Bharatiya Shruti Darshan Kendra, Jaipur

Aatmaprabodh

Kumarkavi · 2010/06

PDF Proofread

Front matter

dent new प्रकाशक- श्रीपन्नालाल बाकलीवाल महामंत्री-भारतीयजैनसिद्धांतप्रकाशिनी संस्था, नं. ९ विश्वकोपलेन, कलकत्ता। श्रीराखालचंद्रमित्र विभकोप प्रेम, नं०९ विभकोपलेन, weawadam are प्रबोध आत्म जिनशास्त्रोंपर जरा भी श्रद्धान नहिं करनेवाले हैं और सुषुप्त हैं-मोहकी गाढ़ निद्रामें गहरी नींद ले रहे हैं उनके लिये हमारा यह परिश्रम नहीं है-इस आत्मप्रबोध ग्रंथकी रचना हम उनके लिये नहिं करते हैं। किंतु जिनकी मोहरूपी निद्रा बहुत जल्दी नष्ट होनेवाली है-शीघ्र ही जो निर्मोही होनेवाले हैं वे ही इस आत्मप्रबोध ग्रंथके अधिकारी हैं-उन्हींकेलिये यह परिश्रम किया जा रहा है ॥६॥ जीवस्वरूपमनुरूपकमस्य चिह्न त्यागोऽथ शश्वदहितस्य हिते प्रवृत्तिः।। योग्यं तयोः फलमिति स्फुटमात्मविद्भिः प्रस्थानपंचकमुदीरितमात्मबोधे ॥७॥ अर्थ--जो पुरुष आत्माके स्वरूपके जानकार हैं उन्होंने आत्माके बोधमें 'जीवका वास्तविक स्वरूप, उसकी पहिचानके चिह्न, अहितका त्याग, हितमें प्रवृत्ति, और हित अहित दोनोंका फल' ये पांच स्थान-कारण बतलाये हैं। भावार्थ- . कर ८ 4 14483 Careeraamaraamaaranam आत्मप्रबोधविरहादविशुद्धबुद्धेरन्यप्रबोधनविधि प्रति कोशूधिकार सामर्थ्यमस्ति तरितुं सरितो न यस्य तस्य प्रतारणपरा परतारणोक्तिः ॥ ४ ॥ कर्तुं यदीच्छसि परप्रतिबोधकार्यमात्मानमुन्नतमते प्रतिबोधय त्वं । चक्षुष्मतैव पुरमध्वनि याति नेतुमंधेन नांध इति युक्तिमती जनोक्तिः ॥५॥ GOOO भारतीक sia-वान केन्द्र जयपुर grandirasdavesvagraava10670687amvalsrataravavailavdarasveerards VOCON प्रबोध इंद्रियां इसे जान ही कैसे सकती हैं ! भावार्थ-स्पर्शको स्पर्शन इंद्रिय, रसको रसना इंद्रिय, गंधको घ्राण इद्रिय, रूपको चक्षु और शब्दको श्रोत्र इंद्रिय, विषय करती है। परंतु इनमें ऐसी एक भी इद्रिय नहीं जो दूसरी इंद्रियके विषयको ग्रहण कर सके इसलिये जब इनमें यह भी सामर्थ्य नहीं कि एक इंद्रिय दूसरी इंद्रियके रूपी विपयको भी ग्रहण करले तब ये आत्माके स्वरूपको तो विषय कर ही नहिं सकती क्योंकि वह स्पर्श आदि पदार्थोंसे सर्वथा रहित अरूपीहै । यहां तक कि स्पर्श आदि पदार्थों के समान भी नहीं । उनसे सर्वथा विलक्षण है इसलिये इद्रियोंसे आत्माके स्वरूपका कदापि ज्ञान नहिं हो सकता ॥ १४ ॥ यत्केवलं विमलमस्खलितप्रकाशं प्रत्यक्षमक्षणिकमक्षगणानपेक्षं। आनंदकंदलितमुक्तिलतैकमूलं तेनात्मतत्त्वमिह सर्वविदो विदंति ॥१५॥ १८

आत्मबोषसे शून्य जनोंको नहिं परबोधनका अधिकार ।
तरणकलासे रहित पुरुषका यथा तरण-शिक्षण निस्सार ।।
जो अभीष्ट परवोधन तुझको तो आत्मन् । हो निज ज्ञानी ।
नेत्रवान अंघको खेता नहिं अंधा यह जगजानी ॥१॥

प्रवोध नहिं जाना जा सकता परंतु जो पुरुष विद्वान हैं वे पहिले आगम और अनुमान प्रमाणसे इसे जान लेते हैं पश्चात् व्यवहित पदार्थोंको भी जनानेवाले 'अहं अहं' इस अनुभव प्रत्यक्षसे उसका निश्चय करलेते हैं । भावार्थ-यदि आत्मामें स्पर्श रस आदि पदार्थ होते तब तो इसका ज्ञान स्पर्शन रसना आदि इंद्रियोंके होजाता। परंतु वैसा तो है नहीं इसलिये इंद्रियोंके तो यह सर्वथा अगोचर है । किंतु जो पुरुप विद्वान हैं-आत्माके स्वरूपके जाननेकेलिये लालायित हैं, वे पहिले तो वीत. रागप्रतिपादित आगमप्रमाणसे उसको जानते हैं पश्चात् अनुमान प्रमाणसे उसका निश्चय करते हैं। जव आगम और अनुमानसे पूर्ण निश्चय हो जाता तब 'अहं अहं' ( मै मैं ) इस स्वानुभव प्रत्यक्षसे उसका पूर्णतया साक्षात्कार भी करलेते हैं ।। २०॥ आत्मानं प्रतिपद्य चेतसि जिनोपज्ञागमज्ञापितं विज्ञायाप्यनुमानमानकलनैस्तनिर्णयं कुर्वतः। साक्षादीक्षितुमेनमानुभविकं प्रत्यक्षमभ्यस्यतः है आवेदन। आत्माके निरंजन निराबाध अनुपम स्वरूपका भलेप्रकार जानना अध्यात्मज्ञान और वन पर्वत आदि बाह्य पदार्थीका ज्ञान बाह्य ज्ञान कहा जाता है । यद्यपि व्यवहारी मनुष्योंको वन पर्वत सुवर्ण रजत आदिका ज्ञान भी आवश्यक है परंतु प्राणिमात्रकेलिये जितना अध्यात्मज्ञान कल्याणकारी और प्रयोजनीय है उतना बाह्यज्ञान नहीं क्योंकि बाह्य ज्ञानसे सदा हमारी आत्मा आकुलतारूप होनेसे अशांत रहती है परंतु जिससमय आत्माका निर्दोष ज्ञान हो जाता है उस समय हृदयमें स्वयं शांति छटकने लगती है और उस समय अध्यात्मज्ञानियोंको यह स्पष्टरूपसे मालूम पड़ जाता है कि जो कुछ शांति और सुख है वह इसी अध्यात्म ज्ञानमें है। यद्यपि आत्मा अमूर्तिक पदार्थ है और मूर्तिक इंद्रियोंके अगोचर है इसलिये सिवाय सर्वज्ञके अन्य कोई भी मनुष्य उसके स्वरूपको स्पष्ट नहिं जान सकता तथापि दयालु पूर्वा- चार्योंने अपने योगबलसे आत्माके कुछ असली स्वरूपका अनुभवकर अन्य मनुष्योंके लिये भी उसके अनुभवका द्वार बतलाया है और यह बात निस्संशय है कि उनके द्वारा बत- लाये गये, मार्गका अनुसरण करनेसे अवश्य आत्माके निर्दोष स्वरूपकी कुछ छटा हृदय- - प्रबोध और संन्यासी हुआ, बहुत बार तूने शिखा और जटा भी रखाई, अनेक वार क- पायवस्त्र और चर्मकंबल भी धारण किये बहुत बार तू नग्न माधु भी हो चुका इसप्रकार प्रायः समस्त पाखंडियोंके तूने वेप धारण करलिये और इन वेपोंको धारणकर अपनी आत्माकी खूब ही विडंबना की । परंतु हाय-बड़े खेद और दुःख की बात है कि कभी तूने अपने आत्मस्वरूपके जाननेकेलिये प्रयत्न न किया। भावार्थ-संसारमें जो लोग दंडी संन्यासी नग्न आदि मुद्राके धारक होते हैं वे आ- रमज्ञान वा आत्मकल्याणके लिये होते हैं परंतु वास्तविक आत्माका स्वरूप न समझ सकनेके कारणसे उनका वेष ढोंगी वेप समझाजाता है और नट जिसप्रकार वाहवाही लूटनेकेलिये और दूसरोंको रिझानेकेलिये राजा आदिका वेप धारण करता है उसीप्रकार उनका ( साधु आदिका) वह वेप भी समझा जाता है । परिणाम यह निकलता है कि वे आत्मज्ञानकेलिये प्रयत्न करते नहीं और व्यर्थ के संन्यासी आदिके वेप धारणकर अपनी आत्माको निराकुलतामय सुखसे वंचित रखते हैं । रे आ- त्मन् ! तूने भी जो कुछ साधु संन्यासी आदिका वेप रक्खा वह आत्माका भले- ment ३० - . पर,अंकित हो जाती है। आजकल हम लोगोंका उपयोग व्यावहारिक बातोंकी ओर वि- शेषरूपसे जानेके कारण अध्यात्मज्ञानकी ओर न भी झुके तथापि इस बातको हम नि- संशय हो कह सकते हैं कि कुछ समय पहिले भारतवर्ष में लोगोंकी अध्यात्मज्ञानमें वि- शेष रुचि थी और व्यवहारी मनुष्य भी अध्यात्म ज्ञानकी चर्चासे अपनेको धन्य समझते थे। पाठक ! आज हम पुनः आपके करकमलोंमें आत्मप्रसोध नामका अनुपम ग्रंथ समपर्ण करनेके लिये प्रस्तुत हुये है इस ग्रंथके निर्माणकर्ता विद्वच्छिरोमणि कविवर श्री कुमार हैं और ये इसीग्रंथके १४९ वें श्लोकमें दिये गये कवि विशेषणसे गृहस्थ जान पडते हैं। यद्यपि यह अंथ बहुत छोटा है क्योंकि इसकी श्लोक संख्या केवल १४९ है परंतु इसकी कविता बडे ऊँचे दर्जेकी और स्फुट है और एक गृहस्थ (जैसा कि हमारा अनुमान है) विद्वानका शुद्ध आत्माके विषयमें इतना उन्नत विचार होना परम प्रशंसनीय है । इस ग्रंथमें ग्रंथकारने जिसको आत्माका भलेप्रकार ज्ञान है वही दूसरेको आत्माका उपदेश दे सकता है । इसके साथ आत्माका स्वरूप, उसका लक्षण, उसके स्वरूपको बतलानेवाले प्रमाण, जीवोंको आत्मामें दृढताका उपदेश, इद्रजाल मंत्र आदि अविद्या- ओंकी निंदा, मन वचन कायको वशकर स्वाध्याय करना, स्वाध्यायकी परम प्रशंसा, प्रधुोध नीलेंदीवरचंदनेंदुतरुणीतारुण्यपद्मादि यत् रूपान्यं रसवच्च वर्णयसि तन्नानाविधैर्वर्णकैः आत्मानं रसरूपवर्जितमिमं यद्यादरादीक्षसे तत्काव्यव्यसनप्रलापचपलां वाचालतां मुंचसि ॥ ३१॥ हे कविगण ! तू बड़ी खूबीके साथ भांति-भांति के वर्णनोंसे नीलकमल, चंदन, चंद्रमा, युवति, युवावस्था और कमल आदिके रूप और रसोंका वर्णन करता है यदि तू रस और रूपसे रहित इस आत्माकी ओर आदरसे दृष्टि लगावे तो यह जो तेरेमें काव्य बनानेका व्यसन पड़ रहा है और काव्योंकी रचनासे जो तेरेमें वावदूकपना है वह सब नष्ट होजाय । भावार्थ-जबतक विद्वान लीगों- को रूप रस आदि जड़ पदार्थों के धर्मोसे सर्वथा रहित, अचिंत्य, अविनाशी, सम्य- रज्ञान आदि गुणोंके भंडार आत्माका वास्तविक ज्ञान नहिं होता-उनकी दृष्टि आत्माके असली स्वरूपकी ओर नहिं झुकती तब तक वे रागके कारण नील ध्यानका माहास्य, ध्यानसे विचलित करनेवाली स्त्रियोंकी निंदा, पुत्र धन धान्य आदि परिग्रहोंसे घृणा, आठ प्रकारके मदोंकी निंदा, उनका कुछ स्वरूप, ध्यानके भेद और उनका स्वरूप, ध्यानके पात्र, ध्यानके पिंडास्पद, पदास्पद, रूपास्पद, और रुपातीत ये चार भेद और इनका भिन्न २ स्वरूप, ॐ शब्दकी व्युत्पत्ति, ॐ मंत्रकी उत्कृष्टता, अर्ह मंत्रका फल, ही मंत्रका फल, परमात्माका स्वरूप, अन्य सिद्धांतकारों द्वारा मानेगये आत्मामें अरुचिपूर्वक जैनसिद्धांतानुसार भात्मस्वरूपका निरूपण आदि बातोंका वर्णन किया है । यद्यपि ग्रंथकारने इन प्रकरणोंको बहुत ही संक्षेपमें वर्णन किया है तथापि उनके वर्णनमें ऐसी खूबी दिखाई है कि ग्रंथको छोडनेके लिये जी नहिं चाहता और कथा- ओंके पढ़ने में जितना आनंद नहीं आता उससे भी अधिक आनंद इसमें मालूम पड़ता है कविवर श्रीकुमार। कविवर श्रीकुमार द्विजवंशावतंस विद्वद्वर गोविंदभट्टके सबसे बड़े पुत्र और प्रसिद्ध कवि हस्तिमल्लके ज्येष्ठ प्राता थे। एवं ये ई० सन् १२९० अर्थात् वि० सं० १३४७ में मौजूद थे। इन्होंने यद्यपि स्वयं अपने गोत्र आदिका परिचय नहीं दिया है इसलिये संदेह होता है कि आत्मप्रबोधके कर्ता ये ही श्रीकुमार है या कोई अन्य तथापि--- . प्रबोध SAS ७६ ध्यानसे कषायोंकी उत्पत्ति और नरक आदिके दुःख भोगने पड़ते हैं ।।६२ ॥ भवाटवीपर्यटनैकहेतू तवार्तरौद्रे यदि हंतुमिच्छा नदैतयोमुच निमित्तभूतं कषायकल्माषितमात्मभावं ॥६३॥ अर्थ- हे.आत्मन् ! आत रौद्र ये दोनों ध्यान संसाररूपी गहन अटवीमें भूमण करानेवाले हैं और इनकी उत्पत्तिमें मुख्य कारण कपायसे मलिन आत्माके वि- भाव परिणाम है यदि तू इन दोनों ध्यानोंका नाश करना चाहता है तो आत्माके अतिशय मलिन कपायरूप परिणामोंका सर्वथा त्याग करदे ॥ ६३ ॥ अहंकारः कारागृहमिह वृतिर्गादममता महामोहो लौहः पदनिगडबंधोतिनिविड: कपायाश्चत्वारो विषमर्परुषा रक्षपुरुषाः कया युक्त्या मुक्तिर्भवति परतंत्रस्य भवतः॥६४ ॥ अर्थ- हे आत्मन् ! तू सर्वथा परतंत्र है-दूसरोंके आधीन पड़ा हुआ है 22 Pravah ७६१ श्रीमज्जिनेंद्रचरणाग्रनखोन्मयूखचंद्रोदयाभिमुखचित्तचकोरकेण । श्रीमत्कुमारकविनात्मविबोधनार्थमात्मप्रबोधइति शास्त्रमिदं व्यधायि ॥१४॥ इस श्लोकके तृतीय चरणमें "श्रीमत्कुमारकविना" इस वाक्यके उल्लेखसे यह स्पष्ट जान पडता है कि ये ही श्रीकुमार आत्मप्रबोध ग्रंथके कर्ता है क्योंकि इन्होंने श्रीकुमार इस नामके रक्षार्थही यहां श्रीमत् पदका उल्लेख किया है। इसके सिवाय "दिगंबर जैन ग्रंथकर्ता और उनके प्रथ" इस बम्बईसे मुद्रित छोटीसी पुस्तकसे भी यही मालूम हुआ है कि हस्तिमल्लके ज्येष्ठ भ्राता श्रीकुमार आत्मप्रबोध ग्रंथके कर्ता है। सामग्रीके अभावसे हम इन कविरत्नका अधिक परिचय नहिं दे सके इसलिये पाठकगण ! क्षमा करे और इनकी सर्वोत्तम कविता देखकर लाभ उठावें । हमै इस ग्रंथकी एक ही प्रति प्राप्त हुई सो भी प्रायः अशुद्ध दशरा मशराके रूपमें थी इसलिये इसके अनुवादमें हमारी विशेष त्रुटियां भी रहगई होंगी उनकेलिये पाठकोंसे प्राथर्ना है कि वे हमै उनसे सूचित करै जिससे कि दूसरे संस्करणमें वे निकाल दी जाय । वशंवद गजाघरलाल जैन ।

. प्रबोध ८२ राग करना उचित होवा, सो तो है नहीं, वे उपटन काजल पान आदि पदा- थोंसे अपना सौंदर्य वनाती हैं क्योंकि यदि उनमें स्वाभाविक सौंदर्य होता तो काजल पान आदि पदार्थोंका अवलंबन वे क्यों करतीं ? परंतु यह जीव इतनारा- गांध है कि सब कुछ जानकर भी पागल होजाता है और स्त्रियोंसे अपनीलालसा नहिं हटाता ॥ ६९॥ रूपं संध्याभूरूपं लवणिमविभवोंऽभोधिकल्लोललोल: शैलोत्संगापगेव स्वयमसकृदधःपातिनी यौवनश्री: सौभाग्यश्रीः समीराहतकुसुमरजोराजिवद्भगुरोति व्यालोलालंबनत्वादरतिरिव रतिर्मुच्यतां चंचलैषा ॥६९॥ अर्थ-स्त्रीका रूप तो संध्याकालके बद्दलोंके समान चंचल है । लावण्य, समु- द्रकी तरंगों के समान देखते २ नाश होनेवाला है। यौवनकी शोभा, पर्वतकीन- दीके समान प्रतिसमय नीचे गिरनेवाली है। और सौभाग्य पवनसे प्रेरित पुष्पकी ८२,

No text on this page.

wwwmamta R रौद्रार्तमशुंभं त्यक्त्वा शुभं धर्म्यमधिष्ठिताः तदिशुद्धाश्च निर्वाति शुक्लध्यानेन योगिनः॥७८ ॥ अर्थ-जो योगी अशुभध्यान आर्त और रौद्रका सर्वधा नाशकर घHध्याका अव- लंबन करते हैं और धर्म्यध्यानसे विशुद्ध हो शुक्लध्यानका आचरण करते हैं वे निर्वाण घाममें जाकर विराजमान हो जाते हैं-निराकुलतामय सुराका भोग कर- ते हैं ॥ ७८ ॥ आर्तरौद्रोभिते ध्याने ध्यातारनिविधा मताः आरंभकाश्च तनिष्ठाः केऽपि निष्पन्नयोगिन ॥७९॥ अर्थ-आते और रौद्रको छोड़कर धH शुक्ल दो उत्तम ध्यान हैं और आ- रंमक तनिष्ट और निष्पन्न भेदसे तीन प्रकारके ध्याता ध्यान करनेवाले हैं।॥ ७९ ॥ सम्यग्नैसगिकी वा विरतिपरिणति प्राप्य सांसर्गिका वा काप्येकांते निविधाः कपिचपलचल-मानसस्तंभनाय -

SSEREDEEEEEEEEEEEEEEE
9299332222222222222222
खस्ति औ१० ०५ वीरसेन खामी
महारक
सस्थान-कारजा।

प्रबोध १८ स्थितौ पाईं यस्मिन् रुविरथमथारोहतु मुनिः। अतिक्रामत्वेवं गुरुगहनसंसारसरणिं क्रमादुद्भूतांतर्लयमविलयं यातु निलयं ।। ८३॥ अर्थ-इस तनिष्ठ योगीक ध्यान और अध्ययन दोनो अश्वके समान है, पूर्ण रूपसे शिक्षित हैं, सुख प्रदान करनेवाले हैं और श्रद्धास्पीरथ आम पारा राडे हुये हैं-रथमें जुते हुये हैं। यदि यह योगी इस बमें बैठे तो महागहन संम्पररूपी मार्ग- को तय कर और आत्मामें लीन होकर निराकुलतामय अविलय निलय अविना- शीक स्थान मोसमें जा विराजे । मावार्थ-जियप्रकार समान शक्तिवाले गिक्षित और मनोहर अश्वोंसे युक्त स्थमें बैठनेवाला मनुष्य कठिनसे कठिन मी मागको तयकर यथास्थान पहुंच जाता है उसीप्रकार यदि तनिष्ठयोगीके प्रबल ध्यान और अध्ययनके साथ आत्मस्वरूपके प्राप्त करनेकी अभिलाषा वा गति होगई है तोवह आत्मस्वरूपमें लीन होकर और संसारका नागकर मोक्षम जानिराकुलतामय . ORE चुन्नीलालजैनग्रंथमाला । आत्मप्रबोधः। आत्मानमात्मनि निरंजनमात्मनैव पश्यन् ददर्श निखिलान्यपि यो जगंति । पुंसामतींद्रियदृशामपि दूरदृश्यं तं विश्वदर्शिनमनश्वरमानतोऽस्मि ॥१॥ अर्थ-जो परमात्मा अपनी निष्कलंक आत्माको अपनेसे ही अपनेमें देखकर प्रबोध २८ आनेवाले ज्ञानावरण आदि आठो काँके उदयसे जो २ फल उत्पन्न होते हैं वैप्र- तिफलित रहते हैं-सदा कर्मोंके फलोंका ध्यान होता रहता है उन योगियोंके प- रम पवित्र विपाक नामका ध→ध्यान होता है । भावार्थ ज्ञानावरण दर्शनावरण वेदनीय मोहनीय आयुः नाम गोत्र और अंतराय ये आठ कर्म हैं । ये अपने अ- पने समयसे उदयमें आते रहते हैं और इनके फल भी जुदे २ होते हैं। जो यो- गी अपने चित्तमें इन कर्मोंके फलको चितवन करता रहता है उसके विपाक विचय नामका धर्म्यध्यान होता है॥ ९२ ।। त्रिचत्वारिंशद्भिस्त्रिशतमधिकं यस्य घनतः प्रमाणं रज्जूनां त्रिपवनपुटैयों वलपितः। कटीहस्तोर्चस्थप्रसृतपदपुंसाकृतिरसौ स्थिरश्चित्यो लोकः सततमिति संस्थानविचयः॥९॥ अर्थ-यह लोक तीनसौ तेतालीस राजू घनाकार है । सदा इसको धनवात १०८ - आत्म प्रबोध समस्त जगतको स्पष्टरूपसे देखता है और जिसके स्वरूपको हमारी तोक्या बात, अतींद्रिय ज्ञानरूपी दृष्टिके धारक भी योगी नहीं देख सकते उस विश्व- दर्शी-सर्वदृष्टा, अनश्वर-अविनाशी परमात्माके लिये नमस्कार है। भावार्थ- जैनसिद्धांतमें गुण गुणीका सर्वथा भेद नहिं माना गया है । निश्चयनयसे वे एक ही हैं इसलिये जितने आत्माके केवलदर्शन केवलज्ञान आदि गुण हैं उनसे आत्मा कोई जुदा पदार्थ नहिं है और इसीलिये यदि वह (आत्मा) केवलदर्शन वा केवल- ज्ञानसे स्वयंको तथा परपदार्थोंको देखता जानता है तो अपनेसे ही देखता जानता है ऐसा कहा जाता है। इसी आशयको हृदयमें रखकर ग्रंथकारने "जो अपनेसे ही अपनेमें अपने शुद्धस्वरूप और परद्रव्योंको देखने जाननेवाला है जिसके स्वरूपको दिव्यज्ञानी भी कठिनतासे देख सकते हैं ऐसे सर्वदर्शी अविनाशी परमात्माके लिये नमस्कार है" यह परमात्माकी स्तुति की है ॥१॥ आत्मप्रबोधमधिगम्य परप्रबोधं ये संविधाय विदधुः स्वपरार्थसिद्धिं ।

प्रयोध का धारण करना वा उसे छोड़ वाग्योगका धारण करना योग संक्रांति है जिसमें ये तीनों संक्रांति और वितर्क हो उसै पृथक्त्ववितर्क-वीचार नामका शुक्ल- ११२, ध्यान कहते है।जिसमें अर्थ आदिकी संक्रांति तो न हो किंतु वितर्क अवश्य हो उसका नाम एकत्ववितक नामका दूसरा शुक्लध्यान है । जहांपर शरीरकी क्रियाओंकी सूक्ष्मता हो वह तीसरा सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाती है और जहाँपर उसका भी अभाव होजाय वह व्युपरतक्रियानिवृत्ति नामका चौथा शुक्लध्यान है। इनमें पृथक्त्ववितर्क नामका प्रथम शुक्लध्यान मन वचन काय तीनों योग धारण करनेवाले सकल श्रुतधारीके होता है। दूसरा एकत्ववितर्क नामका शुक्लध्यान तीनोंमेंसे किसी एक योगवाले श्रुतज्ञानीके होता है। तीसरा सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाती नामका शुक्लध्यान काय योगवाले केचलीके और चौथा व्युपरतक्रियानिवृत्ति नामका शुक्लध्यान अयोगकेवली चौदवे गुणस्थानवालेके होता है ॥९५-९६ ॥ मिथ्यासासादनमिश्रस्थानकस्थायिनो जनाः। आर्तरौद्राशुभध्यानसंधानस्याधिकारिणः ॥ ९७॥ ---- १ प्र व्यामोहविभूमभरच्छिदुरा गुरुभ्य- स्तेभ्यो मम प्रणतिरस्तु परापरेभ्यः ॥२॥ अर्थ-जिन गुरुओंने अपनी आत्माका यथार्थ स्वरूप जानकर दूसरे मनु- प्योंको भी उसके स्वरूपका प्रतिबोध दिया, अपने पराये प्रयोजन सिद्ध किये और जो मूढ़ता भ्रांतिके सर्वथा नष्ट करनेवाले हुये उन परापर गुरुओंकेलिये भी हमारा सविनय नमस्कार है । भावार्थ-जो गुरु अपनी आत्माका स्वरूप न समझकर दूस- रोको उसके समझानेकी चेष्टा करते हैं उन गुरुओंके नमस्कारकी यहां कोई आ- वश्यकता नहीं है किंतु जो अपने स्वरूपको भलीभांति समझकर पीछे उसे दूसरों- को समझानेकी चेष्टा करते हैं और उसमें सफल होमूढ़ता एवं भ्रांतिको सर्वथा नष्ट करनेवाले होते हैं उन गुरुओंको भक्तिभावसे नमस्कार है ॥ २ ॥ नास्ति श्रुते परिणतिः प्रतिभा न ताहर वक्तृत्वभंगिरपि न प्रतिपादिका मे। ल प्रबोध आत्म १२० . अर्थ-आचारके धारण करनेवालोंमें अतिशय उत्तम, ज्ञान और ऐश्वर्यसे मंडित, संघके स्वामी आचार्यों का परिचायक अक्षर आकार है अर्थात् आकारसे आचार्यों का बोध होता है ॥ ११० ॥ उपदेष्टार उत्कृष्टा उदात्ता उन्नतिप्रदाः । उपाधिरहिता ध्येया उपाध्याया उकारतः॥ १११ ॥ अर्थ-समीचीन उपदेश देनेवाले, उत्कृष्ट, अतिशय तेजस्वी, उन्नति प्रदान करनेवाले और वाह्य अभ्यंतर दोनाप्रकारकी उपाधियोंसे रहित उपध्याय कहे जाते हैं और उनका उकारसे चितवन करना चाहिये अर्थत् उपाध्यायका वाचक उकार अक्षर है ॥१ ॥ १११ ॥ साधारणा रिपौ मित्रे साधकाः स्वपरार्थयोः। साधुवादास्पदीभूताः साकारे साधकाः स्मृताः॥ ११२॥ अर्थजो महात्मा मित्र, और शत्रुओंमें समान हैं अर्थात् मित्रोंमें तो राग १२० प्रबोध शक्तिर्न बोधयितुमन्यजनं किमन्य- दात्मप्रवोधमधुना प्रथमं करोमि ॥३॥ अर्थ---में (अंधकार न विगणल्पने शारोका ताता हूँ। न मेरी चम- कारिली पारि। मग बोलनकी शैली भी ऐसी उत्तम नहीं है जो मैं भलेनकार पदाचा राम्प वर्णन करना और दूसरे मनुष्यको में प्रबोध दूं ऐसी मुझमें भनि भी नहीं है। वम और अधिक स्या कहूं, पहिले ही पहिले मैं इस आत्म- प्रयोष अंधी हीरगना कर रहाई ॥३॥ आत्मप्रबोधविरहादविशुद्धबुद्ध- रन्यप्रवाधन विधि प्रति कोधिकारः। सामर्थ्यमस्ति नरितुं सरितो न यस्य तस्य प्रतारणपरा परतारणोक्तिः ॥४॥ ४ प्रबोध ३ बनता है इसलिये यह ओंकार भी मतिज्ञान आदि पांचो ज्ञानस्वरूप है ॥११७॥ अकारोयं साक्षादमृतमयमूर्तिः सुखयति स्फुरद्रेको रत्नत्रयमविकलं स कलयति । समोहं हंकारो दुरितनिवहं हंति सहसा स्मरेदेवं वीजाक्षरमभिन्नाक्षरपदं ॥ ११८ ॥ अर्थ-यहांपर 'अहं' इस वीजाक्षर मंत्रके प्रत्येक अक्षरका इसप्रकार फल ब- तलाया है-अई इस वीजाक्षरमंत्रमें जो अकार है वह साक्षात् अमृतमय-निराकुल- तामयसुखकी मूर्ति है और जो इसमंत्रको सिद्ध करते हैं उन्हें सुख प्राप्त होता है रेफ, सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र स्वरूप है और 'ह' यह शब्द सम- स्त पाप और मोहको मूलसे नष्ट करनेवाला है तथा अर, ह इन अक्षरोंको आपसमें मिलाकर अर्थात् 'अहं'ऐसा एकसाथ उचारणकर इसका स्मरण करना कल्याणकारी है। भावार्थ-जिसमकार सम्यदर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र सर्वोत्कृष्ट पदार्थ १२६ प्रवोध आत्म अर्थ-नदीको तैरकर पार करनेकी सामर्थ्य न रखनेवाला मनुष्य, यदि दूसरोंको तैरनेका उपदेश(शिक्षण)दे तो जैसा उसका वह उपदेश वंचक उपदेश समझा जाता है कोई मनुष्य उसके उपदेशपर विश्वास नहिं करता उसीप्रकार जिसकी आत्मा स्वयं प्रबुद्ध नहीं है और बुद्धि भी परद्रव्यके संपर्कसे मलिन है वह मनुष्य यदि दूसरोंको प्रबोध दे-मोक्षका मार्ग बतलावे तो उसका उसप्रकारका प्रबोध देना भी विश्वासके योग्य नहीं है-अप्रबुद्ध पुरुष दूसरोंको प्रबोध देनेका अधिकार रख सकता । भावार्थ-जिसप्रकार तरनेके स्वरूपको जाननेवाले मनुष्यका तरनेका उपदेश प्रमाणीक माना जाता है और वह उपदेश फलपद भी होता है किंतु जिसने कभी तरना नहिं सीखा, तरनेकी तो क्या बात, उसै आखोंसे देखा तक भी नहीं, उसका उपदेश प्रमाणीक नहिं गिनाजाता और न उससे कुछ फल ही निकलता है उसीप्रकार अच्छीतरह आत्माके स्वरूपको जाननेवाले और नि- मल बुद्धिके धारक मनुष्यका आत्माके स्वरूपका उपदेश विश्वासके योग्य होता है परंतु जो जरा भी आत्माका स्वरूप नहिं जानता बुद्धि भी जिसकी मलिन है Uname ५ I त्म प्रयोध ३० अंधकारका नाश होता है उसीप्रकार इसमंत्रमें भी रेफका स्फुरण है और उसका फल अंधकारका नाश है । जिसप्रकार आकाशमें चंद्रमाकी लेखा उदित होती है उसीप्रकार इस मंत्रमें भी विंदुसहित चंद्रलेखा विद्यमान है । आकाश जिसमकार अकलित अपरमित सीमाका धारक है उसीप्रकार इस मंत्रराजकी आदि अंतकी सीमा भी अ-कलित-अ से सहित है इसलिये जो महानुभाव ऐसे अनुपम मत्रका आराधन करते हैं वे धन्य हैं और उन्हें मोक्षकी प्राप्ति होती है।। १२० ॥ रागांगवर्जितरसंगतया स्फुरत्या ज्योतिःशिखोज्ज्वललसत्कलया सनाथः। शब्दोऽनहंकृतिरहं यदि चिंत्यते चे- सर्वज्ञनाथपदसिद्धिकरस्तदा स्यात् ।। १२१ ॥ अर्थ-रागके कारणोंको नष्ट करनेवाले रेफसे युक्त, स्फुरायमान और अखंड ज्योतिकी धारक अर्धचंद्रकलासे शोमित, अहंकारको नाश करनेवाले, आत्म प्रयोध ६ उसके उपदेशपर कोई मनुष्य विश्वास नहिं करता-वह मनुष्य विद्वानोंकी दृष्टिमें वंचक ढोंगी समझा जाता है इसलिये जो मनुष्य आत्माके स्वरूपका ज्ञान दूसरों को कराना चाहते हैं उन्हें पहिले स्वयं उसका ज्ञान करना चाहिये ॥४॥ कर्तुं यदीच्छसि परप्रतिबोधकार्य- मात्मानमुन्नतमते ! प्रतिवोधय त्वं । चक्षुष्मतैव पुरमध्वनि याति नेतु- मंधेन नांध इति युक्तिमती जनोक्तिः ॥५॥ अर्थ- हे उच्चबुद्धिके धारक आत्मन् ! यदि तू दूसरे मनुष्योंको प्रतिबोध देना चाहता है- अन्य मनुष्य आत्माका भलेप्रकार स्वरूप समझ जावें यदि तेरी यह इच्छा है, तो तू पहिले अपनी आत्माको प्रतिबुद्ध बना-उसे आत्मस्वरूपका जानकार कर । क्योंकि लोग ऐसा कहते हैं और उनका यह कहना सर्वथा युक्तियुक्त भी है कि सूझता मनुष्य ही अंधको सुरक्षित रूपसे मार्गमें ले जासक- करता है तथा जिसका अकारादिस्वर, ककारादि वर्ग और कमल आदि परिकर ऐसे अनुपम वीजाक्षर ही मंत्रका विद्वानोंको सदाआराधन करना चाहिये भावार्थ- जिससमय ही इस मंत्रको किसी कपड़े आदिपर कमलके आकारमें काढा जाता है तो उससमय कमलके आठदलोंमें अकारादिस्वर और कवर्ग चवर्गआदि वर्ग लिखे जाते हैं इललिये जिसमंत्रका स्वर वर्ग और पद्म आदि परिकर है तथा जो ऊर्च और निम्न रेफोंसे सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान, कलासे सम्यक्चारित्रको और शून्यसे परमात्मा सिद्ध परमेष्ठीको धारण करता है विद्वानोंको चाहिये कि ऐसे अनुपम बीजाक्षर मंत्रका वे अवश्य आराधन कर अर्थात् ही इस बीजाक्षर मंत्रके आराधनसे सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्र और निर्दोष सिद्ध परमात्मा पदकी प्राप्ति होती है । .१२२ ॥ अध्वेव सिद्धिनगरस्य नमः पुरोग- नीरागपंचपरमेष्ठिपदप्रयोगः। १३२ बोध आत्म ७ ता है अंधा अंधेको नहीं । भावार्थ-जिसप्रकार नेत्रवाले पुरुषको मार्ग अच्छी तरह सूझता है इसलिये वह अंधेको ठीक ठिकानेप हुंचा देता है परंतु अंधा अंधे- को नहीं। क्योंकि, उसै जरा भी मार्ग नहीं सूझता । उसीप्रकार हे आत्मन् ! यदि तू भलेप्रकार आत्माके स्वरूपका जानकार होगा तो दूसरेको उसका ज्ञाता बना सकेगा, अज्ञानी होनेपर नहीं । इसलिये पहिले तू आत्मस्वरूपका जानकार बन, पीछे दूसरोंको उसके ज्ञाता बनानेका प्रयत्न कर । अन्यथा तू डूबेगा सो तो डूबेगा ही, अन्य भी मनुष्योंको और डुबा बैठेगा ।। ५॥ मिथ्यात्वमूढमनसः सततं सुषुप्ता ये जंतवो जगति तान्प्रति न श्रमोनः। येषां मियासुरचिरादिव मोहनिद्रा ते योग्यतां दधति निश्चितमात्मबोधे ॥६॥ अर्थ--ग्रंथकार कहते हैं कि जो जीव मिथ्यात्वसे मूढ़ हैं-जिनवचन और प्रयोग आत्म १५० और आत्मासे आत्माके स्वरूपका लाभ करना दोनों वाते एक हैं ॥ १४१ ॥ सद्दृष्टिज्ञानवृत्तं शिवपदपदवी ज्ञानमंतः प्रविष्टं दृष्टौ दृष्टिश्चरित्रे तदमलमचलं शुद्धचैतन्यमेव । नैषा भिन्नति रत्नत्रितयपरिणतिस्तत्त्वतो भाति यस्मा-- तन्नित्यं निर्विकल्पे कलयति परमात्मानमात्मन्यभिन्न१४२ अर्थ-सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यश्चारित्र ये तीनों रत्नत्रय - मोक्षके मार्ग हैं उनमें ज्ञान तो अंतरंगमें प्रविष्ट है, श्रद्धानमें सम्यग्दर्शन और चारित्रमें अवि- चल निर्मल शुद्ध चैतन्य विद्यमान है इसलिये जिसके सम्यग्दर्शन आदि तीनों रन निश्चयनयसे अभिन्न हैं-भिन्न नहिं जानपड़ते उस अविनाशी परमात्माका योगी अपने निर्विकल्प आत्मासे निश्चय करता है। भावार्थ-विना सम्यग्दर्शन सम्य- रज्ञान और सम्यक्चारित्र प्राप्त हुये मोक्ष नहिं मिल सकती इसलिये सम्यग्दर्शन आदि मोक्षके मार्ग हैं और ये चैतन्यस्वरूप परमात्माके स्वरूपसे अभिन्न हैं GURU १५० .

प्रबोध . आत्मा जबतक आत्माका वास्तविक स्वरूप क्या है यह वात न जानली जायगी, उसके जाननेके चिद न पहिचानलिये जायगे, अहितका त्याग, हितमें प्रवृत्ति और उन दोनोंका फलज्ञान न होगा तबतक कभी भी आत्माकाबोध नहिं होसकता इसलिये जो मनुष्य अपनी आत्माको प्रबुद्ध बनाना चाहते हैं उन्हें चाहिये कि वे इन पांच वातोंपर अवश्य ध्यान दें ॥ ७ ॥ निर्वाणवादिभिरपि प्रतिपत्तिपूर्व- मस्तित्वमात्मविषये प्रतिपन्नमास्ते। नास्तीति नास्तिकतया यदि केचिदाहुः किं मे मुमुक्षुमुनिवृंदवहिःकृतस्तैः ॥ ८॥ अर्थ-जो पुरुष निर्वाणवादी हैं-मोक्ष कोई पदार्थ है इस बातको पूर्णरूपसे माननेवाले हैं वे युक्तिपूर्वक आत्माका अस्तित्व अवश्य स्वीकार करते हैं । परंतु ना- स्तिकलोग, स्वर्ग मोक्ष आदि पदार्थोंको न मानकर आत्माका अस्तित्व नहिं मानते। T न I आत्म प्रवाध १० खैर ! मत मानो। उनके न माननेसे कोई हानि नहिं आसकती क्योंकि, वे मोक्षा- भिलाषी मुनिगणसे भिन्न हैं- वे विचारे 'आत्मा निराकुलतामय सुखका कैसे अनु- भव करता है ?' इस बातको ही नहिं जानते । भावार्थ-जितने नैयायिक वैशे- षिक वेदांती आदि हैं वे सब इस बातको स्वीकार करते हैं कि जड़ पदार्थोंसे भिन्न आत्मा कोई पदार्थ है और वे उसका मोक्ष स्वर्ग जाना भी मानते हैं । किंतु एक नास्तिक ऐसा है जो कि आत्माको मिन्न पदार्थ नहिं मानता, पृथ्वी जल आदि पंचभूतोंसे उत्पन्न शक्तिविशेषको ही आत्मा कहता है और स्वर्ग मोक्ष आदि पदार्थोंको भी वह स्वीकार नहिं करता। किंतु इस लोकमें मेवा मिष्टीन्न उत्तम स्त्री पुत्र आदि पदार्थोंकी प्राप्तिको ही स्वर्ग मोक्ष कहता है। परंतु उसके न स्वीकार करनेसे कोई हानि नहीं। क्योंकि वह अज्ञानी है वह यही नहिं जानता कि मेरी आत्माका कल्याण किस रीतिसे होसकता है ॥ ८॥ नित्यो निरत्ययगुणः परिणामधाम बुद्धो बुधैगवबोधमयोपयोगः। " १० १ A प्रबोध आत्म ११ . आत्मा वपुःप्रमितिरात्मपरप्रमाता कर्ता स्वतोऽनुभविताऽयमनंतसौख्यः॥९॥ अर्थ-यह आत्मा नित्य है । अविनाशी गुणोंका भंडार है । परिणमनशील है। विद्वान लोगों द्वारा जाना और अनुभव किया जाता है, ज्ञानदर्शनवरूप उप- योगमय है, शरीरप्रमाण है, स्व परका ज्ञाता है, कर्ता है, कर्मके फलका भोक्ता है और अनंत सुखका भंडार है । भावार्थ-द्रव्यार्थिकनयकी अपेक्षा कभी आत्मा- का नाश नहिं हो सकता इसलिये यह नित्य अविनाशी है। सम्यग्ज्ञान आदि गुण इसके कभी नष्ट नहिं होते इसलिये यह नित्य गुणोंका भंडार है । पर्यायार्थिकनयसे सदा इसका परिणमन हुआ करता है । सर्वज्ञ अपने आनंद और ज्ञानसे, विद्वान मनुष्य अपने स्वानुभव प्रत्यक्षसे इसका साक्षात्कार करते हैं। यह भलेप्रकार पदा- थाको जानता देखता है इसलिये ज्ञानदर्शनस्वरूप उपयोगमय है। पर्यायार्थिंकन- यसे इसकी सर्वदा पर्यायें पलटा करती है-इसलिये यह जितना छोटा बड़ा शरीर पाता है उसीके प्रमाण है । स्व और परको जानता है इसलिये स्वपरका ज्ञाता, स्वयं ११ -- आत्म प्रबोध १२ . काँका उपार्जन करता है इसलिये कौका कर्ता, स्वयं कोंके फलका भोगनेवाला होनेसे भोक्ता और निराकुलतामय अनंत सुखोंका भंडार है ॥९॥ नायं जडोनमलिनःक्षणिको न शून्यो नात्मज्ञ एव नियमान्न परज्ञ एव । अस्य खरूपमथ तत्त्वविधैर्विमर्थात् प्रागुक्तयुक्तिघटितां घटनामुपैति ।। १०॥ अर्थ-आत्माके स्वरूपकी भलेप्रकार परीक्षा करनेसे इसवातका पक्का निश्चय होगया है कि न यह आत्मा जड़ है। न मलिन है, न क्षणिक और शून्य है । तथा केवल अपना ही जाननेवाला वा प्रहीका जाननेवाला है ऐसा भी नहीं है। किंतु पहिले जो अविनाशी गुणोंका भंडार आदि बतला आये हैं वैसा ही है भावार्थ-एक दर्शनकार मानता है कि यह आत्मा पृथ्वी आदि जड़ पदार्थोके संसर्गसे उत्पन्न हुआ है इसलिये जड़ है। कोई कहता है यह कर्ममलसे सदा ढका १२ प्रबोध - '१३ रहता है इसे ऐसा कभी अवसर नहिं मिलसकता जब कि यह कर्मोंसे रहित होजाय इसलिये यह सदा मलिन है । बौद्ध मानता है कि सब पदार्थ प्रतिक्षण नष्ट होते रहते हैं आत्मा भी पदार्थ होनेसे प्रतिक्षण विनाशीक है इसलिये क्षणिक है। शुन्य वादी कहता है कि संसारमें कोई पदार्थ विद्यमान नहीं इसलिये उसके मतसे आत्मा कोई पदार्थ नहीं । कोई कहता है कि आत्मा अपने ही को जानता है और कोई कहता है कि परपदार्थोंको ही जानता है। परंतु ये सब वातें प्रमाणकाधित हैं। तर्क बलसे जड़ आदि स्वरूप आत्मा कमी सिद्ध नहि होसकता ॥१०॥ आस्ते खभावविशदोऽपि कलंकितोऽय- मंतर्निलीनधनकार्मणकालिकाभिः। जीवः सुवर्णवदुदग्रतपोऽग्नितप्तः -स्वं ज्योतिरप्रतिहतप्रसरं तनोति ॥११॥ अर्थ-यह आत्मा सुवर्णके मानिंद है। क्योंकि, सुवर्ण जिसप्रकार स्वभावसे , 4 - १३ प्रबोध १४ स्वच्छ रहनेपर भी कीटक आदिके संबंधसे मलिन होजाता है और जिससमय अग्निसे तपाया जाता है उससमय ज्योंका त्यों शुद्ध हो दमक निकलता है जिससे कि चारो ओर उसकी दीति छटकने लगती है उसीप्रकार यदि शुद्धनिश्चयनयसे देखा जाय तो यह आत्मा शुद्ध निष्कलंक है और कर्मोंके घनिष्ट संपर्कसे यह मलिन हो रहा है परंतु जिससमय यह तपरूपी अग्निसे कर्मोंको भस्म करदेता है उस- समय यह ज्योंका त्यों होजाता है, चारो ओर इसका अप्रतिहतरूपसे प्रकाश फैल जाता है अर्थात् अपने केवलज्ञान और केवलदर्शनकी सहायतासे यह संसा- रके छोटे बड़े सब पदार्थोंको जान देख लेता है ॥ ११ ॥ मूढैरनादिधनसंघटनप्ररूढ़ो भिन्नोऽप्यभिन्न इति कर्ममलोऽभ्यधायि । भिन्नो न चेत्कथमिवामलकेवलार्चि- रस्याभ्युदेति हतकार्मणसंचयस्य ॥१२॥ १४ प्रबोध १५ अर्थ-विषय आदि कार्योंके सेवन करनेसे वृद्धिको प्राप्त यह कर्ममल अनादि- कालसे जीवोंके साथ संबद्ध हो रहा है और आत्मासे सर्वथा जुदा है। परंतु जो पुरुष, मोहदे जालमें फसे हुये मूढ़ हैं वे उसै अभिन्न मानते हैं-उनकी दृष्टिमें आत्मा और कर्म एक है, किंतु वह उनकी बड़ी भारी भूल है । क्योंकि, यदि कर्म भिन्न नहिं होता तो जिससमय यह जीव समस्त कमोंको नष्ट करदेता है उससमय इसके अतिशय देदीप्यमान केवलज्ञानरूपी विभूति छटकती हुई दृष्टि गोचर न होती । भावार्थ-यदि वास्तविक दृष्टि से देखा जाय तो यह आत्मा- शुद्ध निष्कलंक है । परंतु काँकेद्वारा गादरूपसे आच्छन्न होनेके कारण इसके केवलज्ञान आदि स्वरूपका विकास नहिं होता किंतु जिससमय तप आदिके बलसे इसके कर्म नष्ट होजाते हैं उससमय इसका स्वरूप प्रकट होजाता है और इस संसारके समस्त पदार्थोंके जा- नने देखनेमें किसीप्रकारका कष्ट नहिं उठाना पड़ता । यदि कर्म और आत्माको अनादिकालसे आपसमें एकमएक जानकर सर्वथा एक मान लिया जायगा तो इससे कर्म कमी जुदे न होंगे । इसका केवलज्ञान आदि स्वरूप भी विकसित न 7 १५ प्रबोधा आत्म होगा और कर्मोंसे सदा मलिन रहनेके कारण यह निराकुलतामय सुखका भी अ- नुभव न कर सकेगा इसलिये मानना पड़ेगा कि कर्म और आत्मा कभी भी एक नहिं होसकते ॥ १२॥ देही यथा निगदितो नियमात्तथेति पक्षो न मूढगमकैः प्रतिबाधितोऽयं । त्रेधा प्रमाणमिह साधकमस्ति यस्मात् प्रत्यक्षमाप्तवचनं च तथानुमानं ॥ १३ ॥ अर्थ--जैसा हमने पहिले संसारी आत्माका स्वरूप प्रतिपादन किया है वह वैसाही है हमारा वह पक्ष किसीभी प्रतिवादीके अभिमत प्रमाणसे बाधित नहिं हो सकता। क्योंकि, उसको सिद्धकरनेवाले प्रत्यक्ष आगम और अनुमान ये तीन प्रमाण मोजूद हैं । भावार्थ-आत्मा नित्य अविनाशी गुणोंका भंडार और ज्ञान आदि स्वरूप है यह बात सकलप्रत्यक्ष केवलज्ञानसे सर्वथा निश्चित है। आगमप्रमाण १६ प्र प्रबोध १७ भी इसी बातको प्रतिपादन करता है और अनुमानसे भी यह बात सिद्ध होती है इसलिये आत्माका नित्यत्व, उपयोगमयत्व आदि स्वरूप जो हमने बतलाया है वह निर्दोष और अबाधित है ॥ १३ ॥ प्रत्यक्षमक्षजनितं न जनस्व साक्षा- लक्ष्यीकरोति तमलक्ष्यमतींद्रियत्वात् । स्पर्शाधशेषविपयव्यतिरिक्तरूपं संविद्रते विसदृशं कथमिंद्रियाणि ॥१४॥ अर्थ---यह नित्यत्व आदि आत्माका स्वरूप, अतींद्रिय है-इंद्रियां इसे विषय नहिं करसकती इसलिये यह इंद्रियजन्य प्रत्यक्षज्ञानसे नहि जाना जा सकता । ठीक भी है क्योंकि जिस पदार्थमें स्पर्श रस गंध आदि गुण हों उसीको इंद्रियां जान सकती हैं अन्यको नहीं और यह आत्मस्वरूप स्पर्श आदि पदार्थोंसे सर्वथा भिन्न है तथा स्पर्श आदि पदार्थों के समान न होकर उनसे सर्वथा विलक्षण है फिर विचारी APANursure marriorrner १७ प्रबोध आत्म १९ अर्थ-जो समस्तपदार्थोके जानकार-सर्वज्ञ हैं वे अतिशय निर्मल, जिसका प्रतिरोध ही नहि हो सकता ऐसे अनुपम प्रकाशके धारक, प्रत्यक्ष-एकमात्र आत्माकी सहायतासे विकसित, अविनाशी, पदार्थोंके जाननेमें इंद्रियोंकी सहायता न चाह- नेवाले, आनंददायक मुक्तिरूपी लताके मूल कारण अपने केवलज्ञानसे इस आ- रमाके स्वरूपको स्पष्टरूपसे जानते हैं । भावार्थ-पहिले कह आये हैं कि आत्माके स्वरूपका ज्ञान प्रत्यक्ष आगम और अनुमान प्रमाणसे होता है। सो वह सकलप्रत्यक्ष ज्ञान केवलज्ञान ही है। क्योंकि यह अतिशय निर्मल है, अनुपम प्रकाशका धारक, अविनशी, पदार्थोके ज्ञान करनेमें इंद्रिय आदिकी अपेक्षा न करने वाला और आनंद- मय सुखका परम कारण है अन्य कोई भी ज्ञान ऐसा नहीं । इसलिये जो मनुष्य केवलज्ञानी हैं वे आत्माके स्वरूपको स्पष्टरूपसे जानते हैं उनको ही इसका पूर्णरूप- से साक्षात्कार होता है ।। १५ ।। आत्मा जिनैरनुभवप्रतिपन्नपूर्वो भव्येषु दिव्यवचसा प्रतिपादितश्च । १ ९ ।

आत्म प्रवीध तत्त्वोपलंभनविधावकृतप्रलंभ तथ्यं सुपथ्यमिति जैनवचःप्रमाणं ॥१६॥ अर्थ-भगवान जिनेंद्रने प्रथम तो अपने अनुभवसे-केवलज्ञानसे आत्माको जाना पश्चात् अपनी दिव्यध्वनिसे-दिव्यवचनोंसे कल्याणके इच्छुक उत्तम जीवोंके सामने उसका वास्तविक स्वरूप बतलाया । यहां पर यह शंका न करनी चाहिये कि भगवान जिनेंद्रके वचनोंपर एसा गाढ श्रद्धान क्यों ? क्योंकि, उनके वचन वस्तुके स्वरूप वर्णन करनेमें वंचना करनेवाले नहीं होते-वस्तुका जैसा स्वरूप होता है उसको वे उसी रीतिसे वर्णन करते हैं और तथ्य-पूर्वापर विरोधरहित सुपथ्य हित- कर होते हैं इसलिये वे प्रमाण हैं। भावार्थ-भगवान जिनेंद्र वीतराग थे और वीतराग मनुष्य पदार्थका जैसास्वरूप होता है वैसा ही प्रतिपादन करता है । दूसरे जीवोंको वह मिथ्या जालमें फसाना नहिं चाहता और उसके वचन पूर्वीपरविरोधरहित और निश्चित रहते हैं। वीतराग भगवान जिनेंद्रने अपने अखंड ज्ञानसे आत्माके हितकर स्वरूपको भलेप्रकार जानकर अपने दिव्यवचनोंसे मनुष्योंके समक्ष उसका २० प्रबोध आत्म २१ प्रतिपादन किया है इसलिये उनके वचन सर्वथा प्रमाणीक हैं। इसश्लोकसे वीतराग सर्वज्ञ प्रणीत आगम प्रमाण है और उससे जो आत्माके स्वरूपका ज्ञान होता है वह विलकुल सत्य होता है यह बात बतलाई है ॥ १६ ॥ यो बेष्टि रज्यति विमुह्यति स ह्यनाप्तो दूरांतरे व्यभिचरति वचांसि तस्य । न देष्टि रज्यति विमुह्यति यः स आतो नैवायतौ व्यभिचरंति वचांसि तस्य ॥ १७ ॥ अर्थ-जो रागी द्वेषी और मोही है वह अनाप्त है और उसके वचन दूरवर्ती एवं व्यवहित पदार्थोंमें बाधित होजाते हैं। वह दूरके पदार्थको वा पहाड़ आदि से ढके हुये पदार्थको ठीक ठीक नहिं बता सकता । परंतु जो न द्वेषी न रागी और न मोही है वह आप्त है और उत्तरकालमें उसके वचनोंमें किसी प्रकारका विरोध नहिं आता । भावार्थ-मेरुपर्वत, राम, लक्ष्मण, कृष्ण, परमाणु आदि वा २१ आत्म प्रवोध २२ जमीनके अंदर रक्खे हुये पदार्थोंके वर्णन करनेवाले जिसके वचनमें किसीप्रकारका विरोध न आता हो, वे जैसे थे, वा हैं, उनको उसीरूपसे जो वर्णन करनेवाला हो एवं राग द्वेष मोहसे सर्वथा रहित हो वह तो आप्त है और जो रागी द्वेपी मोही हो एवं दूर अंतरित पदार्थोके वर्णन करनेमें जिसके वचनोंमें विरोध आता हो वह अनाप्त है।॥ १७॥ क्षेत्रज्ञमाप्तवचनादधिगम्य सम्यक् तस्मिन्नृणामविदुषां च विवादिनां च । सत्यानुमानगमकः कृतिनामभीष्टो यो हेतुरप्रतिहतस्तमुदाहरामि ॥१८॥ अर्थ-जो मनुष्य मूढ़ हैं वा आत्माके विपयमें विवादग्रस्त हैं उनकेलिये मै भगवान जिनेंद्रके वचनसे भलेप्रकार आत्माके स्वरूपको जानकर उसीकी सिद्धि में सत्य, अनुमानको जनानेवाले, विद्वानोंको अभीष्ट और दूसरे हेतुओंसे सर्वथा अका- २२ प्रवोध ट्य, निषि हेतुका प्रयोग करताई अर्थान उनके सामने मैं आत्माका स्वरूप सच्चे हेतुत्रोंये मंडिन अनुमानस सिद्ध करता हूं ॥ १८ ॥ आदानदानगमनागमनानुवाद- वादश्रुतिस्मृतिसुखानुभवादिचेष्टा । यस्मिन् सति स्फुरति येन विना न देहे चिद्रस्तु तदिशदलक्षणवेद्यमस्ति ॥ १९॥ अर्थ-जिमकी मोजूदगीमें शरीरसे पदार्थोंका ग्रहण करना, दान देना, जाना, आना, अनुवाद करना, वाद करना, सुनना, स्मरण करना, और सुख दुःख पादिका अनुभव करना हो और जिसके विनावे न हों वही आत्मा है ऐसा सम- झना चाहिये । भानार्थ-शरीरके भीतर एक ऐसा पदार्थे है जो कि-शरीरसे पदा- ोंका ग्रहण करता है, दान देता है, गान करता है, ठहर जाता है, दूसरेके वच- नांका अनुवाद करता है, स्वयं बोलता है, शब्दोंको सुनाता है, पहिली बातोंका २३ । आत्म प्रवोध २४ + स्मरण करता है और सुख दुःख आदिका भी अनुभव करता है। परंतु जिस- समय वह शरीरको छोड़ देता है अर्थात् मरणावस्था होजाती है उस समय यह शरीर ज्योंका त्यों पड़ा रह जाता है-इससे एक भी चेष्टा नहिं होती इसलिये इस अविनामावसंबंधसे अर्थात् शरीरके भीतर विद्यमान उस पदार्थ के संबंधसे शरीरसे चेष्टाओंका होना और उस पदार्थके अभावमें बुद्धिपूर्वक किसी चेष्टाका न होना इत्यादि व्याप्तिसे जान पड़ता है । वह पदार्थ आत्मा ही है और उसीका आदान कारण आदि निर्दोप लक्षण है अन्यका नहीं ॥ १९ ॥ देही दृषीकगणनिर्विषयोऽपि विज्ञै- ज्ञेयो जिनप्रवचनानुमितिप्रमाभ्यां । तस्यैव वा व्यवहितप्रतिपत्तिकारि प्रत्यक्षमानुभविकं क्रमशः प्रयोज्यं ॥२०॥ अर्थ--यह आत्मा स्पर्शन रसना आदि इंद्रियोंके अगोचर है-उनसे कभी २४ ६ ॥SU आत्म प्रबोध . २६ प्रत्यक्षा यमिनो भवत्यनुपमा लक्ष्मीविलंबं विना॥२१॥ अर्थ--जो मुनिगण, भगवान जिनेंद्रद्वारा प्रतिपादित आगमसे भलेप्रकार ज्ञापित आत्माको अपने मनमें निश्चलरूपसे धारण कर और अनुमान प्रमाणसे भी उसका ज्ञानकर निर्णय करते हैं पश्चात् उसै साक्षात् देखनेकेलिये अनुभव प्रत्यक्षका अभ्यास करते हैं वे थोड़े ही कालमें अनुपमलक्ष्मी-मोक्षलक्ष्मीको प्रत्यक्ष करलेते हैं- बहुत जल्दी उन्हें मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है ॥३१॥ विद्यते कति नात्मबोधविमुखाः संदेहिनो देहिनः प्राप्यते कतिचित्कदाचन पुनर्जिज्ञासमानाः कचित् । आत्मज्ञाः परमप्रमोदसुखिनः प्रोन्मीलदंतर्दृशो वित्रा स्युर्वहवो यदि त्रिचतुरास्ते पंचषा दुर्लभाः।२२। अर्थ---इस संसारमें प्रायः सब जीव आत्मबोधसे विमुख हैं यदि कोई कदाचित आत्माको जानते भी हैं तो वे आत्मा क्या है ? किस आत्मा कहते हैं ? २६ -- प्रबोध आत्म २७ इसी संदेहमें उलझ रहे हैं इसलिये उनको भी यह स्पष्ट ज्ञान नही कि वास्त- विक आत्मा क्या पदार्थ है। कई एक उसके स्वरूप जाननेके अभिलाषी कहीं किसी कालमें उसे जान भी लेते हैं परंतु जो वास्तविक आत्माके स्वरूपके जान- कार हैं-आत्मज्ञानसे उत्पन्न हुये प्रमोदसे हर्षायमान हैं और जिनकी दृष्टि बाह्य पदार्थोंसे सर्वथा हटकर निज आत्माकी और झुक गई है ऐसे महानुभाव दो ही तीन वा तीन चार ही हैं और पांच या छै मिलने तो अत्यंत दुर्लभ हैं । भावार्थ- संसारमें आत्माके स्वरूपका जानना अतिकठिन है क्योंकि एक तो जीव, रात दिन अपनी इंद्रियोंके विषय पोपणमें लगे रहते हैं इसलिये वे इंद्रियोंके विषयोंके सिवाय अन्य किसी पदार्थको जानते ही नहीं दूसरे कदाचित् इंद्रियोंके विषयोंसे विमुख होकर पदार्थोंका खोज भी करै तो इसी संदेहमें उलझ जाते हैं कि आत्मा किस पदार्थको ठहरावें और उसका स्वरूप क्या निश्चित करै ? खैर! संदेहको दूरकर देश कालके योग्य मिल जानेपर उसका स्वरूप जान जाय तो उसके स्वरूपके ज्ञानसे उत्पन्न हुये आनंदसे आनंदित और उसकी ओर सर्वथा उन्मुख दो तीन वा बहुतसे बहुत तीन चार होंगे पांच वा छै मिलने तो नितरां दुर्लभ हैं ॥२२॥ २७ म प्रबोध २८ ये धर्मध्वजिनोत्र तीर्थपुलिनध्वांक्षा जडा दांभिकाः मजंतो वकवद्भयातकपिवंदृग्मीलकोन्मीलकाः। आत्मन् ! दुर्जय जंजपूकवदनाः कुर्वत्यनात्मस्पृशो मिथ्यैवांगुलिपर्वखर्वगणनां तैः संगति मा कृथाः॥२३॥ अर्थ-हे आत्मन् ! इस संसारमें धर्मकी ध्वजा धारण किये हुये--अपनेको साक्षात् धर्मका स्वरूप माननेवाले जो तीर्थों के काक पंडे दृष्टिगोचर होते हैं वे महा जड़ हैं अत्यंत मायाचारी कके समान गंगा आदि नदियोंमें डुबकी लगानेवाले, भयभीत बंदरके समान आखोंके खोलने बंद करनेवाले. मिथ्या जप जपनेवाले और आत्माकी ओर जरा भीन निहारने वाले हैं। तथा परमात्माके नामके बहानेसे व्यर्थ ही वे अपनी अंगुलियोंके घटने गिनते हैं इसलिये तू उनके साथ जरा भी सहवास न कर । भावार्थ-बहुतसे मूढ पुरुप तीर्थोंके पंडोंको धर्मका स्वरूप मान पूजते हैं उन्हें अपना सर्वस्व अर्पण करनेपर भी बड़े प्रसन्न होते हैं । परंतु यह २८ प्रबोध २९ उनकी बड़ी भारी भूल है क्योंकि वे लोग अपनेको देवका पुजारी बोधर्मका भक्त बता भोले लोगोंको फुसलाकर शिकार करनेवाले हैं। महामूर्ख, महा मायाचारी, स्वार्थकेलिये नदीमें गोता मारनेवाले, व्यर्थ जप जपनेवाले, दिखानेकेलिये अंगु- लियोंके घटना गिननेवाले और आत्मज्ञानसे सर्वथा पराङ्मुख हैं। इसलिये वे जरा मी सहवासके योग्य नहीं । आत्मन्-! यदि तू इनके साथ सहवास करैगा तो सं- साररूपी अगाध समुद्रमें सदा गोता खाता रहेगा ॥ २३ ॥ मुंडैदंडधरैः शिखंडिभिरभिस्फूर्जज्जटामंडलैः काषायांबरचर्मकंबलधरै ग्न्यादिभिर्मुद्रितः। आ पाखंडिपरंपरासु भवता शैलूपनाट्योपमै- पैरात्मविडंबनं कृतमहो नात्मप्रबोधः कृतः ॥२४॥ अर्थ-रे आत्मन् ! जिसमकार नाटकके अंदर नट, कमी स्त्रीका वेष धारण करता है तो कभी राजा वा रंकका, उसीप्रकार कईबार तू शिर घुटाकर साधु, दंडी २९ ह प्रबोध ३१ प्रकार स्वरूप न जानकर याहवाही चाहनेकेलिये वा दूसरोंके रिझानेकेलिये ही रक्खा और आत्मज्ञान की प्राप्तिकेलिये किसीप्रकारका प्रयत्न न कर उसै निराकुल- तामय सुखका लाभ न होने दिया ॥ २४ ॥ दीप्तोत्तप्ततपःपरीपहजयोद्योगैर्नियोगोद्यमैः सद्भिक्षुप्रतिमाभिरप्यनशनैर्मासोपवासादिभिः। कायलेशभरैः प्रयाति कृशतां कायो न कर्मोचय- स्ते कर्मक्षयहेतवस्तव तदा स्वस्थो यदा स्थास्यति॥२५॥ अर्थ--हे आत्मन् ! यदि तू आत्मस्वरूपमें लीन नहिं होगा तो तू चाहै कैसे भी प्रचंड और संताप देनेवाले तप कर, उग्रसे उग्र भी परीपहोंको जीत, भले- प्रकार मनोयोग धारणकर, मुनिमुद्रा उपवास और मासोपवास भी कर परंतु इन कायक्लेशोंसे तेरा शरीर ही कृश होगा काँका ढेर जरा भी न घटेगा। हां यदि तू तप आदि आचरण करता हुआ अपनी आत्मामें लीन रहैगा तो तेरे ये प्रवोध किये हुये तप आदि कार्य कर्मोंके नाशक हो जायगे-आत्मामें लीनताके साथ किये हुये तप आदिसे तेरे समस्त कर्म नष्ट हो जायंगे । भावार्थ-कर्मोंके नाश करने में सबसे मुख्य कारण तो आत्मस्वरूपमें लीनता है, तप आदि तो वाह्य वा गौण कारण हैं क्योंकि, यदि आत्मस्वरूपमें लीनता न हो और तप आदि आच- रण किये जाय तो उनसे कर्म एक रत्तीभर भी कम नहिं होते, उल्टा शरीर ही कुश होता चला जाता है । इसलिये रे आत्मन् ! तुझै चाहिये कि तू आत्मस्वरूपमें लीनताके साथ तप आदिका आचरण करै ॥ २५॥ ग्रीष्मे शैलशिलासु तीव्रतपनोत्तप्तासु तप्तं त्वया प्रावृद्-कालकरालमेघपटलादंगीकृता वृष्टयः। सोढाः प्रौढ़तुषारपातपरुषाः शीतर्तुवातोर्मयो नांतर्बोधकृतश्रमो यदि भवानेष श्रमो निष्फलः ॥२६॥ अर्थ--हे आत्मन् ! तूने ग्रीष्मकालमें धूपसे अतिशय ततायमान पर्वतोंकी " प्रबोध ३३ शिलाओं पर बैठकर उग्रतप भी तपा, वर्षाकालमें विकराल मेघोंसे उत्पन्न हुई वर्षा- के जलका भी दुःख भोगा, शीतकालमें तुषारके संबंधसे तीक्ष्ण ठंडे प्रचंड पवनके झकोरे भी सहे, परंतु यदि तुने अंतर्बोध आत्मज्ञानकेलिये कमी प्रयत्न न किया तो वे सब तेरे निष्फल-निष्प्रयोजन हैं। भावार्थ-जोमनुष्य मुमुक्षु हैं-मोक्ष प्राप्त करना चाहते हैं, वे विना आत्मस्वरूपके ज्ञानके लिये प्रयत्न किये चाहँ कैसे भी पर्वतकी शिलापर बैठकर उग्रतप क्यों न करें, वर्षाकालमें विकराल मेघकीधाराओंसे भी क्यों न अपने शरीरको कष्ट देंवा अपने तीक्ष्ण झकोरोंसे शरीरको चीरनेवाले शीतलकालके पवनका भी दुःख क्यों न भोगें, कमी मोक्ष प्राप्त नहिं कर सकते । इसलिये आत्म ज्ञानकी प्राप्तिकेलिये विना प्रयत्न किये घोर तप आदिका तपना व्यर्थ है ॥२६॥ गर्योग्रग्रहलंघितोऽस्यसि महाहंकारवातार्दितो- मोहोन्मादहतोसि हंत ममतामैरेयमत्तोऽसि च । तेनात्मन् प्रतिबोधशून्यविबुधमन्य ! त्वमन्यैः समा ३३ प्रयोध त्मि ३४ मूढ़ेः पंडितमानिभिः कलकलोत्तालाकुल युध्यसे॥२७॥ अर्थ-रे आत्माज्ञानसे रहित भी अपनेको प्रवल पंडित मानने वाले आत्मन् ! महामूढ़ और अपनेको भी प्रवर पंडित समझनेवाले मनुष्योंके साथ जो तू उत्ताल शब्दोंसे युद्ध करता है-वाद विवाद करता है उससे ऐसा जान पड़ता है कि तू महाभयंकर गर्वरूपी ग्रहसे दवा हुआ है। अहंकाररूपी महाप्रबल वातसे पीडित है । मोहरूपी उन्मादसे उन्मत्त और ममता रूपी मदिरासे विवेकशून्य हो रहा है ! भावार्थ-हे आत्मन् ! यदि तुझै सच्चा आत्माका ज्ञान है तो तू सरल परिणामी, धर्मसे प्रेम रखनेवाले मनुष्योंको उपदेश दे उन्हें ही आत्माके स्वरूप- का ज्ञान करा परंतु प्रचंडपरिणामी विवादियोंके साथ विवाद मत कर । क्योंकि, वे महाजड़ और अपनेको पंडित माननेवाले हैं इसलिये तेरे सत्य भी उपदेशका उनपर असर नहिं पड़ सकेगा। यदि ऐसा जानकर भी तू उनके साथ विवाद करै तो इसमें कोई संदेह नहीं, कि तू महागर्विष्ठ महा अहंकारी, महामोही और अपनेको अद्वितीय पंडित मानने वाला है ॥२७॥ ३४.

प्रवोध किंवादेन वितंडया किमनया जल्यैरनल्पैश्च कि भूभंगांगुलिभंगभंगिचपलैश्चर्चाविचारैश्च किं । संजातः पशुरेव कर्कशवहिस्तर्केण वाया भवानं- तस्तर्कमधीष्व किंचिदुदयत्यात्मप्रवोधो यतः ॥२८॥ अर्थ-हे आत्मन् ! यदि तू आत्मप्रबोध प्राप्त करना चाहता है-अपनी आत्माके स्वरूपका भलेप्रकार ज्ञाता बनना चाहता है तब न तो तुझै बाद करनेकी आव- श्यकता है। न वितंडा और जल्प कथासे ही कोई प्रयोजन है, भोहैं चलाकर और अंगुली घुमाकर चर्चा और विचार करनेसे मी कुछ लाभ नहीं क्योंकि ये सब वाह्य तर्क है और इनके करनेसे तू पशु-अज्ञानी और आत्मज्ञानसे शून्य समझा जायगा। तू तो अं- तरंग तर्कका आश्रयकर-अपनी दृष्टिको अंतरंगकी ओर लगा, जिससे तुझे आत्मा- का ज्ञान हो और उसके स्वरूपको समझ निकले। भावार्थ-जिसमें प्रमाणके द्वारा सा- धन वा दूपण बताये जाय, जो सिद्धांतके विरूद्ध न हों, व जिसमें प्रतिज्ञाहेतु आदिका ३५

आत्म
प्रबोध
३६
अवलंबन और पक्ष प्रतिपक्षका ग्रहण हो, वह वाद है । जिसमें वादकी सब सामग्री
रहै और किसी एक प्रयोजनीय अर्थके लिये शब्दका प्रयोग होनेपर उसका छल-
से दूसरा अर्थ कर दिया जाय ( अर्थात् किसीने किसीको नवकंवलवाला कहा,
वहां वक्ताका तात्पर्य तो यह था कि इसके पास नवीन कंबल है क्योंकि नव श-
ब्दका अर्थ नया और नौ दोनों होता है परंतु प्रतिवादी द्वारा-नवका नौ अर्थकर
यह विचारा महादरिद्र है इसके एक भी कंवल नहीं नौ तो कहांसे आये !
ऐसा प्रकट करदेना आदिका प्रयोग किया जाय) उसका नाम जल्प है और जहां-
पर द्वितीय पक्षवादी वैतंडिकका कोई पक्ष न हो वह सत् असत् सब सिद्धांतोंमें
दूपण लगोने वाला हो उसका नाम वितंडा है । इसप्रकार बहुतसे लोग वाद जल्द
वितंडासे, भौंके चलाने और अंगुली घुमानेसे चर्चा विचार करते हैं। परंतु ये
सब तर्क वाह्य तर्क है इनसे आत्माका ज्ञान नहिं हो सकता। आत्माका ज्ञा
आत्माकी और दृष्टि लगानेसे ही होता है इसलिये हे आत्मन् ! तुझै उसीकी ओर
दृष्टि लगाना चाहिये ॥२८॥

प्रधवो आत्म ३७ हुंफदकारवषट्पुरःसरमहामन्त्रैः परानद्भुतै- भूतोत्थज्वरशाकिनीग्रहहतानुन्मोदयन् तृप्यसि आत्मानं पुनरुद्धतस्फुरदहंकारग्रहोलंधितं नैवोलंघयितुं दधासि हृदये सन्मंत्रबीजाक्षरं ॥२९॥ अर्थ-आत्मन् ! जो जीव भूत पिशाच आदिसे उत्पन्न हुये ज्वरसे ग्रस्त हैं जिनके ऊपर शाकिनी डांकिनी ग्रह आदिका पूरा पूरा प्रकोप है उन्हें तू हुं फट- कार और वषद् आदि महामंत्रोंसे आनंदित करता हुआ तृप्त करता है-अपने महामंत्रों- के वलसे उनके भूत आदिसे उत्पन्न विकारोंको सर्वथा दूर कर देता है परंतु न मालूम उद्धत और प्रचंड अहंकार रूपी ग्रहसे ग्रस्त अपने आत्माको वश करनेकेलिये तु बीजा- क्षर महापवित्रमंत्रको हृदयमें क्यों धारण नहिं करता । भावार्थ-जब तक इस आत्मा पर अहंकार रूपी ग्रहका प्रकोप रहैगा तब तक यह आत्मा अपने आनंदमय स्व- रूपका अनुभव नहिं कर सकता इसलिये हे आत्मन् ! तू ऐसे परम पवित्र बीजा- आत्म प्रबोध ३८ क्षर महामंत्रका आराधन कर, जिससे यह तेरा अहंकार ग्रह नष्ट होजाय परंतु अपनी वाहबाहीकेलिये वा अन्य पुरुषोंके रंजायमान करनेकेलिये तू भूत पिशाच डांकिनी आदिकी बाधाओंको दूर करनेवाले हुं फटकार वपद् आदि मंत्रोंका अभ्यास मत कर । याद रख इनके अभ्याससे तेरी आत्माका कभी कल्याण नहीं हो सकता ॥ २९॥ स्तोकेनाविशदेन संशयवता किं पोतकीपिंगला- काकादिव्यभिचारिशाकुनपरिज्ञानेन निश्चीयते स्वस्थं सद्गतिदिव्यनादपरमानंदोदयं बुध्यसे हसं चेदिह किं न कि कलयसि स्वाधीनबोधस्तदा ॥३०॥ अर्थ-आत्मन् ! तू शकुनके ज्ञानको प्रकर्ष ज्ञान मानता है परंतु वह विल- कुल थोड़ा है । महा मलिन अपवित्र, संशय उत्पन्न करने वाला और कबूतरी बगलोंकी पंक्ति और काक आदिका व्यभिचारी है-अर्थात् शकुनी मनुष्य कभी ३८ प्रबोध आत्म ३९ कभी यह पूर्ण निश्चय नहिं कर सकता कि कबूतरी बक आदिके सामने पड़ जानेसे क्या फल होगा ! इसलिये तू उस ज्ञानसे कभी भी किसी बातका नि- श्रय नहीं कर सकता यदि तुझे अपने स्वरूपमें लीन, उत्तम गति, दिव्यध्वनि और अतिशय आनंदसे मंडित आत्माका ज्ञान है तो तू उसीसे सब बातोंका निश्चय करसकता है । क्योंकि उससमय तेरा ज्ञान स्वाधीन-आत्मिक है भावार्थ-जब तक आत्माको स्वाधीन बोध प्राप्त नहिं होता तब तक वह निस्सन्देह होकर किसी भी पदार्थका निश्चय नहिं कर सकता तथा इसका लाभ स्वस्थ, उत्तमगति और दिव्यध्वनिके धारक, एवं आनंद स्वरूप आत्माके निश्चयसे होता है । इसलिये हे आत्मन्, यदि तू वास्तविक सब पदार्थोंका निश्चय करना चाहता है तो इसी स्वाधीन ज्ञानका तू लाभ कर। व्यर्थके शकुनज्ञानमें मत फँसै क्योंकि वह ज्ञान स्तोक-विलकुल थोड़ा ज्ञान है । अविशद-परोक्ष, और संशय करनेवाला है तथा कबूतरी आदिके सामने पड़जानेसे, समझ तो कुछ और शकुन लिया जाता है और हो कुछ और ही जाता है इसलिये व्यभिचारी है ॥३०॥ ३९ । HA प्रबोध आत्म ४१ कमल आदि पदार्थोके रूप रस आदिगुणोंका वर्णन करना ही अपना सर्वस्व समझते हैं और नवीन काव्योंकी रचना कर अपने पांडित्यका प्रसार करते हैं किंतु जिस समय उन्हें अपनी आमाका असली ज्ञान होजाता है उससमय वे यह समज्ञ- कर कि नील कमल आदि वाहय पदार्थोंके गुण वर्णन करनेसे केवल पापका ही संचय होता हैं उनका सर्वथा वर्णन करना छोड़ देते हैं इसी बातको हृदयमें धारण कर ग्रंथकार कवियोंको उपदेश देते हैं कि-हे कवियो ! जबतक तुम्हें अ सली आत्माके स्वरूपका ज्ञान नहिं होता तभी तक तुम नीलकमल आदि वाह्य पदार्थोंके गुणोंका वर्णन करते हो और नवीन काव्य बनाकर अपनी वाचलता प्रगट करते हो किंतु जिससमय तुम्हें असली आत्माके स्वरूपका ज्ञान होजायगा उससमव तुम वाह्य पदार्थोंका व्यर्थ वर्णन भी न करोगे और नवीन २ काव्योंके बनानेमें जो तुम्हारा वावदूकपना है वह भी एक ओर किनारा कर जायगा ॥३१॥ अत्यंतं वहिरंगरंगरसिकास्त्यक्तात्मसंवित्तयः संख्यातुं कतिं यांति ये तु कृतिनो जिज्ञासवः केचन म ४१ UP आत्म प्रवोध ४२ कार्या तैरहितानिवृत्तिरनु च प्राप्तिः प्रयत्नैर्हिते दुखोदकमिहाहितं सुखरसोदकं हितं तय॑तां ॥३२॥ अर्थ-जो मनुष्य रंग विरंगे वाह्य पदाथोंके रंगमें रंग रहे हैं और आत्माके वा- स्तविक ज्ञानसे सर्वथा विमुख हैं ऐसे मनुष्योंकी यदि गणना की जाय तो बहुतसे मिलेंगे परंतु जो मनुष्य कृति-थर्मात्मा हैं और जिज्ञासु-असली तत्वोंका खोज करना चाहते हैं ऐसे मनुष्य कोई विरले ही होंगे, इसलिये जो मनुष्य वस्तुके य- थार्थ स्वरूपके जाननेके अभिलाषी हैं उन्हें चाहिये कि वे अहितसे बचें और बड़े प्रयत्नसे हितमें प्रवृत्ति करें क्योंकि आगे अहितसे दुःख होता है और हितसे सुखकी प्राप्ति होती है । भावार्थ-प्रायः यह देखनेमें आता है कि बहुत- से मनुष्य वाह्य पदार्थोकी चटक मटकमें ही उलझे रहते हैं उन्हें ही अपने परम हितकारी मान अहोरात्र उनकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करते रहते हैं इस रीतिसे उन्हें आत्माके असली स्वरूपका ज्ञान भी नहिं होता-वे सर्वथा आत्मस्वरूपके ज्ञानसे विमुख रहते हैं इसलिये यदि गणना करके देखा जाय तो ऐसे ही मनु- 20 प्रबोध आत्म प्य बहुत मिलेंगे जो वाह्य पदार्थोके रंगमें रंगे हों किंतु धमात्मा और असली तत्त्व- के खोज करने वाले कोई एक विरले ही दृष्टि गोचर होंगे तथा संसारमें सुख भी उस समय हो सकता है जब कि बुरे कामोंसे निवृत्ति और अच्छे कामोंमें प्रवृत्ति होगी इसलिये विवेकियोंको चाहिये कि वे पदार्थोंका यथार्थ स्वरूप जानकर अहितसे मुख मोड़ें और हितकी ओर झुकें क्योंकि हितसे कल्याण और अहितसे अकल्याण होता है ॥ ३२ ॥ अस्वाधीनमसारमंतविरसं दुःखप्रदं वाध्यतौ शास्त्रे प्रस्तुतमत्र निवृतिपथे सौख्यं न सांसारिक स्वार्धानं निरुपाधि वाधरहितं निःसीम यत्तत्सुखं विद्यां तजननी हिताय समुपादद्यादविद्यां ज्यजेत् ॥३३॥ अर्थ-संसार सुख पराधीन, असार, अंतमें विरस, और उत्तरकालमें दुःख देनेवाला है इसलिये शास्त्रकारोंने मोक्षके मार्गस्वरूप शास्त्रोंमें संसारके Mal 1 ४३ . आत्म प्रवोध ४४ सुखको सुख नहिं बतलाया है किंतु जो सुख स्वाधीन, सारभूत, राग द्वेष आदि उपाधि और बाधाओंसे रहित एवं असीम है, वही वास्तविक सुख है । इसलिये जो मनुष्य इस उत्तम सुखको प्राप्त करना चाहते हैं वे आत्माके हितके लिये उस सुख- की जननी-उत्पन्न करनेवाली विद्याको अवलंबन करें और उसको प्राप्त न कराने वाली अविद्याका सर्वथा त्याग कर दें। भावार्थ--संसारमें जो सुख इंद्रियोंसे जन्य है, उसे लोग सुख मानते हैं परंतु वह सुख, सुख कदापिनहिं हो सकता, क्योंकि वह धन स्त्री वा इंद्रिय आदि पदार्थों से उत्पन्न है । इसलिये पराधीन है निस्सार है परिणाममें कड़वा है इंद्रियजन्य सुख पहिले तो मीठा लगता है परंतु पीछे उससे भयंकर दुख भोगने पड़ते हैं । और आगमिकालमें भी दुःखका देनेवाला परंतु जो सुख मोक्षमें प्राप्त होता है, वह वैसा नहीं क्योंकि वह आत्माधीन है, रागद्वेप आदि दुःखदायी उपाधियोंसे रहित है, अव्यावाध स्वरूप और अ- सीम है, इसलिये उत्तम सुखके प्रेमियोंको चाहिये कि वे इस अनुपम सुखकी उत्पन्न करनेवाली विद्याका अवलंबन करै और जिससे वह सुख न उत्पन्न हो सकै d ४४ - - , ४५ ऐसी अविद्याका संबंध सर्वथा छोड़ें दे ॥ ३३ ॥ या सद्दर्शनबोधचारुचरिता साध्यात्मविद्या परा विद्या स्यादथ वैपरीत्यविहितस्पंदामविद्यां विदुः एषा नात्महितेति दुःखनिकरक्ष्वेडांकुरोत्पादिनी क्षेमार्थी विषकंदलीमिव समुच्छिंद्याबुधो नेतरः॥३४॥ अर्थ-जो विद्या सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्रसे भूषित है वह अध्यात्मविद्या-आत्माके वास्तविक स्वरूपको बतलानेवाली, उत्कृष्ट विद्या है परं- तु जो मिथ्यादर्शन मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्रसे कलंकित है, और वाह्य पदार्थों में रिझानेवाली वह अविद्या है । एवं यह अविद्या नानाप्रकारके दुःख रूपी अंकुरोंको उत्पन्न करनेवाली विषवृक्षकी लताके समान है इसलिये जो पुरुष वि- द्वान हैं-आत्माका वास्तविक स्वरूप प्राप्त करना चाहते हैं, वे तो यह जानकर कि अविद्यासे कभी आत्म कल्याण नहिं हो सकता इसका सर्वथा त्याग कर देते हैं ४५ 1 आत्मा प्रवोध ४६ किंतु जो मनुष्य मूढ हैं-इंद्रियोंका पोपण करना ही सब कुछ समझते हैं, वे इसीमें लीन बने रहते हैं ॥ ३४ ॥ या चित्तभ्रममूलसंचयवती मिथ्यालवालोत्थिता यस्या मोहतरुर्विकल्पवलनैरारोहणायाश्रयः रागाद्या नव पल्लवानि विषयाः पुष्पाणि पापं फलं संसारपसरेण सा जगदपि व्यामोत्यविद्यालता ॥३५॥ अर्थ-यह अविद्या मानिंद लताके है क्योंकि भ्रांति-विपरीत ज्ञानरूप तो इसकी मजबूत जड़ है। मिथ्यात्वरूपी आलवाल-क्यारी है । मोहरूपी वृक्ष आश्रय है जिसपर कि नानाप्रकारके संकल्प विकल्परूपी मोड़े देकर चढ़ा जाता है। राग द्वेप आदि नवीन २ पल्लव हैं। इंद्रियों के विषय-पुष्प और पाप-फल हैं तथा प्रायः यह समस्त संसारमें फैली हुई है इसलिये अपने फैलावसे इसने समस्त जगत व्याप्त करलिया है। भावार्थ-अविद्यासे पदार्थों में भ्रांति-कुछका कुछ ज्ञान हो ४६ - । प्रवोध आरमा ४७ जाता है । मिथ्याश्रद्धान्, मोह, नानरप्रकारके विकल्प, राग द्वेप क्रोध मान आ- दि, इंद्रियोंके विपयोंमें प्रवृत्ति, और पापोंकी उत्पत्ति होती है इसलिये विद्वानों- को चाहिये कि वे अविद्यारूपी विशाल शत्रुसे बचें और परम कल्याणकारी अ- ध्यात्मविद्याको अपनावें ॥ ३५ ॥ सूक्ष्मे सन्निहितेऽपि वस्तुनि नृणां दृष्टिं तिरस्कुर्वती संदेहंच विपर्ययं च चिदचिद्रूपद्धये तन्वती कुर्वाणा सकलं सदप्यसदिति स्वच्छात्मचंद्रोदयं मिथ्यातामसकृष्णपक्षरजनी लुंपत्यविद्या वलात् ॥३६॥ अर्थ-यह अविद्या पासमें रक्खे हुये सूक्ष्म पदार्थको नहिं जानने देती। चेतन और अचेतन दोनोंप्रकारके पदाथोंमें संदेह वा भ्रम करा देती है और वि- द्यमान भी निर्मल आत्मारूपी चंद्रमाके उदयको अविद्यमान सरीखा कर देती है इसलिये यह मिथ्यात्वरूपी घोर अंधकारको धारण करनेवाली अंधेरी रात ४७ M - आत्म प्रबोध ४८ भावार्थ-जिसप्रकार अंधेरी रातमें पासमें रक्खा हुआ भी पदार्थ दृष्टि गोचर नहि होता, स्पष्टरूपसे न दीखनेके कारण सीप चांदी, चांदी सीप, रस्सी सर्प, सर्प रस्सी, व सूखा ढूंठ पुरुप मालूम होने लगता है और विद्यमान भी चंद्रमा अवि- द्यमान सरीखा जान पड़ता है उसीप्रकार इस विद्याके होनेपर पासमें रक्खा हुआ भी पदार्थ, पूर्णरूपसे ज्ञात नहिं होता, ज्ञात भी होता है तो उसका विपरीत ज्ञान वा यह क्या है ? ऐसा संदेहात्मक ज्ञान होजाता है किंतु परम शुद्ध निष्क- लंक आत्माका भान नहिं होता ॥३६ ॥ रागं रत्सभिषंगरंगरसिकं दग्विभ्रमैः कुर्वती चारित्रेण सहापहत्य सहसा विद्याविवेकोनती निष्पापं कुलमंगनेव मंदनान्मादैरविद्या हठात् पापं कारयति प्रपातयति च श्वभ्रांधकूपे नरं ॥३७॥ अर्थ-यह अविद्या व्यभिचारिणी स्त्रीके समान है क्योंकि व्यभिचारिणी स्त्री ४८ प्रबोध १९ जिसत्रकार मनुष्यको अपने कटाक्षपातसे रतिक्रीड़ाके रसकी चाहना करानेवाले रागको उत्पन्न करती है उसीप्रकार अविद्या भी मिथ्यादर्शन मिथ्याज्ञान और रतिक्रीड़ाके रसकी चाहना करानेवाले रागको करती है। व्यभिचारिणी स्त्रीके सं- घसे जिसप्रकार चारित्र विद्या और विवेक एक ओर किनारा कर जाते हैं। उसी- प्रकार अविद्याके संबंधसे भी चारित्र विद्या और विवेक नष्ट हो जाते हैं। व्य- मिचारिणी स्त्री जिसप्रकार कामके उन्मादसे निष्कलंक कुलको कलंकित बना देती है उसीपकार अविद्या भी किोप कुलको सदोष बना देती है और व्यभिचारि- णी स्त्री जिसप्रकार मनुष्यको नरककूपमें डाल देती है उसीप्रकार अविद्या भी मनुष्यको नरक कूपमें डुबानेवाली है ।। ३७ ॥ किं स्वप्नेन किमिंद्रजालकलया विद्युदिलासेन किं छायाक्रीडनकेन किं किममुना यंत्रप्रयोगेण च किं गंधर्वपुरेण तानि नियतान्यालोकय व्यापिनी ४९ मात्म प्रबोध ५० लोके तत्क्षणदृष्टनष्टविलसचेष्टामविद्यालतां ॥३८॥ अर्थ--हे आत्मन् ! जो तू स्वप्नमें देखे हुये पदाथोंसे, इंद्रजालकी खूबीसे, विजलीकी चमकसे, तस्वीरोंके देखनेसे, चलते हुये यंत्र और गंधर्व नगरके दे- खनेसे कौतूहल मानता है सो व्यर्थ है क्योंकि ये नियत हैं-विलकुल थोड़े देशमें वा विलकुल थोड़े काल तक ठहरने वाले हैं इस अविद्याकी ओर क्यों नहिं देखता क्योंकि यह सर्वत्र व्यापक-विद्यमान है और क्षणभर दीखकर नष्ट होनेवाली अ- नेक चेष्टाओंसे युक्त है । भावार्थ-स्वप्न इंद्रजाल विजली चित्र यंत्र और गंधर्व नगरके देखनेमें जो कुछ चमत्कारी दृष्टि गोचर होती है वह सब अविद्याका ही माहात्म्य है-इंद्रजाल आदि सब अविद्याके ही विलास हैं इसलिये हे आत्मन् ! तू सबकी जननी और सर्वत्र फैली हुई अविद्याको देख, इंद्रजालं आदिको देखकर क्यों भोंचक होता है ! ये सब तो उसके टुकड़े हैं ॥ ३८ ॥ एतस्या ममताकलत्रसहिताऽहंकारनामात्मजः ५० .

प्रबोध आत्म ५१ संकल्पौ स्वपरात्मकावथ तयोः पुत्रौ ततश्चैतयोः भार्ये रत्यरती सुखासुखसुतप्रोद्भासिते इत्यहो संतानेन सहाक्षयेण महती नंदत्याविद्या चिरं ॥ ३९॥ अर्थ-इस अविद्याका पुत्र अहंकार है । ममता अहंकारकी स्त्री है। अपने संकल्प विकल्प और परके संकल्प विकल्प ये दो अहंकारके पुत्र हैं उन दोनों पु- त्रोंकी क्रमसे रति और अरति दो स्त्रियां हैं और उनके सुख दुख दो पुत्र हैं इस प्रकार हे आत्मन् ! इस अविद्याका विशाल किंतु अक्षय परिवार है और उसके साथ यह दिनोंदिन वृद्धिको प्राप्त होती रहती है। भावार्थ अविद्यासे अहंकार परपदार्थोंमें ममता, नानाप्रकारके संकल्प विकल्प, रति अरति, राग द्वेष, और सुख दुःख होते हैं और जैसे जैसे अहंकार ममता आदि बढते जाते हैं वैसी वैसी अविद्या भी बढ़ती चली जाती है ॥ ३९ ॥ तर्षाद्धावति धूप्यते श्रमवशान्निद्राति विद्राति च ५१ . आत्म प्रबोध ५२ AN क्रौर्याक्रुध्यति युध्यति प्रहरते रोपाच्च संदीप्यते हर्षाद्वायंति नृत्यति प्रहसति क्रीडत्यसौ चंचलो- लोकः किं न करोति चंडचपलाविद्यापिशाचीवशः॥४०॥ अर्थ-प्रचंड चंचल अविद्यारूपी पिशाचीके वशीभूत यह निर्बुद्धि लोक, धन आदिकी तृष्णासे दौड़ता है, धूप सहता है, थक जाता है तो सोता है, बुरी जगह जाता है, क्रूरतासे गुस्सा होता है, युद्ध करता है, रोपसे दूसरोंको मारता है, प्रज्वलित होता है, हर्पसे मत्त हो गाता है, नांचता है, हंसता है, कूदता है, वि- शेष क्या कहा जाय अविद्यासे यह मनुष्य नीच ऊंच सब प्रकारके काम करता है । भावार्थ-यदि लोकपर अविद्याका प्रभाव न पड़ा होता तो क्यों तो यह तु- ष्णासे जहां तहां दौड़ता ! क्यों धूप सहता ! क्यों निद्रा लेता ! और निंदित स्थानोंपर गमन करता क्यों क्रोध करता युद्ध करता मारता और प्रज्वलित होता! और क्यों ही गाता नाचता हंसता और खेलता! परंतु अविद्या पिशाचिनीके ५२ प्रबोध आरम ५३ फंदमें पड़कर इसे सब कुछ करना पड़ता है क्योंकि यह लोकको पागल वना देती है ॥ ४०॥ सोल्लासैः करणैः कृतांगवलनभूलास्यदृग्वलिगतै- भर्भावैः सात्विकभावभावितरसैः संचारिभिः स्थायिभिः शृंगारोत्तरहारिहास्यकरणस्फारामविद्याभिधां लोकः पश्यत नाटिकां नटनिभो नित्यं नरीनृत्यते ॥४१॥ अर्थ-जिसमें समस्त इंद्रियां हुलसाय मान रहती हैं । शरीरका मटकाना, भौंका चलाना, और कटाक्ष विक्षेप किया जाता है। जहां सात्विक भावोंसे प्रकट किये गये रसोंसे युक्त स्थायी संचारी भावोंका प्रयोग होता है और जो शृंगार आदि रस एवं विशेषकर हास्य रससे सुहावना जान पड़ता है ऐसे इस अविद्या- रूपी नाटकको देखो यह जीव इसी अविद्यारूपी नाटकमें सदा नृत्य करता रहता है। भावार्थ-इस लोकपर अविद्याका ऐसा प्रभाव पड़ा हुआ है कि यह मूढ बन ५३ आत्म प्रवोध है ५४ गया है कभी यह इंद्रियोंका प्रिय काम करता है कभी किसीकी भलाई तो कभी किसीकी बुराई करता है और कमी कभी शृंगार आदि रसोंमें मग्न रहा आता परंतु कल्याणकारी आत्मस्वरूपके जाननेका कभी प्रयत्न नहिं करता ॥४१॥ कामक्रोधमदादिदुःपरिणतिप्रायं पृथक्कर्म मे कायस्तजनितो मम व्यवहितस्तेनार्जितो यः किल दूरे वाह्यपरिग्रहः स इति हि प्रत्येतुम)पि सन् एतत्सर्वमविद्यया परवशो न त्वं पृथग्मन्यसे ॥४२॥ अर्थ-हे आत्मन् !तू इस बातको खूब जानसकता है कि काम क्रोध मद आदि निंदित परिणामोंका धारक कर्म मुझसे जुदा है। यह जो मेरा शरीर है वह कर्मसे उत्पन्न हुआ है इसलिये यह भी मुझसे भिन्न है । शरीरसे उपार्जन किये धन गाय भैंस स्त्री आदि वाह्यपरिग्रह भी मेरे नहीं-मुझसे सर्वथा पृथक् हैं परंतु तू अवि- द्याके विलकुल परवश हो रहा है-उसने तेरे ऊपर अपना पूरा २प्रभाव जमा रक्खा ५४ ।

प्रबोध इसलिये उन्हें मिस नहि गमहना-मामा कर्म और शरीर आदि पदार्य पर ही यह मानना है। मायार्ग-कर्म गरीर बी पुत्र आदि पदार्थ मया मित्र ई कि आया नन है और कर्म आदि जड़ है इसलिये ये कमी एक दो हीनदि गाने नया आत्मा और कर्म आदिकी भिन्नताको यह आत्मा जान मी गकता है परंतु विद्याक प्रबल पदेने इसकी समीचीन ज्ञान शक्तिको ढक एकदा है इसलिये इसे उनकी भिन्नताका भान होना जग कठिन है॥४२॥ आत्मन ! मत्रिहितेय तिष्ठति मदा विद्या जगत्वावनी मनारित्रमुदर्शनावललमत्तेजोभिरुदभासिता पना मुंगसि किं मती किमसती दुष्टामविद्यां मुहुः सर्वत्र व्यभिचारिणी रमयसे दृष्टो विवेकस्तव ॥ ४३ ।। अर्थ वात्मन ! ममस्त जगतको पवित्र करनेवाली और सम्यक् चारित्र और गम्यग्दर्शन रूपी अनिशय निर्मल नेजसे देदीप्यमान यह विद्या सदा तेरे स. ५५ आत्मा प्रबोध ५६ मीपमें ही रहती है परंतु इस सती साध्वी विद्याको तो तू छोड़ देता है और महा दुष्टिनी सर्वत्र व्यभिचारिणी-सब जगह दृष्टि गोचर होनेवाली अविद्याके साथ आनंद रमण करता है !!! वस, देख लिया तेरा विवेक-हित अहितका ज्ञान ? भा- वार्थ-जिसप्रकार अनेक गुणोंसे भूपित सती साध्वी अपनी स्त्रीको छोड़कर महा व्यभिचारिणी अनेक दोषोंकी खान वेश्या आदिके साथ रमण करनेवाला पुरुष महा निंदित नीच गिना जाता है उसीप्रकार हे आत्मन् । तू भी महा नीच और निंदित है क्योंकि जो विद्या समस्त जगतको पवित्र करनेवाली है। सम्यग्दर्शन आदि उत्तमोत्तम गुणोंसे "पित, निर्दोष और सदा तेरे पास रहती हैं उस- की ओर तो तू झांक कर भी नहिं देखता किंतु अनेक दोपोंकी खान, सर्वथा अ- हित करनेवाली और समस्त संसारमें फैली हुई अविद्यासे प्रेम करता है तथा तिसपर भी यह कहता है कि मैं बड़ा विवेकी हूं बस रहने दे, तेरे ऐसे विवे- कके लिये हजार बार धिक्कार है ॥४३॥ रागद्वेषविषानपोषविषमा स्पर्शादिभिर्जीवहृत् ५६ प्रबोध त्यक्तव्या विषकन्यकेव नियतं दूरादविद्या त्वया एह्येहि श्रुतिशुक्तिपात्रनिहितां सतर्पणायात्मनो- निर्वाणामृतसारपूर्णकलशीमध्यात्मविद्यां पिव ॥४४॥ अर्थ-हे आत्मन् । यह अविद्या रागद्वेषरूपी विषमय अन्नकी पुष्टिसे महा विपम और स्पर्श करते ही प्राणोंकी हरण करनेवाली विषकन्याके समान है इस- का तू सर्वथा त्याग करदे और यहां आ, देख यह शास्त्ररूपी सीपके स्वच्छपात्र- पर रक्खी हुई निर्वाणरूपी महामिष्ट अमृतरसकी भरी हुई कलशी, अध्यात्म विद्या मोजूद है अपनी आत्माकी तृप्तिकेलिये इस पी । भावार्थ-जिसमकार सर्पिणी विपके उत्पन्न करनेवाली चीजोंके खानेसे महा भयंकर और स्पर्श करते ही प्राण हरनेवाली होती है उसीप्रकार यह अविद्या भी राग द्वेषसे विषम और जीवनको नष्ट करनेवाली है-अर्थात् राग द्वेषके चक्रमें पड़कर अनंतकाल संसारमें घूमना और आत्माके स्वरूपसे वंचित रहना पड़ता है इसलिये हे आत्मन् ? तू इस महा- ५७ प्रवोध आत्म ५८ निकृष्ट अविद्याका संबंध छोड़ दे और आत्माको तृप्त करनेवाली अतिशयस्वच्छ सीपके पात्रपर रक्खी हुई महामिष्ट अमृतजलकी भरी हुई कलशीके समान भले- प्रकार शास्त्रोंमें वर्णित इस अध्यात्मविद्याका रसास्वादन कर ॥ ४४ ॥ जन्मोन्मज्जनमृत्युमज्जनकरी निम्नं नयंती हठात् घोरापारभवार्णवं नयति या जतूनविद्या नदी तस्यामाविश खंडितोत्तमपथा सा दुस्तरोत्तीर्यतां विद्यानावमवाप्य योगिकमहाकाठोच्चयाधिष्ठितां ॥४५॥ अर्थ-जो अविद्यारूपी नदी जन्मरूपी उन्मज्जन-उछलना और मृत्युरूपी म- जन-डूबना, करानेवाली है । बल पूर्वक नीचे-तलीमें घसीटकर लेजानेवाली है और इस संसाररूपी अपार समुद्र में जीवोंको घुमानेवाली है। उसमें जानेका मार्ग उत्तम नहीं इसकारण वह दुस्तर है-जल्दी तिरी नहिं जा सकती इसलिये हे आत्मन् ? तू ध्यान रूपी काष्ठ समूहसे भरी हुई विद्यारूपी नावमें बैठकर उस नदीमें प्रवेशकर । ५८ प्रबोध आत्म ५९ भावार्थ-जिसपकार नदी अपनेमें गिरे हुये मनुष्यको उछालती डुबाती हुई गोता खवाती है। घसीटकर नीचे तलीपर ले जाती है। समुद्र में लेजाकर छोड़ देती है और दुस्तर है परंतु जो मनुष्य समझदार हैं वे काष्ठसे भरी हुई नावपर सवार हो उसै तिर जाते हैं उसीप्रकार यह अविद्या भी मनुष्यको जन्म मरणका दुःख भुगानेवाली है। नरक ले जानेवाली और इस अपार संसारमें घुमानेवाली है एवं इसके चक्रसे छूटना भी बड़ा कठिन है परंतु जो मनुष्य अध्यात्मविद्याके प्रेमी हैं वे ध्यानके बलसे इसे देखते २ नष्ट करदेते हैं-अध्यात्मविद्याके सामने इसका जरा भी प्रकोप नहिं रहने पाता ॥ ४५ ॥ निद्रातर्षक्षुधार्तिश्रममरणजराजन्मभीमन्मथाद्या- दोषाः कर्मैकमूलास्तदुपशमनविधिः कर्मणां प्रक्षयेण हेतुस्तेषामविद्या नयति परमिमामंतमध्यात्मविद्या सा स्वाधीना तवास्ते प्रतिसमयमनुष्ठीयतामप्रमादात् ॥४६॥ ५९ आत्म प्रवोध ६० अर्थ-हे आत्मन् ? निद्रा तृष्णा भूख पीडा थकावट मरना बुढापा जन्म भय और काम आदिक जितने विकार वा दोष हैं वे कर्मसे हैं-उनकी उत्पत्तिमें मूल कारण कर्म है तथा कर्मों के नाशसे उनका नाश होता है । काकी उत्पत्ति अ- विद्यासे होती है । और अविद्याको नाश करनेवाली अध्यात्म विद्या है जो स्वा- धीन और सदा तेरे पास रहती है इसलिये तू प्रमाद रहित होकर उसीका पूर्ण- रूपसे अभ्यास कर । भावार्थ-वास्तविक सुख, अध्यात्म विद्याकी प्राप्तिसे ही होता क्योंकि इससे अविद्याका नाश होता है अविद्याके नाशसे कर्मोका नाश और कर्मोंके नाशसे निद्रा तृष्णा भूख प्यास आदिके जरा भी दुःख नहिं भोगने पड़ते तथा वह अध्यात्मविद्या स्वाधीन है उसमें इंद्रिय आदिकी अपेक्षा नहिं है और वह सदा तेरे पास रहती है इसलिये हे आत्मन् ! तू उसीका ध्यान कर ॥ ४६॥ तावत्तापःक्षपयति वहिः क्लेशहेतुं शरीरं शैत्यं तावज्जनयति वहिर्वाह्यसौख्यानुपगं ६० प्रबोध आत्म Con अंतस्तापप्रशमनपटु त्यक्तजाड्यानुबंध नातःशैत्यं परिणमति ते यावदध्यात्मयोगात् ॥४७॥ अर्थ-हे आत्मन् ! वाह्य संतापके कारण तेरे शरीरको तभीतक ताप सता सकता है। और तभीतक वाह्य शीत भी तेरे लिये वाह्य सुख उत्पन्न कर सकता है। जबतक तेरी आत्मामें अध्यात्मविद्याके ध्यानसे अंतरंग संताप और जड़ताकी नाश करनेवाली अंतरंग शांति, प्रकट नहिं होती। भावार्थ-जवतक आत्मामें निराकुलतामय सुख और अखंडज्ञान-केवलज्ञान उदित न होगा तब तक तू इस वाहक्लेशके कारण भी शरीरको अपना मान तापसे नितांत दुःख सहेगा। वाह्य भी शीतसे अपनेको सुखी मानेगा परंतु जिस समय अध्यात्मध्यानके बलसे तुझै अविनाशी अंतरंग सुख प्राप्त होजायगा उससमय. तेरा समस्त संताप और जड़ता सर्वदाके लिये एक ओर किनारा कर जायगे ॥४७॥ अधिकमधिकृतं वाधिष्ठितं वा यदात्म- .

आत्म मधुोष ६२ न्यधिगमजनितं वा निस्तरंगांतरंगं निरवधि निरवद्यं वेदनं मुक्तिहेतुः स्फुटघटितनिरुक्तिः सैवमध्यात्मविद्या ॥४८॥ अर्थ-जो ज्ञान आत्मामें समस्त ज्ञानोंकी अपेक्षा अधिक हो, अधिकृत-नि- जाधीन हो, अधिष्ठित-आत्मस्वरूप हो, अधिगमसे उत्पन्न हुआ हो, निश्चल हो अंतरंग हो, असीम, निर्दोप, और मोक्षका कारण हो वही ज्ञान अध्यात्मविद्या है इसमकार अध्यात्मविद्याकी यह निरुक्ति बतलाई गई है। भावार्थ-जो ज्ञान सब- ज्ञानोंसे अधिक, निजाधीन, आत्मस्वरूप, अधिगमज, निश्चल, अंतरंग, असीम निर्दोष और मोक्षका कारण हो उसै अध्यात्मज्ञान समझना चाहिये और उससे मिन्न सब अविद्या है॥४८॥ स्वाध्यायध्यानभेदाविविधविधि तदध्यात्ममाहुनींद्राः स्वस्मिन् स्वस्य स्वकं वाध्ययनमिति भवत्यात्मसबद्धमाचं ६२.

-- प्रधबो आत्म ६३ views -- 16 Aar अक्षक्षेपोज्झितांतःकरणपरिणमध्येयनिर्ध्याननिष्ठं ध्यानं ध्यातुः स्वचित्तेऽचिरचितफलं मोहसंदोहमुक्त॥४९॥ अर्थ-भगवान जिनेंद्रने अध्यात्मविद्याके दो भेद बतलाये हैं स्वाध्याय और ध्यान, अपने अपनेका ( सम्यग्ज्ञान आदिका) वा अपना चितवन करना ऐसे आत्मसंबंधी ज्ञानका नाम स्वाध्याय है और बहुत जल्दी उत्तम फल प्रदान करने वाला और मोहका नाशक जो इंद्रियोंके व्यापारसे रहित केवल मनसे ध्येय-आ- त्मके, स्वरूपका चितवन करना है वह ध्यानरूप अध्य वह ध्यानरूप अध्यात्मविद्या है ॥ ४९ ॥ स्वाध्यायः स्यादितयविधिना धर्ममोक्षागमेषु प्रौढाभ्यासो वितरति स च स्वर्गलोकापवर्गों अस्वाध्यायो भवति स पुनर्योऽर्थकामश्रुतीनां । तस्यावा फलमिति सदा कुर्युराद्यं यतीशाः ॥५०॥ ! अर्थ-स्वाध्याय और अस्वाध्यायके भेदसे स्वाध्याय भीदो प्रकारका बतलाया ) ६३ प्रवोध आत्म ६४ है। उनमें धर्म वा मोक्षके स्वरूपको प्रतिपादन करनेवाले आगमोंका जो प्रौद्ररूपसे अभ्यास करना है उसै तो स्वाध्याय कहते हैं एवं उससे स्वर्ग और मोक्ष सुखोंकी प्राप्ति होती है । और अर्थशास्त्र वा काम शास्त्रोंका अभ्यास करना अस्वाध्याय तथा अस्वाध्यायका फल कार्यकारी न होकर निंदित होता है ऐसा जानकर मुनि गण स्वा-यायका ही आचरण करते हैं। भावार्थ-धर्म वा मोक्षके स्वरूपके वत- लानेवाले आगमोंका अभ्यास करना और अर्थशास्त्र वा कामशास्त्र जो कि आत्मा- को निज स्वरूपके ध्यानसे विचलित करनेवाले हैं उनका स्वाध्याय न करना तो स्वाध्याय है और धर्म वा मोक्षके स्वरूपके प्रतिपादन करनेवाले आगमोंका स्वा- ध्याय न कर अर्थशास्त्र वा कामशास्त्रका स्वाध्याय करना अस्वाध्याय है तथा इनमें स्वाध्याय कार्यकारी है क्योंकि उससे स्वर्ग मोक्ष सुखकी प्राप्ति होती है और अस्वाध्यायसे कुछ भी फल नहिं होता इसलिये आत्मकल्याणी मुनिगण स्वा- ध्यायका ही अवलंबन करते हैं ॥५०॥ मनोबोधाधानं विनयावनियुक्तं निजवपु- ६४ .

प्रधयो - आगम ६५ वचःपाठायत्तं करणगणमाधाय नियतं दधानः स्वाध्यायं कृतपरिणतिजैनवचने करोत्यात्मा कर्मक्षयमिति समाध्यंतरमिदं ॥५१॥ अर्थ-भगवान जिनेंद्रके वचनोंपर भलेप्रकार श्रद्धान करनेवाला जो मनुष्य अ- पने मनको ज्ञानकी ओर लगाकर शरीरको विनयी, वचनको जैन शास्त्रोंका पाठ करनेवाला और इंद्रियोंको नियमित बनाकर-वशकर स्वाध्याय करती है वह मनु- व्य समस्त कर्मोंका नाश करदेता है यह भी एकप्रकारकी दूसरी समाधि है। भावार्थ-जबतक मन वंचन काय और इंद्रियां वश न होंगे तब तक कभी स्वा- ध्याय नहिं हो सकता और विना स्वाध्यायके कर्मोंका नाश और स्वर्ग मोक्षका सुख मिलना असंभव है इसलिये जो मनुष्य स्वाध्यायप्रेमी हैं-स्वाध्यायको कार्य कारी समझते हैं उन्हें चाहिये कि वे पहिले मनको तो ज्ञानकी ओर झुकावें श- रीको विनयी, वचनोंको स्वाध्यायमें लीन और इंद्रियोंको वश करें पीछे स्वाध्याय RPAN --- 4

No text on this page.

7 आरम ६७ स्वाध्यायको अवलंबन नहिं किया जाता तबतक कभी इन कारणोंकी प्राति नाहिं होती इसलिये मोक्षामिलाषियोंको चाहिये कि वे अवश्य स्वाध्याय करें ॥५२॥ जैनागमादितरमध्ययनं विहाय श्रद्धापरः पठति यः शुचिभूमिदेशे शास्त्रे गुरौ च विनयेन समाहितः सन् तस्य श्रुतं गमयति श्रुतदेवतैव ॥ ५३॥ अर्थ-जैनशास्त्रोंसे भिन्न अर्थ काम आदि शाखोंका अभ्यास न कर जो मनुष्य पवित्र स्थानपर बैठकर बड़ी श्रद्धासे जैनशास्त्रोंका अभ्यास करता है और शास्त्र एवं गुरुओंमें भी विनयभाव रखता है उसे साक्षात् सरस्वती देवी ही शास्त्र ज्ञान प्रदान करती है-अर्थात् उसे शास्त्रोंकी श्रद्धा और गुरुभक्तिसे शास्त्र ज्ञान होता है।॥ ५३॥ पठति मनुते सर्वज्ञोक्तागमं वहु मन्यते ६७ प्रबोध मात्मा १८ मधुरवचनाचष्टे यः सभाप्रतिपादकैः कतिपयभवैस्तस्योत्पन्ने समुज्वलकेवले विलसति पटुर्दिव्या भापा जगत्त्रयवोधिनी ॥५४॥ अर्थ-जो मुनि भगवान सर्वजद्वारा प्रतिपादित आगमको पढ़ता है मनन करता है बहुत मानता है-आदरकी दृष्टिसे देखता है और समाके योग्य प्रिय वचनोंसे उनका व्याख्यान करता है उसे थोड़े ही दिनोंके बाद केवलज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है और उससमय उसके तीनों लोकोंको प्रबोधनेवाली दिव्यभाषा दिव्यध्वनि छटकने लगती है। भावार्थ-शास्त्रों के अभ्यास मन्त्र बनान और श्रद्धापूर्वक व्याख्यान करनेसे आत्मज्ञान होता है आत्मज्ञानसे कमाया नाश और फिर थोड़े ही भवोंके बाद केवलज्ञान प्रकट होजाता है तथा उससमय वह योगी अपनी दिव्यध्वनिसे जीवोंको धर्मका उपदेश देता है और उस उपदेशसे समस्त जीवोंको स्व और परका ज्ञान होता है ॥५४॥ ६८ प्रबोध आत्म ६९ व्रतनियमतपस्तेनापूर्णं जिताश्च परीषहा- विहितसकलो मुक्तारत्नावलीप्रमुखो विधिः मदनदमनीमहन्मुद्रां वहन्मुनिरादरा- नियमितमना यः स्वाध्यायं करोति मुहुर्मुहुः॥ ५५ अर्थ-जो मुनि कामदेवको वश करनेवाली मुनिमुद्राको धारणकर और मनको निश्चलकर वारवार स्वाध्याय करता है समझलेना चाहिये उसने व्रत नियम और तपोंका पूर्ण आचरण करलिया । परीषह भी जीत लीं और मुक्तावली रत्नावली आदि विधियोंका मी भलेप्रकार आचरण करलिया । भावार्थ-मुनिगण आत्मस्वरूपकी प्राप्तिकेलिये व्रत, नियम, तप, परीपहोंका विजय और मुक्तावली रत्नावली सिंहनिष्क्रीडित आदि उपवासोंका आचरण करते हैं परंतु उनके केवल १ मुक्तावली उपवासमें पचीस उपवास और नौ पारणा होती है तथा यह चौतीस दिनों समाप्त होता है। रत्नावली उपवासमें तीस उपवास और दश पारणा होती हैं यह चालीस दिनमें। समाप्त होता है उपवासोका विशेष वर्णन हरिबंशपुराणसे समझलेना चाहिये आत्म ७० स्वाध्यायसे ही ये बातें सिद्ध होजाती हैं अर्थात् स्वाध्यायके करनेसे परिणामोंमें निर्मलता बनी रहती है इसलिये स्वाध्याय ही परम व्रत है स्वाध्याय ही परम नियम और तप है स्वाध्याय ही परीपहोंका जय है और स्वाध्याय ही मुक्तावली रत्नावली आदि उपवास हैं ऐसा बतलाया है ॥ ५५ ॥ वहतु नियमादाचेलक्यं चिरं चरतु व्रतं क्षपयतु वपुः कायक्लेशैरलं यमधरणैः रचयति नचेन्नित्यं जैनश्रुताध्ययनं तदा विफलमखिलं स्वाध्यायो यतो न यतिर्यतिः॥५६॥ अर्थ-यदि प्रतिदिन जैन शास्त्रोंका अध्ययन न किया जायगा तो चाहे नग्नमुद्रा क्यों न धारली जाय, सदा व्रत भी क्यों न आचरण किये जाय, और जीवनपर्यंत कायक्लेशोंको करनेवाले संयम धारणकर शरीर मी क्यों न सुखा दिया जाय सब निष्फल जाते हैं क्योंकि स्वाध्याय ही यति न होने पर भी यति JOUR 22 ७० प्रबोध -n ७१ अर्थात् परम यति है। भावार्थ-नग्न मुद्राके धारण करने से व्रतोंके आचरण कर- नेसे और काय क्लेशोंसे शरीर कृशं करनेसे शांतिमय सुखकी प्राप्ति होती है। परंतु विना स्वध्यायके नग्नमुद्रा आदिका धारण करना व्यर्थ है इसलिये स्वा- भ्याय ही परम हितकारी है ॥५६॥ इतश्च स्वाध्यायादहरहरविश्रांतविहितात् परिश्रांतोऽत्यंतं यदि भवति विश्राम्यतु तदा वहिर्जल्पं मुक्त्वा शमसलिलनिस्पंदशिशिरं मुनिर्व्यानं धारागृहमिव सुखाय प्रविशतु ॥ ५७॥ अर्थ-हे आत्मन् ! प्रतिदिन अविश्रांतरूपसे आचरण किये हुये स्वाध्यायसे यदि किसी प्रकारकी तुझै थकावट मालूम हो तोतू वाहय जल्पको छोड़कर अविकल सुखके अनुभव करनेकेलिये शांतिरूपी शीतल जलके नीझरनोंसे शीतल धारागृह (फवारेके धर ) के समान ध्यानमें प्रवेशकर । भावार्थ-धूप आदिसे थका हुआ म- ७१ २, प्रबोध आत्म ७२ नुष्य जिसप्रकार शीतल जलके नीझरनोंसे व्याप्त धरागृहमें प्रवेश करता है और शांतिसुखका अनुभव करता है उसीप्रकार हे आत्मन् ! यदि तू प्रतिदिन लगातार स्वाध्यायके करनेसे थक गया है-सामर्थ्यके न होनेसे स्वाध्याय नहिं कर सकता तो तुझै ध्यान करना चाहिये क्योंकि ध्यान शांतिमयसुख प्रदान करनेवाला है ॥५७॥ कषायमलकश्मले विरसकायकुंडोदरे विधेर्वलवतो वशात्पतितमात्मचिंतामणिं समाध्यमलपावनांभसि विशोध्य गृह्णाति यः स याति पदमुत्तरोत्तरमनाद्यनंतं श्रियः ॥ ५८॥ अर्थ-विधिकी बलवत्तासे यह आत्मारूपी चिंतामणि रत्न, कषायरूपी मल- से मलिन नीरस शरीररूपी कुंडमें गिरगया है परंतु जो मनुष्य उस कुंडसे नि- कालकर और समाधिरूपी निर्मल पवित्र जलसे शुद्धंकर इस ग्रहण करता है वह स्वर्ग आदिके सुख भोगकर मोक्षसुखको भोगता है । भावार्थ-जिसप्रकार मलिन १७२ प्रबोध आत्म ७३ जलसे भरे कुंडमें गिरे हुये चिंतामणि रत्नको पाकर उसै शुद्ध जलसे शुद्धकर मनुष्य परम संतोप मानता है उसीप्रकार कपायोंसे मलिन शरीरमें अना- दि कालसे पड़ेहुये इस आत्माको भी जो मनुष्य समाधिवलसे शुद्धकर ग्रहण करता है उसै स्वर्ग आदिके सुखके साथ निराकुलतामय सुखकी प्राप्ति होती है ॥५८ ॥ तदातं रौद्रं च स्वकपरिणतेधर्म्यमपरं परं शुक्लं शुक्लोल्लसदविकलद्योतिरुदयं चतुर्धे किंतु प्रथमामिह हेयं समलमि- त्युपादेयं प्राज्ञैरमलमितरध्यानयुगलं ॥ ५९॥ अर्थ-आर्त रौद्र धर्म्य और' शुल्कके भेदसे ध्यान चार प्रकार है उनमें आर्त रौद्र तो छोड़ने योग्य हैं क्योंकि ये मलिन हैं-आत्माको मलिन बनानेवाले हैं और धर्म्यध्यान, शुल्कध्यान ग्रहण करने योग्य है क्योंकि ये निर्मल हैं इनके द्वारा आत्मा शुद्ध होता है तथा धर्म्यध्यान आत्माकी परिणति स्वरूप है इसलिये . , ७३ Mall rammmmmmmm प्रयोंध आम ७४ अपर है और शुल्कध्यान अविकल अखंड तेजका धारक है इसलिये पर-उत्कृष्ट ॥५९॥ हेतू तिर्यग्गतिनरकयोरातरौद्राभिधाने ध्याने दूरादमलमतिभियोंगिभिर्वर्जनीये . धर्मध्यानात्रिदिवपदवी मुक्तिसाम्राज्यलक्ष्मीः शुक्लध्यानात्तदुभयमनुष्ठेयमुच्चैःप्रतिष्ठं ॥६॥ अर्थ-आर्त और रौद्र ध्यान तिर्यंच और नरकगतिके कारण है अर्थात् आर्त और रौद्र भ्यानके धारक मनुष्योंको तिर्यच और नारकी होना पड़ता है इसलिये जो योगी विद्वान है-निर्मल बुद्धिके धारक हैं उन्हें इन दोनों ध्यानोंका सर्वथा त्याग करदेना चाहिये तथा धर्म्यध्यानसे स्वर्ग सुख और शुल्कध्यानसे मोक्ष सुखकी प्राप्ति होती है इसलिये इन दोनों ध्यानोंको सर्वोत्तम मान इनका भलेप्रकार आराधन करना चाहिये ॥६०॥ 'अनिष्टयोगप्रियविप्रयोगप्रभृत्यनेकार्तिसमुद्भवत्वात् ७४.

- भवोद्भवार्तेरथ हेतुभावाद्यथार्थमेवार्तमिति प्रसिद्धं ॥६१॥ अर्थ-आर्तध्यान अनिष्टका वियोग आदि अनेक दुःखोंसे उत्पन्न होता है। और जितने संसारके दुःख हैं उनकी उत्पत्ति भी इसीसे होती है इसलिये वास्त वमें इसका नाम आत-पीड़ासे होनेवाला है। भावार्थ--आर्तिका अर्थ पीड़ा है और जो ध्यान पीड़ासे हो वह आर्तध्यान है। यह आर्तध्यान दुष्ट स्त्री दुष्ट पुत्र सर्प सिंह आदि अनिष्ट पदार्थोंके संयो गसे आर उत्तम स्त्री उत्तम पुत्र द्रव्य आदि पदार्थोंके वियोगसे होता है एवं इससे संसारके समस्त दुःख भोगने पड़ते हैं ॥ ६१ ॥ पुंसां यदुत्पत्तिनिमित्तभूता रोषादयो रौद्रतमाः कषायाः रौद्रस्य दुःखस्य च रौरवादेर्यत्कारणं तत्किल रौद्रमाहुः ॥६२॥ अर्थ--जो ध्यान क्रोध मान आदि अतिशय रुद्र कषायोंका कारण हो और जिससे नरक आदिका दुःख भोगना पड़े उसका नाम-रौद्रध्यान है-अर्थात् रौद्र- - ७५ प्रबोध आत्म ७७ क्योंकि अहंकार तो तेरेलिये कैदखाना है । उसका परकोट ममता है । अतिशय निविड़ और लोहकी वनीहुई वेडियां महामोह है। और कैदखानेके द्वारपर तेरी कड़ी रूपसे देखरेख करनेवाले क्रोध मान माया और लोभ चार कपाय चार सि- पाही हैं तुही बता तुझै मोक्षकी प्राप्ति हो तो कैसे हो ? भावार्थ--हे आत्मन् ! सदा तेरे परिणाम अहंकार ममता मोह और क्रोध मान माया और लोभमय बने रहते हैं और इन परिणामोंके आधीन हो अनेक प्र- कारके क्लेश भोगता हुआ तू इस संसारमें भ्रमण करता रहता है कभी तुझै स- न्मार्गकी ओर ध्यान लगानेका अवसर ही नहिं मिलता । फिर बता तुझै मोक्ष मिलै सो कहांसे मिले ? ॥ ६४ ॥ एतैःकेत्र न के हतास्तदपि हि त्वं विप्रलुब्धोऽसि किं माधुर्येण च मार्दवेण च घनस्नेहेन रूपेण च दुर्वाऐंद्रियतर्पणार्पितमनास्तन्मात्मनाशं कृथा ७ आत्म प्रबोध ७८ मैतान भुंक्ष्व सखे विमुंच विषयानंतर्विषान्मोदकान् ॥ ६५ अर्थ---हे मित्र आत्मन् ! इन विषयोंसे संसारमें बहुतसे नष्ट हुये-ठगे गये हैं तब भी तू इनकी मधुरिमा सरलता स्नेह और और सुन्दर रूपसे ठगा जाता है और रात दिन इंद्रियोंके तृप्त करनेमें लगा रहता है यह बड़ाआश्रर्य है । अरे! तू अपनी आत्माको नष्ट न होने दे और इन विषयोंका भोग न कर सर्वथा छोड़दे क्योंकि ये विषय भीतर छिपेहुये विषसे युक्त मोदक हैं। भावार्थ-जिसप्रकार विषयुक्त लाडू पहिले खानेमें मधुर पश्चात् थोड़ी देर बाद प्राण ही लेकर छोड़ता है उसीप्रकार ये विषय पहिले तो स्वादिष्ट लगते हैं परंतु पीछे अचिंत्य दुःख देते हैं इसलिये हे आत्मन् ! तू इन्हें मधुर कोमल मान वा स्नेह करनेवाले और सुंदर जान इनकी ओर लालायित मत हो देख ! इनसे बहुतसे मनुष्य ठगे गये हैं और तू भी ठगा जायगा तथा विषयोंके सेवनसे तेरी आत्मा भी नष्ट भ्रष्ट होगी इसलिये तू इनका सर्वथा सेवन करना छोड़ दे॥६५॥ एणीहशोत्र विषमा विषवल्लरीस्त्वं -1 - . - प्रबोध आत्म ७९ जानन्नपि त्यजसि किं न हितोद्यतस्ताः व्यामोहमेव जनयंत्युपभुज्यमानाः प्राणान हरंति विषये मदनातुरस्य ॥६६॥ अर्थ-आत्मन् ? तू तो अपना हित करना चाहता है इसलिये यह जानकर भी कि ये स्त्रियां महाविषम विषलताके समान हैं क्यों नहि इन्हें छोड़ देता। देख! विषयकालमें जिससमय इनके साथ संभोग किया जाता है उससमय ये कामपीड़ित मनुष्यको मूढ़ बनादेती है और प्राणरहित करदेती हैं। भावार्थ-जिसप्रकार विपलता जीवको अचेतन और प्राण रहित करदेती है उसीप्रकार स्त्रियां भी जीवको मूढ़ और प्राणरहित करनेवाली हैं इसलिये स्त्रियोंको विषलताके समान मानकर उनका सर्वथा त्याग करदेना चाहिये ॥६६॥ मेदो मज्जवसास्थिरक्तपिशितस्नायुस्त्वगंत्रामिका जानंतोऽपि नवीनयौवनलसल्लावण्यरूपामिमा ७९ आत्म प्रयोग ८० मन्वाना रमयति तदिरहिता सीदति मानोद्धताः आनम्यानुनयंति योषितमहो कोऽपि ग्रहाकामिनां ॥ ६७ ॥ अर्थ-कामी पुरुष यह जानकर भी कि सी मेदा मज्जा बसा हड्डी रक्त मांस स्नायु चर्म और आंत स्वरूप है उसै नवीन यौवनसे देदीप्यमान लावण्य- स्वरूप मानते हैं उसके साथ मन माना विषयभोग करते हैं और रूठ जानेपरमा- नसे उद्धत होनेपर भी अतिशय नम्र हो उसका अनुनय-चावलूसी भी करते हैं तथा उसके विरहमें कातर हो निकलते हैं इसलिये जानपड़ता है कामी पुरुषोंके- लिये स्त्री एक विचित्र ग्रह है । भावार्थ-जिसप्रकार ग्रह वा पिशाचर्के चक्रमें गड़कर मनुष्य अंडवंड काम करने लग जाता है और उसे करने न करनेका कुछ भी होश नहिं रहता उसीप्रकार स्त्रीके चक्रमें पड़कर भी मनुष्य जान बूझकर पागल हो जाता है । वह यह जानकर भी कि स्त्री मेदा मज्जा रक्त मांस आदि अपवित्र था. तुओंसे बनी हुई है उसै लावण्य स्वरूप मानता है और उसके साथ रमण कीड़ा करता है उसके विरहमें कातर हो पागल हो जाता है और कुद्ध हो जानेपर बड़ी न- प्रबोध आत्म ८१ र प्रतासे चालूपसी करता है ॥६७॥ कांतिव्यंजनमंजनं नयनयोबिबाघरे रंगक- तांबूलं मृगनाभिपत्रलतिकागंडस्थलीमंडनं गात्रे कुंकुमलंभिते लवणिमेत्याहार्यमणीदृशां सौंदर्य न तथेति पश्यति जनो रागेण पश्यन्नपि ॥ ६८॥ अर्थ-स्त्री, कांति तो अपने शरीरमें उपटन आदिसे उत्पन्न करती है । नेत्रोंको काजल लगाकर और ओठोंको पान चवाकर सुहावना बनाती है । कपोलोपर कस्तूरीसें चित्र रचना करती है और शरीरको केसर. लगाकर सुंदर लावण्यमय बनाती है इसप्रकार स्त्रीका जितनाभर सौंदर्य है सब कृत्रिम है और यह मनुष्य मी इसबातको मलेप्रकार जानता है परंतु यह ऐसे गाढ़ रूपसे रागके जालमें फसा हुआ है कि उस सौंदर्यको कृत्रिम न मानकर स्वाभाविक मानता है। भावार्थ- यदि त्रियोंमें स्वाभाविक सौंदर्य होता तो उनके जालमें फसना और उनपर अनु- ब्ल जात्म प्रबोध ८२ राग करना उचित होता, सो तो है नहीं, वे उपटन काजल पान आदि पदा- अॅसे अपना सौंदर्य वनाती हैं क्योंकि यदि उनमें स्वाभाविक सौंदर्य होता तो काजल पान आदि पदार्थोंका अवलंबन वे क्यों करतीं ? परंतु यह जीव इतनारा- गांध है कि सब कुछ जानकर भी पागल होजाता है और स्त्रियोंसे अपनीलालसा नहिं हटाता ॥ ६९॥ रूपं संध्याभूरूपं लवणिमविभवोंऽभाधिकल्लोललोल: शैलोत्संगापगेव स्वयमसकृदधःपातिनी यौवनश्रीः सौभाग्यश्रीः समीराहतकुसुमरजोराजिवद्भगुरेति व्यालोलालंबनवादरतिरिव रतिर्मुच्यतां चंचलैषा ॥६९॥ अर्थ-स्त्रीका रूप तो संध्याकालके बद्दलोंके समान चंचल है । लावण्य, समु- द्रकी तरंगोंके समान देखते २ नाश होनेवाला है। यौवनकी शोभा, पर्वतकीन- दीके समान प्रतिसमय नीचे गिरनेवाली है। और सौभाग्य पवनसे प्रेरित पुष्पकी प्रबोध ८३ रजके समान क्षणभंगुर है इसप्रकार उसकी रूप आदि समस्त बातोंको चंचल जा- नकर द्वेषके समान उसमें राग भी न करना चाहिये-उससे सर्वथा प्रेम हटा देना चाहिये । भावार्थ-स्त्रियोंके मनोहर रूप आदि देखकर उनमें अरति-द्वेष नहिं होता राग परिणाम हो जाते हैं परंतु यह ठीक नहीं क्योंकि जिसप्रकार सांझके समय बद्दल रंग विरंगे दीखते हैं और देखते देखते नष्ट हो जाते हैं वैसा तो इसका रूप है । समुद्रकी तरंगे टकराकर जल्दी नष्ट हो जाती हैं वैसा इसका ला- वण्य है । पर्वतकी नदी जिसप्रकार प्रतिसमय नीचे गिरती है वैसा इसका यौवन मी दिनोंदिन ढलता रहता है। और जिसप्रकार पवनसे प्रेरित पुष्पकी रेणु दे- खते २ लापता हो जाती हैं उसीप्रकार इसका सौभाग्य भी क्षणभरमें विनष्ट हो जाता है इसलिये इसके रूप आदिको सर्वथा क्षणभंगुर मान कदापि इसमें प्रेम न करना चाहिये ।। ६९॥ आयुर्वीयुहतार्कतूलतरलं शंपेव संपञ्चला छायांक्रीडनयंत्रपुत्रकनिभः पुत्रादिमेलापकः :- - त्मि प्रबोध ८२ राग करना उचित होता, सो तो है नहीं, वे उपटन काजल पान आदि पदा- थोंसे अपना सौंदर्य बनाती हैं क्योंकि यदि उनमें स्वाभाविक सौंदर्य होता तो काजल पान आदि पदार्थों का अवलंबन वे क्यों करतीं ? परंतु यह जीव इतनारा- गांध है कि सब कुछ जानकर भी पागल होजाता है और स्त्रियोंसे अपनी लालसा नहिं हटाता ॥ ६९॥ रूपं संध्याभूरूपं लवणिमविभवोंऽभोधिकल्लोललोल: शैलोत्संगापगेव स्वयमसकृदधःपातिनी यौवनश्रीः सौभाग्यश्रीः समीराहतकुसुमरजोराजिवदंगुरेति व्यालोलालंबनवादरतिरिव रतिर्मुच्यतां चंचलैषा ॥६९॥ अर्थ-स्त्रीका रूप तो संध्याकालके बद्दलोंके समान चंचल है । लावण्य, समु- द्रकी तरंगों के समान देखते २ नाश होनेवाला है । यौवनकी शोभा, पर्वतकी न- दीके समान प्रतिसमय नीचे गिरनेवाली है। और सौभाग्य पवनसे प्रेरित पुष्पकी ६२ प्रबोध आत्म रजके समान क्षणभंगुर है इसप्रकार उसकी रूप आदि समस्त बातोंको चंचल जा- नकर द्वेषके समान उसमें राग भी न करना चाहिये-उससे सर्वथा प्रेम हटा देना चाहिये । भावार्थ-स्त्रियोंके मनोहर रूप आदि देखकर उनमें अरति-द्वेष- नहिं होता राग परिणाम हो जाते हैं परंतु यह ठीक नहीं क्योंकि जिसप्रकार सांझके समय बद्दल रंग विरंगे दीखते हैं और देखते देखते नष्ट हो जाते हैं वैसा तो इसका रूप है । समुद्रकी तरंगे टकराकर जल्दी नष्ट हो जाती हैं वैसा इसका ला- वण्य है । पर्वतकी नदी जिसप्रकार प्रतिसमय नीचे गिरती है वैसा इसका यौवन मी दिनोंदिन ढलता रहता है । और जिसप्रकार पवनसे प्रेरित पुष्पकी रेणु दे- खते २ लापता हो जाती हैं उसीप्रकार इसका सौभाग्य मी क्षणभरमें विनष्ट हो जाता है इसलिये इसके रूप आदिको सर्वथा क्षणभंगुर मान कदापि इसमें प्रेम न करना चाहिये ।। ६९॥ आयुर्वायुहतार्कतूलतरलं शंपेव संपञ्चला छायांक्रीड़नयंत्रपुत्रकनिभः पुत्रादिमेलापकः UGU ܕܝܨ प्रबोध ८३ रजके समान क्षणभंगुर है इसमकार उसकी रूप आदि समस्त बातोंको चंचल जा- नकर देषके समान उसमें राग भी न करना चाहिये-उससे सर्वथा प्रेम हटा देना चाहिये । भावार्थ-स्त्रियोंके मनोहर रूप आदि देखकर उनमें अरति-द्वेष नहि होता राग परिणाम हो जाते हैं परंतु यह ठीक नहीं क्योंकि जिसप्रकार सांझके समय बद्दल रंग विरंगे दीखते हैं और देखते देखते नष्ट हो जाते हैं वैसा तो इसका रूप है। समुद्रकी तरंगे टकराकर जल्दी नष्ट हो जाती हैं वैसा इसका ला- वण्य है। पर्वतकी नदी जिसप्रकार प्रतिसमय नीचे गिरती है वैसा इसका यौवन मी दिनोंदिन ढलता रहता है । और जिसप्रकार पवनसे प्रेरित पुष्पकी रेणु दे- खते २ लापता हो जाती हैं उसीप्रकार इसका सौभाग्य भी क्षणभरमें विनष्ट हो जाता है इसलिये इसके रूप आदिको सर्वथा क्षणभंगुर मान कदापि इसमें प्रेम न करना चाहिये ।। ६९॥ आर्युवायुहतार्कतूलतरलं शंपेव संपञ्चला छायांकीड़नयंत्रपुत्रकनिभः पुत्रादिमेलापकः ८३ 00 आरम प्रबोध ८४ संसारस्थितिरिंद्रजालिककलाकल्पति संकल्प्यतां चिंत्ते वास्तवतामवास्तवतमेश्वेतेषु मात्वं कृथाः ॥७॥ अर्थ- हे आत्मन् ! मनुष्योंकी आयु तो पवनसे प्रेरित आककी रुईसे समान चंचल समझ लेनी चाहिये । संपत्ति विजलीके समान क्षणभंगुर, पुत्र आदिका मि- लाप चित्रके खिलोनेके समान और संसारकी स्थिति इंद्रजालकी रचनाके समान जाननी चाहिये तथा आयु आदिके अंदर जो तेरा यह श्रद्धान बैठा है कि ये वा- स्तविक-सत्य हैं वह श्रद्धान भी दूर करदेना चाहिये । भावार्थ-मूलमनुष्य आयु और संपत्ति आदि पदार्थोंको सच्चे और नित्य मानते हैं परंतु यह उनकी बड़ी भारी भूल है क्योंकि आयु देखते २ आककी रुईके समान क्षणभंगुरमें नष्ट हो जाती है । संपत्ति विजलीके समान क्षणभंगुर है । पुत्र आदिका संबंध, तस्वीरकी पुतली आदि खिलौनेके समान अकार्यकारी हैं और इंद्रजालमें जैसे नवीन २ प- दार्थ दीख पड़ते हैं और नष्ट होजाते हैं उसीप्रकार यह संसारकी स्थिति है अर्थात् कमी इसमें देवपर्याय तो कभी मनुष्य पर्याय धारण की जाती है और वह नष्ट २ ८४ प्रबोध्र होजाती है इसलिये हे आत्मन् ! तुझे आयु आदि पदार्थ नित्य वा वास्तविक कमी न समझने चाहिये ॥७०॥ कनकमृगतृषार्तो विदिषन्नीतसीता- विरहकृतमयासील्लाघवं राघवोऽपि कनकमृगतृषाति मुंच नो चेत्तवापि ध्रुवमविकलबुध्या सीतया स्यादियोगः ॥ ७१॥ अर्थ-हे आत्मन् ? जिससमय रावणने सुवर्णमयी मृगके रूपधारी मारीचके द्वारा सीताका हरण कराया था उससमय सुवर्णमय मृगकी तृष्णासे प्रेरित रामचं द्रको जैसा सीताके वियोगसे अधिक संताप हुआ था उसीप्रकार यदि तू भी सुव- र्णकी तृष्णा करेगा तो तेरेभी शांतस्वरूप निराकुलतामय बुद्धिका वियोग होजायगा और तुझे भी उसके वियोगसे संताप सहना पड़ेगा । इसलिये तू सुवर्णकी तृष्णाको छोड़दे भावार्थ-यह कथा लोक प्रसिद्ध है कि जिससमय रावणने सीताका हरण क- ... ८५ प्रवोध ८६ राया था उससमय रावणकी आज्ञानुसारमारीच सुवर्ण मृगवन जहां रामचंद्र और सीता बैठे थे वहां आया था ज्योंही सीताने उसै देखा वह उसपर मुग्ध होगई और उसै लानेकेलिये उसने रामचंद्रसे आग्रह किया । यद्यपि रामचंद्र इसबातको जा- नते थे कि सुवर्णका मृग होना असंभव है तथापि सीताके आग्रहसे वे उसै पक- इने चलदिये । वह मृग मायामयी था इसलिये बड़े झपाटेसे दूरतक निकलगया। राम भी बराबर उसका पीछा करते गये, और इधर सीताको हरणकर रावण चलता बना जब रामचंद्रने पीछे आकर देखा तो सीताको न पाया और उसके वियोगमें उन्हें अति संताप हुआ। हे आत्मन् ! रामचंद्रके समान यदि तू भी सुवर्णका लो- लूपी बनेगा-उसे अपनाना चाहेगा तो याद रख । तुझे मी शांति प्रदान करनेवाले निराकुलतामय ज्ञानसे जुदा होना पड़ेगा और अचिंत्य कष्ट भोगना होगा इसलिये तुझै सुवर्णकी लालसा सर्वथा छोड़देनी चाहिये ।। ७१ ॥ या पंचेद्रियभर्तृदर्शितरतिर्यापार्थसंतोषिणी या विस्फूर्जति नित्यनूतनसती कामानलज्वालिता .

2 प्रबोध सात्म ८७ या गोत्रक्षयकारिकारितकालः कृष्णेव तृष्णा भृशं श्रेयःसंगमकारिणी कथमहो तस्याःप्रवृत्तिर्भवेत् ॥ ७२ ॥ 'अर्थ--संसारमें जो तृष्णा मालूम पड़ती है वह साक्षात् द्रोपदीके समान है क्योंकि द्रौपदी जैसी-(पंचेंद्रियभदर्शितरतिः) पांचो इंद्रियोंके समान युधिष्ठिर भीम अर्जुन नकुल सहदेव पांचों पतियोंमें प्रेम दिखानेवाली थी उसीप्रकार यह तृष्णा मी पांचो इंद्रियोंको तृप्त करनेवाली है । दौपदी जैसी (पार्थसंतोषि- णी)अर्जुनको संतुष्ट करनेवाली थी उसीप्रकार यह भी अपार्थ-निंदित पदार्थो में सं- तोष करानेवाली है। द्रौपदी जिसप्रकार (कामानलज्वालिता नित्यनूतनसती) परम कामिनी होनेपर भी सदा नूतन सती पनी रहती थी उसीप्रकार यह भी कामा- नलको दीप्त करनेवाली और सदा नवीन नवीन हुआ करती है। द्रौपदी जैसी ( गोत्रक्षयकारिकारितकलिः) वंशविध्वंस करनेवाली कलह मचानेवाली थी उसीप्रकार तृष्णा भी वंशको नष्ट करनेवाली कलह उत्पन्न करती रहती है-तृष्णा करनेवाले मनुष्यको सदा दूसरोंसे झगड़ा और कलह करनी पड़ती है इसलिये ८७ ।

आत्म प्रबोध ८८ ऐसी तृष्णा करनेसे मोक्षका समागम मिलै सो कैसे मिलै ! भावार्थ-अन्य लोग ऐसा मानते हैं कि द्रौपदी पांचो पांडवोंकी स्त्री थी। स्नेह उसका पांचोंपर था परंतु अर्जुनको वह विशेष चाहती थी। अधिक कामिनी होनेपर भी सती वजती थी और उसीने गोत्रको क्षय करनेवाली महाभारतकी कलह माचाई थी ठीक ऐसी ही यह तृष्णा है क्योंकि इससे पांचो इंद्रियोंका पोषण होता है । यह दुष्क- मोंकी ओर झुकानेवाली है। प्रतिदिन नूतन २ होनेवाली, और जीवोंको कामा- नलसे दीप्त करनेवाली है और इसी तृष्णाके महात्म्यसे गोत्रमें दिनरात कलह मची रहती है इसलिये इस तृष्णासे कभी मोक्ष सुख नहिं मिल सकता ॥ ७२ ॥ त्व,रत्नत्रयधाम धाम भवतः कायोयमत्र स्थितः साधीयः किल साधयिष्यसि पदं सम्यक् समाधानतः तत्संशोषितसप्तधातुनिचयाद्धभंगभीमेक्षणा- न्मैनं नाशय रक्ष रक्ष विषमक्रोधाख्यरक्ष:पतेः॥ ७३॥ 2 ८८.

प्रबोध ८९ - ' अर्थ है आत्मन् ! तू तो सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र स्वरूप रत्नत्रयका घर है और तेरा घर इस समय यह शरीर है । समाधिवलसे यदि तू इस शरीरसे उत्तमपद मोक्ष प्राप्त करना चाहता है तो तू इस शरीरको क्रोधरूपी राक्षसके फंदमें न फसने दे, बडी सावधानीसे इसकी उससे रक्षाकर क्योंकि वह राक्षस हड्डी मांस चर्म आदि सात धातुओंके पिंडस्वरूप इस शरीरको सुखानेवाला है और जिससमय इसका प्रकोप होता है उससमय भृकुटियोंकी कुटिलतासे नेत्र महा भयंकर हो जाते हैं। भावार्थ--जिसमकार राक्षस शरीरको भक्षण कर जाता है और उसकी भृकुटी चढ़ी रहती हैं इसलिये नेत्र महाभयंकर मालूम पडते हैं उसीप्रकार यह क्रोध भीधीरे धीरे कृश करता हुआ शरीरको भक्षण कर जाता है और इसके प्रकोपसे भृकुटी चढी रहती हैं इसलिये नेत्र महाभयंकर होजाते हैं। हे आत्मन् ! तू स्वयं रत्नत्रयका घर होनेपर भी इससमय तेरा घर शरीर है और इससे तुझे सबसे बडा कार्य मोक्ष सिद्ध करना है इसलिये इस क्रोधरूपी राक्षससे इस शरीरकी रक्षाकर-व्यर्थ नष्ट न होने दे ॥७३॥ ९८ आत्म प्रबोध यदुपरि भवदीयः क्रोधवह्निः प्रदीप्त- स्तमिह दहतु मा वा त्वां दहत्येव तावत् अरणिमिव हुताशःस्वाश्रयाशस्तथासौ प्रशमधनंजलौघेहंत हंतव्य एव ॥ ७४॥ अर्थ-हे आत्मन् ! जिस मनुष्यपर तेरी क्रोधाग्नि प्रदीप्त हुई है वह जलै या जलै तू तो पहिले जल ही जाता है क्योंकि यह क्रोधाग्नि, अपने आश्रयको मी नष्ट करनेवाली बंशसे उत्पन्न अग्निके समान है इसलिये शांति रूपी मेघके ज- लसे इसका सर्वथा नाश करदेना चाहिये-कदापि क्रोधमय परिणाम न करने चाहि- ये । भावार्थ-जिसप्रकार दो वांसोंके परस्पर घिनसे उत्पन्न हुई अग्नि प्रथम तो अप- ने आधार वासोंको जलाकर खाक करदेती है पश्चात् समस्त वनको भस्म करडालती है अथवा वन भस्म हो या न हो अपने आधारको तो अवश्य खाक करदेती है उसीप्रकार क्रोधरूप अग्नि मी प्रथम तो आत्माको जला देती है-उसै स्वरू- ९० प्रबोध ९१ पसे विचलित करदेती है और पीछे दूसरे जीवोंको नष्ट करती है-उनके परिणा- मोंको खलवला देती है अथवा क्रोधसे दूसरेका अहित हो या न हो अपना तो अवश्य अहित होजाता है इसलिये जिसप्रकार मेघके जलसे वनाग्नि नष्ट करदी जाती है उसीप्रकार समतासे क्रोधका भी नाश करदेना चाहिये ॥ ७४ ॥ स्पष्टाष्टदर्शितमदं विनयांकुशेन मानदिपं नियमय त्वमखंडितेन आरोहको भवसि येन सुभद्रजातेः सदोधसिंधुरपतेः शुभलक्षणस्य ॥७५॥ अर्थ-हे आत्मन् ! ज्ञान पूजा आदि आठ मदोंको स्पष्ट रूपसे धारण करने- वाले मानरूपी हाथीको तू अखंडित विनयरूपी अंकुशसे यशकर जिससे तू अने- क शुभलक्षणोंके धारक अतिशय उत्तम सम्यग्ज्ञानरूपी ऐरावतपर सवार हो सके। भावार्थ-जिसप्रकार मदसे मत्त सामान्य हाथीको अंकुशसे वशकर महावत उत्तम ९१ आत्म प्रवोध ९२ हाथीपर-चढ़नेके योग्य होता है उसीप्रकार हे आत्मन् ! जिससमय तू-मैं ज्ञानी हूं वलवान हूँ, इत्यादि मदोंके करानेवाले अभिमानको छोड़ देगा उससमय तुझै अ- खंड ज्ञान-सम्यग्ज्ञानकी प्राप्ति होगी-मानको बिना दूर किये सम्यग्ज्ञान प्राप्त नहिं होसकता ॥७५॥ अहं सुरूपः सुभगो युवाह, शूरोहमाब्योऽहमहं विपश्चित अहं स इत्यावहतो विकल्पान्, न कल्प्यते हंस पदोदयस्ते॥७६॥ अर्थ--हे आत्मन् ! जबतक तू-मै रूपवान हूं, सुंदर हूं, युवा हूं, शूर वीर हूं धनवान हूं, और विद्वान हूं, इन विकल्पोंमें फसा रहेगा तब तक तुझै कभी आत्मस्वरूपकी प्राप्ति नहिं हो सकती-रूपआदिका अभिमान आत्मस्वरूपकी प्राप्तिमें बाधक है ।। ७६ ॥ अंतर्निगूढघृतरौद्रकषायसा- श्छन्ना वहिःकपटकूरपिधानकेन AUGU ९२ मायाहिडिककरंडकमंडलीव मा पश्यतां कुशलिभिः कुशलोदयाय ॥७७॥ ५१ अब हे आत्मन ! यह माया सपेड़ीकी पिटारी है क्योंकि इसके भीतर तो महाभयंकर कपायरूपी सर्प छिपे हुये हैं और बाहिर वह कपटरूपी पारेसे ढकी हुई है इसलिये जो मनुष्य अपनी आत्माका कल्याण चाहनेवाले हैं उन्हें चा- हिये कि वे अपनी कुशलताकेलिये इस मायाकी ओर झांककर भी न देखें । भा- कार्य-शिमप्रकार मपेड़ीकी पिटारीमें भीतर सर्प भरे रहते हैं और ऊपर पारा ढका रहता है उगीप्रकार मायानारी मनुष्य के भीतर तो क्रोध आदि कपाय विद्यमान रहते है और आरसे बान ऐसी करना है कि भीतरी क्रोध आदिका पता नहिं लगने देवा-रूपदमे यह विलाल सीधा साधा भोला बन जाता है और दूसरों के अहिन करने मी नहिं कता इसलिये विद्वानोंको मायाका सर्वथा त्याग कर- देना चाहिये ।। ७७ ॥ ९३ . प्रबोध • ९५ . शश्वनासाग्रपाली-घनघटितदृशो धीरवीरासनस्था- ये निष्कंपाः समाधेर्विदधति विधिनारंभमारंभकास्ते ॥८॥ अर्थ--जो महानुभाव बंदरके कमान चंचल मनके रोकनेकेलिये स्वभावसे वामुनि आदिके संसर्गसे विरक्त होकर, धीर वीर आसनको मादकर, एकांत स्थानमें स्थित होते हैं और नासिकाके अग्रभागमें अपनी दृष्टि लगाकर निश्चल हो विधिपू- वक समाधिका आरंभ करते हैं वे आरंभक ध्याता कहे जाते हैं। भावार्थ-जबतक मन वशमें नहिं होता तबतक समाधिका आरंभ भी नहिं हो सकता और मन वश उसीसमय होता है जब कि संसारसे सर्वथा ममत्व छोड़कर, दृढ़ आसन मादकर नासाग्र दृष्टि हो, एकांत स्थानमें स्थिति की जाती है । इसलिये जो मुनि इसरूपसे मनको वशकर समाधिका प्रारंभ करते हैं वे आरंभक ध्याता कहे जाते हैं ॥८॥ हंहो मानस ! किं विभो ! भ्रमसि किं ! व्याकृष्टमत्रंद्रियः कस्मिन् ! वैषयिके सुखे तदसुखं किं सौख्यमेकाग्रता : ९५ आत्म प्रमोद ९६ सास्यात्केन ? समाधिना कस! मयि कासि त्वमस्मिन्नहं पश्यांतर्विश जीवदेव सुचिरं दृष्ट्या प्रसादं कुरु ॥ ८१॥ अर्थ-आत्मदेव और मनका आपसमें संवाद (जीवदेव) अरे मन (मन) महाराज ! (आत्मा) क्यों भ्रमण करते हो ? (मन) इंद्रियोंके आधीन हो । (आत्मा) कहां? (मन) विषय सुखमें । (आत्मा) अरे भाई बहतो दुःख है-सुख नहीं । (मन) सुख क्या है ? (आत्मा) एकाग्रता-निराकुलता । (मन)वह कैसे प्राप्त होती है ? (आत्मा) समाधिसे । (मन) वह कहां है ? (आत्मा) मुझमें । (मन) तुम कहां हो ? (आत्मा)समाधिमें यदि निश्चय न होतो भीतर बैठकर देखो। (मन) हे देव ? यदि ऐसा है तो मुझपै प्रसन्न हों-मुझे अपनेमें निश्चल होकर रहनेकेलिये स्थान दें।भावार्थ-इस श्लोकमें आत्माने मनको इसप्रकार समझाया है कि हे मन! तू इंद्रियोंके आधीन हो विषय सुखमें क्यो फसा हुआ है ? यह विषय सुख, सुख नहिं परम दुःख है किंतुः सुख निराकुलता है वह समाधिसे प्राप्त होती है समाधि प्रबोध ९७ मुझमें और मैं समाधिमें लीन हूं यदि इसबातको तू मिथ्या माने तो भीतर प्रविष्ट होकर देख और चंचलता छोड़कर वहां निराकुलतामय सुखका अनुभव कर ॥८१॥ कुर्वाणो मरुदासनेंद्रियमनःक्षुत्तर्षनिद्राजयं योऽतर्जल्पनिरूपणाभिरसकृत्तत्त्वं समभ्यस्यति । सत्त्वानामुपरि प्रमोदकरुणामैत्रीभृशं मन्यते ध्यानाधिष्ठितनिष्ठयाभ्युदयते तस्येह तनिष्ठना॥८२॥ अर्थ-जो योगी काम, इंद्रिय, मन, क्षुधा, तृष्णा और निद्राको जीतता है। बा-) हिर शब्दोंको प्रकाशित न कर भीतर ही भीतर तत्त्वोंका अभ्यास करता है, वि- द्वान मनुष्योंपर प्रमोद, दुःखित जीवोंपर करुणा और समस्त जीवोंमें मित्रभाव रखता है एवं ध्यानमें जिसकी पूरी पुरी भक्ति है वह तनिष्ठ ( ध्यानमें प्रेम रख- नेवाला) ध्याता कहलाता है ।। ८२ ॥ समौ सिद्धौ ध्यानाध्ययनतुरगावस्य सुखदौ ९७ प्रबोध ११ - गुलका अनुमवकरसता है ।। ८३॥ उपरितवाहिरंतर्जल्पकल्लोलमाले लसदविकलविद्यापद्मिनीपूर्णमध्ये। सततममृतमंतानसे यस्य हंसः पिवति निरूपलेपः सोऽत्र निष्पन्नयोगी॥८४॥ अर्थ-जिम मनुष्यका हंस-आत्मा वाह्य अभ्यंतर दोनों प्रकारके जल्परूपी नरंगोंमे रहित-शांत, देदीप्यमान अविकलविद्या-केवलज्ञानरूपी कमलिनीसे संयुक्त मानन मगेवर में अपने आमामें निरंतर अमृत पान-स्वस्वरूपका चितवन करता रहता है और निरुपलेप-कर्मके लेपसे रहित है वह मनुष्य निष्पन्नयोगी नामका ध्याता कहा जाना है । भावार्थ-जिसप्रकार निस्तरंग और कमलोंके समूहसे शोमित मान- म सगेवरमें हंग सानंद मिष्ट जलका पान करता है उसीप्रकार वाह्य अभ्यंतर दोनों प्रकारके जल्पोंसे रहित और अखंड केवलज्ञानरूपी विभूतिसे शोभित अपने ९९ - आत्म १०० आत्मामें जो योगी अपने स्वरूपका चितवन करता है और कोंके चक्रसे इट गया है वह निष्पन्नयोगी कहलाता है ।। ८४ ॥ प्रचलति किल क्षोणीचक्र चलंत्यचला अपि प्रलयपवनखालोलानलंति पयोधयः । पवनजयिनः स्वावष्टंभप्रकाशितशक्तयः स्थिरपरिणतेरात्मभ्यानानलंति न योगिनः॥८५॥ अर्थ- चाहे पृथ्वीचक्र भी क्योंन कंपायमान होजाय ! अचल मी पर्वत वर्षों न चलायमान होजाय । प्रलयकालके पवन के प्रबलवेगसे समुद्र मी स्यों न चल अचल हो उठे। परंतु जिन योगीश्वगेंने अपनी प्राणवायुका विजय और स्वाधीन शक्तिको प्राप्त कर लिया है-महाशक्तिमान हो चुके हैं वे कमी भी निशल प्रात्म- ध्यानसे विचलित नहिं होने । भावार्थ-यद्यपि पृथ्वी पर्वत और समुद्रोंका पल विचल होना दुस्सा-य है तथापि किसी अवमरपर, ये चल विचल हो उठने हैं.

प्रबोध आन्म १०१ रंतु जो योगिगण अपनी प्राणवायुको वशकर अचिंत्य स्वाधीन शक्तिका लाभ कर चुके हैं-जिनकी आत्मा अनंत चलकी धारक बन गई है वे कभी भी ध्यानसे विचलित नहिं होते-भयंकरसे भयंकर भी उपद्रव उनका बाल भी वांका नहिं करसकते ।। ८५॥ धर्मों वस्तुस्वभावः शमधृतिरथ वा स्वोत्थशुद्धोपयोगः सवृत्तं वा श्रुतं वा दशविधविलसल्लक्षणो वापि धर्मः। धर्मस्थं धर्मधाम प्रगुणगुणगणं पंचकं वा गुरूणां नेहक्षाद् ध्येयधर्माद् व्यपगतमिति हि ध्यानमाभातिधय ८६॥ अर्थ-वस्तुका स्वभाव, शांतिका धारण करना, केवल आत्मासे उत्पन्न केवल- ज्ञान केवलदशेन गुणस्वरूप शुद्धोपयोग, सम्यकचारित्र, शास्त्र वा दशप्रकारके लक्षणोंके धारक उत्तमक्षमा मार्दव आदि दश धर्म कहे जाते हैं अथवा धर्मके धा- रण करनेवाले, धर्मके स्थान, अनेक गुणोंके भंडार अहेत सिद्ध आचार्य आदि

आत्म
प्रयोग
१०२
पांच गुरु भी धर्म कहे गये हैं इसलिये इनके यरूपका चितवन करना ही धम्म-
ध्यान है और इनसे भिन्न पदार्थोक चितवन करनेको धर्मध्यान नहि कहते ।
भावार्थ-धर्मके स्वरूपका चितवन करना धम्प यान है और वह धर्म वस्तुका
स्वभाव चितवन करना अर्थात् आत्माका स्वरूप क्या है ? धर्म अधर्म आकाश
किन पदार्थोको कहते हैं ? कर्म किसका नाम है ? ऐगा विचार करना, शांति
धारण करना, केवलज्ञान केवलदर्शना शुद्धोपयोग, मम्मम्चारित्र, शास्त्र,
उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, गौच, मुत्य, संगम, नप, लाग, प्राकिंगन्य.
ब्रह्मचर्य, अथवा अहेत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याग, और माधु इमप्रकार अनेक
प्रकारका माना गया है इसलिये इन्हींके स्वरूपका नितवन करना धर्य ध्यान
और मोहके कारण स्त्री पुत्र आदि पदार्थों का चितवन करना धHध्यान नहि
हो सकता।। ८६॥
आज्ञामपायं विविध विपाकं संस्थानमित्थं न तदन्यथेति ।
वैचिंत्यते येन यतोऽथ यत्रचत्वारि तत्त्वानि तदेव धयं ॥८७॥

. प्रबोध आत्म १०३ अर्थ-जिसके आज्ञाविचय, अपायविचय विपाकविचय और संस्थानविचय ये चार भेद हैं और जहाँपर इनके (आज्ञाविचय, अपायविचय, विपाकविचय और संस्थानविचय ) यथार्थ स्वरूपका चितवन किया जाता है वह ही धम धर्म्य- ध्यान है ॥८७॥ आज्ञा जैनवचःप्रमाणकरणं कर्मात्मनोः सर्वथा विश्लेषोऽयमपाय इत्यनुभवस्तेषां विपाकाह्वयः। संस्थानं भुवनस्थितिश्च विचयस्तद्भाविनी भावना धर्म्य ध्यानमुदाहृतं हतमहामोहं चतुर्धा बुधैः॥८॥ अर्थ-भगवान जिनेंद्रके वचनोंपर विश्वास करना-उन्हें प्रमाणीक · मानना आज्ञा है। कर्म और आत्माका सर्वथा विश्लेष जुदाई जानना अपाय है। कर्मों के फलका अनुभव करना विपाक है। लोककी स्थिति संस्थान है और आज्ञा आदिकी भावना का करना विचय है इसप्रकार मोहको सर्वथा नाश करनेवाले धर्म्यध्यानके ये चार - MARAT १०३.

No text on this page.

प्रबोध आत्म HA १०५ ne अर्थ-भगवान जिनेंद्रने एक पदार्थ सत्ता, द्रव्यार्थिक पर्यायार्थिक वा निश्चय, व्यहार दो नय, सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यकचारित्र तीन मोक्षके मार्ग, देव मनुष्य नरक तिर्यच चार गतियां, औदारिक वैक्रियिक आहारक तैजस और का- माण पांच शरीर, पृथ्वीकायिक,अपकायिक, तेजःकायिक,वायुकायिक, वनस्पतिका- यिक और त्रसकायिक छै प्रकारके जीव, स्यादस्ति स्यान्नास्ति स्यादस्तिनास्ति,स्याद- वक्तव्य स्यादस्तिचावक्तव्य, स्यानास्तिचावक्तव्य स्यादस्तिनास्तित्वावक्तव्य ये सात भंग, सम्यक्त्व ज्ञान दर्शन वीर्य अव्यायाध सूक्ष्मत्व अगुरुलघुत्व अवगा- हना ये आठ सिद्धोंके गुण, जीव अजीव आस्रव बंध संवर निर्जरा मोक्ष पुण्य और पाप ये नौ पदार्थ, उत्तमक्षमा मार्दव आर्जव आदि दश धर्म, दर्शनप्रतिमा, व्रत- प्रतिमा, सामायिक, प्रोषध, सचित्तविरत, रात्रि भुक्तित्याग, ब्रह्मचर्य, आरंभत्याग, परिचितपरिग्रहत्याग, अनुमतित्याग और उत्कृष्ट श्रावक ये ग्यारह श्रावकोंकी प्रतिमा, एवं अनशन अवमोदये वृत्तिपरिसंख्यान रसपरित्याग विविक्तशय्यासन कायक्लेश प्रायश्चित्त विनय वैय्यावृत्य स्वाध्याय व्युत्सगे और ध्यान ये वारह MPA + MAM- G १०५ आत्म प्रबोध १०६ तप बतलाये हैं। इसप्रकार जो मुनिवर भावनारूपी नेत्रसे भलेप्रकार पदाथाको रखकर भगवान केवलीने जो पदार्थों का स्वरूप बतलाया है विचार करता है वह मुनिवर आज्ञाविचय धर्म्यध्यानका धारक कहा जाता है। भावार्थ-भगवान जिन- द्रने जो सत्ता तप आदिका स्वरूप और उसके भेद बतलाये हैं उनका उसी- प्रकारसे जो मुनिवर चितवन करता है वह आज्ञाविचय धम्येध्यानी कहा जाता है)।। ८९-९०॥ यादशचिह्न प्रकृतिरपि या यन्निदानं यदोजो यः प्रारंभो विकृतिरथ या तत्तदालक्ष्य साक्षात् । कर्मव्याधरुपशमकरैर्योग्ययोग्यैरुपायैः प्रोद्भिन्वानो यतिपतिभिषग्यात्यपायाख्यधयं ॥ ९१॥ अर्थ-जो मुनींद्ररूपी वैद्य कर्मरूपी व्याधिकी इसप्रकार जांचकर कि-इसके लक्षण ऐसे हैं, ऐसी प्रकृति है, यह इसका निदान है, ऐसा प्रकोप है, इसतरह इस- AUGUAGA १०६ प्रबोध आत्म 4 १०७ का प्रारंभ हुआ है और इसका विकार यह है, उसके उपशम करनेवाले योग्य योग्य उपायोंसे उसे दूर करता है उसके अपाय विचयनामका धर्म्यध्यान होता है। भावार्थ-जिसप्रकार वैद्य, रोगके लक्षण प्रकृति कारण प्रकोप प्रारंभ और विकारको भलेप्रकार जांचकर योग्य योग्य उपायोंसे उसे दूर करता है उसीप्रकार जो मुनि कर्मोंका चिन्ह, स्वभाव, कारण, शक्ति, प्रारंभ, और विकारको भलेप्रकार जान- कर उन्हें मूलसे नश करता है उस योगीके अपायविचयनामका धर्म्यध्यान होता है । ९१॥ अष्टानामपि कर्मणां निजनिजोत्पत्तिक्रमाद्धाविनी या यावत्युदयावली बलवती यद्यदिधत्ते फलं । तत्तद्रूपनिरूपणा प्रतिफलत्यंतर्यतो योगिनां ध्यानं ध्यानधुरंधरास्तदन, वैपाकधयं विदुः॥ ९२ ॥ अर्थ-जिस धर्म्यध्यानके द्वारा योगियों के चित्तमें अपने अपने समयमें उदयमें १०७ म । । तनुवान और अयान तीनों प्रकार के पवन येष्टित किये रहने हैं। यह हार्थोको क- मम्पर गराकर पंगको मारकर सीधे खड़हुये मनुष्यक आकार है और स्थिर है मे लोक स्वरूपका जो मनमें चितवन करता है उसका नाम संस्थानविचय नामका घHधान है।०३ ॥ मलमनलशिखाभिस्तापितं हेम यद्र- त्यजति भजति वर्णोत्कर्षतः षोडशत्वं । अधिकतरविशुद्धेनिर्मलीभूय तद्ध- त्परिणमति हि शुक्लथ्यानभावेन धयं ॥ ९४॥ पी-निमग्रकार वार २ अग्निसे तपाया हुआ सुवर्ण कीट आदि मैलको लोदकर अपने वर्णकी अधिक चमक दमकसे सोलह वारका तपाहुआ अर्थात् वि- लाल शुद्ध हो जाना है उसीप्रकार धम्येध्यान जिससमय अधिक शुद्ध हो जाता है उससमग यही शुक्ल यान बन जाता है । भावार्थ-जिसमकार कीट कालिमा Anema FES AmA -- NPAPAK' , MARATH M आत्म प्रयोध ॐ ११० आदि निश्चित सुवर्णकी, शुद्ध सुवर्ण, पर्याय होती है उसीप्रकार धर्म्य यानकी अतिशय विशुद्ध पर्याय शुक्लध्यान होती है इसलिये धHध्यानसे शुक्लध्यानकी प्राप्ति होती है ।। ९४ ॥ योऽर्थव्यंजनयोगसंक्रमविधैर्भेदःश्रुतालंवन- स्तत्पार्थक्यवितर्कयुग्विचरणं शुक्लं वदंत्यादिम। किंचार्थप्रमुखेप्यसंक्रममिहैकत्वश्रुतालंबनं पाहैकत्ववितर्कणाविचरणाभिख्यं द्वितीयं जिनः॥१५॥ कायक्रिया किमपि सूक्ष्मतरास्ति यस्मिन् सूक्ष्मक्रियं निकटसंघटमानसिद्धि । सूक्ष्मक्रियापि न तु यत्र तुरीयकं त- च्छिन्नक्रियं भवति निवृतिरेव तस्मात् ॥ ९६ ॥ Wan- PLA ८ .११० न प्रबोध १११ अर्थ-शुक्लध्यानके पृथक्त्ववितर्कवीचार, एकक्त्ववितर्कविचार, सूक्ष्मक्रिया- प्रतिपाति और व्युपरतक्रियानिवृत्ति ये चार भेद हैं इनमें जो ध्यान वितर्क और वीचार दोनोंसे युक्त हो वह पृथक्त्ववितर्क वीचार नामका प्रथम शुक्लध्यान है तथा अर्थ, व्यंजन और योगोंके पलटनेको वीचार और श्रुतज्ञानको वितर्क कहते हैं । जिसमें अर्थ व्यंजन और योगोंका पलटना न हो किंतु वितर्क हो वह एकत्ववितर्कवि- चार नामका द्वितीय शुक्ल ध्यान है। जिसमें शरीरकी क्रिया विलकुल सूक्ष्म हो जाती हैं और जिसके पासमें ही मोक्ष रहजाती है वह सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाती नामका तीसरा शुक्लध्यान है और जहां उस सूक्ष्मक्रियाका भी नाश होजाता और जिससे मोक्ष ही होती है वह व्युपरतक्रियानिवृत्ति नामका चौथा शुक्ल ध्यान है । भावार्थ-ध्येयद्रव्यको छोड़कर उसकी पर्यायोंका ध्यान करना और पर्यायोंको छोड़कर द्रव्यका ध्यान करना अर्थसंक्रांति है शास्त्रके किसी एक वचनका अवलंबन कर दूसरे वचनका अवलंबन करना एवं उसे छोड़ और दूसरे वचनका अवलंबन करना व्यंजनसंक्रांति है और काय योगको छोड़कर मनोयोग- म प्रबोध * 4 तथाऽविरतसदृष्टौ विरताविरतेपि च । धर्म्यध्यानं जगुर्गौणं प्रमादिनि च संयते ॥९८॥ मुख्यवृत्त्या तदेव स्यादप्रमत्तादिधामसु । शमकक्षपकश्रेण्योराछ शुक्लद्वयं क्रमात् ॥ ९९ ॥ सूक्ष्मक्रियं समाध्यास्ते स योगी योगिनां वरः। समुच्छिन्नक्रियं योगवर्जितः परमेश्वरः॥१०॥ सिद्धा न ध्यानकर्तारो न गुणस्थानवर्तिनः । अष्टात्मगुणसपन्ना अनष्टात्मगुणाः परं ॥ १०१ अर्थ-मिथ्यात्व सासादन और मिश्र इन तीन गुणस्थानोंमें रहनेवाले जी- वोंके आर्तध्यान और रौद्रध्यान होते हैं । अविरतसम्यग्दृष्टि देशविरत और प्र- मत्तसंयत इन तीन गुणस्थानोंमें धर्म्यध्यान तो होता है परंतु गौणरूपसे हो- SH Inufa आत्म ११४ ता है और अप्रमत्त आदिगुणस्थानों में वह मुख्यरूपसे होता है। तथा उपशम श्रेणीमें पृथक्त्ववितर्कवीचार और क्षपकश्रेणीमें एकत्ववितर्कवीचारनामका शु. क्लध्यान होता हैासयोगकेवली तेरहवं गुणस्थानमें मुमकियाप्रतिपाती और अ- योगकेवली चौदहवें गुणस्थानमें व्युपरतक्रियानिवृत्तिनामका चौथा शुक्लन्यान होता है।जो जीव चौदहो गुणस्थानोंको अतिक्रांत करजाते हैं वे सिद्ध हो जाते हैं। उनके नतो किसीप्रकारका कोई ध्यान ही होता है और न गुणस्थान ही। उनकेतो सम्यक्त्व आदि आठगुण प्रकट हो जाते हैं और वे आत्मिकगुण कमी नए नहि होते, सदा काल जैसेके तैसे बने रहते हैं ॥९७-१०१ ॥ चतुर्विधध्यानविधिःप्रसिद्धो यथायमन्योऽपि तथाप्रकार: पिंडास्पदं नाम पदास्पदं च रूपास्पदं रूपविवर्जितंच ॥१०२।। त्रीण्यत्र सालंबनभावभाजि ध्यानं निरालंवनमंत्यमेकं । सालंवनाभ्यासनिवद्धलक्ष्यो भवेनिरालंबनयोगयोग्यः॥१०३॥ --- mpurAN F प्रबोध सपात ११५ . अर्थ-ध्यानके जिसप्रकार आर्त रौद् धर्म्य और शुल्क चार भेद वतला आये है उसीप्रकार उसके पिंडस्थ पदस्थ रूपस्थ और रूपवर्जित ये भी चार भेद हैं और इन चारप्रकारके ध्यानोंमें आदिके तीन ध्यान अर्थात् पिंडस्थ पदस्थ और रूपस्थ अवलंबन सहित हैं-इनमें किसी न किसी पदार्थका उनके स्वरूप विचार- नेकेलिये अवश्य अवलंबन करना पड़ता है परंतु चौथा रूपवर्जितध्यान निरालंबन उसमें किसी पदार्थका अवलंबन नहिं रहतातथाजो मुनि प्रथम सालंबन ध्यानोंका अभ्यास करता है वही निरालंबनध्यानके योग्य होता है अर्थात् विना पिंडस्थ पदस्थ रूपस्थ ध्यान किये कभी रूपवर्जित ध्यान नहिं होसकता ॥१०२-१०३।। तरुणतरणिश्रेणीदीप्तप्रभावलयोऽपि स- नमृतजलधावुत्कल्लोलैर्मनःस्नपयन्निव । जगदधिपतिर्थेयो मध्ये स्वपिंडमखंडितं स्थिरपरिणतिं पिंडस्थाख्यं समाधिमधिष्ठितैः॥१०४॥ e आत्म प्रदोष ११६ अर्थ-जो मुनि अखंड और निचल पिंडस्थ ध्यानका आचरण करना चाहने हैं उन्हें अपने शरीरके अंदर मध्याह्नकालके अनेक मूर्योकी दीप्तिके समान देदी- प्यमान भी जगतका स्वामीआत्मा अमृत समुद्रम, उसकी मनोहर तरंगोंसे मनको स्नान कराता है ऐसा चितवन करना चाहिये। भावार्थ जिससमय मुनि अपने शरी- रके अंदर यह मानकर कि मेरा आत्मा अखंड तेजका राशि है और निराकुलता- मयसुखमें गोता माररहा है, ध्यान करता है उससमय उसके पिंडस्थभ्यान होता १०४॥ शशधरकलाक्रांतं वीजाक्षरं परमेष्ठिनः क्षरदविरलानंदस्रोतोरसायन-संस्तुते। हृदयकमले नाभ्यंभोजे शिरःसरसीरहे दधति सुधियः पिंडस्थोयं समाधिरथापरः ॥१०॥ अर्थ जो मुनिगण, चंद्रमाकी कलाके समान कलावाले परमेष्ठी ( अहंत सिद्ध ११६ ८ . प्रबोध मार ११७ उसके भी आचार्य उपाध्याय और साधु) के वाचक 'ओं' इस वीजाक्षरको, निरंतर झरते हुये अनुपम आनंदमयी रससे व्याप्त अपने हृदयकमलमें वा नाभिकमल और ललाट कमलमें, धारण करते हैं उनके भी पिंडस्थध्यान होता है तथा यह पिंडस्थध्यान पूर्वोक्त पिंडस्थध्यानसे भिन्न है-यह दूसरा पिंडस्थध्यान है। भावार्थ-कमलकी स्थापना हृदयमें वा नाभि और ललाटमें की जाती है इसलिये जो मुनि हृदय, नामि, या ललाट किसी स्थानपर कमलकी रचनाकर बड़े उत्साह और आ- 'ओं' इस बीजाक्षरको उस कमलमें स्थापितकर ध्यान करता पिंडस्थ नामका ध्यान होता है॥१०५॥ निश्शेषधातुरहितोज्ज्वलदिव्यदेह । मुन्मीलदस्खलितकेवलसत्प्रकाशं । आत्मानमाईतकलाकलितं विचिन्वन् पिंडस्थमन्यतममेतदुपैति योगी ॥ १०६ ॥ ११७ आत्म प्रयोग 1/ ११८ anema ne ma- NMH अर्थ- जो योगी इसवातका ध्यान करता है कि मेरा गरीर रक्त मन्ना आदि निंदित धातुओंसे रहित दिव्य है और आत्माको अखंडकेवलज्ञानरूपी प्रकाशसे। देदीप्यमान और अहंतोंकी समस्त कलाओंसे भूपित मानता है उसके भी एक म. कारका पिंडस्थ ध्यान होता है ॥ १०६ ॥ यदक्षरं पदं वाक्यमंतजल्पस्थिरीकृतं । ध्येयनामांकितं किंचित्स समाधिः पदास्पदः॥ १०७ ॥ अर्थ-जिसपदार्थका ध्यान किया जाय उसके अंकित किसी अक्षर पद, या वाक्यको अपने चित्तमें स्थिर कर विचार करना पदास्पद-पदस्थ ध्यान कहाजाना है | भावार्थ-अ,सि, आ, इ, साओं, आदि अक्षर परमात्माके वाचक हैं इनमें जिसका ध्यान करना हो उसीके वाचक अक्षर, पद, या वाक्यको अपने हृदयमें निभयक- जो मुनि उसीका ध्यान करता है उसके पदस्थ ध्यान होता है. ॥ १०७ ॥ अनंतोऽनंतवोषधेरधीशस्यातिशायिनः। - - प्रबोध आन्म ११९ अकारो लक्षकः साक्षादर्हतः परमेष्ठिनः॥१०८॥ अर्थ - अविनाशी, अनंतज्ञानरूपी ऋद्धिके धारक, सबके स्वामी सर्वोत्कृष्ट, प- रमपदके धारक' भगवान अर्हतको साक्षात् वतलानेवाला अक्षर, अकार है-अर्थात् अकारका उच्चारण करते ही अर्हत परमेष्ठीका ज्ञान हो जाता है ॥१०८ ॥ सिद्धयति स्म स्वभावेन सेधति स्म गतिं परां। सिद्धो देवः सिकारस्थो योगिनां सिद्धिसाधकः ॥१०९॥ अर्थ-जो स्वभावसे ही सिद्धपदको प्राप्त हुआ था। जिसने उत्तम गतिका भी लाभ किया था और जो योगियोंको सिद्धि मोक्ष प्रदान करनेवाला है वह पर- मात्मा सिद्ध है एवं उसका परिचायक अक्षर 'सि' है अर्थात् वह 'सि' अक्षरसे पहिचान लिया जाता है ।। १०९॥ आचाराधारधुधुर्यान ज्ञानेश्वर्येण संयुतान् । आकारो बोधयंत्येष आचार्यान्संघनायकान् ॥ ११०॥ ८ १९ Mal - प्रबोध १ आत्म १२१ नहिं करते और द्वेषियोंसे द्वेष नहिं करते । अपने पराये दोनोंके प्रयोजन सिद्ध क- रनेवाले हैं और जो साधुवादके स्थान हैं अर्थात् जिनकी सब लोग प्रशंसा करते वे साधु हैं उनका परिचायक अक्षर 'सा' है अर्थात् 'सा'से साधुओंका ग्रहण हो- ता है ॥ ११२ ।। अ-सि-आ-उ,-साक्षराणि क्षरंत न क्षणमपीह वै क्षेपात् । पंचापि यस्य मनसः स पंचमी याति गतिमचिरात् ॥ ११३॥ अर्थ-जो महानुभाव अ, सि, आ, उ, सा, इन पांच अक्षरोंको अपने मनसे क्षणभरकेलिये भी दूर नहिं करता-प्रतिक्षण जो इन्हींका विचार करता रहता है वह शीघ्र ही पांचवीं गतिको प्राप्त होता है अर्थात् उसै निराकुलतामय मोक्ष सुखकी प्राप्ति होती है ।। ११३॥ अहंददेहाचार्योपाध्यायमुनीश्वरादिवर्णोत्थः । प्रणवो हृदि प्रणीतः स्मरयत्येकोऽपि पंचगुरून्॥ ११४ ॥ १२१ आत्म प्रयोध १२२ PMw- अर्थ-अहंत अशरीर (सिद्ध) आचार्य उपाध्याय और मुनीश्वरोंके अ-अ-आ-उ म् इन अक्षरोंसे बना हुआ 'ओ' यह मंत्र है यदि इस हृदयमें धारण किया जाय तो यह अकेला ही पांच गुरुओंका स्मरण करादेता है अर्थात् केवल ओंका रके ध्यानसेही पांचों परमेष्ठियोंका ध्यान हो जाता है ॥ ११४ ॥ आलोकेनोपलंभेन मुनित्वेन च साधितः । ओंकारः सिद्धये ध्येयो रत्नत्रयमयोंजसा ॥ ११५॥ गअर्थ-अर्हतका अ, अशरीरकाअ और आचार्यका आ इन तीनोंकी संघिसे सिद्ध आ अक्षरसे, उपाध्यायके 'उ' अक्षरसे और मुनिक म् अक्षरसे ओंकारकी सिद्धि होती है तथा यह ओंकार सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यरुचरित्र स्वरूप है इसलिये मोक्षकी प्राप्तिकेलिये इसका अवश्य ध्यान करना चाहिये अर्थात् ओंकारके ध्यान कर- नेसे मोझकी प्राप्ति होती है ॥ ११५ ॥ अधोलोकस्याद्यावयवमवनेरूध्वजगतः १२२ प्रबोध स्वयं पिंडीकृत्योपरि शशिकला निवृतिशिला। तदूर्व सिद्धाली लसदमृतविंदूज्ज्वलशिखा निधाय ध्यायेयं प्रणवमिति लोकत्रयमयं ॥ ११६ ॥ १२३ अर्थ-अधोलोकका आदि अक्षर 'अ' अवनि (मध्यलोक) का आदि अक्षर 'अ' और ऊर्चलोकका आदि अक्षर 'ऊ, इन तीनोंकी संधिकर ओंकार मंत्रका 'ओ'इ- तना भाग सिद्ध होजाता है तथा इसके ऊपर जो यह अर्धचंद्राकार चिन्ह है वह सिद्ध शिला है और उसके ऊपर जो अनुस्वार-विंदु रक्खी है-वह सिद्धोंकी पंक्ति है इस- प्रकार यह ओंकार तीनों लोकमय है ऐसा विचारकर इसका ध्यान करना चाहिये भावार्थ-मनके स्तंभनकेलिये मुनिगण तीनोंलोकके स्वरूपका ध्यान करते हैं पीछे वे शुल्कभ्यानके पात्र कहे जाते हैं परंतु यह ओंकार ही तीनों. लोक स्वरूप है इ- सलिये इसका ध्यान करना भी तीनलोकका ध्यान करना कहा जाता है क्योंकि तीनलोकके ध्यानमें अधोलोक मध्यलोक उर्वलोक सिद्धशिला और सिद्धोंका म . १२३ आत्म प्रबोध १२४ ध्यान किया जाता है। ओंकारके ध्यानसे भी इन सब बातोंका ध्यान हो जाता है अ- थात् ओंकारका 'ओ' भाग अ,आ और ऊकी संधि करनेसे सिद्ध होता है क्योंकि यहां अकारसे अधोलोक, दूसरे अकारसे अवनि-मध्यलोक और ऊकारसे ऊर्यलोकका ग्रहण किया गया है उसके ऊपर रक्खा हुआ (७)यह चिन्ह सिद्ध शिला है क्योंकि सिद्ध शिला आधे चंद्रमाके आकार वतलाई है और यह चिन्ह भी आधे चंद्रमाके आकार है तथा सिद्ध, अशरीर-शून्य सरीखे होते हैं इसलिये इसचिबके ऊपर रक्खे हुवे शून्यसे सिद्धोंका ग्रहण है ॥ ११६ ॥ अभिनिबांधकेन सममागममवधिमनःसपर्ययं संयोज्याथ बोधमुत्कृष्टं केवलनाम निर्मलं । (?) अमृतकलालयं च मोक्षाक्षरमुपरि नियोज्य विरचितः प्रणव पंचबोधफलनिचयं रचयतु पांचबोधिकः ॥११७॥ अर्थ-यह ओंकार पांच ज्ञान स्वरूप भी है क्योंकि अभिनिरोध (मतिज्ञान)का १२४ . 7 प्रबोध Mu १२५ अआगम (श्रुतज्ञान) का आ, अवधिज्ञानका अ, अंतःकरणबान(मनपार्ययज्ञान)का अ, और अतिशय निर्मल ज्ञान केवलज्ञानका 'उत्कृष्ट' यह नाम निक्षेपकर उ, ग्र- हण कर और आपसमें उनकी संधिक ओंकारका'ओ'भाग सिद्ध हो जाता है तथा अमृतमय मोक्षका 'म' ग्रहणकर और सबको एकसाथ मिलाकर बोलनेसे ओंकार मंत्र बनजाता है एवं इसके पांचज्ञान स्वरूप होनेके कारण पांच ज्ञानोंका जो फल होता है वही इससे होता है। भावार्थ-जिसमकार मतिज्ञानके ध्यानसे मतिज्ञान- का फल श्रुतज्ञानकेसे श्रुतिज्ञानका, अवधिज्ञानकेसे अवधिज्ञानका, मनःपर्यय- ज्ञानकेसे मनःपर्ययज्ञानका, केवलज्ञानकेसे केवलज्ञानका, और पांचोंके से पांचों- का फल मिलता है उसीप्रकार ओंकारमंत्रके ध्यानसे भी पांचोंका फल मिलता है क्योंकि यह ओंकार अ, आ, अ, उ, और म् के आपसमें मिलनेपर सिद्ध होता है सो यहां अमिनिबोधक-मतिज्ञानका अ, आगम-श्रुतज्ञानका आ,अवधिज्ञान- का अ, अंतःकरण-मनःपर्ययज्ञानका अ, उत्कृष्ट-केवलज्ञानका उ, और मोक्षका म् ग्रहणकर और उनसबकी व्याकरण शास्त्रके अनुसार आपसमें संधिकर ओंकार , V १२५ ।

1 प्रबोध १२७ हैं और उनके फलभी अतिशय कल्याणकारी और जुदे हैं परंतु मोक्षकी प्राप्ति इ- नतीनोंकी एकतासे ही होती है केवल सम्यग्दर्शन वा सम्यग्ज्ञान अथवा सम्यक चारित्र मोक्षको नहिं प्राप्त करासकता उसीप्रकार 'अहं' इस मंत्रमें अकार रकार और 'हं' शब्दके फल जुदे २ और उत्तम हैं परंतु अभीष्टकी सिद्धि इनतीनों अक्ष- रोंके समुदायस्वरूप 'अहं' इस मंत्र जपनेसेही होती है इसलिये जो मनुष्य अ- भीष्टकी सिद्धि करना चाहते हैं उन्हें 'अहं' ऐसे मंत्रका आराधन करना चा- हिये ॥ ११८॥ दधति वसतिं मध्ये वर्णा अकारहकारयो- रिति यदनघं शब्दब्रह्मास्पदं मुनयो जगुः। यदमृतकलां विभ्रबिंदूज्ज्वलां रचितार्चिषं ध्वनयति परंब्रह्मध्यानं तदस्तु पदं मुदे ॥ ११९॥ अर्थ-जिसके अकार और हकार अक्षरोंके मध्यमें समस्त वर्णमाला वास क- A १२७ आत्म प्रबोध १२८ रती है और इसी लिये जिसको मुनिगणोंने शब्दब्रह्मका आस्पद बतलाया है एवं जो रेफसे व्याप्त अमृतकला अर्धचंद्राकार विंदुसे युक्त होकर परंचूमके ध्यान- को प्रकट करता है वह अहं मंत्र हमैं आनंद प्रदान करै । भावार्थ-'अहं' इस- मंत्रमें अ, र, हु, और विंदु ये चार वर्ण हैं इसमें अ और ह तो शब्द ब्रह्मको बत- लाते हैं क्योंकि अ अक्षरसे लगाकर ह अक्षर पर्यंत समस्त स्वर व्यंजन आजाते और वे ही शब्द शास्त्रमें ब्रह्म नामसे कहेगये हैं तथा जो रेफ सहित अर्धचन्द्रा. कार विंदु है वह परंह्म-परमात्मा सिद्धगणका ज्ञान कराती है क्योंकि सिद्ध अर्द्ध- चद्राकार सिद्ध शिलापर रहते हैं, देदीप्यमान हैं और शून्य-अशरीर है इसलिये ऐसा शब्दब्रह्म और परंब्रह्मका ज्ञान करानेवाला अहे मंत्र हमारा कल्याण करे यह प्रार्थना है ॥ ११९ ॥ यस्मिन् रविस्फुरणमुद्दलितांधकार- मिंदोरुदेत्यमृतविंदुमती च लेखा। तस्मिन्वियत्यकलिताद्यवसानसीम्नि . १२८ 1 R प्रबोध म १२९ धन्याः प्रविश्य किल मोक्षपदं लभते॥१२०॥ अर्थ-यह 'अहं' मंत्र एकप्रकारका विस्तीर्ण आकाश है क्योंकि आकाशमें जैसा अंधकारको नाशकरनेवाले रविका स्फुरण, मूर्यका स्फुरण है उसीपकार 'अहं' इस मंत्रमें भी रेफका विस्फुरण है और इस रेफका फल अंधकारका नाश होना है। जिसप्रकार आकाशमें चंद्रमाकी अमृतमयी लेखाका उदय होता है उसीप्र- कार अर्ह इसमंत्रमें भी शांतिप्रदान करनेवाली बिंदुसे उज्वल चंद्राकार रेखा, मोजूद है । जिसमकार आकाशकी सीमा अकलित-अपरमित है न उसकी आदि है और न अंत है उसीप्रकार 'अर्ह' इसमंत्रकी आदि और अंतकी सीमा भी अकलित-अकारसे कलित सहित है अर्थात् आदि और अंतमें इसके अ है इसलिये ऐसे अनुपम अर्ह मंत्ररूपी आकाशमें प्रवेश करनेवाले मनुष्य धन्य हैं और वे ही मोक्षपदको प्राप्त होते हैं। भावार्थ-बहुतसे लोग आकाशका ध्यान किया करते हैं यदि वे 'अहं' इसमंत्रका ध्यान करें तब भी आकाशका ध्यान होजाता है क्योंकि जिसप्रकार आकाशमें रविस्फुरण-सूर्यका स्फुरण होता है और उससे GA १२९ . आत्म प्रवरघ १३१ अहँ शब्दका अर्थात् अर्ह शब्दका यदि मनके अंदर ध्यान किया जाय तो उससे सर्वज्ञनाथके पदकी सिद्धि अर्थात् मोक्ष लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है । भावार्थ-जिस अहं मंत्रका रेफ, रागके कारणोंका नष्ट करनेवाला है और जो ( . ) इसरूपकी कलासे शोभित है ऐसे अर्ह मंत्रके ध्यान करनेसे मोक्ष सुखकी प्राप्ति होती है इ- सलिये विद्वानोंको चाहिये कि वे ऐसे अनुपम अर्ह मंत्रका अवश्य आराधन करें॥१२१॥ अधोग्रामिभ्यां यद्गवगममुद्रामथ कलां सुकृत्यं संधत्ते नभसि परमात्मानममलं । प्रधानं तबीजाक्षरमविरतं ध्यायतु बुधः स्वरावर्गाः पद्मप्रभृतिरिति शेषः परिकरः॥१२२॥ अर्थ-जो ही मंत्र अपने ऊर्ध्व और निम्न रेफोंसे सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञा- नको, वे कला () से सम्यक्चारित्रको और शून्यसे निर्दोष परमात्माको धारण ९ हूँ वीजाक्षर भी है उसमें भी यह बात होती है इसलिये उसका ध्यान करना भी योग्य है । - , प्रबोध आरम वाह्यांतरंगरिपुचक्रपराजयाय ध्येयः सुधीभिरपराजितमंत्रराजः॥ १२३॥ १३३ अर्थ (जो मोक्षरूपी नगरके मार्गके समान है जिसमें नमः (णमो) पदके साथ पांचों परमेष्ठीके वाचक पदोंका प्रयोग है ऐसे अपराजितमंत्रका अर्थात्-‘णमो अरहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आयरीयाणं णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्वसा- हूणं' इसमंत्रका वाहय अभ्यंतर दोनों प्रकारके शत्रुओंको जीतनेकेलिये विद्वानोंको ध्यान करना चाहिये। भावार्थ-'णमो अरहताणं णमो सिद्धाणं णमो आयरीयाणं णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्वसाहूणं, इसमंत्रमें अर्हत आदि पांचों परमेष्ठि- योंको नमस्कार किया है । इससे मोक्षकी प्राप्ति होती है। वाहय अभ्यंतर दोनों प्रकारके शत्रु समूहका विजय होता है और यह मंत्र किसी मंत्र द्वारा जीता नहिं जासकता इसलिये अपराजित है अतः विद्वानोंको चाहिये कि वे अपने अभीष्टकी सिद्धिकेलिये अवश्य इस मंत्रका आराधन करै ॥ १२३ ॥ १३३ CREC आत्म प्रबोध carina १३४ स्वपन जाग्रत्तिष्ठन्नथ पथि चलन्वेश्मनि वसन् स्खलन् भ्रश्यन् क्लिश्यन् वनगिरिसमुद्रेष्ववतरन् । नमस्कारान् पंच स्मृतिखनिनिर्वातानिव मनः- प्रशस्तौ विन्यस्तानिव वहतियः सोऽत्रसुकृती॥१२४॥ अर्थ (जो महानुभाव मनुष्य सोते जगते बैठते मार्गमें चलते घरमें स्थित होते स्खलित भ्रष्ट क्लिष्ट होते और वन पर्वत एवं समुद्रों में भी पतित होते हुये, प्रसन्न मनसे निश्चल हो पंच नमस्कारमंत्रकी आराधना करता है वह मनुष्य पुण्यवान कहा जाता है)। १२४ ॥ रूपवद्रस्तुनि ध्यानं रूपस्थं रूपितं जिनैः रूपादित्यक्तचिद्रूपगोचरं रूपवर्जितं ॥ १२५॥ अर्थ-जो ध्यान रूपवान पदार्थका कियाजाय वह रूपस्थ कहा जाता है और रूपादिरहित केवल शुद्ध चिपके ध्यानको रूपवर्जित-रूपातीत नामका UA १३४ प्रवोध आत्म १३५ ध्यान कहते हैं । १२५ ।। रक्ताशोकातपत्रत्रयचमरमरुन्मंडलीपुष्पवृष्टि-- स्पष्टोद्यदिव्यघोषातिवलयमहासिंहपीठावाद्यैः । साश्चर्यैः प्रातिहाथैर्युगपदतिशयैर्धीजमानःसमग्रै- ध्येयः श्रीमंडपांतःप्रणतपदयुगो योगिदैजिनेंद्रः॥१२६॥ अर्थ- जो योगी रूपस्थध्यानके आराधन करनेवाले हैं उन्हें-अशोक वृक्ष, तीन छत्र, चमर, सुगंधितपवन, पुष्पवर्षा, दिव्यध्वनि, भामंडल और सिंहा- सन इन आठ प्रातिहार्य और चौंतीसप्रकारके अतिशयोंसे मंडित, देव इंद्र नरेंद्र आदिसे प्रजित, समवसरणमें स्थित भगवान जिनेंद्रका ध्यान करना चाहिये । भावार्थ-जिससमय भगवान जिनेंद्र चार घातिया कर्मों का नाशकर अहंत होजाते हैं उससमय उनके अष्ट प्रातिहार्य समवसरणकी विभूति और एक मुखका चौमुख दीखना आदि चौंतीस प्रतिशय प्रकट हो जाते हैं इसलिये जो योगी इसप्रकारके आत्म १३६ जिनेंद्रका ध्यान करते हैं वे रूपस्थभ्यानी कहे जाते हैं ।। १२६ ।। मुक्तिश्रीतल्पकल्पारुणरुचिरुचिरोत्तानहस्तांघ्रिपझं पर्यकं मंदराद्रिद्रढिमपरिवृढप्रोढवंधं दधानः । योगींद्रश्चंद्रकांताचलविमलतनुर्निश्चलार्धावमाल- नासाग्रन्यस्तनेत्रो मनसि सुकृतिभिर्दश्यते योगदृष्ट्या ।। अर्थ-जो योगींद्र अहंत मुक्तिरूपी स्त्रीके हथेलीके समान रक्त. मनोहर और ऊंचेको उठेहुये हस्तकमल और चरणकमलोंसे गोमित है मंदराचलकेसमान अच- ल और दृदरूपसे बंधेहुये पर्यक आसनके धारण करनेवाले हैं, चंद्रकांत मणिके समान निर्मलशरीरके धारक और नासिकाके अग्रभागपर नेत्रोंके लगानेवाले-नासाग्र- दृष्टि हैं ऐसे योगींद्रको पुण्यवान मनुष्य अपनी योगदृष्टिसे चित्तके अंदर स्पष्ट- रूपसे देख लेते हैं । भावार्थ-जो मनुष्य पुण्यवान और पिंडस्थध्यानके आराधन करनेवाले हैं वे पिंडस्थसमाधिके बलसे भगवान अहतके हस्त चरण शरीर और १३६ . प्रवोध आत्म १३७ नासाग्रदृष्टिपनेको अपने मनमें स्पष्टरूपसे जान लेते हैं । १२७ ॥ पिंडस्थप्रभृतित्रयं सकलमित्याहुः समाधिं बुधा मन्यते चतुरः कलान्वितगुरूनाश्रित्य वा तादृशान् । सिद्धात्मा रसरूपवर्जिततया नीरंजनो निष्कल- स्तस्य ध्यानमतीतरूपममलं तनिष्कलं वा विदुः ॥१२८॥ अर्थ-पिंडस्थ पदस्थ और रूपस्थ ये तीन प्रकारके सकल ध्यान शरीरके धारक अर्हत आचार्य उपाध्याय और साधु इन चार परमेष्ठियोंके वा इनके समा- न अन्य महात्माओंके अवलंबनसे होते हैं उनमें अर्हत आदिके रूप आदिका विचार रहता है इसलिये ये ध्यान सावलंबन हैं परंतु रूपातीतध्यान निरालंबन है रूप आदिको विना अवलंबन किये ही होता है क्योंकि उसमें सिद्धोंका ध्यान किया जाता है और सिद्ध रस रूप आदिसे रहित, कर्म कालिमा और शरीरसे भी विनिर्मुक्त हैं । अतः अतिशय निर्मल इस रूपातीत ध्यानको निष्कल ध्यान भी .. | १३७ प्रवोध आत्म १३८ कहते हैं। भावार्थ-जिस ज्ञानमें रूप रस कला आदिका अवलंबन हो अर्थात्-रूप रस कला आदिके द्वारा शुद्ध आत्माका ध्यान किया जाय वह ध्यान सावलंबन और जो रूप-रस कला आदिसे रहित शुद्ध आत्माका ध्यान हो वह निरालंबन ध्या- न है । पिंडस्थ पदस्थ और रूपस्थ ये तीन ध्यान ऐसे हैं कि इनमें अहंत आदि चारो पमेष्ठियोंके रूप रस आदिका अवलंबन रहता है इसलिये सावलंबन हैं और रूपातीत ध्यानमें रूप रस कला शरीर आदिसे रहित शुद्ध सिद्ध परमे- ष्ठीका ध्यान रहता है इसलिये वह निरालंबन है। इस रूपातीतध्यानको निष्कल- ध्यान भी कहते हैं ॥ १२८ ॥ नान्यैर्जन्यो न परजनको नान्यकर्त्ता न कार्य नान्यान भावाननुभवति यो नानुभाव्योऽन्यभावैः । पुण्यापुण्यप्रकृतिषु न यो बंधको नापि बंध्यः 'सिद्धात्मासौ वितरति परां सिद्धिमध्यात्मदृष्टः ॥१२९॥ १३८ आत्म प्रवोध १३९ अर्थ-यह अ यात्म विद्याद्वारा देखागया सिद्ध-परमात्मा न तो किसी दूस पदार्थसे उत्पन्न हुआ है।न दूसरे पदार्थोंका उत्पन्न करनेवाला है, न किसी पदा- र्थका कती है और न कार्य है । न अन्य पदार्थोंका अनुभव करता है और न कि- सीके द्वारा अनुभव किया जाता है। पुण्य पापोंका बांधनेवाला भी नहीं है और न उनसे बंधने ही योग्य है इसलिये ऐसा परमात्मा सदा सिद्धि प्रदान करता है ।।१२९ ।। सुखमखिलमनंतज्ञानमानंत्यमानं बलमतुलमनंतं दर्शनश्रीरनंता। पदमसममनंतं यस्य नादिर्न चांतः स जयति परमात्मा निष्कलो निष्कलंकः ॥१३०॥ अर्थ-जो परमात्मा अनंतसुख अनंतज्ञान अनंतवीर्य और अनंतदर्शन इसप्र- कार अनंत चतुष्टयका धारक है आदि अंत रहित अनुपम और अनंत, सिद्धप- दसे भूपित है समस्तप्रकारकी देहोंसे. और कलंकोंसे मुक्त है ऐसा परमात्मा १३९ आत्म प्रवोध १४० सदा इसलोकमें जयवंत रहो ॥ १३० ।। प्रतिफलितमिवांतर्दर्पणादर्पणं यः स्फुरितमिदमनतानंतबोधिर्विशुद्धः । कलयति सदनंतानंतमाकाशमित्थं स भवति कलनीयो निष्कलात्मात्मनैव ॥१३॥ अर्थ-जो अनंतानंतज्ञानका धारक परमात्मा कर्म रहित होने के कारण दर्पणमें दर्पणकेसमान अपने अंतरंगमें प्रतिविम्बित और स्फुरायमान, अनंतानंत आकाशको 'ऐसा है' इसप्रकार जानता है वह निष्कलंकात्मा परमात्मा अपनी आत्मासे ही निश्चयके योग्य है । भावार्थ-यद्यपि आकाश अनंतानंत है तथापि उसे जो विशुद्ध परमात्मा जिसमकार दर्पणमें प्रतिफलित दर्पण इसरूपका-ऐसा है ऐसा स्पष्टरूप से जानलिया जाता है उसीप्रकार अपने अनंतज्ञानके माहत्म्यसे स्पष्ट जानलेता और समस्त कलंकोंसे रहित है वह(परमात्मा)अपनेसेही ज्ञात होता है दूसरा कोई १४० प्रबोध आरम - Ama १४१ GURUS पदार्थ उसका ज्ञान नहि करा सकता ।। १३१ ।। न स गुरुर्न लघुनं च मध्यमो न च शिशुर्न युवा न वयोऽधिकः। न वनिता न पुमान्न नपुंसकं न भिदुराश्छिदुरो न स भंगुरः॥ १३२॥ अर्थ-वह परमात्मा न भारी है न हलका है न मध्यम-वीचका है। न बालक युवा और वृद्ध है न स्त्री पुरुष और नपुंसक है एवं मिदनेवाला छिदनेवाला और क्षणभंगुर भी नहीं है । भावार्थ-भारी, हलका, बालक, युवा, वृद्ध, स्त्री, पुरुष, नपुं- सक, भेदन, छेदन, और क्षणभंगुरपना जड़ शरीरकी पर्यायें हैं परमात्मा शरीरसे रहित है इसलिये उसमें भारीपना आदि कोई बात नहीं ॥ १३२ ॥ न सरसः सहजन न नीरसो द्रवमयप्रकृतिर्न घनो न च । are १४१ - -, प्रबोध १४२ न विवृतो भगवान्न स संवृतो न विरतोऽविरतो न निगद्यते ॥ १३३॥ अर्थ-वह परमात्मा, न स्वभावसे सरस-रस सहित है, न नीरस-रसरहित है न द्रवित है न कठिन है न विवृत-खुलाहुआ है न संवृत-ढकाहुआ है न विरत वैरागी है और न अविरत-सरागी है ॥ १३३ ॥ न कुरुते हरते न स रक्षति क्षपितमोहतमा न समीहकः । न सतमा न सरजा न स सत्त्ववान् परगुणैर्न गुणी गुणवान् निजैः॥ १३४ ॥ अर्थ-वह परमात्मा न कुछ काम करता है न किसीका संहार और रक्षा करता है । मोहरूपी प्रबल अंधकारका नाश करनेवाला है। इच्छा अज्ञानांधकार और कलं- कोंसे रहित है बलवान है और परपदार्थों के गुणोंसे गुणवान न होकर अपने-आत्मि- ११२ . आत्म प्रबोध ३. १४३ क गुणोंसे गुणवान है । भावार्थ-बहुतसे मनुष्य परमात्माके तीन भेद मानते हैं ब्रह्मा विष्णु और महेश । और उनमें ब्रह्माको जगतका बनानेवाला विष्णुको उस- की रक्षा करनेवाला, और महेशको प्रलयकालमें संहार करनेवाला मानते हैं परंतु वह परमात्मा राग द्वेष आदिसे रहित होजानेके कारण न किसीका कती है हती और रक्षक है उसने समस्त मोहको दूर करदिया है इच्छाओंको जीत लिया है किसीप्रकारका अज्ञान और मलभी उसके पास नहिं फटकनेपाता तथा वह महा- बलवान और पर पदार्थोंके गुणोंसे गुणी न होकर निर्दोष आत्मिक गुणोंसे गुणी है ॥ १३४॥ न करणं न स कर्म न कारको न नशुभो न शुभो न शुभाशुभः। स हि विशुद्धिविशोधितबोधिमान् निरवधिनिरुपाधिरधीश्वरः ॥ १३५॥ ५ १४३ . आत्म प्रवोध १४४ सम . अर्थ-वह परमात्मा न करण है 'उसके द्वारा कोई काम नहिं होता' न कर्म 'दूसरोंके द्वारा स्वयं नहींहोता है' और न कारक है 'किसी क्रियाको करता है। न शुभ है न अशुभ है और न शुभाशुभ है । विशुद्धिद्वारा अतिशय विशुद्ध और सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्र स्वरूप है असीम, कर्मोंकी उपाधिसे रहित, और सबका स्वामी है ॥ १३५ ।। परमशर्मनिधेः परमात्मनः परमरूपनिरूपणमांतरं। निरुपमं तदकृत्रिमसुंदरं न वचसो मनसोऽपि न गोचरं ॥ १३६ ॥ अर्थ- इसप्रकार परम कल्याणके भाजन परमात्माका स्वरूप सर्वोत्कृष्टस्वरूप इसलिये उसका निरूपण करना अतिगहरा-कठिन है क्योंकि वह निरुपम-उपमा रहित है अकृत्रिम सुंदर है-बनावटी न होकर भी अतिशय सुहावना है तथा मन १४४ प्रबोध १४५ . और वचन द्वारा भी उसका वर्णन नहिं होसकता ॥ १३६ ।। तदखिलं न किल श्रुतदेवता गदितुमुत्सहते भगवत्यपि। कथमतत्त्वहशो वत मादृशाः कुकवयो निगदेन गदंत्वमी ॥ १३७॥ अर्थ-यदि साक्षात् भगवती श्रुतदेवी भी इस बातका साहस करै कि मैं परमात्माके विषयमें कुछ कहूं-उनके अनंतज्ञान आदिका यथार्थ प्रतिपादन करूं तो वह भी जब नहिं करसकती तब मेरे समान जराभी तत्वको न जाननेवाले निंदित तुच्छ कवि कैसे उनके स्वरूपका वर्णन करसक्ते हैं ? अर्थात् परमात्माके अविकल स्वरूपका प्रतिपादन करना एकप्रकारसे असंभव है ॥ १३७॥ यदि मनसि गतस्ते सिद्धिशुद्धांतरंगो भव भृशमभवात्मध्यानशुद्धांतरंगः।

आत्म १४६ सकलविमलवोधध्याननिषूतकर्मा प्रकृतिमुपलभस्व स्वात्मनो निष्कलंकः ॥१३८॥ अर्थ-हे आत्मन् ! यदि तेरा मन मोक्षकी प्राप्तिकेलिये लालायित है तो तू अपने मनको परमात्माके ध्यानसे शुद्ध बना- परमात्माका ध्यान कर और सकल एवं विमल ज्ञान या उसके धारक परमात्माके ध्यानसे समस्त कमाको जलाकर और समस्त कलंकोंसे रहित होकर स्वात्मा शुद्ध-आत्माकी प्रकृतिको प्राप्त कर । भावार्थ--जंवतक मन.परमात्माके ध्यानसे शुद्ध न होगा तबतककर्मोका नाश, कलं- कोंका परिहार और शुद्धात्माका स्वभाव भी प्राप्त न होगा इसलिये जो महानु- भाव शुद्धात्माके स्वरूपके अभिलापी है उन्हें परमात्माके ध्यानसे मनको शुद्धकर तथा कर्म और कलंकोंका नाशकर उसै प्राप्त करना चाहिये ॥ १३८ ॥ योज्या पात्रे कचिदपि दशा कापि न स्नेहंदिग्धा नैतस्याचिळवहिततरं बोधनेऽन्वेषणीयं । . १४६ १ आत्म प्रबोध १४७ हेतुः सर्वोऽजनपरिणतेरेष नीरंजनवा- दात्मज्योतिर्ग्रहणविधिना बोध्यतामात्मदीपः॥ १३९॥ अर्थ-इस आत्माके ज्ञानकरानेमें न तो तैल बत्तीका दीपक ही सहायता करसकता है और न अन्य कोई ज्योतिस्वरूप-घट पट आदिककोप्रकाशित करनेवाले पदार्थ ही मदद पहुंचा सक्ते हैं क्योंकि वे सब कारण रूपी पदार्थोंके द्योतक हैं आत्मा अरूपी निष्कलंक है । उसको तो उसी आत्माकी ज्योति ही जान करांसक्ती है इसलिये आत्माके द्वाराही आत्माका ज्ञानकरना उचित है ।। १३९ ॥ सौरं चांद्र मणिगणभवं वैद्युतं दाहनं वा नास्तव्यस्तं प्रभवति महो यस्य विध्वंसनाय । मोहध्वांतं तदभिभवितुं योगभाजो भजंतां ज्योति रंजनमघभिदेऽनश्वरं भास्वरं च ॥१४॥ अर्थ-सूर्य चंद्रमा मणि विजली और अग्निका तेज अस्त व्यस्त है-थोड़े देशमें १४७ आत्म १४८ रहनेवाला और विनाशीक है इसलिये वह मोहरूपी अंधकारके नाश करनेकेलिये समर्थ नहिं हो सकता । कभी भी उससे मोहांधकार नष्ट नहिं हो सकता। किंतु मोहरूपी अंधकार और पापसमूहका नाश निष्कलंक आत्माकी ज्योतिसे होता है क्योंकि वह अविनाशी और सर्वत्र दैदीप्यमान है इसलिये योगियोंको पापोंके नाशार्थ उसीका ध्यान करना योग्य है। भावार्थ-यद्यपि संसारमें सूर्य चंद्रमा मणि विजली आदि बहुतसे तेज हैं परंतु वे सब थोड़े देशमें रहनेवाले और विना- शीक हैं। उनमें ऐसा एकभी तेज नहिं जो मोह और पापरूपी निविड़ अंध- कारको दूर करसके । किंतु एक आत्मतेज ही ऐसा है जो सब तेजोंमें अनुपम हैं अविनाशी और सर्वत्र फैला हुआ है तथा इसके प्रगट होते ही मोह और पापरूप अंधकार देखते देखते पलायन कर जाते हैं इसलिये योगियोंको आत्मतेजका ही ध्यानकरना उचित है ॥ १४० ॥ पालेयांशोरविकलकला श्रीरिवोष्मेव वढे- स्तेजः सूर्यादिव जलनिर्वारिवेलावलीव । २१ mmmmmmmmmm प्रबोध आत्म १४९ वर्तिींपादिव न हि पृथग्वर्तिनी ज्ञानशक्ति- यस्मात्तस्मात्कुरुत परमादात्मनः स्वात्मलाभं ॥ १४१ अर्थ-जिसप्रकार चंद्रमासे कला, अग्निसे उष्णता, सूर्यसे तेज, समुद्रसे जल और तरंगे एवं दीपकसे वत्ती पदार्थ जुदे नहिं उसीप्रकार ज्ञानशक्ति भी आत्मासे जुदी नहिं है इसलिये अवश्य योगियोंको अपनी आत्मासे अपनी आत्माका स्वरूप प्राप्त करना चाहिये । भावार्थ-अनेक सिद्धांतकार गुण गुणी और अवयव अव- यवीका सर्वथा भेद मानते हैं परंतु वे सिद्धांत सर्वथा निर्मूल जानपड़ते है क्योंकि कोई भी अनुभवी विद्वान इसबातको नहिं कह सकता कि कला चंद्रमासे भिन्न हैं । उष्णता अग्निसे, तेज सूर्यसे, जल वा तरंगे समुद्रसे, और वत्ती दीपकसे जुदी है यदि कला आदि पदार्थ चंद्रमा आदिसे सर्वथा भिन्न मान लिये जायगे तो चंद्रमा आदि पदार्थ ही सिद्ध न हो सकेंगे क्योंकि कला आदिका समुदाय ही चंद्रमा आदि पदार्थ हैं इसीप्रकार ज्ञानशक्तिभी आत्मासे मिन्न नहीं, गुण गुणी होनेसे आत्मा और ज्ञान एकही है इसलिये आत्मासे ज्ञानशक्तिका लाभ करना Hd १४९ प्रयोध १५१ सम्यग्दर्शन आदि स्वरूप ही परमात्मा है इसलिये योगीगण विकल्पोंसे रहित अपने आत्मामें सम्यग्दर्शन आदि स्वरूप अविनाशी परमात्माका निश्चय करते हैं ॥१४२।। तैस्तैरात्मस्वरूपं निखिलमविकलं लक्ष्मभिर्लक्षयित्वा हित्वा हेयामविद्यां भृशमहितकरी दीर्घसंसारहेतुं । अध्यास्तेऽध्यात्मविद्यां हितवसतिमुपादेयबुद्धयाधिकां यः पुंसस्तस्यावरीतुं क्षिपति निरुपमा मालिकां मोक्षलक्ष्मीः। अर्थ-इसप्रकार आत्माके परिचायक जो जो लक्षण हैं उन सबसे भलेप्रकार आत्माका स्वरूप पहिचानकर जो मनुष्य त्यागने योग्य, अहितको करनेवाली एवं दीर्घकालतक संसारमें घुमानेवाली अविद्याको छोड़कर परमहितकारिणी, ग्रहण करनेयोग्य अध्यात्मविद्यामें अधिक स्थिति करता है उसके गलेमें मोक्ष- रूपी लक्ष्मी प्रसन्न होकर वरनेकेलिये वरमाला डालती है अर्थात् वह सर्वोत्तम पुरुष मोक्ष प्राप्त करलेता है। भावार्थ-आत्माके जनानेवाले इस ग्रंथमें बतलाये प्रबोध म २२ गये वे और उनसे अन्यभीबहुतसे लक्षण हैं परंतु जबतक संसारमें भ्रमण करानेवाली महा निकृष्ट अविद्याका प्रभाव रहेगा और परमार्थविद्या जो कि परमहितकारिणी उसका आश्रय न किया जायगा तबतक न आत्मस्वरूपकी प्राप्ति हो सकती है और मोक्षसुख ही मिलसकता है इसलिये योगियोंको चाहिये कि वे अविद्याको हटाकर अध्यात्मविद्याका यथाशक्ति अवलंबन करें और आत्माके लक्षणोंको जानकर उसका स्वरूपपहिचानें जिससे उन्हें मोक्षसुखकी प्राप्ति होजाय ॥ १४३ ॥ नात्यंताभावरूपा न च जडिममयी व्योमवव्यापिनी नो न व्यावृत्तिं दधाना विषयसुखघना नेष्यते सर्वविद्भिः। सद्रूपात्मप्रसादहगवगमगुणौधा च संसारसारा निस्सीमात्यक्षसौख्योदयवसतिरनियापिनी मुक्तिरुक्ता१४४ अर्थ-यह मोक्ष न तो अत्यंताभावरूप है । न जड़तामय है, न आकाशके समान व्यापक है, न व्यावृत्तिको धारणकरनेवाली अर्थात् उससे लोटकर जीव चले १५.

आत्म प्रबोध . - १५३ - आते हैं, ऐसी है और न विद्वानलोग उसै सघन विषयसुखका प्राप्त होजाना स्वरूपही मानते हैं परंतु वह सत्स्वरूप है, निराकुलतामय है, दर्शन ज्ञान आदि गुणस्वरूप है, संसारमें सार है, असीम है, अतींद्रियसुखका भंडार और अव्यापक है। भावार्थ-बौद्ध मानते हैं कि जिसप्रकार. दीपक बुझ जाता है उसीप्रकार आत्मत- त्वका सर्वथा नाश होजाना मोक्ष है । नैयायिक आदिका यह सिद्धांत है कि ज्ञान आदि दुःखके कारण हैं-ज्यों ज्यों ज्ञानशक्ति बढ़ती जाती है त्यों त्यों जीवको आकु- लता होती जाती है किंतु जिससमय ज्ञान और उसके सहभावी इच्छा सुख आदि गुण नष्ट होजाते हैं उससमय इसको किसीप्रकारकी आकुलता नहिं रहती इस- लिये जहां ज्ञान आदिका अभाव है वही मोक्ष है इसतरह वे आत्माकी जड़ता- रूप अवस्थाको मोक्ष मानते हैं। तथा कोई समस्त जगतमें आत्माके समान प्रदे- शोंके फैलाव होनेपर मोक्ष होती है ऐसा स्वीकार करते हैं । अनेक मतकार यह मानते हैं कि जीव मोक्षमें जाकर लोट आते हैं और अनेक विवेकविहीन मनु- प्योंका सिद्धांत यह है कि संसारमें परिपूर्ण इंद्रियोंका सुख प्राप्त होजाना ही मोक्ष १५३ आत्म प्रबोध १५४ है परंतु इनमें एकभी सिद्धांत युक्तियुक्त नहिं मालूम पड़ता क्योंकि एक तो आत्मा नित्य-अविनाशी पदार्थ है उसका कभी नाश हो नहिं सक्ता । दूसरे मोक्षकी प्राप्ति इसलिये की जाती है कि हमारी आत्मा शांतिमय सुखका अनुभव करै परंतु यदि वह मोक्ष अवस्थामें जाकर नष्ट होगया तो उसकी प्राप्तिकेलिये उसका प्रयत्न ही निरर्थक गया । उसै क्या लाभ हुआ ? तथा ऐसा कौन बुद्धि- मान मनुष्य होगा जो अपने नाशकेलिये उपाय करैगा ? इसलिये आत्माकी समू- लनाश अवस्था कमी मोक्ष नहिं होसकती। आत्माकी जड़ अवस्थाभी मोक्ष नहिं क्योंकि निजस्वरूप अनंतज्ञान और अनंतसुखकी प्राप्तिकेलिये मोक्षका उद्यम किया जाता है यदि वहां जाकर हमारी निज संपत्तिभी नष्ट होगई तो उसकी प्राप्तिसे लाभही क्या हुआ ? दूसरे-मोक्ष स्थानमें स्थित आत्मा और दीवाल आदि जड़ पदार्थों में भेदही क्या रहा ? क्योंकि मोक्षमें आत्माभी जड़ और दीवाल आदि पदार्थ भी जड़ दोनों समान हैं इसलिये आत्माकी जड़ अवस्थामी मोक्ष नही । यदि मोक्षसे लोटकर फिर संसारमें आनापड़ा और यहांके दुःख भोगने १५४ प्रबोध आत्म १५५ पड़े तो मोक्षकेलिये किया हुआ समस्त परिश्रम ही व्यर्थ गया क्योंकि सदा कालकेलिये तो संसारसे छूटना हुआ ही नहिं तथा संसारके कारण रागद्वेष आदि वासना है और जिससमय ये समस्त वासना नष्ट हो जाती हैं उससमय मोक्ष होती है इसकारण मोक्षमें चले जानेपर वासनाके अभावसे भी फिर संसारमें लोटकर नहि आया जा सकता इसलिये मोक्ष जाकर पुनः आत्मा लोटकर संसारमें आ- जाता है यह सिद्धांत नितांत भ्रमपूर्ण है और परिपूर्ण विषय सुखकी प्राप्ति भी मोक्ष नहिं कही जासकती क्योंकि वैषयिक सुख चिनाशीक और परिणाममें दुःख देनेवाला है एवं मोक्षसुख नित्य और सदा निराकुलतामय आनंद प्रदान करने- वाला है इसलिये वैषयिक सुख जरा भी उसकी तुलना नहिं करसकता । अतः मोक्षपदार्थ सत्स्वरूप है, उसमें जाकर निराकुलतामयसुखका भोका कर्ममलसे रहित आत्मा विद्यमान रहता है, आत्मप्रसाद और सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान आदि गुणोंका भंडार है सर्वोत्कृष्ट, असीम, अनंत अतींद्रिय सुखकाभंडार और अव्यापक अर्थात् जिस शरीरसे जिसका आत्मा मोक्षको प्राप्त करता है उसका आत्मा उस अंतिमशरीरके परिमाणही रहता है न्यूनाधिक जरा भी नहिं होता ॥ १४४ ॥ १५५ आत्म प्रबोध १५६ ध्यानान्निःपंकशीघ्रप्रघटितमहाकर्मसंघट्टशुक्ते-- भेदेन प्रोल्लसंती धृतसकलयथाख्यातवृत्ता महार्घा । स्वच्छात्मीयस्वभावप्रतिफलदमलांतर्गुणा नः प्रदेया- दंतज्योति प्रकाशं हृदयविनिहिता सिद्धमुक्तावलीय।।१४५॥ अर्थ-जो सिद्धोंकी पंक्तिरूप मुक्तावली, ध्यानके द्वारा पंकरहित नवीन महा- कर्मोंकी राशिरूपी सीपको भेदकर प्रकाशमान है, सकलयथाख्यातरूपीटत्त (चरित्र निज गोलाई) को धारण करनेवाली है, । बहुमूल्य है और जिसमें स्व- भावस्वरूप गुण सदा प्रतिविम्बित रहते हैं वह (सिद्धोंकी पंक्तिरूपी मुक्तावली) हृदय ( कंठ, मन ) में धारणकी गई आत्मज्योतिके प्रकाशको प्रदान करै । भावार्थ-जिसप्रकार मुक्ताओंका समूह सीपसे वाहिर निकलकर अतिशय प्रकाश- मान जान पड़ता है, गोल और बहुमूल्य होता है एवं उसमें उसके चाकचिक्य आदि गुण प्रतिविम्बित रहते हैं तथा कंठमें पहिरनेपर अपनी कांतिसे जगमगा १५६ . प्रबोध आत्म १५७ . देता है उसीप्रकार सिद्ध भी जिससमय कर्माचरणोंसे रहित होजाते हैं उससमय देदीप्यमान मालूम पड़ते हैं, यथाख्यातचारित्रके धारक और महार्य कहे जाते हैं एवं उनकी आत्मामें अनंतज्ञान अनंतदर्शनरूपीगुण प्रतिविम्बित रहते हैं इसलिये हमारी प्रार्थना है कि हृदयमें धारण किये गये वे सिद्ध परमात्मा हम योगियोंको- केवलज्ञान आदि आत्माकी ज्योति प्रदान करें ॥ १४५॥ श्लाघ्यास्ते ते महार्घा जगति कृतधियः सर्वथा तेकृतार्था-- स्तेभ्योऽस्माभिः प्रणामांजलिपुटघटना भक्तिनम्रीकृतेयं । येषां निर्वाणलक्ष्मनिवयुवतिवशीकारमंत्रस्तथेति स्फूर्जयात्मप्रबोधस्त्रिभुवनभवनालोकहस्तप्रदीपः ॥१४६॥ अर्थ-जिन योगियोंके मोक्षलक्ष्मीरूपी नव युवतिके वश करनेकेलिये (वशी- कार) मंत्र, और तीनलोकरूपी घरके प्रकाशकरनेवाला 'हाथमें स्थित दीपक स्वरूप, आत्मप्रबोध प्रकाशमान है वे योगी परम प्रशंसनीय हैं महाघे हैं ज्ञानवान . १५७ - आत्म प्रबोध १५८ और कृतकृत्य हैं तथा उन योगियोंको नम्रता और भक्तिभावसे मैं प्रणामकरता हूं। संसारकारणशुभाशुभहानिहेतो- निर्वाणकारणविशुद्धिविवर्धनाय । सम्यचिकीर्षुरितरप्रतिवोधसिद्धि- मात्मप्रबोधमवगच्छतु शांतयोगी ॥१४७॥ अर्थ-यह आत्मप्रबोध-आत्मज्ञान संसारके कारण शुभ अशुभ कमाका नाश करनेवाला है और मोक्षकी कारण जो विशुद्धि उसका बढ़ानेवाला है इसलिये 'जो शांत योगी दूसरोंको प्रतिबोध देना चाहता है उसै चाहिये कि वह भलेप्रकार आत्मप्रबोध-आत्मज्ञानको जाने । भावार्थ-जो योगी दयालु हैं-जिनकी यह उत्कट इच्छा है कि हम दूसरोंको प्रतिबोध दें उन्हें चाहिये कि वे पहिले अपनीआत्मा- को प्रतिबुद्ध बना अर्थात् विना आत्मप्रबोधके दूसरोंकोप्रतिबोध देना अशक्य है इस लिये पहिले आत्मप्रबोधका अभ्यास करैं । यह आत्मप्रबोध परम कल्याणकारी है प्रबोध १५९ क्योंकि इससे संसारके कारण शुभ अशुभ कर्मोंका नाश होता है और जिस वि- शुद्धिसे मोक्षकी प्राप्ति होती है उस विशुद्धिकी भी वृद्धि होती है ॥ १४७॥ सिद्धांततर्कपदलक्षणयोगलक्ष्मशास्त्रश्रमादिगुणभूषणभूषितानां । संजायते हि गुणिनां मुखमंडनश्रीरात्मप्रबोधतिलकेन विशेषपूर्णा।। अर्थ-जो महानुभाव सिद्धांत न्याय व्याकरण और योग शास्त्रोंके मनन आदि श्रमसे उत्पन्न हुये गुणरूपी भूपणसे भूपित-गुणी हैं उनके मुखमंडनकी शोभा आत्मप्रबोधरूपी तिलकसे विशेष होती है। भावार्थ-मुखका मंडन करनेपर भी यदि ललाटपर तिलक लगालिया जाय तो शोभा अधिक बढ़जाती है उसीप्रकार अनेक शास्त्रोंगे विद्वान रहनेपर भी जो गुणवान मनुष्य आत्मबोधका पर्या- लोचन करते हैं उनकी विद्वत्ता और भी अधिक छटकने लगती है अर्थात् विद्वा- नोंको अवश्य इस आत्मप्रबोधग्रंथका-पोलोचन करना चाहिये ॥ १४८ ॥ श्रीमजिनेंद्रचरणाग्रनखोन्मयूखचंद्रोदयाभिमुखचित्तचकोरकेण। .

आत्म मेयर श्रीमत्कुमारकविनात्मविबोधनार्थमात्मप्रबोधइतिशास्वमिदंव्यधायि इत्यात्मप्रबोधनामाध्यात्मशास्त्रं समाप्तं ।। अर्थ-जिसका चित्तरूपी चकोर जिनेंद्र भगवानके चरणकमलोंके नखकिरण- रूपी चद्रमाकी ओर अभिमुख है ऐसे श्रीमान कुमारकविने अपनी आत्माके संबो- धनार्थ इस आत्मप्रबोधग्रंथकी रचना की है । भावार्थ-जिसप्रकार चकोर पक्षीका चंद्रमाके ऊपर गाढ़ प्रेम रहता है उसीप्रकार जिसका भगवान जिनेंद्रके चरणों में गाढ प्रेम है ऐसे कुमार कविने इस ग्रंथका निर्माण किया है तथा इस श्लोकमें जो 'आत्मविवोधनार्थ' यह पद दिया है उससे यह बतलाया है कि इस ग्रंथके बनानेमें कोई लोभ मान आदि कारण नहीं किंतु मेरी आत्मा किसीप्रकारसे प्रबुद्ध हो जाय इस आशासे ही मैंने यह ग्रंथ बनाया है ॥१४९ ॥ इस तरह यह आत्मप्रवोध ग्रंथ समाप्त हुआ। A

No text on this page.

Aatmaprabodh

Author
Kumarkavi
Title
Aatmaprabodh
File name
Aatmaprabodh
Text
OCR done
Published
2010/06
Publisher
Bharatiya Jain Siddhant Prakashini Sanstha, Calcutta
Language
Sanskrit
Pages
174
Library
Bharatiya Shruti Darshan Kendra, Jaipur
DLI number
327246
Barcode
99999990002728.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
HMilYjOk52o
Download PDF

Aatmaprabodh