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Nyaayabindu

Shriidhara~mottaraa Chaara~ya · 2005-12-03

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OU_184554
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॥श्रीः॥
* काशी-संस्कृत-अन्धमाला *
PP
( बौद्धन्यायविभागे प्रथमपुष्पम् )
बौद्धाचार्यश्रीधर्मकीर्तिप्रणीतः
न्यायबिन्दुः
श्रीधर्मोत्तराचार्यकृतटीकासमेतः ।
स चायं
काशीहिन्दूविश्वविद्यालयाध्यापक
आचार्य श्रीचन्द्रशेखरशास्त्रिणा
हिन्दीभाषायामनुवादित: भूमिकया विषमस्थलटिप्पण्या
च संयोज्य सम्पादितः ।
४
चौखम्बा-संस्कृत-सीरिज, बनारस-१
सं० २०११]
द्वितीयं संस्करणम्
[ ई० १९५४

प्रकाशक:-
जयकृष्णदास हरिदास गुप्ता,
चौखम्बा-संस्कृत-सीरिज आफिस,
पो. बाक्स नं. ४, बनारस
(पुनर्मुद्रणादिकाः सर्वेऽधिकाराः प्रकाशकाधीनाः)
The Chowkhamba Sanskrit Series Office,
P. O. Box 8, Banaras.
1954
प्रथम संस्करण सन् १९२४ ई.
मूल्य )
विद्याक्लिास प्रेस,

KASHI SANSKRIT SERIES
22
( Buddhist Nyāya Section No. I)
THE
NYAYA BINDU
OF
S'RĪ DHARMA KİRTI
WITH A SANSKRIT COMMENTARY
BY
SRI DHARMOTTARĀCHARYA
EDITED WITH
Nites, Introduction & Hindi Translation
BY
ĀCHĀRYA CHANDRASEKHARA SĀSTRI
Professor, Banaras Hindu University.
THE
CHOWKHAMBA SANSKRIT SERIES
BANARAS-1
1954

भूमिकाविषयसूची विषय (१) प्राथमिक निवेदन (२) बौद्धन्यायके इतिहासपर एक दृष्टि धर्मोत्तराचार्य १ २ (३) धर्मकीर्ति " जीवनचरित्र धर्मकीर्ति और कुमारिल दिग्विनाथ ११ १२ समय १३ १५ " १६ १७ रचनायें ( ४ ) धर्मकीर्तिका सम्प्रदाय ( ५ ) धर्मकीर्तिका बौद्धन्यायमें स्थान ( ६ ) धर्मकीर्तिकृत दिङनागका खण्डन इष्टविघातकृत् विरुद्ध विरुद्धव्यभिचारी दृष्टान्तका कार्य (७) न्यायबिन्दु तथा उसका न्याय प्रथम परिच्छेद द्वितीय परिच्छेद स्वभाव, कार्य और अनुपलब्धि तृतीय परिच्छेद असिद्ध, विरुद्ध और अनैकान्तिक (८) न्यायविन्दु में अन्य दर्शनों के सिद्धान्त (६) न्यायबिन्दु की टीकाएं (१०) न्यायबिन्दु में बौद्धदर्शनके सिद्धान्त धन्यवाद द्वितीय संस्करण की भूमिका २१ २३ २४ " २५ २६ Y २८ भूमिका । (१) प्राथमिक निवेदन । हर्षका विषय हैं कि आजकलके विद्वानों का हृदय क्रमशः धार्मिक विषयोंमें उदार क्विारों का होता जा रहा है। भिन्न २ मत वाले विद्वानों के द्वारा भिंन २ मतकी पुस्तकों का सम्पादन उसीका शुभ परिणाम है। यद्यपि प्राचीन कालके भारतीय विद्वान् भी भिन्न २ मतोंके ग्रन्थोंका अध्ययन करते थे तथापि उनका अध्ययन प्रायः उन प्रन्थोंका खण्डनमण्डन करने के उद्देश्य से ही होता था, जैसा कि स्वामी शङ्कराचार्य, जैन न्यायके उद्धारक श्री अकलङ्कदेव श्रादिके प्रन्थोंको देखनेसे पता चलता है । हर्षकी बात है कि आजकल के बहुतसे विद्वानोंका यह मत हो गया है कि प्रत्येक धर्ममें अधिक परिमाणमें सत्य विद्यमान है। पश्चिमीय विद्वानोंके विचार इस विषयमें बहुत ही प्रशंसनीय हैं। हमारे बहुतसे प्रन्योंको और बौद्ध साहित्यके अधिकांश ग्रन्थोंको संसारके प्रकाशमें लानेका श्रेय उन्हींको प्राप्त है। प्रस्तुत प्रन्य और उसके कर्ता प्राचार्य धर्मकीति और धर्मोत्तरके विषयमें भी हमको सर्व प्रथय उन्हींसे विदित हुआ था । यद्यपि प्राचार्य धर्मकीर्ति और न्यायबिन्दुका नाम सर्वदर्शनसंग्रह इत्यादि हिन्दूग्रन्थों और प्रमेयकमलमार्तण्ड आदि जैन प्रन्यों में विद्यमान होनेके कारण भारतीय विद्वानोंको पहिलेसें ही विदित था, किन्तु अनुसन्धानप्रियताके अभावके कारण उनका जानना न जानना एक सा ही था। हमको पहले पहल 'श्राचार्य धर्मो. तर' का नाम बतलानेवाला पश्चिमीय विद्वान (W. Wassiljew ) डब्ल्यू वैसिलज्यू नामका एक रूसी विद्वान् था। यह विद्वान् सन् १८४० से १८५० तक ( दस वर्ष तक ) पेकिनमें रहा। यह चीनी और तिब्बी दोनों भाषाओंका अच्छा पण्डित था। इसने इन भाषाओं के ज्ञानसे बहुतसे बौद्ध प्रन्योंका पता लगाया । इन्होंने अपने सबसे पहिले प्रन्थ 'बुधिज्म, इटस् डाग्मस, हिस्ट्री पेण्ड लिटरेचर' ( Buddhism, its Dogmas, History & Literature ) में धर्मोत्तरके विषयमें बहुत कुछ. बतला दिया है । न्यायविन्दुको सर्व, प्रथम प्रो. पीटसन साहिकने १८:९ में निकाला था। यह संसारण उन्होंने. उत. अन्यको दो. हस्तलिखित प्रतियों ( Manuscripte) की सहायतासे सम्पादन किया था, जिनमें से पा उमको काम्बेके शान्तिमायके मन्दिर में ताइपत्र पर लिखी मिली थी। (पीटर्सन साहबने इस प्रतिक नाम (A) और हमने (क) रखा है । ), और, दूसरी रायल एशियाटिक सोसायटी की कमाई शाखाके भाऊ दाजीके हस्तलिखित प्रन्यों के संग्रहमें भगवान दास केवलराम की सूचनाओंमेंसे मिली थी। ( पीटर्सन साहबने इसका नाम (B) और हमने (क) २ भूमिका । रखा है ।) क. और ख. दोनों पुस्तकोंमें धर्मोत्तराचार्य की न्यायविन्दु टीका थी, किन्तु धर्मकीर्ति का मूल प्रन्य केवल ख. में ही था। हमने पाठोंके परिवर्तन क. और ख. से चिह्नित किये हैं। छपी पुस्तकको हमने अपनी टिप्पणीमें मुद्रित पुस्तक हो लिखा है और हमारी सम्मतिमें जहाँ मुद्रित पुस्तकका पाठ बदलने योग्य था उसको भी हमने टिप्पणी में दिखला दिया है। यद्यपि हमने पोटर्सन साहिवको सभी अशुद्धियोंको बतलाया है तथापि हमारे प्रन्थमें भी प्रूफ सम्वन्धी बहुतसी अशुद्धियां अनुभव हीनताके कारण रह गई होंगी। आशा है विद्वज्जन मुझको इसके लिए क्षमा करते हुए उनको सुधार कर पढ़ेंगे। ( २ ) बौद्धन्यायके इतिहास पर एक दृष्टि । यद्यपि दर्शनशास्त्रके प्रारंभिक कालमें भी बहुतसे शास्त्रार्थ हुआ करते थे तथापि उस समय न्यायकी ओर किसीका विशेष लक्ष्य न था। वुद्धके निर्वाणके समयको पुस्तकों में भी इसका कुछ विवरण नहीं है । गौतमका न्यायसूत्र उस समय तक बन चुका था। किन्तु वौद्ध और जैन दार्शनिकांका ध्यान अभी तक उधर आकर्षित नहीं हुआ था। यद्यपि सुत्तपिटकके दिग्पनिकायके भाग ब्रह्मजाल सुत्त, मज्झिमनिकायके भाग अनुमान सुत्त और खुद्दक निकायके भाग उदान तथा विनयपिटकके परिवार और पातिमोक्ख तथा अभिधम्मपिटकके कथावत्थुप्रकरण आदि ग्रन्थोंमें न्यायके कुछ शब्द तथा निर्णय करने के कुछ नियम मिलते हैं किन्तु हमारी सम्मतिमें उनपर भी गौतमके न्यायसूत्रोंकी छाप पूर्ण रूपसे लगी हुई है। क्योंकि उनमें 'उपनय' तथा 'निग्रह' का भी कुछ वर्णन किया गया है। नीति ( अथवा न्याय ) शब्दका उल्लेख पालोके केवल एक प्रन्थ मलिन्दप होमें ( जो कि भिक्षुसूत्र भी कहलाता है) मिलता है। इससे भलीप्रकार पता चल र कता है कि उस समय के बौद्ध आचार्योंने इस विषय पर कितना प्रकाश डाला है। ईस्वी सन्के प्रारम्भमें भारत पर कुसान, तुरुष्क अथवा सीथियन लोगों के आक्रमण हुए। उनके एक सरदारका नाम कनिष्क था। उसने काश्मीर, पल्हव और देहलीको विजय किया। उसके विषयमें कहा जाता है कि उसीने ईस्वी सन् ७८ में एक सम्वत् की नींव डाली । उसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और बौद्धोंका एक नया समादाय महायानको स्थापित किया। तवसे पाली त्रिपिटकमें वर्णित प्राचीन सम्प्रद य हीनयान कहा जाने लगा । महायान क्रमशः नेपाल, तिब्बत, मंगोलिया, चीन, जापान और कोरिया आदिमें फैल गया और हीनयान सिंहल और वहांसे बर्मा और श्याम आदिमें फैल गया। भारतमें दोनों ही सम्प्रदाय चलते रहे। कनिष्ण के संरक्षण तथा पार्श्व ( या पूर्णक) और वसुमित्रके निरीक्षणमें ५०० बौद्ध भिक्षुषोंकी एक बृहत्सभा जालन्धरमें हुई। इसमें पालीके सुत्त, विजय तथा अभिधम्म इन त्रिपिटकोंकी टीका स्वरूप क्रमशः सूत्र उपदेश, विनय विभाषा और अभिधर्म विमाषा बनाये गये । महायान सम्प्रदायके साहित्य में सबसे प्राचीन यही प्रन्य है।

- भूमिका । यद्यपि कनिष्कसे पहिले भी संस्कृतमें कुछ बौद्ध प्रन्योंकी रचना हो चुकी थी (उदाहरण के लिये अभिधर्म विभाषा अथवा अभिधर्म महानिभाषा शास्त्र जिसकी रचना कनिष्ककी सभामें की गई थी, कात्यायनी पुत्रके अभिधर्मज्ञान प्रस्थानशास्त्र ( यह पाली श्रभिधम्म पिटककी टीका है और बुद्ध के निर्वाणके ३०० वर्ष पश्चात् तथा कनिष्कसे १०० वर्ष पहिले बनाया गया था) के ऊपर टीका है) तथापि संस्कृतको बौद्धसाहित्यकी भाषा बनानेका श्रेय उसीको प्राप्त है। उसके समयसे लगाकर असंख्य संस्कृत बौद्धप्रन्यों की रचना हुई है, जिनमें से नवधर्म संज्ञक नौ ग्रन्थ महायान सम्प्रदायके विशेष रूपसे पूज्य हैं। नव धर्म ये हैं- (१) अष्ट साहस्रिका प्रज्ञापारमिता, (२) गंडव्यूह, (३) दशभूमीश्वर, (४) समा- घिराज, (५) लंकावतार, (६) सद्धर्मपुण्डरीक, (७) तथागतगुह्यक, (८) ललितविस्तर और (९) सुवर्णप्रभास । इनमें अनेक स्थलों पर न्यायका भी उल्लेख किया गया है। बुद्धने अपना उपदेश पाली अथवा मागधी भाषामें दिया था। उसके पश्चात् उसकी शिक्षायें बौद्ध भिक्षुओं की तीन सभाओंमें एकत्रित की गई। ये सभायें राजगृह, वैशाली और पाटलिपुत्रमें क्रमसे राजा अजातशत्रु, कालाशोक और अशोकके संरक्षणमें हुई थीं । पहिली सभा ईसासे ४९० वर्ष, दूसरी ३९० वर्ष तथा तीसरी २५५ वर्ष पूर्व हुई थी । ( पहिली सभा बुद्ध के निर्वाणके संवत्में, दूसरी उसके १०० वर्ष पश्चात् और तीसरी अशोकके शासनकालके १७३ वर्षमें हुई थी। अशोक ईसासे २७२ वर्ष पूर्व सिंहासन- पर बैठा था )। जो भिक्षु प्रथम सभामें एकत्रित हुए थे वह (१) थेरा कहे जाने लगे। वैशालीकी द्वितीय सभाके निर्णयसे दस सहस्र भिक्षु थेरावादके कुछ नियमों का उल्लंघन करनेके कारण थेरा संघसे पृथक् कर दिये गये। ये निकाले हुए धर्मगुरु (२) महा. सांघिका कहलाये । मूल बौद्ध धर्ममें से पृथक् होने वाला पहिला सम्प्रदाय यही था। उन्होंने थेरावादमें कुछ नियम घटाये तथा कुछ बढ़ा दिये। इसके पश्चात् बुद्धके निर्वाणके २०० वर्षों के भीतर मूलधर्मसे पृथक् (Heretical) सोलह और सम्प्रदाय चले, उनके नाम ये हैं-(३) गोकुलिका, (४) एकब्बोहारिक, (५) पण्णत, (६) बाहु- लिक (७) चेतिय, (८) सब्बत्थि, (९) धर्मगुत्तिक, (१०) कस्सपीय, (११) संकतिक, (१२) सुत्त, (१३) हिमवत, (१४) राजगिरीय, (१५) सिद्धस्थिक, (१६) पुब्बसेलिय, (१७) अपरसैलिय, (१८) वजिरिय । तीसरी सभाके पश्चात् लगभग ईसाके २५५ वर्ष पूर्व अशोकके पुत्र महिन्दने त्रिपिटकों को शिक्षाका सिंहलमें प्रचार किया। जहाँ के पुरोहितोंने इसको कण्ठ रख २ कर चलाये रखा। महावंश अध्याय ३३ के अनुसार प्रथम ये राजा वत्तगा- मणिके समयमें लिखे गये, जिसने ईसासे १०४ वर्ष से ७६ वर्ष पूर्व तक सिंहलका राज्य किया था । त्रिपिटकके अतिरिक्त अन्य भी बहुतसे अन्य पाली में लिखे गये थे जिससे पाली साहित्य बहुत विस्तीर्ण हो गया। .

D ४ भूमिका । कुछ समय के पश्चात् उपरोक १९ सम्प्रदायों में से कुछ लोप हो गये तथा कुछ मये उत्पन्न हो गये। इसके परिणामस्वरूप कनिष्कके समयमें चार समुदायोंमें निम्नलिखित १८ सम्प्रदाय थे-- १. आर्यसर्वास्तिवाद (१) मूल सर्वास्तिवाद (२) काश्यपीय (३) महीशासक (४) धर्मगुप्तीय (५) बहुश्रुतीय ये सब वैभाषिक दर्शनके (६) तामरथारीय सिद्धान्त वाले हैं। (७) विभज्यवादिन् २. मार्यसम्मतीय (८) कुरुकुल्लक (९) आवन्तिक (१०) वात्सीपुत्रीय ३. आर्यमहासांघिक (११) पूर्व शैल (१२) अपर शैल (१३) हैमवत (१४) लोकोत्तरवाधिन ये दार्शनिक विचारों में सौधान्तिक (१५) प्रक्षिप्तवादिन सम्प्रदायके हैं। ४. पार्यस्थविर (१६) महाविहार (१७) जेतवनीय,और (८) अभयगिरिवासिन् उपरोक्त सब सम्प्रदाय हीनयानके हैं, यद्यपि पीछेसे ये महायान में भी मिल गये थे। इनके दार्शनिक विचार क्रमसे वैभाषिक और सौत्रान्तिक मत के हैं। कनिष्कके स्थापित किए हुए महायानने माध्यमिक और योगाचार नाम के दो और दार्शनिक सम्प्रदायोंकी नींव रखी। अब बौद्धोंमें चार दार्शनिक सम्प्रदाय हो गये- (१) वैभाषिक, (२) सौत्रान्तिक, (३) माध्यमिक और (४) योगाचार । वैभाषिक सर्वास्तिवाद सम्प्रदायका ही पीछे का नाम है, जो अपने मामा के अनुसार संसारकी प्रान्तरिक और बाह्य वास्तविकताको स्वीकार करता है। वैभाषिक कहता है कि हमारा शाम और ज्ञेय ( उस शामके विषय) दोनों हीवास्तविक है। इस समादाम का मुख्य प्रन्थ अभिधर्मशान प्रस्थान शास्त्र भयवा केवल झाम प्रस्थान शास्त्र है, जो ।

भूमिका। बुद्धंक ३.०० वर्ष पश्चात् बनी था। इसका दूसरा प्रन्थ अभिधर्म महाविभाषा शास्त्र अथवा केवल विभाषा है, जो सन् ७८ ईस्वीके लगभग कनिष्कको सभामें बनाया गया था। इस सम्प्रदायका नाम वैभाषिक इसी विभाषासे पाया है। क्योंकि विभाषाका अर्थ टीका है। ऐसा प्रतीत होता है कि बुद्धकी शिक्षाओंपर निर्भर करनेकी - अपेक्षा टीकाओंपर ही निर्भर करने के कारण यह सम्प्रदाय वैभाषिक कहलाता है । संघभद्रका न्यायानुसार शास्त्र अथवा केशकारक शास्त्र, (जो ४८९ ईस्वीके लगभग बना था') इस सम्प्रदायका बड़ा विद्वत्तापूर्ण प्रन्थ है । सौत्रान्तिक ज्ञान और वाह्य विषयोंकी सत्ताको अनुमानके द्वारा स्वीकार करता है । सौत्रान्तिक शब्द सूत्रान्तसे निकाला गया है, जिसका अर्थ सूत्रका अन्त है । सम्भवतः टीकाओंकी अपेक्षा बुद्धकी शिक्षाओं पर ही निर्भर करने के कारण यह सम्प्रदाय सौत्रान्तिक कहलाता है । वह मूल जिसके आधार पर सौत्रान्तिक दर्शन वना है आर्य- स्थविर (अथवा पालीके अनुसार थेरात्रओं) और महासांघिकों के सम्प्रदायसे सम्बन्ध रखता है । यह कहा जाता है कि इस सम्प्रदायके दार्शनिक सिद्धान्तोंको एक धर्मोत्तर या उत्तरधर्म नामके प्राचार्यने कनिष्कके समयमें सन् ७८ ई. के लगभग काश्मीरमें बनाया था। परन्तु चीनी यात्री हुएन्त्सांग (जो भारतमें ७ वीं शताब्दीके प्रारम्भमें आया था) के अनुसार इस सम्प्रदायका संस्थापक तक्षशिलाका प्रसिद्ध अध्यापक कुमारलब्ध था, जिसने इस विषय पर बहुतसे अमूल्य प्रन्थ लिखे थे। कुमारलब्ध, नागार्जुन, आर्यदेव और अश्वघोषके समकालीन थे, अतएव उनके सन् ३०० ई० के लगभग होनेका अनुमान किया जाता है। दूसरे अत्यन्त प्रसिद्ध अध्यापक श्रीलब्ध थे, जिन्होंने सौत्रान्तिक सम्प्रदायके विभाषाशास्त्र को लिखा था । हुएन्त्सांगने अयोध्यामें संघारामके वह खंडहर देखे थे जिनमें श्रीलब्ध रहते थे । योगाचार का सिद्धान्त है कि बाह्य पदार्थ तो वास्तविक नहीं हैं किन्तु हमारे ज्ञानकी वास्तविकताका निषेध नहीं किया जा सकता। योगाचार शब्द योग और आचार दो शब्दों से बना है। योग करने को योगाचार कहते हैं। भूमियों (बौद्ध पूर्णताकी १७ श्रेणियों ) की प्राप्तिका असाधारण कारण केवल योगको ही कहने के कारणसे यह योगाचार कहलाता है। योगाचारमें प्रतिपादित किया हुआ मुख्य सिद्धान्त श्रालय विज्ञान है । यह चेतनात्मक ( Conscious ) अवस्थाओं का मूल है और हमारे 'आत्मा' के समान है। इस सम्प्रदाय के संस्थापकका कुछ भी पता नहीं चलता। परन्तु तिब्वत और चीन की पुस्तक में लंकावतार सूत्र, महासमय सूत्र, बोधिसत्वचर्यानिर्देश और सप्तदश भुमिशास्त्र को इस संप्रदाय के प्राचीन तथा प्रामाणिक अन्य मानते हैं । मैत्रेयनाथ और आर्य असङ्ग इसके प्रारंभिक अध्यापक थे। ऐसा प्रतीत होता है कि योगाचार की स्थापना लगभग सन् ३०० ई० में हुई थी, जब कि लंकावतार सूत्र आदि बनाये गये थे। माध्यमिकों का सिद्धान्त है कि हमारा विज्ञान और उनके विषयीभूत वाह्यपदार्थ २ न्या० भक wr । है आर्यदेवका हस्तबल, . भूमिका। न तो पूर्ण रूपसे वास्तविक और न पूर्ण रूपसे काल्पनिक ही हैं । माध्यमिक शब्द मध्यमसे बनता है । मध्यम बीच को कहते हैं। दोनों अन्तके सिद्धान्तोको छोड़नेके कारणसे यह माध्यमिक कहलाता है । अर्थात् यह न तो सर्वास्तित्ववादी ही है, और न सबके अस्तित्वका निषेध हो करता है । किन्तु इसने एक बीचका मार्ग चुनकर निश्चय किया जो कि संसारकी एक वैकल्पिक सत्ता ( Conditional existence ) थी। यह कहा जाता है इसके संस्थापक नागार्जुन २५०-३२० ईस्वी तक हुए । किन्तु वास्तवमें इसके सिद्धान्त उससे प्राचीन अन्य प्रज्ञापारमितामें मिलते हैं। नागार्जुनकी माध्यमिक कारिका, बुद्धपालितकी मूल माध्यमवृत्ति, भव्य की मध्यमहदयकारिका, कृष्णका मध्यम प्रतीत्यसमुत्पाद, चन्द्रकीर्तिकी माध्यमिक वृत्ति और जयानन्दकी माध्यमिकावतार टोका माध्यमिक सम्प्रदायके मुख्य प्रन्थ हैं। नागार्जुनकी एक मूल माध्यमिक वृत्ति अकुतोभयका तिब्बी भाषा अनुवाद मिलता है, जिसके अन्तमें माध्यमिक दर्शनके इन आठ प्रचारकों ( Expounders ) के नाम दिये हुए हैं-१आर्य नागार्जुन, २स्थविर बुद्धपालित, ३चन्द्रकीति, ४देवशर्मा, ५ गुणश्री, ६गुणमति, स्थिरमति और ८भव्य ( या भावविवेक )। उपर्युक्त चारों दार्शनिक सम्प्रदायोंके साथ ही बौद्ध जनता में न्यायके अध्ययनका भी विकाश होने लगा । अब चारों ही सम्प्रदायोंके नेता अपने सिद्धान्तके मण्डन और दूसरोंके सिद्धान्तके खण्डन के लिये न्यायको उपयोगी समझने लगे। जैसा कि माध्यमिक सम्प्रदायके नागार्जुन और आर्यदेव तथा योगाचार सम्प्रदायके मैत्रेय, असंग और वसुबन्धुके लेखोंसे स्पष्ट है। अपने पक्ष मण्डन और परपक्षका खण्डन करनेके लिये उपयोगकी हुई युक्तियोंने अक्षपादके प्राचीन न्यायका प्रचार और बौद्धों बहुतसे नैयायिकोंको उत्पन कर दिया। बौद्धोंमें न्यायके ऊपर विस्तारसे प्रथम विचार करने वाला माध्यमिक सम्प्रदायका प्रवर्तक आर्य नागार्जुन था। यह महाकौशल देशके विदर्भ नगर में आन्ध्र राजा सद्वाह अथवा सातवाहनके समयमें उत्पन्न हुआ था। इसने कृष्णा नदीके तटपर श्रीपर्वतकी गुफामें बहुत-सा समय ध्यान करनेमें व्यतीत किया था। ये 'शरह' के शिष्य थे। कहा जाता है कि इन्होंने एक बड़े शक्तिशाली राजा भोजदेवको बौद्ध बनाया था। बौद्धग्रन्थों के अनुसार ये बुद्धके निर्वाण के ४०० वर्ष पश्चात् अथवा ईसासे ३३ वर्ष पूर्व हुए थे। किन्तु म. म. डाक्टर सतीशचन्द्र विद्याभूषणकी सम्मतिमें इनका समय कुछ पीछे है। इन्होंने अपनी माध्यमिक कारिका में प्राचीनन्यायके परिभाषिक शब्द पुनरुक्त, सिद्धसाधन, साध्यसम और परिहार का प्रयोग और अक्षपादके सिद्धान्त प्रमाणके दीपकके समान स्वपरप्रकाशकत्वका निराकरण किया है। इन्होंने अपने प्रन्थ विग्रहव्यावर्तनी कारिकामें भी अक्षपादके सिद्धान्तको समालोचना की थी। प्रमाण विटेतन या प्रमाणविध्वंसन और उपायकौशल्यहृदयशास्त्र इनके न्याय पर स्वतन्त्र अन्य है। किन्तु इनपर प्राचीन न्यायका पूरा प्रभाव पड़ा हुआ है। क्योंकि इनमें .

। भूमिका । इन्होंने नैयायिकों के १६ पदार्थ माने हैं। कार्यहेतु, स्वभावहेतु और अनुपलब्धि हेतुका वर्णन भी इन्होंने किया है। आर्यदेव ( लगभग ३२० ई० ), मैत्रेय (लगभग ४०० ई०), आर्य प्रसंग ( लगभग ४०५-४७० ई० तक) और वसुबन्धु ( लगभग ४१० से ४९० तक ) ने भी बौद्धन्यायपर स्वतन्त्र ग्रन्थ लिखे हैं। किन्तु इनके ग्रन्थों पर भी प्राचीन न्यायका पूरा प्रभाव देखने में आता है । ये प्रन्थकार बौद्धन्यायकी आदिम अवस्थाके थे। सारांश यह है कि ईसासे पूर्व छठी शताब्दीमें बौद्ध धर्मको स्थापनासे लेकर ईसाको चौथी शताब्दीमें इसका चार दार्शनिक संप्रदायों में विकाश होने तक बौद्धन्याय के ऊपर कोई भी क्रमबद्ध ग्रन्थ नहीं था । केरल दार्शनिक और धार्मिक प्रन्धोंमें न्यायका यतस्ततः आभास देखनेमें आता था। नागार्जुनने लगभग ३०० ई० में न्यायपर एक स्वतन्त्र प्रन्थ लिखा । किन्तु वह केवल प्राचीन न्यायके सिद्वान्तोंकी पालोचना मात्र थी। ई० ४०० से ५०० तक मैत्रेय, असंग और वसुबन्धुने भी न्यायको चलाया, किन्तु उनका लेख केवल आकस्मिक था। क्योंकि वह योगावार और वैभाषिकके सिद्धान्तोंसे मिला हुअा था । हुएन्त्सांगके बतलाये हुए वसुबन्धुकृत तीनों ग्रन्थ अनु- पलब्ध हैं । अतएव उनके विषयमें कुछ भी नहीं कहा जा सकता। ४५० ई० से वह समय आया जप न्याय साधारण दर्शनसे बिलकुल पृथक् हो गया और बहुतसे बौद्ध लेखकों का ध्यान इधर पूर्णरूपसे आकर्षित हुआ। इनमें दिङ्नागका नम्बर सबसे पहिला है। दिङ्नागको आधुनिक बौद्वन्यायका पिता कहना अनुचित न होगा। क्योंकि अधिकांश बौद्धन्यायके सिद्धान्तोंकी नींव उसीने डाली है। उसने नालन्द, उड़ीसा, महाराष्ट्र और दक्षिण (मद्रास ) की यात्रा की थी। ये जहाँ गये वहाँ इनको अपने विरोधियोंसे शास्त्रार्थ ही करना पड़ा। उनका सम्पूर्ण जीवन चोटें करने और सहनेमें ही व्यतीत हुआ । उनके मरने पर भी कालीदास, उद्योतकर, वाचस्पतिमिश्र, मल्लिनाथ, कुमारिल भट और पार्थसारथिमिश्रने उनके ऊपर कम आक्रमण नहीं किये । वेदान्ती और जैनी भी उनपर आक्रमण करनेसे न चूके । यहाँ तक कि बौद्धसाधु धर्मकीर्तिने भी उनका विरोध करनेका प्रयत्न कर ही डाला। दिङ्नागके प्रन्थोंसे उनकी सार्वतोमुखी प्रतिभाका खूब परिचय मिलता है। प्रमाणसमुच्चय, न्यायप्रवेश, हेतुचकहमरु, प्रमाणसमुच्चयवत्ति, प्रमाणशास्त्र न्यायप्रवेश, आलम्बन परीक्षा, आलम्बन परीक्षावृत्ति और त्रिजालपरीक्षा इनके न्यायपर स्वतन्त्र प्रन्य हैं। इनमें से इनका प्रमाणसमुच्चय सबसे प्रधान है और यही बौद्धन्याय का पथप्रदर्शक है। इसमें छः अध्याय हैं- (१) प्रत्यक्ष, (२) स्वार्थानुमान, ( ३ ) परार्थानुमान, ( ४ ) हेतु दृष्टान्त, ( ५ ) अपोह और ( ६ ) जाति । दिङ्नागके पश्चात् परमारथ (४९८ ई० से ५६९ ई. तक ) हुए । इन्होंने कुछ बौद्धप्रन्थोंका चीनी भाषामें अनुवाद किया । इन्होंने एक न्यायभाष्य भी लिखा था। - - भूमिका। शंकरस्वामिन् ( लगभग ५५० ई० ) आचार्य दिङ्नागके शिष्य थे। कहा जाता है कि शंकरस्वामिन् और अन्य दश प्राचार्योंके द्वारा न्यायशास्त्र दिङ्नागसे शालिभद्र तक पहुँचा था। इन्होंने एक ग्रन्थ न्यायप्रवेशशास्त्र या न्यायप्रवेशतर्कशास्त्र नामका लिखा था। । धर्मपाल ( लगभग ६०० से ६३५ ई. तक ) कांचीपुर ( वर्तमान कंजीवरम् ) के राजमन्त्रीके ज्येष्ठ पुत्र थे। यह धर्मकीर्तिके गुरु थे। इन्होंने बाल्यावस्था में ही वैराग्य ले लिया था। प्रारम्भमें ये नालन्द विश्वविद्यालयमें पढ़ने गये, किन्तु पीछेसे ये उस विद्यालयके प्रधान बना दिये गये। ये योगाचार मतावलम्बी थे। इन्होंने आलम्बन प्रत्यय ध्यान शास्त्रव्याख्या, विद्यामात्र सिद्धिशास्त्र व्याख्या और शत-शास्त्र वैपुल्य व्याख्या आदि ग्रन्थ लिखे थे। शालिभद्र ( ६३५ ई. ) बंगाल के राजा समतटके कुटुम्बके थे। ये ब्राह्मण थे। नानन्द विश्वविद्यालयमें ये धर्मपालके शिष्य थे, जिसके ये उनके पीछे प्रधान हो गये थे। चीनी यात्री हुएन्त्सांग ( सन् ६३५ ई० ) इनका शिष्य था । शालिभद्र बड़े भारी विद्वान् और नैयायिक थे। श्राचार्य धर्मकीर्ति ( लगभग ६३५ से ६५० ६० तक )के विषयमें आगे विस्तारसे विचार किया जावेगा। देवेन्द्रबोधि ( लगनग ६५० ई०) धर्मकीर्तिके समकालीन थे। इन्होंने प्रमाणा- वार्तिकपंजिका बनाई थी। कहा जाता है कि धर्मकीर्तिने अपने प्रमाणवातिकके ऊपर टीका लिखनेके योग्य देवेन्द्रबोधिको ही चुना। तदनुसार देवेन्द्रबोधिने टीका बनाकर धर्मकीतिको दिखलाई किन्तु उसने उसको धो डाली। देवेन्द्रबोधिने फिर बनाकर दिखलाई इस बार धर्मकीर्तिने उसको जला दी। किन्तु तीसरी बार देखने पर धर्मकीर्तिने उसको रहने दी। शाक्यबोधि ( लगभग ६७५ ई०) ने जो कि देवेन्द्रबोधिका शिष्य था एक टीका प्रमाणवार्तिक पंजिका पर बनाई। जिसका नाम उन्होंने प्रमाणवार्तिक ( पंजिका) दीका रखा। न्यायबिन्दुटोकः ( धर्मकीर्तिका न्यायबिन्दु ), हेतुबिन्दु (धर्मकीर्तिका ) टीका, वादन्याय (धर्मकीर्तिकृत ) व्याख्या, सम्बन्ध रीक्षा (धर्मकीर्तिकृत ) टीका, आल- म्बनपरीक्षा ( दिङ्नागकृत ) टोका और सन्तानान्तरसिद्धि (धर्मकीर्तिकृत ) टीकाके कर्ता, विनीतदेव ( लगभग ७०० ई० ) राजा गोविन्दचन्द्र के पुत्र राजा ललितचन्द्र के समयमें नालन्दमें रहते थे। धर्मकीर्तिको मृत्यु भी गोविन्दचन्द्र के समयमें हुई थी। गोविन्दचन्द्र के पिता विमलचन्द्रका विवाह भर्तृहरि (जो मालनेके प्राचीन राजवंशके थे।) की बहिनसे हुआ था । यदि हम भर्तृहरि और इस नामके वैयाकरणीको जो ६५१ मा ६५० ई० में परलोक गये एक ही अक्ति मान लें तो हम उनके समकालीन गोविन्दचन्द्रको ५ वी शताब्दीके मध्यमें रख सकते हैं। धर्मकीर्तिकी सत्युका भी भूमिका। ६ यही समय है। इससे परिणाम निकाला जा सकता है कि गोविन्द चन्द्रके पुत्र ललितचन्द्र ७वीं शताब्दीके अन्तमें हुए होंगे। अतएव ललितचन्द्र के समकालीन विनीतदेव भी उसी समय हुए होंगे। क्योंकि यह विचार धर्मकीर्तिके उमयसे भी मिलता है ( जिसकी उसने टीका की थी।) रविगुप्त ( लगभग ७२५ ई० ) काश्मीरमें उत्पन्न हुए थे। ये वारेन्द्र के राजा हर्षके समकालीन थे और न्यायमंजरीकार जयन्तसे पूर्व उत्पन्न हुए थे। ये अवश्य ही सातवीं शताब्दीके पूर्वमें रहे होंगे। क्योंकि उनका शिष्य प्रसिद्ध तांत्रिक साधु सर्वज्ञ मित्र उस शताब्दीके मध्यमें था। गुप्त सम्वत् ४३५ (७५४ ई०) में वसन्तसेन के लेखोंमें उनको सर्वदण्डनायक और ,महाप्रतिहार कहा गया है । उन्होंने धर्मकीर्तिके प्रमाणवर्तिकपर प्रमाणवार्तिकवृत्ति बनाई थी। विशालामलदती नाम प्रमाण समुच्चयटीकाके लेखक जिनेन्द्रबोधि (लगभग ७२५ ई०) थे। सम्भवतः ये वही व्यक्ति हैं जिन्होंने ८वीं शताब्दीमें पाणिनि याकरणके ऊपर प्रसिद्ध न्यास लिखा था। शान्तरक्षित ( ७४९ ई० ) जहूर (बंगालमें या लाहौर के पास ) के राजवंशमें उत्पन्न हुए थे। यद्यपि इनका समय अनिश्चित ही है तथापि यह कहा जाता है कि वह गोपाल ( जिसने ७०५ ई० तक राज्य किया ) के समयमें जन्मे और धर्मपाल ( जो ७६५ में राजा हुआ) के सम में मरे थे। वे स्वतन्त्र माध्यमिक मतके अनु. यायी और नाज़न्दके अध्यापक थे। ये राजा खोखानडीत्सान Khrisron dea tsan ( जो ७२८ ई० में उत्पन्न और ८६४ ई० में मरा) के निमन्त्रणपर तिब्बत गये थे । राजाने शान्तरक्षितकी सहायतासे ७४९ ई० में समयेके बिहार ( Monas. tery of sam-ye ) को बनवाया था जो मगधके उदन्तपुर विहारके जैसा बनाया गया था। तिब्बतमें समये सबसे पहिला नियमित विहार था और शान्तरक्षित उसके पहिले महन्त थे। उन्होंने तिब्बतमें १३ वर्ष तक अर्थात् ७६२ ई० तक कार्य किया। वे वहां प्राचार्य बोधिसत्वके नामसे प्रसिद्ध थे। वे निम्नलिखित ग्रन्थोंके कर्ता थे वादन्यायवृत्ति विपंचितार्थ, धर्मकीर्ति के वादन्याय की टीका और तत्त्वसंग्रहकारिका- यह ३१ अध्यायोंका अमूल्य दार्शनिक ग्रन्थ है। इसमें सांख्य जैन आदिका खण्डन भी है। न्यायबिन्दु पूर्वपक्षे संक्षिप्त (धर्मकीर्तिके न्यायबिन्दुकी समालोचनाओं का संक्षेप) और तत्वसंग्रह पंजिका (शान्तरक्षितके तत्वसंग्रहकी टीका ) के कर्ता कमलशील ( लगभग ७५० ई० ) शान्तरक्षितके अनुगामी थे । इन्होंने तिब्बतमें महायान होशंग नामक चीनी साधुको पराजित करके बड़ा नाम कमाया था। सर्वज्ञसिद्धि कारिका, सामार्थसिद्धिकारिका, श्रुतिपरीक्षा, अन्यापोहविचार कारिका और ईश्वरसंग कारिकाके कई कल्यापारक्षित धर्मोत्तराचार्य के गुरु थे। ये राजा धर्मपाल के समकालीन थे, जिनका देहान्त ८२९ ई० में हुआ था।

१० भूमिका। धर्मोत्तराचार्य ( लगभग ८४७ ई० ) धर्मोत्तर, जिसका वर्णन 'तारानाथ की गेस्चिच्टे देव बुधिज्मस वॉन शीफनर' के पृ० २२५ और 'ड्पाग-ब्साम-ब्जान' के पृ० १४४ में किया गया है-जिनको श्रावार्य धर्मोत्तर या धर्मोत्तराचार्य भी कहते हैं-तिब्वी भाषामें 'चांस-म्चांग' के नामसे प्रसिद्ध है। ये कल्याणरक्षित और काश्मीरके धर्माकरदत्तके शिष्य थे। यह प्रतीत होता है कि राजा वाणपालके बंगाल में राज्य करने के समय में ही ये कश्मीरमें हुए थे। ब्राह्मण । ब्राह्मण नैयायिक श्रीधर ( लगभग ९९१ ई० ) ने अपने प्रन्थ न्यायकन्दली (पृ० ७६ विजयानगरम् सीरीज ) में, धर्मात्तर टिप्पणकके कर्ता जैन दार्शनिक मल्लि- वादिन्ने लगभग ९६२ ई० के धर्मोत्तरकी न्यायबिन्दुटीकाकी टीका धर्मोत्तर टिप्पणकमें और प्रसिद्ध श्याद्वादरत्नाकरावतारिका के कर्ता रत्नप्रभसूरिने ११८१ ई० में इनके नामका उल्लेख किया है। ( मल्लिवादिन्के प्रथमें उसका संवत् ८८४ पड़ा हुआ है । यदि इसे विक्रम म ना जावे तो यह ८२७ अथवा यदि इसे शक माना जावे तो यह ९६२ ई० होता है। एक प्रकारके विद्वानोंका मत है कि मल्लिवादिन् धर्मोत्तरके समकालीन थे किन्तु दूसरे प्रकार के विद्वान् उनका समय एक शताब्दी पीछे निर्धारित करते हैं।) धर्मोत्तराचार्यके बनाये हुए निम्नलिखित ग्रन्थोंका पता चलता है- १. न्यायबिन्दुटीका-धर्मकीर्तिके न्यायबिन्दु पर विस्तृत टीका। यह अपनी मूल अवस्थामें छप कर पाठकोंके हाथ में है। इसका तिब्बी अनुवाद भी मिलता है। धर्मोत्तराचार्यके निम्नलिखित ५ प्रन्योंका और पता चला है। किन्तु उनका संस्कृत लुप्त है। केवल तिब्बी अनुवाद मिलता है । वे प्रन्थ ये हैं - २. प्रमाणपरीक्षा, ३. अपोह नाम प्रकरण, ४. परलोकसिद्धि, ५. क्षणभङ्गसिद्धि और ६. प्रमाणविनिश्चय टीका-यह धर्मकीर्तिके प्रमाणविनिश्चय की टीका है । Accores- धर्मोत्तराचार्यके पश्चात् बौद्ध न्यायके अन्य भी अनेक विद्वान् हुए हैं। किन्तु उन्होंने न्यायबिन्दुके ऐसा कोई अन्य नहीं लिखा । अतएव अपना प्रयोजन निकल जानेसे हम इस विषयको यहीं समाप्त करके अब न्यायबिन्दुकार धर्मकीर्ति के ऊपर विचार करते हैं। (३) धर्मकीर्ति । (धर्मकीर्तिके विषयमें अनेक प्रन्थोंमें खोजने पर भी हमको डाक्टर सतीशचन्द्र विद्याभूषणके इतिहाससे विशेष कहीं भी नहीं मिला। अतएव यहां उन्हीं का अविकल अनुवाद दिया जाता है। जीवन चरित्र । धर्मकीर्ति दक्षिणके चूडामणि ( सम्भवतः यह चोल देशका नाम है ) राज्यमें थे। यद्यपि इस नामका कोई भी देश नहीं है तथापि सभी प्रकारके विद्वान् त्रिमलयको धर्मकीर्तिकी जन्मभूमि कहते हैं । सम्भव है कि त्रिमलयका ही प्राचीन उत्पन्न हुए भूमिका। ११ नाम चूडामणि रहा हो । उनके पिता ब्राह्मण जातिके तीर्थ थे । (बौद्धलोग अपने और जैनधर्मके अतिरिक्त शेष भारतीय धर्मवालों को तीर्थ कहते थे। ) उनका नाम परिव्राजक कुरुनन्द था । धर्मकीर्ति बाल्यावस्थासे ही बड़े बुद्धिमान और प्रतिभाशाली थे। अतएव ये शीघ्र ही वेद, वेदाङ्ग, वैद्यक, व्याकरण आदि तीर्थों के सभी सिद्धान्तोंमें दक्ष हो गये । १६ या १८ वर्षको अवस्थामें ही ये तीर्थोके दर्शनशास्त्रके अच्छे विद्वान् पण्डित हो गये । ये प्रायः बौद्धधर्मके व्याख्यान भी सुना करते थे अन्तमें इनको विश्वास हो गया कि बौद्ध सिद्धान्त बिलकुल निर्दोष है । अब ये पूर्णरूपसे बौद्ध धर्मकी ओर झुकने लगे। इन्होंने अपना वेष बौद्ध उपासकों का सा बनाया । जब ब्राह्मणोंने इनसे इसका कारण पूछा तो इन्होंने बौद्ध धर्मकी प्रशंसा की । ये इसी बात पर जातिच्युत कर दिये गये। इसके पश्चात् ये मध्यदेशमें आये । ( यद्यपि तिब्वतदेशीय साहित्यमें मध्यदेश मगध को कहा है परन्तु मनुजी ने उत्तरमें हिमालय, दक्षिणमें विन्ध्याचल, पूर्वमें प्रयाग और पश्चिममें सरस्वती ही के बीचके देशको मध्यदेश कहा है । जैसा कि कहा है-'हिमवद्विन्ध्ययोर्मध्ये यत् प्राग विनशादपि । प्रत्यगेव प्रयागाच्च मध्यदेशः प्रकीर्तितः ॥ मनु० ॥ २ ॥ २१ ॥' ) यहां इनको आचार्य धर्मपालने संघमें प्रविष्ट कर लिया । इन्होंने यहाँ त्रिपिटकोंका अध्ययन किया । अब इनको ५०० सूत्रधारणी कण्ठ याद हो गई। धर्मकीर्ति और कुमारिल । ये तीर्थमतके गुप्त सिद्धान्तोंके जानने की अभिलाषासे दासोका सा वेष बनाकर दक्षिण की ओर गये । यहाँ इनको पूछनेसे विदित हुआ कि ब्राह्मण कुमारिल उक्त विषयके अद्वितीय विद्वान् थे । भारतीय प्राथ कुमारिलके धर्मकीर्तिका चाचा होने की किम्वदन्ती का समर्थन नहीं करते । कुमारिलके पास राजा की दी हुई बड़ी भारी सम्पत्ति थी। इनके पास बहुतसे चावलों के खेत, ५०० दास, ५०० दासियां और कई सौ आदमी थे । जब धर्मकोर्तिने उनके यहां सेवाकार्यमें प्रवेश पाकर बाहर और भीतर के ५० दासोका काम संभाल लिया तो कुमारिल और उनकी स्त्री सन्तुष्ट हो गये । अब धर्मकीर्ति को गुप्त सिद्धान्तोंके सुननेकी अाशा मिल गई । धर्मकी तिने कुमारिलसे गुप्तशिक्षाका ज्ञान प्राप्त करके उनका घर छोड़ दिया । कुमारिलले उसको अपनी विशेष सेवाके बदलेमें कुछ धन भी मिला था, जिससे उसने अपनी यात्राको रात्रिमें ब्राह्मणों को एक बड़ा भोज दिया। अव उसने कणादके मत वाले कणादगुप्त और तीर्थमतके अन्य अनुयायियों को शास्त्रार्थ के लिए बाह्वान किया और उनसे शास्त्रार्थ करने लगा । शास्त्रार्थ वरावर तीन मास तक होता रहा, जिसमें उसने अपने सभी विपक्षियों को पराजित कर दिया और उनमैसे बहुतोंको बौद्ध बना लिया । इसपर कुमारिलको बड़ा क्रोध आया । वह ५०० ब्राह्मणों को लेकर शास्त्रार्थके लिये अग्रसर हुए । कुमारिलने प्रस्ताव किया कि शास्त्रार्थ में जो पराजित हो वह मार डाला जावे । किन्तु धर्मकीर्तिने जो कुमारिलकी १२ भूमिका। मृत्यु नहीं चाहता था, आग्रह किया कि पराजित व्यक्ति विजेताके धर्मको स्वीकार कर ले । इस प्रकार धर्मको पारितोषिकके रूपमें रखकर दोनों शास्त्रार्थमें भिड़ गये । किन्तु विजयश्री अन्तमें धर्मकीर्तिके ही हाथ रही । कुमारिल और इसके ५०० अनुगामी बौद्ध हो गये। उसकी दिग्विजय। धर्मकीर्तिने इसके पश्चात् निर्ग्रन्थ (दिगम्बर जैनी ) रघुवतिन् और दूसरोंपर जो विन्ध्याचलमें रहते थे विजय पायो । उसने द्रवली ( द्राविड ) को लौटते हुए घोषणा करादी कि जो तैयार हो आकर शास्त्रार्थ करे । तीर्थ लोगोंकी अधिकांश संख्या भाग गयी और कुछने बिलकुल स्वीकार कर लिया कि उस युद्ध में उनके समान नहीं थे । उसने उस देशकी उन सब धार्मिक संस्थाओंका जो अवनत दशामें पड़ी थीं, उद्धार किया और फिर वह गहन वनमें जाकर एकान्त सेवन और ध्यान करने लगा। धर्मकीर्तिने अपने जीवन की समाप्तिके दिनों में कलिग देशमें एक विहार बनवाया और बहुतसै लोगों को अपने धर्म में दीक्षित कर परलोकवासी हुआ । उसके वह शिष्य जिनकी आत्मा ब्रह्मके समान हो गयी थी उसको दाहसंस्कारके लिये स्मशानभूमिमें ले गये । वहाँ एक पुमोंको भारी वृष्टिं हुई और सात दिन तक सारा देश सुगन्ध और रागोंसे भरा रहा। ये भावार्य (धर्मकीर्ति ) और तिब्वतका राजा स्रोत्संगम्पो समकालीन कहे जाते जो कि प्रमाण रूपमें माना जा सकता है । . धर्मकीर्तिका समय। इस कथन में यह स्पष्ट है कि धर्मकीर्ति धर्मपालका शिष्य था। धर्मपाल ६३५ ई. में जीवित था (जैसा कि हुएन्त्सांगके लेखोंसे स्पष्ट है ) अतएव धर्मकीर्ति भी उस समयके लगभग अवश्य रहा होगा । यह समय धर्मकीर्तिके राजा स्रोत्संगम्पो का समकालीन होनेके भी अविरुद्ध है, जो ६२७-६९८ तक जीवित रहा । ऐसा प्रतीत होता है कि ६३५ ई० में धर्मकीर्ति बहुत छोटा था, क्योंकि हुएनत्सांगने उसका नाम नहीं लिया है । इसके विरुद्व इत्सिंग, जिसने भारतमें ६७१-६९५ ई० तक यात्राको दिडनागके पश्चात् 'धर्मकीर्तिने न्यायमें आगे कैसे उन्नति की' का वर्णन प्रभावपूर्ण शब्दों में करता है । धर्मकीर्तिने ब्राह्मण नैयायिक उद्योतकर पर बांक्षेप किया है । इसके विरुद्व बृहदारण्यकवार्तिकके रचयिता मीमांसक सुरेश्वराचार्य और अष्टसहस्रीके रचयिता' दिगम्बर जैन विद्यानन्दिने धर्मकीर्तिकृत प्रत्यक्षके लक्षणको समालोचना की है । धर्मकीर्ति अन्य ग्रन्थों में केवल कीर्ति भी कहा गया है। वाचस्पति मिश्रने भी धर्मकीतिको समालोचना करनेके लिये उनका नाम लिया है।

३ भूमिका । १३ धर्मकीर्तिको रचनायें। धर्मकीर्तिने निम्नलिखित प्रन्थ बनाये १. प्रमाणवातिककारिका --- यह ग्रन्थ मृल संस्कृतमें तो लुप्त है । किन्तु इसका तिब्बी भाषामें अनुवाद मिलता है। इस प्रन्थ के बनाये जानेको कथा भी बड़ी रोचक है । कहते हैं कि एक दिन धर्मकीर्ति दिखनागके शिष्य ईश्वरसेनके यहां गये । वहां इन्होंने दिङ्नागका प्रमाणसमुच्चय सुना । धर्मकीर्ति उसको प्रथम बार सुननेसे ईश्वरसेनके समान उस प्रन्थ के विद्वान् बन गये उन्होंने उसको दोबारा फिर सुना इस वार वह दिग्नागके समान बन गये । और तीसरी बार सुननेपर उन्होंने उसमें की कई गलतियां निकालीं। उन्होंने वे अशुद्धियां ईश्वरसेनको बतलायीं। जिसने गुरुनिन्दापर अप्रसन्न होनेके स्थानमें उनसे एक समालोचनात्मक टीका बनानेको कहा । उसी परिश्रमका फल स्वरूप यह प्रन्थ है। इसमें चार अध्याय है-जिनमेंसे प्रथममें स्वार्थानुमान, द्वितीयमें प्रमाणसिद्धि, तृतीयमें प्रत्यक्ष और चतुर्थमें परार्थवाक्य का वर्णन है। २. प्रमाणवार्तिकवृत्ति- यह प्रमाणवार्तिककारिकाको टीका है । इसका भी मूल लुप्त होकर तिब्बी अनुवाद ही शेष है । ३. प्रमाणविनिश्चय -इसमें न्यायबिन्दुके ही समान प्रत्यक्ष, स्वार्थानुमान और परार्यानुमान नामके तोन परिच्छेद है। इसका भी सम्भवतः मूल लुप्त और तिब्बी अनुवाद ही शेष है। ४. न्यायबिन्दु-- यह ग्रन्थ पाठकोंके सामने है । इसका वर्णन आगे किया जावेगा। ५. हेतुबिन्दुविवरण-इसमें तीन अन्याय हैं, जिनमें कमसे स्वभावहेतु, कार्यहेतु, और अनुपलब्धिहेतु का वर्णन किया गया है । ६. तर्कन्याय या चादन्याय-मूल इसका भी सम्भवतः लुप्त हो है । ७. सन्तानान्तरसिद्धि- ८. सम्बन्धपरीक्षा-और ९. सम्बन्धपरीक्षा वृत्ति-यह सम्बन्धपरीक्षाकी टीका है। (४) धर्मकीतिका संप्रदाय । यद्यपि धर्मकीर्तिके विषयमें ऊपर (इस छोटी-सी भूमिकामें ) कम नहीं लिखा गया तथापि उसके सम्प्रदायको जाने विना यह विषय अधूरा ही रह जाता है । इस विषयमें सब एक मत हैं कि वह माध्यमिक नहीं था क्या कि माध्यमिक दर्शन शून्यवाद है और धर्मकीर्तिके प्रन्यों में स्थान २ पर अनेक पदार्थ देखनेमें आते हैं । अतएव माध्यमिक न होनेसे वह या तो वाह्यास्तित्ववादी ( सौत्रान्तिक और वैभाषिक ) ही हो सकता है या विज्ञानाद्वैतवादी ( योगाचार ) हो हो सकता है । अतएव अब हम इसीपर विचार करेंगे कि वह इन दोनों में से किस मतका अनुयायी था। ३ न्या० भूत - भूमिका । यह पीछे दिखलाया जा चुका है कि धर्मकीर्ति धर्मपालका शिष्य था और यह भी वतला दिया गया है कि धर्मपाल योगाचार (विज्ञानाद्वैतवाद ) मतावलम्बी था । अतएव जो मत गुरुका हो वही शिष्यका भी होना चाहिये । किन्तु न्यायविन्दुमें स्थान स्थान पर ऐसे वाक्य पाये हैं जिनसे वाह्य अर्थका अस्तित्व स्पष्ट प्रतीत होता है । उदाहरणके लिये ऐसे कुछ वाक्य दिये जाते हैं- 'इन्द्रियज्ञानम्' पृ० १२ 'स्वविषयाजन्तरविषयसहकारिणेन्द्रियज्ञानेन समनन्तरप्रत्ययेन जनितं तन्मनो- विज्ञानम्' पृ० १३ 'सर्वचित्तचैत्तानामात्मसंवेदनम्' पृ. १४ 'भूतार्थभावनाप्रकर्षपर्यन्तजं योगिज्ञानं चेति' पृ० १४ इत्यादि २ । न्यायबिन्दुके इस प्रकारके वाक्य ही इस प्रश्नको उपस्थित करते हैं कि वह वाह्यार्थास्तित्ववादी था या विज्ञानाद्वैतवादी ? क्योंकि यद्यपि योगाचार बाह्य अर्थको नहीं मानता तथापि उपचारसे उसको वह भी मानता ही है। यदि हम धर्मकीर्तिको विज्ञानाद्वैतवादी मान लें तो न्यायबिन्दुके वाह्यार्थास्तित्ववाचक शब्दोंको औपचारिक मानना पड़ेगा। किन्तु उन वाक्योंके ढंगसे ऐसा प्रतीत नहीं होता। यदि उक्त वाक्य श्रौपचारिक होते तो उनमेंसे किसीमें तो उपचारवाचक श द अवश्य ही होता किन्तु ऐसा कोई शब्द न्यायबिन्दुमें उपलब्ध नहीं है। अतएव धर्मकीर्तिको विज्ञानाद्वैतवादी मानना युक्ति संगत नहीं है। इसके अतिरिक्त एक बात यह भी है कि धर्मकीर्ति पहिले तीर्थमतका था। उसके दिग्विजयसे प्रतीत होता है कि उसका मनन वैशेषिक श्रादि मतोंका विशेष था। वेदान्तियोंसे उसकी किसी भी भिड़न्तका पता नहीं च रता बौद्ध होनेसे पूर्व वह बाह्य और प्रान्तर दोनों प्रकारके पदार्थ के अस्तित्वको माननेवाले किसी दर्शनका अनुगामी होगा । सो दोनों अस्तित्वको माननेवालेकी दूसरी सीढ़ी एकको ही मानना या न मानना हो सकती है और वह सीढ़ी वात्यार्थास्तित्ववाद है। अतएव धर्मकीर्ति वाह्यास्तित्ववादी था। तीसरी बात यह भी है कि नैयायिक प्रायः कमसे कम बाह्य अर्थको माननेवाले होते हैं। जैन यद्यपि बाह्य और आन्तर दोनों अर्थको मानते हैं तथापि शास्त्रार्थकी मंझटोंको दूर करने और विपक्षीको आक्षेपका मौका न देनेके लिये ही उनको मतिज्ञान रूप परोक्षज्ञानको सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष कहना पड़ा है । अतएव ऐसी दशामें यह प्राशा नहीं की जा सकती कि बौद्ध न्यायका उद्धार कर्ता धर्मकीति बाह्य अर्थतकका स्पष्ट रूपसे अस्तित्व न मानता होगा। ( ५ ) धर्मकीर्तिका बौद्ध न्यायमें स्थान । धर्मकीर्तिके बौद्धन्यागमें स्थानको लिखनेसे पूर्व यह प्रश्न उपस्थित होता है कि धर्मकीतिका बौद्ध दर्शनमें क्या स्थान है ? किन्तु उसके बनाये हुए किसी भी दार्शनिक है। अतएव भूमिका। प्रन्थके सामने न होनेसे हम इस पियार लिखनेमें असमर्थ हैं। क्योंकि केवल न्यायके प्राथके आधारपर दार्शनिक विषयकी समालोचना करना हम योग्य नहीं समझते । यह पीछे प्रगट किया जा चुका है कि आचार्य दिड्नाग अाधुनिक बौद्ध न्यायके जन्मदाता थे। किन्तु गौम न्यायसूत्रके वात्स्यायन भाष्यको टीका न्यायवार्तिक के रचयिता उद्योतकरने अपने प्रन्थ में उनको ब समालोचना की है। उस समय इस समालोचनासे ब्राह्मणोंका प्रभाव बहुत कुछ बढ़ गया और बौद्धीका घट गया। दिङ्नागसे धर्मकीर्ति तकके वीचमें कोई भी ऐसा बौद्ध नैयायिक नहीं हुआ जो उस उखड़ी हुई प्रतिष्ठाको जमाता। किन्तु धर्मकीर्तिने स्थान २ पर शास्त्रार्थ करके बौद्ध मतका इतना प्रचार किया कि उसके पीछे के प्रायः सभी दर्शनोंके न्यायवालोंने उसकी समालोचना करनेमें ही अपना गौरव समझा। इन्होंने न्या वार्तिककी भी समालोचना खूब की थी। इनके पश्चात् पौद्ध नैयाचिका में ऐसा दमदार कोई नैयायिक नहीं हुआ। इसलिये जबकि हम दिङ्नागको आधुनिक न्यायका जन्मदाता कहते हैं तो घर्षकातिको बौद्धन्यायका उद्धारक कहना बहुत योग्य होगा। (६) धर्मकीर्तिकृत दिङ्नागका खण्डन । प्रमाणपातिककारिकाके बनने के वर्णनमें कहा जा चुका है कि धर्मकीर्तिने दिङ्नागके प्रन्थमें उसकी गलतियां पकड़ों। यपि हमारे सामने प्रमाणपातिककारिका उपस्थित नहीं है तथापि न्यायविन्दु टीकासे दिङ्नागसे धर्मकीर्तिक मतभेद स्पष्ट प्राट हो जाता है। यद्यपि डाक्टर सतीशचन्द्र विद्याभूषणने इस विषय पर भी काफी लिखा है किन्तु इस स्थलपर उस विषयमें न लिखना भी अनुचित होगा अतएप हम यहां पर वही विषय डाक्टर साहिबसे अभिन्न सम्मति रखते हुए लिखते हैं- इष्टविघातकृत विरुद्ध । हेतुके साध्य के विरुद्ध होनेको दिङ्नाग और धर्मकीर्ति दोनोंने ही हेत्वाभास माना है। किन्तु दिङ्नागने अपने न्यायप्रवेशमें हेतुके अभिलषित ( Implied ) साध्य के (जिस समय साध्य अनिश्चित अथवा संदिग्ध हो ) विपरीत होनेको पृथक् हेत्वाभास माना है, जिसको उन्होंने इष्टविघातकृत् विरुद्ध नाम दिया है। किन्तु धर्मकीर्तिने अपने प्रन्थ न्यायबिन्दुमें इस सम्मतिको यह कह कर अप्राह्य माना है कि दूसरा विरुद्ध हेत्वाभास प्रथममें ही गर्भित हो जाता है । ( *तत्र च तृतीयोऽपि इष्टविघात- कृत् विरुद्धः ?' “स इह कस्मानोक्तः । अनयोरेव अन्तर्भावात् । अयं च विरुद्धः प्राचार्यदिङ्नागेनोक्तः । स कस्मात् वार्तिककारेण सता स्ल्या नोक्तः । न्या० पृष्ट ७९, ८०भाषा पृ० २२ ) इष्टविघातकृत् विरुद्धका एक उदाहरण दिया जाता है- नेत्र प्रादि दूसरेके उपयोगके लिये हैं। क्योंकि वह संघातरूप हैं। जैसे-शमन, आसन आदि। यहाँ साध्य दूसरेके लिये अनिश्चित या संदिग्ध है । क्योंकि वह संघात है - - भूमिका। (उदाहरणके लिये शरीर ) और असंघात (दाहरणके लिये जीव ) दोनोंको ही वतला सकता है। यदि वक्ता 'दूसरेके लिये' शब्दको असंघात अर्थमें प्रयोग करे जिसको श्रोता संघात अर्थमें समम जाये तो उस समय साध्य हेतु के विरुद्ध हो जावेगा। उस समय वह हेतु इष्टविघातकृत् विरुद्ध कहलाता धर्मकीर्तिने अपने ग्रन्थ न्यायबिन्दुमें इसको पहिले विरुद्धका ही उदाहरण माना है। क्योंकि अनुमान वाक्यमें प्रयोग किये हुए साध्यवाचक शब्दका एक ही अर्थ हो सकता है। और यदि कहे हुए और समझे हुए अर्थोमें सन्देह हो तो प्रकरणसे पहिले वास्तविक अर्थ निश्चय कर लेना चाहिये । यदि प्रयोग किया हुअा अर्थ वास्तविक होगा तो सा य और हेतुमें स्वाभाविक विरोध होगा। विरुद्धव्यभिचारी। दिङ्नागने एक और हेत्वाभास 'विरुद्धाव्यभिचारी' भी माना है, जिसको उसने सन्देहका कारण कहा है। यह ऐसे स्थान पर होता है जब दो विरुद्ध परिणाम एक ही हेतु ( Valid truth reason ) से पुष्ट किये जाते हैं । उदाहरण के लिये-एक वैशेषिक दार्शनिक कहता है शब्द अनित्य है क्योंकि वह उत्पन्न होता है। एक मीमांसक उत्तर देता है- शब्द नित्य है क्योंकि वह श्रव्य ( सुनने योग्य ) है। उपरोक्त मामलों में काममें लाये हुए दोनों हेतु क्रमसे वैशेषिक और मीमांसाके सिद्धान्तके पुष्ट करनेके कारण उन २ दर्शनकारी द्वारा ठीक माने जाते हैं। किन्तु दो विरुद्ध परिणामोंपर लेजानेसे वह अनिश्चित है। और इसीलिये वह हेत्वाभास है । धर्मकीर्तिने न्यायबिन्दुमें विद्धाव्यभिचारी हेत्वाभासका निषेध (न्या० पृ. ८६-८८ भाषा० पृ० २४-२५) किया है। इसका कारण उन्होंने यह दिया है कि यह न तो अनुमानके विषयमें ही उठता है और न शास्त्र ही इसका आधार है । हेतुका साध्यमें स्वभाव, कार्य या अनुपलब्धि रूपमें रहना आवश्यक है और उसके द्वारा ठीक परिणाम निकलना चाहिये । परस्परविरोधी दो परिणाम ऐसे हेतुओंसे पुष्ट नहीं हो सकते जो ठीक (Valid) हैं । परस्पर विरुद्ध दो परिणामोंके सिद्ध करने में दो शास्त्र उसी प्रकार सहायता नहीं कर सकते जिस प्रकार एक शास्त्र प्रत्यक्ष और अनुमानको पुष्ट नहीं कर सकता और वह केवल बुद्धिके न पहुँचने योग्य विषयोंमें ही प्रमाण होता है । इसलिये विरुद्धाव्य भिचारी असंभव है। दृष्टान्तका कार्य। दिङ्नागके विरोध धर्मकीर्ति ( त्रिरूपो हेतुरुक्तः । तावतैव अर्थप्रतीतिरिति न पृथग् दृष्टान्तो नाम साधनायवः कश्चित् । तेनास्य लक्षणं पृथगन] उच्यते गार्थ- स्वात् । ( न्या० पृ० ९१ भाषा० पृ. २६) सम्भवतः 'न' भूलसे छूट गया है।

Re- भूमिका । तिब्बी अनुवादमें 'न' मिलता है । ) कहता है कि दृष्टान्त' नामका कोई साधनका अवयव नहीं है । क्योंकि इसका हेतुमें अन्तर्भाव हो जाता है । जैसे- पर्वतमें अग्नि है क्योंकि वहाँ धूम है । जसे पाकशाला में। इस वाक्यमें दृष्टान्त पाकशाला और उसी प्रकारको अन्य वस्तुएं हेतु में ही आजाती हैं। अतएव 'दृष्टान्त' पाकशालाको पृथग कहना व्यर्थ है। धर्मकीति कहता है कि इतना होने पर भी दृष्टान्त का यह मूल्य है ही (... उक्तम् अभेदेन' ' 'पुनर्विशेषेग दशनायावुक्ती ) कि यह हेतुके द्वारा साधारण रूपसे कथन लिये हुए को विशेषरूपसे बतला देता है । इस प्रकार साधारण कथन ‘सब धूम वाली वस्तु अग्नि वानी होती हैं' का विशेष दृष्टान्त पाकशाला ने बाधक जोरदार बना दिया जा कि धूम वाली भी है और अग्नि वाली भा है । (७) न्यायविन्दु तथा उसका न्याय । इस बातको प्रमाणित करने की अब कोई अवश्यकता नहीं रह गई है कि प्राचीन कालमें सर दर्शनकारोंने अपनी २ प्रमाण व्यवस्था पृथक् ही खड़ी की थी। यद्यपि यह आवश्यक नहीं था कि उन सबकी व्यवस्थाएं एक दूसरेसे भिन्न हो हो तथापि अपनी मानी हुई वस्तु के स्वरूपको बतलाने तथा अपनी युक्तियाको सिद्ध करने के लिये पृथक् ही प्रमाणको आवश्यकता थी। जहां दर्शन पदार्थांका वर्णन करता है वहां न्याय उन पदार्थोंको सिद्ध करने वाली युक्तियाका वर्णन करता है। इस प्रकार दर्शन और न्याय दोनों सापेक्ष हैं। प्रमाण सामान्यका लक्षण तो एक प्रकारसे विशुद्ध दर्शानिक विषय है अतएव इस पर हम पृथक् विचार करेंगे । यह पीछे प्रमाणित किया जा चुका है कि यद्यपि बौद्धन्याय गौतम न्यायदर्शन के पीछे बना है तथापि भारतके दार्शनिकोंको विशुद्ध न्यायके ही ग्रन्थोंको लिखनेका मार्ग बौद्ध नैयायिकोंने ही दिखलाया है । गौतमाय न्याय अथवा प्राचीन न्याय, दर्शन और न्यायका मिला हुआ प्रन्थ है । किन्तु बौद्धाने अपने न्यायग्रन्थोंकी स्वतन्त्र रचना करके उस समय भारतपर अपना सिक्का जमा लिया। ब्राह्मणों के पास तो पहिलेसे हो न्याय दर्शन था। अतएव उन्हाने उसका ही टीका प्रटीकाओं तथा उसी ढंगके अन्य प्रन्थोंपर ही भरोसा रखा, किन्तु जैन नैयायिकोसे यह सहन न हुआ। अस्तु, उन्होंने भी बौद्धोंके समान न्यायके ऊपर स्वतन्त्र प्रन्थ लिखने आरम्भ किये । भारतका मध्यकालीन दार्शनिक इतिहास जैन और बौद्ध धर्मोके ही शास्त्रार्थोंसे भरा पड़ा है । धीरे २ कालयोगसे ब्राह्मणों का फिर प्राबल्य हुश्रा । उस समय अपनी कुछ आन्तरिक निर्बलताओं तथा कुछ जैन और ब्राह्मणोंके धक्केसे बौद्ध धर्मपर तो ऐसा आघात पहुंची कि वह भारतसे अश्य ही हो गया। किन्तु जैन धर्म किसी प्रकार सबकी चोटें सहता हुआ अभी तक भारतवर्षमें फैल ही रहा है। मिथला तथा नवद्वीपके नैयायिकोंने अभी लगभग छ: सौ वर्ष पूर्व प्राचीन न्यायका परिष्कार करके एक नध्य न्याय खड़ा किया है किन्तु यह प्राचीन न्यायका ही रूपान्तर है। अतएव मुख्य न्याय १८ भूमिका । तीन ही हैं । गौतमीय न्याय, जैन न्याय और बौद्धन्याय । किन्तु इससे यह न समझ लेना चाहिये कि अन्य दर्शनकारोंने न्यायपर कुछ लिखा ही नहीं। क्योंकि उनके प्रन्या में भी न्याय के बहु नसे अङ्गापर वहुत कुछ प्रकाश मिलता है । प्राचार्य धर्मकीतिने न्यायबिन्दुको तीन परिच्छेदोंमें विभक्त किया है। जिनमें से प्रथम परिच्छेदमें प्रत्यक्ष, द्वितीयमें स्वार्थानुमान और तृतीयमें पराथीनुमानका वर्णन है। प्राचार्य धर्मोत्तरने इसी क्रमका अनुसरण करते हुए इसके ऊपर एक विस्तृत टोका बनाई है जो कि पाठकोंके हाथमें है। यद्यपि यह टीका बहुत अच्छी है और इसमें प्रत्येक वातको भनीप्रकार सममाया गया है तथापि यह टीका अपने असली रूपमें केवल उन्हींके कााकी रह गई है जो चौद्ध दर्शन के विद्वान् हैं। क्योंकि यदि गौतमीय और जैन न्यायके कोई विद्वान् बिना बौद्ध दर्शनका अभ्यास किये इसको स्वयं पढना चाहें तो उनके लिये भी इसका पढ़ना बहुत कष्ट साध्य है । क्योंकि इसमें कुछ ऐसे चौद्ध फरभाषिक शब्द आगये हैं जिनका अर्थ लाख प्रयत्न करनेपर भी बिना बतलाये हुए समझमें नहीं आ सकता। हमने इस त्रुटिको यथाशक्ति अपनी संस्कृत टिप्पणी और भाषाटीकामें दूर करनेका प्रयत्न किया है । किन्तु यह कहना कठिन है कि हम इस प्रयत्नमें कहाँ तक सफल हुए अब हमको यह देखना है कि न्यायबिन्दुके पृथक् २ परिच्छेदोंमें क्या कहा हैं। गया है- - . प्रथम परिच्छेद। हम पीछे कह आये है कि प्रमाण सामान्य एक दार्शनिक विषय है। अतएव प्रथम यहाँ उसीके लक्षणपर विचार किया जाता है सांख्यदर्शन में कहा है- 'द्वयारेकतरस्य वा यसन्निकृष्टार्थपरिच्छित्तिः प्रमा तत्साधकतमं यत्तत् त्रिविधं प्रमाणम् । अध्याय १ सूत्र ८७ । अर्थात् असनिकृष्ट (प्रमातामें श्रमाप्त ) अर्थका निश्चय करना प्रमा है। वह प्रमा चाहे बुद्धि और पुरुष दोनों का धर्म हो, अथवा बुद्धिका ही धर्म हो, अथवा पुरुषका ही धर्म हो। जो उस प्रमाका साधकतम ( फलका एकमात्र और अभिन्न कारण) हो वह प्रमाण होता है । वह तीन प्रकारका है। यहां यदि प्रमारूप फलको पुरुषमें रहनेवाला माना जावे तो बुद्धिवृत्ति प्रमाण होगा। क्योंकि पुरुषजन्य प्रमा बुद्धिवृत्तिसे ही हो सकती है अन्यसे नहीं हो सकती। अथवा यदि प्रमारूप फलको बुद्धिमें ही रहने वाला माना जावे (क्योंकि पुरुष तो ज्ञानस बिलकुल पृथक् है ) तो इन्द्रियवृत्ति सन्निकर्ष श्रादि ही प्रमाण होंगे। क्योंकि पुरुष तो प्रमाका साक्षी है उसको प्रमाता कहने में उसमें कर्तृत्वका आरोप करना पड़ेगा अथवा यदि पौरुषेय बोध और बुद्धिवृत्ति दोनोंको ही प्रमा कहा जावेगा ता उक दोनोंको ही प्रमाण मानना पड़ेगा।

१६ भूमिका। योगदर्शनके पातञ्जल भाष्यमें प्रथम मतको ही स्वीकार किया गया है। किन्तु सांख्यका प्राचीन मत उपरोक्त मतों से दूसरा प्रतीत होता है। इस प्रकार सांख्य तथा योगदर्शनका प्रमाण अस्वसंचित और अचेतन है। प्रमाणका लक्षण न्याग दर्शन या वात्स्यायनभाध्य किसी में भी नहीं मिलता। न्याय. भायकी टीका न्यायवार्तिकमें निम्नलिखित वावय मिलते हैं- इन्द्रियं खलु अर्थप्रकाशकलात् प्रमाणं' ...'उपलब्धिहेतुः प्रमाणम् ।' प्रमाणोत्पत्ताविन्द्रियार्थसन्निकर्षमपेक्षमाणाभ्यां प्रामातृप्रमेयाभ्यां प्रमाणं जन्यते । अर्थात् अर्थके प्रकाशक होने से इन्द्रिय ही प्रमाण है । क्योंकि उपलब्धिका हेतु प्रमाण होता है। और प्रमाणकी उत्पत्तिमें इन्द्रिय और अर्थके सन्निकर्षकी अपेक्षा करनेवाले प्रमाता और प्रमेय ज्ञानके जनक होते हैं । किन्तु अन्य प्रन्थोंको परिशीलन करने से पता चलता है नैयायिक मतमें भी सन्निकर्षको ही प्रमाण माना है । वैशेषिक दर्शन के प्रशस्तपाद भाष्य में लिखा है- बुद्धिरुपलब्धिर्ज्ञानं प्रत्यय इति पर्यायाः । 'तस्या सत्यप्यनेकविधत्वे समा. सतो वे विधे विद्या चाविया चेति विद्यापि चतुर्विधा । प्रत्यक्षलैङ्गिक- स्मृत्यार्षलक्षणा। अर्थात् बुद्धि, उपलब्धि, ज्ञान और प्रत्यय ये सब ही एकार्थवाची हैं। उसके ( बुद्धिके ) अनेक भेद होने पर भी संक्षेपसे दो भेद हैं । विद्या और अविद्या । विद्याके भी चार भेद हैं । प्रत्यक्ष, अनुमान, स्मृति और आर्ष । इससे प्रतीत होता है कि वैशेषिकोंके विद्या और प्रमाण भिन्न २ नहीं हैं । अतएव वैशेषिक दर्शनके अनुसार प्रमाण ज्ञान है । मीमांसामें मुख्य रूपसे दो आवार्योंके मत लिये जाते है। कुमारिलभट्ट और प्रभाकरके- कुमारिलने प्रमाणका यह लक्षण किया है- 'अनधिगततथाभूतार्थनिश्चायकं प्रमाणम्' अर्थात् जो न जाने हुए और तथाभूत वास्तविक ) अर्थको निश्चय करावे वह प्रमाण है। यह एक प्रकारका 'प्रमाकरणं प्रमाणम्' ही हुआ। प्रभाकरका प्रमाणका लक्षण यह है- 'अर्थतथात्वप्रकाशको ज्ञातृव्यापारोऽज्ञानरूपोऽपि प्रमाणम्' अथवा 'अनुभूतिः प्रमाणम्'। अर्थात् अर्थके वास्तविक रूपको प्रकाशित करने वाला ज्ञाताका अज्ञानरूप अनुभव व्यापार प्रमाण है अथवा अनुभूति या अनुभव ही प्रमाण है। यहाँ भी प्रमाण ज्ञान रूप है- जैनियोंके न्यायके प्रसिद्ध प्रन्थ परीक्षा मुखमें प्रमाणका यह लक्षण किया गया है-'स्वापूर्वार्थव्यवसायात्मकं ज्ञानं प्रमाणम्' । -- है २० भूमिका । अर्थात् अपने और अपूर्व अर्थको निश्चय करानेवाले ज्ञानको प्रमाण कहते हैं इसमें भी ज्ञानको ही प्रमाण कहा है । अब अन्त में देखना चाहिये कि बौद्ध दर्शन में इस विषयमें क्या कहा है । न्याय बिन्दु मूलमें प्रमाणने स्थान पर प्रायः सम्यग्ज्ञान शब्द का प्रयोग मिलता है । सम्यग्ज्ञान विषयमें टीकामें लिखा है- 'अविसंवादकं ज्ञानं सम्यग्ज्ञानम्' । न्याय बि० पृ० ४ पं० ६ जो पहिले से जाने हुए पदार्थमें प्रवृत्ति करता है उसे लोकमें संवादक कहते हैं ज्ञानके विषयमें भी यही बात घटती है क्योंकि ज्ञान भी उसी प्रकार स्वयं दिखला हुए अर्थमें प्रवृत्ति करता हुआ संवादक कहा जाता । अतएव अविदित अर्थको बतलान वाला ज्ञान सम्यग्ज्ञान कहलाता है। जैसा कि कहा है- 'अनधिगतविषयं प्रमाणम् .' न्याय वि० पृ० ४ ५० १३ अर्थात् प्रमाण अविदित विषय वाला है। बौद्धोंने प्रमाण और ज्ञान को दो पदार्थ न मानकर एक ही माना है। जैसा वि जैनियोंने भी किया है । ज्ञानमें 'सम्मक' विशेषणसे संशय, विपर्यय और अनध्यवसार ज्ञान को स्पष्टतया प्रमागपरेका निषेध किया है। 'अविसंवादक' अथवा 'अनधिगत विषय' से भद्वारा स्वीकार किये हुए धारावाहिक ज्ञान में प्रामाण्य का निषेध किया है । बौद्धोंकी प्रमाणसंख्या यद्यपि और सबोंसे तो भिन्न है किन्तु वैशेषिकोंके समान ही है। उन्हें ने प्रत्यक्ष और परोक्ष दो ही प्रमाण माने हैं। (न्यायबिन्दु पृ० . भाषाटीका पृ० १ ) अन्तर दोनोंमें वेवल इतना ही है कि वैशेषिक तो उपमान और अर्थापत्ति आदिका अनुमान में अन्तर्भाव कर लेता है किन्तु बौद्ध कार्य, स्वभाव और अनुपलब्धि हेतु जनित ज्ञानको ही अनुमान मानता है । अतएव बौद्ध अनुमानमें उनक पूर्ण अन्तर्भाव नहीं है। बौद्धोंका प्रत्यक्ष जितना विचित्र है उतना ही उसको समझना भी कठिन है वैदिक दर्शनकारोंने इन्द्रियों और पदार्थके सन्निकर्ष से उत्पन्न हुए ज्ञानको प्रत्यक्ष मान है । जैनियोंका प्रत्यक्ष भी यद्यपि विचित्र ही है किन्तु उसका समझना उतना कठिन नहीं है । जैनियोंने प्रत्यक्ष के दो भेद किये हैं-एक इन्द्रियप्रत्यक्ष ( अथवा सांव्यव हारिक प्रत्यक्ष ) दूसरा अतीन्द्रिय प्रत्यक्ष ( अथवा पारमाथिक या मुख्य प्रत्यक्ष ) जैनियोंका इन्द्रिय प्रत्यक्ष लगभग वैदिक दर्शनकारोंके ही जैसा है किन्तु अतीन्दिर प्रत्यक्ष एक प्रकार का योगिज्ञान है, जो केवल अात्मिक शक्तिसे आत्मामें ही होत है। बौद्ध लोग कल्पना रहित और निर्धान्त ज्ञानको प्रत्यक्ष कहते हैं । (न्या० पृ. ८ भा० पृ० १) कल्पना रहितको प्रत्यक्ष कहने का कारण यह है कि कल्पना अर्थ उपस्थितिकी अपेक्षा नहीं रखती किन्तु बौद्ध प्रत्यक्ष अर्थ के सान्निध्यमें ही हो सकता है अन्य अवस्थाओंमें नहीं हो सकता (न्या० पृ० १०, ११) भूमिका । २१ इन्होंने प्रत्यक्षके चार मेद माने हैं- इन्द्रियप्रत्यक्ष, मनःप्रत्यक्ष, स्वसंवेदनप्रत्यक्ष और योगिप्रत्यक्ष, जो ज्ञान इन्द्रियोंके आश्रित होता है उसे इन्द्रियप्रत्यक्ष कहते हैं। (न्या० पृ० १२ भा० पृ० २) इन्द्रियविज्ञान (इन्द्रिय प्रत्यक्ष ) के दूसरे क्षणमें जब कि इन्द्रियज्ञान समनन्तरप्रत्यय (भा० पृ० २ पं० ७) हो गया हो, जो ज्ञान होता है वह मनोविज्ञान या मनःप्रत्यक्ष कहलाता है । (पृ० १२, १३, १४ भा० पृ० २ ) इसमें और इन्द्रिय विज्ञानमें अन्तर केवल इतना ही है कि इसमें आलम्बन प्रत्यय ( भा० पृ. २ पं० १० ) इन्द्रिय विज्ञान होता है और इन्द्रियविज्ञानमें पालम्बन प्रत्यय घट पट आदि पदार्थ होते हैं। यद्यपि बौद्ध दर्शन में आत्मा या जीव नामका कोई पदार्थ नहीं है तथापि सुख दुःख आदिमें में सुखको भोगता हूँ' अथवा 'मैं दुःखको भोगता हूँ' आदि प्रत्यय होते ही हैं । इस अनुभवको ही स्वसंवेदन प्रत्यक्ष या प्रात्मसंवेदन कहते हैं। योगिप्रत्यक्ष स्पष्ट ही है वह योगियोंको ही होता है। प्रत्यक्षका विषय भी एकक्षणवर्ती पदार्थ है । किन्तु अनुमानका विषय सामान्य लक्षण है । अर्थात् अनुमानके द्वारा अनेक क्षणों की बातको भी जान सकते हैं। प्रत्यक्ष प्रमाणका फल प्रत्यक्ष ज्ञान है और ज्ञानका पदार्थके समान बन जाना ही प्रमाण है । क्योंकि उसीसे पदार्थका ज्ञान होता है । (न्या० पृ०१६ की न० ३ की टिप्पणी) द्वितीय परिच्छेद। प्राचार्य धर्मकीर्तिने जिस प्रकार प्रथम परिच्छेदमें प्रमाणका लक्षण किये बिना ही उसके भेद कर डाले हैं उसी प्रकार यहाँ भी अनुमानका लक्षण किये बिना ही पहिले अनुमानके स्वार्थानुमान और परार्थानुमान दो भेद किये हैं। हमारा अनुमान है कि यह बात धर्मोत्तराचार्य को भी अवश्य खटकी थी किन्तु प्रथम परिच्छेद में उन्होंने इसको प्रगट न करते हुए स्वयं ही प्रमाणका लक्षण कह दिया है । क्योंकि उसमें लक्षण कहनेके लिये भेदवाले वाक्यसे पहिले एक और भी वाक्य था। किन्तु इस परिच्छेदमें पहिले ही वाक्यसे भेद चल पड़े। यहाँ टीकाकारको अपनी खटक शंकाके रूप में प्रगट करनी ही पड़ी (न्या० पृ० २१५० ४ ) किन्तु आगे चलकर उन्होंने इसका स्वयं ही समाधान किया है कि भेदका कहना ही लक्षणका कहना है। क्योंकि दोनोंके लक्षण बिलकुल पृथक् २ होनेसे उनका एक लक्षण सम्भव नहीं है । (न्या० पृ० २१ पं० ५) किन्तु युक्तिपूर्वक विचार करनेसे धर्मोत्सराचार्य की यह दलील कमजोर बैठती है । क्योंकि उन दोनोंके अत्यन्त पृथक होते हुए भी अनुमानको अपेक्षा तो उनमें एकता ही है। प्राचार्य धर्मकीर्ति ने दोनों अनुमानोंके ये लक्षण किये हैं- 'तत्र स्वार्थ त्रिरूपालिकाद्यनुमेये ज्ञानं तदनुमानम् । न्यायविन्दु पृ० २१ 'त्रिरूप- लिमाख्यानं परार्थानुमानम्' न्यायबिन्दु पृ. ४६ । अर्थात् जो ज्ञान अनुमेयमें (न्या० पृ. २४) त्रिरूालिग से उत्पन्न होता उसे स्वार्थानुमान कहते हैं। - २२ भूमिका। तथा त्रिरूपलिजका कहना परार्थानुमान है। बद्यपि इन लक्षणोंसे स्वार्थामुमानका ज्ञानरूप तथा परार्थानुमान का वचन रूप होना स्पष्ट है तथापि इन दोनोंका एक लक्षण हो सकता था। क्योंकि यद्यपि ये दोनों ज्ञान तथा वचन रूप हैं तथापि दोनों ही त्रिरूपलिङ्गसे उत्पन्न होते हैं । अतएव श्राचार्य धर्मकीर्ति अथवा धर्मोत्तर अनुमानका लक्षण 'त्रिरूपलिकत्वमनुमानम्' कर सकते थे। जैसा कि प्राचीन न्यायके नये प्रन्य सिद्धान्तमुक्तावली, तर्कभाषा तथा तर्कसंग्रहकारने भी किया है। इन सबने ही ज्ञानात्मक स्वार्थानुमान तथा वचनात्मक परार्यानुमान माना । तथापि 'लिपरामर्श दोनोंमें समान होनेसे इन्होंने 'लिङ्गपरामर्शोऽनुमानम्' अनु. मानका लक्षण कहा है। जैनियोंका अनुमानका लक्षण इन सबसे अधिक परिष्कृत है । वह यह है- 'साधनात्साध्यविज्ञानमनुमानम्' ( परीक्षामुखसूत्र उद्देश ३ सूत्र ९) अर्थात् साधन या हेतुसे साध्यका ज्ञान होना अनुमान है। इसमें यह बात ध्यान रखने योग्य है कि जैनी ज्ञानको ही अनुमान मानते हैं। परार्थानुमान भी उनके यहाँ ज्ञान रूप ही है । अन्तर दोनों अनुमानों में केवल इतना ही है कि स्वार्थानुमान विना किसीके उपदेशके अनुमाता ( अनुमान करने वाला) स्वयं करता है। किन्तु परार्यानुमानका ज्ञान अनु माताको दूसरेके वचनसे होता है । आचार्य धर्मकीतिका भी परार्यानुमानसे सम्भवतः यही श्राशय था किन्तु उस समय योग्य शब्द स्मरण न आनेसे वह सीधे प्राचार्य दिङ्नागके पीछे ही चले गये। क्योंकि परार्थानुमान के लक्षणकी पुष्टिमें उन्होंने हेतु यह दिया है 'कारणे कार्योपचारात्' (न्या० पृ० ६१)। अर्थात् यहाँ कारण 'वचन' में कार्य 'ज्ञान' का उपचार कर लेनेसे वचन ही परार्थानुमान माना गया है। ऐसा विदित होता है कि अनुमानके स्वार्थ और परार्थभेद बौद्ध नैयायिकों के आविष्कार थे। क्योंकि न तो उनका सिद्धसेन दिवाकर (लगभग ४८०-५५० ई० ) से पहिले के जैन न्यायके ग्रन्थों में ही उल्लेख है और न न्याय दर्शनमें ही है। इसके विरुद्ध न्याय दर्शनमें उसके और ही पूर्ववत् , शेषवत् और सामान्यतोष्ट नामके तीन २ भेद उपलब्ध होते हैं। ऊपर न्यायविन्दुकथित स्वार्थानुमानका लक्षण कटा जा चुका है। यदि सूक्ष्म दृष्टिसे विचार किया जावे तो बौद्धोका 'तत्र स्वार्थ त्रिरूपालिङ्गाद्यदनुमेये ज्ञानं तदनुमानम् और जैनियों 'साधनात्सायविज्ञान मनुमानम्' एक ही बात है। क्योंकि अनुमेय साध्य होता ही है ( न्या. पृ. २४ पं० १२ ) और त्रिरूपलिज भी हेतुके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। जैसा कि न्यायबिन्दुक बहुतसे स्थलोंसे प्रगट होता है। इसीलिये स्वार्थानुमान के लक्षणके पश्चात् न्यायबिन्दुमें पक्षधर्मत्व, सपक्षसत्व और विपक्षाव्या. वृत्ति नामक त्रिरूपलिङ्गका वर्णन किया गया है। यदि विस्तारसे कहना हो तब तो मध्यकालीन नैयायिकों के समान इनमें अबाधितविषयत्व और असत्प्रतिपक्षत्त्व और बढ़ाये जा सकते हैं किन्तु बौद्धोंने तीन ही रूप रखकर हेतुका कथन किया है । इस - भूमिका । २३ अवसर पर हमको फिर जैनियोंका हेतुका लक्षण स्मरण हो पाता है जो इनसे अधिक परिष्कृत, संक्षिप्त तथा युक्तिपूर्ण है । वह यह है- 'साध्याविनाभावित्वेन निश्चितो हेतुः । ( परीक्षामुख उद्देश ३ सूत्र १५ ।) अर्थात् जिसका साध्य (अनुमेय ) के साथ अविनाभावी सम्बन्ध निश्चित हो वह हेतु होता है। वास्तवमें विचार किया जावे तो त्रिरूपलिङ्ग अविनाभावनियम अथवा व्याप्ति के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । इस प्रकार न्याय बिन्दुकारने हेतुके लक्षणका वर्णन करके फिर उसके भेदोंका वर्णन किया है। किन्तु उन बेचारोंको अपना अभिप्राय प्रगट करने योग्य पर्याप्त शब्द यहाँ भी नहीं मिले हैं। क्योंकि कभी वह पक्षधर्मत्व आदिको त्रिरूपलिङ्ग कहते हैं तथा कभी वह हेतुके भेद अनुपलब्धि, स्वभावलिङ्ग और कार्यलिङ्गको त्रिरूपलिङ्ग कहते हैं। इसी मुसीबतमें पड़ जानेसे उन्होंने त्रिरूपलिङ्गको एक स्थानपर 'नरूप्य' (न्या? पृ० २२ पं० ९) तथा दूसरे स्थान पर भेदोंको 'त्रिरूपलिङ्ग' कहा है (न्या. पृ. २५ पं० १४) अब थोड़ा विचार बौद्धोके इन तीनों हेतुओं पर भी कर लें। प्राचीन नैयायिकोंने तो हेतुके भेद करनेपर विशेष ध्यान ही नहीं दिया है । हाँ, जैन नैयायिकोंमें हेतु के भेद बौद्धोंसे भी अधिक किये हैं। किन्तु विषयान्तर हो जानेसे हम यहाँ केवल बौद्धोंके ही हेतुके मेदोंपर विचार करेंगे । यह पीछे दिखलाया जा चुका है कि बौद्धोंने हेतुके तीन भेद माने हैं- स्वभाव, कार्य और अनुपलब्धि । जो पदार्थ उपलब्ध हैं वह अनुपलब्ध नहीं हो सकते अतएच उपलब्ध होना पदार्थका स्वभाव है । स्वभाव लिङ्गमें पदार्थों की यह उपलब्धि ही हेतु रूपमें उपस्थित की जाती है । जैसे-यह वृक्ष है, क्योंकि यह शीशम है' कार्यलिङ्ग अनुमेय ( साध्य ) के कार्यको देखकर उसकी उपलब्धिका अनुमान करता है। जैसे किसीने धुआँ देखकर कहा कि-'यहाँ अग्नि है क्योंकि यहाँ धुमाँ है।' पदार्थका न मिलना अनुपलब्धि है। बौद्धोंने इसको भी हेतु माना है। जैसे- देवदत्तको उसके घरमें अनुपस्थित देखकर कोई कहे-'देवदत्त घरमें नहीं है। क्योंकि वह वहाँ अनुपलब्ध है।' इन तीनों हेतुओं से स्वभाव और कार्य वस्तु की उपस्थिति और अनुपलब्धि अनुपस्थितिको साधन करते हैं। इसके पश्चात् कुछ इन हेतुओका ही वर्णन करके अनुपलब्धिके भेद बतलाकर द्वितीय परिच्छेद समाप्त किया गया है। अनुपलब्धिके भेदोंको हम विस्तारके भय से यहाँ नहीं लिख रहे हैं। । ।

२४ भूमिका। तृतीय परिच्छेद। इस परिच्छेदमें परार्थानुमानका वर्णन है । प्रारम्भमें उसकी परिभाषा दी हुई है, जिसका पीछे वर्णन कर आये हैं। इसके पश्चात् उसके साधर्म्यवत् और वैधर्म्यवत् दो भेद बतलाकर स्वयं ही कह दिया है कि इनमें अर्थसे कोई भेद नहीं है केवल प्रयोगका भेद है (न्या० पृ० ४७ पं०१७)। अतएव इन दोनों के विषयमें हम यहाँ कुछ नहीं लिखेंगे। इन दोनों ही प्रयोगोंमें पक्षका अवश्य ही निर्देश किया जाना चाहिये। अतएव परार्थानुमानके भेदोंके पश्चात् पक्षका वर्णन किया गया है। जो कि लगभग सभी ग्यायोंमें एक ही प्रकारसे कहा गया है । यहाँ सामान्यरूपसे परार्यानुमानका वर्णन समाप्त हो गया है। इसके पश्चात हेत्वाभासोंका वर्णन है। यह पीछे बतलाया जा चुका है कि बौद्ध हेतुमें पक्षधर्मत्व आदि तीन बातोंका होना आवश्यक मानते हैं। अतएव उन तीनों रूपोंमेंसे एक भी रूपके न होने अथवा संदिग्ध होनेपर हेत्वाभास हो जाता है। अतएव त्रिरूपलिङ्ग माननेसे बौद्धोंको तीन ही हेत्वाभास भी मानने पड़े हैं । जो कि ये हैं- असिद्ध, विरुद्ध और अनैकान्तिक । पीछे दिखलाया जा चुका है कि मध्यकालीन नैयायिक हेतुमें पाँच बातोंका होना आवश्यक मानते थे। अतएव उनके मतके अनुसार इन्हीं तीनमें बाधितविषय और सत्प्रतिपक्ष ये दो और जोड़ देनेसे पाँच हेत्वाभास होते हैं। न्याय दर्शनमें सव्यभिचार, विरुद्ध, प्रकरणसम, साध्यसम और कालातीत ये पाँच हेत्वाभास माने हैं, जो कि ऊपर वालोंसे अविरुद्ध ही हैं। जैनियोंने असिद्ध, विरुद्ध, अनैकान्तिक और अकिश्चिरकर ये चार हेत्वाभास माने हैं। जिनमें अकिश्चित्कर हेत्वाभास नया हेत्वाभास है। न्यायबिन्दुमें इनके भेद प्रमेद भी बहुतसे दिखलाये हैं जो अन्य नैयायिकोंसे विशेष भिम नहीं है। हेत्वाभासोंके पश्चात् दृष्टान्त और दृष्टान्ताभासोका वर्णन है । (८) न्यायबिन्दुमें अन्य दर्शनों के सिद्धान्त । हम पीछे बतला पाये हैं कि प्रारम्भिक बौद्धन्यायपर गौतमीय न्यायकी पूरी छाप लगी हुई है । न्यायबिन्दुको देखनेसे पता चलता है कि वह छाप इतनी पक्की हो गई थी कि धर्मकीर्ति भी उसकी उपेक्षा न कर सके। और इसी कारणसे उन्होंने अन्य समाप्त करते २ विशेष आवश्यक न होनेपर भी दूषणा, जाति और जात्युत्तरका थोड़ा सा वर्णन कर ही डाला। इनमें से जाति न्यायदर्शनका एक मुख्य विषय है । न्याय- बिन्दुकी समालोचनाको समाप्त करते हुए इतना लिख देना और आवश्यक प्रतीत होता है कि न्यायविन्दु पद्य तो है ही नहीं, किन्तु यह सूत्र या वार्तिक भी नहीं है। सूत्र किसी अपेक्षासे इसको कह भी सकते हैं। किन्तु लेखके बीचमें संख्या इत्यादिका ।

भूमिका २५ बिलकुल प्रभाव होनेसे इसको सूत्र समझना भी कठिन है। हमारी सम्मतिमें यह बौद्ध न्यायके ऊपर एक स्वतन्त्र निबन्ध है जो कि विचार कर ऐसे ढंगसे लिखा गया है कि उसका प्रत्येक वाक्य सूत्र सा प्रतीत होता है। न्यायविन्दु टीकामें पृष्ठ ५२ पं० २३ में तस्यैवेति' पाठ है किन्तु उसका मूल उपलब्ध नहीं है । यद्यपि तस्यैव' को अगले वाक्य में मिला देनेसे वह वाक्य ( तस्यैव तत्स्वभावत्वात्स्वभावस्य च हेतुत्वात् ) पूरा हो जाता है तथापि चित्तमें यह खटका बना ही रहता है कि न जाने और कहाँ २ पाठ छूट गया हो । न्यायबिन्दुसे प्रगट होता है कि प्राचार्य धर्मकीर्ति और धर्मोत्तर दोनों अन्य भारतीय दर्शनोंके भी धुरन्धर विद्वान् थे । क्योंकि हष्टान्ताभासके वर्णन तथा अन्य ऐसे ही स्थलों पर उन्होंने थोड़े २ शब्दोंमें अन्य दर्शनोके सिद्धान्तोंका अच्छा वर्णन किया है । आचार्य धर्मकीर्तिने न्यायविन्दु पृ० ९८ पं० १५ तथा पृ० १०० पं० ७ में जैनियोंके तीर्थंकर ऋषभका उल्लेख दोनों स्थल पर तथा वर्धमानका उल्लेख प्रथम स्थलपर किया है। इससे प्रगट होता है कि उनके समय आठवीं शताब्दीमें भी जैनेतर विद्वान् जैनधर्मका प्रथम उपदेश देनेवाला भगवान् ऋषभदेवको ही समझते थे न कि भगवान् वर्धमानको । जनधर्मका प्रथम उपदेष्टा भगवान महावीर या पार्श्वनाथको कहने की धारणा पाश्चात्य ऐतिहासिकों के ही मस्तिष्ककी उपज विदित होती है (8) न्यायबिन्दुकी टीकाएँ। न्यायबिन्दु जैसा क्लिष्ट प्रन्थ है वैसी ही प्रचुर संख्यामें इसकी टीकायें नहीं मिलतीं । यद्यपि टीकायें इसकी भी कम नहीं बनी तथापि उनमेंसे अधिकांशका मूल संस्कृत लुप्त हो गया है, केवल उनका तिब्बी अनुवाद शेष है। न्यायविन्दुको निम्नलिखित टीकायें बनी हैं- १-न्यायबिन्दुपिण्डार्थ- -प्राचार्य जिनमित्र ( लगभग १०२५ ई० ) कृत । इसमें न्यायबिन्दुका सारांश है। २-न्यायविन्दुपूर्वपक्ष संक्षिप्त-प्राचार्य कमलशील ( लगभग ७५०ई० ) कृत इसमें न्यायबिन्दुकी समालोचनाओंका संक्षेप है। ३-धर्मोत्तरटिप्पणक-श्वेताम्बर जैन श्राचार्य मल्लवादिन ( लगभग ८२७ ई.) कृत । धर्मोत्तरकृत न्यायबिन्दु टीका की टीका । यह अनहिलवाड़ा पाटनमें ताइपत्र पर लिखी हुई रखी है। ४-न्यायबिन्दुटीका-आचार्य विनीतदेव ( लगभग ७०० न्यायबिन्दुके ऊपर विस्तृत टीका है। ५-न्यायबिन्दुटीका-आचार्य धर्मोत्तर (लगभग ८४७ ई०) कृत । यह पाठकोंके हाथोंमें विद्यमान है । यह भी न्यायबिन्दुके ऊपर विस्तृत टीका है। ई०) कृत, - २६ भूमिका। (१०) न्यायबिन्दुमें बौद्ध दर्शनके सिद्धान्त । यद्यपि न्यायविन्दु विशुद्ध न्यायका ही प्रन्य है तथापि प्रसवश कहीं २ प्राचार्यने उसमें ऐसे वाक्य भी लिखे हैं जिनसे बौद्ध सिद्धान्तोंकी बहुत कुछ झलक मिलती है। हमने ऐसे वाक्योंको यथाशक्ति प्रयत्न करके न्यायविन्दुमें से निकाला और उनके अन्दरसे हमारी सम्मतिमें जो दार्शनिक सिद्धान्त निकाले जा सकते हैं उनको नीचे दिया है- (१) जहाँ सांख्य सत्से सत् की उत्पत्ति मानता है वहाँ बौद्ध असत्की उत्पत्ति और सत्का निरन्वय विनाश मानता है । जैसा कि कहा है-- 'परस्य चासत उत्पाद उत्पत्तिमत्वम् । सतश्च निरन्वयो विनाशोऽनित्यत्वं सिद्धम्। (न्या० पृ० ६९ पं० १४) ( २ ) बौद्धाने विज्ञान, इन्द्रिय और आयुके निरोधको ही मरण माना है। जैसा कि धर्मकीर्तिने कहा है- 'विज्ञानेन्द्रियायुनिरोधलक्षणस्य मरणस्यानेनाभ्युपगमात्' । (न्या पृ. ६८ पं० १०) ( ३ ) बौद्धदर्शन वृक्षों में विज्ञान प्राधिका सद्भाव नहीं मानता। अतएव मरने या जीनेका उनमें विकल्प ही नहीं है- 'तस्य च विज्ञानादिनिरोधात्मकस्य तरुष्वसंभवात्' । ( न्या० पृ. ६८ पं० १९) ( ४ ) बौद्ध सुख आदिको अचेतन मानते हैं । जैसा कि धर्मकीर्ति के निम्नलिखित वाक्यसे प्रगट होता है- 'श्रचेतनाः सुखादय इति साध्य उत्पत्तिमस्वमनित्यत्वं वा सांख्यस्य स्वयं वादिनोऽ- सिद्धम्' । ( न्या० पृ. ६७ पं० ७) (५) बौद्ध आत्माको नहीं मानता । जैसा कि टीकामें कहा गया है 'तदिह बौद्धस्यात्मैव न सिद्धः' । (पृ. ७१ पं० ५) तथा 'बौद्धेनोक्तं नास्त्यात्मा'। (पृ. ६३ पं० १२) (६) पीछे बतला दिया है कि बौद्ध दर्शन विज्ञान, इन्द्रिय और आयुके निरोध को मरण मानता है किन्तु अात्माको नहीं मानता। यहाँ यह शङ्का होती है कि जब प्रात्मा ही नहीं है तो मरण किसका होता है। उसका समाधान यह है कि बौद्ध वास्तवमें मरण नहीं मानता किन्तु निरोध ( रुकना) मानता है। बौद्ध प्राण आदिको मानता है किन्तु अनात्मवादी होनेसे न तो उनको सात्मक ही मानता है और न निरा- स्मक ही मानता है । जब तक विज्ञान आदि शरीरमें रहते हैं तब तक शरीर जीता है जब नहीं रहते तो मर जाता है। इसलिये प्राण मादि जीवित शरीर सम्बन्धी हैं । जैसा कि धर्मकीर्तिने कहा है- 'सात्मकत्वेन निरात्मकत्वेन वा प्रसिद्ध प्राणोदरसिद्धिः' । (पृ. ८३ पं० २ )। तथा 'तस्माज्जीवच्छरीरसम्बन्धी प्राणादिः' । (पृ. ८३ पं० - - परमाणवः -- भूमिका। (७) कर्मको अन्य दर्शनकारोंके समान बौद्धने भी अनित्य ही माना है। जैसा कि टीकामें कहा है- 'साध्यविकलं कर्म तस्यानित्यत्वात् (पृ. ९५ पं० १ ( ८ ) परमाणुको वौद्ध भी मूर्त मानता है । जैसा कि टीकामें कहा है 'असर्वगतं द्रव्यपरिमाणं मूतिः । असर्वगताश्च द्रव्यरूपाश्च (पृ० ९५ पं० ३ ) ( ९) घटको अनित भी माना है और मूर्त भी माना है । जैसा कि कहा है- (घटस्तूभयविकलः । अनित्यत्वान्मूर्तत्वाच्च घटस्येत : ( पृ० ९५ पं० ४ ) (१०) बौद्ध दर्शन में जो पदार्थ विद्यमान हैं वे सब अनित्य हैं। जैसा कि धर्मकीर्तिने कहा है- 'यत्सत्तत्सर्वमनित्यं यथा घटादिरिति' । (पृ० ४९ पं० १५.) (११) बौद्व दर्शनमें साध्य और साधनको बिलकुल अभिन्न मानकर उनका तादात्म्य सम्बन्ध माना है । उनमें भेद समारोप जनित है । जैसा कि कहा है- 'साध्यसाधनयोस्तादात्म्यम् । समारोपितस्तु साध्यसाधनयोर्भेदः' । (पृ० ५३ पं० ११) हमने न्यायबिन्दुके उपरोक्त वाक्योंमें से स्थूल सिद्धान्तोंको ही निकाला । सूक्ष्म सिद्धान्तोंको निकालनेका काम अपने लिये असाध्य सममकर विशेष विद्वानों के लिये छोड़ दिया है। धन्यवाद। इस भूमिकाको समाप्त करने के पूर्व मुझे एक और कर्तव्यका पालन करना है। सवसे प्रथम मुझे डाक्टर सतीशचन्द्रजी विद्याभूषणको धन्यवाद देना है जिनकी पुस्तकसे मैं इस भूमिकामें ऐतिहासिक अंश देने में सफल हुआ हूँ । यद्यपि हमने इस विषयके अन्य भी कई अन्य देखे, किन्तु उनसे कुछ भी विशेष लाभ न हो सका। दूसरे मुझे हिन्दू विश्वविद्यालयके फिलासफीके प्रोफेसर तथा सहायक रजिस्ट्रार पं० इन्द्रदेव जी तिवारी एम० ए० को देना है जिनसे मुझको समय २ पर योग्य सम्मति तथा अनेक प्रकारकी सहायता मिली है। वास्तव में आपकी सहायताके बिना मेरा काम अत्यन्त गुरुतर हो जाता। गवर्नमेन्ट संस्कृत कालेजके प्रिंसिपल तथा संस्कृत परीक्षाओं के रजिस्ट्रार पं. गोपीनाथजी कविराज एम ए० की सहायता का तो मैं अत्यन्त आभारी हूँ, जिन्होंने अपने अमूल्य समयको नष्टकर मुझे विविध प्रकारकी राहायता दी है । भदैनी, बनारस . चन्द्रशेश्वर शास्त्री। काव्यसाहित्यतीर्थाचार्य। दि. २८ जून १९२४ ई० द्वितीय संस्करण की भूमिका भारत में बौद्ध विषयक ग्रन्थों के सम्बन्ध में जनता की रुचि का पता इस तथ्य से भली प्रकार लगता है कि इस प्रन्थ के द्वितीय संस्करण का उत्थान सन् १९२४ के पश्चात् आज ३० वर्ष की लम्बी अवधि के उपरान्त पाया है । यद्यपि यह ग्रंथ कई विश्वविद्यालयों के एम० ए० तथा संस्कृत की अनेक स्नातकोत्तर परीक्षाओं का पाठ्य प्रन्थ है, किन्तु संभवतः विद्यार्थियों के अतिरिक्त अन्य विद्वानों ने इसमें अधिक रुचि प्रकट नहीं की। इसको देश के दुर्भाग्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं समझा जा सकता। न्यायविन्दु के १९२४ में प्रकाशित होने के उपरान्त विद्वानों ने बौद्धन्याय के सम्बन्ध में पर्याप्त खोज की भारत के कुछ विद्वानों ने तिब्बत के प्राचीन प्रन्थ भण्डारों में जाकर तिब्बती में लिखे हुए संस्कृत प्रन्यों के अन्वेषण में अपना सारा जीवन लगा दिया । इस खोज के फलस्वरूप प्राचार्य धर्मकीर्ति के कुछ अन्य न्याय प्रन्थों का अपने मूल संस्कृतरूप में पता लग गया । धर्मकीर्ति के अतिरिक्त अन्य भी अनेक बौद्ध प्राचार्यों के प्रन्थों का अपने मूल संस्कृतरूप में पता लग चुका है । प्राचीन भारतीय वाङ्मय की इस महत्त्वपूर्ण खोज के फलस्वरूप पटना की विहार रिसर्च सोसाइटी ने बौद्धन्याय के निम्नलिखित सस्कृत प्रन्थों को प्रकाशित किया है- १, प्रमाणवार्तिक-यह प्राचार्य धर्मकीर्ति की रचना अपने मूल संस्कृत रूप में छपी है। २. वादन्याय अथवा तर्कन्याय-भी धर्मकीर्ति का प्रन्थ है। ३. प्रमाणवातिकवृत्ति-इसकी रचना मनोरथनन्दी ने की है । ४. प्रमाणवातिकभाष्य- इसकी रचना प्रज्ञाकर गुप्त ने की है विहार रिसर्च सोसाइटी के जर्नल में। ५. धर्मकीर्ति का प्रमाणवार्तिक स्ववृत्ति टीका भी प्रकाशित हुई है। इसकी रचना कर्णकगोमी ने की है । बाद में इसको प्रयाग के किताबमहल ने प्रकाशित किया । पटना से रत्नकीर्ति के अन्य भी अनेक न्यायनिबन्धों के प्रकाशित होने की आशा है । वहां ज्ञानश्रीमित्र के न्यायप्रन्थों का संपादन तथा प्रकाशन करने का भी आयोजन किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त गायकवाड ओरिएंटल सीरीज़ में हेतुविन्द टीका अपनी अनुटीका सहित छपी है। इन प्रन्थों को प्रकाश में लाने का बहुत कुछ श्रेय महापण्डित राहुल सांकृत्या. यन को है। इस प्रकार यद्यपि विशेष विद्वान् बौद्धन्याय के सम्बन्ध में अधिकाधिक खोज करते जाते हैं, किन्तु जनता की उनमें पर्याप्त रुचि नहीं होती । स्वाधीन भारत के नागरिकों को गंभीर अध्ययन के क्षेत्र में अपने दृष्टिकोण को अत्यधिक उदार बनाना चाहिये । ४५६६ बाजार प्रहारगंज नई दिल्ली-१ चन्द्रशेखर शास्त्री दनांक १९ अगस्त १९५४ ई.

न्यायबिन्दु-विषयानुक्रमणिका प्रथमः परिच्छेदः। विषयः पृष्ठं पंक्तिः ... १ ४ ६ ३ ११ ६ ४ १३ ११ १६ w मङ्गलाचरणम् ग्रन्थस्याभिधेयप्रयोजनम् अभिधेयादीनामावश्यकताप्रदर्शनम् सम्यग्ज्ञानस्य लक्षणम् प्रमाणसामान्यवर्णनम् सम्यग्ज्ञानस्य द्वैविध्यम् प्रत्यक्षलक्षणम् कल्पनाया लक्षणम् प्रत्यक्षस्य चातुर्विध्यम् इन्द्रियज्ञानम् मनोविज्ञानम् स्वसंवेदनप्रत्यक्षम् योगिप्रत्यक्षम् प्रत्यक्षस्य विषयः स्वलक्षणम् परमार्थसत् सामान्यलक्षणम् १२ २० २१ ३ १३ १४ ५ " २० १५ " १० ३ " १८ १ अनुमानस्य विषयः १८ ४ " प्रमाणफलम् प्रमाणम् : : १० २२ ४॥न्या० [ २ ] द्वितीयः परिच्छेदः। पृष्ठ पंक्तिः २१ २ १५ " २३ ... विषयः अनुमानस्य द्वैविध्यम् स्वार्थानुमानम् अनुमानस्य फलम् त्रैरूप्यम् पक्षधर्मत्वम् सपक्षसत्वम् विपक्षाव्यावृत्तिः अनुमेयः २२ 8 १२ २३ ३ ... १२ " २४ " सपक्षः १७ " • • • " २ २७ " २८ १६ २६ १६ २१ ३३ असपक्षः त्रिरूपलिङ्गानि अनुपलब्धिः उपलब्धिलक्षणप्राप्तिः स्वभावविशेषः कार्यस्योदाहरणम् त्रिरूपलिङ्गानामेव हेतुत्वम् स्वभावकार्ययोरेव तादात्म्यतदुत्पत्ती दृश्यानुपलब्धिः अनुपलब्धेः प्रकारभेदप्रदर्शनम् स्वभावानुपलब्धिः कार्यानुपलब्धिः व्यापकानुपलब्धिः स्वभावविरुद्धोपलब्धिः विरुद्धकार्योपलब्धिः विरुद्धव्याप्तोपलब्धिः कार्यविरुद्धोपलब्धिः व्यापकविरुद्धोपलन्धिः ३ " ३६ २३ " ३७ १० १६ " ३६ or १२ पंक्तिः पृष्ठं ३६ २१ [ ३ । विषयः कारणानुपलब्धिः कारणविरुद्धोपलब्धिः कारणविरुद्धकार्योपलब्धिः तासां स्वभावानुपलब्धावन्तर्भावः विप्रकृष्टविषयानुपलब्धिः २१ " ४१ १३ २१ ४६ २ 41 ४७ " 15 ... " ४६ २२ w 초성 १ ..4 " १२ ५२ तृतीयः परिच्छेदः। परार्थानुमानस्य लक्षणम तस्य द्वैविध्यम साधर्म्यवत् स्वभावहेतोः प्रयोगः शुद्धस्य स्वभावहेतोः प्रयोगः स्वभावभूतधर्मभेदेन स्वभावस्य प्रयोगः कृतकत्वम् प्रत्ययभेदभेदित्वादयः साध्यधर्मः साधनस्य स्वभावः तस्मिन्नेव विषये हेतुः तस्य प्रतिज्ञार्थंकदेशहेतुत्वस्य परिहारः कार्यहेतोः प्रयोगः वैधर्म्यवतः प्रयोगः स्वभावहेतो_धर्म्यप्रयोगः कार्यहेतोवैधर्म्यप्रयोगः साधर्म्यणापि प्रयोगेऽर्थाद्वैधर्म्यगतिः वैधhणाप्यन्वयगतिः स्वभावप्रतिबन्धस्य द्वैविध्यम् पक्षस्य लक्षणम् प्रत्यक्षनिराकृतः अनुमाननिराकृतः ६ " " २२ ५५ १३ २२ .. ५६ ५ " १६ mr ६० १० २२ ६३ ६४ w पृष्ठं ६४ ११ २४ " ६.७. ६६ २१ ... ७० २ ११ " २३. " ७१ १० ४ विषयः प्रतीतिनिराकृतः स्ववचननिराकृतः हेत्वाभासः असिद्धहेत्वाभासः संदिग्धासिद्धः स्वात्मना संदिह्यमानः आश्रयणसिद्धः धर्मिणः सिद्धावप्यसिद्धः अनैकान्तिको हेत्वाभासः अविकलकारणस्य भवतोऽन्यभावो नाम प्रथमो विरोधः परस्परपरिहारस्थितलक्षणता नाम द्वितीयो विरुद्धः विरुद्धहेत्वाभासः दिङ्नागेनाभ्युपगत इष्टविघातकृद्विरुद्धः धर्मकीर्तिना तस्य निराकरणम् संदिग्धोऽन्वयः दिग्नागेनाभ्युपगतो विरुद्धाव्यचारी हेतुः तस्य धर्मकीर्तिना निराकरण विरुद्धाव्यभिचारिण्युदाहरणम् अस्य स्वभावहेतुत्वम् दिङ्नागेनाभ्युपगतस्य दृष्टान्तस्य साधना- वयवत्वस्य निराकरणम् ७५ २१ ७६ & ८० ६ ८१ ५६ ३. " ... ६१ १ १७ ... चन्ताभासाः ६४ १०३ ४. .. १८ दूषणा जातयः जात्युत्तराणि. दीकाकारकृतमन्तिममङ्गलम् ग्रन्थसमाप्तिः २३ १०४ ४ ॐ नमः सर्वज्ञाय न्यायबिन्दुः प्रथमपरिच्छेदः - जयन्ति(१) जातिव्यसनप्रबन्धप्रसूतिहेतोर्जगतो विजेतुः । रागाधराते: सुगतस्य वाचो मनस्तमस्तानवमादधानाः ॥ सम्यग्ज्ञानपूर्विकेत्यादिनास्य प्रकरणस्याभिधेयप्रयोजनमुच्यते- सम्यग्ज्ञानपूर्विका सर्वपुरुषार्थसिद्धिरिति तद् व्युत्पाद्यते । (१) तत्र विदुषामग्रणीः श्रीधर्मोतराचार्य न्यायबिन्दुं व्याचिख्यासुः प्रारिप्सितग्रन्थस्य निर्विघ्नपरिसमाप्त्यर्थं शिष्टाचारपरिपालनार्थं वा स्वमतं स्थापयन् भगवतो बुद्धस्य गुणसं- स्तवनं करोति । 'जयन्ति' इत्यादिना । सुगतस्य भगवतो बुद्धरय वाचः वाण्यः जयन्ति । कथम्भूतस्य बुद्धस्येत्यत आह-जातीनाम् प्राणिसामान्यानां । 'जातिर्जातञ्च सामान्यम् इत्यमरः। व्यसनस्य विपदः 'व्यसनं विपदि भ्रंशे दोषे कामजके पजे'. इत्यमरः । प्रबन्धस्य सन्दर्भस्य परम्परायाः इत्यर्थः । या प्रसूतिः श्व्योतः क्षरणं नाश इत्यर्थः । 'प्रसूतिः प्रसवे श्च्यते' इत्यमरः । तस्या हेतुः कारणभूतस्तस्य । एतेन संसारस्य दुःख- मयत्वं बुद्धस्य तद्विनाशे कारणत्वश्च प्रदर्शितम् । जगतः संसारस्य विजेतुः जयकर्तुस्त- स्मिन्ननासक्तस्येत्यर्थः । एतेन बुद्धस्य सर्वसंसारसम्बन्धिविकारेषु ज.यत्वं जगतस्तरणत्वच सूचितम् । रागादोनाम् रागद्वेष नोभमोहादिसंसारसम्बन्धिभावानामरातिश्शत्रुस्तस्य । एतेन तस्य वीतरागित्वं द्योतितम् । एतादृशः सुगतस्य बुद्धस्य वाचः जयन्ति । कथम्भूता वाचः इत्यत आह-मनः इत्यादि । मनसो यत्तमस्तस्य तानां तनोः भावस्तं काय॑मादधानाः सम्पादयन्त्यः । एतेन बुद्धस्य वाचि ज्ञानप्रदत्वं प्रकटीकृतम् । सौगताः 'बुद्धः परमेश्वस्यावतार' इति नाभिमन्यन्ते । किन्तु तेषां मते सर्वसंसारि- १ 'सम्यग्ज्ञानपूर्विका सर्वेत्यादिना इति पाठान्तरम् 'क' पुस्तके।

२ न्यायबिन्दुः द्विविधं हि प्रकरणशरीरं शब्दोऽर्थश्चेति । तत्र शब्दस्य स्वाभिधेय- प्रतिपादनमेव प्रयोजनम् । नान्यत् । अतस्तन्ने निरूप्यते । अभिधेयं तु यदि निष्प्रयोजनं स्यात्तदा तत्प्रतिपातये शब्दसन्दर्भोऽपि नारम्भणीयः स्यात् । यथा काकदन्तप्रयोजनाभmer तत्परीक्षारम्भगीया प्रेक्षावता । तस्मादस्य प्रकरणस्यारम्भणीयत्वं दर्शयताभिवेयप्रयोजनमनेनोच्यते । यस्मा- त्सम्यग्ज्ञानपूर्विका सूर्वपुरुषार्थसिद्धिवस्मात्तत्प्रतिपत्त्यर्थमिदमारभ्यत इत्यय- मन्त्र क्यार्थः । अत्र च प्रकरणाभिधेयस्य सम्यग्ज्ञानस्य सर्वपुरुषार्थसिद्धिहेतुत्वं प्रयो- जनमुक्तम् । अस्मिंश्चार्थ उच्यमाने सम्बन्धप्रयोजनाभिधेयान्युक्तानि भवन्ति । तथा हि-पुरुषार्थोश्योमि सम्यक्षानं व्युत्पादयितव्यमनेन प्रक- रणेनेति ब्रुवता सम्यग्ज्ञानमस्य शनसन्दर्भरयाभिधेयं, तद्व्युत्पादनं प्रयो- अनं, प्रकरण वेदमुपायो व्युत्पादनस्यत्युक्तं भवति । तस्मादभिधेयभागप्र- योजनाभिधानसामात्सम्पन्धापीन्युक्तानि भवन्ति । न विदमेकं वाक्यं सम्बन्धमभिधेयं प्रयोजनं च वक्तुं साक्षात्समर्थम् । एकं तु वदत् त्रयं 1 नीवानामिव वुद्धोऽप्यस्मिन्नेव संसारेऽनादिकालादारभ्य संसरति स्म । पश्चात्काललब्धि- सा-शुभकर्म कृत्य काचिन्छुभगतीः प्राप्तनाव । क्रमेण च स शुद्धोदवगृहे सिद्धार्थो बभूल तत्र, कानिचिदिनानि यौवनसुखमनुभूय तेम्वसन्तुष्टः सन् यौवनावस्थायामेव स कल अशानिटइं परिल्याज्य सुदुष्करं स्पश्चकार । क्रमेण च संसार कारणीभृतरागादिभावान् स्वकाका बुद्धो बभूवः । बदनन्तरं स सर्वसंसारिजीवान दुःखनिवृत्युपायं बोधयित्वा विळणं धामन्मन् । अयमेष भाको टीकाकारेण स्लोकेऽस्मिन् प्रदर्शितः । १ 'चेति' इति पदं 'ख' पुस्तके न विद्यते । २ 'स्वाभिधेच०' इत्यस्य स्थाने 'अभि. धेयः इति पाठो विद्यते 'ख' पुस्तके। ३ सर्वेषां शब्दानां स्वाभिधेयप्रतिपादनपर. स्वात' इति पदं कर पुस्तके न विद्यते। ४ 'अभिधेये तु निः प्रयोजने तत्प्रतिप. को' इति समान्तरं '' पुस्तके । ५ 'सहमतिपतः' इति पाठान्सरम '' पुस्तके । कक्षा-लिखा सिमबन्धं श्रोतुं श्रोता वर्तते । समदी लेर काव्यः सम्बन सप्रयोजनः ॥ १॥ यावत् प्रयोजनास्य सम्बन्धो वाभिधीयते । असम्बद्धमलापि. स्वाइवेचावसङ्गतिः॥२॥ तस्माद् ध्याख्याङ्गमिच्छभिः सहेतुः सप्रयोजनः। शास्त्राव. तारसम्बन्धो वाच्यो नान्योऽस्ति निष्फलः ॥३॥ ७ 'उपायो व्युत्पादनस्थ' इत्यस्य स्थाने 'उपयोग्युत्पादनस्य' इति पाठान्तरम् 'ख' पुस्तके । ८ 'वाच्यम् इति पाठा- न्तरम् व पुस्तके। ९'सामर्थप-एकं तु वदत् इति पाठान्तरं ' पुस्तके । 'क' पुस्तके नेतात्यारकिर्यानयावलोकित महामि । ..

प्रथमपरिच्छेदः सामर्शियति । तत्र तदित्यभिवेयपदम् । अस्पाद्यत इति प्रयोजन मिदम् । प्रयोजनं चात्र वक्तुः प्रकरणकरणब्यापारस्थ चिस्यले प्रोतुम्ब श्रवणव्यापारस्य । तथा हि-सर्व प्रेक्षामन्तः प्रवृत्तिप्रपोजममधिष्य प्रवर्त- न्ते । ततश्चाऽऽचार्येण प्रकरणं किमर्थं कृतं श्रोतुमिच किमर्थ अयत इति संशयव्युत्पादनं प्रयोजनमभिधीयते । सम्यग्ज्ञानं व्युत्पाद्यमानानामारमा ठयुत्पादकं कर्तुं प्रकरणमिदं कृतं; शिष्यैश्चाचार्यप्रयुकामात्मनो व्युत्पत्तिमि- च्छद्भिः प्रकरणमिदं श्रूयत इति प्रकरणकरणश्रवयोः प्रयोजनव्युत्पादनम् । सम्बन्धप्रदर्शनपदं तु न विद्यते । सामादेव तु स प्रतिपर्तव्यः । प्रेता- घता हि सम्यग्ज्ञानव्युत्पादनाय प्रकरणमिदमारब्धवताऽयमेवोपायो मान्य इति दर्शित एवोपायोपेयभावः प्रकरमाप्रयोजनयोः सम्बन्ध इति । ननु च प्रकरणश्रवणात्प्रागुक्तान्यस्य भिधेयादीनि प्रमाणभावानेशाय- द्भिर्न गृह्यन्ते तत्किमेतैरारम्भप्रदेश' उक्तः । सत्यम् । अश्रुते प्रकरणे कथिताम्यपि म निश्चीयन्ते उक्तेषु स्वप्रमाणकेष्वष्यभिधेयादिषु संशय अल्प- द्यते संशयाच प्रवर्तन्ते । अर्थसंशयोऽपि हि मवृत्त्यङ्गम् प्रेक्षावशाम् । अनर्थसंशयो निवृत्त्यङ्गम् । अत एव शासकारेगैव पूर्व सम्बन्धादीमि युज्यन्ते वक्तुम् । "व्याख्यातृणां हि धर्म "क्रोनद्यर्थमन्मथापि सम्मा- व्यते । शास्त्रकृतां तु प्रकरणप्रारम्भे म विपरीताभिव्यायभिधाने प्रयोजन- मुत्पश्यामो नापि प्रवृत्तिम् । "अतस्तेषु संशयो युक्तः । अनुक्केषु तु प्रतिपत्तृभिर्मिष्प्रयोजनममियेयं संभाव्येसास्य प्रकरणस्व काकदन्तपरीक्षाया इच, अशक्यानुष्ठानं वा जरहरसक्षकचूधारमालारोपदेशवत् , अनाम- मचा प्रयोजनं मातृपियाहामोपदेशयम् , "श्रतो या प्रकरणाल्लबुर असल 'प्रयोजनपवम्' :! १ सम्यक्वकारेणासाय। इति 'पदं 'क' सुस्तके म वियते । प्रमोनल मणमिवयः। ध्यमानान् पहिल्या प्रति। स.युत्वाचमामाना। साविशेषेणोत्पादमस्यर्थमिति बुत्पादक पोषकहति यावत् । 'इदम् इति पदं पुस्तके न विद्यते। ८ शसध्यः। ९ नागुपदेन शान्त सर्वत्र । १० भपि' इति पदं 'ख' पुस्तके व वियते। वाहत्या पाठो विचले मुद्रितपुस्तके। १९ सत्यमित्यईस्वीकारे। ' सुस्तके 'अपि' इत्यधिक पठो विद्यते। १४ख.बाध्यातणांतीकाराणाम्म १५काम रया. वयोजनाभावात् । सम्वादिषु ॥ सम्मावादिषु । स. "पर 1 १.ख, साकल्प "भावाप्रकरणम्यः इति पारमयसीयो। ।

न्यायबिन्दुः उपाय: प्रयोजनस्य, अनुपाय एव वा प्रकरणं सम्भाव्येत। एतासु चान- र्थसम्भावनास्वेकस्यामप्यनर्थसम्भावनायां न प्रेक्षावन्तः प्रवर्तन्ते । अभि- धेयादिवर्थसम्भावनाऽनर्थसम्भावना विरुद्धोत्पद्यते । तया तु प्रेक्षावन्त: प्रवर्तन्ते । इति प्रेक्षावतां प्रवृत्त्यङ्गमर्थसम्भावनां कर्तुं सम्बन्धादीन्यभिधी- यन्त इति स्थितम् । अविसंवादकं ज्ञानं सम्यग्ज्ञानम् । लोके च पूर्वमुपदर्शितमर्थं प्रापय- न्सम्बादेक उच्यते तद्वज्ज्ञानमपि स्वयं प्रदर्शितमर्थ प्रापयत्संवादकमुच्यते । प्रदर्शिते चार्थे प्रवर्तकत्वमेव प्रापकत्वम् । नान्यत् । तथा हि-न ज्ञानं जनयदर्थं प्रापयति । अपि त्वर्थे पुरुपं प्रवर्तयत्प्रापयत्यर्थम् । प्रवर्तकत्वमपि प्रवृत्तिविषयप्रदर्शकत्वमेव । न हि पुरुषं हठात्प्रवर्तयितुं शक्नोति विज्ञानम् । अत एव चार्थाधिगतिरेव प्रमाणफलम् । अधिगते" चार्थे प्रवर्तितः पुरुषः प्रापितश्चार्थः । तथा च सत्याधिगमात्समाप्तः प्रमाणव्यापारः । अत एवानिधिगतविषयं प्रमाणम् । येनैव हि ज्ञानेन प्रथममधिगतोऽर्थस्तेनैव प्रवर्तितः पुरुषः प्रापितश्चार्थः । तत्रैवार्थे किमन्येन ज्ञानेनाधिकं कार्यम् । ततोऽधिगतविषयमप्रमाणम् । तत्र योऽर्थो दृष्टत्वेने ज्ञात: स प्रत्यक्षेग प्रवृत्तिविषयीकृतः । यस्माद्यस्मिन्नर्थे प्रत्यक्षस्य साक्षात्कारित्वव्यापारो विक- ल्पेनानुगम्यते तस्य प्रदर्शकं प्रत्यक्षम् । तम्मादृष्टतया ज्ञात: प्रत्यक्षदर्शि- त: । अनुमानन्तु लिङ्गदर्शनानिश्चिन्वत् प्रवृत्तिविषयं दर्शयति । यथा च प्रत्यक्ष प्रतिभासमानं नियतमर्थं दर्शयति, अनुमानं च लिङ्गसम्बद्धं नियत- मर्थ दर्शयति । अत एते नियतस्यार्थस्य प्रदर्शके । तेन ते प्रमाणे । नान्यद्वि- ज्ञानम् । प्राप्तुंशक्यमर्थमार्दै शयत्प्रापकम् । प्रापकत्वाच प्रमाणम् । आभ्यां १ ख. पुस्तके संख्यावाची शब्द ५१ अपि दृश्यतेऽत्र । चतुणां पूर्वाणामप्यने संख्या दृश्यन्ते। २ ख. पुस्तके 'तक्तेषु' पाठान्तरमुपलभ्यते । यथाशुद्धत्वात् 'उक्तषु' इत्यस्य स्थाने प्रयुक्तमिवावलोक्यते। ३ 'तु' इति पदं ख. पुस्तके न विद्यते। ४ ख. 'अभि. संवादसंज्ञानम्' इति पाठान्तरमशुद्धं प्रतीयते । ५ न खलु पूर्वमुपदर्शितेऽर्थे प्रवर्त. कत्वमपि स्वपूर्वमुपदर्शितेऽर्थे प्रवर्तकत्वं संवादकत्वम् । ६ 'स्वयम्' इति पदं 'क' पुस्तके न विद्यते। ७ उत्पत्तिक्षण एव। ८ ख. ज्ञानम् । ९'च' इतिपदं ख. पुस्तके नैवो. पलभ्यते। १०ज्ञाते। ११'च' इत्यधिकं पदं ख. पुस्तके। १२ ख. तत्रैव चार्थे । १३ प्रत्यशष्टत्वेन । १४ ख. प्रवृत्तविषयः। १५ निश्चयं कुर्वत् । १६ क. पुस्तकस्य 'लिङ्गसम्बन्धमा इति पाठोऽशुद्धो प्रतीयते । १७ ख. 'नियतार्थस्य' । १८ ख. 'उपदर्शयस्' प्रथमपरिच्छेदः प्रमाणाभ्यामन्येन च ज्ञानेन प्रदर्शितोऽर्थः कश्चिदत्यन्तविपर्यस्तः । यथा मरी- चिकासु जलम् । स चासत्त्वात्प्राप्तुमशक्यः । कश्चिदनियतो भाभावयोः । यथा संशयार्थः । न च भावाभावाभ्यां युक्तोऽर्थो जगत्यस्ति । तत: प्राप्तुमश- क्यस्तादृशः । सर्वेण चालिङ्गजेन विकल्पेन नियामकमदृष्टया प्रवृत्तेन भावा- भावयोरनियत एवार्थो दर्शयितव्यः । स च प्राप्तुमशक्यः । तस्मादश- क्यप्रापणमत्यन्तविपरीत भावाभावनियतं चार्थं दर्शयदप्रमाणमन्यज्ज्ञा- नम् । अर्थक्रियार्थिभिश्चार्थक्रियासमर्थार्थप्राप्तिनिमित्तं ज्ञानं मृग्यते । यच्च तैम॑ग्यते तदेवं तेन शास्त्रे विचार्यते । ततोऽर्थक्रिया समर्थवस्तुप्रदर्शकं सम्यग्ज्ञानम् । यच्च तेन प्रदर्शितं तदेव प्रापणीयम् । अर्थाधिगात्मकं हि प्रापकमित्युक्तम् । तत्रं प्रदर्शितान्यद्वस्तु भिन्नाकारं भिन्न देशं भिन्नकालं च । विरुद्धधर्मसंसर्गाद्धयन्यद्वस्तु । देशकालाकारभेदश्च विरुद्धधर्मसंसर्गः । तस्मादन्याकारंवद्वस्तुमाहि नाकारान्तरवति वस्तुनि प्रमाणम् । यथा पीत- शङ्खमाहि शुक्ल शङ्ख । देशान्तरस्थप्राहि च न देशान्तरस्थे प्रमाणम् । यथा कुम्बि काविवरदेशस्थायां मणिप्रभायां मणिग्राहि ज्ञानं नापवरकदेशस्थे मणौ । कालान्तरयुक्तग्राहि च न कालान्तरवति वस्तुनि प्रमागम् । यथा- र्द्धरात्रे मध्याह्नकालवस्तुमाहि स्वप्नज्ञानं नार्द्धरात्रकाले वस्तुनि प्रमाणम् । ननु चे देशनियतमाकारनियां च प्रापयितुं शक्यं यत्कालं तु परिच्छिन्नं तत्कालं न शक्यं प्रापयितुम् । नोच्यते यस्मिन्नेत्र काले परिच्छिद्यते तस्मिन्नेव काले प्रापयितव्यमिति । अन्यो हि दर्शनकालोऽन्यश्च प्राप्ति, कालः । किं तु यत्कालं परिच्छिन्नं तदेवं तेन प्रापणीयम् । अभेदाध्या- सायाच्च संतानगतमेकत्वं द्रष्टव्यमिति । सम्यग्ज्ञानं पूर्व कारणं यस्याः सा तथोक्ता । कार्यात्पूर्वं भवत्कारणं । १ ख. 'दर्शिः। २ विरुद्धः । ३ ख. पुस्तकस्थ 'अत्यन्तविपरीतभावाभादानि' इति पाठोऽशुद्धो प्रतीयते । ४ 'अर्थक्रियासमर्थ' इति पाठो ख. पुस्तके न विद्यते । ५ 'तेन' इति पदं क० पुस्तके नैवोपलभ्यते । ६ ख० अर्थाविजियासमर्थवस्वधिगमा स्मकत्वम्। अर्थाधिगमे । ८ क० पुस्तकस्य 'संसर्गः' ख० पुस्तकस्य च संसर्गः' इति पाठावशुद्धौ। ९ख० 'अन्याकारवस्तु' । १० क० 'कुंविका'। ११'च' इति पदं क० पुस्तके न विद्यते । १२ 'तेन' इति पदं क० पुस्तके न विद्यते। १३ अध्यवः सायो ज्ञानम्।

६ पायविम्छः पूर्वमुक्तम् कारणशब्दोपादाने तु पुरुषार्थसिद्धः साक्षात्कारणं मन्यते पूर्वशब्दे तु पूर्वमानम् । द्विविधं च सम्यग्ज्ञानम् अर्थक्रियानि सम् , अर्थ- क्रियासमर्थ च प्रवर्तकम् । तयोर्यत्प्रवर्तकं तदिह परीक्ष्यते । तच्च पूर्व- मायम् । म सु साशात्कारणम् । सम्याज्ञाने हि सति पूर्वदृष्टरमरणम् । स्मरणादभिलाषः । अभिलाषात्प्रवृत्तिः । प्रवृत्तेश्च प्राप्तिः । ततो म साक्षा- द्वेतुः । अर्थक्रियानि से तु यद्यपि साक्षात्प्रवृत्तिस्तथापि तन्न परीक्षणी- यम् । यत्रैव हि प्रेतावन्तोऽर्थिनः साशास्तत्परीक्ष्यते । अर्थक्रियानि से च ज्ञाते सति सिद्धः पुरुषार्थः । तेन सत्र न साशङ्का अर्थे झाते । अतस्तन्न परीक्षणीयम् । तस्मात्परीक्षाहमसाक्षात्कारणं सम्यग्ज्ञानमादर्शयितुं कारणशब्दं परित्यज्य पूर्वग्रहणं कृतम् । पुरुषस्यार्थः । अर्थ्यत इत्यर्थः । काभ्यत इति यावत् । हेयोऽर्थ उपोदयो वा । हेयो ह्यर्थो हातुमिष्यते । उयोदेयोऽप्युपादातुम् । म च हेयोपादेयाभ्यामन्यो राशिरस्ति । उपेक्षणीयोऽप्यनुपादेयत्वाद्धेय एव । 'यस्य सिद्धि नमुपादानं च । हेतुनिबन्धना हि" सिद्धिहत्पत्तिकच्यते । ज्ञाननिबन्धना तु सिद्धिरमुष्ठानम् । हेयस्य हानमनुवानम् । उपादेयस्य चोपादानम् । ततो हेयोपादेययोहागोपादानलक्षणानुष्ठितिः सिद्धिरि- 'त्युच्यते । सर्वा चासौ पुरुषार्थसिद्धिश्चेति । सर्वशद इह द्रव्यकालय' वृत्तो मे च प्रकारकोत्स्न्ये । ततो नायमर्थः । द्विप्रकारापि सिद्धिः सम्य. रज्ञामणिबन्धनेति । अषि त्वयमर्थः । था काचित्सिद्धिः सा सर्वा कृतने- वासौ सम्यग्ज्ञाननिबन्धनैवेति । मिथ्याज्ञानाद्धि काकतालीवापि नात्स्वर्थ- सिद्धिः । तथा हियदि 'प्रदर्शितमर्थं प्रापयत्येवं तती भवत्वर्थसिद्धिः । ६२ १० ख० शब्दापादाने। २.ख० पुस्तकस्य 'गम्यत' इति पाओऽशुद्धोऽस्ति । ३ मध्ये' इत्पषिकं ख० पुस्तके । ४ कामना । ५ 'ख' मर्य कियामिर्मासात् । ६ख प्राप्ति । ७० 'ज्ञाने। ८ खः अर्थिनः। ९ अपि पदं पुस्तके न विद्यते। १० हेतुरस्ति निवन्धनं कारणं यस्याः । ११ ज्ञानमस्ति मिबन्धनं यस्याः। १२ इति इति पदं ख० पुस्तके न विद्यते। १२ वात्स्नस्तु सम्पूर्णः । कृत्स्नस्य भाषः कावन्यस्तस्मिन् । १४ 'च' इति पाठः क पुस्तके न विद्यते । १५ एवं इति पाठः ख० पुस्तके नकोपलभ्यते ।

७ प्रथानित प्रदर्शितं च प्रापयत्सम्यग्ज्ञानमेव । प्रदर्शितं चात्राथमिथ्यानानाम् । अप्रापकं च कथमर्थसिद्धिमिधनं स्यात् । लक्ष्मायन्मिथ्याज्ञानं न ततो- अर्थसिद्धिः । यतवार्थसिद्धिस्तत्सम्यग्ज्ञानमेव । अत एव सम्यग्ज्ञानं यत्नतो व्युत्पादनीयम् । यतस्तदेव. पुरुषार्थसिद्धिनिबन्धनम् । ततो योवव्या- त्पुरुषार्थसिद्धिः सम्याज्ञाननिबन्धनैवेति तावदुक्तं सर्वा सा' सम्याज्ञाम- पूर्वि केति । इति शब्दस्तस्मादित्यस्मिन्नर्थे । यत्तदोश्च नित्यमभिसम्बन्धः । तदयमर्थो यस्मात्सम्यग्ज्ञानपूर्विका सर्वपुरुषार्थसिद्धिस्तस्मात्तव्युत्पाद्यते । यद्यपि च समासे गुणीभूतं सम्यग्ज्ञानं तथापीह प्रकरणे व्युत्पादयितव्य- चात्प्रधानम् । ततस्तस्यैव तच्छब्देन सम्बन्धः । व्युत्पाद्यते इति विप्रतिप- त्तिनिराकरणेच प्रतिपाद्यते न्युत्पाद्यत इति । चतुर्विधा चात्र धिप्रतिपत्तिः। संख्यालक्षणगोचर फलविषय । तत्र, संख्याविप्रतिपत्तिनिराकर्तुमाह- द्विविधं सम्यग्ज्ञानम् । द्वौ विधौ प्रकारवस्येति द्विविधम् । संभवाप्रदर्शनद्वारेण च व्यक्तिभेदो दर्शितो भवति । द्वे एव सम्यग्ज्ञानव्यक्ती इति । व्यक्ति से प्रदर्शिते प्रतिव्यक्तिनियतं सम्यग्ज्ञानलक्षणमाख्यातुं शक्यम् | अप्रदर्शिते तु व्यक्ति- भेदे सकलष्य क्त्यनुयायि सभ्याचानलक्षणमेकं न शक्यं वक्तुम् । ततो लक्षणभेदकथनाङ्गमेव संख्याभेदकथनम् । अप्रदर्शिते तुं व्यक्तिभेदात्मके संख्याभेदे लक्षणभेदस्य दर्शयितुमशक्यत्वात् । लक्षणनिर्देशाङ्गत्यादेव च प्रथमं संख्याभेदकथनम् । १ सिद्धि०' इत्यस्य स्थाने 'सिद्धेः' इति पाठः ख० पुस्तके। २ ख. पुस्तकस्य 'यावदसूम इति पायोऽशुद्धः प्रतीयते । क. 'या काचिपुरू-सम्पज्ञान म 'सा सम्यग्ज्ञान'। ३ ख० पुस्तके 'सा' इति पदं न विद्यते । ४ 'तद्व्युत्पाद्यते' इत्यस्य स्थाने 'तस्सम्यग्ज्ञान एम्पायने' इति पाठा ख०पुस्तके । ५ 'व्युत्पाद्यते इति पवं ख. पुस्तके न वर्तते । ६ गोचरस्तु विषयः । ७ कित्तिपत्तिस्तु विक्षदा ९ 'एक इति पारः क. पुस्तके व क्यिते । १.क. 'व्यक्तिरे। ख. 'भेदे। ११ 'सकलव्यत्ययुगायि' इति पदं ख० पुस्तकादानीमच। क. पुस्तक इदन्न सुपाठ्यम् । १२ 'तु' इति सोऽधिको विकास पुस्तके।

८ - । न्यायविन्दुः किं पुनस्तद्वैविध्यमित्याह- प्रत्यक्षमनुमानञ्च । प्रतिगतमाश्रितमक्षम् । अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीययेति समासः । प्राप्तापन्नालङ्गतिसमासेषु परवल्लिङ्गप्रतिषेधात् । अभिधेयवल्लिङ्गे सति सर्वलिङ्गः प्रत्यक्षशब्दः सिद्धः । अक्षाश्रितत्वं च व्युत्पत्तिनिमित्तं शब्दस्य । न तु प्रवृत्तिनिमित्तम् । अनेन त्वलक्षाश्रितत्वेनैकार्थसमवेतमर्थसाक्षात्का- रित्वं लक्ष्यते । तदेव शब्दस्य प्रवृत्तिनिमित्तम् । ततश्च यत्किंचिदर्थस्य साक्षात्कारिज्ञानं तत्प्रत्यक्षमुच्यते । यदि त्वक्षाश्रितत्वमेव प्रवृत्तिनिमित्तं स्यादिन्द्रियज्ञानमेव प्रत्यक्षमुच्येत । न मानसादि । यथा गच्छतीति गौरिति गमनक्रियायां व्युत्पादितोऽपि गोशब्दो गमनक्रियोपलक्षितमेका- र्थसमवेतं गोत्वं प्रवृत्तिनिमित्तीकरोति । तथा च गच्छत्यगच्छति च गवि गोशब्दः सिद्धो भवति । मीयतेऽनेनेति मानम् । करणसाधनेन मानशब्देन सारूप्यलक्षणं प्रमाममभिधीयते । लिङ्गग्रहणसम्बन्धरमरणरय पश्चान्मानमनुमानम् । गृहीते पक्षधर्मे स्मृते च साध्यसाधनसम्बन्धेऽनुमान प्रवर्तत इति पश्चा- त्कालभाव्युच्यते । चकारः । प्रत्यक्षानुमानयोस्तुल्यबलत्वं समुचिनोति । यथार्थाविनाभावित्वादर्थविनाभाविवादर्थ प्रापयत्प्रत्यक्षं प्रमाणम् । तद्वद्- र्थविनाभावित्वादनुमानमपि परिच्छिन्नमर्थ प्रापयत्प्रमार्गामति । तत्र कल्पनापोढमभ्रान्तं प्रत्यक्षम् । तत्रेति सप्तम्यर्थे वर्तमानो निर्धारणे वर्तते । ततोऽयं वाक्यार्थः । तत्र तयोः प्रत्यक्षानुमानयोरिति समुदायनिर्देश: । प्रत्यक्षमित्येकदेशः । तत्र समुदायात्प्र:यक्षत्वजात्यैकदेशस्य पृथक्करणं निर्धारणम् । तत्र प्रत्यक्ष- त्वमनूद्य कल्पनापोढत्वमभ्रान्तत्वं च विधीयते । यत्तद्भवतामस्माकञ्चार्थेषु १ 'वैविध्य' इति पाठः क० पुस्तके ख० पुस्तके च विद्यते । मुद्रितपुस्तकस्य सम्पादकस्य सम्मतौ 'द्विविधं' इति भवितव्यम् । अस्माकं मते तु प्रकृतः पाठः एव शोभनम् । २'अक्षाश्रितत्वेन' इत्यशुद्धः पाठः मुद्रितपुस्तकस्य । ३ ख० 'लभ्यते । ४ ख. 'विज्ञानम्।। ५ कथ्यते । ६ ख० 'गृहीत.' । ७ ख० 'एकदेशनिर्देशः । ८का प्रत्यक्षा। ९'च' इति पदं ख० पुस्तके न विद्यते ।

8 प्रथमपरिच्छेदः साक्षात्कारिज्ञानं प्रसिद्धं तत्कापनापोटाभ्रान्तत्वयुक्तं द्रष्टव्यम् । न चैतन्म- न्तव्यं कल्पनापोढाभ्रान्तत्वं चेदप्रसिद्धं किमन्यत्प्रत्यक्षस्य ज्ञानस्य रूपम- वशिष्यते । यत्प्रत्यक्षशब्दवाच्यं सदनद्यतेति । यस्मादिन्द्रियान्वयव्यति- रेकानुविधाय्यर्थेषु साक्षात्कारिज्ञानं प्रत्यक्षशब्दवाच्यं सर्वेषां सिद्धम् । तद- नुवादेन कल्पनापोढाभ्रान्तत्वविधिः । कल्पनाया अपोढमपेतं कल्पनापोढम् । कल्पनास्वभावरहितमित्यर्थः । अभ्रान्तमर्थक्रियातमे वस्तुरूपेऽविपर्यस्तमुच्य- ते। अर्थक्रियाक्षमंच वस्तुडपं सन्निवेशोपाधिधर्मात्मकम् । तत्र यन्न भ्राम्यति तदभ्रान्तम् । एतच्च लक्षणद्वयं विप्रतिपत्तिनिराकरणार्थम् । न त्वनुमा- ननिवृत्त्यर्थम् । यत: कल्पनापोढप्राणेनैवानुमानं निवर्तितम् । तत्रासत्य- भ्रान्तग्रहणे गच्छवृक्षदर्शनादि प्रत्यक्ष कपनापोढवात्स्यात् । ततो हि प्रवृत्तेन वृक्षमात्रमवाप्यत इति संवादकत्यात्सम्यग्ज्ञानम् । कल्पनापोढत्वाञ्च प्रत्यक्षमिति स्यादाशङ्का । तन्निवृत्त्यर्थमभ्रान्तग्रहणम् । तद्धि भ्रान्तत्वान्न प्रत्यक्षम् । त्रिरूपलिङ्गजत्वाभावाच्च नानुमानम् । न च प्रमाणान्तर- मस्ति । अतो गच्छद्बलदर्शनादि मिथ्याज्ञानमित्युक्तं भवति । यदि मिथ्याज्ञानं कथं ततो वृक्षावातिरिति चेत्, न ततो वृक्षावाप्तिः । ना- नादेशगामी हि वृतस्तेन परिच्छिन्नः एकदेशनियतश्च वृक्षोऽवाप्यते" । ततो यद्देशो गच्छवृक्षो दृष्टस्तद्देशो नावाप्यते । यद्देशश्चावाप्यते स न दृष्ट इति । न तस्मात्कश्चिदर्थोऽत्राप्यो । ज्ञानान्तरादेव तु वृक्षादिरोंs- वाप्यते । इत्येवमभ्रान्तग्रहणं विप्रतिपत्तिनिरासार्थम् । भ्रान्तं ह्यनुमा- नम् । "स्वप्रतिभासेऽनर्थेऽध्यवसायेन प्रवृत्तत्वात् । प्रत्यक्षं तु ग्राह्ये रूपे न विपर्यस्तम् | अपि त्वत्रिसंवादकमभ्रान्तगिह ग्रहीतव्यम् । यत: सम्य- ज्ञानमेव प्रत्यक्षम् । नान्यत् । तत्र सम्यग्ज्ञानत्वादेवाविसम्बादकत्वे लब्धे पुनरविसम्बादकग्रहणं भ्यते। १ ख० तत्कल्पनापोडभ्रान्तस्व० । २ प्रकटीक्रियेत । ३ ख. प्रसिद्धं। तदनकल्पना। ५ रहितम्। ६ अविरुद्धम् । ७ 'च' इति पदं क० पुस्तके नवोपक- ८क० ख० वर्णात्मकम् । है ख० निरासार्थम् । १० प्राप्तितिरित्यर्थः। ११ प्राप्यते ज्ञायत इत्यर्थः। १२ ख० च। १३ (विप्रतिप्रत्तिनिरासार्थ) तथाऽनान्तग्रणे- नाप्यनुमाने निवर्तिते कल्पनापोढग्रहणं विप्रतिपत्तिनिरासार्थम् इत्यधिको पाठो विद्यते ख० पुस्तक इति ज्ञातव्यम् । १४ ख. स्वप्रतिभासो (स्वप्रतिभासे) धैर्थाध्यबसाये।

१० न्यायविन्दुः निष्प्रयोजनमेव । एवं हि वाक्यार्थः स्यात् । प्रत्यक्षाख्यं यदविसम्वादकं ज्ञानं तत्कल्पनापोढमविसम्पादकं चेति । न चानेन द्विरविसम्बादग्रहणेन किश्चित् | तस्माद्ग्राह्येऽर्थक्रियाक्षमे वस्तुरूपे यदविपर्यस्तं तदभ्रान्तमिह वेदितव्यम् । कीहशी पुनः कल्पनेह गृह्यत इत्याह- अभिलापसंसर्गयोग्यप्रतिभासप्रतीतिः कल्पना तया रहितम् । अभिलोप्यतेऽनेनेति अभिलापो वाचकः शब्दः। अभिलापेन संसर्गः अभिलापसंसर्गः । एकस्मिज्ञानेऽभिधेयाकारस्याभिधानाकारेण सह ग्राह्या- कारतया शीलनम् । ततो यदेकस्मिज्ञानेऽभिधेयाभिधानयोराकारौ संनि- विष्टौ भवतस्तदा संसृष्टेऽभिधानाभिधेये भवतः । अभिलापसंसर्गाय यो- ग्योऽभिधेयाभासो यस्यां प्रतीतो सा तथोक्ता । तत्र काचित्प्रतीतिरभि. लापेन संसृष्टाभासा भवति । यथा व्युत्पन्नसंकेतस्य घटार्थकल्पना घट- शब्दसंसृष्टार्थावभासा भवति । काचित्त्वभिलापेनासंसृष्टाऽप्यभिलापसंस- गयोग्याभासा भवति । यथा बालकस्याव्युत्पन्नसंकेतस्य कल्पना | तत्राभि- 'लापसंसृष्टाभासा कल्पनेत्युक्तावव्युत्पन्नसङ्केतस्य न संगृह्यते"। योग्यग्रहणे साऽपि संगृह्यते । यद्यप्यभिलापसंसृष्टाभासा" न भवति तदर्हजातस्य बालकस्य कल्पना अभिलापसंसर्गयोग्यप्रतिभासा तु भवत्येव । या चाभि- लापसंसृष्टा साऽपि योग्या। तत "उभयोरपि योग्यग्रहणेन सङ्ग्रहः । असत्यभिलापसंसर्गे फुतो"योग्यतावसितिरिति चेत्। अनियतप्रति भासत्वात् । अनियतप्रतिभासत्वं च प्रतिभासनियमहेतोरभावात् । प्रायो मर्थो विज्ञानं जनयन्नियतप्रतिभासं कुर्यात् । यथा रूपं चक्षुर्विज्ञानं जनय- ज्ञातम्यम् । २ ख० अभिलप्यते । ३ 'अभिलापसंसर्गः' इति पदं क० पुस्तके न विधत। ४० ख० मीलनम्। ५ख. अभिधानाभिधेययोः । ६ ख. निविष्टौ । " अभिधेवाकारभासः। ८ ख० अभिलाप० । ९ 'भवति' इति पदं ख० पुस्तके न वियते । १० संसष्टाभासा, ख० संसृष्टप्रभासा (१० संसृष्टप्रतिभासा)। ११ ख० संगृह्यते । १.जामासा, ख० प्रतिभासा। ॥ इदं पदं क० पुस्तके न विद्यते। १४ अमिलापसं. योग्यप्रतिभाखामिलापसंदृश्योः। १५ योग्यता, ख. योग्यत्व०। १६ स्थानम् । तु १३ .

प्रथमपरिच्छेदः ११ नियतप्रतिभासं जनयति । विकल्पविज्ञानं त्वर्थान्नोत्पद्यते। ततः प्रतिभास- नियमहेतोरभावादनियतप्रतिभासम् । कुत: पुनरेतद्विकल्पोऽर्थान्नोत्पद्यत इति । अर्थसंनिधिनिरपेक्षत्वात् । बालोऽपि हि यावदृश्यमानं स्तनं स एवायमिति पूर्वदृष्टत्वेन न प्रत्यव- मृशति तावन्नोपरतरुदितो मुखमर्पयति स्तने । पूर्वदृष्टापरदृष्टं चार्थमेकी- कुर्वद्विज्ञानमसन्निहितविषयम् । पूर्वदृष्टस्यासन्निहितत्वात् । असब्रिहित- विषयं चार्थनिरपेक्षम् । अनपेक्षं च प्रतिभासनियमहेतोरभावादनियत- प्रतिभासम् । तादृशं चाभिलापसंसर्गयोग्यम् । इन्द्रियविज्ञानं तु सन्निहि- तमात्रग्राहित्वादर्थसापेक्षम् । अर्थस्य च प्रतिभासनियमहेतुत्वानियतप्रति- भासम् । ततो नाभिलापसंसर्गयोग्यम् । अत एव स्वलक्षणस्यापि वाच्य- वाचकभावमभ्युपगम्यैतदविकल्पकत्यमुच्यते । यद्यपि हि स्वलक्षणमेव वाच्यं वाचकं च भवेत्तथाप्यभिलापसंसृष्टार्थ विज्ञानं सविकल्पकम् । न चेन्द्रियविज्ञानमर्थन नियमितप्रतिभासत्वाद- भिलापसंसर्गयोग्यप्रतिभासं भवतीति निर्विकल्पकम् । श्रोत्रज्ञानं तर्हि शब्दस्खलक्षणग्राहि । शब्दस्वलक्षणं किञ्चिद्वाच्यं किश्चिद्वाचकमित्यभिलाप- संसर्गयोग्यप्रतिभासं स्यात् । तथा च सविकल्पकं स्यात् । नैप दोषः । सत्यपि स्खलक्षणस्य वाच्यवाचकभावे सङ्केतकालदृष्टत्वेन गृह्यमाणं स्वलक्षणं वाच्यं वाचकं च गृहीतं स्यात् । न च सङ्केतकालभाविदर्शनविषयत्वं वस्तुनः सम्प्रत्यस्ति । यथा हि सङ्केतकालभाविदर्शनमद्य निरुद्धं तद्वत्तद्विषयत्वमप्यर्थस्याद्य नास्ति । तत: पूर्वकालदृष्टत्यमपश्यच्छोत्रज्ञानं न वाच्यवाचकभावनाहि । अनेनैव न्यायेन योगिज्ञानमपि सकलशब्दार्थावभासित्वेऽपि सङ्केतकाल- दृष्टत्वाग्रहणानिर्विकल्पकम् । तया कल्पनया कल्पनास्वभावेन रहितं शून्यं सज्ज्ञानं यदभ्रान्तं तत्प्रत्यक्षमिति परेण सम्बन्धः । कल्पनापोढत्वाभ्रान्तत्वे परस्परसापेक्षे प्रत्यक्षलक्षणं न प्रत्येकमिति दर्शयितुं तया रहितं यदभ्रान्तं तत्प्रत्यक्षमिति लक्षणयोः परस्परसापेक्षयोः प्रत्यक्षविषयत्वं दर्शितमिति । १ विकल्पविज्ञानम् । २ स्मरति । ३ समिहितमात्र० ख० संनिहितार्थमात्र। ४ ख० श्रोत्रविज्ञानं। ५ 'शब्द' इति पाठः ख० पुस्तके न विद्यते । ६ शब्दस्वलक्षण, ख०शब्दे स्वलक्षणं च । ७ ज्ञानं, ख० विज्ञानं। ८ ख० पुस्तके 'सूत्रेण (लिखित. पुस्तके मूत्रेण) इत्यधिकः पाठो विद्यते ।

१२ न्यायबिन्दुः तिमिराशुभ्रमणनौयानसंक्षोभाद्यनाहितविभ्रमं ज्ञानं प्रत्यक्षम् । तिमिरमक्ष्णोनिप्लवः । इन्द्रियगतमिदं विभ्रमकारणम् । आशुभ्रम- णमलातादेः । मन्दं हि भ्रम्यमाणेऽलातादौ न चक्रभ्रान्तिरुत्पद्यते । तदर्थमाशुग्रहणेन विशेष्यते भ्रमणम् । एतच्च विषयगतं विभ्रमकोरणम् । नावा गमनं नौयानम् । गच्छन्त्यां नावि स्थितस्य गच्छवृतादिभ्रान्ति- रुत्पद्यत इति यानग्रहणम् । एतच्च बाह्याश्रयस्थितं विभ्रमकारणम् । संक्षोभो वातपित्तश्ले'मणाम् । वातादिपु हि क्षभं गतेषु ज्वलितस्तम्भादि- भ्रान्तिरुत्पद्यते । एतच्चाध्यात्मगतं विभ्रमकारणम् । सर्वै रेव च विभ्रमका- रणैरिन्द्रियविषयबाह्याध्यात्मिकायगतैरिन्द्रियमेव विकर्त्तव्यम् । अविकृत इन्द्रिय इन्द्रियंभ्रान्त्ययोगात् । एने संक्षोभपर्यन्ता आदयो येपां ते तथोक्ताः । आदिग्रहणेन काचकामलादय इन्द्रियस्था गृह्यन्ते । आशुन- यनानयनादयो विषयस्थाः। आगुनयनानयने हि कार्यमाणेऽलातादाव- निवर्णदण्डाभासा भ्रान्तिर्भवति । हस्तियानादयो बाह्याश्रयस्था गाढमर्म- प्रहारादय आध्यात्मिकाश्रयस्था विभ्रमहेतबो गृह्यन्ने। "तैरनाहितो विभ्रमो यस्मिंस्तत्तथाविधं ज्ञानं प्रत्यक्षम् । तदेवं लक्षणमाख्याय यरिन्द्रियमेव द्रष्टु कल्पितं मानसप्रत्यक्षलक्षणे च दोष उद्भावित: स्वसंवेदनं च नाभ्युपगतं योगिज्ञानं च तेषां विप्रति. "पत्तिनिराकरणार्थ प्रकारभेदं प्रत्यक्षस्य दर्शयन्नाह- तच्चतुर्विधम् । इन्द्रियज्ञानम् । इन्द्रियस्य ज्ञानमिन्द्रियज्ञानम् । इन्द्रियाश्रितं यत्तत्प्रत्यक्षम् । - १ नेत्रयोः। २ख० भ्रम । ३ 'हि' इति पदं ख० पुस्तक एवोपलभ्यते। ४ ख. भ्राम्यमाणे। ९क० भ्रम०। ६ ज्वलित०, ख० ज्वलितरूपं । ७ ख० आध्यात्मिक प्रान्तिकारणम् । ८ 'इन्द्रिय' इति पाठः ख० पुस्तके नैवोपलभ्यते । ९ 'हि' इति पदं ख० पुस्तके नैवोपलभ्यते। १० ख० अलाते । १९ख० एतैः। १२ अनाहितः दूरी कृतः। १३ ख० निरासार्थम् ।

प्रथमपरिच्छेदः १३ मानसप्रत्यक्षे पर्यो दोप उद्भावितस्तं निराकत्तु मानसप्रत्यक्ष- लक्षणमाह- स्वविषयानन्तरविषयसहकारिणेन्द्रियज्ञानेन समन- न्तरप्रत्ययेन जनितं तन्मनोविज्ञानम् । स्व आत्मीयो विषय इन्द्रियज्ञानस्य तस्यानन्तरः । न विद्यतेऽन्तर- मस्येत्यनन्तरः । अन्तरं च व्यरधानं विशेषश्वोच्यते । ततश्चान्तरे प्रतिपिद्धे समानजातीयो द्वितीयक्षणाव्युपाडे यक्षण इन्द्रियविज्ञानविषयस्य गृह्यते । तथा च सतीन्द्रियज्ञानविषयक्षणादुत्तरक्षण एकसन्तानान्तर्भूतो गृहीतः । स सहकारी यस्थेन्द्रियविहानरय तत्तथोक्तम् । द्विविधश्च सहकारी । परस्परोपकारी एककार्यकारी च । इह च क्षणिके वस्तुन्यति- शयाधानायोगाडेककार्यकारिलेन सहकारी गृह्यते । विषयविज्ञानाभ्यां हि मनोविज्ञानमेकं क्रियने यतस्तनयोन परस्परसहकारित्वम् । ईदृशेनेन्द्रिय- विज्ञानेनालम्ब प्रययभूतेनापि योगिजानं जन्यते । तन्निरासार्थ सम- नन्तरप्रत्ययग्रहणं कृतम् । समश्वासी ज्ञानत्वेनानन्तर श्वासावव्यवहितत्वेन स चासौ प्रत्ययश्च हेतुत्वात्समनन्तरप्रत्ययस्तेन जनितम् । तदनेनैकसन्तानान्तर्भूतयोरेवेन्द्रियज्ञानमनोज्ञानयोर्जन्यजनकभावे मनोविज्ञानं प्रत्यक्षमित्युक्तं भवति । ततो योगिज्ञानं परसन्तानवर्ति निरस्तम्" । यदा चेन्द्रियज्ञानविषयादन्यो विषयो मनोविज्ञानस्य तदा गृहीतग्रहणादासञ्जि तोऽप्रामाण्यदोपो निरस्तः । यदा चेन्द्रियज्ञानविषयो- पादेयभूतः क्षगो गृहीतस्तदेन्द्रियज्ञानेनागृहीतस्य विषयान्तरस्य ग्रहणा- दन्धबधिराद्यभावदोपप्रसंगो निरस्त: । एतच्च मनोविज्ञानमुपरतव्यापारे चक्षुपि प्रत्यक्षमिप्यते । व्यापारवति तु चक्षुपि यद्रूपज्ञानं तत्सर्वं चक्षु- राश्रितमेव । इतरथा चक्षुराश्रितत्वानुपपत्ति: कायचिदपि विज्ञानस्य । १ ख मानसे च प्रत्यक्षे । २ अन्यवादिभिः । ३ प्रकटीकृतः । ४ ख. विज्ञानस्य । ५ 'अनन्तरः' इति पदं ख० पुस्तक एवोपलभ्यते । ६ विषयविज्ञानाभ्यां हि मनोविज्ञानं, ख० विषयविज्ञानाभ्यां मनोविज्ञानाभ्यां मनोविज्ञानम् । ७ तदनयोन परस्परसहका. रिवं, ख० तदनयोः परस्परस्य सहकारित्वम् । ८ 'कृतम्' इति पदं ख० पुस्तके नैवोपलभ्यते । ९ इदं पदं ख० पुस्तके न विद्यते । १० 'इति' इति पदं ख० पुस्तके न विद्यते। ११ अपाकृतं खण्डितमित्यभिप्रायः। १२ प्राप्तः। १३ ख० ज्ञानस्य ।

न्यायविन्दुः एतच्च सिद्धान्तप्रसिद्धं मानसं प्रत्यक्षम् । न त्वस्य प्रसाधकमस्ति प्रमाणम् । एवं जातीयकं तद्यदि स्यान्न कश्चिद्दोष: स्यादिति वक्तुं लक्षण- माख्यातमस्येति । स्वसंवेदनमाख्यातुमाह- सर्वचित्तचैत्तीनामात्मसंवेदनम् । चित्तमर्थमात्रग्राहि । चैत्ता विशेषावस्थाग्राहिणः सुखादयः । सर्वे च ते चित्तचैत्ताश्च सर्वचित्तचैत्ताः । सुखादय एव स्फुटानुभवत्वात्स्वसंवि- दिताः । नान्या चित्तावस्थेत्येतदाशङ्कानिवृत्त्यर्थं सर्वग्रहणं कृतम् । नास्ति सा काचिञ्चित्तावस्था यस्यामात्मन: संवेदनं न प्रत्यक्षं स्यात् । येन हि रूपेणात्मा वेद्यते तद्रूपमात्मसंवेदनं प्रत्यक्षम् । इह च रूपादौ वस्तुनि दृश्यमानेऽन्तर: सुखाद्याकारस्तुल्यकालं संवेद्यते । न च गृह्यमाणाकारो नीलादिः सातादिरूपो वेद्यते इति वक्तुं शक्यम् । यतो नीलादिः सात- रूपेणानुभूयत इति न निश्चीयते । यदि हि सातादिरूपोऽयं नीलादिरनु- भूयत इति निश्चीयेत स्यात्तदो तस्य सातादिरूपत्वम् । यस्मिन्रूपे प्रत्य- क्षात्य साक्षात्कारित्वव्यापारो विकल्पेनानुगम्यते तत्प्रत्यक्षम् । न च नीलस्य सातरूपत्वमनुगम्यते । तस्मादसातान्नीलाद्यर्थादन्यदेव सातमनु- भूयते नीलानुभवकाले । तच्च ज्ञानमेव । ततोऽस्ति ज्ञानानुभवः । तच्च ज्ञानरूपं वेदनमात्मनः साक्षात्कारि निर्विकल्पकमभ्रान्तं च तस्मात्प्रत्यक्षम् । योगिप्रत्यक्षं व्याख्यातुमाह- भृतार्थभावनाप्रकर्षपर्यन्तजं योगिज्ञानं चेति । भूत: सद्भूतोऽर्थः । प्रमाणेन दृष्टश्च सद्भूतः । यथा चत्वार्या- १ बाह्याझुस्तित्ववादिनां सौत्रान्तिकानां मते वस्तु द्विविधम् । न्तरञ्च । बाझं पुनर्द्विविधम् । भूतं भौतिकश्च । आन्तरमपि हिविधम् । चितं चैत । चैत्तिकमपि कथ्यते । भूतं पृथिन्यादयश्चत्वारः परमाणवः । भौतिकं रूपा- प्यारादयश्च । चित्तं विज्ञानम् । चैत्तिक रूपविज्ञानवेदनासंज्ञासंस्कारसंज्ञकाः पत्र स्कन्धाः। विज्ञानं पुनहि विधम् । आलयविज्ञानमहमित्याकारकम् । प्रवृत्तिविज्ञान मिन्द्रियादिजन्य रूपादिविषयम् । २ वक्तुं शक्यं, ख० शक्यं वक्तुं । ३ सातरूपेण, सातानुरूपेण। ४ सातादिरूपः, ख० सतरूपः। ५ 'तदा' इति पदं ख० पुस्तक एवोपकमाते। ६ तच्च ज्ञानरूपं वेदनं, स्व० तत्वज्ञानस्वरूपवेदनम् । - बाममा. .

। प्रथमपरिच्छेदः १५ यसत्यानि | भूतार्थस्य भावना पुन: पुनश्चेतसि विनिवेशनम् । भावनाया: प्रकर्षो भाव्यमानार्थाभासस्य ज्ञानस्य स्फुटाभत्यारम्भः । प्रकर्षरय पर्यन्तो यदा स्फुटाभत्वमीषदसम्पूर्णं भवति । यावद्धि (फुटाभत्वमपरिपूर्ण तावत्त- स्य प्रकर्षगतिः । सम्पूर्णं तु यदा तदा नास्ति प्रकर्षगतिः । ततः सम्पूर्णा- वस्थाया: प्राक्तन्यवस्था स्फुटाभत्वप्रकर्षपर्यन्त उच्यते । तस्मात्पर्यन्ताद्यज्ज्ञातं भाव्यमानस्य संनिहितस्येव स्फुटतराकारग्राहि ज्ञानं योगिनः प्रत्यक्षम् । सदिह स्फुटाभत्वारम्भावस्था भावनाप्रकर्षः । अभ्रकव्यवहितमिव यदा भाव्यमानं वस्तु पश्यति सा प्रकर्षपर्यन्तावस्था । करतलामलकवद्भाव्यमा- नस्यार्थस्य यदर्शनं तद्योगिनः प्रत्यक्षम् । तद्धि स्फुटाभम् । स्फुटाभवादेव च निर्विकल्पकम् । विकल्पविज्ञानं हि संकेतकालदष्टत्वेन वस्तु गृह्णच्छन्द- संसर्गयोग्यं गृह्णीयात् । संकेतकालदृष्टत्वं च संकेतकालोत्पन्नज्ञानविषय- त्वम् । यथा च पूर्वोत्पन्नं विनष्टं ज्ञानं सम्प्रत्यसत् । तद्वत्पूर्वविनष्टज्ञान- विषयत्वमपि सम्प्रति नास्ति वस्तुनः। तदसद्रूपं वस्तुनो गृलदसंनिहि- तार्थग्रीहित्वादरफुटाभम् । अस्फुटाभत्वादेव च सविकल्पकम् । ततः स्फुटाभत्वानिर्विकल्पकम् । प्रमाणशुद्धार्थवाहित्वाच्च संवादकम् । अतः प्रत्यक्षम् । इतरप्रत्यक्षवत् । योगः समाधिः। स यत्यास्ति स योगी। तस्य ज्ञानं प्रत्यक्षम् । इति शब्दः परिसमाप्तथर्थः । इयदेव प्रत्यक्षमिति । तदेवं प्रत्यक्षस्य कल्पनापोढत्वाभ्रान्तत्वयुक्तस्य प्रकारभेदं प्रतिपाध विषयविप्रतिपत्तिं निराकर्तुमाह- तस्य विषयः स्वलक्षणम् । तस्य चतुर्विधप्रत्यक्षस्य विषयो बोद्धव्यः । स्वलक्षणम् । स्वमसाधारणं लक्षणं तत्त्वं स्वलक्षणम् । वस्तुनो ह्यसाधारणं च तत्त्वमस्ति सामान्यं च । १ चत्वार्यसत्यानि दुःखसमुदयनिरोधमार्गसंज्ञकानि । २ विनिवेशनं स्थापनम् । ३ 'भावनायाः' इत्यस्य स्थाने ख. पुस्तकस्य 'भावनयो' इति पाठोऽशुद्धः प्रतीयते । ४ आमासस्य, ख० अवभासस्य । ५गतिः, ख० गमनम् । ५गतिः, ख० गमनम् । ६ यस्मिन् काले संकेत उत्पद्यते तस्मिन्नेव काले तस्य ज्ञानविषयवं संकेतकालोस्पसज्ञानविषयत्वम् । अर्थः इति पाठः ख० पुस्तके न विद्यते । ८ एव च' इति पाठः ख० पुस्तक एवोपल. पत। परिसमाप्त्यर्थः, ख० परिसमाप्तिवचनम् । १० चतुर्विध०, ख. चतुर्विधस्य ।

१६ न्यायविन्दुः यदसाधारणं तत्प्रत्यक्षमाद्यम् । द्विविधो हि प्रमागस्य विषयो ग्राह्यश्च यदा- कारमुत्पद्यते । प्रापणीयश्च यमध्येवरयति । अन्यो हि ग्राह्योऽन्यश्चाध्यव- सेयः । प्रत्यक्षस्य हि क्षण एको ग्राह्यः । अध्यॆवसेयस्तु प्रत्यक्षबलोत्प- न्नेन निश्चयेन संतान एव । संतान एव च प्रत्यक्षरय प्रापणीयः । क्षणस्य प्रापयितुमशक्यत्वात् । तथानुमानमपि स्वप्रतिभासेऽर्थेऽनाध्यवसायेन प्रवृत्तेरनर्थवाहि । स पुनरारोपितोऽर्थी गृह्यमाणः स्वलक्षणत्वेनावसीयते यतस्ततः स्वलक्षणमध्य सितं प्रवृत्तिविपयोऽनुमानस्य । अनर्थस्तु ग्राह्यः । तदत्र प्रमाणस्य ग्राह्यं विएयं दर्शयता प्रत्यक्षस्य स्वलक्षणं विषय उक्तः । कः पुनरसौ विपयो ज्ञानस्य यः स्खलक्षणं प्रतिपत्तव्य इत्याह-- यस्यार्थस्य संनिधानासंनिधानाभ्यां ज्ञान- प्रतिभासभेदस्तत्स्वलक्षणम् । अर्थशब्दो विषयपर्यायः । यस्य ज्ञानविपयस्य । सन्निधानं निकट- देशावस्थानम् । असन्निधानं दूरदेशावस्थानम् । तस्मात्सन्निधानाद- सन्निधानाच्च ज्ञानप्रतिभासस्य ग्राह्याकारस्य भेद: स्फुटत्वास्फुटत्वाभ्याम् । यो हि ज्ञानस्य विषयः सन्निहित: "सरफुटमाभासं ज्ञानस्य करोति । अस- निहितस्तु योग्यदेशावस्थित एवारफुटं करोति तत्वलक्षणम् । सर्वाण्येव हि वस्तूनि दूराद'फुटानि दृश्यन्ते । समीपे स्फुटानि । तान्येव स्वल- क्षणानि । १ प्रमाणस्य विषयः, ख० विषयः प्रमाणस्य । २ अध्यवस्थति ज्ञास्यतीत्यर्थः । ३ बौद्धनये विज्ञानमर्थजनितमा झारमर्थस्य ग्राहकम् । तदुत्पत्तिमन्तरेण विषयं प्रति नियमायोगात् । घटज्ञानं घटादेवोस्पद्यत इत्यर्थः । जनितत्वं विज्ञानस्य प्रमाणस्य वा। प्रमाणस्य प्रायो विषय एव तस्यार्थाकारत्वम् । तस्य प्रापणीयो विषय एव तस्यार्थ. प्राहकत्वम्। ४ अध्यवसेयोऽर्थः । ५ बौद्धमते यत्सत्तत्सर्व क्षणिकम् । यदेकस्मिन् क्षणे विद्यते तद्वितीये क्षणे विनश्यते। जीवस्य विषयेऽपि त इस्थमेव प्राहुः । एकस्मिन् प्राणिन्येकस्मिन्क्षणे यो जीवो विद्यते स क्षणान्तरमेव विनश्यते। द्वितीयक्षणे तस्य सन्तानमात्रमवशिष्यते । आदानप्रदानादीनां स्टतिरूपव्यवहारस्तु संस्काराजायते। ६न कोऽपि प्रत्यक्षेण क्षणं प्रापयितुं शक्यः । तस्यात्यन्तसूचमत्वात् । अत एवाविद्या. प्रत्ययेन पूर्ववदिवावभासयन्सन्तान एव प्रत्यक्षस्य प्रापणीयः । ७ अनर्थाध्यवसायेन, ख. अर्थाध्यवसायेन। ८ ज्ञातव्यः। ९ज्ञानस्य, ख० ज्ञान०। १० सन् , ख० स ।

प्रथमपरिच्छेदः - कस्मात्पुन: प्रत्यक्षविपय एत्र स्वलक्षणम् । तथा हि विकल्पविषयोपि वहिश्श्यात्मक एवावसीयत इत्याह- तदेव परमार्थसत् । परमार्थोऽकृत्रिममनारोपितं रूपम् । तेनास्तीति परमार्थसत् । य एवार्थः सन्निधानासन्निधानाभ्यां स्फुटमाफुटं च प्रतिभासं करोति परमा- र्थसन्स एव । स एवं च प्रत्यक्षविपयो यतस्तस्मात्तदेव स्वलक्षणम् । कामात्पुनस्तदेव परमार्थसदित्याह- अर्थकियासामर्थ्यलक्षात्वा द्वस्तुनः । अर्थ्यत इत्यर्थः । हेय उपादेयश्च । हेयो हि हातुमिष्यत उपादेय- श्वोपादातुम् । अर्थस्य प्रयोजनस्य क्रिया निपत्तिस्तस्यां सामर्थ्य शक्तिस्त- देव लक्षणं रूपं यस्य वस्तुनस्तदर्थ क्रिया सामर्थ्यलक्ष गम् । तस्य भावः । तरमाद्वस्तु शब्दः परमार्थसत्पर्यायः । तदयमर्थो यस्मादर्थक्रियासमर्थ परमार्थसदुच्यते सन्निधानासन्निधानाभ्यां च ज्ञानप्रतिभासरय भेदको- थोऽर्थक्रियासमर्थः । तस्मात्स एव परमार्थसत् । तत एव हि प्रत्यक्ष- विषयादर्थक्रिया प्राप्यते । न विक पविषयात् । अत एव यद्यपि विकल्प- विषयो दृश्य इवायसीयते तथापि न दृश्य एव । ततोऽर्थक्रियाभावात् । दृश्याञ्च भावात् । अतस्तदेव स्वलक्षणं न विकल्पविषयम् । अन्यत्सामान्यलक्षणम् । एतस्मात्स्वलक्षणाद्यदन्यत्स्वलक्षणं यो न भवति ज्ञान विषयस्तत्सामा- न्यलक्षगन् । विकल्पविज्ञानेनारसीयमानो ह्यर्थः सन्निधानासन्निधानाभ्यां ज्ञानप्रतिभासं न भिनत्ति । तथा ह्यारोप्यमागो वह्निरारोपादरित । आरोपाश्चदूरस्थो निकटस्थश्च । तस्य समारोपितस्य सन्निवानादसन्नि. धानाच ज्ञानप्रतिभासस्य न भेदः स्फुरत्वेनारफुरत्वेन वा । ततः स्पलक्ष- णादन्य उच्यते । सामान्येन लक्षणं सामान्यलक्षणम् । साधारणं रूप- १ निश्चीयते । २'एव' इति पदं ख० पुस्तक एवोपलभ्यते। । यदेवार्थक्रिया- कारी तदेव परमार्थसत् । नित्यं नार्थक्रियाकारी तस तत्परमार्थसत् । लक्षणम् , ख० तस्मात्सामान्यलक्षणम् । नीश्चीयमानः । ३ न्या० तरसामान्य - - न्यायविन्दुः मित्वः । समारोष्यमाणं हि रूपं सकलवहिसाधारणम् । ततस्तत्सामान्य- लक्षणम् । तश्चानुमानस्य ग्राह्य दर्शयितुमाह- सोऽनुमानस्य विषयः। सोऽनुमानस्य विषयो ग्राह्यरूपः । सर्वनानोऽभिधेयवल्लिङ्गपरिग्रहः । सामान्यलक्षणम् । अनुमानरय विषयं व्याख्यातुकामेनायं स्वलक्षणस्वरूपा- ख्यानप्रन्थ आवर्तनीय: स्यात् । ततो लाघवार्थ प्रत्यक्षपरिच्छेद एवानु. मानविषय उक्तः । विषयविप्रतिपत्तिं निराकृत्य फलविप्रतिपत्तिं निराकर्तुमाह- तदेव च प्रत्यक्षं ज्ञानं प्रमाणफलमर्थप्रतीतिरूपत्वात् । यदेवानन्तरमुक्तं प्रत्यक्षं तदेव प्रमाणस्य फलम् । कथं प्रमाणफल- मित्याह । अर्थस्य प्रतीतिरवर्गमः । सैव रूपं यस्य प्रत्यक्षज्ञानस्य तदर्थ- प्रतीतिरूपम् । तस्य भावः । तस्मादेतदुक्तं भवति । प्रापकं ज्ञानं प्रमाणं । प्रापणशक्तिश्च न केवलादर्थाविनाभावित्वाद्भवति । बीजाद्यविनाभाविनो- प्यारादेरप्रापकत्वात् । तस्मादादुत्पत्तावप्यस्य ज्ञानस्यास्ति कश्चिदवश्य- कर्तव्यः प्रापकव्यापारः । येन कृतेनार्थः प्रापितो भवति । प्रमाणफलम् । यदनुष्ठानात्प्रापकं भवति ज्ञानम् । उक्तं च पुरस्तात्प्रवृत्ति- विषयप्रदर्शनमेव प्रापकस्य प्रापकव्यापारो नाम । तदेव च प्रत्यक्षमर्थ. प्रतीतिरूपमर्थदर्शनरूपम् । अतस्तदेव प्रमाणफलम् । यदि तर्हि ज्ञानं प्रमितिरूपत्वात्प्रमाणफलं किं तर्हि प्रमाणमित्याह- अर्थसारूप्यमस्य प्रमाणं । अर्थेन सह यत्सारूप्यं सादृश्यमस्य ज्ञानस्य तत्प्रमाणमिह । यस्मा. द्विषयाज्ज्ञानमुदेति तद्विषयसदृशं तद्भवति । यथा नीलादुत्पद्यमानं नील- सदृशम् । तञ्च सारूप्यं सादृश्यमाकार इत्याभास इत्यपि व्यपदिश्यते । ततस्तसामान्यलक्षणम् , ख० ततस्तस्मात्सामान्यलक्षणम् । २ पुनः कथनीय स्यात् । ३ अवगमो ज्ञानम् । ४ अर्थात्, ख० प्राथादर्थात् । ५ अर्थदर्शन०, ख अत्रदर्शन ६ साश्यम् , ख० यत्साहश्यम् । ७ ज्ञानं, ख. विज्ञानम् ८ विशनमजनितम कारमर्यस्य च ग्राहकमिति पदुक्तं पुरस्तादस्माभिः ९'सारूप्यम्' इति पदं ख. पुस्तक एकोपलभ्यते। १.कथ्यते । स एव च - "M प्रथमपरिच्छेदः १४ ननु च ज्ञानादव्यतिरिक्तं सादृश्यम् । तथा च सति तदेव शानं प्रमाणम् । तदेव प्रमाणफलम् । न चैकं वस्तु साध्यं साधनं चोपपद्यते । तत्कथं सारूप्यप्रमाणमित्याह- तद्वशादर्थप्रतीतिसिद्धेरिति । तदिति सारूप्यं तस्य वशात्सारूप्यसामर्थ्यात् । अर्थस्य प्रतीतिरव- बोधस्तस्या: सिद्धिः । तत्सिद्धेः कारणात् । अर्थस्य प्रतीतिरूपं प्रत्यक्षं विज्ञानं सारूप्यवशासिध्यति प्रतीतं भवतीत्यर्थः । नीलनिर्भासं हि विज्ञानं यतस्तस्मान्नीलस्य प्रतीतिरवसीयते । येभ्यो हि चक्षुरादिभ्यो विज्ञान- मुत्पद्यते न तद्वशात्तज्ज्ञानं नीलस्य संवेदनं शक्यतेऽवस्थापयितुम् । नील- सदृशं त्वनुभूयमानं नीलस्य संवेदनमवस्थाप्यते । न चात्र जन्यजनक- भावनिबन्धन: साध्यसाधनभावः येनैकस्मिन्यस्तुनि विरोध: स्यात् । अपि तु व्यवस्थाप्यव्यवस्थापकभावेन । तत एकस्य वस्तुन: किंचिद्रूपं प्रमाणं किंचित्प्रमाणफलं न विरुध्यते । व्यवस्थापनहेतुर्हि सारूप्यम् । तस्य ज्ञानस्य व्यवस्थाप्यं च नीलसंवेदनरूपम् । व्यवस्थाप्यव्यवस्थापकभावोऽपि कथमेकस्य ज्ञानस्येति चेदुच्यते । सदृशमनुभूयमानं तद्विज्ञानम् । यतो नीलस्य ग्राहकमवस्थाप्यते निश्चयप्रत्ययेन । तस्मात्सारूप्यमनुभूतं व्यव- स्थापनहेतुः । निश्चयप्रत्ययेन च तज्ज्ञानं नीलसंवेदनमवस्थाप्यमानं व्यवस्थाप्यम् । तस्मादसारूप्यव्यावृत्त्या सारूप्यं ज्ञानस्य व्यवस्थापनहेतुः । अनीलबोधव्यावृत्त्या च नीलबोधरूपत्वं व्यवस्थाप्यम् । व्यवस्थापकश्च विकल्पप्रत्ययः प्रत्यक्षबलोत्पन्नो द्रष्टव्यः । ननु निर्विकल्पकत्वात्प्रत्यक्षमेव नीलबोधरूपत्वेनात्मानमवस्थापयितुं शक्नोति । निश्चयप्रत्ययेनाव्यवस्थापितं सदपि नीलबोधरूपं विज्ञानम- सत्कल्पमेव । तस्मान्निश्चयेन नीलबोधरूपं व्यवस्थापितं विज्ञानं नीलबो- धात्मना सद्भवति । तस्मादध्यवसायं कुर्डदेव प्रत्यक्ष प्रमाणं भवति । तसिझे, ख० ततः सिद्धेः। २ विज्ञानम्, ख. ज्ञानम् । ३ यत्र खेकस्मिव वस्तुनि जन्यजनकभावनिबन्धनः साध्यसाधनभावो भवति तत्र विरोध प्रापद्यते । अत्र तु व्यवस्थाप्यव्यवस्थापकभावोऽस्ति । अत एवात्र न कविशिरोधः । इति पई ख. पुस्तक एकोपलभ्यते । । .

२० न्यायविन्दुः अकृते त्वध्यवसाये नीलबोधरूपत्वेनाव्यवस्थापितं भवति विज्ञानम् । तथा च प्रमाणफलमधिगमरूपत्वमनि पन्नम् । अत: साधकतमत्वाभा- वात्प्रमाणमेव न स्याज्ज्ञानम् । जनितेन त्वध्यवसायेन सारूप्यवशान्नील- बोधरूपे ज्ञानेऽवस्थाप्यमाने सारूप्यं व्यवस्थापनहेतुत्वात्प्रमाणं सिद्धं भवति । यद्येवमध्यवसायसहितमेव प्रत्याप्रमाणं स्यान्न केवलमिति चेत् । नैतदेवम् । यस्मा प्रायबलोत्पन्नाध्यवसायेन दृष्टत्वेनाऽर्थोऽवसीय नोत्प्रेक्षितत्वेन । दर्शनं चार्थसाक्षात्करणाख्यं प्रत्यक्षव्यापारः । उत्प्रेक्षणं विकल्पव्यापारः । तथा हि परोक्षमर्थ विकापयन्त उत्प्रेक्षागहे न तु पश्याम इत्युत्प्रेक्षात्मकं विकल्पव्यापारमनुभवादयस्यन्ति । तस्मात्स्वव्यापारं तिरस्कृत्य प्र यक्षव्यापारमादर्शयति । यत्रार्थे प्रत्यक्षपूर्वकोऽध्यवसायस्तत्र प्रत्यक्ष केवलमेव प्रमाणन् । इति न्यायबिन्दुटीकायां प्रथमः परिच्छेदः समाप्तः ॥ ५अवस्य. १रूपत्वं, ख० रूपम्। २ अवस्थाप्यमाने, ख० व्यवस्थाप्यमाने । ३ दर्शनं, ख. अदर्शन ( • वेनादर्शनं)। ४ 'तु' इति पाठो ख० पुस्तके नवोपलभ्यते । स्ति, ख० अध्यवस्यन्ति । ३ 'मङ्गलमस्तु' इत्यधिको पाठो विद्यते ३० पुस्तके । स्व. 'इति आचार्यधर्मोचरविरचितायां न्यायविन्दुटीकायां प्रथमः प्रत्यसपरिच्छेदः ।।

- अथ द्वितीयपरिच्छेदः । एवं प्रत्यक्षव्याख्यायानुमानं व्याख्य तुमाह अनुमानं द्विधा । द्विप्रकारकम् । अथानुमानलक्षणे वक्तव्ये किमस्मात्प्रकारभेदः कथ्यते । उच्यते । परार्थानुमानं शब्दात्मकं स्मार्थानुमानं तु ज्ञानात्मकम् । तयोरत्यन्तभेदान्नैक लक्षणमस्ति । ततस्तयोः प्रतिनियतं लक्षगमाख्यातुं प्रकारभेदः कथ्यते । प्रकारभेदो हि व्यक्तिभेदः । व्यक्तिभेदे च कथिते प्रतिव्यक्तिनियां लक्षणं शक्यो दक्तुम् । नान्यथा । ततो लक्षगनिर्देशा- ङ्गमेव प्रकारभेदकथनम् । अशक्यतां च प्रकारभेदकथनमन्तरेग लक्षग. निर्देशस्य ज्ञात्वा प्राक्प्रकारभेदः कथ्यत इति । कि पुनस्तद्वैविध्यमित्याह. स्वार्थ परार्थ च । स्वस्मादिदं स्वार्थम् । येन स्वयं प्रतिपद्यते तत्स्वार्थम् । परस्मादिदं परार्थम् । येन परं प्रतिपादयति तत्परार्थम् । तत्र स्वार्थ त्रिरूपाल्लिङ्गाद्यदनुमेये ज्ञानं तदनुमानम् । तत्र तयोः स्वार्थपरार्थानुमानयोर्मध्ये स्वार्थ ज्ञानं किंविशष्टमित्याह- त्रिरूपादिति । त्रीगि रूपागि यस्य वक्ष्यमा गलक्षणानि तत्रिरूपम् । लिङ्गयते गम्यतेऽनेनार्थ इति लिङ्गम् । तस्मात्त्रिरूपाल्लिङ्गाद्यजातं ज्ञान- मिति । एतद्धेतुद्वारेण विशेषणम् । तत्रिरूपाञ्च लिङ्गात्रिरूपालिङ्गालम्ब- नमप्युत्पद्यत इति विशिनष्टि । अनुमेय इति । एतच्च विपयद्वारेण विशे- पणन् । त्रिरूपाल्लिङ्गायदुत्पन्नमनु नेयालम्बनं ज्ञानं तत्स्वार्थमनुमानमिति । लक्षगविप्रतिपत्तिं निराकृत्य फलविप्रतिपत्तिं निराकर्तुमाह- प्रमाणफलम्यवस्थात्रापि प्रत्यक्षवत् । प्रमाणस्य यत्फलं तस्य या व्यस्थात्रानुमानेऽपि प्रत्यक्षवत्प्रत्यक्ष इव १ व्याख्यातुकामः। २ विभिनत्वात् । ३ निश्चितम् । ४ कथयितुम् । ५ निर्दे शार्थमेव । ६ प्रत्यक्षवत्प्रत्यक्ष इव । लिखितपुस्तकयोः प्रत्यक्ष इव प्रत्यक्षवत् । सम्म वतोऽनावश्यकतयायं पाठः न संस्कृतः।

२२ न्यायविन्दुः वेदितव्या । यथा हि नीलसरूपं प्रत्यक्षमनुभूयमनं नीलबोधरूपमवस्था- प्यते । तेन नीलसारूप्यं व्यवस्थापनहेतुः प्रमाणम् । नीलबोधरूपं तु व्यवस्थाप्यमानं प्रमाणफलम् । तद्वदनुमानं नीलाकारमुत्पद्यमानं नील- बोधरूपमवस्थाप्यते । तेन नीलसारूप्यमस्य प्रमाणम् । नीलविकल्पनरूपं त्वस्य प्रमाणफलम् । सारूप्यवशाद्धि तन्नीलप्रतीतिरूपं सिध्यति । नान्यथेति । एवमिह संख्यालक्षणफलविप्रतिपत्तयः । प्रत्यक्षपरिच्छेदे तु गोचरवि. प्रतिपत्तिनिराकृता । लक्षणनिर्देशप्रसङ्गेन तु त्रिरूपं लिङ्गं प्रस्तुतम् । तदेव व्याख्यातुमाह- त्रैरूप्यम् पुनः लिङ्गस्य यन्त्रैरूप्यं यानि त्रीणि रूपाणि तदिदमुच्यत इति शेषः । किं पुनस्तत्त्रैरूप्यमित्याह- लिङ्गस्यानुमेये सत्त्वमेव । अनुमेयं वक्ष्यमाणलक्षणम् । तस्मिंल्लिङ्गस्य सत्त्वमेव निश्चितमेकं - - त्तम् । यथा बीजमकुरस्य । अदृष्टाद्भूमादमेरप्रतिपत्तेः । नापि स्वविषय- ज्ञानापेक्षं परोक्षार्थप्रकाशनम् । यथा प्रदीपो घटादेः । दृष्टादप्यनिश्चित- सम्बन्धादप्रतिपत्तेः । तस्मात्परोक्षार्थनान्तरीयकतया निश्चयनमेव लिङ्गस्य परोक्षार्थप्रतिपादनव्यापारः । नापरः कश्चित् । अतोऽन्वयव्यतिरेकपक्षधर्म- त्वनिश्चयो लिङ्गव्यापारात्मकत्वावश्यकर्त्तव्य इति सर्वेषु रूपेषु निश्चित- ग्रहणमपेक्षणीयम् । तत्र सत्त्ववचनेनासिद्धं चाक्षुषत्वादि निरस्तम् । एव- कारेण पक्षकदेशासिद्धः निरस्तो हेतुः । यथा चेतनास्तरवः स्वापादिति । पक्षीकृतेषु तरुषु पत्रसंकोचलक्षण: स्वाप एकदेशेन सिद्धः । न हि सर्वे वृक्षा रात्रौ पत्रसंकोचभाज: । किं तु केचिदेव । सत्ववचनस्य पश्चात्कृते. १ पदमिदं ख. पुस्तके न विद्यते। २ यद्यपि सूत्रमिदमपरिपूर्णमिवावलोक्यते, तथापि नात्र द्वितीयं सूत्रं स्थापयितुं शक्नुमस्तावन्मात्रस्यैव त्रैरूप्यस्वाभावात् । ३ 'तत्' इति पदं क. पुस्तके नैवोपलभ्यते । ४ निरस्तम, स्व. निविदम् । ५'निरस्तो हेतुः' इति पाठः ख. पुस्तक एवं वियते ।।

द्वितीयपरिच्छेदः २३ - नैवकारेणासाधारणो धर्मो निरस्तः । यदि ह्यनुमेय एव सत्त्वमिति कुर्या- छछावणत्वमेव हेतुः स्यात् । निश्चितग्रहणेन संदिग्धासिद्धः सर्वो निरस्तः । सपक्ष एव सत्त्वम् । सपक्षो वक्ष्यमाणलक्षणः । तस्मिन्नेव सत्त्वं निश्चितं द्वितीयं रूपम् । इहापि सत्त्वग्रहणेन विरुद्धो निरस्तः । हि नास्ति सपक्षे । एवकारेण साधारणानैकान्तिकः । अनित्यः शब्दः प्रमेयत्वात् । स हि न सपक्ष एव वर्तते किं तूभूयत्रापि । सत्त्वग्रहणात्पूर्वावधारणवचनेन सपक्षापि- सत्ताकस्यापि प्रयत्नानन्तरीयकस्य हेतुत्त्वं कथितम् । पश्चादवधारणे त्वयंमर्थः स्यात् । सपक्षे सत्त्वमेव यस्य स हेतुरिति प्रयत्नानन्तरीयकत्वं न हेतु: स्यात् । निश्चितवचनेन संदिग्धान्बयोऽनैकान्तिको निरस्तः । यथा सर्वज्ञः कश्चिद्वक्तृत्वात् । वक्तृत्वं हि सपक्षे सर्वज्ञे संदिग्धम् । असपक्षे चासत्त्वमेव निश्चितम् । असपक्षो वक्ष्यमाणलक्षण: । तस्मिन्नसत्वमेव निश्चितं तृतीयं रूपम् । तत्रासत्त्वग्रहणेन विरुद्धस्य निरास: । विरुद्धो हि विपक्षेऽस्ति । एवकारेण साधारणस्य विपक्षकदेशवृत्तेनिरासः । नित्य : शब्दः कृतकत्वात् खवत्" । प्रयत्नानन्तरीयकत्वे साध्ये घनित्यत्वं विपक्षकदेशे विद्युदादावस्त्याकाशादौ नास्ति । ततो नियमेनास्य निरासः । "असत्त्ववचनात्पूर्वस्मिन्नवधारणेऽ- यमर्थ: स्यात् । विपक्ष एव यो नास्ति स हेतुः । तथा च प्रयत्नानन्तरी- यकत्वं सपक्षेऽपि सर्वत्र नास्ति । ततो न हेतु: स्यात् । तत: पूर्व न कृतम् । निश्चितग्रहणेन संदिग्वविपक्षव्यावृत्तिकोऽनैकान्तिको निरस्तः । । - - १ कुर्यात्, ख० ब्रूयात् । २ विरुद्धः । ३ वाक्यमिदं ख० पुस्तक एवोप लभ्यते। ४ साचारणानकान्तिकः । ५ पक्षे सपक्षे च । ६ क. पुस्तके 'सपक्षव्यापिसत्ताकस्य' इत्यस्य स्थाने 'सपक्षऽव्यापिसत्ताकस्य' इति पाठो विद्यते । यच्च मुद्रितपुस्तकस्य सम्पादकस्य सम्मती 'सपक्ष' इत्यस्य 'सपक्षा' इति संस्कृतरूपोऽस्ति । अस्माकं सम्मती तु ' इति चिह्नोऽसावधानतयैव केनविलेखकेन प्रयुक्तः। ७ तु. क. हि । ८ निखि तवचनेन, क. मिनायवचनेन । ९ ययप्यमरकोशे 'सर्वज्ञस्सुगतो बुद्धो' इत्येवमादि. लिखितमस्ति, तथापि प्रत्यक्षानुमानप्रमाणवादिनस्ते चौडाः न कश्चित्सर्वज्ञमामनन्ति । १. वाक्यमिदं ख. पुस्तक एवोपलभ्यते। ११ आकाशवत् । १२ असववचनात, ख. असत्वशम्दात् । १३ इदं पदं स० पुस्तकेमेवोपलभ्यते।

न्यायविन्दुः ननु च सपक्ष एव सत्त्वमित्युक्ते रिपक्षेऽसत्त्वमेदेति गम्यत एव । तत्किमर्थं पुनरुभयोरुादानं कृतम् । तदुच्यो । अन्त्रयो व्यतिरेको वा नियमवानेव प्रयोक्तव्यो नान्यथेति दर्शयितुं द्वयोरप्युपादानं कृतम् । अनियमे हि द्वयोरपि प्रयोगेऽयमर्थः स्यात् । सपक्षे योऽस्ति विपक्षे च नास्ति स हेतुरिति । तथा च सति स श्यामात पुत्रत्वादृश्यमानपुत्रवदिति तत्पुत्रत्वं हेतुः स्यात् । तम्मानियम तारेवायव्यतिरेकयोः प्रयोगः कर्तव्यः । येन प्रतिवन्धो गम्येत साधनस्य साध्येन । नियमवतोश्च प्रयोगेऽवश्यकर्त्तव्ये द्वयोरेक एवं प्रयोक्तव्यो न द्वाविति नियमानेबान्वयो व्यतिरेको वा प्रयोक्तव्य इति शिनगार्थ द्वयोरुपादानमिति । त्रैरूप्यकथनप्रसङ्गेनानुमेयः सपतो विपक्षश्च क्तः । तेषां लक्षणं तत्र कोऽनुमेय इत्याह- अनुमेयोऽत्रं जिज्ञासितविशेषो धर्मी । अत्र हेतुलक्षणे निश्चेतव्ये धर्म्यनु ने यः । अन्यत्र तु साध्यप्रतिपत्ति- काले समुदायोऽनु मेय: । व्यातिनिश्चयकाले तु धर्मोऽनुमेय इति दर्शयितु- मत्रग्रहणम् । जिज्ञासितो ज्ञातुमिष्टो विशेपो धर्मो यस्य धर्मिग: स तथोक्तः । कः सपक्षः- साध्यधर्मसामान्येन समानोऽर्थः सपक्षः । समानोऽर्थः सपक्षः । समानः सदृशो येोऽर्थः पक्षेग से सपन उक्त उपचारात् । समानशब्देन विशेष्यो। समानः पक्षः सपक्षः । समानस्य च सशब्दादेश: । स्यादेतत् । किं तत्पक्षसपक्षयोः सामान्य येन समानः सपक्षः पक्षणेत्याह। साध्यधर्मसामान्येनेति । साध्यश्चा- वक्तव्यम् , - १ तदुच्यते, ख० उच्यते । २ 'अपि' इति पदं ख० पुस्तके नैवोपलभ्यते । ३ अनियमे, ख० अनियते । ४ प्रयोक्तव्यः, क० कर्तव्यः। ५ स्वार्थानुमानलक्षणे। ६ 'पर्वतोऽयमग्निमान्धूमवरवा' इत्यस्मिन्ननु माने धूपटन गोधर्मी वह्निरनुमेयः साध्य स्वात् । ७ 'शब्दो नित्यः कृत करवा' इपस्मिन्ननुमाने शब्द नित्यावं साध्यते । अत एवात्र 'शब्दो नित्यः' इति समुदायाऽनुमेयः साध्यत्वात् । ८ 'यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्र वह्निः, यत्र वह्निनास्ति तन धूपोऽपि नास्ति' इति व्याप्ती धूमस दावेऽग्निसद्धायो साध्यः। धूमोऽत्र वह्नर्धोऽस्ति । स एवात्र साध्यः । अत एव ज्या'तनिश्चयकाले धर्मोऽनुमेयः । ९ इदं पदं क० पुस्तके न विद्यते । १० सामान्यम्, ख० साम्यम् ।

- द्वितीयपरिच्छेदः २५ सावसिद्धत्वाद्धर्मश्च पराश्रितत्वात्साध्यधर्मः । न च विशेष: साध्यः । अपि तु सामान्यम् । अत इह सामान्यं साध्यमुक्तप् । साध्यधर्मश्चासौ सामान्यं चेति साध्यधर्मसामान्येन समानः पक्षेग सपन इत्यर्थः । कोऽसपक्ष इत्याह- न सपक्षोऽसपक्षः। न सपक्षोऽसपक्षः । सपक्षो यो न भवति सोऽसपक्षः कश्च सपक्षो न भवति- ततोऽन्यस्तद्विरुद्धस्तदभावश्चेति । ततः सपक्षादन्यः । तेन चे विरुद्धः । तस्य च सपक्षस्याभावः । सपक्षादन्यत्वं तद्विरुद्धत्वं च न तावत्प्रत्येतुं शक्यं यावत्सपक्षस्वभावाभावो न विज्ञातः । तस्मादन्यत्वविरुद्धत्वप्रतीतिसामर्थ्यात्सपक्षाभावरूपौ प्रतीता- वन्यविरुद्धौ । ततोऽभावः साक्षात्सपक्षाभावरूपः प्रतीयते । अन्यविरुद्धौ तु सामर्थ्यादभावरूपौ प्रतीयेते । ततस्त्रयाणामप्यसपनत्वम् । त्रिरूपाणि च । उक्तेन त्रैरूप्येण त्रिरूपाणि च त्रीण्येव लिङ्गानीति चकारो वक्तव्या- न्तरसमुच्चयार्थः । त्रैरूप्यमादौ पृष्टं त्रिरूपाणि च लिङ्गानि परेण । तत्र त्रैरूप्यमुक्तम् । त्रिरूपाणि चोच्यन्ते । त्रीण्येव च लिङ्गानि त्रीण्येव त्रिरूपाणि लिङ्गानि । त्रयस्त्रिरूपलिङ्गप्रकारा इत्यर्थः । कानि पुनस्तानीत्याह - अनुपलब्धिः स्वभावकार्ये चेति । प्रतिषेध्यस्य साध्यस्यानुपलब्धिस्त्रिरूपा । विधेयस्य साध्यस्य स्वभाव- स्त्रिरूपः । कार्य च । .'' इति पदं ख० पुस्तके न विद्यते । २ तहिल्दत्वं, खच विरुदत्वम् ।। .. ४ न्या० 1 २६ न्यायविन्दुः अनुपलब्धिमुदाहर्तुमाह- तत्रानुपलब्धिर्यथा न प्रदेशविशेषे क्वचिडट उपलब्धिलक्षणप्राप्तस्यानुपलब्धेरिति । यथेत्यादि । यथेत्युपप्रदर्शनार्थम् । यथेयमनुपलब्धिस्तथान्यापि । न त्वियमेवेत्यर्थः । प्रदेश एकदेशः । विशिष्यत इति विशेष: प्रतिपत्त- प्रत्यक्षः । तादृशश्च न सर्वः प्रदेशः । तदाह कचिदिति । प्रतिपतृप्रत्यक्ष कचिदेव प्रदेश इति धर्मी । न घट इति साध्यम् । उपलब्धिर्ज्ञानम् । तस्या लक्षणं जनिका सामग्री । तया ह्यनुपलब्धिलक्ष्यते । तत्प्राप्तोऽर्थो जनकत्वेन सामग्रथन्तर्भावादुपलब्धिलक्षणप्राप्तो दृश्य इत्यर्थः । तस्यानुप- लब्धेरित्ययं हेतुः । अथ यो यत्र नास्ति स कथं तत्र दृश्यः । दृश्यत्व. समारोपादसन्नपि दृश्य उच्यते । यश्चैवं संभाव्यते यद्यसावत्र भवेद्दृश्य एव भवेदिति स तत्राविद्यमानोऽपि दृश्यः समारोप्यः । कश्चैवं संभाव्यः । यस्य समग्राणि स्वालम्बनदर्शनकारणानि भवन्ति । कदा च तानि समग्राणि गम्यन्ते । यदेकज्ञानसंसर्गिवस्त्वन्तरोपलम्भः । एकेन्द्रियज्ञानग्राह्यं लोचनादिप्रणिधानाभिमुखं वस्तुद्वयमन्योन्यापेक्षमेकज्ञानसंसर्गि कथ्यते । तयोहि सतो कनियता भवति प्रतिपत्तिः । योग्यताया द्वयोरप्यविशिष्टत्वात् । तस्मादेकज्ञानसंसर्गिणि दृश्यमाने सत्येकस्मिन्नितरत्समग्रदर्शनसामग्रीक यदि भवेद्देश्यमेव मवेदिति संभावितं दृश्यमारोप्यते । तस्यानुपलम्भो दृश्यानुपलम्भः । तस्मात्स एव घेटविविक्तप्रदेशस्तदालम्बनं च ज्ञानं दृश्यानुपलम्भनिश्चयहेतुत्वादृश्यानुपलम्भ उच्यते । यावद्धधकज्ञानसंसर्गि वस्तु न निश्चितं तज्ज्ञानं च न तावदृश्यानुपलम्भनिश्चयः । ततो वस्त्व- प्यनुपलम्भ उच्यते तज्ज्ञानं च । दर्शननिवृत्तिमात्रं तु स्वयमनिश्चितत्वाद- गमकम् । ततो दृश्यघटरहित: प्रदेशस्तज्ज्ञानं च वचनसामर्थ्यादेव दृश्यानुपलम्भरूपमुक्तं द्रष्टव्यम् । १ उपलब्धिर्ज्ञानम् । तस्या लक्षणं अनिका सामग्री, क. उपलब्धिज्ञानं तस्य लणं। जनिका सामग्री । २ कथ्यते, ख० गम्यते। ३श्य, ख. श्यत्वम् । घटविविक्त०, ख० घटादिविविक्त। ५ वस्तु न निश्चितं तज्ज्ञानं च, ख० वस्तु तज्ज्ञानं पा (मा)मनिधितम्। ६ ततो इश्यपटरहिता, ख. ताशयरहितः । . - द्वितीयपरिच्छेदः २७ का पुनरुपलब्धिलक्षणप्राप्तिरित्याह- उपलब्धिलक्षणप्राप्तिरुपलम्भप्रत्ययान्तरसाकल्यं स्वभावविशेषश्च । उपलब्धिलक्षणप्राप्तिरुपलब्धिलक्षणप्राप्तत्वं घटस्य । उपलम्भप्रत्यया- न्तरसाकल्यमिति । ज्ञानस्य घटोऽपि जनकः । अन्ये च चक्षुरादयः । घटादृश्यादन्ये हेतवः प्रत्ययान्तराणि । तेषां साकल्यं संनिधिः । स्वभाव एव विशिष्यते तदन्यस्मादिति विशेषो विशिष्ट इत्यर्थः । तदयं विशिष्टः स्वभावः प्रत्ययान्तरसाकल्यं चैतद्वयमुपलब्धिलक्षणप्राप्तत्वं घटादेष्टव्यम् । कीदृशः स्वभावविशेष इत्याह- यः स्वभावः सत्स्वन्येषूपलम्भप्रत्ययेषु यत्प्रत्यक्ष एव भवति स स्वभावः । सस्वित्यादि । उपलम्भस्य यानि घटादृश्यात्प्रत्ययान्तराणि तेषु सत्सु विद्यमानेषु यः स्वभावः सन् प्रत्यक्ष एव भवति स स्वभावविशेषः । तदयमत्रार्थः । एकप्रतिपत्तपेक्षमिदं प्रत्यक्षलक्षणम् । तथा च सति द्रष्टुं प्रवृत्तस्यैकस्य द्रष्टुर्दश्यमान उभयवान्भावः । १ । अदृश्यमानारतु देश- कालस्वभावविप्रकृष्टाः स्वभावविशेषरहिताः प्रत्ययान्तरसाकल्यवन्तस्तु । यैर्हि प्रत्ययैः स द्रष्टा पश्यति ते संनिहिताः । अतश्च संनिहिताय द्रष्टुं प्रवृत्तः सः । २ । द्रष्टुमप्रवृत्तस्य तु योग्यदेशस्था अपि द्रष्टुं ते न शक्याः। प्रत्ययान्तरवैकल्यवन्तः स्वभावविशेषयुक्तास्तु । ३ । दूरदेशकालास्तूभय- विकलाः । ४ । तदेवं पश्यतः कस्यचिन्न प्रत्ययान्तरविकलो नाम । १ । स्वभावविशेषविकलस्तु भवेत् । २ । अपश्यतस्तु शक्यो द्रष्टुं योग्यदेशस्थ: प्रत्ययान्तरविकल: । ३ । अन्ये तूभयविकला इति । ४ । १ उपलम्भप्रत्ययान्तरसाकल्यस्वभावविशेषवान् । २ क० पुस्तकस्य 'भातशा इति पाठोऽशुद्धः प्रतीयते । ख. अतश्च समिहिता यद्रष्टुं प्रवृत्ताः (अशुधः) स। ३ पश्यतः कस्यचित् पुरुषस्य न प्रत्ययान्तरविकलस्वं भवति । ४ स्व० पुस्तकेऽनाका न विद्यन्ते।

२८ न्यायविन्दुः अनुपलब्धिमुदाहृत्य स्वभावमुदाहर्तुमाह- स्वभावः स्वसत्तामात्रभाविनि साध्यधर्मे हेतुः । स्वभावो हेतुरिति सम्बन्धः । कीदृशो हेतुः साध्यस्यैवं स्वभाव इत्याह । स्वस्यात्मनः सत्ता सैव केवला स्वसत्तामात्रम् । तस्मिन् सति भवितुं शीलं यस्येति । यो हेतोरात्मनः सत्तामपेक्ष्य विद्यमानो भवति न तु हेतुसत्ताया व्यतिरिक्तं कश्चिद्धेतुमपेक्षते से स्वसत्तामात्रभावी साध्यः । तस्मिम् साध्ये यो हेतुः स स्वभावः । तस्य साध्यस्य नान्यः । उदाहरणम्- यथा वृक्षोऽयं शिशपात्वादिति । अयमिति धर्मी । वृत्त इति साध्यम् । शिशपात्वादिति हेतुः । तदयमों वृक्षव्यवहारयोग्योऽयं शिंशपाव्यवहारयोग्यत्वादिति । तत्र प्रचुर- शिंशपे देशेऽविदितशिशपाव्यवहारो जडो यदा केनचिदुच्चां शिंशपामुपा- दोच्यते अयं वृक्ष इति तदासौ जाड्याञ्छिशपाया उच्चत्वमपि वृक्षव्य- वहारनिमित्तमवस्यति । तदा यामेवानुच्चां शिशपां पश्यति तामेवावृतमव- स्यति । सं मूढः शिंशपायमात्रनिमित्ते वृक्षव्यवहारे प्रवर्त्यते । नोच्चत्वादि निमित्तान्तरमिह वृक्षव्यवहारस्य । अपि तु शिंशपात्वमात्रं निमित्तं शिश- पागतशाखादिमत्त्वं निमित्तमित्यर्थः । कार्यमुदाहर्तुमाह- कार्य यथाग्निरत्र धूमादिति । "अग्निरिति साध्यम् । अत्रेति धर्मी । धूमादिति हेतुः । कार्यकारण- भावो लोके "प्रत्यक्षानुपलम्भनिबन्धन: प्रतीत इति न स्वभावस्येव कार्यस्य लक्षणमुक्तम् । १ साध्यस्यैव स्वभाव, ख० साध्यस्य भावः । २ इदं पदं क० पुस्तके नैवोपलभ्यते। ३ शिशप०, क. प्रथमस्थाने 'सिंसप' द्वितीयस्थाने च 'शिंशप' इति लिखति । द्वितीयः पंक्तावप्यिदमेव, 'प्रचुरसिसपे' किन्तु 'अविदितशिंशपा०। ४ यदा, ख० यथा। ५ उपा- दर्य, ख० उपदयं । ६ वृक्षव्यवहारनिमित्तं, ख० वृक्षव्यवहारस्य निमित्तम् । ७ शिशपां पश्यति, ख. पश्यति शिंशपाम् । ८ अवृक्ष, क. अवृक्षस्वम्। ९ख० पुस्तके 'स मूतः इत्यस्यानन्तरं ' इति विरामः प्रयुक्तः । १० अग्निरिति, क० वतिरिति । ११ प्रत्यक्षानुपलम्भनिबन्धनः, ख० प्रत्यक्षानुपलम्भः निबन्धनम् ।

द्वितीयपरिच्छेदः २६ - ननु त्रिरूपत्वादेकमेव लिङ्गमयुक्तम् । अथ प्रकारभेदाद्भेदः । एवं सति स्वभावहेतोरेकस्यानन्तप्रकारत्वात्त्रित्वमयुक्तमित्याह- अत्र द्वौ वस्तुसाधनौ। अत्रेति एषु त्रिपु हेतुषु मध्ये द्वौ हेतू वस्तुसाधनौ विधेः साधनौ गमको । - एकः प्रतिषेधहेतुः। एक: प्रतिषेधस्य हेतुर्गमकः । प्रतिषेध इति चाभावोऽभावव्यवहार- श्वोक्तो द्रष्टव्यः । तदयमों हेतुः साध्यसिद्धयर्थत्वात्साध्याङ्गम् । साध्यं प्रधानम् । अतश्च साध्योपकरणस्य हेतोः प्रधानसाध्यभेदाभेदो न स्वरूप- भेदात् । साध्यश्व कश्चिद्विधिः कश्चित्प्रतिषेधः । विधिप्रतिषेधयोश्च परस्परपरिहारेणावस्थानात्तोंहेतू भिन्नौ । विधिरपि कश्चिद्धतोभिन्नः कश्चि- दभिन्नः । भेदाभेदयोरप्यन्योन्यत्यागेनात्मस्थितेभिन्नौ हेतू । तत: साध्यस्य परस्परविरोधाद्धेतवो भिन्ना न तु स्वत एवेति । कस्मात्पुनस्त्रयाणां हेतुत्वं कस्माञ्चान्येषामहेतुत्वमित्याशङ्कय यथा त्रयाणामेव हेतुत्वमन्येषां चाहेतुत्वं तदुभयं दर्शयितुमाह- स्वभावप्रतिबन्धे हि सत्यर्थोऽर्थं गमयेत् । स्वभावेन प्रतिबन्धः स्वभावप्रतिबन्धः । साधनं कृतेति समासः । स्वभावप्रतिबद्धत्वं प्रतिबद्धस्वभावत्वमित्यर्थः । कारणे स्वभावे च साध्ये स्वभावेन प्रतिबन्धः कार्यस्वभावयोरविशिष्ट इत्येकेन समासेन द्वयोरपि संग्रहः । हिर्यस्मादर्थे । यस्मात्स्वभावप्रतिबन्धे सति साधनार्थः साध्याथ गमयेत्तस्मात्त्रयाणां गमकत्वमन्येषामगमकत्वम् । कस्मात्पुनःस्वभावप्रतिबन्ध एव सति गम्यगमकभावो नान्यथेत्याह- तदप्रतिबद्धस्य तदव्यभिचारनियमाभावात् । तदिति स्वभाव उक्तः । तेन स्वभावेनाप्रतिबद्धस्तदप्रतिबद्धः । यो १ 'युक्तम्' इति पाठः क. पुस्तक एव विद्यते । सर्वत्रान्यत्र तु 'अयुक्त' इत्येव पाठः। मुद्रित पुस्तकस्य सम्पादकेनापि 'अयुक्त' एव प्रयुक्तम् । अस्माकं सम्मतौ तु 'अयुक्त अत्रायुक्तमेव । २ अत्रेति एषु, ख० अत्रेति अत्र । ३ इदं पदं ख० पुस्तके न विद्यते । ४ इदं पदं ख० पुस्तके न विद्यते । हेतवोऽपि । ७ कारणे, ख० कारण। - । ५परस्पर०, ख० परस्परम् । ६ हेतवः, ख.

३० न्यायविन्दुः - यत्र स्वभावेन न प्रतिबद्धस्तस्य तदप्रतिबद्धस्य तदव्यभिचारनियमाभावस्त- स्याप्रतिबद्धविषयस्याव्यभिचारस्तदव्यभिचारस्तस्य नियमस्तदव्यभिचारनि- यमस्तस्याभावात् । अयमर्थः । न हि यो यत्र स्वभावेन ने प्रतिबद्धः स तमप्रतिबद्धविषयमवश्यमेव न व्यभिचरतीति नारित तयोरव्यभिचार- नियमः । अविनाभावनियमः । अव्यभिचारनियमाञ्च गम्यगमकभावः । नहि योग्यतया प्रदीपवत्परोक्षार्थप्रतिपत्तिनिमित्तमिष्टं लिङ्गम् । अपि त्वव्यभिचारित्वेन निश्चितम् । ततः स्वभावप्रतिबन्धे सत्यविनाभाव- निश्चयः । ततो गम्यगमकभावः । तस्मात्स्वभावप्रतिबन्धे सत्यर्थोऽथ गम- येन्नान्यथेति स्थितम् । ननु च परायत्तस्य प्रतिबन्धोऽपरायत्ते । तदिह साध्यसाधनयो: कस्य के प्रतिबन्ध इत्याह स च प्रतिबन्धः साध्येऽर्थे लिङ्गस्य वस्तुतस्ता- दात्म्यात्साध्यार्थादुत्पत्तेश्च । स च स्वभावप्रतिबन्धो लिङ्गस्य साध्येऽर्थे । लिङ्गं परायत्तत्वात्प्रति- बद्धम् । साध्यस्त्वर्थोऽपरायत्तत्वात्प्रतिबन्धविषयो न प्रतिबद्ध इत्यर्थः । तत्रायमर्थस्तादात्म्याविशेषेऽपि यत्प्रतिबद्धं तद्गमकम् । यत्प्रतिबन्धविषय- स्तद्गम्यम् । यस्य च धर्मस्य यनियतः स्वभावः स तत्प्रतिबद्धो यथा प्रयत्ना- नन्तरीयकत्वाख्योऽनित्यत्वे । यस्य तु स चान्यश्च स्वभाव: स प्रतिबन्ध- विषयः । न तु प्रतिबद्धः । यथानित्यत्वाख्यः प्रयत्नानन्तरीयकत्वाख्ये । निश्चयापेक्षो हि गम्यगमकभावः । प्रयत्नानन्तरीयकत्वमेव चानित्यस्वभावं निश्चितम् । अतस्त देवानित्यत्वे प्रतिबद्धं, तस्मानियतविषय एव गम्यगम- कभावो नान्यथेति । कस्मात्पुनः स्वभावप्रतिबन्धो लिङ्गस्य न वातुन इत्याह । वस्तुत इत्यादि । स साध्योऽर्थ आत्मा स्वभावो यस्य तत्तदात्मा १ अभावः, ख० अभावात् । २ अप्रतिबद्ध०, ख० अप्रतिबन्धः । ३ इदं पदं ख० पुस्तके न विद्यते। ४ अप्रतिबद्ध० ख. अप्रतिबन्धः। ६ अविनाभावनिश्चयः, ख. अविनामाविस्वनिश्चयः। ६ छ, ख० का। ७ अस्माकं सम्मतौ 'वस्तुत: अन्यत्र तु 'वस्तुनः । ८ 'न वस्तुनः' इति पाठः ख० पुस्तक एकोपलभ्यते। ९ 'अर्थ आत्मा' इति पाठः ख० पुस्तके न विद्यते । - द्वितीयपरिच्छेदः ३१ । - तस्य भावस्तादात्म्यं तस्माद्धेतोर्यतः साध्यस्वभावं साधनं तस्मात्तत्तंत्र स्वभावप्रतिबद्धमित्यर्थः। यदि साध्यस्वभावं साधनं साध्यसाधनयोर- भेदात्प्रतिज्ञार्थंकदेशो हेतुः स्यादित्याह वस्तुत इति । परमार्थसता रूपेणा- भेदः । तयोर्विकल्पविषयस्तु यत्समारोपितं रूपं तदपेक्षः साध्यसाधन- भेदः । निश्चयापेक्ष एव हि गम्यगमकभावः । ततो निश्चयारूढरूपापेक्ष एव तयोर्भेदो युक्तो वास्तवस्त्वभेद इति । न केवलं तादात्म्यादपि तु ततः साध्यादर्थादुत्पत्तिर्लिङ्गस्य तदुत्पत्तेश्च साध्येऽर्थे स्वभावप्रति- बन्धो लिङ्गस्य । कस्मानिमित्तद्वयात्स्वभावप्रतिबन्धो लिङ्गस्य नान्यरमादित्याह- अतत्स्वभावस्यातदुत्पत्तेश्च तत्राप्रतिबद्धस्वभावत्वात् । स स्वभावोऽस्य सोऽयं तत्स्वभावः । न तत्स्वभावोऽतत्स्वभावः । तस्मादुत्पत्तिरस्य सोऽयं तदुत्पत्तिः न तथातदुत्पत्तिः । यो यत्स्वभावो यदुत्पत्तिश्च न भवति तस्यातत्स्वभावस्यातदुत्पत्तेश्च । तत्रातत्स्वभावेऽ- नुत्पादके चाप्रतिबद्धः स्वभावोऽस्येति सोऽयमप्रतिबद्धस्वभावस्तस्य भावोऽ- प्रतिबद्धस्वभावत्वं तस्मादप्रतिबद्धस्वभावत्वात् । यद्यतत्स्वभावेऽनुपाद के च कश्चित्प्रतिबद्धस्वभावो भवेत्, भवेदन्यतोऽपि निमित्तात्स्वभावप्रतिबन्धः । प्रतिबद्धस्वभावत्वं हि स्वभावप्रतिबन्धो न चान्यः कश्चिदायत्तस्वभावः । तस्मात्तादात्म्यतदुत्पत्तिभ्यामेव स्वभावप्रतिबन्धः । भवतु नाम तादात्म्यतदुत्पत्तिभ्यामेव स्वभावप्रतिबन्धः कार्यस्वभाव- योरेव तु गमकत्वं कथमित्याह- ते च तादात्म्यतदुत्पत्ती स्वभावकार्ययोरेवेति ताभ्यामेव वस्तुसिद्धिः। इतिस्तस्मादर्थे । यस्मात्स्वभावे कार्य एव च तादात्म्यतदुत्पत्ती स्थिते तन्निबन्धनश्च गम्यगमकभावस्तस्मात्ताभ्यामेव कार्यस्वभावाभ्यां वस्तुनो विधेः सिद्धिः । १ तादाम्यं, ख० तादात्म्यं तत्स्वभावस्वम् । २ इदं पदं ख० पुस्तक एवोपलभ्यते। धर्मधर्मीसमुदायो प्रतिज्ञा । तदेकदेशो धर्मो धर्मी वा । ४ निश्चयापेक्ष एव, ख० निश्च यापेक्षया एवं । ५ लिङ्गस्य, ख० लिङ्गस्य स्यात् ।

- - - ३२ न्यायबिन्दु अथ प्रतिषेधसिद्धिरदृश्यानुपलम्भादपि कस्मान्नेष्टेत्याह- प्रतिषेधसिद्धिरपि यथोक्ताया एवानुपलब्धेः । प्रतिषेधव्यवहारस्य सिद्धिर्यथोक्ता क्ता या दृश्यानुपलब्धिस्तत एव भवति यतस्तस्मादन्यतो नोक्ता । ततस्तावत्कस्माद्भवतीत्याह- सति वस्तुनि तस्या असंभवात् । सति तस्मिन्प्रतिषेध्ये वस्तुनि यस्मादृश्यानुपलब्धिर्न संभवति तस्मादसंभवात्ततः प्रतिषेधसिद्धिः । अथ तत एव कस्मादित्याह- अन्यथा चानुपलब्धिलक्षणप्राप्तेषु देशकालस्वभावविप्र- कृष्टेष्वात्मप्रत्यक्षनिवृत्तेरभावनिश्चयाभावात् । सति वस्तुनि तस्या अदृश्यानुपलब्धेः संभवादित्यन्यथा शब्दार्थः । एतस्मात्कारणान्नान्यस्या अनुपलब्धेः प्रतिषेधसिद्धिः । कुत एतत्सत्यपि वस्तुनि तस्याः संभव इत्याह । अनुपलब्धिलक्षणप्राप्तेष्वित्यादि । इह प्रत्ययान्तरसाकल्यात्स्वभावविशेषाञ्चोपलब्धिलक्षणप्राप्तार्थ उक्तः। द्वयोरेक- स्याप्यभावेऽनुपलब्धिलक्षणप्राप्तोऽर्थ उच्यते । तदिहानुपलब्धिलक्षणप्राप्ते. विति प्रत्ययान्तरकैवल्यवन्त उक्ताः | देशकालस्वभावविप्रकृष्टेष्विति । स्वभावविशेषविप्रकृष्टा उक्ताः । देशश्च कालश्च स्वभावश्च तैर्विप्रकृष्टा इति विग्रहः । तेष्वभावनिश्चयस्याभावात् | सत्यपि वस्तुनि तग्याभाव इष्टः । कस्मानिश्चयाभाव इत्याह । तेषु प्रतिपत्तुरात्मनो यत्प्रत्यक्षं तस्य निवृत्तेः कारणानिश्चयाभावः । यस्मादनुपलब्धिलक्षणप्राप्तेष्वात्मप्रत्यक्षनिवृत्तेरभा- बनिश्चयाभावस्तस्मात्सत्यपि वस्तुन्यात्मप्रत्यक्षनिवृत्तिलक्षणाया अदृश्यानुप- लब्धेः संभवः । ततो यथोक्ताया एव प्रतिषेधसिद्धिः । १. 'एकस्य' इति पाठा० ख० पुस्तक एवं विद्यते। क. पुस्तके मुद्रिसपुस्तके च 'एकैकस्य इति पाठ उपलभ्यते । २. स्वभावविशेषविप्रकृष्टाः, स्व. स्वभावविशेष. रहिताः। ३. ज्ञातुः।

वेति यावत् । द्वितीयपरिच्छेदः ३३ अथेयं दृश्यानुपलब्धिः कस्मिन्काले प्रमाणं किस्वभावा किंव्यापारा चेत्याह- अमूढस्मृतिसंस्कारस्यातीतस्य वर्तमानस्य च प्रतिपत्तृ- प्रत्यक्षस्य निवृत्तिरभावव्यवहारसाधनी । प्रतिपत्तुः प्रत्यक्षो घटादिरर्थरतस्य निवृत्तिरनुपलब्धिस्तदभावस्वभा- अत एवाभावो न साध्यः स्वभावानुपलब्धेः सिद्धत्वात् । अविद्यमानोऽपि च घटादिरेकज्ञानसंसर्गिणि भूतले भासमाने समग्र- सामग्रीको ज्ञायमानो दृश्यमानतया संभावितत्वात्प्रत्यक्ष उक्तः । अत एकज्ञानसंसर्गी दृश्यमानोऽर्थतज्ज्ञानं च प्रत्यक्षनिवृत्तिरुच्यते । ततो हि दृश्यमानादर्थात्तबुद्धेश्च समग्रदर्शनसामग्रीकत्वेन प्रत्यक्षतया संभावि- तस्य निवृत्तिरवसीयते । तस्मादर्थज्ञान एवं प्रत्यक्षस्य घटस्याभाव उच्यते । न तु निवृत्तिमात्रमिहाभावो निवृत्तिमात्रादृश्यनिवृत्त्यनिश्चयात् । ननु च दृश्यनिवृत्तिरवसीयते दृश्यानुपलम्भात् । सत्यमेवैतत् । केवलमेकज्ञान- संसर्गिणि दृश्यमाने घटो यदि भवेदृश्य एव भवेदिति दृश्य: संभावित- स्ततो दृश्यानुपलब्धिनिश्चिता । दृश्यानुपलब्धिनिश्चयसामर्थ्यादेव च दृश्याभावो निश्चित: । यदि हि दृश्यस्तत्र भवेद्दृश्यानुपलम्भो न भवेत् । अतो दृश्यानुपलम्भनिश्चयादृश्याभावः सामादवसितो न तु व्यवहृत इति दृश्यानुपलम्भेन व्यवहर्तव्यः । तस्मादर्थान्तरमेकज्ञानसंसर्गि दृश्य- मानं तज्ज्ञानं च प्रत्यक्षनिवृत्तिनिश्चयहेतुत्वात्प्रत्यक्षनिवृत्तिरुक्तं द्रष्टव्यम् । यथा चैकज्ञानसंसर्गिणि प्रत्यक्षघटस्य प्रत्यक्षत्वमारोपितमसतोऽपि तथा तस्मिन्नेकज्ञानसंसर्गिण्यतीते वर्तमाने चामृढम्मृनिसंस्कारे च घटस्य तद्रूप- मारोपितमसत इति द्रष्टव्यम् । अनेन दृश्यानुपलब्धिः प्रत्यक्ष घटनिवृत्ति. स्वभावोक्ता । सा च सिद्धा तेन न घटाभावः साध्योऽपि त्वभावव्य. - वहार इत्युक्तम् । १. इदं पदं ख० पुस्तक एवोपलभ्यते। २'श्यमानतया' इति पाठः ख. पुस्तक एवास्ति । अन्यत्र सर्वत्र तु 'दृश्यतया' इत्येव पाठः। ३. संसर्गी, ख. संसर्गात् । ४. समग्र, ख० समय । ५. 'तु' इति पाठः ख. पुस्तके नैवोपलभ्यते । १. 'न' इति पाठः ख० पुस्तके नैवोपलभ्यते । ५ न्या० न्यायविन्दुः अमूढोऽभ्रष्टो दर्शनाहित: स्मृतिजननरूप: संस्कारो यस्मिन्घटादौ स तथोक्तः । तस्यातीतस्य प्रतिपत्तप्रत्यक्षस्येति सम्बन्धः। वर्तमानस्य च प्रतिपत्तप्रत्यक्षस्येति सम्बन्धः। अमूढस्मृतिसंरकारग्रहणन्तु न घर्तमान- विशेषणम् । यस्मादतीते घटविविक्तप्रदेशदर्शने स्मृतिसंस्कारो मूढो दृश्यघटा- नुपलम्भे दृश्ये च घटेऽमूढो भौति । वर्तमाने च घटरहितप्रदेशदर्शने न स्मृतिसंस्कारमोहः । अत एव न घटानुपलम्भे नापि घटे मोहः । तस्मान्न वर्तमाननिषेध्यविशेषणममूढस्मृतिसंस्कारग्रहणम् । स्मृतिसंरकार- व्यभिचाराभावाद्वर्तमानस्यार्थरय । अत एव वर्तमानस्य चेति । चशब्द: कृतो विशेषणरहितस्य वर्तमानस्य विशेषणवतातीतेन समुच्चयो यथा विज्ञा- येतेति । तदयमर्थोऽतीतोऽनुपलम्भः स्फुट रमर्यमाणः प्रमाणं वर्तमानश्च । ततो नासीदिह घटोऽनुपलब्धत्वान्नास्त्यनुपलभ्यमानत्वादिति शक्यं ज्ञातुम् । न तु न भविष्यत्यत्र घटोऽनुपलप्यमानत्वादिति शक्यं ज्ञातुम् । अनागताया अनुपलब्धेः सत्त्वसन्देहादिति । कालविशेषोऽनुपलब्धेा- ख्यातः । व्यापारं दर्शयति । अभावस्य व्यवहारा नास्तीत्येवमाकारं ज्ञानं शब्दश्चैचमाकारो निःशवं गमनागमनलक्षणा च प्रवृत्तिः कायिकोऽभाव- व्यवहारः । घटाभावे हि ज्ञाते निःशङ्कं गन्तुमागन्तुं च प्रवर्तते । तदेव- मेतस्य त्रिविधस्याप्यभावव्यवहारस्य॑ दृश्यानुपलब्धिः साधनी प्रवर्तिका ! यद्यपि च नास्ति घट इति ज्ञानमनुपलब्धेरेव भवत्ययमेव चाभावनिश्चय- स्तथापि यस्मात्प्रत्यक्षेण केबल: प्रदेश उपलब्धस्तस्मादिह घटो नास्ती- त्येवं च प्रत्यक्षव्यापारमनुसरत्यभावनिश्चयः । तस्मात्प्रत्यक्षस्य केवलप्रदेश. ग्रहणण्यापारानुसार्यभावनिश्चयः प्रत्यक्षकृतः । किञ्च । दृश्यानुपलम्भनि- श्रयकरणसामर्थ्यादेव पूर्वोक्तया नीत्या प्रत्यक्षेणैाभावो निश्चित: । केव- लमदृष्टानामपि सत्त्वसंभवात् । सत्त्वशङ्कया न शक्नोत्यसत्त्वं व्यवहर्तुम् । । १. स्मृतिसंस्कारः। २. इदं पदं ख० पुस्तके न विद्यते। ३. 'इति' इति पाठः ख. पुस्तके न विद्यते। १. स्फुरं, क. स्फुरः। ५. अनुपलप्स्यमानत्वात् , क० अनुगलम्यमानस्यात् । १. निाश गमनागमन, ख. निःशंकगमागमः । ७. तदेव- मेतस्य, ख. तदेव तस्य । ८. व्यवहारस्य, क० व्यवहार० । .

द्वितीयपरिच्छेदः ३५ अतोऽनुफ्लम्भोऽभावं व्यवहारयति । दृश्यो यतोऽनुपलब्धामामास्ती. त्यतो दृश्यानुपलम्भोऽभावज्ञानं कृतं प्रवर्तयति न त्वकृतं करोतीत्यभावनि- श्वयोऽनुपलम्भात्प्रवृत्तोऽपि प्रत्यक्षेण कृतोऽनुपलम्भेन प्रवर्तित उक्त इत्य. भावव्यवहारप्रवर्तिन्युपलब्धिः । कस्मात्पुनरतीते वर्तमाने चानुपलब्धिर्गमिकेत्याह- तस्या एवाभवनिश्चयात् । तरया पव यथोक्तकालाया अनुपलब्धेरभावनिश्चयात् । अनागत' ह्यनुपलब्धिः स्वयमेव संदिग्धस्वभावा । तस्या असिद्धाया नाभावनिश्च योऽपि त्वतीतवर्तमानाया इति । संप्रत्यनुपलब्धेः प्रकारभेदं दयितुमाह- सा च प्रयोगभेदादेकादशप्रकाग । सा चैषानुपलब्धिरेकादशप्रकारा, एकादश प्रकारा अस्या इत्येकाद- शप्रकारा । कुतः प्रकारभेदः प्रयोगभेदात् । प्रयोगः प्रयुक्तिः शब्दस्या. भिधानव्यापार उच्यते । शब्दो हि साक्षात्कचिदन्तिराभिधायी कचि प्रतिषेधान्तराभिधायी । सर्वत्रैव तु दृश्यानुपलब्धिरशब्दोपात्तापि गम्यत इति वाचकव्यापार वादनुपलम्भप्रकारभेदो न तु स्वरूपभेदा- दिति यावत् । प्रकारभेदानाह- स्वभावानुपलब्धिर्यथा । नात्र धूम उपलब्धि- लक्षणप्राप्तस्यानुपलब्धेरिति । प्रतिषेध्यस्य यः स्वभावस्तस्यानुपलब्धिः । यथेति । अत्रेति धर्मी न धूम इति साध्यम् । उपलब्धिलक्षणप्राप्तस्यानुपलन्धेरिति हेतुः । अयं च हेतुः पूर्ववव्याख्येयः ॥ १ ॥ १. इदं पदं क० पुस्तके नैव विद्यते । २'प्रवर्तिनी' इत्ययमेव पाठः ख. पुस्तके विद्यते। क० पुस्तके स्पष्टरूपेण 'प्रवर्सनमुपला' इति लिखितं यच्च 'प्रवर्तन्यु. पस'झ्यशुद्ध रूपे विकारितम् । ३. ख० पुस्तके 'एकादशप्रकारा एकादश प्रकारा अस इत्कारकाका इति लिखितम् । मुद्रितपुस्तके क० पुस्तके च 'एकादश प्रकारा अस्था इत्येकादशप्रकारा' इति पाठः। ४. भेदार, क. मेद । ranteermane ३६ न्यायविन्दुः कार्यानुपलब्धिर्यथा । नेहाप्रतिबद्धसामर्थ्यानि धूम- कारणानि सन्ति धूमाभावात् । प्रतिषेध्यस्य यत्कायं तस्यानुपलब्धिरुदाहियते । यथेति । इहेति धर्मी । अप्रतिबद्धमनुपहतं धूमजननं प्रति सामर्थ्य येषां तान्यप्रतिबद्ध- सामर्थ्यानि न सन्तीति साध्यम् | धूमाभावादिति हेतुः । कारणानि च नावश्यं कार्यवन्ति भवन्तीति कार्यादर्शनादप्रतिबद्धसामर्थ्यानामेवाभावः साध्यः । न त्वन्येषाम् । अप्रतिबद्धशक्तीनि चान्त्यक्षणभावीन्येवान्येषां प्रतिबन्धसंभवात् । कार्यानुपलब्धिश्च यत्र कारणमदृश्यं तत्र प्रयुज्यते दृश्ये तु कारणे दृश्यानुपलब्धिरेव गमिका । तत्र धवलगृहोपरि- स्थितो गृहाङ्गणमपश्यन्नपि चतुषु पार्श्वेष्वङ्गणभित्तिपर्यन्तं पश्यति । भित्तिपर्यन्तसमं चालोकसंज्ञकमाकाशदेशं धूमविविक्तं पश्यति । तत्र धूमाभावनिश्चयाद्यद्देशस्थेन वहिना जन्यमानो धूमस्तद्देशः स्यात् । तस्य च वढेरप्रतिबद्धसामर्थ्यस्याभावः प्रतिपत्तव्यः । तद्गृहाङ्गणदेशेन वहिना जन्यमानो धुमस्तद्देशः स्यात् । तस्मात्तदेशस्य वढेरभावः प्रतिप- त्तव्यः । तद्गृहाङ्गगदेशं भित्तिपरिक्षिप्तं भित्तिपर्यन्तपरिक्षितेन चालोका- त्मना धूमविविक्तेनाकाशदेशेन सह धर्मिणं करोति । तस्माद्देश्यमानादृश्य- मानाकाशदेशावयवः प्रत्यक्षाप्रत्यत्तसमुदायो वह्नयभावप्रतीति सामर्थ्यायातो धर्मी न दृश्यमान एव । इहेति तु प्रत्यक्षनिर्देशो दृश्यमानभागापेक्षो न केवलमिहैव दृश्यादृश्यसमुदायो धर्म्यपि त्वन्यत्रापि । शब्दस्य क्षणिकत्वे साध्ये कश्चिदेव शब्दः प्रत्यक्षोऽन्यस्तु परोक्षस्तद्वदिहापि । यथा चात्र धर्मी साध्यप्रतिपत्त्यधिकरणभूतो दृश्यादृश्यावयवो दशितस्तद्वदुत्तरेल्वपि प्रयोगेषु स्वयं प्रतिपत्तव्यः ॥ २ ॥ व्यापकानुपलब्धियथा । नात्र शिशपा वृक्षाभावादिति । प्रतिषेध्यस्य व्याप्यस्य यो व्यापको धर्मस्तस्यानुपलब्धिरुदालियते । १. धवलगृह० ख० धवलगृहस्य । २. ख० पुस्तके नायं पाठो दृश्यते। ३. क. तगृहागणदेशेन भ (अशुद्धः) वह्निना। ख० तगृहांगणस्थेन च। ४. 'तरेशः' इति पाठ ख. पुस्तके 'ताश' इवावलोक्यते । ५. दृश्यमानादृश्यमानाकाशदेशावयवः, क. श्यमानाकारी (अशुद्धः) देशावयवः ।

द्वितीयपरिच्छेदः यथेति । अत्र धर्मी । न शिंशपेति शिशपाभावः साध्यः । वृक्षस्य व्यापकस्याभावादिति हेतुः । इयमप्यनुपलब्धिाप्यस्य शिशपीत्वस्य दृश्याभावे प्रयुज्यते । उपलब्धिलक्षणप्राप्ते तु व्याप्ये दृश्यानुपलब्धि- र्गमिका | तत्र यदा पूर्वापरावुपश्लिष्टौ समुन्नतौ देशौ भवतस्तयोरेकस्त- रुगहनोपेतोऽपरश्चैकशिलाघटितो निवृतकतः । द्रष्टापि तत्स्थान्वृक्षान्प- श्यन्नपि शिंशपादिभेदं ने यो विवेचयति । तस्य वृतत्वं प्रत्यक्षमप्रत्यक्ष शिंशपात्वम् । स हि निर्वृक्ष एकशिलाघटिते वृक्षाभावं दृश्यत्वादृश्यानु- पलम्भादवस्यति । शिशपात्वाभावं तु व्यापकरय वृत्तस्याभावादिति । तादृशे विषयेऽस्या अभावसाधनाय प्रयोगः ॥ ३ ।। स्वभावविरुद्धोपलब्धिर्यथा । नात्र शीतस्पर्शोऽग्नेरिति । प्रतिषेध्यस्य स्वभावेन विरुद्धस्योपलब्धिरुदाह्रियते । यथेति । अत्रेति धर्मी । न शीतस्पर्श इति शीतस्पर्शप्रतिषेधः साध्यः । वह्वेरिति हेतुः । इयं चानुपलब्धिस्तत्र प्रयोक्तव्या यत्र शीतस्पर्शोऽदृश्यः । दृश्ये दृश्यानु- पलब्धिप्रयोगात् । तस्माद्यत्र वर्णविशेषाद्वह्निदृश्यः शीतस्पर्शो दूरस्थत्या- त्सन्नप्यदृश्यस्तत्रास्याः प्रयोगः ॥ ४ ॥ विरुद्धकार्योपलब्धिर्यथा । नात्र शीतस्पर्शो धूमादिति । प्रतिषेध्येन द्विरुद्धं तत्कार्यस्योपलब्धिर्गमिका । यथेति । अत्रेति धर्मी । न शीतस्पर्श इति शीतस्पर्शाभावः साध्यः । धूमादिति हेतुः । यत्र शीतस्पर्शः सन्दृश्य: स्यात्तत्र दृश्यानुपलब्धिमिका | यत्र विरुद्धो वह्निः प्रत्यक्षस्तत्र विरुद्धोपलब्धिः । द्वयोरपि तु परोक्षत्वे विरुद्धकार्योप- लब्धिः प्रयुज्यते । तत्रं समस्तापवरकस्थं शीतं निवर्तयितुं समर्थस्याग्नेर- नुमापकं यदा विशिष्टं धूमकलापं निर्यान्तमपवर कात्पश्यति तदा विशिष्टा- द्वहेरनुमिताच्छीतस्पर्शनिवृत्तिम नुमिमीते । इह दृश्यमानद्वारप्रदेशसहितः सर्वाप'वरकाभ्यन्तरदेशो धर्मी साध्यप्रतिपत्त्यनुसरणात्पूर्ववद्रष्टव्यः ॥ ५ ॥ १. शिशपावस्य, ख. शिंशपास्व० । २. न यः, ख० यो न । ३. ताशे क. ताश। ४. पाठोऽय ख० पुस्तके नैवोपलभ्यते । ५ क. पुस्तके 'इति' इत्यसंगृया 'न शीतस्पर्श इत्यशुद्धो पाठो विद्यते । ६. श्ये, क. श्यो, स्व० श्ये तु । ७. दूर स्थत्वाद, ख• दूरत्वात् । ८. विरुद्ध०, क. विरोधः । ९. तत्र,क० यत्र। १०.निब. तिमनुमिमीते, क. निकृतिरनुमीयते । ११. सर्वापवरक०, ख. सर्वोपवरकः । .

विरुद्धव्याप्तोपलब्धियथा । म ध्रुवभाषी भृतस्यापि भावस्य विनाशो हेत्वन्तरापेक्षणादिति । प्रतिषेध्यस्य यद्विरुद्धं तेन व्याप्तस्य धर्मान्तरस्योपलब्धिरुदाहर्तव्या । यथेति । ध्रुवमवश्यं भवतीति' ध्रुवभावी नेतिध्रुवभावित्वनिषेध: साध्यः । विनाशो धर्मी । भूतस्यापि भावस्येति धर्मिविशेषणम् । भूतस्य जातस्यापि विनश्वरः स्वभावो नावश्यंभावी किमुताजातस्येत्यपि शब्दार्थः । जनना. खेतोरन्यो हेतुर्हेत्वन्तरं मुद्रादि तदपेक्षते विनश्वरः। तस्यापेक्षणादिति हेतुः । हेत्वन्तरापेक्षणं नामाधुबभावित्वेन व्याप्तम् । यथा वाससि रागस्य रञ्जनादिहेत्वन्तरापेक्षणध्रुवभावित्वेन व्याप्तम् । ध्रुवभावित्वविरुद्धं चाध्रुव- भावित्वम् । विनाशश्च विनश्वरस्वभावात्मा हेत्वन्तरापेक्ष इष्टः । ततो विरुद्धव्याप्तहेत्वन्तरापेक्षणदर्शनाद् ध्रुवभावित्वनिषेधः । इह ध्रुवभावित्वं नित्यत्वमध्रुवभावित्वं चानित्यत्वम् । नित्यत्वानित्यत्वयोश्च परस्परपरिहा- रेणावस्थानादेकत्र विरोधः । तथा च सति परस्परपरिहारवतोयोर्यदैक दृश्यते तत्र द्वितीयस्य तादात्म्यनिषेधः कार्यः । तादात्म्यनिषेधश्च दृश्य- तयाऽभ्युपगतस्य संभवति । यत एवं तादात्म्यनिषेधः क्रियते यद्ययं दृश्यमानो निस्यो भवेनित्यरूपो दृश्येत । न च नित्यरूपो दृश्यते । तस्मान्न नित्यः । एवं च प्रतिषेध्यस्य नित्यत्वस्य दृश्यमानात्मत्वमभ्युपगम्य प्रतिषेधः कृतो भवति । वस्तुनोऽप्यदृश्यस्य पिशाचादेर्यदि दृश्यघटात्म- त्वनिषेधः क्रियते दृश्यात्मत्वमभ्युपगम्य कर्तव्यः । "यद्ययं दृश्यमानः पिशाचामा भवेत्पिशाचो दृष्टो भवेत् । न च दृष्टस्तस्मान्न पिशाच इति दृश्यात्मत्वाभ्युपगमपूर्वको दृश्यमाने घटादौ वस्तुनि वरतुनोऽवस्तुनो वा दृश्यस्यादृश्यस्य च तादात्म्यनिपेधः । तथा च सति यथा घटस्य दृश्यत्व- मभ्युपगम्य "प्रतिषेधो दृश्यानुपलम्भादेव तद्वत्सर्वस्य परस्परपरिहारवतोऽ- १ पाठोऽयं ख० पुस्तके न विद्यते । २ जननात्, ख० जनकात् । ३ विनश्वरः। तस्य, कविनगरस्य। नामाध्रुव० ख० नाध्रुव०। ५ रखनादिक, ख रजकादि। पदंख० पुस्तके न विद्यते। श्यतया, क० तया। श्वमानात्मत्वं, खहरयमानात्मकत्वम् । १० यदि, ख० बर्दव। १वयं, ख० बयं घटः। १६ प्रतिषेधा, निषेधः। ८ यता, क. यः। "श्यघटा- व, ख. श्वात्मकाब।

द्वितीयपरिच्छेदः ३६ न्यत्र दृश्यमाने निषेधो दृश्यानुपलम्भादेव । तथा चास्यैवंजातीयकस्य प्रयोगस्य स्वभावानुपलब्धावन्तर्भावः ॥ ६ ॥ कार्यविरुद्धोपलब्धिर्यथा । नेहाप्रतिबद्धसामर्थ्यानि शीतकारणानि सन्त्यग्नेरिति । प्रतिषेध्यस्य यत्कार्य तस्य यद्विरुद्धं तस्योपलब्धेरुदाहरणम् । यथेति । इहेति धर्मी | अप्रतिबद्धं सामर्थ्य येषां शीतकारणानां शीतजननं प्रति नं तानि सन्तीति साध्यम् । बङ्गेरिति हेतुः । यत्र शीतकारणान्यदृश्यानि शीतस्पर्शोऽप्यदृश्यरतत्रायं हेतुः प्रयोक्तव्य: । दृश्यत्वे तु शीतस्पर्शस्य तत्कारणानां वा कार्यानुपलब्धिदृश्यानुपलब्धिर्वा गमिका ! तस्मादेषाऽप्य- भावसाधनी। ततो यस्मिन्देशे सदपि शीतकारणमदृश्यं शीतस्पर्शश्च दूरस्थत्वात्प्रतिपत्तुर्वहि स्वरवर्णत्वाद् दूरादपि दृश्यस्तत्रायं प्रयोगः ॥ ७ ॥ व्यापकविरुद्धोपलब्धिर्यथा। नात्र तुषारस्पर्शोऽमेरिति । प्रतिषेधस्य यद्व्यापकं तेन यद्विरुद्धं तस्योपलब्धिरुदाईतव्या । यथेति । अत्रेति धर्मी । तुपारस्पर्शो नेति साध्यम् । बढेरिति हेतुः । यत्र व्याप्य- स्तुषारस्पर्शो व्यापकश्च च शीतत्पर्शी न दृश्यस्तत्रायं हेतुः । तयोदृश्यत्वे स्वभावस्य व्यापकग्य चानुपलब्धिर्यतः प्रयोक्तव्या । तथा च सत्यभाव- साधनीयम् । दूरवर्तिनश्च प्रतिपत्तुस्तुषारस्पर्शः शीतस्पर्शविशेषः । शीतमात्र च परोक्षम् । वह्विस्तु रूपविशेषाद् दूरस्थोऽपि प्रत्यक्ष: । ततो वह्नः शीत- मात्राभावः । ततः शीतविशेषतुषारस्पर्शाभावनिश्चयः । शीतविशेषस्य शीतसामान्येन व्याप्तत्वादिति विशिष्टेविषयेऽस्या: प्रयोगः ॥ ८ ॥ कारणानुपलब्धिर्यथा । नात्र धूमोऽग्न्यभावादिति । प्रतिषेध्यस्य यत्कारणं तस्यानुपलब्धेरुदाहरणम् । यथेति । अत्रेति धर्मी । न धूम इति साध्यम् । वह्नयसत्वादिति हेतुः । यत्र कार्य सदपि दृश्यं न भवति तत्रायं प्रयोगः । दृश्ये तु कार्ये दृश्यानुपलब्धिर्गमिका । न तानि सन्नीति, ख० तानि न संती (अशुद्धः)। २ वढेः, ख. अग्नेः । ३ पदमिदं ख० पुस्तक एवं पश्यते । ४ पदमिदं ख० पुस्तके ने श्यते । ५ विशिष्ट०, ख० विशिष्टे। ६रयंम भवति, ख. अश्यं भवति ।

४० न्यायविन्दुः ततोऽयमप्यभावसाधनः । निष्कम्पायतसलिलपूरिते हदे हेमन्तोचित- बाष्पोद्गमे विरले संध्यातमसि सति सन्नपि तत्रं धूमो न दृश्य इति कारणानुपलब्ध्या प्रतिषेध्यते । वह्रिस्तु यदि तस्याम्भस उपरि प्लवमानो भवेज्ज्वलितो रूपविशेपादेवोपलब्धो भवेत् । अज्वलितस्त्विन्धेनमध्यनिविष्टो भवेत्तत्रापि दहनाधिकरणमिन्धनं प्रत्यक्षमिति स्वरूपेणाधाररूपेण वा दृश्य एव वह्निरिति तत्रास्याः प्रयोगः ॥ ६ ॥ कारणविरुद्धोपलब्धिर्यथा । नास्य रोमहर्षादिविशेषाः संनिहितदहनविशेषत्वादिति । प्रतिषेध्यस्य यत्कारणं तस्य यद्विरुद्धं तस्योपलब्धेरुदाहरणम् । यथेति । अस्येति धर्मी । रोम्णां हर्ष उद्भेदः स आदिर्येषां दन्तवीणादीनां शीतकृतानां ते विशिष्यन्ते तदन्येभ्यो भयश्रद्धादिकृतेभ्य इति रोमहर्षादि- विशेषाः । ते न सन्तीति साध्यम् । दहन एवं विशिष्यते तदस्माद्दहना- च्छीतनिवर्तनसामर्थ्यनेति दहनविशेष: । कश्चिदहन: सन्नपि न शीत- निवर्तनक्षमो यथा प्रदीपः । तादृशनिवृत्तये विशेषग्रहणम् । संनिहितो दहनविशेषो यस्य स तथोक्तस्तस्य भावस्तस्मादिति हेतुः । यत्र शीतस्पर्शः सन्नप्यदृश्यो रोमहर्षादिविशेषाश्चादृश्यास्तत्रायं प्रयोगः । रोमहर्षादिवि- शेषस्य दृश्यत्वे दृश्यानुपलब्धिः प्रयोक्तव्या । शीतस्पर्शस्य दृश्यत्वे कारणा- नुपलब्धिः । तस्मादभावसाधनोऽयम् । रूपविशेषाद्विदूरादहनं पश्यति । शीतस्पर्शस्त्वदृश्यो रोमहर्षादिविशेषाश्च । तेषां कारणविरुद्धोपलब्ध्याभाव: प्रतिद्यत इति । तत्रास्याः प्रयोगः ॥ १० ॥ कारणविरुद्धकार्योपलब्धिर्यथा । न रोमहर्षादिविशेष- युक्तपुरुषवानयं प्रदेशो धूमादिति । प्रतिषेध्यस्य यत्कारणं तस्य यद्विरुद्धं तस्य यत्कार्य" तस्योपलब्धिरुदा- १ पदमिदं ख० पुस्तके न विद्यते । २रश्यः, ख० दृश्यते । ३ प्रतिषेध्यते, ख० प्रतिषिध्यते । ४ ज्वलितः, ख० प्रज्वलितः। ५ इन्धन, ख० वन । ६ विशिष्यन्ते, ख. विशेष्यन्ते । ७ विशिष्यते, ख. विशेष्यते। ८ पदमिदं ख० पुस्तके नैवोपलभ्यते । ९ दहनविशेषस्यैव शीतानिवृत्ती कारणस्वात्, न दहनसामान्यस्य । (अशुद्धा), ख० भावम् । ११ कार्य, मुद्रितपुस्तके 'कार्य' (अशुद्धः)। १० । १०क० भाव द्वितीयपरिच्छेदः ४१ हर्तव्या | यथेति । अयं देश इति धर्मी। योगो युक्तं रोमहर्षादिविशेषै- र्युक्तं रोमहर्षादिविशेषयुक्तम् । तस्य सम्बन्धी पुरुषो रोमहर्षादिविशेषयुक्त- पुरुषः । तद्वान्न भवतीति साध्यम् । धूमादिति हेतुः । रोमहर्षादिविशे- षस्य प्रत्यक्षत्वे दृश्यानुपलब्धिः । कारणस्य शीतस्पर्शस्य प्रत्यक्षत्वे कारणा. नुपलब्धिः । बस्तु प्रत्यक्षत्वे कारणविरुद्धोपलब्धिः प्रयोक्तव्या । त्रया- णामप्यदृश्यत्वेऽयं प्रयोगः । तस्मादभावसाधनोऽयम् । तत्रं दूरस्थस्य प्रतिपत्तुर्दहनशीतस्पर्शरोमहर्षादिविशेषा अप्रत्यक्षाः सन्तोऽपि धूमस्तु प्रत्यक्षो यत्र तत्रैतत्प्रमागम् । धूमस्तु यादृशस्तस्मिन्देशे स्थितं शीतं निवर्तयितुं समर्थस्य वढेरनुमापकः स इह प्रायः । धूममात्रेण तु वह्नि- मात्रेऽनुमितेऽपि न शीतस्पर्शनिवृत्तिर्नापि रोमहर्षादिविशेषनिवृत्तिरवसातुं शक्येते ने धूममात्रं हेतुरिति द्रष्टव्यमिति ॥ ११ ॥ यदोकः प्रतिपेधहेतरुक्तः कथमेकादशाभावहेतव इत्याह- इमे सर्वे कार्यानुपलब्ध्यादयो दशानुपलब्धिप्रयोगाः स्वभावानुपलब्धौ संग्रहमुपयान्ति । इमेऽनुपलब्धिप्रयोगाः । इदमानन्तरप्रयोगान्ता" निर्दिष्टाः । तत्र कियतामपि ग्रहणे प्रसक्त अाह कार्यानुपलब्ध्यादय इति । कार्यानुपल- ब्ध्यादीनामपि त्रयाणां चतुर्णा वा ग्रहणे प्रसक्ते सत्याह" | दशेति । दशा- नामप्युदाहृतमात्राणां ग्रहणप्रसङ्ग सत्याह । सर्व इत्येतदुक्तं भवति । अप्र- युक्ता अपि प्रयुक्तोदाहरणसदृशाश्च सर्व एवेति दशग्रहणमन्तरेण सर्वग्रहणे क्रियमाणे प्रयुक्तोदाहरणकास्न्यं गम्येत । दशग्रहणात्तदाहरणकारन्येऽवगते सर्वग्रहणमतिरिच्यमानमुदाहृतसदृशकाावगतये जायते । ते म्वभावा- नुपलब्धौ संग्रहतादात्म्येन गच्छन्ति । स्वभावानुपलब्धिस्वभावा इत्यर्थः । - । १ देशः, ख० प्रदेशः । २ पदमिदं ख० पुस्तके नोपलभ्यते । ३ विशेषयुक्त०, ख. विशेषगुणयुक्त० । ४ रोमहर्षादि०, ख० रोमहर्ष० । ५ तत्र, क० यत्र । ६ तस्मिन्देशे, ख० तहशे। ७ पदमिदं क० पुस्तके न विद्यते । ८ 'विशेष' इति पाठो ख० पुस्तके न विद्यते । ९ पाठोऽयं क० पुस्तके नास्ति । १० प्रयोगान्ताः. क० प्रयोक्तान (अशुद्धः), ख० प्रक्रांता ११ सत्याह, क. त्याह (अशुद्धः)। १२ ख० पुस्तके 'सति' इति पाठो न विद्यते। १३ दशग्रहणात्तूदाहरण०, ख० दशग्रहणोदाहरण । ६न्या० ननु च स्वभावानुपलब्धिप्रयोगाद्भिद्यन्ते कार्यानुपलब्ध्यादयस्तत्कदम- न्तर्मषन्तीत्याह- पारम्पर्येणार्थान्तरविधिप्रतिषेधाभ्यां प्रयोगभेदेऽपि प्रयोगदर्शनाभ्यासात्स्वयमप्येवं व्यवच्छेदप्रतीतिर्भवतीति स्वार्थेऽप्यनुमानेऽस्याः प्रयोगनिर्देशः । प्रयोगभेदेऽपि । प्रयोगस्य शब्दव्यापारस्य भेदेऽपि अन्तर्भवन्ति । कथं प्रयोगभेद इत्याह । अर्थान्तरविधीत्यादि । प्रतिपेध्यादर्थादर्थान्तरस्य विधिरूपलब्धिः । स्वभावविरुद्धायुपलब्धिप्रयोगेषु प्रतिषेधः । कार्यानुप- लव्यादिप्रयोगेवार्थान्तशविधिनाऽर्थान्तरप्रतिषेधेन चः प्रयोगा भिद्यन्ते । यदि प्रयोगान्तरेष्वर्थान्तरविधिप्रतिषेधौ कथं तन्तिर्भवन्तीत्याह । पारम्प- र्येणेति । प्रणालिकयेत्यर्थः । एतदुक्तं भवति । न सातादेते प्रयोगा दृश्यानुपलब्धिमभिद्धति । दृश्यानुपलब्ध्यव्यभिचारिणं त्वर्थान्तरस्य विधि- निषेधं वाऽभिदधति । ततः प्रणालिकयाऽमीपां स्वभावानुपलब्धौ संग्रहो न साक्षादिति । यदि प्रयोगभेदेन भेदः परार्थानुमाने वक्तव्य एषः । शब्दभेदो हि प्रयोगभेदः । शब्दश्च परार्थानुमानमित्याशङ्कयाह प्रयोग- दर्शनेत्यादि । प्रयोगाणां शास्त्रघटितीनां दर्शनमुपलम्भः । तस्याभ्यास: पुनः पुनरावर्तनम् । तस्मानिमित्तात्स्वयमपीति प्रतिपत्तुरात्मनोऽप्येवमित्य. नम्तरोक्तन क्रमेण व्यवच्छेद्यस्य प्रतिषेधस्य प्रतीतिर्भवतीति । इति शब्दस्तस्मादर्थे । तदयमर्थः । यस्मात्स्वयमप्येवमनेनोपायेन प्रतिप- द्यते प्रयोगाभ्यासात्तस्मात्स्वप्रतिपत्तावप्युपयुज्यमानस्यास्य प्रयोगभेदस्य स्वार्थानुमाने निर्देशः । यत्पुनः परप्रतिपत्तावेवोपयुज्यते तत्परार्थानुमान एव वक्तव्यमिति । ननु च कार्यानुपलब्ध्यादिषु कारणादीनामदृश्यानामेव प्रतिषेधः दृश्यनिषेधे स्वभाषानुपलम्भप्रयोगप्रसङ्गात् । तथा च सति न तेषां *अर्थान्तरविधीत्यादि, लिखितपुस्तकयोः, अर्थान्तरविधीति । २ प्रतिषेध्यादर्थाः दर्थान्तरस्य, ख० प्रतिषेध्यादर्थान्तरस्या। ३ शब्दश्च, ख० शब्दस्तु । ४ घटितानाम, ख. परिघटितानाम् । ५'इति पदं ख. पुस्तके न विद्यते । ६ प्रतिषेधः, ख. निषेधः।

द्वितीयपरिच्छेदः ४३ दृश्यानुपलब्धेनिषेधस्तत्कथमेषां प्रयोगाणां दृश्यानुपलब्धामर्तभाव इत्याह- सर्वत्र चास्यामभावव्यवहारसाधन्यामनुपलब्धौ येषां स्वभावविरुद्धादीनामुपलब्ध्या कारणादीनामनुपलब्ध्या च प्रतिषेध उक्तस्तेषामुपलब्धिलक्षणप्राप्तानामेवोपलब्धिरनु- पलब्धिश्च वेदितव्या । अभावश्च तस्य च व्यवहारोऽभावव्यवहारी । स्वभावानुपलब्धावा- वव्यवहारः साध्यः । शिष्टेष्वभावः । तयोः साधन्यामनुपलब्धौ। सर्वत्र चेति चशब्दो हिशब्दस्यार्थे । यस्मात्सर्वत्रानुपलब्धी सत्यां येषां प्रतिषेध उक्तस्तेपामुपलब्धिलक्षणप्राप्तानां दृश्यानामेव से प्रतिषेधस्तस्माद् दृश्यानुप- लब्धावन्तर्भावः । कुत एतद्दृश्यानामे त्याह स्वभावेत्यादि । अत्रापि चकारो हेत्वर्थः । यस्मात्स्वभावविरुद्ध आदिपेषां तेषामुपलब्ध्या कारणमा- दिर्ये तेषामनुपलब्ध्या प्रतिषेध उक्तस्तस्माद् दृश्यानामेव प्रतिषेध इत्यर्थः । यदि नाम स्वभावविरुद्धाशुपलब्ध्या कारणाद्यनुपलब्ध्या च प्रति- षेध उक्तस्तथापि कथं दृश्यानामेव प्रतिषेध इत्याह उपलब्धिरित्यादि । अत्रापि चकारी हेत्वर्थः । यस्माद्ये विरोधिनो व्याप्यव्यापकभूता: कार्य- कारणभूताश्च ज्ञातास्तेषामवश्यमेवोपलब्धिरुपलब्धिपूर्वा चानुपलब्धिर्वेदि- तव्या | उपलब्ध्यनुपलब्धो च द्वे येषां स्तस्ते दृश्या एव । तस्मात्स्वभा- वविरुद्धायुपलब्ध्या कारणाधनुपलब्ध्या चोपलब्ध्यनुपलब्धिमतां विरुद्धा- दीनां प्रतिषेधः क्रियमाणो दृश्यानामेव कृतो द्रष्टव्यः । बहुषु चोयेषु प्रका- न्तेषु परिहारसमुच्चवार्थश्वकारो हेत्वों भवति । यस्मादिदं चेदं च समा- धानमस्ति तस्मात्तत्तयोखमयुक्तमिति चकारार्थः । कस्मात्पुनः प्रतिषेध्यानां विरुद्धादीनामुपलब्न्यनुपलब्धी वेदितव्ये अन्येषां विरोधकार्यकारणभावासिरिः। उपलब्ध्यनुपलब्धिमयोऽन्धेऽनुपलब्धा एवं मे तेषां विरोधश्च १ सस्वच व्यवहारः, ख० तड्यवहारमा । २ पदमिदंसपुस्तके मैचोपलम्यते । ३यामामेव, स. एश्यमानानामेव । ४ पदमिदं ख० पुस्तके न मिलते।

४४ न्यायविन्दुः कार्यकारणभावश्च केनचित्सहाभावश्च व्याप्यस्य व्यापकस्याभावेन सिध्यति यस्मात्ततो विरोधिकार्यकारणभावासिद्धेः कारणादुपलब्ध्यनुपलब्धिमन्त एव विरुद्धादयो निषेध्याः । उभयवन्तश्च दृश्या एव । तस्माद् दृश्यानामेव प्रतिषेधः । तदयमर्थः । विरोध: कार्यकारणभावश्च व्यापकाभावे व्याप्या- भावश्च दृश्यानुपलब्धेरैवेति । एकसंनिधावपराभावप्रतीतौ ज्ञातो विरोधः । कारणाभिमताभावे च कार्याभिमताभावप्रत्ययेऽवसितकार्यकारणभावः । व्यापकाभिमताभावे च व्याप्याभावे निश्चिते निश्चितो व्याप्यव्यापकभावः । तत्र व्याप्यव्यापकभावप्रतीतेनिमित्तमभावः प्रतिपत्तव्यः । इह गृहीते वृक्षाभावे हि शिंशपात्वाभावप्रतीतौ प्रतीतो व्याप्यव्यापकभावः । अभाव- प्रतिपत्तिश्च सर्वत्र दृश्यानुपलब्धेरेव । तस्माद्विरोधं कार्यकारणभावं व्याप्य. व्यापकभावं च स्मरता विरोधकार्यकारणभाकव्याप्यव्यापकभावविषयाभाव- प्रतिपत्तिनिबन्धनं दृश्यानुपलब्धिः स्मर्तव्या। दृश्यानुपलब्ध्यस्मरणे विरो- धादीनामस्मरणम् । तथा च सति न विरुद्धादिविधिप्रतिषेधाभ्यामितरा- भावप्रतीतिः स्यात् । विरोधादिग्रहणकालभाविन्यां च दृश्यानुपलब्धाव- वश्यस्मर्तव्यायां तत एवाभावप्रतीतिः । तत्र यद्यपि सम्प्रति नास्ति दृश्यानु- पलब्धिर्विरोधादिग्रहणकाले त्वासीत् । या दृश्यानुपलब्धिः सम्प्रति स्मर्य- माणा सैवाभावप्रतिपत्तिनिबन्धनम् । ततः सम्प्रति नास्ति दृश्योपलब्धि. रित्यभावसाधनत्वेन दृश्यानुपलब्धिप्रयोगाद्भिद्यन्ते कार्यानुपलब्ध्यादि- प्रयोगाः । विरुद्धविधिना कारणादिनिषेधेन च यतो दृश्यानुपलब्धिरा- क्षिप्ता ततो दृश्यानुपलब्धेरेव कालान्तरवृत्तायाः स्मृतिविषयभूताया अभाव- प्रतिपत्ति: । अमीषां च प्रयोगाणां दृश्यानुपलब्धावन्तर्भावः । तदनेन सर्वेण दृश्यानुपलब्धावन्तर्भावो दशानामनुपलब्धिप्रयोगाणां पारम्पर्येण दर्शित इति वेदितव्यम् । उक्ता दृश्यानुपलब्धिरभावेऽभावव्यवहारे साध्ये प्रमाणम् । अदृश्या- नुपलब्धिः किं स्वभावा किं व्यापारा चेत्याह- विप्रकृष्टविषयानुपलब्धिः प्रत्यक्षानुमानानिवृत्ति- विरोधा, ख० विरोधच । २ पदमिदं ख. पुस्तके न विद्यते । पुस्तके न विद्यते। इसम्प्रति नास्ति, ख सम्पतितनी। - .

द्वितीयपरिच्छेदः ४५ लक्षणा संशयहेतुः प्रमाणनिवृत्तावप्यर्थाभावासिद्धेरिति । विप्रकृष्टस्त्रिभिर्देशकालस्वभावविप्रकर्यस्याः विषयः सा विप्रकृष्टविष- येति संशयहेतुः। किं स्वभावा सेत्याह । प्रत्यक्षानुमाननिवृत्तिलक्षणं स्वभावो यस्याः सी प्रत्यक्षानुमाननिवृत्तिलक्षणा ज्ञानज्ञेयस्वभावेति यावत् । ननु च प्रमाणात्प्रमेयसत्ताव्यवस्था । ततः प्रमाणाभावात्प्रमेयाभावप्रतिपत्तिर्युक्ते- त्याह । प्रमाणनिवृत्तावपीत्यादि । कारणं व्यापकं च निवर्तमान कार्य व्याप्यं च निवर्तयेत् । न च प्रमाणं प्रमेयस्य कारणं नापि व्यापकमतः प्रमाणयोनिवृत्तावप्यर्थस्य प्रमेयस्य निवृत्तिर्न सिध्यति । ततोऽसिद्धेः संशय- हेतुरदृश्यानुपलब्धिः । न निश्चयहेतुः । यत्पुनः प्रमाणसत्तया प्रमेयसत्ता सिध्यति तद्युक्तम् । प्रमेयकार्य हि प्रमाणम् । न च कारणमन्तरेण कार्य- मस्ति । न तु कारणान्यवश्यं कार्यवन्ति भवन्ति । तस्मात्प्रमाणात्प्रमेयसत्ता व्यवस्थाप्या । न प्रमाणाभावात्प्रमेयाभावव्यवस्थेति ॥ इति न्यायविन्दुटीकायां द्वितीयः परिच्छेदः समातः । १ पदमिदं ख. पुस्तके नैवोपलभ्यते। २ लक्षणा, क लक्षणा। न ज्ञान ३ नत, ख०नचा चे अथ तृतीयपरिच्छेदः । स्वार्थपरार्थानुमानयोः स्वार्थ व्याख्याय परार्थं व्याख्यातुकाम आह- निरूपलिङ्गाख्यानं परार्थानुमानम् । त्रिहपलिङ्गाख्यानमिति । त्रीणि रूपाण्यन्त्रयव्यतिरेकपक्षधर्मत्वसंज्ञ- कानि थस्य तत्त्रिरूपम् । त्रिरूपं च तल्लिङ्गं च तस्याख्यानम् । आख्या- यते प्रकाश्यतेऽनेनेति त्रिरूपं लिङ्गमित्याख्यानम् । किं पुनस्तद्वचनम् । वचनेन हि त्रिरूपं लिङ्गमाख्यायते । परस्मादिदं परार्थम् । ननु सम्यग्ज्ञानात्मकमनुमानमुक्तम् । तत्किमर्थं सम्प्रति वचनात्म- कमनुमानमुच्यत इत्याह । कारणे कार्योपचारात् । कारणे कार्योपचारादिति त्रिरूपलिङ्गाभिधानास्त्रिरूपलिङ्गम्मृतिरुत्प- द्यते स्मृतेश्चानुमानम् । तस्यानुमानस्य परम्परया त्रिरूपलिङ्गाभिधानं कार- णम् । तस्मिन्कारणे वचने कार्यस्यानुमानस्योपचार: समारोपः क्रियते । तत: समारोपात्कारण वचनमनुमानशब्देनोच्यते । औपचारिकं वचनम- नुमानं न मुख्यमित्यर्थः । न च यावत्किंचिदुपचारादनुमानशब्देन वक्तुं शक्यं तावत्सर्वं व्याख्येयम् । किं त्वनुमानं व्याख्यातुकामेनानुमानस्वरूपस्य व्याख्येयत्यानिमित्तं व्याख्येयम् । निमित्तं च त्रिरूपं लिङ्गम् । तञ्च स्वयं वा प्रतीतमनुमानस्य निमित्तं भवति परेण वा प्रतिपादितं भर्वति । तस्मा- लिङ्गस्य स्वरूपं व्याख्येयं तत्प्रतिपादकश्च शब्दः । तत्र स्वरूपं स्वार्थानु- माने व्याख्यातम् । प्रतिपादकः शब्द इह व्याख्येयः । ततः प्रतिपादकं शब्दमवश्यं वक्तव्यं दर्शयन्ननुमानशब्देनोक्तवानाचार्य इति परमार्थः । १ ससिकं, क. लिङ्ग। २ पाटोऽत्र क० पुस्तके नैवोपलभ्यते। ३ औपचारिकम् , कोषचारकम् । “पदमिदं ख पुस्तक एवोपरून्यते । ५ बास्येवम् , ख०च म्याख्येवम् ।

द्वितीयपरिच्छेदः ४७ परार्थानुमानस्य प्रकारभेदं दर्शयितुमाह- तद्विविधं प्रयोगभेदात् । तद्विविधमिति । तदिति परार्थानुमानम् । द्वौ विधौ प्रकारौ यस्य तद्विविधम् । कुतो द्विविधमित्याह । प्रयोगस्य शब्दव्यापारस्य भेदात् । प्रयुक्तिः प्रयोगोऽर्थाभिधानम् । शब्दस्यार्थाभिधानव्यापारभेदाद्विविधम- नुमानम् । तदेवाभिधानव्यापारनिबन्धनं द्वैविध्यं दर्शथितुमाह- साधर्म्यवद्वैधय॑वच्चेति । समानो धर्मो यस्य सोऽयं सधर्मा तस्य भावः साधर्म्यम् । विसदृशो धर्मोऽस्य विधर्मा विधर्मणो भावो वैधर्म्यम् । दृष्टान्तधर्मिणा सह साध्य- धर्मिणः सादृश्यं हेतुकृतं साधर्म्यमुच्यते । असादृश्यं च हेतुकृतं वैधर्म्य- मुच्यते । तत्र यस्य साधनवाक्यस्य साधर्म्यमभिधेयं तत्साधर्म्यवत् । यथा यत्कृतकं तदनित्यं यथाद्यघटः । यथा च कृतक: शब्द इत्यत्र कृत- कत्वकृतं दृष्टान्तसाध्यधर्मिणोः सादृश्यमभिधेयम् । यस्य तु वैधर्म्यमभिधेयं तद्वैधर्म्यवत् । यथा यन्नित्यं तदकृतकं दृष्टं यथाकाशम् । शब्दस्तु कृतक इति । कृतकत्वाकृतकत्वकृतं शब्दाकाशयोः साध्यदृष्टान्तधर्मिणोरसादृश्य- मिहाभिधेयम् । यद्यनयोः प्रयोगयोरभिधेयं भिन्नं कथं तर्हि त्रिरूपं लिङ्गमभिन्न प्रकाश्य- मित्याह. नानयोरर्थतः कश्चिद्भेदोऽन्यत्र प्रयोगभेदात् । नानयोरर्थत इति । अर्थः प्रयोजनं प्रकायितव्यं वस्तु यदुद्दिश्यानु- माने प्रयुज्यते । तत: प्रयोजनार्दनयोन भेदः कश्चिन् । त्रिरूपं हि लिङ्गं प्रकाशयितव्यम् । तदुद्दिश्य द्वे अप्येते प्रयुज्यते । द्वाभ्यामपि त्रिरूपं लिङ्ग १ वाक्यमिदं ख० पुस्तके नोपलभ्यते । २ साधर्म्यववैविध्यवच्चेति । ३ धर्मोऽस्य, क० 'यव्य' (अशुद्धः) 'यस्य' इत्यस्य स्थाने, ख० धर्मोस्य । पुस्तके मध्यस्थं पाटं त्यक्त्वा 'साधर्म्यमभिधेयं यस्य तु वैधय॑मभिधेयम् ।' इति पाठो विद्यते। ५ क० शब्दः । त्यत्र । ९ख० 'अर्थः प्रयोजनं यत्प्रयोजनं प्रकाशयितव्यं वस्तु उद्दिश्या। ७ क. 'प्रकायितव्यस्तु ।' ८ अनयोः, ख. नानयोः। - ४ख० ४८ न्यायविन्दः प्रकाश्यत एव । ततः प्रकाशयितव्यं प्रयोजनमनयोरभिन्नम् । तथा च न ततो भेदः कश्चित् । अभिधेयभेदोऽपि तहिं न स्यादित्याह । अन्यत्र प्रयोगभेदादिति । प्रयोगोऽभिधानं वाचकत्वम् । वाचकत्वभेदादन्यो भेदः प्रयोजनकृतो नास्तीत्यर्थः । एतदुक्तं भवति । अन्यदभिधेयमन्यत्प्रकाश्यं प्रयोजनम् । तत्राभिधेयापेक्षया वाचकत्वं भिद्यते । प्रकाश्यं त्वभिन्नम् । अन्वये हि कथिते वक्ष्यमाणेन न्यायेन व्यतिरेकगतिर्भवति । व्यतिरेके चान्वयगतिः । ततस्त्रिरूपं लिङ्ग प्रकाश्यमभिन्नम् । न च यत्राभिधेयभेद- स्तत्र सामर्थ्यगम्योऽप्यर्थो भिद्यते । यस्मात्पीनो देवदत्तो दिवा न भुते। पीनो देवदत्तो रात्रौ भुत इति । अनयोर्वाक्ययोरभिधेयभेदेऽपि गम्य- मानमेकमेव । तद्वदिहाभिधेयभेदेऽपि गम्यमानं वस्त्वेकमेव । तत्र साधर्म्यवद्यदुपलब्धिलक्षणप्राप्तं सन्नोपलभ्यते सो- ऽसद्व्यवहारविषयः सिद्धः। तत्रेति । तयोः साधर्म्यवैधर्म्यवतोरनुमानयोः साधर्म्यवत्तावदुदाहर- णमुदाहर्तुमनुपलब्धिमाह यदित्यादिना । यदुपलब्धिलक्षणप्राप्तं यदृश्यं सन्नोपलभ्यत इति । अनेन दृश्यानुपलम्भोऽनूद्यते । सोऽसद्वयवहारस्य विषयः सिद्धः । तदसदिति ब्यवर्तव्यमित्यर्थः । अनेनासद्वयवहारयोग्य- स्वस्य विधिः कृतः । ततश्चासद्व्यवहारस्य योग्यत्वे दृश्यानुपलम्भो निय- त: कथितः । दृश्यमनुपलब्धमसद्व्यवहारयोग्यमेवेत्यर्थः । साधनस्य च साध्येऽर्थे नियतत्वकथनं व्याप्तिकथनम् । यथोक्तम् । व्याप्तिापकस्य तत्र भाव एव व्याप्यस्य च तत्रैव भाव इति । व्याप्तिसाधनस्य प्रमाणस्य विषयो दृष्टान्तस्तमेव दर्शयितुमाह- यथान्यः कश्चिदृष्टः शशविषाणादिः । यथान्य इति । साध्यधर्मिणोऽन्यो दृष्टान्त इत्यर्थः। दृष्ट इति प्रमा- णेन निश्चितः । शशविषाणं हि न चक्षुषा विषयीकृतम् । अपि तु प्रमा- १ 'उदादरणमुदाहतुं इति पाठो ख. पुस्तक एवोपलभ्यते, अन्यत्र तु 'उदाहरन्' इत्येवास्ति। २ पदमिदं ख० पुस्तके नोपलभ्यते । ३ योग्यत्वस्य, ख. योग्यत्वे । " व्याप्तिः, क० च्याप्ति। ५ च, क. वा। 4- तृतीयपरिच्छेदः ४६ णेन दृश्यानुपलम्भेनासद्व्यवहारयोग्यं विज्ञातम् । शशविषाणमादिर्यस्या- सद्व्यवहारविषयस्य स तथोक्तः । शशविषाणादौ हि दृश्यानुपलम्भमात्र- निमित्तोऽसद्व्यवहारः प्रमाणेन सिद्धः । तत एवं प्रमाणादनेन वाक्येना- भिधीयमाना व्याप्तिर्जातव्या । सम्प्रति व्यानि कथयित्वा दृश्यानुपलम्भस्य पक्षधर्मत्वं दर्शयितुमाह- नोपलभ्यते च क्वचित्प्रदेशविशेष उपलब्धि लक्षणप्राप्तो घट इति । नोपलभ्यते चेति । प्रदेश एकदेश: पृथिव्याः । स एव विशिष्य- तेऽन्यस्मादिति विशेष: । एक: प्रदेशविशेष इत्येकस्मिन्प्रदेशे क्वचि- दिति । प्रतिपत्तुः प्रत्यक्ष एकोऽपि प्रदेश: स एवाभावव्यवहाराधिकरणं यः प्रतिपत्तः प्रत्यक्षो नान्यः । उपलब्धिलक्षणप्राप्त इति दृश्य: । यथा चा- सतोऽपि घटस्य समारोपितमुपलब्धिलक्षणप्राप्नत्वं तथा व्याख्यातम । स्वभावहेतोः साधर्म्यवन्तं प्रयोगं दर्शयितुमाह ... तथा स्वभावहेतोः प्रयोगः यत्सत्तत्सर्वमनित्यं यथा घटादिरिति । तथेति । यथानुपलब्धेस्तथा स्वभावहेतोः साधर्म्यवान्प्रयोग इत्य- र्थः । यत्सदिति सत्त्वमनूद्य तत्सर्वमनित्यमित्यनित्यत्वं विधीयते । सर्व- ग्रहणं च नियमार्थम् । सर्वमनित्यं न किंचिन्नानित्यं यत्सत्तदनित्यमेवानि- त्यत्वादन्यत्र नित्यत्वे सत्वं नास्तीत्येवं सत्त्वमनित्यत्वे साध्ये नियतं ख्या- पितं भवति । तथा च सति व्याप्तिप्रदर्शनवाक्यमिदम् । यथा घटादि- रिति । व्याप्तिसाधनस्य प्रमाणस्य विषयकथनमेतत् । शुद्धस्य स्वभावहेतोः प्रयोगः । शुद्धस्येति । निर्विशेषणस्य स्वभावस्य प्रयोगः । ve - : १ शशविषाणादिः। २ मात्र०, ख० मात्रः। ३ बौद्धनये यत्सत्तत्सर्वमनित्यं घटा- दिवत् । न किविद्वस्तु तेषां मते नित्यमस्ति । ४ प्रयोगः । सविशेषणं, ख० प्रयोगस्य विशेषणम्। ७ न्या.

। ५० न्यायविन्दुः सविशेषणं दर्शयितुमाह- यदुत्पत्तिमत्तदनित्यमिति । यदुत्पत्तिमदिति । उत्पत्ति: स्वरूपलाभो यस्यास्ति तदुत्पत्तिमत् । उत्पत्तिमत्त्वमनूद्य तदनित्यमित्यनित्यत्वविधे': । तथा च सत्युत्पत्तिमत्त्वम- नित्यत्वे नियतमाख्यातम् । स्वभावभृतधर्मभेदेन स्वभावस्य प्रयोगः । स्भावभूतः स्वभावात्मको धर्मस्तस्य भेदेन भेदं हेतूकृत्य प्रयोगः । अनुत्पन्नेभ्यो हि व्यावृत्तिमाश्रित्योत्पन्नो भाव उच्यते। सैव व्यावृत्तिः । यदा व्यावृत्त्यन्तरनिरपेक्षा वक्तुमिष्यते तदा व्यतिरेकिणीव निर्दिश्यते । भावस्योत्पत्तिरिति । तया च व्यतिरिक्तयेवोत्पत्त्या विशिष्टं वस्तूत्पत्तिमदु- क्तम् । तेन स्वभावभूतेन धर्मेण कल्पितभेदेन विशिष्टः स्वभावः प्रयुक्तो द्रष्टव्यः । यत्कृतकं तदनित्यमित्युपाधिभेदेन । यत्कृतकमिति ! कृतकत्वमनूद्यानित्यत्वं विधीयत इति । अनित्यत्वे नियतं कृतकत्वमुक्तमतो व्याप्तिरनित्यत्वेन कृतकस्य दर्शिता । उपाधिभे- देन स्वभावस्य प्रयोग इति सम्बन्ध: । उपाधिर्विशेषणम् । तस्य भेदेन भिन्नेनोपाधिना विशिष्टः स्वभावः प्रयुक्त इत्यर्थः । इह कदाचिच्छुद्ध एवार्थ उच्यते । कदाचिदव्यतिरिक्तेन विशेषणेन विशिष्टः । कदाचिद्व्यतिरिक्तेन । देवदत्त इति शुद्धः । लम्बकर्ण इत्यभिन्नकर्णद्वयविशिष्टः । चित्रगुरिति व्यतिरिक्तचित्रगवीविशिष्टः । तद्वत्सत्त्वं शुद्धमुत्पत्तिमत्त्वमव्यतिरिक्तविशेष- णम् । कृतकत्वं व्यतिरिक्तविशेषणम् । ननु च चित्रगुशब्दे व्यतिरिक्तस्य विशेषणस्य वाचकश्चित्रशब्दो गोशब्दश्चास्ति । कृतकशब्दे तु निर्विशेषणवाचिनः शन्दस्य प्रयोगोऽस्तीत्या- शङ्कयाह । यस्य, ख०स यस्य । २ उत्पत्तिमत्, क० उत्पत्तिमत् , यदुत्पत्तिमदिति । ३ विधे, ख. विधिः। ४ नियतं म्यासमित्यर्थः। भनिस्यत्वे, क० भनियतत्वे ।

तृतीयपरिच्छेदः अपेक्षितपरव्यापारो हि भावः स्वभावनिष्पत्तौ कृतक इति । अपेक्षितेति । परेषां कारणानां व्यापारः स्वभावस्य निष्पत्ती निष्प- त्यर्थमपेक्षित: परव्यापारो येन स तथोक्तः । हीति यस्मादर्थे । यस्माद- पेक्षितपरव्यापारः कृतक उच्यते तस्माद्व्यतिरिक्तेन विशेषणेन विशिष्टः स्वभाव उच्यते । यद्यपि व्यतिरिक्तं विशेषणपदं ने प्रयुक्तं तथापि कृतक- शब्देनैव व्यतिरिक्त विशेषणमन्तर्भावितमत एव संज्ञाप्रकारोऽयं कृतकशब्दः । यस्मात्संज्ञायामयं कन्प्रत्ययो विहितः । यत्र च विशेषणमन्तर्भाव्यते तत्र विशेषणपदं न प्रयुज्यते । कचित्प्रतीयमानं विशेषणं यथा कृत इत्युक्ते हेतुभिरित्येतत्प्रतीयते । तत्र चं हेतुशब्दः प्रयुज्यते । कदाचिन्न वा प्रयुज्यते । प्रयुज्यमानस्वशब्दश्च यथा प्रत्ययभेदभेदिशब्दे प्रत्ययभेदः । एवं प्रत्ययभेदभेदित्वादयो द्रष्टव्याः । यथा च कृतकशब्दो भिन्न विशेषणस्वभावाभिधाय्येवं प्रत्ययभेदभेदि- त्वमादिर्येषां प्रयत्नानन्तरीयकत्वादीनां तेऽपि स्वभावहेतोः प्रयोगा भिन्न. विशेषणस्वभावाभिधायिनो द्रष्टव्याः । प्रत्ययानां कारणानां भेदो विशेष- स्तेन प्रत्ययभेदेन भेत्तुं शीलं यस्य स प्रस्ययभेदभेदी शब्दस्तस्य भाष: प्रत्ययभेदभेदित्वम् । ततः प्रत्ययभेदभेदित्वाच्छब्दस्य कृतकत्वं साध्यते । प्रयत्नानन्तरीयकत्वादनित्यत्वं साध्यते । तत्र प्रत्ययभेदशब्दो व्यतिरिक्त- विशेषणाभिधायी प्रत्ययभेदभेदिशब्दे प्रयुक्तः । प्रयत्नानन्तरीयकशन्दे च प्रयत्नशब्दः । तदेवं त्रिविधः स्वभावहेतुप्रयोगो दर्शितः । शुद्धोऽव्यतिरिक्त- विशेषणो व्यतिरिक्तविशेषणश्च । एवमर्थं चैतदाख्यातम् । वाचकभेदान्मा भूत्कस्यचित्स्वभावहेतावपि प्रयुक्त व्यामोह इति । सन्नुत्पत्तिमान्कृतको वा शब्द इति पक्षधर्मोपदर्शनम् । कृतकस्य लक्षणमिदम् । २ न, ख० न च। ३ विशेषणं, ख विशेषणपदम् । ४ इदं पदं ख० पुस्तके न विद्यते। ५ प्रत्ययभेदभेदिशब्दे, ख० प्रत्ययभेदशब्द। ६ पद. मिदं ख. पुस्तके नैवोपलभ्यते । ७क. प्रयोगः, स. योगः। एतदर्थम् । किबिदपि टीकाकारणास्योपरि न लिखितम् । ८ एवमर्थ, स.

स ५२ न्यायविन्दुः सर्व एते साधनधर्मा यथास्वं प्रमाणैः सिद्धसाधन. धर्ममात्रानुबन्ध एव साध्यधर्मेऽवगन्तव्याः । अथ किमेते स्वभावहेतवः सिद्धसंबन्धे स्वभावे साध्ये प्रयोक्तव्याः, आहोस्विदसिद्धसंबन्ध इत्याशङ्कथ सिद्धसंबन्धे प्रयोक्तव्या इति दर्शयितु- माह । सर्व एत इति । गमकत्वात्साधनानि पराश्रितत्वाच्च धर्माः साधन- धर्मा एव साधनधर्ममात्रम् । मात्रशब्देनाधिकस्यापेक्षणीयस्य निरासः । तस्यानुबन्धोऽनुगमनमन्त्रयः सिद्धः साधनधर्ममात्रानुबन्धो यस्य तथोक्तः । केन सिद्ध इत्याह । यथा स्वं प्रमाणैरिति । यस्य साध्यधर्मस्य यदात्मीयं प्रमाणं तेनैव प्रमाणेन सिद्ध इत्यर्थः । स्वभावहेतूनां च बहुभे- दत्वात् । संबन्धसाधनान्यपि प्रमाणानि बहूनीति प्रमाणैरिति बहुवचन- निर्देशः । गमयितव्यत्वात्साध्यः पराश्रितत्वाश्च धर्मः साध्यधर्मस्तदयं परमार्थः । न हेतुः प्रदीपवद्योग्यतया गमकोऽपि तु नानन्तरीयकतया विनिश्चितः । माध्याविनाभावित्वनिश्चयनमेव हि हेतोः साध्यप्रतिपादन- व्यापारो नान्यः कश्चित् । प्रथमं बाधकेन प्रमाणेन साध्यप्रतिबन्धो निश्चेतव्यो हेतोः पुनरनुमानकालेन साधनं साध्यानन्तरीयकं सामान्येन स्मर्तव्यम् । कृतकत्वं नामानित्यत्वस्वभावमिति सामान्येन स्मृतमर्थ पुनर्विशेषे योजयतीदमपि कृतकत्वं शब्दे वर्तमानमनित्यस्वभावमेवेति । तत्र सामान्यस्मरणं लिङ्गज्ञानम् । विशिष्टस्य तु शब्दगतकृतकस्यानित्यत्व- स्वभावस्य स्मरणमनुमानज्ञानम् । तथा च सत्यविनाभावित्वज्ञानमेव परोक्षार्थप्रतिपादकत्वं नाम । तेन निश्चिततन्मात्रानुबन्धिसाध्यधर्मे स्वभावहेतवः प्रयोक्तव्या नान्यत्रेत्युक्तम् । यद्येवं सम्बन्धो निश्चेतव्यः । साध्यस्य साधनेन सह साधनधर्म- मात्रानुबन्धस्तु साध्यस्य कस्मानिश्चितो मृग्यत इत्याह । तस्यैवेति । सिद्धसाधनधर्ममात्रानुबन्धस्य । गमकत्वात्, क. गमत्वात् । २'इति' इति पाठः ख. पुस्तके नोपलभ्यते । ३ पाठोऽयं ख. पुस्तके नोपलभ्यते । ४ 'हि' इति पाठः ख० पुस्तके नैवोपलभ्यते । ५स्मृतमर्थम्, ख० स्मृतमर्थाय । ६ नायं तस्यैवेति' मूलेऽवलोक्यते । तस्मादस्माकं सम्मतौ किश्चिच्छब्दं बाक्यं वाऽऽत्र परित्यक्तम् , मूलपुस्तकस्य लेखकेन प्रमादवसात् ।

तृतीयपरिच्छेदः ५३ तत्स्वभावत्वात्स्वभावस्य च हेतुत्वात् । तत्स्वभावत्वादिति । साधनधर्मस्वभावत्वात् । यो हि साध्यधर्मः साधनधर्ममात्रानुबन्धवान्स एव तस्य साधनधर्मस्य स्वभावो नान्यः । भव- स्वीडश एव स्वभावः । स्वभाव एव तु साध्ये कस्माद्धेतुप्रयोगः । स्वभावस्य हेतुत्वात् । स्वभाव 'इह हेतुः प्रक्रान्तः । तस्मात्स एव साध्यः कर्तव्यः । यः साधनस्य स्वभावः स्यात्साधनधर्ममात्रानुबन्धश्च स्वभावो नान्यः । यदि साध्यधर्मः साधनस्य स्वभावः प्रतिज्ञार्थंकदेशरतर्हि हेतुः स्यादित्याह । वस्तुतस्तयोस्तादात्म्यात्तन्निष्पत्तावनिष्पन्नस्य तत्स्वभा- वत्वाभावाव्यभिचारसंभवाच्च । वस्तुत इति । वस्तुतः परमार्थत: साध्यसाधनयोस्तादात्म्यम् । समारोपितस्तु साध्यसाधनयोर्भेदः । साध्यसाधनभावो हि निश्चयारूढे रूपे। निश्चयारूढं च रूपं समारोपितेन भेदेनेतरव्यावृत्तिकृतेन भिन्नमित्य- न्यत्साधनमन्यत्साध्यम् । दूराद्धि शाखादिमानर्थो वृक्ष इति निश्चीयते न शिंशपेति । अथ च स एव वृक्षः । सैव शिंशपा । तम्मादभिन्नमपि वस्तु निश्चयो भिन्नमादर्शयति व्यावृत्तिभेदेन । तस्मानिश्चयारूढरूपापेक्षयान्य. साधनमन्यत्साध्यम् , अतो न प्रतिज्ञार्थंकदेशों हेतुर्वास्तवं च तादात्म्य- मिति । कस्मात्पुनः साधनधर्ममात्रानुबन्ध्येवं साभ्यः स्वभावो नान्य इत्याह । तनिष्पत्ताविति । यो हि यन्नानुबध्नाति स तनिष्पत्तावनिष्पन्नः। तस्य तनिष्पत्तावनिष्पन्नस्य साधनस्वभावत्वमयुक्तम् । यतो निष्पत्स्यनि- प्पत्ती भावाभावरूपे । भावाभावी च परस्परपरिहारण स्थिती। यदि च पूर्वनिष्पन्नस्यानिष्पन्नस्य चैक्यं भवेत् , एकस्यैवार्थस्य भावाभावौ स्यातां युगपन्न च विरुद्धयोर्भावाभावयोरैक्यं युज्यते । विरुद्धधर्मसंसर्गात्मकत्वा- १ इह, ख० एव । २ अनुबन्धश्च स्वभावः, ख. अनुबन्धाश्च भावः। ३ साध्य. साधनयो, ख. साध्यसाधनभेदः । ४ 'अर्थोः इत्यस्य स्थाने मुद्रितपुस्तके 'अयो' इति पाठोवियते । यश्चास्माकं सम्मती अशुद्ध एष। ५ अनुबन्ध्येव, ख० अनुवन्धे च। क.स तक्षिपसावनिप्पलस्य साधन।

५४ न्यायविन्दुः देकत्वाभावस्य । किं च पश्चादुत्पद्यमानं पूर्वनिष्पन्नाद्भिन्नहेतुकम् । हेतु- भेदपूर्वकश्च कार्यभेदः । ततो निष्पन्नानिष्पन्नयोविरुद्धधर्मसंसर्गात्मको भेदो भेदहेतुश्च कारणभेद इति कुन एकत्वम् । तस्मात्साधनधर्ममात्रानु- बन्ध्येव साध्यः स्वभावो नान्यः । मा भूत्पश्चान्निष्पन्न: पूर्वजस्य स्वभावः । साध्यस्तु कस्मान्न भवतीत्याह । पूर्वजेन पश्चानिष्पन्नस्य व्यभिचारः परि- त्यागो यस्तस्य संभवाच्च । न पूर्वनिष्पन्नस्य पश्चानिष्पन्नः साध्यः । तस्मात्साधनधर्ममात्रानुवन्ध्येव स्वभावः । स एव च साध्याः । तथा च सिद्धसाथनधर्ममात्रानुबन्ध एव स्वभावहेतवः प्रयोक्तव्या इति स्थितम् । कार्यहेतोरपि प्रयोगः । यत्र धूमस्तत्राग्निर्यथा महानसादावस्ति चेह धूम इति । इहापि सिद्ध एव । कार्यकारणभावे कारणे साध्ये कार्यहेतुर्वक्तव्यः । कार्यहेतोः प्रयोगः साधर्म्यवानिति प्रकरणादपेक्षणीयम् । यत्र धूम इति । धूममनूद्य तत्राग्निरित्यग्नेविधिः । तथा च नियमार्थः पूर्ववदनु- गन्तव्यः । तदनेन कार्यकारणभानिमित्ता व्याप्तिर्दर्शिता । व्याप्तिसाधन- प्रमाणविषयं दर्शयितुमाह । यथा महानसादाविति । महानसादौ हि प्रत्यक्षानुपलम्भाभ्यां कार्यकारणभावात्माविनाभावो निश्चित: । अस्ति चेहेति । साध्यधर्मिणि पक्षधर्मोपसंहारः । इहापीति । न केवलं स्वभावहेता- विहापि कार्यहेतौ सिद्ध एवेति । निश्चिते कार्यकारणत्वे कार्यकारणत्व निश्चयो ह्यवश्यकर्तव्यः । यतो न योग्यतया हेतुर्गमकोऽपि तु नान्तरीयक- त्वादित्युक्तम् । साधर्म्यवान्स्वभावकार्यानुपलम्भानां प्रयोगो दर्शितः । वैधवन्तं दर्शयितुमाह- वैधर्म्यवतः प्रयोगो यत्सदुपलब्धिलक्षणप्राप्तं तदु- पलभ्यत एव । यथा नीलादिविशेषः। न चैवमिहोप- १ स्वभावः । स एव च साध्यः। तथा च सिद्धसाधन०, ख० यः स्वभावः स एव च साध्यस्वभावः सिसाधन । २ स्वभावहेतवः, स्व० स्वभावे स्वभावहेतवः । ३ अग्ने, ख० अग्निः । ४ कार्यहेती, ख० कार्यहेतोः। ५ कार्यकारणस्व० ख० कार्यकारणभाव। . .

तृतीयपरिच्छेदः लब्धिलक्षणप्राप्तस्य सत उपलब्धिर्घटस्येत्यनुपलब्धि- प्रयोगः। -- वैधर्म्यवत इति । यत्सदुपलब्धिलक्षणप्राप्तमिति । यत्सादृश्यमित्यस्ति- त्यानुवादः। तदुपलभ्यते इति उपलम्भविधिः । तदनेन दृश्यस्य सत्त्वं दर्शनविषयत्वेन व्याप्तं कथितमसत्त्वनिवृत्तिश्च । सत्त्वमनुपलम्भनिवृत्तिश्चो- पलम्भः । तेन साध्यनिवृत्यनुवादेन साधननिवृत्तिविहता । तथा च साध्य- निवृत्तिः साधननिवृत्तौ नियतत्वात्साधननिवृत्त्या व्याप्ता कथिता । यदि च धर्मिणि साध्यधर्मो न भवेद्धतुरपि । हेत्वभावेन साध्याभावस्य व्याप्त- त्वात् । अस्ति च हेतुरतो व्यापकस्य साधनाभावस्याभावाद्वयाप्यस्य साध्या- भावस्याभाव इति साध्यनिश्चयो भवति । ततो वैधर्म्यप्रयोगे साधना- भावे साध्याभावो नियतो दर्शनीयः सर्वत्रेति न्यायः । स्वभावहेतोवैधर्म्यप्रयोगमाह- असत्यनित्यत्वे नास्ति सत्त्वमुत्पत्तिमत्त्वं कृतकत्वं वा । असंश्व शब्द उत्पत्तिमान्कृतको वेति स्वभावहेतोः प्रयोगः। असत्यनित्यत्व इति । इहानित्यत्वस्य साध्यस्याभावो हेतोरभावे नियंत उच्यते । तेन हेत्वभावेन साध्याभावो व्याप्त उक्तः । त्रिष्वपि स्वभावहेतुषु सन्नुत्पत्तिमान्कृतको वा शब्द इति त्रयाणामपि पक्षधर्मत्व- प्रदर्शनम् । इह च साधनाभावस्य व्यापकस्याभाव उक्तः । ततो व्याप्योऽपि साध्याभावो निवृत्त इति साध्यगतिः । कार्यहेतोवैधर्म्यप्रयोगमाह- असत्यमौ न भवत्येव धूमोऽत्र चास्तीति कार्य- हेतोः प्रयोगः। असत्यग्नाविति । इहापि वह्नयभावो धूमाभावेन व्याप्त उक्तः । 'हेतुरपि' इति पाठः क. पुस्तके नोपलभ्यते। २ नियतः ख. २नियतः ख० नियमः। ३ मुद्रितपुस्तकस्य 'अनिस्वस्यः इति पाठोऽशुद्धः प्रतीयते । . नियतः, ख नियमः। ५ निवृत्तः, ख. निवर्तते। ६ वैधयंप्रयोगम् , स्व० वैधय॑वस्प्रयोगम् । - । न्यायविन्दुः अस्ति चात्र धूम इति व्यापकस्य धूमाभावस्याभाव उक्तः । ततो व्याप्यस्य वह्नयभावस्याभावे साध्यगतिः । ननु च साधर्म्यवेति व्यतिरेको नोक्तः । वैधर्म्यवति चान्वयः । तत्कथमेतत्रिरूपलिङ्गाख्यानमित्याह- साधम्र्येणापि हि प्रयोगेऽर्थाद्वैधर्म्यगतिरिति । असति तस्मिन्साध्येन हेतोन्वयाभावात् । साधयेणेति । साधर्म्यणाप्यभिधेयेन युक्ते प्रयोगे क्रियमाणेऽर्थादिति सामर्थ्यद्वैधर्म्यस्य व्यतिरेकस्य गतिर्भवतीति । हीति यस्मात् । तस्मास्त्रि- रूपलिङ्गाख्यानमेतत् । यदि नाम व्यतिरेकोऽन्धयवति नोक्तो तथाप्यऽ. न्वयवचनसमादेवावसीयते । कथम् ? असति तस्मिन्व्यतिरेके बुद्धध- ध्यवसिते साध्येन हेतोरन्वयस्य बुद्धयोवसितस्याभावात् । साध्ये नियत साधनमन्वयवाक्यादवस्यता साध्याभावे साधनं नाशङ्कनीयम् । इतरथा साध्यनियतमेव न प्रतीतं स्यात्साध्याभावे च साधनाभावगतिर्व्यतिरेक- गतिः । अत: साध्यनियतस्य साधनस्याभिधानसामर्थ्यादन्वयवाक्येऽवसितो व्यतिरेकः । तथा वैधम्र्येणाप्यन्वयगतिः । अमति तस्मिन् साध्याभावे हेत्वभावस्यामिः। तथेति । यथान्वयवाक्ये तथार्थादेव वैधयेण प्रयोगेऽन्वयस्यानभि- धीयमानस्यापि गतिः । कथमसति तस्मिन्नन्वये बुद्धिगृहीते ते साध्याभावे हेत्वभावस्यासिद्धेग्नवसायात । हेत्वभावे साध्याभावं नियतं व्यतिरेकवा. क्यादवस्यता हेतुसम्भवे साध्याभावो नाशङ्कनीयः । इतरथा हेत्वभावे नियतः साध्याभावो न स्यात्प्रतीतः । हेतुसत्त्वे च साध्यसत्त्वगतिरन्वय- गतिः । अत: साधनाभावनियतस्थ साध्याभावस्याभिधानसामर्थ्याव्यतिरेक- वाक्येऽन्वयगतिः । १ साधम्यवति व्यतिरेकः, ख० साधर्म्यव्यतिरेकः । २ 'इति' इति पाठः स्व० पुस्तके नैवोपलभ्यते। ३ख० तथाप्यन्वयवचनसामर्थ्यात्। ४ का व्यतिरेक० । ५ वर बुद्ध्यवसितस्य । ६ पदमिदं ख० पुस्तके नावलोक्यते । ७०साबसाव।

- तृतीयपरिच्छेदः यदि नामाकाशादी साध्याभावे साधनाभावस्तथापि किमिति हेतु- सम्भवे साध्यसम्भव इत्याह- न हि स्वभावप्रतिबन्धे सत्येकरय निवृत्तावप- रस्य नियमेन निवृत्तिः । नहीति । स्वभावेन प्रतिबन्धो यस्तस्मिन्नमत्येकस्य साध्यम्य निवृत्या नापरस्य साधनस्य नियमेन युक्ता नियमवती निवृत्तिः । स च द्विप्रकारः । सर्वस्य तादात्म्यलक्षणस्तदुत्पत्ति- लक्षणश्वेत्युक्तम् । स च स्वभावप्रतिबन्धो द्विप्रकार: सर्वस्य । तादात्म्यं लक्षणं निमित्त यस्य स तथोक्तः । तदुत्पत्तिलक्षणं निमित्तं यस्य स तथोक्तः । यो यत्र प्रतिबद्धस्तस्य स प्रतिबन्धविषयोऽर्थः स्वभावः कारणं वा स्यात् । अन्य- स्मिन्प्रतिबद्धत्वानुपपत्तेः । तस्माद्विप्रकार: स इत्युक्तम् । स च साध्येऽर्थे लिङ्गस्येत्यत्रान्तरेऽभिहितः । तेन हि निवृत्तिं कथयता प्रतिबन्धो दर्शनीयः । हिर्यस्मादर्थे । यस्मात्स्वभावप्रतिबन्धे निवर्त्यनिवर्तकभावस्तेन साध्यस्य निवृत्तौ साधनस्य निवृत्तिं कथयता प्रतिबन्धो निवर्त्य निवर्तकयोद- र्शनीयः । तस्मान्निवृत्तिवचनमाक्षिप्तप्रतिबन्धोपदर्शनमेव भवति । यदि हि साधनं साध्ये प्रतिबद्धं भवदेवं सानिवृत्तौ तनियमेन निवर्तेत । यतश्च तस्य प्रतिबन्धो दर्शनीयातस्मात्साध्यनिवृत्तौ यत्माधन- निवृत्तिवचनं तेनातिप्तं प्रतिबन्धोपदर्शनम् । यच्च तदाक्षिप्तप्रतिबन्धोपदर्शनं तदेवान्वयवचनम् । प्रतिबन्धश्चेदवश्य दर्शयितव्यः । न वक्तव्यातमुन्वयः । यच्च प्रतिबन्धोपदर्शनं तदेवान्वयवचनमित्येकेनापि वाक्येनान्वयमुखेन व्यतिरेकमुखेन वा प्रयुक्तेन सपक्षा- १ ख. सर्वस्य प्रतिबद्धस्य। २ 'तत्' इति पदं ख० पुस्तके नोपलभ्यते। १० तेनाक्षिप्त प्रतिबन्धोपदर्शनम् तदेवान्वयवचनम् । न्या.

५८ न्यायविन्दुः सपक्षयोलिङ्गस्य सदसत्त्वख्यापनं कृतं भवतीति नाव- श्यवाक्यद्वयप्रयोगः। यस्मादृष्टान्ते प्रमाणेन प्रतिबन्धो दर्यमान एवान्वयो नापरः कश्चित्तस्मानिय॑निवर्तकप्रतिबन्धो ज्ञातव्यः । तथा चान्वय एव ज्ञातो भवति । इतिशब्दो हेतौ। यस्मादन्वये व्यतिरेकगतिर्व्यतिरेके चान्वय- गतिस्तस्मादे केनापि सपक्षे चासपक्षे च सत्त्वासत्त्वयोः ख्यापनं कृतम् । अन्वयो मुखमुपायोऽभिधेयत्वाद्यस्य तदन्वयमुखं वाक्यम् । एवं व्यतिरेको मुखं यस्येति । इति हेतौ। यस्मादेकेनापि वाक्येन द्वयगतिस्तस्मादेक- स्मिन्साधनवाक्ये द्वयोरन्धयव्यतिरेकवाक्ययोरवश्यमेव प्रयोगो कर्तव्यः । अर्थगत्यर्थो हि शब्दप्रयोगः । अर्थश्चेदवगतः किं शब्दप्रयो- गेण । एकमेव त्येन्वयवाक्यं व्यतिरेकवाक्यं वा प्रयोक्तव्यम् । अनुपलब्धावपि यत्सदुपलब्धिलक्षणप्राप्तं तदुपल- भ्यत एवेत्युक्तेऽनुपलभ्यमानं तादृशमसदिति प्रतीतेरन्वय- सिद्धिः। अनुपलब्धावपि व्यतिरेकेगो क्तेनान्वयगतिः । यत्सदुपलब्धिलक्षण- प्राप्तमिति । साध्यस्यासद्वयवहारयोग्यत्वस्य निवृत्तिदृश्यसत्वरूपमाह तदुपलभ्यत एवेति । अनुपलम्भस्य निवृत्तिमुपलम्भरूपामाह | तदनेन साध्यनिवृत्ति: साधननिवृत्या व्याप्ता दर्शिता । यदि च साधनसम्भवेऽपि साध्यनिवृत्तिर्भवेन्न साधनाभावेन व्याप्ता भवेत् । अतो व्याप्ति प्रतिपद्य- मानेन साधनसम्भवः साध्यसम्भवेन व्यातः प्रतिपत्तव्यः । अत एवा- हानुपलभ्यमानतादृशमिति । दृश्यमसदिति प्रतीतेः संप्रत्ययादन्वय- सिद्धिरिति । द्वयोरप्यनयाः प्रयोगेऽवश्यं पक्षनिर्देशः । १निवर्त्य निवर्तक०, ख. निवर्य निवर्तकयोः । २ अन्वये, ख० अन्वयेऽपि । ३० इतिकरणो हेतौ। ४ 'तु' इति पदं ख. पुस्तके नास्त्येव । ५ उक्केन, ख. युकन। ६० व्याप्तिप्रतिपयमानेन । ७ पदमिदं क. पुस्तके न विद्यते ।

तृतीयपरिच्छेदः ५६ यतश्च साधनं साध्यधर्मप्रतिबद्धं तादात्म्यतदुत्पत्तिभ्यां प्रतिपत्तव्यं द्वयोरपि प्रयोगयोस्तस्मात्पक्षोऽवश्यमेव न निर्देश्यः । यत्साधनं साध्यनियतं प्रतीतं तत एव साध्यर्मिणि दृष्ट्या साध्य- प्रतीतिरतो न किंचित्साध्यनिर्देशेनेत्येवमेवार्थमनुपलब्धिप्रयोगे दर्शयति । यस्मात्साधर्म्यवत्प्रयोगेऽपि यदुपलब्धिलक्षणप्राप्त सन्नोपभ्यते सोऽसयवहारविषयः । साधर्म्यवति प्रयोगेऽपि सामर्थ्यादेव नेह घट इति भवति । किं पुनस्तत्सामर्थ्यमित्याह । यदुपलब्धिलक्षणप्राप्तमिति । अनुपलम्भानुवादः सोऽसद्वयवहारविषय इत्यसद्व्यवहारयोग्यत्वविधिः । तथा च सति दृश्या- नुपलम्भोऽसद्वयवहारयोग्यत्वेन व्याप्तो दर्शितः । नोपलभ्यते चात्रोपलब्धिलक्षणप्राप्तो घट इत्युक्ते सामर्थ्यादेव नेह घट इति भवति । नोपलभ्यत इत्यादिना साध्यधर्मिणि सत्वं लिङ्गस्य दर्शितम्। यदि च साध्यधर्मस्तत्र साध्यधर्मिणि न भवेत्साधनधर्मोऽपि न भवेत् । साध्य- नियतत्वात्तस्य साधनधर्मस्येति सामर्थ्यम् । तथा वैधर्म्यवत्प्रयोगेऽपि यः सद्व्यवहारविषय उप- लब्धिलक्षणप्राप्तः स उपलभ्यत एव न तथात्र तादृशो घट उपलभ्यत इत्युक्ते सामर्थ्यादेव नेह सद्व्यवहार- विषय इति भवति । यथा साधर्म्यवत्प्रयोगे तथा वैर्धम्यवत्प्रयोगेऽपि सामर्थ्यादेव नेह सद्वयवहारविषयोऽस्ति घट इति भवति । सामर्थ्य दर्शयितुमाह । यः सद्वयवहारविषय इति विद्यमानः । उपलब्धिलक्षगप्राप्त इति दृश्यः । इत्येषा साध्यनिवृत्तिरुपलभ्यत एवेति साधननिवृत्तिरित्यनेन न साध्य- १ख० पुस्तकस्य पाठः 'प्रयोगयोः' इत्यस्मादारभ्य 'घट इति भवति' पर्यन्तं न सम्यक्पठयते। २ यदुपलब्धिलक्षणप्रासमिति, ख. यदुपलब्धिलक्षणप्राप्तं समोपलभ्यत इति । ।

६० न्यायविन्दुः निवृत्तिः साधननिवृत्त्या व्याप्ता दर्शिता । न तथेति । यथान्यो दृश्य उपल- भ्यते न तथात्र प्रदेशे तादृश इति दृश्यो घट उपलभ्यत इत्यनेन सान्य. निवृत्तेापिका साधननिवृत्तिरसती साध्यधर्मिणि दर्शिता । कीदृशः पुनः पक्ष इति निर्देश्यः । यदि च न साध्यधर्मः साध्यर्मिणि भवेत्साधनधर्मोऽपि न भवे- दस्ति च साधनधर्म इति सामर्थ्यात्ततः सामर्थ्यान्नास्त्यत्र घट इति प्रती- तेर्न पक्षनिर्देशः । एवं कार्यस्वभावहेत्वोरपि सामर्थ्यात्सम्प्रत्यय इति न पनिर्देशः । कीदृशः पुनरर्थः पक्ष इत्यनेन शब्देन निर्देश्यो वक्तव्य इत्याह । स्वरूपेणैव स्वयमिष्टोऽनिराकृत पक्ष इति । स्वरूपेगैवेति । साध्यत्वेनैव स्वयमिति वादिना इष्ट इति नोक्त एवापि त्विष्टोऽपीत्यर्थः । एवंभूतः मन्प्रत्यक्षादिभिरनिराकृतो योऽर्थः स पक्ष इत्युच्यते । अथ यदि न पक्षो निर्देश्यः कथमनिर्देश्यस्य लक्षणमुक्तम् । न साधनवाक्यावय रत्वादस्य लक्षणमुक्तमपि त्वसाध्यं केचित्साध्यं साध्यं चासाध्यं प्रतिपन्नाः । तत्साध्यासाध्यविप्रतिपत्तिनिराकरणार्थ पक्षलक्षण- मुक्तम् । स्वरूपेणेति साध्यत्वेनेष्टः । स्वरूपेणैवेति साध्य- त्वेनेष्टो न साधनत्वेनापि । स्वरूपेणेष्ट इत्यस्य विवरणम | साध्यत्वेनेष्ट इति पक्षस्य साध्यत्वा- नापरमस्तिरूपम् । अत: म्वरूपं साध्यत्वमिति । एवशब्दं विवरीतुमाह । स्वरूपेणैवेति । ननु चैवशब्द: केवल एव प्रत्यवमटव्यस्तत्किमर्थं स्वरूपशब्देन सह प्रत्यवमृष्टः । उच्यते । एवशब्दो निपातो द्योतकः । पदान्तराभिहितस्या- र्थस्य विशेषं द्योतयतीति पदान्तरेण विशेष्यवाचिना सह निर्दिष्टः । न १ मुद्रितपुस्तकस्य 'इष्टो किराकृतः' इति पाठोऽशुद्धः प्रतीयते। २ क० साध्यत्वे- वास्वमिति । ३ अर्थः, ख० अर्थो यः । ४ असाध्यं केचिरसाध्यं साध्यं चासाध्यं प्रसिपनाः, ख. असाध्यं किंचिरसाध्यं साध्यं चासाध्यं केचिरप्रतिपत्राः । र्थम् , ख० तस्कथम् । - .

तृतीयपरिच्छेदः ६१ साधनत्वेनापीति । यत्साधनत्वेन निर्दिष्टं तत्साधनत्वेनेष्टमसिद्धत्वाच्च सान्यत्वेनापीष्टं तस्य निवृत्त्यर्थ एवशब्दः तदुदाहरति । यथा शब्दस्यानित्यत्वे साध्ये चाक्षुषत्वं हेतुः । यथेति । शब्दस्यानित्यत्वे साध्ये चाक्षुषत्वं हेतुः । शब्देऽसिद्धत्वात्साध्यं न पुनस्तदिह साध्यत्वेनैवेष्टं साधनत्वेनाप्यभिधानात् । शब्देऽसिद्धत्वात्साध्यमित्यनेन साध्यत्वेनेष्टिमाह । तदिति । चाक्षु- षत्वमिहेति शब्दे न साध्यत्वेनैवेष्टमिति । साध्यत्वेनेष्टिनियमाभाव. माह । साधनत्वेनाभिधानादिति । यतः साधनत्वेनाभिहितमतः साधन- त्वेनापीष्टम् । न साध्यत्वेनैवेति । स्वयमिति वादिना यस्तदा साधनमाह । एतेन यद्यपि कचिच्छास्त्रे स्थितः साधनमाह । तच्छास्त्रकारेण तस्मिन्धर्मिण्यनेकधर्माभ्युपगमेऽपि यस्तदा तेन वादिना धर्मः स्वयं साधयितुमिष्टः स एव साध्यो नेतर इत्युक्तं भवति । स्वयमित्यनेन स्वयंशब्दं व्याख्येयमुपक्षिप्य तस्यार्थमाह । वादिनेति । स्वयंशब्दो निपात: । आत्मन इति षष्ठ्यन्तस्यात्मनेति च तृतीयान्तस्यार्थे वर्तते । तदिह तृतीयान्तस्यात्मशब्दस्यार्थे वृत्त: स्वयंशब्दः । आत्मशब्दश्च सम्बन्धिशब्दो वादी च प्रत्यासन्नभूतो यस्य वादिन आत्मा तृतीयार्थयुक्तः स एवं तृतीयार्थयुक्तो निर्दिष्टो वादिनेति । ननु स्वयंशब्दस्य वादिने. त्येष पर्यायः । कः पुनरसौ यादीत्याह । यस्तदेति । वादकाले साधन- माह । अनेकवादिसम्भवेऽपि स्वयंशब्दवाच्यस्य वादिनो विशेषणमेतद् यद्येव वादिन इष्टः साध्य इत्युक्तम् । एतेन च किमुक्तेन । अनेन तदा १ 'च' इति पदं ख० पुस्तके नैवावलोक्यते । २ उदाहरति, ख. उदाहरति ययेति । हितीयान्तस्वार्थे वर्तते, ख० तृतीयान्तस्यायन युक्तः। ४ 'एव इति पदं ख० पुस्तके न वियते । ५'अपि' इति पदं ख. पुस्तके नामस्येव । - 3 - - ६२ न्यायबिन्दुः वादकाले तेन वादिना स्वयं यो धर्मः साधयितुमिष्टः स एव साध्यो नेतरो धर्म इत्युक्तं भवति । वादिनोऽनिष्टधर्मसाध्यत्वनिवर्तनमस्य वचनस्य फल- मिति यावत् । अथ कस्मिन्सत्यन्यधर्मसाध्यत्वसंभवो यन्निवृत्यर्थं चेदं वक्तमित्याह । तच्छास्त्रकारेणेति । यच्छास्त्रं तेन वादिनाभ्युपगतं तच्छा- स्वकारेण तस्मिन्साध्यधर्मिण्यनेकस्य धर्मस्याभ्युपगमे सत्यन्यधर्मसाध्यत्व- संभवः । तथा हि शास्त्रं येनाभ्युपगतं तत्सिद्धो धर्मः सर्व एव तेन साध्य इत्यस्ति विप्रतिपत्तिरनेनापास्यते । अनेकधर्माभ्युपगमेऽपि सति स एव साध्यो यो वादिन इष्टो नान्य इति । ननु च शास्त्रानपेतं वस्तुवलप्रवृत्तं लिङ्गम् । अतोऽनपेक्षणीयत्वान्न शास्त्रे स्थित्वा वादः कर्तव्यः । सत्यम् । आहोपुरुषिकया तु यद्यपि कचि- च्छास्त्र स्थित इति किंचिच्छास्त्रमभ्युपगतः साधनमाह । तथापि य एव तस्येष्टः स एव साध्य इति ज्ञापनायेदमुक्तम्- इष्ट इति यत्रार्थे विवादेन साधनमुपन्यस्तं तस्य सिद्धिमिच्छता सोऽनुक्तोऽपि वचनेन साध्यस्तदधिकर- णत्वाद्विवादस्य । इष्ट इति । इष्टशब्दमुपक्षिप्य व्याचष्टे । यत्रार्थ आत्मनि विरुद्धो वादः प्रक्रान्तो नास्त्यात्मेत्यात्मप्रतिषेधवाद आत्मसत्तावादविरुद्धो विधि- प्रतिषेधयोविरोधात् । तेन विवादेन हेतुना साधनमुपन्यस्तम् । तस्यात्मा- र्थस्य सिद्धि निश्चयमिच्छता वादिना सोऽर्थः साध्य इत्युक्तं भवतीष्ट- शब्देन । यत्तदित्युक्तं भवतीतिग्रहणमन्ते तदिहापेक्ष्य वाक्यं परिसमापयि- तव्यम् । यद्यपि परार्थानुमान उक्त एव साध्यो युक्तोऽनुक्तोऽपि तु वच- नेन साध्यः सामोक्ततत्वात्तस्य । कुत एतदित्याह । तदित्यादि । तदिति । सोऽधिकरणमाश्रयो यस्य स तदधिकरणो विवादस्तस्य भाव- स्तत्वं तस्मादित्येतदुक्तं भवति । यस्माद्विवादं निराकर्तुमिच्छता वादिना साधनमुपन्यस्तं तस्माद्यदधिकरणं विवादस्य तदेव साध्यम् । यतो विरुद्धं १ इदं पदं ख. पुस्तके न विद्यते। २साध्यस्व० ख० साध्यस्वस्य । ३चेदं, ख. चैतत्। 'तस्य' इति पदं ख० पुस्तके न विद्यते ।

तृतीयपरिच्छेदः - । वादमपनेतुं साधनमुपन्यस्तम् । तच्चेन्न साध्यं किमिदानीं जगति नियतं किंचित्साध्यं स्यादिति । अनुक्तमपि परार्थानुमाने साध्यमिष्टं तंदुदाहरति- यथा पराश्चक्षुरादयः संघातत्वाच्छयनासनाद्यङ्ग- वदिति । अत्रात्मार्था इत्यनुक्तावप्यात्मार्थतानेनोक्तमा- त्रमेव साध्यमित्युक्तं भवति । परार्था इति । चक्षुरादिर्येषां श्रोत्रादीनां ते चक्षुरादय इति धर्मी। परस्मायिमे परार्था इति साध्या परार्थ्यम् । संघातत्वादिति हेतुः । व्याप्तिविषयप्रदर्शनं शयनासनाद्यङ्गवदिति । शयनमासनं च ते आदी यस्य तच्छयनासनादि पुरुषोपभोगाङ्गं संघातरूपम् । तद्वदत्र । यत्प्रमाणे यदप्यात्मार्थाश्चक्षुरादय इत्यात्मार्थता नोक्ता । अनुक्ताप्यात्मार्थता साध्या । तथा हि । सांख्येनोक्तमस्त्यात्मा । तद्विरुद्धं बौद्धनोक्तं नास्त्यात्मेति । ततः सांख्येन स्ववादविरुद्धं बौद्धवाद हेतूकृत्य विरुद्धवादनिराकरणाय स्ववाद- प्रतिष्ठापनाय च साधनमुपन्यस्यम् । अतोऽनुक्ताप्यात्मार्थता साध्या तद- धिकरणत्वाद्विवादस्य । शयनासनादिषु हि पुरुषोपभोगाङ्गेष्वात्मार्थत्वेना. न्वयो न प्रसिद्धः संघातत्वस्य । परार्थमात्रेण तु सिद्धः । ततः परार्था इत्यु- क्तम् । चक्षुरादय इत्यत्रादिग्रहणाद्विज्ञानमपि परार्थं साधयितुमिष्टम् । विज्ञानाच्च पर आत्मैव स्यात् । परस्यार्थकारि विज्ञानं सेत्स्यतीति साम- ादात्मार्थत्वं सिध्यति चक्षुरादीनामिति मत्वा परार्थग्रहणं कृतम् । तेनेष्टसाध्यवचनेन नोक्तमात्रमपि तु प्रतिवादिनो विवादास्पदत्वाद्वादिनः साधयितुमिष्टमुक्तमनुक्तं वा प्रकरणगम्यं साध्यमित्युक्तं भवति- अनिराकृत इति । एतल्लक्षणयोगेऽपि यः साध- यितुमिष्टोऽप्यर्थः प्रत्यक्षानुमानप्रतीतिस्ववचनैर्निराक्रियते न स पक्ष इति प्रदर्शनार्थम् । 'तत्' इति पदं ख० पुस्तके न रयते । २ 'ते' इति पदं ख. पुस्तके नोप- लम्पते । ३ 'अनुक्का' इति पाठः ख० पुस्तके न विद्यते । ४ शयनासनाविषु, क० शय. नादिषु। ५० मारमार्थत्वेन प्रसिद्धः । ६ 'परस्य' इति पदं ख० पुस्तके नोपकम्यते ।

न्यायविन्दः - - अनिराकृत इति व्याख्येयम् । एतदित्यनन्तरप्रकान्तं यत्पक्षलक्षणमुक्तं साध्यत्वेनेष्टेत्यादि । एतल्लक्षणेन योगेऽप्यर्थो न पक्ष इति प्रदर्शनार्थ प्रदर्शनायानिराकृतग्रहणं कृतम् । कीदृशोऽर्थो न पक्षः साधयितुमिष्टोऽ- पीत्याह । यः साधयितुमिष्टोऽर्थः प्रत्यक्षं चानुमानं च प्रतीतिश्च स्ववचनं चैतैर्निराक्रियते विपरीतः साध्यो न स पक्ष इति- तत्र प्रत्यक्षनिराकृतो यथा-अश्रावणः शब्द इति । तत्रेति । तेषु चतुर्पु प्रत्यक्षादिनिराकृतेषु प्रत्यक्षनिराकृतः कीदृशः । यथेति । यथायं प्रत्यक्षनिराकृतस्तथान्येऽपि द्रष्टव्या इति यथाशब्दार्थः । श्रवणेन ग्राह्यः श्रावणः । न श्रावणोऽश्रावणः श्रोत्रेण च ग्राह्य इति प्रति- ज्ञार्थः । श्रोत्राग्राह्यत्वं शब्दस्य प्रत्यक्षसिद्धेन श्रोत्रग्राह्यत्वेन बाध्यते- अनुमाननिराकृतो यथा-नित्यः शब्द इति । अनुमाननिराकृतः । नित्यः शब्द इति शब्दस्य प्रतिज्ञातं नित्यत्व- मनित्यत्वेनानुमानसिद्धेन निराक्रियते प्रतीतिनिराकृतो यथा-अचन्द्रः शशीति । प्रतीत्या निराकृतः । अचन्द्र इति । चन्द्रशब्दवाच्यो न भवति शशीति प्रतिज्ञातार्थः । अयं च प्रतीत्या निराकृतः । प्रतीतोऽर्थ उच्यते । विकल्पविज्ञानविषय: प्रतीति: । प्रतीतत्वं विकल्पविज्ञानविषयत्वमुच्यते । तेन विकल्पविज्ञानविषयत्वेन प्रतीतिरूपेण शशिनश्चन्द्रशब्दवाच्यत्वं सिद्ध- मेव । तथा हि । यद्विकल्पज्ञानग्राह्यं तच्छब्दाकारसंसर्गयोग्यम् । तत्सा- केतिकेन शब्देन वक्तुं शक्यम् । अत: प्रतीतिरूपेण विकल्पविज्ञानविष- यत्वेन सिद्धं चन्द्रशब्दवाच्यत्वमचन्द्रत्वस्य बाधकं द्रष्टव्यम् । स्वभावहेतुश्च प्रतीति: । यस्माद्विकल्पविषयत्वमात्रानुबन्धिनी सांकेतिकशब्दवाच्यता ततः स्वभावहेतुसिद्धं चन्द्रशब्दवाच्यत्यमवाच्यत्वस्य बाधकं द्रष्टव्यम्- स्ववचननिराकृतो यथा-नानुमानं प्रमाणम् । १ अमिराकृतः, क० अनिकृतः । २ प्रदर्शनाय, ख० प्रतिपादनाय । ३ नस पक्षः, ख० सन पतः। ४ 'प्रत्यक्ष इति पाठः ख० पुस्तके नोपलभ्यते। ५विकल्पविज्ञान- विषयस्वेन, क. विकल्पविज्ञानेन । ६ विकल्पज्ञानग्राध, क. ज्ञानप्राई।

तृतीयपरिच्छेदः ६५ - स्ववचनं प्रतिज्ञार्थस्यात्मीयो वाचकः शब्दम्तेन निराकृतः । प्रति- ज्ञार्थो न साध्यः । यथा नानुमानं प्रमाणम् । अत्रानुमानस्य प्रामाण्य- निषेधः प्रतिज्ञार्थः । स नानुमानं प्रमाणमित्यनेन स्ववाच केन वाक्येन बाध्यते । वाक्यं ह्येतत्प्रयुज्यमानं वक्तः शाब्दस्य प्रत्ययस्य सदर्थत्वमिष्टं सूचयति । तथाहि | मद्वाक्याद्योऽर्थसंप्रत्ययस्तवोत्पद्यते सोऽसत्यार्थ इति दर्शयन्याक्यमेव नोच्चारयेद्वक्ता । वचनार्थश्वेदसत्यः परेण ज्ञातव्यो वच- नमपार्थकम् । योऽपि हि सर्व मिथ्या ब्रजीमीति वक्ति सोऽप्यस्य वाक्यस्य सत्यार्थत्वमादर्शयन्नेव वाक्यमुच्चारयति । तंद्येतद्वाक्यं सत्यार्थमाद- शितम् । एवं वाक्यान्तराण्यात्मीयान्यसत्यार्थानि दर्शितानि भवन्ति- एतदेव तु यद्यसत्यार्थमन्यान्यसत्यार्थानि न दर्शि- तानि भवन्ति । ततश्च न किंचिदुच्चारणस्य फलमिति नोच्चारयेत् । तस्माद्वाक्यप्रभवं वाक्यार्थालम्बनं विज्ञानं सत्यार्थं दर्शयन्नेव वक्ता वाक्यमुच्चारयति । तथा च सति बाह्यवस्तुनान्तरीयकं शब्दं दर्शयता शब्दजं विज्ञानं सत्यार्थ दर्श- यितव्यम् । ततो बाह्यार्थकार्याच्छब्दादुत्पन्नं विज्ञानं सत्यार्थमादर्शयता कार्यलिङ्गजमनुमानं प्रमाणं शाब्दं दर्शितं भवति । तस्मान्नानुमानं प्रमा- णमिति ब्रुवता शाब्दस्य॑ प्रत्ययस्यासन्धाह्यं उक्तोऽसदर्थत्वमेव ह्यप्रामाण्यमु- च्यते । नान्यत् । शब्दोच्चारणसामर्थ्याच्चार्थाविनाभावी स्वशब्दो दर्शितः । तथा च सन्नर्थो दर्शितः । ततः कल्पितादर्थकार्याच्छब्दाच्छाब्दप्रत्ययार्थ- स्यानुमितं सत्त्वं प्रतिज्ञायमानमसत्त्वं प्रतिबध्नाति । तदेवं स्ववचनानु- मितेन सत्त्वेनासत्त्वं वाच्यमानं स्ववचनेन बाधितमुक्तमित्ययमत्रार्थः । अन्ये त्वाहुः । अभिप्रायकार्याच्छब्दाज्जातं ज्ञानमभिप्रायालम्बनं सदर्थमिच्छतः शब्दप्रयोगः । तेनाप्रामाण्यं प्रतिज्ञातं बाध्यत इति । तद- युक्तम् । यत इह प्रतीतेः स्वभावहेतुत्वं स्ववचनस्य च कार्यहेतुत्वं कल्पि- १ ब्रवीमीति वक्ति, ख० ब्रवीति वक्ति। २ 'तद्येतद्' इति पाठः क० पुस्तक एव विद्यते । अन्यत्र सर्वत्र तु 'यद्येतद्' इति पाठः एव। ३ क. असत्यानि । ५ आदर्शयता, क. आदर्शयिता। ७ ख० असन्तों ग्राह्य, क० असन् ग्राह्य। ८ शाब्दप्रत्ययार्थस्य, क. शब्दप्रत्ययार्थस्य । ४ तथा, क० यथा। ६ शाब्दस्य, ख० शब्दस्य । . न्या.

न्यायविन्दुः समिष्टम् । न वास्तवम् । अभिप्रायकार्यत्वं च वास्तवमेव शब्दस्य । तत- रसादिह न गृह्यते । किं च यथानुमानमनिच्छन्वन्ाव्यभिचारित्वं थूमस्य न प्रत्येति । तथा शब्दम्याप्यभिप्रायाव्यभिचारित्वं न प्रत्येष्यति । बाह्य- बस्तुप्रत्यायनाय च शब्दः प्रयुज्यते । तन्न शब्दस्याभिप्रायाविनाभवित्वा- भ्युपगमपूर्वकः शब्दप्रयोगः । अपि च न स्वाभिप्रायनिवेदनाय शब्द उच्चार्यते । अपि तु बाह्यवस्तुसत्त्वप्रतिपादनाय । तस्माद्वाद्यवस्तुविनामा- वित्माभ्युपगमपूर्वकः शब्दप्रयोगः । तत: पूर्वकमेव व्याख्यानमनवद्यम्- इति चत्वारः पक्षाभासा निराकृता भवन्ति । एवं चं सत्यनिराकृतग्रहणेनानन्तरोक्ताश्चत्वार: पक्षवदाभासन्त इति पक्षाभासा निरस्ता भवन्ति । संप्रति पक्षलक्षणपदानि येषां व्यवच्छेदकानि तेषां व्यवच्छेदन यादशः पक्षार्थी लभ्यते तं दर्शयितुं व्यवच्छेद्यान्संक्षिप्य दर्शयति । सिद्धस्थासिद्धस्यापि साधनत्वेनाभिमतस्य स्वयं वादिना तदा साधयितुमनिष्टस्योक्तमात्रस्य निराकृतस्य च विपर्ययेण साध्यस्तेनैव स्वरूपेणाभिमतो वादिन इष्टोऽनिराकृतः पक्ष इति पक्षलक्षणमनवा दर्शितं भवति । एवमित्यनन्तरोक्तंक्रमेण सिद्धस्य विपर्ययेण विपरीतत्वेन हेतुना साम्यो द्रष्टव्यः । यस्मादत्सिद्धोऽर्थो विपरीत: स साध्य इत्यर्थः । सिद्धश्च विपरीतोऽसिद्धस्य । तस्मादसिद्धः साध्यः । असिद्धोऽपि न सर्वोऽपि तु साधनत्वेनोक्तस्यासिद्धस्यापि विपर्ययेण स्वयं वादिना साध- थितुमनिष्टस्यासिद्धस्य विपर्ययेण । तथोक्तमात्रस्यासिद्धस्यापि विपर्ययेण । १ ख० पुस्तके 'अपि च' इत्यस्मादारभ्य 'शब्दप्रयोगः' इस्येतावत्पर्यन्तं हे पंक्ती परित्यक्ते। संभवतः लेखकस्य दृष्टिः प्रथमं शब्दप्रयेगः' इति पदं दृष्ट्वा अमेण द्वितीयस्य "शब्दप्रयोगः' इत्यस्योपरि पतिता । २ शब्दः, क० टब्दः । ३ 'च' इति पाठः ख. 'पुस्तक 'एष विद्यते। ४ मुद्रितपुस्तकस्य 'अवचं' इति पाठोऽस्माकं सम्मतावशुद्धोऽस्ति ५ अनन्तरोतक्रमेण, ख० अनन्तरोन क्रमेण । .

तृतीयपरिच्छेदः तथा निराकृतस्यासिद्धस्यापि विपर्ययेण साध्यः । यश्चायं पञ्चभिर्व्यवच्छेयै रहितोऽर्थोऽसिद्धोऽसाधनम् । वादिन: स्वयं साधयितुमिष्ट उक्तोऽनुक्तो वो प्रमागैरनिराकृतः साध्यः । स एवासी स्वरूपेणैव स्वयमिष्टोऽनिराकृत एतैः पदैरुक्त इत्यर्थः । यश्चायं साध्यः स पक्ष उच्यते । इतिशब्द एवमर्थे । एवं पक्षलक्षणमनवद्यमिति । अविद्यमानमवद्यं दोषो यस्य तदनवद्यम् । दर्शितं कथित्तम् । त्रिरूपलिङ्गाख्यानं परिसमापय्य प्रसङ्गागतं च पक्षलक्षणमभिधाय हेत्वाभासान्वक्तुकामरुतेषां प्रस्ताव रचयति । त्रिरूपेत्यादिना । त्रिरूपलिङ्गाख्यानं परार्थानुमानमित्युक्तम् । एतदुक्तं भवति । त्रिरूपलिङ्गाख्यानं वक्तुकामेन स्फुटं तद्वक्तव्यम् । एवं च तत्स्फुटमुक्तं भवति । यदि तच्च तत्प्रतिरूपकं बोध्यते । हेयज्ञाने हि तद्विविक्तमुपादेयं सुज्ञातं भवतीति । त्रिरूपलिङ्गाख्यानं परार्थानुमान- मिति प्रागुक्तम् । तत्र त्रयाणां रूपाणामेकस्यापि रूपस्यानुक्तौ सा- धनाभासः उक्तावप्यसिद्धौ संदेहे वा। प्रतिपाद्यप्रतिपा- दकयोरेकस्य रूपस्य धर्मिसंबन्धस्यासिद्धौ संदेहे चासिद्धो हेत्वाभासः। तत्रेति । तस्मिन्सति त्रिरूपलिङ्गाख्याने परार्थानुमाने सतीत्यर्थः । त्रयाणां रूपाणां मध्य एकस्याप्यनुक्तौ । अपिशब्दाद्वयोरपि । साधनस्या- भासः सदृशं साधनस्य न साधनमित्यर्थः । त्रयाणां रूपाणां न्यूनता नाम साधनदोषः । न केवलमनुक्तावुक्तावप्यसिद्धी संदेहे वा कस्ये- त्याह । प्रतिपाद्यरय प्रतिवादिनः प्रतिपादकस्य च वादिनो हेत्वाभासः । अथ कस्य रूपस्यासिद्धौ संदेहे वा किंसंज्ञको हेत्वाभास इत्याह । एकस्य रूपस्येति । धर्मिणा सह सम्बन्धः धर्मिसंबन्धः। धर्मिणि सत्त्वं हेतोः । १ असाधनं, क० असाधनं २। २वा, क० वा ४। ३ निराकृतः, निराकृत ५॥ ४. एतद् , तद् । ५ प्रतिरूपकं, ख० प्रतिरूपम् । ६ क. विवक्तम् । ख० कस्यैकस्य । ८ वा किं०, क. वाक्यं ।

६८ न्यायविन्दुः - तस्यासिद्धौ संदेहे वाऽसिद्धसंज्ञको देत्वाभासः । असिद्धत्वादेव च धर्मिण्य- प्रतिपत्तिहेतुर्न साध्यस्य न विरुद्धस्य न संशयस्य हेतुरपि त्वप्रतिपत्ति- हेतुर्न कस्यचिदतः प्रतिपत्तिरिति कृत्वा । अयं चार्थोऽसिद्धसंज्ञाकरणादेव प्रतिपत्तव्यः । उदाहरणमाह- यथा-अनित्यः शब्द इति साध्ये चाक्षुषत्वमुभ- यासिद्धम् । यथेत्यादि । अनित्यः शब्द इत्यनित्यत्वविशिष्टे शब्दे साध्ये चाक्षु- षत्वं चक्षुह्यत्वं शब्द द्वयोरपि वादिप्रतिवादिनोरसिद्धम् । चेतनास्तरव इति साध्ये सर्वत्वगपहरणे मरणं प्रतिवाद्यसिद्ध विज्ञानेन्द्रियायुनिरोधलक्षणस्य मरणस्या- नेनाभ्युपगमात्तस्य च तरुष्वसंभवात् । चेतनास्तरव इति तरूणां चैतन्ये साध्ये सर्वा त्वक्सर्वत्वक् । तस्या अपहरणे सति मरणं दिगम्बरैरुपन्यस्तम् । प्रतिवादिनो बौद्धस्यासि- द्धम् । कस्मादसिद्धमित्याह । विज्ञानं चेन्द्रियं चायुश्च । रूपादिविज्ञानो- त्पत्या यदनुमितं कायान्तर्भूतं चक्षुर्गोलकादिस्थितरूपं तदिन्द्रियम् । आयु- रिति लोके प्राणा उच्यन्ते । न चागमसिद्धमिह युज्यते वक्तुम् । अत: प्रमाणस्वभावमायुरिह । तेषां निरोधो निवृत्तिः। स लक्षणं तत्त्वं यस्य तत्तथोक्तम् । तथाभूतस्य मरणस्यानेन बौद्धेन प्रतिज्ञातत्वात् । यदि नामैवं तथापि कथमसिद्धमित्याह । तस्य च विज्ञानादिनिरोधात्मकस्य तरुष्वसंभवात् । सत्तापूर्वको निरोधः । ततश्च यो विज्ञाननिरोधं तरु- विच्छेत्स कथं विज्ञानं नेच्छेत् । तस्माद्विज्ञानानिष्टेनिरोधोऽपि नेष्टरत- रुषु । ननु च शोषोऽपि मरणमुच्यते । स च तरुषु सिद्धः । सत्यम् । केवलं विज्ञानसत्तया व्याप्तं यन्मरणं तदिह हेतुर्विज्ञाननिरोधश्च । तत्स- १ अनित्यः, ख० नित्यः । २ ख. द्वयोर्द्वयोरपि । ३ चायुश्च, ख० चायुश्च तत्रविज्ञान (अशुद्धः) चक्षुरादि जयित (अशुद्धः)। ४ ख० कार्यान्तभूतं । ४ ख० कार्यान्तभूतं। ५ ख० उच्यते। ६ आयुरिह । तेषां, ख० आयुः । इह तेषां । ७ असंभवात् , ख० अभावात् । ८ 'विज्ञान- सत्तया' । क० मुद्रितपुस्तके च 'विज्ञानसत्ताया। ।

तृतीयपरिच्छेदः ६६ त्या व्याप्तो न शोषमात्रम् । ततो यन्मरणहेतुस्तत्तरुष्वसिद्धम् । यत्तु सिद्धं शोषात्मकं तदहेतुः । दिगम्बरस्तु साध्येन व्याप्तमव्याप्तं वा मरण- मविविच्य मरणमात्रं हेतुमाह । तदस्य वादिनो हेतुभूनं मरणं न ज्ञातम् । अज्ञानात्सिद्धं शोषरूपम् । शोपरूपस्य मरणस्य तरुपु दर्शनात् । प्रति- वादिनस्तु ज्ञातमतोऽसिद्धम् । यदा तु वादिनोऽपि ज्ञातं तदा वादिनोप्य- सिद्धं स्यादिति न्यायः । अचेतनाः सुखादय इति साध्य उत्पत्तिमत्त्वमनि- त्यं वा सांख्यस्य स्वयं वादिनोऽसिद्धम् । अचेतनाः सुखादय इति । सुखमादिर्यपां दु:खादीनां ते सुखा- दयः । तेषामचैतन्ये साध्य उत्पत्तिमत्वनित्यत्वं वा लिङ्गमुपन्यस्तम् । य उत्पत्तिमन्तोऽनित्या वा ते न चेतना यथा रूपादयः । तथा चोत्प- त्तिमन्तोऽनित्या वा सुखादयन्तस्मादचेतनाः । चैतन्यं तु पुरुपस्य स्वं रूपम् । अत्र चोत्पत्तिमत्त्वमनित्यत्वं वा पर्यायेण हेतुर्न युगपत् । तच्च द्वयमपि सांख्यस्य वादिनो न सिद्धम् । परार्थो हि हेतूपन्यासः । तेन यः परस्य सिद्धः स हेतुर्वक्तव्यः । परस्य चासत उत्पाद उत्पत्तिमत्त्वम् । सतश्च निरन्वयो विनाशोऽनित्यत्वं सिद्धम् । तादृशं च द्वयमपि सांख्यस्यासि- द्धम् । इहाप्यनित्यत्वोत्पत्तिमत्त्वसाधनाज्ञानाद्वादिनाऽसिद्धम् । यदि त्वनित्यत्वोत्पत्तिमत्त्वयोः प्रमाणं वादिनो ज्ञातं स्यात् । वादिनापि सिद्ध स्यात् । तत: प्रमाणापरिज्ञानादिदं वादिनोऽसिद्धम् । संदिग्धासिद्धं दर्शयितुमाह- तथा स्वयं तदाश्रयणस्य वा संदेहेऽसिद्धः। स्वयमिति | हेतोरात्मनः संदेहेऽसिद्धः । तदाश्रयणस्य चेति । तस्य हेतोराश्रयगमाश्रीयतेऽस्मिन्हेतुरित्याश्रयणं हेतोर्व्यतिरिक्त आश्रयभूतः साध्यधर्मी कथ्यते । तत्र हि हेतुर्वर्तमानो गमकत्वेनाश्रीयने । तस्याश्रय- णस्य संदेहे संदिग्धः । १ सत्तया, क. मुद्रितपुस्तके च 'सत्ताया'। २ ततः क० तत्र। ३ हेतुभूतं, क० हेतुज्ञात्ततं (अशुद्धः)। ४ पराथों हि, ख. परार्थादि । ८ प्रमाणं, ख. प्रमाग्यं । ६ स्यात् , ख० स्यात्तदा। - - न्यायविन्दुः स्वात्मना संदिह्यमानमुदाहर्तुमाह- यथा वाष्पादिभावेन संदिह्यमान्छे भृतसंघातोऽ- मिसिद्धावुपदिश्यमानः संदिग्धासिद्धः । यथेति । बाष्प आदिर्यस्य स बाष्पादिस्तद्भावेन बाष्पादित्वेन संदिद्यमानो भूतसंघात इति । भूतानां पृथिव्यादीनां संघातः समूहः । अग्मिसिद्धावग्निसिद्धयर्थमुपादीयमानोऽसिद्धः। एतदुक्तं भवति । यदा धूमोऽपि बाष्पादित्वेन संदिग्धो भवति । तदासिद्धो गर्मकरूपानिश्चयाद्भू- मतया निश्चितो वन्निजस्यत्वाद्गमकः । यदा तु संदिग्धस्तदा न गमक इति । असिद्धताख्यो दोषः । आश्रयणासिद्धमुदाहरति- यथेह निकुञ्जे मयूरः केकायितादिति । यथेति । इह निकुञ्ज इति धर्मी । पर्वतोपरिभागेन तिर्यनिर्गतेन प्रच्छादितो भूभागो निकुञ्जः । मयूर इति साध्यम् । केकायितादिप्ति हेतुः । केकायितं मयूरध्वनि: । कथमाश्रयणासिद्ध इत्याह तदापातदेशविभ्रमे । तदापात इति । तस्य केकायितस्यापात आगमनं तस्य देशः स उच्यते । यस्माद्देशादागच्छति केकायितम् । तस्य विभ्रमे व्यामोहे सत्य- यमाश्रयणासिद्धः । निरन्तरेषु बहुपु निकुञ्जषु सत्सु यदा केकायितायात- विभ्रम: किमस्मानिकुञात्केकायितमागतमाहोस्विदस्मादिति तदाश्रयणा- सिद्ध इति । धर्मिणो सिद्धावप्यसिद्धत्वमुदाहरति- धर्म्यसिद्धावप्यसिद्धो यथा सर्वगत आत्मति साध्ये सर्वत्रोपलभमानगुणत्वम् । यथेति । सर्वस्मिन् गतः स्थित: सर्वगतो व्यापीति यावत् । व्यापित्व १ क० वाप्पादिह्यमाना। ४ केकायितापा- तविभ्रमः, ख० केकायितापातनिकुंजे विभ्रमः। ५ अस्मात् , ख० अन्यस्मात् । m- २ क. गक। ३ क० तदघात ।

तृतीयपरिच्छेदः आत्मनः साध्ये सर्वत्रोपलभ्यमानगुणत्वं लिङ्गम् । मर्वत्र देश उपलभ्य- मानाः सुखदु:खेच्छाद्वेषादयो गुणा यस्यात्मनस्तम्य भावस्तत्त्वम् । न गुणा गुणिनमन्तरेण वर्तन्ते । गुणानां गुणिनि समवायात् । निष्क्रिय- श्चात्मा । ततश्च यदि व्यापी न भवेत्कथं दक्षिणापथ उपलब्धाः सुखादयो मध्यदेश उपलभ्येरन् । तस्मात्सर्वगत आत्मा : तदिह बौद्धन्यात्मैत्र न सिद्धः किमुत सर्वत्रोपलभ्यमानगुणत्वं मिध्येत् । तस्येत्यसिद्धौ हेला- भासः । पूर्वमाश्रयगसंदेहेन धर्मिगि संदेह उक्तः । संप्रति त्वसिद्धो पर्युक्त इत्यनयोर्विशेषस्तदेवमेकस्य रूपस्य धर्मिबद्धस्यासिद्धावसिद्धो हेत्वाभासः । तथैकस्थ रूपस्यासपक्षेऽसत्त्वस्यासिद्धावनैकान्तिको हेत्वाभासः। तथा परस्यैकस्य रूपस्यासपतेऽसत्त्वाख्यस्यासिद्धावनैकान्तिको हेत्वा- भासः । एकोऽन्त एकान्तो निश्चयः । स प्रयोजनमस्येत्यैकान्तिकः । नैकान्तिकोऽनैकान्तिकः । यस्मान्न साध्यस्य न विपर्ययस्य निश्चयोऽपि तु तद्विपरीत: संशयः । साध्येतरयोः संशयहेतुरनैकान्तिक उक्त: । तमुदाहरति- यथा शब्दस्यानित्यत्वादिके धर्मे साध्ये प्रमेयत्मा- दिको धर्मः मपक्षविपक्षयोः । सर्वत्रैकदेशे वा वर्तमान- स्तथास्यैव रूपस्य संदेहेऽप्यनकान्तिक एव । यथेत्यादिना । अनित्यत्वमादिर्यस्य सोऽनित्यत्वादिको धर्मः । आदिशब्दादप्रयत्नानन्तरीयकत्वं प्रयत्नानन्तरीयकत्वं नित्यत्वं च परिगृ- ह्यते प्रमेयत्वमादिर्यस्य स प्रमेयत्यादिकः। आदिशब्दादनित्यत्वं पुनरनि- त्यत्वममूर्तत्वं च गृह्यते । शब्दस्य धर्मिणोऽनित्यत्वादिके धर्म साध्ये प्रमे- यत्वादिको धर्मोऽकान्तिकः । चतुर्णामपि विपक्षेऽसत्त्वमसिद्धम् । तथाहि । अनित्यः शब्दः प्रमेयत्वादाकाशवदटवदिति प्रमेयत्वं सपक्षविपक्षव्यापि । १ मुदिनापुल्तकस्य 'सत्यस्य' इति पाठोऽशुद्धः प्रतीयते । २ पदमिदं स्व० पुस्तके नोपलभ्यते। ३ गृह्यते, ख० गृह्यन्ते । - .. ७२ न्यायविन्दुः अप्रयत्नानन्तरीयकः शब्दोऽनित्यत्वाद्विादाकाशवद्घटवच्चेत्यनित्यत्वं स- पक्षकदेशवृत्ति विद्युदादावरित नाकाशादौ । विपक्षव्यापि प्रयत्नानन्तरीयके सर्वत्र भावात् । अनित्यत्वात्ययत्नानन्तरीयक: शब्दो घटवद्विगुदाकाश- बच्चेत्यनित्यत्वं विपक्षकदेशशब्दवृत्ति विद्युदादावरित नाकाशादौ । सप- क्षव्यापि सर्वत्र प्रयत्नानन्तरीयके भावात् ! नित्यः शब्दोऽमृतत्वादाका- शपरमाणुवकर्मघट वच्चेत्यमूर्तत्वमुभयैकदेशवृत्ति । उभयोरेकदेश आकाशे कर्मणि च वर्तते । परमाणौ तु सपक्षकदेशे घटादौ च विपक्षकदेशे न वर्तते । मूर्तत्वाद्धटपरमाणुप्रभृतीनाम् । नित्यास्तु परमाणवो वैशेषिकैरभ्यु- पगम्यन्ने । ततः सपक्षान्तर्गताः । अस्य चतुर्विधस्य पक्षधर्मस्यासत्त्वम- सिद्धं विपक्षे । ततोऽनैकान्तिकता | यथा चास्य रूपस्यासिद्धावनैका- न्तिकस्तथास्यैव विपक्षेऽसत्त्वाख्यस्य रूपस्य संदेहेऽनैकान्तिकः । तमुदाहरति- यथाऽसर्वज्ञः कश्चिद्विवक्षितः पुरुषो रागादिमान्वे- ति साध्ये वक्तृत्वादिको धर्मः संदिग्धविपक्षव्यावृत्तिकः । सर्वत्रैकदेशे वा सर्वज्ञो वक्ता नोपलभ्यते इति । यथेति । असर्वज्ञ इति । अ अपर्वज्ञत्वं साध्यम् । कश्चिद्विविक्षित इति वक्तुरभिप्रेत: पुरुषो धर्मी । राग आदिर्यस्य द्वेषादेः स रागादिः स यस्या- स्ति स रागादिमानिति द्वितीयं साध्यम् । वाग्रहणं रागादिमत्त्वस्य पृथ- क्साध्यत्तख्यापनार्थम् । ततोऽसर्वज्ञत्वे रागादिमत्त्वे वा साध्ये प्रकृते वक्तृत्वं वचनशक्तिस्तदादिर्यस्योन्मेपनिमेषादेः स वक्तृत्वादिको धर्मोऽनै- कान्तिकः । संदिग्धा विपक्षाघ्यावृत्तिर्यस्य स तथोक्त: 1 असर्वज्ञत्वे साध्ये सर्वज्ञत्वं विपक्षः । तत्र वचनादेः सत्त्वमसत्त्वं वा संदिग्धम् । अतो न ज्ञायते वक्ता सर्वज्ञ उतासर्वज्ञ इत्यनैकान्तिकं वक्तृत्वम् । ननु च सर्वज्ञो वक्ता नोपलभ्यते तत्कथं वचनं सर्वज्ञे संदिग्धम् । अत एव सर्वज्ञो वक्ता नोपलभ्यत इति । १ क० विद्युदाकाशद्घटवत् । २ लेखकस्य प्रमादेन ख० पुस्तके 'नाकाशादौ' इयमध्यस्थः पाठः परित्यक्तः । ३ संदिग्धा, ख० संदिग्धः । ४ पदमिदं ख० पुस्तके नोपलभ्यते। .

तृतीयपरिच्छेदः एवं प्रकारस्यानुपलम्भस्वादृश्यात्मविषयस्वेन संदेहे हेतुत्वात् । एवंप्रकारत्यै जातीयस्यानुपलम्भस्य संदेहहेतुत्वात् । कुत इत्याह ! अदृश्यात्मा विषयो यस्य तस्य भावोऽदृश्यात्मविषयत्वं तेन संदेहहेतुत्वम् । असर्वज्ञविपर्ययाक्तृत्वादेर्व्यावृत्तिः संदिग्धा । वक्तृत्वसर्वज्ञत्वयोर्विरोधाभावाच्च । यतोऽदृश्यविषयोऽनुपलम्भः संशयहेतुर्न निश्चयहेतुस्ततोऽसर्वज्ञविप- क्षात्सर्वज्ञाद्वक्तत्यादेावृत्ति: संदिग्धा । नानुपलम्भात् । सर्वझे यक्तत्व- मसद्रुमोऽपि तु सर्वज्ञत्वेन सह वक्तृत्वस्य विरोधात् । एतन्न सर्वज्ञत्व- वक्तृत्वयोर्विरोधो नास्ति । विरोधाभावाच कारणाढ्यतिरेको न सिष्यतीति सम्बन्धः । व्याप्तिमन्तं व्यतिरेकं दर्शयति । यः सर्वज्ञः स वक्ता न भवतीत्यदर्शनेऽपि व्यति- रेको न सिध्यति । संन्देहात । यः सर्वज्ञ इति । साध्याभावरूपं सर्वज्ञत्वमनूद्य न सं वक्ता भव- तीति साधनस्य वक्तत्वस्याभावो विधीयते । तेन साध्याभावः साधना- भावे नियतत्वात्साधनाभावेन व्याप्त उक्त इति व्याप्तिमानीहशो व्यति- रेको विरोधे सति वक्तृत्वसर्वज्ञत्वयोः सिध्येत् । न चास्ति विरोध: । तरमान सिध्यति । कुत इत्याह । संदेहान् । यतो विरोधाभावस्तस्मात्सं- देहः । संदेहाव्यतिरकासिद्धिः । कथं विरोधाभावः । द्विविधो हि पदार्थानां विरोधः । . १ एवंजातीयस्य, ख० एवंजातीयकस्य। २ मंशयहेतुः, ख. संदेहेतुः (अशुद्धः)। सर्वज्ञे, ख. संदिग्धे । ४ मुद्रितपुस्तकस्य संम्पादकन 'संदेहान्' इति हेतुवाक्यं विविधमित्यग्रिमवाक्ये निबद्धम् । ५न स वक्ता, ख० स वक्ता न। ६साधना- भावेन, ख. साधर्म्यभावेन । ७ सिध्यति, स्व० सिम्पतीति । १० न्या० ७४ न्याबिन्दुः गतिः । हीति । यस्माद् द्विविध एव विरोधो नान्यः । तस्मान्न वक्तृत्वसर्वज्ञत्व- योविरोधः । कः पुनरसौ द्विविधो विरोध इत्याह । अविकलकारणस्य भवतोऽन्यभावः । अविकलकारणस्येति । अविकलानि समग्राणि कारणानि यस्य स तथोक्तः । यस्य कारणकन्यादभावो न तस्य केनचिदपि विरोधगतिः । तदर्थमविकलकारणग्रहणम् । ननु च यस्यापि कारणसाकल्यं तस्यापि निवृत्तिरशक्या केनचिदपि कर्तुं तत्कुतो विरोधगतिः । एवं तहि । अभावाद्विरोधगतिः । अविकलकारणस्यापि यत्कृतात्कारणवैकल्यादभावः । तेन विरोध- तथा च सति यो यस्य विरुद्धः स तस्य किचित्कर एव । तथा हि । शोतस्पर्शस्य जनको भूत्वा शीतस्पर्शान्तरजननशक्ति प्रतिबध्नशी- तस्पर्शस्य निवर्तको विरुद्धः । तस्माद्धेतुबैकल्यकारी विरुद्धो जनक एव । निवर्त्यस्य सहानवस्थानविरोधश्चायम् । ततो विरुद्धयोरेकस्मिन्नपि क्षणे सहा- यस्थानं परिहर्तव्यम् । दूरस्थयोविरोधाभावाच्च निकटस्थयोरेव निवर्त्यतिवर्त- कभावः । तस्माद्यो यस्य निवर्तकः स तं यदि परं तृतीये क्षणे निवर्तयति । प्रथमे क्षणे सन्निपतन्नसमर्थातस्थानयोग्यो भवति । द्वितीये विरुद्धमसमर्थ करोति । तृतीये त्वसमर्थे निवृत्ते तद्देशमाक्रामति । तत्रालोको गतिधर्मा क्रमेण जलतरङ्गन्यायेन देशमाक्रामन्यदान्धकारे निरन्तरमालोकक्षणं जनयति, तदा- लोकसमीपवर्तिनमन्धकारमसमर्थ जनयति । ततोऽसामध्यं तस्य यस्य समी- पवालोकः । असामर्थ्य निवृत्ते तादृशो जायत आलोक इत्येवं क्रमेणा- लोकेनान्धकारोऽपनेयः । तथोष्णस्पर्शन शीतस्पर्शो निवर्तनीयः । यदा त्वालोकस्तत्रैवान्धकारे देशे जन्यते तदा यत: क्षणादन्धकारदेशस्यालोकस्य जनकक्षण उत्पद्यते तत एवान्धकारोऽन्धकारान्तरजननासमर्थ उत्पन्नः । १ हीति यस्मात् , ख० हिर्यस्मात् । २ आक्रामन् , ख० आक्रामयन् । ३ असामर्थ्य, क० असमर्थ्य, ख० असमर्थ। ४ अन्धकारान्तरजननासमर्थः, क. अन्धकारान्तरासमर्थः, ख० अन्धकारान्तराजनना समर्थः ।

तृतीयपरिच्छेदः ७५ ततोऽसमर्थावस्थाजनकत्वमेव नियतकत्वम् । अतश्च यस्मिन् क्षणे जनक- स्ततस्तृतीये क्षणे निवृत्तो विरुद्धो यदि शीघ्रम् निवर्तते। जन्यजनक- भावाच्च संतानयोविरोधो न क्षणयोः । यद्यपि च न संतानो नाम वस्तु तथापि संतानिनो वस्तुभूताः । ततोऽयं परमार्थः न क्षणयोविरोधः । अपि तु बहूनां क्षणानाम् । यत: सत्सु दनक्षणेपु प्रवृत्ता अपि शीतक्षणा निवृत्तिधर्माणो भवन्तीति । संतानयोनिवर्त्यनिवर्तकत्वनिमित्ते च विरोधे स्थिते सर्वेषां परमाणूनां सत्यप्येकदेशावस्थानाभावेन विरोध इतरेतरसंता- नानिवर्तनात्तेषां गतिधर्मा चालोको आं दिशमात्रामति तदिग्वतिनो विरोधि संतानान्निवर्तयति । ततोऽपरग्कैकदेशस्था प्रदीपप्रभान्धकारनिकटवर्ति- न्यपि नान्धकारं निवतर्यति । अन्धकारीकान्तायां दिश्यालोकक्षणान्तर- जननासामर्थ्यात् । कारणासामर्थ्यहेतुकृतं संताननिष्ठमेव विरोधं दर्शयता भवतेति कृतम् । भवतः प्रबन्धेन वर्तमानस्य शीतरपर्शसंतानस्याभावोऽन्य- स्योष्णस्पर्शसन्तानन्य भावे सतीति । ये त्वाहुन विरोधो वास्तव इति त इदं वक्तव्या: । यथा न निष्पन्ने कार्ये कश्चिजन्यजनकभावो नाम दृष्टोऽस्ति । कारणपूर्विका तु कार्य- प्रवृत्तिरतो वास्तव एव । तद्वन्न निवृत्ते वस्तुनि कश्चिदिष्टो नाम विरो- धोऽस्ति । दहननिमित्तं तु शीतस्पर्शस्य क्षणान्तरासामर्थ्यमतो विरोधोऽपि वास्तव एव । उदाहरणमाह । शीतोष्णस्पर्शवत् । शीतश्वोष्णश्च तावेव स्पर्शी तयोरिव । शीतोष्णस्पर्शयोहि पूर्ववद्वि- रोधो योजनीयः । द्वितीयमपि विरोधं दर्शयितुमाह । परस्परपरिहारस्थितलक्षणतया वा भाववत् । परस्परपरिहारः परित्यागस्तेन स्थितं लक्षगं रूपं ययोस्तद्भावः पर- १ असमर्थावस्था०, ख० असामर्थ्यावस्था० । २ संतानयोः, क. संतनयोः । ३ तदिग्वर्तिनः, क० तद्विवत्तिनः । ४ अन्धकाराकान्तायां, क. अन्धकारायाक्रान्तायां । ५ हेतुकृतं, ग्व० हेतुत्वकृतं । ६ भवता, क० ख० भवतः।

७६ न्यायविन्दुः स्परपरिहारस्थिताक्षणता तया । इह यस्मिन्परिच्छिद्यमाने यव्यवच्छिद्यते वत्परिच्छिद्यमानमवच्छिन्यमानपरिहारेण स्थितरूपं द्रष्टव्यम् । नीले च परिच्छिद्यमाने ताद्रूप्यप्रच्युतिरवच्छिद्यते तदब्यवच्छेदे नीलापरिच्छेद- प्रसङ्गात् । तस्माद्वस्तुनो भावाभावौ परस्परपरिहारेण स्थितरूपौ। नीलात्त यदन्यद्रूपं तन्नीलाभावाव्यभिचारि । नीलस्य दृश्यस्य पीतादावुपलभ्यमाने त्रुपलम्भादभावनिश्चयात् । यथा च नीलमभावं परिहरति तद्वदभावान्य- भिचारि पीतादिकमपि । लथा च भावाभावयोः साक्षाद्विरोधों' वस्तुनो- स्थन्योन्याभावाध्यभिचारित्वाद्विरोधः। कस्य चान्यत्राभावावसायो यो नियताकारोऽर्थस्तस्य । न त्वनियताकारोऽर्थः क्षणिकत्वादिवत् । क्षणिकत्वं हि सर्वेषां नीलादीनां स्वरूपात्मकम् । अतो न नियताकारम् । यतः कणिकत्वपशिहारेण न किंचिदृश्यते । यद्येवमभावोऽपि न नियताकारः । कथं न । नियताकारो नाम यावता वस्तुरूपविविक्ताकार: कल्पितोऽभावः । ततो दृष्टं कल्पितं वा नियतं रूपमन्यत्रासदवसीयते नानियतम् । एवं मिल्यस्वे पिशाचादिरपि नियताकार: कल्पितो द्रष्टव्यः । एकात्मकत्व- विरोधश्चायम् । बयोहि परस्परपरिहारेणावस्थानं तयोरेकत्वाभावः । अत एव लाचाणिकोऽयं विरोध उच्यते । लक्षणं रूपं वस्तूनां प्रयोजनमस्येति कृत्या । बिरोधेन ह्यनेन वस्तुतत्वं विभक्त व्यवस्थाप्यते । अतएव दृश्य- माने रूपे यन्निपिध्यते तदृश्यमेवाभ्युपगम्य निषिध्यते । तथा हि । अभावोऽपि पिशाचोऽपि यदा पीते निषेद्धमिष्यते तदा दृश्यात्मतया निषेध्य इति दृश्यत्वमभ्युपगम्य रश्यानुपलब्धेरेव निषेधः । तथा च सति रूपे परिच्छिद्यमान एकस्मिस्तदभावो दृश्यो व्यवच्छिद्यते । ततः स्वप्रच्यु- तिवत्प्रच्युतिमन्तोऽपि व्यवच्छिन्ना इति ये परस्परपरिहारस्थितरूपा: सर्वे तेऽनेन निषिद्धकत्वा इति सत्यपि चास्मिन्विरोधे सहावस्थानं स्यादपि । ततो भिन्नव्यापारौ विरोधौ। एकेन विरोधेन शीतोष्णस्पर्शयोरेकत्वं वार्यते । अन्येन सहावस्थानं भिन्नप्रवृत्तिविषयौ च । सकले वस्तुन्य- . विरोधौ, ख घिरोधो। २ कः कस्य । ३ नित्यत्वे, ख० नित्यत्व । ४ परस्पर परिहारेज, ख० परस्परेण । ५ वस्तुतात्र, क० स्तुतत्वं । ५ घस्तुतस्त्र, क. स्तुतत्वं। ६ 'प्रवृत्ति' इति पाठः ख० पुस्तके नोपलभ्यते ।

तृतीयपरिच्छेदः ७७ वस्तुनि च परस्परपरिहारविरोध: । वस्तुन्येव कतिपये सहानवस्थान- विरोधः । तस्माद्भिन्नव्यापारी भिन्नविपयौ च । ततो नान्योरन्योन्यान्त- र्भाव इति । स च द्विविधोऽपि विरोधो वक्तृत्वसर्वज्ञत्वयोन संभवति । स चायं द्विविधोऽपि विरोधो वक्तृत्वं च सर्वज्ञत्वं च तयोर्न संभवति न ह्यविकलकारणस्य सर्वज्ञत्वस्य वक्तृत्वभावादभावति: । सर्वज्ञत्वं ह्यदृश्यम् । अदृष्टस्य चाभावो नावसीयते । ततो नानेन विरोधगतिर्भवति। न च वक्तृत्वपरिहारेण सर्वज्ञत्वमवस्थितम् । काष्ठादयोऽपि वक्तृत्वपरि- हृतास्तेषामपि सर्वज्ञत्वप्रसङ्गात् । नापि सर्वज्ञत्वपरिहारण वक्तृत्वम् । काष्ठादीनामपि वक्तृत्वप्नसङ्गात् । तत एवाविरोधाद्वक्तृत्वविधानेन सर्व- ज्ञत्वनिपधः । स्यादेतत् । यदि नास्त्येव विरोधी घटपटयोरिव । स्यादपि तयोः सहावस्थितिदर्शनम् । अदर्शनातु विरोधातः । विरोधाचाभावगति- रित्याशङक्याह- न चाविरुद्ध विधेरनुपलब्धावप्यभावगतिः । रागा- दीनां वचनादेश्व कार्यकारणभावासिद्धेः । न चाविरुद्धविधेरिति । अनुपलब्धावपि नायं निरुद्धविधिः । यद्यपि च सहावस्थानानुपलम्भस्तथापि न तयाविरोधो यस्मान्न सहानुपलम्भ- मात्राद्विरोधोऽपि निवनिवर्तकभावावसायात् । तु द्वयोरुपलभ्यमानया तस्मादनुपलब्धावपि न वक्तृत्वविरोधिविरुद्धविधिः । अतोऽस्मान्नान्यस्या- भावगतिस्तथा न वक्तृत्वाद्रागादिमत्त्वगतिः । यतो यदि वचनादि रागा- दीनां कार्य स्याद्वचनादे रागादिगतिः स्याद्रागादिमिवृत्ती वचनादिनिवृत्तिः स्यात् । न च कार्यम् । कुतः । रागादीनां वचनादेश्व कार्यकारणभावस्या- सिद्धेः । कारमान्न कार्यमतोऽस्मान्न गतिः । माभूद्रागादिकार्य वचनम् । सहचारि तु भवति । ततो रागादी १ सहानवस्थान०, ख० सहावरथानं। २ द्विविधः, क० द्विरोधः। ३ 'च' इति पदं ख० पुस्तके नोपलभ्यते । ४ निवळ०, क० निर्वयं। ५ वचनादि, ख० वचन ।

७८ न्यायविन्दुः सहचारिणि निवृत्ते निवर्तते बचनमित्याशङ्कथाह अर्थान्तरस्य वा कारणस्य निवृत्तौ न वचनादेनि- वृत्तिरिति संदिग्धव्यतिरेकोऽनैकान्तिको वचनादिः । अर्थान्तरस्य वा कारणस्य निवृत्ती सहचारित्वदर्शनमात्रेण नान्यस्य वचनादेर्निवृत्तिः । अतो वक्तृत्वं भवेद्रागादिविरहश्चेति । इति शब्दस्त. स्मादर्थ । तस्मादसर्वज्ञत्वविपर्ययाद्विपक्षात्सर्वज्ञत्वाद्रागादिमत्त्वविपर्ययादरा- गादिमत्त्वात्संदिग्धो व्यतिरेको वचनादेः ! अतोऽनेकान्तिको वचनादिः । एवमेकैकरूपादिसिद्धिसंदेहे हेतुदोषानाख्याय द्वयोर्द्वयोरूपयोरसिद्धि- संदेहे हेतुदोपान्वक्तुकाम आह- द्वयो रूपयोर्विपर्ययसिद्धौ विरुद्धः । द्वयो रूपयोर्विपर्ययसिद्धी सत्यां विरुद्धः । त्रीणि च रूपाणि सन्ति ततो विशेषज्ञापनार्थमाह- कयोईयोः सपक्षे सत्त्वस्यासपक्षे चासत्त्वस्य यथा कृतकत्वं प्रयत्नानन्तरीयकत्वं च नित्यत्वे साध्ये विरुद्धो हेत्वाभासः। कयोर्द्वयोरिति । विशिष्टे रूपे दर्शयति । सपक्षे सत्त्वस्यासपक्षे चासत्त्वस्य विपर्ययसिद्धाविति सम्बन्धः । कृतकत्वमिति स्वभावहेतुः । प्रयत्नानन्तरीयकत्यमिति कार्यहेतोः। प्रयत्नानन्तरीयकशब्देन हि प्रयत्नानन्तरं जन्म ज्ञानं च प्रयत्नानन्तरीयकमुच्यते । जन्म जायमानस्य स्वभावः । ज्ञानं ज्ञेयस्य कार्यम् । तदिह प्रयत्नानन्तरं ज्ञानं गृह्यते । तेन कार्यहेतुः । एतौ हेतू नित्यत्वे साध्ये विरुद्धौ हेत्वाभासौ। कस्मात्पुनरेती विरुद्धावित्याह- अनयोः सपक्षेऽसत्त्वमसपक्षे च सत्त्वमिति विपर्ययसिद्धिः। । - १ 'तस्मादसर्वज्ञत्वविपर्ययाद्विपक्षात्' आदि, ख० 'तस्मादसर्वज्ञवावीतरागत्व विपर्य गत् (अशुद्धः) तिपक्षात्सर्वज्ञत्वावीतरागादिमत्वारसंदिग्धः' आदि ।

- - -- तृतीयपरिच्छेदः ७४ अनयोरिति । सपक्षे नित्ये कृतकत्वप्रयत्नानन्तरीयकत्वयोरसत्त्वमेव निश्चितम् । अनित्ये विपक्ष एव सत्त्वं निश्चितमिति विपर्यसिद्धिः ! करमात्पुनर्विपर्ययसिद्धाबप्येतौ विरुद्धावित्याह- एतौ च साध्यविपर्ययसाधनाद्विरुद्धौ । एतौ च साध्यस्य नित्यत्वस्य विपर्ययमनित्यत्वं साधयतः साध्य- विपर्ययसाधनाद्विरुद्धौ । यदि साध्यविपर्ययसाधनाविरुद्धारेतायुक्तं न परार्थानुमाने साध्यं न त्वनुक्तम् । इष्टं चानुक्तमतोऽन्य इष्टविघातकृदाभ्यामिति दर्शयन्नाह- तत्र च तृतीयोऽपीष्टविघातकृविरुद्धः । ननु च तृतीयोऽपि विरुद्ध उक्तः । उक्तविपर्ययसाधनौ द्वो तृतीयोऽ- यमिष्टस्य शब्देनानुपात्तस्य विधानं करोति विपर्ययसाधनादिति । इष्ट- विघातकृत् । तमुदाहरति-- यथा पगाश्चक्षुरादयः संघातत्वाच्छयना- शनाद्यङ्गवदिति । यथेति । चक्षुरादय इति धर्मी। परोऽर्थः प्रयोजनं संस्कार्य उप. कर्तव्यो येषां ते परार्था इति साध्यम् । संघातत्वात्संचितरूपत्वादिति हेतुः । चाक्षुरादयो हि परमाणुसंचितिरूपाः । ततः संघातरूपा उच्यन्ते । शयनमासनं चादिर्यस्य तच्छयनासनादि । तदेवाङ्गं पुरुषोपभोगाङ्गत्वात् । अयं व्याप्तिप्रदर्शनविपयो दृष्टान्तः । अत्र हि पारायंन संहतत्वं व्याप्तम् । यत: शयनासनादयः संघातरूपा: पुरुषस्य भोगिनो भवन्त्युपकारका इति परार्था उच्यन्ते । कथमयमिष्टविघातकृदित्याह- तदिष्टासंहतपारार्थ्यविपर्ययसाधनाविरुद्धः । तदिष्टासंहतपारार्थ्यविपर्ययसाधनादिति । असंहते विपये पारार्थ्यम- संहतपारार्थ्यम् । तस्य सांख्यस्य वादिन इष्टमसंहतपारायं तदिष्टसंहतपारायं तस्य विपर्ययः । संहतपारायं नाम तस्य साधनाद्विरुद्धः। आत्मास्तीति - ८० न्यायविन्दुः ब्रुवाणः सांख्यः । कुत एतदिति पर्यनुयुक्तो बौद्धनेदमात्मन: सिद्धये प्रमाण- माह । तस्मादसंहतस्यात्मन उपकारकत्वं साध्यं चक्षुरादीनाम् । अयं तु हेतुविपर्ययव्याप्तः । यस्माद्यो यस्योपकारकः स तस्य जनकः । अन्धमानश्च युगपत्क्रमेण वा भवति संहतः । तस्मात्परार्थाश्चक्षुरादय इति संहतपरार्था इति सिद्धम् । स इह कस्मान्नोक्तः। अयं च विरुद्ध आचार्यदिग्नागेनोक्त: । स कस्माद्वार्तिककारेण सता त्वया नोक्तः । इतर आह- - अनयोरेवान्तर्भावात् । अनयोरेव साध्यविपर्ययसाधनयोरन्तर्भावात् । ननु चोक्तविपर्ययं न साधयति तत्कथमुक्तविपर्ययसाधनयोरेवान्तर्भाव इत्याह- न ह्ययमाभ्यां साध्यविपर्ययसाधनत्वेन भिद्यते । नह्ययमिति । हीति यस्मादर्थे । यस्मादयमिष्टविघातकृदाभ्यां हेतुभ्यां साध्यविपर्ययसाधनत्वेन न भिद्यते । यथा तौ साध्यविपर्ययसाधनौ तथा- यमप्युक्तविपर्ययं तु साधयतु वा मा वा किमुक्तविपर्ययसाधनेन । तस्मा- दनयोरेवान्तर्भावः । ननु चोक्तमेव साध्ये तत्कथं साध्यविपर्ययसाधनत्वेनाभेद इत्याह- न हीष्टोक्तयोः साध्यत्वेन कश्चिद्विशेषः इति द्वयो रूपयोरेकस्यासिद्धावपरस्य च संदेहेऽनैकान्तिकः । नहीति । यस्मादिष्टोक्तयोः परस्परस्य साध्यत्वेन न कश्चिद्विशेषे भेद इति । तस्मादनयोरेवान्तर्भावः इत्युपसंहार: । प्रतिपादिनो हि यज्जि- ज्ञासितं तत्प्रकरणापन्नम् । यच्च प्रकरणापमं सत्साधनेच्छया विषयीकृतम् । साध्यमिष्टमुक्तमनुक्तं वा । । १. परस्परस्य, क० परस्परस्मात् ।

तृतीयपरिच्छेदः ८१ । --- ननूक्तमात्रमेव साध्यं नाविशेष इति । द्वयो सयोरसिद्धौ विरुद्ध उक्तः । अनयोगामा एक यालिदापा: का जहहे कान्तिकः । की- शोऽसा त्याह- यथा वीतरागः कश्चित्सर्वज्ञो वा वक्तृत्वादिति । व्यतिरेकोऽत्रामिडः। संदिग्धोऽन्वयः । यथेति । विगतो रागो यस्य स वीतराग इत्येकं साध्यम् । पर्यजो वेति द्वितीया । बतृत्वादिति हेतः । व्यतिरेकोऽत्रासिद्धः इति लामो समय चापर्यज्ञेच विश्ने उक्तृत्व दृश्य । अतोऽसिद्धो व्यतिरेकः । संदिग्धोऽन्ययः कुत इत्याह- सर्वज्ञवीतगगयोर्विप्रकर्षाद्वचनादेस्तत्र सत्त्वमसत्त्वं वा संदिग्धमनयोरेव द्वयों रूपयोः पदेहेऽनैकान्तिकः । ग्यपक्षभूतयोः सर्वज्ञवीतरागयोर्विप्रकयोदित्यतीन्द्रियत्नाडूचनादेरिन्द्रि- कान्य यापि । तत्रातीन्द्रिययोः सर्वज्ञत्ववीतरागयोः सत्त्वमसत्त्वं वा संदि- ग्ध । ततश्च न ज्ञायने किं वक्तृत्वात्मज्ञ उत ने गनेकान्तिक इति । संप्रति द्वयोरेव संदेहेऽनेकान्तिकं वक्तुमाह । अनयोरेवान्वयव्यतिरे- करूपयो: संदेहात्संशयहेतुः । उदाहरणान-- सात्मकं जीवच्छरीरं प्राणादिमत्त्वादिति । हात्मना बत। सात्ममिति साध्यम । शरीरमिति धर्मी । जी द्यःणं धमिांगोषणम् । मृते ह्यात्मान बेच्छति । प्राणा आश्वासादय आदिर्य योन्मे पाहः प्राधिर्मस्य स प्राणादिः । स यस्यास्ति तत्प्राणा- दिमजीकच्छरीरम् । तस्य भागस्तत्वम् । तस्मादित्येष हेतुः । अयम- साधारण संशयहेतुरुपपादयितव्यः । पक्षधर्मस्य च द्वाभ्यां कारणाभ्यां संशयहेतुत्वम् । संशयविषयौ यावाकारौ ताभ्यां सर्वग्य वस्तुनः संग्रहात् । तयोश्च व्यापकयोराकारयोरेकत्रापि वृत्यनिश्चयाद्यकाभ्यां ह्याकाराभ्यां सर्व वस्तु न संगृह्यते । तयोराकारयोर्न संशयः । प्रकारान्तरसम्भवे हि पक्ष- ११ न्या० ८२ न्यायबिन्दुः धर्मो धर्मिणमवियुक्तं द्वयोरेकेन धर्मेण दर्शयितुं न शक्नुयादतो न संश यहेतुः स्यात् । द्वयोधर्मयोरनियतं भावं दर्शयन्संशयहेतुईयोस्त्वनियतम भावं दर्शयितुमशक्तोऽप्रतिपत्तिहेतुर्नियतं भावं दर्शयन्हेतुर्विरुद्धो वा स्या स्मायकाभ्यां सर्व वातु संगृह्यते तयोः संशयहेतुर्यदि तयोरेकत्रापि सद्भाः निश्चयो न स्यात् । सद्भावनिश्चये तु यद्येकत्र नियतसत्तानिश्चयो विरु हेतुर्वा स्यात् । अनियतसत्तानिश्चये तु साधारणानेकान्तिकः । संदिग्ध विपक्षव्यावृत्तिकः संदिग्धान्वयोऽसिद्धव्यतिरेको बा स्यात् । एकत्रापि वृत्यनिश्चयादसाधारणानकान्तिको भवति । ततोऽसाधारणनैकान्तिकस्यानैकान्तिकत्वे हेतुद्यं दर्शयितुमाह- न हि सात्मकनिरात्मकाभ्यामन्यो राशिरस्ति । यत्र प्राणादिर्घर्तते । -न हीति | सहात्मना वर्तते सात्मकः । निष्क्रान्त आत्मा यस्मात निरात्मकः । ताभ्यां यस्मान्नान्यो राशिरस्ति । किंभूतो यत्रायं वस्तुधर प्राणादिवर्तते । तस्मादयं तयोर्भवति संशयहेतुः । कस्मादन्यराश्यभाव इत्याह- आत्मनो वृत्तिव्यवच्छेदाभ्यां सर्वसंग्रहात् । आत्मनो वृत्तिः सद्भावो व्यवच्छेदोऽभावस्ताभ्यां सर्वस्य वस्तुन संग्रहात्क्रोडीकरणात् । यत्र ह्यान्मास्ति तत्सात्मकम् । तदन्यन्निरात्मकम ततो नान्यो राशिरस्ति संशयहेतुत्वकारणः । प्रकाराभ्यां सर्वसंग्रहं प्रतिपाद्य द्वितीयमाह- नाप्यनयोरेकत्र वृत्तिनिश्चयः । नाप्यनयोः सात्मकानात्मकयोर्मध्य एकत्र सात्मकेऽनात्म के वा वृतं सद्भावस्य निश्चयोऽस्ति । द्वावपि राशी त्यक्त्वा न वर्तते प्राणादिर्वस्त धर्मत्वात् । ततश्चानयोरेव वर्तत इत्येतावडेव ज्ञातम् । विशेषे तु वृत्ति निश्चयो नास्तीत्ययमर्थः । - - १ यकाभ्यां, क. याभ्यां। २ साधारणानकान्तिकः, क. साधारणानेकान्तिक० ३ व्यावृत्तिकः, क० व्यावृत्तिकः २। .

तृतीयपरिच्छेदः ८३ - - - तदाह- सात्मकत्वेन निरात्मकत्वेन वा प्रसिद्ध प्राणादेरसिद्धिः। सात्मकत्वेनानात्मकत्वेन वा विशेषेण युक्ते प्रसिद्ध निश्चिते वस्तुनि प्राणादेघर्मस्यासिद्धेरनैकान्तिकोऽनिश्चितस्यान । तदेवमसाधारणस्य धर्म- स्यानैकान्तिकत्वे कारणद्वयमभिहितम् । पक्षधर्मश्च भवन्सर्वः साधारणोऽ- साधारणो वा भवत्यनैकान्तिकः । तस्मादुपसंहारव्याजेन पतधर्मत्वं दर्शयति- तस्माज्जीवच्छरीरसम्बन्धी प्राणादिः। तस्मादित्यादिना जीवच्छरीरस्य सम्बन्धी पधर्म इत्यर्थः । यस्मा- नयोरेकत्रापि न निवृत्तिनिश्रयस्तस्मामाभ्यां न व्यतिरिच्यते । वस्तुधर्मो हि सर्ववस्तुव्यापिना: प्रकारयोरेकत्र नियतसद्भाचो निश्चित: प्रकारान्तरान्निवर्तत । तत प्रवाह- सात्मकादनात्मकाच सर्वस्मायावृत्तत्वेनासिद्धेः । सात्मकादनात्मकाच्च सर्वस्माद्रस्तुनो व्यावृत्तत्वेनासिद्धेरिति । प्राणा- दिस्तावत्कुतश्चिहटादेनिवृत्त एव । तत: एतावदवसातुं शक्यं सात्मकाद- नात्मकावा कियतो निवृत्तः। सर्वस्मात निवृत्तो नावसीयते । ततो न कुतश्चिव्यतिरेकः । यद्येवमन्वयोऽस्तु तयोनिश्चित इत्याह- ताभ्यां न व्यतिरिच्यते न तत्रान्वेति । न तत्र सात्मकेऽनात्मके वार्थऽन्वत्यन्वयवान्प्राणादिः । कुत इत्याह- एकात्मन्यप्यसिद्धः। एकात्मनि सात्मकेऽनात्मकः वासिद्धेः कारणात् । वस्तुधर्मतया तयोर्द्वयोरेकत्र वा वर्तते इत्यवसितः प्राणादिर्न तु सात्मक एव निरात्मक एव वा वर्तत इति कुतोऽन्वयनिश्चयः । १ भवन्सर्वः, क० भवत् सर्वः । - न्यायविन्दुः - ननु च प्रतिवादिनो न किञ्चित्सात्मकमस्ति । ततोऽस्य हेतोर्न सात्मकेऽन्वयो न व्यतिरेक इत्यन्वयव्यतिरेकयोरभावनिश्चयः । सात्मके न तु सद्भावसंशय इत्याह- नापि सात्मकान्निरात्मकाच्च तस्यान्वयव्यतिरेकयोर- भावनिश्चयः । नापि सात्मकाद्वस्तुलस्तस्य प्राणाइरन्ययव्यतिरेकयोरमा निश्चयः । नापि च निरात्मकात् । सात्मकादनात्मकादिति च पञ्चमी व्यतिरेकशब्दा- पेक्षया द्रष्टव्या । कथमन्वयव्यतिरेकयोनामावनिश्चय इत्याह- एकाभावनिश्चयस्यापराभावनान्तरीयकत्वात् । एकस्यान्वयस्य व्यतिरेकस्य वा योऽभावनिश्चयः सोऽपरस्य दिदी- यस्याभाव निश्चय शान्तरायको भाति । निश्चयस्यायी पारी तस्य भाव- स्तत्त्वम् । तस्मावत एकामावनिश्चयोऽपरभावनिश्चयनान्तर्गयकस्तस्मान्न द्वयोरेकत्राभावनिश्चयः । कस्मात्पुनरेकस्याभावनिश्चयोऽपरसद्भा निश्चयाव्यभिचारीत्या:- अन्वयव्यतिरेकयोरन्यान्यव्यवच्छेदरूपत्वात् । अन्यव्यतिरेकयोर न्योन्यव्य रच्छेहरूपत्वादिति । अन्योन्यस्य व्या. च्छेदोऽभावः स एव रूपं ययोस्तयोर्भावस्तत्वं तस्मा कारणात् । अन्यय- व्यतिरेको भावाभावी । भावाभावों च परस्परव्यवच्छेदरूपी । यस्य व्यवच्छेन यत्परिछिया तत्तत्परिहारेण व्यवस्थितम् । स्वभावव्यवच्छे. देन च भाष: परिच्छिद्यने । तस्मास्वाभारव्यवच्छे इन भाक, व्यन- स्थितः । अायो हि नीरूपा यादृशो बिकल्पेन दर्शित: । नीरूपतां च व्यवच्छिद्य रूपमाकारवत्परिछिद्यते । तथा च सत्यन्वयाभावो व्यतिरको व्यतिरेकाभावश्चान्त्रयः । ततोऽन्वयाभावे निश्चिते व्यतिरेको निश्चित भवति । व्यतिरेकाभावे च निश्चितेऽन्ययो निश्चितो भवति । तस्मादि नाम सात्मकमवस्तु निरात्मकं च वस्तु तथापि न तयोः प्रागाइरन्वय. १ 'निश्चयन' इति पाठः क० पुस्तके नोपलभ्यते ।

तृतीयपरिच्छेदः व्यतिरेकयोरभावनिश्चयः । एकवस्तुन्येकवस्तुनो युगपद्भालाभावविर धात् । तयोरभावनिश्चयायोगात् । न च प्रतिभाधनुरोधात्मा मकानात्मके वस्तुनी सदसती किं तु प्रमागानुरोधादित्युभे संदिग्धे । ततस्तयोः प्रामादिमत्त्यस्य सदसत्त्वसंशयः । अत एवान्वयव्यतिरेकयोः सन्देहाद कान्तिकः । यत एक क्वचिदन्वयव्यतिरकयान भा निश्चया नात्यभावनिश्चयस्तत एवान्वयव्यनिरेकयोः मन्देहः । यदि तु कांचदप्यन्वयव्यनिरकयोरेकस्या- प्यभावनिश्चय: स्याल एक द्वितीयस्य भाषांनश्चय इत्यन् ययतिरकसंदह एव न स्यात् । यतश्च न कचिद्भावामाननिश्चयस्लत एतान्त्र यव्यतिरेकयो: संदेहः । संदेहाच्चानेकान्तिकः-- कस्मादनकान्तिकः- माध्येतरयोरतो निश्चयाभावात् । साध्यस्वेतरस्य च विरुद्धस्यात: मंदिग्धान्वयव्यतिरेकान्निश्चयाभा- वात् । सपनरिपक्षयोहि सदसत्त्वसं न साध्या य न विरुद्धस्य सिद्धिः । न च सात्मकानात्मकाभ्यां च पर: प्रकार: संगति । ततः प्रागादि. मत्त्वाद्धमिणि जीपच्छरीरे संशयः । आत्मभानाभारयोरित्यनैकान्तिक: प्राणादिरिति । त्रयाणां रूपाणामसिद्धी संहहे च हेतुदोषानुपपाद्योपसंहरन्नाह- एवं त्रयाणां रूपाणामेकैकस्य द्वयोर्द्वयोर्वा रूग्योर- सिद्धौ संदेहे च यथायोगमसिद्धविरूद्धानकान्तिकास्त्रयो हेत्वाभासाः। एवमित्यनन्तरोक्तेन क्रमणेषां मध्य एकक उदयं यदसिद्धं लंदिग्धं वा भवति । द्वे द्वे वासिद्ध संदिग्धे का भवत: । तदातिद्धश्च विरुद्धश्चानैका- न्तिकश्च ते हेत्वाभासाः। यथायोगमिति । यस्यासिद्धी सं हे वा यो १ निश्चयायोगात् , ख० निश्चययोगात् । २ प्राणादि० क. प्रमाणादि। पुस्तके 'साध्यस्ये योहि' लिखित्वा पंक्तिरेका परित्यक्ता। ४ सिद्धिः, ख० असिद्धिः । ५ पदमिदं ख० पुस्तके न विद्यते । ६ पदमिदं ख० पुस्तके न विद्यते । ३ख० .

न्यायविन्दुः । - हेत्वाभासो युज्यने स तस्यासिद्धेः संदेहाच व्यवस्थाप्यत इति यस्य यस्य येन येने योगो यथायोगमिति । विरुष्हाव्यभिचार्यपि संशयहेतुरुक्तः । स इह कस्मान्नोक्तः । ननु चाचार्येण विरुद्धाव्यभिचार्यपि संशयहेतुरुक्त: । हेत्वन्तरसा- धितस्य विरुद्धं यत्तन्न व्यभिचरति स विरुद्धाव्यभिचारी। यदि वा विरुद्धश्चासौ साधनान्तरसिद्धस्य धर्मस्य विरु द्धनाधनादव्यभिचारी च स्वसाथ्याव्यभिचाराविरुद्धाव्यभिचारी ! सत्यमुक्त आचार्येण । मया त्विह नोक्तः । कस्मादित्याह- अनुमानविषयेऽसंभवात् । अनुमानस्य विषयः प्रमाणसिद्धं त्रैरूप्यम् । यतो ह्यनुमानसद्भाव: सोऽनुमानस्य विषयः । प्रमाणसिद्धाच्च त्रैवल्यादनुमानसद्भावस्तस्मात्तदे- वामानविषयः । तस्मिन् प्रक्रान्ते न विरुद्धाव्यभिचारिसंभवः । प्रमाण- सिद्धो हि त्रैय्ये प्रस्तुतं स एवं हत्वाभास: संभवति यस्य प्रमाणसिद्ध रूल्यम् | न च विरुद्धाव्यभिचारिणः प्रमाणसिद्धमस्तिरूपम् । अतो न संभवः । ततोऽसंभवो नोक्तः । कस्मादसंभव इत्याह- न हि संभवोऽस्ति कार्यस्वभाबयोरुक्तलक्षणयोरमु- पलम्भस्य च विरुद्धतायाः। न चान्योऽव्यभिचारी । न हीति । यस्मान्न संभवोऽस्ति विरुद्धलायाः । कार्य च स्वभा- वश्च तयोरुक्तलक्षणयोरिति । कार्यस्य कारणाज्जन्मलक्षणं तत्त्वम् । स्वभा- वस्य च साध्यव्याप्तत्वं तत्तम । यत्कार्य यश्च स्वभावः स कथमात्म- कारणं व्यापकं च स्वभावं परित्यज्य भवेधेन विरुद्धः स्यात् । अनु- पलम्भस्य चोक्तलक्षणस्येति । दृश्यानुपलम्भत्वमनुपलम्भलक्षणम् । तस्यापि च स्वभावाव्यभिचारित्वान्न विरुद्धत्वसंभवः स्यात् । एतेभ्यो- पदमिदं कर पुस्तके नोपलभ्यते । २ विरुद्धं यत् , ख० यद्विरुद्धं । ३ स्यात्, ख० स्यादेति तत् ।

तृतीयपरिच्छेदः ऽम्यो भविष्यतीत्याह । न चान्य एतेभ्योऽव्यभिचारी त्रिभ्योऽत एव तेष्वेव हेतुत्वम् । क ताचार्यदिङनागेनायं हेतुदोष उक्त इत्याह । तस्मादवस्तुदर्शनबलप्रवृत्तमागमाश्रयमनुमानमा- श्रित्य तदर्थविचारेषु विरुद्धाव्यभिचारी साधनदोष उक्तः । यस्माद्वस्तुबलप्रवृत्तेऽनुमाने न संभवनि तस्मादागमाश्रयमनुमानमा- श्रित्य विरुद्धाव्यभिचार्युक्तः । आगमसिद्धं हि यस्यानुमानस्य लिङ्गत्रैरूप्यं तस्यागम आश्रयः । - - ननु चागमसिद्धमपि त्रैरूप्यं प्रमाणसिद्धमिल्याट । अवस्तुदर्शनबल- प्रवृत्तमिति | अबस्तुनो दर्शनं विकल्पमात्रं तस्य बलं सामर्थ्यम् । ततः प्रवृतमप्रमाणाद्विकल्पमात्रायरस्थितं रूप्यमागमसिद्धमनुमानस्य । न तु प्रमाणात् । तत्तीनुमानेनागमसिद्धौयं काधिकृतमित्याह ! तंदर्थति । तस्या- गमस्य याऽर्थोऽतीन्द्रियः प्रत्यक्षानुमानाभ्यामविपयीकृत: सामान्यादिस्तस्य विचारेषु प्रक्रान्तेवागमाश्रयमनुमानं संभवति । तदाश्रयो विरुद्धाव्यभिचार्युक्त आचार्येणेति । कस्मात्पुनरागमाश्रयेऽप्यनुमाने संभव इत्याह- शास्त्रकाराणामर्थेषु भ्रान्त्या विपरीतस्य स्वभावोप- संहारसंभवात् । शास्त्रकृतां विपरीतस्य वस्तुविरुद्धस्य स्वभावस्योपसंहारो ढोकनम- र्थषु तस्य संभवाद्विरुद्धाव्यभिचारिसंभवः । भ्रान्त्येतिविपर्मसेन । विप- यस्ता हि:शाखकागः सन्तमसमतं स्वभावमारोपायन्तीति । यदि शास्त्रकृतोऽपि भ्रान्ता अन्येष्वपि पुरुपेषु क आश्वास इत्याह- न ह्यस्य संभवो यथावस्थितवस्तुस्थितिष्वात्मकार्येषू- पलम्भेष्ठ । - १ पाठोऽयं क पुस्तके नोपलभ्यते। २ काममाश्रयो ।

८८ न्यायविन्दुः नहीति ! न हेतुपु कल्पनया हेतुत्वव्यवस्थापि तु वस्तुस्थित्या । ततो यथास्थिावस्तुस्थितियात्मकार्यानुपलम्भेष्तस्य संभवो नास्ति । अवस्थितं परमार्थ दस्तु सदनतिक्रान्ता यथावस्थिता वस्तुस्थितिव्यवस्था येपात यथावस्थित स्तुस्थितयः । हि यथा वस्तु स्थितं तथा स्थिता न कल्पनया, भ्रान्तरवकाशोऽस्ति न विरुद्धाव्यभिचा- रिसंभव: स्यात् ! तत्र विरुद्धाव्यभिचारिण्युदा रणम्-- तत्रोदाहरणं यत्सर्वदेशावस्थितैः स्वसम्बन्धिभिः संबध्यते तत्सर्वगतं यथाकाशमभिसंबध्यते सर्वदेशाव- स्थितैः स्वमम्वन्धिभिर्युगपत्सामान्यमिति । यास्मिन वस्थितैः स्वसंबन्धिभिर्युगपदाभिसंबध्यते तत्सर्वदे- शावस्थितैरभिसंबध्यमानत्वं सामान्यस्यानूद्य सर्वगतत्वं विधीयते । तेन युगपदभिनंबध्यमान, सर्वगतः नियः न व्याप्तं कथ्यते । इह सामान्यं कणादमार्पणा निष्क्रियं दृश्यमेकं चोक्ता । युगपञ्च सर्वैः स्वैः स्वैः सम्बन्धिभिः सान संबद्धप । नत्र पैलु केन कणादशिष्येण व्यक्तिषु व्यक्तिरपुि च गेषु सामान्य स्थितं साधयितुं प्रमागमिदमु- पन्यस्त । यथाकाशमिति । व्यानिप्रदर्शनविपयो शान्त: । आकाशमपि हि सर्व शाबस्थितनादिभिः संयोगिभिर्युगपदर्भिसंबध्यमानं सर्वगतं चाभिलम्बध्यो च सर्व शास्थितैः स्वसंबन्धिभिरिति हेतोः पक्षधर्मत्व- प्रदर्शनम् - अस्य स्वभावहेतुत्वं प्रयोजयितुमाह- तत्संबन्धिस्वभावमात्रानुबन्धिनी तद्देशसंनिहित. स्वभावता। तत्संबन्धीति । तेषां सर्वदेशावस्थितानां द्रव्याणां संबन्धी सामा- न्यस्य स्वभाव: स एव तत्संबन्धिस्वभावमात्रन । तदनुबनातीति तदनु- १ एकं, ख० एव । २ संबन्धिभिः, ख० स्वसम्बन्धिभिः। ३ च, ख० वा । , , तृतीयपरिच्छेदः ह - बन्धिनी । कासावित्याह-नदेशसंनिहितस्वभावता । तेषां संबन्धिनां देशस्तदेशस्तद्देशे संनिहितः स्वभायो यस्य तत्तद्देशसंनिहितस्वभावं तस्य भावस्तत्ता । यस्य हि येषां संबन्धी स्वभावस्तनियमेन तेषां देशे संनि- हितं भवति । ततस्तत्संबन्धित्यानुबन्धिनी तद्देशसंनिहितता सामान्यस्य । ननु च गवां संबन्धी स्वामी । न च तद्देशे संनिहितस्वभावः स्वामी । तत्कथं संबन्धित्वात्तद्देशत्वमित्याह- न हि यो यत्र नास्ति स तद्देशमात्मना व्याप्नोतीति स्वभावहेतुप्रयोगः। न हीति । यो यत्र देशे नास्ति स देशो यस्य स तद्देशस्तं न व्याप्न त्यात्मना स्वरूपेण । इह सामान्यस्य तद्वतां च समवायलक्षणः संबन्धः । स चाभिन्न देशयोरेव । तेन यत्र यत्समवेतं तत्तदात्मीयेन रूपेण क्रोडीकुर्वत्समवायिरूपदेशे स्वात्मानं निवेशयति । तद्देशरूपनिवेशनमेव तत्क्रोडीकरणम् । ततस्तत्समवायः । तस्माद्यद्यत्र समवेतं ततव्यं व्याप्नुवदात्मना तद्देशे संनिहितं भवति । तदयमर्थः । तदेशस्थवस्तु व्यापनं तद्देशसत्तया व्याप्तम् । तदेशसत्ताभावे तळ्यापनाभावाध्यापन लक्षण: समवायसंबन्धो न स्यात् । अस्ति च व्यापनम् । अतस्तद्देशे संनिहितत्वमिति । तदयं स्वभावहेतुः । पैठरप्रयोगं दर्शयन्नाह- द्वितीयोऽपि प्रयोगो यदुपलब्धिलक्षणप्राप्तं सन्नो- पलभ्यते न तत्तत्रास्ति । तद्यथा-क्वचिदविद्यमानो घटः। द्वितीयोऽपीति | यदुपलब्धेर्लक्षणतां विषयतां प्राप्तं दृश्यमित्यर्थः । एतेन दृश्यानुपलब्धिमनूद्य तत्तत्तत्रास्तीत्यसद्व्यवहार्यत्वं विहितम् । ततो व्याप्यदृश्यानुपलब्धेापकमसब्यवहार्यत्वं दर्शितम् । तद्यथेति । कचिद- सन्घटो दृष्टान्तः । - १ समवायलक्षणः, क० समवायलक्षण० । २ तेन, ख० अनेन । ३ तत्क्रोडी० ख० न क्रोडी। ४ तद्देशसत्ताभावे, ख. तद्देशसत्ताया अभावे । ५ तत्तत्तत्र, क० ततत्तत्र ख० तत्तत्र। १२ न्या० - न्यायविन्दुः पक्षधर्मत्वं दर्शयितुमाह- नोपलभ्यते चोपलब्धिलक्षणप्राप्तं सामान्य व्यक्त्य- न्तरालेष्विति । नोपलभ्यते चेति । व्यक्तरन्तरालं व्यक्त्यन्तरं च व्यक्तिशून्यं चाकाशं दृश्यमपि कस्यांचि व्यक्ती गोसामान्यमश्वादिषु व्यक्तयन्तरेषु व्यक्तिशून्ये चाकाशे चोपलभ्यते । तस्मान्न तेष्वस्तीति गम्यते । अयमनुपलम्भप्रयोगः स्वभावश्च परस्परविरुद्धार्थ- साधनादेकत्र संशयं जनयतः । अयमनुपलम्भ: पूर्वोक्तश्च स्वभावः परस्परविरुद्धौ यात्रौँ त्योः साधनात्तावेकस्मिन्धर्मिणि संशयं जनयतः । न ह्येकोऽर्थः परस्परविरुद्ध- स्वभावो भवितुमर्हति | एकेन चात्र व्यक्तयन्तरेषु व्यक्तिशून्ये चाकाशे सत्त्वम । अपरेण चानुपलम्भेना प्रत्त्वं साध्यते । न चैकस्यैकदैकत्र सत्व- मसत्त्वं च युक्तं तयोविरोधात् । तदागमसिद्धस्य सामान्यस्य सर्वगत- वासर्वगतत्वयोः साध्ययोरेतौ विरुद्धाव्यभिचारिणी जातौ । यत: सामान्य- स्यैकस्य युगपत्सर्व देशारस्थितैरभिसंबन्धित्वं चाभ्युपगतं दृश्यत्वं च । ततः सर्वसम्बन्धित्वात्सर्वगतत्वं दृश्यत्वादन्तरालानुपलम्भादसर्वगतत्वं । ततः शास्त्रकारेणैव विरुद्धव्यातत्वमपश्यता विरुद्धव्याप्ती धर्माबुवा विरु- द्धान्यभिचार्यत्रकाशो दत्त इति । न च वस्तुन्यस्य संभवः । इत्युक्ता हेत्वाभासाः । ननु च साधनावयवत्वाद्यथा हेतव उक्तास्तत्प्रसङ्गेन हेत्वाभासास्तथा साधनात्रयक्त्वाद् दृष्टान्ता वक्तव्यास्तत्प्रसङ्गेन च दृष्टान्ताभासास्तत्कथं नोक्ता इत्याह- १ व्यक्तिशून्ये, क. शून्ये । २ पदमिदं ख० पुस्तके नोपलभ्यते । ३ तदागमसिद्धस्य, क. सदामममसिक (अशुद्धः) ख० तस्मादामम० । ४ सर्वमतत्वासर्वगतत्क्योः, ख. सर्वगतकोः। ५ अभिसंबन्धित्वं, स्व० अभिसंबद्धत्वं । ६ उत्ता विरुद्ध०, क. उत्तौ। ७ न च वस्तुन्यस्य, ग्० न वस्तुन्यस्य हेतोः । इह विरुद्ध।

Ĉ - तृतीयपरिच्छेदः त्रिरूणे हेतुरुक्तः। त्रिरूपो हेतुरुक्तस्तत्कि दृष्टान्तः । स्यादेतत्तायता नार्थप्रतीतिरित्याह- तावतैवार्थप्रतीतिरिति न पृथग्दृष्टान्तो नाम साध- धनावयवः कश्चित् । तोवतैवेति । उक्तलक्षणेनैव हेतुना भवति साध्यप्रतीति: । अंत: स एव गमकस्तद्वचनमेय साधना । न दृष्टान्तो नाम साधनस्यावयवः । यतश्चायं नावय रस्तेन नास्य दृष्टान्तस्य लकणं हेतुल ज्ञणात्पृथगुच्यो । कथं तर्हि हेतोाप्तिनिश्चयो यद्यदृष्टान्तको हेतुरिति चेत् । नोच्यते हेतुर- दृष्टान्तक एवापि तु न हेतोः पृथग्दृष्टान्तो नाम । हेत्वन्तर्भूत एव दृष्टान्तः । तेन नास्य लक्षणं पृथगुच्यते । अत एवोक्तं नास्य लक्षणं पृथगुच्यत इति । न वेवमुक्तं नास्य लक्षणमुच्यत इति । यद्येवं हेतूपयोगिनोऽपि लक्षणं वक्तव्यमे येत्याह । गतार्थत्वात् । गतार्थत्वात् । गतोऽर्थः प्रयोजनमभिधेयं वा यस्य दृष्टान्तलक्षणस्य तत्तथा तस्य भावस्तत्त्वं तस्मात् । दृष्टान्तलक्षणं ह्युच्यो दृष्टान्तप्रतीतिर्यथा स्यात् । दृष्टान्तश्च हेतुल क्षणादेवावसित: । ततो दृष्टान्तलक्षणस्य यत्प्रयोजनं दृष्टान्तप्रतीतिस्तद्गतं निष्पन्नमभिधेयं वा । गतं ज्ञानं दृष्टान्ताख्यम् । कथं गतार्थत्वमित्याह- हेतोः सपक्ष एव सत्त्वमसपक्षाच्च सर्वतो व्यावृत्तो रूपमुक्तमभेदेन पुनर्विशेषेण कार्यस्वभावयार्जन्म तन्मा- त्रानुबन्धौ दर्शनीयावुक्तौ । - - १ 'उक्तः' इति पदं ख. पुस्तके नोपलभ्यते । २ तावतयति, क. तावता चेति । ३ असा, ख० लतः। ४ तद्वचनं, ख० ततस्तचनम् । ५ पदमिदं ख० पुस्तके नोपल. भ्यते। ६ पदमिदं ख० पुस्तके नोपलभ्यते । ७ पदमिदं क० पुस्तके नोपलभ्यते ।

६२ न्यायविन्दुः हेतो रूपमभेनोक्तं सामान्येन साधारणं कार्यस्वभावानुपलम्मा- नामेतल्लतणमित्यर्थः । किं पुनस्तत्सपक्ष एव यत्सत्त्वं विपक्षाच्च सर्वस्मा- व्यावृत्तिर्या रूपद्वयमेतदभेदेनोक्तम् । न च सामान्यमुक्तमपि शक्यं ज्ञातुम् । अतस्तदेव विशेषनिष्ठं वक्तव्यम् । अत: पुनरपि विशेषेण विशेषयन्ती जन्मतन्मात्रानुबन्धौ दर्शनीयावुक्तौ । कार्यस्य जन्म ज्ञातव्य- मुक्ता । जन्मनि हि विज्ञाते कार्यस्य सपत्त एव सत्त्वं विपत्ताच्च सर्व- स्माब्यावृत्तिर्ज्ञाता भवति । स्वभावस्य तन्मात्रानुबन्धो दर्शनीय उक्तः । तदिति साधनं तदेव तन्मात्रं साधनमात्रं तस्यानुबन्धोऽनुगमनं साधन- मानभाने भा: साध्यस्य । तन्मात्रभावित्वमेव हि साध्यस्य तादात्म्यम् । साधनस्य यदा स्वभावो ज्ञातो भवति तदा स्वभावहेतोः सपत्त एव सत्वं विपक्षाच सर्वस्माब्यावृत्तिमता भवति । तदेवं सामान्यलक्षणं विशे- पात्मकं ज्ञातव्यं नान्यथा । ततो विशेषलक्षणमुक्तम् । किमतो यदि नामैवमित्याह- तच्च दर्शयता यत्र धूमस्तत्राग्निरसत्यनौ न क्वचिद्- धूमो यथा महानसेतरयोः। तत्र सामान्यलक्षणे दर्शयितुकामेन विशेपलक्षणं दर्शयतैवं दर्शनी- यमिति संबन्धः । यत्र धूमस्तत्राग्निरिति कार्यहेतोर्व्याप्तिर्दर्शिता | व्यातिश्च कार्यकारणभावसाधनात्प्रमाणान्निश्चीयते। ततो यथा महानस इति दर्श- नीयम् । असत्यग्नौ न भवत्येव धूम इति व्यतिरेको दर्शितः । स च यथेतरस्मिन्निति दर्शनीयः । वह्निनिवृत्तिहिं धूमनिकृतौ नियता दर्शनीया । सा च महानसादितरत्र दर्शनीया । यत्र कृतकत्वं तत्रानित्यत्वमनित्यत्वाभावे कृतक- त्वासंभवो यथा घटाकाशयोरिति दर्शनीयम् । यत्र कृतकत्वं तत्रानित्यत्वमिति स्वभावहेतोाप्तिर्दर्शिता । अनि. . १ अभेदेनोक्तं, ख० उक्तमभेदेन । २ 'यस्' इति पदं ख० पुस्तके नोपलम्यते। ३ विज्ञाते, ख० ज्ञाते । ४ तस्य, ख० साधनमात्रस्य । ५ एवं, ख० एवं च । ६ इतरत्र, क० इतरत्रेति ।

- .. । तृतीयपरिच्छेदः ६३ त्यत्वाभावे न भवत्येव कृतकत्वमिति व्यतिरेको दर्शितः । व्याश्च साधकं प्रमाणं साधर्म्यदृष्टान्ते दर्शनीयम् । प्रसिद्धव्याप्तिकस्य च हेतोः साध्यनिवृत्तौ निवृत्तिदर्शनीया। तदवश्यं यथा घटे यथाकाशे चेति दर्शनीयम् । कस्मादेवमित्याह- न ह्यन्यथा सपक्षविपक्षयोः सदसत्त्वे यथोक्तप्रकारे शक्ये दर्शयितुम् । न हीति । यस्मादन्यथा सामान्यलक्षणरूपे सपदविपक्षयोः सद- सत्त्वे यथोक्तप्रकारे इति नियते । सपक्ष एव सत्त्वं विपक्षेऽसत्त्वमेवेति नियमो यथोक्तप्रकार: । ते न शक्ये दर्शयितुम् । विशेषलक्षणे हि दर्शिते यथोक्तप्रकारे सदसत्त्वे दर्शिते भवतः । न च विशेषलक्षणमन्यथा शक्यं दर्शयितुम् । तत्कार्यतानियमः कार्यलिङ्गस्य स्वभावलिङ्गस्य च स्वभावेन व्याप्तिः। तस्य साध्यस्य कार्य तत्कार्यं धूमस्तस्य भावस्तत्कार्यता सैव नियमो यतस्तत्कार्यतया धूमो दहने नियत: सोऽयं तत्कार्यतानियमो विशेषलक्ष. णरूपोऽन्यथा दर्शयितुमशक्यः । स्वभावलिङ्गस्य च स्वभावेन साध्येन व्याप्तिर्विशेषलक्षणरूपा न शक्या दर्शयितुम् । यस्मात्कार्यकारणभावस्ता- दात्म्यं च महानसे घटे च ज्ञातव्यं तस्माद्व्याप्तिसाधनं प्रमाणं दर्शयता साधर्म्यदृष्टान्तो दर्शनीयः । वैधर्म्यदृष्टान्तस्तु प्रसिद्ध तत्कार्यत्वे कारणा- भावे कार्याभावप्रतिपत्यर्थम् । तत एव नावश्यं वस्तु भवति । कारणा- भावे कार्याभावो वस्तुन्यवस्तुनि वा भवति । ततो वस्त्ववस्तु वा वैध- Hदृष्टान्त इष्यते । तस्माद् दृष्टान्तव्यतिरेकेण हेतोरेन्वयो व्यतिरेको वा न शक्यो दर्शयितुम् । अतो हेतुरूपाख्यानादेव हेतोयाप्तिसाधनस्य प्रमा- णस्य दर्शक: साधर्म्यदृष्टान्तः । प्रसिद्धव्याप्तिकस्य साध्याभावे हेत्वभाव- प्रदर्शनाद्वैधर्म्यदृष्टान्त उपादेय इति च दर्शितं भवति । . १ साधर्म्य० ख० साधर्म्य । २ सदसत्त्वे, क० सदसवे २। ३ साधर्म्य०, ख. साध्य०॥ ४ दृष्टान्यव्यतिरेकेण, ख० दृष्टान्तमन्तरेण । ५ हेतो...."न, ख० न हेतो।

न्यायविन्दुः अस्मिश्चार्थे दर्शिते दर्शित एव दृष्टान्तो भवति । अस्मिश्चार्थे दर्शिते दर्शित एव दृष्टान्तो भवति । योऽयमर्थो व्याप्तिसाधनप्रमाणप्रदर्शिनः कश्चिदुपादेयो निवृत्तिप्रदर्श- नश्चेत्यस्मिन्नर्थे प्रदर्शिते दर्शितो दृष्टान्त इत्याह- एतावन्मात्ररूपत्वात्तस्येति । एतावन्मानं रूपं यस्य तस्त्र भावस्तत्त्वं तस्मादिति । एतावदेव हि रूपं दृष्टान्तस्य । यदुत व्याप्तिसाधनप्रमाणदर्शनत्वं नाम साधर्म्यह- ष्टान्तस्य प्रसिद्धव्याप्तिकस्य वा साध्यनिवृत्ती साधननिवृत्तिप्रदर्शकत्वमि- त्येतद्वैधर्म्य दृष्टान्तस्य । तच्च हेतुरूपाख्यानावाख्यातमिति किं दृष्टान्त- लक्षणेन । एतेनैव दृष्टान्तदोषा अपि निरस्ता भवन्ति । एतेनैव च हेतुरूपाख्यानाद् दृष्टान्तत्वप्रदर्शनेन दृष्टान्तस्य दोषा दृष्टा- न्ताभासाः कथिता भवन्ति । तथाहि । पूक्तिसिद्धये य उपादीयमा- नोऽपि दृष्टान्तो न समर्थः स्वकार्य साधयितुं स दृष्टान्तदोप इति साम- •दुक्तं भवति । दृष्टान्ताभासानुदाहरति- यथा-नित्यः शब्दोऽमृर्तत्वात् । कर्मवत्पर- माणुवढटवदिति । यथेति । नित्यः शब्द इति । शब्दस्य नित्यत्वे साध्येऽमूर्तत्वादिति हेतु: । साधर्म्यण कर्मवत्परमाणुवद्भटवदित्येने दृष्टान्ता उपन्यस्ताः । एते च दृष्टान्तदोषाः साध्यसाधनधर्मोभयविकलास्तथा संदिग्धसाध्य- धर्मादयश्च । १ प्रदर्शनः, क. प्रदर्शिन, ख० दर्शकः । २ प्रदर्शिते, ख० दर्शिते। ३ 'वर्यदृष्टा. न्तस्य तत्' इति पाठः ख० पुस्तके नोपलभ्यते । ४ दृष्टान्तस्य दोषाः, क० गुस्तकस्य 'दोषा' मलिनत्वेन न पठ्यते । ख० दृष्टान्तदोपा। ५ पदमिदं ख० पुस्तके नोपलभ्यते । ६ ॥ तं भवति, ख० इत्येतदुक्तं भवति । ७ शब्दस्य नित्यत्वे साध्ये, खनित्यत्वे साम्ये शब्दस्य। 1 - - तृतीयपरिच्छेदः साध्यं च साधनं चोभयं 'चेति तैर्विकलाः । साध्यविकलं कर्म तस्यानित्यत्वात । साधनविकल: परमाणुमूर्तत्वात्परमारनाम् । असर्व. गतं द्रव्यपरिमाणं मूर्तिः । अप्सर्वगताच द्रव्यापाश्च परमाणवः । नित्यास्तु वैशेषिकैरिष्यन्ते । ततो न साध्यविकल: । घटस्तूभयविकल: । अनित्य- त्वान्मूर्तत्वाच्च घटस्येति । तथा संदिग्धः साध्यधर्मो यस्मिन्स संदिग्ध- साध्यधर्मः स आदिउँपान्ते तथोक्ताः । मंदिग्धसाध्यधर्मः । संदिग्धसा- धनधर्मः । संदिग्धोभयः । उदाहरणम्- यथा-रागादिमानयं वचनाद्रथ्यापुरुषवत् । रागादिमानिति सगादिमत्त्वं साध्यम् । वचनादिति हेतुः । रथ्यापु- रुषवदिति दृष्टान्तः । रागादिमत्त्वं संदिग्धम् । मरणधर्मोऽयं पुरुषो रागादिमत्त्वाद्रथ्यापुरुषवत् । मरणं धर्मोऽस्येनि मरणधर्मा तर य भागो मरणधर्मत्वं साध्यम् । अयं पुरुष इति धर्मी। रागादिमत्त्वादिति हेतु: । रथ्यापुरुपे दृष्टान्ने संदिग्धं साधनं साध्यं तु निश्चितं मरणधर्मत्वमिति । असर्वज्ञोऽयं रागादिमत्वाद्रथ्यापुरुषवदिति । असर्वज्ञ इति । असर्वज्ञत्वं साध्यम् । रागादिमत्त्वादिति हेतुः । तदुभयमपि रथ्यापुरुषे दृष्टान्ते संदिग्धम् । असर्वज्ञत्वं रागादिमत्वं चेति । अनन्वयोऽप्रदर्शितान्वयश्च । तथानन्त्रय इति। यस्मिन् दृष्टान्ते साध्यसाधनयोः संभवमात्रं दृश्यते न तु साम्येन व्याप्तो हेतुः सोऽनन्वयः । अप्रदर्शितान्वयश्च यस्मिन् दृष्टान्ते विद्यमानोऽप्यन्वयो न प्रदर्शितो क्क्त्रा सोऽप्रदर्शितान्वयः । अनन्वयमुदाहरति । यथा-यो वक्ता स रागादिमानिष्टपुरुषवत् । यथेति । यो वक्तेति वक्तृत्वमनूद्य स रागादिमानिति रागादिमत्त्वं १ रागादिमत्वं, क० रागादिमत्त्वे । ~ न्यायबिन्दुः विहितम् । ततो वक्तृत्वस्य रागादिमत्त्वं विहितम् । ततो वक्तृत्वस्य रागा- दिमत्त्वं प्रति नियमस्तेन व्याप्तिरुक्ता । इष्टपुरुषवदिति । इष्टग्रहणेन प्रतिवाद्यपि गृह्यते वाद्यपि । तेन वक्तृत्वरागादिमत्त्वयोः सत्त्वमात्रमिष्टे पुरुष सिद्धम् । व्याप्तिस्तु न सिद्धा । तेनानन्बयो दृष्टान्त इति । अनित्यः शब्दः कृतकत्वाहटवदिति । अनित्यः शब्द इत्यनित्यत्वं साध्यम् । कृतकत्वादिति हेतुः । घट- वदित्यत्र दृष्टान्तेन प्रदर्शितोऽन्वयः । इह यद्यपि कृतकत्वेन घटसदृश: शब्दस्तथापि नानित्यत्वेनापि सदृश: प्रत्येतुं शक्योऽतिप्रसङ्गात् । यदि तु कृनकत्वमनित्यत्वेस्वभावं विज्ञातं भवत्येवं कृतकत्वादनित्यत्वप्रतीति: स्यात् । तस्माद्यत्कृतकं तदनित्यमिति । कृतकत्वमनियंत्वनियतमभिधाय नियमसाधनायायवाक्यार्थप्रतिपत्तिविषयो दृष्टान्त उपादेयः । स च प्रदर्शि- तान्वय एव । अनेन यन्वयवाक्यमनुक्त्यैव दृष्टान्त उपात्तः । ईदृशश्च साधर्म्यमात्रेणैवोपयोगी। न च साधर्म्यात्साध्यसिद्धिः । अतोऽन्वयार्थी दृष्टान्तस्तदर्थश्चानेन नोपात्तः । साधार्थश्चोपात्तो निरुपयोग इति वक्तृदोपादयं दृष्टान्तदोषः । वक्त्रा ह्यत्र परः प्रतिपादयितव्यः । ततो यदि नाम न दुष्टं वस्तु तथापि वक्त्रा दुष्टं दर्शितमिति दुष्टमेव । तथा विपरीतान्वयः। तथा विपरीताऽन्वयो यस्मिन् दृष्टान्ते स तथोक्तः । तमेवोदाहरति- यदनित्यं तत्कृतम् । यदनित्यं तत्कृतकमिति | कृतकत्वमनित्यत्वनियतं दृष्टान्ते दर्शनीयम् । एवं कृतकत्वादनित्यत्वगतिः स्यात् । अत्र त्वनियत्वं कृतकत्वे नियतं दर्शितम् । कृतकत्वं त्वनियतमेवानित्यत्वे । ततो यादृशमिह कृतकत्वम- नियतमनित्यत्वे प्रदर्शितं तादृशान्नास्त्यनित्यत्वप्रतीतिः । तथा हि । यद- १ गृह्यते, ख० संगृह्यते । २ वाद्यपि, क० विद्यपि। ३ 'अत्र' इति पदं ख० पुस्तके नोपलभ्यते । ४ शक्यः, ख० शक्यते। ५ अनित्यत्व० ख० अनित्य । ६ अनित्यत्व, ख० अनित्यत्वे। .

तृतीयपरिच्छेदः नित्यमित्यनित्यत्वमनूद्य तत्कृतकमिति कृतकत्वं विहितम । अतोऽनित्यत्वं नियतमुक्तं कृतकत्ये न तु कृतकत्वमनित्यत्वे । ततो यथानित्यत्वादनियता- प्रयत्नानन्तरीयकत्वेन प्रयत्नानन्तरीयकत्वप्रतीतिस्तद्वत्कृतकत्वादनित्यत्वप्रति- पत्तिर्न स्यात् । अनित्यत्वेऽनियतत्वात्कृतकत्वस्य । यद्यपि च कृतकत्वं वस्तुस्थित्यानित्यले नियतं तथाप्यनियतं वक्त्रा दर्शितम् । अतस्तत्स्त्र- यं न दुष्टमपि वक्तुं दर्दोषाढुष्टम् । तस्माद्विपरीलान्वयोऽपि वक्तुरपराधान वस्तुन: । परार्थानुमाने च वक्तुरपि दोपश्चिन्त्यते । इति साधम्र्येण । इति साधर्म्यण नव दृष्टान्नदोपा उक्ताः । वैधर्येणापि नव दृष्टान्नदोपान वक्तुमाह- वैधयेणापि परमाणुबत्कर्मवदाकाशवदिति साध्या- द्यव्यतिरकिणः। नित्यत्वे शब्दस्य साध्ये हेतावमृतत्वे परमाणुवद्वैधय॑दृष्टान्त: । साध्याव्यतिरेकी नित्यत्वात्परमाणुनाम । कर्म माधनाव्यतिरेकि । अमूर्त- त्वात्कर्मणः । आकाशमुभयाव्यतिरकि । नित्यत्वादभूर्तत्वाच्च । साध्यमादि- यंपा तानि साध्यादीनि साध्या साधनोभयानि पामव्यतिरेको वृत्त्यभाव: स येपामस्ति ने साध्याद्यव्यतिरेकिणः । ते चोदाहृताः । अपरानुदाहर्तुमाह- तथा संदिग्धमाध्यव्यतिरेकादयः । तथेति । साध्यस्य व्यतिरकः साध्यातीकः संदिग्धः साध्यव्यति- रेको यस्मिन् स संदिग्धसाध्यव्यतिरकः ल आदिर्येपां ते त्थोक्ताः । संदिग्धसाध्यव्यतिरेकमुदाहर्तुमाह- यथाऽसर्वज्ञाः कपिलादयोऽनाता वा । अविद्यमान- १ 'तथाप्यनियतं' इति पाठः क० पुस्तके नोपलभ्यते । २ वक्तुर्दोषात , क. वक्तु दोषात् , ख० वक्तृदोषात् । ३ नव दृष्टान्त०, ख० तदृष्टान्त । ४ मुद्रितपुस्तके 'द्वैधय॑ण'। ५ पदमिदं ख० पुस्तके नोपलभ्यते। ६ वक्तुमाह, ख० वक्तुकाम आह । ७ परमाणुषत् , ख० परमाणु । ८ वृत्यभावः, ख० निवृत्ताभावः (अशुद्धः)।९ 'यथा- ऽसर्वज्ञाः' इति पाठोऽस्माकं सम्मतौ। मुद्रितपुस्तके तु 'यथा सर्वज्ञाः' इति पाठ एव । १३ न्या० - - ६८ न्यायविन्दुः सर्वज्ञताप्ततालिङ्गभूतप्रमाणातिशयशासनत्वादिति। यथेति । असर्वज्ञा इत्येकं साध्या । अनाता अक्षीणदोषा इति द्वितीयम् । कपिलादय इलि धर्मी। अविद्यमानसर्वज्ञतेत्यादिहेतुः । सर्वज्ञता चापता च तयोलिङ्गभूतः प्रमाणातिशयो लिङ्गात्मकः प्रमाणविशेषः । अविद्यमानः रदर्वज्ञतालालिङ्गभूतः प्रमाणातिशयो यस्मिस्तत्तथोक्तं शासनम् । तादृशं शासनं शेषां ते तथोक्तास्ते पां भावस्तत्त्वं तस्मात्प्रमाणातिशयो ज्योतिर्ज्ञानोपरेश इटाभिप्रेतः । रादि हि कपिलादयः सर्वज्ञा आप्ता वा स्युस्तदा ज्योतिर्ज्ञानादिकं कस्मान्नोपदिष्टयन्तः । न चोपदिष्टवन्तः । तस्मान्न सर्वज्ञा आता या । अत्र प्रमाणे वैधादाहरणम् - अत्र वैधम्र्योदाहरणं यः सर्वज्ञ आप्तो वा स ज्योतिर्ज्ञानादिकमुपनिष्टवान् । यः सर्वज्ञ आनो ग स ज्योति नादिकं सर्वज्ञताप्रतालिङ्गभूतमुप- दिष्टवान् । तद्यथा । ऋषभवर्धमानादिरिति । यथा ऋपभो वर्धमानश्च ताबादौ यस्य त ऋपभवर्धमानादिदिगम्ब- राणां शास्ता सज्ञ आप्तति । तत्रासर्वज्ञतानाप्ततयोः साध्यधर्मयोः संदिग्धो व्यतिरेकः । तदिह वैधोदाहरणादृपमादरसर्वज्ञत्यस्यानातायाश्च व्यतिरेको व्यावृत्ति: संदिग्धा । यनो ज्योतिर्ज्ञानं चोपदिशेदसर्वज्ञश्च भवेदनातो वा । कोऽत्र विरोधः । नैमित्तिकमेतज्ज्ञानं व्यभिचारि न सर्वज्ञत्वमनुमापयेत् । संदिग्धसाधनव्यतिरेकः । संदिग्धः साधनव्यतिरेको यस्मिन्स तथोक्तः । जैनानां चतुर्विंशतितीर्थकरमध्ये प्रथमस्तीर्थंकरः। २ तेषामेवान्तिमः । 'महावीरः' इत्यभिख्यामपि लभते । ३ 'दिगम्बर जैनानां सम्प्रदायविशेषोऽस्ति । यद्यपि चतुर्विशतिरेव तीर्थंकराः श्वेताम्बरादिभिरपि मन्यन्ते तथापि 'ग्रन्थकर्तृसमये न श्वेताम्बरास्सर्वसाधारणैर्जायन्ते स्म' इत्यपि कथयितुं शक्नुवन्ति । यश्व

तृतीयपरिच्छेदः
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तमुदाहरति-
यथा-न त्रयीविना ब्राह्मणेन बाह्यवचनः कश्चित्पु-
रुषो रागादिमत्त्वादिति ।
यथेति । ऋक्सामयजूंषि त्रीणि त्रयी तां बेति त्रयोचित् । तेन न
ग्राह्यं वचनं यस्येति साध्यम् । विाि इति कपिलादिर्धर्मी । रागादि-
मत्वादिति हेतुः ।
अत्र वैधर्योदाः करणम् ।
अत्र प्रमाणे वेधोडा रणन् । साध्यामा साधनाभावेन व्यानो
यंत्र दयी तधिोदाहरगन् ।
ये ग्राह्यवचना न ते रागादिमन्तस्तद्यथा गौतमा-
दयो धर्मशास्त्राणां प्रणेतार इति गौतमादिभ्यो रागादि-
मत्त्वस्य साधनधर्मस्य व्यावृत्तिः ।
ग्राह्यं वचनं येषां प्राह्मवचना इति साध्यनिवृत्तिमनून न ते
रागादिमन्त इति साधनाभायो विदितः । गौतम आदिर्यपात तथोक्ता
मन्याइयो धर्म सामाणि स्वस्लेषां कतरि: । त्रयोविदा हि ब्राह्मणेन
ग्राह्यवचना धर्मशानवतो वीतरागाश्च । त इति धर्मो । व्यतिरेकविषयो
गौतमादय इति गौतमादिभ्यो रागादिमत्वस्य साधनस्य निवृत्ति: संदिग्धा ।
यद्यपि ते ग्राह्य पचनास्त्रयोविदा तथापि किं सरागा उत वीतरागा इति
संदेहः ।
संदिग्धामंदिग्धोभयव्यतिरेकः ।
सन्दिग्ध उभयोय॑तिरको यस्मिन् स तथोक्तः ।
तमुदाहरति-
यथाऽवीतरागाः कपिलादयः परिग्राग्रहयोगादिति ।
यथेति । अवीतरामा इति रागादिमत्त्वं साध्य । कपिलादय इति
१ व्याप्तो यत्र, ख० यत्र व्याप्तः । २ रागादि०, ख० रोगादि० । ३ त इति, ख०
त इतीह। ४ त्रयीविदा, ख० त्रयोविदः।

१०० न्यायविन्दुः धर्मी । परिग्रहो लभ्यमानस्य स्वीकार: प्रथमः । स्वीकारादूर्ध्वं यद्गार्थ्य मात्सर्यं स आप्रहः । परिग्रहश्चाग्रहश्च ताभ्यां योगात् । कपिलादयो लभ्यमानं स्वीकुर्वन्ति स्वीकृतं न मुञ्चन्तीति ते रागादिमन्तो गम्यन्ते । अत्र वैधम्र्येणोदाहरणम् । अत्र प्रमाणे वैधादाहरणम् । यत्र साध्याभावे साधनाभावो दर्शयितव्यः । यो वीतरागो न तस्य परिग्रहाग्रहो यथा-ऋषभा- देरिति । ऋषभादेवीतरागत्वपरिग्रहाग्रहयोगयोः साध्य- साधनधर्मयोः संदिग्धो व्यतिरेकः । यो गीतराग इति साध्याभावमा न तस्य परिग्रहापहाविति साधनाभावो विहितः । यथा ऋषभादरिति दृष्टान्त: । एतस्मादृषभादे- ईष्टान्तादवीतरागत्वस्य साध्यस्य परिणामहयोगस्य च साधनस्य निवृत्ति: संदिग्धा । ऋपभादीनां हि परिग्रहाग्रहयोगोऽपि संदिग्धो वीतरागत्वं च । यदि नाम तत्सिद्धा बीतरागाश्च निष्परिग्रहाश्च पठ्यन्ते तथापि संदेह एव । अपरामपि त्रीनुदाहर्तुमाह- अव्यतिरेको यथाऽवीतरागो वक्तृत्वात् । अविद्यमानोऽव्यतिरेको यस्मिन् सऽव्यतिरकः। अवीतराग इति रागादिमत्त्वं खाध्यम् । वक्त बादिति हेतुः । इह व्यतिरकमाह- वैधयोदाहरणं यत्र वीतरागत्वं नास्ति स वक्ता यथोपलखण्ड इति । यद्यप्युपलखण्डादुभयं व्यावृत्तया सर्वो वीतरागो न वक्तेति व्याप्त्या व्यतिरेकासिद्धरव्यतिरेकः। यत्रावीतरागत्वं नास्तीति साध्याभावानुवादः । तत्र वक्तृत्वमपि १० योगस्य, क० योगत्वस्य ।

तृतीयपरिच्छेदः १०१ । नास्तीति साधनाभावविधिः । तेन साधनाभावेन साध्याभावो व्यात उक्तः । दृष्टान्तो यथोपलखण्डति । कथमयमव्यतिरको यावतोपलखण्डा- दुभयं निवृत्तम् । किमतो यमुपलखण्डादुभयं व्यावृत्तं सरागत्वं च बक्तृत्वं च तथापि व्याप्त्या व्यतिरेको यस्तस्यासिद्धेः कारगतदव्यतिरेकोऽयम् । कीदृशी पुनर्व्याप्तिरित्याह । सो वीतराग इति साध्याभावानुवादः । न वक्तेति साधनामावविधिः । तेन साध्यामाव: साधनाभावनियत: ख्यापितो भवतीति | ईदृशी व्याप्तिस्तया व्यतिरको न सिद्धोऽस्य चार्थस्य प्रसिद्धये दृष्टान्तस्तत्स्वकार्याकरणादुष्टः । अप्रदर्शितव्यतिरेको यथा-अनित्यः शब्दः कृतकत्वा- दाकाशवदिति । अप्रदर्शितो व्यतिरेको यस्मिन् स तथोक्तः । अनित्यः शब्द इत्यनि- त्यत्वं साध्याम् । कृतकवादिति हेतुः । आकाशदिति बैधhण दृष्टान्तः । इह परार्थानुमाने परस्मादर्थः प्रतिपत्तव्यः । स शुद्धोऽपि स्वतो यदि परेणाशुद्धः ख्याप्यते । स तायद्यथा प्रकाशितस्तथा न युक्तो यथा युक्त- स्तथा न प्रकाशितः । प्रकाशितश्च हेतुः । अतो वक्तुरपराधादपि परार्था- नुमाने हेतुईष्टान्तो वा दुष्टः स्यादपि । न च सादृश्यादसादृश्याद्वा साध्य- प्रतिपत्तिरपि तु साध्यनियताद्धताः । अनः साध्यनियतो हेतुरन्त्रवान येन व्यतिरेकवाक्येन च वक्तव्यः | अन्यथा गमको नोक्त: स्यात् । स तथोक्तो दृष्टान्तेन सिद्धो दर्शयितव्यः । तस्मादृष्टान्तो नामान्वव्यतिरेक- वाक्यार्थप्रदर्शनः । न चेह व्यतिरेकनाक्यं प्रयुक्तम् । अतो वैधHधान्त इहासादृश्यभावेन साधक उपन्यस्त: । न च तथा साधको व्यतिरेक- विषयत्वेन । स साधको न च तथोपन्यस्त इति । अतोऽप्रदर्शितव्यनिरेको वक्तुरपराधाहुष्टः । वैधम्र्येणापि विपरीतव्यतिरेको यथा- यदकृतकं तन्नित्यं भवतीति । १ ख्यापितः, क. स्थापितः । २ 'इति' इति पदं ख० पुस्तके मोपलभ्यते । ३ दृष्टान्तेत सिद्धः, ख० दृष्टान्तेनासिद्धः। ४ अतः, ख० क्षयं ।

१०२ न्यायबिन्दुः विपरीतो व्यतिरेको यस्मिन् वैधर्म्यदृष्टान्ते स तथोक्तः । तमुदा. हरति । यदकृतकमित्यादि । इहान्वयव्यतिरेकवाक्याभ्यां साध्यनियतो हेतुर्दर्शयितव्यः । यदा च साध्यनियतो हेतुर्दर्शयितव्यस्तदा व्यतिरेक- वाक्ये साध्याभावः साधनाभावे नियतो दर्शयितव्यः । एवं हि हेतुः साध्यनियतो दर्शित: स्यात् । यदि तु साध्याभावः साधनाभावे नियतो नाख्यायते साधनसत्तायामपि साध्याभावः संभाव्येत । तथा च साधनं साध्यनियतं न प्रतीयत । तस्मात्साध्याभावः साधनाभावे नियतो वक्तव्यः । विपरीतव्यतिरेके च साधनाभावः साध्याभावे नियत उच्यते । न साध्याभावः साधनाभावे । तथा हि । यदकृतकमिति साधनाभावमनूद्य तन्नित्यमिति साध्याभावविधिः । ततोऽयमर्थः । अकृतको नित्य एव । तथा च सत्यकृतकत्वं नित्यत्वे साध्यभावे नियतमुक्तं न नित्यत्वं साधना- भारे । ततो न साध्यनियतं हेतुं व्यतिरेकवाक्यमाह । तथा च विपरीत- व्यतिरेक ऽपि वक्तुरपराधादुष्टः । दृष्टान्तदोषानुदाहृत्य दुष्टत्वनिबन्धनत्वं दर्शयितुमाह- न ह्येभिर्दृष्टान्ताभासैहेतोः सामान्यलक्षणं सपक्ष एव सत्त्वं विपक्षे च सर्वत्रासत्वमेव निश्चयेन शक्यं दर्शयितुं विशेषलक्षणं वा । न होभिरिति । माध्यनियतहेतुप्रदर्शनाय दृष्टान्ता वक्तव्याः । एभिश्च हेतोः सपत एव सत्त्वं विपक्षे च सर्वत्रासत्वमेव यत्सामान्यलक्षणं तन्निश्चयेन न शक्यं दर्शयितुम् । ननु च सामान्यलक्षणं विशेषनिष्ठमेव प्रतिपत्तव्यं न स्वत एवेत्याह । विशेषलक्षणं वा । यदि विशेषलक्षणं प्रति- पादयितुं शक्येत । स्या देव सामान्यलक्षणप्रतिपत्ति: । विशेषलक्षणमेव तु न शक्यमेभिः प्रतिपादयितुम् । तदर्थापत्त्यैषां निरासो वेदितव्यः । तस्मादापत्त्या सामर्थ्येनेति तेषां निराकरणं द्रष्टव्यम् । साध्य- । १ ख० संभाव्यते । २ ख० प्रतीयते । ३० प्रदर्शनाय, ख० प्रदर्शना हि । ४ मुद्रित पुस्तके 'इति न तेषां' इति पाठोऽस्ति । किन्वस्माकं सम्मतौ 'न' इति पदं नात्र युज्यते।

तृतीयपरिच्छेदः १०३ नियतसाधनप्रतीतय उपात्ताः । तदसमर्था दुष्टाः स्वकार्यकरणादिति साम- य॑म् । इयता साधनमुक्तम् । दूषणं वक्तुमाह- दूषणा न्यूनतायुक्तिः। दूषणा का द्रष्टव्या । न्यूनतादीनामुक्तिरुच्यते । न येत्युक्तिर्वचनं न्यूनतादिर्वचनम् । दूषणं विवरीतुमाह- ये पूर्व न्यूनतादयः साधनादोषा उक्तास्तेषामुद्भावनं दूषणम् । ये पूर्वं न्यूनतादयोऽसिद्धविरुद्धानेकान्तिका उक्तास्तेपामुद्भागनं यद्वचनं तहूषणम् । ननु च न्यूनतादयो न विपर्ययसाधनास्तत्कथं दूषणमित्याइ. तेन परेष्टार्थसिद्धिप्रतिबन्धात् । तेन न्यूनतादिवचनेन परेपामिष्टश्चासापर्थश्च तस्य सिद्धिनिश्चयस्त- स्याः प्रतिबन्धानावश्यं विपर्ययसाधनादेव दूपणं विरुद्धवदपि तु परस्या- भिप्रेतनिश्चयनिबन्धान्निश्चयाभावो भवति । निश्चयविपर्यय इत्यस्ति विपर्ययसिद्धिरिति । दूषणाभासास्तु जातयः । उक्ता दूषणाभासा इति । दूषणेवदाभाउन्न इति दूपणाभामा: । के ते जातयः । जातिशब्दः सादृश्यवचन उत्तरसदृशानि जात्युत्तराणीति । उत्तरस्थानप्रयुक्तत्वादुत्तरसदृशानि जात्युत्तराणि । तदेवोत्तरसादृश्यमुत्तरस्थानप्रयुक्तत्वेन दर्शयितुमाह- अभूतदोषोद्भावनानि जात्युत्तराणीति । १ प्रतीतये, ख० प्रतिपत्तये । २ अस्ति, ख० अस्त्येव । ३ दूपणवत्, ख० दूषणा- वत् । ४ 'इति' इति पदं ख० पुस्तके न विद्यते ।

१०४ न्यायविन्दुः अभूतस्यासत्यस्य दोषस्योद्भावनानि । उद्भाव्यत एतैरित्युद्भावनानि वचनानि तानि जात्युत्तराणि । जात्या सादृश्येनोत्तराणि जात्युत्तराणीति | इति तृतीयः परिच्छेदः समाप्तः । कतिपयपद वस्तुव्याख्यया यन्मयाप्तं कुशलममलमिन्दोरंशुवन्न्यायविन्दोः । पदमजरमबाप्य ज्ञानधर्मोत्तरं यजगदुपकृतिमात्रव्यागृति: स्यामतोऽहम् ।। न्यायबिन्दुः समाप्तः। समाप्लेयं न्यायबिन्दुटीका कृतिराचार्यधर्मोत्तरस्य ॥०॥ सहस्रमेकं श्लोकानां शतचतुष्टयम् । सप्तसप्ततिसंयुक्तं निपुणं परिपिण्डितम् ॥ तथा . यत् । १ अथ श्रीधर्मोत्तराचार्यः स्वाभिप्रायप्रकाशपुरःसरं कृतिमुपसंहरन्नाहकतिपयेति । मया धर्मोत्तराचार्येण । इन्दोश्चन्द्रस्य । अंशुवत् किरणवत्। न्यायबिन्दोः न्यायविन्दुः नाम अस्य ग्रन्थस्य । कतिपयान्यमूनि पदानि तान्येव वस्तूनि तेषां व्याख्या तया न्यायविन्दुटीकया इत्यर्थः । कुशलं निर्विघ्नं । अमलं निर्मलं । अजरं अनश्यम् । पदम् । अवाप्य प्राप्य । यत् । ज्ञानं च धर्म च ज्ञानधर्मे ताभ्याम् , उत्तरं श्रेष्ठं ज्ञानधर्मोत्तरम् । अथवा अनेन पदेन आचार्येण स्वनाम 'धर्मोत्तराचार्यः' प्रदर्शितम् , आचार्यस्य ज्ञानकारणत्वात् । आप्तं प्राप्तम् । अतोऽस्मात् न्यायबिन्दुटीकारूपकार्यात् । जगतः उपकृतिरुपकारस्तन्मात्रमेव व्यापृतिः व्यापारो यस्य स । अहं धर्मोत्तराचार्यः। स्याम् । २ 'समाप्तेयं आदि; ख. आचार्यधर्मोत्तरपादविरचितायां न्यायबिन्दुटीकायां तृतीयः परिच्छेदः समाप्तः। ३ ग्रन्थस्यास्य परिमाणं १४७७ श्लोकप्रमितिमात्रमस्ति । श्लोकेऽत्र द्वात्रिंशदक्षराणि ज्ञेयानि ।

निवेदन। बौद्धदर्शनके प्रेमियों के संमुख मैं न्यायबिन्दुका यह हिन्दी अनुवाद लेकर उपस्थित हो रहा हूँ | अनुवाद कैसा है यह पाठक ही बतला सकेंगे । क्योंकि मुझे इस विषय में कहने का कुछ अधिकार नहीं है। यह अवश्य है कि इस अनुवाद के करनेमें बौद्धों के पारिभाषिक शब्दोंकी व्याख्या करना तो दूर उनके समझने में भी मुटो महीनों उलझना पड़ा है। आशा है कि पाठकोंको उनमें अब विशेप न उत्तझना पड़ेगा। ग्रन्थकी भापाके लिये मुझे सबसे प्रथम क्षमा प्रार्थना करनी है । क्योंकि न्यायका कोई भी अन्य हिन्दी में न होनेसे मुझे इसके लिये स्वयं ही ढंग सोचना पड़ा है। भापासम्बन्धी त्रुटियाँ निकालने वालोंसे मुझे यह प्रार्थना है कि उनको जिस वारय भाषासम्बन्धी त्रुटि जान पड़े उसको प्रथम स्वयं टीक करके ही दूसरोंको दिख जायें। मेरा करनेसे उन्हें इस सम्बन्धन ठिबनाका ब त कु.र आभाप हो जावेगा। उचित तो यह होता कि कुछ संस्कृत न्याय तथा कुछ हिन्दी साहित्यके विद्वानोंकी एक समिति न्यायकी भाषा को निश्चित करनी, किन्तु यह न होता देखकर मैंने स्वयं ही इस विषय पर लेखनी उठाया है। आशा है कि इसके लिये हिन्दी भाषा के विद्वान मुझे क्षमा करेंगे। यदि मूल संस्कृत ग्रन्थका शाब्दिक अनुवाद ही किया जाता तो वह किसी कामका भी न होता । अतएव बास्य पूरा करने के लिये गुझको दूसरे शब्द डालने पड़े हैं जो [ ] ऐसे कोष्ठक में रखे गये हैं। भावको स्पष्ट करने वाले शब्द साले कोष्टकमें रखे। आशा है कि इस प्रन्थसे हिन्दी साहित्य के दर्शन विभागको कुछ उत्ते- जना मिलेगी। भदैनी, बनारस चन्द्रशेखर शास्त्री। दि० २८ जून १६२४ ई० १४ न्यार

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बौद्ध न्यायबिन्दु का हिन्दी अनुवाद . अनुवादक- काव्यसाहित्यतीर्थाचार्य श्री चन्द्रशेखर शास्त्री । प्रथम परिच्छेदः । सम्यग्ज्ञानपूर्विका सर्व पुरुषार्थसिद्धिरिति तद व्युत्पाद्यते । सभी पुरुषार्थोकी सिद्धि सम्यग्ज्ञान पूर्वक होती है, अतएव [ इस ग्रन्थमं ] उसी का वर्णन किया जाता है। द्विविधं सम्यग्ज्ञानम् - सम्यग्ज्ञान दो प्रकारका हे ता है- प्रत्यक्षमनुमानश्च । प्रत्यक्ष और अनुमान । तत्र कल्पनापोढमभ्रान्तं प्रत्यक्षम् । उनमें से कल्पनारहित निर्धान्त ज्ञानको प्रत्यक्ष कहते हैं। अभिलापसंसर्गयोग्यप्रतिभासप्रतीतिः कल्पना तया रहितम् । अभिलाप ( वाचकशब्द ) से संसर्ग ( एक ज्ञानमें अभिधेयाकारका अभिधाना- कारके साथ ग्रहण करने योग्य हो जाना। जो कहा जावे उसे अभिधेय तथा कहने या नाम को अभिधान कहते हैं ) के योग्य प्रतिभासको प्रतीनिको कल्पना कहते हैं । ( 'वृक्ष' इस शब्दके कहते ही हृदयमें इस शब्द के संसर्ग से इस शब्द के योग्य स्कन्ध और शाखादिमान् पदार्थका प्रतिभास होने लगता है। उस पदार्थको प्रतीतिको कल्पना कहते हैं।) प्रत्यक्षज्ञान उस कल्पनासे रहित होना चाहिये। तिमिराशुभ्रमणनीयानसंक्षोभायनाहितविभ्रमं ज्ञानं प्रत्यक्षम् । जिस ज्ञानमें अन्धकार, [ अलात आदि का ] शीघ्र २ घूमना, नौकापर जाना और [ वात पित्त और श्लेष्मके ] संक्षोभ आदिसे विभ्रम नहीं हुआ हो ऐसा [ कल्पना रहित और निर्धान्त ] ज्ञान ही प्रत्यक्ष होता है ।

२ भाषाटीका सहित तचतुर्विधम् । प्रत्यक्षज्ञान चार प्रकार का होता है- १ इन्द्रियज्ञान, २ मनोविज्ञान, ३ आत्मसंवेदन (स्वसंवेदन ) और ४ योगिप्रत्यक्ष ( योगिज्ञान )। इन्द्रियज्ञानम् । इन्द्रियोंके ज्ञानको इन्द्रियज्ञान कहते हैं। स्वविषयानन्तरविपयसहकारिणेन्द्रियज्ञानेन समनन्तर- प्रत्ययेन जनितं तत् मनोविज्ञानम् । अपने विषयके पश्चात् , विषयके सहकारी, समनन्तरप्रत्ययरूप इन्द्रियज्ञानसे उत्पन्न होनेवाले ज्ञानको मनोविज्ञान कहते हैं। ( वौद्ध दर्शनमें ज्ञानके ४ प्रत्यय ( कारण ) माने हैं । नेत्रसे घटको देखने में पहला कारण स्वयं घट है । अतएव विषय होनेसे इसको आलम्बन प्रत्यय कहते हैं । दूसरा कारण आलोक है । क्योंकि इसकी सहायताके बिना इन्द्रियाँ किसी विषयको प्रहण नहीं कर सकतीं । अतए। उसको सहकारी प्रत्यय कहते हैं । तीसरा कारण इन्द्रियाँ हैं उनको अघितिप्रत्यय कहते हैं । और चौथा कारण प्रहण करने अथवा विचार करनेकी वह शक्ति है जिसका उपयोग न होने से हम प्रायः देखते हुए भी नहीं देख सकते, शब्द होते हुए भी नहीं सुन सकते । बौदेतर दर्शनोंकी अपेक्षा इसको मन कहना उपयुक्त होगा । इसको समनन्तरप्रयय कहते हैं। ) सर्वचित्तचैत्तानामात्मसंवेदनम् । सभी चित्त ( अर्थमात्रको ग्रहण करने वाले ) और चैनों (विशेष अवस्थाको प्रहण करने वाले मुख आदि ) का आत्माको प्रकट करना आत्मसंवदन है। ( बाह्यास्तित्ववादी बौद्धोंके मतमें प्रत्येक वस्तुके दो भेद हैं-वाह्य और आन्तर । बाह्यके फिर दो भेद हैं-भूत और भौतिक । अान्तरके भी दो भेद हैं-चित्त और चैत्त । चैत्तको चैत्तिक भी कहते हैं । भूत पृथ्वी श्रादि चार परमाणु हैं । भौतिक रूप आदि और चक्षु आदि हैं । चित्त विज्ञान है। चैत्तिक रूप, विज्ञान, वेदना, संज्ञा और संस्कार संज्ञा वाले पाँच स्कन्ध हैं । विज्ञान के फिर दो भेद हैं-श्रालयविज्ञान जो 'अहं' या 'मैं' इस प्रकारका है । प्रवृत्तिविज्ञान इन्द्रिय आदिसे उत्पन्न होता है और रूप आदिको विषय करता है।) १. पीटर्सन साहब की पुस्तक में विरामचिह्न 'इन्द्रियज्ञानम्' के पश्चात् न देकर अगले वाक्य में 'तत्' के पश्चात् दिया गया है । जिससे 'स्वविषय' आदिके इन्द्रियज्ञान का लक्षण होने का भ्रम होता है। २. पहिली पुस्तक का पाठ 'सर्व चित्त-' आदि है। किन्तु वह अशुद्ध है ३ न्यायबिन्दु भूतार्थभावनाप्रकर्षपर्यन्तजं योगिज्ञानं चेति । सद्भूत अर्थ के प्रकर्ष तक होने वाले ज्ञानको योगिज्ञान कहते हैं । ( योगिप्रत्यक्ष सद्भुत अर्थका ही हो सकता है। असद्भूतका नहीं हो सकता, और यह भी थोड़ा बहुत नहीं होता किन्तु प्रकर्ष अर्थात् चरम सीमा तक होता है।) तस्य विषयः स्वलक्षणम् । प्रत्यक्षका विषय स्वलक्षण है। [जो कि क्षण है।] यस्यार्थस्य संनिधानासंनिधानाभ्यां ज्ञानप्रतिभासभेदस्तत्स्व- लक्षणम् , तदेव परमार्थसन , अर्थक्रियासा- मध्य लक्षणवाद्वस्तुनः। जिस विषयकी समीपता और असमीपतारी ज्ञान के प्रतिभागमें भेद हो तह स्वलक्षण है । और वही परमार्थ सत् है। क्योंकि वही वस्तुमें अर्थविया कराना है। अन्यत्सामान्यलक्षणम् , सोऽनुमानस्य विषगः । रवलक्षणसे भिन्न सामान्यलक्षण होता है । यह अनुमानका विषय होता है । तदेव न प्रत्यक्षं ज्ञानं प्रमाणफलमर्थप्रतीतिरूपत्वा । वह प्रत्यक्ष ज्ञान ही अर्थ प्रतीतिरूप होनेसे प्रमाणका फल है । अर्थसारूप्यमस्य प्रमाणं, तद्वशादर्थप्रतीतिसिद्धेरिति । इस ज्ञानका अर्थक समान बन जाना प्रमाण है। क्योंकि उसीसे अर्थकी प्रतीतिकी सिद्धि होती है। इति प्रथम परिच्छेद। com

द्वितीय परिच्छेद ।
अनुमानं द्विधा-
अनुमान दो प्रकारका होता है-
स्वार्थ परार्थं च ।
स्वार्थ और परार्थ।
तत्र स्वार्थं त्रिरूपाल्लिङ्गाघदनुमेये ज्ञानं तदनुमानम् ।
त्रिरूपलिङ्ग से होने वाले अनुमेयके ज्ञान को स्वार्थानुमान कहते हैं।
प्रमाणफलव्यवस्थात्रापि प्रत्यक्षवत् ।
प्रमाणके फल की व्यवस्था यहां भी प्रत्यक्ष के ही समान है।
त्रैलप्यम् पुनः-
लिङ्गस्यानुमेये सत्त्वमेव,
सपक्ष एव सत्त्वम्,
असपक्षे चासत्त्वमेव निश्चितम् ।
त्रैरूप्य ( त्रिरूपलिङ्ग) यह है-
(१) अनुमेयमें लिङ्गकी विद्यमानता-
(लिङ्ग शब्दका अर्थ चिह्न है । जैसे-दूरसे देखनेवाले के लिये अग्निका चिह्न या
है । धूम ही हेतु है । इसको धर्म भी कहते हैं । )
( २ ) लिङ्गका सपक्षमें अवश्य रहना । और
(३) लिङ्गका विपक्षमें किसी अवस्थामें भी न रहना ।
अनुमेयोऽत्र जिज्ञासितविशेषो धर्मी ।
जिस धर्मीको अनुमानके द्वारा जाननेको इच्छा की आती हैउसे अनुमेय कहते हैं
(जिस गुण या लक्षणको दिखला कर वस्तु (अनुमेय ) सिद्ध की जाती है उरं
धर्म कहते हैं। जिस वस्तु (अनुमेय ) में वह धर्म रहे उसे धर्मी कहते हैं। जि
सिद्ध किया जावे उसे साध्य कहते हैं । )
साध्यधर्मसामान्येन समानोऽर्थः सपक्षः ।
जो पदार्थ साध्यधर्म के समान हो उसे सपक्ष कहते हैं ।
(बौद्धग्रन्थों में 'धर्म' शब्द के चार अर्थों में चार प्रयोग मिलते हैं-
(१) Scriptural Texts या मूल धार्मिक पुस्तकें ।
( २ ) Quality या गुण ।
लिज धूम

५ न्यायबिन्दु ( ४ ) Unsubstantial and Soulles या निःसत्त्व और निर्जीव । इस को पालो में 'निसत्त निजीव' कहते हैं। हमारी सम्मति में न्यायबिन्दु के समासों में 'धर्म' शब्द का तीसरे अर्थ में प्रयोग किया गया है। ) न सपक्षोऽसपक्षः। जो सपक्ष नहीं होता उसे विपक्ष या असपक्ष कहते हैं। ततोऽन्यस्तद्विरुद्धस्तदभावश्चेति । जो वस्तु सपक्षसे भिन्न हो या सपक्षके विरुद्ध हो अथवा जिसमें सपक्षका अभाव हो वह असपक्ष होती है। त्रिरूपाणि च ॥ [ ऊपर कहे हुए ] त्रिरूप हैं। त्रीण्येव च लिङ्गानि- अनुपलब्धिः स्वभावकार्ये चेति । लिङ्ग भी तीन ही होते हैं- अनुपलब्धि, स्वभाव और कार्य । तत्रानुपलब्धिर्यथा-न प्रदेशविशेषे कचिद् घट उपलब्धिलक्षणप्राप्तस्यानुपलब्धेरिति । उनमें से अनुपलब्धि इस प्रकार है। जैसे-किसी विशेष स्थान में घट नहीं है। क्योंकि घटके उपलब्धिलक्षणप्राप्त होने पर भी उसकी वहां अनुपलब्धि है । ( घट स्वभावसे ही विद्यमान है। अर्थात् घटके अस्तित्वमें स्वभाव के अतिरिक्त अन्य कारण नहीं है। अतएव घट उपलब्धि (मिलना) लक्षण वाला है। घटमें उपलब्धिलक्षण है अतएव वह उपलब्धिलक्षणप्राप्त है। घटका उपलब्धिलक्षणप्राप्तपना उसकी उपलब्धिलक्षणप्राप्ति है । अनुपलब्ध न मिलने को कहते हैं । ) उपलब्धिलक्षणप्राप्तिरुपलम्भप्रत्ययान्तरसाकल्यं स्वभावविशेषश्च । उपलब्धिलक्षणप्राप्ति उपलम्भप्रत्ययान्तरसाकल्य और स्वभावविशेष [यह तीनों एकही हैं । ] ( पीछे उपलब्धिके चार प्रत्यय बतला दिये हैं। यहाँ प्रत्ययान्तर शब्द आलम्बनप्रत्ययके अतिरिक्त अन्य प्रत्ययोंका वाचक है। साकल्य सम्पूर्णताको कहते हैं । उपलम्भके प्रत्ययान्तरोंकी एकत्रित सम्पूर्णताको उपलम्भप्रत्ययान्तरसाकल्य कहते हैं।)

w भाषाटीका सहित - यः स्वभावः सत्स्वन्येषूपलम्भप्रत्ययेषु यत्प्रत्यक्ष एव भवति स स्वभावः । [श्रालम्बनप्रत्ययके अतिरिक्त ] शेष उपलम्भप्रत्ययोंके रहते हुए जो स्वभावसे प्रत्यक्ष होता है वह स्वभाव है । ( यह स्वभाव विशेषकी परिभाषा है।) स्वभावः स्वसत्तामात्रभाविनि साध्यधर्म हेतुः । यथा-वृक्षोऽयं शिंशपात्वादिति । [जो पदार्थ अपने हेतु के अस्तित्वकी अपेक्षाकरके विद्यमान होता है और हेतु. सत्तासे भिन्न अन्य किसी हेतुकी अपेक्षा नहीं करता वह स्वसत्तामात्रभावी साध्य है । ] उस स्वसत्तामात्रभावी साध्यधर्ममें जो हेतु है वह स्वभाव हेतु है । जैसे-यह वृक्ष है, क्योंकि यह शीशम है। कार्यं यथाग्निरत्र धूमादिति । कार्यका उदाहरण- जैसे-यहाँपर अग्नि है, क्योंकि यहाँ धूम है । अत्र द्वौ वस्तुसाधनौ, एकः प्रतिषेधहेतुः । इन तीन हेतुओंमें ( अनुपलब्धि, रणभाव और कार्य में ) से दो हेतु ( स्वभाव और कार्य ) वस्तुकी विधिको बतलाते हैं। और एक (अनुपलब्धि ) प्रतिषेधको बतलाता है। स्वभावप्रतिवन्धे हि सत्यर्थोऽथं गमयेत् । स्वभावप्रतिबन्ध (स्वभावसे एक स्थान में नियत होना) होने पर ही साधन अर्थ साध्य अर्थको बतलाता है। [ इस कारण से यह तीन ही साध्य को सिद्ध कर सकते हैं अन्य नहीं ] तदप्रतिबद्धस्य तदव्यभिचारनियमाभावाद । क्योंकि जो जहाँ पर स्वभावसे प्रतिबद्ध नहीं होता उसका अप्रतिवद्वविषय में अव्यभिचार के नियम का अभाव होता है। [श्रतएव स्वभावसे अप्रतिबद्धों में अभ्यभि. चारनियम अथवा अविनाभा नि म नहीं बन सकता। गम्यगमकभान अमभिचार• नियम से ही होता है। लिङ्ग योग्यताने दीपकके समान परोक्ष अर्थको प्रकाशित करनेका निमित्त भी नहीं माना जा सकता। विरुद इसके वह अभ्यभिचारीपने से ही निश्चय किया जाता है । अतएव स्वभावप्रतिबन्ध होने पर ही अविनाभाव का निश्चय होता है । और गम्यगमकभाव अविनाभावसे ही होता है। श्रतएव स्वभावप्रतिबन्ध होने पर ही अर्थ अर्थको बतलाता है अन्य प्रकार से नहीं बतलाता।] १. पूर्व छपी पुस्तक में विराम चिह्न '-साधनौ' के पाश्चात् है। 'प्रतिषेधहेतुः' के पश्चात् कोई चिह्न न देकर उसे अगले वाक्य में मिला दिया है, जिससे अर्थ बिलकुल गड़बड़ा जाता है न्वायबिन्दु स च प्रतिबन्धः साध्येऽर्थे लिङ्गस्य वस्तुतस्ता- दात्म्यात्साध्यार्थादुत्पत्तेश्च । स्वभावप्रतिबन्ध साध्य अर्थमें लिजका होता है। (पराधीन होने से निज प्रति- बद्ध होता है । साध्य अर्थ पराधीन न होनेसे प्रतिबन्धका विषय अथवा प्रतिबन्धविषय होता है किन्तु प्रतिबद्ध नहीं होता )। क्योंकि वास्तव में साध्य और लिङ्गका तादात्म्य है और साध्य अर्थसे लिङ्गको उत्पत्ति होती है। (अर्थात् तादात्म्य और तदुत्पत्तिसे ही स्वभावप्रतिबन्ध होता है ) अतत्स्वभावस्यातदुत्पत्तेश्च तत्राप्रतिबद्धस्वभावत्वात् । क्योंकि जिसका वह स्वभाव न हो तथा जिसकी उससे उत्पत्ति न हो उसमें प्रतिबद्धस्वभावता नहीं होती है। ते च तादात्म्यतदुत्पत्ती स्वभावकार्ययोरेवेति ताभ्यामेव वस्तुसिद्धिः। तादात्म्य और तदुत्पत्ति स्वभाव और कार्य में ही होती हैं। अतएव कार्य और स्वभावसे ही वस्तुकी (अथका विधिकी ) सिद्धि होती है। प्रतिषेधसिद्धिरपि यथोकाया एकानुपलब्धेः । सति वस्तुनि तस्या असंभवात् । प्रतिषेध व्यवहार की सिद्धि भी पूर्वोक्त श्यानुफ्लब्धि से ही होती है। [ क्योंकि प्रतिषेध्य ] वस्तुके विद्यमान होनेपर दृश्यानुपलब्धि नहीं हो सकती। अन्यथा चानुपलब्धिलक्षणमाप्तेषु देशकालस्वभावविप्र- कृष्टेष्वात्मप्रत्यक्षनिवृत्तेरभावनिश्चयाभावात् । अनुपलब्धिलक्षणप्राप्त (जिसकी उपलब्धिका कोई कारणविशेष उपस्थित नहीं है ) देशकालस्वभावविप्रकृष्ट पदार्थोंका आत्मप्रत्यक्ष न हो सकनेसे उनका अभाव नहीं कह सकते। ( देशविप्रकृष्ट-जैसे भारतसे अमेरिका। कालविप्रकृष्ट-जैसे-भूत- कालमें रामचन्द्र । स्वभावविप्रकृष्ट-जैसे-मदारीका अपने मुखमें से अग्नि निकालना) [ अदृश्यानुपलब्धि वस्तु के विद्यमान होते हुए भी ही हो सकती है। जिसप्रकार अन्धेको सब वस्तुएँ अदृश्य होनेसे अनुपलब्ध हैं । अतएव प्रतिषेध सिद्धि अदृश्यानु- पलब्धिसे न होकर दृश्यानुपलब्धिसे ही होती है। ] अमूढस्मृतिसंस्कारस्पातीतस्य वर्तमानस्य च प्रतिपत्त- प्रत्यक्षस्य निष्ठत्तिरभावव्यवहारसायनी। तस्या एवाभावनिश्चयात् । १. पूर्वपुस्तक में 'वस्तुतः' यह पाठ है। किन्तु हमारी सम्मति में वह अशुद्ध है। २. पूर्वपुस्तक में 'इति' के पश्चात् विराम दे दिया है। १५ न्या० भाषाटीका सहित यह दृश्यानुपलब्धि जानने वालेके पूर्व अनुभूतप्रत्यक्ष (जिस प्रत्यक्ष ज्ञानका उसके द्वारा पहिले अनुभव किया जा चुका है ) और वर्तमानकालके प्रत्यक्षकी निवृत्तिके अभावके व्यवहारको बतलाने वाली है। क्योंकि अतीत और वर्तमानकालीन अनुपलब्धि ही अभावको निश्चय करती है । सा च प्रयोगमेदादेकादशप्रकारा । अनुपलब्धि प्रयोगके भेदसे ग्यारह प्रकारकी होती है- स्वभावानुपलब्धिर्यथा । नात्र धूमः उपलब्धि- लक्षणप्राप्तस्यानुपलब्धेरिति । स्वभावानुपलब्धि (प्रतिषेध्यके स्वभावको अनुपलब्धि )- जैसे-यहां धूम नहीं है, क्योंकि वह उपलब्धिलक्षणप्राप्त होने पर भी अनु- पलब्ध है ॥१॥ कार्यानुपलब्धियथा । नेहाप्रतिबद्धसामर्थ्यानि धूम- कारणानि सन्ति धूमाभावात् । कार्यानुपलब्धि ( प्रतिषेध्यके कार्यकी अनुपलब्धि )- जैसे-यहां अप्रतिबद्धसामर्थ्यवाले (जिस धूमको गतिकी सामर्थ्य रुकी न हो) धूमके कारण नहीं हैं, क्योंकि यहां धूमका अभाव है ॥ २ ॥ व्यापकानुपलब्धियथा । नात्र शिंशपा वृक्षाभावादिति । व्यापकानुपलब्धि (प्रतिषेध्यके व्याप्यके व्यापक धर्मकी अनुपलब्धि )- जैसे-यहां शिशपा (शीशमका वृक्ष ) नहीं है, क्योंकि इस स्थानमें वृक्षका अभाव है ॥ ३ ॥ स्वभावविरुद्धोपलब्धिर्यथा । नात्र शीतस्पर्शोऽग्नेरिति । स्वभावविरुद्धोपलब्धि (प्रतिषेध्यके स्वभावसे विरुद्धको उपलब्धि )- जैसे-यहाँ शीतस्पर्श नहीं है, क्योंकि यहाँ अग्नि है ॥ ४ ॥ विरुद्ध कार्योपलब्धिर्यथा । नात्र शीतस्पर्शो धूमादिति । विरुद्धकार्योपलब्धि ( प्रतिषेध्यसे विरुद्ध कार्य की उपलब्धि )- जैसे--यहाँ शीतपर्श नहीं है, क्योंकि यहां धुआं है ॥ ५॥ विरुद्ध व्याप्तोपलब्धिर्यथा । न ध्रुवभावी भूतस्यापि भावस्य विनाशो हेत्वन्तरापेक्षणादिति । विरुद्धव्याप्तोपलब्धि (प्रतिषेध्यके विरुद्ध से व्याप्त धर्मान्तर कीउ पलब्धि)- जैसे-उत्पन्न हुई वस्तुका भी नाश अवश्यंभावी नहीं है (अनुत्पन्नका तो कैसे कह सकते हैं), क्योंकि वह हेत्वन्तर की अपेक्षा रखती है ॥ ६ ॥ कार्यविरुद्धोपलब्धिर्यथा । नेहाप्रतिबद्धसामर्थ्यानि ६ न्यायबिन्दु कार्याविरुद्धोपलब्धि (प्रतिषेध्यके कार्यके विरुद्धकी उपलब्धि)- जैसे-यहां पर अप्रतिबद्ध सामर्थ्यवाले शीतके कारण नहीं हैं; क्योंकि यहां अग्नि है ॥ ७ ॥ व्यापकविरुद्धोपलब्धिर्यथा । नात्र तुषारस्पर्शोऽग्नेरिति । व्यापकविरुद्धोपलब्धि (प्रतिषेध्यके व्यापकसे विरुद्धकी उपलब्धि)- जैसे—यहां तुषारका स्पर्श नहीं है; क्योंकि यहां अमि है ॥ ८ ॥ करणानुपलब्धियथा । नात्र धूमोऽग्न्यभावादिति । कारणानुपलब्धि ( प्रतिषेध्यके कारणको अनुपलब्धि)- जैसे-यहां पर धूम नहीं है। क्योंकि यहाँ अग्निका अभाव है ॥ ९ ॥ कारणविरुद्धोपलब्धिर्यथा । नास्य रोमहर्षादिविशेषाः संनिहितदहनविशेषत्वादिति । कारणविरुद्धोपलब्धि (प्रतिषेध्यके कारणके विरुद्धकी उपलब्धि)- जैसे—इस पुरुषको रोमहर्ष आदि नहीं हो रहे हैं; क्योंकि उसके पास अग्नि- विशेष है ॥ १० ॥ कारणविरुद्धकार्योपलब्धिर्यथा । न रोमहर्षादिविशेष- युक्तपुरुषवानयं प्रदेशो धूमादिति । कारणविरुद्धकार्योपलब्धि ( प्रतिषेध्यकारणके विरुद्व के कार्यकी उपलब्धि ) जैसे-इस प्रदेशमें रोमहर्ष आदिसे युक्त पुरुष नहीं है; क्योंकि यहां धूम है ॥११॥ इमे सर्वे कार्यानुपलब्ध्यादयो दशानुपलब्धिप्रयोगाः स्वभावानुपलब्धौ संग्रहमुपयान्ति । ये सब कार्यानुपलब्धि श्रादि दश अनुपलब्धिके प्रयोग स्वभावानुपलब्धिमें ही आ जाते हैं। पारम्पर्यणार्थान्तरविधिप्रतिषेधाभ्यां प्रयोगमेदेऽपि प्रयोगदर्शना- भ्यासात्स्वयमप्येवं व्यवच्छेदप्रतीतिर्भवतीति स्वार्थेऽप्यनुमानेऽस्याः प्रयोगनिर्देशः । [ कार्यानुपलब्धि आदिमें यद्यपि ] अर्थान्तरसे विधि और प्रतिषेधसे प्रयोगभेद है तथापि परम्परासे [ स्वभावानुपलब्धिमें अन्तर्भूत हो जाते हैं। हम लोगोंको इन ] प्रयोगोंको देखनेके अभ्याससे स्वयं ही व्यवच्छेद (प्रतिषेध ) की प्रतीति होती है । इसी लिये इनका प्रयोग स्वार्यानुमानमें भी किया गया है । सर्वत्र चास्यामभावव्यवहारसाधन्यामनुपलब्धौ येषां स्वभाव- विरुद्धादीनामुपलब्ध्या कारशादोनामनुपलब्ध्या च प्रतिषेध उक्त- -

१०
भाषाटीका सहित
स्तेषामुपलब्धिलक्षणशानामेवोपलब्धिरनुपलब्धिश्च बेदितव्या ।
अन्येषां विरोधकार्यकारणभावासिद्धिः।
इस अभाव और अभावको साधन करने वाली अनुपलब्धिमें जिन स्वभावविरद्ध
आदिकोंकी उपलब्धि और कारणादिकोंकी अनुपलब्धिसे प्रतिषेध कहा गया है उन्हीं
उपलब्धिलक्षणमामों की उपलब्धि और अनुपलब्धि जाननी चाहिये। क्योंकि दूसरोंके
विरोध और कार्यकारणभावकी सिद्धि नहीं हो सकती।
विष कृष्टविषयानुपलब्धिः प्रत्यक्षानुमाननिवृत्ति-
लक्षणा संशयहेतुः प्रमाणनिष्ट वावप्यर्थाभावासिद्धेरिति ।
संशयके कारण विप्रकृष्टविषयानुपलब्धि (अश्यानुपलब्धि) प्रत्यक्ष अनुमानकी
निवृत्ति ( उसमें प्रत्यक्ष और अनुमान दोनोंकी गति नहीं है ) लक्षण वाली है।
( ज्ञानज्ञेयस्वभाव वाली है )। क्योंकि प्रमाणकी निवृत्ति होनेपर भी अर्थका अभाव
प्रसिद्ध ही है।
इति द्वितीय परिच्छेद ।
evar

तृतीय परिच्छेद त्रिरूपलिङ्गाख्यानं परार्थानुमानम् । त्रिरूपलिङ्गका कहना पगर्थानुमान है । कारणे कार्योपचारात् । क्योंकि यहाँ कारणमें कार्यका उपचार किया जाता है। (त्रिरूपलिङ्ग के कहने से त्रिरूपलिङ्गकी स्मृति उत्पन्न होती है। स्मृति से अनु. मान होता है । अतएव त्रिरूपलिङ्ग का कहना अनुमान का परम्परासे कारण है। उस कारणवचनमें कार्यानुमान का उपचार ( समारोप) किया जाता है । सहकारी आदि होनेके कारणसे अतद्भाव (जो उस स्वरूप न हो) में तद्वत् ( उसी स्वरूप के समान ) के कहने को उपचार करते हैं।) तद् द्विविधं प्रयोगभेदात् । परार्थानुमान के प्रयोग के भेद से दो भेद होते -- साधर्म्यवद्वेधर्म्यवच्चेति । साधर्म्यवत् और वैधर्म्यवत् । नानयोरर्थतः कश्चिद् भेदोऽन्यत्र प्रयोगभेदात् । इन दोनोंमें भेद केवल प्रयोगसे ही है अर्थ से कुछ भी नहीं है । तत्र साधर्म्यवद्यदुपलब्धिलक्षणप्राप्त सन्नोपलभ्यते सोऽसद्व्यवहारविषयः सिद्धः। उसमें से साधर्म्यवत्- जो उपलब्धिलक्षषप्राप्त होता हुआ भी उपलब्ध नहीं होता वह असद्व्यवहारका विषय होता है ( अर्थात् उसका श्रभाव होता है )। यह सिद्ध है। यथान्यः कश्चिद् दृष्टः शशविषाणादिः। जैसे खरहे के सींग श्रादि कोई अन्य (साध्यधर्मी से) दृष्ट (प्रमाण से निश्चित) है। नोपलभ्यते च कचित्पदेशविशेप उपलब्धि. लक्षणाप्राप्तो घट इति । [दृश्यानुपलम्भके पक्षधर्मत्वको दिखलाते हुए कहते हैं-- ] किसी प्रदेशविशेष में उपलब्धिलक्षणप्राप्त घट उपलब्ध नहीं होता। तथा स्वभावहेतोः प्रयोग:- यत्सत्तत्सर्वमनित्यं यथा घटादिरिति । १. पीटर्सन संस्करण में 'शशविषाणादि' के पश्चात् विरामचिह्न न देकर उसे अगले वाक्य में मिलाकर '-विषाणादिनॊप०-' कर दिया है।

- - १२ भाषाटीका सहित तथा स्वभावहेतुका प्रयोग- जो सत् होता है वह सब अनित्य होता है। जैसे-घट आदि । शुद्धस्य स्वभावहेतोः प्रयोगः- यदुत्पत्तिपत्तदनित्यमिति । शुद्ध स्वभावहेतु का प्रयोग- जो उत्पत्तिमान होता है वह अनित्य होता है । (यह अव्यतिरिक्तविशेषणवाला प्रयोग है।) स्वभावभूतधर्मभेदेन स्वभावस्य प्रयोगः- यकृतकं तदनित्यमित्युपाधिभेदेन । स्वभावभूतधर्मके भेद से स्वभाव का प्रयोग जो कृतक होता है वह अनित्य होता है इस प्रकार उपाधिके भेदसे [ स्वभावहेतु का प्रयोग कहा। अपेक्षितपरव्यापारो हि भावः स्वभावनिष्पत्तौ कृतक इति । जो वस्तु अपने स्वभावकी निष्पत्ति ( उत्पत्ति ) में दूसरी वस्तु के व्यापारकी आवश्यकता रखे उसे कृतक कहते हैं। एवं प्रत्ययभेदभेदित्वादयो द्रष्टव्याः । उसी प्रकार प्रत्ययभेदिभेदित्व प्रयत्ननान्तरीयकत्व आदि भी समझ लेने चाहिये । (जिसमें प्रत्यय अथवा कारणके भेदसे मेद निकाला जा सके उसे प्रत्ययभेदभेदी कहते हैं। नान्तरीयक व्याप्तको कहते हैं। अर्थात् जो जिसके रहने पर रहे और न रहने पर न रहे उसे उससे व्याप्त या नान्तरीयक कहते हैं । जैसे सूर्य के होने पर मैदान में प्रकाश अवश्य होता है और उसके न होने पर नहीं होता। जो प्रयत्नसे व्याप्त होता है वह अनित्य होता है । जो प्रत्ययमेदभेदी होता है वह कृतक होता है।) सनुत्पत्तिमान्कृतको वा शब्द इति पक्षधर्मोपदर्शनम् । अथवा शब्द सत् उत्पत्तिमान और कृतक है। इस प्रकार पक्ष धर्म को दिखला दिया। (धर्मी को पक्ष भी कहते हैं। यहाँ धर्मीशब्दमें पक्षके धर्म सत्त्व, उत्पत्तिमत्व और कृतकत्व दिखलाये हैं। उनमें से सत्व वस्तु से बिलकुल अपृथक् होने से शुद्ध विशेषण है। उत्पत्तिमत्त्व से प्रगट होता है कि वस्तुमें उसके अन्दर ही अन्दर कुछ परिवर्तन हुश्रा अतएव यह अव्यतिरिक्तविशेषण है। कृतकत्वसे प्रगट होता है कि करने वाला स्वयं वस्तुसे भिन्न है । अतः यह व्यतिरिक्त विशेषण है।) ( शङ्का ) यह स्वभावहेतु सिद्धसम्बन्ध स्वभावके साध्यमें प्रयोग किये जाने चाहिये अथवा प्रसिद्धसम्बन्धके ? १. पीटर्सन संस्करण में यहाँ भी विराम न देकर इसको अगले वाक्य में मिला दिया है।

न्यायबिन्दु १३ (उत्तर) सिद्धसम्बन्धमें प्रयोग किये जाने चाहिये । (यही दिखलाते हुए कहते हैं) सर्व एते साधनधर्मा यथास्वं प्रमाणैः सिद्धसाधनधर्म- मात्रानुबन्ध एव साध्यधर्मेऽवगन्तव्याः । यह स्वभावहेतु ( साधनधर्म ) निश्चितसाधनधर्ममात्रानुवन्धिसाधनधर्ममें ही प्रयोग किये जाने चाहिये । अन्यत्र नहीं। ( गमक होनेसे साधन और पराश्रित होनेसे धर्म कहा जाता है । साधन धर्म- मात्रसे अभिप्राय केवल साधनधर्मसे ही है । अनुवन्ध अन्वयव्याप्तिको कहते हैं । जैसे-धूम पावकानुबन्धि ( अनुबन्धि-अनुबन्धवाला ) है । जो अपने अनुरूप प्रमाणोंसे सिद्ध हो उसको यहाँ निश्चित कहा है । अतएव स्वभावहेतुका प्रयोग ऐसे निश्चितसाधनधर्ममात्रको अनुबन्ध करने वाले साधनधर्ममें ही किया जाना चाहिये । ) तत्स्वभावत्वात्स्वभावस्य च हेतुत्वात् । [क्योंकि जो साध्यधर्म साधनधर्ममात्रानुवन्धि है ] वह ही उस साधनधर्मका स्वभाव है । और स्वभाव ही हेतु है। [ यद्यपि साध्यधर्म साधनका स्वभाव होता है, तथा साधन हेतु होता है तथापि साधन प्रतिज्ञार्थंकदेशहेतु नहीं है । ] ( धर्म और धर्मी के समुदायको प्रतिज्ञा कहते हैं । एकदेश एक भाग को कहते हैं। यदि प्रतिज्ञा ( धर्म और धर्मी ) के ही किसी भाग को (धर्म या धर्मी को ) हेतु बनाया जावेगा तो वह प्रयोग साध्यको सिद्ध न कर सकनेके कारणसे हेतु का एकदोष हो जाता है । जैसे-'अग्नि उप्ण है; क्योंकि वह उष्ण है' में 'उष्णत्व' हेतु प्रतिज्ञार्थंकदेशहेतु है।) वस्तुतस्तयोस्तादात्म्यात्तनिष्पत्तावनिष्पनस्य तत्स्वभा- वत्वाभावाद् व्यभिचारसंभवाच । क्योंकि वास्तवमें साध्य और साधन का तादात्म्य होता है । और जो तनिष्पत्तिमें अनिष्पन्न है (जो जिसका नियमसे कारण नहीं होता वह तनिष्पत्ति ( उसकी उत्पत्ति ) में अनिष्पन्न ( उत्पन्न न होने वाला ) होता है ) वह उस स्वभाववाला नहीं होता और उसमें व्यभिचार भी आता है। कार्यहेतोरपि प्रयोगः । यत्र धूमस्तत्राग्निर्यथा था महानसादा- वस्ति चेह धूम इति । इहापि सिद्ध एव । कार्यहेतु का प्रयोग- जहाँपर धूम होता है वहां अग्नि होती है; जैसे पाकशाला आदिमें । उसी प्रकार यहाँ भी धूम है । इस लिये यहाँ भी अग्नि सिद्ध ही है। कार्यकारणभाषे कारणे साध्ये कार्यहेतुर्वक्तव्यः । कार्यकारणभाव में कारणके साध्य होनेपर कार्यको हेतु कहना चाहिये । । - - १४ भाषाटीका सहित वैधय॑वतः प्रयोगो यत्सदुपलब्धिलक्षमप्राप्तं तदुपलभ्यत एव । यथा नीलादिविशेषः । न चैवमिहोपलब्धिलक्षणप्राप्तस्य सत उप- लब्धिर्घटस्येत्यनुपलब्धिप्रयोगः । वैधर्म्यवत् का प्रयोग- जो सत् और उपलब्धिलक्षणप्राप्त होता है वह अवश्य उपलब्ध होता है । जैसे- नील आदि विशेष । उसी प्रकार यहाँ उपलब्धिलक्षणप्राप्त सत् घटकी उपलब्धि नहीं है । अतएव यह अनुपलब्धि प्रयोग है। असत्यनित्यत्वे नास्ति सत्त्वमुत्पत्तिमत्त्वं कृतकत्वं वा । असच शब्द उत्पत्तिमान्कृतको वेति स्वभावहेतोः प्रयोमः। [ स्वभावहेतुके वैधर्म्यप्रयोगको कहते हैं- अनित्य व (साध्य) का अभाव होने पर भी सत्त्व, उत्पत्तिमत्व अथवा कृतकत्व नहीं हो सकते । शब्द असत् होते हुए भी उत्पत्तिमान् तथा कृतक होता है, यह स्वभावहेतु का प्रयोग है। असत्यग्नौ न भवत्येव धूमोऽत्र चास्तीति कार्य हेतोः प्रयोगः । अग्नि के न होने पर धूम भी नहीं होता, उसी प्रकार यहाँ है । (अर्थात् अग्निके न होनेसे धूम नहीं है )। यह कार्यहेतु का प्रयोग है । साधम्र्येणापि हि प्रयोगेऽर्थाद्वधर्म्यगतिरिति । असति तस्मिन्साध्येने हेतोरन्वयाभावात् । साधर्म्य (अन्वय ) के प्रयोगसे वैधर्म्य ( व्यतिरेक ) अर्थात् ही आ जाता है । क्योंकि व्यतिरेकके अभावमें हेतुका साध्यसे श्रन्वय न हो सकेगा। ( व्याप्तिके दो भेद हैं । एक अन्वयव्याप्ति, दूसरी व्यतिरेकच्याप्ति । एकके होने पर दूसरे का नियमसे होना. अन्वय है। जैसे-धूमके सद्भाबमें अग्निका सद्भाव अवश्य होनेके कारण धूमका अभि के साथ अन्वय है । एकके न होने पर दूसरेका भी नियमसे न होना व्यतिरेक है । जैसे-अनिके अभावमें धूम का अभाव । तथा वैधयेणाप्यन्वयगतिः । असति तस्मिन्साध्या- भावे हेत्वभावस्यासिद्धः। उसी प्रकार वैधर्म्य ( व्यतिरेक ) से भी अन्वय स्वयं ही आ जाता है । क्योंकि अन्वयके न होनेपर साध्यके अभावमें हेतुका अभाव भी सिद्ध न होगा। १. पीटर्सन संस्करण में 'साध्ये न' पाठ है। संस्कृत टीका में भी यही कर दिया गया है। किन्तु विचार करने से यह पाठ रखने पर अर्थ उलटा हो जाता है। २. पीटर्सन संस्करण में 'साध्यभावे' पाठ है । संस्कृत टीका में भी यही कर दिया गया है। किन्तु विचार करने से यह पाठ रखने पर अर्थ उलटा हो जाता है। । ।

न्यायविन्दु न हि स्वभावप्रतिबन्धे सत्येकस्य निवृत्तावप- रस्य नियमेन निवृत्तिः। स्वभावप्रतिबन्धके होनेपर एककी निवृत्तिमें दूसरेकी निवृत्ति नियमसे नहीं होती । स च द्विप्रकारः। सर्वस्य तादात्म्यलक्षणस्तढत्पत्ति- लक्षणश्चेत्युक्तम् । वह स्वभावप्रतिबन्ध ( सब प्रतिबद्धका ) दो प्रकारका होता है- तादात्म्यलक्षण और तदुत्पत्तिलक्षण । तेन हि निवृत्तिं कथयता प्रतिबन्धो दर्शनीयः । [ स्वभावप्रतिबन्ध होनेपर निय॑निवर्तकभावके होनेके कारण से ] [ वह साध्यकी निवृत्तिमें साधनकी ] निवृत्तिको कहनेवाले [ निवर्त्यनिवर्तकमें ] प्रतिबन्धको देखे । तस्मानिवृत्तिवचनमाक्षिप्तप्रतिबन्धोपदर्शनमेव भवति । [ साधनके साध्यमें प्रतिबद्ध होनेसे साध्यको निवृत्ति होने पर साधनको निवृत्ति भी हो जाती है ] अतएव [ साध्यकी निवृत्तिमें साधन की ] निवृत्तिका कहना उस प्रतिबन्ध का दिखलाना ही हो जाता है । यच्च प्रतिबन्धोपदर्शनं तदेवान्वयवचनमित्येकेनापि वाक्येनान्व- यमुखेन व्यतिरेकमुखेन वा प्रयुक्तेन सपक्षासपक्षयोलिङ्गस्य सदस- त्त्वख्यापनं कृतं भवतीति नावश्यवाक्यद्वयप्रयोगः । और वह प्रतिवन्धोपदर्शन ही (प्रतिवन्ध का दिखलाना ही ) अन्वयवचन इस प्रकार प्रयोग किये हुए एक ही अन्वयमुख अथवा व्यतिरेकमुख वाक्यसे सपक्षमें लिङ्गका सत्त्व अथवा असत्त्व कहा जाता है । इस प्रकार दो वाक्यों के प्रयोगकी कोई आवश्यकता नहीं रहती । अनुपलब्धावपि यत्सदुपलब्धिलक्षणप्राप्तं तदुपलभ्यत एवेत्युक्तेऽनु- पलभ्यमानं तादृशमसदिति प्रतोतेरन्वयसिद्धिः । अनुपलब्धिमें भी 'जो उपलब्धिलक्षणप्राप्त है वह उपलब्ध होता ही है' ऐसा कहने पर उसी प्रकारका 'अनुपलभ्यमान ( न मिलनेवाला ) पदार्थ असत् है ऐसी प्रतीति हो जानेसे अन्वयकी सिद्धि हो जाती है । द्वयोरप्यनयोः प्रयोगेऽवश्यं पक्षनिर्देशः । इन दोनों प्रयोगोंमें पक्षका निर्देश ( कहना ) अवश्य होना चाहिये । यस्मात्साधर्म्यवत्प्रयोगेऽपि यदुपलब्धिलक्षणप्राप्त सन्नोपलभ्यते सोऽसद्व्यवहारविषयः । क्योंकि साधर्म्यवत् प्रयोगमें भी जो उपलब्धिलक्षण प्राप्त होता हुआ भी उपलब्ध नहीं होता वह असत् व्यवहारका विषय है । sto भाषाटीका सहित नोपलभ्यते चात्रोपलब्धिलक्षणप्राप्तो घट इत्युक्ते सामादेव नेह घट इति भवति । 'यहाँ उपलब्धिलक्षण प्राप्त घट नहीं है। ऐसा कहनेपर 'यहां घट नहीं है। यह सामर्थ्यसे ही आ जाता है। तथा वैधय॑वत्प्रयोगेऽपि यः सद्व्यवहारविषय उपलब्धिलक्ष- पप्राप्तः स उपलभ्यत एव, न तथात्र तादृशो घट उपलभ्यत' इत्युक्ते सामर्थ्यादेव नेह सद्व्यवहारविषय इति भवति । उसी प्रकार वैधय॑वत् प्रयोगमें भी जो सद्वयवहारका विषय और उपलब्धिलक्षण- प्राप्त है वह उपलब्ध होता ही है इसी प्रकार यहां वैसा घट उपलब्ध नहीं है' यह कहनेपर सामर्थ्यसे ही यहां पर घट सद्व्यवहारका विषय नहीं है' यह हो जाता है । कीदृशः पुनः पक्ष इति निर्देश्यः। 'अब पक्ष कैसा होता है' यह कहा जाता है। स्वरूपेणैव स्वयमिष्टोऽनिराकृतः पक्ष इति । जो स्वरूपसे ही स्वयं इष्ट और अनिराकृत हो उसे पक्ष कहते हैं। स्वरूपेणेति साध्यत्वेनेष्टः । स्वरूपेणैवेति साध्यत्वेनेष्टो न साधनत्वेनापि । यथा शब्दस्यानित्यत्वे साध्ये चानुषत्वं हेतुः । 'स्वरूपसे इष्ट' शब्दसे पक्षको साय बतलाया है । स्वरूपसे ही साध्यरूपसे ही माना गया है साघनरूपसे भी नहीं माना गया । जैसे-शब्दकी अनित्यताको साध्य करनेमें चाक्षुषत्व ( नेत्रसे उत्पन्न होना) हेतु देना। शब्देऽसिद्धत्वात्साध्यं न पुनस्तदिह साध्यत्वेनैवेष्टं साधनत्वे- नाप्यभिधानात् । वह शब्दमें प्रसिद्ध होनेसे साध्य है । उसको यहां केवल साध्य ही नहीं माना है । क्योंकि उसे साधन भी कहा है। 'स्वयं इस पदका समर्थन- स्वयमिति वादिना यस्तदा साधनमाह । एतेन यद्यपि कचि- च्छास्त्रे स्थितः साधनमाह । तच्छास्त्रकारेण तस्मिन् धर्मिण्यनेकधर्मा- भ्युपगमेऽपि यस्तदा तेन वादिना धर्मः स्वयं साधयितुमिष्टः स एव साध्यो नेतर इत्युक्तं भवति । १. पीटर्सन संस्करण का निराकृतः' पाठ अशुद्ध है। २. पीटर्सन संस्करण का 'स्थितसाधनमाह' पाठ हमारी सम्मति में अशुद्ध है।

न्यायबिन्दु जो स्वयं वादोसे माना गया हो [ पक्ष वही होगा] (जो वादके समयमें साधनको कहे उसे वादी कहते हैं ) इससे यद्यपि वादी किसी शास्त्रमें स्थिर रहकर साधनको कहता है [ तथापि ] उस शास्त्रकारके उस धर्मीमें माने हुए अनेक धर्मीमें से भी वादी जिस धर्मको साधना चाहे वही साध्य होता है, अन्य नहीं । 'इष्ट' पदकी सार्थकता- इष्ट इति यत्रार्थे विवादेन साधनमुपन्यस्तं तस्य सिद्धिमिच्छता सोऽनुक्तोऽपि वचनेन साध्यस्तदधिकरणत्वाद्विवादस्य । वादीने विवाद के द्वारा सिद्ध करनेको इच्छा रखते हुए जिस अर्थमें साधन दिया वह अर्थ वचनसे न कहा जानेपर भी साध्य है, क्योंकि विवादका अधिकरण वही है। यथा पराश्चिक्षुरादयः संघातत्वाच्छयनासनाद्यङ्गवदिति। अत्रा- स्मार्था इत्यनुक्तावप्यात्मार्थतानेनोक्तमात्रमेव साध्यमित्युक्तं भवति । जैसे-चक्षु आदि पदार्थ ( दूसरेके लिये) हैं। क्योंकि वह शयन, आसन आदि अङ्गोंके समान संघातरूप हैं। यहां पर 'आत्मार्थ ( आत्माके लिये )' यह न कहे जानेपर भी तात्पर्यसे निकलने वाली प्रात्मार्थता ही साध्य है, ऐसा कहा जाता है । 'अनिराकृत' इस पदका समर्थन- अनिराकृत इति । एतल्लक्षणयोगेऽपि यः साधयितुमिष्टोऽप्यर्थः प्रत्यक्षानुमानप्रतीतिस्ववचनैर्निराक्रियते न स पक्ष इति प्रदर्शनार्थम्'। जिस अर्थको सिद्ध करना चाहते हैं उसमें उपर्युक्त सब लक्षणों के होनेपर भी यदि वह प्रत्यक्ष, अनुमान, प्रतीति और स्ववचनसे निराकृत (निराकरण किया हुआ ) हो तो वह पक्ष नहीं हो सकता। [अनिराकृत पद ] यह दिखलाने के लिये दिया गया है। तत्र प्रत्यक्षनिराकृतो यथा-अश्रावणः शब्द इति । प्रत्यक्षनिराकृत (जिसका प्रत्यक्ष प्रमाणसे निराकरण किया जावे)- जैसे-शब्द कर्ण इन्द्रियका विषय नहीं है । अनुमाननिराकृतो यथा-नित्यः शब्द इति । अनुमाननिराकृत- जैसे-शब्द नित्य है। प्रतीतिनिराकृतो यथा-अचन्द्रः शशीति । प्रतीतिनिराकृत- जैसे-शशी चन्द्रशब्दका वाच्य नहीं है। स्ववचननिराकृतो यथा-नानुपानं प्रमाणम् । १. पीटर्सन संस्करण में यहाँ विराम चिह्न नहीं है।

१८ भाषाटीका सहित स्ववचननिराकृत जैसे-अनुमान प्रमाण नहीं है । एतदेव तु यद्यसत्यार्थमन्यान्यसत्यार्थानि न दर्शितानि भवन्ति । यदि इसोको असत्यार्थ कह तो अन्य वचन असत्यार्थ नहीं कहे जा सकते । इति चत्वारः पक्षाभासा निराकृता भवन्ति । इस प्रकार चारों पक्षाभास निराकरण किये जाते हैं। सिद्धस्यासिद्धस्यापि साधनत्वेनाभिमतस्य स्वयं वादिना तदा साधयितुमनिष्टस्योक्तमात्रस्य निराकृतस्य च विपर्ययेण साध्यस्तेनैव स्वरूपेणाभिमतो वादिन इष्टोऽनिराकृतः पक्ष इति पक्षलक्षणमनवयं दर्शितं भवति । जो पदार्थ सिद्ध (विपरीत हेतुसे सिद्ध किया हुआ भी साध्य हो सकता है ) अथवा असिद्ध भी साधनरूपसे माना गया हो, तथा स्वयंवादीको अभिष्ट न हो और उपरोक्त प्रत्यक्ष आदि निराकृतोंसे विपरीत हो तथावादी द्वारा साध्य माना गया हो, तथा जो इष्ट और अनिराकृत हो वह पक्ष होता है । यह पक्षका निर्दोष लक्षण है। त्रिरूपलिङ्गाख्यानं परार्थानुमानमित्युक्तम् । इस प्रकार त्रिरूपलिङ्गका अभिधानरूप परार्थानुमान कहा गया । तत्र त्रयाणां रूपाणामेकस्यापि रूपस्यानुक्तौ साधनाभासः । उक्तावप्यसिद्धौ संदेहे वा। तीनों रूपोंमेंसे एकके भी न कहनेसे साधनाभास या हेत्वाभास हो जाता है । [अथवा तोनों रूपोंके कहे जानेपर भी हेतु के प्रसिद्ध होने या उसमें संदेह होनेसे ही हेत्वाभास हो जाता है। प्रतिपाद्यप्रतिपादकयोरेकस्य रूपस्य धर्मिसम्बन्धस्यासिद्धी संदेहे चासिद्धो हेत्वाभासः। प्रतिपाद्य और प्रतिपादकमेंसे धर्मीसम्बन्धी एकरूप ( पक्षधर्मत्व ) के सिद्ध न होनेपर अथवा उसमें संदेह होनेपर प्रसिद्धहेत्वाभास होता है । यथा अनित्यः शब्द इति साध्ये चानुषत्वमुभयासिद्धम् । जैसे-'शब्द अनित्य है, क्योंकि वह चाक्षुष (अक्षुका विषय ) है' में चाक्षुषत्व हेतु उभयासिद्ध है । (जो वादी और प्रतिवादी दोनों के लिये प्रसिद्ध हो उसे उमया. सिद्ध कहते हैं )। १. पीटर्सन संस्करण का निराकृतः' पाठ अशुद्ध है। २. पी० सं० में यहाँ विराम न होने से हेत्वाभास सामान्य और असिद्ध हेत्वाभास का लक्षण निकालने में बड़ी कठिनता पड़ती है।

न्यायबिन्दु चेतनास्तरव इति साध्ये सर्वत्वगपहरणे मरणं प्रतिवायसिद्धं विज्ञानेन्द्रियायुनिरोधलक्षणस्य मरणस्यामेनाभ्युपगमात्तस्य च तस्व- सम्मवात् । 'वृक्ष सजीव होते हैं, क्योंकि वह सब छाल के उतर जाने पर मर जाते हैं ( सूख जाते हैं )। इसमें वृक्षका सब छालके उतर जाने पर मर जाना प्रतिवादी (बौद्ध) को असिद्ध है। [ अतः यह प्रतिवाद्यसिद्ध हेत्वाभास है । ] क्योंकि बौद्धदर्शन विज्ञान, इन्द्रिय और आयुके निरोध होनेको ही मरण मानता है, जिसका होना वृक्षों में असम्भव है। अचेतनाः सुखादय इति साध्य उत्पत्तिमत्त्वमनित्यं वा सांख्यस्य स्वयं वादिनोऽसिद्धम् । 'मुख श्रादि अचेतन हैं, क्योंकि यह उत्पत्तिमान् अथवा अनित्य हैं। इसमें उत्पत्तिमत्व अथवा अनित्यत्व स्वयं वादी अर्थात् सांख्यकी ही प्रसिद्ध है। [ अतः यह हेतु वाद्यसिद्ध है।] तथा स्वयं तदाश्रयणस्य वा संदेहेऽसिद्धः । तथा स्वयं उस साध्यधर्मीके संदिग्ध होनेसे हेतु संदिग्यासिद्ध भी है। [ अपने आप संदेह किये हुएका उदाहरण - ] यथा वाष्पादिभावेन संदिह्यमानी भूतसंघातोऽग्निसिद्धावुपदिश्य- मानः संदिग्धासिद्धः। जैसे-वाष्प आदि भावसे सन्देह किया हुआ पृथ्वी आदिका समूह अग्निकी सिद्धि के लिये प्रहण किये जानेपर संदिग्धासिद्ध है। ( कहीं दूर पर धूल आदिको उड़ती हुई देखकर उसकी धूम समझकर उससे अग्निको सिद्ध करने लगनेसे अभिप्राय है।) [आश्रयासिद्धका उदाहरण - यथेह निकुञ्ज मयूरः केकायितादिति । तदापातदेशविभ्रमे । जैसे-इस निकुञ्ज में मोर है । क्योंकि इधरसे ही मोरका शब्द आ रहा है। उस शब्दके आनेके स्थानमें विभ्रम हो सकनेसे यह आश्रयणासिद्ध है । धर्म्यसिद्धावप्यसिद्धी यथा सर्वगत आत्मेति साध्ये सर्वत्री- पलभमानगुणत्वम् । धर्मीके सिद्ध होनेपर भी प्रसिद्ध- जैसे-'आत्मा सर्वगत ( सर्वत्र व्याप्त ) है' इस साध्यमें सर्वत्र उपलब्ध होनेका गुण प्रसिद्ध है। ।

२० भाषाटीका सहित तथैकस्य रूपस्यासपक्षेऽसत्त्वस्यासिद्धावनैकान्तिको हेत्वाभासः । तथा एकरूप (असपक्षमें असत्त्व ) की असिद्धि में अनैकान्तिक हेत्वाभास होता है। यथा शब्दस्यानित्यत्वादिके धर्मे साध्ये प्रमेयत्वादिको धर्मः सपक्षविपक्षयोः। जैसे-शब्दके अनित्यत्व आदि धर्मके साध्यमें प्रमेयत्व आदि धर्म सपक्ष और विपक्ष दोनों में रहते हैं। सर्वत्रैकदेशे वा वर्तमानस्तथास्यैव रूपस्य संहेदेऽप्यनैकान्तिक एव । अथवा सर्वत्र या एकदेशमें रहने वाले इसी रूप ( असपक्षमें असत्व ) के संदेहमें भी अनेकान्तिक ही है। यथाऽसर्वज्ञः कश्चिद्विवक्षितः पुरुषो रागादिमान् घेति साध्ये वक्तृत्वादिको धर्मः संदिग्धविपक्षव्यावृत्तिकः । सर्वत्रैकदेशे वा सर्वज्ञो वक्ता नोपलभ्यते इति । जैसे-'कोई विवक्षित पुरुष सर्वज्ञ अथवा रागादिमान् है' इस साध्यमें वक्तृत्व श्रादिधर्म संदिग्धविपक्षव्यावृत्ति वाले हैं। [क्योंकि] सर्वज्ञ वक्ता सर्वत्र अथवा एकदेशमें कहीं भी उपलब्ध नहीं है। एवं प्रकारस्यानुपलम्भस्यादृश्यात्मविषयत्वेन संदेहे हेतुत्वाद । क्योंकि अश्यात्मविषय वाला (जिसका विषय अदृश्यात्मा है ) अनुपलम्भ संदेहमें कारण है। असर्वज्ञविपर्ययाद्वक्तृत्वादेात्तिः संदिग्धा । वक्तृत्वसर्वज्ञ- त्वयोविरोधाभावाच्च । असर्वज्ञका विपर्यय होनेसे वक्तृत्व आदिकी व्यावृत्ति संदिग्ध है [निधय नहीं है। क्योंकि सर्वज्ञत्व और वक्तृत्व में विरोधाभाव भी है । (व्याप्तिमान् व्यतिरेकको बतलाते हैं.-] यः सर्वज्ञः स वक्ता न भवतीत्यदर्शनेऽपि व्यतिरेको न सिध्यति, सन्देहात्। जो सर्वज्ञ होता है वह वक्ता नहीं होता। इस प्रकार सर्वज्ञ वक्ता के न देखे जाने पर भी व्यतिरेक सिद्ध नहीं होता। क्योंकि उसमें सन्देह है। द्विविधो हि पदार्थानां विरोधः । पदार्थोका विरोध दो ही प्रकारका होता है। [जिनमेंसे प्रथम विरोध दिखलाया जाता है-] १. पी० सं० का 'सत्वस्य' पाठ अशुद्ध है। २. पी० सं० में 'संदेहात्' के पश्चात् विरामचिह्न न देकर उसकी अगले वाक्यमें सन्धि कर दी है, जिससे उसका अर्थ कुछ नहीं बैठता।

न्यायबिन्दु २१ अविकलकारणस्य भवतोऽन्यभावः । अविकल ( सम्पूर्ण) कारणवाले (जिसके सब कारण उपस्थित हो) विद्यमान पदार्थका अन्यभाव होना (विद्यमानसे अन्यभाव अर्थात् अभाव होना।) अभावाद्विरोधगतिः। अभावसे ही विरोध चल सकता है । शीतोष्णस्पर्शवत् । जैसे-शीतस्पर्श और उष्णस्पर्श का विरोध है । अब दूसरे विरोधको दिखलाते हैं। परस्परपरिहारस्थितलक्षणतया वा भाववत् । परस्परपरिहारस्थितलक्षणतासे भावके समान विरोध है । ( जो एक दूसरेका परिहार करके अथवा उसका अभाव करके स्थित हों वह वस्तुएं परस्परपरिहारस्थित- लक्षण वाली हैं । जैसे-भाव और अभाव ।) स च द्विविधोऽपि विरोधो वक्तृत्वसर्वज्ञत्वयोर्न सम्भवति । वह दोनों ही प्रकारका विरोध वक्तृत्व और सर्वज्ञत्वमें संभव नहीं है। न चाविरुद्धविधेरनुपलब्धावप्यभावगतिः। रागादीनां वचनादेश्व कार्यकारणभावासिद्धः। अविरुद्धविधिकी अनुपलब्धिमें भी प्रभाव नहीं हो सकता। क्योंकि राग श्रादिकों और वचन आदिका कार्यकारणभाव प्रसिद्ध है। अर्थान्तरस्य वा कारणस्य निवृत्तौ न वचनादेनिवृत्तिरिति संदिग्धव्यतिरेकोऽनैकान्तिको वचनादिः। अथवा अर्थान्तरकारणकी निवृत्तिमें ( सहचारिके दर्शनमात्रसे ) वचन आदि की निवृत्ति नहीं होती। अतएव सर्वज्ञमें वचन आदि संदिग्धव्यतिरेक अनैकान्तिक हैं। द्वयो रूपयोविपर्ययसिद्धौ विरुद्धः । दो रूपोंके विरुद्ध सिद्ध हो जानेपर विरुद्ध हेत्वाभास होता है । कयोयोः १ सपक्षे सत्वस्यासंपक्षे चासत्त्वस्य । यथाकृत- कत्वं प्रयत्नानन्तरीयकत्वं च नित्यत्वे साध्ये विरुद्धो हेत्वाभासः । किन दो के ? सपक्षमें सत्त्व और असपक्ष में असत्व के। जैसे-नित्यत्वके सिद्ध करनेमें कृतकत्व और प्रयत्नानान्तरीयकत्व विरुद्ध हेत्वाभास हैं। अनयोः सपक्षेऽसत्त्वमसपक्षे च सत्त्वमिति विपर्ययसिद्धिः। इन दोनोंके सपक्षमें न रहने और असपक्षमें रहनेसे विपर्ययकी सिद्धि होती है। १. पी० सं० का 'सपक्षे पाठ ठीक नहीं है।

२२ भाषाटीका सहित एनौ च साध्यविपर्ययसाधनाविरुद्धौ । यह दोनों साध्य (नित्यत्व) के विपरीत (अनित्यत्व) का साधन करनेसे विरुद्ध हैं। तत्र च तृतीयोऽपीष्टविघातद्विरुद्धः । एक तीसरा इष्टविघातकृत् विरुद्ध भी है। यथा पराश्चक्षुरादयः संघातत्वाच्छयनाशनायङ्गचदिति । जैसे-चक्षु श्रादि परार्थ हैं । क्योंकि वह शयन, श्रासन श्रादि पुरुषके उपभोगके अङ्गोंके समान संघात ( परमाणुसंचितिरूप ) हैं। तदिष्टासं हतपराय विपर्ययसाधनाविरुद्धः । वह [ वादी सांख्य के ] इष्ट असंहत ( विषय ) की परार्थताके विपरीत को साधन करनेसे विरुद्ध है। स इह कस्मानोक्तः ? वह यहां क्यों नहीं कहा गया? अनयोरेवान्तर्भावात् । क्योंकि उसका इन दोनों में ही अन्तर्भाव हो जाता है । न ह्ययमाभ्यां साध्यविपर्ययसाधनत्वेन भिद्यते । क्योंकि यह इष्टविघातकृत् इन दोनों हेतुओसे साध्यविपर्ययसाधनताकी अपेक्षा भिन्न नहीं है। न हीष्टोक्तयोः साध्यत्वेन कश्चिद्विशेषः इति द्वशे रूपयोरेकस्या- सिद्धाबपरस्या च संदेहेऽनैकान्तिकः । क्योंकि इष्ट और उक्त में एक दूसरेका साध्य होनेसे ] कोई विशेष नहीं है। अतएव दो रूपों में से एकके असिद्ध होने तथा दूसरेके संदिग्ध होनेसे अनैकान्ति- कता आती है। यथा वीतरागः कश्चित्सर्वज्ञो वा वक्तृत्वादिति व्यतिरेकोज़ासिद्धः। संदिग्धोऽन्वयः । जैसे- कोई वीतराग अथवा सर्वज्ञ है, बयोंकि वह वक्ता है। यहाँ पर व्यतिरेक प्रसिद्ध और श्रन्यय संदिग्ध है। सर्वज्ञवीतरागयोर्विप्रकर्षावचनादेस्तत्र सत्त्वमसत्त्वं वा संदिग्ध- मनयोरेष यो रूपयोः संदेहेऽनैकान्तिकः । सर्वज्ञ और वीतरागके विप्रकर्ष ( दूर ) होनेसे वहां वचन आदिका होना या न होना संदिग्ध है । अतएव इन दोनों रूपोंमें संदेह होनेसे वक्तृत्व हेतु अनेकान्तिक है ।

न्यायबिन्दु २३ सात्मकं जीवच्छरीरं प्राणादिमत्त्वादिति । जैसे-जीवित शरीर आत्मासहित है, क्योंकि उसमें प्राण श्रादि हैं। न हि सात्मकनिरात्मकाभ्यामन्यो राशिरस्ति । यत्र प्राणादिर्वतते । सात्मक और निरात्मकसे भिन्न ऐसी कोई राशि नहीं है जहां प्राण आदि हो । आत्मनो वृत्तिव्यवच्छेदाभ्यां सर्वसंग्रहात् । आत्माके सद्भाव और प्रभावसे सबका संग्रह करनेसे अन्यराशिका अभाव है। नाप्यनयोरेकत्र वृत्तिनिश्चयः । इन दोनों [ सात्मक और निरात्मक ] में एक स्थानमें सद्भावका निश्चय नहीं है। सात्मकत्वेन निरात्मकत्वेन वा प्रसिद्ध प्राणादेरसिद्धिः। क्योंकि सात्मक अथवा निरात्मक रूपसे प्रसिद्ध होनेसे प्राण भादिकी प्रसिद्धि हो जावेगी। तस्माजीवच्छरीरसम्बन्धी प्राणादिः । अतएव प्राण आदि जीवितशरीर-सम्बन्धी हैं। सात्मकादनात्मकाच सर्वस्माद्वथावृत्तत्वेनासिद्धः । क्योंकि सात्मक और निरात्म सबसे व्यावृत्त होनेसे प्रसिद्ध है। ताभ्यां न व्यतिरिच्यते न तत्रान्वेति । एकात्मन्यप्यसिद्धः । उसका न तो उन दोनोंसे व्यतिरेक और न अन्वय ही है । क्योंकि वह ( दोनों) एक आत्मामें भी सिद्ध नहीं हो सकते । नापि सात्मकान्निरात्मकाच्च तस्यान्वयव्यतिरेकयोरभावनिश्चयः। सात्मक और निरात्मकसे भी उसके अन्वय और व्यतिरेकके अभावका निषय नहीं होता। एकाभावनिश्चयस्यापराभावनान्तरीयकत्वात् । क्योंकि एक के अभावका निश्चय दूसरेके अभावके निश्चय का अव्यभिचारी होता है। अन्वयव्यतिरेकयोरन्योन्यव्यवच्छेदरूपत्वात् । क्योंकि अन्वय और व्यतिरेक अन्योन्यव्यवच्छेद रूप हैं। अत एवान्वयव्यतिरेकयोः सन्हेहादनकान्तिकः । अतएव अन्वय और व्यतिरेकमें सन्देह होनेसे अनैकान्तिक है। साध्येतरयोरतो निश्चयाभावात् । क्योंकि इससे साध्य और उसके विरोधी निश्चयका प्रभाव २४ भाषाटीका सहित एवं त्रयाणां रूपाणामेकैकस्य द्वोर्द्वयोर्वा रूपयोरसिद्धौ संदेहे च यथायोगसिद्धविरुद्धानकान्तिकास्त्रयो हेत्वाभामाः । इस प्रकार तीनों रूपोमें से एक २ अथवा दो २ रूपों के प्रसिद्ध अथवा सन्दिग्ध होने पर यथायोग असिद्ध, विरुद्ध और अनेकान्तिक ये तीन हेत्वाभास होते हैं । विरुद्धाव्यभिचार्यपि संशयहेतुरुक्तः । स इह कम्मान्नोक्तः ? ( शंका ) विरुद्धात्यभिचारी भी संशयका कारण कहा गया है। उसको यह क्यों नहीं कहा? ( जो हेत्वन्तरसे सिद्ध किये हुए के विरुद्ध होता है वह व्यभिचारको प्राप्त नहीं होता। बही विरुद्धान्यभिचारी है। अथवा जो विरुद्ध होते हए अन्य साधनसे सिद्ध किये धर्मके विरुद्ध साधन करनेसे व्यभिचारी हो वह अपने साध्यसे व्यभिचरित न होनेसे विरुद्वाव्यभिचारी होता है। जैसे हेत्वन्तर धूमसे सिद्ध किये हुए अग्नियुक्त पर्वत के जलयुक्त तालाब विरुद्ध है । अतएव तालाब पर्वत में व्यभिचरित नहीं हो सकता । अथवा जो विरुद्ध होते हुए अन्य साधन धूम से सिद्ध किये हुए धर्म अग्नि के विरुद्ध जल को सिद्ध न करनेसे उसमें अव्यभिचारी हो वह अपने साध्यसे व्यभिचरित न होनेसे विरुद्धाव्यभिचारी है । ) अनुमानविषयेऽसंभवात् । ( उत्तर ) अनुमान के विषय ( रूप्य ) में असम्भव होनेसे उसका कथन यहाँ नहीं किया गया है। न हि संभवोऽस्ति कार्यस्वभावयोरुक्तलक्षणयोरनुपलम्भस्य च विरुद्धतायाः । न चान्योऽव्यभिचारी। क्योंकि उक्त लक्षण ( त्रैरूप्य ) वाले कार्य, स्वभाव और अनुपलम्भ की विरुद्धता सम्भव नहीं है । और [ उनसे भिन्न ! अन्य कोई अव्यभिचारी भी नहीं है, [अतएव उनीमें हेतुला है।] [ तब आचार्य दिग्नागने इस हेतुदोषको किस स्थल पर कहा है ? इसके लिये कहते हैं-] तस्मादपस्तुदर्शनबलपरत्तमागमाश्चयमनुमानमाश्रित्य तदर्थ- विचारेषु विरुद्धाव्यभिचारी साधनदोष उक्तः । श्रवस्तु के दर्शन के बलसे प्रवृत्त हुए आममाश्रय अनुमानका धाश्रय लेकर उसके अर्थके विचारोंमें विरुद्धाव्यभिचारी साधन दोष कहा शास्त्रकाराणामर्थषु भ्रान्त्या विपरीतस्य स्वभावोपसंहारसंभवात् । क्योंकि अर्थमें भ्रान्ति हो जानेसे शास्त्रकारोंका विपरीतको स्वभाव कह देना सम्भव है।

न्यायबिन्दु २५ न ह्यस्य सम्भवो यथावस्थितवस्तुस्थिनिष्वात्मकार्येषूपलम्भेषु । यह यथावस्थितवस्तुकी स्थिति और प्रात्मकार्यों के उपलम्भ में सम्भव नहीं है । तत्रोदाहरणं यत्सवदेशावस्थितैः स्वसम्बन्धिभिः सम्बध्यते तत्सर्वगतं यथाकाशमभिसंबध्यते सर्वदेशावस्थितैः स्वसम्बन्धिभि- युगपत्सामान्यमिति। इसका उदाहरण-जो सर्वदेशावस्थित ( सब स्थानों में रहने वाले ) अपने सम्बन्धियों से सम्बन्धित होता है वह सर्वगत है। जैसे-श्राकाश सर्वदेशावस्थित स्त्रसम्बन्धियों से एक साथ सामान्य ही सम्बन्धित होता है। तत्संबन्धिस्वभावमात्रानुबन्धिनी तद्देशसंनिहितस्वभावता । तद्देशसंनिहितस्वभावता तत्सम्बन्धिस्वभावमात्रको कारण करने वाली है । न हि या यत्र नास्ति स तद्देशमात्मना व्याप्नो- तीति स्वभावहेतुप्रयोगः। 'जो जहाँ पर नहीं है वह उस प्रदेशको अपने द्वारा व्याप्त भी नहीं करता' यह स्वभाव हेतु का प्रयोग है। द्वितीयोऽपि प्रयोगो यदुपलब्धिलक्षणमाप्तं सन्नोपलभ्यते न तत्तत्रास्ति ! तद्यथा कचिदविद्यमानो घटः । दूसरा प्रयोग-जो उपलब्धि लक्षण प्राप्त होता हुश्रा भी उपलब्ध नहीं होता वह वहाँ पर नहीं है । जैसे-कहीं अविद्यमान घट । नोपलभ्यते चौपलब्धिलक्षणमाप्तं सामान्य व्यक्त्यन्तरालेविति । व्यक्तियों के अन्तराल में उपलब्धिलक्षण प्राप्त सामान्य उपलब्ध नहीं होता। अयमनुफ्लम्भप्रयोगः स्वभावश्च परस्परविरुद्धार्थ- साधनादेकत्र संशयं जनयतः । यह अनुपलम्भप्रयोग और स्वभाव परस्पर विरुद्ध अर्थको साधन करने से एक स्थान में संशय को उत्पन्न करते हैं । त्रिरूपो हेतुरुक्तः। इस प्रकार त्रिरूप हेतु कह दिया । तावतवार्थप्रतीतिन पृथादृष्टान्तो नाम साधनावयवः कश्चित् । तेन नास्य लक्षणं पृथगुच्यते, गतार्थत्वात् । १. पी० सं० मे 'न' नहीं है। डाक्टर शतीशचन्द्र विद्याभूषण के लेखसे विदित होता है कि न्यायविन्दु के तिब्बती भाषा के अनुवाद में 'न' है। हमारी सम्मति में भी यहाँ इसका होना आवश्यक है।

२६ भाषाटीका सहित उतनेसे ही अर्थकी प्रतीति हो जानेसे दृष्टान्त नामवाला कोई पृथक् अवयव साधन में नहीं है । इसलिये उसका लक्षण पृथक् नहीं कहा [क्योंकि उतने से ही ] अर्थ विदित हो जाता है। हेतोः सपक्ष एव सत्त्वमसपक्षाच सर्वतो व्यावृत्तो रूपमुक्त- मभेदेन पुनर्विशेषेण कार्यस्वभावयोजन्मत- न्मात्रानुबन्धौ दर्शनीयावुक्तौ। क्योंकि हेतु का सपक्ष में ही रहना और सब विपक्षोंका उससे शून्य रहना ये दोनों रूप कह दिये। विशेष अभेदसे कार्य जन्म [ज्ञातव्य ] और स्वभाव का तन्मात्रा. नुबन्ध दर्शनीय कह दिया। तच्च दर्शयता यत्र धूमस्तत्राग्निरसत्यग्नौ न कचिद धूमो यथा महानसेतरयोः। उसको दिखलाते हुए 'जहाँ धूम होता है वहाँ अग्नि होती है'। अग्नि के प्रभाव में धूम भी नहीं होता । जैसे पाकशाला और तालाब में ।' यत्र कृतकत्वं तत्रानिन्यत्वमनित्यत्वाभावे कृतकत्वासंभवो यथा घटाकाशयोरिति दर्शनीयम् । जहाँ कृतकत्व होता है वहाँ अनित्य होता है । अनित्यत्व के अभाव में कृतकत्व असम्भव है । जैसे घट और आकाश में । यह सब देखना चाहिए। न ह्यन्यथा सपक्षविपक्षयोः सदसत्त्वे यथोक्त- प्रकारे शक्ये दर्शयितुम् । तत्कार्यतानियमः कार्यलिङ्गस्य स्वभावलिङ्गस्य च स्वभावेन व्याप्तिः । क्योंकि अन्यथा यथोक्तप्रकार के सपक्ष और विपक्षमें सत्त्व और असत्त्व और कार्यलिङ्ग का तत्कार्यतानियम और स्वभावलिङ्ग की स्वभाव से व्याप्ति नहीं दिखलायी जा सकती। अस्मिंश्वार्थे दर्शिते दर्शित एव दृष्टान्तो भवति । इस अर्थ के समझ जाने पर दृष्टान्त समझ में आ ही जाता है। एतावन्मात्ररूपत्वात्तस्येति । क्योंकि वह केवल उतना ही है । एतेनैव दृष्टान्तदोषा अपि निरस्ता भवन्ति । इससे ही दृष्टान्तदोषों का भी निराकरण हो जाता है । यथा-नित्यः शब्दोऽमूर्तत्वात् , कर्मवत्परमाणुवद घटवदिति ।

२७ न्यायबिन्दु जैसे-शब्द नित्य है, क्योंकि वह कर्म, परमाणु और घटके समान अमूर्त है । साध्यसाधनधर्मोभयविकलास्तथा सन्दिग्धसाध्यधर्मादयश्च । साध्यधर्मविकल, साधनधर्मविकल, उभयविकल तथा सन्दिग्धसाध्यधर्म आदि ( सन्धिग्धसाधनधर्म तथा सन्दिग्धोभय) [दृष्टान्त दोष हैं ] । ( इनमें से कर्म साध्यविकल, परमाणु साधनविकल और घट उभयविकल दृष्टान्त हैं।) यथा रागादिमानयं वचनाद्रथ्यापुरुषवत् । जैसे-यह राग आदि से युक्त हैं, क्योंकि मार्गमें चलनेवाले पुरुषके समान बोलता है ( यह संदिग्धसाध्यधर्म का उदाहरण है )। मरणधर्मोऽयं पुरुषो रागादिसत्त्वाद्रथ्यापुरुषवत् । यह पुरुष मरणधर्मवाला है, क्योंकि यह मार्ग में चलने वालों के समान रागादिमान है । ( यह संदिग्धसाधनधर्म दृष्टान्त है । ) असर्वज्ञोऽयं रागादिमत्वाद्रथ्यापुरुषवदिति । यह असर्वज्ञ है क्योंकि यह रथ्यापुरुष ( मार्ग में चलने वाले पुरुष ) के समान रागादिमान् है । ( यह सन्दिग्धोभय दृष्टान्त है।) अनन्वयोऽप्रदर्शितान्वयश्च । अनन्वय और अप्रदर्शितान्वय भी [ दृष्टान्त दोष हैं। ] ( जिस दृष्टान्तमें साध्य और साधनमें सम्भवता तो दिखलाई दे किन्तु वह साध्यसे व्याप्त न हो वह अनन्वय है । जिस दृष्टान्त में अन्वय के होते हुए भी उसे कहने वाले ने दिखलाया न हो उसे अप्रदर्शितान्वय कहते हैं। ) यथा यो वक्ता स रागादिमानिष्टपुरुषवत् । जैसे-जो वक्ता होता है वह इष्ट पुरुष के समान रागादिमान होता है । (यह अनन्वय का उदाहरण है।) अनित्यः शब्दः कृतकत्वाद्धटवदिति । शब्द अनित्य है। क्योंकि वह घटके समान कृतक होता है। (यह अप्रदर्शि- तान्वय का उदाहरण है।) तथा विपरीतान्वयः । तथा विपरीतान्वय- यदनित्यं तत्कृतकम् । जो अनित्य होता है वह कृतक होता है । इति साधर्येण । यह साधर्म्य से [ नौ दृष्टान्त कह दिए । ] वैधयेणापि परमाणुवकर्मवदाकाशवदिति साध्याचव्यतिरेकिणः । 1 - २८ भाषाटीका सहित वैधर्म्य से भी ‘परमाणु, कर्म और आकाश के समान' ये साध्याध्यतिरेकि श्रादि दृष्टान्त दोषों के उदाहरण हैं। ( इसमें परमाणु साध्याव्यतिरेकि, कर्म साधनाव्यतिरेकि और आकाश उभया- व्यतिरेकि दृष्टान्त हैं।) तथा संदिग्धसाध्यव्यतिरेकादयः । तथा संदिग्धसाध्यव्यतिरेक श्रादि- यथाऽसर्वज्ञाः कपिलादयोऽनाता वा । अविद्यमानमर्वज्ञताप्त- तालिङ्गभूतप्रमाणातिशयशासनत्वादिति । जैसे- कपिल आदि असर्वज्ञ अथवा अनाप्त हैं, क्योंकि उनमें सर्वज्ञता का लिजभूत प्रमाणातिशयशासन नहीं है । अत्र वैधयोदाहरणं यः सर्वज्ञ प्राप्तो वा स ज्योति- आनादिकमुपदिष्टवान् । यद्यथा-ऋषभवर्धमानादिरिति । इस प्रमाणमें वैधर्म्य उदाहरण- जो सर्वज्ञ या प्राप्त होता है वह ज्योतिति श्रादि का उपदेश देता है । जैसे- ऋषभ और वर्धमान आदि [ जैन तीर्थकर । ] तत्रासर्वज्ञतानाप्तनयोः साध्यधर्मयोः संदिग्धी व्यतिरेकः। क्योंकि साध्यधर्म असर्वज्ञता और अनाप्तता में व्यतिरेक सन्दिग्ध है। संदिग्धसाधनव्यतिरेकः। यथा-न त्रयीविदा ब्राह्मोन ग्राह्यवचनः कश्चि- त्पुरुषो रामादिमत्त्वादिति । सन्दिन्धसाधन व्यतिरेक- कोई पुरुष त्रयोवित् (जो ऋक , यजुः और साम इन तीनों वेदों को जानता है ) ब्राह्मणसे ग्राह्यवचनवाला (जिसका चन ग्रहण किये जाने योग्य हो) नहीं हैं। क्योंकि पुरुष राग आदि से युक्त होता है । अत्र वैधयर्योदाहरणम् । ये ग्राह्यवचना न ते रागादिमन्तस्तद्यथा गौतमादयो धर्मशास्त्राणां प्रणेतार इति गौतमादिभ्यो रागादिमत्वस्य साधनधर्मस्य धात्तिः उसमें वैघोदाहरण- जो प्रात्यवचन वाले होते हैं । वह रागादिमान नहीं होते। जैसे-गौतम आदि १. पी० सं० में 'सर्वशाः' पाठ है, जो अशुद्ध है।

न्यायबिन्दु २६ धर्मशास्त्रोंके बनानेवाले। इस प्रकार गौतम आदिसे रागादिमत्त्व साधनधर्म की व्यावृत्ति की। संदिग्धासंदिग्धोभयव्यतिरेकः । यथाऽवीतरागाः कपिलादयः परिग्रहाग्रहयोगादिति । संदिग्धासंदिग्धोभयव्यतिरेक- जैसे-कपिल श्रादि वीतराग नहीं है क्योंकि उनमें परिप्रह और आप्रह है। अत्र वैधय॑णोदाहरणम् । यो वीतरागो न तस्य परिग्रहाग्रही यथा ऋषभादेरिति । ऋषभादेवोतरागत्वग्ग्रिहाग्रहयोगयोः माध्यमाधनधर्मयोः संदिग्धा व्यतिरेकः। इसमें वैधोदारण- जो वीतराग होता है उसके परिग्रह और आग्रह नहीं हता। जैसे-ऋषभ आदि। ऋषभ आदि के साध्यधर्म अवीतरागत्व और साधनधर्म परिग्रह और आग्रहत योगमें व्यतिरेक संदिग्ध है। अव्यतिरेको यथाऽवीतरागो वक्तृत्वात् । अन्यतिरेक- वक्ता होनेसे वीतराग नहीं है। वैधोदाहरणं यत्र वोरागत्वं नास्ति स वक्ता । यथोपलखण्ड इति । यद्यप्युपलखण्डाभयं व्यावृत्तया सर्वो वीतरागो न वक्तेति व्याप्त्या व्यतिरेकासिद्धेश्यतिरेकः । वैधोदाहरण- जिसमें वीतरागता होती है वह वक्ता नहीं होता। जैसे-पाषाणखण्ड । यद्यपि पाषाणखण्डसे दोनों की व्यावृति हो जानेसे ‘सभी वीतराग वक्ता नहीं होते' इस व्याप्तिसे व्यतिरेक के सिद्ध न होनेसे अव्यतिरेक है ! अप्रदशितव्यतिरेको यथा-अनित्यः शब्दः कृतकत्वादाकाशवदिति । अप्रदर्शितव्यतिरेक- जैसे- शब्द अनित्य है; क्योंकि वह आकाशके समान कृतक है । वैधयेणापि विपरीतव्यतिरेको यथा यदकृतकं तन्नित्यं भवतीति । वैधर्म्यसे भी विपरीत यतिरेक- जो कृतक नहीं होता वह नित्य होता है। न येभिदृष्टान्ताभास हैतोः सामान्य लक्षणं सपक्ष एव सत्त्वं विपक्ष

३०
भाषाटीका सहित
च सर्वत्रासत्त्वमेव निश्चयेन शक्यं दर्शयितुं विशेषलक्षणं वा ।
इन दृष्टान्ताभासों से हेतुका सामान्यलक्षण, सपक्षमें ही रहना और विपक्षमें सर्वत्र
अभाव अथवा विशेषलक्षणको निश्चय रूपसे दिखला ही नहीं सकते ।
तदर्थापत्त्यैषां निरासो वेदितव्यः ।
अत एव उनका निराकरण अर्थापत्ति ( सामर्थ्य ) से ही जान लेना चाहिये ।
दूषणा न्यूनतायुक्तिः।
न्यूनता का कहना दूषणा है।
ये पूर्व न्यूनतादयः साधनदोषा उक्तास्तेषामुद्भावनं दूषणम् ।
जो पहिले न्यूनता आदि साधनदोष कहे हैं उनका कहना दूषण है।
तेन परेष्टार्थसिद्धिप्रतिबन्धाद ।
क्योंकि उससे दूसरेके इष्ट अर्थ की सिद्धि में रुकावट होती है ।
दूषणाभासास्तु जातयः।
दूषणाभास जातियाँ हैं।
अभूतदोषोद्भावनानि जात्युत्तराणीति ।
अभूत दोषका प्रकट करना जात्युत्तर है।
इति तृतीयः परिच्छेदः समाप्तः ।
न्यायविन्दुः समाप्तः।
इति तृतीय परिच्छेद समाप्त ।
न्यायविन्दु समाप्त ।
१. मुद्रित पुस्तक में 'अनुभूत०' पाठ है। किन्तु टीका से हमारे ही पाठ की पुष्टि होती है।
इसके अतिरिक्त पहिले पाठ से अर्थ भी ठीक नहीं बैठता।

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Nyaayabindu

Author
Shriidhara~mottaraa Chaara~ya
Title
Nyaayabindu
File name
Nyaayabindu
Text
OCR done
Citation
1954
Published
2005-12-03
Publisher
Chaukhambaa San'skrxta Siirija
Language
Sanskrit
Pages
184
Classification
Philosophy. Psychology
DLI number
369518
Barcode
2030020016339.00
Scanning centre
RMSC, IIIT-H
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
IN_COPYRIGHT
VMLT id
HOFj2pqZ0Uk
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