Shantarakshita Library Sarnath

Kalliyana Chandrodaya

Nithya Nand Misra · 21-04-06

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शिवकवि-विरचितम
कूर्माचलीयकाव्यान्तर्गतम्
कल्याणचन्द्रोदयम्
(कुमाऊं हिमालय का विस्मृत इतिहा
व्याख्या, सम्पादन, अनुवाद
एवं परिचय
ESIनित्यानन्द मिश्र
प्रकाशक
श्री अल्मोड़ा बुक डिपो
माल रोड, अल्मोड़ा (उ० प्र०)

प्रकाशक
श्री अल्मोडा बुक डिपो
अल्मोडा-263601
फोन 22148, 22113
ब्राच A/2, 71-B, लारेन्स रोड, दिल्ली
ISBN -81-85865-33-7
© प्रकाशक
150823
Accession No......
Shanta la Library
Tibetan Institute-Sarnath
लैजर टाइप सैटिग
कम्प्यूटर कोड्स
विराट भवन, कमर्शियल काम्पलेक्स
मुखर्जी नगर, दिल्ली - 110009
Rs.150
मुद्रक डी० के० फाईन आर्ट प्रेस, दिल्ली

सूची-पत्र
1
14
27
36
1
आभार
2 भूमिका
3 परिचय
4 कल्याणचन्द्रोदय प्रथम सर्ग
5 कल्याणचन्द्रोदय द्वितीय सर्ग
6 कल्याणचन्द्रोदय तृतीय सर्ग
7 कल्याणचन्द्रोदय चतुर्थ सर्ग
8 कल्याणचन्द्रोदय पचम सर्ग
9 कल्याणचन्द्रोदय षष्ट सग
10 कल्याणचन्द्रोदय सप्तम सर्ग
11 परिशिष्ट
सस्कृत साहित्य को कूर्मांचलीय विद्वानों की देन
45
54
62
71
78
91

गल्ली निवासी पं० विष्णु दत्त ज्योतिर्विद
(1861-1931)
आभार
कल्याण चन्द्रोदय की एक प्रति लेखक को १६७८ मे अपने मातामह गल्ली निवासी
पण्डित विष्णुदत्त ज्योतिर्विद के घर मिली। उनके पौत्र प० रामचद्र ज्योतिर्विद, वकील ने
अपने वश के कुछ
चदकालीन दस्तावेजो के साथ इस हस्तलिखित
पुस्तक
को लेखक को
दिखलाया। उन्होने लेखक को इसका हिन्दी अनुवाद एव प्रकाशन की सहर्ष अनुमति दी।
लेखक उनका हृदय से आभारी है।
प० विष्णु दत्त जी के पूर्वज चद राजाओ के दर्बार मे प्रतिष्ठित पदो पर नियुक्त थे।
वे देवभाषाधिकारी तथा धर्माधिकारी थे। महाराज त्रिमलचद के समय प० दिनकर
ज्योतिर्विद मत्री पद पर नियुक्त हुए। दिनकर जी की चौथी पीढी मे श्री लक्ष्मीपति
ज्योतिर्विद् जी हुए। प्रस्तुत काव्य के नायक महाराज कल्याणचद्र के समय वे धर्माधिकारी
एव देवभाषाधिकारी थे। उन्होने १७४५ ई० मे बाडाखेडी (वटोषर) के युद्ध मे सक्रिय भाग
लिया। इन्ही श्री लक्ष्मीपति जी की पाँचवी पीढी में प० विष्णुदत्त जी हुए। इनके घर
प्रस्तुत काव्य की प्रति मिली। इस प्रति के उन्नीस पृष्ठ नही मिले। अत लगभग ७२
श्लोको का अर्थ नही लिखा जा सका।
आवरण चित्र के लिये प्रसिद्ध पुरावेत्ता डा. यशोधर मठपाल जी का आभारी हूँ।
नित्यानन्द मिश्र
जाखन देवी, अल्मोडा

भूमिका कल्याणचन्द्रोदय काव्य एवं उसके प्रणेता पं० शिवानंद पाण्डे Contemporary literature is one of the most important sources of information in reconstructing the history of any country It is the most effective document which makes the dead past living The present historical poem named 'Kalyan Chandrodaya Kavya' throws a flood of light on the history of Kumaon from 1638 AD to 1745 AD It was written by Pt Shivanand Pande,a resident of Pandegaon in Bhim Tal near Naini Tal His ancestors were great scholars and held important responsible posts in the court of the Chand kings of Kumaon The writer himself was closely associated with the Chand administration and held the important post of the ambassador and Counsellor for forty years He had intimate knowledge of the intrigues, upheavals that shook the Chand administration He took a leading part in the battle of Barakhora (Batokhara) against the Rohillas in April 1745 AD Apart from its literary merit this epic gives a vivid picture of the social, political and economic condition of Kumaon from 1638 to 1745 The Himalayan Gazetteer itself is based on the information furnished by the epic which was well known to Pt Rudra Datt Pant who helped Mr Atkinson in compiling the Gazetteer प्राचीन इतिहास को जानने के लिये समकालीन साहित्य का महत्वपूर्ण स्थान है। भारत के प्राचीन इतिहास को जानने के लिये समकालीन ऐतिहासिक साहित्य कम उपलब्ध है। कल्हण की राजतरगिणी, वाणभट्ट लिखित हर्षचरित, बिल्हण द्वारा विरचित विक्रमाक देव चरित, सन्ध्याकार नन्दिन लिखित (रामपाल का चरित) रामचरित, चालुक्यो के बारे मे कई जैन ग्रन्थ है जिन से तत्कालीन इतिहास की जानकारी मिलती है। इसी प्रकार कूर्माचलीय इतिहास के शोध मे समकालीन साहित्य का महत्वपूर्ण स्थान है। कूर्माचल के कल्याणचन्द्रोदय 2 कत्यूरी एव चन्दराजा गुणग्राही, विद्वानो का आदर करने वाले, धर्मनिष्ठ एव हिन्दू धर्म के पोषक रहे हैं। इनमे से कई नरेश स्वय प्रकाण्ड विद्वान, साहित्यवेत्ता एव रचनाकार हुए हैं। उनकी सभा मे दूर-दूर से प्रख्यात विद्वान, साहित्यकार वेदशास्त्र विशारद, दार्शनिक, कर्मकाण्ड विशारद, प्रकाण्ड ज्योतिर्विद, वैद्यक, आयुर्वेद, वास्तुशास्त्र, धर्मशास्त्र, मीमासा, पुराणों मे निष्णात पडित आये। यथेष्ट सम्मान एव समुचित राज्याश्रय मिलने पर इसी भू-भाग में बस गये निरन्तर सारस्वत साधना से उन्होने चन्दवशीय नरेशो की सभा एव समस्त कूर्माचल के गौरव को बढ़ाया। इन्ही मे से कतिपय विद्वानो ने ऐतिहासिक काव्य, चन्द्रवशीय नरेशो की प्रशस्तियाँ लिखी। इनकी रचनाओ से कूर्माचल के इतिहास पर व्यापक प्रकाश पडता है। इन विद्वानो की जो रचनाये आज तक उपलब्ध है उनमे प्रमुख निम्नलिखित काव्य 1 पाटिया के प० लक्ष्मीपति पाण्डे अारा लिखित (1) अब्दुल्लाह चरितम् (2) फर्रुखसियर चरितम् । दोनो ग्रन्थ चन्द नरेश जगच्चन्द के समय लिखे गये। कवि, जगच्चन्द (1708-20) से पूर्व, ज्ञानचन्द (1698-1708) के भी सभा रत्न थे। इन दोनो ग्रथो से मुगल राज्य के पतन मुगल सरदारो की गुटबन्दी, षडयत्र, सत्तालोलुपता एव चन्दवशीय नरेशो का मुगल शासको के साथ सबध पर अच्छा प्रकाश पडता है। 2 तीसरा ग्रथ है प० भगीरथ के पुत्र प० पद्मदेव द्वारा विरचित जगच्चन्द्रिका टीका। ये टीकाये राजा जगच्चन्द (1708-20) के समय उसकी सभा के विद्वानो ने सस्कृत काव्यों पर लिखी। ये टीकायें आश्रयदाता जगच्चन्द के नाम पर जगच्चन्द्रिका टीकाये कहलायी गयी। प० पद्मदेव द्वारा विरचित ग्रथ रघुवंश की टीका है। टीकाकार ने टीका से पूर्व अपने वश एव चन्दवशीय नरेशो का परिचय दिया है। यह इतिहास के शोध के लिये महत्वपूर्ण है। 3 चौथा ग्रथ है कार्तवीर्योदय जिसे उनाडा (गगावली) से नेपाल गये राजमान्य विद्वान सुकृतिदत्त पत ने लिखा। अप्रकाशित पुस्तक नेपाल राज्य के लेखाभिगार मे है। सभवत इसमे कार्तवीर्य के वशधर कत्यूरियो का वर्णन है। 4 पाँचवी पुस्तक जिससे ऐतिहासिक तथ्यो पर प्रकाश पडता है भक्ति प्रबध काव्य एव उसकी भूमिका है। यह पुस्तक चीनाखान निवासी श्री लकराज के वशधर प० त्रिलोचन ज्योतिर्विद् ने अठारहवी सदी के मध्य काल मे कल्याणचन्द देव (1739-48) के समय लिखी। इस भूमिका से महाराज कल्याण चन्द के समय की गतिविधियो, राजनीतिक घटनाओ एव समकालीन विद्रानो पर यथेष्ट प्रकाश पडता है। रुहीला आक्रमण का भी इसमे वर्णन मिलता है। 5 छठी एव सातवी ऐतिहासिक काव्य कृतियाँ भीमताल के छखाता परगना के बाडाखोडा (बटोषर) ग्राम निवासी प० शिवानन्द पाण्डे द्वारा विरचित कूर्माचल काव्य एव उसके अन्तर्गत कल्याण चन्द्रोदय काव्य है। काव्य की मूल प्रतियाँ उनके वशधर प० भवानी दत्त पाण्डेय के पास होने का अनुमान है। कूर्माचल के विद्वत् समाज मे इन काव्यो की बड़ी भूमिका चर्चा रही। पहले छापेखाने नही थे। विद्वान परिवारों मे यह परिपाटी थी कि मूल प्रति से पहाडी कागज या भोजपत्र मे बहुचर्चित काव्यो की नकल अपने एव अपने शिष्यो के पाठनार्थ कर ली जाती थी। पाठशालाये भी विद्वान पडितो की अपने गावों में होती थी। वही दूर-दूर से शिष्य विद्यार्जन के लिए आते थे। अवकाश के समय हस्तलिखित प्रसिद्ध पुस्तको की नकल भी करते थे। इस प्रकार ज्ञान का प्रसार होता था। पर कभी-कभी मूल प्रतियाँ एक हाथ से दूसरे हाथ मे जाने से या तो खो जाती थी या चुरा ली जाती थी। लोग नकल करने मागते, पर लौटाते नहीं थे। इस प्रकार कूर्माचल के गौरवमय वाड् मय की रक्षा न हो सकी। छापाखाने खुलने पर तो हस्तलिखित पुस्तको का चलन इतना कम हुआ कि विद्वान पण्डित परिवार भी उनकी समुचित रक्षा न कर सके। जीर्ण-शीर्ण अवस्था में यह हस्तलिखित पुस्तके मिलती हैं। प्रस्तुत कल्याण चन्द्रोदय काव्य को सर्वप्रथम कूर्मांचल के प्रकाण्ड विद्वान पल्यू ग्राम निवासी प० अनन्त राम पाण्डेय ने 1918 मे प्रकाशित करवाया। पर आज इसकी एक भी प्रति उपलब्ध नही है। अल्मोडा के पोखरखाली मुहल्ले के निवासी कलेत ग्राम के पण्डित दयाराम त्रिपाठी ने दन्या के ज्योतिर्विदो के वश वर्णन मे 1808 ई० मे कूर्माचल एव कल्याण चन्द्रोदय काव्यो का उल्लेख किया है। इस प्रकार दोनो ऐतिहासिक काव्य पण्डित-समाज मे बहुचर्चित रहे। लेखक को कल्याण चन्द्रोदय की एक प्रति 1978 ई० मे अपने मातामह गल्ली निवासी पण्डित विष्णुदत्त ज्योतिर्विद के यहाँ मिली। उनके पौत्र पण्डित रामचद्र ज्योतिर्विद ने अपने वश के कुछ आवश्यकीय कागजो के साथ इस हस्तलिखित पुस्तक को लेखक को दिखलाया। इस परिवार के मसूरी प्रवास के समय हस्तलिखित पुस्तके तथा अन्य चदकालीन दस्तावेज एक सन्दूक मे बन्द कर ऊपर की मजिल मे रख दिये गये वर्षा के पानी के टपकने से वह अमूल्य निधि कुछ नष्ट भ्रष्ट हो गयी। प० रामचन्द्र के सौजन्य से यह हस्तलिखित पुस्तक लेखक को प्राप्त हुई। पर इस प्रति के भी 12 पृष्ठ खो गये हैं। 86 श्लोकों का अर्थ नही लिखा जा सका। लेखक ने 1978 के अक्टूबर मास मे सारे काव्य का अनुवाद किया। उसके सामने सबसे बड़ी समस्या थी काव्य मे वर्णित कूर्माचल के महापुरुष, राजनीतिज्ञ, विद्वान एव पदाधिकारियो का सही पता लगाना। 234 वर्ष के अन्तराल में स्मृतियो का धूमिल हो जाना स्वाभाविक है। इसके लिए लेखक ने कई प्रतिष्ठित परिवारो की लगभग 14 वशावलियाँ देखी, चन्दकालीन ताम्र-पत्र देखे। फलस्वरूप कुछ सफलता इस शोध में मिली। पर पूरे नामो एव स्थानो का पता अब भी नहीं मिल सका। जो श्लोक अभी तक उपलब्ध नही हुए उनकी खोज भी चल रही है। ग्रथ के प्रणेता पण्डित शिवानन्द पाण्डेय हैं। ये भीमताल के पास छखाता परगना में बाडाखोडा (बटोषर) ग्राम के निवासी थे। इनके वशधर वर्तमान समय मे पाण्डे गाव मे रहते है। काव्य मे वर्णित बाडाखोडा का युद्ध कूर्माचलीय एव रुहीलो के बीच 1745 ई० मे हुआ। अनुमानत ग्रन्थ तीन-चार साल बाद 1748/1749 के आस-पास लिखा गया। भीमताल 4 कल्याणचन्द्रोदय मे पाण्डे गाँव के निवासी प० कृष्णानन्द तिवाडी ने दिनाक 29-9-79 को लेखक के पास कवि के पूर्वजो की वशावली भिजवाई। उस प्राचीन हस्तलिखित वशावली एव सक्षिप्त टिप्पणी से निम्नलिखित बाते प्रकाश मे आयी हैं। वटोषर के पाण्डेय पूर्व दिशा मे भगवत नाम नगर से बदरीनारायण की यात्रा को आये। यात्रा करने के उपरान्त कूर्माचल देश मे अवलम्पुर मे बसे। राजा रुद्र चन्द ने वटोषर का ग्राम दिया। वहाँ दो भाई प० सिह पाण्डेय एव नृसिह पाण्डेय बसे। बाद मे छोटे भाई नृसिह पाण्डेय को कूर्माचल राज्य के पश्चिम मे द्वाराहाट के निकट बैडती ग्राम मिला। वे वहा बस गये। उनके वशधर आज द्वाराहाट से महाकालेश्वर तक पान, बैडती, गैराड एव कगनर के ग्रामो मे बसे हैं। प० सिह पाण्डेय बाडाखोडा मे ही रहे। सिह पाण्डेय की सातवी पीढी मे महाराज दिलीप चन्द के समय प० वासुदेव पाण्डेय हुए। ये महाराज रुद्रचन्द्र देव के सभारत्न, षट्शास्त्र वेत्ता प० चक्रपाणि पाण्डेय के पुत्र थे। दोनो का वर्णन कवि ने काव्य के प्रथम सर्ग मे किया है। वासुदेव के दो पुत्र हुए। बड़े प० वामदेव पाण्डेय थे। छोटे पुत्र प० लक्ष्मीधर नेपाल राज्य मे चले गये। नेपाल मे लक्ष्मीधर जी के वशधरो को बडी ख्याति मिली। वे राजगुरु एव कोषाध्यक्ष के सम्मानीय पदो पर रहे। इस वश के सर्वश्री विजयराज पाण्डेय, हेमराज पाण्डेय एव भुवनेश्वर प्रसाद पाण्डेय बहुत प्रसिद्ध विद्वान् हुए। काशी एव नेपाल मे यश सम्मान प्राप्त किया। आज भी नेपाल राज्य के राजगुरु है। बड़े भाई प० वामदेव पाण्डेय राजा बाजबहादुर चन्द (1638/78) के सभारत्न थे। कूर्माचल नरेश के गुरु एव परामर्शदाता रहे। उन्हे दौत्य पद पर भी नियुक्त किया गया। उनकी सेवाओ से प्रसन्न होकर महाराज ने उन्हे आठ गाँव दिये। वामदेव के पुत्र विश्वरुप जी विलक्षण बुद्धि के थे। 1664 ई० मे बाजबहादुर चन्द ने उन्हे पहाडसिह गुसॉर्ड के साथ देहली मुगल सम्राट औरगजेब के पास भेजा। इनकी सेवाओ से कूर्माचल राज्य का पूर्ण अधिकार मध्य प्रदेश ( माल भाबर) मे हो गया। मुरादाबाद की ओर से कठेडियो का आगे बढना रोका गया। महाराज के आदेश पर उन्होने सारे मध्यदेश की व्यवस्था की योजना बनायी। योग्य अधिकारियो के सहयोग से उन्होंने कुछ ही समय मे माल-भाबर को आबाद कर दिया। रुद्रपुर, काशीपुर एव बाजपुर नगरो का निर्माण किया। माल-भावर की उर्वरा भूमि ने कूर्माचल की आर्थिक दशा सुदृढ कर दी। बाजबहादुर ने इनकी सेवाओ से प्रसन्न होकर उन्हे कई गॉव देने चाहे। पर विश्वरुप ने केवल तीन गॉव लिये। विश्वरुप पाण्डेय के दो पुत्र हुए, शिवानन्द पाण्डेय एव ब्रह्मानन्द पाण्डेय । विश्वरुप जी का जीवन काल 1625 के 1690 तक काव्य के आधार पर अनुमानित है। मृत्यु से पूर्व उनका मतभेद बाज बहादुर के पुत्र उद्योतचन्द (1678-98) से हो गया था। उन्होने सभा जाना छोड़ दिया। निरन्तर शिवार्चन मे लगे रहे। 1690 के लगभग शिव-सायुज्य प्राप्त किया। मृत्यु के उपरान्त उद्योतचन्द को पश्चाताप हुआ। उसने उनके पुत्र शिवानन्द पाण्डेय को पिता के ही पूर्व पद पर प्रतिष्ठित किया। यही शिवानन्द पाण्डेय कूर्माचल काव्य एव कल्याण चन्द्रोदय काव्य के प्रणेता थे। काव्य के आधार पर उनका जीवनकाल 5 भूमिका 1670 से 1750 तक अनुमानित है। 1690 से 1730 तक उन्होने चन्द्र राज्य की सेवा की। वे बडे विद्वान, कुशाग्र बुद्धि एव आशु कवि थे। उनकी कवित्व शक्ति, साहित्यज्ञान का परिचय इन काव्यो से मिलता है। वे ज्वालामुखी के उपासक थे। शिव के भी अनन्य भक्त थे। काव्य से ज्ञात होता है कि वे अन्तिम समय वाराणसी चले गये थे। ज्ञानचन्द द्वितीय (1698-1708) के समय अपने ही विरादर पद्मापति पाण्डेय के देशद्रोह, राजद्रोह के कारण उनके गाँव, सम्पत्ति, राजसभा मे पद सभी छिन गये। पर महाराज जगच्चन्द ने (1708-1720) फिर उन्हे पूर्व पद पर प्रतिष्ठित किया। 1726 मे देवी चन्द (1720-26 ) की कोटाबाग के निकट देवीपुर मे निर्मम हत्या हुई। इसी समय से कूर्माचल मे चन्द-शक्ति का विनाश प्रारम्भ हुआ। अजीत चन्द (1726-29 ) के समय मे भी षडयत्र, उपद्रव, विप्लव, कुव्यवस्था का तारतम्य बना रहा। बहुत से विद्वान परिवार कूर्माचल छोड़ कर अन्यत्र चले गये। इसी समय रामगढ़ के पास के खसो ने इनकी सम्पत्ति छीन ली। वे भी आश्रय की खोज मे इधर-उधर भटकते हुये हिमाचल प्रदेश मे सिर्मोर (नाहन) राज्य के राजा विजय प्रकाश की सभा मे पहुँचे। दरबार मे पद-मान सभी मिला। वहाँ उन्हे एक अशर्फी रोज मिलती थी। पर उनका मन वहाँ भी न लगा। वे वाराणसी चले गये। वहाँ तीन-चार साल वात-पीडा से पीडित रहे। उस समय उनके विद्वान् पुत्र शिवदेव पाण्डे ने उनकी बड़ी सेवा की। शिवदेव पाण्डे को महाराज जगच्चन्द ने अपनी पुत्री के साथ नाहन भेजा था। लगभग 14 वर्ष प्रवास मे रहने के उपरान्त शिवानन्द पाण्डे को कूर्मांचल नरेश कल्याण चन्द्रदेव (1730-48 ) ने लगभग 1743-44 मे उनके ही अनुज ब्रह्मानन्द द्वारा अली मुहम्मद नामक रुहेला सरदार के आक्रमण के समय, कूर्माचल फिर बुलाया। तब कूर्माचल मे षड्यन्त्रकारियो के उपद्रव हो रहे थे। जब महाराज अजीत चन्द 1729 मे षडयत्रकारियो के नेताओ द्वारा राजधानी के मल्ले महल में मारे गये। रिक्त सिहासन पर षड्यत्रकारियो ने खवासन के एक छोटे बालक को बालो कल्याण के नाम से गद्दी पर बिठाया। इसे समस्त कूर्माचलीय जनता बर्दाश्त नहीं कर सकी। कूर्मांचल के इतिहास मे एक महत्वपूर्ण बात देखने मे आयी है कि जब-जब देश मे सकट की घडी उपस्थित हुई यहाँ के दो परस्पर विरोधी दल 'मार' एव 'फडत्याल सदा एक हो गये। उन्होने सदा सोम चन्द की गद्दी की रक्षा की तथा गद्दी पर उनके ही विशुद्ध वशधरो को बिठाया। 1730 मे उन्होने रुद्रचन्द्र देव के पौत्र नारायण चन्द के पुत्र कल्याण चन्द को (1730-48 ) गद्दी पर बिठाया और षड्यत्रकारियो का वध किया। कल्याणचन्द ने अपने राज्य काल के प्रारम्भिक वर्षो मे क्रूरता बरती। अपने पद, अपनी शक्ति को स्थिर करने के लिये उसने चन्द वशीय राजकुमारो एव उनके समर्थको को मरवा डाला। जरा सा शक होने पर लोग पकडे गये। चन्द राज्य के स्वामिभक्त प्रतिष्ठित परिवारो के लोग या तो भूमिगत हो गये या देश छोड अन्यत्र चले गये। इनमे कई चन्दवशीय लोग भाग कर पड़ोसी राज्य रुहेलखण्ड चले गये। इनमे से प्रमुख हिम्मत सिह रोतेला10 6 कल्याणचन्द्रोदय थे। उन्हे ऑवला-बरेली के शासक अली मुहम्मद खाँ ने शरण दी। पर कल्याण चन्द के गुप्तचरो ने ऑवले मे हिम्मत सिह रौतेला को मार डाला। इससे बौखला कर अली मुहम्मद ने कूर्माचल पर आक्रमण किया। राजधानी अल्मोडा सात महीने तक रुहेला अफगानो के अधिकार मे रही। कल्याण चन्द भाग कर गढवाल मे लोहाबा की ओर चले गये। इस सकटपूर्ण स्थिति में जो भूमिका, माल-भाबर मे रुद्रपुर के गर्वनर, झिझाड ग्रामवासी शिवदेव ने निभाई वह कूर्मांचलीय इतिहास मे अविस्मरणीय है। वह रुहेला सेना से चार बार लडा। हारा, पर हार नही मानी। गढवाल नरेश प्रदीप्त शाह की सहायता से रुहिला सेनापति हाफिज रहमत खाँ से सधि की। कूर्मांचल को विदेशियो के हाथ से मुक्त किया। तब कल्याणचन्द की आँखे खुली । पुरानी भूले सुधारी गयी। चन्द राज्य के पुराने स्वामिभक्त परिवारो को बुलाया गया और पूर्व पदो पर नियुक्त किया गया। इसी समय कवि शिवानन्द को वाराणसी से बुलाया गया। उन्होने राजा को सत्परामर्श दिया। राजनीति की सूक्ष्म बाते बताई। कूर्मांचल के विरोधी दल एकता के सूत्र में बद्ध किये गये। इस प्रकार राज्य की स्थिति दृढ की गयी। सधि की शर्तो को न मानने पर अली मुहम्मद ने तीन महीने के भीतर ही कूर्माचल पर 1745 मे दूसरा आक्रमण कर दिया। पर इस समय आन्तरिक स्थिति बदल गई थी। शिवदेव जोशी एव शिवानन्द पाण्डे के प्रयत्नो से एकता के सूत्र मे आबद्ध कूर्माचलियो ने भीमताल के पास बटोपर (बाडाखोडा) के युद्ध मे अली मुहम्मद को पराजित किया। इस युद्ध का वर्णन कवि ने छठे सर्ग मे किया है। शिवानन्द पाण्डे एव उनके मामा के पुत्र हरिराम पत11 ने गढ मुक्तेश्वर एव सम्भल मे मुगल सम्राट मुहम्मद शाह एव अवध के नवाब अली मसूर खाँ से मिलकर सहायता प्राप्त की। इधर शिवदेव जोशी ने बाडाखोडा के मुहम्मद के मसूबो पर पानी फेर दिया। दोनो शिवो ने कूर्माचल की रक्षा की। कल्याण चन्द की विजय के बाद कवि शिवानन्द पुन वाराणसी चले गये। वही शिवसायुज्य प्राप्त किया। सभवत वही इन काव्यो की रचना हुई। प० युद्ध मे अली काव्य का सर्गबद्ध संक्षिप्त निरुपण प्रथम सर्ग इस सर्ग में महाराज बहादुर चन्द (1638-1678) के राज्य काल का वर्णन है। उस समय के प्रमुख विद्वान् एव उच्च पदाधिकारियो के नाम दिये गये हैं। प्रस्तुत पाण्डुलिपि मे प्रथम उन्नीस श्लोक नही मिले है। पर श्लोको का पूर्वापर सबध बिठाने पर यह पता चलता है कि महाराज विजय चन्द (1624-25) के समय शोर (पिथौरागढ) के शकराम कार्की, पीरू गुसॉई तथा विनायक भट्ट के षडयत्र से विजयचन्द की हत्या हुई। अल्मोडा के मल्ला महल मे भयकर रक्तपात हुआ। विजयचन्द के चाचा नील सिंह गुसाई अन्धे कर दिये गये। उनके एकमात्र पुत्र बाजबहादुर को चौसार के त्रिपाठियो के घर शरण मिली। वही श्रीमती धर्माकर त्रिपाठी ने राजकुमार को अपने पुत्र नारायण के साथ पाला 7 भूमिका पोसा। कूर्माचलीय जनता ने इस अत्याचार का घोर विरोध किया। ‘मार' दल की सहायता से विजयचन्द के चाचा त्रिमल चन्द (1625-38) गद्दी पर बैठे। वे नि सन्तान थे। अत उन्होने अपने मृत भाई नील सिह गुंसाई के पुत्र बहादुर चन्द को अपना उत्तराधिकारी बनाया। त्रिमलचन्द की मृत्यु के बाद बाजबहादुर चन्द (1638-1678) गद्दी पर बैठे। उनके शासन काल के चालीस वर्षों मे कूर्मांचल की सर्वागीण उन्नति हुई। उसने पडौसी राज्य गढवाल पर विजय प्राप्त की। तराई भावर से कठेडियो को हटाया। सारे माल-भावर को फिर से आवाद किया गया। इस कार्य में कवि शिवानन्द पाण्डेय के पितामह वामदेव तथा पिता विश्वरूप पाण्डेय ने महाराजा की पूर्ण सहायता की। विश्वरूप पाण्डेय 1664 ई० में महाराज द्वारा ओरगजेब के पास राजदूत के रूप मे भेजे गये। कवि ने इस सर्ग मे गज्य की अभिवृद्धि का वर्णन किया है। बाजबहादुर चन्द के पुत्र उद्योत चन्द के दो पुत्र ज्ञान चन्द एव हार चन्द (हरिचन्द) के जन्म का वर्णन है। बड़े होने पर दोनो राजकुमारो में वैमनस्य हो गया। ज्ञानचन्द बाज बहादुर को प्रिय थे। और महाराजकुमार उद्योतचन्द हारचन्द को अच्छा मानते थे। इस कारण महाराज एव महाराजकुमार के बीच विरोधाग्नि बढ़ने लगी। इस विरोधाग्नि को विश्वरूप पाण्डे ने अपने निर्णय से शात किया। उनके परामर्श से बाजबहादुर चन्द ने अपने पुत्र उद्योत चन्द को हारचन्द के साथ राजधानी से दूर गगावली (गगोली) प्रात मे शासन करने भेज दिया। इन दोनो के हटने से कूर्माचल का गृह युद्ध बच गया। महाराज प्रसन्न हुए। अब उन्होने विश्वरूप जी से मध्य देश (माल-भावर ) की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिये कहा। विश्वरूप जी ने माल-भावर को पुन आवाद करने के लिये योजना बनाई। इस कार्य मे उन्हे जगन्नाथ, रमा पडित एव कायस्थ कुलाग्रवर्ती अरिका दास से सहायता मिली। सीमावर्ती कठेडी राजपूत एव मुसलमान नियत्रण मे रक्खे गये। काशीपुर को केन्द्र बनाया गया। काशीनाथ, श्रीनाथ, विनायक एव रामभद्र आदि अधिकारियो की सहायता से जमीन आवाद की गयी। जगल काटे गये, सडके बनवायी गयी, कुऐ खुदवाये गए। बाजपुर काशीपुर एव रुद्रपुर नगरो काविस्तार हुआ। काशीपुर का विशेष वर्णन इस सर्ग मे है। द्वितीय सर्ग इस सर्ग मे रुद्रपुर का वर्णन है। द्वारिका दास ने उसे अपने कार्य क्षेत्र का केन्द्र बनाया। विश्वस्प जी की योजना कुछ वर्षों में फलवती हुई। राईपुर से श्रावण तक कायापलट हो गई। फसल बढी। राज्य की आर्थिक स्थिति सुधरी। इसी सर्ग में बाजबहादुर चन्द की मृत्यु तथा उद्योत चन्द (1678-98) के सिहासनारोहण का वर्णन है उद्योत चन्द का डोटी (पश्चिमी नेपाल) तथा गढवाल के राजाओ से युद्ध हुआ। उसकी राज्यश्री की अभिवृद्धि का वर्णन है। विश्वस्प जी का राज्य भार से हटना तथ उनकी मृत्यु का वर्णन है। उनके पुत्र शिवानन्द जी पिता के पूर्व पद पर प्रतिष्ठित हुए। कुमार हरिचन्द की मृत्यु तथा उद्योत चन्द के दु ख का वर्णन इस सर्ग मे है। पुत्र शोक से उद्योतचन्द की मृत्यु हुई और उनके ज्येष्ठ पुत्र ज्ञानचन्द द्वितीय (1698-1708) गद्दी पर बैठे। गढ़वाल पर आक्रमण हुआ। ज्ञानचन्द की विजय हुई। कवि के एक बाधव पद्मापति पाण्डेय ने श्रीनगर (गढवाल) मे शरण ली और अपने राजा एव देश से द्रोह किया। पद्मापति के -- 8 कल्याणचन्द्रोदय तृतीय सर्ग इस कृत्य से ज्ञान चन्द रुष्ट हुए। उन्होने अपनी शासन नीति बदल दी। कुलीन एव प्रतिष्ठित कुलो के पदाधिकारी हटाये गये। उनकी भूमि छीन ली गयी। राज्य मे माणिक, नन्दु बिष्ट तथा परमानन्द जैसे लोगो का प्रभाव बढा। जगच्चन्द 1708 मे गद्दी पर बैठे। उदार व्यक्तित्व वाले इस राजा ने नीति में परिवर्तन किया। दन्या के वीरभद्र एव सेलाखोला के रुद्रदेव को आमात्य बनाया पर माणिक बिष्ट का प्रभाव बना रहा। राजा की दानशीलता का वर्णन है। 1720 मे जगच्चन्द की चेचक से मृत्यु हुई। इस सर्ग मे राजा देवीचन्द (1720-26) के शासन काल का वर्णन है। स्वार्थी मत्रियो के षड्यत्र से राजा की कोटा-भाबर के पास देवीपुर मे निर्मम हत्या हुई। माणिक एव नन्दु बिष्ट का प्रभाव बढा। इसी समय बहुत कुलीन परिवार स्वदेश छोडकर मैदानी भागो मे चले गये क्योकि कूर्माचल मे जीवन सुरक्षित नही था। देवीचन्द की हत्या से देशभर मे कुव्यवस्था अराजकता, अधेर गर्दी फैल गयी। राजभक्त शिवानन्द पाण्डे भी इतने खिन्न हुए कि स्वदेश छोड महाराज विजय प्रकाश के राज्य सिर्मोर (नाहन) चले गये। माणिक का कूर्माचल की गद्दी पर पूरा अधिकार हो गया। उसने कुमार हरिचन्द की पुत्री के लडके अजीत सिह कठेडी को अजीत चन्द (1726-29 ) के नाम से सिहासन पर बिठाया। सदा भोग-विलास मे लिप्त अजीतचन्द की भी हत्या करवा दी गयी। कूर्माचल मे हत्या, अत्याचार, अन्याय, अधेर गर्दी का क्रम चलता रहा। वास्तव में इसी समय से कूर्माचल मे चन्द-सत्ता का विनाश प्रारम्भ हुआ। जनता ने इस अत्याचार का खुल कर विरोध किया। 'मार' एवं 'फडत्याल दलो ने मिलकर महाराज लक्ष्मी चन्द के वशज उद्योत चन्द के पुत्र कल्याण चन्द* को सिहासन पर बिठाया। अत्याचारी मत्री मारे गये। इस सर्ग मे कल्याण चन्द (1729-48) के शासन काल का वर्णन है। प्रारम्भ मे अधेर गर्दी चलती रही। रौतेला एव चन्द वशीय क्षत्रियो का वध होता रहा। उनके समर्थक ब्राह्मणो को थोड़ा भी सन्देह होने पर अन्धा कर दिया। शिवानन्द पाण्डेय इस बीच स्वदेश के समाचारो से अत्यन्त खिन्न हुए। बटोषर (बाडाखोडा) मे उनकी जमीन तथा घट (पनचक्की) रामगढ के कमलापति ने छीन ली। वे सिर्मोर से निराश होकर काशी चले गये। इस सर्ग मे उन्होने विश्वनाथ पुरी का वर्णन किया है। उनका स्वास्थ्य गिर गया। तीन साल तक बात-ब्याधा से चारपाई पर लेटे रहे। गगा की स्तुति सुन्दर छन्दो मे की गयी है। इस बीच कूर्माचल की दुरवस्था का लाभ उठाकर रुहेलखण्ड के शासक अली मुहम्मद खाँ ने आक्रमण कर दिया। इस विदेशी आक्रमण से महाराज की बुद्धि ठिकाने आयी। बाजबहादुर चन्द के समय के प्राचीन, स्वामिभक्त कुलीन घरानो के वशजो की खोज होने लगी और उनकी सम्पत्ति लौटाई जाने लगी। उन्हे पूर्व पदो पर प्रतिष्ठित किया जाने लगा। इसी समय कल्याण चन्द ने प० शिवानन्द पाण्डे के पास वाराणसी मे चतुर्थ सर्ग * काव्य में कल्याण चद को उद्योत चन्द का पुत्र बतलाया है। गैजेटियर में कल्याणचद को नारायण चद का पुत्र लिखा है।

9 पचम सर्ग षष्टम सर्ग -- भूमिका उनके ही अनुज ब्रह्मानन्द पाण्डेय द्वारा एक पत्र भेजा। उन्हे आग्रह पूर्वक अल्मोडा बुलाया गया था। स्वदेश की आसन्न विपत्ति का अनुमान कर तथा स्वदेश के प्रति अनन्य प्रेम-भावना से प्रेरित हो कर उन्होने कल्याण चन्द का निमत्रण स्वीकार किया। अपने भाई के साथ कवि शिवानन्द वाराणसी से अल्मोडा पहुचे। कल्याण चन्द की दृष्टि समीचीन न देखकर कवि ने दरबार मे सर्वप्रथम अपनी इष्ट देवी ज्वालामुखी की स्तुति की। एक नि स्पृह अकिचन ब्राह्मण ने भरी सभा मे राजा को उसके पूर्व कृत्यो पर फटकारा। कर्तव्य तथा नीति का मार्ग बतलाया। मौल मत्रियो को पूर्व पदो पर प्रतिष्ठित करवाया। अपनी छीनी हुई भूमि भी माँगी। इसी सर्ग में कवि ने महाराज को उनके पूर्वजो की महत्ता का परिचय दिया। राजदरबार के उन विलक्षण एव प्रतिभाशाली विद्वानो का उल्लेख किया जो उस समय अराजकता के कारण विदेश चले गये थे। तब उन्होने बतलाया कि काल समान कराल अली मुहम्मद अपनी सेना सहित मध्य प्रदेश मे प्रविष्ट हो गया है। इस सर्ग मे कवि ने अली मुहम्मद के विरुद्ध कूर्माचलीय सेना के रण प्रयाण का ओजस्वी भाषा मे वर्णन किया है। महाराज कल्याण चन्द के नेतृत्व मे कूर्माचलीय वीर भीमताल की ओर बढे। बटोषर (बाडाखोडा) मे भयकर युद्ध हुआ। महाराज के सेनापति शिवदेव जोशी तथा उनकी अधीनता में लड़ने वाले सैकडो कूर्माचलीय वीरों के अद्भुत शौर्य का कवि ने ओजस्वी भाषा मे वर्णन किया है। स्वय कवि युद्ध से पूर्व गढ मुक्तेश्वर की ओर चले गये। वहाँ उस समय ससैन्य मुगल सम्राट मुहम्मद शाह डटे थे। कूर्माचलीय राजदूत के रूप मे कवि ने मुगल सम्राट, उनके वजीर कमरुद्दीन तथा अली मसूर खाँ (सफदर जग) अवध के नवाब से भेट की और उनकी सहानुभूति अपनी ओर कर ली। बाडाखोडा के युद्ध मे शिवदेव जोशी ने अली मुहम्मद के सेनापति नजीब खाँ (नजीबुद्दौल्ला) को बुरी तरह परास्त किया। स्वय अली मुहम्मद बनगढी की ओर बढा। वहाँ अवध के नवाब अली मसूर खाँ ने उसे पराजित कर बन्दी बना लिया। मुहम्मद शाह ने उसे देश से निर्वासित कर दिया। कवि शिवानन्द ने अपने मामा के पुत्र हरिराम पत द्वारा महाराज के पास सदेश भेजा। महाराज ने सेनापति शिवदेव जोशी के साथ मुगल सम्राट से गढ मुक्तेश्वर तथा विसौली में भेट की। मध्यदेश मे पूर्ण अधिकार प्राप्त किया। रण तथा राजनीति दोनों मे कूर्मांचलीय विजयी हुए। अन्तिम सर्ग मे कवि ने अल्मोडा मे विजयोत्सव का विशद वर्णन किया है महाराज कल्याण चन्द के स्वागत मे नगरी मे भव्य समारोह हुआ। उसका वर्णन इस सर्ग मे है। सभा मे महाराज ने सेनापति शिवदेव जोशी एव कवि शिव का यथेष्ट सम्मान किया। कल्याण चन्द के विभिन्न आमात्यो के गुण-दोष का वर्णन कवि ने किया है। अन्त मे कवि ने बतलाया कि शिवदेव जोशी सर्वश्रेष्ठ हैं। और उन्हें प्रधानामात्य बनाया जाय। इस प्रकार स्वदेश की रक्षा हुई। धर्म सस्कृति की रक्षा हुई। मनोरथ सिद्ध होने पर कूर्माचल के अमर कवि शिव पुन वाराणसी चले गये। सम्भवत वही उन्होने शिव सायुज्य पाया। । सप्तम सर्ग -- 10 कल्याणचन्द्रोदय कूर्मांचल के इतिहास में काव्य का महत्व - काव्य बाडाखोडा के युद्ध (1745) के बाद लिखा गया। 1624 से 1745 तक अर्थात 121 वर्ष का इतिहास इस काव्य मे वर्णित है। सत्रहवी एव अठारहवी सदी के कूर्माचल की झॉकी इसमे पूर्णत चित्रित है। सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक एव आर्थिक दशा की जानकारी प्राप्त होती है। राज्य व्यवस्था प्राचीन धर्म शास्त्रो पर आधारित थी, सामाजिक दाचा वर्णाश्रम धर्म पर आश्रित था। राजा को सर्वोपरि माना जाता था। उसे ईश्वरीय अश समझा जाता था। उससे यह अपेक्षा की जाती थी कि वह प्राचीन हिन्दू आदर्शों के आधार पर शासन करे एव समस्त प्रजा की रक्षा करे। बाज बहादुर चन्द ने अपने कुमार उद्योत चन्द से गगावली जाने से पूर्व कहा - "गोब्राह्मणाना त्राणार्थ स्रष्टा सृष्टास्म भूभुज ।" क० च०सर्ग 1 कुलीन तथा अभिजात्य वर्ग के लोग उच्च पदो पर नियुक्त किये जाते थे। बाज बहादुर चन्द ने इसका कारण स्वय इस प्रकार स्पष्ट किया है एतदर्थ कुलीनाना नृपा कुर्वन्ति सग्रहम् । आदि मध्यावसानेषु न ते यान्ति हि विक्रियाम् ।। क० च० सर्ग1 राजा के कर्तव्यो के बारे मे जब कल्याण चन्द ने कवि शिवानन्द पाण्डे से পুজা कथ कि करणीयमितो मया त्वमसि मौल इतीव हि पृच्छयते । इसके उत्तर मे कवि ने कहा नीतिरिविलासिनीव सतत राज्याङ्कणे नर्तकी, तिष्ठेत्कटकिनो व्रजतु विलय राज्यस्थितिर्जायताम्।। भूपादने मौलमत्री सुमत्री पूज्य पूज्यो मानितश्चैव मान्य दूतो दूतो लेखको लेखको वैद्यो वैद्यो व्युतक्रमे व्युतक्रमोऽस्ति।। सत्पडिताश्चैव नरेन्द्रदूता स्यु सूपकाराश्च चिकित्सकाश्च, शस्त्राधिकारेऽपि च कोशमध्ये तिष्ठन्तु चाप्ताश्च परीक्षिताश्च ।। मौला सुशीला सुभगा प्रियवदा नृपान्तिके सन्तु न चेतरे पुन सबधिनो यस्य भवन्ति ये च ते तेपा गृहेऽश्नन्तु सदैव पायसम्।। काणा कुरूपा कुकुलाश्च येऽन्ये तेभ्यो दयादान न यथोक्तमेव, सख्यावतो मूढजनस्य कि तु गजस्य तुच्छस्य शुनो न साम्यम् ।। - - इस प्रकार काव्य मे कई नीति तथा आदर्श की बाते हैं जिनसे राजा प्रेरणा लेते थे और राज-काज चलाते थे। राजा के मत्रीमण्डल मे प्रधानमत्री के अतिरिक्त सेनापति, शस्त्रागार अध्यक्ष, रणाधिकारी (बख्शी), कोषाध्यक्ष, राजगुरु, राजपुरोहित, राजदूत, लेखाधिकारी, देवभाषाधिकारी, सूपकार, चिकित्सक का भी स्थान था। सभी अधिकारियो की नियुक्ति मे 11 भूमिका बड़ी सावधानी बरती जाती थी। राजमहल मे कथा-पुराण सुनाने के लिए व्यासासन मे विद्वान पण्डित प्रतिष्ठित किये जाते थे। ज्योतिषी भी नियुक्त होते थे। स्थान-स्थान पर पदाधिकारियो एव विद्वान पण्डितो के नाम काव्य मे दिये गये है आर्थिक दशा सुधारने के लिए माल भाबर की ओर विशेष ध्यान दिया गया। इससे राज्य की शक्ति बढी। काव्य से पडौसी डोटी (नेपाल), गढवाल, रुहेलखण्ड, अवध एव मुगल राज्य से कूर्माचल के राजनीतिक सबधो पर पर्याप्त प्रकाश पडता है। कूर्मांचल की आतरिक दुरवस्था, षडयत्र, हत्याओ तथा विदेशी आक्रमण का कवि ने पूरा वर्णन किया है। स्वय कवि राज-सभा मे चालीस वर्ष रहे। अपने अनुभव, अपने पर बीती गाथा कवि ने विस्तार से कही है। ऑखो देखी घटनाओ का वर्णन किया है। तत्कालीन ऐतिहासिक तथ्यो को जानने के लिए यह काव्य अमूल्य निधि है। काव्य से ज्ञात होता है कि इस मध्यकालीन हिन्दू समाज मे देव भाषा सस्कृत का प्रचार था। गुणग्राही चन्दवशीय नरेशो ने दूर-दूर से विद्वानो को बुलाकर उन्हें सम्मानित पदो पर प्रतिष्ठित किया। सस्कृत के प्रचार के लिए एक विशेष अधिकारी आमात्य मडल मे नियुक्त किया था। इसे देव-भाषाधिकारी कहा जाता था। सस्कृत की उच्च शिक्षा के लिए योग्य छात्र राजकीय खर्चे पर काशी भेजे जाते थे। इसका प्रमाण बाजबहादुर चन्द के समकालीन काशी के मूर्धन्य महाराष्ट्रीय विद्वान अनत देव ने अपने धर्म ग्रन्थ स्मृति-कौस्तुभ मे दिया है। यह ग्रन्थ इस गुणग्राही राजा ने पडित अनन्तदेव से लिखवाया। काशी मे इनकी पूरी व्यवस्था कूर्माचलीय नरेश ने की। यह ग्रन्थ 1909 मे प्रकाशित हुआ। अपने आश्रयदाता बाजबहादुर चन्द (1638-78) के वश का परिचय इस महाराष्ट्रीय विद्वान ने पुस्तक के प्रथम 20 श्लोको मे दिया है। छठे श्लोक मे अनन्त देव ने लिखा है - ततस्त्रिमल्लचन्द्रोऽभूद् भूयो स्पोद्भटो भुवि । काशीस्थ विद्रादिभ्यो धनराशीनदात् सदा।। 150823 स्मृ० NA बाज बहादुर चन्द के बारे मे इसी महाराष्ट्रीय विद्वान् ने लिखा arekshita Library श्री बाजबहादुरचन्द्रनृपस्ततोऽभू च्चन्द्रान्वय स भुवि भूरियशोऽकरोद्य । सर्वावनिस्थ विदुषामवन प्रकुर्वन्योऽस्मिन् कलावपि शास्त्रम्।। स्म० कौ० ।। 8 ।। त्रिमलचन्द ने काशी मे रहने वाले विद्वानो को सदा धनराशि दी। बाजबहादुर चन्द ने विद्वानो की रक्षा करते हुए इस कलि काल मे सम्पूर्ण शास्त्रो की रक्षा की। गोदावरी तट पर जन्मे एक नाथ के पौत्र, आपदेव विद्वान् के पुत्र श्री अनन्त देव के ये उदगार कूर्माचल के चन्दवशीय नरेशो की विद्वत्ता, गुणग्राहकता के अकाट्य प्रमाण है। महाराज रुद्र चन्द देव (1567-1597) से कल्याण चन्द देव पचम (1730-48) तक कूर्माचल का स्वर्ण युग कौ० ।। Tibetan institute-Sarnat| ररक्ष समस्त 12 कल्याणचन्द्रोदय रहा। सस्कृत साहित्य की समृद्धि हुई। कूर्मांचल काव्य में इसका प्रचुर प्रमाण मिलता है। काव्य में कवि ने लगभग 18 विद्वानों की सूची दी है। लेखक ने 14/15 वशावलियों एव कई ताम्रपत्रो के आधार पर उनका सही पता लगाया है। मध्यकालीन हिन्दू राज्य की पूरी झाकी काव्य में मिलती है। गगा-यमुना के दोआब से, विशेषकर कान्यकुब्ज, प्रयाग, उन्नाव, फर्रुखाबाद आदि स्थानों से आये हुए ब्राह्मण तथा क्षत्रियों का दबदबा अधिक था। विजित जातियों ने कई बार विद्रोह किया और आर्य सस्कृति के व्यापक प्रभाव मे घुल-मिलकर एक हो गई। समन्वय का अनुपम उदाहरण कूर्मांचलीय इतिहास मे मिलता हैं। काव्य से ज्ञात होता है कि अर्थ व्यवस्था को सुदृढ करने में साहू, चौधरी, रत्तगलियो का विशेष हाथ था। राज दरबार के उच्च अधिकारियो मे चिन्ता चौधरी, गुजर देव, जीतमल आदि कई नामो का उल्लेख, तराई-भाबर की व्यवस्था में काशीनाथ, द्वारिकादास, श्री नाथ, जगन्नाथ, रमा पडित, विनायक एव रामभ्रद आदि के नाम मिलते हैं। कवि शिवानन्द ने ऐतिहासिक तथ्यो को यथा सम्भव निष्पक्ष रूप से रक्खा है। अत्याचार, अन्याय एवं अनाचार के सामने सर नही झुकाया। स्वय महाराज कल्याणचन्द को उनके अनुचित कार्यों पर फटकारा। चाटुकारिता उनमें नही थी। कवि मे देश-प्रेम तथा स्वाभिमान कूट-कूट कर भरा था। जीवन के चढाव-उतराव में उनका मानसिक सतुलन बना रहा। विदेशो में भटकना पड़ा। स्वास्थ्य गिर गया। अन्त में वाराणसी आ गये। कल्याण चन्द के निमत्रण मिलने पर स्हेला आक्रमण के समय अल्मोडा आये। राजा को सत्परामर्श दिया। उसका मनोबल बढाया। राजदूत बनकर मुगल सम्राट मुहम्मद शाह (1719-48) एव अवध के सूबेदार अली मसूर खा (सफदर जग 1739-56) की सहायता प्राप्त की। विजय प्राप्ति के बाद पुन वाराणसी चले गये। S128 वासुदेव पाण्डेय के पितामह प० चिन्तामणि पाण्डेय महाराज रुद्र चन्द देव के समकालीन थे। भीमताल में पाण्डे गाँव उनके पितामह वरदेव पाण्डे जी को दिया गया। चिन्तामणि पाण्डेय षट्शास्त्री थे। रुद्र चन्द के सभारत्न उनके पुत्र चक्रपाणि पाण्डेय भी रहे। उनके पुत्र वासुदेव पर कवि ने लिखा है तदा बटोषरस्थानमास्थितैर्भूपसमते । श्री चक्रपाणितनयै वासुदेवैरुदीरितम । श्रीमदिलीपचन्द्राय स्वस्ति कल्याणमस्त्वति। क० च० सर्ग 1/14, 15 वासुदेव दिलीप चन्द (1621-1624) के सभा रत्न थे। 2 चक्रपाणि के विषय में लिखा है विद्रद्वन्दे चक्रपाणिर्मनीषी, मान्यश्चासीत् मत्रिवर्गेषु मुख्य ।

भूमिका 13 3 दुष्टत्यागात् सज्जनाना च सगात् राज्य सम्यक् तस्य राज्ञो बभूव । क० च० सर्ग 1/6 वे रुद्र चन्द के सभा रत्न थे। ग्रामाष्टक श्रीनगराधिराजश्रीलुठनोत्तुगमहोत्सवेन । श्री बाजचन्द्रेण नृपेण दत्त श्री वामदेवाय सुनीतिक! ।। क० च० सर्ग 1/39 4 तत्स्पर तत्प्रभवो नृपाप्त श्री विश्वरूपोतिविशालबुद्धि । विख्यातकीर्ति स्वकुलावतसो यो मध्यदेशानयनाद्रभूव।। क० च० सर्ग 1/40 देखिये प० बद्रीदत्त पाण्डेय लिखित 'कुमाऊ का इतिहास 5 नृपमुकुटमणेर्बाजबहादुरस्यभक्त पूज्यो नितान्त कुलकमलरविर्विश्वरूपोऽभिधान । जातस्तस्यागजन्मा कविकुमुदशशी श्रीशिवानन्दशर्मा । ब्रह्मानन्दाग्रजन्मा तदनुशिवकवि तत्कृति सन्मदेस्यात्।। क० च० सर्ग7/75 6 तत्सूनु सुमति श्रीमान्देवद्विजपदार्चक । शिवानन्द इति ख्यात सर्वशास्त्रार्थपारग । राज्ञासम्मानितश्चासीत् पश्चाताप प्रकुर्वता। द्विजेन्द्राणा कवीन्द्राणा दातृणा च धुरि स्थित ।। क० च० सर्ग 2/69, 62 7 वामदेवान्वयेकश्चित कुलागारो गढ गत । नाम्नापमापतिर्दृषी विश्वरूपीयसतते।। क० च० सर्ग 2/69 8 देखिये हिमालयन गैजेटियर भाग 2 पृ0 583 " 9 " " " 584 10 11 इसकी सूचना प० जर्नादन पाण्डेय साहित्याचार्य ने दी। लेखक उनका ऋणी है।

परिचय ग्रंथकर्ता का परिचय ) प्रस्तुत 'कल्याण चन्द्रोदय काव्य के प्रणेता पण्डित शिवराम अथवा शिवानद पाण्डेय है। काव्य मे दोनो नाम कवि ने अपने लिये प्रयुक्त किये है। वे नैनीताल जिले में षष्ठीखाता (छखाता) परगने के अन्तर्गत वटोषर (बाडाखोरी) ग्राम के निवासी थे। वर्तमान भीमताल के पास वटोषर का ग्राम स्थित है। गाँव काश्यप गोत्रीय पाण्डे लोगो का है। इसी गाँव के पास से मध्य देश (माल भाबर) से चदो की राजधानी अल्मोडा को प्रधान मार्ग जाता था। इस मार्ग की चौकसी के लिये वटोपर मे चद राजाओ ने एक छोटे दुर्ग का निर्माण किया था। आज भी इस के अवशेष देखे जा सकते हैं। काठगोदाम से ऊपर भीमताल मार्ग मे भमौरी गाँव के ऊपर यह दुर्ग था। यह कूर्माचल का मुख्य प्रवेशद्वार था। इसी दुर्ग के पास 1745 ई० मे कूर्माचल नरेश कल्याण चद का रहिला सहर अली मुहम्मद खाँ से निर्णायक युद्ध हुआ। इस युद्ध मे कूर्माचल के अमर कवि प० शिवराम पाण्डेय ने प्रमुख भूमिका निभायी और अपने काव्य मे इस महत्वपूर्ण घटना का जीवन्त वर्णन किया है। पडित शिवराम पाण्डेय जी के पिता पण्डित विश्वरूप पाण्डेय जी थे। वे कूर्माचल के सबसे अधिक प्रतापी तथा यशस्वी महाराजाधिराज बाजबहादुर चद (1638-78 ई०) के गुरु तथा परामर्श दाता थे। महाराज ने उन्हे दौत्य पद पर नियुक्त किया था। श्री विश्वरूप जी के पिता श्री वामदेव जी को महाराज बाज बहादुर चद ने उनकी सेवा तथा विद्वत्ता से प्रभावित हो कर आठ गाँव दिये। काव्य के प्रथम सर्ग के 39वे श्लोक मे श्री शिवराम पाण्डेय ने लिखा है ग्रामाष्टक श्रीनगराधिराजश्रीलुठनोत्तुगमहोत्सवेन । श्री बाजचन्द्रेण नृपेण दत्त श्री वामदेवाय सुनीतिक:।। ये आठ गाँव श्रीनगर (गढवाल) की श्री लूटने के उपरान्त दिये गये। इन्ही वामदेव जी के पुत्र श्री विश्वरूप जी हुए। उनके बारे मे इसी प्रथम सर्ग के चालीसवें श्लोक मे कवि ने लिखा है - तत्स्पर तत्प्रभवो नृपाप्त श्री विश्वरूपोति विशालबुद्धि । विख्यातकीति स्वकुलावतसो यो मध्यदेशानयनाद्बभूव ।। श्री बाजघद्रो नृपति प्रसन्नो दातु यदा ग्रामगण प्रवृत्त । गृहीतमेतेन नृपाग्रहेण नृपाग्रहेण ग्रामत्रय लोभपराङ्मुखेन।। विश्वरूप जी की सेवाओ से महाराज बाज बहादुर चद इतना प्रसन्न हुए कि वे उन्हे कई गाँव देना चाहते थे किन्तु नि स्पृह ब्राह्मण ने महाराज के आग्रह से केवल तीन गाँव परिचय 15 - लिये। विश्वरूप जी का जीवन काल 1625 से 1690 ई. तक का काव्य के आधार पर अनुमानित है। वे बाजबहादुर चद तथा उसके पुत्र उद्योत चद के समय चद राज्य मे दूत पद पर नियुक्त थे। वे बड़े मेधावी तथा प्रतिभाशाली थे। लगभग 1664 ई० मे बाज बहादुर चद ने उन्हे अपना राजदूत बनाकर कुँवर पर्वत सिंह गुसाईं के साथ देहली में मुगल सम्राट औरगजेब के पास भेजा। अपनी विलक्षण बुद्धि से सम्राट् को प्रसन्न कर सारा मध्य देश (माल-भाबर) का प्रान्त अपने स्वामी के लिये प्राप्त किया। कठेडियों का आगे बढ़ना रोका। उन दिनो तराई-भाबर का प्रान्त मध्यदेश (मधेशिया) कहलाया जाता था। महाराज के आग्रह से विश्वरूप पाण्डेय जी ने सपूर्ण माल-भाबर को फिर से आबाद किया। रुद्रपुर, काशीपुर, बाजपुर के नगरो का निर्माण किया। इसका पूरा वर्णन कल्याण चद्रोदय के प्रथम सर्ग मे मिलता है। विश्वरूप जी ने बाज बहादुर चद के दो पौत्र कुमार ज्ञान चद तथा हरिचद की बढती हुई विरोधाग्नि को शान्त किया और कूर्माचल को गृह युद्ध से बचाया। उनके ज्येष्ठ पुत्र श्री शिवराम पाण्डे प्रस्तुत काव्य के प्रणेता है। कवि ने सप्तम सर्ग के अन्तिम श्लोक मे अपने बारे में इस प्रकार लिखा है नृपमुकुटमणेर्बाजबाहादुरस्य भक्त पूज्यो नितात कुलकमलरविर्विश्वरूपाभिधान । जातस्तस्यागजन्मा कविकुमुदशशी श्री शिवानद शर्मा ब्रह्मानदाग्रजन्मा तदनुशिव कवि तत्कृति सन्मुदेस्यात्।। विश्वरूप जी की मृत्यु महाराज उद्योत चद के समय लगभग 1690 ई० मे हुई। मृत्यु से पूर्व महाराज से मतभेद हो गया था। उन्होने दरबार जाना छोड़ दिया था। निरतर शिवार्चन मे लगे रहे और शिव सायुज्य प्राप्त किया। उनकी मृत्यु के उपरान्त महाराज उद्योतचद को बहुत पश्चाताप हुआ। उन्होने विश्वरूप जी के ज्येष्ठ पुत्र शिवानद जी को बुलाकर पूर्व पद पर प्रतिष्ठित किया। कवि ने द्वितीय सर्ग के ६१वे तथा ६वे श्लोक मे इस प्रकार लिखा है तत्सूनु सुमति श्रीमान्देवद्विजपदार्चक । शिवानद इति ख्यात सर्वशास्त्रार्थपारग ।। राज्ञा सम्मानितश्चासीत्पश्चाताप प्रकुर्वता। द्विजेन्द्राणा कवीन्द्राणा दातृणा च धुरि स्थित ।। कवि का जीवन काल काव्य के आधार पर १६७० ई० से १७४८ तक अनुमानित है। १६६० ई० से लगभग १७३० ई० तक श्री शिवानद पाण्डेय चालीस वर्ष तक चद दर्बार मे दौत्य पद पर बने रहे। उद्योत चद की मृत्यु के उपरान्त ज्ञानचन्द (१६६८-१७०८ ई० ) के समय भी कवि शिवानद का राज दर्बार मे यथेप्ट सम्मान हुआ और सरयू तट पर बागेश्वर के पास उनको भूमि प्रदान की गयी। काव्य के दूसरे सर्ग मे कवि ने ज्ञानचद के विषय मे लिखा है अज्ञानध्वातहता खलगणहृदयाम्भोजसकोचकर्ता कीर्ति र्योत्स्नाप्रसादोद्घटितजनमनव्यूहचचच्चकोर । - 16 कल्याणचन्द्रोदय नन्दु विष्ट, स्फूर्जन्रात्रौ दिने चाद्भुतरसजनको भूपतिर्ज्ञानचद्र साक्षात् सूर्योऽपि जात प्रदहनपर प्रौढशत्रूनप्रतापै ।।६७ ।। यो वागीश्वरसन्निधौहि जगता सद्भुभुक्तिमुक्तिप्रदे ख्याते श्रीशरयूतटे सुविधिना चन्द्रोपरागेददत् । भूभाग परिवारिभूसुरपतिशिवानन्दाय भूमीपति लक्ष्मीमार्दवबुद्धिवीर्यलसितश्चासीत् पुरा षट् समा ।।६।। इसी ज्ञानचद के समय श्री वामदेव के वशज किसी पद्मापति नामक व्यक्ति ने गढवाल जाकर गढवाल नरेश की शरण ली। इसके फलस्वरूप कवि शिवानद को दुखद परिणाम भोगने पड़े। उनकी सम्पत्ति ज्ञानचन्द ने छीन ली। माणिक विष्ट, गुणनिधि तथा रमानन्द जैसे लोगों का प्रभाव राज दर्बार में बढ़ने लगा। कवि ने लिखा है - वामदेवान्वयेकश्चित्कुलागारो गढ गत । नाम्नापदमापति देषी विश्वरूपीयसतते।।६।। तत्रैश्वर्य गढेशेन दत्त तस्मै दुरात्मने। अत्रत्याना तस्य दोषाज्जन्मभूरपि सहृता।।७।। महाराज जगत चन्द (१७०८-१७२०) ने अपने आमात्य वीरभद्र जोशी के परामर्श पर इन्हें पुन पूर्व पद पर प्रतिष्ठित किया। पर जगत चन्द्र की असामयिक मृत्यु से परिस्थिति बदल गयी। जगत चन्द के उत्तराधिकारी देवी चन्द की १७२६ ई० में कोटा भाबर के पास देवीपुर में निर्मम हत्या हुई। इसी तिथि से कूर्मांचल का विनाश प्रारभ हुआ। १७२६ में महाराज अजीत चद की हत्या अल्मोडा में हुई। अधेर गर्दी, अत्याचार तथा हत्या का क्रम चलता रहा। इन दस वर्षों के बीच कई प्रतिष्ठित विद्वान् स्वदेश छोड विदेश चले गये। शिवानद पाण्डेय की भी सम्पत्ति छिन गयी। अत्यन्त दुखी होकर वे सिरमोर (नाहन) नरेश विजय प्रकाश के राजदर्बार में गये। राजा ने इस विद्वान का यथेष्ट सम्मान किया। एक अशर्फी प्रति दिन इन्हें दर्बार से मिलती थी। कवि ने लिखा है स्वपूर्वजाना पदपद्मपकरजोणुमानादपि सूक्ष्ममान । जातोऽस्म्यह प्रत्यहमेकमुद्रार्पणेन सिर्मोरपतेरधीन ।। सिर्मोर से कवि शिवानद काशी गये। वहाँ उनका स्वास्थ्य गिर गया। बात व्याधा से इतने अशक्त हो गये कि तीन वर्ष तक चारपाई से उठ न सके। इस बीच इनके ज्येष्ठ पुत्र शिवदेव पाण्डेय ने पिता की महती सेवा की। रुग्णावस्था में भी उनका लेखन कार्य चलता रहा। पतित पावनी गगा की स्तुति में सुन्दर छद रचे गये। स्वास्थ्य सुधरा । इधर कूर्मांचल में भी राजनीतिक दशा सुधरी। महाराज कल्याणचद सिंहासनारूढ हुए (१७२६-१७४८ ई.)। महाराज बाजबहादुर चद के समकालीन कुलीन घरानो के आमात्यों तथा विद्वान व्यक्तियों की खोज होने लगी। उन्हें उनके पूर्व पदों पर प्रतिष्ठित किया जाने लगा। उनकी छीनी हुई सम्पत्ति वापस होने लगी। इसी बीच महाराज कल्याण चद का एक पत्र लेकर कवि शिव के अनुज ब्रहमानद काशी पहुँचे। उन्होने कवि को स्वदेश की घटनाओं की जानकारी दी। अली मुहम्मद के आक्रमण की सूचना दी। दी। कवि का स्वदेश प्रेम उमड़ पड़ा। - परिचय 17 महाराज के नियंत्रण को स्वीकार किया और स्वदेश लौटे। राजधानी अल्मोडा पहुँचे। भरे दर्बार में राजा को उसके पूर्व कृत्यो पर फटकारा। नीति की बाते बतलायी। पूर्ववर्ती राजाओं की नीति का अनुसरण करने का परामर्श दिया। रुहीला आक्रमण को विफल करने के लिये विचार विमर्श किया। युद्ध से पूर्व कवि शिवराम स्वय गढ़मुक्तेश्वर मुगल सम्राट मुहम्मद शाह से भेट करने गये। रुहीला सर्दार अली मुहम्मद की बढती शक्ति से मुगल सम्राट, उनके वजीर कमरुद्दीन तथ अवध के सूबेदार अली मसूर खाँ और कठेड के जमीदार भी सशक थे। विज्ञान तथा बुद्धिमान शिवानद ने तुरत मुगल सम्राट् से बिसौली तथा गढमुक्तेश्वर मे भेट की। मुगल सम्राट को अली मुहम्मद के अत्याचारों से अवगत कराया। इधर बाराखोडी (भमौरी) के पास झिजाड़ के शिवदेव जोशी तथा हरीराम जोशी के नेतृत्व में कूर्मांचलीय सेना ने अल्मोडा की ओर बढती रुहीला सेना को बुरी तरह पराजित किया। ठीक इसी विजय के समय शिवानद पाण्डे के भेजे हुए उनके मामा के पुत्र हरिराम पत गढमुक्तेश्वर से आये। उन्होने बाराखोडी (भीमताल) के पास महाराज कल्याण चद से भेट की और राजदूत शिवानद पाण्डे का सदेश दिया। सदेश था कि महाराज तुरत मुगल सम्राट से भेट करे। महाराज कल्याण चद अपने सेनापति शिवदेव जोशी के साथ बिसौली पहुँचे। मुगल सम्राट् से मिले। फिर दो बार गढ मुक्तेश्वर में भेंट की। इधर मुगल सम्राट की आज्ञा से अवध के सूबेदार अली मसूर खाँ ने बनगढी के पास अली मुहम्मद को पूर्ण रूप से पराजित किया और बदी बना लिया। इस प्रकार सकट के बादल टले। महाराज कल्याण चद का पूर्ण अधिकार माल-भाबर के प्रान्त पर हो गया। कूर्माचल की स्वतत्रता अक्षुण्ण रही। विजयोत्सव राजधानी अल्मोडे मे बड़ी धूम से मनाया गया। महाराज कल्याण चद ने कूर्मांचलीय वीरों का, विशेष कर सेनापति शिवदेव तथा कवि शिव का, यथेष्ट सम्मान किया। स्वय कवि ने लिखा है कुलेन शीलेन समौ शिवौ द्वौ मौलौ नृपाप्तौ च तथापि चित्रम्। एक शिवो राजति पूर्णचद्रो विद्वान् द्वितीय किमपीह दृश्य ।। (क० च० सप्तम सर्ग६१) इसी दर्बार मे शिवदेव जोशी को प्रधान मत्री बनाया गया। यह नियुक्ति भी कवि शिव के सत्परामार्श से हुई। इस प्रकार मनोरथ सिद्ध होने पर कवि ने पुन वाराणसी जाने की इच्छा प्रकट की वृद्ध शिवो गच्छतु धूर्जटेस्ता वाराणसीप्राप्तमनोरथश्री शूर क्षमी मत्रविदा वरिष्ठो ज्योतिर्विदग्रेशिवदेवक स्यात्।। (क० च० सप्तम८६) शिवानद पाण्डे पुन वाराणसी गये। वही इस काव्य को पूर्ण कर शिवसायुज्य प्राप्त - किया। कूर्माचलीय काव्य तथा उसके प्रत्येक सर्ग का सक्षिप्त विवरण चतुर्थ सर्ग के अन्त मे कवि ने लिखा है 18 कल्याणचन्द्रोदय - दवहासमिद काव्य चतु सर्गान्तमादित । तत कल्याणचद्रस्योदयो भाति महीतले।। ( दवहसन समाप्तम् ) (क० च० चतुर्थसर्ग के अन्त मे) पहले चार सर्गों को दवहास काव्य कहा गया है। यह काल कूर्मांचल के विनाश अवनति तथा अवसान का है। इसके उपरात कल्याण चद्र का उदय हुआ और हास समाप्त हुआ। इस प्रकार काव्य सात सर्गों में विभक्त है। कुल श्लोक सख्या ५०७ है। प्रसिद्ध अलकारशास्त्री मम्मट ने काव्य की परिभाषा इस प्रकार की है सकलप्रयोजनमौलिभूत समनन्तरमेव रसास्वादनसमुद्भूत विगलितवेद्यान्तरमानन्द प्रभुसमितशब्दप्रधानवेदादिशास्त्रेभ्य सुहृत्समितार्थतात्पर्यवत् पुराणादितिहासेदभूश्च शब्दार्थयो गुणभावेन रसागभूतव्यापारप्रवणतया विलक्षण यत्काव्य लोकोत्तरवर्णनानिपुणकविकर्म ।। जगन्नाथ पण्डित ने कहा है - रमणीयार्थप्रतिपादक शब्द काव्यम्। विद्यानाथ ने काव्य के विषय मे लिखा है वाक्य रसात्मक काव्यम्। साराश यह है कि जीवन के चढाव-उतराव, उत्थान-पतन, सुख-दुख, मिलन-विछोह, शयन-जागरण, अवसान-उदय मे जो उच्च विचार, अनुभूति, उत्साह-उमग, निराशा-आशा आदि भावो का उद्रेक कवि हृदय में उमडता है उसी की सुन्दर, सरस शब्दो में अभिव्यक्ति काव्य है। काव्यो का प्रणयन अलकार शास्त्र के नियमो के अनुसार होता है। साहित्यदर्पणकार विश्वनाथ ने निम्न लिखित बातो का किसी महाकाव्य मे समाविष्ट होना आवश्वकीय बतलाया है सर्गबधो महाकाव्य तत्रैको नायक सुर । सदशक्षत्रियो वापि धीरोदात्तगुणान्वित । एकवशभवाभूपा कुलजा बहवोपि वा। शृगारवीरशान्तानामेकोऽडी रस इष्यते।। अगानि सर्वेपि रसा सर्वे नाटकसधय । इतिहासोद्भव वृप्समन्यदा सज्जनाश्रयम् ।। चत्वारस्तस्य वर्गा स्युस्तेप्वेक च फल भवेत्। आदौनम क्रियाशीर्वा वस्तुनिर्देश एव वा।। क्वचिन्निन्दाखलादीना सता च गुणकीर्तनम् । एकवृत्तमयै पद्यैरवसाने ऽन्यवृत्तकै ।। नातिस्वल्पा नातिदा सर्गा अष्टाधिका इह। नानावृत्तमय क्वापि सर्ग कश्चन दृश्यते।। सर्गान्ते भाविसर्गस्य कथाया सूचन भवेत् । सन्ध्यासूर्येन्दुरजनीप्रदोषध्वान्तवासरा ।। प्रातमध्याह्मृगयाशैलर्तुवनसागरा । सम्भोगविप्रलम्भौ च मुनिस्वर्गपुराध्वरा ।। - परिचय 19 रणप्रयाणोपयममत्रपुत्रोदयादय । वर्णनीया यथायोग सागोपागा अमी इह ।। कवेव॒तस्य वा नाम्ना नायकस्येतरस्य वा। नामास्य सर्गोपादेय कथया सर्ग नाम तु।। काव्य के ये लक्षण कल्याण चद्रोदय काव्य मे पूर्णत घटित होते हैं। यह काव्य भी सर्ग बध है। इसके नायक कूर्मांचल नरेश कल्याणचन्द्र है। महाभारत के आदि पर्व मे मनु की कन्या तथा इक्ष्वाकु की भगिनी इला का वृत्तान्त है। बुध तथा इला का पुत्र पुरुरवा हुआ। यही पुरुखा समस्त भारत के चद्रवशीय क्षत्रियों का पूर्वज था। इसकी राजधानी प्रयाग के पास प्रतिष्ठानपुर मे बतलायी गयी है। सातवी शताब्दी के लगभग भागीरथी नदी के दक्षिण प्रान्तवर्ती कान्यकुब्ज प्रदेश मे पुरुखा के वशज चद्रवशी राजाओ का राज्य था। ये सुप्रसिद्ध नृपतिचक्रचूड़ामणि महाराज शालिवाहन के वशज थे। इन्ही के नाम से शाका प्रसिद्ध है। ७00 से ७३० ई० तक इस कान्यकुब्ज प्रदेश मे इतिहास प्रसिद्ध यशोवर्मा का राज्य था। इन्ही की सभा को मालती माधव, महावीर चरित्र और उत्तर रामचरित्र के प्रणेता श्रीकण्ठपदलाछन पदवाक्यप्रमाणशचरणगुरुकपक्तिपावन सोमपीथी वाजपेययाजी काश्यपमहाकवि भवभूति ने अलकृत किया था। यशोवर्मा को प्रतिष्ठानेश या नरेन्द्रयश सोम भी कहते थे। इनके चार पुत्र हुए। उनमे से एक का नाम सोमचन्द्र था। ये शाके ६०७ में बदरीनाथ यात्रा के लिये सप्तागसहित कूर्माचल आये। सोमचन्द्र का विवाह कार्तिकेयपुर (कत्यूर) के राजा वैचलदेव की पुत्री से हुआ। काली कुमाऊ (कूर्मांचल का पूर्वी अचल) मे उसे १५ वीसी जमीन तथा मढो की माल (मध्यदेश-भाबर का प्रान्त) दहेज मे मिली थी। यही काली कुमाऊ मे चम्पकावती नामक स्थान मे (वर्तमान चम्पावत) सुदृढ़ दुर्ग बना कर सोमचद्र ने अपने राज्य की स्थापना की। कालान्तर मे सोमचद्र के वशजो ने कार्तवीर्यपुर (कत्यूर) के शासको की शक्ति क्षीण होने पर अपने राज्य का विस्तार किया। इनके राज्य की सीमा पूर्व मे काली नदी, पश्चिम मे रामगगा, उत्तर मे हिमालय तथा दक्षिण मे काशीपुर, मुरादाबाद, पीलीभीत तक थी। इसी सोमचद्र की छपनवी पीढी मे इस काव्य के नायक कल्याण चद १७२८ में कूर्मांचल के शासक बने। काव्य का नायक सद्भश क्षत्रिय है। सोमचद्र के विषय मे दो प्रमाण मिले है। राजा जगत चद्र (१७०८-१७२० ई०) के समय हरिहराचार्य जी के वशज श्रीमन्महामहोपाध्याय सीमाल्टीयोपनामक श्री भगीरथ पाण्डेय के पुत्र श्री पद्मदेव जी ने जगच्चन्द्रिका नामक रघुवश की टीका लिखी। अपने वश का परिचय देते हुए पद्मदेव जी ने लिखा है पार्थक्यान्मुखराधातुश्चचला शाईि णो वधू । विमृश्यैव देवदेवो ह्योमो जयतेतराम्।। स्वस्ति श्रीमनमहाराधिराज शालिवाहन । योऽधुना शाककृत्तस्य कुले भूपत्यजायत।। नरेन्द्रयश सोमाख्यश्चत्वारस्तत्सुता बभु । - 20 कल्याणचन्द्रोदय - श्रीबदरीशयात्राया सो मेन्दु कौऱ्यामागत ।। सप्तागसहितो विदरीहरपुरोधसा। इसी सीमाल्टीय वश को दिये हुए ताम्रपत्र मे निम्न लिखित श्लोक मिलता हे श्रीबदरीशयात्रायै शालिवाहनवशज । आगत सोमचद्राख्य प्रतिष्ठानेशदारक । सप्तागसहितो विन्दरीहरपुरोधसा। यो लब्धवान् नृपात् सूर्यवशोत्थादर्जुनात्मजाम्।। विवाहे कमठाद्रि च शाकेऽद्यभ्राड (६०७) सके। निर्ममौ सुदृढ दुर्ग नगरी चम्पकावतीम्। चतुर्वीश्थ्यात्मक देश वालीशादि सुरान्विताम्।। ताम्रपत्र बाज बहादुर चद (१६३८-७८ ई० ) के समय का है। काव्य के नायक महागज कल्याण चद कुलीन क्षत्रिय है। वे वीर, उदार, धर्मनिष्ठ, गो ब्राह्मण पालक है। धीरोदात्त गुणो से युक्त है। काव्य मे उनसे पहले आठ पूर्वजो का वर्णन है। महाराज विजयचद (१६२४-२५) से लेकर महाराज अजीत चद (१७२६-२६) तक प्रमुख घटनाओ का वर्णन है। विशेष वर्णन महाराज बाज बहादुर चद (१६३८-७८ ) के समय का किया गया है। काव्य मे नौ चन्द्र वशीय शासको का वर्णन है। वीर रस प्रधान रस है। घटनाये तत्कालीन इतिहास से सबद्ध हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, जीवन के इन चारो वर्ग तथा उद्देश्य का समावेश है। काव्य का आरभ कवि की आराध्या इष्ट देवी की स्तुति से है। सर्वत्र कवि की यही भावना रही कि “शिवा शिव कुर्यात्" । प्रत्येक सर्ग मे एक वृत्त मे श्लोको की रचना है परन्तु सर्ग के अन्त मे अन्य वृत्तो का प्रयोग किया है। एक सर्ग की रचना नाना प्रकार के वृत्तो मे की गयी है। सर्ग के अन्त मे अगले सर्ग की कथा की सूचना है। दुष्ट तथा अत्याचारी व्यक्तियो की खुल कर निन्दा की है। साथ ही सज्जन, उदार व्यक्तिया की प्रशसा है। सर्ग न तो बहुत छोटे न बहुत दीर्घ हैं। आक्रमणकारी अली मुहम्मद खाँ क विरुद्ध कूर्माचलीय रणबॉकुरो के प्रयाण का जीवन्त वर्णन है। उनके शार्य तथा उनक सेनापति शिवदेव जोशी की स्वामिभक्ति, अप्रतिम वीरता, अडिग देशभक्ति का विशद वर्णन है। अल्मोडा, काशीपुर, रुद्रपुर तथा काशी का सुन्दर वर्णन किया गया है। काव्य का नाम 'कूर्माचलीय काव्य' है। इसके अन्तर्गत कल्याण चन्द्रोदय' नाम आता है। इस प्रकार काव्य न तो कवि के नाम पर, न कथा वस्तु के नाम पर, न किसी विशेष नायक के नाम पर, अपितु सम्पूर्ण कूर्माचल के नाम पर है। इस प्रकार महाकाव्य के सभी नियमो को ध्यान म रखकर कवि ने कूर्माचलीय काव्य की रचना की है। जिस ऐतिहासिक घटना रुहीला आक्रमण का कवि शिवानद ने अपने काव्य मे सविस्तार वर्णन किया है वह है रुहेल खड के अफगान शासक अली मुहम्मद का कूर्माचल पर आक्रमण । यह वही अलीमुहम्मद था जिसके बारे मे निम्न लिखित दोहा कूर्माचल तथा स्हेल खड मे प्रसिद्ध है परिचय 21 के बाद वैसे से ऐसी करी, देखो प्रभु के ठाठ। ऑवले को राजा भयो, बॉकोली को जाट।। अली मुहम्मद को रुहेला सर्दार दाउद खाँ ने गोद लिया था। दाऊद खाँ की मृत्यु वह रुहेल खड का शासक बना। बदायूँ से हटाकर उसने अपनी राजधानी बरेली के पास ऑवले मे बनायी। मुगल साम्राज्य के पतन काल मे अठारहवी सदी के पूर्वार्ध मे पेशावर के पास से युसुफजई जाति के अफगान गगा के उत्तरी भाग मे बस गये। यह भाग पहले कठेड कहलाया जाता था। गगा के उत्तरी तट से कूर्माचल-गढवाल के पहाडो के नीचे तक यह भूभाग फैला हुआ था। रुहेला अफगानो की शक्ति का प्रसार होने पर यह भूभाग रुहेलखड नाम से प्रसिद्ध हुआ। दाऊद खाँ के नेतृत्व मे इन्होने धीरे-धीरे शक्ति बढा ली। पहली बार कूर्माचल के राजा देवी चद के समय रुहीला अफगानो का सम्पर्क कूर्माचल से हुआ। तारीखे हिन्दी मे रुस्तम अली ने इस घटना का उल्लेख किया है। शबीर शाह नामक किसी व्यक्ति ने मुगल सम्राट के विरुद्ध कुमाऊ के राजा देवीचद से सहायता मांगी। रुहीला सर्दार दाऊद खाँ ने देवी चद को मुगल सम्राट के विरुद्ध इस अभियान मे पूर्ण सहायता का वचन दिया। सम्राट की सेना का सामना करने कूर्माचलीय सेना तथा रुहीला सेना नगीना के पास एकत्रित हुई। मुहम्मदशाह के आदेश से मुरादाबाद सभल के सूबेदार शेख अजमत उल्ला खाँ ने शबीर शाह, देवीचद तथा दाऊद खाँ की सम्मिलित सेनाओ का सामना किया। युद्ध से पूर्व एक बडी धन राशि देकर शेख अजमत उल्लाखाँ ने दाऊद तथा उसके चालीस हजार रुहेलो को अपनी ओर मिला लिया। राजा अकेले रह गये। कूर्माचलीय सेना पराजित हुई। राजा किसी तरह अपनी जान बचा कर ठाकुरद्वारा आ गये। दाऊद खाँ ने राजा को बदी बनाने की चेष्टा की। पर उसका यह प्रयास निष्फल हुआ। उसने देवीचद से सेना का व्यय मॉगा। धन राशि देने के लिये राजा ने दाऊद को ठाकुरद्वारा बुलाया। जब दाऊद खॉ ठाकुरद्वारा पहुंचे राजा के सैनिको ने उन्हे बदी बना लिया और उनकी हत्या कर दी। विश्वासघात का बदला विश्वासघात से लिया गया। दाऊद खाँ के उत्तराधिकारी अली मुहम्मद इस हत्या को भूले नही थे। उनकी नीति थी कि कूर्माचल को रुहीला राज्य मे मिला लिया जाय और इस पार्वत्य प्रदेश को रुहीला उपनिवेश बना लिया जाय। इसके दो कारण और भी थे। पूर्व की ओर अवध के सूबेदार अली मसूर खाँ (सफदर जग) उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ रहे थे। सर्बना बिल्हारी तक उनकी सेनाये बढ गयी थी। रुहीला शक्ति का टकराव अवध से हो गया। आये दिन सीमा पर झडपे होती रहती थी। दूसरी ओर मुगल सम्राट मुहम्मदशाह भी अली मुहम्मद की शक्ति वृद्धि से सशकित थे। सम्राट स्वय सेना लेकर गढमुक्तेश्वर तथा सभल तक बढ गये थे। इन दो सबल शक्तियो के बीच रुहेल खड के शासक अली मुहम्मद को अपने पिस जाने की आशका थी। इसीलिये उसकी लोलुप दृष्टि कूर्माचल के पार्वत्य प्रदेश पर पड़ी। समय कुसमय पर रुहीला लोग अपनी रक्षा इस दुर्गम पार्वत्य प्रदेश मे कर सकते थे। अवसर भी अच्छा मिल गया। १७२६ मे कूर्माचल मे देवीचद की हत्या हुई। तीन साल बाद ही उनके उत्तराधिकारी अजीत चद की हत्या हुई। कल्याणचद गद्दी पर बैठे।

22 कल्याणचन्द्रोदय उनके समय मे भी हत्याओ का क्रम चलता रहा। अपनी शक्ति को सुदृढ सुरक्षित करने के लिये उन्होने चद वशी रौतेला लोगो का वध किया। तथा उनके समर्थक ब्राहमणो को अधा कर दिया। इन चद वशी राज कुमारो मे एक हिम्मत सिह गुसॉई थे। उन्होने सैनिक शक्ति द्वारा कल्याण चद का विरोध किया। पहाडी प्रदेश मे पराजित होने पर उन्होने काशीपुर मे कल्याण चद से अन्तिम युद्ध किया। युद्ध मे पराजित हुए और भाग कर अली मुहम्मद की शरण मे चले गये। पर कल्याण चद ने अपने गुप्तचर भेजकर ऑवले मे ही सपरिवार हिम्मत सिह गुसॉई की हत्या करवा दी। इस पर अली मुहम्मद खाँ क्रुद्ध हुआ। उसने १७४४ ई० मे कूर्माचल पर आक्रमण कर दिया। कुमाऊ की इस आन्तरिक दुर्व्यवस्था का वर्णन काव्य मे यत्र तत्र मिलता है। इसी दुरव्यवस्था का लाभ उठाया विदेशियो ने। चदो के एक हजार वर्ष से भी अधिक शासन काल मे अभी तक इतना गम्भीर आक्रमण राज्य पर नही हुआ था। छोटे मोटे युद्ध समय समय पर होते रहे। पर यह पहाडी प्रदेश के बाहर माल-भाबर मे हुए। पहली बार रुहीला सेनाये पहाडी भाग मे भीतर घुस आयी। रुहीला सेना की गतिविधि की पूरी जानकारी काशीपुर के कूर्माचलीय अधिकारी रामदत्त ने तथा रुद्रपुर के अधिकारी शिवदेव जोशी ने समय पर अल्मोडा कल्याण चद के पास भेज दी। इन दोनो योग्य अधिकारियो ने सैन्य सग्रह तथा दुर्गों की मरम्मत के लिये महाराज से आर्थिक सहायता मागी। पर महाराज के सलाहकारो ने सुझाया कि शिवदेव व्यक्तिगत खर्च के लिये धन की मांग कर रहा है। अत उसे धन नहीं देना चाहिये। वैसे भी रुहेले दुर्गम पार्वत्य प्रदेश मे घुस नही सकते। ऐसा परामर्श मिलने पर कृपण कल्याण चद ने धन नही दिया। शिवदेव न तो उचित रूप से सैन्य सग्रह कर सके न दुर्गों की मरम्मत। दस हजार रुहेले सैनिक ऑवले से रुद्रपुर की ओर बढे। रुद्रपुर मे शिवदेव ने रुहीला सेना का मुकाबिला किया। पर पर्याप्त साधन के अभाव मे कूर्माचलीय सेना पराजित हुई। शिवदेव बची खुची सेना लेकर भीमताल के पास बाडाखोरी (वटोषर) के दुर्ग मे आ गये। यह कूर्माचल का मुख्य द्वार था। भमौरी दर्रे की रक्षा करना आवश्यकीय था। रुहीला सेना हाफिज रहमत खाँ, पैंदा खाँ तथा बख्शी सर्दार खाँ के नेतृत्व मे कुमाऊनी सेना का पीछा करती हुई भीमताल के पास विजैपुर तक आ गयी। अब कल्याण चद की आँखे खुली। एक छोटी सेना शिवदेव की सहायता के लिये अल्मोडा से भेजी गयी। बिजैपुर मे फिर रुहीला सेना से मुकाबिला हुआ। कूर्माचलीय सेना फिर पराजित हुई। बाडाखोडी का दुर्ग हाफिज रहमत खाँ के हाथ आ गया। वृद्ध बख्शी सर्दार खाँ को दुर्ग का भार सौप कर रहीला सेनापति हाफिज रहमत खाँ राजधानी अल्मोडा की ओर रामगढ तथा प्यूडा होते हुए बढे। राजधानी पर रुहीला सेना का अधिकार हो गया। कल्याण चद सपरिवार भाग कर लोहाबा के पास गैरसेन चले गये। पहली बार दुर्गम पार्वत्य प्रदेश मे यवन सेनाये प्रविष्ट हुई। कूर्माचल का अस्तित्व सकटापन्न हो गया। धर्म, सस्कृति, सहस्रो वर्ष की पूर्वजो की परम्परा खतरे मे पड गयी। सात महीने रुहीला सेना अल्मोडा मे रही। खुली लूट हुई, देवालय भ्रष्ट हुए, कला की परिचय 23 अप्रतिम मूर्तियाँ टूटी, पुस्तकालय जले, प्राचीन पाण्डुलिपियाँ नष्ट हुई। कोसी-गगास की उर्वरा घाटियाँ रौदी गयी। इस बीच स्वय अली मुहम्मद अल्मोडा आये। सैनिको को उपहार दिये गये। पर सैनिक यहाँ की जलवायु से घबडा कर वापस जाने को उतवाले थे। रुहीला सेना की बेचैनी का विशेष कारण था जनता का पग पग पर विरोध। कूर्माचलीय नरेश पराजित हुए थे। पर कूर्मांचलीय जनता ने गाँव-गाँव मे रुहीलो का विरोध किया इस जन जागरण के नेता थे झिजाड के शिवदेव जोशी। इस व्यक्ति का साहस अप्रतिम था। दो बार रुहेलो से पराजित होने पर भी वह सर्बना मे थोडी मात्रा मे सैन्य सग्रह कर कूर्मांचल मे प्रविष्ट हो गया था। उसने गगास की घाटी मे कैडेरौ मे फिर रुहीला सेना का मुकाबिला किया। पर पराजित होने पर वह महाराज कल्याण चद के पास गैरसेन चला गया। रुहीला सेना द्वाराहाट की ओर बढी। कल्याण चद की सहायता के लिये गढवाल नरेश प्रदीप्त शाह सेना सहित द्वाराहाट आये। पर रुहीला सेनापति हाफिज रहमत खाँ ने गढवाल तथा कूर्माचल की सम्मिलित सेना को द्वाराहाट के पास हरा दिया। विजयी होने पर भी रुहेले वापस ऑवला जाने को उतावले थे। एक तो जलवायु कष्ट कर दूसरा उससे भी कप्टतर जनता का विरोध । गढवाल नरेश के बीच बचाव करने पर तीन लाख रुपया लेकर रूहीला सेना वापस रुहेलखड चली गयी। हाफिज रहमत खॉ की जीवनी मे सधि की दो शर्तो का और उल्लेख है। एक तो कूर्माचल राज्य साठ हजार रुपया वार्षिक रुहेलो को खिराज दे तथा कल्याण चद के स्थान पर किसी अन्य चद वशीय राजकुमार को गद्दी पर बिठाये। पर इन दोनो शर्तो की कूर्माचलीय जनता ने उपेक्षा की। कल्याण चद फिर अल्मोडे आये। टूटे दुर्ग फिर उठ खडे हुए। सेना फिर सगठित की गयी। राज्य व्यवस्था सुदृढ की गयी। प्राचीन आभिजात्य मौल मत्रियो को नियुक्त किया गया। अभी पुराने घाव भरे नही थे कि १७४५ के चैत्र के महीने मे फिर रुहेला सेनाये कूर्माचल की ओर बढ़ने लगी। इस बार पूर्व मे टनकपुर के पास तिमली के दर्रे से, कोटादून के पास कोटा से तथा भमौरी काठगोदाम के पास बाडाखोरी से रुहीला सेनाये कूर्माचल मे प्रविष्ट होने लगी। केवल तीन महीने के अन्दर यह दूसरा आक्रमण हुआ। कारण था अली मुहम्मद का रोष। उसकी सुनिश्चित नीति थी कि कूर्माचल पर स्थायी रूप से अधिकार कर लिया जाय। जब हाफिज रहमत खाँ वापस लौटे वह उनसे अप्रसन्न हो गया। उनको पदच्युत कर नजीब खाँ को नियुक्त किया गया। यह वही नजीब खाँ है जो बाद मे नजीबउद्दौला के नाम से इतिहास मे प्रसिद्ध हुए और उन्होने पानीपत के तृतीय युद्ध मे प्रमुख भूमिका निभायी। इस बार स्पष्ट आदेश थे कि कूर्माचल पर स्थायी अधिकार कर लिया जाय। कूर्माचल का पार्वत्य प्रदेश आर्थिक रूप से सुसपन्न नही था। आय का बड़ा स्रोत माल-भाबर (मध्य देश) से था। यह भाग रुहीलो के अधिकार मे आ गया था। उस समय कूर्माचल की जन सख्या मुश्किल से चार-पाँच लाख के लगभग होगी। अधिकाश भाग जनता मे उन लोगो का था जो दसवी ग्यारहवी सदी मे गगा यमुना के दोआब से अपने धर्म, 24 कल्याणचन्द्रोदय अपनी सस्कृति की सुरक्षा हेतु यहाँ बस गये थे। लगभग एक हजार से भी अधिक वर्ष की स्वतत्रता सकट मे पड गयी। आय का प्रधान स्रोत माल-भाबर छिन गया। धर्म, सस्कृति अपितु सम्पूर्ण जीवन नाश के कगार पर है। इससे अधिक विपत्ति और क्या हो सकती है ? सम्पूर्ण कूर्माचलीय समाज उत्तेजित हो उठा। जनता का यह जीवन-मरण का प्रश्न था। इसी लिये कवि शिवराम ने इस दूसरे युद्ध का विशद वर्णन अपने काव्य मे किया है और कूर्माचलीय वीरो के बलिदान तथा शौर्य की गाथा गायी है। १७४५ का यह दूसरा युद्ध कूर्माचलीय जनता के लिये महत्वपूर्ण था। चारो वर्ण के लोग इस युद्ध मे लडे और अपने देश के लिये मर मिटे। उनकी दृढ़ता के सामने अली मुहम्मद के स्वप्न नष्ट हो गये। माल-भाबर फिर कूर्माचलीयो के हाथ आ गया। इस युद्ध मे प्रमुख भूमिका निभायी सेनापति शिवदेव तथा कूर्माचल के अमर कवि शिवराम ने। फाल्गुन के महीने शाका १६६७ मे होलियो के बाद महाराज कल्याण चद के नेतृत्व मे कूर्माचलीय वीरो ने कूर्माचल के मुख्य प्रवेशद्वार वटोषर (बाडाखेडी) के निकट नजीब खाँ की सेना से लोहा लिया। युद्ध से पूर्व स्वय कवि शिव मुगल सम्राट मुहम्मद से भेट करने गढमुक्तेश्वर की ओर चले गये। इस समय रुहीला शक्ति चरम सीमा पर पहुंच चुकी थी। कठेड के बाइस कठेडी राजा भी ठाकुरद्वारा के राजा के नेतृत्व मे गढमुक्तेश्वर पहुँच चुके थे। मुगल सम्राट तथा अली मसूर खाँ (सफदर जग) भी रुहीलो की बढती शक्ति से चिन्तित थे। समीचीन अवसर था मुगल सम्राट से सहायता प्राप्त करने का। इसी लिये कूर्माचल के राजदूत वृद्ध शिवराम पाण्डे भी गढमुक्तेश्वर पहुंचे। उनके वहाँ पहुँचने के पूर्व ही कूर्मांचलीय सेना ने बढती हुई रुहीला सेना को भीमताल के पास वटोषर के दुर्ग के पास पूर्णत पराजित कर दिया। सेनापति शिवदेव जोशी ने अपने ही समान चुने हुए वीरो को लेकर वटोषर का दुर्ग ले लिया। दुर्ग से रुहेले सैनिकों को पीछे खदेड दिया। इसके बाद मैदानी भाग से बढती हुई नजीब खाँ की सेना पर विकट वेग से आक्रमण किया। भयकर युद्ध हुआ। कूर्माचलीयो के लिये तो यह युद्ध जीवन मरण का प्रश्न था। शिवदेव तथा उसके वीरो के अप्रतिम साहस, अडिग शौर्य, दृढ मनोबल तथा अपूर्व बलिदान से विजय श्री कूर्माचलीयो को मिली। जिन वीरो ने इस युद्ध मे अपूर्व शौर्य दिखलाया उनके नाम काव्य मे इस प्रकार दिये है - झिजाड के हरीराम जोशी, जयकृष्ण जोशी, दन्या के वीरभद्र के पुत्र शिवदेव जोशी, गल्ली के शिरोमणि जोशी के पौत्र लक्ष्मीपति जोशी, राजकुमार लक्ष्मी सिंह, शस्त्रागार के अध्यक्ष चद्रि सिंह, रणजीत सिह, केसरी सिंह, पदम सिंह, तेज सिह, गज सिह, हिम्मत सिह, वीरबल सिह, नाहन (सिर्मोर) का प्रसिद्ध योद्धा धर्म , नाहर सिह, श्याम सिह, कृष्ण सिह, नरी, जिउण तथा सुरतानक। इस युद्ध मे धर्मु तथा श्यामसिह का अमानवीय शौर्य तथा अपूर्व बलिदान का सुन्दर वर्णन किया है। बीरबल, जयकृष्ण, कृष्णसिंह तथा नाहर सिंह ने अपने पराक्रम से शत्रु के छक्के छुडा दिये। युद्ध मे विजय हुई। टनकपुर तथा कोटा से बढती हुई रुहेला सेनाये भी वापस लौटी। कल्याण चद का अधिकार माल-भाबर पर भी हो गया। अली मुहम्मद को वनगढी के युद्ध मे अवध के दूसरे नवाब अली मसूर खाँ (सफदरजग) ने पराजित किया। - परिचय 25 वह बदी हुआ। मुगल सम्राट ने उसे देश से निर्वासित कर दिया। इस युद्ध के बाद फिर कूर्माचल पर रुहेला आक्रमण नही हुआ। रुहेलो तथा कूर्माचलीयो के सबध मैत्रीपूर्ण हो गये। विशेषत हाफिज रहमत खाँ तथा महाराज दीपचद के सबध १७७४ तक सौहार्दपूर्ण रहे। काव्य में वर्णित चन्द कालीन प्रसिद्ध व्यक्तियो की सूची बाज बहादुर चद (१६३८-७८) के समय मत्रि मडल मे ऋषीकेश जोशी, भवदेव जोशी थे। दिनकर जोशी के पुत्र शिरोमणि जोशी लेखाधिकारी थे। राजदूत के पद पर वामदेव पाण्डे थे। राजपुरोहित महादेव तथा उनके अनुज माधव थे। राजगुरु के पद पर लक्ष्मीधर तथा विश्वरूप थे। व्यासासन पर त्रिलोचन आदि सत्पुत्रो सहित पडित भवदेव थे। प्रसिद्ध षट्शास्त्री मणिराम तथा महादेव भी राजसभा की शोभा बढाते थे। रुद्रदेव त्रिपाठी प्रसिद्ध धर्माधिकारी थे। सूपकार पद पर वासुदेव, शिव, श्याम नारायण आदि थे। राजा के आमात्य वर्ग मे प्रमुख विट्ठल गुसॉई, प्रयागदास, नरोत्तम, चिन्ता चौधरी, नारायण अधिकारी तथा काशीनाथ अधिकारी थे। श्रीदास लाल आदि यष्टीधर थे। राजवैद्य वैकुण्ठ जी थे। वामदेव जी के बाद विश्वरूप पाण्डेय दौत्य पद पर नियुक्त हुए। महाराजकुमार उद्योत चद भी राजसभा मे थे। तराई भाबर के प्रबध मे प्रमुख अधिकारी विश्वरूप पाण्डेय, भवदेव, जगन्नाथ, रमा पडित, द्वारिका दास कायस्थ, श्रीनाथ, विनायक आदि थे। उद्योत चन्द्र (१६७८-६८) के समय ऋषीकेश जोशी के पाँच पुत्र मनोरथ, कमलापति, परशुराम, पद्मापति तथा शिव सचिव थे। इनके बारे मे काव्य मे लिखा है ऋषीकेशस्य ये पुत्रा पच ते तु महौजस । मनोरथादय सर्वे सचिवा शस्त्रपाणय ।। इनके अतिरिक्त मत्रि मडल मे भवदेव के दो पुत्र भवानद तथा भानुदेव बहुत बुद्धिमान तथा कुशल थे। नरसिह आदि चौधरी पद पर थे। भूमि लेखन कार्य मे लक्ष्मण त्रिपाठी थे। भवदेव जोशी लेखाधिकारी थे। देवभाषाधिकारी लक्ष्मीपति जोशी थे। माल-भाबर मे श्रीनाथ तथा रमापडित अधिकारी थे। राजदूत पद पर विश्वरूप जी के पुत्र शिवानद नियुक्त हुए। द्वाराहाट के अधिकारी गुजरु थे। दानाध्यक्ष दिनमणि तथा पुरोहित नारायण त्रिपाठी थे। ज्ञान चद्र (१६८८-१७०८) के समय प्रसिद्ध व्यक्ति अग्नि सिह, माणिक विष्ट, गुणनिधि, नदु विष्ट, परमानद आदि हुए। जगत चद (१७०८-१७२०) के समय मत्रिमडल मे माणिक, वीरभद्र जोशी तथा रुद्रदेव जोशी थे। देवीचद (१७२०-२६) के समय माणिक, पूरनमल, वीरभद्र सचिव थे। अजीत चद (१७२६-२६) के समय पूर्वोक्त व्यक्ति ही सर्वोच्च अधिकारी थे। कल्याण चद (१७२६-४८) के समय के विशिष्ट व्यक्तियो की सूची कवि ने विस्तृत रूप से दी है तथा उनका चारित्रिक विश्लेषण भी किया है। कल्याण चद के समय राजसभा मे दो राजकुमार दीपचद तथा कृष्णसिंह थे। हरिसिह तथा सुमेर सिह जैसे योद्धा अगरक्षक थे। व्यासासन मे बृहस्पति के तुल्य हर्ष देव विराजमान थे। प्राणनाथ राज पुरोहित थे। हरिकृष्ण राजगुरु थे। ज्योतिषियो मे श्रेष्ठ - 26 कल्याणचन्द्रोदय रमापति थे। उच्च अधिकारियो मे वीरता के कारण शिवदेव को नियुक्त किया गया। रामदत्त अधिकारी माल-भाबर का प्रबध करते थे। रणाधिकारी हरीराम जोशी तथा द्विजाधिकरी कृष्णदेव थे। प्रयाग दास के प्रपौत्र रुद्रदेव जोशी सचिव थे। विद्वान् उमापति सूपकार पद पर थे। राजा के अन्तरग मित्र अनूप सिह थे। भवानद जोशी कोषाध्यक्ष थे। विलौरी ग्राम के शक्ति सिह रौतेला मत्रिमडल मे थे। हरिमल्ल, जैमल्ल, रुद्रमल्ल, चद्रि सिंह तथा जीवनवाहक प्रमुख भट थे। लक्ष्मीपति जोशी लेखाधिकारी थे। वीरभद्र के पुत्र शिवदेव भी सचिव पद पर थे। चिन्ता चौधरी तथा परमानद विष्ट आदि लेखक थे। मत्रि मडल के मत्रियो के गुण दोष का वर्णन करते हुए कवि ने तीन मत्रियो को सर्वश्रेष्ठ बतलाया है। वे है शिवदेव, भवानद तथा कृष्ण देव। इनमे भी सर्वश्रेष्ठ शिवदेव जोशी (झिजाड निवासी) को बतलाया है। इसीलिये मुख्य मत्री उनको बनाया गया। कवि ने लिखा है मुख्य कृतोऽय शिवदेव शर्मा मत्री ततोऽय हरिसिह वर्मा। वृद्धो द्विजो राम इति प्रसिद्धश्चद्रान्वितो भाति स शक्तिसिह ।। ज्योतिर्विदग्रे शिवदेवनामा युगानुरुप सचिवो न यस्मात् । विराजते कोऽपि महानुभावोऽधुना न मत्री नृप मौल इदृक् ।। काव्य के प्रणेता ज्वालामुखी देवी के अनन्य भक्त थे। यत्र तत्र इसके उद्धरण मिलते है। काव्य सरस प्राज्जल भाषा मे लिखा गया है। नाना प्रकार के वृत्तो तथा अलकारो का - बाहुल्य है। दशहरा ६ अक्टूबर १९६२ नित्यानद मिश्र कल्याण चन्द्रोदय काव्यम् ।। प्रथम सर्ग । --शशभृत् प्रपेदे ।।१६।। हेतो महात्मा विदेवतात्मा दुरान्त्मभिर्ये विजय स राजा। विनायक ते न कथ निहन्युस्तन्मत्रिण मत्रविचारदक्षम्।।२०।। (काव्य के प्रथम चार सर्गो को कवि शिव दवहास काव्य कहते हैं। इसके उपरान्त कल्याण चन्द्र का उदय हुआ और दवहास समाप्त हुआ। बाज बहादुर चद से पूर्व त्रिमल चन्द्र कूर्माधिपति थे। ये नि सन्तान थे। इन्होने अपने भाई ओर प्रतिद्वद्री नारायण चन्द्र को गद्दी न देकर अपने छोटे भाई नीलू गुसॉई के पुत्र बाज बहादुर को अपना उत्तराधिकारी बनाया। त्रिमल चन्द से पूर्व लक्ष्मी चन्द के ज्येष्ठ पुत्र दलीप चन्द गद्दी पर बैठे। १६२१ से १६२४ तक इनका शासन काल रहा। मणि कोटी राजाओ क समय सही गगावली मे पत और उप्रेती ब्राह्मणो के बीच वेर भाव हो गया। राजा दलीप चन्द्र ने उप्रतियों का पक्ष लिया और पतो की बढती शक्ति का दमन किया। इस राजा न अपन मत्री विनायक पत को पद से हटा दिया। दलीप चद के बाद विजय चद सिहासनारुढ हुए। इन्होंने कवल एक वर्ष राज्य किया। १६२५ मे कूर्मांचल म हत्याकाण्ड अधेर गर्दी, अराजकता रही। विजयवद विलासी था। राजसत्ता शोर के तीन व्यक्तियो के हाथ चली गयी। य थे सुखराम खडू, पीरु गुसॉई और विनायक भट्ट। इनका पूर्ण प्रभाव राजा और गजपत्ता पर था। अन्त पुर मे विलास की सामग्री जुटा कर विलासी विजय चद का रनिवास में बन्द कर चारो ओर पहरा बिठा दिया गया। कोई भी बिना इन तीन दुगत्माआ की अनुमति से राजा से मिल न सकता था। राजा के चाचा नीलू गुसाँई ने इस प्रतिबध का घोर प्रतिवाद किया। इस पर सुखराम, पीरू तथा विनायक ने राजमहल में एक रात भयकर हत्याकाण्ड किया। नीलू गुसॉई अधे कर दिये गये। कई चन्द्र वशी राजकुमार तलवार क घाट उतार दिये गये। रक्त से सनी तलवार लिये जब हत्यारे रनिवास मे नीलू के नन्हे कुमार बाजा की हत्या करने पहुँचे तो एक धाय ने सोते कुमार को शीघ्रता से शाल मे लपेट कर किले के पिछवाडे रख दिया। वहाँ पर सोया राजकुमार चौसार के पडित धर्माकर त्रिपाठी की पत्नी को मिला। यही नन्हा कुमार त्रिपाठियो के घर मे पला। नि सन्तान महागज त्रिमल चन्द्र न इसी बाजा को अपना उत्तराधिकारी बनाया। बाजा कृर्माचल क इतिहास में महागज बाजबहादुरचद्र के नाम से प्रसिद्ध हुए। इन्होने चालीस साल गज्य किया (१६३४-७८) और कूर्माचल की भी समृद्धि बढायी। इसी का वर्णन इस प्रथम गर्ग मे हुआ। इस हत्या * (पृष्ठ १, २, ३ उपलब्ध नही हे अत प्रथम १६ श्लोक काव्य के प्राप्त नहीं है।)

28 कल्याणचन्द्रोदय वे काण्ड के बाद सुखराम खर्के ने एक राजचेली की सहायता से विजय चन्द्र की हत्या कर दी। इस पर समस्त कूर्माचलीय जनता क्षुब्ध हो गयी। लक्ष्मीचन्द्र के दो पुत्रो मे से एक त्रिमल चद गढवाल भाग गये और दूसरे नारायण चन्द्र डोटी भाग गये। महर दल के लोगो ने त्रिमल चन्द्र को सहायता दी। फडत्याल दल के लोग नारायण चन्द्र को बुला लाये। गल्ली तथा झिजाड के जोशियो की सहायता से त्रिमल चन्द्र पहले अल्मोडा पहुँच गये। नारायण के पहुचने से पहले त्रिमल चन्द्र का राज्याभिषेक हो गया। इन्होने तेरह वर्ष राज्य किया। नारायण चन्द्र वापस डोटी चले गये। त्रिमल चन्द्र ने विजय चन्द्र के हत्यारो को सख्त सजा दी। सुखराम को प्राण दड दिया। विनायक भट्ट अधे किये गये। पीरू को प्रयाग राज मे अक्षय वट के पास आत्महत्या करने भेजा गया। इनकी सारी सपत्ति छीन ली गयी। इसी परिप्रेक्ष्य मे पूर्वापर सबध के अभाव मे इस काव्य के प्रथम सर्ग के श्लोको का अर्थ देखना है।) (२०वे श्लोक का अर्थ) महात्मा, पृथ्वी पर देवता स्वरूप उस राजा विजय चद्र को जिन दुरात्माओ ने मार डाला, दुष्ट उस मत्रणा करने मे चतुर उस विनायक मत्री को क्यो नही मार डालते ? तत्कालरात्रौ सचिवेन सम्यगश्रीबाजचन्द्रो भयभीत एव । तिग्माशुधामा गुनिनातनाम्ना सुप्तोऽवितो देव त्रिपाठिगेहे।।२१।। तत्काल रात्रि मे ही गुणवान् मत्री ने सूर्य के सदृश तेजस्वी डरे से उस बाजचद को जो कि (धर्म) देव त्रिपाठी के घर मे सोये हुए थे मृत्यु से (अतनाम्ना ) बचा लिया। ( ।। यदा नृशसा ।।२१।। ।। जब क्रूरता हुई।।) दुवृत्तास्तान्सोधिराजो ऽतिदूर कृत्वा किचिद्रासुदेव विहस्य। स्वस्तीत्युत्वत्वा सूचयन्पूर्ववाक्य मुख्यामात्य चाप्तभावाच्चकार।।२२।। उस राजा ने, उन दुष्टो को बहुत दूर कर, थोडा हँस कर, स्वस्ति इस उक्ति से पहले कहे हुए वाक्य को सूचित करते हुए, वासुदेव को अत्यन्त विश्वस्त भाव से मुख्य आमात्य बनाया। विलोक्य हृद्ग्रथियुत तमीश कूर्माचलेशस्य पद स तुच्छम् । निधाय चित्ते सचिवत्वमुच्चै सुतेषु विन्यस्य जगाम काशीम् ।।२३ ।। राजा के हृदय मे ( गाँठ) कपट देखकर, चित्त मे कूर्माचल नरेश का पद तुच्छ विचार कर, मत्रिपद पुत्रो को सौप कर वह (वासुदेव) काशी चला गया। वर्षे स चैकादशकेऽनपत्य पौरदर प्राप्य पद शरच्वाम् । विचार्य नारायणबाजचद्रौ श्रीबाजचन्द्र स्वपदे नियुज्व ।।२४ ।। नारायण (चद्र) तथा बाजचद्र को विचार कर, ग्यारह वर्ष राज्य कर नि सन्तान (त्रिमल चन्द्र) श्री बाजचन्द्र को अपने पद पर नियुक्त कर, राजा (त्रिमल चन्द्र) पौरदर पद को प्राप्त हुए। (स्वर्गवासी हुए) नारायणेनापि तद्भटेन दिल्लीश्वरात्प्राप्तवता महत्वम् । स्थितिष्कृता रुद्रपुरे परेण पत्रयेवकीनाशपथ स नीत ।।२५।।

प्रथम सर्ग 29 . उस समय शूर वीर नारायण ने भी मुगल सम्राट से महत्व प्राप्त करने पर रुद्रपुर मे अपना डेरा डाला। वही उसे (पल्ल्या+एव) बाजबहादुर ने ही यमपुर को भेज दिया। श्रीबाजबाहादुर चद्र देवे भूमडलाखडलता प्रपेदे। न कोऽपि मूर्खकृपणस्तदानी दिल्लीश्वरो यद्भयतश्चकपे।।६।। श्री बाजबहादुर चन्द्र के समस्त भूमडल के इन्द्रत्व (स्वामित्व) पद को प्राप्त करने पर ऐसा कोई मूर्ख कृपण नही था जो दिल्लीश्वर के भय से न कॉपा हो। आसीन्महादेव पुरोधसस्तु भ्राता कनीयान्किलमाधवाख्य । धीमान् पुरोधा शितिकण्ठकल्यो गुरू च लक्ष्मीधर विश्वरूपौ।।२७ ।। महादेव पुरोहित थे। उनके छोटे भाई माधव थे। बुद्धिमान और चतुर शितिकण्ठ पुरोहित थे। राजगुरु लक्ष्मीधर तथा विश्वरूप थे। श्रीव्यासदेवासनगैस्त्रिलोचनै सत्सूनुयुक्तैर्भवदेव पडितै । षट्शास्त्रदीपै मणिराममुख्यकै सौध महादेव बुधैर्विराजितम्।।२८ ।। राज महल (उस समय) व्यासासन ग्रहण किये त्रिलोचन आदि पडितों से, अच्छे पुत्रो सहित भवदेव आदि पडितो से, षटशास्त्री मणिराम आदि विद्वानो से तथा महादेव आदि विद्वानो से शोभित था। पुरोहितस्याथ गुरोश्चतद्वत्पौराणिकस्यापि मत विचित्य। दत्तानुजायैव कुलप्रतिष्ठा मनोरथेनापि भगीरथाय ।।२६ ।। मनोरथ ने पुरोहित, गुरु तथा पौराणिक के मत को विचार कर अपने अनुज भगीरथ को ही कुलप्रतिष्ठा दी। पुरोहितश्चाथ गुरुस्तथैव व्यासासनस्थ सचिवश्च मुख्य । षट्शास्त्रवक्ता स्मृतिमार्गदर्शी सप्तर्षयो ज्योतिषिणा सहासन्।।३०।। तारिकाओ सहित सप्तषियो के समान ये पुरोहित, व्यासासनस्थ गुरु, मुख्य सचिव, षटशास्त्र पर बोलने वाले, स्मृति मार्ग का दर्शन कराने वाले विद्वान् थे। पुरोधसा सद्गुरुणापरेण ज्योतिर्विदापुष्पहरेण हर्म्यम् । विराजित रुद्रचतुष्टयेन त्रिपाठिना धर्मयुतेन चैव ।।३१।। राजमहल (बाजबहादुरचद्र का) राजपुरोहित, राजगुरु, ज्योतिर्विद पुष्पहर से तथा धर्मयुक्त चार रुद्र नामधारी त्रिपाठियो से शोभित था। स्फुरद्वासुदेवादिसत्सूपकारै शिवश्यामनारायणैर्धमयुक्तै । लसद् राजपुत्रैविठल्लप्रधान नृपामात्यवर्ग पुर शोभित तत्।।३२ ।। उस समय (अल्मपुरी) राजपुरी, वासुदेव आदि अच्छे रसोइयों से, शिव श्यामनारायण आदि धर्मात्माओ से, बिठल्ल आदि प्रमुख राजकुमारो से, राजा के आमात्य वर्गों से शोभित थी। प्रयागदासेन नरोत्तमेन चिन्तादिना चौधरिसकेन। नारायणेनाप्यधिकारिभिस्तै काश्यादिभि कूर्मधराधिराजे।।३३ ।। कूर्माचल नरेश (बाज बहादुर चद) के राज्य में प्रमुख अधिकारी प्रयागदास (सेलाखोला), नरोत्तम (झिजाड) चिन्ता चौधरी (खाडी), नारायण, काशी (नाथ अधिकारी) आदि से (पुरी शोभित थी) 30 कल्याणचन्द्रोदय रराज तद्राजपुर महेभैरश्वैश्च तत्तत्पुरवासिभिश्च । नानादिगतागतपण्यवस्तुग्रहाग्रह किल्किलितै समतात् ।।३४ ।। वह राजपुर (अल्मपुरी, अल्मोडा) बडे-बडे हाथियो, घोडो तथा नगरनिवासियो से शोभायमान था। दिगदिगत नाना देशो से आयी हुई क्रय-विक्रय की वस्तुओ के क्रय-विक्रय का शोर चारो ओर बाजार मे होता था। बभौ तदा राजपुर वरिष्ठैर्वैकुटमुख्यै सशिवैभिषग्मि । योगान्वितैस्तार्किक तात्रिकैश्च सवैष्णवैर्वेदविचारद: ।।३५ ।। उस समय राजपुर श्रेष्ठ शिव सहित वैकुण्ठ (मिश्र) आदि वैद्यो से, योगशास्त्र के ज्ञाता, तार्किक, तात्रिक, सवैष्णव, वेद विचार मे दक्ष विद्वानो से शोभित था। श्रीदासलालप्रमुखै सुवर्णयष्टीधरैर्वारवधूसमेतै । कूर्माचलीयैश्चभटोभटैश्च वैदेशिकैश्चाल्मन्पुर चकाशे।।३६ ।। अल्मपुर (अल्मोडा), सुवर्णयष्टि धारण किये हुए श्रीदास लाल आदि मुख्य व्यक्तियो, वारवधुओं के समेत, कूर्माचलीय तथा विदेशी शूरवीरो से शोभित था। दिनकरस्य हि सुतो हि शिरोमणिपतिना कृत एव सुलेखक । ऋषि इति प्रथितो नयलोचन सचिवता गमितो भवदेवयुत्।।३७ ।। महाराज (बाजबहादुर चद्र) ने दिनकर (जोशी) के पुत्र शिरोमणि को लेखक बनाया। राजनीतिज्ञ ऋषीकेश (जोशी) भवदेव (जोशी) के साथ सचिव हुए। इतो वामदेवोऽभवद्भातृवर्गे सुविधो लसत्पद्यधाराभिवर्षी । हत बाजचन्द्रेण दौत्ये पदीये गढेशस्य तदुर्गावर्ग पुर च ।।३८ ।। इधर अपने भ्रातृवर्ग मे विद्वान तथा ललित पद्य की धारा बहाने वाले वामदेव (पाण्डे) हुए। उनको बाजबहादुर चन्द्र ने गढवाल के दुर्गाकार पुर मे दूत पद पर नियुक्त किया। ग्रामाष्टक श्रीनगराधिराजश्रीलुठनोतुगमहोत्सवेन। श्रीबाजचंद्रेण नृपेण दत्त श्रीवामदेवाय सुनीतिकā।।३।। श्रीनगर के महाराज की लक्ष्मी लूटने के महोत्सव मे श्री बाजबहादुरचन्द्र ने अच्छे नीतिज्ञ वामदेव को आठ गाँव दिये। तत्स्पर तत्प्रभवो नृपाप्त श्रीविश्वरूपोऽतिविशाल बुद्धि । विख्यातकीर्ति स्वकुलावतसो यो मध्यदेशानयनाद्भभूव ।।४।।। श्री वामदेव के बाद, उन्ही के पुत्र, श्री विश्वरूप अत्यन्त विशाल बुद्धि के हुए जो मध्य देश (माल-चौरासी) से आने के बाद विख्यात कीर्ति वाले तथा अपने कुल मे रत्न हुए। श्रीबाजचन्द्रो नृपति प्रसन्नो दातु यदा ग्रामत्रण प्रवृत्त । गृहीतमेतेन नृपाग्रहेण ग्रामत्रय लोभपराङ्मुखेन ।।४१ ।। श्री बाजबहादुरचन्द्र जब प्रसन्न होकर इनको कई गाँव देने तत्पर हुए तो राजा के आग्रह से नि स्पृह, निर्लोभी विश्वरूप ने केवल तीन गॉव स्वीकार किये। लक्षमुद्रा समानीय मृत्यु जापानतोऽपि यै न्यस्ता श्रीबाजचद्रस्य कोशे शपथपूर्वकम् ।।४।।

प्रथम सर्ग 31 मृत्यु जानते भी (बिना मृत्यु की परवाह किये) जिन्होने (विश्वरूप) श्री बाजबहादुर चन्द्र के खजाने मे शपथपूर्वक एक लाख मुद्रा लाकर रख दी। श्रीबाजचन्द्रतपसा सुतो राशिदिवापर । श्रीमदुद्योतचन्द्रोऽभून्मूर्तिमदभाग्यमर्थिनाम् ।।४३ ।। याचको के लिये मूर्तिमान भाग्य के समान, चन्द्र के समान प्रकाशमान श्री बाजबहादुर चन्द्र का पुत्र उद्योतचन्द्र हुआ। अस्यास्ता श्रीकुमारौ द्रौ ज्ञानेंदुर्ज्ञानसागर । हारचन्द्र कनिष्ठस्तु साक्षात्कामइवापर ।।४४।। इस (उद्योत चन्द्र) के दो कुमार हुए। एक ज्ञानचन्द्र जो ज्ञान का सागर था और दूसरा हारचन्द्र (हरिचन्द्र) जो कनिष्ठ था और साक्षात दूसरा कामदेव था। पितामहप्रियतमो ज्येष्ठ श्रीमानजायत। प्राणात्प्रियतरो जात कनिष्ठस्तु पितुर्महान्।।४५।। पितामह (बाजबहादुर) को ज्येष्ठ कुमार (ज्ञान चन्द्र) प्रियतम था। कनिष्ठ राजकुमार (हारचन्द्र) पिता (उद्योत चन्द्र) को प्राणो से भी अधिक प्यारा था। अथ दुर्दैवतोऽमोत्तयो नृपकुमारयो । व्यवर्धत विरोधाग्नि र्लोकसहारकारक ।।४६।। दुर्भाग्य से दोनो राजकुमारो की लोकसहारक विरोधाग्नि असहनशीलता (ईर्ष्या ) से बढी। (दोनो का घोर विरोध हो गया। राजा निपातितास्तत्र बहवो बकवृत्तय । ऋषीकेशादयो मत्रिबृद्धास्त्वर्धमृता स्थिता ।।४७ ।। इस (गृह युद्ध के समय) राजा बाज बहादुर चद्र ने बहुत से कपटी बगुले की वृत्ति वालो को मार दिया। ऋषीकेश आदि बूढे मत्री तो अधमरे थे। (निश्चेष्ट और अकर्मण्य हो गये ) थे। एव सोपद्रव तत्र मन्यमानेन भूपति । बोधित सर्वभावेन विश्वरूपेण धीमता।।४।। इस प्रकार वहाँ उपद्रव की स्थिति को समझते हुए, बुद्धिमान विश्वरूप ने सादर राजा (बाजबहादुर चन्द्र) से कहा। (उसे समझाया)। शिवरात्रि कुमारार्थे करे कृत्वा सुदीपकम् । सावरोधेन नीता या सा रात्रिविस्मृता किमु ।।४६ ।। हाथ में दीपक लिये, कुमार के जन्म के लिये, शिवरात्रि की वह जागरण की रात्रि क्या भुलाई जा सकती है ? (पुत्र के जन्म के लिये यह कठिन अनुष्ठान जागेश्वर के मृत्युजय मदिर मे किया जाता था। कुमारों के इस विरोध में उद्योत चद्र ने पिता बाजबहादुर चन्द्र का विरोध किया। सभवत बाजबहादुर ने अपने पुत्र उद्योत को कठिन दड देना चाहा। इस पर विश्वरूप जी ने कहा कि कठिन तपस्या के फलस्वरूप प्राप्त पुत्र के साथ यह बर्ताव ठीक नही है।

32 कल्याणचन्द्रोदय यावद्रोहो नेकतेऽय वर्तते तावदेवतु। गगावल्या राज्यमस्ति कुमारस्तत्र तिष्ठतु।।५० ।। जब तक यह द्रोह बढा हुआ है तब तक कुमार उद्योत चन्द्र को गगावली के राज्य मे भेजा जाय। (विश्वरूप जी ने विरोध को दबाने के लिये उद्योत चन्द्र को राजधानी से दूर गगावली (गगोली) भेजने की राय दी। इसमें सफलता भी मिली। विरोधाग्नि शान्त हो गयी। महार्हशयनीयानि स्वर्णमुद्रादिक धनम् । तावूलादीनि गच्छतु कुतश्चिन्मध्यदेशत ।।५१ ।। बहुमूल्य पलग, स्वर्णमुद्रा आदि धन, ताम्बूल इत्यादि मध्यदेश (माल) से कहाँ जावे ? (गगावली की ओर कुमार उद्योत चन्द्र को भेजी जावे।) राज्ये कूर्माचल श्रेष्ठस्तत्र गगावली शुभा। ब्राह्मणा यत्र वतन्ते कुलीनाश्चविपश्चित ।।२।। राज्य में कूर्मांचल श्रेष्ठ है। उसमे भी गगावली पवित्र है जहाँ कुलीन और विद्वान ब्राह्मण रहते हैं। किंचित्काले मते श्रीमत्कुमारेऽमितविक्रमे उत्कठा महती देव भविष्यति तदीक्षणे।।३।। श्रीमान् कुमार ( उद्योतचन्द्र), जो अमित पराक्रमी हैं, उनके जाने के बाद कुछ समय बीतने पर (विश्वरूप ने कहा) हे देव (बाजबहादुर चन्द्र), उसे (कुमार को) देखने की (आप को) बहुत उत्कठा होगी। सहसा विदधीतेति नैवकिचिच्छुत न हि। तस्माद्बजतु सन्मानातथैवेहागमिष्यति ।।५४।। (विश्वरूप ने राय दी।) कोई कार्य सहसा (बिना विचारे) न किया जाय। ऐसा कही कुछ नही सुना गया। इसलिये (कुमार) सम्मान के साथ (गगावली) जावे और उसी प्रकार (वहाँ से) पुन यहाँ आवेगे। (शीघ्रता मे कोई कार्य अथवा दड न किया जाय या दिया जाय)। द्विजाना सचिवाना च तिष्ठतो उपरि सर्वदा। सामोपायेन सक्रोध सात्वितो नृपतिर्जगौ।।५५ ।। द्विज तथा सचिवों के ऊपर सर्वदा स्थित रहने वाला क्रुद्ध (कुपित) राजा शान्तिमय उपाय से सात्विकता की ओर गया। (साम की नीति से राजा शान्त हुआ और उसमें सदवृत्ति आयी। एतदर्थं कुलीनाना नृपा कुर्वन्ति सग्रह आदिमध्यावसानेषु न ते याति हि विक्रियाम्।।५६ ।। बाज बहादुर ने कहा इसीलिये ( अच्छी और नेक सलाह के लिये) राजा कुलीन कुल के लोगों का सग्रह करते हैं। कुलीन मे आदि, मध्य और अन्त मे कोई बिगाड नही होता।

प्रथम सर्ग 33 (सदा एक ही वृत्ति उनमे होती है।) (कुलीन विश्वरूप के निर्णय से यह लोक सहारक गृह युद्ध शान्त हुआ। उद्योत चन्द्र को कठोर दण्ड भी न दिया गया।) पूर्वसूरिभिरियुक्त तद् व्यक्त भवता कृतम्। अकीर्तेर्नरकाच्चापि रक्षितोऽह महात्मना ।।७।। राजा बाज बहादुर चन्द्र ने (अपने कुल पुरोहित) विश्वरूप से कहा, "जो बात पुराने (प्राचीन) विद्वानो ने कही है उसे आपने व्यक्त किया। आप महानुभाव ने मुझे अपकीर्ति तथा नरक से भी बचा लिया।" इत्युक्तोद्योतमाहूय चन्द्र चन्द्रनिभाननम् । जगादाखेटकार्थ त्व गगावल्यामितो व्रज।।५८ ।। ऐसा कह कर बाजबहादुर चन्द्र ने चन्द्र की कान्ति समान उद्योत चन्द्र को बुला कर कहा, ।“आखेट के निमित्त तुम यहाँ से गगावली जाओ।" गोब्राहमणाना त्राणार्थ स्रष्टा सृष्टास्म भूभुज । व्यात्रैर्वरादर्भल्लूकै वाध्यन्ते तत्रभूरिश ।।५६ ।। ब्रहमा ने राजाओ की सृष्टि गोब्राहमणो की रक्षा के लिये की है। वहाँ (गगावली मे) वे लोग बाघ, वराह तथा भालुओ से बहुत पीडित किये जाते हैं। नृपोक्तमाकर्ण्य मनोहर वच प्राप्त कुमारोऽपि कुमारविक्रम । गगावली वेदनिनादशोभिनी दानेन मानेन जनान् प्रहर्षयन् ।।६० ।। कार्तिकेय के समान पराक्रमी कुमार ( उद्योत चन्द्र) राजा (बाज बहादुर चन्द्र) के मनोहर वचन सुनकर दान तथा मान से लोगो को खुश करते हुए, वेदपाठ की ध्वनि से गुजित गगावली पहुंचे। गते कुमारे वदति स्म राजा त भास्वर भूसुरविश्वरूपम् । विप्रास्क्त देहीति वदत्यजसप्रजासु दड सचिवा वदन्ति ।।६१ ।। कुमार (उद्योत चन्द्र) के (गगावली) जाने के बाद राजा बाज बहादुर चन्द्र उस तेजस्वी ब्राह्मण विश्वरूप से बोले, "ब्राहमण तो सदा दो (प्राणदान दो) ऐसा कहते हैं। प्रजा को दण्ड दो ऐसा मत्री कहते हैं।" द्विजाश्च सर्वे यत्र पालनीया सत्यैवलोका सुतवत् सुपोष्या । शोभा विदेशीयभटै विना मे न जायते किन्वधन करोमि।।२।। "सभी ब्राहमणो का मैने पालन करना है। सभी प्रजाजन सुत के समान पाले जाने चाहिये। विदेशी योद्धाओ के बिना मेरी शोभा नही है। अब मै बिना धन के क्या करूँ?" (व्यय भार बढा हुआ है। विदेशी सैनिको पर खर्च बहुत है। प्रजा का पालन मेरा कर्तव्य है। क्या करूँआय अधिक कैसे हो?) धनाकरो मे खलु मध्यदेश सोऽरण्यतामेव गतस्त्विदानीम् । कथ जना तत्र वसेयुरित्यमाशा मदीया वरिवर्त्यजसम् ।।६३ ।। ( 34 कल्याणचन्द्रोदय "धन का स्रोत तो मेरा मध्यदेश (तराई-भाबर) है। वह इस समय सारा जगल हो गया है। किस प्रकार लोग वहाँ बसें यह मेरी आशा सदा बढ़ती जाती है। यवनास्यगता बहिष्कृता भवताद्यामम मध्यभूमिका। द्विजपुगव सा पुनर्नवाभवताहस्तदीवयोग्यता।।६४ ।। मेरी मध्य भूमिका (माल भाबर) से यवन निकाल (बाहर) दिये है। हे द्विज श्रेष्ठ, वह मध्य भूमि फिर से नयी हो यह योग्यता आपके ही पास है।" इति भूपतिभाषित वच प्रतिगृह्याथ बभाण विप्रराट् । नरदेव भवत्प्रभावत प्रभवत्येवहि कार्यसिद्भय ।।५।। इस प्रकार राजा के वचन सुनकर द्विजश्रेष्ठ (विश्वरूप) बोले, "हे राजन, आपके ही प्रभाव से कार्य मे सिद्धि होगी।" हेतुभूतमहमस्मि साधने विश्वरूप इति विश्वसम्प्रत । मुचलेखकवर भवादिक देवमैष वसतात्सदातिके।।६६।। "मैं विश्व मे प्रख्यात विश्वरूप इस कार्य को साधने मे केवल कारण रूप हूँ। आपके पास सदा रहने वाले लेखकों में श्रेष्ठ भवदेव को छोडो (माल भाबर भेजो।" वृहज्जगन्नाथ इति प्रसिद्धस्तथा रमापडित नामधेय । मौल स कायस्थकुलाग्रवतीय द्वारिकादास इति ब्रुवन्ति ।।६७ ।। "विशाल डील डौल वाला जगन्नाथ, रमा पडित नाम वाले विद्वान और कुलीन कायस्थ कुल के अग्रणी द्वारिकादास।" मित्राण्यसख्यानि वसति तत्र श्रीराजकार्यैकरसादराणि। शूरा कृतास्त्राश्च कठेडियास्ते वशे स्थिता में मुलतानिकाश्चा।।६।। "जैसे असख्य मित्र वहाँ (मध्यदेश) राज्य कार्य में एक रस हो कर सलग्न हैं। हथियार लिये शूरवीर वहाँ रहते हैं। कठेड के कठेडिया तथा मुसलमान सब वश मे कर लिये गये हैं।" सर्वान्समाहूय सुदानमानै करोमि तादृग्जनता यथामी। वस्तु जनौघादिशितु वनेऽपि स्पृहालव स्यु मम मान एष ।।६६ ।। सब (मित्रों को) बुलाकर दान मान से सम्मानित कर मै उनको ऐसा करता हूँ कि वे घोर वन में प्रवेश करने के लिये तथा रहने के लिये इच्छुक हो जाय। इसी मे मेरा मान है। एता प्रतिज्ञा सुदृढा विधाय काशीपुरे काशिनमादधातु। श्रीनाथक चैव विनायक च वजन्तदाशीर्वचन बभाषे।७।। ऐसी सुदृढ प्रतिज्ञा करके काशीपुर मे काशी (नाथ) तथा श्रीनाथ तथा विनायक को लाने के लिये, जाते हुए (विश्वरूप) उस समय राजा से आशीर्वादात्मक वचन बोले। अभिमतफलदस्ते देव लबोदरस्यान्नवनिधिमभित प्रागष्टसिद्धिं च दद्यात्। द्विजगुरुसेवासाधक सर्व काले प्रभुगुणगणनाथा रामभद्र सुभूया ।।७१ ।। "हे देव, श्री गणेश तुम्हारे मनोरथ को पूर्ण करे, चारों ओर नव निधि और अष्ट सिद्धि दे। सदा प्रभु के गुणों की गणना में द्विजों की सेवा को साधने वाले रामभद्र मगल करें।"

प्रथम सर्ग 35 राजाथ साश्रु प्रणमन्यपात तत्पादपकेरुहयो सुभृग । स्वपादपद्मादरविदनेत्रमुत्थाप्य भूदेववर प्रतस्थे। ७२ ।। ऑसू गिराते हुए राजा (बाजबहादुर चद्र) उस (द्विज श्रेष्ठ विश्व रूप के) चरण कमल मे भवरे के समान प्रणाम करते हुए गिर पडे। अपने चरण कमल से कमल नयन नृपति को उठाकर द्विज श्रेष्ठ (माल-भाबर को) रवाना हो गये। वादित्रवाद्यै नृपवेश्यगीतकै नृत्यैश्चतत्तत्पुरवारयोषिता। प्रमोदित पौरजनान्प्रहर्षयन्द्विजैस्क्तश्चारणवदिमिभृशम् । ७३ ।। राज महल में बाद्यो से, गीतो से, वारवधुओं के भाँति भाँति के नृत्यो से, द्विज, चारण तथा बदीजनो से नगर वासियो को प्रमुदित करता हुआ वह (राजा) बहुत प्रसन्न हुआ। त काशिन तत्र निवेश्य भास्वत्काशीपुरे तन्निकटे स्वय च। स्थित्वात्मनश्चैव यश पटानि हाणि कूपोपवनानितेन।।७४ ।। वहाँ काशीपुर मे काशी (नाथ अधिकारी) को रखकर उसी के निकट उस (विश्वरूप) ने अपनी स्थिति की। अपने ही यश के अनुकूल उसने वहाँ सुन्दर घर बनवाये, कुँवे खुदवाये और बाग लगवाये। दिल्लीश्वरस्थानमिवापर त विधाय काशीपुरमृद्धमागात्। कुणेश्वरी चात्मनिवासयोग्या पुरी सुविन्यस्य ततोऽन्यदेशम् । ७५ ।। दिल्लीश्वर के स्थान के समान (दूसरी दिल्ली बना कर) काशीपुर को बनाकर उसे ऋद्धि सम्पन्न बना दिया। अपने रहने योग्य कुणेश्वरी पुरी को बना कर वह दूसरे भाग मे गया। ।। इति श्री कल्याणचन्द्रोदये कूर्माचलीयकाव्ये प्रथम सर्ग ।।

।। द्वितीय सर्ग ।। अथ रुद्रपुरे वसद्विज कृतका नृपकार्यसिद्धये। जनतापि यतस्तत स्थिता पतिमन्विष्य पतिव्रता गता।।१।। राजा के कार्य की सफलता के लिये कर्म मे जुटे हुए उस द्विज (विश्वरूप) के रुद्रपुर मे रहते हुए जनता भी इधर उधर से वहाँ आयी जैसे पति को ढूढ कर पतिव्रता उसके पीछे जाती है। ते द्वारिकादासमुखास्तदानी समागतास्त सचिवावतस। फुल्लाबुजानीव हि यदिरेजुर्मित्र समासाद्य न तद्विचित्रन्।।२।। उस समय उस सचिवश्रेष्ठ (विश्वरूप) के पास द्वारिकादास आदि प्रमुख अधिकारी आये। मित्रो को पाकर (सूर्य को पाकर) वह (विश्वरूप) खिले हुए कमल के समान विराजमान हुआ। यह विचित्र (आश्चर्यप्रद) नही है। (मित्र का अर्थ सूर्य एव मित्र है। राईपुरात् समारभ्य श्रवणातमतस्पर विश्वरुपेण तद्भयौ विश्वरूप निदर्शितम् ।।३।। रायपुर से लेकर श्रवण के अन्त तक विश्वरूप ने उस सारी भूमि मे अपना विश्वरूप प्रदर्शित किया। (सारा मध्य देश आबाद कर दिया।) अनुस्यूता तु महती गोहस्तिरथवाजिना रेखेवेवहि खरोष्ट्राणा ग्रामाद् ग्राम प्रपूरिता ।।४।। गाय, हाथी, रथ, घोडे, खच्चर, ऊटो से गुंथी हुई रेखा (कतार) के समान गाँव के गाँव भर दिये। प्रतिग्राम राजपथा कारिताहचर्थसिद्धये। समवायोऽभवद् यत्र नानादेशनिवासिनाम् ।।५।। आर्थिक सफलता के लिये प्रत्येक ग्राम मे राजपथ बनवाये गये जहाँ नाना नाना देशो से आये हुए मनुष्यो का मिलन हुआ। (देश देश से लोग वहाँ आये और बसे।) ग्रामायित महारण्यै ग्रामैश्चनगरायितम् । नगराइद्रप्रस्थत्व ययुर्गोप्तरि भूसुरे।।६।। उस द्विज के सरक्षण मे जगल गाँव बने, गाँवो ने नगरो का रूप लिया और नगरो ने इन्द्रप्रस्थ (देहली) का स्वरूप लिया। (जगल काट कर गाँव बसाये गये। आबादी बढ़ने पर गाँवो ने नगरो का आकार लिया तथा व्यापार, धन, सम्पत्ति, आबादी बढने पर छोटे नगर इन्द्रप्रस्थ के समान बड़े हुए।) धान्येक्षुगोधूमतिलै शार्षपैश्चोपशोभिता। अदैवमातृका साभूरुरुचे ते न कारिता।।७।।

द्वितीय सर्ग 37 वह मध्य देश की भूमि धान, ईख, गेहूँ, तिल तथा सरसों से उपशोभित हुई। जहाँ मेघ द्वारा वृष्टि न हो वहाँ उसने नदी, नहर, पुलो के द्वारा सिचाई करवाई। (इस प्रकार मध्य देश को शस्य श्यामला बनाया।) गव्यूतिद्वयतो यत्र प्रतिमार्गेऽश्ववारका । विधाय दुर्ग रक्षायै स्थापिता शब्दवेधिन ।।८।। जहाँ (दोनो ओर से चरागाह बनवाये गये) प्रत्येक मार्ग पर घुडसवार रक्खे गये। रक्षा के लिये दुर्ग बनवा कर उस पर धनुर्धारी रक्खे गये। भटाना वेतनार्थ तु सर्वेभ्य षष्टमशक। कल्पित देशरक्षायै सर्वज्ञेन महात्मना।।६।। उस सर्वज्ञ महात्मा (विश्वरूप) ने देश की रक्षा के लिये सैनिको के वेतन का भुगतान करने के निमित्त सारी प्रजा पर से उपज का छटा अश लिया। ब्रह्मक्षत्रिय विट्शूद्भभुक्तेत्थ सा सुमध्यभू । शास्त्र शस्त्रैश्च वाणिज्यै सेवाभिश्च यथाक्रमम् ।।१०।। वह सुन्दर उर्वरा मध्यभूमि यथाक्रम शास्त्र, शस्त्र, वाणिज्य तथा सेवा द्वारा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रो से भोगी गयी। धनाकरस्तत्र तथा यथा कूर्माचलेश्वर । दिल्लीश्वरेण समता प्राप्तोदानात्ततोऽधिक ।।११।। वह (मध्यभूमि) अर्थ (धन) का प्रधान स्रोत थी जिससे कूर्माचलेश्वर ने दिल्लीश्वर (मुगल सम्राट ) की समता प्राप्त की। दान देने से तो उससे भी अधिक बढ गये। वर्षाशनतु काश्यादिपुरीषु प्रेषित यदा। द्रीपातरादपि प्राप्ता श्रुत्वा तद्दानशौंडता ।।१२।। जब वर्षाशन काशी आदि नगरियो को भेजा गया तो उस दान की उदारता सुन कर देश विदेश से लोग आये। (वर्प भर का भोजन (नाज के रूप मे) काशी आदि तीर्थ स्थानो को माल भावर से भेजा जाता था।) श्रीमज्जालधरात्पीठादग्रतो ये भटा स्थिता । शूरा समाययुस्तम भूमीन्द्रमुपसेवितुम् ।।१३।। श्री जालधरपीठ से आगे ( जम्मू, नगरकोट, गुलेर से) जो शूरवीर सैनिक थे वे वहाँ माल-भाबर मे राजा की सेवा (नौकरी) करने आये। यथोप्ट्राद्रिभ्यति गजास्तथोष्ट्रा करितोभृशम् । कूर्माचलीयान्प्रति ते बभूवुस्तेऽपितान्प्रति।।१४।। जैसे ऊट से हाथी डरते हैं उसी प्रकार हाथी से ऊट बहुत डरते है। वे (शूर वीर) भी कूर्मांचलीयों के प्रति वैसे ही हुए जैसे कूर्माचलीय उनके प्रति। ( एक दूसरे से डरते रहे। भय एक दूसरे का बना रहा।) ग्रामग्रामेष्वसख्यानि कूपाद्युपवनानि च । कृतानि तत्र तास्कर्य शब्दमात्रे प्रतिष्ठितम् ।।१५।।

38 कल्याणचन्द्रोदय गाँव गाँव मे असख्य कुँवे, बाग बनावाये गये। वहाँ चोरी केवल 'चोरी शब्द मे ही रह गयी। (सुदृढ प्रबध से चोरी डकैती बद हो गयी। एव श्रीबाजचन्द्रस्य यावद्राज्य विवर्धितम् । तावद्वाजेदुना वास पुरदरपुरे कृत ।।१६।। इस प्रकार जब श्रीबाजबहादुर चन्द्र का राज्य बढा तब वे इन्द्रपुरी के लिये चले गये। (स्वर्गवासी हो गये। अथ कूर्माचलेशोऽभू श्रीमानुद्योतचन्द्रमा। येनाष्टवर्ष तद्रराज्य पितृवत्प्रतिपालितम् ।।१७।। इसके उपरान्त श्रीमान् उद्योतचन्द्र कूर्माचल के राजा हुए जिन्होने आठ वर्ष उस राज्य का पिता के समान पालन किया। शीर्ष श्रीनगरेशस्य चादौ चानपुर महत्। दुर्गं विध्वसित यत्तु सा मतिर्वेश्वरुपिकी ।।१८।। श्रीनगर (गढवाल) के राजा का एक सिरे मे पहले चानपुर (चाँदपुर) का बड़ा दुर्ग था। यह विश्वरूप की नीति का फल था कि वह दुर्ग तोड दिया गया। क्रोधाद्रोणाचल प्राप्ते गढेशे गुजरुर्दुतम् । ऊचिवान्विष्टिक पृष्ठे कृत्वा गच्छामिभूपतिम् ।।१६।। क्रोध से गढवाल के राजा के दूनागिरि तक आ जाने पर गुजरु विष्टिक ? पीठ दिखा कर बोला, “मै शीघ्र राजा के पास जाता हूँ। (उद्योत चन्द्र के पास जाता हूँ।" निष्काशितो गढपति र्वेताल इव यत्रत । घिष्कृतो गुजरु मूढो सा मतिवैश्वरपिकी।।२०।। यह भी विश्वरूप की बुद्धि थी कि वहाँ (दूनागिरि) से गढ़वाल का राजा बेताल की भाँति निकाला गया और मूर्ख गुजरु धिक्कारा गया। यत् त्रासाद्गढपेनाशु कृतामैत्र्यमुनापि च। डोटीश्वरविनाशाय सा मतिर्वैश्वरूपिकी।।२१।। यह भी विश्वरूप की बतायी नीति का फल था कि डर से गढेश ने शीघ्रता से उस (उद्योतचन्द्र) से मैत्री की। डोटी के राजा के विनाश के लिये भी यही विश्वरूप की नीति फलवती हुई। गढ जित्वा जमीर प्राग्द्विपायनमतस्परम् । डोटीशश्चोतुता नीत सा मतिर्वैश्वरूपतिकी।।२२।। यह भी विश्वरूप की बुद्धि का चमत्कार था कि गढवाल जीत कर, पूर्व में जमीर (जुमला) से द्विपायन से आगे तक जीतकर डोटीश को नीचा दिखाया। अथ कश्चिद्गते काले राजा कामवश गत । सुख सुष्वाप दिवसे जजागार निशामहो।।२३ ।। इस प्रकार कुछ समय बीतने पर राजा (उद्योत चन्द्र) काम के वश मे हो गये। वे दिन मे आराम से सोते थे और रात्रिभर जागरण करते थे।

द्वितीय सर्ग 39 . धर्मादीन्सूपकारॉश्चतथा पुष्पवटूनपि। रुद्रगगारामयोश्च सुतान्कृत्वात्मपार्श्वगान् ।।२४।। (राजा उद्योत चन्द्र) धर्म आदि रसोइयो को, रुद्र और गगाराम के पुत्रो को, कुछ योद्धाओ को (अपनी रक्षा के निमित्त) अपने पास रखकर (अन्त पुर मे रहने लगे)। श्रीपद्मापतये सम्यगुपकर्तृत्वमर्पितम् । कृष्णनारायणौ श्रीमत्पावतीशेन वर्द्धितौ ।।२५ । । भली प्रकार श्री पद्मापति को कारोबार सौपा गया। कृष्ण और नारायण की राजा के पास रहने से वृद्धि हुई। श्यामदास कचुकिन रामदास च तादृश । सत्कृत्यातस्पुरे वास चकार कतिचित्समा ।।२६।। श्यामदास कचुकी तथा उसी प्रकार गमदास का आदर कर राजा ( उद्योतचन्द्र) ने कुछ वर्ष अन्त पुर मे बिताये। कचित्काल विश्वरूपपण्डितै र्भारमुद्धृतम्। जयदेवेति दुर्वृत्तास्तदोचुर्द्रिजपुगवम् ।।२७ ।। कुछ समय तक पण्डित विश्वरूप ने भार संभाला। उस समय जयदेव आदि दुष्ट आचरण वाले लोग उस द्विज श्रेष्ठ से बोले। श्रुत्वा कूर्माचलीयाना कर्णपीडाकर वच । द्विजावतसो मे वातपीडा जातेति तस्थिवान्।।२८ ।। कूर्माचलीयो के कर्ण को पीडा पहुंचाने वाले वचन सुनकर द्विजो मे अग्रणी (विश्वरूप) मुझे वात पीडा हो गयी कह कर चल दिये। मासाते नृपतिर्विप्र नारायण त्रिपाठिन। दानाध्यक्ष दिनमणि प्रेषयित्वानयत्सतम् ।।२६ ।। एक महीने के बाद राजा ने नारायण त्रिपाठी तथा दानाध्यक्ष दिनमणि को भेजकर उन्हे बुलवा लिया। (विश्वरूप फिर बुलवाये गये।) अथोवाच द्विजवर विश्वरूप महीपति । सर्वोपरित्व भवता वर्तते पूर्ववत्पदम् ।।३०।। राजा (उद्योत चन्द्र) द्विज श्रेष्ठ विश्वरूप से बोले, "आप का पद पहले की भाँति सबके ऊपर है।" गुरुत्व श्रीमतामेव पितृतोऽपि ममाधिकम् । भवता तत्र सलग्न मानो मे व हि तादृशम् ।।३१ । । “आप का गुरुत्व मेरे पिता जी से भी अधिक है। आप के वहाँ (राज्य कार्य मे) सलग्न होना जैसा मान मेरे लिये वैसा अधिक कोई मान नही है। (आप ही मेरी प्रतिष्ठा हैं।"

40 कल्याणचन्द्रोदय - चतुष्कमध्ये विदुषा मत्रिणा च पुर सरा । द्रोणा नृप क्रोधसमन्वित । गम्यतामित्युदीर्थ्याग्रे रुरोध बुधसत्तमम् । ।४३ ।। - दु सगाद्हतबुद्धीना पात्रापात्रविचारणा। नास्त्याशीविषसबधा दुग्धेनिर्विषता यत ।।४४।। दु सग के प्रभाव से हत बुद्धि लोगो की पात्र कुपात्र को विचारने की क्षमता नही होती। विपधर सर्प के सबध से दुग्ध मे निर्विपता नही होती है। कुसग का प्रभाव अवश्यमेव पडता है। उसका परिणाम जहरीला ही होता है। दैदीप्यमानवपुषा विश्वरूपेण षट् समा । नीतागृहातिके सम्यक् श्रीसाम्वपदसेवनात्।।४५ ।। भगवती अबा के चरणो की सेवा करते हुए दीप्तिमान विश्वरूप ने अपने घर के निकट ही छ वर्ष अच्छी प्रकार बिताये। विद्रद्वन्देर्वद्यमानधरणे दीपके हृते। राज्यमेताबदेवासीदाभासोप्यथ वर्ण्यते।।४६।। विद्वानो द्वारा पूज्यनीय चरण दीपक (प्रकाश) के छिन जाने पर (विश्वरूप के राज्य भार से हट जाने पर ) राज्य इस प्रकार ही था। इसका आभास वर्णन किया जाता है। तत श्रीनाथनामासीन्मुख्य सर्वाधिकारके। मध्यदेशे रमापूर्णपण्डित सर्वत स्थित ।।४७ ।। इसके बाद मध्य देश (भाबर ) मे श्रीनाथ नाम का मुख्य अधिकारी सम्पूर्ण अधिकार मे था। रमा पडित पूर्ण रूप से सब जगह स्थित थे। ज्योतिर्विद्भवदेवोभूल्लेखक स्वकुलाग्रणी। लक्ष्मीपतिदिजन्मा तु देव भापाधिकारके।।४८।। अपने कुल मे श्रेष्ठ भवदेव ज्योतिर्विद् लेखक हुए। ब्राह्मण लक्ष्मीपति सस्कृत भाषा के अधिकारी बने। ऋषीकेशस्य ये पुत्रा पच ते तु महोजस । मनोरथादय सर्वे सचिवा शस्त्रपाणय ।।४।। ऋषीकेश (जोशी) के जो पाँच ओजस्वी पुत्र मनोरथ आदि थे (मनोरथ, कमलापति, परशुराम, पद्मापति तथा शिवदेव) वे सब सचिव थे और सदा उनके हाथ मे शस्त्र रहता था। भवदेवस्य पुत्रौ द्वौ भवानदस्तत पर। भानुदेव इति ख्यातस्तौ बुद्धिकुशलावुभौ ।।५० ।। भवदेव (जोशी) के दो पुत्र भवानद तथा भानुदेव बडे बुद्धिमान तथा प्रख्यात कीर्ति वाले हुए।

द्वितीय सर्ग 41 नरसिहादयश्चैव चौधरीसज्ञका स्थिता । भूम्यादिलेखने तद्वत्रिपाठी लक्ष्मण स्मृत ।।५६ ।। नरसिह आदि चौधरी पद पर थे। उसी प्रकार भूमि के लेखन कार्य मे लक्ष्मण त्रिपाठी नियुक्त थ। ये यत्र स्थपिता पूर्व विश्वरूपेणधीमता। ते तथैव स्थिता सर्वे चक्रधारानुपायिन ।।२।। जो अधिकारी जहाँ पर पडित विश्वरूप ने स्थापित किये वे उसी प्रकार वहाँ पर चक्रधारा के समान स्थित रहे। एकदोद्योतचन्द्रेण रामभद्राभिदोद्विज । प्रेपितो विश्वरूपस्य पाāराज्ञोक्तमूचिवान् ।।५३ ।। एक समय उद्यात चन्द्र द्वारा भेजे हुए रामभद्र नाम के ब्राह्मण ने विश्वरूप के पास जाकर राजा का यह संदेश कहा। साम्प्रत न मया गज्य भज्यते नेतिभगयताम् । शाल्मप्रदेश युप्मभ्य दत्त ग्रामचतुष्टयम्।।४।। श्रुत नवेति तच्छुत्वा वज्रनिर्घातनिष्ठुर। किचित्क्रोध समालव्य प्रत्युक्त भूपति प्रति।।५५ ।। युग्मम् 'इस समय शाल्म प्रदश ( सालम पट्टी) मे आपको दिये हुए चार गाँवो का लगान मुझे प्राप्त नहीं है।" जो नही सुना ऐसा वज्र के समान कठोर वचन सुनकर कुछ क्रोध कर विश्वरूप ने राजा को उत्तर दिया। भूखडस्येकखड त्वत्पित्रा निष्कटकीकृत। राज्य मया कृतमिति किमात्मान विकत्थ्यसे ।।५६।। “सारे भृखड को एक कर तेरे पिता (बाजबहादुर ) न राज्य को निष्कटक किया। यह राज्य मेन बनाया एसी शखी त केसे बघारता है ?" त्व तु बाजदजन्मासि शीलादा-गुणेर्युत । द्वित्रा अग्रे चरिष्यति यदा तदापि राज्यकम्।।५७ ।। “शील उदारता से युक्त तू तो बाजबहादुर चद्र का पुत्र है। आगे भी दो तीन और जैसे तैसे राज्य करेंगे।" इत्थ त्रिपाठिनाक्त तद्राक्य श्रुत्वा महीपति । हियान किचित्प्रोवाच तूस्मीमतस्प्रवेशह।।५८ ।। त्रिपाठी (गमभद्र) द्वारा कहे हुए विश्वरूप के उस वाक्य को सुनकर राजा थोडा लज्जित होकर बोला, "चुप हो कर प्रवेश कगे।" इत शाकाभितप्तन विश्वरूपण सत्वर। द्राणायित विशपेण निर्वाणमभिगच्छता ।।५।। यहाँ शाक स अविभूत विश्वरूप ने शीघ्र ही निर्वाण को प्राप्त होकर द्रोण के समान आचरण किया।

42 कल्याणचन्द्रोदय ईदृशानामुदकं तु यस्मिन् राज्ये समजसम् । जात तथापि न त्यक्त सेवन फलकाक्षिभि ।।६०।। ऐसे (पुरुषो का) अन्त (परिणाम) जिस राज्य मे उचित समझा जाता है उस राज्य की सेवा फल की आकाक्षा करने वालों से फिर भी नही छोड़ा जाता। (विश्वरूप के पुत्र शिवानद कवि सेवा मे फिर उपस्थित हुए।) तत्सूनु सुमति श्रीमान्देवद्विजपदार्चक । शिवानद इति ख्यात सर्वशास्त्रार्थपारग ।।६।। उस (विश्वरूप) के पुत्र, देव तथा द्विजो की चरण पूजा करने वाले, सुबुद्धि सम्पन्न, सब शास्त्रो के अर्थ जानने वाले शिवानद प्रसिद्ध हुए। राज्ञा सम्मानितश्चासीत्पाश्चात्ताप प्रकुर्वता। द्विजेन्द्राणा कवीन्द्राणा दातृणा च धुरि स्थित ।।६२।। पश्चाताप करते हुए राजा ने ब्राहमणो, कवियो तथा दानियो मे श्रेष्ठ उस शिवानद का सम्मान किया। ततो डोटीश्वराभ्यासे श्रीमदुद्योतभूभुजा। श्रीनाथादीन्पुरस्कृत्य जुराइल गढ जितम् ।।६३ ।। इसके अनन्तर श्रीनाथ आदि अधिकारियो को आगे कर राजा उद्योत चन्द्र ने डोटीश्वर के पास से जुराइल का दुर्ग जीता। किचित्काले व्यतीते तु कुमारो मारविक्रम । हरिचद्राभिद श्रीमान्देवलोकातिथिर्ययौ।।६४।। कुछ समय बीतने पर कामदेव के समान पराक्रमी कुमार हरिचन्द्र ( उद्योत चन्द्र के कनिष्ठ पुत्र) स्वर्गवासी हुए। गते कुमारे राजापि हाहेति प्रलपन्मुहु । व्यसु पपात रामस्य शोकादशरथो यथा।।६।। राजा भी कुमार के मरने पर बार बार हाहाकार करता हुआ पृथ्वी पर गिर पडा जैसे राम के शोक से दशरथ ने किया। (राजा उद्योत भी पुत्र शोक से स्वर्गवासी हुए।) तदापराज्य ज्ञानेदुर्गटेशगजकेसरी। स्वपूर्वराजनीतीना सारग्राही धुरधर ।।६६।। इसके बाद राज्य ज्ञान चन्द्र ने पाया जो गढनरेशरूपी गज पर केसरी के समान था, अपने पूर्वजो की राजनीति का सारग्राही था और धुरधर था। अज्ञानध्वातहता खलगणहृदयाभोजसकोचकर्ता। कीर्ति ज्योत्स्नाप्रसादोद्धटितजनमनव्यूहचचच्चकोर ।। स्फुर्जन्रात्रौ दिने चाद्भुतरसजनको भूपतिर्ज्ञानचन्द्र । साक्षात्सूर्योऽपि जात प्रदहनपर प्रौढशत्रून्प्रतापै ।।६७।। अज्ञान के अधकार का नाश करने वाले, दुष्टो के हृदय कमल को सकुचित करने वाले, जन मन रूपी चकोर को अपनी कीर्ति रूपी चाँदनी से प्रफुल्लित करने वाले, रात दिन द्वितीय सर्ग 43 अद्भुत रस के उत्पादक, ज्ञानचन्द्र शक्तिशाली शत्रुओ को अपने प्रताप से जलाने वाले सूद के साक्षात् प्रतिबिब थे। यो बागीश्वरसन्निधो हि जगता समुक्तिमुक्तिप्रदे। ख्याते श्रीशरयूतटे सुविधिना चन्द्रोपरागे ददत् । भूभाग परिवारिभूसुरपतिशिवानदाय भूमीपति । लक्ष्मीमार्दवबुद्धिवीर्यलसितश्चासीत्पुराषटसमा ।।६८ ।। ससार को भोग तथा मोक्ष देने वाले सरयू तट पर स्थित, प्रख्यात वागीश्वर के निकट जिसने विधिपूर्वक चन्द्रापराग म भूमि घेर कर शिवानद द्विज श्रेष्ठ को दी। लक्ष्मी से सम्पन्न, नम्रता बुद्धि तथा शक्ति से युक्त यह राजा छ वर्ष रहा। वामदवान्वयककश्चित्कुलागारा गढ गत । नाम्ना पदमापतिपी विश्वरूपीयसतते।।६।। कुलागार पद्मापति नाम का एक द्वपी जो वामदेव का वशज था और विश्वरूप की सतति था गढ़वाल चला गया। (पमापति द्वेष से देशद्रोह कर गढवाल चला गया।) तथेश्वर्य गढेशेन दत्त तस्मे दुरात्मने। अत्रत्याना तस्य दोपाज्जन्मभूरपि सहृता । ७० ।। उस दुष्ट का गढवाल नरश न वहाँ एश्वर्य प्रदान किया पर उसके (देशद्रोह से) दोष से यहाँ कूर्माचल में रहने वाला की जन्म की भूमि भी छिन गयी। (पद्मापति के इस कुकृत्य का फल समस्त ब्राहमणो को भागना पड़ा जब माणिक विष्ट ने राजा का सकेत मिलने पर इन्हे दण्ड दिया। कालनान्यव सजाता ज्ञानेन्दार्वपरीत्यता। स्वकमागय दातृत्व न्यस्त कार्पण्यमात्मनि।।७१ ।। कुछ समय पश्चात ज्ञानचन्द्र मे बुद्धि वेपरीत्य हो गया। अपने कुमार (जगत चन्द्र) को सब कुछ दने के लिय स्वय कार्पण्य भाव ( कमी, दारिद्रय भाव) अपना लिया। मालान्सर्वान्तृणीकृत्य मानसिहाय खशा । माणिकाता तृण वज्र कुर्वतानन वर्द्रिता ।।७२।। इयन ( ज्ञानचन्द्र ने ) सब पुगन कुलीन घगने लोगो को तिनके के समान तुच्छ बनाकर, माणिक आदि खशा को ( तिनका का वज्र समान बनात हुए) बढा दिया। (पुराने लोगो को हटाकर मणिक आदि लागा को राज्य प्रबध सोपा गया।) यनानीता गुणनिधिर्भवानदपद महत्। यकलाल्लखकान्दित्वा वड़िता नन्दुविष्टक ।।७३ ।। इमी ज्ञानचन्द्र न भवानद क महान पद पर गुणनिधि को ला नियुक्त कर दिया। सब (पुगन) लखको का लाडकर ( लखक पद पर ) नन्दु विप्ट को बढाया। ग्मानद समानीता वृद्धभन्लूक सन्निभ । माता लक्ष्माधररत्वका नतभिर्वधित कथम् ।।७४ ।।

44
कल्याणचन्द्रोदय
बूढे भालू के समान रमानद लाया गया। केवल एक पुराना (मत्री) लक्ष्मीधर कैसे बढाया
गया 2
विशिष्टान् पडितान्त्यक्त्वा मणिकण्ठपुर सरान्।
मडलादीन् बहून्चक्रे यत्र कुत्राधिकारिण ।।७५ ।।
मणिकण्ठ आदि प्रमुख विशिष्ट पडितो को छोडकर बहुत मडल बनाकर इधर उधर जिस
किसी को अधिकारी बना दिया।
एव सृष्टद्यतर कुर्वन् युवाशूरक्षमीनृप ।
यक्ष्मणा राजयुक्तेन सामर्षेणैव पातित ।।७६ ।।
इस प्रकार दूसरी ही सृष्टि बनाता हुआ वह युवा, शूर और क्षमाशील राजा राजयक्ष्मा से
पीडित हो स्वर्गवासी हुआ। ( असहनशीलता से ही गिरा।)
तत्सूनुर्गढपादिमडलगतान् जित्वैव भूपालकान।
सप्राप्तोऽय जगद् विधुश्च श्चबलवान्पौरदरतत्पदम् । ७७ ।।
उस (ज्ञानचन्द्र का) पुत्र गढवाल आदि मडलो के राजाओ को जीतकर बलवान् जगतचन्द्र
इन्द्र पद को प्राप्त हुआ।
दत्वा स्वर्णधरा गजाश्चबहुशो ग्रामाश्चगा कोटिशो।
मेरुर्येन न दत्त एव विभुना देवस्वबुद्ध्यैवहि ।।७।।
राजा जगत चन्द्र ने उर्वरा पृथ्वी (सुर्वण धारण करने वाली पृथ्वी ) हाथी, गाँव, बहुत सी
गाये देकर अपनी बुद्धि से मेरु केवल नही दिया।) (राजा जगत चन्द्र दान के लिये प्रसिद्ध
हुए।
ज्योतिर्विद् वीरभद्रो वरसचिवतया स्थापितो येन ।
मौल मत्वा तद्देश्वरूप कुलमतिविमल पालित दौत्यवृत्या।
आहूता येन सर्वे स्फुटितविगलिता रुद्रदेवादयोपि।
प्राप्त पूर्वं पद तै नरपतिहरक हा कृतान्तधिगस्क्ता।।७६ ।।
इसी राजा जगत चन्द्र ने वीरभद्र ज्योतिर्विद् को श्रेष्ठ सचिवपद पर स्थापित किया।
अत्यत निर्मल विश्व रूप के कुल को मौल जान कर उन्हे ( वशजो को) दूत वृत्ति मे नियुक्त
किया। रुद्र देव आदि सभी गत वैभव सचिवो को जिसने पुन बुलाया और पुराना पद
दिया वही राजा जगतचन्द्र काल कवलित हुआ। उस काल को धिक्कार है।
।। इति श्रीकल्याणचन्द्रोदये कूर्माचलीयकाव्ये शिवकवि कृतौ द्वितीय सर्ग ।।

।। तृतीय सर्गः ।। श्रीदेवचन्द्रस्तत आविरासीद्धनीपकग्रामविराषभूमि । पित्र्य पद श्रीनगर च येन कात्वा कृत स्वर्णतुलादिदानम् ।।१।। इसके बाद धनीपक (?) ग्राम मे निवास करने वाला देवचन्द्र राजा हुआ जिसने अपने पितरो की प्रथानुसार श्रीनगर पारकर स्वर्ण तुला दान में दिया। प्रौढ राज्येऽधिष्ठित देवचन्द्र दृष्ट्वा दुष्टै मत्रिन चाथभीत्या। विगै मौलै श्रीशिवानदमुख्यै न स्थेय चेदप्रसिद्धिर्भवेन्न ।।२।। देवचन्द्र को (मत्री सहित (?) राज्य में दृढता से अधिष्ठित देखकर दुष्टों ( मत्रियों ने) डर से यह सोचा कि शिवानद आदि मुख्य कुलीन ब्राहमण यहाँ न रहें तो हमें यहाँ सिद्धि मिलेगी। समत्र्येत्य प्राब्रुवत नवीनमुन मत्वादेवपूर्वैव सृष्टि । स्यादेव चेद्भदेवै शिवादिनदै स्थेय नाहणेशस्य पार्वे ।।३।। नवीन परिस्थिति अपने लिये उग्र समझ कर, आपस में यह मत्रणा कर वे दुष्ट बोले कि देव (चन्द्र) से पूर्व की परिस्थिति हो जाय यदि शिवादि ब्राह्मण नाहण के नरेश के यहाँ रहें। एव जिह्वै यत्र कुत्रानभिज्ञै मौलामात्या प्रेषिता कार्यसिद्धे। राजा सम्यग्प्रापित पजरस्थक्रीडावस्था दुर्जेनर्भूमिदेवै ।।४।। इस प्रकार (मत्रणा कर) बिना किसी को बताये कुलीन आमात्य इधर उधर कार्य की सफलता के लिये भेजे गये। इस प्रकार दुष्ट ब्राहमणो ने राजा (देवचन्द्र) को पिंजड़े में भली प्रकार भोग विलास की अवस्था मे पहुँचा दिया। (इन दुष्टों ने गहरा षडयत्र कर राजा के विनाश का उपाय सोचा। अच्छे लोगो को राज्य से हटा दिया।) यावद् ज्ञानस्याकुरोत्पत्तिरासीदेवीचंद्र यत्तायास्त्वणुत्वम् । तावद् दुष्टैर्दारुण स्त्वर्धरात्रौ सुप्तो राजा दीर्घनिद्रा प्रणीत ।।५।। जब तक थोडा भी ज्ञान इस भयकर षडयत्र का देवीचद्र को होवे, उन भयानक दुष्टों ने (माणिक, पूरनमल, रणजीत पटोलिया तथा अन्य दुष्टो ने) अर्ध रात्रि के समय सोया राजा (देवीपुर में) मार डाला। (कूर्मांचल का विनाश यही से प्रारभ हुआ।) तत्कालमारभ्य गत शिवादिनदस्य सूनु शिवदेव नामा । भ्रमन्स्थित श्रीविजयप्रकाशपार्श्वेऽति भास्वच्छिरमोरदेशे।।६।। उस समय से ही इधर उधर घूमता हुआ शिवानद का तेजस्वी पुत्र शिवदेव सिरमोर देश में (नाहण मे) श्री विजय प्रकाश के पास पहुँचा। अथ माणिकनामधेयक कृतवान्कूधिराधिपत्यताम्। प्रतिगृहय कठेडियाख्यक हरिचन्द्रस्यसुतासुतशिशुम् ।।७।। इस (भयानक हत्या) के बाद माणिक नाम के व्यक्ति ने हरिचन्द्र (उद्योत चन्द्र के कनिष्ठ पुत्र) की पुत्री के पुत्र कठेड वशीय ( अजीत को) शिशु को कूर्माचल का राजा बनाया।

46 कल्याणचन्द्रोदय स सहायमवाप्य भूसुर बहुवक व तथास्त्रधारकम् । नृपमौलजनान्विमर्दयन्श्स्वमताशक्तजनानवर्द्धयत् ।।८।। उसने (माणिक ने) ब्राहमण तथा बहुत कुटिल शस्त्रधारी लोगो की सहायता प्राप्त कर (पूर्व) राजा के पुराने सलाहकारो का दमन किया और अपने विचारो मे आस्था रखने वाले लोगो को बढाया। भिषज कमपीष्टसाधकशठमतष्पुरचारिण जडम्। वरमौक्तिकभूषणान्वित तमकार्षीद्बहुविप्रकटकम् ।।६।। उसने (माणिक) अन्त पुर जाने वाले किसी मूर्ख, साथ ही दुष्ट विप्रो के कटक, वैद्य को अपना इष्ट साधने के लिये सुन्दर आभूषण दे ( अपनी ओर मिलाया।) ईदृग्विधैर्मूसुरकै महत्व प्राप्त तदानी सचिवै पद स्वम् । देशेषु सर्वेषु तथाधिपत्व काशीपुरादिष्वपि तैरवाप्तम् ।।१०।। इस प्रकार ब्राहमण सचिवो ने अपने पद का महत्व प्राप्त किया तथा काशीपुर आदि सब जगह अधिकार पाया। एक शिवानद इति प्रसिद्धो दु खी स्थितोभूसुरचक्रवर्ती । यस्तजितोहदिवमाहूयेति शिवादिदेव सिरमोरदेशात् ।।११ ।। केवल द्विजाग्रणी शिवानद बहुत दुखी था। उसे रात दिन डराया जाता था कि सिरमौर से शिवदेव को बुला लो। गाम्भीर्येण सरित्पति विजयते सदिययागीष्यति । वाचाचोद्भव सन्निभ प्रतिभयाक्षात्या च पृथ्वीसम । रूपे मारसमो जये जयसमो द्रोणेन तुल्यो बली। दाने कर्णसम सुतस्तव कथ नायाति कूर्माचले।।१२।। तेरा पुत्र (शिवदेव) जो गम्भीरता मे समुद्र से तथा सद्भिया मे सामवेदी से अधिक है, जो प्रतिभा तथा वाणी मे विष्णु के समान है, क्षमा मे पृथ्वी के समान, रूप मे कामदेव के समान, जय मे जय के समान, द्रोण के समान बली, दान मे कर्ण के समान है वह कूर्माचल क्यो नही आता? यदोद्योतचन्द्रस्य सूनो सुराज्य भवेदा सुतो मे स एव प्रधान । यदाजीतचन्द्रस्य दार्च कदाचिन्त्तदामेकनिष्ठ सुतोऽस्तीहभोक्तुम् ।।१३।। इतीवानिश काम्यमान सुगीतै छलेनासितद्गद्यपद्यैर्नवेक्ष्मि। अतो गच्छ मत्पार्श्वत कित्वयामे विधेय सुत त दर्शयस्व ।।१४।। युग्मम् ।। जब उद्योत चन्द्र के पुत्र का (कल्याणचन्द्र का) सुराज्य होवे तो मेरा पुत्र ही प्रधान होगा। कदाचित् जब अजीत चन्द्र की मृत्यु हो जाय तो मेरा कनिष्ठ पुत्र है जो इस (राज्य) का भोग करेगा। इसी की रात-दिन इच्छा करते हुए, अच्छे गद्य पद्य मय गीतो से, छल से नही जानता हूँ। इस लिये मेरे पास से तुम जाओ। तुमने मेरे लिये क्या करना है ? उस पुत्र को शीघ्र दिखलाओ।

तृतीय सर्ग 47 मत्री भवानदकसज्ञको हतो यशोधरस्यापि पशोप॑ति कृता। रमापतेश्चापि च लुठन महदृष्ट्वानभीतस्पलित किमर्थम् ।।१५।। मत्री भवानद मार डाले गये। यशोधर की भी पशु के समान मृत्यु हुई। रमापति को लूटा गया। इसे देखकर (वह) डरा नही पर किसलिये भागा ? गत श्रीशिवानदनामाथ काशी भयात्सोऽपिदैवत्प्रभुर्माणकीय । मृत्स्पिपलीमाश्रिता केचिदेके कृतार्थाश्च कल्याणचन्द्रादभूवन् ।।१६।। भय से शिवानद काशी चले गये। भाग्य से माणिक (विष्ट) का स्वामी (अजीत चन्द्र) भी मरा। पिपली मे स्थित कुछ लोग कल्याण चन्द्र से कृतार्थ हुए। (अजीत की हत्या हुई। महर फडत्याल दल के लोगो ने कल्याण को गद्दी पर बिठाया।) इतोऽपि शूद्र कमलापतेस्क्त कूर्माचलस्यैव शिरो चिकीत्। सपुत्रमित्र स हि खडखड नीतो नवीनेन नृपेण चासीत् ।।१७।। इसके बाद उस शूद्र ने कमलापति का शिर ऐसे काट डाला मानो कूर्माचल का ही शिर काट डाला हो और नये राजा ने उसको पुत्रो और मित्रो सहित टुकडे-टुकडे कर डाला। सदश्विरूपो मणिरामनामा ज्योतिर्विदग्रे जयरामयुक्त । तत्रत्यलोकस्य तृतीयनेत्रोह्ययध कृतोधेन विनाशकाले।।१८।। आगे जयराम के साथ प्रसिद्ध ज्योतिषी मणिराम को भी जो कि वहाँ के लोगो के लिये तीसरे नेत्र (ज्ञान का प्रकाश देने वाले) के समान था उस अधे ने अधा बना डाला। नोपद्रवाच्छिवरामगेहे सरक्षकस्तत्र तु वासुदेव । यत्स्त्रीचरित्र प्रवदति लोके तत्सत्यताकारि हि नदुपल्या।।१६।। उपद्रव से शिवराम के घर को बचाने वाला वासुदेव के अतिरिक्त कोई नही था। ससार मे जो स्त्री चरित्र कहा जाता है उसकी सच्चाई नदु की पत्नी ने कर दिखलाई। नीति कृतेय हरिसिहवर्मणा स्कन्ध समारोप्य विपक्षमुच्चकै । तथैव विद्वत्कुलचक्रवर्तिना शिवेन दूरस्थितिरेव कल्पिता।।२०।। उच्च विपक्षी लोगो को (अपने साथ मिला कर) यह नीति हरि सिह ने बनायी। उसी रहते हुए भी विद्वानो मे श्रेष्ठ शिव ने उसे बखूबी समझ लिया। ये सस्थिता वेतसवृत्तिमत्यामाश्रित्य कल्याणविधुतदानीम् । कालेन सिहा इव ते व्यनर्दन्क्वशूद्रगतेत्यसकृद्धवत ।।२१ ।। जो लोग कल्याण चन्द्र का आश्रय लचीले वाँस की वृत्ति के समान लिये थे ( झुके हुए) कालानतर मे सिह के समान गर्जते हुए बार-बार कहने लगे कौन शूद्रगामी है ? हतो भ्रातृपुत्रेण साक यदीय पिता कृष्णदेव प्रधानस्तदेति। कृत पूर्वकालेभवन्सर्व एव लसत्कूर्मशैलीयलोकास्तुसिहा ।।२२ ।। जब पिता भाई के पुत्र के साथ मारा गया उस समय कृष्णदेव प्रधान थे। पूर्व समय मे आपने सब कुछ किया। कूर्माचल के लोग तो सिह के समान शोभित है। प्रकार दूर 48 कल्याणचन्द्रोदय कृतज्ञता भूय कृता तदासीतभृत्यभृत्या अपि मौक्तिकौघान्। अवाप्नवन्ते किमतोस्ति लभ्य नृपेण लोकेन च धन्यताप्ता ।।२३ ।। कृतज्ञता बहुत दिखलायी गयी उस समय। उनके नौकरों के सेवको को भी बहुत धन आभूषण मिलने पर फिर क्या पाना रह जाता है। राजा और जनता ने धन्यता (वाहवाही) प्राप्त की। श्रुत्वेति वार्ता शिवदेवनामा समागत पश्चिमत स्वदेशम्। पाश्चात्यभूपालहयान् गृहीत्वा कल्याणचद्र प्रति दौकिकार्थम् ।।२४ ।। यह बात सुनकर शिवदेव पश्चिम से (नाहण से) अपने देश लौट आया। कल्याण चन्द्र को उपहार देने के लिये पश्चिम के राजा के घोडे लाया। सतज्य तत्तच्छिरमोरदेशे सर्वोपरित्व प्रथम ततोपि। भूपस्य तत्रत्यकुमारकस्य कृपा च गोष्ठी सचिवैश्चसाकम् ।।२५ ।। वस्त्राणि सूक्ष्माणि हयादियान सुभोग च यथेच्छक कल्याणचद्रार्पितचित्तवृत्या मौलीयबुद्ध्यातृणवत्कृततत् ।।२६ ।। युग्मम्।। शिवदेव (पाण्डेय) ने कल्याण चद्र को अपनी सारी चित्तवृत्ति समर्पित करने के कारण तथा कुलीन कुलीय बुद्धि से सिरमोर देश मे अपना सारा ऐश्वर्य तथा मान को तिनके के समान तुच्छ समझा। उस देश मे अपना श्रेष्ठतम पद, वहाँ के राजा तथा कुमार की कृपा, मत्रियो के साथ बैठके, सूक्ष्म वस्त्र, घोडा गाडी, यथेच्छ भोग सब छोडकर वह स्वदेश आ तु। गये। आगत्य राज्ञा स्फटिकाभिरामशीलेन वाक्येन सुधासमेव। सतर्पितेवापि च हर्षदेव हर्षस्य हर्षादतिहर्षितेन।।२७।। शिवमन शिक्षा विहिता नृपाय विलिख्य पत्रस्य परपरात । शिक्षा तु सा क्षुद्रजनेन मध्ये हिताय भूपाय कदापि नोक्ता।।२८ ।। युग्मम् ।। आकर (शिवदेव के आने पर) स्फटिक मणि के समान सुन्दर शील युक्त तथा अमृत के समान वाक्य से राजा ने उन्हे सन्तुष्ट किया। अत्यत हर्षित शिवदेव ने राजा के लिये शिक्षा पत्र की परपरा से लिख कर दी। राजा के हित के लिये वह शिक्षा नीचो के बीच कभी नही कहनी चाहिये। उत्तानबुद्धयाधिकृत सभाया प्रमाणिक पूर्वपद न दत्तम् । नीचा कृता सद्गतमौक्तिकार्हा काकेषु हस किमसौ करोति।।२६ ।। अपनी उत्कृष्ट बुद्धि से अधिकृत राज सभा मे पहला प्रामाणिक पद उसे नही दिया गया। अच्छी मुक्ता माल धारण करने योग्य व्यक्ति को छोटा पद मिला। कौवो के बीच वह अकेला हस क्या कर सकता है? स्थित्वा कथचित्प्रभुसन्निधाने विलोक्य तत्सारमसारमेव। निषेविताधूजटिसत्कृताभूर्भूत्वापितु पादपरागभृग ।।३०।।

49 तृतीय सर्ग कुछ समय प्रभु (कल्याण चन्द्र) के पास रहकर, उस सब सार को (वैभव को) असार समझकर पिता के चरण पराग का भवरा हो कर उसने शिव द्वारा सम्मानित देवी की आराधना तथा सेवा की। (राज दर्बार तथा सासारिक वैभव की लिप्सा त्याग दी।) कृत्वा सदाके पितर कथचिज्जलादिदान सुभुजिक्रिया च। कडूयन शौचमनेन सर्वा वातेन वद्धस्य कृतातिसेवा ।।३१ ।। वात से पीडित अपने वृद्ध पिता (शिवराम की) सेवा बहुत की। पिता को गोद मे बिठाकर पानी पिलाया, खाना खिलाया, उनको शौच कराया, उनकी खुजली दूर की। हर प्रकार से वात पीडित पिता की सेवा (काशी मे) की। प्रीतेन पुत्रा तु जप स्तवादिकृतस्त्रिवर्ष शयनस्थितेन। कृत्वा स्वपद्येव शिवादिदेव सरक्षणायैव हि नाममालाम् । ।३२ ।। पुत्र द्वारा सेवित शिव (देव) ने पलग पर लेटे ही तीन वर्ष तक जप प्रार्थना की (वात के कारण)। अपने ही रचित पद्यो से अपनी रक्षा के लिये नाममाला बनायी। भवानीशतारे रमे रामगगे गणेशान्नपूर्णे रवे काशिमध्ये। हरे माधवत्र्यक्षदुर्गेऽब विष्णो शिवे कालिके मे सुखी मत्सुत स्यात्।।३३ ।। काशी के मध्य मे सुन्दर गगा के तट पर स्थित शिव को पार लगाने वाली, गणेश की अन्नपूर्णा, त्रिनेत्र वाली हे दुर्गा माता तथा शिव और विष्णु, हे मेरी कालिका, मेरा पुत्र सुखी होवे। ततोक्तपद्य हृदये निधाय मत्वा जनिं स्वा सफलाशिवेन। ससेविता सा मणिकर्णिकेत्थविश्वेशपाइँ पितरनिषेव्य।।३४।। उपर्युक्त पद्य को हृदय मे धारण कर, अपने जन्म को सफल जानकर, पितरो की सेवा कर शिव ने विश्वनाथ के निकट मणिकार्णिका की सेवा की। इस प्रकार प्रातष्कृत पच नव सदैव स्नान गभस्तीश्वरदर्शनच। श्रीभैरवस्यापि च दडपाणेवीरेश्वरस्यापि च सकटाया ।।३५।। सदा प्रात काल पाँच नौ बार स्नान करके विश्वनाथ, श्री भैरव, दडपाणि, वीरेश्वर तथा सकटा के दर्शन किये। सिद्धयेश्वरी चैव सदान्नपूर्णा नत्वाथ दुढीवरबृद्धकालम्। ससेव्य विदन्विमाधव च गगास्क्तापक्तिमितै सुपद्यै ।।३६।। सिद्धयेश्वरी, सदा अन्नपूर्णा, ढुढीवर बुद्ध काल को नमस्कार कर, विद्वर माधव की सेवा कर, इन सुदर पद्यो से गगा की स्तुति की। भगवति भवताप दारितु देवलोकात्पतति वसुधारा स्वादुपीयूष धारा। स्पृशति यदि जनस्ता ज्ञानवानाकोतेसुरदसि तौ तौ तुल्यता भजेते ।।३७ ।। हे भगवति गगे, तेरी आस्वाद मे मीठी अमृतधारा देवलोक से भवताप दूर करने के लिये गिरती है। यदि कोई ज्ञानवान् अथवा मूर्ख भी उस धारा को छूता है वह देवसभा मे उन्ही के तुल्य हो जाता है।

50 कल्याणचन्द्रोदय हरिचरणसरोज भासयती स्वभासा हरशिरसिसुधाशो सन्निधाने वहती। अपि च विधिपुरोगै सेवितासिद्धसधै रपहरतु मदीय पापनुत्यापजालम् ।।३८ ।। विष्णु के चरणकमलो को अपनी ज्योति से प्रकाशित करती हुई, शिव के मस्तक मे विराजमान चन्द्र के निकट बहती हुई, ब्रहमा आदि मुख्य देवताओ तथा सिद्ध योगियो द्वारा सेवित गगा मेरे पापजालो को दूर करे। बृदारकाम्बुजमुखीकुचकुभलग्न दिव्यागरागसुरभीकृतवारिपूरा। तीरास्थितोत्तमसुरद्रुमचुविभृगज कारि चचलतरा त्रिपथापुनातु ।।३।। वह गगा मुझे पवित्र करे जिसका जल श्रेष्ठ कमलमुखियो के कुचो मे सलग्न दिव्य अगराग से सुरभित है और जिसके तट पर स्थित उत्तम कल्पवृक्ष मे भ्रमर गुजार रहे है और जिसकी लहरे चचल हो उठी हैं। यस्या समीरपरिशीलनतो महेन्द्र पानीयबिन्दुसकृदाचमनाद्विरचि । उन्मज्जनादतिपतेर्जनकोरिपुर्वा लोकोम्बवत्यवनतोऽस्मि सुरापगाताम्।।४०।। जिस गगा के समीर के बहने से महेन्द्र, पानी की बूँद का एक बार आचमन करने से व्रहमा, स्नान करने से कामारि शिव पवित्र होते है। उस सुर सरिता के प्रति मै सिर झुका कर प्रणाम करता हूँ। तव चरणसरोजे देवि भृगो भवेय किमुत वरविहग शक्ररूप च हित्वा । कृमिरपि भवितु मे त्वत्सकाशो समीहा। द्विपदपशुविमुक्त सार्वभौम किमस्ति।।४।। हे देवि, मैं तुम्हारे चरण कमल मे भृगरूप हो जाऊ। अथवा ऐन्द्र स्वरूप छोडकर पक्षी हो जाऊ। मेरी इच्छा है कि तुम्हारे पास कीडा हो जाऊ। मनुष्य तथा पशु से विमुक्त सार्वभौम और कौन है। दीनातिदीन नखरदनैविहीन नासाविलीन पशुतोघ्यधीन। प्रज्ञातिहीन रजसाविलीन प्रक्षालयेत्को जननी विनान्य ।।४२।। मॉ गगा के बिना दीनो से भी दीन को, नख दन्त विहीन को, नासिका रहित को, पशु से भी अधिक गये बीते को, प्रज्ञाहीन को और धूल से आवृत को कौन धुलायेगा ? पितागरीयान्पितृतोऽपि माता दयावती सूक्ष्ममनादवैमि। भक्तया भवस्तोषमुपैत्यकचित्सतारयेत्वत्वणुजीवमात्रम् ।।४३ ।। - तृतीय सर्ग 51 पिता महान हैं पर पिता से भी अधिक दयावती माँ है। यह मै सूक्ष्मबुद्धि से जानता हूँ। भक्ति से तुष्ट होकर वह किसी भी अणु जीवमात्र को तार देती है। हरालयात्सागरतस्त्वमेका सुरेन्द्रतापादनशक्तिरूपा। श्रीतीर्थराजस्य तथाप्यनुज्ञामालव्य काश्या पतन तनो स्यात्।।४४।। सुरेन्द्र के कष्ट को दूर करने के लिये अनत शक्तिरूपा तुम कैलास से सागर तक एक हो। फिर भी तीर्थराज (प्रयाग) की आज्ञा मानकर काशी मे प्रवाहित हुई। त्वत्तीरे तनुमोचनोत्सवमह काशीश्वरालकृते काक्षेऽस्मादपरो वशे न हि भवेतद्वाक्षित जायताम् । मातर्जाह्नवीदोपत कफघटासघट्टिते घूर्णिते जिह्वाया परिवर्तता तदात्वन्नामचिन्ताक्षरम्।।४५ ।। हे माता जाहवी, विश्वनाथ से अलकृत तेरे तट पर मेरा शरीर छूटे। इससे अधिक किसी दूसरे वर की इच्छा नही है। दोप से कफ वात पित्त से दबाये जाने पर हे मातु गगे, तेरे नाम की चिन्ता मिटाने वाली निरन्तर रट जिह्वा मे चलती रहे। धन तावदाकाक्षते जीवलोके शिवादानशौडोनभूतोनभावी। न चास्ते प्रथा प्राप्तुकामोऽस्मि काश्यामियदानशीलोन मे विश्वनाथात्।।४६ ।। जीव लोक (ससार) मे धन की तब तक आकाक्षा करता है (जब तक) उसे (यह आभास नही होता कि शिव सा दान शूर न हुआ न होगा।) माँगने की प्रथा काशी मे नही है। न मै इच्छा करता हूँ। विश्वनाथ से अधिक इतना बडा दानशील कोई नही है। (वही बेडा पार करेगे। एव स्तुवन् स्तोत्रपुराणगीतकै देवान्पितृश्चैवुतोपयन्स्थित । तात्वत्तु दैवादनुज प्रियात्प्रियो ब्रह्मादिनद समुपागतो गृहात्।।४७ ।। इस प्रकार स्तोत्र, पुराण, गीतो से देवता, पितरो की स्तुति करता हुआ (शिव राम पाण्डे) वहाँ (काशी मे) स्थित था तब सहसा उनका प्रिय से भी प्रिय कनिष्ठ भ्राता ब्रहमानद वहाँ घर से आया। श्रीतीर्थराजस्य जल गृहीत्वा श्रीवेद्यनाथाय नृपार्थमुच्चै । ददन् करे भूपनिदेशपत्री शिवस्य चाहूतवतोऽग्रजस्य ।।४।। प्रयागराज का जल लेकर राजा (कल्याणचद्र) के लिये श्री विश्वनाथ को चढाते हुए ब्रह्मानद ने राजा का आज्ञा पत्र अपने ज्येष्ठ भ्राता शिवानद (जिसे बुलाया गया था), के हाथ मे दिया। ।। युग्मम् ।। ज्येष्ठो महात्मा पितृभक्तिशील सद्भातृभक्तोऽपि जपन्यजस्तु। योग सुजातस्तनयो र्यदेव शिवात्मकत्व विहिउँनु पित्रा ।।४।। ज्येष्ठ पुत्र ( शिवराम ) महात्मा तथा पितृभक्त था। कनिष्ठ भ्राता (ब्रहमानद) भी भ्रातृभक्त था। जिस समय उन दोनो पुत्रो का जन्म योग हुआ तो पिता (विश्वरूप) ने शिव के साथ साक्षात्तकार कर लिया था।

52 कल्याणचन्द्रोदय कैवल्यमेवाशुगतस्य सम्यक्कृत्वोर्द्धदेहादिकमस्यभक्तया । श्रीमालती मातृसमानशीला नत्वा गतो गेह जनानुरागात् ।।५।। कैवल्य पद प्राप्त किये विश्व (विश्वरूप) का भक्ति से ऊर्द्धदैहिक सब कृत्यो को भलीभाँति करके, मात समान श्रीमालती को प्रणाम कर (शिव) देशवासियो के प्रेम से वापस घर को रवाना हुआ। गत्वाल्मपुर्यां प्रथम नृपस्य दृष्टि समीचीनतरा न दृष्टा। कदर्यसगादतिनिर्मलोऽपि किं दर्पणो मालिनता नधत्ते।।५१ ।। अल्मपुरी (अल्मोडा) जाकर पहले राजा (कल्याण चद्र) की दृष्टि उसे ठीक न दिखलाई दी। क्या कीचड के सग से निर्मल दर्पण भी मैला नही होता है प्रभोस्क्त तादृक् समवेक्ष रूप ज्वालान्तिक द खनिवेदनाय। गत्वा स्तुतिस्तत्र कृता शिवेन प्रोड्डीयते हयात्मसम खगेन।।२।। अपने स्वामी का वैसा रूप देखकर अपने ज्वालान्तिक दुख निवेदन करने के लिये शिव (कवि) ने वहाँ (राजसभा मे) जाकर स्तुति (देवी की) की। अपने साथ खग की भाति उडा। ज्वलज्ज्वाले मातस्त्रिभुवनपरित्राणशरणे सुधासारे पारे सकलसुरसपूजितपदे। असारे ससारे पतितपहिते ज्ञानसलिले समुद्भर्तु हर्तु वृजिनमपि योग्यासि परमे।।५३ ।। ज्वाला के समान प्रकाशमान हे मात । तुम तीनो लोको की रक्षिका तथा आश्रय हो, तुम अमृतस्वरूप हो, सपूर्ण देवो द्वारा तुम्हारे पैर पूजे गये हैं, इस असार ससार मे पतितो के हित के लिये ज्ञान रूपी सलिल हो, पापी का उद्धार करने तथा पाप दूर करने के लिये तुम परम योग्य हो। ज्वलज्ज्वालेशक्तस्तवचरितमुच्चैर्विरचितु चतुर्वक्त्रैर्वेधा न भवति फणीन्द्रो मुखशतै । कथ मर्त्यस्तुच्छ स्तुवनमिह कु-महमहो समुद्भर्तु हर्तु वृजिनमपि योग्यासि परमे।।४।। ज्वाला के समान प्रकाशवती शक्तिशालिनी, तेरे चरित्र का उच्च स्वर से बखान करने के लिये चार मुंह वाले ब्रहमा तथा सैकडो मुंह वाले शेष भी समर्थ नहीं हैं। किस तरह मै मरणशील तुच्छ व्यक्ति तुम्हारी स्तुति करूँ ? पापी का उद्धार तथा पाप का नाश करने के लिये तम समर्थ हो। ज्वलज्ज्वाले वेधा सृजति तव मूर्तिजगदिद हरि प्राप्तो विश्वभर इति प्रथा तेऽतिकृपया। निमेषोन्मेषाभ्या हरति च हर सर्वमखिल समुद्भर्तु हर्तु वृजिनमपि योग्यासि परमे।।५।।

तृतीय सर्ग 53 . ज्वाला के समान प्रकाशवती माँ, तेरा ही मूर्त रूप ब्रहमा इस जगत को रचता है। तेरी ही अतीव कृपा से विष्णु ससार का भरण-पोषण करता है। पल भर में शकर इस सपूर्ण जगत का सहार करते हैं। पापी का उद्धार करने, पाप को दूर करने में तुम सक्षम हो। ज्वलज्ज्वाले तुष्टि धृतिरपि च लक्ष्मी स्मृतिरपि क्षुधाछायाशक्तिस्तुहिन गिरिकन्ये ननु दया। जगन्निद्राबुद्धि जनजननिसर्वं त्वमसि यत् समुद्भर्तुं हर्तुं वृजिनमपि योग्यासि परमे।।५६ ।। हे ज्वाला सम प्रकाशवती जगत माता तुम तुष्टि, धृति, लक्ष्मी, स्मृति, निद्रा, बुद्धि सब कुछ हो। पापी का उद्धार करने और पाप नष्ट करने में तुम परम योग्य हो। ज्वलज्वाले दृष्टया भृशतरमभूद्रस्मनिचय सधूमाक्षो दैत्यस्तवमहिषरक्तौ कवलको। त्वयाधीशे शुभे हतवति सुरत्त्राणमभवत् समुद्धर्तुं हर्तुं वृजिनमपि योग्यासि परमे।।७।। हे ज्वालासम प्रकाश वाली माँ, तुम्हारी दृष्टि से वह धूम्राक्ष दैत्य भस्म का ढेर हो गया, महिषासुर और रक्तबीज तुम्हारे ग्रास हो गये, तेरे द्वारा असुरो के स्वामी शुभ के मारे जाने पर देवताओ की रक्षा हुई। हे माँ, तुम पाप दूर करने तथा पापी का उद्धार करने मे सक्षम हो। ज्वलज्ज्वाले पापान्ममपरममानापहरण यदा जात तापस्तव जननि नाम्ना निरसित । स एवाह साक्षात्तव चरणमूलेम्ब पतित समुद्भर्तुं हर्तुं वृजिनमपि योग्यासि परमे।।५।। हे उज्ज्वल प्रकाशमयी, पाप से मेरे परम अहकार का अपहरण किया। जब दुख हुआ, माँ, तेरे नाम से दूर हुआ। वही मैं, माँ, तेरे चरणों में गिरा हूँ। पाप हरने और पापी को उबारने के लिये तुम परम योग्य हो। ज्वलज्वाले काले पलितममले म्लानवदन करालै दुष्टोद्यै वहुविधमवद्यैरनुदिनम् । समाक्रान्त भ्रान्त मधु समुद्भर्तु हर्तुं वृजिनमपि योग्यासि परमे।।५६ ।। शिव कवि कृतौ कूर्माचल काव्ये कल्याण चन्द्रोदये तृतीय सर्ग ।। चतुर्थ सर्ग ।। " (प्रथम २० श्लोक नहीं है। २७, २८, २६ पृष्ठ उपलब्ध नहीं हैं।) वमतिष्कृतेयम् ।।२०।। मूढोऽस्मि पुत्र सुतरा मदीय कूर्माचले लुठनमेव द्राक् । महर्द्धियुक्तस्य कुबाधवास्ते मृतावशिष्टा अपि साक्षराश्च ।।२१ ।। युग्मम् ।। (युग्म श्लोक का पूर्वार्ध नही है।) मै मूढ हूँ। पुत्र मेरा अधिक ( मूर्ख) है। शीघ्र ही कूर्माचल मे खुली लूट हुई। ऋद्धि सम्पन्न होने पर भी तेरे ( राजा के ) सबधी दुष्ट है। कुछ इनमे मरे, कुछ बचे, फिर भी कुछ जीवित है। ( सशस्त्र है) इत्थ खलस्त्वत्र निधाय सूनु पैशुन्यमुच्चै कृतवान्कृतघ्न । राज्यस्य मूल किल विश्वरूपकुल समुन्मूलयितु सदेच्छन्।।२२।। इस प्रकार उस कृतघ्न दुष्ट ने पुत्र को यहाँ रखकर बहुत बडी दुष्टता (चुगलखोरी) की। राज्य के मूल विश्वरूप के कुल को भली प्रकार उखाड फेकने की इच्छा की। श्रृणु तदीश कुलव्रतमीदृश स्वनृपति परिपृच्छययतस्तत । गमनमिष्टतर फलदायक स्थितिरपीह तथैवहि कामये।।२३ ।। हे ईश, सुनो वह कुल का व्रत इस प्रकार है। इधर उधर अपने नृपति से पूछकर जाना ही अच्छा और फलदायक है। यहाँ भी स्थिति वैसी ही हो यही कामना है। तव नरेश पदाम्बुजसन्निधौ शिव इति प्रथितो मधुपो युवा। सुललित मकरदरस पिबन्स्मरतितामलिनीसहचारिणीम् ।।२४ ।। हे नरेश, आपके चरण कमल के निकट तो शिव युवा मधुप के समान है। सुन्दर स्वादिष्ट मकरद रस (पराग) को पीते हुए अपनी भ्रमरी सहचरी का स्मरण करता है। भ्रात्रात्मजै सार्द्धमथोद्य तेन शिवेन गतु विजयादिराज्ञे । सान्वर्थनाम्ने सकुटबकाय सन्मत्रियुक्ताय कृतास्तदाशी ।।२५ ।। विजय प्रकाश (सिरमोराधिपति) के राज्य मे भाई तथा पुत्रो के साथ जाने के लिये शिव ने सार्थक नाम वाले (विजय) के लिये मत्री सहित, कुटुब सहित आशीर्वाद दिया। जगतिहि विजयप्रकाशभूप सुतवनितावरमत्रिमडित । चिरमिहलभता क्रमेणधीमानरिनिवहे स्वजनेऽपि नाम सार्थम् ।।२६।। सुत, वनिता, श्रेष्ठ मत्रियो से युक्त ससार मे धीमान राजा विजयप्रकाश शीघ्र ही क्रम मे शत्रु समूह मे विजय और स्वजनो मे प्रकाश पाये। नाम की सार्थकता क्रम से मिले। जयति जगतिधीर श्रीकुमारावतार प्रणयनयनिधान प्राण एव प्रजानाम् । प्रभुगुणगणपूर्ण श्रीविलासैकदक्ष क्षितिपवरकुमार श्रीप्रदीपसिह ।।२७ ।। राजा के श्रेष्ठ कुमार प्रदीपसिह की ससार मे जय हो जो धीर है, कुमार कार्तिकेय के अवतार है, प्रणय की नीति में कुशल हैं, प्रजा के प्राण हैं, प्रभुत्व के सभी गुण समूह से पूर्ण है और भोग विलास मे दक्ष हैं। (लक्ष्मी प्रदत्त ऐश्वर्य पूर्ण है।

चतुर्थ सर्ग 55 विप्रेषु वैरिनिकरेषु च दानवृष्टिलॊकेषु नीतिनिगमेषु च चारुदृष्टि । क्रूरेषु ततृवलकसृष्टिषुकोपदृष्टिरानदसिह इति राजति राजसूनु ।।२८ ।। राजपुत्र आनन्दसिह शोभायमान हैं जो ब्राह्मण तथा शत्रु समूह को दान की वृष्टि करते हैं, जिनकी ससार तथा नीति शास्त्र मे सुदर दृष्टि है। क्रूर अरि समूह पर जिनकी कोपदृष्टि रहती है। धरामरस्याशिषमित्यमग्या श्रुत्वा भवन्स्कदरुपूर्वकास्ते। चित्रार्पितेवैप बहूपभोक्तु कल्याणचद्र प्रतिधावितोक्त ।।२६।। भूमिदेव शिव का इस प्रकार अग्रणी आशीर्वाद सुनकर (सैनिक) चित्र लिखित से हो गये। बहुत काल तक उपभोग करने के लिये कल्याण चद्र की ओर दौडा ढिया (भेज दिया )। तथापि रत्नस्य परीक्षकैस्तै राशे नृपामात्यजनैळलेखि। सप्रेप्यतामत्र शिवादिदेवो न मानित येन वचोस्मदीयम् ।।३०।। फिर भी रत्न के परीक्षक गजसचिवो ने राजा के लिये लिखा, "शिवदेव यहाँ भेजे जॉय जिसने हमारा कहना नही माना।" प्रागेव राजाभिपजाधमेन ससूचितस्ततव नायकेन । पत्री विलोक्याज्वलद्रुग्ररोषानृतस्ययोगादनलो यथैव ।।३१ ।। आपके नायक नीच राजवैद्य ने पहले ही सूचना दे दी। पत्र देखकर वह क्रोध से उबल पडा जैसे घी पड़ने पर आग भडक उठती है। तदा काकतालीययोगाद्घरट्टे हृते शूद्रकल्याणकेनैवशैवे। छलन्यायमध्ये द्रुरुक्त युद्रुक्त सदा पापवार्ता बुधैर्गोपनीया।।३२ ।। उसी काकतालीय योग से शूद्र कल्याण ने चक्की छीन ली। घट छीन लिया। छल न्याय के सबध मे जो कुछ गया वह यह है कि बुधो ने पापवार्ता गोपनीय रखनी चाहिये। श्रीरुद्रचन्द्रादिमहीपतीना द्विजादरोभूदधुनेतरस्य। सहस्रवर्षीय घरट्टक यद् द्विजात्समाकृष्य खशाय दत्तम् ।।३३ ।। श्री रुद्रचन्द्र आदि राजाओ ने द्विजो का आदर किया। अब इन द्विजो मे एक का हजार वर्ष पुराना घट द्विज से छीन कर खश को दिया गया। यत्तत्र म स्यात्किल वैरभद्री श्रीमद् भवानद इति प्रसिद्ध । स्थितास्तदान्यैवदशेत्यजस्त्र विशकते विप्रकुलावतस ।।३४।। वीरभद्र का पुत्र भवानद वहाँ न होव तो विप्रकुलभूषण (शिव) को बहुत शका होती। दूसरे तो उस समय केवल किकर्तव्य विमूढ स्थित थे। स्वाशस्य भूर्भूपतिभि द्विजेभ्यो दत्ताधुना सा तुहृता खशेन। हाहोति चिन्ता जनिता यदैव तावत्वनर्थातरएव वृत्त ।३५।। राजाओ ने अपने अश की भूमि विप्रो को दी। वही भूमि इस समय खश ने छीन ली। जब तक हाय हाय ऐसी चिन्ता हुई तब तक बात दूसरी न रही। ( उससे भी भूमि छिन गयी)।

56 कल्याणचन्द्रोदय भूपात् वशाच्चैव हृतावशिष्टा या भूस्थितालीमहमद्ग्रहेण । ग्रस्तैव वृत्ति जिरूपम्लेच्छै नीताथ गीता शिवेन पीता ।।३६ ।। अलीमहमद रूपी ग्रह ने जो भूमि छीनी या जो छिनने से बच गयी वह राजा से छीन ली। द्विजरूपी म्लेच्छो ने ले ली। यह शिव ने (पद्यो मे) गाया। म्लेच्छाधिपत्येऽपि खसैविभुज्यते विभुज्यते देव करप्रदा वय। इत्थ भणभिजिगेहलुठन कृतो हि तत्तद्हुपुस्तकव्यय ।।३७ ।। हे देव, म्लेच्छाधिपति के लिये भी खसो ने वह भूमि बाँटी। हे देव, हम तो कर देने वाले हैं। इस प्रकार कहते हुए खसो ने ब्राहमण के घर की लूट की। इस पर बहुत पुस्तक नष्ट की। नासीत्पुरैव धनधान्यसमृद्धिरुच्चै सद्रत्नपुस्तकधनान्यपहाय वेगात् । स्कधे निधाय पृथुकान बलापुरस्ताद्धाहेति भ्रातृसुतबधुजनै प्रयात ।।३८ ।। पहले से ही धन धान्य समृद्धि अधिक न थी। धन पुस्तक आदि रत्नो को छोड कर, कधे मे बच्चो को बिठाकर, स्त्री जन तथा भाई, पुत्र, बधु जनो के साथ वेग से (प्राण बचाने) ( वह द्विज) चला गया। चपावती प्रथमतोऽति भयाच्च काली गगावली नृपनृपेत्य सकृद्भ्रमित्वा । हानतदेव इतिवत्पतित पल्याऊ कौडिन्यवन्निपततितो मिलितोप्यवृद्ध ।।३।। भय से पहले चपावत गया। काली, गगावली की ओर राजाओ के पास एक बार घूम कर उस समय भारी हानि उठाकर पल्याऊ पहुँचा। (वहाँ) कौडिन्य के समान (एक) युवक मिला। ज्ञानस्य राशिरवदन्निधिनामधेय कल्याणचन्द्रनृपति निकटे विभाति। उत्तिष्ठ भुसुरकुलाग्रिम चक्रवर्ती सूर्योदयेधतमसस्य न हि प्रभाव ।।४० ।। ज्ञान की राशि उस निधि नाम के व्यक्ति ने कहा "राजा कल्याण चन्द्र निकट ही शोभयमान है। हे द्विज कुलाग्रणी, उठो, सूर्य के उदय होने पर अधकार दूर हो गया है।" दुर्दैवतस्तवगतानुजधर्मपत्नी खिद्यस्वमेह नृपति प्रभुविष्णुरस्ति। तत्पूर्वमेव सुपद भवितेति तत्र किचित्स्थितो द्विजवरस्य वचोभिशसन् ।।४।। दुर्देव से तुम्हारी अनुज की धर्मपत्नी चली गयी। शक्तिशाली राजा है। तुम यहाँ खेद करते हो। वहाँ तुम्हारा पहला वाला ही पद रहेगा। इस प्रकार वहाँ कुछ टिक कर उसने द्विजवर (निधि) के वचन की प्रशसा की। शुभै कृतज्ञै कितवैश्चकैश्चिद् गर्गाचलस्योपरिसस्थितैस्त्य । ग्रामेषु स्वेष्वेव निवस्यते स्वे भ्रमत्यहोऽय शिवदेव एक ।।४२ ।।

चतुर्थ सर्ग 57 पवित्र विचार वाले, कृतज्ञ, धूर्त भी गर्गाचल के ऊपर स्थित अपने गाँवों में रहते हैं पर केवल एक शिव (कवि) घूमता फिरता है। यह आश्चर्य है। अग्रे सराये यवनस्य पूर्वं तत्रैव कल्याणविधो पुरस्तात् । भूमीघरट्टातिकगा शिवस्य हरति कल्याणमुखा खशास्ते।।४३ ।। यवन (रोहिला अफगानो) की सराय के आगे कल्याण चद्र के सामने ही कल्याण आदि खसो ने शिव की भूमि, घर, गाय, बैल छीन लिये। नाश्चर्यमेतन्नलरामयोस्क्त युधिष्ठिरस्यापि गतिर्विचिंत्या। गुणागुणस्यात्रविचारणा किं नाकालके केऽपि फलति वृक्षा ।।४४ ।। नल राम की, युधिष्ठिर की अवस्था (विपन्नावस्था) विचार कर यह कोई आश्चर्य नही है। यहाँ गुण के गुणो को विचारना है। क्या अकाल मे ही वृक्ष फलते हैं। भव्योऽस्ति कल्याणसविधुर्वरिष्ठो दातादयालुर्वयसापि पक्व । कूर्माचलस्यैव हि मातृरूपा कुमारमातेव कुमारमाता।।४५।। यह कल्याण चद्र भव्य है, वरिष्ठ, दाता, दयालु तथा अवस्था में भी प्रौढ है। सारे कूर्माचल की मातृरूपा कुमार (कार्तिकेय) की जननी पार्वती स्वरूपा है ( आप के कुमारो की माता है)। श्रीदीपचन्द्रस्त्वन कृष्णसिंहो जाग्रत्स्वरूपौ नृपते कुमारौ। विभाति पार्वे हरिसिहकाद्या सुमेरुपूर्वा परिचारकाश्च ।।४६।। राजा कल्याण चन्द्र के दो सुन्दर राजकुमार श्री दीपचन्द्र तथा कृष्ण सिह हैं। राजा के पास हरिसिह आदि सुमेरु (सुमेर सिंह) आदि सेवक शोभित है। श्रीव्यासदेवासनसन्निविष्टो हर्षादिदेवोप्युपकारशील । कुलप्रदीपोनुपम सुपुत्रो विराजते जीवसमान जीव ।।४७ ।। गुरु व्यास के आसन पर उपकारशील हर्षदेव विराजमान हैं। वे कुलप्रदीप सुपुत्र तथा बृहस्पति के तुल्य हैं। श्रीप्राणनाथाख्व पुरोहितोपि विधान्विनीत स्वकुलावतस । गुरुगरीयान्हरिकृष्णनामा दैवज्ञमुख्योस्तिरमापतिश्च ।।४।। श्री प्राणनाथ पुरोहित हैं। वे विद्वान, विनीत तथा स्वकुलभूषण हैं। हरिकृष्ण गुरु हैं और ज्योतिपियो में प्रमुख रमापति हैं। मौल शिवो वीरतया गृहीत काशप्रकाशोपि च रामदत्त । रणाधिकारी हरिराम नामा द्विजाधिकारी किल कृष्णदेव ।।४।। वीरत्व के कारण कुलीन शिवदेव लिये गये हैं। काश पुष्प के समान प्रकाशवान् रामदत्त हैं। रणाधिकारी हरिराम और द्विजाधिकारी कृष्णदेव है। स्पष्टार्थवक्ता खलु रुद्रदेव प्रयागदासस्य कुलैकततु । राज्यैकसार सुकृती च विद्वानुमापति पतिसूपकार ।।५।। प्रयागदास के कुल के रुद्रदेव स्पष्ट बोलने वाले हैं। राज्य के सार, पुण्यात्मा तथा विद्वानउमापति राजा के सूपकार हैं।

58 कल्याणचन्द्रोदय कूर्माचलीयेषु तथाग्रवर्ती ह्यनूपसिह श्चनृपातरग । पक्षे सदानद करोति भाग्याद्राज्ये भवानद इति प्रसिद्ध ।।१।। कूर्माचलीयो मे श्रेष्ठ अनूप सिह राजा के अतरग मित्र है। पक्ष मे सदा आनददायक भाग्य से भवानद राज्य मे है। सद्धार्मिकी वेदवकारयुक्त शिव विलोक्यैवहि शक्तिसिह । नृपादरे तोषमनादरेपि सकोचमाप्नोति विलौरिजन्मा।।५२ ।। विलौरि ग्राम मे जन्मा, धार्मिक शक्तिसिह शिव (कवि) को देखकर राजा द्वारा (शिव को) आदर दिये जाने पर सतोष पाता है और अनादर करने पर उसे सकोच होता है। (चार वकारो से युक्त विशिष्ट, विष्ट, वीर, विद्वान् ) अन्यै जिक्षत्रियवैश्यशूद्रवर्ग शिव सद्गुणिन विचित्य। मूकस्य वृत्ति विहितेव राज्ञा न वर्द्धित कि निकटे महात्मा।।५३ ।। दूसरे ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रवर्ग के लोग सद्गुणी शिव को सोचकर मौन वृति धारण किये यही सोचते है कि अपने निकट इस महात्मा को राजा ने क्यो नही बढाया ? चद्रीदुलुप् चैव जैमलोऽग्रे रुद्रस्तथा जीवनवाहकश्च । करोति कार्य हरिमल्लमुख्यै भटैश्चदेशाधिकृतै सहैव ।।५४ ।। देश के अधिकारी हरिमल्ल आदि प्रमुख शूरो के साथ ही चद्रीटुलुप, जैमल, रुद्र तथा जीवनवाहक भट कार्य करते हैं। लोका स्थितिर्देवसुधाशुतोयातामेव जानति न प्राक्तनीयाम् । न कृष्णदेवादियनात्रदोषोतर्धवृद्धस्य तुदुर्लभत्वात्।।५५ ।। मनुष्य तो यह स्थिति देवचन्द्र के समय से हुई यह जानते है न कि पहले की। कृष्ण देव आदि ऊपर जाने वाले बुद्ध (शिव) का इसमे दोष नही पाते दोप तथा उसके दुर्लभ होने को ( नही जानते) श्रीहर्पदेवेन तु पूर्वकालेपित्रा कृत यत्कृतमस्ति सर्वम्। काश्यादियात्रासु महीपप्रश्न श्राद्धादिके धौत्रसमर्पर्ण च ।।५६ ।। श्री हर्ष देव ने पूर्वकाल मे पिता का क्रिया कर्म सब किया। काशी की यात्रा मे राजा का प्रश्न ओर श्राद्ध आदि मे धौतसमर्पण सब किया। दैवाधीन याति कार्य्य यदेतत्प्रोक्त वृद्वैस्तथ्यमेवेहमन्ये। म्लेच्छाकातेकैश्चिदैश्वर्यमाप्त स्थानभ्रप्टा साप्रत केपि जाता ।।७।। जो बृद्धो ने कहा है कि कार्य दैवाधीन है उसे मै सत्य मानता हूँ। म्लेच्छ क आक्रमण स कुछ ने ऐश्वर्य प्राप्त किया और कुछ इस समय स्थान भ्रष्ट भी हुए। शिवस्य कूर्माचलके न वृत्तिभूमि स्थिता सात्यजनेन नीता। गुणस्यप्राचुर्यमतद्रिदेषु कदर्यवर्येषु कथ निवेश्यम् । ।३८ ।। कूर्माचल मे शिव (कवि) की कोई आजीविका नही है। जो भूमि थी वह अन्त्यज ने छीन ली। विदेशो मे नीचो मे गुण का प्राचुर्य केस निवेश किया जाय ? ) चतुर्थ सर्ग 59 मे ) कूर्माचलेनत गुणा स्फुरन्ति दोषो गुणद्रोहकरस्तथैक । मदीय वशेप्यगुणोयदास्यान्मयैव जेतव्यमदष्यथोति।।५६ ।। कूर्माचल मे अनत गुण है पर एक दोष गुण का द्रोह करना है। जिस समय मेरे (दोष) हो जाय तो मुझे ही उसे दबाना होगा। एकेन प्राणार्पणतो महीप सतोष्य यत्किचिदुपाज्यंतेतत् । सगृहयतेशस्यमिषात् परेण महाबलित्व नृपतेस्तदस्तीस्त ।।६० ।। एक ने प्राण देकर राजा को सतुष्ट कर जो कुछ उपार्जित किया दूसरे ने छल से उसके एक भाग का सग्रह किया। नृपति की शक्ति तो है ही। मातृश्राद्धे शष्कुली भक्षण ये प्रापुस्तेमीशुद्धशुद्धातमृत्या। पूजामध्येदर्शन चैव येषा तेषा श्याला सिहतामावहति ।।६१ ।। जो माता के श्राद्ध मे चावल का मॉड खाते थे वे इस समय शुद्ध अन्न खाते है। जिनका पूजा के बीच दर्शन होता था उनके साले भी इस समय सिह बने हैं। शकेनु जागर्ति पितामहास्य पितुस्तथैवेश्वरभूपभक्ति । यज्जीवत स्वच्छतया शिवेन सधार्यतेऽद्यापि विनैववृत्या ।।६२।। इस शिव के पितामह ( वामदेव) तथा पिता (विश्व रूप) की ईश्वर तथा राज भक्ति एक बैल से ही जागृत हो जाती थी। बिना वृत्ति के शिव ने शुद्धतया जीवन धारण किया है। अस्मिन्महाघोरतरे कुकाले वर्षा कदाचिन्नपतेन्नभस्त । भाडारिकोघौनभवेद्भवादिनदस्तदाकिचिदपीह न स्यात् ।।६३ ।। यदि इस घोर कुकाल मे आकाश से कदाचित् वर्षा न होवे और भवानद जैसा भडारी न होवे तो यहाँ कुछ भी न होवे। नीचानसौ वर्द्रयते कुलीनुपेक्षते तत्तुमहान्हि दोष । सभ्रातृको यत्वणुजीवमात्र नमस्करोतीति गुणाभिराम ।।६४ ।। जो नीचो को बढाता है, कुलीनो की उपेक्षा करता है यह तो महान दोष है। भ्रातृ सहित जो अणु जीव मात्र को प्रणाम करता है वह गुणाभिराम है। श्रीविश्वरूपप्रमुखाविपश्चिता दिवा अहोमौक्तिककुडलान्विता । श्रुत्वात्विदानी नरलिगधारिण शिवादृते भूपतिरूपहारिण ।।६५ ।। मौक्तिक कुडलो से युक्त दो तीन विश्वरूप आदि विद्वान हुए। पर इस समय तो शिव को छोडकर अन्य मनुष्य भूपति के ऐश्वर्य का हरण करने वाले है। सर्वेऽमात्या सर्व एवाधिकारे सर्वदूता सर्वएवेहमान्या । राज्ञ सर्वे निन्दकावतएव सर्व सर्वो नाहमस्मीति वक्ति ।।६।। सब आमात्य सब अधिकार मे है। सब दूत यहाँ मान्य है। सब राजा के निन्दक है। वे ही सब कुछ है। मै नही हूँ। यह मेग कथन है। तत्साप्रत जातमिद विलक्षण यत्रानभिज्ञा अपि यात्यभिज्ञताम्। विद्योतमाना अपि भूपणावरेगच्छत्यदाहेत्य सकृद्गृहेगृहे ।।६७ । ।

60 कल्याणचन्द्रोदय इस समय तो यह विलक्षण बात हो गयी कि अजानकारी (अज्ञता) भी जानकारी हो गयी (मूर्ख भी विद्वान हो गये) अच्छे आभूपणो से अलकृत एक बार घर घर जाकर हँसी करते राजासमीचीनतरस्तथैव वृद्धाश्च मौलाश्चकुलप्रसूता । कूर्माचलीयाश्च भयस्त एव दोष कलेर्नेहनरस्य किचित् ।।६८ ।। राजा ठीक है उसी प्रकार वृद्ध कुलीन कुलीय मत्री ठीक ही है। कूर्माचल के शूर वीर भी वैसे ही है। दोष कलि का है न कि किसी मनुष्य का। अस्माद्देशान्निर्गत कोपि धूर्तो दूता स्फीतास्तस्य गच्छति नान्ये। तिष्ठत्यन्ये मत्रिणश्चाधिकारे देशाधीशा केपि नाशा शिवस्य ।।६।। इस देश से बाहर गया कोई धूर्त है। उसके बहुत से दूत (इधर उधर ) जाते है और कोई नही। दूसरे मत्री तथा राजा लोग भी ( उसके) अधिकार मे हैं। और कोई नही है यह शिव का अनुमान है। यत्रामत्रीपार्श्ववर्ती नृपस्य मौलस्तिष्ठेदेकदेशे कुतश्चित्। ही हीत्युच्चैर्हस्यते बाह्यलोकै भस्मन्नोरत्नवन्नि प्रभोधिक् ।।७।। जहाँ मत्री पद के अयोग्य कुलीन राजा के पास है वहाँ एकता कहाँ से हो ? बाहर के लोग हँसते है। भस्म से ढके रत्न के समान राजा को धिक्कार। स्वभूपभक्तया जनकावतारनृपायमान विहित मया यत्। लब्ध फल तत्क्षुधितोस्मि गताचेन्मेफल स्यान्नतदन्यथातु।७१ ।। अपने राजा की भक्ति के कारण मैने जो जनक के समान राजा का अपमान किया उसका फल मिल गया। भूखा ही मै चला जाऊ तो मुझे फल मिलेगा ही और कोई दूसरी बात नही द्विजापमानेन जगत्सुधाशोर्विचितनीया जनितेष्टसिद्धि । श्रीबल्मभाख्येन पुरोधसापि त्यागान्नृपस्यैव विशीर्णताप्ता।।७२ ।। द्विज के अपमान से जगत चद्र की उत्पन्न की इष्टसिद्धि सोचने योग्य है। नृप के त्याग से श्रीवल्लभ नाम के पुरोहित ने क्षीणावस्था प्राप्त की। ब्रह्मघोनैव राजाविधेयो ह्याज्ञाभगश्चैव गज्ञो न यज्ञै । स्तोक भुक्त्वा तोप एवात्म देशे कार्यो वृत्ते वर्तन वर्तते चेत्।।७३ ।। राजा ने ब्रह्म द्वेप नही करना चाहिये न ब्राहमणो ने राजा की आज्ञा भग करनी चाहिये थोडा भोग कर अपने देश मे सतोप ही होगा यदि कर्तव्य मे लगा रहना हो (सर्वत्र प्रसन्नता होगी)। सत्य व्रवीमि श्रृणुतात्महितानुरूप लभ्य न किचिदपिहीनगुणेविदेशे। कूर्माचले कुलमणि र्यदि कोपि भूयातत्पादरज्जुकरणादपि किचिदस्ति ।।७४ ।। हे राजन्, आप सुने मै सत्य कहता हूँ कि विदेश मे हीन गुणो से अपने हित के अनुरूप फल नही पाया जाता। कूर्माचल मे कोई कुलमणि होवे उसके चरण मे रस्सी बाधन मात्र से कुछ होता है।

चतुर्थ सर्ग 61 राजानोऽवनिमडले नु बहवोदृष्टा श्रुताश्चापरे सव्य बाहुमथोश्चोर्द्धमेव सुचिर नीत्वा शिवनोच्यते। दाता कूर्मधराधिनाथ सदृशो नान्योऽस्ति यस्यागुणी नो वाय गुणवान्यितैव समता सम्पादक कामधुक् ।।७५ ।। इस पृथ्वी मे बहुत राजा देखे और बहुत राजा सुने दाहिने हाथ को ऊपर उठाकर शिव कहता है कि कूर्माचल नरेश के समान दाता कोई नहीं है जिसकी गणना अथवा जिसके गुणो की समता सकल कामना पूर्ण करने वाली कामधेनु से हो सकती है। गुणावतसेन वराटिकापि न प्राप्यते चेदहि किं विधेयम्। तीर्थस्थितै वृत्तिधरैरिवान्यै xिजै विदेशे न पद निधेयम् ।।७६ ।। गुणवान् यदि एक कौडी भी प्राप्त न करे तो क्या किया जाय तीर्थ मे रहने वाले, वृत्ति वाले द्विज तथा दूसरे द्विज विदेश मे पैर न रखे। एता प्रतिज्ञा सुदृढा विधाय धुधूधुधूधू विहिता शिवेन । देवान्पितृनिष्टजनान्समग्रान्प्रशाम्य गतु सकुटुबकेन। ७७ ।। ऐसी सुदृढ प्रतिज्ञा कर शिव ने उत्तेजना (सकपन) दिखलायी। कुटुम्ब सहित जाने के लिये देव, पितर तथा समस्त इप्ट जन को शान्त किया। समा द्विपचाशदित कथचिनकूर्माचलेशान् बहवोनिषेव्य। स्थित्वा ढडयोष्या दवहास काव्य विधाय सत्क्षेत्रमतिष्कृताते।।७८ ।। अब से बावन वर्ष तक किसी प्रकार कूर्माचल नरेशो की बहुत सेवा कर, शिव ने ढडयोष्टी मे रहकर इस दवहास काव्य की रचना कर (सत्क्षेत्र छोड़ दिया 2) इत्थ शिवे गच्छति दूरदेशदैवादकस्मादिवपुष्पवृष्टि । कल्याणचद्रप्रहितातिभास्वत्समागताहाकरी सुपत्री।।७६ ।। इस प्रकार शिव के दूर देश जाते समय अकस्मात् आकाश से पुष्प वृष्टि जैसी हुई। श्री कल्याण चन्द्र द्वारा भेजी पत्री (चिट्ठी) उस तेजस्वी द्विज को मिली। इति श्री कल्याण चन्द्रोदये कूर्माचलीयकाव्ये शिवकविकृतौ चतुर्थ सर्ग ।। (दवहासमिद काव्य चतु सर्गान्तमादित । तत कल्याणचन्द्रस्योदयो भातिमहीतले दवहसन समाप्तम्) चौथे सर्ग तक यह अवमान का दवहास काव्य कहा गया है। अब इसके बाद महीतल मे कल्याण चन्द्र का उदय हुआ। ह्रास समाप्त हुआ।

पंचम सर्ग अथागत श्रीशिवदेवनामा घसै स्त्रिभिभूपतिसन्निवेशम्। कृपार्द दृष्टया नृपसत्कृतोऽसौ ब्रूते वच साशिखमग्रजन्मा।।१।। तीन दिन में श्री शिवदेव राजा के पास आ गये। कृपामयी दृष्टि से राजा द्वारा सत्कृत वह ब्राहमणो मे श्रेष्ठ विप्र यह वचन बोला। श्रीमानुद्योतचद्र स्फुरदनललसच्चडसिहप्रतापो नाम्ना धाम्ना च खर्वीकृतशशितपनो योऽभवद्धर्ममूर्ति । श्रीमद् ज्ञानेदुपूर्वास्तदनु नवसुतास्तत्रतत्सूनुमध्ये श्रीमन्कल्याणचन्द्र क्षितिपतितिलको जीवतादब्दलक्षम्।।२।। प्रज्वलित अग्नि के समान शोभायमान, प्रताप मे सिह के समान भयकर, नाम धाम से जिन्होने सूर्य चन्द्र को छोटा कर दिया ऐसे साक्षात् धर्म की मूर्ति महाराज उद्योत चन्द्र हुए। श्रीमद् ज्ञानचन्द्र आदि उनके ६ पुत्र हुए। उन पुत्रो मे श्री महाराजाधिराज कल्याण चन्द्र एक लक्ष वर्ष जीवे। कल्याणेदो नित्यकल्याणमुच्चै भूयादित्य भाषतेभूमिदेव । दुष्टे मेंधै छादित कैरवो वा मध्ये मध्ये दृश्यते यत्स्वबुद्धया। ३ ।। उच्च स्वर से ब्राहमण ने कहा, "कल्याण चन्द्र का नित्य कल्याण होवे। दुष्ट मेघो से आच्छादित श्वेत कमल बीच बीच मे अपनी बुद्धि से दिखाई देता है।" स्वदक्षिण श्रीनगरेशशीस्मि दत्त पद पूर्वमयेन येन। समर्घ वामेनपदेनशूद्र जागर्ति राजा जगतीतत्नेऽसौ ।।४।। यह राजा इस समय पृथ्वी मे प्रसिद्ध है जिसने अपना दाहिना पैर श्रीनगर (गढवाल) के राजा की सीमा तक स्थापित किया और बॉये पैर से शूद्र का मर्दन किया। राज्यार्थमन्त्रैर्बहुराजपुत्रैर्यत्नेकृते यत्रतप प्रधान।। विस्मृत्य कल्याणबिधु दुरुक्तमतद्भिदैस्तत्फलमाशु लब्धम्।।५।। जहाँ राज्य प्राप्ति मे तप प्रधान है (कष्टसाध्य है) वहाँ कल्याण चद्र को भूल कर द्रोही राजकुमारो के बहुत यत्न करने पर भी (राज्य पाने के लिये) उनको शीघ्र ही इसका फल मिल गया (सब विद्रोही मारे गये) कूर्माचलीयै कृतमस्ति सर्व तानैव शूरान्ब्रुवते जनौधा । इतीवधात्रा कुपितेन मन्ये सृष्टोस्त्यलीमन्महदष्कराल ।।६।। कूर्माचलीयो ने बहुत कुछ किया। उन्ही (विद्रोही) शूर वीरो से जन समूह कहता है, “मैं तो यही मानता हूँ कि कुपित विधाता ने (सर्वनाश के लिये) भयकर अली महमद खाँ की सृष्टि की।" (हिम्मतसिह गुसाँई इत्यादि इस रुहेला सर्दार को कूर्माचल पर चढा लाये।) कि वाकृतज्ञ कितवैर्नृपस्य कूर्माचलीयै सह भेदबुद्धि । यै कारिता तैर्यवनाधमोऽत्र प्रवेशितस्ते नृपनाशनीया ।।७।।

पचम सर्ग 63 "कृतघ्न, दुष्ट, छल फरेब वाले लोगों ने राजा के कूर्माचलीयों के साथ जो भेद बुद्धि की (फूट डलवाई) वे ही दुष्ट इस अधम यवन को यहाँ (कूर्माचल पर आक्रमण करने) लिवा लाये हैं। वे सब दुष्ट राजा के द्वारा नष्ट होने योग्य हैं।" इति वदतममु विहसन्नृप कथितवान्सरसीरहलोचन । कथय किं करणीयमितो मया त्वमसि मौल इतीव हि पृच्छयते।।८।। ऐसा कहते हुए उस विप्र (शिवराम) से कमल के समान नेत्रो वाले राजा (कल्याण चन्द्र) ने कहा, "कहो, अब मैंने क्या करना चाहिये। आप (परापरगत पौरोहित्य पद पर प्रतिष्ठित) मौल है। इसीलिये आप से पूछता हूँ।" वदत्यथैन शिवदेवविप्रो जानति ते ह्याधुनिकाविशेषम् । तथाप्यनुज्ञावसत स्वकीयज्ञानानुरूप तव देव वच्मि ।।६।। शिवदेव विप्र उससे (कल्याण चद्र से ) यह बोले, "वे आधुनिक (आजकल के नये लोग) विशेष (अधिक) जानते हैं। देव, आपकी आज्ञानुसार अपने ज्ञान के अनुरूप आपसे कहता हूँ।" नीरक्षीरपरीक्षको नरपति कल्याणचद्रश्चिरजीयान् म्लेच्छवधोधमैकरसिक सामाधुपायै शम् । नीतिर्वारविलासिनीव सतत राज्यागणे नर्तकी तिष्ठेत्कटकिनो व्रजतु विलय राज्यस्थिति र्जायताम् ।।१०।। "महाराज कल्याण चन्द्र, जो नीरक्षीर के स्वय परीक्षक हैं (भले बुरे को पहचानने की जिनमे बुद्धि है), जो साम, दाम, दड, भेद आदि बहुत उपायो से म्लेच्छ (अलीमहम्मद) के वध के प्रयत्न में रुचि रखते हैं, वे दीर्घायु होवे। राजा के आँगन मे नीति नाचने वाली वेश्या के समान (भाँति भाँति के हाव भाव प्रदर्शन करने वाली वारवनिता के समान) रहे तब दुष्ट कपटी उत्पात मचाने वालो का विलय (नाश) होता है और राज्य की स्थिति बनती ) भूपादने मौलमत्री सुमत्री पूज्य पूज्यो मानितश्चैवमान्य । दूतो दूतो लेखको लेखको वैद्यो वैद्यो व्युतक्रमे व्युतक्रमोऽस्ति ।।११। राजा के आगे (सामने) तो मौल मत्री ही अच्छा मत्री है, पूज्य ही पूज्य है, आदर किये (सम्मानित) लोग ही आदरणीय हैं, दूत ही दूत है, लेखक ही लेखक, वैद्य ही वैद्य है। इस क्रम का अतिक्रमण ही बेतरतीबी, असगठन (अराजकता) है। वक्रप्रवेशो न भवेन्नृपस्य पार्वेऽतिमूढस्य सेवकस्य। पृष्ठ न भूयादहिते च दाने कोशे सुनीत्यैव धनागमोस्क्त।।१२।। "राजा के पास (छल कपट) टेढ़े मेढे ढग से अत्यन्त मूर्ख सेवक का प्रवेश न होवे। अहित दान की ओर भी (राजा की) पीठ न होवे (आँख बद कर पात्र कुपात्र का ध्यान न रखते हुए दान न देवे)। अच्छी नीति से ही कोश (राजकोष) मे धन आवे।" सत्पडिताश्चैव नरेन्द्रदूता स्यु सूपकाराश्च चिकित्सकाश्च । शस्त्राधिकारेऽपि च कोशमध्ये तिष्ठतु चाप्ताश्च परीक्षिताश्च । ।१३ ।।

64 कल्याणचन्द्रोदय "राजा के दूत, सूपकार (रसोइये) तथा चिकित्सक अच्छे पडित होने चाहिये। शास्त्रों के अधिकार में तथा राजकोष में विश्वसनीय तथा भली प्रकार परखे हुए व्यक्ति नियुक्त होने चाहिये।" मौला सुशीला सुभगा प्रियवदा नृपातिके सतु न चेतरे पुन । सबधिनो यस्य भवति ये च ते तेषा गृहेश्नतु सदैव पायसम् ।।१४।। "राजा के निकट फिर से कुलीन, सुशील, सुन्दर, मिष्टभाषी लोग होवे और दूसरे नहीं। जो जिसके सबधी होते हैं वे उनके घर सदा खीर खावे।" काणा कुरूपा कुकुलाश्च येऽन्ये तेभ्यो दयादाननयथोक्तमेव । सख्यावतो मूढजनस्य किंतु गजस्य तुच्छस्य शुनो न साम्यम् ।।१५।। "जो काने, कुरूप और नीच कुल के हैं उनके लिये दया दान यथोचित नहीं है। मूर्ख जन की मैत्री की इच्छा करने वाले की, हाथी तथा छोटे कुत्ते की कोई समता नही है।" यदुच्यते देव न मत्रिभिर्मेविधीयते कापि पुर सुवार्ता । समान्यजात्यैव हि मत्रिभाव मत्या (त्यू) शिव प्रौढतयेति वक्ति ।।१६।। "हे देव, आपने जो अच्छी बात कही उसे मेरे मत्रियो ने पहले नही किया। कुलीन जाति मे ही मत्रित्व भाव है यह उक्ति शिव (राम) की प्रौढ बुद्धि जन्य है। यह मैं स्वीकारता हूँ।" (राजा ने कहा)। द्विज शिवस्तत्र कुलीनसूनु कवि क्रियावान्कुशल कलासु। शास्त्रार्थदीति न कार्यमध्ये माभून्मतिस्ते स्थाये न स एष ।।१७।। वहाँ पर शिव द्विज कुलीन कुल का है, कवि है, कर्मठ है, कलाओ मे प्रवीण है, शास्त्रो के अर्थ को जानने वाला है। तो आपकी बुद्धि कार्य के बीच अचल और अडिग रहे। (डॉवाडोल न हो।) स दृष्टातादच्मि स्वस्थैव राजन् चारा प्रोक्ता दृष्टयो भूमिपात चे। लोके स्युस्तहिते दीनमत्रीगेहेगेहे जीवनार्थी न गच्छेत्।।१८।। "हे राजन् , मै दृष्टान्त सहित कहता हूँ, यदि चर (जासूस) भली प्रकार सब जगह सतर्क दृष्टि रक्खे तो बेचारा असहाय मत्री घर घर मे जीवन की रक्षा निमित्त न जावे।" शौचार्थमेकस्य गृहाद्गृहीत्वाकक्षालन चान्य गृहे मुखस्य । विधीयते पूजनमन्य गेहे स्चेप्टस्य चान्यत्र भुजिक्रिया च ।।१६।। “(यहाँ तो यह हाल है कि) शौच के लिये एक के घर से (बर्तन) लेकर दूसरे के घर मे मुख धोना पडता है, पूजा किसी अन्य के घर करनी होती है तो खाने की क्रिया किसी अपने अन्य मित्र के यहाँ करनी पड़ती है। (कोई ठौर ठिकाना ही नही है।" कथ सभायामधिवर्तितव्य को रक्षक स्यादसतेस्तदानीम् । देवो नृदेवोऽपि च सेवने न फल ददातीश तदन्यथा न।।२०।। "हे ईश, सभा में कैसे रहा जाय ? उस समय रहते हुए का कौन रक्षक है ? यदि सेवा करने पर स्वय राजा फल नही देता तो और कोई नहीं दे सकता।"

पचम सर्ग 65 ग्रामाभवेयुर्नहि वा भवेयु कूर्माचले यद्यपि सशयोऽस्ति। तथापि कस्यापि हि जन्मभूम्या भवेन्नचान्यो जननायकस्क्त ।।२१।। "गाँव होवे अथवा न होवे यद्यपि कूर्माचल मे सशय है ( गडबडी है। फिर भी किसी की भी जन्मभूमि मे दूसरा जननायक न होवे।" न कोऽपि कस्यापि हि जन्मभूम्यामन्यो बलाध्यति गोपदासान् । प्रभुर्यदीयो नृपपार्श्वसेवीतिष्ठेद्धि सर्वोपरिसन्निविष्ट ।।२२।। कोई दूसरा किसी की भी जन्मभूमि मे बल से ग्वालो तथा दासो को नही मारता है जब कि उनका स्वामी सर्वोच्च पद पर स्थित राजा के पास रहता है एकत्र शस्त्राधिकृतस्य दासाश्चान्यत्र साध्यो विचरति खिन्ना । ततोऽपरमापि हृत घरट्ट कल्याणशूद्रेण नराधमेन ।।२३ । एक ओर तो हाथ मे शस्त्र लिये ( बलवान ) के दास घूमते हैं और दूसरी ओर साधु व्यक्ति खिन्न होकर घूमते है। फिर दूसरी ओर हे कल्याण, नीच शूद्र ने चक्की भी छीन ली। (चारो आर अधेरगर्दी हो रही है। सज्जन साधु पुरुषो की कोई स्थिति ही नही है।) अकारि लक्ष्मीदुमहीभुजा पुरा वादिन वाद्य द्रिजताडिते खशे। उक्त च राज्य पितृवाक्यतो दृढ द्विजप्रजान जनित महमित्।।२४ ।। खशो के द्वारा ब्राहमणो को सताये जाने पर पूर्व काल मे महाराज लक्ष्मीचन्द्र ने बाजे बजवाकर यह घोषणा की, “पिता के (रुद्र चन्द्र के) वाक्य से (उनके कथनानुसार ) यह राज्य ब्राहमण प्रजा से ही श्री सम्पन्न तथा दृढ हुआ।" सर्वोपरित्व तु गत ततोऽनुसप्तर्षिता चेव द्विपट्ता। सकष्टदान न हि मासदान तथापि धृष्ट प्रकरोति सेवाम् ।।२५ ।। (इस कारण) राज्य उत्कृष्टता को प्राप्त हुआ (लक्ष्मीचद्र की नीति अनुसार) किन्तु इसके बाद (बाह्य द्वेष बढा)। न सकष्ट दान होता है न मास दान फिर भी धृष्ट (उच्छृखल) व्यक्ति सेवा करता है। हृताधिकारे सति कृष्णदेवे खिद्यत्यसौ हृष्यति साधिकारे। न पक्तिमध्येप्यभिपेकिपात्व शतेषु गच्छत्सुफल किमस्य ।।२६ ।। कृष्णदेव के अधिकार छिन जाने पर उसे खेद होता था और अधिकार युक्त होने पर प्रसन्नता होती थी। जब सैकडो चले गये तब इनकी दसो मे (पक्तिमध्ये) क्या गिनती होगी। भूलोके त्वयि भूपतौ निवसता श्रीचन्द्रवशप्रभो कृष्णेय जगती समग्रफलदा जाता त्वदीयैर्गुणै । हे श्रीचन्द्रवश के स्वामिन, इस भूलोक मे तेरे निवास करते हुए यह सारी जगती शस्यश्यामला तथा सम्पूर्ण फलो को देने वाली तेरे ही गुणो से हुई। नानादेशसमागता द्विजगणा पूर्णा सकामा विभो मोदते वयमेक एव सुतरा शीर्णास्म दुर्दैवत ।।२७ ।।

66 कल्याणचन्द्रोदय बहुत से देशो से आये ब्राहमण यहाँ सुखी, सपन्न, सतुष्ट थे। किन्तु दुर्भाग्य से इस समय हम सब क्षीण (दु खी) हो गये हैं। केनापि नोक्त प्रभवे मनस्वी दुखी शिव खिद्यति भृत्यहीन । स्थिति कृता भूपतिनात्मपार्श्वे तथास्य दु ख स्वयमेव हर्ता ।।२८ ।। आपसे किसी ने नहीं कहा कि यह मनस्वी शिव (कवि) भृत्य हीन होने से दुखी है। (अधेर गर्दी के समय इस ब्राहमण के घर, नौकर चाकर तथा भॉडे बर्तन सब छीन लिये थे।) राजा ने अपने ही पास यह स्थिति की है फिर वही (राजा) इस दु ख का हर्ता भी है। धव विना नैव विभाति दारा विनाधिकार न पुमान्कुतश्चित् । द्विज शिव वीक्ष्य सदो गृहस्था हीहीति कुर्वन्ति पदाभिमानात् ।।२६ ।। पति के बिना स्त्री शोभित नही होती। बिना अधिकार के पुरुष कही भी शोभित नही होता। सद्गृहस्थ पदाभिमान से द्विज शिव (कवि) को देखकर (विपन्नावस्था देख कर) हँसते - दीनो नवीनो नृपते सभाया वदति मा को विशतीति मत्ता । गुणा गुणस्यैव परीक्षण चेत्काचो न गारुत्म् रुचिं विधत्ते।।३०।। दीन नवीन कहता है कि मुझे राजसभा मे कौन प्रविष्ट करवाता है। गुण ही गुण का परीक्षण है। क्या काँच पन्ने का स्वरूप धारण कर सकता है ? (असली गुण ही मनुष्य को योग्य बनाते हैं। न दान मध्ये न मत्रमध्ये नियोगिमध्येऽपि न ताम्रपत्रे। प्रमाणभूतो न कुतश्चिदेपो हास्यास्पद याति शिवादिदेव ।।३१ ।। यह शिवदेव (पाडे) हास्यास्पद अवस्था में है क्योकि (जमीन तथा घट इत्यादि के विषय मे) न दान, न राजाज्ञा, न राजा के द्वारा नियुक्त होने का, न ताम्रपत्र का कोई भी प्रमाण नही है। नाय मुख्यसचिवश्चापि विप्रो हर्ता पुष्पस्यापि नाय द्विजिह्व । नाय शूद्र किकरश्चानुवर्ती प्राचीनोऽय वाजबाहादुरीय ।।३२।। यह (शिवराम) द्विज न तो मुख्य सचिव है, न पुष्प का चुराने वाला छली कपटी है, न यह दास वृत्ति का शूद्र है, यह तो महाराज बहादुर चद्र के समय का प्राचीन वशीय द्विज है। वदत्यमु भूसुरमेव मत्रिणो द्विजास्तु हास्यात्सचिवोऽस्यहेति। विनाधिकार नृप कि करोतु मौल सभायामधिरूढ एष ते।।३३ ।। मत्री इस ब्राहमण से कहते हैं कि ब्राहमण हँसी के पात्र हुए इसका कारण मुख्य सचिव है। बिना अधिकार के राजा क्या करे जबकि सभा में यह मौल पूर्ण रूपेण अधिरूढ है। (राजा के ऊपर भी उसका पूर्ण प्रभाव है।) क्षुद्रा समतान्नृपकार्यमध्ये श्री ज्ञानचद्रेण कृता यदैव। तदैव मौला सचिवा लघुत्व गता ललाटस्थितबाहुशाखा ।।३४ ।।

पचम सर्ग 67 जिस समय महाराज ज्ञान चन्द्र ने राजकार्य चलाने क्षुद्र, तुच्छ व्यक्ति अपने चारो ओर नियुक्त किये उसी समय कुलीन सचिव लघु हो गये (ऊचाई पर स्थित शाखा के समान नीचे आ गये। खिद्यति तेऽद्यापि वहि सभाया षट्कर्णमत्रस्य फल तु लब्ध। तथापि किचित् सचिवा स्फुरति शीर्णास्त एवेह पराधिकारात्।।३५ ।। वे (मत्री) आज भी क्षुब्ध है। राजसभा मे छ कानो के बीच गयी हुई बात का फल भी मिल गया है। (कोई बात गोपनीय नही रही) फिर भी कुछ मत्री प्रसन्न है पर वे भी दूसरे के अधिकार से क्षीण हो गये है। मुग्ध शिवस्तिष्ठति तेऽतिकेऽय हित्वा अन्यत प्रात्यहिकी सुमुद्रा। अश्वादियान च विहायभृत्यान्त्वदर्शननेव कृतार्थभूता ।।३६ ।। इस समय यह शिव विस्मित आपके पास खडा है प्रात कालीन मुद्रा को छोडकर, घोड़े की सवारी, भृत्यो को छोड़ कर आपके दर्शन से कृतार्थ हुआ और आपके सम्मुख है। श्री रुद्रचन्द्रात्तवतात्पादादधिराज्य सचिवत्वमुच्चै । न पूर्वजानामनु चार्घ विप्र श्रीनाथनामाजनितो यशस्वी।।३७ ।। महाराज रुद्रचन्द्र से आपके पिता ( उद्योतचन्द्र) तक आधा राज्य ऊचे सचिवो पास था। हमारे पूर्वजो के पश्चात् आधा भाग यशस्वी श्रीनाथ के पास था। सबधमाश्रित्य नरेशजात सन्मानसिह सचिवावतस । शास्त्रार्थमुत्सृज्य तत कृतोऽभूच्क्षुद्र खसो माणिकनामधेय ।।३८ ।। अपने सबधी, राजकुलावतस सज्जन साधुप्रकृति के मानसिह सचिव सिरमौर थे। शास्त्रार्थ छोडकर उनके स्थान पर माणिक नाम के क्षुद्र खस को मत्री बनाया। दौवारिक केशवनामधेयस्तथाभवत् पुष्पवटु , प्रभाकर । वणिकवरो जीतमलस्ततोऽभूयो लालराईति न विद्महे वयम् ।।३।। केशव नाम का व्यक्ति द्वारपाल बना, प्रभाकर नाम का शूर योद्धा था, वैश्यो मे श्रेष्ठ जीतमल हुए जो लाल राइत था, उसे हम नही जानते है। इत्थ राज्य तुच्छमुच्चैर्विदित्वा नीत शूद्रेणात्मनाशायहस्ते। देवीचन्द्रस्यातक त निहत्य दीपस्थाने दीपएवासि राजन् ।।४०।। इस प्रकार तुच्छ को ऊचा जानकर शूद्र ने अपने ही नाश के लिये राज्य को अपने हाथ मे लिया। महाराज देवीचन्द्र के उस हत्यारे को मारकर (माणिक पूरनमल इत्यादि को) हे राजन, आप दीप ( देवीचन्द्र) के स्थान पर दीप (दीपक) के समान ही प्रकाशमान हो। श्रीरुद्रचन्द्रात्स्वपितु पुरस्तात्कृत यदीशै सकल विधेय। श्रीज्ञानचन्द्रात्तु खशातराज्यात्सार गृहाणेश न किचिदन्यत् ।।४१ ।। महाराज श्री रुद्र चन्द्र से लेकर अपने पिता (उद्योतचन्द्र) तक जो कुछ भी राजाओ ने पहले किया वह सब (आपने) करना चाहिये। श्री ज्ञान चन्द्र से खश (माणिक) के राज्य तक हे राजन् , केवल सार ही ग्रहण कीजिये और दूसरा कुछ भी नहीं।

68 कल्याणचन्द्रोदय ) यत्रास्त्यमात्यपदवी वरिवर्तित देश सोऽन्य कुतश्चिदुभयो समतैव चास्ति। कूर्माचले कुमुदबाधवसन्निधाने योग सुजीवबुधयो र्भवतीति मन्ये ।।४।। जहाँ (राज्य मे) आमात्य पदवी (मत्री पद) है देश बढ़ता है (श्री सम्पन्न होता है)। दूसरा कोई और (माणिक) किस प्रकार दोनो (दो मत्री) की समता रखता है। मैं तो यह मानता हूँ कि कूर्माचल मे चन्द्रमा के घर मे बृहस्पति और बुध का योग हुआ है। (बुध, बृहस्पति राज्य मत्री, चन्द्र वशीयो के राज्य मे) विधाय मौलानान्सचिवान्पुरस्तात्पुरापि देवै कृतमस्ति कार्यम्। तत्साक्षिभूतास्त्वधुनापि केचिद्युगानुरूपाश्च लसति पार्श्वे ।।४३ ।। पहले भी राजाओ ने कुलीन वश के लोगो को सचिव बना कर कार्य किया। इस बात के प्रमाण स्वरूप इस समय भी कुछ युग के अनुरुप सचिव (आप के ) पास शोभित हैं। वहिस्थितास्ते बहवो भटोद्भटा विशिष्टरुद्रादिकुलप्रसूता । कूर्माचलीया सचिवाश्चमौला द्विजास्क्त सीदति विपश्चितोऽमी ।।४४१ श्री रुद्र चन्द्र आदि विशिष्ट राजाओ के कुल में जन्मे आप के बहुत से शूर वीर योद्धा बाहर चले गये हैं और सभी कूर्माचलीय कुलीन वशी मत्री और ये विद्धान ब्राह्मण (अकर्मण्य ) सुस्त बैठे है। ज्ञानादर्श दिनमणिबुधे वासुदेवे च कृष्णे षट्शास्त्रज्ञे हरनिधियुगे रामयुक्ते शिवे च। ब्रह्मानदे हरिहरयुगे श्मश्रुले सानिरुद्धे काशीनाथे च दृष्टि पततु तव विभो कामदेवे तथैव।।४५।। (कूर्माचलीय विद्वान पडितो का लेखा देते हुए कवि कल्याणचद्र से कहता है) हे राजन्, आप की दृष्टि ज्ञान के आदर्श मे पडित दिनमणि, वासुदेव, कृष्ण, षट् शास्त्रों के ज्ञाता हरनिधि के युग के शिवराम, हरिहर के समकालीन ब्रह्मानद, दाढी वाले अनिरुद्ध, काशीनाथ तथा कामदेव पर पड़े। कृष्णानद शकराख्य गुरू च नित्यानन्द शैवदत्ति हरिं च। वेणीपूर्व वल्लभ पश्य राजन् सम्यग् दृष्टया वैद्यनाथ द्वय च।।४६।। हे राजन्, भली भाँति कृष्णानद, शकर, गुरू नित्यानद, शिवदत्त के पुत्र हरि, वेणीवल्लभ, और दो वैद्यनाथो को देखिये। पश्य देव मणिराम पडित तदैव बलभद्रनामक। हसराममतिराम सयुतो जीवनाथरघुनाथकावुभौ ।।४७ ।। हे राजन्, देखिये मणिराम पडित, उसी के समान (विद्वान) बलभद्र को हसराम, मतिराम, जीवनाथ तथा रघुनाथ को देखिये।

पचम सर्ग 69 हुआ।) राधापति चोभयक बहुश्रुत सदाशिव चैव त्रिपाठिन पर। चपावतीय कमलापति भवानीशकर चात्मतयावलोकया।।४।। उद्भट विद्वान राधापति, सदाशिवत्रिपाठी, चपावातीय (सिमाल्टीय) कमलापति तथा भवानीशकर को अपनी दृष्टि से देखिये। स्वपूर्वजाना पदपद्मपकरजोणुमानादपि सूक्ष्ममान । जातोऽस्म्यह प्रत्यहमेकमुद्रापणेन सिरमोरपतेरधीन ।।४६।। अपने पूर्वजो के चरणकमलो की धूल की कण से भी सूक्ष्म मै (शिव) एक अशर्फी प्रति दिन मिलने पर सिरमोर (नाहन ) के राजा के अधीन हुआ (क्योंकि अधेर गर्दी के समय स्वदेश छोडने पर विवश नान्तोऽस्ति कूर्माचलपडिताना दिग्दर्शन देव कृत मयैतत् । स्यादानकाले स्मरण सदैपा वित्तानुसारेण विदेशिन स्यु ।।१०।। हे देव, कूर्माचलीय पडितो का अन्त नही है। मैं ने यह केवल दिग्दर्शन मात्र किया है। इन का सदा दान देते समय स्मरण होना चाहिये। वित्तानुसार ये सब (अधेर गर्दी के समय) विदेशी हुए। (विदेश गये।) इति कथित रमणीय श्रुतिपथमुपनीय सादर विभुना। प्रोक्त द्विजवरसकल पैतामहपद लप्स्यते मौलम् ।।५१ ।। महाराज कल्याण चन्द्र ने यह मनोहर वचन सुन कर आदर सहित कहा कि ये सब कुलीन ब्राह्मण श्रेष्ठ अपने पितामह के पद को प्राप्त करेंगे। (पितामह के समय दिये हुए पद, सपत्ति, अधिकार प्राप्त करेगे।) इत्यादृतेन कथितो द्विजपुगवस्तु ब्रूते नृपाप्टदशविप्रवरस्य मध्ये। सस्थापयासु सचिवेषु च पचम स्या (१) दूरेऽस्ति पूर्वपदवी तु खपुप्पतुल्या।।२।। इस प्रकार राजा द्वारा सम्मानित द्विज श्रेष्ठ बोला, “हे राजन, अठारह श्रेष्ठ विप्रो के मध्य स्थापित सचिवो मे पाँचवा दूर है। अत यह पहले की पदवी आकाश कुसुम के समान है भो पुरपदरधुरधररम्य भूमिखडमविचार्य दीयताम् । अन्नमन्नमम यत्र कुटवेनेव चीरमिति चीरमिहेच्छा ।।५३ ।। हे इन्द्र के समान प्रतापी राजन्, सुन्दर रम्य भूमि खड बिना सोचे दी जाय (इन द्विज श्रेष्ठो को जिन की सपत्ति अपहृत कर ली गयी) फिर प्रति परिवार अन्न की इच्छा करने वालो को अन्न, वस्त्र की इच्छा करने वालो को वस्त्र दिया जाय। इति विचार्य मया मनसापि भो त्वदपरो न नृप परिसेवति। तदधुना मम पादतलस्थितैरधिगता नमयेति किमुर्वरा ।।४।।

70 कल्याणचन्द्रोदय - ऐसा विचार कर मै ने मन से भी, हे राजन्, आप के अतिरिक्त किसी दूसरे राजा की सेवा नही की। तो इस समय मेरे पैरो के नीचे स्थित क्या वह उर्वरा भूमि मै ने अधिकृत नही की अपरिचित्रमतीव रण विना भवति भूरि भटेषु धनव्यय । भ्रमति यस्य कुटबमितस्ततस्तवकृपेव शिवे परिहासभू ।।५।। दूसरी आश्चर्य की बात यह है कि बिना युद्ध के सैनिको मे अधिक धन व्यय है। आप की कृपा की भाँति जिसका कुटब इधर उधर भटकर रहा है यह शिव हॅसी का पात्र हो गया है। कूर्माचलेश प्रथित पृथिव्याँ प्रख्यातकीतिर्द्विजपुगवोऽयम् । यदत्र दुखी वद कस्य दोषो भूमडलाखडलवदिताघ्रि ।।५६।। कूर्माचल नरेश पृथिवी मे व्याप्त है, यह द्विज श्रेष्ठ भी प्रख्यात कीर्ति वाला है। फिर भी यह दुखी है, हे राजन्, जिस की समस्त भूमडल के लोग वदना करते है, बताओ यह किस का दोष है ? यमीक्षसे देव दृशैव किचित्सएव वेत्ता द्विपद पशुश्च । द्विजोप्यय गच्छति यत्र चास्य वृद्धि कुरुक्षेत्रमयीतिचित्रम् ।।५७ ।। हे देव, जिसे आप आँख से देखते हैं वही मनुष्य तथा पशु जानने वाला है, यह द्विज भी वहाँ जाता है जहाँ इस की वृद्धि होती है। यह विचित्र है कि ससार कुरुक्षेत्र समान है ( कर्म क्षेत्र है।। बुद्धयस्व केचित्स्फटिकाभिरामभास स्फुरत्यैव भवत्सुरगात्। मणि सुदीप्त्यैव विभासमानस्तिष्ठत्यय सूक्ष्मधियेतिधीर ।।५८ ।। यह जानो कि कोई आपके सुरग से (१) सुन्दर स्फटिक की कान्ति से जाते है। मणि अपनी ही कान्ति से प्रकाशमान होता है। यह धैर्यशाली (द्विज) भी अपनी सूक्ष्म बुद्धि से ही स्थित है। रत्न गृहाणेश किमश्मभिस्ते कार्य कृत कि करणीयमस्ति। त्वदीयपूर्वं न वटोषराणा कुलेन रत्नाकरधी कृता किम् ।।५६ ।। हे राजन्, रत्न ग्रहण करो, पत्थर से आप का क्या काम ? किये हुए को क्यो करना है ? आप के ही पूर्वजो ने, न कि वटोपर ग्राम के वासियो के कुल ने, यह पृथ्वी श्री सत्पन्ना की। ॐ इत्युत्त्क्त्वामान्नमेक सुमुद्रामुक्त राजा श्रीहरेघरस्त्रकेदात्। स्वस्तीत्युक्तवा श्रीशिवोप्याग्रजन्मा शिष्यै सार्द्ध कौशिकीपारमास्ते।।६० ।। ऐसा कहने के बाद राजा (कल्याण चन्द्र) ने एक अशर्फी के साथ द्विज (शिव) को अर्घ्य समर्पित किया। 'स्वस्ति ऐसा कह कर भी शिव अपने शिष्यो के साथ कौशिकी (कोसी) पार (गढमुक्तेश्वर की ओर (राज कार्य करने) चल दिये। ।। इति श्री कल्याणचन्द्रोदये कूर्माचलीयकाव्ये शिवकवि कृतौ पचम सर्ग ।।

कल्याण चन्द्रोदय का छठा सर्ग - यावत्समीहा कुरुते मनीषी ततोऽपि गन्तु त्रिपथैकदेशे उत्पातमूर्ति र्दुत्नुवाभिधानो रोध शिवस्याश्चाकरोदवयं ।।१।। जब विद्वान् शिव ने वहाँ से गढमुक्तेश्वर जाने की इच्छा की, साक्षात उत्पात की मूर्ति नीच दुलुवा नामी व्यक्ति ने उस को रोका। श्री देवचन्द्रेण यदीय नासा हृताथ कर्णो च करौ निकृन्तो। स स्वानुरूप नृपति विधाय नीचाश्रयाद्रुद्रपुरे स्थितोऽग्रे।।२।। श्री देव (देवी चद्र) चन्द्र ने जिस की नाक काट दी ओर दोनो कान और हाथ काट दिये वह नीच (दुलुवा ) राजा ( देवीचद्र) को अपना जैसा बना कर नीचो का आश्रय पा आगे रूद्रपुर मे स्थित था। श्रुत्वा कल्याणचन्द्र क्षितिपतितिलको होलिकारगमध्ये। भेरीभाकारमुच्चै सपदि बहुतरान्वाद्यकान्सविधाय । हस्तौ निप्पीड्य धीरो धरगतदशनो वक्रितभूकराल सयातो खबंदर्प प्रबलरिपुवने वह्निरपस्तरस्वी।।३।। यह सुन कर राजाओ मे श्रेष्ठ कल्याणचद्र होली के रग के बीच शीघ्र ही भेरी, नगाडा तथा बहुत प्रकार के बाजो को उच्च स्वर से बजवा कर युद्ध भूमि का प्रस्थित हुए। उस समय शत्रु के दर्प को नष्ट करने वाले धीर कल्याण चद्र क्रोध से दोनो हाथो का दबा कर प्रबल शत्रु के वन मे साक्षात अग्नि के समान प्रविष्ट हुए। उस महान् स्फूर्तिवान कल्याण क दाँत क्रोध से होठो के नीचे आ गये थे ओर उन की टेढी भोहें कराल हो गयी थी। तत कृतो स्वस्त्ययनोऽधिराज श्रीप्राणानाथप्रमुख प्रयात । रमापति गर्गनिभ वरेण्य दैवज्ञमग्द्र पुरतो निधाय।।४।। तब श्रीप्राणानाथ आदि पण्डितो के स्वस्तिवाचन करने पर, महाराजाधिराज (कल्याण चद्र ने साक्षात् गर्ग के समान, दैवौँ, मे अग्रणी और श्रेष्ठ रमापति को आगे रख कर यद्धि भूमि को प्रस्थान किया। जाते मुहूर्तेऽभिजिति प्रशस्ते भीमहदाभीमसमानतेजा। सदिश्य मौल शिवदेवमग्रे भटोद्भट प्रत्यरिसैन्यमध्ये ।।५।। कल्याणकारी तथा विजयकारी अभिजित मुहूर्त के बीतने पर भीम के समान बलिप्ट कल्याण चद्र ने भीमताल के पास आभिजात्य कुल के मोरूसी मत्री, योद्धाआ म श्रेष्ठ, शिवदेव को शत्रुसेना के बीच आक्रमण करने का भार सौपा। आयोधनाचार्यमुदारवृत्त धीरोद्धत त हरिरामक च। ज्योतिर्विद कोकनदप्रकाश जयादिकृष्णेनसम तथेश ।।६।। - 72 कल्याणचन्द्रोदय - कूर्माचलीयेषु कृताधिकार शिव विशिष्ट वरवैरभद्रि। तत्रत्यकैश्चानुगत भटोभटै सहैव लक्ष्मीपतिलेखकेन।।७।। श्रीमल्लक्ष्मीसिहक राजसूनु शस्त्राध्यक्ष चद्रिसज्ञ तथैव। रजीताख्य केसरीसिहक च वक्र तत्पद्मसिह नृसिह ।।८।। तेजसिहगजसिह सज्ञकानुद्रतानपि च धर्मपूर्वकान्। वीरवल्लसदृशान्भटोद्भटान्युद्धनर्तितभुजान्सहिम्मतान्।।६।। विसृज्य सर्वान्नृपति स्थितोऽसौ शिलोच्चयाने रणरगधीर । साक चमू सापि गतातिधीरवीरेण सेनापतिना शिवेन । ।१०।। कुलकम् । इसी प्रकार नृसिह के समान तेजस्वी महाराज कल्याण चद्र, आयोधनाचार्य, उदारचरित्रवाले, धीरोद्धत, लालकमल को प्रकाश करने वाले सूर्य के समान तेजस्वी हरिराम ज्योतिर्विद को जयकृष्ण आदि के साथ , वीरभद्र के पुत्रो मे श्रेष्ठ, कूर्माचलीयो मे पूर्ण अधिकार किये हुए विशिष्ट शिवदेव को , तथा वहाँ पर इकट्ठा हुए योद्धाओ के साथ तथा लेखक लक्ष्मीपति के ही साथ अपने अनुगतो को, राजपुत्र श्रीमान् लक्ष्मीसिह को, उसी प्रकार शास्त्रागार के अध्यक्ष चद्रिसिह को तथा रणजीत सिंह, कराल केसरी सिह, उसी के समान भयकर पद्मसिह को, तथा धर्मु इत्यादि के साथ तेजसिह, गजसिह नाम के उद्धत योद्धाओ को, हिम्मतसिह के साथ युद्ध मे भुजाओ को नचाते हुए बीरबल के समान उत्कृष्ट योद्धाओ को छोड कर रण मे धीर महाराज कल्याण चन्द्र एक ऊची चट्टान पर स्थित हो गये। धीर वीर सेनापति शिवदेव के साथ वह सेना भी आगे बढ़ी। वटोषरस्योपरिवर्तमान विध्वस्य दुर्ग सशिवैसिहै । कल्याणचन्द्रस्य जयो यदोक्तो न जीविषा तत्र समागतोद्राक् ।।११।। शिवदेव के साथ नृसिंहो ने (पुरुषसिहो ने) वटोषर के ऊपर स्थित दुर्ग का विध्वस कर जिस समय कल्याण चद्र की जयजय कार की उस समय वहाँ पर जीवन की इच्छा करने वाला कोई तुरत नही आ सका। तत्पावतश्चदखामियॉखाँ प्राप्तौ चिचीचीति क्रुधाकुशतौ । धिग् धिग् ब्रुवन्तौ असलादिखान रे मूढ कि जीवसि युद्धचौर ।।१२।। उस (दुर्ग) के बगल से क्रोध से चिल्लाते हुए, ढूँढते हुए चाँदखाँ और मियाँखाँ आये। वे असलतखान को धिक्कारते हुए कह रहे थे, “युद्ध से जी चुराने वाले हे मूढ, तू क्या जीवित श्रुत्वालसत्वा कटुभापित तन्निष्कृन्मानात्मयशिररत्तदैव । कामातुरा क्रोधवशवदाश्च न मानयुक्ता गणयति जीवम् ।।१३।। इस कटु वाक्य को सुन कर उसी समय असलत खाँ ने अपना शिर काट दिया। कामातुर, क्रोध के वशीभूत तथा आत्म सम्मान वाले लोग प्राण की कुछ गिनती नही करते । (कुछ भी परवाह नही करते) छठा सर्ग 73 त्यस्तत्तदालीमहमदविसृष्टा हुकृत्य सेनापतयो जवेन। खगदयो रक्षगणा इवात्मनाश विधातु सहसा प्रपन्ना ।।१४।। उस समय अलीमहमद के द्वारा भेजे गये तीन सेनापति हुकार कर बडे वेग से सहसा वहाँ आ गये मानो अपना नाश करन के लिये खर आदि राक्षसगण आ गये हो। समागता सा चतुरगसेना यत्रोत्थितैरश्वजरेणुजालै । नाहो न गबिर्नपरा न चान्यो भटोभ्दटैनैव विशकितोभूत् ।।१५।। वह चतुरगिणी ( यवन ) सेना वहाँ आ गयी जहाँ घोडो के खुरो से उठी धूल के जाल मे न दिन, न रात्रि, न दृसग, न ओर कोई ( दिखाई दे) कोई भी योद्धा भयत्रस्त न हुआ। तत शिव सर्वशिवाभिधायी भटान्स्वतुल्यान्पुरतो निधाय । य लुठका प्रेक्षककातगश्च तानेकतो न्यस्य गतो रणाब्धौ ।।१६।। तब सम्पूर्णरूप स शिवस्वम्प शिवदेव अपने समान बलवान योद्धाओ को आगे रखकर, जो लुटेरे, केवल प्रक्षक रूप मे थे ओर जो कायर थे उन को एक ओर रख कर, सग्राम सागर मे प्रविष्ट हु। जन्य तदाकारि महत्कराल कर्माचलीये यवने सहेत्थ । यद्रालवृद्धाश्च दिदृक्षवापि रणोत्सुका एवहि योगिनश्च ।।१७।। इस प्रकार कूर्माचलीया का यवनो के साथ उस समय भयकर युद्ध हुआ जिसे स्वय लड़ने को उत्सुक बाल, वृद्ध तथा यागिया न देखा। कल्याणचन्द्रस्य जय जयतस्तथाह्यलीमन्महदस्य चापि। स्व प्रभानाममुदीरयता गर्जात्तदोच्चैम्भयत्र वीरा ।।१८।। ( आक्रमण से पूर्व) एक और कल्याण चद्र की जयजयकार और दूसरी ओर अलीमहमद की जयजयकार करत हार दोनों ओर के वीर अपने अपने स्वामियो का नाम पुकारते हुए ऊचे स्वर से गर्ज। तामापतती यवनस्यसेनामुद्रीक्ष वीगनवदच्छिव स्वान् । अहो जयादा नृपमानमिष्ट शरीरदानाच्चसुगगनाप्ति ।।१६।। उस यवन सेना को आती हुई देख शिवदेव अपने वीरो से बोले, “हे वीरो, जय प्राप्त करने से राजा क मान की रक्षा होगी। शरीर का दान करने से अप्सराओ की प्राप्ति होगी।" इति चमृपतिना समुदीरित प्रतिनिशम्य वचोतिमनोहर। अग्मयुश्च मर्गजिउणादयो वरभटा सुरतानकमुख्यका ।।२०।। अपने सनापति क मनाहर वचन सुन कर योद्धाओ मे श्रेष्ठ नरी, जिउण तथा सुरतानक आदि वीर बहुत प्रसन्न हुए। श्यामादिसिहन तु मल्लयुद्धमगतिमि सार्द्धमकारितीव्रम् । तनेव पश्चाद्गढपालियन समाश्रितेद्रस्यसभात्मदानात् ।।२१ ।। श्यामसिह आदि ने शत्रुआ के साथ भीपण मल्लयुद्ध किया। इस के पश्चात ही इस गढपाल ने ( श्यामयिह न) अपन शरीर क दान म इन्द्र की सभा मे स्थान पा लिया।

74 कल्याणचन्द्रोदय जैकृष्णजनाहरसिंहमुख्यै पुरस्थितै भीममकारिजन्य। धैर्य समालव्य स कृष्णसिहो रणेथ हिमवद्हुधाव्यशोभीत्।।२२।। जैकृष्ण जै नाहरसिंह आदि योद्धाओ ने अग्रिम पक्ति मे खडे हो कर भीषण युद्ध किया। धैर्य धारण कर वह कृष्ण सिह रण मे हिम के समान छा गया। यदा वीरवल्लो विकोशात्तखड्गो वृहद्वैरिवृदेऽपतदयुद्धशौड । तदा साधुवादो महानाविरासी गुणस्यैव यत्पक्षपातो नृलोके ।।२३ ।। जिस समय युद्धकला मे प्रवीण वीरवल्ल म्यान से तलवार निकाल कर विशाल अरि समूह मे झपट पडा उस समय चारो ओर से वाह वाह की ध्वनि गूंजी। मर्त्यलोक मे केवेल गुण का ही पक्षपात होता है यह महान उपलब्धि है। सिर्मोरकूर्माचलयो सदैक्य स्थितत्विदानी न रणाग्निमध्ये। इतीव लज्जाकुलितो नृपार्थे हौषीत्स्वजीव सहसैव धर्मु ।।२४ ।। सिरमोर (नाहन) तथा कूर्माचल की सदा एकता रही किन्तु इस समय रणभूमि मे नही है ऐसा सोचते हुए लज्जा से आकुलित सिरमोर के वीर धM ने नृप के लिये अपने प्राण सहसा रणाग्नि मे होम दिये। युद्ध पुराभूत् किल तारकामय त्रेतायुगे रावणयुद्धमद्भुत। ततो महाभारतक तृतीयके शिवेन सार्द्ध तु वटोषरे कलौ।।२५ ।। कहा जाता है कि त्रेतायुग मे तारकमय (शिवमय) अद्भुत रावण युद्ध हुआ और उस के बाद (द्रापर मे ) महाभारत का युद्ध हुआ तीसरा युद्ध कलिकाल मे वटोपर मे शिव (देव) के साथ हुआ। रणोऽभवद्भीरभयानकस्त्तदा मुदावहो बीरपथानुवर्तितना । समागता कौतुकिनो वटोषरस्थले कुरुक्षेत्राधिया रणागडणे।।३४ ।। वीरपथ के अनुगायियो का, कायरो के लिये अत्यन्त भयानक किन्तु वीरो के लिये आनददायक, युद्ध हुआ। कुरुक्षेत्र के समान उस वटोषर की रणभूमि मे तमाशबीन (दर्शक) युद्ध देखने आये। वृत्ते कूटास्त्रयुद्धे रणरसरसिका शक्तिभि केपि वीरा प्राहार्युश्चर्महस्ता करकमलधृतै श्चद्रहासैश्च केचित् । एके क्षुद्रासिनद्धा दिविजिंगमिषवो यष्टिभिर्मुष्टिभिस्ताम् । जानतो मल्ललीलामतिकठिनभुजास्त्ताम्रवक्त्रा परेतु । ।३५ ।। रण के रस का आस्वादन करने वाले वीर वृत्तयुद्ध तथा कूट युद्ध मे चमडे के दस्ताने पहने भालो को फेक रहे थे। कोई वीर हाथो मे चमकती तलवारे लिये युद्ध कर रहे थे। कोई छोटी तलवारे बाँधे आकाश मे छाने वाले बाण छोड़ रहे थे। कोई लाठियो से ही लड रहे थे। कोई अत्यत बलिष्ठ मासल भुजा वाले, लाल मुंह वाले मल्लयुद्ध की कला जानने वाले वीर मुट्ठियो से लड रहे थे। * आठ श्लोक २५ से ३३ तक अप्राप्त है। मूल प्रति का ५०वाँ पृष्ठ नहीं मिला।

छठा सर्ग 75 चापी चापधर रथी रथवरे वलान्तमूर्जस्विन खड्गी खड्गधर प्रहारमकरोद् यता गजस्थरिपुम्। इत्थ तद्ररणरगके प्रतिभटा प्रक्षेपणीयैश्चिर युद्धयतो वलवत्तरै प्रतिभटै प्रोन्मदितास्तत्क्षणम् ।।३६ ।। उस युद्ध मे धनुर्धर धनुर्धारी से, रथी रथवाले से, बलवान् बलवान् से, असिधारी असिधर से, गज पर बैठा दूसरे गजस्थ रिपु से भिड गये और एक दूसरे पर प्रहार करने लगे। इस प्रकार उस युद्ध मे प्रेक्षपणीय अस्त्रो से देर तक लड़ते हुए योद्धा अधिक बलवान् योद्धाआ के द्वारा उसी समय भली प्रकार मर्दित् कर दिये गये। अथ वीरै जयोद्धतैरभित कूर्मधराधिवासिभि हयरत्नधनादिलुण्ठन कृतमस्त्रोघवलेन वेगत ।।३७ ।। जय से उन्मत्त कूर्माचलीय वीरो द्वारा, बहुत वेग से, अस्त्रो के समह के बल से, शत्रु के घोडे, रत्न और धन आदि की लूट हुई। कल्याणचन्द्राय नृपाय तत्तदुपायनार्थ प्रतिगृह्य वस्तु। समेत्य सेनापतिपार्श्वक ते तूर्ण समागनतीतार कुर्बन्।।३८ ।। महाराज कल्याणचन्द्र को उपहार देने के लिये उन सब वस्तुओ को ग्रहण कर (वे कुमाऊनी वीर) सेनापति (शिवदेव ) के सहयोगी के पास ( उन वस्तुओ को) इकट्ठा कर शीघ्र ही उच्च स्वर से अभिवादन करते हुए एकत्रित होने लगे। तान्समीक्ष्य स चमूपतिर्युवा स्वर्णमुष्टिरददात् सुहर्षित । मत्रवत्प्रतिशिरस्त्वति चित्र देवभक्तिकुशलोप्यय कलौ।।३।। उन (कूर्माचलीय वीरो को) को देख कर उस युवा सेनापति (शिवदेव) ने अत्यन्त प्रसन्न होकर मुट्ठी मुट्ठी पर सोना दिया। प्रत्येक (कूर्माचलीय) सैनिक मत्रवत् इतना अनुशासित है और यह (सेनापति) राजा की भक्ति मे इतना कुशल है यह कलिकाल मे आश्चर्यजनक बात है। दत्त स्वजीवो रणरगकैयस्तै स्वर्गसोपानपथ गृहीत। नाश्चर्यमेतत्वपर विचित्र यल्लब्धमत्रैवशिवात्पदस्वम् ।।४०।। जिन (वीर कूर्माचलीय) योद्धाओ ने (इस युद्ध मे) अपने प्राण दिये उन्होने स्वर्ग का मार्ग पकडा यह आश्चर्य नही है। दूसरी विचित्र बात यह है कि यहाँ (मर्त्य लोक) मे ही शिव (देव) से अपना पद प्राप्त कर लिया। विजित्य जेतारिवल वटोषरस्थले स्थितोऽलीयमहमदविशकया। यद्यागमिष्यत्यचिरेण तेन मे रणो हिमात्प्रीतिकरो भविष्यति।।४१ ।। युद्ध जेता (शिवदेव), अरि की सेना जीत कर, अली मुहमद की, (फिर लौटने की आशका से, वटोपर के स्थल पर ही स्थित रहे। वह (अलीमुहमद) यदि शीघ्र ही आजायेगा तो मेरे लिये युद्ध हिम से अधिक प्रीतिकर न होगा। इति विचार्य चमूपतिनादृता यवनतीव्रशरोघनिपीडिता । अयुरथो नृपति रणकोविदा नयवता सचिवेन विसजिता ।।४२।। " 76 कल्याणचन्द्रोदय - - ऐसा विचार कर चमूपति (शिवदेव) ने यवनो के तीक्ष्ण बाणों के समूह से पीडित (वीरो का) का, आदर किया और उस राजनीति मे कुशल मत्री ने उन रण मे कोविदो (कुमाऊनी वीरो) को विसर्जित किया और नृपति (कल्याणचद्र) के पास गये। सप्राप्य सर्वे जयदेवेत्युदीयं देवातिकमाशुवीरा । आसन्विचित्रावरभूषणे लसन्मुक्ताफलै भूपतिसत्कृतास्ते।।४३ ।। शीघ्र ही सब (कूर्माचलीय) वीर देव की जय कह कर नृपति (कल्याणचद) के निकट आये। रग बिरगे सुन्दर वस्त्र भूषणो से तथा चमकते हुए मोतियो की मालाओ से नृपति द्वारा उन का सत्कार किया गया । गजाश्वरत्नैर्बहुदानमानैग्रामैश्चतत्तन्नगरोपमैश्च। गोदासदासीकरककणैश्त्तानतोषयद् भूतिपतिर्वदान्य ।।४४ ।। श्रेष्ठ भूपति कल्याणचन्द्र ने ( उन कूर्माचलीय वीरो को) हाथी, घोडे, रत्न तथा बहुत दान मान दे कर तथा नगरो के समान बडे बडे गाँव दे कर तथा गाये, दास, दासी तथा ककण आदि दे कर (उन्हे) सन्तुष्ट किया। पारितोषिकमदादधीश्वरो जे तु तत्र रणत समागता । ये न तत्तु यवनात्प्रतित्नब्ध वस्तु जातमपि तस्य नाग्रहीत् ।।४५।। कूर्माचत्न नरेश ने उन वीरो को जो रण से वापस आये पारितोषिक दिया जिन्होने यवनों से मिली हुई वस्तु को ग्रहण नही किया था। सुरेन्द्रलोक प्रति प्रस्थिता ये कृत्वात्मजीवार्पणक नृपार्थे । तेषा यदैश्वर्यमभूत्पुरा यन्न्यस्त तदीयेषु जनेषु राज्ञा ।।४६ ।। राजा के लिये अपने जीवन को अर्पण करके जो (वीर) इन्द्र लोक को प्रस्थित हो गये उन का जो पुराना ऐश्वर्य था वह सब राजा द्वारा उन्ही के बॉधवो को दे दिया गया। शिवादिसेनापतिमुख्यकम्य प्रतप्तकातस्वरभास्वराणि । वस्त्राणि सप्रेष्य भवद्विरत्र समीहित न कृत मिव लेणि।४७ ।। शिव देव आदि मुख्य सेनापतियो के लिये तपते सोने के चमकीले वस्त्र (उपहारस्वरूप) भेज कर राजा ने इस कार्य द्वारा हमारा ही भला किया। को वो समर्थ कथितु रसाया शेष बिना शेमुपि वान्यशेष । गढेश डोटीश नृपादयोन्ये जितायप्यत्र महविचित्रम।।४८ ।। शेष (नाग) के बिना पृथ्वी पर आपकी कीर्तित कहने मे कौन समर्थ है ? यद्यपि आपने गढेश और डोटीश आदि दूसरे नृप जीते किन्तु यहाँ (वटोबर) मे ( आपकी ) यह विजय महान् आश्चर्यजनक है गोविप्रहन्ता यवनाधियासौ क्रूर करात्नो रणकर्कश्च । नजीविखाँ यद्रणतो गतोग्रे मन्येप्यत्नीमन्महदोहताश ।।४।। ( छठा सर्ग 77 गो ब्राह्मण को मारने वाला यह यवन, क्रूर, कराल और कर्कश है। चूँकि नजीब खाँ (अली महमद का सेनापति) रण से चला गया है तो मैं यह मानता हूँ कि अली महमद भी हताश हो गया है। इति शिवाय ससारमुत्सुकान्नरपति स्वहितानतिसृष्टवान् । सपदि पुष्पवटूनभिसम्मतान् वरमनोहररत्नसमन्वितान् । ।५० ।। ऐसा सोच कर (कही यवन न आजॉय) महाराज कल्याणचन्द्र ने आदरसहित अपने सेनापति शिवदेव के लिये शीघ्र ही सुन्दर मनोहर रत्नो से युक्त (रण के लिये) उत्सुक, अपने हित को चाहने वाले, जो सब प्रकार से उपयुक्त थे, ऐसे वीर योद्धा भेजे। तदा भूसुरेम्यो जयद्रव्यमुच्चै ददातु नरेश कलौ कर्णतुल्य । स ऐच्छद्धनेनातिशीघ्र विधातु महादानशौडो दरिद्रमदरिद्रम् ।।५१ ।। उस समय कलिकाल मे महादानी कर्ण के समान देने मे अति प्रवीण चन्द्र नरेश ने ब्राह्मणो को विजय का प्रशस्त द्रव्य देने के लिये धन से शीघ्र दरिद्र को अदरिद्र करने की इच्छा की। इति क्षितीशो बहुदानमानै सभाव्य सर्वानतुलप्रताप । मत्र समीरप्रमुखै विधातुमहोविशद्रस्त्रकुटीमुदाराम् । ५२ ।। इस प्रकार अतुल प्रतापशाली राजा कल्याणचन्द्र सबको बहुत दान-मान से सम्मानित कर समीर (समीर सिह चौहान) आदि प्रमुखो के साथ मत्रणा करने वस्त्रो की बनी विशाल कुटी (शिविर ) मे गये। इति कल्याणचन्द्रोदये शिवकविकृतौ कूर्मांचलीयकाव्येऽलीमहमत्सैन्यभगो नाम षष्ट सर्ग ।

सप्तम सर्ग के यावन्नृपो मत्रयतेथ मत्र युगानुरूपै सचिवै समेत । तावद्विज श्रीशिवरामनाम्ना सप्रेषितोगाद्धरिनामधेय ।।१।। जिस समय महाराज कल्याणचद्र युग अनुरूप अपने मत्रियो के साथ मत्रणा कर रहे थे उस समय श्री शिवराम के द्वारा भेजा हुआ हरि (हरिराम पत) नाम का ब्राह्मण ( वहाँ) आया। गगावलीयेषु महत्प्रतिष्ठा सप्रापितो मातुलजस्तदीय । पुरोहितस्यैव धियार्चितोसौ वचोवददिप्रवरस्तदीयम् ।।२।। उस (शिवराम) के मामा के पुत्र (हरिराम) ने गगावली के लोगो मे महान् प्रतिष्ठा प्राप्त की थी। विप्रो मे श्रेष्ठ इस ब्राह्मण ने पुरोहित की बुद्धि से राजा की अर्चना की और यह वचन कहे। दिल्लीपति देव तदैव दैवान् प्राप्तोस्त्यत्लीमन्महद निहन्तु। सस्थाप्य सैन्य स्वमुपत्यकाया भवद्भिरत्रागमन विधेयम् ।।३।। "हे राजन, अली महमद को मारने के लिये दिल्लीपति मुगल सम्राट ( मुहम्मद शाह) उसी समय सहसा स्वय आ गये है। अपनी सेना को पहाड के नीचे उपत्यका मे स्थापित कर आप को यहाँ ( गढमुक्तेश्वर ) आना चाहिये।" हरिहराच्छिवरामबुधोदित प्रतिनिशम्य वचो नृपतिर्दुतम्। अथ तमेव विसृज्य तदोचिवान्प्रियतर सचिर्व धनपडितम् ।।४।। हरिहर के द्वारा पडित शिवराम के वचन सुन राजा कल्याण चद ने उसे शीघ्र छोड उसी समय अपने प्रियतर अर्थसचिव से कहा। कार्य कृत जो भवदीयपूर्वजै भवद्भिरस्मिन्समये विधीयताम्। प्रभुत्वमूल समवायिकारण तत्साधने त्व धनदो भवापर ।।५।। 'आप के पूर्वजो ने हमारा कार्य किया। आप इस समय ( हमारा कार्य) करे। प्रभुत्व का मूल (धन) प्रभुत्व का विशेष कारण है। उस प्रभुत्व के सम्पन्न करने मे आप धनाध्यक्ष सहायक बने।" तथैव ते देव भविष्यतीति यदुक्तमेतेन कुतोऽपि लब्धा। सिद्धि कुतश्चित् किमु कल्पशाखा चिन्तामणि र्वा उत कामधेनु ।।६।। हे देव, जो इस ने कहा वैसा ही होगा। सिद्धि कहाँ से प्राप्त होगी ? कल्प शाखा या चिन्तामणि या कामधेनु से? या वीरभद्रेण कृता समाख्या पित्रा भवानद इति स्वसूनो । अन्वर्थतायै किमनेन तस्या मतिष्कृता सर्वशिवाभिधात्री।।७।। अपने पुत्र भवानद के लिये पिता वीरभद्र ने जो अर्थ की समाख्या की क्या उसी समाख्या के अर्थ से सलग्न रहने के लिये उस की बुद्धि सब की मगल करने वाली हुई ?

सप्तम सर्ग 79 शिव विधायाथ चमूपतीन्दै भूमींद्रदेवस्य दिदृक्तयान्य। द्विज शिव तत्र निधाय भास्वद् द्रोणेन तुल्य नृपतिस्ततोगात्।।८।। ब्राह्मण के आदर के लिये दूसरे शिव (देव) को चमूपतियो का स्वामी बना कर तथा द्रोण के समान दूसरे तेजस्वी ब्राह्मण शिव (राम) को वहाँ रख कर राजा कल्याण चद्र वहाँ से (वटोषर से) (सभल की ओर) गये। कूर्माचत्नीयै बहुवारितो ऽपि द्रुत न ते देव गति प्रशस्ता। दिल्लीश्वर शवलसन्निविष्ट दिदृक्षयागीकृतवान्न किंचित् ।।६।। "हे देव, आप की यह शीघ्रता उचित नही है।" ऐसा कूर्माचलीयो के बहुत रोकने पर भी राजा कल्याणचन्द्र ने सभल (मुरादाबाद) के पास आये हुए दिल्लीश्वर मुगलसम्राट (मुहम्मदशाह) को देखने के लिये यह (सुझाव) अगीकार नही किया। दिल्लीश्वरो भूमिपुरदरोसौ कूर्माचलेशोऽपितयोहियोग । जातो यदा कपमवापशेष कि वर्ण्यते ऽसौ यवन कृमिस्क्त ।।१०।। दिल्लीश्वर (मुगल सम्राट) तथा कूर्माचल नरेश का जब मिलन हुआ तब शेष भी कॉप उठे इस कीडे के समान तुच्छ यवन (अलीमुहमद) का तो कहना ही क्या ? अथागत श्रीशिवरामनामागस्त्यर्षितुल्य कलिकालमध्ये। विंध्यायमान सहसैव खर्व कर्तुं ह्यलीमन्महद पुरस्तात् ।।११।। विध्याचल के समान सहसा बढते हुए अलीमुहम्मद को छोटा करने के लिये कलिकाल मे अगस्त्य ऋषि के तुल्य श्री शिवराम यहाँ (सभल) आये। सम्मानितो भूपतिना पुरोधा वचोवदत्तार्किकमौलिभूत । यदासत्नोकान्मनसोरलेस्तानपीडयत्सैवमृतिस्तदीया।।१२।। राजा कल्याण चद्र द्वारा सम्मानित किये जाने पर तर्क सम्मत तथा मौलिक बात करने वाले पुरोहित (शिवराम पाण्डे) ने कहा, "जिस समय इस (अलीमुहम्मद) ने मसूरअली (अवध के नवाब) के प्रजाजन को पीडित किया उसी समय (यह कार्य) इस की (अली मुहम्मद की) मृत्यु समझिये। भूमीन्द्रदेवाय मयैतदुक्त म्लेच्छाधिनाथान्सुबहून्प्रविश्य। श्रीजाहवीपारमसौ करोति विधाय राज्य हरिनदनान्तम् ।।१३।। (शिवराम कहता है, ) मै ने (दर्बार मे) प्रवेश कर बहुत से मुसलमान सर्दारो तथा मुगल सम्राट से यह कहा कि ( अलीमुहम्मद) गगा के पार हरिनन्दन तक राज्य विस्तार कर शासन करता है। कूर्माचलातकोटिमित गृहीत विध्वस्य राज्य बहुकोशजातम् । शत्रुर्गदोप्यग्निकणेन यज्ञैनॊपेक्षणीय कृशतागतोपि ।।१४ । इस ने (अलीमुहम्मद ने) राज्य को विध्वस कर कूर्माचल के राजकोश से एक करोड तक धन लिया। जिस प्रकार यज्ञ से अग्नि कण रूप हो कर भी उपेक्षणीय नही है उसी प्रकार क्षीणता को प्राप्त हुआ शत्रु भी उपेक्षणीय नही है। (उसे समूल नष्ट कर देना है।) ) 80 कल्याणचन्द्रोदय । श्रीसार्वमौभानुगातै मदुक्तमगीकृत तै र्यवनप्रधानै । तत्सर्वथैवेश विनाशाकाल जातो ह्यलीमन्महदोचिरेण ।।१५।। सार्वभौम मुगल सम्राट (मुहम्मदशाह) के अनुगत उन यवन सर्दारो ने (मसूर अली खाँ, कमरुद्दीन खाँ आदि ने) मेरी (शिवराम पाण्डे की) कही बात स्वीकार की। तो हे राजन्, शीघ्र ही अलीमुहम्मद का विनाश समुपस्थित है।" इत्थ द्विजे जल्पति सार्वभौमपालस्थित कश्चिदुपेत्यराज्ञे। समागतो अलीमहमत्करौरचौ वध्वाभिमानी द्रुतमित्यवोचत् ।।१६।। इस प्रकार ब्राह्मण के कहते ही सम्राट के पार्श्व में स्थित कोई राजा के (कल्याण चद्र) के पास आकर शीघ्र यह बोला कि अभिमानी अलीमहमद दोनो हाथ बाँधकर (सम्राट के पास) आ गया है। (नवाब मसूर अली खाँ ने नवलराय को साथ लेकर अली महम्मद खाँ को वनगढी के पास पराजित किया। अलीमहम्मद, पैदा खाँ, दूंदे खाँ, फतहखाँ तथा जयसिह राय पकडे गये और मुगल सम्राट के पास लाये गये।) कर्णामृत तत्तु निपीय राजा सभाव्य त भूसुरमुत्तमोक्त्या। भूमीन्द्रदेवातिकमुत्सुकोऽसौ समागतस्तस्य दिदृक्षयारे।।१७।। कर्णो को मधुर लगने वाले वचनो को सुन कर राजा कल्याण चद्र उस ब्राह्मण (शिवराम ) को उत्तम वचनो के कारण सम्मानित कर उस शत्रु (अली महम्मद खाँ को) को देखने मुगल सम्राट ) ( मुहम्मद शाह) के निकट जाने को उत्सुक हो कर वहाँ आये। भूमडलाखडदृष्टिगोचरो गजाश्वरत्नवरभूषणै र्दुतम्। सम्मानित कूर्मधराधिनाथ स्वा- गज, अश्व, रत्न, सुन्दर वस्त्र भूषण से, समस्त भूमडल जिस के दृष्टिगोचर है, ऐसे कूर्माचल नरेश का सम्मान हुआ। ।१८। श्चा सन्मत्रिणो जानपदाश्च वृद्धापुरोकसश्चाभि मुखास्तदासन् । ।२५ ।। (उस समय जब महाराज कल्याण चद्र वटोषर का युद्ध जीत कर और मुहम्मद शाह और मसूर अली खाँ द्वारा अभिमानी अली महम्मद का दर्प दमन कर अल्मपुरी लौटे वहाँ उन का अभूत पूर्व स्वागत हुआ) उस समय मत्री, श्रेष्ठ नागरिक, वृद्धपुरोहित सामने थे। अन्येपि कौतूहलकामुकजना समागतास्तत्पुरवासिनो नृप। दिदृक्षवो राजपथ सुभूषित सुरूपवेपस्तरूणीगणोप्यथ ।।६।। * इन श्लोकों के कुछ अश हस्तलिखित पुस्तक में मिट गये हैं। अत ये अपूर्ण हैं। इस पुस्तक का ५६वाँ पृष्ठ उपलब्ध न होने के कारण १८वें श्लोक से २५वें श्लोक तक ८ श्लोकों के अर्थ नहीं लिखे गये। सम्पादक सप्तम सर्ग 81 राजपथ मे महाराज कल्याणचन्द्र को देखने दर्शक रूप मे अन्य नागरिक भी आये और आयी सुन्दर अलकारो से सजी रूपवती स्त्रियाँ। स्तन पिबत तनय तु काचिदाल विहायैव गता गवाक्षम् । ताबूलमन्या खदिरेण हीन चूर्णेन तप्तद्रदने दधाना।।७।। कोई स्त्री (कूर्माचल नरेश कल्याण चन्द्र की सवारी देखने) स्तन पीते हुए छोटे बच्चे को छोड कर खिडकी के पास चली गई। कोई दूसरी स्त्री (जल्दी मे) बिना कत्था लगाये ही केवल चूना लगे पान को मुँह मे दबाये गवाक्ष के पास आ खडी हुई। काच्चिन्मृगाक्षी नयनाजनेन सव्य न सभाव्य गतातितूर्णम् । तथैवचैक चरण नवोढा लाक्षारसेनाशु विरज्य नाज्यम् ।।२८ ।। (स्वागत समारोह तथा महाराज का दर्शन करने की शीघ्रता मे) कोई मृगाक्षी नयनाजन से (केवल बॉयी आँख सँवार कर) दाहिनी आँख न सँवार कर गवाक्ष के पास शीघ्रता से आयी। इसी प्रकार नवोढा लाक्षारस से एक चरण रग कर दूसरा चरण बिना रगे ही राजा को देखने भागी। अहो तदा काचन दपती रति प्रसगकालेपि गवाक्षमागतौ। धृत्वा कथचिद्रभसादधोशुक सव्यान युग्में न विनैवचोत्सुकौ।।२६ ।। आश्चर्य की बात है कि उस समय (जब रात्रि मे राजा की सवारी जा रही थी) कोई दपति रति प्रसग के समय भी गवाक्ष के पास आ गये। उस समय वे इतने उत्सुक थे कि शीघ्रता मे केवल नीचे का अधोवस्त्र धारण कर बिना रति किये ही खिडकी के पास आ गये। सद्वर्तुलोन्नतकुचयोग्यहारमुदग्रथयती महिला तदैका। समुत्थिता तत्पदपद्मयुक्तावली चानुपद गतास्या।।३०।। सुन्दर गोल तथा उन्नत कुचो के लिये उपयुक्त हार गूंथती हुई उस समय जब एक महिला ( राजा के दर्शन करने सहसा) उठी तो हार उस के चरण कमल मे लिपटा हुआ उस के ही पैरो के पीछे आ गया। काचिन्लिखती वनिता स्वकीयमावासभित्ति पतितोषणार्थम् । क्षण गता लोकपथ तथान्यास्रकचदनादीन्यनुकुर्वती च ।।३१ ।। कोई वनिता पति को प्रसन्न करने के लिये अपने गृह की दीवाल को चित्रित करती हुई क्षण भर मे (राज दर्शन को) सडक पर आ गयी और उसी प्रकार दूसरी महिला हार और चदन इत्यादि का अनुकरण करती लोकपथ पर आ गयी। द्यूत परित्यज्य ससभ्रमेण दोला न हित्वा शुकसारिका च। गान सुवीणामलकादिक तद्विस्मृत्य श्रृंगारमधावतैव ।।२।। कोई जल्दी मे द्यूतक्रीडा छोडकर, कोई झूले मे ही शुक-सारिका को छोड कर, कोई गाना और वीणा छोड कर, कोई केश सवारना भूल कर (राजदर्शन को) दौडे।

82 कल्याणचन्द्रोदय सद्ब्रहतोकास्तमवेक्षितु हयद् गुरो सकाशादपि कौतूत्सुका । समागतास्तेक्षणमब्रुवन्नमु ह्याशी स्वशाखीयवचोभिरीश्वरम् ।।३३ ।। उस समय सद् ब्राह्मणो के पुत्र, गुरू के पास से, कौतुक देखने के उत्सुक, राजा के दर्शन को आये। उस क्षण उन्होने अपनी शाखाओ के वचनो के अनुसार राजा को आशीर्वाद दिया। सत्क्षत्रियास्तिमुदारवृत्तमाकर्ण्य भूमीद्रमितोभिपन्ना । समागत राजपथ मनोज्ञवेषास्त्तदा सद्गुरुशिक्षितास्त्रा ।।३४।। उदारमना नृपति कल्याणचद्र का आना सुन कर सुन्दर वस्त्र पहने हुए, अच्छे गुरू से शस्त्राभ्यास किये हुए कुलीन तथा योग्य क्षत्रिय राजपथ पर (स्वागत के लिये) आये। बणिक्तुडिभैरपि तत्क्षणागतै महार्हमाल्यावररत्नभूषितै । प्रतप्तचामीकर गौरगात्रैरशोभितद्राजपुर सुशोभितै ।।३५ ।। उस समय आये हुए, मूल्यवान् माला तथा श्रेष्ठरत्नो से विभूषित, तथा तपाये सोने के समान गौर गात्र वाले, सुन्दर वैश्य बालको से राजपुरी सुशोभित हो रही थी। सुवर्णकारैरपि माल्यकारकैरालेख्यकारै रपि रगकारकै । सुशोभितासीन्नृपते यथाल्मपूर्न चालका तत्प्रतिमामरावती।।३६।। सुवर्णकारो से, माला बनाने वालो से, चित्रकारो से, रग करने वालो से राजा की नगरी अल्मपुरी इस प्रकार शोभित हो रही थी मानो वह अलकापुरी तथा अमरावती की प्रतिमा हो। भास्वत्सहाशुरवोदितो लसद्राजापि तद्राजपुरोपकठे। याने मनुष्यै परितोभिसप्पितै विनीयमाने सुखयानसज्ञिते।।३७ ।। उस राजपुरी के नजदीक, सुखयान मे आसीन, मनुष्यो द्वारा चारो ओर उस यान मे घूमते हुए, राजा कल्याण चद्र चमकते हुए उदीयमान सूर्य के समान शोभित योगीद्रवृदोप्यगमत्तदानी कल्याणचद्रस्य दिदृक्षयैव । तद्रूपमैश्वर्यविदग्धता तु कि वर्णयह तनुवाग्विलास ।।३८ ।। उस समय (राजा की सवारी देखने) योगियो का समूह भी वहाँ आया। राजा के रूप तथा ऐश्वर्य की महत्ता का मैं क्या वर्णन करूँ? वाणी का विलास (अभिव्यक्ति) क्षीण हो गया है। राजीवतुल्यैर्नयनैरधस्थितानालोकयन्नापणगान्महाजनान्। सोपायनानद्भुत भासिताननानन्व ग्रहीत्सप्रणय नृपो मुदा।।३।। नाना प्रकार के अद्भुत प्रकाशमान उपहारो को लिये, अपनी दुकानो मे आये नीचे खडे, महाजनो को कमल के समान नेत्रो से देखते हुए राजा कल्याण चन्द्र ने उन से भेटे बडे प्रेम से स्वीकार की। भूति]षा विभूतिर्वसनमपि वृहद्धारिण च चर्मशुष्क वाहो यष्टीस्तथैवाशनमपि च शिल भूषण चाक्षजाल। तान्मुक्ताहार युक्ताननुपमवसनानश्वराजेधिरूढा तत्काल राजपुत्रानिव ददृशुरथो ब्रह्मवृदान्पुरस्था ।।४०।। हु।

सप्तम सर्ग 83 श्रेष्ठ घोडो पर बैठे हुए पुखासियो ने मुक्ताहार पहने तथा अनुपम वस्त्र पहने राजपुत्रो के समान उन ब्राह्मणो के समूह को देखा जिनका ऐश्वर्य भस्म है, जिन का वस्त्र बड़े हिरन की सूखी खाल है, जिनके हाथो मे दण्ड है, जिन का भोजन नाज के वे दाने हैं जो फसल कटने के बाद भूमि पर पड़े रहते है ( उज्छ वृत्ति) और जिनका आभूषण रुद्राक्ष की माला है। तावद्राजसुतास्त्वमात्यसहिता सुच्चाश्वपृष्ठे गता सोत्कीर्णा कुसुमैरिवात्मविभुना सार्द्र सुवेषान्विता । श्रीमद्राजपुरस्य सौधशिखरे सप्राप्त पौरागना सधैस्तत्क्षणमुक्तलाजनिवहै योगीन्द्रमानापहै ।।४१ ।। उस समय अमात्यो के साथ राजपुत्र, ऊचे घोडो की पीठ पर बैठे हुए, पुष्पो के समान (घोडो के वेग के कारण) ऊपर उछलते हुए, सुन्दर वेश मे अपने स्वामी (कल्याण चद्र) के साथ आये। उस समय समृद्धिसपन्न राजपुर के भवनो के छतो पर जितेन्द्रिय योगियो के मान को नष्ट करने वाली तथा उस समय लाज छोड कर पुर की सुन्दरियो का समूह आया। कल्याणचद्रो नृपतिर्यथागमत्प्राप्तास्तदीया पदवी पुरस्त्रिय । अधिक्षिपत्योति विपादतोक्षिणीस्वपक्षमपातान्नृपदर्शनोत्सुका ।।४।। जिस समय महाराज कल्याणचद्र आये उस समय अपने विष भरे पक्ष्मल कटाक्षों को चारो ओर बिखेरती हुई राजा के दर्शन को उत्सुक राजपुर की रमणियाँ राजा के ही मार्ग पर आयी। इत्थ स राजा पुरवासिकौतुकान्यालक्ष चागच्छदित स्वमदिरम्। यत्रेदिरास्वीयमनादिचापल विहाय तिष्ठत्यसकृद्धशीकृता ।।४३ ।। इस प्रकार राजा कल्याणचन्द्र कौतुक देखने वाले पुरवासियो को देख कर अपने महल मे गये जहाँ लक्ष्मी अपनी अनादि काल से चली आयी चपलता को छोडकर पूर्ण रूप से वशीकृत हो कर वर्तमान है। गवाक्षमार्गेषु समागतानामतष्पुरानेकविलासिनीनाम् । सभ्यरतदाशोभत नेत्रसप्रैस्तत्सौधमिंदीवरमालयैव ।।४४।। उस समय गवाक्षमार्ग से आयी हुई अन्त पुर की अनेक सुन्दरियो के नेत्र समूह से वह महल सुन्दर कमल की माला के समान भली प्रकार शोभायमान हुआ। भेरीभाकृतिभिर्नरेन्द्रसदन धावत एवागता । (१) सख्यावद्विजराजपुत्रवणिज सोपायनाश्त्तत्क्षणम्।। नगाडे तुरही के बजने पर उपहार लिये हुए सकारण ब्राह्मण (विद्वान), क्षत्रिय तथा वैश्य राजमहल की ओर दौडते हुए आ गये। घटारावविभूपित गजगण यता समेत तदा। (२) दृष्टाश्वानपि रम्यवेषरचितानासन्प्रमोदान्विता ।।४५।।

84 कल्याणचन्द्रोदय उस समय वे (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) महावतो समेत हाथियो के समूह को जो चिघाड रहे थे तथा जिन की गले की घटियाँ बज रही थी तथा सुन्दर सजे हुए अश्वो को देख प्रसन्न हुए। गत्वा ते मध्यकक्षा पुनरपिरुचिरा वारवामास्तदानी बिबोष्ठी पूर्णचन्द्राननरूचिरतरास्तारवेणीरपश्यन्। यासा तीर्यक्तकटाक्ष कुचयुगललसद्भपणाना चसधै योगीद्रस्यापिमानापह्नतिरथभवेत्तत्कथ वर्णयता ।।४६।।। राज महल के मध्य कक्ष मे आकर उन्होने (नागरिको ने) उस समय सुन्दर वारवधुओ को देख जिनके होठ बिम्ब फल के समान लाल थे, जिनके मुख पूर्णचन्द्र के समान रुचिर थे, जिन के चमकीले केश सजे सवरे थे, जिन की तीखी चितवन से तथा जिनके दोनो कुचो मे शोभायमान आभूपणो के समूह से जितेन्द्रिय योगियो के भी मान का अपहरण होता है। मै कैसे उन का वर्णन करूं। कक्षामेतासतीत्याद्भुतरसजनक रत्नसिहासनस्थ त वदिस्तूयमान सुरपतिसदृश चामरैर्वीज्यमानम् । कन्दर्पाकारमूर्ति नृपनरशतकै सर्वत सेविताघ्रि श्रीमन्कूर्माचत्नेशान्वयमुकुटमाणि भूपति सन्नतास्ते ।।४७ ।। इस कक्ष को पार कर वे (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य नागरिक) कूर्माचल नरेश के वशधरो के मुकुट-मणि श्रीमान् कल्याणचन्द्र के सम्मुख, जो अद्भुत रस के उत्पादक रत्नसिहासन मे आसीन थे, जिनकी वदीजन स्तुति कर रहे थे, जो इन्द्र के समान थे, जिन के ऊपर चँवर डुलाया जा रहा था, जो साक्षात कामदेव की प्रतिमूर्ति थे तथा सैकडो छोटे राजा जिन की सेवा मे उपस्थित थे, अभिवादन करने झुके। श्रीपुरदरधरधरोपि तानात्मराष्ट्रमहितान्फदलैनैर्युतान् । दृष्टिमात्रपतिते ससभ्रमादुत्थित किल फलान्यथाग्रहीत्।।४८ ।। कृता तदा काचनवृष्टस्च्चकै कल्याचन्द्रेण नृपेण सादर। यदादिभूदेवगृहद्विनिर्गत दारिद्यशब्द किमत परभवेत् ।।४।। उस समय श्री कल्याण चन्द्र ने आदर सहित ऊचे से सुवर्ण वृष्टि की ( इतनी सुवर्ण वृष्टि हुई) कि ब्राह्मणो के घरो से दरिद्र शब्द ही निकल गया। इस से अधिक और क्या हो। ये स्थापितास्तत्र बटोषरस्थले शिवप्रधाना समुपागतास्तदा। भूमीन्द्रदेवेन च बाहुनागके सलापितास्ते निकटे निवेशिता ।।५।। उस समय शिव ( देव आदि) जो प्रमुख अधिकारी वटोषर के स्थान मे नियुक्त थे वे आये। राजा कल्याण चन्द्र ने आलिगन कर उन से बात की और उन्हे अपने निकट बिठलाया। शिवस्तदाशीर्वचन ददाति सद्गद्यपद्यैश्च सुमगलैश्च। श्रीदीपचन्द्रस्य मुदे पुरस्तानश्रीकृष्णसिहस्य च भास्वरस्य ।।५१ ।। उस समय (राज सभा मे) सुन्दर मगलमय गद्य-पद्य मे शिव (राम) ने श्री दीपचन्द्र तथा तेजस्वी कृष्णासिह ( दोनो राजकुमारो के) के परितोषणार्थ आशीर्वाद दिया।

सप्तम सर्ग 85 अनुकृतमरकतवर्णा शोभितकर्णा कदवकुसुमेन । नखमुखमुखरितवीणा मध्ये क्षीणा शिवा शिव कुर्यात्।।२।। मरकत (मणि) के समान वर्ण वाली, कदव पुष्प से शोभित कर्ण वाली, नख-मुख से झकृत वीणा वाली, क्षीण क्रटि वाली शिवा मगल करे। श्रुत्वातितुष्टेन नृपेण सम्यग्ग्राम प्रदत्त सहसा शिवाय। पुराकृतानेन सुपुष्पवाटी द्विजेन यस्मिन्कदलीप्रधाना।।५३ ।। यह सुन कर अत्यन्त सतुष्ट होकर नृपति (कल्याणचद्र) ने (पुरोहित) शिवराम को सहसा वह (समूचा ) ग्राम दे दिया जहाँ उस ब्राह्मण ने पहले केले का बाग तथा पुष्पो की वाटिका बनायी थी। तत समानीय जनानवीवदत्समीक्षलोकावदतोतिपेशलम् । राज्य कथ स्यात्कुशल त्वत पर वर्पाण्यतीतानिनिरर्थकानहो ।।४।। सर्वसाधारण लोगो मे अफवाह फैलाने वाले लोगो को ला कर उन्हे देख कर राजा बहुत कोमल स्वर से बोले “राज्य मे इस से अधिक कुशल कैसे हो ? अहो ये पिछले वर्ष तो निरर्थक बिताये गये। ध्वस्त राज्य शत्रुणेत्थ मदीय भ्रष्टा केचित्केऽपि चौराधनस्य। केचित्क्षीणा सति योद्धार एते याचत्यदातद्धन कुत्रत स्यात्।।५।। मेरा राज्य शत्रु ने (रोहिला अफगानों ने) ध्वस्त कर दिया है। कुछ लोग भी भ्रष्ट है और कुछ धन को चुराने वाले हैं। जो शूर वीर योद्धा थे वे क्षीण हो गये हैं। जो धन नष्ट हो गया उस की आपूर्ति कहाँ से हो? अनूपरैमल्लमुखैस्तदानी कूर्माचलीयैर्बहुबलानाते। प्रोक्त चतुर्वर्पमितोस्मदीयग्रामान्गृहाण व्यवहारसिद्धये ।।६।। ( राजा के वचन सुन कर) कूर्माचलीयों मे श्रेष्ठ और धनवान् अनूप (सिंह) तथा रैमल जैसे प्रमुख जमीदारो ने कहा, “अब से चार वर्ष तक आप कार्य चलाने के लिये हमारे (सब) गाँव ले लीजिये।" दान मित स्यात्परिधानक च मिता भवेयु परिसेवकाश्च । शुभाशुभौ नैव समो भवेता मत्रिन मौलादितर पुरस्तात्।।७।। "दान तथा वस्त्र नपे तुले सीमित हो, सेवक भी थोडे होवे। शुभ और अशुभ कभी बराबर न होवे। सामने (आसीन) मत्री से कोई दूसरा कुलीन नहीं है।" उत्तानबुद्धया सदसि प्रवेशितो मौलत्वदृष्टयैव न तत्प्रतिष्ठा। दत्ता न चास्यै नृपतेहितेच्छया कृते तथाप्येष शिवो मनीषी।।५।। “अपनी उत्कृष्ट बुद्धि से इस ने (शिवदेव ने) राजसभा मे प्रवेश किया। मौलत्व की दृष्टि से इसे वह प्रतिष्ठा नही दी गयी। तथापि यह मनीषी शिव देव नृपति की (कल्याणचन्द्र की) हित की इच्छा से कार्य मे प्रवृत्त हुआ।

86 कल्याणचन्द्रोदय ) धर्माद्राज्य प्राप्यते तत्र नीत्या सभोक्तव्य साधुसामाधुपायै । भूपालाना मडले द्वादशाना मध्ये स्थेय भानुवर्भूमिपालै ।।५६ ।। "(जहाँ) भूमिपालो से धर्म से राज्य प्राप्त किया जाता है तो वहाँ पर उन्होने अच्छे शान्तिमय उपायो से नीति द्वारा उस का उपभोग करना चाहिये। उन्होने सूर्य के समान बारह भूपालो के मडल के मध्य स्थित रहना चाहिये। कीतिस्तवैय नृपराज सम्यग्भूमीन्द्रदेवागमनादरिष्ठा। जातासि जेतास्ति रणे सपत्नान् युध्यस्व बुद्रयस्व हिताहितॉश्च ।।६० ।। "हे राजन्, मुगल सम्राट ( मुहम्मद शाह ) के आने से आप की यह कीर्ति भली भाँति बढी है। आप रण मे शत्रुओ पर हावी हो गये। मित्र और शत्रुओ को बुद्धि तथा युद्ध से जीतो। कुलेन शीलेन समौ शिवौ द्रौ मौलौ नृपाप्तौ च तथापिचित्रम् । एक शिवो राजति पूर्णचन्द्रो विद्रान्द्रितीय किमपीहदृश्य ।।६१ ।। यह बड़ी विचित्र बात है कि राजा कल्याण चन्द्र को आभिजात्य वर्ग के कुल और शील मे बराबर दो शिव मिल जाये। एक शिव (देव) पूर्ण चन्द्र के समान शोभायमान है और दूसरा शिव (राम) विद्वान् है। यह कैसा दृश्य यहाँ पर (राज सभा मे) है ? मुख्य कृतोऽय शिवदेव शर्मा मत्री ततोऽय हरिसिह वर्मा। वृद्धो द्विजो राम इति प्रसिद्धश्चद्रान्वितो भाति स शक्तिसिह ।।६२ ।। ( राजा कल्याण चन्द्र ने) इस शिवदेव ( जोशी को) मुख्य मत्री बनाया। फिर हरि सिह को मत्री नियुक्त किया। प्रसिद्ध शिवराम वृद्ध द्विज को पुरोहित बनाया तथा चद्र वशी शक्तिसिह मत्रिमडल मे शोभित हुए। लक्ष्मीनिधीयोतिषिक सुवक्ता सर्वज्ञतास्ते दुलपे सभायाम्। चिन्तादयोन्ये परमादिनदा सलेखका सति तथापि वच्मि ।।६३ ।। 'अच्छी भविष्य वाणी करने वाले लक्ष्मीनिधि ज्योतिषी थे। दुलपि की सभा मे उन की सर्वज्ञता प्रसिद्ध थी। चिन्ता (चौधरी) तथा परमानद (विप्ट) आदि अच्छे लेखक हैं। फिर भी मैं कहता हूँ कि शिवादिदेवाच्च भवादिनदात्कृष्णादिदेवाद्यदि चेत्तुरीय । एभ्योऽधिको वापि समो नृपाप्त सिद्धिस्तदास्यादिति मे वितर्क ।।६४ ।। 'शिवदेव, भवानद तथा कृष्णदेव से कोई यदि चौथा (मत्री) इन से अधिक या इन के ही बराबर राजा का विश्वसनीय हो तो सिद्धि होनी चाहिये ऐसा मेरा (मत) तर्क है। कूर्माचलीयत्वजनोक्तिदोषो ह्यनूपसिहे यदि चेन्नभूयात्। बुद्धि समीरादिजनेन चेत्स्यान्मुक्तादिहीनेषु न वाच्यमिष्टम् ।।६५ ।। चौथा व्यक्ति मत्रित्व के लिये ढूँढने (राजसभा के अन्य अधिकारी वर्ग पर विचार करते हुए कवि अपना मत प्रकट कर रहा है।) यदि अनूप सिह मे कूर्माचलीय जन मे फैला अपवाद का दोष न हो, यदि समीरसिंह मे बुद्धि न हो तो पतित तथा हीन लोगो से कहना उचित नही है।

सप्तम सर्ग 87 न तुच्छता चेगरिरामके स्यान्नरूद्रदेवे यदि चचलत्व। चेद्रामदत्ते हठता न मौढय वैदेशिकत्व चतुरीयता स्यात् ।।६६ ।। यदि हरिराम मे तुच्छता न हो, यदि रूद्रदेव मे चचलता न हो, यदि रामदत्त मे हठता, मूर्खता तथा विदेशियो की चतुरता न हो, न मुग्धता चेदरिसिहके स्याच्चेच्छक्तिसिहे ऽपि च शक्तिमत्वम् । यशोधरादावपि वक्तृभाव चेस्यातत्तुरीयो न हि दृश्यतेऽन्य ।।६७ ।। यदि हरिसिह मे मूर्खता न हो, शक्तिसिह मे शक्ति का भाव न हो, यदि यशोधर मे वक्तृभाव न हो तो कोई चोथा विश्वसनीय तथा योग्य व्यक्ति नहीं दिखता है। (शिवदेव, भवानद तथा कृष्णदेव की समता ये अन्य दर्बारी नही कर पा रहे है।) यदि कोऽपि भूयादितरो मनीपी मौलो महन्मत्रविदा वरिष्ठ । न शक्यत तत्तुमयातुरीय स्वकीयसभावनपालयुत्वम् ।।६८ ।। मत्रियो म श्रेष्ठ कोई दूसरा आभिजात्य वर्ग का विद्वान हो जो चौथा स्थान सभाले इस मेरी सभावना का पालन करने के लिये कोई अन्य व्यक्ति नही है। दिल्लीश्वरात्कूर्मधराधिनाथोधिकोऽस्ति सन्मार्गदृशेहसिद्धि । यदुच्यते भूपतिनैकवार तस्यानुसधानमितो विभो स्यात्।।६६ ।। दिल्लीश्वर ( मुगल सम्राट) से कूर्माचल नरेश अधिक है यह सिद्धि सन्मार्ग दर्शन से प्राप्य है एक बार भूपति (कल्याणचद्र) ने कहा है। हे राजन, इस का अनुसधान होवे। (सन्मार्ग दिखलान वाला चोथा मौल मत्री खोजा जाय।) भापोक्तितो वेदविशि स्वकीया लब्ध्वा यथा तुष्यति मुद्रयैष । असख्यभूम्या द्रविणेन चान्ये तुष्टा यदि स्यु परमार्थसिद्धि ।।७० ।। जेसे कहने पर मे जानता हूँ, अपने घर को पाकर या मुद्रा से यह (कवि शिव) सतुष्ट होता है उसी प्रकार यदि असीमित भृमि (दान) से और धन से दूसरे भी सतुष्ट हो तो यह सब से बड़ी उपलब्धि है। दोपे दडो दीयते यत्सयागो साधो पूजा कल्पशाखा न यस्य। लिप्सा तभूभिभागे यदा चेत्सिद्भिदडोनिनिमित्ते रुचि स्यात्। ७१ ।। दोप करने पर दड दिया जाता है। जैसे साधु की पूजा कल्पशाखा नही है। इसी प्रकार यदि भूमि खड मे लिप्सा हो तो दड ही फलदायक है। सकारण दड (देने मे ) रुचि होवे। ग्रामादिक यन्नहरेऽधिकारे सप्राप्यते तत्तु हृताधिकारे। विभुज्यतेऽग्रेऽपि नव नवीनो गृह्णति राज्य तु तदेव चित्रम् ।।७२ ।। जो ग्राम नरसिह ( पुरुप सिह कल्याण) के अधिकार मे थे वे हाथ से छिन जाने पर फिर अधिकार मे आ गये है। आगे भी इस का भोग किया जाता है पर यह विचित्र है कि नये लोग नया राज्य ग्रहण करते है। यज्ञ सहित 88 कल्याणचन्द्रोदय उद्योतचन्द्रेण विजित्य डोटी तद्गढ ज्ञानसुधाशुना च। दृष्टवा फल श्री जगदिन्दुजाके कृष्णैवतन्नीति परपरात ।।७३ ।। (आप के पूर्वज) उद्योत चन्द्र ने डोटी (पश्चिमी नेपाल) जीत कर तथा ज्ञानचन्द्र ने उसी प्रकार गढ़वाल जीत कर, जगतचन्द्र के अक मे लक्ष्मी देख कर (जगत चद्र के काल मे देश सपन्न देख कर) कृष्ण के समान ही परपरागत नीति का अनुसरण होना चाहिये। सा देवचन्द्रेण तु दानमध्ये नि शेषिता कृष्णद्विज सकाशात्। ततोवशिष्टा किल मत्रिणो ये ते माणकेनेह हता खशेन।।७४।। वह (लक्ष्मी ) कृष्ण द्विज के साथ देवचन्द्र ने दान देकर नि शेष कर दी। जो बचे हुए मत्री थे उन्हे माणिक नाम के खश ने यही मार दिया। गृहावशेषाप्यधमेन सा पू सम्मर्दिताभय जनातिमौढयात्। समुद्भतेऽय नृहरे त्वयेऽयदीना नवीना नृपसविधेया।।७५ ।। तीन लोगो की भारी मूर्खता से इस नीच ( अलीमुहम्मद द्वारा) के द्वारा यह नगरी, जहाँ केवल घरो के खडहर है, खूब दबायी गयी। आप पुरुषसिह के द्वारा इस नगरी का उद्धार होने पर यह दीन नगरी फिर नवीन होनी चाहिये। ददस्व दान द्विजपुगवेभ्यो मान तथा मत्रिषु सूक्ष्मदृष्टया। लालित्यमुच्चै ललनासु नित्य दीने दया तेस्त्क प्रजा प्रजेव।।७६ ।। "(हे राजन् ) ब्राह्मणो को दान दीजिये। सूक्ष्म दृष्टि से मत्रियो को मान, ललनाओ को खूब लालित्य, दीनो को सदा दया दीजिये। प्रजा को अपनी सतान के समान समझिये। कट्टारयुक्तास्तु लसतु राजन् कूर्माचलीया निकटस्थ वकै । नयालपूर्वरितरै स्क मध्यदेशीयलोकै सहराजमानै ।।७७ ।। "हे राजन्, राजमान से सम्मानित, नयालो के वशज, दूसरे मध्यदेशीय (तराई-भावर के) लोगो के साथ, भीम कर्मा कूर्माचलीय कटार बाँधे हुए तेरे निकट शोभित हो। भूमिपति कूर्मधराधिनाथ पुन पुन सैव विलोकनीया। दड विधातु (नमल विहर्तुं ताबूलपत्रस्य) धिया धरेश ।।७८ ।। "कूर्माचल नरेश ने दण्ड देने के लिये बुद्धि से बार बार यह बात साचनी चाहिये। दीपोत्सव देव विधाय गेहे देवीपुरादौ मृगया विहार। कृत्वाथ तत्रत्य पलाशपुष्पे भूयात्प्रतिष्ठा भवनेबिकाया ।।७६ ।। "देव, घर मे दीपावलि मना कर, देवीपुर (कोटा-भावर) मे मृगया आखेट कर, वही (देवीपुर मे ही) पलाश पुष्पो से देवी के मदिर मे प्रतिष्ठा होवे। नानायागै सुप्रसन्ना द्विजा तत्तभोगैस्तुदिला मत्रिणश्च । तत्राप्येषो मुख्यमत्री नितान्त श्रोत्रे लग्न स्यान्न कश्चिद्वितीय ।।८।। नाना प्रकार के यज्ञो से ब्राह्मण प्रसन्न होवे, नाना प्रकार के भोगो से मत्री मोटे होवे, फिर भी यह मुख्यमत्री वेद पाठ मे सर्वथा पूर्णत लग्न है। ऐसा कोई दूसरा नही है।

सप्तम सर्ग 89 मौल सुशील सुभग सभाया सभ्य सह शास्त्रपथैकमत्री। प्रोक्तोऽस्ति विप्र सकलार्थदर्शी यो (नान्य) प्त मार्गेण भवेत्स चौर ।।१।। यह मत्री कुलीन, सुशील, रूपवान और सभा में (राजसभा) सदस्यो के साथ केवल शास्त्रानुकूल पथ का अनुसरण करने वाला, सब प्रकार की बात जानने वाला विप्र है। जो दूसरे मार्ग का अनुसरण करने वाला है यह चोर होता है अत पर क्षुद्रजनाधिकार काशीपुरादौ निकटेऽपि मा भूत्। कुलानुसारेण जनेषु बुद्धि सजायते तत्कुरु मौलभूतान् ।।२।। इस लिये काशीपुर आदि के निकट (मध्यदेशीय भूभाग मे) क्षुद्र जनों का अधिकार न होवे। कुल के अनुसार ही लोगो की बुद्धि प्रसूत होती है। इसलिये (क्षुद्र जनो को हटा कर) कुलीन वश के लोगो की नियुक्ति कर। वटोपरस्येव सदाधिकारे सयोज्यता वल्लभ नामधेय । जातौ गरुत्मान्वटको कश्चिज्जातौ समौ नैव कृतौ भवेताम् ।।३।। "वटोपर (दुर्ग) के अधिकार मे वल्लभ (पाण्डे) नामक व्यक्ति की नियुक्ति होनी चाहिये। दिग्दर्शन देव कृत मयैतन्नियोगिना स्वानुपद पदस्यात्। यश्चाधिकार कुस्ते परश्च स मूढधी नश्यति मूलतोऽपि।।४।। "हे देव, मैं ने नियुक्त व्यक्तियों का अपने पदों के अनुसार दिग्दर्शन किया है। (अपनी योग्यतानुसार प्रत्येक स्वपद पर रहे। ) जो मूढ बुद्धि दूसरे के पद पर अधिकार करता है वह मूर्ख समूल नष्ट हो जाता है। कार्यं महन्नीचजनेऽर्पितस्या चेदास्यास्पद याति तथाति खर्व । फलेभिलापात्करमुक्षिपन्चैकथचिदुच्चै पुरुषेण लभ्ये।।५।। “यदि महान् कार्य नीच क्षुद्र जनो को दिया जाये तो वह (क्षुद्र जन) हास्यास्पद हो जाता है जैसे एक बौना ऊचे में लगे फल की अभिलापा से हाथो को ऊपर उठाते हुए किस प्रकार से उसे प्राप्त कर सकता है। (महान कार्य सपादित करने के लिये योग्य और महान व्यक्ति की नियुक्ति होनी चाहिये। ज्योतिर्विदग्रे शिवदेव नामा युगानुरूप सचिवो न यस्मात् । विराजते कोऽपि महानुभावोऽधुना न मत्री नृप मौल ईदृक् ।।६।। "ज्योतिविदो मे अग्रणी शिवदेव के समान कोई युगानुरूप सचिव नही है। हे राजन्, इस समय कोई दूसरा महानुभाव कुलीन मत्री इस के समान नही है। दृष्ट कश्चित्वत्समो नैव राजा भूदेवेन्द्रस्यापि तस्या सभाया। अस्मादन्यो मौलमत्री नितान्त योग्य कश्चिदतिते नेतिमन्ये।।७।। "मुगल सम्राट (मुहम्मदशाह) की उस सभा मे आप के समान कोई दूसरा राजा नही देखा। इस (शिव देव) के अतिरिक्त कोई दूसरा कुलीन योग्य मत्री वर्तमान है ऐसा मैं नहीं मानता।

90 कल्याणचन्द्रोदय वृद्ध शिवो गच्छतु धूर्जटेस्ता वाराणसी प्राप्तमनोरथश्री । शूर क्षमी मत्रविदा वरिष्ठो ज्योतिर्विदग्रे शिवदेवक स्यात्।।८।। 'यह वृद्ध (कवि शिवराम ) मनोरथ रूपी श्री के प्राप्त होने पर बाबा विश्वनाथ की वाराणसी को जावे। ज्योतिविदो का सिरमौर शूर, क्षमाशील, शिवदेव मत्रियो मे सबसे प्रमुख होवे। ( अर्थात् प्रधानामात्य बने।) सितान्वित मुग्धमहो रसालानि पीयते प्राक्तनपुण्यतोयै । धन्या किमेते नृपभारतीये वहति सत्सारमयी रसालाम् ।।८६ ।। पूर्व जन्म के सचित पुण्य कर्मो से अहो, इस निर्दोष (सीधे सादे) वृद्ध से मीठे स्वादिष्ठ आम चूसे जाते है। ये भारत के नृपतिगण धन्य है जो सुन्दर शस्यश्यामला पृथ्वी का भार वहन करते है। (जो इस का शासन करते है।) देवप्रयागद्गणमुक्तित श्रीभागीरथीमध्यगतस्य राज्ञ । स्याद्राज्यमुच्चै शिवभक्तिपूर्व श्रीदीपचन्द्रप्रमुखै कुमारे ।10।। देवप्रयाग (गढवाल) से गढमुक्तेश्वर तक गगा के मध्य भाग तक फैला हुआ यह राज्य श्रीदीपचन्द्र आदि प्रमुख राजकुमारो द्वारा शिव की पूर्ण भक्ति से और विकसित, और वर्द्धित हो। नीत्या श्रीरुद्रोनृपमुकुटमणि शौर्यतो बाजचन्द्रो दानादुद्योत चद्र क्षितिपतितिलको ज्ञानचद्र क्षमायाम्। गोप्ता व कर्ता धनजनपटु स्याज्ज (गत चद्र ) - - 11६१।। नीति मे श्री रुद्रचन्द्र नृपमुकुटमणि हुए। शौर्य में बाजबहादुर चन्द्र श्रेष्ठ थे। दान से उद्योतचद्र की कीर्ति बढी। महाराज ज्ञान चद्र क्षमा मे श्रेष्ठ थे। रक्षण मे, धन सचय मे पटु जगतचन्द्र हुए- नृपमुकुटमणे जिबाहुदरस्यभक्त पृज्यो नितान्त कुलकमलरवि विश्वरूपाभिधान । जातस्त्तस्यागजन्मा कविकुमुदशशी श्री शिवानदशर्मा ब्रह्मानदाग्रजन्मा तदनु शिवकवि तत्कृति सन्मुदेस्यात्।।२।। इति श्री कल्याणचन्द्रोदये शिकविकृतौ कूर्माचलीय काव्ये सप्तम सर्ग ।। राजाओ के मुकुटमणि बाजबहादुर के भक्त, अपने कुलकमल को विकसित करने वाले सूर्य के समान तेजस्वी, पूर्णत पूज्य विश्वरूप (पाण्डेय) थे। उन के कवियो के कुमुद रुपी पुष्प को विकसित करने वाले, चन्द्र के समान, शिवानद शर्मा हुए। वे ब्राह्मानद के ज्येष्ठ भ्राता थे। उस शिव कवि की यह कृति ( काव्य ) अच्छी तरह प्रकाश मे आये।

परिशिष्ट संस्कृत साहित्य को कूर्माचलीय विद्वानों की देन नित्यानन्द मिश्र कूर्माचल का सस्कृत वाङ् मय के विकास मे एक विशिष्ट स्थान है। यहाँ के उच्चकोटि के विद्वानो ने समय-समय पर अपनी उत्कृष्ट कृतियों से देव-भाषा के साहित्य की अभिवृद्धि की। इन मनीपियो ने न केवल ज्योतिष तथा कर्मकाण्ड पर ही अपनी कृतियों का प्रणयन किया, उन्होने व्याकरण, न्याय, मीमासा, छद शास्त्र, वेदान्त, वैद्यक, तत्र तथा साहित्य पर उच्चकोटि के ग्रन्थ रत्नों का प्रणयन कर सस्कृत साहित्य के भण्डार को भरा। इन विद्वानो के बहुत से ग्रन्थ प्रकाशित होकर पर्याप्त प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके हैं। आश्चर्य है कि सस्कृत साहित्य के इतिहासकारो को यह ज्ञात ही न हो सका कि इनके प्रणेता पर्वतीय थे। आज भी अधिकाश हस्तलिखित ग्रन्थ सग्रहालयों में उपलब्ध हैं। कुछ ग्रन्थकार और ग्रन्थ ऐसे भी हैं जिनके नाम तथा ग्रन्थ के उद्धरण इनके स्वरचित ग्रन्थों अथवा अन्य ग्रन्थकारो की रचनाओ मे उपलब्ध होते हैं। बहुत से अमूल्य ग्रन्थ देहातों में पण्डित समाज के घरो मे पडे है जिनकी उपादेयता न तो वे समझते हैं और न किसी विज्ञ व्यक्ति को समझने देते हैं। बहुत सी अमूल्य कृतिया काल के प्रवाह मे कुपात्रों के हाथ आकर नष्ट हो गई है। सस्कृत के प्रति घोर उपेक्षा के कारण पूर्वजो की अमूल्य निधि से भावी समाज वचित हो गया। ताम्रपत्र, शिला लेख तथा प्राचीन पाण्डु लिपियों पर शोध करने से जिन कतिपय मनीपियो का विवरण ज्ञात हो सका है उसे प्रस्तुत करने से पूर्व यह आवश्यक है कि इस क्षेत्र के पूर्व इतिहास पर एक विहगम दृष्टि डाली जाय। यह भूभाग जिसे हम कूर्माचल नाम से जानते हैं पौराणिक काल मे मानस खण्ड कहलाया जाता था। स्कन्द पुराण में इस पर्वतीय भाग को चार भागों में बाँटा है - (१) हिमाद्रि खण्ड, (२) मानस खण्ड, (३) कैलाश खण्ड तथा (४) केदार खण्ड। स्कन्द पुराण मे मानस खण्ड की सीमा इस प्रकार बतलायी गयी है। उत्तर मे मानसरोवर, दक्षिण मे मोटेश्वर (काशीपुर जिला नैनीताल), पूर्व में छत्रेश्वर (डोटी नेपाल) तथा पश्चिम में स्कन्द प्रयाग (गढवाल)। यही क्षेत्र बाद मे (कूर्माचल) नाम से प्रसिद्ध हुआ। सस्कृत के इस ग्रन्थ से ही हमारे इस भू-भाग का भौगोलिक तथा ऐतिहासिक परिचय प्राप्त होता है। इस विशाल ग्रन्थ का अनुवाद अग्रेज विद्वान सर जान स्ट्रैची ने किया। अब प गोपाल दत्त पाण्डे जी ने सपादित कर काशी से प्रकाशित कराया है। स्कन्द पुराण के अतिरिक्त इस भाग का उल्लेख वेदों, ब्राह्मण तथा शतपथ ब्राह्मण मे हिमालय के इस भाग का प्रचुर भाग मे वर्णन मिलता है। कौशीतकी ब्राह्मण में एक 92 कल्याणचन्द्रोदय -- महत्वपूर्ण उल्लेख है कि सस्कृत का अध्ययन करने छात्र भारत के उत्तर के प्रदेशो की ओर जाते थे और वहाँ से इस भाषा मे पूर्ण निष्णात होकर आते थे। इस ब्राह्मण ग्रन्थ का लेखक साख्यायान उत्तर के प्रदेशो मे काश्मीर तथा बदरिका आश्रम का विशेष उल्लेख करता है। वह लिखता है कि इन दोनो स्थानो मे वाक् देवी (सरस्वती) का निवास है। इस ग्रन्थ के भाष्यकार अपने भाष्य मे इस कथन का स्पष्टीकरण इस प्रकार करते है "भाषा (सस्कृत) इन भागो मे अच्छी प्रकार बोली तथा समझी जाती है तथा वहाँ उच्चारण शुद्ध है। काश्मीर तथा बदरिका आश्रम मे वेद ध्वनि गूजती रहती है क्योकि यही वाक् देवी का निवास है।" हिमालय के इस कोख मे अनेक मनीषियो ने सरस्वती की आराधना की और अपनी कृतियो से साहित्य की अभिवृद्धि की। कूर्माचल के लगभग दो हजार वर्ष से भी अधिक ज्ञात इतिहास से इतना पता चलता है कि यहाँ विशुद्ध आर्य सस्कृति के पोषक, विद्यानुरागी, वर्णाश्रम धर्म के अनुयायी क्षत्रियो का राज्य था। पश्चिमी रामगगा के पास तालेश्वर मे दो ताम्रपत्र ईसा की पाचवी सदी मे उत्कीर्ण हुए। इनमे जिन राजाओ का उल्लेख है उनके नाम है अग्नि वर्मन्, द्युतिवर्मन्, विष्णु वर्मन् तथा द्विज वर्मन्। ये बडे शक्तिशाली थे और शेप नाग ( अनन्त) के उपासक थे। ये ताम्र पत्र शुद्ध सस्कृत मे लिखे गये हे जिससे ज्ञात होता है कि इन के राज्य मे राजकीय भाषा सस्कृत थी। ताम्रपत्र के आदेश ब्रह्मपुर से दिये गये है। यह वही ब्रह्मपुर है जहा सातवी सदी मे प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनशाग आया था। इन ताम्रपत्रो से ज्ञात होता हे कि पाचवी सदी मे सस्कृत के विद्वान भारि पति शर्मा तथा त्रात नामक व्यक्ति जिन्हे कई गाँव इन राजाओ द्वारा दिये गये। छ अभिलेख हैहय वशज कार्तवीर्यपुर अथवा कात्तिकेयपुर (वर्तमान कत्यूर) के शासको के मिले है। पाच लेख ताम्रपत्रो मे तथा एक लेख पत्थर पर उत्कीर्ण है। ये लेख भी सस्कृत भाषा मे है। सातवी आठवी सदी के लेख हैं। लेखो मे आदेश कार्तिकेयपुर से दिये गये है। बैजनाथ-गरुड मे ही कात्तिकेयपुर स्थित था। कत्यूर शब्द इसी का अपभ्रश है। इन लेखो मे वर्णित शासक भी वर्णाश्रम धर्म के अनुयायी गो ब्राह्मण पालक और आर्य सस्कृति के पोपक थे। गिरिराज चक्रचूड़ामणि इनकी पदवी थी और नन्दा-देवी के उपासक थे। इसी वश के ललितशूर देव ने तत्कालीन सस्कृत के विद्वान नारायण भट्टार्क को गोरुन्नसारि मे कई गाँव दिये। ये कत्यूरी शासक बड़े शक्तिशाली थे। इनका राज्य पश्चिम मे शतद्रु पर्यन्त (सतलज) पूर्व मे जमुला (डोटी) पर्यन्त, दक्षिण मे गगा के उत्तर कूल शाहजहाँपुर पर्यन्त था। श्री शकराचार्य, बासुदेव के शासनकाल, मे यहाँ आये और ज्योतिर्मठ की स्थापना की। शकराचार्य जी का समय 710 शाका से 743 तक बतलाया जाता है। राजा के अपराध से रुष्ट होकर इन्होने उसे शाप दिया। इसी के फलस्वरूप कत्यूरी शासको का गौरवसूर्य अस्त हो गया। कत्यूरी राज्य के पतन के समय लगभग 700 ई० से 730 ई० तक कान्यकुब्ज प्रदेश मे यशो वर्मा का राज्य था। यशोवर्मा को श्री पद्मदेव कृत जगच्चद्रिका टीका म परिशिष्ट 93 नरेन्द्रयश सोम तथा प्रतिष्ठानेश भी कहा गया है। इनके चार पुत्र थे। उनमे एक का नाम सोम चन्द्र था। ये शाके 607 मे सप्ताग सहित बदरीनाथ यात्रा के लिये यहाँ आये। इनके साथ प्रतिष्ठानपुर से रणकुशल क्षत्रिय तथा विद्वान ब्राह्मण आये। सुधानिधि चतुर्वेदी, श्री निवास द्विवेदी, हरिहराचार्य एव लकराज प्रमुख विद्वान थे। काश्यप गोत्रीय हरिहराचार्य कान्यकुब्ज के महाराज यशोवर्मन के राजगुरू थे। यशोवर्मन के ज्येष्ठ पुत्र सोमचन्द के साथ चम्पावत आ कर यही बस गये। इनके वशज सिमाल्टीय पाण्डे है। आचार्य हरिहर जी चद काल के प्रथम सस्कृत के उद्भट विद्वान थे जिन्होने मीमासा का भाष्य लिखा। पारस्कर गृह्य सूत्र पर इन का हरिहर भाष्य उच्च तथा प्रामाणिक ग्रन्थ माना जाता है। इन्ही हरिहराचार्य जी की नवी पीढी मे पद्मापति पाण्डेय शैव दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान हुए। इनके लिखे गन्थ उपलब्ध नही है। पद्मापति जी के पुत्र केदार जी हुए। ये छन्द शास्त्र के विख्यात गन्थ वृत्तरत्नाकर के प्रणेता है। ये विक्रम की बारहवी सदी मे विद्यमान थे। इनके बारे मे जगच्चद्रिका मे लिखा है 'पद्मापतिर्यत्सुतस्तु केदारच्छद शास्त्रवित् ।' इन्ही केदार जी की सोलहवी पीढी मे सस्कृत के उद्भट विद्वान भगीरथ पाण्डे हुए। इन्होने काव्यादर्श, रघुवश, किरातार्जुनीय, शिशुपाल वध, नैषध, देवी महात्म्य, महिम्नस्तोत्र आदि कई ग्रन्थो पर टीकाये की है जो तत्कालीन चन्द राजा जगच्चन्द्र (1707-1720) के नाम पर 'जगच्चन्द्रिका' नाम से विख्यात है। इन्ही महमहोपाध्याय भगीरथ पाण्डेय जी के आत्मज पद्मदेव जी ने 1664 शाके मे मोहन चन्द्रिका पूर्ण की थी। इस समय महाराज कल्याण चन्द्र (1730-48) शासक थे। मोहन चन्द्रिका आशौच निर्णय सम्बन्धी ग्रथ है। इन्ही पद्मदेव पाण्डेय जी ने जगच्चन्द्रिका नाम से रघुवश की व्याख्या लिखी। जगच्चन्द्रिका मे दिये हुए इनके वश वर्णन से चन्द राजाओ के इतिहास पर अच्छा प्रकाश पडता है। अठारहवी सदी के मध्य भाग मे कल्हण की राजतरगिणी के समान 'कूर्माचल काव्य की रचना हुई। इसमे छन्दोबद्ध इतिहास चद राजाओ का लिखा गया। इसी काव्य के अन्तर्गत कल्याण चन्द्रोदय काव्य का प्रणयन हुआ। इन काव्यो का प्रणयन कूर्माचल के अमर कवि श्री शिवराम पाण्डेय ने किया। ये बाडाखोरी भीमताल के निवासी थे। इनके पितामह विश्वरूप पाण्डेय जी महाराज बाजबहादुर चन्द के दूत बन कर औरगजेब के दरबार मे गये थे। अपनी दक्षता तथा कुशाग्र बुद्धि से मुगल सम्राट को प्रसन्न कर मध्य देश (माल-भावर) को अपने स्वामी बाजबहादुर चन्द के लिए प्राप्त करने में समर्थ हुए। उस समय से इस वश के लोग दौत्य पद पर बराबर बने रहे। शिवराम पाण्डेय सस्कृत के उद्भट विद्वान थे। कूर्माचल काव्य तथा कल्याण चन्द्रोदय काव्य सस्कृत की विशिष्ट रचनाये है और चन्दकालीन इतिहास पर अच्छा प्रकाश डालती है। सस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान गगावली के प्रेमनिधि पन्त हुए है। ये तन्त्र शास्त्र के उत्कृष्ट ज्ञाता थे। इन्होने तन्त्रराज और शारदा तिलक जैसे विशिष्ट ग्रन्थो पर सुदर्शन तथा शब्दार्थचिन्तामणि नामक 94 कल्याणचन्द्रोदय टीकाये की हैं। इन के अतिरिक्त अन्तर्याग रत्न, बहिर्यागरत्न, काम्य-दीप-दान, घृतदान, लवण दान पद्धति, दीपदान रत्न, दीप प्रकाश, प्रयोग-रत्न, प्रयोग-रत्न सस्कार, प्रयोगरत्नाकरोड, प्रयोग रत्नाकर, भक्तवात सतोषक, भक्ति तरगिणी मूल-प्रकाश तथा शक्ति सगम की टीका इतने ग्रन्थ इनके उपलब्ध हैं। महिला विदुषियो मे प्राण मजरी का प्रमुख स्थान है। ये प्रेमनिधि पत जी की पत्नी थी। इन्होने प्राणमजरी नाम से ही तत्र शास्त्र पर स्वतन्त्र ग्रन्थ की रचना की जो प्रकाशित - कल्याण चन्द्र के समय अठारहवी सदी मे जो कूर्माचलीय सस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान राजसभा के रत्न थे उन का वर्णन शिवराम पाण्डे जी ने अपने काव्य मे इस प्रकार किया है ज्ञानादर्श दिनमणिबुधे वासुदेवे च कृष्णे। षट्शास्त्रज्ञ हरनिधियुगे नामयुक्तै शिवे च।। ब्रह्ममानन्दे हरिहरयुगे श्मश्रुले सानिरुद्धे। काशीनाथे च दृष्टि पततु तव विभो कामदेवे तथैव ।। कृष्णानन्द शकराख्य गुरू च नित्यानन्द शैवदत्ति हरि च। बेणीपूर्व वल्लभ पश्य राजन् सम्यग् दृष्टया वैद्यनाथ द्रय च।। पश्य देव मणिराम पडित तद्रदेव बलभद्रनामक। हसराममतिरामसयुतौ जीवनाथरघुनाथकावुभौ।। राधापतिं चोभयक बहुश्रुत सदाशिव चैव त्रिपाठिनपर। चम्पावतीय कमलापति भवनीशकर चात्मतयावत्नोकया। स्वपूर्वजना पदपद्मपकरजोणुमानादपि सूक्ष्ममान । प्राप्तोऽस्म्यह प्रत्यहमेकमुद्रार्पणेन सिर्मोरपतेरधीन ।। नान्तोऽस्ति कूर्माचलपण्डिताना दिग्दर्शन देव कृत मयैतत् । स्याद्दानकाले स्मरण सदैषा वित्तानुसारेण विदेशिन स्यु ।। लगभग अट्ठाइस विद्वानो की इस सूची को कवि शिव केवल दिग्दर्शन मात्र कहते है। चन्द राजा सदा विद्यानुरागी रहे। इनकी राज सभा को बड़े विद्वान अलकृत करते थे। बालो कल्याण चन्द, रूद्र चन्द, लक्ष्मी चन्द, त्रिमल चन्द, बाजबहादुर चन्द, उद्योत चन्द, ज्ञान चन्द, जगत चन्द तथा कल्याण चन्द ये सभी राजा सस्कृत के प्रेमी थे। इन्होने राजकीय खर्चे से वेद पाठी ब्राह्मणो को काशी भेजा। सम्पूर्ण विद्या मे निष्णात हो कर इन विद्वानो ने देव-भाषा का प्रचार किया और सस्कृत मे ग्रन्थो का प्रणयन किया। देव भापा तथा इन विद्वानो की देख-रेख के लिए मन्त्री मण्डल मे देव-भाषाधिकारी का महत्वपूर्ण स्थान था। गगावली के सुकृति दत्त पन्त साहित्य के प्रसिद्ध विद्वान हुए। नैषध के एक पद्य की इनकी की हुई 12 व्याख्याये मिलती है जिन मे व्युत्पत्तिवाद व्याख्या आदि 15 कृतियो का परिशिष्ट 95 निदर्शन रूप में उन्होने उल्लेख किया है। दूसरे विद्वान हरिकृष्ण पन्त हुए है। ये राम रुद्रीकार प्रसिद्ध नैयायिक महादेव के शिष्य थे। इन के विभिन्न कोड न्याय पर उपलब्ध हुए - अठारहवी शती में श्री वल्लभ उपाध्याय के वशज पाटिया ग्राम निवासी विश्वेश्वर पाण्डेय हुए। इन के पिता श्री लक्ष्मीधर पाण्डेय महाराज बाजबहादुर चन्द की राज सभा मे राजगुरू थे। सस्कृत के प्रकाण्ड वियन थे। इनकी कोई रचना अभी तक उपलब्ध नहीं हुई। इन्होने अपने पुत्र यशस्वी विश्वेश्वर जी की शिक्षा दीक्षा स्वय की। विश्वेश्वर जी का सस्कृत साहित्य के सभी अगों पर पूर्ण अधिकार था। अलकार शास्त्र के प्रतिभाशाली विद्वान थे। अपने प्रत्येक ग्रन्थ के मगलाचरण मे अपने पूज्य पिताजी का उल्लेख किया है। इन्होने अपने भाई उमापति जी के मत का उल्लेख अलकार कौस्तुभ के परिकरालकार मे किया है। सम्भवत उमापति जी ने भी अलकारों पर अपनी रचना की हो। विश्वेश्वर पाण्डेय जी की कई रचनाये निर्णय सागर प्रेस, बम्बई तथा चौखम्भा सस्कृत सिरीज काशी से प्रकाशित हुई है। बहुत सी अभी अप्रकाशित हैं। वैयाकरण सिद्धान्त सुधानिधि नामक इनका एक ग्रन्थ, जिसके केवल तीन ही अध्याय उपलब्ध हुए हैं, 1525 पृष्ठों में छपा है। यदि पूरे आठ अध्याय उपलब्ध हो तो कितना विशाल ग्रन्थ होगा। इसी प्रकार अलकार कौस्तुभ, अलकार शास्त्र का विलक्षण प्रौढ ग्रन्थ हैं। इसकी टीका स्वय इन्होने लिखी जो अभी पूरी उपलब्ध नही हुई। अभी तक इस विलक्षण विद्वान के बीस ग्रन्थ उपलब्ध हुए। इनका विवरण इस प्रकार है अलकार कौस्तुभ, अलकार प्रदीप, अलकार मुक्तावली, रस चन्द्रिका, कवीन्द्रकर्णाभरण, आर्या सप्तशती, मदार मजरी, रस मजरी टीका, नवमालिका नाटिका, लक्ष्मी विलास, वक्षोजशतक, रोमावली शतक, होलिका शतक श्रृगारमजरी सट्टक तथा तन्त्र शास्त्र के कुछ ग्रन्थ। इन में प्रथम आठ ग्रथ प्रकाशित हो चुके हैं। सिद्धान्त सुधानिधि तथा अलकार कौस्तुभ अब दुष्प्राप्य हैं। शेष अप्रकाशित हैं। लक्ष्मीपति जी ने अब्दुल्ला चरितम् एव फर्रुखासियर चरितम नामक ऐतिहासिक काव्य सस्कृत मे लिखे। मुगल राजाओ तथा चन्द राजाओं के पारस्परिक सम्बन्धों पर इन ग्रन्थो से अच्छा प्रकाश पडता है। इन्होंने लिपिमालिका चम्पू का भी प्रणयन किया। भेरग पट्टी के पुष्करिणी (पोखरी) ग्राम के ज्योतिर्विद ज्योतिष विद्या मे निष्णात हुए। श्री कृष्णानद जी के पुत्र भूधर पुत्र भूधर जी ज्योतिष के प्रकाण्ड विद्वान थे। इन्होने महाराजा त्रिमल चन्द के समय पचाग-विधि-सारिणी लिखी। इसी कौशिक गोत्रीय ज्योतिर्विदो के वशज श्री मनोरथ ज्योतिर्विद को शाके 1644 में ताम्रपत्र महाराज बाजबहादुर चन्द द्वारा दिया गया। शाके 1691 मे महाराजा उद्योत चन्द ने उनके पुत्र ऋषीकेश जी को ताम्रपत्र द्वारा कई ग्राम दिये और सम्मानित किया। इसी यशस्वी वश में हरिवल्लभ, नारायण कृष्ण, रत्नपति जैसे विख्यात ज्योतिष हुए। न केवल कूर्माचल में, डोटी (नेपाल), टिहरी (गढवाल), अवध के नवाबो के दरबारो मे भी उनका सम्मान हुआ। .

96 कल्याणचन्द्रोदय आगिरस गोत्रीय, माला, सर्प तथा चौड़ के ग्रामवासी, ज्योतिर्विदो ने भी ज्योतिष शास्त्र में अनेक ग्रन्थो का प्रणयन किया। महाराज कल्याण चन्द के समय माला के श्री रमापति ज्योतिर्विद ज्योतिष के प्रकाण्ड विद्वान हुए। इनका सम्मान राजसभा मे बराबर बना रहा। इनके लिखे ग्रन्थ अभी उपलब्ध नहीं हुए। सर्प ग्राम के श्री कृपाराम तथा उनके पुत्र भवदेव सस्कृत के उद्भट विद्वान थे। भूदेव जी को अलवर राज्य मे सम्मानित किया गया। उन के पुत्र रामदत्त जी ने गर्भाधानमुखप्रयोग तथा वार्षिक कर्म पद्धति ग्रन्थो की रचना की। उन के पुत्र देवीदत्त जी ने ज्योतिष शास्त्र पर सुगम ज्योतिष की रचना की। सध्यादर्पण नामक ग्रथ भी लिखा। प० प्रेमवल्लभ पाण्डे ने ज्योतिप पर परम सिद्धान्त नामक ग्रथ लिखा। श्री रुद्रदेव जोशी ने ज्योतिष चन्द्रार्क और रुद्र प्रदीप, दैवज्ञ देवकी नन्दन ने होरा हस्कर तथा दैवज्ञ भास्कर ने भूगर्भ शास्त्र, वास्तु शास्त्र पर ग्रन्थो का प्रणयन किया। महाराज बाज बहादुर चन्द के समय उनकी सभा मे बैकुण्ठ मिश्र नाम के धुरन्धर वैद्य थे जिन्होने वैद्यक पर कई ग्रन्थ लिखे। पर आज ये उपलब्ध नही है। गगावली के दुर्गादत्त पन्त जी वैद्य को अभी मुरादाबाद वाले भूले नही है। इनकी सुश्रुत की सस्कृत व्याख्या उल्हण से कही उच्चकोटि की है। पदार्थ विज्ञान तथा रसायन विज्ञान पर भी इनके ग्रन्थ है। मुरादाबाद । मुरादाबाद निवासी प० भवानी दत्त जोशी सस्कृत के उत्कृष्ट विद्वान थे। इनकी शिष्य परम्परा में विख्यात विद्वान ज्वाला प्रसाद मिश्र थे। इनकी एक कृति वार्षिक कर्म पद्धति पर उपलब्ध है। अठारहवी सदी के अन्तिम चरण मे गगावली उपरडा ग्राम के श्री लोकरत्न पन्त सस्कृत के प्रकाण्ड विद्धान हुए। अपने गुमानी उपनाम से लोक प्रसिद्ध हुए। सस्कृत इनके ग्रन्थ छोटे होने पर भी उपादेय है। इनकी रचनाये है - रामनाम पचाशिका, राम महिमा, गगाशतक, जगन्नाथाष्टक, कृष्णाष्टक, राम सहस्त्र-गण-दण्डक, रामाप्टक, चित्र पद्यावली, कालिकाप्टक, राम-विज्ञप्ति-सार, भक्ति-विज्ञप्ति-सार, उपदेश-शतक, ज्ञानभैषज्यमजरी, तत्वविद्योतिनी, आशौच निर्णय सम्बन्धी दो ग्रन्थ, कई राजाओ के सर्ग बद्ध जीवन चरित्र सस्कृत तथा लोकभाषाओ की बहुत सी समस्या पूर्तियाँ तथा भापा मे A मे स्फुट रचनाएँ। अठारहवी सदी के अन्त तथा उन्नीसवी सदी के पूर्व चरण मे कूर्माचल में सस्कृत व्याकरण का वह प्रकाण्ड विद्वान हुआ जिसने देश काल की सीमा लॉघ अपनी प्रतिभाशाली शिष्य परम्परा द्वारा समस्त भारत मे अपनी विद्वत्ता की धाक जमायी। ये थे ज्योली ग्राम के महामहोपाध्याय पडित गगाराम शास्त्री। उन्होने शेखरद्रय के अध्ययन में परिष्कार परिपाटी का काशी मे श्रीगणेश किया। इस नूतन प्रणाली ने व्याकरण के अध्ययन का ढाचा ही बदल दिया। लघु शब्देन्दु शेखर तथा परिभाषेन्दु शेखर पर आधुनिक काल मे जो टीकाये हुई वे सब इन्ही की शिष्य परम्परा की कृतियाँ हैं। उनके प्रमुख शिष्यो मे नेपाल परिशिष्ट 97 के पण्डित रगनाथ गुरुज्यू तथा महाराष्ट्र के पण्डित जगन्नाथ शास्त्री गाडगिल बहुत प्रसिद्ध हुए। रगनाथ जी नेपाल महाराज के प्रधानामात्य बने और गाडगिल जी चित्रकूट मे अन्तिम पेशवा अमृतराव के आमात्य बने। पडित गगाराम शास्त्री के अन्य प्रमुख शिष्यो मे पडित राजाराम शास्त्री कार्लेस्कर, बाला शास्त्री गगाधर शास्त्री (महाराष्ट्रीय), दामोदर शास्त्री भारद्वाज, शिवकुमार शास्त्री तथा तात्या शास्त्री हुए। ये सब अपने पाण्डित्य से समस्त भारत मे विख्यात हुए। इन सभी को महामहोपाध्याय का गौरवमय सम्मान भी प्राप्त हुआ। इनके शिष्यो मे महामहोपाध्याय प० नित्यानन्द पन्त पर्वतीय का नाम स्मरणीय है। नित्यानन्द जी गगाराम जी के दौहित्र थे। अनूप शहर के पास गगाराम शास्त्री जी की भेट दौलतराव शिदे से हुई। उनके अमित ज्ञान का प्रभाव इस राजनीतिज्ञ पर पड़ा। ग्वालियर राज्य ने झॉसी मे कई गाँव माफी के दिये तथा नेपाल के महाराज ने कूर्माचल मे कई गाँव इनकी विद्वत्ता के प्रति सम्मान प्रदर्शित करते हुए दिये। अठारहवी सदी के अतिम चरण मे काशी में एक पर्वतीय विद्वान पडित, नीलाम्बर पत तिलाडी ग्राम से आकर बस गये। ये बडे तपस्वी, दार्शनिक तथा यो गौत्र प० नामदेव पत भी सस्कृत के विद्वान हुए। इन्ही नामदेव जी के पुत्र महामहोपाध्याय ५० नित्यानन्द पत जी थे। 1867 में इनका जन्म हुआ। ये बीसवी सदी के सस्कृत के मूर्धन्य विद्वान हुए। इनकी प्रमुख कृतिया ये हैं - लघुश्ब्देन्दुशेखर टीका, सस्कार दीपक (तीन भाग), अन्त्यकर्म दीपक, वर्षकृत्य दीपक, कातीयेष्टि दीपक, सापिण्ड्य दीपक। आपने अनेक ग्रन्थों का अपनी सारगर्भित टिप्पणियो सहित सपादन किया। जैमिनीय सूत्र वृत्ति, मीमासा परिभाषा, लघु मजूषा, पाराशर श्रौत सूत्र (11 अध्याय तक) वीर मित्रोदय (आरभिक भाग) का सपादन किया। जीवन के अतिम क्षणों मे कुमारिल भट्ट के श्लोक वार्तिक की व्याख्या आरभ की पर स्वास्थ्य ठीक न होने से पूरा न कर सके। कूर्माचल के विद्वानों का सस्कृत वाङ् मय की अभिवृद्धि में बड़ा हाथ है। वेद, मीमासा, न्याय, व्याकरण, छद शास्त्र, साहित्य तन्त्र, वैद्यक, कर्मकाण्ड तथा ज्योतिष में ग्रन्थ प्रणयन करके अपने पूर्वजों की सपदा को अक्षुण्ण रखने में इन पर्वतीय विद्वानों का प्रमुख सहयोग रहा। विद्वान सर्वत्र पूज्यते। इसीलिए उनका आदर भारत मे सर्वत्र हुआ। (इस लेख को लिखने में मुझे अपने गुरु स्वर्गीय प० मनोरथ पाण्डे शास्त्री जी के लेखो तथा काशी के पर्वतीय विद्वान प० जनार्दन शास्त्री पाण्डेय के लेखों से बहुत सहायता मिली। मैं उनका अनुग्रहीत हू। पडित गोपाल दत्त शास्त्री पाण्डेय जी के लेख से उनके नाना प० नित्यानन्द जी का इतिवृत्त ज्ञात हुआ। अत उनके प्रति भी आभार प्रकट करता है। श्री वसन्त वल्लभ भट्ट जी का भी आभारी हू जिन्होने मुझे इन विद्वानो की सूचना भेजी)।

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पमुकुटमणेाजयाहारस्पेभक्त पूज्योनितांत कुलकमलरविधि
श्वस्याभिधानाजानलस्योगजन्माकविकुमुद्दाशी श्रीशिवानंद
मब्रिह्मानंदाग्रजनमात शिकवि तहनिःस मुदण्यातनिधीक
ल्याहा चंद्रोदय शिकविनोकूमावलीयकाव्येसमनसर्ग:mmm
राजन
है
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Kalliyana Chandrodaya

Author
Nithya Nand Misra
Title
Kalliyana Chandrodaya
File name
Kalliyana Chandrodaya
Text
OCR done
Published
21-04-06
Publisher
Sri Almora Book Dipo Mal Road ,almora
Language
Sanskrit
Pages
102
Library
Shantarakshita Library Sarnath
Classification
Literture
DLI number
477401
Barcode
5990010152530.00
Scanning centre
IIIT, Allahabad
VMLT id
HSrEvWJU7Bm
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