The Asiatic Society, Kolkata

Kriyaratnasamuchchaya

Gunaratnasuri · 2007/12/20

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॥ ग्रन्थमालोत्पादकेभ्यः श्रीधर्मविषयगरुभ्यो नमः ।। आम् श्रीजैनयशोविजयग्रन्थमाला [१०] ॐ श्रीगुणरत्नसूरिविरचितः क्रियारत्नसमुच्चयः। उद्धृत्य ये व्याकरणाम्बुराशितो विलोड्य बुद्धिप्रसरामराद्रिणा । शुद्धक्रियारत्नसमुच्चयं सतामाश्चर्यभूतं विबुधालये ददुः ॥ १ ॥ [श्रीमुनिसुन्दरसूरयः] RRGISTERED UNDER SECTIONS 18 AND 19 OF ACT XIV OF 1867. जैनश्वेताम्बरश्रीसङ्घकलिकाता- साहाय्येन काशीस्थन्यायविशारदश्रीयशोविजयनामाङ्कितजैनपाठशालातः प्राकाश्यं नीतः । सोऽयं काश्यां चन्द्रप्रभायन्त्रालये मुद्रितः वीर संवत् २४३४।

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॥ अहम् ।। * भूमिका * प्रियवर! समय भी क्याही अपूर्व पदार्थ है; देखिये, एक समय वह था जब इसी भारतवर्ष में जैनधर्म, सीमा को उल्लङ्घन कर संपूर्ण देशो में पूर्ण रूप से छाया हुआ था और अनेक जैनाचार्यों ने उद्भट असङ्ख्य ग्रन्थ जैन- दर्शन पर निर्माण किये थे जिनका देखना क्या श्रवणगोचर होना भी इस समय अति दुर्लभ होगया है अब न तो लोगों में विद्यानुरागिता रह गई और न बल बीर्य का उद्भव है तब प्रतिभा जो सार पदार्थ विद्वानों का है कहाँ से आवे । हा! भारतवर्ष की कैसी दुर्दशा होगई कि अब एक भी वैसा विद्वान् नहीं और न होने के लिये कोई प्रयत्न करता है फिर जैनधर्म की वृद्धि का उपाय क्या रह गया ? क्योंकि सभी धर्मों की स्थिति शुद्ध विद्याही पर निर्भर है. यदि कोई विद्याभ्यास न करे तो वादी के मत का खण्डन कर अपने मत का मण्डन नहीं कर सकता । तथापि " यावद् बुद्धिबलोदयम्" हमलोग अपने कर्तव्य में कटिबद्ध हैं हमलोगों का मुख्य कर्तव्य यही है कि किसी तरह विद्यार्थियों को विद्याभ्यास में सुलभता हो । इसलिये पाठशाला खोलना, प्राचीन पुस्तकों को छपवाकर सुलभ करना, और जैनधर्मानुरागियों को इस विषय में उत्तेजना देना, आये हुए विद्यार्थियों को संमान पूर्वक रखना आदि यथाशक्य किया जाता है। सबसे मुख्य कार्य यही समझा गया कि उत्तम २ उपयोगी प्राचीन व्याकरण, न्याय, साहित्य और धर्म आदि सम्बन्धी ग्रन्थ छापे जायें अतएव श्रीमुनिराज धर्मविजयजी के उपदेश से श्रीजैनयशोविजयग्रन्थमाला कतिपय वर्षों से छपवाकर प्रकाशित की जाती है जिसमें श्रीसिद्धहेमव्याकरण लधुवृत्ति वगैरह सहित, हैमलि- ङ्गानुशासन,व्याकरणग्रन्थ; प्रमाणनयतत्त्वालोकालङ्कार, रत्नाकरावतारिका टिप्पण पञ्जिका सहित, न्यायग्रन्थ; कुमुदचन्द्रप्रकरण साहित्य ग्रन्थ; स्तोत्रसंग्रह दो . २ ) भाग, गुर्वावली वगैरह धर्मग्रन्थ कई एक छपकर निकल चुके हैं; अब यह श्रीगुणरत्नसूरिविरचित क्रियारत्मसमुच्चय व्याकरण का अपूर्व ग्रन्थ छपवाकर निकाला गया है। प्रायः सभी विद्वानों को क्रिया के रूपों में कुछ न कुछ सन्देह बना ही रहता है इस ग्रन्थ के रचने से इस अभाव को श्रीगुणरत्नसूरी जी ने मिटा दिया । यह ग्रन्थ प्रायः सर्वमतानुयायियों को अपने पास रखना चाहिये विशेषकर हैमव्याकरण के पढ़नेवालों को उपयोगी है। श्रीहैपशब्दागमपाठकानां महोपकारी जयतात् सदैषः । प्रन्थः क्रियारत्नसमुच्चयाख्यो विद्वन्मणेः श्रीगुणरत्नसुरेः॥ १ ॥ श्रीगुणरत्नसूरी जी ने अपने स्थिति का समय स्वयं इसी ग्रन्थ की प्रशस्ति भाग में दिया है- लिखा है कि श्रीविक्रमादित्य से संवत् १४६६ व्यतीत होने पर गुरूजी के आज्ञावश अपना और संसार का उपकार समझकर बुद्धिहीन भी मैंने इस ग्रन्थ को रचा; विना कारणही उपकार करनेवाले साधु विद्वान जन इस को शुद्ध करलें:- "काले पदसपूर्व १४६६ वत्सरमिते श्रीविक्रमादिगते गुर्वादेशवशाद्विमृश्य च सदा स्थान्योऽपकारं परम् । अन्थं श्रीगुणरत्नमूरिरतनोत्मज्ञाविहीनोऽप्यमुं निर्हेतूपकृतिप्रधानजननैः शोध्यस्त्वयं धीधनैः ॥ ६३ ॥" इनके बनाये हुए क्रियारत्नसमुच्चय, षड्दर्शनसमुच्चय की वृहवृत्ति आदि ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं-यह बात कल्पकिरणाक्ली प्रवचनपरीक्षा आदि ग्रन्थ के कर्ता श्रीधर्मसागरोपाध्यायकृत तपागच्छपट्टावली से भी विदित होती है जो कि इस ग्रन्थ की संस्कृतभूमिका में विस्तार पूर्वक लिखी गयी है उसका यहाँ लिखना आवश्यक नहीं है आपलोग उसी में देखलें; और इनके गुणों का भी पूर्ण- रूप से वर्णन है । लिखा है कि “ श्रीगुणरत्नसूरी जी अपूर्व विद्वान् थे और अहङ्कार, क्रोध, विकथादि के नियम अर्थात् दमन करने में उनका लोकोत्तर प्रभाव था, तथा उनके चरित्र आदि के निर्मलता से मुक्तिरूपी लक्ष्मी दासी- भूत थी" इत्यादि।

( ३ ) विक्रम संवत् १४६६ में मुनिसुन्दरसूरी की बनाई हुई गुर्वावली से भी श्रीगुणरत्नसूरी जी का पण्डितशिरोमणि, प्राभाविकधुरन्धर आदि होना स्पष्ट निश्चित होता है। इस परमोपयोगी ग्रन्थ के छपवाकर प्रकाशित करने में पूर्ण सहायता देनेवाले सुकार्यतत्पर परम उदार श्रीजैनश्वेताम्बरकलिकातासङ्घ का धन्यवाद पूर्वक हमलोग परम उपकार मानते हैं। चार पुस्तकों के आधार पर परम परिश्रम से यह पुस्तक शुद्ध कर छापी गई और पीछे से शुद्धिपत्र भी दिया गया है । यदि अब भी दृष्टिदोष से कहीं कोई अशुद्धि रह गई हो तो आप लोग कृपाकरके शुद्ध करलें । कई कारणों से इस नम्बर के निकलने में विलम्ब हुआ है किन्तु अब शीघ्र २ निकलने का पूरा प्रबन्ध किया गया है। इस ग्रन्थमाला के उत्पादक श्रीमुनिराज धर्मविजयजी महाराज का चित्र (फोटो) देना उचित है किन्तु वे इस बात को स्वीकार नहीं करते इस लिये उक्त मुनिराज के गुरू परमोपकारी शान्तमूर्ति श्रीवृद्धिचन्द्रजी महाराज का चित्र और उन्हीं का स्तुतिरूप गुर्वष्टक भी दिया गया है । शास्त्रं नाम समुच्चयान्तमनघं चक्रुः क्रियारत्नमा- बालं सत्वरबोधकारणमिदं सर्वप्रमोदप्रदम् । ये खुदाखिल शास्त्र सुन्दरकलास्सक्रियायाः पदं ते श्रीमद्गुणरत्नसूरिपतयः सन्तु प्रबोधाय वः ॥ १॥ निवेदक श्रीजैनयशोविजयपाठशालाव्यवस्थापक । poorn Smart ve.at Pub . m

ॐ
श्रीगुणरत्नसूरयः।
श्रीहैमशब्दागमपाठकानां महोपकारी जयतात्सदेषः ।
ग्रन्थः क्रियारत्नसमुच्चयाख्यो विद्वन्मणेः श्रीगुणरत्नसूरेः ॥ १ ॥
अखण्डितपण्डामण्डनमण्डितपण्डितमण्डलाकाण्डितचण्डाहङ्कारान्धकारवा-
रनिवारणेऽप्रतिमप्रतिभाप्रकर्षप्रखरप्रभप्रभाकरानुकारिणश्चश्चश्चारुचातुरीचचितचे-
तस्विचेतश्चमत्कारकारिकृतान्तसङ्घाताः श्रीगुणरत्नसूरयः कदा कतमं क्षमामण्डलं
मण्डयाम्बभूवुरिति जिज्ञासायामनेकग्रन्थप-लोचने प्रवृत्ते-
श्रीगुणरत्रसूरीणामसाधारणनियमः। तदुक्तम्-
जगदुत्तरो हि तेषां नियमोऽवष्टम्भरोषविकथानाम् ।
आसमां मुक्तिरमा वदति चरित्रादिनैर्मल्यात् ॥” इति
तत्कृताश्च प्रन्थाः क्रियारनसमुच्चयषड्दर्शनसमुच्चयबृहवृत्त्यादयः
इति कल्पकिरणावलीप्रवचनपरीक्षादिग्रन्थसार्थग्रन्थितृतपागणगगनाङ्गणग-
गनाध्वगायमानश्रीधर्मसागरोपाध्यायविहिप्ततपागच्छपट्टावलीतः-
देवमुन्दरगुरुक्रमपमो.
पास्तिविस्तृतसमस्तगुणा ये।
तद्विनेयवृषभा विजयन्ते
कीर्तयामि ततकीर्तिततीस्तान् ॥ १॥
आधा जयन्ति गुणरत्नमुनीन्द्रचन्द्रा:
सूरीश्वराः सुगुणरत्नविभूषणेयः ।
सा काऽप्यवापि सुभगत्वरमा यया तान्
श्लिष्यन्ति सर्वबुधमानसत्तिनार्यः ॥ २ ॥
तेषां निर्जितवादिराजिकुयशोजम्बालजालाबिले
भ्रान्त्वा भूवलयेऽखिलेऽथ चलिता ख स्वर्गदण्डाध्वना ।
स्वान्ती श्रान्तिहतीच्छयेन्दुसरास स्वैरं सुधाशीकरान्
कीर्तिर्यान् विकिरत्यमी प्रतिनिशं दृश्या ग्रहादिच्छलात् ॥ ३ ॥

२ ) यजाता हिमभूभृतः पशुपतेः पनीत का प्रत्यय- स्तत्कीर्तिनिताऽमुनेति तु सतां नूनं प्रतीतेः पथः । एषा यच्छिशिराऽर्जुनाऽपि जनयेत् म्लानि जवाद्वादिनां वाम्भोजगणेषु निर्दहति च मोदामदर्पनुमान् ॥ ४ ॥ ग्रन्थेषु येषु न परस्य धियां प्रवेशोऽ प्येतेष्वपि प्रसरवीह तदीयधुदिः । बेभाययत्यापि तटाश्रितमन्यमधि- यः सोऽपि दैत्यरिपुणा किमु नो ममन्थे ॥ ५ ॥ जगदुत्तरो हि तेषां नियमोग्वष्टम्भरोषविकथानाम् । आसमा मुक्तिरमा वदति चरित्रातिनैमल्यात् ॥६॥ सिद्धत्वात् सार्ववैयस्य ते सिदपुरुषोत्तमाः। सदाप्ततत्कणा शिष्या यदशीकुर्वते जगत् ।। ७॥ सर्वव्याकरणावदातहदयाः साहित्यसत्यासवो गम्भीरागमदुग्धसिन्धुलहरीपानकपीताब्धयः । ज्यायोज्योतिषनिस्तुषाः प्रदधतस्तर्केषु चाचार्यक वादे सेऽत्र जयन्त्यशेषविदुषां वैद्यदर्पोष्मलान् ॥ ८ ॥ उत्कल्लोळं दिशि दिशि बुधाः कर्णपात्रैः पिबन्तः स्फीतं गीतं सुकृतिततिभिस्तयश क्षीरपूरम् । तेषां शुद्धां चरणकमलां बिभ्रतां श्रीगुरूणां सृष्टया स्रष्टा जगदुपकृतं मन्यते साम्प्रतं वै ॥ ९॥ परमेष्ठिमन्त्रतत्वान्नायमरणेन दैवतादेशैः। पारत्रिकैहिकीस्ते प्रायो जानन्ति कार्यगतीः ॥ १० ॥ खदर्शने वा परदर्शनेषु वा प्रन्थः स विद्यासु चतुर्दशस्वपि । समीक्ष्यते नैव मुदुर्गमेऽप्यहो यत्र प्रगरमा न तदीयशेमुषी ॥११॥ या शानायुधमपौढिर्या च नित्याऽममादिता। या चैषां स्मरणा शक्तिः साऽन्यत्र श्रूयतेऽपि न ॥१२॥ चक्रुष्टीकाशलाका ते पदर्शनसमुचये । झाननेत्राचनायेव सतां तत्त्वार्थदोशनीम् ॥१३॥ उमृत्य ये व्याकरणाम्बुराशितो विलोड्य बुद्धिमसरामराद्रिणा ।

( ३ ) शुद्धक्रियारलसमुच्चयं सता. पाश्चर्यभूतं विबुधालये ददुः ॥१४॥ लोकोत्तरी सच्चरणश्रियं मुदा सदा भजन्तश्च सरस्वतीं प्रियाम् । दुष्कर्मदैत्यव्यथका जयन्तु ते गुरुपवेकाः पुरुषोत्तमाश्विरम् ॥१५॥ ( युग्मम् ) इति वादिगोकुलषण्ढकालीसरस्वत्याधनेकबिरुदधारकसहस्राभिधानधर्तृ- श्रीमुनिसुन्दरसूरिभी रसरसमनुमिते १४६६ विक्रमाब्दे विरचिताद् श्रीगु बली- नामकग्रन्थाच सहृदयहदयहृदयङ्गमग्रन्थितनिर्ग्रन्थागण्यगुणगणाकृष्टोत्कृष्टदुष्टा- निष्टकष्टदारिष्टपटलानामुक्तसूरीणां दृप्यदुर्मदवहादिवारणनिवारणोल्लसहिरद- कईनलं चातुर्वैधवैशारधं प्राभाविकधुरन्धरत्वञ्च स्फुटमेव निश्चेचीय्यते । पूज्याचार्य्यवाणां चैतेषां १४६६ वैक्रमिकः सत्तासमय इति ग्रन्थप्र- शस्तिगतश्लोकेन प्रकटमेव प्रतीयते । अस्य पुनः सिद्धहेमचन्द्रव्याकरणाध्येतॄणां महोपयोगिनो ग्रन्थस्य सर्वतो मुद्रणादिव्ययदातुः सुकार्यालीनपरमादारश्रीकलिकाताजैनश्वेताम्बरसङ्घस्यातीव धन्यवादपुरस्सरं परमोपकारं मन्यामहे । पुस्तकचतुष्काधारेणातीवायासतः शोधितमुद्रिते दत्तशुद्धिपत्रेऽप्यस्मिन् अन्थे दृष्टिदोषाद् यत्र क्वचनाशुद्धिः स्थिता जाता वा तां कृपां विधाय सहृदयहृदयाः शोधयिष्यन्तीति- - यतः गच्छतः स्खलनं क्वापि भवत्येव प्रमादतः । हसन्ति दुर्जनास्तत्र समादधति सज्जनाः ॥ इति निवेदकाः श्रीयशोविजयजैनपाठशालाव्यवस्थापकाः ।

॥ भूमिका ॥ जैन-साहित्यनी उन्नति तथा प्रचारना विषयमा काशीस्थ श्रीमद्यशो- विजयजी जैन पाठशाला, तथा श्रीजैनयशोविजयग्रन्थमाला आपेलो फाळो केवो अपूर्व तथा आनन्दप्रद छे, ते सम्बन्धी अभिप्राय उचारवानो अमोने अधिकार नथी. परन्तु हरकोई व्यक्ति पछी भले ते उक्त संस्थानो शुभे- छक होय के शत्रु होय, पण जो तेना आंतर् चक्षुओ खुलेला हशे; तो तेने पक्षापक्षना तोफानी प्रवाहमा तणाती आ संस्थानी मुश्केलीनो ख्याल आव्या वगर रहेशे नहीं. पाठशालाना सम्बन्धमां आ स्थाननो उपयोग करवो से अधर्म्य होवाथी पाठशालाना प्रश्नने अक बाजु पर राखी, ग्रन्थमालाना विषयमांज अत्र बोलीशु. पांच वरस दरमीयान प्रस्तुत ग्रन्थमालाने पण अवा अनेक संकटो नड्या छे! अम छतां अमारा जैन-साहित्य-प्रिय वांचनाराओना हाथमां दशम स्न, जरा विलम्बथी पण मुंकवा शक्तिवान् नीवड्या छी); ते अमारा माटे ओछा सन्तोषनी वात तो नज कहेवाय. उपस्थित दशमरत्न जन समाजने केटलुबधुं उपयोगी तथा जैनाचार्यनी सरल अने कोमल कृतिनुं आदर्श छे, ते तेना अधिकारी अभ्यासी सिवाय संपूर्णतः समजी शकाय अम नथी, तदपि ग्रन्थना अन्तिम भागमा स्वयं कर्त्ताओज आपेली प्रशस्ति उपरथी आ वाततो स्पष्ट रीते प्रकाशी नीकळे छे के, ग्रन्थकार-श्रीमद् गुण- रत्नसूरि महाराजे, श्रीसिद्धहेम-व्याकरणना अभ्यासीओने धातुना तथा कृदं. तना प्रयोगो सम्बन्धी अनेकशः नउती मुश्केलीओ दूर करवाना अति उच्च उद्देशथीज आ ग्रन्थनी रचना विक्रम सम्बत् १४६६ मां करीछे. धातुओना कालना अने कृदन्तना विविध रूपाख्यानो के जेमा उद्भट कहेवरावता आधु. निक वैयाकरणो पण घणी वार गो) खाइ बेसे छे, तेवा क्लिष्ट रूपाख्यानोनुं स्पष्टीकरण आपवामां उक्त आचार्य महाराज अटले बधे दरज्जे सफलता पाम्या छे के, अमो अम खात्री पूर्वक कहेवाने तत्पर थया छीके के तेओश्रीना गमे ( २ ) ते स्थले रहेला पवित्रात्माने, क्रियारत्नसमुच्चयना अभ्यासको अनन्त आ- शीर्वादथी वधावी लीधा वगर रही शकशे नहीं. आ आचार्य महाराजश्रीओ आ ग्रन्थ उपरान्त पण अन्य अनेक ग्रन्थोनी रचना करी छे. ते उपरथी तेओश्रीनी प्रतिभा किंवा अप्रतिबद्ध बुद्धिनुं सहज अनुमान थइ आवे अम छे. ग्रन्थकारनी स्तुति करता सुप्रसिद्ध आचार्य श्रीमुनिसुन्दरसूरि पण कहेछे केः- आधा जयन्ति गुणरत्नमुनीन्द्रचन्द्राः सूरीश्वराः सुगुणरबविभूषणेयः । सा काऽप्यवापि सुभगत्वरमा यया तान् श्लिष्यन्ति सर्पबुधमानसदृत्तिनार्यः ।। अर्थात्-मुनीन्द्रोने विषे चन्द्र समान श्रीगुणरत्नसूरीश्वर जयवन्ता वर्तछे. सद्गुण रूपी रत्नना आभूषण रूप जे गुरु ते वडे कोइपण अवी सौभाग्य स्त्री प्राप्त करवामां आवी के जे स्त्रीने लइने सर्व शाणा पुरुषोनी मानसिक वृत्ति रूपी नारीओ तेमने आलिङ्गन करेछे. सारांश के विद्वान् पुरुषोनी मनो- वृत्ति तेमना प्रति आकर्षीया विना रही शकतीज नथी. आ उपरान्त ग्रन्थ- कारना यशोगान अथवा गुणानुरागमां मुनिसुन्दरसूरि अटला बधा पृष्ठो रोके छे के, ते सर्वनो उल्लेख अत्र अशक्य थइ पडेछे. परन्तु प्रस्तुत ग्रन्थ क्रियारत्न समुच्चयनी अपूर्वता तथा सुन्दरताचं वर्णन तो आप्या विना आ प्रसंग पसार करी शकीशुं नहीं. तेओश्री लखछे के:- उद्धृत्य ये व्याकरणाम्बुराशितो विलोड्य बुद्धिप्रसरामराद्रिणा । शुद्ध-"क्रियारत्नसमुच्चयं " सतामाश्चर्यभूतं विबुधालये ददुः ।। अर्थात्-जेओओ बुद्धिना विस्तार रूपी अमराचल-कनकाद्रि वडे व्याकरण- रूप समुद्रमांथी, चिरान्दोलन करीने सज्जनोने आश्रयभूत अवा शुद्ध क्रिया- रत्नसमुच्चयने करवा साथे तेने पंडितोना आवासमा समर्पण कर्यो! इत्यादि. आ बधा निरूपण पछी अम समजाववानी कदाचज जरूर पडशे के, संस्कृत विद्यार्थीओना मार्गमां गमे ते प्रकारे सरलता आणवानोज अकमात्र उद्देश आ ग्रन्थरत्नमां समायेलो छे. मात्र धातुओना रूपाख्यानोज आपीने बेसी नहीं रहेता, नाम तथा सौत्र धातुओना सर्व रूपाख्यानोनी पण विस्तारथी समज ३ ) आपवा उपरांत, कयो काल केवे प्रसंगे वापरवो जोइ ? तेनी अवी तो असरकारक समज आपी छे के अकंदर रीते विद्यार्थी-वर्गने आ ग्रन्थ आशी. र्वाद रूप थइ पड्या वगर रहे नहीं. जे जे स्थले काइक कठिन स्थल-विशेष कर्त्ताने मालूम पडयुं छे; त्यां त्यां पोतानी ( प्राचीन ) गुजराती भाषामा पण समजाववानुं कर्त्तव्य विसरी गया नथी. 'सौभाग्यनो विषय छे के आवा अनेक ग्रन्थ रत्नोना प्रतापे श्रीजैनयशो. 'विजय ग्रन्थमाला लोकादर संपादन करवाने दिनानुदिन अधिकतर शक्ति. वती थती जाय छे. टुंक समयमांज अनेक सुप्रतिष्ठित नरो तेनी मुक्त कंठथी प्रशंसा करवाने ललचाया छे. खुद हिंदी सरकारे पण आ ग्रन्थमालानुं प्रथम रत्न-प्रमाणनयतत्त्वालोकालंकार कलकत्ता युनिवर्सिटीमा M. A. नी परीक्षामा दाखल करी, आपणा जैन साहित्यने इन्साफ आपी तेना प्रवर्त्त- कोने उत्तेजित कर्या छे. तात्पर्य मे छे के आ प्रमाणे ग्रन्थमालानुं भविष्य मूलथीज तेजस्वि छे. तेने वधारे तेजखि बनावी साहित्यना प्रचारमा सहायक थर्बु ओ आपणुं सर्व- कर्त्तव्य छे. आ कर्त्तव्यनो पार पामवा जो अमारा पूज्य मुनिवरो तथा श्रीमानो अमने योग्य सहाय आपी ग्रन्थमालानो पायो सुदृढ करवानी पोतानी फरज विचारशे तो अमने आशा नहीं पण विश्वास छे, के जैनाचार्योनी शब्द-प्राचुर्य किंवा खण्डन-मण्डन रहित, हृदयंगम अने सरल कृति जन समाजने मोहित कर्या वगर रहेशे नहीं । प्रस्तुत ग्रन्थ प्रगट करवामां आर्थिक सहाय अर्पनार श्रीकलकत्ताना संघनो अत्र आभार मानीओ छी); अने आवा ज्ञानप्रचारना अनेक कार्योमां पुनः पुनः उजमाल थाय ओम इच्छीओ छीओ ॥ आ नानी भूमिका समाप्त करता अन्ते प्रार्थिरों के अक त्यागी, वैरागी अने प्रभाविक मुनिवरना पवित्र अने प्रबल प्रयत्न द्वारा स्थापित थयेली श्री यशोविजय जैनपाठशाला तथा तदन्तर्गत श्रीजैनयशोविजय ग्रन्थमाला, समस्त प्राणीओना समुल्लासने अर्थे “यावच्चन्द्रदिवाकरौ” रहो ? व्यवस्थापक-श्रीयशोविजयजनप्रन्थमाना।

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PREFACE. The Kriyaratna-samuccaya' is a very useful supplement to the Sankrit grammar (Siddha Hema-Sabdanusasana) of Hema Candra Suri, containing as it does the paradigms of almost all Sanskrit verbs (roots) arranged under different ganas, classes, as Bhvādi, Adidi, etc.. Guparatna Suri, who wrote this work, is well known as the author of another work-a commentary on the Şaddarsana-samuccaya named Şaddarsana-samuccayavịtti or Tarka-rahasya-dipikā." In this latter work Guņaratna has men- •tioned Sauddhodani, Dharmottarācārya, Dharmakirti, Prajnakara, Dignaga, and other Buddhist authors, as well as numerous Brāhmaņa authors such as Akşapäda, Vātsyāyana, Udyotakara, Vācaspati, Udayana, Srikantha, Abhayatilakopādhyāya and Jayanta. Gunaratna belonged to the Tapāgaccha of the Svetāmbara sect, and was a pupil of Devasundara who attained the exalted position of Sūri in Anahillapattana in Samvat 1420 or A.D. 1363, as is evident from Ratnasekhara Siri's Sraddha-pratikramana-sutra-vrtti' composed in Samvat 1496 or A.D. 1439. Devasundara Suri, teacher of Gunaratna, was a contemporary of Munisundara Sori, the famous author of the Gurvāvali," 2 · This preface was written at our request by Mahāmahopadhyāya Dr. Sutis Chandra Vidyābhūşaņa, M.A., Ph.D., Professor of Sanskrit and Pali, Presidency College, Calcutta, and Jt. Philological Secretary, Asiatic Society of Bengal.--- EDITOR. पोहेमचन्द्रसूरीशकृतव्याकरणादिह । बहूपयोगिधासूनां क्रियारत्नसमुच्चयम् ॥ २ ॥ श्रीदेवसुन्दाभिख्यमुगुरुणां निदेशतः । सूरिः श्रीगुणरत्नोऽयं कुसते तज्जतुष्टये ॥ ३ ॥ ( क्रियारत्नसमुच्चयः ) 3 The Şaddarsana-samuccaya-vrtti has been published by the Asiatic Society of Bengal under the editorship of Dr. Suali of Bologna, Italy. • विख्यातसपेत्याख्या जगति जगचन्द्रसूरयोऽभूवन् । श्रीदेवसुन्दरगुरुत्तमाम तदनुक्रमाहिदिताः ॥ पञ्च च तेषां शिष्यालेष्वाद्या ज्ञानसागरा गुरवः कुलमण्डना द्वितीयाः प्रौगुणरत्रास्तृतीयाच ॥ षड्दर्शनवृत्तिक्रियारत्नसमुच्चयविचारनिधय सजः । एषां श्रीसुगुरुणां प्रसादतोऽब्दे घडङ्कविश्वमिते । औरतशेखरगणिईतिमिमामकृत कृतितुष्टैग ॥ ( श्राद्धप्रतिक्रमणसूत्रत्तिः) रमरममनुमितवर्ष १९६६ मुनिसुन्दरसूरिणा कृता पूर्वम् मधस्थेरवधार्या गुर्वालीयं जयश्रौद्धा ॥ २६ ॥ (गुर्वावलो, पृः १०९

iܐ
PREFACE.
composed in Samvat 1468 or A.D. 1409. These facts show that Guparatna
lived between 1868 A.D. and 1489 A.D. Guņaratna himself says that his
Kriyaratna-samuccaya was composed in Samvat 1466 or A.D. 1409. This
fixes his date with an absolute certainty.
Regarding the merits of the works which are being published in the
series called the Jaina-yaso-vijaya-granthamālā, I need not add any note as
they are well known to the scholars of the East and West.
SATIS CHANDRA VIDYABHUSANA.
PRESIDENCY COLLEGE,
CALOUTTA:
The 26th May, 1908.
। काले घडरमपूर्व १४६६ वत्सरमिते श्रीविक्रमादिते
गुर्वावशवचाहिमच्य च सदा स्वान्योपकारं परम् ।
प्रन्यं श्रीगुणरत्नपूरिरसनोत् प्रज्ञाविहीनोऽप्यमुम्
निस्पकृतिप्रधानजननेः शोधस्त्वयं धौधः ।। ६३ ॥
(क्रियारत्नसमुच्चयः, प्रः ३०९)।

क्रियारत्नसमुच्चयग्रन्थस्य विषयानुक्रमः। पृष्ठम् विषयाः। दशविभक्तिप्रयोगविभागे १९० २०४ वर्तमाना। पृष्ठम् विषयाः। " पुषादिः। आत्मनेपदिनः । " सूयत्यादि। २११ उभयपदिनः । २१२ स्वादिगणः । ५ सप्तमी। " पश्चमी। १२ " तुदादिगणे २२२ परस्मैपदिनः। २२४ २३४ कुटादिः। २३७ , आत्मनेपदिनः । २३९ रुधादिगणः । " मुचादिः। ० २४८ तनादिगणः । १०६ " बस्तनी। १० अद्यतनी। परोक्षा। आशी। श्वस्तनी। भविष्यन्ती। १५ क्रियातिपत्तिः । १६ " प्राकृत० विभक्तयः । भ्वादिगणे १९ परस्मैपदिनः। ८५ , आत्मनेपदिनः । उभयपदिनः। १२१ , धुतादय आत्मनेपदिनः। ज्वलादिः। १३२ यजादयः । १३९ घटादिः। अदादिगणे १४२ परमैपदिनः । अन्तर्गणो रुदादिः। आत्मनेपदिनः। उभयपदिनः । १७४ हादयः । दिवादिगणे १८३ परस्मैपदिनः । १२६ ॥ २५१ यादयः । २५४ " प्वादयः । चुरादिगणे २६५ , परस्मैपदिनः। २७४ पात्मनेपदिनः । २७५ " अदन्ताः। २८० युजादिः । २८५ सौत्रा धातवः । २८८ नामधातवः । ३०२ प्रशस्तिः । ३१० ग्रन्थस्य बीजकम् । धातूनां सूची १५१ " इति।

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॥ अहम् ॥ शिष्टाचरिताचरणविजिताजेयकरणगणस्याद्वादसमुद्रोल्लासनचन्द्रपरमपूज्यशान्तरसैकनिधि शान्तमूर्तिश्रीवृद्धिचन्द्रसद्गुर्वष्टक स्तुतिरूपम् । वाचं वाचं प्रभुगुणगणं लब्धकीर्तिर्जने यो. बोधं बोधं विषमविबुधं जातपूज्यप्रभावः । वेदं वेदं सकलसमयं प्राप्तशान्तखभावः स्वर्गस्थोऽसौ विलसति सुखं मद्गुरुर्वृद्धिचन्द्रः ॥१॥ स्नाय स्नायं सुपवितवपुः सार्ववाचामृतेन हायं हायं कुमतकपटं विश्ववन्द्यप्रतापः । घातं घातं सुभटपदवी प्राप दुष्कर्मवृन्दं स्वर्गस्थोऽसौ विलसति सुखं मद्गुरुवृद्धिचन्द्रः ॥ २ ॥ पावं पावं मुनिजनपथं कृत्यकार्येषु लीनः स्तावं स्तावं गुणिगुणगणं शुद्धसम्यक्त्वधारी । नावं नावं जिनवरवरं नीतपुण्यप्रकर्षः वर्गस्थोऽसौ विलसति सुखं मद्गुरुद्धिचन्द्रः ॥ ३ ॥ दायं दायं स्वभयमतुलं प्राणिपु प्रीतिपुञ्ज धायं धायं सुमतिमहिलां क्लुप्तकल्याणपोतः । भायं भायं प्रवचनवचो वीरदेवाभिमानः स्वर्गस्थोऽसौ विलसति सुखं मद्गुरुर्वृद्धिचन्द्रः ॥ ४ ॥ मारं मार रतिपतिभटं त्यक्तमोहादिदोषो. धारं धारं यतिपतिपदं कुत्तकर्मादिवर्गः । वारं वारं कुपथगमनं जैनगडान्तरक्तः स्वर्गस्थोऽसौ विलसति सुखं मद्गुरुर्वृद्धिचन्द्रः ॥ ५ ॥ द्वेषं द्वेषं कपटपटुकं निह्नवं न्यायमुक्तं पेष पेषं कुशलविकलं कर्मवारं प्रभूतम् । .

( २ ) पोषं पोष विमलकमलं चित्तरूपं महात्मा खर्गस्थोऽसौ विलसति सुखं मद्गुरुर्वृद्धिचन्द्रः ॥ ६ ॥ शोषं शोषं कलुषजलधि ध्वस्तपापादिपङ्कः प्लोषं प्लोषं सकलमशुभं शुद्धधीध्यानममः । तोषं तो भविजनमनो जैनतत्त्वादिभिर्यः वर्गस्थोऽसौ विलसति सुखं मद्गुरुर्वृद्धिचन्द्रः ॥ ७ ॥ सिद्धान्तोदधिमन्थनोत्थविमलज्ञानादिरलबजे शिष्येभ्यो वितरन् समाधिसहितः संप्राप नाकं शुभम् । सोऽयं मद्गुरुरन्वहं विजयतां श्रीवृद्धिचन्द्रो मुनि स्तस्यैव स्तुतिरूपमष्टकमिदं भव्याः पठन्तु प्रगे ॥ ८ ॥ इति परमपूज्यशान्तमूर्तिश्रीमद् वृद्धिचन्द्रचरणामलकमलचञ्चरीकायमाणश्रीजैनयशो. विजयग्रन्थमालोत्पादक-श्रीयशोविजय (बनारस ) जैनपाठशालासंस्थापक- योगशास्त्रविवरणसहितसंशोधक-श्रीमुनिराजधर्मविजयाविरचितं स्वगुर्वष्टकम् । JHUJHUN श्रीगुणरत्नसूरि- विरचितः क्रियारत्नसमुच्चयः। जयति जिनवर्द्धमानो नवो रविनित्यकेवलालोकः । अपहृतदोषोत्पत्तिर्गतसर्वतमाः सदाऽभ्युदितः ॥१॥ श्रीहेमचन्द्रसूरीशकृतव्याकरणादिह । बहूपयोगिधातूनां क्रियारत्नसमुच्चयम् ॥ २॥ श्रीदेवसुन्दराभिख्यसुगुरूणां निदेशतः । सूरिः श्रीगुणरत्नोऽयं कुरुते तज्ज्ञतुष्टये ॥ ३ ॥ (युग्मम्) इह सदोपयोगिनां क्रियारत्नानां प्रयोगप्रकारं बुभुत्सूनामुपकाराय वर्त्त- मानादिदशविभक्तीनां सदादिकालत्रयविषयःप्रयोगविभागः पूर्व तावन्निरूप्यते- "त्रीणि त्रीण्यन्ययुष्मदस्मदि।३।३।१७॥ सर्वासां विभक्तीनां त्रीणि २ वचनानि अन्यस्मिन्नर्थे युष्मदर्थेऽस्मदर्थे चाभिधेये क्रमाद्भवन्ति । तत्राप्येकस्मिन्नर्थे एक- वचनम् । द्वयोरर्थयोर्दिवचनम्। बहुष्वर्थेषु बहुवचनम् । अत्र अन्यत्वं युष्मदस्म- दपेक्षं संनिधानात् । युष्मच्छब्दवाथ्योऽर्थो युष्मदर्थः । तेन भवच्छब्देनोच्यमानो न युष्मदर्थः॥ स जयति। तौ जयतः। ते जयन्ति॥ स विजयते। तौ विजयेते । ते विजयन्ते॥भवान् जयति।भवन्तौ जयतः। भवन्तो जयन्ति इत्यादि।युष्मदि; त्वं जयसि । युवां जयथः। यूयं जयथ ॥ त्वं विजयसे । युवां विजयेथे । यूयं विजयध्वे॥ अस्मदि ; अहं जयामि। आवां जयावः । वयं जयामः ॥अहं विजये। आवां विजयावहे । वयं विजयामहे॥ एवं सर्वासु । द्वययोगे त्रययोगे च शब्द- स्पर्धात् पराश्रयमेव वचनं भवति। स च त्वं च जयथः । स चाहं च जयावः।

२ क्रियारत्नसमुच्चयः। लं नाहं च जयावः । स च त्वं चाहं च जयामः ॥ व्यस्तनिर्देशेऽपि परमेव । अहं च स च जयावः । अहं च त्वं च जयावः । अहं त्वं स च जयामः । ॥ तदुक्तम् ॥ अन्ययुष्मदस्मदर्थाः सहोक्तौ स्युर्यथापरम् । यथा ज्ञौ त्वं स च स्यातं ज्ञाः स्याम त्वमहं स च ॥१॥ इति॥ अथ वर्तमाना ॥ “सति” ।५।२।१९॥ वर्तमानकाले वर्तमाना ॥स चतुर्दा । प्रवृत्तोपरतश्चैव १ वृत्ताविरत एव च २ । नित्यप्रवृत्तः ३ सामीप्यो ४ वर्तमानश्चतुर्विधः ॥ १ ॥ सम्प्रति जीवघातं न करोति । परमर्माणि न जल्पति । परदारान् परि - हरति। सुरापानं वर्जयति। इति प्रवृत्तोपरतो वर्तमानः॥१॥ इह कुमाराः क्रीडन्ति । इह श्राद्धाः पर्वणि पौषधं गृह्णते। इह च्छात्रा अधीयते। अरण्ये किराता वस्त्राण्या- ददते। इति वृत्ताविरतः॥ आचन्द्रार्क नदी वहति । तिष्ठन्ति पर्वताः। तरणिस्तमांसि तिरस्कुरुते। द्वे सागरोपमे शक्रः साम्राज्यं कुरुते। हरिप्रेरणया ब्रह्मा सृष्टि रचयति। असुराः सदा वेदमार्ग विलुम्पन्ति । इति नित्यप्रवृत्तः॥ कथं तर्हि तस्थुः स्थास्यन्ति गिरय इति। उच्यते। भूतभाविनां भरतकल्किप्रभृतीनां राज्ञां याः क्रियास्तदवच्छे- देन पर्वतादिक्रियाणामप्यतीताऽनागतत्वोपपत्तेन भूतभाविप्रत्ययानुपपत्तिदोषः।३।। कदा मैत्राऽऽगतोऽसि ।अयमागच्छामि । कदा मैत्र गमिष्यसि । एष गच्छामि। इति सामीप्यः। अयं च “सत्सामीप्ये सद्दा” इत्यत्र विकल्पेन वक्ष्यते॥४॥२॥ अथ भूते वर्तमानां विवक्षुबघवार्थ ह्यस्तन्यादित्रयं प्राहा। वाद्यतनी पुरादौ”। ५।२।१५॥ पुरादयःपुरा तदा अथ यावद् ह शश्वदादयः प्रयोगतो गम्याः।भूतानद्यतने पुरादियोगेऽद्यतनी वा। पक्षे अपरोक्षे ह्यस्तनी। परोक्षे परोक्षा च । अवात्सुरिह पुरा च्छात्राः। पुराशब्दोऽत्र चिरातीते।अवसन्निह पुरा च्छात्राः। ऊषुरिह पुरा च्छात्राः। तदाऽभाषिष्ट राघवः। तदाऽभाषत राघवः।बभाष राघवस्तदा॥२॥ अथ भूते वर्तमान।। "स्मे च वर्तमाना"।५।२।१६॥ स्मे पुरादौ चोपपदे भूतानद्यतने वर्तमाना। इति स्मो- पाध्यायः कथयति । पृच्छति स्म पुरोधसम् । स्मशब्दोऽतीतकालद्योतकश्चादिः। वस.

विभक्तिप्रयोगविभागः । । न्तीह पुरा च्छात्राः। भाषते राघवस्तदा।अथाह वर्णी विदितो महेश्वरः। क्रोधं प्रभो- संहर संहरेति यावद्गिरः खे मरुतां चरन्ति ॥ एवं च पुरादियोगेऽद्यतनीह्यस्तनीपरो- क्षावर्त्तमानाश्चतस्रो विभक्तयः सिद्धाः। स्मेन सहिते तु पुरादौ परत्वाद् वर्तमानैव नटेन स्म पुराऽधीयते । इतिह स्मोपाध्यायः कथयति । हशब्दोऽत्र स्मृत्यर्थे । इतिह इत्यव्ययसमुदायो वा संप्रदाये। शश्वदधीते स्म बटुः ॥३॥“ ननौ पृष्टोक्तौ सद्धत्”।५।२।१७॥ ननावुपपदे पृष्टस्य प्रतिवचने भूतेऽर्थे सहद्भवति। सहवचनाद्वर्त्त- माना शत्रानशौ च भवन्ति। किमकार्षीश्चैत्र कटम् । ननु करोमि भोः। ननु कुर्वन्तं कुर्वाणं मां पश्य । किमवोचः किंचिच्चैत्र । ननु ब्रवीमि भोः । ननु ब्रुवन्तं ब्रुवाणं मां पश्य ॥ ४॥ "नन्वोर्वा" ।५।२।१८॥ ननुशब्दयोर्योगे भूतेऽर्थे सद्वत् । किमकार्षीः कटं चैत्र । न करोमि भोः। न कुर्वन्तं न कुर्वाणं मां पश्य । नाकार्षम्। कस्तत्रावोचत् । अहं नु ब्रवीमि । ब्रुवन्तं ब्रुवाणं नु मां पश्य। अहं न्ववोचम् ॥५॥अथ भविष्यति वर्त्त- माना। “पुरायावतोर्वर्त्तमाना"।५।३।७॥ पुरायावतोरुपपदयोर्वय॑ति वर्तमाना॥चैत्र शीघ्रं भुक्ष्व पुरा ग्रामं गच्छसि । पश्चाद्गमिष्यसीत्यर्थः। पुराशब्दोऽत्र भविष्यदासन्ने। भोः सत्वरं पुस्तकं गृहाण पुराऽध्यापक आगच्छति । अयं यावहुक्त तावत्प्रती- क्षस्व । कदा राजभवनं प्रयास्यति । मित्र यावोज्यं भवति । अयं कियन्तं कालमध्येप्यते । यावत्पाणिग्रहणं सम्पद्यते । भविष्यदनद्यतनेऽपि परत्वाद्वर्त्तमा- नैव । पुरा श्वो भुङ्क्ते । यावच्च्यो व्रजति । यावच्छब्दोऽत्रावध्यर्थः। परिमाणार्थे तु न स्यात् । यावद्दास्यते तावदोक्ष्यते। यत्परिमाणमित्यर्थः॥६॥ “कदाकोर्नवा"।।३।८॥ अनयोोंगे वय॑ति वा वर्तमाना। पक्षे भविष्यन्तीश्वस्तन्यावपि । कदा भुते । कदा भोक्ष्यते। कदा भोक्ता। कर्हि भुङ्क्ते। कर्हि भोक्ष्यते । कर्हि भोक्ता । भूते तु नित्यं परोक्षादयः। कदा बुभुजे । कदा भुक्तवान् ॥ कर्हि बुभुजे भुक्तवान् वा ॥७॥ "किंवृत्ते लिप्सायाम्"।५।३।९॥ विभक्त्यन्तस्य डतरडतमान्तस्य च किमो वृत्तं किं. वृत्तमिति वैयाकरणसमयस्तेन किंतरां किंतमामिति न किंवृत्तं, तस्मिन्नुपपदे प्रष्टु- लब्धुमिच्छायां गम्यायां वय॑ति वा वर्तमाना। पक्षे भविप्यन्तीश्वस्तन्यावपि । १ पुति क्रियाविशेषणं कालविशेषणे वा सप्तमी, कालाध्य-१२।२।२३॥ इति कर्ममंज्ञायामम् वा, कर्तृविशेषणे प्रथमा वा। २ वर्म्यतीत्यस्य भविष्यदर्थ इत्यर्थः ।

४ क्रियारत्नसमुच्चयः। को भवतां भिक्षां ददाति दास्यति दाता वा । कं भवन्तो भोजयन्ति भोजयिष्य- न्ति भोजयितारो वा। कतरो भवतोर्भिक्षां ददाति दास्यति दाता वा। कतमो भवतां भिक्षां ददाति दास्यति दाता वा। लिप्साया अभावे तु, कः सिद्धपुरं यास्यति ॥८॥ “लिप्स्यसिद्धौ”।५।३।१०॥ लब्धुमिष्यमाण ओदनादिलिप्स्यस्तस्मात्सिद्धौ स्वर्गा- द्यवाप्तिलक्षणायां गम्यायां वर्त्यति वा वर्तमाना । पक्षे भविष्यन्तीश्वस्तन्यावपि। अकिंवृत्तार्थोऽयमारम्भः । यो भिक्षां ददाति दास्यति दाता वा स स्वर्ग याति यास्यति याता वा। अत्रोभयोर्वाक्ययोलिप्स्यसिद्धिरवगम्यते । तेनोभयत्रा- प्यनेनैव वर्तमाना सिद्धा । लिप्स्याद्भक्तात् स्वर्गसिद्धिमाचक्षाणो हि दातारं प्रोत्साहयति ॥९॥ “ पञ्चम्यर्थहेतौ”।५ । ३ । ११॥ पञ्चम्यर्थः प्रैषानुज्ञाऽवसराः । न्यक्कारपूर्वा प्रेरणा प्रैषः । कामचारानुमतिरनुज्ञा । अवसरः कर्त्तव्यकालप्राप्तिः । तस्य प्रैषादर्हेतुनिमित्तमुपाध्यायागमनादि, तस्मिन्नर्थे वर्त्यति वा वर्तमाना । पक्षे भविष्यन्तीश्वस्तन्यावपि । उपाध्यायश्चेदागच्छति आगमिष्यति आगन्ता वा, अथ त्वं सूत्रमध्वीप्व, अथ त्वमनुयोगमादत्स्व । अत्र भविष्यदुपाध्यायाग- मनं प्रैषादेर्हेतुर्भवति ॥ १० ॥ “सप्तमी चोर्द्धमौहूर्तिके” । ५। ३ ॥१२॥ ऊई- मुहूर्ताद्भव ऊर्द्धमौहर्तिकः । उत्तरपदवृद्धिरस्मादेव निर्देशात् । पञ्चम्यर्थहेता- वर्द्धमौहूर्त्तिके वर्त्यति सप्तमीवर्तमाने वा। पक्षे भविष्यन्तीश्वस्तन्यावपि । ऊई- मुहूर्तात् , उपरि मुहूर्त्तस्य, परं मुहू दुपाध्यायश्चेदागच्छेत् आगच्छति आगमिष्यति आगन्ता वा, अथ त्वं तर्कमध्वीष्व, अथ त्वं सिद्धान्तमधीष्व ॥११॥ अथ भूतभविष्यतोवर्तमाना ॥“ सत्सामीप्ये सहवा"।५।४।१॥ सतो वर्तमानस्य सामीप्ये भूते भविष्यति चार्थे सहत्प्रत्यया वा भवन्ति । कदा मैत्रागतोऽसि, अयमागच्छामि आगच्छन्तमेव मां विद्धि। वा वचनाद्यथाप्राप्तं च । अयमागमं, एषोऽस्म्यागतः । कदा मैत्र गमिष्यसि, एष गच्छामि गच्छन्तमेव मां विद्धि । पक्षे एष गमिष्यामि गन्नास्मि गमिष्यन्तमेव मां विद्धि। असामीप्ये तु न सद्वत् । परुदगच्छत् । वर्षेण ::२० ॥ २॥ अथ पुनर्भविष्यति सा ॥ “भूतवच्चाशंस्ये वा” ।५।४॥२॥अनागतः ऽर्थः प्रातुनिष्यमाण आशंस्यः, तस्मिन्नर्थे भूतवत्सहच्च प्रत्यया वा भवन्ति। आशस्यस्य भविष्यत्वादयमतिदेशः। वा ग्रहणाद्यथाप्राप्तं च । उपाध्यायश्चेदागमत् विभक्तिप्रयोगविभागः । एते तर्कमध्यगीष्महि । अत्र स्थानद्वयेऽप्यनेनैव भूतप्रत्ययः। उभयत्राप्याशंस्यस्य विद्यमानत्वाद्विशेषस्यानतिदेशात् । उपाध्यायश्चेदागतः एतैस्तोऽधीतः उपाध्यायश्चेदागच्छति एते तर्कमधीमहे । पक्षे । उपाध्यायश्चेदागमिष्यति एते तर्कमध्येतास्महे । सामान्यातिदेशे विशेषस्याऽनतिदेशात् ह्यस्तनीपरोक्षे न भवतः । आशंस्यादन्यत्र, गुरुरागमिष्यति तर्कमध्येष्यते मैत्रः॥ १३ ॥ अथ कालत्रये वर्तमाना। "क्षेपेऽपिजात्वोर्वर्त्तमाना"।५।४।१२।क्षेपो गर्दा, तस्मिन् गम्ये वर्तमाना सर्वेषु कालेषु। अपि तत्रभवान् जन्तून् हिनस्ति । जातु तत्रभवान् अनृतं भाषते। धिग्गामहे ॥ १४॥ “कथमि सप्तमी च वा”।५।४।१३ । क्षेपे गम्ये सर्वेषु कालेषु सप्तमी वर्तमाने वा भवतः । कथं नाम तत्र- भवान् मांसं भक्षयेत, मांसं भक्षयति । धिग्गर्हामहे । अन्याय्यमेतत् । पक्ष ह्यस्तन्यादय आशीर्वोः सर्वा अपि । कथं नाम तत्रभवान् मांसमभक्षयत् अबभक्षत् भक्षयांचकार भक्षयिता भक्षयिष्यति अभक्षयिष्यत् वा । अत्र सप्तमीनिमित्तमस्तीति भूते क्रियातिपतने वा क्रियातिपत्तिरप्युदाहारि । भवि- प्यति तु क्रियातिपतने क्रियातिपत्तिरेवैका नत्वन्याः। कथं नाम तत्रभवान् मांसमभक्षयिष्यत् । क्षेपादन्यत्र। कथं नाम तत्रभवान् साधून अपूपुजत् । एवं यथाप्राप्तं वर्त्तमानादयोऽप्युदाहार्याः ॥ १५ ॥ इति वर्तमानाव्याप्तिः ।। अथ सप्तमी॥"विधिनिमन्त्रणामन्त्रणाधीष्टसंप्रश्नप्रार्थने"।५।४।२८॥ विध्या. दिषु षट्सु सर्वप्रत्ययापवादौ सप्तमीपञ्चम्यौ । विधिरप्राप्ते नियोगः कियायां प्रेर- णेत्यर्थः। अज्ञातज्ञापनमित्येके। कटं कुर्यात् , करोतु भवान् । प्राणिनो न हिंस्यात्, न हिनस्तु भवान् । प्रेरणायामेव यस्यां प्रत्याख्याने प्रत्यवायस्तन्निमन्त्रणम् । इच्छा- मन्तरेणापि नियोगतः कर्त्तव्यमिति यावत् । हिसन्ध्यमावश्यकं कुर्यात् करोतु भवान् । सामायिकमधीयीत, अधीतां भवान् । यत्र प्रेरणायामेव प्रत्याख्याने कामचारस्तदामन्त्रणम् । इहासीत आस्तां भवान् । इह शयीत शेतां भवान्, यदि रोचते। प्रेरणैव सत्कारपूर्विकाऽधीष्टम् । अध्येषणं तत्वज्ञानम् । नः प्रसीदयुः प्रसीदन्तु गुरुपादाः । तत्वज्ञानं कर्मतापन्नं नोऽस्मभ्यं प्रसादपूर्वकं दद्युरित्यर्थः । बतं रक्षेत् रक्षतु भवान् ॥ संप्रश्नः संप्रधारणा ॥ किं नु खलु भी व्याकरणमधीयीय क्रियारत्नसमुच्चयः। अध्ययै, उत सिद्धान्तमधीयीय अध्ययै॥ प्रार्थनं याच्ञा ॥ प्रार्थना मे व्याकरण- मधीयीय अध्ययै, तेन स्यां नाथवानित्यादि ॥१६॥ “सम्भावने ऽलमर्थे तद- ऽर्थानुक्तौ”।५।४।२२॥ अलमर्थः सामर्थ्यम् । तद्विषये सम्भावने श्रद्धाने गम्येऽल- मर्थस्यानुत्तौ सप्तमी । सर्वविभक्त्यपवादः। शक्यसम्भावने । अपि मासमुपव- सेत। अपि पुण्डरीकाध्यायमह्नाऽधीयीत । अशक्यसम्भावने। अपि शिरसा पर्वतं भिन्द्यात् । अपि समुद्रं दोभ्या तरेत् । अलमर्थोक्तौ तु न । वसति चेत्सुराष्ट्रेषु वन्दिष्यतेऽलमुज्जयन्तम् । शक्तश्चैत्रो धर्म करिष्यति ॥ १७ ॥ "किंवृत्ते सप्तमी- भविष्यन्त्यौ”।५।४।२४॥ किंवृत्ते उपपदे क्षेपे गम्ये सप्तमीभविष्यन्त्यौ। सर्वविभक्त्य- पवादः। किं तत्रभवाननृतं ब्रूयात् वक्ष्यति वा । को नाम कतरो नाम कतमो नाम यस्मै तत्रभवान् अनृतं ब्रूयात् वक्ष्यति वा ॥१८॥ अश्रद्धाऽमर्षेऽन्यत्रापि”।५।४।१४॥ अन्यत्र अकिंवृत्तेऽपिशब्दात्किवृत्ते चोपपदेऽश्रद्धाऽमर्षयोर्गम्ययोः सप्तमीभविष्य- न्त्यौ । सर्वविभक्त्यपवादः । अश्रद्धायां। न श्रद्दधे, न सम्भावयामि, नाऽवकल्प- यामि, तत्रभवान्नामादत्तं गृह्णीयात् ग्रहीप्यति । किंवृत्तेऽपि । न श्रद्दधे, न सम्भावयामि, किं तत्रभवानदत्तमाददात, आदास्यते । अमर्षे । न मर्षयामि न क्षमे धिग् मिथ्या नैतदस्ति तत्रभवान्नामादत्तं गृह्णीयात् ग्रहीष्यति । किंवृत्तेऽपि । न क्षमे किं तत्रभवानदत्तं गृह्णीयात, ग्रहीष्यति । अत्राश्रद्धा- मर्षयोर्गम्यत्वं पदैः प्रयोगेणैव ज्ञेयम्। एतच्चास्मिन्नेव सूत्रे ज्ञातव्यं नान्यसूत्रेषु " शेषे भविष्यन्त्ययदौ”। इत्यत्र। चित्रं यदि सोऽधीयीत । अत्राश्रद्धा- प्यस्तीति कथयिष्यति ॥१९॥“जातुयद्यदायदौ सप्तमी"।५।४।१७॥अश्रद्धामर्षयोर्ग- म्ययोः सप्तमी। पूर्वसूत्रप्राप्ताया भविष्यन्त्या अपवादः। न श्रद्दधे न क्षमे जातु यत् यदा यदि वा तत्रभवान् सुरां पिबेत् । न श्रद्दधे यत् तत्रभवानस्मानाक्रोशेत् । एवं जातु यदा यद्युपपदेऽपि ॥२०॥ अथ भविष्यति सप्तमी ॥ “क्षिप्राशंसार्थयो- भविष्यन्तीसप्तम्यौ”।५।४।३॥ क्षिप्रार्थे आशंसार्थे चोपपदे आशंस्येऽर्थे यथासंख्यं भविष्यन्तीसप्तम्यौ । “भूतवच्चाशंस्ये वा”। इत्यस्यापवादः । उपाध्यायश्चेदा- गच्छति आगमत् आगमिष्यति आगन्ता क्षिप्रमाशुत्वरितमरंशीघ्रमेते सिद्धान्त- मध्येण्यामहे । श्वस्तनीविषयेऽप्येतद्वचनबलाहविष्यन्त्येव । उपाध्यायश्चेच्छ यतः विभक्तिप्रयोगविभागः । ७ शीघ्रमागमिष्यति एते श्वः क्षिप्रमध्येष्यामहे । आशंसार्थे, उपाध्यायश्चेदा- गच्छति, आगमत् आगमिष्यति आगन्ता आशंसेऽवकल्पये सम्भावये युक्तो ऽधीयीय। द्वयोस्सूपपदयोः सप्तम्येव। शब्दतः परत्वात्। आशंसे क्षिप्रमधीयीया॥२१॥ "वय॑ति हेतुफले"।५।४।२५॥ हेतुः कारणम्। फलं कार्यम् । हेतुभूतं फलभूते च वर्त्यति सप्तमी वा। यदि गुरूनुपासीत शास्त्रान्तं गच्छेत् । यदि गुरूनुपासिष्यते शास्त्रान्तं गमिष्यति। अत्र गुरूपासनं हेतुः। शास्त्रान्तगमनं फलम्। वर्त्यतोऽन्यत्र तु न सप्तमी। दक्षिणेन चेद्याति न शकटं पर्याभवति। केचित् तु सर्वेषु कालेषु सर्वविभक्त्यपवादं सप्तमी वा मन्यन्ते । दक्षिणेन चेद्यायात् याति अयासीत् यास्यति वा न शकटं पर्याभवेत् पर्याभवति पर्याभूत् पर्याभविष्यति वा । कियातिपत्तिस्तु स्वस्थाने दर्शयिष्यते। हनिष्यतीति पलायिष्यते । वर्षिष्यतीति धाविष्यतीत्यत्र हेतुफलभावस्येतिशब्देनैव द्योतितत्वात सप्तमी न भवति ॥२२॥ अथ सति सप्तमी॥ सतीच्छार्थात्"।५।४।२४॥सति वर्तमाने इच्छार्थात धातोः सप्तमी वा पक्षे तु वर्तमानैव । चैत्रः सुखमिच्छेत् इच्छति। उश्यात् वष्टि। कामयेत कामयते । वाञ्छेत्, वाञ्छति। “ क्षेपेऽपिजात्वावर्त्तमाना" । इत्यादावपि पर- त्वादयमेव विकल्पः । अपि संयतः सन्नकल्प्यं सेवितुमिच्छेत् इच्छति धिग्गरे- महे॥२३॥ “इच्छार्थ सप्तमीपञ्चम्यौ”।५।४।२७॥इच्छार्थे धातावुपपदे प्रयोक्तः कामोक्तो गम्यायां सप्तमीपञ्चम्यो । सर्वविभक्त्यपवादः। इच्छामि भुञ्जीत भुतां वा भवान् । कामये प्रार्थये अभिलषामि वश्मि । अधीयीत भवान् अधीतां वा ॥ २४ ॥ इति सप्तमीव्याप्तिः २ ॥ अथ पञ्चमी । सा च विध्याद्यर्थषट्के प्राग् सप्तम्यासहोदाहारि ॥ प्रैषानुज्ञावसरे कृत्यपञ्चम्यौ” ।५।४।२९। प्रैषादिषु कृत्याः पञ्चमी च भवन्ति । न्यक्कारपूर्विका प्रेरणा प्रैषः । अनुज्ञा कामचारानुमतिः। अवसरः प्राप्तकालता । भवता खलु कटः कार्यः कर्त्तव्यः करणीयः कृत्यः। भवान् हि प्रेषितोऽनुज्ञातो- । भवतोऽवसरः कटकरणे । कृत्या हि प्राक्सामान्येन भावकर्मणोर्विहिताः सर्व- प्रत्ययापवादभूतया पञ्चम्या बाध्येरन्निति पुनर्विधीयन्ते। पञ्चमी प्रैषे । भवान् कटं करोतु।रे ग्रामं याहि । अनुज्ञायाम्। स्वयं गन्तुमिच्छन्तं गन्तुं प्रवृत्तं का कश्चिदाह क्रियारत्नसमुच्चयः । ग्रामं गच्छ । एवं शास्त्रमधीष्व । क्षुल्लोऽयं पुस्तकान् वाचयतु । राजा भवतु धार्मिकः। अवसरे। काले वर्षतु पर्यन्यः सुप्रभूतेन वारिणा ।अथत्वं कुरु । अथ तव कर्तुमव- सर इत्यर्थः । प्रस्तावे भवतु कार्यम् ॥ २५ ॥ आशिषि पञ्चमी आशी:- स्थाने वक्ष्यते ॥ कश्चित्तु समर्थनायां पञ्चमीमिच्छति । परैरशक्यस्य वस्तु. नोऽध्यवसायः समर्थना।कश्चिदाह, समुद्रः शोषयितुमशक्यः। स प्राह, समुद्रमपि शोषयाणि । पर्वतमप्युत्पाटयानि । सत्पुरुषः पृथ्वीमपि भ्रमितुं नतु क्लेशमाप्नोति। दिनं प्रति ग्रन्थसहस्रं लिखानि। मूर्दा भिन्दानि गिरिम्। पादप्रहारेण भूमिं विदा- रयाणि । बाहुभ्यामब्धि तराणि ॥२६॥ “भृशाभीक्ष्ण्ये हिस्खौ यथाविधि तध्वमौ च तयुष्मदि।५।४।४२॥भृशत्वे आभीक्ष्ण्ये च सर्वकाले धातोःसर्वविभक्तिसर्ववचनवि- षये पञ्चम्या हिवौ भवतः यथाविधि धातोः सम्बन्धे। यत एव धातोर्यस्मिन्नेव कारके हिखौ विधीयते तस्यैव धातोस्तत्कारकविशिष्टस्यैव सम्बन्धेऽनुप्रयोगे सति । तथा तध्वमा। तयोस्तध्वमोः सम्बन्धी बहुत्वविशिष्टो युष्मद्, तस्मिन्नभिधेये भवतः। चकारात् हिस्खौ च यथाविधि धातोः सम्बन्धे । लुनीहि लुनीहीत्येवायं लुना- ति । भृशं पुनः पुनर्वा लुनातीत्यर्थः। लुनीहि लुनीहीत्येवेमौ लुनीतः। लुनीही- लुनीहीत्येवेमे लुनन्ति। एवं त्वं लुनासीत्यादीनि सर्वविभक्तीनां सर्वाणि ९० परस्मै- पदवचनानि। लुनीष्वलनीष्वेत्येवायं लुनीते। इमौ लुनाते।इमे लुनते । इत्यादी- न्यात्मनेपदवचनानि च ९. अनुप्रयोज्यानि । अनुप्रयोगात्कालवचनभेदोऽभिव्य- ज्यते। एवं अधीष्वाधीष्वेत्येवायमधीते । इमावधीयाते। इमेऽधीयते इत्यादि यावत्। अधीष्वाधीष्वेत्येवायमध्येष्यामहे । एवं देहिदेहीति ददामि । देहिदेहीत्यदात् । आदत्स्वादत्स्वेत्येवाददीध्वम् । भृशमभीक्ष्णं वा गृह्णीध्वमित्यर्थः॥ इत्यादि ॥ एवं भावकर्मणोरपि । शय्यख २ इत्येव शय्यते अशायि शायिष्यते भवता । लूयस्खलूयवेत्येव लूयते अलावि लविष्यते केदारः । अधीयस्व २ इत्यधी- यते अध्यगायि अध्यगायिष्यते शास्त्रं भवता । हन्यख २ इत्येव रिपुर्जने । अत्यर्थमभीक्ष्णं वा हत इत्यर्थः ॥ तध्वमौ च तद्युष्मदि । लुनीत २ इत्येव यूयं लुनीथ । अधीध्वमधीध्वमित्येव यूयमधीध्वे । हिखौ च । लुनीहि लुनीहीति यूयं लुनीथ । अधीष्वाधीष्वेत्येव यूयमधीध्वे । एवं तिष्ठत २ इति स्थेयास्त ।

विभक्तिप्रयोगविभागः । अधीध्वमधीध्वमित्येव यूयमध्ये, अध्यगीढं वा । एवं युष्मदर्थे बहुवेऽन्यसर्व- विभक्तिष्वप्युदाहार्यम् ॥ लुनीहि लुनीहीत्यादौ च भृशाभीक्ष्ण्ये द्विवचनम् । इतिशब्दश्च सम्बन्धोपादानार्थोऽन्यथाऽसत्त्वभूतार्थवाचिनोराख्यातयोः परस्परेण सम्बन्धो नावगम्यते॥२७॥ "प्रचये नवा सामान्यार्थस्य"|५|४|४३॥प्रचयः समुच्चयः, स्वतः साधनभेदेन वा भिद्यमानस्य एकत्रानेकस्य धात्वर्थस्याध्यावाप इत्यर्थः, तस्मिन् गम्ये सामान्यार्थस्य धातोः सम्बन्धे सति हिखौ तध्वमौ च तद्युष्मदि वा भवतः । ब्रीहीन वप, लुनीहि, पुनीहीत्येव यतते, चेष्टते, समीहते, यत्यते, चेष्ट्यते, समीह्यते । पक्षे, व्रीहीन वपति, लुनाति, पुनातीत्येव यतते, यत्यते । देवदत्तोऽद्धि, गुरुदत्तोऽडि, जिनदत्तोऽडीत्येव भुञ्जते, भुज्यत । पक्ष, देवदत्तो त्ति, गुरुदत्तोऽत्ति, जिनदत्तोऽत्तीत्येव भुञ्जते, भुज्यते। सूत्रमधीप्व, नियुक्तिमधीष्व, भाष्यमधीप्वेत्येवाऽधीते, पठति, अधीयते, पठ्यते । पक्षे, सूत्रमधीते, नियुक्तिम- धीते, भाष्यमधीते इत्येवाऽधीते, पठति, अधीयते, पठ्यते । तध्वमौ च तद्युष्मदि, त, व्रीहीन् वपत, लुनीत, पुनीतेत्येव यतध्वे, चेप्टध्वे। हि, व्रीहीन वप, लुनीहि, पुनीहीत्येव यतध्वे, चेष्टध्ये। पक्षे, व्रीहीन वप, लुनीथ, पुनीथेत्येव यतध्वे, चष्टध्वे । ध्वं, सूत्रमधीध्वं, नियुक्तिमधीध्वं, भाष्यमधीध्वमित्येवाध्वीध्वे, पठथ । ख, सूत्रमधीप्व, नियुक्तिमध्वीप्व, भाष्यमधीप्वेत्येवाधीध्वे, पठथ । पक्षे. सूत्रमधीध्वे, नियुक्तिमधीध्वे, भाष्यमधीध्वे इत्येवाधीवे. पठथ । पक्षे, सूत्रमधीध्वे, नियुक्तिमधीध्ये, भाष्यमधीध्वे इत्येवाधीध्वे, पठथ । एवमन्य- विभक्तिष्वपि ॥ २८ ॥ इति पञ्चमी व्याप्तिः ॥३॥ अथ शस्तनी॥ “अनद्यतने ह्यस्तनी"||२७॥ आन्याय्यादुत्थानात् आन्या- य्याच संवेशनादहरुभयतः सार्द्धरात्रं वाऽद्यतनकालः, तम्मिन्नसति भूतेऽर्थ ह्यस्त- नी।अकरोत् , अहरत्। अद्य तु, अकार्षीत् ॥२९॥“ख्याते दृश्ये"।५।२।८। लोकविज्ञाते दृश्ये प्रयोक्तुः शक्यदर्शने भूते ऽनद्यतनेऽर्थे ह्यस्तनी । परोक्षापवादः। अरुणत्सि- द्वराजोऽवन्तीम्।अख्याते तु, परोक्षा। चकार कटं बटुः। अदृश्येऽपि सा। जघान कंस किल वासुदेवः। अद्यतने तु, उदगादद्यादित्यः॥३०॥ "हशश्वद्युगान्तःप्रच्छये ह्यस्त- नीच"।५।२।१३॥ पञ्चवर्ष युगम् , तस्यान्तर्मध्यं तत्र पृच्छयते यःस युगान्तः प्रच्छ्यः,

१०
क्रियारत्नसमुच्चयः।
हशश्वद्योगे युगान्तप्रष्टव्ये च भूतानद्यतने परोक्षेऽर्थे ह्यस्तनी परोक्षा च । इतिह
अकरोत् । इतिहशब्दो निपातसमुदायः प्रवादपारंपर्ये वर्त्तते। यहा। इति एतत्,
ह इति वाक्यालङ्कारे । शश्वदकरोत, चकार वा। प्रच्छये, किमगच्छस्त्वं मथुराम।
किं जगन्थ त्वं मथुराम्॥३१॥"अविवक्षिते" ।५।२।१४॥ भूताऽनद्यतने परोक्षे परो-
क्षत्वेनाविवक्षिते ह्यस्तनी । अभवत्सगरो राजा । अहन् कंसं वासुदेवः ॥३२॥
इति ह्यस्तनी व्यातिः॥ ४ ॥
अथाद्यतनी ॥ “अद्यतनी"।५।२।४॥भूतेऽर्थेऽद्यतनी। अकार्षीत् ऋषभो वार्षिक
तपः। अद्य व्यहार्षीत् ॥३३॥ “विशेषाविवक्षाव्यामिश्रे”।५।२।५॥ अनद्यतनादिवि-
शेषस्याविवक्षायां व्यामिश्रणे च सति भूतेऽर्थे ऽद्यतनी। अगमाम घोषान् । अपाम
पयः ।अजैषीजैत्रोऽयं हूणान्। रामो वनमगमत् । सतोऽप्यत्र विशेषस्याविवक्षा ।
व्यामिश्रे, अद्य ह्यो वाऽभुक्ष्महि। ततःप्रभृत्यद्य यावद्वयं सुखमेवासिष्महि । विशेष-
विवक्षायां तु, अगच्छाम घोषान् । अपिबाम पयः। अजयजैत्रो हूणान् । रामो
वनं जगाम । ह्यस्तन्यादिविषयेऽप्यद्यतन्यर्थ वचनम् ॥३४॥ “रात्रौ वसोऽन्त्यया-
मास्वप्तयद्य" ५।२।६॥ रात्रौ भूतेऽर्थे वस्धातो_स्तन्यपवादोऽद्यतनी, तत्क-
" चेद्रात्रेरन्त्ययामे स्वप्ता न भवति । रात्रावन्त्ययामं यावत् स्वप्ता न भवतीति तु
पाणिनीयाः। अद्य अद्यतने चेत्प्रयोगो भवति । रात्रेरन्त्ययामे कंचित्पथिकं कश्चि-
दाह, क भवानुपितः। स आहामुत्रावात्समिति । अन्त्ययामे तु मुहूर्तमपि स्वापे
ह्यस्तन्येव । अमुत्रावसमिति ॥ ३५॥ “माङयद्यतनी” ।५।४।३९॥ माङयुपपदेऽद्य-
तनी। सर्वविभक्त्यपवादः। मा कार्षीदधर्मम् । मा हार्षीत् परस्वम् । मा दः।मा गमः।
अहं मा स्थाम् । कथं मा कुरु, मा कुरुष्व, मा करिष्यास, मा भवतु, तस्य पापं
मा भूयात् , मा भविष्यतीति असाधव एवैते । केचिदाहुः । अङितो माशब्दस्यैते
प्रयोगाः। स्वमते ऽप्यङिन्माशब्दस्य प्रयोगोऽस्ति किंतु क्रियायोगे तस्य प्रयोगो
नेष्यते अतः केचिदाहुरित्युक्तम् ॥३६॥ “सस्मे ह्यस्तनी च” ।५।४।४०॥ स्मसहिते
माङयुपपदे यस्तनी। चकारादद्यतनी च । मास्म करोत् । अत्र माशब्देन निषेध
उच्यते स्मशब्देन च स एव द्योत्यते । एवं मास्म कार्षीत। व्यवधानेऽपि।मा चैत्र स्म
हरः परद्रव्यम् ।मा चैत्र स्म हार्षीः परद्रव्यम्॥३७॥"तौ माङयाक्रोशेषु"।५।२॥२१॥

, विभक्तिप्रयोगविभागः । माङ्योगे आक्रोशे तौ शत्रानशौ सति स्याताम, बहुवचनादसत्यपि। तेन ये केचि- सत्यसति वा आक्रोशास्तेषु शत्रानशौ भवतः। मा कुर्वन् , मा कुर्वाणः, मा ददानः, मा पचन वृषलो ज्ञास्यति । मा पचमानोऽसौ मर्तुकामः॥ तथा च माघः॥ मा जी- वन्यः परावज्ञा दुःखदग्धोऽपि जीवति । शत्रानशोरनुवृत्तावपि तौ ग्रहणमव- धारणार्थम् । तेनाक्रोशे माङ्योगे ऽद्यतनी न भवतीत्यपि कश्चित् ॥ ३८ ॥ “सम्भावने सिद्धवत्" ।५।४।४॥ हेतोः शक्तिः श्रद्धानं सम्भावनं, तस्मिन् विषये ऽसिद्धेऽपि वस्तुनि सिद्धवत्प्रत्यया भवन्ति । समये चेत्प्रयत्नोऽभूदुदभूवन् विभूतयः । इषे चेन्माधवोऽवर्षीत् समपत्स्यन्त शालयः ॥ १ ॥ जातश्चायं मुखेन्दुश्चेद् भ्रकुटिप्रणयी ततः । गतं च वसुदेवस्य कुलं नामावशेषताम् ॥ २ ॥ ३९ ॥ इत्यद्यतनी व्याप्तिः ॥५॥ अथ परोक्षा । “परोक्षे”।५।२।१२ ॥ भूतानद्यतने परोक्षेऽर्थे परोक्षा ॥ जघान कंसं कृष्णः।धर्म दिदेश तीर्थकरः । एवं च परोक्षानद्यतने विवक्षावशात् हस्तन्य- द्यतनीपरोक्षास्तिस्रो विभक्तयः सिद्धाः । परोक्षत्वेनानद्यतनत्वेन चाविवक्षिते “विशेषाविवक्ष”-इत्यनेनाद्यतनी । परोक्षवेन त्वविवक्षिते “अविवक्षिते” इत्यनेन ह्यस्तनी। उभयसद्भावविवक्षायां तु “परोक्षे” इत्यनेन परोक्षा॥ तथा च रामायणे।। न्यक्षिपञ्चाङ्गदं तदा। अन्वनैषीत्ततो वाली। सुग्रीवं प्रोचे सद्भावमागतः॥ महाभारते तु॥ सैन्यं समस्तं सोऽयुयुत्सयत् । राक्षसेन्द्रस्ततोऽभैषीत् । स्वयं युयुत्सयांचके। ॥ तथा ॥ अभूवन् तापसाः केचित् पाण्डुपत्रफलाशिनः । पारिव्रज्यं तदाऽऽदत्त मरीचिश्च तृषार्दितः ॥१॥४०॥ कृतास्मरणातिनिह्नवे परोक्षा"।५।२।११॥ कृतस्यापि व्यापारस्या- स्मरणेऽत्यन्तनिह्नवे वा भूते ऽनद्यतनेऽर्थे परोक्षा । अपरोक्षकालार्थ आरम्भः । सुप्तोऽहं किल विललाप । चिन्तयन् किलाहं शिरः कम्पयाम्बभूव । अति- १२ क्रियारत्नसमुच्चयः। निह्नवे, कश्चिदाह त्वया कलिङ्गेषु ब्राह्मणो हतः । न कलिङ्गेषु ब्राह्मणमह- महनम् ॥ ४१ ॥ इति परोक्षा व्याप्तिः ॥ ६ ॥ अथाशीः ॥ "आशिष्याशीःपञ्चम्यौ"।५।४।३८॥ शिष्योऽयं सर्व सिद्धान्तं पठ्यात् , शत्रूणां क्षयं क्रियात्। पुत्रोऽयं विद्यानां पारं यायात्। एते दुष्टा मृषीरन् । लक्ष्मीवानहं भूयासम् ॥ उक्तं च॥ श्रुतस्य यायादयमन्तमर्भकस्तथा परेषां युधि- चेति पार्थिवः। तथा च ॥ क्रियादघानां मघवा विघातम् । पञ्चमी॥ एष नन्दतात्। एतौ नन्दताम् ॥ एते नन्दन्तु । स श्रियेऽस्तु ॥ ४२ ॥ इत्याशीर्व्याप्तिः ॥ ७ ॥ अथ श्वस्तनी ॥ "अनद्यतने श्वस्तनी"।५।३।५॥ न विद्यतेऽद्यतनो यत्र तस्मिन् वय॑ति श्वस्तनी। कर्त्ता, श्वःकर्ता। अनद्यतनइति बहुव्रीहितो व्यामिश्रे माभूत्। अद्य श्वो वागमिष्यति । कथं श्वो गमिष्यति। प्राग्धात्वर्थे भविष्यन्ती पश्चात् श्वः- शब्देन योगः ॥४३॥ “परिदेवने" ।५।३।६॥ परिदेवनमनुशोचनम् , तस्मिन् गम्ये वर्त्यति श्वस्तनी। अननद्यतनार्थ आरम्भः। इयं तु कदा गन्ता, यैवं पादौ निद- धाति।अयं तु कदाऽध्येता, य एवमनभियुक्तः। विशेषविधानात् कदाकर्हियोगलक्ष- णा विभाषा बाध्यते॥४४॥"नानद्यतनःप्रबन्धासत्त्योः”।५।४।५॥ प्रबन्धः सातत्यं, आसत्तिः सामीप्यं कालतः, धात्वर्थस्य प्रबन्धे आसत्तौ च गम्यायां ना- नद्यतनः । न अद्यतनोऽनद्यतनः तद्विहितः प्रत्ययो न स्यादित्यर्थः ।भूतानद्यतने ह्यस्तनी, भविष्यदनद्यतने च श्वस्तनी, तयोः प्रतिषेधः । यावज्जीवं भृशमन्नम- दात्, ददौ, दत्तवान् । यावज्जीवं भृशमन्नं दास्यति, यावज्जीवं युक्तो ऽध्याप- यिष्यति । आसत्तौ, येयं पौर्णमास्यतिक्रान्ता एतस्यां जिनमहः प्रावतिष्ट, प्रववृते, प्रवृत्तः। येयं पौर्णमास्यागामिनी अस्यां जिनमहः प्रवर्तिष्यते । द्वौ प्रति- षेधौ यथाप्राप्तस्याभ्यनुज्ञानाय ॥४५॥ “एष्यत्यवधौ देशस्याऽर्वाग्भागे" ५॥४॥६॥ देशस्यायधावुपपदे देशस्यैवार्वाग्भागे एप्यति नानद्यतनः । एष्यतीति वचनात् श्वस्तन्या एव प्रतिषेधः । योऽयमध्वा गन्तव्य आशत्रुञ्जयात् तस्य यदवरं वलभ्या- स्तत्र द्विभॊक्ष्यामहे॥४६॥ “कालस्यानहोरात्राणाम्" ।५।४।७॥ कालस्यावधावुपपदे कालस्यैवार्वाग्भागे एप्यत्यर्थे ऽनद्यतनो न स्यात्, न चेत्सोऽर्वाग्भागोऽहोरात्राणां सम्बन्धी भवति । यत्राहःशब्दो रात्रिशब्दो वा प्रयुज्यते तत्राहोरात्रत्वम् । योऽ- विभक्तिप्रयोगविभागः । १३ यमागामी संवत्सरस्तस्य यदवरमाग्रहायण्यास्तत्र जिनपूजां करिष्यामः । अहो. रात्रप्रयोगे तु, योऽयं त्रिंशद्रात्रआगामी तस्य योऽवरः पञ्चदशरात्रस्तत्र युक्ता अध्येतास्महे ॥४७॥ “परे वा" ।५।१८॥ कालस्यावधौ कालस्यैव परस्मिन् भागे एष्यति नानद्यतनः स्यात् । आगामिनः संवत्सरस्य आग्रहायण्याः परस्ताविःसूत्रमध्येष्यामहे, अध्येतास्महे वा। कालादन्यस्य परभागे तु, आश- त्रुञ्जयाद्गन्तव्येऽस्मिन्नध्वनि वलभ्याः परस्ताद्विरोदनं भोक्तास्महे ॥ ४८ ॥ इति श्वस्तनी व्याप्तिः ॥ ८ ॥ अथ भविष्यन्ती ॥'भविष्यन्ती”।९।३।४॥ वर्त्यति भविष्यन्ती । गमिष्यति, स भोक्ष्यते ॥४९॥ क्षिप्राशंसार्थयोर्भविष्यन्ती सप्तमीस्थान भाणि ॥ अथ भूते भवि- प्यन्ती । “अयदि स्मृत्यर्थे भविष्यन्ती"।५।२।९॥ स्मृत्यर्थे धातोवुपपदे भूतेऽर्थे भवि- ध्यन्ती, यच्छब्दश्चेत्क्रियाविशेषणं न प्रयुज्यते । यस्मादर्थे तु भविष्यन्त्येव। स्मरसि भो महापुरुष लघुत्वे बहुमूल्यानि वासांसि परिधास्यामः, अश्वानारोक्ष्यामः, मिष्टान्नं भोजनं भोक्ष्यामहे च। अभिजानासि देवदत्त कश्मीरेषु वत्स्यामः। स्मरासि साधो स्वर्गे स्थास्यामः। एवं बुध्यसे, चेतयसे, अध्येषि, अवगच्छसि चैत्र कलिङ्गेषु गमिष्यामः।। ॥ तथा च माघः ॥ स्मरत्यदो दाशरथिर्भवन् भवानमुं वनान्ताहनिताऽपहारिणम् । पयोधिमाबद्दचलज्जलाबिलं विलय लङ्कां निकषा हनिष्यति ॥१॥ अत्र जघानेत्यस्य स्थाने हनिष्यतीत्युक्तम् ॥ यच्छब्दप्रयोगे तु ह्यस्तनी । अभिजानासि मित्र यत्कलिङ्गेष्ववसाम । यहसनं तत्स्मरसी- त्यर्थः ॥ ५० ॥ “ वा कांक्षायाम्” । ५ । २ । १० ॥ स्मृत्यर्थे धातावुपपदे यद्ययदि वा प्रयुज्यमाने प्रयोक्तः क्रियान्तराकांक्षायां भूतानद्यतने वा भविष्यन्ती, पक्षे ह्यस्तनी ॥ स्मरसि मित्र काश्मीरेषु वत्स्यामस्तत्रौदनं भोक्ष्यामहे, पास्यामः पयांसि च । स्मरसि मित्र कश्मीरेष्वऽवसाम, तत्रौदनमभुंज्महि । स्मरसि मित्र यत्कश्मीरेषु वत्स्यामो यत् तत्रौदनं भोक्ष्यामहे । स्मरसि यत्कश्मीरे- प्ववसाम। यत्तत्रौदनमभुज्महि । अत्र वासो लक्षणं, भोजनं पानं च लक्ष्यमिति लक्ष्यलक्षणयोः सम्बन्धे प्रयोक्तुराकांक्षा. भवति ॥५१॥ "शेषे भविष्यन्त्ययदौ”।

क्रियारत्नसमुच्चयः । ५।४।२०॥ शेषे यच्चयत्राभ्यामन्यस्मिन्नुपपदे चित्रे गम्ये कालस्यानिर्देशात्रिषु का- लेषु भविष्यन्ती, अयदौ, यदिश्चेन्न प्रयुज्यते । सर्वविभक्त्यपवादः। चित्रमा- श्वर्यमद्भुतम्, अन्धो नाम पर्वतमारोक्ष्यति, बधिरो नाम व्याकरणं श्रोष्यति, मूको नाम धर्म कथयिष्यति । यदि प्रयोगे तु । आश्चर्य यदि स भुञ्जीत। चित्रं यदि सोऽधी यीत । अत्र श्रद्धाप्यस्ति न केवलं यदिशब्दयोग इति ॥“जातुयद्यदा"-इत्यनेन सप्तमी ॥ ५२ ॥ “वा हेतुसिद्धौ क्तः”।५।३।२॥ वय॑त्यर्थे धात्वर्थस्य हेतुः कारणं, तस्य सिद्धौ सत्यां वाक्तः। किं ब्रवीषि वृष्टो देवः, सम्पन्नास्तर्हि शालयः, संपत्स्यन्ते वा । प्राप्ता नौ,स्तीर्णा तर्हि नदी, तरिष्यते वा ॥५३॥ “किंकिलास्त्यर्थयोर्भवि- प्यन्ती"।५।४।१६॥किंकिलेति शब्देऽस्त्यर्थे चोपपदेऽश्रद्धामर्षयोर्गम्ययोभविष्यन्ती। सप्तम्यपवादः। न श्रद्दधे न मर्षयामि, किं किल नाम तत्रभवान् परदारानुपकरि- प्यते गन्धन"-इति सूत्रेण साहसे आत्मनेपदम्। अस्त्यर्थाः,अस्तिभवतिविद्यतयः। न श्रद्दधे न मर्षयामि, अस्ति नाम, भवति नाम, विद्यते नाम, तत्रभवान् परदारा- नुपकरिष्यते ॥ ५४॥ “धातोः सम्बन्धे प्रत्ययाः”।५। ४ । ४१॥ धातुशब्देन धात्वर्थउच्यते, धात्वर्थानां सम्बन्धे विशेषणविशेष्यभावे सति अयथाकालमपि कृत्तद्धितादयः प्रत्ययाः साधवो भवन्ति । तत्र स्याद्यन्तो विशेष्यः, कृत्तद्धिता- द्यन्तो विशेषणम्। विश्वदृश्वाऽस्य पुत्रो भविता। कृतः कटः श्वो भविता। भावि. कृत्यमासीत्। विश्वदृश्वेति भूतकालः प्रत्ययो भवितेति भविष्यत्कालेन प्रत्ययेना- भिसंबध्यमानः साधुर्भवति । एवं कृतः कटः श्वो भवितेति । भाविकृत्यमासी दित्यत्र तु भावीति भविष्यत्कालः प्रत्यय आसीदिति भूतकालेन प्रत्ययेन संबन्ध्य- मानः साधुः। एवं तद्धिता अपि । गोमानासीत् । धनवान् भविता॥अस्तिविवक्षायां हि मतुरुक्तः स कालान्तरे न स्यादिति । तथा त्याद्यन्तमपि यदा परं त्याद्यन्तं प्रतिविशेषणत्वेनोपादीयते तदा तस्यापि समुदायवाक्यार्थापेक्षया कालान्यत्वं भवत्येव ॥ साटोपमुमिनिशं नदन्तो यैः प्लावयिष्यन्ति समं ततोऽमी । तान्येकदेशान्निभृतं पयोधेः सो ऽम्भांसि मेघान् पिबतो ददर्श ॥१॥ अत्र प्लावयिष्यन्तीति भविष्यदर्थस्य विशेषणस्य ददर्शति विशेष्येण सह

विभक्तिप्रयोगविभागः ।
संबन्धाद्भूतार्थानुगमः कवेरभिप्रायः । तेन यैः प्लावितवन्त इति गम्यमानोऽर्थः ।
कृदन्तस्य तु विशेष्यस्यान्यकालभवं त्याद्यन्तं विशेषणं दुष्टमेव ॥ यथा साटोप-
मित्यत्रैव ददर्शेति स्थाने दृष्टवानिति प्रयोगे प्लावयिष्यन्तीति दुष्टमेव । यतस्त्या-
धन्तं साध्यात् धात्वर्थाद्विधीयमानं प्रधानं। प्रधानं च कथमप्रधानस्य कृतोऽनुयायि
स्यात् ॥ ५५ ॥ इतिभविष्यन्ती व्याप्तिः ॥ ९॥
अथ भविष्यति कियातिपत्तिः। 'सप्तम्यर्थे क्रियातिपत्तौ क्रियातिपत्तिः”।५।
१९॥सप्तम्या अर्थो निमित्तं हेतुफलकथनादिका सामग्री। कुतश्चिद्वैगुण्यात् कियाया
अतिपतनमनभिनिवृत्तिः क्रियातिपत्तिः, तस्यां सत्यामप्यत्यर्थे धातोः सप्तम्यर्थे
क्रियातिपत्तिः ॥ दक्षिणेन चेदयास्यन्न शकटं पर्याभविष्यत् । यदि कमल-
कमाहास्यन्न शकटं पर्याभविष्यत् । अत्र दक्षिणगमनं कमलकाह्वानं च हेतुः ।
अपर्याभवनं फलम् । तयोः कुतभित्रमाणाहविष्यन्तीमनभिनिवृत्तिमवगम्यैवं
प्रयुक्ते । एवमभक्ष्यित् भवान् घृतेन यदि मत्समीपमागमिष्यत् । स यदि गुरूनु-
पासिष्यत् शास्त्रान्तमगमिष्यत् । अत्र “वर्त्यति हेतुफल” इत्यनेन सप्तम्यर्थः ।
५६॥ अथ भूते क्रियातिपत्तिः। “भूते"।५।४।१०॥ भूतेऽर्थे क्रियातिपत्तौ सत्यां सप्त-
म्यर्थे क्रियातिपत्तिः । सप्तम्यर्थश्च “विधिनिमन्त्रण"-इत्यादिना प्रागेव भणितो-
ऽस्ति। यद्ययं दानमदास्यत् ततो विश्वेऽपि यशः प्रासरिष्यत् । यदि ग्राममग-
मिष्यत् तदा चौरा द्रव्यं नाहरिष्यन् । दृष्टो मया भवतः पुत्रोऽन्नार्थी चक्रम्यमाणः
अपरश्चातिथ्यर्थी यदि स तेन दृष्टोऽभविष्यत् । उताभोक्ष्यत, अप्यभोक्ष्यत॥ ननु
दृष्टोऽन्येन पथा गत इति न भुक्तवान् । अत्र उतापिशब्दौ बाढाएँ । ननु
पुष्पं प्रवालोपिहितं यदि स्यान् मुक्ताफलं वा स्फुटविद्रुमस्थम् ।
ततोऽनुकुर्याहिशदस्य तस्य ताम्रौष्ठपर्यस्तरुचः स्मितस्य ॥ १ ॥
तथा। लज्जातिरश्वां यदि चेतसि स्यादसंशयं पर्वतराजपुत्र्याः ॥ इत्यत्र कथंन
क्रियातिपत्तिः।सत्यं, क्रियातिपत्तेर्भवने भूतकालो निरीक्ष्यते अत्र तु श्रीकालिदास-
कविना वर्तमानो विवक्षितः । प्राक्तनसूत्रे भविष्यत्काले इह च भूतकाले सप्त-
म्यर्थे क्रियातिपत्तिराभ्यधायि । वर्तमानकाले तु विवक्षिते क्रियातिपत्तिः क्वापि
नस्यादिति तात्पर्यम् ॥ ५७ ॥ इति कियातिपत्तिव्याप्तिः ॥ १० ॥

क्रियारत्नसमुच्चयः।
अथ बालानामवबोधाय प्राकृतवार्ताभिर्विभक्तिविभागो वर्ण्यते ॥ विभ-
क्ति १० ॥ काल ३ ॥ तत्र वर्तमानकालिविभक्ति ३, वर्तमाना, सप्तमी,
पञ्चमी । एउ करइ, लिअइ, दिअइ, जायइ, आवइ, जागइ, सुअइ,
ए घणा करई, लिई । तूं कर, लि, दिौं। तुम्हे करउ, लिअउ, दिअउ । हूं
करउं, लिउं, दिउं । अम्हे करउं । इत्यर्थे कर्तरि वर्तमाना । एष करोति ।
लाति । ददाति । याति । आपतति । जागार्ति । स्वपिति इत्यादि । तथा देव-
दत्तई तई मई हुईअइ, सुईअइ, बइसीअइ इत्यादि । अकर्मकधातूक्तौ भावे
अन्यद यमात्मनेपदैकवचनम् । देवदत्तेन त्वया मया वा भूयते । शय्यते
आस्यते इत्यादि । कीजइ, लीजइ, दीजइ । कीजई, लीजई, दीजई ।
तूं कजिं, तुम्हे कीजउ, हूं कीजउं इत्यर्थे कणि वर्तमाना । कटः
क्रियते, लायते । कटाः क्रियन्ते । त्वं क्रियसे । यूयं क्रियध्वे । अहं
क्रिये इत्यादि ॥ तथा स्मयोगेऽतीते वर्तमाना ॥ सेहि आवश्यकु पढिउं । शैक्ष
आवश्यकं पठतिस्म । पुरायावतोर्यो भविष्यति वर्तमानो । देवदत्त बहिलउं
जिमि । पाछइ गाम जाइसि। देवदत्त क्षिप्रं मुंश्व, पुरा ग्रामं गच्छसि । कदायं
राजभवनं प्रयास्यति, यावन्मित्र भोज्यं भवति। तातो गच्छति । अयं कियन्तं
कालमध्येष्यते, यावत्पाणिग्रहणं संपद्यते ॥१॥ वर्तमानकाल एव "विधिनिम-
न्त्रणामन्त्रणाभीष्टसम्प्रश्नप्रार्थने।५।४।२८॥इति वचनात्करेवउं, लेवउं, देवउं तथा
करिजो, लेजो, देजो। तूं करिजे, लेजे, देजे। तुम्हे करिजो। हूं अम्हे करिजउं, लेजउं,
देजउं। तथा करत, लेअत, देअत इत्यर्थे विध्यादिप्रधानायां उक्तौ कर्तरि सप्तमी।
श्रावकइं विनउ जिनरहई करिवउ । जन्मनउं फल लेजउं । देजउं । दानु-
देवउं । श्राद्धो विनयं जिनस्य कुर्यात् कुर्वीत वा । जन्मनः फलं गृह्णीयात्
गृह्णीत वा । दद्यात् ददीत वा दानम् ॥ यदुक्तं योगशास्त्रे। ब्राहये मुहूर्त उत्तिष्ठेत् ॥
नाश्नीयात्पिशितं सुधीः ॥ तथा अम्हे भीख जिमवी । जूनउं वस्त्र पहिरवउं ।
इत्याद्युक्तौ।
भुञ्जीमहि वयं भैक्षं जीर्ण वासो वसीमहि ।
शयीमहि महीपीठे कुर्वीमहि किमीश्वरैः॥१॥

विभक्तिप्रयोगविभागः । गुरि अणुजाणिउ चेल उ व्याकरण पढत। गुरुभिरनुज्ञातः क्षुल्लकोऽपि व्याकरणमधीयीत। त्वमपि सिद्धान्तं वाचयः । अहमपि अनुयोगं गृह्णीय। एवं लघुरपि वाचनां दद्यात् । सोऽपि तपः कुर्वीत । तूं करिजे, त्वं कुर्याः । हूं करि- जउं, अहं कुर्याम् ॥ यदुक्तं ॥ तेन स्यां नाथवांस्तस्मै स्पृहयेयं समाहितः, इत्यादि। कर्मणि, तीण कीजइत, तेन क्रियेत । एवं त्वया क्रियेत, मया कि- येत इत्यादि। भावे, हुईअत, तेन त्वया मया वा भूयेत॥२॥ करउ, लिउ, दिउ, हुउ । तूं करि, लइ, दइ, जा, आवि, पढि, गुणि इत्यर्थे अनुमतौ कर्तरि पञ्चमी। करो- तु, कुरुतां वा । लातु, ददातु, भवतु । त्वं कुरु इत्यादि । कर्मणि तु, कीजउ, लीजउ ॥ क्रियतां, लायतां । तथा आशिषि पञ्चमी । एउ राज्य करउ। अयं राज्यं करोतु। एहना वइरी मरउ। अस्य वैरिणो म्रियन्ताम् । दुःखानि क्षयं यान्तु। जिनः श्रियेऽ स्तु ॥ ३॥ अतीतकालिविभक्तिः ४ । ह्यस्तनी, अद्यतनी, परोक्षा, क्रियातिपत्तिः ॥ अतीतस्त्रिविधः ॥ आजनउ अतीतअद्यतनः १। कालनउ ह्यस्तनः २ । तेह पहिल उ तत्प्राक्तनः । तत्राद्यतने, आजु कीधउं, आजुलीधउं, आजु दीधउं, इत्यर्थे अद्यतनी, अद्याकार्षीत्, अलासीत्, अदासीत्। ह्यस्तने, कालि कीधर, कालि लीधउं, इत्यर्थे ह्यस्तनी, ह्योऽकरोत् , अलात्। तत्प्राक्तनो द्विधा। प्रत्यक्षः१, परोक्षश्च २। प्रत्यक्षे ह्यस्तनी। अयमकरोत्। परोक्षे सामान्यतः परोक्षा। दिदेश धर्म जिनः। अहं चकर बाल्ये क्रीडाम् । परोक्षेऽपि लोकप्रसिद्धे द्रष्टुं शक्ये ऽर्थे ह्यस्तन्येव । अभनग् मुद्गलपतिर्योगिनीपुरम् । अरुणसिद्धराजोऽवन्तीम्॥ अथ- वा सामान्यतोऽतीतकाले, आगइ करतउ, आगइ लेतउ, आगइ करता, आगइ लेता, इत्यर्थे कर्तरि । आगइ कीधउं, आगइ लीधउं, आगइ दीधउं, इत्यर्थे कर्मणि च ह्यस्तनी, अद्यतनी, परोक्षास्तिस्रोऽपि भवन्ति क्तवत्वादयश्च ॥ तथा हि अतीते कर्तरि उक्तौ । लहुड पणि दिहाडी प्रति हूँ बि करस घी जिमतु। एउ पाँच जो. अण भूमि चालतउ। तूं दिहाडी प्रति ५० श्लोकव्याख्यानि भणतउ। लघुत्वे दिनं प्रति अहं घृतस्य द्वौ कर्षों अभुञ्जि, अभुक्षि, बुभुजे, भुक्तवान् , भुक्तो वा । अयं पञ्च योजनानि भूमिमचलत् , अचालीत, चचाल, चलितवान् वा । वं दिनम्प्रति ५० श्लोकानभणः, अभाणीः, बभणिथ, भणितवान् वा । आगई क्रियारत्नसमुच्चयः। ए चेला दिहाडी प्रति बि सहस्र सज्झाय गुणता । तुम्हे त्रिन्नि सइं ग्रन्थ लि- खता। अह्मे सउ श्लोक पढता । पूर्वमेते क्षुल्ला दिन प्रति स्वाध्यायस्य द्वे सहस्रे अगुणयन, अजुगुणन्, गुणयांबभूवुः, गुणितवन्तो वा । यूयं ग्रन्थस्य त्रीणि शतानि अलिखत, अलेखिष्ट, लिलिख, लिखितवन्तो वा । वयं शतं श्लोकान- पठाम, अपठिष्म, पेठिम, पठितवन्तो वा । एउ गामि गिउ । एष ग्राममग- च्छत् , अगमत् , जगाम, गतवान् वा। कर्मणि उक्तौ तु, ईणइं धर्म कीधउं। अनेन धर्मोऽक्रियत, अकारि, चक्रे, कृतो वा । ईणइं पुरुषई दस ग्राम पाम्यां । अनेन पुरुषेण दश ग्रामाः प्राप्यन्त, प्राप्सत,प्रापिरे, प्राप्ता वा। ईणइं वस्त्र वीक्यां । अनेन वस्त्राणि व्यकीयन्त, व्यक्रेपत, विचिक्रियरे वा । एवमन्यत्रापि ज्ञेयम् । तथा म्मरणार्थे धातावुपपदेऽतीतेऽपि भविष्यन्ती। स्मर हो सङ्घ साथइ श्रीशत्रुजइ श्रीगुरु चालिआ। स्मरसि भोः संघेन सह श्रीशत्रुञ्जये श्रीगुरवो विहरिष्यन्ते । जाण हो मित्र- अहे दिहाडे आपणि जलकेलि करता । स्मरसि भो मित्र एषु वासरेषु वयं जलक्रीडां विधास्यामः । जाण हो आपणि देवपणइ तीणइ विमानि वसता । चेतयसे भो वयं दवत्वे तस्मिन् विमाने वत्स्यामः॥ तथा मकरे, मकरिजे, मकरिसि, मदिइ, मदेजे, मदसि । मजा मरहि जिउं । इत्यर्थे माङयोगेऽद्यतनी । मा कार्षीः । मा दाः । मा गमः।मा स्थामहं । केचित्तु अङिन्माशब्दस्य योगे पञ्चम्याद्यपीच्छन्ति। मा कुरु, मा करिष्यसि, मा कुरुष्वाऽत्र सन्देहमित्यादि ॥ आक्षेपपूर्वमुक्तौ ॥ आक्रोशे गम्ये म कीधु, म लीधु, म दीधु, म जईउ, रखेजीवतउ, रखेजातउ, रखेकरतउ इत्यर्थे माङयोग शत्रानशौ । मा कुर्वन्, मा कुर्वाणः । मा ददत् , मा ददानः, इत्यादि ॥ रखे जीवतउ जे परावज्ञाइं छतीइं जीवइ । मा जीवन यः परावज्ञायामपि सत्यां जीवति ॥ जइ किमइ अमुकं करत, लिअत, दिअत । तउ अमुकं हुयत, इत्यर्थे ऽतीतकाले क्रियातिपतने क्रियातिपत्तिः । यद्यहमकरिष्यं ततः कार्यमभविष्यत् । चेद्ग्राममगमिष्यः तदा भव्यमभवि- प्यत् । यद्ययं दानमदास्यत्ततः सर्वैः प्रीतिरभविष्यदित्यादि ॥ ४ । ५। ६।७ ॥ भविष्यकालिविभक्तिः ३ । श्वस्तनी, भविष्यन्ती, आशीः ॥ भविष्यस्त्रिविधः ॥ आजनउ अद्यतनः१, कालनउ श्वस्तनः२, तेहपरहउ तत्परतस्तनश्च ३ । अद्यतने " भ्वादिगणः । भविष्यन्ती। अद्य सायं कार्य भविष्यति । श्वस्तने श्वस्तनी। श्वोभविता। तत्परत- स्तन तु करिसिइं, लेसिई, देसिइं। तूं करिसिइ, लेसिइ, देसिइ। तुम्हे करिसिउं । हूँ करिसु । अम्हे करिसिउं, इत्यर्थे श्वस्तनी, भविष्यन्ती वा। आश्विन्यां पौर्णमास्यां चन्द्रादमृतं स्रोता, स्रोप्यति वा। अथवा सामान्यतो भविष्यत्काले भविष्यन्ती। अयं ग्रामं गमिष्यति ॥ ८ ॥ ९॥ करिज्यउ, पढिज्यउ, मरिज्यउ, हुज्यउ इत्यर्थे, आशिषि आशी:, पुत्रोऽयं सङ्घपतीभूय तीर्थयात्रां क्रियात्, पूर्वाणि पठ्यात् , शर्मियात्, भूयाज्जिनः श्रेयसे ॥ १० ॥ इति तपागच्छेशश्रीदेवसुन्दरसूरिशिष्यश्रीगुणरत्नसूरिविरचिते क्रियारत्नसमुच्चये विभक्तिप्रयोगविभागः॥१॥ भ्वादिगणः। भू सत्तायाम्। भू इति निर्विभक्तिको निर्देशः सान्तरान्तशङ्कानिरासार्थः। एवं सर्वत्र। वर्णसमाम्नायक्रमेण स्वरान्तव्यञ्जनान्तधातूपदेशप्रतिज्ञानेऽपि प्रथममस्य पाठो वृद्धसमयानुवर्त्तनार्थ मङ्गलार्थ च । एवमदाद्यादिगणेष्वप्याद्यानां निर्देशे प्रयोजनमभ्यूह्यम् ॥ आदौ वर्तमाना ॥ शेषात्कर्तरि परस्मैपदे शवि गुणे च । भवति, भवतः, भवन्ति, भवसि, भवथः, भवथ, भवामि, भवावः, भवामः। “क्रियाव्यति. हारऽगति-"।३।३।२३ ॥ इत्यात्मनेपदे व्यतिभवते । व्यतिभवते । व्यतिभवन्ते ॥ अत्र " स्वरस्य परे-"।७।४।११०॥ इति प्राचः परस्मिन्नपि विधी कर्तव्ये "लुगस्य-"। २ । १ । ११३ ॥ इत्यल्लुकः स्थानित्वात् “अनतोऽन्त-"४।२।११४॥ इत्यन्न भवति । व्यतिभवसे, व्यतिभवथे, व्यतिभववे, व्यतिभवे, व्यतिभवावहे, व्यातिभवामहे । भावे औत्सर्गिकमेकवचनमेव । भूयते, व्यतिभूयते । कर्मणि तु मर्वाण्यपि । केवलस्य कर्माभावादनुपूर्वकोऽयं दर्यते ॥ अनुभूयते सुखम् , अनु- भूयत, अनुभू७ यन्ते, यसे, येथे, यध्वे, ये, याबहे, यामहे । अत्राऽनुभू इति पदं यन्ते इत्यादिषु सप्तसु स्थानेषु योज्यम् । कथम् । अनुभूयन्ते, अनुभूयसे, २० क्रियारत्नसमुच्चयः । अनुभूयेथे इत्यादि । एवमन्यत्रापि पूर्वखण्डं अङ्कतुल्यैरुत्तरखण्डैः संयोज्यम् ।। सप्तमी ॥ भवेत् , भवेतां, भवेयुः, भवः, भवेतं, भवेत, भवेयं, भवेव, भवेम। व्यतिभवेत, व्यतिभवे८ याता, रन्, थाः, याथां, ध्वं, य, वहि, महि । भावे, भूयेत, व्यतिभूयेत । कर्मणि, अनुभूयेत, अनुभूये ८ याता, रन, थाः, याथां, ध्वं, य, वहि, महि॥पञ्चमी ॥ भवतु, भवतात् , भवताम् , भवन्तु, भव, भवतात्, भवतं, भवत, भवानि, भवाव, भवाम । व्यतिभवताम् , व्यतिभवेतां, व्यतिभ ७ वन्तां, वस्व, वेथां, वध्वं, वै, वावहै, वामहै । भावे, भूयतां, व्यतिभूयतां । कर्मणि तु । अनुभूयताम्, अनुभूयेताम्, अनुभूयन्ताम्, अनुभू ६ यस्ख, येथां, यध्वं, ये, यावहै, यामहै ॥ ह्यस्तनी ॥ अभवत्, अभवताम्, अभवन्, अभवः, अभ- वतम्, अभवत, अभवं, अभवाव, अभवाम । व्यत्यभवत, व्यत्यभवेताम्, व्यत्य- भ७ वन्त, वथाः, वेथां, वध्वं, वे, वावहि, वामहि । भावे । अभूयत, व्यत्य- भूयत ॥ कर्मणि तु ॥ अन्वभूयत, अन्वभू ८ येताम्, यन्त, यथाः, येथां, यध्वं, ये, यावहि, यामहि ॥ ४ ॥ अद्यतनी॥ “पिबैति-"। ४ । ३ । ६६॥ इति सिचो- लुपि न चेटि “भवतेः सिज्लुपि" ।४।३।१२॥ इति न गुणे च । अभूत, अभू- ताम्, अभूवन् । अत्र “सिविदोऽभुव" । ४ । ३ । ९२ ॥ इति अनः पुसादेशाभावे उवि "भुवो व-"। ४ । २ । ४३ ॥ इत्युपान्त्ये ऊत् । अभूः, अभूतम्, अभूत, अभूवं, अभूव, अभूम। व्यत्यभविष्ट, व्यत्यभविषातां, व्यत्यभविषत, व्यत्यभविष्ठाः, व्यत्यभविषाथां, ध्वमि । " सो धि वा”। ४ । ३ । ७२ ॥ इति वा सिचोलुकि व्यत्यभविध्वम् । “हान्तस्थाञी-”।२।१।८१ ॥ इति वा धस्य ढत्वे । व्यत्य- भविदम् । सिचोलोपाभावपक्षे “नाम्यन्तस्थ-"।२।३।१५॥ इति सः षत्वे “ तृती- स्तृतीयः”। १ । ३ । ४९ ॥ इति डत्वे “तवर्गस्य-"।१।३ । ६०॥ इति धो ढत्वे च । व्यत्यभविड्ढ् । अन्यत्रापि ध्वमोरूपत्रयं यत्र स्यात्तत्रैवमेव साध्यम् । व्यत्यभ- विषि, व्यत्यभविष्वहि, व्यत्यभविष्महि ॥ भावे जिचि । अभावि। कर्मणि त्रिचि। अन्वभावि । “स्वरग्रह-"।३।४।६९॥ इति वा मिटि । अन्वभाविषाताम् । पक्षे इटि ! अन्वभविषातां, अन्वभाविषत, अन्वभविषत, अन्वभाविष्ठाः, अन्वभ- विष्ठाः, अन्वभाविषाथां, अन्वभविषाथां, अन्वभाविध्वं, अन्वभाविद्धं, अन्वभाविड्ढें, भ्वादिगणः । अन्वभविध्वम्, अन्वभविवं, अन्वभविड्डुम्, अन्वभाविषि, अन्वमविषि, अन्वभा- विष्वहि, अन्वभविष्वहि, अन्वभाविष्महि, अन्वभविष्महि ॥परोक्षा ॥ बभूव, द्वित्वे वृद्धौ आवि “भुवो व-४।२।४३॥ इत्युपान्त्य ऊति “भूस्खपो-४।१।७०॥ इति पूर्वस्य अः सर्वत्र । बभूवतुः, बभूवुः। “स्क्रसृवृ-"|४|४८१॥ इति व्यञ्जने इटि बभूविथ, बभूवथुः, बभूव, णवो वा णित्वे आवि अवि च कृते उपान्त्य ऊति एकमेव रूपम्। बभूव, बभूविव, बभूविम । व्यतिबभूवे, व्यतिबभूवाते, व्यतिबभूविरे, विषे, वाथे, विध्वे, विवे, वे, विवहे, विमहे॥ भावे ॥ बभूवे ॥ कर्मणि ॥ अनुबभूवे । अनुबभू ९ वाते, विरे, विषे, वाथे, विध्वे, विड्ढ़े, वे, विवहे, विमहे, केचित्तु कतर्येव भुवो द्वित्वे पूर्वस्याकारमिच्छन्ति, न भावकर्मणोः, तन्मते बुभूवे, अनुबुभूवे इत्याद्येव भवति ॥ आशीः ॥ भूयात्, भूयास्तां, भूयासुः, भूयाः, भूयास्तं, भूयास्त, भूयासं, भूयास्व, भूयास्म । व्यतिभविषीष्ट, व्यतिभवि ९षीया- स्तां, पीरन्, षीष्ठाः, षीयास्थां, षीध्वम्, पीड्वम्, षीय, षीवहि, षीमहि ॥ भावे वा जिटि भाविषीष्ट, भविषीष्ट, कर्मणि जिटि अनुभावि १० षीष्ट, षीया- स्ताम्, षीरन्, षीष्ठाः, षीयास्थाम्, पीध्वम्, षीट्वम्, षीय, षीवहि, धीमहि ॥ इटि तु अनुभवि १० षीष्ट, षीयास्ताम्, पीरन् , षीष्ठाः, पीयास्थाम्, षीध्वम् , पीढ़म्, पीय, पीवहि, पीमहि ॥ श्वस्तनी ॥ भविता, भवितारौ, भवितारः, भवि- तासि, भवितास्थः, भवितास्थ, भवितास्मि, भवितास्वः, भवितास्मः । व्यति- भविता, व्यतिभविस्तारौ, तारः, तासे, तासाथे, ताध्वे, ताहे, तास्वहे, तास्महे । ॥ भावे ॥ भविता, भाविता । कर्मणि इटि अनुभवि ९ ता, तारौ, तारः, तासे, तासाथे, ताध्ये, ताहे, तास्वहे, तास्महे । निटि अनुभावि९ता, तारौ, तारः, तासे, तासाथे, ताध्वे, ताहे, तावहे, तास्महे ॥ भविष्यन्ती ॥ भविष्यति, भाविष्यतः, भविष्यन्ति, भविष्यासि, भविष्यथः, भविष्यथ, भविष्यामि, भवि- प्यावः, भाविष्यामः । व्यतिभविष्यते, व्यतिभविटष्येते, ष्यन्ते, प्यसे, प्येथे, ष्यध्वे, प्ये, प्यावहे, ष्यामहे ॥ भावे ॥ भविष्यते, भाविष्यते । कर्मणि इटि अनुभविष्यते, अनुभविष्येते, प्यन्ते, प्यसे, येथे, प्यध्ये, ष्ये, प्यावहे, प्यामहे । निटि तु अनुभावि९ष्यते, प्येते, ज्यन्ते, ष्यसे, येथे, ध्यध्वे, प्ये, प्यावहे, प्यामहे ।।

२२ क्रियारत्नसमुच्चयः। . कियातिपत्तिः ॥ अभविष्यत्, अभविष्यताम्, अभविष्यन् , अभविष्यः, अभविष्यतम्, अभविष्यत, अभविष्यम्, अभविष्याव, अभविष्याम । व्यत्य- भविष्यत, व्यत्यभविटष्येताम्, ष्यन्त, व्यथाः, ष्येथाम्, प्यध्वम्, प्ये, व्यावहि, ष्यामहि ॥ भावे ॥ अभविष्यत, अभाविष्यत ॥ कर्मणि ॥ अन्वभविष्यत, अन्वभविष्येताम्, अन्वभविष्यन्त, व्यथाः, ष्येथाम् , ष्यध्वं, ध्ये, प्यावहि, प्यामहि । अन्वभावि९ष्यत, ष्येताम्, ष्यन्त, व्यथाः, ष्येथाम्, ष्यध्वम् , ष्ये, ष्यावहि, ष्यामहि ॥१०॥ एवं प्राथुपसर्गपूर्वकोऽपि भूः सर्वविभक्तिपुंदाहार्यः । तत्र, प्रभवतीति स्वाम्यर्थः प्रथमत उपलम्भश्च । पराभवति, परिभवति, अभिभवतीति तिरस्कारः। पर्याभवतीति स्वयंभङ्गः । सम्भवतीति जन्यार्थः प्रमाणानतिरेकेण धारणं च । अनुभवतीति संवेदनम् । विभवतीति व्याप्तिः । आभवतीति भागागतिः । उद्भवतीत्युद्भेदः । प्रतिभवतीति लमकत्वमिति । एव- मुपसर्गवशाद् यथास्वमन्यस्यापि धातोरनेकोऽर्थः प्रकाशते इति ज्ञानीयम् ॥ अत्र कर्तरि शवप्रत्ययान्तो भावकर्मणोः क्यप्रत्ययान्तश्च भूधातुर्यथा वर्तमाना- दिविभक्तिचतुष्टये न्यदार्श, तथैवान्येऽपि शवन्ताः क्यप्रत्ययान्ताश्च सर्वे धातव. उदाहरणीयाः, अतएवाग्रे तेषां शवक्यान्तानां रूपमात्रमेव दर्शयिष्यते नतु विभ- क्तिचतुष्टयवचनविस्तरः, तथा सर्वस्मात्सकर्मकाद्धातोः “एकधातौ-॥३४॥८६॥ इति सूत्रेण त्रिक्यात्मनेपदविधानात् वर्तमानादिदशविभक्तिषु कर्मण्युक्तानि सर्वाणि वचनानि कर्मकर्त्तर्यपि भवन्ति यथाऽत्रैव । अभिभवति शत्रुञ्चैत्रः । पुनः शत्रोः सुजेयखेन कर्तृत्वे अभिभूयते; अभिभूयेत; अभिभूयताम; अभ्यभूयत; "स्वर- दुहोवा"॥३४१९०॥इति वा जिचि अभ्यभावि; पक्षे इटि अभ्यभविष्ट; अभिबभूवे। इटि अभिभविता । जिटि अभिभाविता; अभिभावषीष्ट, अभिभाविषीष्ट । अभि- भविष्यते, अभिभाविष्यते, वा शत्रुः स्वयमेव। क्रियातिपत्तिरल्पविषयत्वान्नादार्श॥ एवं विभक्तीनां कर्मगतानि द्वित्वबहुत्वविषयाण्यपि वचनानि कर्मकर्तरि दर्शनी. यानि; एवं सकर्मस्वन्यधातुष्वपि; विशेषस्तु स्वस्वस्थाने वक्ष्यते॥ अथ प्रत्ययाः॥ भवन् । व्यतिभवमानः। “श्यशवः”।२।१।११६॥ इति अन्ति, भवन्ती; भवत् ; भाविष्यन्। भविष्यन्ती। भविष्यती। अत्र “अवर्णादन-रा११११५॥ इति वा अन्त् ।

म्वादिगणः। २३ एवं नवस्वप्यादिषु सर्वधातुषु स्त्रियां स्ये प्रत्यये सति शतुर्वाऽन्त वाच्यः। भविष्यत्॥ अनुभूयमानम्। “न ख्याग्"।२।३।९०॥ इति णत्वाभावे प्रभूयमानम् । एवं परिपरा- पूर्वोऽपि । इटि अनुभविष्यमाणम् । निटि अनुभाविष्यमाणम् । अनुबभूवानम् । बभूवान् , बभूवांसौ। शसि बभूवुषः।टायां बभूवुषा । भ्यामि “संस्ध्वंस्-२।११६८॥ इति दवे बभूवयाम् । सुपि बभूवत्सु । स्त्रियां तु बभूवुषी । नपुंसके बभूवत्, बभू- वुषी, बभूवांसि ॥ भूतः; भूतवान् । अत्र किति “उवर्णात् ४।४।५८॥ इति नेट । भावेतु अनुभूतमनेन। एवमन्यत्रापि भावे क्तः परिभाव्यः॥ भूतिः; भूत्वा; अनु- भूय । “स्वाङ्गतश्च्च्यर्थनानाविनाधार्थेन भुवश्च" ॥५॥४॥८६॥ इति भुवः कृगश्च क्वाणमौ ॥ पार्श्वतोभूय, पार्श्वतोभूत्वा, पार्श्वतोभावमास्ते । “ तृतीयोक्तं वा" ॥३॥१॥५०॥ इति तत्पुरुषविकल्पनात् पक्षे क्त्वो यप्नभवति । एवं पार्श्वतः कृत्य, पार्श्वतः कृत्वा, पार्श्वतःकार शेते । अनाना नानाभूत्वा नानाभूय, नानाभूत्वा, नानाभावम् । विनाभूय, विनाभूत्वा, विनाभावम् । द्विधाभूय, विधाभूत्वा, द्विधाभावमास्ते। “तूष्णीमा”।५।४।८७॥ तूष्णीभूय, तूष्णीभूत्वा, तूष्णींभावमास्ते । तूष्णींशब्दो मौने तद्वति च वर्त्तते ॥ “आनुलोम्येऽन्वचा" ॥ ५।४। ८८ ॥अन्व. ग्भूय, अन्वग्भूला, अन्वग्भावमास्ते । भविता; भवितुं; भवितव्यं, भव- नीयं । भावे ये भव्यमनेन । आवश्यके ध्यणि भाव्यम् । अवश्यभाव्यमनेन "कृत्येऽवश्यम-१३।२।१३८॥ इति मो लुक् । “भुवो वा” ( उणादि-९२२) इति णिनि भावी । णित्वाभावे भवी वर्त्यति साधू ॥ “कृभ्वस्तिभ्यां कर्मकर्तृभ्यां प्रागतत्तत्त्वे चिः”॥७।२।१२६॥ इति कृगा योगे कर्मताश्वः । स्वस्तिना च कर्तृतः। अशुक्लं शुक्लं करोति शुक्लीकरोति पटम् । शुक्लीक्रियते पटः । शुक्ल्यकार्षीत् । शुक्लीचकार । शुक्लीचक्रे । शुक्लीकरिष्यति । शुक्लीकृत्येत्यादि । अशुक्लः शुक्लः सम्पद्यते शुक्लीभवति । शुक्लीभूयते । शुक्ल्यभवत् । शुक्ल्य- भूत् । शुक्लीबभूव । शुक्लीभविता । शुक्लीभविष्यति । क्त्वि शुक्लीभूयेत्यादि । एवं शुक्लीस्यात् ; शुक्ल्यभूदित्यादि । एवं कारकीकरोति चैत्रम्, कारकीभवति, कारकीस्याच्चैत्रः । सङ्घीकरोति गाः, सङ्घीभवन्ति, सङ्घीस्युर्गावः । घटीकरोति मृदं, घटीभवति, घटीस्यान्मृत् । “नोऽपदस्य "६१॥ इति नलुकि, भस्मी- .

क्रियारत्नसमुच्चयः। करोति, भस्मीभवति, भस्मीस्यात् । मालीकरोति, मालीभवति, मालीस्यात् । एषु "ईश्च्याववर्ण-|४।३।१११॥ इति ईः, अव्ययस्य तु न ईः । दिवाभूता रात्रिः । दोषाभूतमहः । शुचीकरोति, शुचीभवति, शुचीस्यात् । पटूकरोति, पटूभवति, पटूस्यात् । बहूकरोति, बहूभवति, बहूस्यात् । एषु “ दीर्घश्च्चि-” ॥ ४ । ३ । १०८ ॥ इति दीर्घः । पित्रीकरोति, पित्रीभवति, पित्रीस्यात् । मात्रीकरोति, मात्रीभवति, मात्रीस्यात् । एषु “ ऋतो रीः” ॥४।३ । १०९॥ इति रीः । कर्मकर्तृभ्यामन्यत्र तु न चिः। प्रागगृहे इदानीं गृहे करोति भवति वा । कथं समीपीभवति दूरीभवति अभ्याशीभवति, अत्राप्युपचारात्तत्स्थे द्रव्ये वर्तमानात्समीपादीनां कर्तृत्वम् । अनरुः अरुःकरोति अरूकरोति, अरूभवति, अरूस्यात् । मनीकरोति, मनीभवति, मनीस्यात् । एवमुन्मनः सुमनः शब्दा: वपि। मा उन्मनीभूः। चर्करोति, चक्षूभवति, चक्षूस्यात्। चेतीकरोति, चेती- भवति, चेतीस्यात् । विचेतीकरोति, विचेतीभवति, विचेतीस्यात् । रहीकरोति, रहीभवति, रहीस्यात् । रजीकरोति, रजीभवति, रजीस्यात् । विरजीकरोति, विरजीभवति, विरजीस्यात् । एषु, “अर्मनश्चक्षुश्वेतोरहोरजसा लुक्च्चौ" ॥१२॥ १२७॥ इति सोलुक् । “इसुसोर्बहुलम् ॥७२।१२८॥ इति सोलुकि, सीकरोति नव- नीतम्, सर्पिर्भवति, धनूभवति वंशः, धनुर्भवति। बहुलग्रहणं प्रयोगानुसरणार्थम्।। बहुलं व्यञ्जनान्तस्य ईः। दृषदीभवति शिला, दृषद्भवति। समिधीभवति काष्ठम् , समिद्भवति। अत्र भूप्रसङ्गेन कृग् अस्तिश्च लाघवार्थमवक्षाताम्॥ “भूङःप्राप्तौ." ३।४।१९॥ इति वा णिङि भावयते प्राप्नोतीत्यर्थः। पक्षे भवते, एवं भावयेते; भवते, भावयन्ते; भवन्ते। भावयसे; भवसे०॥भावे ॥ भाव्यते; भूयते॥ कर्मणि ॥ भाव्यते; भूयते । भाव्येते; भूयेते । भाव्यन्ते; भूयन्ते । इत्यादिना सर्वविभ- क्तिषु द्वे द्वे रूपे वाच्ये। नवरं णिङन्तो वक्ष्यमाणणिगन्तभूवत् आत्मनेपदे वाच्यः। केवलस्तु व्यतिपूर्वकभूवत् । भूङ् इति निर्देशो णिङभावेऽप्यात्मनेपदार्थः । प्राप्त्यभावेऽपि कचिदात्मनेपदमिष्यते ॥ यथा ॥ याचितारश्च नः सन्तु दातारश्च भवामहे । आक्रोष्टारश्च नः सन्तु क्षन्तारश्च भवामहे इति ॥ प्राप्तावपि परस्मै. पदामित्यन्ये । सर्व भवति, प्राप्नोतीत्यर्थः ॥ अथ सन् ॥ वर्तमाना ॥ भवितु- भ्वादिगणः। २५ मिच्छति बुभूषति। अत्र “ग्रहगुहश्व-४५९॥ इति उवर्णान्तान्नेट । “नामिनोऽ- निट"४।३।३३।इति सन् कित, तेन न गुणः। बुभूषतः, बुभूषन्ति, बुभूषसि, बुभूषथः, बुभूषथ, बुभूषामि, बुभूषावः, बुभूषामः। व्यतिबुभूषते,व्यतिबुभूषेते, व्यतिबुभूषन्ते, व्यतिबुभूषसे, षेथे, षध्वे, थे, पावहे, षामहे ॥ भावे बुभूष्यते । कर्म- णि तु अनुबुभूष्यते, अनुबुभूष्येते, अनुबुभूष्यन्ते, अनुबुभू६ष्यसे, प्येथे, प्यध्वे, प्ये, व्यावहे, ज्यामहे ।। सप्तमी ॥बुभूषेत् , बुभूटषेताम, षेयुः, षेः, षेतम्, षेत, यम्, घेव, पेम ॥ व्यतिबुभूषेत, व्यतिबुभूषेयाताम्, षेरन्, षेथाः, षेयाथाम्, षेध्वम्, पेय, षेवहि, षेमहि ॥ भावे बुभूष्येत ॥ कर्मणि तु अनुबुभूष्येत, अनुबुभूष्ये- याताम्, प्येरन्, ष्येथाः, ष्येयाथाम्, प्येध्वम्, प्येय, प्येवहि, ष्येमहि ॥ पञ्चमी ।। बुभूषतु, बुभूषतात्, बुभूषताम्, बुभू८षन्तु, ष, षतात, षतम्, षत, पाणि, पाव, षाम। व्यतिबुभूषताम्, व्यतिबुभूषेताम्, षन्ताम्, षस्व, षेथाम्, षध्वम् , पै, षावहै, षामहै । भावे बुभूष्यताम् । कर्मणि अनुबुभूष्यताम्, अनुबुभू ८ प्येताम्, प्यन्ताम्, व्यस्त्र, प्येथाम्, प्यध्वम् , प्यै, प्यावहै, प्यामहै। ह्यस्तनी ॥ अबुभूषत्, अबुभू८षताम् , षन्, षः, षतम् , षत, षम्, पाव, षाम । व्यत्य- बुभूषत, व्यत्यबुभूटषेताम, षन्त, षथाः, षेथाम्, षध्वम् , षे, पावहि, षामहि॥भावे अबुभूष्यत ॥ कर्मणि अन्वबुभूष्यत, अन्वबुभूप्येताम्, प्यन्त, प्यथाः, प्येथाम् , प्यध्वम् , प्ये, व्यावहि, ष्यामहि ॥ अद्यतनी ॥ अबुभूषीत्, इटि ईति सिचो- लुक् । अबुभू८षिष्टाम् , षिषुः, षीः, षिष्टम् , षिष्ट, षिषम् , षिष्व, षिष्म। व्यत्यबु- भूषिष्ट, व्यत्यबुभूषिथ्षाताम्, षत, ष्ठाः, पाथाम्, “सो धि वा"॥४।३।७२॥ इति वा सिच्लुकि, व्यत्यबुभूषिध्वम्, पक्षे सिचो “नाम्यन्त-"॥२३॥१५॥ इति षत्वे डत्वे “तवर्ग-"॥१॥३॥६॥ इति धो ढे व्यत्यबुभूषिड्छम्, व्यत्यबुभूषि३षि, वहि, महि । सर्वत्र इटि, “अतः" ॥४।३।८२॥ इति सनोऽल्लुक् ॥ भावे अबुभूषि ॥ कर्मणि अन्वबुभूषि, इटि मिटि वा सदृशरूपत्वे, अन्वबुभूषि९ पाताम्, षत, ठाः, षाथाम्, ध्वम्, ड्ढुम, षि, वहि, महि॥ परोक्षा॥ बुभूषांचकार, बुभूषां ९ चक्रतुः, चक्रुः, चकर्थ, चक्रथुः, चक्र, चकर, चकार, चकृव, चकृम । व्यतिबुभूषांचके, व्यतिबुभुषांचक्राते, चक्रिरे, चकृषे, चक्राथे, चकृते, " म्यन्त" .

२६ क्रियारनसमुच्चयः । धायि तदा " ॥२॥१८॥ इति ढः । चक्रे, चकृवहे, चकृमहे॥ बुभूषांबभूव, बुभूषांबभूवतुः, वुः, विथ, वथुः, व, व, विव, विम । व्यतिबुभूषांबभूव, व्यतिबुभूषांबभूवतुः, युः, विथ, वयुः, व, व, विव, विम ॥ बुभूषामास, बुभूषामा८सतुः, सुः, सिथ, सथुः, स, स, सिव, सिम। "धातोरनेकस्वर-"॥३४॥४६॥ इत्यत्राऽस्तेविधानबलादेवास्ते न भवति । एवमन्यत्रापि । व्यतिबुभूषामास, व्यतिबुभूषामासतुः, व्यतिबुभूषामा ७सुः, सिथ, सथुः, स, स, सिव, सिम । अत्र व्यतिबुभूषांबभूवेत्यादौ, व्यति- बुभूषामासेत्यादी च, सन्नन्तधातोरात्मनेपदेऽपि भ्वस्तिधात्वार्यत् परस्मैपदमभ्य- आमः कृगः" ॥ ३ । ३ । ७५ ॥ इत्यत्र कर्तरि कृग एव धातुसदृशं पदं, वस्त्योस्तु परस्मैपदमेवेति भणनात् ॥ भावे बुभूषांचक्रे । बुभूषांबभूवे । बुभूषामाहे । परोक्षाया एकारे हकारं नेच्छन्त्यके । बुभूषामासे । एवमग्रेऽपि परमतं सर्वत्र । कर्मणि अनुभूषांचके, अनुबुभूषांचढ़ाते, किरे, कृषे, काथे, कुठे, के, कृवहे, कृमहे । अनुबुभूषांबभूवे, अनुबुभूषांबभूवाते, विरे, विषे, वाथे, विवे, विध्वे, वे, विवहे, विमहे । अनुबुभूषामाहे । अनुबुभूषामा८साते, सिरे, सिषे, साथे, सिध्वे, हे, सिवहे, सिमहे ॥ आशीः ॥ बुभूष्यात्, बुभू८ प्यास्ताम्, ष्यासुः, ष्याः, प्यास्तम्, प्यास्त, प्यासम्, प्यास्व, प्यास्म। व्यतिबुभूषि- षीष्ट । व्यतिबुभूषिदषीयास्ताम्, षीरन् , षीष्ठाः, षीयास्थाम्, षीध्वम् , षीय,- षीवहि, धीमहि ॥भावे बुभूषिषीष्ट ॥ कर्मणि अनुबुभूषिषीष्ट, अनुबुभूषि८षीयास्तां, इत्यादि कर्तृवत् ॥ श्वस्तनी ॥ बुभूषिता, बुभूषितारौ, तारः, तासि, तास्थः, तास्थ, तास्मि, तास्वः, तास्मः। व्यतिबुभूषिता, व्यतिबुभूषितारौ, तारः, तासे, तासाथे, ताध्वे, ताहे, तावहे, तास्महे ॥ भावे बुभूषिता ॥ कर्मणि अनुबुभूषिता, अनुबुभूषितारौ, तारः, तासे, तासाथे, ताध्वे, ताहे, तास्वहे, तास्महे ॥ भविष्यन्ती॥ बुभूषिष्यति, बुभूषि ८ प्यतः, ष्यन्ति, ष्यसि, प्यथः, प्यथ, प्यामि, घ्यावः, प्यामः ॥ व्यतिबुभूषिष्यते, व्यतिबुभूषि ८ प्येते, प्यन्ते, प्यसे, प्येथे, प्यध्वे, प्ये, प्यावहे, प्यामहे ॥ भावे बुभूषिष्यते ॥ कर्मणि अनुबुभूषिष्यते, अनुबुभूषिट प्येते, ष्यन्ते, ष्यसे, येथे, व्यध्वे, ध्ये, व्यावहे, ष्यामहे ॥ क्रियातिपत्तिः ।। अबुभूषिष्यत् , अबुभूषि८ष्यताम्, प्यन्, ष्यः, ष्यतम्, प्यत, प्यम्, प्याव, ज्याम, भ्वादिगणः । व्यत्यबुभूषिष्यत, व्यत्यबुभूषिटष्येता, ष्यन्त, ष्यथाः, प्येथाम्, प्यध्वम्, ष्ये, ष्या- वहि, ष्यामहि ॥ भावे अबुभूषिष्यत ॥ कणि अन्वबुभूषिष्यत, अन्वबुभूषिटप्ये- ताम्, ष्यन्त, ष्यथाः, ष्येथाम्, प्यध्वम्, प्ये, प्यावहि, ष्यामहि ॥ कर्मकर्सरि सर्व स्मात्सन्नन्ताद्धातोः “एकधातौ कर्म-"३८६॥ इति भिक्यात्मनेपदेषु प्राप्तेषु "भूषा- र्थसन्-"॥३४९३॥इति निक्यनिषेधात् केवलमात्मनेपदमेव भवति । अनुबुभूषति विषयसुखं चैत्रः। स एवं विवक्षिते, नाहमनुबुभूषामि। किंतु अनुबुभूषते,अनुबुभूषेत, अनुबुभूषताम्, अन्वबुभूषत, अन्वबुभूषिष्ट, अनुबुभूषांचक्रे, अनुबुभूषांबभूवे, अनुबुभूषामाहे, अनुबुभूषिषीष्ट, अनुबुभूषिता, अनुबुभूषिष्यते, वा विषयसुखं स्वय- मेव । एवमात्मनेपदीयानि द्विवचनादीन्यपि कर्मकर्त्तर्युदाहार्याणि ॥ बुभूषन् । बुभू- षिष्यन् । व्यतिबुभूषमाणः, व्यतिबुभूषिष्यमाणः । अनुबुभूष्यमाणम् , अनुबुभूषि- ष्यमाणम् । बुभूषां३चकृवान्, बभूवान् , आसिवान् वा। व्यतिबुभूषांश्चक्राणः, बभूवान्, आसिवान् वा । भावकर्मणोः। अनुबुभूषांश्चक्राणम्, बभूवानम्, आसानं वा । बुभूषिरतः, वान् । बुभूषित्वा। अमुबुभूष्य। अनुबुभूषिरता, तुम् । सेटामनिटां वा स्वरान्तानां व्यञ्जनान्तानां च सर्वेषां धातूनां सनि यानि रूपाणि भवेयुस्तानि सर्वविभक्त्यादिषु सन्नन्तभूवज्ज्ञातव्यानि । अतएवाग्रे सनि धातूनां रूपमा प्रकटयिष्यते न पुनर्विभक्तिविस्तरः। परं स्वरादिसन्नन्तधातूनां हस्तन्य- द्यतनीक्रियातिपत्तिषु वृद्धिरादौ वाच्या ॥ यथा; ईक्षि, ऐचिक्षिषत । ऐचिक्षिषिष्ट । ऐचिक्षिषिष्यत । एवमन्यत्रापि ॥ अथ यङ् । “व्यञ्जनादेरेकखर-" ॥३४॥९॥ इति वा याङ बोभूयते, पक्षे भृशं पुनः २ र्वा भवतीति वाक्यम् । भव भवेत्येवायं भवतीत्यादिकं वा स्यात् । एवमग्रतोऽपि सर्वत्र ज्ञेयम् । बोभूयेते, बोभूयन्ते, बोभूयसे, बोभूपयेथे, यध्वे, ये, यावहे, यामहे ॥ भाक॥अत्र ग्रन्थे भावकर्मणो- भकति संज्ञा ॥ अनुबोभूय्यते “अतः"।४।३।८२॥ इति यङोऽल्लुक् । अनुबोभू- य्येते, अनुबोभूय्यन्ते, य्यसे, य्येथे, य्यध्वे, य्ये, व्यावहे, य्यामहे ॥ सप्तमी ॥ बोभू- येत, बोभूट्येयाताम् । येरन्, येथाः, येयाथाम, येध्वम्, येय, येवहि, येमहि ॥ भाक ॥ अनुबोभूय्येत । अनुबोभूट्य्येयाताम्, य्येरन् , य्येथाः, य्येयाथाम् , य्यध्वम् , य्येय, य्येवहि, य्येमहि ॥पञ्चमी । बोभूयताम् , बोभूट्येताम् , यन्ताम् , २८ क्रियारत्नसमुच्चयः। यस्व, येथाम्, यध्वम्, यै, यावहै, यामहै ॥ भाक ॥ अनुबोभूय्यताम् , अनु- बोभूट्य्येताम्, य्यन्ताम् , य्यस्ख, य्येथाम्, य्यध्वम्, प्यै, व्यावहै, य्यामहै ॥ ह्यस्तनी ॥ अबोभूयत, अबोभूप्येताम्, यन्त, यथाः, येथाम्, यध्वम् , ये, यावहि, यामहि ॥ भाक ॥ अन्वबोभूय्यत, अन्वबोभू८य्येताम् , य्यन्त, य्यथाः, य्येथाम् , य्यध्वम्, य्ये, य्यावहि, य्यामहि ॥ अद्यतनी ॥ सिचि इटि च परे यडोऽल्लोपः सर्वत्र ॥ अबोभूयिष्ट, अबोभूयिषाताम्, अबोभूयिषत, अबोभूयि८ ष्ठाः, षाथाम्, ध्वम्, ट्वम्, ड्वम्, षि, ष्वहि, महि ॥ भाक ॥ त्रिचि अन्व- बोभूयि, अन्वबोभूयिषाताम् , अन्वबोभूयि९षत, ठाः, पाथाम् , ध्वम्, ट्वम, ड्ढ्दम् , षि, ध्वहि, महि ॥ परोक्षा॥ बोभूयांचके, बोभूयांचाते, क्रिरे, कृषे, काथे, कृवे, के, कृवह, कृमहे ॥ बोभूयांबभूव, बोभूयांबभूवतुः, वुः, विथ, वथुः व, व, विव, विम । बोभूयामास, बोभूयामा ८ सतुः, सुः, सिथ, सथुः, स, स, सिव, सिम । बोभूयांचक्रे इत्यादौ “आमः कृगः॥३।३।७५॥ इति नियमादामः परात् कृग एवं कतर्यात्मनेपदं न भ्वस्तिभ्याम् ॥ भावे बोभूयांचक्रे, बोभूयांबभूवे, बोभूयामाहे । कर्मणि अनुघोभूयांचक्रे, अनुबोभूयांच८काते, क्रिरे, कृष, काथे, कृट्वे, के, कृवहे, कृमहे ॥ अनुबोभूयांबगवे, अनुबोभूयांबभूवाते, विरे, विषे, वाथे, विवे, विध्वे, वे, विवहे, विमहे ॥ अनुबोभूयामाहे, अनुबोभूयामा८साते, सिरे, सिषे, साथे, सिध्वे, हे, सिवहे, सिमहे ॥ आशीः ॥ बोभूयिषीष्ट, बोभूयि९षीयास्ताम् , परिन्, षीष्ठाः, षीयास्थाम् , षट्विम्, षीध्वम्, षीय, षीवहि, षीमहि ॥ भाक ॥ अनुबोभूयिषीष्ट, अनुबोभूयिषीयारतामित्यादि ॥ एतत्कर्तृवत् ॥ श्वस्तनी ॥ बोभूयिता, बोभूयि८तारौ, तारः, तासे, तासाथे, ताध्ये, ताहे, तावहे, तास्महे ॥ भाक ॥ अनुबोभूयिता, अनुषोभूयिस्तारौ, तारः, तासे, तासाथे, ताध्वे, ताहे, तास्वहे, तास्महे ॥ भविष्यन्ती॥ बोभूयिष्यते, बोभूयिष्येते, प्यन्ते, प्यसे, प्येथे, प्यध्ये, प्ये, प्यावहे, ष्यामहे ॥ भाक ॥ अनुबोभूयिष्यते, ष्येते, इत्यादि कर्तृ- वत् ॥ क्रियातिपत्तिः ॥ अबोभूयिष्यत, अबोभूयि८प्येताम्, प्यन्त, प्यथाः, ध्येथाम्, प्यध्वम्, ध्ये, ष्यावहि, प्यामहि ॥ भाक ॥ अन्वबोभूयिष्यत, अन्व- बोभूयिष्येताम्, प्यन्त, प्यथाः, ध्येथाम्, प्यध्वम्, प्ये, ध्यावहि, प्यामहि ॥

भ्वादिगणः अत्राशीःप्रभृतिषु ४ विभक्तिषु कर्तरि कर्माण च रूपाणि सदृशान्येव भवन्ति। कर्मकर्तरि “एकधातौ-"३।४।८६॥ इत्यनेन स्वयमेव सुखमनुबोभूय्यते इत्यादिना दशविभक्तीनां कर्मवचनानि सर्वाणि वाच्यानि । बोभूयमानः; बोभूयिष्यमाणः ॥ भाक ॥अनुबोभूय्यमानम् ; अनुबोभूयिष्यमाणम् । बोभूयां३चक्राणः, बभूवान्, आसिवान् वा ॥ भाक॥अनुबोभूयां३ चक्राणम् , बभूवानम् , आसानम्, वा। बोभू- यिरतः, वान्। बोभूयिला, अनुबोभूय्य । बोभूयिरता, तुम् । एवं सर्वेषां स्वरान्तानां धातूनां यङि स्वानि २ यानि रूपाणि जायन्ते तानि यङन्तभूवन्निर्विशेषमभ्यूह्यानि॥ अथ यङ्लुप् ॥ बोभवीति, बोभोति, बोभूतः, बोभुवति, बोभवीषि, बोभोषि, बोभथः, बोभूथ, बोभवीमि, बोभोमि, बोभूवः, बोभूमः ॥ भाक ॥ क्ये; अनु- बोभूयते, अनुबोभूयेते, अनुबोभूयन्ते, अनुबोभूक्ष्यसे, येथे, यध्वे, ये, यावहे, यामहे ॥ सप्तमी ॥ बोभूयात् , बोभूयाताम् , बोभूयुः, बोभूक्ष्याः, यातम्, यात, याम् , याव, याम ॥ भाक ॥ अनुबोभूयेत, अनुबोभूट्येयाताम्, येरन् , येथाः, येयाथाम् , येध्वम्, येय, येवहि, येमहि ॥ पञ्चमी ॥ बोभवीतु, बोभोतु, बोभूतात् । ङित्त्वेन वित्त्वस्य बाधनान्नात्र गुणः । बोभूताम् , बोभुवतु, बोभूहि, बोभूतात् , बोभूतम् , बोभूत, बोभवानि, बोभवाव, बोभवाम ॥ भाक ॥ अनु- बोभूयताम् , अनुबोभू८येताम् , यन्ताम् , यस्व, येथाम् , यध्वम् , यै, यावहै, यामहै ॥ ह्यस्तनी ॥ अबोभवीत् , अबोभोत्, अबोभूताम्, अबोभवुः । अत्र 'द्वयुक्तजक्ष-"॥ ४।२।९३॥ इति अनः पुस् “ पुस्पौ"||३।३॥ इति गुणः। अबोभवीः, अबोभोः, अबोभूतम्, अबोभूत, अबोभवम्, अबोभूव, अबोभूम ॥ भाक ॥ अन्वबोभूयत, अन्वबोभू८येताम् , यन्त, यथाः, येथाम् , यध्वम्, ये, यावहि, यामहि ॥ अद्यतनी ॥ प्रकृतिग्रहणे यङ्लुबन्तस्यापि ग्रहणमिति न्यायात् “पिबैति-" ॥४॥३॥६६॥ इति सिचोलुप्, नचेट, सिचोलुम्विधानाच्च न वृद्धिः, किन्तु “भवतेः सिलुपि"॥४॥३॥१२॥ इत्यत्र तिन्निर्देशाद् यङ्लुपि गुणः । अबोभोत, अबोभोताम् , अबोभूवन् । अत्र “सिविदोऽभुवः॥४।२।९२॥ इति निषे- धान्न पुस् । गुणेऽवादेशे च "भुवो व-॥४॥२॥४३॥ इति ऊत् । अबोभोः, अबोभोतम् , अबोभोत, अबोभूवम्, अबोभोव, अबोभोम ॥ भाक ॥ भिचि अन्वबोभावि । , ३० क्रियारत्नसमुच्चयः। जिटि, अन्वबोभाविषाताम्, अन्वबोभावि९षत, ठाः, षाथाम्, ध्वम्, ट्वम्, ड्वम्, षि, वहि, ष्महि । इटि तु अन्वबोभविषाताम्, अन्वबोभवि९षत, ष्ठाः, षाथाम्, ध्वम् ,ढुम, ड्वम्, षि, ष्वहि, महि॥परोक्षा॥ “वेत्तेः कित्"॥३॥४॥५१॥ इत्यत्र आमः परोक्षावद्भावनिषेधाद् भुवो वः प-"॥४॥२॥४३॥ इति न ऊ। बोभवाञ्चकार, बोभवाञ्च .९क्रतुः, क्रुः, कर्थ, क्रथुः, क्र, कर, कार, कृव, कृम। बोभवांबभूव, बोभवांबभू ८ वतुः, वुः, विथ, वथुः, व, व, विव, विम । बोभवामास, बोभवामा८सतुः, सुः, सिथ, सथुः, स, स, सिव, सिम ॥ भावे बोभवांचक्रे, बोभवांबभूवे, बोभवा- माहे ॥ कर्मणि अनुबोभवांचके, अनुबोभवांटचक्राते, चक्रिरे इत्यादि ॥ अनुचोभवां ९ बभूवे, बभूवाते इत्यादि ॥ अनुबोभवा९माहे, मासाते इत्यादि । आशी:प्रभृतिषु ४ विभक्तिषु कर्त्तरि परस्मैपदे भावकर्मणोश्चात्मनेपदे भूधातोः केवलस्य यानि रूपाणि तान्येवात्रापि, तथापि तद्दिग्मात्रमुच्यते ॥ आशीः ॥ बोभूयात्, बोभूयास्तां ॥ भाक ॥ निटि अनुबोभाविषीष्ट । इटि अनु- बोभविषीष्ट० ॥ श्वस्तनी ॥ बोभविता, बोभवितारो० ॥ भाक ॥ भिटि अनु- बोभावि९ता, तारौ, तारः ॥ इटि अनुबोभवि९ता, तारौ, तारः ॥ भविष्यन्ती ॥ बोभविष्यति, बोभविष्यतः० ॥ भाक ॥ अनुबोभावि९ष्यते, ष्यते ॥ अन्वबोभ- विष्यते, प्येते, ष्यन्ते ॥ क्रियातिपत्तिः ॥ अबोभवि९ष्यत्, ष्यताम०॥भाक॥ अन्वबोभावि९ष्यत, प्येताम् • ॥ अन्वबोभविष्यत, ष्येताम् , प्यन्त, ष्यथाः०॥ अत्रापि कर्मकर्त्तरि सुखं स्वयमेवानुबोभूयते इत्यादिना सर्वविभक्तीनां सर्वकर्मवच- नानि दर्शनीयानि । बोभुवत्, अत्र इयुक्तात्परस्यान्तो नस्य लुक् । स्यप्रत्ययेन व्यवहितस्य तु न । बोभविष्यन् । अनुबोभूयमानम्, अनुबोभविष्यमाणम् , अनु बोभाविष्यमाणम्। बोभवांश्चकृवान् , बभूवान् , आसिवान् ॥भाक॥ अनुबोभ- वांश्चक्राणम्, बभूवानम्, आसानम् । “क्त्त्वा"।४।३।२९॥ इति सेट् क्त्वा न कित् बोभविवा, अनुबोभूय । बोभुविरतः, वान् । बोभवि३ता, तुम्, तव्यम्, एवमन्येऽपि उदूदन्ताः । स्तु, पूप्रभृतयो धातवः सर्वेऽपि यङ्लुबन्तभूवद् अद्यतनीकर्तृवर्ज विज्ञातव्याः ॥ उच्चारस्वेवम् :-तोष्टवीति, तोष्टोति, तोष्टुत इत्यादि । पोपवीति, पोपोति, पोपूत इत्यादि ॥ अद्यतन्यां कर्तरि पुनरेवम् :-अतोष्टावीत् , अतोष्टावि- भ्वादिगणः। ३१ ष्टाम्, अतोष्टाविषुः, अतोष्टावीः, अतोष्टाविष्टम् , अतोष्टाविष्ट, अतोष्टाविषम्, अतोष्टाविष्व, अतोष्टाविष्म । एवं अपोपावीत्, अपोपाविष्टामित्याद्यपि । अत्र सर्वत्र सिचि इटि, “सिचि परस्मै-"॥४॥३॥४४॥इति वृद्धिः ॥ एवमुदूदन्तान्यधातुष्वपि ॥ किश्च अनुस्वारेतोऽननुस्वारेतो वा धातवः सनि यङि यङ्लुपि णिगि च सति बहु- स्वरत्वेन सर्वेऽपि सेट एव जायन्ते, “एकस्वरात्-"॥४४॥५६॥इत्यनेन इटो निषे- धाभावात्। नवरं कृतै नृतै घृतै प्रभृतीनां अल्पीयसां यङ्लुप्यपिक्तादौ यदनिट्त्वं सम्भवि तत् स्वस्थाने वक्ष्यते॥ अथ णिगन्तः॥भवन्तं प्रयुङ्क्ते भावयति, करो- तीत्यर्थः।भावयत्यनित्यतां ध्यायतीत्यर्थः। भावयतः, भावयन्ति, भावयास, भाव यथः, यथ, यामि, यावः, यामः । गित्त्वादात्मनेपदमपि । भावयते, भाव८येते, यन्ते, यसे, येथे, यध्वे, ये, यावहे यामहे ॥ भाक ॥ भावकर्मणोर्दीत इत्यर्थः। भाव्यते, भाव्यते, भा ७ व्यन्ते, व्यसे, व्यथे, व्यध्वे, व्ये, व्यावहे, व्यामहे ।। सप्तमी ॥ भावयेत् , भाघ८येताम्, येयुः, येः, येतम्, येत, येयम्, येव, येम । भाव९येत, येयाताम् , येरन्, येथाः, येयाथाम्, येध्वम्, येय, येवहि येमहि ॥ भाक ॥ भाव्येत, भाव्ये८याताम्, रन्, थाः, याथाम्, ध्वम्, य, वहि, महि ॥ पञ्चमी ॥ भाव १८ यतु, यताम् , यन्तु, य, यतम्, यत, यानि, याव, याम । यताम्, येताम्, यन्ताम्, यस्व, येथाम् , यध्वम् , यै, यावहै, यामहै ॥ भाक ॥ भा९व्यताम् , व्येताम्, व्यन्ताम्, व्यस्ख, व्येथाम्, व्यध्वम्, व्य, व्यावहै, व्यामहै ॥ ह्यस्तनी ॥ अभावयत्, अभाव८यताम् , यन् , यः, यतम्, यत, यम्, याव, याम॥अभाव९यत, येताम्, यन्त, यथाः, येथाम् , यध्वम्, ये, याव. हि, यामहि ॥ भाक॥अभाव्यत, अभा८व्येताम्, व्यन्त, व्यथाः, व्येथाम् , व्य- ध्वम्, व्ये, व्यावहि, व्यामहि ॥अद्यतनी। भूणिग् भावि, दि णौ यत्कृतं तत्सर्व. इति न्यायात् भूहित्वं हस्वः “उपान्त्यस्यास"॥४॥२॥३५॥ हस्वः। “असमानलोप." ॥४।१।६३॥इति सन्वद्भावात् “ओर्जान्तस्था-"॥४।१६०॥ ओः इः, "लघोर्दी-"॥४॥ ११६४॥अबीभवत् , अबीभवताम्, अबीभवन्, अबीभवः, अबीभवतम्, अबीभवत, अबीभवम् , अबीभवाव, अबीभवाम ॥ अबीभवत, अबीभवेताम्, अबीभवन्त, अबीभवथाः, अवीभवेथाम् , अबीभवध्वम्, अबीभवे, अबीभवावहि; अबीभवा- ३२ क्रियारत्नसमुच्चयः। महि ॥ भाक ॥ निचि अभावि, निटि लुंकि अभाविषाताम्, अभावि ९ षत, ष्ठाः, षाथाम्, ध्वम्, वम् , ड्ठम्, षि, वहि, महि ॥ इटि अभाव- यि१०षाताम् , षत, ठाः, षाथाम् , ध्वम् , ट्वम् , ड्ढम् , षि, ष्वहि, महि ॥परोक्षा। “आमन्ताल्व-" ॥४॥३८५॥ इति अयि भावयाञ्चकार, भावयाश्चक्रतुः, भावयाश्च- क्रुः,कर्थ, क्रथुः, क्र, कर, कार, कृव, कृम। आत्मनेपदे भावयाश्चक्रे, भावयाश्च- काते, किरे, कृषे, काथे, कृवे, के, कृवहे, कृमहे ॥ भावयाम्बभूव, भावांव- भूवतुः, दुः, विथ, वथुः, व, व, विव, विम । णिगन्ताद्भूधातोरात्मनेपदेऽनु- प्रयुज्यमानाच्च परस्मैपदे भावयांबभू९व, वतुः, युः, विथ, वथुः, व, व, विव, विम। भावयामास, भावयामा सतुः, सुः, सिथः, सथुः, स, स, सिव, सिम ॥ भाक॥ भावयाञ्चक्रे, भावयाञ्च८काते, क्रिरे, कृषे, काथे, कृट्वे, के, कृवहे, कृमहे ॥ भायवांबभूवे, भावयांबभू९वाते, विरे, विषे, वाथे, विध्वे, विवे, वे, विवहे, विमहे । भावयामाहे, भावयामा८साते, सिरे, सिषे, साथे, सिध्वे, हे, सिवहे, सिमहे ॥ आशीः॥ भाव्यात्, भा८व्यास्ताम्, व्यासुः, व्याः, व्यास्तम्, व्यास्त, व्यासम्, व्यास्व, व्यास्म ॥ भावयिषीष्ट, भावयि९षीयास्ताम् , षीरन्, षीष्ठाः, षीयास्थाम्, षीध्वम्, षीढ्वम्, षीय, पीवहि, धीमहि ॥ भाक ॥ मिटि गे कि भाविषीष्ट, भावि९षीयास्ताम्, षीरन् , षष्ठिाः, षीयास्थाम् , षीध्वम्, षीदवम्, षीय, षीबहि, षीमहि। इटि भावयिषीष्ट, भावयि९षीयास्ताम् , इत्यादि ॥श्वस्तनी ॥भाव- यिता, भावयितारो, तारः, तासि, तास्थः, तास्थ, तास्मि, तावः, तास्मः ॥ भावयि९ता, तारौ, तारः, तासे, तासाथे, ताध्वे, ताहे, तास्वहे, तास्महे ॥भाक ॥ मिटि भाविता, भाविःतारौ, तारः, तासे, तासाथे, ताध्वे, ताहे, तास्वहे, तास्महे । इटि भावयिता, भावयिस्तारौ इत्यादि ॥ भविष्यन्ती ॥ भावयिष्यति, भावयिष्यतः, भावयि१६ष्यन्ति, प्यसि, व्यथः, ष्यथ, ष्यामि, ष्यावः, ष्यामः । प्यते, ष्येते, ष्यन्ते, प्यसे, येथे, ष्यध्वे, ष्ये, व्यावहे, ज्यामहे ॥ भाक ॥ भाविष्यते, भाविप्येते, ष्यन्ते, व्यसे, प्येथे, प्यध्वे, ष्ये, व्यावहे, ज्यामहे ।। भावयिष्यते, भावयिष्येते इत्यादि । क्रियातिपत्तिः ॥ अभावयिष्यत् , अभा- वयि १६ ष्यताम्, ष्यन्, ष्यः, ष्यतम्, ष्यत, प्यम्, प्याव, ष्याम । ष्यत, भ्वादिगणः प्येताम् , ष्यन्त, प्यथाः, ष्येथाम्, प्यध्वम्, ष्ये, व्यावहि, ष्यामहि ॥ भाक ॥ जिटि अभाविष्यत, अभाविष्येताम्, ष्यन्त, ष्यथाः, प्येथाम्, प्यध्वम् , ष्ये, प्यावहि, ष्यामहि । इटि अभावयिष्यत, अभावयिष्येताम्, प्यन्त, व्यथाः, प्येथाम्, ष्यध्वम् इत्यादि । कर्मकर्त्तरि सर्वस्मात् ण्यन्ताद्धातोः “एकधातो कर्म-" ॥३४॥८६॥ इति मिनिटक्यात्मनेपदेषु प्राप्तेषु "णिस्नुश्य-" ॥३॥४.९२॥ इति निचो निषेधनेन निटो विधानात्, “भूषार्थसन्-" ॥ ३ । ४ । ९३ ॥ इति क्यस्य निषेधाच्च, जिट् आत्मनेपदं च स्याताम् । अनुभवति विषय- सुखं चैत्रः तं मैत्रः प्रयुङ्क्ते अनुभावयति विषयसुखं चत्रेण मैत्रः । स एवं विवक्षते नाहमनुभावयामि किन्तु अनुभावयते विषयसुखं स्वय- मेव । यदि वा खयमनुभूयमानं विषयसुखं स्वं प्रयुङ्क्ते अनुभावयते वि- षयसुखं स्वयमेव। एवमनुभावयेत, अनुभावयताम्। अन्वभावयत । अन्वबीभवत। इटि अनुभावयिषीष्ट । मिटि अनुभाविषीष्ट । अनुभावयिता, अनुभाविता। अनुभा. वयिष्यते, अनुभाविष्यते, वा विषयसुखं स्वयमेव । एवं द्विवचनादीन्यपि नि- दर्शनीयानि । भावयन् । भावयन्ती । भावयत् । भावयिष्यन् । भावयिष्यन्ती । भावयिष्यती । भावयिष्यत् । भावयमानः । भावयिष्यमाणः ॥ भाक ॥ भाव्य- मानम् । इटि भावयिष्यमाणम् । मिटि भाविष्यमाणम् । भावयांचक्राणः।भाव. यां३चकृवान् , बभूवान् , आसिवान् ॥ भाक ।। भावयां३चक्राणम्, बभूवानम्, आसानं वा ।भावयि३ता, त्वा, तुम् । यपि अनुभाव्य । “सेटक्तयोः"॥४॥३८४॥ इति गेहूंकि भावितः, २ वान् । एवं सर्वे णिगन्ताः णिजन्ताश्च चौरादिका नाम- धातवोऽपि च सर्वे सर्वविभक्तिषु कर्मकर्तरि शत्रादिप्रत्ययेषु च णिगन्तभूव- निर्विशेषं निरूपणीयाः । नवरमद्यतन्यां कर्तरि के कचन यो विशेषः सम्भवी सोऽग्रे वक्ष्यते । अत एवाग्रे णिणिजन्तधातूनां यथा स्वस्थानं रूपमात्रम्, उप्रत्यये रूपविशेषश्चाविष्करिष्यते न पुनः शेषविभक्तिविस्तर इति ज्ञेयम् । यङन्तात् सनि बोभूयिषते। "पुनरेकेषाम्॥४।१।१०॥ इति पुनर्दित्वे बुबोभूयिषते। यङ्लुबन्तात्सनि बोभविषति । अनेकस्वरत्वात् “ग्रहगुहश्च-" ॥४|४|५९॥ इति इनिषेधो न भवति णिगन्तात्सनि बिभावयिषति, ते । अत्र पौ यत्कृतम् .

क्रियारत्नसमुच्चयः । ॥ इति भूहित्वे “ ओर्जान्तस्थ-" ॥ ४ । १ । ६० ॥ इति इः। सन्नन्ताप्णिगि बुभूषयति, ते। यङन्ताण्णिगि बोभूययति, ते । यङ्लुबन्ताण णिगि बोभु- वतं प्रयुङ्क्ते बोभावयति, ते । णिगन्ताण णिगि, भावयति, ते । अत्र "णेरनिटि"॥४।३।८३॥ इति आद्यणिग्लुक् । अतत्सन इति वचनादिच्छासन्न- न्तात् सन्नास्ति, यङ् च सन्यब्यङ्लुबन्तेभ्यो बहुस्वरत्वेन नागच्छति, “व्यञ्ज- नादेरेकस्वरात्-'॥३।४।९॥ इति भणनात् । एवं सर्वधातुषु सणिगादिसंयोगाः स्वयं वेदितव्याः॥१॥ अथ तृवर्जाः २४ अनिटोऽनुस्वारेत्त्वात् ॥ पां पाने ॥ वर्तमाना ॥ पिबति, पिबतः, पिबन्ति ।"श्रौति-"॥४।२।१०८॥इति पिबादेशस्यादन्तत्वान्न शवि गुणः। व्यतिपि९बते, बेते, बन्ते॥भाक ॥"ईर्व्यञ्ज-"॥४।३।९७॥ई। पीयते, पीयेते, पीयन्ते इत्यादि ॥ सप्तमी॥ पिबेत, पि८बेताम्, बेयुः, बेः, बेतम् . बेत, बेयं, बेव, बेम । व्यतिपिबेत॥भाक ॥ पीयेत, पीयेप्याताम्, रन् , थाः, याथाम्, ध्वम् , य, वहि, महि ॥ पञ्चमी॥ पिबतु, पिबतातू , पिबताम् , पिबन्तु, पिब, पिबतात् , पिबतम् , पिबत, पिबानि, पिबाव, पिबाम । व्यतिपिबताम् ॥ भाक || पीयताम् , पीये- ताम् , पीयन्ताम्॥ ह्यस्तनी ॥ अपिबत् , अपि८बताम् , बन, बः, बतम् , बत, बम् , बाव, बाम ॥ व्यत्यपिबत ॥ भाक ॥ अपी ९ यत, येताम् , यन्त, यथाः, येथाम्॥अद्यतनी॥ “पिबैति-"॥४।३।६६॥ इति सिचो लुप् । अपात्, अपा- " सिज्विद-"॥ ४ ॥२॥ ९२ ॥ इति पुसि अपुः, अपाः, अपातम् , अपात, अपाम्, अपाव, अपाम् । व्यत्यपा ५ स्त, साताम्, सत, स्थाः, साथाम् । “सो धि वा"॥४।३।७२॥ इति वा सो लुकि, पक्षे “तृतीयस्तृतीय-"॥१।३।४९॥ इति सो दत्वे व्यत्यपाएध्वम्, इम्, सि, स्वहि, स्महि ॥भाक ॥ “आत ऐः-१॥४॥३॥५३॥ अपायि । वा मिटि अपायिषाताम् , अपायि ९ षत, ठाः, षाथाम्, ध्वम् , दवम्, ड्वम् , षि, वहि, महि । पक्षे अपासाताम् , अपा ८ सत, स्थाः, साथाम्, द्ध्वम्, ध्वम् , सि, म्वहि, स्महि ॥ परोक्षा ॥ पपौ, "इडेत्पुसि च-"॥४॥३९४ ॥ इति आल्लुकि, पपतुः, पपुः, पपाथ, पपिथ, “सृजिहाश-"॥४४७८॥ इति वेट, पपथुः, पप, मपौ, पपिव, पपिम॥भाक ॥ पपे, पपाते, पपिरे, पपिपे, पपाथे, पपिध्वे, ताम्;

भ्वादिगणः। ३५ पपे, पपिवहे, पपिमहे ॥ आशीः ॥ पेयात्, पेयास्ताम् , पेयासुः, पेयाः, पेयास्तम्, पेयास्त, पेयासम्, पेयाख, पेयास्म ॥ भाक ॥ पायि १० षीष्ट, पीयास्ताम् , षीरन् , पीष्ठाः, षीयास्थाम्, पीध्वम्, षीट्वम्, षीय, पीवहि, धीमहि ॥ पक्षे, पा९सीष्ट, सीयास्ताम् , सीरन्, इत्यादि ॥ श्वस्तनी ॥ पाता, पातारौ, पातारः, पातासि ॥ भाक ॥ पाता, पायिता, पातारौ, पायितारौ० ॥ भविष्यन्ती ॥ पास्यति, पास्यतः, पास्यन्ति, पास्यसि ॥ भाक ॥ पास्यते, पायिष्यते, पास्येते, पायिष्येते, पास्यन्ते, पायिष्यन्ते०॥ क्रियातिपत्तिः॥ अपा९स्यत् , स्यताम्, स्यन् , स्यः, स्यतम् ॥ भाक ॥ अपा१८स्यत, यिष्यत, स्येताम् , यिष्येताम् , स्यन्त, यिष्यन्तः ॥ आशीरादिषु ४ भावकर्मणोज॑िट् सर्वत्र विकल्प्यः ॥ सनि, पिपा- सति ॥ भाक ॥ पिपास्यते । यङि पेपीयते, अत्र प्राक् तु खरे इत्यधिकारात् "ईर्व्यञ्जन-"॥४।३।९७॥ इति प्राग ईः पश्चात्तु द्वित्वम्, यङोव्यञ्जनादित्वात् , एव- मग्रेऽपि ॥ भाक ।। पिपीय्यते । शेषं सन्यङ्न्तभूवदित्युक्तं पुराऽपि लुपि पापेति, पापाति । "श्रौति-"॥२॥१०८॥ इति प्रकृतिग्रहणेन प्राप्तोऽपि अत्यादावित्यधि- कारान्न पिबादेशः। शतरि तु पापेतीति वाक्ये द्वित्वापन्नस्य पिबादेशे पिबत् इति स्यात् । एवं घ्राध्मोरपि । क्ते, पापिरतः, वान्। पापि३त्वा, तुम् , ता, लुपि शेषं स्थास्थाने ऽतिदेक्ष्यते, णिगि, “पाशा-"॥४२॥२०॥ इति ये, पाययति । फलवति "चल्याहार-"॥३।३।१०८॥ इति परस्मैपदे प्राप्तेऽपि “परिमुह-"॥३।३।९४॥ इत्यात्म- नेपदे, पाययते बटुम्॥अद्यतनी ॥ “पियः पीप्य्॥४।१।३३॥ इति पीप्यः। अपी- प्यत, अपी८प्यताम् , प्यन्, प्यः, प्यतम् , प्यत, प्यम्, प्याव, प्याम । अपी९प्यत, प्येताम्, प्यन्त०॥भाक॥ अपायि, अपायिषाताम्, अपाययिषाताम्, अपायिषत, अपाययिषत०॥डे पिबः-४।१।३३॥ इत्यत्र लुप्ततिनिर्देशात् यङ्लुपि न पीप्यः। अपापयत् , शेषं भूवत्। पिबन् । पीयमानम् । पास्यन् । पास्यमानम् , पायिष्य- माणम् । पपिवान् । पपानम् । पीरतः, वान्। पीत्वा । निपाय। निपीय इति तु पीडो भविष्यति । पातुम्। पाता। पेयम्। पातव्यम्। पानीयम्॥ २ ॥ घ्रां गन्धोपादाने॥ "श्रौति-॥४।२।१०८॥ इति जिघ्रः। जिघ्रति, जिघ्रतः॥ भाक ॥ घ्रायते, घ्रायेते॥अद्यतनी ॥ "टेघाश-"॥४।३।६७॥ इति वा सिच्लुप् । अ- ,

क्रियारत्नसमुच्चयः ।
लोपे च “यमिरमिनम्यातः-"॥४॥८६॥ इति इट् सोऽन्तश्च, अघ्रात्, अघ्रासीत्,
अघ्राताम् , अघ्रासिष्टाम् , अघ्रः, अघ्रासिषुः, अघ्राम, अघ्रासिष्म ॥भाक॥अघ्रायि,
अघ्रासाताम् , अघायिषाताम्॥परोक्षा॥जघौ, जघिथ, जघ्राथ, जधिम॥भाक।
जले०॥आशीः॥ "संयोगादेर्वाशिष्येः॥४॥३९५॥ इति वा एः घेयात्, घ्रायात्,
घेयास्म, घायास्म । शेषासु पांवत् । सनि जिघ्रासति । यङि व्यञ्जनादिवेन
"घ्राध्मोः-"॥४।३।९८॥ इति द्वित्वात् प्राग ई., जेधीयते। लुपि तु न ईः, जाति,
जाघ्राति, जाघीतः । अत्र “एषामी:-" ॥४।२।९७॥ इति ईः ॥ अन्ये तु यङ्लु-
प्यपि “घ्राध्मोः"॥४।३।९८॥ इति ईत्वमिच्छन्ति । जेघीतः। एवं ध्मोऽपि,
देध्मीतः। शतरि तु जिघ्रत्, धमत् । शेषं यङ्लुपि त्रैवत् । णौ विशेषबोधार्थ-
वात् “गतिबोध-"॥२॥२५॥ इत्यणिक्कर्तुः कर्मवे चैत्रो मैत्रं गन्धं घ्रापयति। ये तु
दृशेरन्यस्य विशेषबोधार्थस्य नेच्छन्ति तन्मते घ्रापयति मैत्रेण चैत्रः ॥ भाक ॥
घ्राप्यते। डे, “जिघ्रतेरिः"॥१२॥३८॥ इति उपान्त्यस्य वा इः, अजिघ्रपत्, अजि.
घ्रिपत् । “जिघ्रतेः ॥१२॥३८॥ इति तिन्निर्देशात् यङ्लुपि णौ न इः अजाघ्र-
पत् । जिघ्रन् ।घ्रास्यन् । प्रायमाणम्। “ग्रही-॥४।२७६॥ इति वा नये, घारणः,
वान् , घारतः, वान्, घ्रा३ता, तुम्, वा। आघ्राय । घातव्यम् । प्रेयम् ॥ ३ ॥
ध्मां शब्दाग्निसंयोगयोः । शब्दे मुखादिना चाऽग्निसंयोगे "श्रौति-"॥१२॥
१०८॥ इति धमादेशे, शङ्खमङ्गारान् वा धमति ॥ भाक ॥ ध्मायते।अद्यतनी ॥
मध्मा९सीत् , सिष्टाम्, सिषुः० ॥ भाक ॥ अध्मायि, अध्मासाताम्, अध्मायि-
षाताम्॥ सनि दिध्मासति । यङि देध्मीयते। णौ ध्मापयति । डे, अदिध्मपत् ।
ध्मातः२, वान् । शेषं घ्रांवत् ॥ ४॥
ष्ठां गतिनिवृत्तौ॥वर्त्तमाना ॥"श्रौति-"॥४।२।१०८॥ इति तिष्ठादेशे, तिष्ठति।
"अधेः शीस्थास-'॥२॥२॥२०॥ इत्याधारस्य कर्मत्वे, गृहमधितिष्ठति, प्रतितिष्ठति;
अनुतिष्ठति ॥ तिष्ठतः, तिष्ठन्ति, तिष्ठसि०, तिष्ठामः। "देवा मैत्री-"॥३३॥६॥
इत्यनेनोपात्कर्त्तर्यात्मनेपदे जिनेन्द्रमुपतिष्ठते, रथिकानुपतिष्ठते, गङ्गा यमुनामुप-
तिष्ठते, अयं पन्थाः स्रुघ्नमुपतिष्ठते, ऐन्या गार्हपत्यमुपतिष्ठते । “वा लिप्सायाम्"
॥३॥३।६१॥.भिक्षुर्दातृकुलमुपतिष्ठरते, ति वा । “उदोऽनूइँहे" ॥ ३ ॥ ३॥६२ ॥

भ्वादिगणः ।
मुक्तावुत्तिष्ठते। “संविप्रावात्"॥३॥३६३॥ संतिष्ठते, प्रतिष्ठते इत्यादि ॥ “ज्ञीप्सा-
स्थेये"॥३३॥६॥ तिष्ठते कन्या च्छात्रेभ्यः, “श्लाघगुस्था-'||२।२।६०॥ इति चतुर्थी।
संशय्य कर्णादिषु तिष्ठते यः । “प्रतिज्ञायाम्" ॥३३॥६५॥ तदतदात्मकं तत्त्व.
मातिष्ठते । “उपास्थः"॥३।३।८३॥ इति कर्मण्यसति, भोजने उपतिष्ठते, प्रतिष्ठते,
प्रतिष्ठेते, प्रतिष्ठन्ते ॥ भावे, “ईर्व्यञ्ज-४।३।९७॥ ईः, स्थीयते, उत्थीयते ।
कर्मणि, केवलस्य कर्माभावत् अनुपूर्वो दर्यते । “स्थासेनि-"॥२ ॥ ३ ॥४०॥
इति षत्वे अनुष्ठी ९ यते, येते, यन्ते, यसे० ॥ सप्तमी ॥ तिष्ठेत् , तिष्ठेताम्,
तिष्ठेयुः, तिष्ठेः ॥ प्रतिष्ठेत, प्रतिष्ठेयाताम्, प्रतिष्ठेरन् ॥ भावे, स्थीयेत ॥
कर्मणि, अनुष्ठी९येत, येयाताम् , येरन् ॥ पञ्चमी॥ तिष्ठतु, तिष्ठताम् , तिष्ठन्तु,
तिष्ठ, तिष्ठानि । प्रति९ष्ठताम्, ष्ठेताम्, छन्ताम्, ठस्व, ठेथाम् ॥ भावे,
स्थीयताम् । कर्मणि, अनुष्ठी९यताम् , येताम्, यन्ताम् ॥ ह्यस्तनी ॥ अति.
९ष्ठत् , ष्ठताम्, ठन्॥ प्रातिष्ठत, प्रातिष्ठेताम्, ष्ठन्त, ठथाः ॥ भावे,
अस्थीयत ॥ कर्मणि अन्वष्ठी९यत, येताम्, यन्त, यथाः, येथाम्, यध्वम् ,
ये०॥ अद्यतनी ॥ "पिबैति-"॥४।३।६६॥ इति सिचो लुप्, अस्थात् । “स्थासेनि"
॥२।३।४०॥ इति अड्व्यवधानेऽपि षले
अध्यष्ठात्, प्रत्यष्ठात्, अस्थाताम्, अस्थुः,
"सिञ्चिदो-४।२।९२॥ इति पुस् । अस्थाः, अस्थातम्, अस्थात, अस्थाम् ,
अस्थाव, अस्थाम । प्रास्थित, “इश्च स्थादः ॥ ४।३।४१॥ इति इः, सिच्
किच्च, “धुहस्व-"॥४।३।७०॥ इति सिच्लुक् । प्रास्थिषाताम्, प्रास्थिषतं,
प्रास्थिज्याः, षाथाम्, ट्वम्, डवम्, षि, वहि, महि ॥ भावे, अस्थायि ।
कर्मणि त्रिचि, अन्वष्ठायि । “खरग्रह-"॥३।४।६९॥ इति वा ब्रिटि, अन्वष्ठायि-
षाताम्, अन्वष्ठिषाताम्, अन्वष्ठायिषत, अन्वष्ठिषत, अन्वष्ठायिष्ठाः, अन्वष्ठि-
थाः, अन्वष्ठायिषाथाम् , अन्वष्ठिषाथाम् , अन्वष्ठायि३ध्वम्, ट्वम्, ड्ढम् । अत्र
" सो धि-" ॥४३॥७२॥ इति वा सिच्लुक् “हान्त-" ॥२।१८१॥ इति वा ढश्व,
पक्षे सिचः षत्वडवे धो ढः, अन्वष्ठिरवम् , ड्वम् । “इश्व-"॥४३॥४१॥ इति
षले, “सो धि"॥४॥३॥७२॥ इति वा सिच्लुकि, “ म्यन्त-"॥२।१।८०॥ इति
नित्यं ढः । पक्षे सिचो “ नाम्यन्त-गा।३।१५॥ इति षवे "तृतीय-"॥१॥३॥४९॥

३८ क्रियारत्नसमुच्चयः । इति डवे “तवर्गस्य-"॥१।३।६०॥ इति धो ढः। अन्वष्ठायिषि, अन्वष्ठिषि, अन्व- ठायिष्वहि, अन्वष्ठिष्वहि, अन्वष्ठायिष्महि, अन्वष्ठिष्महि ॥ परोक्षा ॥ तस्थौ "स्थासेनि"।।३।४०॥ इति द्वित्वेऽपि षत्वे, अधितष्ठौ, तस्थतुः, तस्थुः। सृजिद्दशि-" ॥४।४।७८॥ इति वेटि, तस्थिथ, तस्थाथ, तस्थथुः, तस्थ, तस्थौ, तस्थिव, तस्थिम । प्रत९स्थे, स्थात, स्थिरे, स्थिषे, स्थाथे, स्थिध्वे, स्थे, स्थिवहे, स्थिमहे॥भावे तस्थे । कर्मणि अनुत ९ठे, ठाते, ष्ठिरे, ष्ठिषे, ठाथे, ठिध्वे, ठे, ष्ठिवहे, ष्ठिमहे ॥ आशीः ॥ स्थेयात्, स्थेयास्ताम्, स्थेयासुः, स्थेयाः, स्थेयास्तम्, स्थेयास्त, स्थेयासम्, स्थेया. स्व, स्थेयास्म ॥ प्रस्था९सीष्ट, सीयास्ताम् , सीरन्, सीष्ठाः, सीयास्थाम्, सीध्वम्, सीय, सीवहि, सीमहि ॥ भावे ॥ स्थायिषीष्ट, स्थासीष्ट ॥ कर्मणि वा ब्रिटि अनुष्ठायि१०षीष्ट, पीयास्ताम्, षीरन्, षीष्ठाः, पीयास्थाम्, पीध्वम्, षीट्वम्, पीय, पीवहि, धीमहि ॥ पक्षे, अनुष्ठा९सीष्ट, सीयास्ताम् , सीरन् इत्यादि ॥ श्वस्तनी ॥ स्थाता, स्थातारी, स्थातारः ॥ प्रस्थाता, प्रस्थातारौ, प्रस्थातारः, प्रस्थातासे ।। भावे स्थायिता, स्थाता । कर्मणि अनुष्ठा ९ ता, तारो, तारः, तासे इत्यादि । अनुष्ठायि९ता, तारौ, तारः, तासे इत्यादि ॥ भविष्यन्ती ॥ स्थास्यति, अधिष्ठा- स्यति, प्रतिष्ठास्यति, स्थास्यतः० ॥ प्रस्थास्यते, प्रस्थास्येते, प्रस्थास्यन्ते ॥ भावे स्थायिष्यते, स्थास्यते ॥ कर्मणि अनुष्ठायिष्यते, अनुष्ठास्यते, अनुष्ठायि- प्येते, अनुष्ठास्यते, अनुष्ठायिष्यन्ते, अनुष्ठास्यन्ते॥ क्रियातिपत्तिः॥ अस्थास्यत् , अध्यष्ठास्यत् । अस्था८स्यताम् , स्यन् , स्यः०॥ प्रास्था९स्यत, स्येताम्, स्यन्त, स्यथाः०॥ भावे अस्थायिष्यत, अस्थास्यत। कणि वा ब्रिटि, अन्वष्ठायि९ष्यत, प्येताम् , ष्यन्त०॥ पक्षे अन्वष्ठा९स्यत, स्येताम् , स्यन्त इत्यादि। सनि, तिष्ठासति; संतिष्ठासते; अवतिष्ठासते । यङि, तेष्ठीयते। यङ्लुपि, तास्थेति। "श्रौति-" २।१०८॥ इत्यत्रात्यादावित्यधिकारान्न तिष्ठः; तास्थाति, तास्थीतः, एषाम् “ईय॑ञ्ज." ॥४॥३९७॥ ई। तास्थति,“नश्चातः॥४।२।९६॥ इति आलोपः। तास्थेषि, तास्थासि, तास्थीथः, तास्थीथ, तास्थेमि, तास्थामि, तास्थीवः, तास्थीमः॥भाक॥क्ये, अनुता- प्ठीयते, अनुताष्ठी८येते, यन्ते, यसे, येथे, यध्वे, ये, यावहे, यामहे ॥ सप्तमी । तास्थी९यात्, याताम् , युः, याः, यातम्, यात, याम्, याव, याम ॥ भाक ॥

भ्वादिगणः। ३९ , अनुताष्ठी९येत, येयाताम् , येरन् , येथाः, येयाथाम्, येध्वम् , येय, येवहि, येमहि ॥ पश्चमी ॥ तास्थेतु, तास्थातु, तास्थीतात् , तास्थीताम् ,तास्थतु, तास्थीहि, तास्थी- तात्, तास्थीतम्, तास्थीत, तास्थानि, तास्थीव, तास्थीम॥ भाक ॥ अनुताष्ठी- ९यताम् , येताम्, यन्ताम् , यस्ख, येथाम्, यध्वम् , यै, यावहै, यामहै ॥ह्यस्तनी॥ अतास्थेत्, अतास्थात्, अतास्थीताम् , अतास्थुः, अतास्थेः, अतास्थाः, अता- स्थीतम्, अतास्थीत, अतास्थाम् , अतास्थीव, अतास्थीम ॥ भाक ॥ अन्वता- ष्ठीयत, अन्वताष्ठी८येताम् , यन्त, यथाः, येथाम् , यध्वम् , ये, यावहि, यामहि। अद्यतनी ॥अतास्थात्, "पिबैति-"॥४॥३॥६६॥ इति सिच्लुप् नेट् च। अतास्थीताम्, अतास्थुः,अतास्थाः, स्थातम् , स्थात, स्थाम् , स्थाव, स्थाम॥भाक॥ अन्वताष्ठा- यि। जिटि अन्वताष्ठायि १० षाताम्, षत, प्ठाः, षाथाम्, ध्वम् , ढ्वम् , ड्ढम् , षि, वहि, ष्महि ॥ परोक्षा ॥ तास्थांचकारेत्यादि९ । तास्थांबभूवेत्यादि । तास्था- मासेत्यादि ९॥ भाक ॥ अनुताष्ठांचक्रे ९ । अनुताष्ठांबभूवे ९ । अनुताष्ठामाहे ९, मासाते, मासिरे ९॥ आशीः ॥ तास्थे९यात् , यास्ताम् , यासुः, याः, यास्तम्, यास्त, यासम् , याख, यास्मं । “गापास्थासा-॥४।३।९६॥ इति एः॥भाक॥ अनुताष्ठा- यि १० षीष्ट, पीयास्ताम्, पीरन् , पीष्ठाः, षीयास्थाम्, षीदवम्, पीध्वम् , पीय, षीवहि, धीमहि । अनुताष्ठि९षीष्ट, पीयास्ताम् , षीरन् , षीष्ठाः, षीया. स्थाम् , षीध्वम् ॥ श्वस्तनी । इटि तास्थिरता, तारो, तारः, तासि० ॥ भाक॥ अनुताष्ठायि९ता, तारो, तारः, तासे, तासाथे० ॥ अनुताष्ठि९ता, तारौ, तारः, तासे, तासाथे० ॥ भविष्यन्ती ॥ तास्थि९ष्यति, प्यतः, ष्यन्ति० ॥ भाक ॥ अनुताष्ठायि ९ ष्यते, प्येते, ष्यन्ते, ष्यसे०॥ अनुताष्ठि ९ ष्यते, प्येते, ष्यन्ते ॥ क्रियातिपत्तिः॥ अतास्थि९प्यत्, प्यताम्, प्यन्, ष्यः, प्यतम् ० ॥ भाक ॥ अन्वताष्ठायि ९ ष्यत, प्येताम्, प्यन्त, प्यथाः० । अन्वताष्ठिष्यत, प्येताम् ॥क्ते, तास्थितः, २ वान्। तास्थित्वा । प्रतास्थाय । तास्थितुम् । शतरि तु"श्रौतिकृवु." ॥४।२।१०८॥ इत्यत्र प्रकृतिग्रहणात्तिष्ठादेशे तिष्ठत्। यङ्लुबन्तात् सनि तास्थि- पति । “पुनरेकेषाम् ॥४१॥१०॥ इति पुनहिले तितास्थिषति । एवं "गापास्था- सा-"॥४।३।९६॥ इति सूत्रोक्ता हांक वर्जाः पञ्चदश धातवो यङ्लुपि , क्रियारत्नसमुच्चयः । स्थावदभ्यूहनीयाः ॥ तत्र पिबतेः सर्व स्थातुल्यम् । दासंज्ञानां तु षण्णां यः शिति विशेषः सम्भवी स स्वस्थानेऽग्रे वक्ष्यते । गादीनां तु पुनरष्टानां स्थासका- शादय विशेषः यदुताद्यतनी पदस्मैपदे सिचि “यमिरमिनम्यात:-" ॥४४१८६।। इत्यनेन इट् सोन्तश्च स्यात् नतु सिचो लुप्, गाङ् मैं वा ॥ अजागासीत्, अजागासिष्टाम्, अजागासिषुः, अजागासीः, अजागासिषम् , अजागासिष्म । एवं पैं, अपापासीत् । सो मैं वा; अवासासीत् । मांक मांङ् मेङ् वा; अमामासीत्, अमामासिष्टामित्यादि। तथा शतरि "श्नश्च-"||२।९६॥ इति आ लुकि जागत्, पापत्, अवसासत्, मामत्, इति स्यात् ; शेषं वेषां स्थातुल्यम् । उक्तेभ्यो- ऽन्ये तु सर्वेऽप्याकारान्ताः त्रैङः स्थाने वक्ष्यन्ते । अथ णिग् । स्थापयति, स्थापयतः ॥ भाक ॥ स्थाप्यते, स्थाप्येते. ॥ अद्यतनी ॥ अतिष्ठिपत्, अति- ष्ठिपताम् , अतिष्ठिपन्, “तिष्ठतेः”॥ ४।२।३९ ॥ इत्युपान्त्यस्य इः । तिन्निर्देशात् यङ्लुपि णौ न इः, अतास्थपत् । णिगन्तात्सनि, तिष्ठापयि- षति । णिगन्ताणिगि, स्थापयति द्रव्यं सत्येन । तिष्ठन् । तिष्ठन्ती । प्रति- ष्ठमानः स्थास्यन् । प्रस्थास्यमानः स्थीयमानम्, प्रस्थीयमानम्। स्थास्यमानम्, स्थायिष्यमाणम् । तस्थिवान्, तस्थुषी, तस्थिवत् । प्रतस्थानः । स्थित्वा । प्रस्थाय । उत्थाय । स्थितः, २ वान् । उत्थितः,२ वान् । “श्लिष्शीङ्-"॥५॥१॥९॥ इति वा कर्तरि क्ते, उपस्थितो गुरु शिष्यः। पक्षे कर्मणि, उपस्थितो गुरुः शिष्येण ॥ भावे उपस्थितं शिष्येण, अत्र दोसोमा." ॥४|४|११॥ इति इः। अनुष्ठितः, अत्र “स्थासेनि-॥२।३।४०॥ इति षत्वम्। सुस्थितो दुस्थित इत्यादौ तु उपसर्गप्रतिरूपका निपाता एते, इत्युपसर्गाभावान्न पलम् । स्था३ता, तुम् , तव्यम् । स्थेयम् । स्थानीयम् । “प्रात्स्थः” (उणादि-९२४) इति णिनि प्रस्था- स्यते, प्रस्थायी भविष्यति साधुः । “ग्रहादिभ्यो णिन्"॥५॥१॥५३॥ स्थायी॥५॥ म्नां अभ्यासे । "श्रौति-"॥४२॥१०८॥ इति मनः, आमनति, आमनतः, आमनन्ति ॥भाक ॥ आम्ना९यते, येते, यन्ते; शेषं ध्मांवत्। यङि तु विशेषः, आमाम्नायते ॥ ६ ॥ दाम् दाने।"श्रौति-"॥४।२।१०८॥ इति यच्छः, यच्छति धनम् ; प्रयच्छति, भ्वादिगणः - यल्छतः, यच्छन्ति ॥भाक॥"ईर्व्यञ्जने-"॥४।३।९७॥ई, दीयते, दीयेते, दीयन्ते ॥ सप्तमी ॥ यच्छेत् , यच्छेताम् ॥भाक ॥ दीयेत.॥ पश्चमी॥ यच्छतु, यच्छताम्॥ भाक ॥ दीयताम् ॥ ह्यस्तनी ॥ अयच्छत्० ॥ भाक ॥ अदीयत० ॥ डुदांग्क्, धातोरद्यतन्यादिषु सन्यङ्गिगादिषु च यानि रूपाणि वक्ष्यन्ते तान्येवास्यापि वक्तव्यानि । नवरं परस्मैपदमेव कर्तरि वाच्यमत्राव्यतिपूर्व चात्मनेपदमपि । दास्या संप्रयच्छते । दामः संप्रदानेऽधर्म्य आत्मने च”॥२।२।५२॥ इति सम्प्रदानात्तृतीया आत्मनेपदं च ॥ ७ ॥ जिं जिं अभिभवे । अयं जिधा । जयति जिन इति अकर्मकः; जयति शनिति सकर्मकः ॥ वर्तमाना ॥ जयति, जयतः, जयन्ति ॥ “परावेर्जेः" ॥३।३।२८॥ इत्यात्मनेपदे, पराजयते, विजयते, विजयेते, विजयन्ते ॥ भाक ॥ जीयते, जीयेते, जीयन्ते, जीयसे० एवं सप्तम्यादिषु ॥ अद्यतनी ॥ “सिचि परस्मै-" ॥४॥३॥४४॥ इति वृद्धिः, “सः सिज-"॥४॥३॥६५॥ इति ईञ्च, अजैषीत् , अजैष्टाम् , अजैषुः, अजैषीः, अजैष्टम्, अजैष्ट, अजैषम् , अजैष्व, अजैष्म । सिचो लुकः परत्वेऽपि नित्यत्वात् प्रागेव गुणे व्यजेष्ट, व्यजेषाताम् , व्यजेषत, ष्ठाः, षाथाम्, ढ्वम् , इवम् , षि, प्वहि, महि ॥ भाक ॥ अजायि, अजायि१०षाताम् , षत, प्ठाः, षाथाम् , ध्वम् , दवम् , ड्ढ्यम् , षि, प्वहि, ष्महि ॥ अजे९षाताम् , षत, प्ठाः, पाथाम् , वम् , ड्वम् , षि, प्वहि, प्महि ॥ परोक्षा ॥ "जेर्गिः सन्.” ॥४१॥३५॥ इति गिः, जिगाय, जिग्यतुः, जिग्युः, “ योऽनेकखरस्य "॥२।११५६॥ इति यत्वम् । जिगयिथ, जिगेथ, सृजि-"॥४|४|७८॥ इति वेट् । जिग्यथुः, जिग्य, जिगय, जिगाय, जिग्यिव, जिग्यिम ॥ विजिग्ये, विजिग्याते, विजिग्यिरे। हान्तस्थ-"॥२॥११८१॥ इति वा ढे विजिगिढ्वे, ध्वे०॥भाक ॥ जिग्ये, जिग्याते, जिग्यिरे, जिंग्यिषे, “ स्क्रस-” ॥४४८१॥ इतीट् । जिग्याथे, जिग्यिट्वे, जि- ग्यिध्वे, जिग्ये, जिग्यिवहे, जिग्यिमहे ॥ आशीः ॥ जीयात्, जीयास्ताम् , जीयासुः, जीयाः० ॥ विजे९षीष्ट, पीयास्ताम् , पीरन् , पीष्ठाः ॥ भाक ॥ जायिषीष्ट, जेषीष्ट, जायिषीयास्ताम् , जेषीयास्ताम् ॥ श्वस्तनी ॥ जेता, जेतारौ, जेतारः० ॥ विजेता९, तारो, तारः ॥ भाक ॥ जायिता, जेता, , .

क्रियारत्नसमुच्चयः । ४५ जायितारौ, जेतारो० ॥ भविष्यन्ती ॥ जेष्यति, जेष्यतः, जेष्यन्ति ॥ विजे९. प्यते, ज्येते, ष्यन्ते ॥ भाक ॥ जायिष्यते, जेष्यते, इत्यादि । क्रियातिपत्तिः ।। अजे९ष्यत् , ष्यताम् , ष्यन् । व्यजे९ष्यत, प्येताम्, प्यन्त०॥ भाक ॥ अजा- यिष्यत, अजेष्यत, अजायिष्येताम्, अजेप्येताम् ॥ सनि, जिगीषति; विजि- गीषते । यङि, जेजीयते ॥ भाक ॥ जेजीय्यते । यङ्लुपि जेजयीति, जेजेति, जेजितः, जेज्यति, “योऽनेकखरस्य"॥२।११५६॥ इति यत्वम्, जेजयीषि, जेजेषि, जेजिथः ॥ “परावेर्जेः॥३।३।२८॥ इत्यत्र प्रकृतिग्रहणे यङ्लुबन्तस्यापीति न्याया- दात्मनेपदे, विजेजिते, विजेज्याते, विजेज्यते ॥ भाक ॥ जेजीयते, जेजयिते ॥ सप्तमी ॥ जेजियात् । विजेज्यीत. ॥ भाक ॥ जेजीयेत०॥ पञ्चमी ॥ जेज- यीतु, जेजेतु, जेजितात् , जेजिताम् , जेज्यतु०॥ विजेजिताम्॥ भाक ॥जेजी- यताम्॥ ह्यस्तनी ॥ अजेजयीत्, अजेजेत्, अजेजिताम्, अजेजयुः, “युक्त-" ॥४।२।९३॥ इति पुस् “पुस्पौ”॥४।३।३॥ गुणः । व्यजेजित० ॥ भाक ॥ अजेजीयत. ॥ अद्यतनी ॥ “सिचि परस्मै-”॥४।३।४४॥ वृद्धौ, अजेजा. यात् , अजेजायिष्टाम् , अजेजायिषुः, अजेजायाः, अजेजायिषम् ॥ व्यजे- जयिष्ट० ॥ भाक ॥ अजेजायि, अजेजायिषाताम् , अजेजयिषातामित्यादि । परोक्षा ॥ जेजयांचकार, जेजयांबभूव, जेजयामासेत्यादि २७ । विजेजयां३चके, बभूव, आस इत्यादि २७ ॥ भाक ॥ जेजयांचवे इत्यादि २७ ॥ आशीः ॥ जेजीयात्, जेजीयास्ताम् ॥ भाक ॥ जेजायिषीष्ट, जेजयिषीष्टेत्यादि । श्वस्तनी ॥ जेजयिता० ॥ भाक ॥ जेजायिता, जेजयिता० ॥ भविष्यन्ती ॥ जेजयिष्यति । विजेजयिष्यते ॥ भाक ॥ जेजायिष्यते, जेजयिष्यते ॥ क्रियातिपत्तिः ॥ अजेजयिष्यत् ॥ भाक ॥ अजेजायिष्यत, अजेजयिष्यते. त्यादि, भावकर्मणोप्रिंटिटौ सर्वत्र विकल्प्यौ । जेज्यितः । जेजयित्वा । जेज- यितुम् । जेज्यत् । एवं चि, नी प्रभृतय इदीदन्ताः सर्वेऽपि यङ्लुपि जिवदवगन्तव्याः। नवरं श्रि क्षि प्रभृतयो ये संयोगाक्षरपूर्वा इदीदन्ताः स्युस्तेषां अविति शिति खरे " संयोगात्" ॥२॥१॥५२॥ इत्यनेन इय् आदेशः कार्यः, नतु यत्वम्। यथा-शेश्रियति, शेश्रियतु। चेक्षियति।चेक्षियतु। शेषं जितुल्यम् ।

भ्वादिगणः । ४३ एवमन्यधातुष्वपि।णिगि “णौ क्रीजीङ:"|२|१०॥ इत्याले जापयति । डे, अजी- जपत् । शेष भूवत् ॥ णिगन्तात्सनि, जिापयिषति। यङन्ताणिगि जेजीययति, ते । यङ्लुबन्ताणिगि जेजापयति,ते। उ, अजेजपत् । यङ्लुबन्तात्सनि जेज- यिषति । णिगि सनि च जिजापयिषति । जयन्। जयन्ती। विजयमानः। जेष्यन् । जेष्यन्ती। विजेष्यमाणः ॥ भाक ॥ जीयमानम् । जेष्यमाणम्। ब्रिटि जायि- ष्यमाणम् । जिगिवान् । विजिग्यानः । जितः२, वान्। जिला। विजित्य । जेता । जेतुम्। जेतव्यम् । “क्षय्यजय्य-"॥४।३।९०॥ इति निपातनाज्जेतुं शक्यो जय्यः शत्रुः। शक्यं जेतुं जय्यं राज्ञा । शक्तेरन्यवाहें जेयोऽन्यः । जयनीयम् ॥ अत्र ब्रिस्त्यक्तः। अन्ये तु ख्रिस्थाने जूं इति ऋकारान्तं पठन्ति । जरति । ज्रियते । अजार्षीत् । जजार । जो । जग । जरिष्यति । जरन् । शेषं कृग्वत् ॥ ८॥ क्षि क्षये ॥ क्षयति । कर्मकर्तरि तु क्षीयते । कथं क्षयति देवदत्तः पदार्थ, स एवं विवक्षते नाहं क्षयामि, स्वयमेव क्षीयते।अपक्षीयते । उपक्षीयते॥ परोक्षा। चिक्षाय, चिक्षियतुः, चिक्षियुः, चिक्षयिथ, चिक्षेथ, चिक्षियिम०, शेष जिवत् , परं गिरादेशो न कार्यः । तथा कर्त्तरि क्ते “क्षेः क्षीच-"॥४।२।७४॥ इति क्तस्य नः, क्षीश्च, क्षीणः २, धान् मैत्रः । अधिकरणे, इदमेषां क्षीणम् ॥ भावे क्ते तु, क्षितमनेन । क्वि, क्षित्वा। "क्षेः क्षीः॥४॥३८९॥ इति क्षीः, प्रक्षीय, उपक्षीय। "क्षय्यजय्यौ-"४।३९०॥ इति निपातनात् शक्यःक्षेतुम् क्षय्यो व्याधिः। शक्यं क्षेतुं क्षय्यं बटुना । शक्तेरन्यत्र बर्हे क्षेयम् ॥९॥ इं दुं दुं शुंलुंगतौ । ई । अयति, उदयति०॥ भाक ॥ ईयते ॥ ह्यस्तनी॥ आयत्, आयताम् , आयन् ॥ भाक ॥ ऐयत, ऐयेताम् ॥ अद्यतनी ॥ ऐषीत् , ऐष्टाम् , ऐषुः॥भाक॥ आयि, आयिषाताम्, ऐषाताम् । ध्वमि, ऐड्वम्, ऐट्नम, आयिध्वम् , आयिट्ठम्, आयिड्ठम्। सर्वत्र "स्वरादेस्तासु"||३१॥ इति वृद्धिः।। परोक्षा ॥ इयाय, इयतुः, अत्र “ योऽनेकखरस्य" ॥२॥१॥५६॥ इति द्वित्वे सति यत्वम् , इयुः, इययिथ, इयेथ, इयथुः, इय; इयाय, इयय, इयिव, इयिम ॥ भाक। इये ॥आशीः॥ ईयात् ॥ भाक ॥ आयिषीष्ट, एषीष्ट० ॥ श्वस्तनी ॥ एता ॥ भाक ॥ आयिता, एता ॥ भविष्यन्ती॥ एष्यति, आ एष्यति “उपसर्गस्यानिणे-" ४४ क्रियारत्नसमुच्चयः। " ॥१२॥१९॥ इति आङ्लोपे, एष्यति, समेष्यति ॥ भाक ॥ आयिष्यते, एष्यते ॥ क्रियातिपत्तिः ॥ ऐष्यत् ॥ भाक ॥ आयिष्यत, ऐष्यतेत्यादि । “नामिनोऽनिट्" ॥४॥३॥३३॥ इति सनः कित्त्वे "स्वरहन-"॥४११०४॥ इति दीर्घ “स्वरादेः- ॥४।११४॥ इति षस्य द्वित्वे “सन्यस्य"॥४।१।५९॥ इति ईः । उदीषिषति । णौ, आययति । डे, आयियत् । उदयन् । ईयिवान् । इत्वा । आ इत्वा, एत्य । उदित्य । उदितः२, वान् । एता। आ एता एता । एतुम्, एतव्यम् । एयम् । अयनीयम् ॥ दुशू त्यक्तौ । छ। द्रवति, विद्रवति, उपद्रवति ॥भाक॥ द्रूयते॥ अद्यतनी ॥ "णिश्रि-॥३।४।५८॥ इति , अदुद्रुवत, अदुद्रुवताम् , वन्० ॥ वाम ॥ भाक ॥ अद्रावि, अद्राविषाताम्, अद्रोषाताम् ॥ परोक्षा ॥ दुद्राव, दुद्रुवतुः। स्क्रस-"॥४४८१॥ इत्यत्र दुवर्जनान्नेट , द्रुद्रोथ, दुद्रुव, दुद्रुम ॥भाक॥ दुद्रुवे । द्रोता । द्रोप्यति । दुद्रूषति । दोद्रूयते । दोद्रवीति, दोद्रोति, अग्रे भूवत् । अद्यतन्यां तु प्रकृतिग्रहणाण णिश्रि-" ॥३।४।५८ ॥ इति उ, अदोद्वत् । णौ "चल्याहासर्थ-"।३।३।१०८॥ इति फलवत्कर्त्तर्यपि परस्मैपदे द्रावयत्ययः। णौ ङे, "असमानलोपे-"॥४।१।६३॥ इति सन्वद्भावात् “श्रुद्रु-"॥४॥ १६१॥ इति सनीव वा इः, अदिद्रवत् , अदुद्रवत् । णौ सनि "श्रुनु॥४११।६१॥ इति पूर्वस्योतो वा इः, दिद्रावयिषति, दुद्रावयिषति । द्रुतः। द्रुत्वा । उपद्रुत्य । द्रोता। द्रोतुम् । एवं सुरपि साध्यः । स्रवति, प्रस्रवति ॥ भाक ॥ चूयते ॥ अद्यतनी ॥ “णिश्रि-"॥३।४।५८॥ इति ढे, असुनुवत् ॥ भाक ॥ अस्रावि ॥ परोक्षा ॥ सुस्राव, सुनुवतुः, सुस्रोथ, सुनुव, सुसुम ॥ भाक ॥ सुनुवे । स्रोता । स्रोष्यति । सनि, सुनूपति । कुटिलार्थेति यङि, सोनूयते । सोस्रवीति, सोस्रोति । यङ्लुपि सनि, सोस्रविषति । णौ "चल्य-"॥३।३।१०८॥ इति पर- स्मैपदे, स्रावयति तैलं चैत्रः। णौ डे वा इः, असिस्रवत् , असुस्रवत् । णौ सनि "श्रुनु -१६१॥ इति वाइः, सिस्रावयिषति,सुस्रावयिषति॥१०॥११॥१२॥ सुं प्रसवैश्वर्ययोः । गतावप्येके । सवति । सूयते । असौषीत् । अषोपदे. शान्न षत्वं, सुसाव । सोता । सोष्यति। शेषं पुंक्वत्, परं न षत्वम् ॥ १३ ॥ स्म चिन्तायाम् । “स्मृत्यर्थ-"॥२२॥११॥ इति वा कर्मवे मातुर्मातरं वा

भ्वादिगणः।
४५
स्मरति, स्मरतः। वि, सु, अप, अनु, सं, पूर्वोऽप्येवम् ॥ भाक॥ क्ये, “क्ययङा.
शीर्ये "॥४॥३॥१०॥ इति गुणः, स्मर्यते, स्मर्येते.॥ ह्यस्तनी ॥ अस्मरत्॥ भाक ॥
अस्मयंत ॥ अद्यतनी ॥ अस्मार्षीत्, अस्मार्टाम् , अस्मार्षः ॥ भाक ॥ अस्मारि,
जिटि अस्मारिषाताम् , “ संयोगादृतः” ॥४४॥३७॥ इति वेटि अस्मरिषाताम् ,
अस्मृषाताम् , अत्र "ऋवर्णाद्॥४॥३॥३६॥ इति अनिट् सिच् कित् । अस्मारिषत,
अस्मरिषत, अस्मृषत, अस्मारिष्ठाः, अस्मरिष्ठाः, अस्मृथाः०, अस्मारिध्वम् , अस्मा-
रिदम्, अस्मारिड्दुम् , अस्मरि३ध्वम् , दुम् , ड्ढम् । अस्मृदम्, ड्ढुम्, ॥
परोक्षा॥ सस्मार । “संयोगादर्तेः॥४:३९॥ इति गुणे, सस्मरतुः, सस्मरुः, सस्मर्थ,
"ऋतः॥४।४।७९॥ इति थवि नेट, सस्मरथुः,सस्मर, सस्मार, सस्मर, सस्मरिव, सस्म-
रिम।सस्म१० रे, राते, रिरे, रिषे, रिठे, रिध्वे॥ आशीः॥स्मर्यात् , ९ स्ताम् , सुः०॥
भाक ॥ स्मारिषीष्ट । “संयोगादृतः॥४॥४॥३७॥ इति वेटि, स्मरिषीष्ट ।"ऋवर्णाद्॥४
३॥३६॥ इति कित्त्वे, स्मृषीष्ट । एवं षीयास्तामित्यादावपि त्रीणि२ रूपाणि॥ श्वस्तनी॥
स्मर्त्ता, स्मर्तारौ०॥ भाक॥स्मारिता, स्मर्त्ता०॥ भविष्यन्ती। हनृत-"॥४|४|४९॥ इति
इटि, स्मरिष्यति ॥ भाक॥स्मारिष्यते, स्मरिष्यते॥ क्रियातिपत्तिः॥ अस्मरिष्यत्॥
भाक॥ वा जिटि, अस्मारिष्यत, अस्मारष्यत०॥ सनि, “स्मृदृशः"॥३।३।७२॥ इत्या-
त्मनेपदे,सुस्मूर्षते। यङि, सास्मर्यते । सरी, रि, ३, स्मरीति, अत्र रीरिरां३पृथक्-
योजनेनोदाहरणत्रयं ज्ञातव्यम् , एवमग्रेऽन्यत्र च। सरी, रि, ३, स्मति । शेष
यङ्लुबन्तकृग्वत् । परं “क्ययङाशीर्ये'।।३।१०॥ इत्यनेन क्ये, आशीर्येव गुणः
सरीस्मर्यते । सरीस्मर्यादित्यादि । तथा “संयोगादृतः॥४४॥३७॥ इत्यनेन वा इट्
भणनादद्यतन्याशिषोरात्मनेपदे यथा ऽयं स्मृधातुरभिहितस्तथैव यङ्लुबन्तो
ऽप्ययं भणितव्यः॥ णौ, स्मारयति, विस्मारयति । आध्याने घटादित्वात् हूखे,
स्मरयति । डे, “स्मृदृत्वर-"॥४॥१॥६५॥ इति पूर्वस्य अः, असस्मरत् । णौ
सनि सिस्मारयिषति । अषपाठान्न षः। स्मरति कोकिलो वनगुल्मम् । स्मरयत्येनं
वनगुल्मः । “अणिक्कर्मणिकर्तृकाण्णिगो-"॥३॥३॥८८॥ इति स्मृत्यर्थवर्जनान्नात्मने-
पदम् । स्मरन् । स्मर्यमाणम् । स्मरिष्यन् । स्मरिष्यमाणम् । स्मारिष्यमाणम् ।
सस्मृवान् । सस्म॒षी। सस्म्राणम् । स्मृतः२, वान् । स्मृत्वा । विस्मृत्य । स्मर्ता ।
स्मर्तुम् । स्मर्त्तव्यम् । स्मरणीयम्। स्मारणीयम् । स्मार्यम् ॥ १४ ॥

“
क्रियारत्नसमुच्चयः ।
सं गतौ। सरति, प्रसरति, अनुसरति, उपसरति, अपसरति, संसरति, निःसर-
ति, अभिसरति । अत्यादौ शिति “वेगे सर्तेर्धात्"।४।२।१०७॥ धावति ॥भाक॥
क्ये, स्रियते । अद्यतनी ॥ “सर्त्यःर्वा"॥३४६१॥ इति वा अङ्, अस९रत्,
रताम्, रन्०॥ पक्षे असार्षीत् , असाीम् ॥ भाक॥ असारि, असारिषाताम् ,
अमृषाताम् ॥ परोक्षा ॥ ससार, सस्रतुः । स्कसू-"॥४।४।८१ ॥ इत्यत्र
सृवर्जनान्नेट, ससर्थ, समृव, समृम ॥ भाक ॥ सस्रे । सर्ता । सरिष्यति ।
सनि, सिसीर्षति । यङि, सेस्रीयते । सरी, रि, ३, सरीति, सरी, रि, ३,
सत्ति ॥अद्यतनी ॥ असरिसारीत्। शतरि, सरी, रि, ३, सत्। णौ, सारयति ।
णौ, सनि, सिसारयिषति, षोपदेशाभावान्न षः । अद्यतनीशित्कर्तृवर्ज सर्वः
सः कृग्वत् । परं शतरि, सरन् । सरन्ती ॥ १५॥
कं प्रापणे च, चात् गतौ च । "श्रौति-"॥४।२।१०८॥ इति ऋच्छः, ऋच्छति,
ऋछतः, ऋग्छन्तिः ॥
" समोगमि-"॥३।३।८४॥ इति कर्मण्यसत्यात्मनेपदे,
समृ९च्छते, च्छेते, छन्ते॥ भाक ॥ “क्ययङा-"|||३.१०॥ इति गुणः, अर्यते,
अर्येते, अर्यन्ते ॥ ह्यस्तनी ॥ "स्वरादेस्तासु"॥४४॥३१॥ इति वृद्धिः, आर्च्छत् ,
आर्छताम् , आर्छन्॥ समार्च्छत, समाईताम् ॥भाक॥ क्ये, आर्यत, आर्ये-
ताम्, आर्यन्त॥ अद्यतनी ॥"सर्त्यर्तेर्वा"॥३४॥६॥इति वा अङि, "प्रवर्णदृशो-
ऽडि"॥४॥३७॥ इति गुणे “स्वरादेः-॥४४॥३१॥ इति वृद्धिः आर्।आरत्, निरारत,
आरताम्, आरन्॥ पक्षे, आर्षीत्, आर्टीम्, आर्युः ॥ समारत, समार्ट, सिच्-
लोपात् प्रागेव नित्यत्वाद् वृद्धिः ॥ भाक ॥ आरि, आरिषाताम्, आर्षाताम,
आरिषत, आर्षत, आरिष्ठाः, आर्टीः०॥ परोक्षा॥ द्वित्वे वृद्धौ च आर। “संयोगा-
दृदः॥४॥३९॥ इति गुणे, आरतुः, आरुः। “ऋवृव्ये-"॥४८०॥ इति इटि, आ.
रिथ, आरथुः, आर२, आरिव, आरिम। समारे, समाराते॥भाक॥आरे, आराते,
आरिरे॥आशीः॥ अर्थात्, अर्यास्ताम्, अर्यासुः०। समृषीष्ट०॥ भाक ॥ ऋषीष्ट,
"ऋवर्णात्"॥४॥३॥३६॥ इति कित्त्वम् । आरिषीष्ट । ऋषीयास्ताम्, आरिषयिास्ता.
म् ॥ श्वस्तनी ॥ अर्त्ता, अगरौ०॥ समर्त्ता, समारो० ॥ भाक ॥ अर्ता,
आरिता, अतीरौ, आरितारो० ॥ भविष्यन्ती ॥ अरिष्यति, "हनृतः॥४९॥

भ्वादिगणः। ४७ इतीट् । अरिष्यतः । समरिष्यते ॥ भाक ॥ आरिष्यते, अरिष्यते, आरिष्येते, अरिष्यते ॥ कियातिपत्तिः॥आरिष्यत्, आरिष्यताम्। समारिष्यत०॥भाक॥ आरिष्यत, आरिष्येताम्, अत्र ब्रिटिटोवृया रूपसादृश्यम् । सनि, “ऋस्मि-" ॥४|४|४८॥ इति इटि, अरिरिषति । ननु अत्र प्राक्तुस्वरे इति वचनात्कथं न गुणात्प्राग् द्वित्वम्, उच्यते । स्वरादित्वाद्धातोर्हितीयांशस्येटो द्वित्वे कर्तव्ये द्वित्वनिमित्तस्य स्वरस्याभावात् द्वित्लात् प्राग् गुण एव । भृशं पुनः२ र्वा ऋच्छति, "अट्यति-"॥३४॥१०॥ इति यङि, “क्ययङा-"॥४॥३॥१०॥ इति गुणे “खरादेर्डिं- तीयः॥४॥ इति यस्य द्वित्वे व्यञ्जनस्यानादे कि, “आ गुणा-"॥४१॥४८॥इति आल्वे, अरार्यते । अर्यङ्लुपि द्वित्वे तोऽति "रिरौ च लुपि"||४|११५६।। इति रागमे अर इति रूपं स्यात्। रि री आगमे तु “पूर्वस्यास्वे-"॥४।१।३॥ इति इयि, अरिय इति रूपं स्यात् । एके वियादेशं नेच्छन्ति, तन्मते “इवर्णादेरख-"॥१॥ २।२१॥ इति यत्वे अर्य इति रूपं स्यात् । तदेवं अर १ अरिय२ अर्यु ३ इति ऋधातो रूपत्रयं जातम् । आचं रूपं विभक्तिः प्रथमं संचार्य्यते, अररीति, अरर्ति, अरतः, “इवर्णादेः”॥ १।२।२१॥ इति रवे रोरे लुकि पूर्वस्य दीर्घत्वे च आरति, अररीषि, अरर्षि, अरथः, असृथ, अररीमि, अरर्मि, अवः, अरमः॥ भाक॥ क्ये "संयोगादर्तेः॥४।३।९॥ इत्यत्र तिन्निर्देशात् “क्ययङ-"॥४॥३॥१०॥ इति गुणाभावे "रिःशक्या-"॥४।३।११०॥ इति रि आदेशे रोरे लुकि, पूर्वस्य दीर्घले, आरियते, आरियेते, आरियन्ते० २१॥ सप्तमी॥ अश्रूयात् , अयाताम्, अयुः०॥ भाक ॥ क्ये रित्वादौ, आरियेत, आरियेयाताम्, आरियरन्० १८ ॥ पश्चमी ॥ अररीतु, अरतु, अरतात्, अरताम् । रत्वे, रोरेलुकदीर्घयोः। आरतु, अहि, अरतात्, अरृतम्, अरत, अरराणि ॥ भाक ॥ आरियताम्, आरियेताम्०२१॥ ह्यस्तनी ॥ "स्वरादेस्तासु"॥४४॥३१॥ इति वृद्धौ, आररीत् । गुणे “व्यञ्जनाद्दे:." ॥४॥३७८॥ इति दिव्लोपे, आरः, आताम्, “युक्त-"॥४।२।९३॥ इति पुसि "पुस्पौ"॥४॥३३॥ इति गुणे आररुः, आररीः, आरः। “सेः सद्धाम्॥४।३७९॥ इति सिव्लुक् । आरतम्, आरत, आररम्, आरव, आरम॥भाक॥ आरियत, आरि- येताम्० २०॥ अद्यतनी॥ सिचि इटि ईति "सिचि परस्मै-"॥४।३।४४॥ इति वृद्धौ , , क्रियारत्नसमुच्चयः । इट ईति सिचोलुपि आरारीत् , आरारिष्टाम् , आरारिषुः, रीः, रिष्टम् , रिष्ट, रिषम्, रिष्व, रिष्म ॥भाक ॥ त्रिचि आरारि । जिटिटोः आरारिषाताम् , आररिषाताम्, आरारिषत, आररिषत, आरारि३ध्वम् , वम्, ड्ढुम्, आररि ३ध्वम्, द्वम् , ड्ढम् ,• ३० ॥ परोक्षा ॥ आमि परोक्षाकार्याभावात् गुणे, अरराञ्चकारेत्यादि १० । अररांबभूवेत्यादि ९। अररामासेत्यादि ९ ॥ भाक ॥ अररांचके इत्यादि ९ । अररांबभूवे इत्यादि ९ । अररामाहे इत्यादि ९ । एवं ५५ ॥ आशीः ॥ रिः शक्य इति रिः, रोरे लुक्दी!, आरियात्, आरियास्ताम्० ॥ भाक ॥ वा जिटि अरारिषीष्ट । इटि अररिषीष्ट, अरारिषीयास्ताम्, अररि- षीयास्ताम् । अरारि २षीध्वम् , पीढ़म् • २९ ॥ श्वस्तनी ॥ अररि९ता, सारौ, तारः ॥ भाक ॥ अरारिता, अररिता इत्यादि २७ ॥ भविष्यन्ती ॥ अररि९ ष्यति, प्यतः, प्यन्ति०॥ भाक ॥ अरारिष्यते, अररिष्यते०२७ ॥ क्रियातिपत्तिः।। आररिष्यत् ॥ भाक ॥ आरारिष्यत, आररिष्यतेत्यादि २७ ॥ एवं अर इत्यस्य रूपाणि २७५॥ एवं तदपररूपयोरपि, तदेवं यङ्लुपि ऋरूपाणि ८२५ स्युः॥ अथ द्वितीयं रूपं दर्यते। अरियरीति, अरियार्ति, अरिय॒तः, अरियति इत्यादि॥भाक। क्ये रिः । अरियूयते, अरियियेते. ॥ ह्यस्तनी ॥ आरियरीत्, आरियः, आरि. यताम् ॥ भाक ॥ आरियियत० ॥ अद्यतनी ॥ आरियारीत् , आरियारिष्टाम्॥ भाक ॥ आरियारि, आरियारिषाताम्, आरियरिषाताम् ॥ परोक्षा ॥ अरियरां- चकारेत्यादि ५५ ॥ आशीः ॥ अरियियात् • ॥ भाक ॥ अरियारिषीष्ट, अरिय- रिषीष्ट०, शेषं प्रागुक्तानुसारेण २ ॥ अथ अर्यरूपमुच्यते ॥ अर्यरीति, अर्ति, अय॒तः, अति० ॥ भाक ॥ अयिते ॥ पञ्चमी ॥ अन्तु, अर्थतु० ॥ भाक ॥ अयिताम् ॥ ह्यस्तनी ॥ आर्यरीत् , आर्यः ॥ भाक ॥ आयित०॥ अद्यतनी ॥ आर्यारीत्, आर्यारिष्टाम् ॥ भाक ॥ आर्यारि, आर्यारिषाताम्, आर्यरिषाताम् ॥ परोक्षा ॥ अर्यरांचकारेत्यादि ॥ आशीः ॥ अयिात्०, शेषं सुगमम् ॥ समोगमृच्छि-"॥३॥३८४॥ इत्यत्राःस्तिन्निर्देशाद्यङ्लुपि नात्मनेपदम्। समरति, समररीति समरियर्ति, समरियरीति । समर्ति, समर्यरीति ३॥अर्ते- यङ्लुपि अरर्तीति वाक्ये शतरि हिले पूर्वस्यात्वे रागमे धातोश्च रवे शेरेलुग्-" भ्वादिगणः। ४९ ॥१३॥४१॥ इति रोपे पूर्वदीर्घत्वे च । आरत्, अरियत् , अर्थत् । णिगि, "अतिरी-॥४॥२१॥ इति पौ “पुस्पौ”॥४॥३३॥ इति गुणे, अर्पयति ॥भाक॥ अर्यते, अप्येते. ॥ अद्यतनी ॥ ढेरं पश्चाद्विश्लष्य "स्वरादेः-"॥४।१।४॥ इति पिद्वित्वे गेलुंकि, आर्पिपत्, आर्पिपताम् , आर्पिपन्० ॥ भाक ॥ आप्पि, आर्पि- पाताम्, आर्पयिषाताम् । “स्वरग्रह॥३।४।६९॥ इति वा ब्रिटि, "अतिरी-॥४२॥ २१॥ इत्यत्र तिन्निर्देशाद्यङ्लुपिणौ न पुः। अरारयति, अरियारयति, अर्यारयति । ऋच्छन् । समृच्छमानः। अर्यमाणम् । अरिष्यन् । आरिष्यमाणम्, अरिष्यमाणम् । कसौ एकस्वरत्वमन्ते भावि इति कृत्वा द्वित्वात्प्रागेव परत्वेन “घसेकस्वर-"||४|४८२॥ इति इटि पश्चाद्वित्वे, “ऋतोऽत्” ॥४१॥३८॥ इत्यले “अस्यादेः-" ॥४॥१६॥ इत्यावे एकस्य स्थाने भवन् अल्पाश्रितो रत्वादेश इति “अवर्णस्ये-"॥१।२।६।। इत्यरं बाधित्वा “इवर्णादेः-" ॥१।२।२१॥ इति रले आरिवान् । आराणम् । ते, “ऋही-" ॥४।२७६॥ इति वा नवे, ऋणं अधमर्णदेयम् । ऋतं सत्यम् । ऋला । अर्ता । अर्तुम् ॥ १६ ॥ तृ प्लवनतरणयोः। तरति; वितरति; अवतरति; उत्तरति; निस्तरति; तरतः, तरन्ति ॥ भाक ॥ तीर्यते, तीर्येते, तीर्यन्ते०॥ सप्तमी ॥तरेत्, तरेताम् , तरेयुः, तरेः॥ भाक ॥ तीर्येत, तीर्येयाताम्॥पञ्चमी ॥ तरतु, तरतात्, तरताम्, तरन्तु, तर, तरतात् , तरतम्, तरत,तराणि०॥भाक॥तीर्यताम् , तीर्येताम् ॥शस्तनी ॥ अतरत् , अतरताम्, अतरन्, अतरः ॥ भाक ॥ अतीर्यत, अतीर्येताम् ॥ अद्यतनी॥ अतारीत्, अतारिष्टाम् , अतारिषुः, अतारीः, रिष्टम् , रिष्ट, रिषम् , रिष्व, रिष्म ॥ भाक ॥ अतारि, " स्वरग्रह-”॥३।४।६९॥ इति वा ब्रिटि, इसिजाशिषोरा-"॥४।४।३६॥ इति वेटि “वृतो नवा-" ॥४।४।३५॥ इति इटो वा दीर्घवे “ऋवर्णात्" ॥४।३ । ३६॥ इत्यनिटोः सिजाशिषोः कित्त्वे च चातूरूप्यम् । अतारिषाताम् , अतरिषाताम्, अतरीषाताम् , अतीर्षाताम् । अतारिषत, अतरिषत, अतरीषत, अतीर्षत ४ । अतारिष्ठाः, अत- रिष्ठाः, अतरीष्ठाः, अती। अतारिषाथाम् , अतरिषाथाम् , अतरीषाथाम् , अती- र्षायाम् ४ । अतारिध्वम्, छम् , ड्ट्वम् ; अतरिध्वम् , ट्वम् , ड्ढम् ; अतरीध्वम्, ५० क्रियारत्नसमुच्चयः। दवम् , इवम् ; अतीर्द्धम् , ड्ढम् , ४ इत्यादि॥ परोक्षा ॥ ततार, प्राक्तुस्वरे इति भणनात्पूर्व द्वित्वे “स्कृच्छृतोऽकि-"॥४॥३८॥ इति गुणे “तृत्रप-" ॥४।१।२५।। इति अत एत्वे न च हिः इति वचनात् कृतमपि हित्वं निवर्त्तते । तेरतुः, तेरुः, तेरिथ, तेरथुः, तेर, ततर, ततार, तेरिव, तेरिम ॥ भाक ॥ तेरे, तेराते, तेरिरे, तेरिषे, तेराथे, तेरिध्वे, द्वे, तेरे, तेरिवहे, तेरिमहे ॥ आशीः ॥ तीर्यात् , तीर्यास्ताम् ॥ भाक ॥ “वृतो नवा-" ॥४।४ । ३५॥ इत्यत्राशिषि इटो दीर्घत्वनिषेधात् , तारिषीष्ट, तरिषीष्ट, तीर्षीष्ट इत्यादि ३।३। तारिषीध्वम् , तारिपीदम्, तरिषी २ वम्, ध्वम्, तीर्षीढम् ॥ श्वस्तनी ॥ तरिता, तरी- ता, तरितारौ, तरीतारौ०॥ भाक ॥ तारिता, तरीता, तरितेत्यादि ३।३॥ भवि० ॥ तरिष्यति, तरीष्यति ॥ भाक ॥ तारिष्यते, इटो वा दीर्घे, तरीष्यते, तरिष्यते। एवं क्रियातिपत्तावपि । अत्र सर्वविभक्तिषु यान्येव कर्मणि रूपाणि तान्येव कर्मकर्त्तर्यपि, नवरमद्यतन्यां कर्मकर्त्तरि ते “स्वरदुहो वा'||३।४।९०॥ इति वा मिचि, पक्षे वा ब्रिटि, तत्पक्षे वेटि, इटो वा दीर्घत्वे च पाञ्चरूप्यम् । अतारि, अतारिष्ट, अतरिष्ट, अतरीष्ट, अतीर्ट ५ । अतारिषातामित्यादि तु, शेषं सर्व कर्मवत् । साने, “इवृध-" ||४|४७॥ इति वेटि “वृतो नवा-" |४|४|३५॥ इति वा दीर्घत्वे च, तितरिषति, तितरीषति, तितीर्षति०, अत्र “नामिनोऽनिट”।।४।३।३३॥ इति सनः कित्त्वाद् इर् ॥ यङि, तेतीर्यते, तेतीर्येते, तेतीर्यन्ते ॥ भाक ॥ क्ये “ अतः"॥४।३।८२॥ इति यङोऽल्लोपे “ योऽशिति" ॥४।३।८०॥ इति यलोपे च, तेतीर्यते, तेतीर्येते. ॥ अद्यतनी ॥ अतेतीरिष्ट । सिचि इटि च सति, अतो यश्च लोपौ प्राग्वत् । अतेतीरिषाताम् , अतेतीरिषत०॥ भाक॥ अतेतीरि । अतेतीरिषाताम् । अतेतीरिषत० ॥ परोक्षा ॥ तेतीराञ्चके, तेतीराञ्चक्राते । इत्यादि २७ ॥ भाक ॥ तेतीराञ्चक्रे इत्यादि २७ ॥ आशीः ॥ तेतीरिषीष्ट० ॥ श्वस्तनी॥ तेतीरिता०॥भवि०॥ तेतीरिष्यते॥ क्रियाति ॥ अतेतीरिष्यतः। तेती- रित्वा । अवतेतीर्य । तेतीरितः। तेतीरितुम् । तेतीर्यमाणः। यङ्लुपि, तातति, तात- रीति। “ऋतां विङतीर"|४|४|११६॥ इतीर तातीर्त्तः, तातिरति, तातरीषि, तातर्षि, तातीर्थः, तातीर्थ, तातरीमि, तातर्मि, तातीर्वः, तातीर्मः॥भाक ॥ क्ये. तातर्यिते, , भ्वादिगणः तातीर्येते.॥ सप्तमी॥तातीर्यात्॥ भाक ॥तातीर्येत०॥ पश्च०॥ तातरीतु। तातर्जु०॥ भाक ॥ तातीयताम् ॥ हस्तनी ॥ अतातरीत्, अतातः ॥ भाक ॥ अता- तीर्यत० ॥ अद्यतन्यामाशीःप्रभृतिषु विभक्तिषु च यथाऽस्यैव केवलस्य तृधातो रूपाणि प्रोक्तानि तथैवात्रापि ज्ञेयानि; उच्चारस्त्वेवम् । अतातारीत् , अतातारिष्टाम् , अतातारिषुरित्यादि ॥ परोक्षा ॥ तातरांचकार ९ । बभूव ९ । आस ९॥भाक॥ तातरांचके ९ । बभूवे ९| आहे ९॥ आशीः॥ तातीर्यात०॥ भवि०॥ तात १८ रिष्यति, रीष्यति ॥ क्रियातिपत्तिः ॥ अतात १८ रिष्यत् , रीष्यत् ॥ तात २ रित्वा, रीत्वा। अवतातीर्य । अनेकवरात् , क्तस्य विहितत्वेन “ऋवर्ण- इन्यू-" ॥४।४।५७॥ इति इनिषेधाभावे, इरि वा दीर्घ च, ताति २ रितः, रीतः । तात २ रितुम्, रीतुम्। तातिरत् ॥ एवं कृपृ मृ शृस्त्र प्रभृतयोऽपि सर्वे ऋदन्ता यङ्लुपि ज्ञातव्याः, नवरं पृ म प्रभृतीनां क्ङिति परे । पृ मृ प्रभृतीनां विङति परे “ओष्ठ्यादुर्" ॥ ४।४। ११७ ॥ इति उरादेशः कार्यः । यथा तसि, पापूर्त्तः । अन्ति, पापुरति । क्ये, पापूर्यते । आशीर्ये, पापूर्यादित्यादि । णिगि, तारयति, प्रता- रयति, तारयतः० ॥ भाक ॥ तार्यते, विप्रतार्यते, तार्येते. ॥ अद्यतनी ॥ , अतीतरत्, अतीतरताम् , अतीतरन् ॥ भाक ॥ अतारि, अतारिषाताम् , अतारयिषातामित्यादि भूवत् ॥ तरन् । तीर्यमाणम् । तरिष्यन् , तरीष्यन् । तरिष्यमाणम्, तरीष्यमाणम्, तारिप्यमाणम् । वितितीर्वान् । विततिराणम् । काने पूर्व द्वित्वं पश्चात् इरादेशः, स्वरविधित्वात् । “ऋवर्णश्यू-"॥४।४।५७॥ इति किति नेट , तीर्ला । "ऋल्बादेः-" ॥४।२।६८॥ इति तो नः। तर्णि: २ वान् । तरि २, ता, तुम्। तरी २ ता, तुम्। तार्यम् ॥ १७ ॥ हें पाने । धयति, धयतः, धयन्ति ॥ भाक॥ "ईर्व्यञ्जने-४।३।९७॥ ईः। धीयते, धीयेते॥ अद्यतनी॥ "टेश्वेर्वा ॥३।४।५९॥ इति ङ, अदधत् , अदधताम् । अदधन्॥ पक्षे "ट्रेनाशा-"॥४॥३॥६७॥ इति या सिच्लुक् । अधात् , अधाताम् , अधुः, अधाः, अधातम्॥ सिचोऽलोपे च “यमिरमिनम्यातः॥४४॥८६॥ इति इट् सोऽन्तश्च । अधासीत् , अधासिष्टाम्, अधासिषुः, अधासीः, अधासिष्टम्॥ भाक ।। अधायि, अधायिषाताम् , अधिषाताम् , अत्र इश्वस्थाद इः । अधायिषत, , कियारत्नसमुच्चयः। अधिषत, अधायिष्ठाः, अधिष्ठाः, अधायिषाथाम् , अधिषाथाम्, अधायि ३ ध्वम्, ट्वम् , ड्डुम्; अधिढ़म् । परोक्षादिषु दधावित्यादि सर्व पानार्थपाधातुवत् । परं, सनि, “मिमी-" ॥४।१।२०॥ इति इत् । धित्सति । यङि, देधीयते । लुपि, दाधेति। दाधाति । “नश्च-" ॥४।२।९६॥ इति आलुकि, “अधश्चतुर्थ-॥२।१।७९॥ इत्यत्र धावर्जनेनास्यापि वर्जनात् तथोर्धत्वाभावे, दात्तः । दाधति । शेषं यङ्लु- बन्तधांगवत् । णिगि, धापयति, धापयतः०॥ भाक ॥ धाप्यते । डे, अदीधपत् । चल्याहार-" ॥३ । ३।१०८ ॥ इत्यनेन फलवत्यपि परस्मैपदे प्राप्ते “ परिमुह-" ॥३॥३९४॥ इत्यात्मनेपदे, धापयते शिशुं माता ॥ १८ ॥ दैव् शोधने। वकारो “अवौ दाधौ दा॥३।३।४॥ इति दासंज्ञानिषेधार्थः। दाय- ति। गुणइति सान्वयसंज्ञासमाश्रयणादत्र न गुण ऐकारादेकारस्य हीनत्वात्। एवम- ग्रेऽपि । क्ये, निदायन्ते भाजनानि।अदासीत् । ददौ । ददे । दाता । दास्यति । दिदासति । दादायते । दादेति, दादाति, दादीतः। “एषाम् ॥४।२।९७॥ इति ईः । दादति । दात्वा । अवदाय। अवदातं मुखम् । अशिति शेषं यांक्वत् ॥ १९ ॥ ध्य चिन्तायाम्। मातुायति, मातरं ध्यायति । “स्मृत्यर्थ-॥२२॥११॥ इति वा कर्म । निध्यायति; विध्यायति; अनुध्यायति ॥ भाक॥ अनुध्यायते॥ सप्तमी ॥ ध्यायेत् ॥ भाक ॥ ध्यायेत. ॥ अद्यतनी ॥अध्यासीत् , अध्यासिष्टाम् , अध्या- सिषुः ॥ भाक ॥ अध्यायि, अध्यायिषाताम्, अध्यासाताम् ॥ ध्वमि, अध्या २ ध्वम् , ध्वम् , अध्यायि ३ ध्वम्, वम् , ड्ठम् ॥ परोक्षा ॥ दध्यौ, दध्यतुः, दध्याथ दध्यिथ, दध्यिम ॥ भाक ॥ दध्ये, दध्याते॥ आशीः ॥ “संयोगादेर्वा-" ॥४।३।९५॥ इति वा एः। ध्येयात्, ध्यायात्, ध्येयास्ताम् , ध्यायास्ताम्॥ भाका ध्यायिषीष्ट । ध्यासीष्ट० ॥ श्वस्तनी ॥ ध्याता, ध्यातारौ० ॥ भाक ॥ ध्यायिता, ध्याता, ध्यायितारौ, ध्यातारौ० ॥ भविष्यन्ती ॥ ध्यास्यति । भाक । ध्यायिष्यते, ध्यास्यते॥ क्रियातिपत्तिः ॥ अध्यास्यत्॥भाक॥ अध्यायिष्यत, अध्यास्यत०॥ सनि, दिध्यासति॥ यङि, दाध्यायते, दाध्यति, दाध्याति णौ, ध्यापयति । डे, अदिध्यपत्। ध्यायति वनगुल्म कोकिलः। ध्यापयत्येनं वनगुल्मः। अत्र “अणि- कर्म-"||३३१८८॥ इति स्मृत्यर्थवर्जनान्नात्मनेपदम्। “व्यञ्जनान्तस्थ-"||२|७१॥ .

भ्वादिगणः।
इति ध्यावर्जनाक्तयोर्न नः। ध्यातः १ वान् । ध्यात्वा । ध्यातुम्। ध्याता। ध्येयम्।
दध्यिवान् ॥ २० ॥
ग्लैं हर्षक्षये । हर्षक्षयो धावपचयः। म्लैं गात्रविनामे। विनामः कान्तिक्षयः।
नै खप्ने । धैं तृप्तौ । एते ध्वत् । णिग्क्तेषु तु विशेषोऽपि । ग्लैं । ग्लायति ।
सनि, जिग्लासति। यङि, जाग्लायते।णौ, “ज्वलह्वल-"॥४॥२॥३२॥ इत्यनुपसर्गस्य
वा हखे ग्लपयति, ग्लापयति । सोपसर्गस्य तु न हूस्वः। प्रग्लापयति। अग्लपि।
अग्लापि । प्राग्लापि । “व्यञ्जनान्तस्थ-"॥४।२।७१॥ इति क्तयोनः। ग्लानः,२ वान् ।
म्लैं । म्लायति। सनि, मिम्लासति । यङि, माम्लायते । म्लानः । ३ । निद्रायति;
विद्रायति। निद्राणः २ वान् । निदद्रिवान् । | । ध्रायति “ऋहीघा-"॥४।२।७६॥
इति क्तयोर्वा नः। ध्राणः२, वान् । भ्रातः २, वान् । दधिवान् ॥२१॥२२॥२३॥२४॥
के गरै शब्दे ॥ गैं,गायति, गायतः। भाक ॥ “ईय॑ञ्ज-"॥४॥३।९७॥ ईः।
गीयते, गीयते इत्यादि॥ सप्त०॥ गायेत् , गायेताम्॥भाक ॥ गीयेत,गीयेताम्॥
पञ्चमी ॥ गायतु० ॥भाक ॥ गीयताम्०॥ ह्यस्त०॥ अगायत्॥ भाक ॥ अगी-
यत०॥अद्यतनी ॥.“यमिरमिनम्यातः-'॥४४॥८६॥ इति इटि सेऽन्ते च। अगासीत् ,
अगासिष्टाम् , अगासिषुः॥भाक॥अगायि, अगायिषाताम्, अगासाताम् , अगा-
यिषत, अगासत०, अगा २ ध्वम् , द्ध्वम् ; अगायि ३ ध्वम्, वम् , ड्ढम् ।
परोक्षा ॥ जगौ, जगतुः, जगुः, जगिथ, जगाथ, जगथुः, जग, जगौ, जगिव,
जगिम ॥ भाक ॥ जगे, जगाते, जगिरे०॥ आशीः॥ गापा इति एः। गेयात्।।
भाक ॥ गायिषीष्ट, गासीष्ट०॥ गायि २ षीध्वम् ,षीदवम् , गासीध्वम् । श्वस्तनी।
गाता, गातारो० ॥ भाक ॥ गायिता, गाता०, ॥ भविष्यन्ती ॥ गास्यति ॥
भाक ॥ गायिष्यते, गास्यते ॥ क्रिया० ॥ अगास्यत् अगास्यताम् ॥भाक ॥
अगायिष्यत, अगास्यत० ॥ सनि, जिगासति । यङि, जेगीयते । लुपि,
जागेति, जागाति । शेषं स्थास्थाने। णौ, गापयति । डे, अजीगपत् , अजी-
गपताम् । गायन् । गास्यन् । गीयमानम् । गास्यमानम्, गायिष्यमाणम् ।
जगिवान् । गीतः २ वान् ॥ गा २ ता, तुम्। गीत्वा, प्रगाय । गेयम् । गात.
व्यम् ॥ २५ ॥

५४ क्रियारत्नसमुच्चयः । पैं शोषणे । अयं गैंवत् । णिगि तु पाययति केशान् , शोषयतीत्यर्थः । डे, अपीपयत् ॥ २६॥ अथ यत्रानिटलं वेट्त्वं वा न वक्ष्यते ते सर्वेऽपि सेट एव ज्ञेयाः। उखेति दण्डके, रिखुइखु वल्ग रिगु तगु लिगु गतौ, वल्गवर्जा उदितः। उदनुबन्धस्तु“उदि- तः स्वर ४१९८॥ इति नागमार्थः। एवमन्यत्रापि ज्ञेयम् । रिङति। अरिङ्क्षीत् । रिरिल । रितिता । रिङन् ॥ इङ्खति । प्रेवति । प्रेलाञ्चकार, प्रेहन , शाने " स्वरात्” ॥२ । ३ । ८५ ॥ इति णे, प्रेङ्खमाणः । वल्गति । अवल्गीत्, अवल्गिष्टाम् । ववल्ग० । ववल्गे• । वलिगष्यति । वल्गन् । रङ्गति । रङ्गन् । सगुः स्खलने रूढः । लिङ्गति । आलिङ्गति, आलिङ्गयते । आलिङ्गीत्, आलिङ्गिटाम् । आलिङ्गि, आलिङ्गिषाताम् । आलिलिङ्ग । आलिलिङ्गिमहे ।। आलिङ्गयात् । आलिङ्गिषीष्ट० । आलिङ्गिता । आलिङ्गिष्यति । आलि- लिङ्गिषति । आलेलिङ्गयते आलेलिङ्गीति, आलेलिति। आलिङ्गयति । उल्लिङ्गय- ति । ड़े, आलिलिङ्गत् । आलिङ्गन् । आलि ५ ङ्गिता, तुम्, तः, २ वान् , तव्यम् । आलिङ्गय ॥ २७ ॥ २८ ॥ २९ ॥ ३० ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ शिघु आघ्राणे, गन्धोपादाने, नेऽन्ते । शिवति; निशिवति । यङ्लुपि, शशिति । शेषं णिदु कुत्सायामित्यस्येव ॥ ३२ ॥ लघु शोषणे, नेऽन्ते। लङ्घति०। लङ्घयते। अलचीत्। ललच । लविता०। लालति । लजि २ त्वा, तः २, वान् , शेषं टुनदुवत् ॥ ३४ ॥ शुच शोके । शोचति । क्ये, शुच्यते। सप्तमी। शोचेत् ।। क्ये, शुच्येत॥ ह्यस्तनी॥ अशोचत्०॥भाक ॥ अशुच्यत ॥ अद्यतनी॥अशोचीत् , अशोचिष्टाम् । भाक॥ अशोचि, अशोचिषातामित्यादि । परोक्षा॥शुशोच, शुशुचतुः, शुशोचिथ, शुशुचिम ॥ भाक ॥ शुशुचे, शुशुचाते. ॥ आशीः ॥ शुच्यात् ॥ भाक ॥ शोचिषीष्ट. ॥ श्वस्तनी ॥ शोचिता० ॥ भाक ॥ शोचिता, शोचितारो० ॥ भवि० ॥ शोचिष्यति०॥ भाक ॥ शोचिष्यते ॥ क्रियातिपत्तिः। अशोचिष्यत्॥ भाक॥ अशोचिष्यत॥“चौ व्यञ्ज-"॥४।३।२५॥ क्वासनोर्वा कित्त्वे, शुशुचिषति।

भ्वादिगणः । , शोशुच्यते, शोशोक्ति । णौ, शोचयति । डे, अशूशुचत् । शुचितः । शुचित्वा, शोचित्वा । शोचि २ ता, तुम् । शोचितव्यम् ॥ ३५ ॥ कुश्च कौटिल्याल्पीभावयोः। सङ्कुश्चति; आकुञ्चति । कुच्यते । अकुञ्चीत् । चुकुश्च । चुकुञ्चे। सङ्कुच्यात् । कुञ्चिष्यति । सङ्कुचितः। “नो व्यञ्जन-"॥४।२।४५॥ इति न लुक् । सङ्कुच्य । सङ्कुश्चि३ता, तुम् , तव्यम् ॥ ३६ ॥ लुच अपनयने । अनुपयुक्तापासने । लुञ्चति, लुच्यते । अलुश्चीत् , अलुश्चिष्टाम्।। अलुश्चि०।लुलुश्च ०। लुच्यात्। लुञ्चिषीष्ट । लुश्चिष्यति । लुलु- श्चिषति । लोलुच्यते। लोलुञ्चीति, लोलुङ्क्ति, लोलुक्तः, लोलुचति । लुञ्चयति। अलुलुश्चत् । लुञ्चन् । लुश्चिष्यन् , लुच्यमानम् । कित्त्वान्न लुकि, लुलुच्चान् । लुलुचानम्। “ऋत्तृष-"॥४।३।२४॥ इति वा कित्त्वे, लुञ्चित्वा लुचित्वा । लुचिरता, तुम् , तव्यम् । लुचितः, २ वान्। लुञ्चित इत्यप्यन्ये ॥ ३७ ॥ अर्चपूजायाम् ॥ अर्चति; अभ्यर्चति ॥क्ये, अर्च्यते॥ह्यस्तनी । आर्चत् । भाक ॥ आय॑त. ॥ अद्यतनी ॥ आर्चीत् , आर्चिष्टाम् , आर्चिषुः, आर्चीः, आर्चिष्टम् , आर्चिष्ट, आर्चिषम् , आर्चिष्व, आर्चिष्म ॥ भाक ॥ आर्चि, आर्चि- पाताम् , आर्चिषत, आचिर्दाः, आर्चिषाथाम् , आर्चिवम् , आर्चिध्वम् , आ- चिषि, आर्चिष्वहि, आर्चिष्महि॥ परोक्षा। अनातो नश्चान्त-"॥४।१।६९॥इति पूर्वस्य आ, नोऽन्तश्च । आनर्च, आनर्चतुः आनर्चुः। “स्क्रसृ."॥४|४८१॥इति इटि, आन- चिंथ, आनर्चथुः आनर्च, आनर्च, आनर्चिव, आनर्चिम ॥ भाक॥आनर्चे, आन- र्चाते, आनर्चिरे, आनर्चिषे०॥आशीः। अर्ध्यात् , अास्ताम्॥भाक॥अर्चिषीष्ट, अर्चिषीयास्ताम्॥श्वस्तनी॥अर्चिता, अर्चितारौ०॥भाक ॥ अर्चिता, अर्चितारौ० ॥ भविष्यन्ती ॥ अर्चिष्यति ॥ भाक ।। अर्चि९प्यते, प्येते, प्यन्ते. ॥ क्रिया- तिपत्तिः ॥ आर्चिष्यत् ॥ भाक ॥ आर्चिप्यत०, आर्चिष्यन्त ॥ सनि, अर्चि चिषति । णिगि, अर्चयति । डे, आर्चिचत्। णो सनि, अर्चिचयिषति ॥ आन- वा॑न् । आनर्चानम् । अर्चितः, २ वान् । अर्चित्वा ॥ ३८ ॥ अञ्चू गतौ च, चात्पूजायाम्। अञ्चति, अञ्चतः, अञ्चन्ति ॥ क्ये, अञ्च्यते, इत्यादि। सर्व पूजायां नलोपाभावादर्चवहक्तव्यम्। नवरं क्तक्तवतुक्त्वासु, "लुभ्यश्चेः-" क्रियारत्नसमुच्चयः। तुः, ॥४४॥४४॥ इतीटि, अञ्चिता अस्य गुरवः। अञ्चितवान् गुरून्। शिरोऽञ्चित्वेव संवहन।। गतौ त्वेवम्-अञ्चति; उदञ्चति; अन्वञ्चति; अञ्चतः॥क्ये, अच्यते॥ "अञ्चोऽनर्च-"॥४२॥४६॥ इति क्ङिति न लुक्॥अद्यतनी॥ आञ्चीत् , आञ्चि- ष्टाम्॥ परोक्षा॥ आनञ्च ।“इन्ध्यसंयोग-"॥४।३।२१॥ इति कित्त्वाभावे, आनञ्च- आनश्चिम ॥भाक ॥आनञ्चे॥ आशीः॥ अच्यात् , अच्यास्ताम्॥ भाक ॥ अञ्चिषीष्ट ॥ श्वस्तनी॥अञ्चिता०॥ भविष्यन्ती । अञ्चिष्यति। क्रियातिपत्तिः। आञ्चिष्यत् । सनि, अञ्चिचिषति। णौ, अञ्चयति । ङ, आञ्चिचत् । कसौ कित्त्वान्न लुकि, आचिवान् । ऊदितो वा"॥४|४|४२॥ इति क्त्वायां वेटि, अक्त्वा, अञ्चित्वा । उदक्तमुदकं कूपात् ॥ ३९ ॥ वञ्चू चञ्चू गतौ ॥ वञ्चति, वञ्चतः ॥ क्ये ॥ वच्यते ॥ अद्यतनी ॥ अवञ्चीत्, अवञ्चिष्टाम्॥ परोक्षा॥ ववश्च, धवञ्चिरथ,म ॥वच्यात्। वञ्चि- ष्यति विवञ्चिषति। यङि, “वञ्चस्रंस-॥४॥१॥५०॥ इति न्यागमे वनीवच्यते। यङ्लुपि, वनीवञ्चीति०, वनीवति, वनीवक्तः, वनीवचति.। णौ, “चल्याहारार्थ-" ॥३।३।१०८॥ इति परस्मैपदे, अहिं वञ्चयति, गमयतीत्यर्थः । णिगन्तात्तु प्रल- म्भेन वर्तमानात् “प्रलम्भे गृधिवञ्चेः ॥ ३।३।८९॥ इत्यात्मनेपदम्, बालं वञ्चयते ॥ उदित्वात् त्वायां वेट, वक्त्वा । इटि " ऋतृष-”॥४३॥२४॥ इति क्त्वो वा कित्त्वे, वचित्त्वा, वञ्चित्त्वा । वेटत्त्वात् क्तयोर्नेट , वक्तः । वक्तवान् । वञ्चित इति तु वञ्चिण प्रलम्भने इत्यस्य ॥ ४० ॥ लाछु लक्षणे । लाञ्छति । लक्षयतीत्यर्थः, अङ्कयतीति वा। अलाञ्छीत्। ललाञ्छ । यङ्लुपि, लालांष्टि । शेषं वाछुवत् ॥ ४१ ॥ वाछु इच्छायाम्। वाञ्छति। क्ये, वाञ्छ्यते। अद्यतनी। अवाञ्छीत् , अवा- ञ्छिष्टाम् ॥भाक ॥ अवाञ्छि, अवाञ्छिषाताम् । परोक्षा ।। ववाञ्छ, ववाञ्छतुः, ववाञ्छि २ थ, म॥ भाक॥क्वाञ्छे, बवाञ्छाते०॥ आशीः॥ वाञ्छयात्॥ भाक॥ वाञ्छिषीष्टेत्यादि। विवाञ्छिषति। वावाञ्छ्यते । वावाञ्छीति । छस्य शवे “यज-" ॥२॥१८७॥ इति षत्वे, वावांष्टि, वावांष्टः, वावाञ्छति, छीषि, ष्ठः, छीमि, श्मि । वस्य विकल्पेनानुनासिकत्वात् “अनुनासिके चच्छ्वः-"॥४।१।१०८॥ इति छः शवे , भ्वादिगणः। वावाश्वः । पक्षे, वावांच्छ्वः। वावांश्मः ॥ भाक ॥ वावाञ्छयते । हौ छस्य शले षत्वे “हुधुट-" ॥४।२।८३॥ इति हेधौ “ तृतीय-" ॥१॥३॥४९॥ इति षस्य डले "तवर्गस्य-॥१३॥६०॥ इति ढिः। वावांढि० ॥ ह्यस्तनी॥ अवावाञ्छीत् । छस्य शले "व्यञ्जनादेः-"॥४।३।७८॥ इति दिवः “पदस्य"॥२।१ । ८९ ॥ इति शम्य च लुकि। अवावान् , अवावांटाम् , अवावाञ्छुः, अवावाञ्छीः, अवावान् ॥ भाक॥ अवावा. ज्छयत०॥ अद्यतनी ॥ अवावाञ्छीत, अवावाञ्छिष्टाम् ॥ भाक ॥अवाञ्छि, अवावाञ्छिषाताम्॥ परोक्षा॥वावाञ्छांचकारेत्यादि॥ आशीः ॥ वावाञ्छयात्॥ भाक ॥ वावाञ्छिवीष्ट० ॥ भविष्यन्ती ॥ वावाञ्छिष्यति। णौ, वाञ्छयति । ङ, अववाञ्छत् ॥ ४२ ॥ मुर्छा मोहसमुच्छ्राययोः। मूर्छति । मूर्च्यते ॥ अद्यतनी ॥ अमूर्चीत , अमूर्छिष्टाम्० ॥ भाक ॥ अमूर्छि, अमूर्छिपाताम्॥ परोक्षा ॥ मुमूर्छ, मुमूर्छतुः, मुमूर्छि२ थ, व॥भाक ॥ मुमूर्छ ०॥आशीः। मूछात्।। मूछिपीष्टेत्यादि । मुमूर्छिप- ति०। मोमूर्यते । मोमूर्थीति । “राल्लुक" ॥४।१।११०॥ इति धुडादौ छस्य लुकि “ लघोः." ॥४॥३४॥ इति गुणे, मोभाति, मोमूर्तः, मोमूर्छति ॥ क्ये, मोमूर्यते ॥ ह्यस्तनी ॥ अमोमूछात् । राल्लुक् ॥४।१।११०॥ इति छस्य लुकि “व्यञ्जनादेः- "॥४।३ । ७८ ॥ इति दिवलुकि उपान्त्यगुणे च, अमोमो:, अमोमू म्॥अद्यतनी॥ अमोमूत् , अमोमूछिष्टाम्०॥ भाव ॥ अमो. मूर्छि । णौ, मूर्छयति । डे, अमुमूर्छत् । आदित्त्वात् क्तयारिडनावे मूर्तः, २ वान् । मूर्छति तु भिदादिलादङि, मूर्छा सञ्जाताऽस्येति तारकादित्वात् इते, मूछितः । नवा भावारम्भे"|४|४७२॥ इति वेडभावे मूच्छितं मूर्तमनेन, प्रमूर्तः । प्रमूर्छितः ॥ ४३ ॥ ब्रज गतौ। व्रजति: प्रव्रजति । प्रवज्यते ॥ अद्यतनी ॥ प्रात्राजीन , अत्र “वदब्रज-"॥४।३।४८॥ इति वृद्धिः। प्राब्राजिष्टाम् , प्रात्राजिपुः।। भाव ॥ प्रावाजि ॥ परोक्षा॥प्रवव्राज। “स्क्रम-"|४|४|८१॥ इतीट, प्रवजिरथ, म।बज्यात् । व्रजिना। बजिप्यति ।अवजिप्यत् । प्रविबाजिपति। वाव्रज्यते। वात्र २ जीनि, ति, वावतः, वाव्रजति । वात्रटजीषि, क्षि, क्थः, क्थ । जीमि, जिम, ज्वः, उमः। क्ये, वात्रज्यते " %3D

क्रियारत्नसमुच्चयः ।
॥ सप्तमी ॥ वाव्रज्यात्॥ पञ्चमी ॥ हौ, वावन्धि ॥ ह्यस्तनी ॥ अवाबजीत्,
अवाव्रक्, अवाव्रक्ताम्, अवावजुः ॥ अद्यतनी ॥ अवाबाजीत्, अवाब्राजिष्टा-
म्, अवावाजिषुः ॥ परीक्षा ॥ वाव्रजाञ्चकार३ । वाव्रज्यात् । वाव्रजिष्यति ।
णौ, प्रव्राजयति । प्रव्राज्यते । उ, प्रावियजत् । व्रजन् । व्रजिष्यन् । ववज्वान् ।
वव्रजानम् । व्रजितः, २ वान् । ब्रजित्वा । ब्रजितुम् ॥ ४४ ॥
अज क्षेपणे च । चाद्गतौ । अजति। “क्रियाव्यति-" ॥३।३।२३॥ इति
गत्यर्थवजनाद्गतौ नात्मनेपदम् , व्यत्यजन्ति ग्रामम् । क्षेपणे वात्मनेपदमेव,
व्यत्यजन्ते । आशति, “ अघक्यप्-" ॥४।४।२॥ इति वी, प्रवीयते ।
अवैषात् । विवाय । वीयात् । प्रविवीषति । वेवीयते । वीवा । प्रवीय ।
प्रवीतः । “त्रने वा”॥४।४।३॥ इति वा वीं प्रवेता, प्राजिता । शेषं
अशिति णोंग्वत्। अय्व्यञ्जने वा वीमिच्छन्त्यन्ये, तन्मते. प्राजिता।प्राजिष्यति।
प्राजिजिपति । प्राजित इत्याद्यपि भवति ॥ ४५ ॥
अर्ज अर्जने । अर्जति, । अर्यते। आर्जीत्। “अनात-"|४|११६९॥ इति
पूर्वस्यावे नागमे च, आनर्ज। आनर्जे । अात् । अर्जिष्यति, “अयिरः"॥४।१।६।।
इति रस्य द्विवाभावे, अजिजिषति । अर्जयति । , आर्जिजत् । अर्जितः ।
आर्ज ३ ता, तुम् , तव्यम् ॥ ४६ ॥
एज़ कम्पने। एजति। ऐजीत्। आमि, एजाञ्चकार । ऋदित्वात् “उपान्त्य-
स्य-"॥४।२।३५।। इति हस्खाभावे, माभवानेजिजत् । शेषं ओणवत् ॥ ४७ ॥
ट्वोस्फूर्जा वज्रनिर्घोषे । स्फूर्जति। क्ये, स्फूर्यते॥ अद्यतनी ॥ अस्फूर्जीत्॥
परोक्षा॥ पुस्फूर्ज ॥आशीः॥स्फूर्ध्यात्॥ भवि०॥ स्फूर्जिष्यति । यङि, पोस्फूर्य-
ते । लुपि, पोस्फूर्जीति, पोस्फूक्ति । पोस्फू१०तः, जति, जीषि, क्षि, थः,थ,
ममि, मि, र्वः, ऊर्मः ॥ ह्यस्त०॥ दिवि “ रात्सः”॥२।१।९०॥ इति नियमात्
संयोगान्तलुगभावे, अपोस्फू११, जीत, र्ताम् ॥ अद्य० ॥ अपोस्फूर्जीत् ,
अपोस्फूर्जिष्टामित्यादि । स्फूर्जि ३ त्वा, ता, तुम् । उदिलात् क्तयोस्तस्य नवे
आदित्त्वाच्चेडभावे णवे च स्फूर्णः, स्फूर्णवान् । “नवा भावारम्भे"॥४४॥७२॥

म्वादिगणः। ५९ , इति वेडभावे, स्फूर्णम् , स्फूर्जितमनेन । प्रस्फूर्णः, प्रस्फूर्जितः । “भ्वादेर्ना- मिन-"॥२।१।६३॥ इति दीर्घ सिद्धे दीर्घोच्चारणं भ्वादेरिति दीर्घत्वस्यानित्यत्वज्ञा. पनार्थम् , तेन कुर्दते, कुर्दनः इत्यपि सिद्धम् ॥ ४८ ॥ कूज गुजु अव्यक्ते शब्दे। कूजति पक्षी। अकूजीत् । चुकूज। कूजितम् । गुजु । गुञ्जति सिंहः । जुगुञ्ज । गुञ्जितम् । शेषं द्वयोः स्फूर्जावत् ॥४९॥५०॥ तर्ज भर्त्सने । तर्जति । अतीत् । ततर्ज । शेषं गर्जवत् ॥ ५१ ॥ गर्ज शब्दे । गर्जति। गय॑ते । अगीत् । जगर्ज; जजिम । जगजें। गर्जिष्यति । जिगर्जिषति । जागय॑ते। बहुलमेतन्निदर्शनमिति वचनात् चुरा- दित्वात् णिचि, गर्जयति । अजगर्जत् । क्ते, गर्जितम् ॥ ५२ ॥ हावनिटौ। त्यजं हानौ, त्यागे । त्यजति; परित्यजति । क्ये, त्यज्यते॥ अद्य- तनी।“ व्यञ्जनानामनिटि" ॥४१३१४५॥ इति वृद्धौ, अत्याक्षीत् । “धुट्हस्वात्-" ॥४।३१७०॥ इति सिलुकि, अत्यात्ताम् , अत्याक्षुः, अत्या ६ क्षीः, क्तम् , क्त, क्षम् , क्ष्च, क्ष्म ॥ भाक ।। अत्याजि, अत्यक्षाताम्, अत्यक्षत, अत्यक्थाः० ॥ परोक्षा ॥ तत्याज, तत्यजतुः, तत्यजुः । “सृजि-" ॥ ४।४। ७८ ॥ इति वेटि, तत्यजिथ, तत्यक्थ, तत्य जथुः, तत्यज२, तत्याज, “ स्क्रसृ. "॥४८॥ इतीटि तत्यजि २ व, म ॥ भाक॥ तत्यजे । त्यज्यात्। त्यक्षीष्ट। त्यक्ता। त्यक्ष्यति, ते । सनि, तित्यक्षति । यङि, तात्यज्यते । लुपि, तात्यजीति, तात्य ११क्ति, जति०, ॥ शस्तनी ॥ अतात्यजीत्, अतात्य १०, क्ताम् , जुः, जीः, क्० ॥ अद्यतनी।। व्यञ्जनादेोपान्त्य-" ॥ ४ । ३ । ४७ ॥ इति वा वृद्धौ, अतात्यजीत् , अतात्याजीत् । तात्यजांचकार । तात्याजिष्यति । क्त, तात्यजितः । णौ, यति । डे, अतित्यजत् । त्यजन् । त्यक्ष्यन् । तत्यवान् । तत्यजानम् । त्यक्त २, वान् । त्यक्त्वा। सन्त्यज्य । त्यक्ता । त्यक्तुम् । ध्याण, “त्यज्यज-"|४|११११८॥ इति गत्वनिषेधे, त्याज्यम्॥ ५३॥ षजं सङ्गे। “दंशसञ्जः शवि"॥४॥२॥४९॥ इति न लोपे, सजति; प्रसजति; व्यासजति; “स्थासेनि”॥२।३।४०॥ इति थे, अभिषजति। क्ये, सज्यते ॥ ह्यस्तनी ॥ अभ्यषजत्॥ अद्यत० ॥ “ व्यञ्जनानामनिटि” ॥ ४ । ३।४५॥ इति त्याज-

क्रियारत्नसमुच्चयः।
,
वृद्धौ, असांक्षीत् , असां ८ क्ताम् , क्षुः, क्षीः, क्तम् , क्त, क्षम् , क्ष्व, म ॥ भाकं ॥
असञ्जि, असङ्क्षाताम् , असथाः० ॥ परोक्षा ॥ ससञ्ज । अभिषषञ्ज ।
"इन्ध्यसंयोग-१॥४,३।२१॥ इति कित्त्वाभावान्नस्यालोपे, ससञ्जतुः, ससजिथ,
ससङक्थ, ससजिम ॥ भाक ॥ ससञ्ज ॥ आशीः॥ सज्यात् । सङ्क्षीष्ट ॥
श्वस्तनी ॥ सङ्का ॥ भविष्य० ॥ सङ्ख्यक्ति, ते ॥ क्रिया० ॥ असङ्ख्यत् । षणि,
"णिस्तारेव-॥२॥३॥३७॥ इति नियमान्न पत्वे, सिसङ्क्षति । “स्थासेनि ॥२॥३॥४०॥
इति उपसर्गात् द्विवेऽपि, अट्यपि षत्वे, अभिषिपङ्क्षति । अभ्यषिषङ्क्षत् । यङि,
सासज्यते । अनुषापज्यते । असासजिष्ट। लुपि, सासजीति, सासङ्क्ति, सासक्तः,
सासजति । हो, सासग्धि । सासञ्जाञ्चकार । णौ, सञ्जयति । डे, असस ९
ञ्जत, जताम, जन्० ॥ सञ्जयाञ्चकार । षोपदेशाण्णौ सनि “ सजेर्वा
॥२।३।३८ : इति वा पल्ले, सिषञ्जथिषति, सिसञ्जयिषति । सजन् ।।
सजन्ती । सक्ष्यन् । कसुकानयोः परोक्षावद्भावादेव कित्त्वे सिद्धे कित्करणं
संयोगान्तधामर्थन, तेन संयोगान्तात् परोक्षायाः कित्त्वनिषेधेऽपि अनयोः
कित्त्वान्न लुकि "अनादे-"॥१॥२४॥ इत्यत्त्वे, सेजिवान् । सेजानम् । सङ्का ।
सङ्क्तम् । प्रसक्तः, २ वान् । प्रसक्तव्यम् । क्ते ऽनिट्त्वाद् घ्यणि गवे प्रसङ्ग्यः ।
"जनशोनि"||४।३।२३॥ इति क्यो वा कित्त्वे, सतवा, सङ्क्त्वा । यादेः क्त्वो नित्यं
कित्त्वे, आमज्य; प्रसज्य ॥ ५४ ॥
कटे वर्णवर्णयोः । वृष्टी आवरणे चार्थे । कटति। प्रकटति । एदित्वाद् “नश्वि-"
॥४॥३।४९' इति न वृद्धौ, अकटीत । चकाट, चकटुः। ण्यन्तस्य त्वस्य अद्यतन्यामेव
प्रयोगो दृश्यते, तेन णो ङ, प्राचीकटत् ॥५५ ।।
शट रुजाधिशरणगत्यवसादनेषु । चतुर्वर्थेषु । शटति । शट्यते ॥ शटेत् ।
शटतु। अशटत् ॥ अद्य०॥ “व्यञ्जनादेवोपा-"||४।३।४७॥ इति वा वृद्धौ, अशाटीत् ,
अशटीत् , अशाटिष्टाम् , अशटिष्टाम्॥भाक॥अशटि, अशाटिषाताम् ॥परोक्षा।
शशाट, शेटतुः, शटि२थ, म । शेटे ॥ आशीः॥ शट्यात् । शटिष्यति । अश-
टिप्यत् । शिशटिपति । शाशट्यते । णो, शाटयति । डे, अशीशटत् ॥५६॥
खिट उत्रासे । उत्त्रासा भयोद्गतिः उबासन च । गाः खेटति । खिट्यते ।
अखेटीत् । चिखेट । णौ, खेटयति । अचीखिटत् ॥ ५७ ॥

भ्वादिगणः । णट नृत्तौ । नतावित्यन्ये । हिंसायामप्यके।नटति। णपाठात् “अदुरुप-"॥२॥ ३७७॥इति णत्वे, प्रणटति । नायं णोपदेश इत्यके । प्रनटति। नेटतुः, नेटुः । णौ नतौ घटादित्वात् हस्खे, नटयात शाखाम् । नृत्तौ हिंसायां च न हूस्वः, नटं नाट- यति; प्रणाटयति, नर्तयतीत्यर्थः । चौरस्य चौरं वा उन्नाटयति । अत्र हिंसार्थ- त्वात्परमतेन “ जासनाट-"॥२॥२॥१४॥ इति कर्मणो वा कर्मत्वम् । शेषं सर्व पठिवत् ।। ५८ ॥ लुट विलोटने । लोटति । अलोटीत् । लुलोट। लोटिष्यति । “चौ व्यञ्ज-" ॥४।३।२५॥ इति वा कित्त्वे, लुलोटिषति, लुलुटिषति । लोलुट्यते । लोलुटीति, अत्र "यक्तोपान्त्य-"॥४॥३॥१४॥ इति न गुणः । लोलोट्टि । “ भ्राजभास-"। ४।२।३६॥ इति उ वा हूखे, अलूलुटत्, अलुलोटत् । लुटित्वा, लोटिला । लोटिश्ता, तुम्, तः ॥ ५९ ॥ अट पट कट गतौ । अटति, पर्यटति । अठ्यते । आटत् ॥अद्यतनी ॥ आटीत , आटिष्टाम्॥भाक ॥ आटि, आटिषाताम्॥ परोक्षा ॥ द्विवे पूर्वस्य अस्य “अस्यादेः-"॥ ४॥ १।६८॥ इति आः, आट, आटतुः, आटिम । आटे। अट्यात्। अटिष्यति । आटिष्यत् । सनि, अटिटिषति । “अट्यर्ति-"॥ ३ । ४।१०॥इति यङि, अटाट्यते। णौ, आटयति । , प्रात्तुस्वरे स्वरविधेः इत्यधिकारात् प्रागेव टेहित्वे पश्चाण्णेलुकि, आटिटत् । ओणे.ऋत्किरणज्ञापकात् “ उपान्त्यस्य-॥४॥ २॥३५॥ इति हवे कृते द्विवे च, माभवानटिटत् । पट । पटति। शेष पठवत्। णौ, पाटयात । ङे, अपपिटत्। कट । कटति। "व्यञ्जनादेवो"||४.३।४॥ इति वा वृद्धी प्राकाटीत्, प्राकटीत् । ण्यन्तस्य तु प्रपूर्वस्य प्रयोगोऽद्यतन्यामेव दृश्यते, प्राचीकटत् ॥ ६० ॥ ६१ ॥ ६२ ॥ लुटु स्तेये । नेऽन्ते । लुण्टति । अलुण्टीत् । लुलुण्ट, लुलुण्टतुः । लुण्टितः ॥ ६३ ॥ स्फट स्फुट्ट विशरणे । स्फटति वस्त्रम् । अस्फाटीत् , अस्फटीत् । भावे । अस्फाटि । पस्फाट, परफटतुः। णौ, स्फाटयति। ङे, अपिस्फटत् । क्ते, स्फटितम् । स्फुट्ट । स्फोटति।क्ये, स्फुट्यते । ऋदिच्छवि-"॥३।४।६५॥ इति वा अङ्, अस्फुटत्। ,

क्रियारत्मसमुच्चयः।
,
अस्फोटीत् ॥ परोक्षा॥ पुस्फोट, पुस्फुटतुः। स्फुट्यात्। स्फोटिष्यति। अस्फोटिष्यत् ।
सनि"वौ व्यञ्जनादेः-"॥४।३।२५॥ इति वा कित्त्वे, पुस्फोटिषति, पुस्फुटिषति।
यङि, पोस्फुट्यते । णौ, स्फोटयति । अपुस्फुटत् । स्फुटिला, स्फोटित्वा ।
स्फुटितः ॥ ६४॥६५॥
रट परिभाषणे । अयं शटवत् । यङ्लुपि, रारटीति, “तवर्गस्य"।।१।३।६०॥ इति
तस्य टवे रारट्टि, रारट्टः, रारटति, रारटीषि, “सस्य शषौ।।१।३।६१॥ इति प्रारक्षि,
रारट्ठः, रारट्ठ, रारटीमि, रारमि, रारट्वः, रारट्मः। क्ये, रारट्यते ॥ सप्तमी ।।
रारट्यात्॥पञ्चमी॥ हौ, रारढि, अत्र “हुधुटो-"॥४।२।८३॥ इति धिः; “तवर्गस्य"
॥१॥३६०॥ इति ढिः; “तृतीयस्तृतीय-॥१॥३॥४९॥ इति टस्य डः ॥ ६६ ॥
पठ व्यक्तायां वाचि ॥ पठति, पठतः । शब्दार्थनिषेधात् क्रियाव्यतिहारे-
प्यनात्मनेपदे, व्यतिपठन्ति । पठ्यते। पठेत्। पठतु, पठतात् । अपठत् ॥ अद्य-
तनी । “व्यञ्जनादेवों-"४।३।४७॥ इति वा वृद्धौ, अपाठीत् , अपाठिष्टाम् , ठिषुः,
ठीः, ठिष्ठम्, ठिष्ठ, टिषम् , ठिष्व, ठिष्म। पक्षे, अपठीत् , अपठिष्टां इत्यादि। अपाठि,
अपठि९षाताम्, षत, ष्ठाः, पाथाम् , ध्वम् , ड्वम् , षि, ष्वहि, महि ॥
परोक्षा ॥ पपाठ, क्रियाव्यतिहारे, व्यतिपपाठ, पेठतुः, पेठुः, पेठिथ, पेठथुः, पेठ,
अहं पपाठ, पपठ, पेठिव, पेठिम । पेठे। पठ्यात् । पठिषीष्ट । पठिता २ ॥ पठिष्यति ।
अपठिष्यत्। सनि, पिपठिषति।अपिपठि९षीत्, षिष्टाम् , षिषुः०॥ क्विपि, पिपठीः।
अत्र “णषम्-"॥२।१।६०॥ इति षस्यासत्त्वात् सौ रुर्भवति “पदान्ते”।२।११६४॥ इति
दीर्घश्च ॥ यङि, पापठ्यते। अपापठिष्ट। पापठांचक्रे३ । लुपि, पापठीति, पापट्टि,
पापट्टः, पापठति, पापठीषि, पापक्षि, पापट्ठः, पापट्ठ, पापठीमि, पापट्मि,
पापट्वः, पापटमः ॥ हौ पापढि ॥ ह्यस्त । अपापठीत् , अपापट् । अद्यतनी ॥
अपापठीत्, अपापाठीत्, अपापठिष्टाम्, अपापाठिष्टाम् । पापठाञ्चकार ३ ॥
पापठ्यात् । पापठिता । णौ, पाठयति ॥ क्ये, पाठ्यते । अपीपठत् । पाठयां
चकार३ । णिगन्ताण् णिगि, अपीपठत् माणवकमुपाध्यायेन। पठन्। पठिष्यन्।
पेठिवान् । पेठानम । पठितः । पठितवान् । पठि ३ त्वा, तुम् , तव्यम् ॥ ६७ ॥
हठ बलात्कारे। हठति । जहाठ, जहठतुः। शेषं पठवत् ॥ ६८ ॥

भ्वादिगणः । क्रीड विहारे । क्रीडति, “क्रीडोऽकूजने ॥३३॥३३॥ इत्यात्मनेपदे, संक्रीडन्ति शकटानि।“अन्वाङ्परेः"॥३॥३॥३४॥ अनुक्रीडते;आक्रीडते, परिक्रीडते॥ अद्यतनी। अक्रोडीत् ,अक्रीडिष्टाम्॥ परोक्षा॥ चिक्रीड। सनि, चिक्रीडिषति। चेक्रीड्यते।लुपि, चेक्रीडीति, चेक्रीट्टि, चेक्रीट्टः, चेक्रीडति, चेक्रीडीषि, चेक्रीषि, चेक्रीट्ठः, चेक्री, चेक्रीडीमि, चेक्रीड्मि, अत्र लघोरभावान्न गुणः । चेक्रीड्वः, चेक्रीड्मः । क्ये, चेक्रीड्यते । हौ, चेक्रीड्ढि ॥ ह्यस्तनी ॥ अचेक्रीडीत् , अचेक्रीट, अचेक्रीट्टाम् , अचेक्रीडुः, अचेक्रीडीः, अचेक्रीट । शेषं पठवत् । णौ, क्रीडयति । ऋदित्त्वान् ऊँ न हवः, अचिक्रीडत् । क्ते, क्रीडितम् ॥ ६९ ॥ लड विलासे । लडति। लवे, ललति; उल्ललति । लड्यते । “वदव्रज." ॥४॥३॥४८॥ इति वृद्धौ, अलालीत् । ललाड; लेलुः । ललिता । णौ, लाडयति चित्रम् । लालयति बालम् । अलीललत् । लालितः ॥ ७० ॥ अद्ड् अभियोगे। दोपान्त्यः। तवर्गस्य-"॥१।३।६०॥ इति दस्य डत्वे, अड्डति, अभ्यड्डुति । आड्डीत्, आडिष्टाम्॥ "अना-"॥४।१।६९॥ इति इत्यात्वे ने च, आनड्ड, आनड्डतुः। अड्डिष्यति । सनि, “न बदनम् ॥४।१।५॥ इति दस्य द्वित्वाभावे, अड्डि- डिषति। अन्ये तु डोपान्त्यं मन्यन्ते, “न बदनम् ।।४।१।५॥ इति प्रतिषेधाभावात् डि इत्यस्य द्वित्वे, अडिड्डिषति । णौ, अड्डयति । उ, आड्डिडत् । अड्डितः ॥ ७१ ॥ रण भण कण क्वण शब्दे। शब्दः शब्दक्रिया। रणति नूपुरम् । रराण, रेणतुः, रेणुः । णौ, राणयति । “भ्राज-"॥४।२।३६॥ इति ङ वा हस्खे, अरराणत, अरीरणत् । शेष भणवत्। भण। भणति।क्ये, भण्यते। अभणीत् , अभाणीत् । अभाणि, अभ- णिषाताम् । बभाण, बभणतुः, बभणुः, बभणिथ, बभणथुः, बभण, बभाण, बभण, बभणिव, बभणिम। भप्यात् । भणिषीष्ट । भणिता। भाणप्यति । अभणिप्यत् । बिभणिषति । बिभणिप्यते। यङि, बम्भप्यते। अबम्भणिष्ट । बम्भणाञ्चके । लुपि, बम्भणीति, बम्भष्टि । “अहन्पञ्चम-"॥४।१।१०७॥ इति दीर्घत्वे, बम्भाण्टः, बम्भण- ति, बम्भणीषि, बम्भाषि, बम्भाण्ठः, बम्भाण्ठ, बम्भणीमि, बम्भण्मि, बम्भण्वः, बम्भण्मः । क्ये, बम्भण्यते । हो, बम्भाहि ॥ णौ, भाणयति । भाण्यते । भ्राजभास-” ॥४।२। ३६ ॥ इति वा हवे, अबभाणत्, अबीभणत् ।

क्रियारत्नसमुच्चयः। भाणयाञ्चकार । भणन् । भाणष्यन् । भण्यमानम् । भणिष्यमाणम्। बभण्वान् । बभणानम् । भणितः, २ वान् । भणि३त्वा, तुम् , तव्यम् । भणनीयम् । भाण्यम् । कण । कणत्यार्त्तः । चकाण । कण । कणति वीणा । चक्काण । काणयति । अचिक्कणत् । शेष कणकणयोर्भणवत् ॥ ७२ ॥ ७३ ॥ ७४ ॥ ७५ ॥ ओण अपनयने । ओणति।ओप्यते। औणीत् , औणिष्टाम्।औणि। “गुरुनाम्य-" ॥३॥४॥४८॥इति आमि,ओणांचकार।ओणिणिषति।ओणयति।ङ, ऋदित्वात् उपा- न्त्यस्य-"॥४२॥३५॥ इति हस्खाभावे, माभवानोणिणत्। ननु नित्यत्वादन्तरङ्गत्वाच द्वित्वे कृते उपान्त्याभावादेव ह्रखो न प्राप्नोति किं ऋदित्करणेन, सत्यम् , इदमेव ऋदित्करणं ज्ञापकम् , हित्वं उपान्त्यहखो बाधते, तेनान्यत्रापि पूर्व एस्खे कृते पश्चाद्वित्वम् , माभवानशिशत्। माभवानटिटत्। ओणित्वा, आणिता, ओणि२ तः, तवान् । ओणितुम् ॥ ७६ ॥ चितै संज्ञाने । चेतति । अचेतीत् । चिचेत । “वौ व्यञ्जन ॥४।३।२५॥ इति क्त्वासनोर्वा कित्त्वे, चिचितिषति, चिचेतिषति । चितित्वा, चेतित्वा । ऐदित्त्वाद् "डीयश्चै-'॥४४६१॥ इति क्तयोर्नेट् । चित्तः२ वान् ॥ ७७ ॥ अत सातत्यगमने । अतति । अयं अटवत् । नवरं न यङ् ॥ ७८ ॥ च्युत आसेचने । आसेचनमीषत्सकः । चुतृ स्चुतृ स्च्युतृ क्षरणे । क्षरणं स्रवणम् । एते चत्वारोऽपि सदृशसाधनका एव, नवरमन्त्ययोः “सस्य शौ”। १।३ । ६१॥ इति सस्य शः । च्योतति । चोतति । श्चोतति । च्च्योतति । अन्तिमो दर्श्यते, निःश्च्योतति । “ ऋदित्वादिश्वि-" ॥३।४।६५ ॥ इति वाऽङि, अश्च्युतत्, अश्च्योतीत्, अश्च्युतताम् , अश्च्योतिष्टाम् । " अघोषे शिटः॥४।११४५॥ इति द्वित्वे पूर्वस्य शोलुकि, चुश्च्योत, चुरच्युततुः, चुश्च्युतुः। इच्युत्यात्। श्च्योतिषीष्ट । श्च्योतिता । श्च्योतिष्यति। “चौ व्यञ्जनादेः"॥४।३।२५॥ इति क्वासनोर्वा कित्त्वे चुदच्युतिपति, चुश्च्योतिषति । चोरच्युत्यते । चोश्च्युतीति, चोश्च्योत्ति। णौ, श्च्योतयति । अचुश्च्युतत् । श्च्युतित्वा, श्च्योतित्वा। “उतिश- वह-॥४।३।२६।। इति क्तयोर्वा कित्त्वे श्च्युतितम् , श्च्योतितम् । एवमन्ये त्रयो- ऽपि, नवरं चुतो छ, अचूचुतत् ॥ ७९ ॥ ८० ॥ ८१ ॥ ८२ ॥ .

भ्वादिगणः। ६५ 'अतु बन्धने । नेऽन्ते । अन्तति। अन्त्यते। आन्तीत्। आनन्त । अन्तिता। अन्तिष्यति । अन्तितिषति । अन्तयति । आन्तितत् । अन्तिरत्वा, तः, ॥८३॥ कित निवासे। धातूनामनेकार्थत्वात् “कितः संशयप्रती-"॥३॥४६॥ इति स्वार्थे सनि, विचिकित्सति मे मनः, संशेत इत्यर्थः ॥ चिकित्सति आतुरं वैद्यः, प्रति- करोतीत्यर्थः। क्ये, चिकित्स्यते इत्यादि सन्नन्तभूवत् । इच्छासनि तु चिकि- सिषति । निग्रहविनाशौ प्रतीकारस्यैव भेदौ, तेनात्रापि भवति । क्षेत्रे चिकि- स्यः पारवारिकः, निग्राह्य इत्यर्थः । चिकित्स्यानि क्षत्रे तृणानि, विनाशयित- व्यानीत्यर्थः ॥ ८४ ॥ खाह भक्षणे । खादति। क्ये, खाद्यते। अखादीत् । चखाद । सनि, चिखा- दिषति । चाखाद्यते । चाखादीति; चाखात्ति। णौ, खादयत्योदनं मैत्रेण चैत्रः, अत्र “गतिबोध-"॥२॥२५॥ इति खादिवर्जनादणिकर्तुर्न कर्मत्वम् , “चल्याहार." ॥३।३।१०८॥ इति फलवत्यपि परस्मैपदं च । ऋदित्त्वात् ह्रस्वाभावे, अचखादत् । णौ सनि, चिखादयिषति । खादितः ॥ ८५ ॥ गद व्यक्तायां वाचि।गदति। निगदति । नेीदा-"॥२।३१७९॥ इति नेर्णत्वे, प्रणिगदति। प्रण्यगदत् । प्रण्यागदत् । “पदेऽन्तर-"॥२।३।९३॥ इत्यत्राङोवर्जना- दाव्यवायेऽपि णः । क्ये, गद्यते । अगादीत्, अगदीत् । जगाद, जगदतुः, जगदुः। जिगदिषति। जागद्यते । जागदीति, जागत्ति । शेषं पठवत् ।। ८६ ॥ अदु बन्धने । नेऽन्ते । अन्दति । आनन्द । अतुवत् ॥ ८७ ॥ इदु परमैश्वर्ये । परमेशनक्रियायाम् । नेऽन्ते । इन्दति । ऐन्दीत् । आमि, इन्दांचकार । इन्दिदिषति । इन्दितः ॥ ८८ ॥ णिदु कुत्सायाम् । नेऽन्ते; निन्दति। णोपदेशाण्णत्वे, प्रणिन्दति।परिणिन्दति। अग्रे वाछुवत् । निनिन्दिषति । नेनिन्द्यते। नेनिन्दीति, नेनिन्तः। दिवि, अनेनि- न्दीत् , अनेनिन्, अत्र परे गुणे दलोपस्यासत्त्वादुपान्त्याभावान्न गुणः॥ अद्यतनी॥ अनेनिन्दीत् , अनेनिन्दिष्टाम् । णौ, निन्दयति । ङे, अनिनिन्दत्। निन्दितः, वा, तुम् । “निंसनिक्षनिन्दः कृति वा"।।२।३।८४॥ इति वा णत्वे, प्रणिन्दनीयम् , प्रनिन्दनीयम् ॥ ८९ ॥ १.

- , ६६ क्रियारनसमुच्चयः। टुनदु समृद्धौ। नेऽन्ते। नन्दति। नोपदेशान्न णः, प्रनन्दति । क्ये, नन्द्यते। नन्दतु, नन्दतात्०॥ अद्यतनी ॥ अनन्दीत्, अनन्दिष्टाम्, अनन्दिषुः । भाक। अनन्दि।नन्द्यात् । नन्दिष्यति । निनन्दिषति। नानन्द्यते । नान १२ न्दीति, न्ति, न्तः, दति ॥ ह्यस्तनी ॥ अना११नन्, नन्दीत्, नन्ताम् , नन्दुः ॥ अद्यतनी ॥ अनानन्दीत् । णौ, नन्दयति । ङे, अननन्दत् । नन्दितः, २ वान् ॥ ९ ॥ कदु रोदनाऽऽह्वानयोः । नेऽन्ते । क्रन्दति, आक्रन्दति । चक्रन्द । शेषं नन्दतिवत् ।। ९१॥ स्कन्दूंगतिशोषणयोः । अनिट् । स्कन्दति। "वेः स्कन्दोऽक्तयोः॥२।३।५१॥ इति वा षत्वे; विष्कन्दति; विस्कन्दति। “परेः॥२॥३॥५२॥ इति वा षे, परिष्कन्दति, परिस्कन्दति।आस्कन्दति। क्ये,स्कद्यते। ऋदिवाहाऽङि “नो व्यञ्जन-"॥४।२।४५॥ इति नलुाके, अस्कदत्, अस्कदतामित्यादि । पक्षे, अस्कान्त्सीत्, अस्कान्ताम्, अस्कांत्सुः, त्सीः,त्तम् , त्त, त्सम् , त्स्व , स्म॥भाक॥अस्कन्दि, अस्कं ९ त्साता- म् , त्सत, त्थाः, त्साथाम् , द्ध्यम , ध्वम् , सि, स्वहि, स्महि। चस्कन्द, चस्क- न्दतुः, चस्कन्दुः, चस्कत्थ, चस्कन्दिथ । स्कन्ता । स्कन्त्स्यति । चिस्कन्त्सति । यङि, “वश्वस्रंस-"॥४।१।५०॥ इति न्यागमे, चनीस्कद्यते। चनीस्कन्दीति, चनीस्कन्ति, चनीस्कन्तः, चनीस्कन्दति। स्कन्दयति । अचस्कन्दत् । स्कन्दत् । चस्कहान् । स्कन्नः । स्कन्नवान् । क्तयोर्न षः, विस्कन्नः, २ वान् । “परेः” ॥२।३ । ५२॥ इति क्तयोरपि वा षत्वे, परिस्कन्नः, परिष्कण्णः । "स्कन्द- स्यन्दः”॥ ४।३ । ३०॥ इति क्तवः कित्त्वाभावे, स्कन्त्वा । प्रस्कन्छ । यपः कित्त्वमित्यन्ये, प्रस्कद्य । स्कन्त्ता । स्कन्तुम् । सर्वधातूनां बहुलं वेडित्यन्ये । आस्कन्दिषम् , आस्कांसम् । आस्कन्त्तव्यम् , आस्कन्दितव्यमित्यादि । एव- मन्यधातुष्वपि । पक्ता, पचिता । पट्टा, पटिता इत्यादि । इदं च मतं “धूगौदितः' ॥४॥४॥३८॥ इत्यत्र व्यवस्थितविभाषाविज्ञानादागमशास्त्रमानित्यमिति न्यायाच खमतेऽपि संगृहीतं द्रष्टव्यम् ॥ ९२ ॥ षिधू गत्याम्। सेधति। “गतौ सेधः"॥२॥३६१॥ इति न षले, अभिसेधति । अनुसेधति गाः । अभिगच्छति, अनुगच्छतीत्यर्थः । असेधीत् । सिषेध । सेधि- , भ्वादिगणः । ष्यति। "णिस्तोरेव-"॥२॥३॥३७॥ इति नियमेन षत्वाभावे, सिसिधिषति, सिसेधि- पति । सेषिध्यते । सेधयति। असीषिधत् । सिषेधयिषति । “ऊदितो वा"||४|४|४२॥ इति क्वि वेटि, “वौ व्यञ्जन-" ॥४।३।२५॥ इति वा कित्त्वे च । सिद्धा, सेधिवा, सिधित्वा । तिव वेड्त्वात् क्तयोर्नेट् । सिद्धः । सिद्धवान् । एवमभ्यनु- पूर्वोऽपि । अनेकार्थत्वेन गतेरन्यत्र तु, “स्थासेनि-"॥२॥३॥४०॥ इति अट्यपि द्विवेऽपि, उपसर्गात्परस्य सस्य षत्वे, निषेधति। प्रनिषेधति। न्यषेधत् ।न्यषेधीत्। नाम्यन्तस्थ-"॥२३॥१५॥ इति षत्वे, निषिषेध, निषिषिधिम । निषेधिष्यति । निषिषिधिषति, निषिषधिषति । प्रत्यषिषिधिषत्, प्रत्यषिषेधिषत् । निषेषिध्यते । निषेषिधीति । निषेषिधयति । न्यषीषिधत् । निषिषेधयिषति । निषिद्ध । निषिद्धः ॥ ९३ ॥ ध्वन वन शब्दे ॥ ध्वनति, प्रतिध्वनति । अध्वनीत् , अध्वानीत् । दध्वान । ध्वनिता । ध्वनिष्यति । दन्ध्वन्यते । दन्ध्वनीति, दन्ध्वन्ति । शब्दे घटादिलाण णौ हवे, ध्वनयति । अन्यत्र ध्वानयति। डे, अदिध्वनत् । ध्वनि- तः,२वान् ॥ वन । स्वनति। अस्खानीत, अखनीत् । सस्वान । “जुभ्रम-४१ १२६॥ इति वा एवे, खेनुः सखनुः। वनिता। स्वनितो मृदङ्गः।“ व्यवात्स्वनोऽ- शने”॥२॥३॥४३॥ इति द्विलेऽपि अट्यपि षत्वे, विष्वणति; अवष्वणति । व्यष्वणत् । अवाष्वणत् । व्यष्वाणीत्, व्यवणीत् । अवाष्वाणीत् , अवा- वणीत् । विषष्वाण । अवषष्वाण । विषवणतुः। विष्वणिता । विषिष्वणिषति । अवषिष्वणिषति । विषष्वण्यते । अवर्षष्वण्यते । विष्वाणयति । व्यषिष्वणत् । अवाषिष्वणत् । विष्वाणितः। अशनादन्यत्र तु न पत्वम्, अवाखनत् गजः । विसवान मेवः ॥ ९४ ॥ ९५ ॥ गुपौ रक्षणे । “गुपौधूप-" ॥३।४।१॥ इति स्वार्थे आयः । गोपायति । "अशवि ते वा” ॥३४॥ इति वाऽऽये, गोपाय्यते, गुप्यते । अद्यतनी ॥ अगोपायीत् । औदित्वात् । “धूोदितः ॥४४॥३८॥ इति वेटि, नामनिटि"॥४।३।४५॥ इति वृद्धौ, अगौप्सीत्.। अगोपीत् । अगोपायि, अगोपि, अगोपायिषाताम् । “सिजाशिष-"॥४॥३॥३५॥ इति कित्त्वे, अगुप्सातामें , अगोपि- व्यखना- क्रियारत्नसमुच्चयः। षाताम् । ध्वमि, अगोपायि ३ ध्वम् , द्वम्, ड्वम्; अगुब्द्ध्वम् , अगुब्ध्वम्, अगोपि २ ध्वम्, ढ्वम् । गोपायांचकार, जुगोप । गोपायांचक्रतुः, जुगुपतुः । गोपाय्यात्, गुप्यात् । गोपायिषीष्ट, गुप्सीष्ट, गोपिषीष्ट । गोपायिता, गोप्ता, गोपिता । एवमन्यत्रापि । जुगोपायिषति । “ उपान्त्ये"॥४॥३॥३४॥ इति कित्त्वे, जुगुप्सति । “वौ व्यञ्जन."॥४।३।२५॥ इति वा कित्त्वे, जुगोपिषति, जुगुपिषति। जोगुप्यते । जोगुपीति, जोगोप्ति । औनिर्देशात् यङ्लुपि न आयः । गोपायय- ति, गोपयति। आयस्यादन्तत्वेन “ उपान्त्य-”॥ ४।२।३५॥ इति इस्वाभावे, अजुगोपायत्, अजूगुपत् । गोपायन् । गोपायिष्यन् । गोपायितः, २ वान् । वेट्वात् , “ वेटोऽपतः” ॥४|४|६२॥ इति नेटि, गुप्तः, २ वान् । गोपायित्वा, गुप्त्वा, गोपित्वा, गुपित्वा । गोपायिता, गोप्ता, गोपिता । गोप्यम् ॥ ९६ ॥ तपं धूप सन्तापे । आद्योऽनिट् । तपति । “निसस्तप-॥२॥३॥३५॥ इति षले, निष्टपति स्वर्णम् , सकृदग्निं स्पर्शयतीत्यर्थः। आसेवायां तु न षः। पुनः२ करणमा- सेवा । निस्तपति, पुनः २ तपतीत्यर्थः। “व्युदस्तपः॥३३८७॥ इत्यात्मनेपदेऽक- मणि, वितपते; उत्तपते रविः, दीप्यते इत्यर्थः । स्वाङ्गे कर्मणि, वितपते; उत्तपते पृष्ठम्, तापयतीत्यर्थः । क्ये, तप्यते । अताप्सीत् , अताप्ताम्, अताप्सुः। अतापि, अतप्साताम्, अतप्सत, अत ७ प्थाः, प्साथाम्, ब्ध्वम्, ब्द्ध्वम् , प्सि, प्वहि, प्स्महि । तताप, तेपतुः, तेपुः, तेपिथ, ततप्थ, तेपथुः, तेप, तताप, ततप, तेपिव, ते- पिम । तेपे, तेपाते, तेपिरे, तेपिषे । तप्यात् । तप्सीष्ट । तप्ता, २॥ तप्स्यति। “तपेस्तपः कर्मकात्॥३।४।८५॥ इति कर्त्तर्यात्मनेपदम् , क्यश्च।तप्यते तपः साधुः। तेपे तपांसि साधुः। तपिरत्र करोत्यर्थः। “तपः कर्चनु-"॥३।४।९१॥ इति न मिच् । तेन कर्म- कतार, अन्ववातप्त कितवः स्वयमेव । कर्त्तरि, अतप्त तपांसि साधुः । अनुता- पग्रहणाद्भावे कर्मणि च अन्वतप्त चैत्रेण, पश्चात्तापः कृत इत्यर्थः। अन्ववातप्त पापः पापेन, पश्चात्तापं कारित इत्यर्थः । तितप्सति । तातप्यते । तात१२पीति, प्ति, प्तः, पति०॥ शनिर्देशात् यङ्लुपि न षः, निस्तात २ प्ति, पीति । तात- पत् । तातपती । तातपितः। तातपित्वा । तापयति । अतीतपत् । तपन्, तप्यमानम् । तप्स्यन् । तप्स्यमानम्। तेपिवान् । तेपानम्। तप्तः। मिष्टप्ता अरातय भ्वादिगणः। इत्यत्र सदप्यासेवनं न विवक्ष्यते, तेन षवं सिद्धम् । सप्ता। तप्त्वा । तप्तुम् ।धूप । धूपायति।धूपाय्यते।धूप्यते। अधूपायीत्, अधूपीत् ,अधूपायिष्टाम्, अधूपिष्टाम्, अधूपायि, अधूपि । धूपयांचकार । दुधूप, दुधूपतुः, दुधूपुः।धूपाय्यात् , धूप्यात्। धूपायिता, धूपिता। धूपायिष्यति, धूपिष्यति । दुधूपायिषति, दुधूपिषति । दोधू- प्यते । दोधूपीति, दोधूप्ति। धूपाययति, धूपयति। आयस्याऽऽदन्तवेन, अदुधूपा- यत्, अदूधुपत । धूप्यमानम्, धूपाय्यमानम् । धूपायाश्चकृवान्, दुधूप्वान् । धूपायाञ्चक्राणम् । दुधूपानम् ॥ ९७ ॥ ९८ ॥ लप जल्प व्यक्ते वचने । लपति । आ, प्र, वि, सम्, उद्, अप, अभि- पूर्वोऽपि । अयं सर्वः पठिवत्, परं यङ्लुपि, लालपीति, लालप्ति, लालप्तः, लाल ९ पति, पीषि, प्सि, प्थः, प्थ, पीमि, प्मि, प्वः, प्मः। “हुधुटो-" ॥४२॥८३॥ इति धिः, “ तृतीयस्तृ-"॥१॥३॥४९॥ इति बः। लालब्धि । दिवि, अलाल ३ पीत्, प्, ब् । "भ्राजभास-”॥४।२।३६॥ इति डे, वा हस्खे । अलीलपत्, अललापत् । “भ्राज-"॥४।२।३६॥ इति सूत्रे लपामिति बहुवचनं शिष्ट- प्रयोगानुसारेणान्येषामपि णौ डे वा हुस्वार्थ, तेन अबिभ्रसत् , अबभ्रासदित्यादि- सिद्धम्। जल्प। जल्पति। "क्रियाव्यतिहारेऽगति-"॥३।३।२३॥ इत्यत्र शब्दार्थवर्ज- नान्नात्मनेपदम् , व्यतिजल्पति । अजल्पीत् । जजल्प । यङि, जाजल्प्यते । शेषं वांछतिवत् ॥ ९९ ॥ १० ॥ जप मानसे च । मनोनिर्व] वचने । चायक्त वचने । जपति। जजाप, जेपतुः, जेपुः, जेपिथ । जपिता । जपिष्यति । यङि, गर्हितं जपति जञ्जप्यते, जपजभ-"॥४।१ । ५२ ॥ इति मुरन्तः । भृशाभीक्ष्ण्ययोस्तु वाक्यमेव । "श्वसजप-"||४|४/७५॥ इति क्तयोर्वा नेट। जप्तः, २ वान् । जपितः, जपितवान् । जप्यम् । जाप्यम् । शेषं पठिवत् ॥ १०१ ॥ सृप्लं गतौ। अनिट्।सर्पति; उपसर्पति; उत्सर्पति।क्रियाव्यतिहारे गत्यर्थवर्ज- नादात्मनेपदाभावे, व्यतिसर्पन्ति।क्ये, सृप्यते । लुदित्त्वादङि, असृपत्। असर्पि, असृप्साताम् , असृब्ध्वम् , असृब्द्ध्वम् । ससर्प, ससृपतुः, ससूपुः । मृप्यात् । सृप्सीष्ट । सय॑ति । सिसृप्सति । कुटिलं सर्पति, सरीसृप्यते । सर्पयति । अत्र " क्रियारत्नसमुच्चयः। "वर्णस्य"||४।२।३७॥ इति वा ऋः। असीसृपत्, अससर्पत्। णौ सनि, सिसर्प-. यिषति । सः । सृप्त्वा । सप्र्तुम् । सृप्तः ॥ १०२ ॥ चुप मन्दायाम्। गतावित्यनुवर्त्तते, चोपति, किंचिच्चलतीत्यर्थः। अचोपीत्। चुचोप। चोपिता।णौ चल्यर्थत्वात्परस्मैपदे, चोपयति शाखाम्।अचूचुपत्॥१०३॥ चुबु वक्रसंयोगे । नेऽन्ते । चुम्बति; विचुम्बति । अचुम्बीत् । चुचुम्ब । चुम्बितुम् ॥ १०४ ॥ चमू जिमू अदने । चमति; विचमति । आपूर्वस्य “ष्ठिवूक्लम्व-"॥ ४।२। १०९॥ इति शिति दीर्घवे, आचामति । क्ये, आचम्यते । “नश्वि-"॥४॥३॥४९॥ इति वृद्ध्यभावे, आचमीत् । “मोऽकमि-"॥ ४॥३॥५५॥ इति चमो न वृद्धिः। अचमि । आचमेस्तु स्यात् । आचामि, आचमिषाताम्। आचचाम, आचेमतुः, आचेमुः, आचेमिथ । आचेमे । आचम्यात् । आचमिष्यति । आचिचमिषति । आचश्चम्यते। चञ्चमीति, चञ्चन्ति, चञ्चान्तः, चश्चमति, चञ्चमीषि, चञ्चसि । “शिड्हे-"॥१॥३॥४०॥ इत्यनुवारः; चञ्चा २ न्थः, न्थ, चञ्च ४ मीमि, न्मि, न्वः, न्मः । अत्र “मो नो म्वोश्च"॥२।१।६७॥ इति मस्य नः ॥ हौ “ अहन्- पञ्चम-"॥४।१।१०७॥ इति दीर्घ “शिड्हे-"॥१॥३॥४०॥ इत्यनुवारे च, आचश्चां- हि ॥ अद्यतनी ॥ "नश्चि-॥४॥३।४९॥ इति न वृद्धौ, अचश्चमीत्। शेषं यङ्लुब- न्तपचिवत्। “अमोऽकम्य-"॥४।२।२६॥ इति णौ हूस्वाभावे, आचामयति । आची- चमत् । आचामि । आचामन् । आचमिष्यन्। आचेमिवान् । आचेमानम् । अदि- त्त्वात् तिव वेट , चान्त्वा, चमित्त्वा । आचम्य। वेट्लात् क्तयोर्नेट्। आचान्तः,२ वान् । आचमितुम् । आचमिता । जिम । जेमति । क्ये, जिम्यते । अजेमीत्, अजेमिष्टाम्। अजेमि, अजेमिषाताम् । जिजेम, जिजिमतुः, जिजिमुः, जिजेमिथ, जिजिमथुः, जिजिम, जिजिमिम । जिम्यात्। जेमिता। जेमिष्यति । जिजिमिषति, जिजेमिषति। जेजिम्यते । जेजिमीति, जेजेन्ति, जेजीन्तः, जेजिमति, जेजिन्वः, जेजिन्मः, हौ, जेजींहि ॥ ह्यस्तनी ॥ अजेजिमीत् । “मो नो-" ॥२।१।६७॥ इति पदान्ते नः ॥ अजेजेन्, अजेजीन्ताम् , अजेजिमुः ॥ अद्यतनी ॥ अजेजेमीत् । जेजेमामास । जेजिम्यात् । जेजेमिष्यति। जेजिमितः। जेजेमिला, जेजिमिला ।

भ्वादिगणः। जेजेमितुम्। जेमयति । अजीजिमत्। जेमितः। जेमन्। जमिष्यन् । जिम्यमानम्। जिजिन्वान्, अत्र “मो नो-" ॥२॥११६७॥ इति नः । जिजिमानम् । जेमिता । जेमि २ तुम्, तव्यम्। अदित्वाहेटि “ अहन्पश्चम-"॥१२१०७॥ इति दीर्घे, जीन्त्वा । पक्षे, “वौ व्यञ्जन-"॥४॥३॥२५॥ इति वा कित्त्वे, जिमिला, जेमिला। वेट्वान्नेटि, जीन्तः, २ वान् ॥१०५॥१०६॥ क्रमू पादविक्षेपे। पदन्यासे। "क्रमो दीर्घः-४।२।१०९॥ इति दीर्घे, कामति, "भ्रासम्लास-॥३।४।७३॥ इति कर्त्तरि, वा श्ये, क्राम्यति, “क्रमोऽनुपसर्गात्" ॥३३॥४७॥ इत्यात्मनेपदे, वा श्ये च, क्रमते, क्रम्यते। एवं ४ रूपाणि । उपसर्गात्तु परस्मैपदे, प्रतिक्रामति, प्रतिक्राम्यति। एवं, सम् निरति अभिपूर्वोऽपि । “वृत्तिसर्ग- ॥३॥३॥४८॥ इत्यात्मनेपदे, ऋज्वस्य क्रमते बुद्धिः, न प्रतिहन्यत इत्यर्थः। युद्धाय क्रमते, उत्सहत इत्यर्थः। प्राज्ञे शास्त्राणि क्रमन्ते, स्फीतीभवन्ति । “परोपात्" ॥३३॥४९॥ पराक्रमते, परावृत्त्या कामति, शौर्य वा कुरुते इत्यर्थः। उपक्रमते, समीपे गच्छतीत्यर्थः । वा श्ये । पराक्रम्यते । उपक्रम्यते । एवमन्यत्रापि ॥ "वेः खार्थे ॥३३॥५०॥ पादन्यासे । साधु विक्रमते हंसः। स्वार्थादन्यत्र तु, विक्रामति, उत्सहत इत्यर्थः । “प्रोपादारम्भे" ॥३।३।५१॥ प्रक्रमते; उपक्रमते भोक्तुम् । " आङो ज्योतिरुद्गमे "॥३।३ । ५२॥ आक्रमते नभोऽर्कः। ज्योतिरुद्रमादन्यत्र तु आक्रामति धूमो नभः। क्ये, क्रम्यते। हौ, काम । क्राम्य । सङ्क्राम । सङ्का- म्य ॥ अद्य०॥ “नश्वि-॥४।३।४९॥ इति वृद्यभावे, अकरमीत् , मिष्टाम् , मिषुः०॥ "क्रमः"॥४।४।५३॥ इत्यात्मनेपदे नेट। अक्रंस्त, प्राक्रस्त, उपाक्रस्त, अकंसाताम्॥ भाक ॥ “मोऽकमि-॥४।३।५५॥ इति नजिचि वृद्धिः, अक्रमि। आत्मने नटि; अक्रं- साताम् , अक्रसत, अकंस्थाः, अक्रंध्वम् . अक्रंद्ध्वम् ॥ परोक्षा॥ चक्राम, चक्रमतुः, चक्रमि २ थ, म । चक्रमे, चक्रमिध्वे । क्रम्यात् । कंसीष्ट; प्रक्रंसीष्ट; उपक्रंसीष्ट । ऋमिता । क्रन्तासे ।क्रमिष्यति। कंस्यते। अक्रमिष्यत् , अकंस्यत्। प्राक्रस्यत, उपा- कंस्यत ।सनि, चिक्रमिषति। अनुपसर्गस्य चात्मने चिकंसते। प्रचिकंसते, उपचि- कंसते, आचिकंसते। अचिक्रसिष्ट। प्राचिक्रसिष्ट। प्रचिक्रंसिष्यते। उपचिक्रसिष्यते। कुटिलं कामति चकम्यते । “अतः॥४।३।८२॥ इति अल्लुकि “योऽशिति" , , क्रियारत्नसमुच्चयः। ३२८०॥ इति यलुकि, अचमि ९ष्ट, षाताम्॥ चक्रमा चक्रे । चक्रमिषीष्ट । चङ्गमिष्यते।लुपि, चङ्क २ मीति, न्ति, चक्रान्तः, चङ्कमति॥ अद्यतनी ॥ अचकमीत् । चङ्कमामास ३। भृशाभीक्ष्ण्ये तु वाक्यमेव, नतु यङ्। भृशमभीक्ष्णं वा कामतीति, गत्यर्थादृशाभीक्ष्ण्ये कुाटलयुक्त एव यङ्, न केवले, इति केचित् । एवं “गृलुप-"॥३४॥१२॥ इति सूत्रोक्तेष्वपि परमतम्॥णौ, “अमोऽकम्यमि-|| २६॥ इति इस्वे, क्रमयति। अचिक्रमत्। ञिणम् परेतु वा हस्वे, अक्रामि, अक्रमि। क्रमयाञ्चकार । क्रामन् । क्रममाणः । आक्रामन् धूमः। कथं जगदाक्रममाणस्येति, शानेन भविष्यति । क्रम्यमाणम् । कंस्यमाणम् । चकन्वान् । “क्रमोऽनुप-"॥३३॥ ४७॥ इति वात्मनेपदे विषयत्वे "तुः ||४।४।५४॥ इत्यनेनात्मनेपदीवषयत्वान्नेट । क्रन्ता; प्रक्रन्ता; उपक्रन्ता; आकन्ता।अनात्मने विषयत्वे तु, क्रमिता, निष्क्रमिता। उदित्वात् क्त्वि वेटि "क्रमः त्विवा॥४।१।१०६॥ इति वा दीर्घे, कन्वा, कान्वा, क्रमिला। वेट्वान्नेट, क्रान्तः । कान्तवान् । क्रमितुम् । क्रमितव्यम् ॥ १०७ ।। अथ हावनिटौ। यमूं उपरमे । यच्छति । " यमः स्वीकारे" ॥३३॥५९॥ इत्युपादात्मनेपदम् ; उपयच्छते कन्याम्। "आङोयमहनः स्वेऽङ्गे च ॥३॥३॥८६॥ आयच्छते पाणिम्, दीर्धीकरोतीत्यर्थः । “ समुदाङो यमः-"॥३३॥९॥ संयच्छते ब्रीहीन् । उद्यच्छते भारम् । आयच्छते वस्त्रम् । “पदान्तरगम्ये वा"।।३।३।९९॥ खान् ब्रीहीन संयच्छते, संयच्छति वा।क्ये, यम्यते॥अद्यतनी॥ “यमिरमिनम्य" ॥४४॥८६॥ इति सोऽन्तः, इट् च । अयंसीत्, अयंसिष्टाम् , अयंसिषुः । आयस्त कूपाद्रज्जुम् , उद्धृतवानित्यर्थः । “ यमः सूचने"॥४३॥३९॥ इति सिचः कित्त्वे, “यमिरमि-"॥१२॥५५॥ इति मलुकि, उदायत, उदायसाताम्, उदाय. सत । " वा स्वीकृतौ” ॥४॥३॥४०॥ उपायत, उपायंस्त महास्त्राणि, कन्यां वा । मोपयध्वं भयम् । उपा २ यध्वम् , यंद्ध्वम् ॥ भाक ॥ “मोऽकमि-" ॥४।३।५५।। इति अनिषेधाद् वृद्धिः। अयामि, अयंसाताम्। ध्वमि, अयन्ध्वम्, अयन्द्ध्वम् ॥ परोक्षा ॥ ययाम, येमतुः, येमुः, येमिथ, ययन्थ, येमिम । येमे। यम्यात् । यंसीष्ट । यियंसति । यंयम्यते । यंयमित्वा । यंयमितः । यंयम्यमानः। लुपि, यंय २ मीति, न्ति । " यमिरमिनमि-" ॥४।४।८६॥ इति मलुकि । यतः, भ्वादिगणः। ७३ यंयमति । हौ, यंयहि ॥ हस्तनी ॥ अयंयन् । अयंय १० मीत् , ताम् ,मुः,न , मीः ॥ अद्य० ॥ अयंयंसीत्। शतरि तु, यंयच्छत्। णौ, “यमोऽपरि-"॥४॥२॥२९॥ इति हखे यमयति केशान् । परिवेषणे तु, यामयत्यतिथीन् । “अणिगि प्राणि-"॥३॥ ३।१०७॥ इत्यस्यापवादः, परिमुह-॥३।३।९४॥ इत्यात्मनेपदम्,आयामयते सर्पम्। परमतेनात्र न हूखः । स्वमतेन तु भवत्येव । आयमयते। अयीयमत् । अयामि । अयमि । परिवेषणे तु, अयामि । यच्छन् । यस्यन् । येमिवान् । यतः, २ वान् । यन्ता । ऊदित्वात् तिव वेटि, यत्वा, यमित्वा । यपि “वामः" ॥४२॥५५॥ इति वाऽन्तलोपे, प्रयम्य, प्रयत्य ॥ १०८ ॥ णमं प्रहत्वे, नम्रत्वे । नमति । णपाठात् “अदुरुपसर्ग-"॥२॥३।७७॥ इति णः, प्रणमति। परिणमति । क्ये, नम्यते । अनंसीत्, “यमिरमिनम्यात-" ॥४४॥८६॥ इति सोऽन्तः इट् च । अनंसिष्टाम् , अनंसिषुः । “ मोऽकमि-"॥४॥ ३॥५५॥ इति अनिषेधाद् वृद्धौ, अनामि, अनंसाताम् ; अनंस्थाः; अनंध्वम्, अनंद्ध्वम् ॥ परोक्षा ॥ ननाम । प्रणनाम । अत्र परे द्वित्वे कार्ये णत्वशास्त्र- स्यासत्त्वात् द्विवे कृते णत्वम् । एवमन्यत्रापि । नेमतुः, नेमुः, नेमिथ, ननन्थ, नेमथुः, नेम, ननाम, ननम, नेमिव, नेमिम। नेमे; नेमिध्वे । नम्यात् । नंसीष्ट । नस्यति ॥ कर्मकर्तरि “एकधातौ-"॥३।४।८६॥ इत्यात्मनेपदे अनंसीद्दण्डं दण्डी । अनस्त नमते वा दण्डः स्वयमेव । परिणमति मृदं कुलालः । परि . णमते मृत् स्वयमेव । अत्र "भूषार्थ-"॥३४॥९३॥ इति निषेधात् क्यो निश्च न भवतः। ननु नम् अकर्मकस्तत्कथमस्य कर्मस्थक्रियत्वम्। उच्यते । अन्तर्भूतण्य- र्थवेन सकर्मकत्वाद्दण्डस्य कर्मकर्तृत्वम् । यत्र तु ण्यों नास्ति तत्र कर्तृत्व, यथा नमति पल्लवो वातेन । एवमन्यत्रापि । निनंसति। प्राग् णवे पश्चात् द्वित्वे, प्रणिणंसति । ननम्यते । नमीति, न्ति । “यमिरमिनमि” ॥४॥२॥५५॥ इति मस्य लुकि, नंनतः, नंनमति, नंनमीषि, नंनंसि, नंनथः, थ, मीमि, न्मि, न्वः, न्मः, “मो नो-"॥२॥१।६७॥ इति मस्य न् । हो, नंनहि । अद्य० ॥ अनंनं- सीत् । शेषं पठिवत् । क्ते, नंनमितः । “ज्वलह्वल-"||२॥३२॥ इत्यनुपसर्गस्य णौ वा हस्खे, नमयति, नामयति । सोपसर्गस्य तु, “ अमोऽकम्यमि-२२६॥ ११ क्रियारत्नसमुच्चयः । इति नित्यं हूखे, प्रणमयति । उन्नमयति । अनीनमत् । प्राणीनमत् । “ज्वलहल-" ॥१२॥३२॥ इत्यनेन वा इखविधानात् , त्रिणम्परे इति नानूद्यते, ततो “ अमोऽ- कम्य ॥४।२।२६॥ इत्यनेनैव निरुपसर्गस्य सोपसर्गस्य वा त्रिणम्परे णौ वा दीर्घः सिद्ध एव । अनामि, अनमि। प्राणामि, प्राणमि । नमन् । नस्यन् । नम्य- मानम् । नस्यमानम्। नेमिवान् । नतः। नला । यपि “वाम-"||५७॥ इति वाऽन्तलुपि, प्रणत्य, प्रणम्य । नन्तुम् । नन्ता। नन्तव्यम् ॥ १०९ ॥ अम शब्दभत्त्योः; भक्तिर्भजनम् । अमति। प्रपूर्वोऽयं प्राप्तावपि, प्रामति। अम्यते । “नश्वि-"॥४।३।४९॥ इति वृद्धिनिषेधेऽपि " स्वरादेस्तासु"॥४४॥३१॥ इति वृद्धौ, आमीत्, आमिष्टाम् । “मोऽकमि-"॥४।३।५५॥ इति वृद्धिनिषेधेऽपि "स्वरादेः-"॥४४॥३१॥ इति वृद्धौ, आमि, आमिषाताम्।आम, आमतुः, आमुः। अमिता। अमिष्यति।अमिमिषति। "अमोऽकमि-"॥४२॥२६॥ इत्यत्र वर्जनान्न हुस्खे, आमयति । आमिमत् । आमि । आमं २ । प्रामम् २ । अमन् । अमिष्यन् । "श्वसजप-"॥४।४।७५॥ इति क्तयोर्वा नेटि, अभ्यान्तः, अभ्यमितः । अमि३ता, तुम्, वा। प्राम्य ॥ ११० ॥ अम, गम्लं गतौ । अमिरुदाहृत एव, अर्थभेदार्थ तु पुनः पाठः । गम् । अनिट् । गच्छति । “क्रियाव्यातहार-"॥३।३।२३॥ इति गत्यर्थनिषेधानात्मनेपदे, व्यतिगच्छति मिथुनम् । अकर्मणि “समो गमृच्छि-"॥३३॥८४॥ इत्यात्मनेपदे, सङ्गच्छते । कर्मणि तु सति, सङ्गच्छति सुहृदम् । क्ये, गम्यते । सङ्गम्यते ॥ ह्यस्तनी॥ अगच्छत् । समगच्छत ॥ अद्यतनी ॥ “लविद्युतादि-"॥३।४।६४॥ इत्यङि, अगमत् , अगदमताम्, मन् , मः, मतम्, मत, मम्, माव, माम । "गमो वा॥४॥३॥३०॥ इति सिजाशिषोरात्मने वा कित्त्वे “यमिरमि-"|४|४|८६॥ इत्यन्तलोपे, “धुट्हस्व-"॥४।३।७०॥ इति सिच्लुकि च, समगत, समगस्त, समगसाताम्, समगंसाताम् ॥भाक॥ “मोऽकमि-"॥४॥३॥५५॥ इति अनिषेधाद्- वृद्धौ, अगामि । समगामि । अगसाताम, अगंसाताम्, अगसत, अगंसत, अगथाः, अगंस्थाः, अगसाथाम् , अगंसाथाम् । सिचो वा कित्वे मस्य लुकि, "सो धि."॥४।३।७१॥ इति सिचो वा लुकि च, अगध्वम् , अगद्ध्वम्, भ्वादिगणः। ५ अगन्ध्वम्, अगन्द्ध्वम्, अगसि, अगंसि, अगवहि, अगंवहि, अगस्महि, अगस्महि ॥ परोक्षा ॥ जगाम “गमहन-"॥४२॥४४॥ इत्युपान्त्यलुकि, जग्म- तुः, जग्मुः। “सृजदृशि-"॥४१७८॥ इति थवि वेट, जगमिथ, जगन्थ, जग्मथुः, जग्म, जगाम, जगम । “स्कसू-"॥४१४१८१॥ इतीटि, जग्मिव, जग्मिम | सञ्जग्मे, सञ्जग्माते,सञ्जग्मिरे, सञ्जग्मिषे ॥भाक॥ जग्मे; जग्मिध्वे । गम्यात् । सगसीष्ट, सङ्गंसीष्ट, चैत्रः॥ भाक॥गसीष्ट, गंसीष्ट ।गन्ता। सङ्गन्तासे। “गमोनात्मने"|| ५१॥ इतीटि, गमिष्यति । आत्मनेपदे तु नेटि, सङ्गस्यते वत्सो मात्रा ॥ भाक ॥ गंस्यते ग्रामः। अगमिष्यत्। समगंस्यत।अगस्यत। जिगमिषति। जिगमिषिष्यति। जिगमिषि ३ ता, तुम्, तः। आत्मनेपदविषयस्यात्मनेपदाभावे इटि, सञ्जिग- मिषि ३, ता, तः, तव्यम् । आत्मनेपदे तु नेटि, जिगंस्यते ग्रामः। “स्वरहन्ग- मोः॥४११०४॥ इत्यत्र गमुग्रहणाद्गमो न दीर्घः। सञ्जिगंसते वत्सो मात्रा। सञ्जिगं३ स्यते, सिष्यते, समानः। जङ्गम्यते । अजङ्गमि ९ष्ट, षाताम्, षत०॥ जङ्गमांचके। जङ्गमिष्यते । जङ्गमिला। जङ्गमितः । योऽल्लुकः स्थानित्वाद् “गमहन-"पर ॥४४॥ इत्युपान्त्यलोपो न स्यात् । लुपि, जङ्गमीति । त्यादौ तु, न छः । जङ्गन्ति, जङ्गतः, जङ्ग्मति, जङ्गमीषि, जङ्गसि, जङ्ग २ थः, थ, जङ्ग ३ न्मि, न्वः, न्मः ॥ " समो गमृच्छ-॥३।३।८४॥ इत्यत्र प्रकृतिग्रहणात् यङ्लुप्यात्मनेपदमेव, संजङ्गते, सञ्जङ्ग्माते, सञ्जग्मते । हौ, जङ्गहि॥ह्यस्तनी॥ “मो नो म्बोश्च ॥२॥१॥ ६७॥ इति पदान्ते नः, अजङ्ग ९ न् , मीत्, ताम्, मुः, न् , मीः ॥ अद्यतनी ॥ लदिद्युतादि-"॥३॥४६४॥ इत्यत्र लदनुबन्धनिर्देशाद्यङ्लुपि नाऽङ्; अजङ्ग ३ मीत् , मिष्टाम्, मिषुः । अजङ्गामि, अजङ्गसाताम्, अजङ्गसाताम् । आत्म- नेपदे नेट् । “गमोऽनात्मने"॥४४॥५१॥ इत्यत्र प्रकृतर्ग्रहणात्, जङ्गमाञ्चकारत्यादि। आशीःप्रभृतिषु प्राग्वत् । शतरि तु “गमहन-"॥२४॥ इत्युपान्त्यलोपे “गमिषद्-"॥४।२।१०६॥ इति मश्छत्वे “अघोष-॥१३॥५०॥ इति गस्य कत्व, जंक्छत् । णिगि “अमोऽकम्यमि-'॥४॥२॥२६॥ इति हस्खे, गमयति मैत्रम् , अत्र फलवत्कर्त्तर्यपि “अणिगि प्राणि-॥३।३।१०७॥ इति परस्मैपदम् । सकर्मकत्वविव- क्षायां तु, गमयति; गमयते वा मैत्रं ग्रामम् । अत्र गतिः पादविहरणे, चलनं तु ७६ क्रियारत्नसमुच्चयः। स्थितस्यैव पदार्थस्येति “ चल्याहारार्थ-"॥३॥३।१०८॥ इति न परस्मैपदमेवैकम् , अवगमयति, गुरुः शिष्यं धर्मम् । त्रिष्वपि “ गतिबोध ॥२२॥५॥ इत्यणिकर्तुः कर्मवं, णिगि कर्त्ता तु न कर्म, गमयति चैत्रो मैत्रम्, तं परः प्रयुक्ते, गमयति चैत्रेण मैत्रं जिनदत्तः । “गमेः क्षान्तौ”॥३।३ ५५॥ इत्यात्मने- पदे, आगमयते गुरून् ; किञ्चित्कालं प्रतीक्षत इत्यर्थः। आगमयस्व तावत्, किञ्चित्कालं सहस्वेत्यर्थः । क्षान्तेरन्यत्र तु, आगमयति विद्याः, गृह्णातीत्यर्थः। डे, अजीगमत्, त ॥भाक॥ ञिणम्परे तु वा दीर्घः, अगामि, अगमि । अवागामि, अवागमि । गामं २, गमं २ । गच्छन् । गमिष्यन् । सङ्गच्छमानः। संगंस्यमानः। गम्यमानम् ।गंस्यमानम् । “गमहन-"|४|४८३॥ इति कसौ वेटि, जग्मिवान्, जग- न्वान् । “गत्यर्थ-॥५।१।११॥ इति वा कर्तरि क्ते, गतो ग्रामं चैत्रः। पक्षे,कर्मणि, गतो ग्रामश्चैत्रेण । भावे, गतमनेन। “अद्यर्थाच्चाधारे" ॥५॥१॥१२॥ इदमहेर्गतम्। "क्तयोरसद-"॥२।२।९१॥ इत्याधारवर्जनात् कर्तरि षष्ठी। क्तौ, गतिः । गत्वा । आगत्य, आगम्य । गन्तुम्। गन्ता । गन्तव्यम् । गमनीयम् ॥ १११ ॥ ईj ईर्ष्यार्थः । ईय॑ति । छात्रायेमेते, अत्र कर्माभावाद्भावे आत्मनेपदम्। ऐयीत्। ईर्ष्याञ्चकार । ईर्ष्यात् । “यिः सन्वर्ण्यः॥४।१।११॥ इति येः सनो चा द्विवे, ईयियिषति, ईयिषिषति । णौ ङे, येईिवे, ऐयियत् । ईयितः ॥११२॥ चर भक्षणे च; चाद्गतौ । चरति, आचरति । एवं प्र, सम्, वि, परि, उप, अति, व्यभि, अभ्यनु पूर्वोऽपि क्रियाव्यतिहारे गतिनिषेधाद्गतौ नात्म- नेपदम्, व्यतिचरन्ति ग्रामम् । भक्षणे तु स्यात्, व्यतिचरन्ते चारिम् “ उदश्चर.”॥३।३।३१॥ इत्यात्मनेपदे, गुरुवच उच्चरते, अनुवतीत्यर्थः । गहमुच्चरते, उल्लङ्घयतीत्यर्थः । साप्यादित्येव, धूम उच्चरति । “समस्तृती- यया" ।।३।३।३२॥ अश्वेन सञ्चरते । क्ये, चर्यते । “वदव्रजल-"॥ ४।३।४८॥ इति वृद्धौ, अचारीत्, अचारिष्टाम् । अचारि, अचरिषाताम् । चचार; चेरुः; चेरि २ थ;म । चर्यात्। चरिता। चरिष्यति। चिचरिषति । अश्वेन सञ्चिचरिषते। "गृलुप-"||३।४।१२॥ इति यङि, गर्हितं चरति चञ्चूर्यते । अत्र “तिचोपान्त्यः शा५४इत्यत उः। द्विवे सतीत्याधिकारान्न पूर्वमुत्वम्। चरफलाम्"श५३॥ इति भ्वादिगणः । मुरन्तः । गर्यादन्यत्र तु न यङ्, भृशं कुटिलं वा चरति ॥ ह्यस्तनी ॥ अचञ्चूर्यत ॥ अद्यतनी ॥ अतो यश्च लुकि, अचञ्चूरिष्ट । लुपि, चञ्चूर्ति, चञ्चुरीति, चञ्चूर्तः, चञ्चुरति, चञ्चुरीषि, चञ्चूर्षि, चञ्चुर्थः, चञ्चूर्थ, चञ्चुरीमि, चञ्चूमि, चञ्चूर्वः, चञ्चूर्मः। आच ४ ञ्चूः, चुरीत्, चूर्त्ताम्, चुरुः । आचञ्चु ३ रीत, रिष्टाम्, रिषुः । णौ, विचारयति । उच्चा- रयति । व्यचीचरत् । चेरिवान् । चरि ३ ता, वा, तुम् । आचर्य । चरितः, २ वान् । कथं, चीर्णः, २ वान् इति । वृ इति धावन्तरं चरति समानार्थम्, क्तक्तवतुविषयमामनन्ति ॥ ११३ ॥ दल, त्रिफला विशरणे । दलति । अदालीत् । ददाल, देलतुः, देलुः।णौ; उद्दालयति । केचिदेनं घटादौ मन्यन्ते; दलयति । दलिता। दलितुम्। त्रिफला । फलति । प्रतिफलति । शेषं फलनिष्पत्तावित्यस्येव, परम् “अनुपसर्गाः क्षीवोल्ला- घ-"॥४।२।८०॥इतिक्ते निपातनात्, फुल्लः। फुल्लमनेन। उत्फुल्लः;संफुल्लः। सोपसर्गस्य तु प्रफुल्ला लता। अत्र जीत्वाद् "ज्ञानेच्छा-"॥५।२।९२॥ इति सति क्तः, क्तवतौ निपातनाभावात् , प्रफुल्तवान्। उत्फुल्तवान्। संफुल्तवान् । अन्येतु क्तवतावपी. च्छन्ति, फुल्लवानित्यादि । आदित्त्वात् “नवा भावारम्भे"॥४।४।७२॥ इति क्तयोर्वा नेटि, प्रफुलितमनेन । प्रफुल्लमनेन । प्रफुलितः । प्रफुल्तः ॥ ११४ ॥ ११५ ॥ मील निमेषणे; सङ्कोचे । मीलति । उन्मीलति । प्रनिसम्पूर्वोऽपि । अमीलीत् । मिमील। मीलिष्यति। मिमीलिषति। मेमील्यते, मेमी१२ ल्ति, लीति, ल्तः, लति०॥ णौ ङे, “भ्राजभास-"॥४॥२॥३६॥ इति वा हस्खे, अमीमिलत् । अमिमीलत् । णौ क्ते, मीलितः। मीलित्वा। मीलयित्वा। निमील्य ॥११६॥ मूल प्रतिष्ठायाम् । मूलति। अमूलीत् । मुमूल । णौ उन्मूलयति केशान्। उदमृमुलत् । मूलयांचकार । क्ते, उन्मूलितः ॥ ११७ ॥ फल निष्पत्तौ; सिद्धौ । फलति । प्रतिफलति। “वदव्रज-"॥४।३।४८॥ इति वृद्धौ, अफालीत् । पफाल । तृत्रप-"॥४।१।२५॥ इत्येत्वे, फेलतुः, फेलुः, फेलिथ । फलिता। फलिष्यति । पिफलिषति। “तिचोपान्त्य"।।४।१।५४॥ इत्यत उः, पंफुल्यते । “हृयुक्तोपान्त्य-"॥४॥३॥१४॥ इति न गुणे, पंफुलीति । “ तिचो- “ कियारत्नसमुच्चयः। पान्त्य-"|४|११५४॥ इत्यत्र अनोदिति वचनाद्गुणाभावे, पंफु ११ल्ति, ल्तः, लति, लीषि, ल्षि • । णौ, फालयति । अपीफलत् । फलितः, २ वान् ॥ त्रिफलेत्यस्य तु, फुल्लः ॥ ११८ ॥ फुल्ल विकसने । फुल्लति । अफुल्लीत् । पुफुल्ल, पुफुल्लतुः, पुफुल्लुः । फुल्लि- ता। फुल्लितः, २ वान् ॥ ११९ ॥ वेल, खेल, स्खल, चलने। वेलति।उद्वेलति। विवेल। वेलिता। णौ, उहेलयति। उ, ऋदित्त्वाद् “उपान्त्य-"॥४।२।३५॥ इति हस्खाभावे, अविवेलत् । खेलति ।अखे- लीत् । चिखेल।चिखेलिषति। चेखेल्यते । ऋदित्वात्, अचिखेलत् । स्खलति । चस्खाल । णौ सनि, चिस्खालयिषति । स्खलिता ॥१२०॥१२१ ॥१२२ ॥ गल, चर्ब अदने । गलति । “वदव्रज-"॥४।३।४८॥ इति वृद्धौ, अगालीत् । जगाल। गलिष्यति। स्रवणेऽप्ययमनेकार्थत्वात् ; गलत्युदकं कुण्डिकायाः॥ चर्बति। “बहुलमेतन्निदर्शनम्” इति चुरादित्वे । चर्बयति ॥ १२३ ॥ १२४ ॥ गर्व दर्प । गर्वति । अगर्वीत् । जगर्व । गर्वितः ॥ १२५ ॥ ष्ठिवू निरसने । “षः सो-"॥ २।३।९८॥ इत्यत्र ष्ठियो वर्जनान्न षः सः। "ष्ठिवूक्लम्ब-"॥४।२।११०॥ इति दीर्घ, ष्ठीवति । निष्ठीवति । क्ये, “भ्वादेः॥२१ ।६३॥ इति दीर्धे, ष्ठीव्यते। अष्ठेवीत् , अष्ठेविष्टाम्, “तिर्वा ष्ठिवः॥४१॥४३॥ इति पूर्वस्य वा तित्वे, तिष्ठेव, टिष्ठेव । “इवृध-"॥४४॥४७॥ इति सनि वेटि, तिष्ठे- विषति । टिष्ठेविषति । पक्षे, “ उपान्त्ये "॥४॥३॥३४॥ इति सनः कित्त्वे ऊटि द्विवे "तिर्वा ष्ठिवः"४।१।४३॥ इत्यत्र तेरिकारस्योच्चारणार्थत्वात् वा ठस्य तत्वे च, तुष्ठयूपति, टुष्ट्यूषति । तेष्ठीव्यते, टेष्ठीव्यते । “ष्ठिवूक्लम्व-"॥४।२।११०॥ इत्यत्र अत्यादावधिकाराद्यङ्लुपि त्यादौ न दीर्घः । तेष्ठेति, अत्र “य्वोः- "||४|४|१२१॥ इति व्लुक् । तेष्ठिवीति, तेष्ठयूतः, तेष्ठिवति । एवं टेष्ठेतीत्याद्यपि । शतरि तु, "ष्ठिवू-"॥४।२।११०॥ इति अदिन्निर्देशाधङ्लुपि न दीर्घः, तेष्ठिवत् । टेष्ठिवत् । ष्ठेवि २, ता, तुम्। अदित्त्वात् त्तिव वेट् , ठयूत्वा, ष्ठेवित्वा। निष्ठीव्य। वेट्वान्नेट , निष्ठयूतः, २ वान् । “ष्ठिसिवोऽनटि वा"|४|११२॥ इति वा दीर्घ, निष्ठीवनम्, निष्ठेवनम् ॥ १२६ ।।

भ्वादिगणः । जीव प्राणधारणे । जीवति। उपजीवति । जीवतु, जीवतात् ; जीव, जीवतात् । अजीवीत् , अजीविष्टाम्। अजीवि। उपाजीविषाताम् , उपाजीवि ३ ध्वम् , दम, ड्ठम्। जिजीव, जिजीवतुः; जिजीविथ । जिजीवे।उपजिजीविध्वे, ट्व। जीव्यात् । उपजीवि१०षीष्ट । षीदम् , षीध्वम्॥जीविता। जीविष्यति। जिजीविषति । जेजी- व्यते । जेजीवीति । जेज्योति । द्विवे कृते “अनुनासिके च-४।१।१०८।। इति ऊट , जेज्यूतः, जेजीवति, जेजीवीषि, जेज्योषि, जेज्यूथः, जेज्यूथ, जेजीवीमि, जेज्योमि । वस्य विकल्पेनानुनासिकवाद् “ अनुनासिके चच्छु-" ॥४।१।१०८॥ इत्यूटि, जेज्यूवः । निरनुनासिकले तु, “य्वोः प्वय्-'"||१२१॥ इति ब्लुकि, जेजीवः, जेज्यूमः। क्ये, जेजीव्यते ।हौ, जेज्यूहि । ह्यस्तनी ॥वे । अजेज्यूब, अजेजीव । जेजीवि ३ ला, ता, तः। जीवयति । “भ्राजभास."||१२|३६॥ इति के, वा हूखे, अजीजिवत्; अजिजीवत् । “य्वोः॥४४|१२१॥ इति व्लुकि, जिजीवान् । जिजीवानम्। जीवि ३ खा, तुम्, तः। सञ्जीव्य ॥ १२७ ॥ अव रक्षणगतिकान्तिप्रीतितृप्त्यवगमनप्रवेशश्रवणस्वाम्यर्थयाचनक्रियेच्छा- दीप्त्यवाप्त्यालिङ्गनहिंसादहनभाववृद्धिषु, १९ अर्थेषु । अवति । आव, आवतुः, आवुः । अविता । शेषं यवर्जम् , अटवत् ॥ १२८ ।। अथ द्वावनिटौ। दृशृं, प्रेक्षणे। पश्यति । कर्माभावे, “समो गम्-"॥३।३।८।। इत्यात्मनेपदे, संपश्यते। व्यतिपश्यते । क्ये, दृश्यते ॥ अद्य० ॥ ऋदित्वाहाडि, "वर्ण-"३७॥ इति गुणे च, अदर्शत् , अदर्शताम्, अदर्शन ; अदर्शाम ॥ पक्षे सिचि, अः सृजि-"|४|४|१११॥ इति अः, व्यञ्जनानामनिटि"॥४३॥ ४५॥ इति तद्वृद्धिश्च, अद्राक्षीत् , अद्राष्टाम् ; धुहस्व ॥४।३।७०॥ इति सिच्लुकि, अद्राक्षुः, अद्राक्षीः, अद्राष्टम् , अद्राष्ट, अद्राक्षम्, अद्राक्ष्व, अद्राक्षम । “सिजांशिष-"॥8॥३॥३५॥ इति सिचः कित्त्वे, समदृष्ट, समदृ३क्षाताम् , क्षत, ठाः ॥ भाक ॥ अदर्शि; "स्वरग्रह-"॥३।४।६९॥ इति वा ब्रिटि, अद- शिषाताम् , अदृक्षाताम् , अदर्शिष्ठाः, अदृष्ठाः, अदर्शिध्वम् , अदर्शिट्ठम् । यज-"॥२।११८७॥ इति शः थे, “ सो धि-"॥४॥३॥७२॥ इति वा सिच्लुकि, "तृतीय-"॥१॥३॥४९॥ इति डे, धो ढे च, अदृड्ड्वम्। “यज-"||२|११८७॥ इति शः .

क्रियारत्नसमुच्चयः। थे, "षढो:-"॥२॥१॥६२॥ इति षः के, “ नाम्यन्त"॥२॥१५॥ इति सः थे, डत्वे, धो ढत्वे च, अदृग्डढ्वम्, अदर्शिषि, अदृक्षि; अदर्शिष्वहि, अदृश्वहि, अदर्शिष्महि, अदृक्ष्महि ॥ परोक्षा ॥ ददर्श, ददृशतुः, ददृशुः । “ सृजिशि-" ॥४४७८॥ इति वा नेटि, दद्रष्ठ, ददर्शिथ, ददृशथुः, ददृश, ददर्श। “स्कस." ॥४४८१॥ इति इटि, ददृशिव, ददृशिम । ददृशे, ददृशाते; ददृशि २ थे, ध्वे । दृश्यात्। “सिजाशिष-॥४।३।३५॥ इति कित्त्वाम्न अः, दृक्षीष्ट । दर्शिषीष्ट । द्रष्टार। दर्शिता । द्रक्ष्यति, ते, दर्शिष्यते। अद्रक्ष्य २ त, त; अदर्शिष्यत । “उपान्त्ये." ॥४॥३॥३४॥ इति सनः कित्त्वाद्गुणाभावे, “ स्मृदृशः- "॥३३॥७२॥ इत्यात्मनेपदे, दिदृक्षते। दरीदृश्यते । शेषं पचिवत् । लुपि,"द्वयुक्तो॥४॥३॥१४॥ इति न गुणे, दरी, रि,र ३ दृशीति। धुडादौ अकिति अदागमे। दरी, रि, र३द्रष्टि, ददृष्टः, दर्दशति, दशीषि, दक्षि, दर्दृष्ठः, दर्दष्ठ, ददृशीमि, दर्दश्मि, ददृश्वः, ददृश्मः। समो गम्-" ॥३।३।८४॥ इत्यत्र प्रकृतिग्रहणेन यङ्लुबन्तस्यापि ग्रहणादात्मनेपदे, सन्दरीद्रष्टे, सन्दरीदृशाते॥ह्यस्तनी॥अदृशीत्, अदर्द्रग् । आदेशादागम इति न्यायेन दिवो. लोपात् प्रागेवादागमः, “ ऋत्विज्- "॥२॥११६९॥ इति शो गः । अदष्टाम्, अददृशुः, अद ७ दृशीः, ग्, ईष्टम् , ईष्ट, दृशम् , ईश्व, दृश्म।अद्यतनी॥ऋदि- त्वनिर्देशात् यङ्लुपि नाऽङ्, अदरिद ९ शीत , शिष्टाम् , शिषुः ॥ ददर्शाचकार । ददृश्यात् । दर्दर्शिष्यति । दर्दशत् । “शौ वा"॥४।२।९५॥ इति वाऽन्तोऽत् ; दरिदृशति, दरिदृशन्ति, वा कुलानि । दरिदृशितः, तवा ॥४३॥२९॥ इति सेट्क्वा न कित, दरिदर्शि ३ वा, ता, तव्यम् । णौ, दर्शयति । डे, “ऋव- र्णस्य ॥२॥३७॥ इति वा ऋत् , अदीदृशत् । पक्षे गुणः, अददर्शत्। “अणि- कर्म-"॥३।३।८८॥ इत्यात्मनेपदे, पश्यन्ति राजानं भृत्याः, दर्शयते राजा भृत्यान् , भृत्यैर्वा । अत्र “दृश्यभिवदोः- "॥२।२।९॥ इति वाऽणिक्क णिगि कर्मत्वम् । पश्यन् । द्रक्ष्यन् । दृश्यमानं; द्रक्ष्यमाणम् । “गमहन-"॥४।४।८३॥ इति वेटि, ददृशिवान् , ददृश्वान् । ददृशानम्। द्रष्टा।"दृशः कनिम्॥५।१।१६६॥ मेरुदृश्वा । स्त्रियां “णस्वराघोषाद्-"॥२॥४४॥ इति नस्य रे, तत्वदृश्वरी । दृष्टः, २ वान्। दृष्ट्वा । संदृश्य । द्रष्टुम् । द्रष्टव्यम् ॥ १२९ ॥ , भ्वादिगणः । 1 दंशं दशने। “दंशसञ्जः ॥२।४९॥ इति नलुकि, दशति । क्ये, दश्यते। अद्यतनी ॥ “यजसृज-"॥२।१।८७॥ इति षः, “षढोः-" ॥२॥११६२॥ इति कः, "नाम्यन्त-"॥२॥३॥१५॥ इति षः। अदाङ्क्षीत् , अदांष्टाम्, अदाङ्क्षः, अदाङ् ६ क्षीः, ष्टम् , ष्ट, क्षम्, क्ष्व, म ॥ अदंशि, अदं ९क्षाताम् , क्षत, ठाः, ड्वम्, ग्ड्वम्, क्षि० ॥ ददंश, ददं९ शतुः, शुः, शिथ, ष्ठ, शथुः, श, श, शिव, शिम। दंदशे। दश्यात् । दक्षीष्ट। दंष्टा । दक्ष्यति। दिदङ्क्षति । गर्हितं दशति "गृलुप-"॥३।४।१२९ इति यङि, दन्दश्यते । लुपि, गृलुप-"॥३।४।१२।। इति कृतन- लोपस्य निर्देशान्नो लुकि, दन्दशीति; दन्दष्टि, दन्द १० ष्टः, शति, शीषि, क्षि, ४ः, ठ, शीमि, श्मि, श्वः, श्मः ॥ ह्यस्तनी ॥ अदन्द ११ शीत्, ट्, ष्टाम्, शुः, शीः, ट, ष्टम् , ष्ट, शम्, श्व, श्म । दंशयति । अददंशत् । दशन् । दशन्ती । दष्टः, २ वान् । दष्ट्वा । प्रदश्य । दंष्टा । दंष्टुम् ॥ १३० ॥ शब्दे । घोषति; उद्घोषति । ऋदित्वाद्वाऽङि, अघुषत् , अघोषीत् । जुघोष । घोषिता। घोषिष्यति । जुघोषिषति; जुथुषिषति। जोघुष्यते। घोषयति । अजूघुषत् । घोषित्वा, घुषित्वा । घोषितुम् । “घुषेरविशब्दे"॥४४६८॥ इतीट्- निषेधात् ; घुष्टा रज्जुः, सम्बद्धावयवेत्यर्थः । विशब्दने तु, घुषितं वाक्यम् , नानाशब्दैर्भाषितमित्यर्थः ॥ १३१ ॥ तूष तुष्टौ । तूषति । अतूषीत् । तुतूष । तूषिता । तूषितुम् ॥ १३२ ॥ लुष स्तेये । लोषति । अलोषीत् । लुलोष । लोषिता । लुषितः ॥१३॥ कृषं विलेखने, हलोत्कर्षणे, अनिट् । कर्षति । आमापोदाविपूर्वोऽपि । कृष्यते । स्पृशमृश-" ॥३४॥५४॥ इति वा सिचि, अकार्षीत्, अकार्टाम्, अकाभ्रुः। “स्पृशादि-"॥४।४।११२॥ इति वा अकारागमे, अक्राक्षीत् , अक्राष्टाम् , अक्राक्षुः । पक्षे, अनिट्वात् , हशिट-॥३४॥५५॥ इति सकि, अकृक्षत्, अकृक्षताम् , अकृक्षन्, अकृक्षम् , अकृक्षाम ॥ भाक ॥ अकर्षि । सिचि "सिजाशिष-"॥४।३।३५॥ इति कित्त्वान्न अः, अकृक्षाताम् , अकृक्षत, अकृष्ठाः, अकृक्षाथाम् , अकृड्ड्वम्, अकृग्ड्ढ्वम्, अकृ ३ क्षि, वहि, महि । सकि तु “खरेत-"|४|३७५॥ इत्यल्लुकि, अकृक्षाताम् । अल्लुकः स्थानिखात्' अन्तो- " “ , १२ ८२ क्रियारत्नसमुच्चयः । ऽदभावे, अकृ७ क्षन्त, क्षथाः, क्षाथाम् , क्षध्वम्, क्षि, क्षावहि, क्षामहि ॥ परोक्षा ॥ चकर्ष, चकृषुः, चकार्षथ, चकृषिम। चकृष। कृष्यात्। कृक्षीष्ट । कर्टा, कष्टा । कयति, क्रक्ष्यति । चिकृक्षति । चरीकृष्यते । चरी, रि, र ३ कृषीति । चरि, री, र ३ कर्टि । चरि, री, र ३ ऋष्टि । चरि १४ कृष्टः, ऋष्टः, कृषति, कृषीषि, कलिं, कक्षि, कृष्ठः, ऋष्ठः, कृष्ठ, ऋष्ठ, कृषीमि, कर्मि, कृष्वः, कृष्मः । हौ, चरिकृड्ढि, चरिकड्ढि ॥ ह्यस्तनी ॥ अचरि १६ कृषीत्, कर्ट क्रट, कृष्टाम्, क्रष्टाम् , कृषुः, कृषीः, कर्ट, क्रट ॥ अद्य० ॥ अचरिकर्षीत् । णौ, कर्षयति; उत्कर्षयति। “ऋवर्णस्य"।४।२।३७॥ इति उ वा ऋत् , अचीकृ- षत्, अचकर्षत् । चकृष्वान् । कृष्ट्वा । कृष्टः, २ वान् । क्रष्टुम् । कटुंम् ॥१३४॥ भष भर्त्सने, कुत्सितशब्दकरणे । भषति श्वा, बुक्कतीत्यर्थः। भषति भषकः, पैशुन्येन वक्तीत्यर्थः।भष्यते। अभाषीत् , अभषीत् । बभाष। भषिता। भषिष्यति। भाषितः। भषित्वा ॥ १३५॥ विषू, वृषू सेचने । वेषति; परिवेषति । अवेषीत् । विवेष । वेषिता । वेषिष्यति। "वौ व्यञ्जन-४।३।२५॥ इति क्त्वासनोर्वा कित्त्वे, परिविवेषिषति, परि- विविषिषति । ऊदिलात् तिव वेट, विषिला, वेषित्वा, विष्ट्वा । विष्टः । वृष । वर्षति मेघः । वृष्यते । अवर्षीत्। अवर्षि । ववर्ष, ववृषः। वृष्यात् । वर्षिषीष्ट । वर्षिता २ । वर्षिष्यति। विवर्षिषति । वरीवृष्यते । वरि,री, र् ३ वृषीति । वरि, र्, री ३ वर्टि । वरि २ वृष्टः, वृषति । वर्वृषत् । वर्वर्षिया । वर्षयति। डे, अवीवृषत् , अववर्षत् । ववृष्वान् । वृष्ट्वा, वर्षिखा। ऊदित्वात् क्वि वेट; वेट्लात् क्तयोर्नेटि, वृष्टः, २ वान् । वर्षिता ॥ १३६ ॥ १३७ ॥ मृषू सहने च; चात् सेचने। मर्षति। अमर्षीत् । ममर्ष; ममृषुः ।मर्षिता । उदित्वात् क्त्वि वेटि, "ऋत्तृष-'"॥४॥३॥२४॥ इति वा कित्वम्, मृष्ट्वा, मृषित्वा, मर्षित्वा । मृष्टः, २ वान् ॥ १३८ ॥ उधू, प्लुषू दाहे। ओषति । औषीत् , औषिष्टाम् । “जाग्रुष-"॥३४॥४९॥ इति वा आमादेशे, ओषां९चकार, चक्रतुः, चक्रुः। उवोष, ऊषतुः, ऊषुः०॥ ओषिता। ओषिषिषति । ऊदित्वात् वेटि, ओषित्वा, उष्ट्वा । उष्टः, २ वान् । ओषिता ।

भ्वादिगणः।
प्लुष् । प्लोषति । अप्लोषीत् । पुप्लोष, पुप्लुषुः । प्लोषिता । पुप्लुषिषति । पुप्लोषि-
पति । वेट्त्वात् नेट्, प्लुष्टः २ वान् । प्लोषि २ ता, तुम् । प्लुष्ट्वा, प्लोषित्वा,
प्लुषित्वा ।। १३९ ॥ १४० ।।
धृष्
संघर्षे । घर्षति । अघर्षीत् । जघर्ष । घर्षिता । अदित्वात्, घृष्ट्वा,
धर्षित्वा । वेट्त्वात्, घृष्टः, २ वान् ॥ १४१॥
पुष पुष्टौ । पोषति । पुष्यते। पोषेत्। पोषतु । अपोषत् । अपोषीत् । पुपोष;
पुपुषुः । पोषिता। शेषं पुषश् वत् ॥ १४२ ॥
भूष अलङ्कारे । भूषति । अभूषीत् । बुभूष । भूषिता । भूषितः ॥१४॥
रस शब्दे । रसति । अरसीत्, अरासीत् । ररास, रेसतुः, रेसुः। रेसे ।
रसिता । रसितुम् ॥ १४४ ॥
लस श्लेषणक्रीडनयोः । लसति; उल्लसति; अभ्युल्लसति; विलसति ।
लस्यते । व्यलसीत्, व्यलासीत् । विललास, लेसतुः, लेसुः । लसिता । विलि-
लसिषति । लालस्यते । व्यलीलसत्; त । लसित्वा । विलस्य । लसि.
तम् ॥ १४५ ॥
हसे हसने । हसति; प्रहसति; विहसति; उपहसति । क्रियाव्यतिहारे हस
वर्जनान्नात्मनेपदे, व्यतिहसन्ति। "नश्वि-"||३१९|| इति वृद्धिनिषेधे, अहसीत्,
अहसिष्टाम्। जहास, जहसतुः, जहसुः। हसिता। जिहसिषति। जाहस्यते । जाह
१२ सीति, स्ति, स्तः, सति, सीषि, स्सि० । हौ, जाह २ धि, द्धि। “सोधि-"॥४॥
३।७२॥ इति वा स्लुक् दिवि “धुटस्तृती-॥२।१७६॥ इति द्, अजाह ३ द्, त्,
सीत् ॥ अद्य० ॥ अजाहासीत्, अजाहसीत् । “नश्वि-"॥४॥३॥४९॥ इत्यत्रौदितां
यङ्लुपि न वृद्धिनिषेधः, हासयति। अजीहसत् । हसिता ॥१४६॥
शंसू स्तुतौ च; चाहिंसायाम् । प्रशंसति । क्ये, प्रशस्यते । अशंसीत् ।
शशंस, शशंसतुः, शशंसुः। शंसिता । ऊदित्वात्, शस्त्वा, शंसित्वा । प्रशस्य ।
शस्तः, २ वान् । “कृवृषि-"॥५॥१॥४२॥ इति वा क्यपि, प्रशस्यम् । पक्षे, ध्यणि
प्रशंस्यम् । शेष सञ्जवत् ॥ १४७ ॥

८४ क्रियारत्नसमुच्चयः। " दहं भस्मीकरणे । अनिट् । दहति । दह्यते। अधाक्षीत् । अत्र “व्यञ्जना- नाम्-" ॥४॥३॥४५॥ इति वृद्धौ, "भ्वादेः-"२।१।६३॥ इति घे “गडदबा-"॥२॥ १७७॥ इति आदेर्धे “अघोषे प्र-॥१॥३॥५०॥ इति कि "नाम्यन्त-"॥२।३।१५॥ इति षः। अदाग्धाम् । अत्र धुहस्व- "॥४॥३७०॥ इति सिच्लुकस्थानिदेन वृद्धिः । “अधश्च-"॥२।१।७९॥ इति धः । “तृतीय-"॥१॥३॥४९॥ इति गः । अत्र हि सकारे परे आदेश्चतुर्थे धे कर्तव्ये वर्णविधित्वेन सिचो न स्थानित्वम् ; तेन आदेर्दस्य न धः । ननु तर्हि वृद्धौ कार्यायां कथं सिचः स्थानित्वमिति चेत्, उच्यते । धुहख-"॥४३७०॥ इत्यत्र लुबधिकारेऽपि लुग्ग्रहणं वृद्धौ कर्तव्यायां सिचः स्थानित्वार्थम्, तेन सा भवति । एवमन्यत्रापि । अधा- क्षुः, अधाक्षीः, अदाग्धम्, अदाग्ध, अधाक्षम्, अधाक्ष्व, अधाक्षम । अदाहि, अध २ क्षातां, क्षत, अदग्धाः, अध ६ क्षाथाम् , ग्ध्वम् , ग्ड्ढ्वम् , क्षि, वहि, माहे । ददाह, देह तुः, देहुः, देहिथ, ददग्ध, देहथुः, देह, ददाह, ददह, देहिय, देहिम। देहे । “हान्त-"॥२।११८१॥ इति वा ढे, देहि २ ध्वे, ट्वे । दह्यात्। धक्षीष्ट; धक्षीध्वम् । दग्धा । धक्ष्यति । दिधक्षति । दन्दह्यते । दन्द ५ हीति, ग्धि, ग्धः, हति, हीषि । दन्धक्षि, दन्द ६ ग्धः, ग्ध, मि, हीमि, हः, मः । हो, दन्दग्धि । दाहयति । अदीदहत् । दहन् । धक्ष्यन् । देहिवान् । दग्धः, २ वान् । दग्ध्वा । अत्र धत्वस्यासत्वाद् “गडदबा-"॥२।१७७॥ इति आदेर्न चतुर्थः। दग्धुम्। दग्धा। दग्धव्यम् ॥१४८॥ वृहु शब्दे च; चाद् वृद्धो; नेऽन्ते। वृंहति गजः। उद्वंहति । क्ये, वृंद्यते । अवृहीत्, अबृंहिष्टाम्। वह। वहे। वृंहिता। विहिषति । वरीयते । उपवृंह- यति। उपाववृहत् । वृहन् । वृंहिता । वृहितं गजस्य ॥ १४९ ॥ अर्ह, मह पूजायाम् । अर्हति । आनर्ह । शेषं अर्चवत् । अयं पूजायां चुरादिरपि । अर्हयति, पूजायाम् । अन्यत्र तु योग्यत्वादौ न णिच्, अर्हति । अर्जिहिषति । णिगि, अर्हयति । डे, आर्जिहत् ॥ मह । महति । क्ये, मद्यते । “नश्चि-"॥४॥३॥४९॥ इति न वृद्धिः, अमहीत् । ममाह। मेहे।महितः॥१५०॥१५१।। उक्ष सेचने। उक्षति। उक्ष्यते। औक्षत् ॥ अद्यतनी ॥ औक्षीत् , औक्षिष्टाम्।

भ्वादिगणः । ८५ उक्षाञ्चकार । उपसर्गस्य क्रियाविशेषकत्वादव्यवधायकत्वे; उक्षांप्रचक्रुरित्यादि भवत्येव । एवमन्यत्राप्यामुपसर्गे सति भवति । उक्ष्यात् । उक्षिता । औ- क्षिण्यत् । उचिक्षिषति । उक्षयति । औचिक्षत् । उक्षाञ्चकृवान् । उक्षि ३ तः, त्वा, तुम् ॥ १५२ ॥ रक्ष पालने, चौराद्रक्षति । अरक्षीत् । ररक्ष । रक्षिता । णौ , रक्षयति । अररक्षत् । रिरक्षयिषति । रक्षितः ॥ १५३ ॥ तक्षौ तनूकरणे; कार्ये । “तक्षः स्वार्थे वा"॥३।४।७७॥ इति वा अनुः, तक्ष्णोति। तक्षति। स्वार्थग्रहणं ज्ञापकं धातवोऽनेकार्था इति; तेन स्वार्थादन्यत्र, तक्षति वाग्भिः शिष्यम् , निर्भर्त्सयतीत्यर्थः । औदित्वात् “धूगौदितः "॥४४॥३८॥ इति वेटि, अतक्षीत् । इडभावे तु सिचि ईति, “ व्यञ्जनानामनिटि-” ॥४।३।४५॥ इति वृद्धौ “ संयोगस्यादौ- ॥२।११८८॥ इति क् लुकि, “पढोः कः-"॥२।१।६२॥ इति षस्य कत्वे सिचः षत्वे च, अताक्षीत् । ततक्ष । तष्टा; तक्षिता । तक्ष्यति, तक्षिष्यति । तितक्षिषति । तात३क्ष्यते, क्षीति, ष्टि । णौ डे, अततक्षत् । तष्ट्रा, तक्षित्वा । तष्टुम् , तक्षितुम् । वेट्वान्नेट , तष्टः, २ वान् ॥ १५४ ॥ काक्षु काङ्क्षायाम्, नेऽन्ते । काङ्क्षति; आकाङ्क्षति । अकाङ्क्षीत् । चकाङ्क्ष । चिकाक्षिषति । चाकाझ्यते । ङे, अचकाङ्क्षत् ॥ १५५ ॥ इति परस्मैपदिनः। अथात्मनेपदिनो वर्णक्रमेण वक्ष्यन्ते । तत्र, डीङ्, पूङ् वर्जा नवाऽनिटः। गाङ्गतौ। “इडितः।।३।३।२२॥ इत्यात्म- नेपदम् ; गाते, गाते, गाते, गासे, गाथे, गाध्वे । इडेत्-"॥४३९४॥ इति आलुकि, गे, गावहे, गामहे । क्ये, “ ईय॑ञ्जने.” ॥४॥३॥९॥ इति ईखे, गीयते ॥ सप्तमी ॥ गेत, गेयाताम् , गेरन् ॥ पञ्चमी ॥ गाताम्, गाताम् , गाताम् , गाव, गाथाम्, गाध्वम्, गै, गावहै, गामहै ॥ यस्तनी ॥ गात, अगाताम्, अगात ॥ अद्यतनी ॥ अगास्त, अगासाताम् , अगासाताम्, अगाध्वम्, अगाद्ध्वम् ॥ भाक ॥ अगायि। “स्वरग्रह-"३।४।६९॥ इति वा मिटिं, अगा- " अ- , क्रियारत्नसमुच्चयः। यिषाताम्, अगासाताम् । जगे, जगाते, जगिरे, जगिषे । गासीष्ट ॥ भाक ॥ गायिषीष्ट,गासीष्ट । गास्यते॥ भाक॥ गास्यते,गायिष्यते। जिगासते। जेगीयते। जागेति, जागाति। शेषं स्थास्थाने । गापयति । अजीगपत् । आनाश, गानः । जगानः । गीतः, २ वान् । गीत्वा । गाता, गातुम् ॥ १५६ ॥ मिङ् ईषद्धसने। विस्मयते। क्ये, स्मीयते । स्मयेत। स्मयताम् । अस्मयत। अस्मेष्ट, अस्मेषाताम् ॥भाक॥ अस्मायि, अस्मायिषाताम् , अस्मेषाताम्। षपाठात् "नाम्यन्त-"॥२३॥१५॥ इति षः । सिष्मिये, सिण्मियाते, सिष्मियिरे, सिष्मियिषे, सिष्मियिदे, ध्वे ॥ भाक, कर्तृवदेव ॥ स्मेषीष्ट २, स्मायिषीष्ट । स्मेता २, स्मायिता। स्मेष्यते २, स्मायिष्यते । “ऋस्मि-"|४|४|४८॥ इतीटि, सिस्मयिषते। सेष्मीयते । सेष्मीति, सेष्मेति । शेषं जिंवत्। णौ “स्मिङः प्रयोक्तुः-"॥३।३।९१॥ इत्यात्त्वम्, आत्मने च। मुण्डो विस्मापयते। , व्यसिष्मपत। व्यस्मापि । करणेन तु विस्मयभावे, रूपेणैनं विस्माययति। ङ, असिष्मयत् । णौ सनि, सिष्माययिषति । “स्मिङ:-"। ३।३९१॥ इत्यत्र डिन्निर्देशाद्यङ्लुपिणौ, नात्मनेपदम् , सेष्माययति । स्मयमानः। स्मेष्यमाणः । स्मीयमानम् । सिष्मियाणः । स्मितः, २ वान् । स्मिला । स्मेता । स्नेतुम् ॥१५७ ॥ डीङ् विहायसाङ्गतौ । डयते; उड्डयते । क्ये, डीयते । अडयिष्ट, अड- यिषाताम्, अडायिषाताम् । डिड्ये, डिड्याते, निडिडियरे । डयिता । डयिष्यते। डिडयिषते। डेडीयते। डेडयीति, डेडेति, डेडीतः, डेड्यति। “न डीङ्-"॥४।३।२७॥ इत्यत्र डिन्निर्देशाद्यङ्लुपि क्तयोः कित्त्वमेव । डेड्यितः, २ वान् । उड्डाययति । उदडीडयत् । “नडीशी-॥४॥३॥२७॥ इति क्ते कित्वनिषेधात्, डयितः२ वान् । डीङ् च गतावित्यस्य तु, डीनः, २ वान् , डयि ३ ता, तुम्, तव्यम् ॥ १५८॥ कुंङ् शब्दे । कवते । कूयते। अकोष्ट, अकोषाताम् । अकावि। चुकुवे । कोता । चुक्षति । “न कवतेर्यङ:-॥४१॥४७॥ इति कस्य न चः, कोकूयते खरः। लुपि तु तिन्निर्देशाचः स्यात्, चोकवीति, चोकोति, चोकु २ तः, वति, कोतुम् ॥१५९॥ च्युङ्, श्रृंङ्, प्लुंङ्गतौ। च्यवते। च्यूयते । नित्यत्वात् सिचो लोपात् प्रागेव म्वादिगणः । गुणे, अच्योष्ट । अच्यावि, अच्योषाताम् , अच्याविषाताम् । योषीष्ट २, च्या. विषीष्ट । चुच्यूषते । चोच्यूयते । चोच्यवीति, चोच्योति, चोच्यु २ तः, वति चोच्यवित्वा, चोच्युवितः । णौ, च्यावयति । णौ सनि, "श्रुसु-"॥११॥ इति वा उः इः, चिच्यावयिषति, चुच्यावयिषति । उ सन्वद्भावात् , अचिच्य- वत्, अचुच्यवत् । च्युतः। प्रच्युत्य । च्योता । च्योतुम् । एवं ग्रुप्लू अपि । पुप्लूषते । पोप्लूयते । पोप्लवीति, पोप्लोति । पिप्लावयिषति, पुप्लावयिषति । डे, अपिप्लवत् , अपुप्लवत् ॥ १६० ॥ १६१ ॥ १६२ ॥ पूङ् पवने । पवते । पूयते । अपविष्ट । अपावि, अपाविषाताम् । अप- विषाताम् । पुपुवे । पविषीष्ट २ । पाविषीष्ट । पविता २। पाविता। पविष्यते २ । पाविष्यते। अपविष्यत २। अपाविष्यत । “ऋस्मि-४४८॥ इतीटि, “ओर्ज-" ॥४।१।६०॥ इति उः इः। पिपविषते। पोपूयते । पोपोति, पोपवीति । शेषं भूवत्। परं “ न डीशीफूङ्-॥४।३।२७॥ इत्यत्र डिनिर्देशात् क्तयोर्यङ्लुपि कित्वे, पोपुवितः, २ वान् । अत्रानेकस्वरत्वात् “उवर्णात्"॥४।४।५८॥ इति नेनिषेधः । "पूक्लिशि-४४४५॥ इति विकल्पोऽपि न, तिवाशवेति न्यायात्। पावयति। अपीपवत् । “ओर्ज-४११६०॥ इति उः इः, पिपावयिषति । पवमानः । पूय- मानम् । “पूक्लिशि-॥४।४।४५॥ इति क्तत्त्वामादौ वेटि "न डी ॥४॥३॥२७॥ इति क्तयोः “त्वा-"॥४।३।२९॥ इति क्त्वायाश्च किवाभावाद्गुणः । पवितः, २ वान् । पूतः, २ वान् । पवित्वा, पूत्वा । प्रपूय । पवितुम् ॥ १६३ ॥ मेंङ् प्रतिदाने, प्रत्यर्पणे । मयते । "नेादा-"॥२॥३॥७९॥ इति णत्वे, प्रणिमयते । “ईय॑ञ्जन-"॥४।३।९७॥ इतीले, मीयते । अमास्त । अमायि । ममे । “गापास्था-"॥४।३।९६॥ इति एः, मेयात् । माता । मास्यते । “मिमीमा- दा-॥१॥२०॥ इति इद् नच द्विः, मित्सते । मेमीयते । मामेति, मामाति, माता । मातुम् । “दोसोमास्थ इ"॥४|४|११॥ मितः, २ वान् । मित्वा । यपि, “मेडो वा मित्॥४।३।८८॥ अपमित्य, अपमाय वा याचते ॥१६॥ देंङ्, पालने । दयते पुत्रम्।“ ईय॑०-१॥३॥९७॥ ईः, दीयते। अदित, अदिषाताम् । अदायि, अदायिषाताम्, अदिषाताम् । देर्दिगिः"॥४१॥३२॥ :

८८ क्रियारत्नसमुच्चयः। दिग्ये, दिग्याते, दिग्यिषे । दासीष्ट २ । दायिषीष्ट । एवं स्यते इत्यादावपि । दित्स- ते। देदीयते । दादेति । दापयति । अदीदपत् । “ने दा-"॥२॥३॥७९॥ इति णिः, प्रणिदातुम् । दत्तः, २ वान् । दत्वा । दाता ॥ 3ङ् । त्रायते; परित्रायते । क्ये, त्रायते। अत्रास्त; अत्रासाताम् । अत्रायि; अत्रायिषाताम् , अत्रासाताम्। “सोधि-" ॥४३॥७२॥ इति वा सलुकि, अत्रा २ ध्वम्, द्ध्वम् । " हान्त-" ॥२॥१८॥ इति वा ढे, अत्रायिध्वम्, ढुम्, ठम् । तत्रे, तत्राते, तत्रिरे, तत्रि२, षे; ध्वे, अत्र “स्क्रसृ-४४८१॥ इति इटि “ इडेत्पुसि-॥४।३।९४॥ इति आलुक् । त्रासीष्ट २। त्रायिषीष्ट । त्राता २ । त्रायिता । त्रास्यते २ । त्रायिष्यते । तित्रा- सते । तित्रास्यते। सर्वे णिगन्ताः सन्नन्ता यङन्ताश्च स्वरान्ता धातवस्तत्तदन्त- भूवद्वाच्या इत्युक्तं प्रागपि, तथाऽप्ययं यङन्त उक्तस्मृतये दर्श्यते । तात्रायते । क्ये, तात्राय्यते। तात्रायते। क्ये, तात्राय्यते । तात्रायताम् ॥ भाक ॥ तात्राय्य. ताम् । अतात्रायत ॥ भाक ॥ अतात्राय्यत ॥ अद्यतनी ॥ अतात्रायिष्ट, अता- त्रायिषातां, अतात्रायिषत ॥ भाक ॥अतात्रायि, अतात्रायिषातामित्यादि॥परोक्षा॥ तात्रायां ३ चक्रे, बभूव, आस ।अत्र धातोरात्मनेपदेऽपि “आमः कृग-"॥३३७५॥ इत्यत्र कृग्ग्रहणादस्तिभुवोः परस्मैपदमेव ॥ भाक ॥ तात्रायां ३ चक्रे; आहे; बभूवे । तात्रायिषीष्ट ॥ भाक ॥ तानायिषीष्ट । एवं तात्रायिष्यते २। अतात्रायि- ष्यत । तात्रायमाणः । तात्रायिष्यमाणः॥ भाक ॥ तात्राय्यमाणम् । तात्रायिष्य- माणम्।तात्रायां ३ चक्राणः, बभूवान् , आसिवान् । 'आमः कृग-॥३।३।७५॥ इत्यत्र भ्वस्तिभ्यां परस्मैपदस्याभिधानादत्र वसुः॥भाक ॥ तात्रायां३ चक्राणम्, बभूवानम्, आसानम् । ताप्रायि ५ त्वा, ता, तुम्, तः, २ वान् ॥ एवं सर्वेऽपि स्वरान्ता यङि, त्रैवदवगन्तव्याः ॥ यङ्लुपि तु, तात्रेति, तात्राति । “एषाम्-"॥४।२।९७॥ इति ई:, तात्रीतः । “नश्च-"॥४।२।९६॥ इति आलुकि, तात्रति, तात्रेषि, तात्रासि, तात्रीथः, तात्रीथ, तात्रेमि, तात्रामि,तात्रीवः, तात्रीमः। क्ये, तात्रायते। तात्रायात् ॥ भाक ॥ तात्रायेत । तात्रेतु, तात्रातु, तात्रीताम्, तात्रतु, तात्रीहि ॥ भाक ॥ तात्रायताम् ॥ ह्यस्तनी ॥ अतात्रेत, अतात्रात्, अतात्रीताम् , अतात्रुः, अता- प्रेः,त्राः, त्रीतम् , त्रीत, नाम्, त्रीव, त्रीम ॥ भाक ॥ अतात्रा ९ यत, येतां॥ ३ ३ .

भ्वादिगणः । ८९ अद्यतनी॥सिचि “यमिरमिनम्य-॥४।४।८६॥ इति इट् सोऽन्तश्व, अतात्रा९ सीत् , सिष्टाम् , सिषुः, सीः०, सिष्म ॥ भाक ॥ अतात्रायि। सिटि इटि च, अतात्रायि- षाताम्, अतात्रिषाताम् , अतात्रायिषत, अतात्रिषत॥ परोक्षा ॥ तात्रांचकारेत्यादि ॥ भाक ॥ तात्राञ्चके इत्यादि ॥ आ० ॥ “संयोगादेर्वाशिष्यः॥४।३।९५॥ इति वा एः, तात्रेयात्, तात्रायात् , तात्रेयास्ताम् , तात्रायास्ताम् ॥ भाक, जिटिटोः॥ तात्रायिषीष्ट, तात्रिषीष्ट ॥ श्वस्तनी ॥ तात्रिता ॥ भाक ॥ तात्रायिता, तात्रिता ॥ भविष्य ॥ तात्रिष्यति॥ भाक ॥ तात्रायिष्यते, तात्रिष्यते॥ क्रिया० ॥ अता- त्रिष्यत् ॥ भाक ॥ अतात्रायिष्यत, अतात्रिष्यत । तात्रत् । तात्रिष्यन् ॥ भाक।। तात्रायमाणम् । तात्रिष्यमाणम् । जिटि, तात्रायिष्यमाणम् । तात्रां३ चकृवान्, बभूवान् , आसिवान् वा ॥ भाक ॥ तात्रां ३ चक्राणम् , बभूवानम् , आसानम् वा । तात्रि ५ त्वा, ता, तुम् , तः २, वान् । अस्य स्थाधातोच यङ्लुबन्तस्य क्ये, परस्मै सिचि आशीर्ये च स्थानत्रय एव विशेषोऽस्ति नान्यत्र । यथैवायं चॅडभिहितस्तथैव घ्रां, ध्मां, म्नां, ग्लैं, म्लें, स्नांकादयः संयोगादिकाः, हांक, हांङ्, पांक्, यां, लां, वां, रां, छों, शोच दांब , बादयश्चासंयोगादिकाः सर्वेऽप्याकारान्ता यङ्लुपि चैंवत् ज्ञातव्याः। नवरं; हांक्, हांङादीनामसंयुक्तादिकानामाशीर्यकारे एकारो न स्यात् । हांक । जहायात् , जहायास्ताम् ॥ हांङ् । जाहायात्, जाहायास्ताम् । पांक् । पापायात् , पापायास्ताम् । एवं यांकादिप्वपि । “गापास्था- सा-"॥४॥३॥९६॥ इति सूत्रोक्तास्वादन्ता हांकवर्जाः १५ स्थास्थाने ऽभिहिताः सन्ति । णिगि, त्रापयति । ङ, अतित्रपत् । त्रायमाणः । वास्यमानः। तत्राणम् । "ऋही-॥४।२७६॥ इति वा नः, त्राणः, २ वान् । त्रातः, २ वान् । व्यव- स्थितविभाषेयम् , तेन संज्ञायां न नत्वम, त्रातः । देवत्रातः । अन्यत्र तु नत्व- म्, त्राणः । उभयमित्येके । त्राता । त्रात्वा । परित्राय ॥ १६५ ॥ १६६ ॥ लोकृङ् दर्शने । लोकते। एवं वि, आङ, अव पूर्वोऽपि । लोक्यते । अलो- किष्ट, अलोकिपाताम् । ध्वमि, अलोकिध्वम्, ड्ठम् । अलोकि। लुलोके । लौकि- पीष्ट। लोकिता। लोकिप्यते । लुलोकिपते । लोलोक्यते । लोलो ४ कीति, क्ति, क्तः, कति। लोकयति । ऋदित्वात् “उपान्त्य ॥४।२।३५॥ इति हखाभावे, अलु- १३

क्रियारत्नसमुच्चयः ।
लोकत्। लोकमानः । लोक्यमानम् । लुलोकानम् । लोकितः,२ वान् । लोकिला।
विलोक्य । लोकि २ ता, तुम् ॥ १६७ ॥
रेकृङ्, शकुङ् शङ्कायाम्। शङ्का सन्देहः, पूर्वस्याऽर्थः; द्वितीयस्य त्रासश्च ।
आरेकते। आरेकिष्ट । आरोकि। आरिरेके। आरेकिता। आरोकिष्यते। ऋदिलात्
ढे न हम्बः, आरिरेकत्। शकु। नेऽन्ते। शङ्कते । आशङ्कयते । अशङ्किष्ट, अश-
किपाताम् । अशङ्कि । शशङ्के, शशङ्काते। शङ्किता। शिशङ्किषते । शाशङ्कय-
ते । शाशङ् १२ क्ति, कीति० । शङ्कि ३ त्वा, ता, तुम् ॥ १६८ ॥१६९॥
चकि तृप्तिप्रतिघातयोः । चकते। चक्यते । अचकिष्ट, अचकिषाताम् ।
अचाकि । चेके, चेकाते । चकिष्यते। उक्तार्थयोर्घटादित्वात् णौ हखे, चक-
यति । अचीचकत् । ञिणम् परे तु वा दीर्घः; अचाकि, अचकि । चाकं २,
चकं २ । चकितः २, वान् । चकि ३ वा, ता, तुम् ॥ १७० ॥
ढौकङ, श्रीकृङ्, टीकृ, लघुङ्, गतौ । ढौकते । ढौक्यते । अढौ.
किष्ट । अढाकि, अढौकिषाताम् । डुढौके; डुढौकिरे । ढौकिता २ । डुढौकिषते ।
डोढौक्यते । डोढी १२ कीति, क्ति, क्तः, कति । ढोकयति । ऋदित्वात् डे
न हवः, अडुढौकत्॥ त्रीकृङ्। त्रौकते । तुत्रौके । बौकिता ॥ टीकृङ्। आटी
कते । आटिटीके । टीकिता । ऋदित्वात् डे, न इस्वः, अतुत्रौकत् । अटिटी-
कत् । लघुङ् । नेऽन्ते । लङ्घते, उल्लङ्घते । अलविष्ट, अलविषाताम् । अल-
जि । ललचे, ललचाते । लविता । लिलङ्घिषते । लालङ्घयते । लाल २ वीति,
ग्धि । उल्लङ्घय । लङ्घि ४ त्वा, ता, तुम्, तः। लडिर्भोजननिवृत्त्यर्थोऽपि । नव-
ज्वरो लङ्घनीयः ॥ १७१ ॥ १७२ ॥ १७३ ॥ १७४ ॥
श्लाघृङ् कत्थने, उत्कर्षाऽऽख्याने । “श्लाघगुस्था-"॥२।२।६०॥ इति चतुर्थ्या,
मैत्राय श्लाघते । श्लाघ्यते । अश्लाधिष्ट, अश्लाघिषाताम् | अश्लाधि । शश्लाघे,
शश्लाघाते, शश्लाघिरे, शश्लाधिषे । श्लाघिषीष्ट । श्लाधिता । श्लाघिष्यते ।
शिश्लाघिषते । शाश्लाघ्यते । शाश्ला१२ घीति, ग्धिः । श्लाघयति । अशश्लाघत् ।
श्लाघमानः । श्लाध्यमानम् । श्लाघि ४ त्वा, तः, ता, तुम् ॥ १७५ ॥

भ्वादिगणः । " लोचूङ् दर्शने । आलोचते । लुलोचे । डे, अलुलोचत् । शेषं लोक- वत ॥ १७६ ॥ पचुङ् व्यक्तीकरणे । नेऽन्ते । प्रपञ्चते । पञ्च्यते । अपश्चिष्ट, अपश्चि- षाताम् । अपश्चि । पपश्चे, पपञ्चाते, पपश्चिरे । पञ्चिप्यते । पिपश्चिपते । डे, अपपञ्चत् । पच्चि ३ ता, तुम्, तः । प्रपञ्च्य । पचुण विस्तारे इत्यस्य तु, पञ्च- यति ॥ १७७ ॥ भ्राजि दीप्तौ । भ्राजते। अभ्राजिष्ट । बभ्राजे । भ्राजिता। बिभ्राजिषते । बाभ्रा- ज्यते । “यजसृज-"२।११८७॥ इत्यत्र राजिसहचरितस्यैव भ्राजेग्रहणादस्य षत्वा- भारे यङ्लुपि, बाभ्राक्ति । तस्य तु बाभ्राष्टि इति स्यात् । बाभ्राक्तः, बाभ्राजति । भ्राजभास.”॥४।२।३६॥ इति वा हस्खे, अविनजत् , अबभ्रा- जत् ॥ १७८ ॥ ऋजि गतिस्थानार्जनोजनेषु। ऊर्जनम्, प्राणनम् । अर्जते । ऋत्यारुप- सर्गस्य” ॥१।२।९॥ इत्यारि, उपाय॑ते । आजिष्ट, आर्जिपाताम् । आर्जि। 'अना- त-"॥४।१।६९॥ इति पूर्वस्याले ने च, आनृजे। अर्जिता । अर्जिष्यते । सनि, इट द्वित्वं प्रति न निमित्तम्, तेन द्वित्वात् प्रागेव स्वरस्य गुणे “अयिर-॥४१॥६॥ इति रनिषेधनेन जिरेव द्विः, अर्जिजिषते । णौ, अर्जयति । ङ, आर्जिजत् । ऋजितः । अर्जि ३ वा, ता, तुम् ॥ १७९ ॥ भृजैङ् भर्जने; पाकप्रकारे । भर्जते । अभर्जिष्ट, अर्जि । बभृजे । बिभर्जिषते। णौ, भर्जयति । , "ऋवर्णस्य"।४।२।३७॥ इति वा ऋः, अबी- भृजत्, अबभर्जत् । ऐदित्वात् क्तयोर्नेट, भृक्तः २, वान् । भर्जित्वा ॥१८॥ तिजि क्षमानिशानयोः; निशानं, तीक्ष्णीकरणम् । “गुप्तिज- "॥३४॥५॥ इति क्षान्तौ, खार्थे सनि “ स्वार्थे "||४|४|६०॥ इति नेटि, तितिक्षते कोपम्; तिति ८ क्षेते, क्षन्ते ॥ भाक ॥ तितिक्ष्यते । अतितिक्षिष्ट । तितिक्षांचके । तितिक्षि ३ षीष्ट; तासे; ष्यते । अतितिक्षिप्यत । तितिक्षमाणः । तितिक्ष्यमा- णम् । तितिक्षांचक्राणः। तेजने तु, णिगादिप्रत्ययान्तरमेवाभिधीयते, न तु प्रायेण त्यादयः । णौ, तेजयति । अतीतिजत्। एवं “गुप्तिजो."३।४।३॥ इत्यादि

९२
क्रियारत्नसमुच्चयः।
सूत्रत्रयोक्तानां गुपादीनामपि सूत्रोक्तार्थाभावे ज्ञेयं, प्रायोग्रहणात् । गोपमा-
नम् , तेजमानम्, केतन्तं वा प्रयुत इत्यादि णिगि वाक्यम् । गोपते, तेजते,
केतति, वधते, इत्याद्यपि च कचन भवति ॥ १८१ ॥
चेष्टि चेष्टायाम ; चेष्टा, ईहा । आचेष्टते । चेष्ट्यते । अचेष्टिष्ट, अचेष्टि-
पाताम् । अचेष्टि । चिचेष्टे, चिचेष्टाते । चेष्टिता। चेष्टिष्यते । चिचेष्टियते। चे-
चेष्ट्यते । चे चेष्टीति । “शुटो धुटि-'।१।३।४८॥ इति वा लुकि, चेचे ४ ष्टि,
ष्टि, प्टः, षट्टः । हौ, .
हुधुट्-"॥४।२।८३॥ इति धिः, “तवर्गस्य-"॥१।३।६०॥
इति ढिः, "धुटो धुटि-"॥१॥३॥४८॥ इति वा लुकि, “ तृतीय-"॥१।३।४९।।
इति षो डः, चेचे २ ड्डि, ड्ढि । दिवि, अचेचे २ ट, प्टीत् । चेष्टयति । डे,
"वा वेष्टचेष्टः॥४।१।६६।। इति पूर्वस्य वा अः, अचचेष्टत् , अचिचेष्टत् । चेष्ट-
मानः । चेप्ट्यमानम् । चेष्टि ४ तः, ता, वा, तुम् ॥ १८२ ॥
वेष्टि वेष्टने; वेष्टनम् ; ग्रन्थनम् , लोटनम्, परिहाणिश्च । आवेष्टते । सर्व
चेप्टिवत् ॥ १८३ ॥
अथ चत्वार उदितः । कठुङ् शोके; शोकोऽत्राध्यांनम् । उत्कण्ठते ।
उत्कण्ठ्यते । उदकण्ठिप्ट, अकण्ठिपाताम् । अकण्ठि । उच्चकण्ठे। उत्कण्ठि-
प्यते । उच्चाकण्मयते । उलटि ३ तः, ता, तुम् ॥ १८४ ॥
पिडुङ् सङ्घाते। पिण्डते । अपिण्डिष्ट। अपिण्डि, अपिण्डिपाताम् । पिपिण्डे ।
पिण्डिता । पिण्डिप्यते । विपिण्डिपते । पिण्डि ४ ला, ता, तुम्, तः। पिडुण स-
छाते । पिण्डयति ॥ १८५ ॥
खटुङ् मन्थे । खण्डते । अखण्डिष्ट । चखण्डे । खण्डिता। खडुण भेदे।
खण्डयति ॥ १८६ ॥
भडुङ् परिभाषणे । भण्डते । बभण्डे । भण्डिता ॥ १८७ ॥
हेडङ् अनादरे । हेडते । लत्वे, अवहेलते । अहेलिप्ट । जिहेले । हेलिता।
जिहेलिषते । णौ, अवहेलयति, ते । ऋदित्वान्न ह्रस्वः, अवाजिहेलत् ।
अवहेलि ५ तः, त्वा, ता, तुम, तव्यम् ॥ १८८ ॥

भ्वादिगणः।
९३
इङ् गतौ च, चादनादरे । नेऽन्ते; हिण्डते । अहिण्डिष्ट । अहिण्डि ।
जिहिण्डे । हिण्डिता । जेहिण्ड्यते । जेहिण्डीति । “तवर्गस्य-"॥१॥३॥६०॥ इति
तः टः, “धुटो धुटि-"॥१।३।४८॥ इति वा ड् लुकि, जेहिं २ टि; ट्टि । हिण्डित्वा ।
हिण्डितः ॥ १८९ ॥
घुणि, घूर्णि भ्रमणे । घोणते । अघोणिष्ट । जुघुणे । घोणिता ॥ घूर्णते ।
अघूर्णिष्ट । जुघूर्णे । घूर्णिता ॥ १९० ॥ १९१ ॥
पणि व्यवहारस्तुत्योः । “गुपौधूप-"॥३।४।१॥ इत्याये, आयान्तस्य इङि-
त्त्वाभावात् परस्मै, पणायति । “विनिमेयधूत-"।२।२।१६॥ इति वा कर्मवे शेषे
षष्ठ्यां च, शतं शतस्य वा पणायति, “ अशविते क"॥ ३।४।४॥ इति
वा आये, अपणायीत् । अपणिष्ट । पणायांचकार । पेणे । पणायिता, पणिता ।
पम्पण्यते । शेषं पनिवत् ॥ १९२ ॥
यतैङ् प्रयत्ने । यतते । अयतिष्ट, अयतिपाताम् । अयाति । येते । यति-
प्यते । यियतिषते । ऐदित्त्वात् क्तयोर्नेट् , यत्तः, २ वान् । आयत्तः। यत्यम् ॥१९३॥
नाथूङ्
उपतापैश्वर्याशी:पु च, चाद्याचने, उपताप उपघातः । सर्पिषो ना-
थते, सर्पि थते, सर्पिर्मे भूयादित्याशास्त। "नाथः॥२।२।१०॥ इति वा अकर्मत्वम् ।
"आशिषि नाथः ।।३।३।३६॥ इति आशिष्येवात्मनेपदनियमात् , अर्थान्तरे परस्मै-
पदमेव; रिपुं नाथति, उपतपति । खामी नाथति ईष्टे । नृपं नाथति याचते,
एप्वात्मनेपदाभावात्, “नाथः”।२।२।१०॥ इति वा अकर्मकवाभावात् “ कर्म-
णि"॥२२॥४०॥ इति द्वितीयैव । नाथ्यते । अनाथीत् । अनाथिष्ट । अनाथि ।
ननाथ, ननाथतुः । ननाथे, ननाथाते । नाथ्यात् । नाथिपीष्ट । नाथिता २।
नाथिष्य, २ ति, ते । निनाथिषति, ते । नानाथ्यते । नाना २ थीति, त्ति ।
हौ, नानाद्धि । नाथयति । ऋदिलान्न हस्खे, अननाथत् । नाथन्। नाथमानः ।
नाथि २ ष्यन् , प्यमाणः । नाथितः, २ वान्। नाथि २ वा, तुम् ॥ १९४ ॥
अथ त्रय उदितः॥ ग्रथुङ् कौटिल्ये, कौटिल्यं कुसृतिः, बन्धश्च । ग्रन्थते।
ग्रन्थ्यते । शेषं सर्व ग्रन्थश् वत् । परं क्ङिति न नस्य लुक् ॥ १९५ ॥

९४ क्रियारत्नसमुच्चयः । वदुङ् स्तुत्यभिवादनयोः, स्तुतिर्गुणैः प्रशंसा; अभिवादनं पादयोः प्रणि- पातः । वन्दते देवान् , स्तोतीत्यर्थः। वन्दते गुरून्, अभिवादयत इत्यर्थः । क्ये, वन्द्यते । अवन्दिष्ट, अवन्दि९ षाताम् , षत, ठाः, षाथाम् , ध्वम् , ड्वम् , षि, ष्वहि, महि। अवन्दि । ववन्दे, ववदान्ते, ववन्दिषे। वन्दिषीष्ट । वन्दिता।वन्दिष्यते । अवन्दिष्यत । विवन्दिषते। “सन्भिक्षाशंसेरुः"॥५।२।३३॥ इति उः, विवन्दिषुः। क्विपि परे रत्वे षत्वस्या सत्त्वात् “सो रुः"॥२।१।७३॥ इति रत्वे, “पदान्ते"।२।११६४॥ इति दीपे, विवन्दीः, विवन्दिषौ, विवन्दिषः; विवन्दीभिः । एवं सन्नन्तेऽन्यत्रापि ज्ञेयम् । वावन्द्यते । वाव १२ न्दीति, न्ति,न्तः, दति, दीषि, सि, त्थः, स्थ, दीमि, मि, द्वः,द्मः। हो, वावन्ति ॥ ह्यस्तनी॥अवाव११न्दीत्, न् , न्ताम्, न्दुः,न्दीः, न०॥ अद्यतनी ॥ अवाव ९ न्दीत, दिष्टां०। वन्दयति । अववन्दत् । अवन्दि । ब्रिटि, अवन्दिषाताम् , इटि, अवन्दयिषाताम् , अवन्दिध्वम् , ड्ड्वम्, अवन्दयिध्वम्, ढम्, ड्ढम्। वन्दमानः । वन्द्यमानः । वन्दिष्यमाणः। ववन्दानः । वन्दि ३ वा, तः, तुम्॥ १९६ ॥ स्पदुङ् किञ्चिच्चलने । स्पन्दते, परिस्पन्दते । स्पन्द्यते। अस्पन्दिष्ट । अस्पन्दि । पस्पन्दे , पस्पन्दाते। स्पन्दिष्यते । पिस्पन्दिषते । पास्पन्द्यते । स्पन्दयति । अत्र “चल्याहार-"॥३।३।१०८॥ इति फलवत्यपि परस्मैपदम् । उ, अपस्पन्दत्। स्पन्दमानः । पस्पन्दानः । स्पन्दि २ ला, तः। प्रस्पन्द्य ॥१९७॥ मुदि हर्षे । अकर्मकोऽयम् । मोदते । मुद्यते । अमोदिष्ट, अमोदि१० षा- तां०, महि। अमोदि, अमोदिषाताम् । मुमुदे, मुमुदाते। मोदिषीष्ट । मोदिता। मोदिष्यते । अमोदिष्यत । “वौ व्यञ्जन-'॥४।३।२५॥ इति वा कित्ये; मुमुदिषते। मुमोदिषते । मोमुद्यते। “युक्तोपान्त्य-'॥४॥३॥१४॥ इति गुणाभावे, मोमुदीति, मोमोत्ति, मोमुत्तः, मोमुदति। अम्वि, अमोमुदम् । णौ, प्रमोदयति चैत्रम् ; अत्र "आणिगि-"॥३।३।१०७॥ इति फलवत्यपि परस्मैपदम् ; “गतिबोध-"॥२॥२५॥ इत्यणिक्कर्तुः कर्मवं घ। अनुमोदयामि । डे, अमूमुदत् । अमोदि।इटि, अमो- दयि१०षाताम्, षत, ष्ठाः, षाथाम् , ध्वम्, वम्, ड्ढ्वम्, षि, वहि, महि । ब्रिटि, अमोदि ९ षाताम् , षत, ष्ठाः, षाथाम् , ध्वम् , ड्ढम् , षि, वहि, महि ।

भ्वादिगणः " - शेषं णिगन्तभूवत् । मोदमानः । मुद्यमानम् । मुमुदानः । मुदिला, मोदित्वा । मुदितः, २ वान् । “उतिशव-॥४।३।२६॥ इति भावे, आरम्भे च वा कित्त्वे, मुदितम् , मोदितमनेन । प्रमुदितः २, वान् । प्रमोदितः, २ वान् ॥ १९८ ॥ ददि दाने । ददते, ददेते, ददन्ते। दद्यते। अददिष्ट, अददिषाताम् , अदा- दि। न शसदद" ॥४।१।३०॥ इत्येत्त्वनिषेधात् । दददे। ददिता । दिद- दिषते । दादद्यते ॥ १९९ ॥ हदि पुरीषोत्सर्गे । अनिट् । हदते । “धुट्हस्व-"॥४।३७०॥ इति सिच्- लुक्; अहत्त, अहत्साताम् , अहरवम् , ध्वम् । अहादि। जहदे । हत्स्य- ते । जिहत्सते । हत्त्वा । हत्ता । हन्नः । हत्तुम् ॥ २०० ॥ ष्वदि, स्वादि आस्वादने; जिह्वया लेहे । चैत्राय वदते । स्वद्यते । अस्त्र- दिष्ट । अस्वादि । सखदे । स्वदिता । स्वदिष्यते । “णिस्तोरेव"।।२।३।३७॥ इति नियमात षत्वाभावे, सिस्वदिषते । णौ, स्वादयति । षपाठात्षः, असिष्वदत् । णिस्तोरेवेत्यत्र वर्जनात् ण्यन्तस्य षत्वाभावे, सिस्वादयिषति । स्वादि । स्वादते । सस्वादे । स्वादिता । अषपाठान्न षः । सिखादिषते । असिवदत् ॥२०१॥२०२॥ कुर्दि क्रीडायाम् । “भ्वादेः-"॥२।१।६३॥ इति दीर्धे, कूर्दते । अर्दिष्ट । चुकूर्दै । कूर्दिता । यङ्लुपि दिवि, अचोकू २ र्दीत्, । सिवि, अचो ३ कूः, कूर्द, कूर्दीः ॥ २०३ ॥ हादैङ् सुखे च, चाच्छब्दे । आह्लादते । आह्लादिष्ट। आह्लादि । जह्लादे। हादिषीष्ट । ह्लादिता । ह्लादिष्यते । जिह्लादिषते । जाह्लाद्यते। जाहारदीति, त्ति । आह्लादयति।अजिह्लदत्। क्ते, आह्लादितः। ऐदित्वान्नेट। “ह्लादो ह्रद्॥४।२।६७।। इति हृद्, तो नश्च, प्रह्लन्नः २, वान् । ह्लादि ३ त्वा, ता, तुम् ॥ २०४ ॥ पर्दि कुत्सिते शब्दे, पायुध्वनौ । अन्ये त्वशब्देऽधोवाते इत्याहुः । पर्दते । पद्यते । अपर्दिष्ट । अपदि । पपर्दै । पर्दिता । पर्दिप्यते । पिपर्दिषते । यङ् लुपि, दिवि, अपाप २ र्दीत् , ई । सिवि, अपापाः, अपाप३र्दीः, ई, त् ॥२०॥ एधि वृद्धौ । अकर्मकः, सोपसर्गस्तु साप्योऽपि । एधते । “उपसर्गस्याऽनि.

क्रियारत्नसमुच्चयः। , ण"।१।२।१९॥ इत्यत्रैधिवर्जनान्नालुक् । प्रैधते । एध्यते । ऐधिष्ट, ऐधिषाताम् । ऐधि । एधांचके । एधिषीष्ट । एधिता। एधिष्यते । ऐधिष्यत। एदिधिषते । एधयति। ऐदिधत् । ओणे;दित्करणान्नित्यमपि द्वित्वं ह्रखो बाधते, तेन हूखे द्वित्वे च, मा भवानिदिधत् । एधमानः। एधि ३ तः, त्वा, तुम् ॥ २०६ ॥ स्पढि सङ्घर्षे; सङ्घर्षः पराभिभवेच्छा। अकर्मकोऽयम्। स्पईते । अस्पर्धिष्ट, अस्पर्धिषाताम् । अस्पर्धि । पस्पर्धे, पस्पर्द्धाते, पस्पर्धिरे। स्पर्दिषीष्ट। स्पर्द्धिता । स्पर्द्धिप्यते । पिस्पर्धिषते । पास्पर्ध्यते । पास्प १२ डीति, र्डि, ई, ईति, डीषि, त्सिाहौ, पास्पर्डि ॥ ह्यस्तनी॥ अपास्प , ई, पीत् , अपारपाम्, अपास्प?, "सेः द्धाम् ।।४।३७९॥ इति सिव्लुकि, धस्य रुत्वे,“रोरे-॥१।३।४१लुकि, दीर्घ च।अपास्पाः, अपास्प ३ , ई, मः, अपास्प५ ईम् , ई, र्धम्, ध्व, ध्म ॥अद्यतनी॥ अपास्प २ ीत् , ढिष्टाम् । स्पर्द्धयति मैत्रमित्यत्र “अणिगि-॥३।३।१०७॥ इति फलवत्यपि परस्मै, “गतिबोध-॥२।२।५॥ इत्यणिकर्तुः कर्मत्वं च । डे, अपस्पईत्। स्पर्द्धमानः। स्पर्दिष्यमाणः ।. स्पर्धि ५ त्वा, ता, तुम् , तः २ वान् ॥ २०७ ॥ बाधृङ् रोटने, प्रतिघाते। बाधते । अबाधिष्ट, अबाधिषाताम् । अबाधि । बबाधे, बबाधाते । बाधिषीष्ट । बाधिता । बाधिष्यते । बाबाध्यते । बाबा ५ ५ धीति, डि, डः, धति, धीषि । “गडद-"॥२।१।७७॥ इति बो भत्वे, बाभात्सि। हौ, बाभाद्धि ॥ ह्यस्तनी ॥ पदान्ते भत्वे, अबाभा २ द्, त्, अबाबा ३ धीत् , द्धां, धुः। अबा ३ भाः, भात् , भाद् । अबाबा ६ धीः, द्धम् , ह, धम्, ध्व, ध्म । बाधयति। ऋदित्वाद् उ न ह्रस्वः, अबबाधत्। बाध्यमानम् । बाधि ३ त्वा, तः, तुम् ॥ २०८ ॥ दधि धारणे । दधते । अदधिष्ट । अदाधि । देधे । दधिता । दादध्यते । दाद २ धीति, द्धि । णौ ङे, अदीदधत् ॥ २०९ ॥ बधि बन्धने । “शान्दान्-"॥३४॥ इति वैरूप्ये सनीतो दीर्घ च, बीभत्सते । “स्वार्थे"||४।४।६०॥ इति नेट, अबीभत्सिष्ट, अबीभत्सिषाताम्। अबी- भत्सि । बीभत्सांचके । बीभत्सिषीष्ट । बीभत्सिता । बीभत्सिष्यते । इच्छा सनि तु, बीभल्सिषते । बीभत्समानः । बीभत्स्यमानम् । बीभत्सांचक्राणः । अर्थान्तरे . ,

भ्वादिगणः ।
तु प्रत्ययान्तरं स्यान्नतु प्रायेण त्यादयः प्रायोग्रहणात् , बधते । “न जनबधः"।
॥४३॥५४॥ इति वृद्ध्यभावे, अवधि; हिंसित इत्यर्थः ॥ २१ ॥
पनि स्तुतौ । जिनं पनायति । अत्रायान्तस्येङित्त्वाभावात्परस्मैपदम्। पने-
रिदित्त्वादात्मनेपदमित्यन्ये; पनायते जिनम् । एवं पणेरपि । पणायते । “अश-
विते वा"॥३।४।४॥ इति वा आये, पनाय्यते। पन्यते। अपनायीत् । अपनिष्ट ।
पनायांचकार । पेने, पेनाते । पनायिष्यति। पनिष्यते । पिपनायिषति । पिपनि-
षते । पम्पन्यते । पम्प २ नीति, न्ति; पम्पान्तः, पम्पनति । पनाययति । पान-
यति । आयस्यादन्तत्ये, अपपनायत् । अपीपनत् । पनायि, २ त्वा, तः।
पनि २ त्वा, तः ॥ २११ ॥
मानि पूजायां विचारे। "शान्दान्मान्-॥३।४।७॥ इति सनीतौ दीर्घ च, मीमां-
सते धर्मम् । शेषं गर्हासन्नन्तगुपिवत् । अर्थान्तरे तु त्यादिवर्ज प्रत्ययान्तरमेव स्यात्।
यङि, मामान्यते; अत्रातः परस्यानुनासिकस्याभावात् “मुरत-॥४।१५१॥ इति
पूर्वस्य मुरन्तो न भवति । येत्वत इति पूर्वस्य विशेषणं प्रतिपन्नास्तन्मते
मौ, मंमान्यते । णिगि, मानयति । अमीमनत् । मानि ३ तः, तुम् ,
तव्यम् ॥ २१२ ॥
टुवेपृङ्,
, कपुङ् चलने । वेपते; प्रवेपते । अवेपिष्ट । अवेपि । विवेपे,
विवेपाते । वेपिता। वेवेप्यते। वेवे १२ प्ति, पीति, तः, पतिः । वेपयति ।
ऋदित्वाद् डे, अविवेपत् । कपुङ् । नेऽन्ते । कम्पते । अकम्पिष्ट, अकम्पिषा-
ताम्। अकम्पि । चकम्पे । कम्पिता। कम्पिष्यते । “चल्याहार-"॥३।३।१०८॥ इति
फलवत्यपि परस्मैपदे, “गतिबोध-॥२॥२५॥ इत्यणिकर्तुः कर्मत्वे च, कम्पयति
शाखाम् । अचकम्पत् । “लङ्गिकम्प्योः-"॥४।२।४७॥ इति नलुकि, विकपितः ।
अङ्गविकृतेरन्यत्र तु, कम्पितः ॥ २१३ ॥ २१४ ॥
त्रपौषि लज्जायाम् । त्रपते । अत्रपिष्ट । औदित्त्वाइट ; अत्रप्त, अपि-
पाताम् , अत्रप्साताम् । अत्रापि । “तृत्रप-"॥४।१।२५॥ इत्येत्त्वे; त्रेपे । त्रप्ता,
त्रपिता । त्रप्स्यते, पिष्यते । तित्रपिषते। तित्रप्सते । वेट्वान्नेट; वप्तः, २
वान् ॥ २१५ ॥

९८
क्रियारत्नसमुच्चयः ।
गुपि गोपनकुत्सनयोः । गर्दायां सनि, “स्वार्थेn४४६०॥ इति नेटि,
जुगुप्सते, जुगुप्सेते । क्ये, जुगुप्स्यते । अजुगुप्सिष्ट ॥ भाक ॥ अजुगुप्सि,
अजुगुप्सिषाताम् ॥ परोक्षा ॥ जुगुप्सां ३ चक्रे, बभूव, आस वा ॥ भाक ॥
जुगुप्सां ३ चक्रे, बभूवे, आहे वा । आ० ॥ जुगुप्सिषीष्ट ॥ भाक ॥ जुगुप्सि-
षीष्ट । श्वस्तनी ॥ जुगुप्सिता ॥ भाक । जुगुप्सिता ॥ भविष्यन्ती । जुगुप्सिष्य.
ते ॥ क्रिया० ॥ अजुगुप्सिष्यत ॥ भाक ॥ अजुगुप्सिष्यत । जुगुप्सितुमिच्छति
इतीच्छा सनि, जुगुप्सिषते । गर्हाया अन्यत्र तु प्रायेण त्यादयो नाभिधीयन्ते,
तेनार्थान्तरे णौ, गोपयति । अजूगुपत् । क्तौ, गुप्तिः ॥ ननु तितिक्षते,
मीमांसते, जुगुप्सते, इत्यादौ कथं सन्व्यवधानेऽप्यात्मनेपदम् । उच्यते,
तिजादीनामर्थविशेषेषु केवलानामप्रयोगात्सन्नन्तसमुदायार्थमेमनुबन्धविधानम् ,
तन सन्व्यवधानेऽपि आत्मनेपदम् ॥ २१६ ॥
लबुङ् अवलंसने च, चाच्छब्दे। नेऽन्ते । लम्बते; प्रलम्बते; अव.
लम्बते; आलम्बते; उल्लम्बते; विलम्बते; इत्यनेकार्थत्वमुपसर्गद्योतितमन्य-
त्राप्युदाहार्यम् । अलम्बिष्ट, अलम्बिषाताम् । अलम्बि । ललम्बे । लम्बिषीष्ट ।
लम्बिता । लिलम्बिषते । लम्बयति । अललम्बत् ॥ २१७ ॥
कवृङ् वर्णे । वर्णो वर्णनम् ; शुक्लादिश्च । कवते । अकविष्ट । अकावि।
चकवे । कविता। ऋदित्त्वाद् , अचकावत्, अयं वान्तोऽपि वृद्धोक्तवाद्वान्तेषु
प्रोक्तः ॥ २१८ ॥
अथ त्रय उदितः । लभुङ् शब्दे । उपालम्भते । अलम्भिष्ट । ललम्भे ।
लम्भिता । णौ, लम्भयति । अललम्भत् । क्ते, लम्भितः ॥ २१९ ॥
टभुङ् स्तम्भे; क्रियानिरोधे। स्तम्भते । “अवाञ्चाश्रय-"॥२३॥४२॥इति षत्वे,
अवष्टम्भते दण्डम् । अवष्टम्भते शूरः । “उदः स्था-"॥१॥३॥४५॥ इति स्लुकि,
उत्तम्भते पताकाम् । स्तम्भ्यते । अस्तम्भिष्ट । तस्तम्भे । स्तम्भिता । तिष्टम्भि-
षते । तास्तम्भ्यते । स्तम्भयति । अतस्तम्भत् । णौ सनि षत्वे, तिष्टम्भयिषते ।
ठपरः षकारोऽयमित्येके तन्मते, टाष्ठम्भ्यते । टिष्ठम्भयिषते ॥ २२० ॥

भ्वादिगणः। जुभुङ् गात्रविनामे । जृम्भते; विज़म्भते । जृम्भ्यते । अजृम्भिष्ट, अजृम्भिषाताम् । अजृम्भि । जम्भे । जृम्भिता। जृम्भिष्यते । जृम्भितः २, वान् । जृम्भित्वा ॥ २२१ ॥ अथ द्वावनिटौ, रभिं राभस्ये, कार्योद्यमे । आरभते; संरभते; परिरभते । आरभ्यते । आरब्ध, आर ९ प्साताम्, प्सत, ब्धाः, प्साथाम्, ब्ध्वम्, ब्द्ध्वम् , प्सि, प्वहि, प्स्महि । “रभोऽपरोक्षा-"॥४।४।१०२॥इति स्वरेने,आरम्भि, आरप्साताम् । आरेभे, आरेभाते । आर २ प्सीष्ट । आरब्धासे । आरप्स्यते । सनि, आरिप्सते । “रभलभ-"॥४१॥२१॥ इति इनच द्विः, रार ३ भ्यते, म्भीति, ब्धि। “रभोऽपरोक्षा-४११०२॥ इति खरे ने,आरम्भयति। आरम्भ्यते । आर- रम्भत् । आरभमाणः। आरभ्यमाणम् । आरेभाणः । आरब्धः, २ वान् । रब्ध्वा। आरभ्य । आर २ ब्धा, ब्धुम् । आरम्भणीयम् । आरभ्यम् । “रुणम्चाभीक्ष्ण्ये" ॥५।४।४८॥ इति ख्णमि, आरम्भमारम्भं याति ॥ २२२ ॥ डुलभिष् प्राप्तौ । लभते; आलभते; उपालभते । लभ्यते । अलब्ध, अल- प्साताम्, अल ८ प्सत, ब्धाः, प्साथाम् ; ब्ध्वम्, ब्द्ध्वम्, प्सि, प्वहि, प्स्महि। "जिख्णमोर्वा"॥४।४।१०६॥ इति वा ने, अलाभि, अलम्भि। “उपसर्गात्खल्-" ॥४।४।१०७॥ इति ने, उपालम्भि; प्रालम्भि, अवञ्चि इत्यर्थः । लेभे, लेभाते, लेभिरे, लेभिषे । लप्सीष्ट । लब्धा । लप्स्यते। सनि “ रभ-"॥४।१।२१॥ इति इनच द्विः, लिप्सते । लालभ्यते । “लभः"॥४|४|१०३॥ इति शवपरोक्षा वर्जे खरे ने, लाल१२म्भीति, ब्धि, ब्धः, म्भति, म्भीषि, प्सि, ब्धः, ब्ध, म्भीमि, मि, भ्वः, भ्मः । प्रतिलम्भयति । लम्भ्यते । अललम्भत् । लभमानः । लभ्यमानम् । लप्स्यमानः। लेभानः । लब्धः २, वान् । आलब्धा । लब्धा । लब्धुम् । ख्णमि, लाभं २, लम्भं २ । “ आङो यि "॥४११०४॥ इति नेऽन्ते, आलम्भ्या गौः । आङोऽन्यत्र, लभ्यः । “उपात् स्तुतौ"॥४।४।१०५॥ इति नेऽन्ते, उपलम्भ्या विद्या भवता । स्तुतेरन्यत्र उपलभ्या वार्ता । उपलभ्यमस्मात् ॥ २२३ ॥ क्षमौषि सहने । क्षमते, क्षमेते । क्षमताम्। अक्षमत । क्षम्यते। औदिखाद् "धूगौदितः"॥४॥४॥३८॥ इति वेटि, अक्षमिष्ट; अक्षस्त, अक्षमिषाताम्, अक्षं- - , क्रियारत्नसमुच्चयः। साताम् । “मोऽकमियमि-"॥४॥३॥५५॥ इति न बृद्धिः, अक्षमि । चक्षमे, चक्ष- माते, चक्षमिरे । क्षमिषीष्ट, क्षेसीष्ट । क्षमिता, क्षन्ता । क्षमिष्यते, ऑस्यते । चिक्षमिषते, चिशंसते । चङ्क्षम्यते। अचङ्क्षमिष्ट। लुपि, चङ्क्ष २ मीति, न्ति, चङ्क्षान्तः, चङ्क्षमति, चङ्क्षमीषि, चङ्खसि, चह्नान २ थः, थ । चङ्क्ष ४ न्मि, मीमि, न्वः, न्मः । क्ये, चङ्क्षम्यते । चङ्क्षम्यात् । चङ्क्षांहि, अत्र "शिड्हे-॥१॥३॥४०॥ इत्यनुस्वारः॥ह्यस्तनी॥अचङ् ११क्षत् , क्षमीत्, क्षान्ताम् , क्षमुः, क्षन् , क्षमीः, क्षान्तं, क्षान्त, क्षमम् , क्षन्वः, क्षन्मः ॥ अद्य०॥ “नश्वि-" ॥४।३।४९॥ इति न वृद्धौ, अचह्नमीत् । शेषं पचिवत् । यत औदित्त्वेन यङ्लुपि न वेटलं किंतु सेट्वं नित्यं, औदित इत्यनुबन्धनिर्दिष्टस्य यङ्- लुप्यप्राप्तेः । एवमन्यत्रापि । क्षमयति । अचिक्षमत् । अक्षामि, अक्षमि । क्षम- माणः । क्षम्यमाणः । क्षम्यमाणम् । चक्षमाणः । वेट्वान्नेट , क्षान्तः, २ वान् , क्षान्त्वा, क्षमित्वा । क्षमि २ ता, तुम् । क्ष २ न्ता, न्तुम् ॥ २२४ ॥ कमूङ् कान्तौ । कान्तिरभिलाषः। “कमेणिङ्"॥३।४।२॥ कामयते । अका- मयत । “अशविते वा"॥३।४।४॥ इति वा णिङि, कम्यते, काम्यते । णिङभावे "णिश्रि-'॥३।४।५८॥ इति ङे, अचकमत । णिङि, अचीकमत । “मोऽकमि- यमि-"॥४॥३॥५५॥ इति अनिषेधाद् वृद्धौ, अकामि । णियपि, अकमिषाताम् । “अमोऽकम्य-"॥४।२।२६॥ इति न हवः, अकामयिषाताम् । चकमे । कामयांचक्रे । कमिषीष्ट, कामयिषीष्ट । कमिता, कामयिता। कमि- ष्यते, कामयिष्यते । अकमिष्यत, अकामयिष्यत । चिकमिषते । चिकामयि- पते । चङ्कम्यते । लुपि चमूवत् । णिङन्तस्य तु वाक्यमेव न यङ् । णिगि, "अमो-॥४।२।२६॥ इति न हस्खे, कामयति । अचीकमत् । अकामि । काम- यमानः। कम्यमानम् । काम्यमानम् । चकमानः। कामयाञ्चक्राणः । “अदितो वा" ॥४।४।४२॥ इति वेट्, कान्वा; कमित्वा । कामयित्वा । वेट्वान्नेट, कान्तः । णिङि, कामितः । कमि २ ता, तुम् । कामयि २ ता, तुम् । कम्यम्, काम्यम् ॥२२५॥ अगि गतौ। अयते । “उपसर्गस्यायौ"।।२।३।१००॥ इति लः, पलायते; अकामि, भ्वादिगणः । ३ سعر पल्ययते; प्लत्ययते। पलाय्यते। पलायिष्ट, पलायिषाताम् , पलायि ३ ध्वम्, दम्, ट्वम्। पलायि । “दयायास्-"॥३।४।४७॥ इत्यामि, अयां ३ चक्रे, बभूव, आस वा। पलायां ३ चक्रे । ३ । पलायि ३ षीष्ट, षीदम्, षीध्वम् । पलायिष्यते । पलायि- प्यत । पलायियिषते। णौ, पलाययति । पलायियत् । पलायमानः । पलाय्यमा- नम् । पलायाश्चक्राणः । पलायि ४ ता, तुम् , तः, वान् । पलाय्य ॥ २२६ ॥ दयि दानगतिहिंसादहनेषु च । चाद्रक्षणे । “स्मृत्यर्थदयेशः”।२।२।११॥ इति वा कर्मवे, दानस्य दानं वा दयते । क्ये, दय्यते । अदयिष्ट । “दयाय-" ॥३।४।४७॥ इत्यामि, "वेत्तेः कित "॥३।४।५१॥ इत्यत्र कित्त्वभणनेन आमः परोक्षात्वाभावाद् “अनादेशादेः-॥४।१।२४॥ इति न एः, दयाञ्चक्रे । दयिता। दिदयिषते।यलवानां वाऽनुनासिकत्वे, दन्दय्यते। दादय्यते। दन्दयाँति।दादयोति । “य्वोः-"||४|१२१॥ इति य्लुकि, दादति, दादतः, दादयति, दादयीषि, दादसि, दाद २ थः, थ । यो लुकि, “मव्यस्याः” ॥४।२।११३॥ इत्याकारे च, दादामि, दादावः, दादामः ॥ अद्य० ॥ “नश्वि-"॥४।३।४९॥ इति न वृद्धौ, अदादयीत् । एवं दन्दरूपाण्यपि । दाययति । अदीदयत् । दयि ३ तः, त्वा, तुम् ॥२२७॥ ऊयैङ् तन्तुसन्ताने। उयते; प्रोयते; व्यूयते।क्ये, व्यूय्यते। औयिष्ट। औयि, औयिषाताम्। “गुरुनाम्य-"॥३।४।४८॥ इत्यामि, ऊयाञ्चके । ऊयिता । ऊयिष्यते। औयिष्यत, ऊयियिषते । ऊययति । ऐदित्वात् क्तयोर्नेट्, “य्वोः-"||४|४|१२१॥ इति यलुक् च, ऊतः २, वान् । ऊयित्वा ॥ २२८ ॥ स्फायैङ्, ओप्यायैङ् वृद्धौ । स्फायते । स्फायताम् । अस्फायत । अस्फा- यिष्ट ॥ परोक्षा ॥ परफाये। स्फायिता । पिस्फायिषते । पास्फाय्यते । पास्फा- यीति; पास्फाति। “य्वोः-"॥४|४|१२१॥ इति यलुक्, पास्फातः, पास्फायति। णौ, स्फायः स्फाव्; स्फावयति। पारायणिकानां तु, स्फाययतीत्यपि । डे, अपिस्फवत्, अपिस्फयत् । ऐदित्त्वान्नेट क्तयोः, स्फातः २, वान् । “स्फायः रफीर्वा"|४|१९४॥ स्फीतः२, वान् । प्यायैङ् । आप्यायते। प्याय्यते । “दीपजन-"॥३।४।६७॥ इति कर्तरि वा त्रिचि तलुकि, अप्यायि, अप्यायिष्ट, अप्यायिषाताम् , अप्यायि॥ परोक्षा- यङोः "प्यायः पीः॥४१९१॥ आपिप्ये, आपिप्याते। प्यायिता । पिप्यायिषते ।

क्रियारत्नसमुच्चयः। आपेपीयते । “प्यायः पीः"।४।१।९१॥ इति दीर्घनिर्देशाद्यङ्लुप्यपि पीः, आपे. पेति, आपेपयीति। आपेपीतः, आपेप्यति।क्ते, पेप्यितः। प्याययति। अपिप्ययत्। "क्तयोरनुप-४११९२॥ इति पीः, “सूयत्य-"॥४॥२७०॥ इति नः, पीनम् २, वम्मु- खम् । “आङोऽन्धूध-" ।।४।१।९३॥ इति पीः, आपीनमूधः। अर्थान्तरे तु आप्यानश्चन्द्रः, “व्यञ्जनान्तस्थ-"॥४॥२७१॥ इति नः ॥ २२९ ॥ २३० ॥ ताङ् सन्तानपालनयोः । सन्तानः, प्रबन्धः । तायते। ताय्यते । “दीप- जन-"॥३।४।६७॥ इति वा जिचि, अतायि, अतायिष्ट । अतायि । तताये । तायिता । ताताय्यते । तातायीति, ताताति। ऋदिवान् डे न हवः, अततायत् । तृनि, तायनशीलः तायिता । "णिन्चावश्यक-" ॥५॥४॥३६॥ इति णिनि, तायी ।। २३१॥ वलि संवरणे । वलते, निर्वलते, अववलते। वल्यते। अवलिष्ट। अवालि। "न. शस-"॥४१॥३०॥ इत्येत्वनिषेधात्, ववले । वलिषीष्ट। वलिता। विवलिषते। लान्तस्य वाऽनुनासिकान्तवे, वंवल्यते, वावल्यते । वालयति।अवीवलत् । वल- मानः । वल्यमानम् । ववलानः । वलि ५ ता, तुम्, वा, तः, २ वान् ॥२३२॥ कलि शब्दसङ्ख्यानयोः। कलते; आकलते; सङ्कलते; प्रत्याकलते; विकलते । अकलिष्ट । अकालि। चकले । कलिषीष्ट । कालयति । अचीकलत् । कलमानः । कलि ५ ता, वा, तुम्, तः २, वान् ।। २३३ ॥ तेवृङ्, देवृङ् देवने । तेवते । तितेवे । तेविता। ऋदित्त्वान् ङे, अतितेवत् । देवृङ् । देवते, परिदेवते । दिदेवे । देविता । देदेव्यते । देदेवीति, देदयोति, देदेति, देदयूतः, देदेवति । ऋदित्त्वान् डे न हूखः, अदिदेवत् । द्वयोः शेष वृवत् ।। २३४ ॥ २३५॥ षेवृङ्, सेवृङ् सेवने । सेवते; आसेवते । परिनिवेः सेवः "॥२३॥४६॥ इति षः, परिषेवते; निषेवते; विषेवते । अन्योपसर्गे तु न षत्वम्, अनुसेवते; प्रतिसेवते । सेव्यते। अड्व्यवायेऽपि षः; पर्यषेवत; न्यषेवत । असेविष्ट, असे- विषाताम्। असेवि । षपाठात् “नाम्यन्तस्था-"॥२।३।१५॥ इति षः, सिषेवे; परि. विषेवे । सेविषीष्ट । सेविता । सेविष्यते । सिषेविषते । परिषिषेविषते, अत्र " भ्वादिगणः । । , "णिस्तोरेव-"॥२॥३॥३७॥ इति नियमेन बाधितमपि “परिनि-"॥२॥३॥४६॥ इत्यनेन षत्वम्। सेषेव्यते । परिषेषेव्यते । प्रतिसेषेव्यते । सेषेवीति। “अनुनासिके च."॥ ४।१।१०८॥ इति वस्योटि गुणे च, सेषयोति। क्ङित्येवोडिति मते तु "टवो-गा। १२१॥ इति बलुकि, सेषेति, सेषयूतः सेषेवति, सेषेवीषि, सेषयोषि, सेषेषि, सेषयूथः, सेषयूथ, सेषेवीमि, सेषयोमि, वस्य वाऽनुनासिकत्वे, सेषयूवः, सेषेवः, सेषयूमः, सेषेमः । सेवयति । ऋदित्त्वान् उ न हूस्वः, असिषेवत् ; पर्यषिषेवत् ; प्रत्यसिषेवत्, अत्रोपसर्गाश्रितं न षत्वम्, धातोस्तु द्विवाश्रितं स्यादेव । सेवि ५ वा, ता, तुम्, तः२, वान्। सेवृङप्येवम् , परं अषपाठान्न षत्वम् , सेवते; परिसेवते। पर्यसेवत । असेविष्ट । सिसेवे। परिसिसेविषते । सेसेव्यते । सेसेवीति । सेस- योति । सेसेति । णौ ङे, असिसेवत् ॥ २३६ ॥ २३७ ॥ काशृङ् दीप्तौ । प्रकाशते । अकाशिष्ट । अकाशि । चकाशे । काशिता। णौ, प्रकाशयति । प्रकाश्यते । ऋदित्वान्न हखः, अचकाशत् ॥ २३८ ॥ भाषि व्यक्तायां वाचि। भाषते; परिभाषते; सम्भाषते । भाष्यते। अभा- षिष्ट, अभाषिषाताम् । अभाषि । बभाषे ।भाषिषीष्ट । भाषिता । बिभाषि- षते । बाभाष्यते । भाषयति । , "भ्राज-"॥४।२।३६॥ इति वा हखः, अबी- भषत् । अबभाषत् । भाषि ५ ता, त्वा, तुम्, तः, २ वान् ॥२३९॥ एषङ्गतौ । एपते; अन्वेषते । अन्वैषिष्ट, अन्वैषिषाताम् । अन्वैषि, “गुरु- नाम्य-"॥३४॥४८॥ इत्यामि, एषांचके । एषिता । अन्वेषिषषते, "स्वरादेईि. ॥॥१४॥ इति षिर्दिः, ऋदित्त्वान् उ न इस्वः, माभवानेषिषत् । अन्वेषि ४ ता, तुम्, तः, २ वान् । अन्वेष्य ॥ २४० ॥ हेपृङ् अव्यक्ते शब्दे। हेषते। अहेषिष्ट । जिहेषे । हेषिता। ऋदित्वान् , अजिहेषत् । हेषितम् ॥ २४१ ॥ कासृङ् शब्दकुत्सायाम् । शब्दस्य कुत्सारोपः । कासते । अकासिष्ट । "दयाय-"॥३४॥४७॥ इत्यामि, कासाञ्चके। कासिता, कासयति । ऋदित्त्वान्न हुस्खः, अचकासत् । कासि ३ त्वा, तुम्, तम् ॥ २४२ ॥ भासि दीप्तौ । अवभासते; विभासते; प्रतिभासते; प्रभासते । भास्यते ।

क्रियारत्नसमुच्चयः। अभासिष्ट । अभासि । बभा २ से, साते । भासिता। बिभासिषते । बाभास्यते । वाभासीति, बाभास्ति । हौ, बाभाद्धि । "भ्राज-"॥४॥२॥३६॥ इति वा हस्खे, अबीभसत् ; अबभासत् । भासि ५ ता, ला, तुम्, तः, २ वान् ॥२४३॥ आङः शसुङ् इच्छायाम् । आङः पर एवायं प्रयुज्यते, नान्योपसर्गात्, नापि केवलः । नेऽन्ते । आशंसते । आशंस्यते। आशंसिष्ट । आशशंसे। आशं- सिषीष्ट। आशंसिता । आशंसिष्यते । आशिशंसिषते । आशाशं३स्यते, सीति, स्ति । आशंसयति । आशशंसत् । आशंसि ३ तुम्, तः, २ वान् । आशंस्य ॥ २४४ ॥ असूङ् अदने। ग्रसते। ग्रस्यते। अग्रसिष्ट । अग्रासि। जग्रसे । ग्रसिता। प्रसिष्यते । जिग्रसिषते । जाग्रस्यते । जाग्ररसीति, स्ति । ग्रासयति । अजि- प्रसत् । ऊदित्वात्, ग्रस्त्वा, ग्रसित्वा । ग्रसितुम् । वेट्त्वान्नेट, प्रस्तः २, वान् ॥ २४५ ॥ ईहि चेष्टायाम् , ईहते। ईह्यते। ऐहिष्ट । ईहाञ्चक्रे । अत्र कूग उभयप. दित्वेऽपि "आमः कृगः ॥३।३।७५॥ इत्यात्मनेपदमेव न परस्मै । ईहाम्बभूव; ईहामास; भ्वस्तिभ्यां परस्मैपदमेव । एवमन्यत्रापि । ईजिहिषते । ईहयति । ऐजिहत् । ईहमानः। ईहाञ्चक्राणः । ईहि ४ ता, त्वा, तः २, वान् ॥२४६॥ गर्हि कुत्सने । गर्हते । गद्यते । अगर्हिष्ट । जगहें । गर्हिता । जिगर्हि- षते । जागयते । जाग ४ हीति, लि, ढः, र्हति । क्त, जागर्हितः। गर्हयति । अजगर्हत् । गर्हमाणः । गर्यमाणम् । गर्हि ५ त्वा, ता, तुम्, तः, २ वान् । किपि, सुघर्ट् ॥ २४७ ॥ द्राह निक्षेपे । निद्राक्षेप इत्येके । दाहते । अद्राहिष्ट । दद्राहे । द्राहिता । ऋदित्त्वान् ङे, अदद्राहप्त् ॥ २४८ ॥ उहि तर्के। तर्क, उत्प्रेक्षा । ऊहते । “उपसर्गादस्य-" ॥३।३।२६॥ इति घाऽऽत्मनेपदे, समूहति २, ते; अपोहति, ते; व्यपोहति, ते। ऊह्यते । “उपसर्गा- दूह-"॥४।३।१०६॥ इति क्ङिति यहवे, अभ्युह्यते; समुह्यते । ऊऊह इति उकारप्रश्लेषात् आ उह्यते, ओह्यते। समोह्यत इत्यत्र न हूस्वः। अपोह २ त्, त।

भ्वादिगणः। समौद्यत, अत्र प्राग्वन्न हवः। औहिष्ट। समौहीत्। समौहिष्ट। ऊहाञ्चके ।समू- हा २ श्चकार, चक्रे वा । समुह्यात् । समूहिषीष्ट । ऊजिहिषते। ऊहयति । औजिहत् । ऊहि ४ ता, त्वा, तुम्, तः। समुह्य ॥ २४९ ॥ गाहौङ् विलोडने; परिमलने । गाहते, अवगाहते। औदित्त्वाद्वेट, अगाढ, अगाहिष्ट, अघा २ क्षाताम्, क्षत; अगाहि २ षातां, षत; अगाढाः, अगा. हिष्ठाः, अघाक्षाथाम्, अगाहिषाथाम्, अघा २ ग्ड्ढुम्, ढम् , अगाहि ३ ड्ढ़म् , ढम्, ध्वम्, अघाक्षि, अगाहिषि, अघावहि, अगाहिष्वहि, अघा. महि, अगाहिष्महि ॥ भाक ॥ अगाहि । शेष कर्तृवत् ॥ परोक्षा ॥ जगाहे; जगाहि ३ थे, ध्वे, द्वे । घाक्षीष्ट; गाहिषीष्ट । गाढा; गाहिता । घाक्ष्यते; गाहि- ष्यते । जिघाक्षते; जिगाहिषते । जागाह्यते । जागाहीति, जागाढि, जागाढः, जागाहति, जागाहीषि, जाघाक्षि, जागाढः, जागाढ, जागा २हीमि, मि । गाह- यति । अजीगहत् । वेट्त्वान्नेट, गाढः २, यान्। गावा, गाहित्वा । अवगाह्य । गा २ ढा, दुम् । गाहि २ ता, तुम् ॥ २५० ॥ . धुक्षि सन्दीपनक्लेशनजीवनेषु । धुक्षते; सन्धुक्षते । अधुक्षिष्ट । दुधुक्षे । धुक्षिता । क्ते, सन्धुक्षितः । विपि, सुधुट् । संयोगस्यादौ-"॥२।१।८८॥ इति क्लुक्॥२५॥ शिक्षि विद्योपादाने । शिक्षते । शिक्ष्यते । अशिक्षिष्ट । शिशिक्षे । शि- क्षिता । शिशिक्षिषते । शेशिक्ष्यते । शेशिक्षीति, शशिष्टि । गुणे कर्तव्ये क्- लुकोऽसत्त्वान्न गुणः । क्ते, शेशिक्षितः । शिक्षयति । अशिशिक्षत् । णो सनि, शिशिक्षयिषति । शिक्षमाणः । शिक्ष्यमाणम् । शिक्षि ३ त्वा, तुम्, तः ॥२५२॥ भिक्षि याज्ञायाम्। भिक्षते गां राजानम् । बिभिक्षे । शेषं शिक्षिवत् ॥२५३॥ दीक्षि मौण्ड्येज्योपनयननियमव्रतादेशेषु । मौण्ड्यं वपनम् । इज्या यजनम्। उपनयनं मौजीबन्धः। नियमः संयमः। व्रतादेशः संस्कारादेशः। दीक्षते।दिदीक्षे। शेष शिक्षिवत् ॥ २५४ ॥ ईक्षि दर्शने । ईक्षते। उप, प्रति, परि, प्र, अप, तम् , वि, निः पूर्वो- ऽपि । ईक्ष्यते । ऐक्षत । ऐक्ष्यत ॥ अद्य० ॥ ऐक्षि १० ष्ट, पाताम्, षत, ष्ठाः, " क्रियारत्नसमुच्चयः । पाथाम् , ध्वम्, ड्वम् , षि, ष्वहि, महि । ऐक्षि । ईक्षाचक्रे । ईक्षामास । ईक्षाम्बभूव । “आमः कृगः" ॥३।३।७५॥ इत्यत्र कृग्ग्रहणादस्तिभुषोः परस्मै- पदमेव । ईक्षि २ षीष्ट; षीध्वम् । ईक्षिता । ईक्षिष्यते। ऐक्षिष्यत । “यहीक्ष्ये- राधीक्षी"||२।२।५८॥ इति चतुर्थी, मैत्रायेक्षते । ईक्षितव्यं परस्त्रीभ्यः । ईचिक्षिषते । क्ते, ईचिक्षिषितः। ईक्षयति। ऐचिक्षत्; त । ईक्षमाणः । ईक्ष्यमा- णम् । ईक्षा ३ चक्राणः, बभूवाद, आसिवान् वा । ईक्षि ४ ला, ता, तुम्, तः। वीक्ष्य ॥ २५५ ॥ इत्यात्मनेभाषा। अथोभयपदिनः । श्रिग् सेवायाम् । श्रय२ ति, ते; आश्रय २ ति, ते । “अघोष-"॥१३॥५०॥ इति दस्ते “तवर्ग-"॥१॥३६०॥ इति तश्चे"प्रथमादधुटि-"॥१।३।४॥ इति वा शश्छे उच्छ्यति, ते; उच्श्रयति, ते । एवं समुच्छ्यति, ते; समुच्श्रयति, ते। अत्यु- च्छ्रयति, ते; अत्युच्श्रयति, ते; निश्रयति, ते। क्ये, श्रीयते ॥ अद्य० ॥ "णिश्रि॥३।४।५८॥ इति डे, द्वित्वे "संयोगात्-"॥२॥१॥५२॥ इति इयि च, अशिश्रि १८ यत्, यताम् , यन्, यः, यतम्, यत, यम्, याव, याम । यत, येताम् , यन्त, यथाः, येथाम् , यध्वम् , ये, यावहि, यामहि ॥ भाक ॥ अश्रा- यि । जिटि, अश्रायि १० पाताम् , षत, ष्ठाः, षाथाम्, ध्वम् , दवम्, इदम् , षि, वहि, प्महि । एवं इट्यपि, अश्रयिषातामित्यादि १०॥ परोक्षा॥ शिश्राय, शिश्रियतुः, शिश्रियुः, शिश्रयिथ शिश्रिये, शिश्रियाते. ॥ भाक ॥ शिश्रिये। ॥ आशीः॥ श्रीयात् । श्रयिषीष्ट ॥ भाक॥ इञिटोः, श्रयिषीष्ट; श्रायिषीष्ट । एवम- ग्रेऽपि । श्रयिता २ । श्रायिता। श्रयिष्यति, ते । श्रायिष्यते । अश्रयिष्यत्, त । अश्रायिष्यत । "णिस्नुश्य-"॥३।४।९२॥ इति त्रिचो "भूषार्थ-"॥३।४।९३॥ इति क्यस्य च निषेधात् कर्मकर्त्तरि, उच्छ्यति दण्डं दण्डी; उच्छ्रयते। उदशिश्रियत। उच्छ्रायता। उच्छ्रयिष्यते दण्डः स्वयमेव । जिनिषेधात् ञिट तु स्यादेव। उच्छा- यिता। उच्छ्रायिष्यते दण्डः स्वयमेव। “इवृध-"|४|४|४७॥ इति वेटि, शिश्रीषरति, ते। शिश्रयिष २ ति, ते। शेश्रीयते। शेश्रयीति, शेश्रेति, शेश्रितः, शेश्रियति ।क्तयो- भ्वादिगणः । १०७ रनेकस्वराद्विहितत्वेन"ऋवर्णश्यूर्णगः॥४।४।५७॥ इति इनिषेधाभावे, “संयो. गात्-"॥२॥१॥५२॥ इति इयि च, शेश्रियितः२ वान् । क्त्वोऽकित्त्वाद्गुणे, शेश्रयि ४त्वा, तुम, ता, तव्यम्। श्राययति। अशिश्रयत्, अत्रोपान्त्यहस्वे कृते पश्चाविले पूर्वस्य सन्वहावः । आश्राययाञ्चकार । श्रयन् । श्रयिष्यन् । श्रयमाणः । श्रयिष्यमा- णः । श्रीयमाणम् । श्रयिष्यमाणम् । शिश्रिवान् । शिश्रियाणः। “ऋवर्णश्यूर्णगः कितः॥४४॥५॥ इति इडभावे, श्रित्वा । आश्रित्य । श्रितः २, वान् । श्रयि २ ता, तुम् ॥ २५६ ॥ अथ पञ्चानिटः। णीग् प्रापणे | अजां नयति, नयते वा ग्रामम् , प्रापय- तीत्यर्थः ॥ एवं अनु, अप, आङ्, अभि, पूर्वोऽपि । णपाठाद् “अदुरुपसर्ग'-॥२॥३॥ ७७॥ इति णः, परिणयति, ते । पराणयति, ते । प्रणयति, ते । निर्णयति, ते । "पूजाचार्यक-"॥३।३।३९॥ इत्यात्मनेपदे, नयते विद्वान् स्याहादे; युक्तिभिः स्थि- रीकृत्य प्रज्ञापयतीत्यर्थः । बटुमुपनयते; अध्ययनाय स्वान्तिकं नयतीत्यर्थः । कर्मकरानुपनयते; वेतनेनात्मसमीपं प्रापयतीत्यर्थः । शिशुमुदानयते; उत्क्षिप- तीत्यर्थः । नयते तत्वार्थे; तत्र प्रमेयं निश्चिनोतीत्यर्थः । ऋणं विनयन्ते; दानेन शोधयन्तीत्यर्थः । शतं विनयते; व्ययते इत्यर्थः । “कर्तृस्था- "॥३॥३१४०॥ इत्यात्मनेपदे, क्रोधं विनयते । अकर्तृस्थमूर्त्तयोस्त्वाप्ययोः परस्मैपदमेव; चैत्रो- मैत्रस्य क्रोधं विनयति । गहुं विनयति । अत्र च सूत्रे शमयत्यर्थादेव नयते- रात्मनेपदं दृश्यते न प्रापणार्थात् ; तेन कोपं शमं नयति, प्रज्ञां वृद्धिं नयती- त्यादौ परस्मैपदमेव । क्ये, नीयतेऽजा ग्रामम् ॥ अद्य० ॥ अनैषीत, अनैष्टां, अनैषुः, अनैषीः । अनेष्ट, अनेषाताम् , अनेषत, अने ७ ठाः, पाथाम्, ढ्वम् , ड्ढम् , षि, प्वहि, महि ॥ भाक ॥ अनायि, अनेपाताम्, अनायिषाताम्०; अने २ वम्, ड्वम् ; अनायि ३ ध्वम्, ढ्वम , ड्ढ्वम् ॥ परोक्षा॥ निनाय, निन्यतुः, निन्युः, निनयिथ, निनेथ, निन्यथुः, निन्य, निनाय, निनय, निन्यि- २ व, म । निन्ये, निन्याते, निन्यिरे, निन्यिषे; निन्यि ३ ढ्वे, ध्वे; महे ॥ भाक ॥ निन्ये इत्यादि तदेव । नीयात् । नेषी २ ट; वम् ; नायिपी ३ ट; वम् , ध्वम्। नेता २ । नायिता। नेष्यति, ते । नायिष्यते । सनि, निनीपति, ते । प्रणि- ३ १०८ क्रियारत्नसमुच्चयः। , नीति, ते । पूर्व धातोरुपसर्गयोगे तु, णवे कृते पश्वाविवे, प्रणिणीषति, ते । नेनीयते । नेनयीति, नेनेति, नेनीतः, नेन्यति । शेष जिंवत्, पर नेनीथेत्यादौ नीर्वाच्यो नतु निः॥क्ते, नेन्यितः। नेनयि ३ त्वा, ता, तुम् । “गतिबोध-" ॥२।२।५॥ इत्यत्र नीवर्जनादणि कर्तुः कर्मत्वाभावे, नाययति भारं ग्राम मैत्रेण । अनीनयत् । णौ सनि, निनाययिषति । नयन् । नयमानः। नीयमानम् । नेष्यमाणम् । नी ३ त्वा, तः, वान् । आनीय । ने २ ता, तुम् । नेतव्यम् । नेयम् । आनेयम् ॥ २५७ ॥ हंगहरणे। हरति, ते। अयं अभ्यव, व्यव, सम्प्र, व्याङ्, आङ्, प्र, उद् पूर्वोऽपि । प्रादीनां चापञ्चभ्यः प्रायेण प्रयोगो भवति । आहरति; व्याहरति, अभिव्याहरति; समभिव्याहरति; प्रसमभिव्याहरति; ते। “विनिमेय- ॥२।२।१६॥ इति वा अकर्मले, शतस्य शतं वा व्यवहरते । “हगोगत- ॥३॥३॥३८॥ इत्यात्मने. पदे, पैतृकमश्वा अनुहरन्ते; पितुरागतं गुणविषयं क्रियाविषयं वा सादृश्यमविकलं शीलयन्तीत्यर्थः । अथवा पितुरागतं गमनमविच्छेदेन शीलयन्तीत्यर्थः; यतो गतं सादृश्यमनुकरणमिति यावत् । अथवा गतं गमनं तयोस्ताच्छील्यम् , उत्पत्तितो नाशं यावत् तत्स्वभावता । एवं पितुः पितरं वाऽनुहरते । गत- ताच्छील्यादन्यत्र रूपेण पितरमनुहरति ॥ क्ये, ह्रियते । अहार्षीत् , अहार्टाम्, अहार्युः, अहार्षीः । अहत, अहषाताम् , अहषत ॥ भाक ॥ अहारि, अहषा. ताम् ; अहारिषाताम् ॥ जहार, जहतुः, जह्वः; "ऋतः"॥४।४।७९॥ इति नेटि, जहर्थ, जहथुः, जह, जहार, जहर, जहिव, जहिम । जहे, जहाते । एवं कर्मण्यपि । ह्रियात् । हृषीष्ट । हारिषीष्ट । हर्त्ता २ । हारिता । हरिष्यति, ते । हारिष्यते । जिहीर्षति, ते । जेहीयते । जरि री र ३ हरीति; जरि रीर् ३ हर्ति । णौ, "हकोनया"||२१८॥ इत्याणिकर्तुर्वा कर्मत्वम् । अकर्मकवे; हरति मैत्रः हारयति मैत्र मैत्रेण वा चैत्रः। अभ्यवहरति मैत्रः; अभ्यवहारयति मैत्रं मैत्रेण वा चैत्रः । सकर्मकवे तु, हरति द्रव्यं चौरः; हारयति द्रव्यं चौरं चौरेण वा चैत्रः । हरति भारं चैत्रः; हारयति भारं चैत्रं चैत्रेण वा मैत्रः। डे, अजी- हरत् । सनि, जिहारयिषति । हरन् । हरिष्यन् । हरमाणः । ह्रियमाणम् । , म्वादिगणः। १.९ हरिष्यमाणम् । जहृवान् । जहाणः । हृतः, २ वान् । हत्वा । हर्तुम् । संहृत्य । हार्यम् । शेषमद्यतन्यादौ स्सट्वर्ज कृग्वत् ॥ २५८ ॥ भुंग भरणे । भरति, ते । भियते । अभार्षीत् । अभृत । अभारि । बभार; स्क्रसृवृभृ-'॥४४८१॥ इति भृनिषेधाद् इडभावे, बभर्थ; वभृ. २ व, म । बभ्रे; बभृषे । भरिष्यति; भारिष्यते । सनि, “इवृध-"॥४४॥४७॥ इति वेटि "नामिनोऽनिट” ॥४॥३॥३३॥ इति कित्त्वं, बुभूषति, ते । बिभरिषति, ते । बिभ्रीयते । बरी, रि, र ३ भरीति। बरि, री, र ३ भर्ति । “इवृध-"॥४|४ ॥४७॥ इत्यत्र भर इति शवा निर्देशो यङ्लुपो निवृत्यर्थः; तेन यङ्लुबन्तात्सनि नित्यमिट् नतु वेट् । बरिषति । भारयति । अबीभरत् । शेषं, अशिति कृग्वत् ।। २५९॥ धुंग धरणे । धरति, ते । दधार । दधे । उद्दिधीर्षति, ते । देधीयते । डे, अदीधरत् । अयं सर्वो हंग्वत् । ॥ २६ ॥ डुकंग करणे । “कृग्तनादेरुः ॥३।४।८३॥ करोति । “अतः शित्युत्” । ४।२।८९॥ इति पूर्वस्य उः, कुरुतः, कुर्वन्ति, करोषि, कुरु २ थः, थ, करोमि, " कृगो यि च” ॥४।२।८८॥ इत्युलोपे कुर्वः, कुर्मः। कुरुते, कुर्वाते, कुर्वते, "अनतोऽन्तोऽद्-"॥४२११४॥ कुरुषे, कुर्वाथे, कुरुध्ये, कुर्वे, कुर्वहे, कुर्महे । कृगो यि च” ॥४।२।८८॥ इत्युलुक्, कुर्यात् , कुर्याताम् । कुर्वीत् , कुर्वी- याताम्, कुर्बीरन् ० ॥ करोतु, कुरु २ तात् , ताम्, कुर्वन्तु, कुरु, कुरु ३ तात्, तम्, त, करवा ३ णि, व, म । कुरुताम् , कुर्वाताम् , कुर्वताम्, कुरुष्व, कुर्वा- थाम् , कुरुध्वम् , करवै, करवा २ वहै, महै । अकरोत् , अकुरुताम् , अकु- र्वन् , अकरोः, अकुरु २ तम् , त, अकरवम्, अकुर्व, अकुर्म । अकुरुत, अकुर्वाताम् , अकुर्वत, अकुरुथाः, अकुर्वाथाम् , अकुरुध्वम्, अकुर्वि, अकु- हि, अकुर्महि । क्ये, क्रियते । कियेत । क्रियताम् । अक्रियतेत्यादि । "सिचि परस्मै-"॥४॥३॥४४॥ इति वृद्धौ, “सः सिज-"॥४।३६५॥ इति ईति, अकार्षीत्, अकार्टाम् , अकार्पः, अकार्षीः, अकार्टम्, अकार्ट, अकार्षम् , अकार्य, अका- र्म । अकृत; "धुट्हस्व ॥४।३।७०॥ इति सिच्लुक्, अकृषाताम् , अकृथाः, ११० कियारत्नसमुच्चयः । मा त्वं कृथाः, अकृषाथाम् ; “ सोधि-"॥४।३।७२॥ इति वा सिच्लुकि, " म्यन्त-"॥२।१।८०॥ इति ढे, अकृढ्वम्, अकृड्ढ्वम्, अत्र “नाम्यन्त-" ॥२।३।१५॥ इति स्पः, तस्य डः। अकृषि, अकृष्वहि, अकृष्महि ॥ भाक । अकारि , अकृषाताम् , इत्यादि कर्तृवत् । वा निटि तु, अकारिषाताम्, अकारि- षन; "हान्त-"॥२।१।८१॥ इति वा ढे, अकारि ३ध्वम् , ढ्वम्, ड्वम् ॥ परो०॥ चकार, चक्रतुः, चक्रुः, चकर्थ, चक्रथुः, चक्र, चकार, चकर, चकृव, चकृम । चक्रे, चक्राते, चक्रिरे, चकृषे, चक्राथे, चकृट्वे, चक्रे, चकृवहे, चकमहे । “स्क्रसृ" ॥४।४।८१॥ इत्यत्र सस्सट् कृग्ग्रहणान्नात्र थवादौ इट् ॥ भाक ॥ चक्रे इत्यादि तदेव ॥ आशीः॥ क्रियात् । कृषीष्ट; कृषीढम्॥भाक ॥ कृषीष्ट । कारिषीष्ट; कारिषी- ध्वम् , कारिषीढ्वम् । कर्त्ता २ ॥भाक॥ कर्ता, कारिता। “हनृतः स्यस्य'।४।४।४९॥ इतीटि, करिष्यति, ते॥भाक॥ करिष्यते, कारिष्यते । अकरिष्यत् , त ॥ भाक॥ अकरिष्यत, अकारिष्यत. ॥ तनादिषु पाठमकृत्वाऽस्यात्र पाठः, "तन्भ्यो वा-" ॥४॥३॥६८॥ इति विकल्पनिषेधाद् “ धुटहख-॥४।३।७०॥ इति सिचलुगर्थः, शवर्थश्च । तेन करति, करते इत्यादौ शवपि भवति । एवं व्या, प्रत्युप, निरा अपा, प्रति प्र, अप, अनु, उपादि पूर्वोऽपि वाच्यः॥ “परानोः कृगः"।३।३।१०१॥ इति फलवत्यपि परस्मैपदे, पराकरोति; अनुकरोति । “गन्धन-"॥३।३।७६॥ इत्यात्मनेपदे, उत्कुरुते, द्रोहाभिप्रायेण सदोषं प्रतिपादयतीत्यर्थः। अवचक्रे; कुत्सितवान्, नि- भसितवान्वेत्यर्थः। उपचक्रे, सिषवे इत्यर्थः। परदारान् प्रचक्रिरे, अभिजग्मुरित्य- र्थः। एधोदकस्योपस्कुरुते, तत्र गुणान्तरमादधातीत्यर्थः । “अधेः प्रसहने ॥३॥ ३।७७॥ अधिकुरुते शत्रुम् ; अभिभवतीत्यर्थः ॥ “वेः कृगः ॥३।३।८५॥ क्रोष्टा विकुरुते स्वरान् । विकुर्वते सैन्धवाः। “तीयशम्ब-"७२।१३५॥ इति कृषौ डाच् कृगा योगे, द्वितीयाकरोति क्षेत्रं; द्वितीयं वारं कृषतीत्यर्थः । एवं तृतीया करोति क्षेत्रम् । “सङ्ख्यादेर्गुणात्।।७।२।१३६॥ डाच, द्विगुणं कर्षणं करोति क्षेत्रस्य; द्विगुणाकरोति क्षेत्रम् । त्रिगुणाकरोति क्षेत्रम् । “समयाद्यापनायाम्"। ७।२।१३७॥ समयाकरोति । अद्य श्वो वा दास्ये, इति कालक्षेपं करोतीत्यर्थः ॥ "सपत्रनिष्पत्रादतिव्यथने ॥७२।१३८॥ सपत्राकरोति वृक्षं वायुः; पत्रशातने.

भ्वादिगणः । १११ नातिव्यथयतीत्यर्थः । एवं निष्पत्राकरोति वृक्षं वायुः । “निष्कुलान्निष्कोषणे"। ७।२।१३९॥ निष्कुलङ्करोति, निष्कुलाकरोति दाडिमम्; निष्कुष्णातीत्यर्थः । एवं निष्कुलाकरोति पशुं चण्डालः॥ “प्रियसुखादानुकूल्ये"॥७॥२।१४०॥ प्रियाक- रोति गुरुम् , सुखाकरोति गुरुम्, आनुकूल्यकरणादाराधयतीत्यर्थः ॥ “दुःखात्प्रा- तिकूल्ये"॥७२।१४१॥ दुःखाकरोति शत्रु, प्रातिकूल्येन पीडयतीत्यर्थः । “शूला- पाके"॥७।२।१४२॥ शूलाकरोति मांसं, शूले पचतीत्यर्थः । “सत्यादशपथे ॥७॥ २।१४३॥ सत्याकरोति वणिग्भाण्डम् ; स्वयमेव क्रयणाय द्रव्यदानेन निणर्यति। शपथे तु, सत्यंकरोति; शपथेन प्रत्याययतीत्यर्थः । “मद्रभद्राहपने"॥७२।१४४॥ मद्राकरोति शिरः । एवं भद्राकरोति; उभयत्र मुण्डयतीत्यर्थः । च्चिस्तु भूस्थाने ऽवाचि ॥ सनि, “नामिनोऽनिट"॥४॥३॥३३॥ इति कित्त्वे “खरहन्-'१।४।१।१०॥ इति दीर्घ इरि द्विवे च, चिकीर्षति,ते । चिकीर्षा । चिकीर्षुः। चिकीः, चिकीर्षों । शेष सन्नन्तभूवत् । यङो व्यञ्जनादित्वेन प्राक् तु खरे स्वर इत्यधिकारात् " ऋतोरी: "॥४।३।१०९॥ इति रीभावे कृते पश्चाद्वित्वम् , तेन ऋमत्त्वाभावान्न "ऋमतारीः"॥४१॥५५॥ चक्रीयते। क्ये, चेक्रीय्यते। अग्रतो यङन्तं त्रैववद्वा। अन्तरङ्गानपि विधीन् बहिरङ्गाऽपि लुब्बाधत इति न्यायात् प्राग् यङो लुपि हिले, चरी रि र ३ करीति; चरी रि र ३ कति । एवमग्रेऽपि री रि र त्रयम् । चर्कतः, चक्रति, चर्करीषि, चर्षि, चर्कथः, चर्कथ। बहुलवचनान्न ईति, चर्कर्मि, चर्क- रीमीत्यप्यन्ये । चर्कवः, चर्कमः।क्ये, चर्कियते, चरिक्रियेते। सप्त० । चकूयात् । हो, चरिकृहि ॥ ह्यस्त०॥ अचर्करीत्, अचर्कः, अचकृताम् , अचर्करुः, अचर्करीः, अचर्कः ॥ अद्य० ॥ अचरिकारीत् , अचरिकारिष्टाम् , अचरिकारिषुः ॥ भाक ॥ अचर्कारि । ब्रिटिटोः, अचर्कारिषाताम् , अचरिषाताम् ॥ परो०॥ चर्करांचकार, चर्करांबभूव, चर्करामास ॥ भाक ॥ चर्करां ३ चक्रे, बभूवे, आहे ॥ आशीः ॥ चर्कियात् ॥ भाक ॥ चर्कारिषीष्ट, चर्करिषीष्ट ॥ श्वस्तनी ॥ चर्करिता ॥ भाक ॥ चर्कारिता, चर्करिता ॥ भवि० ॥ चर्करिष्यति ॥ भाक ॥ चर्कारिष्यते । चर्क- रिष्यते ॥ क्रिया० । अचर्करिष्यत् ॥ भाक ॥ अचर्कारिष्यत, अचर्करिष्यत । चर्चात् । चरिकरिष्यन् । चरिक्रियमाणम् । इटि, चरिकरिष्यमाणम् ।। मिटि, ११२ क्रियारत्नसमुच्चयः । चरिकारिष्यमाणम् । चरिकराश्चकृवान्। च• बभूवान् । च. आसिवान् ॥ भाक ॥ चरिकरां ३ चक्राणम्, बभूवानम् , आसानम्, वा। एवं यङ्लुपि स, ह, भू, धृ, मृ, पृ, प्रभृतयः ऋदन्ताः सर्वेऽपि ज्ञेयाः॥णौ, कारयति। "हकोर्नवा"॥२॥२८॥ इत्यणि- कतुर्वा अकर्मत्वे, करोति कटं चैत्रः; कारयति कटं चैत्रं चैत्रेण वा मैत्रः। “मिथ्या- कृग-"॥३।३।९३॥ इत्यात्मनेपदे, पदं मिथ्या कारयते; अत्र मिथ्येति पदसमाना- धिकरणं मिथ्याभूतं पदं करोति; उच्चरति काश्चत्तमन्यः प्रयुक्ते, णिग्, खरा- दिदोषदुष्टमसकृदुच्चारयतीत्यर्थः। कार्यते। अचीकरत् । अकारि । ब्रिटिटोः, अका- रिषाताम्, अकारयिषाताम्। कारयाञ्चकारेत्यादि णिगन्तभूवत्। कर्मकर्तरि मिटि, अकारिषातां कटौ स्वयमेव । कारिष्यते कटः स्वयमेव । क्रियते, क्रियमाणो वा कटः स्वयमेव । चके, करिष्यते वा कटः स्वयमेव । भावविवक्षायां च, क्रियते कटेन। एषु “एकधातौ-"॥३।४।८६॥ इति भिटक्यात्मनेपदानि । अकृत, अकारि कटः स्वयमेवेत्यत्र तु, “स्वरदुहो वा॥३।४।९०॥ इति वा न मिच्। भूषा- र्थ, अलमकार्षीत्, कन्यां .चैत्रः। अलमकृत कन्या वयमेव । एवमलंकुरुते, अलङ्करिष्यते कन्या खयमेव । सन्नन्त, अचिकीर्षीत् कटं चैत्रः । अचिकीर्षिष्ट, चिकीर्षते कटः स्वयमेव । एषु "भूषार्थ-"॥३।४।९३॥ इति न जिनिटक्याः । ण्यन्त, कारयति कटं चैत्रेण मैत्रः। कटस्य सुकरत्वेन कर्तृत्वे; कारयते कटः स्वयमेव; अत्र “भूषार्थ-"॥३।४।९३॥ इति न क्यः। अचीकरत् कटं चैत्रेण मैत्रः। अचीकरत कटः वयमेव; अत्र “णिस्नुश्य-"॥३।४।९२॥ इति न बिच् । णिरिन्वति पृथग् योगकरणेन त्रिच् एव निषेधाद् निट भवत्येव । कारिता, कारिषीष्ट कटः स्वयमेव । कुर्वन् । कुर्वाणः। क्रियमाणम् । करिष्यमाणम्। ब्रिटि, कारिष्यमाणम् । चकृवान् । चक्राणः । कृत्वा । उपकृत्य । “कृगो नवा"॥३। श१०॥ इति वा गतिसंज्ञायां "तिरसो वा"॥२॥३२॥ इति वा रस्य सत्वे, तिर- स्कृत्य, तिरःकृत्य । गतिलाभावे च “गतिक-"॥३॥१॥४२॥ इति समासाभावान्न यप्, तिरः कृत्वा । कृतः, २ वान् । कर्त्ता । कर्तुम् । कर्त्तव्यम् । करणीयम् । कृत्यम् । कार्यम् । “सम्परेः कृगः-"॥४।४।९१॥ इति स्सटि, संस्करोति, परि- करोति । “स्सटि समः"॥१॥३॥१२॥ इति मस्य सत्वेऽनुस्वारानुनासिकयोश्च 4 भ्वादिगणः । ११३ T पूर्वस्य, संस्स्क्रियते; सँस्स्क्रियते । कस्यादिरिति व्याख्यानेऽनुवारस्य व्यञ्जन- वाद् “धुटो धुटि-"॥१३॥४८॥ इत्येकस्य सस्य वा लुकि तु, सस्क्रियते । “लुक्" ॥१॥३॥१३॥ इति मस्य लुकि, सस्क्रियते । एवं रूपचतुष्टयं सम्योगे सर्वत्र ज्ञेयम् । परिष्क्रयते । समस्करोत् । “स्तुस्वञ्जश्चाटि- ॥२॥३॥४९॥ इति वा अटि षत्वम; पर्यष्करोत् ; पर्यस्करोत् । समस्कार्षीत् । पर्यष्कार्षीत् ; पर्यस्का- र्षीत् । समस्कृतेत्यादि सर्व प्रागुक्तकृग्वत् । परोक्षायां तु विशेषः; सञ्चस्कार । परिचस्कार । “स्कृच्छृत-'"॥४॥३८॥ इति गुणे सञ्चस्करतुः, सञ्चस्करुः; “सृजि दृशि-४|४|७८॥ इति वेटि, सञ्चस्करिथ, सञ्चस्कर्थः । "स्क्रसृ.॥४४८१॥ इतीटि, सञ्चस्करिव, सञ्चस्करिम । सञ्चस्करे इत्यादि। पर्यस्कार्षीत् कन्यां चैत्रः; पर्यस्कृत । परिष्करिष्यते, परिष्कुरुते कन्या स्वयमेव । अत्र “भूषार्थ-"। ३।४।९३॥ इति जिक्यनिषेधादात्मने; “ उपाश्रूषा-" ॥४४९२॥ इति स्सटि, कन्यामुपस्करोति; भूषयतीत्यर्थः। तत्र २ न उपस्कृतम् ; समुदितमित्यर्थः । एधोदकस्योपस्कुरुते; तत्र प्रतियतत इत्यर्थः । उपस्कृतं भुङ्क्ते, संसक्तं धान्यं भुङ्ग इत्यर्थः । उपस्कृतं जल्पति, अधीते वा; सवाक्याध्याहारमित्यर्थः । सञ्चिस्कीर्षति; ते। परिचिस्कीर्षति, ते । उपचिस्कीर्षति, ते । सञ्चस्क्रीयते । परिचेष्क्रीयते । उपचेस्क्रीयते। उ स्सटि च, समचिस्करत् । पर्यचिस्करत् । “संपरेः कृग-॥४॥४॥ ९१॥ इत्यत्र स्सडिति हिसकारनिर्देशात् सञ्चिस्कीर्षतीत्यादौ समचिस्करदित्यादौ च षो न भवति । परिपूर्वस्य तु परिष्करोतीत्यादौ ङवर्ज “असोङसिवू."॥२॥३॥ ४८॥ इति वचनाद्भवति । परिचस्कारेत्यादौ तु स्सटो व्यवहितत्वान्न पो, द्वित्वेऽपी- त्यधिकारस्य निवृत्तत्वात् । सञ्चस्कृवान् । सञ्चस्क्राणः ॥ २६१ ॥ डुयाचग्याञायाम् । याचति, ते । अयाचीत्, अयाचिष्ट । ययाच । ययाचे । याचिता । ऋदित्त्वान् ङ न हूस्वः, अययाचत् । याच २ न्, मानः । ते, याचितः । याचि ३ ता, वा, तुम् ॥ २६२ ॥ डुपची पाके । अनिट् । पचति । पचते । “नेमादा-"॥२।३।०९॥ इति सूत्रोक्तधातून् कखादि षान्तं च धातुं वर्जयित्वा ऽन्यसर्वधातूनां सर्वेषु शव् सिच्सन्नादिप्रत्ययेषु परेषु; अकखाद्य. "॥२।३।८०॥ इति नेर्वा पत्वे, प्रणि. " क्रियारत्नसमुच्चयः। पचति, ते । प्रनिपचति, ते। एवमन्यधातुष्वपि नेर्णवं दृश्यम् । पच्यते । अपाक्षीत् , अपाक्ताम् , अपाक्षुः, अपाक्षीः, अपाक्तम, अपाक्त, अपाक्षम्, अपा. व,अपाक्ष्म । अपक्त, अपक्षाताम् , अपक्षत, अपक्थाः, अपक्षाथाम् । “सो धि." ॥४॥३७२।। इति वा सिच्लुकि, अपग्ध्वम् | पक्षे “चजः-"॥२॥१८६॥ इति के, "नाम्यन्त"।।२।३।१५॥ इति थे, "तृतीयस्तृतीय ॥१॥३॥४९॥ इति डे,"तवर्गस्य-" ॥१॥३६०॥ इति ढे, अपग्ड्वम् , अपक्षि, अपक्ष्वहि, अपक्ष्महि ॥ भाक ॥ अ. पाचि, अपक्षातामित्यादि ॥ परोक्षा ॥ पपाच, पेचतुः, पेचुः, पेचिथ, पपक्थ, पेचथुः, पेच, पपाच, पपच, पेचिव, पेचिम । पेचे; पेचिषे; पेचिध्ये; पेचिमहे । पच्यात्। पक्षीष्ट । पक्ता २। पक्ष्यति, ते । अपक्ष्यत् , त । पिंपक्ष २ ति, ते ) पिषक्षा । किपि, पिपक् ॥ यङि, पापच्यते । क्ये, “अतः"।४।३।८२॥ इत्यल्लुकि “योऽशिति"४ ३।८०॥ इति यलुकि च, पापच्यते। सप्त. ॥ पापच्येत । क्ये, पापच्येत ॥ पश्च०॥ पापच्यताम् । क्ये, पापच्यताम् ॥ ह्य०॥ अपापच्यत। क्ये, अपापच्यत॥अद्य० ॥ प्राग्वद्यलोपे; अपापचिष्ट, अपापचिषाताम् ॥ भाक ॥ यङोऽल्लुकः स्थानित्वान्न वृद्धिः,अपापचि ॥परोक्षा॥ पापचा ३ चक्रे, बभूव, आस वा॥भाक॥पापचा ३ञ्चक्रे, बभूवे, आहे वा ॥ आशीः॥ पापचिषीष्ट ॥ श्वस्तनी ॥ पापचिता ॥ भवि०॥ पापचि- प्यते॥ क्रिया० ॥अपापचिष्यत ॥ आशीःप्रभृतिषु भावकर्मणोरपि कर्तृसदृशमेव । पापच्यमानः। पापचिष्यमाणः॥ भाक ॥पापच्यमानम्। पापचिष्यमाणम्। पापचां ३ चक्राणः, बभूवान्, आसिवान् वा ॥भाक ॥ पापचा ३ श्चक्राणम् , बभूवानम्, आसानं वा । पापचि ५ त्वा, ता, तुम्, तः, २ वान् । एवं सर्वे व्यञ्जनान्ता यङि ज्ञातव्याः; तत्र इत् उत् ऋत् उपान्त्यानामद्यतन्यादौ यो यलुकि उपान्त्ये गुणो न कार्यों यङोऽल्लुकः स्थानिवेनाप्राप्तेः । जिमूः। अजेजिमिष्ट ॥ भाक । अजे. जिमि । एवं मुदिः। अमोमु २ दिष्ट, दि । वृषू। अवरी २ षिष्ट, षि, इत्यादि- वत् । यङ्लुपि, पाप १२ चीति, क्ति, क्तः, चति, चीषि, क्षि, क्थः, क्थ, चीमि, मि, च्वः, च्मः। क्ये, पापच्यते । सप्त. ॥ पापच्यात् । क्ये; पापच्येत । ॥पश्च०॥ पाप १० चीतु, क्तु, क्ताम्, चतु, ग्धि, क्तम्, क्त, चानि, चाव, चाम। क्ये, पापच्यताम् ॥ ह्य० ॥ अपाप ११ चीत्, क्, क्ताम् , चुः; चीः, क्, क्तम् , क्त, भ्वादिगणः । ११५ चम्, च्व, च्म । क्ये; अपापग्यत॥अद्य०॥ अपाप ३ चीत्, चिष्टाम् , चिषुः । भाक ॥ अपापाचि, अपापचिषाताम् ॥ परोक्षा ॥ पापचा ३ ञ्चकार, बभूव, आ- स वा । भाक ॥ पापचा ३ श्चके, बभूवे, आहे वा ॥ आशीः ॥ पापच्यात् ।। भाक ॥ पापचिषीष्ट । श्व० ॥ पापचिता ॥ भाक ॥ पापचिता ॥ भवि० ॥ पाप- चिष्यति ॥ भाक ॥ पापचिष्यते ॥ क्रिया० ॥ अपापचिप्यत् ॥ भाक ॥ अपाप- चिष्यत । अन्तोनोलुकि, पापचत्। पापचती । पापचिष्यन् । भाक ॥ पापच्य- मानम् । पापचिष्यमाणम् । पापचाश्च ३ कृवान्, कृवत्, क्रुषी । पापचां बभू- ३ वान्, वत्, पुषी । पापचामा ३ सिवान, सिवत्, सुषी । एते त्रयः शब्दा- स्त्रिषु लिङ्गेषु विद्वच्छब्दवत्सर्वविभक्तिषु स्वयमभ्यूह्याः ॥ भाक ॥ पापचां ३ चक्राणम् , बभूवानम् , आसानं वा । पापचि ५ त्वा, ता, तुम्, तः, २ वान् । पाप ३ चितव्यम्, चनीयम्, च्यम् । एवं सर्वेऽपि व्यञ्जनान्ता धातवो यङ्- लुप्यभिधानीयाः; नवरमद्यतन्यादिषु इत् उत् ऋदुपान्त्यानां धातूनामाशीर्यवर्ज सर्वत्रोपान्त्ये गुण एत् ओत् अर् लक्षणो वाच्यः; सचैवम् । जिम् । अजेजेमीत्, अजेजेमिष्टाम्। अजे.जेमि, अजेजेमिषाताम्। जेजेमांचकार; आमोऽकित्त्वाद्गुणः। जेजिम्यात्। जेजेमिषीष्ट। जेजेमिष्यति, ते। मुद्। अमोमोदीत् , अमोमोदिष्टाम् । अमोमोदि, अमोमोदिषाताम्। मोमोदाश्चकार । मोमुद्यात् । मोमोदिषीष्ट । मोमो- दिष्यति, ते । वृषू । अवरिव ४ (त् , र्षिष्टाम् ; र्षि, र्षिषाताम् । वरिवर्षाश्चकार वरिवृष्यात् । वरिवर्षिषीष्टं । वरिवर्षिष्यति, ते । तथा इत् उत् ऋदुपान्त्यानां स्वादिप्रत्ययेषु शतृक्यक्तवर्जेषु गुणः कार्यः । जेजेमिश्ला, ता, तुम् । जेजेमां चकृवान् । जेजेमाञ्चक्राणम् । मोमोदि ३ त्वा, ता, तुम् । मोमोदाञ्चकृवान् । मोमोदाञ्चक्राणम् । वरिवर्षि ३ वा, ता, तुम् । वरिवर्षाञ्चकृवान् । वरिवर्षा- उचक्राणम् । शत्रादौ तु न गुणः । जेजिमत् । जेजिम्यमानम् । जेजिमितः। जे. जिमितवान्। मोमुदत्। मोमुद्यमानम्। मोमुदितः । वरिवृषत् । वग्वृिष्यमाणम् । वरिवृषितः। सस्ये तु शतरि गुणः स्यात्, जेजेमिष्यन् इत्यादि । ईत् ऊत् ऋदु- पान्त्यानां तु न गुणः; उपान्त्ये लघोरभावेन गुणाप्राप्तेः । अमेमीलीत् । अदो- धूपीत् इत्यादि। एवमन्यत्रापि। शिति तु येषां यो विशेषः सम्भवी स खवस्थाने क्रियारत्नसमुच्चयः । वक्ष्यते । णिगि पाचयति, ते । अपीपचत् , त । पाचया २ ञ्चकार, चक्रे । णि- गन्ताणिगि; अपीपचत्, त । अथ कर्भकर्त्तरि, अपाच्योदनः स्वयमेव । पच्यते ओदनः स्वयमेव । अपक्त ओदनः स्वयमेव । पक्ष्यते ओदनः स्वयमेव । अत्र “पचिदुहेः”।३।४।८७॥ इति अिच्क्यात्मनेपदानि । उदुम्बरः फलमपाक्षीद्वायुः । उदुम्बरः फलं पच्यते, पक्ष्यते वा स्वयमेव; अत्र कर्मणा योगे “न कर्मणा-"॥ ३।४।८८॥ इति न मिच् ; क्यात्मनेपदे तु भवत एव। उदुम्बरं फलं पचति, पक्ष्यति या वायुः । उदुम्बरः फलं पच्यते पक्ष्यते वा स्वयमेव । णिगि, अपीपचत् ओदनं चैत्रेण मैत्रः। तस्य सौकर्येण कर्तृत्वे; अपीपचतौदनः स्वयमेव । “णिस्नु-'॥३।४।९२॥ इति न त्रिच् । ञिचनिषेधात् जिट् भवत्येव, पाचिता, पाचिषीष्टौदनः स्वय- मेव । पाचयतेऽन्नं स्वयमेव । अत्र “भूषार्थ-॥३।४।९३॥ इति आत्मने नतु क्यः, जिट् पुनरनेन निषिद्धोऽपि णिस्नु इति पृथग्योगाद्भवत्येव; निच एव तत्र निषेधात्, तच्च प्रागेवादर्शि । पचन् । पक्ष्यन् । पचमानः । पक्ष्यमाणः । पेचिवान् । पेचुषी। पेचानम् । पक्त्वा, पक्ता, पक्तुम् । “शुपि-"॥४।२।७८॥ इति तो वः; पक्कः, २ वान् । घ्यणि “क्तेऽनिट-"॥४।१।१११॥ इति कत्वे, पाक्यम् ॥ २६३ ॥ राजग्, टुभ्राजि दीप्तौ । राजति, ते । राज्यते । अराजीत् , अराजिष्टाम् । अराजिष्ट, अराजिषाताम् , अराजि २ ध्वम् , ट्वम्। अराजि । रराज। “जुभ्रम-"। ४।१।२६॥ इति वैत्वे, रेजतुः, रराजतुः, रेजुः, रराजः, रोजिथ, रराजिथ।रराजे, रेजे राज्यात् । राजिषीष्ट । राजिता २। राजिष्यति,ते । रिराजिषते । राराज्यते। रारा- जीति, राराष्टि । राजयति, ते । ऋदित्त्वान् , अरराजत् । राजन् । राजिष्यन् । राजमानः। राजिष्यमाणः। रराज्वान्। रोजिवान्। रराजानः, रेजानः। विराजितः। राजि ४ ता, तुम्, ला, तव्यम्। भ्राज्। भ्राजते। भ्राज्यते। अभ्राजिष्ट । अभ्रा- जि । “भ्रम-"॥४।१।२६।। इति वैवे, भेजे, बभ्राजे । भ्राजिषीष्ट । भ्राजिता । भ्राजिष्यते । बिभ्राजिषते । बाभ्राज्यते । बाभ्राजीति; भ्राजेरात्मनेपदिनोऽपि पुनरिहपाठो राजसाहचर्यप्रदर्शनार्थः, तेन “यजसृज-"||२।१।८७॥ इत्यत्रास्यैव ग्रहणात्षत्रे, बाभ्राष्टि, बाभ्राष्टः, बाभ्राजति, बाना २ जीषि, क्षि । पूर्वस्य तु भ्वादिगणः । भ्राजे[भ्राक्ति इति स्यात् । यद्येवं षत्वमेव विकल्प्यतां किं पुनः पाठेन । सत्यम्। अस्यात्मनेपदाव्यभिचारोपदर्शनद्वाराऽन्येषां यथादर्शनमात्मनेपदानित्यत्वज्ञापना. र्थः पुनः पाठः, तेन लभते, लभति; सेवते, सेवति; श्रोतारमुपलभति न प्रशंसितारम् ; 'स्वाधीने विभवेऽप्यहो नरपति सेवन्ति किं मानिनः' इत्यादयः प्रयोगाः साधवः । भ्राजयति । भ्राजभास- "॥४२॥३६॥ इति डे वा हस्खे, अबिभ्रजत्, अबभ्राजत् । भ्राजि ५ ता, वा, तुम्, तः २ वान् ॥२६४॥२६५।। अथानिटौ हौ । भजी सेवायाम् । भजति, ते। संविभजति, ते। भज्यते। अभाक्षीत् , अभाक्ताम् ; अभक्त, अभक्षाताम् , अभक्षत, अभक्थाः। अभाजि । बभाज । "तृत्रप-"॥४।१।२५॥ इत्येत्वे, भेजतुः, भेजुः भेजिथ, बभक्थ, भेजथुः, भेज, बभाज, बभज, भेजिव, भेजिम । भेजे । भज्यात् । भक्षीष्ट । भक्ता २ । भक्ष्यति, ते । बिभक्षति, ते । बाभज्यते । बाभ २ जीति, क्ति । शेषं पचि- वत् ॥ २६६ ॥ रञ्जी रागे । “अकट्विनोश्च-"॥४२॥५०॥ इति नलुकि; रजति, ते । क्ये, रज्यते । अराङ्क्षीत् , 'अराताम् , अराक्षुः, अराङ्क्षीः; अराङ्क्षम् । अरत, अरझाताम्। अरञ्जि । ररञ्ज । "इन्ध्य-॥४।३।२१॥ इति न कित्त्वे, ररञ्जतुः, ररञ्जः, ररञ्जिथ, ररक्थ, ररञ्जिम । ररञ्जे । रज्यात् । रङ्क्षीष्ट । रङ्गा, २ । रक्ष्यति, ते । “कुषिरओ:-"|| ३७॥ इति कर्मकर्तरि शिद्विषये वा परस्मै- पदं तद्योगे श्यश्च । रजति वस्त्रं रजकः; रज्यति, रज्यते वा वस्त्रं स्वयमेव । विरज्यति, विरज्यते वा भव्यो भोगेभ्यः स्वयमेव । शितोऽन्यत्र तु; अरञ्जि, रीष्ट, रक्ष्यते वा वस्त्रं खयमेव । रिरङ्क्षति, ते । रारज्यते । रार ४ जीति, क्ति, क्तः जति ॥ ह्यस्त०॥ अरारञ्जीत् । अरारन् । रारजत् । " णौ मृग-"॥४।२।५१॥ इति नलुकि, “कगेवनू-"॥४।२।२५॥ इति हस्खे, रजयति मृगं व्याधः । ङ, अरीरजत् । जिपरे तु वा दीर्घः, अराजि, अरजि । मृग- रमणादन्यत्र नस्यालोपे; रञ्जयति नटः सभाम् । रञ्जयति रजको वस्त्रम् । अररञ्जत् । अरञ्जि । क्ते, रञ्जितः। रञ्जयित्वा । रजन् । रजमानः। रक्ष्यन् । रक्ष्यमाणः । कित्त्वान्नलुकि एवे च, रेजिवान् । रेजानः। “जनशो-४।३।२३॥

११८
क्रियारनसमुच्चयः।
इति वा कित्त्वे, रक्त्वा, रङ्क्त्वा । विरज्य। रक्तः । रङ्का। रक्तुम् । रतव्यम् ।
रञ्जनीयम् । रङ्गयम् ॥ २६७ ॥
बुधृग् बोधने । बोधति, ते । बुध्यते । ऋदिलाहाऽङि, अबुधत् । अबो-
धीत्, अबोधिष्टाम्, अबोधिषुः । आत्मनेपदेवडोऽसत्त्वे, अबोधिष्ट, अबो-
धिषाताम् ॥ भाक ॥ अबोधि । बुबोध; बुबुधुः; बुबोधिथ । बुबुधे । बुध्यात्।
बोधिषीष्ट । बोधिता २ । बोधिष्यति, ते । “वौ व्यञ्जनादेः॥४।३।२५॥ इति
क्वासनोः सेटोर्वा कित्त्वे, बुबुधिषति, ते । बुबोधिषति, ते। बोबुध्यते। बोबोधी-
ति, बोबोद्धि, बोबु २ छः, धति, बोबुधीषि, बोभोत्सि । शेषं बुधिञ्च्वत् ।
बोधयति । बोध्यते । अबूबुधत् । बोधयां २ चकार, चक्रे वा । बोधित्वा, बुधि-
वा। बुधितः, २ वान् । बोधि २ ता, तुम्॥ २६८ ॥
खनूर, अवदारणे । खनति, ते । “ये नवा-"॥४।२।६२॥ इति वा आत्वे,
खायते, खन्यते । अखनीत् , अखानीत् ; अखनिष्टाम् , अखानिष्टाम् । अखनिष्ट,
अखनिषाताम्। अखानि । चखान । “गमहन
-२४४॥ इत्यल्लुकि, चख्नतुः,
चख्नुः, चखनिथ, चख्नथुः, चख्न, चखान, चखन, चख्निव, चख्निम । चख्ने,
चख्नाते।"ये नवा॥४२॥६२॥ इत्यत्र अकारान्तस्य यस्य ग्रहणान्नात्वम् , खन्यात्,
खायादित्यन्ये । खनिषीष्ट । खनिता २। खनिष्यति, ते । चिखनिषति, ते ।
प्रतिचिखनिषत् । चाखायते, चङ्खन्यते । लुपि, चलनीति, चङ्खन्ति । “आः
खनि- "॥४।२।६०॥ इत्यात्वे; चलातः, चङ्नति । चङ्ख्नत् । खानयति, ते ।
अचीखनत् । खनन् । खनिष्यन् । खनमानः । खायभानम् , खन्यमानम् ।
खनिष्यमाणम् । चखन्वान् । चख्नानः । ऊदित्त्वादेटि, खावा, “आः खनि-"
॥२६०॥ इति आत्वम् । खनित्वा । उत्खाय, उत्खन्य । खनि २ ता, तुम् ।
वेट्वान्नेटि, खातः, २ वान् । “खेय-"॥५॥१॥३८॥ इति क्यपि, खेयम् ॥२६९॥
दानी अवखण्डने । शानी तेजने; आर्जवे । “शान्दान्-"॥३।४।७॥ इति
सनि, "स्वार्थे"|४|४|६०॥ इति नेटि, दीदांसति, ते । निशाने सनि, शीशांसति,
ते। शेषं सन्नन्तभूवत् । इच्छासनि, दीदांसिषति, ते। शीशांसिषति, ते । अर्था-
न्तरे तु सनोऽभावेन प्रायो न विभक्तयः, प्रत्ययान्तराणि तु भवन्ति ॥२७०॥२७१॥

भ्वादिगणः। . शपी आक्रोशे, विरुद्धानुध्याने । अनिट् । शपति, ते । अनेकार्थवादुपा- लम्भनेऽपि । “शप उपलम्भने"॥३॥३॥३५॥ इत्यात्मनेपदे, चैत्राय शपते। "श्लाघलु- स्था-"||२।२।६०॥ इति चतुर्थी; चैत्रं कञ्चिदर्थ बोधयतीत्यर्थः। अथवा वाचा शपथं कुर्वन् चैत्रं प्रत्याययतीत्यर्थः । अशाप्सीत् , अशाप्ताम् , अशाप्सुः । अशप्त, अशप्साताम् । शशाप, शेपतुः, शेपुः, शेपिथ, शशप्थ; शेपिम। शेपे, शेपाते। शप्यात् । शप्सीष्ट, शप्ता २ । शप्स्यति, ते । शिशप्सति, ते । शाश ३ प्यते, पीति, प्ति । शेषं पचिवत् । शापयति । अशीशपत् । शप्त्वा । शप्ता । शप्तुम् । शप्तः,२ वान् ॥ २७२ ॥ धावूग् गतिशुद्ध्योः । धावति, ते । धाव्यते । अधावीत्, अधाविष्टाम् । अधाविष्ट, अधाविषाताम् । अधावि । दधाव, दधावतुः । दधावे, दधावाते । धाव्यात् । धाविषीष्ट । धाविता २ । धाविष्यति,ते। दिधाविषति, ते। दाधाव्यते। दाधावीति । “अनुनासिके च."॥४।१।१०८॥ इति वस्योटि, “ऊटा-"॥१२॥१३॥ इत्यौले, दाधौ २ ति, तः, दाधावति । धावयति । अदीधवत् । अदित्त्वात् क्वि वेटि; धौला, धावित्वा । प्रधाव्य । वेट्वात् क्तयोर्नेट, धौतः, २ वान् पादौ । कथं धावितः, २ वान् ; सत्यपि वेट्वे गतौ क्तयोरिट्पतिषेधस्यानित्यवात् । धावि ३ ता, त्वा, तुम् । धौतिः ॥ २७३ ॥ लषी कान्तौ, कान्तिरिच्छा। “भ्रासम्लास-"३।४।७३॥ इति वा श्ये; लष्य- ति, लषति, इच्छतीत्यर्थः । अभिलष्यति, ते; अभिलषति, ते । क्ये, अभिल- प्यते । अभ्यलषीत् , अभ्यलाषीत् ; अभ्यलषिष्टाम् , अभ्यलाषिष्टाम् • । अभ्य- ल २ षिष्ट, षिषाताम् । अभ्यलाषि । अभिललाष, अभिलेषतुः। अभिलेषे । अभिलष्यात् । अभिलषि ४ षीष्ट, ता, ष्यति, ष्यते । अभिलिलषिषति, ते । अभिलाल ३ ष्यते, पीति, ष्टि । अभिलाषयति । अभ्यलीलषत् । अभिलषि ५ ता, वा, तुम् , तः २ वान् । अभिलष्य ॥ २७४ ॥ चषी भक्षणे। चषति, ते। अचाषीत्, अचषीत् । चचाप । चेषे । चषिता। क्ते, चषितम् । शेषं लषीवत् ॥ २७५ ॥ गुहौग संवरणे । “गोहः स्वरे"।४।२।४२॥ इत्यूत्वे; गूहुति, ते । गुह्यते ।

१२० क्रियारत्नसमुच्चयः । " औदित्वाहेटि गुणे सत्यूकारे कृते, अगृहीत् , अगूहि २ ष्टाम् , षुः। पक्षे “हशिट-" ॥३४॥५५॥ इति सकि, अधुक्ष ३ त्, ताम् , न् । अत्र “हो धुट्-"॥२।११८२॥ इति ढः,"षढोः-"॥२।१।६२॥ इति कः, “गडद ॥२।११७७॥ इति घः । नाम्यन्त.” ॥२॥३॥१५॥ इति षः । अत्र ढस्थानस्य कस्यासत्वात् चतुर्थान्तलक्षणो घो भव- ति । “हशिट"॥३४॥५५॥ इति सकि, तथधदेषु परेषु, “दुहदिह-"॥४।३।७४॥ इति वा सको लुकि वेटि च, अघुक्षत । अगूढ । अगूहिष्ट “स्वरेतः"॥४॥३।७५।। इति सकोऽल्लुकि, अघुक्षाताम् , अगूहिषाताम् , अघुक्षन्त । अत्राल्लुकः स्थानिलाद् “अनतोऽन्त- ॥४।२।११४॥ इत्यत् न भवति । अगृहिषत, अघु- क्षथाः, अगूढाः, अगूहिष्ठाः, अघुक्षाथाम् , अगूहिषाथाम् , अघुक्षध्वम् , अघू. ट्वम् , अगृहि ३. ध्वम् , ट्वम् , ड्वम्, अघुक्षि, अगृहिषि, अघुक्षावहि, अगुह्वहि, अगूहिष्वहि, अघुक्षामहि, अगूहिष्महि । अगृहि । जुगूह, जुगुहतुः । “गोह-"। १२।४२॥ इति गुणनिर्देशान्नात्र उत्; जुगुहुः, जुगूहिथ । जुगुहे, जुगुहाते । गुह्यात् । गृहिषीष्ट । “ सिजाशिष-॥४।३।३५॥ इति कित्त्वे,घुक्षीष्ट । गृहिता २। गोढा २ । गृहिष्यति, ते । घोक्ष्यति, ते । एवं अव, नि पूर्वोऽपि । “ग्रहगु- हश्व-॥४।४।५९॥ इतीनिषेधात् , “उपान्त्ये”॥४।३।३४॥ इति सनः कित्त्वे, जुघुक्षति, ते । जोगुह्यते। जोगुहीति, जोगोढि, जोगूढः, जोगुहति, जोगुहीषि, जोघोक्षि ॥ ह्य० ॥ अजोगुहीत् । पदान्ते गो घत्वे, अजोघोट् , ड्, अजोगूढाम् , अजोगुहुः, अजोगुहीः, अजोघोट, ड्, अजोगूढम् , अजोगूढ, अजोगुहम् , अजोगुह, अजोगुह्म । निगृहयति । ङे, न्यजूगुहत् । हस्खाभावमते तु, अजुगृहत् । निगूहन् । निगूहमानः । निगुह्यमानम् । “वेटो-"॥४।४।६२॥ इति नेटि, गूढः, २ वान् । गूढिः । गूढा; गूहित्वा । गोढा, गृहिता । गोढुम् , गुहितुम् । गृहनीयम् । “कृवृषि-"॥५॥१॥४२॥ इति वा क्यपि, गुह्यम् । पक्षे घ्यणि, गोह्यम्, गृहनम् ॥ २७६ ॥ भ्लक्षी भक्षणे । अयं भक्षीत्यन्ये । भक्षति, ते । अभक्षीत्। अभाक्षिष्ट । बभक्ष । बभक्षे । भाक्षि ४ त्वा, ता, तुम् , तम् ॥ २७७॥ इत्युभयपदिनः । , , १२१ भ्वादिगणः । अथ द्युतादय श्रात्मनेपदिनः । धुति दीप्तौ । द्योतते; विद्योतते । धुत्यते ॥ अद्य० ॥ “द्युझ्योऽद्यतन्याम्"। ३॥३॥४४॥ इति वाऽत्मनेपदे; पक्षे, “लदिद्युता-"३।४।६४॥ इत्यङि, अद्युतत्, अधुतताम्, अद्युतन् , अधु ६ तः, ततम् , तत, तम् , ताव, ताम । अद्योतिष्ट, अयोतिषाताम् ; अद्योतिध्वम् । अद्योतिड्ढम् ॥भाक ॥ अधोति । “धुतेरिः"॥४॥ १॥४१॥ इति पूर्वस्येत्वे; दिद्युते, दिद्युताते, दिद्युतिरे, दिद्युतिषे । द्योतिषीष्ट । द्यो- तिता। द्योतिप्यते। अद्योतिष्यत । दिद्युतिषते; दिद्योतिषते। देद्युत्यते। देद्युतीति, देद्योत्ति, देद्युत्तः, देद्युतति । द्योतयति। अदिद्युतत् । सनि, दिद्योतयिषति । द्योत- मानः।योतिष्यमाणः । दिद्युतानः । धोति २ ता, तुम् । द्युतितः २ वान् । “उति- शवर्हा-"॥४।३।२६।। इति भावारम्भे वा कित्त्वे; धुतितम; द्योतितमनेन । प्रद्यु- तितः २, वान् । प्रद्योतितः २, वान् । एवमन्यत्रापि । “वौ व्यञ्जन-"॥४।३।२५॥ इति क्तासनोर्वा कित्त्वे; द्युतिया, द्योतिला । प्रद्युत्य ॥ २७८ ॥ रुचि अभिप्रीत्यां च; चादीप्तौ । अभिप्रीतिरभिलाषः । “रुचिक्लृप्य-||२।२। ५५॥ इति चतुर्थ्या; मैत्राय रोचते दधि । रुच्यते । द्युतादिलादङि, अरुचत् । अरोचिष्ट, अरोचिषाताम् ; अरोचि २ ध्वम्, दुम् । अरोचि । रुरुचे, रुरुचाते, रुरुचिरे, रुरुचिषे । रोचिषीष्ट । रोचिता २। रोचिष्यते। अरोचिष्यत । "वो व्य. जन-४।३।२५॥ इति वा कित्; रुरुचिषते, रुरोचिषते। “न गृणा-॥३।४।१३।। इति न यङ्, भृशं रोचते। “अणिगि प्राणि-"।।३।३।१०७॥ इति फलवति परस्मै प्राप्तावपि, “परिमुह-"॥३३९४॥ इत्यात्मनेपदे, चैत्राय मैत्रं परिरोचयते । अरूरु- चत । रोचमानः । रोचिष्यमाणः । रुरुचानः। रुचितः २, वान् । “उतिशव-" ॥४।३।२६॥ इति भावारम्भे वा कित्त्वे; रुचितम्, रोचितम् । प्ररुचितः, प्ररोचितः। रोचित्वा, रुचित्वा । रोचि ३ ता, तुम्, तव्यम् ॥ २७९ ॥ शुभि दीप्तौ। शोभते । शुभ्यते। अशुभत् । अशोभिष्ट, अशोभिषाताम्। अशोभि । शुशुभे, शुशुभाते । शोभि ३ षीष्ट, ता, प्यते । शुशुभिषते, शुशो- भिषते । भृशं शोभत इति वाक्यम् । शेषं रुचिवत् ।। २८० ॥

३
,
१२२
क्रियारत्नसमुच्चयः।
क्षुभि सञ्चलने । रूपान्यथात्वे । क्षोभते । अक्षुभत् । अक्षोभिष्ट, अक्षो-
भिषाताम् । अक्षोभि। चुक्षुभे । क्षोभि ३ षीष्ट, ता, प्यते । चोक्षुभ्यते । चोक्षु-
भीति, चोक्षोब्धि। क्षोभयति । अचुक्षुभत्। “क्षुब्ध "||४|४७०॥ इति निपातनात
क्षुब्धो मन्थः । क्षुभितोऽन्यः । अयमर्थः । मन्थस्यानेकार्थत्वात् मन्थे, मथिते,
मथ्यमानक्षोभिते वा । क्षुब्धः समुद्रः, मथित इत्यर्थः; मथ्यमानः सन् क्षोभङ्ग-
मित इति वाऽर्थः । मन्थने । क्षुब्धं वल्लवेन, विलोडनं कृतमित्यर्थः । मन्थादन्यत्र
तु, क्षुभितं समुद्रेण, सञ्चलितमित्यर्थः। एवं क्षुभितं मन्थानकन। क्षुभितः समुद्रो-
वातेन । शेषं रुचिरिव ॥ २८१ ॥
सम्भूङ्
विश्वासे । दन्त्यादिः। विस्रम्भते । द्युताद्यङि, नलुकि च; अस्र-
भत् । अत्रंम्भिष्ट । सस्रम्भ । विस्रम्भिषीष्ट । विस्रम्भिप्यते । विसिस्रम्भिषते ।
विसासभ्यते । विसास्रं २ म्भीति, ब्धि । विस्रम्भयति । व्यससम्भत् । ऊदि-
त्त्वाद्वेट; स्रब्ध्वा, स्रम्भित्वा । “क्त्त्वा"।।४।३।२९॥ इति सेट्क्त्त्वा न कित्, तेन
नलुक् न स्यात् । वेट्वान्नेटि, विस्रब्धः, २ वान् । विसाम्भ ३ ता, तुम्,
तव्यम् ॥ २८२ ॥
भ्रंशूङ्, स्रंसूङ् अवस्रंसने । आद्यस्तालव्यान्तः, परो दन्त्यादिः । “शिड्हे"
॥११३।४०॥ इत्यनुस्वारः । भ्रंशते। भ्रश्यते। अङि, अभ्रशत् । अभ्रंशिष्ट, अभ्रं-
शिषाताम् । अभ्रंशि। बभ्रंशे, बभ्रंशाते । 'इन्ध्य-"॥४।३।२१॥ इति परोक्षा न
कित् । भ्रंशि ३ षीष्ट, ता, ष्यते ॥ अभ्रंशिष्यत । बिभ्रंशिषते । बनीभ्रश्यते ।
बनी १२ भ्रंशीति, भ्रष्टि, भ्रष्टः, भ्रशति, भ्रंशीषि, भ्रंक्षि, भ्रष्ठः, भ्रष्ठ, भ्रंशीमि,
भ्रंश्मि, भ्रश्वः, भ्रश्मः । भ्रंशयति । अबभ्रंशत् । भ्रंशमानः । भ्रंशिष्यमाणः ।
भ्रश्यमानम् । बभ्रशानः । ऊदित्त्वाइट, भ्रष्ट्वा, भ्रंशिवा । प्रभ्रश्य । वेट्वात्,
भ्रष्टः २, वान् । भ्रंशि २ ता, तुम्। भ्रंशनीयम् । भ्रंश्यम् ॥ संसूङ् । स्रंसते।
स्रस्यते । अस्रसत् । अस्रंसिष्ट । अस्रंसि । सस्रंसे । स्रंसि ३ षीष्ट, ता, प्यते ।
अनंसिष्यत । सिस्रांसिषते । सनीस्रस्यते । सनी ४ स्रंसीति, स्रंस्ति, स्रस्तः,
स्रसति । संसयति । असलंसत् । स्रस्त्वा; संसित्वा । प्रस्रस्य । स्रस्तः, २ वान्
नंसि २ ता, तुम् ॥२८३ ॥ २८४ ॥

भ्वादिगणः। १२३ ध्वंसूङ् गतौ च; चादवलंसने। ध्वंसते; अवध्वंसते; विध्वंसते । ध्वस्यते । अङि, अध्वसत् । अध्वंसिष्ट, अध्वंसिषाताम् । अध्वंसि । दध्वंसे । ध्वंसि ३ षीष्ट, ता, ष्यते । दिध्वंसिषते । दनीध्वस्यते । दनी ४ ध्वंसीति, ध्वंस्ति, ध्वस्तः, ध्वसति । ध्वंसयति । अदध्वंसत् । ध्वंसयांचकार । दध्वसानः । ध्वस्त्वा, ध्वंसित्वा । प्रध्वस्य । ध्वस्तः, २ वान् । ध्वंसि २ ता, तुम् । ध्वंसनीयम् । ध्वंस्यम् ॥ २८५॥ घुताधन्तर्गणो वृदादिः पञ्चकः । वृतूङ् वर्त्तने। स्थितौ वर्त्तते । प्रवर्त्तते । अनु, वि, परि, नि, व्या, परा, आङ्, निर्, पूर्वोऽपि वाच्यः। वृत्यते। प्रावर्त्तत धुताद्यङि, अवृतत् । अवर्त्तिष्ट, अवतिषाताम् ; अवतिष्ठाः; अवर्ति २ ध्वम्, ड्ढम् । अवति । ववृते, ववृताते । वर्तिषीष्ट । वर्त्तिता । "वृद्ध्य-"॥३।३।४५॥ इति स्यसनोर्विषये वाऽत्मनेपदम्। आत्मनेपदाभावे च, "न वृद्ध्यः॥४।४।५५।। इति नेट, वर्त्यति; वर्तिष्यते । अवय॑त् ; अवतिष्यत । विवृत्सति; विवर्तिषते । अविवृत्सीत्, अविवर्तिषीष्ट । विवृत्साञ्चकार । ३ । 'विवर्तिपाञ्चके । ३ । विवृ- सिष्यति । विवर्तिषिप्यते । स्यसनि वृतादीनां श्वस्तन्यां च क्लुपेर्विकल्पस- हावात्परस्मैपदनिमित्तत्वमात्मनेपदनिमित्तवं चोभयमप्यस्ति; तेन सन्नन्तानां तादावपि उभयपदनिमित्तत्वात् इडभाव इट् चोभयमपि भवति ॥ विवृत्सि ५ तः, त्वा, ता, तुम् , तव्यम् । विवर्तिषि ५ तः, त्वा, ता, तुम्, तव्यम् । प्रविवृत्स्य । प्रविवर्तिष्य । एवं स्यन्दादिष्वपि । वरीवृत्यते । लुपि, वरीवृतीति, वरिवृतीति । रागमे बहुलवचनान्न ईत् , तेनात्र तृतीयो र आगमो नोक्तः। वरी- रि २३ वर्ति । वरी रि र ३ वृत्तः । वरी रि र ३ वृतति । वरि ८ वृतीषि, वसि, वृत्थः, वृत्थ, वमि, वृतीमि, वृत्वः, वृत्मः । हौ, वरिवृद्धि ॥ ह्य० ॥अवरि ११ व , वृतीत् , वृत्ताम्, वृतुः, वृतीः, वर्त, वृत्तम्, वृत्त, वृतम्, वृत्व, वृत्म । शेष पचिस्थानोक्तम् । वर्त्तयति । “ऋवर्णस्य "॥४॥२॥३७॥ इति गुणापवादो वा ऋः; अवीवृतत्, अववर्चत् । वर्सयाञ्चकार । “वृत्तवृत्तम् ॥४४॥६५॥ इति निपातनात् ; णौ क्ते, वृत्तस्तर्कः, अभ्यासित इत्यर्थः । ग्रन्थादन्यत्र तु, वर्तितं कुडमम् । अन्ये तु प्रन्थेऽपि पत्रितमिति प्रयोगमाद्रियन्ते । वर्तमानः । पय॑न्। , क्रियारत्नसमुच्चयः । वर्तिष्यमाणः । वृत्यमानम् । वर्तिष्यमाणम् । ववृतानः । ऊदित्त्वात् ; वृत्त्वा, वर्तित्वा । प्रवृत्य । वेट्वात् , वृत्तः, २ वान् । वृत्तिः । वर्त्ति २ ता, तुम् ॥२८६॥ स्यन्दौङ् स्रवणे । स्यन्दते। “निरभ्यनोश्च स्यन्दस्याप्राणिनि"||२।३।५०॥ इति वा षत्वे, निःष्यन्दते, निस्स्यन्दते तैलम् । अभिष्यन्दते, अभिस्यन्दते । एवम् अनु, परि, नि, बि, पूर्वस्यापि वा पलं वाच्यम् । प्राणिनि तु कर्तरि , परिस्यन्दते मत्स्य उदके। पर्युदासेन प्राणिन एव केवलस्य निषेधात्प्राण्यप्राणि- द्वयप्रयोगे तु षत्वविकल्प एव; अनुष्यन्देते मत्स्योदके, अनुस्यन्देते वा । स्य- द्यते । अङि, अस्यदत् । पर्यष्यदत्, पर्यस्यदत् । अस्यंदिष्ट । औदित्त्वावेट , अस्यन्त, अस्यन्दि ९ षाताम्, षत, ठाः, षाथाम, ध्वम्, ड्वम्, पि० । अस्य ९ साताम् , न्त्सत, न्त्थाः, न्त्साथाम् , द्ध्वम्, द्दध्वम् , सि० । अस्य- न्दि। सस्यन्दे । स्यन्दिषीष्ट; स्यन्त्सीष्ट । स्यन्दिता, स्यन्ता । “वृनः स्यसनोः" ॥३।३।४५॥ इति वाऽत्मने । आत्मनेपदाभावे " न वृद्भ्यः" ॥४४॥५५॥ इति नेट् । आत्मनेपदे चौदित्त्वाद्वेट्। स्यन्त्स्यति; स्यन्दिप्यते, स्यन्त्स्यते। अस्यन्त्स्यत्; अस्यन्दिष्यत, अस्यन्त्स्यत । सिस्यन्त्सति, ते। सिस्यन्दिषते। सास्यद्यते । सास्य. ४ न्दीति, न्त्ति, न्त्तः, दति। स्थन्दस्येति शनिर्देशाद्यङ्लुपिन षत्वम् । अभिसा- स्यन्दीति तैलम् । स्यन्दयति । असस्यन्दत् । सिस्यन्दयिषति । स्यन्दमानः । स्यन्त्स्यन् । स्यन्दिप्यमाणः । सन्त्स्यमानः। सस्यदानः । इडभावे "स्कन्दस्यन्दः" ॥४।३।३०॥ इति न तवा कित् । इटि तु " क्त्वा "||४|३॥२९॥ इति न कित्, स्यन्त्वा, स्यन्दित्वा । यपि, प्रस्यन्ध । तादिरेव न किदिति मते तु, प्रस्यद्य । घेट्त्वान्नेट ; स्यन्नः, २ वान् । स्यन्दिता, स्यन्ता। स्यन्दितुम्, स्यन्तम्। स्यन्द- नीयम् । स्यन्द्यम् ॥ २८७ ॥ वृधूङ् वृहौ । वर्धते । वृध्यते । अवृधत् । अवर्धिष्ट, अवडिषाताम् । अवद्धि । ववृधे, ववृधाते। वर्धिषीष्ट । वर्धिता । "वृश्यः-"॥३३॥४५॥ इति वाऽऽ- त्मनेपदाभावे "न वृद्मः"॥४४॥५५॥ इति नेट; वर्त्यति। वर्धिष्यते। अवय॑त्। अवर्धिष्यत । विवृत्सति । विवर्धिषते । वरीवृध्यते । वरी रि र, ३ वृधीति, 'वरी रि २,३ वर्द्धि । वरी रि र , ३ वृत्तः, वरी रि र ३ वृधति। वरि ८ वृधीषि, : १२५ . ते भ्वादिगणः । वर्सि, वृद्धः, वृद्ध, वृधीमि, वमि, वृध्वः, वृध्मः । हौ वरिवृद्धि । वरिवृधानि ।। ह्य० ॥ अवरि १२ वर्त, वृधीत्, वृद्धाम् , वृधुः, वृधीः, वाः, वर्तु , वृद्धम् , वृद्ध, वृधम् , वृध्व, वृध्म । णौ, वर्धयति । अवीवृधत् ; अववर्धत् । वर्धमानः । वृध्य- मानम् । वय॑न् । वर्धिष्यमाणः । ववृधानः । ऊदित्त्वात् , वृध्वा, वर्धित्वा । वेट्वात्, वृद्धः, २ वान् । वृद्धिः । वर्धिता । वर्धितुम् ॥ २८८ ॥ शृधूङ् शब्दकुत्सायाम् । तालव्यादिः। शब्दकुत्सा पायुशब्दत्वात् । शर्ध- । अशृधत् । अशर्धिष्ट । शशृधे । शय॑ति । शर्धिष्यते । शिशृत्सति । शि- शर्धिषते । शृध्वा; शर्धित्वा । शृद्धः, २ वान् । सर्व वृधूवत् ॥ २८९ ॥ कृपौङ् सामर्थ्ये । “र-"||२।३।९९॥ इति लत्वे, कल्पते; प्रकल्पते; विकल्पते; सङ्कल्पते । लत्वे, क्लुप्यते । अङि, अक्लपत् । औदिलाइटि, अकल्पि २ ट, षाताम्। अक्लप्त, अक्लप्साताम्, अत्र “सिजाशिष-"॥४॥३॥३५॥ इति कित्त्वम् ।अकल्पि। चक्लपे, चक्लपाते । कल्पिषीष्ट । “सिजा-''||४।३।३५॥ इति कित्त्वे, क्लप्सीष्ट। “कृपःश्वस्तन्याम् ।।३।३।४६॥ इति “वृद्भ्यः स्यसनोः'। ३।३।४५॥ इति च वाऽऽत्मनेपदम् । पक्षे " न वृद्भ्यः "॥४।४।५५॥ इति नेट् । आत्मनेपदेवौदित्त्वाइंट, कल्तासि । कल्तासे, कल्पितासे। कल्प्स्यति । कल्पि- प्यते, कल्प्स्यते । अकल्प्स्यत्, त । अकल्पिप्यत । “उपान्त्ये” ॥४॥३॥३४॥ इत्यनिट् सन् कित् ; चिक्लप्सति, ते। अत्र ऋवर्णोपदिष्टं कार्य लवर्णस्यापीति. लतोऽपि "ऋतोऽत् ॥४।१।३८॥ चिकल्पिषते । चलीक्लप्यते । चलि ली ल् ३ क्लपीति, चलि लील् ३ कल्ति, क्लुप्तः, क्लपति।कल्पयति। कल्प्यते।अचकल्पत्। अचीक्लपत् ; “ऋवर्णस्य"।४।२।३७॥ इति वा ऋः। “ऋर-"॥२।३।९९॥ इति लः। कल्पमानः। प्रक्लप्यमानम्, अत्र लभध्ये लकारस्य सद्भावात् 'स्वरात्" ॥२।३।८५॥ इति न णः; अलचटेत्यधिकारात्। कल्प्स्यन् । कल्पिष्यमाणः, कल्प्स्य- मानः। कल्पिता, कल्प्ता । कल्पितुम्, कल्तुम् । कल्पित्वा, क्लुप्त्वा । वेटला- , कृप्तः, २ वान् । कल्पनीयम्। कल्प्यम्॥वृत् । वर्त्तनं वृत् । धुतादिवृता- दिश्चान्तर्गणौ वर्तितौ, समाप्तावित्यर्थः । वृधेः क्विपि, वृत्वर्धितौ पूर्णावित्येक॥२९०॥ इति द्युतादिः । न्नेट, १२६ क्रियाग्नसमुच्चयः । G अथ ज्वलादिः । ज्वल दीप्तौ । ज्वलति । ज्वल्यते । “ बदव्रज-"॥४॥३॥४८॥ इति वृद्धी, अज्वालीत् ; अज्वालिष्टाम् । अज्वालि, अज्वालिषाताम् । जज्वाल, जबलतुः; जज्वलिथ। जज्वले। ज्वल्यात् । ज्वलिषीष्ट। ज्वलिता २। ज्वलिष्यति, ते। अज्व. लिप्यत् , त । जिज्वलिषति । यवलानां वाऽनुनासिकले, जज्वल्यते; जाज्व- ल्यते । जव २ लाँति, ल्ति । जाज्व २ लीति, ल्ति । णौ, घटादित्वात् हस्खे, प्रज्वलयति । “ज्वलह्वल-"॥४।२।३२॥ इत्यनुपसर्गस्य वा ह्रस्वे; ज्वलयति, ज्वालयति । अजिज्वलत् । “ज्वलहल-"॥४।२।३२॥ इत्यत्र वा हस्खविधा- नात्, “घटादेः॥४।२।२४॥ इत्यनेनैव सो वा दीर्थे; प्राज्वालि, प्राज्वलि । अग्वालि, अज्वलि । ज्वलन्। ज्वलिष्यन् । ज्वल्यमानम् । ज्वलिष्यमाणम् । जज्वल्वान् । ज्वलि ५ ता, त्वा, तुम्, तः, २ वान् । प्रज्वल्य ॥ २९१ ॥ कुच सम्पर्चनकौटिल्यप्रतिष्टम्भविलेखनेषु । सम्पर्चनं मिश्रता । प्रतिष्ट. म्भो रोधनम् । विलेखनं कर्षणम् । सङ्कोचति । सङ्कुच्यते । अकोचीत् ।अको- चि, अकोचिषाताम् । चुकोच। चुकुचे। कुच्यात्। कोचिषीष्ट । कोचिता। कोचि- प्यति। चुकुचिषति, चुकोचिषति । चोकुच्यते । चोकोक्ति। चोकु ३ चीति, क्तः, चति । सङ्कोचयति। अचूकुचत् । सङ्कोचन्। सङ्कुच्यमानम् । सङ्कुचितः, २ वान्। कुचित्वा, कोचित्वा । सङ्कुच्य । कोचि २ ता, तुम् ॥२९२॥ पत्ल, पथे गतौ । पतति । "नेचीदा-"॥२।३१७९॥ इति णत्वे, प्रणि- पतति। प्र, उद्,आ, नि, अनु पूर्वोपि वाच्यः। पत्यते। प्रण्यपतत्। अटो धात्वा- दित्वान्न व्यवधानम् । लदित्त्वादङि, "श्वयत्य-"॥४।३।१०३ ॥ इति पप्तादेशे, अपप्त ३ त्, ताम्, न् । अपाति, अपतिषाताम् । पपात, पेततुः, पेतुः, पेतिथ, पेतथुः। पेते, पेताते, पेतिरे, पेतिषे । पत्यात् । पतिषीष्ट । पतिता २ । पतिष्यति, ते।अपतिष्यत्, त। "इवृध-"||४|४|४७॥ इति वेटि, पिपतिषति । पक्षे "रभलभ-" ४२२१॥ इति : पित्सति । “धश-"॥४१॥५०॥ इति नीः पनीपत्यते । पनीप ४ तीति, लि, चः, तति । अघ• ॥ लवनुबन्धात्प्राप्तस्य अमे, यङ्लुप्यप्राप्तः, भ्वादिगणः । - अपनीपतीत्। पातयति । अपीपतत् । णिगन्ताणिगि, पातयत्यानं चैत्रेण । पतन्। पतिष्यन् । पत्यमानम् । पतिष्यमाणम् । पेतिवान् । पेतानम् । पति ३ ता, त्वा, तुम् । उत्पत्य, “वेटोऽपतः॥४४१६२॥ इति पतो वर्जनात् इट् , पतितः,२ वान्। पथे धातुस्त्यक्तः ॥ २९३ ।। मथे विलोडने । मथति । मथ्यते। एदित्वात् "नश्चि-"॥४॥३॥४९॥ इति न वृद्धिः, अमीत्, अमथिष्टाम्। अमाथि, अमाथिषाताम् । ममाथ, मेथतुः, मेथुः, मेथिथ । मेथे । मथ्यात् । मथि ३ षीष्ट, ता, ष्यति । मिमथिषति । मामथ्यते । माम ३ थीति, ति, त्तः, इत्यादि सर्व पचिवत् । यतोऽद्यतन्यां एदितां यङ्- लुपि, “ नाश्वि- "॥४॥३॥४९॥ इति न वृद्धिप्रतिषेधः, अमामाथीत् , अमाम- थीत्, इति स्यात् । प्रमाथयति । प्रामीमथत् । मथन् । मथिष्यन् । मथ्यमा- नम् । मथिष्यमाणम् । मेथिवान् । मेथानम् । मथि ५ ता, त्वा, तुम्, तः, २ वान् ॥ २९४ ॥ अथानिटौ द्वौ॥ षद्लं विशरणगत्यवसादनेषु । विशरणं शटनम् । अवसा. दोऽनुत्साहः । "श्रौति-"॥४।२।१०८॥ इति सीदः, सीदति;प्रसीदति; उत्सीदति। "सदोऽप्रतेः॥२।३।४४॥ इति द्वित्वेऽपि अट्यपि षत्वे; निषीदति; विषीदति । प्रतेस्तु न षः, प्रतिसीदति । क्ये, सद्यते । न्यषीदत्; व्यषीदत् । लदित्त्वादङि, आसद ३ त्, ताम्, न् । आसादि, आसत्साताम् । ससाद । परोक्षायां त्वादेव पः; निषसाद; विषसाद । आससाद, सेदतुः, सेदुः, सेंदिथ, ससत्थ । सेदे, सेदाते, सेदिरे, सेदिषे। सद्यात् । निषत्सीष्ट। निषत्ता २। विषत्स्यति, ते। "नाम्य- न्तस्था-"॥२।३।१५॥ इति षे, सिषत्सति; निषिषत्सति; विषिषत्सति, प्रतिसिषत्सति, उपविविक्षतीत्यर्थः । “गृलुप-"॥३॥१२॥ इति गर्थे यङि, सासद्यते; निषाष- यते । सादयति; निषादयति। असीषदत् ;न्यषीषदत् ; व्यषीषदत्; प्रत्यसीषदत्, अत्राद्यस्य सस्य न षत्वम् , द्वितीयस्य तु "नाम्यन्तस्था-"॥२॥३॥१५॥ इति षत्वम्। विषीदन् । विषीदन्ती। विषत्स्यन् । विषयमानम्। विषत्स्यमानम् । निषेदिवान् ; आसेदिवान् ; अस्य बहुलाधिकारात्कानो न स्यात् । सन्नः, २ वान् । निषण्णः, २ वान् । सत्त्वा। निषध । सत्ता । सत्तुम् । आसत्तव्यम् । षद्लंत अवसा.

१२८. क्रियारक्षसमुच्चयः। दने इत्यस्य तु शतरि अयं विशेषः; सीदती, सीदन्ती स्त्री कुले वा । शेष तुल्यम् ॥ २९५ ॥ शद्लं शातने । तनूकरणे । “शदेः शिति "॥३॥३॥४१॥ इत्यात्मनेपदे, "श्रौति-"॥४।२।१०८॥ इति शीयः, शीयते, शीयते । क्ये, शद्यते । शीयेत । शीयताम् । अशीयत । शितोऽन्यत्र परस्मैपदे, लूदित्त्वादङि, अशदत् । अशादि, अशत्साताम् । शशाद, शेदतुः । शेदे । शद्यात् । शत्सीष्ट। शत्ता २। शत्स्यति, ते । शिशत्सति । “शदेः शिति" ॥३३॥४१॥ इत्यात्मनेपदं शिन्निमित्तं, नतु धातुनिमित्तम्, तेनात्र “प्राग्वत्।।३।३।७४॥ इत्यात्मनेपदं न भवति । एवं मुमू- पतीत्यादावपि ज्ञेयम् । शाशद्यते । णौ “शदिरगतौ शात्"।४।२।२३॥ पुष्पाणि शातयति । गतौ तु गाः शादयति । शीयमानः । शद्यमानम् । शन्नः । शत्त्वा । शत्ता ॥ २९६ ॥ बुध अवगमने। ज्ञापने । प्रतिबोधति । बुध्यते। अबोधीत्, अबोधिष्टाम्, अबोधिषुः। अबोधि, अबोधिषाताम्। बुबोध, बुबुधतुः। बोधिता २।अनुस्वारेदय- मित्येके तन्मते, अभौत्सीत् । बोडा। बुबुधिषति, बुबोधिषति । बोत्रुध्यते । लुपि, बुधिंवत् । जौ “गतिबोध ॥२।२।५॥ इत्यणिकर्तुः कर्मत्वे, बोधयति शिष्य धर्मम् । बुधित्वा, बोधित्वा ॥ २९७ ॥ टुवमू उद्गरणे । भुक्तस्यो गतौ । वमति; उद्दमति । वमेत । वमतु । अवमत् । वम्यते । “नश्वि-"॥४।३।४९॥ इति न वृद्धिः; अवमीत, अव २ मिष्टाम, षुः । “मोऽकमि ॥४।३।५५॥ इति अनिषेधावृद्धिः, अवामि, अवमि- पाताम् । ववाम, "न शम-"||४।१।३०॥ इत्यप्राप्तावपि, “भ्रम-"।४।१।२६।। इति वा एः; वेमतुः ववमतुः, वेमुः, ववमुः, वेमिथ, ववमिथ । वेमे, ववमे । वम्यात् । वमिषीष्ट । वमिता २ । वमिष्यति, ते । अवमिष्यत्, त। विवमिषति। "तो मुमो-"॥१॥३१॥ इति स्वोऽनुनासिकः, ववम्यते । अनुस्वारेतु, वंवम्यते । वंवमीति, वंवन्ति, वंवान्तः, वंवमति, वंवमीषि, वंसि, वंवान्थः, वंवान्थ, वंव ४ मीमि, न्मि; न्वः, न्मः, “ मो नो- "॥२१॥६७॥ इति नः ॥ अद्य० ॥ " नश्वि-."॥४॥३॥४९॥ इति यङ्लुप्यपि वृद्धिनिषेधात, अवंवमीत् । णौ, भ्वादिगणः। " अमोऽकमि-"||२।२६॥ इति इखे, उदमयति । उदवीवमत् । भिणम्परे तु वा दीर्घः; उदवामि, उदवमि । अवामि, अवमि । वामं २, वमं २ । "ज्वलहल."॥४।२।३२॥ इत्यनुपसर्गस्य वा इखे, वमयति, वामयति । अवी- वमत् ; “ज्वलह्वल-"॥४॥२॥३२॥ इत्यनेन वा इख एव विधीयते, न पुनर्भिण- म्परे वा दीर्घः, अतः स प्रागुदाहारि। वमन् । वमिष्यन् ।वम्यमानम्। वमिष्य- माणम् । ववन्वान् । वेमिवान् । वेमानम् । ववमानम् । वमि २ ता, तुम् । ऊदित्त्वात् क्वि वेट, वान्त्वा, वमित्ला । वेट्लादप्राप्तौ, "श्वसजप-"|४|४७५॥ इति वेटि; वान्तः, २ वान् ; वमितः, २ वान् ॥ २९८ ॥ भ्रमू चलने । भ्रमति । “भ्रासम्लास-"॥३।४।७३॥ इति वा श्ये, भ्रम्यति । क्ये, भ्रम्यते । “न श्वि"॥४।३।४९॥ इति न वृद्धिः, अभ्रमीत्, अभ्रमिष्टाम् । "मोऽकमि-"॥४॥३॥५५॥ इति न वृद्धिः; अभ्रमि, अभ्रमिषाताम् । बभ्राम । शेषं सर्व भ्रमूच्चत् । शतरि तु; भ्रमन् , भ्रम्यन् ॥ २९९ ॥ क्षर सञ्चलने । सकर्माऽकर्मा चायम् । क्षरति गौः; पयो मुञ्चतीत्यर्थः । क्षरति जलं; स्त्रवतीत्यर्थः। क्षर्यते । “वद-"॥४॥३॥४८॥ इति वृद्धौ; अक्षारीत्, अक्षारिष्टाम् । अक्षारि, अक्षरिषाताम् । चक्षार; चक्षरिम। चक्षरे । क्षर्यात् । क्षरि- षीष्ट । क्षरिता २ । क्षरिष्यति, ते । चिक्षरिषति । चाक्षर्यते । क्षारयति । अचि. क्षरत् । क्षरि ५ ता, वा, तुम्, तः २, वान् ॥ ३०० ॥ चल कम्पने। चलति। चल्यते । “वदव्रज-॥४॥३॥४८॥ इति वृद्धौ; अचा- लीत्, अचालिष्टाम् । अचालि, अचलिषाताम्। चचाल, चलतुः; चेलिम। चेले। चल्यात् । चलिषीष्ट। चलिता २ । चलिष्यति, ते । चिचलिषति । यलवानां वा- ऽनुनासिकवे मुरन्तोऽपि वा; चञ्चल्यते, चाचल्यते । कम्पने घटादिलाण णौ इखे, “चल्याहार-"३३३१०८॥ इति फलवत्यपि परस्मैपदे च; चलयति शाखाम् । अन्यत्र, चालयति सूत्रं सार्थ वा । चल्यते, चाल्यते । अचीचलत् । चलन् । चलिष्यन् । चेलिवान् । चेलानम् । चलि ५ ता, त्वा, तुम् , तः, २ वान् ॥३०॥ शल गतौ । तालव्यादिः। शलति; उच्छलति । उच्छल्यते । “वदव्रज-"। ३॥४८॥ इति वृद्धौ, उदशालीत् । शशाल, शेलतुः। शलिता । शलिष्यति ।

क्रियारत्नसमुच्चयः। उच्छिशलिषति । उच्छालयति । उदशीशलत् । शलन् । उच्छलि ३तः, तुम्, ता। उच्छल्य । शलि चलने च; चात्संवरणे । शलते ॥ ३०२॥ अशं आह्वानरोदनयोः । अनिट् । आक्रोशति। आक्रुश्यते । “हशिट-॥ ३।४।५५॥ इति सकि, अक्रुक्ष ३ त् , ताम् , न् । अक्रोशि । “खरेऽतः" । ४१३७५॥ इति सकोऽल्लुकि; अक्रुक्षाताम् , अक्रु ७ क्षन्त०, क्षध्वम्, क्षाम. हि । चुक्रोश, चुक्रुशतुः; चुक्रोशिथ; चुकुशिम । चुक्रुशे । क्रुश्यात् । क्रुक्षीष्ट । क्रोष्टा २ । क्रोक्ष्यति, ते । चुक्रुक्षति । चोक्रुश्यते । चोक्रुशीति, चोक्रोष्टि, चोक्रुष्टः, चोक्रुशति । हौ, चोकुड्ढि ॥ ह्य० ॥ अचोक्रोट, ड्, अचोक्रु ३ शीत्, टाम्, शुः, अचोक्रोट, ड्, अचोक्रु ६ शीः, ष्टम्, ष्ट, शम्, श्व, श्म । आक्रोश- यति । आचुक्रुशत् । आक्रोशन् । क्रुश्यमानम् , क्रोक्ष्यमाणम् । आक्रुष्टः, २ वान् । क्रुष्टिः । क्रुष्ट्वा । आक्रुश्य । आक्रो २ टा, ष्टुम् ॥ ३०३ ॥ कस गतौ । विकसति । कस्यते । अकासीत्; अकसीत्, अकासिष्टाम् , अकसिष्टाम् । अकासि, अकसिषाताम् । चकास, चकसतुः । चकसे। कस्यात् । कसिषीष्टं । कसिता २ । विचिकसिषति । “वश्च-"॥४।१।५०॥ इति नीः; चनी- कस्यते । चनीकसीति । णौ, निष्कासयति। निरचीकसत्। कसि ५ ता, ला, तुम्, तः, २ वान्। विकस्य ॥ ३०४ ॥ अथ द्वावनिटौ । रुहं जन्मनि । बीजजन्मनीत्यन्ये । रोहति।अकर्मकाअ- प्युपसर्गसम्बन्धात्सकर्मका भवन्ति । वृक्षमारोहति । सं, प्र, अधि, अव, अभि पूर्वोऽप्येवम् । क्ये, रुह्यते । सकि, अरुक्ष २ त्, ताम् । अरोहि, अरुक्षाताम्, अरुक्षन्त । रुरोह, रुरुहतुः; रुरोहिथ; रुरुहिम । रुरुहे । रुह्यात् । रुक्षीष्ट । रोढा २। रोक्ष्यति, ते । अरोक्ष्यत् , त । रुरुक्षति। रोरुह्यते । रोरोढि, रोरुहीति, रोरूढः, रोरुहति, रोरोक्षि, रोरुहीषि, रोरूढः, रोरूढ, गेरुहीमि, रोरोह्मि, रोरु २ हः, मः॥ ह्यस्त०॥ अरोरुहीत, अरोरोट, ड्, अरोरूढाम् , अरोरुहुः, अरोरुहीः, अरोरोट, ड्। रोहयति, ते; रोपयति, ते वा वृक्षान् ।आरोहयति, ते; आरोपयति, ते वा शकटे भारम् । “रुहः पः॥१२॥१४॥ इति वा पः। अरूरुहत्, त; अरूरु- पत्, त । कर्मकतरि, 'अणिकर्म-"॥३।३।८८॥ इत्यात्मनेपदे, आरोहयते । थे, न्वादिगणः। १३१ आरुरुहत । इटि, आरोहयिष्यते; ब्रिटि, आरोहिष्यते वा हस्ती खयमेव; एषु ण्यन्तात् “णिस्नु" ॥३।४।९२॥ इति जिचो “भूषार्थ-"॥३।४।९३॥ इति क्यस्य च निषेधात् जिट् आत्मने च भवतः; आरोहन् । आरोक्ष्यन् । रुह्यमाणम्। रोक्ष्य. माणम् । रुरुह्वान् । रुरुहाणम्। रूढः, २ वान् । रूढिः। रूढ़ा। आरुह्य । रोढा। रोदुम् । रोढव्यम् । रोहणीयम् ॥ ३०५ ॥ रमिं क्रीडायाम् । रमते। “व्यापरे रमः॥३।३।१०५॥ इति परस्मैपदे, विर- मति; आरमति; परिरमति । “वोपात्"।३।३।१०६॥ उपरमति, उपरमते वा सन्तापः। मैत्रं उपरमति, ते वा । अन्तर्भूतण्यर्थोऽयं सकर्मकः। रम्यते । “यमिरमि-"||४|| ८६॥ इतीटि सेऽन्ते च; व्यरं ९ सीत्, सिष्टाम् , सिषुः,सीः, सिष्टम् , सिष्ट, सिषम्, सिष्व, सिष्म । अरंस्त, अरंसाताम्, अरंसत; अरंद्ध्वम्, अरंध्वम् । “मोऽकमि-" ॥४३॥५५॥ इति अनिषेधात् वृद्धिः; अरामि, अरंसाताम् । विरराम, विरेमतुः, विरेमुः, विरेमिथ, विररन्थ; विरेमिव । रेमे, रेमाते, रोमिरे, रमिषे । विरम्यात् । रंसीष्ट । विरन्ता; रन्ता। विरंस्यति; रंस्यते । व्यरंस्यत्; अरंस्यत । विरिरंसति; रिरंसते । रम्यते । रर, २ मीति, न्ति । “यमिरमि-॥४२॥५५॥ इति म्लुकि, रंरतः, रंरमति, ररंसि, रंर ७ मीषि, थः, थ, मीमि, न्मि, न्वः, न्मः । हौ, रंरहि ॥ अद्य० ॥ अग्रसीत् । रमयति । अरीरमत् । अरमि, अरामि, अरमयि. षाताम् । सनि, रिरमयिषति । विरमन् । विरंस्यन् । रममाणः । रंस्यमानः । रम्य- माणम् । रंस्यमानम् । रेमाणः। रतः, २ वान् । विरतिः। रत्वा; एषु “यमि-"। ४।२।५५॥ इति म्लुक् । ऊदिदयमित्येके; तन्मते; रत्वा, रमित्वा । “वामः"। ४।२।५७॥ इति वाम्लुकि; विरत्य, विरम्य । रन्ता। रन्तुम् । रन्तव्यम् ॥३०६॥ षहि मर्षणे। क्षमायाम् । सहते; उत्सहते; संसहते। सहेत। सहताम्। अस- हत। सह्यते। असहिष्ट, असहिषाताम् । ध्वमि, “हान्त-"॥२।१।८१॥ इति वा ढे; असहि ३ ध्वम्, वम्, ड्ढ्वम् । असाहि। सेहे, सेहाते, सेहिरे, सेहिष । सहि- षीष्ट । सोढा । सहिष्यते।असहिष्यत। “असोङ-"॥२।३।४८॥ इति षवे, परिषहते; विषहते; निषहते । “स्तुखाश्चाटि नवा "॥२॥३॥४९॥ पर्यषहत, पर्यसहत; व्यषहत, व्यसइत । न्यबहिष्ट, न्यसहिष्ट । षट्खपि असहिष्टेत्यर्थः । सनि पला.

कियारत्नसमुच्चयः। पन्ने, "णिस्तोरेव-"२३॥३७॥ इति नियमात्षवाभावे, सिसहिषते। सासयते । सासहीति । “साहिवहे:-"॥१॥३॥४३॥ इति लुक् ओच्च; सासो २ ढिः, ढः, सासहति, सासहीषि, सासक्षि, सासो २ ढः, ढ; सास ४ हीमि, मि, हः, मः ॥ अद्य० ॥ "न श्वि"॥४॥३॥४९॥ इति न वृद्धिः; असासहीत् । साहयति । "नाम्यन्तस्था-"॥२॥३॥१५॥ इति षवे, असीषहत्; पर्यसीषहत् । मा विषीसहः; अत्र "असोङ-"॥२॥४८॥ इति वर्जनात्पूर्वस्य न षः; उत्तरस्य तु, "नाम्य. न्त-"॥२३॥१५॥ इति स्यादेव । “णिस्तोरेव."॥२॥३॥३७॥ इत्यत्र ण्यन्तस्यापि सहे. वजनान्न षत्वम; उत्सिसाहयिषति । सहमानः । सामानम् । सेहानः । “दा- खत्साह्वद्-'॥४।१।१५॥ इति निपातनात्परस्मैपदे कसौ, साह्वान, साह्वांसौ । "सहलुभ-"॥४४॥४६॥ इटि तादावशिति वेटि; सोढा, सहिता । सोढा, सहित्वा । सोढुम्, सहितुम् । वेट्वात्, सोढः, २ वान् । “असोङ-"॥२॥३॥४८॥ इति सो वर्जनात्षवाभावे; परिसोढः; निसोढः । सोढव्यम्, सहितव्यम् । परिसो. ढव्यः; निसोढव्यः; विसोढव्यः । सह्यम् ॥ ३०७ ।। इति ज्वलादिः । , अथ यजादयो नव श्वि,वदवर्जा अनिटश्च यजी देवपूजासङ्गतिकरणदानेषु। यजति, ते। यजेत्, त । यजतु, ताम्। अयजत् , त। “यजादिवचेः-"॥४।११७९॥ इति वृति; इज्यते ।अयाक्षीत , अया. ष्टाम्, अयाक्षुः, अया ६ क्षीः, ष्टम् ,ट,क्षम् , क्ष्व, म । अयष्ट, अय ९क्षाताम्, क्षत, ष्ठाः, क्षाथाम् , ड्ठम्, ग्ड्ढ़म्, क्षि, वहि,क्ष्महि । अयाजि, अयक्षाताम्। “यजादिवश-"|४|११७२॥ इति द्विवे कृते पूर्वस्य य्वृति, इयाज; “यजादिवचेः-"। ११७९॥ इति वृति, पश्चात् द्विवे समानदीर्घवे च; ईजतुः, ईजुः, इयजिथ, इयष्ठ, ईजथुः, ईज, इयाज, इयज, ईजिव, ईजिम । ईजे, ईजाते, ईजिरे, ईजिषे, ईयाथे, ईजिध्वे, ईजे, ईजि २ वहे, महे । इज्यात् । यक्षीष्ट । यष्टा २ । ग्रक्ष्यति,.ते । अयक्ष्यत, त। यियक्षति, ते । यायज्यते । याय १२ जीति, म्वादिगणः । ष्टि, ष्टः, जति, जीषि, क्षि, ष्ठः, ष्ठ, जीमि, ज्मि, ज्वः, ज्मः। याजयति । अयी- यजत् । यजन् । यजमानः । यक्ष्यन् । यक्ष्यमाणः । इज्यमानम् । ईजिवान् । ईजानः । यष्टा । यष्टुम् । इष्टः, २ वान् । इष्ट्वा । यष्टव्यम् । यज्यम् । "त्यज्यज-"॥४।१।११८॥ इति गत्वाभावे; याज्यम् ॥ ३०८ ॥ वेंग् तन्तुसन्ताने । वयति, ते । वयेत् , त । वयतु, ताम् । अवयत् , त । क्ये, य्वृति “दीर्घश्च्वि-॥४।३।१०८॥ इति दीर्धे; ऊयते । “यमिरमि- ॥४१४१८६॥ इति सेऽन्ते, अवासीत् , अवा ८ सिष्टाम्, सिषुः, सीः सिष्टम्, सिष्ट, सिषम् , सिष्व, सिष्म । अवा १० स्त, साताम् , सत, स्थाः, साथाम् , ध्वम्, द्ध्वम्, सि, स्वहि, स्महि ॥ भाक ॥ अवायि, अवासाताम्; अवायि- पातामित्यादि । “वेर्वय् ||४|४|१९॥ इति वा वय् । पक्षे वे इति धातुरेव । वय् इत्यस्य; विति परोक्षायां; “यजादिवश्-||४।१।७२॥ इति पूर्वस्य य्वृति; उवाय । "न वयोय॥४।१।७३॥ इति यं निषिध्य, “यजादिवचेः-"॥४।१।७९॥ इति वस्य य्वृति, ततो द्वित्वे; ऊयतुः, ऊयुः । थवीव वयादेशस्य तृच्यभावात्; "सृजि-"॥४४७८॥ इत्यप्राप्तेः; "रक्रसृ-'४|४|८१॥ इति नित्यमिटि, उव- यिथ, उयथुः, ऊय, उवाय, उवय, ऊयिव, ऊयिम । ऊये, ऊयाते; ऊयिट्वे, ध्वे। वे इत्यस्य तु, “धेरयः ।।४।१७४॥ इति न वृत्। ववौ, ववतुः ववुः; "सृजि. दृशि-४४७८॥ इति वा नेटि, वविथ, ववाथ, ववथुः, वव, ववौ, वविध, वविम । ववे, ववाते, वविरे, वविषे । वे इत्यस्यैव च; "अविति वा "|४|११७५॥ इति वा य्वृति द्विवे, “वार्णात्प्राकृतं बलीयः” इति पूर्वमुवादेशे, समानदीर्घ च; ऊवतुः; अत्र “य्वृत्सकृत् ॥४।१।१०२॥ इति न्यायात्पश्चाद्वकारस्य न वृत्, ऊवुः, ऊवथुः, ऊब, ऊविव, ऊविम । ऊवे, ऊवाते इत्यादि । ऊयात् । वासीष्ट; वायिषीष्ट । वाता २; वायिता। वास्यति, ते; वायिष्यते । अवास्यत्, त; अवायिष्यत । विवासति । वावायते । वावेति, वावाति, वावीतः, वावति । णौ, “पाशाच्छा-२०॥ इति ये; वाययति । अवीवयत् । वाययिष्यति । वयन् । वयमानः। वास्यन् । वास्यमानः । ऊयमानम् । ऊयिवान् । वविवाम् । अविवान् । उयानः । बवानः । ऊवानः । ऊतः, २ वान् । “वीर्घमवो-"।

क्रियारत्नसमुच्चयः। १११०३॥ इत्यत्र वा वर्जनान्न दीर्घः; उला। “ज्यश्च यपि"18१७६॥ न वृत्, प्रवाय; उपवाय । वाता । वातुम् । वेयम् ॥ ३०९ ॥ व्यग् संवरणे । आच्छादने । संव्ययति, ते । “यजादिवचे:-"४११७९॥ इति वृति, दीर्घ च; संवीयते । समव्यासीत्, समव्यासिष्टाम् , समव्यासिषुः । समव्यास्त, समव्यासाताम् । समव्यायि, समव्यासाताम् ; समव्यायिषाताम् । "व्यस्थव्णवि"॥४॥२॥३॥ इति न आः। द्विवे, “यजादिवश-"॥४१॥७२॥ इति वृद्वाधनार्थ “जाव्ये-"||१७१॥ इति इकारस्यापि इः; अयादेशे उपान्त्यवृ. द्विश्व; संविव्याय । “यजादिवः ॥४।१।७९॥ इति य्वृति, “योऽनेकखरस्य"। २।१।५६॥ इति यत्वे च; संविव्यतुः, संविव्युः । “ऋवृ-"॥४४८०॥ इतीटि; संविव्ययिथ, संविव्यथुः, संवि ५ व्य, व्याय, व्यय, व्यिव, व्यिम । संविव्ये, संविव्याते; संविव्यिषे । संवीयात् । व्यासीष्ट; व्यायिषीष्ट । व्याता २; व्यायि- ता। व्यास्यति, ते; व्यायिष्यते । अव्यास्यत्, त; अव्यायिष्यत । सम्विव्या- सति । "व्येस्यमो-"॥४२११८५॥ इति वृति; सम्वेवीयते । सम्वेवयीति, सम्वे ३ वेति, वीतः, व्यति। "पाशा-"॥४।२।२०॥ इति ये, सम्व्याययति। समविव्ययत्। सम्व्ययन् । व्यास्यन् । सम्व्ययमानः । व्यास्यमानः। सम्वीयमानम् । सम्विवी- वान् । सम्विव्यानः। वीतः, २ वान् । वीवा। " व्यः” ॥४।१।७७॥ इति न य्वृत्, उपव्याय । “सम्परेर्वा"॥४।११७८॥ सम्व्याय; सम्बीय । सम्व्या ४ ता, तुम्, तव्यम्, नीयम् । सम्व्येयम् ॥ ३१ ॥ हेंग् स्पर्द्धाशब्दयोः। आह्वयति, ते । “हः स्पर्द्ध"॥३३॥५६॥ इत्यात्मनेपदे, मल्लो मल्लमाह्वयते। “सन्निवेः ॥३।३।५७॥ संह्वयते; निह्वयते; विह्वयते । “उपात्" ॥३।३।५८॥ उपह्वयते । क्ये, “यजादिवचेः-"|४|११७९॥ इति वृति, आहूयते । "हालिप्-"॥३।४।६२॥ इत्यङि, आह्न ३ त्, ताम्, न् । “ वाऽत्मने "॥३।४।६३॥ आह्वत । आह्वास्त । आह्वायि, आह्वासाताम्, आह्वायिषाताम् ॥ "द्वित्वे हः” ॥४।१८७॥ इति वृति; जुहाव, जुहुवतुः, जुहुवुः । “सृजिशि-"rel७८॥ इति वा नेटि, जुहोथ, जुहविथ, जुहुवथुः, जुहुव, जुहाव, जुहव, जुहु- विव, जुहुविम । जुहुवे, जुहुवाते. । आहूयात् । हासीष्ट; हायिषीष्ट ।

भ्वादिगणः। १३५ हाता २; हायिता । हास्यति, ते; हायिष्यते । आह्वास्यत्, त; आह्नायिष्यत । जुहूषति, ते । जोहूयते। आजो १२ हवीति, होति, हूतः, हुवति, हवीषि, होषि, इथः, इथ, हवीमि, होमि, हूवः, हूमः ॥ ह्य० ॥ आजो ६ होत् , हवीत् , हूताम् , हवु:, होः, हवीः ॥ अद्य० ॥ “हालिप्-"॥३।४।६२॥ इत्यत्र प्रकृतिग्रहणादङि, आजोहुवत् ॥ परोक्षा ॥ आजोहवाञ्चकारेत्यादि । “पाशा-॥४।२।२०॥ इति ये, आह्वाययति । क्ये, आह्वाय्यते । “णौ ङसनि॥४।११८८॥ इति णिविषयेऽपि स्वृति, “भ्राजभास-"M२॥३६॥ इति वा इखे; आजुहावत् , आजूहवत् । आह्वाय्य । आजुहावयिषति । आह्वयन् । आह्वास्यन् । आह्वयमानः । हास्य- मानः। आहूयमानम्। आह्वास्यमानम् । जुहूवान् । जुहुवानः। आहूतः, २ वान् । आहूतिः । हूला। आहूय । आह्वा ४ ता, तुम्, नीयम्, तव्यम् । आवे. यम् ॥ ३११ ॥ टुवपी बीजसन्ताने । बीजानां क्षेत्रे विस्तारणे । वपति, ते । “ नेादा-" ॥२॥३॥७९॥ इति णवे, प्रणिवपते । वपेत्, त । वपतु, ताम् । अवपत्, त । “यजादिवचेः-४।१९७९॥ इति वृति; उप्यते । उप्येत । उप्यताम् । औप्यत । "व्यञ्जनानामनिटि"।।४।३।४५॥ इति वृद्धौ, अवाप्सीत्, अवा ८ ताम् , प्सुः, प्सीः, प्तम्, प्त, प्सम्, प्व, स्म । अवप्त, अव ९ प्साताम्, प्सत, प्थाः, प्साथाम् , ब्ध्वम्, ब्द्ध्वम्, प्सि.। अवापि, अवसाताम् । “यजादिवश्-"॥४१॥७२॥ इति स्वृति, उवाप । " यजादिवचेः-"।४।१।७९॥ इति य्वृति पश्चावित्वे च; ऊपतुः, ऊपुः, उवपिथ, उवप्थ, ऊपथुः, ऊप, उवाप, उवप, ऊपिव, ऊपिम । ऊपे, ऊपाते, ऊपिरे, ऊपिथे । उप्यात्। वप्सीष्ट । वप्ता २ । वप्स्यति, ते। अवप्स्यत्, त। विव- प्सति, ते । वावप्यते । वाव १२ पीति, प्ति. ॥ वापयति । अवीवपत् । विवा- पयिषति । वपन् । वप्स्यन् । वपमानः। वपस्यमानः । उप्यमानम् । ऊपिवान् । ऊपानः । उप्तः, २ वान् । उप्तिः । उप्त्वा । वप्ता । वप्तुम् । वप्तव्यम् । वाप्यम् ॥ ३१२॥ वहीं प्रापणे । भारं वहति, ते। सकर्मापि धातुरर्थान्तरे वर्तनादकर्मा भवति । यथाऽत्र नदी वहति, स्रवतीत्यर्थः । एवमन्यत्रापि । उदहति, ते।

क्रियारनसमुच्चयः । .. , निः, प्र, परि, सम्, आङ्, पूर्वोऽपि वाच्यः । “ने दा-"॥२॥३१७९॥ इति णिः, प्रणिवहति । “प्रादहः॥३।३।१०३॥ “परेमषश्चं"।३।३।१०४॥ इति फलवत्यपि परस्मैपदे प्रवहति, परिवहति । उह्यते । वहेत्, त । उह्येत । वहतु, ताम् । उह्यताम् । अवहत्, त । औह्यत । अवाक्षीत् । पूर्व वृद्धौ, एकदेशेति न्याया- इहेरोले; अवोढाम, अवाक्षुः, अवाक्षीः, अवोढम् , अवोढ, अवा ३ क्षम्, क्ष्व, क्ष्म । अबोढ, अवक्षाताम्, अवक्षत, अवोढाः, अवक्षाथाम्, अवोट्दम् । अत्र "सोधि-"॥४॥३॥७२॥ इति वा सिच्लुकि, “हो धुट्-"।२।१८२॥ इति हो ढे; "तवर्गस्य ॥१॥३६०॥ इति धो ढे; “सहिवहे:-।१।३।४३॥ इति दलुक् ओञ्च । पक्षे सिजलुकि, “हो-"॥२॥११८२॥ इति ढे, “षढोः-"॥२।११६२॥ इति के, "नाम्यन्त-"॥२॥३॥१५॥ इति थे, "तृतीयस्तृ.॥१३॥४९॥ इति डे, गे च; "तवर्ग-'॥१॥३६०॥ इति धो ढे च; अवग्ड्ड्वम् ; अव ३ क्षि, वहि, क्ष्महि । अवाहि, अवक्षाताम् ॥ वपींवत् स्वृति । उवाह, ऊहतुः, ऊहुः, "सृजि-"|४|४७८॥ इति वेटि, उवहिथ, उवोढ, ऊहथुः, ऊह, उवाह, उवह, ऊहिव, ऊहिम । उहे, ऊहाते, अहिरे, ऊहिषे; उहि २. ध्वे, द्वे । उह्यात् । वक्षीष्ट । वोढा, २ । वक्ष्यति, ते । अवक्ष्यत्, त । विवक्षति, ते । वावह्यते । वावहीति, वावोढि, वावोढः, वावहति, वाव २ क्षि, हीषि, वावो २ ढः, ढ, वाव ४ मि, हीमि, ह्वः, मः। “यजादि-"॥४११७९॥ इति गणनिर्देशान्न रवृति, क्ये, वावह्यते । वावह्यात् । वावो २ दु, ढाम्; वावहतु, वावोढि । अवाव ३ ट्, ड्, हीत् ॥ अद्य० ॥ “न श्वि-"॥४॥३॥४५॥ इति न वृद्धौ, अवावहीत् । शेषं पचिवत् । वाहयति वाहम् । अवीवहत् । वहन् । वक्ष्यन् । वहमानः । वक्ष्यमाणः । उह्यमानम् । ऊहिवान् । ऊहानः । ऊढः, २ वान् । ऊढिः । ऊढ़ा । समुह्य । वोढा । वोढुम् । वोढव्यम् । वह्यम् । वाह्यम् ।। ३१३ ॥ ट्वोश्वि गतिवृयोः। श्वयति । श्वयेत् । श्वयतु । अश्वयत् । क्ये, “यजादि. वचेः॥४।१।७९॥ इति वृति, शूयते । शूयेत । शृयताम् । अश्रूयत ॥ अद्य०॥ अङसियोऽत्र भवन्ति । “ऋदिक्वि-॥३॥६५॥ इति वा अङि, "श्वयत्यसू-"।

भ्वादिगणः।
"
"
४।३।१०३॥ इति श्वादेशे; अश्वत्, अश्व २ ताम्, न, अश्वः, अश्व २ तम्, त, अश्वम्,
अश्वा २ व, म । ट्रेश्वेर्वा " ॥३४५९॥ इति वा ढे, अशिश्वि ९ यत्,
यताम् , यन्, यः, यतम् , यत, यम्, याव, याम । पक्षे सिचि, “ न श्वि-"॥
४।३।४९॥ इति वृद्धिनिषेधाद्गुणे; अश्वयीत्, अश्व ८ यिष्टाम् , यिषुः, यीः, यिष्टम्,
यिष्ट, यिषम् , यिष्व, यिष्म ॥ भाक ॥ अश्वायि । ब्रिटिटोः, अश्वायिषाताम्,
अश्वयिषातामित्यादि। वा परोक्षायङि ॥१९०॥ इति वा स्वृति; शुशाव,
शिश्वाय, शुशुवतुः, शिश्वियतुः, शुशुवुः, शिश्वियुः, शुशविथ, शिश्वयिथ;
शुशुविम, शिश्वियिम । शुशुवे, शिश्विये । शूयात् । श्वयिषीष्ट; श्वाथिषीष्ट ।
श्वयिता २; श्वायिता । श्वयिष्यति, ते; श्वायिष्यते । शिश्वयिषति । शोशूयते,
शेश्वीयते । लुपि, शोशवीति, शोशोति; शेश्वयीति, शेश्वेति । “दीर्घमवो-"।
४।१।१०३॥ इति दीर्घे, शोशूतः, शेश्वितः। शोशुवति, शेश्वियति। अग्रतस्तु य्वृति
दीर्घ शूरूपं श्विरूपश्च यङ्लुबन्तभूजिस्थानोक्तपूशिवद्वक्तव्ये । अद्यतन्यां तु,
"श्वयत्यसू-॥४।३।१०३॥ इत्यत्र तिनिर्देशाधङ्लुपि न श्वः। अङ्तु, “ऋदिच्छ्रि-"
॥३४॥६५॥ इत्यत्र प्रकृतिग्रहणाद्वा स्यादेव । अशोशुवत्, अश्वियत् । पक्षे "टे-
श्वेर्वा"॥३।४।५९॥ इति वा , अशोशुवत् ; अशेश्वियत् । तत्पक्षे सिचि, अशो-
शवीत् , अशेश्वयीत् ; अत्र "न श्वि-"॥४।३।४९॥ इति यङ्लुप्यपि न वृद्धिः। श्वाय-
यति । श्वाय्यते । णौ ङसन्परे; "श्वेर्वा"||४|१८९॥ इति वा य्वृति; अशूशवत्,
अत्र विषयविज्ञानात्प्राग य्वृति पश्चाद् वृद्धौ, आवादेशे उपान्त्यहवे णिकृतस्य
स्थानित्वेन शुद्वित्वे प्राग्दीर्घः । बृदभावे श्विद्वित्वे तु; अशिश्वयत् । शुशावयि-
षति; शिश्वावयिषति । श्वयन् । श्वयिष्यन् । शूयमानम् । श्वयिष्यमाणम् । शि-
श्विवान्, शुशूवान् । शिश्वियानम् , शुशुवानम् । ओदित्त्वात् “सूयत्यादि।
२१७०॥ इति नः; “डीयश्वि-"|४|४६१॥ इति नेट ; शूनः, २ वान् । शूतिः ।
"क्त्त्वा”॥४।३।२९॥ इति क्त्वा न कित् ; श्वयित्वा । प्रशूय । श्वयि ३ ता, तुम,
तव्यम् । श्वेयम् ॥ ३१४ ॥
वद व्यक्तायां वाचि। वदति । “दीप्तिज्ञान-"॥३३७८॥ इत्यात्मनेपदे; वदते
विद्वान् स्याहादे । वदन् ; दीप्यत इत्यर्थः । “व्यक्तवाचां सहोक्तौ "॥२॥३७९॥

१३८ क्रियारत्नसमुच्चयः। सम्प्रवदन्ते द्विजाः । “विवादे वा”।३।३।८०॥ विप्रवदन्ते, ति वा मौहूर्तिकाः । "अनोः कर्मण्यसति"॥३।३।८१॥ अनुवदते कठः कलापस्य । “वदोऽपात्"॥३३॥ ९७॥ फलवति; एकान्तमपवदते । अन्यत्र तु, अपवदति । “यजादिवचेः॥४॥ ११७९॥ इति वृति क्ये; उद्यते । वदेत् । उद्येत । वदतु । वदताम् । उद्यताम् ॥ ह्य० ॥ अवदत् । अवदत । औद्यत ॥ अद्य० ॥ “वदव्रज-"॥४॥३॥४८॥ इति वृद्धौ; अवादीत्, अवादिष्टाम् । आत्मने, अवदिष्ट । अवादि, अवदिषाताम्। अवदि २ ध्वम् , ड्ट्वम् , अवदिषि । उवाद, “कियाव्यतिहार-"॥३३॥२३॥ इति परस्मैपदे; व्यत्युवाद, ऊदतुः, ऊदुः; " स्कसू-"॥४।४।८१॥ इतीटि, उवदिथ; ऊदिम । ऊदे, ऊदाते, ऊदिरे, ऊदिखे। उद्यात् । वदिषीष्ट । वदिता। वदिष्यति, ते । अवदिष्यत् , त । विवदिषति । वावद्यते। वाव १२ दति, त्ति, त्तः, दति, दीषि, सि, स्थः, स्थ, दीमि, द्मि, द्वः, द्मः। णौ, "अणिगि प्राणि-" ॥३।३।१०७॥ इत्यप्राप्तेऽपि; “ परिमुह-" ॥३।३।९४॥ इत्यात्मनेपदे; वदति चैत्रः, वादयते चैत्रं मैत्रः; “गतिबोध-"॥२।२।५॥ इत्यणिकर्तुः कर्मलम् । फलवतो ऽन्यत्र तु परस्मै, वादयति चैत्रं मैत्रः। विसंवादयति।अवीवदत् । णिगन्ताणि- गि; वदति वीणा, तां परिवादकः प्रायुत, तमप्यन्यः अवीवदत् वीणां परिवा. दकेन । यद्यप्यत्र णो णेोपोऽभूत्तथाऽपि न समानलोपः; यतो णाविति जात्या एकवचनम् । ततश्च यः कश्चित् णिग् सर्वोऽपि निमित्ततयोपात्तः, अतः स लुप्तोऽपि निमित्त एव । एवमपीपठदित्यादावपि । विवादयिषति, ते । वदन। वदिष्यन् । सम्प्रवदमानः । उद्यमानम् । वदिष्यमाणम् । अदिवान् । उदा- नम् । उदितः, २ वान्। उदितिः। उदिवा | अनूद्य । वदि ३ ता, तुम्, तव्यम्। वाद्यम् ॥ ३१५ ॥ वसं निवासे । वसति; निवसति । “उपान्वध्यावसः"॥२।२।२१॥ इत्याधा- रस्य कर्मवे; ग्राममुपवसति । अनु, अधि, आङ् पूर्वोऽप्येवम् । एषूपादयो वासार्थः त्रिरात्रमुपवसति; अत्र भोजननिवृत्यर्थस्योपस्याधारस्त्रिरात्रं कर्म । क्ये वृति; “घखसः॥२।३।३६॥ इति षत्वे; उष्यते। “सस्तः सि"॥४।३।९२॥ इति तः; अवा- त्सीत्। विषयसप्तमीविज्ञानासिजुत्पत्तेः प्रागेव सस्य तले सिचो लुकि स्थानिवेन भ्वादिगणः। वृद्धौ च; अवात्ताम् । “धुड्ख ॥४॥३७०॥ इत्यत्र हि लुबधिकारे लुग्ग्रहणं सिज्- लुक्यपि स्थानिवेन तत्कार्यप्रतिपत्त्यर्थम् ; तेनात्र वृद्धिः सिजभावेऽपि सिद्धा । अवात्सुः, अवा ६ त्सीः, त्तम्, त्त, त्सम्, त्व, स्म । अवासि, अवत्सा- ताम्, अवत्सत, अवत्थाः, अवत्साथाम्, अवध्वम्, अवद्ध्वम्, अव ३ त्सि, त्वहि, त्महि । “यजादिवश्॥४।१।७२॥ इति पूर्वस्य रवृति; उवास, "यजादिवचेः-४।१७९॥ इति वृति, “घस्वसः॥२३॥३६॥ इति षत्वे; ऊपतुः, उषुः, “सृजिद्दशि-४४७८॥ इति वा नेटि; उवस्थ, उवसिथ; ऊषथुः, ऊष, उवास, उवस, ऊषिव, अषिम । ऊषे, उषाते; ऊषिध्वे । उष्यात् । वत्सीष्ट । वस्ता २ । वत्स्यति, ते । अवत्स्यत्, त । विवत्सति । वावस्यते । वाव ४ सीति, स्ति, स्तः, सति । वावसि ३ ला, तः, २ वान् । अत्र गणनिर्देशाद् “ यजादिवचेः- "॥४।११७९॥ इति न वृत् । यङ्लुपि क्त्वादी नास्येडित्यन्ये । वाव ३ स्वा, स्तः, २ वान् । णिगि, निवासयति; उहासयति; प्रवासयति । फलवति तु, “अणिगि प्राणि-"॥३।३।१०७॥ इति परस्मैपदप्राप्तावपि; "परिमुह-" ॥३॥३॥९४॥ इत्यात्मनेपदे, वासयते चैत्रं मैत्रः; "गतिबोध-" ॥२।२।५॥ इत्यणि- कर्तुः कर्मता । अवीवसत्, त । विवासयिषति, ते । वसन् । वत्स्यन् । उष्य. माणम् । वत्स्यमाणम् । “घसेक-"॥४।४।८२॥ इतीटि, अनूषिवान् गुरु शिष्यः। अध्यूषिवान् ; बहुलाधिकारात्कानोऽस्मान्न भवति। "क्षुधवस-|४|४|४३॥ इतीटि, उषितः, २ वान् । उषिला। उपोष्य । वस्ता । वस्तुम् । वास्यम् ॥३१६।। इति यजादिः । अथ घटादिः। घटिष् चेष्टायाम्। ईहायाम्। घटते । घटेत । घटताम् । अघटत। घट्यते। अघटिष्ट, अघटिषाताम् ॥ भाक ॥ अघाटि । जघटे, जघटाते, जघटिरे। घटि- ३ षीष्ट, ता, ष्यते। अघटिष्यत । जिघटिषते । जाघट्यते । जाघ ४ टीति, ट्टि, दृः, टति । णौ, “घटादेईख-"॥४।२।२४॥ इति हखे, घटयति । अजीघटत् ॥ भाक ॥ दीर्घस्तु वा निणम्परे त्रिचि; अघाटि, अघटि । त्रिटि, अघाटि- क्रियारत्नसमुच्चयः। षातां, अघटिषाताम् । इटि तु, अघटयिषाताम् । एवं घाटिष्यते, घटिष्यते; घटयिष्यते । घाटं घाटम्; घटं घटम् । घटादीनां पठितार्थेष्वेव घटादिकार्यविज्ञा- नम् । तेनार्थान्तरे तु, उद्घाटयति, प्रविघाटयति; उद्घाटितः कपाट इत्यादौ इखो न भवति । विघटयतीति तु, अजन्तस्यादन्तस्य वा; "णिज् बहुलं नाम्नः." ॥३४॥४२॥ इति करोत्यर्थे णिचि रूपम् । घटमानः । घटिष्यमाणः । घट्यमा- नम्। जघटानः। घटितम् । घटिला । विघट्य । घटि २ ता, तुम् । घाट्यम् ॥३१७॥ व्यथिष भयचलनयोः। दुःखेऽप्यन्ये । व्यथते। व्यथ्यते । अव्यथिष्ट, अव्य- थिषाताम् ॥ अव्याथि । “ज्याव्येव्यधि-"॥४।१।७१॥ इति पूर्वस्येवे; विव्यथे, विव्यथाते; विव्यथिषे । व्यथिषीष्ट । व्यथिता । व्यथिष्यते । अव्याथिष्यत । विव्यथिषते । वाव्यथ्यते । वाव्य २ थीति, त्ति । व्यथयति । अविव्यथत् । अव्याथि, अव्यथि । व्यथमानः । विव्यथानः । व्यथि ५ ता, वा, तुम्, तः, २ वान् ॥ ३१८॥ प्रथिष् प्रख्याने प्रसिद्धौ । प्रथते । प्रथ्यते । अप्रथिष्ट, अप्रथिषाताम् , अप्रथिषतः । अप्राथि । पप्रथे, पप्रथाते, पप्रथिरे, पप्रथिषे । प्रथि ३ षीष्ट, ता, ष्यते । अप्रथिष्यत । पिप्रथिषते । पाप्रथ्यते । णौ, प्रथयति । डे, "स्मृदृत्वर- ॥४॥१॥६५॥ इति पूर्वस्य अः, अपप्रथत् । अप्राथि, अप्रथि । प्राथम् २, प्रथम २। प्रथमानः । प्रथिष्यमाणः । प्रथ्यमानम् । पप्रथानः । प्रथितः, २ वान् । प्रथि ३ ता, खा, तुम् ॥ ३१९ ॥ ऋदुङ् वैक्लव्ये । विक्लवः कातरस्तस्य भावः कर्म वा वैक्लव्यम् । नेऽन्ते; आक्रन्दते । क्रन्धते । अक्रन्दिष्ट, अक्रन्दिषाताम् । अक्रन्दि । चक्रन्दे, चक्र- न्दाते । क्रन्दि ३ षीष्ट, ता, ष्यते। चिक्रन्दिषते। चाक्रन्द्यते । चाक ४ न्दीति, न्ति, न्त्तः, न्दति । क्रन्दयति । अचक्रन्दत् । ञिणम्परे तु वा दीर्घः; अक्रान्दि, अकन्दि । कान्दम् २; क्रन्दम् २ । ऋन्दि ४ ता, तुम्, त्वा, तः॥ ३२० ॥ जित्वरिष् सम्भ्रमे; सम्भ्रमोऽत्राशुकारिता। त्वरते। वरेत। त्वरताम् । अल- रत । त्वर्यते । अवरिष्ट, अत्वरिषाताम् । अत्वारि, अत्वरिषाताम् । तत्वरे, भ्वादिगणः । तत्वराते, तत्वरिरे, तत्वरिषे० । वरि ३ षीष्ट, ता, ष्यते । अलरिष्यत । तित्व- रिषते । तात्वर्यते। तात्वरीति; "मव्य-"॥४।१।१०९॥ इति वस्योपान्त्येन सहोटि, तातूर्ति, तातूर्तः, तात्वरति, तात्वरीषि, तातूर्षि, तातूर्थः, तातूर्थ, तात्वरीमि, तातूर्मि, वस्य वाऽनुनासिकत्वे; तातूर्वः, तात्वर्वः, तातूर्मः । णौ, त्वरयति । "स्मृदृत्वर-॥४॥१॥६५॥ इति पूर्वस्यात्वे, अतत्वरत्। अत्वारि, अत्वरि । त्वारम् २; त्वरम् २ । त्वरमाणः । त्वरिष्यमाणः । त्वर्यमाणम्। तत्वराणः । जीत्त्वात्, “ज्ञाने- च्छा-"॥५।२।९२॥ इति सतिक्ते, "श्वसजप-"||७५॥ इति वा नेटि, “रदा." ॥४।२।६९॥ इति तो नत्वे, “मव्यवि."॥४।१।१०९॥ इति सखरस्य वस्योटि च; तूर्णः, २ वान् । त्वरितः, २ वान् । त्वरि ३ त्वा, ता, तुम् ॥ ३२१ ॥ स्मं आध्याने; उत्कण्ठायाम् । स्मरति । णौ घटादित्वात् हूंखे, स्मरयति । आध्यानादन्यत्र, चित्तं स्मारयति; विस्मारयति । उक्तस्याप्याधाने घटादिकार्या- थमिह पाठः ॥ ३२२ ॥ भये । दरति । दीर्यते । णौ घटादित्वाद् हस्खे, दरयति बालम् । भया- दन्यत्र, काष्ठं दारयति । शेषं दृश् विदारणे इत्यस्येव ॥ ३२३ ॥ लगे सङ्गे । लगति; विलगति । लग्यते । एदित्वात् “न श्चि-४।३।४९॥ इति न वृद्धिः; अलगीत्, अलगिष्टाम् । अलागि । ललाग, लेगतुः । लेगे । लग्यात् । लगिषीष्ट । लगि, २ ता, ष्यति । लिलगिषति । लालग्यते । लुपि तु पचिवत् । णौ, लगयति । अलीलगत् । अलागि, अलगि। लागम् २; लगम् २। लगन् । लागष्यन् । विलेगिवान् । लेगानम् । "क्षुब्ध-"॥४४|७०॥ इति निपा. तनात्; लग्नः सक्तः । लगितोऽन्यः। लगि ३ ता, त्वा, तुम् ॥ ३२४ ॥ ष्ठगे, स्थगे संवरणे; आच्छादने । ठगे । स्थगति । स्थग्यते । एदित्त्वात् , "न श्चि"॥४॥३॥४९॥ इति न वृद्धिः; अस्थगीत्, अस्थगिष्टाम् । अस्थागि । तस्थाग, तस्थगतुः । तस्थगे। स्थग्यात् । स्थगिता । णौ, स्थगयति। षोपदेश- त्वात्षत्वे, अतिष्ठगत् । तिष्ठगयिषति । स्थगे । स्थगति । अस्थगीत् । तस्थाग । स्थगयति । षत्वाभावे, अतिस्थगत् । तिस्थगयिषति । यङ्तल्लुपोः पचि. वत् ॥ ३२५ ॥ ३२६ ॥ दृ १४२ क्रियारत्नसमुच्चयः। णट नतौ । नटति । णौ, नटयति शाखाम् । नृत्तौ तु, नाटयति ॥३२७॥ मदै हर्षग्लपनयोः । णौ, मदयति गुरुं शिष्यः; हर्षयतीत्यर्थः । विमदयति शत्रुम् ; ग्लपयतीत्यर्थः । अन्यत्र तून्मादयति; प्रमादयति । मदैच् हर्ष इत्ययमन- योरर्थयोर्घटादिकार्यार्थमिह पठितः ॥ ३२८ ॥ ध्वन शब्दे । णौ, ध्वनयति। शब्दादन्यत्र तु, ध्वानयति। शेषं प्रागपठि- तवत् ॥ ३२९ ॥ चल कम्पने । णौ, चलयति । कम्पादन्यत्र, चालयति । शेषं ज्वलादि- पठितचलवत् ॥ ३३० ॥ हल चलने । हलति । हलिता । णौ हखे; विह्वलयति ॥ ३३१ ॥ ज्वल दीप्तौ च; चाच्चलने । प्रज्वलयति; संज्वलयति । “ज्वलह्वल-"। ४।२।३२॥ इत्यनुपसर्गस्य वा हूखे; ज्वलयति, ज्वालयति । चलज्वलौ ज्वला- दौ पठितावप्येतौ घटादिकार्यार्थमिहाधीतौ । केचित्तु दलि, वलि, स्खलि, क्षपि, अपीणामपि घटादित्वमिच्छन्ति । तन्मते, दलयति; वलयति; स्खलयति; क्षप- यति; त्रपयतीत्यपि भवति ॥ ३३२ ॥ इति घटादयः। इति तपाचार्यश्रीदेवसुन्दरसूरिशिष्यश्रीगुणरत्नसूरिविरचिते क्रियारत्नसमुच्चये भ्वादिगणः । , अथादादिगणः। ॥ तत्रादौ १७ अनिटः । अदं, प्सांक् भक्षणे । “कर्त्तर्यनयः-"॥३४७१॥ इत्यदादिवर्जनाच्छवभावे; अत्ति, अत्तः, अदन्ति, अत्सि, अत्थः, अत्थ, अद्मि, अहः, अद्मः । “क्रियाव्यतिहार-॥३३॥२३॥ इत्यात्मनेपदे; व्यत्यत्ते, व्यत्यदाते ॥ भाक ॥ अद्यते, अद्यते। अद्यात् । व्यत्यदीत । क्ये, अद्येत । अत्तु, अत्ताम्, अदन्तु, अद्धि, अत्तम्, अत्त, अदानि । व्यत्यत्ताम् । क्ये, :

अदादिगणः ।
१४३
अद्यताम० ॥
“
अदश्वाट् ॥४॥४।९०॥ इति दिस्योरादिरट ; आदत्, आत्ताम्,
आदन, आदः आत्तम् । व्यत्यात्त । क्ये ॥ आद्यत० ॥ "घस्लसन्."॥४४॥१७॥
इति घस्लादेशे, लूदित्त्वादङि, अघस ३ त्, ताम्, न् । व्यत्यवत्त, व्यत्यघ.
साताम् ॥ भाक ॥ अघासि, अघत्साताम्, अघत्सत, अघत्थाः, अघत्साथाम्,
"सो धि"॥४।३।७२॥ इति वा सिच्लुकि, अघद्ध्वम् , अघद्ध्वम्, अघत्सि,
अघत्स्वहि, अघत्स्महि । परोक्षायां नवा”॥४।४।१८॥ घस्ल; जघास,
गमहन. "॥१२॥४४॥ इत्युपान्त्यलुकि, “ अघोषे- "॥१॥३॥५०॥ इति के
"नाम्यन्त-"॥२॥३॥१५॥ इति षत्वे, जक्षतुः, जक्षुः । थवीव घसादेशस्य तृव्य-
भावात् “सृजि-'॥४।४।७८॥ इत्यप्राप्तौ नित्यम् । स्क्रसृ-"॥४।४८१॥ इतीटि,
जघसिथ, जक्षथुः, जक्ष, जघास, जघस, जक्षिव, जक्षिम। जक्षे, जक्षाते.; जक्षि-
महे। पक्षे, आद, आदतुः, आदुः, "ऋवृ-"॥४।४।८०॥ इतोटि, आदिथ, आदथुः,
आद, आद, आदिव, आदिम । आदे, आदाते, आदिरे, आदिषे० । अद्यात् ।
अत्सीष्ट । अत्ता, २। अत्स्यति, ते । आत्स्यत्, त । जिघत्सति । णौ, “गति-
बोध-"॥२।२।५॥ इत्यत्र वर्जनादणिक्कर्तुः कर्मत्त्वाभावे; आदयते पिण्डी चैत्रेण,
अत्र “चल्याहार-"३।३।१०८॥ इति परस्मैपदप्राप्तावपि, “परिमुह-"३३३९४॥
इत्यात्मनेपदम् । क्ये, आद्यते । आदिदत् । अदन् । अदती । अत्स्यन् । अ-
त्स्यन्ती, अत्स्यती। अद्यमानम् । अत्स्यमानम् । जक्षिवान् । आदिवान् ।
जक्षाणम् । आदानम् । “यपि चादः॥४४॥१६॥ इति जग्धादेशे; जग्धः, २
वान् । “धुटो धुटि-"॥१३॥४८॥ इति ध्लुकि तु, जग्धः, २ वान् । जग्धिः।
जग्ध्वा । प्रजग्ध्य । एकपदाश्रयत्वेनान्तरङ्गत्वाद्यबादेशात् प्रागेव जग्धादेशे
सिद्धेऽपि, “यपि चाद-॥१६॥ इत्यत्र यग्रहणं तादौ क्वि यत्कार्य तद् यपि
न भवतीति ज्ञापनार्थम् । तेन प्रशम्य, पपृच्छय, प्रदीव्य, प्रखन्य, प्रस्थाय,
प्रपाय, प्रदाय, प्रधाय, प्रपठ्येत्यादौ, दीर्घत्वं शत्वमूत्वमालमित्वावं तूत्वं हित्व-
मिट च यपि न भवति । अनुबन्धकार्यन्तु भवत्येव । प्रतीर्य; अत्र कित्त्वाद्
इर् । अत्ता । अत्तुम् । अत्तव्यम् । आद्यम् । प्सा । प्साति। प्सायात्; प्से-
यात् । “संयोगादेवी-॥४।३।९५॥ इति एः । शेष ख्यांक्वत्॥ १ ॥२॥

कियारत्नसमुच्चयः। भाक् दीप्तौ । भाति; आभाति; विभाति; प्रतिभाति; भातः, भान्ति । व्यति ९ भाते, भाते, भाते, भासे, भाथे, भाध्वे, भे, भावहे, भामहे । क्ये, भायते । भायात् । व्यति २ भेत, भातु । व्यति ९ भाताम् , भाताम्, भाताम् , भाख० । अभात्, अभाताम् , अभान्। अभुः, अभाः । व्यत्य ९ भात, भाता, भात; भाथाः० । अभासीत् । अभासिष्टाम् । व्यत्यभा९ स्त, साताम् , सत०, ॥ भाक ॥ अभायि, अभासाताम् ; अभायिषाताम् । अभा २ ध्वम् , द्ध्वम् , अभायि ३ ध्वम्, ढ्वम् , ड्वम् । बभौ, बभतुः, बभुः, बभाथ, बभिथ; बभिम । बभे; बभिध्वे; बभिमहे । भायात् । भासीष्ट, भायिषीष्ट; भासीध्वम् ; भायि २ षीध्वम् , पीढ्वम् । भाता २; भायिता। भास्यति, ते; भायिष्यते । अभास्यत्, त; अभायिष्यत । बिभासति । बाभायते । बाभाति; बाभेति । भाप- यति । अबीभपत् । भा ३ ता, वा, तुम्। प्रतिभाय । भातः, २ वान् । भेयम्। भातव्यम् ॥ ३॥ यांक प्रापणे | याति; प्रयाति; उपयाति; प्रणियाति, यातः, यान्ति, यासि, याथः, याथ, यामि, यावः, यामः । क्ये, यायते । यायात् । यातु । अदुरुप- सर्ग-"।२।३७७॥ इति णत्वे, प्रयाणि। अयात् , अयातां । “वा द्विष."४।२।९१॥ इति वा पुसि; अयान, अयुः; अयाः । अयायत । “यमिरमि-"॥४॥४॥८६॥ इतीटि सेऽन्ते च; अयासीत्, अयासिष्टाम् , अयासिषुः । अयायि, अयासाताम् । ब्रिटि, अयायिषाताम् ; अयासत; अयायिषत; अया २ द्ध्वम् , ध्वम् ; अयायि ३ ध्वम्, ड्ढ्वम् , वम् । ययौ, ययतुः; "इडेत्-"॥४॥३९॥ इति आलुक्, ययुः; "सृजि-"४७८॥ इति वेटि; ययाथ, ययिथ, ययथुः, यय, थयौ, ययिव, "रक्रसृ-"॥४१४८१॥ इतीट्, ययिम । यये, ययाते, ययिरे, ययिषे, ययाथे, ययि ४ ध्वे, वे; वहे, महे । यायात् । यासीष्ट; यायिषीष्ट । याता २; या- यिता । यास्यति, ते; यायिष्यते । अयास्यत्, त; अयायिष्यत । यियासति । यायायते । यायेति, यायाति । यायन् । यायितः । शेषं मैंवत् । यापयति; "अत्तिरी -२१॥ इति पुः । याप्यते । अयीयपन, यान् । “अवर्णादनः-"॥ २।११११५॥ इति वाऽन्त; यान्ती, याती। यायमानम्। “स्वरात्"॥२॥३८५॥ इति " , , अदादिगणः। १४५ वजत्; णले, प्रयायमाणम् ; परियायमाणम् । यास्यन् । यास्यन्ती, यास्यती। यास्यमानम्। यायिष्यमाणम् । ययिवान् । ययुषी । ययानम्। यातः २, वान् । प्रयाय । या ३ वा, ता, तुम् । येयम् । प्रयाणीयम् । परियाणीयम् । आदादिका आदन्ता अनुस्वारेतः सर्वेऽपि यांकद्वक्तव्या विशेषवचनं विना ॥ ४ ॥ वांक् गतिगन्धनयोः। वाति; निर्वाति । अवासीत् । वबौ। वाता। यांक्- वत् ; परं णौ, “यो विधूनने-"॥४।२।१९॥ इति जे; पक्षकेणोपवाजयति। विधूनना- दन्यत्र, “अति-"॥४।२।२१॥ इति पौ; वापयति केशान् ; शोषयतीत्यर्थः । उ, अवी- अवीवपत्। “निर्वाणमवाते"॥४।२।७९॥ इति निपातनात्तो नः; निर्वाणो- भिक्षुः। निर्वाणो दीपः। वाते तु कर्त्तरि; निर्वातो वातः। निर्वातं वातेन ॥५॥ ष्णांक शौचे। नाति। स्नायते। अस्नासीत् ।सस्त्रौ। स्माता । स्नात् । सर्व यांक्वत् ; परं आशीर्ये वा एः; स्नायात् , स्नेयात् । षोपदेशात् “नाम्यन्त -"॥२॥३॥१५॥ इति पत्वे, सिष्णासति । णौ, “ज्वलहल-"॥४।२।३२॥ इत्यनुपसर्गस्य वा हस्खे, स्नप- यति, स्नापयति । सोपसर्गस्य तु न इस्त्रः; प्रस्नापयति । असिष्णपत् । अस्लपि, अस्नापि; प्रास्नापि । सिष्णपयिषति, सिष्णापयिषति ॥ ६ ॥ द्रांक् कुत्सितगतौ । कुत्सिता गतिः पलायनम् , स्वप्नश्च । द्राति; निद्राति; विद्राति । द्रायते। अद्रासीत्। दद्रौ। द्राता। निदिद्रासति । दाद्रायते। द्रापयति। द्रातुम् । द्रात्वा । निद्राय । “व्यञ्जनान्तस्था-"॥४।२७१॥ इति नवे, द्राणः २, वान् । तृनि, द्राणशीलो दाता ॥ ७ ॥ पांक् रक्षणे । पाति । “ईर्व्यञ्जने-"॥४।३।९७॥ इत्यत्र गास्थासहचरितस्य पिबतेर्ग्रहणात् क्ये ईन; पायते। अपासीत् । पपौ। पपे। पायात्। पाता। पिपासति । पापायते । एवं यांक्वत् ; परं णौ, “पातेः॥४।२।१७॥ इति ले; पालयति । अपीपलत् । “ पातेः "॥४।२।१७॥ इत्यत्र तिन्निर्देशाद्यङ्लुपि योऽन्त एव; पापाययति ॥ ८॥ लांक आदाने। लाति, लातः, लान्ति । क्ये, लायते। लायात् । लातु । अलात्, अलाताम्, अलान् , अलुः, अलाः। व्यत्यलात् । व्यत्यले । क्ये, अलायत। अलासीत, अलासिष्टाम्, अलासिषुः। अलायि, अलासाताम् , अला- २० कियारलसमुच्चयः । विषाताम् । ललौ, ललतुः, ललुः; ललाथ, ललिथ; ललिम । लले; ललिमहे । लायात् । लासीष्ट; लायिषीष्ट । लाता, २; लायिता । लास्यति, ते । अलास्यत्, त। लिलासति । लालायते। लालेति, लालाति, लालीतः, लालति । णौ, "लोल" ॥४।२।१६॥ इति वा ले; घृतं विलालयति। पक्षे पौ, घृतं विलापयति । के, व्य- लीललत; व्यलीलपत् । लातः । ला ३ वा, ता, तुम् । लेयम् ॥ ९ ॥ रांक् दाने । आदानेऽपीति कश्चित् । राति । रायते। रातु । अरासीत् । रौ । राता । रारायते । रातुम् । एवं यांक्वत् ॥ १० ॥ दांब्क् लवने। बित्त्वान्न दासंज्ञा। दाति क्षेत्रम्। दायन्ते व्रीहयः। अदासीत् । व्यत्यदास्त, व्यत्यदा २ साताम् , सत । ददौ । दाता । दिदासति । दादायते । दादेति, दादाति, दादीतः, दादति; दादीथः । सर्वो यांक्वत् ॥ ११ ॥ ख्यांक प्रकथने । प्रकटन इत्यन्ये । ख्याति; आख्याति; व्याख्याति। ख्या- यते । ख्यायात् । ख्यातु । अख्यात् , अख्याताम्, अख्यान, अख्युः, अख्याः । अद्य० ॥ “शास्त्यसू-॥३४॥६०॥ इत्यङि, आख्य ६ त्, ताम्, न, :, तम्, त; आख्यम् , आख्या २ व, म । आख्यायि, आख्यासाताम्, आख्यायिषाताम् । चख्यौ, चख्यतुः, चख्युः, चख्याथ, चख्यिथ; चख्यिम। चख्ये, चख्याते। वा एक; ख्यायात्, ख्येयात् । ख्यासीष्ट, ख्यायिषीष्ट । ख्याता २; ख्यायिता । ख्यास्यति, ते; ख्यायिष्यते। व्याचिख्यासति। ख्यापयति । अचिख्यपत्। शेष यांक्वत्॥१२॥ मांक माने; मानं वर्त्तनम् । माति पात्रम् । क्ये, मायते । अमात्, अमा- ताम् , अमान्, अमुः ॥ अद्य० ॥ अमासीत् । ममौ । मायात् । मिमासति । प्रमिमासति । मामायते । मातः २,वान् ; इत्यादिः सर्वः परमते यांक्वद्वाच्यः । खमते वेवम् ; माति; निर्माति, प्रमाति; अनुमाति, मातः, संमान्ति । क्ये, मीयते, “ईय॑ञ्जने-"॥४।३।९७॥ इति ईः । मायात् । मीयेत । मातु। मीयताम् । ह्य०॥ अमात्, अमाताम्, अमान् , अमुः, अमाः; अमाम् । अमीयत । अमा- सीत्, अमासिष्टाम् । अमायि, अमासाताम्, अमायिषाताम् । ममौ, ममतुः, ममुः, ममाथ, ममिथ, ममथुः, मम, ममौ, ममि २व, म । ममे; ममिमहे "गापा-" ॥४॥३९६॥ इति एः, मेयात् , मेयास्ताम् । मासीष्ट, मायिषीष्ट । माता २; मायिता।

अदादिगणः । १४७ मास्यति, ते; मायिष्यते। “मिमी-"॥११॥२०॥इति इत् , मित्सति । "ईर्व्यञ्जने." ॥३९७॥ईः; मेमीयते। लुपि तु, साक्षात् ङियञ्जनाभावात् नईः; मामाति, मामेति। शेषं त्रैवत् । मापयति । अमीमपत् । मिमापयिषति । मान् । मान्ती, माती।मास्यन् । मास्यन्ती, मास्यती। मीयमानम् । “वरात्"।२।३।८५॥ इति णले, निर्मीयमाणम् । मास्यमानम् । ममिवान् । ममानम् । “दोसो-"||४|४|११॥ इति इ.; मितः, २ वान् । प्रस्थः स्थाल्यां मिला। प्रमाय। मितिः। माता। मातुम्। निर्माणीयम् ॥१३॥ इंक् स्मरणे । इङिकावधिनैव प्रयुज्यते । “स्मृत्यर्थ-"॥२२॥११॥ इति वा कर्मणः कर्मले; मातुर्मातरं वाऽध्येति, अधीतः; “इको वा"॥४॥३॥१६॥ इति वा यत्वे, अधियन्ति । पक्षे इयादेशे; अधीयन्ति, अध्येषि, अधी २ थः, थ, अध्येमि, अधी. २ वः, मः। क्ये, अधीयत । अधीयात् ॥ ५० ॥ अध्येतु, अधीताम्, अधि- यन्तु, अधीयन्तु; अधी २ तम्, त, अध्यया ३ नि, व, म ॥ ह्य० ॥ अध्यैत्, अध्यैताम् । “इको वा"॥४॥३॥१६॥ इत्यनेन वा यत्वे, पक्षे इयि च प्राप्ते सति, यवं बाधित्वा "एत्यस्तेः-१॥४४॥३०॥ इति वृद्धौ; अध्यायन् । पक्षे इया- देशे सति, "स्वरादेः-"॥४।४।३१॥ इति वृद्धौ; अध्ययन् , अध्यैः, अध्यै २ तम् , त, अध्यायम् , अध्यैव, अध्यैम । क्ये, अध्ययत । अद्य० ॥ “इणिको- ४।२३॥ इति गा; "पिबैति-"॥४॥३॥६६॥ इति सिज्लुप् च; अध्य३ गात्, गातां, गुः । व्यत्यध्यगा ३ स्त, साताम् , सत ॥ भाक ॥ अध्यगायि, अध्यगा २ साताम्, यिषाताम् । अधी ११ याय, यतुः, युः, येथ, ययिथ, यथुः, य, याय, यय, यिव, यिम । अधीये, अधी ३ याते, यिरे, यिषे । अधीयात् । "आशिषीणः॥४।३।१०७॥ इत्यत्रेकोऽपि ग्रहणात इखे, अधियादित्यप्यन्ये । अध्येषीष्ट, अध्यायिषीष्ट । अध्येता २; अध्यायिता। अध्येष्य २ ति, ते; अध्या- यिष्यते। अध्यैष्य २ त्, त; अध्यायिष्यत । “सनीङश्च" ॥२५॥ इति गमुः, “गमोऽनात्मने"॥४॥५१॥ इतीट् , अधिजिगमिषति मातुः। आत्मनेपदे पुनर्नेट, अधिजिगांस्यते माता। अधिजिगांसिष्यते। अत्र “स्वरहन्-"॥११।१०४॥ इति दीर्घः;"णावज्ञाने गमुः॥२॥ अधिगमयति प्रियम् । अध्यनीगमत् ।

क्रियारनसमुच्चयः । अधि २ यन् , यती। अधी २ यन् , यती। अध्येष्यन् । अधीयानम्। अध्येष्य- माणम् । अधीतः, २ वान् । अधीत्य । अध्ये २ ता, तुम् ॥ १४ ॥ इण्क् गतौ । एति; उदेति;प्रत्येति; अत्येति। "उपसर्गस्यानिण-"॥२२॥१९॥ इत्यत्रेणवर्जनान्नावर्णलुक् ; ऐति; उपैति; परैति, इतः; उपेतः। “हिणोः-।।४।३।१५॥ इति यत्वे, यन्ति; उपयन्ति, एषि, इथः, इथ, एमि, इवः, इमः। क्रियाव्यतिहारे गत्यर्थवर्जनात्परस्मै, व्यतियन्ति । ज्ञानार्थत्वात्मनेपदमेव; व्यतिप्र ३ तीते, तियाते, तियते। क्ये, “दीर्घश्च्चि-"॥४।३।१०८॥ इति दीर्घे, ईयते॥स०॥ इयात्। व्यति- प्रति ३ यीत, यीयाताम् , यीरन् । ईयेत । एतु, इतात्, इताम् , यन्तु, इहि, इतात् , इतम्, इत, अया ३ नि, व, म। ईयताम् । ऐत् , ऐताम्, आयन् , ऐः, ऐतम्, ऐत,आयम्, ऐव, ऐम । ऐयत। अद्य०॥ “इणिकोर्गा"।४।४।२३॥ इतिगा; पिबैति-॥४॥३॥६६॥ इति सिज्लुप् ; अगात् , अगाताम् , अगुः, अगाः, अगातम् , त,म्, व, म । अगायि, अगासाताम् , अगायिषाताम्०, अगा २ ध्वम्, द्ध्वम्; अगायि, ३ ध्वम्, ट्वम् , ढ्वम् । “नामिनोऽकलि-॥४।३।५१॥इति वृद्धौ, “पूर्वस्या- खे-'॥४१॥३७॥ इति पूर्वस्य इयादेशे; इयाय। हिले, “योऽनेक-"॥२॥१॥५६॥ इति यत्वापवादे "इणः-"॥२॥१॥५१॥ इति इयि; ईयतुः, ईयुः, इयेथ, इययिथ, ईयथुः, ईय, इयाय, इयय, ईयिव, ईयिम । ईये, ईयाते; ईयि २ ध्वे, ट्वे । “दीर्घश्च्चि-" ॥४॥३।१०८॥ इति दीर्घे, ईयात् । “आशिषीणः॥४।३।१०७॥ इतिहखें, समियात्। ई इण इति ईकारप्रश्लेषात्, आ ईयात्, एयात् । समेयादित्यत्र न ह्रस्वः। प्रतीया- दित्यत्र तु समानदीर्घवे कृते सति उपसर्गात्परस्येणोऽभावात् न हूस्वः । केचि- दत्रापीच्छन्ति; प्रतियात् । एषीष्ट; आयिषीष्ट; एषीध्वम् ; आयि २ षीध्वम्, पीढ्वम् । एता २; आयिता । एष्यति। “उपसर्गस्यानिण-"।१।२।१९॥ इति आलु- गभावे आ एप्यति, ऐष्यति । समैष्यति । एष्यते; आयिष्यते । ऐष्यत्, त; आयिष्यत । “सनीडश्च"॥४।४।२५॥ इति गमुः, “गमोऽनात्मने"|४|४५१॥ इतीद; जिगमिषति ग्रामम् । कर्मण्यात्मनेपदे तु नेट ; “स्वरहन्-"॥४।१।१०४॥ इति दीर्घश्च; जिगांस्यते ग्रामः । “समो गम-॥३।३।८४॥ इति कर्त्तर्यात्मनेपदेऽपि नेट्; सज्जिगांसते चैत्रः। ज्ञानेतु न गमुः; अर्थान् प्रतीषिषति, अत्र सनोऽकार- अदादिगणः। करणात्, “स्वरादेर्द्वितीयः"|४|११४॥ इति सस्वरस्य सस्य द्वित्वं षवं पश्चात् सन्यस्य इः । अधिपूर्वस्तु स्मरणे । अधीषिषति; स्मर्तुमिच्छतीत्यर्थः । “णिस्तो- रेव-"॥२॥३॥३७॥ इत्यत्र पणि निमित्ते णिस्तुवर्जधातोरेव षत्वं निषिद्धं न तु सनः, तेनेह सनो द्वित्वे षत्वं सिद्धम् । “णावज्ञाने गमुः॥४।४।२४॥ गमयति ग्रामम् । अजीगमत् । ज्ञाने तु, शब्दोऽर्थ प्रत्याययति। प्रत्यायियत्। प्रत्यायि। इटि, प्रत्याय यिषाताम् । ब्रिटि, प्रत्यायिषाताम् । प्रत्याययांचकार ३ । यन् । यती । एष्यन् । एष्यन्ती, एष्यती स्त्री कुले वा। ईयमानम् । एष्यमाणम् । “वेयिवद्-''।५।२॥३॥ इति भूतमात्रे वा कसौ निपातनात्, ईयिवान्। समीयिवान् । उपेयिवान् । पक्षे ऽद्यतन्यादयोऽपि । ईयानम् । इतः, २ वान् । इत्वा । उपेत्य । इतिः । एता । एतुम् । एतव्यम् । अयनीयम् । इत्यम् । एयम् ॥ १५॥ पुंक् प्रसवैश्वर्ययोः । “उत औः-॥४।३।५९॥ सौति, सुतः, सुवन्ति, सौषि । सूयते। सूयात् । सौतु; सुहि; सवानि। असौत् , असुताम् , असुवन् । असौषीत् , असौष्टाम् । असावि, असोषाताम् , असाविषाताम् । एवमिहाग्रेऽपि जिट् । "नाम्यन्त-"॥२॥३॥१५॥ इति षः; सुषाव, सुषुवतुः, सुषुवुः, सुषविथ, सुषोथ; सुषुविम । सुषुवे । सूयात् । सोषीष्ट । सोता । सोष्यति । सुसूषति । सोषूयते । सावयति । असूषवत् । सुत्वा । सुतः । सोता। सोतुम् ॥ १६ ॥ तुक वृत्तिहिंसापूरणेषु । तौति । विति व्यञ्जने, “यङ्तु-"।४।३६४॥ इति ईति; तवीति । शेषं पुंक्वत् ॥ १७ ॥ युक् मिश्रणे । अयुतसिद्धानामित्यादिदर्शनादमिश्रणेऽप्यन्ये । “उतऔर्वि-" ॥४॥३५९॥ इति; यौति, युतः, युवन्ति, यौषि, युथः । यूयते । युयात् । यौतु, युतात् । ङित्त्वात् , “उतऔर्विति-"॥४।३।५९॥ इति न औः; ङित्त्वेन वित्त्वस्य बाधनात् ; युहि; यवानि । अयौत्, अयुताम् , अयुवन् , अयोः । अयावीत् , अयाविष्टाम् , अयाविषुः। अयावि, अयविषाताम् , अयाविषाताम् ; अयवि ३ ध्वम् , ढुम्, ड्ढम् ; अयावि३ ध्वम् , द्वम्, ड्ढ्वम्। युयाव, युयुवतुः, युयुवुः, युयविथ; युयुविम । युयुवे; युयुवि २ ध्वे, वे; युयुविमहे। यूयात्। यविषीष्ट, यावि- षीष्ट; यवि २ षीध्वम् , षीदवम् ; यावि २ बाध्वम्, षीद्वम्। यविता २, याविता।

.
१५०
क्रियारलसमुच्चयः।
यविष्य २ ति, ते; याविष्यते । "इवृध-"||४७॥ इति वेटि, “ओन्ति-
६०॥ इति पूर्वस्य इ., यियविषति; युयूषति । योयूयते । योयवीति । अहेरिति
निषेधान्न औः; योयोति । यङ्लुबन्तस्यापि औरित्यम्ये; योयौति । यावयति ।
असमान-"॥४।१।६३॥ इति इ., अयीयवत् । “ओर्जान्त-"॥११॥६०॥ इति
इः, यियावयिषति । युवन् । युवती । यूयमानम् । यविष्यन् । यविष्यमाणम् ।
युयुवान् । युयुवानम् । “उवर्णात् ॥४॥५८॥ इति नेटि, युतः, २ वान्। युला ।
यवि २ ता, तुम् ॥ १८ ॥
णुक् स्तुतौ । नौति । अन्ये तु युक्णुभ्यां व्यञ्जनादौ विति शिति,
ईतमपीच्छन्ति । यवीति; नवीति । “अदुरुपसर्ग-"॥२२३७७॥ इति णः, प्रणौति:
परिणौति, नुतः, नुवन्ति । “नुप्रच्छः॥३।३।५४॥ इत्यापर्वादात्मनेपदे, आनुते
सृगालः; आनु २ वाते, वते । क्ये, नूयते; प्रणूयते । शेषं युक्त् । “ग्रह-
गुहश्च-"॥४४५९॥ इति नेट, नुनूषति । नोनूयते । नोनवीति, नोनोति ।
नावयति । अनूनवत् । नुवन् । नुवती । नविष्य २ न, माणम् । नुनुवान् ।
नुनुवानम् । “उवर्णात् "॥५८॥ इति नेट् , नुतः, २ वान् । नुला । प्रणुत्य ।
नुतिः ॥ १९॥
क्ष्णुक् तेजने । क्ष्णौति, क्ष्णुतः, क्ष्णुवन्ति । “ समः क्ष्णोः "॥३॥३॥२९॥
इत्यात्मनेपदे; संक्ष्णुते शस्त्रम् । चुक्ष्णूति । चोक्ष्णूयते । चोक्षणोति । शेष
युक्कत् ॥ २० ॥
स्नुक् प्रस्रवणे; क्षरणे। स्नौति, स्नुतः, स्नुवन्ति । क्ये, स्नूयते । प्रास्तावीत्।
प्रसुनाव । प्रस्नविता । प्रस्त्रविष्यति । एवं सर्वो युक्वत् ;
परं "लोः ॥५२॥
इत्यात्मनेपदाभाव एवेट्विधानादात्मनेपदे नेट् । प्रास्लोषाताम् । प्रस्नोषीष्ट ।
प्रस्नोतासे । प्रस्तोष्यते । कर्मकर्तरि, “एकधातौ-"३८६॥ इति जिक्या-
त्मनेपदेषु प्राप्तेषु, "भूषार्थ-"||३||९३॥ इति निक्ययोः प्रतिषेधात् ; प्रस्तुते ।
प्रास्त्रोष्ट गौः स्वयमेव । अन्तर्भूतण्यर्थवेन सकर्मकवाद् गोः कर्मकर्तृलम् । यत्र
तुण्यों नास्ति तत्र कर्तृतैव । यथा, प्रस्नौति गौर्दोग्धुः कौशलेन । एवमन्यत्रापि।
"ग्रहगुहश्च ॥४/१५९॥ इति इट्प्रतिषेधे; सुस्नूषति । सोस्नूयते। सोनोति,
सोसवीति ॥ २१ ॥

अदादिगणः । १५१ टुक्षु, रु, कुंक्, शब्दे। क्षौति, क्षुतः, क्षुवन्ति । चुक्षाव । क्षविता । चुक्षूषति। चोक्ष्यते । चोक्षोति; चोक्षवीति । क्षावयति । णौ यत्कृतमिति न्यायात् क्षुद्धि- ले; अचुक्षवत् । चुक्षावयिषति। “उवर्णात्॥४।४।५८॥ इति नेटि, क्षुत्वा । क्षुतम्। क्षुतः, २ वान् । क्षवि २ ता, तुम् । “य एच-"॥५॥१॥२८॥ इति ये; क्षव्यम् । "उवर्णादावश्यके"॥५॥१॥१९॥ इति ध्यणि; क्षाव्यमवश्यम्। रु । रौति; “यङ्तुरु- स्तो: -१३१६४॥ इति ईति; रवीति, रतः, रुवन्ति । रुराव । रविता।रुरूषति। रोरू. यते। रोरोति, रोरवीति।लुप्यपि “उत औः-"||४।३।५९॥ इति औरित्यन्ये; रोरौति । रावयति। “असमान-"॥४।११६३॥ इति इः; अरीरवत् “ओर्जान्त-"॥४।१।६०॥ इति इ.; रिरावयिषति । शेष द्वयोर्युक्वत् । कुंक्। अनिट् । कौति । चुकाव । कोता। चुकूषति । “न कवतेः-|४|११४७॥ इति भ्वादेरेव प्रतिषेधात् “कङश्च-"॥१॥४६॥ इति पूर्वस्य चः; चोकूयते । चोकोति; चोकवीति । कावयति। अचूकवत्। शेष पुंक्वत् । कुंङ्, कुंक्, कुंङ्त् इत्येतेषां शब्दार्थत्वेऽप्यर्थभेदोऽस्ति । कुंङ् अव्यक्ते शब्दे ज्ञेयः, कुंक शब्दमात्रे, कुत् आर्त्तखरे ॥२२॥२३॥२४॥ अथान्तर्गणो रुदादिः पञ्चकः । रुदृक् अश्रुविमोचने । “रुत्पश्चकात्-"॥४८॥ इतीटि; रोदिति, रुदितः, रुदन्ति, रोदिषि, रुदिथः, रुदिथ, रोदिमि, रुदिवः, रुदिमः । रुद्यते । रुद्यात् । रुद्याताम् । रुघेत । रोदितु, रुदिताम् , रुदन्तु, रुदि ३ हि, तम्, त, रोदा ३ नि, व, म । रुद्यताम् । दिस्योरीट् ॥४।४।८९॥ अरोदीत् । अदश्वाट"॥ ४।४।९०॥ अरोदत्, अरुदिताम् , अरुदन्, अरोदीः, अरोदः, अरुदि २ तं, त, अरोदम् , अरुदि २ व, म । अरुद्यत । अद्य० ॥ “ऋदिच्छि-"॥३४॥६५॥ इति वाऽङि, अरुद ३ त्, ताम्, न् । पक्षे, अरो ३ दीत्, दिष्टाम् , दिषुः । अरोदि, अरोदिषाताम् ; अरोदि २ ध्वम्, ड्ढ्वम् , अरोदिषि । रुरोद, रुरु- दतुः, रुरुदि २ व, म । रुरुदि २ ध्वे, महे । रुद्यात् । रोदिषीष्ट । रोदिता २ ॥ रोदिष्यति, ते । अरोदिष्यत् , त । "रुदविद-"॥४॥३२॥ इति क्वासनोः कित्त्वे, रुरुदिषति । रोरुयते। रोरुदीति, रोरोत्ति, रोरुत्तः, रोरुदति । हौ, रोरुद्धि ।

१५२ क्रियारत्नसमुच्चयः। ह्य० ॥ अरोरु २ दीत्, द् । अरोरु २ त्ताम् , दुः, अरोरोः, अरोरोत्, अरोरुत्तम् । अद्य० ॥ ऋदनुबन्धनिर्दिष्टत्वेन यङ्लुपि अङभावे, अरोरोदीत् । शेषं पचि- स्थानोक्तवत् । रोदयति । अरूरुदत् । रुदन् । रुदती । रोदि ३ ष्यन् , ष्यन्ती, ष्यती । रुद्यमानम् । रोदिष्यमाणम् । रुरुद्वान् । रुरुदानम् । रुदितः २, वान् । “उतिशवर्हाझ्यः-"॥४।३।२६॥ इति भावारम्भयोर्वा कित्त्वे, रुदितम् , रोदित- मनेन । प्ररुदितः २, वान् ; प्ररोदितः २, वान् । रुदित्वा, रोदित्वा । रोदि २ ता, तुम् । रोद्यम् ॥ २५ ॥ जिष्वपंक् शये । अकर्माऽनिट् च। शिति व्यञ्जनादौ इटि; स्वपिति, स्वपितः, स्वपन्ति। "स्वपेर्यङ्डे च"॥४३११८०॥इति वृति, सुप्यते । स्वप्यात् । स्वपि २ तु, ताम् ॥ ह्य० ॥ अस्वपत्; अस्वपीत् ; अस्व ९ पिताम् , पन्, पः, पीः, पितम् , पित, पम्, पिव, पिम॥अद्य०॥ अस्वा९प्सीत, ताम्, प्सुः, प्सीः, तम्, प्त, प्सम, प्स्व, प्स्म । अस्वापि । “भूस्वपोः-४।११७०॥ इति पूर्वस्य उः, “नाम्यन्त-"॥२ ॥३॥१५॥ इति पश्च, सुष्वाष; “स्वपेर्यङ्-'॥४।१।८०॥ इति य्वृति, सुषुपतुः। निर्दः सुविपूर्वस्य; "अवः स्वपः॥२॥३।५७॥ इति षवे, निःषुषुपतुः; दुःषुषुपतुः, सुषु- षुपतुः; विषुषुपतुः; सुषुपुः, सुष्यपिथ, सुष्वप्थ, सुषुपथुः, सुषुप, सुष्वाप, सुष्वप, सुषुपि २ व, म । सुषुपे; सुषुपिमहे । सुप्यात्। स्वप्सीष्ट । स्वप्ता २। स्वप्स्यति, ते। अस्वप्स्यत, त । “रुद-"॥४।३।३२॥ इति सन् कित् , सुषुप्सति । सोषुप्यते । यङन्तात सनि, सोषुपिषते । “अतः॥४।३।८२॥ इत्यनेन विषयेऽप्यतोलोपात् "स्वरस्य परे."॥४।११०॥ इति स्थानित्वाभावे, “योऽशिति"।४।३।८०॥ इति यलुक सिद्धः। पुनर्दित्वमते तु, सुसोषुपिषते; अत्र पणि "णिस्तोरेव-॥२३॥३७॥ इति नियमात् सुपरस्य सस्य न षः। यङ्लुप्यपि वृति, सोषुपीति, सोषोप्ति, सोषु २प्तः, पति ।यङ्लुपि न य्वृदित्यन्ये, सास्वप्ति। प्रकृतिग्रहणात् यङ्लुप्यपि सनः कित्त्वे, सोषुपिषति। सोषोपयति। सोषोपयिषति। स्वापयति। “स्वपेर्यङ्डेच॥४।१।८०॥ इति य्वृति गुणे ह्रस्वत्वे द्वित्वे पूर्वदीर्घवे च, असूषुपत्। णौ सनि, “स्वपो णावुः" ॥४।१।१२॥ इति पूर्वस्य उत्ते; सुष्वापयिषति । स्वपन् । स्वपती । खप्स्यन् । स्वप्स्यन्ती, खप्स्यती। सुप्यमानम् । स्वप्स्यमानम् । सुषुप्वान् । सुषुपानम् ।

अदादिगणः । १५३ सुप्तः २, वॉन् । सुप्त्वा । प्रसुप्य । दुःषुप्तः । सुषुप्तः । सुप्तिः । खप्ता । खप्तुम् ॥ २६ ॥ अन, श्वसक् प्राणने; जीवने । अनिति; "द्वित्वेऽप्यन्तेऽपि."॥२॥३८१॥ इति णत्वे, प्राणिति; पराणिति; अनितः, अनन्ति । क्ये, अन्यते; प्राण्यते । प्राण्यात् । प्राणितु। प्राणत् , प्राणीत् , प्राणिताम्, प्राणन् ,प्राणः, प्राणीः। प्राण्यत। प्राणीत् , प्राणि २ ष्टाम्, षुः। प्राणि, प्राणिषाताम् । “अस्यादेः-४।१।६८॥ इति पूर्वस्य आः, आन; आनतुः; प्राण, प्राणतुः, प्राणुः, प्राणिथ; प्राणिम। प्राणे, प्राणाते; प्राणिषे। प्राण्यात् । प्राणिषीष्ट । प्राणिता २। प्राणिष्यति । प्राणिष्यत्। अनिनिषति । द्वित्वे कर्तव्ये णत्वशास्त्रस्यासत्त्वाद् द्वित्वे कृते पश्चाद्वयोर्ण, प्राणिणिषति । परेस्तु वा णः, पर्यणिणिषति, पर्यनिनिषति । सन्नन्ताण्णौ ङे, "पुनरेकेषाम् ॥४।१।१०॥ इति पुनर्दित्वे, प्राणिणिनिषत् ; अत्र “हित्व-॥२।३।८१॥ इति वचनाद्; द्वित्वे कृते पश्चाद् द्वयोरेवाद्ययोर्णत्वं न तृतीयस्य; आनयति;प्राणयति। आनिनत् ; प्राणिणत्। पर्याणिणत्, पर्यानिनत् । प्राणिणयिषति । प्राणन् । प्राणती । प्राणिप्यन् । प्राण्यमानम् । प्राणिवान् । प्राणानम् । प्राणि ४ ता, तुम् , तः, तवान् । अनि- वा । प्राण्य ॥ श्वस् ॥ तालव्यादिः । श्वसिति; विश्वसिति; आश्वसिति; निश्व- सिति; श्वसितः, श्वसन्ति । श्वस्यते । श्वस्यात् । न स्वपेदिति, न विश्वसेदमि- त्रस्य मित्रस्यापि न विश्वसेदिति च दर्शनाददादिभ्योऽपि क्वचित् शवि- त्यन्ये । श्वसितु; श्वसिहि ॥ ह्य० ॥ अश्व ११ सत्, सीत्, सि ताम्, सन्, सः, सीः, सितम्, सित, सं, सिव, सिम । अश्वस्यत ॥ अद्य० ॥ अश्व २ सीत् , सिष्टाम् । अश्वा २ सीत्, सिष्टाम् । अश्वासि, अश्वसिषाताम् । शश्वास, शश्वसतुः; शश्वसिथ । शश्वसे; शश्वसिमहे । श्वस्यात् । श्वसिषीष्ट । श्वसिता। श्वसिष्यति । शिश्वसिषति । शाश्वस्यते । शाश्व २ सीति, स्ति। आश्वासयति । अशिश्वसत् । व्यशिश्वसत् । श्वस २ न, ती । श्वसिष्य ३ न्, न्ती, ती । श्वस्यमानम् । शश्वस्वान् । शश्वसानम् । श्वसि ३ त्वा, ता, तुम् । “श्वसजप." ॥४७५॥ इति वा नेटि; आश्वस्तः, २ वान् ॥ २७ ॥ २८ ॥ जक्षक् भक्षहसनयोः।अयं रुत् पञ्चकस्य पञ्चमो जक्षपञ्चकस्य त्वाय इत्युभय- २१ १५४ क्रियारत्नसमुच्चयः। द्रि- कार्यभाक् । जक्षिति, जक्षितः; "अन्तो नो लुक् "||१२|९४॥ जक्षति । जक्षतु । "युक्तजक्ष-"॥४।२।९३॥ इति शिदनः पुसि, अजक्षुः । जजक्ष । शतरि, जक्षत्; "शौ वा"॥१२९५॥ जक्षति, जक्षन्ति, कुलानि । जक्षि ३ ता, तुम, तः । शेषं श्वस्वत्॥ २९ ॥ दरिद्राक् दुर्गतौ। दरिद्राति । "इर्दरिद्रः"॥४।२।९८॥ दरिद्रितः, अन्तो नो लुकि, “नश्चातः॥४।२।९६॥ लुकि च; दरिद्रति, दरि ६ द्रासि, द्रिथः, द्रिथ, द्रामि, द्रिवः, द्रिमः । क्ये, “अशित्यस्सन्-"॥४।३।७७॥ इत्यालुकि, दरिद्रयते । सप्त० ॥ दरिद्रियात् । दरि ४ द्रातु, द्रितां, तु, दिहि । अदरि ३ द्रात्, ताम् , दुः; अत्र “युक्त-१॥४।२।९३॥ इति पुसि, "इडेत्-"॥४॥३९॥ इत्यालुकि, अदरि ६ द्राः, द्रितम्, द्रित, द्राम् , द्रिव, द्रिम ॥ अद्य० ॥ “दरिद्रोऽद्यतन्यां वा" ॥४।३१७६॥ आलुक्; अदरि ३ द्रीत् , द्रिष्टाम् , द्रिषुः । पक्षे; अदरिद्रा २ सीत्, सिष्टाम् ॥ भाक ॥ अदरि २ द्रि, द्रायि । इटि जिटि च, अदरिद्रिषाताम् । दरिद्रां ३ चकार, बभूव, आसेत्यादि । “आतो णव-"॥४।२।१२०॥ इत्यत्र ओकारे- जैव पपावित्यादिसिद्धौ औविधानं दरिद्रातेणव आमादेशानित्यत्वार्थम् , ददरिद्रौ। अन्यथा “अशित्यस्सन्-'॥४।३।७७॥ इति आलोपे, इदं रूपं न सिचेत् ॥ भाक ॥ दरिद्रां ३ चक्रे, बभूवे, आहे । दरिद्यात् । दरिद्रिषीष्ट । दरिद्रता २ ॥ दरिद्रिष्यति, ते। अदरिद्रिष्यत्, त । “इवृध-'॥४४॥४७॥ इति वेटि, दिद- रिद्रासति; दिदरिद्रिषति । दरिद्रयति । अददरिद्रत् । णौ आलुकं नेच्छन्त्यन्ये, दरिद्रापयति । अददरिद्रपत्; अत्र लघोः परेण वर्णसमुदायेन र्व्यवधेति पूर्वस्य सन्वद्भावात् इर्न भवति । अन्तो नो लुकि, दरिद्र ५ त् , तौ, ती, ति, न्ति, कुलानि । दरिद्रिष्य २ न्, माणम् । दरिद्यमाणम् । दरिद्राञ्चकृवान् । 'शिवस्तु णवोऽन्यस्याप्यामादेशमनित्यमिच्छति । तन्मते, ददरिद्वानित्यपि । षष्ठ्यां तु ददरिद्रुष इति भवति । केचित् कसौ आलोपं नेच्छन्ति, ददरिद्रा- वान् । दरिद्रि ५ वा, ता, तुम् , तः, वान् । दरिद्रणीयम् ॥३०॥ जागृक् निद्राक्षये। अकर्मा । जागर्ति। सकर्मा च । प्रतिजागर्ति । जागृतः, अन्तोनो लुंकि, जाग्रति, जागर्षि, जागृथः, जागृथ, जागर्मि, जाग २ वः, .. , अदादिगणः। १५५ मः । क्ये, “जागुः किति "॥४॥३६॥ इति गुणे, जागर्यते । जागृयात् । जाग- तु; जाग्रतु ॥ ह्य० ॥ अजागः; नानिष्टार्थ इति न्यायात् सन्निपातन्यायोऽत्र न प्रवृत्तस्तेन गुणे कृते देर्लुक् सिद्धः; अजागृताम् । “द्वयुक्त-"॥४।२।९३॥ इति पुसि, अजागरुः, अजा ६ गः, गृतम्, गृत, गरम्, गृव, गृम । अजागर्यत ॥ अद्य०॥ "न श्विजागृ-"॥४।३।४९॥ इति न वृद्धिः, अजाग ९ रीत्, रिष्टाम् , रिषुः । "जागुर्बिणविणा४।३।५२॥ इति वृद्धौ, अजागारि । प्रत्यजागरि १० षाताम्, षत, ठाः, पाथाम् , ध्वम्, ट्वम्, ड्वम्, षि, वहि महि । एवं प्रत्यजागारिषा- तामित्याद्यपि ॥ परो० ॥ “जाग्रुष-॥३४॥४९॥ इति वा आमि, जागरां३चकार, बभूव, आसेत्यादि । ९ । आमः परोक्षात्वाभावाण्णवि न वृद्धिः ॥ भाक ॥ जागरां ३ चक्रे, बभूवे, आहे । पक्षे; जजागार; “जागु:-"॥४॥३६॥ इति गुणे, जजागरतुः, जजागरुः । अनेकवरत्वात् "ऋतः॥४।४७९॥ इतीट् निषेधाभावे, जजागरिथ । णवि, जजागर, जजागार; जजागरिम । जजागरे, प्रतिजजागरे, प्रतिजजागरिट्वे, ध्वे । जागर्यात्। जागरिषी ३ ट; ढ्वम् , ध्वम्। जागारिषीष्ट। जागरिता २; जागारिता । जागरिष्यति, ते; जागारिष्यते । जिजागरिषति । अनेकवरत्वान्न यङ् । अस्यापि यङित्यपरे; जाजागीयते। जरिजागर्ति ॥ अद्य०॥ "न श्वि-॥४।३।४९॥ इति यङ्लुप्यपि न वृद्धौ, अजर्जागरीत् । सर्वस्माता- तोः आयादिप्रत्ययरहितात् केचिद्यङमिच्छन्ति । अव् । अवाव्यते । ई, इण् वा। "स्वरादेईितीयः"॥४१॥४॥ इति यद्विवे, “आगुण-"|४|११४८॥ इति आले; इयायते। इंक्, इंक्वा । अधीयायते। ईञ्च । ईयायते । दादरिद्यते । एवमन्य- सर्वधातुष्वपि “जागुर्बिणवि"॥४३॥५२॥ इति ञिणवोरेव वृद्धिनियमात् णी गुणे, जागरयति । अजजागरत्। जाग्र ५ त् , तौ, ती, ति, न्ति, कुलानि। जागर्यमाणम्। जागरि २ प्यन् , माणम् । अस्य क्वसुर्नास्तीत्येके । गुण एवेत्यन्ये । जजागर्वान् । जजागराणम् । कसुकानयोन गुण इत्यपरे । जजागृवान् । व्यतिजजाग्राणः । जागरि ५ ला, ता, तुम्, तः २ वान् । जागर्यम् ॥ ३१ ॥ चकासृक् दीप्तौ । चकास्ति, चकास्तः। न्लुकि, चकासति, चका ३ स्सि, स्था; चकास्यते । चकास्यात् । चकास्तु, चका २ स्ताम् , सतु; “सोधि-"॥ स्मि।

१५६ क्रियारत्नसमुच्चयः। ४।३।७२॥ इति वा सो लुर्कि; चका ३ डि, धि, स्तम्। “व्यञ्जनादेः-॥४।३७८॥ लुकि स्दः; अचकात् , अचकास्ताम् , अचकासुः, “सेः स्द्धाम्-"॥४३॥७९॥ इति सेलुकि स् वा रुः, अचकाः। पक्षे “धुट्-॥२।१।७६॥ इति स् द्, अचकात्, अचका ५ स्तम्, स्त, सम्, स्व, स्म । अचका २ सीत्, सिष्टाम् । अच- कासि, अचकासिषाताम् । “धातोरनेक-'॥३।४।४६॥ इत्यामि, चकासां २ चकार, चक्रतुः । चकासाञ्चके। चकास्यात् । चकासिषीष्ट । चकासिता २ । चकासिष्य- ति, ते । चिचकासिषति । चकासयति । ऋदित्त्वाद् डे न हवः; अचचकासत् । चका ५ सत् , सतौ, सती, सति, सन्ति कुलानि । चकास्यमानम् । चकासिष्य- ४ न्, न्ती, ती, माणम् । चकासां २ चकृवान् , चक्राणम्। चकासि ५ त्वा, ता, तुम् , तः २, वान् ॥ ३२ ॥ शासूक् अनुशिष्टौ; नियोगे। शास्ति; अनुशास्ति। “इसासः-४।४।११८॥ इति आस इस् , “नाम्यत-"॥२॥३॥१५॥ इति षः, शिष्टः शासति, शारिस, शिष्टः, शिष्ट, शास्मि, शिष्वः, शिष्मः। व्यतिशि ३ष्टे, क्षे, ड्वे। शिष्यते। शिष्यात् । व्यतिशासीत।शास्तु, शिष्टाम् ; शासतु। “शास-४२८४॥ इति शाधौ; शाधि, शिष्टम् , शिष्ट, शासा ३ नि, व, म । व्यतिशिष्टाम् । “व्यञ्जनाद्देः-१॥४।३७८॥ इति दिव्लुक् सो दश्च; अशात्, अशिष्टाम् , अशासुः, अशाः, अशात् , अशि- ष्टम् । व्यतिशिष्ट । “शास्त्यसू-"॥३४६०॥ इति अङि, अशिष ३ त् , ताम् , न ; अशिषाम । अङि, व्यत्यशि २ षत, घेताम् । अन्वशिषत स्वयमेव । नात्म- नेपदेऽडित्येके । व्यत्यशासिष्ट ॥ भाक ॥ अशासि, अशासिषाताम् ; अशा- सि २ ध्वम्, ड्वम् । शशास, शशासतुः; शशासि २ थ; म । शशासिमहे । शिष्यात् । शासिषीष्ट । शासिता । शासिष्यति । अशासिष्यत् । शिशासिषति । शेशिष्यते । शाशा २ सीति, स्ति, शाशिष्टः, शाशासति, शाशा २ सीषि, स्सि, शासि ४ ष्टः, ष्ट; प्वः, ष्मः । शाशिष्यते । हो, शाधि ॥ अद्य० ॥ अशाशा २ सीत् , सिष्टाम् । शासयति । “उपान्त्यस्य ॥४॥२॥३५॥ इत्यत्र वर्जनान्न हवः, अशशासत् । “उपान्त्यस्य ॥४॥२॥३५॥ इत्यत्र शासेरूदित्करणं यङ्लुपि णौ ढे ह्रस्वार्थम् , अशाशसत् । अशाशासदित्यप्यन्ये । शास ५ त् , तौ, ती, ति, , अदादिगणः । न्ति कुलानि । शासिष्य ४ न , ती, न्ती, माणम् । शिशिष्वान् । शशासा- नम् । उदित्त्वात् तित्व वेट, शिष्ट्वा, शासित्वा । अनुशिष्य । वेट्वान्नेट, शिष्टः, २ वान् । शिष्टिः। इकिस्ति०, शास्तिः। शासि ३ ता, तुम् , तव्यम् ॥३३॥ वचंक् भाषणे । अनिट् । वक्ति, वक्तः, वचन्ति; अन्तौ वचेः प्रयोगं नेच्छन्त्येके, वक्षि, वक्थः, वक्थ, वच्मि, च्वः, च्मः । “यजादिवचेः॥४।१।७९॥ इति वृति, उच्यते । वच्यात्। वक्तु, वक्तात्, वक्ताम्, वचन्तु, बग्धि; वचानि । अवक्, अवक्ताम् , अवचन , अवक्, अवक्तम, अव ४ क्त, चं,च्च, च्म । “शास्त्य- सू.॥३।४।६०॥ इत्यङि, "श्वयति-"॥४।३।१०३॥इति वोचः, अबोच ३ त्,ताम्, न् , अवोचः; अबोचाम । अवाचि, अव ९ क्षाताम् , क्षत, क्थाः, क्षाथाम् , ग्ध्वम् , ग्ड्ढम्, क्षि, वहि, महि। “यजादिवश्-"॥४।१।७२॥ इति पूर्वस्य वृति, उवाच; “यजादिवचेः-"॥४।११७९॥ इति वृति, पश्चात् द्वित्वे च, ऊचतुः, ऊचुः, उव. चिथ, उवक्थ, ऊचथुः, ऊच, उवाच, उवच, अचि २ व, म । ऊचे; ऊचि २ थे, ध्वे, अचिमहे । उच्यात् । वक्षीष्ट । वक्ता । वक्ष्यति । अवक्ष्यत् । विवक्षति । वावच्यते । वाव १२ चीति, क्ति, क्तः, चति, चीषि, क्षि०; हो, वावग्धि ॥ शास्त्यसू-"॥३।४।६०॥ इत्यत्र तिन्निर्देशान्न अङ्, अवावची- दित्यादि । शेषं पचिवत् । वाचयति । अवीवचत् । विवाचयिषति । वचन् । वचती । उच्यमानम् । वक्ष्य २ न् , माणम् । ऊचिवान् । ऊचानम् । उक्तः,२ वान् । उक्तिः । उक्त्वा । प्रोच्य । वक्ता। वक्तुम् । घ्याण, वाक्यम् । वाच्यमिति तु वचण भाषणे इत्यस्य रूपम् ॥ ३४ ॥ मृजौक शुद्धौ।"लघोः"॥४॥३४॥ इति गुणे, पश्चात् “मृजोऽस्य-"॥४॥३॥४२॥ ॥ इति वृद्धौ, “यजसृज-"॥२।१।८७॥ इति षे, मार्टि; संमार्टि । एवं नि, प्र, परि, पूर्वोऽपि । मृष्टः; "ऋतः स्वरे वा"||४।३।४३॥ इति वा वृद्धौ; परिमा- जन्ति, परिमृजन्ति, मार्ति, मृष्टः, मृष्ट, मामि, मृज्वः, मृज्मः । व्यतिमृष्टे । मृज्यते। मृज्यात् । व्यतिमार्जीत, व्यतिमृजीत । माष्टु, मृष्टाम्, मार्जन्तु, मृजन्तु, मृड्ढि, मृष्टं, मृष्ट, मार्जानि । व्यतिमृष्टाम् । अर्माट् , अमृष्टाम् , अमा. र्जन् , अमा, अमृ २ टम्,ष्ट, अमार्जम् , अमृ २ ज्व, ज्म । व्यत्यमृष्ट। औदि- अद्य० ॥

१५८ कियारत्नसमुच्चयः। . त्वाद्वेटि, अमा ९क्षीत् , टीम् , क्षुः, क्षीः, ष्टम्, टं, क्षम, व, र्भ । पक्षे; अमा ९ जीत्, Gिष्टाम्, र्जिषुः, र्जीः, र्जिष्टम् , र्जिष्ट, र्जिषम् , जिष्व, जिष्म। व्यत्य- मृष्ट; व्यत्यमार्जिष्ट । अमार्जि; "सिजाशिष-"॥४॥३॥३५॥ इति कित्त्वे, अमृक्षा- ताम् ; अमार्जिषाताम् ; अमृष्ठाः अमार्जिष्ठाः; अमृ २ ड्ढ्वम् , ग्ड्ढवम् ; अमार्जि २ ध्वम् , ड्ढवम् , अमृक्षि, अमार्जिषि । ममार्ज, ममृजतुः, ममार्जतुः, ममृजुः, ममार्जुः, ममार्जिथ; ममृजिम, ममार्जिम । ममृजे, ममार्जे, ममृजाते, ममा- र्जाते; ममृजिमहे, ममार्जिमहे। मृज्यात् । मृक्षीष्ट; मार्जिषीष्ट । मार्टी, मार्जिता । मायति, मार्जिष्यति । मिमार्जिषति, मिमृक्षति । मरीमृज्यते । मरी रि र ३ मृजीति, मरी, रि, र ३ मार्जीति, मर् , रि, री ३ मार्टि । एवं तिवि ९ रूपाणि । मरि री र ३ मृष्टः, मरि री र ३ मृजति, मरि र री ३ मार्जति । प्रमार्जयति । "ऋ-"॥४।२।३७॥ इति वा ऋः, प्रामीमृजत् ; प्राममार्जत् । प्रमृज २ न्, ती। प्रमार्जन्, ती । प्रमृज्यमानम् । मायन् । मार्यमाणम् । मार्जिष्य २ न्, माणम् । वेट्त्वान्नेट, मृष्टः २, वान् । मृष्ट्वा, मार्जिला । प्रमाय॑ । मार्टा, मार्जिता । माष्टुम् , मार्जितुम् । मार्टव्यम् , मार्जितव्यम् । मार्जनीयम् । क्यपि; मृज्यम्। ध्यणि, मार्यम् ॥ ३५॥ विदक ज्ञाने । “तिवां णवः-"|१२|११७॥ इति वा णवाद्याः, वेद, विदतुः, विदुः, वेत्थ, विदथुः, विद, वेद, विद्व, विद्म । पक्षे वेत्ति, वित्तः, विदन्ति, वेत्मि, वित्थः, वित्थ, वेद्मि, विद्वः, विद्मः । “समो गम्-"॥३३॥८४॥ इति कर्मण्यसत्या- त्मनेपदे । “तौ मुमो- "॥१३१४॥ इत्यनुस्वारानुनासिकौ; संवित्ते, संवित्ते, संविदाते; "वेत्तेर्नवा"।।४।२।११६॥ इति अन्तो वा रति; संविद्रते। पक्षे; “अन- तोऽन्त-"॥४।२।११४॥ इत्यति, संविदते, संविदत्से, दाथे, हे, दे, द्वहे, द्महे । साप्ये तु परस्मैपदम्, संवेत्ति शास्त्रम् । क्ये, विद्यते । विद्यात् । संविदीत । “पञ्चम्याः कृग्"॥३४॥५२॥ इति वा आमि, विदाङ्करोतु; कित्त्वान्न गुणः, विदाकु ५ रु- ताम् , र्वन्तु, रु, रुतम् , रुत, विदाङ्करवा ३ णि, व, म । संविदाकु ६ रुताम् , ताम्, र्वताम्, रुष्व, थाम् , रुध्वम्, संविदाङ्कर ३ वै, वावहै, वामहै । पक्षे । वेत्तुं, वित्ताम्, विदन्तु, विद्धि, वित्तम्, वित्त, वेदा ३ नि, व, म ।

अदादिगणः । १५९ . . संवित्ताम् , संविदाताम् । वा रति; संविद्रताम्, संविदताम्, संवित्व, संवि २. दाथाम्, द्ध्वम् , संवे ३ दै, दावहै, दामहै। य० ॥ अवेत् । अविचाम्, "सिज्विद-"॥४।२।९२॥ इति पुसि; अविदुः। अविदन् , इत्यपि कश्चित् । “से: स्दाम्-"॥४॥३७९॥ इति सिक्लुक् दो वा रुश्च । अवेत् ; अवेः, अवित्तम्, अवेदम् । समवि ५ त्त, दाताम् , द्रत, दत, त्थाः ॥ अद्य० ॥ अवेदीत् । अवे ३ दिष्टाम् , दिषुः, दीः । समवेदिष्ट, समवेदिषाताम् । अवेदि, अवेदि ३ षाताम् ; ध्वम्, इदम् । “वेत्तेः कित्"॥३४॥५१॥ इति वा आमि; विदाञ्च १० कार, क्रतुः, क्रुः, कर्थ, क्रथुः, क्र, कर, कार, कृव, कृम । विदाम्बभू ९ व, वतुः, वुः, विथ, बथुः, व, व, विव, विम । विदामा ९ स, सतुः, सुः, सिथ, सथुः, स, स, सिव, सिम । संविदाश्च ९ क्रे, काते इत्यादि । संविदांबभूव, आस वेत्यादि च । पक्षे, विवेद, विविदतुः, विविदुः, विवेदिथ, विवि २ दथुः, द, विवेद, विवि- दि २ व, म । संविविदे; संविविदिमहे ॥ भाक ॥ विदांच ९ के, काते, क्रिरे, कृष, काथे, कृवे, के, कृवहे, कृमहे । विदांबभू १० वे, वाते, विरे, विषे, वाथे, विध्वे, विवे, वे, विवहे, विमहे । विदामा ९ हे, साते, सिरे, सिषे, साथे, सिध्वे, से, सिवहे, सिमहे । संविदा ३ चक्रे, बभूवे, आहे इत्यादि । पक्षे, वि. विदे, विविदाते; विविदिध्वे । विद्यात् । वेदि २ षीष्ट; षीध्वम् । वेदिता । वेदि- ध्यति । “रुदविद ॥४॥३॥३२॥ इति क्त्वासनोः कित्त्वे; विविदिषति। वेविद्यते । वेविदीति, वेवत्ति, वेवित्तः, वेविदति; वेत्तेनवा" |४|११६॥ इत्यत्र तिनिर्देशाधङ्लुपि न रत् । व्यतिवेविंदते । “समो गम्-"।।३।३।८४॥ इत्यात्मने- पदे, संवेवित्ते, संवेविदाते. ॥ क्ये, वेविद्यते । ह्य० ॥ अवे ७ विदीत्, वेत् , वित्ताम् , विदुः, विदीः, वेः, विदम् । अद्य० ॥ अवेवे २ दीत् , दिष्टाम्। “वेत्तेः कित्॥३।४।५१॥ इत्यत्र तिन्निर्देशाद्यङ्लुपि आम् वा न, किन्तु “धातोरनेक-" ॥३४॥४६॥ इति नित्यं आम् ; वेवेदांचकार। वेदयति; निवेदयति। अवीविदत् । विवेदयिषति । सति “वावेत्तेः कसुः॥५।२।२२॥ विद्वान्। विदुषी । पक्षे, विदन् । विदती । वेदिष्य ३ न, न्ती, ती। संविदानः। विद्यमानम् । वेदिष्यमाणम् । विविद्वान् । संविविदानः । विदितः २, वान् । भावे तु; विदितमनेन । वेदिर, ता, तुम् । विदित्वा । संविद्य ॥ ३६ ॥ ..

क्रियारत्नसमुच्चयः। हनं हिंसागत्योः। अनिट् । हन्ति प्रतिहन्ति प्रहन्ति निहन्तिः "नेा- दा-"॥२।३।७९॥ इति णिः,प्रणिहन्ति। “यमिरमि-"॥४॥२॥५५॥ इति नलुकि, हतः, "गमहन॥४२॥४४॥ इत्युपान्त्यलुकि, "हनो ह्र॥२।१।११२॥ इति नि,म्नन्ति; "हनो घि"।।२।३।९४॥ इति णत्वनिषेधे; प्रनन्ति। "क्रियाव्यतिहार-"॥३३॥२३॥ इत्यत्र हिंसार्थवर्जनात्परस्मै, व्यतिनन्ति; हंसि, हथः, हथ, हन्मि, हन्वः, हन्मः । "वमि वा ॥२।३।८३॥ इति वा गले; प्रहण्मि, प्रहन्मि, प्रहण्वः, प्रहन्वः, प्रहण्मः, प्रहन्मः; अन्तर्हण्मः, अन्तर्हन्मः । “आङो यम-"॥३॥३॥८६॥ इत्यात्मने- पदे कर्मण्यसति; आहते । स्वाङ्गे कणि; आहते शिरः। नेह, आहन्ति शिरः शत्रोः । आनाते, आप्ते, आहसे, आप्नाथे, आहध्वे, आने, आह २ न्वहे, न्महे; पाहण्वहे, प्राहण्महे । क्ये, हन्यते । “हनः"॥२।३।८२॥ इति णवे, प्रहण्यते; पराहण्यते; निहण्यते; अन्तर्हण्यते । हन्यात् । आनीत । हन्तु, हतात्, द्, हताम्, मन्तु,“शास-॥४।२।८४॥ इति जहौ; जहि, हतात् हतम्, हत, हना ३ नि, व, म । आहताम् , आनाताम्; आहस्व ॥ ह्य० ॥ अहन् , अहताम्, अनन् , अहन् , अहतम् , अहत ॥ अद्य०॥ “अद्यतन्यां वा त्व-॥४४॥२२॥ इति वधेऽनुखारेत्त्वेऽप्यनेकवरत्वादिटि, अल्लुकः स्थानिलेन “व्यञ्जनादेः-४।३४७॥ इति न वृद्धिः; अवधीत्, अवधिष्टाम्, अवधिषुः । “वात्मने"॥३।४।६३॥ आवधिष्ट, आवधि ८ षाताम्, षत; पाथाम् , ध्वम्, ड्ढ्वम्, षि०। पक्षे, “हनः सिच्”॥४॥३॥३८॥ इति सिचः कित्त्वान्नलुक्, “धुहस्य-"॥४।३।७०॥ इति सिच् लुक् च, आहत, आहसाताम्, आह ८ सत, थाः, साथाम, ध्वम् , ध्वम्, सि, स्वहि, स्महि ॥ भाक ॥ वा वधादेशे त्रिचि; अवधि; इटि, अवधिषाताम्॥ पक्षे जिचि, “जिणवि घन्”।४।३।१०१॥ अघानि, “स्वरग्रह-"॥३।४।६९॥ इति वा जिटि, अघानि ९षाताम् , षत,ष्ठाः, षाथाम् ,ध्वम् , ड्ढवम्, षि, वहि, महि। तत्पक्षे; अह ९ साताम् , सत इत्यादि । जघान, जन्नतुः, जघ्नुः, “अङे हि-" ॥४॥१॥३४॥ इति हो घः, जघनिथ, जघन्थ, जन्नथुः, जन, जघान, जघन, जनिव, जनिम । आजन्ने; आजनिमहे । आशीविषये, “हनो वध-"॥४४॥२१॥ इति वधे, वध्यात्, वध्यास्ताम् । आवधिषीष्ट, आवधिषीयास्ताम् । अत्र विषय- अवाविमणः। विज्ञानात पूर्वमेव वधादेशे इट् सिद्धः; अन्यथा तु विहितव्याख्याने एकस्वर- वात् इट् न स्यात् । भाक । अाविति निषेधात् सिविषये न वधः, घानिषीष्ट हन्ता; आहन्ता; घानिता । "हनृतः-"hea४९॥ इतीटि; हनिष्यति, धानिष्यते । अहनिष्यत्, त; अघानिष्यत । कर्मकर्तरि जिक्यात्मनेषु प्राप्तेषु "णिस्नु-"॥३।४।९२॥ इति आत्मनेपदाऽकर्मकवाञिचो “भूषार्थ ॥३।४।९३॥ इति क्यस्य च निषेधात् आत्मनेपदे; आहते । आवधिष्ट। आहत । आहन्ता । आह- निष्यते वा गौः स्वयमेव; "णिस्नु.॥३।४।९२॥ इत्यत्र त्रिनिषेधात् “भूषार्थ-" ॥३।४।९३॥ इति जिनिषेधो न भवति पृथग्योगात् । आघानिष्ट । आघा. निता । आघानिषीष्ट गौः स्वयमेव । "खरहन्-'॥४।१।१०४॥ इति दीपे, जिघां- सति । “हनो नीर्वधे॥४।३।९९॥ जेनीयते । वधेऽपि विकल्पेन मीत्यन्ये; लं जेनीयसे, जवन्यसे । नि इत्यकृत्वा नी इति निर्देशाद्यङ्लुप्यपि नी; जेनेति, जेनयीति, जेन्नीतः, जेनियति । क्ये, जेनीयते । हौ, जेनीहि । शेषं जिंस्थानो- क्तवत् । अन्यतु यङ्लुपि नी नेच्छन्ति । वधादन्यत्र तु, गतौ; जङ्घन्यते । जङ्घनीति, जवन्ति । “यमिरमि-"॥४॥२॥५५॥ इति नलुकि, “अड़े हि-१ १३४॥ इति धे, जङ्घतः, जाति, जङ्घनीषि, जङ्घसि, जङ्घथः, जक्थ, जब नीमि, न्मि, न्वः, न्मः । क्ये, जङ्घन्यते । हौ, “शासस्॥४।२।८४॥ इति जहौ, जहि; नेच्छन्त्यन्ये; जङ्घहि ॥ ह्य० ॥ अजछन् , अजङ्घनीत् , अजङ्घताम् , अजनुः, अजङ्घन ; अजङ्घत ।अद्यतन्यादौ तु पचिवस् । येतु “यमिरमि-"। ४।२।५५॥ इति लुगभावं क्डिति “अहन्पश्चम-"॥४।१।१०७॥ इति हन्तेरपि दीर्घवं चेच्छन्ति तन्मते तसि; जवान्तः । थमि, जङ्घान्थः । हौ, जङ्घांहि इत्याद्यपि भवति । "णिति घात् "॥४।३।१००॥ घातयति । अजीतत्, अजीतताम् । नन्, “हनो घि”।२।३।९४॥ इति न णः, प्रनन् । नती । आनानः। हन्यमानम् । हनिष्य ४ न्, ती, न्ती, माणम् । “गमहन-"||४|४|८३।। इति वेटि, जनिवान्, जघन्वान् । आजन्नानः। हतः,२ वान् । हत्वा । “यपि"॥१२॥५६॥ इति न्लुकि, प्रहत्य । हन्ता । हन्तुम् । हननीयम् । हन्तव्यम् । ध्यणि, घात्यम् ॥ ३७ ॥ वशक् कान्तौ; इच्छायाम् । “यज-"॥२।११८७॥ इति षः, वष्टि; “वशेर. २२ क्रियारलसमुच्चयः। यडि"॥११॥८॥ इति स्वृति; उष्टः, उशन्ति, वक्षि, उष्ठः, उष्ठ, वश्मि, उश्वा, उश्मः । उश्यते । उश्यात् । वष्टु, उष्टात् , उष्टाम्, उशन्तु । “हो धुट्-"॥२१ ।८२॥ इति घिः, “यज-'॥२।१८७॥ इति षः, “तवर्गस्य-"॥११३६०॥ इति ढः, "तृतीयस्तृ-"॥१३॥४९॥ इति डः, उड्ढि, वशानि । अवट, ड्, औष्टाम् , औशन् , अवट , ड्, औष्टम् , औष्ट, अवशम् , औश्व, औश्म । औश्यत । अवाशीत्, अवशीत्, अवाशि, अवशिषाताम् । “यजादिवश्-"॥४।१७२।। इति पूर्वस्य स्वृति; उवाश, ऊशतुः, ऊशुः, उवशिथ, ऊशथुः, ऊश, उवाश, उवश, ऊशि २ व, म । ऊशे; ऊशिमहे । उश्यात् । वशिषीष्ट । वशिता २ । वशिष्यति । विवशिषति । वावश्यते । वाव १२ शीति, ष्टि, ष्टः, शति, शीषि, क्षि, ष्ठः, ष्ठ, शीमि, शिम, श्वः, इमः, यङ्लुप्यपि क्ङिति परे वृदित्यन्ये, वाव- टि, वोष्टः, वोशति । वाशयति । अवीवशत् । उशन् । उशती । वशिष्यन् । उशिवान् । ऊशानम् । उशितः, २ वान् । “स्वा॥४॥३॥२९॥ इति न कित्, वशित्वा । प्रोश्य । वशि २ ता, तुम् ॥ ३८॥ असक् भुवि; भूः सत्ता। अस्ति; प्रादुरस्ति । "नास्त्योः-"॥४।२१९०॥ इत्य- लुकि; स्तः; प्रादुःस्तः; अनुस्तः; निस्तः; सन्ति; “प्रादुरुपसर्ग-"॥२।३।५८॥ इति षे, प्रादुःषन्ति; अभिषन्ति; निषन्ति; विषन्ति । शिड् नान्तरेऽपि; निःषन्ति, असि, "अस्तेः सि-"॥४॥३।७३॥ इति सो लुक्; स्थः, स्थ; अस्मि, स्वः, स्मः, प्रादुःस्मः; अनुस्मः। व्यतिस्ते; “प्रादुः ॥२।३।५८॥ इति थे, व्यति २ पाते, षते; "अस्तेः सि-॥४॥३॥७३॥ इति सो लुकि; व्यतिसे, व्यति ३ पाथे, द्ध्वे, ध्वे । हस्खेति, व्यति ३ हे, वहे, स्महे । स्यात् । षत्वे, प्रादुःण्यात्; अभिष्यात्; निःण्यात्, स्याताम्, स्युः, स्याः, स्यातम्, स्यात, स्याम्, स्याव, स्याम । व्यति- षीत । अस्तु, स्तात्, स्ताम्, सन्तु, "शासस्हन:-"॥४२॥८४॥ एधि, स्तम्, स्त, असा ३ नि, व, म । व्यति ७ स्ताम्, षाताम्, षताम्, ख, षा- थाम, ध्वम् , द्ध्वम्, व्यत्य ३ सै, सावहै, सामहै । “सः सिज-"॥४॥३॥६५॥ इति ईति, आसीत्, “एत्यस्तेः॥४॥३०॥ इति वृद्धिः; आस्ताम्, आसन् । माङा योगे तु न वृद्धिरल्लुक् तु भवेत् ; मारम भवन्तः सन्। आसीः, आस्तम्, अदादिगणः । १६३ . आस्त, आसम्, आख, आस्म । व्यत्या १० स्त, साताम्, सत, स्थाः, साथाम् , ध्वम् , ध्वम्, सि, स्वहि, स्महि । “अस्तिब्रुवोः-१॥ इति म्वादेशे; भूयते । अभूत् । बभूव । भूयात् । भविता । भविष्यति । बुभूषति । बोभूयते । एवमशिति भूबत् । सन् । सती । विषन् ॥ ३९ ॥ यङ्लुक्च । सर्वे धातवो यङ्लुबन्ताः कित्करणाददादौ शव्प्रत्ययानहीं: परस्मैपदिनश्च । बोभवीति, बोभोति इत्यादि । "क्रियाव्यतिहारे."॥३।२३।। इत्यात्मनेपदे "शीङोरत्"।।२।११५॥ इत्यत्र डिन्निर्देशेन यङ्लुबन्तस्याग्रहणा- दन्तोरदभावे "अनतोऽन्त-१२।११४॥ इत्यति; “योऽनेक-"॥२।१।५६॥ इति यवे च; व्यतिशेश्यते । “शीङ ए:-"।४।३।१०४॥ इत्यत्रापि ङित्त्वात् ; तिवाशवा इति यलुबन्तस्याग्रहणम् तेन न एः; व्यतिशेशीते । यङ्लुबन्तमात्मनेपदे न प्रयुज्यते इत्येके । भावकर्मणोरात्मनेपदे न प्रयुज्यते इत्यन्ये । यङ्लुबन्तस्य चर्करीतं, चर्करीतिश्च पूर्वेषां संज्ञा । यङ्लुबन्तं छन्दस्येवति केचित् ॥ ४० ॥ अथात्मनेपदिनः । इंक् अध्ययने । अनिट् । अधीते, अधीयाते, अत्र इय्; अधीयते, अधीषे, अधीयाथे, अधी ४ ध्वे, ये, वहे, महे । क्ये, अधीयते । अधीयीत । अधीयेत । अधीताम् । ऐवि, अध्ययै । अधीयताम् । अध्येत, अध्ययाताम् ; इयादेशे वृद्धिः; अध्ययत, अध्यैथाः, अध्ययाथाम् , अध्यध्वम्, अध्यैयि, अध्यै- वहि, अध्यैमहि। क्ये, अध्ययत । “वाद्यतनीक्रिया-"॥४४॥२८॥ इति वा गीङ्; अध्यगीष्ट, अध्यगी ५ षाताम् , षत, ठाः; ड्ठम् , दम्। पक्षे वृद्धौ, अध्यैष्ट, अध्यै ५षाताम् , षत, ठाः; ड्वम् , दम् । भाक । अध्यगायि, अध्यायि, अध्यगीषाताम् , अध्यैषाताम्, शेषं कर्तृवत् । ब्रिटि, अध्यगायिषाताम्, अध्यायिषाताम् , अध्य- गायि ३ ध्वम्, वम्, ड्वम् । अध्यायि ३ ध्वम्, वम्, ड्वम् । परोक्षायाम्॥४॥२६॥ अधिजगे, अधिज ३ गाते, गिरे, गिषे । अध्ये २ षीष्ट, षीदवम् । अध्यायि ३ षीष्ट; षादवम् , षाध्वम् । अध्येता २; अध्यायिता । अध्येष्यते २. अध्यायिष्यते । वा गीडि, अध्यगीण्यत; अध्यैष्यत । सिटि, "गा:

१५४ क्रियारलसमुच्चयः । अध्यगायिष्यत, अध्यायिष्यत । “सनीङश्च"२५॥ इति गमुः; गमोऽनात्मने" ॥४॥५१॥ इत्यत्र निषेधात्, आत्मनेपदे नेट् । “स्वरहन्-"॥४।१।१०४॥ इति दीर्घश्च; अधिजिगांसते विद्याम् । अधिजिगां ४ स्यते, सिष्यते, समानः, सिष्य- माणः । आत्मनेपदाभाचे तु इटि; अधिजिगमिषिता शास्त्रस्य । अधिजिगमिषुः । अधिजिगमिषि २ तः, तव्यम् । इह इटं नेच्छन्त्यके तन्मते; अधिजिगांसते । अधिजिगांसिष्यते । अधिजिगांसिता । अधिजिगांसुः। अधिजिगांसितव्यमित्या. येव भवति । “णौ क्रीजीङः॥१२॥१०॥ इत्यात्त्वे, “अर्ति ॥४॥२१॥इति पौ, "चल्याहारार्थेङ् ॥३।३।१०८॥ इति परस्मैपदे च; सूत्रमध्यापयति शिष्यम् । " णौ सन्डे वा "॥४४॥२७॥ गाः ङे, अध्यजीगपत्; अध्यापिपत् । सनि, अधिजिगापयिषति, अध्यापिपयिषति । अधीयानः । अध्येष्यमाणः । अधीयमा- नम् । अधिजगानः । अधीतः, २ वान् । अधीतिः। अधीत्य । अध्ये २ ता, तुम् । अध्येयम् । विपि, अधीत् । “धारीङोऽकृच्छ्रेऽतृश्"।५।२।२५॥ अधीयन् सिद्धान्तम् । “तृन्नुदन्त-"॥२।२।९०॥ इति न षष्ठी । “इष्टादेः॥७१११६८॥ इति क्तान्ताद् इनि, अधीती शास्त्रे, अत्र “व्याप्ये क्तेनः"॥ २।२।९९ ॥इति सप्तमी ॥ ४१ ॥ शीङ् स्वप्ने । सेट् । “शीङ ए: शिति"॥४।३।१०४॥ शेते; संशेते; अनु- शेते; अतिशेते; “अधेः शीङ् ॥२।२।२०॥ इत्याधारस्य कर्मत्वे, ग्राममधिशेते, शयाते, "शीडोरत्"।४।२।११५॥ इत्यन्तो रति; शेरते, शेषे, शयाथे, शेध्वे, शये, शेवहे,शेमहे । “विङति यि शय्॥४।३।१०५॥शय्यते।शयीत। शेताम, शयाताम्, शेरताम् , शेष्व, शयाथाम् । अशेत, अशयाताम् , अशेरत०। इ, अशयि; अश- यिष्ट, अशयिषाताम् । अशायि, अशयिषाताम्, अशायिषाताम् , अशयिध्वम्, दवम् , इढ्वम् ; अशायि ३ ध्वम्, इम्, ड्ढ्वम् , अशयिषि; अशायिषि । शिश्ये, शिश्याते; शिश्यि २ ट्वे, ध्वे; शिश्यिमहे । शयिषीष्ट २, शायिषीष्ट; शयि २ षोदवम् , षोध्वम् , शायि २ षीदवम् , ध्वम् । शयिता २, शायिता । शयिष्यते २; शायिष्यते। शिशयिषते। "क्ङिति यि शय्॥४।३।१०५॥ शाशय्यते । शेषं शया- देशे व्यञ्जनान्तवाद् यङन्तपचवत्। "अतः॥४॥३८२॥ इति अल्लुकि, "योs. .

अदादिगणः। शिति"||३१८ ।। इति य्लुकि च; शाशयिता। अन्येतु लाक्षाणकव्यञ्जनाद् यलोपं नेच्छन्ति; शाशय्यिता। शेशेति, शेशयीति, शेशीतः, शेश्यति, शेशेषि । व्यतिशे ३ शीते, श्याते, श्यते । श्येश्यत् । “न डीशीङ्-"।।४।३।२७॥ इत्यत्र ङिनिर्दे- शाद्यङ्लुपि क्तयोः कित्त्वमेव; शेश्यितः, २ वान् । यपि; संशेशीय । शेषं लुषि जिंवत् । अणिगि प्राणि-"॥३।३।१०७॥ इति परस्मैपदे, मैत्रं शाययति । अशी- शयत् । शयानः। शयिष्यमाणः । शय्यमानम् । शिश्यानः। “न डीङ्-"॥४॥३॥ २७॥ इति कित्त्वाभावे, शयितः, २ वान् । “श्लिषशीङ्-"॥५॥१॥९॥ इति साप्या- दपि वा कर्तरि क्ते; अतिशयितो गुरु शिष्यः । पक्षे कर्मणि क्ते; अतिशयितो गुरुः शिष्येण । शयित्वा । उपशय्य । शयि २ ता, तुम्। शेयम् ॥४२॥ ढुंङ्क अपनयने; अपलापे । अनिट् । “मनयवल-॥१॥३॥१५॥ इति मो- ऽनुनासिकानुस्खारौ, किन्नुते; किंनुते; अपह्नते; "श्लाघौँ-॥२।२।६०॥इति चतुर्थ्याम् , चैत्राय निनुते, नुवाते, नुवते, नुषे। नूयते। ह्लवीत । नुताम् । अनुत, अनुवाताम् , अनुवत । अह्रोष्ट, अह्रोषाताम् । अह्रावि, अह्रोषा- अह्नाविषाताम् । जुनुवे, जुनुबाते । होषीष्ट, ह्राविषीष्ट । होता, ह्रावि- ता।ह्रोष्यते; ह्लाविष्यते । अपजुनूषते । जोनूयते । नावयति । अजुनुवत्। नुवानः । नूयमानम् । इनोष्यमाणः । नुतः, २ वान्। नुवा । अपह्नत्य । ह्नो २ ता, तुम् । नव्यम् । नाव्यम् ॥ ४३ ॥ पूडौक् प्राणिगर्भविमोचने । सूते, सुवाते, सुवते, सूषे, सुवाथे, सूध्ये, सुवे, सूवहे, सूमहे। सूयते । सुवीत। सूताम् , सुवाताम्, सुवताम्, सूष्व, सुवा- थाम् , सूध्वम् । “सूतेः पञ्चम्याम्"॥४॥३॥१३॥ इति गुणाभावे, उवि च; सुवै, सुवावहै, सुवामहै । असूत । औदिलाटेटि, असोष्ट, असविष्ट, असावि, असो- पाताम् , असविषाताम् । मिटि, असाविषाताम् । सुषुवे, “नाम्यन्त-"॥२॥३॥१५॥ इति षः; सुषुवाते; सुषुविषे । सोषीष्ट, सविषीष्ट; साविषीष्ट । सोता, सविता; साविता । सोष्यते, सविष्यते; साविष्यते । “ग्रहगुहश्च-"|४|४|५९॥ इति नेटि, "णिस्तोरेव-"॥२३॥३७॥ इति नियमेन न षले, सुसूषते । सोषूयते । सोषोति, सोषवीति, सोपूतः, सोषुवति । शेष भूवत् । सोषवाणि, सोषवा २ व, म । ताम्, , , कियारनसमुच्चयः। "सूतेः पञ्चम्याम् ॥३॥१॥ इत्यत्र तिनिर्देशाद्गुणनिषेधो न भवति । साव- यति । असूषवत् । णौ सनि, सुषावयिषति । सुवानः । सविष्यमाणः । सूय- मानम् । सुषुवाणः । “उवर्णाद्॥४।४।५८॥ इति किति नेट, सूतः, २ वान् । सूतिः । “निःसुवे:-"॥२॥३॥५६॥ षः, निःपूतिः। दुःपूतिः । सूला। प्रसूय । सो २ ता, तुम् । सवि २ ता, तुम् ॥ ४४ ॥ पृचैङ्क् सम्पर्चने; मिश्रणे । पृक्त; संपृक्ते, पृचाते, पृचते, पृक्षे, पृचाथे, पृग्ध्वे; "तृतीय-"॥१३॥४९॥ इति गः, पृचे, पृच्चहे, पृथ्महे । पृच्यते। अप- र्चिष्ट । पपृचे । पृचिता । सम्पर्चिष्यते। संपिपर्चिषते । परीपच्यते । पर्पति, पर्ष चीति । सम्पर्चयति । अपीपृचत् ; अपपर्चत् । पृचानः। पर्चिष्यमाणः । पर्चि २ ता, तुम्। पर्चिला। संपृच्य। ऐदित्वात् क्तयोर्नेट; संपृक्तः, २ वान् । “ऋदुपान्त्य." ॥५॥१॥४१॥ इति क्यपि; संपृच्यः ॥ ४५ ॥ ईडिक् स्तुतौ । ईट्टे, ईडाते, ईडते । “ईशीडः॥४।४।८७॥ इतीटि; ईडिषे, ईडाथे, ईडिध्वे, ईडे, ईड्वहे, ईड्महे । ईड्यते । ईडीत । ईट्टाम् , ईडाताम् , ईडताम्, ईडिष्व, ईडाथाम् , ईडिध्वम् , ईहै, ईडावहै, इडामहै । ऐट्ट, ऐडा- ताम्, ऐडत, ऐट्ठाः, ऐडाथाम् , ऐड्वम् , ऐडि, ऐड्वहि, ऐड्महि । ऐडिष्ट, ऐडिषाताम् । ऐडि । ईडां ३ चक्रे, बभूव, आस । ईडिषीष्ट । ईडिता । ईडि- ष्यते । ऐडिष्यत । ईडिडिषते । ईडयति । ऐडिडत् । ईडानः । ईडिष्यमाणः । ईडाचक्राणः । ईडि ५ ता, तुम्, वा, तः, २ वान् । घ्यणि, ईड्यः ॥ ४६॥ ईरिक गतिकम्पनयोः । ई, ईराते, ईरते, ईर्षे, ईराथे, ईचे। ईर्यते । ईरीत। ईतम्, ईराताम् , ईरताम् , ईल, ईराथाम्, ईर्ध्वम्, ईरै। ऐत, ऐराताम्, ऐरत, ऐर्थाः। ऐरिष्ट, ऐरिषाताम्। ऐरि। ईराञ्चके। ईरिषीष्ट । ईरिता। ईरिष्यते । ऐरिष्यत । ईशिरिषते । ईरयति, ते। ऐरिरत् । ईराणः । ईरि ५ ता, खा, तुम्, तः, २ वान्। ध्यणि, ईर्यः ॥ ४७ ॥ ईशिक् ऐश्वर्ये । “स्मृत्यर्थ-"॥२॥११॥ इति वा कर्मणः कर्मले "शेषेगा २२२१८१॥ इति षष्ठयाम् ; भुव ईष्टे; भुवमीष्टे, ईशाते, ईशते; "ईशीडः-४४८७॥ टि; ईशिष, ईशाथे, ईशिध्वे। ईश्यते। ईशीत । ईष्टाम्, ईशाताम्, ईशताम् अदादिगणः । इंशिष्व; ईशिध्वम्, ईशै। ऐट, ऐशाताम् , ऐशताम्, ऐष्ठाः, ऐशाथाम् । “यज-" ॥२।१।८७॥ इति षे, "तवर्ग-"॥१॥३॥६०॥ इति धो ढे, "तृतीय-"॥१॥३४॥ इति डे; ऐड्ढ्वम् , ऐशि, ऐश्वहि । ऐशिष्ट, ऐशिषाताम् । ऐशि । ईशां ३ चके, बभूव, आस । ईशिषीष्ट । ईशिता । ईशिष्यते । ऐशिष्यत। ईशिशिषते । ईश- यति । ऐशिशत् । ईशानः। ईशिष्यमाणः। ईशाश्चक्राणः। ईशि ५ ता, तुम्, वा, तः, २ वान् ।। ४८ ॥ वसिक् आच्छादने। वस्ते पटम् ; वसाते, वसते, वस्से; “सो धि-"॥४।३।७२॥ इति वा स्लुकि, वध्वे, वद्ध्वे। वस्यते। वसीत । वस्ताम्, वसाताम्, वसताम्। अवस्त, अवसाताम्, अवसत, अवस्थाः; अव २ ध्वम्, ध्वम् । अवसिष्ट । अवासि, अवसिषाताम् । “न शस-४२३०॥ इति न एः, ववसे, ववसाते । वसिषीष्ट । वसिष्यते । वसानः। वसिष्यमाणः। ववसानः। वसि ५ ता, तुम् , ला, तः, २ वान् ॥ ४९ ॥ आङः शासूकि इच्छायाम् । “को"|४|४|११९॥ इत्येव सिद्धे; "आङ"। ४।१२०॥ इति वचनम्, आङः परस्य कावेवेति नियमार्थम् ; तेन शास्तेरासो न इस्; आयुराशास्ते, आशा ९ साते, सते, से, साथे, ध्वे, द्ध्वे, से, स्वहे, स्महे । आशास्यते । आशासीत । आशास्ताम् ; आशास्व; आशाध्वम्, आशा- द्ध्वम् । आशास्त; आशासि २ ट, षाताम् । आशासि । आशशासे; आशशा. सिषे । आशासि ३ षीष्ट, ता, ष्यते । आशिशासिषते । आशाशास्यते । आशाशा २ सीति, स्ति । अशासयति । “उपान्त्यस्य-"॥४२॥३५॥ इत्यत्र शास्तेरेव निषे- धात् हखे; आशीशसत् । अस्यापि हस्खनिषेध इत्यन्ये; आशशासत् । आशासा- नः। आशासिष्यमाणः । आशासि २ ता, तुम् । ऊदित्वात् तिव वेट ; अत एवोत्तरपदान्तस्यापि त्वो न यब् , यपि हि इट्प्राप्तिरेव नास्ति । आशास्त्वा; आशासित्वा । यपमिच्छन्त्येके; आशास्य । वेट्लात् क्तयोर्नेट, आशास्तः, २ वान् । मतेनेटि; आशासितः, २ वान् ॥५०॥ आसिक् उपवेशने । आस्ते; उदास्ते; उपास्ते । “कालाध्व-"॥२२॥२३॥ इति कर्मले; मासमास्ते । “अधेः शीङ्-१॥२२॥२०॥ इत्याधारस्य कर्मले, प्राम- क्रिवारमसमुच्चयः। मध्यास्ते, आसाते, आसते,आस्से, आसाथे, आध्ये, आध्वे; “सो धि-"॥४॥३॥७२॥ इति वा स्लुक्, आसे, आस्वहे, आस्महे । आस्यते । आसीत, आसीयाताम् , आसीरन् । आस्ताम्, आसाताम्, आसताम् । आस्त, आसाताम् , आसत । आसिष्ट, आसिषाताम् , आसिषत । आसि । “दयाय "॥३४॥४७॥ इत्यामि%B आसां ३ चक्रे, बभूव, आस। पर्युपासां ३ चक्रे । आसि ३ षोष्ट, ता, ष्यते। अध्या- सिसिषते। “अणिगि प्राणि-"३।३।१०७॥ इति परस्मैपदे, आसयत्यन्यम् । आसि- सत् । आनशि, “आसीनः"||४|४|११५॥ इति निपातनादासीनः; उदासीनः3; उपासीनः; अध्यासीनः । आसिष्यमाणः । आस्यमानम् । आसाश्चक्राणः । आ- सितः, २ वान् । आसि ३ ता, तुम् , त्वा । उपास्य ॥ ५१ ॥ णिसुकिं चुम्बने । निस्ते; णपाठात् “अदुरुपसर्ग-"॥२।३१७७॥ इति णवे, प्रणिस्ते; परिणिस्ते । वा णत्वमित्यन्ये । प्रणिस्ते, प्रनिस्ते, निसाते; निंसते; "नाम्यन्तस्था-"॥२॥३॥१५॥ इत्यत्र शिटा नकारेण चान्तरेपीति प्रत्येक वाक्यपरि- समाप्तेरुभयव्यवधाने न षत्वम् ; निस्से, निसाथे । “सोधि-"॥४॥३॥७२॥ इति वा सोलुकि, निध्वे, निद्ध्वे, निसे, निखहे, निस्महे । निस्यते । अनिसिष्ट, अनिसिषाताम् । निनिसे; प्रणिनिसे । निसिष्यते । निनिसिषते । नेनिस्यते । नेनिंसीति । निसयति । अनिनिंसत् । निसितः । निसि ३ त्वा, तुम् , तव्यम् । ध्यणि, निस्यम् । “निसनिक्ष-"||२।३।८४॥ इति कृति वा णत्वे, प्रणिंसनम्, प्रनिसनम् ॥ ५२॥ चक्षिक व्यक्तायां वाचि । “संयोगस्यादौ-"॥२।१।८८॥ इति क्लुकि, आ- चष्टे; व्याचष्टे; प्रत्याचष्टे; आच ४ क्षाते, क्षते, क्षे, क्षाथे । क्लुकि, "तृतीय"। १॥३॥४९॥ इति षस्य डवे, आच ४ ड्ड्वे, क्षे, वहे, महे । अशिति; “चक्षो- वाचि-"॥४४॥ इति क्शांग्ख्यांगौ । आक्शायते । “शिट्याद्यस्य-"॥१॥३१५९॥ इति कः खत्वे, आख्शायते। आख्यायते। एवमग्रेऽपि सर्वत्र त्रीणि २ रूपाणि । आचक्षी ३ त,याताम् , रन् ।आचष्टाम् , आच७क्षाताम् ; श्व, क्षाथाम् , ढ्वम्, १०। आचष्ट, आचक्षाताम् , आचक्षत, आच ६ ष्ठाः, क्षाथाम् , ड्वम् , क्षिः । गित्वादुभयपदे; आक्शा ९सीत् , सिष्टाम्, सिषुः । “शास्त्यसू.॥३४६०॥ इत्य- .

अदादिगणः । डि; आख्यत, आख्यताम्। आक्शास्त; आख्यत, आक्शासाताम् ; आख्येताम् , आक्शासत; आख्यन्त। आक्शायि; आख्यायि, आक्शासाताम् ; कः खत्वे, आ- ख्शासाताम् ; मिटि, आक्शायिषाताम् ; आखशायिषाताम्, आख्यासातास; आख्यायिषाताम् । एवमग्रेऽपि कर्मणि आशीःप्रभृतौ पाप्यमवगन्तव्यम् । आक्शा २ ध्वम्, द्ध्वम् ; आक्शायि ३ ध्वम् , ढ्वम्, ड्ढ्वम् ; आख्या २ ध्वम् , द्ध्वम् ; आख्यायि ३ ध्वम् , वम् , ड्वम् । “नवा परोक्षायाम्" ॥४।४।५॥ क्शांग्ख्यांगौ; आचक्शौ; आचख्शौ; आचख्यौ । आचक्शे; आच- ख्रशे; आचख्ये। पक्षे, आचचक्षे, आचच ३ क्षाते, क्षिरे, क्षिषे । वा ए; आक्शेयात् , आक्शायात्, आख्येयात्, आख्यात् । आक्शासीष्ट, आक्शायिषीष्ट; आख्या- सीष्ट, आख्यायिषीष्ट । आक्शाता; आख्याता । आक्शास्यति, ते; आख्या- स्यति, ते । आचिक्शासति, ते; आचिख्यासति, ते । आचाक्शायते; आचा- ख्यायते । आच २ क्शेति, क्शाति; आचा २ ख्येति, ख्याति । शेषं चैंवत् । आक्शापयति; आख्यापयति । आचिक्शपत्; आचिख्यपत् । आचक्षाणः । आचक्शिवान ; आचख्यिवान् । आचक्शानः; आचख्यानः; आचचक्षाणः । कशा ४ ता, तुम्, तः, २ वान्। ख्या ४ ता, तुम्, तः, २ वान् । क्शावा, ख्यात्वा । आकशाय; आख्याय । आक्शातव्यम् ; आख्यातव्यम् । आक्शेयम् ; आख्ययम्। उभयत्र विषयसप्तमीविज्ञानात् प्रागादेशे ततो यः । वागर्थस्यैव क्शांगल्यांगो, तेन वर्जनार्थाद् घ्यणि संचक्ष्या दुर्जनाः; वर्जनीया इत्यर्थः। परिसञ्चक्ष्याः । क्तिव, सश्चक्ष्य गतः । भक्षणार्थात्तु क्त्वादौ, चक्षि ३ त्वा, ता, तः । चक्ष्यम् ॥ ५३ ॥ . अथोभयपदिनः । ऊर्णगक् आच्छादने । “ वोर्णोः "॥४।३।६०॥ इति औत्वे, प्रोणीति, प्रोर्णोति, प्रोणुतः, प्रोणुवति, प्रोोषि, प्रोर्णोषि, प्रोणुथः । प्राणुते, प्राणुवाते । प्रोणूयते । "न दिस्योः"॥४।३।६१॥ इति न औत्वम् ; प्रौर्णोत् ; प्रौर्णोः; प्रौणु- तम् , “वोर्गुगः-"॥४।३।४६॥ इति वा वृद्धौ, “वोर्णोः।।४।३।१९।। इतीटो वा डिवे च; प्रौर्णावीत् , प्रौर्णवीत् , प्रौणुवीत्। पौर्णविष्ट, प्रौणुविष्ट । प्रौर्णावि । “गुरुना- ܣ K क्रियारत्नसमुच्चयः। म्य-"॥४८॥ इत्यत्रो!वर्जनात् आमभावे, प्रोणुनाव; प्रोणुनविथ, प्रोणुनु- विथ; इटो वा ङित्त्वेऽपि अवित्परोक्षायाः कित्त्वाद्गुणाभावे, प्रोणुनुविम । प्रोणुनुवे। प्रोग्र्यात्। प्रोर्णविषीष्ट, प्रोणुविषीष्ट; प्रोर्णाविषीष्ट । एवमग्रेऽपि भावकर्मणोः ३३ । "इवृध-"॥४॥४७॥ इति वेटि वा ङित्त्वे, प्रोणुनविष २ ति, ते प्रोणुनुविष २ ति, ते; पक्षे, प्रोणुनूषति, ते। एवं ६॥ “अटयति-"॥३।४।१०॥ इति यङि, प्रोर्णोनूयते। प्रौर्णोनोति, अहेरिति निषेधान्न औः। अन्येलिच्छन्ति, प्रोर्णोनौति, प्रौर्णोनीति, प्रोर्णोनुतः, प्रोर्णोनुवति, इत्यादिमूलप्रकृतिवत् । अद्यतन्यां तु “वोर्गुगः सेटि" ॥४॥३॥४६॥ इत्यत्र गिन्निर्देशाद् यङ्लुपि न विकल्पेन वृद्धिः, किन्तु अङित्त्व. पक्षे “सिचि परस्मै-"॥४।३।४४॥ इत्यनेन नित्यं वृद्धिः, प्रौर्णोनावीत् । ङित्त्वेतु, प्रौर्णोनुवीत्। “वोर्णोः॥४।३।१९॥ इत्यत्र हि अनुबन्धाभावाद्यङ्लुबन्तस्यापि ग्रह- णम्। "ऋवर्णश्न्यू-"या५७॥ इत्यत्र गित्वाद्यङ्लुपि इट् स्यादेव, ऊर्णोनुवितः। ऊर्णोनवि ३ त्वा, ता, तुम्; ऊर्णोनुवि ३ वा, ता, तुम् । प्रोर्णावयति । प्रोर्ण- नवत्, अत्र स्वरादित्वाद् द्वित्वे पूर्वस्य "लघो:-"॥४॥१६४॥ इति न दीर्घः । प्रोणु- नावयिषति । “ऋवर्णश्न्यू-"॥४।४।५७॥ इति नेटि, प्रोणुतः, २ वान् । ऊर्गुला । प्रोर्तुत्य । प्रोर्णवि २ ता, तुम् । प्रोणुवि २ ता, तुम् ॥ ५४ ॥ अथ २० अनिटः। टुंग्क् स्तुतौ । स्तौति; “उपमर्गात्सुग्-"।२।३।३९॥ इाते षवे, अभिष्टौति; “यतुरु-"॥४।३।६४॥ इतीति, स्तवीति, स्तुतः, स्तुवन्ति, स्तौषि, स्तवीषि, स्तुथः, स्तुथ, स्तौमि, स्तवीमि, स्तुवः, स्तुमः । स्तुते, स्तुवाते, स्तुवते, स्तुपे, स्तुवाथे, स्तुध्ये, स्तुवे, स्तुबहे, स्तुमहे । स्तूयते । स्तूयात् । स्तुवीत। स्तौतु, स्तवीतु । स्तुताम् । अस्तौत् , अस्तवीत् ; अभ्यष्टौत, अभ्यष्टवीत् । परिपूर्वस्य, "स्तुस्वजश्च-"||२।३१४९॥ इत्यड्व्यवाये बा पखे, पर्यष्टौत्, पर्यस्तीत् । पर्यष्ट- वीत् , पर्यस्तवीत् ; अस्तुताम् , अस्तुवन् ; अभ्यष्टुवन् , अस्तौः, अस्तवीः । अस्तुत, अस्तुवाताम् , अस्तुवत; अस्तुध्वे । “धूग्सुस्तोः॥४॥८५॥ इतीटि, .

अदादिगणः। , अस्तावीत्, अस्ताविषाताम्। अस्तोष्ट, अस्तोषाताम् । अस्तावि, अस्तोषाताम्, अस्ताविषाताम् । “नाम्यन्त-"॥२।३।१५॥ इति थे, तुष्टाव, तुष्टुवतुः, तुष्टुवुः; "स्क्रसृ.॥४॥४॥८१॥ इत्यत्र स्तोर्वर्जनान्नेट्; तुष्टोथ, तुष्टुवथुः, तुष्टुव, तुष्टाव, तुष्टव, तुष्टुव, तुष्टुम । तुष्टुवे; तुष्टुध्वे; तुष्टुमहे । स्तूयात् । स्तोषीष्ट; स्ताविषीष्ट । स्तोता २; स्ताविता । स्तोष्यति, ते; स्ताविष्यते । तुष्टूपति, ते। अभितोष्ट्रयते। तोष्टवीति, तोष्टोति । स्तावयति । अभ्यतुष्टवत् । तुष्टावयिषति । अन्ये सन्वर्ज द्विवे सति उत्तरस्यापि षत्वं नेच्छन्ति, अभितुस्ताव । णौ ङे, अभ्यतुस्तुवत् । अभितोस्तूयते इत्यादि। स्तुवन् । स्तुवती । स्तोष्य २ न् , माणः । स्तूयमानम् । स्तुतः, २ वान् । स्तुत्वा । अभिष्टुत्य । स्तो २ ता, तुम् । तादौ वेडित्यन्ये तन्मते, स्तवि ३ ता, तुम्, तव्यम् इत्यपि । क्यपि, स्तुत्यः, अभिष्टुत्यः ॥ ५५ ॥ बूंग व्यक्तायां वाचि । “ब्रूगः पश्चानाम्-"॥४।२।११८॥ इति ब्रूग आह, तिवां णवादयश्च; आह,आहतुः, आहुः; “नहाहोईतौ"||२।११८५॥ इति ते; आत्थ, आहथुः। पक्षे, “ब्रूतः परादिः"-॥४॥३।६३॥इतीति, ब्रवीति, ब्रूतः, ब्रुवन्ति, ब्रवीषि, घूथः, ब्रूथ, ब्रवीमि, ब्रूवः, ब्रूमः। ब्रूते, बुवाते, ब्रुवते। ब्रूयात्। ब्रवीत्। ब्रवीतु; अवाणि। ब्रूताम् । अब्रवीत् । अब्रूत । “अस्तिब्रुवोः-"॥४॥४॥१॥ इत्यशिति वच्, "यजादिवचेः-"॥४१७९॥ इति वृत्; उच्यते । “शास्त्यसू-॥३।४।६०॥ इति अङि, "श्वयत्यसू-"॥४।३।१०३॥ इति वोचः; अवोचत् । अवोचत , अवोचेताम् । अवाचि, अवक्षातामित्यादि पचिवत् । “यजादिवश्-'"॥४।११७२॥ इति पूर्वस्य यवृति, उवाच; “यजादिवचेः-"॥४।१।७९॥ इति वृति द्विवे च, ऊचतुः; उवचिथ, उवक्थ; ऊचिम । ऊचे; उचिमहे । उच्यात् । वक्षीष्ट । वक्ता २ । वक्ष्यति, ते । किरादित्वाझिक्ययोरभावे कर्मकर्त्तरि, ब्रूते, अवोचत वा कथा स्वयमेव । विवक्षति, ते । वावच्यते । वाव २ चीति, क्ति ॥ अद्य० ॥ “शास्त्यसू-"॥३।४ १६०॥ इत्यत्र तिनिर्देशान्न अङ्, अवावचीदित्यादि । वाचयति । अवीवचत्, त । ब्रुवन् । ब्रुवती । ब्रुवाणः। उच्यमानम् । वक्ष्य २ न , माणम् । ऊचि- वान् ; अनूचिवान् । ऊचानः। उक्तः, २ वान् । उक्त्वा । वक्ता । वक्तुम् ॥५६॥ द्विषींक अप्रीतौ। द्वेष्टि, द्विष्टः, द्विषन्ति, द्वेक्षि, द्विष्ठः, द्विष्ठ, द्वेष्मि, क्रियारलसमुच्चयः। द्विष्वः, द्विष्मः । द्विष्टे, द्विषाते, द्विषते; द्विड्ड्वे। द्विष्यते। द्विष्यात् । द्विषीत। द्वेष्टु; हौ, हिड्ढि, द्विष्टम् ; द्वेषाणि । द्विष्टाम् । अद्वेट, अद्विष्टाम् । “वा द्विष-"॥ ४।२।९१॥ इत्यनो वा पुसि, अद्विषुः, अद्विषन् , अद्वेट् । अद्विष्ट, अद्विषाताम् , अद्विषत ॥ अद्य० । "हशिट-"॥३।४।५५॥ इति सकि, अद्विक्ष ३त् , ताम्, न् । अहि २ क्षत, क्षाताम्, “खरेऽतः"॥४।३।७५॥ इति सकोऽल्लुक्; अद्वि ७ क्षन्त, क्षथाः, क्षाथाम् , क्षध्वम् , क्षि, क्षावहि, क्षामहि । अद्वेषि । दिद्वेष, दिद्विषतुः, दिद्विषुः, दिदृषिथ; दिहिषिम। दिद्विषे०; दिद्विषिमहे । द्विष्यात् । द्विक्षीष्ट । द्वेष्टा २। द्वेक्ष्यति, ते । दिद्विक्षति, ते। देद्विष्यते । देहिषीति, देद्वेष्टि । द्वेषयति । अदिद्विषत्, त । द्विषन् । द्विषती । द्वेक्ष्यन् । द्वेक्ष्यमाणः। “सुग्द्विषः॥५।२।२६॥ इत्यतृशि, “द्विषो वाऽतृशः"॥२।२।८४॥ इति वा कर्मणि षष्ठ्याम्, चौरस्य चौरं वा द्विषन् । द्विष्टः, २ वान् । द्विष्ट्वा । प्रद्विष्य । द्वेष्टा । द्वेष्टुम् । ध्यणि, द्वेष्यः ॥ ५७ ॥ दुहीक क्षरणे । दोग्धि, दुग्धः, दुहन्ति, धोक्षि, दुग्धः, दुग्ध, दोमि, दुह्रः, दुह्मः । दुग्धे, दुहाते, दुहते, धुक्षे, दुहाथे, धुग्ध्वे, दुहे, दुहहे, दुरहे। दुह्यते । दुह्यात् । दुहीत । दोग्धु, दुग्धाम्, दुहन्तु, दुन्धि । दुग्धाम्, दुहाताम् , दुहताम् , धुक्ष्व, दुहाथाम्, धुग्ध्वम् । अधोक्, अदुग्धाम्, अदुहन्, अधोक् । "हशिट-"॥३॥४॥५५॥ इति सकि, अधुक्षत्, अधुक्षताम् । तथधवादावात्मने- पदे, “दुहदिह-"॥४।३।७४॥ इति सको वा लुकि, अदुग्ध, अधुक्षत, अधुक्षा- ताम्। “स्वरेऽतः”॥४।३।७५॥ इत्यल्लुकि; "आतामाते-"॥४।२।१२१॥ इति इत्वम्, "अवर्णस्य-"॥१।२।६॥ इत्येवं च न भवति; अधुक्षन्त । अल्लुकः स्थानि- वान्न अन्तोऽद्, अदुग्धाः, अधुक्षथाः, अधुक्षाथाम् ; अधुग्ध्वम्, अधुक्षध्वम्, अधुक्षि, अदुहहि, अधुक्षावहि, अधुक्षामहि ॥ भाक ॥ अदोहि, अधुक्षातामि- त्यादि । दुदोह; दुदोहिथ; दुदुहिम । दुदुहे, दुदुहाते; दुदुहिमहे । दुह्यात् । धुक्षीष्ट । “सिजाशिष-"॥४॥३॥३५॥ इति कित्त्वम्, दोग्धा २ । धोक्ष्यति, ते । कर्मकर्त्तरि, “एकधातौ ॥३॥१॥८६॥ इति जिक्यात्मनेपदेषु प्राप्तेषु, "भूषार्थ" ॥३।४।९३॥ इति किरादित्वाद् भिटक्यनिषेधे, दुग्धे गौः स्वयमेव । दुग्धे गौः पयः

A
अदादिगणः।
खयमेव । “स्वरदुहो वा"॥३।४।९०॥ इति वा जिनिषेधे, अदुग्ध; अधुक्षत, अदोहि
वा गौः खयमेव । “न कर्मणा-"॥३।४।८८॥ इति कर्मयोगे नित्यं जिनिषेधे, अदुग्ध,
अधुक्षत वा गौः पयः स्वयमेव । “उपान्त्ये॥४॥३॥३४॥ इति कित्त्वे, दुधुक्षति,
ते । दोदुह्यते । दोदुहीति, दोदोग्धि, दोदुग्धः, दोदुति, दोधोक्षि, दोदु ३
हीषि, ग्धः, ग्ध, दोदोझि, दोदु ३ हीमि, हः, मः,॥ ह्य० ॥ अदोधो २ क्, ग्;
अदोदु ३ हीत्, ग्धाम, हुः, अदोधो २ क्, ग्, अदोदु ६ हीः, ग्धम्, ग्ध,
हम्, ह, म । शेषं पचिस्थाने । दोहयति । अदूदुहत् । दुहन् । दुहती । दुह्य-
मानम् । धोक्ष्यमाणम् । दुदुह्वान् । दुहानः। दुग्धः, २ वान् । दुग्ध्वा। दोग्धा ।
दोग्धुम्। दुह्या, दोह्या, गौः । दुह्यम् , दोह्यम् ॥ ५८ ॥
दिहीक लेपे । देग्धि; सन्देग्धि; "ने ॥२॥३१७९॥ इति णिः, प्रणिदेग्धि ।
सन्दिग्धे । दिह्यते। सकि, अधिक्षत् । वतवर्गे वा तल्लुकि, अधिक्षत, अदिग्ध,
अधिक्षाताम्, अधिक्षन्त, अधिक्षथाः, अदिग्धाः, अदिक्षाथाम्, अधिक्षध्वम्,
अधिग्ध्वम् , अधिक्षि, अधिक्षावहि, अदिह्वहि । अदेहि । सन्दिदेह। सन्दिदिहे।
धेक्ष्यति । दिधिक्षति । देदिह्यते। देदिहीति, देदेग्धि । एष सर्वो दुहीक्वत् ॥५९॥
लिहीक् आस्वादने । लेढि; अवलेढि, लीढः, लिहन्ति, लेक्षि, लीढः, लीढ,
लेमि, लिहः, लिमः । लीढे, लिहाते, लिहते, लिक्षे, लिहाथे, लीवे । लिह्यते ।
लिह्यात् । लिहीत । लेढु, लीढाम् , लिहन्तु, लीढि। लोढाम् । अलेट, अलेड्,
अलीढाम् , आलिहन् । अलीढ, अलिहाताम् । सकि; अलिक्ष ३ त् , ताम्, न् ।
वतवर्गे वा सक्लुकि, अलीढ, अलिक्षत, अलीढाः, अलिक्षथाः, अलीढ्वम् , अलि-
क्षध्वम् ; अलिहहि, अलिक्षावहि, अलिक्षामहि । लिलेह । लिलिहे। लेक्ष्यति, ते ।
लिलिक्षति, ते । लेलिह्यते । लेलिहीति, लेलेढि, लेलीढः, लेलिहति, लेलिहीषि,
लेलेक्षि । लेहयति । अलीलिहत् । लीढः, २ वान् । लीवा । लेढा । लेटुम् ।
लेढव्यम् । एषोऽपि दुहींक्वत् ॥ ६॥

क्रियारलसमुच्चयः। अथ ह्वादयः। हुंक् दानादनयोः; दानमत्र हविष्प्रक्षेपः; अदनं भक्षणम् । “हवः शिति" ॥४।१।१२॥ इति द्वित्वे; जुहोति, जुहुतः, "हिणोः-"॥४॥३॥१५॥ इति वत्वे, अन्तो नो लुकि च; जुह्वति, जुहोषि, जुहुथः । हूयते। जुहुयात् । जुहोतु; जुहुताम्, जुहतु, “हुधुटोहेधिः ||४।२८३॥ जुहुधि०। अजुहोत् , अजुहुताम् । “इयुक्त-"॥ ।२।९३॥ इति पुसि, “पुस्पौ"॥४॥३३॥ इति गुणे च; अजुहवुः, अजुहोः, अजुहु २ तम् , त, अजुड्वम् । अहौषीत् , अहौष्टाम्, अहौषुः, अहौषीः । अहावि, अहोषाताम् , अहाविषाताम् । “भाही-॥३॥४॥५०॥ इति वा आमि तिव्वहा. वात्, “हवः॥१॥१२॥ इति द्विवे, जुहवां ३ चकार, बभूव, आस । जुहवां ३ चक्रे, बभूवे, आहे । पक्षे, जुहाव, जुहुवतुः, जुहुवुः, जुहोथ, जुहविथ; जुहुविम । जुहुवे । हूयात् । होषीष्ट, हाविषीष्ट । होता २, हाविता । होण्यति, ते; हाविष्यते । जुहूषति । जोहूयते । जोहवीति, जोहोति, जोहु २ तः, वति । हावयति । अजूहवत् । जुहावयिषति । जुह्वत् , जुह्वती, जुह्वतः, जुह्वतम्। जुह्व- ती स्त्री । जुह ४ त्, ती, ति, न्ति। होष्यन् । हूयमानम्। होष्यमाणम्। जुहु- वान् । जुहुवानम्। हुतः, २ वान् । हुत्ला । आहुत्य । होता । होतुम् । होतव्यम् । हव्यम् ॥ ६१॥ ओहांक् त्यागे। जहाति । “हाकः॥४।२।१०॥ इति वेवे; पक्षे "एषाम्-"। ४।२।९७॥ इतीले च; जहितः, जहीतः, जहति, जहासि, जहिथः, जहीथः, जहिथ, जहीथ, जहामि, जहिवः, जहीवः, जहिमः, जहीमः। “ईय॑ञ्ज-"॥४॥३॥९॥ इतीले, हीयते । “यि लुक्॥४।२।१०२॥ इत्यन्तलुकि, अह्यात् , जह्याताम् , जह्युः। जहातु; जहिताम् , जहीताम् , जहतु; "आ च हौ"||४।२।१०१॥ जहाहि, जहिहि, जहीहि; जहानि । अजहात् , अजहिताम् , अजहीताम्, अजहुः, अजहाः; अजहाम् । अहासीत्, अहासि, २ष्टाम्, षुः। अहायि, महासाताम् , अहायिषाताम् ।जहौ, जहतुः, जहुः, जहाथ, जहिथ०; जहिम। जहे । “गापास्था-"॥४।३।९६॥ इत्येः; हेयात् । हासीष्ट; हायिषीष्ट। हाता २; हायिता। हास्यति, ते; हायिष्यते। जहाति शब्दं देवदत्तः स एवं विवक्षते, नाहं जहामि, हीयते शब्दः वयमेव । जिहा.

अदादिगणः। सति । जेहीयते । “न हाको-"॥४१॥४९॥ इति न पूर्वस्य आः, जहाति, जहेति, जहीतः, जहति। जहत् । जहि २ ला, तः। द्वित्वे मूर्वदीर्घत्वमपीच्छन्त्येके । जाहि २ त्वा, तः । शेषं 3ङ् स्थाने । हापयति । अजीहपत् । जिहापयिषति । जहत् । जहती । हास्यन् । हास्यन्ती, हास्यती। जहिवान् । जहानम् । ओदित्त्वात् "सूयत्य-२७०॥ इति ने, हीनः, २ वान् । “स्वरात्"।२।३।८५॥ इति णे, महीणः, २ वान् । परिहीणः, २ वान् । “हाको हिः तिव"॥४।४।१४॥ हित्वा । विहाय । हातुम् । हाता । हेयम् । हातव्यम् । प्रहाणीयम् ॥ ६२ ॥ जिभीक् भये । बिभेति; "भियो नवा"॥४।२।९९॥ इति वा इः, बिभितः, विभीतः, बिभ्यति, बिभेषि, बिभिथः, बिभीथः, बिभिथ, बिभीथ, बिभेमि, बिभिवः, बिभीवः, बिभिमः, बिभीमः । भीयते। बिभियात्, बिभीयात् । बिभेतु, बिभितात्, बिभीतात्, बिभिताम् , बिभीताम् , बिभ्यतु, बिभिहि, बिभीहि, बिभितात्, बिभीतात्; बिभिया ३ नि, व, म । अबिभेत्, अबिभिताम्, अबिभीताम् , अबिभयुः, अबिभेः; अबिभयम् । अभैषीत्, अभैष्टाम् , अभैषुः, अभै ६षीः, ष्टम् , ष्ट, षम् , ष्व, म । अभायि, अभेषाताम् , अभायिषाताम् । "भीही-'॥३॥४५॥ इति वा आमि, बिभियां ३ चकार, बभूव, आस । बिभियां ३ चक्रे ३ । पक्षे, बिभाय, बिभ्यतुः, बिभ्युः, बिभेथ, बिभयिथ०%3B बिभ्यिरव, म । बिभ्ये।भीयात् । भेषीष्ट; भायिषीष्ट । भेता २; भायिता। भेष्यति, ते; भायिष्यते । बिभीषति। बेभीयते। बेभयीति, बेभेति, बेभितः, बेभीतः, बेभ्यति । "बिभेतेीष् च”॥३।३।९२॥ इत्यात्वे, भीषि, आत्मनेपदे च; मुण्डो भापयते, भी- षयते वा । करणाये तु कुञ्चिकयैनं भाययति । अबीभपत्, अबीभिषत्, अबी. भयत् । लिनिर्देशाद् यङ्लुपि न आवादि, बेभाययति । बिभ्यत् । बिभ्यती । भेष्यन्। बिभयांचवान् । बिभीवान् । बिभयाञ्चक्राणम् । बिभ्यानम् । भीतः, वान् । भीत्वा । भे ३ ता, तुम्, तव्यम् ॥ ६३ ॥ ह्रींक लज्जायाम् । जिहेति, जिहीतः; “संयोगात्"॥२॥१॥५२॥ इतीयि, जिहियति, जिहेषि, जिही २ थः, थ, जिरेमि, जिहीवः, जिहीमः। हीयते । जिही- यात्। जिहेतु, जिह्रीताम् , जिहियतु, जिहीहि ।अजिहेत्, अजिहीताम्, अजिड्युः, २ क्रियारमसमुच्चयः। अजिहः । अहै २ षीत , ष्टाम् । अहायि, अहेषाताम् , अहायिषाताम् । “भीही-"॥ ३।४।५०॥ इति वा आमि, जिठ्याञ्चकार । जियाश्चके । जिह्वाय, जिलियतुः, जिहियुः, जिह्रथ, जिह्रायथ; जिहियिम । जिहिये । हीयात् । द्वेषीष्ट; हायिषीष्ट । हृता २; ड्रायि- ता। द्वेष्यति, ते; हायिष्यते। जिह्रीषति । जेहीयते । जेह्रयीति, जेहेति, जेहीतः, जेहियति । “अचिरी-"।४।२।२१॥ इति पौ, “पुस्पौ”॥४।३।३॥ इति गुणे, खूपयति। अजिहिपत् । जिहेपयिषति। जिहिय २ त्, ती । द्वेष्यन् । जिह्रयांचकृवान्। जिही- वान् । “ऋही-"॥४।२।७६॥ इति वा नः, ह्रीणः,२ वान् ; ह्रीतः, २ वान् । ह्रीत्वा । हे ४ ता, तुम्, तव्यम्, यम् ॥ ६४ ॥ पृक् पालनपूरणयोः । “पृभृ-"॥४।१।५८॥ इति पूर्वस्येत्वे, व्यापिपर्ति, पिपृतः, पिप्रति, पिपर्षि, पिपृथः, पिपृथ, पिपर्मि, पिपृवः, पिपृमः । प्रियते । पिपृयात् । पिपर्तु; पिप्रतु । अपिपः, अपिपृताम्, अपिपरुः, अपिपः । अपार्षीत् अपाष्टम् , अपार्षुः, अपार्षीः । अपारि, अपृषाताम्, अपारिषाताम् । पपार, पप्रतुः, पद्मः, पपर्थ; "ऋतः॥४।४।७९॥ इति नेट , “स्क्रसृ-'४।४।८१॥ इतीटि; पप्रि २ व, म । पप्रे । प्रियात् । पृषीष्ट; पारिषीष्ट । पर्ती २; पारिता । "हनृतः॥४।४।४९॥ इतीटि, परिष्यति, ते; पारिष्यते । पुपूर्षति । पेप्रीयते । परि री र ३ परीति । पर् रि री ३ पति, पर्पतः, पर्षति । पारयति । अपीपरत् । पिप्र २ तु, ती। परिष्यन् । प्रियमाणम् । पपृवान् । पप्राणम् । व्यापृतः, २ वान् । पर्ला । पर्तुम् । पृत्वा । व्यापृत्य । व्यापर्त्तव्यम् ॥ ६५ ॥ ऋक् गतौ । “हवः ॥४।१।१२॥ इति द्वित्वे, “पृभृ॥४।११५८॥ इति पूर्व- स्येत्वे, “पूर्वस्यास्वे-॥४।१।३७॥ इतीयि, “नामिनो ॥४॥३॥१॥ इति गुणे, इयर्ति, इयतः, इयूति, इयर्षि, इय॒थः, इयृथ, इयर्मि, इयूवः, इयूमः। 'समोगम् ॥३॥३॥८॥ इत्यात्मनेपदे; समियते । आप्ये तु सति परस्मैपदे; समिर्ति मित्रम्। समि- याते, समियूते, समिषे । क्ये “क्ययङ"॥४।३।१०॥ इति गुणे, अर्यते । इयू. यात् । समियीत । इयतु; इय॒ताम् , इयूतु, इयहि; इयराणि । समिय॒ताम् । ऐयः, ऐय॒ताम् , ऐयरुः, ऐयः, ऐयरम् । ऐवृत; समैयुत । अद्य०॥ आरत्, आर- ताम् । आर्षीत्, आर्णीमित्यादि सर्व कं प्रापणे इत्यस्येव ज्ञेयम् परं शत्रानशोः। ३ , अदादिगणः । IN इयत्। इयूती । समियाणः । अर्यमाणम् ॥ ६६ ॥ ओहां गतौ । “हवः-१॥४।१।१२॥ इति द्वित्वे, “पृभृ-॥४।१।५८॥ इति पूर्वस्येत्वे, “एषाम् ॥४।२।९७॥ इतीवे च, जिहीते; उज्जिहीते, उत्पद्यते इत्यर्थः । सञ्जिहीते, जिहाते, निहते, जिहीषे, जिहाथे, जिहीध्वे, जिहे, जिही २ वहे, महे । “ईयंजने-"॥४॥३॥९७॥ इत्यत्र हाकोऽनुवृत्तिर्न हाङः तेनास्य क्ङिति अशिति ईवाभावे, हायते । जिहीत, जिहीयाताम् । जिहीताम्, जिहाताम्, जिहताम् , जिहीष्व, जिहाथाम् , जिहीध्वम् , जिहै। अजिहीत, अजिहाताम् , अजिहत । अहास्त, अहासाताम् , अहासत, अहास्थाः । अहायि, अहासाताम् , अहायिषाताम् । संजहे; संजहिमहे । हासीष्ट; हायिषीष्ट । हाता; हायिता । हास्यते; हायिष्यते । जिहासते। जाहायते । जाहेति, जाहाति, जाहीतः, जाहति । हापयति । अजीहपत् । जिहापयिषति । जिहानः । हाय- मानम् । जहानः । हास्यमानः। ओदित्त्वात् , “सूयत्य-"॥४।२।७०॥ इति नः; हानः, २ वान् । “वरात्॥२।३।८५॥ इति णे, प्रहाणः, २ वान् । हावा। प्रहाय । हाता । हातुम् । हानीयम् । हेयम् ॥ ६७ ॥ मांङ्क् मानशब्दयोः। “पृभृ-"॥४।१।५८॥ इति पूर्वस्येवे, “एषाम् ॥४।२।९७॥ इतीले च; मिमीते धान्यं चैत्रः । “नेी-॥२॥३७९॥ इति णिः, प्रणिमिमीते; प्रमिमीते; निर्मिमीते; अनुमिमीते, मिमाते, मिमते, मिमीषे, मिमाथे, मिमीध्वे, मिमे, मिमीवहे, मिमीमहे । “ईय॑ञ्जने-"॥४।३।९७॥. इतीखे, मीयते। मिमीत । मिमीताम् , मिमाताम्, मिमताम् , मिमीष्व, मिमाथाम्, मिमीध्वम्, मिमै, मिमा २ वहै, महै । अमिमीत । अटो धात्ववयवत्वेन व्यवधायकवाभावाण्णले, प्रण्यमिमीत, अमिमाताम्, अमिमत, अमिमीथाः । अमास्त, अमासाताम् , अमासत, अमा ४ स्थाः, साथाम् , द्ध्वम् , ध्वम् । अमायि, अमासाताम् ;जिटि, अमायिषाताम् , अमा २ ध्वम्, द्ध्वम् ; अमायि ३ ड्ढ्वम् , दवम् , ध्वम् । ममे, ममाते; ममिमहे । अकित्त्वाद् “गापास्था-"॥४।३।९६॥ इति नैवे, मासीष्ट; मायि- षीष्ट । माता; मायिता। मास्यते; मायिष्यते।“मिमी-॥४१॥२०॥ इतीति,प्रमित्सते। "ईय॑जने"॥४।३।९७॥ इति ईः, मेमीयते । मामाति, मामेति, मामीतः, माम- २४ क्रियारत्नसमुच्चयः । ति । शेषं स्थास्थाने । मापयति । अमीमपत् । मिमापयिषति । मिमानः, “ख- राद्-"॥२।३।८५॥ इति कृतो नस्य णत्वे; निर्मिमाणः। मास्यमानः। मीयमानम् ; निर्मीयमाणम् ; प्रमीयमाणम् । ममानः। किति तादौ, "दोसोमास्थ इ."॥४॥११॥ प्रमितः,२ वान् । मित्वा । प्रमाय । प्रमा २ ता, तुम् । प्रमेयम् । प्रमाणीयम् । प्रमातव्यम् । प्रमितिः॥ ६८ ॥ डुदांग्क् दाने । “हवः-॥४॥१२॥ इति द्वित्वे, ददाति; प्रणिददाति । "एषामी:-"॥४।२।९७॥ इत्यत्र दावर्जनाद् ईत्वाभावे, "नश्चातः॥४।२।९६॥ इत्या- ल्लुकि; दत्तः, “अन्तो नो लुक्॥४।२।९४॥ ददति, ददासि, दत्थः, दत्थ, ददामि, दहः, दद्मः। दत्ते; प्रणिदत्ते। आपूर्वादफलवत्यपि, “दागोऽस्वास्य-"॥३३॥५३॥ इत्यात्मनेपदे, विद्यामादत्ते । स्वास्यप्रसारविकाशे तु परस्मै, उष्ट्रो मुखं व्याददाति, प्रसारयतीत्यर्थः। कूलं व्याददाति। विपादिका व्याददाति, विकसतीत्यर्थः । ददाते, ददते, दत्से, ददाथे, दद्ध्वे, ददे, दवहे, दद्महे । “ईर्व्यञ्जने ॥४॥३॥९७॥ दीयते। दद्यात् । ददीत । ददातु, दत्तात् , दत्ताम् , ददतु; "हौ दः॥४।१।३१॥ इत्येनं च हिः; देहि, दत्तात् , दत्तम्, दत्त, ददानि । दत्ताम् , ददाताम् , ददताम् , दत्व, ददा- थाम , दद्ध्वम् , ददै, ददा २ वहै, महै । अददात्, अदत्ताम्, “युक्त" ॥४।२।९३॥ इत्यनः पुसि, अददुः, अद ६ दाः, त्तम्, त्त, दाम्, द्व, द्म । अदत्त, अददाताम्, अददत, अदत्थाः, अददाथाम्, अदद्ध्वम् , अददि, अदबहि । अदीयत ॥ अद्य० ॥ "पिबैति-"॥४॥३॥६६॥ इति सिच्लुपि, अदात्, अदाताम् ; "सिज्विद-”॥४।२।९२॥ इत्यनः पुसि, "इडेत्-"॥४।३।९४॥ इत्याल्लुकि; अदुः, अदाः, अदातम् , अदात, अदाम् , अदाव, अदाम । "इश्व स्थादः"॥४॥३॥४१॥ इति सिचः कित्त्वे द इत्वे, “धुड्ख-४।३।७०॥ इति सिच्लुकि च; अदित, अदिषाताम्, अदिषत, अदि ७ थाः, षाथाम् , इदम्, ट्वम; षि, वहि, महि ॥ भाक ॥ अदायि, अदिषाताम् ; अदायिषाताम् ; अदि २ ठ्ठम् , ढ्वम् ; अदायि ३ ड्वम्, ट्वम् , ध्वम् । ददौ, ददतुः; ददुः, ददाथ, ददिथ, ददथुः, दद, ददौ, ददिव, ददिम । ददे, ददाते, ददिध्वे; ददि- महे । विति, "गापा-"||३।९६॥ इत्येः, देयात्। दासीष्ट, दायिषीष्ट; दासीध्वम् ; , दादिगणः। १७९ दायि २ षीध्वम, पीढ्वम्। दाता २; दायिता । दास्यति,ते; दायिष्यते।अदास्यत्, त;अदायिष्यत । मिमी-॥४॥२०॥ इतीति; दित्सति, ते । ईय॑ञ्जने-४।३।९७॥ देदीयते । दादाति, दादेति; “श्नश्च-"॥४।२।९६॥ इत्याल्लुकि, दात्तः, दादति, दादेषि, दादासि, दात्थः, दात्थ, दादेमि, दादामि, दाहः, दाद्मः । क्ये, दादीयते ॥ स० ॥ दाद्यात् । दादातु, दादेतु, दात्ताम् , दादतु, देहि, दात्तात्, दात्तम् , दात्त, दादानि । अदादात्, अदादेत्, अदात्ताम् , अदादुः, अदादाः, अदादेः, अदात्तम्, अदात्त, अदादाम् , अदाह, अदान । अद्यतन्यादौ सर्व स्थावत्, तदिग् लिख्यते । अदादात्, अदा २ दाताम् , दुः॥भाक ॥ अदादायि; ब्रिटि, अदादायिषाताम् ; इटि, “इडेत्-"॥४।३।९४॥ इत्याल्लुकि, अदादिषाताम् । दादाञ्चकारेत्यादि । “गापा-"॥४।३।९६।। इत्येः, दादेयात् । दादायिषीष्ट ; दादि- षीष्ट । दादिता २; दादायिता । दादिष्यति, ते; दादायिष्यते । दादि ६ वा, तुम्, ता, तः, २ वान् , तव्यम् । दादत् । दादती। एवं षडपि दासंज्ञा अवगन्तव्याः; विशेषस्तु स्वस्वस्थाने उक्तो, वक्ष्यते च । दापयति । अदीदपत् । शेषं ण्यन्तभू- वत् । दिदापयिषति । "अन्तो नो लुक्॥४।२।९४॥इति नो लुकि, ददत् , ददतौ। ददती स्त्री। ददत् , ददती, "शौ वा॥४।२।९५॥ इति नो वा लुकि, ददति, ददन्ति कुलानि । एवमन्यत्रापि । ददानः ।आददानः। दास्य २ न् , मानः। दीयमा- नम् । ददिवान्। ददानः। “प्रादागः-॥४॥४७॥ इति वा त्ते, दातुमारब्धम्, प्रत्तम्। पक्ष, प्रदत्तम् । “निविस्वन्ववात्"॥४८॥ इति वा त्ते; "दस्ति"।।३।२।८८॥ इति दीर्घ च, नीत्तम् ; वीत्तम् ; सूत्तम् ; अनूत्तम् ; अवत्तम् , पञ्चस्वपि दत्तमित्यर्थः। पक्षे, निदत्तमित्यादि । “स्वरादुपसर्गाद्-"॥४।४।९॥ इति ते, आत्तः; उपात्तः, प्रकर्षेण दीयते स्म प्रत्तः। प्रत्तवान् । परीत्तः, २ वान् । “दत्"४।४।१०॥ इति दति; दत्तः,२ वान् । दत्तिः । दत्त्वा । प्रदाय । दाता । दातुम् ॥ ६९ ॥ डुधांग्क् धारणे च; चाहाने । दधाति; श्रद्दधाति । “वा वाप्योः-" ॥३।२।१५६॥ इति अपेः पिर्वा; पिदधाति; अपिदधाति; "ने -'॥२॥३॥७९॥ इति णिः, प्रणिदधाति । एवं अभि, अव, आङ्, उपा, व्यव, वि, नि, परि, सं पूर्वोऽपि । “अध-२।११७९॥ इत्यत्र भावर्जनात्तथोर्न धवे; धत्तः, अत्र क्रियारलसमुच्चयः। धागस्तथोश्च"।२।११७८॥ इति चतुर्थान्तस्य तथसध्वेषु पूर्वस्य धः, दधति, दधासि, धत्थः, धत्थ, दधामि, दध्वः, दध्मः । धत्ते; अपिधत्ते; पिधत्ते; दधाते, दधते, धत्से, दधाथे, धद्ध्वे, दधे, दध्वहे, दध्महे ।"ईर्व्यञ्जने-"|४।३९७॥ धीयते। दध्यात् । दधीत। दधातु, धत्तात्, धत्ताम् , दधतु, धेहि, धत्तात्, धत्तम्, धत्त, दधानि, दधाव, दधाम । धत्ताम् , दधाताम् , दधताम् , धत्व, दधाथाम् , धद्ध्वम् , दधै, दधा २ वहै, महै। अदधात्, अधत्ताम्, अदधुः, अदधाः, अधत्तम्, अधत्त, अदधाम्, अदध्व, अदध्म । अधत्त, अधाताम्, अद- धंत, अधत्थाः, अदधाथाम्, अधद्ध्वम्, अदधि, अद २ ध्वहि, ध्महि ॥ अद्य० ॥ "पिबैति-"॥४॥३॥६६॥ इति सिच्लुपि, अधात् , अधाताम् , अधुः, अधाः, अधातम्, अधात, अधाम्, अधाव, अधाम । “इश्च-॥४॥३॥४१॥ इतीत्वे, कित्त्वे, “धुहख-॥४॥३७०॥ इति सिच्लुपि, अधित, अधि९षा- ताम्, षत, थाः, षाथाम् , ड्वम् , दवम् , षि, प्वहि, ष्महि ॥ भाक ॥ अधा- यि, अधिषाताम् , अधायिषाताम् , अधि २ ड्वम् , वम् ; अधायि ३ ड्वम् , वम् , ध्वम् । दधौ, दधतुः, दधुः, दधाथ, दधिथ, दधथुः, दध, दधौ, दधि- २व,म । दधे, दधाते, दधिरे, दधिषे, दधाथे, दधिध्वे, दधे, दधि २ वहे, महे । "गापा-"॥४।३।९६॥ इत्येः, धेयात्। धासीष्ट; धायिषीष्ट । धाता २,धायिता। धास्य- ति, ते; धायिष्यते । अधास्यत्, त; अधायिष्यत। “मिमी-॥४१॥२०॥ इतीति, धित्सति, ते । देधीयते; “ईर्व्यञ्ज-॥४।३।९७॥ ईः। दाधाति, दाधेति । "नश्च." ॥३।२।९६|| इत्याल्लुकि, “धागस्तथोश्व"।२।१।७८॥ इत्यत्र गिन्निर्देशात् पूर्वस्य न धा; दात्तः, दाधति, दाधेषि, दाधासि, दात्थः, दात्थ, दाधेमि, दाधामि, दाध्वः, दाध्मः। क्ये, दाधीयते । दाध्यात् । दाधातु, दाधेतु; हौ, धेहि । अदा- धात् , अदाधेत्, अदात्ताम् , अदाधुः ॥ अद्य० ॥ अदाधात्, अदाधाताम्; अदाधुः । अदाधायि, अदाधिषाताम्, अदाधायिषाप्ताम् । दाधाञ्चकार । दाधे- यात् । दाधिषीष्ट; दाधायिषीष्ट । दाधिष्यति, ते; दाधायिष्यते, “धागः॥४॥१५॥ इत्यत्र निर्देशान्न हिः; दाधि ५ वा, ता, तुम्, तः, २ वान् । विदाधाय । दाधत् । धापयति; विधापयति; प्रणिधापयति । अदीधपत् । विधापयाञ्चकार ।

अदादिगणः ।
विदिधापयिषति । दधत्, दधती, "शौ वा"।।२।९५॥ दधति, दधन्ति कुलानि ।
धास्यन् ।धास्यन्ती, धास्यती । दधानः। धीयमानम् । धास्यमानम् ; धायिष्यमा.
णम् । दधिवान् । दधानः । “धागः॥४४|१५॥ इति हिः, विहितः, २ वान् । पिहि-
तम्, अपिहितम् । हिला । विधाय । “ऊर्याध-"३२॥ इति श्रच्छब्दस्य
गतिसंज्ञायां यबादेशे; श्रद्धाय । हितिः । धातुम् । धाता । धातव्यम् ।
धेयम् ॥ ७० ॥
टुडुभंग्क् पोषणे च; चाद्धारणे । “हवः-"॥४।१।१२॥ इति द्वित्वे, “पृ"
॥४।१।५८॥ इति पूर्वस्य इः; बिभर्ति, बिभृतः, बिभ्रति, बिर्षि । बिभृते, बि-
भ्राते, बिभ्रते, बिभृषे, बिभ्राथे, बिभृध्वे, बिभ्रे, बिभृ २ वहे, महे । क्ये,
भ्रियते। बिभृयात् । बिभ्रीत। बिभर्तु; बिभृताम् , बिभ्रतु, बिभृहि०, बिभरा ३
णि, व, म । बिभृताम् , बिभ्राताम् , बिभ्रताम् , बिभृष्व; बिभ ३रै, रावहै, रामहै।
अबि ९ भः, भृताम् , भरुः, भः, भरम् । अबि ९ भृत, भ्राताम्, भ्रत,
भृथाः, भ्राथाम्, भृध्वम्, भ्रि, भृवहि. ॥ अद्य० ॥ अभार्षीत् , अभार्टीम् ।
"ऋवर्णात्"॥४॥३॥३६॥ इत्यनिटिसजाशिषोः कित्त्वाद् गुणाभावे, “धुहस्त्र'
॥४॥३७०॥ इति सिज्लुकि च; अभृत, अभृ ५षाताम् , षत,थाः; ड्वम् , दवम्।
अभारि, अभृषाताम्, अभारिषाताम् । “भीही-"॥३४॥५०॥ इति वा आमि,
बिभराञ्चकार । बिभराञ्चक्रे इत्यादि । पक्षे, बभार, बभ्रतुः, बभ्रुः, "स्क्रसृ-'
॥४८॥ इत्यत्र भृवर्जनान्नेटि; बभर्थ, बभ्रथुः, बभ्र, बभार, बभर, बभृ २
व, म । बभ्रे; बभृमहे । भ्रियात् । भृषीष्ट; भारिषीष्ट । भर्ती २, भारिता ।
भरिष्यति, ते; भारिष्यते । बुमूर्षति, ते । “इवृध-"॥४४॥४७॥ इत्यत्र भरति
ग्रहणान्नास्य सनि वेट्वम् । अन्येत्वस्यापि वेटं; कृतगुणभरनिदेशेन इड-
भावपक्षे कित्त्वेऽपि गुणं चेच्छन्ति; बिभर्षति, बिभरिषति । बेभ्रीयते । बरिरीर
३ भरीति, बरि र री ३ भर्त्ति । भारयति । अबीभरत् । बिभ्रत् । बिभ्रती। भ्रिय.
माणम् । भरिष्य २न्, माणम् ; भारिष्यमाणम् । बिभरांच २ कृवान्, क्राणः।
'बभृवान् । बभ्राणः । भृतः, २ वान् । भृत्वा । संभृत्य । भर्ता । भर्तुम् । भर्त-
व्यम् । शेषं कृगवत् ॥ ७१ ॥

क्रियारत्नसमुच्चयः । णिजूंकी शौचे च, चात् पोषणे । नेनेक्ति यशः क्षमाम् , निर्मलीकुरुते इत्यर्थः । अयं विजूंकीवत् ॥ ७२ ॥ विजूंकी पृथग्भावे । “निजाम्-"॥४।११५७॥ इति पूर्वस्यैत्वे; वेवेक्ति न यश- चन्द्रात् , उज्वलनेन न पृथग्भवतीत्यर्थः । वेविक्तः, वेविजति, वेवेक्षि। वेविक्ते, वेवि ८ जाते, जते, क्षे, जाथे, ग्ध्वे, जे, ज्वहे, ज्महे । विज्यते। वेविज्यात्। वेविजीत। वेवेक्तु; “द्वयुक्तोपान्त्य-"॥४॥३॥१४॥ इति गुणाभावे; वेविजानि । वेविक्ताम् । अवेवेक, अवेविक्ताम् , अवेविजुः, अवेवेक्; अवेविजम् । अद्य० ॥"ऋदिच्छ्वि-" ॥३॥४॥६५॥ इति परस्मैपदे वा अङि, अविजर त् , ताम् । पक्षे, “व्यञ्जनानाम्-" ॥४॥३॥४५॥ इति वृद्धौ, अवैक्षीत् , अवैक्ताम् । अविक्त, अविक्षाथाम् , अवि- क्षत, अविक्थाः। अवेजि। विवेज; विवेजिथ; विविजिम। विविजे; विविजिमहे । विज्यात् । विक्षीष्ट । वेक्ता २। वेक्ष्यति, ते । विविक्षति, ते । वेविज्यते । वेज- यति । अवीविजत्। वेविजत् । वेविजानः। विक्तः,२ वान् । विक्त्वा । प्रविज्य । वैक्ता । वेत्तुम् । वेगः । चान्तोऽयमिति सभ्याः; वेवेक्ति, वेविक्तः, वेविचति । णिगि, वेचयति; विवेचयति । विवेत्तुम् । विवेचनम् । विवेकः ॥ ७३ ॥ विष्लंकी व्याप्तौ । वेवेष्टि यशः क्ष्माम, व्याप्नोतीत्यर्थः। वेविष्टः, वेविषति, वेवोक्षि। वेविष्टे, वेविषाते, वेविषते । विष्यते । आनिवि; वेविषाणि । ह्य० ॥ अनि, अवेविषुः । अमि; अवेविषम् ॥ अद्य० ॥ लदित्त्वादङि, अविषत् । आत्मनेपदेवङभावे, “हशिटो-"॥३४॥५५॥ इति सकि, अविक्षत, अविक्षा- ताम्, अविक्षन्त । अवेषि । विवेष । विविषे । वेक्ष्यति । विविक्षति, ते । विविष्यते। परिवेषयति । पर्यवीविषत् । विष्ट्वा । वेष्टा । वेष्टुम् । विष्टः, २ वान् । शेषं विज़ुकीवत् ॥ ७४ ॥ अत्र घृप्रभृतयः ११ अन्यैरुक्ता अपि अलौकिकत्वात्प्रभुभिरुपेक्षिताः ॥ इति तपाचार्यश्रीदेवसुन्दरसूरिशिष्यश्रीगुणरत्नसूरिविरचिते क्रियारत्नसमुच्चयेऽदादिगणः॥

दिवादिगणः । अथ दिवादयः। ३ दिवूच् क्रीडाजयेच्छापणिद्युतिस्तुतिगतिषु । जयेच्छा विजिगीषा; पणिर्व्यव- हारः क्रियादिः। “दिवादेः श्यः"॥३।४/७२॥ इति श्ये, “भ्वादेः-"॥२।१।६३॥ इति दीर्घ च, दीव्यति; “उपसर्गादिवः ॥२२॥१७॥ इति विनिमेयद्यूतपणयोः कर्मणो वा कर्मवे, शतस्य शतं वा प्रदीव्यति । अनुपसर्गस्य,"न"||२।२।१८॥इति कर्मलाभावे, शतस्य दीव्यति । “करणं च॥२॥२॥१९॥ इति करणस्य कर्मत्वकरणवयोः, अक्षान् दीव्यति; अक्षैर्दीव्यति । दीव्यतः, दीव्यन्ति, दीव्य ३ सि, थः, थ, दीव्या ३ मि, वः, मः । क्ये, दीव्यते, दीव्येते. । दीव्येत् । दीव्यतु । अदी- व्यत् । अद्य० ॥ अदेवीत् , अदेविष्टाम् । अदेवि, अदेविषाताम्, अदेवि ३ ड्ढ्वम् , दवम् , ध्वम् । दिदेव, दिदिविम । दिदिवे; दिदिविमहे । दीव्यात् । देविषीष्ट । देविता २ । देविष्यति, ते । “इवृधः॥४७॥ इति वेटि, "अनु- नासिके च-"॥४।१।१०८॥ इति वस्योटि च; दिदेविषति, दुथ्षति; अत्रासिद्ध बहिरङ्गमिति खरानन्तर्ये नेष्यते, तेन यत्वं भवति । एवमन्यत्रापि । देदीव्यते । देदिवीति, “अनुनासिके च-"॥४।१।१०८॥ इति वस्योटि, देद्योति । क्ङित्येवोडिति मते तु, “य्वोः-"|४|४|१२१॥ इति वलुकि, देदेति, देद्यूतः, देदिवति, देदिवीषि, देवोषि, देदेषि, देयूथः, देचूथ, देदिवीमि, देद्योमि, देयूवः, देदिवः; अत्र वस्य विकल्पेनानुनासिकवाहा ऊट, पक्षे “य्वोः ||४|४|१२१॥ इति व्लोपश्च; देधूमः। क्ये, देदीव्यते। देदीन्यात् । ह्य० ॥ अदेदिवीत् , अदेद्योत्, अदेदेत् , अदेयूताम्, अदेदिवुः, अदेदेवीः, अदेद्योः, अदेदेः। अद्यतन्यादौ पचिस्थानोक्तवत् । वेत्यनुवा "करणं च ॥२॥२॥१९॥ इत्यत्र चकारकरणं संज्ञाद्वयसमावेशार्थम् , तेन करणत्वा- तृतीया । कर्मत्वाचानाप्यलक्षणमणिक्कर्तुर्णौ कर्मत्वं, “अणिगि प्राणि-"॥३॥३॥ १०७॥ इति परस्मैपदं च न भवति; अक्षैर्देवयते मैत्रश्चैत्रेण । अदीदिवत् । दीव्यन् । दीव्यन्ती । देविष्य २ न , माणम् । दीव्यमानम् । “य्वोः-"॥४।४।१२१॥ इति वलुकि, दिदिवान् , दिदिवासौ । उदित्त्वात् त्वि वेट; धुत्वा, देवित्वा । “वौ १८४ कियारत्नसमुच्चयः। २ .. व्यञ्जन-"॥४॥३॥२५॥ इत्यत्र अय्व इति निषेधाद्वान कित्त्वम् , किन्तु "क्वा ॥४।३।२९॥ इति कित्त्वाभावस्तेनात्र गुणः; वेट्त्वात् क्तयोर्नेट् ; द्यूतः, २ वान् । धूतादन्यत्र, “पूदि."॥४।२।७२॥ इति नः; आयूनः, २ वान् । देवि ३ ता, तुम् , तव्यम् । देव्यम् ॥ १॥ जृष् अष्च् जरसि; वयोहानौ । जीर्यति । क्ये, जीर्य्यते। जीर्येत् । जीर्यतु । अजीर्यत् । अद्य० ॥ “ऋदिच्छवि ॥३॥४॥६५॥ इत्यङि, "ऋवर्ण-"॥४॥३७॥ इति गुणे; अजरत् , अजरताम् । पक्षे, “सिचि परस्मै-'॥४।३।४४॥ इति वृद्धौ; अजारीत्, अजारिष्टाम् । “इट् सिज-"॥४।४।३६॥ इति वेटि, “वृत"॥४॥४॥३५॥ इति वा दीर्घे, "ऋवर्णात् ॥४॥३॥३६॥ इत्यनिसिजाशिषोः कित्त्वे च, अज- रिष्ट, अजरीष्ट, अजीष्ट स्वयमेव; एषु “एकधातौ-"॥ ३ । ४ । ८६ ॥ इति कर्म- कर्त्तर्यात्मनेपदम् ; किरादित्वाच्च, “भूषार्थ-"॥३।४।९३॥ इति न मिनिटक्या भवन्ति ॥ भाक ॥ अजारि; ब्रिटि, अजारिषाताम् ; इटि, अजरीषाताम् ; अजरिषाताम् ; कित्त्वे, अजीर्षाताम् ४ । एवमग्रेपि ४, ४ ॥ जजार, “स्कृच्छृत-" ॥४॥३८॥ इति गुणे, “जुभ्रम-४।१।२६॥ इति वैत्वे, द्वित्वाभावे च, जेरतुः, जजरतुः, जेरिथ, जजरिथ । जेरे, जजरे। जीर्यात् । जारिषीष्ट, जरिषीष्ट, जी- र्षीष्ट । जरिता २; जरीता २; जारिता । जरिष्यति, जरीष्यति ॥ भाक ॥ जरि- ष्यते, जरीष्यते, जारिष्यते । “इवृध-"॥४।४।४७॥ इति वेटि, “नामिनोऽनिट" ॥४॥३॥३३॥ इति कित्त्वे च; जिजरिषति, जिजरीषति, जिजीर्षति । जेजीर्यते । जाजरीति, जाजति । शेषं तृवत् । “कगे-"॥४।२।२५॥ इति ह्रखे, जरयति । अजीजरत् । भिणम्परे णौ तु वा दीर्घः; अजारि, अजरि । जिजरयिषति । जीर्यन् । जीर्यमाणम् । अरिष्य २ न , माणम् ; जरीष्य २ न , माणम् ; जारिष्यमाणम् । जिजी- र्वान् । जजिराणम् । कसौ इरि कृते द्वित्वम् । काने तु द्वित्वे कृते इर् स्वर- विधित्वात् । किति "ऋवर्णश्रि-४५७॥ इति नेटि, “गत्यर्थाकर्मक-"|| ५।१।११ ॥ इति वा कर्तरि क्ते, "ऋल्व-"||२६८॥ इति ने, जीर्णश्चैत्रः। जीर्ण चैत्रेण वा । "ऋवर्णश्रि-"५७॥ इति निषेधात् , “जब्रश्वः-811४१॥ इत्यत्र निरनुबन्धज्रग्रहणाच्च नास्य सानुबन्धस्येट, जीवा॑ । अस्यैवेच्छन्त्यन्ये, दिवादिगणः । जरिवा, जरीत्वा । जरि ३ ता, तुम्, तव्यम् ; जरी ३ ता, तुम्, तव्यम् । सृष् । झीर्यति । अयं जृष्वत्, नवरं परोक्षायाम् ; जझार; जझरिम । जझरे । तिव, झीा ॥ २ ॥ ३ ॥ चत्वारोऽनिटः ॥ शोंच तक्षणे; तनूकरणे । “न शिति"॥४॥२२॥ इत्यात्व निषेधात् “ओतः श्ये"॥४।२।१०३॥ इति ओल्लुकि, श्यति; निश्यति, श्यतः, श्यन्ति । शायते । “ट्धेघा-"॥४।३।६७॥ इति वा सिच्लुपि, अशात् , अशा- ताम् , अशुः, अशाः । पक्षे, “यमिरमि-"॥४॥४॥८६॥ इतीटि, सेऽन्ते च; अशा- सीत् , अशासिष्टाम् , अशासिषुः, अशासीः । अशायि, अशायिषाताम्, अशा. साताम् । शशौ, शशतुः; शशाथ, शशिथ; शशिम । शशे, शशाते । शायात् । शासीष्ट; शायिषीष्ट । शाता २;शायिता। शास्यति, ते; शायिष्यते । शिशासति। शाशायते । शाशेति, शाशाति । "पाशा-"||२२०॥ इति ये, निशाययति । अशीशयत् । शिशाययिषति । श्यन् । शास्यन् । शशिवान् । शशानम् । किति ते, “छाशोर्वा"॥४।४।१२॥ इति वेत्वे, निशितः, २ वान् ; निशातः, २ वान् । शित्वा; शात्वा । “शो व्रते"॥४।४।१३॥ नित्यं इ, संशितव्रतः साधुः । शाता । शातुम् ॥ ४॥ दों, छोंच्छेदने । यति; अवद्यति, धतः, द्यन्ति । “ईय॑ञ्जने-"||३९७॥ ई:, दीयते । “पिबैति-"॥४॥३॥६६॥ इति सिच्लुपि, अदात् , अदाताम्, अदुः, अदाः। अदायि, अदायिषाताम्, अदिषाताम्, “इश्व-"॥४॥३॥४१॥ इति इः । ददौ । ददे; ददिमहे । “गापा-"॥४।३।९६॥ इत्येः; देयात् । दायिषीष्ट; दासी- ष्ट । दाता २; दायिता। दास्यति, ते; दायिष्यते। दित्सति । देदीयते। दादाति । "इडेत्-"॥४।३।९४॥ इति आलोपे, दादितः, २ वान् । दापयति । छन्। दास्यन्। ददिवान् । ददानम् । “दोसोमास्थ इ:"॥४|४|११॥ दितः, २ वान् । दित्वा । "स्वरात्-"४९॥ इति त्तत्वे, अवत्तम् । “दस्ति"॥३।२।८८॥ इति नामिनो दधिं, परीत्तम् । दाता । दातुम् ॥ छों ॥ अवच्छयति । छायते । अच्छात् । अच्छासीत् । चच्छौ । चच्छे । छायात् ; अपच्छायात्, अत्र छस्य द्वित्वं लाक्षणिकम्, तेन “संयोगादेर्वा-गा।३।९५॥ इति न एः । छास्यति । चिच्छासति। २५ १८६ क्रियारत्नसमुच्चयः । चाच्छायते । णौ, छाययति । अचिच्छयत् । शेषं सर्व शोचवत् ॥ ५ ॥ ६ ॥ षोंच अन्तकर्मणि, विनाशे । अवस्यति; व्यवस्यति; “उपसर्गात्सुग्-" ॥२।३।३९॥ इति षत्वे, “ने -॥२॥३॥७९॥ इति णिः, प्रणिष्यति । क्ये, "ईर्व्यञ्जने-"॥४।३।९७॥ इति ईः; अवसीयते; विषीयते, न अस्यते इत्यर्थः । अभिषीयते, अपनीयते इत्यर्थः । अड्व्यवायेऽपि षः, अभ्यष्यत् ; व्यष्यत् । “ट्धेघा-"४।३।६७॥ इति वा सिज्लुपि, अवा ३ सात् , साताम् , सुः। पक्षे, अवासा ३ सीत्, सिष्टाम्, सिषुः । अवासायि, अवासायिषाताम् ; अवासा- साताम् । अवससौ । अवससे । अवसयात् । सासीष्ट; सायिषीष्ट । सास्यति, ते; सायिष्यते । षपाठात् “नाम्यन्त-"॥२।३।१५॥ इति षः, सिषासति । द्वित्वे निषेधादाद्यस्य न षः, अभिसिषासति । सेषीयते । सासेति, सासाति । शेषं त्रैवत् । “पाशा-"॥२॥२०॥ इति ये, अवसाययति । अवासीषयत् । अव- सिषाययिषति । अवस्यन् । अवसास्यन् । ससिवान् । ससानम् । “दोसो-" ॥४|४|११॥ इति इः, अवसितः, २ वान् । सित्वा। अवसाय। अवसा ३ ता, तुम्, तव्यम् ॥ ७॥ बीड्च् लज्जायाम् । व्रीड्यति । ऋफिडादित्वाल्लवे, वील्यति। व्रीड्यते । अत्री ३ डीत्, डिष्टाम् , डिषुः । अवीडि। विव्रीड। विव्रीडे । बीड्यात् । वीडि- षीष्ट । वीडिष्यति, ते । वेव्रीड्यते । वेत्री २ डीति, ट्टि । वीडयति । अविविडत् । बीड्यन् । वीडि ५ ता, तुम् , त्वा, तः, २ वान् ॥ ८ ॥ नृतैच् नर्त्तने; नाट्ये । नृत्यति। अणपाठात् “अदुरुप-॥२।३।७७॥ इति न णः; प्रनृत्यति । क्ये, नृत्यते । अन ३ र्तीत् , तिष्टाम् , तिषुः। अनर्ति, अनतिषा- ताम् । ननर्त्त; ननृतिम । ननृते । नृत्यात् । “कृतचूतनृत-"॥४४॥५०॥ इत्यसिचः सादेरादिर्वेट, नतिषीष्ट; नृत्सीष्ट । “सिजाशिष.॥४॥३॥३५॥ इति कित्त्वम् ; नर्ति- ता २ । नय॑ति, ते; नतिष्यति, ते । निनृत्सति, नितिषति । "नृतेर्यडि" ॥२।३।९५॥ इति णत्वप्रतिषेधे, नरीनृत्यते । नरि, री, र ३ नर्ति। “युक्तो-॥४॥ ३।१४॥ इति गुणाभावे, नरी, रि, र ३ नृतीति। रागमे ईतं नेच्छन्त्यन्ये। नर्तृत्तः, ननूतति । अमि, अननृतम् । शेषं वृतूवत् । वेटत्वादेव क्तयोरिडभावे सिद्धे T दिवादिगणः। १८७ ऐदित्वं यलुबन्तादनेकखरादपीडभावार्थम् ; नरीनृत्तः, २ वान् । फलवत् कर्तरि "अणिगि प्राणि-"॥३।३।१०७॥ इति परस्मै प्राप्तौ, “परिमुह-"॥३३॥९॥ इत्यात्मनेपदे, नर्त्तयते नटं चैत्रः। “ऋढ-"॥४।२।३७॥ इति वा ऋः, अनीनृतन् अननर्त्तन् । नृत्यन् । नृत्यन्ती । नय॑न् ; नतिष्यन् । ननृत्वान् । ननृतानम् । वेट्वान्नेटि, नृत्तः, २ वान् । नर्ति ३ ता, तुम्, त्या। प्रनृत्य ॥ ९ ॥ कुथ्च् पूतिभावे; दुर्गन्धक्लेदे। कुथ्यति । कुथ्यते। अको २ थीत्, थिष्टाम् । अकोथि। चुकोथ। चुकुथे। कुथ्यात् । कोथिषीष्ट । कोथिता २। कोथिष्यति, ते । चुकुथिषति; चुकोथिषति । चोकुथ्यते । अचूकुथत् । कोथिला। अत्र “वौ व्य- ञ्जन-"॥४॥३॥२५॥ इति क्त्वो विकल्पेन कित्त्वेऽपि "ऋत्तृष-"॥४।३।२४॥ इत्यत्र न्युपान्ये इत्यस्य व्यावृत्तिबलात् , “क्तवा"॥४।३।२९॥ इत्यनेन नित्यं न कित्त्वम् ; कुथितम् । कोथि २ ता, तुम् ॥ १० ॥ गुधच् परिवेष्टने । गुध्यति । जुगोध । गोधिता। गोधितुम् । “क्षुधक्लिश-" ॥४॥३॥३१॥ इति त्वः कित्त्वे, गुधित्वा । गुधितः । शेषं कुथच्वत् ॥ ११ ॥ त्रयोऽनिटः॥ राधंच् वृद्धौ । स्वादिषु पठिष्यमाणस्याप्यस्येह पाठो वृद्धावेव श्यार्थः। राध्यति, वर्डत इत्यर्थः। वृद्धेरन्यत्र नुरेव; राप्नोति, पचतीत्यर्थः। चुरा- देराकृतिगणवात् , राधयति; आराधयति। कश्चित्तु राध, साध, संसिद्धाविति पठन् वृद्धेरन्यत्रापि राधेः श्यं, साधिं च धात्वन्तरमिच्छति । राध्यत्यन्नम् ; आराध्यति । साध्यति ॥ १२ ॥ व्यधंच ताडने । “शिदवित्"॥४।३।२०॥ इति श्यस्य ङित्त्वात् “ज्याव्यधः क्ङिति"॥४८॥ इति वृति, विध्यति। विध्यते । अव्यात्सीत्, अव्याहाम्, अव्यात्सुः, अव्यात्सीः, अव्याडम्, अव्याड, अव्यात्सम् , अव्यात्व, अव्यात्स्म । अव्याधि, अव्यत्साताम् । “ज्याव्येव्यधि-"||१७१॥ इति पूर्वस्येवे, विव्याध, विविधतुः, विविधुः, विव्यधिथ, विव्यद्ध, विविधथुः, विविध, विव्याध, विव्यध, विविधि २ व, म। विविधे । विध्यात् । व्यत्सीष्ट । व्यडा २ । व्यत्स्यति । अव्य- स्यात् । विव्यत्सति । वेविध्यते। व्यञ्जनादौ विति, वेवे ३ दि; त्सि; ध्मि । शेषे, बेवि धीति, दुः, धति, धीषि, हः, हु धीमि, ध्वः, ध्मः। हो, वेविद्धि ॥ ह्य. ।

१८८ क्रियारमसमुच्चयः। व्यअनादौ विति; अवे ३ वेत् ; वे, वेत्। शेषे, अवेवि ९धीत्, डाम्, धुः, धी:, द्वम्, ; धं, ध्व, ध्म । शेषं पचिस्थाने । व्याधयति । अविव्यधत्। विध्यन् । व्यत्स्यन् । विद्धः,२वान् । विद्ध्वा।प्रविध्य।व्यद्धा । व्यडुम्। व्यद्धव्यम् ॥१३॥ क्षिपंच, प्रेरणे । क्षिप्यति । अक्षेप्सीत् । चिक्षेप । क्षेप्ता । क्षिप्तः । शेषं तु क्षिपीत् प्रेरणे इत्यस्येव ॥ १४ ॥ तिम, तीम, ष्टिम, टीमच् आर्द्रभावे । तिम्यति । क्ये, तिम्यते । अतेमीत्, अतेमिष्टाम् । अतेमि, अतेमिषाताम् । तितेम; तितिमिम । तितिमे । तिम्यात् । तेमिषीष्ट । तेमिता।तेमिष्यति,ते। अतेमिष्यत् , त। तितेमिषति; तितिमिषति । तेतिम्यते। तेतिमीति, तेतेन्ति, तेतीन्तः, तेतिमति । तेमयति । अतीतिमत। तिते- मयिषति । तिम्यन्। तिम्यन्ती । तिम्यमानम् । तेमिष्य २न् , माणम् । तिमितः, २ वान् । “चौव्यः॥४।३।२५॥ इति क्वासनोर्वा कित्त्वे, तेमित्वा; तिमित्वा । प्रति- म्य । तेमि २ ता, तुम्। तितिन्वान् । तितिमानम् ॥ ष्टिम् ॥ स्तिम्यति । स्तिम्यते। अस्तेमीत् । षपाठात् षवे; तिष्टेम; तिष्टिमिम । तिष्टिमे । स्तमिता । स्तेमिष्यति । "णिस्तोरेव."॥२॥३॥३७॥ इति न षत्वे, तिस्तिमिषति; तिस्तेमिषति । तेष्टिम्यते । तेष्टेन्ति; तेष्टिमीति । स्तेमयति। अतिष्टिमत् । शेषं तिम्वत् । तीम, टीमौ चाप्र- सिद्धत्वादल्पं लिख्यते । तीम्यति । अतीमीत् । तितीम । तीमिता । स्तीम्यति । अस्तीमीत् । तिष्टीम । तिष्टीमे । स्तीमिता । स्तीमितः ॥१५॥१६॥१७॥१८॥ पिवूच उतौ; उतिर्वानम् ; तन्तुसन्तान इत्यर्थः। सीव्यति। क्ये, सीव्यते। असेवीत, असे ३ विष्टाम्, विषुः, वीः । असेवि, असेविषाताम्। सिषेव, सिषि- वतुः, सिषिवुः, सिषेविथ, सिषिवथुः, सिषिव, सिषेव, सिषिवि २ व, म । सिषिवे। सीव्यात्। सेविषीष्ट। सेविता। सेविष्यति। असेविष्यत् । परि, नि, वि पूर्वस्य "अ- सोङसिवू -२३४८॥ इति षे, परिषीव्यति; निषीव्यति; विषीव्यति। अड्व्यवाये, "स्तुस्वञ्जश्च-"॥२॥३॥४९॥ इति वा थे, पर्यषीव्यत् , पर्यसीव्यत्; न्यषीव्यत्, न्य- सीव्यत् ; व्यषीव्यत्, व्यसीव्यत् , षट्खपि ऊतवानित्यर्थः । परिषिषेव । परिषिषेवे इत्यादि । “इवृध-"॥४४॥४७॥ इति वेटि, सुस्यूषति; सिसेविषति, अत्र “णिस्तोरेव-" ॥२२॥३७॥ इति नियमात् षणि न षत्वम्, “चौ व्यञ्जने-"३।२५॥ इत्यत्र दिवादिगणः। अय्व इति निषेधान्न क्त्वासनोः कित्त्वं च। सेषीव्यते। यन्तात्सनि; सेषिविषते। लुपि, सेषिवीति, सेष्योति, सेषेति । “असोङ-"॥२।३।४८॥ इत्यत्र सिवोऽनुबन्ध- निर्देशादत्र न षवे, परिसेषिवीति, सेप्यूतः, सेषिवति, सेष्योषि, सेषिवीषि, सेषेषि । अग्रे दिवूच्वत् । सेवयति; परिषेवयति । ऊ, असीषिवत् । “असोङ-" ॥२।३।४८॥ इति निषेधान्न षले, पर्यसीषिवत् । मा परिसीषिवत् । सिषेवयिषति । सीव्य २, मानम्। सेविष्य २ न् , माणम्। “य्वोः-॥४।४।१२१॥ इति व्लुकि, सिषिवान् । सिषिवाणम् । सेवि २ ता, तुम् । अदित्त्वात् क्वि वेटि, स्यूत्वा; "क्त्वा "॥४।३।२९॥ इति कित्त्वाभावाद्गुणे, सेविला । वेट्त्वान्नेटि, स्यूतः, २ वान् । सेवितव्यम् । सेव्यम् । “ष्ठिव्सिवोऽनटि वा"।२।११२॥ इति वा दीर्थे, सेवनम्, सीवनम् ॥ १९ ॥ ष्ठिवूच् निरसने । “षः स-॥२।३।९८॥ इत्यत्र ष्ठिवो वर्जनान्न सः, "भ्वादेः-"॥२॥१॥६३॥ इति दीर्घ, ष्ठीव्यति । क्ये, निष्ठीव्यते । शेषं भौवादिक- ष्ठिवूवत् ॥ २० ॥ इषच गतौ । इष्यति; अन्विष्यति, प्रेष्यति । क्ये, इष्यते । अद्य० ॥ ऐषीत् , ऐषिष्टाम् , ऐषिषुः । ऐषि, ऐषषाताम् । इयेष, ईषतुः, ईषुः; इयेषिथ, ईषिम। ईथे, ईषाते । इष्यात्। एषिषीष्ट । एषिता २ । एषिष्यति । प्र, एषिष्यति “उपसर्गस्यानिण्॥१।२।१९॥ इत्यलुकि, प्रेषिष्यति, ते । ऐषिष्यत्, त । एषि- षिषति । एषयति । एष्यते । एषिषत् । इष्यन् । इष्यन्ती । इष्यमाणम् । एषिष्य २ न, माणम् । ईषिवान् । ईषुषी । ईषाणम् । ईषितः, २ वान् । एषि ३ ता, तुम् , तव्यम् । एषित्वा । प्रेष्य । ध्यणि, एण्यः । “प्रस्यैषैष्य-"॥१॥ २॥१४॥ इत्यैवे, प्रैष्यः। अलुकि, प्रेषणम् ॥ २१ ॥ त्रसैच् भये । “भ्रासम्लास-॥३॥४॥७३॥ इति वा श्ये, त्रस्यति ।पक्षे, शवि, त्रसति । क्ये, त्रस्यते ॥ अद्य० ॥ अत्र २ सीत्, सिष्टाम्, सिषुः। अत्रा ३ सीत्, सिष्टाम् , सिषुः। अत्रासि, अत्रसिषाताम् । तत्रास । “जुभ्रम-४।१।२६॥ इति वैत्वे, सतुः, त्रेसुः, त्रेसिथ; सिम । त्रेसे । पक्षे, तत्रसतुः, तत्रसुः; तत्र- सिव, तत्रसिम । तत्रसे । त्रस्यात् । त्रसिषीष्ट । त्रसिता २ । त्रसिष्यति, ते ।

९ क्रियारत्नसमुच्चयः। अत्रसिष्यत्, त । तित्रसिषति । तात्रस्यते । तात्र २ सीति, स्ति । त्रासयति । अतित्रसत् । त्रस्यन् । सन् । त्रसिष्यन् । त्रसिष्यमाणम् । त्रेसिवान् ; तत्र- खान् । त्रेसानम् ; तत्रसानम् । त्रसि ३ ता, तुम्, वा । ऐदित्त्वान्नेटि, त्रस्तः, २ वान् ॥ २२ ॥ षहच शक्तौ। सह्यति । परि, नि, वि पूर्वस्य, “असोङ-"॥२॥३॥४८॥ इति षत्वे, परिषह्यति । सह्यते। “न श्वि-"॥४॥३॥४९॥ इति न वृद्धिः, असहीत् । ससाह । “अनादे-४१॥२४॥ इत्येवं, न च द्विः, सेहतुः। सहिता । सहिष्यति। सिष. हिषति ॥ २३ ॥ ३ अथ पुषादिः। पुषंच पुष्टौ । अकर्मकोऽयं अनिट् च । पुष्यति, पुष्टो भवतीत्यर्थः । क्ये, पुष्यते। परस्मैपदे पुषादित्वादङि, अपुषत् , अपु ८ षताम् , षन् , षः, षतम् , षत, षम्, पाव, षाम । एवमग्रेऽपि । सकि, व्यत्यपु ९ क्षत, क्षाताम् , क्षन्त, क्षथाः, क्षाथाम् , क्षध्वम् , क्षि, क्षावहि, क्षामहि ॥ भावे; अपोषि । पुषोष, पुपुषतुः; पुपोषिथ; पुपुषिम। पुपुषे। पुष्यात्। पुक्षीष्ट, कित्त्वान्न गुणः। पोष्टा। पोक्ष्यसि । अपोक्ष्यत् । पुपुक्षति । पोपुष्यते । पोपोष्टि, पोपु ३ षीति, ष्टः, षति; पोपोक्षि, पोपु ३ षीषि, ष्ठः, ष्ठ, पोपोष्मि, पोपु ३ षीमि, प्वः, ष्म । पोपुष्यात् । पोपोष्टु । अपोपोट, अपोपुषीत् , अपोपुष्टाम्, अपोपुषुः, अपोपोट, अपोपुषीः; अपोपुषम् । पोषयति। अपूपुषत् । पुष्यन् । पोक्ष्यन् । पुष्यमाणम् । पोक्ष्यमाणम् । पुष्टः, २ वान् । पुष्टिः । पुष्ट्वा । प्रपुष्य । पोष्टा । पोष्टुम् । पोष्टव्यम् । पोष्यम् ॥२४॥ लुटच् विलोटने । लुट्यति । पुण्याद्यङि, अलुट २ त्, ताम्। शेषं भूवा- दिलुटवत् ॥ २५ ॥ विदांच् गात्रप्रक्षरणे; धर्मस्रुतौ । अनिट् । विद्यति, प्रविद्यति । क्ये, खिद्यते । पुष्याद्यङि, अस्विद ३ त् , ताम्, न् । अखेदि । सिष्वेद, सिवि. दतुः; सिष्वेदिथ । सिष्विदे । स्विद्यात् । “सिजाशिष ॥४।३।३५॥ इति कित्त्वे, दिवादिगणः । वित्तीष्ट । खेत्ता । खेत्स्यति । सिवित्सति । सेष्विद्यते । खेदयति । असिवि- दत् । “णिस्तारेव-"॥२॥३॥३७॥ इत्यत्र वर्जनान्न षत्वे, सिखेदयिषति । आदित्त्वान्नेट; खिन्नः, २ वान् । “नवा भाव-"॥४।४/७२॥ इति वा नेटि, खिन्नमनेन । प्रखिन्नः, २ वान् । पक्षे इटि, “न डीङ्-॥४।३।२७॥ इति कित्त्वाभावाद्गुणे, खेदितमनेन । प्रस्वेदितः, २ वान् । खेत्ता। खेत्तुम्। वित्त्वा । प्रखिद्य ॥ २६ ॥ क्लिदौच आर्द्रभावे। क्लियति। क्लिद्यते । पुष्याद्यङि, अक्लिदत् । अक्लेदि । चिक्लेद । चिक्लिदे । क्लिद्यात् । औदित्त्वाद्वेटि, क्लित्सीष्ट; क्लेदिषीष्ट । क्लेता; क्लेदिता । क्लेत्स्यति; क्लेदिष्यति । चिक्लित्सति; चिक्लिदिषति; चिक्लेदिषति । चक्लिद्यते । क्लेदयति । अचिक्लिदत् । क्लियन् । वेट्लान्नेट , क्लिन्नः, २ वान् । क्लेत्ता । क्लेत्तुम् । क्लेदि २ ता, तुम् । वेटि, “वौ व्यञ्जन-"॥४।३।२५॥ इति वा कित्त्वे च, क्लित्त्वा, क्लिदित्वा, क्लेदित्वा ॥ २७ ॥ चत्वारोऽनिटः ॥ क्षुधंच् बुभुक्षायाम् । क्षुध्यति । क्ये, क्षुध्यते । अङि, अक्षुध ३ त् , ताम्, न् । अक्षोधि, अक्षु ९ त्साताम्, त्सत, डाः, साथाम् , द्ध्वम्, द्ध्वम् , सि, त्स्वहि, स्महि । चुक्षोध, चुक्षुधतुः; चुक्षोधिथ । चुक्षुधे। क्षुध्यात् । क्षुत्सीष्ट । क्षोद्धा २ । क्षोत्स्यति । अक्षोत्स्यत् । चुक्षुत्सति । चोक्षु- ध्यते । चोक्षोद्धि, चोक्षुधीति । क्षोधयति । अचुक्षुधत् । क्षुध्यन् । क्षुध्यमानम्। क्षुधवसस्तेषाम् "||४|४|४३॥ इतीटि, क्षुधितः, २ वान् । "क्षुध-"॥४४४३॥ इतीटि, “क्षुधक्लिश-॥४।३।३१॥ इति कित्त्वे च, क्षुधित्वा । क्षोधिवा इत्यप्यन्ये । क्षोद्धा । क्षोडुम् ॥ २८ ॥ शुधंच् शौचे; नैर्मल्ये । शुध्यति; विशुध्यति । क्ये, विशुध्यते । अङि, अशुधत् । भाक । अशोधि, अशुत्साताम् । शुशोध, शुशुधतुः; शुशोधिथ, शुशुधिम । शुशुधे । शुध्यात् । शुत्सीष्ट। शोद्धा । शोत्स्यति । शुशुत्सति । शोशु- ध्यते । शोशोद्धि, शोशुधीति । शोधयति । अशूशुधत् । शुद्धः, २ वान् । शुद्धिः । शोडा । शोडुम् । शुद्ध्वा । विशुध्य ॥ २९ ॥ क्रुधंच कोपे। "क्रुद्रुह-"॥२।२।२७॥ इति सम्प्रदानवे, मैत्राय क्रुध्यति । क्ये; क्रुध्यते । अक्रुधत्। अक्रोधि। चुक्रोध। चुक्रुधे । क्रुध्यात् । क्रुत्सीष्ट । क्रोद्धा। , १९२ क्रियारत्नसमुच्चयः । , कोत्स्यति । चुक्रुत्सति । चोक्रुध्यते। चोक्रोद्धि, चोक्रुधीति । क्रोधयति । अचु. क्रुधत् । क्रुद्धः, २ वान् । क्रुद्ध्वा । क्रोडुम् । क्रोद्धा ॥ ३० ॥ षिधूंच संराद्धौ; निष्पत्तौ । सिध्यति; “स्थासेनिसिध-"॥२॥३॥४०॥ इत्यत्र सिध्यतेरग्रहणादुपसर्गान्न षत्वम्, अभिसिध्यति, सिध्यतः, सिध्यन्ति । क्ये, सिध्यते । अङि, असिधत् , असिधताम् । असेधि । षपाठात् “नाम्यन्त-" ॥२॥३॥१५॥ इति षत्वे, सिषेध, सिषिधतुः, सिषिधुः, सिषेधिथ; सिषिधिम । सि- विधे। सिध्यात् । सित्सीष्ट । सेद्धा । सेत्स्यति । असेत्स्यत् । सिषित्सति । सेषि. ध्यते । सेषेद्धि, सेषिधीति । णौ “सिध्यतेरज्ञाने"॥४।२।११॥ इत्यावे, मन्त्रं साध. यति; तपः साधयति; अन्नं साधयति दातुम् । ज्ञाने तु, आचारः कुलं सेध- यति, ज्ञापयतीत्यर्थः । असीषधत् ; असीषिधत् । सिषाधयिषति; सिषेधयिषति । साधितः । साधयित्वा । सिध्य २ न्, मानम् । सेत्स्य २ न्, मानम् । सिषि. ध्वान्। सिषिधानम् । सिद्धः, २ वान् । सिद्ध्वा, सिधित्वा, सेधित्वा; ऊदित्वात् तिव वेट। सेद्धा । सेडुम् । सिद्धिः ॥ ३१ ॥ ऋधूच् वृद्धौ । ऋध्यति; समृध्यति। क्ये, ऋध्यते । पुष्याद्यङि, आर्धत् ; मायोगे न वृद्धिः, मा ऋधत्, आर्धताम् , आर्धन् । आर्घि । “अनात-"॥ ११।६९॥ इति पूर्वस्यावे, ने च, आनर्ध, आनृधतुः, आनृधुः, आनर्धिथ; आनृधिम । आनृधे । ऋध्यात् । आधिषीष्ट । अर्धिता २ । अधिष्यति । आ- धिष्यत् । “इवृध--"||४|४७॥ इति वेटि, अदिधिषति । पक्षे “ऋध ई॥४१ ॥१७॥ इति ई न च द्विः, ईर्ल्सति । णौ, अर्द्धयति । आर्दिधत् । समृध्यन् । समृध्यमानम् । समर्धिष्यन् । आनृध्वान् । आनृधानम् । अदित्त्वात् तिव वेट, ऋद्ध्वा; अर्धित्वा । समृध्य । वेट्वान्नेटि, ऋद्धः, २ वान् । अर्धिता । अर्धितुम् ॥ ३२ ॥ गृधूच अभिकाङ्क्षायाम् । गृध्यति । क्ये, गृध्यते । अङि, अगृधत् । अगर्धि, अगर्धिषाताम् । जगर्ध, जगृधतुः; जगृधिव, जगृधिम । जगृधे । गृध्यात् । गर्धिषीष्ट । गर्धिता । गर्धिष्यति। अगर्धिष्यत् । जिगर्धिषति । जरी- गृध्यते । “युक्तोपान्त्य-"॥४॥३१॥ इति गुणाभावे, जरीगृधीति; जरीगदि । , दिवादिगणः । १९३ रि, री,र् त्रयं प्रत्येकमत्राग्रे च योज्यं सर्वत्र। जरि१०गृद्धः, गृधति, घसि, गृधीषि, गृद्धः, गृह, गृधीमि, गमि, गृध्वः, गृध्मः । क्ये, जरिगृध्यते । जगुंध्यात् । जरीगृधीतु; जरीगई। हो, जशृद्धि ॥ ह्य० ॥ अजरि ५ घt , घ, गृधीत्, गृद्धाम्, गृधुः । “सेः सुद्धाम्-"॥४॥३॥७९॥ इति से कि वा धस्य रुवे; आदिचतुर्थले; "रो रे-॥१॥३॥४१॥ इति रकि, अतो दीर्घ च, अजरी ९ घाः, धत्, धर्ट्स, गृधीः, गृद्धम् , गृद्ध, गृधम्, गृध्व, गृध्म । शेषं पचिस्थाने । णौ, "प्रलम्भे गृधि-'॥३॥३८९॥ इत्यात्मनेपदे; गईयते श्वानम्, प्रतारयतीत्यर्थः । अन्यत्र गर्डयति, प्रलोभयतीत्यर्थः । “ऋदृ-"॥१२॥३७॥ इति वा ऋः, अजी- गृधत्, अजगर्धत् । गृध्यन् । गृध्यमानम् । गर्धिष्य २ न्, माणम् । जगृध्वान् । जगृधानम् । गृद्ध्वा, गर्धित्वा; ऊदित्त्वाद्वेट , "त्या"॥४।३।२९॥ इत्यकित्त्वा- गुणश्च । वेट्लान्नेटि; गृद्धः, २ वान् । गर्धि २ ता, तुम् ॥ ३३ ॥ त्रयो वेटः॥ रघौच हिंसासरायोः; संराद्धिः पाकः । रध्यति । क्ये, रध्यते । पुष्याद्यङि, स्वरादौ प्रत्यये, “रध-"॥४४१०१॥इतीटि ने,“नो व्यञ्जन-"॥४।२।४५॥ इति नलुकि; अरधत्, अरधताम् । अरन्धि; औदित्त्वादेटि, इटि तु परोक्षाया- मेवेति नियमान्नागमाभावेच; अरधिषातामित्यादि । पक्षे, अरत्साताम्, अरत्सत, अरद्धाः; अरद्ध्वम्, अरद्ध्वम् । “रध-॥४|४|१०११॥ इति ने, ररन्ध, “इन्ध्य-"॥१३।२१॥ इति संयोगारिकत्त्वाभावे; ररन्धतुः, ररन्धुः, ररन्धिथ, रर ५ न्धथुः, न्ध, न्ध, न्धिव, न्धिम । ररन्धे । रध्यात् । रत्सीष्ट; रधिषीष्ट । रद्धा, रधिता। रत्स्यति, रधिष्यति । अरत्स्यत् ; अरधिष्यत् । रिरत्सति; रिरधिषति । रारध्यते । रारद्धि, रारन्धीति, रारद्धः, कित्त्वान्नस्य लुकि; रारधति ॥ ह्य० ॥ अरा ७ रत्, रन्धीत्, रडाम्, रधुः, रः, रत्, रन्धीः । रारधत् । रन्ध- यति । अररन्धत् । रिरन्धयिषति । रध्यन् । रत्स्यन् ; रधिष्यन् । “अनादेशादेः” ॥१२॥ इत्येवे, “घसेक-"४/८२॥ इतीटि, “रध-"॥४|४|१०१॥ इति ने, कसोः कित्त्वान्नलुकि च; रेधिवान् । रेधानम् । वेट्लान्नेट ; रडः, २ वान् । रद्ध्वा; रधिला । रधि २ ता, तुम् । रद्धा, रहम् । रडव्यम्; रधित- व्यम् ॥ ३४॥ २६ १९४ क्रियारलसमुश्चयः। तृपौच प्रीतौ; सौहित्ये । तृप्यति । क्ये, तृप्यते । आङि, अतृपत् । "स्पृ- शमृश-"॥३४॥५४॥ इति वा सिचि, अताप्सर्सीत्, "स्पृशादि-॥१११२॥ इति खरात्परे वा अति; अत्राप्सीत् । रणे कृतान्तमत्राप्सीत् , तृप्तीचक्रे इत्यर्थः । अन्त- भूतणिगर्थोऽत्र तृपिः सकर्मकः। औदिलादेटि, अतीत् , अतृपताम् ; अताप्तम्, अत्राप्ताम् , अतर्पिष्टाम्। अतर्पि, “सिजाशिष-"॥४॥३॥३५॥ इति कित्त्वाद् ,अद- नागमे, अतृप्साताम् , अतर्पिषाताम् । थासि, अतृप्थाः अतर्पिष्ठाः। ध्वमि, अतृ- ब्ध्वम्, अतृब्द्ध्वम् ;अतर्पि २ ध्वम्, ड्वम् । ततर्प, ततृपतुः; ततर्पिथ; ततृपिम। ततृपे । तृप्यात् । तृप्सीष्ट; तर्पिषीष्ट । ता; त्रप्ता; तर्पिता । त्रप्स्यति, तपे- ति, तर्पिष्यति । अत्रप्स्यत्, अतय॑त् , अर्पिष्यत् । तितृप्सति, तितर्पिषति । तरीतृप्यते। तरीतर्ति, तरीत्रप्ति, तरीतृपीति। रिरी र त्रयं सर्वत्र । तर्तृप्तः, तप्तः, तरीपति । तर्तृपत्। तर्पयति । तय॑ते । अतीतृपत्, अततर्पत् । तृप्यन्। तृप्य- माणम् । ततृप्वान् । ततृपाणम् । वेट्वान्नेट ; तृप्तः, २ वान् । तृप्त्वा; तर्पि- ला । प्रतृप्य । ता, त्रप्ता, तर्पिता । तप्तुम् , त्रप्तुम्, तर्पितम् । ततव्यम्, त्रप्तव्यम् , तर्पितव्यम् । तृप्यम् ॥ ३५॥ दृपौच हर्षमोहनयोः; मोहनं गर्वः। दृप्यति। दृप्यते। अदृपत्। अदाप्र्सीत्; अद्राप्सीत् ; अदपीत् । अदर्पि । ददर्प, ददृपतुः । ददृपे । दृप्यात् । दृप्सीष्ट, दर्पिषीष्ट । दप्ता, द्रप्ता, दार्पिता । दय॑ति, द्रप्स्यति; दर्पिष्यति । एवं क्रिया- तिपत्तावपि । दिदृप्सति, दिदर्पिषति । दरीदृप्यते । दरि ६ हपीति, दर्ति, द्रप्ति, दृप्तः, द्रप्तः, दृपति । दर्पयति। अदीदृपत् , अददर्पत् । दृप्तः, २ वान् । दृप्तिः। दृप्त्वा, दर्पिला । प्रदृप्य । दप्ती, द्रप्ता, दर्पिता । दर्तुम् , द्रप्तुम्, दर्पितुम् । दर्तव्यम् , द्रप्तव्यम् , दर्पितव्यम् । दृप्यम् । साधनिका तृपिवत् ॥ ३६ ॥ कुपच् कोपे। कुप्यति । कुप्यते । अकुपत्। अकोपि । चुकोप; चुकुपिम । चुकुपे । कुप्यात्। कोपिषीष्ट । कोपिता। कोपिष्यति । अकोपिष्यत् । चुकुपिषति, चुकोपिषति । चोकुप्यते । चोकोप्ति, चोकुपीति, चोकुप्तः, चोकुपति । कोप- यति । अचूकुपत् । “ व्यञ्जनादे म्युपान्त्याहा"॥२।३।८७॥ इति वा गले, प्रकुप्यमाणम् ; प्रकुप्यमानम् । कुपितः, २ वान् । कुपित्ला, कोपित्वा । कोपि दिवादिगणः १९९ ३ ता, तुम्, तव्यम् । कुप्यम्, कोप्यम् । प्रकोपणीयम्, प्रकोपनीयम् ॥३७॥ गुपच् व्याकुलले । गुप्यति; विगुप्यति । गुप्यते । अगुपत् । अगोपि । जुगोप । जुगुपे । गुप्यात् । गोपिषीष्ट । गोपिता । गोपिष्यति । जुगुपिषति, जुगोपिषति । जोगुप्यते । अजूगुपत् । गुपितः, २ वान् । गुपिला, गोपिला । गोपितुम् ॥ ३८ ॥ लुपच् विमोहने । लुप्यति । अयं कुपच्वत् ; परं "गृलुप-"॥३२॥१२॥ इति गार्थायङ्, लोलुप्यते ॥ ३९ ॥ लुभच् गाये; गार्चमभिकाङ्क्षा । लुभ्यति। लुभ्यते । अलुभत् । अलोभि। लुलोभ, लुलुभतुः; लुलुभिम । लुलुभे। लुम्यात् । लोभिषीष्ट । तादौ “सहलुभ-" ॥४४॥४६॥ इति वेटि, लोब्धा, लोभिता । लोभिष्यति । लुलुभिषति, लुलो- भिषति । लोलुभ्यते । लोलुभीति, लोलोब्धि । लोभयति; प्रलोभयति । अलू- लुभत् । वेट्लान्नट; लुब्धः, २ वान् । वेटि, "वौ व्यञ्जन॥४।३।२५॥ इति वा कित्त्वे, लुब्ध्वा, लुभित्वा, लोभित्वा । लो ३ ब्धा, ब्धुम्, ग्धव्यम्; लोभि३ ता, तुम्, तव्यम् । लोभ्यम्, लुभ्यम् ॥ ४० ॥ क्षुभच् सञ्चलने; रूपान्यथात्वम् । क्षुभ्यति । अक्षुभत् । चुक्षोभ । क्षोभि ता। "क्षुब्धविरिब्ध-"|४|४/७०॥ इति क्ते निपातनात् , क्षुब्धो मन्थः। क्षुभितोऽन्यः शेषं कुपच्वत् ॥ ४१ ॥ नशौच अदर्शने; अनुपलब्धौ । नश्यति; "नशः शः"।।२।३।७८॥ इति णत्वे, प्रणश्यति; परिणश्यति । क्ये, नश्यते ॥ अद्य० ॥ पुष्याद्यङि, "नशे- Hश्वा-"॥४।३।१०२॥ इति वा नेशादेशे, अनेशत् , अनशत् । भाक। अनाशि । औदिवाइटि, “नशो धुटि"॥४।१०९॥ इति मे, अनङ् ९ क्षाताम्, क्षत, ष्ठाः, क्षाथाम् , ड्वम्, ग्ड्ढ्वम्, क्षि, वहि, महि । पक्षे इटि, अनशिषाता- मित्यादि । ननाश, नेशतुः, नेशुः, नेशिथ, नेशथुः, नेश, ननाश, ननश, नेशिव, नेशिम। नेशे। नश्यात् । नङ्क्षीष्ट, नशिषीष्ट । नंष्टा, नशिता । नक्ष्य- ति, नशिष्यति; "नशः शः "॥२॥३७८॥ इत्यनेन षान्तस्य न णः; प्रनक्ष्यति; परिनक्ष्यति । शान्तस्य तुणा, प्रणशिष्यति । निनङ्क्षति; निनशिषति । नान- क्रियारत्नसमुच्चयः। श्यते । नानीति, नाष्टि, नानंष्टः, नानशति । णौ "चल्याहार-"॥३३॥१० इति फलवत्यपि परस्मैपदे, नाशयति। अनीनशत्। मा विनीनशः। “जनशोनि-" ॥४॥३॥२३॥ इति वा कित्त्वे; नष्ट्वा, नंष्ट्वा, नशिखा । प्रणश्य । वेट्वान्नेट, "नो व्यञ्जनस्य-"॥४२॥४५॥ इति नलुक् च, नष्टः, २ वान्, षान्तस्य णत्वा- भावे, प्रनष्टः, २ वान् । नंष्टा, नशिता । नंष्ट्री, नशित्री। नंष्टुम्, नशितुम्; प्रनंष्टुम्, प्रणशितुम् । नंष्टव्यम्, नशितव्यम् । नशनीयम् । विपि "नशो वा" ॥२॥१७॥ इति वा गे, “यज-"॥२।११८७॥ इति षे च; नक्, नट् ॥ ४२ ॥ भृशू, भ्रंशूच् अधःपतने । भृश्यति । क्ये, भृश्यते । आङि, अभृशत् । अभर्शि । बभर्श; बभृशिम । बभृशे। भृश्यात् । भर्शिषीष्ट । भर्शिता। भार्शष्य- ति । बिभर्शिषति । बरीभृश्यते। बरिभृशीति, बरिभटिं। रिरीरागमत्रयं सर्वत्र । बरिभृष्टः, बरिभृशति । भर्शयति । अबीभृशत् ; अबभर्शत् । भृश्यन् । भृश्य- मानम् । भार्शष्य २ न्, माणम् । बभृ २ श्वान्, शानम् । अदित्वाद्वेट, भृष्ट्वा, भर्शित्वा । वेट्वान्नेट; भृष्टः, २ वान् । भर्शि २ ता, तुम् ॥ भ्रंशू ॥ भ्रश्यति । भ्रश्यते । अभ्रशत् । अभ्रंशि । बभ्रंश, बभ्रंशतुः; “इन्ध्य-"॥४॥३॥ २१॥ इति न कित्त्वं संयोगात्, बभ्रंशिम । बभ्रंशे। भ्रश्यात् । भ्रंशिषीष्ट । भ्रंशिता। भ्रंशिष्यति। बिभ्रंशिषति। “वञ्चस्रंस-"॥४॥१५०॥ इति ध्वंसिसहचरितस्य भ्वादे- रेव भ्रंशेग्रहणान्न्यागमाभावे, बाभ्रश्यते । बाभ्रंशीति, बाभ्रष्टि । भ्रंशयति । अबभ्रं- शत्। भ्रश्यन् । भ्रश्यमानम् । भ्रंशिष्य २ न्, माणम् । बभ्र २ श्वान् , शानम्। भ्रष्ट्वा, "क्तवा"॥४।३।२९॥ इत्यकित्त्वे, भ्रंशित्वा । भ्रष्टः, २ वान् । भ्रंशि २ ता,, तुम् ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ कृशच् तनुत्वे। कृश्यति । अकृशत् । चकर्श। कर्शिता । चिकर्शिषतिः । चरीकृश्यते । चरीकृशत् । अचीकृशत्, अचकर्शत् । “अनुपसर्गाः क्षीव-"४।२।८०॥ इति क्तयोनिपातनात् ; कृशः,२ वान् । परिकृशः, २ वान् । सोपसर्गस्य तु; प्रकृ- शितः, २ वान् । “ऋत्तृष-"॥४॥३॥२४॥ इति. क्त्वो वा कित्त्वे, कृशित्वा, कर्शित्वा । शेषं भृशूच्वत् ॥ ४५ ॥ त्रयोऽनिटः ॥ शुषंच् शोषणे । शुष्यति । शुष्को भवतीत्यकर्मकः । शुष्कं G

दिवादिगणः ।
१९७
i
करोतीत्यन्तर्णिगर्थविवक्षायां च सकर्मकोऽपि । क्ये, शुष्यते। अशुषत्। अशोषि;
सकि, अशुक्षाताम, ध्वमि, अशुक्षध्वम् । शुशोष; शुशोषिथ, शुशुषिम ।
शुशुषे । शुष्यात् । शुक्षीष्ट । शोष्टा । शोक्ष्यति। अशोक्ष्यत्। शुशुक्षति । शोशु-
ष्यते । शोशुषीति; शोशोष्टि । शोषयति । अशूशुषत् । शुष्य २ , माणम् ।
शोक्ष्य २ न् , माणम् । शुशुष्वान् । शुशुषाणम् । “शुषि-"||२|७८॥ इति
कत्वे; शुष्कः, २ वान् । शुष्टिः । शुष्ट्वा । शोष्टा । शोष्टुम् । शोष्टव्यम् ।
शोष्यम्। शोषणीयम् ॥ ४६ ॥
दुषंच् वेकृत्ये; रूपभङ्गे । दुष्यति । क्ये, दुष्यते । अदुषत् । अदोषि ।
दुदोष, दुदुषतुः; दुदोषिथ। दुदुषे। दुष्यात् । दुक्षीष्ट । दोष्टा। दोक्ष्यति । अदो-
क्ष्यत् । दुदुक्षति । दोदुष्यते । दोदोष्टि, दोदुषीति । णौ, “ऊदुष-"॥४।२।४०||
इति ऊत्, दूषयति चित्ते वा; चित्तं दूषयति । प्रज्ञां दूषयति; दोषयति वा ।
चित्तसहचरितत्वात् प्रज्ञाऽपि चित्तम्। ढे, अदूदुषत् । ड्रे न इख इत्यन्ये, अदु-
दूषत् । दुदूषयिषति । दुष्य २ न , माणम् ; दोक्ष्य २ न्, माणम् । दुदु २ ष्वान्,
षाणम्। दुष्टः, २ धान् । दुष्टिः । दुष्ट्वा । प्रदुष्य। दोष्टा । दोष्टुम् ॥४७॥
श्लिपंच आलिङ्गने। श्लिष्यति; विश्लिष्यति; आश्लिष्यति। क्ये, श्लिष्यते ।
लिष्येत् । श्लिष्यतु । अश्लिषत् । “श्लिषः "॥३१॥५६॥ इति सकि, आश्लिक्षत
कन्यां चैत्रः। क्रियाव्यतिहारे, “हशिट-"३।४।५५॥ इति सकि, व्यत्यश्लिक्षत
कन्याम् । असत्त्वाश्लेषे तु "नासत्त्वे ॥३।४।५७॥ इति सको निषेधात् पुण्याद्यङि,
समाश्लिषत् जतु च काष्ठं च। अश्लिषत् । आत्मनेपदे सिचि; व्यत्याश्लिष्ट । भाक।
आश्लेषि।आश्लि ८ क्षाताम्, क्षन्त, क्षथाः, क्षाथाम् , क्षध्वम्, क्षि, क्षावहि, क्षामहि।
असत्त्वाश्लेषे तु सिचि; आश्लि ९क्षाताम्, क्षत, ष्ठाः, क्षाथाम् , ड्वम् , ग्ड्वम् ,
क्षि, क्ष्वहि, महि । शिश्लेष, शिश्लिषतुः, शिश्लिषुः, शिश्लेषिथ; शिश्लिषिम ।
शिश्लिषे, श्लिष्यात् । श्लिक्षीष्ट । श्लेष्टा । श्लेक्ष्यति । अश्लेक्ष्यत् । शिश्लिक्षति ।
शेश्लिष्यते । शेश्लेष्टि, शेश्लिषीति । श्लेषयति । अशिश्लिषत् । श्लिष्यन् ।
श्लेक्ष्यन् । शिश्लिष्वान्। शिश्लिषाणम् । श्लिष्टः, २ वान् । श्लिष्टिः । श्लिष्ट्वा ।
आश्लिष्य । श्लेष्टा । श्लेष्टुम् । श्लेष्टव्यम् ॥ ४८ ॥

क्रियारमसमुच्चयः। प्लुधूच् दाहे। प्लुष्यति । क्ये, प्लुष्यते। अङि, अप्लुषत् । अग्लोषि, अप्लो- विषाताम् । शेषं प्लुषू दाहे इत्यस्येव ॥ ४९ ॥ नितृषच् पिपासायाम्। तृष्यति । क्ये, तृष्यते। अतृषत् । अतर्षि । ततर्ष; ततृषिम । ततृषे । तृष्यात् । तर्षिषीष्ट। तर्षिता। तर्षिष्यति । तितर्षिषति। तरी- तृष्यते । तरि ४ तृषीति, तष्टि, तृष्टः, तृषति । रिरीरः ३ सर्वत्र । तर्षयति । अतीतृषत् , अततर्षत् । तृष्यन् । तर्षिष्यन् । ततृष्वान्। ततृषाणम् । तृषितः, २ वान् । “ऋत्तृष-॥३२॥ इति वा कित्त्वे; तृषित्वा, तर्षित्वा । प्रतृष्य । तर्षि ३ ता, तुम्, तव्यम् ॥ ५० ॥ तुषं, हृषच्, तुष्टौ; प्रीतौ । आद्योऽनिट, तुष्यति । अतुषत् । तुतोष । तोष्टा । तुष्ट्वा । शील्यादित्वात्सति क्ते, तुष्टः । तुष्टिः। शेषं दुषंच्वत् ॥ हृष् ।। हृष्यति । अहषत् । जहर्ष । हर्षिता । हृषितः, २ वान्। “हषेः केश"४|४|७६॥ इति वा नेटि, केशाधुदुषणे; हृष्टाः, हृषिताः केशाः । हृष्टानि, हृषितानि लोमानि । हृष्टम्, हृषितं केशैर्लोमभिर्वा । हृष्टः, हृषितश्चैत्रः; विस्मित इत्यर्थः। हृष्टाः, हृषिता दन्ताः; प्रतिहता इत्यर्थः । तवा ॥४॥३॥२९॥ इत्यकित्त्वे, हर्षित्वा । प्रहष्य । ऊदिदयमिति नन्दी; हृष्ट्वा, हर्षित्वा । वेट्त्वात् क्तयोर्नेट, हृष्टः, २ वान् । शेषं तृषच्वत् ॥ ५१ ॥ ५२ ॥ रुषच रोषे । रुष्यति । क्ये, रुष्यते । अरुषत्। अरोषि । रुरोष; रुरुषिम । रुरुषे । रुष्यात् । रोषिषीष्ट । तादौ "सहलुभ-"॥४४॥४६॥ इति वेटि, रोष्टा, रोषि- ता। रोषिष्यति । रुरोषिषति, रुरुषिषति। रोरुष्यते।रोरुषीति, रोरोष्टि। रोषयति। अरूरुषत् । रुष्यन् । रोषिष्यन् । रोषिष्यमाणः।रुरु २ ष्वान् ,षाणम् । “श्वसजप-” ॥४४/७५|| इति वेटि, शील्यादित्वात्सतिक्ते च; रुष्टः, २ वान् ; रुषितः, २ वान् । तादौ वेटि; रोष्टा, रोषिता। रुष्ट्वा, रोषित्वा, रुषित्वा। रोष्टुम्, रोषितुम् ॥५३॥ असूच क्षेपणे । अस्यति; “उपसर्गादस्य-"॥३।३।२५॥ इति वात्मनेपदे, विपर्यस्यति, से; निरस्यति, ते; अभ्यस्यति, ते; अपास्यति, ते; “अकखादि-"॥२॥३॥ ८०॥ इति वा णिः, प्रण्यस्यति, प्रन्यस्यति । क्ये, अस्यते। पुष्याद्यङि, “श्वयत्य-" ॥३।१०३॥ इत्यस्थः; आस्थत् ; आस्थम्; आस्थाम। आत्मनेपदे तु; “शास्त्यसू."

दिवादिगणः । , ॥२६॥ इत्यङि, उदास्थत, उदास्थेताम् अपा९स्थत, स्थताम् , स्थन्त, स्थथाः, स्थेथाम् , स्थध्वम्, स्थे, स्थावहि, स्थामहि । भाक । आसि, आसिषाताम् । "अस्यादेः॥४।१।६८॥ इति पूर्वस्यात्वे, आस, आसतुः, आसुः, आसिथ। आसे, आसाते, आसिरे, आसिषे; आसिमहे । अस्यात् । असिषीष्ट । असिता। असि- प्यति । आसिष्यत् । असिसिषति; निरसिसिषति, ते । आसयति । आसिसत्। आसयाश्चकार । ऊदित्त्वात् क्त्वि वेट, अस्त्वा, असित्वा । निरस्य; अपास्य । वेट्त्वान्नेटि; अस्तः, २ वान् । असि ३ ता, तुम्, तव्यम् । आस्यम् । अस- नीयम् ॥ ५४॥ यसूच प्रयत्ने । प्रयस्यति; आयस्यति; संपूर्वस्यानुपसर्गस्य च, "भ्रास- भ्लास-॥३।४।७३॥ इति वा श्ये, संयस्यति; यस्यति । पक्षे शवि, संयसति; यसति । क्ये, यस्यते । आङि, अयसत् । अयासि । ययास, येसतुः, येसुः, येसिथ, येसथुः, येस, ययास, ययस, येसि २ व, म । येसे । यस्यात् । यसि- षीष्ट । यसिता । यसिष्यति । यियसिषति । यायस्यते । यायस्ति, यायसीति । णौ फलवति, “अणिगि प्राणि-"॥३।३।१०७॥ इति परस्मै प्राप्तावपि, “परिमुह-" ॥३३९४॥ इत्यात्मनेपदे, आयासयते शत्रु मैत्रः । आयीयसत । ऊदित्त्वात क्त्वि वेट; यस्त्वा, यसित्वा । आयस्य । आयस्तः, २ वान् । आयसि २ ता, तुम् ॥ ५५ ॥ शमू, दमूच् उपशमे । “शमसप्तकस्य-"॥४।२।१११॥ इति श्ये, दीर्थे; शाम्य- ति; निशाम्यति; "ने -॥२॥३॥७९॥ इति णिः, प्रणिशाम्यति । क्ये, शम्यते । पुण्याद्यङि, अशमत् । अशमि, “मोऽकमि-"॥४॥३॥५५॥ इति न वृद्धिः । एक- मग्रेऽपि । अशमिषाताम् । शशाम, शेमतुः, शेमुः, शेमिथ०, शेमिम । शेमे, शेमाते, शेमिरे, शेमिषे । शम्यात् । शमिषीष्ट । शमिता। शमिष्यति । शिशमि- षति । शंशम्यते । शंशमीति, शंशन्ति, शंशान्तः, शंशमति, शंशमीषि, शंशं. सि, शंशान्थः, शंशान्थ, शंश ४ मीमि, न्मि, न्वः, न्मः ॥ अद्य०|| "नश्चि-"। ४।३।४९॥ इति न वृद्धौ, अशंशमीत्; पुष्यादिगणानिर्देशाच्च न अङ् । शेष यङ्लुबन्तपचिवत् । णौ, " शमोऽदर्शने ॥४।२।२८॥ इति इखे, शमयति कियारत्नसमुच्चयः। रोगम् ; निशमयति श्लोकान् । अशीशमत् । अशामि, अशमि । शामम् । शमम् २। दर्शने तु, निशामय २ ति, ते रूपम् । न्यशीशमत्, त । न्यशामि । घटादेहखो वा भिणम्परे इत्येव हुखविकल्पेन सिद्धे दीर्घग्रहणं णिग्यङ् व्यवहितेऽपि णौ ञिणम्परे दीर्घत्वार्थम् । णिगन्ताण्णिगि; अशामि, अशमि । शामम् शशमम् शयन्ताणिगि; अशंशामि, अशंशमि। शंशामम् २। शंशमम् २; अत्र हि योऽसौ णौ णिलृप्यते, यश्च यङोऽकारस्तस्य स्थानित्वेन र्व्यवहितत्वाद् हस्वविकल्पो न स्यात् ; दीर्घग्रहणे तु, “न सन्धिङी-७४।१११॥ इति दीर्घविधौ स्थानित्वप्रतिषेधात्तद्विकल्पः सिध्यति। क्ते, "णौ दान्त-"॥४४७४॥ इति निपात- नात्; शान्तः। पक्षे, "सेट्क्तयोः"॥४।३।८४॥ इति णेलुंकि, शमितः। शमयित्वा । "लघोर्यपि"||४।३।८६॥ इत्ययि; प्रशमय्य । शाम्यन्। शमिष्यन् । शेमिवान् । शेमा- नम्। ऊदित्त्वाद्वेट; शान्त्वा, शमित्वा । उपशम्य । वेट्त्वान्नेट ; शान्तः, २वान्। शमि र ता, तुम्। ये, शम्यम् ॥ दमू ॥ दाम्यति। क्ये, दम्यते। अदमत्। अदमि । ददाम, देमतुः; देमिम। देमे । दम्यात्। दमिषीष्ट। दमिता। दमिष्यति । अदमिष्यत् । दिदमिषति। दन्दम्यते। दन्दमीति; दन्दन्ति, दन्दान्तः, दन्दमति। णौ, “अमोऽक- म्यमि-|४।२।२६॥ इति हस्वे, “अणिगि प्राणि-''॥३।३।१०७॥ इति प्राप्तेऽपि परस्मै. पदे “परिमुह-" ॥३।३।९४॥ इत्यात्मनेपदे; “गतिबोध-"॥२।२।५॥ इत्यणिकर्तुः कर्मत्वे च; दाम्यत्यश्वः, दमयतेऽश्वं चैत्रः। “अकख-"॥२।३।८०॥ इति णिः, प्रणिदमयते । अदीदमत । अदामि, अदमि। दमयित्वा । “णौ दान्त -७४॥ इति वा निपातनात्, दान्तः; दमितः। दाम्यन् । दम्यमानम् । दमिष्य २ न् , माणम् । देमिवान् । देमानम् । दान्त्वा; दमित्वा । दान्तः, २ वान्। दान्तिः । दमि ३ ता, तुम् , तव्यम् । दम्यः। शेषं शमूवत् ॥ ५६ ॥ ५७ ॥ तमूच् काङ्क्षायाम् । ताम्यति । तम्यते । अतमत् । अतमि । तताम, तेमतुः । तेमे । तमिता। तान्तः, २ वान् । तान्त्वा; तमित्वा। एवं सर्वो दमूच्वत्; परं णिगि परस्मै, तमयति । अतीतमत् ॥ ५८ ॥ श्रमूच् खेदतपसोः। श्राम्यति; विश्राम्यति; परिश्राम्यति । क्ये, श्रम्यते । अश्रमत् । “मोऽकमि-॥४॥३॥५५॥ इति न वृद्धौ, अश्रमि । “विश्रमेर्वा" , दिवादिगणः। T ॥४॥३॥५६॥ इति वा न वृद्धौ; व्यश्रमि, व्यश्रामि । शश्राम, शश्रमतुः; शश्र- मिम । शश्रमे । श्रम्यात् । श्रमि ३षीष्ट, ता, ष्यति । शिश्रमिषति । शंश्रम्यते। शंश्रमीति, शंश्रन्ति, शंश्रान्तः, शंश्रमति०; शंश्र ३ न्मि, न्वः, न्मः ॥ अद्य०॥ अशंश्रमीत् । श्रमयति । अशिश्रमत् । अश्रमि, अश्रामि । श्रमयित्वा । विश्र- मय्य । श्राम्यन् । श्रम्यमाणम् । श्रमिष्य २ न , माणम् । शश्रन्वान् । शश्र- माणम् । श्रान्त्वा, श्रमित्वा । विश्रम्य । श्रान्तः,२ वान् । श्रान्तिः। श्रमि ३ ता, तुम, तव्यम् । श्रम्यम् ॥ ५९ ॥ भ्रमूच् अनवस्थाने, देशान्तरगमने । “भ्रासम्लास-"३।४।७३॥ इति वा श्ये शवि च; भ्राम्यति; भ्रमति । एवं वि, सं, परि पूर्वोऽपि । क्ये, भ्रम्यते । अङि, अभ्रमत् । “मोऽकमि-"॥४।३।५५॥ इति न वृद्धौ, अभ्रमि, अभ्रमिषाताम् ; ध्वमि; अभ्रमि, २ ध्वम्, ड्वम् । बभ्राम, “भ्रम-7॥४।१।२६॥ इति वैत्वे, भ्रमतुः, बभ्रमतुः; भ्रमिथ, बभ्रमिथ; भ्रमिम, बभ्रमिम । भ्रमे, बभ्रमे । भ्रम्यात् । भ्रमि, ३ षीष्ट, ता, ष्यति । बिभ्रमिषति । बंभ्रम्यते। बंभ्र ३ म्यति, मीति, न्ति; यङ्लुपि. शमादिगणनिर्देशान्न दीर्घः; श्यस्तु वा भवत्येव, “भ्रास- भ्लास-"॥३४॥७३॥ इति प्रतिपदोक्तत्वात् ॥ अद्य० ॥ “न श्वि-"॥४।३।४९॥ इति न वृद्धौ, अबंभ्रमीत् । शेषं यलुबन्तपचिवत् । भ्रमयति । अबिभ्रमत् । अभ्रामि, अभ्रमि । भ्राम्यन् ; भ्रमन् । भ्राम्यमाणम्। भ्रमिष्यन् । भ्रमिष्यमाणम् । बभ्रन्वान् , भ्रमिवान् । बभ्रमाणम्, भ्रमाणम् । अदित्वात् तिव वेट ; भ्रान्त्वा, भ्रमित्वा । परिभ्रम्य । वेट्वान्नेटि; भ्रान्तः, २ वान् । भ्रान्तिः । भ्रमि, ३ ता, तुम, तव्यम् । भ्रम्यम् ॥ ६० ॥ क्षमौच सहने । क्षाम्यति, क्षाम्यतः, क्षाम्यन्ति । क्ये, क्षम्यते । पुष्या- घङि, अक्षमत् । अक्षमि; औदित्त्वादेटि, अक्षसाताम् , अक्षमिषाताम् । चक्षाम, चक्षमतुः; चक्षमिम । चक्षमे । क्षम्यात् । क्षेसीष्ट, क्षमिपीष्ट । क्षन्ता, क्षमिता। क्षस्य- ति, क्षमिष्यति । चिक्षसति, चिक्षमिषति । चंक्षम्यते । लुपि तु क्षमौषि सहने इत्यस्येव । क्षमयति । अचिक्षमत् । अक्षामि, अक्षमि, अक्षमयिषाताम् । क्षम- याञ्चकार। क्षमयित्वा । प्रक्षमय्य । क्षमितः, २ वाम् । क्षाम्यन् । क्षस्यन् , क्षमि- २७ २०२ - कियारत्नसमुच्चयः। ष्यन् । चक्षन्वान् । चक्षमाणम् । क्षान्त्वा, क्षमित्वा । क्षान्तः, २ वान् । क्षान्तिः। क्षं ३ ता, तुम्, तव्यम् ; क्षमि ३ ता, तुम्, तव्यम् । क्षम्यम् । क्षमी ॥६१॥ मदैच् हर्षे । माद्यति, प्रमाद्यति; उन्माद्यति । क्ये, मद्यते। अङि, अमदत्। अमादि । ममाद, मेदतुः; मेदिम। मेदे । मद्यात् । मदि ३ षीष्ट, ता, ष्यति। मिम- दिषति । मामद्यते । माम ४ त्ति, दीति, त्तः, दति ॥ ह्य० ॥ सिवि, अमा ३ मः, मत् , मदीः। णौ हर्षग्लपनयोघटादित्वात् हवे, मदयति । अन्यत्र, प्रमाद- यति; उन्मादयति । मदि ४ ला, ता, तुम् , तव्यम् । प्रमद्य । ऐदिलात् क्तयो- नेंटि, “रदात्-'।२।६९॥ इत्यत्र मदेवर्जनान्न नवम् ; मत्तः, २ वान्। ये, मद्यम् । उपसर्गात्तु ध्यणि; प्रमाद्यम् ॥ ६२ ॥ क्लमूच् ग्लानौ। "भ्रासम्लास-"॥३४॥७३॥ इति वा श्ये शवि च, “ष्ठिवुक्लमू-" ॥४।२।११०॥ इति दीर्घे, क्लाम्यति, क्लामति। क्ये, क्लम्यते । अक्लमत् । अक्लमि । चक्लाम, चक्लमतुः; चक्लमिम । चक्लमे । क्लम्यात् । क्लमिषीष्ट । क्लमि २ ता, ष्यति । चिक्लमिषति। चक्लम्यते । त्यादौ तु न दीर्घः, चंक्ल २ न्ति, मीति; “अहन्-"॥४॥१॥ १०७॥ इति दीर्घे, चंक्लान्तः, चंक्लमति०; चंक्ल २ न्वः, न्मः। अद्य०। अचंक्लमीत् इत्यादि। “ष्ठिवुक्लमू॥४।२।११०॥ इत्यत्र ऊकारनिर्देशाद् यलुपि न दीर्घः, चंक्ल- मत् । क्लमयति । अचिक्लमत् । अक्लमि, अक्लमिषाताम् । क्लाम्यन् , क्लामन् । क्लमि- ष्य २ न् , माणम् । चक्लन्वान् । चक्लमानम् । अदित्त्वात् क्तिव वेट, क्लान्त्वा, क्लमि- त्वा । परिक्लम्य । वेट्त्वात् क्लान्तः, २ वान् । क्लमि, ३ ता, तुम्, तव्यम् । क्लम्यम् ॥ ६३ ॥ त्रयो वेटः॥ मुहौच वैचित्त्ये; अविवेके । मुह्यति।क्ये, मुह्यते। अङि, अमु. हत् । अमोहि; औदित्वाहेटि, अमोहिषाताम् ; पक्षे सकि, अमुक्षाताम् । मुमोह, मुमुहतुः; मुमोहिथ; मुमुहिम। मुमुहे। मुह्यात् । मुक्षीष्ट, मोहिषीष्ट । “मुहद्रुह" ॥२॥१८४॥ इति वा हस्य घवे, औदिलादेटि च; मोग्धा, मोढा, मोहिता । मोक्ष्यति, मोहिष्यति । मुमुक्षति, मुमुहिषति, मुमोहिषति । मोमुह्यते । मोमु- हीति, मोमोग्धि, मोमोढि, मोमुग्धः, मोमूढः, मोमुहति, मोमुहीषि, मोमोक्षि, मोमुग्धः, मोमूढः०; मोमुहः, मोमुह्मः । हो, मोमुग्धि, मोमूढि । ह्य० । अमो दिवादिगणः । २०३ १६ मुहीत् , मोक्, मोट, मुग्धाम् , मूढाम्, मुहुः, मुहीः, मोक्, मोट; मुहम् , मुह, मुह्म । शेषं पचिस्थानोक्तवत् । णौ फलवति “अणिगि प्राणि-॥३।३।१०७॥ इति परस्मैपदापवादे “परिमुह-"॥३।३।९४॥ इत्यात्मनेपदे, परिमोहयते शत्रुम् । मोहयति । अमूमुहत् । मुह्यन् । मोक्ष्यन् ; मोहिष्यन् । मुमुहान् । मुमुहानम् । वेट्वान्नेटि, मुग्धः, २ वान् ; मूढः, २ वान् । मुग्धिः, मूढिः । मुग्ध्वा, मूवा; मोहिला, मुहित्वा । मोग्धा, मोढा, मोहिता। मोग्धुम् , मोढुम्, मोहितुम्। मोह- नीयम् । मोह्यम् ॥ ६४ ॥ द्रुहौच जिघांसायाम् । “क्रुद्रुह ॥२।२।२७॥ इति सम्प्रदानत्वे, मैत्राय द्रुह्यति। क्ये, द्रुह्यते । अद्रुहत् । अद्रोहि । दुद्रोह; दुद्रुहिम । दुदुहे । द्रुह्यात् । औदित्वादोटि, ध्रुक्षीष्ट, द्रोहिषीष्ट । द्रोग्धा, द्रोढा, द्रोहिता । थ्रोक्ष्यति, द्रोहिष्य- ति । दुर्घक्षति, दुदुहिपति, दुद्रोहिषति । दोगुह्यते । शेष मुहौच्चत् ; परं सिवि, दोनोक्षि । द्रोहयति । अदुद्रुहत् । द्रुह्यन् । ध्रोक्ष्यन् , द्रोहिष्यन् । “मुहद्रुह-"॥ २।१।८४इति वा घे; दुग्धः, २ वान् । दूढः, २ वान् । दुग्ध्वा, द्रूवा; द्वाहिला, द्रोहित्वा । द्रोग्धा, द्रोढा, द्रोहिता । विपि; मित्र २ धुक्, ध्रुट् ॥६५॥ ष्णिहौच प्रीतौ । स्निह्यति । स्निह्यते । अस्मिहत् । अस्नेहि । “नाम्यन्त-"॥२ ।३।१५॥ इति षः, सिष्णेह; सिष्णिहिम । सिष्णिहे । स्निह्यात् । निक्षीष्ट, स्नेहिषीष्ट। स्रग्धा, स्नेढा, स्नेहिता । स्नेक्ष्यति, स्नेहिष्यति । षणि “णिस्तोरेव-पा२।३।३७॥ इति नियमात् षत्वाभावे; सिस्निक्षति; सिस्निहिषति, सिस्नेहिषति । सेनि. ह्यते । अग्रतो मुहौच्वत् । स्नेहयति । असिष्णिहत्। स्निग्धः, २ वान् । स्त्रीढः, २ वान् । स्नेग्धा, स्नेढा, स्नेहिता । स्नेग्धुम् , स्नेढुम् , स्नेहितुम् । स्निग्ध्वा, स्त्रीवा; लिहिला, स्नेहित्वा ॥ ६६ ॥ शमू, दमू, तमू, श्रमू, भ्रमू, क्षमौ , मदै, असू, यसू, प्लुपू, लुट, भृशू, भ्रंशू, कृश, ञितृष्, रुष, हृष, कुप, गुप, लुप, लुभ, क्लिदौ, ऋधू, गृधूचां पुष्यादित्वं नेच्छन्त्यन्ये । तन्मते पुष्याधङभावे सिचि; अशमीत्; अद. मीत् ; अश्रमीत् ; अलोटीत; अस्त्रोषीत, अकोपीत्, अलोपीत् ; अहर्षीदित्यादि । इति पुष्यादिः ॥

२०४ क्रियारत्नसमुच्चयः। अथ सूयत्यादिर्नवकः । पूडौच् प्राणिप्रसवे । सूयते, सूयेते, सूयन्ते । क्ये, सूयते । औदित्त्वा- देटि, असोष्ट, असविष्ट । सुषुवे । सोता, सविता । “ग्रहगुहश्च ॥४४५९॥ इति नेटि, "णिस्तोरेव-"॥२॥३॥३७॥ इति नियमान्न षः; सुसूषति । “उवर्णात्" ॥४।४।५८॥ इति नेटि, सूत्वा । प्रसूय । “सूयत्यादि-"॥४।२७०॥ इति क्तयो- स्तस्य नवे; सूनः, २ वान् । प्रसुनं कुसुमम् । अतएवायमप्राणिप्रसव इत्यन्ये । शेष पूडौक्वत् ॥ ६७ ॥ दुङ्च् परितापे, खेदे । दूयते । क्ये, दूयते । अदविष्ट, अदविषाताम्, अदविषत ॥ भाक ॥ अदावि, अदाविषाताम्, अदविषाताम् । दुदुवे, दुदुवाते, दुदुविरे, दुदुविषे । दविषीष्ट २; दाविषीष्ट । दविता २; दाविला । दविष्यते २; दाविष्यते । दुदूषति । दोदूयते । दोदवीति, दोदोति, दोदूतः, दोदुवति । दावयति । अदूदवत् । दावितः। दावयित्वा । दूयमानः । दविष्यमाणः । दुदु- वानः । “सूयत्य-'||२|७०॥ इति नये; दूनः, २ वान् । दैत्यान् दूनवान् सः । इति सकर्मोक्तोऽस्ति याश्रये । दूतिः । दूत्वा । दवि ३ ता, तुम्, तव्यम् । दव्यं; दाव्यम् ॥ ६८॥ द्वावनिटौ ॥ दीच् क्षये । अकर्मकोऽयम् । दीयते; उपदीयते, क्षयं न गच्छतीत्यर्थः। क्ये, दीयते। “यबक्ङिति"॥४।२।७॥ इत्यावे, उपादास्त। दारूपस्य बहिरङ्गत्वात् दासंज्ञाया अभावे, “इश्च स्था-"॥४॥३॥४१॥ इति न इः, अदासाताम् , अदासत, अदास्थाः; अदाध्वम् , अदाद्ध्वम् । अदायि, अदायिषाताम् , अदा. साताम् । “दीय दीङः क्ङिति स्वरे"॥४।३।९३॥ उपदिदीये, उपदिदी ९ याते, यिरे, यिषे, याथे, यिध्वे, यिढ़े, ये, यिवहे, यिमहे। दासीष्ट २; दायिषीष्ट । दाता २, दायिता। उपदास्यते २, उपदायिष्यते । “दीङः सनि-"॥२६॥ इति वा आत्ले, दिदासते, दिदीषते । उपदेदीयते । उपदे ४ दयीति, देति, दीतः, द्यति । सानु- बन्धनिर्देशान्न आवम् , दीय् च । क्ते, उपदेधितः। उपदापयति । उपादीदपत् । उपदीयमानः । दास्यमानः । दिदीयानः। “सूयत्य-"॥४।२७०॥ इति नः, दीनः,२ वान् । दीवा। उपदाय । दाता । दातुम् । उपदातव्यम्।अनटि, उपदानम् ॥६९|| , दिवादिगणः । २०५ लीच् श्लेषणे । लीयते; विलीयते; निलीयते । क्ये, लीयते । “यबक्ङि- ति"॥४२॥ “लीलिनोर्वा"॥२९॥ इति वा आवे, व्यलेष्ट, व्यलास्त । व्यलायि, व्यलायिषाताम्, व्यलेषाताम् , व्यलासाताम् । विलिल्ये, विलि ४ ल्याते, ल्यिरे, ल्यिषे; ल्यिध्वे । विलेषीष्ट; विलासीष्ट, विलायिषीष्ट । विलेता, विलाता, विलायिता। विलेष्यते, विलास्यते, विलायिष्यते। विलिलीषते । लेली. यते । “लीलिनो-"॥४।२।९॥ इत्यत्र डिन्निर्देशाद् यङ्लुपि न आः, लेल- यीति, लेलेति, लेलीतः, लेल्यति । णौ, "लियो नोऽन्तः-"॥४।२।१५॥ इति वा ने, घृतं विलीनयति, विलाययति, अत्र वृद्धौ आय् । लिय ई ली इति ईकार प्रश्लेषादात्वे कृते नोऽन्तो न स्यात् । “लो लः "॥४॥२॥१६॥ इति वा ले, "अतिरी-॥४।२।२१॥ इति पौ घ; घृते विलालयति, विलापयति । स्नेहद्रव्या- दन्यत्र, अयो विलाययति, विलापयति । “लीलिनोर्वा"||९॥ इत्याले आत्मनेपदे च, जटाभिरालापयते; परैः खं पूजयतीत्यर्थः। श्येनो वर्तिकामपलाप- यति, अभिभवतीत्यर्थः । मायावी लोकमुल्लापयते, वञ्चयते इत्यर्थः । एतदर्थ- अयादन्यत्र, बालमुल्लापयति, उत्क्षिपतीत्यर्थः । अत्र “लीलिनोर्वा"||२|९॥ इत्यात्वम् । ड़े, व्यलीलिनत् ; व्यलीलयत्; अलीललत् ; व्यलीलपत् । लीय. मानः । लेष्यमाणः; लास्यमानः । लिल्यानः । लीनः, २ वान् । लीला । विलीय, विलाय । विले ३ ता, तुम्, तव्यम्; विला ३ ता, तुम्, तव्यम् ॥ ७० ॥ डीच् गतौ । डीयते । क्ये, डीयते । “डीयाश्व-"६१॥ इति क्तयो- नैटि, “सूयत्यादि-"॥४।२७०॥ इति नवे च; डीनः, २ वान् । अयमपि विहा- यसां गतावित्यन्ये । शेषं भ्वादिडीवत् ॥ ७१ ॥ इति सूयत्यादिः । अथ द्वादशानिटः॥ पीङ्च् पाने । मैत्रो जलं पायते; निपीयते; आपीयते। क्ये, पीयते। अपेस्त, अपेषाताम् । अपायि, अपायिषाताम् , अपेषाताम् । पिप्ये, पिप्याते, पिप्यिरे, पिप्यिषे। पेषीष्ट, पायिषीष्ट । पेता, पायिता। पेष्यते, पायिष्यते। पिपीषते । पेपीयते। पेपेति, पेपयीति, पेपीतः, पेप्यति । पाययति । अपीपयत् ।

क्रियारत्नसमुच्चयः । पीयमानः । पेष्यमाणः । पिप्यानः । पीतः, २ वान् । आपीय; निपीय । पीला । पेता । पेतुम् । पयनीयम् । पेयम् ॥ ७२ ॥ ईच् गतौ । ईयते; प्रतीयते; उदीयते; उपेयते। क्ये, ईयते। ऐट, ऐषा- ताम्, ऐषत, ऐष्ठाः, ऐषाथाम् । ध्वमि; ऐ २ वम् , ड्वम् । ऐषि, आयि, आयिषाताम् , ऐषाताम् ; “गुरुनाम्य-"॥३॥४॥४८॥ इत्यामि, अयाञ्चक्रे इत्यादि । आमं नेच्छन्त्येके । ईये, ईयाते, ईयिरे। एषीष्ट २; आयिषीष्ट । एता, आयिता । एष्यते, आयिष्यते । ऐष्यत २, आयिष्यत । ईषिषते । आययति; प्रत्याययति । आयियत् । ईयमानः । एष्यमाणः । ईयानः । ईतः, २ वान् । ईला। उपेय; निरीय । एता । एतुम्। एतव्यम् । उपेयम् ; उपायनम् ॥ ७३ ॥ प्रींच् प्रीतौ । प्रीयते । क्ये, प्रीयते । अप्रेष्ट, अप्रायि, अप्रायिषाताम् , अप्रेषाताम् । “संयोगात्॥२।११५२॥ इतीयि; पिप्रिये; पिप्रियिमहे । प्रेषीष्ट २, प्रायि- षीष्ट । प्रेता २, प्रायिता । प्रेष्यते २, नायिष्यते । पिप्रीषते। पेप्रीयते। पेप्रयीति, पेप्रेति, पेप्रीतः, पेप्रियति । प्राययति । अपिप्रयत् । प्रीयमाणः । प्रेष्यमाणः । पिप्रियाणः । प्रीतः,२ वान् । प्रीवा। प्रेता। प्रेतुम्। प्रेतव्यम् । प्रेयम् ॥७॥ युजिच् समाधौ; चित्तवृत्तनिरोधे । युज्यते । वि, नि, प्र, समन्वभि, प्राङ् पूर्वोऽपि । वियुज्यते । क्ये, युज्यते । “सिजाशिष-"४।३॥३५॥ इति वा कित्त्वे, अयुक्त, अयुक्षाताम्, अयु ८ क्षत, क्थाः, क्षाथाम्, ग्ध्वम्, ग्ड्ढ्वम्, क्षि, वहि, महि । अयोजि । युयुजे; युयुजिमहे । युक्षीष्ट । योक्ता । योक्ष्यते । युयुक्षते । योयुज्यते । योयुजीति, योयोक्ति । योजयति । अयूयुजत् । युज्य- मानः । योक्ष्यमाणः । युयुजानः। युक्तः, २ वान् । “कुशलायुक्त-"॥२।२।९७॥ इति वा सप्तम्याम् ; आयुक्तो देवार्चायाम, देवार्चया वा । युक्त्वा । नियुज्य । योक्ता । योक्तुम् । क्विपि, युजमापन्ना मुनयः । ध्यणि, "क्तेऽनिटः"।४।१।१११॥ इति गः; योग्यम् ; प्रयोग्यम्। “निप्राधुजः-४।१।११६॥ इति गत्वाभावे, नियो- क्तुं शक्यं नियोज्यम् । प्रयोज्यम् ॥ ७५ ॥ सृजिंच विसर्गे । सृज्यते माला चैत्रः । उत्सृज्यते । उप, बि, नि, व्युत्स पूर्वोऽपि । कर्मकर्त्तरि, “एकधातौ-"॥३४॥८६॥ इति क्ये, सृज्यते माला स्वय- दिवादिगणः। २०७ मेव । सिचो लुक्यपि कित्त्वं प्रति स्थानित्वात् , “अः सृजि."॥४|४|१११॥ इति न अत् ; असृष्ट, असृक्षाताम्, असृक्षत, असृष्ठाः; अमृ, २ ड्ढ्वम् , ग्वम्। असर्जि। ससृजे; ससृजिध्वे । सूक्षीष्ट । “अः सृजि-"॥४|४|१११।। इत्यति, स्रष्टा । स्रक्ष्यते । अस्रक्ष्यत । सिसृक्षते । सरीसृज्यते । सरि री र ३ सृजीति, सरिस्रष्टि, सरिस्रष्टः, सरिसृजति । एवं दृशवत् । सर्जयति । अससर्जत् । असीसृजत् । सिसर्जयिषति । सृष्टः, २ वान् । सृष्टिः । सृष्ट्वा । स्रष्टा । स्रष्टुम् । स्रष्ट- व्यम् ॥ ७६ ॥ पदिंच गतौ; गतिर्यानं ज्ञानं च । पद्यते; प्रणिपद्यते । आ, प्र, उद्, सम्, निरुपपूर्वोऽप्येवम् । क्ये, पद्यते । कर्त्तरि, “त्रिच ते पदस्तलुक् च"॥३४॥६६॥ अपादि, अपत्साताम् , अपत्सत, अपत्थाः, अपत्साथाम् , अप २ द्ध्वम् , ध्वम् , अप ३ सि, स्वहि, स्महि । भाक । अपादि । पेदे; पेदिमहे । पत्सीष्ट । पत्ता। पत्स्यते। अपत्स्यत। “रभलभ-"॥४।१।२१॥इतीति, पित्सते ।“वञ्च-"॥४१॥५०॥ इति नीः; पनीपद्यते । पनीप २ दीति, त्ति । उत्पादयाते। उदपीपदत् । प्रत्यपादि। पद्य- मानः । पत्स्यमानः । पेदानः । प्रपन्नः, २ वान् । पत्त्वा । प्रपद्य । पत्ता। पत्तुम्। पत्तव्यम् । पाद्यम् ॥ ७७ ॥ विदिंच सत्तायाम् । विद्यते । क्ये, विद्यते । अवित्त, अवि ८ त्साताम्, त्सत, त्थाः; द्ध्वम् , द्ध्वम् , सि, स्वहि, त्स्महि । अवेदि । विविदे; विवि- दिषे । वित्सीष्ट । वेत्ता । वेत्स्यते। विवित्सते । वेविद्यते । वैवेत्ति, वेविदीति। वेद- यति।अवीविदत् । विद्यमानः। वेत्स्यमानः। “रदात्-"॥१॥२।६९॥ इति नः, विन्नः, २ वान् । क्ते, “निर्विण्णः”॥२॥३॥८९॥ इति निपातनात्; निर्विण्णः प्राब्राजीत्, विरक्त इत्यर्थः। क्तवतौ तु न णः, निर्विन्नवान् । वित्त्वा। वेत्ता । वेत्तुम् ॥७८॥ खिदिच् दैन्ये । विद्यते; खिद्यामहे । खिद्यते। अखित्त । चिखिदे। खेत्ता। चिखित्सति । खिन्नः । एवं विदिच्वत् ॥ ७८ ॥ युधिंच सम्प्रहारे; हनने । युध्यते । क्ये, युध्यते । अयुद्ध, अयु ६ त्सा- ताम् , त्सत, डाः; द्ध्वम्, ध्वम् , त्सि । अयोधि । युयुधे; युयुधिमहे । युत्सीष्ट । योडा। योत्स्यते । युयुत्सते । योयुध्यते । योयोडि, योयुधीति ।

- क्रियारत्नसमुच्चयः । "चल्याहार-"॥३।३।१०८॥ इति फलवत्यपि परस्मैपदे, चैत्रः काष्ठं योधयति । अयूयुधत् । युध्यमानः । योत्स्यमानः । युयुधानः । युद्धः, २ वान् । युद्ध्वा । प्रयुध्य । योद्धा । योद्धम् । योद्धव्यम् । योध्यम् ॥ ७९ ॥ अनो रुधिंच कामे; काम इच्छा । अनुरुध्यते । अन्वरुद्ध । अनुरुरुधे । अनु- रोडा। शेषं युधिंवत् । कामादन्यत्र रुधादित्वात् श्रे, अनुरुणद्धि । अनु- रुन्ढे ॥ ८०॥ बुधिं, मनिंच ज्ञाने । बुध्यते; अवबुध्यते; विबुध्यते; प्रतियुध्यते । क्ये, बुध्यते । “दीपजन-"॥३।४।६७॥ इति कर्तरि ते वा मिचि; अबोधि, अबुद्ध, अत्र वर्णे सकारे परतो विधिरिति वर्णविधित्वेन सिचः स्थानिवद्भावो नास्तीति सिजलुकि आदेर्न चतुर्थः; कित्त्वं तु प्रतिवर्णविधेरभावात् स्थानित्वम्, तेनात्र न गुणः । एवमन्यत्रापि । अभु २ साताम् , त्सत, अबुद्धाः, अभु ६ त्साथाम , द्ध्वम् , द्ध्वम् , सि, त्वहि, त्स्महि । भाक। अबोधि । शेषं कर्तृवत् । बुबुधे, बुबुधाते; बुबुधिमहे । भुत्सीष्ट । बोद्धा । भोत्स्यते । अभोत्स्यत । “उपान्त्ये-" ॥४॥३॥३४॥ इति कित्त्वे, बुभुत्सते । बोबुध्यते । बोबोद्धि, बोबु ४ धीति, द्धः, धति, धीषि, बोभोत्सि, बोबु ३ द्वः, , धीमि, बोबोध्मि; बोबु २ ध्वः, ध्मः ॥ ह्य० ॥ अबोबुधीत्, अबो ६ भोत्, बुद्धाम् ; बुधुः, बुधीः, भोः, भोत् । शेषं पचिवत् । “चल्या-''॥३।३।१०८॥ इति फलवत्यपि परस्मैपदे; बोधयति पद्मं रविः। शिष्यं धर्म बोधयति। अबूबुधत् । बुबोधयिषति। बुध्यमानः। भोत्स्यमानः । बुबु- धानः। बुद्धः, २ वान् । “ज्ञानेच्छा-"॥५।२।९२॥ इति सतिक्ते, राज्ञां बुद्धः । बुद्ध्वा, अत्र तवास्थानस्य ध्वस्य लाक्षणिकत्वाद्, “गडदबा-"॥२॥११७७॥ इति आदेर्न चतुर्थः । प्रबुद्ध्य । बोडा। बोद्धव्यम् । बोडुम् । बोध्यम् ॥ मनिंच् ॥ “मन्यस्य-" ॥२॥२॥६॥ इत्यतिकुत्सने कर्मणि वा चतुर्थ्याम् , न त्वां तृणाय तृणं वा मन्यते; अनुमन्यते; अवमन्यते; विमन्यते । क्ये, मन्यते । अमंस्त, अमं ८ साताम्, सत, स्थाः; द्ध्वम्, ध्वम् , सि, स्वहि, स्महि । अमानि । मेने, मेनाते, मेनिरे, मेनिथे । मंसीष्ट । मन्ता । मंस्यते । मिमंसते । मंमन्यते । मंमन्ति, मंमनीति, “यमिरमि-"॥२॥५५॥ इति नलुकि, मंमतः, मंमनति । मानयति । अमी.

दिवादिगणः । । मनत् । मन्यमानः। मंस्यमानः। मेनानः। मतः, २ वान् । “ज्ञानेच्छा-।५।२।१२।। इति सति क्ते, राज्ञां मतः । मत्वा । “यपि"॥४॥२॥५६॥ इति नलुकि, अवमत्य । मन्ता। मन्तुम् । मन्तव्यम् ।। ८१ ॥ ८२ ॥ जनैचि प्रादुर्भावे; उत्पत्तौ । “जा ज्ञा-"||१२|१०४॥ इति; जायते।जायेत । जायताम्। अजायत।क्ये,“ये नवा"।४।२।६२॥ इति क्ङिति येवा आत्वे; जायते, जन्यते । “दीपजन-३३४६७॥ इति वा मिचि, “न जनवधः॥४॥३॥५४॥ इति वृद्ध्यभावे, अजनि, अजनिष्ट, अजनि९षाताम्, षत,ष्ठाः, पाथाम् , ध्वम्, ड्वम्, षि, वहि, महि।भावे ।अजनि । “गमहन-"४।२।४४॥ इत्यल्लुकि, जज्ञे, जज्ञाते, जझिरे, जज्ञिरे । जनि २ षीष्ट, पीध्वम् । जनिता । जनिष्यते । अजनिष्यत । जिजनिषते । वा आत्वे, जाजायते; जजन्यते । त्यादौ तु न जादेशः; जञ्जन्ति, जञ्जनीति। "आः खनि-"४।२।६०॥ इति नस्य आत्वे, जञ्जातः । “गमहन-"॥र ॥४४॥ इत्यल्लुकि, जञ्जति । जञ्जन्तीति वाक्ये शतरि, "जा ज्ञा-"॥४॥२॥१०॥ इति जादेशे, “नश्चातः॥४।२।९६॥ इत्याल्लुकि; जव; अत्यर्थे जायमान इत्यर्थः। “कगेवनू."॥४॥२॥२५॥ इति हुस्खे, “चल्या-"॥३।३।१०८॥ इति फलवत्यपि परस्मै; जनयति । अजीजनत् । भिणम्परे वा दीर्घः; अजानि, अजनि । जानम् २ । जनम् २ । जायमानः। जायमानम्; जन्यमानम् । जनिष्यमाणः । जज्ञानः । ऐदित्वात् क्तयोर्नेटि, “गत्यर्थाकर्म-"॥५॥२॥११॥ इति वा कर्तरि क्ते, "आः खनि-"॥४२॥६०॥ इत्यात्वे; जातः, २ वान् । पक्षे भावे क्ते, जातं चैत्रेण । साप्यादपि, “श्लिषशीङ्-"॥५॥२९॥ इति क्ते, अनुजातः कनी चैत्रः । पक्षे कर्मणि क्ते; अनुजाता कनी चैत्रेण । विजाता वत्सं गौः। विजातो वत्सो गवा; विजातं गवा। अकर्मका अपि हि सोपसर्गाः सकर्मका भवन्ति । जनित्वा । "ये नवा"||१२६२॥ इति वा आत्वे, प्रजाय, प्रजन्य । जनि ३ ता, तुम्, तव्यम् । जन्यम् ॥ ८३ ॥ दीपैचि दीप्तौ । दीप्यते; प्रदीप्यते । क्ये, दीप्यते । “दीपजन-" ॥३४१६७॥ इति वा मिचि तलुकि च; अदीपि, अदीपिष्ट, अदीपि ९ षा. ताम्, षत । भावे । अदीपि । दिदीपे, दिदीपाते, दिदीपिरे, दिदीपिषे । २८ २१० क्रियारत्नसमुच्चयः । दीपिषीष्ट । दीपिता । दीपिष्यते । दिदीपिषते । देदीप्यते । देदी ४ पीति, ति, तः, पति । दीपयति । “भ्राजभास-"॥४॥२॥३६॥ इति वा हवे; अदीदिपत्, अदिदीपत् । दीप्यमानः । दीपिष्यमाणः । दिदीपानः । ऐदित्त्वान्नेटि; दीप्तः, २ वान् । दीपि ३ ता, तुम्, त्वा । प्रदीप्य । दीपनीयम् । दीप्यम् ॥ ८४ ॥ तपिच् ऐश्वर्ये वा। अनिट् । तपं, धूप सन्तापे इत्यस्यैवैश्वर्येऽर्थे दिवादित्व- मात्मनेपदं च वा विधीयते । तप्यते । अतप्त, अतप्साताम्। अतापि । तेपे । तप्ता। तप्स्यते । तितप्सते। तप्तः। पक्षे ऐश्वर्येऽपि भ्वादित्वात् , प्रतपति । अता. प्सीत् । प्रततापेत्यादि । एके तु तपिंच ऐश्वर्य इति धावन्तरं दिवादिमाहुः । अन्ये तु भ्वादेरेवैश्वर्ये सन्तापे च श्यात्मनेपदे वेच्छन्ति ॥ ८५ ॥ पूरैचि आप्यायने, वृद्धौ । पूर्यते । क्ये, पूर्यते । “दीपजन-"॥३।४।६७।। इति वा मिचि; अपूरि, अपूरिष्ट, अपूरिषाताम् । भावे। अपूरि । पुपूरे, पुपूराते। पूरिषीष्ट । पूरिता । पूरिष्यते । पुपूरिषते । पोपूर्यते । पोपू ४ रीति, ति, तः, रति । पूरयति । अपूपुरत् । “णौ दान्त-"|४|४७४॥ इति वा निपातनात् ; पूर्णः, पूरितः । पूर्यमाणः। पूरिष्यमाणः। पुपूराणः। ऐदित्त्वान्नेटि; पूर्णः, २ वान् । पूर्तिः । पूरिला । प्रपूर्य । पूरि ३ ता, तुम्, तव्यम् ॥ ८६ ॥ क्लिशिच् उपतापे । क्लिश्यते; संक्लिश्यते। क्ये, क्लिश्यते। अक्लेशिष्ट, अक्लेशिषाताम् । अक्लेशि । चिक्लिशे; चिक्लिाशमहे । क्लेशिषीष्ट । क्ले- शिता । क्लेशिष्यते । “चौ व्यञ्जन-"॥४।३।२५॥ चिक्लिशिषते, चिक्लेशिषते। चेक्लिश्यते । चेक्लेष्टि; चेक्लिशीति । क्लेशयति। अचिक्लिशत् । “पूक्लि- शि-"|४|४|४५॥ इति क्तत्तवासु वेट ; क्लिष्टः,२ वान् ; क्लिशितः, २ वान् । क्लिष्ट्वा; क्षुधक्लिश-"॥४॥३॥३१॥ इति कित्त्वे, क्लिशिवा । क्लेशि ३ ता, तुम्, तव्यम् ॥ ८७ ॥ काशिच् दीप्तौ । प्रकाश्यते । अकाशिष्ट । प्रकाशयति । “उपान्त्यस्य-' ॥४॥२॥३५॥ इति हस्खे, अचीकशत् । हूस्खं नेच्छन्त्यन्ये, अचकाशत् । शेषं का- शृवत् ॥ ८८ ॥ वाशिच् शब्दे । वाश्यते पशुः । अवाशिष्ट काकः । अवाशि । ववाशे । " दिवादिगणः । २११ वाशिता । वाशिष्यते । विवाशिषते । वावश्यते । वाशयति । अवीवशत् । न हूख इत्यन्ये; अववाशत् । वाशि ४ तः, ता, तुम्, वा ॥ ८९ ॥ इत्यात्मनेपदिनः । मृषीवर्जास्त्रयोऽनिटः ॥ रीच रागे । रज्यति, रज्यते । क्ये, रज्यते । शेष रञ्जीवत् ॥ ९० ।। शपींच आक्रोशे। शप्यति, शप्यते । क्ये, शप्यते । शेष भ्वादिशपी वत् ॥ ९१ ॥ मृषीच तितिक्षायाम् ; क्षमायाम् । सेट् अयम्। मृष्यति, मृष्यते। “परेर्मू- पश्च"॥३।३।१०४॥ इति फलवत्यपि परस्मैपदे; परिमृष्यति। क्ये, मृष्यते।अमर्षीत्, अमर्षि २ ष्टाम् , षुः। अमर्षिष्ट, अमर्षिषाताम् । अमर्षि । ममर्ष, ममृषतुः, ममृषुः, ममर्षिथ; ममृषिम । ममृषे; ममृषिमहे । मृष्यात्। मर्षिषीष्ट । मर्षिता २। मर्षिष्यति, ते। मिमर्षिषति, ते। मरीमृप्यते।मरि री र ३ मटिं, मरि री र ३ मृषीति, मर्म २ष्टः, षति । मर्षयति।अमीमृषत् , अममर्षत् । मृष्य २ न् , माणः; मर्षिष्य २ न , माणः। ममृष्वान् । ममृषाणः । “ऋत्तृष-"॥४।३।२४॥ इति वा कित्त्वे, मृषित्वा, मर्षि- वा। परिमृष्य । “मृषः क्षान्तौ "॥४।३।२८॥ इति क्तयोरकित्त्वे, मर्षितः, २ वान् । क्षान्तेरन्यत्र भूषणादिषु कित्त्वे; मृषितः, २ वान् । मर्षि ३ ता, तुम्, तव्यम् ॥ ९२ ॥ णहीच बन्धने । नाति, नह्यते; संनयति, ते; णपाठात् “अदुरुप.” ॥२॥३७७॥ इति णत्वे, प्रणयति, ते । “वाऽवाप्यो:-॥३।२।१५६॥ इति अपेः पिर्वा; अपिनाति, ते; पिनाति, ते । क्ये, नह्यते । “नहाहोः॥२।१८५।। इति हस्य धे; अनात्सीत् , अनाद्धाम् , अनात्सुः, अनात्सीः । अनड, अन- साताम्; अनदाः; अन २ द्ध्वम् , ध्वम् । अनाहि । ननाह, नेहतुः, नेहः, नेहिथ, ननद्ध, नेहथुः, नेह, ननाह, ननह, नेहि २ व, म । नेहे । नद्यात् । नत्सीष्ट । नद्धा २ । नत्स्यति, ते । सन्निनत्सति । नानह्यते । नान १२ हीति, द्धि, द्वः, हति, सि, हीषि, डः, हु, हीमि, मि, हः, मः। हौ; नानद्धि ॥ह्य० ॥ .

२१२ क्रियारत्नसमुच्चयः । अनान १३ तू, द्, हीत्, द्धाम, हुः, त्, द्, हीः, द्वम्, हु, हम्, हू, म। शेषं पचिवत् । नाहयति । अनीनहत् । नहः २, वान् । पिनद्धम्, अपिन- दम् । नद्ध्वा । संनह्य । नडा । नडुम् । नद्रव्यम् ॥ ९३ ॥ उभयपदिनः। इति तपाचार्यश्रीदेवसुन्दरसूरिशिष्यश्रीगुणरत्नसूरिविरचिते क्रियारत्नसमुच्चये दिवादिगणः ।। अथ स्वादिः। तत्रादौ धूग्ट् वर्जाः पञ्चानिटः ॥ पुंग्ट् अभिषवे। अभिषवः, क्लेदनं सन्धा नाख्यम्, पीडनमन्थने वा । स्नानमिति चान्द्राः । खादेः श्नुः "॥३॥४७५॥ इति श्नौ, "उनोः॥४॥३॥२॥ इति गुणे, सुनोति; "उपसर्गात्सुग्॥२॥३॥३९|| इति षत्वे, अभिषुणोति, अन्तर्भूतणिगर्थत्वेन नपयतीत्यप्यर्थः। सुनुतः, सुन्वन्ति, सुनोषि, सुनुथः, सुनुथ, सुनोमि । “वम्यविति वा "॥४।२।८७॥ इत्युतो वा लुकि; सुन्वः, सुनुवः, सुन्मः, सुनुमः। सुनुते, सुन्वाते, सुन्वते, सुनुषे, सुन्वाथे, सुनुध्वे, सुन्वे,सुन्वहे, सुनुवहे, सुन्महे, सुनुमहे ।क्ये, सूयते; अभिषूयते । सुनु- यात् । सुन्वीत । सूयेत्। सुनोतु, सुनुताम् , सुन्वन्तु; “असंयोगादोः"॥४१२८६ इति हेलुंकि, सुनु, सुनुतम्, सुनुत, सुनवा ३ नि, व, म । सुनुताम् , सुन्वा- ताम् , सुन्वताम्, सुनुष्व, सुन्वाथाम्, सुनुध्वम्, सुनवै, सुनवा २ वहै, महै । सूयताम् । अड्व्यवायेऽपि षत्वम् , अभ्यषुणोत् । असु २२ नोत्, नुताम्, न्वन् , नोः, नुतम् , नुत, नवम्, नुव, न्य, नुम, न्म; नुत, न्वाताम् , न्वत, नुथाः, न्वाथाम्, नुध्वम्, न्वि, नुवहि, न्वहि, नुमहि, न्महि । असूयत । एवं स्वादिसर्वधातुष्वपि ४ विभक्तयः ॥ अद्य० ॥ “धूग्सुम्तोः-"|४|४८५॥ इति सिचीटि, असावीत् , असा ८ विष्टाम्, विषुः; विष्म । आत्मनेपदे विडभावे, असोष्ट, असो ९ षाताम् , षत, ठाः; दम्, ड्वम् । असावि । अद्वित्व इत्युक्ते पूर्वस्य षत्वाभावे, उत्तरस्य त्तरस्य तु षपाठात्, "नाम्यन्त-"॥२॥३॥ १५॥ इति स्वादिगणः । षत्वे, अभिसुषाव; सुषुवतुः, सुषुवुः, सुषविथ, सुषोथ; सुषुविम । अभि- सुषुवे; सुषुविमहे । अभिषूयात् । सोषीष्ट । सोता २ । “ सुगः स्यसनि" ॥२।३।६२॥ इति न षत्वे, अभिसोष्यति, ते । अभ्यसोष्यत; त । “णिस्तोरेव-" ॥२॥३॥३७॥ इति नियमादुत्तरस्य षत्वाभावे; सुसूषति, ते । अद्वित्व इति निषे- धात् पूर्वस्यापि न षत्वे, अभिसुसूषति, ते । अभ्यसुसूषत्, त । सुसूषतेः किपि; सुसूः, अभिसुसूः; अत्र धातोः षाण षत्वं निषिद्धमपि परे रुत्वे षत्व- स्यासत्त्वात्, “ सो रुः "॥२।१।७२॥ इति रुत्वे कृते, वर्णविधौ स्थानित्वाभावात् षणोऽभावेनानिषेधात् पुनः प्राप्तं सत्, सुगः स्वसनि ”॥२।३।६२ ॥ इति पुनर्निषिध्यते; सोषूयते; अभिसोधूयते । सोषवीति, सोषोति । सावयति; अभिषावयति; अत्र प्रागुपसर्गसम्बन्धः । ण्यन्तस्य पश्चादुपसर्गसम्बन्धे तु, अभिसावयति । असूषवत् । द्वित्वे तु न षः, अभ्यसूषवत् । सुषावयि- षति । सुन्वन् । सुन्वती । सुन्वानः । सोष्य २ न्, माणः । सुषुवान् । सुनुवा- णः । सुतः, २ वान् । सुत्वा । अभिषुत्य । सो ३ ता, तुम्, तव्यम् ॥१॥ किंग्ट् बन्धनेसिनोति; विसिनोति, सिनुतः, सिन्वन्ति। सिनुते, सिन्वा- ते । सीयते । असैषीत । असेष्ट । असायि । षपाठात्, “नाम्यन्त-"॥२३॥१५॥ इति षत्वे, सिषाय, सिष्यतुः; सिषयिथ, सिषेथ; सिष्यिम । सिष्ये । सीयात् । सेषीष्ट, सायिषीष्ट । सेष्यति, ते। सिषीषति, ते । सेषीयते । सेषयीति, सेषेति । साययति । असीषयत् । सिन्वन् । सेष्यन् । सिषिवान् । सिष्याणः । सितः, २ वान् । “सेासे-"॥४।२७३॥ इति क्तयोस्तस्य नत्वे, सिनो ग्रासः खयमेव । "प्रसितोत्सुक-"॥२२॥४९॥ इति आधारे वा तृतीया; केशैः केशेषु वा प्रसितः । परि, नि, वि पूर्वस्य “सयसितस्य"॥२॥३॥४७॥ इति षवे, परिषितः; निषितः, विषि- तः, त्रिष्वपि बद्ध इत्यर्थः । सित्वा । प्रसित्य । सेता । सेतुम् ॥ २ ॥ डुमिंग्ट प्रक्षेपणे। मिनोति; निमिनोति, प्रक्षिपतीत्यर्थः । प्रमिनोति, प्रनि- मिनोति । मिनुते । क्ये, मीयते । यबक्ङिति, "मिग्मीग-"॥२८॥ इत्यावे, न्यमासीत्, न्यमासिष्टाम् । न्यमास्त, न्यमासाताम् । न्यमायि । विषय- व्याख्यानात् प्रागावे पश्चात् द्विवे, ममौ । धातुपारायणे तु, मिमायेति यद- कियारत्नसमुच्चयः । स्ति तत्तु नावबुध्यते, प्रथमादर्शलेखकदोषाहा सम्भवति । मिम्यतुः, मिम्युः; वेटि, ममिथ, ममाथ, मिम्यथुः, मिम्य, ममौ, मिम्यिव, मिम्यिम । मिम्ये । मीयात् । मासीष्ट। माता; जिटि, मायिता । मास्यति, ते; मायिष्यते । “मिमी- मा-"॥४॥१॥२०॥ इतीति, प्रमित्सति, ते । निमेमीयते । निमेमयीति, निमेमेति; "मिग्मीग्-'॥२८॥ इत्यत्रानुबन्धनिर्देशाद्यङ्लुपि न आत्वम् । निमापयति । न्यमीमपत् । मिन्वन् । मिन्वानः।मीयमानम्।मास्यन् । मास्यमानः। मिमिवान् । मिम्यानः। मितः, २ वान् । मितिः । मित्वा । प्रमाय । मा ३ ता, तुम्, तव्यम् । मानीयम् । मेयम्। मानम् ॥ ३ ॥ चिंग्टु चयने । चिनोति, चिनुते । से, प्र, उप, अव, परि, उद् , आङ्, निः पूर्वोऽप्येवं; "नेमा-"॥२॥३॥७९॥ इति णिः, प्रणिचिनोति । क्ये, चीयते । चिनुयात्। चिन्वीत । चिनोतु। चिनुताम्। अचिनोत् । अचिनुत।शेष पुंग्ट्वत् ॥ अर्थ ॥ अचैषीत् , अचै ८ ष्टाम्, षुः, षीः, ष्टम् , ट, षम्, ष्व, ष्म । “धुट्- इस्व-"॥४।३।७०॥ इति सिच्लुकः परत्वेऽपि नित्यत्वात् प्रागेव गुणे, अचेष्ट, अचे- षाताम्, अचेषत, अचेष्ठाः । “सो धि-"॥४३॥७२॥ इति वा सिचोलुकि, “ म्य-" ॥२।१।८०॥ इति ढे, अचे २ ट्वम्, ड्वम्। भाक । अचायि, अचायिषाताम् , अचे- षाताम् ; अचायि ३ ध्वम्, वम् , ड्ढ्वम् ; अचे २ वम्, ड्वम्। सन्परोक्षयोः, "चेः किर्वा ॥४।१।३६॥ चिकाय, चिचाय, चिक्यतुः, चिच्यतुः; चिकयिथ, चिकेथ, चिचयिथ, चिचेथ; णवि, चिकय, चिकाय, चिचय, चिचाय; चिक्यिम, चिच्यिम। चिक्ये, चिच्ये; चिक्यिमहे, चिच्यिमहे । चीयात् । चेषीष्ट, चायिषीष्ट; चेषी- दवम् ; चायि २ षीदवम् , षीध्वम् । चेता २; चायिता । चेष्यति,. चायिष्यते । चिकीषति, ते; चिचीषति, ते । चेचीयते । चेचयीति, चेचेति, चेचितः, चेच्यति। क्ये, चेचीयते ॥ सप्त० ॥ चेचियात् । ह्य०॥ अचे ४ चयीत्, चेत्, चिताम्, चयुः । क्ये, अचेचीयत ॥ अद्य० ॥ अचेचायीत् । भाक । अचेचायि, अचेचायिषाताम्, अचेचयिषाताम् । चेचयाञ्चकार । भाक । चेच- याश्चके । चेचीयात् । भाक । चेचायिषीष्ट, चेचयिषीष्ट । चेचयिष्यति । भाक । चेचायिष्यते, चेचयिष्यते। अचेचयिष्यत् ।भाक।अचेचायिष्यत, अचेचयिष्यत । ते;

स्वादिगणः । २१५ णिगि, “चिस्फुरो:-"।४।२।१२॥ इति बाआले, “अतिरी॥४।२।२१॥ इति पौ, नि- श्वापयति, निश्चाययति। अचीचपत्, अचीचयत् । चिचापयिषति, चिचाययिषति। चिन्वन्। चिन्वानः । चीयमानम् । चेष्यन् । चेष्यमाणः । चिचिवान् , चिकि- वान् । चिच्यानः, चिक्यानः। चितः, २ वान् । चित्वा। सञ्चित्य । चेता। चेतुम् । चेतव्यम्। चेयम् ; परिचयम् । अन्येवेनं चुरादौ पठिला अस्य घटादित्वं, “चि- स्फुरोः-"॥४।२।१२॥ इत्यावाभावं चेच्छन्ति । तन्मते, चययति । आवमप्यन्ये, चापयति । णिजभावे तु; चयति, चयते इत्यादि ॥ ४ ॥ धूग्ट् कम्पने। धूनोति, धूनुते। क्ये, धूयते। धूनुयात् । धून्वीत । धूनोतु । धूनुताम् । अधूनोत् । अधूनुत । “धूगसुस्तोः॥४।४।८५॥ इतीटि, अधावीत्, अधाविष्टाम् । आत्मनेपदे तु, "धूगौदितः॥४॥४॥३८॥ इति वेटि, अधोष्ट, अधविष्ट । अधावि, अधाविषाताम् ; अधोषाताम्, अधविषाताम् । दुधाव, दुधुवतुः, दुधुवुः, दुधविथ; दुधुविम । दुधुवे । धूयात् । “धूगौदितः॥४।४।३८॥ इति वेटि, धोषीष्ट, धविषीष्ट, धाविषीष्ट । धोता, धविता; धाविता । धोष्यति, धविष्यति, ते; धाविष्यते । दुधूषति, ते; दुधुविषति, ते । दोधूयते । दोधवीति, दोधोति । णौ, “धूम्प्रीगो:-"॥४।२।१८॥ इति ने, विधूनयति । व्यदूधुनत् । ग्निर्देशाद्यङ्लुपि णौ न नोऽन्तः । दोधावयति । धूतः, २ वान् । “उवर्णात्" ॥४।४।५८॥ इति नेट, धूत्वा । विधूय । धोता; धविता । धोतुम् ; धवितुम् । धोतव्यम् ; धवितव्यम् । उदन्तोऽनिट चायमित्येके, धुनोति, धुनुते । क्ये, धूयते । धुनुयात् । धुनोतु । अधुनोत् । अधोष्ट । अधावि । धोता । विधुतः।. धुत्वा । विधुत्य इत्यादि ॥ ५ ॥ स्तुंग्ट आच्छादने । स्तृणोति, स्तृणुते। क्ये, “क्ययङ-"॥४।३।१०॥ इति गुणे, आस्तयते। अस्तार्षीत्, अस्तासम्, अस्तार्पः, अस्तार्षीः । आत्मने सिजा- शिषोः; “संयोगादृतः॥४॥४॥३७॥ इति वेटि; आस्तरिष्ट, आस्तृत । “ऋव- त्॥४॥३॥३६॥ इति सिच् कित् । “धुट्-"॥४।३।७०॥ इति लुक्, अस्तारि; ब्रिटि, अस्तारिषाताम् , अस्तरिषाताम् , अस्तृषाताम् । तस्तार; “संयोगाद्-" ॥३॥९॥ इति गुणे, तस्तरतुः; "ऋतः॥४॥४॥७९॥ इति नेटि, तस्तर्थ, तस्तरथुः;

२१६ कियारत्नसमुच्चयः। तस्तरिम । तस्तरे। स्तर्यात्। स्तृषीष्ट, स्तरिषीष्ट, स्तारिषीष्ट । तिस्तीर्षति, ते । तास्त. यते। तरी रि र ३ स्तरीति, ततति, तरि २ स्तृतः, स्त्रति । स्तारयति । अतिस्तरत् । स्तृण्वन् । स्तृण्वानः। स्तरिष्य २ न् , माणः । तस्तूवान् । तस्त्राणः । स्तृतः, २ वान् । विस्तीर्ण इति तु स्तृणातेः । स्तृत्वा । आस्तुत्य । स्त" । स्तर्तुम् ॥६॥ वृग्ट् वरणे । वृणोति, वृणुते; प्रावृ २ णोति, णुते। आ, सं, परि पूर्वोऽपि । क्ये, वियते। अवारीत्, अवारिष्टाम्, अवारिषु ।। "इट् सिजाशिषोः-"॥४॥३६॥ इति वेटि, “वृत-"॥४॥३५॥ इति वा दीर्धे च, अवृत, अबरिष्ट, अवरीष्ट । अवारि, अवृषाताम् , अवरिषाताम्, अवरीषाताम् ; मिटि, अवारिषाताम् । ववार, वव्रतुः, वत्रुः; "ऋवृ.॥४१८०॥ इतीटि, ववरिथ, वत्रथुः, वव्र, ववार, ववर; "स्कस-"॥४४८१॥ इत्यत्रास्य वर्जनान्नेटि; ववृव, ववृम । वत्रे, वव्राते, वत्रिरे, ववृषे; ववृ २ वहे, महे । त्रियात् । वेटि दीर्घाभावे च, वृषीष्ट, वरिषीष्ट, वारिषीष्ट । वा दीर्घे, वरिता २, वरीता २, वारिता । वरिष्यति, ते; वरीष्यति, ते; वारिष्यते । अवरिष्यत्, त; अवरीष्यत्, त; अवारिष्यत । "इवृध-"॥४४॥४७॥ इति वेटि, “नामिनोऽनिट् ॥४॥३॥३३॥ इति कित्त्वे चं; प्राविवरिषति, ते; प्राविवरीषति, ते; प्रावुवूर्षति, ते । वेत्रीयते । वरि री र ३ वरीति, वरि री र ३ वर्ति, वर्वृतः, वर्चति । वर्बत् । वारयति । अवीवरत् । वृण्वन् । वृण्वानः । ब्रियमाणम् । वरिष्य २ न्, माणः; वरीष्य २ न , माणः । ववृवान् । वव्राणः । "ऋवर्णश्रि-"५५॥ इति किति नेटि; वृतः, २ वान् । वृतिः। वृत्वा । प्रावृत्य । वरि ३ ता, तुम्, तव्यम्; वरी ३ ता, तुम्, तव्यम् । क्यपि, प्रावृत्यः ॥ ७ ॥ इत्युभयपदिनः । अथ सप्तानिटः ॥ हिंट गतिवृद्योः । हिनोति; 'अदुरुपसर्ग-॥२॥३७७॥ इति णत्वे; प्रहिणोति, प्रहिणुतः, प्रहिण्वन्ति । क्ये, प्रहीयते । हो, प्रहिणु । दिवि, प्राहिणोत् । अमि, प्राहिणवम् ॥ अद्य० ॥ अहैषीत्, अहैष्टाम्, अहै ७ षुः, षीः, ष्टम्, ष्ट, षम्, ष्व, म । अहायि, अहेषाताम् ; ब्रिटि, अहायि- पाताम् , अहेष्ठाः, अहायिष्ठाः; अहे २ ड्ढ्वम्, वम् ; अहायि ३ ड्वम् , स्वादिगणः । ढ्वम्, ध्वम् । “अङे हि-"॥४॥१॥३४॥ इति हो घे; जिघाय, जिघ्यतुः, जिघ्युः, जिघयिथ, जिघेथ, जिघ्यथुः, जिघ्य, जिघाय, जिघय, जिध्यिव, जिध्यिम । जिध्ये, जिध्याते, जिध्यिरे, जियिषे । हीयात् । हेषीष्ट; हायिषीष्ट । हेता २; हायिता । हेष्यति; हायिष्यते । जिघीषति । जेघीयते । जेघयाति; जेधेति, जेषितः, जेध्यति । जेध्यत्। शेषं चिवत् । प्रहाययति । डे न घः, प्राजीहयत् । प्रजिहाययिषति। प्रहिण्वन् । प्रहेष्यन् । प्रहीयमाणम् । प्रहेष्यमाणम् । प्रहितः, २ वान् । “सातिहेति-"॥५॥३।९४॥ इति क्तौ भावाकर्निपातनाद् , हेतिः। हित्वा। प्रहित्य । हे ३ ता, तुम्, तव्यम्। हेयम् ॥ ८ ॥ श्रृंट् श्रवणे । गतावित्यन्ये । “श्रौति-"॥४।२।१०८॥ इति शृः; शृणोति । "प्रत्याङः श्रुवा-"।२।२।५६॥ इति चतुर्थ्याम्; मैत्राय प्रतिशृणोति; मैत्राय आशृ- णोति, शृणुतः, शृण्वन्ति, शृणोषि, शृणुथः, शृणुथ, शृणोमि, शृण्वः, शृणुवः, शृण्मः, शृणुमः। “समो गम्-"॥३॥३८४॥ इत्यात्मनेपदे; संशृणुते, संच,१०ण्वाते, ण्वते, णुषे, ण्वाथे, णुध्वे, ण्वे, ण्वहे, णुवहे, ण्महे, णुनहे। कर्मणि तु सति परस्मै. पदे; संशृणोति हितम्। क्ये, श्रूयते । शिति शेषं पुंग्टवत् । अश्रौषीत, अश्री- ष्टाम् , अश्रौ ७ घुः, षीः, टम्, ट, पम्, प्व, ष्म । समश्रो ६ष्ट, पाताम् , षत, ष्ठाः; ड्वम्, ट्वम् । अश्रावि, अश्राविषाताम्, अश्रोपाताम् । शुश्राव, शुश्रुवतुः, शु. श्रुवुः, “स्क्रस-"॥४।४।८१॥ इत्यत्र श्रुवर्जनान्नेट, शुश्रोथ, शुश्रुवथुः, शुश्रुव, शु- श्राव, शुश्रव, शुश्रुव, शुश्रुम । शुश्रुवे, शुश्रुवाते; शुश्रुमहे । “श्रुसद-३५।२।१।। इति भूतमात्रे वा परोक्षा; शुश्राव । पक्षे, अश्रौषीत् । अशृणोत् । श्रूया ।। श्रोषीष्ट; श्राविषीष्ट । श्रोता२;श्राविता।श्रोष्यति, ते; थाविष्यते। "श्रुवाऽनाङ्॥३३७१॥ इत्यात्मनेपदे; शुश्रूषते गुरून ; संशुश्रूपते शब्दान् । आझतेस्तु परस्मैपदे, आशुश्रूषति; प्रतिशुश्रूषति । शोश्रूयते। शोश्रवीति, शोश्रोति, शोश्रु २ तः, वति, शोश्रवीषि, शोश्रोषि, शोश्रु २ थः, थ, शोश्रवीमि, शोश्रोमि, शोश्रु २ वः, मः । “समो गम्-'।।३।३।८४॥ इत्यत्र प्रकृतिग्रहणादात्मनेपदे; संशोश्रुते, संशोश्रु- २ वाते, वते। क्ये, शोश्रूयते। शोश्रुयात् । शेषं भूस्थाने। "श्रौति-"||१२|१०८॥ इत्यत्र तिनिर्देशान्न शृः। यङ्लुप्यपि शृगोतीत्यादीच्छन्त्यन्ये। शोश्रुवत् । यङ्- २९ क्रियारत्नसमुच्चयः । लुपि सनि "श्रुवोऽनाङ्-"॥३॥३७॥ इत्यात्मने; शोश्रविषते । णौ, श्रावयति । सनि "श्रुमुदु-॥४।१६१॥ इति पूर्वस्योतो वेले, शिश्रावयिषति, शुश्रावयिषति । डे, “असमानलोपे-४११६३॥ इति सन्वद्भावे, अशिश्रवत् , अशुश्रवत् । शृण्वन् । संशृण्वानः। श्रोष्यन् । श्रोष्यमाणम् । “तत्र कसुकानौ-"॥५॥२॥२॥ इति परोक्षामात्रविषये कसुरेव; शुश्रुवान् , उपशुश्रुवान् । बहुलाधिकारात् कानो. ऽस्मान्नास्ति । श्रुतः, २ वान् । श्रुत्वा । प्रतिश्रुत्य । श्रोता । श्रोतुम् । श्रव्यम् । श्राव्यम् । श्रोतव्यम्॥ ९॥ टुडुंट् उपतापे । दुनोति । क्ये, दूयते । अदौषीत्, अदौष्टाम् , अदौषुः । अदावि, अदोषाताम्, अदाविषाताम्। दुदाव, दुदुवतुः; दुदोथ, दुदविथ; दुदु- विम । दुदुवे। दूयात् । दोषीष्ट; दाविषीष्ट । दोता २; दाविता २ । दोष्यति, ते; दाविष्यते । "स्वरहन्-॥४।१।१०४॥ इति दीर्धे, दुदूषति। दोदृयते । दोदवीति, दोदोति, दोदुतः, दोदुवति । दावयति । अदीदवत् । दुन्वन् । दोष्यन् । दूय- मानम् । दुदुवान् । दुदुवानम् । “दुगोः॥४।२।७७॥ इति नवं ऊश्च; दूनः, २ वान् । दुत्वा । प्रदुत्य । दोता । दोतुम् ॥ १० ॥ पूंट प्रीतौ । पृणोति । क्ये, प्रियते । अशिति शेषं सर्व पुंक्वत् ॥११॥ शक्लंट शक्तौ । शक्नोति, शकुतः, शक्नुवन्ति; अत्र उव्। शक्नुवः, शक्नुमः; अत्र संयोगसद्भावान्न उलुक् । क्ये, शक्यते । शक्नुयात् । शक्नोतु, शकुताम्, शक्नुवन्तु, शक्नुहि; संयोगान हेर्लुक् । अशक्नोत् । शिति शेषं घुग्ट्वत्। लुदि- त्वादङि, अशक ३ त् , ताम् , न् । अशाकि, अश ९ क्षाताम्, क्षत, कथाः, क्षाथाम् , ग्ध्वम् , ग्ड्ढ्वम् , क्षि, क्ष्वहि, क्षमहि । शशाक, शेकतुः,शेकुः, शेकिथ, शशक्थ, शेकथुः, शेक, शशाक, शशक, शेकि २ व, म । शेके । शक्यात् । शक्षीष्ट । शत्ता २। शक्ष्यति, ते । “रभलभ-"॥४।१।२१॥ इति इत्वे, "शको- जिज्ञासायाम् ॥३३॥७३॥ इत्यात्मनेपदे च; विद्याः शिक्षते, ज्ञातुं शक्नुयामिती- च्छतीत्यर्थः । अशिक्षिष्ट । आमादेशे, शिक्षाश्चके; अत्र धातोः परस्मैपदित्वेऽपि "शको-"॥३।३।७३॥ इति वचनादेव " आमः कृगः " ॥३३७५॥ इत्यनेन परस्मैपदं न भवति । जिज्ञासाया अन्यत्र तु परस्मै, शक्तुमिच्छति शिक्षति ।

खादिवतः ।
२११
शाशक्यते । शाश २ कीति, क्ति । शेष पचिवत् । शाकयति । अशीशकत् ।
शाकि २ तः वान्, । शक्नुवन् । शक्यमानम् । शक्ष्य २ न, माणम् । शेकिन
वान् । शेकानम् । शक्तः, २ वान् चैत्रः। “शकः कर्मणि"|४|४|७३॥इति कर्मणि
तेषा नेट, शकितः शक्तो वा घटः कर्तु चैत्रेण । कर्मणि क्तवतुर्नास्तीति नोदाहि-
यते । शत्वा । शक्ता । शक्तुम्। शक्यम् । शकनीयम्। शक्तव्यम् ॥१२॥
राध, साधंट संसिद्धौ; फलसम्पत्तौ । रानोति, पचतीत्यर्थः । आरानोति ।
वि, अप, प्रति, पूर्वोऽप्येवम् । “यद्वीक्ष्ये-'"।२।२।५८॥ इति चतुर्थ्याम्; मैत्राय
रानोति, मैत्रस्य शुभाशुभं पर्यालोचयतीत्यर्थः । राध्नुतः, राध्नुवन्ति; राध्नुवः,
राध्नुमः । क्ये, राध्यते । हो, राध्नुहि ॥ अद्य० ॥ अरात्सीत्, अराहाम्,
अरात्सुः, अरात्सीः, अराद्धम् , अराद्ध, अरात्सम, अराव, अरात्स्म । अराधि,
अरा ५ त्साताम् , त्सत, डाः; द्ध्वम्, ध्वम् । रराध, रराधतुः, रराधुः, रराधिथ;
रराधिम । रराधे । वधे तु, "अवित्परोक्षा-"॥४।१।२३॥ इति एनं च हिः, प्रतिरेधतुः।
प्रतिरेधे। राध्यात् । रात्सीष्ट । राडा २ । रात्स्यति, ते । “राधेर्वधे-॥४१॥२२॥ इति
इः, प्रतिरित्सति । वधादन्यत्र, आरिरात्सति । राराध्यते। रारा ४ धीति, डि, डा,
धति। राधयति । अरीरधत् । राध्नुवन् । राध्यमानम्। रात्स्य २ न्, मानम् । ररा-
२ ध्वान्, धानम् । राद्धः, २ वान् । राद्ध्वा । आराध्य ।राडा । राद्धम् । राद्धव्यम् ।
राध्यम् ॥ साधं ॥ सानोति, साध्नुतः, साध्नुवन्ति; साध्नोमि, साध्नुवः, साध्नुमः ।
क्ये, साध्यते । हौ, साध्नुहि । असात्सीत् , असाझाम् , असात्सुः। असाधि,
भसात्साताम् । ससाध, ससाधतुः; ससाधिथ; ससाधिम । ससाधे । सा-
ध्यात् । सात्सीष्ट । साहा । सात्स्यति । सिसात्सति । सासाध्यते । साधयति ।
असीसधत् । सिसाधयिषति । षपाठात् “नाम्यन्त-"॥२३॥१५॥ इति पल-
मित्यन्ये । सिषासति । असीषधत् । सिषाधयिषति । साध्नुवन् । सात्स्यन् ।
साध्यमानम् । साद्धः, २ कान् । सावा । प्रसाथ्य । साधा। साडुम् । साड-
व्यम् ॥ १३ ॥ १४ ॥
कधूट वृद्धौ। कमोति । "ऋत्यारुप-॥१॥रामा इत्यारि, प्राओंति
प्रोति । क्य, ऋध्यते । अशिति रोष ऋधूक्त् ॥ १५ ॥

२२० क्रियारत्नसमुच्चयः । आप्लंट् व्याप्तौ । अनिट् । आप्नोति । एवं प्र, अव, वि, आङ्, सम्, प्रति पूर्वोऽपि । आप्नुतः, आप्नुवन्ति, आप्नोषि, आप्नुथः, आप्नुथ, आप्नोमि, आप्नुवः, आप्नुमः । आप्यते । प्राप्नुयात् । आप्नोतु, आप्नुताम् , आप्नुवन्तु, आप्नुहि; आप्नवानि ॥ ह्य० ॥ आप्नुवत् ; आप्नुव ॥ अद्य० ॥लदित्त्वादाङि, आ- पत् , आप २ ताम्, न, आपः; आपाम। आपि, आप्साताम्, आप्सत, आप्थाः; आब्ध्वम्, आन्द्ध्वम् , आप्सि । आप, आपतुः, आपुः, आपिथ, आपथुः, आप, आप, आपिव, आपिम । आपे । आप्यात् । आप्सीष्ट । आप्ता २ । प्राप्स्यति। 'ज्ञप्यापो-॥४।१।१६॥ इतीपि, ईप्सति । आपयति । “अदुरुपसर्ग-"॥२।३।७७|| इति णत्वे, प्रापयाणि । आपिपत् । आपितः । “वाऽऽप्नोः॥४३८७॥ इति णेर्वा अयि, प्रापय्य; प्राप्य । प्राप्नुवन् । प्राप्यमाणम् । प्राप्स्यन् । आपिवान् । आपानम् । “गत्यर्था- ॥५॥१॥११॥ इति कर्तरि क्ते, आप्तः, २ वान् । पक्षे, आप्तम्। आप्त्वा। प्राप्य। प्राप्ता । प्राप्तुम् । प्राप्तव्यम्। प्राप्यम् ॥१६॥ तृपट प्रीणने । क्षुम्नादिवाण्णत्वाभावे, तृप्नोति, तृप्नुतः, तृप्नुवन्ति । क्ये, तृप्यते । शिति शेषं आप्लंट्वत् । अशिति तु तृपौच्चत्, परं नित्ये. ट्त्वं ज्ञेयम् ॥ १७ ॥ दम्भूट दम्भे । दन्नोति, दभ्नुतः, दभ्नुवन्ति । दभ्यते । अदम्भीत , अद. म्भिष्टाम् । अदम्भि, अदम्भिषाताम्। ददम्भ । “दम्भः॥४।१।२८॥ इत्येत्वे नलुकि च, देभतुः, देभुः; “थे वा" ॥४।१।२९॥ देभिथ, ददम्भिथ, देभथुः, देभ; देभिम । देभे। दभ्यात्। दम्भिषीष्ट । दम्भिता । दम्भिष्यति । “इवृध-" ॥४४|४७॥ इति वेटि, दिदम्भिषति । पक्षे, “दम्भो धिपधीप्” ॥४॥१॥१८॥ न च द्विः, धिप्सति, धीप्सति। दादभ्यते । दादम्भीति, दादम्ब्धि । दम्भयति । अददम्भत् । दनुवन् । दम्भिष्यन् । देभिवान् । देभानम् । ऊदित्त्वाइटि, दब्ध्वा, दम्भित्वा। वेट्वान्नेटि; दब्धः, २ वान् । दम्भि ३ ता, तुम्, तव्यम् ॥ १८ ॥ धिवुट् गतौ । प्रीणनेऽप्यन्ये । "श्रौति-४।२।१.८॥ इति धिः; धिनोति; धिनुतः, धिन्वन्ति । क्ये, उदित्वान्ने, धिन्व्यते । अधिन्वीत, अधिन्विष्टाम् । अधिन्वि । दिधिन्व, दिधिन्वतुः; दिधिन्विम । दिधिन्वे। धिन्व्यात् । धिन्विषीर।

स्वादिगणः । २२१ २ धिन्विता । धिन्विष्यति । दिधिन्विषति । देधिन्व्यते । धिन्वयति । अदिधि- न्वत् । धिन्वन् । धिन्वि ६ ता, तुम्, तव्यम्, वा, तः; २ वान् ॥ १९ ॥ ष्टिघिट आस्कन्दने । स्तिघ्नुते; आस्तिघ्नुते । आस्तिष्यते । आस्तेषिष्ट । तिष्टिधे । स्तेषिता । तिष्टिघिषते, तिष्टेघिषते । तेष्टिध्यते । तेष्टक्ति, तेष्टि- घीति । स्तिघितः । स्तेधित्वा, स्तिघित्वा ॥ २० ॥ अशौटि व्याप्तौ । सङ्घातेऽप्यन्ये । अश्नुते, अश्नुवाते, अश्नु ७ वते, थे, वाथे, ध्वे, वे, वहे, महे । अश्यते । अश्नुवीत, अश्नु ६ ताम्, वाताम्, वताम, व, वाथाम् , ध्वम् , अन ३ वै, वावहै, वामहै । आश्नु ९ त, वाताम्, वत, थाः, वाथाम् , ध्वम् , वि, वहि, महि। आश्यत ॥ अद्य० ॥ औदित्त्वाद्वेट, आशिष्ट, आशि ९ षाताम् , षत, ष्ठाः; ड्वम् , ध्वम् , पि० । पक्षे, आष्ट, आक्षा- ताम्, आक्षत, आष्ठाः, आक्षाथाम् , “सो धि वा"॥४।३।७२॥ इति वा सिच्- लुकि, “यज-"||२।११८७॥ इति धे, “तृतीयस्तृ.॥१॥३॥४९॥ इति डे, “तवर्ग-" ॥१॥३६०॥ इति ट्वे, आड्ढ्वम्, आग्ड्ढ्वम् , आक्षि, आक्ष्वहि, महि । आशि । 'अनात ॥४।१।६९॥ इति पूर्वस्याले नेऽन्ते च; आनशे, आनशाते, आनशिरे, आनशिषे । अक्षीष्ट, अशिषीष्ट । अष्टा, अशिता । अक्ष्यते, अशिष्यते । “ऋस्मि-"|४|४|४८॥ इति इटि, अशिशिषते । “अट्यर्ति-" ॥३४॥१०॥ इति यङि, अशाश्यते । आशयति, ते । आशिशत् । अश्नुवानः । अक्ष्यमाणः; आशिष्यमाणः । आनशानः । अष्टः २, वान् । अष्ट्वा, अशित्वा अष्टा; अशिता । अष्टुम् , अशितुम् । अशनीयम् ॥ २१ ॥ इति तपाचार्यश्रीदेवसुन्दरसूरिशिष्यश्रीगुणरत्नसूरिविरचिते क्रियारत्नसमुच्चये स्वादिगणः ॥

१२२ क्रियारलसमुचयः। अथ तुदादिगणः। , दशानिटः॥ तुदीत् व्यथने। "तुदादेःशः॥३॥८॥इति शे, तस्य ङित्त्वा- नं गुणे; तुदति, तुदते । क्ये, तुद्यते । अतौत्सीत्, अतौत्ताम्, अतौत्सुः, अतौत्सीः, अतौत्तम्, अत्तौत्त, अतौत्सम्, अतौत्स्व, अतौत्स्म । “सिजाशिष." ॥४॥३॥३५॥ इति कित्त्वे; अतुत्त, अतु ९ साताम् , त्सत, त्थाः, साथाम्, ध्वम्, ध्वम्, सि, स्वहि, महि । तुतोद, तुतुदतुः; तुतोदिथ; तुतु- दिव । तुतुदे । तुद्यात् । तुत्सीष्ट । तोत्ता २। तोत्स्यति, ते । “उपान्त्ये" ॥४॥३॥३०॥ इति कित्त्वे, तुतुत्सति। तोतुद्यते । तोतुदीति; तोतोत्ति । तोदयति। अतूतुदत् । तुदन् । “अवर्णादश्न-"॥२।१।११५॥ इति बाऽन्त्, तुवन्ती, तुदती स्त्री कुले वा। तुदमानः । तुद्यमानम्। तोत्स्य २ न्, मानः। तुतुर हान्, दामः। तुन्ना, २ वान् । तुत्त्वा । तोत्ता । तोत्तम्। सोत्तव्यम् ॥१॥ भ्रस्जीत् पाके । शे, “ग्रहवश्व-"॥४।१।८४॥ इति वृति, "सस्य शषौ"॥१॥ २६१॥ इति शे, “तृतीयस्तृ-॥१॥३॥४९॥ इति शस्य जे, भृज्जति, ते । अशिति, "भृज्जो भ॥४॥४६॥ इति वा भर्जादेशे, स्थानिवद्भावेन पूर्वेण वरेण सह रस्य स्वृति, भृज्यते । पक्षे भ्रस्जो बृति, भृज्ज्यते। एवमग्रेऽपि क्ङितिरूपयस्य वृत् ज्ञेयम् । अभाीत्, अभाटीम्, अभाक्षुः । अभ्राक्षीत् , अभ्राष्टाम्, अनाक्षुः । अभष्ट, अभ्रष्ट, अभांताम् , अभ्रक्षाताम् ; अभनॊः, अभ्रष्ठाः । सो वा लुकि "यज-"॥२।१।८७॥ इति षवे, अभवम् , अभ्रड्वम् । पक्षे, “पढोः कः" ॥२१॥१२॥ इति षः कले, “नाम्यन्त-"॥२॥३॥१५॥ इति सः षले, "तृतीय-"। ॥१॥३॥४९॥ इति डवे, को गवे च, अभईवम्, अभ्रग्ड्ढ्वम् । अभर्जि, अभ्रज्जि । बभर्ज; संयोगाकित्त्वाभावान्न म्वृति, बभर्जतुः, बर्जिथ, बभर्छ; बभार्जिम। बभर्जे । बभ्रज्ज, बभ्रज्जतुः; बभ्रज्जिथ, बभ्रष्ट; बभ्रज्जिम । वभ्रज्जे। प्राग्वत् स्वृति, भृज्यात् ; भृज्ज्यात् । भीष्ट; भ्रक्षीष्ट । भर्टा; भ्रष्टा । भमंति, ते; भ्रक्ष्यति, ते । “इवृध-"||r७॥ इति वेटि, विभर्जिषति, ते बिभर्फति, तुदादिगणः । २२३ ते विभ्रजिषति, ते; विभ्रक्षति, ते। एवं रूपाणि ८ । बरीभृज्यते, बरीभृज्ज्य- ते। "भृज्ज-४६॥ इत्यत्र लुप्ततिनिर्देशाद्यङ्लुपि भर्जादेशाभावे भ्रस्ज एवं य्वृति द्वित्वे च, बरी रि र ३ भृज्जीति; अत्र अय्वृल्लेनदित्युक्तेयङ्लुप्यपि वृत् सिद्धम् । बभृष्टि; अत्र परे गुणे विधेये “संयोगस्यादौ-॥२।१।८८॥ इति सलोपस्यासत्त्वेनोपान्त्याभावान्न गुणः । बर्ध १० ष्टः, ज्जति, जीषि, क्षि, ष्ठः, छ, ज्जीमि, ज्ज्मि, ज्ज्वः, उज्मः । क्ये, बर्धज्ज्यते । हो, ब ड्ढि ॥ ह्य० ॥ अब १२ ज्जीत्, ड्ट,ष्टाम्, ज्जुः, ज्जीः, ट् ड्, ष्टम्, ट, ज्जम् , ज्व, ज्ज्म। ॥ अद्य० ॥ अब ज्जीदित्यादि । यङ्लुपि न य्वृदित्यन्ये । बाभ्र ४ ज्जीति, ष्टि, ष्टः, ज्जति ॥ ह्य० ॥ अबाभ्रड् इत्यादि । भर्जयति, भ्रज्जयति । अबभर्जत्, अबभ्रज्जत् । भृज्जन् । भृज्जमानः। भर्पा २ न, माणः; भ्रक्ष्य २ न , माणः। बभृ. ज्वान् , बभृज्ज्वान् । बभृजानः, बभृज्जानः। भ्रष्टः २, वान् । भृष्ट्वा; एषु षले कृते द्वयोः सदृशं रूपम्।भा, भ्रष्टा। भष्टुम् , भ्रष्टुम् । भट्टव्यम् , भ्रष्टव्यम्।ध्यणि "क्तेऽनिट -११११॥ इति गत्वे, भर्म्यम् । “तृतीयस्तृ-" ॥१३॥४९॥ इति सस्य दत्वे, भ्रद्ग्यम्.॥ २ ॥ क्षिपीत् प्रेरणे । क्षिपति,ते।आ, वि, सम्, प्र, उप, परि, उद्, नि पूर्वोऽप्ये- वम् । फलवत्यपि “प्रत्यभ्यते:-"॥३।३।१०२॥ परस्मैपदे, प्रतिक्षिपति; अभिक्षिपति; अतिक्षिपति । क्ये, क्षिप्यते। अझैप्सीत् , अक्षताम् , अझैप्सुः०; अझैप्स्म । अ. क्षिप्त, अक्षि ९ प्साताम् , प्सत, पथाः, प्साथाम् , ब्ध्वम्, ब्द्ध्वम्, प्सि, प्वहि, प्स्महि । अक्षेपि । चिक्षेप, चिक्षिपतुः; चिक्षिपिम । चिक्षिपे । क्षिप्यात् । क्षि- प्सीष्ट । क्षेप्ता २ । क्षेप्स्यति, ते । चिक्षिप्सति, ते । चेक्षिप्यते । चेक्षिपीति, चेक्षेप्ति । क्षेपयति । अचिक्षिपत् । क्षिप्तः, २ वान् । क्षिप्त्वा। प्रक्षिप्य । क्षेप्ता । क्षेप्तुम् । क्षेप्यम् ॥ ३॥ दिशीत् अतिसर्जने; त्यागे । दिशति, ते । आ, सम्, निर्, उप, अति, प्रति, प्र, समापूर्वोऽपि । क्ये, दिश्यते । सकि, आदिक्षत्, आदिक्षताम् । आदि ९ क्षत, क्षाताम्, क्षन्त, क्षथाः, क्षाथाम् , क्षध्वम्, क्षि, क्षावहि, क्षामहि । अदेशि । दिदेश, दिदिशतुः दिदशिथ; दिदिशिम । दिदिशे। दिश्यात् । दिक्षीष्ट ।

३२४ क्रियारत्नसमुच्चयः । देष्टा २ । देक्ष्यति, ते । दिदिक्षति, ते । देदिश्यते । देदिशीति, देदेष्टि । देश- यति । अदीदिशत् । दिशन् । दिशमानः । देक्ष्य २न्, माणः । दिदि २ श्वान्, शानः । दिष्टः, २ वान्। दिष्ट्वा । उपदिश्य । देष्टा । देष्टुम् । देष्टव्यम् ॥४॥ कृषीत् विलेखने। कृषति, ते; आकृषति, ते । कृष्यते । “स्पृश-"॥३।४।५४॥ इति वा सिचि; अकाीत् । “स्पृशादि."॥४।४।११२॥ इति वा अः; अकाक्षीत्। पक्षे सकि, अकृक्षत् , अकाटीम, अक्राष्टाम् , अकृक्षाताम्, अकार्वाः, अक्राक्षुः; अकृ- क्षन् । “सिजाशिष-"॥४।३।३५॥ इति कित्त्वान्न अः, अकृष्ट । अकृक्षत; सिचि सकि च; अकृक्षाताम् । भाक । अकर्षि । शेषं कृषंच्वत् , नवरं कर्त्तर्या- त्मनेपदमपि ॥ ५॥ मुचलंती मोक्षणे । शे "मुचादि-"|४|४।९९॥ इति नेऽन्ते च, मुञ्चति; मुश्चामः। मुञ्चते; मुश्चामहे । मुच्यते। लदित्वादङि, अमुचत् , अमुचताम् । अमुक्त, अमु- क्षाताम्। अमोचि । मुमोच, मुमुचतुः; मुमोचिथ; मुमुचिम । मुमुचे। मुच्यात् । मुक्षीष्ट । मोक्ता २। मोक्ष्यति, ते । “अव्याप्यस्य-"॥४।१।१९।। इति वा मोकि, मोक्षति, ते । मुमुक्षति, ते। व्याप्ये तु, मुमुक्षति वत्सं चैत्रः । “एकधातौ-''॥३४॥ ८६॥ इति जिक्यात्मनेपदेषु प्राप्तेषु “भूषार्थ-"||३||९३॥ इति निक्ययोनिषेधे; मोक्षते, मुमुक्षते । अमोक्षिष्ट, अमुमुक्षिष्ट वा वत्सः स्वयमेव । मोमुच्यते । मोमुचीति, मोमोक्ति ॥. अद्य० ॥ लदनुबन्धनिर्दिष्टत्वाद् यङ्लुपि न अङ्, अमोमोचीत् । एवमन्यत्रापि । मोचयति । अमूमुचत् । मुञ्चन् । मुश्चमानः । मुच्यमानम् । मोक्ष्य २ न, माणः । मुमुच्वान् । मुमुचानः । मुक्तः, २ वान् । मुक्त्वा । विमुच्य । मोक्ता । मोक्तुम् । मोक्तव्यम् ॥ ६॥ षिचीत् क्षरणे । “मुचादि-"|४|४|९९॥ इति ने, सिञ्चति । सोपसर्गस्य "स्थासेनि-"॥२॥३॥४०॥ इति द्विवेऽपि अटयपि षत्वे, अभिषिञ्चति । सिञ्चते; सिचामहे । सिच्यते ॥ ह्य० ॥ असिञ्चत् ; अभ्यषिश्चत् ॥ अद्य० ॥ "हालिप् सिच-"||३।४।६२॥ इत्याङि, असिचत् । “ वाऽऽत्मने "॥३।४।६३॥ असिचत, असिक्त; असिक्षाथाम् । असेचि । “नाम्यन्त-"॥२।३।१५॥ इति षवे; सिषे च; अभिषिषेच । सिषिचे, अभिषिषिचे। सिच्यात् । सिक्षीष्ट । सेक्ता २ ।

तुदादिगणः। , - सेक्ष्यति, ते; अभिषेक्ष्यति, ते । “णिस्तोरेव-'"॥२॥३॥३७॥ इति नियमात् षला- भावे, सिसिक्षति, ते; अभिषिषिक्षति, ते । अभ्यषिषिक्षत्, त । “सिचो यडि" ॥२।३।६०॥ इति षत्वनिषेधे, सेसिच्यते; अभिसेसिच्यते । सेसिचीति, सेसे- क्ति, सेसि २ क्तः, चति । सेचयति; अभिषेचयति । असीषिचत् ; सोप- सर्गाण्णौ, अभ्यषीषिचत् । ण्यन्तस्य पश्चादुपसर्गयोगे पूर्वस्य नं षत्वम् ; अभ्यसीषिचत् । सिञ्चन् । सिश्चमानः । सिच्यमानम् । सेक्ष्यन् । सेक्ष्यमाणः । सिक्तः, २ वान्। सिक्तिः। सिक्त्वा। अभिषिच्य। सेक्ता । सेक्तुम् । सेक्तव्यम् । ध्याण, "क्तेऽनिट:-"॥४।१।१११॥ इति कत्वे; सेक्यम् ॥ ७॥ विद्लंती लाभे । नेऽन्ते। विन्दति, ते। विद्यते । लदित्त्वादङि, अविदत्; अविदाम । अवित्त, अवित्साताम् । अवेदि । विवेद; विविदिम । विविदे । "वेत्तेः कित"॥३।४।५१॥ इति वाऽस्याप्यामित्यन्ये । विदांचकार; विवेदेत्यादि। विद्यात् । वित्सीष्ट । वेत्ता, २ । वेत्स्यति, ते । विवित्सति, ते । वेविद्यते । वेविदीति, वेवेत्ति । वेदयति । अवीविदत् । विन्दन् । विन्दमानः । वेत्स्यन् । वेत्स्यमानः। विद्यमानम्। “गमहन-"॥४॥४॥८३॥ इति वेटि, विविदिवान् ; विवि. द्वान्। विविदानः। “वित्तम्-"॥४।२।८२॥ इति निपातनात, वित्तं धनं प्रतीतं च । अन्यत्र तु “रदात्-"॥४।२।६९॥ इति नत्वे; विन्नः, २ वान् । क्ते, “निर्विण्णः ॥२॥३॥८९॥ इति निपातनात्; निर्विण्णो विरक्तः। क्तवतौ तु न णः, निर्विन्नवान् । वित्त्वा । प्रविद्य । वेत्ता । वेत्तुम् । वेत्तव्यम्। वेद्यम् ॥ ८ ॥ लुप्लंती छेदने । लुम्पति, ते; विलुम्पति, ते । लुप्यते । लदित्त्वादङि, अलुपत् । अलुप्त, अलुप्साताम् । अलोपि । लुलोप; लुलुपिम । लुलुपे । लुप्यात् । लुप्सीष्ट । लोप्ता २ । लोप्स्यति, ते । लुलुप्सति, ते । “गृलुप्-' ॥३।४।१२॥ इति यङि, लोलुप्यते । लोलोप्ति, लोलुपीति । लोपयति । 'भ्राजभास-॥४॥२॥३६॥ इति वा हस्खे, अलूलुपत्; अलुलोपत् । लुम्पन् । लुम्पमानः । लुप्यमानम्। लोप्स्य २ न् , मानः। लुलुप्वान् । लुलुपानः। लुप्तः, वान् । लुप्तिः । लो ३ ता, प्तुम् , प्तव्यम् । लुप्त्वा । विलुप्य ॥ ९ ॥ लिपीत् उपदेहे; वृद्धौ। लिम्पति; आलिम्पति । लिम्पते । लिप्यते । २ ३० क्रियारलसमुच्चयः । "हालिप्."॥३४६२॥ इत्यङि, आलिपत्। “वाऽऽत्मने"||३।४।६३॥ अलिपत, अलि- पेताम् । अलिप्त, अलिप्साताम्। अलेपि। लिलेप। लिलिपे। लिप्यात्। लिप्सीष्ट । लेप्ता २। लेप्स्यति,ते। लिलिप्सति, ते। लेलिप्यते। लेलेप्ति, लेलिपीति । लेपयति । अलीलिपत् । लिम्पन् । लिम्पमानः। लिप्यमानम् । लेप्स्य २ न् , मानः। लिलि. प्वान्। लिलिपानः। लिप्तः,२ वान् । लिप्वा । विलिप्य । लेप्ता। लेप्तुम् । लेप्त- व्यम् । लेप्यम् ॥ १०॥ कृतैत् छेदने । “मुचादि-"॥४।४।९९॥ इति ने; कृन्तति, कृन्ततः, कृतन्ति। कृत्यते। “कृतचूत-"५०॥ इत्यत्र सिचो वर्जनान्नित्यमिटि, अकीत्, अक- तिष्टाम्। अकर्ति, अकतिषाताम् । चकर्त्त; चकृतिम। चकृते । कृत्यात् । सादा- वशिति “कृतचूत-"॥४४॥५०॥ इति वेटि, कृत्सीष्ट, कतिषीष्ट । कर्चिता २ । कर्त्यति, ते; कतिष्यति, ते । चिकृत्सति; चिकर्तिषति । चरीकृत्यते । चरी- रिर् ३ कृतीति, चर्कति । वेट्वेऽप्यैदित्त्वं यङ्लुबन्तादनेकखरादपि क्योरिड- भावार्थम् । चरीकृत्तः, २ वान् । कर्त्तयति। अचीकृतत्; अचकर्त्तत् । कृन्तन् । कतिष्यन् ; कर्त्यन् । चकृत्वान् । चकृतानम् । बेट्वान्नेटि; कृत्तः, २ वान् । कर्तिवा । प्रकृत्य । कार्त ३ ता, तुम्, तव्यम् ॥ ११ ॥ इति मुचादिः। मृत् प्राणत्यागे । अनिट् । शिदद्यतन्याशीःषु, “म्रियतेरचतन्या-"॥३॥ ॥४२॥ इति आत्मनेपदे, "रिः शक्य-"॥४।३।११०॥ इति रौ;"धातोरिवर्ण-"॥२॥ ११५०॥ इतीयि; म्रियते; अनुम्रियते भर्तारम्; म्रियेते, म्रियन्ते, म्रियसे, नियेथे, म्रियध्वे, म्रिये, म्रियावहे, म्रियामहे । क्ये, म्रियते । म्रियेत । म्रिय- ताम् । अम्रियत ॥ अद्य० ॥ अमृत, अमृषाताम् । अमारि, अमारिषाताम् ; अमृषाताम् । शिदादेरन्यत्र परस्मैपदे; ममार, मम्रतुः, मम्रः, ममर्थ, मम्रथुः, मम्र, ममार, ममर, मम्रिव, मम्रिम । ममे । मृषीष्ट, २ । मारिषीष्ट । म २। "हनृतः-"n४|४|४९॥ इतीटि, मरिष्यति, ते । मारिष्यते । अमरिष्यत् । मुमू- पति । मेम्रीयते । “म्रियतेः-"॥३३॥४२॥ इत्यत्र तिनिर्देशाद्यङ्लुपि परस्मैपदे तुदादिगणः । मरी रि र ३ मरीति, मर्मति, मर्मतः, मम्रति । कृग्वत् । मारयति। अमीमरत्। मारयांचकार । मिमारयिषति । म्रियमाणः । मरिष्य २ न, माणम् । ममृवान् । मम्राणम् । मृतः, २ वान् । म२ र्चा, र्तुम् । मृखा । मृतिः। मर्त्तव्यम् ॥१२॥ कृत् विक्षेपे । किरति; उत्किरति सूत्रधारः पुत्रिकाम् । किरामः, “अप- स्किरः"॥३३॥३०॥ इत्यात्मनेपदे, “अपाच्चतुष्पाद्-" ॥४।९५॥ इति स्सटि, अपस्किरते वृषभो हृष्टः। अपस्किरते कुक्कुटो भक्ष्यार्थी।अपस्किरते श्वा आश्रयार्थी। "एकधातौ-॥३४॥८६॥ इति भिक्यात्मनेपदेषु प्राप्तेषु "भूषार्थ-"॥३४॥९॥ इति क्यज्योः प्रतिषेधे; अवकिरते पांशुः खयमेव । क्ये, कीर्यते । अकारीत्, अकारिष्टाम् । “इसिज-"|४|४॥३६॥ इति वेटि, "वृतो नवा-"॥३५॥ इति धेटो दीर्थे, अनिटिसचः “ऋवर्णात् ॥३३॥३६॥ इति कित्त्वे, अवाकोट, अवाकरिष्ट, अवाकरीष्ट वा पांशुः स्वयमेव । भाक । अकारि; ब्रिटि, अकारि- पाताम् , अकीर्षाताम्, अकरीषाताम् । चकार, “स्कृ॥४॥३८॥ इति गुणे, चकरतुः, चकरुः, चकरिथ । चकरे । कीर्यात् । कोर्षीष्ट, करिषीष्ट, कारिषीष्ट । करिता २; करीता २.। भिटि; कांरिता । करिष्यति, ते; कारिष्यते । “ऋस्मि-" ॥४४॥४८॥ इतीटि, चिकरिषति; चिकरीषति । चेकीर्यते । चाकर्ति । कारयति । अचीकरत् । विचिकीर्वान् । चिविकिराणम् । काने स्वरविधिवाद् द्विले कृते इर् । किति “ऋवर्णश्रि"॥४५७॥ इति नेट , "ऋल्वादेः-॥४॥२६८॥ इति ने, कीर्णः, २ वान् । कीर्खा । अवकीर्य । करि ३ ता, तुम्, तव्यम्; करी ३ ता, तुम्, तव्यम् ॥ १३ ॥ गृत् निगरणे; भोजने । गिरति; उद्गिरति । “नवा स्वरे"॥२।३।१०२॥ इति लले; गिलति; उगिलति। प्रतिज्ञायां “समः ॥३॥३॥६६॥ इत्यात्मने, सङ्गिरते। "अवात्॥३॥३॥६७॥ अवगिरते । कर्मकर्तरि “भूषार्थ-"॥३।४।९३॥ इति किरा- दिलात् क्यञ्योः प्रतिषेधे, निगिरते ग्रासः स्वयमेव । क्ये, गीर्यते । अगारीत्, अगारिष्टाम् । न्यगीर्ट, न्यगरीष्ट वा ग्रासः स्वयमेव ॥ भाक ॥ अगारि, अगारिषाताम् ; अगीर्षातामित्यादि । जगार; जगरिम । जगरे । गीर्यात् । गी- र्षीट, गरिषीष्ट, गारिषीष्ट । गरिता २,गरीता २। गारिता । गारिष्यति, ते; गरीष्य- २२८ खिष्टाम्, क्रियारत्नसमुच्चयः । ति, ते। गारिष्यते। जिगरिषति, जिगरीषति; जिगलिषति, जिगलीषति । गर्हितं निगिरतीति वाक्ये “गृलुप-"॥३।४।१२॥ इति यङि, अय्वृल्लेनदित्युक्तेर्यङ्लुप्यपि च “यो यङि"।।२।३।१०१॥ इति लत्वे, निजेगिल्यते । निजागलीति, निजा- गल्ति । तृवत् । निगारयति, निगालयति । न्यजीगरत् , न्यजीगलत् । गिरन् । गीर्यमाणम् । गरिष्य २ न् , माणम् ; गरीष्य २ न् , माणम्। शेषं कृत्वत्॥१४॥ लिखत् अक्षरविन्यासे । लिखति । अव, वि, आ, उद्, सम्, परिपू- वोऽप्येवम् । लिख्यते। लिखेत्। लिखतु । अलिखत् । अले ३ खीत्, खिषुः । अलेखि, अलेखिषाताम् । लिलेख; लिलिखिम। लिलिखे । लिख्यात् । लेखिषीष्ट । लेखिता २। लेखिष्यति; ते । लिलिखिषति; लिलेखिषति । अलि- लिखिषत् ; अलिलेखिषत् । लेलिख्यते। लेलिखीति, लेलेक्ति, लेलिक्तः, लेलि- खति । लेखयति । क्ये, लेख्यते । अलीलिखत् । लिखन् । लिखती, लिखन्ती। लिख्यमानम् । लेखिष्य ४ न् , ती, न्ती, माणम् । लिलिख्वान् । लिलिखानम्। लिखि ३ तिः, तः, २ वान् । “वौ व्य-"॥४।३।२५॥ इति सन्क्त्वोर्वा कित्त्वे; लिखित्वा, लेखित्वा । विलिख्य । लेखि ३ ता, तुम्, तव्यम् । लेखनीयम् । लेख्यम् । लेखनम् । कुटादिरयमित्येके । लिखनीयम् । लिखनम् । लिखि- तव्यम् ॥ १५ ॥ ओव्रस्चौत् छेदने । “सस्य शषौ"॥१॥३॥६१॥ इति सस्य शे, “ग्रहवश्व-" ॥श८४॥ इति वृति, वृश्चति । क्ये, वृश्च्यते । औदिखाइटि, अवश्चीत्, अवश्चिष्टाम् । अवश्चि, अवृश्चिषाताम् । पक्षे, अवाक्षात् , अव्राष्टाम् इत्यादि प्रच्छवत । वव्रश्च । संयोगादकित्त्वे न वृत् । वव्रश्चतुः; वश्विथ । वनश्चे । वृश्च्यात् । व्रश्चिषीष्ट; व्रक्षीष्ट । ब्रश्चिता, व्रष्टा। व्रश्चिष्यति, वक्ष्यति । विव्रश्चि- षति, विव्रक्षति। वरीवृश्च्यते। वरि री र ३ वृश्चीति। “संयोगस्यादौ-"॥२।११८८॥ इति शस्य लुकि, “यज-"॥२॥१८७॥ इति चस्य च षत्वे, परे गुणे विधेये शलो- पस्यासत्त्वाद् गुणाभावे; वरिव ३ ष्टि, ष्टः, श्चति । यङ्लुपि न स्वृदित्यन्ये । वात्र ३ ष्टि, ष्टः, श्चति । व्रश्चयति । अवतश्चत् । वृश्चन् । व्रश्चिष्यन् ; व्रक्ष्यन् । ववृश्च्वान् । ववृश्चानम् । वेट्वान्नेटि, “सूयत्य-"॥४।२।७०॥ इति नत्वे, तुदादिगणः । २२९ "क्तादेशोऽषि"॥२।११६१॥ इति नस्यासिद्धत्वेन, सस्य लुकि चस्य कवे च; वृक्णः, २ वान् । षत्वे कर्तव्ये नत्वं सिद्धमेवेति धुडभावान्न “यज-"॥२।११८७॥ इति षत्वं, “जवश्व-"॥४४॥४१॥ इति इटि, “क्त्त्वा"।।४।३।२९॥ इत्यकित्त्वे न वृत्। व्रश्चित्वा । प्रव्रश्च्य । व्रष्टा, व्रश्चिता। व २ ष्टुम्, ष्टव्यम् ; व्रश्चि २ तुम्, तव्यम् । व्रश्चनीयम् । व्रश्च्यम् । मूलवृट् ॥ १६ ॥ त्रयोऽनिटः॥ प्रछंत् ज्ञीप्सायाम् ; ज्ञीप्सा जिज्ञासा । “स्वरेभ्यः"॥१३॥३०॥ इति छस्य द्विवे, “ग्रहवश्च-"॥४।१८४॥ इति वृति, पृच्छति । कर्मण्यसति, "समो गम्॥३॥३॥८४॥ इत्यात्मनेपदे, संपृच्छते । आयूर्वस्य, “नुप्रच्छ"॥३३॥ ५४॥ आपृच्छते गुरून् । क्ये, पृच्छयते; क्यस्य सानुनासिकलं नादृतमिति "अनुनासिके."||१०८॥ इति शो न भवति। "अनुनासिके चच्छ:-"३११०८॥ इत्यत्र छस्य द्विःपाठात् द्वयोरपि शले, “यज-"॥२॥१८७॥ इति षत्वे, “षढोः-" ॥२॥१॥६२॥ इति कलेच; अप्राक्षीत्, अप्राष्टाम् , अप्राक्षुः, अप्रा ६क्षीः, ष्टम् , ष्ट, क्षम् , क्ष्व, म । आप्रष्ट, आप ९ क्षाताम् , क्षत, ठाः, क्षाथाम्, ड्वम्, ग्ड्ढ्वम्, क्षि, क्ष्वहि, क्ष्महि । अप्रच्छि, अप्रक्षाताम् । पप्रच्छ । संयोगात् कित्त्वाभावे न स्वृत् ; पप्रच्छतुः, पप्रच्छुः, पप्रच्छिथ, पप्रष्ठ; पप्रच्छिम । आप- प्रच्छे; सम्पप्रच्छिमहे। पृच्छयात् । आप्रक्षीष्ट । प्रष्टा; आप्रष्टा । प्रक्ष्यति; आप्र- क्ष्यते । “ऋस्मि-४।४।४८॥ इतीटि, "रुदविद॥४।३।३२॥ इति सनः कित्त्वे, पिपृच्छिषति; सम्पिपृच्छिषते । परीपृच्छयते। “लुप्यय्वृल्लेनत्"॥७।४।११२॥ इत्यत्र वृद्दर्जनात् यङ्लुप्यपि वृति; परिरीर् ३ पृच्छीति । रवृति द्वित्वे "स्वरेभ्यः" ॥१३॥३०॥ इति छस्य द्विवे, “अनुनासिके च-"॥४।१।१०८॥ इति छशब्दस्यापि शत्वे, उपान्त्यगुणे, “यज-"॥२।१।८७॥ इति षत्वे, परिपटिं, परि २ पृष्टः, पृच्छति। न वृदित्यन्ये । पाप्र ३ ष्टि, ष्टः, च्छति। णौ, प्रच्छयति । पृच्छयते । अपप्रच्छत्। पृच्छन् । आपृच्छमानः। पृच्छयमानम् । प्रक्ष्यन् । सम्प्रक्ष्यमाणः । पपृच्छ्वान् । संपपृच्छानः । पृष्टः, २ वान्। पृष्टिः । पृष्ट्वा । आपृच्छय । प्र ३ ष्टा, ष्टुम्, ष्टव्यम् । प्रच्छनीयम् । प्रच्छयम्। प्रच्छनम् ॥ १७ ॥ सृजत् विसर्गे । सृजति; उत्सृजति । एवं व्युद्; वि, समुपा, नि, २३० कियारत्नसमुच्चयः। , पूर्वोऽपि । सृज्यते । “अः सृजि-"|४|१११॥ इति अति, अनाक्षीत् , अस्रा- टाम्, अस्राक्षुः; अस्राक्ष्म । असर्जि, असृक्षाताम् । सिजाशिषोः कित्वान्न अत् । ससर्ज, ससृजतुः, “सृजिदृशि॥४।४।७८॥ इति वेटि, सस्रष्ठ, ससर्जिथ; समृ- जिम । ससृजे । सृज्यात् । सूक्षीष्ट । स्रष्टा । स्रक्ष्यति । “सृजः श्राद्धे-" ॥ ३।४।८४॥ इति जिक्यात्मनेपदेषु; असर्जि, सृज्यते, स्रक्ष्यते वा माला धार्मिकः । श्राद्धादन्यत्र, अस्राक्षीत् , सृजति; स्रक्ष्यति वा मालां मालिकः । कर्मकर्त्तरि तु; असर्जि, सृज्यते; स्रक्ष्यते वा माला स्वयमेव । सिसृक्षति । सरीसृज्यते । सृजती, सृजन्ती स्त्री कुले वा । शेषं सृजिंवत् ॥ १८ ॥ टुमस्जोत् शुद्धौ; शुद्ध्या स्नानं ब्रुडनं च लक्ष्यते । “सस्य शषौ' ।।१।३।६१॥ इति शे, “तृतीयस्तृ."॥१॥३॥४९॥ इति शस्य जे, मज्जति; निमज्जति; उन्मज्जति । मज्ज्यते । “मस्जेः सः"॥४।४।११०॥ इति धुटि सस्य नत्वे, अमाङ्क्षीत्, अमा- काम्, अमाङ्क्षुः, क्षीः, क्तम्, क्त, क्षम्, क्ष्व, क्षम। अमज्जि । ममज्ज, ममज्जतुः, ममज्जुः, ममज्जिथ, ममक्थ; ममज्जिम । ममज्जे। मज्ज्यात्। मङ्क्षीष्ट । मता २। मक्ष्यति, ते। मिमङ्क्षति। मामज्ज्यते। मामज्जीति, मामति; “नो व्यञ्जन" ॥४॥४५॥ इति नलुकि, मामक्तः; मामजति । मज्जयति । अममजत् । मज्जन् । मज्ज्यमानम् । मझ्यन् । ममज्वान् । ममज्जानम् । “मरजेः-" ॥१११०॥ इति सो ने, ओदित्त्वात् “सूयत्य-॥४।२७०॥ इति नवे, “नो व्य- अन-"१२।४५॥ इति न्लुकि, ममः, २ वान् । सो नत्वे “जनश-"॥४॥३॥२३॥ इति वा कित्त्वे; मत्त्वा, मङ्क्त्वा । म ३ ता, क्तुम् , क्तव्यम् । मङ्की । ध्यणि, "क्तेऽनिटः ॥४।१।१११॥इति जोगे, "तृतीयस्तृ-'॥१३॥४९॥ इति सो दे, मद्ग्यः॥ १९ ॥ उद्झत् उत्सर्गे। दोपान्त्यः । “तवर्गस्य-"॥१।३।६०॥ इति दो जे; उज्झति। क्ये, उज्झ्यते । औझीत्; औझिष्टाम् , औझिषुः। औज्झि, औज्झिषाताम् । "गुरुनाम्य-॥३४॥४८॥ इत्यामि; उज्झाश्चकार; उज्झाश्चकृम। उज्झाञ्चके । उज्झ्या- त् । उज्झिषीष्ट । उज्झिता । उज्झिष्यति । उज्जिझिषति । उज्झयति । “न बदनम् ॥४॥१५॥ इति निषेधात् झेईित्वे, औझिझत् । उज्झन् । उज्झती, तुदादिगणः । उज्झन्ती स्त्री कुले वा । उज्झिष्यन्। उज्झाश्चकृवान् । उज्झाश्चकाणम् । उज्झि ५ तः, २ वान्, ता, तुम्, तव्यम् । उज्झित्वा । प्रोज्झ्य । उज्झनीयम् ॥२०॥ घुण, घूर्णत् भ्रमणे । घुणति । अघोणीत् । जुघोण । घोणिता। घुणितः । ॥ घूर्ण ॥ घूर्णति । घूर्ण्यते । अघूर्णीत् । जुघूर्ण । घूर्णिता । घूर्णन् । घूर्णती, घूर्णन्ती स्त्री कुले वा । पूर्णितः ॥ २१ ॥ २२ ॥ णुदत् प्रेरणे । अनिट् । नुदति; णपाठाद् “अदुरुप-"॥२।३७७॥ इति णत्वे, प्रणुदति । नुद्यते । अनौत्सीत् । अनोदि, अनुत्साताम् । नुनोद, नुनु- दिम । नुनुदे। नुद्यात् । नुत्सीष्ट । नोत्ता। नोत्स्यति। नुनुत्सति । नोनुद्यते। नो- दयति; विनोदयति । अनूनुदत् । “ऋही-"॥४।२।७६॥ इति वा नत्वे, नुन्नः, २ वान् ; नुत्तः, २ वान् । नुत्त्वा । प्रणुध । नोत्ता । शेषं तुदीत्वत् । ईदिदय. मित्येके । नुदति, नुदते । अनुत्त । नुनुदे । नोत्स्यति, ते ॥ २३ ॥ विधत विधाने। विधति। विध्यते। अवेधीत्। अवेधि । विवेध । विविधे । वधिष्यति । विविधिषति, विवेधिषति । विधितः, २ वान् । विधित्वा, वेधित्वा । वेधिता ॥ २४ ॥ छुपंत् स्पर्शे । छुपति । छुप्यते । “व्यञ्जनानाम् ॥४॥३॥४५॥ इति वृद्धौ, अच्छौप्सीत् , अच्छौप्ताम् , अच्छौ ७ प्सुः, प्सीः, प्तम् , त, प्सम्; प्ख, प्रम। अच्छोपि, अच्छुप्साताम् ; “सिजाशिष-"॥४।३।३५॥ इति कित्त्वम् । चुच्छोप । चुच्छुपे । छुप्यात् । छुप्सीष्ट । छोप्ता । छोप्स्यति। चुच्छुप्सति । चोच्छुप्यते । छोपयति । अचुच्छुपत् । छुपन्। छुप्तः । छोप्ता । छुप्त्वा ॥ २५ ॥ गुफ, गुंफत् ग्रन्थने । “मुचादि-॥४।४।९९॥ इति ने, गुम्फति। गुफ्यते । अगोफीत् । अगोफि । जुगोफ, जुगुफतुः । जुगुफे । गुफ्यात् । गोफिषीष्ट । गो. फिता। गोफिष्यति। गुफितः। “ऋत्तृष-"॥४।३।२४॥ इत्यत्र न्युपान्त्यव्यावृत्तिबला- हा न कित्त्वे, किन्तु नित्यं “क्त्त्वा"॥४।३।२९॥ इति कित्त्वे, गोफि ३ ता, तुम्, वा ॥ गुंफ ॥ “नो व्यञ्ज-"॥४।२।४५॥ इति नलुकि; गुफति । गुफ्यते। अगुम्फीत् । अगुम्फि। जुगुम्फ, जुगुम्फतुः; जुगुम्फिम; अत्र संयोगान्न कित्त्व- म् । जुगुम्फे । गुफ्यात् । गुम्फिषीष्ट । गुम्फिता। गुम्फिष्यति । जुगुम्फिषति ।

२३२ कियारनसमुच्चयः । जोगुफ्यते । गुम्फयति । अजुगुम्फत् । गुफितः, २ वान् । “ऋत्तृष-॥४॥३२॥ इति वा कित्वे, गुफिवा; गुम्फित्वा । गुम्फि ३ता, तुम्, तव्यम् ॥२६॥२७॥ शुभ, शुंभत् शोभार्थे । “मुचादि-४।४।९९॥ इति ने, शुम्भति। शुभ्यते। अशोभीत् । अशोभि । शुशोभ, शुशुभिम । शुशुभे । शुभयात् । शोभिषीष्ट । शोभिता। शोभिष्यति । शुशुभिषति, शुशोभिषति । “न गृणा-"॥३४॥१३॥ इत्यत्र शोभतेर्वर्जनादस्य यङि, शोशुभ्यते । शोभयति । अशूशुभत्। शोभि- तः, २ वान् । शुभित्वा; शोभिवा । शोभि ३ ता, तुम्, तव्यम् ॥ शुंभ ॥ "नो व्य-"॥४।२।४५॥ इति नलुकि; शुभति । शुभ्यते। अशुम्भीत् । अशुम्भि। शुशुम्भ; शुशुम्भिम । शुशुभे । शुभ्यात् । शुम्भिष्यति । शुम्भितः । शुम्भित्वा । शुम्भि ३ ता, तुम्, तव्यम् । भ्वादौ शुभभाषणे च; चाहिंसायाम् । तालव्या- दिः। शुम्भति; निशुम्भति।शुभ्यते । शुशुम्भ इत्यादि ॥ २८ ॥ २९ ॥ दृभैत् ग्रन्थे। दृभति,संदृभति। दृभ्यते । दृभेत् । दृभतु। अदृभत् । अदर्भात्, अदर्भिष्टाम् । अदर्भि । ददर्भ, ददृभतुः; ददृभिम। ददृभे । दृभ्यात्। दर्मिषीष्ट । दर्भिता। दर्भिष्यति । दिदर्भिषति । दरीदृभ्यते । दर्भयति । अदीभत; अद- दर्भत् । ऐदित्त्वान्नेट ; दृब्धः, २ वान् । “क्त्वा"॥४।३।२९॥ इत्यकित्त्वे गुणे, दर्भि ४ त्वा, ता, तुम् , तव्यम् ॥ ३० ॥ स्फलत् स्फुरणे । चलन इत्येके । स्फलति; आस्फलति । स्फल्यते। आस्फा- लीत्, आस्फालिष्टाम् । आस्फालि, आस्फालिषाताम् । परफाल; फस्फलिम । पस्फ- ले । स्फल्यात् । स्फलि ३ षीष्ट, ता, ष्यति । पिस्फलिषति। वाऽनुनासिकान्तले; पंस्फल्यते; पास्फल्यते । आस्फालयति । आपिस्फलत् । आस्फलितः। आस्फा- लनम् । स्फलि ६ वा, तुम्, ता, तव्यम्, तः, २ वान् ॥ ३१ ॥ मिलत् श्लेषणे । मिलति । मिल्यते । अमेलीत् , अमेलिष्टाम् । अमेलि। मिमेल; मिमिलिम। मिमिले । मिल्यात्। मेलि ३ षीष्ट, ता, ष्यति । मिमेलिषति, मिमिलिषति । मेमिल्यते । मेलयति । अमीमिलत् । मिलितः । मिलिला, मेलि ४ खा, ता, तुम्, तव्यम् ॥ ३२ ॥ अथ त्रयोऽनिटः॥ स्पृशंत् संस्पर्शे । स्पृशति । स्पृश्यते । "स्पृशमश-" तुवादिगणः। - ॥३॥५४॥ इति वा सिंचि वृद्धौ, अस्पार्धात्, अस्पार्टाम्, अस्पाक्षुः । "स्पृशादि."॥४।४।११२॥ इति वा अः, अस्पाक्षीत्, अस्पाष्टाम् , अस्पाक्षुः । पक्षे सकि, अस्पृक्ष ४ तु, ताम्, न, अस्पृक्षाम। अस्पर्शि । सिचि "सिजा- शिष-॥४॥३॥३५॥ इति सिजाशिषोः कित्त्वान्न अः; अस्पृ ९क्षाताम् , क्षत, ष्ठाः, क्षाथाम्, ड्वम् , ग्ड्वम्, क्षि, क्ष्वहि, महि । सकि, "खरेऽतः॥४।३७५॥ इत्यल्लुकि, अस्पृ ८ क्षाताम् , क्षन्त, क्षथाः, क्षाथाम्, क्षध्वम्, क्षि, क्षावहि, क्षामहि । पस्पर्श, पस्पृशतुः; पस्पर्शिथ; पस्पृशिम । पस्पृशे। स्पृश्यात् । स्पृक्षीष्ट । स्पी २; स्प्रष्टा २ । स्पयति; स्प्रक्ष्यति। पिस्पृक्षति। परीस्पृश्यते। परि,र,री ३ स्पृशीति, पर्पटिं, परष्टि, पर्पष्टः, पEष्टः, परप्शति । शेषं दृश्वत् । स्पर्शयति। 'ऋवर्णस्य"||४।२।३०॥ इति वा ऋः, अपिस्पृशत्, अपस्पर्शत् । स्पृशन् । स्पृशती, स्पृशन्ती । स्पयन् , स्प्रक्ष्यन् । पस्पृश्वान् । पस्पृशानम् । स्पृष्टः, २ वान् । स्पृष्टिः । स्पृष्ट्वा । संस्पृश्य । स्पर्टी; स्प्रष्टा । स्पष्टुंम्, स्प्रष्टुम् । स्पष्ट- व्यम्, स्प्रष्टव्यम् । स्पर्शनीयम् । स्पर्यम् । विपि “ऋलिग्-।।२।१६९॥ इति स्पृक् ॥ ३३ ॥ विशंत् प्रवेशने । विशति; प्रविशति । एवं आङ्, सम्, उप, समा पूर्वोऽपि । “निविशः।।३।३।२४॥ इत्यात्मने, निविशते । “वाऽभिनिविशः" ॥२।२।२२॥ इत्याधारस्य कर्मले, ग्राममभिनिविशते । क्ये, विश्यते । सकि, अविक्षत, अवि ८ क्षताम्, क्षन्, क्षः, क्षतम् , क्षत, क्षम्, क्षाव, क्षाम । अवेशि; "स्वरेऽतः॥४।३।७५॥ इति अल्लुकि, अवि ८ क्षाताम् , क्षन्त, क्षथाः, क्षाथाम् , क्षध्वम् , क्षि, क्षावहि, क्षामहि । विवेश, विविशतुः; विविशिम । विवि- शे । विश्यात्। विक्षीष्ट । वेष्टा २ । वक्ष्यति,ते। विविक्षति । निविविक्षते। वेविश्यते । अवेविशिष्ट । वेविशांचके । वेविशिषीष्ट । वेविशिष्यते । लुपि, वेवेष्टि, वेवि- ३ शीति, ष्टः, शति । प्रकृतिग्रहणाद्यङ्लुप्यपि आत्मनेपदे, निवेविष्टे ॥ ह्य. अवेवेट , अवेवि ४ शीत्, टाम् , शुः, शीः; अवेवेट् ॥ अद्य० ॥ अवेवे २ शीत्, शिष्टाम् । वेविशांचकार । वेवेशिष्यति । प्रवेशयति । क्ये, प्रवेश्यते । प्रावीविशत् । विशन् । विशती, विशन्ती। वेक्ष्यन् । निवेक्ष्यमाणः। “गमहन-" ॥ ३ कियारनसमुचयः। ४४८॥ इति वेटि, विविशिवान्, विविश्वान् । विविशानम् । प्रविष्टः, २ वान्। विष्टा । प्रविश्य । प्रवे३ ष्टा, टुम्, ष्टव्यम् ॥ ३४ ॥ मृशंत् आमर्शने, स्पर्शे । मृशति; विमृशति; परामृशति; प्रत्यवमृशति; आमृशति । क्ये, मृश्यते । अमाक्षीत् , अम्राक्षीत् ; अमृक्षत् । अशि, अमृ. क्षाताम् । ममर्श; ममृशिम । ममृशे । मृश्यात् । मृक्षीष्ट । मर्टा; स्रष्टा । मयं- ति, म्रक्ष्यति । मिमृक्षति । मरीमृश्यते । मरी, रि, र ३ मशीति, मर्मष्टि, मर्मष्टि, मभ्रष्टः, मर्मुशति । मर्शयति । अमीमृशत्, अममर्शत् । मिमर्शयिषति । मृशन् । म्रक्ष्यन् , मय॑न् । मृष्टः, २ वान् । मृष्टिः। मृष्ट्वा । विमृश्य । मष्टी, म्रष्टा । मृश्यम् । शेषं स्पृशंत्वत् ॥ ३५ ॥ इषत् इच्छायाम् । “गमिषद्-"॥४।२।१०६॥ इति छे, इच्छति; प्रतीच्छति अन्विच्छति; व्यतीच्छते। इष्यते । इच्छेत् । इच्छतु । ऐच्छत्। ऐष्यत। ऐषीत, ऐषिष्टाम् , ऐषिषुः । ऐषि, ऐषिघाताम् । इयेष, ईषतुः, ईषुः, इयेषिथ; ईषिम । ईथे । इष्यात् । ईषिषीष्ट । तादौ “सहलुभ."॥४।४।४६॥ इति वेटि, एष्टा, एषिता। एषिष्यति । ऐषिष्यत्। एषिषिषति। एषयति । ऐषिषत् । इच्छती, इच्छ- न्ती । एषिष्यन् । इष्यमाणम् । ईषिवान् । ईषाणम्। वेट्वान्नेट; इष्टः, २ वान्। इष्टिः । इष्ट्वा । “क्त्त्वा"॥४।३।२९॥ इत्यकित्त्वाद्गुणे; एषित्वा । प्रेष्य । ए ३ ष्टा, ष्टुम् , ष्टव्यम् । एषि ३ ता, तुम् , तव्यम् । “ऋवर्ण-॥५॥१७॥ इति ध्यणि, एष्यः । “प्रस्यैष-"॥११२।१४॥ इत्यैत्वे, प्रैष्यः ॥ ३६॥ मिषत् स्पोयाम् । मिषति; उन्मिषति; निमिषति । अमेषीत् । मिमेष । मेषिता । उन्मिमिषिषति, उन्मिमेषिषति । उन्मिषितम् ॥ ३७॥ .. अथ कुटादिः। कुटत् कौटिल्ये । कुटति; सङ्कुटति । कुट्यते । “कुटादेः -१७॥ इति ङित्त्वाद् गुणाभावे; अकुटीत् , अकुटिष्टाम् , अकुटिषुः, णिति तु, ङित्त्वा- भावाद्गुणे; अकोटि, अकुटिषाताम् ।चुकोट, चुकुटतुः, चुकु ४ टुः, टिथ, टथुः,ट, णवो वा णित्त्वाद् कुटादीनां गुणविभाषा; चुकोट, चुकुट, चुकुटि २ व, म ।

तुदादिाणा चुकुटे। कुट्यात् । कुटिषीष्ट । कुटिता २ कुटिष्यति । "वौ व्यञ्जन-PAR५॥ इति वा कित्त्वेऽपि ङित्त्वाद्गुणाभावे, चुकुटिषति; प्रत्यासत्तेायात् यत्कार्य कुटा. देर्डिद्वारा प्राप्नोति तस्मिन्नेव कार्ये ङित्त्वं, न आत्मनेपदादौ । तेन सन्नन्तस्यास्य ङित्त्वादात्मनेपदं न भवति। चौकुट्यते। चोकुटीति, “कुटादेः-"॥४॥३॥१७॥ इति गणनिर्देशाद्गुणे, चोकोट्टि। उत्कोटयति । अचूकुटत् । कुटन् । कुटिष्यन् । कुट्य- मानम् । चुकुट्वान् । चुकुटानम् । कुटितः, २ वान् । कुट्टिः । कुटिला । प्रकु. ट्य । कुटि ३ ता, तुम्, तव्यम् ॥ ३८ ॥ णूत् स्तवने । नुवति। नूयते। णपाठात् “अदुरुप-"॥२।३७७॥ इति णले, प्रणुवति । प्रणूयते । “कुटादेः ॥४।३।१७॥ इति ङित्त्वात् “सिचि परस्म-२३ ४४॥ इति वृद्ध्यभावे, अनुवीत्, अनुवि २ ष्टाम्, षुः । अनावि, अनुविषा. ताम्, अनाविषाताम्। नुवाव, नुनु ५ वतुः, वुः, विथ, वथुः, व । “णिद्वान्त्यो णव्" ॥४॥३५८॥ इति वा णित्त्वाहा न वृद्धिः; नुनाव, नुनुव, नुनु २ विव, विम। नुनुवे । नूयात् । नुविषीष्ट; नाविषीष्ट । नुविता २; नाविता । नुविष्यति, ते; नाविष्यते । नुनूषति । “ग्रहगुहश्व-"॥४४५९॥ इति नेट , नोनूयते । नोनवीति, नोनोति । नावयति । अनूनवत् । नुवन् । नुविष्यन् । नुनूवान् । नुनुवानम् । किति; उवर्णात् "॥४।४।५८॥ इतीडभावे, नूतः, २ वान् ; प्रणूतः, २ वान् । नूवा । अन्ये तु ङित्त्वेन कित्त्वस्य बाधनादिनिषेधं नेच्छन्ति । नुवितः, प्रणुवितः। नुवित्वा। प्रणूय । नुवि ३ ता, तुम्, तव्यम् । नुवनीयम् । नूयम् । नाव्यम् ॥ ३९ ॥ धूत् विधूनने । धुवति; निधुवति । धूयते । अधुवीत् । अधावि । दुधाव; दुधुविम । दुधुवे । धूयात् । धुवि ३ षीष्ट, ता, प्यति । ब्रिटि, धावि ३ षीष्ट, ता, प्यते । दुधूषति । दोधूयते । धावयति । अदूधुवत् । धुवन् । धुविष्यन् । धूतः, २ वान् । धूत्वा । मते नेटि, धुवितः। धुवित्वा । विधूय । धुवि ३ ता, तुम्, तव्यम् । शेषं नूत्वत् ॥ ४० ॥ कुचत् सङ्कोचने । कुचति; सङ्कुचति । कुच्यते । अकुचीत् । अकोचि; अकुचिषाताम् । चुकोच; अहं चुकुच, चुकोच, चुकुचिम । चुकुचे । कुच्यात् । कुचि ३ षीष्ट, ता, ष्यति । चुकुचिषति । चोकुच्यते । चोकुचीति, चोकोक्ति ।

क्रियारत्नसमुच्चयः।
सङ्कोचयति । अचूकुचत् । कुचन् । कुचती, कुचन्ती । कुचिष्यन् । चुकुच्चान् ।
कुचि ६ ता, तुम्, ला; तः २ वान् ; तव्यम् । कुचनीयम् । सङ्कुच्यम् ॥४१॥
घुटत् प्रतीघाते । घुटति; व्याघुटति; निघुटति । लज्जायाम्, व्याघुटीत् ।
ञ्णिति तु ङित्त्वाभावाद्गुणे; अघोटि । जुघोट; जुघुटतुः । कुटादित्वाद्गुणाभावे,
घुटिता । घुटितुम्। घुटितः। शेषं कुटत्वत् ॥ ४२ ॥
छुट, त्रुटत् छेदने । छुटति; विच्छुटति । छुट्यते । अच्छुटीत् ।
अच्छोटि, अच्छुटिषाताम् । चुच्छोट, चुच्छुटिम । चुच्छुटे । छुट्यात् । छुटि
३ षीष्ट, ता, प्यति । चुच्छुटिषति । चोच्छुट्यते । छोटयति । अचुच्छुटत् ।
छुटि ६ ता, तुम्, त्वा, तः, २ वान्, तव्यम् । विच्छुट्यम् ॥ त्रुट ॥ "भ्रास-
भ्लास-॥३।४।७३॥ इति वा श्ये, त्रुट्यति, त्रुटति । त्रुट्यते । अत्रुटीत, अत्रु-
टिष्टाम्। अत्रोटि, अत्रुटिषाताम् । तुत्रोट, तुत्रुटिम । तुत्रुटे । त्रुट्यात् । त्रुटि ३
३ षीष्ट, ता, प्यति । तुत्रुटिषति । तोत्रुट्यते । तोत्रुटीति, तोत्रोट्टि, तोत्रु २ ट्टः,
टति । त्रोटयति । अतुत्रुटत् । त्रुटन्। त्रुटती; त्रुटन्ती। त्रुटिष्यन् । तुत्रुट्वान् ।
तुत्रुटानम् । त्रुटितः, २ वान् । त्रुटित्वा । प्रत्रुट्य । त्रुटि ३ ता, तुम्, तव्यम् ।
त्रुटनीयम् । त्रोट्यम् । साधनं कुटत्वत् ॥ ४३ ॥४४॥
मुटत् आक्षेपप्रमर्दनयोः। मुटति । मुट्यते। अमुटीत् । अमोटि । मुमोट ।
मुटिष्यति । मोटयति । अमूमुटत् । मुटि ४ तः, ता, तुम्, वा । मुट प्रमर्दने।
मोटति । मुटण संचूर्णने । मोटयति ॥ ४५ ॥
स्फुटत् विकसने । स्फुटति । अस्फुटीत् । पुस्फोट । स्फुटिष्यति । पुस्फु-
टिषति । पोस्फुट्यते । स्फोटयति । अपुरफुटत् । स्फुटि ४ ता, तः, तुम्, वा।
स्फुटि विकसने । स्फोटते ॥ ४६ ॥
लुठत् संश्लेषणे । लुठति । लुठ्यते । अलु ३ ठीत् , ठिष्टाम् , ठिषुः ।
अलोठि, अलुठिषाताम् । लुलोठ, लुलुठतुः । लुलुठे । लुठ्यात्। लुठि ३. षीष्ट,
ता, प्यति । लुलुठिषति । लोलुठ्यते । लोलुठीति, लोलोट्टि। लोठयति । अलू-
लुठत् । लुठन् । लुठती, लुठन्ती । लुठिष्यन् । लुलुठ्वान् । लुलुठानम् । लुठि ५
तः, ता, तुम् , वा, तव्यम् । विलुख्य ॥ ४७ ॥

तुदादिगणः । २३७ कृडत् घसने; भक्षणे । कृडति । अकृडीत् । अकर्डि । चकर्ड । चकृडे । कृडिष्यति । चिकृडिषति । कर्डयति । अचीकृडत्, अचकर्डत् । कृडि ६ ता, तुम्, वा, तः, २ वान्, तव्यम् ॥ ४८ ॥ गुडत् रक्षायाम् । गुडति हस्तिनम् । अगुडीत् । अगोडि । जुगोड । गुडिता। जुडत् बन्धने। जुडति, अजुडीत् । अजोडि। जुजोड; जुजुडे । जोड- यति । जुडि ४ ता, तः, तुम्, वा । तुडत् तोडने; भेदे । तुडति । अतु- डीत् । अतोडि । तुतोड । तोडयति । तुडि ४ ता, तुम्, वा, तः। गुडादीनां शेषं लुठत्वत् ॥ ४९ ॥ ५० ॥ ५१ ॥ स्फुरत् स्फुरणे । स्फुरति । परि, प्र, सम्, पूर्वोऽपि । “निर्ने:-"॥२।३।५३॥ इति वा षवे, निःष्फुरति, निःस्फुरति । ''वेः॥२॥३॥५४॥ विष्फुरति, विस्फुरति । स्फूर्यते । अस्फुरीत्, अस्फुरिष्टाम् । अस्फोरि, अस्फुरिषाताम् । पुस्फोर, पुस्फुरतुः; पुस्फुरिम । पुस्फुरे । स्फूर्यात् । स्फुरि ३ षीष्ट, ता, ष्यति । पुस्फुरिषति । पोस्फूर्यते । पोस्फुरीति, पोस्फोर्ति । “चिस्फुरोर्नवास१२॥ इति वा आवे; स्फारयति, स्फोरयति । अपिस्फुरत् ; अपुस्फुरत् । णौ यत्कृतमिति न्यायात् पूर्वस्य उः । पुस्फारयिषति; पुस्फोरयिषति । स्फुरन् । स्फुर २ ती, न्ती। स्फुरिष्यन् । पुस्फूर्वान् । स्फुरि ५ ता, तुम्, तव्यम् , तः, त्वा । विस्फूर्य । स्फुरणीयम् । स्फूर्तिः ॥५२॥ इति परस्मैपदिनः । अथ कूङ् वर्जास्त्रयोऽनिटः॥कुंङ्, कूङ्त शब्दे। कुवते । कूयते । ङित्त्वान्न गुणे, "धुट् ॥४।३।७०॥ इति सिच्लुकि, अकुत। अकावि । चुकुवे । कुता। कुप्य- ते । चोकूयते । कु ५ ता, तुम्, ला, तः, तव्यम् ॥ कूङ्॥ कुवते। कूयते। अकु- विष्ट। अकावि। चुकुवे। कुविता । किति “उवर्णात्"।४।४।५८॥ इति नेटि, कूतः, २ वान् । कुवितुम् । कूत्वा ॥ ५३ ॥ ५४ ॥ इति कुटादिः । पृङ् व्यायामे, उद्योगे। " रिशक्य-"॥४।३।११०॥ इति रौ, इयि च; व्याप्रि- यते।क्ये, व्याप्रियते । व्यापृत, व्यापृषाताम्, व्यापृषत। व्यापारि; व्यापृषाताम् ;व्या- २३८ कियारत्नसमुच्चयः । , पारिषाताम्। व्यापप्रे; व्यापप्रिमहे। व्यापृषीष्ट २; व्यापारिषीष्ट। व्यापर्ती २; व्यापा- रिता। ''हनृतः॥४।४।४९॥ इतीटि, व्यापरिष्यते २। व्यापारिष्यते । पुपूर्षते । पेप्री- यते । परि, री, र ३ परीति, पर्पर्ति, परिपृतः, परिप्रति । व्यापारयति । व्यापी- परत् । व्याप्रियमाणः । परिष्यमाणः । पप्राणः । व्यापृतः, २ वान्। व्यापृतिः । व्यापृत्य । पृत्वा । व्याप ३ ती, तुम्, र्तव्यम् । व्यापरणीयम्। व्यापार्यम् ॥५५॥ टुङ्त आदरे । आद्रियते । क्ये, आद्रियते । आइत, आदृषाताम् , आदृषत, आदृष्ठाः । आदारि, आदारिषाताम्, आषाताम् । दद्रे, दद्राते, दद्रिरे, दद्रिषे । आदृषीष्ट, आदारिषीष्ट । आदर्ता, आदारिता । आदरिष्यते; आदारिष्यते । “ऋस्मि-'॥४४॥४८॥ इतीटि, दिदरिषते। देद्रीयते। दरि, री, र ३ दरीति, दर्दर्ति, दर्दृतः, दति । आदारयति । आदीदरत् । आद्रियमाणः। आ- द्रियमाणम् । आदरिष्यमाणः । आदद्राणः । आदृतः, २ वान् । दृतिः । दृत्वा । आदृत्य । आद ३ र्ता, तुम् , र्तव्यम् । आदरणीयम् । क्यपि, आदृत्यम् ॥५६॥ ओविजैति भयचलनयोः । उहिजते । उद्विज्यते । “विजेरिट॥४॥३॥१८॥ इतीटो ङित्त्वान्न गुणः। उदविजि ३ष्ट, पाताम् , षत। उदवेजि । उद्विविजे; उद्विवि- जिमहे । उद्विजि ३ षीष्ट, ता, प्यते । विविजिषते । उद्वेविज्यते । उद्वेविजीति, उद्वेवेक्ति । उद्धे जयति। उद्वेज्यते । उदवीविजत् । क्ते, उद्वेजितः। उहिजमानः। उद्विज्यमानम्। उद्विजिष्यमाणम् । ऐदित्त्वात् क्तयोर्नेटि "सूयत्य-॥१७॥ इति नवे, उद्विग्नः, २ वान् । उद्विजि ३ ता, तुम्, तव्यम्। उहिज्य ॥५॥ ओलस्जैति व्रीडे । “सस्य शषौ ॥१।३।६१॥ इति शे, “तृतीय"॥१३॥४९॥ इति जे, लज्जते। लज्ज्यते। अलज्जिष्ट, अलज्जिषाताम् ; अलज्जिध्वम्, ड्ढ्वम्, अलज्जिषि । अलज्जि । ललज्जे; ललज्जिमहे। लज्जि ३ षीष्ट, ता, ष्यते । लज्ज- मानः। लज्ज्यमानम् । लज्जिष्यमाणः। ललज्जानः । ऐदित्वात् क्तयोर्नेटि, ओ. दिलात् “सूयत्य-"॥४।२१७०॥इति नये, “संयोगस्यादौ-।।२।१।८८॥ इति स्लुकि, लमः, २ वान् । लज्जि ४ ता, त्वा, तुम्, तव्यम् ॥ ५८ ॥ प्वजित् सङ्गे । “स्वञ्जव"॥२॥३॥४५॥ इति द्विवेऽपि अट्यपि षत्वे "नो व्य- अनस्य-"॥४।२।४५॥ इति नलुकि, परिष्वजते; अभिष्वजते । परिष्वज्यते । .

रुधादिगणः । २३९ अभ्यष्वजत। परि, नि, विपूर्वस्य तु, “स्तुस्वञ्जश्चाटि-"॥२॥३॥४९॥ इति वा षत्वे, पर्य- प्वजत, पर्यस्त्रजत ॥ अद्य० ॥ अनुस्वारेत्वान्नेट; परं ना निर्दिष्टस्यानित्यत्वा- दिटि; अस्वञ्जि ५ष्ट; षाताम् ; ध्वम् , ड्वम्, षि। अवञ्जि । परोक्षायां त्वादरेव षत्वे, “स्वञ्जनवा"।।४।३।२२॥ इति परोक्षाया वा कित्त्वे, परिषस्वजे; परिषस्वञ्ज, अभिषस्वजे, अभिषस्वजे; परिषस्वजिमहे; परिषस्वञ्जिमहे । वज्यात् । स्वङ्क्षीष्ट । खता । स्वक्ष्यते। सिखङ्क्षते; अभिषिष्वङ्क्षते । अत्र “णिस्तोरेव-"॥२॥३॥३०॥ इति नियमे सत्यपि स्पर्डे पर इति न्यायात् “स्वञ्जश्च"॥२।३।४५॥ इत्य- नेनैव पूर्वोत्तरयोः सकारयोः षत्वं सिद्धम् । अभिषाष्वज्यते । खञ्जयति। अस- खञ्जत् ; अभ्यषष्वञ्जत् । स्वजमानः। सखजानः, परिषखजानः। परिष्वक्तः, २ वान् । “जनशो-"॥४॥३॥२३॥ इति क्त्वो वा कित्त्वे, स्वक्त्वा, स्वङ्क्त्वा। परिष्वज्य। खता; परिष्व ३ ता, तुम्, तव्यम् । क्तौ, परिष्वक्तिः ॥ ५९ ॥ जुषैति प्रीतिसेवनयोः । जुषते । जुष्यते । अजोषिष्ट । अजोषि । जुजुषे; जुजुषिमहे । जुष्यात् । जोषि ३ षीष्ट, ता, प्यते । जुजुषिषते; जुजोषिषते । जोजुष्यते। जोजुषीति, जोजोष्टि। जोषयति । अजूजुषत् । जुषमाणः। जोषि- ष्यमाणः । जुष्टः, २ वान् । ऐदित्वान्नेट, जोषि ३ ता, तुम्, तव्यम् । जुषि- त्वा, जोषित्वा ॥ ६० ॥ इति श्रीतपागच्छेशश्रीदेवसुन्दरसूरिशिष्यश्रीगुणरत्नसृरिविरचिते क्रियारत्नसमुच्चये तुदादिगणः ॥ अथ रुधादिगणः। आदौ सप्तानिटः॥ रुधूपी आवरणे; व्याप्तौ । “रुधां स्वरात्-"।।३।४।८२॥ इति , रुणद्धि ।अप, उप, सम्, वि, अव, पूर्वोऽपि। “नास्त्योः ॥४।२।९०॥ इति श्नोऽल्लुकि म्नां इति बहुवचनाण्णत्वापवादे ने, रुन्दः; अत्र “अधश्चतु-"॥२।१७९॥ इति तो धः; “तृतीय-॥१३॥४९॥ इति धो दः, रुन्धन्ति, रूणत्सि, रुन्दः, रुन्छ, क्रियारत्नसमुच्चयः । रुणध्मि, रुन्ध्वः, रुन्ध्मः। रुन्डे, रुन्धाते, रुन्धते, रुन्त्से, रुन्धाथे, रुन्द्ध्वे; रुन्धमहे । रुन्ध्यात् । न्धीत । रुध्येत । रुणडु, रुन्द्वाम् , रुन्धन्तु, रुन्छि, रुणधानि । रुन्द्वाम् ; रुन्त्स्व; रुन्द्ध्वम्। रुध्यताम् । अरुणत, अरुन्द्वाम् , अरुन्धन् , अरुणः, अरु- णत् वा; अरुन्धम् , अरुन्ध, अरुणधम्, अरुन्ध्व, अरुन्ध्म । अरुन्छ । अरु- ध्यत ॥अद्य० ॥ “ऋदिवि-"॥३।४।६५॥ इति वा अङि, अरुधत्, अरुधताम्, अरुधन् । पक्षे, "व्यञ्जनानाम्-"||४।३।४५॥ इति वृद्धौ, अरौत्सीत् ; "धुहस्वात्" ॥४।३७०॥ इति सिज्लुकि, अरौद्धाम् ; अरौत्सुः, अरौ ६ त्सीः, डम्, छ, त्सम्, त्व, त्स्म । अरु १० छ, त्साताम् , त्सत, हाः, साथाम् , द्ध्वम् , ध्वम् , त्सि, स्वहि, स्महि । अरोधि । शेष कर्तृवदेव । कर्मकर्त्तरि, "रुधः"॥३।४।८९॥ इति ञिच्- निषेधे, अरुद्ध गौः स्वयमेव । रुरोध, रुरुधतुः, रुरुधुः। रुरोधिथ, रुरुधथुः; रुरुध, रुरोध, रुरुधि २ व, म । रुरुधे, रुध्यात् । रुत्सीष्ट । रोद्धा २ । रोत्स्यति, ते । रुरुत्सति, ते। रोरुध्यते। रोरुधीति, रोरोडि, रोरुद्धः, रोरुधति, रोरोत्सि०॥ ह्य० ॥ अरोरोद्, त् ; अरो ११ रुधीत् , रुद्धाम् , रुधुः, रोः, रुधीत्, रोत् , रुद्धम् ॥ अद्य० ॥ अरोरो ९ धीत , धिष्टाम् । रोधयति । अरूरुधत् । रुरोधयिषति । रुन्धन् । रुन्धानः । रुन्धती । रुध्यमानम् । रोत्स्यन् । रोत्स्यमानः । रुरु- ध्वान् । रुरुधानः। रुडः, २ वान्। रुद्धिः । रुध्वा । संरुध्य । रोद्धा । रोडुम् । रोद्धव्यम् । रोध्यम् । रोधनीयम् ॥ १ ॥ रिपी विरेचने; निःसारणे । रिणक्ति; व्यतिरिणक्ति । रिङ्क्ते। व्यतिरिच्यते। ऋदित्त्वाहा अङि, अरिचत् ; व्यत्यरिचत् । अरैक्षीत् ; व्यत्यरैक्षीत् । अरिक्त, अरिक्षाताम् । अरेचि। रिरेच। रिरिचे। रिच्यात्। रिक्षीष्ट । रेक्ष्यति । रक्ता। रेक्तुम्। रिक्तः । शेषं विचूंपीवत् ॥ २ ॥ विपी पृथग्भावे । विनक्ति, वितः, विश्चन्ति; विनक्षि, विक्थः, विक्थ, विनच्मि, विञ्चः, विञ्च्मः। विते, विश्चाते, विञ्चते, विझे, विञ्चाथे, विग्ध्वे, विश्चे, विञ्च्चहे, विञ्च्महे । विच्यते। विञ्च्यात् । विश्चीत । विनक्तु। विताम् । अविनक, ; अविताम् , अविचन् , अविनक् , ग्, अविङ्क्तम्, अविङ्क्त, अविनचम्, अविञ्च्च, अविञ्च्म । अविङ्क्त । अविच्यत॥अद्य० ॥ ऋदित्त्वाहा , रुधादिगणः। अडि, अविचत, अविचताम; अविचाम । अवैक्षीत् , अवैक्ताम् , अवैक्षुः, अवै. क्षीः, अवैक्तम्०; अवैश्म । “धुट्-"॥४॥३७०॥ इति सिज्लुकि, अविक्त, अवि ९ क्षाताम्, क्षत, कथाः, क्षाथाम् , ग्ध्वम्, ग्ड्ढ्वम् , क्षि, वहि, महि। अवेचि । विवेच, विविचतुः, विविचुः, विवेचिथ, विविचथुः, विविच, विवेच, विविचि २ व, म । विविचे, विविचाते; विविचिमहे । विच्यात् । विक्षीष्ट । वेक्ता २। वेक्ष्यति, ते । विविक्षति, ते । वेविच्यते । वेविचीति, वेवेक्ति । वेचयति । अवीविचत् । विञ्चन् । विश्चती । विश्चानः। विच्यमानम् । वेक्ष्यन् । वेक्ष्यमाणः । विविच्वान् । विविचानः । विक्तः, २ वान्। विक्तिः। विक्त्वा । विविच्य। वेक्ता । वेक्तुम् । वेक्त- व्यम् । विवेकः ॥ ३ ॥ युजूंपी योगे। युनक्ति; निर्युनक्ति; संयुनक्ति; उत्स्वराभावादत्र परस्मैपदम् । युङ्क्तः, युञ्जन्ति, युनक्षि, युकथः, युक्थ, युनज्मि, युवः, युज्मः। युङ्क्ते। "उत्स्वरात्"।।३।३।२६॥ इत्यात्मनेपदे, उद्युक्ते, उपयुङ्क्ते, प्रयुक्त नियुङ्क्ते, वियुङ्क्ते; अनुयुङ्क्ते सिद्धान्तम्, पर्यनुयुङ्क्ते वादिनम् ; युञ्जाते, युञ्जते, युझे, युञ्जाथे, युग्ध्वे, युजे, युवहे, युज्महे । युज्यते । युज्यात् । युञ्जीत । युज्येत । युनक्तु, युङ्क्ताम् , युञ्जन्तु, युधि, युङ्क्तम् , युक्त, युनजानि। युङ्क्ताम् , युजाताम् , युज्जताम् ,युव, युञ्जाथाम् , युग्ध्वम्, युनजै। युज्यताम् ॥ ह्य० ॥अयुनक्, ग्, अयुङ्क्ताम्, अयुञ्जन्, अयुनक्, ग्, अयुङ्क्तम, अयुङ्क्त, अयुनजम्, अयुज्व, अयुज्म । अयुङ्क्त, प्रायु १० क्त, जाताम् , जत, क्थाः, जाथाम् , ग्ध्वम् , ग्ड्छ्वम् , जि, ज्वहि, उमहि । अयुज्यत । अद्य० ॥ ऋदित्त्वाहा अङि, अशुजत्, अयुजताम् , अयुजन् ; अयुजाम । पक्षे, अयौक्षीत्, अयोक्ताम् , अयोक्षुः, अयोक्षीः। अयुक्त, प्रायुक्त, अयु ९ क्षाताम्, क्षत, क्थाः, क्षाथाम्, ग्ध्वम्, ग्ड्ढ्वम् , क्षि, वहि, महि । अयोजि; प्रायोजि । युयोज, युयुजतुः, युयुजुः, युयोजिथ०; युयुजिम । युयुजे । युज्यात्। युक्षीष्ट । योक्ता २ । योक्ष्यति, ते । युयुक्षति, ते । योयुज्यते। योयुजीति, योयोक्ति । योजयति । योज्यते । अयूयुजत्। युयोजयिषति। युञ्जन् । युञ्जती। युञ्जानः। योक्ष्यन् । योक्ष्यमाणः। युयुज्वान् । युयुजानः। युक्तः, २ वान्।

क्रियारत्नसमुच्चयः। , युक्तिः । युक्त्वा । प्रयुज्य । योक्ता। योक्तुम् । योक्तव्यम् । योजनीयम् । योग्यम्। ध्यणि "क्तेऽनिट:-"॥४।११११॥ इति गः। “निप्रात्॥४।१।११६॥ इति न गले, नियोक्तुं शक्यः नियोज्यः । प्रयोज्यः ॥ ४ ॥ भिद्रूपी विदारणे । भिनत्ति, भिन्तः, भिन्दन्ति, भिनत्सि, भिन्थः, भिन्थ, भिनद्मि, भिन्दः, भिन्दाः। भिन्ते, भिन्दाते, भिन्दते, भिन्त्से, भिन्दाथे, भिन्द्ध्वे, भिन्दे, भिन्द्वहे, भिन्द्महे । भिद्यते । भिन्द्यात् । भिन्दीत । भिनत्तु, भिन्ताम् , भिन्दन्तु, भिन्दि; भिनदानि। भिन्ताम् , भिन्दाताम् , भिन्दताम् , भिन्त्स्व । अभिनद्, अभिन्त्ताम् , अभिन्दन , अभिनः, अभिनत् , अभिन्तम् , अभिन्त्त, अभिनदम् , अभिन्ड, अभिन्म । अभिन्त ॥ अद्य० ॥ ऋदित्त्वाहा अडि; अभिद ३ त, ताम्, न ; अभिदाम । अभैत्सीत्, अभैत्ताम् , अभैत्सुः, अभैत्सीः, अभैत्तम्, अभैत्त, अभैत्सम् , अभैत्व, अभैत्स्म । अभित्त, अभित्साताम्, अभि ८ त्सत, त्थाः, त्साथाम् , द्ध्वम्, ध्वम्, सि, स्वहि, त्स्महि । अभे- दि। बिभेद, बिभिदतुः; बिभेदिथ; बिभिदिम। बिभिदे; बिभिदिमहे । भिद्यात् । भित्सीष्ट । भेत्ता २ । भेत्स्यति, ते । बिभित्सति, ते । बेभियते । अवेभिदिष्ट । अबेभिदि। बेभिदांचके । बेभिदिषीष्ट । बेभिदिष्यते । यङन्ताण्णिगि, प्रबेभिदय्य; "लघोर्यपि”॥४।३।८६॥ इति अय् । लुपि, बेभिदीति, बेभेत्ति।क्ये, बेभिद्यते॥ सप्त०॥ वेभिद्यात् ॥ पञ्च० ॥ बेभेत्तु, बेभिदीतु॥ ह्य० ॥ अबे १२ भिदीत् , भेत् , भित्ताम्, भिदुः, भेः, भेत् , भिदीः, भित्तम् , भिन्त, भिदम्, भिट्ट, भिद्म ॥अद्य० ॥ अबे. भेदीत् ॥भवि०॥ बेभेदिष्यते। शेषं पचिस्थानोक्तवत् । भेदयति । भेद्यते। अबी- भिदत् । कर्मकर्त्तरि, “एकधातौ-"॥३।४।८६॥ इति डिक्यात्मनेपदानि, अभेदि । भिद्यते। बिभिदे। भेत्ता, भेत्स्यते वा कुशूलः स्वयमेव । भावे तु, भिद्यते कुशूलेन। सन्नन्त । बिभित्सति, अबिभित्सीत् कुशूलं चैत्रः । बिभित्सते, अबिभित्सिष्ट कुशूलः स्वयमेव । ण्यन्त । भेदयते, अबीभिदत, भेदयिष्यते वा आसाधु मैत्री खयमेव । “भूषार्थ-"॥३।४।९३।। इति निझिटक्यनिषेधादात्मनेपदम् । ण्यन्त- स्य तु “णिस्नु-"॥३।४।९२॥ इति जिनिषेधात् भिड् भवत्येव, पृथगयोगात् । भेदिता, भेदिषीष्ट कुमैत्री स्वयमेव । भिन्दन् । भिन्दती। भिन्दानः। भिद्यमानम्।

रुधादिगणः । २४३ भेत्स्यन् । भेत्स्यमानः। बिभिद्वान् । बिभिदानः । “रदात्-"॥४।२।६९॥ इति नत्वे, भिन्नः, २ वान् । भित्वा । प्रभिद्य । भेत्ता । भेत्तुम्। भेत्तव्यम्। भेदनीयम् ॥५॥ छिद्रूपी द्वैधीकरणे; अद्वैधस्य पृथक्त्वे। छिनत्ति; व्यव, परि, अव पूर्वोऽपि । आच्छिनत्ति । अत्र “अनाङ्माङ्-"॥१।३।२८॥इति आवर्जनान्नित्यं छस्य द्वित्वम्। छिन्त्तः, छिन्दन्ति । छिन्ते, छिन्दाते, छिन्दते । छिद्यते। छिन्द्यात् । छिन्दीत। छिनत्तु । हौ, छिन्द्धि । छिन्ताम् । अच्छिनत्, अच्छिन्ताम्, अच्छिन्दन्, अ- च्छिनः, अच्छिनत् ॥ अद्य० ॥ अच्छित । अच्छै ९ त्सीत्, ताम्, त्सुः, त्सीः, त्तम् । अच्छिन्त, अच्छि ९ साताम्, त्सत, त्थाः; द्ध्वम् । अच्छेदि । चिच्छेद, चिच्छिदतुः; चिच्छिदिम । चिच्छिदे, चिच्छिदाते; चिच्छिदिमहे । छिद्यात् । छित्तीष्ट । छेत्ता । छेत्स्यति, ते। चिच्छित्सति, ते। चेच्छिद्यते। चेच्छि- दीति, वेच्छेत्ति । शेषं भिपीवत् । छेदयति । अचिच्छिदत्। छिन्दन् । छि- न्दानः। छेत्स्यन् । छेत्स्यमानः । चिच्छिहान् । चिच्छिदानम्। छिन्नः, २ वान् । छित्तिः । छित्त्वा । परिच्छिद्य । छेत्ता । छेत्तुभ् । छेत्तव्यम् । छेद्यम् । छेदनी- यम् ॥ ६ ॥ क्षुद्रूपी संपेपे । क्षुणत्ति, क्षुन्तः, शुन्दन्ति । सुन्ते, क्षुन्दाते। क्षुद्यते। ऋदि- त्त्वाहा अङि, अक्षुदत् । अक्षौत्सीत् , अक्षौत्ताम् , अक्षौत्सुः। अक्षुत्त, अक्षु- साताम्। अक्षोदि । चुक्षोद, चुक्षुदिम । चुक्षुदे । क्षुद्यात् । क्षुत्सीष्ट । क्षोत्ता । क्षोत्स्यति, ते। चुक्षुत्सति, ते। चोक्षुद्यते । चोक्षुदीति, चोक्षोत्ति । क्षोदयति । अचु- क्षुदत् । क्षोत्ता। क्षोत्तुम् । क्षुण्णः, २ वान् । क्षुत्त्वा ॥ ७ ॥ इत्युभयपदिनः । पृचैप् सम्पर्के । पृणक्ति; संपृणक्ति शाकम् । पृच्यते । “व्यञ्जना:-" ॥४॥३७८॥ इति दिवो लुकि, अपृणक् । शिति शेषं भञ्जोंप्यत् ॥ अद्य० ॥ अपर्चीत् । पपर्च; पपृचुः । सम्पर्चिता । शेषं पृचैवत् ॥ ८ ॥ हावनिटौ॥ भञ्जोंप्आमर्दने। “रुधाम्-"॥३।४।८२॥ इति श्ने, नलुकि च, भनक्ति, भक्तः, भञ्जन्ति, भनक्षि, भक्थः, भक्थ, भनज्मि, भवः, भज्मः।

२४४ क्रियारत्नसमुच्चयः । भङ्क्ते, भञ्जाते, भञ्जते, भक्षे, भञ्जाथे, भग्ध्वे, भञ्ज, भज्वहे, भज्महे । क्ये, भज्यते।भञ्ज्यात् । भञ्जीत। भनक्तु, भताम् , भञ्जन्तु; भङ्ग्धि, भक्ताम् । अभनक,ग, अभङ्क्ताम्, अभञ्जन , अभना। अभङ्क्त॥अद्य० ॥ “व्यञ्ज- नानाम्-"॥४।३।४५॥ इति वृद्धौ, अभाङ्क्षीत् , अभाङ्क्ताम् , अभाक्षुः, अभाङ्क्षीः । “भजेऔं वा"||४।२।४८॥ इति वा नलुकि, अभाजि, अभञ्जि, अभङ् ९क्षाताम, क्षत, स्थाः, क्षाथाम्, ग्ध्वम्, ग्ड्ढम् , क्षि, वहि, महि । बभञ्ज, बभञ्जतुः; बभजिथ, बभक्थ; बजिम । बभजे। भज्यात् । भीष्ट । भक्ता २। भक्ष्यति । बिभङ्क्षति । “जपजभ-"॥४१॥५२॥ इति मौ अन्ते, बम्भज्यते। बम्भजीति, बम्भक्ति, बम्भङ्क्तः, बम्भजति। बम्भजन् । बम्भजितः। भञ्जयति । अबभञ्जत् । कर्मकर्त्तरि, भञ्जयते निगडः स्वयमेव । भञ्जन् । भञ्जती । भज्यमानम् । भक्ष्यन् । भक्ष्यती। कित्त्वान्नलुकि, बभज्वान् । बभजानम् । भमः, २ वान् ; औदित्त्वात् “सूयत्य-"॥४।२।७०॥ इति नत्वम् । भक्तिः । “जनश-"॥४।३।२३॥ इति क्वो वा कित्त्वे, भक्त्वा, भला । भतम् । भक्तव्यम् । भञ्जनीयम् । भङ्ग्यम् ॥ ९ ॥ भुजंप पालनाभ्यवहारयोः; अभ्यवहारो भोजनम् । पालने तु, भुनक्ति भुवम् । भुङ्क्तः, भुजन्ति।भोजनादौतु, भुनज-"३।३।३७॥ इत्यात्मनेपदे, भुङ्क्ते अन्नम् ; उपभुङ्क्ते; परिभुङ्क्ते। एवमग्रेऽपि परस्मैआत्मनेपदे विभक्तव्ये । उभयपद्ययमि. त्येके। भुजाते, भुञ्जते, भुझे; भुग्ध्वे । क्ये, भुज्यते। भुङ्ग्यात्। भुजीत । भुनक्तु, भुङ्क्ताम्, भुञ्जन्तु, भुझ्धि । भुङ्क्ताम् ; भुव। अभुनक, अभु- ङ्क्ताम् , अभुञ्जन् । अभुङ्क्त ॥ अद्य० ॥ अभौक्षीत् , अभौक्ताम् , अभौक्षुः, अभौक्षीः । अभुक्त, अभु ९ क्षाताम् , क्षत, क्थाः, क्षाथाम् , रध्वम्, ग्वम् , क्षि, वहि, महि । अभोजि, अभुक्षाताम् । शेषं कर्तृवत् । बुभोज, बुभुजतुः; बुभुजिम । बुभुजे; बुभुजि २ ध्वे; महे । भुज्यात् । भुक्षीष्ट । भोक्ता २ । भो. क्ष्यति, ते । बुभुक्षति, ते । बोभुज्यते । बोभुजीति, बोभोक्ति। “गतिबोध ॥२॥२५॥ इत्यणिकर्तुः कर्मवे; “चल्याहार-"॥३।३।१०८॥ इति फलवत्यपि परस्मैपदे, भोज- यति चैत्रं पयो मैत्रः। अबूभुजत्। भुञ्जन् । भुञ्जती। भुजानः। भुज्यमानम् ।

रुधादिगणः । २४५ भोक्ष्यन् । भोक्ष्यमाणः । बुभुज्वान् । बुभुजानः । “गत्यर्थ-"॥५॥१॥११॥ इति वा कतरिक्ते, भुक्तश्चैत्रः । भुक्तं चैत्रेणान्नम् । भुक्तवान् । भुक्तिः । भुक्त्वा। उपभुज्य । भोक्ता । भोक्तुम् । भोक्तव्यम् । ध्यणि "क्तेऽनिटः-॥४।१।१११॥ इति गे, भोग्या भूः। “भुजो भक्ष्ये ॥४।१।११७॥ इति गत्लाभावे, भोज्यमन्नम् ॥ १० ॥ अंजौप व्यक्तिम्रक्षणगतिषु । व्यक्तिः प्रकटता; म्रक्षणं घृतादिसेकः । तत्र केवलस्य म्रक्षण एव वृत्तिः, सोपसर्गस्य तु शेषयोरिति विवेकः । अनक्ति; व्यनक्ति; अभ्यनक्ति, अङ्क्तः, अञ्जन्ति । क्ये, अज्यते । "सिचो. ऽञ्ज:"॥४८॥ इतीटि; आजीत्, आजिष्टाम् , आजिषुः, आजीः । आजि, आजिषाताम् । “अनात-"॥४।१।६९॥ इति पूर्वस्याले नेऽन्ते च; आनञ्ज, आनञ्जतुः; आनजिथ; आनञ्जिम । आनजे । अज्यात् । औ- दित्त्वादेटि; अङ्क्षीष्ट, अजिषीष्ट । अङ्क्ता, अजिता । अक्ष्यति, अञ्जि. ष्यति । “ऋस्मि-"||४|४|४८॥ इतीटि, अजिजिषति । अञ्जयति । “न बदनम-"॥४१॥५॥ इति नस्य हित्वाभावे जेईिवे, आजिजत् । व्यञ्जिजयि- षति । अजन् । अज्यमानम् । अझ्यन् , अजिष्यन् । कित्त्वान्नलुकि, आजिवान्। आजानम् । अक्तः, २ वान् ; व्यक्तः, २ वान् । “जनश-४।३।२३॥ इति वा कित्त्वे; अत्त्वा, अङ्क्तवा; इटि, अजित्वा । अङ्क्ता, अजिता । अतुग, अञ्जितुम् । अङ्क्तव्यम् , अञ्जितव्यम् । घ्यणि "क्तेऽनिट:-"॥१॥ १११॥ इति गे, अङ्ग्यम् ॥ ११ ॥ ओविजैप भयचलनयोः। विनक्ति; उद्विनक्ति, विङ्क्तः, विञ्जन्ति, यिन- क्षि, विक्थः, विक्थ, विनज्मि, विज्वः, विमः। विज्यते । विङ्ग्यात् । विज्येत । विनक्तु । अविनक्, अविङ्क्ताम् ॥ अद्य० ॥ “विजेरिट "॥४॥३॥१८॥ इति ङित्त्वान्न गुणः । उदवि ३ जीत् , जिष्टाम् , जिषुः । उदवेजि, उद- विजिषाताम् । विवेज; विविजिम । विविजे। विज्यात् । विजिता । उद्वि- जिष्यति । उद्विजन् । उद्विजिष्यन् । शेषं ओविजैतिवत् ॥ १२ ॥ द्वौ अनिटौ ॥ शिष्लंप् विशेषणे । शिनष्टि; विशिनष्टि, विशिष्टः, विशि- पन्ति, शिनक्षि, शिंष्ठः, शिंष्ठ, शिनष्मि, शिंष्वः, शिष्मः। शिष्यते । शिंष्यात् । , कियारनसमुच्चयः। २ शिष्येत । शिनष्टु, शिष्टाम् , शिंषन्तु, शिड्ढि; अत्र नस्याकारलोपो "नाम्-" ॥१॥३॥३९॥ इति वर्गान्त्ये कर्तव्ये "न सन्धि-"॥७॥११॥इति स्थानी न भवति। एवमन्यत्रापि।शिनषाणि । अशिनट् , अशिष्टाम्, अशिषन् , अशिन; अशिनषम्, अशिंष्व, अशिष्म ॥अद्य० ॥लदित्त्वादङि, अशिषत् ; अशिषाम । अशेषि; "हशि- ट-"॥३४॥५५॥ इति सकि, अशिक्षाताम्, अशि ७ क्षन्त, क्षथाः, क्षाथाम, क्षध्वम्, क्षि, क्षावहि, क्षामहि । विशिशेष, शिशिषतुः; शिशेषिथ; शिशिषिम । शिशिषे; शिशिषिमहे। शिष्यात् । शिक्षीष्ट । शेष्टा २। विशेष्यति । शिशिक्षति । शेशिष्यते। शेशिषीति, शेशेष्टि, शेशि २ष्टः, षति । शेषयति । व्यशीशिषत् । विशिषन् । शिंषती । शिष्यमाणम् । शेक्ष्यन् । शिशिष्वान् । शिशिषाणम् । शिष्टः, वान् । शिष्टिः। शिष्ट्वा । विशिष्य । शेष्टुम् । शेष्टा । शेष्टव्यम् । शेष- णीयम् । शेष्यम् ॥ १३ ॥ पिष्लंप संचूर्णने । “जासनाट-"॥२२॥१४॥ इति वा कर्मणः कर्मवे, चौरस्य चौरं वा पिनष्टि । हिंसाीदन्यत्र; धानाः पिनष्टि। षान्तत्वात् “अकखादि." ॥२।३।८०॥ इति न नेणिः, प्रनिपिनष्टि, पिष्टः, पिंषन्ति। प्रिष्यते। हो; पिण्ड्ढ। अपिन, टु, अपिष्टाम्, अपिएन् ॥ अद्य० ॥ अपिषत् ; अपिषाम । अपेषि, सकि, अपिक्षाताम् । पिपेष; पिपिषिम । पिपिथे। पिष्यात् । पिक्षीष्ट । पेष्टा २ । पेक्ष्यति। पिपिक्षति । पेपिष्यते। पेपिषीति, पेपेष्टि । पेषयति। अपीपिषत्। पिंषन्। पिंषती। पिष्यमाणम् । पेक्ष्यन् । पेक्ष्यन्ती, पेक्ष्यती । पिष्टः, २ वान् । पिष्टिः। पिष्ट्वा । सम्पिष्य । पेष्टा। पेष्टुम् । पेष्टव्यम् । पेषणीयम् । पेष्यम् ॥ १४ ॥ हिसु, तृहप हिंसायाम् । उदित्त्वान्ने, “रुधाम्-'॥३।४।८२॥ इति श्ने न- लुकि च, हिनस्ति; प्रहिनस्ति, हिंस्तः, हिंसन्ति, हिनस्सि, हिंस्थः, हिंस्थ; हिनस्मि, हिंस्खः, हिंस्मः। हिंसार्थवर्जनात क्रियाव्यतिहारेऽपि नात्मनेपदे; व्यतिहिंसन्ति । हिं- स्यते । हिंस्यात् । हिनस्लु, हिंस्तान्, हिंसन्तु, हिन्दि; हिन्धि । अत्र “हुधुट." ॥४॥२१८३॥ इति हेधौ, “सोधि वा"।।४।३।७२॥ इति सो वा लुकि, अहिनत् , द्। कियाव्यतिहारे तु, व्यत्यहिनदः अहिंस्ताम् , अहिंसन् , अहिनः, अहिनः "सेः स्वाम् ॥७॥३॥७९॥ इति सिचलुकि, सो वा रुः ॥ अद्य० ॥ अहिं ५ रुधादिगणः । २४७ सीत्, सिष्टाम्, सिषुः, सीः, सिष्टम् । अहिंसि, अहिंसिष्टाम् । जिहिंस, जिहिंसतुः; जिहिंसिथ । जिहिंसे । हिंस्यात् । हिंसि ३ षष्टि, ता, प्यति । जिहिंसिषति । जेहिंस्यते। जेहिंसीति। हिंसयति । अजिहिंसत् । हिंसयाञ्चकार । हिंसन्। हिंसती। हिंस्यमानम्। हिंसिष्यन् । जिहिंवान् । जिहिंसिषुः । जिहिंसानः। हिंसि ५ तः, २ वान् , त्वा, ता, तुम् । हिंसनीयम् । हिंस्यम् ॥ तृह ॥ "तृहः नादीत्॥४।३।६२॥ इति विति व्यञ्जनादौ ईत; तृणेढि, तृण्टः, तुंहन्ति, तृणेक्षि; तृणेमि; तूंमः । तृह्यते । तूंह्यात् । तृणेदु । हौ, तृण्डि; तृणहानि । अतृणेट् , अतृण्ढाम् , अतुंहन, अतृणेट; अतृणहम् । अतीत्, अतर्हिष्टाम् । अतर्हि, अतर्हिषाताम् । ततह; ततृहिम । ततृहे । तृह्यात् । तर्हि ३ षीष्ट, ता, प्यति । तितर्हिषति । तरीतृह्यते । तरि री र ३ तृहीति, तर्तढि, तर्तृढः, तर्तृहति । तह- यति । अतीतृहत्; अततहत् । तृहितः, २ वान् । तर्हि ४ वा, ता, तुम्, तव्यम्॥ १५ ॥ १६ ॥ अनिटौ हौ। खिदिप दैन्ये । खिन्त्ते, खिन्दाते, खिन्दते। खिद्यते। खिन्दीत । खिन्त्ताम्। अखिन्त्त, अखित्त। अखेदि। चिखिदे। खेत्ता। खिन्नः। शेषं खिदि- च्वत् ॥ १७ ॥ विदिप विचारणे । वित्ते, विन्दाते। विद्यते । अवित्त । अवेदि, अवित्सा- ताम् । विविदे। वित्सीष्ट । वेत्ता । वेत्स्यते । विवित्सते । वेविद्यते। वित्त्वा । "ऋही-॥४।२।७६॥ इति वा नवे, विन्नः, २ वान् ; वित्तः २ वान्। क्ते, "निर्विण्णः"॥२।३।८९॥ इति निपातनात् , निर्विण्णो विरक्त इत्यर्थः । क्तवतौ तु णत्वाभावे, निर्विन्नवान् । वेत्ता ॥ १८ ॥ जिइन्धैपि दीप्तौ। इन्हे; "धुटो धुटि-"॥१।३।४८॥ इति वा द्लुकि; इन्धे, समिन्हे; तेजस्वी भवतीत्यर्थः । इन्धाते, इन्धते, इन्त्से, इन्धाथे, इन्ध्वे, इन्वे वा । इन्धे, इन्ध्वहे, इन्ध्महे । इध्यते । इन्धीत । इन्डाम् , इन्धाम् वा । ऐन्छ, ऐन्ध वा ॥ अद्य० ॥ ऐन्धिष्ट, ऐन्धिषाताम् । “जाग्रुष-"॥३४॥४९॥ इति वा आमि; समिन्धाञ्चके । पक्षे, “इन्ध्यसंयोग-४।३।२१॥ इति कित्त्वान्नलुकि, द्विले च; समीधे; समीधिमहे । इन्धि ३ षीप्ट, ता, प्यते । इन्दिधिषते । समि- - २४८ क्रियारत्नसमुच्चयः। न्धयति । ऐन्दिधत् । ऐदित्त्वान्नेटि जीत्त्वात्सति क्ते; समिद्धः, २ वान् । इन्धि ३ वा, ता, तुम्। समिध्य ॥ १९ ॥ इति तपागच्छेशश्रीदेवसुन्दरसूरिशष्यश्रीगुणरत्नसूरिविरचिते क्रियारत्नसमुच्चये रुधादिगणः । Deo #ERO अथ तनादिः। तनूयी विस्तारे। “कृग् तनादेः-"॥३।४।८३॥ इति उः, तनोति; व्या, सम् , वि, प्राङ्, पूर्वोऽपि । तनुतः, तन्वन्ति, तनोषि, तनुथः, तनुथ, तनोमि; "वम्यऽविति-"॥४।२।८७॥ इति वा उलुकि, तनुवः, तन्वः, तनुमः, तन्मः।तनुते, तन्वाते, तन्वते, तनुषे, तन्वाथे, तनुध्वे, तन्वे, तनुवहे, तन्वहे, तनुमहे, तन्महे । "तनः क्ये"॥४।२।६३॥ इति नस्य वा आवे; तायते, तन्यते । तनुयात् । तन्वीत । तनोतु । हौ, तनु । तनुताम् । अतनोत् । अमि, अतनवम् । अतनुत ॥ अद्य० ॥ “व्यञ्जनादेर्वो-'"॥४।३।४७॥ इति वा वृद्धौ; अतनीत्, अता- नीत्, अतनिष्टाम् , अतानिष्टाम् , “तन्भ्यो वा-”॥४।३।६८॥ इति तथासो सिचो लुप्, न्णोश्च, न चेट । अतत, अतनिष्ट, अतनिषाताम् , अतनिषत, अतथाः, अतनिष्ठाः, अतनि ६ पाथाम् , ड्वम् , ध्वम् , षि, प्वहि । अतानि । ततान, तेनतुः, तेनुः, तेनिथ, तेनथुः, तेन, ततान, ततन, तेनिव, तेनिम । तेने, तेनाते; तेनि २ ध्वे; महे । तन्यात् । तनि २ षीष्ट; षीध्वम् । तनिता। तनिष्यति, ते । “इवृध-॥४॥४७॥ इति वेटि, “तनो वा"॥४।१।१०५॥ इति वा दीर्धे; तितांसति, ते; तितंसति, ते । पक्षे, तितनिषति, ते । तन्तन्यते । तन्तनीति, तन्तन्ति; अहन्पञ्चम-"॥४।१।१०७॥ इति दीर्घ, तन्तान्तः, "यमिरमि-"॥४२॥५५॥ इत्यत्र तनादेरिति गणनिर्देशाद् यङ्लुपि नात्र अन्त- लुक् । तन्तनति ॥ अद्य० ॥ अतन्तनीत , अतन्तानीत् । अतन्तानि, अन- न्तनिषाताम् । तन्तनत् । यङ्लुबन्तात्सनि, “इवधा४७॥ इति वेटि, तनादिगणः । २४९ , तन्तनिषति, तन्तांसति, तन्तंसति । तानयति । अतीतनत् । तन्वन् , तन्वन्तौ । तन्वती। तन्वानः । तायमानम् ; तन्यमानम् । तनिष्य २ न, माणः । तेनि. वान् । तेनुषी । तेनानः। उदित्त्वात् तिव वेटि; तनित्वा, “यमिरमि-"॥४॥२॥५५॥ इति नलुकि, तत्वा । “यपि"॥४।२।५६॥ इति नलुकि, वितत्य । प्रतत्य। वेट्त्वा. नेटि, ततः, २ वान् । तनि ३ ता, तुम्, तव्यम् । तननीयम् ॥ १ ॥ षणूयी दाने। सनोति । सनुते । क्ये “ये नवा"॥४।२।६२॥ इत्यावे; सायते, सन्यते ॥ अद्य०॥ असानीत् ; असनीत् । “तन्भ्यो वा-॥४।३।६८॥ इति सिजन- योर्वा लुकि; "सनस्तत्र ॥४।३।६९॥ इति वा आत्वे, असात, असत, असनिष्ट ३, असनिषाताम् , असनिषत, असाथाः, असथाः, असनिष्ठाः ३, असनिषाथाम् । ससान, सेनतुः। सेने। “ये नवा"||४।२।६२॥ इत्यत्र अदन्तयग्रहणादिहात्वाभावे, सन्यात् । अन्यथा यि नवा इति कुर्यात् । सायादित्यप्यन्ये । सनि ४ षीष्ट, ता, ष्यति, प्यते । “इवृध-"॥४।४।४७॥ इति वेटि “णिस्तोरेव-"॥२३॥३७॥ इति निय. मान्न पत्वम् ; सिसनिषति, ते। पक्षे, “नाम्यन्तस्था-"॥२३।१५।। इति षत्वे, “सनि" ॥४।२।६१॥ इत्यावे, सिषासति, ते। “ये नवा"||४।२।६२।। इति वा आत्ये; सासायते; संसन्यते । संस २ नीति, न्ति । “आः खनि-"||२६०॥ इति नस्यात्वे, संसातः, संसनति । सानयति । असीपनत् । सिषानयिषति । ऊदित्त्वात् तिव वेट; सनिवा; पक्षे, “आः खनि-"॥४।२।६०॥ इत्यावे; साला । प्रसाय, प्रसन्य, प्रसत्य । वेट्- त्वान्नेटि; सातः, २ वान्। क्तौ, सातिः । सनि २ ता, तुम्। शेषं तनूयीवत् ॥ वन, षण भक्तौ; भक्तिर्भजनम् । सनति, सनतः, सनन्ति ॥ २ ॥ क्षनग्, क्षिनूयी हिंसायाम् । “रपृवात् ।।२।३।६३॥ इति नो णे, क्षणो. ति । क्षणुते । क्षण्यते । अक्षणीत् । अक्षत, अक्षणिष्ट, अक्षणिपाताम्, अक्ष. णिषत, अक्षथाः, अक्षणिष्ठाः । चक्षाण; चक्षणिथ । चक्षणे । क्षण्यात् । क्षणि ४ पीष्ट, ता, प्यति, ष्यते । चिक्षणिपति, ते । चङ्क्षण्यते । चङ्क २ णीति, न्ति । क्षाणयति । अचिक्षणत् । ऊदित्त्वाहेटि, “यमिरमि-"॥४।२।५५॥ इति नलुकि; क्षणित्वा, क्षत्वा । वेट्वान्नेटि, क्षतः, २ वान् । क्तौ, क्षतिः । क्षणि २ ता, तुम् ॥ क्षिनू ॥ “रवर्ण-॥२।३।६३॥ इति नो णे, उपान्त्यगुणं ३३ २५० क्रियारत्नसमुच्चयः। नेच्छन्त्येके । क्षिणोति, क्षिणुतः, क्षिण्वन्ति । क्षिणुते, क्षिण्वाते, क्षिण्वते । क्ये, क्षिण्यते । अक्षेणीत् , अक्षेणिष्टाम् । अक्षित, अक्षेणिष्ट, अक्षेणिषाताम् । अक्षेणि । चिक्षेण । चिक्षिणे । क्षिण्यात् । क्षेणि ४ षीष्ट, ता, ष्यति, प्यते । चिक्षेणिषति, ते; चिक्षिणिषति, ते । चेक्षिण्यते। चेक्षि २ णीति, न्ति । “म्नाम्-" ॥१॥३॥३९॥ इति बहुवचनात् प्रागेव नः, नतु णः; चेक्षीन्तः, चेक्षिणति । क्षेणयति। अचिक्षिणत् । क्षिण्वन् । क्षिण्वानः। क्षिण्वती । क्षेणि २ ष्यन् , ष्य- माणः । चिक्षिण्वान् । चिक्षिणानः । ऊदित्त्वाइटि, “वौ व्यञ्जन-"॥४।३।२५॥ इति वा कित्त्वे; क्षिणिवा, क्षेणित्वा। “यमिरमि-"॥४।२।५५॥ इति नलुकि; क्षित्वा। प्रक्षित्य । वेट्वान्नेटि; क्षितः, २ वान् । क्षणि ३ ता, तुम्, तव्यम् । क्षेणनी- यम् ॥ ३ ॥४॥ इत्युभयतोभाषाः । वनूयि याचने । वनुते, वन्वाते। वन्यते । अवत, अवनिष्ट। अवानि, अव- निषाताम् । “न शस-॥४।१।३०॥ इति न ए:; ववने; ववनिमहे । वनि ३ षीष्ट, ता, प्यते । विवनिषते । वन्यते । वंव २ नीति, न्ति, वंवान्तः, वंवनति । "कगेवनू.॥४।२।२५॥ इति इम्बे, अववनयति; संवनयति । समवीवनत् । जिणम्- परे तु वा दीर्घः; समवानि, समवनि; अवानि, अवनि । संवानम् २, संवनम् २; वानम् २, बनम् २ । अनुपसर्गस्य तु, "ज्वलह्वल-"॥४॥२॥३२॥ इति वा इस्चे; वानयति, वनयति । अवीवनत् । अत्र सूत्रे वा एखविधानाद् ञिणम्- परे इति नानूद्यते । ऊदित्त्वाहेटि; वनित्वा, वत्वा । वेट्लान्नेटि; वतः, २ वान्। वनि २ ता, तुम् ॥ वन, पन भक्तौ । वनति । णिगि, वानयति । अनटि; संवननम् । शेषस्यापि तुल्यम् ॥ ५ मनूयि बोधने । मनुते, मन्वाते, मन्वते, मनुषे, मन्वाथे, मनुध्वे, मन्वे, मनुवहे, मन्वहे, मनुमहे, मन्महे । क्ये, मन्यते। मन्वीत । मनुताम् । अमनुत । "तन्भ्यो-"॥४।३।६८॥ इति सिचोर्वा लुकि, नचेट् । अमत, अमनिष्ट, अम- निषाताम्, अमनिषत, अमथाः, अमनिष्ठाः, अमनिषाथाम् । मेने; मेनिमहे ।

यादिगणः । २५१ मनि ३ षीष्ट, ता, ष्यते । मिमनिषते । मंमन्यते । मंमनीति, ममन्ति, मंमान्तः, मंमनति । मानयति । अमीमनत् । मानयांचकार । मन्वानः । मन्यमानम् । मनिष्यमाणः । मेनानः । ऊदित्त्वादेटि, “यमि-"॥४।२।५५॥ इति नलुकि; मत्वा, मनिला । अवमत्य । वेट्लान्नेटि; मतः, २ वान् । मनि ३ ता, तुम्, तव्यम् । मननीयम् । मान्यम् ॥ ६॥ इति श्रीतपाचार्यश्रीदेवसुन्दरसूरिशिष्यश्रीगुणरत्नसूरिविरचिते क्रियारत्नसमुच्चये तनादिगणः ॥ अथ ज्यादयः। तत्र त्रयोऽनिटः ॥ डुक्रींग्श् द्रव्यविनिमये; द्रव्यपरिवर्ते । "यादेः"॥३॥ ४७९॥ इति श्ना; क्रीणाति; विक्रीणाति। “एपाम् ॥४।२।९७॥ इतीवे; क्रीणीतः, क्रीणन्ति “नश्च-"॥४।२।९६॥ इत्याल्लुक्; क्रीणासि, क्रीणीथः, क्रीणीथ, क्रीणामि, क्रीणीवः, क्रीणीमः । क्रीणीते, क्रीणाते, क्रीणते, क्रीणीपे, क्रीणाथे, क्रीणीध्वे, क्रीणे, कीणीवहे, क्रीणीमहे । फलवतोऽन्यत्र “परिव्यवात-"॥३।३।२७॥ इत्यात्मनेपदे; परिक्रीणीते; विक्रीणीते; अवक्रीणीते । क्ये, क्रीयते। क्रीणीयात् । क्रीणीत। क्रीयेत। क्रीणातु, क्रीणीताम्, क्रीणन्तु, क्रीणीहि । क्रीणीताम ; क्रीणीप्य; क्रीणै। क्रीय- ताम् । अक्रीणात् । अक्रीणीत । अक्रीयत॥ अद्य० ॥ अपीत्, अझै ३ ष्टाम्, पुः, पीः।अक्रेट; अक्रे २ ड्ढम् , ढ्वम् । अकायि, अक्रायिपाताम् , अकेषाताम् , अके २ ड्ढ्वम् , वम् ; अक्रायि ३ ड्वम्, ढ्वम्, ध्वम् । चिकाय, चिक्रियतुः, चिक्रियुः, चिकयिथ, चिक्रेथ, चिक्रियथुः, चिक्रिय, चिकाय, चिक्रय, चिक्रियिव, चिक्रियिम । चिक्रिये, चिक्रियाते; चिक्रियिषे; चिक्रियि २ ढ्वे, ध्वे। क्रीयात् । के ५ षीष्ट; षीट्वम् , ता, प्यति, प्यते । ब्रिटि, क्रायि ६ पीष्ट, पीढ्वम् , पीध्वम् , ता, ष्यति, ष्यते । चिक्रीषति, ते । चेक्रीयते । चेक्रयीति, चक्रेति, चेकीतः, चेकि- यति । “णौ क्रीजी-"॥४२॥१०॥ इत्यावे; कापयति । अचिक्रपत् । कापितः ।

२५२
क्रियारत्नसमुच्चयः।
।
चिक्रापयिषति । क्रीणन् । “अवर्णादश्न:-"॥२।१।११५॥ इति श्नावर्जनान्न अन्त् ।
क्रीणती। क्रीणानः । क्रीयमानम् । वेष्यन् । क्रेष्यन्ती, क्रेष्यती। ऋष्यमाणः ।
चिक्रीवान् । चिक्रियाणः। क्रीतः, २ वान् । “परिक्रयणे"||२।२।६७॥ इति करणादा
चतुर्थ्यां; शताय शतेन वा परिक्रीतः । क्रीत्वा । विक्रीय । क्रेता। केतुम् ।
"कय्यः क्रयार्थे”॥४।३।९१॥ इति निपातनात् ; क्रय्यो गौः । क्रय्यः कम्बलः;
क्रयाय प्रसारित इत्यर्थः । क्रयार्थादन्यत्र, केयं नो धान्यम् , नचास्ति प्रसारितम्।
केतव्यम् ॥ १॥
प्रींग्श् तृप्तिकान्त्योः; कान्तिरभिलाषः । प्रीणाति, प्रीणीतः, प्रीणन्ति,
प्राणासि । प्रीणीते, प्रीणाते, प्रीणते। प्रीयते। प्रीणीयात् । प्रीणीत। प्रीणातु ।
प्रीणीताम्, प्रीणाताम्, प्रीणताम् ॥ ह्य. ॥ अप्री ९ णात्, णीताम्, णन्,
णाः, णीतम् , णीत, णाम, णीव, णीम । अप्रीणीत ॥ अद्य० ॥ अप्रैषीत्,
अप्रैष्टाम्। अप्रेष्ट, अप्रेषाताम् ; अप्रे २ इट्वम् , वम् । अप्रायि, अप्रायिषा-
ताम् , अप्रेषाताम् । पिप्राय, पिप्रियतुः, पिप्रियुः, पिप्रयिथ, पिप्रेथ, पिप्रियथुः,
पिप्रिय, पिप्राय, पिप्रय, पिप्रियि २ व, म । पिप्रिये । प्रीयात् । प्रे ४ षीष्ट, ता,
ष्यति, ष्यते । जिटि, प्रायि ३षीष्ट, ता, ष्यते । पिप्रीपति, ते । पेप्रीयते। पेप्रयीति,
पेप्रेति । “धूम्प्रीगो:-"॥४।२।१८॥ इति ने; प्रीणयति । अपिप्रिणत्। गिन्निर्देशाद्
यलुपि न नोऽन्तः; पेनाययति । प्रीणन्। प्रीणती। प्रीणानः । प्रेष्यन् । प्रेष्य.
माणः । पिप्रीवान् । पिप्रियाणः । प्रीतः, २ वान् । प्रीत्वा । अभिप्रीय । प्रे ४
ता, तुम्, तव्यम् , यम् ॥ २ ॥
मींग्श् हिंसायाम् । मीनाति; मीनीते । “अदुरुप-"॥२॥३७॥ इति णे;
प्रमीणाति प्रमीणीते । क्ये, मीयते । यबक्ङिति “मिग्मीग."॥४।२।८॥ इत्यावे,
अमासीत् ; अमास्त; अमायि । विषयव्याख्यानात् प्रागात्त्वे, पश्चाद् द्वित्वे; ममौ,
मिम्यतुः, मिम्युः, ममाथ, ममिथ०; मिमियम । मिम्ये । मीयात् । मा ४ सीष्ट,
ता, स्यति, स्यते । ब्रिटि, मायि ३ षीष्ट, ता, ष्यते । “मिमी-"।४।१।२०॥ इति
इति, प्रमित्सति, ते । प्रमेमीयते । प्रमे २ मेति, मयीति । प्रमापयति ।
अमीमपत् । मीतः, २ वान् । मीत्वा । प्रमाय । माता । मातुम्। मातव्यम् ॥३॥

यादिगणः। २५३ . , ग्रहीश् उपादाने; स्वीकारे । “ग्रहबश्व-"|४|११८४॥ इति वृति, "रष- वर्ण-"||२।३।६३॥ इति णे च; गृह्णाति, आगृह्णाति । एवं वि, नि, परि, अब, अभि, उप, प्रति, अनु पूर्वोऽपि । गृहीतः, गृह्णन्ति, गृह्णासि, गृह्णीथः, गृह्णीथ, गृह्णामि, गृह्णीवः, गृह्णीमः। गृह्णीते, गृह्णाते, गृह्णते, गृह्णीषे, गृह्णाथे, गृहीध्वे, गृढे, गृह्णीवहे, गृह्णीमहे । गृह्यते । गृह्णीयात् । गृह्णीत । गृह्णातु, गृह्णीताम् , गृह्णन्तु । “व्यञ्जनाच्छ्न-"॥३।४।८०॥ इति आनः; गृहाण; गृह्णीतम्, गृह्णीत, गृह्णानि । गृह्णीताम् , गृह्णाताम्, गृह्णताम् , गृह्णीष्व, गृणीथाम् , गृणीध्वम् , गृह्ण, गृणावहै, गृह्णामहै । अगृह्णात् , अगृणीताम्, अगृह्णन् , अगृ ४ णाः, पीतम् , गीत, ह्णाताम् ॥ अद्य० ॥ अग्रहीत् । “न श्वि-"॥४॥३॥ ४९॥ इति न वृद्धिः, “गृह्ण-"॥४४॥३४॥ इतीटो दीर्घः, दीर्घस्य स्थानिवद्भा- वात् "इट ईति'॥४।३१७१॥ इति सिचो लुक्; अग्रहीष्टाम् , अग्रहीषुः, अग्रहीः, अग्रही ५ ष्टम् ,ष्ट, षम् , प्व, म । अग्रहीष्ट, अग्रहीषाताम् ; अग्रही २ ध्वम्, वम् ; "हान्तस्था-"॥२।१।८१॥ इति वा ढः; अग्रहीदवम् , अग्रही ३ षि, ष्वहि, वहि। अग्राहि, “स्वरग्रह-"३।४।६९॥ इति वा ब्रिटिअग्राहिषाताम् । इटि तु, अग्रही- पाताम् ; अग्राहि ३ ध्वम् , ढ्वम् , ड्ढ्वम् ; अग्रही ३ ध्वम् , ढ्वम् , ढ्वम् । जग्राह, जगृहतुः, जगृहुः, जग्रहिथ, जगृहथुः, जगृह, जग्राह, जग्रह, जगृहि २ व, म । जगृहे, जगृहाते; जगृहिध्वे, ढ्वे; जगृहिमहे । गृह्यात् । इटि, ग्रही ६ षीष्ट; षीढ्वम्, षीध्वम् , ता, प्यति, ष्यते । जिटि, ग्राहि ५ षीष्ट; पीढ्वम् , षीध्वम् , ता, ष्यते । “ग्रहगुहश्च-"।४।४।५९॥ इति नेटि; जिघृक्षति, ते । जरीगृह्यते । “गृहण-"||४|४।३४॥ इत्यत्र विहितविशेषणाद् यङि इटो न दीर्घः; अजरीगृहिष्ट । जरीगृहि ३ ता, तुम्, तव्यमित्यादि । लुपि तु, जरी, रि, र ३ गृहीति । अत्र “लुप्यवृत्-"।७।४।११२॥ इत्यत्र हर्जनाद् यङ्लुप्यपि वृत्- सिद्धम् । जरि ११ गढि, गृढः, गृहति, घर्ति, गृहीषि, गृढः, गृढ, गमि, गृहीमि, गृह्वः, गृह्मः। जर्गृह्यते । जरिगृह्यात् । जर्गर्दु, जगु ५ हीतु, ढाम्, हतु, ढि, हाणि । अजरी ६ घटु, घई, गृढाम् , गृहुः, घर्ट, घडू ॥ अद्य० ॥ अजरिगीत; “गृह्ण-"॥४४॥३४॥ इत्यत्र लुप्ततिनिर्देशान्न दीर्धे; अजरिंग- २५४ क्रियारत्नसमुच्चयः । ८ हिष्टाम्, र्हिषुः । जरिगर्दाञ्चकार । जरिगार्हष्यति । जरिगर्हि ३ ता, तुम्, तव्यम् । जरिगृहितः । उदाहयति । अजिग्रहत्। ग्राहयांचकार, चक्रे वा णि- गन्तभूवत् । जिग्राहयिषति । गृह्णन् । गृह्णती । गृह्णानः । गृह्यमाणम् । ग्रही ४ ष्यन् , ष्यन्ती, प्यती, प्यमाणः । जगृहान् । जगृहाणः । गृहीतः, २ वान् । निगृहीतिः । “रुदविद-"॥४।३।३२॥ इति क्त्वासनोः कित्त्वे; गृहीला । सङ्ग्रह्य । ग्रही ३ ता, तुम् , तव्यम् । ग्रहणीयम् । ग्राह्यम् ॥ ४ ॥ अथ प्वादिः । पूग्श् पवने; पवनं शुद्धिः । “प्वादेः-॥४।२।१०५॥ इति हवे; पुनाति, पुनीतः, पुनन्ति । पुनीते, पुनाते, पुनते। क्ये, पूयते ॥ अद्य०॥ अपा २ वीत् , विष्टाम् । अपविष्ट, अपविषाताम् । अपावि, अपविषाताम् , अपाविषाताम् । पुपाव, पुपुवतुः, पुपुवुः, पुपविथ, पुपुवथुः, पुपुव, पुपाव, पुपव, पुपुवि २, व, म। पुपुवे, पुपुवाते । पूयात् । पविषीष्ट, पाविषीष्ट, पविषीदवम्, ध्वम् । पविता, पाविता । पविष्यति, ते; पाविष्यते । “ग्रहगुहश्च-॥४।४।५९॥ इति नेट् , पुपू- षति, ते । पोपूयते । अचि, पोपूया । पोपोति, पोपवीति, पोपूतः; अत्यादावित्य- धिकारात् “प्वादेः-"॥४।२।१०५॥ इति न इवः; पोपुवति । क्ते, पोपुचितः। शेष यङ्लुबन्तभूवत् । पावयति । पाव्यते। अपीपवत्। णौ सनि “ओर्जान्त-"॥४१ ६०॥इति ओः इः, पिपावयिषति। पुनन् । पुनती। पुनानः। पूयमानम् । पविष्य २ न्, माणः । पवि २ ष्यन्ती, प्यती । पुपूवान् । पुपुवानः । किति “ उवर्णात् " ॥४।४।५८॥ इति नेट; पूतः,२ वान् । पूतिः। नाशे “पूदिवि-"॥४।२।७२॥ इति नवे, पूना यवाः । नाशादन्यत्र, पूतं धान्यम् । पूत्वा । पवि ३ ता, तुम्, तव्यम् । ये, पव्यम् । घ्यणि; पाव्यम् । पूङ् पवने । पवते । पिपविषते ॥ ५ ॥ अथ प्वाद्यन्तर्गणो ल्वादिः । लूग्श छेदने । लुनाति । लुनीते । लूयते । अलावीत् , अलाविष्टाम् । अलविष्ट; अलवि ३ ध्वम् , ढ्वम् , ड्ढवम् । लुलाव; लुलविथ । लुलुवे; लुलुविध्वे, ढ्वे । लवि २ षीध्वम् , षीढ्वम् । लवि. ष्यति, ते । “एकधातौ-"॥३४॥८६॥ इति त्रिनिटक्यात्मनेपदेषु; लूयते ।

क्यादिगणः । अलावि । लाविता, लविता। लाविष्यते, लविष्यते वा केदारः स्वयमेव । लुलूषति, ते । लोलूयते । सनि, लोलूयिषते । लुपि तु, लोलवीति, लोलोति ॥ अद्य० ॥ अलोलावीत्। लोलवाञ्चकार । लोलविष्यति ॥ भाक ॥ लोलाविष्यते, लोलविष्यते। लावयति। लाव्यते। अलीलवत्। णिगन्तात्कर्मकर्त्तरि; "णिस्नु-" ॥३।४।९२॥ इति ञि, “भूषार्थ-"॥३।४।९३॥ इति भिटक्यौ च निषिद्धाः । लावयते; अलीलवत वारम्भा खयमेव । णिगन्तात्सनि; लीलावयिषति।लुनन्। लुनानः । लूत्वा । एवं सर्वः पूग्श्वत् ; नवरं “ऋल्वादेः-"||४।२।६८॥ इति क्त- क्तीनान्तस्य नवे: लूनः, २ वान् । लूनिः ॥ ६ ॥ धूम्श् कम्पने । प्वादित्वात् हस्खे; धुनाति । धुनीते । क्ये, धूयते। धुनी- यात्। धुनीत । धुनातु । धुनीताम् । अधुनात्। अधुनीत । शेष सर्व धूग्ट्वत् ; नवरं "ऋल्वादेः-१॥४।२।६८॥ इति ने; धूनः, २ वान् । धूनिः। धूग्ट् कम्पने । धूनोति। धूनुते । धूत् विधूनने । धुवति। धूग्ण कम्पने । युजादिलाहा णिचि, धूनयति । धवति। धवते ॥ ७ ॥ स्तृग्श आच्छादने । प्वादित्वात् ह्रखे; स्तृणाति । वि, सम्, प्र, आङ्, निःपूर्वोऽप्येवम्। स्तृणीतः, स्तृणन्ति । स्तृणीते, स्तृणाते, स्तुणते । आम्तीर्यते । व्यस्तारीत् ; आस्तारीत्, आस्तारि २ प्टाम् , पुः । “इट सिजाशिषो."॥४।४।३६॥ इति वेट् , “वृता नवा-"॥४४॥३५॥ इति वेटो दीर्घः, आस्तरिष्ट, आस्तरीष्ट; "ऋवर्णात्"॥४॥३॥३६॥ इति सिचः कित्त्वे, आस्तीष्ट । आस्तारि, आस्तरिषा- ताम्, आस्तरीषाताम्, आस्तीपीताम् । त्रिटि, आन्तारिपाताम् । तस्तार, स्कृच्छृत- "॥४॥३८॥ इति गुणे; तस्तरतुः, तस्तरुः, तस्तस्थि, तस्तरथुः, तस्तर, तस्तार, तस्तर, तस्तरि २ व, म । तस्तर । स्तार्यात् । स्तरिपीष्ट, स्ती- पष्टि, स्तारिषीष्ट । स्तरिता २, स्तरीता २, स्तारिता । स्तरिष्यति, ते; स्तरी- प्यति, ते; स्तारिष्यते । “इवृध-'॥४४॥४७॥ इति वेटि, “नामिनोऽनिट" ॥४।३।३३॥ इति कित्त्वे च; आतिस्तरिषति, ते; आतिस्तरीपति, ते; आति. स्तीर्षति, ते । तेस्तीर्यते । तास्तरीति, तास्तति । विस्तारयति । “स्मृदृत्वर-" ॥४१॥६५॥ इति पूर्वस्यावे, व्यतस्तरत् । स्तृणन्। स्तृणानः । आतिस्तीर्वान् । ,

२५६
क्रियारत्नसमुच्चयः ।
आतिस्तिराणः। काने प्राग द्वित्वं पश्चादिर्, स्वरविधित्वात् । किति "ऋवर्णश्रिा
४।४।५७॥ इति नेटि, "ऋल्ब-"॥४।२।६८॥ इति नवे; आस्तीर्णः, २ वान् ।
आस्तीणिः । स्ती । आस्तीर्य । स्तरि ३ ता, तुम्, तव्यम् । स्तरणीयम् ।
ध्याण, आस्तार्यः ॥ ८ ॥
वृग्श् वरणे । “प्वादेईस्वः॥४।२।१०५॥ वृणाति । वृणीते। क्ये, वूर्यते ।
अवारीत, अवारिष्टाम् । अवरिष्ट, अवरीष्ट, अवष्ट ३ । अवारि, अवरिषाताम् ,
अबरीषाताम् , अवर्षाताम् ; अवारिषाताम् । ववार; "स्कृच्छृत-"॥४॥३८॥ इति
गुणे; ववरतुः । ववरे । बुर्यात् । वरिषीष्ट, वर्षीष्ट, वारिषीष्ट । वरिता, वरीता ।
वारिता । वरिष्यति, ते; वरीष्यति, ते; वारिष्यते । विवरिपति, ते; विवरीषति,
ते; वुवर्षति, ते । बोवूर्यते । वावरीति, वावर्ति, वाबूतः, वावुरति । वावुरत् ।
वारयति । अवीवरत् । वृणन् । वृणती। वृणानः । वरिष्यन् ; वरीष्यन् । वुवू.
र्वान् । वुवुराणः । वूर्णः, २ वान् । पूर्णिः । वूर्वा । प्रवूर्य । वरि ३ ता, तुम्,
तव्यम्; वरी ३ ता, तुम्, तव्यम् । वरणीयम् । वार्यम् । हूस्वान्तोऽयमिति
नन्दी ॥९॥
इत्युभयपदिनः ।
अनिटौ हौ ॥ ज्यांश् हानौ । वयोहानावित्येके । “ज्याव्यध-"॥४।१।८१।।
इति य्वृति, "दीर्घमव"॥४।१।१०३॥ इति दीर्घ, “प्वादे:-"॥४।२।१०५॥ इति ह्रखे,
जिनाति, त्यजतीत्यर्थः। जिनीतः, जिनन्ति । क्ये, जीयते। अज्या३ सीत् , सिष्टाम् ,
सिषुः। अज्यायि, अज्यासाताम् , अज्यायिषाताम् । “ज्याव्येव्याधि-"॥४।१७१॥ इति
पूर्वस्यत्वे; जिज्यौ, जिज्यतुः, जिज्युः; “सृजिदृशि-"॥४।४।७८॥ इति वेटि; जिज्यिथ,
जिज्याथ, जिज्यथुः, जिज्य, जिज्यौ, जिज्यि २ व, म। जिज्ये। जीयात् । ज्यासीष्ट,
ज्यायिषीष्ट । ज्याता २, ज्यायिता। ज्यास्यति, ते; ज्यायिष्यते । जिज्यासति ।
जेजीयते । जेजेति, जेजयीति । ज्यापयति । अजिज्यपत् । जिनन् , जिनन्तौ।
जिनती । जास्यन् । जिजीवान् । जिज्यानम् । “ऋल्व-'"॥४।२।६८॥ इति ने;
जीनः, २ वान् । जीत्वा । “ज्यश्च यपि"॥१७६॥ इति स्वृदभावे; प्रज्याय ।
ज्याता । ज्यातुम् ॥ १० ॥

त्यादिगणः । याम्, “ लींश् श्लेषणे । “प्वादेईखः॥४।२।१०५॥ लिनाति । क्ये, लीयते । यब- विङति, "लीङ्लिनोर्वा"।४।२।९॥ इति वा आत्वे; व्यलासीत्, व्यलैषीत् । अला- यि, अलासाताम्, अलेषाताम् ; अलायिषाताम् । लिलाय, लिल्यतुः। लिल्ये । लोयात् । लासीष्ट, लेषीष्ट; लायिषीष्ट । विलास्यति, ते; विलेष्यति, ते; लायि- प्यते । लिलीषति । लेलीयते । लुप्ततिनिर्देशात् यङ्लुपि न आः; लेलेति, लेलयीति । णौ “लीलिन:-॥३।३।९०॥ इत्यात्मनेपदे आत्वे च; जटाभिरालापयते। आत्मानं पूजां प्रापयतीत्यर्थः। श्येनो वर्तिकामुल्लापयते; अभिभवतीत्यर्थः। “लोल:" ॥४।२।१६॥ इति ले, विलालयति । पक्षे, “अतिरी-॥४।२।२१॥ इति पौ; विलापय. ति। “लिय-"॥४।२।१५॥ इति ने, घृतं विलीनयति। पक्षे, “नामिन-'॥४॥३॥५१॥ इति वृद्धौ;घृतं विलाययंति। लिनन् । लेष्यन् ; लास्यन् । विलाय; विलीय । विलाता; विलेता। विलातुम् , विलेतुम् । “ऋल्व-"॥४।२।६८॥ इति ने लीनः, २ वान् ॥११॥ कृ, मृ, शृश् हिंसायाम् । कृणाति । अयं वक्ष्यमाणशृश्वत् , परं परोक्षा- स्कृच्छृत- "॥४॥३॥८॥ इति गुण एवं कार्यः । चकार, चकरतुः, चकरुः, चकरिथ० । चकरे ॥ मृः पुनर्वृग्श्वत् ॥ 7 ॥ प्वादेईखे; वजं गिरीन् शृणाति, शृणीतः, शृणन्ति । क्ये, शीर्यते; विशीर्यते । व्यशारीत् । व्यशा। "इट् सिज-"||४|४॥३६॥ इति वेटि, “घृत-"n४४३५॥ इति इटो वा दीर्घे; व्यश- रिषाताम् , ब्यशरीषाताम्, व्यशीर्षाताम् ; ब्रिटि, व्यशारिषाताम् । विशशार; "ऋः शृदृप्रः"॥४॥४॥२०॥ इति वा ऋः; विशश्रतुः, विशश्रुः । पक्षे, “स्कृच्छृ-" ॥४॥३८॥ इति गुणे; विशशरतुः, विशशरुः; शशरिथ०; शशरिम, शश्रिम । शशरे, शश्रे । शीर्यात् । शरिषीष्ट; शीर्षीष्ट; शारिपीष्ट । शरिता, शरीता; शारिता । शरिष्यति, ते; शरीष्यति, ते; शारिष्यते । शिशरिषति, शिशरीषति, शिशीर्षति । शेशीर्यते । शाशरीति, शाशर्ति । विशारयति । व्यशीशरत् । विशशृवान् ; विशश्राणम् । पक्षे, विशिशीर्वान् ; विशशिराणम् । काने पूर्व द्वित्वं पश्चादिर्, स्वराविधित्वात्। “ऋवर्णश्यू-"॥१४॥५॥ इति नेटि, "ऋल्व" ॥४।२।६८॥ इति ने; शीर्णः, २ वान् । शीर्णिः। शीर्ला । विशीर्य । शरि३ ता, तुम, तव्यम् ; शरी ३ ता, तुम्, तव्यम् ॥ १४ ॥ .

२५८ क्रियारत्नसमुच्चयः। पृश् पालनपूरणयोः। “प्वादेईस्वः”।।४।२।१०५॥ मेघः सरांसि पृणाति, पृणी- तः, पृणन्ति । क्ये, पूर्यते ॥अद्य० ॥अपारीत्, अपारिष्टाम्। अपारि, अपरिषाताम् ; अपरीषाताम्, अपूर्षाताम् । ब्रिटि, अपारिषाताम् । पपार; "ऋः शूदृप्रः॥४|४| २०॥ "स्कृच्छ्र-॥४॥३८॥ इति गुणश्च; पप्रतुः, पपरतुः, पप्रुः, पपरुः, पपरिथ०; पप्रिम, पपरिम । पप्रे, पपरे। पूर्यात् । परिषीष्ट, पूर्षीष्ट; पारिषीष्ट । परिता २, परीता २; पारिता । परिष्यति,ते; परीप्यति, ते; पारिष्यते। पिपरिषति, पिपरीषति, पुपूर्षति । पापूर्यते । पापरीति, पापति, पापूर्तः, पापुरति, पापरीषि, पापर्पि, पापूर्थः, पापूर्थ, पापरीमि, पापर्मि, पापूर्वः, पापूर्मः । क्ये, पापूर्यते। पापूर्यात् । पापरीतु । अपापः, अपापरीत , अपापूर्तीम् , अपापरुः, अपापः, अपापरीः । पारयति । अपीपरत्। अस्य पूरेश्च “णौ दान्त-"॥४।४।७४॥ इति क्ते वा निपातनात् ; पूर्णः। पक्षे, पारितः । पृणन् । पृणती । परिष्यन् ; परीष्यन् । निपवान्। निपप्राणम् । पक्षे, पुपूर्वान ; द्विने कृते उरि, पपुराणम् । “ऋल्ब-"|४।२।६८॥ इत्यत्र वर्ज- नान्नत्वाभावे; पूर्तः, २ वान्। पूर्खा । प्रपूर्य । परि ३ ता, तुम्, तव्यम् ; परी ३ ता, तुम्, तव्यम् । परणीयम् । शेषं तृवत् , नवरं कर्मकर्त्तरि अद्य- तन्यां , अतीथ्रस्थाने अपूष्र्टेति रूपं ज्ञेयम् ॥ १५ ॥ दृश विदारणे । भय इत्यन्ये । इन्द्रोऽद्रीन् वज्रेण दृणाति । विदीर्यते । अदारीत् । ददार। "ऋः शूदृप्रः॥४।४।२०॥ “स्कृ-॥४॥३८॥ इति गुणश्च; दद्रतुः; ददरतुः, दद्रुः, ददरुः। दद्रे, ददरे। दीर्यात् । दरिता, दरीता, दारिता। दरिष्यति, ते; दरीष्यति, ते; दारिष्यते । विदारयति; अवदारयति । “स्मृदृ"॥४।१।६५॥ इति पूर्वस्य असे; अददरत् । दीर्णः, २ वान् । दीर्णिः । दरिता, दरीता । शेष सर्व स्तृग्श्वत् ॥ १६॥ जृश् वयोहानौ । “प्वादेः ||४।२।१०५॥ हस्खे, जृणाति । जीर्यते । जृणीयात् । जृणातु । अजृणात् । णौ, जारयति । अजीजरत् । अजारि । शेषं सर्व जष्च- वत्, नवरं तिव जृवश्व-"॥४|४|४१॥ इतीटि; जरित्वा, जरीवा इति स्यात् ॥ १७ ॥ गृश् शब्दे । गृणारिः । गाय: । अगारीत् । अगारि । जगार; "स्कृ" " त्र्यादिगणः । २५९ ॥४॥३॥८॥ इति गुणे; जगरतुः । जगरे । गीर्यात् । गरिता, गरीता, गारिता । जिगीर्षति, जिगरिषति, जिगरीषति । गीर्णः, २ वान् । गीणिः । शेषं शृश्वत्, परं "न गृणाशुभरुचः॥३।४।१३॥ इति निषेधात् नयङ्, गर्हितं गृणाति ॥१८॥ इति प्वादिादिश्च । ज्ञांश् अवबोधने । अनिट् । “जा ज्ञा-"||४।२।१०४॥ इति जादेशे; जानाति; "एषाम्-"॥४।२।९७॥ इतीत्वे, जानीतः, जानन्ति, जानासि, जानीथः, जामीथ, जानामि, जानीवः, जानीमः। फलवत्कर्त्तरि, “ज्ञोऽनुपसर्गात्।।३।३।९६॥ इत्या- त्मनेपदे, धर्म जानीते।"पदान्तरगम्ये वा"॥३।३।९९॥ स्वांगां जानीते, जानाति वा। उपसर्गातु, “शेषात्-॥३।३।१००॥ इति परस्मैपदे, प्रत्यभिजानाति; अनुजानाति शिष्यम्; अवजानासि माम् । “निह्नवे ज्ञः"॥३।३।६८॥ शतमपजानीते, अपह्नत इत्यर्थः । संप्रतेरस्मृतौ; “समो ज्ञो-"।।२।२।५१॥ इति व्याप्ये वा तृतीयायाम् ; मात्रा मातरं वा सञ्जानीते, अवेक्षत इत्यर्थः । नित्यं शब्दं प्रतिजानीते, अभ्युप. गच्छतीत्यर्थः। स्मृतौ तु; मातुः सञ्जानाति, स्मरतीत्यर्थः। कर्मण्यसति, “ज्ञः"॥३।३ ।८२॥ इत्यात्मनेपदे, "अज्ञाने ज्ञः-"॥२।२।८०॥ इति करणे षष्ठ्याम् ; सर्पिषो जा. मीते; नात्र सर्पितॆयत्वेन विवक्षितं, किं तर्हि प्रवृत्तौ करणत्वेन; सर्पिषा करणेन भोक्तुं प्रवर्त्तत इत्यर्थः । जानाते, जानते, जानीपे, जानाथे, जानीध्वे, जाने, जानी २ वहे, महे । क्ये, ज्ञायते । जानीयात् । जानीत । जानातु; जानीहि; जानानि । जानीताम् । अजानात्, अजानीताम् , अजानन् , अजा ६ नाः, नीतम् , नीत, नाम्, नीव, नीम । अजानीत । अज्ञासीत् , अज्ञामिष्टाम्, अज्ञा ७ सिषुः, सीः, सिष्टम् , सिष्ट, सिषम् , सिप्व, सिष्म । अज्ञास्त, अज्ञासाताम् , अज्ञा- सत, अज्ञास्थाः, अज्ञा ६ साथाम् , ध्वम् , द्ध्वम, सि, स्वहि, स्महि । अज्ञायि, अज्ञासाताम् , अज्ञायिघाताम् । जज्ञौ, जज्ञतुः, जजुः; "सृजिदृशि-॥४।४।७८॥ इति वेटि; जज्ञिथ, जज्ञाथ, जज्ञथुः, जज्ञ, जज्ञौ, जज्ञि २व, म। जज्ञे, जज्ञाते। संयोगादेर्वाशिष्यः॥४।३।९५॥ ज्ञेयात, ज्ञायात् । ज्ञासीष्ट, ज्ञायिषीष्ट । ज्ञाता २, ज्ञायिता । ज्ञास्यति, ते; ज्ञायिप्यते । “अननाः सनः"॥३।३।७०॥ इत्यात्मनेपदे; , २६. कियारत्नसमुच्चयः । धर्म जिज्ञासते; अवजिज्ञासते । अनौस्तु; पुत्रमनुजिज्ञासति पाठाय । जाज्ञा यते । त्यादौ तु न जा, जाज्ञाति, जाज्ञेति, जाज्ञीतः, जाज्ञति । एवं यङ्लुपि वत् । शतरि तु यङ्लुपि, जाज्ञातीति वाक्ये 'जा ज्ञाजन." ॥४२॥१०४॥ इति जादेशे, 'नश्चातः॥४।२।९६॥ इत्याल्लुकि; जत्, अत्यर्थ जानन्नित्यर्थः । णौ, आदेशादागम इति न्यायात् प्राग् प्वागमे पश्चात् "मारणतोषण-"||४।२।३०॥ इति हवे; मारणे, संज्ञपयति पशुम् । तोषणे, विज्ञपयति राजानम् । ज्ञपयति गुरुम् । निशाने, प्रज्ञपयति शस्त्रम् । अन्यत्र, ज्ञापयति; आज्ञापयति । डे, व्यजिज्ञपत् । ञिणम्परे तु वा दीर्घः; व्यज्ञापि, व्यज्ञपि; आज्ञापि । ब्रिटि, व्यज्ञापिषाताम्, व्यज्ञपिषाताम् ; आज्ञा- पिषाताम्, इटि तु, व्यज्ञपयिषाताम्, आज्ञापयिषाताम् । “णौ दान्त-"४४७४॥ इति क्ते वा निपातनात् ; संज्ञप्तः; विज्ञप्तः; प्रज्ञप्तः; आज्ञप्तः; पक्षे, “सेटक्तयोः" ॥४॥३८॥ इति गेलुंकि; संज्ञपितः; विज्ञपितः; प्रज्ञपितः । आज्ञापितः; अत्र मारणाद्यर्थाभावान्न हवः। तेर्ग्रहादिभ्य एवेति नियमान्नेटि; ज्ञप्तिः। “इवृध." ॥४४॥४७॥ इति सनि वेटि; जिज्ञपयिषति । पक्षे, "ज्ञप्याप-"॥४।१।१६॥ इति द्वीप नच द्विः; ज्ञीप्सति । "इवृध-'"|४|४|४७॥ इत्यत्र ज्ञपीति कृत- इस्खस्योपादानात, ज्ञापेर्जिज्ञापयिषतीत्येव भवति । लघोर्यपि "॥४।३।८६॥ इति अयि; विज्ञपय्य; आज्ञाप्य । शेषं णिजन्तज्ञाणवत् । जानन् । जानती। जानानः। ज्ञायमानम् । ज्ञास्यन् । ज्ञास्यती। ज्ञास्यमानः । जज्ञिवान् । जज्ञानः । “ज्ञानेच्छा-"॥५।२।९२॥ इति सतिक्ते; ज्ञातः, २ वान् । ज्ञातिः। ज्ञात्वा । विज्ञाय । ज्ञा ३ ता, तुम्, तव्यम् । ज्ञेयम् ॥ १९ ॥ मन्थश विलोडने । मनाति, मनीतः,मश्नन्ति । मथ्यते।हौ “व्यञ्जनाच्छना हेरानः"॥३।४।८०॥ मथान॥ अद्य० ॥ अमन्थीत्; अमन्थिष्टाम्। अमन्थि, अम- थिषाताम् ।ममन्थ। “इन्ध्यसं-"॥४।३।२१॥ इति कित्त्वाभावे; ममन्थतुः, ममन्युः, ममन्थिथ। ममन्थे। मथ्यात्। मन्थिषीष्ट । मन्थिता। मन्थिष्यति । मिमन्थिषति । मामथ्यते । मामन्थीति । "अघोषे प्रथमो-॥१॥३॥५०॥ इति थस्ते, मामन्ति । मन्थयति अममन्थत् । मनन् । मनती। मन्थिष्यन् । कित्त्वान्नलुकि एवम् ;

श्यादिगणः । २६१ मेथिवान् । मथितः, २ वान् । “ऋत्तृष-"॥४।३।२४॥ इति क्त्वो वा कित्त्वे, मथिला, मन्थित्वा । प्रमथ्य । मन्थि ३ ता, तुम्, तव्यम् । मन्थनीयम् । मन्थ्यम् ॥ २० ॥ ग्रन्थश् सन्दर्भे; बन्धने । प्रश्नाति । अथ्यते । हौ, ग्रथान ॥ अद्य० ॥ अग्रन्थीत्, अग्रन्थिष्टाम् । अग्रन्थि, अग्रन्थिषाताम् । जग्रन्थ । “वा श्रन्थ-" ॥४।१।२७॥ इति वा एर्नलुक् च; ग्रंथतुः, जग्रन्थतुः; ग्रेथुः, जग्रन्थुः; "स्क्रसृ-" ॥४४८१॥ इतीटि, ग्रेथिथ, जग्रन्थिथ । ग्रेथे, जग्रन्थे । ग्रथ्यात् । ग्रन्थिषीष्ट । ग्रन्थिता । ग्रन्थिष्यति । कर्मकर्त्तरि, “एकधातौ-"॥३।४।८६॥ इति जिक्यात्म- नेपदेषु, “भूषार्थ-"॥३।४।९३॥ इति क्यञ्योरभावे; ग्रनीते माला स्वयमेव । अग्रन्थिष्ट माला स्वयमेव; जग्रन्थे वा । जिग्रन्थिषति । जाग्रथ्यते । जाग्रं २ थीति, त्ति । ग्रन्थयति । अजग्रन्थत् । ग्रनन् । प्रश्नती। ग्रन्थिष्यन् । ग्रन्थि- प्यन्ती, ग्रन्थिष्यती। जग्रथ्वान् ; ग्रेथिवान् । ग्रेथानम् ; जग्रथानम् । ग्रथितः, २ वान् । “ऋतृष-"॥४।३।२४॥ इति क्त्वो वा कित्त्वे; ग्रन्थित्वा, ग्रथित्वा । प्रग्रथ्य । ग्रन्थि ३ ता, तुम्, तव्यम् । ग्रन्थनीयम् ॥ २१ ॥ मृदश क्षोदे । मृद्गाति, मृद्गीतः, मृद्गन्ति। क्ये, मृद्यते ॥ अद्य० ॥ अम- र्दीत् , अमर्दिष्टाम्। अमर्दि, अमर्दिषाताम् । ममर्द, ममृदतुः, ममृदुः, मर्दिथ; ममृदिम। ममृदे । मृद्यात् । मर्दिषीष्ट । मर्दिता। मर्दिष्यति । मिमर्दिषति ।मरी- मृद्यते। मरी, रि, र ३ मृदीति; मरी, रि, र्, मर्ति । मर्दयति । अमीमृदत्, अम- मर्दत् । ममृहान् । ममृदानम् । मृदितः, २ वान् । "क्षुधक्लिश"॥४॥३॥३१॥ इति कित्त्वे, मृदिला । प्रमृद्य । मर्दि ३ ता, तुम्, तव्यम् । मर्दनीयः । मर्थम् , मृधम् ॥ २२ ॥ बन्धंश बन्धने । अनिट् । बध्नाति; उपनिबनाति; सम्बनाति । एवं वि, अनु, अभि, प्रति, निपूर्वोऽपि । बध्यते । हो, बधान । “व्यञ्जनानाम्-'।४।३। ४५॥ इति वृद्धौ, “गडदबादेः ॥२।११७७॥ इति बस्य भे; अभान्त्सीत् । “धुट्- हव-"॥४॥३७०॥ इति सिच्लुकि भत्वाभावे च, अबान्डाम्, अभान्त्सुः, अभान्त्सीः, अबान्हम्, अबान्ड, अभान्त्सम्, अभान्त्व, अभान्त्स्म । अब- २६२ क्रियारत्नसमुच्चयः । न्धि, अभन्साताम् , अभन्त्सत, अबन्डाः, भत्वे, अभन्द्ध्वम् , अभन्द्ध्वम् । “सो धि वा"॥४।३।७२॥ इति वा स्लुक्; अभान्त्स । बबन्ध; "इन्ध्य.॥४।३। २१॥ इति कित्त्वाभावे; बबन्धतुः, बबन्धुः; "सृज-"॥४।४।७८॥ इति वेटि, बबन्धिथ, बबन्त्थ; बबन्धिम। बबन्धे; बबन्धिध्वे । बध्यात् । भन्सीष्ट । बन्डा। सम्भन्त्स्यति । अभन्त्स्यत् । बिभत्सति । बाबध्यते । बाब २ न्धीति, न्ति । बन्धयति । अबबन्धत् । बनन् । भन्त्स्यन् । कित्त्वान्नलुकि, बेधिवान् । बेधा- नम् । बद्धः, २ वान् । बद्ध्वा । निबद्ध । सम्बं ३ डा, डुम्, डव्यम् । बन्ध्यः ॥ २३ ॥ क्षुभश् सञ्चलने। "क्षुम्नादीनाम्"।२।३।९६॥ इति न णः, क्षुम्नाति, क्षुभ्नी- तः, क्षुभ्नन्ति । क्षुभ्यते । हौ, क्षुभाण । अक्षोभीत । अक्षोभि, अक्षोभिषाताम् । चुक्षोभ, चुक्षुभतुः; चुक्षोभिथ । चुक्षुभे। क्षुभ्यात्।क्षोभिषीष्ट। क्षोभिता। क्षोभिष्यति। चुक्षुभिषति; चुक्षोभिपति। चोक्षुभ्यते। क्षोभयति । अचुक्षुमत् । क्षुभनन्। “क्षुब्ध- विरिब्ध-"॥४।४।७०॥ इति क्ते निपातनात् ; क्षुब्धो मन्थः; क्षुभितोऽन्यः । “वौ व्यञ्जन-"॥४।३।२५॥ इति क्षुभित्वा; क्षोभित्वा । क्षोभि ३. ता, तुम्, तव्यम् । क्षुभि सश्चलने । क्षोभते । क्षुभच् सञ्चलने । क्षुभ्यति । पुष्याघङि, अक्षु- भत् ॥ २४ ॥ क्लिशौश् विबाधने । “तवर्गस्य-"॥१।३।६०॥ इति नो अस्य, “न शात्"॥ १।३।६२॥ इत्यभावे; क्लिश्नाति परं अकारणम् । अकर्मकोऽप्ययं दृश्यते, 'सूत्रार्थे क्लिश्नतश्चैवं दूरे तत्त्वार्थनिर्णयः' ॥ क्लिश्यते । हौ, क्लिशान । औदित्त्वादेटि; अक्ले- शीदित्यादि। पक्षे "हशिट-॥३।४।५५॥ इति सकि, “यज-"।२।११८७॥ इति शः षे; “षढोः कः ॥२।१।६२॥ इति के, सस्य षत्वे; अक्लिक्षत्, अक्लि ८ क्षताम् , क्षन् , क्षः, क्षतम्, क्षत, क्षम् , क्षाव, क्षाम । अक्लेशि, अक्लिक्षाताम् , अक्लि- क्षन्त । चिक्लेश। चिक्लिशे। क्लिश्यात् । क्लशिषीष्ट, क्लिक्षीष्ट; अत्र “सिजाशिष." ॥४॥३॥३५॥ इति कित्त्वम्। क्लेष्टा, क्लेशिता। क्लेशिष्यति, क्लेक्ष्यति । चिक्लिक्षति “उपान्त्ये”॥४३॥३४॥ इति कित्त्वम् ; चिक्लिशिषति, चिक्लेशिषति । चेक्लिश्यते । चेक्लेष्टि, चेक्लिशीति । क्लेशयति। अचिक्लिशत् । क्लिश्नन्। क्तत्वासु, “पूक्लिशि- यादिगणः । २६३ भ्य-"|४|४|४५॥ इति वेटि, क्लिष्टः, २ वान् ; क्लिशितः, २ वान् । क्लिटवा; "क्षुध. क्लिश-"||४।३।३१॥ इति कित्त्वे; क्लिशित्वा । क्ले ३ टा, टुम् , टव्यम् ; क्लेशि ३ ता, तुम्, तव्यम् । क्लेशनीयम् । क्लिशिच् उपतापे । क्लिश्यते । क्लिश्यतीति त्वात्मनेपदस्यानित्यत्वज्ञापनात् ।। २५ ॥ अशश भोजने । अश्नाति, अनीतः, अश्नन्ति । अश्यते । हौ, अशान अद्य० ॥ आशीत्, आशिष्टाम् , आशिषुः, आशीः । आशि, आशिषाताम्। आश, आशतुः; आशिथ। आशे। अश्यात्। अशिषीष्ट। आशिता । अशिष्यति । अशिशिषति । "अट्यति-"॥३।४।१०॥ इति यङि, “स्वरादेः-"||४|१४॥ इति श्यद्वित्वे, अश्याश्यते । लुपि तु, अद्वित्वे; आशीति, आष्टि । आशयति चैत्र- मन्नम्; अत्र फलवत्यपि "चल्या."॥३।३।१०८॥ इति परस्मैपदम् । आशिशत् । णिगन्तात्सनि; आशिशयिषति । अश्नन् । अश्नती। अश्यमानम् । अशिष्यन् । "वेयिवद्-"॥५॥२॥३॥ इति वा निपातनाद् भूतमात्रे कसुर्नचेट; अनाश्वान् । पक्षे ऽद्यतन्याम, नाशीत् । आशानम्। आशितः,२ वान् । “भावे चाशितात्"।५।१॥ १३०॥ इति निर्देशात्; आशितस्तृप्तः । अशिवा। प्राश्य । अशि ३ ता, तुम्, तव्यम् ॥ २६ ॥ मुष्श् स्तेये। मुष्णाति, मुष्णीतः, मुणन्ति। मुप्यते। मुष्णीयात्। मुष्येत। मुष्णातु। हो, मुषाण । मुष्यताम् । अमुष्णात्। अमुष्यत । अमोपीत्, अमोपि- प्टाम् । अमोषि, अमोषि ९ पाताम् , पत, प्ठाः, पाथाम्, ध्वम्, ड्ठम्, पि, प्वहि, महि । मुमोष, मुमुपतुः, मुमुपुः, मुमोपिथ; मुमुपिम । मुमुपे। मुष्यात् । मोषिषीष्ट । मोषि २ ता, प्यति । “रुदविद-"॥४।३।३२॥ इति त्तवासनोः कित्त्वे, मुमुषिषति । मोमुप्यते । मोमुषीति, मोमोष्टि, मोमु २ ष्टः, पति । मोमुषिषति । मोषयति । मोप्यते। अमूमुषत् । मुष्णन् । मुष्णती । मोषिप्यन् । मोपिप्यमा- णम् । मुमुष्वान् । मुमुषाणम् । मुषितः, २ वान् । मुपित्वा । प्रमुष्य। मोषि ३ ता, तुम्, तव्यम् । मोषणीयः ॥ २७ ॥ पुषश् पुष्टौ । पुष्णाति । पुष्यते । हौ, पुषाण । अपोपीत्, अपोषिष्टाम् २६४ कियारमसमुच्चयः । पुपोष । पोषिता । एवमयं मुषश्वत्, नवरं क्त्वासनोः “वौ व्यञ्ज-"॥४।३।२५॥ इति वा कित्त्वम् ; पुपुषिषति, पुपोषिषति | पुषित्वा; पोषिला ॥ २८ ॥ कुष्श् निष्कर्षे; बहिष्कर्षणे । कुष्णाति; निकुष्णाति दाडिमम्, तबीजानि पृथक् करोतीत्यर्थः। कर्मकर्तरि शिद्विषये, “कुषिरञ्ज-"॥३।४।७४॥ इति वा परस्मै- पदे श्ये च, कुष्यति पादः स्वयमेव । पक्षे, “एकधातौ-"३।४।८६॥ इति क्ये, आत्मनेपदे च; कुष्यते पादः स्वयमेव । हौ, कुषाण । अकुष्णात् । अको- पीत् । निरःपरात् “निष्कुषः "ere|३९॥ इति वेटि सकि, निरकुक्षत् । पक्षे सिचि; निरकोषीत् । चुकोष । कोषिता । कोषिष्यति । निष्कोक्ष्यति । निष्को- षिष्यति । “वौ व्यञ्जन-"॥४॥३॥२५॥ इति सनो वा कित्त्वे; चुकुषिषति, चुको- षिषति । “उपान्त्ये"।४।३।३४॥ इति कित्त्वे; निश्चुकुक्षति । इटि तु, निश्चु- कुषिषति, निश्चुकोषिषति । निश्चोकुष्यते । निष्कोषयति । निरचूकुषत् । 'क्षुधक्लिश- "॥४।३।३१॥ इति कित्त्वे; कुषित्वा । निष्कुष्य । निष्को २ टा, ष्टुम् ; निष्कोषि २ ता, तुम् । “क्तयोः॥४|४|४०॥ इतीटि; निष्कुषितः, २ वान् ॥ २९॥ वृश् सम्भक्तौ; सम्भक्तिः संसेवा । एषाम्-"॥४।२।९७॥ इतीत्वे; वृणीते । वियते । “इट् सिजाशिषोः-||४|४|३६॥ इति वेटि, "वृत-"||४|४|३५॥ इतीटो वा दीर्धे; अवरिष्ट; अवरीष्ट । पक्षे, "ऋवर्णात् "॥४॥३॥३६॥ इति सिचः कित्त्वे, अवृत । ववे । वरिषीष्ट, वृषीष्ट । वरिता, वरीता। वरिष्यति, वरी- ष्यति । “इवृध-"॥४४॥४७॥ इति वेटि; विवरिषते, विवरीषते, युवूर्षति । वृतः, २ वान् । वृत्वा । एवमयमात्मनेपद एव वृग्वत् ज्ञातव्यः ॥ ३० ॥ इति तपागच्छेशश्रीदेवसुन्दरसूरिशिष्यश्रीगुणरत्नसूरिविरचिते क्रियारत्नसमुच्चये ग्यादिगणः । . Omedoc चुरादिगणः । २६९ अथ चुरादिः। سر चुरण स्तेये। “चुरादिभ्यः-"।।३।४।१७॥ स्वार्थे णिचि, “शेषात् ॥३३॥१०॥ इति परस्मैपदे, चोरयति। णिचो गित्त्वाभावात्फलवकतर्यात्मनेपदं नास्ति। चन्द्रस्तु णिच्यप्युभयपदित्वमाम्नासीत्, णिविकल्पं च । क्ये, चोर्यते। चोरयेत् । चोरयतु, चोरयाणि । अचोरयत् ॥अद्य० ॥“णिश्रि-"॥३।४।५८॥ इति ङ; अचूचुरत् , अचू- चुरताम्, अचूचुरन् ; अचूचुराम। त्रिचि, अचोरि; ब्रिटि, अचोरिषाताम् ; इटि, अचोरयिषाताम्, अचोरिषत, अचोरयिषत;अचोरि ३ ध्वम् , ढ्वम्, ड्वम्, अचो- रयि ३ ध्वम्, ट्वम्, ड्ढ्वम्। “धातोरनेकखर-"॥३।४।४६।। इत्यामि; चोरयाञ्चकार; कृग उभयपदित्वेऽपि, “आमः कृगः"॥३।३।७५॥ इत्यत्र प्राच्यधातुवदिति भणना- नात्रात्मनेपदम् । चोरयाम्बभूव, चोरयामासेत्यादि॥भाक ॥ चोरयां ३ चक्रे, बभूवे, आहे । हं नेच्छन्त्येके॥ चोरयामासे । चोर्यात्। चोरयिषीष्ट, चोरिषीष्ट । चोरयि २ ता, चोरिता । चोरयिष्यति, ते; चोरिष्यते । कर्मकर्तरि 'एधातौ-"३।४।८६॥इति त्रि- क्यात्मनेपदेषु प्राप्तेषुः "णिस्नु."॥३।४।९२॥ इति निचो, “भूषार्थसन्-"॥३।४।९३॥ इति क्यस्य च निषेधादात्मनेपदे, चोरयते । अचूचुरत्। इटि, चोरयिषीष्ट, चोरयिष्यते वा गौः स्वयमेव। ण्यन्ताञिच एव प्रतिषेधात् ञिट् भवत्येव । चोरिषीष्ट; चोरि- प्यते गौः स्वयमेव । सनि, चुचोरयिषति। जिन्तस्यानेकवरत्वान्न यङ्।णिजन्ताण णिगि, चोरयति द्रव्यं पत्तिभिः । डे, “णेरनिटि"॥४।३।८३॥ इति णिजो लुक्यपि णिजात्याश्रयणात् समानलोपित्वाभावात् “उपान्त्यस्य ॥४॥२॥३५॥ इति हस्खे,“लघो र्दीर्घः"॥४।११६४॥ इति पूर्वस्य दीर्घ च, अचूचुरत्। चोरयन्। चोरयन्ती। चोर्यमा- णम् । चोरयिष्यन् । चोरयि २ प्यन्ती, ष्यती। चोरिष्यमाणम् ; चोरयिष्यमाणम् । चोरयां ३ चकृवान् , बभूवान् , आसिवान् । चोरयां ३ चक्राणम् , बभूवानम् , आ- सानम् । “सेटक्तयोः"।।४।३।८४॥ इति णेलुकि; चोरितः, २ वान् । चोरयि ४ वा, ता, तुम् , तव्यम्। चोरणीयम् । चौर्यम् । इह पचुण चितुण् प्रभृतीनां सनकारनिर्दे- शमकृत्वोदित्करणं चुरादिणिचोऽनित्यत्वज्ञापकम् , तेन चोरति चिन्ततीत्यादि सि- इम् । तथा घुषेरविशब्दे इत्यकस्वरादित्यधिकारेण चुरादिपठितस्य विशब्दनार्थस्य

२६६
क्रियारत्नसमुच्चयः ।
घुषेणिजन्तस्यानेकवरत्वादेव इट्प्रतिषेधाभावे सिद्धेऽपि, घुषेरविशब्दे इत्यत्र विश-
ब्दप्रतिषेधाज्ज्ञाप्यते अनित्यश्चुरादिणिजिति; तेन “महीपालवचः श्रुत्वा जुधुषुः
पुष्यमाणवाः" ॥ स्वाभिप्रायं नानाशब्दैराविष्कृतवन्त इत्यर्थः इत्यपि सिद्धम् ।
"चुरादिभ्यो णिच् "॥३।४।१७॥ इत्यत्र बहुवचनमाकृतिगणार्थम् ; तेन संवाहय-
तीत्यादि सिद्धम् । अत्र चुरादौ सर्वत्र सर्वविभक्तिषु सर्ववचनविस्तरो णिगन्तभू-
वदुदाहार्यः ॥ १ ॥
पृण पूरणे । पारयति । क्ये, पार्यते । अपीपरत् । अपारि, अपारिषाताम्,
अपारयिषाताम् । पारयां ३ चकार । पार्यात् । पारयिषीष्ट, पारिषीष्ट । पारयिता
२, पारिता । पारयिष्यति, ते; पारिष्यते । सनि, पिपारयिषति । णिगि,
पारयति । अपीपरत् । पारयन् । पारयिष्यन् । पारितः, २ वान् । पारयि ४ ता, तुम्,
तव्यम्, वा । प्रपार्य ॥२॥
पचुण विस्तारे। नेऽन्ते । प्रपञ्चयति । ङे, प्रापपश्चत् । शेषं चुरण्वत् ॥३॥
पूजण् पूजायाम् । पूजयति, पूजयतः, पूजयन्ति । पूज्यते । अपूपुजत् ।
अपूजि, अपूजिषाताम् , अपूजयिषाताम् । पूजयाञ्चकार ३ । पूज्यात् । पूजयि-
षीष्ट; पूजिपीष्ट। पूजयिता २; पूजिता । पूजयिष्यति, ते; पूजिष्यते । पुपूजयि-
पति । णिगि णिजन्तसदृशमेव रूपं ज्ञेयम्। एवमग्रेऽपि सर्वत्र । पूजयन्। पूजयि-
प्यन् । पूजितः,२ वान् । “ज्ञानेच्छा-"॥५।२।९२॥ इति सति क्ते, "क्तयोरसद-"
॥२।२।९१॥ इति सदर्थस्य वर्जनात्प्रतिषेधाभावे "कर्त्तरि" ॥२२॥८६॥ इति षष्ठ्या.
म् ; राज्ञां पूजितः; "ज्ञानेच्छा-" ॥५।२।९२॥ इति प्रतिषेधान्नात्र षष्ठीसमासः ।
पूजयि ४ वा, तुम् , ता, तव्यम् । पूज्यम् ॥ ४ ॥
गजण शब्दे । गाजयति । अयं तडण्वत् ॥ ५ ॥
तिजण निशाने । तेजयति; उत्तेजयति । अतीतिजत् । तेजयामास ॥६॥
नटण अवस्यन्दने, भ्रंशे । “जासनाट-"॥२२॥१४॥ इति वा कर्मले,
"शेषे”।२।२।८१॥ इति षष्ठ्याम् ; चौरस्योन्नाटयति । शेषं तडण्वत् ॥७॥
चुटु, छुटण् छेदने । नेऽन्ते । चुण्टयति । अचुचुण्टत् ॥ छोटयति। आछो-
टयति । आचुच्छुटत् । आच्छोटयामास ॥ ८ ॥ ९ ॥

चुरादिगणः। कुट्टण कुत्सने च; चाच्छेदने । कुट्टयति । अचुकुट्टत् । कुट्टयामास । कुट्टयिष्यति ॥ १० ॥ मुटण संचूर्णने । मोटयति । मोट्यते । अमूमुटत् । मोटयामास ॥११॥ लुंटण स्तेये च, चादनादरे । लुण्टयति । क्ये, लुण्ट्यते । अत्र णिलुकः स्थानिलेनोपान्त्यत्वाभावान्नलुकोऽप्रसङ्गः । अलुलुण्टत् । लुलुण्टयिषति ॥१२॥ घट्टण चलने । घट्टयति; सङ्घयति । घट्टयते । अजघट्टत् । घट्टयामास । जिघट्टयिषति ॥ १३ ॥ स्फिटण हिंसायाम् । स्फेटयति। स्फेट्यते । अपिस्फिटत् । स्फिटण् अना- दरे इत्यन्ये ॥ १४ ॥ गुठुण वेष्टने । नेऽन्ते । गुण्ठयति । गुण्ठ्यते । अजुगुण्ठत् । क्ते, अव- गुण्ठितः ॥ १५ ॥ लडण उपसेवायाम् । लाडयति । डस्य लत्वे, उपलालयति । अलील- लत् ॥ १६ ॥ ओलडुण उत्क्षेपे। उदित्त्वान्ने; ओलण्डयति । ओलण्ड्यते । औललण्डत् ; "स्वरादेः-॥४१॥ इति द्वितीयस्य द्विलम् । “सेट्क्तयोः॥४॥३८४॥ इति गेलुंकि; ओलण्डितः, २ वान् ॥ १७ ॥ पीडण् गहने; गहनं बाधा । पीडयति; उत्पीडयति । डलयोरैक्ये; पीलयति; उत्पीलयति; उपपीडयति । क्ये, पीड्यते ॥ अद्य० ॥ "भ्राजभास-" ॥४।२।३६।। इति वा हस्खे, अपीपिडत् , अपिपडित् । अपीडि; निंटि, अपीडि- षाताम् ; इटि, अपीडयिषाताम् । पीडयाञ्चकार ३ । पीड्यात् । पीडिपीष्ट; पीड. यिषीष्ट। पीडयिष्यति, ते; पीडिष्यते । सनि, पिपीडयिषति । पीडयन् । पीड- यन्ती । पीडयिष्यन् । पीडयाञ्चकृवान् । पीडितः,२ वान् । पीडयित्वा। प्रपीड्य। पीडयि ३ ता, तुम्, तव्यम्। पीडनीयम् । पीड्यम् ॥ १८ ॥ तडण आघाते । ताडयति । ताड्यते । अतीतडत् । अताडि, अताडिषा- ताम् , अताडयिषाताम् । ताडयाञ्चकार ३। ताड्यात् ।ताडिपीष्ट, ताडायपीष्ट । ताडयिष्यति, ते; ताडिप्यते । तिताडयिषति । ताडितः, २ वान् । ताडयित्वा । प्रताड्य । ताडयि ३ ता, तुम्, तव्यम्। ताड्यः ॥ १९ ।।

२६८
क्रियारत्नसमुच्चयः।
उदितः पञ्च॥ खडुण भेदे। खण्डयति । अचखण्डत् । खण्डयिष्यति ॥२०॥
कडुण् खण्डने च; चाहेदे । कण्डयति तण्डुलान् । कण्ड्यते । अच-
कण्डत् ॥ २१ ॥
गुडुण वेष्टने च; चादक्षणे । गुण्डयति। अवगुण्ड्यते। अजुगुण्डत् ॥२२॥
मडुण् भूषायाम् । मण्डयति। मण्ड्यते । अममण्डत् । मण्डयाञ्चकार ३ ।
मण्डयिष्यति, ते; मण्डिप्यते । कर्मकर्त्तरि, “एकधातौ-"॥३।४।८६॥ इति त्रि-
क्यात्मनेपदेषु प्राप्तेषु ण्यन्तत्वेऽपि भूषार्थत्वेन “भूषार्थ-"॥३।४।९३॥ इति निक्ययो-
निषेधात्; अममण्डत् कन्यां छात्रः ।अममण्डत । मण्डयिष्यते मण्डयते वा कन्या
खयमेव। मिमण्डयिषति ॥ २३ ॥
पिडुण सङ्घाते । पिण्डयति । पिण्ड्यते । अपिपिण्डत् ॥ २४ ॥
ईडण् स्तुतौ। ईडयति । ईड्यते। उ, ऐडिडत्। ईडयामास ३। ईडयिष्यति,
ते; ईडिष्यते । ऐडयिष्यत्, ऐडिष्यत । ईडिडयिषति । ईडितः, २ वान् ।
ईडयि ३ वा, ता, तुम् ॥ २५ ॥
चूर्णण प्रेरणे; दलने । चूर्णयति । अचुचूर्णत् ॥ २६ ॥
श्रणम् दाने। श्राणयति; विश्राणयति । विनाण्यते । अशिश्रणत् ; अश-
श्राणत्; "भ्राजभास-"॥४॥२॥३६॥ इति वा ह्रस्वः । अश्राणि, अश्राणिषाताम्,
अश्राणयिषाताम् । श्राणयाञ्चकार ३। श्राण्यात् । श्राणयिषीष्ट, श्राणिषीष्ट ।
श्राणयिता २; श्राणिता । श्राणयिष्यति, ते; श्राणिष्यते । विशिश्राणयिषति ।
श्राणयन् । श्राणयिष्यन् । विश्राणितः, २ वान् । श्राणयित्वा । विश्राण्य ।
श्राणयि ३ ता, तुम् , तव्यम् ॥ २७॥
चितुण् स्मृत्याम् । नेऽन्ते । चिन्तयति । चिन्स्यते । अचिचिन्तत्। अचि-
न्ति, अचिन्तिषाताम्, अचिन्तयिषाताम् । चिन्तयाञ्चकार ३ । चिन्त्यात्। चि.
न्तयिषीष्ट, चिन्तिषीष्ठ । चिन्तयिता २; चिन्तिता । चिन्तयिष्यति, ते; चिन्ति.
प्यते। चिचिन्तयिषति । चिन्तयन् । चिन्तयिष्यन् । चिन्तयांबभूवान् ३ । चिन्ति.
तः, २ वान् । चिन्तयित्वा । विचिन्त्य । चिन्तयि ३ ता, तुम्, तव्यम् । चि.
न्त्यम् ॥ २८ ॥

२६९ चुरादिगणः । कृतण संशब्दने; ख्यातौ। “कृतः कीर्तिः"।४।४।१२२॥ कीर्तयति; सङ्कीर्त- यति; परिकीर्त्तयति, कीर्तयतः, कीर्तयन्ति । कीर्त्यते । कृत ऋदुपदेशो डे ऋकार श्रवणार्थः, तेन “ऋवर्णस्य" ॥४॥२॥३७॥ इति कील्देशापवादे ऋतो वा ऋति, अचीकृतत्, अचिकीर्त्तत् । चन्द्रमतेन णिजन्तस्य कर्त्तर्यात्मनेपदे; अचीकृतत, अचिकीर्तत० ३ । अचीकृते, अचिकीर्ते । अकीर्ति, अकीर्ति- पाताम्, अकीर्तयिषाताम् । कीर्तयाञ्चकार ३ । कीर्त्यात्। कीर्तयिषीष्ट, कीर्ति- षीष्ट। कीर्तयिता। कीर्तयिष्यति । चिकीर्त्तयिषति। कीर्तितः,२ वान्। कीर्तयि ४ खा, ता, तुम्, तव्यम् ॥ २९ ॥ पथुण् गतौ । ने, पन्थयति; परिपन्थयति । पन्थ्यते । पर्यपपन्थत् ॥३०॥ प्रथण प्रख्याने । प्राथयति । प्राथ्यते । “स्मृदृत्वर-" ॥४॥१॥६५॥ इति पूर्व- स्यात्वे; अपप्रथत् । अप्राथि । प्राथयाञ्चकार । शेषं श्रणण्वत् ॥ ३१ ॥ छदण् संवरणे । छादयति गृहं तृणैः । छाद्यते । अचिच्छदत् । अच्छा- दि । चिच्छादयिषति। "णौ दान्त"॥४।४।७४॥ इति ते वा निपातनात्, छन्नः; छादितः। शेषं श्रणवत् । अदन्तोऽप्ययमित्येके । छदयति ॥ ३२ ॥ चुदण् संचोदने; नोदने । चोदयति । य एच्च-"॥५॥१॥२८॥ इति ये; चोद्यम् ॥ ३३ ॥ छर्दण् वमने । छर्दयति । अचछर्दत् ॥ ३४ ॥ बन्ध, बधण संयमने । बन्धयति ॥बधण् ॥बाधयति। डे, अबीबधत् ॥३५॥३६॥ यमण परिवेषणे । यामयत्यतिथीन् । अयीयमत् । यामयामास । परिवे. षणादन्यत्र तु, “यमोऽपरि-"॥४।२।२९॥ इत्यत्र णिचि च इति इखे, यमयति; नियमयति; संयमयति । अयीयमत् । ञिणम्परे तु वा दीर्घः; अयामि, अयमि । यमयामास ॥ ३७ ॥ यत्रुण सङ्कोचने । उदित्त्वान्ने; यन्त्रयति; नियन्त्रयति । न्यययन्त्रत् । न्ययन्त्रि । नियन्त्रयामास ॥ ३८ ॥ क्षलण शौचे; शौचकर्मणि । क्षालयति; प्रक्षालयति । क्षाल्यते । अचिक्ष- लत् । अक्षालि । क्षालयामास । क्षालितम् । क्षालयित्वा । शेषं श्रणण्यत् ॥३९॥ " २७० क्रियारत्नसमुच्चयः। तुलण उन्माने । तोलयति; धुरण्वत् । तुलयतीति तु तुलाशब्दाद् "णिज्बहुलम्-"॥३।४।४२॥ इति णिजि रूपम् ॥ ४० ॥ दुलण उत्क्षेपे । दोलयति। शेषं चुरण्वत् । अन्दोलयतीति तु रूढेः; यथा प्रेढोलयति; वीजयति ॥ ४१ ॥ मूलण रोहणे । मूलयति; उन्मूलयति । पूजण्यत् ॥ ४२ ॥ बुलण निमज्जने । बोलयति । बोल्यते । अबूबुलत् । बोलितम्। बोलयि- ३ खा, ता, तुम् ॥ ४३ ॥ पलण् रक्षणे । पालयति । प्रतिपर्यनुपूर्वोऽपि वाच्यः । अपीपलत् । अयं तडण्वत् ॥ ४४ ॥ इलण् प्रेरणे । एलयति । "उपसर्गस्यानिण." ॥१।२।१९॥ इत्यवर्णलोपे, प्रेलयति, परेलयति । प्रेल्यते। उ ऐलिलत । प्रेलयामास ३ । प्रेलयिष्यति॥४५॥ सांत्वण सामप्रयोगे । सान्त्वयति । अससान्त्वत् । अषोपदेशात् “णिस्तो. रेव-"॥२॥३॥३७॥ इति षत्वाभावे; सिसान्त्वयिषति । षोपदेशोऽयमित्येके । मिषा- न्वयिषति ॥ ४६॥ पुंसण अभिमर्दने । पुंसयति । क्ते, उत्पुंसितम् ॥ ४७ ॥ जसण् हिंसायाम् । “जासनाट-"॥२२॥१४॥ इति कर्मणो वा कर्मत्वे, चौरस्य चौरं वोज्जासयति ॥ ४८ ॥ भक्षण अदने । भक्षयति । णिगि “भक्षेहिसायाम्"॥२।२।६॥ इत्यणिकर्तुः कर्मत्वे, भक्षयति गौर्यवान् । भक्षयति गां यवान् मैत्रः; अत्र यवानां प्ररोहधर्म- वेन हिंसाऽस्त्येव । हिंसाया अन्यत्र, “गतिबोध-"||२।२।५॥ इति प्राप्तमपि कर्मवं न भवतीति “हेतुकर्तृ.॥२२॥४४॥ इति तृतीयायाम् ; भक्षयति पिण्डी शिशुना मैत्रः ॥ ४९ ॥ लक्षीण दर्शनाङ्कनयोः; अङ्कन चिह्नम् । फलवत्कर्त्तर्यात्मनेपदे, लक्षयते । फलवतोऽन्यत्र; लक्षयति; उपलक्षयति । लक्ष्यते । अललक्षत् ॥ ५० ॥ इतोऽर्थविशेष आलक्षिणः । इतः परं प्रायः प्रागुक्ता अप्यर्थविशेषे ये लक्षिण पर्यन्ताश्चुरादयस्ते प्रस्तूयन्ते ॥

चुरादिगणः ।
२७१
ज्ञाण मारणादिनियोजनेषु। “मारणतोषण-"॥४॥२॥३०॥ इति हवे; मारणे,
संज्ञपयति पशुम् । तोषणे, विज्ञपयति गुरुम् ; ज्ञपयति । निशाने, प्रज्ञपयति
शस्त्रम् । नियोजने, आज्ञापयति भृत्यम् ; अत्र मारणाद्यर्थाभावान्न हूस्खः । उक्ता.
थेभ्योऽन्यत्र तु, क्रयादित्वाच्छ्ना; जानाति । क्ये, विज्ञप्यते;आज्ञाप्यते। व्यजिज्ञ.
पत्; आजिज्ञपत्। व्यज्ञपि; व्यज्ञापि, अज्ञापि। इटि, व्यज्ञपयिषाताम् ;आज्ञापयिषा.
ताम् । ब्रिटि, व्यज्ञपिषाताम् , व्यज्ञापिषाताम् , आज्ञापिषाताम् । विज्ञपयाञ्चकार ३;
आज्ञापयाश्चकार ३। विज्ञप्यात् ; आज्ञाप्यात्। ज्ञपयिषीष्ट, ज्ञापयिषीष्ट; ज्ञपिषीष्ट,
ज्ञापिषीष्ट । ज्ञपयिता, ज्ञापयिता; ज्ञपिता, ज्ञापिता । विज्ञपयिष्यति, ते;
आज्ञापयिष्यति, ते । ब्रिटि, विज्ञपिष्यते; आज्ञापिष्यते । “इवृध-॥४४॥४७॥ इति
वेटि, जिज्ञपयिषति। पक्षे, “ज्ञप्याप-"॥४।१।१६॥ इति ज्ञीपि, ज्ञीप्सति । ज्ञापेस्तु,
जिज्ञापयिषति । “णौ दान्त "४४७४॥ इति वा निपातनात् ; ज्ञप्तः, २ वान् ;
विज्ञप्तः,२ वान ;आज्ञप्तः, २ वान् ; ज्ञपितः, २ वान ; विज्ञपितः,२ वानः आज्ञापितः,२
वान्। विज्ञपय्य ।आज्ञाप्य। विज्ञपयि ३ ता, तुम्, तव्यम्;आज्ञापयि ३ ता, तुम्, तव्य-
म् । संज्ञपयतीत्यत्र ज्ञाण्ज्ञांशोणिचि णिगि च रूपसाम्येऽप्यर्थभेदोऽस्ति, एकत्र स्वा-
र्थोऽन्यत्र प्रयोक्तृव्यापारः। ज्ञाण हि प्रथममेव स्वार्थे मारणे वर्त्तते; अन्यस्तु प्रथम
मरणे ततो मारणे इत्यर्थः । एवं विज्ञपयतीत्यादावपि ॥ ५१ ॥
भूण अवकल्कने; मिश्रीकरणे । दनौदनं भावयति । अवकल्पन इत्यन्ये ।
भावयति साधुः समयम् । क्ये, भाव्यते॥ अद्य० ॥ अबीभवत् । अयं सर्वोऽपि
णिगन्तभूवत् ॥ ५२ ॥
लिगुण चित्रीकरणे । नेऽन्ते । लिङ्गयति शब्दम् । स्त्रीपुंनपुंसकलिङ्गैश्वित्री-
करोतीत्यर्थः । उल्लिङ्गयति । उदलिलिङ्गत् ॥ ५३ ॥
चर्चण अध्ययने । चर्चयति शास्त्रम् । अचचर्चत् । अन्यत्र चर्च्परिभा-
षणे इति केचित् । चर्चति ॥ ५४ ॥
चट, स्फुटण् भेदने। चाटयति; उच्चाटयति। अयं तडण्वत् । णिचोऽनि-
त्यत्वाच्चटति दोलायाम ; उच्चटति चित्रम् ; विचटति ॥ स्फोटयति । स्फोट्यते ।
अपुस्फुटत् । आस्फोटयाञ्चकार । अर्थान्तरे तु स्फुट्ट विशरणे । स्फोटति । स्फुटि
विकसने । स्फोटते । स्फुटत् विकसने । स्फुटति ॥ ५५ ॥ ५६ ॥

२७२
क्रियारत्नसमुच्चयः।
घटण् सङ्घाते । घाटयति; उद्घाटयति। उद्घाटितः कपाटः। उद्घाटनम् ।
अयं तडण्वत् । अर्थान्तरे तु, घटिष् चेष्टायाम् । घटते । णिगि घटादित्वात्
इस्खे, घटयति ॥ ५७ ॥
हन्त्यर्थाश्च येऽन्यत्र हिंसार्थाः पठ्यन्ते तेऽप्यत्र चुरादौ वेदितव्याः; तेन
णिज्शवादिकं कार्य भवति ॥ हनं हिंसागत्योः। घातयति । हिसु, तृहप् हिंसा-
याम् । हिंसयति । तर्हयति । तत्तद्गणपाठसामर्थ्यात्तु हन्ति; हिनस्ति; तृणेढी-
त्यादयोऽपि अनेनैव सिद्धेऽन्येषां हिंसार्थानां चुरादौ पाठ आत्मनेपदादिगत-
रूपभेदार्थः ॥ ५८ ॥
यतण निकारोपस्कारयोः; निकारः खेदनम् । यातयत्यरिम् । निर्यातयति
वैरम् । “णिवेत्ति-"॥५॥३।१११॥ इत्यने; यातना तीव्रव्यथा। उपस्कारे, यातयति
दरिद्रो नरः परस्य धनम् । यातयति छिद्रं राजा; प्रच्छादयतीत्यर्थः । प्रतियातयति,
प्रतिबिम्बयतीत्यर्थः । अर्थान्तरे, यतैङ् प्रयत्ने । यतते ॥ ५९ ॥
निरश्च प्रतिदाने ।निरः परोयतिः प्रतिदानेऽर्थे चुरादिः । निर्यातयति ऋणं,
शोधयतीत्यर्थः ॥ ६ ॥
ष्वदण आस्वादने। खादयति । खाद्यते । षपाठात् “नाम्यन्त-"॥२॥१॥१५॥
इति थे, असिष्यदत् । सिष्वादयिषति । अर्थान्तरे तु, ष्वदि आवादने । मैत्राय
वदते दधि ॥ ६१ ॥
आखदः सकर्मकात् । आपूर्वात् स्वदतेः सकर्मकात् णिज् भवति न
पुनरकर्मकात; आस्वादयति यवागूम् ॥ ६२ ॥
मुदण् संसर्गे। मोदयति सक्तून् सर्पिषा । मोदयत्युष्णा आपः शीता-
भिरहिः, उभयत्र संसृजतीत्यर्थः ॥ ६३ ।।
कृपण अवकल्कने; अवकल्कनं मिश्रीकरणम् सामर्थ्य च । कल्पयति ।
अवकल्पन इत्यन्ये । कल्पयति वृत्तिं राजा । अर्थान्तरे तु, कृपौङ् सामर्थ्ये ।
कल्पते ॥ ६४ ॥
चरण असंशये । विचारयति अर्थान् । अन्ये तु, चरण संशये इति
पठन्ति; सति हि संशये विचारणेत्याहुश्च । विचार्यते । व्यचीचरत् । व्यचारि,
व्यचारिषाताम् ; व्यचारयियाताम् । विचारयाञ्चकार ॥ ६५ ॥

चुरादिगणः । २७३ धुषण विशब्दने; विशिष्टशब्दकरणे, नानाशब्दने वा । घोषयति । अविशब्दन इत्येके । अपघोषयति पापम् , अपहृत इत्यर्थः। ऋदित्करणं चुरादि णिचोऽनित्यत्वे लिङ्गम् ; तेन “ऋदिच्छि-॥३।४।६५॥ इति वा अङि, अघुषत्। पक्षे, अघोषीत् । घोषति; जुघुपुः इति विशब्दनेऽपि भवति । अर्थान्तरे तु, घुष- शब्दे । घोषति ॥ ६६ ॥ भूष, तसुण् अलङ्कारे । भूपयति कन्याम् । अबूभुषत्कन्यां चैत्रः। अबूभुषत। भूषयिष्यते; भूषयते कन्या स्वयमेव । अत्र ण्यन्तत्वेऽपि भूषार्थत्वेन, “भूषार्थ-' ॥३।४।९३॥ इति निझिटक्यानां निषेधादात्मनेपदमेव॥तसु॥ नेऽन्ते । तंसयति; उत्तंसयति ॥ ६७ ॥ ६८ ॥ त्रसण वारणे । त्रासयति मृगान् ; निराकरोतीत्यर्थः ॥ १९ ॥ अर्हण पूजायाम् । अर्हयति । हे, आजिहत् ॥ ७० ॥ अथ वर्णक्रमेण भासार्थाः॥ लोक, तर्क, लघु, लोच, अजु, पिजु, भजु, लुट, वृत, वृध, गुप, धूप, कुप, दशु, वृहुण भासार्थाः। एते १५ भासार्थाः। लोकयति; विलो- कयति ।ऋदित्त्वादुपान्त्यस्य हस्खाभावे, अलुलोकत्०;अलुलोकाम।अन्यत्र लोकृङ् दर्शने।लोकते॥तर्क॥तर्कयति । ते, तर्कितः । गणान्तरेप्वपठिता अप्यत्र दण्डके पाठात् धातव एवेत्यर्थान्तरे; तर्कयति॥लघु॥नेऽन्ते।लङ्घयति; उल्लङ्घयति। अन्यत्र लघुङ् गतौ । लङ्घते ॥ लोचू ॥ लोचयति; आलोचयति; पर्यालोचयति । ऋदि- त्वान्न उपान्त्यहवः । अलुलोचत् । अन्यत्र, लोचङ् दर्शने। लोचते ॥ अथ त्रय उदितः॥ अजु ॥ अञ्जयति । अन्यत्र, अाप व्यक्त्यादौ । व्यनक्ति० ॥ पिजु ॥ पिञ्जयति । अस्य चुरादौ पिजुण हिंसाबलदाननिकेतनेप्विति प्राग् पाठेऽप्यत्र पुनः पाठोऽर्थविशेपार्थः, आत्मनेपदार्थः, सकर्मकार्थश्च । पिञ्जयते । अन्यत्र, पि- जुकि संपर्चने । पिते ॥ भजु ॥ भञ्जयति । अन्यत्र, भोप आमर्दने । भनक्ति । ॥ लुट् ॥ लोटयति ।अन्यत्र, लुटि प्रतीघाते। लोटते । लुटच् विलोटने । लुट्य- ति ॥ वृत ॥ वर्त्तयति। अनेकार्थत्वे तु, वर्त्तयति कुटुम्बं वाणिज्येन । प्रवर्त्तयति स्वेच्छया। परिवर्त्तयति वस्त्रम् । उद्वर्त्तयति अङ्गम् । अन्यत्र, वृतूङ वर्तते ॥ वृध ॥ वर्द्धयति । अन्यत्र, वृधू वईने। वईते ॥ गुप॥ गोपयति । ॥ ॥ वर्तने । ३६ २७४ क्रियारत्नसमुच्चयः। अन्यत्र, गुपौ रक्षणे । गोपायति॥ धूप ॥ धूपयति । अन्यत्र, धूप सन्तापे । धूपायति ॥ कुप् ॥ कोपयति । अन्यत्र, कुपच् कोपे । कुप्यति ॥ हाधुदितौ ॥ दशु॥ दंशयति । अन्यत्र, दंशं दशने । दशति ॥ वृहु ॥ वृहयति; उपवृंहयति । अन्यत्र, वृहु शब्दे च । बृंहति । लोकृतर्कादयः स्वार्थे णिचमुत्पादयन्ति । भासार्थश्चेति पारायणम् । भासयति दिशः; दीपयति; इन्धयति; प्रकाशयति । गणान्तरपाठस्त्वेषामात्मनेपदादिकार्यार्थः ॥७१॥७२॥७३॥७९॥७५॥७६।७७॥७॥ ७९॥८०॥८१॥८२॥८३॥८४॥८५॥ इति परस्मैपदिनः। वंचिण प्रलम्भने; मिथ्याफलाख्याने । वञ्चयते । अववश्चत । अन्यत्र, वञ्चू गतौ । वञ्चति । इदित्त्वादेव णिजन्तादात्मनेपदे सिद्धे, “प्रलम्भे गृधिवश्ः” ॥३।३।८९।। इति तद्विधानं णिगन्तादफलवत्कर्बर्थम् ॥ ८६ ॥ विदिण् चेतनाख्याननिवासेषु। चेदयते सुखम्, चेतयत इत्यर्थः ।आवेदयते धर्मम्, आख्यातीत्यर्थः । वेदयते गृहम्, निवासं करोतीत्यर्थः । विवादेऽप्यन्ये । प्रवेदयते वादिना । अन्यत्र, विदक् ज्ञाने । वेत्ति । विदिच् सत्तायाम्। विद्यते । विद्लंती लाभे । विन्दति । विन्दते । विदिप विचारणे । विन्ते ॥ ८७ ॥ मनिण् स्तम्भे; गर्वे । मानयते; विमानयते; अपमानयते । पक्षे, मन- तीति चन्द्रः ॥ ८८ ॥ भलिण आभण्डने; निरूपणे । भालयते; निभालयते; संभालयते । अन्यत्र, भलि परिभाषणहिंसादानेषु । भलते । बभले । भलिता ॥ ८९ ॥ कुत्सिण अवक्षेपे । कुत्सयते । अचुकुत्सत ॥ ९ ॥ लक्षिण आलोचने । लक्षयते। अन्यत्र, लक्षीण दर्शनाङ्कनयोः।लक्षयति, ते । णिचोऽनित्यत्वात्, लक्षते ॥ ९१ ॥ इत्यर्थविशेषे चुरादयः । तर्जिण संतर्जने । तर्जयते । यत्तु लक्ष्ये, तर्जयति; भर्त्सयति; निशाम-

चुरादिगणः।
यति; भालयति; कुत्सयति; निवेदयतीत्यादिपरस्मैपदं दृश्यते; तम्यादौ राजग,
टुभ्राजीत्यत्रात्मनेपदस्यानित्यत्वज्ञापनात् सिद्धम् ॥ ९२ ॥
त्रुटिण् छेदने । त्रोटयते रज्जुम् । डान्तोऽयमित्येके । उबोडयते तृणम् ।
त्रुटत् छेदने । त्रुट्यति, त्रुटति ॥ ९३ ॥
चितिण संवेदने । चेतयते । अचीचितत ॥ ९४ ॥
गन्धिः अर्दने । गन्धयते ॥ ९५ ॥
शमिण आलोचने । “यमो परिवेषणे-'।४।२।२९॥ इत्यत्र णिचि चेति वच.
नात् यमोऽन्येषां णिचि न हवः । शामयते; निशामयते । न्यशीशमत ।न्यशामि।
"णौ दान्त-"॥४४॥५४॥ इति क्ते वा निपातनात् , शान्तः; "सेटक्तयोः॥४॥३॥८॥
इति गेलुंकि, शामितः । शमून् उपशमे । शाम्यति । णिगि, “शमोऽदर्शने"
॥४।२।२८॥ इति अदर्शने; शमयति रोगम् ॥ ९६ ॥
गुरिण उद्यमे । गूरयते; उद्रयते खड्गम् ; आगूरयते ॥ ९७ ॥
मन्त्रिण गुप्तभाषणे । मन्त्रयते; आमन्त्रयते; निमन्त्रयते ॥ ९८ ॥
ललिण ईप्सायाम् । लालयते ॥ ९९ ॥
दंशिण दशने । दंशयते ॥ १० ॥
भर्सिण संतर्जने । भर्सयते । आत्मनेपदानित्यत्वे तु, भर्सयतीत्यपि ।
अबभर्सत ॥ १०१ ॥
इत्यात्मनेपदिनः ।
इतोऽदन्ताः॥अदन्तवे हि सुखयति, रचयति इत्यत्राल्लुकः स्थानित्वाद्गुण-
वृद्ध्यभावः। अररचत् । असुसुखत् ; अत्र समानलोपित्वात्सन्वहावदीर्घयोरभावः।
असुसूचत्; अत्रोपान्त्यहूस्खाभावः । अङ्कादीनां तूक्तफलाभावेऽपि पूर्वाचार्या-
नुरोधेनादन्तेषु पाठः । णिजभावेऽनेकस्वरत्वात् यनिवृत्त्यर्थ इत्येके । द्रमिला-
स्वेवंप्रकाराणामदन्तत्वविधानसामर्थ्यादल्लोपाभावं मन्यन्ते । ततश्च “णिति"॥४॥
३१५०॥ इति वृद्धौ प्वागमे च; दुःखापयति; वण्टापयति; रहापयति; अर्था-
पयते; सत्रापयते; गर्वापयते इत्याद्युदाहरन्ति; ते हि "णिति"॥४॥३॥५०॥
इति वृद्धि स्वरमावस्येच्छन्ति ॥ १०२ ॥

२७६
क्रियारत्नसमुच्चयः ।
अङ्कण लक्षणे । अङ्कयति । उ " स्वरादेः- "॥१४॥ इति केर्डिले,
आश्चिकत् । सनि, अश्चिकयिपति । अकुङ् लक्षणे । अङ्कते ॥ १०३ ॥
सुख, दुःखण् तक्रियायाम् ; सुखनं दुःखनं च, तकिया। मुखयति ।
असुसुखत् । दुःखयति । अदुदुःखत् ॥ १०४ ॥
रचण् प्रतियत्ने । रचयति; विरचयति । क्ये, रच्यते । अररचत्, अररच-
ताम्, अररचन् । अरचि । त्रिटि, अरचिपाताम् । इटि, अरचयिषाताम् ।
रचयाश्चकार ३ ॥ भाक ॥ रचयाञ्चक्रे ३ । रच्यात् । रचिषीष्ट; रचयिषीष्ट ।
रचयिता २, रचिता । रचयिष्यति, ते; रचिष्यते । रिरचयिषति । रचयन् । रच-
यन्ती । रच्यमानम् । रचयिष्यन् । रचिप्यमाणम् ; रचयिष्यमाणम् । रचयाञ्च-
कृवान् , बभूवान् , आसिवान् वा ॥ भाक॥ रचयाञ्चक्राणम् , बभूवानम् ,आसानं
वा। रचितः,२ वान् । रचयिला । “लघोर्यपि"॥४॥३॥८६॥ इति णेरयि; विरचय्य।
रचयि ३ ता, तुम् , तव्यम् । रचनीयम् । रच्यम्। एवं सर्वेऽप्यदन्ताः॥१०५॥
सूचण पैशुन्ये । सूचयति। सूच्यते।अषपाठान्न पः। असुसूचत । असूचि ।
सूचयाञ्चकार ३ । सुसूचयिपति। “अट्यति ॥३।४।१०॥ इति यङि, सोसूच्यते ।
अषोपदेशान्न षत्वम् । एवं सूत्रादीनामपि । संसूच्य । सूचयित्वा ॥ १०६ ।।
भाजण् पृथकर्मणि । भाजयति; विभाजयति; अवभाजयति। भाज्यते ।
अबभाजत् । अभाजि । भाजयामास । भाजितम् । भाजयि ३ ता, तुम् , त्वा।
विभाज्य ॥ १०७ ॥
सभाजण प्रीतिसेवनयोः। प्रीतिदर्शनयोरित्यन्ये । सभाजयति। क्ये, सभा.
ज्यते। डे, अससभाजत् । असभाजि । सभाजयामास । सभाजयिष्यति॥१०८॥
खोटण क्षेपे । खोटयति । ङे, अचुखोटत् । डान्तोऽयमिति देवनन्दी ।
खोडयति । दान्त इत्यन्ये । खोदयति ॥ १०९ ॥
दण्डण् दण्डनिपातने । दण्डयति । दण्डादेनाम्नो णिचि, दण्डय-
त्यादिसिहौ दण्डण प्रभृतीनां पाठो यथाविधानं णिचं विनाऽपि प्रयोगार्थः ।
अत एवादन्तलस्याप्यनेकस्वरत्वेन परोक्षामादेशो यनिवृत्त्यादि च
कलम् ॥ ११०॥

२७७ चुरादिगणः । वर्णण वर्णक्रियाविस्तारगुणवचनेषु । वर्णक्रिया वर्णनम्, वर्णकरणं वा । कथं वर्णयति कविः । सुवर्ण वर्णयति। विस्तारे वर्णनेयम् । गुणवचनं स्तुतिः, शुक्लायुक्तिर्वा । राजानमुपवर्णयति । D, अबवर्णत् ॥ १११ ।। कर्णण भेदे । कर्णयति; आकर्णयति । आचकर्णत् ॥ ११२ ॥ गणण संख्याने । गणयति; अवगणयति; परिगणयति । गण्यते । , "ई च गणः॥४।१।६७॥ इति पूर्वस्यावे, ईतिच; अजगणत्; अजीगणत्। अगाण। गणयित्वा । प्रगणय्य । शेषं रचण्वत् । अदन्तवं च सुखादीनां णिच्सन्नि- योग एवान्ते वक्ष्यते, ततोऽनित्यत्वेन णिजभावे, जगणतुः; जगणिथेत्यत्रानेक- स्वरत्वाभावादाम् न भवति ॥ ११३ ॥ ११४ ॥ गुण, केतण आमन्त्रणे; आमन्त्रणं गूढोक्तिः। गुणयति । अजुगुणत् । अगु- णि । गुणयाश्चकार ३ । गुण्यात् । गुणयिषीष्ट; गुणिषीष्ट । गुणयिष्यति, ते; गुणिष्यते । जुगुणयिषति । एवं रचण्वत् ॥ केतयप्ति; सङ्केतयति । अँ, अचि. केतत् । सङ्केतितः। सङ्केत्य । अयं निःस्रावणनिमन्त्रणयोरपीत्येके ॥ ११५ ॥ पतण् गतौ वा । वा शब्दो णिजदन्तत्वयोर्युगपद्विकल्पार्थः। पतयति । ङ, अपपतत् । पक्षे, पतति । “व्यञ्जनादेः-॥४।३।४७॥ इति वा वृद्धौ, अपातीत्, अपतीत् ॥ ११६ ॥ कथण वाक्यप्रबन्धे । कथयति; संकथयति । क्ये, कथ्यते । ङ, अच- कथत् । कथं अचीकथदिति । ये गणयतेरन्येषामपि च पूर्वस्य यथादर्श- नमीत्त्वमिच्छन्ति तन्मते भविष्यति; प्रकृत्यन्तरं वाऽन्वेष्यम् । अकथि, अक- थिषाताम् ; अकथयिषाताम् । कथयाञ्चकार ३ । कथयिष्यति, ते; कथि- प्यते । कथयित्वा । "लघो:-"॥४।३।८६॥ इति णेरयि, संकथय्य । एवं रच- ण्यत् ॥ ११७॥ छेदण द्वैधीकरणे । छेदयति; विच्छेदयति। छेद्यते। अचिच्छेदत्। अच्छे- दि, अच्छेदिपाताम् , अच्छेदयिषाताम् । छेदयाञ्चकार । छेदयिष्यति, ते; छेदि- प्यते । चिच्छेदयिपति । छेदितम्। छेदयित्वा । विच्छेद्य ॥ ११८ ॥ रूपण रूपक्रियायाम् ; रूपक्रिया राजमुद्रादिरूपस्य करणम् । रूपयति ।

२७८ क्रियारत्नसमुच्चयः । रूपदर्शनं वा रूपकिया । निरूपयति; प्ररूपयति । निरूप्यते । प्रारुरूपत् । प्रारूपि । प्ररूपयामास ३ । प्ररूपितः । प्ररूप्य ॥ ११९ ।। क्षपण प्रेरणे । क्षपयति । क्षप्यते । अचक्षपत् । अक्षपि, अक्षपिषाताम् ; अक्षपयिषाताम् । क्षपयामास । क्षप्यात् । क्षपयिष्यति, ते; क्षपिष्यते । चि- क्षपयिषति । क्षपितः । क्षपयित्वा ॥ १२० ॥ व्ययण वित्तसमुत्सर्गे; त्यागे । व्यययति । व्यय्यते । ङे, अवव्ययत् । अव्ययि, अव्ययिषाताम् ; अव्यययिषाताम् । व्यययामास । विव्ययिषति ॥१२१॥ सूत्रण विमोचने; विमोचनं मोचनाभावो ग्रन्थनमिति यावत् । सूत्र- यति । सूत्र्यते। ङे, असुसूत्रत् । असूत्रि। सुसूत्रयिषति । “अट्यत्ति-"॥३४॥१०॥ इति यङि, सोसूच्यते ॥ १२२ ॥ मूत्रण प्रस्रवणे । मूत्रयति । अमुमूत्रत् । “अट्यर्ति-"॥३॥१०॥ इति यङि, मोमूत्र्यते ॥ १२३ ॥ पार, तीरण कर्मसमाप्तौ । पारयति । पार्यते । अपपारत् । अपारि । पिपारयिषति । पारितम् ॥ तीरयति । तीर्य्यते । अतितीरत् ॥१२४ ॥ १२५ ॥ चित्रण चित्रक्रियाकदाचित्दृष्ट्योः । चित्रयति; आलेख्यं करोति, कदा- चित्पश्यति चेत्यर्थः । वैचित्र्यकरणार्थोऽयं, न चित्रक्रियार्थ इत्यन्ये । चित्रयति; वैचित्र्यं सम्पादयतीत्यर्थः। अचिचित्रत् । चित्रितम् ॥ १२६ ॥ छिद्रण भेदे । छिद्रयति । डे, अचिच्छिद्रत् ॥ २२७ ॥ मिश्रण संपर्चने, श्लेषे । मिश्रयति । डे, अमिमिश्रत, अमिश्रि । मि. श्रयाञ्चकार ३। मिमिश्रयिषति ॥ १२८ ॥ कलण् सङ्ख्यानगत्योः। कलयति; सङ्कलयति; आकलयति। कल्यते। उ, अचकलत । रचण्वत् ॥ १२९॥ शीलण उपधारणे, अभ्यासे, परिचये वा। शीलयति; परिशीलयति । , अशिशीलत् । शील समाधौ । शीलति । णिगि डे, अशीशिलत् ॥ १३० ॥ गवेषण मार्गणे । गवेषयति। गवेष्यते। ङे, अजगवेषत्। अगवेषि, अग- चुरादिगणः। २७९ वेषिषाताम् , अगवेषयिषाताम् । गवेषयाञ्चकार । गवेषितः। गवेषयित्वा। गवे- षणम् ॥ १३१॥ मृषण क्षान्तौ; तितिक्षायाम् । मृषयति । णिचोऽनित्यत्वे, मृषति । क्ये, मृष्यते । डे, अममृषत् । अमृषि, अमृषयिषाताम्, अमृषिषाताम् । मृष- याञ्चकार । मृषयिष्यति। मिमृषयिषति। मृषितः। मृषयिता। मृषायवा॥१३२॥ रसण आस्वादनस्नेहनयोः । रसयति । अररसत् । रस शब्दे । रसति । णिगि, रासयति । अरीरसत् ॥ १३३ ॥ महण् पूजायाम् । महयति । डे, अममहत् । अमहि ॥ १३४ ॥ रहुण गतौ । नेऽन्ते । रंहयति । अदन्तत्वबलात् “अतः"॥४॥३६८२॥ इति लुकं बाधित्वाऽनुपात्यस्याप्यतो "णिति"॥४।३।५०॥ इति वृद्धौ, “अतिरी॥४॥ २।२१॥ इति पौ, रंहापयति । डे, अररहत् ॥ १३५ ॥ स्पृहण ईप्सायाम् । “स्पृहेाप्यं वा”।२।२।२६॥ इति व्याप्यस्य वा सम्प्र. दानवे, पुष्पेभ्यः पुष्पाणि वा स्पृहयति। क्ये, स्पृह्यते । स्पृहयेत्। स्पृहयतु। अस्पृ- हयत् ॥ अद्य० ॥ अपस्पृहत्। अस्पृहि, अस्पृहिषाताम् , अस्पृहयिषाताम् । स्पृहया- चकार ३ ॥ भाक ॥ स्पृहयां ३ चक्रे, बभूवे, आहे । स्पृह्यात् । स्पृहिषीष्ट; स्पृहयिषीष्ट। स्पृहयिता,२ स्पृहिता । स्पृहयिष्यति, ते; स्पृहिष्यते । पिस्पृहयिषति। अकर्मकत्वाद् “गत्यर्थः॥५॥२१॥ इति कर्तरि क्ते, पुष्पेभ्यः स्पृहितो मैत्रः । पक्षे, पुष्पाणि स्पृहयति । कर्मणि क्ते, पुष्पाणि स्पृहितानि मैत्रेण । स्पृहयि ४ वा, ता, तुम्, तव्यम्। क्त्वो यपि, संस्पृहय्य । स्पृहणीयम्। स्पृह्यम्। “शीशद्धा-"॥५।२। ३०॥ इत्यालौ, “आमन्त-"॥४३॥८॥ इति शेरयि; स्पृहाशीलः स्पृहयालुः॥१३६॥ रूक्षण पारुष्ये । रूक्षयति; विरूक्षयति। डे, अरुरूक्षत्। यपि, विरूक्ष्य । रूक्षितम् । णिजभावेऽप्यदन्तवार्थोऽस्य पाठः, तेनानेकस्वरत्वात् यङ् न भवति । एवं गर्विप्रभृतीनामपि ॥ १३७ ॥ इति परस्मैपदिनः।

२८० क्रियारत्नसमुच्चयः । मृगणि अन्वेषणे । मृगयते । क्ये, मृग्यते । डे, अममृगत, अममृगे- ताम् ॥ भाक ॥ अमृगि, अमृगिघाताम्, अमृगयिषाताम् । मृगयाञ्चके। मृग- यिष्यते। मिमृगयिषते। मृगयमाणः । मृग्यमाणम् । मृगयिष्यमाणः। मृगयां ३ चक्राणः, बभूवानः, आसानो वा। मृगितः । मृगयि ४ ला, ता, तुम् , तव्यम् । क्लो यपि, विमृगय्य ॥ १३८ ॥ अर्थणि उपयाचने । अर्थयते; प्रार्थयते । पूर्वाचार्यानुरोधाददन्तेष्यस्य पाठः । एवं गरपि । केचिददन्तपाठबलादतोलुकं बाधित्वाऽनुपान्त्यस्यापि "णिति"॥४।३।५०॥ इति वृद्धौ, “अर्तिरी-||४।२।२१।। इति पौ, अर्थापयते; गर्वापयते इत्याहुः । क्ये, अर्थ्यते । ङे, आतिर्थत । आर्थि, आर्थिषाताम् ; आर्थयिषाताम्। अर्थयाञ्चक्रे ३ । अर्थयिष्यते । अतिथयिषते । अर्थितः । अर्थीय- त्वा । प्रार्थ्य । अर्थयि ३ ता, तुम् , तव्यम् ॥ १३९ ॥ सङ्ग्रामणि युद्धे। सङ्ग्रामयते शूरः। क्ये, सङ्ग्राम्यते ।असङ्ग्रामयत । ङ, अससङ्ग्रामत । अपपाठान्न षः। सिसङ्ग्रामयिपते। क्त्वि, सङ्ग्रामयित्वा । सङ्ग्रामितः । अयं परस्मैपदीत्येके । सङ्ग्रामयति ॥१४० ॥ गणि माने। गर्वयते । गर्व्यते। डे, अजगर्वत । गर्व वर्षे । गर्वति॥१४१॥ गृहणि गृहणे । गृहयते । क्ये, गृह्यते। , अजगृहत । यपि, संगृहय्य । क्ते, गृहितम् । गृहयालुः । शेषं मृगण्यत् । अदन्तवं च सुखादीनां णिच्सनि- योग एव द्रष्टव्यम् । ततोऽनित्यत्वेन णिजभावे, जगणतुरित्यादि सिद्धम्॥१४२॥ इत्यदन्ताः समाप्ताः । . अथ युजादिः । युजण सम्पर्चने । “युजादेः-"॥३।४।१८॥ इति वा णिचि; योजयति । पक्षे शव् , योजति । क्ये, योज्यते; युज्यते ॥ अद्य० ॥ डे, उपान्त्यहस्खे, अयूयुजत् । अयोजीत, अयोजिष्टाम् , अयोजिपुः । अयोजि । इटि, अयोजयि- षाताम् । ब्रिटि, णिजभावे इटि च, अयोजिपाताम्, अयोजयिषत, अयोजिषत । योजयाञ्चकार । युयोज, युयुजतुः, युयुजुः, युयोजिथ०। योध्यात्; युज्यात् ।

चुरादिगणः । २८१ योजयिषीष्ट; योजिषीष्ट । योजयिता; योजिता। योजयिष्यति, ते; योनिष्यति, ते । युयोजयिषति, “वौ व्यञ्जन-"॥४।३।२५॥ इति क्लासनोर्वा कित्त्वे, युयो. जिषति; युयुजिषति; णिजभावे यङ् भवति; योयुज्यते । योयुजीति, योयोक्ति, योयुक्तः, योयुजति। णिगि, योजयति । अयूयुजत् । योजयन् ; योजन् । योज्य. मानम् ; युज्यमानम् । योजयिष्यन् ; योजिष्यन् । योजयाञ्चकृवान् ; युयुज्वान्। प्रयोजितः, २ वान् ; प्रयुजितः, २ वान् । योजयित्वा; योजित्वा; युजित्वा । प्रयोज्य, प्रयुज्य । योजयिता; योजिता ३ । योजनीयम् । याज्यम् । युणिच् समाधौ । युज्यते। युनूंपी योगे । युनक्ति । युङ्क्ते । इह युजादीनां नियतो णिजविकल्पः, चुरादीनां तु णिजनित्य इति ॥ १४३ ॥ लीण् द्रवीकरणे । “लियो नोऽन्तः ॥४।२।१५॥ इति नेऽन्ते; घृतं विलीन- यति । पक्षे, “नामिन-''॥४।३।५१॥ इति वृद्धौ; विलाययति। “लीलिनोर्वा" ॥४।२।९॥ इति वाऽऽत्वमस्यापीत्ये के; तन्मते “लो लः"।४।२।१६॥ इति वा लेऽन्ते, घृतं विलालयति; विलापयति । “लीङ्लिनोवा ||४।२।९॥ इत्यात्मनेपदमावं चास्यापि णिच्यपीत्येके । कस्त्वामुल्लापयते; आलापयते । णिजभावे, विलयते । क्ये, विलीन्यते; विलाय्यते । अन्यमते, विलाल्यते; विलाप्यते; बिलीयते । व्यलीलिनत् ; व्यलीलयत्; व्यलीललत् ; व्यलीलपत् । व्यलायीत् । व्यलीनि, व्यलायि । व्यलालि, व्यलापि, व्यलायि । इटि, व्यलीनयिषाताम् ; व्यलाययि- व्यलालयिषाताम् ; व्यलापयिषाताम् ; व्यलयिषाताम् ; ब्रिटि टुंकि, व्यलीनिषातामित्यादि । व्यलायिषाताम् । विलीनयाञ्चकारेत्यादि । विलिलाय, विलिल्यतुः। विलिलीनयिपति; विलिलायिषति। विलिलयिपति । अणिचि यङि, विलेलीयते । विलेलयीति; विलेलेति, विलीनितः; विलायितः; विलयितः । विलीन्य, विलाय्य, विलीय । विलीनयिता, विलायिता, विलयिता । लीङ्च् श्ले- षणे | लीयते । लींश श्लेषणे । लिनाति ॥ १४४ ।। प्रीग्ण तर्पणे । गित्त्वं णिजभावे उभयपदार्थम् । णिचि परस्मैपदे; "धूगनीगो:-"॥१॥२॥१८॥ इति नेऽन्ते; प्रीणयति । ऋयादरेव नमिच्छन्ति: तन्मते "नामिन-"॥४॥३॥५१॥ इति वृद्धौ, प्राययति । पक्ष, प्रयति; प्रयते। क्ये, . षाताम्; , क्रियारत्नसमुच्चयः । प्रीण्यते; प्राय्यते; प्रीयते । डे, अपिप्रिणत्, अपिप्रियत् । अप्रायीत् । शेषं लीण्वत् ॥ १४५ ॥ धूग्ण कम्पने । “धूनप्रीगो:-"॥४।२।१८॥ इति ने, धूनयति । नं नेच्छन्त्ये- के । धावयति । पक्षे, गित्त्वादुमयपदे; धवति; धवते । शेषमशिति णिज- भावे धूगट्वत् ॥ १४६ ॥ वृगण आवरणे । वारयति; निवारयति; आवारयति । पक्षे गित्त्वादुभय- पदे, वरति; वरते । शेषमशिति णिजभावे वृग्वत् ॥ १४७ ॥ जृण् वयोहानौ । जारयति । णिजभावे जृष्च्वत् ॥ १४८ ॥ मार्गण अन्वेषणे । मार्गयति । मार्गति; विमार्गति । माय॑ते । अमार्गीत् । ममार्ग । ममार्गे । मार्गिष्यति । मिमार्गयिषति; मिमार्गिषति । णिजभावे यङ्, मामार्ग्यते ॥ १४९॥ पृचण संपर्चने। संपर्चयति। संपर्चति । यङि, परीपृच्यते ॥ १५० ॥ रिचण् वियोजने च । चात्संपर्चने । रेचयति; विरचयति । रेचति । व्य. रीरिचत् । व्यरेचीत् ॥ १५१ ॥ घचण भाषणे । संदेशन इत्येके । वाचयति । वचति । क्ये, वाच्यते; वच्यते । “यजादि-"|४|१७९॥ इत्यत्रास्याग्रहणान्न वृत् । अवीवचत्; अवी- बचाम । अवाचि, अवाचयिषाताम् , अवाचिषाताम् । पक्षे, अवाचीत् , चीत्, अवाचिष्टाम् , अवचिष्टाम्, अवाचिषुः, अवचिषुः; अवाचिष्म, अवचि- ष्म । अवाचि, अवचिषाताम् , अवचिषत । वाचयाञ्चकार । वाचयाश्चके । पक्षे, ववाच, ववचतुः; ववचिथ । ववचे । वाच्यात् ; वच्यात् । वाचयिषीष्ट; वाचिषीष्ट; वचिषीष्ट । वाचयिता; वचिता । वाचयिष्यति, ते; वचिष्यति, ते । विवाचयिषति; विवचिषति । यङि, वावच्यते । वावचीति, वाव ३ क्ति, क्तः, चति । वाचितम् ; वचितम् । वाचयित्वा; वचित्वा ॥ १५२ ॥ अर्चिण पूजायाम् । अर्चयति । इदित्त्वादात्मनेपदे, अर्चते ॥ अद्य० ॥ आर्चिचत् । आर्चिष्टं । आर्चि, आर्चयिषाताम्, आर्चिषाताम् । अर्चयाञ्चकार । आनचें । अर्चयिष्यति; अचिंप्यते । अर्चिचयिषति; अर्चिचिषते । अर्चितः । अत्र-

चुरादिगणः ।
२८३
अर्चयि ४ वा, ता, तुम् , तव्यम्; अर्चि ४ वा, ता, तुम्, तव्यम् ॥१५३॥
वृजैण् वर्जने । वर्जयति; परिवर्जयति; आवर्जयति । वर्जति । वय॑ते;
वृज्यते । अववर्जत् । अवीवृजत् । अवर्जीत्, अवजिष्टाम्। अवर्जि, अवर्जयि-
षाताम्, अवर्जिषाताम् । वर्जयाञ्चकार । ववर्ज, ववृजलुः; ववर्जिथ; ववृजिम ।
ववृजे। वात् , वृज्यात्। वर्जयिष्यति; वर्जिष्यति। विवर्जयिषति; विवर्जिषति।
वरीवृज्यते । वरि, री, र , ३ वक्ति; वरि, री, र्, ३ वृजीति। वर्जितम् ; वृजितम्।
वर्जयित्वा; वर्जिवा ॥ १५४ ॥
मृजौण शुद्धौ । “मृजोऽस्य-"॥४।३।४२॥ इति वृद्धौ, मार्जयति; परिमा-
जयति । पक्षे शवि; माजति । माय॑ते । अममार्जत् । अमीमृजत् । पक्षे
औदित्त्वादेटि, अमार्जीत्। अमाहीत् । णिचि शेषं चुरण्वत् । णिजभावे, मृजौ-
क्वत् ॥ १५५ ॥
कठुण शोके । नेऽन्ते । कण्ठयति; उत्कण्ठयति । उत्कण्ठति प्रियाम् ।
उदचकण्ठत् । उदकण्ठीत् । कठुङ् शोके । कण्ठते; उत्कण्ठते ॥ १५६ ॥
ग्रन्थण सन्दर्भे; बन्धने । ग्रन्थयति । ग्रन्थते । शेष ग्रन्थश्वत् ॥१५७॥
अर्दिण् हिंसायाम् । अर्दयति । णिजभावे इदित्त्वादात्मनेपदे, अर्दते ।
डे, आदिदत् । आर्दिष्ट । परस्मैपद्ययमित्येके । अर्दति । आर्दीत् ॥ १५८ ॥
बदिण् भाषणे । संदेशन इत्यन्ये । वादयति; संवादयति । पक्षे इदि-
वादात्मनेपदे, वदते । क्ये, वद्यते । अस्य यजादिवाभावान्न वृत् ॥१५९॥
छदण अपवारणे । छादयति । छति । प्रच्छादयति । प्रच्छदति शय्याम् ।
उच्छादयति । उच्छदति ॥ १६० ॥
आङः सदण् गतौ । आङः परः सद् गतावर्थे युजादिः । आसादयति ।
आसीदति । आसदतीत्येके । आङोऽन्यत्र, सीदति । गतरन्यत्रासीदति ॥१६॥
मानण् पूजायाम् । मानयति । मानति ॥ १६२ ॥
तपिण दाहे । तापयति । इदिवादात्मनेपदे; तपते ॥ १६३ ॥
तृपण प्रीणने । संदीपन इत्येके । तर्पयति। तर्पति । क्ते, तर्पितम्, तृपि-
तम् ॥ १६४ ॥

२८४ कियारत्नसमुच्चयः । आप्लण् लम्भने; प्राप्तौ । आपयति; प्रापयति । आपति । आपिपत् । लदित्त्वादङि, आपत् । आपयिष्यति; आपिष्यति । क्ते, आपितम् । “वाप्नोः” ॥४॥३॥८७॥ इति यपि णेर्वाऽय् अस्यापीत्येके, प्रापय्य; प्राप्य ॥ १६५ ॥ ईरण क्षेपे; प्रेरणे । गतावित्येके । ईरयति; प्रेरयति । ईरति । ऐरिरत् । ऐरीत् । ईरयिष्यति, ईरिष्यति ॥ १६६ ॥ मृषिण् तितिक्षायाम् । मर्षयति । पक्षे इदित्त्वादात्मनेपदे, मर्षते । अमी- मृषत्; अममर्षत् । अमर्षिष्ट । अमर्षि, अमर्षयिषाताम्, अमर्षिषाताम् । मर्ष- यामास । ममृषे । मर्षयिष्यति; मर्षिष्यते । मिमर्षयिषति, मिमर्षिषते । मरीमृ- ष्यते । अर्चि, अर्दि, तर्पि, वदि, मृषयः परस्मैपदिन इति भीमसेनीयाः॥१६७॥ शिषण असर्वोपयोगे; अनुपयुक्तत्वे । शेषयति; शेषति ॥ १६८ ॥ विपूर्वोऽतिशये; उत्कर्षे । शिषिरतिशये युजादिः । विशेषयति । विशे- प्यते । व्यशीशिषत् । विशेषयामास । क्ते, विशेषितः । पक्षे, विशेषति । क्ये, विशिष्यते । सिचि, व्यशेषीत् । विशिशेष । विशिशिषे । विशेषिष्यति । विशि. षितः। विशिष्य ॥ १६९ ॥ धृषण प्रसहने; अभिभवे । धर्षयति । धर्षति । अदीधृपत्; अदर्पत् । अधर्षीत् । “न डीङ्-"॥४।३।२७॥ इति सेटतयोः कित्त्वाभावे; धर्षितः, २ वान् । क्यपि, प्रधृष्यम् । धर्षित्वा ॥ १७० ॥ हिसुण हिंसायाम् । हिंसयति । हिंसति ॥ १७१ ॥ गर्हण विनिन्दने । गर्हयति । गर्हति ॥ १७२ ॥ षहण मर्षणे । साहयति । सहति भारं धौरेयः ॥ १७३ ॥ "बहुलमेतन्निदर्शनम्” । यदेतद्भवत्यादिधातुपरिगणनं तबाहुल्येन निद- र्शनत्वेन ज्ञेयम् ॥ तेनात्रापठिता अपि क्लविप्रभृतयो लौकिकाः, स्तम्भूप्रभृतयः सौत्राश्चुलुम्पादयश्च वाक्यकरणीया धातव उदाहार्याः ॥ विक्लवन्ते दिवि ग्रहाः; विच्छायीभवन्तीत्यर्थः । उपक्षपयति प्रावृट् ; आसन्नीभवतीत्यर्थः । उत्तन्नाति; निस्कुन्नाति । निपानं दोलयन्नेष प्रेढोलयति मे मनः । पवनो वीजयन्नाशा ममाशामुच्चुलुम्पति ॥१॥ .

सौत्रा धातवः । - तावत्खरः प्रखरमुल्ललयाञ्चकार । यद्वा । भूवादिगणाष्टकोक्ताः स्वार्थे णिजन्ता अपि बहुलं भवन्ति। चुरादिपाठस्तु निदर्शनार्थः॥ यदाहुः॥ “निवृत्तप्रेषणा- द्धातोः प्राकृतेऽर्थे णिजिष्यते"। रामो राज्यमकारयद् अकरोदित्यर्थः। रञ्जयति वस्त्रम्; रजतीत्यर्थः । भेदयति भृत्यान् , भिनत्तीत्यर्थः । तापयति, वाचयति, वाहयति, घातयति; तपति, वक्ति, वहति, हन्तीत्यर्थः। प्रयोज्यव्यापारेऽपि प्रयोक्तृव्यापारा- नुप्रवेशो णिगं विनाऽपि बुद्ध्यारोपाहहुलं भवति। जजान गर्भ मघवा; इन्द्रोऽजी- जनदित्यर्थः । एकं द्वादशधा जज्ञे; जनितमित्यर्थः । षड्भिर्हलैः कृषति; कर्ष- यतीत्यर्थः वान्ति पर्णशुषो वाता वान्ति पर्णमुचोऽपरे । वान्ति पर्णरुहोऽप्यन्ये ततो देवः प्रवर्षति ॥१॥ अथवा णिज्बहुलमित्येव सिद्धे सूत्रमूत्रच्छिद्रान्धादय उदाहरणार्थाः; तेना- दन्तेष्वनुक्ता अपि बहुलं द्रष्टव्यास्तेन, स्कन्ध समाहारे । स्कन्धयति । ऊष च्छरणे । ऊषयति । स्फुट प्रकटभावे । स्फुटयति । वस निवासे । वसयती- त्यादयोऽपि भवन्ति । तथा । तडित् खचयतीवाशाः । पांशुर्दिशां मुखमतुच्छ- यदुत्थितोऽद्रेः ॥ ओजयत्योजः ॥१७॥ विस्मृत्याऽवज्ञया वाऽपि भूवादिपु नवस्वपि । धातवो नोचिरे येऽत्र ज्ञेयाः पारायणात्तु ते ॥ १॥ इति तपाचार्यश्रीदेवसुन्दरसूरिशष्यश्रीगुणरत्नसूरिविरचिते क्रियारत्नसमुच्चये चुरादिगणः । ORRECOc एवमुक्ता नवादिभवा गणजा धातवः । अथ सौत्रा उच्यन्ते केचन । "धातोः कण्ड्वादर्यक्॥३।४।८॥ द्विविधाः कण्ड्वादयः; धातवो नामानि च । कण्ड्वादिभ्यो धातुभ्यः स्वार्थे यक् स्यात् । कण्डूग् गात्रविकर्षणे । कण्डूयति, कण्डू- यते। महीङ् वृद्धौ पूजायाञ्च । महीयते । हणी रोषलज्जयोः। हणीयते। मन्तु रोपवै- मनस्ययोः। मन्तूयति । वल्गु माधुर्यपूजयोः। वल्गूयति। असु मानसोपतापे । अ-

२८६
क्रियारत्नसमुच्चयः ।
सूयति । अन्ये तु, असूङ् दोषाविष्कृतौ रोगे । असूयते इत्याहुः ॥ वेङ्, लाङ्;
वेट्, लाट एते धौल्ये, पूर्वभावे, स्वप्ने च । आद्ययोर्ड आत्मनेपदार्थः । लिट् अल्पार्थे
कुत्सायां च। लिट्यति । लोट् दीप्तौ । उरस ऐश्वर्ये । उरस्यति । इरस, इरज्
ईर्ष्यार्थौ । तिरस् प्रसिद्धार्थः। दुवस् परितापपरिचरणयोः। भिषज् चिकित्सायाम्।
भिषज्यति । भिष्णज् उपसेवायाम् । एला, केला, खेला, विलासार्थाः । केलायति।
मेधा आशुग्रहणे। मगध परिवेष्टने। मगध्यति । “अतः॥४।३।८२॥ इत्यल्लुक् ।
इषध् शरधौ रणे ।कुरुरु क्षेपे। सुख, दुःख, तत्क्रियायाम्। सुख्यति; दुःख्यति । तरण
प्रसिद्धार्थः। गद्गद वाक्यस्खलने । गद्गद्यति । गद्गदङ् इत्येके ।गद्गद्यते। भरण गतौ।
तुरण त्वरायाम्। पुरण गतौ।भुरण धारणपोषणयुद्धेषु । भुरण्यति। चुरण मतिचौर्य-
योः। भरण प्रसिद्धार्थः। भरण्यति । तन्तस, पम्पस दुःखार्थौ । अरर आराकणि।
समर युद्धे । समयति। सपर पूजायाम् । सपर्यति । अनुक्तार्थत्वात् शेषा नोक्ताः॥
क्ये, कण्डूय्यते ॥ अद्य० ॥ अकण्डूयीत् । अकण्डूयिष्ट । “अतः"॥४।३।८२॥ इत्य-
ल्लुकि, “योऽशिति"॥४।३।८०॥ इति यलुकि, अभिषजीत् । अकण्डूयि। अभि-
षजि । अत्राल्लुकः स्थानित्वान्न वृद्धिः । कण्डूयाञ्चकार, चक्रे वा । भिषजा-
श्चकार । कण्डूयिता । भिषजिता । "क्यो वा"॥४/३/८१॥ इत्यत्र यकोऽपि
लुगित्यन्ये । भिषजिता; भिषज्यिता । “कण्ड्वादेस्तृतीयः"।४।१।९॥ इति तृती-
यस्य हिले; कण्डूयियिषति, ते। असूयियिषति । णिगि, कण्डूययति । डे,
अकण्डूयियत् । अत्र “अतः॥४।३।८२॥ इत्यनेन विषयेऽप्यकारलोपात् “स्वर-
स्य."॥७४११०॥ इति स्थानित्वाभावात् यि इत्यस्य द्वित्वं नतु य इत्यस्य । एवमा-
सूयियत् । कण्डूयि ३ वा, ता, तुम् ॥ इति कण्ड्वादिः ॥ १ ॥
अन्दोलण, प्रेढोलण् अन्दोलने ॥ वीजण वीजने। एते त्रयोऽप्यदन्ताः। बहु-
लवचनात् स्वार्थे णिचि, अन्दोलयति । क्ये, अन्दोल्यते । डे, आन्दुदोलत् ।
प्रेढोलयति । वीजयति । वीज्यते । अवीजयत् । राजहंसैरवीज्यत । उ, अवि-
वीजत् ॥ २॥ ३ ॥ ४ ॥
रिखिलिखेः समानार्थः । रेखति चित्रकृत् । रिख्यते । अरेखीत् । अशि-
ति सर्व लिखित् वत् ॥ ५ ॥

सौत्रा धातवः । २८७ चुलुम्प इति सौत्रः । चुलुम्पति; उच्चुलुम्पति । चुलुम्पाञ्चकार ॥ ६ ॥ स्तम्भू, स्तुम्भू स्तम्भे। “स्तम्भूस्तुम्भूस्कम्भूस्कुम्भूस्कोः श्ना च॥३।४७८॥ इतिश्नाश्नू। शित्त्वाद् ङित्त्वे नो लुकि, स्तन्नाति; स्तभ्नोति। उपसर्गद्, “अङप्र- तिस्तब्ध-"॥२॥३॥४१॥ इति षले, विष्टनाति; प्रतिष्टश्नोति । “उदः स्था-"॥१॥३॥ ४४॥ इति स्लुकि, उत्तभ्नाति; उत्तभ्नोति पताकाम् । “अवाच्चाश्रयोगविदूरे" ॥२।३।४२॥ इति द्वित्वेऽप्यट्याप षत्वे; आश्रये, दुर्गमवष्टभ्नाति; अवष्टनोति । और्जित्ये; अहो वृषलोऽवष्टनाति । अवष्टश्नोति रिपुं शूरः । अबिदूरेऽनति- विप्रकृष्टे; अवष्टम्नोति शरत् ; आसन्नीभवतीत्यर्थः । क्ये, स्तभ्यते, अवष्टभ्यते। हौ, उत्तभान, उत्तभ्नुहि । व्यष्टभ्नात् ; प्रत्यष्टनात्; अवाष्टन्नात् । “ऋदिन्छि-" ॥३४॥६५॥ इति वा अङि, अस्तभत्, अस्तम्भीत् ; अवाष्टभत् ; अवाष्टम्भीत् । अस्तम्भि, अस्तम्भिषाताम् । तस्तम्भ; अवतष्टम्भ; प्रतितष्टम्भ । स्तम्भिष्यति; अवष्टम्भिष्यति । तिस्तम्भिषति; अभितिष्टम्भिषति । तास्तभ्यते; प्रतिताष्टभ्यते; अवताष्टभ्यते। स्तम्भयति; अवष्टम्भयति । डे तु निषेधान्न पः; अवातस्तम्भत्; प्रत्यतस्तम्भत्; अतस्तम्भत् । स्तनन् ; स्तभ्न्वन् । ऊदित्वात क्तित्व वेट; स्तब्ध्वा, स्तम्भित्वा; अत्र “क्त्वा"॥४।३।२९॥ इति न क्त्वा कित् । दुर्गमवष्टभ्यास्ते । वेट्वान्नेट ; स्तब्धः, २ वान् ; प्रतिस्तब्धः; निस्तब्धः; अवष्टब्धः, २ वान् । "अवाच्च-"।२।३।४२॥ इत्यत्र चोऽनुक्तसमुच्चयार्थः; तेनोपष्टब्धः, उपष्टम्भ इत्या- दावुपादपि षो भवति । उपावादित्यकृत्वा चकारेण सूचनमनित्यार्थम् ; तेनो- पस्तब्ध इत्यपि भवति । स्तम्भिता; अवष्टम्भिता ॥ स्तुम्भू ॥ नाश्नू । स्तुभ्ना- ति; स्तुभ्नोति । क्ये, स्तुभ्यते । अस्तुम्भीत् । तुस्तुम्भ । तुस्तुम्भ । अषपाठान्न षः ॥ ७॥ ८ ॥ स्कम्भू, स्कुम्भू बन्धने । स्कम्नाति; स्कन्नोति । वेः “स्कन्नः"॥२॥३॥५५॥ इति षत्वे, विष्कन्नाति; अत्र क्षुम्नादित्वाण्णवाभावः। “स्कन्नः"।।२।३।५५॥ इति श्नानिर्दे- शात् सश्नोः षो मा भूत; विस्कन्नोति, विष्कम्नीतः, विस्कभ्नुतः, विष्कम्नन्ति, विस्कन्नुवन्ति । विष्कभ्यते । हौ, विष्कमाण; विस्कम्नुहि ॥ ह्य० ॥ द्वित्वेऽप्यट्य- पीत्यधिकारस्य निवृत्तत्त्वात् षलाभावे; व्यस्कन्नात; व्यस्कश्नोत् ॥ अद्य० ॥

२८८ क्रियारत्नसमुच्चयः। व्यस्कम्भीत् । विचस्कम्भ । विष्कम्भिता । विष्कम्भिष्यति । विचिस्कम्भिषति । विचास्कभ्यते । विचास्कम्भीति । विष्कम्भयति । व्यचस्कम्भत् । ऊदित्त्वाइटि, स्कब्ध्वा; स्कम्भित्वा । विष्कभ्य । वेट्वान्नेटि, विष्कब्धः, २ वान् । विष्कम्भि ३ ता, तुम् , तव्यम् ॥ स्कुम्भू ॥ स्कुनाति; स्कुभ्नोति । अस्कुम्भीत् ॥९॥१०॥ लुल कम्पने । लोलति । लुल्यते । लुलितम्, धुतमित्यर्थः ॥ ११ ॥ इति श्रीतपाचार्यश्रीदेवसुन्दरसूरिशिष्यश्रीगुणरत्नसूरिविरचिते क्रियारत्नसमुच्चये सौत्रा धातवः ॥ , अथ नामधातवः । "द्वितीयायाः काम्यः"॥३।४।२२॥ इति वा; पुत्रमिच्छति पुत्रकाम्यति । स्त्रीकाम्यति । वस्तुकाम्यति । "चजः कगम्-"॥२।१।८६॥ इति कत्वे, वाक्का. म्यति; गोधुक्काम्यति; राट्काम्यति। अनडुत्काम्यति; अत्र “संस्ध्वंस्-"॥२।१। ६८॥ इति हो दः । “उः पदान्ते-"॥२।१।११८॥ इति व उत्ते, द्युकाम्यति। श्रेय- स्काम्यति; तेजस्काम्यति; अब रोः काम्ये”।२।३।७॥ इति सः। हविष्काम्यति; सर्पि- काम्यति; धनुष्काम्यति; “नामिनस्तयोः-"॥२॥३८॥ इति षः। अव्ययस्य वर्जना- त्सषयोरभावे; अधःकाम्यति; बहिःकाम्यति । रोरभावे रेफेस्य तु न सः षो वा । वाःकाम्यति गी:काम्यति; धूःकाम्यति । राजकाम्यति; गुणिकाम्यति; एतत्काम्यति; अदस्काम्यति; इदङ्काम्यति; किंकाम्यति; भवत्काम्यति । त्वत्काम्यति; मत्काम्य- ति; "त्वमौ प्रत्ययोत्तर-।।२।१।११॥ इति मान्तयोस्त्वमौ । युवां युष्मान्वेच्छति युष्मत्काम्यति; अस्मत्काम्यति; स्वःकाम्यति; स्वस्तिकाम्यति । “सर्वादयोऽस्यादौ”। ३।२।६१॥ इति पुंवत्त्वे; सर्वामिच्छति सर्वकाम्यति; भवत्काम्यति; एककाम्यति । एवं क्यन्याप पुंवत्त्वं ज्ञेयम् । काम्येनैव कर्मण उक्तत्वादात्मनेपदं भावे; पुत्रकाम्यते; धनकाम्यते । अत्र 'योऽशिति"॥४।३।८०॥ इति यस्य न लुक्, धातो- य॑ञ्जनात्परस्य योऽभावात्॥अद्य० ॥ अपुत्रका ३ म्यीत, म्यिष्टाम् , म्यिपुः। भावे, अपुत्रकाम्यि ॥ परो० ॥ पुत्रकाम्यां ३ चकार, बभूव, आस वा । क्कारमियेष, का.

नामधातवः । २८९ म्याञ्चकार; काम्यस्यादन्तत्वादाम् सिद्धः । पुत्रकाम्यात् । पुत्रकाम्यिष्यति । णिगि, घटकाम्ययति। ङे, “अन्यस्य"॥४॥१८॥ इति प्रथमादारभ्य यथेच्छं द्वित्वे, अजघटकाम्यत् ; अघटटकाम्यत्; अघटचकाम्यत् ; अघटकामम्यत् । एवं अपु- पुचकाम्यत् ; अपुतत्रकाम्यत्, अत्र सस्वरस्य काम्यस्य फलं समानलोपात् न सन्वद्भावः । पुत्रकाम्यन् । पुत्रकाम्यि ५ स्वा, ता, तुम्, तः, २ वान् । पक्षे तु वाक्यं सिद्धम् ॥ इति काम्यः ॥ १ ॥ "अमाव्ययात् क्यन् च"॥३४॥२३॥ इति क्यन्, चात्काम्यश्च; तेन क्यना काम्यो न बाध्यते । पक्षे च वाक्यमपि । पुत्रमिच्छति; “क्यनि"॥४।३।११२॥ इति ईकारे; पुत्रीयति, पुत्री ८ यतः, यन्ति, यसि० । द्रविणीयति । खट्टीयति । मालीयति। “दीर्घश्च्चि-॥४।३।१०८॥ इति दीर्घ; निधीयति। दधीयति।अग्नीयति। औषधीयति । पट्टयति । वस्तूयति । दात्रीयति । "ऋतो रीः॥४।३।१०९॥ पित्रीयति। मात्रीयति । भ्रात्रीयति। स्वस्रीयति। रायमिच्छति रैयति । गव्यति । नाव्यति; “य्यक्ये”॥१२॥२५॥इति ओदौतोरवावौ । गार्ग्यमिच्छति, "आपत्यस्य क्यव्योः" ॥२।४।९१॥ इति यलोपे; गार्गीयति । वात्सीयति । विद्वांसमिच्छति विद्वस्यति । राजीयति; अत्र “नं क्ये"।।१।१।२२॥ इति पदान्ते;"नाम्नो नो-"॥२।१।९१॥ इत्यत्र असत्पर इत्यधिकारस्यानागमनात् क्यविधौ नलुकः सत्त्वात् "क्यनि"॥४।३।११२॥ इति ईकारः सिद्धः । शमीयति । पथीयति । अहर्यति; अत्र “रो लुप्यरि" ॥२।१।७५॥ इति रः । “माम सिद्-"॥११॥२१॥ इत्यत्र अयिति प्रतिषेधेन पदा- न्ताभावात् क्रमेण उत्वगत्वकत्वाद्यभावे; दिवमिच्छति दिव्यति; दृश्यति; वा- च्यति । समिधमिच्छति समिध्यति । गोदुह्यति । योपित्यति । महत्यति । तद्यति । यधति । एतद्यति । अदस्यति । भवत्यति । त्वद्यति । मद्यति । युष्मद्यति । अस्मद्यति । चतुर इच्छति चतुर्यति। अनुडुह्यति। गीर्यति । धूर्यति; "भ्वादेः-"।२।११६३॥ इति दीर्घः । नेत्यन्य; गिर्यति; धुर्यति । एवं क्यङ्यपि । पुंस्यति । सर्पिष्यति । अर्चिष्यति । धनुष्यति । "क्षुत्तृड्गर्देऽशनाय-"॥४।३। ११३॥ इति निपातनात्; अशनमुदकं धनमिच्छति अशनायति; उदन्यति; धनायति । क्षुत्तृड्ग भ्योऽन्यत्र तु; अशनीयति; उदकीयति; धनीयति दातुम् । ३८ २९० क्रियारत्नसमुच्चयः। मैथुनतृष्णायां; "वृषाश्वाद्-'॥४।३।११४॥ इति स्सेऽन्ते; वृषमिच्छति वृषस्यति गौः । अश्वस्यति वडवा । वृषस्याश्वस्यशब्दौ मैथुनेच्छापर्यायौ मनुष्या- दावपि प्रयुज्यते । लक्ष्मणं सा वृषस्यन्ती । तं साऽश्वस्यति । मैथुनादन्यत्र, वृषीयति; अश्वीयति ब्राह्मणी । दध्याद्यदनतृष्णायां “अश्व-"||४।३।११५॥ इति असि स्सेऽन्ते च; दध्यस्यति; दधिस्यति । स्स इति द्विसकारनिर्देशान्नात्र षत्वम् । मध्वस्यति; मधुस्यति । क्षीरस्यति । लवणस्यति । दधिस्यतीत्यादि प्रयोगदृष्टेः प्रसिद्धस्यैव "नाम्यन्तस्था-"॥२॥३॥१५॥ इति षत्वस्य निषेधो नत्वप्रसि- द्धस्य; तेन सर्पिष्ष्यतीत्यादावागमसकारस्य, “सस्य शो"॥१३६१॥ इत्यनेन षत्वं सिद्धम्। पय इच्छति, क्यनि; "नाम सिद्-"॥१।१।२१॥ इति नियमेन पदसंज्ञाका. र्याणां व्यावर्तितत्वात्; पयसस्यति । चर्मणस्यति । स्सेऽन्ते तु व्यञ्जनादित्वात्पद- संज्ञायां; पयस्स्यति । चर्मस्यति । मान्ताव्ययनिषेधात् इदमिच्छति, किमिच्छति, वस्तीच्छति, स्वरिच्छतीति वाक्यमेव । अत्र प्रतिनियतकर्मसम्बन्धे हि कर्मा- न्तराऽयोगादकर्मकत्वम् , तेन भावे आत्मनेपदम् । पुत्रीय्यते। अशनाय्यते । समिध्य्यते; समिध्यते; अत्र “क्यो वा"।।४।३।८१॥ इति व्यञ्जनान्तात् क्यस्य वा लुक् । एवमग्रेऽप्यशिति ज्ञेयम् ॥ स० ॥ पुत्रीयेत् । समिध्येत् ॥ ५० ॥ पुत्री- यतु, समिध्यतु ॥ ह्य० ॥ महापुत्रमैच्छत् अमहापुत्रीयत् । असमिध्यत् । इन्द्र, ऐश्वर्य, औषधं वा ऐच्छत् ऐन्द्रीयत् , ऐश्वर्यायत, औषधीयत् । उस्रांगां ऐच्छत् औस्रीयत् । विषयमैच्छत् , अडागमे; “सयसितस्य"॥२।३।४७|| इत्यनेन षत्वा- प्राप्तौ, व्यसयीयत् ॥ अद्य० ॥ अपुत्रीयीत् , अपुत्रीयिष्टाम्। असमिधीत् ; अस- मिध्यीत् । भावे, अपुत्रीयि; असमिधि; असामध्यि ॥ परो० ॥ पुत्रीयाञ्चकार । कीयाञ्चकार; क्यनः सस्वरत्वेनात्राम् सिद्धः । समिधाञ्चकार; समिध्याञ्चकार । पुत्रीयात। समिध्यात ;समिध्यात्। पुत्रीयिता। पटमेष्टा पटीयिता। समिधिता; समि- ध्यिता । पुत्रीयिष्यति । समिधिष्यति; अल्लुकः स्थानित्वान्न गुणः। समिध्यि- प्यति । अपुत्रीयिष्यत् । सनि “अन्यस्य"॥४॥१८॥ इति प्रथमादेईित्त्वे, पुपुत्री- यिषति; पुतित्रीयिषति; पुत्रीयियिषति; पुत्रीयिषिषति । एवं सिसमिधिषति; सिसमिध्यिषति । इन्दिद्रीयिषति; अत्र नकारस्य संयोगादित्वाद् "न बदनम्" ..

नामधातवः । २९१ . . ॥४१॥५॥इति न द्वित्त्वम् । आजिह्वायकीयिषति । णिगि, पुत्रीययति । समिधयति; समिध्ययति। डे, अपुपुत्रीयत; अपुतित्रीयत; अपुत्रीयियत् ; अत्र "अतः"॥४॥३॥ ८२॥ इत्यनेन विषयेऽप्यकारलोपात् परनिमित्तत्वाभावात् , “स्वरस्य-"॥७।४।११०॥ इति स्थानित्वाभावात् यि इत्यस्य द्वित्वं नतु य इत्यस्य । एवं क्यङ्डादिष्वपि ज्ञेया साधनिका । पुत्रीययाञ्चकारेत्यादि । पुत्रीयन् । पुत्रीयि ५ ला, ता, तुम्, ता, २ वान् । समिध्यन् । समिधि ५ त्वा, ता, तुम्, तः, २ वान् । समिध्यि ५ त्वा, ता, तुम् , तः, २ वान् । एवमन्योदाहरणेष्वापि सर्व वाच्यम् ॥ "आधारा- चोपमान-"||३।४।२४॥ इति आचारक्यनि तु, पुत्रमिवाचरति मन्यते पुत्री- यति शिष्यम् । पित्रीयति श्वशुरम् । “ऋतो रीः॥४।३।१०९॥ इति री:; मात्री. यति परदारान् । शयति बन्धून् । पायसीयति कदन्नम् । वस्त्रीयति कम्बलम् । कर्मण्यात्मनेपदम् ; पुत्रीय्यते गुरुणा शिष्यः । स्वजनीय्यते परः साधुना । सनि तु, अशिश्वीयिषति; अश्वीयियिषति; अश्वीयिषिषति । कथं ॐ नमः पार्श्वनाथाय विश्वचिन्तामणीयते इति चतुर्थ्यन्तम् । उच्यते । चिन्ता- मणिमिवात्मानमाचरन् चिन्तामणीयन् तस्मै; अत्र वृत्तावन्तर्भावान्न कर्मणः पृथग् प्रयोगः, क्विपस्थाने वक्ष्यमाणपरमतप्रयोगे इव । एवं अलीयते इत्यादि- प्रयोगेष्वपि ज्ञेयम् । आधारादपि क्यन् । प्रासाद इवाचरति व्यवहरति प्रासा- दीयति कुट्याम् । सौधीयति कुटीरे । खट्वीयति भूमौ । क्ये, प्रासादीय्यते ॥ ह्य० ॥ प्रासादीयत् । प्रासिसादीयिषति । "न प्रादि-"॥३३॥४॥ इत्यनेन प्रादे- रुत्तर एव धातुरिति तस्याडागमो द्विर्वचनं च भवतः । सौधीयित्वा। प्रासादीय्य गतः। शेषं प्राग्वत् ॥ इति क्यन् ॥ २ ॥ "कर्तुः किप्॥३।४।२५॥ अश्व इवाचरति अश्वति ।गर्दभति।पुत्रति । कलवति। दरिद्रति कृपणः। अर्कति विधुः।मालाति सर्पः । अरयति भ्राता। नारयति पुमान् । रिपवति ।विधवति।वधवति । भ्रातरति; एषु गुणः। रायति ।गवति।नावति । गोधुग्, मधुलिड् वा इवाचरति गोदाहति; मधुलेहति; अत्रोपान्त्यगुणः। नाम्नो धातुलेऽप्यु- पान्त्यस्य धातुनिष्पन्नत्वाभावाद्गुणाभावे; अनडुहति। गिरति। पुरति । “रो लुप्यरि" ॥२।१।७५॥ इति रत्वे; अहरति । राजेवाचरति राजनति; अस्य किपो व्यञ्जनादिल- २९२ क्रियारत्नसमुच्चयः । , , कित्त्वपित्त्वफलं नेष्यते;तेन "नाम सिद्-"॥१॥१॥२१॥ इति पदसंज्ञायाअभावान्नात्र न लोपः। प्राग्दर्शितेषु अरयतीत्यादिपु गुणः । अयामवाचरति इदमति। किमती. त्यादौ “अहन्पञ्चम-॥४।१।१०७॥ इति न दीर्घश्च। अन्ये तु विपः कित्त्वाीर्घ- मिच्छन्ति; इदामति । कीमति । कम् , कामति। शम्, शामतीत्यादि । गल्भ क्लीब होडात्तु ङित् । ङित्त्वादात्मनेपदम् । गल्भ इवाचरति गल्भते; प्रगल्भते । क्ली- बते । होडते । होडो मूर्खः । भावे; अश्व्यते एडकेन । गर्दभ्यते किशोरेण । "दीर्घश्च्चि-"॥४।३।१०८॥ इति दीर्घे, अरीयते बन्धुना । विधूयते मुखेन । “रिः शक्य-"॥४॥३।११०॥ इति रित्वे; पित्रियते श्वशुरेण । “य्यक्ये"।।१।२।२५॥ इति क्यवर्जनादवादेशाभावे; गोयते रासभ्या; अत्र "आत्सन्ध्यक्षरस्य"॥१२॥१॥ इति न आः; गव्यतीति क्यन्नन्तप्रयोगे आत्वादर्शनात् । “नं क्ये"॥१११।२२॥ इत्यत्र क्यस्याग्रहणात्पदान्ताभावान्नस्य लुगभावे; राजन्यते सेवकेन । अश्वेत् । अश्वतु। आश्वत् ॥ अद्य० ॥ आश्वीत् , आश्विष्टाम्, आश्विषुः, आश्वीः । एवं अगर्द- भीत्, अगर्दभिष्टाम् । अमालासीत् । अवादेशे कृते "व्यञ्जनादेर्वोपान्त्य-" ॥४॥३॥४७॥ इति वा वृद्धौ; अगावीत् , अगवीत् । विः पक्षी, स इवाचारीत् अवायीत् , अवयीत्; अयादेशे पश्चात् वृद्धिः । भावे; आश्वि । अमालायि । अगावि ॥ प० ॥ प्राचः पूर्वस्माद्विधिरित्याश्रयणे, "स्वरस्य परे."||१४|११०॥ इति अल्लुकः स्थानिवेन. “धातोरनेक-॥३।४।४६॥ इत्यामि; अश्वाञ्चकार ३ । हंसाञ्चकार । गल्भाञ्चक्रे; प्रगल्भाञ्चके । द्विवेऽवि च कृते वृद्धौ; जुगाव, जुग- वतुः; जुगविम । कश्चित्तु प्रत्ययान्तादेकखरादप्यामादेशमिच्छति । गवाञ्चकार ३। स्वाञ्चकारेत्यादि । भावे, अश्वाञ्चके । जुगवे । अश्थ्यात् । गव्यात् । राज- न्यात् । अश्विषीष्ट । अश्विता । अश्विष्यति । गविष्यति । आश्विष्यत् । अग. विष्यत् । श्वेईिवे; अशिश्विषति; अश्विषिषति । एवं जिहंसिषति । जुगविषति । अश्वन्तं प्रयुङ्क्ते अश्वयति । डे, आशश्वत् ; अत्र श्वद्वित्वम्।गावयति । अजूगवत्। उरुरिवाचरतीति किब्लोपे णौ, उरावयति । डे, औरिरवत् । द्वित्वे कृते पूर्वस्य "लघोः-॥४।१।६४॥ इति न दीर्घः स्वरादित्वात् । अश्वन् । अश्वन्ती । अश्वत्। अश्विष्यन् । अश्वि ६ त्वा, ता, तुम्, तः, २ वान्, तव्यम् । गवितः। एके तु नामधातवः। २९३ कर्तुः सम्बन्धिन उपमानात् द्वितीयान्तात् विपक्यङाविच्छन्ति; अश्वमिवात्मा- नमाचरति गर्दभः अश्वति । श्येनमिवात्मानमाचरति काकः श्येनायते। तन्मत- संग्रहार्थ “कर्तुः॥३।४।२५॥ इति षष्ठी व्याख्येया, "द्वितीयायाः-"॥३।४।२२॥ इति चानुवर्तनीयम् ॥ इति विप् ॥ ३ ॥ "क्यङ्॥३।४।२६॥ इति आचारे क्यङि, पुरुष इवाचरति पुरुषायते स्त्री । राजायते । श्येनायते काकः । भारायते नेपथ्यम् । सन्ध्यायतेऽ लक्तकः । गार्ग्य इवाचरति गार्गीयते । वात्सायते, अत्र “आपत्यस्य क्यच्योः॥२।४९१॥ इति यो लोपः। चिन्तामणीयते। वाल्मीयते। ग्रामणीयते। प्रभूयते सेवकः। विधूयते। पित्रीयते। भ्रात्रीयते। रैयते। गव्यते। नाव्यते। दधृष्यते। मित्रद्रुह्यते। मरुत्यते। जलमुच्यते। भिषज्यते। सम्राज्यते। दिव्यते । तद्यते । यद्यते । एतद्यते । इदम्यते। किम्यते । भवत्यते । खद्यते सुतस्ते । मद्यते मङ्कृत्यः । “सो वा लुक्-'॥३४॥ २७॥ इति वा सलोपे, सरायते, सरस्यते । चन्द्रमायते, चन्द्रमस्यते । विद्वायते, विद्वस्यते । पय इवाचरति पयायते, पयस्यते । “ओजोऽप्सरसः"॥३।४।२८॥ इति नित्यं सलोपे, ओज इवाचरति ओजायते; ओजस्वीवाचरतीत्यर्थः । ओजः शब्दस्य तहति वृत्तिः । अप्सरायते । ओजस्यते । अप्सरस्यते इत्यप्यन्ये । “क्यमानि- पित्तद्धिते"||३।२।५०॥ इति पुंस्त्वे; युवतिरिवाचरति युवायते । तरुणी, तरुणायते। श्येनी, श्येतायते। एनी, एतायते। एवं हरिण्यादयोऽपि। तत्र श्येनी शुभ्रा। एनी कर्बुरा, शुभ्रा वा । हरिणी नीला । भरिणी पाटला धूसरा घृतवर्णा वा । रोहिणी रक्ता । एवं पटवी, पटूयते। "तद्धिताककोपान्त्य-"३।२।५४॥ इति न पुंवत् ; धार्मि- कायते । एकिकायते । पाचिकायते । पाठिकायते । कारिकायते। एकादशीयते। चतु. यिते। पञ्चमीयते । "तद्धितः स्वरवृद्धिहेतुः॥३२॥५५॥ इति न पुंस्त्वम् ; माहे- श्वरीयते । सौगतीयते । रक्ते तु स्यात् ; कौङ्कुमायते । “स्वाङ्गान्ङीर्जातिश्चामा- निनि"॥३।२।५६॥ इति पुंवद्भावाभावः; चारुकेशीयते । सुगात्रीयते । वानरीयते। ब्राह्मणीयते ॥भाक॥ पुरुषाय्यते कुटिलाभिः। राजाय्यते॥ ह्यस्त०॥उत्सुक इवा. चरत् औत्सुकायत ॥ अद्य०॥ औत्सुकायिष्ट। दृषदिवाचारीत् अदृषदिष्ट; अदृष- धिष्ट; अत्र “क्यो वा"||४३८१॥ इति क्यङो वा लुक् ॥ भाक ॥ अह- २९४ क्रियारत्नसमुच्चयः । , पदि; अदृषधि। क इबाचचार कायाञ्चक्रे अत्र क्यङः सवरत्वेन आम् सिद्धः। दृषदिषीष्ट; दृषधिषीष्ट । स्वरान्तात्तु क्यङो न लुक् । पटायिता । दृषदिष्यते; दृषधिष्यते । सनि, पुपुरुषायिषते; पुरुरुषायिषते; पुरुषिषायिषते; पुरुषायियिषते; पुरुषायिषिषते । एवं जिहंसायिषते । शिश्येनाविषते । उत्सुसुकायिषते । उत्सु. कायि ५ तः, वा, तुम्, ता, तव्यम् ॥ शेषं क्यन्वत्॥ इति आचारक्यङ्॥४॥ "व्यर्थे भृशादेःस्तोः"॥३।४।२९॥ इति व्यर्थे वा क्य, स्तोः सम्भवे लुक् च। अभृशो भृशोभवति भृशायते । शीघ्रायते । उन्मनायते । वेहायते गौः । संश्वायते; विस्मापकीभवतीत्यर्थः । अनोजस्वी ओजस्वी भवति ओजायते; अत्र तवृत्तेरेव व्यर्थ इति, धर्ममात्रवृत्तेन भवति; अनोज ओजोभवति । पक्षे तु चिः, भृशीभवति । भृश, उत्सुक, शीघ्र, चपल, पण्डित, आणुर, कगुर, फेन, शुचि, नील, हरित, मन्द, मद्र, भद्र, संश्वत्, तृपत्, रेफत्, रेहत्, वेहत् , वर्चस् , ओजस्, उन्मनस् , सुमनस्, दुर्मनस, अभिमनस ॥ ह्यस्त० ॥ अनभिमना अभिमना अभवत् अभ्यमनायत । औत्सुकायत ॥ अद्य० ॥ अभ्यमनायिष्ट । अभिमिमनायिषते; अभिमनिनायिषते; अभिमनायियिषते; अभिमनायिषिषते । णौ; अभिमनाययति । ; अभ्यममनायत; अभ्यमनना- यत्; अभ्यमनायियत् ; अत्र विषयेऽप्यल्लोपात् परनिमित्तत्वाभावेनाल्लुकः स्था- नित्वाभावात् यिद्वित्वम्। क्तिव, अभिमनाय्य गतः॥ इति व्यर्थक्यङ् ॥ ५ ॥ "डाच्लोहितादिभ्यः-"॥३॥४॥३०॥ इति क्यङ् । डाचन्त; अपटत् पटत् भवति पटपटायति; पटपटायते। “क्यतो नवा"॥३।३।४३॥ इति वाऽऽत्मनेपदम् । अत्र "अव्यक्तानुकरणादनेकखरात्कृभ्वस्तिनानितौ द्विश्च ॥७२॥१४५॥ इति डाच् द्वित्वं च, “डाच्यादौ"॥७॥२॥१४९॥ इति पूर्वस्य तो लुक् च । एवं दमदमा, घटघटा, झणझणा, मदमदा, छमछमा, कमकमा, बणबणा, फरफरा इत्यादयः। अलोहितो लोहितो भवति लोहितायति, ते । लोहित, जिह्म, श्याम, धूम, चर्मन्, हर्ष, गर्व, सुख, दुःख, मूी, निद्रा, कृपा, करुणा, धूमादीनां स्वतन्त्रार्थवृत्ती- नां च्व्यर्थाभावात् तद्ववृत्तिभ्य एव प्रत्यया भवति। अधूमवान् धूमवान् भवति धूमायति, ते । बहुवचनमाकृतिगणार्थम् ; तेनामृतं यस्य विषायतीति सिद्धम् ।

नामधातवः । तथा लम्ब, शोभा, लीला, शब्द, बिभ्रमादयोऽपि शब्दा ज्ञेयाः। तत्र च शोभा- दयस्तद्वति वर्तमाना एवावगन्तव्याः; तेन लम्बायमानं, शोभायमानमित्यादि सिद्धम् ॥ इति क्यङ् ॥ ६ ॥ कष्टकक्षकृच्छ्रसत्रगहनाय पापे क्रमणे "॥३४॥३१॥ कष्टादिभ्यश्चतुर्थ्य. न्तेभ्यः पापवृत्तिभ्यःक्रमणेऽर्थे वा क्यङ् । कष्टाय कर्मणे कामति प्रवर्त्तते कष्टायते। कक्षायते । कृच्छ्रायते। सत्रायते। गहनायते । “रोमन्थाद्व्याप्यादुच्चर्वणे"॥३४॥३२॥ रोमन्थमुच्चयति रोमन्थायते गौः; उद्गीर्य चर्बयतीत्यर्थः। "फेनोष्मबाष्पधूमा-"॥ ॥३४॥३३॥ फेनमुहमति फेनायते। ऊष्मायते । “नं क्ये"॥१॥१॥२२॥ इति पद- त्वान्नलोपः । बाष्पायते । धूमायते । “सुखादेरनुभवे"॥३।४।३४॥ सुखमनुभवति सुखायते । दुःखायते। सुख, दुःख, तृप्र, कृच्छ्र, अस्र, आस्र, अलीक, करण, कृपण, सोढ, प्रतीप । “शब्दादेः कृतौ वा"॥३४॥३५॥ शब्दं करोति शब्दायते। वैरायते । कलहायते । “शब्दादेः कृतौ वा"||३४|३५|| इत्यत्र वाशब्दो व्यवस्थितविभाषार्थः; तेन पक्षे यथादर्शनं णिजपि । शब्दयति । वैरयति । वाऽधिकारस्तु वाक्यार्थम्। शब्द, वैर, कलह, ओघ, वेग, युद्ध, अभ्र, कण्व, मम, मेघ, अट, अट्टा, अटाट्या, सीका, सोटा, कोटा, पोटा, पुष्वा, सुदिन, दुर्दिन, नीहार ॥ इति क्रमणा. धर्थक्यङ् ॥ ७ ॥ "तपसः क्यन्"३।४।३६॥ इति करणेऽर्थे क्यन् । तपः करोति तपस्यति यती; अत्र व्रतार्थस्तपःशब्दः । सन्तापार्थे तु, शत्रूणां तपः करोति तपस्यति शत्रून् । णिगि “अतः॥४।३।८२॥ इत्यल्लुकि, "क्यो वा"।।४।३।८१॥ इति वा क्यलुकि; तप. स्ययति; तपसयति; अत्राल्लुकः स्थानित्वान्नान्त्यस्वरादिलोपः॥अद्य० ॥ डे, अत. तपस्यत्; अतपपस्यत् ; अतपसस्यत् ; अत्र “अन्यस्य"॥४॥१८॥ इति तृतीयावय- वस्य द्वित्वेऽदन्तक्यनः फलम्।क्यलुकि तु; अततपसत्, अतपपसत्, अतपसिसत्; अत्राल्लुको न स्थानित्वम् । “नमोवरिवश्चित्रडोऽर्चासेवाश्चर्ये'।३।४।३७॥ नमः करोति नमस्यति देवान् । वरिवस् अव्ययः। वरिवः करोति वरिवस्यति गुरुम् । चित्रं करोति चित्रीयते । कस्य चित्रीयते न धीरित्यकर्मकः । चित्रमाश्चर्य करो. ति जनस्येति विवक्षायां चित्रीयते जनमिति सकर्मकः । ङ आत्मनेपदार्थः ।

क्रियारत्नसमुच्चयः । आश्चर्यादन्यत्र तु, चित्रं करोति; आलेख्यमित्यर्थः ॥ भाक ॥ नमस्य्यते देवः । नमस्यते; अत्र “क्यो वा॥४।३।८१॥ इति बा क्यलुक् ।अनम ४ स्यीत्, सीत्, स्यिष्टाम्, सिष्टाम् । नमस्याञ्चकार ३; नमसाश्चकार ३ । नमस्यि ४ तः, त्वा,ता, तुम् ; नमसि ४ तः, त्वा, ता, तुम् । इति करणाधर्थक्यन् ॥८॥ अथ णिङ् ॥ " अङ्गान्निरसने णिङ्"॥३।४।३८॥ हस्तौ निरस्यति हस्त- यते । पादयते । ग्रीवयते । “पुच्छादुत्परिव्यसने"॥३४॥३९॥ पुच्छमुदस्यति उत्पुच्छयते । पर्यस्यते परिपुच्छयते । व्यस्यति विपुच्छयते । अस्यति पुच्छयते । “भाण्डात्समाचितौ"॥३।४।४०॥ समाचयनं समा परिणा च द्योत्यते। भाण्डानि समाचिनोति सम्भाण्उयते; परिभाण्डयते । “चीवरात्परिधानार्जने"। ३।४।४१॥ चीवरं परिधत्ते परिचीवरयते । चीवरमर्जयति चीवरयते । क्ये, हस्त्यते । पाद्यते ॥ ९ ॥ अथ णिच् ॥ “णिज्बहुलं नाम्नः कृगादिषु॥३४॥४२॥ मुण्डं करोति मुण्ड- यति छात्रम् । एवं मिश्रयत्योदनम् । श्लक्ष्णयति वस्त्रम् । लवणयति सूपम् । "सम्प्रोन्नः सङ्कीर्णप्रकाशाधिकसमीपे"॥७।१।१२५॥ इति प्राक् प्रकाशेऽर्थे कटप्रत्यये प्रकटः,तं करोति प्रकटयति स्वाभिप्रायम् । प्रमाणयति साक्षिणम् । कृतार्थयति । छिद्रं करोति छिद्रयति।कर्णयति । दण्डयति। अन्धयति। अङ्कयति । व्याकरणस्य सूत्रं करोति व्याकरणं सूत्रयति।प्रत्यये उत्पन्ने व्याकरणसूत्रयोः सम्बन्धो निवर्त्तते सूत्रयति। क्रियासम्बन्धात्तु द्वितीयैव नतु षष्ठी। एवं द्वारस्योद्घाटं करोति द्वारमु- हाटयति । पर्यन्तयति कृत्यम् । चिह्नयति दृष्टचरम् । संवर्गयति बन्धून् । खट्- यति दारु । पाप्मिनामुल्लाघं करोति पाप्मिन उल्लाघयति । त्रिलोकी तिलकय- तीत्याद्यपि द्रष्टव्यम्। पटुमाचष्टे करोति वा "नामिनोऽकलि-"॥४३॥५१॥ इति वृद्धौ अन्त्यस्वरलोपे, पटयति । पटीमाचष्टे करोति वा “जातिश्च णि-॥३॥२॥५१॥ इति पुंवत्त्वे वृद्धौ अन्त्यस्वरलोपे च; पटयति । एवं लघु लघ्वी वा लघयति । एवं सुखिनं सुखयति । दुःखिनं दुःखयति । कुशलयति। वार्त्तयति। एवं प्रियं प्रापयति। स्थिरं स्थापयति । स्फिरं स्फापयति । उरुं वरयति। गुरुं गरयति । बहुलं वंहयति । तृप्रंत्रपयति । दीर्घ द्राघयति। वृद्धं वर्षयति। वृन्दारकं वृन्दयति । "प्रियस्थिर- नामधातवः । स्किरोरुगुरुबहुलतृप्रदीर्घवृद्धवृन्दारकस्येमनि च प्रास्थास्फावरगरवहनपद्राघवर्षवृन्द म्" ॥७४।३८॥इत्यनेन प्राद्यादेशाः। एवं “पृथुमृदुभृशशदृढपरिवृढस्य ऋतोरः" ॥७॥४॥३९॥ प्रथयति, म्रदयति, भ्रशयति, कशयति, द्रढयति । द्रढयित्वा। परिद्र- ढय्य गतः । परिवढयति। पृथ्वी, प्रथयति । मृबौं, म्रदयति; पुंवद्भावः । स्थूल- दूरयुवहवक्षिप्रक्षुद्रस्यान्तस्थादेलुंग गुणश्च नामिनः स्थूलमाचष्टे करोति वा स्थवयति । एवं दूरं, दवयति । युवानं, यवयति । हवं, हृमयति । क्षिप्रं, क्षेप- यति । क्षुद्रं, क्षोदयति। स्रग्विणमाचष्टे स्त्रजयति । एवं ओजस्विनं, ओजयति । .गोमन्तं, गवयति । त्वग्वन्तं, त्वचयति । कुमुद्वन्तं, कुमुदयति । अत्र “विन्म- तोर्णीष्ठेयसौ लुप्"॥७४।३२॥ इति विन्मवोर्लुप् । कर्तृमन्तमाचष्टे करयति । कती- रमाचष्टे करयति । पयस्विनं, पययति । वसुमन्तं, वसयति; एषु पूर्वेण विन्मत्वालृपि पश्चात् “त्र्यन्त्यस्वरादेः॥७॥४॥४३॥ इति तृशब्दस्यान्त्यस्वरस्य च लुक् । एवं संक्रा- मन्तं करोति संक्रामयति । मातरं, भ्रातरं वाऽऽचष्टे मातयति, भ्रातयति; इत्यत्र त्वव्युत्पन्नत्वात् तृशब्दस्य न लोपः । स्त्रीमाचष्टे स्त्राययति । रे, राययति । गो, गवयति । नौ, नावयति । गिर् , गिरयति । पुर् , पुरयति । एषु "नैकवरस्य" ॥७।४।४४।। इति न अन्त्यस्वरादिलोपः। “अल्पयूनोः कन् वा॥१४॥३३॥ अल्पं युवानं वाऽऽचष्टे कनयति । पक्षे, अल्पयति; यवयति । प्रशस्यमाचष्टे करोति घा श्रयति; "प्रशस्यस्य श्रः"॥७४।३४॥ एवं वृद्ध, ज्ययति; "वृद्धस्य च ज्यः" ॥७४।३५॥ बाढं साधयति; अन्तिकं नेदयति; “बाढान्तिकयोः साधनेदौ" ॥७४।३७॥ बहुमाचष्टे करोति वा भूययति; “ बहोर्णीष्ठे भूय् ” ॥७।४।४०॥ चिरमाचष्टे विलम्बते वा चिरयति दूतः । वृक्षमाचष्टे रोपयति वा वृक्षयति । कृतं गृह्णाति कृतयति। एवं वर्णयति । त्वां मां वाऽऽचष्टे त्वदयति,मदयति; अत्र नित्यत्वादन्त्यस्वरादिलोपात् प्रागेव अदं विश्लेष्य त्वमादेशौ; पश्चादपि अन्त्यस्व- रादिलोपो न; लोपात्स्वरादेश इति न्यायात् लुगस्येत्येव प्रवर्त्तते । तस्मिन्नपि कृते न "नैकस्वरस्य"॥७॥४४॥ इति निषेधात् । “णिति"॥४।३।५०॥ इति वृद्धि- रापि न, अधातुत्वात् । युवा युष्मान् वाऽऽचष्टे युष्मयति । एवं अस्मयति । त्वच गृह्णाति वचयति । त्वचशब्दोऽदन्तस्त्वपर्यायः । व्यअनान्तस्य तु "णिति" ३९ क्रियारत्नसमुच्चयः। ॥४॥३॥५०॥ इति वृद्धौ त्वाचयतीति रूपं स्यात्, तच्चानिष्टमिति न कृतम् । अत्र व्यञ्जनान्तं त्वक्शब्दं परित्यज्य स्वरान्तपाठेन ज्ञाप्यते नानोऽप्यतोऽ- त्यस्योपान्त्यस्य च; अतो “णिति"॥४।३।५०॥ इति सूत्रेण वृद्धिर्भवतीत्युत्पल- मतं स्वस्यापि क्वचित्संमतमस्तीति । यथा त्वां मां वाऽऽचष्टे; अत्र परत्वा- त्पूर्वमन्त्यखरादिलोपे त्वमादेशऽन्त्यस्वराकारस्य वृद्धौ प्वागमे; त्वापयति, माप- यतीति । ननु कथं कारापयति, वन्दापयति, कथापयति, लेखापयतीत्यादि । उच्यते । महाकविप्रयुक्ता एते प्रयोगाः कापि न दृश्यन्ते । यदि च वचन सन्ति तदैवं समर्थनीयाः । करणं कारस्तमनुयुते; त्वं कुरुष्वेति प्रेरयतीत्यर्थः ।. उत्पलमतेन अतो “णिति"॥४।३।५०॥ इति वृद्धौ प्वागमे; भृत्येन कारा- पयति । एवं वन्दापयतीत्यादिष्वपि । रूपं दर्शयति रूपयति । रूपं निध्या. यति निरूपयति । लोमान्यनुमार्टि अनुलोमयति । तूस्तानि विहन्ति उद्ध- न्ति वा वितूस्तयति, उत्तूस्तयति केशान् ; विजटीकरोतीत्यर्थः । वस्त्रं वस्त्रेण वा समाच्छादयति संवस्त्रयति । वस्त्रं परिदधाति परिवस्त्रयति । तृणानि उत्प्लुत्य शातयति उत्तृणयति । हस्तिनाऽतिकामति अतिहस्तयति । एवम- त्यश्वयति । वर्मणा सन्नाति संवर्मयति । तुलां रोपयति तुलयति कनकम् । वीणया उपगायति उपवीणयति । सेनयाऽभियाति "स्थासनि-"॥२॥३४॥ इति षत्वे, अभिषेणयति । चूर्णैरवध्वंसयति अवकिरति वा अवचूर्णयति । वास्या छिनत्ति वासयति । एवं परशुना परशयति । असिना असयति । श्लोकैरुपस्तौति उपश्लोकयति । हस्तेनापक्षिपति अपहस्तयति । अश्वेन संयु- नक्ति समश्वयति । गन्धेनार्चयति गन्धयति । एवं पुष्पयति । बलेन सहते बलयति । शीलेनाचरति शीलयति । एवं सामयति । सान्त्वयति । छन्दसा उपचरति उपमन्त्रयते वा उपच्छन्दयति । पाशेन संयच्छति संपाशयति । पाशं पाशाहा विमोचयति विपाशयति । शूरो भवति शूरयति । वीरं उत्सहते वीरयति । कूलमुल्लङ्घयति उत्कूलयति । कूलं प्रतीपं गच्छति प्रतिकूलयति । कूलमनुगच्छति अनुकूलयति । लोष्टानवमर्दयति अवलोष्टयति । पुत्रं सूते पुत्रयतीत्यादि । अत्रोत्पुच्छयते इत्यादाविव, विपाशयति संपाशयतीत्यादौ यत्रैक.

नामधातवः । २९९ . . शब्देन नानाकियार्थानामाभिधानं तत्र युक्तौ विविधोपसर्गप्रयोगः; यत्र त्वेक एव क्रियार्थस्तत्र सन युक्तः, श्येनायते इत्यादिवत् अतिहस्तयतीत्यादौ तु णिचः करोत्याचष्टेऽतिक्रामतीत्याद्यनेकार्थत्वात्सन्देहे तयक्तये युक्त उपसर्गप्रयोगः ॥ भाक ॥ मुण्ड्यते; प्रकट्यते इत्यादि ॥ ह्यस्त० ॥ अभ्यषेणयत् ॥ अद्य० ॥अमु- मुण्डत् । “अन्यस्य"॥१८॥ इति यथेच्छं द्वित्वे, अपप्रकटत् ; अप्रचकटत् ; अप्रकटिटत् । स्वापमकरोत् असवापत् । नाम्नोपि "स्वपेर्यङ्डे च"||४|११८०॥ इति वृतमिच्छन्त्यन्ये । असुषुपत् । अर्यमाख्यत् आर्यत् ; अत्रान्त्यस्वरलोपः। "स्वरादे:-"श॥ इति यद्वित्वे कार्ये स्थानिनिमित्तापेक्षयापि प्राविधिरि- ष्यते । शूरं मालां वाऽऽख्यत् अशुशूरत् ; अममालत । दृषदमाख्यत् अदद्द- षत् । राजानमतिकान्तवान् अत्यरराजत् । लोमान्यनुमृष्टवान् अन्वलुलोमत् । स्वामिनमाख्यत् असस्वामत् । तादृशमाख्यत् अततादत् । मातरमाख्यत् अम- मातत् । कलिं हलिं वाऽग्रहीत् अचकलत्, अजहलत् ; एषु समानलोपान्न सन्वहावः । कलिहलिवर्जनान्नाम्नोऽपि वृद्धिः स्यात् ; तेन वास्या परिछिसवान् पर्यवीवसत् । स्वादु कृतवान् असिस्वदत् । पटुं लघु कपि हरि वाऽऽख्यत् ; अपीपटत् ; अलीलघत् ; अचीकपत् ; अजीहरत् ; अत्रेकारोकारयोः पूर्वमेव वृद्धौ कृतायामन्न्यस्वरादिलोपे समानलोपाभावात् “उपान्त्यस्यासमान-"||१।२।३५।। इति यथासम्भवमुपान्त्यहखो "असमानलोपे सन्वद्-"॥४।१।६३॥ इति रान्वद्भा- वश्च सिद्धः। अन्ये तु नाम्नो वृद्धिमनिच्छन्त उइकारयोरेव लोपमिच्छन्तः समानलो. पित्वात्सन्वद्भावाभावेऽपपटत् ; अललघत् ; अचकपत् इत्याद्येवाहुः। इं उं बाऽऽख्यत् ; वृद्धौ "स्वरादे-:"॥१४॥ इति द्वितीयस्य द्वित्वे च; आयियत् , आविवत् । आ- तुमाख्यत् ; खरलोपस्य स्थानित्वेन तुहित्वे, औतुतत्। गोर्होर्यहा गामहिना नौः गानौः, “मयूरव्यंसक-"३।१।११६॥ इति मध्यपदलोपी समामः; तामाख्यत्, त्र्यन्त्यस्वर."॥७॥४॥४३॥ इति औलोपे; अजूगुनत् । औतः स्थानित्वेनोपान्त्यत्वाभा. वान्न हूख इति केचित् । अजुगोनत् । वहेः क्ते ऊढः, तमाख्यत् , औजढत; अत्र परे द्वित्वे "हो धुट्पदान्ते"।।२।११८२॥ इत्यस्यासत्त्वे तदाश्रितत्वात् “अधश्चतुर्थात्त- थोर्ध:"॥२११७९॥ इत्यस्याप्यसत्त्वे ढत्वधत्वयोरसत्त्वात्, अन्त्यस्वरादिलोपस्य च क्रियारनसमुच्चयः द्वित्वे स्थानित्वादकारेण सह "नाम्नो द्वितीय-'॥४।१।७॥ इत्यनेन हेति द्विवचनम् ; एवमूढिमाख्यत् औजिढत्। केचित्तु अन्त्यस्वरादिलोपस्य स्थानित्वमनिच्छन्तो हि इति द्वित्वे, ऊढमूढिं वाख्यत् औजिढदिति मन्यन्ते ॥भाक॥ अमुण्डि। निटि, अमुण्डिषाताम् । इटि, अमुण्डयिषाताम् ; अमुण्डि २ ध्वम्, इट्वम् ; अमुण्डयि ३ ध्वम्, दम्, ड्वम् । एवं अप्रकटि । अकलि । अहलि । अपटि । अलघि । अकपि । अहरि। अगोनि । कर्मकर्त्तरि; अमुमुण्डत स्वयमेव पोतः॥ परोक्षा ॥ मुण्डयां ३, चकार, बभूव, आस वा । प्रकटं दृषदं पटुं कलि लघु कपि चाचख्यौ चकार वा प्रकटयाञ्चकार ३; दृषदयाश्चकार ३; पटयाञ्चकार ३; कलयाञ्चकार ३; लघयाश्चकार ३; कपयाञ्चकार ३ ॥ भाक ॥ मुण्डयाञ्चके ३; बभूवे; आहे इत्यादि ॥ आशीः ॥ मुण्ड्यात् ; दृष्यात् ; पट्यादित्यादि ॥ भाक ॥ इटि, मुण्डयिषीष्ट । जिंटि, मुण्डिषीष्ट । एवं दृषयिषीष्ट; दृषिषीष्टेत्यादि ॥ श्वस्त०॥ मुण्डयिता; दृषयिता; पटयिता ॥ भाक ॥ मुण्डयिता; मुण्डिता ॥ भविष्य० ॥ मुण्डयिष्यति; दृषयिष्यति; पटयिष्यतीत्यादि ॥भाक ॥ मुण्डयिष्यते; मुण्डिष्यते। दृषयिष्यते; दृषिप्यते । पटयिष्यते; पटिप्यते । एवमन्येऽप्युदाहार्याः ॥ सनि, मुमुण्डयिषति । शुशूरयिषति । स्वापञ्चिकीर्षति सिष्वापयिषति; अत्र "स्वपो णावुः" ॥४।१।६२॥ इति न पूर्वस्य उः गेर्घञा व्यवधानात् । इं उं घाख्यातुमिच्छति आयिययिषति; आविवायषति । उतुं उडु चाख्यातुमिच्छति उतुतयिषति । उडुडयिषति; अत्रान्त्यस्वरलोपस्य स्थानित्वेन तुडु द्वित्वम् । प्रकटं कर्तुमिच्छति पिप्रकटयिषति; प्रचिकटयिषतीत्यादि । एवं कवलं धवलं च कर्तुमिच्छति चिकवलयिषति; दिधवलयिषति । सेनयाऽभियातुमिच्छति अभिषिषणयिषति । अभ्यषिषणयिषीत् । णिगि तु मुण्डयन्तं पटयन्तं वा प्रयुङ्क्ते गे कि मुण्डयति पटयतीत्यायेव प्राग्वत् । मुण्डयित्वा । सप्रत्ययस्य प्रादेर्धातुत्वात् यबभावे; प्रक- टयि ४ वा, ता, तुम्, तव्यम् । “सेटक्तयोः॥४।३।८४॥ इति गेलुंकि; प्रक- टितः, २ वान् ॥ "व्रतागुजितन्निवृत्त्योः"॥३॥४॥४३॥ पय एव मया भोक्तव्यमिति व्रतं करोति गृह्णाति वा पयोव्रतयति। सावधानं मया न भोक्तव्यमिति व्रतं करोति गृह्णाति वा नामधातवः। ३०१ सावद्यान्नं व्रतयति । “सत्यार्थवेदस्याः"॥३॥४४॥ सत्यमाचष्टे करोति वा सत्याप. यति । एवमर्थापयति; वेदापयति । श्वेताश्वाश्वतरगालोडिताह्वरकस्याश्वतरेतकलुक्” ॥३४॥४५॥ श्वेताश्वमाचष्टे करोति वा; श्वेताश्वेनाऽतिकामति वा श्वेतयति । एवमश्वयति । गालोडितं गोदोहनं विलोडनं वा, तदाचष्टे करोति वा गालोडयति । एवमारयति; आह्वरकं कुटिलं वाक्यं, कुटिलः पुरुषो वा ॥ अद्य० ॥ , अवव्रतत् । विषयेऽप्यतो लोपस्य परनिमित्तत्वाभावेन स्थानित्वा- भावे तु तिद्वित्वे; अवतितत् । अससत्यपत् । असतित्यपत् । ओणेदित्कर- णज्ञापकात्पूर्व उपान्त्यहवे पश्चाद् हित्वे, असत्यपिपत् । अतीथपत् । उपान्त्य- हस्खे द्वित्वे च, अर्थपिपत् । एवं अविवेदपत् ; अशिश्वेतत् ; आशश्वत् ॥ परोक्षा ॥ अर्थापयां ३ चकार; बभूव; आस वा । अर्थाप्यात् । अर्थापयिष्यति। अर्तिथापयिषति; अर्थापिपयिषति; अर्थापयियिषति; अर्थापयिषिषति । एवं सिसत्यापयिषति । णिगि, अर्थापयतीत्यायेव मूलप्रकृतिवत् । अर्थापितः । अर्थापयित्वा । अर्थापयिता ॥ इति श्रीमत्तपाचार्यश्रीदेवसुन्दरसूरिशिष्यश्रीगुणरत्नसूरिविरचिते क्रियारत्नसमुच्चये नामधातवः ॥

॥ अहम् ॥
अथ गुरुपर्वक्रमवर्णनाधिकारः ।
अनन्तं तज्ज्ञानं स हि निरुपमो दोषविलयो
नतिः शकादीनामहमहमिकापूर्वमिह सा ।
विसंवादातीतं तदपि च वचो दैवतगणे
न यस्मादन्यस्मिन् स जयतितरां वीरजिनपः ॥ १॥
जयति विजितदोषः श्रीसुधर्मा गणेशो (१)
जनितजनकजायाचौरबोधोऽथ जम्बूः (२) ।
प्रभवविमुरथो यचौर्यलम्वत्रिरत्नो (३)
मखगतजिनबुद्धः सूरिशय्यम्भवोऽतः (४) ॥२॥
यशोभद्रः सूरिस्तदनु समभूहिश्वविदितः (५)
ततः सूरिः ख्यातोऽजनि जगति सम्भूतिविजयः।
तथा भद्राहाहूरचितवरनियुक्तिततिको
वराहाऽमोत्थं ह्यशिवमहरद्यः स्तवनतः (६) ॥ ३ ॥
योगीन्द्रः स्थूलभद्रोऽभूदथान्त्यः श्रुतकेवली ।
सिंहं स्वं दर्शयामास भगिनीविस्मयाय यः (७) ॥ ४ ॥
तस्मान्महागिरिरभज्जिनकल्पिकल्पः
श्रीसम्प्रतेनरपतेश्च गुरुःसुहस्ती (८)।
शिष्योत्तमावथ सुहस्तिविभोरभूतां
श्रीसुस्थितस्थविरसुप्रतिबद्धसूरी ॥ ५ ॥
तदा च सूरिमन्त्रस्य ध्याता ज्ञानचतुष्कवान् ।
सर्वज्ञदृष्टद्रव्याणां कोट्यंशमवलोकते ॥६॥
तेन तौ कौटिकौ ख्यातौ ततोऽभूत्कौटिको गणः (९)।
तत्रेन्द्रदिन्न (१०) दिन्नर्षी (११) सूरिः सिंहगिरिस्ततः (१२)॥ ७ ॥

श्रीगुरुपर्वक्रमवर्णनाधिकारः ।
जातिस्मृतिर्जुम्भकदत्तविद्ये श्रीसङ्घवात्सल्यमनीहता च ।
यस्मिन्नतुल्यान्यभवंस्ततोऽभूद् विभुः स वज्रो दशपूर्ववेदी (१३) ॥ ८ ॥
श्रीवज्रशाखाधुरिवज्रसेना (१४) नागेन्द्रचन्द्रादिकुलप्रसूतिः (१५)।
चान्द्रे कुले पूर्वगतश्रुताढ्यः सामन्तभद्रो विपिनादिवासी (१६) ॥ ९ ॥
ततोऽपि वृद्धोऽजनि देवसूरिः (१७) प्रद्योतनः सूरिरथो शमादयः (१८)।
श्रीमानदेवोऽथ पदस्य काले यदंसयोर्वीक्ष्य रमागिरौ दे॥१०॥
भ्रष्टोह्ययं ही भवितेति खिन्ने गुरौ विधिज्ञः किल योऽभ्यगृह्णात् ।
भक्ताङ्गिभक्तिं विकृतीश्च सर्वा आजन्म भोक्ष्ये न हि सर्वथेति ॥११॥
पद्माजयादिदेवीभिर्नतो नड्डूलपू:स्थितः।
शाकम्भरीपुरे मारि जहे शान्तिस्तवाच्च यः (१९)॥ १२ ॥
त्रिभिर्विशेषकम् ।
भक्तामराद्यद्भुतकाव्यसिद्धिः श्रीमानतुङ्गोऽथ बहुप्रसिद्धिः (२०)।
श्रीवीरसूरि (२१)जयदेव (२२) देवानन्दौ (२३) क्रमेण प्रभुविक्रमश्च (२४)॥१३॥
नरसिंहपुरे बोधितहिंसकयक्षोऽथ सूरिनरसिंहः (२५)।
नागहूदतीर्थकृते क्षपणकजेता समुद्रोऽथ (२६)॥ १४ ॥
ख्यातः श्रीहरिभद्रमित्रमभवत् श्रीमानदेवस्ततो
मान्द्याद्विस्मृतसूरिमन्त्रमिह यो लेभेऽम्बिकाया मुखात् (२७)।
तस्मात् श्रीविबुधप्रभोऽजनि (२८) जयानन्दस्ततः संयमी (२९)
भव्याम्भोजरवी रविप्रभगुरुर्जज्ञेऽथ विज्ञेश्वरः (३०)॥ १५ ॥
सरस्वतीकण्ठसुवर्णभूषणख्यातियशोदेवयतीश्वरोऽमुतः (३१)।
प्रद्युम्नसूरिर्जिनशासनाम्बरप्रद्योतनैकामाणस्ततोऽभवत् (३२) ॥ १६ ॥
श्रीमानदेवोऽप्युपधानवाचकग्रन्थप्रणेताऽजनि विश्वपावकः (३३)।
वादे जिते गोपगिरीशपूजितः सत्स्वर्णसिद्धिविमलेन्दुरप्यतः (३४)॥१७॥
युगाङ्कनन्दप्रमिते ९९४ गतेऽब्दे श्रीविक्रमार्कात्सह सङ्घलोकैः ।
पूर्वावनीतो विहरन् धरायामुद्योतनः सूरिरथार्बुदाधः ॥ १८ ॥

३०४ क्रियारत्नसमुच्चयः। .. आगत्य टेलीपुरसीमसंस्थपद्यासमासन्नवृहद्दटाधः । शुभे मुहूर्त स्वपदेऽष्टसूरीनतिष्ठिपत्सौवकुलोदयाय ॥ १९ ॥ ॥ युग्मम् ॥ ततो गणोऽयं वटगच्छसंज्ञोऽप्यभूद् वृहद्गच्छ इति प्रसिद्धः (३५) । श्रीसर्वदेवो विदितोऽतिभूरिप्रशस्यशिष्यः प्रथमोऽत्र सूरिः (३६)।॥ २० ॥ रूपश्रीविरुदख्यातो देवसूरिस्ततोऽभवत् (३७)। श्रीसर्वदेवसूरीन्द्रः पुनरासीद्गुणोदधिः (३८) ॥ २१ ॥ तस्माद्यशोभद्रयतीशचन्द्रः श्रीनेमिचन्द्रश्च विनिद्रभद्रः (३९)। ततोऽजनि श्रीमुनिचन्द्रसरिः प्रज्ञापराभूतसुपर्वसूरिः ॥ २२ ॥ नित्यं पपौ काञ्जिकमेकमम्भस्तत्याज सर्वा विकृतीश्च सम्यग् । जिगाय यो भावरिपूंश्च सोऽयं श्लाघ्यो न केषां मुनिचन्द्रसूरिः (४०) ॥२३॥ तस्याभवन्नजितदेवमुनीन्द्रवादि- श्रीदेवसूरिवृषभप्रमुखा विनेयाः (४१) । आद्यादभूहिजयसिंहगुरुगरीयान् निस्सङ्गतादिकगुणैरनिशं वरीयान् (४२) ॥ २४ ॥ ततः शतार्थिकः ख्यातः श्रीसोमप्रभसूरिराट् । सूरिः श्रीमणिरत्नश्च भारत्यास्तनयाविव (४३) ॥ २५ ॥ मणिरत्नगुरोः शिष्याः श्रीजगञ्चन्द्रसूरयः । सिद्धान्तवाचनोद्भूतवैराग्यरसवार्द्धयः ॥ २६ ॥ विधोश्चैत्रगणाम्भोधौ तपोज्ञानकियानिधेः । वाचकानामलङ्कारात् देवभद्रगणीश्वरात् ॥ २७ ॥ चारित्रमुपसम्पद्य यावज्जीवमभिग्रहात् । आचामाम्लतपस्तेनुस्तपागच्छस्ततोऽभवत् (४४) ॥ २८ ॥ त्रिभिर्विशेषकम् । तत्पट्टोदयभूधरे शशिरवी वागीश्वरीमन्दिरे सेनान्यौ वृषभूपतेः शमरमाकर्णावतंसावुभौ ।

श्रीगुरुपर्वक्रमवर्णनाधिकारः ।
३०५
श्रीदेवेन्द्रमुनीश्वरोऽमलमना आद्यो द्वितीयः पुनः
सूरीशो विजयेन्दुरुत्तमगुणः सेव्यावभूतां सताम् (४५)॥ २९ ॥
श्रीदेवेन्द्रगुरोः शिष्यौ तमस्तौमैकभेदको ।
महाप्रभावजायेतां जम्बूद्वीपरवी इव ॥ ३० ॥
विद्यानन्दमुनीन्दुरादिम इह प्रह्लादने पत्तने
यस्याचार्यपदेऽमुचन् दिविषदो गन्धोदकं मण्डपात् ।
दुष्टस्त्रीदमनः सुशास्त्ररचनः श्रीधर्मघोषः पुनः
पाथोधिप्रकटीकृताद्भुतमणिःश्रीगोमुखोद्बोधकृत् (४६) ॥३१॥
॥ तदा च ॥
योगी कभन शिष्यवृन्दकलितोऽवन्त्यां स्थितो गर्वभू-
नानासिडिबहुप्रसिदिहतहृद्भपप्रजाऽभ्यर्चितः ।
तत्र स्थातुमयं न जैनयतिनां दत्ते कदाऽपि क्वचि-
चेदागच्छति कोऽपि साधुरिह यस्तं प्रत्यसौ मत्सरात् ॥ ३२ ॥
आसन्नोऽप्यथ दूरगोऽपि सहसा सौवप्रभावाहुरो
हुङ्कारात्तृणतन्तुधूलिकणिकाक्षेपात्तथा स्वाङ्कतः ।
मार्जारान्नकुलोन्दुराहिसरटान् गोधावृकान् वृश्चिकान्
फेरण्डप्रभृतींश्च मुश्चतितमां लक्षादिसङ्ख्यान् क्षणात् ॥३३॥
॥ युग्मम् ॥
अन्याश्चापि विभीषिकाः प्रकटयत्युच्चैः स नानाविधा-
स्तद् दृष्ट्वा भयविप्लुताँश्छलयति क्षुल्लान् स पापः क्षणात ।
साधुः कोऽपि न तत्र तिष्ठति ततः श्रीधर्मघोषोऽन्यदा
सूरिस्तत्र समीयिवान् बहुपरीवारो विहारक्रमात् ॥ ३४ ॥
साधूनध्वनि सङ्गतान् स सहसा दृष्ट्वाऽथ दुष्टो रुषा
दन्तैर्दष्टरदच्छदोऽवददऽदः श्वेताम्बराः किंधराः ।
शून्यास्ते सकलाऽपरा यदिह भोः प्राप्ता विशङ्का हठात्
दृष्टोऽहं यदि नो, श्रुतोऽपि किमु रे नात्र स्थितो नन्वहम् ॥ ३५ ॥

क्रियारत्नसमुच्चयः । बाहुभ्यां जलधि तराणि यदि वा तं शोषयाणि क्षणा- दाकाशं विपुलं प्रयाणि खगवद्रात्रौ च कुर्या दिनम् । शेषाहिं दृढयोगपट्टतुलया बनानि सौवासने फूत्कृत्यापि गिरीन् नयानि गगने वायूरजोवद् रयात् ।। ३६ ॥ ॥ युग्मम् ॥ भो भो यात पलाय्य दृष्टिपथतो मां माऽवमन्ध्वं हठा- नो चेत्स्थेयमिह स्थिरैर्भवति यत्तदृश्यतां सम्प्रति । व्याहार्युर्मुनयो मुधाऽऽत्मनि मदं धत्से विधत्से न किं क्षान्ति ब्रूम इदं हिताय भवतो जानासि चेकिंचन ॥३७॥ नोचेद्यन्ननु रोचते प्रकुरु तत् तावत् स्थिताः स्मो वयं योगिन्नुच्छलितोऽपि यन्न चणको भाण्डं प्रभेत्तुं क्षमः । क्रुद्धस्तद्वचसा विधाय विकृतं वक्त्रं स भीत्यावहं दन्तान् स्थूलतरानदीदृशदथो जान्वग्रजाग्रन्मुखान् ॥ ३८ ॥ किं नो भीषयसे तृणाय न वयं मन्यामहे वादृशं व्याहत्येति भयोज्झिता मुनिवरास्तपातसंसूचनीम् । उद्गीर्य स्खकफोणिमुन्नततरां जग्मुस्ततः श्रीगुरो- रभ्यर्णे जगदुश्च तद्गुरुरथो प्रोवाच सर्वान् यतीन् ॥ ३९ ॥ चेद्योगीह विभीषिकां विकुरुते माभैष्ट तो मनाक् त्राताऽहं वरिवमि वोऽथ वसतौ-दोषागमे लक्षशः । शूच्याख्या अतिवज्रतुण्डनखरा अन्यान्यदेहोर्द्धगाः कल्लोला इव वारिधेर्दशदिगुद्भूताः प्रसस्रुः क्षणात् ॥ ४० ॥ अङ्गारोहणवस्त्रपात्रवलकम्तम्भादनैकादरान् दृष्ट्वा तान् वसतेबहिश्च परितः श्वानौतुसर्पध्वनीन् । श्रुत्वा रौद्रतमान् प्रकंप्रतनवो भीतेर्भरात्साधवो- ऽन्योन्याह्वानपराश्च नालमभवन् स्थातुं प्रनष्टुं तथा ॥ ४१ ॥ वस्त्रच्छन्नमुखे घटे प्रथमतः सज्जीकृते श्रीगुरु- दत्त्वा हस्तमथाजपद्गतभयो यावत्स तावच्छठः।

श्रीगुरुपर्वक्रमवर्णनाधिकारः । ३०७ सर्वाङ्गेऽप्युदितं व्यथासमुदयं हर्तुं विषोढुं प्रणि- होतुं वाऽप्यसहस्ततोऽनुगजनानूचे म्रिये भो म्रिये ॥ ४२ ॥ धिग् मामनात्मज्ञमदीर्घदर्शिनं येनाभिमानादपमानितो गुरुः । काणुः क मेरुः क सरः क सागरः काहं हहा कैष च सर्वसिद्धिभृत् ॥४३॥ भीतः सोऽविकलं निजं विलसितं संहृत्य पीडावशा- दाकन्दंश्व कणंश्च तत्र वसतौ गत्वा मुखात्ताङ्गुलिः । ऊचेऽज्ञानवशायदत्र विहितं तत्क्षम्यतां क्षम्यतां नातो वो विदधामि किञ्चिदशुभं साक्षी जनोऽत्राखिलः ॥४४॥ निरीक्ष्य दीनं स्वपदोविलीनं तं योगिराजं सुसमाधिभाजम् । चकार शान्तः प्रभुधर्मघोषः पुण्यप्रभायाश्च बभूव पोषः (४६) ॥ ४५ ॥ श्रीसोमप्रभसूरयो ऽजनिषताथैकादशाङ्गीरफुर- त्सूत्रार्थाः किल कार्तिके समधिके कृत्वा चतुर्मासकम् । अन्याचार्यगणे निषेधति भृशं ये भीमपल्या ययु. भडंभाविनमेक्ष्य मन्त्रनिवहं नालुर्गुरुभ्यश्च ये (४७) ।। ४६ ॥ तेषां विनेया वरभागधेयाश्चत्वार आसन् स्वगुणैरमेयाः । चतुर्गतिभ्योऽमुमतां सुखेनोद्धाराय धर्मस्य वपूंषि किं नु ॥ ४७ ॥ श्रीविमलप्रभसूरि : श्रीपरमानन्दसूरि गुरुराजः । वचनातिगयतनावान् सूरि : श्रीपद्मतिलकगुरुः ॥ ४८ ॥ श्रीसोमतिलकाख्याश्च सूरयो यद्यशोऽर्णवे । ज्योत्स्ना जलं ग्रहाः फेनपिण्डा वेलावलिर्दिशः॥ ४९ ।। ॥ युग्मम् ॥ विश्वख्याततपागणाधिपतयः सार्वत्रिकख्यातयः सबैराग्यपयोधयस्त्रिजगतीदीव्यद्गुणश्रेणयः । आसन् ग्रन्थकृतः सदागमभृतश्चारित्रलक्ष्मीवृतः सद्भाग्याभ्यधिकाश्च सोमतिलकाः सूरीशवृन्दारकाः (४८) ॥५०॥ तेषां शिष्यास्त्रयः ख्याता अभूवन्नद्भुतैर्गुणैः । ज्ञानदर्शनचारित्रत्रयी मूर्तिमती किल ॥ ५१ ।।

कियारत्नसमुच्चयः ।
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संक्षुब्धसागरगभीररवेण नित्यमावर्जिताखिलजगज्जनमानसालिः ।
श्रीचन्द्रशेखरगुरुगरिमैकधाम विद्याविलासवसतिः प्रथमो बभूव ॥५२॥
भव्यप्राणिशिवधियोः परिणये सांवत्सराधीश्वराः
गाम्भीर्यादिगुणैर्निजैरुदधिवत्केनाप्यलब्धान्तराः ।
ते ऽजायन्त यतीश्वरायिह जयानन्दा द्वितीयाः क्रमात्
येषां देवतया करेण निहतो भ्राताऽनुमेने व्रतम् ॥ ५३ ।।
वैराग्यं विमलं शमोऽतिविशदः शास्त्रज्ञता चाद्भुता
सिद्धान्तकरुचिर्मनोहरतरा भव्योपकारः परः ।
चारित्रं त्रिजगत्यनुत्तरतमं भाग्यं ह्यसाधारणं
येषां श्रीयुतदेवसुन्दरवराः ख्यातास्तृतीयास्तु ते ॥ ५४ ॥
एकद्वित्रिमुख्यैर्गुणैः कृतमदा देहेऽपि गेहेऽपि ये
नो मान्ति प्रचुरा नरा जगति ते सन्तु प्रकामं परे ।
ये सर्वेषु गुणेषु सत्स्वपि मदं कुर्वन्ति नो कहिंचित्
तेऽमी श्रीयुतदेवसुन्दरवराः सन्त्येक एवावनौ ॥ ५५ ॥
न यन्निन्दास्तुती कर्तुं शक्यते खलसज्जनैः ।
असद्भावेन दोषाणां गुणानां चाप्रमाणतः (४९)॥५६॥
तच्छिष्याः सूरयः पञ्च मेरुपश्चकसन्निभाः।
सुवर्णभरविख्याता विद्यन्ते गरिमास्पदम् ॥ ५७ ॥
यद्वैराग्यमखण्डितं बहुविधं नित्यं तपो यत्परं
बाहुश्रुत्यमुदारविस्मयकरं यद्यच्च शान्तं मनः ।
योऽन्यो वाऽप्यभवद्गुणो गुरुवरे श्रीज्ञानतः सागरे
तत्सर्व नहि वीक्ष्यते गणिगणेऽन्यस्मिन् कदाऽपि क्वचित् ॥५८॥
दाक्षिण्यैकपयोधयश्चतुरसञ्चेतश्चमत्कृद्गुणाः
सिद्धान्तार्णवगाहनैकरसिका उत्सर्गमार्गाध्वगाः ।
प्रागल्भ्यप्रवरास्तपोविधिरताः सन्मत्युदाराशयाः
आसञ् श्रीकुलमण्डनाइयगुरूत्तंसा द्वितीया इमे ॥ ५९ ॥

श्रीगुरुपर्वक्रमवर्णनाधिकारः । भूतभाविभवत्सूरिक्रमरेणुकणोपमः । सूरिः श्रीगुणरत्नाह्वस्तृतीयः समजायत ॥ ६० ॥ श्रीसोमसुन्दर इति प्रथिताभिधानाः सौभाग्यभाग्यविशदाः क्षमया प्रधानाः । तुर्याः सुधामधुरिमाश्चितवाग्विलासाः सूरीश्वरा गणिगुणैः कृतनित्यवासाः ॥११॥ श्रीसाधुरत्नाश्च ततो मुनीन्द्रास्तदद्भुतं यत्सुगुणा यदीयाः । नान्यत्र सन्तोऽपि जगज्जनानां सर्वत्र कर्णातिथयो भवन्ति॥६॥ ले षड्रसपूर्व १४६६ वत्सरमिते श्रीविकमार्काद्गते गुर्वादेशवशाहिमृश्य च सदा स्वान्योपकारं परम् । ग्रन्थं श्रीगुणरत्नसूरिरतनोत्प्रज्ञाविहीनोऽप्यमुं निर्हेतूपकृतिप्रधानजननैः शोध्यस्त्वयं धीधनैः ॥६३॥ प्रत्यक्षरं गणनया ग्रन्थमानं विनिश्चितम् । षट्पञ्चाशच्छतान्येकषष्टयाधिकान्यनुष्टुभाम्॥ ६४ ॥ वाछासङ्घपतेरियदरविभोर्मान्यस्य धन्यः सुतः शश्वद्दानविधिविवेकजलधिश्चातुर्यलक्ष्मीनिधिः । अन्यस्त्रीविरतः सुधर्मनिरतो भक्तः श्रुतेऽलेखयत् साधुर्वीसलसंज्ञितो दश वरा अस्य प्रतीरादिमाः ॥ ६५ ॥ श्रीमत्सङ्घनृपस्य वासवगणैर्नम्यक्रमाम्भोरुहो विश्वास्थानजुषो बिभर्ति हि नभो नीलातपत्रं सदा । तारामौक्तिकशोभि यावदमलं मेरुं च दण्डं विधि- स्तावन्नन्दतु शास्त्रमेतदनिशं संम्प्रेक्ष्यमाणं बुधैः ॥६६॥ इति तपाचार्यश्रीदेवसुन्दरसूारीशष्यश्रीगुणरत्नसूरिविरचिते श्रीहैमव्याकरणानुसारिण क्रियारत्नसमुच्चये श्रीगुरुपर्वक्रमवर्णनाधिकारः ।

अथ ग्रन्थस्य बीजकम् । दशविभक्तिविभागः ॥ भू १ पां२ घ्रां ३ मां ४ ष्ठां ५ म्नां ६ दाम् ७ जिं, त्रिं ९ किं १० इं, दु, टु, शुं, मुं १५ सुं १६ स्मं १७ सं १८ – १९४ २० ट्धे २१ व् २२ ध्य २३ ग्लैं, म्लैं, ., | २७ कैं, गैं, रैं ३० ३१ रिखु, इखु, वलग, रिगु, तगु, लिगु ३७ शिघु ३८ लघु ३९ शुच ४० कुश्च ४१ लुञ्च ४२ अर्च ४३ अञ्चू ४४ वञ्चू, चञ्चू ४६ लाछु ४७ वाछु ४८ मुछी ४९ व्रज ५० अज ५१ अर्ज ५२ एज ५३ ट्रोस्फूर्जा ५४ कूज ५५ गुजु ५६ तर्ज ५७ गर्ज ५८ त्यजं ५९ षनं ६० कटे ६१ शट ६२ खिट ६३ णट ६४ लुट ६५ अट, पट, कट ६८ लुटु ६९ स्फट, स्फुट्ट ७१ रट ७२ पठ ७३ हठ ७४ क्रीड ७५ लड ७६ अद्ड् ७७ रण, भण, कण, क्वण ८१ ओण ८२ चितै ८३ अत ८४ च्युत, चुतृ, श्चुतृ, श्च्युतृ ८८ अतु८९ कित ९० खादृ ९१ गद ९२ अदु ९३ इदु ९४ णिदु ९५ टुनदु ९६ क्रदु ९७ स्कन्दं सर्वधातूनां वेट्वमतं ९८ षिधू ९९ ध्वन, खन १०१ गुपौ १०२ तपं, धूप १०४ लप, जल्प १०६ जप १०७ सृप्लं १०८ चुप १०९ चुबु ११. चमू, जिमू ११२ क्रमू ११३ यमूं ११४ णमं ११५ अम ११६ गम्लं ११७ ईj ११८ चर ११९ दल, त्रिफला १२१ मील १२२ मूल १२३ फल १२४ फुल्ल १२५वेल, खेल, स्खल १२८ गल, चर्ब १३० गर्व १३१ ष्ठिवू १३२ जीव १३३ अव १३४ दृशृं १३५ दंशं १३६ घुष १३७ तूष १३८ लुष १३९ कृषं १४० भष १४१ विषू, वृषू १४३ मृषू १४४ उधू, प्लुपू १४६ घृषू १४७ पुष १४८ भूष १४९ रस १५० लस १५१ हसे १५२ शंसू १५३ दहं १५४ वृहु १५५ अर्ह, मह १५७ उक्ष१५८ रक्ष १५९ तक्षौ १६० काक्षु १६१ ॥ इति परस्मैपदिनः ॥ गाङ् १६२ मिङ् १६३ डीङ् १६४ कुंङ् १६५ च्युङ्, श्रृंङ्, प्लुङ् १६८ पूङ् १६९ मेंङ् १७० देंङ्, त्रैङ् १७२ लोकङ् १७३ रेकृङ्, शकुङ् १७५ चकि १७६ ढोकृङ्, त्रौकृङ्, टीकृङ्, लघुङ् १८० श्लाघृङ् १८१ लोचङ् १८२ पचुङ् १८३ भ्राजि १८४ ऋजि १८५ भृजैङ् १८६ तिजि १८७ चेष्टि १८८ वेष्टि १८९ कठुङ् १९० पिडुङ् १९१ १ ग्रन्थस्य बीजकम् । खडुङ् १९२ भडुङ् १९३ हेडङ् १९४ हिडुङ् १९५ घुणि, घूर्णि १९७ पणि १९८ यतैङ् १९९ नाथूङ् २०० ग्रथुङ् २०१ वदुङ् २०२ स्पदुङ् २०३ मुदि २०४ ददि २०५ हदिं २०६ ष्वदि, स्वादि २०८ कुर्दि २०९ हादङ् २१० पर्दि २११ एधि २१२ स्पर्धि २१३ बाधृङ् २१४ दधि २१५ बधि २१६ पनि २१७ मानि २१८ टुवेपृङ्, कपुङ् २२० त्रपौषि २२१ गुपि २२२ लबुङ् २२३ कवृङ २२४ लभुङ् २२५ ष्टभुङ् २२६ जुभुङ् २२७ रभि २२८ डुलभिष् २२९ क्षमौषि २३० कमूङ् २३१ अयि २३२ दयि २३३ ऊयैङ् २३४ स्फायैङ्, ओप्यायैङ् २३६ तायङ् २३७ वलि २३८ कलि २३९ तेवृङ्, देवृङ् २४१ षेवृङ्, सेवृङ् २४३ काशृङ् २४४ भाषि २४५ एपृङ् २४६ हेषङ् २४७ कासृङ् २४८ भासि २४९ आङः शसुङ् २५० ग्रसूङ २५१ ईहि २५२ गर्हि २५३ द्राहङ् २५४ उहि २५५ गाहौङ् २५६ धुक्षि २५७ शिक्षि २५८ भिक्षि २५९ दीक्षि २६० ईक्षि २६१॥इत्यात्मनेपदिनः॥ श्रिग् २६२ णींग २६३ हंग २६४ भंग २६५ धुंग २६६ डुकुंग २६७ डुयाचूग २६८ डुपचीष २६९ राजग, टुभ्राजि २७१ आत्मनेपदा- नित्यत्वं; भजी २७२ रञ्जी २७३ बुधृग २७४ खनूग २७५ दानी २७६ शानी २७७ शपी २७८ धावूग २७९ लषी २८० चषी २८१ गुहौग २८२ भ्लक्षी २८३ ॥ इत्युभयपदिनः ॥ द्युति २८४ रुचि २८५ शुभि २८६ क्षुभि २८७ सम्भूङ् २८८ भ्रंशूङ्, स्रसूङ् २९० ध्वंसूङ् २९१ वृतूङ् २९२ स्यन्दौङ् २९३ वृधूङ् २९४ शृधूङ् २९५ कृपौङ् २९६॥ इति द्युतादिः ॥ ज्वल २९७ कुच २९८ पत्ल २९९ मथे ३०० षद्ल ३०१ शद् ३०२ बुध ३०३ टुवमू ३०४ भ्रमू ३०५ क्षर ३०६ चल ३०७ शल ३०८ क्रुशं ३०९ कस ३१० रुहं ३११ रमि ३१२ षहि ३१३ इति ज्वलादिः ॥ यजी ३१४ वेंग ३१५ व्यग् ३१६ ह्रग् ३१७ टुवपी ३१८ वहीं ३१९ ट्वोश्वि ३२० वद ३२१ वसं ३२२ ॥ इति यजादिः ॥ घटिए ३२३ व्यथिष् ३२४ प्रथिष् ३२५ ऋदुङ् ३२६ जित्वरिष् ३२७ स्मृ ३२८ दृ ३२९ लगे ३३० ष्ठगे, स्थगे ३३२ णट ३३३ मदै ३३४ ध्वन ३३५ चल ३३६ हल ३३७ ज्वल ३३८ ॥ इति भ्वादिगणः॥ अदं, प्साक् २ भांक ३ यांक ४ वांक ५ ष्णांक ६ द्रांक ७ पांक ८ लांक ९ ३१२ क्रियारत्नसमुच्चयः । रांक १० दांब्क् ११ ख्यांक १२ मांक १३ इंक १४ इण्क १५ फूंक १६ तुक १७ युक् १८ णुक १९ क्ष्णुक २० स्नुक् २१ टुक्षु, रु, कुंक २४ रुदृक् २५ भिष्वपंक २६ अन, श्वसक् २८ जक्षक २९ दरिद्राक् ३० जागृक् सर्वधातुभ्यो यङिति मतं; ३१ चकासृक् ३२ शासूक् ३३ वचंक ३४ मृजौक् ३५ विदक ३६ हनंक ३७ वशक् ३८ असक ३९ यङ्लुक् ४० ॥ अथात्मनेपदिनः॥इंङ् ४१ शाक् ४२ ढुंङ्क् ४३ पूडौक् ४४ पृचैङ्क ४५ ईडिक् ४६ ईरिक् ४७ ईशिक ४८ वसिक ४९ आङः शासूकि ५० आसिक् ५१ णिसुकिं ५२ चक्षिक ५३ ॥ अथोभयपदिनः ॥ ऊर्णग्क् ५४ ष्टुंग्क् ५५ बॅग्क् ५६ द्विषींक ५७ दुहीक ५८ दिहीक् ५९ लिहीक्६० ॥ अथ ह्वादयः ॥ हुंक् ६१ ओहांक ६२ ञिभीक ६३ ह्रींक ६४ पृक् ६५ ऋक् ६६ ओहांङ्क् ६७ मांङ्क ६८ डुदांग्क् ६९ डुधां- गक् ७० टुडु,गक् ७१ णिजूंकी ७२ विज़ुकी ७३ विष्लंकी ७४ ॥ इत्यदादिगणः । दिवूच १ जृष्, झूषच ३ शोंच ४ दो, छोंच ६ षोंच ७ वीड्च ८ नृतच ९ कुथच् १० गुधच् ११ राधंच १२ व्यधंच १३ क्षिपंच १४ तिम, तीम, प्टिम, टीमच १८ षिवूच १९ ष्ठिवूच २० इषच २१ त्रसैच २२ षहच २३॥अथ पुषादिः॥ पुषंच २४ लुटच २५ विदांच २६ क्लिदौच २७ क्षुधंच २८ शुधंच २९ क्रुधंच ३० षिचूंच् ३१ ऋधूच ३२ गृधूच ३३ रधौच ३४ तृपौच ३५ दृपौच ३६ कुपच ३७ गुपच ३८ लुपच ३९ लुभच ४० क्षुभच ४१ न शौच ४२ भृशू , भ्रंशूच ४४ कृशच ४५ शुषंच ४६ दुषंच ४७ श्लिषंच ४८ प्लुषूच् ४९ ञितृषच ५० तुषं, हृषच ५२ रुषच ५३ असूच ५४ यसूच ५५ शमू, दमूच ५७ तमूच ५८ श्रमूच् ५९ भ्रमूच ६० क्षमौच ६१ मदैच ६२ क्लमूच ६३ मुहौच ६४ दुहौच ६५ ष्णिहौच ६६॥ इति पुषादिः । पूडौच ६७ दूच ६८ दींच ६९ लींच डीच् ७१ ॥ इति सूयत्यादिः॥ पीच ७२ ईच् ७३ प्रीङ्च् ७४ युजिंच ७५ सृजिंच ७६ पदिंच ७७ विदिंच ७८ खिदिंच ७९ युधिंच ८० अनो रुधिंच् ८१ बुधिं, मनिंच ८३ जनैचि ८४ दीपैचि ८५ तपिंच ८६ पूरैचि ८७ क्लिशिच् ८८ काशिच ८९ वाशिच ९० रञ्जींच ९१ शपीच ९२ मृषीच् ९३ णहींच ९४ ॥ इति दिवादिगणः ॥

ग्रन्थस्य बीजकम् । ३१३ पुंगट १ पिंगट २ डुमिंगट ३ चिंगट ४ धूगट् ५ स्तूंगट ६ वृगट् . ७ ॥ इत्युभयपदिनः॥ हिट् ८ श्रृंट ९ टुदुंट १० ऍट् ११ शक्लंट् १२ राध, साधंट १४ ऋधूटू १५ आप्लंट् १६ तृपट् १७ दम्भूटू १८ धिवुट् १९ ष्टिघिट २० अशौटि २१ ॥ इति स्वादिगणः ॥ तुदीत् १ भ्रस्जीत् २ क्षिपीत् ३ दिशीत् ४ कृषीत् ५ मुच्लंती ६ षिचीत् ७ विलंती ८ लुप्लंती ९ लिपीत् १० कृतैत् ११ ॥ इति मुचादिः ॥ मृत् १२ कृत् १३ गृत् १४ लिखत १५ ओवस्चौत् १६ प्रछंत् १७ सृजत् १८ टुमरजोत १९ उद्झत् २० घुण, घूर्णत् २२ णुदत् २३ विधत् २४ छुपंत २५ गुफ, गुंफत २७ शुभ, शुंभत् २९ दृभैत् ३० स्फलत् ३१ मिलत् ३२ स्पृशंत् ३३ विशंत ३४ मृशंत् ३५ इषत् ३६ मिषत् ३७ ॥ अथ कुटादिः ॥ कुटत् ३८ णूत् ३९ धूत् ४० कुचत् ४१ घुटत् ४२ छुट, त्रुटत् ४४ मुटत् ४५ स्फुटत् ४६ लुठत् ४७ कृडत् ४८ गुडत्, जुडत्, तुडत् , ५१ स्फुरत् ५२ ॥ इति परस्मैपदिनः ।। कुंङ्, कूङ्त् ५४॥ इति कुटादिः॥ पृङ्त् ५५ दृत् ५६ ओविजैति ५७ ओल. स्जैति ५८ प्वजित् ५९ जुषैति ६० ॥ इति तुदादिगणः ॥ रुधूपी १ रिघृपी २ विचूंपी ३ युजूंपी ४ भिदंपी ५ छिद्रूपी ६ क्षुद्रूपी ॥ इत्युभयपदिनः ॥ पृचैप् ८ भञ्जोंप ९ भुजंप १० अौप् ११ ओविजैप १२ शिष्लंप् १३ पिप्लंप् १४ हिसु, तृहप् १६ खिदिप १७ विदिप १८ जिइन्धैपि १९ ॥ इति रुधादिगणः ॥ तनूयी १ षणूयी २ क्षनूग्, क्षिनूयी ४ ॥ इत्युभयपदिनः॥ वनूयि ५ मनू- यि ६ इति तनादिगणः ॥ डुक्रींग्श् १ प्रींग्श २ मींग्श ३ ग्रहीश् ४ ॥ अथ प्वादिः ॥ पूग्श ५ । ॥अथ ल्वादिः॥ लूग्श ६ धूम्श् ७ स्तृन्ग ८ वृग्श् ९॥ इत्युभयपदिनः ॥ ज्यांश १० लींश् ११ कृ, मृ, शृश १४ पृश् १५ दृश् १६ जृश् १७ गृश् १८ इति प्वादिादिः । ज्ञांश १९ मन्थश् २० ग्रन्थश २१ मृदश् २२ बन्धंश २३ क्षु- भश् २४ क्लिशौश् २५ अशश २६ मुष्श् २७ पुष्श २८ कुप्श् २९ वृश ३० ॥ इति ज्यादिगणः ॥ ४१ ३१४ कियारनसमुच्चयः । चुरण १ पृण २ पचुण ३ पूजण ४ गजण ५ तिजण ६ नटण ७ चुटु, छुटण ९ कुट्टण १० मुटण ११ लुटण १२ घट्टण १३ स्फिटण १४ गुठुण १५ लडण १६ ओलडुण १७ पाडण १८ तडण १९ खडुण २० कडुण २१ गुडुण २२ मडुण २३ पिडुण २४ ईडण २५ चूर्णण २६ श्रण २७ चितुण् २८ कृतण् २९ पथुण ३० प्रथण ३१ छदण ३२ चुदण ३३ छर्दण ३४ बन्ध, बधण ३६ यमण ३७ यत्रुण ३८ लण ३९ तुलण ४० दुलण ४१ मूलण ४२ बुलण ४३ पलण ४४ इलण ४५ सांत्वण ४६ पुसण ४७ जसण ४८ भक्षण ४९ लक्षीण ५० ॥इतोऽर्थविशेषे आलक्षिणः ॥ ज्ञाण ५१ भूण ५२ लिगुण ५३ चर्चण ५४ चट, स्फुटण ५६ घटण ५७ हन्त्यर्थाः ५८ यतण ५९ निर्यतण ६० ष्वदण ६१ आखदण ६२ मुदण ६३ कृपण ६४ चरण ६५ घुघृण ६६ भूष, तसुण ६८ त्रसण ६९ अर्हण ७० लोक, तर्क, लघु, लोच, अजु, पिजु, भजु, लुट, वृत, वृध, गुप, धूप, कुप, दशु, वृहुण ८५॥ इति परस्मैपदिनः॥ वंचिण ८६ विदिण ८७ मनिण ८८ भलिण ८९ कुत्सिण ९० लक्षिण ९१ तर्जिण ९२ त्रुटिण ९३ चितिण ९४ गन्धिण ९५ शमिण ९६ गूरिण ९७ मन्त्रिण ९८ ललिण ९९ दंशिण १०० भणि १॥ इत्यात्मनेपदिनः ॥ इतोऽदन्ताः ॥ अदन्तवृद्धिप्वागममतं अङ्कण २ सुख, दुःखण् ४ रचण् ५ सूचण ६ भाजण ७ सभाजण ८ खोटण ९ दण्डण १० वर्णण ११ कर्णण १२ गणण १३ गुणण्, केतण १५ पतण १६ कथण १७ छेदण् १८ रूपण १९ क्षपण २० व्ययण २१ सूत्रण २२ मूत्रण २३ पारण, तीरण २५ चित्रण २६ छिद्रण २७ मिश्रण २८ कलण २९ शीलण ३० गवे- षण ३१ मृषण ३२ रसण ३३ महण ३४ रहुण ३५ स्पृहण ३६ रुक्षण ३७ ॥इति परस्मैपदिनः॥ मृगणि ३८ अर्थणि ३९ सङ्ग्रामणि ४० गर्वणि ४१ गृहणि ४२॥ इत्यदन्ताः॥अथ युजादिः॥युजण ४३ लीण ४४ प्रीगण ४५ धूगण ४६ वृग्ण ४७ जृण ४८ मार्गण ४९ पृचण ५० रिचण ५१ वचण ५२ अर्चिण ५३ वृजैण ५४ मृजौण ५५ कठुण ५६ ग्रन्थण ५७ अर्दिण ५८ वदिण ५९ छदण ६० आङः सदण ६१ मानण ६२ तपिण् ६३ तृपण ६४ आप्लण ६५ ईरण १ ग्रन्थस्य बीजकम् । , ६६ मृषिण ६७ शिषण ६८ विपूर्वः ६९ धृषण ७० हिसुण ७१ गर्हण ७२, पहण ७३ बहुलं ७४; एवं १७४ ॥ चुरादिगणः ॥ एवं नवगणजा धातवः सर्वे ८१६ ॥ अथ सौत्राः॥ कण्ड्वादयः १ अन्दोलण, प्रेढोलण, वीजण ४ रिखिः ५ चुलुम्प ६ स्तम्भू ७ स्तुम्भू ८ स्कम्भू ९ स्कुम्भू १० लुल ११ । अथ नामधातवः । काम्यः १ क्यन् २ क्विप् ३ आचारक्यङ् ४ च्च्यर्थ- क्यङ् ५ क्यङ ६ क्रमणाद्यर्थक्यङ् ७ करणाद्यर्थक्यन् ८ णिङ् ९ णिच् १० णिजन्तविभक्तयः । प्रशस्तिः ॥ इति सम्पुर्णोऽयं क्रियारत्नसमुच्चयो नाम ग्रन्थः सबीजकम् । ग्रन्थमानम् ५७७८ ॥

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अथ क्रियारत्नसमुच्चयस्थधातूनां सूची । पृष्ठम् धातवः पृष्ठम् धातवः १०४ ईहि २७६ अङ्कण ५८ अज ८४ उक्ष २७३ अजु ५५ अञ्चू २३० उझत ८२ उषू २४५ अौप ६१ अट २२१ अशौटि ६४ अत ६५ अतु पृष्ठम् धातवः पृष्ठम् धातवः २८. अर्थणि इ २८३ अर्दिण् ८४ अर्ह १४७ इंक् २७३ अर्हण् ५४ इखु ७९ अव १६३ इङ्क् २६३ अशश् १४८ इणक ६५ इदु .१६२ असक् २७० इलण १९८ असूच १८९ इषच २३४ इषत् प्रा १०४ आङःशसुङ् १६७ आङ:- १०५ ईक्षि २०६ ईच् २८३ आङः सदण २६८ ईडण २९३ आचारक्यङ् १६६ ईडिक् २२० आप्लंट् २८४ ईरण २८४ आपलण् १६६ ईरिक् २७२ आस्वदण् १६७ आसिक् १६६ ईशिक् १०१ ऊयैङ् १६९ अर्णग्क् १०४ अहि १४२ अदं ६३ अड् ६५ अदु १५३ अन २८६ अन्दोलण २०८ अनोरुधिंच् ७४ अम ई शासूकि ऋ ४६ ऋ १७६ क् ९१ ऋजि १९२ ऋधूच् २१९ ऋधूट् १०. अयि ५५ अर्च २८२ अर्चि ७६ ईय ए ५८ एजु ५८ अर्ज ( २ ) पृष्ठम् धातवः पृष्ठम् धातवः ९५ एधि १०३ ए २९५ करणाद्यर्थ- श्रो ६४ ओण १०१ ओप्यायैङ् २६७ ओलडुण २३८ ओलस्जैति २२८ ओवरचौत् २३८ ओविजैति २४५ ओविजैप १७४ ओहांक १७७ ओहांङ्क् पृष्ठम् धातवः पृष्ठम् धातवः २९४ क्यङ् २०१ क्षमौच २८९ क्यन् ९९ क्षमौषि १२९ क्षर क्यन् २६९ क्षलण २७७ कर्णण ४३ क्षि ६६ क्रदु २४९ क्षिनूयी १४० क्रदुङ १८८ क्षिपंच २९५ क्रमणाद्यर्थ- २२३ क्षिपीत् क्य २४३ क्षुद्रूपी ७१ क्रमू १९१ क्षुधंच ६३ क्रीड १९५ क्षुभच १९१ क्रुधंच २६२ क्षुभश् १३० क्रुशं १२२ क्षुभि २७८ कलण १३० कस २०२ क्लमूच ८५ काक्षु १०२ कलि २८८ काम्यः १९१ क्लिदौच २१० काशिच् २१० क्लिशिच १०३ काशृङ् २६२ क्लिशौश १०३ कासृङ् ५५ कुश्च २३४ कुटत् २६७ कुट्टण २७४ कुत्सिण् १८७ कुथ्च २७३ कुप १९४ कुपच ९५ कुर्दि २६४ कुषश् २३७ कूत ५९ कूज २३७ कृडत् २२६ कृतैत् २७२ कृपण १२५ कृपाङ् ८१ कृषं २२४ कृषीत् १९६ कृशन् क ६१ कट ६० कटे ९२ कठुङ् २८३ कठुण २६८ कडुण ६३ कणं ६५ कित २५७ कृ २२७ कृत् २६९ कृतम् ६३ कण २९१ किप ९८ कवृ १५० णुक् २४९ क्षनूग २७८ क्षपण २८५ कण्ड्वादयः २७७ कथण ९७ कपुङ् १०० कमूङ २७७ केतण् १५१ कुंक् ८६ कुं २३७ कुंङ् १२६ कुच २३५ कुचत् पृष्ठम् धातवः पृष्ठम् धातवः ख पृष्ठम् धातवः १०४ गर्हि २५३ ग्रहीश् २५८ गृश पृष्ठम् धातवः .६४ च्युत ७६ चर ५३ गैं १०४ ग्रसूङ २७२ चरण ७८ गल घ २७१ चर्चण २७२ घटण २६७ घट्टण ७८ चर्ब १२९ चल ९२ खडुङ् २६८ खडुण ११८ खनूग १४६ ख्यांक ६५ खाह ६. खिट २०७ खिदिच २४७ खिदिप ७८ खेल २७६ खोटण १३९ घटिष ३५ घ्रां २६३ घुटत् २३१ घुण २७८ गवेषण ८५ गाङ् १०५ गाहौङ् ५९ गुजु २६७ गुठुण २३७ गुडत् २६८ गुडुण २७७ गुण १८७ गुधच २७३ गुप १९५ गुपच ९३ घुणि १४२ चल २९४ च्व्यर्थ- क्यङ् ११९ चषी २१४ चिंगट २७८ चित्रण २७५ चितिण २६८ चितुण ८१ घु ग २७३ घुघृण २३१ धूणत् ९३ घूर्णि ६४ चितै २६६ गजण २७७ गणण ६५ गद २७५ गन्धिण ७४ गम्लं ८३ घृपू २६६ चुटु ९८ गुपि ६४ चुत ६७ गुपौ ५९ गर्ज ७८ गर्व च १६८ चक्षिक १५५ चकासक् २६९ चुदण ७० चुप ७० चुबु २६५ चुरण २८७ चुलुम्प ९० चकि २३१ गुफ २३१ गुंफत् ११९ गुहौग २७५ गरिण १९२ गृधूच २८० गृहाण ९३ ग्रथुङ् २८३ ग्रन्थ २६१ ग्रन्थ ५६ चञ्चू २७१ चट २६८ चूर्णण ९२ चेष्टि २८. गर्वणि २८४ गर्हण ७० चमू ८६ च्युइ २२७ गृत् ( ४ ) पृष्ठम् धातवः पृष्ठम् धातवः पृष्ठम् धातवः ४१ जिं जिमू ७९ जीव ६१ गट १४२ णट पृष्ठम् धातवः ९० टीकृङ् १५१ टुक्षु १८१ टुडु,गक २१८ टुइंट् ६६ टुनदु ११६ टुभ्राजि २३० टुमरजोत् २३७ जुडत् ७३ णमं छ २६९ छदण २८३ छदण २६९ छर्दण २७८ छिद्रण २४३ छिपी २३६ छुट २६६ छुटण २३१ छुपंत् २७७ छेदण १८५ छोंच २३९ जुषैति ९९ जुभुङ् २८२ जण २५८ जृश १८४ जृष १३५ टुवपी २११ णहीच २९६ णि २९६ णिच १८२ णिजॅकी ६५ णिदु १६८ णिसुकि १०७ णींग १२८ टुवमू ९७ टुवेपृङ् भ ड १८४ झूषच १५० णुक ज २३१ गुदंत् ञ २३५ णूत् १५३ जक्षक २७१ ज्ञाण २५९ ज्ञांश त २०९ जनैचि २४७ त्रिइन्धैपि १४० जिवरिष १९८ जितृषच ७७ जिफला १७५ जिभीक १५२ भिष्वपंक् ८६ डी २०५ डीङ्च २५१ डुक्रीगर १०९ डुकुंग १७८ डुदांगक १७९ दुधांगक ११३ डुपचीष २१३ डुमिंगट ११३ डुयाग ९९ डुलभिष ८५ तौ ६९ जप २५६ ज्यांश ५४ तगु २६७ तडण २४८ तनूयी ४१ जिं ६९ जल्प ६८ तपं १२६ ज्वल ट १४२ ज्वल ढ २१० तपिंच २८३ तपिण २०० तमूच ५१ ट्धे १३६ ट्वोश्वि ५८ टोस्फूर्जा २७० जसण १५४ जायक ९. ढाकृत ५९ त्य ( ५ ) पृष्ठम् धातवः पृष्ठम् धातवः पृष्ठम् धातवः १९४ तृपौच ध २७३ तर्क ५९ तर्ज २४६ तृहप २७४ तर्जिण ४९ तृ ३६ ध्मां ५२ ध्य ९७ पौषि १०२ तेवृङ् ५३ | पृष्ठम् धातवः ११८ दानी १४६ दाबक् ४० दाम् १८३ दिवूच २२३ दिशीत् १७३ दिहीक १०५ दीक्षि २०४ दीङ्च २०९ दीपैचि ४३ दूं ६७ ध्वन द २७३ त्रसण १८९ सैच २३६ त्रुटत् २७५ त्रुटिण ८७ . ९० श्रीकृ २७३ तसुण १०२ तायुङ् २६६ तिजण २७६ दण्डण ९५ ददि ९६ दधि २७६ दुःखण २७० दुलण २२० दम्भूट १९९ दमूच १०१ दाय .१२१ धुति १४५ द्रांक १०४ द्राहृङ् १५४ दरिद्राक् १४२ ध्वन १२३ ध्वंसूङ् ११९ धावूग २२० घिवुट् १०५ धुक्षि २१५ धूगट २८२ धूगण् २५५ धूम्श २३५ धूत् ६८ धूप २७३ धूप १०९ धुंग २८४ धृषण १९७ दुषंच १७२ दुहीक ९१ तिजि १८८ तिम १८८ तीम २.४ दूङ्च ४३ हूँ २३८ दंङ्त १९४ हपौच २३२ हभैत् ७९ दृशृं २७८ तीरण १४९ तुंक २३७ तुडत् २२२ तुदीत् २७० तुलण १९८ तुषं ८१ तूष १४१ दृ २५८ दृश २०३ दुहीच ५३ दें ७७ दल १७१ हिषांक ८१ दंशं २७५ दंशिण २७३ दशु ८४ दह ८७ दें १.२ देवृङ् न २६६ नटण १९५ नशौच ९३ नाथूङ २७२ निर्यतण १८६ नृतैच २२० तृपट् ५२ दैव १८५ दों २८३ तृपण ( ६ ) पृष्ठम् धातवः पृष्ठम् धातवः पृष्ठम् धातवः प पृष्ठम् धातवः २४३ भञ्जोंप ३४ पां ५४ पैं ९२ भडुङ् ९१ पचुङ् २६६ पचुण १४५ पांक २७८ पारण फ ६१ पट २७३ पिजु ७७ फल ६२ पठ ७८ फुल्ल :0: ९३ पणि ब १२६ पत्ल २७७ पतण २६९ पथुण २०७ पदिंच २६९ बधण ९२ पिडुङ् २६८ पिडुण २४६ पिप्लंप २०५ पीच २६७ पीडणं ८३ पुष १९० पुषंच २६३ पुषश २७० पुंसण ६३ भण २७५ भर्तिण १२९ भ्रमू २०१ भ्रमूच १२२ भ्रंशूङ १९६ भ्रंशूच् २२२ भ्रस्जीत ९१ भ्राजि १२० भ्लक्षी २७४ भलिण ८२ भष १४४ भांक ९६ बधि ९७ पनि २२९ प्रच्छंत् २६९ प्रथण १४० प्रथिष २५४ पूग्श ८७ पूङ् २६९ बन्ध २६१ बन्धंश १७१ बॅग २८४ बहुलमेतन्नि दर्शनम् ९६ बाधृङ् १२८ बुध ९५ पर्दि २७६ भाजण १०३ भाषि १०३ भासि १०५ भिक्षि २०८ बुधिं ११८ बुधृग २७० बुलण २८१ प्रीगण २६६ पूजण २५२ प्रींग्श २१० पूरैचि २०६ प्रींच १७६ पुंक् ८६ प्रुङ २३७ पृङ्त् २८६ प्रेखोलण २८२ पृचण १६६ पृचैङ्क ८६ प्लुङ् २४३ पृचैप् २१८ ऍट् १९८ प्लुपूच २६६ पृण १४२ प्सांक २७० पलण भ २४२ भिद्रूपी २४४ भुजप १९ भू २७१ भूण ८३ भूष २७३ भूष १०९ भुंग ८२ प्लुपू २७० भक्षण ११७ भजी २५८ पृश २७३ भजु ( ७ ) पृष्ठम् धातवः पृष्ठम् धातवः पृष्ठम् धातवः पृष्ठम् धातवः ९१ भृजैङ य १३१ रमिं १९६ भृशू १६३ यङ्लुक् १३२ यजी म २७२ यतण २६९ यत्रुण २५२ मांश ७७ मील २२४ मुच्छंती २३६ मुटत् २६७ मुटण २७२ मुदण ९४ मुदि ५७ मुर्छा २६३ मुषश २०२ मुहौच ८३ रस २७९ रमण २७९ रहुण १४६ रांक ११६ राजग २६८ मडुण १२७ मथे १४२ मदै ९३ यतैङ् २६९ यमण ७२ यमूं २१९ राधं १८७ राधच २८६ रिखिः ५४ रिखु ५४ रिगु २७८ मूत्रण ७७ मूल २७० मूलण १९९ यसूच १४४ यांक १४९ युक् २८० युजंण २०६ युजिंच २४१ युपी २०७ युधिंच २८२ रिचण २४० रिचुंपी १५१ रु १२१ रुचि २०२ मदैच ४० म्नां २७५ मन्त्रिण २६० मन्थश २७४ मनिण २०८ मनिंच २५० मनूयि ५३ म्लैं ८४ मह २७९ महण १४६ मांक १७७ मांङ्ख २८३ मानण ९७ मानि २८२ मार्गण २३२ मिलत् २७८ मिश्रण २३४ मिषत् २८० मृगणि १५७ मृजौक २८३ मृजौण २२६ मंत् २६१ मृदश २३४ मृशंत र १५१ रुदृक् २३९ रुधूपी १९८ रुषच ८५ रक्ष २७६ रचण २७९ मृषण ११७ रञ्जी १३० रुहं २८४ मृषिण २११ मृषीच २११ रञ्जींच ६२ रट २७९ रूक्षण २७७ रूपण ९० रेकृङ् ५३ रें ८२ मृपू २५७ म ६ ८७ मेंङ् ६३ रण १९३ रधौच ९९ रभिं ( ८ ) पृष्ठम् धातवः पृष्ठम् धातवः ५५ लुश्च ९४ वदुङ् पृष्ठम् धातवः ल २७४ लक्षिण २७० लक्षीण २५० वनूयि १३४ व्यंग १४० व्यथिष् १८७ व्यधंच पृष्ठम् धातवः २३१ विधत २३३ विशंत २८४ विशिषण ८२ विधू १८२ विष्लंकी २८६ वीजण १४१ लगे ५४ लघु २७३ लघु २७८ व्ययण ९० लघुङ् २७३ लुट १९० लुटच २६७ लुटण ६१ लुटु २३६ लुठत् १९५ लुपच २२५ लुप्लंती १९५ लुभच २८८ लुल ६३ लड २१६ वृगट् २८२ वृगण २६४ वृश १८६ व्रीड्च २७७ वर्णण ५४ वल्ग २६७ लडण ६९ लप २८३ वृजैण् ९८ लबुङ् ९८ लभुङ् १०२ वलि १६१ वशक् २७५ ललिण २५४ लूग्श १३८ वसं ११९ लषी २७३ लोक २७३ वृत १२३ वृतूङ २७३ वृध १२४ वृधू ८२ वृषू ८४ वृहु २७३ वृहुण २५६ वृशि ८९ लोकृङ् २७३ लोचू ९१ लोचुङ् ८३ लस १४५ लांक ५६ लाछु २२८ लिखत् ५४ लिगु २७१ लिगुण २२५ लिपीत् १७३ लिहीक् २०५ लींच २८१ लीण २५७ लींश १६७ वसिक् १३५ वहीं १४५ वांक ५६ वाछु २१० वाशिचे २४० विचूंपी १८२ विजूंकी १५८ विदक् २२५ विलंती २०७ विदिच - २७४ विदिण २४७ विदिप व १५७ वचंक २८२ वचण २७४ वंचिण ५६ वञ्चू १३७ वद २८३ वदिण १३३ वेंग ७८ वेल ९२ वेष्टि श २१८ शक्लंट ९० शकुङ् ( ९ ) पृष्ठम् धातवः पृष्ठम् धातवः पृष्ठम् धातवः ७८ स्खल ६४ श्चुत ६४ च्युत पृष्ठम् धातवः १२७ षद्लं ८६ मिङ् २३८ वंजित् २८० सङ्ग्रामाणि २८७ स्तम्भू २८७ स्तम्भू २७२ ष्वदण ४३ शुं ५४ शुच १९१ शुधंच् २३२ शुभ २३२ शुभत् १२१ शुभि १९६ शुषंच १२५ शृधू २१५ स्तूंगट ९५ प्वदि १९० विदांच २५५ स्तृग्श १४१ स्थगे १९० षहच २८४ षहण १५० स्नुक ९४ स्पदुङ् २५७ शृश ६० शट १२८ शद्लं ११९ शपी २११ शपींच २७५ शमिण १९९ शमू २६८ श्रण २०० श्रमूच १०६ श्रिग २१७ श्रृंट १२९ शल ९० श्लाघृङ् १९७ श्लिषंच १५३ श्वसक ८३ शंसू १८५ शौच ९६ स्पईि ष ५९ षञ्ज २३२ स्पृशत् २७९ स्पृहण ६१ स्फट २३२ स्फलत् १०१ स्फायैङ २६७ स्फिटण ९८ ष्टभुङ् १३१ पहि २१३ किंग्ट २२४ षिचीत ६६ षिधू १९२ षिचूंच १८८ षिवूच १४९ धुंक् २१२ धुंग्ट् १६५ पूडौक २०४ पूडौन् १०२ षेवृङ् १८६ षोंच २२१ ष्टिघिट १८८ टिम १८८ ष्टीमच १७० ष्टुंग्क् ६१ स्फुट्ठ २७१ रफुटण ११८ शानी १५६ शासूक् १४१ ष्ठगे ३६ ष्ठां १०५ शिक्षि ५४ शिघु २८४ शिषण २४५ शिष्लंप १६४ शीक् २७८ शीलण ७८ ष्ठिवू १८९ ष्ठिवूच् १४५ ष्णांक २०३ ष्णिहौच २४९ षणुयी स ६६ स्कन्, २८७ स्कम्भू २८७ स्कुम्भू २३६ स्फुटत् २३७ स्फुरत् २७६ सभाजण १४१ स्मृ ४४ स्मूं १२४ स्यन्दौङ १२२ सम्भू ( १. " पृष्ठम् धातवः पृष्ठम् धातवः २७८ सूत्रण ९५ हदि ४६ सुं १६० हनंक २२९ सृजत् २०६ सृजिच पृष्ठम् धातवः १२२ संसूङ ४३ खं ६७ स्वन ९५ स्वादि २१९ साधंट २७० सान्त्वण ४४ सुं २७६ सुख २७६ सूचण पृष्ठम् धातवा २१६ हिंद ९३ हिडुङ् २४६ हिसु २८४ हिसुण १७४ हुंक् १०८ हंग १९८ हृषच २७२ हन्त्यर्थाः १६५ डंक् १७५ ह्रींक ९५ हादैङ् १४२ हल १३४ द्वेग ६९ सप्लं १०२ सेवृङ् her ६२ हठ ८३ हसे १०३ हेक ॥ इति॥

शुद्धिपत्रम् । -:0: ८ १२ ३ अहनम् ६ मतेन -मते न " " पृष्ठम् पक्तिः अशुदम् शुद्धम् १५ लुनिही लुनीहि २० -वायम- •व वयम- २ युगान्तप्र- युगान्तःप्र. जघान १३ ११ धातोवु धातावु- १५ १३ अभोक्ष्यत् अभोक्ष्यत १४ पासिष्यत् पासिष्यत २६ -राभ्य. -रभ्य- १० विचिक्रियरे विचिक्रियिरे १९ २१ व्याति- व्यति- २७ ७ विवक्षिते विवक्षते २९ ४ वोभूय बोभूय- १३ पिपीय्यते पेपीय्यते -भावात् १९ प्रास्थिषतं प्रास्थिषत २६ षत्वे इत्वे ४ तास्थीव तास्थाव तास्थीम तास्थाम ९ अतास्थीताम् अतास्थाताम् ४ पदमै परस्मै- ७ अवा- असा- २२ विजिगि विजिग्यि- ४४ इ: ११ दुद्रोथ दुद्रोथ ११ स्मर्यात्, ९ स्मर्यात, १९ आशीर्येव आशीर्ये च ४७ २६ सिक्लुक् सिच्लुक २७ तातर्यिते तातीर्यते ७ •भावत् पृष्ठम् पङ्क्तिः अशुद्धम् शुद्धम् २७ इश्व- ५३ २ -वर्जना. वर्जनात्- ५५ १० कित्त्वान्न लु- कित्त्वान्नलु- ५६ ४ न लुक् ९. •त्र लुकि लुकि १७ उदित्वात् ऊदित्वात् ६० १९ -वर्णयोः -वरणयोः ६१ १८ -ऋदित्- गृदित्- १४ ठिष्ठम् ठिष्टम् ठिष्ठ विष्ट ११ आणिता ओणिता १५ डीयश्चै- डीयश्व्यैः १७ स्कन्दत् स्कन्दन् ७२ ७ अिणम् प. मिणम्प- १२ ऊदित्वात् ऊदित्त्वात् ७३ ८ ऊदित्वात ऊदित्वात् २३ नंनमी- नंनरमी- ७४ २ प्राणीनमत् प्राणीणमत् २५ कित्वे कित्त्वे २६ कित्वे कित्त्वे १५ छः ८ चरति समा- चरतिसमा- प्रफुल्ता १७ प्रफुल्ल- प्रफुल्त. ८ दर्शिप्यते दर्शिष्यते ८१ ७ दंदशे ददंशे ८२ १६ उदित्वात ऊदिस्वाद ur 9 " ७४ ७७ । १४ प्रफुल्ला " " ( २ ) २३ पपृच्छय २७ वाऽन्त " " " . १५६ १३ कित्वे १८ कित्वा- शाशि " २१ कित्वे १८ वेत्मि २१ थमि पृष्ठम् पङ्क्तिः अशुद्धम् शुद्धम् २० २३ कित्वम् कित्त्वम् २७ ऊदित्वात ऊदिश्वात् ८३ ५ उदित्वात् ऊदित्वात् २४ २२ डीइ च डीच कित्त्वे कित्त्वा- ९० २० ग्धि गाधि कित्त्व ८ हदि हदि २७ धुगौदिसः धूगोदितः ८ विभ्रीयते बेभ्रीयते १११ ८ निणर्यति निर्णयति १११ १५ ऋमता ऋमतां भ्रम भ्रम- १२१ ड्ढवम् १२ •सारभ्भी. -सासम्भी- १२३ १४ -षीष्ट -पिष्ट १२४ ११ ध्वम्, न्द्ध्वम्, " ध्वम्,त्सि न्द्ध्वम्,न्सि. १२ स्यन्ता स्यन्त्ता १६ तः १२५ ९ शृध्वा शृधवा- यौ १२८ २१ न शम- न शस. १३१ २ आरुरुहत आरूरुहत २४ ईयाथे ईजाथे पृष्ठम् पङ्क्तिः अशुद्धम् शुद्धम् १३८ २४ वासार्थ- वासार्था- १४३ प्रपृच्छय ९४४ वाऽन्त १४५ १९ स्नात् स्नान् २६ व्यात्यलात् व्यत्यलात १५० १७ क्ष्णूतः क्ष्णुतः १५३ १९ -ताम् -ताम् १३ नाम्यत. नाम्यन्त- २४ शासि २४ ष्टःष्ट १५८ वेत्सि १६१ थसि ११ णिमुकि णिसुकि १६९ १० आख्यात् आख्यायात् १३ आच অাণ २२ प्रोणुवति पोर्गुन्वति ७ पौर्णोनोति प्रोर्णोनोति २१ स्तूयात स्तुयात् १७१ २ अस्ताविषाताम् अस्ताविष्टाम् १५ ब्रवीत् ब्रुवीत १३ अदिक्षायाम् अधिक्षाथाम् १७५ १३ बिभिया विभया १६ बिभियां बिभयां १७ बिभियां विभयां २४९ २ तन्त. तित- २ तन्ता- तितो- २ तन्तं तितं. २५१ ११ विक्रीणाति विक्रीणीते १९ वरिष्यति परिष्यते २० वरीष्यती वरीष्यते २६५ १५ अचूचुरत् अचूचुरत ११५ १० सबीजकम् सबीजकः " १८ जृभ्रम २४ जूभ्रम- १६ वम् " १७३ १२६ १० यो

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Kriyaratnasamuchchaya

Author
Gunaratnasuri
Title
Kriyaratnasamuchchaya
File name
Kriyaratnasamuchchaya
Text
OCR done
Citation
1907
Published
2007/12/20
Publisher
N. A.
Language
Sanskrit
Pages
356
Library
The Asiatic Society, Kolkata
DLI number
322343
Barcode
4990010252215.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
HWsISNghmBV
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