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Manohar Denanath · 2011/03

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रोबो

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रोषो
दिनानाय मनोहर
हिन्दी स्पान्तर
भगवानदास वर्मा

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उन अनगिनत व्यक्तियों के लिए,
जिन्होंने स्वयं वंचित रहकर खोई हुई मानवता
को सुरक्षा के लिए ज्सर बलिदान किया।

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आसमान बिलकुल माफ या। हवा खामोश थी। वृक्ष स्तब्ध थे । वातावरण निश्चल । सूरज क्षितिज की ओर झुका था। पेड़ों के साये दूर तक सड़क पर फते थे। रोड से रेजिमेंट ऑफिस तक का इंट-रोड़ो का बना रास्ता अलसाया-सा। परे, रेजिमेंट ऑफिस। साफ-सुपरी सफेद इमारत । कमाडिग अफसर का दफतर। दफतर के दरवाजे पर खड़ा हुआ संतरी। पेड़ के नीचे जीप । जीप में हील के पीछे बैठा हुआ ड्राइवर । पूरी दुनिया किसी एक दाण पर ठिठक गयी है। जिदगी रुक गयी है। यह आकाश, ये पेड़, यह रास्ता, यह बिल्डिंग, यह सतरी, यह ड्राइवर- सब एक तरह की निर्जीव स्थिरता मे बंध गये हैं। सिर्फ साये धीमी लेकिन निश्चित गति से बढ़ रहे हैं। कंपनी ऑफ़िम के अहाते में रखी बडी मेज के पीछे एड्ज्युटेंट कैप्टन काली कुर्सी पर बैठा हुआ है। उसके दायें-बायें हैं कपनी कमाइर कंप्टन सोहनसिंह और सूबेदार उन्नीकृष्णन। सिर पर तिरपाल को कामचलाऊ छत बनायी गयी है । लेकिन छत की छांव इन लोगो के पीछे दूर हरी घास पर पड़ रही है। मेज़ के सामने आदमियों की एक लबी कतार है । खाकी हाफ़-पंन्ट और लाल पी० टी० शूज पहने ये लोग कतार में आगे खिसक रहे हैं। हरी बनियान मे से उनका अलसा हुआ जिस्म धूप मे चमक रहा है। मेज के सामने सात-आठ सौ रंगट अलग-अलग टोलियां बनाकर बैठे

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आसमान विलकुल साफ था। हवा खामोश थी। वृक्ष स्वन्ध थे। वातावरण निश्चल । मूरज क्षितिज की ओर झुका था। पेड़ों के साये दूर तक सड़क पर फले थे। रोड से रेजिमेंट ऑफिस तक का इंट-रोड़ी का बना रास्ता अलसाया-मा। परे, रेजिमेंट ऑफिम। साफ-सुपरी सफ़ेद इमारत । कमाडिग अफसर का दफ़्तर। दफतर के दरवाजे पर खड़ा हुआ संतरी। पेड़ के नीचे जीप । जीप में ह्वील के पीछे बैठा हुआ ड्राइवर । पूरी दुनिया किसी एक क्षण पर ठिठक गयी है। जिदगी रुक गयी है। यह आकाश, ये पेड़, यह रास्ता, यह विल्डिंग, यह सतरी, यह ड्राइवर- सब एक तरह की निर्जीव स्थिरता में बंध गये हैं। सिर्फ साये धीमी लेकिन निश्चित गति से बढ़ रहे हैं। रुपनी ऑफिस के अहाते में रखी बड़ी मेज के पीछे एज्युटेंट कैप्टन काली कुर्सी पर बैठा हुआ है। उसके दायें-बायें हैं कपनी कमाडर कैप्टन मोहनसिंह और मूवेदार उन्नीकृष्णन। सिर पर तिरपाल की कामचलाऊ छत बनायी गयी है। लेकिन छत को छांव इन लोगो के पीछे दूर हरी घास पर पड रही है। मेज के सामने आदमियो की एक लंबी कतार है। बाकी हाफ़-पैन्ट और लाल पी० टी० शूज पहने ये लोग कतार में आगे खिसक रहे हैं। हरी बनियान मे से उनका झुलसा हुआ जिस्म धूप में चमक रहा है। मेज के सामने सात-आठ सौ रंगष्ट अलग-अलग टोलियां बनाकर बैठे ।

8 रोवो हुए हैं। उनके पीछे जे०सी० ओ० खड़े हैं। सुबह से वेचन करने वाली धूप की तीव्रता अव कुछ कम हुई है। कुछ लोग पालथी मारे घुटनों पर हाथ रखे बैठे हैं। कुछ घुटने मोड़े, कुछ उफाड़ और कुछ पंजों के बल बैठे हैं। कुछ तो टांगें पसारे भी बैठे हैं। इनमें से कुछ धीरे-धीरे आगे बढ़नेवाली क़तार की तरफ़ देख रहे हैं। कुछ सड़क की तरफ़ ताक रहे हैं, तो कुछ अपनी हथेलियों को निहार रहे हैं। ज्यादातर लोग जमीन की तरफ़ टकटकी लगाये वक्त गुजार रहे हैं। कुछ लोग यूं ही छोटे-छोटे कंकर उठा-उठाकर फेंक रहे हैं। कुछ जमीन पर मिट्टी में उंगलियों से लकीरें खींच रहे हैं। कुछ अपने हिलते हुए पंजों को एकटक धूर रहे हैं। बहरहाल, ज्यादातर लोग खुद में सो . गये हैं। आज कौन-सी तारीख है ? और दिन ? मैं यहाँ किस दिन माया? दो दिन पहले या दो महीने पहले ? उसने पीछे मुड़कर देखा । वीते समय का फ़ासला नापने के लिए स्मृतियों के चिह्न तलाशे। दूर तक पानी का विस्तार था, क्षितिज तक उमड़ता हुआ पानी ! और उसके परे आकाश का शून्य । दूरियां कहाँ से गिर्ने ? किनारा बहुत दूर, प्टि की पकड़ से वहुत दूर। जब वह सामान का बोझ संभाले स्टेशन के बाहर आया था, रिक्शा वाले उसके पीछे पड़ गये थे। 'वाबूजी रिक्शा, वावूजी ट्रेनिंग सेंटर, सिर्फ आठ थाना।' साइकिल-रिक्शा में बैठना हमेशा से उसकी जान पर आता था। जब भी वह रिक्शा में बैठता था, उसकी नज़र रिक्शावाले के अपने- आप पर-नीचे होते परों पर केंद्रित हो जाती थी। पिंडलियों की फूली हुई नमें उसे वेचन करती रहती थीं। वायें हाथ का बैग उसने जमीन पर रखा। बाजुओं को झटके देकर ढोला किया। उसने सोचा, दायें कंधे पर का होलडॉल जमीन पर रख दूं और पुछ हलका महसूस करूं। लेकिन अब तो मिलिटरी बैरक बहुत करीब दिखायी दे रहे थे। जिल्म को आराम की छूट देकर सहलाना, उसकी हविस पूरी करना अब ठीक नहीं। भविष्य के कप्टों, यातनाओं और कठिनाइयों का अगर रोवो १ मामना करना है तो जिस्म की आदतें बदलनी होंगी। बंग उठाकर वह आगे बढा। सड़क पर कोई खास मावाजाही नहीं थी। निशब्द शाति फली हुई थी। सड़क के दोनों किनारे चौड़े फुटपाथ थे। फुटपाय में सटे हुए छोटे-छोटे बंगले थे। बंगलो के चारो ओर भव्य बगीचे । वह वैरक के पास आ पहुंचा। दायो तरफ वाली वैरक तार से घिरी थी। लोहे के दरवाजे के पास सतरी सड़ा था। बगल की दीवार से सटकर दो-तीन युवक बड़े थे, जो बहुत देर से उसकी तरफ़ एकटक देख रहे थे। वह पाम आया तब भी उनकी नजरें उसी पर गड़ी थी। करीव आने पर उन्हें देखकर वह मुसकराया। लेकिन उनके चेहरे के भाव विलकुल नहीं बदले । ठंडी-ठिठुरी दृष्टि से वे उसकी तरफ़ देखते रहे। पूछताछ करने के लिए वह उनकी तरफ मुड़ना ही चाहता था कि एक ने बिना कुछ कहे सडक के पार वाली विल्डिग की तरफ उँगली से इशारा किया । कंघे का बोझ सभाले वह उधर मुड़ा। रिपोटिंग रूम' की तरती देखकर वह अंदर चला गया। कमरे में पांच-छ में पड़ी थी। बीच को खाली जगह मे सामान संभाले वह सडा रहा । आम दफतरी की तरह यह भी किसी दफ़तर का कमरा था। लेकिन यहां की विशिष्ट डिसिप्लिन उसे प्रभावित कर गयी । दीवार से लगी रंक्म । रंवम और मेजी पर फाइलें बड़े सलीके से जमायी गयी थी। कमरे में तीन आदमी ये। सबकी पोशाक एक जैसी थी-खाकी हाफ-पन्ट, याकी जी, लाल पी०टी० शूज। उनमे से एक फ़ाइल देख रहा था, और कुछ लिख रहा था। तीनी में यह सबसे कम उम्र था। बाकी दो यूं ही बैठे थे। किस मे पूछताछ की जाये? इसी संशय में पहा वह खडा रहा। "अवे ओ सलीम के बच्चे, सामान बाहर रख और जरा मलीके से मड़ा रह । नेहरू पार्क समझकर यहाँ टहलने आये हो?" मुंह वाले प्रौढ किस्म के आदमी ने उमका यों स्वागत किया। वह फ्री में कमरे के बाहर हो लिया। रिकटिंग ऑफिम से प्राप्त हुए पेपर उसने मूंछ वाले आदमी के मामने रमे। मूंछ वाले ने दो-तीन जगह उस पर हस्ताक्षर किये और उन्हें वग़ल वाले टेविल पर बढ़ा दिया । उमटविल वाले जवान आदमी ने उन्हें दंग में ।

रोबो - - में रख दिया। "रिक्रूटिंग ऑफ़िस से मिले कंवल यहीं जमा कर दो।" मूंछ वाला मद्दी, सम्खी आवाज़ में बोला। "लेकिन...मुझे कोई कंबल नहीं मिले !" "नहीं मिले? ब्लडी फूल, क्या मतलब है तुम्हारा ? लेकर क्यों नहीं आये ?" "लेकिन, मिस्टर, रिक्रूटिंग ऑफ़िस ने मुझे दिये ही नहीं तो मैं कैसे लाता?...हाऊ एम आई टु नो व्हॅट द रिक्रूटिंग ऑफ़िस इज सपोज्ड तीनों, नजरें गड़ाकर उसकी तरफ़ देखते रहे। जवान आदमी की नजरों में उसे कुछ संतोष का भाव दिखायी दिया। "ठीक है, ठीक है। न दिये हों तो, वैसा बोलो। और यह मिस्टर, मास्टर छोड़ दो। 'सर' कहो, 'साहब' कहो। याद रखो, अव फ़ौज में हो, बच्चू, तमीज़ से बात करना सीनियर के साय। 'सर' कहो, 'उस्तादजी' गाहो।" कुछ क्षण मुंठों वाला रुका। फिर आवाज़ ऊंची करके कहने लगा, "ज्यादा बकवास नहीं, समझे ! जो कुछ पूछा जाये उसका जवाब सिर्फ हां या ना में चाहिए । चलो, बाहर ठहरो।" यह बरामदे में आया। शाम को सात-साढ़े सात तक और रंगरूट आ नुके थे। कुछ विहार से, कुछ केरल से। ये सब लोग इस दुनिया के लिए अजनवी थे। बरामदा छोड़कर के जब बाहर निकले तव अंधेरा हो चुका था। मूंछवाले ने उन्हें तीन-तीन के कतार में खड़ा किया। उसी पोजीशन में उन्हें छोड़कर वह अंदर चल गया। काफी देर के बाद जब वह लौटकर आया, तो उसके साथ एक जवा सिग्नलमन भी था। सिग्नलमैन ने सूचना दी, "मैं जब 'सावधान' कहूँ' सावधान रहना, 'दाहिने मुड़' कहूँगा तो दाहिने मुड़ना, "यंम' कहूँगा एक जाना, और 'तेज चल' कहूँगा तो तेज चलना। चलते वक्त मुंह वं समझे?" 1. मझे का मासूम कि भली दफतर वालों को मया करना चाहिए था?

रोगी 11 परेड कसरी थी। रवान नह ने 'दri...ri, nei... ने जा रहा था, मेरिन मरे आने कृदन रदद नहीं पड़ रहे है। दशमीनही यो। दिन भादवन दीव में वह 'दा...वा, द्वा...दान करता जा रहा था। बैंमद यरनवी। दरों में नजरें यो, दुहने उदे। दर बनने के बाद सेना, उनके पैर और पा रहे हैं। रोगहरन में मुरमा निमा पााटा....र...टर-नांवारा हरकत अहट बन्द एक- याली यी। दमनार मन-बार है, नेरिन बद उन्द एक सूत्र में, एक अनुमान में देने करा रहे है। मकान हरद. मनात दिया, मन कार पोर मरठित गति। इन नवरी टाउट में आनी दाद जोड़ने को, नीति में आनी गमिहापौरान करने की कॉगिन कर रहा था। एहमान हुआ कि उसने पिता ने बेनी नादी है, बर रहीं में दमके नाम की पुकार हो रही है। वह टेविन दरसा । मुटियों कोकनकर और करदन दानकर वह मड़ा रहा। दल ने मह उठाकर हम देखा। मीना प्लाकर और पेट को मिडकर उमं माना गयर और खादा चम्न किया। कद्धार कार दुर' मोती। उनकीटहार नापन्ना मोना टनर के दिने नाममा देवकर मदद ने कहा, "हैं! बरगल दो करो वान, मादकी। नहीन, तुम्हारा नंदर बोरी। रंक दोनो। नान दोनो। कहीं--कर, विट..की मदन.... कास.रिटरिया परेड के निहारिरहै.मर।" "सर, नि...श्रीदन... जादव रिहिनी देर के दिर गारीकी मानक आवाज दर टमी पर एक नाप मनी।

रोवो - पर लटके बल्ब से निकली किरणों की सलाखें उसकी आँखों में आ तीं। सफ़ेद दीवारों ने उसे घेर लिया। चौकोर हॉल, चौकोर दीवारें, कोर दरवाजे, चौकोर खिड़कियां और चौकोर फ़र्श...एकरस, भावहीन फ़ेद रंग । अतीत की एक भी खरोंच न सह पाने वाली, पापाण-मुद्रा लिये बड़ी यह इमारत ! उसका शरीर पत्थर हो गया था। अचेतन, मृत, ठंडा कलेवर उस वैरक में पड़ा था। मैं यहां क्या कर रहा हूँ ? कहां आया हूँ मैं? इस अजनबी, अपरिचित दुनिया में कैसे आया मैं ? प्रश्न, कई प्रश्न । इन प्रश्नों के क्या कोई जवाब हैं ? क्या इनके जवाब मिलने जरूरी हैं ? जवाब मिल भी जायें...तो भी क्या फ़र्क पड़ने वाला है ? स्थिति में क्या कुछ परिवर्तन होने वाला है ? मैं हूँ। मैं हूँ, और मेरे सिर पर लटकने वाले बल्ब की नुकीली किरणें हैं। पापाण चेहरे की यह इमारत है। वह धीमे से उठकर बैठा। उँगलियों से पिंडलियों को छुआ। पिंड- लियां ऊपर के हिस्से में फूल आयी थीं। उँगलियों से उन्हें सहलाने लगा। उँगलियों का दवाव कुछ बढ़ा और एक पैनी टीस समूचे शरीर में फैलतो हुई दिमाग पर आ लगी। नसें और तमाम स्नायु ऐंठ चुके थे। दर्द बहुत था। टखनों पर फफोले पड़ गये थे। पैरों पर सूजन आ चुकी थी। उँग- लियों के जोड़ों में जलन थी। कमर और पीठ के स्नायु टीस रहे थे। मैं खुद अपने शरीर से डर रहा हूँ। उम्र में पहली बार आज शरीर का एहसास मुझे हो रहा है । अव तक लगता रहा कि शरीर मन का गुलाम है । मन के नियंत्रण में काम करत है । लेकिन अब जान पाया है कि शरीर का अपना अलग वजूद है । क्या मा शरीर का ही अस्तित्व है ? मन केवल भ्रम है ? केवल छाया है ? शरी लपकता आगे बढ़ने वाला प्रवाह ! मन, वहते हुए पानी की छलछल । उसने कंबल हटाया। गरीर का जोड़-जोड़ कराह उठा । अगर इन कराहना ऐप्लीफाई किया जाये तो कितनी बड़ी गर्जना होगी ! इस काल ने वह हेमा । पास में नोये हुए मोटे शरीर वाले पांडे ने गर्दन उठाकर देगा। पांडे का शरीर इतना नर्म और युल-धुल था कि उसे देखते ही लिडे स्पर्श मा अनुभव होने लगता । डिकी को यही एहसास हुआ।

रोबो 13 "गुड मॉनिग, हिको।" "मॉनिंग, पांडे।" पांडे के नगे वदन पर मेडिकी ने अपनी नजर हटायी। मेक्शन के अफमर माथी अव उठ चुके थे। कुछ बारम्म चले गये थ शेव की तैयारी में लगे थे। कुछ चाय की चुस्कियां लेते गड़े थे। मछ कंबल लपेटे घुटनों में भाया हाले बैठे थे। पांडे कुछ कह रहा था। "आज पचास हुए !" परे बैठे शर्मा ने जोर से गर्दन हिलायी। यमिक ट्रेनिग शुरू हुए कल उनचाम दिन पूरे हो चुके थे। बाज का पचामा दिन । एक मी बीम दिन की इस ट्रेनिंग के खत्म होने में यमी मत्तर दिन बाकी हैं। सत्तर दिन...हिल...पी०टी०...फटीग ! हिल...पी०टी०... फटीग! उमने दीवार के पास में मीशा उठाया यौर बम पर रगा। वह याना चेहरा देम रहा था। आईने में एक बरनवी चेहरा उसकी तरफ़ देख रहा था। चौड़ा माया, पिचके हुए गान, गांचों में टिकी हुई बांग । ठिकुरी, पकी हुई नजरें। आंखों के नीचे मिपाह मुरिया। पतला लटका हुआ जबहा। सो, दिम इउमी, रियल मी !' उम बजनवी पहरे की तरफ़ वह देगता रहा। चेहरे में उमने पहले वाले शिकी को तमाग की कोजित की । लेकिन वह मृद नहीं ममल पा रहा पाकि वह करा नाग कर रहा है ? हिरे चहरे को टिसी मुद भून पुका था। निम्मी, चेहरे को मामिस्त उमने तराग हानी थी। उन मैकड़ों में वह भी एक मामीहार-पंट, माकी बनियान, नान पी. टी० र ! मकान ए-10. 623725 किट टिकी। मि मंता! दातो...बाली, दार्मा ..दार्मा । नेट-गहर..मट-गट, मान्न पंन । चानीन दानों पर एक माप करे। गाय हाय पदनों की मरट मित्र गनरेन्द। । . सोमाराम राबमी गाय रोबो - . ही उनकी मेडिकल जांच हो चुकी थी। मेडिकल रूम में कल दोपहर व सात-आठ सौ रंगरूट जमा हुए थे। सौ के करीव लड़के कतार में इथे। उन्होंने हाफ़-पेट और बनियान उतार दिये थे। सिर्फ़ जांघिये पहने, गे बदन । कतार धीरे-धीरे आगे खिसक रही थी। कमरे में, अंदर की तरफ़ गलमुच्छों वाला मेडिकल कोर का हवलदार हाथ में पेन्सिल लिये बैठा था। ए-10 सेक्शन वाले रंगरूटों की फेहरिस्त हवलदार के सामने थी कतार के लड़के हवलदार से पांच-छ: नंवर पीछे ही जांघिये के नाड़े खोलकर तैयार रहते थे, क्योंकि हवलदार का वक्त कीमती था। पुकार होते ही रंगरूट को जांघिया घुटने तक खिसकाकर हवलदार के सामने खड़े हो जाना पड़ता था। पीछे मुड़, नीचे झुको, खांसो...नेक्स्ट, अगला नंबर । मेरे जिस्म की खासियत, मेरे व्यक्तित्व का आवरण किसी ने खुरच डाला है । उस 'अदृश्य' के क्रूर और तेज़ नाखून मेरी खाल को अलग कर चुके हैं। अब उँगलियां जिस्म पर तैर रही हैं। सहज, धीमी, लेकिन लगातार । मैं जानता हूँ, किसी भी क्षण ये उँगलियाँ मेरे जिस्म में भोंकी जा सकती हैं। भीतर...दूर तक, मस्तिष्क तक, हृदय तक ये उँगलियां पहुंचेंगी, गहरी...और गहरी। परत-दर-परत चीरती हुई, एक के बाद एक, खाल की परतों को छीलती हुई, खाल को छीलकर भीतर छूत हुई...। मेरी चाल, वात करने का अपना ढंग, खड़े होने का अपना तरी फयते कपड़े, मेरी आदतें, मेरे विचार, मेरे मत, मेरी यादें और.. सपने। मेरे समूने अस्तित्व के चिथड़े-चिथड़े कर दिये जायेंगे। और वस्य हट्टियों के ढांचे पर टांग दिये जायेंगे और मैं पड़ा रहूंगा लकाय मरीज की तरह-लिजलिजा, वेवस, आतंकित । मेरे अस्ति एक-एक कण चीयता रहेगा। कांपता रहेगा। लेकिन मैं बिलकुल नहीं। पानी में गिरे हुए मिट्टी के ढेले की तरह गलता चला बिगरता जाऊँगा। दिली ? टिकी कहां होगा तब ? साल, चरबी, स्नायु की दी जायेंगी तब पया बचेगा? दिल और दिमाग के चिथडे .

रोबो 15 देने के बाद शेष क्या रहेगा? हड्डियो का ढांचा, या अनश्वर आत्मा? हर पल. हर लमहे...दिन-रात...यह प्रक्रिया चल रही है। मुझे निगलने वाली इस प्रक्रिया का वर्णन करना कठिन है। इसकी व्याख्या करना भी आसान नहीं है। इसान की इंसानियत को मार डालने वाली प्रक्रिया है यह । मानुष को अमानुप बना देने वाली...हैवान बना देने वाली ...यंत्र बना देने वाली प्रक्रिया ! पाडुरंग अदर आया। रोज की तरह आज भी उसने डिकी के सिरहाने रखा हुआ गिलास उठाया। मग से आधी चाय गिलास मे उंडेली और अपनी जगह वापस चला गया। डिकी को ख़याल आया, आज पाडुरग भूपाली के स्वर नही गुनगुना रहा था। "क्यो पाडुरग, क्या हुआ?" कुछ देर पांडुरग कप से चाय के पूंट लेता रहा। फिर यकायक ऊँची आवाज में कहने लगा, "वोडं पर आज चालीसवां दिन लिखा है।" बैरक में शाति फैली थी। चालीस? ए-10 मेक्शन इच रेलीगेटेड। टेन डेज ! दस दिन .. दस दिन...दस दिन बढा दिये गये थे। मेव करते. करते पाडे रुका । शर्ट के बटन लगाते हुए शर्मा अवाक् सहा रहा। विश्व- नाथ का पैर दरवाजे के पास लडखडाया। डिकी को रीढ की हड्डी ढीली पड़ने लगी । कंधे लटक गये। होठ सुल गये । "लडी रास्कल्स !" वलवीर सिंह को जोरदार गाली उसके कानो से आकर टकरायी और उसने महसूम किया, सभी की तरह यह भी सुन्न हो चुका था। आई मस्ट नॉट योल्ड ।' मुझे हर क्षण सतकं और सावधान रहना चाहिए । सतत जागृत। कुछ हद तक बाजी में हार चुका हूँ। लेकिन अब जितना बचा है उसे सुरक्षित रखना होगा। वॉच आउट...अनयर, विना किसी गफलत के। । 1. मुम हार नहीं माननी चाहिए ।

"सो
16 रोवो
डिकी उजलत में उठा। बाहर निकलते-निकलते उसने कहा,
वॉयज, अस्सी दिन और । चियर्स!"
वह कमरे से बाहर आया। इसमें अप्रत्याशित जैसा कुछ नहीं था।
ट्रेनिंग की अवधि भले ही एक-सौ बीस दिन की हो, पर सहूलियत के लिए
सेक्शन 'रेलीगेट' किये जाते हैं। चलता है।
दो वैरकों के बीच की दरार से पूरव की तरफ़ आसमान में चमकता
शुक्रतारा उसे दिखायी दिया। वह ठिठका। साढ़े चार बजे हैं, शायद ।
तोलिया संभाले वह आगे बढ़ा, तब उसको ख़याल हुआ कि आज उसने
हमेशा की तरह तारे को देखकर दाद नहीं दी थी।
"हाज ब्यूटीफुल !" जोर से उसने कहा।

दो कठोर रंग पुता एइम्यूटेंट टेस्ट अब करीव आ चुका है। ट्रेनिंग शुरू हुए आज नब्बे दिन पूरे हुए।...कनवस पर कितनी लबी अवधि ! लेकिन इस संबी अवधि की स्मृतियां क्या मेरे दिमाग में अब भी जीवित हैं ? समय के लवे-चौड़े कैनवस पर सिर्फ काला, हुआ है । वीभत्म, कड़े, काले रंग की लबी पट्टी । डिल...पी० टी०...फ़टीग । हिल...पी०टी०...फटीग! इम लंबी अवधि के हर क्षण ने मेरा अस्तित्व निचोड डाला है। प्रत्येक क्षण में अनंत काल का रूप धारण करके मेरे समूचे अस्तित्व को ढंक चुका है। प्रत्येक क्षण ससार का बोझ उठाये मेरी छाती पर आ गिरा है। इम क्षण के नीचे में घुटा जा रहा हूँ। लेकिन अब मैं उन दिनो को, अनगिनत घटों को और अनत क्षणों को सामान्य शब्दों मे बयान कर सकता हूँ। उन यातनाओ को कम-से-कम पाब्दी में व्यक्त कर सकता हूँ। एज्यूटेंट काले को नजरें गिद्ध की-सी पी। परेड-ग्राउन्ड के किनारे ज्यों ही वह आकर सहा होता, मारे डिल-इस्पेक्टर घबरा जाते । एडम्यूटेंट काले की जीप आती देसकर हवलदार जर्मनसिंह ने अपने सेक्शन को खडा किमा और राइफल से सलामी देने की पोजीशनें समझाने लगा। पूरा मेगन स्तब्ध सहा जर्मनसिंह की तरफ देख रहा था। सभी ने एड्ज्यूटेंट का जीप को देखा था। एड्ज्यूटेंट काले की आवाज उनके कानो तक पहुँची।

18 रोयो । "हवलदार जर्मन, रिअर लाइन नंबर फाइव क्यों हिल रहा है? वेक-अप !" हालांकि परेड-ग्राउन्ड काफ़ी दूर थी, फिर भी कैप्टन काले की नजरों ने पांडे को पकड़ लिया था। डिकी ने पांडे की तरफ़ कनखियों से देखा। पांडे थरथर कांप रहा था। एड्ज्यूटेंट काले के चले जाने के बाद हवलदार जर्मनसिंह ने माराम की पोजीशन में सेक्शन को खड़ा किया। तने हुए स्नायु ढीले करके सब रिलेक्स हो चुके थे। पिछले आठ दिनों से जर्मनसिंहने सेक्शन से काफ़ी मेहनत करवायी थी। परेड-टाईम के अलावा दोपहर में लगातार तीन-तीन, चार-चार घंटे ड्रिल करवायी थी। दायां...वायां, दायां...वायाँ, धम ! पीठ का पसीना बहकर जूतों के तले में जमा हो जाता था। चीख-चीखकर जर्मनसिंह का हलफ़ सूख जाता था। सुबह-शाम वह नमक के पानी से गरारे करता हुआ दिखायी पड़ता था। हवलदार जर्मनसिंह ने अपने चेहरे का पसीना पोंछा। उसका गोरा चेहरा लाल हो चुका था। कुछ मिनटों के लिए उसने अपनी गरदन नीची को, कंधे ढीले किये, और जूतों पर नज़रें गड़ाये खड़ा रहा । और फिर अचानक उसका जिस्म तन गया। गरदन तानकर वह चीखा। "मेशन !" सबकी रीढ़ की हड्डियां तन गयीं। घुटने अंदर की तरफ़ खिच गये। पेट अंदर धंस गये । सबकी नजरें शून्य में खो गयीं । कुछ क्षण रुवाकर जमनसिंह भीका, “पांडे, फ़ॉल-आउट !" धीमी चाल से पांडे कतार के बाहर आया। सेक्शन की आँखें उस पर जमी थीं। अगर संभव हो सकता तो पांडे परेड-ग्राउन्ड छोड़कर कभी का भाग चुका होता । जर्मनसिंह की नरें पांडे की तरफ़ उठीं। उसने पूछा, "पांडेजी, आप कहाँ तक पढ़े हैं ?" "जी? जी, मैंने बी० ए० पास किया है।" पांडे ने जवाब दिया। अब तफ पांडे काफ़ी संभल चुका था। ऐसा लगता था, मानो जमनसिंह ने उसे प्यार तथा भाईचारे की बातें करने के लिए फ़ॉल-आउट किया हो। "बी० ए०? अरे, आप तो बहुत पड़े हुए हैं, पाटेजी !" गुशी के मारे पांडे की छाती फूल उठी। नज़रों में चमक थी। "अपने पूरे देजिमेंट में कोई ग्रेज्युएट नहीं होगा। सेक्शन में है कोई और ग्रेज्युएट?" ।

रोवो 19 पाहे इस तरह की जिंदगी के लिए कतई फिट नहीं था। लाह-प्यार में पले उसके शरीर, और उसको आदतों आदि के लिए यह बर्दास्त के बाहर था। इस मामले में वह यहुत कमजोर था। डिल हो मा पी० टी०, पार्ड लगातार गलतियां करता था और लगातार गालियां सुनता था, लगातार अपमानित होता था। लेकिन वह ग्रेज्युएट था और इस पोधे आधार पर अफमर बन जाना चाहता था। इम झूठे विश्वास के बल पर, पग-पग पर अमफलताओ को झेलते हुए वह जो रहा था। धोखा देने वाले इस विश्वाम की आड में बह एक-एक क्षण, आने वाले हर क्षण को धक्का दे रहा था। "कौन-सी डिवीजन में पास किया है वी० ए० आपने, पाडेजी ?" जर्मनसिंह ने पूछा। "मेकन्ड, जी।" "सेकन्द ! बहुत पूच ! पाडेजी, सर्टिफिकेट तो होगा आपके पास?" "हा जी, है तो, है मेरे पास।" बडे उत्साह से पाडे ने जवाब दिया। "तो ऐमा करो, पांडेजी," जर्मनसिंह नाटकीय ढंग से का, पॉज लिया। "सर्टिफिकेट को अच्छी तरह रोल कर लो, अपना पाईप रहता है ना? वैसे...और...और डाल लो अपनी उसमें साले, मादरचोद, ब्लडी फूल...आ गये आर्मी में ! आमों को बदनाम करने । दापो-चायो नही समझ में आता गधों को, और कहते हैं हमने बी०ए० पास किया है जी...! क्या आर्मी ने न्योता भेजा था मापको?" पाडे एकदम पस्त हो गया। उसका चेहरा लटक गया। लग रहा था कि वह जोर से सिसकते हुए गला फाडकर रो पड़ेगा। बीच रात डिको अचानक जाग पड़ा। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह कहाँ है ! धुंधलके में उसे दिखायी पड़ा, पाडे जैसी कोई आकृति दरवाजे से बाहर बड़ी तेजी से चली जा रही है। वह हडबड़ाकर उठ बैठा। शर्ट के बटन लगाते हुए बाहर आया। सेक्शन तीन लाईन में राडा था। हिकी बड़ी फुर्ती ने अपनी जगह आकर मडा हुआ। कड़ाके की सर्दी थी। रात के दो बज चुके थे। "क्या हुआ?" उसने शर्मा से पूछा । "मालूम नहीं।" शर्मा ने जवाब दिया। शायद रात के दो बजे उठकर अपना रोवो - मांगता हूँ। शूट को अच्छा नहीं लगा था। वह कुछ नाराज था। जर्मनसिंह अपने कमरे से हर आया। उसने घुटनों तक लम्बा ओवरकोट पहन रखा था। "गधे, वेवकूफ़ ब्लडीफूल, रास्कल. मादर-!" जर्मनसिंह की ज़बान पर सरस्वती नाच रही थी। जर्मनसिंह कश्मीरी डोगरा था। लेकिन उसे भारत की चौदह भापाओं और अंग्रेजी की गालियां जवानी याद थीं। सेक्शन के पास पहुंचते ही उसने 'दाहिने मुड़' का ऑर्डर दिया और 'लाइंग पोजीशन' काहकर भौंका। डिकी ऊब गया। अंदर विस्तर में 'लाईग पोजीशन' क्या कुछ ग़लत थी? जमीन साली कितनी ठंडी है ! कंकर चुभ रहे हैं । इस भड़वे को क्या कुछ सपना आया था जो रात के दो बजे लगा सीटियां बजाने ! "कॉलिंग शुरू । वरक के चारों ओर चक्कर काटो। पहले चार आदमी !" हां, यह कुछ ठीक लगा । शरीर में कुछ हरारत तो पैदा हो जायेगी। लेकिन आखिर मामला क्या है? पर सोचने के लिए वक्त कहाँ था? मुहनियों के बल जल्दी-जल्दी आगे बढ़ना शुरू हुआ। क्या बदमाशी है ! आधी राती को विस्तर की गर्मी छोड़कर इतनी कड़ाके की सर्दी में वाहर निकल आने और सेक्शन को परेशान करने से क्या लाभ ? खुद भी परेशान और दूसरे भी परेशान । शायद जर्मनसिंह भी अपनी बीवी की याद से येचन होगा। कुहनियों और घुटनों की हरकत तेज़ करके डिकी आगे बढ़त गया। बैरक का एक चक्कर काटकर सब लोग अव जर्मनसिंह के सामने आ गये। "पड़े रहो, दौड़कर चलो, पहले चार आदमी चाहता हूँ।" स लाफे दौड़ने लगे। इसके बाद काफ़ी देर तक दौड़ना, रेंगना और एक जगह पर कूदना । अलग-अलग प्रकार की वजिश चलती रही। इसके व सबको फ़तार में बड़ा कारके जमनसिंह ने फिर से अपना गाली-पाठ दे राया। याद करके बची-युची तमाम गालियाँ दे डाली। अब इसके गया किया जाये ? उसकी ममत में नहीं आ रहा था। इसलिए कुछ द लिए यह मामोश सदा रहा। फिर यकायक चीला, "लाइंग पोजीशन जर्मनमिह की नजरों में ओझल हो जाने के बाद बैरक के पिछले हि पहुँन जान पर टिकी ने अपनी टांगें पसार ली, और बाजुओं पर JAIFUR-302004 रोबो 21 टिकाकर आस वद कर ली। शर्मा सबके पोये से दौड़ता हुआ हिकी के करीब आया। उमने डिकी को चेतावनी दी, "टिकी, पलो यार, वरना तुम्हारे लिए सबको रगड़ना पड़ेगा।" डिकी ने फिर से अपनी पोजोगन ली और कहा, "टीक है यार, उस्ताद भी साला अजीब आदमी है। फ्रॉग- जंप्म, कॉलिंग...मेंढ़क बनो, माप बनो। अरे, अच्छे-सामे इन्सान हैं हम । हमे भागने को नहीं, हमें दौड़ने को कहो ! आर्मी में आने से पहले जर्मनसिंह शायद जादूगर बनना चाहता होगा। लेकिन भाबिर मामला क्या है ? यह मव-कुछ रात के दो बजे क्यों?" "रात में किसी ने बैरक में टट्टी कर दी।" शर्मा ने हांफते हुए कहा। डिकी और शर्मा चरक का चक्कर लगाकर सेक्शन में जा मिले। जर्मनमिह को लेक्चरवाजी जारी थी। "तुम लोग आर्मी की रजत बिगाइ रहे हो। न जाने कहाँ मे कचरा भर दिया है ? सिविल लाइफ में कुछ नहीं कर पाये तो यही आ गये। उधर ही रहते तो क्या कुछ विगढ़ जाता?" इम पर किसी को दो राय नहीं हो सकती थी। काफी देर तक एक ही रेकॉर्ड बजा चुकने पर जमनसिंह का। इस अवसर का और अंधेरे का फायदा उठाकर किसी ने धीमी आवाज में फमफुमाकर कहा, "उस्तादमी, शायद कुत्ता होगा। रात में मैंने एक कुत्ते की बैरक के बाहर जाते देखा पा।" उसके बाद काफ़ी देर तक चर्चा चलती रही। जर्मनमिह अपने माय एमपटों की एक टोली को लेकर अदर चला गया। बैरक की पत्तियों जलायी गयी। काफी देर तक छानबीन चलती रही। गवाहियों और जिरहें हुई और फंसला दिया गया। उस्ताद बाहर आया "अब साढ़े तीन बज रहे हैं । अब सोना नहीं।" वडीप्यारी और कीमती मलाह देकर जमनसिह गरारे करने के लिए निकल गया। टर गजब की थी। फिर भी प्यास के मारे डिकी का गला मूग रहा था। नल पर जाकर उसने पानी पिया। लौरा, तो देखा कि पाडे घुटनो के वीर सिर दिये बरामदे में बैठा है । डिको उसकी बगल में बैठ गया। "पाडे, हिम्मत न हारो यार, जायेंगे, ये दिन भी जायेंगे।" डिकी उमे दिलासा देना चाहता था। पार्ड डिकी के कप 22 रोबो - - रखकर सिसकने लगा। डिकी चुपचाप उसकी पीठ सहला रहा था । नल की तरफ़ जाते हुए बलबीरसिंह कुछ क्षण रुका। उसने पांडे की तरफ़ देखा और व्यंग्यात्मक स्वर में कहने लगा, "अरे क्या पांडेजी, इतने में ही हार गये? अभी तो कोसों चलना है। पंछी अब जाल में फंस गया है। रोने से क्या फ़ायदा? आये देश-सेवा करने ! दे हैव कॉट अस, माई चम' ! मान लिया, भाई, मान लिया, देश-सेवा ! देश के वीर ! सपूत ! मातृभूमि ! बहुत पूध ! बहुत खूब ! अब कोई रास्ता नहीं, यार। मैं बताऊँ, पांडे, बस सोचना वद करो। सिर्फ खाओ, पियो, जियो। यू आर नॉट टू क्वेश्चन हाई, यू आर वट टु डू ऐंड डाई।" "यू ईडियट, शट अप !" बलवीरसिंह नल की ओर चला गया। पांडे डिकी के कंधे पर माथा घिस रहा था। सिसकियां भरकर रो रहा था। डिकी का कंधा दर्द कर रहा था। पांडे के आंसुओं से उसकी कमीज गीली हो चुकी थी। कंधे के पास उसे कुछ ठंडा-ठंडा लग रहा था। "पांडे, तुम ग्रेज्युएट तो थे ही। कमीशन लेकर ही आना या आमी में।" पांडे का शरीर कांप उठा। "कुछ बात नहीं, यार, अपना ट्रेड तो ऑपरेटर है। टेक्निकल ट्रेनिंग सेंटर में अपना कमाल दिसाना।" नीचे का फ़शं सर्द था। टांगों को उसका सा सहन नहीं हो रहा था। 'ओ, डेम यू, डेम यू !' दिकी मन-ही-मन बुड़बुड़ाया। तमाम दिन पांडे का मन ठिकाने नहीं रहा । सारे दिन वह लगातार गलतियां करता रहा और लगातार गालियां साता रहा। दूसरे दिन परेड के लिए सेगशन 'फॉल-इन' हुआ तो उसमें पांडे नहीं था। राबको लगा, शायद पांडे 'सिक रिपोर्ट पर गया होगा। नुवह किसी ने उसे देखा नहीं पा। नाश्ते पर से जव सेक्शन वैरक में लौट आया तो हवलदार जमनसिंह नेरिकी को एक तरफ़ बुलाया। “डिकी, तुम ज़रा इधर ही ठहरना । परेट पर मत जाना।" तमाम रंगट जब परेड ग्राउंड पर जा चुके तो टिकी और हवलदार 1. मेरे यार, दहीन हमें काम लिया है। 2. तुम्हें पोई समाप्त नहीं करने है, सिर्फ मामा-पालन करना है और मरना है। 3. पपार बन्द करो, पद !

रावा 23 जर्मनसिंह रेजिमेट ऑफिम की तरफ़ चले गये। कैप्टन काले बाहर ही खड़ा था। "जवान, पाडे को पहचानते हो?" "पांडे मेरे ही सेक्शन में है, सर।" "हाँ, वह तो ठीक है, पर तुमसे उसकी खास दोस्ती थी ना?" "खास दोस्ती ? वैसा तो कुछ नहीं था, सर।" "नही कैसे? मैंने तुम्हें कई बार आपस मे बातें करते देखा है।" जर्मन- मिह बीच में ही पूछ बैठा। डिकी कुछ कहना चाहता था कि उसके पहले ही कैप्टन काले ने कहा, "हवलदार जर्मनसिंह, तुम अंदर चलो, हम आ ही रहे हैं।" हवलदार जर्मनसिंह दफ़्तर में गया, उसके दूर निकल जाने के बाद कप्तान साहम ने डिकी के कधे पर हाथ रखा। "डिकी, तुम बंबई के हो न?" डिकी ने गर्दन हिलाकर 'हाँ' कहा । "तुम्हारी और पाडे की गहरी दोस्ती थी, यह मैं जानता हूँ। डिकी, तुम इससे इकार नही कर सकते, और इसमे कोई बुराई भी नही, इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं।" कप्तान साहब कुछ देर रुके। "कल रात से पाडे गायव है, तुमसे कुछ बात हुई थी उसकी ?" "कल सुबह के बाद से उससे मेरी कोई बात नही हुई, सर।" "वह तो ठीक है, पर तुम्हे कुछ अदाजा तो होगा कि कहाँ है पाडे ?" "सर, मुझे कोई अदाजा नहीं । सच, मैं कुछ नहीं जानता, सर ।" "क्या जर्मनसिंह पाडे को बिना वजह परेशान करता या ?" "पाडे के साय उस्ताद की कोई खास दुश्मनी नहीं थी, सर ।" डिकी को पहली बार महमूस हुआ कि पाडे के बारे मे वह कुछ नहीं जानता। पिछले चार महीनो से वे साथ साते, साय सोते; ड्रिल, राइफल ट्रेनिंग, फटीग आदि हर तरह की रगडाई को दोनों ने साय-साथ सहा था। फिर भी पांडे के बारे में वह कुछ नही जानता था। पांडे उसके करीब आया था, फिर भी बहुत दूर रहा था। कहां चला गया होगा पाडे ? काफी देर तक उल्टे-सीधे सवाल पूछने के बाद का 4 रोबो कुछ तसल्ली हुई। वह अपना चेहरा डिकी के चेहरे के पास लाये। उनकी गिद्ध जैसी नज़रें डिकी के चेहरे को घूर रही थीं। "डिकी,...आज सुबह रेलवे ब्रिज के नीचे पांडे की लाश मिली है। तुम्हें आइडेंटीफ़िकेशन के लिए जाना पड़ेगा।" कप्तान साहब को सामने देखकर डिकी ने जेब से रूमाल निकाला और माथे पर से पसीना पोंछा। पांडे इस परिवेश के भीतर आ चुका था, लेकिन यहाँ टिके रहने की क्षमता उसमें नहीं थी। वह यहां रह नहीं सकता था। लेकिन यहां से लौट जाना भी संभव नहीं था। अव तो वह वाहर भी नहीं रह सकता था। भीतर आकर उसने ग़लती की थी, शायद जिंदगी की पहली और आखिरी गलती ! ऐसी ग़लती, जिसमें सुधार की क़तई कोई गुंजाइश नहीं थी। इट वॉज लाइक ऐन ओरिजिनल सिन'; पांडे ने अपनी मुक्ति करवा ली थी। इस फटघरे से मुक्ति का सबसे आसान और फ़रीब का रास्ता उसने अपनाय या। पांडे को अपनी शक्ति का सही-सही पता था। - टेक्निकल ट्रेनिंग सेंटर में दाखिल हुए डिकी को दो दिन हो चुके थे। वे ट्रेनिंग खत्म करके वह यहां आया था। शाम को रोल-कॉल के रेजिमेंटल ऑर्डर पढ़कर सुनाने के बाद कंपनी हवलदार-मेजर (सी० एम०) ने कहा था, "जिसे तैरना आता है वह कल सुबह आठ बजे स्व टंक पर कैप्टन जुनेजा को रिपोर्ट करे।" टेक्निकल ट्रेनिंग सेंटर का ' कुछ अलग था। यहां ड्रिल, पी० टी० आदि का ख़ास महत्व नहीं श्यादा जोर टेक्निकल ट्रेनिंग पर था। फ़ौज में स्पोर्टसमैन ऐश कर इनफा नाभास टिकी को था। सुबह वह स्वीमिंग टैंक पर आया सत्तर जवान पहले ही से वहां मौजूद थे। कैप्टन जुनेजा का फ़द र बदन घरहरा था; चेहरे के अनुपात में कुछ कम लंबी नाक, 1. पह तो एममस पार मी तरह पी।

रोवो 25 - वारीक मूंछे, आवाज में हलकी शरारत, कुल मिलाकर आकर्षक व्यक्तित्व था उनका । घटे-भर तक शोर-शराबा चलता रहा और फिर दस लड़को को चुना गया। अपने मेक्शन से अकेला डिसी उन दम में या। कंप्टन जुनेजा उन्हें एक तरफ़ ले गये और हरेक का परिचय प्राप्त किया। "पिछले मात वरसो मे स्वीमिंग चंपियनशिप को शील्ड दूमरी रेजिमेंट को जाती रही है। सी० ओ० साहब चाहते हैं कि इस बार शील्ड हमारी रेजिमेंट को मिलनी चाहिए। मैं पसंनली इसका खयाल रतूंगा। शुरू के दो पीरियड तुम्हें माफ कर दिये जायेंगे। लेकिन रोज चार-पांच घटे प्रैक्टिस होनी चाहिए और यहां मैं तुम्हारा इस्ट्रक्टर हूँ। नो नॉनसेंस ऑफ़ सल्यूटिंग।" टिकी कप्तान जुनेजा से सुश था। वह खुद इस मत का या कि जिसके कंधे पर पीतल के बटन लगे हों सिर्फ इसलिए उसे मंल्यूट किया जाये, मरासर वेवकूफी है । और ट्रेनिंग सेंटरों में तो दिन-भर में लगभग साठ- मतर वार सलामी देनी पड़ती है । सयोगवश जब कोई अफसर सामने पड़ जाता, सैल्यूट करना पड़ता। इसमे बचने के लिए टिकी दूमरे रास्ते बिल्डिगों के पिछवाड़े से या पेड़ों की आड से निकल जाता। टेक्निकल ट्रेनिंग मेंटर में आ जाने में उनके दोस्त बदल चुके थे। बैरक में उसको साट के अगल-बग्रज अनिल माहा और मुधाभूषण चन्द्र की बाट यौ। सुधाशु का रग काला या, चेहरा मादा और कुछ वाहर को उभरी हुई आंखें । वह अपनी में लगातार मिचमिवाता रहता था, मानो उमकी आँसों का उससे अलग कोई अस्तित्व हो। अनिल माहा मुघागु का बिलकुल उलट था। वहुत ही नाजुक, नाटा कद, गोल चेहरा और गदत्रदा शरीर, कधे कुछ उतरे हुए, आँखें बडी-बडी, चेहरे पर मुंहामे, होठों पर हलको पतली-पतली मूंछे, घुघराले बाल। और फिर उसकी मधुर प्रवाहमयी असमिया भाषा, जिममें कर्णकटु व्यवनो का इम्नेमाल यूं भी नहीं होता। कुछ भारी लेकिन दबी हुई आवाज़ में बात करने का उमका दंग उमे और कोमल बना देता था। वैन अनिल शुद्ध हिंदी भी बोलता य 1. संस्यूट मादिकरने की कोई सरत नहीं।

26 रोबो लेकिन लहजा असमिया था। इसीलिए सेक्शन कमांडरहवलदार पिल्ल को वह बहुत पहले ही प्रभावित कर चुका था। हवलदार पिल्ल पेंशन की उम्र को पहुंच चुका था। उसका ट्रेड रेडियो मेकेनिक का था, पर वह कुशल ऑपरेटर भी था। जब वह 'मोर्स-की' ऑपरेट करता तब हेड-फोन से मोर्स के सुर इतने स्पष्ट और लयबद्ध होते थे कि उन्हें लिपिबद्ध करने के बजाय हाय रोककर उन्हें सुनने को मन करता था। पिल्ले आकारबद्ध चेहरे का सुंदर कृष्णवर्णी व्यक्ति था। शरीर स्थल होने पर भी वह स्मार्ट दिखायी देता था। नजरों में रोब था, लेकिन उनमें करता नहीं थी। आवाज कठोर । किसी मोर्चे पर अपना सेक्शन पीछे न रहे, इसके लिए वह स्वयं प्रयत्नशील रहता। रात को आठ से दस के बीच वह एक्स्ट्रा पीरियड्स लेता। मोर्स रीडिंग, मोस सेंडिग में कमजोर लड़कों को लेकर वह बरामदे में बैठ जाता। नये रंगल्टों के साथ व्यवहार करते समय उस्ताद लोगों को दो बार सोचना पड़ता, क्योंकि ये लोग आर्मी के कायदे-कानूनों का नंबर बताकर अपने से ऊपर वालों को चुप करने की कोशिश में रहते । लेकिन अफ़सरों से न घबराने वाले लड़के हवलदार पिल्ले से घबराते थे। पिल्लै छोटी-मोटी बातों और बेवजह की डिसिप्लिन से लड़कों को परेशान नहीं करता था। आउट-पास के बगैर कभी कोई यूनिट घूमता हुआ दिखायी पड़े तो बाते सुनाकर वह उन्हें छोड़ देता। लेकिन रात को क्लास में वेत हाथ में लेकर ही बैठता था। क्लास शुरू होने के पहले दिन उसने सबको चेतावनी दे दी थी- "मैं क्लास में, जहां मौका मिला पिटाई करता हूँ, और ऐसे मौके इंदता रहता है; पिटाई भी ऐसी कि नानी याद आ जाये। एक त टूट जाये तो दूसरा ले आता हूँ, अपने पैसों से।" हवलदार पिल्ले को मुलाना कठिन था, लेकिन उसके खिलाफ शिका- यत करके भी कोई फायदा नहीं था। पिल्ल और कंपनी कमांडर एक साथ आर्मी में दामिल हुए थे। मेजर सुन्धाराव को कमीशन मिल गया था, हबलदार पिल्लं सिर्फ हबलदार रह गया था। डिकी सुबह-शाम स्वीमिंग की प्रनिटम करता। शाम तफ वह इतना थक जाता कि विना कुछ साये, रोवो 27 मिर्फ दूध पीकर मो जाना । दूसरे लडके पढ़ते रहने, रटते रहते । पिल्लं का शोर जारी रहता। लेफिन इम गोर-शराये के बीच डिकी ऊपता रहता। चैकिंग के लिए पिल्ल जव चरक मे आता नो हिकी को मोता देखकर हंस- नाता।बेंत साट पर पटककर यहता, "यह कौन गो रहा है लडी फूल ? अवे ओ, रेजिमेंट प्लेअर, आर्मी का दामाद, मोनी, मोओ, यरगरदार !" धीरे मे पलकें खोलकर डिको उमकी तरफ देयता और अलसायी हुई मुमकराहट फेंककर फिर आ वद कर लेता। शनिवार की शाम को दिकी कुछ जल्दी लाट आया था। हर शनिवार को अफ़सरों की बीवियो-बच्चियो के लिए तीसरे पहर के पांच बजे तक स्वीमिंग टक गुला रहता था। उस दिन डिकी और उसके मापी निर्धारित समय पर वहां पहुंचे, लेकिन मभ्य स्त्रियां टैक में बाहर निकलने के लिए तैयार नहीं थी। कंप्टन जुनेजा किनारे पर सई बड़ी भलमनमाहत से उन्हें बाहर निकालने की कोशिश करते रहे। इस बहाने वह फनल गुरुवासिंह की बेटी के माप बातचीत करने का मौका हूँढता था शायद । गुरुवलयसिंह की बेटी कुलवत कोर मोरटाइल तैरने में बड़ी माहिर थी। 'म्पोर्ट' उमकी कम थी, लेकिन 'स्ट्रोक्म' में बहुत 'प्रेम' और 'हामनी' थी। जुनेजा को बीवी पर पटकते हुए 'इस रूम' से बाहर निकली। यह स्त्री जुनेजा को बीवी के रूप में नहीं जंचती थी। ठोम पपरीला चेहरा और वेडोल जिस्म वाली इस स्त्री और जुनेजा को कमी पटती होगी, यह समझना मुश्किल नहीं था। कैप्टन जुनेजा अपनी बीवी के साथ हो लिया, इमलिए अव सव लोग भी थे। वीच का काफी टाइम फ्री था, इसलिए डिकी हवलदार पिल्ले की बलास में जा बंटा। पिल्लं अभी आया नहीं था । क्लाम के लडके गप्पें मार रहे थे। डिकी अनिल के पास जाकर बंट गया। धमे अनिल पढ़ने में बहुत तेज नही था। हवलदार पिल्लं वैत लिये वनाम में दाखिल हुआ । वैत एक तरफ रखकर उसने बैठने-वंटने एक बार मारी क्लाम पर नजर डाली। डिकी अनिल के माय मुमुर-फ.मुर कर रहा था। "डिकी, तुम यहाँ क्या कर रहे हो?" "सर, आज स्वीमिंग की छुट्टी है। टाइम है, इमलिए...."

3 रोबो चलो, "ठीक है, ठीक है । क्लास में बातचीत नहीं मांगता हूँ। अनिल, को' लेकर यहां आओ।" अनिल चुपचाप उठा। अपनी जगह छोड़कर उठना उसे बहुत खल रहा था। मुंह बनाते हुए यह हवलदार पिल्ल को बग़ल में जा बैठा । पिल्लं कोप ने उससे 'सेंडिंग' करने के लिए कहा। अनिल के हाथ स्थिर नहीं थे, रहे थे, इसलिए सिग्नल लगातार नहीं आ रहे थे, बीच-बीच में कट रहे थे। हवलदार पिल्लं ने अनिल की उँगलियों पर अपनी उँगलियां रखीं और 'की' पकड़ी। अनिल को पोंचा ढीला करने को कहकर वह खुद 'सेंडिंग' का 'डिमांस्ट्रेशन' देने लगा। अब स्पष्ट और लयबद्ध सिग्नल सुनायी दे रहे थे। डिकी संदेश ले रहा था, लिख रहा था। दो सिग्नलों के बीच जव ज्यादा अंतर आने लगा तव लिखते-लिखते वह रुका, गरदन ऊपर' उठायी और देखा कि अनिल के दायें हाथ पर पिल्ले का दायां हाथ था। इसलिए यह साफ़ था कि हवलदार पिल्लं अनिल से एकदम सटकर बैठा था। उसकी टांगें अनिल की टांगों को छू रही थीं। अनिल और डिकी की नजरें मिलीं। अनिल ने आंखें फेर ली। उसकी आंखों में शर्म और अपराध का भाव स्पष्ट था। डिकी देख रहा था। हवलदार पिल्ले की हथेली अनिल की पीठ पर घूम रही थी। आहिस्ता-आहिस्ता नीचे तक खिसक जाती, ओशल हो जाती और फिर ऊपर की तरफ़ उठ आती। डिकी बेचन था। उसने भरसक कोशिश की कि उसका ध्यान 'रीडिंग' पर लगे, लेकिन वह अराफल. रहा। अब डिकी रोज यही क्लास अटेंड करता। अनिल के पास बैठता, गानो अनिल को पिल्ले से दूर रखने की जिम्मेदारी उसी की थी। जब भी पिल्ल अनिल से सटकर बैठता, डिकी को खांसी आना जरूरी था। तब हवलदार पिल्लै उसे तीखी नजरों से देखता, लेकिन डिकी शांत नजरों से उसका जवाब देता। डिकी की पढ़ाई बहुत अच्छी चल रही थी। फैप्टन जुनेजा के साथ उसके बहुत अच्छे संबंध थे। वरक की डिसिप्लिन को बारे में कोई उस पर उँगली नहीं उठा सकता था। पिल्ले से उसको कोई खतरा नहीं था। उन दोनों के संबंध हमेशा क - रावा 29 तरह ठीक चल रहे थे, लेकिन डिकी को कभी-कभी लगता कि किसी अज्ञात विदु पर हवलदार पिल्लं और उसके बीच कही दुश्मनी है। एक दिन दोपहर के वक्त पड़ोस को बैरक वाला शिदे संदीन की तरफ से दौड़ता हुआ आता दिखायी दिया। उसने बायें हाथ से अपनी दापी होली दवा रखी थी। दायी हथेली मे सून वह रहा था। वह सीधे कपनी हवलदार- मेजर (सी०एच०एम०) के कमरे में घुसा। कुछ देर बाद मेजर (मी०एच० एम० और शिंदे मेडिकल रूम की तरफ़ चले गये। कई जवानो ने इस हादसे को देखा था। कुछ लोग सी०एच० एम० के कमरे के पास जमा हो गये थे। वहां चल रही बातो से डिकी को पता लगा कि शिदे दीन की तरफ जा रहा था। यूनिट से लैट्रीन काफी दूर थी। सड़क पार करके जाना पड़ता था। चलते-चलते वह कैंटीन मे गया था। कैंटीन वाले के पमें चुकाने के लिए उसने जेव से नोट निकाले पे। किसी ने देख लिया होगा। शिदे लैट्रीन तक पहुंचा ही था कि अचानक दो आदमियों ने उस पर हमला किया। शिदे ने उनका मुकावला डटकर किया, लेकिन उनमें से एक ने उसका मुंह दबाया और दूगरे ने चाकू से वार किया। हापापाई में शिदे जम्मी हो गया। हाय की उंगलियो फट गयी और पंगे भी चले गये। हालत इतनी खराय थी कि उंगलियां हमेशा के लिए वेकार हो सकती थी। इस घटना में डिकी को कुछ गडबड दिपायी दे रही थी। वह शिदे को करीब से जानता था। शिदे निडर लडका था। ताकतवर भी था। पहले ही दिन से शिदे की और उसकी जान-पहचान हो गयी थी। गिदे का हममुस चेहरा हमेशा सिला रहता था। बीच की 'रो' का वह गाईड या। ठिगना कद, गठा हुआ जिस्म, माचिग करते वक्त उसकी जांघों की पेशियों का उतार-चढ़ाव पैट के बाहर से भी साफ देखा जा सकता था। कुछ गह- बड़ जरूर थी। भरी दोपहरी में चोरों का मिलिटरी एरिया में यह साहस मुमकिन नहीं लग रहा था। सुबह पता लगा, अस्पताल में दाखिल करने के बजाय घिदेको क्वाटर - 30 रोवो गार्ड की प्रिज़न सेल में रखा गया था। धीरे-धीरे सही वारदात का पता लगा। उस दिन दोपहर को उसने लैंट्रीन के पास एक बड़ा-सा पत्थर ढूंढा। दाहिना पंजा पत्थर पर रखकर दूसरे हाथ से तेज़ छुरी चलायी। उँगलियाँ काट डालने की कोशिश थी उसकी। शिदे को पता था कि उँगलियों के बिना ऑपरेटरी का काम चल नहीं सकता था, और उँगलियाँ कट जाने के बाद उसे 'डिस्चार्ज' मिल सकता था। कैसी हिम्मत ! कितनी सहनशीलता !छुरी कैसे चलायी होगी उसने ? वार कैसे किया होगा? छुरी फिसली होगी, खून के फ़व्वारे छूटे होंगे। दर्द वरदाश्त नहीं हुआ होगा। मशीनी करवल में पंजा बढ़ाकर उँगलियाँ कटवा लेना वात और होती है, लेकिन इस तरह उँगलियों को तोड़ देने की कोशिश करना अजीब बात है ! कमाल है शिदे का ! कौन-सा तमगा दिया जाये उसे? असल में मिलिटरी-लाइफ़से वह भाग रहा था, विलकुल दुम दबाकर। यहाँ वह बिलकुल कमजोर और डरपोक सावित हुआ था। लेकिन उसकी सहन-शक्ति बिलकुल कमजोर नहीं थी। चिट्ठियों की तरह अलग-अलग 'पीजन-होल' में आदमी की सॉटिंग नहीं की जा सकती। कुछ दिनों के बाद शिंदे को 'डिस्चार्ज' मिल गया। उँगलियाँ ठीक हुई या नहीं, पता नहीं चला। अब स्वीमिंग-स्पर्धा का आखिरी दिन नज़दीक आ चुका था । पाँच-पाँच, छः-छः घंटे तैरकर डिकी थककर चूर हो जाता था। पिछले कुछ दिनों से उसने पिल्ले के क्लास में जाना बंद कर दिया था। उस दिन उसे आने में जरा देर ही हुई थी। प्लेट उठाकर वह जल्दी-जल्दी मेस में खाना खाने गया था। मेस बंद हो चुका था। सव बर्तन साफ़ करके रख दिये गये थे । सिविल ड्रेस में वह यूनिट के बाहर निकला। मेन गेट के बाहर उसकी सुधांशु से मुलाकात हुई। दोनों शहर की तरफ चल पड़े। मेन गेट से कुछ दूरी पर 'कॉफ़ी हाउस' में खाना खा लेने का उनका विचार था। वह ।

1 - 1 होटल मे घुमा । होटल में भीड़ कम थी। मंद रोशनी में पाश्चात्य संगीत की लहरें हवा में तैर रही थीं। डिकोने कोने को मेज चुनी। पाते वक्त दमका ध्यान सामने वाली मंड पर बैठे जोड़े की तरफ़ गया। उनकी तरफ उनकी पीठ थी। वे दोनों एक-दूसरे से सटकर बैठे थे। पुग्प की आकृति उमे जानी-पहचानी लगी। वह कैप्टन जुनेजा था। कंप्टन जुनेजा सिविल डेम में बड़ा स्मार्ट लग रहा था। डिकी चाहता था कि कैप्टन जुनेजा पीछे मुड़कर न देने । वैये जुनेजा से वह घबराता नही था, लेकिन, अगर जुनेजा उमे यहाँ देख ले तो वह खुद ही इस हालत में शरमा जायेगा-डिकी ने मोचा। सुधागु दड़बड़ा रहा या। टिकी ने सुधांशु को इशारा किया। वात मुधाशु के ध्यान में आयी और वह यकायक खामोग हो गया। इस चुप्पी ने हो शायद उसका ध्यान आकर्षित किया होगा। उमने पीछे मुडकर देखा। हिकी को देखकर वह मुसकरायी, जमे वह उमे जानती हो। कैप्टन जुनेजा ने भी पीछे मुड़कर देखा और हाथ उठाकर 'हाय' किया। कुलवंत कौर देखने में इतनी चिकनी होगी, हिको को पता नहीं था। शायद धीमी रोशनी का यह जादू हो। अब यहां पयादा देर रुकने का कोई मतलब नहीं था। माना कि जुनेजा स्वभाव मे अच्छा आदमी था, फिर भी इस मौके पर डिकी का वहां मौजूद रहना जुनेजा के लिए रुचिकर नहीं हो सकता था। मारे रास्ते सुधाशु बड़बड़ाता रहा था । "हिको, अव सामोश रह्ना ठीक नहीं, कुछ करना होगा। अभी उम बच्चे ने दुनिया देवी ही कहाँ है ! जिंदगी वरवाद हो जायेगी उमको।" "देखो मुधांशु, अनिल अब दूधमुंहा वच्चा नहीं है। आज हम यहाँ हैं, कल को दूसरे यूनिट में कौन होगा उसके साप? हाँ, वहाँ और कोई पिल्ल उहर होगा । अनिन को अगर इसी माहोल में रहना है तो उमे खुद अपना राम्ना तलाशना होगा। उमै खुद अपना फ्रेमला करना होगा। और अगर यह पद इस हरकत को पसंद करता हो...!" "रोंट टॉक रविश' ! हम दोनों अनिल को बहुत अच्छी तरह जानते 1. सरपी को गत मारो!

32 रोवो . वे दोनों यूनिट के मेन-गेट तक आ चुके थे। अनिल और विश्वंभरम् वहीं खड़े थे। "डिकी, अनिल तुमसे कुछ बात करना चाहता है।" "अनिल, सिर्फ एक सवाल मैं तुमसे पूछता हूँ। पिल्लै और मेजर सुब्बाराव की दोस्ती है, तुझे पता है। अगर हम उनके खिलाफ शिकायत कर दें तो नतीजा क्या होगा, यह तुम समझ सकते हो। हम शिकायत नहीं करेंगे, उसका कोई फायदा नहीं। लेकिन अगर यह क़िस्सा ऊपर तक पहुँचा तो तुम अपनी जवान के पक्के रहोगे न ?" "डिकी, मेरी मदद करो, प्लीज । उस साले ने 'लाइट्स ऑफ़' के बाद मुझे अपने कमरे पर बुलाया है। हरामी कह रहा था कि यह ऑर्डर है । अगर मानेगा नहीं तो कहीं-न-कहीं फंसा दूंगा।" "ऑर्डर? माई फुट ! आई शैल फ़क् दैट रास्कल' !" डिकी भड़क उठा। "डिकी, मुझे डर लगता है।" "अनिल, अब सव हम पर छोड़ दो। 'लाइट्स ऑफ़' के वाद तुम ज्ञान- सिंह की खाट पर सो जाना।" 'रम् डे' था उस दिन । यह तय है कि हवलदार उस दिन पीनेवाला था कुछ लड़कों से वात करके डिकी ने योजना बनायी। रात के दस बजे थे । 'लाइट्स ऑफ़' की सीटियाँ बज चुकी थीं। वैर की विजलियां खटाखट बंद हो गयीं । नाइट ड्यूटी करने वाला संतरी पित को ओ० के० रिपोर्ट देकर लौट आया। अनिल ने अपनी जगह बदल ल अनिल के विस्तर पर ज्ञानसिंह सो गया। उसके एक तरफ़ डिकी 3 दूसरी तरफ़ शर्मा । पाँच मिनट गुजरे, दस गुजरे। ये लोग चादरें ओढ़ मच्छरदानियों में लेटे इंतजार कर रहे थे। सो जाने का बहाना व 1. मैं उसकी ऐसी-तैसी करके रख दूंगा।

पिल्ले को राह देग रहे थे। आहट ले रहे थे। डिकी भी इतजार कर रहा आधा घटा गुजर गया। पिल्लं का कड़ी पता न था। वह अब तक जाग रहा था। उसके कमरे से रोशनी की एक किरण वरक में आ रही पी। इतजार करते-करते डिकी थक गया। उसे लगा, अब सो जाना चाहिए। उमने घड़ी देखी। बाकी सभी लोग जाग रहे थे, इसका उमे पूरा भरोसा या। पिल्ले से सभी लोग चिढ़े हुए थे। सभी को पिल्ल पर क्रोध था और पूणा भी। अगर आज को योजना कामयाब हो जाये, तो क्या पिल्ले ज्यादा सूचार हो जायेगा ? अनिल डरपोक है। थोड़े-से दवाव से शायद वह राज गोल देगा । दरवाजे पर हलको-मी आहट हुई। लेकिन फिर विलकुल खामोशी । उसकी आँखें नीद से बंद हुई जा रही थी। उसने सुना, ग्यारह के घटे बज रहे हैं, लेकिन उस पर नीद छायी थी। वह जागते रहना चाहता था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्यों जागना चाहता है ? अब सो जाने का उसने इरादा किया। उसे अनिल को पीठ दिसायी दे रही थी। पीठ पर एक हाथ घूम रहा था। पिल्ले का हाथ ऊपर-नीचे हो रहा था। हाथ कुछ तलाश कर रहा या, कुछ ढूंढ रहा था। डिकी ने चौककर आंखें खोल दी। ही विश्ड दैट ड्रीम टु कन्टीन्यू।' उमने फिर आंखें बंद कर ली और पास के विस्तर से शोर-गुल को भावान नुनायी पडी। ज्ञानसिंह जोर-जोर से चीख रहा था. "चोर चोर ।" मच्छरदानी में पिल्लं की आकृति लड़खडाती दिवायी पडी। फुर्ती से वह मच्छरदानी से बाहर निकला। तब तक पिल्लं चारपाई मे परे जा चुका था और दरवाजे की तरफ बढ़ रहा था। डिकी ने पाम वाला वडा बूट फुर्ती से उठाया और पिल्लं की तरफ फेंका। निशाना ठीक पड़ा होगा, पोकि पिल्लं के मुंह से कुछ गालियां निकली थी। हिको आगे बढ़ा । ज्ञानसिंह ने पिल्लं को पकड़ लिया। शर्मा ने पिल्लं के सिर पर कवल डाल । I. उससेठा थी कि वह यह स्वप्न देखता रहे।

4 रोवो । दया। पिल्ल अंदर छटपटा रहा था। डिकी ने पिल्ल के पेट में चूंसा गाया। पिल्ले तड़प उठा। शोर मच गया। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है ! पांच-छः लोग 'चोर-चोर' चिल्लाते अनिल की चारपाई की तरफ़ लपके । लाइट जलाने के लिए आते संतरी को भी किसी ने पीट दिया था। छहों बाहर भागे। पहले ही से तय था कि बत्ती जलानी नहीं है। बैरक की बत्तियां जव जलीं तो पिल्लै वहाँ नहीं था। अनिल अपनी चारपाई पर आकर बैठ गया । खाटें तितर-बितर हो गयी थीं। जूते इधर- उधर बिखरे पड़े थे । विश्वंभरम् के घुटने पर अच्छी-खासी मार लगी थी। सी०एच०एम० दौड़ा-दौड़ा बैरक में आया। बहुत-से लड़के जमा हो गये। अनिल तैयार बैठा था। उसने रिपोर्ट की : "मेरी खाट के पास कोई गड़बड़ कर रहा था । मैं जाग पड़ा । कोई अधेड़ उम्र का आदमी लुंगी में दिखायी पड़ा।" सी० एच० एम० बरामदे में आया। उसने देखा कि पिल्लै के कमरे का दरवाजा बंद था। इतने शोर-गुल के वावजूद पिल्लै कमरे के बाहर नहीं आया था। क्या हुआ होगा, सी० एच० एम० को शायद इसका अंदाजा था। "कल देखा जायेगा। अभी चलो, सो जाओ। अपनी-अपनी वैरकों में जाओ।" उसने लड़कों को दौड़ाया। फिर अंधेरा। डिकी अपने विस्तर पर लेट गया, लेकिन अनिल और बाकी लोग काफी देर तक खुसर-पुसर करते रहे। वे खुश थे। दूसरे दिन हवलदार पिल्लै किसी को नज़र नहीं आया। उसकी जगह कोई दूसरा हवलदार ड्यूटी पर था। खबर मिली कि पिल्ले को रिटायर कर दिया गया था। लेकिन उस घटना को लेकर कोई पूछताछ नहीं हुई । अनिल से किसी ने इसके बारे में कुछ भी नहीं पूछा। सब तेरी भी चुप और मेरी भी चुप। लगभग डेढ़ महीने बाद एक शाम जब डिकी कॉफ़ी हाउस की तरफ़ जा रहा था, पुलिस की एक जीप उसके पास आकर रुकी। जीप में पिल्ल बैठा हुआ था। वह सिविलियन ड्रेस में था। लगता था, वह कहीं अफ़सर वन गया था, क्योंकि जीप का ड्राइवर उससे बड़े अदव से पेश आ रहा था

"क्यो टिकी, कैसे चल रहा है ?"
पिल्ल खुश था। कुछ देर के लिए गपशप करने के बाद, जाते-जाते
उमने
'कहा, "अच्छा स्किी, सो लांग ! पास्ट इज पास्ट, मैंने तुम लोगो को
माफ कर दिया है।"
"माफ कर दिया? लेकिन आपके माफ करने का सवाल ही नहीं
उठता। गलती आपकी थी। शमिंदा आपको होना चाहिए । आधिर
मोरलिटी नाम की कोई चीज है या नहीं?"
हवलदार पिल्न डिकी की तरफ कुछ क्षण देग्रता रहा। उसके चेहरे
पर मुसकराहट थी । उसने कधे विचकाये। "जो चाहो समझो...मगर
डिकी, डोन्ट डिसीव योरसेल्फ । आई नो, यू हम फेयर अबाउट मोरलिटी।
यू...यू वैभर जेलस...."
जीप जा चुकी थी। कुछ क्षण टिकी बहा रहा, फिर आगे बढ़ा और
बड़बड़ाया,
"पिल्लं इज रिअली वैरी कूडवरना ऐसा कभी हो सकता
है ? ऐसे मामलों में सटाइटी लीड्स यू नो व्हेअर'।"
1. कोबीत गया सोबीत गया।
2. अपने का धोखा मत दो। मैं जामता किम नैदिरता के बारे में at feat
मही करते । तुम्हें गायो।
3. परितृप्ति मापको कहीं नहीं मे वाली।

तीन ट्रेनिंग की अवधि पूरी हो चुकी थी। डिकी अब 'सिग्नलमैन' बन चुका था। उसने नया यूनिट ज्वाइन कर लिया। दोपहर का वक़्त था। नया यूनिट किस स्थिति में होगा, इसका उसे कुछ अंदाज़ा नहीं था। सेक्शन को विदा करते वक्त सुव्बाराव ने कहा था : "देखो जवानो, आज से तुम लोग ऑपरेटर बनने जा रहे हो, यहाँ की ट्रेनिंग ख़त्म हुई, लेकिन तुम्हारी असली ट्रेनिंग तो यहीं से शुरू हो रही है। यहाँ तुमने जो कुछ पढ़ा है, और कम्युनिकेशन की प्रोसीजर समझी है, उससे 'सिग्नल सेंटर' की प्रोसीजर बिलकुल अलग होगी। वहाँ की डिसिप्लिन एकदम अलग होगी। अगर यूनिट ठीक हो तो तुम्हें अपने ट्रेड का काम मिल सकेगा; नहीं तो क्वार्टर-गार्ड ड्यूटी, ड्रिल, परेड ही करते रहोगे। कोशिश करो कि अपने-अपने ट्रेड में लगे रहो, और इज्जत से सर्विस करो।" डिकी लकी रहा। जिस यूनिट में उसकी पोस्टिग हुई थी, वहाँ की दो कंपनियाँ 'सिग्नल सेंटर' ड्यूटी पर थीं। दाखिल होते ही रात को वह ड्यूटी पर हाज़िर हो गया। 'सिग्नल सेंटर', यानी मिलिटरी का पोस्ट-ऑफ़िस-चौवीसों घंटे खुला। आर्मी का लंबा-चौड़ा मामला । कई यूनिट । इन तमाम यूनिटों के बीच कम्युनिकेशन बनाये रखने का काम सिग्नल कोर के ज़िम्मे, आर्मी हेडक्वार्टर और सीमाओं पर फैले हजारों यूनिटों के बीच लाखों शब्दों का आदान-प्रदान-हजारों चिट्ठियाँ, टेलीग्राम, ट्रंककाल, संदेश । - रविवार का दिन पा । मुबह को आठ बज रहे पे। रेजिमेंट बॉफ्रिम के लिए अजेंट मैसेज था। टिकी ऑफिम की तरफ जा रहा था। रास्ते में कंपनी मूबेदार मणि और मूवेदार सगतराम के क्वार्टर पड़ते थे। दोनों बाहर आंगन में गडे धै। मूवेदार मणि लुगी पहने, युश मुंह में दाये गड़ा था। उसे मैल्यूट करना डिकी को बहुत अपरा था। पर गुरू में ही वह समट मोल मैना नहीं चाहता था। इमलिए पाम मे गुजरते वक्त उसने 'मॉनिग सर' कहकर मलामी दी। सूबेदार संगतराम ने 'मानिग' कहकर जवाब दिया। डिकी आगे बढ़ा । पीछे मे आवाज आपी- "जवान, इधर आओ।" हिकी पीछे मुड़कर सूबेदार मणि के सामने यहा रहा। "तुमने सैल्यूट क्यो नहीं किया ?" "मैंने आपको 'गुड मानिंग' विश किया है, सर।" "लेकिन जवान, मैं पूछ रहा हूँ, तुमने मैल्यूट क्यों नहीं किया ?" डिकी चुप रहा। "काय आये इस यूनिट मे?" "दो दिन हुए, सर।" "और दो दिन में यह हालत ? ट्रेनिंग सेंटर मे क्या यही सिखाया गया है ? 'पाम आउट' होके आये, या उस्ताद का बूट पॉलिश करते रहे ? मैं पूछना हूँ, तुमने सैल्यूट क्यो नही किया?" "मर, ट्रेनिंग सेंटर मे यही सिग्माया गया था कि मैल्यूट पलंग को दिया जाता है, किमी भादमी को नहीं । सल्यूट अफ़सर के कधे पर लगे स्टार को दिया जाता है, आदमी को नहीं। अगर मैल्यूट देने वाला या मेल्यूट लेने वाला इनमें से कोई भी यूनिफार्म में न हो तो मैल्यूट देना जरूरी नहीं है।" "यू गट अप ! बफवाम मत करो! मुझे आर्मी रूल सिसा रहे हो? तीस साल से नौकरी कर रहा हूँ यहाँ । गोरों के जमाने में सविम को, और तुम कल के छोकरे, मियाने चले हो मुझे आर्मी रूल ! लही फूल ' याद रपो, आर्मी रुल किताबों में रहते हैं, यहां सीनियम का रूल चलता है। मैं यहाँ अफमर हूँ, और तुम मिपाही, ओ०आर०, ममझे? सोनियर के ऑर्डर को ओके करना-यही एक स्ल है आर्मी का । देख लिया मूबेदार साव?"

8 रोवो फिर वह सूवेदार मणि कुछ क्षण रुका, डिकी पर भौंका: "सावधान !" डिकी सावधान की पोजीशन में आ गया। "सैल्यूट !" डिकी ने सैल्यूट किया। "डाउन !" डिकी ने झटके से हाथ नीचे किया। मणि ने डिकी से पांच बार सैल्यूट करवाया । सूबेदार और लेक्चर देने के मूड में था, लेकिन डिकी ने अपनी जेब से लिफ़ाफ़ा निकाला और दिखाकर कहा, "सर, ओ० सी० साव के लिए ओ० पी० मैसेज है ।" मणि का चेहरा तमतमा उठा, लेकिन लिफ़ाफ़ा देखकर वह अपना गुस्सा पी गया। "ठीक है, जल्दी जाओ। ओ० सी० एच० एम० से कहना कि वह तुम्हें चार्ज-शीट पर ले आये कल सुबह।" । सुबह नौ बजने से पहले बैरक से डिकी का जुलूस निकला । सी० एच० एम० बहुत दूरंदेश आदमी था। सुबह से डिकी का पीछा करने के लिए एक गार्ड तैनात हो चुका था। आगे सी० एच० एम०, पीछे गार्ड और बीच में डिकी~-इस तरह यह वारात रेजिमेंट ऑफ़िस पहुंची। स्थिति का मुकाबला करना होगा। मैं बेक़सूर हूँ। मेरी कोई गलती नहीं। सजा मिलने का कोई सवाल नहीं है, लेकिन सजा हो भी जाये, तब भी मैं कुछ नहीं कर सकता। कुसूर या वेक़सूर, यहाँ इसका कोई महत्व नहीं। सी० एच० एम० ने डिकी को वेल्ट खोलने के लिए कहा। बेल्ट और कैप सिपाहियों के मानचिह्न होते हैं। इनको उतरवाने का मतलब है सिपाही की बेइज्जती । सी० एच० एम० प्यारेलाल सूबेदार-मेजर के दफ्तर गया और कुछ देर के बाद लौटा। उसके चेहरे पर उकताहट थी उसने डिकी को अंदर आ जाने का इशारा किया। आसार बुरे नहीं थे अगर चार्ज-शीट हो जाती तब तो सी० एच० एम० उसे वहीं से मा कराता हुआ अंदर ले जाता । डिकी, सूबेदार मेजर के कमरे तक पहुंचा। "मे आई कम इन, सर?"

रोबो 39 डिकी बडे अदब के साथ अंदर दाखिल हुआ। मेज से पांच-छ: फोट सौदूरी पर उसने रोरदार 'म' करके सूबेदार मेजर को सलामी दी। "गुड मानिग, सर!" 'मानिग, मानिग ..सिग्नलमैन डिकी!" मूबेदार मेजर अपनी सफेद दाढ़ी-मूंछों में से मुराकराया। गूदार- मेजर का यूनिफॉर्म बिलकुल साफ-सुथरा तो पा, लेकिन बहुत कलादार नही था। आँखों में शरारत-भरी मुसकराहट । "तो जवान, यूनिट में दाखिल हुए अभी एक हपता भी नहीं हुआ है और तुम मेरे सामने आये हो। यह ठीक नहीं। बिलकुल ठीक नहीं । कहाँ के रहने वाले हो?" "ववई, सर।" "बबई। ववई, कहाँ ?" "ग्रान्ट रोड, सर।" मेजर ने अपनी सफेद दाढ़ी पर हाथ फेरा। "प्रान्ट रोड...बीस साल पहले कलाया मे था मैं, मैं और जगजीत । कंपाउन्ड बॉल फांदकर हम बाहर निकल जाते थे। सय मिपाही पा में।" मूदार-मेजर अतीत में तैर रहा था। "प्रान्टरोड, कहाँ हुई यह ?" डिकी दो कदम आगे बढ़ा और मेज पर उंगलियों से समीरें पीपकर यहने सगा--- "यह है कुलाबा, यह वी० टी०, यह पेस्टनं रेलवे और यह दादर ग्रान्ट-रोडइसके बीच में है।" उँगलियों से यह पोजीशन दिगा रहा था। मूबेदार मेजर ध्यान से देख रहा था। "इसका मतलय दादर ग्रान्टरोड के उत्तर में है ?" "सर, बंबई में तो कमी नजर उठाके मारामान की तरफ देगाही नहीं। कैसा पूरब और कैसा उत्सर! सगता है, यई में भागमान है ही नहीं।" मूबेदार मेजर गलकर हंसा, "ह! भैया, म्टेशन के पास जो ऊपी.

40 रोवो , , - ऊँची बिल्डिंगें हैं न, उनमें खब्बे हाथवाली विल्डिंग के पास हम जमा होते थे और वहीं से..." .सूबेदार मेजर अब वर्तमान में आ चुका था। उसने गर्दन उठाकर डिकी को देखा। डिकी पीछे खिसका और तनकर खड़ा हो गया। "ओ गुन्डे, मैं वोलता ही रहा। किसलिए आये थे तुम यहाँ ?" "सर...!" "यस ! देखो जवान,...बड़े लोगों की इज्जत रखना चाहिए। आर्मी रूल्स तो हैं ही। हम आर्मीमेन तो हैं ही, लेकिन पहले हम इन्सान हैं । ठीक है न ? देखो, दुवारा ऐसा नहीं होना चाहिए। यह फ़र्स्ट वानिंग है । जाओ, सी० ० एच० एम० को अंदर भेज दो।" डिकी बाहर आया और सी० एच० एम० के पास गया। "मेजरजी, आपको अंदर बुलाया है।" उसकी वेल्ट और कैप उसे देकर सी०एच०एम० अंदर चला गया। वेल्ट लगाते वक़्त प्रश्नात्मक मुद्रा में खड़े गार्ड से डिकी ने कहा, "चलो बेटा, तुम्हारी छुट्टी हुई।" "क्यों, क्या हुआ?" "अपना उस्ताद कहता था, जवान, आर्मी में इज्जत से नौकरी करनी है तो एक पाँव वैरक में रखो, दूसरा क्वार्टर-गार्ड सेल में । इज्जत से सर्विस करनी है तो वेइज्जती से डरो मत ।" डिकी मन-ही-मन मुसकराता बैरक की तरफ़ चल पड़ा। सुवह से जोरदार तैयारियां चल रही थीं। जवानों ने बढ़िया यूनिफ़ार्म पहन रखे थे। आज नौ बजे सालाना 'शपथ-परेड' होने वाली थी। सेक्शन कमांडरों ने अपने-अपने सेक्शन के जवानों की चेकिंग की---यूनिफ़ार्स, बटन, वेल्ट के वकल्स, कैप, कैप के वैज, बूट, जूतों की पॉलिश, तस्मे, दाढ़ी, कटिंग... डिकी ने मशीन से बालों की कटिंग नहीं करायी थी। उसे पीछे धकेल - दिया गया। चेकिंग ख़त्म होने के बाद कमांडरों ने अपने-अपने सेक्शन 'सावधान' रोवो 41 की पोजीशन में सड़े कर दिये और सी०एच० एम० को 'ओ रे रिपोर्ट' दी। मो० एच० एम० ने अपनी कंपनी को 'सावधान' की पोजीशन में पडा किया और रेजिमेंट के सूबेदार मेजर को अपनी 'कंपनी' 'ओका' होने की रिपोर्ट दी। सूबेदार-मेजर ने रेजिमेंट को 'सावधान' की पोजीशन में यहा पिया और एक बार सब जवानों पर नजर दौड़ायो। यकायक यह गौर में चीखाः "कौन हिल रहा है ? हिलो मत उधर । नायक सेमिह बैंक अप, पयो हिल रहे हो? हिलो, मत!" कुछ क्षण शांति, किसी ने धीरे से, लेकिन मूवेदार को सुनायी पने भर को काफी जोर से कहा, "साव, नायक तेजसिंह छुट्टी गया है, मार ।" पूरी यूनिट में हेंसी की एक हलको-सी लहर दौड़ गयी, लेकिन भूबेदार- मेजर के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। वह गुर्राया- "फिकर नहीं । नायक तेजसिह, हिलो मत !" सूबेदार मेजर ने मुडकर एड्ज्यूटेंट को रिपोर्ट किया। मूर्वेदार मेजर ने सारी उम्र आर्मी में वितायी थी। उसे पता था कि अफमर अपना ऑर्डर कभी वापस नहीं लेता। एक बार निकला हुआ ऑर्डर फैमित नहीं होता। ऑर्डर का कसिल होना, गलत फैसले का सबूत है, और आर्मी में अंमले गलत नहीं होते। मिलिटरी में 'ऑर्डर इज काउटरमन्दिर यट नेबर कसिल्ड।" इसके बाद एड्ज्यूटेंट ने सी० ओ० को रिपोर्ट किया कि उसकी रेजि- मेट शपप-परेड के लिए तैयार है। हर माल शपथ लेने का यह समारोह डिकी को वडा हास्यास्पद लगता था। ऐसा लगता था, जमे हर माल वीमारियों को रोकने का टीका लगवाया जाता हो। यम गरय ले लो तो पूरा भरोसा हो जायेगा कि साल-भर फौज में कोई डरपोक, स्वार्थी और देशद्रोही पैदा नहीं हो सकता । अचूक टीका है। दो दिन पहले में गाय- 1. सेना में भादेश को कभी कसिल नहीं लिया जाता, केवल देशाता है।

42 रोवो । परेड के समारोह की तैयारियां चल रही थीं। ग्राउंड पर लाउडस्पीकर लगे थे। माईक पर सी० ओ० साहब खड़े थे। उन्होंने बोलना शुरू किया- "मैं पढ़ता जाऊँगा। मेरे पढ़ने के बाद सब एक साथ एक आवाज़ में दोहरायेंगे।...शुरू...मैं...." सी० ओ० देर रुका। 'मैं' एक आवाज़ में सवने दोहराया। इसके बाद हर एक को अपना नाम और नंबर बताना था। कुछ देर यह सिलसिला चलता रहा। सी० ओ० के होंठ हिल रहे थे। सामने वाली कतार के होंठों की हर- कत दिखायी दे रही थी। पीछे की लाइन वाले लोगों को कुछ दिखायी नहीं दे रहा था । सुनायी भी नहीं दे रहा था। ऐन नाजुक मौके पर लाउड- स्पीकर खराव हो गया था। सी०ओ० साहव के ध्यान में यह बात नहीं आयी । पूरी यूनिट को गूगों की तरह सामने खड़ा देखकर उनकी भौंहें तन गयीं। एड्ज्युटेंट सूबेदार मेजर के ध्यान में यह बात आ चुकी थी। लेकिन परेड सी० ओ० के कमांड में थी, उसके नहीं, उसने मेकैनिक को इशारा किया। सामने वाली लाइन के लोगों ने देखा कि सी० ओ० साहव वेचैन हैं। जिन लोगों को सी० ओ० साहब के अस्पष्ट शब्द सुनायी दिये थे, उन्होंने दोहराना शुरू किया। लेकिन पता लगा कि पीछे के लोग नहीं बोल रहे हैं, तो वे भी खामोश हो गये। सब परेशान थे। गड़बड़ क्या थी, यह बात सबकी समझ में आ चुकी थी। लेकिन गुत्थी कैसे सुलझायी जाये, यह किसी की समझ में नहीं आ रहा था। मशीने बंद पड़ चुकी थीं। शायद यह वात सी० ओ० की समझ में आ चुकी थी, इसलिए उन्होंने अपनी आवाज ऊँची की और फिर से पहली लाइन दोहरायी। इसी दौरान, मेक- निक एम्लिफ़ायर के पास पहुंच चुका था। उसने लूज़ कॉन्टैक्ट पर टेप लगाया। माईक पर हमेशा करूंगा' ये शब्द ऊँची आवाज़ में सुनायी पड़े। आगे की कुछ क़तारों ने पूरी पंक्ति ठीक सुनी थी। वे इसे दोहराने लगे। पीछे के जवानों ने सिर्फ़ 'हमेशा करूँगा' इतना ही सुना था। वे उसे दोहराने लगे। गड़बड़ हुई। विभिन्न सुरों में अलग-अलग वक्फे से 'हमेशा करूँगा' ..'हमेशा करूंगा' की आवाजें आने लगीं। डिकी अपनी हँसी रोक नहीं पाया। हँसी दवाने की कोशिश में उसका चेहरा विचिन हो रहा था। - रोयो 43 लेकिन शोर का लाभ उठाकर उसने हमेगा हमूंगा', 'हमंशा हंगा' की शपय कई बार दोहरायो। गडबड़ी मची देखकर मी० ओ० ने तुरन फमना किया और एइन्युटेंट को रेजिमेट का कमार संभालने को कहकर यह वही से पल दिया। एज्युटेंट ने रेजिमेंट को एक-दो यार 'मावधान', 'वियाम' किया। लेकिन परेड का क्या होना था, इसके बारे में मी० ओ० का कोई हुमम नहीं था। एडज्युटेंट ने रेजिमेंट को सूबेदार मेजर के हवाले कर दिया और चडी फुर्ती से सी० ओ० के पीछे दौडा। मूवेदार-मैजर काफी अनुभवी । उन्होंने रेजिमेंट को रेजिमेंटल हबलदार मेजर के नियंत्रण में सौपा और खुद एइन्युटेंट के पीछे दौड पडे। रेजिमेंटल हवलदार मेजर ने रेजिमेंट की 'विधाम' की पोजीशन में खड़ा किया और रेडियो मेकनिक को फटकारने लगा। सीढ़ी-दर-सीठी नीचे के अफसर पर अपनी जिम्मेदारी धकेलने का मह क्रम बही डिमिप्तिन के साथ पूरा हुआ था। लेकिन इसके बाद? 'शपथ-परेड' शुरू की जाये या नहीं? या परंड को गरम मानकर 'डिस्पसं' का आदेश दे दिया जाये ? सी० ओ० साह लौटकर आने वाले है या नहीं ? इन सवालों के जवाब किसी के पास नहीं थे। हर किसी ने अपनी जिम्मेदारी अपने मातहत के हाथों में मोपकर अपना छुटकारा कर लिया था। अब साढ़े ग्यारह बजने को थे। सुबह साढे मात मे जवान धूप में गड़े थे।

मार योजनाएं शुरू हुई। उसका उत्साह बढ़ रहा था। लेकिन उसके साथी खुश नहीं थे। क्योंकि अव रात-दिन काम, सफ़र और खाने-पीने की तकलीफ़ ज़रूर होने वाली थी। लेकिन रूटीन में फ़र्क पड़ने जा रहा था, इसलिए वह बहुत खुश था। उसकी डिवीज़न अपनी मूल जगह से सौ-डेढ़ सौ मील दूर आगे निकल चुकी थी। युद्ध की ड्रेस-रिहर्सल शुरू थी। पड़ोस में चंद मील की दूरी पर दुश्मन की डिवीज़न का इलाक़ा पड़ता था। ऊँचे स्तर पर हर यूनिट की कार्रवाई की योजना तैयार की जा रही थी। उनकी हलचलें नोट की जा रही थीं। दोनों पक्षों की डिवीज़नें एक-दूसरे को शह देने की कोशिश में थीं। आर्मी हेडक्वार्टर से इनकी हरकतों पर नज़र रखी जा रही थी। कई कंपनियाँ, सेक्शन और प्लैटून वीस-वीस, तीस-तीस मील की यात्रा करके अपने ठिकाने वदल रहे थे। मोवाइल क्वार्टर कोर की अड़चनें, अलग-अलग प्रदेशों की भौगोलिक विशेषताएँ, फ़ौजी दृष्टि से अलग-अलग हिस्सों का महत्व आदि छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दिया जा रहा था। नक़शों पर रंगीन माथे की पिनें लगाकर यूनिटों की आगामी कार्रवाई का संकेत दिया जा रहा था। उसकी कंपनी उस खेत में पिछले कई दिनों से डेरा डाले पड़ी थी। वहाँ पहुँचने पर ऑपरेटरों ने दो दिन तक गढ़े खोदने का काम किया। अफ़सर कभी डाँटते, कभी गुस्सा करते तो कभी पुचकार कर उनसे काम लेते। सिग्नल सेंटर को अंडरग्राउन्ड कर लिया गया था। गढ़े खोद-खोद

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चार योजनाएं शुरू हुई। उसका उत्साह बढ़ रहा था। लेकिन उसके साथी खुश नहीं थे। क्योंकि अव रात-दिन काम, सफ़र और खाने-पीने की तकलीफ़ ज़रूर होने वाली थी। लेकिन रूटीन में फर्क पड़ने जा रहा था, इसलिए वह बहुत खुश था। उसकी डिवीज़न अपनी मूल जगह से सौ-डेढ़ सौ मील दूर आगे निकल चुकी थी। युद्ध की ड्रेस-रिहर्सल शुरू थी। पड़ोस में चंद मील की दूरी पर दुश्मन की डिवीज़न का इलाका पड़ता था। ऊँचे स्तर पर हर यूनिट की कार्रवाई की योजना तैयार की जा रही थी। उनकी हलचलें नोट की जा रही थीं। दोनों पक्षों की डिवीज़नें एक-दूसरे को शह देने की कोशिश में थीं। आर्मी हेडक्वार्टर से इनकी हरकतों पर नजर रखी जा रही थी। कई कंपनियाँ, सेक्शन और प्लैटून बीस-बीस, तीस-तीस मील की यात्रा करके अपने ठिकाने बदल रहे थे। मोवाइल क्वार्टर कोर की अड़चनें, अलग-अलग प्रदेशों की भौगोलिक विशेपत्ताएँ, फ़ौजी दृष्टि से अलग-अलग हिस्सों का महत्व आदि छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दिया जा रहा था नक़शों पर रंगीन माथे की पिनें लगाकर यूनिटों की आगामी कार्रवाई के संकेत दिया जा रहा था। उसकी कंपनी उस खेत में पिछले कई दिनों से डेरा डाले पड़ी थी वहाँ पहुँचने पर ऑपरेटरों ने दो दिन तक गढ़े खोदने का काम किय अफ़सर कभी डाँटते, कभी गुस्सा करते तो कभी पुचकार कर उनसे व लेते। सिग्नल सेंटर को अंडरग्राउन्ड कर लिया गया था। गढ़े खोद-खं समा 45 । उसके कर कंधे और कमर दर्द करने लगे थे। तीन फुट लब, दस फुट चौडे और आठ फुट गहरे गड़े में निम्नल भेंटर हिना या। तमाम दिन परियम करने के बाद रात में नाइट-सेन्ट्री की ड्यूटी करनी पड़ती थी, सो अलग। डिकी काम से कभी कतराता नहीं था। यहां भी कामचोर और चापलूस नोन मौजूद थे, उन्हें तो आराम मिल ही जाता था। दोन्डाई सौ गज की दूरी पर ओ बार० के टेन्ट थे। योडी दूरी पर इधर की तरफ़ अफ़मरों के डेरे ये। टेन्दों के अहाते में छोटी मे और कुर्मियों पड़ी थी। यह एरिया उनकी रेजिमेंट में अन्नी-नन्चे मौल की दुरी पर था। यहाँ मानो फोल्ड एरिया का पूरा हेडक्वार्टर खड़ा कर दिया गया था। उसका एक्सचेंज गिनता एक्सचेंज से जोड़ दिया गया या। स्कीम गुरू हो चुकी थी। पहले ही दिन उसे इस जगह भेजा गया या। वे अपनी जीप में ट्राममोटर रखकर यहाँ दाखिल ये साय दो ऑपरेटर और एक ड्राइवर या। बिलकुल ठोक वक्त पर उनको जीर यहां पहुंच चुकी थी। उसके सभी साथी अपने घधे में होशियार थे। ड्राइवर सिह और डिकी दोस्त थे। जीप को और उसने बड़ी मुस्तैदी में तीस फुट वाला 'एरिअल माम्ट' सडा किया और सेट ऑन किया। उमकी तकदीर अच्छी थी। कट्रोल स्टेशन से सपर्क स्थापित करने में वह कामयाब हो गया। कुछ ही मिनट में अस्सी मील की दूरी पर स्थित कंट्रोल स्टेशन को उसने रिपोर्ट किया कि वह निर्धारित जगह पहुंच गया है। कट्रोल को उसके सिग्नत बहुत साफ मिल रहे थे, लेकिन कट्रोल से वापत आने वाले निग्नल कमजोर थे, पर यह स्वाभाविक था, क्योकि रास्ते में ग्यारह के०वी० की हाइटेंशन लाइन आडी दिशा में जाती थी। रिपोर्ट कर चुकने के बाद उसने कंट्रोल वाले नायक से उधर का हालचाल पूछा। 'मोम-को' पर उसकी उंगलियां फुर्ती से चल रही थी। डा-डिट्-डा ..डा- डा-डा...डिट्-डिट-डा...डिट-डा-डिट् । एक-डेड मील की दूरी पर मिलिटरी ट्रकों के काफिले बीच-बीच में दिसायी पड़ रहे थे। दूसरे दिन सफेद झडा फहराती एक जीप उनके करीब आकर रुकी। बांह पर 'सफेद पट्टी लगाये मेजर साहब जीप से उतरे। दो डिविजनों के बीच अनुशासन, काम के तरीके और मूवमेंट पर प्रत्यक्ष नजर । - 5 रोवो खने वाला अम्पायर स्क्वाड का एक अफ़सर भी उतरा। उसने डिकी को फ़ी परेशान किया। सांकेतिक नामों के बारे में पूछताछ की, ट्रांसमीटर की बैटरियां, स्टेशनरी, एरिअल मास्ट, डेली रेकार्ड और कई दूसरे काग़जात आदि छोटी-मोटी चीजों की जांच करके वह टेन्टों की तरफ़ चल दिया। उसने महसूस किया कि टेन्टों के चारों ओर खुदी 'स्नेक ट्रेन्चों' की गहराई कुछ कम थी। अंदर की जमीन भी समतल नहीं थी। 'फ़र्स्ट एड' और 'डिसिप्लिन' पर ऊबा देने वाला छोटा-सा भापण झाड़कर और सैल्यूट लेकर उनकी जीप धूल उड़ाती हुई निकल गयी। दो दिन शांति से गुजरे। तीसने दिन कुछ तीन टन वाले ट्रक वहाँ आ पहुँचे। गाड़ियों से उतरते ही जवान फटाफट काम में जुट गये। टेन्ट गाड़े गये। एक तरफ़ आर्मी मेडिकल कोर का मेडिकल-रूम बन गया, इसके अलावा दूसरे रिसालों के जवान भी वहां मौजूद थे। उन्होंने अपने-अपने टेन्ट गाड़े। दूसरे दिन शाम तक वहां तीस-चालीस टेन्ट खड़े थे। पास ही के इनफैट्री यूनिट वाले कर्नल ने अपने सिग्नल यूनिट को कुछ संदेश भेजे। सुबह पांच बजे ट्रांसमीटर ऑन करके कंट्रोल रूम से संपर्क स्थापित करना पड़ता था। फिर तमाम दिन दो-दो घंटे के अंतराल से कॉल चालू रहते, संदेश आते-जाते रहते। वहाँ एक वात अच्छी थी, काम बहुत था, लेकिन यूनिफ़ार्म की इस्त्री कोई चेक नहीं करता था। जूतों की पालिश और ग्रास की चमक कोई नहीं देखता था। दाढ़ी के खूट निकल आये थे, फिर भी किसी को शिकायत नहीं थी। पाँचवे दिन आठ बजे रात को डिकी ने कंट्रोल-स्टेशन को अपना आखिरी संदेश भेजा, रूटीन रेकॉर्ड तैयार किया। नौ बजे वाले कॉल अटेंड न कर की इजाजत उसने पहले ही मांग ली थी। कंट्रोल-स्टेशन ने उसे आगाम सुबह के पांच बजे वाला कॉल देकर गुडनाइट किया था। डिकी ने रूढसि को आवाज़ दी। दोनों ने मिलकर ट्रांसमीटर-सेट जीप के बाहर किया वैटरियां निकाल दी। पूरा सामान निकाल लिया। जीप का पिट हिस्सा खाली था। डिकी के दूसरे दो साथी सोने की तैयारी में थे।

रोबो 47 डिकी की योजना पसंद नहीं थी, लेकिन नाराज होने के अलावा वे कर भी क्या सकते थे? डिकी सीनियर था, इसलिए वै उममे दवे रहते थे, यह मही था कि अगर कुछ बसेड़ाखडा हो जाता तो उन्हें भी परेशान होना पड़ता। डिकी को अपनी वैवकूफी का पता था, पकड़े गये तो चौदह या इक्कीम दिन की सजा काटनी पड़ेगी। हदसिंह भी बच नहीं पायेगा। कुछ भी हो, डेट की पूरी जिम्मेदारी तो हिकी की ही थी। रात के अंधेरे में वे अपनी जीप को ढकेलकर रोड पर ले आये। स्टुमिह का गांव वहां में मि] वीस मील की दूरी पर था। गांव मेनरोड से जरा हटकर या। पर रास्ता अच्छा था। लेकिन मुमीवत यह थी कि वह गांव 'दुश्मन की डिवीजन के इलाके में पड़ता था। मेनरोड में गुजरता खतरे से खाली नहीं था। चक्कर काटकर ही पहुंचना पड़ेगा। मिह घर जाने के लिए उतावला था। शादी के फौरन बाद उसको छुट्टी कैमिल कर दी गयी थी। 'झूठमूठ की इस लड़ाई में शरीक होने के लिए लौट बाना पड़ा था। जीप को धनकर वे काफी दूर तक ले बामे थे। बगल-बगल वाले टेन्ट पीछे छूट चुके थे। रूदसिंह ने जीप चालू की। गांव पहुंचने तक माझे ग्यारह बज चुके थे। डिकी ने स्वमिह को आगाह किया, "देग्यो, माद रखो, किसी भी हालत में तीन वने जोर यहाँ से चल पड़नी चाहिए।" रूसिंह ने उससे पर चलने का अनुरोध किया, लेकिन हिकी ने इन्कार कर दिया। सिंह के हिस्मै में मिदं साढ़े तीन घंटे देव थे। इतने कम ममप में कर घर के लोगों को उठायेगा, कब मां-बार बोर माई-बहनों में बातचीत करेगा, और फिर कब बीवी को प्रसाने जाकर उसके संग सोयेगा? स्टियरिंग हील पर सिर टिकाकर हिकी ने आव दद कर नीं। पेटकोट में दुवककर वह आराम से सो माता पा, लेकिन रुदमिह पर भरोसा करने को वह तैयार नहीं था। बीच-बीच में नीद मूल जाने पर वह घड़ी की तरफ देखता। उसकी आँख खुली। चांद पश्चिम की तरफ झुक पका पार पौने दोन वरने को । मोर पहर को टडी हवा वह रही थी। जीप में नीचे उतरकर .

बा . . - हट ली। दूर मे कुनों के मांकन की आवाजें आ रही थीं। बढ़े न भाव गे वह गली के नुक्काद तक गया, और फिर माइसिंह के न में आकर बढ़ा रहा। पांच मिनट बीते, दस मिनट बीते । मिनट की बारह पर आ चुकी थी। नीन बज चुके थे। वह वेचन हो रहा था। आई हेट टु डट । मेरे बम की बात होती तो, बेटाजी, मैं तुम्हें दिन नकलने तक तकलीफ़ न देता। लेकिन...००, पांच मिनट ग्रेस।" उमे ठंड लग रही थी। वह दरवाज़ तक पहुँचा और धीरे से किवाड़ खोले । किवाद चरमराये। गरदन अंदर करके उसने धीर से आवाज़ लगायी, "मन सिंह...........सिंह...!" कोई जवाब नहीं मिला। उसने महसूस किया कि बरामदे के दायीं तरफ़ के कमरे में कुछ खुसर-फुसर चल रही है । "मनुसिंह, चलो माई, तीन बजे हैं, जल्दी करो।" वह लौट आया और दीवार से पीट टिकाकर इंतजार करने लगा। पांच मिनट और निकल गये, अब उसे झुंझलाहट हो रही थी। किसी की 'भावनाओं का ध्यान रखने का यह समय नहीं था। वह फटाक-से मुड़ा, अंदर दाखिल हुआ, कमरे के करीब गया और दीवार से मुंह सटाकर चीख "रूढ़सिंह के बच्चे, ब्लडीफ़ल जल्दी करो, वेवकूफ़ी मत करो।" भीतर रूढसिंह की दवी-दवी आवाज़ आयी, "वस, दस मिनट उस्ताद, प्लीज अंदर की खुसर-पुसर और हरकतें साफ़ सुनायी दे रही थीं। एक झल वह कुछ क्षण के लिए पीछे हट गया और दरवाजे पर हाथ रखकर में खड़ा रहा। फिर जूतों को फ़र्श पर पटकते हुए वह बरामदे रे आया और खिड़की के पास जाकर तेज आवाज में कहने लगा, भगवान के लिए उस सुअर को बाहर निकालो। अभी, इसी वक़्त वह बाहर चला आया और जीप में आकर बैठ गया। वीत चुके थे, रूढसिंह बाहर निकल आया था। उसके साथ थी। सुबह की धुंधली रोशनी में उनकी शक्लें धुंधली-धुंधलीन थीं। दरवाजे के पास आकर बीवी ने उसके कंधे जोर से लिपट गयी। सिसकियां दवाने की कोशिश में उसका शरीर रूढसिंह उसे समझा रहा था। उसने बीवी को धीरे से अ ही क्षण के लिए वह उससे अलग हुई थी, पर फिर दुगने रावी 49 लिपट गयो। उम्र में वह बहुत छोटी मालम पढ़ रही थी। दसिंह बड़ी लाचारी से हिको की तरफ़ देख रहा था। उसने औरत की पीठ पर हाय फेरा । दवी आवाज में वह उसको कुछ समझा रहा था। डिकी ने अपनी घड़ी देखी । पौने चार बज रहे थे। साढे चार बजे सारे जवान सुदकों में जाने वाले थे। डिकी ने नजरें फेर ली। स्टियरिंग होल के बीच में उसने अपनी मुट्ठी जोर से मारी। पो5ss हॉर्न बजा। जब उसे पता चला कि रूढसिंह आकर बगल में बैठ गया है तो उसने कहा, "आई ऐम सॉरी!" मिह ने गाड़ी स्टार्ट को। उसकी नजर सामने थी। उसी रास्ते से लौटने का मतलब या, पहुंचते-पहुंचते साडे पांच बज जाते। तव तक तो सभी जवान खंदकों में दाखिल हो चुके होंगे। अम्पायर लोग मुआइने में लगे होंगे। मिलिटरी-पुलिम तो होगी ही। उसी रास्ते से गुजरना खतरे से खाली नहीं था। पकड़े जाने का बहुत डर था। हर हालत में वक्त पर तो पहुंचना ही होगा। डिकी ने फैसला किया, "रुद्धसिंह, जीप मीधे मेनरोड से ले लो।" जीप तेजी में भागो चली जा रही थी। कुछ ही मिनट में वे मेनरोड पर थे। मोड़ से कुछ उघर की तरफ 'चेक पोस्ट' दिखायी दे रहे थे। लाल- टेन के उजाले में संतरी की छाया साफ दिखायी पड़ रही थी। "स्पीड बढ़ाओ !" डिको ने हॉर्न बजाया। संतरी के दिमाग में कुछ आने से पहले ही जीप आगे निकल चुकी थी। डिको ने इतमीनान की सांस ली । लेकिन अमलो खतरा तो आगे था। अभी 'एनिमी एरिया' चल रहा था । सीमा पर दोनों पक्षों के 'चेक पोस्ट' होंगे। इस रास्ते चले आने का फैसला गलत तो नहीं था? इतनी तेज सर्दी के बावजूद डिकी के माये पर पसीने की बूंदें पर रही थीं। सड़क के मोड़ पर, उसने देखा कि एक जीप खडी थी। खेल खतम ! यह जीप अम्पायर स्क्वाड के सिवा किसी की नहीं हो सकती। सहक के एक किनारे खभे पर लालटेन लटक रही थी। लालटेन की मद्धिम रोशनी मे मंगोन लिये संतरी खड़ा था। वह इन्ही को जीप की तरफ देख रहा था। शायद जीप की आवाज सुनकर वह चौकन्ना हो गया था। चूंकि संतरी एक ही जगह पर खड़ा था, इसलिए आगेवाली जीप में किसी के होने की 50 रोवो संभावना नहीं थी। रास्ता रोकने वाली वल्ली ऊपर उठी हुई थी। उस पर लगी लालटेन अधर में लटक रही थी। अव संतरी रोड के बीचोंबीच आ गया था। डिकी ने रूढ़सिंह को देखा। उस अँधेरे में भी वह पहचान गया कि रूढसिंह पसीने से तर है। डिकी ने उसका कंधा थपथपाया। “ईजन बंद न करना।" उसकी आवाज़ में कुछ थरथराहट थी। शायद आगेवाली जीप 'अम्पायर' की नहीं थी, क्योंकि वह खाली थी। संतरी अपनी जगह से हिला । वह जीप की तरफ़ बढ़ रहा था। डिकी फुर्ती से पीछे मुड़ा। उसने स्टेशनरी में से मैसेज-पैड उठाया और उसे हाथ में लेकर पन्ने उलटते हुए वह आगे बढ़ा। उसने ग्रेटकोट पहन रखा था, इसलिए उसका यूनिफ़ार्म दीख नहीं सकता था। उसकी वेरे कैप अफ़सर-टाइप वनपीस की थी। जीप से सात-आठ फूट पर उसने संतरी को टोका। राइफ़ल आड़ी करके 'तान शस्त्र' की पोजीशन में संतरी उसे चैलेंज करने को ही था कि डिकी उस पर गरजा, "संतरी, यह जीप रास्ते में क्यों खड़ी है ? बेवकूफ़, कौन है तुम्हारा गार्ड कमांडर ? बुलाओ उसे यहाँ । कहो, मेजर साव बुलाता है। दोड़ो, क्विक" कुछ क्षण के लिए संतरी भ्रम में पड़ गया। उसने जीप की तरफ़ देखा, फिर डिकी की तरफ़ देखा, और एकदम'टेन्ट की दिशा में दौड़ पड़ा। 'रूढ़सिंह... ...!" झपटकर जीप आगे बढ़ी, और सड़क पर भागने लगी। पीछे संतरी की आवाज़ आ रही थी, “गार्ड कमांडर,...गार्ड कमांडर !" रूढ़सिंह ने वुलेट की रफ्तार से जीप छोड़ रखी थी। वह अपने ठिकाने से एक फलांग इधर आकर ही रुका। दोनों के बदन से पसीना बह रहा था। डिकी जीप के पीछे गया। रूढ़सिंह एक हाथ से स्टियरिंग सँभाले, गाड़ी ढकेल रहा था। चार वज- कर बीस मिनट हो चुके थे। जवान जूते पहनने में लगे होंगे। इस वक्त उनका ध्यान विचलित नहीं हो सकता था। दस मिनट बाद सीटी बजने वाली थी। कंप का हर जवान खंदक में दाखिल होने वाला था। दोनों की सांस फूल रही थी। डिकी को लग रहा था, कहीं उसकी छाती फट न जाये । हर क्षण क़ीमती था। अव जीप एरियल-मास्ट तक पहुंच चुकी थी। डिकी पीछे मुड़ा।

रोवो 51 उसके साथी टेन्ट के बाहर पड़े थे। वे टेन्ट की तरफ़ दो और ट्रासमीटर लेकर जीप की तरफ लपके। सीटी बजी। सीटो की तेज धार अंधेरे को चीरती हुई चारों ओर फैल गयी। सदसिंह दोडकर टेन्ट में घुसा। तीनो, राइफलें लेकर पदक की तरफ़ दौडे। डिकी ने फुर्ती से ट्रांसमीटर का एरियल जोडा। उमके माथियों ने जीप में बंटी फेंकी और संदक की तरफ दौड़ पड़े। डिकी ने मेट ऑन किया। कुछ ही मिनटो में क्ट्रोल-सेटर से जान-पहचाने सिग्नल सुनायी देने लगे। उमने झीश्वेमी-मीटर ट्यून किया । 'की' पर उसकी उंगलियां दौड रही थीं। बायें हाथ से उसने रूद्धसिंह का हैवरसंक खोला, रम को वोवल निकाली, दांतों से सील तोड़ी। कारी: रम का एक पूंट गले को जलाता हुआ उनके पेट मे उतर गया। उसके बाद तीन दिन के भीतर-भीतर वहाँ एक पूरी कपनी दाखिल हो चुकी थी। कैप्टन भारद्वाज भी आया था। उसने सभी ऑपरेटरी को काम पर लगाया । अडरग्राउन्ड सिग्नल सेंटर बनाया गया। डिकी अब ऑपरेटरों के माय अंडरग्राउन्ड सिग्नल सेंटर में काम कर रहा था। 'स्कीम' ख़त्म हो जाने पर उसकी कपनी जब वापस लौटी तब तक कैप्टन भारद्वाज मेजर हो चुका था। उसको कंपनी ने 'कम्युनिकेशन' बहुत बढिया मेनटेन किया था। रान-दिन ड्यूटी करके ऑपरेटरो के चेहरे फीके पड़ गये थे। जिस्म पर मिट्टी की परतें जमी थी। पता नहीं, कितने दिनों से कपड़े बदलने का मौका भी नहीं मिला था। सोते वक्त भी बदा वूट पांवों में पहने रहना पड़ता था। एक बात बहुत अच्छी थी। यहां के अफमर फालतू की डिसिप्लिन, मल्यूटिंग वगैरह के मामले में इतने चौकम नहीं थे। फिर भी कैप्टन भारद्वाज जैसे-तैसे वक्त निकाल लेता और आघ घटे का लेक्चर तो झाड ही देता ! स्कीम में दो नये लेफ्टिनेंट दाखिल हुए थे। कैप्टन भारद्वाज ने उन्हें बहुत रगड़ा। बेचारे परेशान थे। सहमे-सहमे घूमते रहते । ओ. आर० के माय बड़े अदव मे पेश आते । एक दिन कंप्टन भारद्वाज ने उन्हें ।

रोबो - ने टेन्ट के बाहर 'अटेंशन' खड़ा कर रखा था। सुबह आठ बजे से लेकर रह बजे तक धूप में एक ही जगह पर खड़े रहे थे वेचारे। डिकी को न पर तरस आया। लेकिन, अब तक इन्सानियत से पेश आने वाले ये नों यहाँ के हथकंडों में इतने माहिर हो गये थे कि कुछ ही दिनों में अपने तहतों पर अफ़सरी रोव झाड़ने लगे थे। आखिरी दिन था। टेन्ट लपेटे गये। कैम्प का नामोनिशान मिटा दिया गया। अंडरग्राउन्ड सिग्नल सेंटर का गढ़ा भर दिया गया। जमीन पर घास विलेरकर जगह को सामान्य बना दिया गया, ताकि कोई पहचान न पाये कि यहाँ सिग्नल सेंटर बनाया गया था। काग़ज़ और सिगरेटों के टुकड़े तक साफ़ कर दिये गये । सफ़ाई का काम कैप्टन भारद्वाज की निग- रानी में पूरा हुआ। भारद्वाज ने मौके का फायदा उठाकर एक लेक्चर झाड़ ही दिया। बताया कि युद्ध के दौरान सीक्रेसी की क्या अहमियत होती है और यह कि किन-किन चीजों का ख़याल रखना पड़ता है। तीन टनवाली ट्रकों में सामान भर दिया गया। डिकी यूंही घूमता हुआ अफ़सरों के टेन्टों की तरफ़ आ निकला। जिस जगह कैप्टन भारद्वाज का टेन्ट गड़ा था, उसके करीव वाले खेत की मुंडेर के सहारे वियर की बोतलों का तीन- चार फुट ऊँचा ढेर धूप में चमक रहा था। पूरी दोपहर, और तमाम रात सभी गाड़ियां दौड़ती रहीं। सुबह जब उसने बाथरूम में अपने कपड़े उतारे तो शर्ट और पैन्ट वेकार हो चुके थे। उसने नल के नीचे सिर कर दिया। मोरियों से गन्दा लाल पानी बह रहा था। डेढ़ महीने से शरीर पर जमी मिट्टी और पसीना धोने के लिए सभी जवान ठंडे पानी की धार के नीचे जा बैठे थे। दो दिन की छुट्टी थी। कैप्टन भारद्वाज मेस में बैठा बॉन्डी पी रहा होगा, क्योंकि उसकी 'स्कीम' काम- याब हुई थी और वह अब मेजर भारद्वाज बन चुका था। डिकी कमर पर से मैल की परतें खुरचने की कोशिश कर रहा था।

पाँच सिख इनफैट्री रेजिमेंट में टेंपरेरी ड्यूटी पर आये डिकी को दो महीने हो चुके थे। यहां के माहौल से डिकी खुश था। यूनिट के अफसर और ओ० आर० कई साल मे इसी यूनिट में काम कर रहे थे। इसलिए पूरी रेजिमेट का माहौल भाईचारे का-सा था। रेजिमेंट-कमाडर कर्नल फिलिप्स के साथ डिको की पहली मुलाकात बडी दिलचस्प थी। डिकी अपनी वनटनर स्टेशन-वैगन मे ट्रासमीटर पर बैठा था। यह बैंगन खास मोवाईल कम्युनिकेशन के लिए बनायी गयी यो। तीन घटे से वह कट्रोल-स्टेशन से संपर्क स्थापित करने की कोशिश कर रहा था। कल मे उमकी कोशिश चल रही थी, लेकिन अब तक कॉन्टेक्ट नहीं हो सका था। आसमान बादलो से ढका हुआ था। सुबह से डायल घुमा-धुमाकर कट्रोल-स्टेशन के सिग्नल पकडने की उसको कोशिश नाकाम रही थी। मोम- की पर कंट्रोल के सदेश के सकेत भेजते रहने की कोशिशो से वह अव थक गया था। कान पर लगे हेडफोन को आवाजो से उसके कान सुन्न हो गये थे । इस परेशानी में वह मुबह का नाश्ता भी नही कर पाया था । अब तो वक्त निकल चुका था। बार-बार कॉल करने से उसके हाथ ददं कर रहे थे। किसी भी वक्त कंट्रोल-स्टेशन से, ड्यूटी सिग्नल अफसर को जवाब- तलवी की कॉल आ सकती थी। वह ऊब गया। उसने सेट ऑफ कर दिया। हेडफ़ोन उतारकर रख दिया और हैवरसक से मंगफलियां निकालकर खाने लगा। पीछे की तरफ कुछ आहट हुई। हाफ-पैट से बाहर निकली 54 रोवो - . -- मजवूत जाँचे और गठी हुई पिंडलियाँ दिखायी दीं। एक आवाज़ आयी, "क्यों उस्ताद, कंट्रोल से संपर्क हो गया क्या?" "नहीं यार...साला न जाने कहाँ मर गया ! कल से दिमाग़ खराव कर रहा हूँ। आओ, मूंगफली खाओ।...आज ब्रेकफ़ास्ट तो...." डिकी को लगा कुछ ग़लती हो रही है। उसने पीछे मुड़कर देखा। हाफ़-पैट में शर्ट अंदर किये लाल चेहरे वाला कर्नल फ़िलिप्स खड़ा था। बड़ी शांति से वह डिकी की तरफ़ देख रहा था। डिकी हड़बड़ाकर उठ खड़ा हुआ। उसका सिर गाड़ी की छत से टकराया। सिर पर हथेलो रखकर वह धम से नीचे वैठ गया। "सॉरी सर, मैं समझा..." कर्नल फ़िलिप्स ने उसे रोका। "दैट्स ओ० के०, कोशिश जारी रखो। संपर्क होते ही मुझे खवर करो। और अर्दली से कहकर नाश्ता यहीं मंगा लिया करो। कल से मैं मेस-कंमाडर से बात कर लूंगा।" उसके बाद डिकी ने कर्नल फ़िलिप्स को कई वार ग्राउंड पर देखा था। ग्राउंड के एक छोर से दूसरे छोर तक राइफ़ल लेकर क्रासिंग करते हुए कर्नल फ़िलिप्स को सब जवानों के आगे पाया था। कर्नल फ़िलिप्स सच्चा अफ़सर था। वास्तव में वह लीडर पहले और अफ़सर बाद में श। वाक़ी लोग सिर्फ अफ़सर थे। उसकी नज़रों में सब जवान समान थे। एक ही की तरह दूसरा। सबके साथ उसका वर्ताव एक-जैसा था। फ़िलिप्स हर जवान को इंसान समझकर उससे पेश आता था। डिकी को शेखू की याद आयी । जब भी अफसरों के बारे में चर्चा होती, शेखू चिढ़ जाता था। वह कहता : "अंग्रेजों के जमाने में यह सव ठीक था। सभी अफ़सर हुक्म चलाने वाले होते थे, क्योंकि वे हाकिम देश के नुमाइंदे थे। सारे जवान गुलाम मुल्क के नुमाइंदे थे। अफ़सर अंग्रेज़ थे, और जवान हिंदुस्तानी । इस बुनियाद पर आपसी वर्ताव तय किये जाते थे। इसलिए उनका रोव जमाना ठीक था । हुकूमत करने वाले चाहते भी यही थे। आजादी के बाद यह दीवार टूटनी चाहिए थी, तोड़ी जानी चाहिए थी। बदकिस्मती से हमारे ज्यादातर अफसर इस बात को समझ नहीं पाते । इस तरह का आवश्यक परिवर्तन रोदी 55 नाने के लिए कोई वैयार नहीं । आज भी दे लोन ब्रिटिग अमरों की तरह घमंड में रहते हैं।" जडू का कहना कुछ हद तक सही था, पर फिलिम व्यक्ति इसके सपवाद हैं । अपने आचरण में ये लोग जाने-अनजाने उस दीवार को दोड़ने की कगमकन करते रहते हैं। लेकिन यह दीवार इतनी मजदूत है कि उनके अपान अधूरे मादिन होते हैं, निरयंक रह जाते है । पर्नल फिलिप्प के लिए जवानों के मन में बहुत इज्जत थी,प्यार था। कुछ दिन बाद लान्म-नायक शेङ्क सी मिन्ब रेजिमेंट में बाया। जेनु बार टिकी महरे दोस्त दन गये थे। मेनू खाता अच्छा हॉकी प्लेयर था। गर्मियों के दिनों में, पूरे दिन नू बनती रहती। मिनल सेंटर में, मोटे हरे रंग के कपड़े पहनकर काम करना नामुमकिन या। राठ के दोनाई बजे तक गरम लू चलनी हो रहती थी। निम पर मच्छरदानी लगाना कानूनन जरूरी था। डिकी को मच्छरदानी के अंदर घुटन होती थी। वह "रोल-कॉल' से पहले मच्छरदानी तान देता। और रात में सोते समयलाइट ऑफ होते ही मिर बाहर निकालकर मो बाता। इतनी तेज गर्मी में मच्छरों की नस्ल पनप ही नहीं सकती थी। 'मलेरिया प्रिकॉगन' न हुआ, एक अग्नि-परीक्षा हो गयो ! मूरज डूदने के बाद नंगे बदन रहना सद्ध मना था।परों में मोडे,पूरी वास्तीन की कमोड, गले तक दटन बंद, सिर पर टोपी, मिर्फ़ हायों के बटन म्बुले हुए, दम। यह कानून था। इसे तोड़ना, या उसके नहीं होने पर शक जाहिर करना भी गुनाह या। मूबेदार साह्य कमी-कभार 'रोल-कॉल' के दस बचानक आ जाते थे। तब पापचे उठाकर मोडे दिवाने पहने ये। अगर किमी के मौजे न हों और उसने आधी आस्तीन की कनोज पहन रखी हो तो अगले दिन सुबह चने दफ्तर में हाजिर होना पढ़ता था। इसके दावजूद रान में लाइट-ऑफ के बाद जब, कंपनी-हवलदार का राउंड खत्म हो जाता तो डिको बौर गेवू वैरक के पाम को हांको- प्राउंड पर अपनो साटें दिठा लेने और वहीं सो जाते। शेदू जब भी बात करने लगवा, डिको को दलबीरसिंह याद आता। "तड़ाई में शहीद होने का शौक मुझे नहीं है।" विस्तर पर लेटे-लेटे गैबू बोलने लगता । दोलते-बोलते वह उठ बैठता। सरदार होने के बावजूद 56 रोबो वह दाढ़ी मुंडवाता था और बाल भी कटवाता था। "मेरा जन्म, विलकुल स्वाभाविक है। माँ की कोख में मैंने पूरे दिन काटे हैं। इसलिए मुझे मृत्यु भी उतनी ही स्वाभाविक चाहिए। बुढ़ापा काटकर ही मैं मरूँगा । जंग के मैदान से भाग आने में मुझे कोई शर्म महसूस नहीं होगी। मुझे कभी नहीं लगेगा कि मैंने अपनी आत्मा को धोखा दिया है।" "आखिर हम फ़ौजी, क्यों जिंदा रहते हैं ? किसलिए लड़ते हैं ? किसलिए मरते हैं ? जब उनका वजूद ख़तरे में पड़ जायेगा तव हमारी याद की जायेगी। फ़ौज जव सरहदों पर होगी, रेडियो पर जवानों क स्तुतियाँ गायी जायेंगी। अखवारों में वीर-रस की कविताएँ निकलेंगी उन कीड़ों के लिए हम अपनी जिंदगी तो वरवाद कर ही रहे हैं। उन्हीं के लिए अपनी जान क्यों गवायें ? नहीं डिकी, नहीं, यह मुझे नहीं । तुम समझते नहीं हो। ये लोग अपनी सभ्य दुनिया को बचाये के लिए हमें मशीन बना देते हैं । अपनी इंसानियत को सुरक्षित रखने लिए हमारी इंसानियत का गला घोंट देते हैं। हमें पशु बना देते हैं । यू आ नॉट टु क्वेश्चन व्हाई ! हम मानो चंगेज़ख़ाँ की संतान हैं, कि सामने आ वाले हर आदमी के पेट में संगीन भोंककर आँतें बाहर निकाल लें और उ आँतों में 'वीर चक्र' पिरोकर गले में लटका लें और अपने को धन्य अनु करें। नहीं डिकी, नहीं मैं इंसानों के लिए मरने को तैयार हूँ, पर के लिए नहीं।" यह सब सुनकर डिकी परेशान हो जाता था। रुटीन में पूरे . और डिसिप्लिन से रहने वाला, टर्न-आउट, किट ले-आउट, सैल्यूटिंग आ में पूरी सावधानी बरतने वाला शेखू और इस तरह की बातें करने शेखू-इन दोनों के बीच ताल-मेल बिठाना बहुत मुश्किल था। खड़े-खड़े वह ऊब गया था। कभी ऊपर की तरफ़ देखता तो क जमीन की तरफ़ । सामने सी० एच० एम० 'डेली ऑर्डर' पढ़कर सुना था। कंपनी-हवलदार के इस फ़तवे को सुनना एक बोरियत थी। उस फ़तवे में एरिया कमांडर के आने की सूचना थी । आज से चौदह वाद सव-एरिया कमांडर यूनिट को भेंट देने वाला था। ऑर्डर पढ़ के बाद सी० एच० एम० ने उस पर अपना भापण शुरू किया-- - -- रोवो 57 "सब-एरिया कमांडर साहब के इन्स्पेक्शन के दिन स्पेशल परेड होगी। मव जवान, चाहे वे सिग्नल सेंटर शिफ्ट में हों या और किमी ड्यूटी में हो, चाहे नाइट ड्यूटी, चाहे ऑफ इमटी, हरेक जवान परेड में हाजिर होगा। आज से ही ड्रिल-प्रैक्टिस शुरू होगी। हरेक जवान रोज मुबह, और दोपहर को परेड ग्राउंड पर हाजिर रहेगा। किसी भी जवान को इसमें छुट्टी नही, समझे ? कोई डाउट? आगे, सव-एरिया कमांडर साहब के दौरे के दिन 'किट ले-आउट' होगा। हर जवान "किट ले-आउट' करेगा। किसी को अगर कोई आइटम इश्यू नहीं है, तो आज हो क्वार्टर-मास्टर से ले ले। आगे, वरक की मफाई...ऑफ शिफ्ट के जवान, ऑफ टाइम में बरक की सफाई करेंगे। वरक अंदर से, बाहर से, यूनिट के इर्द-गिर्द, दाय-बायें सव धमाधम मांगता हूँ। कल से गेम परेड़ वंद। सिर्फ कटिंग चलेगी, सिर्फ मफाई।" डिकी सोच में डूब गया। 'पेशल ड्रिल', यानी रोज मुबह-शाम 'दापा, बायो...दायां-बामा', रात मे सिग्नल सेंटर शिपट, और ऑफ टाइम में यह सफाई और मह किट ले-आउट' सिपाहियों में बांटी गयी चीजो की नुमाईश लगाओ। पंन्ट, शर्ट, मोजे, मच्छरदानी, कवल, दरी, बूट, डोरी, सोपकैम और जाने क्या-रा! कपडो को खास तरीके से तह करो, जूतों को पॉलिश करो, वेल्ट के बदन चमकाओ और फिर सब पर मार्मी नबर लगाओ। और यह झमेला महोने में कम-म-कम एक बार तो करना ही पड़ता है। इसलिए दरी से लेकर मच्छरदानी तक सभी चीजो का अलग एक सैट तैयार रखना पड़ता है। इस पचड़े का क्या मतलब था, यह कभी उसकी समझ में नहीं आया था। . डिकी अगले दिन सुबह सिग्नल सेंटर जाने की तैयारी में था कि नायक जोशी वैरक में आया। "अरे, भाई कोई खून देने के लिए नयार है ? मत जरूरत है।" पहले तो डिको ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। आजकल मैकड़ों सिविलियन रक्तदान करके देश सेवा का पुष्य बटोर रहे हैं। आज- 58 रोबो "ओ उस्ताद, अपना 'ओ' ग्रुप हा कल दस-बीस रुपयों के लिए खून बेचने वालों की कमी नहीं है। कुछ के इस आरोप से कि मिलिटरी अस्पतालों में रक्त का काला बाजार है, डिकी खुद इन्कार नहीं कर सकता था। उसे यकायक एरिया-कमांड की विजिट की याद आयी। वह फ़ौरन नायक जोशी की तरफ लपका है, चलेगा क्या?" क़रीब दस बजे वह एम० एच० में हाज़िर हुआ था। खून देते वह सूवेदार साहब के साथ गपशप करता रहा। सूवेदार काफ़ी ग था। रिटायर होने के करीब आ चुका था। पिछले तीस साल मेडिकल कोर में सर्विस कर रहा था। पेंशन के बाद उसे इस उम्र में नौकरी देने वाला था? और वह दूसरा काम कर भी क्या सकता था इतनी-सी पेंशन में बच्चों की पढ़ाई भी नहीं हो सकती थी। इसकी फ़िक उसे थी। दो-चार साल और एक्सटेंशन मिल जाये तो भी ठीक वरना परेशानी-ही-परेशानी। डिकी मेज़ पर लेटा-लेटा सुनने का काम कर रहा था। दोनों की खूब जमी। सूबेदार ने मेज़ के नीचे लगी बोतल की तरफ़ देखा। आ भर चुकी थी। उसने डिकी से उठ जाने के लिए कहा। इसके बाद को तीन दिन के लिए 'सी' कैटीगरी और सात दिन के लिए 'बी' कैट मिली थी। मतलब तीन दिन का बेड-रेस्ट और सात दिन की लाइट इसके अलावा सूबेदार ने वादा किया था कि अगर उसे दस दिन के भी थकावट महसूस हुई तो वह उसे और सात के लिए 'वी' देगा। मूड में था, इसी बीच एक जवान नर्स बरामदे से निकलकर एड़ियों से खट की आवाज करती हुई दरवाज़े से बाहर चली गयी। डिकी की नजरें उसका पीछा कर रही थीं। वात सूवेदार साह ध्यान में आ गयी। "तुम्हारी ही गाँव वाली है। बड़ी काम की छोकरी है । बम्बई क्या नाम है, भला-सा, प्रभा या कुछ ऐसा ही...." सूवेदार को सलामी ठोंककर डिकी जल्दी-जल्दी ऊपर आया। एक वॉर्ड से निकलकर दूसरे वॉर्ड की तरफ जा रही थी। डिकी ने वढ़ाकर उसे पकड़ने की कोशिश की। प्रभा के वॉर्ड में दाखिल होने के . - न - रोगी 59 ही डिनरी उमरा कोडया'ले सवायाप्रमाने भी उमे जिनती नडगे में देग निया पाा प्रभाका गरीर बहा मुशेल पा। डिको पलता रहा, और मूनिट की तरफ निकल गया। नों पर माइन मारना अपने यम का रोग नहीं। माने व अफमर यही धमा करते रहते हैं। ओ० भार० वो कौन चिता परना है? पिन यह गर करने के लिए वात रिमक पाम है? 3-गिद और नाइट- शिएट फरने-करते यहाँ परेशान है। हममे यह रोग पाला नही जायेगा। पिन चीज बने धुरी नहीं है। मीन दिन तक सभी ड्यूटियों में उसे छुटकारा मिन गया था। दोपहर का वक्त था। उमे कोई काम नहीं था।वी जवान बेरक भी माई करने मैं सगं पे। उगने मिनल मेंटर में मुपरिटेट में वादा किया था कि यह नाइट-शिएट मे हाजिर होगा। उमा गिफ्ट मे, मे भी ऑपरेटरो कोनमी ही थी। उसने सिविल ड्रेस पहनी। पीछे की तरफ मेबपाउर पार पसं चाहर निकलने के लिए आउट-पान सेने का नियम पा। गेट पर मिलिटरी- पुलिम शिकार को पात में लगी रहती। बिना 'आउट-पाम' अगर मोरे पकड़ा जाता तो सजा निश्चित पी। ड्री के तीन दिन पहले से ही 'आउट- पाम के लिए नाम दर्ज करवाने पडते या बाहर निगलने की वजह सिगनी पढ़ती थी, तब 'आउट-पास' मिलता था। नौरन पर अदर जाने समय 'आउट-पाम' वापस करना पटना पा। दामित होते ही सपाटर-गाई में रिपोर्ट करनी पड़ती थी। इसक अलावा बाहर जाते यात या सो पूरी मिलिटरीस मे या मफेद पैन्ट, मफेद गई और काले रंग की गोल टोपी पाने विचित्र इम में पलना पड़ता था। टिकी के लिए दोनोगत मुमरिन नहीं पी। अब तक एक बार भी जमने 'आउट-साम' नहीं लिया था। पुलिस को चकमा देने की बड़ी अच्छी तरखी उमे मानम थी। निगलने यात बगल में एक-दो किता याम लो, चात में राफर पंद कर दो। बम, आमानी से बाहर निरता जा मरना था। वह यसस्टंट पर पहुंचा। महर जाने दाती बम पार पी। पमेवर चंड धुरे पै। यह दौड़कर चम में चर गया। एक नजर मजरों पर ली। मिग्नस मेंटर और टेलिफोन एक्मर में काम करने वाली निविरिष्न , 60 रोवो - लड़कियाँ शहर लौट रही थीं। सुरजित कौर को देखकर उसने 'विश' किया। अचानक उसकी नज़र प्रभा पर पड़ी। वह कुछ आगे, दायीं तरफ़ वाली सीट पर बैठी थी। इस बार वह साड़ी में थी। और बिल्कुल वैसे ही रंग का ब्लाउज़ । पीठ पर दो चोटियाँ झूल रही थीं। मुंह से अनचाहे 'वुल्फ़ ह्विसल' निकल गयी। तिरछी नज़रों से प्रभा ने पीछे की तरफ़ देखा, और बग़ल वाले युवक से बातें करने लगी। युवक शायद पंजावी था। कोई अफ़सर होगा। उन दोनों की बातें हिन्दी में चल रही थीं। वस के हिचकोलों में उनके कंधे आपस में टकरा रहे थे। युवक किसी बहाने उसे हँसाने की कोशिश कर रहा था। डिकी आगे बढ़ा और सीट के करीव आकर नीने झुका । पंजावी इलाके में एक मराठी लड़की का पाया जाना, बस यही व . प्रभा से जान-पहचान करने के लिए काफ़ी थी। पंजावी युवक बात करत जा रहा था। उसके कंधे पर उँगली से टैप करके डिकी ने कहा, "एक्स क्यूज़ मी," और फिर प्रभा की तरफ़ मुखातिब हुआ, "क्यों आप मह राष्ट्रियन तो नहीं ?" जवाब मिलने के पहले ही वह कहने लगा, ' हिन के स्टाईल और मैचिंग से पहचाना जा सकता है कि आप पूना की हैं।' प्रभा का अब तक कुछ नाराज़ लगने वाला चेहरा एकदम खिल उठा। "मैं पूना की नहीं, बम्बई की हूँ," उसने कहा। "तव तो फिर जम गयी। हम दोनों एक ही जगह के हैं।" वस फिर क्या था। कुछ ही देर में दोनों इस तरह गप्पें लड़ाने लगे बहुत पुराने साथी हों। दोनों भूल गये कि वे पंजाब में हैं और यह । उनकी वस जालंधर जा रही है। दोनों बम्बई की यादों में खो गये थे। व शहर के क़रीव आ चुकी थी। प्रभा ने डिकी से पंजावी युवक की है करवायी। "आप हैं कैप्टन ओमप्रकाश शर्मा। आर्मी मेडिकल कोर डॉक्टर हैं। और आप हैं डिकी, मेरे शहर के रहने वाले। 2... ऑपरेटर।" डिकी ने प्रभा को बताया था कि वह सिग्नल कोर में सिग्न मैन है। लेकिन पहचान कराते वक़्त प्रभा ने इस बात को बड़ी स..। टाल दिया था। डिकी कुछ क्षण सोच में पड़ा रहा । फिर उसने कहा, ऐम इन सिग्नल कोर, सर, सिग्नलमैन डिकी।" और उससे हाथ म. - रोबो 61 के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया। कैप्टन शर्मा कुछ क्षण हिचकिचाया। एक सिविलियन टेलीफ़ोन ऑपरेटर से हाथ मिलाना तो ठीक है. पर एक ओ० आर० से ! आखिरकार उसने अपना हाय बहाया। डिकी ने प्रभा को नरफ़ देखा । वह कुछ नाराज नजर आ रही थी। "वेल, आई एम पाउड ऑफ बीइंग एसोल्जर !" उसने उसको तरफ देखकर वहा । वह खिड़की के बाहर देखने लगी, "मुझे यहीं उतरना है। ओ० के०, मर, वाई !" वह एक झटके के साथ बाहर निकला। कंप्टन शर्मा के चेहरे पर तसल्ली झलक रही थी। डिकी ने देखा, दैट वास्टर्ड इजप्लोरड...! वह लस्सी-हाउस में दाखिल हुआ । ठडी लम्सी पेट में उतरी। उसका दिमाग जरा शात हुमा। वह वाहर आया और पास के सिनेमाघर में फिल्म देखने चला गया। सीढियां पार करके वह बालकनी में दाखिल हुआ। उसने देखा, उसकी पीछे की लाइन में कंप्टन शर्मा और प्रभा बैठे हुए हैं। उसने अपनी गर्दन नीचे झुका ली। टिकट का नवर और सीट मिलाने के बहाने वह उनके पास तक पहुंच गया। उसे देखकर वे आश्चर्य- चकित थे। "सो वी मीट अगेन ! हेलो सर !" वगल वाली कुर्मी पर बस्ते हुए उसने कंप्टन शर्मा को 'विश किया। कंप्टन मुमकराया, लेकिन उसकी आंखें मानो जल रही थीं, "टु हेल य गो!' शर्मा ने उसकी तरफ देखा। उसके चेहरे पर हलको मुसकराहट यो। डिको ने उधर बिलकुल ध्यान नहीं दिया । वम हिकी बिलकुल शात था। उसने अपनी टांगे सामने वाली कुर्मी की पीठ पर टिका दी और पीछे की तरफ़ झुबकर आराम से बैठ गया। कुछ देर तक उसकी नजरें छत पर, बत्तियो पर, स्त्रीन पर और फिर दर्शको पर घूमती रही। उसने जब गरदन घुमायो तो देखा कि प्रभा उसे देख रही है। एक क्षण के लिए उसकी नजरें झुकी, फिर आपस में मिलीं। डिको की नजरें आहिस्ता-आहिस्ता उसके होठो, वाली और गालों पर से फिसलती हुई कंधो पर, और कधों मे फिसलकर छाती पर होती हुई, हथेलियों पर जा टिकी । एक बार और उसने उसके चेहरे की तरफ देखा। होंठ भीचकर उसने लवी सांस ली और गर्दन झटककर सामने स्त्रीन की तरफ़ देखने लगा। बतियां वुझ चुकी थी। फिल्म शुरू हुई। बीच-बीच में उमके हाथों का सशं डिकी महमूस करता । उसने देखा, कैप्टन शर्मा का 62 रोवो हाथ प्रभा की पीठ तक बढ़ आया था। लेकिन उसके बाद उसका ध्यान उनकी तरफ़ विलकुल नहीं था। प्रभा के लिए यह जिंदगी शायद बड़ी उकता देनेवाली होगी। नाइट- शिफ्ट, डे-शिफ्ट, निरंतर कराहते हुए मरीज़, चीख-पुकार, रोना-धोना, और ऊपर से ये मिलिटरी डॉक्टर । मौत के बीभत्स रूप से निरंतर साक्षात्कार! - वैसे देखा जाये तो, डिकी के मन में प्रभा के प्रति कोई खास आकर्पण नहीं था। और न ही शर्मा को लेकर कोई द्वेष था। लेट देम एंज्वॉय । हमें तो यहाँ के बाद अपने वार्ड हैं ही। स्क्रीन पर साधना के क्लोज-अप देखने में वह मग्न था। इंटरवल में कैप्टन शर्मा हॉल के बाहर जा चुका था। इधर प्रभा एकाध वार डिकी की तरफ़ झुकी, लेकिन डिकी स्क्रीन की तरफ़ देखता रहा। फिर एकाएक वह कहने लगी, "मेरा मंशा वह नहीं था। तुम बेकार में गुस्सा हुए।" उसके मुंह से 'तुम' सुनकर डिकी को अच्छा लगा। उसकी तरफ़ मुड़कर वह हँसा, "फॅरगेट इट, ओ० के० । बंबई कब जाने का इरादा है ?" शर्मा लौट आया था। दोनों बातों में व्यस्त थे । वे दस दिन बड़े मजे में कटे। उन दिनों सिग्नल सेंटर के काम अलावा और कोई काम नहीं था। इसलिए आठ-दस दिन की अवधि में वह तीन बार एम० एच० गया था, प्रभा से मिला था। उनकी मुलाक़ातें वार्ड में ही होती। वह वार्ड के बाहर खड़ा रहता। वह कुछ देर के लिए बाहर आती। कैन्टीन में कॉफ़ी पीते-पीते गप्पं चलती। मौक़ा पाकर वह उसके सौंदर्य की तारीफ़ करता रहता । दोनों के संबंध अव काफ़ी सहज और फ्री हो चुके थे। लेकिन डिकी ने कभी उन संबंधों को गहरा बनाने की कोशिश नहीं की थी। उसने कभी उससे उसकी 'छुट्टी' का प्रोग्राम नहीं पूछा था। हाँ, अतीत को लेकर दोनों खुलकर बातें करते, लेकिन वर्तमान के बारे में चुप्पी साधे रहते । कभी वह उसे अपनी नौकरी के अनुभव बताती, लेकिन इसमें डिकी को कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। शहर में घूमते वक्त एक ।

गयो 63 वार उमने दूर में देखा था कि प्रभा कैप्टन शर्मा के माय जा रही थी। उनमें कतरा जाने के लिए रास्ता बदलकर वह गली में घुमा था। गहर में मिलते रहने का प्रभा ने उमें कई बार मरेत दिया था। लेकिन हिना ने बात टाल दी थी। हां, उमर होम्टस कमीकभार वह चला जाता । अब उनकै भवध काफी महज हो चुके थे, इमलिए दोनों के बीच अब दुलार बातें होती। अब वह शुरु वाला मंकोच नहीं रह गया था। एक दिन प्रभा ने कहा था, "डिकी, तुममे बातें करना मुझे वहा अच्छा लगता है । दिमाग पर कोई बोझ नहीं होता। हम क्या बोल रहे हैं, उमरा क्या मतलब निकाला जायेगा. यह फ़िक्र नहीं होती।" उमने जवाब दिया या, "इन बातों को लेकर विश्लेपन' की कोगिन न करो, प्रमा। हम यहां तक पहुंचे हैं, वही तक टोक हैं। कभी यगता है... ओ हम इट । प्रेम के तौर-तरीका में जानकार नहीं हूँ। मेरे लिए यह मंभव भी नहीं है। जिनके पास सालो दल बहुत है उनके लिए शायद यह संभव है। पोपुन नाइक मी कन नांट एफोर्डर" उनने डिकी की हवेली यायाते हुए जवाब दिया था, "यू टोन्ट नीद इट, टिकी।" वह उमने मिनने के लिए दहा वेचंन रहना ही, एमी दान नहीं थी। लेकिन काफी दिनो नक भेंट न होती तो कुछ अजीब-मा जहर लगता था। मुलायात न होने पर प्रमा फोन पर उमने बातचीत करती न्हती। 1.रेपनि पानही मत।

छः -- "डिकी, तुम्हारा फ़ोन है।" उसके ऑपरेटर साथी मणि ने कहा। डिकी ने पेंडिंग मैसेजों की गड्डी देखी। इसे पहले क्लियर कर डालें, वरना रात में और बोझ पड़ेगा। "किसका फ़ोन है ? होगा पठानकोट से बलवीर का। कहो, मैं रात में उसे रिंग कर दूंगा।" "बलवीर का फ़ोन नहीं, यार, किसी लड़की की आवाज़ है।" डिकी ऑपरेटर से रुकने के लिए कहकर उठा। प्रभा का ही फ़ोन होगा । काफ़ी दिन से उनकी मुलाकात नहीं हुई थी। पिछले कुछ हफ्तों से सरहद पर कुछ सरगर्मियां शुरू हो गयी थीं। छुट्टी पर गये हुए जवानों को तार देकर बुला लिया गया था। रेजिमेंट के कुछ ऑपरेटर यूनिटों में टेंपरेरी ड्यूटी पर भेज दिये गये थे। सिग्नल सेंटर रात-दिन काम कर रहा था। प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री के साधारण वक्तव्यों को भी बहुत पब्लिसिटी दी जा रही थी। इन वक्तव्यों के विशेष अर्थ लगाये जा रहे थे। शायद प्रतिपक्षी मुल्क युद्ध की तैयारियां कर रहा था। परस्पर आरोपों-प्रत्यारोपों की भरमार थी। युद्ध-गीतों, वीर-रस के गीतों और जोशीले गीतों की मानो वाढ़ आ गयी थी। लेकिन सामान्य जवान इसमें कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं दिखा रहा था। उसके पास वक्त भी नहीं था। रेल की कैन्टीनों में मिलने वाली मुफ्त चाय उसके लिए इन गीतों के मुकावले ज्यादा स्फूर्तिदायक थी। इस शोर-शरावे के कारण पिछले पांच- ।

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०७ सवा Phcc "जरूर आना । मैं इंतज़ार करूंगी। फ़ोन रखती हूँ। जल्दी में अभी तैयारी करनी है। क्लिअरेन्स, रेलवे वारंट, वगैरह-वगैरह।" फ़ोन कट चुका था। कुछ क्षण तक डिकी चोंगे की तरफ़ देखता रहा। उसे पता था कि प्रभा से मिलने जाना बहुत मुश्किल है, लगभग असंभव । उसके यूनिट के चारों ओर कड़ा पहरा था। मिलिटरी पुलिस की संख्या बढ़ा दी गयी थी। बड़ा कड़ा बंदोवस्त था। विना आउट-पास के कंपाउंड के बाहर जाना मुमकिन नहीं था। उधर सरहद पर छोटी-मोटी वारदातें हो रही थीं । "ओह डैम देम ! दोज़ ब्रास्टर्ड्स, दोज़ पिग्स !" डिकी को शेखू याद आया। शेखू ने कहा था : 'हाँ, हाँ...और, मरने के बाद कभी वीर-चक्र भी देते हैं। मेरा भी यही कहना है, डिकी, ये लोग हमारी मौत का सम्मान करते हैं । लेकिन हम जीते कैसे हैं, इसे कोई नहीं देखता। अपने भीतर के इंसान को दफ़नाकर, हम किस तरह हैवानों की जिंदगी बसर करते हैं-इस पर शायद ही कोई अपनी कलम चलाता है। युद्धस्थ कथा रम्या ! ओ शिट ! कथाएँ सभी दिलचस्प होती हैं, डिकी। पीड़ाओं की, दुर्भाग्य की, और दुखों की कहानियाँ भी बड़ी दिलचस्प होती हैं, क्योंकि वे कहानियाँ होती हैं, अनुभव नहीं होता। इन लोगों ने जवानों की मौत को ग्लोरीफ़ाई किया है। हमारी मौत पर खूब मसिये लिखे हैं। इन्होंने गद्गद होकर लिखा है, चीख-चीखकर लिखा है। ठीक भी तो है। वे हमें जिलाना चाहते हैं । वी आर ट्रेन्ड टू किल ऑर गेट किल्ड !1 इन कथाकारों में हिम्मत है तो लिखें हमारी जिंदगी पर । क्षण-क्षण मरती चली जाने वाली इस जिंदगी पर। । - - गड्डी में से एक-एक मैसेज डिकी भेज रहा था। उसकी उँगलियां 'मोस-की' पर चल रही थीं। रात के दो बजे होंगे। भयंकर सदी थी। उसके अग़ल- बग़ल चार-पाँच ऑपरेटर हेडफ़ोन लगाये काम में व्यस्त थे। सर्दी की 1. हमें सिखाया ही जाता है-मार देना या मर जाना ।

दबने मदनपनियां रिपरी यो। ननिर उन्ले पर बाले माटर कोरले निर बहा और में ले हरहोटर पर हाय मारि वह टेलिनिटर मन टोटनाने के विरन्द्रावत दैनिटरवर दो-दीदनो मन्दों का एकनंदा "नरन्नी माया पा। वार, द इबाले करना होगा। माद की गन, लकी गल है ! ग्रंकी दरकाले बत उन्ने दुनिटर पर बन्दा । सरदाना टरमत्र पुरजले में हर बनिन कोमन्नतेरे नि हो कुछ रहा था। इस दिदि भी दड़े वदार उन्ने पहले को निनाते हैं। मरिन दहीं होंगा की तरह एकही दाबार- बार आ रहापाः'नाइर दावार नर रेड काइद एट पार्टी हमी दशाहो एक नकार' या जिनकारयाद दह कमीन दे मापारीद-फर्गदहावीपी० तिरेटर काम गुदमरलें में पहने इनी दारको दीर-बार बार टान करता रहता है। लिग- पीरियड में जार परवानी पगारमेकिन इन अमले का निर्माग कहां और कद हमारह दनाला मुरिर है। लिनों गा पाकर वह जाने नरेनौट नाहन में तनाव यााकन ने मदद पर दंदूरों को कावासाकी दे रही दो--- कहार...कट, ...कट! टेनिमिटर पर नगा रहे थे, राद में दिल्ली ! अंबाला!निता! दापरलेन कॉन्टर चीन रहा था: "हनो, देवी,...टू.....देवो! दब देवो! ......देदो,...।" "इपुटी मिनर' निरसा पह-जहार चीन हाया। पूरी मिनिटरी- मगीनरी ओरमार के काम कर रही यौ। दिकी मोटरसाइकिलों को बनाने की आवाजाही कोनट पर उसेटकोटको व में हार नन्दहा । 'ट्रीट नाइट' की रोशनी ननिर पढ़ रही योदोर के पास महेंदो मंदरिलो पारें हिन रही थीं। "मौन-कीपर माहाद देवी ने बन रहा था। वहाँ नबन्नी मोर दूर इननद का एक वाटरों के कार पर उद्वारा प्राक्ष 1. मामिल रहा है।

66 रोवो , . "जरूर आना। मैं इंतजार करूंगी। फ़ोन रखती हूँ। जल्दी में हूँ। अभी तैयारी करनी है। क्लियरेन्स, रेलवे वारंट, वगैरह-वगैरह।" फोन कट चुका था। कुछ क्षण तक डिकी चोंगे की तरफ़ देखता रहा। उसे पता था कि प्रभा से मिलने जाना बहुत मुश्किल है, लगभग असंभव । उसके यूनिट के चारों ओर कड़ा पहरा था। मिलिटरी पुलिस की संख्या बढ़ा दी गयी थी। बड़ा कड़ा बंदोवस्त था। विना आउट-पास के कंपाउंड के बाहर जाना मुमकिन नहीं था। उधर सरहद पर छोटी-मोटी वारदातें हो रही थीं। "ओह डैम देम ! दोज़ ब्रास्टर्ड्स, दोज़ पिग्स !" डिकी को शेखू याद आया। शेखू ने कहा था : 'हाँ, हाँ...और, मरने के बाद कभी वीर-चक्र भी देते हैं। मेरा भी यही कहना है, डिकी, ये लोग हमारी मौत का सम्मान करते हैं । लेकिन हम जीते कैसे हैं, इसे कोई नहीं देखता। अपने भीतर के इंसान को दफ़नाकर, हम किस तरह हैवानों की जिंदगी बसर करते हैं-~-इस पर शायद ही कोई अपनी कलम चलाता है। युद्धस्थ कथा रम्या ! ओ शिट ! कथाएँ सभी दिलचस्प होती हैं, डिकी। पीड़ाओं की, दुर्भाग्य की, और दुखों की कहानियाँ भी बड़ी दिलचस्प होती हैं, क्योंकि वे कहानियाँ होती हैं, अनुभव नहीं होता। इन लोगों ने जवानों की मौत को ग्लोरीफ़ाई किया है। हमारी मौत पर खूब मसिये लिखे हैं। इन्होंने गद्गद होकर लिखा है, चीख-चीखकर लिखा है । ठीक भी तो है वे हमें जिलाना चाहते हैं। वी आर ट्रेन्ड टू किल ऑर गेट किल्ड !1 इन कथाकारों में हिम्मत है तो लिखें हमारी जिंदगी पर । क्षण-क्षण मरती चली जाने वाली इस ज़िदगी पर। - गड्डी में से एक-एक मैसेज डिकी भेज रहा था। उसकी उँगलियाँ 'मोसं-की' पर चल रही थीं। रात के दो बजे होंगे। भयंकर सदी थी। उसके अगल- वग़ल चार-पांच ऑपरेटर हेडफ़ोन लगाये काम में व्यस्त थे। सर्दी की 1. हमें सिखाया ही जाता है- मार देना या मर जाना । .

रोबो 67 वजह मे मबकी उंगलियां ठिठुर गयी थी। इसलिए उसने उघर वाले ऑपरेटर को रकने के लिए कहा और कोने में रमे हुए हीटर पर हाथ मके । फिर वह टेलिप्रिंटर रूम मे ग्रेटकोट लाने के लिए उठा । उम वान टेलिप्रिंटर पर दो-तीन सौ शब्दों का एक संवा 'इमर्जेन्मी मैमेज' आ रहा था। चाप रे, अब इमे आगे पास करना होगा। आज की रात, पल्ल की रान है ! कमरे की तरफ़ जाते वान उमने दूसरे टेलिप्रिंटर पर देवा । उधर वाला ऑपरेटर मैमेज शुरू करने से पहले उँगलियों को गरमाने के लिए यूं ही कुछ टाइप कर रहा था। इस स्थिति में कभी बड़े मजेदार जुमले पढने को मिल जाते हैं। लेकिन वहां हमेशा की तरह एक ही वाक्य बार- बार आ रहा था : 'नाऊ इज द टाईम फ़ॉर ऑल द कॉमरेड्स टु कम टु द एन्ह ऑफ़ द पार्टी। यह भी वमा ही 'एक मवाल' या जिनका जवाब वह कभी न दे मका था । करीय-करीब हर टी० पी० ऑपरेटर काम शुरू करने से पहले इमी वाक्य को तीन-चार वार टाइप करता रहता है । ट्रेनिंग- पीरियड में आदत पड़ जाती थी शायद । लेकिन इस जमले का निर्माण वहां और कब हुआ था, यह बताना मुश्किल है। उगलियों में गर्मी पैदा करके वह अपने कमरे में लौट आया। माहौल में तनाव या। कल मे मरहद पर बंदूकों की आवाजें सुनायी दे रही थी- कड़ाह...कट, कट...कट ! टेलिप्रिंटर पर सदेश आ रहे थे, जा रहे थे दिल्ली ! अंबाला ! शिमला | वायरलेम ऑपरेटर चीज़ रहा था: "हलो, बेवो,...टू...टू...वो ! फाइव वो ! टू.... येवो,...फ़ाइव ।" 'ड्यूटी मिग्नल' ट्रंककॉल पर गला फाड़-फाहकर चीज़ रहा था। पूरी मिलिटरी- मशीनरी पूरे जोर-शोर से काम कर रही थी। खिडकी से मोटर साइकिलों को 'किक' लगाने की आवाजें आ रही थी। मेन गेट पर सतरी ग्रेटकोट की जेब में हाय ठूमे पड़ा था। 'स्ट्रीट लाइट' की रोशनी उमके सिर पर पड़ रही थी। पोछे स्टोर के पास खड़े दो सतरियो की छायाएं हिल रही थी। 'मोम-की' पर उमका हाय तेजी से चल रहा था। यहां से अस्मी मील इन संदेशों का एक-एक शब्द ऑपरेटरो के कागज पर उतारा जा रहा 1. अब सब साथियों से पार्टी ममाप्त करने का समय हो गया है।

68 रोबो था। उधर बर्फ गिर रही थी। उधर का ऑपरेटर वार-बार 'वेट' कहता होगा, क्योंकि वह बार-बार हीटर पर हाथ सेंकने जाता होगा। अस्सी मील की दूरी पर वहाँ क्या हो रहा होगा? वहाँ तोपों के चलने की आवाजें सुनायी तो नहीं दे रही होंगी? कई सवाल एक साथ उसके दिमाग में कौंधने लगे। कुछ के जवाब तुरंत मिल भी जाते, लेकिन हर जवाब कई नये सवालों को जन्म देता है। और फिर जवाव मिलकर भी लाभ क्या था? स्थिति में क्या फर्क पड़ने वाला था? सुपरवाइज़र चंदनसिंह अंदर आया। आते ही प्राप्त संदेश देख लेने की उसकी आदत थी। लेकिन आज वह ख़ामोश था। हीटर के पास जाकर वह खड़ा रहा । उसके दोनों हाथ ग्रेटकोट की जेब में थे। दाढ़ी के सफ़ेद बाल गले में लिपटे हुए मफलर से बाहर चमक रहे थे। क्या वह भी उन्हीं सवालों से परेशान था? इंसान के भीतर की इंसानियत को जीवित रखने के लिए, और युद्ध की निस्सारता को समझने के लिए क्या हर पीढ़ी को युद्ध की यातनाओं से गुजरना ज़रूरी है ? हवलदार चंदनसिंह के सामने सन अड़तालिस या सन बयालिस होगा। हवलदार चंदनसिंह हीटर के लाल तार को देखता हुआ पत्थर की मूरत की तरह खड़ा था। संदेश पर 'क्लिअ- रेन्स' हस्ताक्षर करते वक्त चंदनसिंह से डिकी ने पूछा, "क्यों मेजर, क्या बात है ?" हवलदार चंदनसिंह बिलकुल हिला नहीं। वह एकटक हीटर घूर रहा था। बोलते वक़्त उसकी आवाज़ मोटी और भारी थी। "होल सिख रेजिमेंट इज वॉश्ड आउट !" डिकी ने फौरन मोर्स-को' उठायी, और 'मैसेज' पास करने लगा। उसने अपने दिमाग़ को शब्दों और अक्षरों पर केंद्रित करने की कोशिश की। वह कुछ भी सुनना नहीं चाहता था। पूरी रेजिमेंट ख़त्म हो चुकी थी। सो व्हॅट ? तो? उसका क्या संबंध है इस सबसे दूसरे शब्द उसके कानों से टकरा रहे थे। दिमाग तक पहुँचते भी थे या नहीं-उसकी समझ में नहीं आ रहा था। "क्या कहा?" किसी ने पूछा। "होल सिख रेजिमेंट इज वाण्ड आउट।" । - 1, पूरी सिख रेजिमेंट का सफाया हो गया है।

रोबो 69 "और शेखू ?" शाति ! कभी न खत्म होनेवाली शाति ! और फिर एकदम चदनसिंह की आतक-भरी चोख। "मैंने कहा न, होल सिख रेजिमेंट इज वाश्ड आउट ।" डिको की उँगलियाँ मोसं-की पर चलती रही। सैकड़ों ऑपरेटर इन तारों से और इस हवा में सैकड़ों मील की दूरी पर लाखों शब्द भेज रहे घे। टेलिप्रिंटर कट-कटा रहे थे। टेलीफोन ऑपरेटर चीख रहे थे । मैसेंजर मोटर-साइकिलों पर दौड रहे थे। दूर आर्मी हेडक्वार्टर के ऑपरेशन-रूम के नक्शों पर रग-बिरंगी पिनो को खिसकाया जा रहा होगा। सीमा की मोटी लकीर के पास लगी बड़ी पिनो में से एक पिन अब हटा ली जायेगी। लड़ाई के क्षेत्र की एक ऐक्टिव यूनिट, एक जुझारू रेजिमेंट-एक ड्राइंग पिन ! अफमर उस पिन को निकाल लेगा। वेस्ट-पेपर वास्मैट में फेंका देगा। कल फिलिप्स को शायद वह जानता होगा। मुझे पता करना होगा, शेव कसे मरा मरने में पहले आखिरी हिचकी के समय उसने क्या कहा होगा? उसके दिमाग में कौन-सी बात होगी? ए पैनी फॉर हिज लास्ट थॉट, बट डन इट मैटर नाक ?' शेसू मर 1 उमकी माविरी रात के लिए एक पेनी, लेकिन अब उमसे क्या फायदा तात - रंगिया स्टेशन पर उसने गाड़ी बदली। उसकी बदली वेस्टर्न कमांड की एक यूनिट में कर दी गयी थी। पुराने यूनिट में जैसे-तैसे डेढ़ साल कटा था कि ट्रांसफ़र हो गया था। पर इसमें कोई अप्रत्याशित वात भी नहीं थी। यह आम रिवाज था । आर्मी के इस विशाल विस्तार में, समस्या पैदा करने वाले तथा अनावश्यक ठहराये जाने वाले किसी भी आदमी की कहीं भी बदली हो सकती थी। उसने आर्मी से डिसचार्ज के लिए अर्जी दी थी। कमांडिंग अफ़सर ने उसे इंटरव्यू के लिए बुलाया था। उसकी बात सुनी थी, और उसे उपदेश के दो-चार पाठ भी पढ़ाये थे। बाद में एक हफ्ते के भीतर उसके हाथ में पोस्टिग ऑर्डर थमा दिया गया था। डिकी ने अपना किट सँभाला। कंधे पर राइफ़ल लटकाये अव वह नये यूनिट के रास्ते पर चला जा रहा था। गाड़ी बहुत धीमे-धीमे आगे बढ़ रही थी। सभ्य दुनिया से वह दूर जा रहा था। वातावरण में मादकता थी। बहुत दूर तक सुपारी के बगीचों, धान के खेतों और छोटे-मोटे तालावों से पूरा इलाका ढंका हुआ था। क्षितिज के पास पहाड़ों की चोटियाँ झाँक रही थीं। बीच-बीच में छोटी-छोटी बस्तियाँ मानो धरती पर छिटकी पड़ी थीं। वह बहुत खुश था। स्टेशन पर गाड़ी रुकी। चार-पाँच स्त्रियां अंदर घुसी। डिब्बे में ज्यादा लोग नहीं थे। पास बैठे हुए सीमा-सड़क विभाग के एक आदमी ने उस लड़की की तरफ़ देखा। वह अब तक कोई पत्र पढ़ रहा था। ढलती - ।

रोबो 71 उम्र का यह आदमी, आधे घंटे मे पत्र पर आंखें गड़ाये कुछ सोच रहा था। शायद पत्र उसके घर से आया होगा। उन पक्तियों से झांकती स्मृतियो में वह डूब गया होगा । उन स्त्रियों में से दो लैट्रीन के पास की खुली जगह में नाचने-गाने लगी। उस आदमी ने अपना पत्र जेब में रख लिया और नाचने वाली लड़कियों की तरफ देखने लगा। शुरू में ही उनमे से एक सडको बेंच पर आकर जम गयी थी। गोद में रखे हुए हार्मोनियम पर उमकी उँगलियां बडी सहजता से चल रही थी। वह किसी असमिया लोक- गीत की धुन बजा रही थी। उनमें से एक प्रौढ़ किस्म की स्त्री उस आदमी की बगल में आकर बैठ गयी, विलकुल उससे सटकर। बीच-बीच में वह उस गीत पर दाद देती जा रही थी और कहीं-कही मगत भी कर रही थी। आदमी ने अपना हाथ स्त्री की पीठ पर रख दिया। उसकी उँगलियां अब स्त्री के स्तनों पर थी। आदमी ने कुछ पूछा, स्त्री ने कुछ जवाब दिया, लेकिन हार्मोनियम की आवाज और गीत के शोर में डिकी को कुछ भी नहीं सुनापी दिया। पर इसकी जरूरत भी क्या थी? आदमी के होठो से फूटने वाली हंसी और भूखी नजरों से सब कुछ साफ था। उसने जेब में हाथ डाला, टटोला और एक चवन्नी निकालकर स्त्री की हथेली में दबा दी। चवन्नी निकालते वक्त जेय मे ठुसा हुआ पर उछलकर वेंच पर आ रहा और फिसलकर पैरो के पास गिर पडा । स्त्री कुछ नाराज लगी, फिर भी उमने चवन्नी ले ली। उसे अंटी मे खोसकर वह सामने वाले दूमरे आदमी के पास जा बैठी । डिकी ने झट से एक रुपये का नोट निकाला और बेंच पर रखकर अपने साथ वाले यात्री को तरफ़ देखने लगा। सामने वाली वेंच पर बैठे दो सिपाही हंस रहे थे। वे उन लड़कियों को घूर रहे थे। उनकी नजरें भूखी थी। लडकियों ने अव तक किसी दूसरे आदमी पर कब्जा कर लिया था। दोनों लड़कियां अगल-बगल बैठी उस आदमी से बातें कर रही थी। उनका ध्यान आदमी की जेब की तरफ था। हिकी एक तरफ खिसककर अपने में सिकुड गया। उनमे की एक लड़की डिकी की तरफ खिसकी। डिकी ने उँगली से नोट की तरफ इशारा करते हुए होठो पर मुमकराहट लाने की कोशिश की। वह चाहता था कि लडकी उसको नजरों मे उभरी घृणा या अरुचि को देख न पाये। इन लडकियो को ।

72 रोवो । इस तरह नाचने-गाने के लिए क्यों विवश किया जाता है ? ये लोग अपनी आवरू का सौदा क्यों करती हैं ? वह परेशान था। लड़की एक क्षण के लिए दुविधा में पड़ी उसे देखती रही। फिर उसने झट से नोट उठा लिया। वह थोड़ी-सी झुकी और माथे से नोट को लगाकर उसने सलाम किया और फिर पीछे मुड़ गयी। मिसाभारी स्टेशन पर गाड़ी रुकी। पांच-छ: नंगे वच्चे शोर करते डिब्बे में फंसे और दूसरे दरवाजे से निकल गये । उसने बाहर देखा । गाड़ी सिग्नल कॉसिंग के पास खड़ी थी। सामने की झोंपड़ी में एक स्त्री गोद में बच्ची को लिये खड़ी थी, गाड़ी आगे बढ़ती जा रही थी, और स्त्री अपनी अविचल, स्थिर दृष्टि शून्य में गड़ाये वहीं खड़ी थी। डिकी ओझल होते हुए उस दृश्य को खिड़की से देख रहा था। पता नहीं, उस बच्ची के भविष्य में क्या लिखा था? दस-बारह बरस बाद वह भी कहीं रेल के डिब्बे में हार्मोनियम के सुरों पर नाचती होगी...शायद ! चीन की तरफ़ से जो मार पड़ी थी, अव उसके निशान कुछ-कुछ मिट चुके थे। लेकिन जवान अब भी उन प्रसंगों को पूरी तरह भूल नहीं पाये थे। अब भी कभी बातचीत के दौरान पुराने लोग विशेष स्थानों या मील के पत्थरों से जुड़ी स्मृतियों को दोहराते रहते थे। इधर के लोगों में सीमा के उस पार रहने वाले लोगों के प्रति द्वेप, चिढ़ और क्रोध की भावनाएँ अब भी शेष थीं। लेकिन आज वह बात नहीं रही थी। वास्तव में वे सारे प्रसंग और उनके साथ जुड़ी असफलताएँ उस युद्ध से संबद्ध थीं, जो सही मानों में, कभी लड़ा ही नहीं गया। फिर भी वहाँ शर्म या अपमान का भाव नहीं था। उसकी यूनिट शहर से दो-ढाई मील की दूरी पर थी। रेलवे लाइन से लग- कर जाने वाला रास्ता गांव तक जाता था। गाँव वैसे छोटा था, फिर भी सुन्दर-सुडौल मकान, छोटे-छोटे बंगले, वाँस की चार-दीवारियाँ, बगीचों में खुशबूदार फूल, ठिगनी सांवली असमिया महिलाएं, लेकिन कांति सतेज, लंबे-लंबे वाल, सादा पहनावा, होंठों पर निरंतर मुसकान---यह था परिवेश ।

रोबो 73 यूनिट में अलग-अलग 'कोरों के लोग शामिल थे। नेफा के इलाके में सड़क बनाने का काम चल रहा था। इमलिए सैकड़ो आदमी वारिश में, सदियो में तथा बर्फ में रात-दिन लगातार काम कर रहे थे। वहाँ की विभिन्न टुकड़ियों में एकसूत्रता लाकर उन्हें आवश्यक चीजें पहुंचाने का काम उसकी यूनिट को मौपा गया था। इसलिए उसकी यूनिट में 'सप्नाई कोर' के लोगो को सख्या प्रमादा थी। यहां पो० टी०, ड्रिल या परेड कुछ भी नहीं था। ऑफ टाइम मे केवल सिविल ड्रेस में हर कोई शहर घूम आ मकता या। यूनिफार्म या ढीला-ढाला सफ़ेद मुफ्ती ड्रेस पहनकर ही वाहर जाने की पाबंदी नहीं थी। इमलिए डिको बहुत सुश था। जबर्दस्ती ऊपर मे थोपे गये वधनों का आभास, कदम-कदम पर डरा देने वाली वे परि. स्थितियां यहां नहीं थी। उसके सब-स्टेशन में काम करने वाले सभी ऑपरेटर अनुभवी थे। वैसे काम कोई श्यादा नहीं था। सिग्नल सेंटर के काम के अलावा कोई पास परेशानी नहीं थी। इसलिए सिग्नल कम्युनिकेशन का स्टैन्डर्ड बढ़िया या। अधिकाश अफसर शहर में ही रहते थे, इसलिए ओ० आर० मेस का खाना अच्छा नहीं होता था। मो० आर० लोगों के नाम के राशन में कटौती करके उमे अफमरो के बीवी-बच्चो के नाम कर दिया जाता था। इमे कुछ अनुचित भी नहीं समझा जाता था। फ़ील्ड एरिया के अफसरों के लिए फैमिली के माय रहना कानूनन मना था, इमलिए उन्हें क्वार्टर एला. उन्म नहीं दिया जाता था। सिविल एरिया में किराये पर मकान लेने पडते । महंगाई के इन दिनों में मकानो के किराये, घर के बचें और फिर प्रेस्टीज-एक साथ निभाना कोई आमान योडे ही था !इसलिए अगर मेस के राशन का कुछ हिस्सा' अफसरों के वीवी-बच्चों के काम आ जाये तो दुरी यात क्या थी? कम्म-कमाहर मेजर पडगोकर शहर में ही रहते थे। रोज सुबह एक जवान दूध के कन भी साहब के बंगले पर पहुँमा आता था। मिलिटरी कन्टीन में भरपूर माल भरा रहता था। मार्केट रेट से यहां सभी चीजें सस्ती मिलती थी। लेकिन बूट-पॉलिश को डिविया और यश को छोड कर बाकी सभी चीजें खरीदने के लिए मेजर पडगीकर या क्वार्टर-मास्टर लेफ्टिनेंट कर्नल तलवार को मंजूरी जरूरी थी। हर महीने रेल से माल 4 रोवो - माता और संबंधित स्थानों पर पहुंचा दिया जाता। चालीस-पचास मील के अहाते में फैले तमाम यूनिटों के अफ़सरों के परिवार इसी शहर में रहते थे। हफ़्ते-भर में जितनी वार जी चाहता अफ़सर लोग अपने घरों के चक्कर लगा आते, आर्मी की जी जो इनकी सेवा में रहती थीं ! डिब्रूगढ़ में जव उसकी टेंपरेरी ड्यूटी लगी तो डिकी को बहुत खुशी हुई। शहर से दूर, ट्रांजिट कैम्प में उसका ऑफ़िस था। एक कमरे में ट्रांस- मीटर लगा था और दूसरे में दो ऑपरेटरों को रहने के लिए जगह दी गयी थी। झोपड़ी के दरवाजे से ब्रह्मपुत्र का जल-विस्तार दिखायी देता था। बारिश के मौसम में उसकी इस झोपड़ी में घुटनों तक पानी जमा हो जाता था। उसका साथी नायर वड़ा शांत किस्म का आदमी था। न किसी के लेने में, न देने में-बस अपना काम भला और दाम भला। 'सेट' पर ड्यूटी करना, वक़्त से खाना और सोना, कभी-कभार लायनेरी चले जाना, अखबार देख लेना, रेडियो सुन लेना, वस-इसके अलावा नायर को और कोई शौक़ नहीं था। कंपाउंड लाँघ जाओ तो वस्ती की तरफ़ जाने के लिए. नदी के किनारे पच्चीस-तीस फुट ऊँचे बांध पर से रास्ता बना था। यहाँ ब्रह्मपुत्र ने एक मोड़ लिया था, इसलिए उसका प्रवाह किनारे तक पहुँचता था। बाढ़ से सुरक्षा के लिए यह बाँध बनाया गया था। दस-बारह फुट चौड़ा होगा। नदी के प्रवाह के बीच में आड़ी दीवारें खड़ी की गयी थीं, ताकि उसका बहाव रोका जा सके। इन दीवारों के सहारे पानी में बड़े-बड़े पत्थर छोड़े जाते और बाँध तैयार किये जाते । वाढ़ आती, बाँध ढह फिर वाँध बनाये जाते । संघर्प निरंतर चलता रहता-मनुष्य और प्रकृति का संघर्प। वाँध के नीचे झोंपड़ियों का झुंड था। इनमें रहने वाले अधिकांश लोग बंगाली मुसलमान थे। पूर्वी पाकिस्तान से मज़दूरी की तलाश में ये लो इधर आते रहते थे। रोजी-रोटी की तलाश में भटकने वाले इन लोगों लिए दो देशों के बीच की सीमा-रेखा की कोई बाधा नहीं थी। वाँध पर गुजरने पर दो दृश्य एक साथ दिखायी देते थे---एक तरफ़ ब्रह्मपुत्र की ल लाल पानी की जलधारा, दूसरी तरफ़ झुग्गी-झोपड़ियाँ और उनमें र वाले अधनंगे स्त्री-पुरुष । झोपड़ियों के पीछे की तरफ़, कुछ दूरी पर जाते।

रोबो 75 - - के समानांतर एक सड़क बनी थी । सड़क के दोनो किनारे छोटे-छोटे खूब- मूरत बेंगले थे। इनके अहातो में लगे नारियल और सुपारी के ऊंचे-ऊँचे पेडो के कारण बंगले बाहर से दिखायी नहीं देते थे। झोपड़ियाँ बैंगलो से बहुत थी। डिकी कभी-कभी सोचता था कि अगर नदी का पानी और झोपड़ियों के रहने वाले अपनी सीमाएँ तोड़कर आगे बढ जायें तो इन बंगलो का क्या हाल होगा ! वैसे, ब्रह्मपुत्र हर साल अपनी मीमा तोड देती है, लेकिन बंगलों तक नहीं पहुंच पाती। तलहटी की झोपड़ियां ब्रह्मपुत्र के आक्रमण को रोक नहीं पाती। हर साल बाढ में इन्हे नेस्तनाबूद हो जाना पड़ता है। अस्थायी स्थिरता पाने वाले ये सैकड़ो लोग, फिर पेट-पीठ बांधे, रोटी की तलाश में भटकने लगते हैं । जिदगी-भर एक ही तलाश- रोटी; एक ही धुन-रोटी । जीवन का अयं-रोटी और सिर छुपाने की जगह की तलाश । सत्य की तलाश, आत्मा को तलाश, परमात्मा की तलाश ! अपनी क्षीण दृष्टि को दूर तक फैलाकर देख पाने की शक्ति उसमे नहीं थी। अपनी दुबली-पतली होलियां ऊँची तानकर सुदूर सत्य को छू मकने की ताकत उसके पास नहीं थी। जैसे-तैसे शरीर के बोझ को ढो लेने वाले लड़खड़ाते पैरों में वहां तक पहुंचने की शक्ति नहीं थी। जिंदा रहने के लिए पेट को भरना जरूरी है और पेट के लिए जिंदा रहना आवश्यक है। एकमात्र संघर्ष यही है। यही उसके ज्ञान की सीमा थी। डिकी हर शाम बस्ती की तरफ घूमने के लिए निकल जाता। हवा में रजनीगधा की महक फैली रहती। हलके-फुलके फिल्मी मगीत की धुनें कानो में पड़ती रहती। कभी-कभी हंसी का कोई फव्वारा छूटता हुआ मुनायी दे जाता । क्षण-भर के लिए उसकी चाल धीमी पड़ जाती। अंधेरे मे वह अपने कदम धीरे-धीरे बढ़ाता । मस्ती-भरे इस माहौल में खुद को खो देने की कोशिश करता। लेकिन दिमाग में विचारो का बवडर फिर भी उठता ही रहता। बस्ती वालों में जवानो के प्रति सम्मान या आदर की भावना बिलकुल नहीं थी। उल्टे, इन्हें फौज के आदमियों से डर लगता या, नफरत होती यो। छोटी-छोटी घटनाओं से यह डर, यह नफरत जाहिर भी होती थी। इन आदिवासियो के मन में जवानों के प्रति चिढ़ क्या है ? क्यो ये लोग । - बह 76 रोवो नफ़रत करते हैं उनसे ? लेकिन क्या यह नफ़रत सिर्फ़ फ़ौज वालों के प्रति है ? या वस्ती के सभ्य समाज के प्रति भी है ? कहा नहीं जा सकता। सच पूछा जाये तो, सभ्य कहलाने वाले हमारे समाज ने इन्हें क्या दिया? सिफ़लिस, गनोरिया, अभाव, दरिद्रता, युद्ध, रक्तपात, स्पर्धा, असंतोप! फ़ौज और होती ही क्या है ? सभ्य समाज के खूखार दाँत ! चबाने वाले दांत ! आदिवासियों की स्थिति में सुधार के प्रयास चल रहे थे। इस पर हजारों-लाखों रुपये खर्च किये जा रहे थे। लाखों लोगों के श्रम, खून और पसीने की कीमत देकर इन चौड़ी-चौड़ी घाटियों में, और टीलों पर सड़कें बनायी जा रही थीं। इस जानलेवा काम के लिए दक्षिण भारत के दूसरे सिरे से जवान बुलवाये गये थे। जिन लोगों ने कभी इतनी कड़ी सर्दी देखी ही नहीं थी, वे लोग खून ठिठुराने वाली इन सर्दियों में दिन-रात काम कर रहे थे। फिर भी यहाँ के रहने वालों में उनके प्रति कृतज्ञता तो दूर रही, ज़रा-सी हमदर्दी भी नहीं थी। हरी जीपों को देखकर ये लोग सहमे हुए जानवरों की तरह जंगलों और घाटियों में छिप जाते थे। इसमें उनका क्या कसूर? बस्ती से दो मील पर पक्की सड़क बनी है। रात-दिन जी दौड़ती हैं। लेकिन इससे गाँव की स्थिति में क्या फ़र्क पड़ा है ? वही चल रहा है जो सैकड़ों वर्षों से चला आ रहा है । अगर फ़र्क पड़ा भी है तो- इनकी जिंदगी पहले से बदतर ही हुई है। देश की आजादी दिल्ली के लाल किले पर फहरा रही है। यहाँ के आदमी को, गांधी कौन था -पता नहीं है। समाजवाद किस चिड़िया का नाम है-वह नहीं जानता। जब तक इनकी रोजमर्रा की जिंदगी बदलती नहीं तव तक शासन किसका है, वहाँ जनतंत्र है या फासिज्म, इनके लिए कोई फ़र्क नहीं पड़ता। और मैं इन लोगों की सुरक्षा के लिए यहाँ तैनात हूँ। किसकी ? और किससे सुरक्षा? ब्रह्मपुत्र से, वाढ़ से, भुखमरी से, बीमारी से या अज्ञान से? इनका और देश का एक-दूसरे से सरोकार क्या है, रिश्ता क्या है? कुछ दूर चलने पर सड़क के दोनों किनारे चाय के बगीचे दिखायी पड़ते हैं । सैकड़ों एकड़ भूमि पर ये फैले हुए हैं । हजारों मजदूर इनमें काम ?

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आठ । डिब्रूगढ़ से लौटे डिकी को दो हफ्ते हो चुके थे। शो ख़त्म हुआ। उसने घड़ी देखी। साढ़े बारह बजे थे। रविवार, छुट्टी का दिन, दोपहर का वक्त ! फिर भी लोगों की ज्यादा आवाजाही नहीं थी। फ़िल्म में भी कोई खास भीड़ नहीं थी। कुल चालीस-पचास लोग होंगे। दो-दो, तीन-तीन के गुट बनाकर ये लोग अलग-अलग दिशाओं में चले जा रहे थे। वे तेज-तेज़ चल रहे थे। उसे लगा, वे लोग ज़रूरत से कुछ ज्यादा ही ज़ोर से बोल रहे हैं। लगता था, उनके लिए इस नि:शब्द शांति और घुटन पैदा करने वाली क्षति को सह पाना संभव नहीं था। वे उसे तोड़ने का प्रयास कर रहे थे। उनके शोर में कुछ अप्राकृतिक, अस्वाभाविक लग रहा था । नुक्कड़ पर कॉफ़ी- हाउस के मालिक से उसने यूं ही पूछ लिया, "एनी न्यूज?" "नथिंग न्यू,"2 मालिक ने जवाब दिया। डिकी ने महसूस किया कि वह ज़रूरत से कुछ ज्यादा ही ज़ोर से चीखा था। उसने इधर-उधर देखा और तेज़ चलने लगा। 'नथिंग न्यू', वह बुड़बुड़ाया। उसने जेव से रूमाल निकाला और हथेली और उँगलियाँ पोंछकर आसमान की तरफ़ देखने लगा। सफ़ेद बादलों के कुछ टुकड़े धीमी गति से क्षितिज की ओर बढ़ रहे थे। डॉ० राय के बंगले से रवीन्द्र-संगीत की मंद धुन सुनायी पड़ रही थी : "आज यह दूसरा दिन ।" न्यूज़-पेपर स्टाल बंद हो चुका था। उसने सोचा कि लौटकर कॉफ़ी- - - 1. कोई खास खबर ? 2. नयी कोई नहीं ?

रोयो 79 हाउस पला जाये और कड़क कॉफ़ी पी जाये। पिछले साल एगी कांफी. हाउस में अपने साथियों के साथ, या कभी-कभी अपेला भी यह कई बार आ चुका था। होटल के मालिक से बहुत अच्छी जान-पहचान हो गयी थी। उमे लगा कि इस बार कॉफी-हाउस का मालिक उसकी तरफ पामारी मुमकान से देखेगा, क्योंकि वह कोजी जो था, और मानो धीन द्वारा दिये गये अल्टीमेटम के लिए अकेला वही जिम्मेदार था। पुल पार करते पयत उसने नीचे की तरफ देखा। जसोदा की झोपडी के बाहर मायर विजय- कुमार निढाल लेटा था। पास हो बोतल पड़ी दोर रही थी। हिसी ने सोचा, विजयकुमार को रिक्शा में डालकर यूनिट ले जाना पाहिए। इसके पहले भी दो-तीन बार उसने विजयकुमार को इगी हालत में यूनिट पहुँचाया था। "ओ, व्हट डिफरेन्स इज इट मंक ?" वह आगे यहा। तेजपुर सुरुम्टाल पर रपी हुई फितार 'रेस रदार ओवर चायना' ने उसका ध्यान आकृष्ट किया । क्या गचमुच धीन गइयर करेंगा? चीन पाकिस्तान को क्यो मदद पार रहा है म सवाल का जवाब उसे नहीं मिल पा रहा था, औरों के जवायों में उमका समाधान नहीं हो मका था। क्या माओ का अतिरिक्त राष्ट्राभिमान कांतिकारी नवता माओ पर नहीं हावी हो गया था? तालाब का पार लगाकर वह आगे बढा। कार की तरफ राम्ता संकरा होता जा रहा था । म कॅच टीले पर एक छोटा-मा बगीचा मा- 'पापा'। गेट पार करके सदर दामिल होने के बाद वह का। फिर सबसे ऊँची जगह पर बने हुए वाटर-टंक के पाम वाले छोटे टीले पर महा होकर नीचे की तरफ देखने लगा। नदी के जल को छूकर घर आती हुई ठडी हवा के कारण उसके चेहरे पर ताजगी दौड गयी। दमकी नजरें ब्रह्मपुत्र के किनारे के भू-विस्तार पर विचर रही थी। टीले के नीचे एक यहाकार नील फैली है । उसके पर दूर चमकते हुए पानी ना पहुँचती हुई रेत । दूर कुछ नामथर गति में बीच धाग की ओर बह रही यो। बुट औरतें रेती पार कर होल की नाबट रही थी। वह टॉग फैलावर 1. बरे, इममे सपा है।

80 रोवो । बैठा, बैठ गया। उसकी नजरें क्षितिज से टकराकर झील पर लौट आतीं। दो-तीन गिद्ध पंख पसारे डुबकियां लगा रहे थे। पानी से बाहर निकलकर वे रेत में अपना सीना टिका देते और अपने जंगी पंख फैलाकर रेत में पड़े रहते। दो गिद्ध हवा में चक्कर काट रहे थे, नीचे धरती का मुआइना कर रहे थे। डिकी का जी चाहा कि वह उन गिद्धों को पकड़े। दो गिद्ध नदी की धारा की तरफ़ झपट्टा मारकर नीचे उतरे । उनमें से एक किनारे के पेड़ पर जा दूसरा पानी पर उतरा। अपने वदन पानी में भिगोकर तीनों गिद्ध, दूसरे गिद्धों के पास जा बैठे। उन्होंने अपनी चोंचें रेत में गड़ा दीं। उसने ऊपर देखा। आसमान में कई गिद्ध चक्कर लगा रहे थे। एक जत्था धीरे-धीरे नीचे उतर रहा था। उनके पीछे एक और कतार थी। उसने देखा, वस्ती की तरफ़ से सैकड़ों गिद्ध नदी के किनारे जमा हो रहे थे। वे उड़कर पेड़ों पर बैठ जाते, फिर झपटकर नीचे उतरते। वहाँ से तीन- चार मील तक का इलाक़ा दिखायी पड़ता था। पूरे इलाक़ पर गिद्धों का झुंड मँडरा रहा था। "ओ हेवन्स ! व्हेंट इज़ इन देअर माइन्ड्स !"1 उसने नीचे देखा ! हज़ारों गिद्धों का एक रेला रेती पर सुस्ता रहा था। बीच ही में उनमें से कुछ ऊपर उड़ते, नदी के प्रवाह पर अपने पंख फड़- फड़ाते। उनके गीले वदन रेत पर फैल जाते,उनकी तादाद अब भी बढ़ रही थी। दोपहर की घुटन-भरी अटूट शांति ! उस पर जरा भी आघात किये बिना ये हजारों जीव वहाँ जमा हो रहे थे। पता नहीं, किस अनाम आदेश का पालन कर रहे थे, वे किंस शोक-दिवस पर मातम-पुर्सी के लिए यहाँ जमा हुए थे? क्या उनकी तीखी नज़रों ने भविष्य को भांप लिया था? अनगिनत पंख ! अनगिनत चोंचें ! तेज़ नुकीले नाखून । व्हॅट आर दे प्लानिंग? जवाब में वह कुछ सुनना चाहता था, लेकिन परिवेश स्तब्ध था। एक अप्राकृतिक ख़ामोशी, भव्य रंगमंच पर मूक-नाट्य चल रहा था। क्या होने जा रहा है ? "व्हॅट इज़...स्ट्रेंज रिच्युअल?" - 1. हे परमात्मा ! इनके दिमाग में क्या योजना है ?

रोबो 81 उमे लगा, मस्तिष्क अब संवेदन-शून्य हो गया है। कल रात का हैगओवर क्या अब भी शेप है'छ महीनो के वाद डिगढ से वह कल ही लौटा था। वह यहां वापम आना नही चाहता था। लेकिन उसका रिलीवर आ चुका था, इमलिए रुकने का सवाल ही नहीं था। पुराने साथी मिले थे। हबलदार डाकरे ने बचाकर रखी हुई आधी बोतल निकाली थी। वह चार पेग ने चुका था। दूसरे ग्रुप में बैठे गिल ने उसे बुलाया। इस ग्रुप में आकर जमने और दो पेग चढा लिये। फिर तीसरी मंडली ने उसे निमत्रित किया । उसे अब भी याद आ रहा था कि कसे नौवां पेग गले में जलता हुआ उतर गया था। उसके बाद मस्ती का आलम । पूरा दृश्य अस्पष्ट और धुंधला मालूम पड रहा था। उन पिछले छः महीनों में पीने की कभी नहीं हुई थी। लेकिन कल उसने वेरोक-टोक पी थी आया या तव रात के दो बज चुके थे। बरामदे में यह था। काफ़ी पी।सारा शरीर सर्दी से अकड गया।

रोवो स्तष्क जकड़ गया था। डैम यू, यू फूल्स !' किस पर क्रोध कर रहा था है ? किस पर खीझ रहा था? कुछ समझ में नहीं आ रहा था। उसने एक बार फिर उन गिद्धों की तरफ़ देखा। वही आलम अब सी था। अनचाहे उसका हाथ, ढेले की तलाश में छटपटाने लगा था। उसे यकीन था कि बड़े-से-बड़ा पत्थर भी उस स्थिति में विघ्न पैदा नहीं कर सकता । अज्ञात भय की एक लहर उसके शरीर में दौड़ गयी। उस भयानक दृश्य से नज़रें हटा लेने की उसने कोशिश की लेकिन वे फिर से हठात् उसी निःशब्द भीड़ पर जम जाती। मंत्रमुग्ध व्यक्ति की तरह वह उस दृश्य को एकटक घूरता रहा। पीछे आहट हुई। उसने गरदन घुमायी, कोई उसको देख रहा था। कोई स्त्री थी-बड़ी-बड़ी आँखें, ठिगना सुडौल शरीर, हलके पीले रंग की साड़ी, लवे खुले वाल। उसके चेहरे पर अस्पष्ट-सी मुसकान थी। एक झटके के साथ सब-कुछ रेंगता हुआ उसकी आँखों में समा गया। वह होश में आया। वह अव उस स्त्री को एकटक देख रहा था। स्त्री ने रेत के दृश्य की ओर ठोड़ी से इशारा किया। डिकी ने उधर एक दृष्टि डाली, और फिर उसकी तरफ़ देखने लगा। स्त्री की नज़रों में भय था। डिकी ने कंधे विचकाये... आँखें झपकायौं । शायद, पहले कभी उसने उस स्त्री को कहीं देखा था, शायद डॉ० राय के बँगले के पास ! दुवारा उससे भेंट हो रही थी। उसने याद करने की कोशिश की। कुछ क्षण पहले के सम्मोहन से वह अब मुक्त हो चुका था। उसे लगा कि वोझ हलका हो गया है । वह अव खुलकर साँस ले सकता है। अपनी जगह से वह उछल पड़ा और दो लम्बे डग भरकर उस स्त्री के पास आकर बैठ गया। डिकी की तरफ़ देखकर उसने कहा : 'की दारुण' 'यस, फ़ियरसम ! वट स्ट्रेजली फैसिनेटिंग !' उसने जवाब दिया। अगले दिन, दोपहर के खाने पर वह मेस गया था, चारों ओर मूंग की दा की तीव्र गंध फैली थी। इस गंध ने उसे मानो पीछे धकेल दिया था। उस

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रोबो | लेते हुए पत्थर की शानदार इमारतों में बैठे, यहाँ के बूढ़ों, युवकों, छोटे चों तथा अजन्मी संतानों के भविष्य को तहस-नहस कर देने वाले फैसले र रहे होंगे, और यहाँ इन बेचारों को अपने भविष्य का फैसला करने ली अज्ञात शक्तियों की कल्पना तक नहीं है। । वह बस्ती में दाखिल हुआ। दुकानें खुल चुकी थीं। फिर भी सड़क पर भीड़ नहीं थी। एकाध आदमी अख़वार हाथ में लिये गुज़रता दिखायी देता। वह कॉफ़ी-हाउस गया। उसने आज वेटर से रोज़ की तरह बात नहीं की। मेज़ पोंछते वक्त वेटर भी आज मुसकराया नहीं था। कॉफ़ी पीकर वह वाहर आया और वस्ती से दूर निकल गया। पूरा शहर मेंढक की तरह दुवका पड़ा था-ऐसा मेंढक जिसे किसी ने छू लिया हो और इस कारण वह घबराकर अपना जिस्म फुलाये दुबका पड़ा हो। उसे लगा कि शहर ख़ामोश है, मानो किसी हमले के इंतजार में हो। चौराहे के पास शोर सुनायी पड़ा। पचास-साठ आदमियों की वहाँ भीड़ थी। डिकी अपने रास्ते निकल जाना चाहता था, लेकिन ठिठककर भीड़ की तरफ़ बढ़ गया। भीड़ से घिरा एक आदमी सिर घुटनों में डाले बैठा था। उसका शरीर काँप रहा था। उसकी घिग्घी बंध गयी थी और वह कराह रहा था। जमीन पर खून के क़तरे दिखायी दे रहे थे। सिसकते-सिसकते वह कुछ कह रहा था, अपनी बात बार-बार दोहरा रहा था। डिकी की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था। उसने देखा कि उस आदमी के कपड़े तार-तार हो गये हैं । शायद झोंपड़-पट्टी में रहने वाला कोई मजदूर होगा। एक जवान लड़का उसके कंधों को मजबूती से पकड़े खड़ा था और दो आदमी उसे घेरे खड़े थे। उनकी नज़रों में स्वाभिमान था, मानो उन्होंने कोई बहुत बड़ा पराक्रम किया हो। उनमें से एक आदमी अपनी आस्तीने ऊपर चढ़ाता हु चीख-चीखकर भीड़ से कुछ कह रहा था। वह गालियाँ बके जा रहा था उसकी आवाज़ में घृणा थी। नीचे बैठे हुए आदमी की तरफ़ वह तिरस्क की नजरों से देख रहा था। सुनने वाले आश्चर्यचकित थे। वे स्थिति रोवो 85 मजा ले रहे थे। गालियां बकते हुए उम आदमी ने मजदूर को कमर पर लात मारी । वह लुढक गया। दमकी आंखें भीड़ को देख रही थी। उसकी नगरी में एक ही भाव था--आतक ! भयानक खोऊ ! पिंजरे में बंद पसी की तरह वह महमा हुआ पा। उमर होंठों से खून निकल रहा था। एक हॉट प्रायद फट गया था। उसके गंदे कपड़ों पर खून फैला हुआ था। जवान ने उसे एक और घूमा जमाने के इरादे में अपना हाय कार उठाया। भीड और मिमट आयी। वह मजदूर पूर्वी बंगाल में आया था, पेट भरने के लिए। मुमलमान था। उम ममय भारत और पाकिस्तान के बीच जग चल रही थी। भीड़ के देशाभिमानी लोगों ने उसे पकड़ लिया था। "जासूम है, पाकिस्तानी जामूम । कबूल कमे नहीं करता । पोटो साले को ! मारो सुअर को ! म्माला, नमकहराम " पिटना हुआ वह चीन रहा था। रो रहा था। लोगों में दया की याचना कर रहा था। डिकी को यकीन था कि वह वेगुनाह लेकिन लोग इस तरह का सवहार वो कर रहे हैं ? व्हाई होन्ट दे सी द ऑबविमदे मार टैरिफाइए। वे स्वय भयकर पास के शिकार हो चुके हैं। अनुरक्षा और भर की भावना ने उन्हे घेर लिया है। इसमें वे मुक्ति चाहते हैं, वे महमे हुए हैं, लेकिन स्वय अपना मुकाबला करने की हिम्मत उनमें नहीं है । वे स्वयं अपनी बुजदिली, नामर्दी और भय मे घबरा गये हैं। लेनिन वे उलटे यह माविन करना चाहते हैं कि वे दरपीक नहीं हैं और न घबराये हुए ही है, बल्कि वे तो वहादुर हैं । इसीलिए इम गरीद जादमी पर टूट पड़े है। नहीं, यह आमम हो ही नहीं मकना । उसे बचाने के लिए मुझे कुछ करना चाहिए। उसकी इच्छा हुई कि भीड को कुछ समझाये-चुनाये। लेकिन उसे यह भी पता था कि उसके हस्तक्षेप में कोई फायदा नहीं होगा। भीट से टक्कर लेने का माहम यह जुटा नहीं पाया। उमै गुद पर ग्लानि हुई । उमे यपने-आप मे पृमा होने लगी। आई मम्ट नॉट हेट माईमेरफ! युद से नफरत, मुद पर दया ! जहर की इम जड़ को अपने दिमाग में पनपने नहीं दंगा। इट इज बेरी रेशनल 5 रोवो ईंट आई ऐम डुईग । क्या कर सकता हूँ मैं ? क्या मैं इन लोगों को समझा कता हूँ ? इन लोगों की अकल मारी गयी है। विचार-शक्ति भ्रष्ट हो यी है । अंधे क्रोध ने इन्हें घेर लिया है। जमीन की परतों के नीचे गड़ा हुआ इनका पशु जागृत हो उठा है और अब यह शैतान संस्कृति और मानवता की परतें फाड़कर बाहर निकल आया है। आदमी के अंदर बैठा हुआ यह राक्षस । क्या मैं इसके खिलाफ़ लड़ सकता हूँ? उसने चारों ओर दृष्टि डाली। वह उधर खड़ी थी, जमघट से दूर । भाग निकलने की तैयारी में हो जैसे । वह उसके निकट आया। फिर भी स्त्री का उधर ध्यान नहीं गया। वह भीड़ से घिरे उस मजदूर को देख रही थी। चेहरे पर डर और पीड़ा के भाव स्पष्ट थे। डिकी ने महसूस किया कि स्त्री की साँस ज़ोर से चल रही है। वह देख रहा था कि उसके माथे पर पसीने की बूंदें जमा हो गयी हैं। डवडवायी आँखें जमघट पर स्थिर हैं, होंठ काँप रहे हैं। वह बहुत ज्यादा घबरा गयी थी। डिकी ने अहिस्ता से उसका हाथ छुआ। वह इतनी डर गयी...डिकी को लगा कि वह चीख़ पड़ेगी। कुछ क्षणों के लिए उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं उभर सका। फिर धीमे से वह अस्फुट स्वर में बोली, “चलो, यहाँ से कहीं दूर चलें, जल्दी।" उसकी आवाज काँप रही थी। डिकी के कुछ कहने से पहले ही वह चल पड़ी। डिकी उसके पीछे लंबे-लंबे कदम बढ़ाता निकल गया। दोनों अब साथ-साथ चल रहे थे। शहर के बाहर चले आने के बाद उन्होंने पक्की सड़क छोड़ दी और एक पगडंडी पर चलना शुरू किया। रास्ते में पहाड़ीनुमा एक टीला पड़ता था। सैकड़ों वर्षों की निरंतर आवाजाही के कारण वह चिकना हो चुका था। डिकी उस पर से कूदकर नीचे उतरा। उसने अपना हाथ बढ़ाया और युवती ने अपना हाथ उसके हाथ में दे दिया। दोनों नीचे उतरे। युवती क हाथ अब भी कांप रहा था। समतल भूमि पर आ जाने के वाद वे बाँसों के जंगल की तरफ जाने वाले रास्ते पर मुड़ गये। उसने युवती की तर! 1 रोवो 87 - देखा और पूटा, "तुम इतनी डरी हुई क्यों हो?" जवाब में कुछ कहने में पहले उसने अपने माथे पर हाथ फेरा। "वह आदमी पूर्वी बंगाल का था। मैं भी पूर्वी बंगाल में मामी हूँ।" डिकी खामोश था। उसने युवती का हाय अपने हाथ में लेकर पूछा, "मुझे डिको कहते हैं, तुम्हे ?" "सुनीता," उसने जवाब दिया। दोनो ने एक-दूमरे की तरफ़ देखा। दोनो हँस पड़े। काफी दूर तक जगन के ममानातर चलती हुई वह पगडडी वांम के जंगल का चक्कर काटकर पास के मैदान में समाप्त हो जाती पी। जंगल के बीचोबीच जमीन का एक अंडाकार खाली टुकड़ा था। शायद पहले कभी यहाँ ताताब रहा होगा, और अब पारो और में बहकर आने वाली मिट्टी के कारण भर गश होगा। यह पूरा हिस्सा हरी धाम से बैंक गया था। परे सुपारी का बागीचा दिखायी दे रहा था। मृदु और मांसल हरियाली ! वे चले जा रहे थे। उमीन की नमी के कारण उनके पांव गोले हो गये थे। वे सुपारी के वाग्रोचे की तरफ जा रहे थे। अब उसने युवती को वाह थाम ली थी। दोनो मौन, परस्पर सटकर चल रहे थे। एक जगह पर, पेडों के तले पत्यर के स जमीन पर बाडे डाल दिये गये थे। शायद यही, पहले कभी मदिर रहा होगा। ये पत्थर उसी के भग्नावशेष होंगे। वही एक शिला पर वे दोनों बैठ गये। चारों ओर बाम का घना जंगल था। बाहर की दुनिया, मानो इस जगल ने छिपा ली थी। ऊपर आसमान का गोल छाता। कही ढोलक बजने को आवाज आ रही थी। वे दोनों एक-दूसरे से सटकर बैठे थे। हिकी ने उमका दाहिना हाथ अपने हाथ में पकड़ रखा था और उनकी हथेली की रेखाओ पर अपनी उंगलियां कर रहा था। ऊपर हवाई जहाज की पचडाहट सुनायी पड़ी। डिकी ने पर देसा। आवाज तेज होनी गपी। भयकर आवाद करता हुआ एक जहाज उनके सिर पर में आगे निकल गया । वह उसके और पास मा गयी। डिकी ने अपने हाथ से उसकी पीठ घेर ली और आहिस्ता में उसके कई थपथपाने लगा। का. चाहता था कि उनका साहस बंधाने के लिए कुछ कहे, लेकिन उसे शन - 1 रोबो सूझ रहे थे। युवती का सिर उसके कंधे पर टिका था। नज़रें सामने याली की लहरों में खो गयी थीं। सुनीता ! कौन होगी सुनीता? क्या अता-पता होगा उसका? यह नवी लड़की कितने विश्वास से मेरे कंधों पर माथा टिकाये बैठी है ? र मैं उसके सहवास में इतना मौन और विकारहीन क्यों ? मेरे दिमाग़ उसके बारे में क्यों नहीं कुछ सवाल पैदा होते ? अव तक मैं जो भी चिता रहा हूँ, वह फिर क्या था ! उसके वालों की भीनी गंध उसे सुख दे रही थी। हम अब यहाँ कितनी देर और रुकने वाले हैं ? यह मौन, निकटता और यह एकांत ! एक घंटे बाद, एक महीने वाद, आगे भविष्य में क्या रूप होगा इन सबका? क्या है मेरे मन में ? डू आई वान्ट टु सिड्यूस दिस वूमन ? वह अपने हाथ की छोटी उँगली से उस युवती के पंजे को सहला रहा था। हवाई जहाज़ की घड़घड़ाहट अव भी कानों में गूंज रही थी। स्थितियों के सामने वह विवश था। पर स्थिति के लिए आखिर कौन जिम्मेदार था ? स्थितियों को किसने बनाया? मनुष्य ! उसने ऊपर आसमान की तरफ़ देखा । वह हवाई जहाज अगर लौट आये और आग के गोले बरसाने लगे तो...तो, वह कर क्या सकता है ? क्या वह मौत से घवरा तो नहीं रहा है ? उसे अपनी वेवसी, लाचारी और नपुंसकता से चिढ़ होने लगी। सुनीता की हथेली गुलाबी और नर्म थी। उसके पंजे की पकड़ में सुनीता की हथेली छोटे बच्चे की हथेली की तरह दिखायी दे रही थी। उसने उसकी चूड़ियों पर आहिस्ता से टिचकी लगायी। चूड़ियों की खनक बड़ी मधुर उसने फिर से टिचकी लगायी। एक बार फिर उसे लगा कि उसका दिमाग़ कुछ भी नहीं सोच रहा है। सुनीता के बारे में मानो उसने सोचना ही बंद कर दिया था । गरदन घुमाकर उसने सुनीता की तरफ़ देखा। वह भी उसे देख रही थी। उसकी आँखों में मंद-मंद मुसकान थी। आँखों की मुसकान जब होंठों पर उतरी तव नीचे का होंठ थोड़ा-सा बाहर की ओर उभर आया। युवती ने अपनी ठोड़ी उसके कंधे पर टिका दी; डिकी ने अपनी थी। 1. क्या मैं इस औरत को पथ-भ्रष्ट करना चाहता हूँ?

रोवो 89 पांची उँगलियां उसके वालो में गड़ा दी । उँगलियों को फैलाकर उसने युवती का सिर हिलाया। अब युवती के होंठों को मुमकान स्पप्ट और खिली हुई थी। उसने युवती की आंखो मे देखा। उसके कधों को छुआ। युवती मुडी और उसकी आंखो में आँखें डालकर देखने लगी। डिकी ने अपने होंठ धीरे से उसकी पलकों पर टिका दिये...। शाम को जब वह लौटा तो उसका मन एक अनाम और अगम्य ससार में विचरण कर रहा था। मन का वोझ हलका हो गया था। चिंताएँ मिट चुकी थी। परस्पर लिगन मे दोनो काफी देर तक बैठे रहे थे। लेकिन उस आलिंगन में कहीं भी मस्ती नही थी, आवेग नही था, उतावलापन नहीं था। उसके वालो मे अपना मुंह छिपाते वक़्त उसने उसके कानो, गालो और होंठो का स्पर्श किया था। युवती के दिल की धडकने और उसके शरीर की थरथराहट उसने महसूस की थी। बालो की जाली में से सुपारी के पेडों की लम्बी कतारें उसने देखी थी। ढोलक की धीमी आवाज़ उसकी नसों में समा गयी थी। वर्षा की एक फुहार ने उन्हे उठा दिया था। आस- मान पर वादल घिर रहे थे। "चलो, चलें," उसने कहा ! एक बार फिर उसी हरियाली में पैर गडाये वे पगडडी पर आ गये थे। दोनो एक साथरुके थे। "सुनीता !" डिकी ने कधे पकडकर उसे अपने करीब खीच लिया था। पर उसके चेहरे के पास जब डिकी के होंठ पहुंचे थे तो उसने अपनी आँखें। बद कर ली थी। अधे होठ युवती के होटो को खोजते हुए भटक रहे थे---- उसके गालो पर, ठोड़ी पर । जोर की बारिश होने लगी थी। वह उससे अलग हुआ था और सडक की तरफ मुडते हुए उसने कहा था, "दोपहर में।" - उसका जी चाहा कि अपना अनुभव किसी मित्र को वताये । अपने सुख में किसी और को शामिल कर ले। लेकिन उस अनुभव को, उससे मिले मतोप को, वयान करना कसे सभव था? कर भी दे, फिर भी उसका निजी अनुभव औरो की समझ मे कैसे आयेगा? उसे मुन लेने पर शायद सावत 90 रोवो - कहेगा, 'आखिर साले, असमिया छोकरी को पटा ही लिया न !' गिल बड़ा दुखी होगा और कहेगा, 'वेवकूफ़, मौक़ा खो दिया ! बुद्ध मजा कर लेना था।' डाकरे की प्रतिक्रिया सबसे अलग होगी। वह कहेगा, 'आखिर, असमिया लड़की ने ही तुझे पटा लिया। कोन है वह लड़की ? रहती कहाँ है ?' डिकी इनमें से किसी भी मित्र की शंकाओं का समाधान नहीं कर सकेगा। वास्तव में उन चंद घंटों के दौरान, उसने स्वयं अपने भविष्य के वारे में कुछ भी नहीं सोचा था। उसने लड़की से न तो उसके अतीत के बारे में कोई सवाल पूछा था, और न ही उसके निजी जीवन के बारे में। फिर भी उसके सामीप्य में बीता हर क्षण उसे सुखकर लगा था। चाह बढ़ गयी थी। क्या सचमुच भविष्य में ये संबंध और भी गहरे और दृढ़ होने जा रहे थे? लेकिन उस समय भविष्य की चिता उसे कहाँ थी? वे दोनों नदी के किनारे बैठे थे । अँधेरा बढ़ता जा रहा था। सांझ की किरणों से उनके पैरों के पास का पानी चमक रहा था। लहरों का स्पर्श उन्हें सुख दे रहा था। उस पार कितने ही पेड़ों की मिली-जुली छायाओं ने आकाश की पृष्ठभूमि पर एक बहुत बड़ी छायाकृति बना दी थी। अपनी आँखें उसके कंधों पर टिकाकर वह उससे लिपट गयी थी, मानो एक महाकाय पशु अपने शिकार की तलाश में दुबका बैठा हो । वह कुछ बोले जा रही थी, कानाफूसी के स्वर में । लेकिन डिकी का ध्यान उधर नहीं था। वह समझ गया था कि सुनीता बेचैन है । अपनी वेचैनी को छिपाने के लिए वह हमेशा इसी तरह बड़बड़ाती रही है। आज भी उसकी आवाज सहज नहीं थी। वह खुद अनुभव कर रही थी कि ज़रूर कुछ फिसलता जा रहा है~फिसलना चाहता है । लेकिन उसे मानने को वह तैयार नहीं थी। आगे चलकर इन संबंधों के समाप्त हो जाने का आभास उसके लिए विल- कुल ही अनपेक्षित तो नहीं था। फिर भी यथार्थ को झुठलाने की वह कोशिश कर रही थी। क्या चल रहा होगा उसके दिमाग़ में ? उस पर जुदाई का क्या परिणाम होगा? डिकी सोचता रहा। इस दूसरी मुलाकात के बाद का समय कितनी तेजी से भाग रहा था। चीन का 'अल्टिमेटम' तीन दिन आगे बढ़ गया था। न युद्ध, और न शांति । बड़ी विचित्र स्थिति पैदा हो चुकी थी। राजनीतिक स्तर पर सोच-विचार ।

91 चल रहा था। लेकिन इन सबसे उसका कोई वास्ता नहीं था । उस पत्थर पर दोनो घटों बैठे रहते, एक-दूसरे के निकट, मौन, अपनी कल्पनाओं की दुनिया में खोये हुए। कभी जब उसका मूड होता, खूब बातें करती। अपने यचपन, परिवार, सहेलियो आदि के सबंध में बताती रहती। वह सुनता रहता। कभी वह अपनी मानसिक उलझनो को शब्दों में ढालने की कोशिश करता। परेशान करने वाले सैकड़ो सवालों के समाधान खोजने की कोशिश करता। इस स्थिति में वह अपने-आपको सबोधित करता रहता, नाटक में 'स्वगत' की तरह। फिर भी वह उसे सुनती रहती। दोनों के बीच आत्मीयता, प्यार और आकर्षण उत्तरोत्तर बढता गया। दोनों इसे महसूस करते थे। उसे कभी-कभी आश्चर्य होता कि कैसे सुनीता उसके अन्तर्मन को समझ जाती है । उस वक्त अगर उससे कोई यह कहता कि उनके सबंध शाश्वत नहीं रह सकेंगे तो वह कभी पकीन न करता । उन दिनो तो तमाम उन उमी के साथ बिताने की तैयारी यो उमकी। फिर भी उसने अपने प्यार को पारदो में कभी व्यक्त नहीं किया। इसे वह टालता रहा। अमर प्रेम' जैसी बचकानी कल्पना में वह विश्वास नहीं कर सकता था। समय के शाश्वत होने पर उसे विश्वास नहीं था। उसके लिए शाश्वतता का अर्थ था मौल! अशाश्वतता का अर्थ या नित्य परिवर्तन, अर्थात जीवन । लेकिन जब भी उसे खयाल माता कि विछोह अटल है, उमे बड़ा कष्ट होता। इसलिए निकटता बनाये रखने के लिए अनजाने ही वह प्रयास करता उसने सुनीता के मन की गहराई में उतरकर टटोलने की कोशिश की यो । क्या यह उस कटु यथायं का मुकाबला कर सकेगी वह जानना चाहता था। यह तो तय था कि वह सुनीता के भाव-जगत से सदा के लिए जुड़ नहीं सकेगा। मुनीता की इच्छा भी हो, तब भी यह सभव नही हो सकता। चाहे खुद लालायित क्यों न हो. भविष्य का बदलना मुमकिन नहीं था। वर्तमान उसका नहीं था। वह तो अतीत से निपत्रित था। उसका व्यक्तित्व उसके अतीत का निष्कर्ष था। इसलिए अब व्यक्तित्व को अपनी पसद के सांचे में उडेलकर आकृतिबद्ध करना सभव नहीं था। और सुनीता इस कठोर यथार्थ को नकार रही थी। वह सपनों के कल्पना-लोक में 92 रोवो विचरण कर रही थी। लेकिन यह उसका बचपना था ! माना कि यथार्थ का सामना करना कष्टप्रद होता है, लेकिन उसे नकारने का यह मार्ग नहीं था। मुक्ति का रास्ता यह नहीं था। मन से वे दूर-दूर चले जा रहे थे। शरीर के स्तर पर क्या इस दूरी को पाटना संभव था? उसने अपना हाथ सुनीता के कंधे पर रखा, और सुनीता का शरीर कड़ा हो गया। डिकी उसके शरीर के स्वभाव से परिचित था। अपनी उँगलियों से उराकी पीठ सहलाते समय डिकी ने कई बार सुनीता के शरीर की थिरकान महसूस की थी। वह अपना मुंह उसके जूड़े से सटाकर चंपा के फूलों को सूंघने लगा। डिकी के होंठ उसके कानों के पास थे। सुनीता की साँस वह सुन रहा था। सांस तेज चल रही थी। आलिंगन के लिए उसका शरीर अधीर हो उठा। उसने सुनीता की ठोड़ी पकड़कर उसका चेहरा अपनी तरफ़ मोड़ा। उसके बालों में से उस पार की छाया- कृति नज़र आ रही थी। अपने गालों पर उसके होंठों का हलका-सा स्पर्श उसे महसूस हुआ। उसके होंठों पर अपने होंठ रखकर वह एक क्षण स्थिर रहा। वह मुड़कर उसके बिलकुल सामने गयी। अब उसका हाथ सुनीता की पीठ पर था । वह और निकाट हो गयी। सर्दी के कारण उसके होंठ फट गये थे। डिकी अपने-आपको भूल जाना चाहता था, अपने में खो जाना चाहता था। उसकी जीभ सुनीता के होठों की पंखुड़ियों को अलग करके उसके दांतों को स्पर्श कर रही थी। सुनीता का समूचा शरीर काँप रहा था। सुनीता के हाथ उसके कंधों को कसकर जकड़े हुए थे । वह अपनी पीठ पर उसकी हथेलियों का दवाव महसूस कर रहा था। सोचने की सारी प्रक्रिया रक गयी थी। आकाश की पृष्ठभूमि पर वह छायाकृति अव भी दिखायी दे रही थी, मानो कोई विकराल पशु शिकार की घात में दुबका बैठा हो । ऊपर तारे टिमटिमा रहे थे। सर्दी बढ़ गयी थी। 'नो, 'इट्स ऑफ़ नो यूज, नायदर कैन ही लूज हिमसेल्फ़ गॉर फैन ही फाईड हर !'उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। एक बार फिर उसका हाथ सुनीता के शरीर पर भटकने लगा। 1. 'नहीं, इसका कोई फायदा नहीं । न यह स्वयं हार सफता है और न ही उसे प्राप्त पार सपता है !'

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नौ उसके खाट की निवाड़ काफ़ी ढीली पड़ चुकी थी। लेटो तो झोली में पड़े होने का अनुभव होता था। नीचे रखे ट्रंक से पीठ लगती रहती थी। फिर भी उसने निवाड़ कसवायी नहीं। किसी चीज़ में उसे रुचि नहीं रह गयी थी। सव-कुछ नीरस और ऊवा देनेवाला था । पूरा-का-पूरा यूनिट निकम्मा और बेकार था। मानो फ़ौज के लम्बे-चौड़े कारोवार में यह यूनिट शामिल ही नहीं था। कई अनुभवी वायरलेस-ऑपरेटर तथा रेडियो-मैकेनिक उस कंपनी में बेकार समय काट रहे थे। पिछले दो साल में किसी मैकेनिक ने पेंचकस तक नहीं पकड़ा था, न किसी ऑपरेटर ने 'मोर्स-की' को छुआ था। वाहर खड़ी तीन टन और एक टन वाली गाड़ियों में कई ट्रान्समीटर-सेट रखे थे। साफ़ करते रहने के अलावा इनका और कोई उपयोग नहीं था। इस यूनिट में आये उसे तीन-चार हफ्ते हो चुके थे। लगता था, महीनों गुजार दिये हैं। सुबह-सुबह, तीन-चार मैकेनिक वाथरूम के चारों ओर की घास काटते रहते थे तो उतने ही ऑपरेटर मेस के चारों ओर की। कुछ लोग ऑफ़िस के चारों ओर यही काम करते रहते । कुछ परेड ग्राउंड पर फावड़े लिये खड़े रहते ! सुबह उठते ही फुल यूनिफॉर्म में ग्राउंड पर हाजिर रहना पड़ता था। 'सावधान ! लेफ्ट...राइट...दायाँ...वायां...दायाँ... वायां...पीछे मुड़।' इसमें चालीस मिनट निकल जाते । वैरकों में लौटकर हाफ़-पैन्ट और पी० टी० शूज़ पहने-पहने ही ब्रेकफास्ट । उसके बाद बनियान पहने फावड़ा और खुरपी लेकर ग्यारह बजे तक परेड-ग्राउंड पर ।

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96 रोवो - - - नहीं चाहता। ओबे द ऑर्डर ।' निकल जाओ, यहाँ से । मार्च ऑफ़ !" डिकी को लगा जैसे उसे 'अतिरिक्त' खुशी हुई है। इफ़ लाइफ़ इज़ डल, आई मस्ट मेक इट विअरेवल । उसने इधर-उधर देखा, दूर खड़े वे आठ जवान अब उसी की तरफ़ देख रहे थे । वाथरूम के पास के जवानों का ध्यान भी इधर ही था। अपनी आवाज़ धीमी करते हुए शांति से उसने कहा, "मेजर जी, गाली देने की ज़रूरत नहीं है।" हवलदार निरंजन ने इधर-उधर देखा। सबके सामने इस आदमी से उलझना ठीक नहीं होगा, उसने सोचा। क्रोध का कड़वा बूंट पीते हुए उसने अपने-आपको शांत किया और धमकी के स्वर में बोला, "चलो, कंपनी सूवेदार सा'ब के पास चलो।" क्रमशः बदलती स्थितियों में डिकी दिलचस्पी ले रहा था। उसे लगा, बहुत दिनों के बाद वह खुली हवा में सांस ले रहा है। उसका दिमाग़ अव काफ़ी उत्तेजित हो रहा था। उसने बड़े आत्मविश्वास के साथ क़दम बढ़ाये । वह हवलदार निरंजन के पीछे चल दिया। चलते समय उसने अपनी वेरे कंप कान की तरफ़ और खिसका ली। कंपनी-ऑफ़िस पहुँचने पर हवल- दार निरंजन ने उससे बाहर ही रुकने के लिए कहा। डिकी सामने वाले पेड़ की छाया में खड़ा रहा । हवलदार निरंजन अंदर चला गया। उधर से एक जवान चोरी-चोरी डिकी तक पहुंचा। उसने ऑफ़िस के दरवाजे की तरफ़ नज़र डाली, इधर-उधर देखा, फिर धीरे से पूछा, "क्यों उस्ताद जी, की हुमा ?" "सत्यजित बाबू की नानी मर गयी," डिकी ने गंभीर होकर कहा। क्षण-भर के लिए बंगाली बाबू कुछ परेशान ज़रूर हुआ, लेकिन व्यंग्य समझ में आने पर उसका गुस्सा दूर हो गया। "बोका-~!" वह बुड़बुड़ाया। डिकी मन-ही-मन हँसा। 1. आज्ञा का पालन करो। 2. यदि जिन्दगी उदासी से भरी है, तो मुझे उसे सहने योग्य बनाना ही होगा।

रोवो 97 मे सूबेदार मणियार बाहर आया। निकट आने तक डिको स्थिर दृष्टि में उसकी तरफ़ देखता रहा । मूबेदार कुछ कहने ही को था कि डिकी ने फटाक जूता पटककर उसे कडक सलामी दी। सूबेदार झटके से एक कदम पीछ हटा । उसने सलामी ले ली। "व्हॅट इज रांग?" सूबेदार ने पूछा और हवलदार निरंजन की तरफ देखा । "यू डिसओबेड द ऑर्डर?" मूबेदार ने फिर पूछा । "यस सर, आई मेड, आई वुड नॉट डू दैट टाइप ऑफ वर्क । मैं अपने ट्रेड का काम करना चाहूंगा। इस काम के लिए मुझे पगार नहीं दी जाती।" "तुम्हें किस काम के लिए पगार दी जाती है, उसके बारे में हम मोचेंगे। तुम अपना काम करो।" सूवेदार क्रोध मे नही था। डिकी के करीव जाया और उसके कधे पर हाथ रखकर कहने लगा-"देखो उस्ताद, पागल मत बनो। दो महीने बाद तुम पक्के लान्स-नायक बनोगे। कितने साल हुए नुम्हे मिलिटरी में आये?" "चार साल।" "चार साल? चार साल और गुजर जायें तो तुम नायक बनने लायक हो जाओगे ।...यू आर लकी । अपना करियर मत सराव करो । समझदारी मे काम लो।" "जी ? जी, बहुत शुक्रिया...लेकिन...लेकिन मुझसे यह नहीं होगा," डिकी ने जवाब दिया। "देखो उस्ताद, आर्मी में ऑर्डर ओवे किया जाता है, चाहे वह गलत हो या सही। ऑर्डर इज ऑर्डर । फस्ट ओये इट, देन रिपोर्ट। कुछ क्षणों के लिए डिको चुप रहा। उसने सोचा, यही टनिंग प्वाइट है। उसका जवाब उसके भविष्य को निर्धारित करने वाला था। उवा देने वाली इस एकरस दुनिया से उसे नफ़रत हो रही थी। वट आई मस्ट बी 1. क्यों परेशान हो? 2. तुमने प्रादेश का पालन नहीं किया ? 3. हो श्रीमान जी, मैंने यह कहा था कि मैं इस प्रकार का कार्य नहीं करूंगा। 4. बादश तो आदेश है। पहले उसका पालन करो, फिर कुछ कहो।

98 रोवो रीजनेवल, उसने सोचा। लेकिन इसके पहले ही उसके होंठ खुल चुके थे। "आई डोन्ट थिंक इट इज सेन थिंग टुडू। आई ऐम रिपोटिंग विफ़ोर ओवेइंग।" सूबेदार मणियार अधीर हो उठा । वायें हाथ की छड़ी दायें हाथ में आ गयी। गरदन नीची करके वह छड़ी का सिरा जूतों की नोंक पर पटकता रहा। इधर हलवदार निरंजन अंदर-ही-अंदर वेचैन हो रहा था। सूवेदार ने अपनी गरदन ऊपर उठायी। आग बरसाती हुई आँखों से हवलदार की तरफ़ देखकर उसने कहा, "कल ओ० सी० सा'व के सामने हाज़िर करो इस जवान को । चार्जशीट के बारे में बाद में सोचेंगे। मार्च ऑफ़ !" मुड़ते वक्त उसने डिकी पर एक फिसलती नज़र डाली। डिकी वहाँ से सीधे वैरक की तरफ़ चल दिया। बैरक में आकर वह धड़ाम से खाट पर गिर पड़ा और लेटे-लेटे छत की तरफ़ देखता रहा। फिर सिरहाने पड़ी हर्मन हेस की किताब 'सिद्धार्थ उठाकर पढ़ने लगा। दोपहर की चाय के वक्त हवलदार निरंजन ने उसे एक तरफ़ बुलाकर कहा,"देखो डिकी, ठंडे दिमाग से काम लो। शांति से सोचो। सोचो, इसका नतीजा क्या होगा? तुम्हें कोई तकलीफ़ है, तो मुझे बताओ। आखिर हमारा काम और है ही क्या? अभी कुछ विगड़ा नहीं है। मैं तुम्हारी मदद करूंगा। लेकिन तुम कुछ बताओ तो।" हवलदार निरंजन चाहता था कि बात आगे न बढ़े। "जी, बहुत अच्छा । लेकिन मुझे कोई तकलीफ़ है ही नहीं," डिकी ने जवाब दिया। वह वात को इस तरह ख़त्म करना नहीं चाहता था...और इस तरह हार भी नहीं मान लेना चाहता था। वह पीछे नहीं हटना चाहता था। - 1. मुझे तर्कसंगत होना चाहिए। 2. लेकिन मेरे विचार में यह करना उचित नहीं है । मैं आदेश का पालन करने से पहले ही आपसे कह रहा हूं।"

१५ अगले दिन सुबह नौ बजे डिकी जव ऑफिस के अहाते में खड़ा था तो कल वाला बगालो वाबू आज भी कल की जगह पर बैठा पास साफ़ कर रहा था। डिकी की तरफ़ देखकर वह मुसकरा रहा था। उधर खड़े नायक जाधव ने ऐसी मुद्रा बनायी जैसे वह डिको को पहचानता भी न हो। लेकिन नायक शर्मा तनिक मुमकराया था और गरदन घुमाकर दफ्तर में घुस गया था। कुछ देर बाद मूवेदार मणियार वाहर आया। उसने डिकी का ड्रेस चेक किया । वेल्ट के बकल चमक नहीं रहे थे। जूतों की नोंक की पॉलिश उतर गयी थी। मणियार ने उसमे कुछ नहीं कहा। उसके होठ भिव गये। आँखें तरेरते हुए वह चिल्लाया, "चलो, अदर चलो। सावधान ! दाहिने तेज पल ! वायें घूम...वायें घूम !" डिकी रोव से चलता हुआ अंदर ऑफिस में कंपनी कमाडर के कमरे तक आकर रुका। "दाहिने धूम ..वाये घूम, थम !...दो कदम पोछे चल ! सैल्यूट !... साव, मिक्स...टू...भी...मेवन...सिक्म...टू...फाइय, लान्स नायक डिकी. सर।" लवी भव्य मेज के पीछे फाइलों में अपनी आंखें गडाये बैठे पोहता ने गरदन ऊपर उठायो । उसके मिरपर इक्का-दुक्का बाल थे। रोबदार चेदर धारदार नाक, बद होंठ, पतली ठोड़ी। उसके दोनों हाथ मेज की वार पर थे। उँगलियों के जोड़ों पर सुनहरे बाल चमक रहे थे। अपनी मुनगेन वाली ऐनक उसने बड़ी नजाकत से उतारी। उसकी उंगलियां दी यो-पोरों के पास गांठे। चश्मा उतारने के बाद मेजर मोहटाने का शरीर ढीला छोड़ दिया और टांगे फैलाकर कुछ देर निर्विकार नजरें गड़ाये डिकी की तरफ़ताकता रहा। 'अ ची ट्रिप इर्विन' डिकी मन-ही-मन बुड़बुड़ाया। वह मेजर की आंखों में जाकर मेजर मोहता ने ऐलक फिर चढ़ा ली और ट्रंकर पन्ने उलटने लगा। कुछ सेकड गुजर गये। "वेल, डिकी...वेल, डिकी, नान्मनावर टिम 1. "परेशान करने के लिए क्या होरी बानु" 100 रोबो काफ़ी अच्छा है। गुड डिसिप्लिन । ए-वन इन ट्रेड । ट्रांसफर्ड विद स्पेशल प्रोमोशन। गुड, वेरी गुड ! मेरे खयाल से छः हफ्ते बाद, तुम पक्के लान्स- नायक बनोगे। जरा सोच-समझकर काम लो। दिमाग को ज़रा ठंडा रखो।" "जी...!" डिकी ने हामी भरी। सारा मजा किरकिरा हो गया था। शुरू होने से पहले ही खेल ख़त्म हो चुका था। क्रोध की एक लहर उसके शरीर में दौड़ गयी। कनपटियाँ गर्म हो गयीं। हथेलियों में पसीना छलक आया। उसका जी चाहा कि उछलकर मोहता के टेविल पर खड़े होकर जोर-जोर से चीखे। लेकिन क्या चीखें ? टेलिप्रिंटर पर अनेकों बार पढ़ा हुआ वह निरर्थक वाक्य उसके दिमाग में तैरने लगा : 'नाऊ इज़ द टाइम फॉर ऑल द मेन टु कम टु द एंड ऑफ़ द पार्टी।' उसकी समझ में नहीं आ रहा था, यह निरर्थक वाक्य उसे क्यों याद आ रहा है ! अपने भीतर छलांग भरती उद्रेक की लहरों पर उसे आश्चर्य हो रहा था। लेकिन फिर भी भीतर से कहीं वह बहुत शांत था। क्रोध और आतंक का निरीक्षण कर रहा था। "जी," डिकी ने फिर हामी भरी। लेकिन अबकी बार उसकी 'हाँ' में ढिठाई थी, मस्ती थी, ललकार थी। डिकी की आवाज का फ़र्क मेजर मोहता शायद जान गया था। उसने फाइल एक तरफ़ कर दी। "देखो, लान्स-नायक डिकी," मेजर कुछ क्षण रुका, "आर्मी में सर्विस करना है तो सुपीरियर्स को ओवे करना पड़ेगा। ओवे द ऑर्डर्स । गिव रेस्पेक्ट टु योर सुपीरियर्स ।। सर्विस करना है तो कायदे से करो। तुम्हें सविस करनी है या नहीं ?" यह सवाल नहीं, धमकी थी। दीज़ ऑफिसर्स...दे ऑलवेज़ टॉक इन क्लीशेज़ लाइक मशीन्स !' "जी नहीं !" डिकी ने तुरंत जवाव दिया। उसका दिमाग़ अब पूरी तरह जागृत था। कमरे में जो कुछ भी हो रहा था उसे वह देख रहा था। उसके कान हर आवाज़ को अपने अंदर समाये ले रहे थे। यह देखकर उसे आश्चर्य हुआ कि उसकी टाँगें काँप रही थीं। 1. नादेशों का पालन करो। अपने उच्च अधिकारियों का आदर करो। 2. ये अधिकारी तो हमेशा मशीन की तरह खड़क वात करते हैं। ।

रोवो 101 मेजर मोहता के लिए डिकी का जवाब अनपेक्षित था। उसने अपने हाथ मेज़ के नीचे कर लिये और संभलकर बैठ गया। सामने खड़ा मूबेदार मणियार बेचन हो उठा । कुछ क्षण मेजर मोहता मेज़ को घूरता रहा । जव उमने अपनी नजर ऊपर उठायी तव उसके होठों पर मुसकराहट थी। "लेकिन क्यो? क्या तकलीफ है तुम्हे ? बोलो, खुले दिल से कहो," मेजर मोहता ने कहा। डिकी कुछ क्षण चुप रहा। "शैल आई, टेल यू दटूथ, सर?" उसने पूछा। "ऑफ कोर्स, ऑफ कोर्स ! आई वॉन्ट द टूथ । सच-सच कहो, डरो मत !" मेजर मोहता ने कहा । उस समय सूबेदार मणियार की सांस जोर से चल रही थी। डिकी ने स्पष्ट सुनी थी। 'डरो मत ! माई फुट् !' वह मन-ही-मन बुडबुडाया। जवाब देते ममय उसकी आवाज़ कांप रही थी, "मेरा विचार है कि आर्मी में सविस करके मैं राष्ट्र की सेवा नहीं कर रहा हूं।" कुछ क्षण...एक क्षण शाति। और दूसरे ही क्षण मेजर मोहता की मुट्टियां मेज पर थी। मुट्ठियो को जोर से पटककर वह झट से उठ खडा हुआ। रूखी और भारी आवाज़ मे पता नहीं, वह क्या-क्या वकता रहा। क्रोध के कारण वह अपनी मातृभाषा पर उतर आया था । मूबेदार मणियार थोडा आगे खिसका। लेकिन किया क्या जाये, यह उसकी समझ में नही आ रहा था। परेशान होकर वही खडा रहा। कभी कपनी-कमाडर मेजर मोहता को देखता तो कभी डिकी को। उसकी नज़र झूले की तरह झोके ग्वा रही थी। वाहर वाले ऑफ़िस मे कुर्सी सरकाने की आवाज हुई। फिर किसी के दौडने की आवाज़। टाइप-राइटरो की टिप-टिप अचानक रक गयी थी। मेज पर रखे बिजली के पखे की हवा से ट्रे मे रखे कागज फड. फड़ा रहे थे। डिकी अपने दिल की धडकन साफ सुन रहा था। उसे लगा कि उसके माथे पर पसीना निकल आया । अव उसका पूरा शरीर पमीने मे लथपथ था। पांव कांप रहे थे। उसने अपना ध्यान मेजर मोहता की तरफ केंद्रित करने की कोशिश की। मेजर मोहता "हाऊ यू डेयर, हाऊ यू डेयर ।" को रट लगाये हुए - .02 रोवो था । अपाहिज मशीन टूट चुकी है। डिकी ने उधर देखा। अव मेजर मेहता की नजरें डिकी पर जमी हुई थीं। डिकी भी उसी को देख रहा था। मेजर कुछ सँभल गया। कुर्सी पर बैठते हुए वह चिल्लाया, "ले जाओ इसे ! टेक हिम अवे । आई से हू इज हो? हू इज़ । - ही?" सूबेदार मणियार ने डिकी की बाँह पकड़ी और उसे वाहर ले गया। इस गड़बड़ी में, सूबेदार साहब परंपरागत 'डिसिप्लिन' को भी भूल गये थे। कंपनी-कमांडर सा'ब को सलामी दिये वगर बाहर निकल आये थे। दफ्तर के वावू लोग चटपट अपनी-अपनी सीटों पर बैठ गये थे। हर कोई डिकी की तरफ़ देख रहा था। उनकी आँखों में कुतूहल था, विस्मय था, डर था। डिकी को इन पर तरस आ रहा था। वह जोर से हंसना चाहता था। उसे पता था, वे लोग उसे पागल ठहरा रहे होंगे । सही भी है, क्योंकि बात उन लोगों की समझ से परे थी, या फिर ये लोग इसे समझना ही नहीं चाहते थे। लेकिन इसमें उनका कोई दोष नहीं था। उनका भय बिलकुल सहज और स्वाभाविक था। डिकी का दिमाग़ बेतरतीब ख़यालों, शंकाओं तथा भय और खुशी के बवंडर से आकान्त था। ऐन्ड हियर एन्ड्स दैट मोनोटनी...! - उस दिन शाम को सेक्शन-कमांडर हवलदार नायर उसके पास आकर बैठा। सभी जवान गेम-परेड के लिए ग्राउन्ड पर जा चुके थे। बैरक में वह अकेला ही था। नायर के प्रति उसके दिल में इज्जत थी। हवलदार होते हुए भी नायर फ़ालतू अकड़ नहीं दिखाता था। ऊपर से आने वाले आदेश नीचे वालों को लागू करते वक्त भी बड़ी शिष्टता से पेश आता था बेशक, हवलदार नायर को उस वक्त मेजर साहब ने ही भेजा था। नाय ने उससे कुछ नहीं पूछा था, सिर्फ अपने बारे में बोलता रहा । वह कह रह 1. मैं पूछता हूँ, कोन है यह ? 2. और इसी प्रकार वह उदासी-एकागोपन टूटता है । - - रोवो 103 था-"उसकी पत्नी बीमार है। मां-बाप बूढ़े हो चुके हैं। बच्चों की पढ़ाई तबाह हो रही है। तीन साल से मेडिकल 'वी' मिली हुई है। आजकल नाइट ड्यूटी भी नहीं करता । आमी को अब उसकी सेवाओ से क्या लाभ ? लेकिन डिस्चार्ज भी नहीं देते। चाहे पेंशन की मुविधा न भी मिले, वह नौकरी छोड़ देना चाहता था। रेकॅडं ऑफ़िस ने उसका केस ओ० के० कर दिया था। लेकिन उन्ही दिनो सरहद पर सरगर्मियां शुरू हुई और डिस्चार्ज के बजाय उसका तबादला इस यूनिट मे कर दिया गया । अब फिर से वही चक्कर ! सर्विस तो तकलीफदेह है ही, लेकिन आर्मी से मुक्ति मिलना भी कहाँ आमान है ?कभी लगता है, सारी उम्र बेकार चली जा रही है । 'कोर्ट- मार्शल' करवा लेता वैसे आसान है, लेकिन कई बातो का पयाल करना पडता है। छोटी-छोटी बातों या अस्थायी कठिनाइयो से परेशान होने में कोई फायदा नहीं । और फिर सिविल में भी क्या कम परेशानी है ? आर्मी मे दस-पद्रह साल सर्विस कर लेने के बाद, समझ लो, आदमी बिलकुल निकपमा हो जाता है । अब यहां हवलदार हूँ, बाहर जाकर क्या करूंगा? "वस, जैसा चलता है, चलना पड़ता है। लान्स नायक बनने में मुझे आठ साल लगे। तुम्हें इतनी जल्दी प्रोमोशन मिला है, हो सकता है कमी- शन भी मिल जाये । सोचो...!" चलते-चलते नायर कुछ रुका। कहने लगा, "हाँ, एक बात और है, अगर कुछ करना है तो अभी करो, और दो-चार बरम सविस हुई तो बस, खेल खतम ।" ।

दस डिकी सुबह ज़रा देर से उठा। उस समय उसके साथी यूनिफ़ार्म चढ़ा रहे थे। कुछ लोग तस्मे बाँध रहे थे, कुछ शेव कर रहे थे। नामदेव झाड़ लगा रहा था। नामदेव ने उसे आज जगाया नहीं था। उसे चाय भी नहीं दी थी। रोज की तरह उठते ही वह दाढ़ी बनाने वैठने ही वाला था कि उसका ध्यान उधर कोने में खड़े हवलदार नायर की तरफ़ गया। झट-से उसने चादर सिर पर खिसका ली और आँखें बंद करके फिर लेट गया। इस चार जब वह उठा तो देखा कि सब लोग परेड-ग्राउंड पर जा चुके हैं। उसने नाइट पाजामा चढ़ाया और मेस की तरफ चल दिया। मेस-कमांडर गरम- गरम पूड़ियाँ मुंह में ढूंसे खड़ा था। डिकी को देखकर भी अनदेखा कर दिया। डिकी ने अपने मग में चाय उँडेल ली और बैरक में लौट आया। खाट पर बैठे-बैठे वह देर तक चाय के चूंट लेता रहा। वह बाथरूम से जब लौटा तब तक सभी जवान वापस आ चुके थे। वे लोग ड्रिल-ड्रेस उतारने और हाफ़-पैट और बनियान पहनने में व्यस्त थे । ग्यारह बजे तक के लिए वक़्त गुजारने का कार्यक्रम बनाने में सब लोग लगे थे। हवलदार नायर हर खाट का मुआइना कर रहा था। "नामदेव, तुम्हारे कंवल की फ़ोल्डिंग ठीक नहीं हैं। और यह किसका वेड है ? मास्किटो-नेट क्यों नहीं है ? नंबर चार, चारपाई जरा-सी आगे खींचो, राईट ! नंबर सिक्स, पीछे । गुरुमुख दरवाजे के पास झाड़ कौन लगायेगा?" हवलदार नायर आदेश दे रहा था। डिकी को सब लोग मानो नजर-अंदाज़ कर रहे ." , ६१ वह अपनी जगह बात जाना ईटा रहा बाहर आद बजे । सोटरी हुई। मानिस पर। फोड़ी देर बाद हरदार रिसरोबार नो..माव...धान!" संपनी को मादशान sirmirmir हरदार निरंजन मुझसे दूरी पर गई पूरसार मगर देने के लिए जा रहा होगा। सने पर 'गार रसोर "ब, एक मो अठारह जवान हाशिर, माहि. मीदोलन की नापा आनी ही धोरे-गोरे र सरfaran व्यक्ति को राममो कर रा गुलाम बनाने के निराको जनरें बनायी गयी है। मूरदार मनिसार दंगोfree शिक वाली बैंक के दरवार पर परपर बह रtirfare और अन्दर जाने के बाद वह मोमरी बार पर कवर को तह करके रिपी ने काना रिलर nिiry पर पढने mindiaगा। बाहर को आवाडे दादान रानीपी mur माहीन । हर कम में मानी निविदाटपाबा हुई थी। उसने चारों ओर नारदौलोग मरिमा नहीं की थी। उन लोगों ने मानो दने बारा इस तरह का कोई आदेग नी नहीं पा? ओ., हम इटार 1 एक तार में दिलो मारें मानो रित रकम पर मच्छरदानी की तहे । एक ही मार,रमाईट नहीं। पनग के बीच में हरएर सनदरा गा दी ओडिया, सम्मेदार ठे। हर बार बारी iii एक भी कपड़ा पार नहीं। सभी धीर देगारमार या मि माम का मामान । पौ वाले सामान को तरह पर चवान एरोवार 1. अरे, सो पदोन दशहरा ht 106 रोबो - यहाँ, मग, मेस-टिन, हैवर-सैक सभी एक कतार में, एक 'रो' में। दिस यूनिफ़ोमिटी इज सो डिसगस्टिग ! लेकिन हजारों लोगों पर नियंत्रण रखने के लिए, उन पर काबू पाने के लिए क्या यही एकमात्र जरिया नहीं है ? टर्न दीज घ मन बीइंग्ज इन टु मशीन ऐंड रूल ओवर देम पोसफ़ली। इच्छा होती है, तमाम गांचलों और मच्छरदानियों को किसी कोने में फेंक दे । खाटों को उलट-पुलट कर दे। जूतों को दीवारों के पास फेंक दें। यह सिमिट्री, यह यूनिफॉमिटी ! उसे लगा, चारों दिशाओं से उसके शरीर पर भयंकर दबाव डाला जा रहा है। उसका दम घुटने लगा। वह बैठा रहा। उसी तरह अनगना-सा। नौ बज गये । दस भी बज गये। दफ़तर से बुलाये जाने के इंतजार में वह बैठा रहा। किताब पढ़ने की कोशिश की, लेकिन मन नहीं लग रहा था। ओ हेल, व्हाई शुड आई केयर ? ग्यारह बज गये। उसके सेक्शन के जवान एक-एक कर लौट आये थे, पर उससे बात करने के लिए कोई तैयार नहीं था। मानो उनके लिए उसका अस्तित्व खत्म हो चुका था। उसे यकीन था कि जब वह उनकी तरफ़ नहीं देख रहा होता है तब वे लोग उसी की तरफ़ देखते हैं। अपनी पीठ पर टिकी हुई उनकी नजरों को वह महसूस करता। कभी अचानक मुड़कर किसी की नजरों को पकड़ लेता। वे लोग उसकी तरफ़ इस तरह देखते जैसे चिड़ियाघर के किसी विचित्र प्राणी को देख रहे हों। उनकी नजरों में कौन-सा भाव होगा? केवल जिज्ञासा या विस्मय? तिरस्कार या नफ़रत? समजा पाना कठिन था। एक बात निश्चित है, उनकी आंखों में परायेपन का भाव था। सिर्फ एक ही दिन में मैं उनके लिए अपरिचित हो गया हूँ। पराया हो गया हूँ। कल तक उनमें से ही एक था। लेकिन आज वे मुझे नकार रहे हैं। या ऐसा तो नहीं है कि मैंने ही उन्हें नकार दिया हो? स्लीपर पहनकर वह बाहर आ गया। सूबेदार मणियार दफ़तर से बाहर निकल आया था। उसने डिकी को देखा, और शट-से साइकिल पर 1. यह एक रूपता कितनी निराशाजनक है ! 2. इन इंसानों को मशीनों में पदस दो और उन पर पांतिपूर्वका राज करते रहो।

टांग मारकर घर की ओर चल दिया। आज न सही, कल या और कभी तो उन्हें मुझ पर चार्ज लगाने ही होंगे। दो दिन हो गये, यूनिट ही में पड़ा आराम कर रहा हूँ। जहाँ जो चाहता है घूमता रहता हूँ। परेड के लिए हाजिर नही रहता । स्यादा दिन तक वे इस स्थिति को नजरअदाज नहीं कर सकते, क्योंकि इसमे पूरे यूनिट की डिसिप्लिन खतरे में पड सकती है। चावलों के ककड़ की तरह वे मुझे निकाल फेंकेंगे, मैं जानता हूँ। लेकिन फिर इतना विलंब क्यों हो रहा है ? मंभवतः आज चार्ज-शोट बनकर तैयार होगी। कल मुझे कमाडिंग अफसर के सामने पेश किया जायेगा। अपराधों को मूची मुझे पढ़कर मुनापी जायेगी। नौकरी के चार साल के इतिहास का पुनर्मूल्यारन होगा। आज के संदर्भ में उसे नया अयं दिया जायेगा। उसके बाद, तीन बफमरों का एक पैनेल नियुक्त किया जायेगा। उममें मेरी परवी करने वाला एक अफसर जरूर रखा जायेगा। जी हां, हर बात कानून के मुताविक होनी चाहिए। पैनेल अपना फ़ैसला सुनायेगा-कोर्ट-माल करने का फैमला। और आखिर में कोर्ट-माल का समारोह मपन्न होगा। रेजिमेट के सभी जवान, जे० मी० ओ०, अमर आदि एक जगह जमा होगे । वहां एक बार फिर मेरे अपराधों की सूची पढी जायेगी। फिर एक वार पैनेल का फैसला सुनाया जायेगा। कमाडिंग अकमर मेरे कंधे पर लगा कोर का बैज उतार लेगा। वेल्ट उतार ली जायेगी । तब मैं सिपाही नही रहूँगा। फिर से सिविलियन वन जाऊँगा। उस वक्त मेरी गिरफ्तारी लिए सिविल जेल के अधिकारियों के माय पुसिम-धन तयार पढी होगी। और फिर तीन महीनों की मिविल जेल । मेकिन यह मारा नाटक किसके लिए? उनके लिए हो न, जो अब भी इम चौवट के अदर पुट रहे हैं ? हो सकता है, कहीं कोई और भी इसी रास्ते को अपनी मुक्ति का जरिया न बना रहा हो? वागी को गोली दाग दो। उमत्री नाग कटहरे के दरवाजे पर लटका दौ। क्यों ? दहगत पैदा करने के लिए ही न? लेकिन सिर्फ बेल्ट उतार लेने मे क्या में मिदिलियन बन जाऊंगा? इतनी-मी वात मे क्या चार साल की अवधि मिट पायगी? इस मामले को अब मुरम करना होगा। 'हरी मप यू राम्कल्स' रोवो 108 . 7 जिंदगी का यह पन्ना उलट देना होगा। बिलकुल इसी वक्त । समय गति धीमी पड़ गयी है, लेकिन मैं मजबूर हूँ। पूरा नाटक मुझे खेलना होगा। उनके बनाये हुए नियमों के मुताबिक़ । उनकी शर्तों के नियंत्रण मैंने पहला कदम उठा लिया है। अव मेरे हाथ सिर्फ इंतज़ार करना है। वेट, वाच, ऐन्ड लिसेन ।' लाइब्रेरी-इंचार्ज हवलदार बच्चनसिंह ने मुसकराते हुए डिकी का स्वा किया । लाइब्रेरी में ढेरों अंग्रेजी की किताबें -पड़ी थीं। उन किताबों के : गिने चाहने वालों में मेरा एक नाम और जुड़ रहा था। इसलिए हवलद वच्चन खुश था। सालाना स्टॉक चेकिंग भी तो थी। डिकी ने बच्चरि. के काम में हाथ बँटाने की ख्वाहिश ज़ाहिर की थी। वच्चन के खुश होने यह भी एक कारण था। बच्चनसिंह बड़ा गप्पवाज़ था। उसके साथ ग लड़ाने से डिकी का दिमागी तनाव कुछ ढीला पड़ गया। हाल ही में यूनि में एक एक्सिडेन्ट हो चुका था। दरवाजे के पास खड़ी श्री-टनर पीछे आने वाली ट्रक से टकरा गयी थी। ट्रक का कोई ख़ास नुक़सान नहीं हु लेकिन सिग्नलमैन नायडू ख़त्म हो गया था। वह छुट्टी पर जा था। रेजिमेंट के मुख्य गेट के पास खड़ा स्टेशन की तरफ़ जाने वाली कि गाड़ी का इंतजार कर रहा था। ड्राइवर को उसने टोका तो पता चला। ट्रक स्टेशन की ही तरफ़ जा रहा है। उसने अपना सामान ट्रक में चढ़ा दि और पीछे की तरफ़ से चढ़ ही रहा था कि यह घटना हुई। केवल, अप घर जाने के लिए बनाया गया रेल का वारंट उसकी जेब में था। लेकि अव नायडू किसी और मंज़िल को चला जा रहा था। वच्चन और डि काफ़ी देर तक बातें करते रहे। डिकी को भी कुछ काम नहीं था। जव लौटा तव खाने का वक्त हो चुका था। घंटी बज चुकी थी । तश्तरी 3 मग लेकर वह मेस की तरफ़ चल दिया। कोने वाली टेबिल पर वह वैठा था । बग़ल की सीट खाली थी। प्र आया और उस सीट पर बैठ गया। हवलदार निरंजन खड़ा मेस-कम से गपशप कर रहा था। हवलदार जब वाहर चला गया तो प्रवोध था, 1. प्रतीक्षा करो, देखो और सुनो!

के पास आया। "डिकी, तुमने तो हंगामा कर दिया। कंपनी-ऑफिस में तमाम दिन चर्चा होती रही। कोई कुछ कहता था, और कोई कुछ। मेजर मोहता! दैट ब्लडी भद्र लोग इज रिअली कनफ्यूपड। लगता है, वह तुम्हें इतनी जल्दी परेशान नहीं करेगा। अब तक तो चार्ज-शीट भी तैयार नहीं हुई है।" प्रयोघ बुड़बुड़ा रहा था। डिको सिर्फ गरदन हिला रहा था। बोलते- बोलते वह एकदम रुक गया और गंभीर स्वर में उसने डिकी से पूछा, "डिको, तुम किसी पार्टी के मेम्बर हो क्या?" "प्रवोध, डोन्ट टॉक रविश !" वह दिन भी गुजर गया। हवलदारनायर इन दिनो एक बार भी उससे नहीं मिला था। हवलदार निरंजन ने भी की सरफ ध्यान नहीं दिया था। शाम के वक्त सिविल ड्रेस में डिकी टहलने के लिए निकला था। कैम्प के दरवाजे पर मंतरी ने उसे पूरकर देखा, लेकिन रोका नही । डिको अब उस लबी सड़क पर था। चिकना, चौडा, लबा रास्ता। किनारे की आलीशान कोठियो को देखता हुआ चला जा रहा था। नुक्कड़ के पेट्रोल-पप के पास वाले एक पेड पर सैकड़ों छोटी-छोटी रग-बिरगी बत्तियां जल रही थी। सडक शात थी। कभी एकाध कार गुजर जाती। रुककर उसने पेड़ की तरफ देसा । घने अँधेरे में पेड़ जगमगा रहा था, मानो रंग-बिरगी बहार फूट पड़ी थी। दाहिनी तरफ़, कुछ पीछे की ओर, तीन ऊंची-ऊंची इमारतें सडी थी। उधर से दो-तीन युवक वातें करते इधर आते दिसायी दिये। लेकिन बिना रुके वे लोग जल्दी-जल्दी आगे निकल गये। पुलिस का एक जवान उसके पीछे चल रहा था। वायो तरफ वाले शानदार बंगले के अहाते में गार्डन-चेअर्स पर दो पुरुष और दो महिलाएं बैठे आपस मे बातें कर रहे थे। एक महिला खुलकर हंसी थी। हंसी वडी मधुर थी। सफेद वर्दी में एक नौकर दे लेकर आया था। हंसने वाली महिला ने हाथ का पंसा एक तरफ करके ट्रे में से 110 रोवो . वोतल उठायी। सड़क पर एक आदमी आ रहा था। उससे कन्नी काटने के लिए डिकी झट से एक तरफ़ हो गया। वह आदमी तेज़ क़दमों से चल रहा था और माथे का पसीना पोंछता जा रहा था। उसकी चाल में जोश नहीं था। वह बहुत थका हुआ लग रहा था। डिकी ने फिर एक बार हँसी की आवाज सुनी। आवाज़ में हिलोरें थीं, लेकिन बनावटीपन जरूर था। रास्ता दाहिनी ओर मुड़ा। एक विशाल उद्यान। उद्यान के बीचोंबीच सफ़ेद रंग की आलीशान इमारत । इमारत की बनावट राजमहलों जैसी थी। शायद पिछली शताब्दी में कभी बनी होगी। पार्क के फाटक बंद थे। उस शांत तथा निःशब्द परिवेश में वास्तुकला की सुंदरता और बढ़ गयी थी। चार-दीवारी के सहारे बंगले के नौकर ने अपनी झोपड़ी खड़ी की थी। वाहर एक औरत लवे, चिकने पत्थर पर कुछ पीस रही थी। एक बड़े पेट वाला मरियल-सा वच्चा पास ही बैठा रो रहा था। औरत अपने काम में मग्न थी। दो और वच्चे नजदीक ही अँधेरे में कुछ खटर-पटर कर रहे थे। ग्राउंड की हरियाली पर चित लेटा एक आदमी आसमान के अंधकार को ताक रहा था । वच्चा अभी तक रो रहा था। डिकी फुटपाथ पर खड़ा उस औरत, बच्चे और बग़ल की राजमहल जैसी शानदार सफ़ेद इमारत को एकटक देख रहा था। फाटक खोलकर वह अंदर दाखिल हुआ और पेड़ की आड़ से देखता रहा। वे चारों अब भी गार्डन-चेअर्स पर बैठे थे। दोनों महिलाएं आपस में वातें कर रही थीं। डिकी प्रति क्षण इंतज़ार करता रहा। उसे उस महिला की मधुर हँसी सुननी थी...वड़ी आतुरता से कान लगाये वह उनकी वात- चीत सुनने की कोशिश करता रहा। बोलते-बोलते उस महिला ने अपना सिर कुर्सी की पीठ से टिका दिया । अव वह शायद हँस पड़ेगी...डिकी दो क़दम आगे बढ़ा। ज्योंही वह आगे खिसका उसे विस्मय का एक आघात लगा। मधुर हास्य की जगह उसके कानों में करुण सिसकियों की आवाज़ आने लगी। गार्डन-चेअर पर अव झोंपड़ी वाली औरत बैठी थी। वह ज्योंही हँसने का प्रयत्न करती उसके मुंह से सिसकी निकलती। डिकी और आगे खिसका। उसने सुना, - - "टेक हर अवे, टेक दैट फूल अवे। हू इज शो ! आई से, ह इज शी?" हड़वडाकर उसने कुर्सी पर बैठे पुरुष की तरफ़ देखा। मेजर मोहता इधर ही देख रहा था। वह पोछे मुडा और देतहाशा दौडने लगा। दौड़ते हुए उसका खयाल अपने ड्रेस की तरफ गया और वह रुक गया । उसने सफेद ड्रेस पहन रखी थी। उसकी आंख खुली । कैसा विचित्र सपना था! माथे का पसीना पोछते हुए उसने करवट ली। और फिर आंखें वद कर ली। कमर झुकाय वह आगे वडता जा रहा था। उस गुफा में...गहरे...और गहरे, भीतर...और भीतर। पीछा करने वाली रोशनी धीरे-धीरे लुप्त हो रही थी। कंधे और वाह गुफा को छत से टकराकर दिले जा रहे थे। गुफा धीरे-धीरे संकरी होती जा रही थी। झुककर आगे बढना भी अब मुश्किल हो रहा था। भीतर की गर्म हवा घुटन पैदा कर रही थी। क्षण-भर के लिए दीवार से पीठ टिका- कर वह सुस्ताने लगा। सामने भयकर अघकार । आगे बढ़ पाना असभव या। दार्य, वायें और ऊपर से बाहर निकली हुई पत्थर को नो अस्प दिखायी दे रही थी। वह पेट के बल औंधा लेट गया । घुटनों और कुहनियो के बल जल्दी-जल्दी आगे सरकने लगा। उसके घुटने नुकीले ककड़ों मे छिल जा रहे थे। उनमे खरोंच आ रहे थे। कुहनियों से खून निकल रहा था। पसीने की बूंदें आंखो में उतर रही थी। उसका गला सूख गया था। वह वेहद थक गया था। आँतें जैसे सिमटकर पेट में एक जगह जमा हो गयी थी। लेकिन वह लगातार आगे बढ़ रहा था। उसे पता था, एक बार स्का कि फिर हिलना-डुलना मुमकिन नहीं होगा। और इसलिए फासले को चिता छोडकर वह आगे की तरफ रेंगता जा रहा था। घने अंधकार को चीरता हुआ आगे बढ़ रहा था। उसे पता था, किसी भी वक्त उसका सिर संकरी होती हुई दीवार से टकरा सकता है। उसे महसूस हुआ कि उसकी रफ्तार धीमी पड़ गयी है । पीठ तनिक ऊंची उठाकर, टॉगो के बीच गरदन मोड़कर उसने पीछे की तरफ देखने की कोशिश की। घना अधकार ! उसकी रीढ छन को खुरदरी सतह मे टकरायी। वह घडाम से, पेट के बल 1. "इसे. इस मुहं को यहाँ से ले जाओ । मैं पूछता हूँ, कौन है यह औरत ?"

112 रोबो गिर पड़ा। उसे लगा जैसे टाँगें पेट से चिपक गयी हैं। और अंधकार के कोटर में कहीं वह अधर में लटक तो नहीं रहा है? और फिर वही आवाज़ एक बार और सुनायी पड़ी, मानो दूर पर बजती हुई रेलगाड़ी की सीटी, आवाज़ बड़ी मधुर लग रही थी। लेकिन उसमें कुछ भयावह जरूर था। उसमें हिलोरें नहीं थीं। एक क्रूर नियमितता से क्रमशः तीब्र और कर्कश होती हुई आवाज़ थी। वह आगे बढ़ रहा था। यकायक उसका शरीर, अंधकार और गुफ़ा -तीनों एक साथ सीटी की लय पर काँपने लगे । उसे लगा, किसी भी क्षण उसका मस्तिष्क, विल्लूरी शीशे की तरह टूटकर टुकड़े-टुकड़े हो जायेगा। आवाज़ और तेज हो रही थी। किसी अंधे पागल जीव की तरह वह टकराता-उठता-गिरता-काँपता आगे बढ़ रहा था। शरीर और दिमाग का कण-कण कंपित था। और यकायक वह रुका । अंधकार के अज्ञात शून्य में उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया। उसे पत्थर का कड़ा स्पर्श महसूस हुआ। घुटनों को पेट से चिपकाकर उसने ऊपर की तरफ़ हाथ से टटोला। 'सो, दिस इज़ ऐन ऐन्ड !' उसे शुरू से यकीन था कि वही 'अंत' है। इम्पासे । गतिरोध । कैद। उसने आँखें मीच लीं । बाँहों पर सिर टिकाकर टांगें सीधी कर लीं।...शांति और यकायक उसके समूचे अस्तित्व में एक प्रकार का गहरा भय समा गया। वह चौंक पड़ा और उसने उठने की कोशिश की। नुकीले पत्थरों से उसकी पीठ और बांहें छिल गयी थीं। छाती और पेट पर से गर्म खून फिसलने लगा था। मस्तिष्क में भयंकर विस्फोट चल रहे थे। और पहली वार, बिलकुल पहली बार चीख़ मारने की कोशिश में उसके होंठ खुले थे। उसकी नींद टूट गयी। पूरा शरीर पसीने से तर था। हथेलियाँ और तलुवे ठंडे पड़ गये थे और गला सूख रहा था। कुछ क्षण वह अपनी आँखों को मिचमिचाता रहा, ताकि साफ़ दिखायी देने लगे। धीरे-धीरे बैरक की दीवारें, छत, डोरी पर लटके कपड़े, आदि सब चीजें स्पष्ट होने लगीं। वह उठकर बैठ गया। सपने का आशय स्पष्ट था । सो, ही हैज़ विकम अ कॉवर्ड

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114 रोवो रोज की तरह हवलदार नायर सुबह साढ़े चार बजे जाग गया था। उसने बत्ती जलायी। एक-एक करके सभी जवान जागने लगे थे और अपने- अपने कामों में लग रहे थे। चलते-चलते उनमें से प्रत्येक डिकी की तरफ़ झाँक लेता था, लेकिन किसी ने उसके साथ वात नहीं की थी। उनके इस रवैये से डिकी वेचैन हो उठा था, मानो वह अब उनमें से एक नहीं था। उसने पैड उठाया और लिखने बैठ गया--"प्रिय एन्ड्या...!" उसे पता था, वह कभी उस खत को पोस्ट नहीं करेगा। फिर भी लिखते वक़्त प्रत्येक शब्द सोच-समझकर लिख रहा था। प्रत्येक वाक्य को अर्थपूर्ण बनाने की कोशिश कर रहा था। प्रिय एन्डया...! आय ऐम ऑन द वर्ज ऑफ़ इनसेनिटी। इधर की ताजा घटनाओं पर जव सोचने वैठता हूँ तो लगता है, उन्हें इतना महत्व क्यों दिया जाये? कुछ हालत ऐसी हो गयी है कि छोटी-छोटी वारदातें इधर परेशान करने लगी हैं। मुझे डर लग रहा है कि कहीं में ज्ञान और अज्ञान, सेनिटी और इनसेनिटी की सीमा-रेखा पर तो नहीं खड़ा हूँ। हो सकता है, इन घटनाओं का महत्व केवल सामयिक हो । समय बीतने के साथ ये घटनाएं, हो सकता है, सामान्य लगें। लेकिन आज मैं इन्हीं घटनाओं के संदर्भ में अपने अस्तित्व का अर्थ ढूंढ रहा हूँ, अपने अंदर बैठे अजनवी 'मैं' को देखकर मैं खुद चकरा गया हूँ, सहम गया हूँ। हो सकता है, मैं बहुत आत्मकेन्द्रित हो गया हूँ। पिछले पांच बरसों से इस निर्जीव तथा विकराल यंत्रणा में फंसा मैं एक निर्जीव पुर्जे की तरह घूमता रहा हूँ। निरंतर अपनी आकांक्षाओं के खिलाफ़ चलते रहने के लिए विवश किया गया हूँ। इससे दिमाग पर एक तनाव बना रहा है। उस तनाव का ही नतीजा है कि मेरी हालत दिनोंदिन कमज़ोर और खस्ता होती जा रही है। इधर मेरी कल्पना-शक्ति अप्राकृतिक मोड़ लेती हुई विकृत रूप में भड़क उठी है। दिमाग़ हाइपर-सेंसिटिव हो गया है। स्थितियों को तटस्थता से ग्रहण करने का साहस शायद ख़त्म हो चुका है। 1. मैं पागलपन की सीमा-रेखा के निकट पहुंच रहा हूँ।

रोबो 115 कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि मैं नर्वस ब्रेकडाउन का शिकार हो चुका हूँ। पिछले पांच वरसों से मानो मैं घूमर मेलता रहा हूँ! मन मारकर घूमता रहा हूँ। चक्कर काटता रहा हूँ। शुरू से मन करता कि कही रुक जाऊँ, लेकिन रुक नही सका । उलटे अपने-आपसे जिद करके घूमता रहा, घूमता रहा। गोल-गोल, अपने चारो ओर । जब तक गति थी, मुझ पर अपना काबू था । अब मैं रुकने की कोशिश कर रहा हूँ, पैरों की गति धीमी करना चाहता हूँ, लेकिन अव परिवेश ही घूम रहा है । सारा शरीर झोके पा रहा है । मस्तिष्क धूम रहा है। उचित और अनुचित में फर्क मैं नहीं कर पा रहा हूँ। रुक जाना उचित है या अनुचित, कुछ समझ में नहीं आता ! सत्य क्या है ? मैं स्थिर हूँ या ससार ही घूम रहा है ?...गर- गर 5s ! या संसार स्थिर है और मैं ही घूम रहा हूँ? इसी दुनिया ने मुझे पाला-पोसा, बड़ा किया। इसी ने मुझे 'मेरा आपा' दिया। मेरे 'अह' का पोपण किया। उसे पुष्ट किया। उसका फूलना-फलना बड़े कुतूहल से देखा। इसी दुनिया ने मुझे अपने विशिष्ट 'मैं' को जीवित रसने और उसकी शक्ति बढाने के साधन दिये । इसने ही तो मुझे सिखाया था न ? आई ऐम यूनीक । औरो के 'मैं' को पैरों तले रौंदकर, उन्हे कुवत- कर, उनकी लाशों के ऊपर सवार हो जाने से अपने 'मैं' की सुरक्षा होतो है। इस दुनिया ने मुझे 'मैं' की सुरक्षा का अभिमान दिया। और आज वही दुनिया मुझसे कह रही है, 'यू आर अ नॉन एनो। तुम सिर्फ एक गिनती हो। तुम डिकी नहीं हो, एक यत्र हो । तरत। इस विकरात यत्र का एक छोटा-सा पुर्जा । 'फायर, फापरकार सुनते ही तेरी उँगलियां वदूक के घोडे पर होगी, तेरी कदर में सामने दिखायो पड़ने वाली हिलती हुई आति की और चीरकर पार निकल जाना चाहेगी। दांतों को भीवर. तुम भयकर आवेग से अपनी संगीन सामने वाले मारे और फिर सगीन को पीछे खीचकर, लाल-नांनी तुम्हें यह सोचने की कोई जरूरत नहीं मिला मार रहे हो? बल्कि 'न सोचना' हो हार - 116 रोवो - क्रेजी ! अॅवर वर्ल्ड इज़ केजी। नॉट टु क्वेश्चन व्हॉट ऐन्ड ह्वाई, वट, किल ऑर डाई! तुझे पता है, मैं न तो सेन्टीमेंटल हूँ और न आइडियलिस्ट । आई डोन्ट माइन्ड किलिंग। मानव के अस्तित्व की सुरक्षा के लिए आदमी की वलि चढ़ाना कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन अपने अस्तित्व को इन बुद्धिहीन पिशाचों के हवाले कर देने के लिए मैं तैयार नहीं हूँ, कतई नहीं। मुझे पता है, यह संघर्ष है, जंग है। अपने ही पैदा किये हुए बंधनों के खिलाफ़ अपनी जंग । इस मनोवृत्ति को तोड़ डालने की जंग । मुझमें ताकत है ? स्थापित मूल्यों के मुखौटे उतार फेंकने की क्या सचमुच मुझमें शक्ति है? यह संघर्ष कुछ दिनों या बरसों तक ही सीमित नहीं है । यह लड़ाई कभी न खत्म होने वाली लड़ाई है। यह निरंतर है। एक खोल से मुक्ति पाकर मैं किसी दूसरे खोल में फंस जाऊँगा। हो सकता है, दूसरा खोल फ्यादा विशाल और भव्य होगा, लेकिन वहाँ भी सीमाओं का बंधन तो होगा ही। ऐम आई टॉकिंग मिस्टिसिज्म ? आने वाला कल मेरी ज़िन्दगी में अंतर-बाह्य परिवर्तन की शुरुआत होगी। मुझे यक़ीन है, मैं इसका मुकाबला करता हुआ बाहर निकल आऊंगा। लेकिन...लेकिन फिर भी मुझे शक है, क्या वास्तव में मैं ज्ञान और अज्ञान की सीमा-रेखा पर खड़ा हूँ, या मैं इन सीमाओं को लांघ गया ? हैव आई ऑलरेडी क्रॉस्ड ओवर? आई डोन्ट नो, आई डोन्ट नो। - 1. न मैं भावुक हूँ, न ही आदर्शवादी । मुझे किसी को मारने में भी कोई झिझक नहीं होती।

ग्यारह
उस दिन मुबह दस बजे तक वह बैरक में बैठा रहा। मेजर मोहता के
संभाव्य सवालो और अपने जवायो का खाका बनाता रहा, और ऑफिस में
बुलाये जाने की राह देखता रहा। पैनेल के सामने एक वक्तव्य देने की
इच्छा थी, उसको । उसने अब तक कुछ काल्पनिक सवालों और उनके
जवावों को मन-ही-मन दोहराया था। कभी-कभी तो साक्षात्कार की कल्पना
करके वह बुडबुडाया भी था। अपनी दलीलो मे अपेक्षित परिवर्तन करके
देखे। अब वह ज्यादा सोचना नही चाहता था। इसलिए उसने किताब
उठा ली और पढने की कोशिश करने लगा। पर कोई फायदा नहीं हुआ।
उसने अपनी पुरानी डायरी निकाल ली और पुरानी स्मृतियो मे अपने-
आपको रमा लेने की कोशिश की। लेकिन अब तक तो पुरानी यादें बिलकुल
परायी हो चुकी थी। अब तो वह दूसरे ही व्यक्तित्व वाला 'डिको' था। एक
महीने से सुनीता का कोई पत्र नहीं आया था। वह उदास था। उसे सयाल
आया, उसने इधर का अपना नया पता सुनीता को नहीं लिग
सुनीता को लगभग सभी चिट्ठियां उमने फाड़
हुई एक-दो चिट्ठियो को आज पढ़ने की उसने को
वह बँगला लिपि अच्छी तरह समझ नहीं सकता
जोड-जोड़कर पढने मे उसे कटिनाई हो रही थी।
लग रहा था। उसने वर्तमान में दूर भागने की को
पॅनेल, कोट-मार्शल, सिविल जेल---ये सब उसके ।
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118 रोवो - रहे थे। वह उठा और बैरक के दरवाजे के पास आकर खड़ा हो गया। यूनिट रोज की तरह व्यस्त था। खुरपी वाले जवान बाथरूम के पास पालथी मारे बैठे थे और गपशप कर रहे थे । स्टोर के पास दो जवान फावड़ा लिये खड़े थे देर वह वहीं चक्कर काटता रहा । उसकी ओर किसी का ध्यान नहीं था। दफ़तर से जाधव बाहर निकला। डिकी उसके पीछे-पीछे कुछ कदम हो लिया। जाधव से उसने पून, "क्यों जाधव, मेरे लिए कोई ऑर्डर?" । कुछ "कुछ नहीं।" डिकी सीधे लाइब्रेरी की तरफ चल दिया। हवलदार बच्चनसिंह ने उसका स्वागत किया, लेकिन इस बार उसमें वह अपनापन नहीं था। एक तरह का बल्कि उलटे कुछ दुराव ही था। कुछ देर इधर-उधर की बातें करने के बाद, वह मतलव की बात पर आया- "डिकी, तुम फिकर मत करो। ये लोग जब तक किसी दूसरे यूनिट में तुम्हारी पोस्टिंग नहीं करते, आराम से यहीं पड़े रहो। तुम्हें कोई चार्ज- शीट पर नहीं रखेगा। इस रेजिमेंट में इस साल और कोई कोर्ट-मार्शल नहीं होगा। पिछले दो महीनों में तीन कोर्ट-मार्शल हो चुके हैं। एरिया-कमांडर ने अपने कमांडिंग अफसर से कहा है, इस साल और कोई कोर्ट-मार्शल नहीं 64 चाहता हूँ।" डिकी लाइब्रेरी से लौट आया। किस्सा जल्द खत्म होने वाला नहीं है। दूसरी जगह पोस्टिग होने से पहले कुछ करना होगा। वे लोग उस पर चार्ज लगा ही नहीं सकते, क्योंकि वह उनकी 'अथारिटी' को ही चैलेंज करने जा रहा था। इसलिए उनके पास कोर्ट-मार्शल के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं था। वह आराम नहीं चाहता था, बेकार नैठकर वक्त गुजारना या काम-चोरी उसे पसंद नहीं थी। कोई नया रास्ता ढूंढ़ना ही होगा।

रावा 119 'कॉल मी इनमेन, ऐन्ड लेट भी गो।। मनश्चिकित्सालय के वेटिंगरूम में वह अकेला बैठा था।यूनिट मेडिकल अफ़सर का दिया हुआ पत्र उसने अदर डॉक्टर के पास भेज दिया था, और अब डॉक्टर का इतजार कर रहा था। पिछले डेढ़ महीने से भयंकर मानसिक कष्ट पहुँचाने के बाद आखिर उसे यहां भेजा गया था। यूनिट मेडिकल अफमर ने उसका केस ऊपर 'रेफर' नही किया था। वह इसे टालता रहा था। उसने डिकी को दो बार लौटा दिया था। फिर भी डिकी ने अफसर का पीछा नहीं छोड़ा था। मेडिकल अफ़मर ने डांट-फटकार कर उसे भगाने की कोशिश की थी, लेकिन डिकी टस से मस नही हुआ। इसीलिए आज वह यहां था । इस चीच मानसिक पीड़ाओं को सहते रहने के कारण वह जैसे टूट चुका पा। चेहरे पर उसके स्पष्ट चिह्न दिखायी दे रहे थे। खून की कमी के कारण चेहरा सफेद पड़ गया था। उसे लग रहा था, वह काफी बूढ़ा हो गया है। पिछले डेढ महीने से यहां उसका रहना, न रहने के बराबर था। मेजर मोहता, कंपनी-हवलदार निरजन और चद अफसरों ने उसे पूरी तरह नजरअदाज कर रखा था। उसके साथियो ने उसे लगभग बहिष्कृत कर दिया था। अपना धयं बनाये रखने की कोशिश मे वह उन लोगो से और दूर होता जा रहा था। अब वह थक चुका था। बची-सुची शक्ति बटोरकर उमे अब इस आखिरी सीढी को पार करना पा। उसके सामने, छोटी-सी गोल मेज़ पर अखवार और चद पत्रिकाएँ पड़ी थी। कोने में रेडियो रखा था । फूलदान में ताजे फूल, दीवार पर कुछ कलेंडर । कमरे का हुलिया लिविंग रूम की तरह खुशगवार था। दीवारें हलके नीले रग से पुती थी। कमरे का माहौल कुछ इस तरह का था कि दाखिल होने वाला व्यक्ति सुद को रिलक्म महमूस करे। लेकिन डिकी रिलैक्स नही होना चाहता था। उसने अपनी हथेलियां देखी। पसीना चमक रहा था, उसके हाथ कांप रहे थे। लोगों की आँखों में धूल झोकने के लिए कही मैं नाटक तो नहीं कर 1. मुझे पागल घोषित करके मेरी छुट्टी कर दो।

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इज ही रियली मंड? "हैलो डिकी ..प्लीज, सिट डाउन।" डिकी मुडा। उमकी ही उम्र का एक युवक सोफे के पाम खडा था। उसकी पैट और शर्ट की मैचिंग डिकी को बहुत पसद आयी। भरा-भरा शरीर, चौडा रोबीला माथा, कुछ धुंघराले बाल, मुस पर कानि। डिकी धीरे-धीरे आगे बढ़ा। नाऊ इज द टाईम। अव हर कदम बडे ध्यान से और मोच-समझकर वढाना होगा। स्थिर और शात दिसायी देने वाली उमकी आंखें अब मेरी एक-एक हरकत को नोट करती रहेगी। और आंखों के पोछे का मस्तिष्क उनके अर्थ लगाता रहेगा। कही ऐसा तो नहीं है कि यह मव मेरी अपनी कल्पना का मेल हो' एक झूठी उम्मीद ! यह दिमाग का डॉक्टर भी तो इसी यत्र का एक हिस्सा है ! अभी यहां आने-जाने, या शायद उसके पहले ही उसने मेरे केस का फैमला मोच लिया होगा। डॉक्टर उसकी बगल में बैठ गया। डिकी की तरफ देखकर पहले तो वह खुलकर हँसा। डिकी को उमका हेमना अच्छा लगा। यह आदमी इतनी मासूम हेमी कसे हम मकता है ? डॉक्टर ने अपना हाय उमके कधे पर "प्लीज़ मेक योरमेल्फ ऐट होम-आराम से बैठो। मैं ममझता भूमिका बांधने की कोई जरूरत नहीं। फिर भी. यहां हम दोस्त हैं। में तो अफमर हूँ और न तुम मो० आर०। मैं डॉक्टर नही हूं और न पेशट हो। हम दोनो ने बहुत दुनिया देखी है और 'मच्योर' व्यक्ति हैं सकता है, तुम्हारा अनुभव मेरे मुकाबले कुछ ज्यादा ही होगा। हमे बातो को समझ लेना है। उनकी तलाश करनी है। तुम्हारे ये जो हैं, वक्ती हैं। वास्तव में, दे आर ओनली सिम्पटम्स । नॉट अडिसी लेट बम ट्राई टु फाइंड आउट, व्हेंट इज रांग ऐड व्हेयर इट इज जिम वात का पता नहीं है, उसे मैं जान पाऊँगा, सो बात नहीं। 1. क्या वह वाकई पागल हो गया है ये केवल लक्षण है-बीमारी नहीं । अत हमें यह पता लगाना चाई ?

122 रोवो कोई जादू नही । रास्ता तुम्हें ही तय करना है। मैं सिर्फ तुम्हारी मदद कर सकता हूँ।" डॉक्टर बोलता गया। "हमें समस्या की जड़ तक पहुँचना है, बिलकुल तह तक। दीवार में अगर दरारें पड़ी हों तो उन्हें पोत लेने-भर से काम नहीं चलेगा। अगर दीवार की नींव कमजोर हो गयी हो, नीचे सिर्फ़ रेत ही भरी हो, और समूची दीवार ही कहीं धंसती जा रही हो तो, ऊपर की मरम्मत से क्या लाभ? हाँ, दोप निश्चित रूप से नौंव में ही है। इसका यक़ीन होना ज़रूरी है।" "जी हाँ ! और यक़ीन हो जाये, तो दीवार को जड़ से खोद दिया जाना चाहिए !" डिकी ने कहा । "बिलकुल सही है। और नये सिरे से दूसरी दीवार खड़ी की जानी चाहिए," डॉक्टर धीमे-से मुसकराया । उसकी मशरूमी आँखें चमक रही थीं। आवाज़ में लयदार उतार-चढ़ाव था । वह बोले चला जा रहा था। और शब्दों की लय के साथ डिकी की बाहों पर थपकी लगाता जाता था। "मैं तुम्हारे विचारों को पढ़ नहीं सकता। तुम बोलते चले जाओ, किसी भी विषय पर-बचपन, माता-पिता, तुम्हारा काम, तुम्हारा घर, तुम्हारे सपने...!" ओ ! दिस इडियट इज़ ट्राइंग टु हिप्नोटाईज् मी !1 डिकी ने सोचा कि कोई ऐसी पागलों जैसी हरकत करे और डॉक्टर को आश्चर्य का धक्का दे कि उसकी यह कृत्रिम सहजता ओर स्वाभाविकता एक झटके के साथ खत्म हो जाये । स्टुपिड ! ही इज़ पिटीइंग मी ! मुझे तुम्हारी मित्रता की और हमदर्दी की कोई जरूरत नहीं, दोस्त । मैं तो पहले ही से फैसला करके यहाँ आया हूँ.... इन जंजीरों के बंधन तोड़कर मुझे ऊँची उड़ान भरनी है। पंख फड़- फड़ाकर ऊँची उड़ान भरने वाला हूँ मैं । फैले हुए क्षितिज को अपना लक्ष्य बनाकर ऊँची उड़ान भरने वाला हूँ मैं । अज्ञानी हो तुम । अतीत के लगातार बढ़ते हुए बोझ को अपने कंधों पर ढोये चल रहे हो तुम । शताब्दियों का वोझ । लम्बे इतिहास के इस बोझ से तुम बुरी तरह झुक गये हो। तुम्हारी 1. यह मूर्ख मुझे सम्मोहित करने की कोशिश कर रहा है ! 2. मूवं, मेरे प्रति दया-भाव दिखा रहा है ! !

नजरें झुक गयी हैं। तुम सिर्फ नीचे की जमीन का टुकड़ा देख पाते हो। वहीं तुम्हारा विश्व है और वही क्षितिज । मेरा सब-कुछ छीन लिया तुमने...सब-कुछ लूट लिया और खुद अपनी पीठ पर उसे लाद लिया। तुम्हें लगा कि तुम अपनी शक्ति बढ़ा रहे हो; इस भ्रम मे तुम अपनी पीठ का बोझ वढाते रहे, जिससे और ज्यादा झुक गये। मुझे तुमने पूरी तरह नगा कर दिया। लेकिन इसी वजह से मैरी गरदन तन गयी है। रोढ पूरी तरह मीधी हो गयी है। क्षितिज व्यापक हो चुका है। मेरा अतीत, मेरी स्मृतियाँ, मेरी यादें-मुझे तुमने इस बोझ से मुक्त कर दिया है ! डिकी का ध्यान डॉक्टर की तरफ गया। डॉक्टर उसी को एक टक घूर रहा था। उसके हाथ मे कलम था। सामने डायरी खुली रखी थी। डिकी को लगा कि कही वह अब तक ज़ोर-जोर से बडबडा तो नही रहा या? बेशक मैं बडबड़ा ही तो रहा था। और उसने अपने होंठ भीच लिये। "शब्दो के जाल में फंसो नहीं, डिको ! ऊँची उड़ान भरने वाले गरुड़ को आखिर जमीन पर उतरना ही पड़ता है। नही, उडान के दौरान उसकी नजर आसमान की तरफ नहीं होती, जमीन पर ही चिपकी रहती है।" डॉक्टर कह रहा था, "मुक्ति शब्द का कोई मतलब नहीं होता, डिकी । यह मात्र कल्पना की चीज़ है। मुक्ति किससे? किसलिए? मुक्ति का सबंध इस ठोस यथार्थ से है, डिकी, यथार्थ की पृष्ठभूमि पर ही हमें मुक्ति को समझना पड़ेगा। हमें किसमे मुक्ति चाहिए? वेट-वेट आई नो द आन्सर ।। तुम्हें इस फ़ोजी जिंदगी से मुक्ति चाहिए। यह कैद, यह कैदखाना, आदमी इसमें एक बार फंस गया तो समझो, पूरा फंस गया । मदा के लिए फंस गया। मनुष्य कभी अमानवीय मशीन का पुर्जा बनकर रह नहीं सकता। इसलिए वह इस खोल से बाहर निकलने की पूरी कोशिश करता है। करेगा ही, लेकिन योड़ी ही देर में उसको समझ में आ जाता है कि इस कंद से बाहर निकलने की कोई उम्मीद नही। वह खुद कंदी है, और खुद ही जेलर । इट इज़ हिज़ ओन मेकिंग।' 1. रुको रुको, मुझे इसका उत्तर ज्ञात है । 2. यह सब खुद उसी का बनाया हुआ तो है।

124 रोवो "आखिर, यह जेल भी और क्या है ? बाहर की बड़ी जेल का एक छोटा हिस्सा, एक छोटी जेल !वाहरी जिंदगी का अक्स! इस विकराल यंत्र का एक अटूट हिस्सा । इस जेल से तो तुम मुक्त हो जाओगे। अपने अस्तित्व को दांव पर लगाकर संघर्ष के लिए तैयार हो जाओगे। शायद इस फंदे से मुक्त भी हो जाओगे और इस बोझ को उतार फेंकने में प्रायः सफल भी हो जाओगे। लेकिन उसके बाद?इससे बड़ी जेल में फंस जाओगे। फिर से संघर्प, लड़ाई । अकेले मनुष्य की औक़ात ही क्या है ? नहीं, डिकी नहीं ! वी आर मैन ऑफ़ रीज़न, ऑफ़ रेशनलिटी। दीवार से अपना सिर फोड़कर शहीद हो जाने से क्या फायदा है ? वी मस्ट लन टु एडाप्ट अवरसेल्व्ज़ माना कि इस जिंदगी से समझौता करना मुश्किल है, लेकिन इससे नजात पाना भी मुश्किल है। हम किसी स्थिति विशेप से किस सीमा तक अपने को अडॉप्ट कर पाते हैं, यह हमारी अपनी रेशनैलिटी पर निर्भर करता है, डिकी।" डॉक्टर रुक गया। कुछ क्षण डिकी ख़ामोश रहा। फिर कहने लगा, "डॉक्टर यह दीवार अव फंस चुकी है। इसमें दरारें पड़ गयी हैं। इस दुनिया में कोई चीज़ शाश्वत नहीं होती। कोई विचार, कोई कल्पना कोई धर्म, संस्कृति,दर्शन, समाज-व्यवस्था---कुछ भी शाश्वत नहीं होता। वास्तव में हर अशाश्वतता ही एक मात्र शाश्वत नियम होता है। लेकिन हम हैं कि शाश्वत की तलाश में लगे रहते हैं। अशाश्वत को शाश्वत समझकर अपने- आपको धोखा देते रहते हैं। डॉक्टर, इस बड़ी दीवार की नींव खिसक रही है। इस बात को हम नज़रअंदाज़ करते जाते हैं।" कुछ क्षण डॉक्टर मौन रहा । फिर कहने लगा, "वेल ! परहैप्स यू आर राईट । लेकिन, खैर, अव मुख्य सवाल पर आयें, अपने बचपन के बारे में कुछ कहो। यहाँ आने से पहले तुम क्या करते रहे हो? तुम्हारा ट्रेड तो ऑपरेटर का है। तुम्हारा रेकर्ड भी बहुत अच्छा है । इस लिए, तुममें यह जो दोप पैदा हुआ है नया तो नहीं हो सकता । इसकी जड़ पुरानी ही होगी। पिछले एक-दो वरसों में कोई खास घटना तो नहीं हुई ?" डिकी अपने अतीत के बारे में कुछ बताने को तैयार नहीं था । अतीत 1. हमें स्वयं को हालत के साथ समझौता करना सीख लेना चाहिए ।

अब खत्म हो चुका था। उसे कभी का दफना दिला पाया। अहम नहीं थी कि उसका अतीत रेगिस्तान की नरह समेत हुआ था, या हरी-भरी बनराइयों से वंका था। मगर सोड चुका था। इसलिए वह सब-कुछ अब महन नहो रास्ता चलते-चलते पैरो मे छाले पड़ गये, किन पार करते वक्त तलुवो से खून निकला या, िदादर पड़ गये थे या दूसरी ओर, नर्म हरिमानी पर परे पनि मिला था। अतीत के उस हिस्से पर वह अब दि महारे चक्कर काट सकता था, मृतात्माओं की - तरह । और फिर इतनी दूरी मे देने रान परीदा निर्जन टीले, झरने हरियाली, पूरा-का-पूरा कर सगेगा ही। डिकी डॉक्टर के सवालों का जवाब देना जर आता, कहता चला जा रहा पा। डॉक्टरने में एक चित्र में एक नगा जोडा परस्पर विरट पर गया था। पास एक प्रौढ़ नंमो औरतमणि र जोड़े को कुछ इशारा कर रही थी। इससिम "टेस्टों' का पता था। रोगी को नर्गदागिरी का उपयोग किया जाता या। डांसर- डिकी को पता या किटकनाम डॉक्टर को देवकुळ दनाना गिरदारटा लिए विवित्सक की दुनिया जिक सबंधों का मारहान दार' बिना इनटेस्टों का कोइराक-r रहा था। काळी देर बहार घर "डिको, मुझे कुछ टर' डिकी नै नगमि.raf आगा। वेहरे पर वही 27 m ठीक नहीं है। टन "-zam 126 रोवो हो कहा, "मैं तुम्हें कुछ दिनों के लिए अंडर ट्रीटमेंट रखना चाहता हूँ। मेरा ख़याल है, कुछ दिनों का आराम और माहौल में परिवर्तन तुम्हारे लिए लाभदायक सिद्ध होगा। तुम कभी-कभी बिना वजह ओवर-एक्साइट जाते हो। लेकिन, कोई बात नहीं। यह दोष थोड़ी-सी कोशिश से दूर हो सकता है। वास्तव में यह तुम्हारे हाथ की बात है। तुम्हारी ऐनुअल छुट्टियां कितनी बाक़ी हैं ? नहीं तो मैं तुम्हें मेडिकल लीव रिकमेन्ड कर दूंगा। मेरी राय है, तुम्हें छुट्टी पर चले जाना चाहिए।" डिकी डॉक्टर की ओर देखता रहा। डॉक्टर कुछ देर के लिए मौन था। उसने अपनी जेब से एक लिफ़ाफ़ा निकाला। मन-ही-मन जैसे उसने कोई फैसला कर लिया हो। कहने लगा, "मुझे पता है, डिकी, तुम मुक्ति चाहते हो । तुम्हारे लिए इस जिंदगी से समझौता करना संभव प्रतीत नहीं होता। इसलिए यहाँ से तुम्हारी छुट्टी कर देना ही हितकर होगा। लेकिन... वेल, तुम्हें भी पता है, मैं कुछ नहीं कर सकता। मेरे हाथ बँधे हैं। तुम...तुम ऐसा करो कि छुट्टी पूरी करके जब लौट आओ तो मुझसे मिलो। देखते हैं, शायद कुछ रास्ता निकल आये।" डिकी समझ गया। डॉक्टर उसे नाराज़ नहीं करना चाह रहा था। डॉक्टर का पत्र जेव के हवाले करके वह बाहर निकल गया। -

उनके
वह वाहर आया। तब तक शाम हो चुकी थी। गली पार करके वह मेन
रोड पर आपा पास की किसी फैक्टरी का भोपू बजा। थोड़ी ही देर में
आदमियों के जत्ये पोछे से आकर उससे आगे निकले जा रहे थे। ये
अनगिनत लोग एक ही दिशा में शायद स्टेशन की तरफ तेज कदम बढ़ाते
हुए चले जा रहे थे । आपम में कानाफूसी करते हुए ये लोग ठिठुरी हुई नजरो
से सिर्फ मामने की तरफ एकटक देख रहे थे। उनके थके चेहरों पर पसीना
चमक रहा था। कुछ लोग भीड़ से अलग चल रहे थे। हाव-भाव
से
पता चलता था कि वे सहमे-सहमे है और आपसी बातचीत को पारे
रखना चाहते हैं।
फुटपाथ पर तीन-चार लड़कियां खडी आपस में बाते पर ही
जोर-जोर से कहकहे लगा रही थी। उनकी साडियो के पन्त बार-बार
नीचे सरके जा रहे थे। हेमने के साथ उनकी हातियां भी तो
चलते आदमियो के धक्के उन्हें लगातार लग रहे थे, लेकिन उनका
कोई असर नहीं हो रहा था। पेड के पास दो तीन नरमा
टूटे कनस्तरों में मिट्टी जमा कर रहे थे।
डिको चला जा रहा था। उनमें से एक street
तरफ़ गया। वह सहम गयो। हंसते-हंडे
कुछ तनी, वायें हाथ को झटका देर र
पल्ला संवार लिया। उसकी गहरी का

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अगड़ रहा हूँ, लड रहा हूँ। लेकिन इस विकराल यंत्र के खिलाफ मेरी नडाई क्या सही लड़ाई थी? क्योकि, मैं लड़ तो रहा था, पर उन्ही के बनाये हुए कानून को हथियार बनाकर। उन्ही के नियमो के नियंत्रण में रहकर । वास्तव में उन्ही के मूल्यों के तहत में इस पत्र का हिस्सा बन गया है और अपने इस परिपुष्ट व्यक्तित्व से जरा भी हटे विना इस पत्र को रोकने की कोशिश करता रहा हूँ...जब यह संघर्ष शुरू हुआ, उस समय तक तो मैं इस यत्र का इंधन बन चुका था। उसी का हिस्सा बनकर उसकी गति को बनाये रखने में मदद कर रहा था। आई कन नॉट डेस्ट्रॉय इट ऐंड वी ए पार्ट ऑफ इट । बैंक गॉड ! मैं पुलिस में नहीं हूँ। कम-से-कम नि शस्त्र लोगो पर गोली चलाने का काम तो मुझे नहीं करना पडता। दुश्मन को फ़ोज के लोग निरपराध तो हो सकते हैं, लेकिन नि शस्त्र नहीं हो सकते। सो व्हेंट ? सशस्त्र लेकिन निरपराध इसानों की हत्या करना क्या उचित है ? वह आगे बढा चला जा रहा था। कहीं चला जा रहा था, उसे पता नहीं था। बम चला जा रहा था, जैसे पीछे से उसे कोई ढकेल रहा हो। रास्ते की दुकानें फटाफट वद हो रही थी, अब वह स्वयं भीड का हिस्सा बन गया था। वह उस भीड़-भाड़ और शोर-गुल के साथ चला जा रहा था। ये थे उनके कानून, उन्हीं के बनाये हुए, कि सेल किस तरह सेला जाये । खेल कब वद हो, यह भी उन्ही का फैसला । खेल भी उनका, कानून भी उन्ही के और रेफ़री भी उनके ! अपने खिलाफ़ जाने वाले कानून वे क्यों बनायेंगे? जीत गये तो उनकी जीत, और हार गये तो भी उन्ही की जीत । तब उनके खिलाफ़ लडने का मतलब यही हुआ न कि उन्ही के नियमी और मूल्यों के दायरे में बंधे रहो, और फिर लडो। आई मस्ट रिजेक्ट इट इन रौर्टलिटी। उनके मूल्य, उनकी कल्पनाएँ, उनकी नैतिकता, उनको प्रतिष्ठा, उनका धर्म, उनकी मानवता, उनकी सस्कृति, उनका सत्य...वह सब...वह सब-कुछ जो उनकी प्रतिष्ठा बढाता है, उस सभी को नकारना होगा। 1. में इसका एक पुर्जा बना रह कर मे मिटा नही सकता। 2 मुझे इस सबको पूरी तरह से नकार देना चाहिए।

130 रोवो । फुटपाथ के खोमचे वाले अपना सामान बाँध रहे थे। एक दुकान में से एक आदमी बाहर आया। उसने सड़क की दूसरी साइड से जाती हुई टैक्सी को रुकने के लिए आवाज़ दी। उधर जाने के लिए वह लपककर, पर घबराहट में डिकी से टकराकर गिर पड़ा। उस वक्त वह ज़ोर से चीखा। डिकी आश्चर्य से उसकी तरफ़ देखने लगा। उस आदमी ने एक हाथ से धोती की लाँग कसकर पकड़ रखी थी, और दूसरे हाथ से बैग । वह ज़ोर-ज़ोर से हांफ रहा था। फटी-फटी आँखों से वह डिकी की तरफ़ देखता रहा । उसके चेहरे से वेहद ख़ौफ़ टपक रहा था। एक झटके से उसने डिकी को परे किया और सड़क के दूसरे किनारे पहुँच गया। ह्वाई इज ही एफेड ऑफ़ मी? मुझसे डर रहा था? डरपोक ! पता नहीं, डिकी फुटपाथ से उतरकर कब बीच सड़क पर आ गया था। अब वह कुछ युवकों से घिरा आगे बढ़ रहा था। मुट्ठियों को हवा में ताने वे लोग नारे लगा रहे थे । वह उनके शब्दों को पकड़ने की कोशिश कर रहा था। डिकी देख रहा था कि उन युवकों के बाल विखरे हुए थे। चेहरों पर पसीना चमक रहा था। उनकी आँखों में चमक थी। कपड़े मैले थे। वे चारों तरफ़ नज़रें घुमा रहे थे। हवा में अपने हाथों को नचाकर चीख रहे थे। उन नारों में पता नहीं, उन्हें कैसा संतोप, कैसी खुशी मिल रही थी ! मानो जोर-जोर से चीखकर नारे लगाते चले जाने पर ही उनका अस्तित्व टिका हुआ था। कुछ लोग वीच-बीच में रुक जाते, सहमे-सहमे-से इधर देखने लगते और फिर जन-समुदाय को देखकर नारे लगाना शुरू कर देते । भीड़ का वह प्रवाह अब और तेजी से आगे बढ़ रहा था। धीरे-धीरे वह और बड़ा होता जा रहा था। उसने मुड़कर पीछे देखा। दूर तक सिर-ही-सिर और हिलते हुए हाथ । जलूस अव बड़ी सड़क से हटकर दायीं तरफ़ की एक गली में घुस गया। सामने कुछ लोग जोर-जोर से नारे लगा रहे थे, और पीछे हज़ारों हाथों और हजारों टाँगों वाला भीड़ का यह महाकाय पशु धीमे-धीमे आगे बढ़ रहा था। डिकी ने एक बार फिर पीछे देखने की कोशिश की और पीछे वाला आदमी सीधे उस पर आ गिरा। अब डिकी भीड़ की बाढ़ में वहा चला जा रहा था। भीड़ ने मुझे कब और कहाँ घेर लिया था? कहीं मैं खुद तो इस भीड़ में शरीक नहीं हुआ - ?

रोबो 131 । ये सब लोग अब दूसरी सड़क पर आ गये। उलटी तरफ से लोगों का एक रैला फुटपाथ पर चढ़ा आ रहा था। दोनों जुलूस वहां की एक इमारत के सामने आकर मिल गये। एक साथ कई लोग इमारत के छोटे-से दरवाजे में भीतर घुसने की कोशिश कर रहे थे। शोर बढ़ गया था। वे सब घबराये- से दिखायी पड रहे थे। अब वहां और कई लोग जमा हो गये थे । अचानक उम भीड़ में से चीखने की आवाजें आयीं, एक साथ कई चीखें । किस्सा क्या था, यह समझ आने के पहले ही आस-पास के संकड़ों लोग उलटी दिशा में भागने लगे । वह खुद भी मुड गया और दौडने लगा। पीछे की योर से आने वाले प्रवाह की रफ्तार इतनी तेज थी कि वह गिरते-गिरते बचा। लोग भागे जा रहे थे। हर कोई भयभीत था। नारे वद हो चुके थे। सिर्फ शोर बाकी था। किसी गुमनाम खौफ ने इन्हे घेर लिया था। गरदन ऊँची करके उसने आगे देखने की कोशिश की। उसकी रफ्तार कुछ धीमी पड़ गयी थी, सामने से एक आदमी इधर आ रहा था। वह जोर-जोर से बड़वडा रहा था। पुलिस का एक सिपाही उसके पीछे था। पांच-सात लोग उसे घेरे चल रहे थे। सिपाही के कपडे फट गये थे। किसी दुकान के पटरे पर खड़ा हुआ एक जवान लड़का मुट्ठी ताने जोर-जोर से कुछ कह रहा था। वालो की लटों को पीछ उछाल-उछालकर वह बोल रहा था। शोध के मारे उसकी आवाश कांप रही थी। और फिर एक बार नारों में सारा वातावरण गूंज उठा। भीड़ में फिर से आत्मविश्वास और जान पर खेलने का भाव पैदा हो गया था। मानो किमी अज्ञात शक्ति का आदेश पाकर भीड गयी थी। उसने महसूस किया कि भीड के साथ वह भी पीछे मुड गया था। अनचाहे ही डिकी की मुट्ठियां तन गयी। भीड,फिर से एक बार पलट पडी। अब ये लोग बटी मडक पर आ गये थे। दायी तरफ से और कुछ लोग आकर उसमे मिल गये । आगे पुलिग के कुछ जवान भाग रहे थे। भीड उनका पीछा कर रही थी। सब लोग गला फाड़-फाड़कर चीख रहे थे। आगे वाले हिस्से किसी ने पुलिस अफ़सर की टोपी हवा में उछाल दी थी। हो सकता है, कोई इम्पेक्टर अगे वालों के चगुल में फंस गया हो । शायद वे लोग उसकी धुनाई कर रहे होग दूर, पुलिस-वैन का सायरन बज रहा था। आवाज करीब आ रहो यो। ।

132 रोवो - डिकी ने ऊपर देखा, एक इमारत की चौथी मंज़िल की खिड़की से एक महिला पड़ोस की खिड़की में खड़े आदमी से कुछ कह रही थी, हाथों से इशारे कर रही थी। अचानक गोली चलाने की आवाज़ सुनायी दी-कान फाड़ देने वाली आवाज, थरी देने वाली आवाज़ । उसने आगे वाले आदमी के कंधे पर हाथ रखे और एड़ियाँ ऊँची करके सामने देखने लगा। कोई लाल-सफ़ेद चीज़ उसके सिर के ऊपर से आती दिखायी दी। उसने गरदन नीची कर ली। सिर पर हाथ रखकर वह एक तरफ़ भाग गया। भागने में किसी चीज़ से टकराकर धड़ाम से गिर पड़ा। उसी वक्त उसके शरीर से टकरा- कर दूसरा एक आदमी परे जाकर गिरा । इस हड़बड़ी में उसकी आँखों ने पास की दुकान के पटरे के नीचे जगह तलाश ली। पूरी ताक़त लगाकर उसने उस आदमी के ऊपर से अपनी टाँगें निकाल ली और लपककर पटरे के नीचे पहुँच गया। घुटने छाती में सिकोड़कर वह कुछ देर सांस रोके वैठा रहा । थोडी देर बाद उसने धीरे से गरदन निकालकर सामने की तरफ़ देखा। घुटनों से दर्द की एक टीस उठी और उसके दिमाग़ तक पहुँच गयी। कुछ क्षणों के लिए उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। उसने कसकर आँखें बंद कर लीं। पसीना पोंछने के लिए माथे की तरफ़ हाथ बढ़ाया तो हाथ में भयंकर दर्द महसूस हुआ । शायद किसी का जूता उसके हाथ के पंजे पर पड़ा था, या फिर पटरे से कहीं रगड़ खा गया था। हाथ से खून टपकने को था। गरदन उठाकर उसने सामने सड़क की ओर देखा। उसकी नज़रें एक स्थिर एवं निर्जीव नज़र से टकरायीं। उसके रोंगटे खड़े हो गये। शकल पहचानते उसे देर नहीं लगी। वह वही महिला थी जो कुछ देर पहले चौथी मंज़िल की खिड़की से झांक रही थी। महिला की ठोड़ी पर आश्चर्य का भाव था। उसका प्रत्येक अंग शिथिल हो चुका था, कहीं भी ताज़गी या कसाव नहीं था। गैस के निकल जाने पर लिजलिजे गुब्बारे की तरह वह वहाँ पड़ी थी। पसली के पास से खून निकलकर सड़क पर बह रहा था। काफी देर तक उसकी आँखें खून की लकीर का पीछा करती रहीं। उसे लगा, उसका अस्तित्व कण-कण टूटता हुआ खून के वहाव में घुलकर समाप्त हो गया है । पागलों की तरह वह रक्त प्रवाह के बदलते आकारों को देखता रहा । मस्तिष्क खतरे की घंटी की सूचना दे रहा था। समूची इच्छा-शक्ति बटोरकर उमने अपनी नजरें वहां से हटा लेने की कोशिश की। माथे पर पसीने की बूंदें छलक आयी यो। धौकनी की तरह चलती हुई अपनी सांस को वह स्वयं भी सुन रहा था। उसकी रोड़ कांपने लगी। तनाव असह्य था। मानो आंखों और मस्तिष्क का सपर्क टूट चुका था। और एकाएक मन और शरीर का संपर्क फिर से जुड़ा। शरीर में हरकत हुई । दूसरे ही क्षण पेट के बल पटरे के नीचे रेंगता हुआ वह नुक्कड़ तक पहुँचा । देखा कि सडक के उस पार पुलिस को बैन खड़ी है। गाड़ी के पाम एक अफसर खडा था। उसकी कमर पर लटकी पिस्तोल को डिकी देख रहा था । पूरी सड़क खाली पड़ी थी। सिर्फ वन मे कुछ दूर चार-पांच पुलिस-अफ़सर जल्दी-जल्दी कुछ वातचीत कर रहे थे। वन का रेडियो- ऑपरेटर जोर-जोर से ख़बर भेज रहा था। डिकी पीछे मुड़ा। अचानक किसी के चीखने की आवाज़ और वजनदार जूतो की आहट एक साथ मुनायी दी। उस महिला की लाश के पास पुलिस अफसर खड़ा था। एक लमहे के लिए उसकी नजर डिकी की नजरो से टकरा गयी । एक झटके के साथ डिकी ने अपना शरीर पटरे के नीचे से बाहर निकाला, और तीर की तरह आगे झपटा। उधर सड़क के दूसरे किनारे खड़े हुए दस-पद्रह लोग भी उसके साय भागने लगे। आगे लोगो का और एक जत्या भागा चला जा रहा था। पुलिस के जवान डंडे उठाये उनका पीछा कर रहे थे। डिकी भागा जा रहा था और बीच-बीच मे गरदन घुमाकर इधर-उधर देखता जा रहा था। उसे किसी गली की तलाश थी, जिसमे घुसकर वह पुलिस को चकमा दे सके, वरना दोनों तरफ़ से पुलिस की कैची मे पकड़े जाने का खतरा था। उसने देखा कि वामी तरफ की गली ले किनारे एक आदमो उसकी तरफ देखकर इशारा कर रहा है । एक क्षण के लिए वह हिचकिचाया। और सोग दौड़े चले आ रहे थे। शायद यह पोछे बालो में से किसी को बुला रहा होगा। एक यादमी जोर से चिल्लाया और जमीन पर लुढक गया। पीछ 134 रोवो पुलिस का शोर सुनायी दे रहा था। सीटियाँ बज रही थीं। एक क्षण में डिकी ने फैसला किया, पीछे से आते हुए लोगों को चकमा देकर वह आड़ी सड़क पर भागने लगा। कुछ देर तक दौड़ते रहने के बाद एक गली के पास आकर वह रुका। गरदन घुमाकर उसने पीछे देखा ही था कि किसी ने उसका कंधा पकड़कर उसे अंदर खींच लिया। बड़ी भयंकर गंध उसके नथुनों में घुसी। वह पीछे हटने ही वाला था कि उस आदमी ने एक ज़ोर- दार चूंसा लगाकर उसे भीतर ढकेल दिया । वह खुद भी भीतर आ गया। वह बहुत लवा और तगड़ा था। उसकी सफ़ेद-पीली मूछे उसके होंठों पर झुकी थीं। उसके लाल गमछे से पता चलता था कि वह विहारी होगा। डिकी कुछ बोलने बोलने ही जा रहा था कि उसने उसके कंधे थपथपाये और चुप रहने का इशारा किया। दो बड़ी इमारतों के बीच के गलियारे में वे खड़े थे। नीचे गटर बह रहा था। बाहर की तेज रोशनी से अचानक इस अंधेरी जगह में आ जाने की वजह से उसकी आँखें चुंधिया रही थीं। वह अब थक गया था। उसने दीवार से पीठ टिका दी और आँखें बंद कर ली। जब उसकी आँख खुली तो समझ पाना मुश्किल था कि वह किस जगह था? दीवार से टिककर खड़े-खड़े उसे नींद आ गयी थी, या भयंकर ग्लानि के कारण झपकी आ गयी थी? उसने याद करने की कोशिश की। इधर-उधर देखा। काफ़ी अंधेरा था। गली के दरवाजे से रोशनी भीतर आ रही थी। डिकी धीमे-धीमे बाहर निकल आया। रात हो चुकी थी। सड़क की वत्तियों की रोशनी में उसने घड़ी देखी। घड़ी वंद थी। उसने रूमाल से अपने गाल पर से आँसू पोछे। देखा, रूमाल पर खून के दाग पड़ गये थे। उसने ऊपर देखा । साफ़ आसमान पर चाँद चमक रहा था। वह आसमान की शोभा को खड़ा देखता रहा । आकाश की शीतलता उसकी आँखों में होकर उसके पूरे शरीर में, नस-नस में फैल गयी । वह सड़क के किनारे-किनारे चलने लगा। कुछ दुकानें अभी तक खुली थीं। दुकानों की रोशनी सड़क पर पड़ रही थी। वाक़ी अँधेरा था। शायद सड़क रोवो 135 की सभी वत्तियां तोड दी गयी थी। उसके घुटनो में पीटा की एक लकीर दौड़ गयी। वह आगे वढा। वायी तरफ किसी मोटर का ढांचा जल रहा था। शोले अब भी धधक रहे थे। पुलिस के दो जवान वहां खड़े थे। डिकी वहाँ से खिसका। दायी तरफ आलीशान इमारतों को खिड़कियों में मड़क पर रोशनी आ रही थी। अहाते में पानी का नल था। डिकी ने मुंह धोया। पंट और शर्ट पर पड़े खून के धब्बे गीले स्माल से रगड़कर साफ करने की कोशिश की। नल से पानी पिया। वह गेट के पास आया और इधर-उधर देखकर उस स्थान के बारे में अटकत लगाने लगा। मस्तिष्क का बवडर अव शात हो चुका था। मभी सवालों के जवाव तो नहीं मिले थे, लेकिन उसे लगा, प्रश्नों का मूल उसकी समझ में आ गया है। अब से हर क्षण उसे इन सवालों के जवाब ढूंढने होगे ! शायद कुछ सवाल सवाल ही बने रहें। लेकिन इतना वह जरूर समझ गया था कि जवावो की तलाश कहां करनी है ? मन का सदेह मिट चुका था। - धीरे-धीरे आवाजाही बढ रही थी। शहर का मुख्य इलाका अब करीब था। उस छोटे-से होटल मे कुछ लोग मेज पर चाय के कप रखे बैठे थे होटल के मालिक ने उसे देखा। गरम-गरम चाय पीने को उसका बहुत जी चाह रहा था, लेकिन वह आगे बढता रहा । उमो पुरानी दुनिया में फिर एक वार चले आने का आभास उसे हुआ। दोनो तरफ़ की दुकानें खुली थी। नुक्कड़ वाली दुकान के सामने फुटपाथ पर दो औरतें गरियो से टिकी बैठी थी। उनमे से एक स्त्री सिर खुजाती हुई दूसरी से चीख-चोखकर कुछ कह रही थी। शायद मां-बेटी थी। लड़की की छातियां कुछ उभरी हुई थी। इसके अलावा कोई खास फकं दोनो में नहीं था। लड़को को गोद एक छोटा-सा बच्चा पड़ा हाथ-पांव हिला रहा था। डिकी ने अपनी जैव टटोली। वह अव स्टेशन तक पहुंच गया था। लाउडस्पीकर पर सूचना दी जा रही थी~"नौ बजकर चालीस मिनट पर आने वाली मिमालदह एक्सप्रेस प्लेटफार्म नम्बर 5 पर खडी है। इस गाडी से आगे जाने वाले यात्री कृपया .

136 रोवो - जेब से पैसे निकालते हुए वह बुकिंग ऑफ़िस की तरफ़ गया। उसे खिड़की के पास जगह मिली थी, इसलिए वह बहुत खुश था। गाड़ी पुल पर से गुजर रही थी। उसने लंबी साँस लेकर बाहर की खारी हवा को फेफड़ों में भर लिया और बाहर के आसमान का नजारा देखने की कोशिश की। लेकिन खिड़की के सामने गुजरते हुए खंभों के अलावा और कोई चीज़ उसे दिखायी नहीं दी। कभी-कभी नीचे की तरफ़ काफ़ी गहराई पर चमकता हुआ पानी दिखायी देता । उसने डॉक्टर की दी हुई चिट्ठी निकाली और खिड़की के बाहर फेंक दी। हवा के ज़ोर से चिट्ठी विपरीत दिशा में उड़ गयी थी। उसने एक बार फिर अपनी जेब टटोली । 'पे बुक' निकाली। कुछ क्षण उसे ताकता रहा। फिर खोला। बायें फ्लैप पर लगी तसवीर से लान्स-नायक डिकी का चेहरा उसकी तरफ़ देख रहा था। अपना हाथ खिड़की से बाहर करके उसने लान्स-नायक डिकी की 'पे बुक' धीरे-से नीचे गिरा दी। हवा का झोंका उसे पीछे की तरफ़ उड़ा ले गया। पहियों की खटर-पटर और इंजन की घड़घड़ाहट के बाल । बुक' के पानी में गिर जाने की आवाज़ सुनने के लिए कान र मन हँसता हुआ इंजन की ओर देखने लगा।

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Robo

Author
Manohar Denanath
Title
Robo
File name
Robo
Text
OCR done
Citation
1953
Published
2011/03
Publisher
Dariyaganj,saraswati Vihar
Language
Sanskrit
Pages
144
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Poetry
DLI number
552084
Barcode
4990010032813.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
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Copyright permitted
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