Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Linga Purana Khand-ii
Front matter
भूमिका "लिङ्ग पुराण" के द्वितीय खण्ड मे शिव-तत्व की गम्भीर प्रा. लोचना की गई है। इस समग्र जगत के परम कारण को 'शिव' का नाम देकर उनकी विविध 'मूर्तियो' ( रूपो ) द्वारा सृष्टि की उत्पत्ति, विकास और सहार का वर्णन दार्शनिक दृष्टि से किया गया है। ससार के समस्त मनोपियो की तरह भारतीय विद्वान् भी जगत के निर्माता अथवा 'कारण' परमात्मा को 'एक' और 'अद्वितीय' ही मानते हैं । पर वह परमात्म. शक्ति किस प्रकार अध्यक्त से व्यक्त रूप में प्रस्फुटित होती है और इस बहुरूपात्मक ससार को प्रकट करने का मूल-स्रोत बन जाती है, इस विषय में भारतीय तत्व ज्ञातानो के अतिरिक्त और सब देशो के 'धर्मज्ञ' मौन हो रह जाते हैं । यह ज्ञान केवल भारतीय दार्शनिको के ही हिस्से मे आया है कि वे अव्यक्त से व्यक्त-सूक्ष्म से स्यूल के परिवर्तन की स्पष्ट रूप से व्यारया परके ससार को धमत्कृत वर चुवे हैं । जैसे-जैसे समय बीतता जाता है और विज्ञान प्रकृति की तह मे पहुंचता जाता है, वैसे वैसे ही भारत के योग शक्ति सम्पन्न मनोपियो की व्याख्या यथार्थ सिद्ध होती जा रही है। यह बात दूसरी है कि प्र येक सम्प्रदाय के मनी. पियो की शब्दावली एक दूसरे से भिन्न है और जब वे अपने पक्ष को निर्बल पडता देखते हैं, तो वाद विवाद मे विजयी होने के लिये कुछ सत्य प्रसत्य मिश्रित तर्क भी उपस्थित करने लग जाते हैं। 'शिव' के सर्व तत्त्वात्मक रूप का विवेचन परत हुए लिङ्ग पुराणकार ने कहा है कि "एक 'शिव' ही पच ब्रह्माणो के रूप मे प्रकट होते हैं। उनमे से एक समस्त लोको का सहार करने वाला, एक रक्षा करने याना और एक सब का निर्माण करने वाला होता है । परमेली शिव की प्रथम मूर्ति 'क्षेप' है । इनका नाम ईशान है और ये प्रवृति के भोक्ता हैं । द्वितीय 'मूति' स्थाणु की है, जो 'तत्पुरुप वही जाती है । उस परमात्मा की मधिकरणभूत जाननी चाहिये । 'अघोर' नाम वाली सीमरी मूति 'बुद्धि' की कही जाती है । चौथी 'वामदेव' प्रहदागरमा .
कही गई है, जिससे वह समस्त जगत मे व्याप्त है। पांचवी मूर्ति 'सद्यो- जाता' नाम वाली है जो मनस तत्त्वात्मक होने से सम्पूर्ण प्राणियो मे स्थित रहा करती है । इनमे से ईशान को प्राकाश का, तत्पुरुष को वायु का, अघोर को अग्नि का, वामदेव को जल का तथा मद्योजात को भूमि का उत्पन्न करने वाला कहा गया है। इस प्रकार इस पंच भूतात्मक दृश्य जगत के जनक परमात्मा शिव ही है।" भारतीय दार्शनिको ने देवी सत्ता को दो विभागो में बांटा है और भिन्न भिन्न नामो से उसकी विस्तारपूर्वक व्याख्या की है। इन विभागो को कही सत् और असत् कहीं क्षर और अक्षर, कही भव्यक्त और व्यक्त, कही विद्या और अविद्या प्रादि नामो से पुकारा गया है । पर सब का अतिम निष्कर्ष यही है कि विश्व का मूल कारण एक ही अव्यक्त तत्त्व है जो सृष्टि क्रम के नियमानुसार स्वयम् ही व्यक्त रूप ग्रहण करता रहता है । उसका व्यक्त रूप ग्रहण करना ही "एक से बहुत' होरा है, क्योकि दृश्य पदार्थों की प्राकृति और गुणो मे विविधता दिखलाई पड़ने के कारण मानव बुद्धि उसमे भिन्नता की वलना ही करती है । पर साथ ही विचारक-गरण यह भी जानते और वहते रहते हैं कि इन भिन्न- भिन्न रूपो का प्राधार केवल हमारी दृष्टि और भावना है, अन्यथा जगत मे एक तत्त्व के अतिरिक्त सत्य कुछ भी नहीं है। इसी सिद्धान्त के आधार पर वेदान्त के 'ब्रह्म सत्य जगत मिश' वाली मान्यता का जन्म होता है । इसी कारण ब्रह्मवादी व्यक्ति ससार के समस्त पदार्थों और ध्यवहारो को 'माया' बतलाने लगते हैं। लिंग पुराण' के लेखक ने इस सिद्धान्त हो साम्प्रदायिक रूप देते हुये लिखा है- "महा मनीपीगण तो यही कहते हैं कि शिव के अतिरिक्त न्य कोई भी वस्तु है ही नहीं। उसी को सब्द ब्रह्मादि मौर परब्रह्मात्मव कहा जाता है। कुछ लोग उन्हीं शिव को अनादि निधन अर्थात् प्रादि तथा अन्न से रहित महान देव-प्रभु और प्राणियो की इन्द्रियो तथा अन्त:- करण से ग्रहण किये जाने वाले शब्दादिक विषयो के रूप में मानते हैं। अपर-ब्रह्म और परग्रह्म भी उन्ही को कहा जाता है। अन्य लोग दादर .
को विद्या और अविद्या रूप वाला कहते हैं । 'विद्या' शब्द का पाराय समस्त लोको के घाता-विधाता तथा प्रादि देव महेश्वर से ही है । कुछ मुनिगण उसे योग द्वारा ग्रहण किया करते हैं और कुछ अागमो के आधार पर उसका ज्ञान प्राप्त करते हैं। जो प्रात्माकार से सत्ति होती है उसे बुधजनो द्वारा 'विद्या' के नाम से पुकारा जाता है और जो विकल्प से सर्वथा रहित तत्त्व होता है उसे परम' शब्द द्वारा वयित किया जाता है । इन दो के अतिरिक्त उस ईश का तीसरा रूप कुछ भी नही होता । सम्पर्ण लोको पा विधाता ( रचयिता ) और धाता पोषक ) एव परमेश्वर तथा तेईस तत्वो का समुदाय, ये सब कुछ शिव के लिये ही कहा गया है। इन तीनो का समुदाय ही शङ्कर का स्वरूप होता है 'अशावर' अर्थात् शङ्कर से भिन्न तो कुछ है ही नहीं।" इस प्रकार 'लिङ्ग पुराण' में जो कुछ कहा गया है वह चाहे अन्य विचार वालो को 'शैव सम्प्रदाय' का मत ही जान पडे, पर तत्त्वत वह समस्त विद्वानो द्वारा स्वीकृत ब्रह्म की एकता का सिद्धा त ही है। यह यात कुछ ग्रागे चल कर ब्रह्मा, विष्णु प्रादि देवतानो द्वारा की गई भग- वान् शिव की स्तुति मे और भी स्पष्टता से वणित की गई है- ब्रह्मादि देवो ने कहा--जो यह भगवान् स्ट्र हैं बी ब्रह्म विष्णु तथा महेश्वर है, और वही स्वाद, इन्द्र पौर चौदह भुवन है। अश्विनी- वुमार ग्रह, तारा, नक्षन, अतरिक्ष दिशाएं पचभूत सूय, सोम मठ- ग्रह, प्राण, पाल, यम, मृत्यु अमृत, परमेश्वर, भूत, भव्य और वर्तमान पादि सम्पूण विश्व एवं समस्त जगत भगवान् शिव का ही स्वरूप है। उस सत्य रूप के लिये हमारा सब का नमस्कार और प्रणाम है । हे 'ह- श्वर देव । प्राप ही मादि हैं तथा भूभुच स्व भी ग्राप ही हैं । प्राप अन्त मे विश्वरूप हैं और सर्वदा इम जगत के शीर्ष हैं। आप अद्वितीय ब्रह्म हैं जिके कि प्रकृति और पुरुष तथा ब्रह्मा विष्णु महेश मादि विभिन्न रूप हाते हैं । अर्थात् ये समस्त रूप उगो अद्वितीय शक्ति के हैं । हे सुरेश्वर माप ही सब के प्राधार शाति, पुष्टि, नुनि महत, विश्व अविश्व, दत्त प्रदत्त हो । माप वृत-प्रकृत, पर अपर, ध्रुव, सत्पुरपो . के परायण और असत्पुरुषो के परायण शकर हो । हमने इस शिव स्वरूप का अमृत पान किया है, उससे हम मुक्त हो गये ।" इस प्रकार 'लिङ्ग पुराण' ने भगवान शिव के विश्व रूप की बहुत स्पष्ट रूप मे ध्याख्या की करके यह समझा दिया है कि अनेक देवी. देवतामों की उपासना का विधान और प्रचार होने पर भी सब का मूल एक ही है । अगर मनुष्य अपनी रुचि तथा योग्यता के अनुरूप किसी विशेष सम्प्रदाय का अनुगमन करते हैं तो इसमें कोई दोष नही । प्रत्येक सामान्म मनुष्य को यह सामथ्र्य नहीं कि वह परमात्मा के विराट स्वरूप के रहस्य को समझ सके और संसार के समस्त त्रिया-कलापो में पर- मात्म-शक्ति के अस्तित्व को पहिचान सके । इस लिये यदि वह किसी सीमित रूप मे ही भावान् की उपासना करता है, तो इसे अनुचित नही पहा जा सकता । इस हाट से विचार करने पर सम्प्रदायो को भी उप- योगी समझा जा सकता है, पर तभी तक जय तक कि वे हानिकारक प्रथामो तथा रूढियो से बची रहे और विभिन्न सम्प्रदायो के बीच विप के वीजन बोयें। अगर हम संमार की सचालक शक्ति को शिव के नाम से पुका- रते हैं और उनके प्रादर्श को ध्यान में रख कर त्याग, तपस्या, परोपकार का जीवन बिताते हैं, तो इसे प्रशमनीय ही माना जायगा। इसी प्रकार पदि दूसरा व्यक्ति उस 'शक्ति' को विष्णु के नाम से यदि करता है और उनके गुणो को हृदयगम करके समस्त प्राणियों के प्रति प्रेम, भक्ति मोर मित्रता का भाव रखता है तो उसको भी धन्य कहा जायगा। शुभ कम हम किमी भी नाम से करें उनको बन्दनीर ही मानना चाहिये। पर यहि ये गति लिय' और 'विष्णु के नाम को लेकर पापस में धुरा- भला पहने लग जायें मोर परोपकार तथा सेवा को भुला बैठे तो निस्स- देह यह एक शोचनीय बात होगी भौर उसे निन्दा ये योग्य बताया जायगा । 'मिन पुगा' की यह विशेषता है कि उस सर्वत्र शिव की मरि गाते हुए पन्य देवतापो निन्दा नहीं दी है और जितकी पा. गना ये जितने विधान बतलाये है उनमें कोई प्रल्याण री बात नहीं -श्रीराम शर्मा, प्राचार्य .
E २४ ७७ ६१ विषय-सूची ५७-शिवपूजन विधि और दीपक-दान का पुण्य ५५ पशुपाश से मुक्तिदाता लिंग-पूजा व्रत ५६-शिवमहापंचाक्षर-मंत्र विधि निक ६०-ध्यानयज्ञ माहात्म्य वर्णन ६१-सदाचार शौच निरूपण ६२-यतियों के दोषों का प्रायश्चित. ६३-वाराणसी-माहात्म्य और विश्वेश्वर पूजा विधि ६४-अन्धक दैत्य को गाणपत्य की पदवी ६५-जालंधर-वध ६६-शिव के वामान शिवा की उत्पत्ति ६७-दक्ष-यज्ञ विध्वस ६८-मदन-दाह ६६-उमा-स्वयंवर ७०-विघ्नेश्वर उत्पत्ति ७१-शिव ताएडव नृत्य प्रारम्भ ७२-उपमन्यु-चरित्र उपमन्यु द्वारा श्रीकृष्ण को शिव दीक्षा ७३. कौशिक का वैष्णव-गायन ७४-वैष्णव गीत कथन ७५-वैष्णव के लक्षण और माहात्म्य ७६-अम्बरोप चरित्र श्रीमती पाख्यान .. "लक्ष्मी की उत्पत्ति-प्रलक्ष्मी वास योग्य स्थान विष्णु भयाक्षर, द्वादशाक्षर मंत्र ७७-शिवशडाक्षर मंत्र ७८-शिव का पशुपतित्व कथन ७९-शिवजी प्रकृति रो जीव का बंधन '८०-उमामहेश्वर की पविभूति ८१-शिव का जगत रत्पति कारण १३६ " . १६७ १७० ११६७ २१२ २१७ २२२ १२३२ २३६ २४६ २५३ २५६ २६४ २६८ २७३ २८७ २६४ ३१६ ३३० ३३५ ३४५ ५२-शकर को पृथक-पृथक मूर्ति वर्णन ५३. शिव का सवं तत्वात्मक-स्वरूप ८४ श्री महेश्वर का सर्व स्वरूप ८५-शिव के पृथक पृथक नाम-रूप ८६-रुद्र के विग्रह से विश्वत्पत्ति -ब्रह्मादि देवो द्वारा महेश स्तुति 1-रविमडल मे उमा-महेश पूजा विधि FE-महेश्वर पूजा मे अधिकार निरूपण ६०-तत्रोक्त शिव-दीक्षा विधि ६१-सौर स्नान विधि निरूपरण ६२-मंग मत्र-विद्या सहित शकरार्चन ६३-तमोक्त विधान से शिवार्चन ६४-शिविध प्रग्नि-कार्य प्रतिपादन ६५-शिव लिङ्ग अघोर परिवर्तन ६६-श्री जयाभिषेक वर्णन ६७-रुद्रादि देवता स्थापन विधि ६८-लिङ्ग स्थापन और फल-श्रुति ६E-सर्व देवता स्थापन विधि निरूपण १००-प्रघोर रूपी शिव को प्रतिष्ठा १०१-अघोरेश पाराधन निग्रह १०२-पाराशर वरदान वर्णन १०३ त्रिपुर निवासी दैत्यों का देव पीडन १०५-शिवजी का युद्ध अभियान और त्रिपुर का ध्वंस १०६-लिङ्गार्चन और लिंग पूजा फल १०७-वजवाहिनिका विद्या निरूपण १०८-गायत्री-मत्र पूर्वक वषेश्वरो विद्या १०६-मृत्युञ्जय और त्र्यंबक महामंत्र शिवार्चन मे महिंसा का महत्व ११.-योगमार्ग से व्ययक ध्यान, लिङ्ग पुराण श्रवण पचन फल ३६६ ४०७ ४०८ ४२५ ४२८ ४५६ ४६५ *४८० ४०३ " ४६७
लिङ्ग पुराण
(द्वितीय खण्ड)
५७-शिवपूजन विधि और दीपक दान का पुण्य
कथ पूज्यो महादेवो मत्यमदैमहामते ।
कल्पायुषैरल्पवीयरल्पसत्त्वः प्रजापतिः ।।
संवत्सरसहस्रश्च तपसा पूज्य शंकरम् ।
न पश्यंति सुराश्चापि कथ देव यजति ते ॥२
कथितं तथ्य मेवात्र युष्माभिमुं निपु गवाः ।
तथापि श्रद्धया दृश्यः पूज्यः संभाष्य एव च ॥३
प्रसङ्गाच्चैव संपूज्य भक्तिहीनरपि द्विजाः।
भावानुरूपफलदो भगवानिति कीर्तितः ॥४
उच्छिष्टः पूजयन्याति पैशाचं तु द्विजाधमः।
संक्रद्धो राक्षस स्थान प्राप्नुयान्मूढधीद्विजाः ।।५
अभक्ष्यभक्षी सपूज्य याक्ष प्राप्नोति दुर्जनः ।
गानशीलश्च माधवं नृत्यशीलस्तथैव च ।।
ख्यातिशीलस्तथा बाद स्त्रीपु सक्तो नराधमः ।
मदात पूजयन् रुद्र सोमस्थानमवाप्नुयात् ।।
इस अध्याय मे उच्छिष्टादिक पूजन से उन्यासी प्रकार का लिङ्ग
होता है उसके पूजा और दर्शन का फल तथा दीपदान का फल निरूपित्त
किया जाता है ! ऋषियो ने कहा-हे महामतिमा 1 मन्द मनुष्यो के
द्वारा शिव का पूजन किस प्रकार से करना चाहिए ? क्योकि कल्पायु
चाले सहस्रो वर्षों तक तप के द्वारा शिव का पूजन करके भी देवगण
राइर का दर्शन प्राप्त नहीं किया करते हैं तो फिर मल्ल वीर्य वाले और
अत्यल्प सत्त्व वाले विचारे मानव पैसे उनका पजन कर सकते हैं नया
मत्यन्त कल्याण प्राप्त करते हैं ? ॥१॥२॥ गुतजो नै कहा-हे मुनि-
द्वारा १०] । लिङ्ग पुराण श्रेष्टो ! पाप तोगो ने यह पूर्णतया सत्य कहा है तो भी श्रद्धा एक ऐसी वस्तु है कि उसके द्वारा भगवान् शिव मानवो के दर्शन के योग्य-पूज्य और सम्भाष्य हो जाया करते हैं ॥३॥ हे द्विजो । भक्ति से रहित लोगो भी प्रमङ्ग वश भली-भांति पूज्य होकर भगवान् शङ्कर भावानु- रूप फल के प्रदान करने वाले हो जाते हैं-ऐसा बताया गया है ।।४॥ नीच द्विज उच्छिष्ट होते हुए शिव का पूजन करके पंशाच पद को प्राप्त करता है और मुढ बुद्धि वाला सकद होकर राक्षसो का स्थान पाया करता है । जो अभक्ष्य पदार्थों का भक्षण करने वाला है वह दुर्जन पूजन करके यक्ष पद से प्राप्त करता है । गायन के तथा नृत्य के स्वभाव वाला द्विजाधम गान्धवं स्थान को पाता है। स्त्रियो मे प्रासक्त प्रथम मनुष्य ख्याति के शील बाला चान्द्र स्थान को प्राप्त करता है। जो मदा- सं होता है वह रुद्र का पूजन करता हुआ सोम के स्थान की प्राप्ति किया करता है ॥६॥७॥ गायत्र्या देवमभ्यर्च्य प्राजापत्यमवाप्नुयात् । ब्राह्म हि प्रणवेनैव वैष्णक चाभिनय च ॥ श्रद्धया सकृदेवापि समभ्यर्च्य महेश्वरम् । रुद्रलोकमनुप्राप्य रुद्रः साचं प्रमोदते 16 सशोध्य च शुभ लिंगममरासुरपूजितम् । जलै पूर्तस्तथा पीठे देवमावाह्य भाक्तत. In दृष्ट्वा देव यथान्याय प्रणिपत्य च शकरम् । कल्पिते चासने स्थाप्य धर्मज्ञानमये शुभे ।।११ वैराग्यश्चर्यसपन्ने सर्वलोकनमस्कृते । प्रोकारपद्ममध्ये तु सोमसूर्याग्निसभवे ॥.२ पाद्यमाचमनं चाध्यं दत्त्वा रुद्राय शभवे । स्नापयेद्दिव्यतोयश्च घृतेन पयसा तथा ।।१३ दना च स्नापये शोधयेच्च यथाविधि । तत. शुद्धाबुना स्नाप्य चदनाद्यश्च पूजयेत् ।।१४ मायत्री के द्वारा जो देव को अभ्यर्चना करता है वह प्राजापत्य पद शिवपूजन विधि०] । ११ की प्राप्ति करता है । प्रणव के द्वारा पूजन करके ग्राह्य तथा वैष्णव पद को प्राप्त होता है ।।८। श्रद्धा से एक बार भी महेश्वर भगवान् का पूजन फरके रुद्र लोक की प्राप्ति करता है और वहां रुद्रो के साथ प्रमोद वाला हुआ करता है । हा सुर और असुरो के द्वारा पूजित शिव लिङ्ग का सशोधन करके अर्थात् पूत जल स भली-भांति शुद्धि करके फिर पीठ पर देव की भक्ति स उनका आवाहन करे ॥१०॥ यथा न्याय देव का दर्शन कर शङ्कर को प्रपाम फरे और कल्पित प्रासन पर उनकी स्थापना परनी चाहिए। वह पासन धर्म और ज्ञान से परिपूर्ण एव शुभ होना चाहिए तथा वैराग्य एष ऐश्वय से सम्पन्न हो और सर्व लोको के द्वारा नमस्कृत हो । सोम सूर्याग्नि सम्भव पद्म का पासन ऐसा हो जिसके मध्य मे प्रोद्धार होवे उसी पर स्थापना करे ॥११॥१२॥ मासन पर सस्थापित करने के पश्चात् शम्भु रुद्र के लिये अर्घ्य पाद्य और आचमन समर्पित करे । तथा दिव्य भागीरथी प्रादि के जलो से स्नान करावे । घृत-दूध और दधि से रुद्र का स्नपन करावे और विधि के अनुसार शोधन करना चाहिए। इन सब स्नपनो के अनन्तर शुद्ध जल रो पुन स्नान कराकर च दनादि के द्वारा पूजन करे ॥१॥४॥ रोचनायैश्च सपूज्य दिव्यपुष्पश्च पूजयेत् । बिल्वपरखडेश्व पद्मनाविधस्तथा ॥१५ नीलोत्पलश्च र जीवैनं द्यावतश्च मलिक । चपर्व तिपुष्पश्वक्कुल करवारकै ॥१६ शमीपुप्पबृहत्पुष्पहन्मतागस्यजरपि । सपामागकदबैश्च भूपरणरपि शोभनं ॥१७ दत्त्वा पचविध धूप पायस च निवेदयेत् । दधिमक्त च मध्वाज्यपरिनुतमत परम् ।।१८ शुद्धान्न चैव मुद्गा-न पड्विध च निवेदयेत् । प्रथ पचविध वापि सघृत विनिवेदयेत् ॥१६ केवल चापि शुद्धानमाढक तडुल पचेत् । कृत्वा प्रदक्षिण चाते नमस्कृत्य मुहु हु । २० १२ । [ लिङ्ग पुराण स्तुत्वा च देवमीशान पुन संपूज्य शकरम् । ईशानं पुरुष चैव अघोर वाममेव च ॥२१ सद्योजात जपश्चापि पचभिः पूजयेच्छिवम् । अनेन विधिना देव. प्रसीदति महेश्वर. २२ रोचना आदि से भली-भांति पूजन करके पुनः दिव्य रूपों के द्वारा पूजन करना चाहिए। अखण्डित विल्य के पत्रो से तथा नाना प्रकार के पद्मो से नीलोत्पल-राजीव नद्यावत-मल्लिक-चम्पक-जातिपुष्प-वकुल-कर- कीर के पुष्प शमी के पुष्प वृह पुष्प-उन्मत्त ( धतूरा) पुष्प अगस्त्य के पुष्प-अपामार्ग और कदम्ब के पुष्पो से भगवान् का अर्चन करना चाहिए । तथा फिर सुन्दर भूपणो से देव को समलङ्कृत करे ॥१५॥१६॥१७॥ इसके उपरान्त पांच प्रकार का धूप समर्पित करके भगवान को पायस समर्पित करना चाहिए । इसकै अनन्तर दधिभात और मधु तथा घृत से परिप्लुत शुद्ध अन्न और छ प्रकार का मुद्गान्त निवेदित परना चाहिए। इसके अनन्तर पांच प्रकार का घृत के सहित समर्पित करे ॥१८॥१६॥ अथवा केवल शुद्ध अन्न एक प्राटक तन्दुल का पाक करे । अन्त मे प्रद- क्षिणा करे और वारम्वार नमस्कार करे ॥२०॥ ईशानदेव का स्तवन घरके फिर शकर का पूजन करे और ईशान पुरप अघोर-वाम और सद्यो- जात-इनका जप करते हुए पांचो से शिव का पूजन करना चाहिए। इस विधि से महेश्वर देव परम प्रसन्न होते हैं ।।२१।।२।। वृक्षा पुष्पादिपत्रारुपयुक्ता शिवार्चने । गावश्चैव द्विजथेष्ठा. प्रयाति परमा गतिम् ॥२३ पूजयेद्य : शिव रुद्र शर्व भवमज सकृत् । स याति शिवसायुज्य पुनरावृत्तिवजितम् ।।२४ अचितं परमेशान भव शर्वमुमापतिम् । सकृत्प्रमंगाद्वा दृष्ट्वा सर्वपापै प्रमुच्यते ॥२५ पूजित वा महादय पूज्यमानमथापि वा। दृष्ट्वा प्रयाति व मर्यो ब्रह्मलोक न ससय. ॥६ श्रत्वानुमोदयेच्चापि स याति परमा गनिम्।
१३ शिवपूजन विधि० ] यो दद्याघृतदीपं च सकृलिंगस्य चाग्रतः ॥२७ स तां गतिमवाप्नोति स्वाश्रमैर्दुर्लभां स्थिराम् । दीपवृक्ष पार्थिव वा दारवं वा शिवालये ॥२८ शिवार्चन में पुष्ष और पत्र आदि से जो वृक्ष उपयुक्त होते हैं तथा जो गौएं हैं, जिनके दूध-घृत प्रादि का उपयोग शिवार्चन मे हुमा करता है ये सव हे द्विजगण ! परमगति को प्राप्त हो जाते हैं ॥२३॥ जो शिव-रद्र- भव और प्रज का पूजन एक्वार भी करता है वह शिव के सायुज्य को प्राप्त कर लेता है जहां पहुंच कर पुनरावृत्ति नही हुआ करती है ॥२४॥ परमेशान-भव-शर्व और उमापति का अर्चन चाहे वह प्रराङ्ग से एकबार ही किया गया हो, इनका दर्शन करके मनुष्य सघ तरह के पापो से मुक्त हो जाता है ॥२५॥ महादेव का पूजन करने से अथवा पूज्यमान शिव का दर्शन करने से मनुप्य ब्रह्मलोक को प्राप्त हो जाता है-इसमे सराय नहीं है ॥२६॥ शिवार्चन के विषय मे श्रवण करके जो अनुमोदन करता है वह परम गति को प्रास हो जाता है । जो एक्बार भी लिङ्ग के धागे घृत का दीपक रसत्ता है वह उस स्थिर उत्तम गति को प्राप्त करता है जो अपने वर्णाश्रम के पदों के द्वारा अत्यन्त दुर्लभ होती है । शिवालय में दीप वृक्ष-पार्थिव अपना काष्ठ वा दीप देता है वह भयले सो कुल को शियलोक मे प्रतिदिन किया करता है।।१७॥२८॥ दत्त्या पुलशतं सा शिवलोके महीयते । प्रायसं ताम्रज वापि रौप्यं सोगिक तथा ॥२६ शिवाय दोप यो दद्याद्विधिना वापि भक्तितः । सूर्यायुतसमैः श्लगर्यानः शिवपुरं प्रजेत् ॥३० कातिके मासि यो दद्याद तदीप शिवामनः । सपूज्यमान वा पज्येद्विधिना परमेश्वरम् ॥३॥ स याति ब्रह्मणो लोक अदया मुनिसत्तमा । पावाह्न सुमानिध्य स्थापनं पूजन तथा ॥२ संप्रोक्त रुद्रगायध्या मासन प्रणवेन। पचभिः स्नपनं प्रोक्त रसायन विशेषतः ॥३३ [ लिङ्ग पुराण rव सपूजयेन्नित्यं देवदेवमुमापतिम् । ब्रह्मारण दक्षिणे तस्य प्रणवेन समर्चयेत् ॥३४ उत्तरे देवदेवेश विष्णु गायत्रिया यजेत् । वह्नी हुत्वा यथान्यायं पषभि. प्रणवेन च ॥३५ स याति शिवसायुज्यमेवं सपूज्य शंकरम् । इति सक्षेपत: प्रोक्तो लिगार्चन विधिक्रमः॥३६ व्यासेन कथितः पूर्वं श्रुत्वा रुद्रमुखात्स्वयम् ॥३७ मायस ( लोहे का निति -नाम्रज-रोप्य (चांदी का)-तथा सुवर्ण का बना हुमा दीप शिव के लिये विधि के सहित समर्पित करता है तथा भक्ति-भाव से देता है वह दश सहस्र सूर्य के समान श्लपण यानो के द्वारा शिवपुर को चला जाया करता है ॥३०॥ कार्तिक के मास मे जो कोई घृत का दीपक भगवान् शिव के आगे जाकर रखता है अथवा विधि- विधान से सम्पूज्य मान परमेश्वर का दर्शन किया करता है वह पुरुष हे मुनिगण ! निश्चय ही ब्रह्मलोक को श्रद्धा से प्राप्त हो जाता है । शिव का आवाहन-सनिधीकरण-स्थापन तथा पूजन रुद्र गायत्री के द्वारा कहा गया है और प्रासन प्रणव के द्वारा तथा विशेष रूप से रुद्रादि पांच प्रणवो के द्वारा स्नपन कहा गया है ॥३१॥३२॥३३॥ इस प्रकार एवं विधि से देवो के देव उमापति का नित्य ही पूजन करना चाहिए । उनके दक्षिण मे प्रणव के द्वारा ब्रह्मा का पूजन करे ॥३४॥ उत्तर भाग मे गायत्री के द्वारा देव देवेश विष्णु का यजन करना चाहिए । विधि के अनुसार पांच प्रणवो के द्वारा अग्नि मे हवन करे । इस विवि से भगवान शङ्कर का पूजन करके मानव शिव के सायुज्य की प्राप्ति किया करता है । यह हम ने सक्षेप से शिव के लिङ्ग को अर्चना की विधि का क्रम बता दिया है। पहिले स्वयं रुद्र के मुख से श्रवण करके विस्तार के साथ यह दिया था ॥३५॥३६॥३७॥ ५८-पशुपाश से मुक्तिदाता लिंगपूजा व्रत व्रतमेतत्वया प्रोक्त पशुपाशविमोक्षरणम् । प्रत पाशुपतं लैग पुरा देवरनुष्टितम् ॥
पशु पाश से मुक्तिदाता लिंगपूजा व्रत ] ' वक्तुमर्हसि चास्माकं यथापूर्वं त्वया श्रुतम् । पुरा सनत्कुमारेण पृष्टः शैलादिरादरात् ॥२ नंदी प्राह वच स्तस्मै प्रवदामि समासतः । देवदैत्यस्तथा सिद्ध गंधर्वैः सिद्धचारणः ॥३ मुनिभिनय महाभागैरनुखितमनुत्तमम् । व्रत द्वादशलिंगारयं पशुपाशविमोक्षणम् ॥४ भोगद योगदं चैव कामद मुक्तिद शुभम् । अवियोगकरं पुण्यं भक्तानां भयनाशनम् ॥५ 'पडङ्गसहिान् वेदान्मथित्वा तेन निर्मितम् । सर्वदानोत्तम पुष्पमश्वमेघायुताधिकम् ॥ सर्वमगलद पुण्य सर्वशत्रुविनाशनम् । ससाराएंवमग्नानां जंतूनामपि मोक्षदम् ॥ इस अध्याय मे शिव के द्वारा कहा हुमा पशु पाश का विमोचन करने वाले लिङ्ग पूजा के व्रत का भली-भांति निरूपण किया गया है । ऋषियों ने कहा- हे सूतजी ! आपने यह पशु-पाश के विमोक्षण करने चाला पाशुपत व्रत बतलाया है जो कि पहिले लैङ्ग पाशुपत प्रत देवों ने किया था ॥१॥ पाप ने जैमा भी पूर्व मे श्रवण किया था वह पूर्वा- नुक्रम के अनुमार अब हमको बताने के योग्य होते हैं । सूतजी ने कहा- पहिले सनत्कुमार ने प्रादर मे साथ सैलादि से पूछा था 1121 गन्दी ने उनसे जो वषन कहे थे उन्हे में सक्षेप मे तुमको बताता हूँ। देवों ने-दैत्यों ने सिर और गन्धर्वो ने सिद्ध चारणो ने तथा महाभाग मुनियों ने उग परमोत्तम प्रत को किया था। पपास से विमुक्त कराने वाला द्वारा लिङ्ग नाम वाला प्रत होता है । ॥२॥४॥ यह मत भोगों का देने वाला. कामद-शुभ मुक्तिद वियोग के करने वाता-परम पुण्य और भक्तों के भय का नाश करने पाला है ॥२॥ प्रशो के सहित वेटो वा मपन करके उसने इसका निर्माण विधा है। यह समस्त दानो से उत्तम दर महम मश्वमेघों के पुष्प से प्रषिक पुष्प युक्त होता है । यह प्रा समस्त मजतो वा प्रदान करणे पाला परम पुण्य भौर पर पुप्रो का नारा १६ ] [ लिङ्ग पुराण करने वाला होता है । जो जन्तु इस संसार रूपी सागर में मग्न हो रहे हैं उनको भी मोधा प्रदान वरने वाला है ॥७॥ सर्वव्याधिहर चैव सर्वज्वरविनाशनम् । देवैरनुष्ठित पूर्व ब्रह्मणा विष्णुना तथा । कृत्वाऽकनीयसं लिंग स्नाप्य चदनवारिणा । चैत्रमासादि विद्राः गिवलिंगवत चरेत् 18 कृत्वा हैमं शुभ पद्म कणिकाकेसरान्वितम् । नवरत्नश्च खचितमष्टपत्र यथाविधि ॥१० करिण का ग न्यसेल्लिग स्फाटिक पीठसंयुतम् । तय भक्त्या यथान्यायमर्च ये बिल्वपत्रकः।।११ सितै. सहस्रकमले रक्तैर्नीलोत्सलरपि । श्वेतार्क कणिकारश्च करवीरकरपि ॥१२ एतैरन्यर्यथालाभ गायत्र्या तस्य सुवनाः । सपूज्य चैव गंधाद्य धूपैर्दीपैश्च मगले. ॥१३ नीराज नाधे श्च न्यश्च लिगमूर्ति महेश्वरम् । अगरु दक्षिणे दद्यादघोरेण द्विजोत्तमाः॥१४ यह पाशुपत व्रत समस्त व्याधियो के हरण करने वाला तथा समस्त ज्वरो के विनाश करने वाला है । इस महानत को पहिले देवो ने-ब्रह्मा ने तथा विष्णु ने किया था । एक विशाल लिङ्ग की रचना करके फिर चन्दन जल के द्वारा स्नपन कराना चाहिए । हे विप्र वृन्द । इस व्रत अर्थात् शिव लिङ्ग प्रत को चैत मास के प्रादि मे करना चाहिए ॥९॥ सुवर्ण का अत्यन्त शुभ परिणका और वे सरो से समन्धित पन को रचना करे और उसे आठ पत्रो वाला यथा विधि नौ प्रकार के रत्नो से रचित कराना चाहिए ॥१०॥ स्फटिक को पीठ से सयुक्त लिङ्ग को करिणका में व्यस्त करना चाहिए । वहाँ पर भक्ति के भाव से यथा विधि विल्व पत्रो के द्वारा अर्चन करना चाहिए ॥११॥ श्वेत सहस्र कमलो से- रक्त तथा नील कमलो से श्वेत भर्क के वणिकारो से-करवीर और वको से तथा अन्यो के द्वारा यथा लाभ गायत्री से उसका पूजन करना चाहिए।
पशुपाश से मुक्तिदाता लिंगपूजा प्रत ] [१७ इस प्रकार से गन्धादि धूप और दीपादि मगल उपचारो के द्वारा भली- भांति पूजन करके तथा अन्य नीराजन प्रादि लिङ्ग मूत्ति महेश्वर का अर्चन करे । हे द्विजोत्तमो ! इसके उपरान्त अघोर मन्त्र के द्वारा दक्षिण भाग में अगर देना चाहिए ॥१२॥१३॥ ४॥ पश्चिमे सद्यमरण दिव्या चैव मन.शिलाम् । उत्तरे वामदेवेन चदन वापि दापयेत् ।।१५ पुरुपेरण मुनिश्रेष्ठा हरिताल च पूर्वत । सितागरूद्भव विप्रास्तथा कृष्णागरूद्भवम्।।१६ तथा गुग्गुलुधूप च सोगधिकमनुत्तमम् । सितार नाम धूप च दद्यादीशाय भक्तित ।।१७ महाचरनिवेद्य स्यादाढकान्नमथापि वा। एतद्व कथित पुण्यं शिवलिंगमह व्रतम् ॥१८ सर्वमासेषु सामान्य विशेषोपि च कीर्त्यते । वैशाखे वज्रलिंग च ज्येष्ठे मारकतं तथा ॥१६ आपाढे मौक्तिकं लिंग श्रावण नील निर्मितम् । मासि भाद्रपदे लिग पद्मरागमय शुभम् ॥२० अाश्विने चव विप्रेद्रा गोमेदकमय शुभम् । प्रवालेनैव कातिक्या तथा वै मार्गशीर्षके ।।२१ वैडूर्यनिर्मित लिंग पुष्परागेण पुष्यके । माघे च सूर्यकातेन फाल्गुने स्फाटिकेन च ।।२२ पश्चिम मे सद्य मन्त्र के द्वारा दिव्य मैनसिल तथा उत्तर मे वामदेव मन्त्र के द्वारा चन्दन देना चाहिए ॥१५॥ हे मुनिष्टो । याजक पुरुष को पूर्व मे हरिताल देवे और श्वेत चन्दन से समुत्पन्न एव कृष्ण प्रग से निर्मित तथा गूगल को अत्युत्तम धूप जो कि अति सुगन्धि से युक्त हो, और सितार नामक धूप ईश को प्राघाण करने के लिये भक्ति पूर्वक देनी चाहिए। ।। ६।१७।। इसके अनन्तर महाचरु को निवेदन करना चाहिए अथवा पाढव अन्न निवेदित करे। यह परम पुण्य शिव लिङ्ग का महाव्रत मैंने मापको यतला दिया है ॥१२॥ यह समस्त मासो में १८ ] [ लिङ्ग पुराण साधारण होता है । इसकी जो कुछ विशेषता होती है वह भी बतलाई जाती है । वैशाख मास मे वन लिङ्ग और ज्येष्ठ मास मे मरकतमणि से निर्मित लिङ्ग का पूजन करना चाहिए ॥१६॥ प्राषाढ मास मे मुक्तानो से निर्मित लिङ्ग का यजन करे और श्रावण मे नीलमणि के लिङ्ग का अर्चन करना चाहिए। भाद्रपद मास मे पाराग के शुभ शिव लिङ्ग के पूजन का विशेष फल होता है ॥२०॥ पाश्विन मे हे विप्रगण ! गोमेद नामक रल से निर्मित शिव लिङ्ग का पूजन करे । कात्तिक मास मे प्रवाल ( मूगा) के लिङ्ग का तथा मार्गशीर्ष मे वैडूर्य रचित लिङ्ग का यजन करना चाहिए । पौष मास मे पुण्य राग रल द्वारा निर्मित लिङ्ग का और माघ मे सूर्यकान्त मणि के लिङ्ग का एवं फागुन मे स्फ- टिक रत्न से विरचित लिङ्ग का यजन करने से विशेष फल प्राप्त होता है ।रार सर्वमासेषु कमलं हैममेकं विधीयते । अलाभे राजतं वापि केवलं कमलं त वा ॥२३ रत्नानामप्यलाभे तु हेम्ना वा राजतेन वा । रजतस्याप्यलाभे तु ताम्रलोहेन कारयेत् ।।१४ शैलं वा दारुजं वापि मृन्मय वागवेदिकम् । सर्वगंधमयं वापि क्षणिक परिकल्पयेत् ।।२५ हैमंतिके महादेवं श्रीपरेरणव पूजयेत् । सर्वमासेपु कमलं हैममेकमथापि वा ।।२६ राजतं वापि कमलं हैमणिकामुतमम् । राजतस्याप्यभावे तु बिल्वपत्र: समर्चयेत् ।।२७ सहस्रकमलालाभे तदर्धेनापि पूजयेत् । तदर्धाधन वा रुद्रमष्टोत्तरशतेन वा ।। समस्त मासों मे बमल भौर एक हेम निर्मित शिव लिङ्ग के पूजन पा विधान होता है । यदि सुयणं निमित का लाभ न हो मके तो चोदो से बनाये हुए लिङ्ग का या देवल वमल का ही प्रचंन करे ।।२३।। कोई भी उपयुक्त रनों की प्राप्ति न हो तो रजत या मोर चांदी या भी नीलोत्पल चोत्पल चकमल च विशेषत । सर्ववश्यकर पद्म शिला मर्वार्थसिद्धिदा ।।३१ कृष्णाग[समुद्भूत सवपानि तनम् । गुग्गुलु प्रभृतीना च दीपाना च निवेदनम् ॥३२ सवरोगक्षय चैव चदन सर्वसिद्धिदम् । सौगधिक तथा धूप सक्कामायंपायकम् ॥३३ श्वेनागरूद्भव चव तथा कृष्णागतम्। सौम्य सीतारिधूप च साक्षानिर्वाणदिदिदम् ॥३४ श्वेताकुसुमे साक्षात्वत्र प्रजापनि । नीलोत्पल में साक्षात् भम्बिा विराजमान रहा। उसल में पण्मुख शिकार य युसुमे मेधा साशायप्तिा॥३५ विन्ध पत्र मे सदाण से सौन्दन मानो देवा म्यिनु रहती है मागपिये समाप्रपरनोदमाग विराजमान रहा है। पथ में ममनोमानी। पशुपाश से मुक्तिदाता लिंगपूजा प्रत ] [ १९ लाभ न होवे तो तान अथवा लौह निर्मित लिङ्क, वा ही पूजन करना चाहिए । ॥२४॥ अथवा शैल दारुज ( काष्ठ से निर्मित -मृन्मय ( मिट्टी से रचित)-सर्व वैदिक सर्व गन्धमय अथवा क्षणिक लिङ्ग की रचना फर लेनी चाहिए ॥२शा हेमन्त ऋतु मे बिल्वदल के द्वारा ही महादेव का पूजन करना चाहिए । समस्त मासो मे कमल अथवा एक हेम लिङ्ग का यजन करे । रजत अथवा कमल उत्तम हैम कणिका से युक्त का पूजन करना चाहिए । यदि राजत का भी प्रभाव हो तो बिल्व पनो से भर्चन करे ॥२६॥२खा एक सहस्र कमलो का लाभ न हो सके तो इससे माधी सख्या से और इतने भी न मिलें तो इसकी भी आधी सख्या वाले कमलो से अथवा प्रष्टोत्तरदात से ही न्द्र की अर्चना करनी चाहिए ॥२॥ विल्वपने स्थिता लक्ष्मीदेवी लक्षणसयुना । नीलोत्पलेंबिका साक्षादुत्पले पण्मुखः स्वयम् ।।२६ पद्माश्रितो महादेवः सर्वदेवपति शिव । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन श्रीपय न त्यजेबुध ॥३० महादव विरा २०] [ लिङ्ग पुराण बुद्धिमान याजक ये द्वारा कभी नही त्यागना चाहिए ॥२६॥३०॥ नीलो- त्पल-उत्पल और विशेषकर पमल तथा पद्म सब को वश्य वरने वाला होता है। शिला समस्त प्रर्थों के प्रदान करने वालो बताई गई है ॥३१॥ कृष्णागरु से समुद्भूत धूप समस्त पापो का छेदन करने वाला होता है । गुग्गुलु प्रादि दीपो वा निवेदन भी पाप नाश होता है ।।३२।। समस्त सिद्धियो का पदान करने वाला चन्दन होता है और सम्पूर्ण रागो का क्षय करने वाला होता है । सौगन्धिक अर्थात् सुगन्ध से समन्वित धूप समय काम तथा प्रर्थों का साधन होता है। ॥३ ॥ श्वेत नगर से उत्पन्न किया हुआ तथा कृष्ण अगरु से बनाया हुमा और सौम्य सितारी धूप साक्षात् निर्वाण के देने वाला होता है अर्थात् इससे निरिण की सिद्धि होती है ।।३४॥ श्वेत पाक के पुष्प म साक्षात् चतुर्मुख प्रजापति स्थित रहा करते हैं । करिगकार के पुष्प मे साक्षात् मेघा व्यवस्थित है ॥३५॥ करवीरे गणाध्यक्षो बके नारायण. स्वयम् । सुगधिषु च सर्वेषु कुसुमेपु नगात्मजा ॥३६ तस्मादेतैययालाभ पुष्पधूपादिभि शुभै । पूजयेद्दवदेवेश भक्त्या वित्तानुसारतः ।।३७ निवेदयेत्ततो भक्त्या पायस च महावरम् । सघृत सोपदश च सर्वद्रव्यसमन्वितम् ॥३८ शुद्धान वापि मुद्गान्नताढक चार्धक तु वा। चामर तालवृ त च तस्मै भक्त्या निवेदयेत् ॥ उपहाराणि पुण्यानि न्यायेनैवाजितान्यपि । नानाविधानि चाहणि प्रोक्षितान्यभसा पुन ।।४० निवेदयेच्च रुद्राय भक्तियुक्त न चेतसा। क्षीराव सर्वदेवाना स्थित्यर्थममृत ध्रुवम् ॥४१ विष्णुना जिष्णुना साक्षादाने सर्व प्रतिष्ठितम् । भूतानामन दानेन प्रोतिर्भवति शकरे ।।४२ करवीर के पुष्प मे गणो के स्वामी विराजमान हैं और बक पुष्प मे स्वय नारायण स्थित होते हैं। जितने भी अन्य सुगन्धित पुष्प हैं उन सब पशुपाश से मुक्तिदाता लिंगपूजा व्रत ] [ २१ मे नगात्मजा देवी समास्थित रहा करती हैं ॥३६।। अतएव इन पृष्पी के द्वारा जो भी जिस समय मे प्राप्त हो सकें लाभानुसार पुष्प दीप प्रादि शुभ उपचारो से अपने वित्त के अनुकूल भत्ति-भाव पूर्वक देवदेवेश का पूजनार्चन करना चाहिए ॥३७॥ इसके अनन्तर भक्ति से पायस और महाचरु का समर्पण करना चाहिए । घृत के सहित तथा उपदश से सम. न्वित एव अन्य समस्त द्रव्यो से सयुत शुदान्न अथवा मुद्यान्न एक पाढक अथवा प्राधा पाढक देव की सेवा मे समपित करे। फिर चामर और ताल वृत्त महेश्वर को भक्ति के साथ निवेदित करे ॥३८॥३६॥ पवित्र उपहार जो न्याय पूर्वक अचित किये गये हो और भनेक प्रकार के हो तथा अर्पण करने के योग्य हो, फिर शुद्ध जल से प्रोक्षित हो, उन्हे भक्ति युक्त चित्त से भगवान् रुद्र के लिये समर्पित करे। भगवान् विष्णु ने तो सब देवो की स्थिति के लिये क्षीर सागर से अमृत को उद्धृत किया था 1॥४०॥४१॥ अब अन्न का माहात्म्य बताते हुए कहते हैं कि अन्त मे सभी प्रतिधित होते हैं । प्राणियो को अन्न का दान करने से शकर में प्रीति होती है ।।४।। तस्मात्सपूजयेद्दवमन्ने प्राणाः प्रतिष्ठिता । उपहारे तथा तुष्टिव्यंजने पवन स्वयम् ॥४३ सर्वात्मको महादेवो गधतोये ह्यपापतिः । पीठे वै प्रकृति साक्षान्महदाध व्यंस्थिता ।।४४ तस्माद्देव यजेद्भक्त्या प्रतिमास ययाविधि । पोणमास्या व्रत कार्य मर्वकामार्थसिद्धये 124 सत्य शौच दया शातिः सन्तोपो दानमेव च । पौर्णमास्याममावास्यामुपवास च कारयेत् ।।४६ सवत्सराले गोदान वृपोत्सर्ग विशेषत । भोजयेद्ब्राह्मणाभक्त्या श्रोत्रियान् वेदपारगान् ॥४७ तल्लिंग पूजित तेन सर्वद्रव्यसमन्वितम् । स्थापयेद्वा शिवक्षेने दापयेदयाह्यणाय वा ।।४८ य एव सर्वमासेपु शिवलिंगमहानतम् ।
२२] [ लिङ्ग पुराण कुर्याद्भक्त्या मुनिश्रेष्ठा स एव तपता वर १४ इसलिये अन्न का समर्पण करके ही देव का पूजन करना चाहिए। अन्न मे प्राण प्रतिष्ठित होते हैं। उसी प्रकार से उपहार मे तुमि होती है । व्यन्जन में पवन स्त्रय है ॥४३॥ महादेव सर्वात्मक हैं, गन्यतोय मे अपापति है। पीठ मे महद् प्रादि से व्यवस्थित साक्ष त प्रकृति है ॥४४॥ इसलिये इस प्रकार से भक्ति भाव से प्रतिमास मे पथा विधि यजन करना चाहिए और समस्त कार्यों की सिद्धि के लिये पौर्णमासी मे व्रत करना चाहिए ।।४।। व्रत मे सत्य शौच दया शान्ति सन्तोप और दान के नियमो चा पालन करे तथा पौर्णमासी और अमावास्या में उपवास करे ॥४६॥ जब एक सम्वत्सर पूरा हो जाये तो उसके अन्त मे गो दान करे और विशेष रूप से वृष का उत्सर्ग करे अर्थात सोड बनाकर छोडना चाहिए । जो वेदो के पारगामी अर्थात् पूर्ण पण्डित हो और श्रोत्रिय हो ऐसे ब्राह्म- पो को भक्तिपूर्वक भोजन कराना चाहिए ॥४७॥ उसके द्वारा समस्त द्रव्यो से समन्वित समपित उस शिव लिङ्ग को किसी शिव के क्षेत्र मे मर्थात् देवालय में स्थापित कर देवे अथवा किसी यजन करने वाले योग्य ब्राह्मण को दे देना चाहिए ॥४८॥ है श्रेष्ठ मुनिवृन्द | जो इस रीति एव विधि विधान से समस्त मासो मे भक्तिपूर्वक इस शिव लिङ्ग के महाव्रत को किया करता है वह ही तपस्या करने वालो मे परमथेष्ठ हाता है ॥४६॥ सूर्यकोटिप्रतीकाशैविमान रत्नभूषित । गत्वा शिवपुर दिव्य नेहायाति कदाचन ॥५० अयवा ह्य कमाम वा चरेदेव व्रतोत्तमम् । शिवलोकमवाप्नोति नान कार्या विचारणा । ५१ अथवा सक्तचित्तश्चेद्यान्यान् सचितयेद्वरान् । वपमेक चरेदेव तांताप्राप्य शिव व्रजेत् ।।५२ देवत्व वा पितृत्व वा देवराजत्वमेव च । गाणपत्यपद वापि सक्तोपि लभते नर १५३ विद्यार्थी लभते विद्या भोगार्थी भोगमाप्नुयात् । द्रव्यार्थी च निधि पश्येदायु कामश्विरायुपम् ॥५४
पशुपाश से मुक्तिदाता लिगपूजा व्रत ] 3
[२३
यान्याश्चिनयते कामांस्तास्ताप्राप्येह मोदते ।
एकमासव्रता देव सोते रुद्रत्वमाप्नुयात् । ५४
इदं पवित्र परम रहस्य वोत्तम विश्वसृजापि सृष्टम् ।
हिताय देवासुरसिद्धमर्त्य विद्याधराणा परमं शिवेन ॥५६
वह अति थेट तपस्वी करोडो सूर्यों के समान तेज वाले तथा विविध
रत्नो से समलड्कृत विमानो के द्वारा अन्त मे दिव्य शिवलोक मे चला
जाता है जहाँ से फिर इस ससार मे कभी भी वापिस नहीं आता है
॥५०॥ अथवा एक ही मास पर्यन्त इस परम उत्तम महाव्रत को इस
विधि से कोई करता है तो उसे भी निश्चित शिवलोक की प्राप्ति होती
है-इसमे कोई विचार एव सराय पे करने की आवश्यकता नहीं है
I10 अथवा शिव लिङ्ग की समाराधना मे ग्रासक्त चित्त वाला पुरुष
अन्य सकाम श्रेष्ठ पुरुषो को इम महाव्रत को बताकर उनसे कराता है
और पूर्ण वर्ष पर्यन्त इस प्रकार से समाचरण किया करता है तो वह
पुरप भी उन सबको प्राप्त कराकर स्वय भी शिव के सानिध्य को प्राप्त
पिया करता है ॥५२॥ सक्त नर भी देवत्व अर्थात् देवता का पद पितृत्व-
देवराज का स्थान और गाणपत्य को प्राप्त कर लेता है ॥५३॥ जो कोई
विद्या का चाहना करने वाला है वह लिङ्ग व्रत के प्रभाव से विद्या की
प्राप्ति करता है और जो सासारिक भोगो के उपभोग करने की कामना
परता है वह भोगो को प्राप्त कर लेता है । द्रव्य की इच्छा रखने वाला
पुरुष निधि को पा लेता है तथा जिसकी अपनी प्रायु के बढाने की
कामना होती है वह चिरायुता का लाभ पाता है ।।५४॥ जिन-जिन
फामनानो को पूति मनमे सोचता है उन उन कामनानी को प्राप्त करके
यहाँ लोक मे प्रसन्न होता है। यह एक मास के प्रत का ही इतना फल
होता है और अन्त मे यह रद्रत्व को प्राप्ति करता है ॥५५॥ यह परम
उत्तम परम रहस्य । गोप्य । प्रत है जिसको विश्व के स्रष्टा न सृष्ट किया
है । इरो परम भगयान शिव ने देव प्रगुर-मिड-विद्याधर और मनुष्यो के
हित के लिये ही बनाया है। यह परम पवित्र प्रत है ॥५६॥
२४ ]
[लिश पुराण
॥ ५६-शिवमहापंच क्षर-मंत्रविधि निस्पा ।।
सर्वग्रतेपु सपूज्य देवदेवमुपापतिम् ।
जपेरपंचाक्षरी विद्यां विधिर द्विजोतमाः ॥१
जपादेव न सदेहो प्रताना वै विशेषतः ।
समाप्तिन्यथा तस्माजपेरपंचाक्षरो शुभाम् ॥२
यथं पंचाक्षरी विद्या प्रभावो वा पथं वद ।
क्रमोपाय महाभाग श्रोत कौतूरलं हि नः ॥३
पुरा देवेन रुद्रण देवदेवेन शंभुना।
पार्वत्या कथितं पुण्यं प्रवदामि समासतः ।।४
भगवन्देवदेवेश सर्वलोकमहेश्वर ।
पंचाक्षरस्य माहात्म्यं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।।५
पंचाक्षरस्य माहात्म्यं वर्षकोटिशतरपि।
न शक्यं कथितु देवि तस्मात्संक्षेपतः शृणु ॥६
प्रलये समनुप्राप्ने नष्टे स्थावरजंगमे ।
नष्टे देवासुरे चैव नष्टे चोरगराक्षसे ७
इस अध्याय मे शुभ पञ्चाक्षर विधि शिव के द्वारा बताई हुई विनि-
योग प्रादि के सहित निरूपित की जाती है। सूतजी ने कहा-हे द्विजो.
तमगए ! समस्त व्रतो मे देवो के देव उमा के पति शिव वा भली-
मांति अर्चन वरखे विधिपूर्वक पञ्चाक्षरी विद्या का जप करना चाहिए
॥१॥ इसमे कुछ भी सन्देह नहीं है कि व्रतो की विशेष रूप से समाप्ति
जप से ही होती हैं । अन्यथा व्रतो की पूर्णता नही होती है । इसलिये
शुभ पञ्चाक्षरी विद्या का जप अवश्य ही करना चाहिए ॥२॥ ऋपियो ने
कहा-पचाक्षरी विद्या का प्रभाव किस प्रकार से होता है और वह कैसा
'प्रभाव है -यह है महाभाग [ भाप उसका क्रम एव उपाय बतलाने की
कृपा करें, हमको इसके श्रवण करने की बड़ी लालसा है ।।३।। सूतजी ने
कहा-पहिले समय मे देवो के देव भगवान् शम्भु रुद्र ने इसे पार्वती से
कहा था । उस पुण्यमय विद्या के प्रभाव को मैं सक्षेप मे बतलाता हूँ
॥४॥ श्रीदेवी ने कहा था-हे भगवन् ! हे देवदेवेश्वर ! हे समस्त लोको
शिवमहापंचाक्षर-विधि निरूपण ]
[२५
के महेश्वर | मैं पचाक्षर का माहात्म्य का तत्त्व पूर्वक श्रवण करना
चाहती हूं। श्री भगवान ने कहा-हे देवि ! इस पचाक्षर का माहात्म्य
इतना विशाल एव महान है कि सैकडो करोड वर्षों मे भी कहा नहीं जा
सकता है । इसलिये इसका माहात्म्य सुनना चाहती हो तो राक्षेप में ही
सुनलो ।।५।।६॥ महाप्रलय के प्राप्त होने पर जव कि समस्त यह स्थावर
और जङ्गम जगत् नष्ट हो गया था तथा देव सौर असुर-उरग और
राक्षस सब नष्ट हो गये थे ।ला
सर्व प्रकृतिमापन्नं त्वया प्रलयमेष्यति ।
एकोहं सस्थितो देवि न द्वितीयोस्ति कुचित् ।।
तस्मिन्वेदाश्च शास्त्राणि मंने पंवाक्षरे स्थिताः।
ते नाशं नैव सप्रामा मच्छक्त्या ह्यनुपालिता' 16
महमेको द्विधाप्या प्रकृत्यात्मप्रभेदतः ।
ग तु नारायण गेते देवो मायामयी तनुम् ॥१०
श्रास्थाय योगपर्यकशयने तोयमध्यग ।
तनाभिपंकजाज्जात पंचवक्त्र. पितामहः ॥११
सिसृक्षमायो लोकान्ये त्रीनशक्तोऽसहायवान् ।
दश ब्रह्मा ससर्जादो मानसानमितौजसः ॥१२
तेपा सृष्टिप्रसिद्धयर्थ मां प्रोवाच पितामह ।
मत्पुयाणा महादेव शक्ति देहि महश्वर ॥१३
इति तेन समादिष्ट पंचवक्रधगे त्यहम् ।
पंचाक्षरा-पचमुख प्रोक्तवान् पम योनये ॥१४
यह समस्त जगत् प्रति मे लीन हो गया था पोर तुम्हारे साथ
महाप्रलय पाल मे चला जायगा । उस समय मैं एक अकेला ही सस्थित
रहता हूँ। मेरे सिवाप दूसरा कोई भी यही नहीं रहता है ।।। उस
रामय मे वेद पोर समस्त शास्त्र पचाक्षर मन्त्र मे अवस्थित हो जाते हैं।
ये सब मेरी शक्ति से मनुणलित होर नागरी प्राप्त नही होते हैं।
10 में एक मामा के प्रभेद से प्रकृति से दो प्रकार पा भी था। वह
नारायण देव मापामयी तनु मे पास्थित होकर जस के मध्य में रहते हुए
[ लिङ्ग पुराण योग के पयं शयन में सोया करते हैं। उनकी नाभि से समुत्पन्न पङ्कन से पंच वक्त पितामह उत्पन्न हुए थे॥१०॥११॥ तीन लोकों की सृष्टि करने की इच्छा रखते हुए भी सहायता से रहित होकर अशक्त हो गये थे। फिर ब्रह्मा ने प्रादि मे अपरिमित ओज से सयुक्त दश को मन से उत्पन्न किया था। उनकी सृष्टि की प्रसिद्धि के लिये पितामह ने मुझसे कहा- हे महश्वर ! हे महादेव! मेरे पुत्रो को शक्ति प्रदान करो ॥१३॥ इस तरह से पितामह के द्वारा माज्ञा प्राप्त करने वाले मैंने जो कि मैं पांच मुखो को धारण करने वाला था अपने पांच मुखों से पांच अक्षरों को १ योनि को बताया था ॥१४॥ तापंचवदनगृहन् ब्रह्मा लोकपितामहः । वाच्यवाचकभावेन ज्ञातवान्परमेश्वरम् ॥१५ वाच्यः पंचाक्षरवि शिवस्त्र लोक्यपूजितः। वाचकः परमो मंत्रस्तस्य पंवाक्षरः स्थितः ।।१६ ज्ञात्वा प्रयोग विधिना च सिद्धि लब्ध्वा तथा पंचमुखो महात्मा। प्रोवाच पुत्रेषु जगद्धिताय मंत्र महार्थ किल पंचवर्णम् ॥१७ ते लब्ध्वा मंत्ररत्नं तु साक्षालोकपितामहात् । तमाराधयितु देवं परात्परतरं शिवम् ॥१८ ततस्तुतोप भगवान त्रिमूर्तीनां परः शिवः । दत्तवानखिलं ज्ञानमणिमादिगुणाष्टकम् ॥१६ तेपि लब्ध्वा वरान्विप्रास्तदाराधनकांक्षिणः । मेरोस्तु शिखरे रम्ये मुजवानाम पर्वतः 10 मत्प्रियः सततं श्रीमान्मनूने. परिरक्षितः । तस्याभ्याशे तपस्ताव लोकसृष्टिसमुत्सुकाः ॥२१ लोकों के पितामह ने उन पांच अक्षरों को अपने पांच मुखो से ग्रहण करते हुए वाध्य वाचक भाव से परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त छिया था ॥१५॥ हे देवि ! मोस्य के द्वारा पूजित शिव तो पंचाक्षरो के द्वारा व च्य या मौर वाचक परम मन्त्र पंचाक्षर स्वरूप में स्थित था ॥१६॥ विधि के सहित प्रयोग को जानार तथा सिद्धि को प्राप्त करके पंचमुख महान् शिवमहापंचाक्षर-विधि निरूपण ] -[२७ मात्मा वाले ने उस महान मर्थ चाले पांच वणों से युक्त मन्त्र को जगत् के हित के लिये पुत्रों को बताया था। ॥१७॥ उन दश ब्रह्मा के मानस पुत्रो ने साक्षात् लोक पितामह से उस मन्त्र रत्न की प्राप्ति करके परात्पर देव शिव की आराधना करने लगे थे ।।१८। इसके उपरान्त त्रिमूत्तियों पर प्रधानदेव शिव भगवान् अत्यन्त प्रसन्न हो गये थे। फिर उन्होंने सन्तुष्ट होकर परिणमा मादि अष्ट सिद्धियो का पूर्ण ज्ञान उन्हे प्रदान कर दिया था ॥१९वे सब भी हे विप्रो! उनके पाराधना की पाकाक्षा वाले वरों को प्राप्त करके पर्वत पर चले गये थे। मेरु पर्वत के शिखर पर एक अत्यन्त रमणीय मुज्जवान नामक पर्वत है ॥२०॥ वह पर्वत मेरा अत्यन्त सर्वदा प्रिय है मौर श्री सम्पप्नं वह मेरे भूतगणो के द्वारा परि- रक्षित भी है । उसके ही समीप मे लोको की सृष्टि करने के लिये परम उत्सुक उन्होने तीव्र तपस्या की थी ॥२१॥ दिव्यवर्षसहस्र तु वायुभक्षा: समाचरन् । तितोनुग्रहार्थाय देवि ते ऋषयः पुरा ॥२२ तेषां भक्तिमहं दृष्ट्वा सद्यः प्रत्यक्षतामियाम् । पंचाक्षरमृपिच्छन्दो दैवतं शक्तिबीजवत् ॥९३ न्यासं गडगं दिग्बंध विनियोगमशेषतः। प्रोक्तवानहमारिणा लोकानां हितकाम्यया ।।२४ तच्छु त्वा मंत्रमाहात्म्यमृपयस्ते तपोधनाः । मंत्रस्य विनियोगं च कृत्वा सर्वमनुष्ठिता ।।२५ तन्माहात्म्यात्तदालोकान्सदेवासुरमानुपान् । वर्णान्वर्ण विभागाश्च सर्वधर्मांश्च शोभनान् ॥२६ पूर्वकल्पसमुद्भूताञ्छु तवंतो यथा पुरा । पंचाक्षरप्रभावाच लोका वेदा महर्षयः ॥२७ वी. पर, एक सहल. दिव्य वर्षों तक वायु का भक्षण करते हुए उन तप किया था । हे देवि ! पहिले उस समय मे थे ऋषिमण अनुग्रह की प्राप्ति के प्रयोजन से वहाँ तप मे स्थित रहे थे ।।२२।। उनको पति तीय भक्ति को देखकर मैं तुरन्त ही प्रत्यक्ष हो गया था। उस पचाक्षर मन्त्र २६ [लिङ्ग पुराण योग के पर्यत शयन में सोया करते हैं। उनकी नाभि से समुत्पन्न पवन से पंच वक्त पितामह उत्पन्न हुए थे ॥१०॥११॥ तीन लोको की सृष्टि करने की इच्छा रखते हुए भी सहायता से रहित होकर अशक्त हो गये थे । फिर ब्रह्मा ने प्रादि मे अपरिमित भोज से सयुक्त दश को मन से उत्पन्न किया था। उनकी सृष्टि की प्रसिद्धि के लिये पितामह ने मुझसे कहा- हे महश्वर ! हे महादेव ! मेरे पुत्रो को शक्ति प्रदान करो ॥१३॥ इस तरह से पितामह के द्वारा माज्ञा प्राप्त करने वाले मैंने जो कि मैं पांच मुखो को धारण करने वाला था अपने पांच मुखो से पांच अक्षरों को पप योनि को बताया था ॥१४॥ तापंचवदनल्न ब्रह्मा लोकपितामहः । वाच्यवाचकभावेन ज्ञातवान्परमेश्वरम् ।।१५ वाच्यः पंचाक्षरैर्देवि शिवस्त्रं लोक्यपूजितः । वाचकः परमो मस्तस्य पंवाक्षरः स्थितः ।।१६ ज्ञात्वा प्रयोग विधिना च सिद्धि लब्ध्वा तथा पंचमुखो महात्मा। प्रोवाच पुत्रेषु जगद्धिताय मंत्रं महार्थं किल पंचवर्णम् ॥१७ ते लब्ध्वा मंत्ररत्नं तु साक्षालोकपितामहात् । तमाराधयितु देवं परात्परतरं शिवम् ॥१८ ततस्तुतोप भगवान् त्रिमूर्तीनां परः शिवः । दत्तवानखिलं ज्ञानमणिमादिगुणाष्टकम् ॥१६ तेपि लब्ध्वा वरान्विप्रास्तदाराधनकाक्षिणः । मेरोस्तु शिखरे रम्ये मुजवानाम पर्वतः ।। मत्प्रिय. सततं श्रीमान्मनून, परिरक्षितः। तस्याभ्याशे तपस्ताव लोकसृष्टिसमुत्सुकाः ॥२१ लोको के पितामह ने उन पांच अक्षरो को अपने पांच मुखो से ग्रहण करते हुए वाध्य-वाचक भाव से परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त किया था ॥१५॥ हे देवि! त्रैलोक्य के द्वारा पूजित शिव तो पचाक्षरो के द्वारा व च्य था भौर वाचक परम मन्त्र पचाक्षर स्वरूप में स्थित था ॥१६॥ विधि के सहित प्रयोग को जानकर तथा सिद्धि को प्राप्त करके पचमुख महान शिवमहापंचाक्षर-विधि निरूपण ] [२७ आत्मा वाले ने उस महान पर्थ चाले पाँच वर्णों से युक्त मन्त्र को जगत् के हित के लिये पुत्रो को बताया था। ॥१७॥ उन दश ब्रह्मा के मानस पुत्रो ने साक्षात् लोक पितामह से उस मन्त्र रत्न की प्राप्ति करके परात्पर देव शिव की प्राराधना करने लगे थे ॥१८॥ इसके उपरान्त त्रिमूतियो पर प्रधानदेव शिव भगवान अत्यन्त प्रसन्न हो गये थे। फिर उन्होंने सन्तुष्ट होकर परिणमा प्रादि प्रष्ट सिद्धियो का पूर्ण ज्ञान उन्हे प्रदान कर दिया था ॥१९॥ घे सब भी है विप्रो ! उनफे माराधना की प्राकाक्षा वाले वरो को प्रास करके पर्वत पर चले गये थे। मेरु पर्वत के शिखर पर एक अत्यन्त रमणीय मुज्जवान नामक पर्वत है ॥२०॥ वह पर्वत मेरा अत्यन्त सर्वदा प्रिय है पौर श्री सम्पन्न वह मेरे भूतगणो के द्वारा परि- रक्षित भी है। उसके ही समीप मे लोको को सृष्टि करने के लिये परम उत्सुक उन्होने तीव्र तपस्या की थी ॥२१॥ दिव्यवर्षसहस्रतु वायुभक्षा: समाचरन् । तितोनुग्रहार्थाय देवि ते ऋपय पुरा ॥२२ तेषां भक्तिमह दृष्ट्वा सद्य प्रत्यक्षतामियाम् । पंचाक्षरमृपिच्छन्दो दैवतं शक्तिबीजवत् ॥२३ न्यास पडगं दिग्बधं विनियोगमशेषतः। प्रोक्तवानहमार्यारणा लोकाना हितकाम्यया ।।२४ तच्छु त्वा मंत्रमाहात्म्यमृपयस्ते तपोधनाः । मंत्रस्य विनियोगं च कृत्वा सर्वमनुष्टिता ।।२५ तन्माहात्म्यात्तदालोकान्सदेवासुरमानुपान् । वर्णान्वर्णविभागाश्च सर्वधर्माश्च शोभनान् ।।२६ पूर्वकल्पसमुद्भूताञ्छ तवंतो यथा पुरा । पचाक्षरप्रभावाच्च लोका वेदा महपंयः ॥२७ वहां पर एक सहस्र दिव्य वर्षों तक वायु का भक्षण करते हुए उप तप किया था। हे देवि ! पहिले उस समय मे घे ऋपिगरण अनुग्रह की प्राप्ति के प्रयोजन से वहाँ तप मे स्थित रहे थे॥२२॥ उनकी प्रति तीव्र भक्ति को देखकर मैं तुरन्त ही प्रत्यक्ष हो गया था। उस पचाक्षर मन्त्र -- २८] [ लिङ्ग पुराण को ऋषि छन्द-देवता-बीज और शक्ति सबसे युक्त-पडङ्गन्यास-दिग्बन्ध और विनियोग इन सबके सहित पूर्ण रूप मे लोगो के हित की कामना से उन मायों को मैंने बतला दिया था ॥२३॥२४॥ तप के घम वाले अर्थात् परम तपस्वी उन ऋषियो ने मन्त्र का माहात्म्य श्रवण करके और मन्त्र का विनियोग करके उन्होने पूर्णतया अनुष्ठान किया था ॥२५॥ । उसके माहात्म्य से उस समय मे देय-असुर और मनुष्यो के सहित समस्त लोक-वर्ण-माश्रय के विभाग और समस्त शोभन धर्म जो कि पहले कल्प मे समुद्भूत थे इस पचाक्षर के प्रभाव से लोक-वेद तथा महर्षि सब ज्ञाता हो गये थे ॥२६॥२७॥ ॥ ६०-ध्यानयज्ञ माहात्म्य-वर्णन ।। जपाच्छ्रेष्ठतमं प्राहुाह्मणा दग्धकिल्बिषाः। विरक्ताना प्रवुद्धाना ध्यानयज्ञं सुशोभनम् ॥१ तस्माद्वदस्व सूताय ध्यानयज्ञमशेषतः। विस्तरात्सर्वयत्नेन विरक्तानां महात्मनाम् ।।२ तेषां तद्वचनं श्रुत्वा मुनीना दीर्घसत्रिणाम् । रुद्रण कथितं प्राह गुहा प्राप्य महात्मनाम् ॥३ संहृत्य कालकूटास्यं विष व विश्वकर्मणा। गुहा प्राप्य सुखासीनं भवान्या सह शंकरम् ॥४ मुनयः सशितात्मानः प्रणेमुस्तं गुहाश्रयम् । प्रस्तुवंश्च ततः सर्वे नीलकंठमुमापतिम् ।।५ अत्युन कालकूटास्यं संहृतं भगवंस्त्वया। अतः प्रतिष्ठितं सर्व त्वया देव वृपध्वज ॥६ तेषा तद्वचनं श्रुत्वा भगवान्नीललोहितः। प्रहसन्धाह विश्वात्मा सनंदनपुरोगमान ७ इस अध्याय में कालकूट नाम वाला समस्त दुःखो का निवारक ध्यान तथा शिव के द्वारा परिणत ज्ञान का माहात्म्य निपित किया पाता है । ऋपियो ने कहा-अपने किल्विपो को दग्ध कर देने वाले ध्यानयज्ञ माहात्म्य-वर्णन ] [२६ प्राह्मण प्रबुद्ध अर्थात् ज्ञानी विरक्तो का परम शोभन घ्यान यज्ञ को जप से अधिक थेष्ठ बताते हैं । इसलिय हे सूतजी । प्राप हमको वह ध्यान या पूर्ण रूप से बताने की कृपा करें जिसको महान् प्रात्मा याल विरक्त लोग किया करते हैं । ॥२॥ दीर्घसत्र करने वाले उन मुनियो के इस चचन को सुनकर विश्व कर्मा भगवान् रुद्र ने कालकूटारय विप को सहृत करके महात्मानो की गुहा पे जाकर वहा था उसे कहा। सूतजी ने कहा-गुहा में जाकर भगवान् पङ्कर भयानी के साथ सुख पूर्व विरा- जमान थे ॥३॥४॥ सराय से पूर्ण प्रात्मा वाले मुनिगण ने वहां गुहा में प्राश्रय ग्रहण करने वाले भगवान् शकर यो प्रणाम किया था। फिर सब ने उमा के स्वामी नील कण्ठ की स्तुति वो यो॥शा मुनियो ने पहा-हे भगवन् । अापने प्रत्यन्त उग्र कालकूट विप को सहत किया है। हे वृपध्वजदेव । इससे आपने सब को रक्षा कर प्रतिष्ठित करने की पृपा की है। ॥६॥ उन सबके इस वचन का श्रवण कर विश्व की मात्मा भगवान् नील लोहित हमवर उनसे बोले जिनमै कि सनदन प्रमुख थे ॥७॥ विमनेन द्विजष्ठा विप वक्ष्ये सुदारुणम् । सहरेत्तद्विष यस्तु स समर्यो ह्यनेन किम् ॥ न विप कालकूटास्य ससारो विषमुच्यते । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सहरेत सुदारुणम् ।। समारो द्विविध प्रोक्त स्वाधिकारानुरूपत' ! पुसा सम्ढ नित्तानामसक्षोण सुदारुण ॥१॥ ईपरणागगदोपेण सर्गो ज्ञानेन सुव्रता तनुशादेव सपा घर्माघमा न समय ॥११ असनिष्टे त्वपि शाख तच्छवरणासताम् । बुदिमुत्पादयत्येव ससारे यिदुपा द्विजा ॥१२ तस्मादृष्टानुश्रविप दुमित्युभयात्मपम् । सत्यजेत्सवंयत्नेन विरक्त सोभिधीयते ॥१३ शास्त्रमित्युच्यतेऽभाग श्रुते यमंसु तद्विजा । मूर्धान ग्रहण मारमृषीणां मरण फलम् ॥१४ .
- ३०१, [ लिङ्ग पुराण शिव ने कहा-है द्विजश्रेष्ठो! इससे क्या विप को मैं सुदारुण कहूंगा। जो इस विष का सहार करने वाला है वह परम समर्थ है। इसलिये इससे क्या होता है । कालकूट नाम वाला विष नहीं है । यह समार ही महाविष है । इसलिये सम्पूर्ण प्रयत्नो के द्वारा इस सुदा- रुण विष का सहरण करना चाहिए ॥६॥ अपने अधिकार के अनुरूप यह समार दो प्रकार का बताया गया है जो कि समूढ चित्त वाले पुरुषो का असंक्षीण और अत्यन्त दारुण होता है। ॥१०॥ अब ससार का मूल बनाते हैं । पाप लोग तो ज्ञान से सुव्रत वाले हो-यह इच्छा और विषयो मे प्रीति जो है यही इसका सर्ग है। इन्ही के कारण से सब का धर्म और अधर्म होता है-इसमे कुछ भी संशय नही है ।।११।। अप्रत्यक्षा स्वर्गादि अर्थ मे प्रास्तिक जीवो को श्रवण करने से उसके धर्म का प्रति- पादक शास्त्र ससार मे बुद्धि को उत्पन्न कर ही देता है ॥१२॥ इस- लिये यह विष रूप होने से दो प्रकार का होता है । एक तो दृष्ट जो ऐहिक है अर्थात् इसी लोक मे होने वाला है और दूसरा पारलौकिक है जिसका अनुश्रवण किया करते हैं। ये दोनो ही प्रकार का दोष युक्त है-ऐसा समझ कर जो इसे पूर्ण प्रयत्न से त्याग देता है वही विरक्त कहा जाया करता है ।।१३॥ श्रुति के प्रतिपादित कर्मों में अनेक देशी वेद का मस्तक स्वरूप अतीन्द्रिय दृष्टि वाले ऋषियो का सार निष्काम कर्म का फल जो अध्यात्म शास्त्र है वह ही शास्त्र कहा जाता है ॥१४॥ मनु स्वभ व सर्वेषा कामो दृष्टो न चान्यथा । श्रुतिः प्रवर्तिका तेषामिति कर्मण्यतद्विदः ॥१५ निवृत्तिलक्षणा धर्म समर्थाना मिहोच्यते । तस्माज्ञानमूलो हि ममार सददेहिनाम् ॥१६ कना संशोषमायाति कमणान्यस्वभावत । सकलविविधो जीव। ज्ञानहोनस्त्वविद्यया ॥१७ नारको एक वर्गी पुण्यकर प्रश्रवाद ! व्यतिमिश्रण वै जीवश्चतुर्धा सव्यवस्थित ॥१५ उद्भिज. स्वेदजश्च व मंडजो वै जरायुजः ।
ध्यानयज्ञ माहात्म्य-वर्णन ] एष व्यवस्थितो देही कर्मणाज्ञो ह्यनिर्वृतः।। ६ प्रजया कर्मणा मुक्तिधनेन च सतां न हि । त्यागेनकेन मुक्तिः स्यात्तदभावाभ्रमत्यमौ ।। एवमज्ञानदोपेगनानाकर्मवशेन च। पटकौशिफ समुद्भूतं भजत्येप फलेवरम् ॥२१ सब का स्वभाव काम देखा जाता है। इसके विपरीत नहीं देखा जाता है । उनमें थ ति प्रवृत्त कराने वाली होती है किन्तु कर्म में जो ज्ञाता नहीं होते हैं वे ही अन्यथा कहा करते हैं ॥१५।। जो समर्थ अर्थात् विरक्त हैं उनका धर्म निवृत्ति के लक्षण वाला होता है और वही धर्म- इस नाम से कहा जाया करता है। इसलिये समस्त देहधारियों को यह ससार अज्ञान के मूल वाला होता है ॥१॥ अन्य स्वभाव से काम्य फर्म के घशीभूत होकर यह जीव कला सशोप को प्राप्त हो जाती है अर्थात् सकल हो जाता है । वह राकल जीव तीन प्रकार का है जो अविद्या से ज्ञान हीन होता है ।।१७॥ पापो के करने वाला नारको-पुष्प कर्म करने वाला स्वर्गी होता है क्योकि यह पुण्य के गौरव से होता है। पुण्य तथा पाप स्वरूप व्यति मिश्रित कर्म से युक्त होता है । उद्भिजादि देह से युक्त चार प्रकार का जीव संव्यवस्थित होता है ॥१८॥ उद्भिज- स्वेज-प्रण्डज पोर जरायुज-इन प्रकारों से कर्म से यह अन्न और अनि- वृत देही व्यवस्थित होता है ।।१६। सत्पुरुषों की मुक्ति प्रजा से. कर्म से और धन से मुक्ति नहीं होती है। केवल एक त्याग ही ऐसा है जिससे जन्म-मरण रूपी अावागमन के भव बन्धन से छुटकारा होता है । इसके प्रभाव होने पर यह जीव भ्रमता रहा करता है ॥२०॥ इस प्रकार से प्रज्ञान के दोष से तथा अनेक प्रकार के कर्मों के कारण से स्नायु प्रादि छ कोशो से युक्तः इस कलेवर को धारण कर समुत्पन्न हुआ करता है और उसका सेवन किया करता है ॥२१॥ गर्भे दुःखान्यनेकानि योनिमार्गे च भूतले । कौमारे यौवने चैव वार्धके मरणेपि वा ।।२२ विचारतः सतां दुःख वीसंसर्गादिभिद्विजाः।
३२] [लिङ्ग पुराए दु.सेनैफेन वै दु.खं प्रशाम्यतीह दु.सिन ॥२३ न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥२४ तस्माद्विचारतो नास्ति संयोगादपि वै नृणाम् । अर्थानामर्जनेप्येवं पालने च व्यये तथा ॥.५ पैशाचे राक्षसे दुःखं याक्षे चैव विचारतः । गाध च तथा चारे सौम्यलोके द्विजोत्तमाः॥२६ प्राजापत्ये तथा ब्राह्मे प्राकृते पौरुपे तथा । क्षयसातिशयाद्यस्तु दुसर्दु :खानि सुव्रताः ।।२७ तानि भाग्यान्यशुद्धानि मत्यजेच्च धनानि च । तस्मादष्टगुण भोग तथा पोडशधा स्थितम् ॥२८ यह ससार पूर्ण रूप से दुःखमय है । पहिने जव यह जीव गर्भावास मे आता है तो वहाँ पर नौमास तक रहने में बडी पीडा का अनुभव होता है । गर्भ को अन्ध कोठरी में एक ही नही अनेको दुखो को सहना पडता है । फिर योनि द्वारा तन्त्री के द्वारा तार की भांति जन्म धारण करने मे बडी वेदना हुआ करती है । भूतल मे माने पर बहुत से शारी- रिक कष्ट सहता है बचपन-यौवन और वार्धद्वय मे प्रगणित सासारिक कष्ट भोगता है और अन्त मे मरने का भी महान दुख होता है क्योकि इस शरीर का त्याग करने मे जीव को बडी वेदना हुप्रा करती है । ।।२२।। हे द्विजवृन्द | विचार किया जाये तो सत्पुरुषो को स्त्रो के ससर्ग प्रादि में बडा दुख होता है । यहाँ ससार में ये दुखित प्राणी एक दुख से दूसरे दु ख को प्रशभित करने की चेष्टा किया करते हैं ॥२३॥ काम- नामो को उपभोग द्वारा पत्ति कर देने पर शान्ति नही हुआ करती है। काम पूति से तो वह कामना हवि के जलने से अग्नि की भांति मत्यधिक बढ जाया करती हैं ॥२४॥ इसलिये विचार से तथा मानवो के सयांग होने से दु खो से छुटकारा नहीं होता है । धन के अर्जन मे बहुत कष्ट होता है फिर उसकी रक्ष करने मे तथा व्यय करने मे भी महान दुख होता है ॥२॥ विचार किया जाये तो पैशाच-राक्षस और यक्ष इन सभी . ध्यानयज्ञ माहात्म्य वर्णन ]] [३३ पदो मे दुख भरा हुआ है । हे द्विजवृन्द ! गान्धर्व-चान्द्र और सौम्य लोक मे तथा प्राजापत्य-ब्राह्म प्राकृत और पौरुष म सर्वत्र क्षय, प्रति श्रेष्ठता कारण वाले दु सो से भी अनेक दुःख हुआ करते हैं ॥२६॥२७॥ पूर्वोक्त ससार से सम्बन्ध रखने वाले भाग्य प्रशुद्ध होते । अतएव घनो का भली भांति त्याग कर देना चाहिए क्योकि धन मे कष्ट के अतिरिक्त कोई भी कल्याण नही होता है। पार्थिवादि ऐश्वय अष्टगुण दुखरूप होता है और प्राप्य ऐश्वर्य सोलह गुना दुख स्वरूप होता है ॥ ८॥ चतुर्विशत्प्रकारेण सस्थित चापि सुब्रता । द्वात्रिंशभेदमनघाश्चत्वारिंशद्गुण पुन ॥२६ तथाष्टचत्वारिंशच्च पट्पचाशत्प्रकारतः। चतु पष्टिविध चैव दु खमेव विवे दिन ॥३० पार्थिव च तथाप्य च तेजस च विचारत । वायव्य च तथा व्योम मानस च यथाक्रमम् ।।३१ अभिमानिकमप्येव बौद्ध प्राकृतमेव च । दु खमेव न सदेहो योगिना ब्रह्मवादिनाम् ॥३२ गौण गणेश्वराणा च दु खमेव विचारत । मादी मध्ये तथा चाते सर्वलाकेषु सर्वदा ।।३३ वतमानानि दुखानि भविष्याणि यथातथम् । दोषदुष्टेणु देशेषु दुःखानि विविधानि च ॥३४ न भावयत्यतीतानि ह्यज्ञाने ज्ञानमानिन । क्षुद्याधे परिहारार्थ न सूखायान्नमुच्यते ॥३५ इस प्रकार से प्राठ-आठ की संख्या वृद्धि करने पर चौबीस गुना- बत्तीस गुना चालीस गुना अडतालीस उप्पन तथा चौंसठ प्रकार का दुख विवेकी को होता है ॥२६॥३०॥ इन पाठ से गुणित दुखो का क्रम पार्थिव प्राप्य तेजस बायव्य व्योम और मानस-माभिमानिक-बौद्ध और प्राकृत इस रीति से है। जो ब्रह्मवादी योगी पुरुप हैं उनको दुख ही दुख होता है-इसमे कुछ भी सन्देह नही है ॥३१॥३२।। जो गणेश्वर हैं अर्थात शिवगण के स्वामी हैं उनको गौण दुख होता है। इस प्रकार से ३४] [लिङ्ग पुराण विचार किया जावे तो सभी लोकों में सर्वदा यथातथ दुःख ही हैं-ऐसा जान लेना चाहिए ॥३३॥ दोपो से दूषित देशो मे विविध भौति के दुख हुआ करते हैं। कुछ दुख वर्तमान होते हैं और कुछ भविष्य में होने वाले दुःख हुमा करते हैं ॥३४॥ जो अतीत अर्थात् प्रति कान्त हुए दुख हैं वे अज्ञान मे ज्ञान के मानी को भाषित नहीं होते हैं । क्षुधा की व्याधि के परिहार के लिये और सुख प्राप्त करने के वास्ते अन्त नही कहा जाता है ॥३५॥ यथेतरेषां रोगारणामोषध न सुखाय तत् । शीतोष्णवातवर्षाचे स्तत्तत्कालेषु देहिनाम् ॥३६ दु खमेव न सदेहो न जानंति ह्यपंडिताः । स्वर्गप्येव मुनिश्रेधा ह्यविशुद्धक्षयादिभिः ॥३७ रोग नाविधनस्ता रागद्वेषभयादिभिः। छिन्नमूलतयंवदवशः पतति क्षितौ ॥३८ पुण्यवृक्षक्षयात्तद्वद्गा पतंति दिवौकसः । दुःवाभिलाषनिष्ठाना दुखभोगादिसंपदाम् ॥३६ अस्मात्त पतता दुखं कष्टं स्वर्गादिवौकसाम् । नरके दुःखमेवात्र नरकाणा निपेवणाद ॥४० विहिताकरणाच्चैव वणिना मुनिपु गवा.॥४१ जिस प्रकार से शीत, उष्ण, वात और वर्षा प्रादि से तत्तत्काल में देहपारियों के अन्य रोगो के लिये जो प्रोपध है वह सुख के लिये नहीं होती है ॥३६॥ वह भी दुख ही होता है किन्तु जो परिडत नहीं होते है घे इसे जानते नहीं है । हे अंध मुनिगण । स्वर्ग भी विशुद्ध ज्ञान- प्रविशुद्ध पुण्य और उमके क्षय प्रादि से होने वाले राग-द्वप-भय प्रादि नाना दु ख तथा रोगों से जीव प्रस्त होते हैं और वहाँ से अर्थात् स्वर्ग से छिन मूल वाले घृक्ष की भांति वश रहित होकर पुण्य के क्षीण होने पर पुनः पृथ्वी पर माकर गिरता है । पुण्य की समाप्ति होते ही स्वर्गीय गुखोपभोग समान होकर पुन: भूमोक मे जीवो को जन्म ग्रहण करना पड़ता है ॥३७॥३८॥ पुण्य रूपी वृक्ष के क्षय हो जाने पर अर्थात् जितना ध्यानयज्ञ माहात्म्य वर्णन ] [ ३५ पुण्य होता है उसका स्वर्ग में सुख भोगने पर दिवौकस ( स्वर्गवासी) भी इस भूमि पर आकर गिरा करते हैं। दु.खो के अभिलाप की निष्ठा वाले दुःखभोग प्रादि को सम्पदा वाले स्वर्गवासियों को वहाँ से गिरते हुए महान् कष्ट एवं दुख होता है । नरको के निषेवण से यहां नरक में दुःख ही होता है ।।३६॥४०॥ हे मुनि पुगो! ब्रह्मचारियों को विहित के प्रकरण से ही होता है ॥४॥ यथा मृगो मृत्युभयस्य भीतो उच्छिन्नवासो न लभेत निद्राम् । एवं यातानपरो महात्मा संसारभीतो न लभेत निद्राम् ।।४२ कीटपक्षिमृगाणां च पशूना गजवाजिनाम् । दृष्टमेवासुख तस्मात्त्यजत: सुषमुत्तमम् ॥४३ वैमानिकानामप्येव दुःख कल्पाधिकारिणाम् । स्थानाभिमानिनां चैव मन्वादीनां च सुव्रताः ।।१४ देव नां चैव दैत्यानामन्योन्यविजिगीपया । दुःखमेव नृपाणां च राक्षसानां जगये ॥४५ श्रमार्थमाश्रमश्चापि वर्णानां परमार्थतः । पाश्रमैन च देवश्च यज्ञैः सांख्यवतैस्तथा ॥४६ उग्नेस्तपोभिविविधनानाविधरपि । न लभते तथात्मानं लभते ज्ञ निमः स्वयम् ।।१० तस्मात्सर्वप्रयत्नेन चरेत्पाशुपतव्रतम् । मस्मशायी भवेन्नित्य यते पाशुपते बुधः ।। पंचार्थज्ञानसपन्नः शिवतत्त्वे समाहितः । कैवल्यकरण योगविधिकमच्छिदं वृधः ।।४६ जिस तरह से मृत्यु के भय से मृग उछिन्न निवास वाला होकर निद्रा नहीं लेता है। इसी प्रकार से ध्यान में परायण पति भी संसार से भयभीत होकर निद्रा अर्थात् मोह को प्राप्त नही किया करता है ।।१२।। कोडे-पक्षी मोर मृगों का तथा हायो पोर पोडे मादि पशुओं का दुःख देखा ही हमा है अर्थात् सबको दिखलाई दिया ही करता है। इसलिये इस सासारिफ उत्तम सुस पो त्याग देना चाहिए | यहा के मानों [ लिङ्ग पुराण को ही नहीं विन्तु पल्प पर्यन्त स्वर्ग में निवास करने के अधिकारी वैमा- निकों ( देवों ) को भी दुःख होता है । तथा स्थानाभि मानी मनु मादि को भी हे सुव्रतो! दुःख हुमा करता है ।।४४।। देवता मादि और दैत्यों को परस्पर में एक दूसरे को जीत लेने की इच्छा से दुःख होता है । इस त्रैलोक्य में राजामो को तथा राक्षसी को भी दुख हुअा करता है । ॥४५॥ प्राधम भी श्रम के लिये ही होते हैं और परमार्थ से वों का भी श्रम ही होता है । माश्रमों के द्वारा-देवों के द्वारा-यज्ञों से सांख्य से तथा व्रतों से-उग्र तपो के द्वारा और नाना प्रकार के दानों से उस प्रकार का आत्मोत्थान प्राप्त नहीं होता है जैसा कि ज्ञानी लोग स्वयं भात्मा का उत्थान किया करते हैं ॥४६॥४७॥ इसलिये सम्पूर्ण प्रयत्नों के द्वारा पाशुपत महाव्रत को करना चाहिए। बुद्धिमान पुस्प को पाशुपत व्रत में निन्य भस्म में शयन करने घाला होकर रहना चाहिए १४८ पश्चार्य ज्ञान से युक्त अर्थात् पंचाक्षरी मन्त्र के अर्थ के ज्ञान से युक्त पुरुष शिव तत्त्व में समाहित होता है। ऐसा विद्वान् योग की विधि से कर्मों का छेदन करने वाला कैवल्य करण को अर्थात् मोक्ष को प्रस किया करता है ।।४।। पंचार्थयोगसंपन्नो दुखांतं व्रजते सुधोः । परया विद्यया वेद्य विदत्यपरया न हि ॥५० द्वे विद्ये वेदितव्ये हि परा चैवापरा तथा । अपरा तत्र ऋग्वेदो यजुर्वेदो द्विजात्तमाः ।।५१ सामवेदस्तथाऽयों वेदः सथिसाधकः । शिक्षा कल्पो व्याकरण निरवत छद एव च ।।५२ ज्योतिप चापरा विसा पराक्षरमिति स्थितम् । तददृश्य तदग्राह्यमगोत्रं तदवर्णकम् ॥५३ तदचक्षुस्तदश्रोत्र तदपाणि अपादकम् । तदजातमभूतं च तदशब्द द्विजोत्तमाः ।। ४ अस्पर्श तदरूपं च रसगंध विवजितम् । अव्ययं चाप्रतिष्ठं च तन्नित्य सवंग विभुम् ।।५५ ध्यानयज्ञ माहात्म -वर्णन ] [३७ महांतं तद्गृह तं च तदज चिन्मयं द्विजाः। अप्राणममनस्कं च तदस्निग्धमलोहितम् ।।६ अप्रमेयं तदस्थूलमदीर्घ तदनुल्बरणम् । अहम्व तदपार च तदानद तदच्युतम् ।।५७ पञ्चाक्षरी के अर्थ के योग से सम्पन्न सुधी सम्पूर्ण दुःखो का अन्त कर देता है । वह परा विद्या से वेद्य ( जानने के योग्य ) होता है अर्थात् उस वेद्य को जानते हैं । प्राध्यामिवी विद्या को परा विद्या कहते हैं। अपरा विद्या से नही जानते हैं ।।५०।। दो विद्या जानने के योग्य होती हैं । एक परा विद्या है और दूसरी का नाम अपरा विद्या कहा जाता है। द्विजोत्तमो ! उन दोनो विद्यालो मे जो अपरा विद्या है यह ऋग्वेद- यजुर्वेद है ॥५१॥ सामवेद और समस्त अर्थों का साधक अथर्ववेद है। शिक्षा-कल्प-व्याकरण निरुक्त छन्द ये सभी अपरा विद्या मे वेद तथा वेदाङ्ग पाते हैं ॥५२॥ ज्योतिष भी अपरा विद्या है । परा विद्या अक्षर है-वह प्रहश्य है अग्राह्य अगोत्र-प्रवणक-अव्यय-अप्रतिष्ठ-नित्य-सर्वत्र और विभ्र है । महान-गृह-अज निन्मय-प्रप्राण-प्रमनस्व-प्रस्निग्ध-प्रलो. हित-अप्रमेय प्रस्थूल अदीर्घ यनुल्वग-ग्राहस्व-प्रपार-मच्युत है ।।५३॥५४।। ५५॥५६॥५७॥ अनपावृतमद्वैतं तदनतमगोचरम् । असंवृतं तदात्मैकं परा विद्या न चान्यथा ॥५८ परापरेति कथिते नवेह परमार्थतः। अहमेव जगत्सर्व मय्येव सकल जगत् ॥५६ मत्त उत्पद्यते तिष्टत्मयि मय्येव लीयते । मत्तो नान्यदितीक्षेत मनोवाक्पाणिभिस्तथा ॥३० सर्वमात्मनि सपश्येत्सच्चासच समाहितः । सर्व ह्यात्मनि सपश्यन्नबाह्य कुरुते मनः ॥६१ अघोदृष्ट्या वितस्त्यां तु नाभ्यामुपरितिष्ठति । हृदय तद्विजानीयाद्विश्वस्यायतन महत् ॥६२ हृदयस्यास्य मध्ये तु पुडरीवमवस्थितम् ।
३८] [ लिङ्ग पुराण धर्मकंदसमुद्भूतं ज्ञाननालं सुशोभनम् ॥६३ वह अनपावृत-अद्वैत-अनन्त-प्रगोचर-प्रसवृत और वह प्रात्मैक है । वह परा विद्या अन्य किसी भी प्रकार से वर्णन नहीं की जा सकती है ॥५८॥ परा और अपरा ये कही तो गई है किन्तु परमार्थतः यहाँ पर नही हैं । मैं ही यह समस्त जगत् के स्वरूप वाला हूँ और मुझमें ही यह समस्त जगत् विद्यमान रहता है ॥५६॥ यह मुझसे ही उत्पन्न होता है, 'मुझमे स्थित रहता है और मुझमे ही अन्त में लीन हो जाया करता है। मुझसे अन्य को मन वाणी और याणि से नहीं देखना चाहिए ॥६॥ समाहित होकर सत् और असत् सबको प्रात्मा मे देखना चाहिए सबको मात्मा मे देखते हुए बाहिर में मन को न लगावे ।६१। अधोमुख से नाभि मे ऊपर वितस्ति में जो स्थित रहता है उसे इस विश्व का महान् पायतन हृदय जानना चाहिए ॥६२॥ इस हृदय के मध्य मे पुण्डरीक ( कमल ) 'अवस्थित है । वह धर्म कन्द से समुत्पन्न हुमा है और ज्ञान की नाल से सुन्दर गोभा वाला है ॥६ ऐश्वर्याष्टदलं वेतं परं वैराग्यकरिणकम् । छिद्राणि च दिशो यस्य प्राणाद्याश्च प्रतिष्ठिताः ।।६४ प्राणाद्यश्चैव संयुक्त पश्यते बहुधा क्रमात् । दशप्राणवहा नाड्यः प्रत्येक मुनिपुगवाः ॥६५ द्विमातिसहस्राणि नाडयः संपरिकोर्तिताः । नेत्रस्थं जाग्रतं विद्यात्कंठे स्वप्न समादिशेत् ॥६६ सुपुप्त हृदयस्यं तु तुरीय मूर्धनि स्थितम् । जाने ब्रह्मा च विष्णुश्च स्वप्ने चव यथाक्रमात् ॥६७ इत्यं प्रसन्न विज्ञान गुरुमपर्कजं ध्रुवम् । राग पानृतकोष कामतृष्णादिभिः सदा । ६८ अपरामृष्टमय विज्ञेय मुक्तिद विदम् । अज्ञानमलपूर्यत्वात्पुरुषो मलिनः स्मृतः ।।६६ तरदायाद्धि भवेन्मुक्ति न्यया जन्मकोटिभिः । शानमेकं विना नास्ति पुण्यपापपरिक्षयः ।।
ध्यानयज्ञ माहात्म्य-वर्णन ] [ ३६ पाठ ऐश्वर्य उसके पाठ दल हैं और वैराग्य ही परम श्वेत कणिका है । जिसके छिद्र अर्थात् पत्रातर दिशायें हैं। प्राणादि वायु प्रतिषित हैं ।।६४॥ प्राग्गादि के सयोग से विशिष्ट होता हुआ जीव क्रम से बहुत प्रकार देखता है। हे मुनि पुङ्गयो । प्रत्येक मे दश प्राण वह नाडियां हैं ॥६५॥ बहत्तर हजार नाडियां बताई गई हैं। जब-जब नेवस्थ होता है तो उसे जाग्रत समझना चाहिए और जब कण्ठ मे स्थित होता है तो स्वप्नावस्थ होता है । जब हृदयस्थ होता है तो सुपुप्त होता है और मूर्य में स्थित होने पर तुरीय अवस्था वाला होता है । ब्रह्मा-विष्णु- ईश्वर और महेश्वर ये चारो अवस्थामो के देवता होते हैं ॥६६॥६॥ इस प्रार से प्रसन्न विज्ञान गुरु के सम्पर्क से उत्पन्न होता है और वह ध्रुव है । वह सदा राग-द्वप-अनृत-कोय-काम और तृष्णा मादि से अप- रामृष्ट होता है अर्थात रहित रहता है। इसको प्रब ही विशेष रूप से समझ लेना चाहिए । यह मुक्ति के प्रदान करने वाला होता है । प्रज्ञान मूल होने से पहिले पुरुप मलिन कहा गया है ॥६॥६६॥ उस अज्ञान के नाश होने से मुक्ति होती है । अन्यथा करोडो जन्मो मे भी मुक्ति नहीं हो सकती है । एक ज्ञान के बिना कभी भी पुण्य और पाप का परिक्षय नही होता है ॥७॥ ज्ञानमेवाम्यसेत्तस्मान्मुक्त्यर्थ ब्रह्मवित्तमाः। ज्ञानाभ्यासाद्धि वै पु सा बुद्धिर्भवनि निर्मला ।।७१ तस्मात्सदाभ्यसेज्ज्ञान तनिष्ठस्तत्परायण । ज्ञानेनकेन तृप्तस्य त्यक्तसगम्य योगिन 11७२ कर्तव्यं नास्ति विप्रेन्द्रा प्रस्ति चेत्तत्त्वविन्न च । इह लोके परे चापि पर्तव्य नास्ति तस्य वै ॥७३ जीवन्मुक्तो यतस्तस्माद्ब्रह्मवित्परमार्थतः । जानाम्यासरतो नित्य ज्ञानतत्वापवित्स्वयम् ७४ पतं याभ्यासमुत्सृज्य ज्ञानमेवाधिगच्छति । यश्रिमाभिमानी यस्त्यक्तमोधो द्विजोत्तमा ॥५] मन्यत्र रमते मूढः सोऽशानी नान सरायः।
४० ] रहता [ लिङ्ग पुराण संसारहेतरज्ञान संमारस्तनुसंग्रहः ॥७६ मोक्षहेतुस्तथा ज्ञान मुक्तः स्वात्मन्यवस्थितः। प्रज्ञाने सति विप्रेद्राः क्रोधाद्या नात्र संशयः ॥७७ हे ब्रह्मवित्तमो ! इसलिये मुक्ति के पाने के वास्ते ज्ञान या ही प्रभ्यास करना चाहिए । ज्ञान के प्रयास से पुरुषो की बुद्धि निर्मल हो जाया करती है ॥७॥ ज्ञान मे निष्ठा रसते हुए और तत्परायण होकर इसलिये सदा ज्ञान का ही अभ्यास करना चाहिए। एक ज्ञान से सन्तृत पौर सङ्ग के त्याग करने वाले योगी का कुछ भी तय नहीं है । यदि कुछ कत्त'च्य शेष है तो समझ लो वह तत्त्व वेत्ता नहीं हैं । ज्ञान वाले योगी को इस लोक मे और परलोक मे कुछ भी फिर कर्तव्य शेप नही ॥६॥७३॥ ग्रह्म का वेत्ता जिससे परमार्थ रूप से जीवन्मुक्त हो जाता है और ज्ञानाभ्यास में रत होने वाला स्वय ज्ञान के तत्वार्य का ज्ञाता होता है ।।७४।। जो वर्णाश्रम का अभ्यास का अभिमान रखने वाला है उसे क्रोध को त्याग कर कर्तव्य के अभ्यास का त्याग कर देना चाहिए तब वह ज्ञान को ही प्राप्त कर लेता है ॥७॥ जो मूढ अन्यत्र रमण करता है वह महाज्ञानी है-- इसमे तनिक भी सशय नहीं है। यह ससार तनु का सग्रह होता है और यह ससार ही प्रज्ञान का हेतु है ॥७६।। मोक्ष का हेतु ज्ञान होता है पोर जो मुक्त होता है वह अपनी प्रात्मा ही में स्थित रहता है । हे विन्द्रगरण ! प्रज्ञान के रहने पर ही कप आदि होते हैं - इसमे सन्देह नहीं है ।।७।। क्रोधो हस्तथा लोभो मोहोदभो द्विजोत्तमाः । धर्माधौं हि तेषा च तद्वशात्तनुसंग्रहः ॥७८ शरीरे सति वै क्लेश: सोविद्या सत्यजेद्बुधः । अविद्या विद्यया हित्वा स्थितस्यैव च योगिनः ॥७६ काधाद्या नाशमायाति धर्माधी च व द्विजाः। तत्क्षयाच्च शरीरेण न पुनः संप्रयुज्यते 10 स एव मुक्त ससारादु.खत्रयविवर्जितः।। एवं ज्ञान विना नारित ध्यानं ध्यातुद्धिजर्षभाः॥८१ T - ध्यानयज्ञ माहात्म्य-वर्णन , ११ ज्ञानं गुरोहिं संपन्न वाचा परमार्थतः। चतुव्यू हमिति ज्ञात्वा ध्याता ध्यानं समभ्यसेवा सहजागंतुकं पापमस्थिवागुद्भवें तथा ! ज्ञानाग्निदहते क्षिप्रं शुष्केंवनमिवानलः ।।६३ फ्रोध-हपं-लोभ-मोह-दम्भ-धर्म और अधर्म उनको होते हैं और इनके वदा में होने से तनु का सग्रह हुआ करता है |७८इस शरीर के होने पर ही क्लेश होता है । इसलिये बुध को इस विद्या का त्याग कर देना चाहिए । विद्या के द्वारा अविद्या का त्याग करके योगी को स्थित रहना चाहिए ॥७॥ ऐसे योगी के क्रोधादि तथा धर्माधर्म नाश को प्राप्त हो जाया करते हैं । हे द्विजो ! इन सब के नाश होने से फिर यह सरीर से सप्रयुक्त नही हुमा करता है 10 ऐसा ही पुरुष तीनो प्रकार के दुःखों मुक्त होता हुमा इस संसार से छुटकारा पा गाता है । हे द्विजपंभ- गण ! इस प्रकार से ज्ञान के बिना ध्याता का ध्यान नही होता है ।।८।। ज्ञान गुरु के सम्पर्क से ही होता है जो कि पारमार्थिक है पेपल वचन से नहीं होता है । गुरु के प्रसाद रूपी हेतु से संजस विश्व प्रात सुरीय रूप चतुव्यूह को जानकर ही ध्याता को ध्यान का प्रयास करना चाहिए ८२।। सहज-ग्रागन्तुक और मस्यि तथा वारणो से उद्भव पाला पाप जो होता है उसे सूखे हुए ईंधन को मग्नि के समान यह ज्ञान रूपी मग्नि जला दिया करती है। ज्ञानात्परतर नास्ति सर्वपापविनाशनम् । अभ्यसेच्च सदा ज्ञानं सर्वसङ्गविवर्जितः ॥८४ शानिनः सर्वमपानि जोयते नात्र संशयः । कीडन्नपि न लिप्येत पापनानाविधरपि ।।५ ज्ञान यपा तथा ध्यान तस्माद्धधान समभ्ययेत् । पानं निविपयं प्रोक्तमादी सविषयं तथा ॥६ पप्रकार समभ्यस्य चतुःपदाभिस्तथा। तथा दादशधा व पुनः पोडसधा कमात् ।।२७ द्विधाम्यस्य च योगीमो मुच्यते नान संशयः।
४२] [ लिङ्ग पुराण शुद्धजावूनदाकारं विधूमांगारसन्निभम् ॥ पीत रवतं सितं विद्युत्कोटिकोटिसमप्रभम् । अथवा ब्रह्मरंध्रस्थ चित्त कृत्वा प्रयत्नतः । न सित वासितं पीतं न स्मरेब्रह्मविद्भवेत् । अहंसकः सत्यवादी अस्तेयी सक्यलतः ॥६० ज्ञान से पर तर सब प्रकार के पापो को विनाश करने वाला अन्य कोई भी साधन नहीं है। इसलिये सम्पूर्ण सङ्ग का त्याग करके सदर ज्ञान का ही अभ्यास करना चाहिए ।।1८४|| ज्ञानी पुरुष के समस्त पाप जीर्ण हो जाते हैं-इसमे कुछ भी संशय नहीं है । ज्ञानी पुरुष क्रीडा करता हुमा भी नाना प्रकार के पापो से लिप्त नहीं होता है ॥८॥ ज्ञान जैसा होता है वैसा ही ध्यान होता है इसलिये ध्यान का अभ्यास करे । ध्यान निविषय कहा मया है जो कि आदि म सविषय हुआ करता है। ॥८६॥ छ प्रकार का अभ्यास करके चार छ भौर दश के द्वारा बारह प्रकार से और फिर क्रम से सोलह प्रकार से अभ्यास करे ॥७योगी- न्द्र दो प्रकार से अभ्यास करके मुक्त हो जाता है इसमे सशय नहीं है । अब ध्यान मे शिवाकार को बताते हुए कहते हैं, वह परम शुद्ध सुवर्ण के माकार वाला बिना घूम वाले अङ्गार के तुल्य है । पीत-रक्त और सित करोडो विद्युत् की प्रभा के समान है । अथवा चित्त को ब्रह्म म्ध्र. स्थ करके प्रयत्न पूर्वक ब्रह्म वेत्ता सित-असित और पीत का स्मरण न करे । ब्रह्म वेत्ता को अहिंसक-सत्यवादी-स्तेय (चोरी) से रहित सब यरनो से होना चाहिए ॥८ERIEOH परिग्रहविनिर्मुक्तो ब्रह्मचारी दृढव्रतः सतुष्टः शौचसंपन्नः स्वाध्यायनिरतः सदा ॥६१ मद्भक्तश्चाभ्यसेवयानं गुरुस्ांपर्कजं ध्रुवम् । न बुध्यति तथा ध्याता स्थाप्य चित्तं द्विजोत्तमाः ।।८२ न चाभिमन्यते योगी न पश्यति समततः। न घ्राति न शृणोत्येव लीनः स्वात्मनि य. स्वयम् ।।६३ भीमः सुपिरनाकेऽसौ भास्करे मंडले स्थितः ।
ध्यानयज्ञ माहात्म्य-वर्णन । ४३ ईशानः सोमविवे च महादेव इति स्मृतः ।।६४ पुसां पशुपतिर्देवश्चाष्टघाहं व्यवस्थितः । काठिन्य यत्तनो सर्व पार्थिवं परिगीयते ॥१५ आप्य द्रवमिति प्रोक्तं वरियो वह्निरुच्यते । यसंबरति तद्वायुः सुपिर यद्विजोत्तमाः ॥६६ तदाकाशं च विज्ञानं शब्दज व्योमसंभवम् । तथैव विप्रा विज्ञानं स्पर्शात्यं वायुसंभवम् ।।६) समस्त प्रकार के परिग्रह से निर्मक्त-ब्रह्मचर्य धारण करने वाला- दृढ प्रत से युक्त-रानोप रसने वाला-शोर से सम्पन्न भौर सदा स्वाध्याय परने में निरत रहे । ॥१॥ मेरे भक्त को गुरु के सम्पर्क से प्रास ध्रुव ध्यान का प्रभ्याम करना चाहिए । ध्यान करने वाला अन्य किसी का भान ही नहीं रगता है क्योकि यह ध्यान में ही रित्त को स्थापित कर देता है।सा योगी को ध्यान की स्थिति मे घुछ भी भान अन्य पा नही होता है और न पुष देखता ही है-ग गूंधता है और न पुछ सुनता ही है। यह तो स्वयं भपनी पारमा में ही लोन रहता है। MEnह सुपिर सभा वाले भाषा मे भीम है-मास्कर मण्डल में स्पित शिान है मौर सोम के पिम्र में महादेव कहा गया है । पुरषो का यह पशुपति देव पाठ प्रकार से स्थिर रहता है । जो इसके सनु मे सब प्रकार पाटिन्य है यह पार्थिव रहा जाता है | व स्वरूप इस पाप है और ययि यहिता जाता है। पो सजरगति करता है वह वायु है जो कि मुपिर में रिपत रहता है ॥६६॥ पारामा विमान प्योम सम्भव पास होता है। है विप्र- गुम ! पाय से समुत्रन स्पर्म नाम पासा रिगान है । रूपं वाहग मित्युत्तामाप्य रममय द्विजा । गंधारय पापियं भूपत्रिनयेद्धारमा समात् ।। रेप दक्षिण पामे सोम हद विभुद्विजाः । मानानु पियोतत्यमानामेयारिमाल IIRE भारयहितत्वं स्थानाटांत हिजोत्तमाः।
४४ Lnd [लिङ्ग पुराण वायव्य वै ललाटाचं व्योमाख्यं वा शिवाग्रकम् ।।१०० हंसास्य च ततो ब्रह्म व्योम्नश्चोध्वं तत परम् । व्योमाख्यो व्योममध्यस्थो ह्यय प्राथमिकः स्मरेत् ॥१०१ न जीव. प्रकृति, सत्त्व रजश्वाथ तम. पुनः । महास्तथाभिमानश्च तन्मानारणीद्रियाणि च ॥१०२ व्योमादीनि च भूतानि नैवेह परमार्थतः । व्याप्य तिष्ठद्यतो विश्वं स्थाणुरित्यभिधीयते ।।१०३ उदेति सूर्यो भीतश्च पवते वात एव च । द्योतते चंद्रमा वह्निज्वलत्यापो वहति च ।।१०४ दधाति भूमिराकाशमवकाश ददाति च । तत सर्व तस्माद्वं चितयेद्धि ना. ११०५ तेनैवाधिष्ठितं तस्मादेतत्सर्वं द्विजोत्तमा । सर्वरूपमय शर्व इति मत्वा स्मरेद्भवम् ।।१०६ रूप अग्नि का तथा रसमय जल का और गन्धमय पार्थिव इस क्रम से भास्कर का चिन्तन करना चाहिए । दक्षिण नेत्र में सूर्य-वाम नेत्र मे सोम प्रोर हृदय मे विभु का ध्यान करे । जानु पर्यन्त पृथिवी तत्त्व है और नाभि तक बारि मण्डल है IEE) करठ तक वह्नि तत्त्व है और ललाटात तक वायव्य तत्त्व है । ललाट से यादि लेकर दिखाग्र पर्यन्त व्यागस्य तत्व होता है। इसके उपर हसास्य ब्रह्म तत्त्व होता है । व्योम के मध्य में स्थित व्योमास्य है। यह प्राथमिक है- इसका स्मरण करना चाहिए ।।१००।१०१।। जीव-प्रकृति-सत्त्व-रज-तम-महान- अहसार-पञ्च तन्मात्रा-इन्द्रियाँ व्योमादि भूत ये सब यहाँ परमार्थत: नहीं है । जो इस विश्व को व्याप्त होकर स्थित है वह स्थाणु-इस नाम से कहा जाता है। 1१०२॥ मूर्य भीत होता हुमा उदय होता है । वायु पहन करता हुमा पवित्र रिया परता है । चन्द्रमा प्रवाश फार चम- पता है । अग्नि जलता है और जन वहते हैं। मूमि धारण करती है और पावान प्रवास प्रदान करता है ये सब उसी की मात्रा विस्तार हमा है इसलिये है हिजगण! उसका निन्तन परना चाहिए ॥१३॥ - सदाचार शौच निरूपण ] [४५ २०४१। यह सब उसी के द्वारा प्रधिष्ठित है और सबके स्वरूप वाला यह शर्य ही है-ऐसा मानकर भव का स्मरण करना चाहिए ॥१०॥१०६॥ संसारविषतप्तानां ज्ञानध्यानामृतेन वै । प्रतीकारः समाख्यातो नान्यथा द्विजसत्तमाः १११०७ ज्ञानं धर्मोद्भव साक्षाज्ञानाद्वैराग्यसंभवः । वैराग्यात्परम ज्ञान परमार्थप्रकाशकम् ॥१०८ ज्ञानवैराग्पयुक्तस्य योगसिद्धिद्विजोत्तमाः। योगसिद्धया विमुक्तिः स्यात्सत्त्वनिष्ठस्य नान्यथा ॥१०६ इस संसार रूपी विप से संतप्त जीबो को ज्ञान ध्यान रूपी अमृत से हो प्रतीकार बताया गया है और अन्य कोई प्रतीकार नहीं होता है ॥१०७॥ ज्ञान साक्षात् धर्म से उत्पन्न होने वाला है भोर ज्ञान से ही पैराग्य की उत्पत्ति होती है। पैराग्य से परम ज्ञान होता है जो कि परमार्थ को प्रकाशित करने घाला होता है ५१०८।। जो ज्ञान और वैराग्य से युक्त होता है हे द्विजगण ! उसी को योग की सिद्धि हुआ करतो है । योग को सिसि से जो सत्व में निष्ठ होता है उसी की मुक्ति होती है अन्यथा मुक्ति नहीं हुआ करती है ॥१०९।। ॥६१-सदाचार शौच निरूपण ।। अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि शौचाचारस्य लक्षणम् । यदनुष्ठाय शुद्धात्मा परेत्य गतिम प्नुयात् ॥१ ब्रह्मरणा कथित पूर्व सर्वभूतहिताय वै। संक्षेपात्सर्ववेदार्थ संचयं ब्रह्मवादिनाम् ॥२ उदयार्थ तु शोचानां मुनीनामुत्तमं पदम् ।। यस्तयाथाप्रमत्तः स्यात्स मुनि वसीदति ॥३ मानावमानो द्वावेतो तावेवाहुविपामृते । प्रवमानोऽमृत तत्र सन्मानो विषमुच्यते ॥४ गुरोरपि हिते युक्तः स तु संवत्सरं वसेत् । नियमेवप्रमत्तस्तु यमेषु च सदा भवेत् ।।१ ४६ । लिङ्ग पुराण प्राप्यानुा ततश्चैव ज्ञानयोगमनुत्तमम् । अविराधन धर्मस्य चरेत पृथिवीमिमाम् ॥६ चक्षु पूत चरेन्मार्ग वस्त्रपून जलं पिवेत् । सत्यपूर्त वदेद्वाक्यं मनःपूत समाचरेत् ॥७ इस अध्याय मे योगियो का सदाचार-द्रव्यशुद्धि-शौच और स्त्री धर्म का निहाण किया जाता है। सूतजी ने कहा-इससे प्रामे में शौचाचार का लक्षण बताता हूँ जिसका अनुष्ठान करके शुद पारमा वाला मरकर सद्गति को प्राप्त करता है ॥१। यह सब ब्रह्मा समस्त प्राणियो हित के लिये सम्पूर्ण वेदो का अर्थ सक्षेप मे कहा है जो कि ब्रह्मवादियों के लिये एक सचय है ।।२।। मुनियो के उदय के लिये शोचो का उत्तम पद है। इन शौचो के करने में जो सदा सावधान रहा करता है वह मुनि कभी भी दुखित नहीं होता है । ३॥ मान और अवमान ये दोनों विप तथा अमृत बताये गये हैं। इनमे जो अवमान होता है वह अमृत होता है। सामान विष कहा जाता है ॥४॥ गुरु के हित मे युक्त होता हुया के समीप में एक वप पर्यन्त निवास करना चाहिए। जो नियम हैं उनमे तथा जो यम हैं उनमे सदा अप्रमत्त होता हुआ वहाँ पर निवास करे ॥॥ सर्वोत्तम ज्ञान योग को गुरु से प्राप्त करके उनकी माज्ञा ग्रहण कर धर्म का विरोध न करते हुए इस भूमण्डल मे विचरण करना चाहिए ॥६॥ माग में अपनी प्राख से भली-भांति देखकर ही चलना चाहिए और सर्वदा वस्त्र से छानकर पवित्र जल का पान परे। सदा सचाई के द्वारा परम पवित्र पवन ही बोलने चाहिए एव मन से खूब विचार कर जिसे पवित्र समझे उमे ही करना चाहिए ॥७॥ मत्स्यगृह्यस्य यल पंपण्मास भ्यतरे भवेत् । एकाहे तत्सम शेयमपूतं यज्जल भवेत् ।। अपूतोदक्पाने तु जपेच शतपवकम् । अघोरलक्षणं मंत्र ततः शुद्धिमवाप्नुयात् ।। अथवा पूजयेच्छभु घृतस्नानादिविस्तरैः । विधा प्रदक्षिणीकृत्य शुद्धयते नात्र सरायः ॥१० प्रत कार्य गृहस्थेषु पीलोनेपु चोद्विजाः। यद्दधानेपु दातेगु श्रीयितु महात्मसु ॥१५ सदाचार शौच निरूपण ] [ ४७ मातिथ्य श्राद्धयज्ञेषु न गच्छेद्योगविस्कचित् । एवं ह्यहिंसको योगो भवेदिति विचारितम् ।।११ वह्नौ विधू मेऽत्यंगारे सर्वस्मिन्भुक्तवन्जने । चरेत्त मतिमान् भक्ष्य न तु तेष्वेव नित्यश. ॥१२ अर्थनमवमापते परे परिभवति च । तपा युक्त' चरेद्भक्ष्यं सतां धर्ममदूपयन् ।।३ मैक्ष्य चरेद्वनस्थेषु यायावरगृहेषु च । श्रेष्ठा तु प्रथमा हीयं वृत्तिरस्योपजायते ॥१४ मत्स्यो के ग्रहण करने धाले को छै मातो में जो पाप होता है उतना पाप एक दिन वस्र से पवित्र नहीं दिम हुए जल के पान करने से होता है || यदि प्रमाद यश अपूत जल को पी लेवे तो पांच सौ बार अधोर मन्त्र के जाप करने से शुद्धि को प्राप्त करता है ।।६। मथवा दूसरा प्राय- वित्त अपूत जलपान करने का यह है कि घृत के स्नानादि से विस्तार के साप शिव का पूजन करे और फिर तीन प्रदक्षिणा शिव की करे तब शुद्धि होती है इसमे संशय नहीं है ॥१०॥ योग के वेता को किसी पादर पूर्वक दिये हुए निमन्त्रण मे-श्राद्ध मे पोर अन्य यज्ञादि मे भोजन नहीं करना चाहिए । इस पूर्वोक्त प्रकार से योगी अहिंसक होता है- यह निश्रित है ।।११॥ वहि वे विघूम तथा अङ्गारो से रहित होने पर भर्यात् शीतत हो जाने पर और घर के समस्त सदस्यो के भोजन कर सेने पर मतिमान् योगी को घर पर जाकर भिक्षा करनी चाहिए। वह भी उन्ही घरो मे नित्य भिक्षा न करे ॥१२॥ जिस तरह से इसका दूसरे लोग भयमान करें और परिभूत करें उस तरह से मुक्त होकर ही भक्ष्य गरे मोर सत्पुष्पो का जो धर्म होता है उसे कभी भी दूपित नहीं करे 8 मिधा बन मे स्थिती के यदी तथा दया चरो परो मे जाकर भिसा रे ग पोगी पृषी पर गयेष्ठ वृत्ति होती है ।॥१४॥ मते मय पुरावा मापतितेपुच
। लिङ्ग पुरा
भक्ष्यचर्या हि वर्णपु जघन्या वृत्तिरुच्यते ॥१६
भक्ष्य यवागूस्तक वा पयो यावकमेव च ।
फलमूलादि पक वा कणपिण्य क सक्ता ॥१७
इत्येव ते मया प्रोक्ता योगिनां सिद्धिवर्द्धना.।
पाहारास्तेपु सिद्ध पु श्रेष्ठ भक्ष्यमिति स्मृतम् ।।१८
अम्बिदु यः कुशाग्रैण मासिमासि समश्नुते ।
न्यायतो यश्चरेदर्भक्ष्य पूर्वोक्तास विशिष्यते ॥१३
जरामर गगर्भेम्यो मातस्य नरकादिषु।
एव दाययते तस्मात्तद्भक्ष्य मिति सस्मृतम् ॥२०
दधिमक्षा पयोभक्षा ये च न्ये जीवक्षोणकाः।
सर्वे ते भक्ष्यमक्षस्य कला नाहति पोडशीम् ॥२१
इसके बाद शील वाले एव श्रेष्ठ सदाचारी जो गृहस्थ हो उनके
यहाँ भिक्षा करनी चाहिए। जो गृहम्य श्रद्धा रखने वाले-दमा शील-
श्रोत्रिय और महान आत्मा वाले हो उनके यहां भिक्षा करे ॥१५। इसके
अनन्तर जो दुष्ट और पतित न हो उन वर्गों के यहां भक्ष्यचर्या करे-यह
जघन्य वृत्ति कही जाती है ॥१६॥ भिक्षा मे पवागू-तक-पप-यावक पल
और मूल-पक्क गोपूमाग्न कण तिल चूर्ण और मत्त ये सब भक्ष्य में प्राप्त
होते हैं तो वे योगियो की सिद्धि के बढाने वाले होते हैं । इसलिये मैंने
इनको बनाया है। इनके सिद्ध होने पर जो आहार हैं ये परम श्रेष्ठ
भक्ष्य होता है -ऐसा कहा गया है ।।१७॥१८॥ जो घुशा के अग्र भाग
से जल की वूदें मास-मास मे प्रशन किया करता है और जो न्याय
पूर्वक भिक्षा का चरण किया करता है वह पूर्व मे कहे हुए से विशिष्ट
होता है ।।१६।। जरा-मरण और गम से नरक आदि में जो यति भीत
होता है उसका पूर्व में कहा हुप्रा भक्ष्य भिक्षा) दाय भाग की भांति
ही होता है । इसलिये भक्ष्य को पहा गया है ॥२०॥ जो दधि के भक्षण
घरने वाले तथा दूर के ऊपर ही रहने वाले हैं अथवा कृच्छ मादि के
द्वारा देह का शोषण करने वाले हैं वे सभी इस भिक्षा चरण की सोल-
इवी यला के योग्य नहीं होते हैं ॥२१॥
सदाचार शौच निरूपण ] [४९ भस्मशायी भवेन्नित्यं भिक्षाचारी जितेंद्रियः। य इच्छेत्परमं स्थानं व्रतं पाशुपतं चरेत् ॥२ योगिनां चैव सर्वेषां श्रेष्ठ चांद्रायणं भवेत् । एकट्ठ पोरिण चत्वारि शक्तितो वा समाचरेत् ।।२३ अस्तेय ब्रह्मचर्य च अलोमस्त्याग एव च । प्रतानि पंच भिक्षूणामहिंसा परमा विह ॥२१ अक्रोधो गुरुशुश्रूषा शौचमाहारलाधवम् । नित्यं स्वाध्याय इत्येते नियमा: परिकीर्तिताः।२५ वीजयोनिगुणा वस्तृवत्रः कर्मभिरेव च । यथा द्विर इवारण्ये मनुष्याणां विधीयते ।२६ देवस्तुल्याः सर्वयज्ञक्रियास्तु यज्ञाज्जाप्य ज्ञानमाहूश्च जापात् । ज्ञानाद्धयानं सगरागादपेतं तस्मिन्प्राप्ते शाश्वतस्योपलभः ।।२७ दमः शमः सत्यमकल्मषत्व मौनं च भूतेष्वखिलेषु चार्जवम् । अतीद्रियं ज्ञान मिद तथा शिव प्रास्तथा ज्ञानविशुद्धबुद्धयः ।। जो भिक्षा चरण करने वाला है उसे जितेन्टिय पौर नित्य भस्म मे शयन करने वाला होना चाहिए। जो सर्वोपरि वर्तमान परम स्थान प्राप्त करने की इच्छा रखता है उसे पाशुपत महायत का समाचरण परना चाहिए ॥२२॥ समस्त योगियो लिये चान्द्रायणा प्रत अनि श्रेध होता है । इस चान्द्रायण ग्रन को कम से एक-दो-तीन या चार अपनी शक्ति के अनुसार करना चाहिए ॥२३॥ भिशुमो वे पान परम प्रत होते है-मस्तेय ब्रह्मचर्य-पलोम त्याग मोर अहिंसा, इनमे महिमा सय में परम श्रेष्ठ यताई गई है ॥२४॥ प्रोध न करना-गुरु यो सेवा परना-शुद्धता मोर पाहार का हलकापन ये स्वाध्याय में नित्य नियम यताये गये हैं ॥२५॥ योजयोनि के गुण अर्थात् पिता मोर माता के स्वा. भावित गुण-यस्तु पनादि का बन्धन तथा सचित यमों के द्वारा बन्धन पन में हापो के समान मनुष्यो मे दु.सग्रह देवो के द्वारा दिये जाते हैं ॥२६॥ समम्न यमो कोरिया देवो के सुल्प मात् स्वर्ग के प्राप्त पराने पानी होती है। मन से जाप्प होता है। जप गेनो पेशान पो ५० ] [ लिङ्ग पुराण बताया गया है और ज्ञान से भी उत्तम ध्यान होता है जो सग और राग से अपेत होता है । इसके प्राप्त हो जाने पर शाश्वत पद की प्राप्ति हो जाती है ॥२७॥ शम-दम-सत्य-प्रकल्मपत्व-मौन और समस्त भूतो मे सरलता तथा प्रतीन्द्रिय ज्ञान अर्थात् प्रात्म-शान इसको विशुद्ध बुद्धि वाले शिव कहते हैं ॥२८॥ समाहिता ब्रह्मपरोप्रमादी शुचिस्तथैकातरतिजितेद्रियः। समाप्नुयाद्योगमिमं महात्मा महर्षयश्च वनिंदितामला. ॥२६ प्राप्यतेऽभिमतान् देशानकुशेन निवारितः । एनन्मार्गेण शुद्ध न दग्धबीजो हकल्मषः १३० सदाचारता साताः स्वधर्मपरिपालकाः। सर्वांल्लोकान् विनिजित्य ब्रह्मलोकं व्रजति ते ॥३१ पितामहेनोपदिष्टो धर्मः साक्षात्सनातनः । सर्वलोकोपकारार्थ शृणुध्व प्रवदामि व ॥३२ गुरूपदेशयुक्तानां वृद्धाना क्रमवत्तिनाम् । अभ्युत्थानादिक सर्व प्रणामं चैव कारयेत् ॥३३ अष्टागप्रणिपातेनविधा न्यस्तेन सुबना । विःप्रदक्षिणयोगेन यद्यो वै ब्राह्मणो गुरुः ॥३४ ज्येष्ठान्येपि च ते सर्व वंदनीया विजानता। धाज्ञ भंग न कुर्वीत यदीच्छेरिमद्धिमुत्तमाम् ॥३५ समाहित अर्थात् शान्त चित्त वाला-ब्रह्म के चिन्तन मे परायण- पालस्य रहित-शौच से युक्त विविक्त का सेवन करने वाला-जितेन्द्रिय भौर प्रसन्न चित्त बाला महात्मा इस पाशुपत व्रत के योग को प्राप्त किया करता है-यह प्रनिन्दित एवं अमल महर्षिगण वहते हैं ॥२६॥ जिस तरह मास के द्वारा गज निवारित होता हुमा अपने मभिमत देशो को प्रास दिया जाता है उसी प्रकार से परम सुद इस योगमार्ग के द्वारा दाय बीज पाला तथा परमप रहित हो जाता है । ॥३०॥ सदाचार में रति रसने वाले परम शान्त प्रकृति वाले मौर अपने धर्म के पूर्ण पालन भरने से योगी समस्त लोगों को विनिजित करके ब्रह्मलोर को चले सद चार शौच निरूपण [५१ जाते हैं ॥३१॥ यह धर्म पितामह के द्वारा उपदिष्ट हुआ है । यह साक्षात् सनातन धर्म है। समस्त लोकों के उपकार करने के लिये इसका पाप लोग श्रवण करें। मैं पापको इसे बतलाता हूँ ॥३॥ गुरु के उपदेश में युक्त-वृद्ध और क्रमवर्ती जो मानव हैं उनके समागत होने पर अभ्युत्यान प्रादि देकर उन्हें प्रणाम करना चाहिए ॥३३॥ प्रणाम ऐसा हो निममें पाठों अङ्गों के द्वारा प्रणिपात किया जावे और वह भी तीन वार होना चाहिए। ब्राह्मण गुरु को तीन बार प्रदक्षिणा करके बन्दना करनी चाहिए ॥३४॥ अन्य जो भी ज्येष्ठ हों उन्हे भली-भांति जानते हुए सय को बन्दना करनी चाहिए। यदि अपूर्व उत्तम सिद्धि की चाह हो तो बड़ों की आज्ञा का भङ्ग कभी नहीं करना चाहिए ॥३॥ घातृशून्यबिलक्षेत्रक्षुद्रमंत्रोपजीवनम् । विषग्रह विडंबादोन्वर्जयेत्सर्व यत्नतः ॥३६ कैतवं वित्तशाठ्य च पैशुन्यं वर्जयेत्सदा । अतिहासमवष्टभं लीलास्वेच्छाप्रवर्तनम् ॥३१ वर्जयेत्सर्वयत्तेन गुरूणामपि सन्निधौ । तद्वाक्यप्रतिकूल च प्रयुक्त वै गुरोर्वचः ॥३८ न वदेत्सर्वयत्नेन अनिष्ट न स्मरेत्सदा । यतीनामासनं वस्त्रदंडाद्य पादुके तथा ॥३॥ माल्यं च शयनस्थानं पात्र छायां च यत्नतः। यज्ञोपकरणांगं च न स्पृशेद्वै पदेन च ॥४० देवद्रोह गुरुद्रोहं न कुर्यात्सर्वयत्नतः । कृत्या प्रमादतो विप्राः प्रणवस्यायुतं जपेत् ॥४१ देवद्रोहगुरुद्रोहाकोटिमात्रेण शुध्यति । महापातकशुद्धयर्थं तथैव च यथाविधि ॥४२ धातुवाद-नास्तिकवाद-ऊपरभूमि भूतप्रेतादि के क्षुद्र मन्त्र इनके द्वारा अपनी वृत्ति करना तया विष से युक्त सर्यादिका मन्त्र द्वारा पकडना अर्थात् प्रन्यानुकरण करना इन समस्त निन्दनीय कर्मों को प्रयत्न पूर्वक वजित कर देना चाहिए ॥३६॥ कतर-विचवाध्य भौर पिशुनता इन बुरे ५२] [ लिङ्ग पुराण फर्मों का भी सर्वदा त्याग कर देना चाहिए। अत्यन्त हास करना-असतों का सा प्रारम्भ अर्थात् किसी बुरे कर्म को करना और लीला से स्वेच्छा- चार मे प्रवृत्ति करना इन समस्त कार्यों का गुरुगण की सन्निधि में यन पूर्वक वजित करना चाहिए । गुरु वर्ग के प्रतिकूल-उनके वचन के विरुद्ध एवं प्रयुक्त वचन कभी नही बोलना चाहिए। सम्पूर्ण यल के द्वारा कभी भी अनिष्ट का स्मरण नही करे तथा यतियों के प्रासन-वस्त्र-दएड प्रादि और पादुका तथा यज्ञ के उपकरणाङ्गों का पैर मादि से कभी स्पर्श नही करना चाहिए माल्य-शयन स्थान-पात्र और छाया का भी स्पर्श नही करे । ॥३६॥३७॥३८॥३६॥४०॥ साधना करने वाले मानव को देवता से द्रोह तथा गुरु से द्रोह नहीं करना चाहिए और ऐसा पूर्ण प्रयत्न करना चाहिए कि द्रोह का भाव कभी होवे ही नही और प्रमाद से ऐसा हो भी जाय तो दश सहस्र प्रणव का जाप प्रायश्चित्त के लिये करे ।।४१।। यदि यह देव और गुरु के साथ बुद्धि पूर्वक जान-बूझकर किया जाता है तो एक करोड प्रणव के जप से शुद्धि होती है । महा- पातक की शुद्धि के लिये जो विधि है वैसी ही विधि इस द्रोह मे भी होती है ॥४२॥ पातकी च तदर्धेन शुध्यते वृत्तवान्यदि । उपपार्ताकनः सर्वे तदर्धेनैव सुबताः ।।४३ संध्यालोपे कृते विप्रः त्रिरावृत्त्येव शुद्धयति । प्राह्निकच्छेदने जाते शतमेकमुदाहृतम् ॥४४ लघने समयानां तु अभक्ष्यस्य च भक्षणे। प्रवाच्यवाचनं चैव सहस्र च्छुद्धिरुच्यते ।।४५ क कोलूककपोतानां पक्षिणामपि घातने । शतमष्टोतर जप्त्वा मुच्यते नात्र संशयः॥४६ यः पुनस्तत्त्ववेत्ता च ब्रह्मविदाह्मणोत्तमः। स्मरणाच्छुद्धिमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ।।७ नवमात्मविदामस्ति प्रायश्चित्तानि चोदना। विश्वस्यैव हि ते शुद्धा ब्रह्मविद्याविदो जनाः 1165 - सदाचार शौ नरूपण ] [५२ योगध्यानकनिष्ठाश्च निलेपाः कांचनं यथा । शुद्धानां शोधन नास्ति विशुद्धा ब्रह्मविद्यया ॥४६ पातको पुरुष उसी आधी प्रायश्चित्त की विधि से भी शुद्ध हो जाता है अगर वह पुरुप चरित्रवान होता है । है सुव्रतो ! जो उपपातक करने वाले हैं वे उसके भी प्राधे प्रायश्चित्त से शुद्ध हो जाया करते हैं ॥४३॥ विप्र यदि सन्ध्या का लोप कर देता है अर्थात् सन्ध्या वन्दना नहीं घरता है तो नीन रानि मे ही सुर हो जाता है । दैविक फर्म का घेदन होने पर शुद्धि के लिये एक रात बार जाप से ही शुद्धि कही गई है ।।४।। समय जो नियत है उसके लघन होने पर तथा अभक्ष्य पदार्थ के सा लेने पर और जो नहीं कहना चाहिए उसके कथन करने पर एक राहय जाप से शुद्धि कही जाती है ।।४।। कोमा उल्लू और कबूतर पक्षियों के पात करने पर एकसौ पाठ बार जप से पाप से मुक्त हो जाया करता है- इसमे कुछ भी सराय नहीं है ।।४६॥ जो तत्त्व वेत्ता ब्रह्म कामाता उत्तम पाहाण हो तो ये यल प्रणव पे स्मरण करने ही से शुद्धि प्राप्त कर लेता -इस विषय मे कुछ भी अधिक विचार करने की पावश्यकता नहीं है ।।४७)। जो प्रारम येत्ता पुरुप होते हैं उनके लिये यह प्रायश्चित्त करने की प्रेरणा नहीं होती है ययोंकि वे ब्रह्म विद्या के विद्वान तो विश्वम्भर के लिये ही शुद्ध होते है ॥४८॥ योग मोर ध्यान मे निष्ठा रखने वाले पुरुष तो सुपणं को भौति रावंदा निलेप हुमा परते हैं क्योकि वे तो पहिले ही ब्रह्म विद्या के द्वारा विगुर हुमा मरते हैं। उन विगुलों या कोई भी सोधन नहीं होना है ॥६॥ उद्धृतानुष्ण फेनाभिः पूताभिर्वत्रचापा । पद्भिः समाचरेत्सवं वर्जयेकलुपोदकम् ॥५० गधवारसदुष्टमशुचिस्थानसस्थितम् । पंकारमपितं चंय सामुद्र पल्वलोदकम् ।।४१ सवाल तयान्य दोपविवर्जयेत् । घन शोनान्वितः मुरिसर्वकार्याणि ये द्विजाः ॥१२ नमस्कारादिक सर्व गुरुशुश्रूषण दियम् ।
५४ ]
[ लिङ्ग पुराण
वनशौचविहीनात्मा ह्यशुचिर्नात्र संशय ॥५३
देवकार्योपयुक्ताना प्रत्यह शौचमिष्यते।
इतरेषा हि वखारणा शौच कार्य मलागमे ।।५४
वर्जयेत्मर्वयत्नेन वासो यविधृतं द्विजाः ।
कौशेयाविकयो रूक्ष. क्षोमारणा गौरमपंपैः ॥५५
श्रीफलरंशुपट्टाना कुतपानामरिष्टक ।
चर्मणा विदलाना च वेवारणा वखवन्मतम् ॥५६
अनुष्ण केतो के सहित उद्धृन जल को वस्त्र तथा चक्षु ले पूत करके
ही सब किया करनी चाहिए और जो जल कलुपित हो उसको वर्जित
कर देना चाहिए ॥५०॥ जो जल किसी भी तरह गन्ध तथा वर्ण एव
रस से दूषित हो तथा किसी अपवित्र स्थान मे रखा हुआ हो एव फीच-
पत्थर से दोप युक्त हो वह ममुद्र का हो या किसी सरोवर का हो-शवाल
वाला हो या किसी अन्य दोषो से पूर्ण हो तो उसका त्याग कर देना
चाहिए । है द्विजो ऐसे दूषित जल को वस्त्र के द्वारा शौच से युक्त कर
लेवे तभी उससे स7 कार्यों का सम्पादन करे ॥५१॥५२॥ समस्त नम-
स्कारादिक कार्य तथा गुरु की सेवा आदि के कार्य सर्वदा शुद्ध होकर हो
करने चाहिए । वस्त्र और शौच से जो हीन होता है वह अशुचि होता
है-इसमे कुछ भी सशय नहीं है ।।५३) देवो के कोई भी कार्य हो
उनके करने के उपयुक्त होने के लिये प्रतिदिन सोच ( शुद्धि) की
पावश्यकता होती है । अन्य वस्त्रों की शुदि मैल के छूट जाने पर करनी
चाहिए ॥५४॥ हे द्विजो। दूसरो के द्वारा धारण किये गये वस्त्रो को
सभी प्रयत्नो के द्वारा वजित रखना चाहिए । जो कौशेय ( रेशमी।
वस्त्र हो तथा ऊनी वस्त्र हो उनकी शुद्धि रुक्ष वायु से ही हो जाती है।
जो क्षोभ अर्थात् मतप्ती वस्त्र हों उनकी शुद्धि गौर सरसो से होती है।
जो अशु यह अर्थात् सूर्य किरण युक्त हो उनकी शुद्धि बिल्व फलो से
होती है। जो कुतुय-कुशास्तरण या छाग कम्बल हो उनको शुद्धि सक
रोचन से हो जाती है । जो विदल अर्थात् सत के घर हो तथा धर्म वस्त्र
एव क्षेत्र निमित हों उन सब की शुद्धि यख को भौति होती है ॥५५॥५६॥
सदाचार शौच निरूपण ] [५५ वल्कलानां तु सर्वपां छत्रचामरयोरपि । चैलवच्छो चमाख्यातं ब्रह्मविभिमुनीश्वरैः ।।५७ भस्मना शुद्धयते कांस्य क्षारेणायसमुच्यते। ताम्रमम्लेन वै विप्रास्त्रपुमीसकयोरपि ॥५८ हैममभिः स: शूभ पान रोप्यपात्र द्विजोत्तमाः । मण्यश्मशखमुक्तानां शौचं तैजसवत्स्मृतम् ॥५६ अग्गेरपां च संयोगादत्यंतोपहतस्य च । रस'नामिह सर्वेषां शुद्धिरुत्प्लवनं स्मृतम् ॥६० तृणकाष्ठादिवस्तूनां शुभेनाभ्युक्षणं स्मृतम् । उष्णेन वारिणा शुद्धिस्तथा स क्स्र वयोरपि ।।६१ तथैव यज्ञपात्राणां मुशलोलूखलस्य च । शृगास्थिदारुदतानां तक्षणेनैव शोधनम् ।।६२ सहतानां महाभागा द्रव्याणां प्रोक्षणं स्मृतम् । असंहतानां द्रव्यारणा प्रत्येकं शौचमुच्यते ॥६३ वल्कल वस्त्रो की तथा धन और चामरों की शुद्धि ब्रह्म वेत्ता मुनी. श्वरो ने चैल वस्त्र की भांति ही बताई है ॥५७॥ अब पत्र-शुद्धि बताते हैं -- कांसे का पात्र भस्म से शुद्ध होता है । क्षार से लौह पात्र की शुद्धि होती है । तान पात्र की खटाई से शुद्धि है तथा संग और शीशा के पान की भी खटाई से शुद्धि बनाई गई है ॥१८॥ सुवरणं के पात्र और रौप्य ( चांदी के पात्र की शुद्धि केवल जल से ही हो जाती है । जो मणि-प्रश्म शख-पौर मुक्ता के पाषादि होते हैं उन सब को शुद्धि सुपएं की ही भांति होती है ॥५६॥ सम रमो की शुद्धि उत्प्लवम बताई गई है तथा मग्नि मोर जल के सयोग से मोर मत्यन्त उपहत करने से होती है ॥०॥ तृण भौर काष्ठादि वस्तुयो की शुद्धि पवित्र जल के द्वारा भम्यु- क्षण से होती है । सूक मोर सपा को शुद्धि गर्म पानी से है । ॥६१॥ इसी भांति मन्य या फे पायो यो तथा मूमल मोर उलूसल यो पोर सीग-पस्थि काठ मोर दांत को वस्तुपो की शुद्धि तक्षण (पिलाई ) कर देने से हो जाती है । ६२॥ हे महामागो ! जो पदा हुमा करती [ लिङ्ग पुराण सहत अर्थात् मिले-जुले हो उन सब को शृद्धि केवल प्रोक्षण मात्र से ही हो जाया करती है। जो असहत द्रव्य हो उनकी प्रत्येक की अलग २ शुद्धि हुमा करती है ॥६॥ अमुक्तराशि धान्यानामेकदेशस्य दूषणे । तावन्मात्र समुद्धृत्य प्रोक्षय कुशामसा । ६४ शाकमूलफ्लादीना धान्यवच्छुद्धिरिष्यते । माजनो-मार्जनश्प पुन पाकेन मृन्मयम् ।।६५ उल्लेखनेनाजनेन तथा समाजनेन च । गोनिवासेन व शुद्धा सेचनेन घरा स्मृता ॥६६ भूमिस्थमुदकं शुद्ध वैतृष्ण्यं यत्र गौवजेत् । अव्याप्त यदमेध्येन गधवर्ण रसान्वितम् ।।२७ उत्सः शुचिः प्रसवणे शकुनि फलपातने। स्वदारास्य गृहस्थाग रतौ भार्याभिकांक्षया ॥६८ हस्ताभ्या क्षालितं वस्त्र कारुणा च यथाविधि। कुशावुना सुमप्रोक्ष्य गृह्णीयाद्धर्मवित्तम ॥६९ पण्यं प्रसारित चैव वर्णाश्रमविभागश.। शुचिराकर ज तेपा श्वा मृगग्रारणे शुचि ॥७० जो अभक्त धान्य की राशि हो और उसका एक भाग दूषित हो गया हो तो उसमे से उतना ही दूषित भाग निकाल कर शेष को फुशा द्वारा जल से प्रोक्षण कर देने पर शुद्धि हो जाती है ।।६४॥ शाक-मूल और फलो की शुद्धि भी घान्य के समान ही होती है। घर को शुद्धि मार्जन और जल के द्वारा उन्मार्जन अर्थात् सेचन करने से होती है। मृन्मय । मिट्टी के ) पात्रो की शुद्धि दुबारा अग्नि मे पाक कर देने से होती है ॥६५॥ भूमि की शुद्धि खनन ( खोदने ) से-गोमय के द्वारा लेपन से भली-भौति मल के भपकरण से-गाय के निवास करा देने से और जल के द्वारा सेचन कर देने से हो जाती है ॥६६॥ भूमि मे रहने वाला-जल उतनी मात्रा में होना चाहिए जिससे एक गाय की प्यास पान्त हो जावे तो वह शुद्ध माना गया है । जो प्रमेधा (अपवित्र ) सदाचार शौच निरूपण ] [ ५७ पदार्थ से व्याप्त न हो और गन्ध-वर्ण तथा रस से अन्वित न हो ॥६॥ दोहन के समय में वत्स ( बछड़ा) शुद्ध होता है और फल के गिराने के समय में पक्षी शुद्ध माना जाता है । अपनी स्त्री का मुख गृहस्थों के यहाँ भार्या की अभिकाङ्क्षा से रति के समय मे शुद्ध माना गया है ६८ कार ( कारीगर ) के द्वारा विधिपूर्वक हाथो से धोया हुना वस्त्र कुशा के जल से सम्प्रोक्षण करने के पश्चात् धर्म वेत्ता पुरुप को ग्रहण कर लेना चाहिए ॥६६॥ बाजार की दुकानों फैलाई हुई वस्तु चर्णाश्रम के विभाग से शुद्ध होती हैं जो कि पाकरज हों। मृग के ग्रहण करने के समय में कुत्ता सुद्ध माना गया है ।।७।। छाया च विप्लुपो विप्रा मक्षिकाद्या द्विजोत्तमाः। रजोभूर्वायुरग्निश्व मेध्यानि स्पर्शने सदा ॥७१ सुप्त्वा भुक्त्वा च वै विप्राः क्षुत्त्वा पीत्वा च वै तथा । ष्ठावित्वाध्ययनादौ च शुचिरप्याचमेत्पुनः ॥७२ पादौ स्पृशं ति ये चापि पराचमनबिंदवः । ते पार्थिवः समा ज्ञेया न तैरप्रयतो भवेत् ।।७३ कृत्वा च मैथुनं स्पृष्ट्वा पतितं कुक्कुटादिकम् । सूकरं चैव काकादि श्वानमुष्ट्र खरं तथा ॥७४ यूप चांडालफाद्यांश्च स्पृष्ट्वा स्नानेन शुध्यति । रजस्वला सूतिकां च न पृोदंत्यजामपि ।।७५ सूतिकाशीच संयुक्तः शावाशाचसमन्वितः। संस्पृशेन रजस्तासां स्पृष्ट्वा स्नात्वव शुध्यति ।।७६ मैवाशीचं यतीनां च वनस्थब्रह्मचारिणाम् । नैष्ठिकानां नृपाणां च महलीनां च सुबताः ।।७७ छाया प्रौर घेद-पठन के समय में मुम से निर्गन-विन्दु-विप्र मक्षिका प्रादि तथा रज-भूमि-पायु मोर पनि स्पा करने मे मदा शुद्ध होते हैं 1७१॥ पापन परसे-भोजन करके-इन करके पर्गात जभाई लेकर पेय पदार्य पीकर पूगार पोर प्ययन के मादि में शुचि होते हुए भी पुनः माधमन करना पाहिए ॥७२॥ जो परके भाचमन को विन्दुएँ परोको
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। लिङ्ग पुराण
स्पर्श करती हैं वे पार्थिवों के समान ही जानने चाहिए । उनसे अप्रयत
नहीं होना चाहिए ॥७३॥ मैथुन करके पतित का स्पर्श करके तथा
कुक्कुट प्रादि-सूकर कोमा प्रादि-कुत्ता ऊँट-गधा-यूप और चाण्डाल
आदि को छूवर स्नान करना चाहिए तभी सुद्धि होती है । रजस्वला
स्त्री सूतिका स्त्री और अन्त्यजा स्त्री का भी कभी स्पर्श नही करना
चाहिए ॥७४।७५ । सूतिका का जननाशौच और मृताशीच इनसे युक्त
को भी अपनी रजस्वला स्त्री का स्पर्श नही करना चाहिए और यदि
स्पर्श कर लेता है तो स्नान करके ही शद्ध होता है ॥७६।। पति-वन में
स्थित ब्रह्मचारी-नष्टिय नियम वाला-राजा और राजा के प्रभात्य प्रादि
को पाशौच नहीं होता है ।।७७।।
ततः कार्यविरोधाद्धि नृपाणा नान्यथा भवेत् ।
वैखानसाना विधारणा पतितानामसभवात् ।
असचयद्विजाना च स्नानमानेण नान्यथा ।
तथा संनिहिताना च यज्ञार्थ दीक्षितस्य च ॥७६
एकाहाद्यज्ञयाजीनां शुद्धिरुक्ता स्वयभुवा।
ततस्त्वधीतशाखाना चतुभि सर्वदेहिनाम् ।।
सूतक प्रेतक नास्ति त्र्यहादूर्ध्वममुत्र वै।
अर्वागकादशाहातं वाधवाना द्विजोतमा ८१
स्नानमात्रैण वै शुद्धिर्मरणे समुपस्थिते ।
तत ऋतुत्रयादगेिकाह परिगीयते ॥२
सप्तवततश्चार्वाक विरान हि तत. परम् ।
दशाह ब्राह्मणाना वै प्रथमेऽहनि वा पितु ॥८३
राज्य के कार्यों के विरोध होने राजानों को प्राशौच नहीं हुआ
करता है । वैसानस ( यायावर )-विप्र और पतितो वा असम्भव होने
से प्राशौच नहीं होता है ॥७॥ नित्य ही अजित कर वृत्ति वाले द्विजो
यो तथा प्रज्ञाता शोच वालो को और यनार्थ दीक्षा ग्रहण कर लेने
यात्रा में जो प्रराचय वृत्ति वाले हैं उनको स्नान मात्र से ही शुद्धि होती
है । मजयात्री को एक दिन में ही शुद्धि स्वयम्भू ने बताई है । अधीत
सदाचार शौच निरूपण ] 18 शाखा वालो को प्रर्थात् वेद को शाखा के अध्ययन करने वालो एकाह से ही शुद्धि हो जाती है । अन्य जो असगोन हैं उनको तीन दिन में शुद्धि होती है, जातक और मृतक दोनो ही चतुर्थ दिन मे शुद्ध हो जाते हैं । जो वान्धव है उनको एकादश दिन पर्यन्त भाशीच रहता है ।।७६८० ८१॥ वान्धवो को एकादश दिन के पाद स्नान परने पर शुद्धि हो जाया करती है । यस्मिरण समुपस्थित होता है । जनन के दश दिन के पश्चात् शुद्धि होती है । ऋतु अय के पश्चात् मरण में भी एकाह मरण-शुद्धि के लिये बताया गया है ॥२॥छ मास के अन्तर सात वर्ष पर्यन्त मृता. शौच तीन रात्रि का होता है । इससे मागे ब्राह्मणो के यहां जिनका कि उपनयन सस्कार हो गया है दशाह मृताशौच होता है । यदि जनन होते ही मृत हो जाने पर मातो को तो सूतिका शौच और मृताशौच पूरा होता है किन्तु पिता को रेवल एक पहिले ही दिन का भाशौच होता है- ऐसा भीर विकल्प है ॥३॥ दशाह सूतिकाशौच मातुरप्येवमव्ययाः अर्वाद त्रिवीत्स्नानेन वांधवानो पितु सदा ।।६४ अष्टान्दादेवराण शुद्धि स्याद्वांधवस्य तु । द्वादशाब्दात्ततश्चार्वाक विराने खीपु सुव्रता. १८५ सपिंडता च पुरुपे सप्तमे विनिवर्तते । अतिक्रांते दशाहे तु निरामशुचिर्भवेत् ।।८६ तत सन्निहितो विप्रश्चार्वाक पूर्व तदेव वं । सवत्सरे व्यतीते तु स्नानमानेरण शुध्यति ।।८७ स्पृष्टा प्रेत विराण धर्मार्थ स्नानमुच्यते। दाहयानां च नेतृणां स्नानमात्रमयांधवे 15 अनुगम्य च ये स्नात्या घृत प्राश्य विशुध्यति । प्राचार्य मरणे चव निराव घोत्रिये मृत र पक्षिणी मातुलानां च सोदराणां च वा द्विजा । भूपानां महलीना प सद्यो नीरामवामिनाम् ।।१० पेपत्त द्वामान शमियागा द्विजोत्तमा ।
। लिङ्ग पुराण नाभिषिक्तस्य चाशौच संत्रमादेपुवै रणे ॥६१ दश दिन तक सूतिका शौच माता ही को होता है । तीन वर्ष के बाद वान्धवो को स्नान से ही शुद्धि हो जाती है और पिता को सदा तीन रानि का माशोच होता है ।।८४ हे सुव्रतो। स्त्रियो के मरने पर वान्धको को आठ वर्ष तक ए. रात्रि मे शृद्धि हो जाती है और पाठ वर्ष से बाद मे बारह वर्ष के बाद तीन रात्रि का प्राशीच होता है MEI सात पुरुप अर्थात पीढी तक एक ही गोत्र मे सपिण्डता रहा करती है फिर सात पुरुष तक कोई लगान न होने पर सपिरडता समाप्त हो जाया करती है । दश दिन प्रति क्रान्त हो जाने पर तीन रात्रि का ही भाशीच हुमा करता है ॥८६॥ ब्राह्मण सन्मिहित्य हो तो तीन ऋतु, के बाद मे वही पाशीच पूर्व की भांति होता है । एक वप पूरा • तम हो जाने पर यदि प्राशीच का ज्ञान हो तो कवल स्नान कर लेने से शुद्ध हुमा करती है ।।७॥ प्रेत का स्पर्श करने से तीन रात्रि के बाद शुद्धि होती है और धर्मार्थ स्नान ही शुद्धि के लिये कहा जाता है । वान्धव न होने पर दाह करने काले नेतामो की स्नान मात्र से शुद्धि होती है। H८॥ प्रेत के साप्य श्मशान यात्रा मे जाकर धृत के प्राशन करने और स्नान करने से शुद्धि होती है। प्राचार्य और धोत्रिम क मरन पर तीन रानि मे शुद्धि होती है ।।८६॥ माता के माइयो क मरने पर यक्षिणी मर्याद निराध का माशीच होना है अथवा सोदर उपकारियो के मृत होने पर भी तीन रात्रि का प्राशौच होता है। राजामो और सामन्ता था जो देशान्तर वासी हो तुरन्त स्नान से प्राशौच चला जाता है ॥६॥ हे द्विजोतमो केवल क्षत्रियो को घारह दिन का भाशीष होता है । । अभिषिक्त भी हो और रण मे राप्रमाद होने पर माशीच नहीं होता है ॥११॥ वश्य पचदशाहेन शूद्रो मासेन शुध्यति । इत सक्षेपत. प्रोक्ता द्रवपशुद्धिरनुत्तमा ॥२ प्रशौच चानुव्येण यतीना नव विद्यते। ताप्रभृति नारीणां मासि मास्यातंय द्विजा ॥६३ सदाचार शौच निरूपण [१ कृते सकृयुगवशाज्जायते वै सहैव तु । प्रयांति च महाभागा भार्याभिः कुरवो यथा ॥६४ चर्णाश्रमव्यवस्था व नेताप्रभृति सुव्रताः । भारते दक्षिणे वप व्यवस्था नेतरेष्वथ ॥१५ महावीते सुवीते च जंबूद्वोपे तयाष्टसु । शाकद्वोपादिपु प्रोक्तो धर्मो वै भारते यया ।।६६ रसालासा कृते वृत्तित्रेतायां गृहवृक्षजा । सैवर्तवकृताहोपाद्रागपादिभिर्नृणाम् ॥६७ मैथुनात्कामतो विप्रास्तथैव परुषादिभिः । यवाद्याः संप्रजायते ग्राम्यारण्याश्चतुर्दश ।।६८ वैश्य वर्ण की शुद्धि पन्द्रह दिन मे होती है और शूद्र एक मास में शुद्ध होता है । इस प्रकार से यह द्रव्य शुद्धि सक्षेप से बतादी गई है ॥६२॥ यतियो को यह पाशीच अनुपूर्वी से कभी होता ही नही है । अब स्त्रियों में रजो धर्म की प्रवृत्ति का क्रम बताते हैं-ता से लेकर यह रजो दर्शन प्रत्येक मास मे स्त्रियो को होता है ॥६३॥ कृत युग मे एक वार ही होता था । अब युग के कारण स्त्रियों के साथ ही होता है जैसे महाभाग कुरु वर्षीय भार्या के साथ ही जाते हैं ॥६४ा है सुप्रतो! दक्षिण भारतवर्ष में यह वणों पोर पाश्रमे पी अवस्था प्रेता से लेकर ही है । दूसरे जो किम्युरुषादि वर्ष हैं उनमे यह व्यवस्था नहीं है ।। महातीत मौर सुबीत में भी नही है । जम्बू दीर मे तथा पाठ शाक- दीपादि मे भारत मे जैसा धर्म है वैसा हो रहा गया है ॥६६॥ वृत युग मे रस के उल्लास वाली वृत्ति घो। त्रेता मे गृह और वृक्ष होने वाली यो । वह ही मनुष्यो के राग-द्वेप मादि से प्रात्तव कृत दोष से हो गई है ॥७॥ हे विप्रगण । परुष प्रादि के साथ काम वासना से मैथुन होने से यव प्रादि ग्राम्य एव प्रारम्प चौदह उत्पन्न होते हैं ॥१८॥ ओपध्पश्व रजोदोषाः स्त्री रागादिभिर्नृणाम् । मसाला'विष्यस्ताः पुनरुत्पादितास्तथा IEE तस्मात्सर्यप्रपरलेन न संभाप्या रजस्वला। उत्पन्न ६२] [ लिङ्ग पुराण प्रथमेऽहनि चांडाली यया बज्या तथांगना ॥१०० द्वितीयेऽहनि विप्रा हि यथा वै ब्रह्मघातिनी। तृतीयेऽह्नि तदर्धन चतुर्थेऽहनि सुव्रता ॥१०१ स्मात्याधमासात्संगुद्धा ततः शुद्धिर्भविष्यति । प्राशेडशात्ततः कोण मूत्रवच्छौचमिप्यते ॥१०२ पंपरा तथास्पृश्या रजसा वतंते यदि । मा विद्या दिवसाध्य रजसा पूर्ववत्तथा ॥१०३ स्ताने शोचं तथा गान रोदनं हसनं तथा। यानमभ्यग्नं नारी चूतं चैवानुलेपनम् ।।१८४ दिवास्वप्नं विशेपेण तथा व दतधावनम् । मैथुनं मानसं वापि वाचिक देवतार्चनम् ॥.०५ वर्जयेत्सर्वयत्नेन नमस्कार रजस्वला । रजस्वलागना स्पर्शसभाप च रजस्वला ॥१०६ पौषधियो और मनुष्यो के रागादि मे स्त्रियो को रजोदोप होते हैं। जो कि अकाल में कृष्ट विध्वस्त भौर पुन: उत्पादित हुए हैं ॥१६॥ इस लिये पूर्णतया प्रयत्न के साथ रजस्वला जो स्त्रियां हों उनसे सम्भाषण नहीं करना चाहिए। जिस दिन रजो दर्शन होता है उस प्रथम दिन में तो यह एक चाण्डाली के ही समान वजित होने के योग्य होती है ॥१००। दूसरे दिन मे ब्रह्मघातिनी के सुल्य उसे वजित कर देना चाहिए । तीसरे दिन मे उसमे प्राधी अशुद्धि स्त्रो मे विद्यमान रहा करती है । चतुर्थ दिन मे स्नान करके भी स्त्री को प्राधे मास पर्यन्त रज की अशुद्धि रहा करती है । इसके अनन्तर उसे शुद्धि होनी है । पांचवें दिन से लेकर सोलहवें दिन तक स्त्रियो को रजोदोप रहा करता है। उसका शौच मूत्र की भांति अभीष्ट होता है ।१०१।१०२॥ यदि स्त्री रज से युक्त है तो पांच रात्रि पर्यन्त स्पर्श करने के अयोग्य होती है अर्थात् गमन करने के योग्य नहीं होती है । वह वीस दिन के ऊपर रज़ से पूर्ववत हुमा करती है ॥१०॥ रजस्वला स्त्री को स्नान-शौच-गान-रोदन-हास्य-यान-अभ्य- ज्जम-नारीय त-अनुलेपन-दिन मे शयन दन्तधावन-मैथुन-मानस अथवा सदाचार शौच निरूपण ] [६६ पाचिक भी मैथुन नहीं होना चाहिए। देवार्चन और नमस्कार ये सब काम रजस्वला स्त्री को पूर्णतया तथा विशेष रूप से त्याग ही देने चाहिए । रजस्वला स्त्री के रन के स्पर्श से तथा उसके साथ सम्भापरण से भी रजस्वला के दोष आ जाते हैं ॥१०४॥१०॥१०६।। संत्यागं चैव वस्त्राणां वर्जयेत्सर्व यत्नतः । स्नात्वान्यपुरपं नारी न स्पृशेत्तु रजस्वला ॥१०७ ईक्षयेद्भास्करं देवं ब्रह्मक, ततः पिवेत् । केवलं पचाव्यं वा क्षीर वा चात्मशुद्धये ॥१०५ चतुर्यों स्त्री न गम्या तु गतोल्पायुः प्रसूयते । विद्याहीन व भ्रष्ट पतितं पारदारिकम् ।।१०६ दारिटार्णवमग्नं च तनयं सा प्रसूयते । कन्यायिनैव मतव्या पंचम्यां विधिवत्पुनः ।।११० रक्ताधिक्याभवेन्नारी शुक्राधिक्ये भवेत्पुमान् । समे नपुसके चंव पंचम्यां कन्यका भवेत् ॥१११ पठ्यां गम्या महाभागा सत्पत्रजननी भवेत् । पुत्रत्वं व्यंजयेत्तस्य जातपुत्रो महाद्युतिः ।।११२ रजस्वला स्त्री को राप्रयत्नों से वयो वा स्याग एक स्पर्श का त्याग फर देना चाहिए । यह जव शुद्धि स्नान करे तो उसे अन्य पुरुप का स्पर्श नही करना चाहिए ॥१०७॥ शुद्धिस्नान करने के अनन्तर स्त्री को सूर्य का दर्शन करना चाहिए और ब्रह्म कूर्चक पान करे । प्रारम शुद्धि के लिये केवल पञ्चगव्य अथवा क्षीर लेना चाहिए ॥१०८॥ चतुर्थ दिन में स्त्री का गमन नहीं करे इस दिन गमन से अल्पायु विद्याहीन-व्रतभ्रष्ट- पतित पारदिका-दरिद्रता के सागर मे भग्न पुष का प्रसव हुआ करता है । पुरुप को, जिसे सुमन्सति की इच्छा हो, पांचवे दिन विधि वर कन्या का गमन करना चाहिए ||१०६।११०॥ रक्त की अधिकता से स्त्री की उतात्ति होती है वीर्य की अधिकता होने से पुरुष की उत्पत्ति होती है। दोनो ही यदि समान मात्रा में रहकर गर्भाशय मे स्थित होते हैं तो नपुसक की उत्पत्ति हुआ करती है । पांचवे दिन गमन से कन्या होती [ लिङ्ग पुराण है । छटे दिन गमन करने से स्त्री सत्पुत्र के जनन करने वाली होती है। उसका वह पुत्र पुत्रत्व को प्रकट किया करता है मौर महान् धति वाला होता है ।।११११११२॥ पुमिति नरकस्याख्या दुख च नरकं विदुः। पुसवारणान्वितं पुत्र तथाभूतं प्रसूयते ।।११३ सप्तम्या चैव कन्यार्थी गच्छेत्सव प्रसूयते । अष्टम्यां सर्वसपन्न ननयं सप्रसूयते ॥११४ नवम्या दारिकायार्थी दशम्या पडितो भवेत् । एकादश्या तथा नारी जनयेत्सव पूर्ववत् ।।११५ द्वादश्यां धर्मतत्त्वज्ञ श्रौतस्मार्तप्रवर्तकम् । त्रयोदश्या जहां नारी सर्वसंकरकारिणीम् ॥१.६ जनयत्यंगना यस्मन्न गच्छेत्सर्वयत्नतः । चतुर्दश्या यदा गच्छेत्सा पुत्रजननी भवेत् । ११७ पुम यह नरक का नाम है और नरक दु.ख पूर्ण होता है । उस नरक से जो त्राण करने वाला हो वही पुत्र उत्पन्न होता है ।।११३॥ सातवी रात्रि मे कन्या की इच्छा रखने वाले को गमन करना चाहिए । आठवी रात्रि मे सर्व गुण सम्पन्न पुत्र का प्रसव होता है । नवम रानि मे दारिका-दशमी मे पण्डित-ग्यारहवी मे पूर्व को भौति नारी का जन्म होता है ॥११४॥११५॥ बारहवी रात्रि मे गमन से धर्म के तत्वो का झाता श्रोत-स्मार्त धर्म को प्रवृत्त करने वाला पुत्र होता है । त्रयोदशी रात्रि मे अत्यन्त जड और सब को सकट बना देने वाली नारी उत्पन्न होती है इसलिये इस रात्रि मे पूर्ण प्रयत्न से गमन नही करना चाहिए। चतुर्दशी रात्रि मे पुत्र का जनन होता है ।।११६॥११॥ पंचदश्या च धमिष्ठा पोडश्या ज्ञानपारगम् । स्त्रीणा व मैथुने काले वामपार्श्व प्रभंजन. ॥११८ चरेद्यदि भवेन्नारी पुमासं दक्षिणे लभेत् । स्त्रीणा मैथुनकाले तु पापग्रहविवजिते ।।११६ उक्तकाले शुचिर्भूत्वा शुद्धा गच्छेच्छुचिस्मिताम् ।
पतियो के दोषो०]
[ ६५
इत्येवं सप्रसङ्गन यतीना धर्मसग्रहे ॥१२०
सर्वेपामेव भूतानां सदाचारः प्रकीर्तित ।
य: पठेच्छृणुयाद्वापि सदाचार शुचिर्नर ॥१२१
श्रावयेद्वा यथान्याय ब्राह्मणान् दग्धकिल्पिान् ।
ब्रह्मलोक मनुप्राप्य ग्रह्मणा सह मोदते ॥१२
पन्द्रहवी राषि मे धर्मिष्ठा कन्या और सोलहवी रात्रि मे धर्म ज्ञान
या पारगामी पुत्र प्रसूत होता है । मैथुन के समय मे स्त्रियो के वाम
पावं मे प्रभज्जन चरण करता है तो नारी और दक्षिण मे चरण करने
से
पुरुप का लाभ होता है। मैथुन का बाल ऐमा होना चाहिए जिसमे
कोई भी पाप ग्रह न हो ॥११॥११॥ ऐसे उत्तम समय मे स्वय शुचि
होकर शुद्ध एव शुचिस्मित वाली नारी का गमन करना चाहिए । इस
प्रकार से यतियो के धर्म सनह के प्रसङ्ग से समस्त प्राणियो का सदाचार
बता दिया गया है । जो इस सदाचार का पटन या श्रवण करता है वह
नर शुचि होता है और जो इसको यथा न्याय ब्राह्मणो को श्रवण कराता
है जो कि दग्घ किल्विष वाले हैं वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होकर ब्रह्मा के
साथ प्रसन्नता मा पावन्ह प्रात विया परता है ॥१२०॥१२१।१२२॥
॥६२-यतियों के दोपों का प्रायश्चित्त ।।
प्रत अध्वं प्रवक्ष्यामि यतीनामिह निश्चितम् ।
प्रायश्चित्त शिवप्रोक्त यतीनां पापशोधनम् ॥१
पाप हि विविध ज्ञेय वाड्मन.कायसांभवम् ।
सतन हि दिवा रात्री येनेद वेष्टयते जगत् ।।२
तपणा विनाप्येष तिष्ठतीति परा श्रुति ।
क्षणमेव प्रयोज्यं तु मायुप्य तु विधारणम् ।।३
भवेद्योगोऽप्रमतस्य योग हि परमं बलम् ।
न हि योगात्पर विविनराणा दृश्यते गुमम् ॥४
तस्माद्योग प्रससति धर्मयुत्ता मनीषिणः ।
प्रविध विद्यया जिस्वा प्राप्यश्वर्यमनुतमम् ॥५
[ लिङ्ग पुराण दृष्ट्वापरावर धीराः परं गच्छति तत्पदम् । व्रतानि यानि भिक्षूणां तथैवोपव्रतानि च ॥६ एकंकातिक्रमे तेपण प्रायश्चित्त विधीयते । उपेत्य तु स्त्रियं कामाप्रायश्चित्त विनिदिशेत् ।।७ इस अध्याय मे यतियो के दोषो के दूर करने के लिये शिवोक्त प्रायश्चित्त की विधि भली भांति निरूपित की गई है । सूतजी ने कहा- इससे आगे मैं यतियो का पापो का शोधन करने वाला निश्चित प्राय- दिचत बतलाता हूँ ॥१॥ वाणी-मन और शरीर से होने के कारण पाप तीन प्रकार का होता है । यह तीनो तरह का पाप दिन-रात मे निरन्तर इस जगत् को वेष्टित किया करता है ॥२॥ यह यति कर्म के विना भी स्थित रहता है-यह औप निप ही श्रुति है । अब एक क्षण मात्र समय का योग द्वारा प्रयोग करना चाहिए क्योंकि प्रायुष्य अत्यन्त चल होती है ॥३॥ योग प्रमाद से रहित को होता है। योग बहुत बड़ा बल हुआ करता है । योग से बढकर मनुष्यो के लिये अन्य शुभ कर्म कुछ भी नहीं होता है ।।४।। इस कारण से धर्म से युक्त मनीपी गण योग की प्रशसा किया करते हैं । विद्या के द्वारा विद्या पर विजय प्राप्त करके और सर्व श्रेप्रतम ऐश्वर्य की प्राप्ति करके तथा परावर को भली-भांति देखकर धीर पुरष उस परम पद को प्राप्त किया करते है । यति एव भिक्षुनो के लिये जिम प्रकार से व्रत होते हैं उसी प्रकार से ही उप व्रत भी हुमा वरते हैं ॥५॥६॥ एक भी व्रतोपवत का प्रतिक्रमण करने पर उनके प्रायश्चित्त का विधान होता है। स्वेच्छा से स्त्री का उपगमन करके प्रायश्चित्त का विशेष निर्देश करना चाहिए ॥७॥ प्रारण यामसमायुक्त चरेत्सांतपत्त व्रतम् । ततश्चरति निर्देशात्कृच्छ चांत समाहितः। पुनराश्रममागत्य चरेभिक्षुरत द्रित । न धर्मयुक्तमत्त हिनस्त्रीति मनोपिण तथापि न च क्तव्य प्रसङ्गो ह्यप दारुण । अहोरात्रोपवासश्न प्राणायामशत तथा ॥१० यतियों के दोषों ] [६७ असद्वादो न कर्तव्यो यतिना धर्मलिप्सुना। परमापद्गतेनापि न कार्य स्तेयमप्युत ॥११ स्तेयादभ्यधिकः कश्चिन्नास्त्य धर्म इति श्रु तिः । हिंसा ह्यपा परा सृष्टा स्तन्यं वै कथितं तथा ॥१२ यदेतद्रविणं नाम प्राणा ह्यते बहिश्वराः । स तस्य हरते प्राणान्यो यस्य हरते धनम् ॥१३ एवं कृत्वा सुदुष्टात्मा भिन्नवृत्तो व्रताच्च्युतः। भूयो निर्वेदमापन्नश्चरेच्चांद्र यणं व्रतम् ॥१४ प्राणायाम से समायुक्त सान्तपन व्रत करे । इसके अनन्तर अन्त में समाहित होकर निर्देश से कृच्छ सान्तपन करना चाहिए ॥८॥ फिर प्ररने आश्रम मे पाकर भिक्षु को प्रतन्द्रित होकर चरण करना चाहिए । मनीषी लोग कहते हैं कि धर्मयुक्त अमृत हिंसा नहीं किया करता है ॥६॥ तो भी यह दारण अन्त में प्रसङ्ग नही करना चाहिए। यदि किसी समय हो जावे तो उसका प्रायश्चित्त कहते हैं एक अहोरात्र का उप- वास तथा सो वार प्राणायाम करे ॥१०॥ धर्म के इच्छुक यति को प्रसद्वाद कभी नहीं करना चाहिए । परमाधिक आपत्ति मे प्रस्त हो जाने पर भी स्तेय ( चोरी । कर्म नहीं करे ॥११॥ स्तेय से अधिक अधर्म या बुरा काम कोई नही होता है ऐसा श्रुति प्रतिपादन वरती है । यह स्तेय जिसे कहा गया है यह भी एक दूसरे प्रकार की हिंसा ही गृजन की गई है ।।१२।। जो यह धन होता है वह मानव के वाहिर चरण करने वाले प्राण ही होते हैं अर्थात् प्राणों के ही तुल्य हैं । जो उसके धन का हरण किया परता है वह उसके प्रागो का ही एक प्रकार से हरण करने वाला होता है ।।१३। इस प्रकार का कर्म करके वह दुष्ट मात्मा वाला पुरुष चरित्र से भिन्न भौर प्रत से च्युत हो जाया करता है। फिर वैराग्य को प्राप्त होकर उसे शुद्धि के लिये चान्द्रायरा बता समाचरण करना चाहिए॥१४॥ विधिना शास्त्रप्टेन संवत्परमिति थ तिः। ततः संवत्मरस्याने भूयः प्रक्षीणकल्मपः। - ६.] [ लिङ्ग पुराण पुननिर्वेदमापन्नश्चरेद्भिक्षुरतंद्रितः ॥१५ अहिंसा सर्वभूतानां कर्मणा मनसा गिरा। प्रकामादपि हिंसेत यदि भिक्षुः पशून् कृमीन् ॥१६ कृच्छ्रातिकृच्छकुर्वीत चांद्रायणमथापि वा। स्कदेदिद्रियदौर्बल्यात स्त्रियं दृष्ट्वा यतियदि ॥१७ तेन धारयितव्या वै प्राणायामास्तु पोडश । दिवा स्कनस्य विप्रस्य प्रायश्चित्त विधीयते ॥१८ विरात्रमुपवासाश्च प्राणायामशतं तथा। रात्रो स्कन्नः शुचिः स्नात्वा द्वादशैव तु धारणाः ॥१६ प्राणायामेन शुद्धात्मा विरजा जायते द्विजाः। एकानं मधुमांस वा अशृतान्नं तथैव च ॥२० अभोज्यानि यतीनां तु प्रत्यक्षलवणानि च । एककातिकमात्तेपां प्रायश्चित्त विधीयते ॥२१ शास्त्र मे जो विधि हष्ट हो उसी के अनुसार एक वर्ष तक चान्द्रा- यण व्रत करे- ऐसी वेद की आज्ञा है । इसके पश्चात् एक सम्वत्सर के मन्त मे प्रक्षीण पाप वाला होकर फिर निर्वेद को प्राप्त होता हुमा भिक्षु मतन्द्रित होकर चरण करे ॥१५॥ समस्त प्राणियों को कम मन और वाणी से हिंसा नहीं करनी चाहिए। विना इच्छा के भी अर्थात् अन- जान मे भी यदि भिक्षु पशु और कृमियो की हिंसा ' कर देवे तो उसे उस पाप की निवृत्ति के लिये कृच्छाति कृच्छ व्रत अथवा चान्द्रायण व्रत करना चाहिए। यदि यति अपनी इन्द्रियो के सयम मे दुर्बलता होने के कारण स्त्री को देखकर स्कन्दन करे तो उसे सोलह प्राणायाम धारण करने चाहिए। अब दिन मे स्कन्त विप्र का प्रायश्चित्त बताया जाता है ॥१६॥१७॥१॥ ऐसे दिवा स्कन्त विप्र को तीन रात्रि तक उपवास मोर सौ प्राणायाम करने चाहिए । राग्नि में स्कन्त होना स्नान करके बारह प्राणायामो से ही शुद्धि हो जाया करती है ॥१६॥ह द्विजगण ! प्राणा- याम में बड़ा गुण है । इस प्राणायाम से विप्र शुद्ध मारमा वाला होकर विरजा हो जाता है। एक ही स्वामी का मन्त-मधु-मांस और मसूत वाराणसी माहात्म्य. ] [६६ अर्थात् अपक अन्त तथा प्रत्यक्ष लवण ये सब यति को प्रभोज्य होते है । इनमे एक-एक के अतिक्रम करने से प्रायश्चित्त का विधान बताया जाता है ॥२०॥२१॥ प्रा नापत्येन कृच्छ्रण ततः पापात्प्रमुच्यते । 6 तिक्रमाश्च ये कचिद्वाङ्मनःकायसंभवाः ।। २ सद्भिः सह विनिश्चित्य यद् युस्तत्समाचरेत् ।।२३ चरेद्धि शुद्धः समलोष्ठकांचनः समस्तभूतेषु च सत्समाहितः । स्थानं ध्र वं शाश्वतमव्यय तु परं हि गत्वा न पुनहि जायते।२४ उक्त अतिक्रमो के होने पर प्राजापत्य कृच्छ व्रत करना चाहिए। इसके करने से वह यदि पाप से मुक्त हो जाता है । ये व्यतिक्रम जो कोई भी हों मन-धारणी भौर कर्म के द्वारा उत्पन्न होने वाले समझे जाते हैं ॥२२॥ सत्पुरुषों के साथ इनके प्रायश्चित्तो के विषय में विशेष निश्चय करके जो भी कुछ वे कहे उसे ही करना चाहिए ॥२३॥ मिट्टी का ढेला पौर सुवर्ण इन दोनों को समान ही समझ कर शुद्ध स्वरूप में आस्थित होता हुआ प्राचरण करें और समस्त प्राणियों के विषय मे सत्समाहित रहना चाहिए । इस प्रकार के समाचरण करने वाला यति परम शाश्वत- ध्रुव और अव्यय पर स्थान को जाकर फिर यहाँ ससार मे जन्म ग्रहण नही किया करता है ।।२।। ॥ ६३-वाराणसी माहात्म्य और विश्वेश्वरपूजा विधि ॥ एवं वाराणसी पुण्या यदि सूत महामते। वक्तुमर्हसि चास्माकं तत्प्रभाव हि सांप्रतम् ॥१ क्षेत्रस्यास्य च माहात्म्य मविमुक्तिस्य शोभनम् । विस्तरेण यथान्यायं श्रातु कौतूहल हि नः ॥२ वक्ष्ये संक्षेपतः सम्यक् वाराणस्याः सुशोभनम् । मविमुक्तस्य माहात्म्यं यथाह भगवान् भवः ॥३ विस्तरेण मया वक्तुब्रह्मणा च महात्मना । शक्यते नैव विप्रेद्रा वर्षकोटि शतैरपि ॥४ ७० ] [ लिङ्ग पुराण देवः पुग कृतोद्वाह. शंकरो नीललोहितः । हिमच्छिन्वरादेव्या हैमवत्या गणेश्वरैः ॥५ वाराणसीमनुप्राप्य दर्शयामास शकरः । अविमुक्तेश्वर लिगं वासं तत्र चकार सः॥६ वाराणसोकुरुक्षेत्रश्रीपर्वमहालये। तु'गेश्वरे च केदारे तत्स्थाने यो यति वेत् ।७ योगे पाशुपते सम्पक दिनमेक यतिर्भवेत् । तस्मात्सर्वं परित्यज्य चरेत्पाशुपतं व्रतम् ।। इस अध्याय मे वाराणसी की अद्भुत महिमा और स्थान के सहित पूजा प्रादि की विधि निरूपित की गई है-ऋपियो ने कहा-हे महान मति वाले सूतजी, यदि वाराणसी पुरी यदि ऐसी परम पुण्य है तो अव प्राप हम लोगो को उसका पूर्ण प्रभाव बताने की कृपा करें। इस वारा- पसी के क्षेत्र का माहात्म्य जो इस अविमुक्त क्षेत्र का प्रत्यन्त शोभन है उसे यया विधि कृपया विस्तार के साथ वर्णन करियेगा-हमको मन मे इसके श्रवण करने का बहुत अधिक कौतूहल हो रहा है ॥१॥२॥ सूतजी ने कहा- अब मैं इस वाराणमी के अविमुक्त क्षेत्र का परम सुशोभन माहात्म्य सम्यक् रूप से सक्षेप मे कहता हूँ जैसा कि भगवान् भव ने कहा है ॥३॥ इसको विस्तार के साथ तो मैं और महात्मा ब्रह्मा भी हे विप्रवृन्द ! सैकडो करोड वर्षों में भी नहीं कह सकते हैं ॥४॥ पहिले देव नील लोहित शकर ने विवाह करके हिमवान् के शिखर से देवी हैमवती और गणेश्वरो के सहित धाराणसी पुरी मे पहुंच कर उसे देखा था। वहाँ पर उसने अविमुक्तेश्वर लिङ्ग का वास किया था अर्थात् विश्वेश्वर विश्वनाथ इस नाम से प्रसिद्ध लिङ्ग स्वरूप वहाँ स्थित हुए थे ॥५॥६॥ वाराणसी कुरुक्षेत्र-श्री पर्वत-महालय-तुङ्गेश्वर-केदार ये उसके स्थान हैं। इनमे जो यति होता है और एक दिन पर्यन्त पाशुपत योग मे भली-भांति यति रहता है। इसका महान् पुण्य है । इसलिये अन्य समस्त वर्म पलाप वा त्याग पर पाशुपत व्रत का हो समाचरण करना चाहिए Ill वाराणसी माहात्म्य [७१ देवोद्याने वसेत्तन शर्वोद्यानमनुत्तमम् । मनसा निर्ममे रुद्रो विमानं च सुशोभनम् ।। दर्शयामास च तदा देवोद्यानमनुत्तमम् । गवत्याः स्वयं देवः सनंदी परमेश्वर. ॥१० क्षेत्रस्यास्य च माहात्म्यमविमुक्तस्य शंकरः । उक्तवान्परमेशान: पार्वत्याः प्रीतये भवः ॥११ प्रफुल्लनानाविधगुल्म शोभितं लताप्रताना दमनोहरं वहिः । विरूढपुष्पैः परितः प्रियंगुभिः सुपुष्पित्तः ककितैश्च केतका १२ तमालगुल्मैनिक्ति सुगंधिभिनिकामपुष्पर्वकुलश्च सर्वनः । अशोकपुन्नागशतैः सुपुष्पितद्विरेफमानाकुल पुष्पसचयः ।। ३ कचित्प्रफुल्लाम्बुजरेणुभूपितविहंगमैश्चानुकल प्रणादिभिः । विनादितं सारसचक्रवाकः प्रमत्तदात्यूहवरैश्च सर्वत. ॥१४ वहां पर देवोद्यान मे अतिर्थ शर्वोद्यान है वहाँ निवास करे। भगवान् रुद्र ने मन से परम शोभन विमान का निर्माण किया था ॥६॥ उस समय में नन्दी के सहित परमेश्वर ने स्वय हैमवती को त्तम देवोद्यान दिखाया था। ॥१०॥ परमेशान भगवान् शङ्कर ने पार्वती को प्रोति के लिये इस अविमुक्त क्षेत्र के माहात्म्य को कहा था ।।११।। वह देवोद्यान खिले हुए शनेक तरह के गुल्मो से शोभा युक्त था । इसके बाहिर लताप्रो के प्रतानो की बड़ी ही सुन्दरता विद्यमान थी। चारो पोर विरूढ पुप्पो वाले प्रियगु के वृक्ष थे और सुन्दर पुप्पो से समन्वित कांटे वाले केतकी के वृक्ष लगे हुए थे ।।१२।। यह देवोद्यान सुगन्ध से युक्त तमास की झाडियो से घिरा हुआ था। बहुत से पुष्पो से सयुत बकुल के वृक्ष इसके सब ओर खडे हुए थे । सैकडो अशोक और पुन्ताग के वृक्ष थे जो फूलो से खिले हुए थे और उन पर भ्रमरो की पक्तियां भंडरा रही थी ॥१३॥ इस देयोद्यान में किसी स्थान पर कमल खिले हुए थे जिनके पराग से विभूपित पक्षीगण अपनी परम सुन्दर ध्वनि कर रहे थे। यह देवोद्यान सब पोर से सारस-चक वाक और प्रमत्त दात्यूह अर्थात् केनत सज्ञा वाले पक्षियो के शब्दो से मुखरित हो रहा था ||१४॥ वह परमो- - ७२ ] [ लिङ्ग पुराण कचिच्च केकारुतनादितं शुभं कचिच्च कारंडवनादनादितम् । क्वचिच्चमत्तालिकुलाकुलीकृत मदाकुलाभिभ्रमगंगनादिभिः।१५ निषेवितं चारुमुगंधिपुष्पकः कचित्सुपुष्पैः सहकारवृक्षः। लतोपगूढस्तिलकैश्च गूढ प्रगीतविद्याधरसिद्धारणम् ॥१६ प्रवृत्तनृत्तानुगनाप्तरोगण प्रहृष्टनानाविधपक्षिसेवितम् । प्रनृत्तहारीतकुलोपनादित मृगेद्रनादाकुनमत्तमानमः ।।१७ कचित्कचिद्गंधवद वकंमृगविलूनदर्माकुरपुष्प सवयम् । प्रफुल्लनानाविधचारपकजः सरस्तडागरुपशोभित कचित् ॥१८ विटपनिचयलीनं नीलकंठाभिरामंमदमुदितविहंगप्राप्तनादाभिरामम् कुसुमिततरुशाखालोनमतद्विरेफनवकिसलयशोभाशोभितप्रांशुशाखम् कचिच्च दतक्षतचारुवीरुधं कचिल्लतालिगितचारुवृक्षकम् । कनिद्विलासालसगामिनोभिनिपेवितं किंपुरुपांगनाभिः ।।२० पारावतध्वनिविकूजितचारु गरभ्रंकर्षः सितमनोहर चारुरूपः । आकीर्णपुष्पनिकरप्रविभक्तहरुविभ्राजितं त्रिदशदिव्यकुलरने का२१ इसमे कही पर मयूरों की वाणी गूंज रही थी तो किसी स्थान पर कारण्डवों की ध्वनि प्रयमाण हो रही थी। किसी स्थल पर मद से भाकुल भ्रमरों को मङ्गनामों के साथ प्रत्युन्मत्त भौंरो के द्वारा गुज्जाय- मान हो रहा था पौर पिरा हुमा था ॥१॥ यह देवोद्यान परम सुन्दर सुगन्ध से युक्त पुष्पों से सेवित या और किसी स्थान पर मुपुष्पों से सम. न्वित माम के वृक्षो से युक्त पा । ससानों से उपगूढ़ तिलक के वृक्षो से भरा-पूरा या जिसमे विद्याधर मिद्ध सपा पारणों का गायन हो रहा था ॥१६॥ इस देयोद्यान में मप्सरा गए अपना नृत्य करने मे प्रवृत्त हो रही थी। परम प्रसन पक्षियो से यह सेवित पा । नाचने वाले हारीत पक्षियो फे समूह पेशदापमान था तथा इसमें प्रमत्त मृगेनों के माद से एक मन को मान करने वाली प्रहाचोमा हो रही थी॥१७॥ रिसी स्थान पर भरपरत गाय से युक्त मृगों के समुदाय द्वारा पुमा के पार तपा पुणों रासषय बिसून होता हुप्रा दिखाई दे रहा था। कोई २ स्थान हिए माना प्रकार २ गुन्दर समों से समन्दिस पे और रोबर चारागसी माहात्म्य.] [ ७३ तथा तडागो से उप शोभित थे ॥१८॥ यह देवोद्यान विटयो के समुदाय से लीन पा । नीलकण्ठ पक्षियो के द्वारा यह अत्यन्त सुन्दर था। इसमे मह से परम प्रसन्न पक्षीगण विद्यमान थे। चारो ओर से सुन्दर ध्वनि के कारण यह अत्यन्त सुरम्य दिखाई दे रहा था। खिले हुए पुष्पो से युक्त वृक्षो की शाखाएँ थी जिन पर मस्त भौरे लोन हो रहे थे। यह उद्यान नूतन किसलयो की शोभा से प्राशु शाखा चाला परम शोभित हो रहा था॥१६॥ किसी स्थल पर दलो के क्षत वाली सुन्दर लताऐ हैं तो किसी स्थान पर लतामो के द्वारा वृक्षो का आलिङ्गन किया जा रहा है अर्थात् लताएं वृक्षो से लिपटी हुई हैं। किसी स्थान में इस उद्यान मे रति विलास के कारण मन्द गमन करने वाली किम्पुरुषो की प्रङ्गनाऐ इसका निपेवरा कर रही हैं ॥२०॥ पारावतो की ध्वनि से विजित सुन्दर चोटियो वाले सफेद एव सुन्दर मन के हरण करने वाले रूप से युक्त फैने हुए पुष्ण के समूह के समान प्रविभक्त हसो से समन्वित और देवा क अनेक दिच्य बुलो से युक्त होकर भ्राजमान यह उद्यान है ॥२१॥ "फुलोत्पलाबुजवितानसहस्रयुक्त तोयाशय समनुशोभितदेवमागम् । मार्गातराकलितपुप्पविचित्रपक्तिसबगुल्मपिटपविविधरुपेतम्।।२२ तुङ्गागर्नीलपुष्पस्तबकभरनत प्राशुशाखरशोकदोलाप्रातातलीनथ - तिसुखजनकै सितात मनोज । रात्री चद्रस्य भासा कुसुमिततिलकैरेकता मप्रयात छायासुप्तप्रबु- द्धस्थित हरिणकु लालुमदूर्वाकुरानम् ॥३ तन पिना सुशैलेन स्थापित त्वचलेश्वरम् । अलकत मया ब्रह्मपुरस्तान्मुनिभिः सह ।।२४ चडिकेश्वरक देवि चडिकेशा तवात्मजा। चडिकानिर्मित स्यानमविकातीर्थमुत्तमम् ॥२५ रुविनेश्वरक व धारपा कपिला शुभा । एतेपु देवि स्थानेषु तीर्थेपु विदिधेषु च ॥२६ पूजयेन्मा सदा भक्त्या मया साधं हि मोदते । श्रीशले सत्यजेद्देह ब्राह्मणो दग्पकिल्बिप ॥२७ ७४ ] { लिङ्ग पुराण मुच्यते नात्र संदेहो ह्यविमुक्तं यथा शुभम् । महास्नान च यः कुर्याद्धृतेन विधिनैव तु || स याति मम सायुज्यं स्थानेष्वेतेषु सुव्रते। स्नान पलशत ज्ञेयमभ्यगं पचविंशति ॥२६ यह उद्यान खिले हुए उत्पल तथा अम्बुजो के सहस्रो वितान से युक्त है और जलाशयो से भली-भांति शोभा युक्त देव मार्गों से समन्वित है। मार्गातर में लगी हुई पुष्पो की विचित्र पक्तियो से सम्बद्ध नाना भांति के गुल्म और विटपो से युक्त है ।।२२॥ ऊचे अग्र भाग वाले नील पुप्पो के स्तवको (गुच्छको) क भार से झुकी हुई ऊंची शाखाम्रो वाले तथा दोला प्रान्तान्त से लोन और कानो को सुख देने वाले एव अत्यन्त सुन्दर अशोक के वृक्षो के द्वारा इसका मध्य भाग भामिन हो रहा था। रात्रि मे चन्द्रमा की दीप्ति से कुसुमित तिलको से एक्ता को प्राप्त हुआ एव छाया मे सोये हुए प्रबुद्ध एव स्थित हिरणो के समुदाय से भालुप्त दूभ के अकुरों वाला था ।।२३।। ऐसे परम रमणीय उद्यान मे वहां पर सुशैल पिता ने अचलेश्वर को स्थापित किया था। और ब्रह्मादि ऋपियो के साथ मैंने उसे अलकृत किया था॥२४॥ हे देवि ! देव चण्डिकेश्वर है और तुम्हारी प्रात्मजा चण्डिकेशा है। चण्डिका के द्वारा निर्मित उत्तम स्थान अम्बिका तीर्थ है ॥२॥ और रुचिकेश्वर देव हैं। यह धारा कपिला एव परम शुभ है। हे देवि । इन विविध तीर्थ स्थानो में जो सदा भक्ति से मेरी पूजा करता है वह फिर मेरे साथ मोह प्राप्त किया करता है । श्री शैल मे जो देह का त्याग किया करता है वह ब्राह्मण दग्ध किल्विष अर्थात् पापो से मुक्त हो जाता है ॥२६॥२७॥ वह मुक्त हो हो जाता है- इस म तनिक भी सन्देह नहीं है । जिस तरह अविमुक्त मे शुभ होता है । जो विधि के साथ घृत से महास्नान करता है हे सुनते । इन स्थानो में वह मेरा साप्रज्य प्राप्त कर लेता है। सौ फ्ल का स्नान जानना चाहिए भौर पच्चीस पल का अभ्यङ्ग होता है ॥२८॥२९॥ पलाना हूँ मझे तु महाम्नानं प्रकीर्तितम् । स्नाप्य लिंग मदीय तु गव्येनैव घृतेन च ॥३० वाराणसी माहात्म्य० ] { ७ विसोव्य सर्वद्रव्यस्तु वारिभिरभिपिचति । समाज्यं शतयज्ञाना स्नानेन प्रयुत तथा ॥३१ पूजया सतसात्वमनत गीतवादिनाम् । महास्नाने प्रमक्त तु स्नानमष्टगुण स्मृतम् ॥३२ जलेन केवलेनैव गधतोयेत भक्तितः। अनुलेपनं तु तसर्व पंचविंशत्पलेन वै ॥३३ रामापुष्पं च विधिना बिल्वपत्र व पफजम् । प्रन्यान्यपि च पुष्पाणि विल्यपथ न सत्यजेत् ॥३४ चतुर्दोरगर्महादेवमष्टद्रोणरथापि वा। दशमोगम्तु नवेद्यमष्टदोरथापि वा ।।३५ दो सत्य पलो महास्नान रहा गया है। मेरे लिनपा स्नान मापन प्राटि गाय पेशा से ही करना चाहिए। 1200 स्नान पराने गे पभा समस्त दर रादि मे युक्त जल से जो पनि मिसन परता है यह सायुज्म पाता है। लिन पेशोधन से सौ यमी पापौर स्नान से एर लक्ष पशो का फन पास होता है। पूजा से सो सहप का तया मीन पादियो मो भगा फर होता है । महास्ना नान से भाट गुना पर पाता है ॥३॥ना पबल गल्प पुमका में भक्ति भाव से मुसहोर महारनानीर परादि या प्रपन योग पर से पहा गया मीरे जो frier महिन समरिजा-- faar हो गया हो पपा माय भी कोई पुरोपित पत्र परी पाहिए। नाभी भी रिजरेपूमर में स्थान गीना पाहिए या महादेश को पार होत पणा पाटो मिता : पानी मे पिन mt ne पाठ दोर पा रारा गे देश र समा पारिए परमोगमम पुसमरिदिने। निय विनय ना मादिगार मेरोगगगुरमतिमिरापरहामिमि । 111 [ लिङ्ग पुराण वादिविविधश्चान्यनिनादविविधरपि ॥३७ जागरं कारयेद्यस्तु प्रार्थयेन यथाक्रमम् । स भृत्य पुत्रदारश्च तथा संवधियान्धर्वः ॥३८ सार्धं प्रदक्षिण कृत्वा प्राथयेलिंगमुत्तमम् । द्रव्यहीन क्रियाहीनं श्रद्धाहीनं सुरेश्वर ॥३६ कृत वा न कृतं वापि क्षतुमर्हसि शकर । इत्युक्त्वा वै जपेद्र द्रं त्वरितं शातिमेव च ।।१० जपित्वैव महाबीज तथा पंचाक्षरम्य वै। स एव सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु यत्फलम् ॥४१ तत्फलं समवाप्नोति वाराणस्यां यथा मृतः। तथैव मम सायुज्यं लभते नात्र संशयः ॥४२ मत्प्रियार्थमिदं कार्य मद्भक्त विधिपूर्वकम् । ये न कुर्वति ते भक्ता न भवति न संशयः ।।४३ एक पाठक मे भी शत द्रोण को तुल्य पुण्य का विधान होता है। जो ब्राह्मण वित्त होन हो उसको इसका विचार नहीं करना चाहिए ॥३६)भेरी-मृदङ्ग-मुरज-तिमिठ-पटह श्रादि वादियो के द्वारा तथा अन्य अनेक निनादो के द्वारा वादन करके जागरण जो करता है और यथा क्रम प्रार्थना करता है । उसे भृत्य पुत्र और स्त्री के साथ तथा सम्वन्धी एव बान्धवो के सहित प्राधी प्रदक्षिणा करके उत्तम शिव लिङ्गको प्रार्थना करनी चाहिए-प्रार्थना का स्वरूप यह है-हे देव शङ्कर ! हे सुरो के स्वामिन् ! मैंने जो यह पापका अर्चन मन्त्रो से रहित और समस्त अत्यावश्यक द्रव्यो से हीन एव श्रद्धा से भी शून्य जो जैसा किया है और जो प्रावश्यक छूट गया है उसे पाप क्षमा कर देने के योग्य हैं ||३७॥३इस तरह क्षमा प्रार्थना करके रुद्र का जप करे पौर शीघ्र ही शान्ति जाप करे ॥३६॥४०॥ इस प्रकार से पञ्चाक्षर के महाबीज वा जाप करे। वह इस तरह से समस्त तीयों में और सम्पूर्ण यज्ञो में जो फल होता है उसे प्राप्त कर लेता है।४।। उसी फल को वाराणसी में जो मृत्यु को प्राप्त किया करता है वह प्राप्त करता है और कुछ भी अन्धकदेत्य को गाणपत्य० । [७७ उसी प्रकार से मेरा सापुज्य भी प्राप्त करता है-इसमें कुछ भी संशय नही है ॥४२॥ मेरे भक्तो को मेरी प्रीति के लिये विधि पूर्वक यह करना चाहिए ॥ जो इस तरह नहीं किया करते हैं वे मेरे भरा नहीं होते हैं- इसमे कुछ भी संशय नहीं है ॥४३॥ ॥६४-अन्धकदैत्य को गारपपत्य की पदवी ।। नधको नाम दैत्यद्रो मंदरे चारुकंदरे । दमितस्तु कथं लेभे गाणपत्यं महेश्वरात् ।.१ ववतुमर्हसि चास्माकं यथावृत्तं यथाशु तम् । अधकानुग्रहं चैव मंदरे शोषण तथा १२ चरलाभमशेष च प्रवदामि समासतः । हिरण्याक्षस्य तनयो हिरण्यनयनोपमः ॥३ पुरांधक इति स्यातस्तपमा लब्धविक्रमः। प्रसादाद्ब्रह्मरण. साक्षादवध्यत्वमवाप्य च ॥४ त्रैलोक्यमखिल भुक्त्वा जित्वा चंद्रपुरं पुरा । लीलय. चाप्रयत्नेन प्रासयामास वासवम् ॥५ चाधितास्ताडिताबद्धा. पातितास्तेन ते सुराः । विविशुमंदर भीता नारायणपुरोगमाः ।।६ एव सपीड्य वै देवानधकोपि महासुरः । यदृच्छया गिरि प्राप्तो मदर चारुकदरम् ॥७ इस अध्याय मे देवतापों के शपु मन्धक का निग्रह यरदान को प्राप्ति और गाणपत्य पा निरूपण किया जाता है । ऋषियों ने कहा-अन्धक नाम वाले दैत्य को मुन्दर कन्दरा पाले मन्दराचल पर किस प्रकार दभित लिया था और उसने मरेपर से गाणपत्य पद को मेरो प्रातिको सो १॥ आपले इस विषय में जो भी गुना है मोर लेगा भी हुआ है उसे माप पर्णन करने के योग्य होते हैं । सूतजी ने कहा-अन्धको भार जो मनुषह मोर गन्दर गे सोपण तथा वरदान साम-2. सम्पूर्ण मैं तुम को संक्षेप मे यवनाता है। हिरएमध-पुत्र हिरण्य नयन ७८ ] [ लिङ्ग पुराण की उपमा वाला था। वह पहिले अन्धक इस नाम से विख्यात था और तपस्या के द्वारा उसने पराक्रम की प्राप्ति की थी। ब्रह्मा के प्रसाद से वह साक्षात् अवध्वता को प्राप्त हो गया था ॥२॥३॥४॥ उसने समस्त लोक्य का उपभोग किया था और पहिले इन्द्र के पुर पर विजय प्राप्त करली थी । उमने यो ही लीला से वित्त ही किसी श्यल के इन्द्र को रस्त कर दिया था ॥५।। उसके द्वारा वाधा पहुंचाये गये-पीटे गये बांधे गये और गिराये गये समस्त देवगण नारायण को पुरोगामी बनाकर मन्दराचल के गुफानो मे अत्यन्त भयभीत होकर पविष्ट हो गये थे ।।६।। महान् असुर अन्धक देवगण को इस प्रकार से सपीडित परके पट्टच्छा से रम्यतम कन्दराम्रो वाले मन्दर पर्वत पर पहुंच गया था ॥७॥ ततस्ते समस्ता सुरेद्रा ससाध्याः सुरेश महेश पुरेत्याहुरेवम् । द्रुत चाल्पवीर्यप्रभिन्नागभिन्ना वय दैत्यराजस्य शस्त्र निकृत्ता ॥ इतीदमखिल श्रु त्वा देत्यागममनोपमम् । गणेश्वरंश्च भगवानंधकाभिमुख ययौ।। तनेद्रपद्मोद्भव विष्णुमुख्या. सुरेश्वरा विप्रवराश्च सर्वे । जयेति वाचा भगवतमूचु किरीटबद्धाजलय. समतात् ।।१० अथाशेषासुरांस्तस्य कोटिकोटिशस्तन. । भस्मीकृत्य महादेवो निविभेदाधक तदा ॥११ शूलेन शूलिना प्रोत दग्धकल्मपकंचुकम् । दृष्ट्वायके ननादेश प्रणम्य स पितामह. ॥१२ तन्नादश्रवणानेदुर्देवा देव प्रणम्य तम् । ननृतुमुनय सर्वे मुमुदुर्गरणपुगवा ॥१३ समृजु पुष्पवर्षाणि देवा शभोस्तदोपरि । त्रैलोक्यमखिल हान्ननंद च ननाद च ।।१४ उस समय म वे सम्पूर्ण सुरेन्द्र माध्य वर्ग के सहित देवो के स्वामी महेश्वर के सामने उपस्थित होकर इस प्रकार से कहने सगे--हे देव ! हम लोग अत्यल्प पराक्रम वाले हैं और इस दैत्यराज के स्त्रो से प्रभिन्न मङ्गो वाले एव निकृत्त शीघ्र ही हो गये हैं ।।८। इस प्रकार से उस दैत्य अन्धकदैत्य को गाणपत्य० } [t के प्रागमन का सम्पूर्ण समाचार श्रवण करके भगवान् शिव गणेश्वरो को साथ मे लेवर उस अन्धक दैत्य के सामने प्राप्त हुए थे ।।६। वहाँ पर इन्द्र-ब्रह्मा और विष्णु जिनमे प्रमुख थे ऐसे सब सुरेश्वर और विप्रवर जय-जयकार करके सभी ओर से किरीट पर्यन्त वशाज्जलि वाले होकर भगवान् शिव से बोले थे ।।१०। इसके अनन्तर भगवान् महादेव ने उस अन्धक दैत्य के जो सैकडो करोड असुर थे उनको भस्म करके अन्धक को निभिन्न कर दिया था ॥११॥ भगवान् शूली ने अपने शूल से उसका छेदन किया था जिसके कारण वह दग्य फ्ल्मप रूपी कज्जुक वाला हो गया था। ऐसा उस अन्धक को देखकर पितामह ब्रह्मा ने शिव यो प्रणाम करके नाद किया था ।।१२।। उसके नाद ( ध्वनि को सुनकर समस्त देवो ने भी महादेव को प्रणाम करके हर्ष की ध्वनि की थी । समस्त मुनिगण नृत्य करने लगे थे और श्रेष्ठ गण परम प्रसन्न हो गये थे ॥१३॥ उस समय मे देवगण भगवान् शम्भु के ऊपर पुष्पो की वृष्टि करने लगे थे। पूरा पैलाक्य हर्षातिरेक से मानन्द से भरा गया था और हर्ष यी ध्वनि करने लगा था ॥१५॥ दग्धोग्निना च शूलेन प्रोत. प्रेत इवाधकः । सात्त्विक भावमास्थाय चिंतयामास चेतसा ॥१५ जन्मासरेपि देवेन दग्यो यस्माच्छिवेन वै। पाराधितो मया शभुः गुरा साक्षान्महेश्वरः ॥१६ तस्मादेतन्मया लब्धमन्यथा नोपपद्यते । य. स्मरेन्मनसा रुद्र प्राणाते सकृदेव वा ॥१७ म याति शिवसायुज्य किं पुनवहश. स्मरन् । प्रह्मा न भगवान्विष्णु सर्व देवा. सवासवा. 115 सरण प्राप्य तिष्ठ ति तमेव शरण व्रजेत् । एव सचित्य तुष्टात्मा सोधकश्चाधकादनम् ।। १६ सगरण शियमीशानमस्तुवत्पुण्यगौरवात् । प्राषितस्तेन भगवान् परमातिहरो हरः ॥ हिरण्य नेप्रसनयं शूलाग्रस्य सुरेशर. ।
७८] लिङ्ग पुराण की उपमा वाला था। वह पहिले अन्धक इस नाम से विख्यात था और तपस्या के द्वारा उसने पराक्रम की प्राप्ति की थी। ब्रह्मा के प्रसाद से वह साक्षात् प्रवध्वता को प्राप्त हो गया था ||४| उसने समस्त त्रैलोक्य का उपभोग किया था और पहिले इन्द्र के पुर पर विजय प्राप्त करली थी । उसने यो हो लीला से वित्त ही किसी प्रयत्न के इन्द्र को उस्त कर दिया था ॥१॥ उसके द्वारा वाधा पहुंचाये गये-पीदे गये बांधे गये और गिराये गये समस्त देवगण नारायण को पुरोगामी बनाकर मन्दराचल के गुफामो मे अत्यन्त भयभीत होकर प्रविष्ट हो गये थे १६॥ महान असुर अन्धक देवगण को इस प्रकार से सपीडित करके पट्टच्छा से रम्यतम क दरानो वाले मन्दर पर्वत पर पहुंच गया था ।।७।। ततस्ते समस्ता सुरेंद्रा ससाध्या सुरेश महेश पुरेत्याहुरेवम् । दूत चाल्पवीर्यप्रभिनागभिन्ना वय दैत्यराजस्य शस्त्रनिकृत्ता 115 इतीदमखिल श्रु त्वा दैत्यागममनोपमम् । गरणेश्वरैश्च भगवानधकाभिमुस ययौर तवेद्रपद्मोद्भव विष्णुमुरया सुरेश्वरा विप्रवराश्च सर्वे । जयेति वाचा भगवतमचु किरीटबद्धाजलय समतात् ।।१० अथाशेपासुरांस्तस्य कोटिकोटिशतस्तन । भस्मीकृत्य महादेवो निविभेदायक तदा ॥११ शूलेन शूलिना प्रोत दग्धकल्मपकंचुकम् । दृष्ट्वाय ननादेश प्रणम्य स पितामह ॥१२ तन्नादश्रवणानेदुर्देवा देव प्रणम्य तम् । ननृतुमुनय सर्वे मुमुदुर्गरणपु गवा ॥१३ ससृजु पुष्पवर्षाणि देवा शभोस्नदोपरि। प्रलोक्यमविल हन्निनद च ननाद च ॥१४ उस समय में वे सम्पूर्ण सुरेन्द्र माध्य वर्ग के सहित देयों पे स्वामी महेश्वर से सामने उपस्थित होरर इस प्रकार से पहने रागे-हे देव ! हम सोग मत्पल परवमयारे हैं और इस दस्यराज में पानी से प्रभिन्न पली वाले एक पिरा सीघ्र ही हो गय 11 इस प्रकार से उस दैत्य अन्धकदैत्य को गाणपत्य० ] [E थे मागमन का सम्पूर्ण समाचार श्रवण परके भगवान शिव गणेश्वरी को साथ में लेपर उस अन्धक दैत्य के सामने प्रास हुए थे । वहाँ पर इन्द्र-ब्रह्मा और विष्णु जिनमे प्रमुस थे ऐसे राव सुरेश्वर पौर विप्रवर जय-जयकार पर सभी प्रोर से पिरीट पर्यन्त वझाजलि वाने होर भगवान शिव से बोले थे ॥१०॥ इसके अनन्तर भगदान महादेव ने उस अन्धर दैत्य के जो समडो परोट असुर थे उनको भस्म करवे मन्या पो निभित कर दिया था ॥१॥ भगवान् शूली ने अपने मूल से उगका वेदन किया था जिसके कारण यह दाय पल्मप रूपी इज्जुब वाला हो गपा था। ऐसा उम अन्धा यो देसकर पितामह ब्रह्मा ने शव को प्रणाम परसेनाद दिया था ।।१३।। उसने नाद (यनि) पो गुनगर समस्त देया ने भी महादेव को प्रणाम पर एपं को ध्वनि की पी । समस्त मुनिगण नत्य परो लगे थे मोर अंध गण परम प्रसन्न हो गये थे ॥१३॥ उस समय मे देवगण भगयार शम्भ से उपर पुप्पो को वृष्टि परा सगे थे। पूरा पन्नाक्य हातिरेप रो मानन्द से भरा गया था और र पीपनि करने लगा था ॥१४॥ ग्याग्निना च शूलेन प्रोत प्रेत इवाश्य । सात्यिक भावमास्थाय चितयामाम चेनसा ॥१५ जन्मातरेपि देवेन दग्धो यस्माधिरेन । पाराधितो मया शभु पुरा मासान्महेश्वर ।।१६ तस्माद मया लब्धमन्यथा नापपद्यते । म मरेग्मनसा प्रारणाते सदेव वा ॥१७ ग याति शिवसायुज्यहि पु-या स्मरम् । प्रहा। गभगवाया मय देया सयाममा । पार प्राप्य तिउनि समेव पररा प्रजेत् । एप नित्य सुधारमा गोमाश्यायसादनम् ।। गगग विमो नमस्तरामगोग्यार। प्राषितरतम भगवान् परमानिहरोहर | दिनमानस्य मुरेभर ।
७८] [ लिङ्ग पुराण को उपमा वाला था। वह पहिले अन्धक इस नाम से विख्यात था और तपस्या के द्वारा उसने पराक्रम की प्राप्ति की थी। ब्रह्मा के प्रसाद से वह साक्षात प्रवध्वता को प्राप्त हो गया था |३||४! उसने समस्त त्रैलोक्य का उपभोग किया था और पहिले इन्द्र के पुर पर विजय प्राप्त करली थी। उसने यो ही लीला से वित्त ही किसी प्रयल के इन्द्र को त्रस्त कर दिया था ॥५॥! उसके द्वारा वाधा पहुंचाये गये-पीटे गये वांधे गये और गिराये गये समस्त देवगण नारायण को पुरोगामी बनाकर मन्दराचल के गुफामो मे अत्यन्त भयभीत होकर प्रविष्ट हो गये थे ॥६॥ महान असुर अन्धक देवगण को इस प्रकार से संपीडित करके पट्टच्छा से रम्यतम कन्दराप्रो वाले मन्दर पर्वत पर पहुंच गया था ॥७॥ ततस्ते समस्ता. सुरेद्राः ससाध्याः सुरेश महेशं पुरेत्याहुरेवम् । द्रुतं चाल्पवीर्यप्रभिन्नागभिन्ना वय दैत्यराजस्य शस्रनिकृत्ताः ॥ इतीदमखिलं श्रुत्वा दैत्यागममनोपमम् । गणेश्वरश्च भगवानंधकाभिमुख ययौ। तवेद्रपद्मोद्भव विष्णुमुख्याः सुरेश्वरा विप्रवराश्च सर्वे। जयेति वाचा भगवंतमूचुः किरीटबद्धाजलयः समंतात् ।।१० अथाशेपासुरांस्तस्य कोटिकोटिशतस्तनः । भस्मीकृत्य महादेवो निविभेदाधक तदा ॥११ शूलेन शूलिना प्रोत दग्धकल्मपकंचुकम् । दृष्ट्वीयकं ननादेश प्रणम्य स पितामहः ।।१२ तन्नादश्रवणानेदुर्देवा देव प्रणम्य तम् । ननृतुमुनय. सर्वे मुमुदुर्गणपुगवाः ॥१३ ससृजु पुष्पवर्षाणि देवा. शभोस्तदोपरि। प्रलोक्यमखिलं हपनिनंद च ननाद च ॥१४ उस समय मे वे सम्पूर्ण सुरेन्द्र माध्य वर्ग के सहित देवों के स्वामी महेश्वर के सामने उपस्थित होकर इस प्रकार से कहने लगे-हे देव ! हम लोग पहल परधन वाले हैं और इस दैत्यराज के पात्रो से प्रभिन्न भनी वाले एप निकृत्त शीघ्र ही हो गये हैं 111 इस प्रकार से उस दैत्य अन्धकदैत्य को गाणपत्य.] [७६ के प्रागमन का सम्पूर्ण समाचार श्रवण करके भगवान शिव गणेश्वरा को साथ म लेचर उस अधक दैत्य के सामने प्राप्त हुए थे ॥६॥ वहां पर इद्र-ब्रह्मा और विष्णु जिनमे प्रमुख थे ऐसे सव सुरेश्वर और विप्रवर जय जयकार करके सभी और से किरीट पय त बद्धाज्जलि वाले होकर भगवान् शिव से वोले थे ॥१०॥ इसके अन तर भगवान् महादेव ने उस मन्धक दैत्य के जो संकडा रोड असुर थे उनको भस्म करके अधक को निभिन्न कर दिया था ॥११॥ भगवान् शूली ने अपने शून से उसका छेदन किया था जिसके कारण वह दग्ध पल्मप रूपी कज्जुप वाना हो गया था । ऐसा उस अन्धक को देखकर पितामह ब्रह्मा ने शिव को प्रणाम करके नाद किया था ॥१॥ उसके नाद ( ध्वनि ) का सुनकर समस्त देवा ने भी महादेव को प्रणाम करके हप की ध्वनि की थी । समस्त मुनिगण नृत्य करने लगे थे और श्रेष्ठ गण परम प्रसन्न हो गये थे ॥१३॥ उस समय मे देवगण भगवान् शम्भु के ऊपर पुप्पो की वृष्टि करने लगे थे। पूरा लाक्य हर्षातिरेय से मानद से भरा गया था और हष पी ध्वनि करने लगा था ॥१४॥ दग्धोग्निना च शूलेन प्रोत प्रेत इवाधय । सात्त्विक भावमास्थाय चिंतयामास चेतसा ।।१५ जन्मातरेपि दवेन दग्धो यस्माच्छिवेन दें। पाराधितो मया शभु पुरा साक्षान्महेश्वर ॥१६ तस्मादेत-मया लब्धमन्यथा नोपपद्यते। य स्मरे-मनसा रुद्र, प्राणाते सकृदेव वा ॥१७ म याति शिवसायुज्य किं पुनबहश स्मरन् । ब्रह्मा च भगवान्विप्णु सर्वे देवा तवामवा ॥ पारण प्राप्य तिष्ठति तमेव शरण व्रजेत् । एव सचित्य तुष्टात्मा सोधश्चाधकादनम् ।।१६ सगण शिवमोश नमस्तुवत्पुण्यगौरवात् । प्राषितस्तेन भगवान् परमार्तिहरो हर ॥२० हिरण्यने तनयं मूलाग्रस्य मुरेश्वर ।
1 शिव ८० [ लिङ्ग पुराण प्रोवाच दानवं प्रेक्ष्य घृणया नीललोहितः ॥२१ मूल के द्वारा प्रोत पोर पूल की अग्नि से दग्ध मन्धक प्रेत यो भांति सात्विक भाव में समास्थित होकर चित्त से चिन्तन करने लगा था ॥१५॥ मुझे जन्य जन्म में भी देश शिय ने ही दम्घ किया था । पहिले मैंने साक्षात् महेश्वर शम्भु की आराधना की थी ॥१६॥ इस पारण से मैंने इसे प्राप्त किया है, अन्यथा ऐमा उपपान नही होता है । जो प्राणो के अन्त समय मे एकवार भी मन से रद्र वा स्मरण करता है। वह सापुज्य की प्राप्ति किया करता है । भौर यदि बहुत वार शिव का स्मरण करे तो उस पुण्य-फल का तो पहना ही क्या है । ब्रह्मा- भगवान् विष्णु और इन्द्र के सहित सम्पूर्ण देवगण गिव को शरण प्राप्त करवे ही स्थित द्रमा करते हैं। इसलिये उमी की शरण मे जाना चाहिए। इस प्रकार चिन्तन करके वह अन्धक दैत्य अपने मर्दन करने वाले ईशान शिव की गणो के सहिन पुण्य के गौरव से स्तवन करने लगा था । उस के द्वारा परम आत्ति के हरण करने वाले भगवान् हर प्रार्थित किये गये थे ॥१७॥१८॥१६॥२०॥ शूल के अग्र भाग मे स्थित हिरण्याक्ष के पुन दानव को देखकर सुरो के ईश्वर भगवान् नील लोहित घृणा ( दया ) से युक्त होकर बोले ॥२१॥ तुष्टोलिम वत्स भद्र ते कामं किं करवाणि ते। वरान्वरय दैत्येद्र वरदोह तवाधक ॥२२ श्रु त्वा वाक्य तदा श मोहिरण्यनयनात्मज । पगद्गदया वाचा प्रोवाचेद महेश्वरम् 1२३ भगवन्देवदेवेश भक्तातिहर शकर । स्वयि भक्तिः प्रसीदेश यदि देयो वरश्च मे ॥२४ श्रुत्वा भवोपि वचनमघकस्य महात्मनः । प्रददौ दुर्लभा श्रद्धा दैत्यद्राय महाद्युतिः ।।२५ गाणपत्य च दैत्याय प्रददौ चावरोप्यतम् । प्रणेमुरतं सुरेंद्र द्या गाणपत्ये प्रतिष्ठितम् ॥२६ है वत्स ! मैं तुभने अत्यन्त सन्तुष्ट हूँ ! तेरा कल्याण हो, अब बोल, जालंधर वध ] [८१ तेरा क्या कार्य करूं । हे अन्धक! हे दैत्येन्द्र ! वरदान मांग ले । मैं तुझे वरदान देने वाला उपस्थित हूँ॥२२।। उस समय में हिरण्याक्ष के पुत्र ने भगवान् शम्भु के इस वाक्य का श्रवण कर हपं से अत्यन्त गदगद हो जाने वाली वाणी से महेश्वर से यह कहा था ॥२३॥ हे देवो के भी देवेश्वर ! पाप तो अपने भक्तो को पीडा का दरमा करने वाले हैं। हे शङ्कर ! हे ईश ! यदि प्राप मुझे कोई वरदान दन को कृपा करते हैं तो मैं यही चाहता हूं कि मेरी प्राप मे हद भक्ति होवे ॥२४॥ भगवान् भव ने महान आत्मा वाले अन्धक का यह वचन सुनकर महान द्यति वाले शङ्कर ने उस दैत्येन्द्र को अपनी अति दुर्लभ श्रद्धा-भक्ति प्रदान करदी थी ।।२५।। और उस दैत्य को अपरोपित करके गाणपत्य पद को भी प्रदान किया था। जब वह गाणपत्य पद पर प्रतिष्ठित हो गया तो फिर सुरेन्द्र प्रादि सब देवो ने उसे प्रणाम किया था ॥२६॥ ॥६५-जालंधर वध ॥ जलंधरं जटामौलिः पुरा जंभारिविक्रमम् । कथं जघान भगवान् भगनेत्रहरो हरः॥१ वक्तुमर्हसि चास्माकं रोमहर्पण सुव्रत। जलंधर इति ख्यातो जलमंडलसभवः ।। प्रासीदतकसंक शस्तपसा लब्धविक्रम. । तेन देवाः सगवळ सयक्षोरगराक्षसाः ॥३ निजिताः समरे सर्वे ब्रह्मा च भगवानज । जित्वैव देवसवातं ब्रह्माण वै जलधरः ।। जगाम देवदेवेशं विष्णु विश्वहर गुरुम् । तयो ममभवद्यद्ध दिवाराप्रमविश्रमम् ॥५ जलंधरेशयोस्तेन निजितो मधुसूदनः। जलंधरोपित जित्वा देवदेवं जनार्दनम् ॥६ प्रोवाचेदं दितेः पुत्रान् श्यायघोजैतुमीश्वरम् । सर्वे गिता मया युद्धे शकरो ह्यजितो रणे ।।७ १२] [ लिङ्ग पुराण इस अध्याय में शिव के अतिरिक्त अवध्य जलघर का रुद्र कृत सुद- दर्शन से वध का निरूपण किया जाता है । पियो ने कहा- मस्तक पर जटा धारण करने वाले तथा भग के नेनो का हरण करने वाले भगवान् हर ने जम्भारि विक्रम वाले जलन्धर का किस प्रकार से वध किया था हे रोम हर्पण ! हे सुन्दर व्रत वाले सूतजी ! यह आप हमको बताने के लिये परम योग्य हैं । सूतजी ने कहा-~-जलमण्डल से उत्पन्न होने वाला जलन्धर-इस नाम से ख्यात था ॥२॥ तपश्चर्या के द्वारा विक्रम को प्राप्त कर लेने वाला यह अन्तका के समान था। उसने समस्त देवता गन्धर्वो के सहित तथा यक्ष-राक्षस-उरग गण के सहित युद्ध स्थल मे जीत लिये थे। उस जलन्धर भगवान् अज ब्रह्मा को भी विजित कर लिया था तथा सम्पूर्ण देवो के समुदाय को पराजित कर दिया था ॥३॥४॥ इसके अनन्तर देवदेवेश विश्वहर गुरु विष्णु के समीप मे यह गया था। उन दोनो का रात दिन निरन्तर महान् युद्ध हुआ था ॥५॥ जलन्धर और ईश के इस युद्ध मे उस जल-धर ने मधुसूदन को भी निर्जित कर दिया था। जलन्धर ने देवो के देव उस जनादन को जीत कर न्याय को बुद्धि वाले उसने ईश्वर को जीतने के लिये दिति के पुत्रो से यह कहा था। मैंने युद्ध भूमि में सभी को जीत लिया है । अब तो केवल रण मे अजित एक शङ्कर हो रह गये हैं ॥६॥७॥ त जित्वा सर्वमीशानं गणपनदिना क्षरणात् । अहमेव भवत्वं च ब्रह्मत्व वैष्णवं तथा ॥८ वासवत्व च युष्माक दास्ये दानवपु गवाः । जलंधरवचः श्रुत्वा सर्वे ते दानवाघमा. It जगजुरुच्चै पापिष्ठा मृत्युदर्शनतत्पराः । दैत्यरेतैस्तथान्यश्च रथमागतुरंगमै. ॥१० सन्नद्ध. सह सप्ता शवं प्रति ययो बली। भवोपि दृष्ट्वा दैत्येंद्र मेरुकूटमिव स्थितम् ॥११ अवध्यत्वमपि श्रुत्वा तथान्यभंगनेनहा । ब्रह्मणो वचन रक्षन् रक्षको जगता प्रभुः ॥१२ जालघर वध ] [ ३ साव. सनंदी सगणःप्रोवाच प्रहसन्निव । किंकृत्यमसुरेशान युद्ध नानेन साप्रतम् ॥१३ मद्वाभिन्नसर्वागो मतुमभ्युद्यते मुदा। जलघरोपि तद्वाक्यं श्रुत्वा श्रोनविदारणम् ।।१४ ईशान शव को युद्ध मे जीतकर तथा गणय और नन्दी के साथ एक क्षण मात्र मे अव मैं ही भवत्व का पद तथा ब्रह्मा और विष्णु का स्थान प्राप्त करने वाला हो जाऊंगा |1|| हे दानव श्रेपो ! मैं इन्द्र का पद तो आप लोगो को दे दूंगा । इम जलन्धर के वचन का श्रवण करके वे समस्त अधम दानव एव पापिष्ठ मृत्यु के दर्शन करने में तत्पर होते हुए बहुत ही ऊँचे स्वर से गर्जने लगे थे। वह बलवान् जलन्धर इन दैत्यो तथा अन्य रथ-नाग और तुरङ्गमो से के सहित पूर्णतया सन्नद्ध होकर वह भगवान् शकर को ओर गया था। भगवात् भर ने भी मेरु की शिखर की भांति स्थित उस दैत्य को देखा था ॥६॥१०॥११॥ भग के नेत्रो को हरण करने वाले महेश्वर ने दूसरो के द्वारा उस दैत्य की अवध्यता को सुनवर जगत् के स्वामी प्रभु ने ब्रह्मा के वचन की रक्षा करते हुए प्रम्बा के-नन्दी के और गणो के सहित भगवान् शम्भु ने हमने हुए उस दैत्य से कहा था । हे मसुरो के स्वामिन् । अब इस युद्ध से तुझे क्या करना अभीष्ट है ॥१॥१३॥ मरे वारणो के द्वारा भिन्न समस्त अङ्गो याला तू क्या मानन्द ये साथ मरने के लिये प्रस्तुत हो रहा है ? जालन्धर शिय 4 इस श्रोत्रो से विदारण करने याले वचनो को सुना पा ॥१४॥ सुरेश्वर मुवाचेद मुरेतरपलेश्वर । वाक्येनाल महावाहो देवदेव वृपध्वज ॥१५ चद्राशुसग्निभ. शस्त्रं हर योद्ध मिहागत. । निशम्यास्य वच. शूली पादागुठेन लीलया। महामसि चकाराशु रयांग रोद्रमायुधम् ॥१६ मृत्वाणयामसि सितमगवानरयागं स्मृत्या जगय मनेनहना सुराचा दक्षाघातपुरमययमहर्ता सोरत्रयानककरः महसंस्तदाह ।।१० ।
८४ ] [ लिङ्ग पुराण पादेन निर्मित दैत्य जलधर महार्णवे। बलवान् यदि चोद्धतु तिष्ठ योधु न चान्यथा ।।१८ तस्य तद्वचनं श्रुत्वा क्रोधेनादीमलोचन । प्रदहन्निव नेत्राभ्या प्राहालोक्य जगत्यम् ।।१६ गदामुद्धृत्य हत्वा च नदिन त्वा च शकर। हत्वा लोकान्सुरै सार्धं डुडुभान गरुडो यथा ।।५० हतु चराचर सर्व समर्थोह सवासवम् । को महेश्वर मद्वाणरच्छेद्यो भुवनत्रये ॥२१ सुरेतर अर्थात् दैत्यो के बल का स्वामी सुरो के स्वामी भगवान् शम्भु से यह बोना-हे देवो के देव । हे महा वाहुप्रो वाले । हे वृष- ध्वज । ऐमा वाक्य मत बोलो ।।१५।। हे हर आप यहाँ चन्द्र किरणो के समान शस्त्रो के द्वारा युद्ध करने के लिये आये हैं । इस दैत्य के वचन का श्रवण करके भगवान् शूली ने लीला से ही पैर के अंगूठे शीघ्र ही महाम्भये रौद्र रथाङ्ग प्रायुध को बना दिया था ॥१६।। भगवान ने अवि के जल मे सित रथाङ्ग को करके जगत् त्रय का स्मरण किया और इसने सुरो का हनन किया था। उस समय दक्ष और अन्धक के अन्त करने वाले तथा पुर त्रय के यज्ञ का हरण करने वाले एक तीनो लोको का अन्त कर देने वाले हँसते हुए बोले ॥१७॥ हे दैत्य जलन्धर मैंने पाद से महार्णव मे निभित कर दिया है। यदि इसका उद्धार करने के लिये तू बलवान् है तो युद्ध करने के वास्ते यह ठहर जा, अन्यथा नहीं। ॥१८॥ देव के यह वचन श्रवण करके क्रोध से लाल नेत्र वाला जगत् त्रय को नेगो से दग्ध होते हुए देखकर बोला ॥१९॥ जलन्धर ने पहा- हे शवर गदा को उठाकर तुमको और नदी को मारपर और समस्त सुरो के साथ लोको का हनन करता हूं जिस तरह निमिप सो का हनन किया करता है ॥२०॥ में इस सम्पूर्ण चराचर को इन्द्र के साहित हनन करने में समर्थ हूँ। है महेश्वर । इस भुवन त्रय मे कौन ऐसा है जो मेरे यारणों के द्वारा छेदन करने के योग्य नहीं है ? ॥२१॥ बालभावे च भगवान् तपसव विनिजित ।
जालघर वध ]
[८५
ब्रह्मा बली यौवने वै मुनग सुरपु गवै ॥२२
दग्ध क्षरऐन सकल त्रैलोक्य सचराचरम् ।
तपमा किं त्वया रुद्र निजितो भगवानपि ॥३
इद्राग्नियमवित्त शवायुवारीश्वरादय ।
न से हिरे यथा नागा गध पक्षिपतेरिव ॥२४
न लब्ध्वा दिवि भूमौ च बाहवो मम शकर ।
समस्तान्पर्वतान्प्राप्य पिताश्च गोश्वर. २५
गिरीद्रो मदर श्रीमान्नीलो मेरुः सुशोभन ।
धर्पितो बाहुदडेन कडूनोदार्थमापतत् । २६
गगा निरुद्धा बाहुम्या लीलार्थ हिमवगिरी ।
नारीणा मम भृत्यश्च वज्रो बद्धो दिवौकसाम् । २७
वडवाया मुख भग्न गृहीत्वा वै करेण तु ।
तत्क्षणादेव सकल चैकार्णवमभूदिदम् ।। -
वाल भाव मे भगवान को तप क द्वारा ही विनिजित कर दिया
था । वल वाले ब्रह्मा को समस्त मुनि और देव थेठी के सहित यौवन
म जीत लिया था। एक ही क्षण म इस समस्त चराचर त्रैलोक्य को
दग्ध कर दिया था। हे रुद्र । तपश्चर्या से भगवान को भी विनिजित
कर दिया था अब तुम से क्या है ॥२२॥२३॥ इन्द्र अग्नि यम कुवेर-वायु
और वरुण प्रादि देवगरण पक्षिराज गरुड को गन्ध को नागों की भांति
मेरी गन्ध को भी सहन नहीं करते हैं ॥२४॥ दिविलोक और भूमण्डल
मे हे शङ्कर । मेरे वाहुप्रो के जोड के कोई भी न प्राप्त कर हे गणेश्वर ।
मैने समस्त पर्वतो मे जाकर उन्हे धर्पित किया था ॥२॥f रियो का
स्वामी मन्दराचल श्री सम्पन्न लीलागिरि और परम शोभन मेरु पर्वत को
मैंने अपनी भुजामो की खुजलाहट मिटाने के लिये वाहु दण्ड से घपित
पिया था तो गिर पड़ा था ॥२६॥ हिमालय पर्वत म वाहनो से लीला
के ही लिये मैने गङ्गा नदी को रोक दिया था । मेरो नारिया के भृत्या के
द्वारा देवतामों का वच्च वद्ध कर दिया था ॥२७॥ हाथ ग्रहया करके
८६ ] | लिङ्ग पुराए वडवा का मुख भानकर दिया था। उसी क्षण में यह समस्त एकाएंव हो गया था ॥२८॥ ऐगवतादयो नागाः क्षिप्ताः सिंधुजलोपरि । सरथो भगवानिद्रः क्षिप्तश्च शतयोजनम् ।।२६ गरुडोपि मया बद्धो नागपाशेन विष्णुना । उर्वश्याद्या मया नीता नार्यः कारागृहांतरम् ॥३० कथचिलब्धवान् शक्रः शचीमेका प्रणम्य माम् । मा न जानासि दैत्येन्द्र जलंधरममापते ॥३१ एवमुक्तो महादेवः प्रादह रथं तदा। तस्य नेत्राग्निभागेककलाधिन चाकुलम् ।।३२ दैत्यानामतुलबलेल्यैश्च नागैर्दैत्येद्रास्त्रिपुररिपोनिरीक्षणेन । नागाद्वैशसमनुसवृतश्च नागंदवेश वचनमुवाच चाल्पबुद्धिः ॥३३ कि कार्य मम युधि देवदैत्यसंघहंतु यत्सकलमिदं क्षणात्समर्थः । यत्तस्माद्भयमिह नास्ति योद्ध मीश वाछपा विपुलतरा न सशयोत्र३४ तस्मात्त्व मम मदनारिदक्षशत्रो यज्ञारे त्रिपुररिपो ममैव वीरैः । भूतेद्र हरि वदनेन देवसधैर्यो ते बलमिह चास्ति चेद्धि तिष्ठ॥३५ ऐरावत आदि नाग ( गज) समुद्र के जल में फेंक दिये गये थे पौर रथ के सहित इन्द्रदेव सौ योजन तक दूर फेक दिया गया था ॥२६॥ मने गरुड को भी बांध दिया था और विष्णु की नागपाश से उसका बन्धन किया था । उर्वशी प्रादि नारियां मैने ग्रहण कर कारागृह के अन्दर बन्द करदी थी। इन्द्र ने किसी प्रकार से मुझे प्रणाम करके अपनी पत्नी शत्री को प्राप्त कर लिया था। हे उमा के पतिदेव ! क्या प्राप देत्यो के स्वामी जलधर मुझ को नहीं जानते हैं ॥३०॥३१॥ सूतजो ने पहा - इस तरह से बहे हुए महादेव ने उस समय में उसके नेताग्नि पो कला के अर्धा भाग से प्रावुल उस जलन्धर का रथ जला दिया था । ॥३२॥ उस समय मे विपुर के रिपु महादेव के निरीक्षण से दैत्यो के अतुल पल-हय और गजो के सहित समस्त दैत्येन्द्र क्षणभर में दग्य हो गये थे। गजों रो अनुगत मल्प बुद्धि वाला जलपर नाग रो वेशस पर जालघर वध ] [ ८७ देवेश से यह वचन बोला। हे देव ! मुझे क्या करना चाहिए, मै दत्य संघो के द्वारा क्षण भर मे इन सब को मारने के लिये समर्थ हूं। यहाँ पर मुझे उससे हे ईश । युद्ध करने में कुछ भी भय नहीं है। मेरी सबसे बडी यही इच्छा है-इसमे सशय नहीं है ॥३३॥३४॥ है मदन के शत्रु शिव ! हे पक्ष के शत्रु ! हे त्रिपुर के रिपु ! यदि आपका भूतेन्द्रो के द्वारा, नन्दी के द्वारा और देव समो के द्वारा मेरे ही धीरो के साथ युद्ध करने का बल है तो युद्ध करने को यहाँ रुक जाग्रो ।।३।। इत्युक्त्वाथ महादेव महादेवारिनंदनः । न चचाल न सस्मार निहतान्यांधवान् युधि ।।३६ दुर्मदेनाविनीतात्मा दोभास्फोट्य दोलान् । सुदर्शनारय यच्चन तेन हतु समुद्यत. ॥३७ दुर्धरेण रथागेन कुच्छणापि द्विजोत्तमाः। स्थापयामास वै स्कंधे द्विधाभूतश्च तेन वै ॥३८ कुलिशेन यथा छिनो द्विधा गिरिवरो द्विजा । पपात देत्यो बलवानजनाद्रिरिवापर. ॥६६ तस्य रक्तन रौद्रण सपूर्णमभवत्क्षरणात् । तद्रक्तमरितल रुद्रनियोगान्मासमेव च ॥४० महारौरवमामाद्य रक्तकुमभूदहो। जलधरं हत दृष्ट्वा देवगधर्वपापदा. ॥४१ सिंहनाद महत्त्वा साधु देवेति चाय वन् । यः पठेच्छणुयाद्वापि जलधरविमर्दनम् ॥४२ धावयेद्वा यथान्याय गाणपत्यमवाप्नुयात् ।।४३ महादेव से इस प्रकार से बहार यह हादेव या परिनन्दन नही हिला मोर युद्ध में अपने नित हुए थान्धयो या भी उसने स्मरण नहीं रिया पा । दुमंद से मयिनीन पारमा याो उसने अपनी बाहो से पर परके रद्र के द्वारा निमित्त जो सुदर्शन नाम वाला पर पा उसे यही पठिनाई में याप्रो से स्थापित किया था मोर नगमे हनन करने को समुपत मा पा रितु उससे सन्प में दो टुकडे हो गया था ॥३६॥३७ .
८८] [लिङ्ग पुराण ॥३८॥ हे द्विजगण ! जिम तरह वज्र के द्वारा छिन हया गिरि गिरा करता है उसी भांति वह बलवान् दैत्य दूसरे अर्जन गिरि की भांति दो टुकडे होकर गिर गया था ॥३९।। उसके रक्त से जो कि बहुत ही रोद्र था, सम्पूर्ण भूमण्डल भर गया था । वह सम्पूर्ण रक्त शिव के नियोग से मांस हो गया था ॥४०॥ और वह सब महा रौरव नामक नरक में जाकर वहाँ पर एक रक्त का कुएड बन गया था। उस जलन्धर दैत्य को मृत देखकर समस्त देव-गन्धर्व और पार्षद महान् हर्प सूचक मिहनाद करके हे देव ! बहुत अच्छा किया है-ऐसा कहने लगे थे। इस जलन्धर के मदन की कथा को जो पढता है अथवा श्रवण करता है या यथा विधि इस का श्रवण कराता है वह गाणपत्य पद की प्राप्ति किया करता है ॥४१॥ ॥४२॥४३॥ ।। ६६-शिव के वामांग से शिवानी उत्पत्ति ।। सभवः सूचितो देव्यास्त्वया सूत महामते । सविस्तर वदस्वाद्य सतीत्वे च यथातथम् ॥१ मेनाजत्वं महादेव्या दक्षयज्ञविमर्दनम् । विष्णुना च व थं दत्ता देवदेवाय शंभवे ॥२ कल्याण वा कथं तस्य वक्तुमर्हसि सांप्रतम् । तेषां तद्वचनं श्रुत्वा सूतः पौराणिकोत्तमः॥३ सभवं च महादेव्याः प्राह तेषां महात्मनाम् । ब्रह्मणा कथितं पूर्व दडिने तत्सुविस्तरम् ।।४ युष्माभिर्वे कुमाराय तेन व्यासाय धोमते । तस्मादहमुपश्रुत्य प्रवदामि सुविस्तरम् ॥५ वचनाद्वो महाभागाः प्रणम्योमा तथा भवम् । सा भगाख्या जगद्धायो लिंगमूर्तनिवेदिका ॥६ लिंगस्तु भगवान्द्वाभ्या जगत्सृष्टिद्विजोत्तमाः। लिंगमूर्तिः शिवो ज्योतिस्तमसश्वोपरि स्थितः ॥ इस अध्याय मे महादेवी का जन्म वामाङ्ग से भौर दक्ष पुत्री का शिव के ग्रामरंग 1 होना और पार्वती का होना वरिणत किया जाता है । ऋषियों ने कहा- है महान् मति याने सूतजी ! आपने देवी के जन्म की सूचना मात्र तो दी थी किन्तु अब उनी सतीत्व होने का पूर्ण चरित ठीक २ हमारे शाम- ने वर्सन यिस्तार के सहित कीजिए ॥१॥ महादेवी का मेना से समुत्पन्न होना मोर दक्ष के यज्ञ का ध्वस करना निरूपित करिये । उसको देवों के देव शम्भु के रिय विष्णु के द्वारा कैसे प्रदान किया गया था ? ॥शा सन विष्णु का कल्याण रिस प्रकार से हुआ-यह सब इस समय बताने की योग्य है। नन पिन के इस वचन का प्रवण कर पौराणिको मे सर्वश्रेष्ट सूननी नै उन महात्मा ऋपियों से महादेवी का जन्म वहा था । सूतजी ने कहा-पहित समय में ब्रह्माजी ने ११ यति को दराडो सन- कुमार मे सुविस्तृत ए में कहा था । मनमार ने ध्यास जी यो पहा था और उन ध्यामदेव से मैने पर दिया था। विस्तार के सहित प्रापको बताता हूँ ॥३॥४॥या मूनही नै मालाम यानी! पापक पवन से उमादेवी और देर पिय भी गम न मरता है । यह महादेवी भग समा यात्री श्री राधा सया लिन रूप वाले निय को निगुग्गा प्रति 2018 त्रिोतमो सिन रूप वाले भगवान् nिa future prom परते हैं पोर नही दोनो रोग नगर की गति शिव स्वत प्रमाा सप वार है और यह भाषा Hetauni. मानहायरस १०) [ लिङ्ग पुराण विभजस्वेति विश्वशं विश्वात्मानमजो विभुः। ससर्जदेवी वामांगात्पत्नी चैवात्मन: समाम् ॥२. श्रद्धा ह्यस्य शुभा पत्नी ततः सः पुगतनी। सेवाज्ञया विभोदेवी दक्षपुत्री बभूव ह ॥१३ सतीसंज्ञा तदा सावै रुद्रमेवाधिता पतिम् । दक्षं विनिंद्य कालेन दबी मैना ह्यभूत्युनः ॥१४ लिङ्ग और वेदी इन दोनो का नित्य समायोग होता है प्रतएव सृष्टि के मादि मे अर्ध नारीश्वर अर्थात् माया शक्ल ब्रह्मरूप अचं स्त्री पुमान स्वरूप वाले साकार हुए थे। सबसे प्रथम चतुर्मुख ब्रह्मा को पुत्र रूप में समुत्पन्न किया था 10 विश्वाधिक प्रघं नारीश्वर ज्ञानमय विभु हर ने उस ब्रह्मा को जान का प्रदान किया था ।।६॥ देव ने उत्पन्न हुए हिरण गर्भ को देखा था। उस हिरण्य गर्भ ने भी रुद्र महादेव शङ्कर का दर्शन किया था ॥१०॥ उन अधं नारीश्वर देव प्रभु को सस्थित' देखकर कमल से उद्भव प्राप्त करने वाले ब्रह्मा ने उस वरद प्रभु का परमाभीष्ट वाणि- यो के द्वारा स्तवन किया था ॥११॥ विश्व के ईश तथा विश्व की मात्मा का विभाग करिये-तब अजन्मा विभु ने अपने दामाज से अपने ही समान पलो देवी का सृजन किया था ॥१२॥ इस पुरुष की परम पुरातन पत्नी शुभो थक्षा है । वह ही विभु की मात्रा से अय दक्ष प्रजापति की पुत्री हुई थी ॥१३॥ उस समय इमको सती-यह सज्ञा थी और उस सती नाम धारिणी देवी ने रुद्रदेव को ही अपना पति स्वीकार कर उसके माश्रित हुई थी। कुछ काल के पश्चात् देवी ने दक्ष को विनिन्दित करके मैना के यहां उद्भव ग्रहण किया था ॥१४॥ नारदस्थव दक्षोपि शापादेवं विनिद्य च । अवज्ञ दुर्मदो दक्षो दवदेवमुमापतिम् ॥१५ अनाहत्य वृति ज्ञात्वा सती दक्षेण तत्क्षणात् । भस्मीकृत्वात्मनो देह योगमार्गरण सा पुनः ॥१६ बभूव पार्वती देवी तपसा च गिरेः प्रभोः । ज्ञात्वतद्भगवान् भर्गो ददाह रुपितः प्रभुः॥१७ दक्ष यज्ञ विध्वंस ६१ दक्षस्य विपुलं यज्ञं च्यावनेर्वचनादपि। ज्यवनस्य सुतो धीमान् दधीच इति विश्रुतः॥१८ विजित्य विष्णु समरे प्रसाक्षत् त्र्यंबकस्य च । विष्णुना लोकपालांश्च शशाप च मुनीश्वरः ॥१६ रुद्रस्य क्रोधजेनैव वह्निना हविषा सुराः। विनाशो वै क्षणादेव मायया शकरस्य वै ॥२० दक्ष प्रजापति भी नारद देवपि के शाप से विनिन्दित परके अयज्ञा से दुर्मद हो गया था और देवों के देव उमा के पति का अनादर किया था। १५॥ शिव के अनादर करने के इस दक्ष को कृति का ज्ञान प्राप्त करके सती ने उसी समय में योग मार्ग के द्वारा देवी ने अपना शरीर भस्म कर दिया था ।।१६।। वह देवी फिर गिरिमों के राजा हिमवान के तप से उसके यहाँ पार्वती हुई थी । इस सती के देह-त्याग का समाचार जान कर शोध उत्पन्न होने वाले भर्ग ने दक्ष के विस्तृत यज्ञ का ध्वंस करके दग्ध कर दिया था ॥१७॥ इस दक्ष के यज्ञ का ध्वस को ध्यावनि फै वचन से भी किया था। च्ययन ऋषि के पुत्र का नाम दधीच-यह प्रसिद्ध पा ॥१८i) भगवान् व्यम्बक के प्रसाद से समर मे विष्णु को जीत पर उस मुनीश्वर ने दिप्णु के साथ लोफ पालो को भी शाप दे दिया था ॥१६रद के क्रोध से समुत्पन्न अगि की हवि से शहर की माया से क्षण मात्र में ही विनास हो गया था ॥२०॥ ।। ६७-दक्ष-यज्ञ विध्वंस ।। विजित्य विष्णुना सार्थ भगवान्परमेश्वरः। मन्दिधीचवचनात्कथं भेजे महेश्वरः ॥१ दक्षयज्ञे सुयिपुले देवान् विष्णुपुगेगमान् । दयाह भगवान रुद्रः सलिमुनिगगन २ भद्रो नाम गरास्तेन प्रेषितः परमेष्टिना। विप्रयोगेन देव्या घे दु.सहेनर मुमताः ॥३ सोसृजद्वीरभद्रश्च गणेश.प्रोमजान्दुभान् ।
[लिङ्ग पुराण गणेश्वरैः समारुह्य रथं भद्रः प्रतापवान् ।।४ गंतुचक्र मतिं यस्य सारथिभंगवानजः। गणेश्वराश्च ते सर्वे विविधायुधपाणयः ।। विमानविश्वतो भद्र स्तमन्वयुरथो सुराः । हिमच्छिखरे रम्ये हेम शृगे सुशोभने १६ यज्ञवाटस्तथा तस्य गगाद्वारसमोपतः। तदेशे चैव विस्य तं शुभ कनावलं द्विजाः १७ इस अध्याय मे दक्ष प्रजापति के यज्ञ का विनाश और महादेव से सन्धान का परम अद्भुत निरूपण किया जाता है। ऋपियो ने कहा- भगवान् परमेश्वर महेश्वर ने विष्णु के साथ विजय प्राप्त करके फिर दधीच के वचन से सब का कैसे सेवन किया अर्थात् यज्ञ का सेवन किय था ? सूक्तजी ने कहा- सुमहार दक्ष के यज्ञ मे विष्णु जिनमे प्रमुख थे ऐसे समस्त देवो को भगवान् रुद्र ने दहन कर दिया था और सम्पूर्ण मुनिगणो को भी दग्ध कर दिया था ॥१॥२॥ हे सुव्रतो । देवी के दु सह वियोग से परमेष्ठी ने भद्र नाम वाला गरए भेजा था ॥३॥ उस वीरभद्र ने रोमो से समुत्पन्न परम शुभ गणेशो का सृजन वहाँ कर दिया था। उन गणेश्वरो के साथ परम प्रताप वाले उस वीरभद्र ने एक रथ पर समारोहण किया था ॥४॥ और फिर वहां जाने का विचार किया था जिसके रथ के सारथि भगवान् अज थे। वे समस्त गोश्वर भनेक प्रकार के आयुध अपने हाथो मे ग्रहण किये हुए थे। उस वीरभद्र के साथ में पीछे २ देवो ये दा होने के कारण वाण प्रादि असुर भी गये थे। वे असुर भी वडे अच्छे विमानों के द्वारा वहां गये थे। सुरगण हिमवाद पर्वत के परम रमणीक सुवर्ण के शृङ्ग पर, जो कि प्रत्यन्त शोभा से मन्वित था, यस वाट था उसमे थे । उसके समीप मे गङ्गा द्वार के नकट ही वह देश है जो कि शुभ कनखल इस नाम से विख्यात है ॥५॥ ॥६॥ दग्घुवं प्रेषितश्चासो भगवान् परमेष्ठिना । तदोत्सातो बभूवाथ लोकाना भयशसन. १८ -- दक्ष यज्ञ विध्वंप पर्वताश्च व्यशीयंत प्रचकंपे वसुघरा । मरुतश्चाप्यघूर्णत चुक्षुभे मकरालयः ।। अग्नयो नैव दीप्यंति न च दीप्यति भास्कर.. महाश्च न प्रकाश्यं ते न देवा न च दानवाः ॥१० ततः क्षणात् प्रविश्य व यज्ञवाट महात्मनः । रोम सहितो भद्रः कालाग्निरिव चापरः ।।११ उवाच भद्रो भगवान् दक्षं चामिततेजसम् । संपर्कादेव दक्षाद्यमुनीन्देवान् पिनाकिना ॥१२ दग्धु संप्रेषितनाहं भवतं समुनीश्वरै । इत्युक्त्वा यज्ञशाला ता ददाह गणपुगवः ॥१३ गणेश्वराश्च संकदा यूगनुत्पाट्य चिक्षिपुः । प्रस्ताया सह होत्रा च दग्धं चैव गणेश्वरैः ॥१० यह वीरभद्र को तो भगवान परमेटी ने दग्ध करने को भेजा ही था । उस समय मे लोगो को भय देने वाला बड़ा भारी उत्पात हो गया था | पर्वत विशीर्ण हो गये थे। भूमि काप उठी थी। वायु परिणत हो गया था और मकरालय क्षुब्ध हो गया था। उस सगय अग्नि दीप्ति रहित हो गई तथा भास्कर ने प्रकाश देना त्याग दिया था । ग्रह- गण प्रकाशित नहीं हो रहे थे और वहाँ देव एव दानव सभी तेजहीन-रो हो गये थे ॥१०॥ उमी क्षण में वीरभद्र ने अपने रोमो से उत्पन्न गणेश्वरो के सहित दूसरे वालाग्नि के समान महात्मा के उस मन वाट में प्रवेश किया था ॥११॥ वहाँ पर प्रवेश करके वीरभद्र ने अभित तेज वाले दक्ष से महा - भगवान् पिता को ने मुझे दक्ष जिनमे प्रधान है उन मुनियो को और देवो को स्पर्श मात्र से मुन।श्वरो ये साप प्रापरो दग्य पर देने के लिये भेजा है। इतना भर कहकर उस अंगण ने उस यन- शाला दग्ध कर दिया था।॥१२॥१३॥ गणेश्वरी ने प्रत्यन्त बुपित होर यशाला के यूपो को उसाड पर फेर दिया था। गणेश्वरी ने होगा ये साथ प्रस्तोता सब को दाध कर दिया था ॥१४॥ गृहीत्वा गणपाः सर्वान् गगायोतसि निक्षिपुः ।
१४] [ लिङ्ग पुराण वीरभद्रो महातेजाः शक्रस्योद्यच्छतः करम् ॥१५ व्पष्ट भयददीनात्मा तथान्येपा दिवौकसाम् । भगस्य नेत्रे चोत्पाटय करजाग्रेण लीलया ॥१६ निहत्य मुटिना दंतान पूष्णश्च व न्यपानयत् । तथा चद्रमसं देव पादागुप्ठेन लीलपा ॥१७ घषयामाम भगवान् वीरभद्रः प्रतापवान् । चिच्छेद च शिरस्तस्य शक्रस्य भगवा-प्रभोः ॥१८ वह्नर्हस्तद्वय छित्त्वा जिह्वामुत्पाटय लीलया। जघान मूर्टि। पादेन वीरभद्रो महाबल ९६ यमस्य दड भगवान् प्रचिच्छेद स्वयं प्रभु । जघान देवनीशान त्रिशूलेन महाबलम् ।।२० त्रयस्त्रिंशत्सुरानेवं विनिहत्या प्रयत्नत.। प्रयश्च निश्त तेषा त्रिगाहस्र च लीलया ॥ १ उन गणेश्वरो ने यज्ञशाला की सगस्त वस्तुएं लेकर गङ्गा के प्रवाह मे डाल दी थी। महान् तेज वाले वीरभद्र ने वध से प्रहार करते हुए इन्द्र के हाथ को स्तम्भित कर दिया था प्रर्थात् जहाँ का तहाँ रोक दिया था। उस अदीन आत्मा वाले भद्र गए ने इसी भांति अन्य देवो को भी स्तब्धीभूत कर दिया था । ल ला पूर्वक हाथ के नाखूनो के अग्रभाग मे भग के नेत्रो को निकाल कर विनष्ट कर दिया था। पूषा के दाँतो पर मुष्टि का प्रहार करके उन्हे सोड दिया था । महान् बलवान् वीरभद्र भगवान् ने चन्द्रदेव को लीला के माथ पैर के अंगूठे से घसीट लिया था। इन्द्र के मस्तक को छिन्न कर दिया था ॥१॥१६॥१७॥१८॥ अग्निदेव वे दोनों हाथो को काटकर तया लीला पूर्वक नीम को उखाड़ दिया था। और पैर से उसके मस्तक पर प्रहार किया था ॥१६॥ यमराज के दण्ड को छिन्न कर दिया था। महावली ईशान देव का त्रिशूल से हनन किया था ॥२०॥ तीन सहस्र तीन सौ तीन देवो के भेद हैं । इन सब को दिना किसी प्रयास एव प्रयत्न के क्येि लीला ही में मार गिराया था ॥२॥ - दक्ष यज्ञ विध्वंस ] [६५ प्रय चैव सुरेंद्राणां जघान च मुनीश्वरान् । अन्यांश्च देवान्देवोसौ सर्वान्युद्धाय संस्थितान् ।।२२ जधान भगवाव दः खङ्गमुट्यादिसायकः । अथ विष्णुर्म हातजाश्चकमुद्यम्य मूच्छितः ।।३ युयोध भगवांस्तेन रुद्रण सह माधवः । तयोः समभवशुद्ध सुघोरं रोमहर्पणम् ॥२४ विष्णोर्योगवलात्तस्य दिव्यदेहाः सुदारुणाः ॥२५ शंखचक्रगदाहस्त। असंख्याताश्च जज्ञिरे । तान्सर्वानपि देवोसो नारायणसमप्रमान् ॥२६ निहत्य गदया विष्णु तायामास मूर्धनि । रसित देव लोलयंव रणाजिरे ॥२७ पपात च तदा भूमौ विसंज्ञ. पुरुषोतमः । पुनररथाय त । चक्रमुद्यम्य स प्रभुः ॥ इस देव पौरभद्र ने तीन सुरेन्द्रों को मुनीश्वरो पो, तपा अन्य समस्त देवों को जो भी वहाँ युद्ध के लिये सस्थित थे मार गिराया था मर्थात् हनन कर दिया पा॥२२॥ इसके मनन्तर महान् तेजस्वी प्णुि अपने चक्र से प्रहार घरते हुए मूच्छित हो गये थे ॥२॥ मगवार माधव ने उस रुद्र के साथ यु किया गा । उन दोनो का पड़ा भारी पोर एध गेमहर्पण महान युद्ध हुपा था। भगवान् रर ने राग-मटि तपा सायक प्रादि से हनन लिपा था ॥२४॥ विषणु के योग बन से सुदारुण पौर विध्य देह वाले शख. पत्रा मोर गदा मे निये हए मसंग्यों उत्पन्न कर दिये थे। उन सब नारायण के तुल्य प्रभा वालो को इस देव में गदा से मारसर फिर विष्णु के मस्तक में प्रहार पिया था पोर फिर विष्णु के पक्ष स्थल में उस रणभूमि में ताहित पिया पा ॥२५॥२६॥ ॥२८॥ उमा भगवान् पुरुषोत्तम येहोश होकर भूपि में गिर गयेथे मोर पुनः उठकर प्रभु ने उसको मारने के लिये पर उठाया था ॥२८॥ धरस्तेक्षणः श्रोमानतिष्ठापुरपमः । तस्य चक्रवपद्रौद्र पालादिस्यसमप्रभम् ।।२९ [ लिङ्ग पुराण व्यप्टमयददीनात्मा कास्यं न चचाल सः। प्रतिष्ठलतभितस्तन शृगवानिव निश्चल: ॥३० त्रिभिश्वपितं दशाङ्ग विधाभूतं प्रमोस्तदा । शाङ्गकोटिप्रसंगद्वं चिच्छेद च शिरःप्रभोः ॥३१ छिन्नच निपपातासु शिरस्तस्य रसातले। वायुना प्रे गत चैव प्राणजेन पिनाकिना ॥३२ प्रविवेशता चव नदीयाहवनीयकम् । तत्प्रवियर कनशं भग्नयूपं सतोरणम् ॥३३ प्रदीपितमहागालं दृष्ट्वा यज्ञोपि दुद्रवे । ते तदा मृगरूपेण धावतं गगर्न प्रति ॥३४ वीरभद्रः समाधाय विशिरस्कमाकरोत् । तत्तः प्रजापति धर्म कश्यपंच जगद्गुरुम् ॥३५ विष्णु क्रोध से रक्त नेत्र वाले होकर वहां पर पुरपो मे श्रेय श्रीमान खडे हुए थे। उनका जो रौद्र चक्र था जो कि कालाग्नि के समान प्रादित्य की प्रभा से युक्त था । उसको विष्णु के हाथ में स्थित ज्यों का श्यों उस प्रदीनारमा ने स्तम्भित कर दिया था कि वह फिर नहीं चला था। वह पर्वत को भौति निश्चल एव स्थिर उसके द्वारा किया जाने पर स्तम्भीभूत होकर रुक गया था ॥२९॥६० । तीन के द्वारा घर्पित प्रभु विष्णु का शाङ्ग नाम वाला धनुष उस समय विघाभूत हो गया था। शान के कोटि प्रपङ्ग से प्रभु का शिर छिन्न कर दिया था १३ १४ उन- का कटा हुप्रा वह शिर शीघ्र ही रातल मे.गिर कर चला गया था। फिर पिता की वीरभद्र ने अपनी नि.श्वांस की वायु के द्वारा उसे प्रेरित कर दिया था॥३२॥ उस समय में ब्रह्म ने फिर उसका जो ग्राहवनीयक था वहां प्रवेश दिया था जो कि विध्वस्त क्लश वाला था और जिसके यूय का तोरण के सहित भग कर दिया गया था। उस प्रदीपित महा- शाक्षा को देसकर यज्ञ भी कांपकर भाग गये थे। वह उस मृग के रूप से मानाय को मोर पलायन कर रहे थे कि वीरभद्र ने पकड़ कर शिर से होन कर दिया था। इसके पश्व तु उस. वीरभद्र ने प्रजापति धर्म.
दक्ष-यज्ञ विध्वंस ] [१७ कश्यप और जगद्गुरु के मस्तक मे प्रहार किया था ॥३३॥३४॥३५।। अरिष्टनेमिनं वीरो बहुपुत्र मुनीश्वरम् । मुनिमंगिरसं चैव कृष्णाश्वं च महाबलः ॥६ जघान मूनि पादेन दक्ष चैव यशस्विनम् । चिच्छेद च शिरस्तस्य ददाहाग्नौ द्विजोत्तमाः ॥३॥ 'सरस्वत्याच नासाग्र देवमातुस्तथैव च । निकृत्य करजाग्रेण वीरभद्रः प्रतापवान् ॥३८ तस्थौ श्रिया वृतो मध्ये प्रेतस्थाने यथा भवः । एतस्मिन्नेव बाले तु भगवान्पद्मसभवः ।।३६ भद्रमाह मह तेजाः प्रार्थग्रन्प्ररणतः प्रभुः। अलं क्रोधेन वै भद्र नष्टाश्च व दिवौकसः ।।४० प्रसीद क्षम्यतां सर्वं रोमजः सह सुप्रत । सोपि भद्रः प्रभावेण ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ॥४१ शम जगाम शनकः शांतस्तस्थौ तदाज्ञया । देवोपि तत्र भगवानंतरिक्षे वृषध्वजः ।।४२ अरिष्ट नेमि-बहुपुत्र मुनीश्वर-अङ्गिरा मुनि और कृष्णाव के मस्तको मे महान् बलवान् वीरभद्र ने हनन किया था और परम यश- स्वी दक्ष का हनन करते हुए उसका शिर काट डाला था। हे द्विजोत्तमो ! उस शिर को अग्नि मे दग्ध कर दिया था ।३६।।३७॥ प्रतापी वीरभद्र ने करज के अग्रभाग मे देवमाता सरस्वती का नासिका का अग्र भाग काट लिया था। श्री से वृत वह प्रेत स्थान के मध्य मे भव की भांति स्थित था । इसी बीच मे भगवान् पद्म सम्भव ब्रह्माजी बोले । और महान तेजस्वी प्रमु ने भद्र से प्रणत होकर प्रार्थना की थी। हे भद्र ! अब अधिक क्रोध मत कगे, देवगण सब नष्ट हो गये हैं ॥३८॥३६॥ ५४०४ माजी से सम्म से कहा -हे सुव्रत ! अब पाप प्रसन्नता करिए और क्षमा कीजिए । परमेष्ठो ब्रह्म के प्रभाव से रोमजी गणो के साथ वह वीरभद्र भी उनकी प्रज्ञा से धीरे से शम को प्राप्त हो गया था पौर नितान्त शान्त होकर स्थित हो गया था। तथा वृषध्यज महादेव ।
[ लिङ्ग पुराण १८] भी अन्तरिक्ष मे उम समय सस्थित हो रहे थे ॥४१॥४२॥ सगण. सर्वद शर्व सर्वलोकमहेश्वर । प्रार्थितश्च व देवेन ब्रह्मणा भगवान् भव ॥४२ हताना च तदा तेषा प्रददौ पूर्ववत्तनुम् । इद्रस्य च शिरस्नस्य विष्णोश्च व महात्मन. ॥४४ दक्षस्य च मुनी द्रस्य तथान्येषा महेश्वर । वागीश्याश्च व नासान देवमातुस्तथैव च ॥४५ नाना जीवित चव वराग्गि विविधानि च । दक्षस्य ध्वस्त वकस्य शिरसा भगवान्प्रभु ॥३६ कल्पयामास वै वक्र लोलया च महान् भव । दक्षोपि लब्धसज्ञश्च समुत्थाय कृनाजलि ॥४७ तुष्टाव देवदेवेश श कर वृषभध्वजम् । स्तुतस्तेन महातेजा प्रदाय विविधान्वरान् ॥४८ गाणपत्य ददौ तस्मै दक्षायाक्लिष्टकर्मणे । देवाश्च सर्वे देवेश तप्टुवु परमेश्वरम् । ४६ नारायणश्च भगवान् तुष्टाव च कृताजलि । ब्रह्मा च मुनय सर्वे पृथक्पृयगजोद्भवम् ।।१० तुष्टुवुर्देवदेवेश नीलकठ वृपध्वजम् । ताग्देवाननुगृह्य व भवोप्यतरधीयत ॥५१ सभी कुछ प्रदान करने वाले समस्त लोको के महान ईश्वर भगवान् शम्भु को भी उनके गणो क सहित ब्रह्माजी ने प्रार्थना की थी ॥४३॥ उम समय मे जो भी देवगरण का हनन किया गण था उन सब का शरीर पुन महादेव ने दे दिया था अर्थात् उन्हे जीवित कर दिया था। इन्द्र का और विष्णु का भी शिर जो छिन कर दिया था वापिस प्रान कर दिया था। महेश्वर भगवान् ने मुनीन्द्र दक्ष का तथा अन्य लोगो वा कटा हुमा मस्तक दे दिया था और वाणी की अधिष्ठात्री सरस्वती देवी को नासिका ज्यों की त्यौं लगादी यो॥४४॥ १५॥ जो नष्ट हो गये थे उनका जीवन प्रदान वर अनेक वर भी प्रदान किये थे। वप्त मुख मदन-दाह ] [ ६९ वाले दक्ष का शिर भगवान् प्रभु ने लीला ही से पुनः कलिगत कर दिया था । फिर वह प्रजापति दक्ष सज्ञा । होश ) प्राप्त करके हाथ जोड कर खडा हो गया था ॥४६॥४७॥ दक्ष ने वृषभध्वज भगवान् शङ्कर का स्तवन पिया था। इस प्रकार से उसके द्वारा स्नति किये जाने पर म: - तेजस्वी शम्भु ने उसे अनेक वरदान प्रदान किये थे ॥४॥ उम प्राक्किा कर्म वाले दक्ष को शम्भु ने गाणपत्य पद प्रदान किया था । उस समय समस्त देवो ने परमेश्वर शम्भु का स्तवन किया था ।।४६॥ भगवान् नारायण ने हाथ जोडकर महेश्वर का स्तवन किया था। ब्रह्मा और समस्त गुनिगण ने पृथक् २ भगवान् देवदेवेश नीलकण्ठ वृपभ घज का स्तवन किया था । उन सब देवताग्रो पर अनुग्रह करके भगवान् भव भी फिर अन्तर्धान हो गये थे ॥५०॥५१॥ ॥ ६८-मदन-दाह ॥ कथं हिमवतः पुनी बभूवांवा सती शुभा। काथ वा दवदेवेशमवाप पतिमीश्वरम् ॥१ सा मेनाननुमाश्रित्य स्वेच्छयेव वरागना । तदा हैमवतो जज्ञ तसा च द्विजोत्तमाः॥२ जातकर्मादिकाः सर्वाश्चकार च गिरीश्वर । द्वादशे च तदा वर्षे पूणें हैमवती शुभा ॥३ तपस्तेपे तया धनुजा च शुभानना । अन्या च देवो धनुजा सर्वलोक नमस्कृता ।।४ अपयश्च तदा म सर्वलो महेश्वरीम् । तुष्ट्युम्तपसा देवी ममावृत्य समंतत. ॥५ ज्येष्ठ पर धनु मा चैकपर्णा शुभानना । नृतीया च वरारोहा तशा चस्पाटला १६ तपमा च महादेव्या:पावत्याः परमेश्वरः। वर्ग तो महादेवः सर्वभूत पतिर्भवः ।। इस एरसो एक प्रध्याय में पार्वती का तप एवं जन्म मौर कामदेव १०० ] [ लिङ्ग पुराण पा शिव के द्वारा दाह का वर्णन किया जाता है । ऋपियो ने कहा- सती अम्बा हिमवान् की पुत्री के स्वरूप में कैसे हुई थी और उसने देवे. श्वर शम्भु को अपना पति किस प्रकार से प्राप्त किया था ? ॥१॥ सूत- जी ने कहा है द्विजोत्तमो | उस सती देवी ने अपनी ही इच्छा से तप के द्वारा पोर हिमालय की प्राराधना से मेना के तनुका प्राश्रय ग्रहण करके हैमवती प्रादुर्भूत हुई थी ॥२॥ गिरीश्वर हिमवान ने उस हैमवती देवी के समस्त जात कर्म प्रादि सस्कार सविधि किये थे। जब वह बारह वर्ष की पूरी अवस्था प्राप्त कर चुकी तो उसने तपस्या की थी। उसके साथ शुभ प्रानन वाली उसकी अनुजा भी थी। और अन्य भी एक उसकी छोटी बहिन थी जो समस्त लोको के द्वारा वद्यमान थी ॥३॥४॥ उस समय मे उस पार्वती के चारो ओर एकत्रित होकर सर्वलोक महेश्वरी का सव ऋषिगणो ने स्तवन किया था ॥५॥ पार्वती की तीन भगिनियां थी। उनके नाम बताये जाते हैं सबसे बड़ी अपर्णा थी और छोटी सुन्दर मुख वाली एक पर्णा थी तथा तीसरी सुन्दर प्रारोह वाली एक पाटला थी ।।६। उस समय मे पावती के तप से समस्त भूतो के स्वामी भव महादेव वशीकृत हो गये थे !|७|| एतस्मिन्नेव क ले तु तारको नाम दानव । तारात्मजो महातेजा बभूव दितिनदन ॥ तस्य पुत्रास्त्रयश्चापि तारकाक्षो महासुर । विद्युन्माली च भगवान् कमलाक्षश्च वीर्यवान् ॥E पितामहस्तथा चपा तारो नाम महावल । तपसा लब्ध वीयश्च प्रसादाबह्मण प्रभो ॥१० सोपि तारो महातेजावं लोक्य सचराचरम् । विजित्य समरे पूर्व विष्णु न जितवानसौ ॥११ तयो समभवद्युद्ध सुघोर रोमहर्पणम् । दिव्य वपसहस्र तु दिवारासमविश्रमम् ॥१२ सरथ विष्णुमादाय चिक्षेप शतयोजनम् । तारेण विजित सख्ये दुद्राव गरु:ध्वज ॥१३ मदन दाह ] [१०१ तारो वराञ्छतगुणं लब्ध्वा शतगुणं बलम् । पितामहाज्जगत्सर्वमवाप दितिनंदनः ।।१४ इसी समय मे तारक नाम वाला दानव हुआ था । दिति का पुत्र तारात्मज महान तेज वाला था (III उसके तीन पुत्र थे। तारकाक्ष महान असुर था-दूसरे का नाम विद्युन्माली था और तीसरा महान् परा- क्रमी कमलाक्ष हुमा था॥६॥ इनका पितामह तार नाम वाला महान घलवान् था। उसने प्रभु ब्रह्मा के प्रसाद से तपस्या के द्वारा अतुल पल- वीर्य की प्राप्ति की थी। ॥१०॥ वह तार महान् तेजस्वी था और इस समस्त चराचर को जीत पर फिर युद्ध मे विष्णु को भी पराजित कर दिया था । ।।११॥ विष्णु और तार इन दोनो का अतिघोर तथा बहुत ही भयानक रोमहर्पण महान् युद्ध-हुमा था । यह युद्ध लगाता रात दिन एत सहस्र दिव्य वर्षों तक हुआ था ॥१२॥ इसने रथ के सहित विष्णु को पक्ड पर सो योजन दूरी पर फेंक दिया था । उस युद्ध में गरड. ध्वज विप्] तार से विजित होर भाग गये थे ॥१३॥ तार दानव ने पितामह से शतगुण वरो यो प्राप्त पर तथा शगुण बल का लाभ पर उस दिति नन्दन ने समस्त जगत् को प्राप्त पर लिया था ॥१४॥ देवेद्रप्रमुखान्जित्वा देवान्देवेश्वरेश्वर । वारयामास तर्देवान्सकोके पु मायया ||१५ देवताश्च महेद्रेण तारक दयपीडिना । न शाति लेभिरे शूराः शरण वा भयादिता ॥१६ तदामरपतिः श्रीमान् राग्निपत्यामरप्रभु । उवाचोंगिरसं देवो देवानामपि सन्निधौ ॥१७ भगवस्तारको नाम तारजो दानवोतमः । सेन सनिहता युने वत्सा गोपतिना यया । भयातस्मा महाभाग वृहयुद्ध वृहस्पते । अनियेता भ्रमत्येते आता इव परे ॥१४ पस्मार यान्यमोपानि मायुधान्यंगिरोवर । तानि गोपानि-जायते प्रभायादमnि. O १५२] [ लिङ्ग पुराण दरवर्षमहस्राणि द्विगुणानि वृहस्पते । विपरगुना योधितो युद्ध तेनापि न च सूदितः ॥२१ देवेश्वरेश्वर ने देवेन्द्र प्रमुख देवो को जीत कर माया से देवों को समस्त लोकों मे पास पर दिया था ॥१५॥ इन्द्र के सहित देवताओं ने तारक के भय से उत्पीडित होते हुए कही भी शान्ति प्राप्त नहीं की थी और उन भय से दुसियो को कोई भी रक्षा करने वाला नहीं मिला था ॥१६॥ उस समय देयो का स्वामी इन्द्रदेव जो कि प्रमरो का प्रभु मौर श्री सम्पन्न था साङ्गिरस मुनि के घरगो मे पटकर देवों को सन्निधि मे ही बोला॥१५॥ हे भगवन् ! तार में उत्पन्न होने वाला दानव शिरोमरिया तारक नामधारी दैत्य है मौर उसने गोपति के द्वारा बरसो की भांति हम लोगों को युद्ध मे भली-भांति निहत रिया है ॥१८॥ महाभाग बृहस्प. तिजी ! इस विशाल युद्ध मे उसके भय से ये सव देवगए विना पाश्रय वाले पक्षर मे पक्षियो की भांति भ्रमण किया करते हैं ॥१६॥ हे अङ्गि- रोवर ! हमारे जो भी अमोध मायुध थे वे सब देव शत्रु के प्रभाव से मोघ विफल ) हो गये थे ॥२०॥ हे वृहस्पते ! दश हजार से भी दुगुने वों तक विष्णु ने उसके साथ युद्ध किया था किन्तु वह उनके द्वारा भी नहीं मारा गया है ॥२१॥ यस्तेनानिजितो युद्ध विष्णुना प्रभविष्णुना। कथमस्मद्विधस्तस्य स्थास्यते समरेऽग्रतः ॥२२ एवमुक्तस्तु शकण जोवः सार्ध सुगधिपः । सहस्राक्षेण च विभुसप्राप्याह कुशध्वजम् ।।२३ सोपि तस्य मुखाच्छु त्वा प्रणयात्प्रणतातिहा । देवरशेपः सेट्टैस्तु जोवमाह पितामहः ।।२४ जाने वोति सुरेद्राणां तथापि शृणु साप्रतम् । विनिंद्य दक्षं या देवी सती रुद्रांगसंभवा ।।२५ उमा हैमवती जज्ञे सर्वलोकनमस्कृता। तस्याश्चवेह रूपेण यूयं देवाः सुरोत्तमाः ॥२६ विभोर्यतध्वमाक्रष्टुं रुद्रस्यास्य मनो महत् ।
मदन-दाह ] [ १०३ तयोर्योगेन सभूनः स्कंदः शक्तिधरः प्रभुः ।।२७ पडास्यो द्वादशभुजः सेनानीः पावकः प्रभुः । स्वाहेयः कार्तिकेयश्च गागेयः शरधामज: ॥ देवः शान्वो विशाखश्च नेगमेशश्च वीर्यवान् । सेनापतिः कुमारारूप: सर्वलोकनमस्कृतः ॥२६ जो महाबली दानव प्रभविष्णु विष्णु के द्वारा भी युद्ध मे नही निजित-दुपा है फिर हमारे जैमा समर में उसके सामने किस तरह स्थित रहेगा ।।२२॥ इन्द्र के द्वारा ऐसे कहे जाने पर वृहस्पति इन्द्र और ममम्त देवो को साथ मे लेकर विभु कुश ध्वज के पास पहुंच कर यह बोले ॥२॥ वह भी प्रणय से प्रणतो की पोहा के हरण करने वाले पितामह उस वृहस्पति के मुख से उनकी पीडा का हाल सुनकर सम्पूर्ण देगा और इन्द्र के सहित वृहस्पति से बोले ॥२४॥ मैं सुरेन्द्र माप लोगो को पीडा को जानता हूं तो भी अब सुनिये । दक्ष प्रजापति को विनिन्दिन व रवे जो रुद्र के अङ्ग से सम्भूत हुई देवी सती है वह सम्पूर्ण लाको के द्वारा वन्दित हाना हुई हेमवनी उमा उत्पन्न हुई है । माप सुरा म अंग दल गण मय उसक रूप-लावण्य के द्वारा विभु इन रुद्रदेव के महान मन को पापित करने वा यत्न करें। उन दोनो बा जव योग हागा तो उमसे शक्ति के धारण करने वाले प्रभु स्वन्द उत्पन्न होगे ।।२५।२६।। ७॥ वह स्कन्द छ मुख वाले-यारह भुजानो से युत्ता-सेनानी ( सेना ये नायक ) और प्रभ एव पाकि हैं। उनके नाम स्वाहेय- पातिरेय गाङ्गेय शरधात्मज देव शाख-विशाख-नेगमेश-वीर्यवान्-सेनापति मौ कुमार य है जो कि सम्पूर्ण लोगो के द्वारा बन्यमान हैं ।।२८॥२६॥ लीलयव महासेन प्रबल तारकासुरम् । व लोप विनिहत्यको देवान् संतारयिष्यति ॥३० एवमुक्त स्तदा तेन ग्रह्मणा परमेष्ठिना। वृहस्पसिया सेद्र देवदेवं प्रणम्य तम् ॥३१ मेरोः शिवरमासाद्य स्मरं सस्मार सुव्रतः । स्मरणादेवदेवस्य स्मरोपि सह भार्यया ॥२२
१०४ ]
[ लिग पुराण
रत्या सम समागम्य नमस्कृत्य कृताजलि ।
सशक्माह त जीवं जगज्जीवा द्विजोत्तमा ॥३३
स्मृतो यद्भवता जीव सप्राह तवातिकम् ।
वहि यन्मे विधातव्य तमाद सुरपूजित । ३४
तमाह भगवान्छक सभाव्य मकरध्वजम् ।
शकरेणाविकामद्य सयोजय यथासुसम् ॥३
वह बालक भी होते हुए महारोन लोला ही से उस प्रबल तारकासुर
को एक अकेला ही मार कर सब देवो का सन्तारण वर देंगे ॥३०॥ इस
प्रकार से ब्रह्मा के द्वारा कहे हुए वृहस्पति ने इद्र के तथा देवो वे सहित
उनको प्रणाम किया था। फिर सुन्नत ने मेरु पर्वत के शिखर पर पहुंच
पर कामदेव का स्मरण किया था। देवो के देव के स्मरण करने से
वामदेव भी अपनी भार्या रति को साथ लवर वहाँ मा गया और उसने
हाय जोड कर गुरु और इद्रदव को नमस्कार किया था। हे द्विजथष्ठो ।
समस्त जगत् का जीव वह वामदेव इद्र के सहित वृहस्पति से बोला । हे
वृहस्पति जी । अापके द्वारा स्मरण किये जाने पर मैं यहां अापके समीप
म उपस्थित हो गया हूँ। अब मुझे माज्ञा दीजिए कि मुझ क्या करना
है। तब सुर गुरु ने उससे कहा था ॥३१॥३२॥३३॥३४॥ भगवान्
इन्द्रदेव ने उससे कहा और मकरध्वज पूरी प्रशसा की थी। अब तुम सुख
पूर्वक अम्बिका देवी का भगवान शङ्कर के साथ सयोग करादो ॥३५।।
तया स रमते यन भगवान् वृपभध्वज ।
तेन मार्गेण मार्गस्व पल्ल्या रत्याऽनया सह । ३६
सोपि तुष्टो महादव प्रदास्यति शुभा गतिम् ।
विप्रयुक्तस्तया पूर्व लब्ध्वा ता गिरिजामुभाम् ।।३७
एवमुक्तो नमस्कृत्य देवदव शचीपतिम् ।
दवदवाश्रम गतु मति चक्रे तया सह ॥३८
गत्वा तदाश्रमे शभो सह रत्या महाबल ।
वसतेन सहायेन देव योक्नुमनाभवत् ॥३
तत सप्रेक्ष्य मदन हसन् देव स्त्रियवक ।
मदन दार नयनेन तृतीयेन मावशं तमवक्षत ॥४० ततोस्य नेत्रजो वह्निर्मदन पार्वत. स्थितम् । अदहत्तत्क्षरणादेव ललाप करुणं रतिः ॥४१ रत्या प्रलापमाक्र्ण्य देवदेवो वृपध्वज । कृपया परया प्राह कामपत्नी निरीक्ष्य च ॥४२ ऐसा प्रीति सयोग होना चाहिए कि भगवान् वप ध्वज उस अम्बिका देवी के साथ रमण करने लगें। अब इस अपनी पत्नी रति के साय वही मार्ग तुम खोज लो ।।३६। यह महादेव भी परम सन्तुष्ट होकर तुमको बहुत अच्छी गति प्रदान करेंगे क्योकि उस उमा से वे इस समय विप्रयुक्त हो रहे हैं । उस गिरिजा उमा को वे पुन. प्राप्त कर लेंगे तो उनको बडा तोप होगा ।।३७।। इस तरह से कहा हुए कामदेव ने शची के पति देवेन्द्र को न:स्सार पिया और फिर देवो के भी देव महादेव के प्राथम मे उस पत्ती रति के साथ जाने का विचार किया था ॥३८॥ उस समय शम्भु के पाश्रम में पहुंच कर महान् बलवान् कामदेव रति के सहित वसन्त की सहायता से उन देव को पार्वती के सङ्गत कर देने का मन किया था ।।३६। इसके अनन्तर कामदेव को देखकर भगवान् श्य- म्बक ने हंसते हुए उसको अवज्ञा पूर्वक अपने तीसरे नेत्र से देखा था 1॥४०॥ इसके अनन्तर उम शिव के नेत्र से समुत्पन्न अग्नि ने पास मे स्थित मदन को तुरन्त ही दग्ध कर दिया था । मदन ( पति ) को दग्ध देखकर उसकी भार्या रति करुणा के साथ रुदन करने लगी ॥४१॥ रति के प्रलाप का श्रवण कर वृषध्वज देव ने परम कृपा से काम की स्त्री को देखकर उससे कहा ॥४सा अमूर्तोपि ध्र व भद्र' कार्य सर्व पतिस्तव । रतिकाले ध्र व भद्रे करिष्यति न सशय ॥४३ यदा विष्णुश्च भविता वासुदेवो महायशा. 1 शापाद्भगोर्महातेजाः सर्वलोकहिताय वै ।।४४ तदा तस्य सुतो यश्च स पतिस्ते भविष्यति । सा प्रणम्य तदा रुद्र कामपत्नी शुचिस्मिता ।।४५
१८६]
। लिङ्ग पुराण
जगाम मदन लब्ध्वा वसतेन समन्विता ॥४६
हे भद्र! यह अक विना मूति वाला भी तेरा पति तेरा समाजा
कार्य भली-भांति निश्चित रूप से सम्पादन क्यिा करेगा। जिस समय
रति का काल होगा तो है भद्रे ! यह तेरा पूर्ण तोष करेगा इसमे कुछ
भी सराय नहीं है ॥४३॥ जिस समय भगवान् विष्णु वासुदेव होगे अर्थात्
महान् यश वाले और वसुदेव के यहां जन्म ग्रहण करेंगे जो कि महान
तेजस्वी विष्णु भृगु के शाप से समस्त लोको के कल्याण के लिये ही
अवतीर्ण होगे ॥४४॥ तक तेरा यह पति उनके पुन के रूप मे समुत्पन्न
होगा। तब उम रति कामदेव की पत्नी रुद्र को प्रणाम करके मुस्कराती
हुई मदन को प्राप्त कर वसन्त के साथ वहां से चली गई थी॥४॥४६०
॥ ६९-उमा-स्वयंवर,
तपसा च महादेव्याः पार्वत्या वृपमध्वजः।
प्रीतश्च भगवाञ्छो वचनाद्ब्रह्मणस्तदा ॥१
हिताय चाश्रमाणा च क्रीडाथ भगवान्भव ।
तदा हेमवती देवीमुपयेमे यथाविधि ॥२
जगाम स स्वय ब्रह्मा मगेच्या_महर्षिभिः ।
तपोवनं महादेव्या पार्वत्या. पद्मसंभवः ॥३
प्रदक्षिणी कृत्य च ता देवी स जगतोरणीम् ।
किमर्थ तपसा लोकान्संतापयसि शैलजे ॥४
त्वया सृष्ट जगरसवं मातस्त्व मा विनाशय ।
त्वं हि सघारये लोकानिमान्सस्वितेजसा ॥
सर्वदेवेश्वरः श्रीमान्सवेलोकपतिर्भवः।
यस्य ये देवदेवस्य वयं किंकरवादिनः ॥६
स एवं परमेशानः स्वयं च वरयिष्यति ।
वरदे येन सृष्टासि न विना यस्त्वयाबिके।"
इस अध्याय म तपश्चर्या से सन्तुष्ट देव शङ्कर से देवी का प्रसाद
और स्वयम्बर मे देवो का निग्रह मादि का निरूपण किया जाता है।
समा-स्वयंवर ] [ १०७ सूतजी ने कहा-उस समय ब्रह्मा के वचन से महादेवी पार्वती पोत- स्या से भगवान् घृपभध्वज शर्ष प्रीति युक्त हो गये थे ॥१॥ समस्त साथमो पे हित लिये और ग्रीडा परने के लिये भगवार भघ ने हैम- चती देवी को विधि-विधान के साथ विवाह कर लिग पा ।।२।। उस समय ब्रह्मा स्३य मरीचि प्रादि महपियो को साथ में लेकर महादेवी पार्वती के तपोवन मे गये थे। पद्म सम्भव ने उस देवी की परियामा यी पी पीर जगतों की निमित्त कारण भूता उस देवी से प्रणाम पूर्वष पहा था। हे गैलने ! भाप इस पठिन तप के द्वारा लोको यो रिस पन पी प्राप्ति के लिये सतत कर रही है ॥३॥४॥ है माता ! प्रापने ही इस सम्पूर्ण जगत् का सृजन रिया है । अव प्राप इसका किनारा मा परो। माप ही इन समस्त लोगो को अपने तेग पे द्वारा राम्धारण परती है ॥शा समस्त देयो पे स्वामी मोर सर लोरो के पति श्रीमान भव है। हम गय तो उस देयो मे देव पेकार रहे जाने याले है।वह ही परमे- पान स्वयं भापता यरण बरंगे ।रे परदे ! पे भाग यिना मन्यिो। राना गाय नही परेंगे ॥६॥७॥ वर्तते न व सहस्तव भर्ना भविष्यति । प्रत्युक्त्या तां नमस्टरप मुहुः सप्रेक्ष्य पावंतीम् ।। गते पितामहे देवो भगवान् परमेश्वरः। जगामानुग्रह पत्तद्विजम्पंग चायमम् ।। गा पहला मरूपेण मस्थितम् । प्रतिभा प्रभुभात्या ननाम पमपजम् ।।१० ज्य व देव नगन्यपनागनम् । सुष्टाय परमेगान पानी परधरम् ॥ अनुगृत्य समायोमुगाप प्रगति पुमपर्माश्रयमान भगरस्य महारमन. ।।१२ मोहाय मम सर्मगनिर्भपः। सायपर मादेषितालिगुगामने पारपाप र पो गई मह पता।
१८ [लिङ्ग पुराणे इत्युक्त्वा तां समालोक्य देवो दिव्येन चक्षुपा ॥१४ इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है। वे अापके भर्ता अवश्य ही होगे। इतना कहकर उस देवी को नमस्कार परके पुन: उन्होंने उस देवी का दर्शन किया था ॥६॥ पितामह के चले जाने पर देव भगवान् परमेश्वर ने एक द्विज का रूप धारण कर अनुग्रह करने के लिये वे उसी प्राथम मे गये थे। उस देवी ने एक द्विज के स्वरूप मे स्थित महादेव का दर्शन किया था । उनको प्रतिभा प्रादि से पार्वती ने अपने प्रभु को पहिचान निया और फिर उसने वृषभ ध्वज को प्रणाम किया था ॥१०॥ ब्राह्मण के वेप मे छल करके समागत वरद देव का पार्वती ने भली-भांति पूजन किया था और फिर पार्वती परमेशान परमेश्वर का स्तवन किया था ॥११॥ तव तो उस देवी पर अनुग्रह करके शम्भु हँसते हुए उससे वोले । हे महादेवि ! महात्मा भूयर के कुल के धर्म की रक्षा करते हुए सब देवो का स्वामी भव क्रीड़ा के लिये सत्पुरुषो के मध्य मे तुम्हारे दिव्य सुशोभन स्वयम्वर मे सौम्य स्वरूप मे समास्थित होकर मैं तेरे साथ पाऊँगा। उस देवी से इस प्रकार से यह कहकर देव ने अपनी दिव्य श्वक्षु से उसे देखा था ॥१२॥१३॥१॥ जगामेष्टं तदा दिव्यं स्वपुरं प्रययौ च सा। दृष्ट्वा हृष्टस्तदा देवी मेनया तुहिनाचलः १५ प्रालिंग्याघ्र य संपूज्य पुत्री साझात्तपस्विनीम् । दुहितुर्देवदेवेन न जानन्नभि मंत्रितम् ।।१६ स्वयंवरं तदा देव्याः सर्नलोकेष्वघोषयत् । अथ ब्रह्मा च भगवान् विष्णु. साक्षाजनार्दनः ॥१७ शक्रश्च भगवान् वह्निर्भास्करो भग एव च । त्वष्टार्यमा विवस्वाश्च यमो वरुण एव च ॥१८ वायुः सोमस्तथेशानो रुद्राश्च मुनय स्तथा । अश्विनी द्वादशादित्या गर्वा गरुडस्तथा ॥१६ यक्षः सिद्धास्तथा साध्या दैत्या: किंपुरुषोरगाः। ससुद्राश्च नदा वेदा मंगाः स्तोत्रादयः क्षणाः ॥२० उमा-स्वयंवर ] [१० नागाश्च पर्वता सधै यज्ञाः सूर्यादयो ग्रहा । त्रयस्त्रिाच्च देवाना त्रयश्च त्रिशतं तथा ॥२१ त्रयश्च त्रिसहसंच तथान्ये बहवः सुराः । जम्मुगिरीद्रपुत्र्यास्तु स्वयंवरमनुत्तमम् ॥२२ उस समय मे वह देवी अपने अभीष्ट परम दिव्य मिज पुर को चली गई थी । तब तुहिनाचल मेना के सहित उस देवी को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुपा था ॥१॥ हिमदार ने उम साक्षात् तपस्विनी पुत्री का प्रालिङ्गन कर सत्कार करके और उसके मस्तक को सूप वर देवो के देव शिव द्वारा दुहिता को दिये हुए सकेत को नही जानते हुए हिमालय मे देवी वा स्वयम्बर समस्न लोको मे उद्घोषित कर दिया था। इसके मन- न्तर वहाँ पर ब्रह्मा-साक्षात् जनार्दन भगवान विष्णु, इन्द्र-अग्नि-भग- स्वष्टा-अर्यमा विवस्वान् यम-दरुण वायु सोम-ईशान-रुद्र-मुनिगण यश्विनी- कुपार द्वादश प्रादित्य-गन्धर्व गाड-यक्ष-सिद्ध साध्य-दैत्यगण-विम्पुरुप उ- रग-समुद्र-नद-वेद-मन्त्र मण्डल स्तोत्रादि-क्षण नाग पर्वत-समस्त यज्ञ सूर्य प्रभृति ग्रह-तीन सहस्र तीन सौ तेतीस देवतायो के भेद तथा अन्य बहुत से सुरगण गिरि शिरोमणि हिमवान् की पुत्री के परम श्रेष्ठतम इस स्वयम्वर मे गये थे ॥१६॥१७॥१८॥१६॥२०॥२१॥२॥ प्रय शैलसुता देवी हैमम रुह्य शोभनम् । विमानं सवतोभद्रसर्चरत्नैरलंकृतम् ॥२३ अप्परोभिः प्रनृत्ताभि सर्वाभरणभूपितैः । गर्वसिद्ध विविधः किन्नरश्न सुशोभनं १।२४ चादिभि स्तूयमाना च स्थिता शैलसुता तदा । सितापन रत्नाशुमिश्रित चारहत्तथा ॥२५ मालिनी गिरिपुष्यास्तु संध्यापूर्णेन्दुमंड रम् । चामरासत्ताहस्ताभिर्दिष्यत्रीभिश्च संता॥२ मालां गृह्य जया तस्यो सुरद्रुमसमुद्भवाम् । विजया व्यजनं गृह्य स्थिता देव्या. समीपणा ॥२७ माला प्रगृह्य देव्या तु स्थिताया देवससदि।
११० ] [ लिङ्ग पुराण शिशुभूत्वा महादेवः कोडार्थ वृषभध्वजः ।। उत्सङ्गालसंसुमो बभूव भगवान्भवः । अथ दृष्ट्वा शिशु देवास्तस्या उत्सङ्गवत्तिनम् ॥२६ इसके अनन्तर रोलराज की पुत्री देवी पार्वती सुवर्ण से निर्मित परम शोभा से समन्वित विमान में समारूढ हुई थी। वह विमान सभी प्रकार से बहुत ही भद्र था और समस्त प्रकार के रत्नो से समलङ्घन हो रहा था ॥२३॥ सम्पूर्ण आभरणो से विभूषित नृत्य करती हुई अप्सरामों के द्वारा-गन्धर्व तथा मिद्धो के द्वारा-सुशोभन किन्नरो के द्वारा और वन्दी- गणों के द्वारा स्तवन की जाने वाली शैलराज की पुत्री पार्वती उस पर समारूढ हो रही थी । सित वर्ण का रत्नों की किरणो से मिश्रित एक छन उसके कार लगा हुप्रा था। ॥२४॥२५॥ माला धारण कर रही थी और गिरिवर की पुत्री का मुव सन्ध्या के समय मे पूर्ण चन्द्र मण्डल के समान सुशोभित हो रहा था । चमर हाथो मे लेकर दिव्य प्रङ्गनामों के द्वारा वह देवी सुसंवृत हो रही थी ।।२६।। जया नाम धारिणी उस देवी के ही समीप मे देव द म क पुष्पो द्वारा निर्मित माला को लिये हुए खड़ी थी। विजया हाथ मे व्यजन लिये हुए थी ॥२७॥ इसके अनन्तर समस्त देवगण ने उसके उत्सङ्ग ( गोद मे ) मे एक शिशु को देखा था। जिस समय वरमाला लेकर वह देवी देवो की सभा मे स्थिता थी महादेव वृप- भध्वज क्रीड़ा करने के लिये एक छोटा सा शिशु होकर उस पार्वती के उत्सङ्ग भाग मे सोया हुमा था ॥२८॥२६॥ कोयमत्रेति मंत्र्य चुक्षुभुश्च समागताः । वनमाहाग्यत्तस्य वाहु मुद्यम्य वृत्रहा ॥३० स बाहुरद्यमस्तस्य तथैव समुपस्थित.। स्तंभितः शिशुरूपेण देवदेवेन लीलया ॥३१ वचक्षेप्तुन शशाक बाहु चालयितु तथा । वह्निः शक्ति तथा क्षेतुन शशाक तथा स्थितः ॥३२ यमोपि दंडं खङ्गच निऋतिमुनिपुगवा. । वरुणो नाग प शं च ध्वजयष्टि समीरणः ॥३३ प्रह्मा परमसं विग्नो ध्यानमास्थाय शंकरम् । उमा-स्वयंवर ] सोमो गदा धनेशश्च दड दडभृतां वरः । ईशानश्च तथा शूल तीव्रमुद्यम्य सस्थितः ॥३४ रुद्राश्च शूलमादित्या मुशल वसवस्तथा । मुद्गरं स्तंभिता सवें देवेनाशु दिचौकसः ।।३५ यह इस देवी की गोद मे कौन है - ऐसा विचार कर सभी समागत महानुभावो के हृदय में बहुत क्षोभ उत्पन्न हो गया था। उसके ऊपर इन्द्रदेव ने वाहु से उठाकर वज्र को चलाना चाहा था किन्तु उसका वह चाह वहाँ को वहां पर ही रह गया था । यह देवो के देष की लीला से स्तम्भित हो गया था जो कि एक शिशु के स्वरूप में यहाँ पर उपस्थित थे ॥३०॥३१॥ यह इन्द्र अपने उस वन को फैकने में समर्थ न हो सका था और न वह अपनी वाहु को ही चलाने-डुलाने में समर्थ हुआ था अनि अपनी शक्ति चलाने में असमर्थ हो गया था और ज्यों का त्यौं स्थित रह गया था ।१३२॥ यम भी अपने दण्ड को- निनि खड्ग को. वरुण अपने नाग पाश को और चायु अपनी ध्वज यष्टि को हे मुनि- थेष्टो । वहाँ चलाने में समर्थ न हो सके थे ॥३३॥ सोम गदा को- धनेश्वर कुवेर दण्ड धारियो मे प्रति श्रेणे अपने दण्ड को और ईशान अपने तीव्र शूल को उठार ही रह गये थे ॥३४॥ रद्रगण भी शूल को. प्रादित्य मुसल को और पसुगण मुद्गर को न चला सके थे। देव ने समस्त देवतामो को शीघ्र ही स्तम्भित कर दिया था ॥३५॥ रनभिता देवदेधेन तथान्ये च दिवौकस.। शिरः प्रकरयन्विष्णुश्वकमुद्यम्य मस्थित. ॥३६ तस्यापि शिरसो बाला स्थिरत्व प्रचकार ह । चक्र क्षेप्तु न शशाक वाहश्चालयितु न च ॥३, पूपा दतान्दशन्दतालमैक्षत मोहितः । सस्य पि दशनाः पेतुष्टमात्रस्य शभुना ॥३५ वलं तेजभ योगं च तपंवारतंभयद्विभुः । अब तेषु स्थिरोवेव मन्युमरमु सुरेष्वपि ॥३६ ११२ ॥ [ लिङ्ग पुराण बुबुधे देवमीशानमुमोत्सगे तमास्थितम् ॥४० स बुद्धा देवमीशानं शीघ्रमुत्याय विस्मित । ववंदे चरणो शंभोरस्तुवच्च पितामहः ॥ १ पुराणः सामसगीतः पुण्याख्यगुह्यनामभिः । स्रष्टा त्वं सर्वलोकाना प्रकृतेश्च प्रवत्तंकः ।।४२ देवदेव के द्वारा अन्य दियौपस भो सम्पूर्ण स्तम्भीभूत हो गये थे। विष्णु भी शिर यो प्रापित करते हुए अपने चक्क पो उद्यत पर सस्थित हो गये थे । उम वाल ने उनके सिर को स्थिर कर दिया था मौर यह भी चरा चलाने में तथा अपनी वाहु को हिलाने टुलाने में समर्थ न हो सो थे ॥३६॥३७॥ पूषा ने अपने दांतो यो पोसते हुए ही मोहित होर उस वार को देखा था। दाम्मु के द्वारा पेरल देगने ही से उस पूपा के दीन गिर पड़े थे ॥३८॥ शम्भु ने सब का बलोग मोर योग उसी प्रभार से स्तम्भित कर दिया था। इसी पनन्तर परयन्त कोष मे भरे हुए सम- रस देवगण उगी प्रकार से स्तम्भीभूत होगर स्थित रह गये थे तब ब्रह्मा मे परम विग्न होकर भगवान् गहर का ध्यान दिया था तो प्रमाजी पोशापा मि देवी पे उरान में साक्षात् भगवान शिव ही समा- रिया हो रहे ॥१९॥४॥ प्रधाजी ने ईशान देय को पहिचान पर विनित होते हा दोनही उपर सम्भु परमो पो यदना की थो पौर रितामह ने उारा स्तयन रिया पा ॥४१॥ यह राति पुराणों ने सागोगे तो और उारे गोपीय गुन नामों के द्वारा की गई थी। महारा-2 देय ! पाप तो गमला लोगों में गुना गरने मारपाको प्ररा कराने वाले 10 गुलिम सोना मरम्म्यमोश्वरः। मनामिदिमाग च स्यमेवा प्रयत ग. ॥४३ LEAणासा: पूर्ष पुगता। पामहरमा महायादो देयो नारायण प्रभु १४८ य पाती गाने हि | परirniमारता जमशरणागता ।।
उमा-स्वयंवर ] [११३ नमस्तुभ्यं महादेव महादेव्यै नमोनमः । प्रसादात्तव देवेश नियोगाच्च मया प्रजाः ॥४६ देवाद्यास्तु इमाः सृष्टा मूढास्त्वद्योगमोहिताः । कुरु प्रसादमेतेषां यथापूर्व भवंत्विमे ।।४७ विज्ञाप्येवं तदा ब्रह्मा देवदेवं महेश्वरम् । संस्तंभितांस्तदा तेन भगवानाह पद्मजः ।।८ मूढास्थ देवताः सर्वा नैव बुध्यत शंकरम् । देवदेवमिहायांतं सर्वदेवनमस्कृतम् ॥४६ हे ईश्वर ! पाप ही समस्त लोको का ज्ञान हैं । आप ही इन का प्रहझार है । हे ईश ! समस्त प्राणियो के और इन्द्रियो के प्रवर्तक भी पाप ही होते हैं ।।४३।। पहिले आपके ही दाहिने हाथ से पुरातन मैं सृष्ट हुमा हूँ। पाप बांये हाथ से हे महावाहो । नारायण प्रभु का सृजन हुआ था ||४४॥ हे सृष्टि के कारण ! यह प्रकृति देवी सदा ही आपकी पत्नी के स्वरूप में समास्थित होकर जगत का कारण बनी है । ॥४५॥ हे महादेव ! आपके लिये हम सब का नमस्कार है । इस महादेवी के लिये भी बारम्बार हमारा प्रणाम है । हे देवेश ! आपके ही प्रसाद से और यादेश से मैंने इस प्रजा का और देवगणों का सृजन किया था ॥४६॥ अब ये देवगण सब प्रापके योग से मोहित होकर मूढता को प्राप्त हो गये हैं । अब आप अनुग्रह करिये जिससे ये सब पूर्व की ही भौति हो जावें ॥४७॥ सूनजी ने कहा ब्रह्मा ने इस प्रकार से देवों के देव महेश्वर " स्तवन करके फिर उन स्तम्भित हुए देवो से कहा था -है देवगणो ! श्राप ऐसे मूढ होकर स्थित हो गये हैं कि प्राप लोगो ने भगवान शकर को नही पहिचाना है। ये देवो के देव और सब के द्वारा परम वन्दित शकर यहाँ पाये हुए हैं । ॥४८॥४६॥ गच्छध्वं शरणं शीघ्र देवाः शक्रपुगेगमा.। सनारायणका. सर्वे मुनिभि शकरं प्रभुम् ।।५० सार्ध मयैव देवेशं परमात्मानमीश्वरम् । अनया हैमवत्या च प्रकृत्या सह सत्तमम् ॥५१
११४]
[ लिङ्ग पुराण
तत्र ते स्तंभितास्तेन तथैव सुरसत्तमाः ।
प्रणेमुर्मनसा सर्वे सनारायणकाः प्रभुम् ।।५२
अथ तेषां प्रसन्ना भूद्देवदेवस्त्रियंबक. ।
यथापूर्वं चकाराशु वचनाद्ब्रह्मणः प्रभुः ।।५३
तत एवं प्रसन्ने तु सर्वदेवनिवारणम् ।
वपुश्चकार देवेशो दिव्यं परममद्भुतम् ॥५४
तेजसा तस्य देवास्ते सेद्रचंद्रदिवाकराः ।
सब्रह्मकाः ससाध्याश्च सनारायणकास्तथा ॥५५
सयमाश्व सरुद्राश्च चक्षुर प्राथयन्विभुम् ।
तेभ्यश्च परमं चक्षुः सर्वदृष्टौ च शक्तिमत् ॥५६
दद चापतिः शर्वो भवान्याश्च चलस्य च ।
लब्बा चक्षुस्तदा देवा इद्रविष्णुपुरोमाः ॥५७
सब्रह्मकाः सशक्राश्च तमपश्यन्महेश्वरम् ।
ब्रह्माद्या नेमिरे तूर्णं भवानी च गिरीश्वरः ।।५८
हे देवगणो ! इन्द्र को साथ मे लेकर पाप सब लोग शीघ्र ही भग.
घान् शङ्कर की शरणागति मे चले जानो। नारायण को भी साथ मे
लेकर समस्त मुनिगण शङ्कर की शरण का प्राश्रय ग्रहण करो ! मैं भी
परमात्मा ईश्वर की शरण मे चलता हूँ जो कि इस हैमवती अपनी प्रकृति
के साथ विराजमान हैं । ॥५०॥ १॥ तब वहाँ पर स्तम्भित होने हुए ही
नारायण के सहित समस्त देवगण ने मन से ही शङ्कर को प्रणाम किया
था। इसके मनन्तर देव देव त्र्यम्बक उन सब पर परम प्रसन्न हो गये थे
और ब्रह्मा की प्रार्थना के अनुसार सब को पूर्व की ही भांति कर दिया
था॥५३॥ इस प्रकार से प्रसन्न हो जाने पर वह जो समस्त देवो के द्वारा
नही देरो जाने वाले स्वरूप का त्याग करके देवेश ने परम दिव्य अत्यन्त
रमणीय एव अद्भुत शरीर धारण किया था॥५४॥ उस शंकर ये यु
के तेज से वे समस्त इन्द्र-चन्द्र-दिवाकर ब्रह्मा-साध्य यम-रुद्र और मारा-
यण हरि होन से हो गये थे । उन्होने भगवान् शम्भु चाप्रो की शक्ति
प्राप्त करने की प्रार्थना की थी। तव उन सब को देखने में समर्थ परम
उमा-स्वयंवर ] [ ११५ भक्षु अम्वा के पति ने प्रदान की थी। चन-शक्ति प्राप्त करके समस्त इन्द्र-विष्णु प्रादि परम प्रधान देवों ने तथा ब्रह्मा ने महेश्वर या दर्शन प्राप्त किया था । ब्रह्मा आदि सब देवों ने महेश्वर को प्रणाम किया था। भवानी मौर गिरीश्वर ने भी महादेव को प्रणाम दिया था 1 ॥ ॥१७॥५॥ मुनयश्व महादेव गणेशाः शिवसंमताः । ससर्जु पुष्पवृष्टिं च सेचरा: मिद्धचारणा देवदुंदुभयो नेदुस्तुष्टुवुमुनयः प्रभुम् । जगुगंधर्णमुरुषाश्च ननृतुश्चाप्पगेगणाः ।।६० मुमुहुगणपाः सर्व मुमोदांवा च पाती। तस्य देयो तदा हृश ममक्ष त्रिदियो साग ॥६? पादयोः स्थापयामाम मालां दिनां सुगधिनीम् । साघुमाध्विति संप्रोच्य तया तव पाचितम् ॥६२ मह दव्या नमश्चक : गिरोभिभूजलाश्रितः । स सह्मका देवा: मयक्षोरगराक्षमा.॥३३
११६ ]
[ लिङ्ग पुराण
॥ ७०-विघ्नेश्वर उत्पत्ति ।।
कथ विशयको जातो गजवक्यो गणेश्वर ।
कथन मावस्तस्यैव सूत वक्तुमिहार्हसि ॥१
एतस्मिन्नतरे दवा. सेद्रोद्रा समेत्य ते ।
धर्मविघ्न तदा कत्तु दैत्यानामभवन्द्विजा ॥२
असुग यातुधानाश्च राक्षसा क्रू रकर्मिरण ।
तामसाश्व तथा चान्ये राजसाश्च तथा भुवि ।।३
अविघ्न यज्ञदानाचे समम्पर्य महेश्वरम् ।
ब्रह्म ण च हरि विप्रा लब्धैसितवरा यत ।।४
ततोऽस्माक सुरश्रेष्ठा सदा विजयसभव ।
तेपा ततस्तु विघ्नार्थमविघ्नाय दिवौकसाम् ।।५
पुनाथं चैव नारीणा नराणा वर्मसिद्धये ।
विघ्नेश शकर स्रष्टु गर प स्तोतुमर्हय ॥६
इत्युक्त्त न्यो-यमनघ तुष्टुतु शिवमीश्वरम् ।
नम सर्वात्मने तुभ्य सर्वज्ञाय पिनाकिने । ७
इस अध्याय मे समस्त देवो के द्वारा शिव का स्तव तथा गम्भु से
विघ्नेश की सृधि के लिये कथन वा निरूपण किया जाता है । ऋपियो ने
कहा-गज के समान मुग्व वाले विनायक को कैसे उत्पत्ति हुई थी और
उनका इस प्रकार का प्रभाव कैसे हुपा था हे सूतजी । इस को बताने
की कृपा करिये। सूतजी ने कहा- इगी समय म इद्र और उपद्र के
सहित समस्त देयगणा, हे द्विजगणो । दैत्यो के धम काय मे विघ्न परने
के लिय एकत्रित हुए थे ॥१॥२॥ असुर यातुगन क्रूर कर्म करने वाले
राक्षम-तामस जीव और रजोगुण वाले जीयगण भूमण्डल म विना ही
किसी विनये यश मोर दान भादि के द्वारा महेश्वर को अपना frm
करते हैं तथा ब्रह्मा एव हरि का पूजन पर अपने अभीष्ट वरदान प्राप्त
कर लिया करते हैं ||३||४]] इसनिय हे मुरश्रेष्टो। तभी हमारा सदा
विजय सम्भव हो सकता है जब कि उन दैत्यों के विघ्न करने क लिये
और देवी के विघ्नी का नाम करने के लिये रियो को पुत्र प्राप्ति के लिये
॥१०॥दरारे प्रगगर गृति ने निभंग हार मिरया दर्शन पर राया प्रणाम पर पहा-ये देवगण प्रापरे पर पर गहुए वरदान प्रासपरने शिये पाहावापरानगर है॥११॥ मापसे दयों के बारा पिलगोनेसिपेनी प्रार्थना की है। निगसेहि विघ्नेश्वर उत्पत्ति ] [ ११७ और पुरुषों के कार्यों की सिद्धि के लिये हम सब लोग विघ्नो के स्वामी शङ्कर से गणप का सृजन करने के लिये स्तवन करें ॥१॥६॥ ऐसा पर- स्पर मे कहकर वे सब अनघ ईश्वर शिव की स्तुति करने लगे थे। देवों ने शिव से प्रार्थना को थो-हे देव ! सर्वात्मा सर्वज्ञ और पिनाक धारण करने वाले आपको हमारा सब का नमस्कार है ।।७।। यदा स्थिताः सुरेश्वरा. प्रणम्य चैवमीश्वरम् । तदा बिकापतिर्भवः पिनाकधृङ् महेश्वरः।। ददी निरीक्षण क्षणाद्भव. स तान्सुरोत्तमान् । प्रोमुरादराद्ध र सुरा मुदा लोचनाः ।। भवः सुध मृतोपमैनि रोक्षणनिरीक्षणात् । तदाह भद्रमस्तु वः सुरेश्वरान् महेश्वरः ।।१० वरार्थमीश वीक्ष्यते सुरा गृह गतारित्वमे। प्रणम्य चाह वाक्पति पनि निरीक्षा निर्भयः ।।११ सुरेतरादिमि. सदा ह्यविघ्नमयितो भवान् । समस्तकर्मसिद्धये सुरापकार कारिभि. ॥१२ ततः प्रसीदताद्भवान् सुविघ्नर्मकारणम् । सुरापकारकारिणा मिहेप एव नो वरः ॥१३ सूनजी ने कहा--जिस समय मे गुरेश्वर इस प्रकार से ईश्वर यो प्रणाम करके स्थित हुए थे तब जगदम्या | पति पिनाक ये धारण परने वाले महेश्वर भव ने एक क्षण मात्र के लिये उन सुरथोमो दिव्य घटा प्रदान की थी। उस समय देवगण ने पानन्द से पाद मंत्री वाने होरपडे ही मादर के साथ भगवान हर को प्रणाम पिया या ॥ भगवान राकर ने सुधामृत में समान प्रमो निरीक्षण के द्वारा दृष्टि से ही गुरेश्वरों रो मह कह दिया था तुम्हारा पल्याण होगा।
११८ ] [ लिङ्ग पुराण इन देवो के समस्त कार्यों की पूर्ण सिदि प्राप्त हो जावे क्योकि दैत्यगण देवो के अपकार करने वाले रहा करते हैं ॥१२॥ इसलिये हे देव । प्राप प्रसन्न होइये और सुरो के भपकार करने वालो के सुविघ्न कर्म का कारण हो जाव-यही हमारा यहां पर वरदान है जिसे हम प्राप से चाहते हैं ॥१३॥ ततस्तदा निशम्य वै पिनावधृक् सुरेश्वर । गणेश्वर सुरेश्वर वपुदधार स शिव ॥१४ गरणेश्वराश्च तुष्टुवु सुरेश्वरा महेश्वरम् । समस्तलोकसभव भवात्तिहा िण शुभम् ॥१५ इभाननाश्रितं वर त्रिशूलपाशधारिणम् । समस्तलोकसभव गजानन तदाबिका ॥१६ ददु पुष्पवर्ष दि सिद्धा मुनीद्रास्तथा खेचरा देवसधास्तदानीम् । तदा तुष्टुवुश्चैकदतं सुरेशा प्रणेमुगणेश महेश वितद्रा ।।१७ तदा तयोविनिगन सुभैरव समूत्तिमान् । स्थितो ननत्त बालक समस्तमगलालय ॥ विचित्रवस्त्रभूषगरलकृतो गजाननो महेश्वरस्य पुत्रकोऽभिवद्य तातम बिकाम् ॥१६ जातमान सुत दृष्ट्वा चकार भगवान्भव । गजाननाय कृत्यास्तु सर्वात्सर्वेश्वर स्वयम् ॥२० आदाय च कराम्या च सुसुखाभ्या भव स्वयम् । प्रालिंग्याघ्राय मूर्धान महादेवो जगद्गुरु ॥२१ इसके अनन्तर पिनाक वे धारण करने वाले सुरेश्वर महेश्वर ने यह धवरण करके शिव ने गणो के ईश्वर का वयु धारण कर लिया था ॥१४॥ उस समय म गणेश्वर और सुरेश्वरी ने महेश्वर का स्तवन किया था । जो समस्त लोगो को जम देने वाले-ससार की पीडा को हरण करने वाने-परम शुभ हैं । गज के मुख को धारण करने वाले मोर वर. दान तथा त्रिशूल एव पाग को ग्रहण किये हुए हैं। ऐसे समस्त लोको को जम प्रदान करने वाले गजानन को अम्बिका ने प्रसूत किया था।
[ ११६ विघ्नेश्वर उत्पत्ति ] उस समय सिद्ध-मुनीन्द्र सेचर और देव सघो ने आकाश पुष्पो की वर्षा की थी। उस समय मे सुरेशो ने प्रति समाहित होकर एक दन्त गणेश महेश की स्तुति की थी॥१५॥१६॥१७॥ उस समय उन दोनो से मूति- मान् सुभैरव जो समस्त मङ्गली का आलय है, निकला और वह बालक स्थित होकर नृत्य करने लगा या ॥१८॥ वह गजानन विचित्र वस्त्र और आभूपणो से अलकृत हो रहा था ऐमा यह महेश्वर का पुत्र उत्पन्न हुना और उसने अपने पिता शिव की तथा माता जगदम्बा की वन्दना की थी ॥१६॥ अपने उत्पन्न होने वाले पुत्र के जात कर्म आदि जो आवश्यक सस्कार थे वे शिव ने स्वय किये थे। और सर्वेश्वर शिव ने सुसुख करो से स्वय उसको लेकर उसका प्रालिङ्गन करके तथा मस्तक का आघ्राण करके जगद्गुरु महादेव ने गजानन को समस्त कृत्यो को बता दिया था ॥२०॥२१॥ तवावतारो दैत्याना विनाशाय ममात्मज । देवानामुपकारार्थ द्विजाना ब्रह्मवादिनाम् ॥२२ यशश्च दक्षिणाहीन कृतो येन महीतले । तस्य धर्मस्य विघ्न च कुरु स्वर्गपथे स्थितः ॥३ अध्यापनं चाध्ययन व्य ख्यानं कर्म एव च । योऽन्यायत करोत्यस्मिन् तस्य प्राणान्सदा हर ॥२४ वर्णाच्च्युताना नारीणा नराणा नरपुंगव । स्वधर्मरहिताना च प्राणानपहर प्रभो ।।२५ या स्त्रियस्त्वा सदा काल पुरुषाश्च विनायक । यति तासा तेपा च त्वत्साम्यं दातुमर्हसि ॥२६ त्वं भक्तान् सर्वयत्नेन रक्ष वालगणेश्वर । यौवनस्थाश्च वृद्धाश्च इहामुत्र च पूजित. ॥२७ जगन्येऽत्र सर्वत्र त्वं हि विघ्नगणेश्वरः। संपूज्यो वदनीयश्च भविष्यसि न सशय ॥२८ महेश्वर ने कहा--हे मेरे पुत्र । यह तेरा भवतार दैत्यो के विनाश करने के लिये ही हुआ है । तथा द्विजगण मौर देवो के उपकार के लिये १२. ] [ लिङ्ग पुराण है ॥२२॥ जिमने इस महीतल मे दक्षिणा से रहित यज्ञ क्यिा है पाप स्वर्ग के मार्ग मे स्थित होते हुए उसका विघ्न करेंगे ॥२॥ अध्यापन अध्ययन-व्याख्यान और कर्म जो न्याय से हीन कोई भी परे उसके प्राणो का हरण करो॥२४॥ हे नरथेष्ट ! जो नारियो या मरगण अपने वर्ण धर्म मे च्युत हो और अपने धर्म का समुचित पालन न परें उनके प्राणों का अपहरण करो।।२।। जो स्त्रियाँ तथा पुरुष सदा-सर्वदा है विनाय । प्रर्चन-यजन किया करते हैं उन स्त्रियो तथा पुरुषो को अपना साम्य नुमको देना चाहिए ॥२६॥ हे वालगणेश्वर ! तुम अपने भक्तो था सभी प्रकार के यलो द्वारा रक्षा करना। जो योवन मे स्थित हों तया वृद्ध हो और उनके द्वारा तुम्हारा प्रचंन किया जाये तो उनकी भी रक्षा फरना ।।२७॥ इस तीनो जगत् में यहाँ पर विघ्नगरपो ये ईश्वर भाप ही सर्वत्र भली-भांति पूज्य बन्दनीय होमोगे-इगमे युछ भी संशय नहीं है ॥२८॥ मां च नारायणं वापि ब्रह्माणमपि पुत्रक। यजति यी विप्रेरग्रे पूज्यो भविष्यसि IIFE सामनभ्यच्यं वल्य णं श्रोतं स्मात च लौकिकम् । युरने तस्य कल्याणमल्लारण भविष्यति । ३० ब्रहाण. क्षत्रियवैश्यं. शूदंचव गजानन । संपूज्य गपिदमयं भक्ष्यमोज्यादिमिः शुभैः ॥३१ मा गधपुप्पघूपा रनभ्यच्यं जगनाये । देवरपि तथान्य लक्ष्यध्य नास्ति फुत्रनिद ॥३२ अभ्यचयति ये लोहा मानवास्तु विनाराम् । ते पाचनीयाः समाधयिष्यति न संशयः ॥३३ पज हार न मायापि नममन्यान्मुरानपि । विनर्धापतित्वांपेनाचंयंति पलायिनः॥३४ समज प सदा विमागं गणपतिः प्रभुः। गणे: मा नमस्तस्याप्पनिहत्तस्य पानतः ॥३५ सदा प्रति सोकस्मिजयति गणेश्वरग।
नृत्यारंमः वयं शंभो. किमर्थ वा यपातथम् । शिवतांडव नृत्य प्रारंभ ] दैत्यानां धर्मविघ्नं च चकारासी गणेश्वरः ॥३६ एतद्वः कथितं सर्वं स्कंदाग्रजसमुद्भवम् । यः पठेच्छणुयाद्वापि श्रावयेद्वा सुखीभवेत् ॥३७ जो भी कोई मुझको नारायण को और ब्रह्मा को हे पुत्र । यज्ञों के द्वारा विप्र यजन किया करते हैं उन सभी पूजनार्चनो मे तुम्हारी सर्व- प्रथम पूजा होगी ॥ ३॥ जो बोई नुम्हारी पूजा न करके लौकिक कल्याण के लिये श्रोत तथा स्मार्त कम करना है उसका वह पल्याण अपल्याण के स्वरूप में परिवर्तित हो जायेगा ॥३०॥ हे गजानन ! समस्त कार्यों की सिद्धि के लिये ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य और शूद्रो के द्वारा भक्ष्यभोज्य श्रादि शुभ पदार्थों से भली-भांति पूजा करने के योग्य होगे ॥३१॥ इस त्रिलोकी में प्रापको गन्ध-पुष्प और धूप आदि से अम्पर्चना न करके देवों तथा अन्य किसी द्वारा भी कही कुछ भी प्राप्त नहीं हो सकता है ११३२।। जो मानव लोक भगवान् विनायक को अभ्यर्चना किया करते हैं वे इन्द्रादि देवो के द्वारा पूजनीय हुमा करते हैं-इसमे कुछ भी सशय नही है ॥३३।। प्रज-हरि और मुझको भी तथा शक प्रादि देवों को भी विघ्न वाधा किया करते हैं यदि वे फलार्थी होवर तुम्हारा प्रचंन नहीं करते हैं ॥३॥ उस समय गणपति प्रभु ने विघ्नगण का राजन किया था और वर के लाभ के उसी समय मे गणो के साथ नमस्कार करके उसके प्रागे ही स्थित हो गये थे ।।३। उसी दिन से लेकर लोग भग- वान् गणपति का इस लोक म पूजन करते हैं। इस गणेश्वर ने दैत्यों के धर्म मे विघ्न कर दिया था।॥३६।। यह सम्पूर्ण सन्द के अग्रज (बड़े भाई । वी उत्पत्ति तुमको बतला दी है। जो इसरो पडता है भयवा श्रवण करता है या किसी को दरो थवण कराता है वह परम सुस- सम्पन्न हो जाता है ॥३॥ ॥७१-शिवतांडव नृत्य प्रारंभ ॥ वक्तुमर्हसि पास्मा श्रुतः स्कंदाग्रजोद्भवः ।।१ १२२] लिङ्ग पुराण दारुकोऽसुरसंभू स्तपसा लब्धविक्रमः । सूदयामास कालाग्निरिव देवाद्विजोत्तमान् ॥२ दारुकेण तदा देवास्ताडिता. पीडिता भृशम् । ब्रह्म णं च तथेशानं कुमार विष्णुमेव च ॥३ यममिंद्रमनुप्राप्य वीवष्य इति चासुरः । हीरूपधारिभिः स्तुत्यैर्ब्रह्मास्युधि संस्थितैः॥४ बाधितास्तेन ने सर्वे ब्रह्म ण प्राप्प वै द्विजाः । विज्ञ प्य तस्मै तत्सर्वं तेन साधंमुमापतिम् ।।५ मंप्राप्य तुष्टुवुः सर्वे पितामहपुरोगमाः । ब्रह्मा प्राप्य च देवेशं प्रणम्य बहुधानतः ॥६ दारुणो भगवन्दारु. पूर्व तेन विनिजिताः। निहत्य दारुकं दैत्यं स्त्रीवघ्यं त्रातुमर्हसि ॥७ इस अध्याय मे नृत्यारम्भ के प्रसङ्ग से काली और क्षेत्रपाल का उद्भव निरूपित किया जाता है । ऋषियो ने कहा- स्वन्द के अग्रज के उद्भव का सब हाल भली-भांति श्रवण कर लिया है। अब कृपा कर यह बताइये और इसके बताने के योग्य भी हैं कि भगवान् शकर के नृत्य का प्रारम्भ किस कारण से हुमा,था और किस लिये हुआ था इसे ठीक- ठीक बताइये । सूतजी ने कहा-एक दारुक नाम वाला असुर हुआ था जिसने तप करके बहुत भारी पराक्रम प्राप्त कर लिया था। वह कालाग्नि की भांति देवो को और ब्राह्मणो को मारता था ॥१॥२१॥ उस समय में दाहक के द्वारा देवगरम ताडित और प्रत्यन्त ही उत्पीडित-हुए थे । यह असुर ब्रह्मा-ईशान-कुमार-विष्णु यम और इन्द्र के पास पहुंच कर स्त्री का रूप धारण करने पर भी वध करने वाला हो गया था। स्तुति करने योग्य ब्रह्मादि देव स्त्री का रूप धारण करके युद्ध मे सस्थित हो गये थे तो भी इसने उनको सताया था। हे द्विजो | इससे दुःखित एव बाधित होकर वे समस्त देवगण ब्रह्माजी के पास जाकर सब ख सुनाया और फिर ब्रह्मा को साथ में लेकर वे सब उमा के पति शिव के समीप मे गये थे ।।३।।४॥५॥ उन सब देवो ने, जिनमें पितामह प्रधान थे, शिव की चताडव नृत्य प्रारंभ ] [ १२३ स्तुति की थी। ब्रह्मा जी देवेश में निकट जारर प्रणाम करके अत्यन्त विनम्न होकर प्रार्थना करने लगे थे ॥६॥ हे भगवन् । दारु असुर बहा भारी दारुरा है। उसके द्वाग पहिले हो सब विनिजित हो गये हैं। प्राप उम स्त्री वध्य दारुण देत्य या वध करके सब की रक्षा करने के लिये समर्थ होते हैं ॥७॥ विज्ञप्रिं ब्रह्मण श्रुत्वा भगवान् भगनेग्रहा। देवोमुवाच देवेशो गिरिजा प्रहसनिय 15 भवती प्रार्थय भ्यद्य हिताय जगता शुभे । वधार्थ दाहास्यास्य स्त्रीयध्यस्य वरानने ॥ अथ सा तस्य वचन निशम्य जगनोरणि.। विवेश देहे देवस्य देवेशी जन्नतत्परा ।।१० एपेनासेन देवेश प्रविष्टा देवसत्तमम् । न विवेद तदा ग्रह्मा देवाचे द्रपुरोगमा ॥११ गिरिजा पूर्ववच्छभोदृष्ट्वा पास्वस्थिता शुमाम् । मायया मोहितस्तस्या रामोपि चतुगुम ॥१२ माप्रविष्टा तनुतस्य देवदेवस्य पार्यतो। पठम्थेन विपेरणास्य तनु च तदात्मन । १३ ता च शत्या तपाभूता तृतीयेनेक्षणेन । सराज वाली यामारि पालकठी व पदिनीम् ।
१२४ [ लिङ्ग पुराण को नहीं जाना था ||११|| पूर्व की भांति सम्भु के समीप में स्थित शुभा गिरिजा को देखकर सर्वज्ञ ब्रह्मा भी उस देवी की माया से मोहित हो गये थे ।।१२।। वह पार्वती देवो के देव शिव के शरीर मे प्रविष्ट हो गई और इनके कराठ मे स्थित विंध से उसने अपना शरीर धारण किया था ॥१३॥ उस देवी को उस स्थिति में जानकर काम के मर्दन करने वाले शिव ने काल कराठी कदिनी काली का सृजन किया था ॥१४॥ जाता यदा कालिमकालकंठी जाता तदानी विपुला जयश्रीः । देवतरागामजयस्त्वसिद्धघा तुष्टि वान्या परमेश्वरस्य ॥१५ जाता तदानीं सुरसिद्धसघा दृष्ट्वा भयादुद दुरग्निकलगम् । काली गरालकृतकालकंठीमुपेद्रपद्मोद्भवशमुख्श ॥१६ तथव जात नयनं ललाटे सिताशुलेखा च शि स्युदना । कठे करालं निशितं त्रिशूलं करे करालं च विभूणानि ॥७ साधं दिव्यांवरा देव्याः सर्वाभरणभूषिताः । सिद्धद्रसिद्धाश्च तथा पिशाचा जिरे पुनः ॥१८ धाज्ञया दारुक तस्याः पार्वत्याः परमेश्वरी। दानवं सूदयामास सूदयन्तं सुराधिपान् ॥१६ मरंभातिप्रसंगाढ तस्याः सर्वमिद जगत् । क्रोधाग्निना न विद्राः संबभूव तदातुरम् ॥२० भवोपि बालरूपेण श्मशाने प्रेतसकुले। रुरोद मायया तस्याः क्रोधाग्नि पातुमीश्वरः ॥२१ जिस समय में विष की कालिमा से वाले कराठ वाली बाली उत्पन्न हुई थी उस समय जय श्री बहुत हो गई थी। देवो से इतर जो असुर गण थे उनकी मसिद्धि से अजय हो गई और परमेश्वर वी भवानीकी तुष्टि हुई थी ॥१५॥ महाविष से समलकृत वच्छ पाली अग्नि के सहश स्वरूप वाली उस प्रवतीर्ण भगवती काली को देखकर ब्रह्मा-विष्णु और इन्द्र मादि समस्त देवगण भय से भागने लगे थे ॥१६॥ उस काली भग- वती के ललाट मे उमी प्रकार का एक शिव की भांति तीसरा नेत्र था और शिर में प्रति तीव्र चन्द्र की रेखा थी। उस वाली के कराठ में महा देवी ने उस बालभय को उठा लिया था और उसके मस्तक पा सूधकर शिवताडव नृत्य प्रारंभ ] कालकूट विप या तथा उसके हाथ मे अति तीक्ष्ण एव कराल त्रिशूल था। वह अनेक भूपण धारण किये हुए थी ।।१७]] उस देवी के साथ में दिव्य अम्बर पारण करने वाली तथा समस्त प्राभूपणो से भूपित अनेक देवियाँ और सिद्ध एय पिशाच,भी उत्पन्न हुए थे। ॥१८॥ पार्वती की प्राज्ञा से उस परमेश्वरी महाकाली ने सुराधियो के मारने वाले उस दारुक दानव को मार डाला था ॥१६॥ उसके वेग के अतिशय से यह सम्पूर्ण जगत् हे विप्रेन्द्रगरण | पाली की क्रोधाग्नि से आतुर हो उठा था १॥२०॥ भगवाद भव भी प्रेतो से घिरे हुए काशी के श्मशाग मे वाल रूप धारण कर क्रोधाग्नि का पान करने के लिये उस देवी की माया से रुदन करने लगे थे ॥२१॥ त दृष्ट्वा बालमीशान मायया तस्य मोहिता । उत्थाप्याघ्राय वक्षोज स्तन सा प्रददौ द्विजा १२ स्तनजेन तदा साध कोषमस्या पपो पुन । नोधनानेन वै बाल क्षेत्रारणा रक्षकोऽभवत् ।।२३ मूर्तयोऽष्टौ च तस्यापि क्षेत्रपालस्य धीमत । एव व तेन वालेन वृता सा क्रोचमूच्छिता ।।२४ कृतमस्या प्रसादार्थ देवदेवेन ताडवम् । सध्याया सर्वभुतेन्द्र प्रेतै प्रीतेन शूलिना ॥२॥ पीत्वा नृत्तामृत शभोराकट परमेश्वरो। ननत सा च योगिन्य प्रेनस्थाने यथासुग्वम् ।।२६ तत्र सब्रह्मका देवा सेनेपेद्रा समततः। प्रणेमुस्तुष्टुवु काली पुनर्देवी च पार्वतीम् ।।२७ एक सक्षेपत.प्रोवन ताइव शलिन प्रभो । योगानदेन च विभोस्ताडप चैति च परे ॥२ उम पालस्वरूप ईशान को देखकर उनकी माया मोहित होती हुई उसे अपना पक्षोज स्तन दे दिया था 1 |२२|| उस स्तन के दूध घाल शिय ने इस याली देवी या क्रोध पा पान किया था। इस कोष के साथ १२६ [ लिङ्ग पुराण से वह बाल शिव क्षेत्रों का रक्षक हो गया था ॥२३॥ उस धीमान क्षेत्र- पाल की आठ मूत्तियों हुई थी। इस प्रकार से उस बाल स्वरूप शिव के द्वारा वह मूच्छित हो गई थी ॥२४॥ इसकी प्रसन्नता के लिये उस समय मे देवों के देव महेश्वर ने ताण्डवाविया था। वह सन्ध्या का समय था पोर परम प्रसन्न मूली के साथ समस्त भूतों के स्वामी एवं प्रेतगण थे ॥२५॥ उस परमेश्वरी काली देवी ने कण्ठ पर्यन्त शिव के ताण्डव नृत्य अमृत का पान किया था और फिर वह भी उस प्रेतो के स्थान श्मशान में सुखपूर्वक नृत्य करने लगी थी तथा समस्त योगिनियां भी उसके साथ नाचने लग गई थी ॥२॥ वहाँ पर ब्रह्मा तथा इन्द्र एवं उपेन्द्र के सहित समस्त देवो ने उस काली को और फिर पार्वती को प्रणाम किया था तथा स्तवन किया था ॥२७॥ इस प्रकार से प्रभु शूली का जो ताण्डव नृत्य हुआ था उसका संक्षेप से तुम्को सुना दिया है। कुछ लोग भगवान् भव के ताण्डव नृत्य का कारण उनका योगानन्द ही बतलाते हैं ॥२८॥ ॥७२-उपमन्यु-चरित्र । पुरोधमन्युना सून गाणपत्य महेश्वरात् । क्षीराणंवः कथं लब्धो वक्तुमर्हसि सांप्रतम् ।।१ एवं कालो मुपालम्घ गते देवे त्रियवके । उपमन्युः समम्पर्य तपसा लब्धवान्फलम् ॥२ उपमन्युरिति ख्यातो मुनिश्च द्विजसत्तमाः । कुमार इत्र तेजस्वी कोडमानो यदृच्छया ॥३ कदाचित्क्षीरमरूपं च पोतवान्मातुलाथमे । ईयया मातुलमुतो ह्यपियत् क्षीरमुत्तमम् ॥४ पीत्वा स्थितं यथाकामं दृष्ट्वा प्रोवाच मातरम् । मातर्मातमहाभागे मम देहि तपस्विनि ॥५ गव्यं क्षीरमतिस्वादु नाल्पमुष्णं नमाम्यहम् । उपलालितवं पुत्रेण पुत्रमालिंग्य सादरम् ॥६ उपमन्यु-चरित्र [१२७ दुःविता विललापार्ता स्मृत्वा नैन्यमात्मनः । स्मृत्वास्मृत्वा पुनः क्षीरमुपमन्युरपि द्विजा । देहिदेहीति तामाह रोदमानो महाद्युतिः ।। इस अध्याय में भक्ति से परम प्रसस्त महेश्वर से उपमन्यु के सन्धित भमाद का वर्णन रिया जाता है । पियो ने कहा-हे सूतजी ! पहिले उपमन्यु ने महेश्गर से गाणपत्य प्राप्त किया था फिर उसने क्षीराव पसे प्रास किया था इसे प्राप अब यर्णन कौजिए॥१॥ मूतजी ने कहा- इस प्रकार से काली देवी को उत्पन्न मरके नियम्यक देव ये पले जाने पर-उपमन्यु ने प्रभ्यर्चना करके फन की प्राति को पो हे द्विज- वृन्द ! कुमार के समान तेज वाला यहच्या से कोटा परता हुमा उप. मन्यु-इस नाम से मुनि ग्यात हुमा पा [मा विसी समय में मातुल के पाश्रम मे पोडा सा क्षीर का पान कर लिया था फिर ईया से मामा के पुत्र ने उस उत्तम क्षीर या पान दिया था ॥४॥ इच्छा पूर्वक पान करके फिर माता को देपार मसे बोला चाहे महाभागे ! से माता ! है माता हे सास्पिनि ! मुझे दे दो ॥५॥ यह गरीर मत्पति स्वाद वाला है। यह थोटा भी गम नहीं है। मैं मापको नमस्कार करता हूँ। सूतजी ने पहा-६म प्रकार से पुत्र के द्वारा उप लालिप्त होती हुई पर्यात् रडे ही प्यार से वही गई उसने पुममा मादर के राम मालि- जन करो वह परयन्त दुसिर १६ मार पपनी निता गागरण परमात्तं यह विलाप परने लगी थी। उप न्यु वार २ समीर की याद र परप यह महार पनि याला रोना मा यही रह रहा या है माता ! मुझे धीर दो-सीर दो til उपत्याजितान्योजास्वय पिष्टा पसा तदा। चीजविष्टं तदालोय तोयेन गलभाविती ।। ऐघोहि मम पुत्रेति सामपूर्य ततः मृतम् । मालिग्यादाय धुगात प्रददी त्रिम पय: 16 पोवा पश्मिीर मामा दत्तद्विजोत्तमः। नंतरक्षीरमिति प्राह मातर कातिविहसः॥१० ।
[लिङ्ग पुराए दु.न्विता सा तदा प्राह सप्रेक्ष्याघ्राय मूर्धनि । संमाय ने पुत्रस्य कराभ्यां कमलायते ॥११ तटिनो रत्नपूर्णास्ते स्वगंप तालगोराः। भागहीना न पश्यति भक्तिडीनाश्च ये शिवे ॥११ राज्यं स्वर्ग च मोक्षं च भोजनं क्षीरसंभवम् । न र भंते प्रिय प्येषां नो तुष्यति सदा भवः ।।१३ भवप्रमादजं सर्व नान्यदेवप्रमादजम् । अन्यदेवेषु निरता दुःवार्ता विभ्रमंति च ॥१४ उस समय मे शिलोच्छ वृत्ति से उपाजित किये हुए बीजों को उसने पीस लिया था और उम बीजो की पिर वो उसने जल के साथ मालो- डित कर लिया था। मधुर भाषण करने वाली उसने हे वेटा ! मेरे पास चले मानो-ऐसे बहुत शान्ति के साथ पुत्र का प्रालिङ्गन परके दुख से प्रार्ता उसने अपने पुत्र को वह बनावटी दूध दे दिया था ।।८।। ॥६॥ हे द्विजोत्तम ! उस कृत्रिम ( वनावटी ) क्षीर को पोवर जो कि माता के द्वारा बना कर दिया गया था। यह क्षीर । नही है- ऐसा अत्यन्त विह्वल होकर वह माता से बोला ।।१०। उस समय अत्यन्त दु.सित होनी हुई उसने अपने पुत्र को देखकर तथा उसके मस्तक को सूघ कर और अपने हाथो से कमल के समान विशाल उसके नेत्रो के प्रासुपो को पोंछ कर वह बोली-॥११॥ वेटा, रत्नो से परिपूर्ण रहने वाली और स्वर्ग तथा पाताल मे गोचर होने वाली है । जो शिव मे भक्ति से रहित होते हैं वे भाग्यहीन पुरप उसे नहीं देखते हैं ॥१२॥ जिन पर शिव सर्वदा सन्तुष्ट नही रहते हैं वे राज्य-स्वर्ग-मक्ष-और क्षीर से बनने वाला भोजन इनकी प्रिय वस्तुएं नहीं प्राप्त किया करते हैं ॥१३॥ यह सभी कुछ शिव के ही प्रसाद से प्राप्त हुआ करते हैं और अन्य देवो की प्रसन्नता से नहीं प्राप्त होते है । जो अन्य देवो मे निम्त रहा करते हैं वे दुख से आर्त होर भ्रमण किया करते है ।।१४॥ क्षोरं तत्र कुतोऽस्माक महादेवो न पूजितः । पूर्व जन्मनि यद्दत्त शिवमुद्यम्य वै सुन ।।१५ भाग पर बहुत समाहित होते हुए उसने तर दिया था। उमा तप उपमन्यु-चरित्र ] [ १२६ तदेव लम्यं नान्यत्तु विष्णुमुद्यम्य वा प्रभुम् । निशम्य वचनं मातुरुपमन्युमहाद्युति ॥१६ वालोपि मातर प्राह प्रणिपत्य तपस्विनीम् । त्यज शोकं महाभागे महादेवोस्ति चेत्कचित् ।। ७ चिराद्वा ह्यचिराद्वापि क्षीरोद साधयाम्परम् । ता प्रणम्यवमुक्त्वा स तपः कत्तु प्रचक्रमे ।।१८ तमाह माता सुशुभ कुर्वीति सुतरा सुतम् । अनुज्ञातस्तया तत्र तपस्तेपे सुदुस्तरम् ॥१६ हिमवत्पर्वत प्राप्य वायुभक्षः समाहित. । तपसा तस्य विप्रस्य विधूपितमभूज्जगत् ॥२० प्रणम्याहुस्तु तत्सर्वे हरये देवसत्तमाः । थु त्वा तेपा तदा वाक्य भगवा पुरषोत्तमः । २१ वहाँ हम लोगो को क्षीर कैसे प्राप्त हो सकता है क्योकि हमने कभी शिव का पूजन नहीं किया है । हे बेटा, पूर्व जन्म मे भगवान् शिव का उद्देश्य करके जो दिया है वह ही मिलता है और विष्णु का उद्देश्य परके जो कुछ किया है उससे अन्म कुछ भी नहीं मिलता है । महान् धति वाले उस उपमन्यु ने माना के इस वचन को सुनकर उस बालक ने भी अपनी माता से कहा और उस तप स्वनी यो प्रणाम दिया था। उपमन्यु ने कहा -हे महाभागे । यदि को पर भी महादेव हैं तो तू अपना शोक स्याग दे ॥१५॥१६ ॥१७॥ शीघ्रता से या देर से मैं धीराक्ष का अवश्य ही साधन करूंगा । सून मी ने कहा --उग उपमन्यु ने अपनो माता को प्रणाम करके तपस्या करना प्रारम्भ कर दिया था ॥१८॥ उसकी माता उसरो योनी-शिव का माराधन मेरे पुत्र को गुभ कल्याण युक्त परे-इस प्रकार से अपनी माग द्वारा पापा प्राप्त पर उगने पठिन ताश्वर्या को पी ॥१६॥ हिमालय पर्वत में गायर येवल वायु या रो सम्पूर्ण जगा पिभित हो गया पा॥२०॥ उस समय सब देवतामो में प्रणाम र हरि रो पहा पा और भगवान् पुरुषोत्तम उसी समय [ लिङ्ग पुराण १३० उनके वाक्य का श्रवण किया था॥२१॥ किमिदं विति सचित्य ज्ञात्वा तत्कारणं च सः। जगाम मंदर तूणं महेश्वरदिदृक्षया ॥२ दृष्ट्वा देव प्रणम्यैव प्रोवाचेदं कृतांजलिः । भगवन् ब्राह्मणः कश्चिदुपमन्युरितिश्रुतः ॥२३ क्षीराथमदहत्सर्वं तपसा तं निवारय । एतस्मिन्नतरे देवः पिनाकी परमेश्वरः । शकरूपं समास्थाय गत चक्र मति तदा ॥२४ अथ जगाम मुनेस्तु तपोवनं गजवरेण सितेन सदाशिवः । सह सृरासुरसिद्धमहोरगैरमरराजतनु स्वयमास्थितः ॥२५ सहैव चारुह्य तदा द्विप तं प्रगृह्य वालव्यजन विवस्वान् । वामेन शच्या सहितं सुरेन्द्र करेण चान्येन सितात पत्रम् ॥२६ रराज भगवान् सोमः शक्ररूपी सदाशिवः । सितातपत्रेण यथा चंद्रबिवेन मंदरः ॥२७ प्रास्थायैवं हि शक्रम्य स्वरूप परमेश्वरः । जगामानुग्रह कत्तु मुपमन्योस्तदाश्रमम् । २८ यह क्या है-ऐसा भली-भांति विचार करके और उसके कारण को जानकर भगवान् महेश्वर के दर्शन करने की इच्छा से शीघ्र ही मन्दरा- चल पर गये थे ॥२२॥ इसी बीच मे देव परमेश्वर पिनाकी ने शक ( इन्द्र) के स्वरूप में समास्थित होकर उस समय मे जाने का विचार किया था। भगवान् देव का दर्शन करके और हाथ जोड करके हरि ने यह कहा था । हे भगवन् ! कोई उपमन्यु नाम से प्रसिद्ध ब्राह्मण है । उसने क्षीर के लिये तप के द्वारा सव वा दहन कर दिया है । उसका निवारण करिये ॥२३॥२४॥ इसके अनन्तर भगवान् सदा शिव श्वेत श्रेष्ठ गज के द्वारा उस तपोवन मे गये जहाँ वह मुनिवर तपश्चर्या कर रहा था। उनके साथ समस्त सुर-असुर-सिद्ध-महोरग थे और वे स्वयं देवराज के स्वरूप मे समास्थित थे ॥२५॥ उनके साथ ही उस समय मे वालम्पजन ग्रहण करके विवस्वान उस हाथी पर समारूढ़ थे । वाम उपमन्यु-चरित्र [ १३१ भाग मे शची के सहित सुरेन्द्र थे जो अन्य कर से सित प्रातपत्र ( छन ) ग्रहण किये हुए थे। उस समय मे शक के रुप वाले सदा शिव सोम सुशोभित हो रहे थे। जिस तरह चन्द्र के विम्ब से अन्दर गिरि शोमा युक्त होता है उसी तरह उस श्वेतात पत्र से भगगन सदा शिव शोभा सम्पन्न हुए थे ॥२०॥२६॥२७॥ इस प्रकार से परमेश्वर पित्र ने इन्द्र का स्वरूप धारण करके उपमन्यु के ग्राश्रम मे उस पर अनुग्रह करने लिये पदार्पण किया था। ॥२८॥ त दृष्ट्वा परमेशान शरारूपधर शिवम् । प्रणम्य शिरसा प्राह मुनिमुनिवरा. स्वयम् ॥२६ पावितश्चाश्रमचाय मम देवेश्वरः स्वयम् । प्राप्त शक्रो जगन्नाथो भगवान्भानुना प्रभु ।।३० एवमुक्त्वा स्थित वीक्ष्य वृताजलिपुट द्विजम् । प्राह गभीग्या वाचा शकरूपधरोहर ॥३१ तुष्टोस्मि ते वर हि तपसानेन सुव्रत । ददामि चे स-सन्धिौम्याग्रज महामते । ३२ एवमुक्तस्तदा तेन शक ण मुनिसत्तमः। वरयामि शिव भक्तिमित्युवाच कृतालि ॥३३ ततो निशम्य वचन मुने पुपितवत्प्रभु । प्राह सव्यग्रमीशान शवस्पधर स्वयम् ॥३४ मा न जानासि देव देव राजानमीश्वरम् । लोक्याधिपति शम सर्वदवनमस्कृतम् ॥३५ उन परमेश को इन्द्र ये स्प मे सस्थित देरावर मुनि ने भगयान शिय को प्रणाम रिया या मोर मुनि श्रेष्ट स्यम बान । मेरा यह पाश्रम मात्र देवेश्वर ने स्वय पवित्र पर यिा है | जात्रे स्वामी प्रभु भगवान पर भानु सहित यही पर प्राप्त ए है ३०॥ इस तरह से यह पर हाप जटार पित हिजो देशारा स्याप को धारण परने या भागव शिव गम्भीर पाणी हारा योगे । हे गुगा तुम्हारी सतपस्पा से बाही गनुर एप परम प्रसार हो गरा है।
१३२] [ लिङ्ग पुराण राम यदान मांग लो । हे धौम्याग्रज महान् मति वाले ! तुमको मैं प्रभीष्ट देता है ॥३१॥३२॥ इस प्रकार से उस शक्ररूपी शिव के माराम गये रा गुनि श्रेष्ठ ने अपने हाथ जोड़कर कहा था कि मैं गि परम गति पा परदान पाहता हूँ ।।३३।। इसके पश्चात् मुनि के सग यान को गुनकर शक के रूप को धारण करने वाले प्रभु ईशान पूर्णिम की भाति ध्यप्रता के साथ यह वचन बोले ! है देव ! देवो के राजा प्रभु गुमको पया तुम नही जानते हो ? मैं प्रैलोक्य का स्वामी हूं भोर गमस्त देवतापो के द्वारा वाद्यमान इन्द्रदेव हूं ॥३४॥३५॥ मद्भक्तो भव विप्र मामेवार्चय सर्वदा। ददामि सर्व भद्र' ते त्यज रुद्रच निर्गुणम् ॥३६ ततः शक्रस्य वचन श्रुत्वा श्रोनविदारणम् । उपमन्युरिदं प्राह जपाप बाक्षरं शुभम् ॥३७ मन्ये शक्रस्य रूपेण नूनमत्रागतः स्वयम् । कत्त, दैत्याधमः कश्चिद्धर्मविघ्नं च नात्यथा ॥३ स्वयेय कथितं सर्वं भवनिदारतेन वै । प्रसंगावदेवस्य निर्गुणावं महात्मनः ।।३६ बहुना विमुक्त न मयाद्यानुमितं महत् । भवातरकृतं पाप श्रु ता निदा भवस्य तु ॥४० श्रुत्वा निंदां भवस्याथ तत्क्षणादेव सत्यजेत् । स्वदेहं तं निहत्याशु शिवलोकं स गच्छति ॥४१ यो वाचोत्पाटये जिह्वां शिवनिदारतस्य तु । त्रिः सप्तकुलमुद्धृत्य शिवलोकं स गच्छति ॥४२
[ १३३
उपमन्यु-चरित्र ]
का स्वरूप धारण करके यहाँ पधारे हो। कोई अधम दैत्य ने धर्म में
विघ्न उत्पन्न करने के लिये ही ऐसा किया है अन्यथा ऐमा नहीं होता
।।३८॥ भव की निन्दा मे रत आपने ही यह सब कुछ कहा है । मापने
ही प्रराङ्ग वश देवो के देव महात्मा को निर्गुणता वताई है ॥३६॥ इस
विषय मे मैं अधिक क्या बताऊँ । मैंने आज महान् अनुमान किया है कि
निश्चय ही अन्य जन्म का मेरा कोई मेरा पाप है जिससे इस समय
मैंने शिव को निन्दा का थवरण किया है ॥४०॥ भगवान शिव की निन्दा
को सुनकर शीघ्र ही उसका हनन कर अपने देह का त्याग कर देना
चाहिए वह पुरुष शिव लोक को जाना है ॥४१॥ जो शिव के निन्दव को
बोलने वाली जिह्वा को खीच लेता है और उखाड कर फेंक देता है वह
पुरुप अपने इक्कीस कुलो का उद्धार करके अन्त मे शिवलोक को चला
जाता है ।।४२॥
प्रास्तां तावन्ममेच्छाया क्षरं प्रति सुराधमम् ।
निहत्य त्वा शिवास्त्रेण त्यजाम्येतत्कलेवरम् ॥४३
पुरा मात्रा तु कथितं तत्थ्यमेव न सशयः ।
पूर्वजन्मनि चास्माभिरपूजित इति प्रभुः ॥४४
एवमुक्त्वा तु त देवमुपमन्युरभीतवत् ।
शक चक्र मति हतु मथस्त्रेिण मपवित् । ४५
भस्माधारान्महातेजा भस्ममुष्टिं प्रगृह्य च ।
अथर्वा ततस्तस्मै ससर्ज च ननाद च ।। ६
दग्धु स्वदेह माग्नेयी ध्यात्वा वै धारणा तदा।
प्रतिष्ठच महातेजाः शुप्केघनमिवाव्ययः ।।४७
एवं व्यवसिते विप्रे भगवान्भगनेत्रहा।
वारया मारा सौम्येन धारणा तस्य योगिन. ॥४८
अथर्वा तदा तस्य सहृत चंद्रिकेण तु ।
कालाग्निसदृश चेदं नियोगानंदितस्तथा
मेरी यह क्षीर के प्रति जो इच्छा है उसे यही रहने दिया जाये।
मैं गुरो मे मधम सुझको मारकर शिवार से अपने शरीर का त्याग दिए
१३४ ] [ लिङ्ग पुराण देता हूं ॥४३॥ पहिले ही माता ने जो भी वहा था वह बिल्कुल सत्य है- इसमे कुछ भी सशय नहीं है कि हमने अपने पूर्व जन्म मे प्रभु की पूजा नही की थी ॥४४॥ इस तरह कहकर उपमन्यु ने अभीत की भांति उस देवराज इन्द्र को मन्त्र के वेत्ता ने प्रथस्त्रि में मार देने का विचार किया था ।।४।। महान् तेजस्वी ने भस्म के अाधार से एक भस्म की मुट्ठी लेकर फिर उसके लिये अथर्वास्त्र का सृजन किया था और जोर से ध्वनि की थी।४६|| अपने देह को दाय करने के लिये प्राग्नेयी धारणा का उस समय ध्यान पिया था और महान तेज वाला शुष्क ईधन की तरह वह अव्यय स्थित हो गया था ॥४७॥ इस प्रकार विप्र के निश्चय कर लेने पर भगवान् भग के नेत्रो के हनन करने वाले शिव ने बड़ी सौम्यता से उस योगी की धारणा का वारण पिया था ॥४८॥ उस समय में नन्दी के वियोग से कालाग्नि के समान जो अथर्वास्त्र था उसको उसके चन्द्रिक नाम वाले गण के द्वारा सहत कर लिया गया था ॥४६॥ स्वरूपमेव भगवानास्थाय परमेश्वर.। दर्शयामास विप्राय बालेंदुकृतशेखरम् ।।५० क्षीरधागमस्र'च क्षीरोदार्णवमेव च । दध्यादेरराव चव घृोदार्णवमेव च ॥५१ फलार्णवं च बालस्य भक्ष्य भोज्यावं तथा । अपूप गिरयश्च व तथातिष्ठन् समनत. ॥५२ उपमन्युमुवाच सस्मितो भगवान्वंयुजनः समावृतम् । गिरिजामवलोक्य सस्मितां सघृणं प्रेक्ष्य तु तं तदा घृणी ॥५३ भुक्ष्व भोगान्यथाकामं वाधवः पश्य वत्स मे। उपमन्यो महाभाग तवावैपा हि पार्व ||५४ मया पुत्री कृतोस्यद्य दत्त. क्षीरोदधिस्तथा। मधुनश्चार्णवश्नं व दनवार्णव एव च । ५५ प्राज्योदनार्णवन व फललेह्याणवस्तथा । अपूपगिरयश्च व भक्ष्यभोज्यार्णवः पुनः ।।५६.. पिता तब महादेवः पिता व जगता मुने ।
तुष्टाव च महादेव हपंगद्गदया गिरा ॥६१ उपमन्यु चरित] [१३५ माता तव महाभागा जगन्माता न संशयः ॥र७ अमरत्व मया दत्त गाणपत्य च शाश्वतम् । वरान्वरय दास्यामि नात्र कार्या विचारणा ॥५८ इराके अनन्तर भगवान् परमेश्वर ने अपने ही स्वरूप को धारण कर लिया था और बाल चन्द्र द्वारा शेखर से शोभित उरा स्वरूप को विप्र के लिये दिखा दिया था ॥५०॥ क्षीर की सहस्र धारा तथा क्षीरोद सागर- दधि आदि का प्रणव-धृतोद अगव फलार्णव और बाल का भक्ष्य भोज्य का अर्णव तथा अपूप पर्वत उसके चारो ओर स्थित थे ।॥५१॥५२॥ फिर भगवान मुस्कराहट के साथ व-धुजनो से समावृत उस उपमन्यु से बोले और स्मित से युक्त गिरिजा को देखकर घृणी ने घृणा से युक्त उसको देसकर कहा था ॥५३॥ है वत्स उपमन्यु 1 हे महाभाग । वान्धवो के साथ देखो और यथेच्छया भोगो का उपभोग करो। यह पार्वती तेरी अम्बा हैं ॥५४॥ मने प्राज तुझे अपना पुत्र बना लिया है और यह क्षीरोदधि तुझे दे दिया है । इसके अतिरिक्त मधु का अर्णव-दधिका अर्णव प्राज्योदार्णव-फल लेह्याएंव अपूप गिरिगण और भक्ष्य भोज्यो का अर्णव भी तुझे दिये हैं । हे मुने । समस्त जगतो का पिता महादेव तेरे पिता है और जगत् की जननी यह महान भाग वाली पार्वती तेरी माता हैं ।।५।१५६॥५॥ इममे पुछ भी सशय कभी मत करना । मैंने तुझे अमरत्व प्रदान कर दिया है और शाश्वत गाणपत्य पद भी दे दिया है। अन्य जो भी तू वरदान चाहता है, मांग ल, मै सब तुझे दे दूगा-इसमे कुछ भी विचार मत करना ।।५।। एवमुक्त्वा महादेवः कराभ्यामुपगृह्य तम् । प्राघ्राय म्धनि विभुर्ददौ देव्यास्तदा भवः 118 देवी तनयमालोक्य ददौ तस्मै गिरीन्द्रजा । योगश्वयं तदा तुष्टा ब्रह्मविद्या द्विजोत्तमा १६० सोपि लब्ध्वा वरं तस्या. कुमाररव च सर्वदा। 1 वरयामास प तदा वरेण्य विरजेक्षणम् ।
१३६ ] [ लिज पुराण वृतांजलिपुटो भूत्वा प्रणिपत्य पुन पुनः ॥६२ प्रसीद देवदेवेश त्वयि चाव्यभिचारिणी। श्रद्धा चैव महादेव सानिध्य चैव मर्वदा ॥६३ एवमुक्तस्तदा तेन प्रहसग्निव शंगरः । दत्वेति हि विप्राय तवातरधीयत ॥६४ महादेव ने इस प्रकार से उम उपमन्यु से कहा और दोनों अपने हाथो से उसे ग्रहण पर लिया था। शिव ने उसे हाथो से उठापर उसके मस्तर को पूघा और फिर विभु भय ने उस समय उसे देवी पार्वती को दे दिया था ॥५६॥ गिरि शिरोमणि की तनया देवी पार्वती ने पुत्र को देसार उस समय मे परम तुष्ट होरर है द्विजोत्तमो | उसे योगैश्वर्य और ब्रह्म विद्या प्रदान की थी॥६०॥ वह उपमन्यु भी उस जगदम्बा के घर को तथा सर्वदा कुमारव को प्राप्त वर बडे ही हर्प से गदगद वाणी के द्वारा उसने महादेव का स्तवन पिया था ॥६१।। उस समय उसने विरजेक्षण वरेण्य का वरदान प्राप्त किया था और हाथ जोडार वारम्बार प्रणाम किया था । ६२॥ उपमन्यु ने कहा-हे देवो वे भी देवेश्वर । प्रसन्नता कीजिए । मुझे आप अपने मे अव्यभिचारिणी भक्ति प्रदान करे। हे महादेव । माप मे मेरी अटूट श्रद्धा हो और सदा सर्वदा पाप का ही मुझे सान्निध्य मिलता रहे ।।६३॥ इस तरह से जव शिव से प्रार्थना उप- मन्यु ने की तो भगवान् शङ्कर ने हंसते हुए उस विप्र को सम्पूर्ण ईप्सिन वर प्रदान कर दिये थे और फिर वही पर अन्तहित हो गये ।।६४॥ ॥७२-उपमन्यु द्वारा श्रीकृष्ण को शिवदीक्षा ॥ दृष्टोऽपो वासुदेवेन कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा । धौम्याग्रज स्ततो लब्ध दिव्य पाशुपत व्रतम् ॥१ कथ लब्ध तदा ज्ञान तस्मात्कृष्णेन धीमता। वक्तुमर्हसि ता सूत कथा पातकनाशिनीम् ॥२ स्वेच्छया ह्यवतीर्णोपि वासुदेवः सनातन । निंदयन्नेव मानुष्य देहशुद्धि चकार स. ॥३ उपमन्यु द्वारा श्रीकृष्ण ] { १३७ पुत्रार्थ भगवांस्तत्र तपस्तप्तु जगाम च । आश्रम चोपमन्योर्वे दृष्टवांस्तत्र त मुनिम् ॥४ नमश्चकार तं दृष्ट्वा धौम्याग्रजमहो द्विजाः । बहुमानेन वै कृष्णस्त्रिः कृत्वा वै प्रदक्षिणम् ।।५ तस्यावलोकनादेव मुनेः कृष्णस्य धीमतः । नष्टमेव मलं सर्वं काय कर्मजं तथा ॥६ भस्मनोधूलन कृत्वा उपमन्युर्महाद्युतिः । तमग्निरिति विप्रेद्रा वायुरित्यादिभिः कमात् ।।७ दिव्यं पाशुपत ज्ञानं प्रददौ प्रोतमानसः । मुनेः प्रसादान्मान्योऽसौ कृष्णः पाशुपते द्विजाः ॥ इस अध्याय मे उपमन्यु से श्री कृष्ण का शव विक्षादि के कथन का चर्णन किया जाता है । ऋपियों ने पहा-अलिष्ट पर्म पाले वासुदेव वृष्ण ने इसको देखा था और धौम्याग्रज ने उनसे दिव्य पाशुपत प्रत की प्राप्ति की थी। उस समय धीमान् कृष्ण ने यह ज्ञान कैसे प्राप्त किया था? है सूतजी ! अाप इस पातको के नाश करने वाली सम्पूर्ण कधी चताने के योग्य होते हैं ॥१॥२॥ सूराजी ने कहा- सनातन वासुदेव भग. यान अपनी ही इच्छा से यहाँ प्रवतीर्ण हुए थे तो भी मानुष्यता की निन्दा करते हुए उन्होने देह की शुद्धि की थी ॥३।। भगवान् यहाँ पर पुष के लिये सप करने को गये थे। वहां पर उनने यह मुनि का पाश्रम देसा मौर मुनि को भी देखा था ।।४।। हे द्विजगण ! भगवान ने उस धौम्याग्रज को देखकर प्रणाम किया था। कृपय ने बहुमान करने के कारण उस मुनि को तीन प्रदक्षिणाएं की यो॥२॥ उस मुनि के प्रयलो. पन मात्र से ही धीमान कृष्ण का काया तथा कमंत्र पल नष्ट हो गया था ॥६॥ महान् पति से समन्वित उपमन्यु ने भस्म से उधूलित करके है यिप्रेन्दगण ! उस पंप्या यो अग्नि मोर यायु इछ क्रम से प्रसन्न मन याले मुनि ने परम दिम्य पाशुगत ज्ञान का प्रदान कर दिया था। मुनि के हो प्रसाद से यह कृष्ण भी पागुपर्त ज्ञान मे पति मान्य हो गये थे 1150 [ लिङ्ग पुरास तपसा त्वेकवा ते दृष्ट्वा देवं महेश्वरम् । साव सगरणमन्यन लब्धवान्पुत्रमात्मन. 16 तदाप्रभृति तं कृष्ण मुनय. सशितव्रताः। दिव्याः पाशुपता. सर्व तस्थु संवृत्य सर्वदा ॥१० अन्य च कथयिष्यामि मुक्त्यर्थ प्रारिगना सदा । सौवर्णी मेखला कृत्वा प्राधारं दडधारणम् ।।११ सौवर्ण पिडिकं चापि व्यजन दडमेव च । नरै खियाथ वा कार्य मपीभाजनलेखनीम् ।।१२ क्षुराकतरिका चापि अथ पारामथापि वा। पाशुपताय दातव्य भस्मोद्धूलितविग्रहैः॥३ सौवर्ण राजत वापि ताम्र वाथ निवेदयेद । आत्मवित्तानुसारेण योगिनं पूजयेद्बुधः ।।१४ इसके अनन्तर एक वर्ष के पश्चात् अन्त मे तप करने महेश्वर भग- वान का दर्शन प्राप्त किया था जो कि मम्बा के साथ और गणो के साथ साथ विद्यमान थे तथा अध्यन स्वरूप वाले थे। उन शिव के दर्शन से कृष्ण ने अपना पुत्र भी प्राप्त किया था तभी से लेकर उन कृष्ण को सशित व्रत वाले मुनिगण जो परम दिव्य एव पाशुपत शान वाले थे सवंदा उनको सवृत करके स्थित रहा करते थे॥१०॥ इसके अतिरिक्त अन्य भी व्रत में बतलाता हूं जो कि सदा प्रारियो की मुक्ति के लिये उपयुक्त होते हैं । मुवणं की मेराला करके और उसका प्राधार दरड को भौति करे। सुवर्ण का पिडिक व्यजन-दण्ड और पपी पान से युक्त लेसनी करे। ली हो अथवा पुरप हो सभी को करना चाहिए। शुर के सहित तरिका (पंची ) तथा पलपान श्री सुयणं निमित परक भस्म से उलित शरीर वालो यो पाशुपत प्रत के लिये देना चाहिए । मुगणं को य मय उपयुक्त वस्तुएं न हो सके तो चाँदी की हो अथवा वान यो हो । युध को अपने वित के अनुसार ही निवेदन कर योगी की अर्चा करनी चाहिए ॥११॥१२॥१॥१४॥ ते मय पापनिमुक्ता समस्तालसंयुता. ।
कौशिक का वैष्णव गायन ]
[ १३६
याति रुद्रपद दिव्यं नान कार्या विचारणा ॥१५
तस्मादनेन दानेन गृहस्थो मुच्यते भवात् ।
योगिना सप्रदानेन शिवः क्षिप्र प्रसीदति ॥१६
राज्यं पुन धनं भव्यमश्वं यानमथापि वा ।
सर्वस्वं वापि दातव्य यदीच्छेन्मोक्षमुत्तमम् ॥१७
अध्र वेर। शरीरेण ध्रुव साध्यं प्रयत्नत ।
भव्य पाशुपतं नित्य संसारार्णवतारकम् ॥१८
एतद्वः कथित सर्व संक्षेपान्न च संशयः ।
यः पठेच्छणुयाद्वापि विष्णुलोक स गच्छति ।।१६
ऐसे समस्त दान करने वाले पुरुप अपने सम्पूर्ण कुल से युक्त पापो
से निर्मुक्त होकर परम दिव्य रुद्र भगवान् के पद की प्राप्ति किया करते
हैं-इसमे कुछ भी विचार करने की आवश्यकता नहीं है अर्थात् ऐसा
"मल प्राप्त करना निश्चित एप ध्रुव है ।।१।। इस लिये इस प्रकार के
दान करने से गृहस्थ मे रहने वाला पुरप ससार के बन्धन से मुक्त हो
जाया करता है । योगियो के लिये ऐसा दान देने से भगवान् शिव बहुत
ही शीघ्र प्रसन्न हो जाया करते हैं ॥१६॥ यदि मोक्ष प्राप्त करने की
कोई इच्छा रखना है तो उसे राज्य-धन-भव्य अश्व-यान एव सर्वस्व का
दान कर देना चाहिए ॥१७॥ यह शरीर तो अनित्य है । इसक द्वारा
प्रयत्न पूर्वक ध्रुव एव नित्य वस्तुको माधना करनी चाहिए । पाशुपत
परम भव्य-नित्य और ससार रूपी समुद्र से तारण करने याला प्रत
होता है ।।१८। हमने यह सम्पूर्ण व्रत का विधान सक्षेप से तुमको
बतला दिया है- इसमे तनिक भी सशय नही है । जो पुरुष इस विधान
फा पठन किया करता है अथवा इसका थवरण करता है वह सीधा विष्णु
लोक को चला जाता है ।।१।।
॥७३-कौशिक का वैष्णव गायन ।
कृष्णस्तुष्यति केनेह सर्वदेवेश्वरेश्वरः।
चक्तुमर्हसि चास्माक सूत सर्वार्थविद्भवान् ॥१
प १४० ] I लिङ्ग पुराण पुरा पृष्टो महातेजा मार्कंडेयो महामुनिः। अबरीपेण विप्रेद्रास्तद्वदामि यथातथम् ।।२ मुने समस्तधर्मारणां पारगस्त्वं महामते । मार्कंडेय पुराणोऽसि पुराणार्थविशारदः॥३ नारायणाना दिव्याना धर्मारणा श्रेष्ठमुत्तमम्। तक्कि व हि.महाप्राज्ञ भक्तानामिह सुव्रत ।।४ तस्य तद्वचन श्रु त्वा समुत्थाय कृताजलिः। स्मरनारायण देवं कृष्णमच्युतमव्ययम् ।।५ शृणु भूप यथान्याय पुण्यं नारायणात्मकम् । स्मरण पूजन चैव प्रणामो भक्तिपूर्वकम् ।।६ प्रत्येकमश्वमेघस्य यज्ञस्य सममुच्यते य एकः पुरुषः श्रेष्ठ परमात्मा जनार्दनः॥७ इस लिङ्ग महा पुगण के उत्तर भाग के प्रथम अध्याय मे परम साध्य और प्रत्यन्त प्रियात्मा विष्णु के गान से परम प्रीति होती है:- इस कथा का निरूपण किया जाता है। ऋपियो ने बहा-हे सूतजी ! माप तो समस्त पर्यों के परम ज्ञाता है। अब कृपा कर हमको यह बताइये कि सम्पूर्ण देवो के भी शिरोभूपण ईश्वर, भगरान् श्रीकृष्ण इस समार मे किम विधान से परम सन्तुष्ट हुमा करते हैं ? ॥१॥ सूतजी ने r-है विप्रवृन्द ! यही प्रश्न पहिले राजा मम्बगैप ने महा मुनीश्वर मार्वएडेय जी से पूछा था जो कि महान तेजस्वी मुनिवर थे। उसी को मैं तुमसे ठोक २ यतलाता हूँ। सा सम्परीप ने कहा था-हे महा- मने ! पाप तो महान् बुद्धिमान् है और समस्त धर्मों के भी पारगामी माता है । माप चिरजीवी होने के कारण यहुत ही पुराने भी हैं तपा पुराणों के पषं ये शाता परम पण्डित है ॥३॥ सो भव यह यनलाइये कि मारायण उत्तम एव दिव्य धर्मों में परम श्रेष्ठ एव प्रत्युत्तम पमं पा है । है महान् प्रज्ञा मण्न पल्टिन प्रवर ! हे गुगा ! जो भी भत्तों में पिय पनि हो उगे यसलाइये ॥४॥ मूतमी ने रहा-राजा प्राबरीप पण यपन को गुनगर .माएडेय मुनि ने नजति होर उत्पान कौशिक का वैष्णव गायन ] [ १४१ . किया और अच्युत अव्यय श्री कृष्ण देव का स्मरण किया था 1 ॥२॥ मार्कण्डेय मुनि ने कहा-हे राजन् ! तुम श्रवण करो । नारायण स्वरूप पुण्य न्याय के अनुसार जो भी होता है। इनका स्मरण करना-पूजन करना और भक्ति भाव के साथ प्रणाम करना--इन मे प्रत्येक का फल अश्वमेघ यज्ञ के समान होता है। परमात्मा जनार्दन एक ही श्रेष्ठ पुरुष हैं ।।६।१७॥ यस्माद्ब्रह्मा ततः सर्वं समाश्रित्यव मुच्यते । धर्ममेकं प्रवक्ष्यामि यदृष्ट विदितं मया । पुरा चेतायुगे कश्चित् कौशिको नाम वै द्विजः। वासुदेवपरो नित्य सामगानरतः सदा ॥E भोजनासन शय्यासु सदा तद्गतमानसः । उदारचरित विष्णोर्यायमानः पून. पुनः ॥१० विष्णोः स्थलं समासाद्य हरेः क्षेत्रमनुत्तमम् । अगायत हरि तत्र तालवर्णलयान्वितम् ॥११ मूर्च्छनास्वरयोगेन श्रु तिभेदेन भेदितम् । भक्तियोगं समापन्नो भिक्षामात्रं हि तत्र वै ॥१२ तनं गायमान च दृष्ट्वा कश्चिद्विजस्तदा । पद्याख्य इति विख्यातस्तस्मै चानं ददौ तदा ।।१३ सकुटुबो महातेजा ह्य ष्णमन्नं हि तत्र वै। कोशिको हि तदा हृष्टो गायन्नास्ते हरि प्रभुम् । १४ जिस भगवान नारायण से ब्रह्मा होते हैं और फिर उस ब्रह्मा का समाश्रय ग्रहण कर सभी हमा करते हैं। मैं एक धर्म के विषय मे धत. लाता हूँ जो मैंने देखा है तथा जिसका मुझे ज्ञान है ।।८।। पहिले त्रेता युग मे कोई एक कौशिक नामधारी ग्राह्मण पा । यह निस्य सामगान में निरत रहकर भामुदेव पाया हुआ था। Men भोजन-प्रासन और शय्या के समय में भी वह सदा वासुदेव भगवान् मे ही मन रखा करता था। सर्वदा भगवान् विष्णु के प्रति उदार चरित का बारम्बार गान पिया करता था ।।१०।। भगवान् विष्णु के स्थल को प्राप्त होकर जो १४२ ] [ लिङ्ग पुराण कि सर्वश्रेष्ठ क्षेत्र होता है वहाँ पर वह हरि के गुणानुवाद को ताल तथा वर्ण की सब से युक्त गान किया करता था ॥११॥ मूर्छना स्वर के योग से श्रनि के भेद से भेद वाला भक्ति योग को प्राप्त हुमा वह वहाँ पर ही भिक्षा ग्रहण करके बैठ जाया करता था। अर्थात सकुटुम्ब भिक्षा मात्र लेकर हरि का गान करके वहाँ पर ही परम प्रसन्न होकर रह जाया करता था ॥१२॥ उस समय वहाँ पर इसको गायन करते हुए किसी द्विज ने देखा था जो कि पद्माख्य-इस नाम से विख्यात था। उसने इसको अन्न दिया था।॥१॥ यह महान् तेजस्वी सपरिवार उस उष्ण अन्न को खाकर प्रभु का गान करता हुआ परम प्रसन्न वहाँ पर ही रह गया था॥१॥ शृण्वन्नास्ते स पद्माख्यः काले काले विनिर्गतः। कालयोगेन संप्राप्ता: शिया वै कौशिकस्य च ।।१५ सप्त राजन्यवैश्याना विधारणा कुलसभवाः । ज्ञानविद्याधिकाः शुद्धा वासुदेवपरायणा. ॥१६ तेषामवितथानाधं पद्माक्ष. प्रददौ स्वयम् । शिप्यश्च सहितो नित्य कौशिको हृष्टमानमः ।।१७ विष्णुस्थले हरि तत्र प्रास्ते गायन्यथाविधि । तत्रैव मालवो नाम वैश्यो विष्णुपरायणः ॥१८ दोप माला हरेनित्यं करोति प्रोतिम नसः। मालवी नाम भार्या च तस्य नित्यं पतिव्रता ॥१६ गोमयेन समालिप्य हरे. क्षेत्रं समंतत भी सहास्ते सुप्रीता शृण्वती गानमुत्तमम् ।।२० कुशस्थलात्समापना वाहाणा: शसितव्रताः । पचाशद्व समापन्ना हरेर्गानार्थमुत्तमाः ॥२१ वह पद्मास्य समय-समय पर विनिर्गत होता हुआ उसके गान पा रायण पिया करता था । समय के योग से उस कौशिक के शिष्य वहाँ र मा गये थे ॥१॥ वे सब सात्व थे जो ग्राह्मण-दात्रिय और वैश्यो बुल मे उत्पन्न होने वाले थे। वे सब ज्ञान भोर विद्या में अधिक थे कौशिक का वैष्णव गायन ] [१४३ तथा परम शुद्ध और वासुदेव को भक्ति में परायण रहने वाले ये ॥१६॥ उन सद को परम विशुद्ध अन्न आदि पद्मास्य ने स्वयं दिया था। शिष्यो के सहित पौशिक नित्य ही परम प्रसन्न चित्त वाला रहता था ॥१७॥ जिस विष्णु के स्थल में यह हरि का गान करता हुआ रहता था वहाँ पर ही मालव नाम वाला एक वैश्य जो कि विष्णु की भक्ति मे परायण था आया करता था॥१८॥ यह प्रीति से युक्त मत वाला नित्य हरि की दीप माला किया करता था। उसकी मालवी नाम वाली भार्या थी जो कि उसकी नित्य पतिव्रता यो ॥१॥ वह मालवी नित्य ही गोमय से उस हरि के क्षेत्र को गब पोर से लीप दिया करती थी और अपने स्वामी के साथ परम प्रसन्नता से उस हरि के उत्तम गान को श्रवण किया करती थी ॥२०॥ फिर कुरा स्थल से व्रत ग्रहण किये हुए पचास ब्राह्मण वहाँ आ गये थे जो कि हरि गान करने में बहुत ही श्रे४ थे और इसी लिये वहां उपस्थित भी हुए थे ॥२१॥ साधयतो हि कार्याणि कौशिकस्य महात्मनः । ज्ञानविद्यार्थतत्त्वज्ञः शृण्यंतो ह्यवसस्तु ते ।।२ ख्यातमासीत्तदा तस्य गान व कौशिकस्य तत् । श्रुत्वा राजा समभ्येत्य कलिंगो वाक्यमनवीत् ।।२३ कोशिकाद्य गगः साधं गायस्वेह च मां पुनः । शृणुध्व च तथा यूय कुशस्थलजना अपि ॥२४ तच्छु त्वा कौशिक. प्राह राजान सात्वया गिरा। न जिह्वा मे महाराजन् वाणी च मम सर्वदा ॥२५ हरेरन्यमपीद्र वा स्तौति नंव च वक्ष्यति । एवमुक्त तु तच्छियो वासिष्ठो गौतमो हरिः॥२६ सारस्वतस्तथा चित्रचित्रमाल्यस्नया शिशुः । ऊचुस्ते पार्थिवं तद्वदथा प्राह च कौशिकः ॥२७ श्रावकास्ते तथा प्रोचुः पायिवं विपगुतत्पराः । थोत्राणीमानि शृण्वंत रहिरे यं न पार्थिव ॥२८ महात्मा यौशिक के कार्यों का साधन फरते हुए ज्ञान-विद्या और ५४४ ] [ लिङ्ग पुराण अर्थ के तत्वो के ज्ञाता वै श्रवण करते हुए वहीं पर निवास कर गये थे ॥२९॥ उस समय में उस कौशिक का गान प्रसिद्ध था । यह सुनकर कलिङ्ग-राजा यहां आकर यह वाक्य बोला था । हे कौशिक । आज अपने गणो के साथ यहाँ पर मेरा गायन करो। और इस समय मे कुश स्थल के समस्त मनुष्य भी श्रवण करेंगे ॥२३॥२४॥ यह श्रवण करके यौशिक ने सान्त्वना पूर्ण वाणी से राजा से कहा था । हे राजन् । मेरी कहा और वाणी सर्वदा हरि के अतिरिक्त इन्द्र का भी स्तवन नही करती है और न कुछ बोलती है। अत: यह कुछ भी नहीं बोलेगी। उसके ऐसा कहने पर उसके शिष्य वासिघ्र-गौतम-हरि-सारस्वत-चित्र- चित्रमाल्य और शिशु इन सब ने भी राजा को वैसा ही उत्तर दिया था जैसा कि कौशिक ने उसे दिया था। ॥२शा२६॥२७) श्रावक जो हरि गान के श्रवण करने वाले थे वे सब भी विष्णु भक्ति परायण थे और उन्होने भी राजा से उसी भांति स्पष्ट कह दिया था कि हमारे धोत्र हरि कीर्तन के मतिरिक्त अन्य कुछ भी नही श्रवण किया करते हैं ॥२८॥ गानकीर्ति वयं तस्य शृणुमोन्या न च स्तुतिम् । तच्छु त्या पार्थिवो रुष्टो गायता मिति चामवीत् ॥ स्वभृत्यान्द्राह्मणा ह्य ते कोति शृण्वति मे यथा । न शृष्वति यथ तस्मात् गायमाने समतत ॥३० एव मुक्तास्तदा भृत्या जगु पार्थिवमुत्तमम् । निरुद्धमार्गा विप्रास्ते गाने वृत्ते तु दुखिता ॥३१ का शकुभिरन्योन्य श्रोत्राणि विदधुद्विजा.! कोशिकाद्याश्च ता ज्ञात्वा मनोवृत्ति नृपस्य वै ॥३० प्रसह्यास्मास्तु गायेत स्वगानेसो नृप. स्थित । इति विप्राः सुनियता जिह्वाग्रं चिच्छिदु परे ॥३३ ततो राजा सुसरुद्ध स्वदेशाताल्यवासयत् । मादाय सर्व वित्त च ततस्ते जम्मुरुत्तराम् ॥३४ दिशमासाद्य कालेन कालधर्मेण योजिता. ! तानागतान्यमो दृष्ट्वा कि वर्तव्यमिति स्म ह ॥३५ कोशिक का वैष्णव गायन ] [१४५ श्रोतानो ने राजा से स्पष्ट कह दिया था कि है राजन हम तो केवल भगवान् को ही कीत्ति का गायन सुना करते हैं उसके अतिरिक्त अन्य किसी की भी स्तुति कभी नही सुनते हैं। यह सुनकर राजा बहुत ही रुष्ट हो गया था और गाने वालो मे बोला था कि मेरे भूप मेरी कीति का गान करे जिससे कि ये ग्राह्मण श्रवण करे । देखत है चारो ओर से गाई गई मेरो कीति को कैसे नहीं सुनेंगे ॥२६॥२०॥ उस समय इस प्रकार से जब भृत्यों से राजा ने कहा तो ये भृत्य राजा को पत्ति पा गान करने लगे थे। वे समस्त ब्राह्मण विरुद्ध मार्ग वाले कर दिये गये थे। गान के होने पर वे अत्यन्त दुखित हुए थे ॥३१॥ उस समय ब्राह्म- पो ने पाठ की सूटियो से परस्पर मे एक दूसरे के वानो को बन्द पर दिया था। कौशिक प्रादि ने राजा की मनोवृत्ति वा समझ लिया था कि यह राजा जवर्दस्ती से हमसे अपना कीति पान कराने के लिये स्थित हो गया है प्रतएव ऐसा सब ने निश्चय करके अपने ही हाथो से जिह्वा का अन माग छिन्न कर दिया था ॥३२॥३३॥ इम पर राजा ने बहुत ही अधिक क्रोध किया था और उनको अपने देश से निर्वासित कर दिया या। वे सब ग्राह्मण अपना धन लेकर उत्तर दिशा में चले गये थे ॥३४॥ उत्तर दिशा में पहुंच पर इम स्थूल देह के वियोग से जब ये योजित हुए तो पाये हुए उनको देखकर यमराज ने विचार पिया पिया परना चाहिए इस तरह यह सम्भ्रान्त हो गया था ॥३॥ चेष्टित तत्क्षरणे राजन् ब्रह्मा प्राह सुराधिपान् । कोशिकादोन द्विजानद्य वासयध्धं ययासुबम् ।।३६ गानयोगेन ये नित्य पूजयंति जनादनम् । तानानयत भद्र वो यदि देवत्वमिच्दय ।।३७ इत्युक्ता लोकपालास्ते पौशिकेति पुन. पुन । मालवेति तथा ये चिद पपाक्षेति तथा परे॥३८ मोशमाना समस्येत्य तानादाय विहायसा। ब्रह्मलोक गताः शीघ्र मुहूतनंय ते मुरा. ॥३६ पोशिकादीस्ततो दृष्ट्वा ब्रह्मा लोपपितामहः ।
- १४६ ] [ लिङ्ग पुराण प्रत्युद्गम्य यथान्याय स्वाग तेनाभ्यपूजयत् ।।४० तत. कोलाहलमभूदतिगौरवमुल्यणम् । ब्रह्मणा चरितं दृष्ट्वा देवाना नृपमत्तम ॥४१ हिरण्यगर्भो भगवास्तानिवार्य सुरोत्तमान् । कोशिकादीन्समादाय मुनीन् देव समावृत. 110 यमराज के चिन्तन के समय में ब्रह्माजी ने उनके चरिन को जानकर सुराधियो से कहा था कि इन कौशिक मादि द्विजो का सुख पूर्वक निवास स्थान दो॥३६।। ये अपने गान के योग से नित्य ही भगवान् जनार्दन का अर्चन किया करते हैं। यदि आप लोग अपने देवत्व की इच्छा रखते हैं तो आपका कल्याण होगा, माप उन्हे यहाँ लिवा लामो ॥३७॥ ब्रह्मा जी के द्वारा ब्राह्मणो वे अत्यन्त गौरव के साथ समादर करने पर देव जो लोकपाल थे उनमे बडा भारी कोलाहल उठ खडा हुअा था। वे वार २ कौशिक इस नाम से प्राह्वान कर रहे थे कुछ मालव इस नाम को लेकर बोल रहे थे और दूसरे पद्माक्ष नाम से पुकार रहे थे ॥३॥ इम तरह से उनको लेकर प्राकाश माग से देवगण मुहूर्त मात्र मे अत्यन्त शीघ्र ब्रह्मलोक में चले गय थे ॥३६॥ इसके अनन्तर लोको के पितामह ब्रह्मा ने कोशिकादि विप्रो को देखकर यथा विधि उनकी सागौनी परके स्वागत किया और उनकी अर्चना की थी ।।४०।। इस प्रकार से उनका अत्यधिक गौरव देखकर बडा कोलाहल हो गया था । ब्रह्मा के द्वारा ऐसा गौरवमय व्यवहार देखकर देवो को बडा विस्मय हुआ था ॥४१ । हिरण्य. गर्भ भगवान् ने उन देवो का निवारण करके कौशिकादि मुनियो को लेकर देवो से समावृत होते हुए शीघ्र ही विष्णु लोक को गये थे ॥४२॥ विष्णुलोक ययौ शीघ्र वासुदेवपरायणः । तत्र नारायणो देव श्वेतद्वोपनिवासिभि ॥४३ ज्ञानयोगेश्वर सिद्ध विष्णुभक्तं समाहित । नारायणसमैदिव्यंश्चनुहुधरै शुभ ।।०४ विष्णु चिह्नममापनर्दीप्यमानैरकल्मपं । अष्टाशीतिसहस्रश्न सेव्यमानो महाजन ॥४५ कौशिक का वैष्णव गायन ] [१४७ अस्माभिरिदाय॑श्च सनकायेरकल्मपः। भूत नाविधश्च व दिव्यस्त्रीभिः समंततः॥४६ सेव्यमानोय मध्ये वै सहस्रद्वारसंवृते । सहस्रयोजनायामे दिव्ये मणिमये शुभे ।।४७ विमाने विमले चित्रे भद्रपीठामने हरिः । लोककार्य प्रसक्तानां दत्तदृष्टिश्च माधवः ।।४ तस्मिन्कालेऽथ भगवान् कोशिकाद्यश्च संवृतः । श्रागम्य प्रणिपत्याग्रे तुष्टाव गरुडध्वजम् ||४६ वासुदेव भगवान् मे परायण ब्रहमा विष्णु लोक मे पहुचे थे। वहाँ पर नारायणा देव श्वेत द्वीप निवासियो के द्वारा परिसेवित हो रहे थे । ज्ञान योगेश्वर मिद्ध और समाहित विष्णु के भक्तो के द्वारा नारायण से व्यमान हो रहे थे। जिनका स्वरूप भी विल्कुल नारायण के ही समान था । सब के परम शुभ एव दिव्य चार भुजाऐ थी। समस्त भगवान् के समान ही उनके चिह्न थे परम दीप्यमान एव वल्मप से रहित अट्ठासी सहस्र महान पुरुषो के द्वारा भगवान् नारायण सेवित हो रहे थे ॥४३।। ।।४४।४५।। मध्य मे हम सबसे-नारदादि-सनकादि और नाना प्रकार के कल्मप रहित प्राणियो से सेवित थे तथा सब ओर से दिव्य नियों के द्वारा से व्यमान हो रहे थे । एक सहस्र द्वारो से सवृत और सहस्र योजन के प्रायाम वाला-अत्यन्त दिव्य एव मणिमय परम शुभ विमान था । उस विमल एव चिय भद्रपीठासन पर हरि विराजमान थे । माधव लोक कार्य में प्रसक्त होने वालो पर दृष्टि दिये हुए माधव सुशोभित हो रह थे। उस समय में कौशिकादि से घिरे हुए भगवान् ब्रह्मा ने वहाँ आकर नारायण को प्रणाम दिया और गरुड ध्वज भगवान् का स्तवन किया था ।।४६।। ॥४७॥४८॥४६॥ ततो विलोक्य भगवान् हरिर्नारायणः प्रभुः। कोशिके त्याह संप्रोत्या तान्सर्वांश्च यथाक्रमम् ।।५० जयघोषो महानासोन्महाश्चर्ये समागते । ब्रह्माणमाह विश्वात्मा शृणु ब्रह्मन् मयोदितम् ॥५१ - १४८ ] [ लिङ्ग पुराण कौशिकस्य इमे विप्राः साध्यसाधनतत्परा: । हिताय मप्रवृत्ता वे कुशस्थलनिवासिनः ।।५२ मत्कीर्तिश्रवणे युक्ता ज्ञानतत्त्वार्थकोविदः। अनन्यदेवताभक्ताः साध्या देवा भवंत्विमे ॥५३ मत्समीपे तथान्यत्र प्रवेशं देहि सर्वदा। एवमुक्त्वा पुनर्देव: कौशिकं प्राह माधवः ॥५४ स्वशिष्यस्त्व महाप्राज्ञ दिग्बंधो भव मे सदा । गणाधिपत्यमापन्नो यत्राहं त्वं ममास्व वै ॥५५ मालव मालवी चैव प्राह दामोदरो हरिः। मम लोके यथाकामं भार्यया सह मालव ।।४६ दिव्यरूपधरः श्रीमान् शृण्वन्गानमिहाधिपः । प्रास्व नित्य यथाकाम यावल्लोका भवति वै ॥५७ इसके अनन्तर प्रभु भगवान् नारायण हरि ने इनको देखा और बडी प्रीति के साथ उन सब को यथा कम कौशिक-यह कहा था ॥५०॥ उस समय मे महान् पाश्चर्य हुआ था और महान् जय-जय कार का घोष हुआ था । विश्वात्मा भगवान् ब्रह्मा से वोले-हे ब्रह्मन् ! आप मेरे कथन का श्रवण करो ॥५१॥ कौशिक के ये ब्राह्मण हैं वे सभी साध्य के साधन करने में परायण रहने वाले हैं । ये सव कुशस्थल के निवासियो के हित के लिये सप्रवृत्त हुए थे ॥५२॥ ये लोग मेरी हो कीत्ति के श्रवण करने मे तत्पर रहा करते थे और ज्ञान के तस्वार्थ के पण्डित थे। ये अनन्य देव भक्त थे । ये सव मेरे साध्य देव होगे ॥५३॥ इनका प्रवेश मेरे समीप मे तथा अन्यत्र सर्वदा दे दो। इस तरह ब्रह्मा से कहकर फिर माधव भग- पान कोशिक से वोले ॥५४॥ हे महाप्राज्ञ ! तुम अपने शिष्यो के सहित सदा मेरा दिग्वन्ध हो जानो। गणाधिपत्य को प्राप्त होते हुए जहाँ पर मैं रहूँ वहाँ पर ही तुम भी मेरे साथ मे रहो ||५|| फिर दामोदर हरि गलव और मालवी से बोले -हे मालव ! तुम अपनी स्त्री के साथ यथे. या दिव्यरूप धारण कर यहां पर सात का धया करते हुए अपिल जामो । नित्य अपनी इच्छा के अनुसार यहाँ पर रहो जब तक ये वशिक का वैष्णव गायन ] [ १४६ लोक हैं ॥५६॥१७॥ पभाक्षमाह भगवान् धनदो भव माधव. । धनानामीश्वरो भूत्वा यथाकाल हि मा पुनः ।।५८ प्रागम्य दृष्ट्वा मा नित्य कुरु राज्य यथासुखम् । एवमुक्त्वा हरिविष्णुबह्माणमिदमब्रवीत् 16 कौशिकस्यास्य गानेन योगनिद्रा च मे गता। विष्णुस्थले च मा स्तौति शिष्यैरेप समन्तत ॥६० राज्ञा निरस्त, क रेण कलिंगेन महीयसा । स जिह्वाच्छेदन कृत्वा हरेरन्य कथचन ॥६१ न स्तोष्यामीति नियत प्राप्तोसौ मम लोकताम् । एते च विप्रा नियता मम भक्ता यशस्विनः ॥६२ श्रोनच्छिद्रमथात्त्य शकुभिर्व परस्परम् । श्रोष्यामो नैव चान्यद हरे कीर्ति मिति स्म ह ॥२३ इसके पश्चात् भगवान् माधव पद्माक्ष से बोले तुम धनद हो जाओ। सम्पूर्ण धनो के स्वामी बनकर यथा समय मेरे पास प्राकर मेरा दर्शन करके सुखपूर्वक राज्य के सुख का मानन्द प्राप्त करो। इस प्रकार से हरि विष्णु भगवान् ने फिर ब्रह्मा जी से यह कहा था ॥५॥५६॥ इस कौशिक के गान से मेरी योग निद्रा समास हो गई है । यह शिष्यो से समन्वित होकर विष्णुस्थल मे मेरा स्तवन करता है ॥६०॥ क्रूरकलिङ्ग राजा के द्वारा यह निरस्त हुआ था। इसने अपनी जिह्वा का उच्छेदन कर लिया था और इसने हढ निश्चय कर लिया था कि मैं हरि ये अति- रिक्त अन्य किसी का भी स्तवन नहीं करूंगा। यह परम नियत था। प्रतएव यह मेरे लोक को प्राप्त हुआ है। ये अन्य विप्र भी नियत और मेरे भक्त हैं तथा यशस्वी हैं ॥६॥६१॥६२॥ इन सब ने परस्पर मे अपने बातो के बिटो को काट को खूटियो से पाहत किया था और प्रतिज्ञा की थी कि हरि की कोत्ति के अतिरिक्त अन्य किसी की भी कीति को नही सुनेंगे ॥६॥ एते विप्राश्च देवत्व मम सान्निध्यमेव च ।
१५२ ]
[ लिङ्ग पुराण
केन' हि हरैर्यास्ये योगं देवीसमोपतः ।
अहो तु बरुणा प्राप्त घिमा मूढ विचेतसमें ।।७८
योहं हरेः सन्निकोशं भूतनियतितः कंपम् ।
जीवन्यास्यामि कुत्राहमहो तु वरुणा कृतम् ॥
इति संचितयन् विप्रस्तप प्रास्थितवान्मुनिः ।
दिव्य वर्ष सहस्रं तु निरुच्छवाससमन्वित'1150
ध्यायन्विष्णुमथाध्यास्ते तु बरोः सत्नियों स्मरन् ।
रोदमानो मुहुविद्वान् धिङ मामिति च चितयन् ।।८१
तत्र यत्कृतवान्विष्णुस्तच्छणुष्व नराधिप ।।२
मै रिस प्रकार से देवी के समीप से हरि के योग को प्राप्त करूंगा।
अहो ! इस तुम्बरु ने उसे प्राप्त कर लिया है । मुझ मूढ विचेता को
धिक्कार है १७८॥ जो मैं भूतो के द्वारा हरि के सन्निकाश को कैसे
निर्मातित कर दिया गया ? मैं जीवित रहता हुमा कहाँ जाऊँगा?
अहो ! तुम्बरु ने यह किया है ॥७९॥ इस तरह से चिन्तन करते हुए वह
विप्र मुनि तपश्चर्या में समास्थित हो गया था। एक सहस्र दिव्य वर्ष
तक प्राणायाम मे युक्त हो गया था 11500 तुम्बर को सस्क्रिया का
स्मरण करते हुए वहाँ पर ध्यान करते २ विष्णु में अधिष्ठित हो जाता
है । वह विद्वान् वार-वार रुदन करता हुआ 'मुझे धिक्कार है'- ऐसी
चिन्ता करता रहता था ॥८॥ हे नराधिय ! वहाँ पर विष्णु भगवान्
ने जो कुछ भी किया था अब तुम उसका श्रवण करो १८२॥
ततो नारायणो देवस्तस्मै सर्व प्रदाय वै।
कालयोगेन विश्वात्मा समं चक्रे ऽथं तुबरोः १८३
नारदं मुनि शार्दूल मेवं वृत्तमभूत्युरा ।
नारायणस्य गीतानां गानं श्रेष्ठ पुनः पुनः ।।६४
गानेनाराधितो विष्णुः सत्कीति ज्ञानवर्चसी।
ददाति तुष्टि स्थानं च यथाऽसौ कौशिकस्य वै ॥५
पाक्षप्रभृतीनां च संसिद्धि प्रददौ हरिः।
तस्मात्वया महाराज विष्णुक्षेत्र विशेषतः ॥६
बष्णव गीत कथन ] [ १५३ अर्चनं गाननृत्याचं वाद्योत्सवसमन्वितम् । कर्तव्यं विष्णुभक्ता हि पुरुपैर निशं नृप ।।८७ श्रोतव्यं च सदा नित्यं श्रोतव्योसो हरिस्तथा । विष्णुक्षेने तु यो विद्वान् कारयेद्भक्तिमयुतः ।।८८ गाननृत्यादिक चव विष्ण्वारयानं कथां तथा । जातिस्मृति च मेधा च तथैवोपरमे स्मृतिम् । ८६ प्राप्नानि विष्णुसायुज्यं सत्यमेतन्नृपाधिप । एतत्त कथितं राजन यन्मां रवं परिपृच्छसि ।।६० इसके अनन्तर नारायण देव ने उसको सप प्रदान पर विश्वात्मा ने काल के योग से उसे तुम्बरू के समान ही कर दिया था ॥८॥ पहिले मुनियो मे शार्दूल के समान नारद या वृत्त इस प्रकार का हुआ था कि भगवान् नारायण के गीतो का पुनः पुनः गान होता था ॥४॥ गान के द्वारा प्राराधना रिये गये भगवान् विष्णु सत्कीति-ज्ञान-वर्चस-तुष्टि और स्थान प्रदान पिपा करते हैं जैसा कि इनने कौशिक का किया था ।।८॥ भगवान् हरि ने पद्माण प्रादि को ससिद्धि प्रदान की थी । इसलिये हे महाराज ! विशेष रूप से विष्णु के क्षेत्र में प्रापको प्रचंन गाग-नृत्य मादि वाद्योत्सव के सहित विष्णु भक्त पुरुपो को के साथ निरन्तर है नृप ! करना चाहिए ॥८६॥८७॥ नित्य और सदा श्रवण परना पाहिए और भगवान् हरि प्रवण करने के योग्य है। जो विद्वान् विष्णु क्षेत्र में भक्ति-भाव सयुत होकर ऐसा करता है । गान नृत्य प्रादिक तथा भगवान् विष्णु का मास्यान एव कथा किया परता है वह जाति स्मृति मेपा तथा उपरम में स्मृति प्रौर हे नृपाधिप ! विषणु पा सायुज्य अवश्य ही प्राप्त करता है-यह पूर्णतया सत्य है । हे राजन् यह हमने तुमको सब वह दिया है जिराको कि तुम गुभ से पूछ रहे हो। हे धर्मपारियो मे परम प्रे! पय मागे और बोलो, मैं तुमसे क्या बतलाऊँ ! | REME011 ॥७४-वैष्णव गीत कथन ॥ माकंडेय महाप्राज्ञ केन योगेन लब्धवान् ।
१५४ [ लिड्न पुराण्ड गान विद्या महाभाग नारदो भगवान्मुनिः ।। तु बरोश्च समानत्व कस्मिन्काल उपेयिवान् । एतदाचक्ष्व मे सर्वं सर्वशोसि महामते ॥२ श्रुतो मयायमर्थो वै नारदाद्देवदर्शनात् । स्वयमाह महातेजा नारदोऽसौ महामति. ॥३ मतप्यमानो भगवान् दिव्या वर्षसहस्राम् । निरुच्छवासेन सयुक्तस्तु बरोगोंरक स्मरन् ।।४ तताप च महाघोर तपोराशिस्तप परम् । अथातरिक्षे शुश्राव नारदोऽमौ महामुनि- ॥५ वाणी दिव्या महाघोपामभुतामशरीरिणीम् । किमर्थ मुनिशार्दूल तपस्तपसि दुश्चरम् ॥६ उलूक पश्य गत्वा त्व यदि गाने रता मतिः। मानसोत्तरशैले तु गानवधुरिति स्मृत ।।७ अम्बरीष नृप ने कहा है महान विद्वद्वर । हे मार्कण्डेय । है महान् भाग्य वाले भगवान् नारद मुनि ने किस योग के द्वारा मान्य विद्या की प्राप्ति की थी॥१॥ आप तो महान् मति वाले हैं और सभी कुछ के ज्ञाता हैं । तुम्बरु गन्धर्व की समानता को नारद देवर्षि ने किस समय में प्राप्त की थी यह सभी हमको कृपा करके दलाइये ॥२॥ मार्क- ण्डेय मुनि ने कहा-मैंने यह सब कुछ समाचार देवो के समान दर्शना वासे नारद जी से शवण किया है । महामति और महान तेजस्वी भग- वान् नारद ने स्वयं ही मुझसे कहा था ||३| भगवान नारद ने सहस्र दिव्य वर्ष तक भली-भांति तपस्या की थी भोर निरुच्छ्वास होकर तुम्बह गन्धर्व के महान् गौरव का रमरण किया था ॥४॥ तपोराशि मुनि ने महाघोर परम तपस्या की थी। इसके अनन्तर इस नारद मुनि ने अन्तरिक्ष में थवरण निरा था। प्राकाश में बिना शरीर वाली परम दिव्य- महान् घोप समन्धित एक अत्यहा वाणी हुई थी-'हे मुनिशाल ! तुम किरात की अनिलापा से यह ऐसा परम दुश्वर तप इस तपोभूमि में स्थित होवर पर रहे हो?" यदि गाउ विद्या में तुम्हारा प्रत्यन्त अनु- वैष्णव गीत कथन [१५५ राग है तो मानसोत्तर शैल पर जाकर उलूक का दर्शन करो जो कि वहाँ पर गान वधु कहा गया है ॥५॥६॥७॥ गच्छ शोनच पश्यन गानवित्त्वं भविष्यसि । इत्युक्तो विस्मया विधे नारदो वाग्विदा वर ।। मानसोत्तरशैले तु गानबधु जगाम वै । गधळ किन्नरा यक्षास्तथा चाप्सरसा गरगा I समासीनास्तु परितो गानवधुततस्तत । गानविद्या समापन शिक्षितास्तेत पक्षिणा ।।१० 'स्निग्ध कठस्वरास्तन समासीना मुदान्विता । ततो नारदमालोक्य गानबधुरुवाच ह ॥११ प्रणिपत्य यथान्याय स्व गतेनाभ्यपूजयत् । किमयं भगवानर चागतोऽसि महामते ॥१२ यि कार्य हि मया ब्रह्मन् बहि किं करवाणि ते ५ उलूपेंद्र महाप्राज्ञ शृणु सर्व यथातथम् ।।१३ मम वृत्त प्रवक्ष्यामि पुरा भूत महाद्भुतम् । अतीते हि युगे विद्वान्नारायणसमीपगम् ॥१४ तुम प्रति शीघ्र चले जागो और इस उचूक या दर्शन प्रास परो। इससे तुम गान विद्या ये परम वेत्ता हो जानोगे । इस प्रकार से कहे गये नारद मुनि परम विस्मय से प्राविष्ट हो गये और वारवेत्तानो म प्रतिश्रेष्ठ नारद महामुनि वहां मानसरोवर य उत्तर म स्थित शैन पर गान बाधु के समीप चले गय थे । वहाँ उ होने देखा कि उस गान वन्यु के चारो मोर गन्धर वितर-यक्ष और अप्सरायो । समूह समास्थित हैं और गान विद्या से सम्पप रा पक्षी से वे सब गान विद्या की शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं ||१०॥ वहाँ पर नारद मुनि ने देखा कि सब के पण्ठ प्रति मित्र थे जिनसे बहुत ही स्वर लहरी भापित हो रही थी। सब लोग परम हपं से युक्त होपर यहां पर स्थित हैं। जब वहाँ नारद महामुनि पहुँचे तो इनको देखकर उस गान मन्यु ने नारद से कहा था-॥११॥ पहिते उसो प्रणिपात पिया मोर रागुचित रीति ऐ गारद का स्वागत १५६ । लिङ्ग पुराणा करके अभ्यर्चना की । गान बन्धु ने फिर नारद से वहा-हे महान् मतिः वाले ! आप यहाँ क्सि अभिलाषा को लेकर यहाँ आये हैं ' हे ब्रह्मन !' आप आज्ञा दीजिए मैं पाप की क्या सेवा करू । नारद मुनि ने कहा- हे उलूको में सर्वश्रेष्ठ ! आप तो महान् पण्डित हैं। जो यथार्थ बात है उसे प्राप श्रवण कीजिए । पहिले मेरे साथ जो कुछ भी परम अद्भुत घटना हुई थी ज्म समस्त वृत्त को मैं बतलाऊँगा। व्यतीत हो जाने वाले युग मे हे विद्वन ! मैं भगवान् सर्वेश्वर नारायण के समीप मे गया था॥१२॥१३॥१४॥ मां विनिर्धूय संहृष्टः सम हूय च तुबरुम् । लक्ष्मीसमन्वितो विष्णुरशृणोद्गानमुत्तमम् ॥१५ ब्रह्मादयः सुराः सर्वे निरस्ताः स्थानतोऽच्युताः। कोशिकाद्या. समासीना गानयोगेन वै हरिम् ॥१६ एवमाराध्य संप्राता गाणपत्य यथामुखम् । तेनाहमतिदु.खार्तस्तपस्तप्नुमिहागतः।।१७ यदत्त यद्धृतं चैव यथा वा श्रुतमेव च । यदधीत मया सर्व कला नाहीत पोडशोम् ॥१८ विष्णोर्माहात्म्ययुक्तस्य गान योगस्य वै ततः । संचिंत्याह तपो घोर तदर्थ तप्तवान् द्विज ॥१६ दिव्यवर्षसहस्र वै ततो ह्यशृणुव पुनः। वाणीमाशसंभूता त्यामुद्दिश्य विहंगम ॥२. उलूकं गच्छ देवर्षे गानकंधु मतियदि । गाने चेद्वर्तते ब्रह्मन् तत्र व वेत्स्यसे चिरात् ॥१ लक्ष्मी देवी के साथ रास्थित भगवान् विष्णु ने मेरा तिरस्कार करके परम प्रसन्न होते हुए तुम्बह गन्धर्व को चुना लिया था। फिर विष्णु ने उसका उत्तम गान सुना था ॥१शा ब्रह्मा मादि समस्त देव स्थान से मच्युत निरस्त कर दिये गये थे। कोशिशादि सब वही पर गान के योग से हरि के समीप में समागीन थे। इस प्राार से प्राराधना करके वे यथा गुग गाणपत्य यो सम्प्राप्त हुए थे। उससे में मरयन्त दुखित हपा और चष्णव गीत कथन ] १५७ मैं यहाँ तपस्या करने को पाया हूं ॥१६॥१७॥ जो मैंने दिया-जो कुछ भी हवन किया और जो कुछ भी मैंने अध्ययन किया है वह मब सोलहवी कला के योग्य भी नही है ।।१८) हे द्विज ! महिमा से समन्वित भगवान् विष्णु के गान योग का सचिन्तन करके उसी के लिये महाघोर मैने तप- वर्या की थी ।।१६। एक सहस्र दिव्य वर्ष तक यह तप करके मैने माकाश मे होने वाली वारणी का श्रवण किया था जो कि आपका उद्देश्य लेकर हुई थी। उसमे ग्राफाश वाणी ने यही पाहा था-है देवर्षे ! यदि तेरा गान विद्या के सीखने का अनुराग है तो गान व.घु उलूक के पास चला जा । हे ब्रह्मन् ! वहाँ पर तू चिरकाल में मान विद्या का ज्ञान प्रास कर लेगा ॥२०॥२१॥ इत्यहं प्रेरितस्तेन त्वत्समोपमिहागतः । किं करिष्यामि शिष्योह तव मा पालयाव्य य ॥२ शृणु नारद यदत्त पुरा मम महामते । प्रत्याश्चर्यसमायुक्त सर्वपापहरं शुभम् ।।२३ भुवनेश इति रयानो राजाभूद्धामिकः पुरा। अश्वमेधससंश्च वाजपेयायुतेन च ॥२४ गवां कोटयर्बुदे चैव सुवर्णस्य तथैव च । बाससा रथहस्तीनां कन्य श्वानां तथैव च ॥ ५ दत्वा स राजा विप्रेभ्यो मेदिनी प्रतिपालयन् । निवारयन स्वके राज्ये गेययोगेन केशवम् ।।२६ प्रत्यं वा गेययोगेन गायन्यदि स मे भवेत् । वध्यः सर्वात्मना तस्माद्व दैरीड्यः परः पुमान् ॥२७ गानयोगेन सर्वत्र रियो गायतु नित्यशः । सूतमागधसंघाच गोतं ते कायंतु वै ॥२८ इत्याज्ञाप्य महातेजा गज्यं वै पर्यपालयत् । तस्य राज्ञ. पुराभ्याशे हामिन इति थु तः ॥२६ इस प्रकार से उसके द्वारा प्रेरित होकर में इस समय आपके समीप में उपस्थित हुमा हूँ। हे अव्यय ! मै प्रापका शिष्य हूँ। अब मै आपकी १५८ } और परम [ लिङ्ग पुराण क्या सेवा करूं ? आप मेरा पालन करिये ।।२२।। गान बन्धु ने कहा हे महामति वाले नारद । पहिले मेरा जो कुछ भी हुया उसका तुम अब श्रवण करो। यह घटना भी अत्यन्त प्राश्चर्य से समग्युक्त शुभ सम्पूर्ण पापो के सहरण करने वाली है ॥२३॥ पुराने समय मे एक अति धार्मिक मुक्नेश नाम वाला राजा हुआ था। उस राजा ने एक सहस अश्वमेघ यज्ञ और दश सहस्र वाजपेय किये थे। उस नृप ने करोडो प्रवुद गौ सुवर्ण वस्त्र रथ हाथी कन्या और अश्वो के विप्रो को दान दिये थे और इस परम धार्मिक वृत्ति से उसने मेदिनी का परिपालन किया था। किन्तु उसने गान करने के योग से भगवान् वेशव को उपासना करने का अपने राज्य में निवारण कर दिया था ॥२४॥२५॥२६॥ कोई भी अन्य पुरुष मेरे राज्य मे मेय योग से गान करेगा तो वह मेरे द्वारा वध्य होगा अर्थात में उसे मृत्यु का दण्ड दे दूंगा। पर पुमान् प्रशु केवल वैद के मन्त्रो के द्वारा ही स्तुति करने के योग्य हैं ।।२७।। गान योग से नित्य केवल स्त्रियां ही सर्वत्र गान frया करें और टूा और मागधो के समुदाय मेरा गीत करे । ऐसी प्राना उम राणा ने जो कि महान् तेजस्वो था, देकर ही अपने राज्य का प्रशासन परता था। उस राजा के पुर के समीप मे हरिमित्र नामक एक व्यक्ति था ॥२८॥२६॥ न हाणो विष्णुभक्तश्च सर्व विवजित.। नदीपुलिनमासाद्य प्रतिमा च हरे शुभाम् ॥३० अभ्ययं च यथान्यायं घृतदव्युत्तरं बहु । मिष्टान्न पायसं दत्त्वा हरेरावेद्य पूपकम् । ३१ परिणपत्य यथान्याय तम विन्यस्तमानस.। अगायत हरि तत्र तालवर्गलयान्वितम् ॥३२ प्रतीव स्नेहसंयुक्तम्तद्गतेनातरात्मना। ततो राज समादेशाचारास्तत्र समागताः ॥३३ तदनादि सकल निधू य च समतत.। ब्राह्मण त गृहीत्वा ते राज्ञे सम्पह न्यवेदयन् ।।३४ ततो राजा विजयष्ठ परिभत्स्य सुदुर्मति ।
वैष्णव गोत कथन ] T१६ राज्याग्निर्यातयामास हत्वा सर्व धनादिकम् ॥३५ प्रतिमां च हरेश्वच म्लेच्छा हृत्वा ययुः पुनः। सतः कालेन महता कालधर्ममुपेयिवान् ॥३६ स राजा सर्वलोक्पु पूज्यमानः समंततः । 'क्षुधार्तश्च तथा खिन्नो यममाह सुदुःखितः ।।३७ वह हरिमिन ब्राहारण भगवान् विष्णु का परम भक्त था और सम्पूर्ण द्वन्द्वों से रहित होकर नदी के पुलिन पर चला गया था । वहाँ पर हरि दो परम शुम प्रतिमा की यथा विधि पूजा करके धृत-दपि से सयुत मिटान-पायरा-पूजा हरि फो रामपित कर-विष्णु का प्रणिपात करता था और उसमे विन्यस्त मन वाला होकर हरि के गुणों का गान 'किया करता था जो कि गायन ताल-वर्ण और लय से युक्त होता था। इसका यह गायन जिस समय होना था वह तद्गत अन्तरात्मा वाला होकर अत्यन्त हो स्नेह से समन्वित हो जाया करता था । इसके अनन्तर एकबार राजा की याज्ञा से उसके अनुचर यहाँ पर आ गये थे ॥३०॥ ॥३१॥३२॥३३॥ उन्होने उमफे अर्चना के सब उपचारो को फैक-फांक कर तथा सब के साथ उन्होने उस ब्राह्मण को पकड कर राजा के समक्ष मै उपस्थित कर दिया था ॥३४। इसके पश्चात् उस दुध बुद्धि वाले राजा ने उस श्रेष्ठ द्विज को डांट फटकार के उसके समस्त धन यादि वा हरण कर उसे राज्य से निकाल दिया था ॥३१॥ उस हरिमिन ब्राह्मण के द्वारा पूजित जो हरि पी प्रतिमा थी उसे म्लेच्छ लोग हरण फरके लेगये थे। इसके अनन्तर बहुत काल के पश्चात् वह राजा काल के धर्म मृत्यु को प्राप्त हुना था । वह राजा यहाँ सब लोक में परम पूज्य माना जाता था किन्तु मरणोत्तर वह क्षुधा से प्रार्ह खिप्न और अत्यन्त ही दु:सित होकर यमराज रो बोला-॥३६॥३७॥ शुत्त ट् च वर्तते देव स्वर्गतस्यापि मे सदा। मया पापं कृतं किं वा किं करिष्यामि व यम 11३८ त्या हि सुमहत्पापं कृतमज्ञानमोहतः। हरिमित्रं प्रति तदा वासुदेव परायणम् ॥३६ १६० [लिङ्ग पुराए हरिमित्रे कृतं पापं वासुदेवार्चनादिषु । तेन पापेन संप्राप्तः क्षुद्रोगस्त्वा सदा नृप ।'४१ दानयज्ञ दिकं सर्व प्रनष्ट ते नराधिप । गीतवाद्यसमोपेत गायमानं महामतिम् ॥४१ हरिमित्र समाहूय हृतवानसि तद्धनम् । उपहारादिकं सर्व वासुदेवस्य सन्निधो ॥४२ तव भृत्यस्ता लुप्तं पाप चक्र स्त्वदाज्ञया । हरे. वीति विना चान्यवाह्मणेन नृपोत्तम ॥४३ न गेमयोगे मातव्य तस्मात्यापं कृतं त्वया। नष्टस्ते सर्वलोकोद्य गच्छ पर्वतकोटरम् ।।४६ राजा ने यम से कहा-हे देव ! स्वर्ग में आये हुए भी मुझे सर्वदा भूख और प्यास सता रही है । हे यमराज ! मैंने क्या ऐसा पाप किया है ? अब मैं क्या करूं? यमराज ने कहा-हे राजन् ! तुमने अज्ञान से मोह के कारण बड़ा भारी पाप क्यिा है । तुमने सर्वदा भगवान् वासुदेव के पूजन और कीर्तन में परायण हरिमित विप्र के प्रति वडा अन्याय किया था --यही तुम्हारा परम भीपण पाप है । हरिमित्र ने जो भगवान् वासुदेव की अर्चना प्रादि मे जो पापाराध किया था उस पाप से है नृप ! यह तुमसे सदा भूव का रोग बन गया है ॥३८॥३६॥४०॥ है नराधिय ! तूने जो कुछ भी दान दिये हैं और यज्ञ प्रादि किये हैं वे सभी तेरे नष्ट हो गये हैं क्योंकि तूने गीत वाद्य से युक्त मान करने वाले महान्, मतिमान हरिमित्र नामक विप्र को बुलाकर उसका सम्पूर्ण धन का हर पर लिया था । भगवान् वासुदेव की सन्निधि मे जो उपहारादिक सब थे उन को तेरे हो भृत्यो ने तेरी ही प्राज्ञा से उस समय में लुप्त कर दिया था-यह एक महान् पाप उन्होने किया था। हे नृपोत्तम ! तेरा ही ऐसा आदेश था कि ब्राह्मण के द्वारा भी हरि की कीत्ति के बिना ही अर्थात् मान न करके ही उसना करनी चाहिए।४१४२१४३।। गेय योग में गान नही करना चाहिए-ऐसी प्राज्ञा देकर तूने महत् पाप किया था ४४॥
वैष्णव गीत कथन ] पूर्वोत्सृष्टं स्वदेह तं खादनित्य निकृत्य वै। तस्मिन् कोणे स्विम देह खादन्नित्य क्षुधान्वितः ।।४५ महानिरयसंस्थरत्व यावन्मन्वंतरं भवेत् । मन्वंतरे ततोऽनीते भूम्पा त्वं च भविष्यामि ।।४६ तत कालेन सप्र प्य मानुष्यमवगच्छसि । एवमुक्त्वा यमो विद्वास्तवातरधीयत ।।३७ हरिमित्रो विमानेन स्तूयमानो गणाधिपै । विष्णुलोकं गतः श्रीमान् सगृह्य गणबाधवान् ।।४८ भुवनेशो नृपो ह्यस्पिन कोटरे पर्वतस्य वै। खादमान शवं नित्यमास्ते क्षत्त समन्विनः ।। इरा समय तेरा सर्वलोक नष्ट हो गया है अब पर्वत कोटर मे जानो। वहाँ पर पूर्व मे उत्सृष्ट तेरा अपना देह है उसे ही काटकर नित्य खाकर रहो । उस कोण मे इस देह यो क्षुधा से युक्त होकर नित्य ही साले रहो । महा नर में सस्थित होते हुए जब तक मन्वन्तर समाप्त होगा यहाँ इसी भौति रहोगे । मन्वन्तर के प्रतीत हो जाने पर फिर तुम भूमि पर उत्पन्न होनोगे ॥४५॥४६।। पहिले अन्य पशु प्रादि की योनि मे समुत्पत्ति प्राप्त कर कुछ वाल मे पुन तुझे मनुष्य योनि प्राप्त होगी । गानवन्धु ने कहा इतना रहकर वह विद्वान यमराज वहाँ पर ही अन्त- हिंत हो गया था ॥४७॥ हरिमित्र विमान के द्वारा गणाधियो से स्तूप- मान होता हुमा विष्णु लोक को प्राप्त हुमा था किस श्रीमान के साथ समसा गण वान्ध भी संग्रहीत थे ॥४८|| वह भुवनेश राजा पर्वत के इस योटर मे नित्य शव या भोजन करते हुए भरा प्यास से युग होकर यही रहता था॥४॥ प्रद्राक्ष त नृपं तत्र सर्वमेतन्ममोक्तवान् । समालोक्याहमानाय हरिमियं ममेयिवान् ॥५० विमानेनार्कवर्णन गरछनमगरवृतम् । इद्रद्युम्नप्रसादेन प्राप्त मे ह्यायुरुत्तमम् । ५२ तैनाह हरिमित्रं च हटवानस्मि सुनत ।
१६२ ] [ लिङ्ग पुराण तदैश्वर्य प्रभावेन मनो मे समुपागतम् ॥ २ गानविद्या प्रति तदा किन्नरैः समुपाविशम् । पष्टि वर्षसहस्रारणा गानयोगेन मे मुने ॥५३ जिह्वा प्रसादिता स्पष्टा ततो गानमशिक्षयम् । ततस्तु द्विगुणेनैव कालेनाभूदियं मम ।।१४ गानयोगसमायुक्ता गता मन्वतरा दश । गानाचार्योऽभव तत्र गधर्वाद्याः समाता ॥५५ एते विन्नरसंघा वै मामाचार्य मुपागताः । तपसा नैव शक्या वेगानविद्या तपोधन ॥५६ वहां पर उम राजा को मैने देखा था और यह सब मुक्त से कहा था। मैने जान कर और देखकर फिर मै हरिमित्र के पास प्राप्त हुआ था ॥५०॥ वह हरिमित सूर्य के समान वणं वाले विमान के द्वारा जा रहा था और देवो से समावृत था। मैंने इन्द्रा म्न के प्रसाद से यह उत्तम श्रायु प्राप्त की है ॥५१॥ हे सुव्रत । उस समय इमी से मैंने हरिभित्र को देख लिया था । उसके उस ऐश्वर्य के प्रभाव से मेरा भी मन मा गया था कि मै भी गान विद्या का अभ्यास का और तब किनारो के साथ बैठा था। हे मुने ! मेरो गान योग के द्वारा साठ हजार वर्षों मे जिहा स्पष्ट रूप से प्रसादिन हुई थी तब फिर मैने गान शिक्षा प्राप्त की थी। इसके अनन्तर भी यह विद्या दुगुने काल मे मुझे हुई थी ॥५२॥५३॥५४॥ इस गान योग मे समायुक्त हुए दश मन्वन्तर व्यतीत हो गये हैं । तब मैं गान विद्या का प्राचार्य हुआ था समस्त गन्धर्व आदि पाये थे। ये किन्न- रो के समूह भी सब मुझको ही प्राचार्य मानने वाले हुए हैं । हे तपोधन ! तप से गान विद्या प्राप्त नहीं की जा सकती है ।।५।।५६।। तस्माच्छ तेन सयुक्तो मत्तस्त्वं गानमाप्नुहि । एवमुक्तो मुनिरतं वै प्रणिपत्य जगौ तदा ॥५७ तच्छृणुष्व मुनिश्रेष्ठ वासुदेवं नमस्य तु । उलूकेनैवमुक्तस्तु नारदो मुनिसत्तमः ॥ शिक्षाक्रमेण संयूक्तस्तत्र गानमशिक्षयत।
वैष्णव गीत कथन ] .[ १६३ गानबंधुस्तदाहेदं त्यक्तलज्जो भवाधुना ॥१६ स्त्रीसंगमे तथा गीते द्यूते व्याख्यानसंगमे। व्यवहारे तथाहारे त्वर्थाना च समागमे ॥३० आये व्यये तथा नित्यं त्यक्तलज्जस्तु व भरेत् । न कुचितेन गूढेन नित्य प्रावरण दिभि ।। २ हस्तविक्षेपभावेन व्यादितास्येन चैव हि। निर्यातजिह्वायोगेन न गेयं हि कथचन ॥६२ इसलिये क्योकि इसी शिक्षा में एकमात्र अभ्यास ही कारण होता है, तुम थ त से सयुक्त हो, अब मुझसे इस गान विद्या को प्राप्त करो। इस प्रकार से कहे गये नारद मुनि ने उस गान ब धु को प्रणाम करके तब गान किया था ॥५५॥ हे मुनिश्रेप्र भगवान् वासुदेव को प्रणाम करके उसका श्रवण करो। मार्कण्डेय ने कहा-उलूक के द्वारा इस तरह मुनियो मे परम श्रेष्ठ नारद जी से कहा गया था ।।५। फिर शिक्षा के क्रम के अनुसार सयुक्त होकर यहाँ पर गान विद्या की शिक्षा दी थी। गान बन्धु उस समय नारद से यह बोने इस समय अर्थात् गान विद्या सीखने के समय मे तुमको लज्जा को पूर्ण रूप से त्याग देना चाहिए ॥५६॥ उलूक ने वहा~जो कार्य के विद्या तक हो उन्हे कार्य गिद्धि की इच्छा रखने वाले पुरुष को त्याग ही देना चाहिए। जिन २ कार्यों में लज्जा का त्याग करना चाहिए उन्हे बताते हैं स्त्री के साथ सङ्गम कारने मे-गान करने के समय मे-धूत जीडा करने के समय मे-व्यारयान करने के प्रसङ्ग मे-व्यवहार मे-भोजन करने के समय मे-अर्थ सम्बन्धी समागम मे-पाय मे-व्यय करने के समय में मनुष्य को लज्जा का त्याग कर देने वाला ही होना चाहिए। माग परने वाले व्यक्ति को कुञ्जिन- प्रावरण प्रादि से गूढ -हस्तो के विक्षेप भाव से युक्त व्यादित गुख से युक्त और जिह्वा निकालने वाला होते हुए कभी गान नहीं करना चाहिए। ॥६॥६१॥६२।। न गायेदूवंबाहुश्व नोर्वदृष्टि क्थवन । स्वाग निरीक्षमाणेन पर संप्रेक्षता तथा ॥६३ १६४ ] [ लिङ्ग पुराण संघट्ट च तथोत्थाने कटिस्थान न शस्यते । हासो रोषस्तथा कंपस्तथान्यत्र स्मृतिः पुनः॥६४ नतानिशस्तरूपाणि गानयोगे महामते । नैकहस्तेन शक्य स्यात्तालसंघट्टनं मुने ।।६५ क्षुधालेन भयार्तेन तृष्णार्तेन तथैव च । गानयोगो न कर्तव्यो नांधकारे कथंचन ॥६६ एवमादीनि चान्यानि न कर्तव्यानि गायना। एवमुक्तः स भगवास्नेनोक्तविधिलक्षण. । प्रशिक्षयत्तथा गीतं दिव्यं वर्षसहस्रकम् ।।६७ ततः समस्तसपन्नो गीतप्रस्तारकादिषु । विपंच्यादिपु संपन्नः सर्वस्वरविभागवित् ।।६८ अयुतानि च पत्रिंशत्सहस्राणि शतानि च । स्वराणां भेदयोगेन ज्ञातवान्मुनिसत्तमः ।।६६ ऊर्व वाहु वाला होर तथा ऊर्ध्व (ऊपर की नोर ) दृष्टि वाला होकर कभी भी गान नहीं करना चाहिए । अपने अगो को देखते हुए तथा दूसरे की ओर देखते हुए भी गान न घरे ।।६३।। सघट्ट मे तथा उत्थान मे कटि स्थान प्रशस्त नही होता है। हास्य, रोप, कम्प तथा अन्न की स्मृति करना भी हे महामते । गानयोग मे प्रशस्त रूप नही होते हैं। हे मुनिवर । एक हाथ से तालो का सघट्टन नहीं किया जा सकता है ॥६॥ ॥६५।। भूख से दुखित भय से पार्टी प्यास से पीडित पुरुष को गानयोग नहीं करना चाहिए और अन्धकार में भी इसे न करे ॥६६॥। इस प्रकार से उपयुक्त कुछ नियम है जो गान करने वाले को नहीं करने चाहिए और उन्हे बचाकर हो गान योग का अभ्यास करे। मार्कण्डेय मुनि ने पहा-इम तरह से कहे हुए उन भगवान् ने उक्त विधि के लक्षणो के द्वारा उस गानयोग को एक सहस्र दिव्य वर्ष तक सीखा था । ६७॥ तब पह गीत प्रस्तारक प्रादि सम्पूर्ण विधियो मे समान हुए और विपञ्ची प्रादि वाद्यो मे कुशल तथा समस्त स्वरो के विभाग के ज्ञाता हुए थे ॥६॥ दश सहस्र और छत्तोस सहन सो स्वरो के भेद योग के ज्ञाता वैष्णव गोत कथन ] [ १६५ मुनिश्रौष्ठ नारद हुए थे ॥६६॥ ततो गधर्वसंघाश्च किन्नराणां तथैव च । मुनिना सह संयुक्ताः प्रातियुक्ता भवति ते १७० ग'नबंधु मुनि. प्राह प्राप्य गानमनुत्तमम् । वा समासाद्य संपन्नस्त्वं हि गीतविशारदः ।।७१ ध्वाक्षशत्रो महाप्राज्ञ किमाचार्य करोमि ते । ब्रह्मणो दिवसे ब्रह्मन् मनवस्तु चतुर्दश ।।७२ ततस्त्र लोक्यसंप्लावो भविष्यति महामुने । तावन्मे त्वायुपो भावस्तावन्भे परम शुभम् ।।७३ मनसाध्याहित मे स्य दक्षिणा मुनिसत्तम । अतीतकल्पसंयोगे गरुडस्त्वं भविष्यसि ।।७४ स्वस्ति तेऽस्तु महाप्राज्ञ गमिष्यामि प्रसोद माम् । एवमुक्त्वा जगामाथ नारदोपि जन र्दनम् ॥७५ श्वेतद्वीपे हुपीकेश गापयामास गीतकान् । तत्र श्रुत्वा तु भगवान्नारदं प्राह माधवः ।।७६ तु बरोर्न विशिष्टोसि गीतरद्यापि नारद । यदा विशिष्टो भविता त कालं प्रवदाम्यहम् ॥७७ इसके अनन्तर समस्त गन्धर्वो के समुदाय तथा किन्नरो के समूह नारद मुनि के साथ सयुक्त हुए और प्रीति करने वाले वे सभी होते हैं 11७०॥ फिर नारद मुनि सर्वोत्तम गानयोग यो प्राप्त कर गान यन्यु से बोले-मैं अब गानयोग की विद्या मे पूर्ण हो गया हूँ क्योकि पाप जैसे गीत विद्या के महा मनीषी मुझे शिक्षा देने वाले प्राप्त हो गये थे । हे प्वाक्ष शत्रो ! हे महाप्राज्ञ ! माप मेरे प्राचार्य हैं। अब मुझे पाना दीजिए कि मै मापको क्या सेवा करूं । गान वन्धु ने कहा-हे महा- मुने ! ब्रह्मा के एक दिन मे चौदह मनु होते है। इसके बाद त्रैलोक्य सप्ताव होगा । तब तक मेरी मायु हो-यही मेरे मन वो चाही हुई परम शुभ दक्षिणा होगी । नारद जी ने यहा-मतीत से जो वल्प का संयोग होगा उसमे भाप गाड़ होंगे ॥७॥ नारद जी ने फिर कहा-है महा. ।
[ लिङ्ग पुराण प्राज्ञ । आपका करयारण होवे । मुझ पर आप प्रसन होइये । मैं अब चला जाऊँगा । मुझे प्राज्ञा दीजिए । मार्कण्डेयजी ने कहा-इस प्रकार से कहकर देवर्षि नारद भगवान् जनार्दन के समीप मे चने गये थे ॥७॥ श्वेत द्वीप में पहुंच कर भगवान् हृषीकेश के सामन नारद ने गीतो का गान किया था । उस नारद के गीतो के गायन का श्रवण कर भगवान माधव ने नारद से कहा था- हे नारद ! अभी तक भी पाप तुम्बरु से विशिष्ट गीतो के गायन में नहीं हुए हैं । जिस समय मे पाप मे तुम्बर से विशेपना प्रा जायगी उस समय को में बताता हूँ ॥७६७७॥ गानव समासाथ गानार्थज्ञो भवानसि । मनोवैवस्वतस्याहमष्टाविंशतिमे युगे॥७८ द्वापराते भविष्यामि यदुवगकुलोद्भवः । देवक्या बमुदेवस्य वृष्णो नाम्ना महामते 158 तदानी मा समासाद्य स्मारयेया यथातथम् । तर त्वा गीतसपन करिष्यामि महाव्रतम् ।।१० तु बरोश्च सम चव तथातिशयमयुतम् । तावत्काल यथायोग देवगधर्षयोनिपु॥८१ शिक्षयस्व यथान्यायमित्युक्त्वातरधीयत । ततो मुनि प्रणम्यन वीणावादनतत्पर । ६२ देवदिवसकाश सर्वाभरणभूषित । हपसा निधिरत्यत वासुदेयपरायण ॥३ स्पधे विपनी मामाय सर्वलोकाश्नचारस। वारण याम्यमानेयमैद्रपौवेरमेव च ॥८४ गान धन्धु ने सात गारर मापने गा] विद्या प्रास को है । प्रब वैर. रवा गा प्राशिवं सुगम द्वारर युग ये पत मे में यदुयुत पा में उत्पात हान पाने दक्षी वासुदेव थे यस हे महामने ! 'पृप्रा-ग नाम में पवनीरणं हाऊँगा १७९-७६ रस समय मे पार मेरे पास उपस्थित हार टोr २ स्मररा दिन उस समय में प्रापको महान् प्रन यासा गीता से सम्मन यरगा ॥८॥ तुम्बर के तुल्य प्रयया उससे भी वैष्णव के लक्षण. ] [१६७ अधिक बना दूगा । उस समय तक श्राप देव तथा गन्धर्व योनियों में यथायोग शिक्षा प्राप्त करो जैसा कि शिक्षा प्राप्त करने का क्रम होता है। इतना कहकर भगवान् माधव अन्तर्धान हो गये थे। इसके अनन्तर भग-- वान् को प्रणाम किया और वीणा के बजाने में परायण होकर देवर्षि देव के समान-समस्त प्राभरणो से विभूवित-तप की निधि और वासुदेव ' परायण होकर अपने कन्धे पर धीरणा रखते हुए समस्त लोको मे पिच- रण किया करते थे॥॥२॥८॥४॥ ॥७५-वैष्णव के लक्षण और माहात्म्य ।। घेणवा इति ये प्रोक्त वासुदेवपरायणाः । कानि निहानि तेषां वै तन्नो ब्रू हि महामते ॥१ तेषां वा फि करोत्येप भगवान् भूतभावनः । एतन्मे सर्वमाचक्ष्व सूत सर्वार्थ वित्तम ॥२ अबरीपेण वै पृटो मार्कडेयः पुरा मुनिः । युप्माभिरद्य यत् प्रोक्त तद्वदामि यथातथम् ॥३ शृणु राजन्यथान्यायं यन्मा त्वं परिपृच्छसि । यथास्ते विष्णुभक्तस्तु तत्र नारायणः स्थितः ।।४ विष्णुरेव हि सर्वत्र येषां व देवता स्मृता। कोय॑माने हरी नित्यं रोमांचो यस्य वर्तते ।।५ कंप स्वेदस्नथाक्षेपु दृश्यंते जलबिंदवः । विष्णुभक्तिममायुक्त न् श्रौतस्मातंप्रवर्तकान् ।।६ प्रीतो भवति यो दृष्ट्वा वैष्णवोऽगो प्रकीर्तितः । नान्यदाच्छादयेद्वस्त्र वैष्णवो जगतोऽरणे ॥७ इस अध्याय मे वयवो या लक्षण और उनका माहात्म्य तथा शेयो को उनसे धना पर निरूपए दिया जाता है। प्रपियो ने पक्ष- हे महान् मति पाले! पामुदेव भगवान् मे परापण रहने वाले पुग्प वैष्णय यहे गये हैं। उन वैष्णवो के या चिह्न होते हैं- यह कृपापर हमको यतमाइये । हैं रामस्त मयों के शातामो में परम थे माजी !
१६ ] [ लिङ्ग पुराण । यह भूत भावन अर्थात् प्राणियों पर कृपा रखने वाले भगवान् उनको क्या फल दिया करते हैं । यह पाप हमको सभी बतलाये ॥१॥२॥ सूत जी ने कहा-पुराने समय किसी समय जो तुम आज इस समय मुझ से पूछते हो, यही वात राजा अम्बरीप ने महामुनि मार्कण्डेय जी से पूछी थी । सो मैं तुमको ठीक २ वह सब बताता हूँ। मार्कण्डेय जी ने कहा है राजन् ! तुम जो मुझ से न्यायानुकूल पूछने हो उसका अर श्रवण करो। जहां पर भगवान् विष्णु का भक्त रहता है वहां साक्षात् नारायण विराजमान रहा करते हैं ।।४॥ जिनका सभी जगह केवल भववान् विष्णु ही एकमात्र देवता अर्थात् उपास्य है और जिमके भगवान् के कोत्ति का बखान करते हुए तथा नाम एवं गुणो का संकीर्तन करने पर रोमाञ्च हो जाता है । गानो मे कम्प होता है-शरीर मे पसीना पा जाता है और प्राखो मे माथु प्रो की वूदे झलक पाती हैं और श्रोत तथा स्मात धर्म के प्रवत्तंक एव विष्णु की भक्ति से समायुक्त पुरप भक्तो का दर्शन कर जो परम माहादित एवं अत्यन्त प्रसन्न हो जाता है वह वैष्णव कहा गया है । वैष्णव जन जगत के दर्शन मे रक्षा के लिये अन्य वस्त्र अर्थात् परिधान से अतिरिक्त वस्त्र के द्वारा शरीर का प्रावरण नही क्यिा करता है ।।५॥६॥७॥ विष्णुभक्तमथायांतं यो दृष्ट्वा सन्मुख स्थितः । प्रणामादि करोत्येवं वासुदवे यथा तथा । स वै भक्त इति ज्ञेयः स जयी स्याज्जगत्रये । रुक्षाक्षराणि शृण्वन्दै तथा भागवतेरितः । प्रणामपूर्व क्षात्या वै यो वदेव प्रावो हि सः। गंधपुष्पादिकं सर्व शिरसा यो हि धारयेत् ॥१० हरेः समितीत्येव मत्वासौ वैष्णवः स्मृतः । विष्णुक्षेत्रे शुभान्येव करोति स्नेहमयुतः ॥११ प्रतिमा च हरेनित्य पूजयेत्प्रयतात्मवान् । विष्णुभक्तः स विज्ञेयः कर्मणा मनसा गिरा ॥१२ नारायणपरो नित्यं महाभागवतो हि सः ।
गया वैष्णव के लक्षण.] [ १६६ भोजनाराधनं सर्च यथाशक्त्या करोति य १३ विष्णुभक्तस्य च सदा यथान्याय हि कथ्यते । नारायणपरोविद्वान्यस्यान प्रीतमानस ॥१४ प्रश्न नि तद्धरेरास्य गतमन्न न सशय । स्वाचनादपि चिश्वात्मा प्रीतो भवति माधव ॥१५ जा विष्णु के भक्त को प्राते हुए देखकर सामने स्थित रेकर भग- वान वासुदेव के ही समान समझ कर प्रणाम प्रादि किया करता है वह भगवान विष्णु का सचा भक्त जानना चाहिए । यह लोय मे विजयी होता है । सूसे और कठोर पचनो को सुनकर भी भागवतैरिव होकर प्रणाम पूर्वक क्षान्ति एव शान्ति के साथ बोलता है यह वैष्णव कहा । गन्ध-पुप्प आदि सब को जो शिर पर धारण किया करता है। यह सभी कुछ हरि का प्रसाद स्वरूप है-ऐसा हो रागझ कर अत्यन्त अरदर करता है । वह वैष्णव कहा गया है । विष्णु के क्षेत्र मे वह परम पुण्य कर्म ही स्नेह से सयुत होकर किया करता है ||1||१०॥११॥ जो नित्य प्रति भगवान हरि की प्रतिमा या प्रयत माव्या वाला होकर मन किया करता है वह मन कर्म और वाणी से विष्णु का भक्त समझना चाहिए ॥१२॥ जो नारायण मे सर्वदा परायण रहता है वह महान् भागवत होता है और वह भोजन तथा पाराधन प्रादि सभी काम शक्ति पे अनुसार विया करता है । ॥१३॥ विष्णु के भता वा सदा सब काम यथा न्याय ही वहा जाता है वह विद्ध न नारायण के ही यों में सर्वदा तत्पर रहता है। एसे परम भक्त पुरुष का प्रम जो प्रीति युक्त मन वाला साता है उस अन्न वो हरि के ही गुस मे गया हुमा मास समझना चाहिए इस मे वितुल भी सशय नहीं है। विश्वात्मा माघर अपने अर्चन से भी मधिर प्रसन्न होते हैं ॥१४॥१५॥ महाभागवते तज दृष्ट्वासो भक्तवत्सल. । वासुदेवपर दृष्ट्वा पैठणन दम्पपिल्विपम् ॥१६ देवापि भीतास्त याति प्रणिपत्य यथागतम् । थ यता हि पुगवृत्त विष्णुभक्तस्य भवम् ॥१७ दृष्ट्वा १७०J [ लिन पुराएछ यमोऽपि नै भक्तं नैष्णवं दग्धकिल्बिपम् । उत्याय प्रांजलिर्भूत्वा ननाम भृगुनंदनम् ॥१८ तस्मात्सपूजयेद्भवत्या गैष्णवान्विष्णुवन्नरः । याति विष्णुसामीप्यं नात्र कार्या विचारणा ||१६ अन्यभक्तपहले भ्यो विष्णुभक्तो विशिष्यते । विष्णुभक्तमझेभ्यो रुद्रभक्तो विशिष्यते । रुद्रभक्तात्परतरो नास्ति लोके न संशय. ॥२० तस्मात्त नैपणनं चापि रुद्रभक्तमथापि वा। पूजयेत्सर्वयत्नेन धर्मकामार्थमुक्तये ॥२१ भक्त वत्सल अर्थात् अपने भक्तो पर प्यार करने वाले प्रभु महान भागवत मे यह सब देखकर तथा वासुदेव परायण पापो के दग्ध होने वाले वैप्राव को देखकर देवता भी भयभीत हो जाते हैं और जैसे ही उसको समागत हुआ देखते हैं उसको प्रणिपात किया करते हैं । पहिले होने वाला विष्णु के भक्त का वैभव श्रवण करो॥१६॥१७॥ यमराज भी किल्विप दग्ध हो जाने वाले वैष्णव भक्त को देखकर भृगु के पुन च्यवन को देखकर अपने पासन से खडा हो गया था और हाथ जोडकर उसे प्रणाम किया था ॥१८॥ इसलिये वराव लोगो को विष्णु के ही समान भक्ति पूर्वक भली भांति पूजन करना चाहिए। ऐसा पुरुप विष्णु के समीप में जाता है-इसमे कुछ भी विचार नहीं करना चाहिए । ॥१६॥ अन्य सहस्रो भक्तो से विष्णु का भक्त विशेषता वाता हुमा करता है और सहस्रो विष्णु के भक्तो से भी विशिष्ट रुद्र का भक्त होता है। भगवान् रुद्र के भक्त से बडा लोक मे अन्य कोई भी नही होता है । यह सबसे अधिक पूज्य माना जाता है। इसमे तनिक भी सशय नहीं है ॥२०॥ इसलिये हर एक को विष्णु के भक्त वैष्णव का तथा रुद्र के भक्त का पूर्ण प्रयत्नो के साथ धर्म-अर्थ सौर काम की तथा मुक्ति की सिद्धि के लिये भली भांति पूजा करनी चाहिए ॥२१॥ ॥७६-अम्बरीष चरित्र और श्रीमती पाख्यान । ऐदवारंवरीपो की वासुदेवपरायणः।
नम्बरोप चरित्र०] [१७१ पालयामाम पृथिवी विष्णोराज्ञापुर सर ॥१ श्रत मैतन्महावुद्ध तत्सर्ग वक्तुमहसि । नित्य तस्य हरेश्चक्र शनुरोगभयादिकम् ।।२ हतीति थू यते लोके धार्मिकस्य महात्मन । अवरीपस्य चरित तत्सर्वं हि सत्तम ॥३ माहात्म्यमनुभाव च भक्तियोगमनुत्तमम् । यथावच्छोतुमिच्छाम सूत वस्तु स्वमर्हसि ॥४ श्रू यता मुनिशाई लाश्चरित तस्य धीमत । अबरीपस्य माहात्म्य मनपापहरं परम् ।।५ 'निशकोर्दयिता भार्या सनलक्षणशोभिता। वरीपस्य जननी नित्य शोचसमन्विता ॥६ योगनिद्रासमास्ट शेपपर्यंक्शायिनम् । नारायण महात्मान ब्रह्माउवमलोद्भवम् । ७ तमसा कालरुद्रारय रजसा कनकाडजम् । सत्त्वेन सर्नग विष्णु सर्वदेवनमस्कृतम् ।। अर्चयामाम सतत वाइमन कायकर्मभि । मान्यदानादिक सर्व स्वयमेवमनीवरत् ।। इम अध्याय म राजपि परम भक्त अम्बरीप के परित का वर्णन किया जाता है जो कि विप्णु पी माया से युक्त और परम पद्भुत है। ऋषियो ने यहा हगगन चुन गन मूतमी वायु से वश में समु- स्पन्न राजा अम्बरीप परम भक्त एव वासुदेव मे ही परायण रहने वाला था जो नि यिप्णु को प्रापा ने मसार ही इस पृथ्वी का पालन किया परता था-यह तो लोगा ने राय सुा है पितु इसका रिशेप वर्णन प्रय माप करने मोहपा नीजिए। ऐसा सुना जाता है ।नि म परम धामिर महारमा ये शगुरोप भोर भय मादि वा नित्य ही हरिया सुदर्शा पर एना दिया ररता है । हे घेवम । रा अम्मरीप का सम्पूर्ण चरित हमारे सामा पसाय ॥शाना हे मूनजी ' हम लोम मातरम्प मा मोर प्रति एवं परमोत्तम भक्ति योग यथावत् [ लिङ्ग पुराण १७२ श्रवण करने की इच्छा रखते हैं सो वह सब अाप वर्णन करने के योग्य होते हैं ॥४॥ सूतजी ने कहा-हे मुनिशार्दूलो ! उस परम धीमाव राजपि अम्बरीप का चरित तया समस्त पापो के हरण करने वाला परम माहात्म्य का तुम लोग श्रवण परो ॥१विशडकु की जो भार्या थी वह सम्पूरण लक्षणो से शोभित थी और नित्य ही शौच से सवित रहने वाली राजा अम्बरीष की माता यो ॥६॥ योग निद्रा मे समारूढ तथा शेप के पर्यङ्क पर शयन करने वाले ब्रह्माण्ड से समुत्पन्न कमल से उत्पन्न महात्मा नारायण-तमोगुण से काल रुद्र नाम वाले-रजोगुण से कनकाण्डज तथा सत्वगुण से सर्वत्र व्यास सम्पूर्ण देवो के द्वारा बदित विष्णु का सदा मन-वाणी और कर्म के द्वारा पूजा किया करती थी और माल्य दान आदि सब कार्य स्वय ही किया करती थी ॥७॥८॥ गधादिपेपण चैव धूपद्रव्यादिकं तथा। भूमेरालेपनादीनि हविपा पचन तथा ॥१० तत्कौतुकसमाविष्टा स्वयमेव चकार सा। शुभा पद्मावती नित्य वाचा नारायणेति वै ॥११ अनतेत्येव सा नित्य भाषमाणा पतिव्रता। दशवर्षसहस्राणि तत्सरेणातरात्मना ।।१२ अर्चयामास गोविंद गधपुष्पादिभि शुचि । विष्णुभक्तान्महाभागान् सर्वपापविजितान् ॥१३ दानमानाचनैनित्यं धनरत्नग्तोषयत् । ततः कदाचित्सा देवी द्वादशी समुपोष्य वै ॥१४ गन्ध मादि का पीसना तथा धूप द्रव्य आदि का प्रस्तुत करना- भूमिका प्रालेपन करना और हवियो याचन करना जो नि भगवान् विष्णु के लिये समर्पण करने के योग्य थे वह कौतुर मे समाविष्ट होवर सब काम स्वय ही दिया करती थी। वह शुभ एव पतिव्रता पद्मावती नित्य ही अपनी वाणी से "नारायण” तथा 'अनन्त' इन विष्णु के शुभ नामो को नित्य ही योनी रहा करती थी। इस प्रकार से विष्णु परायण प्रपती मात्मा से दक्ष राहस वर्ष तर परम पवित्र रहार ग घ पु पादि अम्बरीष चरित्र १७३ सा प्रबुद्धा के हारा भगवान गोविन्द का उसने अर्चन किया था। और जो महाभाग विष्णु के भक्त समस्त पापो से विनिमुक्त होते थे उनको दान-मान-पर्चन नथा धन रत्नों के द्वारा नित्य सन्तुष्ट किया करती थी। इसके अनन्तर एकवार उस देवी ने ब्रत करके द्वादशी के दिन दायन किया था ॥१०॥ ॥१२॥१२॥१३॥१॥ हरेरमे महाभागा सुष्वाप पतिना सह । तत्र नारायणो देवस्तामाह पुरुषोत्तमः ।।१५ किमिच्छसि वर भद्र मत्तस्त्व यू हि भामिनि । सा दृष्ट्वा तु वरं वन्न पुत्रो मे वैष्णवो भवेत् ।। ६ सार्वभौमो महातेजाः स्वकर्मनिरतः शुचिः । तथेत्युक्त्वा ददौ तस्यै फलमेकं जनार्दनः ।।१७ फलं दृष्ट्वा भने सर्व न्यवेदयत्। भक्षयामास संहृष्टा फलं तद्गतमानसा ॥१८ तत कालेन सा देवी पुर्व कुलविवर्धनम् । असूत सा सदाचार वासुदेवपरायणम् ।। शुभलक्षणसपनं चक्रांकिततनूरुहम् । जातं दृष्ट्वा पिता पुत्रं क्रिया: सर्वाश्चकार वै ॥२० अंबरीप इति रयातो लोके समभवत्प्रभुः । पितयु परते श्रीमानभिषिक्तो महामुनिः॥२॥ वह महाभाग वाली हरि के प्रागे ही अपने पति के साथ सो गई थी। वहां पर स्वय नारायण परम पुरुषोत्तम देष भाकर उससे बोले- हे भद्रे तू क्या चाहती है ? हे भामिनि ! तू इस समय मुझसे कहकर माम ले । उसने जब भगवान का दर्शन किया ता यह वरदान उनसे मांगा था कि मेरा पुन परम पैप्पर उत्पन होये ॥१५॥१६।। मह सार्वभौम प्रर्थात् चक्रवर्ती सम्राट-महान तेजस्वी-अपने कर्तव्य कर्म में निरत और परम शुचि भी हो । ऐसा ही होगा-यह वार भगवान् जनार्दन ने उसे एक फल प्रदान किया था ।।१७)] वह जग गई तो उसने वह फल देखा था और सारा हाल अपने पति से कह सुनाया था। उसने उसी में अपना
१७४
[लिङ्ग पुराण
लगाकर परम प्रसन्नता से उस फल का भक्षण कर लिया था ||१tt
इसके अनन्तर समय पाने पर कुल की वृद्धि करने वाला अति सदाचारी
और वासुदेव मे ही परायण रहने वाला पुत्र उस देवी ने समुत्पत किया
था॥१६) परम शुभ लक्षणो से युक्त और चक्र से अति तनुरुह वाले
उत्पन्न हुए पुत्र को देखकर पिता ने उसकी जात धर्मादि सत्कारी को
वियाऐ सुसम्पन्न को थो॥२०॥ वह प्रभु अम्बरीष इस नाम से लोक
मे प्रसिद्ध हुआ था और पिता के उपरत हो जाने पर वह महामति
ज्यासन पर अभिषिक्त हुप्रा था IR१r
मंत्रिष्वाधाय राज्यं च तप उग्र चकार सः।
संवत्सरसहस्र जपन्नारायण प्रभुम् ॥२२
हृत्युडरीकमध्यस्थं सूर्यमंडलमध्यत.।
शंखचक्रगदापद्मधारयतं चतुर्भुजम् ॥२३
शुद्धजावूनदनिभ ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम् ।
सर्वाभरणसंयुक्त पोतावरघर प्रभुम् ॥२४
श्रीवत्सवक्षसं देवं पुरुष पुरुषोत्तमम् ।
ततो गरुडमारुह्य सर्वदेवैरभिष्टुतः ।।२५
आजगाम स विश्वात्मा सर्वलोकगमस्कृतः।
ऐरावतमिवाचित्यं कृत्वा वै गएडं हरिः॥२६
स्वयं शक इवासीनस्तमाह नृपसत्तमम् ।
इद्रोऽहमस्मि भद्र ते किं ददामि वरं च ते ॥२७
सर्वलोकेश्वरोऽहं त्वा रक्षितु समुपागतः।
नाह त्वामभिसंधाय तप आस्थितवानिह ॥२८
उसने अभिषिक्त हो जाने के पश्चात् समस्त राज्य के शासन का
कार्य मन्त्रियो पर छोड़ दिया था और अत्यन्त उग्र तपश्चर्या मे स्वय
सलग्न हो गया था। उसने एव सहस्र वर्ष पर्यन्त भगवान् नारायण प्रभु
के महामन्म या जाप निरन्तर किया था ॥२२॥ सूर्य मण्डल के मध्य से
हृदय कमल के मध्य में स्थित तथा शर-वक्र गदा और पद्म को धारण
करने वाले प्रभु वा गाप के समय मे ध्यान करना चाहिए। चार भुजाम्रो
अम्बरीप चरित्र.] चाले विशुद्ध सुपणे को कान्ति के समान ब्रह्मा विष्णु और शिव के स्वरूप वाला-समस्त समुचित भलङ्कारों से युक्त पीताम्वर को धारण करने वाले वक्षःस्थल मे श्रीवत्स का शुभ चिन्ह धारण करने वाले समस्त देवो के द्वारा अभिपुत ऐसे परम पुरुष पुरुषोत्तम देव का ध्यान करते हुए जाप किया तो सर्वलोको से नमस्कृत विश्वात्मा भगवान् गरुड़ पर समा रूढ होकर वहाँ मामे ! हरि ने उस गरुड़ को अचिन्त्य ऐरावत की भांति कर दिया था ॥२३॥२४॥२५॥२६॥ स्वयं प्रभु इन्द्र के समान स्थित होते हुए उस अंध राजा से बोने-मैं इन्द्र हूं-तेरा कल्याण हो- बोल, क्या वरदान तुझे दूं? ॥२७१। मैं इस सम्पूर्स लोक का स्वामी हूँ और यहाँ पर मैं तेरी रक्षा करने के लिये ही उपस्थिव हुमा हूँ ॥२॥ त्वया दतं च नेष्यामि गच्छ शक यथासुखम् । मम नारायणो नाथस्तं नमामि जगत्पतिम् ।।२६ गच्छेद्र माकृयास्त्वत्र मम बुद्धिक्लिोपनम् । ततः प्रहस्य भगवान् स्वरूप मकरोद्धरिः ॥३० शाङ्गचक्रगदापारिणः सङ्गहस्तो जनार्दनः । गरुडोपरि सत्मिा नीलाचल इवापरः॥३१ देवगंधर्व संघेश्व स्तूयमानः समंततः। प्रणम्य स च सतुष्टस्तुष्टाव गरुडध्वजम् ॥३२ प्रसोद लोकनाथेश मम नाथ जनार्दन । कृपण विष्णो जगन्नाथ सर्वलोकनमस्कृत ॥३३ स्वमादिस्त्यमनादिस्त्वमनत पुरुषः प्रभुः । अप्रमेयो विभुर्विष्णुर्गोविदः कमलेक्षण. ॥३४ महेश्वरागजो मध्ये पुष्करः संगम याः। फध्यवाहः कपाली त्व हव्यवाह. प्रभ मन ॥३१ प्रवर्गप ने यहा--में भापका पभिसन्धान करके यहां पर तपश्चर्या करने के लिये समास्थित नहीं हुमा हूँ ॥२८॥ पाप जो कुछ भी प्रदान परी उसी में इच्छा भी नही कहगा। मतएव हे इन्द्र ! साप सुस- पूर्वफ पले जाइये मेरे स्वामी तो भगवान नारायण है। मैं उन्ही को [ लिङ्ग पुराण । नमन करता हूं जो इस जगत् के स्वामी हैं। है इन्द्र ! तुम चले जानो, मेरी बुद्धि का विलोप मत करो। इसके अनन्तर भगवान् प्रसन्नता पूर्वक हंस पडे और हरि ने अपना स्वरूप धारण कर लिया था ॥२६॥३०॥ उस समय जव हरि ने अपना स्वरूप बनाया तो आप का स्वरूप शख- चक्र-गदा तथा सङ्ग हायो में प्रायुध धारण करने वाला था। जनार्दन गरुड वाहन पर विराजमान थे जिस तरह कोई दूसरा नील गिरि हो ॥३१॥ इनके चारो ओर देव तया गन्धवों के समुदाय स्तवन कर रहे थे । राजा अम्बरीप ने ऐसे भगवान का निज स्वरूप में स्थित का दर्शन किया तो वह बहुत सन्तुष्ट हुप्रा था। प्रणाम करके फिर वह भववान् गरुडध्वज का स्तवन करने लगा था । उसने भगवान से प्रार्थना की-है 'लोको के नाथ ! माप तो मेरे सच्चे स्वामी हैं और भाप भक्तजन की पीडाओ का नाश करने वाले हैं। माप मेरे स्वामी हैं । हे कृष्ण ! हे विष्णो ! हे जगद के स्वामिन् ! माप तो समस्त लोको के द्वारा घन्दित हैं । हे प्रभु ! ग्राप सब वे प्रादि हैं-माप मनन्त हैं-पाप मादि से रहित हैं-पाप परासर पुरप हैं प्रमा के अन्दर नहीं माने वाले व्यापक हैं। आप कमल के समान नेत्रो वाले गोविन्द एव विष्णु हैं ॥३२॥३३॥३४॥ पाप महेश्वर ये मङ्ग से उत्पन्न होने वाले मध्य मे पुष्वर मन्तरिक्ष में गमन करने वाले सग है। माप पाली-वच्य वाह हव्य वाह और प्रभ- उजन है ॥३॥ मादिदेव. क्रियानरः परमात्मात्मनि स्थितः । स्वा प्रपन्नोस्मि गोविंद जय देवपिनंदन । जय देव जगनाथ पाहि मा पुष्करेक्षण ॥३६ न्या गतिस्त्वदन्या मे त्वमेव शरणं मम । तमाह भगवान्विष्णु. किं ते हदि चिकोपितम् ।।६७ तत्मय ते प्रदास्यामि भक्तोमि मम सुग्रत । भक्तिप्रियोऽहं सनतं सस्माद्दामिहागतः ।।३८ लोपनाप परागद नित्य मे यतते मतिः। वासुदेयपरो नित्य वाट मन.पायामंभिः ॥३ अम्बरीष चरित्र० ] [ १७७ यथा त्वं देवदेवस्य भवस्य परमात्मनः। तथा भवाम्यहं विष्णो तव देव जनार्दन ॥४० पालयिष्यामि पृथिवीं कृत्वा वै वैष्णवं जगत् । यज्ञहोमाचंनैश्च व तर्पयामि सुरोत्तमान् ।।४१ वैपणवान्पालयिष्यामि निहनिष्यामि शात्रवन् । लोकतापभये भात इति मे धीयते मतिः ॥४२ श्राप प्रादि देव हैं तथा क्रियानन्द स्वरूप हैं। प्रात्मा में स्थित परम आत्मा हैं। मैं प्रापकी शरणागति में जाता हूँ। हे गोविन्द ! है देवकी के तनय ! अापकी जय हो। हे जगत् के स्वामी ! हे कमलनयन ! हे देव ! आपकी जय हो, पाप मेरी रक्षा करो ॥३६॥ मापके अतिरिक्त मेरी अन्य कोई भी गति नहीं है । श्राप ही मेरे एकमात्र शरण अर्थात रक्षक हैं । सूतजी ने कहा-इस प्रकार से जब उसने स्तुति की तो भग. धान विष्णु ने उससे कहा - तेरे हृदय मे क्या करने की इच्छा है ? वह बोल, मैं तुझे वह सभी कुछ प्रदान कर दू गा क्योकि तू मेरा सुन्दर व्रत- धारी परम भक्त है । मैं भक्ति पर ही प्रसन्न होने वाला हूँ और इसी कारण से तुझे प्रदान करने के लिये यहाँ माया हूँ ॥३७॥३८॥ अम्बरीप ने कहा- हे लोको के स्वामिन् । हे परम प्रानन्द स्वरूप! मेरी मति नित्य होती है कि मैं देव मे ही परायण नित्य मन-वाणी और कर्म द्वारा रहूं ॥३६॥ देवो ये देव परमात्मा भर पे जिस तरह हैं है विष्णो ! में उस प्रकार से देव जनार्दन प्रापका हो जाऊँ 100 में इस समस्त जगत् या वैष्णन प्रर्थात् एकमात्र विषणु का समाराधन करने वाला बनाकर हम भूमि का पालन कर गया तथा होम एव प्रचनो पे द्वारा मुरगण फो भी तृप्त वरमा ||४१॥ जो विष्णु के परम भक्तजन होगे उनका पालन वगा और इनः दात्रुप्रो का हनन करूगा । तो ताप के भय शीत ई-ऐसी मेरी मति होती है ॥४२॥ एवमस्तु यथेच्छ वै चझमेतत्सुदर्शनम् । पुग रद्रप्रसादेन सन्ध ये दुलं मग ।।४३ विसापादिकं दुःरांसपुरोगादिकं तथा।
१७८ ]
[ लिन पुराण
निहनिष्यति ते नित्यमित्युक्त्वांतरधीयत ॥४४
ततः प्रणम्य मुदितो राजा नारायणं प्रभुम् ।
प्रविश्य नगरी रम्यामयोध्यां पर्यपालयत् ।।४५
ब्राह्मणादीश्च वर्णाश्च स्वस्वकर्मण्ययोजत् ।
नारायणपरो नित्यं विष्णुभक्तानकल्मपान् ।।४६
पालयामाम हृष्टात्मा विशेपेण जनाधिपः ।
अश्वमेधशतैरिष्ट्वा वाजपेयशतेन च ॥४७
पालयामास पृथिवी सागरावरणामिमाम् ।
गृहेगृहे हरिस्तस्थौ वेदघोपो गृहेगृहे ॥४६
नामघोपो हरेश्च व यज्ञघोषस्तथैव च ।
अभवन्नृपशार्दूले तस्मिन् राज्य प्रशामति ॥४६
श्री भगवान् ने कहा- राजन् ! ऐसा ही सब कुछ होगा-जो कुछ
भी तू चाहता है । यह मेरा सुदर्शन चक्र है जिसको पहिले मैने भगवान्
रुद्र के प्रसाद से प्राप्त किया है यह परम दुर्लभ है ॥४३॥ तेरे ऋपि के
शाप प्रादिक दुख तथा शत्रुरोगादिक दुस नित्य नाश कर देगा - यह
कहकर वह अन्तर्धान हो गया था ॥४४॥ मूतजी ने कहा- इसके मन-
न्तर राजा ने परम प्रसन्न होकर नारायण प्रभु को प्रणाम किया था और
फिर परम रम्प अयोध्या नगरी में प्रवेश करके उसका पर्यपालन किया
था ॥४५॥ वहाँ उसने ब्राह्मण प्रादि समस्त वणों को अपने-अपने कर्म मे
नियोजित कर दिया था। नित्य ही नारायण की सेवार्चना में तत्पर होते
हुए वह राजा निटाप विष्णु के भक्तो का पालन विशेष रूप से प्रहृष्ट
मन वाला होकर किया करता था। उस राजा ने एकसौ अश्वमेधो यज्ञों
तथा सो वाजपेय यज्ञो का यजन किया था ॥४॥४५॥ उसने सागरों के
भावरण से समन्विन इस पृथ्वी का पालन किया था। प्रत्येक घर में
भगराव हरि स्थित रहते थे और घर-घर मे वेदों का उच्चारण हुमा
करता था। उस नृपो मे शार्दूल के समान राजा के शासन करने के
समय में भगवान के पवित्र नामों का घोप-यज्ञो में वेदध्वनि पा घोप
हमा करता था ॥४८॥४६॥
अम्बरोप चरिव० ] [ १७६ नामस्या नातृणा भूमिर्न दुर्भिक्षादिभिर्युता। रोगहीनाः प्रजा नित्यं सर्वोपद्रवजिताः ।।५० अंबरीपो महातेजाः पालयामास मेदिनीम् । तस्यवंवर्तमानस्य कन्या कमललोचना ॥५१ श्रीमती नाम विख्याता सर्वलक्षणसंयुता । प्रदानसमयं प्राता देवमायेव शामना २ तस्मिन्काले मुनिः श्रीमानारदोऽभ्यागतश्च वै। अंबरीपस्य राज्ञो वै पर्वतश्च महामतिः ।। ३ तावुभावागतौ दृष्ट्वा प्रणिपत्य यथाविधि । श्र वरीपो महातेजा: पूजयामाम तावृपो ५४ कन्यां तां रममाणां वै मेघमध्ये शतनाम् । प्राह तां प्रेक्ष्य भगवान्नारद: सस्मितस्तदा ॥५५ केयं राजन्महाभागा कन्या सुरसुतोपमा । व हि धर्मभृतां श्रेष्ठ सर्वलक्षणशोभिता ११५६ उसके शासन काल में कभी भी भूमि प्रसस्या अन्न की फसल से रहित नहीं रहती थी और वह तृणादि से भी शून्य नहीं होती थी अर्थात् समस्त भूमि अन्न एय तृण से परिपूर्ण रहा करती थी तथा किसी भा समय दुर्भिक्ष यादि का भय वहाँ नहीं होता था। उम राजा की सम्पूरण प्रजा रोगो से होन अर्थात् परम स्वस्थ सुखी एव सर्वदा सभी प्रकार के उपद्रवो से रहित रहा करती थी ॥५०॥ राजा अम्बरीप महान् तेज वाला था। उसने बहुत ही अच्छी तरह से मेदिनी का पालन किया था। इस प्रकार से सुन्दर शासन करने वाले उस राजा के कमल के समान नेत्रो वाली समस्त शुभ लक्षणो से समन्वित एक श्रीमती इस शुभ नाम से विख्यात होने वाली कन्या थी। देवमाया की मांति परम शोभा से सम्पन्न उसके प्रदान करने का समय सम्प्राप्त हो गया था ॥५१॥५२॥ उस समय मे राजा अम्बरीप के यहाँ श्रीमान् महामुनि नारद और महान मति वाले पर्वत ये दोनो ग्रा गये थे ।।५३। उन दोनो महामुनियों को देखकर राजा अम्बरीप ने जो कि स्वय महान् तेजस्वी या उन्हें १८० ] [ लिङ्ग पुराण प्रणाम किया और यथा विधि उन दोनो ऋपियो का पूजन किया था ॥५४॥ मेघो के मध्य में विद्युत् की भांति प्रकाश वग्ने वाली परम सुन्दरी उस कन्या को देखकर भगवान् नारद मुस्कराते हुए बोले-हे राजन् ! सुगे की कन्या समान सुन्दरी महान भाग वाली यह कन्या कौन है । यह तो समस्त सुन्दर एव शुभ लक्षणो से परम शोभित है । हे धर्म धारियो मे परम श्रेष्ठ | आप इस कन्या के विषय मे हमे सब पताइये ॥५५॥५६॥ दुहितेयं मम विभो श्रीमती नाम नामतः । प्रदानसमयं प्राप्ता वरमन्वेषते शुभा ॥५७ इत्युक्तो मुनिश Vलस्तामैच्छन्नारदो द्विजाः। पर्वतोपि मुनिस्ता वै चामे मुनिसत्तमाः ॥५८ अनुज्ञाप्य च राजान नारदो वाक्यमब्रवीत् । रहस्याहूय धर्मात्मा मम देहि सुतामिमाम् ॥५६ पर्वतो हि तथा प्राह राजानं रहसि प्रभुः । तावुभौ सह धर्मात्मा प्रणिपत्य भयादित ॥६० उभौ भवौ कन्या मे प्रार्थयानो कथ त्वहम् । करिष्यामि महाप्राज्ञ शृणु नारद मे वचः ॥६१ त्वं च पर्वत मे वावयं शृणु वक्ष्यामि यत्प्रभो। कन्येयं युवयोरेकं वरयिष्यति चेच्छुभा ॥६२ तस्मै कन्या प्रयच्छामि नान्यथा शक्तिरस्ति मे। तथेत्युक्त्वा ततो भूयः श्वो यास्याव इति स्म ह ।।६३ इत्युक्त्वा मुनिशार्दूलो जग्मतु प्रीतिमानसौ। वासुदेवपरी नित्यमुभौ ज्ञानविदावरी ॥६४ राजा अम्बरीष ने कहा-हे विभो ! यह मेरी पुत्री है और इसका नाम श्रीमती है। इसके अब प्रदान करने का समय प्राप्त हो गया है और इसके लिये वर का अन्वेषण यह शुभा करती है ॥५७।। इस प्रकार से जब राजा ने मुनि से पहा था तो वह मुनिशार्दूल नारद स्वय उसकी इच्छा करने लगे । हे द्विजगए ! पर्वत मुनि भी उस पन्या के प्राप्त अम्बरीप चरित्र ] [ १८१ में . करने की इच्छा करने लगे थे ।।५७१५८) नारद मुनि ने एकान्त मे राजा को बुलाकर यह वाक्य कहा था कि राजा इस अपनी पुत्री को तुम मुझे ही देदो । । इसी तरह से पर्वत मुनि ने भी राजा सम्बरोप से एकान्त पहा था । उन दोनो की प्रार्थना को जान कर राजा भयभीत हो गया था और उनसे प्रणाम करके धर्मात्मा राजा ने कहा-आप दोनों हो मेरी कन्या को प्राप्त करना चाहते हैं। हे महान् प्राज्ञ नारद ! प्राप मेरी वात सुनिये कि मैं अब क्या करू । हे पर्वत मुनि ! अाप भी मेरी प्रार्थना सुन लीजिए । हे प्रभो ! यह एक ही कन्या है अतः श्राप दोनों मे से कोई भी एक इस शुभा के साथ विवाह कर सकते हैं । मैं किसी भी एक को श्राप दोनों में से इस कन्या को दे सकता हूँ। इसके अति- रिक्त मेरी कुछ भी शक्ति नहीं है कि मैं आप लोगो की प्राज्ञा का पालन कर सकू। इस पर उन दोनो मुनियो ने कहा हम पल पावेंगे यह कह- कर वे दोनों मुनि प्रसन्न होते हुए वहां से चले गये थे। ये दोनों ही मुनि नित्य वासुदेव परायण.और ज्ञानियो मे परम श्रेष्ठ थे। ६०॥६१॥६२॥ ॥६३॥६४॥ विष्णु लोक ततो गत्वा नारदो मुनिसत्तमः । प्ररिणपत्य हुपीकेशं वाक्यमेतदुवाच ह ॥६५ श्रोतव्यमस्ति भगवन्नाथ नारायण प्रभो । रहसि त्वां प्रवक्ष्यामि नमस्ते भुवनेश्वर ।।६६ ततः प्रहस्य गोविदः सर्वानुत्सार्य त मुनिम् । ब्रहीत्याह च विश्वात्मा मुनिराह च केशवम् ॥६७ त्वदीयो नृपतिः श्रीमानबरीपो महीपतिः । तस्य कन्या विशालाक्षी श्रीमती नाम नामतः ॥६८ परिणेतुमना स्तत्र गतोऽस्मि वचनं शृणु । पर्वतोऽयं मुनिः श्रीमांस्तव भृत्यस्तपोनिधिः ६६ तामैच्छत्सोपि भगवन्नावामाह जनाधिपः । अंबरीपो महातेजाः कन्येय युवयोवरम् 1७० लावण्ययुक्त वृणुयादि तस्मै ददाम्यहम् ।
१८२ ] [ लिङ्ग पुराण इत्याहावां नृपस्तत्र तथेत्युक्त्वाहम गतः ॥७१ आगमिष्यामि ते राजन् श्व प्रभाते गृहं त्पिति । मागतोह जगन्नाथ कर्तुमर्हसि में प्रियम् ।।७२ चानराननवद्भाति पर्वतस्य मुसं यथा । तथा कुरु जगन्नाथ मम चेदिच्छसि प्रियम् ॥७३ इस अनन्तर वे दोनो मुनियो मे से नारद मुनि श्रेष्ट विष्णुलोक को चले गये थे। और भगवान् हृषीकेश को प्रण 6 वरके नारद ने उनसे प्रार्थना की थी-हे भगवन् ! हे नारायण । हे नाथ ! हे प्रभो ! मुझे कुछ श्रोतव्य है अर्थात् मै कुछ श्रवण करना चाहता हूँ सो मै उसे प्राप से एकान्त स्थान मे कहूंगा। हे भुवनो के स्वामिन् ! मेरा आपको प्रणाम है ॥६६॥ इसके अनन्तर भगवान् गोविन्द ने हम कर वहां से सब को अलग कर दिया था और फिर वे विश्वात्मा भगवान् मुनि नारद से बोले- योलो, या कहना है ? उस समय नारद मुनि ने केशव भगवान् से कहा था ॥६७॥ इस भूमि का स्वामी राजा अम्बरीप मापका परम भक्त है । उसकी एक विशाल नेत्रो वाली बडी सुन्दरी क्या है जिसका नाम श्री- मती है ॥६॥ है भगवन् ! आप मेरो प्रार्थना का श्रवण करें, मैं वहाँ उसके साथ विवाह करने की इच्छा से गया था। यह पर्वत मुनि भी जो कि परम तपस्वी आपका ही भृत्य है । यह भी उस कन्या के साथ परि- राय करना चाहता है। हे भगवन् ! हम दोनो ही ने उस राजा से अपनी २ इच्छाएं प्रकट करते हुए कहा था तब उस राजा ने कहा था कि यह एक वन्या है और भाप दोनो में जो भी लावण्य से युक्त है उस एक का वरण कर सकती है यदि में उसके लिये इसे प्रदान करता हूँ। उस महान् तेजस्वी राजा ने हम दोनो से ऐसा कह दिया है। फिर मै यहाँ से कल प्रातः काल मे ग्रापके पास पाऊँगा-यह कहकर मैं चला पाया हूँ। अब हे जगत् के स्वामी । आप मेरा प्रिय पार्य सम्पादन करने के योग्य है सो ऐसा ही कृपा करके कर दीजिए ॥६६॥७०॥७॥ १७२।। हे नाथ ! अब पाप ऐसा कर दीजिए कि पर्वत मुनि का मुख बन्दर के समान मुस हो गावे तो मेरी मन मे चाही हुई वात पूरी हो
अम्बरोप चरित्र]
[१८३
जावेगी । यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो ऐसा ही पर
देवें 1॥
तथेत्युक्त्वा स गोविदः प्रहस्थ मधुसूदनः ।
स्वयोक्तच करिष्यामि गच्छ सौम्य यथागतम् ॥७४
एवमुक्त्वा मुनिष्ट. परिणपत्य जनार्दनम् ।
मन्यमानः कृतात्मान तथाऽयोध्या जगाम सः ॥७५
गते मुनिवरे तस्मिन्पर्वतोऽपि महामुनिः।
प्रणम्य माधव हृष्टो रहस्येनमुवाच ह ।।६
वृत्त तस्य निवेद्याने नारदस्य जगत्पते. ।
गोलागूलमुस यद्वन्मुवं भाति तथा कुरु ।।.
तत्र वा भगवन्दिरगुरत्ययोत च करोमि ।
गच्छदशीघ्रमयोध्या के मादीनारदस्य वै ।।७८
त्यया में संविदं तत्र तयेत्युक्त्या जगाम स ।
ततो राजा समाज्ञाय प्रातो मुनिवरौ तदा ॥
मागत्य विविध सर्वामयोध्या यजमालिनीम् ।
मायामास पप्पन साजश्रव समातः ।।
१८४ ] [ लिङ्ग पुराण फर दूगा। भगवान् ने कहा-अब भाप शीघ्र ही अयोध्या पुरी में पहुंच जानो नारद मुनि इसे न जानने पावें कि मेरी आपके साथ क्या बातें हुई हैं । ऐसा कहकर वह मुनि वहां चला गया था। जब वहाँ दोनो मुनिवर पहुंच गये तो राजा ने इस बात को जान लिया था ॥७६] फिर राजा अम्बरीष ने अयोध्या पुरी को विविध माङ्गल्म वस्तुप्रो के द्वारा मरिडत करा दिया था। वहाँ बहुत-सी ध्वजाएं लगाई गई थी और पुष्प तथा लाजा सभी ओर उपस्थित दिये गये थे। ॥५०॥ अंबुसिक्त गृहद्वारा सिक्तापरणमहापथाम् । दिव्यगधरसोपेता धूपिता दिव्यधूपकै ॥८१ कृत्वा च नगरी राजा मडयामास ता सभाम् । दिव्यगंधस्तथा धूपै रत्नेश्च विविधस्तथा ॥२ अलकृना मरिणस्तभानामाल्योपशोभिताम् । परास्तिरणोपेतैदिव्यर्भद्रासनवृताम् ॥८३ कृत्वा नृपद्रस्ता कन्या ह्यादाय प्रविवेश ह । सर्वाभरासपन्ना श्रोरिवायतलोचनाम् ।।४ करसमितमध्यागी पस्निग्धा शुभाननाम् । स्त्रीभि परिवृता दिव्या श्रीमती मश्रिता तदा ।।९५ सभा च सा भूपपते समृद्धा मरिणप्रवेकोत्तमरत्नचित्रा। न्यस्तासना माल्यवती सुबद्धा तामाययुस्ते नरराजवर्गा ॥८६ अथापरो ब्रह्मवरात्मजो हि विद्य विद्यो भगवान्महात्मा । सपर्वतो ब्रह्मविदा वरिष्ठो महामुनि रद आजगाम।।१७ उस समय अयोध्या के समस्त घरो के द्वार जल से सित किये गये थे और सभी महा पथ एव बाजार भी अम्युक्ति किये गये थे। सर्वत्र दिव्य गन्ध एव रस से वह अयोध्या पुरी युक्त की गई थी और दिव्य धूप से पूषित हो रही थी ||१|| इस प्रकार से राजा ने अयोध्या नगरी को सब तरह से सुशोभित करके फिर उस स्वयम्बर सभा को सुमण्डित पराया था । जहाँ कि परम दिव्य गन्ध धूप विविध रलो के द्वारा उसे विभूपित किया गया था 11८२॥ मरिणयो के स्तम्भो से उस स्वयम्बर अम्बरीष चरित्र० [ १८५ सभा को अलंकृत किया गया था और अनेक माल्यों से उसे उपशोभित बनाया था। उस सभा में बहुत कीमती अति उत्तम मास्तरण विछाये गये थे तथा परम श्रेष्ठ प्रासनो के द्वारा उसे दिध्य बनाया गया था ॥३॥ उस स्वयम्बर सभा को इस प्रकार से परम सुसज्जित करके राजा ने उस कन्या का वहां प्रवेश कराया था। वह पन्या सम्पूर्ण पाभरगो से समलद्कृत थी-सुदीर्घ विशाल नेत्री से बह दूसरी महालक्ष्मी के ही समान परम सुन्दरी थी। यह अत्यन्त कृशोदरी थी और करादि पांचों स्थानो मे अत्यन्त स्निग्ध थी तथा परम शुभ मुख वाली थी । उसके चारो प्रोर बहुत-सी स्त्रियां थी जो कि उम दिव्य श्रीमती की सुध पा कर रही थी ॥४॥८॥ भूपो के भी स्वामी महाराज अम्बरीप की वह सभा अत्यन्त समृद्धि-सम्पन्न थी और मरिणयो के प्रवेक उत्तमोत्तम रत्नों के द्वारा यह विचित्र बनी हुई थी। वहां पर सुवद्धा माल्यवनी न्यस्त प्रासन वाली थी और सभी नरराजो के वर्ग उसके निक्ट में प्राये हुए थे 11८६॥ इसके अनन्तर ब्रह्म वर का पात्मज वेदत्रयी को विद्या का ज्ञाता महान् प्रारमा वाला और मह्म वेत्तानो मे सब से परिण नारद मुनि पर्वत भपि के साथ वहाँ पर मा गये थे ॥८७॥ तावागतौ समीदयाथ राजा संभ्रातमानसः । दिव्यमासनमादाय पूजयामास तावुभौ ॥ उभी देवपिसिद्धो तावुभौ ज्ञानविदा करो। समासीनी महात्मानो कन्य थं मुनिमत्तमो IE तावुभौ प्रणिपत्याने कन्या ता श्रीमती शुभाम् । सुता कमलपनाक्षी प्राह राजा यशस्विनीम् ॥६० प्रनयोयं वरं भद्रे मनसा त्वमिहेच्छसि । तस्मै मालामिमा देहि प्रणिपत्य यथाविधि ॥६१ एवमुक्ता तु सा पन्या स्त्रीभिः परिवृता तदा। माला हिरण्मयी दिव्यामादाय शुभलोचना IMER यग्रासीनी महात्मानौ तत्रागम्य स्थिता तदा। पीक्षमाणा मुनिभेटौ नारदं पर्वतं तया ॥६३ १८६.] । लिङ्ग पुरास- शाखामृगाननं दृष्ट्वा नारदै पर्वतं तथा। गोलांगूलमुख कन्या किंचित् त्राससमन्विता ।।१४ संभ्रांतमानसा तत्र प्रवातकदली यथा । "तस्थौ तामाह राजासौ वत्से किं त्व करिष्यसि ॥९५ अनयोरेक मुद्दिश्य देहि मालामिमा शुभे । साप्राह पितरं अस्ता इमो तो नरवानरो | उन दोनों मुनियो को आये हुए देखकर राजा अम्बरीष सम्भ्रान्त मन वाला होकर तुरन्त ही उठ पडा और दिव्य प्रासन देकर उन दोनो मुनियों का उसने अर्चन किया था ।1८८॥ वे दोनों ही देवर्षि एव सिद्ध पुरुष थे-वे दोनो ज्ञानियो मे परम भेटतम थे-वे दोनों मुनिष्ट पन्या को प्राप्त करने की इच्छा से पाये थे और दोनो महान मात्मा वाले वहाँ पर विराज गये थे ।।८६) उन दोनो को प्रणाम करके उनके अगे राजा ने उस परम शुभ एव सुन्दरी श्रीमती कन्या को जो कि उस राजा की पुत्री थी और परम यश वाली एव कमल के समान सुन्दर नेत्रो वाली थी, पहा था-हे भद्रे ! इन दोनो मे जिस किसी को भी तू मन से वरण करने की इच्छा करतो है उसी महा पुरुष के गले में इस वरमाला को डालदे और विधिपूर्वक उनको प्रणिपात घरले MEDIE१॥ इस प्रवार से राजा के द्वारा पहे जाने पर उस समय स्त्रियो परिवृत वह शुम्म लोचनो वाली पन्या परम दिव्य हिरण्मयो माला को लेकर जहाँ पर वे दोनों महारमा प्रयस्थित थे वहाँ पाकर उस समय में स्थित हो गई थी। यह उन दोनों मुनियों को देराती जा रही पी उन दोनों में एक नारद थे मोर दूसरे पर्वत मुनि थे | उसने नारद मोर पर्वत दोनो को गागाम में समान मुरा वाला देखा पा मोर गोलागूल मुस को देश- कर यह मन्या कुछ भयभीत-सी हो गई यो सम्मान्त मन थाली यह प्रवात से बदली की भांति वह स्पिन रह गई थी तब राजा ने उसी समय जग यहा-हे यरो ! तू पया परेगी? इन दोनों में से पिमो एरो उदय पर उसी पे पएट में है शुभे मालामो पहिना दो। तप यह उसे पिता से योती ये दोनों नर यानर MEAti
अम्बरीष चरित्र. ]
[१८७
मुनिष्ठ न पश्यामि नारदं पर्यनं तथा ।
अनयोर्मध्यत स्त्वेकमूनपोडशवार्षिकम् ॥९७
सर्वाभरणसंपन्नमतसीपुष्पसं निभम् ।।
दीर्घबाहु विशाल क्ष तुगोरस्थलमुत्तमम् ॥६८
रेखाकित कटिग्रीवं रक्तांतायतलोचनम् ।
नम्रचापानुकरणपटुभ्र युगशोभितम् ।।
विभक्तत्रिवतीव्यक्त नाभिव्यक्तशुभोदरम् ।
हिरण्यावर संवीत तुगरत्ननखं शुभम् ।
पद्माकारकर त्वेनं पद्मास्यं पद्मलोचनम् ॥१००
सुनासं पद्महृदय पद्मनाभं श्रिया वृतम् ।
दंतपक्तिभि रत्यर्थ कुदकुड्मलसन्निभः ।।१०१
हसत मा समालोक्य दक्षिण च प्रसार्य वै।
पाणि स्थितममुतत्र पश्यामि शुभमूर्धजम् ।।१०२
सभ्रातमानसा तत्र वेगती कदलीमिव ।
स्थिता तामाह राजासौ वत्से कि त्व कम्प्यिसि ॥१०३
बन्या ने अपन पिता अम्बरीप से कहा कि मैं मुनियो में श्रेष्ठ न रद
तथा पर्वत को यहाँ नही है । रही हूँ । इन दोनो के मध्य मे एक सोलह
वर्ष से कम एक पुरुष को देख रही है। जो समस्त माभरगो से सम्पन्न
है और अतसी (अलसी ) के पुष्प के समान वर्ष से युक्त है । इस महा-
पुरष की बडी दीर्घ वाह है नया प्रत्यन्त विशाल सुन्दर नेत्र हैं और
उन्नत एव उत्तम इसका उर स्थल है। IIEIL इस पुरुप की कटि
तथा प्रीया रेसाहित हैं। इसके रक्त तया पायत लोचन हैं। ना बाप
के अनुकरण करने इसके परम पटु भू युग मोर दोनो मुसिया है जो
कि इसकी शोभा बढ़ा रही है ॥EE विभक्त निवली के द्वारा व्यक्त
तथा नाभि से हरक्त शुभ उदर वाला है । गुवर्ण जैसे वर्ण वाले भास्वर
पत्रो को धारण किये हुए है मौर उच्चकोटि ये रत्नो के सहा इसके
नस परम शुभ है। पपारार कर माना-पय के समान मुख से युक्त
तथा पत्र के तुल्य नेग्रो वाला है ॥१०॥ सुन्दर नासिरा वाला-पय
१८८ [ लिङ्ग पुराण हृदय-पद्मनाभ तथा श्री से समन्वित है । इसकी कुन्दक्ली के समान अत्यन्त सुन्दर दन्तो की पत्तियाँ हैं। दाहिने हाथ को प्रसारित करके स्थित सुन्दर वे शो से युक्त यह है जो कि मुभको देख-देखकर मुस्करा रहा है। मैं ऐसे पुरुष को देखती हूँ ॥१०॥१०२।। इस तरह सम्भ्रान्त मन वानी प्रदात से वदरी को भांति कापती हुई स्थित उस कन्या से इस राजा ने फिर वहा-हे रत्से ! तू क्या कर रही है ? ॥१०३।। एवमुक्त मुनि प्राह नारद संशय गत । कियन्तो बाहवस्तस्य वन्ये न हि यथातथम् ॥१०४ बाहुद्वयं च पश्यामीत्याह कन्या शुचिस्मिता। प्राह ता पर्वतस्तत्र तस्य वक्ष स्थले शुभे ॥१०५ किं पश्यसि च मे यू हि करे किं वास्य पश्यसि । कन्या तमाह माला वै पचरूपामनुत्तमाम् ॥१०६ वक्ष स्थलेऽस्य पश्यामि करे कामुकसायकान् । एवमुक्ती मुनिश्रेष्ठौ परस्परमनुत्तमौ ॥१७ मनसा चि यंती तो मायेयं कस्य चिद्भवेत् । मायावी तस्करो नूनं स्वयमेव जनार्दन ॥१०५ प्रागतो न यथा कुर्यात्कथमस्मन्मुख स्विदम् । गोलागूलत्वमित्येव चिंतया मास नारद ॥१०॥ इस प्रकार से कहने पर सशय को प्राप्त होने वाले नारद मुनि ने कहा-हे कन्ये । यह तो ठीक ठीक बतलायो उसको कितनी वाहु हैं ? ॥१०४॥ शुचिस्मित वाली उस कन्या ने कहा- मैं उसकी दो वाहु देख रही हूँ। तब वहां पर पर्वत मुनि ने उस कन्या से कहा-उसके शुभ पक्ष स्थल मे तू क्या देख रही है और उसके हाथ मे क्या तुझे दिखलाई देता है. यह हमको बतला दे । तव उस कन्या ने उस मुनि से कहा था कि में उसके कण्ठ मे पञ्चरूप वाली परम श्रेष्ठ माला देख रही हूं ॥१०५ ॥१०॥ इस के शुभ वक्ष स्थल मे माला और हाथो मे कामुक (धनुप) और सायको वो मै देसती हूं ऐसा उस पन्या ने उन मुनियो को उत्तर दिया था। ऐसा कहने पर उन उत्तम मुनिश्रेष्टो ने आपस मे चिन्तन अम्बरीप चरित्र [१८६ फरते हुए कहा कि यह किमी को माया हो सकती हैं । निश्चय ही माया- ची तस्कर स्वयं ही जनार्दन हैं ॥१०७॥१०८। वह ही यहां पर पा गया है । नहीं तो यह हमारा मुख यह कैसे पर दिया गया है । नारद ने फिर यही विचार किया था कि यह मुख गोलाइमूलल को इसी प्रकार से प्राप्त हुआ है ॥१०॥ पर्वतोपि यथान्यायं वानरत्यं कथ मम । प्राममित्येव मनसा चितामापेदिवांस्तथा ॥११० ततो राजा प्रणम्यासौ नारद पर्वतं तथा । भवद्भयाँ किमिदं तत्र कृतं बुद्धिविमोहनम् ॥१११ स्वस्थौ भवतो तिष्ठेता यथा कन्यार्थ मुद्यतो। एवमुक्तौ मुनिश्रीष्ठी नृपमूचतुरुल्वणौ ॥११२ स्वमेव मोह कुरुपे नावामिह कथंचन । आवयोरेकमेपा ते वरयत्वेव मा चिरम् ।।११३ ततः सा कन्यका भूय परिणपत्येष्टदेवताम् । मायामादाय तिष्ठत तयोर्मध्ये समाहितम् ॥११४ सर्वाभरणसयुक्त मतमीपुष्पसन्निभम् । दीर्घबाहुं सुपुष्टागं करतायतलोचनम् ॥११५ पूर्ववत्पुरप दृष्ट्वा माला तस्मै ददौ हि सा। अनतर हि सा चन्या न हटा मनुजैः पुनः ॥११६ ततो नादः समभवत् किमेतदिति विस्मिती। तामादाय गतो विष्णुः स्वस्थानं पुरपोत्तमः ।।११७ पुरा तदर्थमनिशं तपस्तप्त्वा वरांगना । श्रीमती सा समुत्पना सा गता च तथा हरिम् ११% पर्यंत मुनि भी मेरा मुख पानावे सुरप से हो गया है-इसी मिन्ता को प्रास दो परे ॥११ राजा ने भारद और पतलो पो भरणाम से उनसे पहा-पाप दोनो को यह पण बुद्धि का विमोह उत्पन्न हो गया है ? यहां पर ऐसा मया होगा है ॥१११॥ माप दोनों स्वरय होर विराजमान होइये पयोकि माप दोनों ही यहाँ पर पन्या १६० ] [ लिङ्ग पुराण प्राप्त करने के लिये उपस्थित हुए हैं। ऐसा जब राजा ने कहा तो वे दोनो मुनिश्रेष्ठ बहुत क्रोधित होकर राजा से बोले-॥११२॥ यहाँ पर हम दोनों किसी भी प्रकार से मोह को प्राप्त नहीं हुए हैं, तुम ही मोह करते हो । यह आपकी कन्या हम दोनो में से किसी भी एक वरण करले इसमे विलम्ब नही करना चाहिए ॥११३॥ इसके पश्चात् उस कन्या ने पुन अपने इष्ट देवता को प्रणाम किया जो कि माया के लेकर उन दोनो के मध्य में समाहित होकर स्थित गा ॥११४॥ वह महापुरुष सभी आभू- पणो से समलकृत और अलसी के पुष्प के समान अति सुन्दर श्यामाभ वर्ण वाला था। दीर्घ बाहुप्रो से युक्त सुपुष्ट प्रङ्गो वाला तथा कर्णो के पर्यन्त तक विशाल नेत्रो वाला था ॥११॥ ऐसे पूर्व की भांति उस परम मनोरम महापुरुष का दर्शन करके उसने उसी के गले में वह वर माला पहिना दी थी। इसके पश्चात् फिर मनुष्यो ने वह कन्या नही देखी थी ॥११६। इसके उपरान्त वह नारद हो गये थे- यह क्या हुमा इस प्रकार से दोनों विस्मित हुए थे। पुरषोत्तम भगवान् विष्णु उस कन्या को साथ लेकर अपने स्थान को चले गये थे ॥११७ । प्राचीन काल मे उस वराङ्गना ने उसकी प्राप्ति के लिये ही बड़ी भारी निरन्तर तपस्या की थी और वही अब श्रीमती नाम धारिणी कन्या के स्वरूप मे समुत्पन्न हुई थी और वह हरि को प्राप्त कर चुकी थी ॥११८॥ तावुभौ मुनिशार्दूलो धिक्कृतावति दुखिती। वासुदेवं प्रति तदा जग्मतुर्भवनं हरे. ॥११६ तावागतौ समीक्ष्याह श्रीमती भगवान्हरि. । मुनिश्रेष्ठी समायातो गृहस्व त्मानमम वै ॥१२० तथेत्युक्त्वा च सा देवी प्रहसंती चपार ह । नारद प्रणिपत्याने प्राह दामोदरं हरिम् ।।.१ प्रियं हि कृन वानद्य मम त्वं पर्वतस्य हि । त्वमेव नून गोविंद कन्या ता हृतवानमि ॥१.२ विमोहावा स्वय बुद्धया प्रतार्य सुरसत्तम । इत्युक्त पुरुषो विष्णु पिधाय श्रोत्रमच्युतः ।
अम्बरीप चरिन] पाणिभ्यां प्राह भगवान् भवद्भयों किमुदीरितम् ॥१५३ कामवानपि भावोय मुनिवृत्सिरहो किल । एवमुक्तो मुनिः प्राह वामदेव स नारदः ॥१२४ कणमूले मम कथ गोलागूनमुख स्विति । चर्णमूले तमाहेद धानरत्व कृतं मया ॥१२५ पर्वतस्य मया विद्वन् गोलागूलमुख तव । मया तव कृत तत्र प्रियार्थ नान्यथा त्विति ॥१२६ पर्वतोऽपि तथा प्राह तस्याप्येव जगाद स.। शृण्वतोरुभयोस्तत्र प्राह दामोदरी वच ॥१२७ वे दोनो मुनिशार्दूल हृदय मे बहुत ही धिक्कृत हुए और अत्यन्त दुखित भी हुए थे । इसके अनन्तर पे दोनो मुनि भगवान वासुदेव के निकट उनके स्थान पर गये थे॥११६। उन दोनो को भाये हुए देखकर भगवान ने श्रीमती से कहा-यहाँ पर अपने प्रापको तुम छिपालो। ॥१२०।। ऐसा ही होगा-यह कहकर उस देवी ने हंसते हुए वैमा ही किया था। देवपि नारद ने भगवान् को प्रणिपात करके उनसे कहा था ॥१२१॥ हे भगवन् । प्राज मापने मेरा और पर्वत मुनि का प्रिय कार्य किया ही हे गोविन्द | प्रापने ही निश्चय रूप से उस कन्या का हरण किया है ।।१२२।। हम दोनो को विमोहित किया था और स्वयं अपनी चुद्धि से हे सुग्थेष्ठ । प्रााने हमको प्रसारित कर दिया था। इस तरह नारद के कहने पर भगवान् अच्युत पुरुप तम ने दोनो अपने कानो को हाथो से ढस्कर फिर कहा-यह प्रापने अभी क्या कहा है । यह भान तो पाम वाला है मौर माप मुनि की वृत्ति वाले हैं । तव ऐसे कहे हुए नारद ने वासुदेव से वर्णमूल मे कहा मेरा यह गोलागूल मुख कैसे हुआ था। तब उनसे फर्णमूल मे ही पह कहा गया था कि यह वानरत्व मैने कर दिया था। १२३॥१२॥१२॥ पवंत का और तुम्हारा यह गोला. गूल मुरा का हो जाना सब मैंने ही किया था। यह सब मैने तुम्हारे ही प्रिय हित के लिये रिया था। इसके अतिरिक्त अन्य इसका कोई भी मभिप्राय नही था ॥१२६। इसी प्रकार से पर्वत मुनि ने भी भगवान से १६२] [ लिङ्ग पुराण कहा था और उनको भी ऐसा ही उत्तर वासुदेव ने दे दिया था । उन दोनो के सुनते हुए वहां पर भगवान दामोदर ने यह वचन कहा था ।।१२७॥ प्रिय भवद्भयां कृतवान् सत्येनात्मानमालभे। नारदः प्राह धर्मात्मा पाक्योर्मध्यतः स्थितः ॥१२८ धनुष्मा-पुरुषः कोत्र तां हत्वा गतवान्किल । तच्छ व व सुदेवोऽसौ प्राह तो मुनिसत्तमौ ॥१२६ मायाविनो महात्मनो बहवः सति सत्तमाः । तन सा श्रीमती नूनमदृष्ट्वा मुनिसत्तमौ ॥१३० चक्रपारिगरह नित्य चतुर्बाहुरिति स्थितः। ता तया नाहमैच्छ वै भवद्भया विदित हि तत् ।। ३१ इत्युक्तो प्रणिपत्यैनमूचतुःप्रीति मानसौ। कोऽत्र दोपस्तव विभो नारायण जगत्पते ।। ३२ दोगत्म्यं तन्नृपम्यव माया हि कृतवानसौ। इत्युक्त्वा जग्मतुस्तस्मान्मुनी नारदपर्वतौ ॥१३३ अबरीप समासाद्य शापेनैनमयोजयत् । नारदः पर्वतश्चैव यस्मादावामिहागतो ॥१३४ आहूय पश्चादन्यस्मै कन्यां त्वं दत्तवानसि । मायायोगेन तस्मात्त्वा तमो ह्यभिभविष्यति ।।१३५ भगवान ने कहा--मैंने आप दोनो का ही प्रिय दिया था~यह मैं बिल्कुल सत्य कह रहा हूँ। तर नारद मुनि ने कहा- वह धर्मात्मा हम दोनो के मध्य मे धनुप धारण करने वाला पुरुष वहाँ पर कौन था जो कि उस कन्या का हरण करके चला गया था ? यह श्रवण भगवान् वासुदेव ने उन दोनो मुनिश्रेष्ठी से कहा था। माया धारण करने वाले बहुत से श्रेष्ठ पुरुप महान् प्रात्मा वाले होते हैं। उस समय उन दोनो मुनियो ने वहां पर उस श्रीमती को नहीं देखा था ॥१३०॥ भगवान् ने पहा-मैं तो चक्र को नित्य हाथ में रखने वाला हूँ और मेरे तो चार भुजाएं हैं। मैं उसको उस रूप से नही चाहता था-यह सब आप दोनो अम्बरीष चरित्र ] [ १६३ को भली-भौति विदित ही है ॥१३१॥ इस तरह से कहे गये उन दोनो मनियो ने भगवान् को प्रणाम करके कहा-हम तो दोनो ही प्रीति युक्त चित्त वाले हैं । हे जगत् के स्वामिन् । हे विभो ! हे नारायण | आपका इसमे क्या दोष है ? ॥१३२॥ यह दुष्टता तो उसो रा को है । मोर उसी ने यह सव माया की थी-इस तरह से बहकर वे दोनो मुनि नारद तथा पर्वत राजा अम्बरीप के समीप मे चले गये थे ॥१३३।। राजा अम्बरीप के पास पहुंच कर इसको शाप से योजित किया था । नारद और पर्वत मुनि जिस कारण से हम दोनो यहाँ आये थे। हमको बुला. कर हे राजन् ! तूने अपनी कन्या को दूगरे के लिये वे विया था और यह माया का योग किया था अतएव यह तम तुझको ही अभिभूत करेगा ॥१३४||१३५॥ तेन चात्मानमत्यर्थ यथावत्त्वं न वेत्स्यसि । एव शापे प्रदत्तं तु तमोराशिरथोत्थितः ॥१३६ नृपं प्रति ततश्चक्र विष्णो. प्रादुरभूत्क्षणात् । चक्रवित्रासित घोरं तावुभौ तम अभ्यगात् ॥१३७ तत सत्रस्तसर्वागी धावमानौ महामुनी। पृष्टतश्चकमालोक्य तमोराशि दुरासदम् ॥१३८ कन्यासिद्धिरहो प्राप्ता ह्याक्योरिति वेगिती। लोकालोकातमनिश धावमानौ भयादितौ ।।१३६ वाहियाहीति गोविदं भाषमाणो भयादिती। विष्णुलोक ततो गत्वा नारायण जगत्पते ॥१५० व सुदेव हृषीकेश पद्मनाभ जनार्दन । श्राद्यावा पुडरीकाक्ष नाथोऽसि पुरुषोत्तम ॥१४॥ ततो नारायणश्चित्य श्रीमान्छीवत्सलांछन । निवार्य चक्र ध्वांत च भक्तानुग्रहकाम्यया ॥१४२ उस तम का यह प्रभाव होगा कि तू अपने आपको यथावत नहीं जानेगा । इस प्रकार वा ऋषियो का शाप देने पर इसके अनन्तर ही तमोराशि का उत्थान हो गया था ॥१६॥ ज्यो हो वह नृप के प्रति १६४ ] [ लिङ्ग पुराण जाने लगा उसी क्षण मे भगवान् विष्णु का सुदर्शन चक्र वहाँ प्रादुर्भुत हो गया था। उस चक्र से अत्यधिक त्रस्त होकर वह तम उन्ही दोनो ऋषियो की ओर चला गया था ॥१३७। इसके पश्चात् सम्यक् प्रकार से त्रस्त सम्पूर्ण अङ्गो वाले वे दोनो मुनि वहाँ से भाग कर चले और अपने पीछे आते हुए उस प्रति दुरासद तमोराशि तथा सुदर्शन चक्र को उन्होने देखा था ॥१३८।। वे दोनो यह कहते हुए भागे चले जाते थे कि अच्छी हम दोनों की कन्या प्राप्त होने की सिद्धि हुई। वे बहुत ही वेग से दौड लगा रहे थे और भय से परम दुखित होकर निर तर लोकालोकान्त तक भागते ही रहे थे । ॥१३६॥ भय से परम पीडित होते हुए गोविंद का स्मरण कर यह पुकार लगा रहे थे कि हे नारायण । हे नाथ । हमारी रक्षा को हमको प्राण प्रदान करो। अन्त 'वे विष्णु लोक मे पहुँच गये थे ॥१४०॥ वहाँ पहुच पर उन दोनो ने भगवान से कहा-है वासुदेव । हे पद्मनाभ माप तो समस्त इन्द्रियों के स्वामी हैं तथा भक्त- जनो के दुखो के अर्दन करने वाले हैं । हे पुण्डरीकाक्ष । भाप परम श्रेष्ठ पुरुष हैं और सब के नाथ । पाप हम दोनो की रक्षा करो । ॥१४॥ इसके अनन्तर श्रीमान् श्रीवत्स के लाच्छन वाले नारायण ने विचार कर उस चक्र को तथा तमोराशि को भत्तो पर अनुग्रह करने की इच्छा से निवारित कर दिया था ॥१४२॥ अबरोपच मद्भक्तस्तथती मुनिसत्तमो। अनमोरस्य च तथा हित व यं गयाऽधुना ।।१४३ पाहूय तत्तमः श्रीमान गिरा प्रह्लादयन् हरि. प्रोवाच भगवान् विष्णु शृणुताम इद वच ॥१४४ पिशापो न चैवासीदन्यथा च बरो मम । दत्तो नृपाय रक्षार्थ नास्ति तस्यान्यथा पुन: 11१५५ अंबरीपस्य पुत्रस्य नप्नुः पुत्रो महायगा । श्रीमान्दशरथो नाम राजा भवति धामिक ॥१४६ तस्याहमग्रज पुषो रामनामा भवाम्यहम् । तम मे दक्षिणो बाहुभरतो नाम व भवेत् ।।१४९ अम्बरोप चरित्र. ] [ १६५ शत्रुघ्नो नाम सव्यश्च शेषोऽमो लक्ष्मण. स्मृत.। तत्र मां समुपागच्छ गच्छेदानी नृपं विना ॥१४८ मुनिश्रेष्ठौ च हित्वा स्वमिति स्माह च माधवः । एवमुक्ततमो नाशं तरक्षणाच जगाम वै ।।१४६ तव श्रीमान् हरि ने उस तम को बुलावर कहा- राजा अम्बरीष मेरा परम भक्त है और ये दोनो मुनि भी मेरे भक्त है । मैंने इस राजा का पोर इन दोनो मुनियो का परम हित का पार्य अब दिया है । हरि ने अपनी वाणी से तम को प्रसन्न करते हुए कहा था कि तुम मेग यह पवन श्रवण कर लो। यह ऋषि का शाप नही था । यह तो अन्य प्रकार से मेरा वरदान ही था। यह नृप की रक्षा के लिये दिया गया है। इस- का फिर भन्यथा नही होगा ॥१४३॥१४॥॥१४५॥ राजा अम्बरीप के पुष के नाती का महान् यश वाला पुत्र ददारथ नाम वाला राजा परम धार्मिक होगा ॥१४६।। उसका मैं सबसे बडा पुत्र रामचन्द्र नाम वाला होऊगा । वहा पर उस समय में मेरा दक्षिण बाह भरत नामधारी होगा घोर वाम याहु शत्रुघ्न नाम वाला होगा । यह शेष लक्ष्मण होगा। उस समय तू मेरे पास पाना। भव राजा को छोटकर ला जा ॥१४७॥ 1॥१४८) माधव ने यहा-पर तू इन दोनो श्रेप मुनियो को छोड । इस प्रकार से भगवान के द्वारा कहे जाने पर यह तम उमो समय नाय को प्रास हो गया था और यहां से चला गया था||१४॥ निवारित हरेश्चक्र यथापूर्वमतिछन । मुनिश्रही भयान्मुक्ती प्रणिपत्य जनार्दनम् ।।१५० निगोशोपसंती ऊनतुस्तौ परस्परम् । प्रद्यप्रभृति देहातमावां कन्यापरि गहम् ।।१५१ न करिष्याव इत्युक्त्वा प्रनिभाय च तावृषो । सोसयारी शुद्ध रशपूवं व्यवस्थित १२ अंबरीपश्च राजासो परिपाल्प च मेदिनीम् । मभृत्यशातिसंपन्नो विष्णुलोकं जगाम पं ॥१५३ मानार्यमवरीपस्य तथैव मुनिमिहयोः ।
योग १९६ ] [ लिङ्ग पुराण रामो दाशरथिभूत्वा नात्मवेदीश्वरोऽभवत् ।।१५४ मुनयश्च तथा सव भृग्वाद्या मुनिसत्तमा । माया न कार्या विद्वद्भिरित्याहु प्रेक्ष्य त हरिम् ॥१५५ निवारित किया हुआ वह हरि भगवान् का चक्र भी पूर्व की भांति भवस्थित हो गया था। दोनो मुनि भय से मुक्त हो गये थे और उन्होंने जनार्दन को प्रणिपात करके वहाँ से निर्गमन किया था। वे परम शोक से दोनो ही सनप्त हो रहे थे तथा परस्पर मे कह रहे थे कि पाज से फिर कभी भी हम दोनों किसी भी कन्या का परिग्रह नही करेंगे। ऐसा कह- कर उन दोनो ऋपियो ने पक्की प्रतिज्ञा की थी। फिर वे दोनो ही अपने ध्यान मे परम शुद्ध होते हुए परायण हो गये थे और पूर्व की ही भांति व्यवस्थित हो गये ॥१५०॥१५१३१५२॥ उम राजा अम्बरीप ने भली-भौति पृथ्वी का परिपालन किया था और फिर वह अपने भृय- ज्ञाति सब को साथ लेकर विष्णु लोक को चला गया था ।॥१३॥ राजा अम्बरीप के मान की रक्षा के लिये तथा दोनो मुनियो के वचनो का पूर्ण पालन करने के लिये राजा दशरथ के पुत्र श्रीराम हुए थे जो प्रात्मवेदी ईश्वर नहीं हुए थे ॥१५४।। उस समय भृगु आदि समस्त श्रेष्ठ- तम मुनिगण भी उन हरि को देखकर यही कहने लगे थे कि विद्वान पुरुपो को माया कभी नही करनी चाहिए ।।१५।। नारद पर्वतश्च व चिर ज्ञात्वा विचेष्टितम् । माया विष्णोविनिधैव रुद्र मक्तो बभूवतु ।।१५६ एतद्धि कथित सर्व मया युष्माकमद्य वै । अबगैपस्य माहात्म्यं मायावित्वं च वै हरे ॥१५७ य पठेच्छणुयाहापि श्रावयेद्वापि मानव । माया विसृज्य पुण्यात्मा रद्रलोकं स गच्छनि ।। ५८ इद पवित्र परम पण्य वेदैरुदीरितम् । साय प्रात पठेनित्य विष्णो सायुज्यमानुगत ।।१५६ नारद और पर्वत मुनि चिरकाल तर उस विचेश्ति का ध्याा करके तथा भगवान् विष्णु को माया की विशेष रूप से निन्दा करके रद के
लक्ष्मी की उत्पत्ति ]
[ १६७
भक्त हो गये थे ॥१५६।। मैंने यह सब राजा अम्बरीष का माहात्म्य और
भगवान् हरि का मायावी होना प्राज आप लोगो के समक्ष मे कह दिया
है ॥१५७॥ इस परम पवित्र चरित्र को जो भी कोई मनुष्य पढ़ेगा या
श्रमण करेगा अथवा इस चरित्र का श्रवण करायेगा वह परम पुण्यात्मा
माया का त्याग करके रुद्र लोक मे चला जायेगा ॥१५८॥ यह चरित्र
परम पुण्यमय एव प्रत्यन्त ही पवित्र है-इसको वेदों ने कहा है । इसका
सायद्याल तथा प्रात काल मे पाठ करने वाला भगवान विष्णु के सायुज्य
की प्राप्ति किया करता है ।।१५६।।
॥७६-लक्ष्मी की उत्पत्ति-प्रलक्ष्मीवास योग्य स्थान ।।
मायावित्व श्रुत विष्णोर्देवदेवस्य धीमतः।
कथ ज्येष्ठासमुत्पत्तिर्देवदेवाज्जनार्दनात् ॥१
वक्तुमर्हसि चास्माक लोमहर्षण तत्त्वत.।
अनादिनिधनः श्रीमान्धाता नारायण प्रभु ॥२
जगद्द्व धमिद चक्रे मोहनाय जगत्पति
विष्णुर्वे ब्राह्मणान्वेदान्वेदधर्मान् सनातनान् ॥३
थिय पदा तथा श्रेष्ठ भागमेकमकारयत् ।
ज्येष्ठामलक्ष्मीमशुभा वेदवाह्यान्नराधमान् र
अधर्म च महातेजा भागमेकमकल्पयत् ।
अलक्ष्मीमग्रतः सृष्ट्वा पश्चात्पमा जनार्दन ॥५
ज्येष्ठा तेन समाख्याता अलक्ष्मीढिजसत्तमा ।
अमृताद्भववेलाया विषानतरमुल्वरणात् ।।६
प्रशुभा सा तथोत्पन्ना ज्येष्ठा इति च वै थुनम् ।
तत श्रीश्च समुत्पन्ना पद्मा विष्णुपरिग्रह ७
इस अध्याय में अलक्ष्मी को उत्तति और उसके आवास के स्थलो
एव वास के योग्य स्थानो का निरूपण किया जाता है । ऋपियो ने
कहा-देवो के भी देव परम धीमान भगवान् विष्णु का मायावी होना हम
लोगो ने भापके श्री मुख से भली-भांति श्रवण किया है । भव प्राप यह
१६८ ] [ लिङ्ग पुराण बताइये कि देवो के देव जनार्दन से ज्येष्ठा को समुत्पत्ति कैसे हुई थी ? ॥श हे लोमहर्पण । आप यह तत्व पूर्वक हमको बताने के लिये परम योग्य हैं। सूतजी ने कहा-प्रभु नारायण तो अनादि निधन तथा श्रीमान एवं सब के घाता हैं ||२|| जगत् के स्वामी ने मोहन के लिये इस जगत को दो प्रकार का कर दिया है। भगवान् विष्णु ने ब्राह्मण वेद पोर सनातन वेद के धर्मों का तथा श्रेष्ठ पमा श्री वा एक भाग किया था और उस महान तेजस्वी ने ज्येष्ठा-प्रशुभा अलक्ष्मी तथा वेद बाह्य अधम नर और अधर्म का एक अलग भाग की कल्पना की है । भगवान् ने पहि- ले अलक्ष्मी का ही सृजन किया था फिर इसके अनन्तर जनार्दन ने पमा का सृजन किया है ॥३॥४॥५॥ उसने इसका नाम ज्येष्ठा रक्खा है हे द्विजय प्रो ! इसकी अलक्ष्मी कहते हैं । यह ज्येष्ठा अमृत की उत्पत्ति के समय मे विष के अनन्तर उल्वरण से वह अशुभा समुत्पन्न हुई थी जो कि ज्येष्ठा-इस नाम से धूपमारण होती थी। इसके मनन्तर पमा श्री समु. स्पन्न हुई थी जो कि भववान् विष्णु का परिग्रह हुई थो ॥६।७।। दु.सहो नाम विपिरुपयेमेऽशुभा तदा । ज्येष्ठा ता परिपूर्णोऽमौ मनसा वीक्ष्य घिष्ठिताम् ।। लोकं चचार हृष्टारमा तया सह मुनिस्तदा । यस्मिन् घोपो हरेश्च व हरम्य च महात्मनः ।। वेदघोषस्तथा विप्रा होमघूमस्तथैव च । भस्मांगिनो वा यत्रासंस्तत्र तत्र भयादिता ॥१० पिधाय करणी संयाति धावमाना इतस्ततः । ज्येष्ठामेवंविधा दृष्ट्वा दुःमहो मोहमागतः ॥११ तया सह वनं गत्वा चचार स महामुनिः। तपो महदने घोरे याति यन्या प्रतिग्रहम् ॥१२ न करिप्यामि चेत्युक्त्वा प्रतिनाय घ तामृपिः । योगज्ञानपरः शुद्धो यत्र योगीश्वरो मुनिः ॥१५ तत्रायांतं महात्मान माकंडेयमपश्यत । प्रणिपरय महात्मानं दुमहो मुनिमयवाद ॥१४ - लक्ष्मी को उत्पत्ति ] [ १६६ - एक दुसह नाम वाले विपि थे। उन्होने उस समय मे उस ज्येष्ठा को मन से अधिष्ठित देखकर परिपूर्ण होने वाले उस विपि ने प्रशुभा के साथ विवाह किया था ॥८॥ तब वह मुनि उसके साथ परम प्रसन्न होकर लोक मे चरण किया करता था। जिम स्थान मे हरि के शुभ नाम का समीर्तन-ध्वनि होती थी या महात्मा हर के नाम का घोप सुनाई देता था !18) जहाँ पर भी ब्राह्मणो के द्वारा वेद ध्वनि होती थी या होम का धूम होता था अथवा भस्म अङ्ग पर धारण करने वाले जहाँ पर भी. होते थे वहाँ पर यह ज्येष्ठा भय से भीत एव दुःखित होकर और दोनो अपने कानो को ढांप कर इधर-उधर भागा करती थी। इस प्रकार से रहने वाली इस ज्येष्ठा को देखकर वह विपि मोह को प्राप्त हो गया या ॥१०॥११।। फिर वह महामुनि उसको साथ में लेकर दन में विचरण करने लगा था । उस घोर महान् वन में वह तप करता कि वह कन्या प्रतिग्रह को प्राप्त होगी किन्तु उसने मैं प्रति ग्रह नहीं करूंगी ऐसी उस ऋपि से प्रतिज्ञा की थी। उस स्थान पर यागोश्वर मुनि शुद्ध होकर योग ज्ञान में परायण रहा करता था ।।१२।।१३।। वहां पर एक बार उस मुनि ने आये हुए मार्कण्डेय मुनि का दर्शन प्राप्त किया था। ऋपि विपि ने मार्कण्डेय मुनि को यथाविधि प्रणाम करके उनसे कहा था॥४॥ भार्ययं भगवन्मह्यन स्थास्यति कथंचन । कि करोमीति विप्र ह्यनया सह भार्यया ॥१५ प्रविशामि तथा कुन कुतो न प्रविशाम्यहम् । शृणु दुःसह सर्वत्र अकोतिरशुभान्विता ॥१६ अलक्ष्मीरतुला चेयं ज्येष्ठा इत्यभिशब्दिता। नारायणपरा यत्र वेदमार्गानुसारिणः ॥१७ रुद्रभक्ता महात्मानो भस्मोद्ध लितविग्रहाः । स्थिता यत्र जना नित्यं मा विशेथाः कथंचन ॥१८ नारायण हृषीकेश पुडरीकाक्ष माधव । अच्युतानंत गोविंद वासुदेव जनार्दन ॥१६ -- २०० ] [ लिन पुराण रुद्र रुद्रति रुद्रति शिवाय च नमो नमः । नमः शिवतरायेति शकरायेति सर्वदा ।।२० महादेव महादेव महादेवेति कीर्तयेत् । उमायाः पतये चैव हिरण्यपतये सदा ॥२१ हिरण्यवाहवे तुभ्यं वृषाकाय नमो नमः । नृसिंह वामनाचित्य माधवेति च ये जनाः ॥२२ वक्ष्यति सततं हृष्टा ब्राह्मणाः क्षत्रियास्तथा । वैश्या. शूद्राश्च ये नित्य तेषा धनगृहादिषु । पारामे चैव गोष्टेपु न विशेथाः कथचन ॥२३ हे भगवन् ! यह भार्या मेरे पास किसी प्रकार भी नही रहेगी। हे विप्र । मै इस भार्या के साथ क्या करूं? मैं कहाँ तो प्रवेश करूं और मैं कहाँ प्रवेश नही करू ? मार्कण्डेय जी ने कहा- पाप सुनिये, अशुभ से युक्त प्रकीति सर्वत्र ही दुसरह होती है ।।१५।१६॥ यह अतुला अल- क्ष्मी है और ज्येष्ठा-ही नाम से पुकारी जाती है । जहाँ पर भगवान् नारायण मे परायण-रहने वाले वेदो के मार्ग का अनुसरण करने वाले- रुद्र के भक्त-महान् प्रास्मा वाले-भस्म से उद्धूलित शरीरो वाले मनुष्य जहाँ पर नित्य स्थित रहा करते हैं वहाँ माप किसी भी प्रकार से कभी प्रवेश न किया करें ।।१७।१८।। जहां पर हे नारायण-हृयोकेश-पुण्डरी- काक्ष-माधव-अच्युतानन्द-गोविन्द-वासुदेव-जनार्दन इन भगवान् के परम पवित्र एव शुभ नामो को तथा रुद्र-रुद्र हे रुद्र ! शिव के लिये बारम्बार नमस्कार है । सर्वदा शिव तर एव शङ्कर के लिये प्रणाम है-हे महा- देव ! हे महादेव ! हे महादेव !- इस प्रकार से शिव के शुभ तम नामों को पुकार कर कीर्तन किया जाता हो- उमा के पति के लिये-सदा हिरण्य पति के लिये तथा हिरएर वाहु वाले तुम्हारे लिये तथा वृपाङ्क के लिये बारम्बार नमस्तार है । हे नृसिंह ! हे वामन ! हे माधव !-इस प्रकार से जहाँ पर मनुष्य बोलते हो चाहे वे ब्राह्मण हो मा क्षत्रिय-वैश्य तथा शूद्र ही हो भगवन्नामोच्चारण करके परम प्रसन्नता प्राप्त करने वाले रहते हो उनके पनगृहादि मे-मारामोद्यानो मे और गोष्ठ मे मापको कभी लक्ष्मी की उत्पत्ति [ २०१ किसी भी प्रकार से प्रवेश नहीं करना चाहिए ॥१६॥२०॥२१॥२२॥२३॥ ज्वालामालाकराल च सहस्रादित्यसन्निभम् । चक्र विष्णोरतीवोन तेपा हति सदाशुभम् ।।२४ स्वाहाकारो वषट्कारो गृहे यस्मिन् हि वर्तते । तद्धित्वा चान्यमागच्छ सामघोपोथ पन पा ॥२५ वेदाभ्यासरता नित्य नित्यकर्मपरायणाः । वासुदेवार्चनरता दूरतस्तान्विसर्जयेत् ॥२६ अग्निहोत्र गृहे येपा लिंगार्चा वा गृहेषु च । वासुदेवतनुर्वापि चडिका यत्र तिष्ठति ॥२७ दूरतो ब्रज तान् हित्वा सर्वपापविवर्जितान् । नित्यनैमित्तिकर्ययजति च महेश्वरम् ॥२८ तान् हित्वा व्रज चायन दु सहत्व सहानया। श्रोनिया ब्राह्मरमा गाबो गुरवोऽतियय सदा २६ रुद्रभक्ताश्च पूज्यते यैनित्य तान् विवर्जयेत् । यस्मिन्प्रवेशो योग्यो मे सब्रू हि मुनिसत्तम ॥३० ऐसे भक्त पुरुषो के पशुभो को तो ज्वालामो को मालाग्रो से महान विकराल स्वरूप बाला-सहस्रो सूर्यों के समान तेज से युक्त अत्यन्त उस भगवान विष्णु का सुदशन चक्र सर्वदा हनन कर दिया करता है ॥२४॥ जिस घर मे स्वाहा वार तथा वषट कार होता हो-इन ऐसे स्थलो वा भीमापको परित्याग करके ही रहना चाहिए । जहाँ सामवेद के मन्त्री का उद्घोष होता है तथा जो रादा वेदो के स्वाध्याभ्यास मे रति रखने पाले निरन्तर उसमे सलग्न रहते हो एव नित्य कर्मानुष्ठान मे परायण रहने वाले लोग निवास परते हो तपा भगवान् पासुदेय पो भर्चना में रत हो ऐसे स्थलो को तो पापको दूर से ही प्यार कर देना चाहिए ॥२५॥२६।। जिन घरों मे निस्य ही पग्निहोत्र होता हो तथा शिव की लिङ्गाना हुमा करती हो तथा वासुदेव को मूत्ति भयवा चण्डिका देवी सो प्रतिमा जहाँ विराजमान हो-ऐसे समस्त प्रभार के पापों से रहित स्थला को छोडकर पापो दूर हो से पन देना चाहिए । नित्य तया [ लिङ्ग पुरा २०२ ] नैमित्तिक यनों के द्वारा जहाँ पर महेश्वर या यजन लोम किया करते हैं उन स्थानों का भी त्याग करके ही अन्य स्थानों में इस प्रपनी भार्या के साप दुराहना पूरा भले जाया करें। प्रोत्रिय ब्राह्मण-गोएँ -गुरु वर्ग मौर अतिथि गए रुद्र के भरत जहाँ सदा पूज्य हुमा करते हैं नित्य ही उन स्यों को प्रापको त्याग ही देना चाहिए । दु.सह ने कहा-हे मनि- घ! अब आप मुझे यह स्थल बता देने की कृपा करें जिनमे मेरा प्रवेश योग्य होता हो ॥२७॥२८॥२६॥३०॥ स्वद्वाक्यायनिर्मुक्तो विशान्मेषां गृहे सदा। न श्रोत्रिया द्विजा गावो गुरवोऽतिथयः सदा । यत्र भर्ता च भार्या च परस्परविरोधिनी ॥३१ समार्यस्त्व गृहं तस्य विशेथा भयवर्जितः । देवदेवो महादेवो रुद्रस्त्रिभुवनेश्वरः ॥३२ विनिद्यो यन भगवान विशस्व भयवजितः। वासुदेवरतिर्नास्ति यत्र नास्ति सदाशिवः ॥३३ जपहोमादिकं नास्ति भस्म नास्ति गृहे नृणाम् । पर्वण्यम्पनं नास्ति चतुर्दश्यां विशेषतः ॥३४ कृष्णाष्टम्यां च रुद्रस्य संध्यायां भस्मजिताः। चतुर्दश्यां महादेवं न यजति च यत्र वै ॥३५ विष्णोर्नामविहीना ये मंगताश्च दुरात्मभिः । नमः कृष्णाय शर्वाय शिवाय परमेष्ठिने ॥३६ ब्राह्मण श्च नरा मुढा न वदंति दुरात्मकाः । तव सतत वत्स सभार्यस्त्वं समाविश ॥३७ आपके वाक्य से मैं भय से विनिर्मुक्त होकर इन लोगो के घर में जदा प्रवेश किया करूंगा । मार्कण्डेय जी ने कहा-जहाँ पर श्रोत्रिय द्विज गौऐं -गुरु वर्ग तथा अतिथि सदा निवास न किया करते हो और जहां पर भर्ता तथा भार्या मे नित्य ही परस्पर मे विरोध रहता हो वहाँ पर अपनी भार्या के साथ भय से रहित होकर उस घर मे प्रवेश किया कीजिए । देवो के भी देव त्रिभुवन के स्वामी महादेव श्रीरुद्र की जहाँ लक्ष्मी की उत्पत्ति.] [ २०३ हुआ करती है निन्दा होती हो अर्थात भगवान की बुराई जिस घर मे उन घर मे बिल्कुल भय से रहित होकर भाप प्रवेश करिए । जहाँ भग- वान् वासुदेव की रति नहीं हो और सदा शिव भी भक्ति तथा अनुरक्ति का प्रभाव हो जप एव होम मादि कुछ भी नहीं पर नही होता हो और जिस घर मे भस्म मनुष्मो के लगाने के लिये नहीं हो पर्व के समय में अर्चन जा नही होता हो तथा विशेष पर चतुर्दशी के दिन जहाँ पर यजन नही दिया जाता हो मास के कृष्णाष्टमी के दिन रुद्र की भस्म से चर्जित सन्ध्या के समय म मनुष्य रहा करते हो और चतुर्दशी मे महादेव का यजन नही किया करते हैं -जिस जगह मानव विष्णु के पविय नामोच्चारण से रहित रहा करते हो तथा पुष्ट आत्मानो वाले मनुष्यो की सङ्गति किया करते हैं एव 'कृष्ण के लिये नमस्कार है-परमेष्ठी शिव शर्व के लिये प्रणाम है' इस प्रकार से जहाँ पर पाह्मण तथा मनुष्य मूढता एव दुधता के वश होकर नहीं बोला करते हैं-हे परस । वहाँ पर ही तू अपनी भार्या के निरन्तर प्रवेश किया करो१॥३१॥३२॥३३॥३४॥ ॥३५॥३६॥३७॥ वेदघोपो न यत्रास्ति गुरुपूजादयो न च । पितृकमविहीनास्तु सभायस्त्व समाविश ॥३० रातो राम्रो गृहे यस्मिन् कलहो वर्तते मिथ । अनया सार्धमनिश विश त्व भयवजित १३६ लिंगार्चन यस्य नास्ति यस्य नास्ति जपादिकम् । रुद्रभक्तिविनिदा च तमेव विश निर्भय ॥४० अतिथिः श्रोत्रियो वापि गुरुर्वा वैष्णवोपि वा। न सति यद्गृहे गाव सभार्यस्त्व समाविश ॥४१ वालाना प्रेक्षमाणाना यत्रादत्त्वा स्वभक्षयन् । भक्ष्यारिण सत्र सहृष्ट सभार्यस्त्व समाविश १४२ प्रनभ्यर्च्य महादेव वासुदेवमथापि वा । अहुत्वा विधिवद्यत्र तत्र नित्य समाविश ४१ पाप कर्मरता मुढा दयाहीना परस्परम् ।
२०४] [लिङ्ग पुराए गृहे यस्मिन्समासते देशे वा तत्र सविश ॥४४ जिस स्थान पर वेद के मन्त्रो की ध्वनि कभी भी नही होती है तथा मुरु वर्ग को अर्चना प्रादि सरकृति नहीं हुमा करती है और जो लोग पितृ वर्म से विहीन होकर निवास किया करते हैं वहाँ पर हो तुम भार्या ज्येष्ठा के साथ प्रवेश किया करो।॥३८॥ जिस घर में प्रत्येक रात्रि में मापस मे कलह हुमा करता है वहाँ पर ही तुम भय से रहित होकर इस अपनी पत्नी के साथ बरावर प्रवेश किया करो ॥३६॥ जिस पुरुष के घर मे शिव के लिङ्ग का प्रचंन नही होता है और जो पुरुष कभी भी मन्त्रो के जप आदि नहीं किया करता है जिस मानव के घर मे भमवान रुद्र की भक्ति का प्रभाव ही रहता है तथा उल्टी देवो को निन्दा की जाया करती है वहाँ तुम बिना किसी भय के प्रवेश किया करो ॥४०॥ जिस स्थान मे कोई अतिथि प्राकर सरकार ग्रहण नही किया करता है और कोई वेदज्ञ श्रोत्रिय न रहता है गुरु तथा विष्णु का भक्त वैष्णव स्थिति नहीं करता है जिस घर मे गौ नही रहती हैं ऐसे घरो मे तुम भार्या के सहित प्रवेश किया करो। ॥४१॥ जिस घर मे बालको के देखते रहने पर उन्हे कुछ भी न देकर भक्ष्य पदार्थों को स्वय मानव खा जाया करते हैं उस घर मे तुम सपत्नीक सानन्द प्रवेश किया करो ॥४२॥ महादेव अथवा भगवान् वासुदेव का अभ्यर्चन न करके तथा विधि पूर्वक हवन नहीं करके लोग रहा करते हैं उन घरो मे नित्य ही तुम अपना प्रवेश किया करो ॥४३॥ जहाँ मानव पाप कर्म मे समारूढ होकर परस्पर में दया से रहित होते हुए निवास किया करते हैं उस घर मे तथा देश में दू भली भांति प्रवेश करके निवास किया कर ॥४४॥ प्राकारागारविध्वंसा न चैवेड्या कुटु बिनी। तद्गृह तु समासाद्य वस नित्य हि हष्टघी ॥४५ पत्र कटकिनो वृक्षा यत्र निष्पाववल्लरी। ब्रह्मवृक्षश्च यमास्ति सभायंस्त्व समाविश ॥४६ अगस्त्यादियो वापि बघुजीवो गृहेषु वै । करवीरो विशेपेण नद्यावर्तमथापि वा॥४७ लक्ष्मो को उत्पत्ति०] T मलिका वा गृहे येषां सभार्यस्त्व समाविश । कन्या च यत्र व वल्ली द्रोही वा च जटी गृहे ।।४८ बहुला कदली यत्र सभार्यम्त्व समाविश । तालं तमाल भल्लातं तित्तिडीखडमेव च ।।४ घदंब. खादिरं वापि सभार्यस्त्वं समाविश । न्यग्रोधं वा गृहे येषामश्वत्थ चूतमेव वा ॥५० उदु वरं वा पनसं सभार्यस्त्व समाविश । यस्य काकगृहं निवे पारामे वा गृहेपि वा ॥५१ दंडिनी मुडिनी वापि सभार्यस्त्वं समाविश। एका दासी गृहे यत्र त्रिगवं पंचमाहिपम् ।।५२ प्राकार से समन्वित भागार मे विघ्बस वाली कुटुम्बिनी ईडित करने के योग्य नहीं है । उसके गृह को प्राप्त करके प्रसन्न चित्त होकर यहाँ नित्य निवास करो ॥४५॥ जहां पर फाटे वाले वृक्ष हो और जहाँ पर निष्पाद वल्लरी हो तथा जिस स्थान में ब्रह्म वृक्ष हो वहाँ पर ही अपनी भार्या के सहित तुम निवास करो॥४६॥ अगस्त्य तथा अर्क आदि दूध वाले वृक्ष-बन्धु जीव करवीर और विशेष रूप से तगर जिस गृह मे हो अथवा मल्लिका लता जहाँ पर हो वहाँ पर तुमको अपनी भार्या के साथ मे लेकर निवास करना चाहिए। जिस गृह मे या स्थान मे अपराजिता अजमोद की वल्ली निम्ब तथा जटा मासी हो वहाँ पर ही तुम भार्या के सहित अपना निवास करो । जिस स्थान मे वहुदायत से कदली के पेड़ उगे हुए हैं वहाँ पर भार्या सहित निवास करना चाहिए । ताल-तमाल- भिलावा तिन्तडी खण्ड-कदम्ब एष खदिर के वृक्ष हो यहाँ पर तुम निवास करो। जिनके घर मे न्यग्रोध ( वट ) तथा अश्वत्थ । पीपल ) एव पान का वृक्ष हो और उदुम्वर । मूलर) तथा पनरा (कटहल ) का पेड हो वहाँ तुम निवास करो ॥४५॥४६॥४७॥४८॥४६॥ जिसके नीम मे कौए का घर हो तथा बाग मे या घर मे भी काको का निवास स्थल बना हुआ हो तथा दण्ड विशिष्टा या नतमस्तका हो यहाँ पर भार्या के सहित निवास करो । जहाँ एक दासी-तीन गो मार पाँच भस
२०६ }
[ लिङ्ग पुराण
हों-छ अरव तथा सात हार्थी रहते हो यहाँ तुझे भार्या के साथ प्रवेश
करना चाहिए ॥५०॥५१॥५२।।
षडवं सप्तमातंग समार्यस्त्वं समाविश।
यस्य काली गृहे देवी प्रेतरूपा च डाकिनी ॥५३
क्षेत्रपालोथवा यय सभायंस्त्व समाविश ।
भिक्षुबिंव च वै यस्य गृह क्षपणकं तथा ।।५४
बौद्ध वा बिंबमासाद्य तय पूर्ण समाविश ।
शयनासनकालेपु भोजनाटनवृत्तिषु ।।५५
येषां वदति नो वारणो नामानि च हरेः सदा।
तद्गृह ते समाख्यातं सभार्यस्य निवेशितुम् ॥५६
पापंडाचारनिरताः श्रौतस्मार्तबहिष्कृताः ।
विष्णुभक्ति विनिमुक्ता महादेवविनिंदकाः॥५,
नास्तिकाश्च शठा या सभार्यस्त्वं समाविश।
सर्वस्मादधिकत्वं ये न वदंति पिनाकिनः ॥५%
साधारणं स्मरंत्येन सभार्यस्त्वं समाविश।
ब्रह्मा च भगवान्विष्णुः शक्रः सर्वसुरेश्वरः ।।५६
रुद्रप्रसादजाश्चेति न वदंति दुरात्मकाः ।
ब्रह्मा च भगवान्विष्णुः शक्रश्च सम एव च ॥६०
वदंति मूढाः खद्योतं भानु वा मूढचेतसः ।
तेषां गृहे तथा क्षेत्र प्रावासे वा सदाऽनया ॥६१
विश भुक्ष्व गृहं तेषां अपि पूर्णमनन्यधीः ।
येश्नति केवल मूढाः पकान्न विचेतसः ॥६.
जिस घर में काली देवी हो और प्रेत के स्वरूप वाली डाकिनी हो
अथवा क्षेत्र पाल हो अर्थात् भैरव हो जिस स्थान पर किसी परि वाजक
की प्रतिमा तथा नन मूत्ति हो या बौद्ध-प्रतिमा हो वहां पर अपना पूर्ण
तया प्रवेश करो। जहाँ शयनासन के समयों मे एव पोजन तथा परन
की वृत्तियो मे जिनकी वाणी हरि के नामो को सर्वदा नही बोला करती
है वह गृह ही भार्ग के सहित तुम्हारे निवास करने के लिये बताया गया
- लक्ष्मी को उत्पत्ति०] । २०७ है ॥५३॥५४॥५५॥५६॥ दम्भ से परि पूर्ण प्राचार मे निरत रहने वाले- थ्रति प्रतिपादित एव स्मृति के द्वारा निर्दिष्ट धर्म से पहिप्त-विष्णु की भक्ति से रहित और महादेव की निन्दा करने वाले नास्तिक ( ईश्वर की सत्ता के न मानने वाले ) शठ जहां पर रहा करते हैं वही पर तुमको सपत्नीक निवास करना चाहिए। जो लोग भगवान् पिनाकी (शिव) को सबसे अधिक नही वहा करते हैं और उनको एक साधारण-सा देव ही मानते हैं वहाँ पर तुम अपना निवास स्थल बनायो । ब्रह्मा भगवान् विष्णु और देवो का राजा इन्द्र ॥५७॥५॥५६॥ ये सब रुद्र के प्रसाद से ही समुत्पन्न हुप्रा करते हैं ऐसा जहाँ के लोग नही रहते हैं और दुष्ट श्रात्मा वाले होते है । ब्रह्मा विष्णु और इन्द्र ये सब समान ही होते हैं- ऐसा कहने वाले मूढ चित्त महा मूढ लोग भानु ( सूर्य ) को भी खद्योत कहा करते हैं । उनके घर मे क्षेत्र मे अथवा भावास मे सदा इस अपनी पत्नी के साथ उनके पूर्ण भी गृह वा अनय बुद्धि वाला होकर भोग करो । जो मूढ प्रज्ञान वाले केवल पके हुए अन्न को खाते हैं ॥६० ॥६१।।६२॥ स्तानमगलहोनाश्च तेषा त्व गृहमाविश । या नारी शौचविभ्रष्टा देहसस्कारजिता ॥६३ सर्वभक्षरता नित्य तस्या स्थाने समाविश । मलिनास्या स्थय मा मलिनावरधारिण ॥६४ मलदता गृहस्थाश्व गृहे तेपा समाविश । पादशौचविनिमुक्ता मध्याकाले च शायिन ।।६५ सध्यायाम श्नुते ये वै गृह तेषा समाविश । प्रत्याशनरता मा प्रतिपानरता नरा ॥६६ यू तवादकियामूडा गृहे तेषा समाविश । ब्रह्मस्वहारिणो ये चायोग्याश्चैव यजति वा ॥६६ शूद्रानभोजिनो वापि गृह तेषा समाविश । मद्यपानरता पापा मास भक्षणतत्परा ॥६८ परदाररता मा गृह तेषा समाविश। - । लिङ्ग पुराण २०० ] पर्वण्यन भिरता मैथुने वा दिवा रताः ॥६६ सध्याया मैथुनं येपा गृहे तेपा समाविश ॥७० रजस्वला स्त्रिय गच्छेचाडाली वा नराधम. ।।७१ और जो स्नान तथा मङ्गल से हीन होते हैं उनके गृह मे तुम प्रवेश परो। जो नारी शुद्धता से भ्रष्ट रहती हो तथा अपने देह के सवारी से होन होती है- सब प्रकार के भक्ष्य पदार्थों के भक्षण करने में रत नित्य हो रहा करती है उसके स्थान मे तुम अपना प्रवेश करो। जो गृहस्थी मलिन मुख वाल और जो मनुष्य मैले वस्त्र धारण करने वाले हैं-जिनके दांत मैले रहा करते हैं ऐसे गृहस्थो के घर मे तू अपना प्रवेश कर । जो पादो , परो ) की शुद्धि से रहित हो अर्थात् पैरो को नही घोया करते हैं तथा सरध्या के समय मे शयन किया करते हैं एव सन्ध्या के समय में जो खाया करते हैं उनके घर मे तुझे प्रवेश करना चाहिए। जो मनुष्य प्रत्य- धिक खाने मे रति रसने वाले हो तथा अत्यन्त पान करने वाले हो भौर जो धूत एव वाद की क्रिया करने वाले मूढ होते हैं उनके घर मे तुमको प्रवेश करके अपना निवास बनाना चाहिए । जो ब्रह्मास्त्र अर्थात् ब्राह्मणो के धन सम्पत्ति को हरण करने वाले हैं और प्रयोग्यो का यजन किया करते हैं-शूद्र के अन्न का भोजन करते हैं। मद्यपान करने मे रति रखने वाले हैं मांस भक्षण करने वाले हैं-पराई स्त्रियो से प्रेमानुराग करने वाले-पर्व दिनो मे भी अर्चन न करने वाले तथा दिन के समय में ही मैथुन करने वाले मनुष्य जहाँ पर निवास किया करते हैं वहां अपना निवास बनालो । जो सन्ध्या के समय में मैथुन करने वाले पुरुष हो और जो नराधम रजस्वला स्त्री तथा चाण्डाल स्त्री का अभिगमन किया करते हैं उनके घर मे निवास परो ॥६३॥६४॥६॥६६॥६॥६॥६६॥ 19011७१ कन्या वा गोगृहे वापि गृहं तेपा समाविश । बहुना कि प्रलापेन नित्यकर्मबहिष्कृता ||७२ रुद्रभक्तिविहीना ये गृह तेषा समाविश । शृ गैदिव्योषधे क्षुद्र. शेफ मालिप्य गच्छति ।।७३
लक्ष्मो को उत्पत्ति०]
[ २०६
भगद्राव करोत्यस्मात्सभार्यस्त्वं समाविश।
इत्युक्त्वा स मुनिः श्रीमान्निर्माज्यं नयने तदा ॥७४
ग्रह्मर्पिन ह्मसंकाशस्तनवांतद्धिमातनोत् ।
दुःसहश्च तथोक्तानि स्थानानि च समीयिवान् ।।५
विशेषाद्देवदेवस्य विष्णोनिदारतात्मनाम् ।
सभार्यो मुनिशार्दूलः सैपा ज्येष्ठा इति स्मृता ।।७६
दु:महस्तामुवाचेदं तडागाश्रममतरे।
भास्व त्वमन चाहं वै प्रवेक्ष्यामि रसातलम् ॥७७
प्रावयोः स्थानमालोक्य निवासार्थ ततः पुनः ।
प्रागमिष्यामि ते पाश्वमित्युक्ता तमुवाच सा ॥७८
किमामि महाभाग को में दास्यति वै वलिम् ।
इत्युक्तस्ता मुनिः प्राह याः विपस्त्वां यजति वै ॥e
बलिभिः पुष्पधूपश्च न तासां च गृहं विश ।
इत्युक्त्वा त्वाविशत्तत्र पातालं बिलयोगतः ॥७०
जो पिसी पन्या का मभिगमन करते हैं तथा गौमों के गृह मे प्रसङ्ग
रिया करते हैं उन पुरषों के पर मे तुमलो प्रवेश करके अपना प्रावास
बनाना चाहिए । अत्यधिर वपन से क्या पस होगा निप्प रूप में यही
कहते है कि जो पुरुष अपने निय बम से पहिलत हो तथा भगयान् रुद्र
देश की भक्ति से रहित हों और भगा द्रावण मरने के लिये जननेन्दिप
को भृक्ष, दिघोषधि पौर शुद्रो से अप्ति पर मभिगमन किया मरते है
उन पर मे तुझे प्रवेश परना पाहिए । मूतजी ने रहा-गप्रसार से
इतना महार उस समय में उस महापुनि ने पपने नेत्रों का निर्मान
पर पह ब्रह्मा के सरम महाधिवही पर हो अन्तर्घात हो गये थे। पौर
दुगहने ये सब मसाये हुए स्पानों की प्राप्ति की पोmursans४॥
1 मिष रूप से देवों के देश विधा तया भगवान् गिव निन्दा
करने में रख रहने वाले लोगों के स्थानों में जो दिमागम मुनि ने
मामा भे यह मनाम दुगद मौर मेधा नाम दानी समसी पानी
दो ये पे ॥७९॥ उस समय वह इदानी मात्रा से
२१० ]
[ लिङ्ग पुराण
पोले - यहाँ जल का प्राश्रय तालाब है और निवास का प्राश्रम भी है।
इसके मध्य मे जो पीपल का वृक्ष है उस पर तुम ठहरो मैं रसातल में
प्रवेश करूंगा 11७11 वहां हम दोनों के निवास करने का प्राश्रम देखकर
तुम्हारे पास अभी कुछ समय मे आ जाऊगा। ऐसा कहने पर वह ज्येष्ठा
उसकी भार्या उससे बोली-हे महाभाग ! मैं यहाँ पर क्या भोजन
फरूंगी और मुझे कौन यहाँ वलि देगा । इस बात का श्रवण कर दु.सह
मुनि ने उससे कहा था -जो स्त्रियां तुम्हारा यजन किया करती हैं ये
बलि और धूप दीप आदि सभी दिया करती हैं किन्तु तुम उनके घरो मे
प्रवेश मत करना । यह कहकर वह मुनि विल के द्वारा वहां पर पाताल
में प्रवेश कर गया था ।।७८||७६011
अद्यापि च विनिर्मग्नो मुनिः स जलसंस्तरे ।
ग्रामपर्वतबाह्य पु नित्यमास्तेऽशुभा पुनः ।।८१
प्रसंगावदेवेशो विष्णुखिभुवनेश्वरः।
लदम्या दृष्टस्तया लक्ष्मीः सा तमाह जनार्दनम् १८२
भर्ता गतो महाबाहो बिलं त्यक्त्वा स मां प्रभो।
अनाथाहं जगन्नाथ वृत्ति देहि नमोस्तु ते ॥३३
इत्युक्तो भगवान्विष्णुः प्रहस्याह जनार्दनः ।
ज्यशामलक्ष्मी देवेशा माधवो मधुसूदनः ॥८४
ये रुद्रमनघ शवं शंकरं नील लोहितम् ।
बां हैमवती वापि जनित्री जगतामपि ।।८५
मद्भक्तानिदयंत्यम तेषां वित्त तवैव दि।
येपि चव महादेवं विनिर्धेय यजति माम् ॥६६
मूढा ह्यभाग्या मद्भक्ता अपि तेषां धनं तव ।
यस्याज्ञया ह्यहं ब्रह्मा प्रसाद'द्वतंते सदा ॥८७
ये यजति विनिवेव मम विद्वपक.रकाः ।
मद्भक्ता नैव ते भक्ता इव वर्तति दुर्मदाः ।।
तेपा गृह धनं क्षेत्रमिष्टापूर्त तवैव हि ।
इत्युक्त्वा तां परित्यज्य लक्ष्म्यालक्ष्मी जनार्दनः
लक्ष्मी की उत्पत्ति० ] [२११ वह मुनि अाज तक भी उस जल सस्तर मे विनिर्मग्न हो रहा है और वह अशुभा नित्य ही ग्राम पर्वत प्रादि बाह्य भागो मे स्थित रहा करती है ।।१।। प्रसङ्ग वश एक समय देवो के भी देव-त्रिभुवन के स्वामी भगवान् विष्णु को उस लक्ष्मी ने देखा था और वह लक्ष्मी उन भगवान् जनार्दन से बोली-हे महान् वाहुप्रो वाले भगवन् ' हे प्रभो ! मेरा स्वामी यहाँ मुझे त्याग कर बिल मे चला गया है । हे जगतो के नाथ ! मैं इस समय बिल्कुल ही अनाथा हो गई हूं। मुझे वृत्ति प्रदान करो। आपको मेरा प्रणाम है ।।२।।८३॥ सूतजी ने कहा-इस प्रकार से कहे गये भगवान् जनार्दन देवेश-माधव-मधुसूदन विष्णु हँसकर उस ज्येष्ठा. अलक्ष्मी से बोले-श्री विष्णु कहा जो पुरुप अनघ रुद्र-शव-शङ्कर और नील लोहित की तथा हैमवती समस्त जगतो की जननी जगदम्बा की और मेरे भक्तो की यहाँ पर निन्दा किया करते हैं उन का जो सपूर्ण घन है वह सभी तेरा ही है। और जो महादेव की निन्दा करके मेरा यजन किया करते हैं वे महान् मूढ हैं और भाग्यहीन होते है । भले ही मेरे वे भक्त हैं उनका भी सब धन तेरा ही है । जिसकी माज्ञा से मोर प्रसाद से मैं और ब्रह्मा सदा वर्तमान रहते हैं उसको निन्दा करके जो यजन किया करते हैं वे मेरे विद्वेष करने वाले ही होते हैं । वे मेरे भक्त ही नहीं है वेवल दिखाने को ही भक्तो की तरह रहा करते हैं वे दुर्मद हैं। उनका सब धन क्षेत्र और इष्टापूर्त सम्पूर्ण तेरा ही है । सूतजी ने कहा- ऐपा कहकर उस अलक्ष्मी का त्याग कर लक्ष्मी के साथ भगवान जनार्दन ने जाप किया था ॥४॥२६॥७॥६॥ जज प भगवान्रुद्र लक्ष्मीक्षयसिद्धये। तस्मात्तदेयस्तस्यै च बलिनित्य मुनीश्वरा. । विष्णुभक्तं न संदेहः सर्वयत्नेन सर्वदा । अगनाभि. सदा पूज्या वलिभिर्विविद्विजाः ॥६१ यः पठेच्छणुयाद्वपि श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान् । अलक्ष्मीवृत्तमनघो लक्ष्मीवाल्लभते गतिम् ॥२ भगवान् ने स्वय उस मलक्ष्मी के अय करने के लिये रुद्र का जप २१२ ] [ लिङ्ग पुराण को किया था। इसलिये है मुनीश्वरो ! उस अलक्ष्मी के लिये नित्य हो बलि देना चाहिए। जो विष्णु के भक्तगण हैं उनको सभी प्रकार के प्रयलो के द्वारा सर्वदा उमे बलि अवश्य ही देना चाहिए-इसमे कुछ भी सन्देह नही है। हे द्विजगण ! अङ्गनामो को उसका सदा ही विविध भांति पी बलि- यो के द्वारा पूजन करना चाहिए | इस प्रलक्ष्मी के जो कोई भी पढता है-श्रवण किया करता है या श्रेष्ठ द्विजो को श्रवण कराता है यह निष्पाप होकर लक्ष्मी वाला हो जाना है और शुभ पति को प्राप्त किया करता है ।।२।। ॥७६-विष्णु-अष्टाक्षर, द्वादशाक्षर मंत्र॥ किंजपान्मुच्यते जंतु सर्वलोकभयादिभिः । सर्वपापविनिमुक्त प्राप्नोति परमां गतिम् ॥१ अलक्ष्मों वाथ सत्यज्य गमिष्यति जपेन वै । लक्ष्मीवासो भवेन्मत्यः सूत वक्तुमिहार्हसि ॥२ पुरा पितामहेनोक्त वमिष्ठाय महात्मने वये संक्षेपतः सर्वं सर्वलोकहिताय वै ॥३ शृण्वंतु वचनं सर्वे प्रणिपत्य जनार्दनम् । देवदेवम विष्णु कृष्णमच्युतमव्ययम् । सर्वपापहरं शुद्ध मोक्षद ब्रह्मवादिनम् । मनसा कर्मणा वाचा यो विद्वा-पुण्यकर्मकृत् ॥५ नारायण जपेन्नित्यं प्रणम्य पुरुषोत्तमम् । स्वपनारायणं देवं गच्छन्नारायणं तथा ॥६ मुंजन्नारायणं विप्रास्तिष्ठाग्रत्सनातनम् । उन्मिपन्निमिषन्वापि नमो नारायणेति वै ॥७ इस सातवें अध्याय मे श्री महाविष्णु भगवान का प्रष्टाभर मग और द्वादशाक्षर मन्त्र का माहात्म्य वरिंगत किया जाता है । ऋषियो ने कहा-ऐसा कौन-सा मन्त्र है जिसके जाप करने से जन्तु समस्त लोक के भय प्रादि से मुक्त हो जाता है तथा सम्पूर्ण पापों से विनिर्मुक्त होकर विष्णु-अष्टाक्षर० ] [२१३ परम गति को प्राप्त किया करता है ? हे सूतजी | यह कृपाकर पाप बत- लाइये कि मनुष्य जप के द्वारा इस अलक्ष्मी का त्याग करके लक्ष्मी के निवास वाला बन जाता है वह किस मन्त्र का जाप होता है । ॥१२॥ सूरजी ने कहा-पहिले पितामह ने वसिष्ठ मुनि से जो कि एक महान् पारना वाले थे, यह कहा था, उसे ही मैं समस्त लोको के हित के लिये यहाँ सक्षेप मे सब बतलाता हूं ॥३॥ आप सब लोग भगवान् जनार्दन को प्रणिपात करके उसका श्रवण करो । भगवान् विष्णु देवो के भी देव हैं- प्रजमा हैं अव्यय-प्रच्युत तथा साक्षात् श्री कृष्ण हैं ॥४॥ ये सम्पूर्ण पापो के हरण करने वाल हैं मोक्ष प्रदान करने वाले तथा ब्रह्मवादी है। वह परम पुण्यात्मा विद्वान् हैं जो मन से वाणी से और कर्म से इनका जप पिया करते हैं 10 पुरुपो मे परम उत्तम भगवान् नारायण को प्रणाम करके उनका जाप करना चाहिए । शयन करते हुए देव नारा- यण का जाप करे गमन करते हुए-भोजन करते हुए और स्थित रहते हुए सभी अवस्थाप्रो मे परम सनातन भगवान् नारायण का जाप है विप्र मनुष्य को करते रहना चाहिए । सवदा नमो नारायणाय' इस का जप तथा ध्यान रखे ॥६॥७॥ भोज्य पेय च लेह्य च नमो नारायणेति च । अभिमत्र्य स्पृशन्भु क्त स याति परमा गतिम् ।। सर्वपापविनिर्मुक्त प्राप्नोति च सता गतिम् । अलक्ष्मीश्च मया प्रोक्ता पत्नी या दु सहस्य च | नारायणपद श्रुत्वा गच्छत्येव न संशय । या लक्ष्मीदेवदेवस्य हरे कृष्णस्य वल्लभा ।।१० गृहे क्षेत्र तथावासे तनौ वसति सुव्रता । मालोउय सनशास्त्राणि विचार्य व पुन पुन १११ इदमेक सुनिष्पन्न ध्येयो नारायण सदा । किं तस्य बहुभिभने किं तस्य बहुभिवते ॥१० नमो नारायणायेति मप्र सर्वार्थसाधक | तस्मात्सर्गेषु कालेपु नमो नारायणेति च । १३ गण .
२१४ ] [ लिङ्ग पुराण जपेत्स याति विप्रंद्रा विष्णुलोक सवाधव.] मन्यच्च देवदेवस्य शृण्वतु मुनिसत्तमा. । १४ भोज्य-पेय तथा लेह्य सभी पदार्थों को 'नमो नारायणाय'- मन्त्र से अभिमन्त्रित करके स्पर्श करे और फिर उसका उपभोग करे तो ऐसा मनुष्य अवश्य ही परम सङ्गठि को प्राप्त होता है । इस प्रकार से सर्वदा 'नमो नारायणाय' इस मन्त्र का जापक पुरुष समस्त पापो से विनिर्मुक्त होकर सत्पुम्पो की सद्गति का लाभ किया करता है । जो मलक्ष्मी मैंने दुसह की पत्नी बतलाई है वह नारायण इस पद को धवरण करते ही चली जाया करती है-इसमे कुछ भी संशय नहीं है । जो भग- वान् हरि वृष्ण देवदेव की प्रिया महालक्ष्मी है वह गृह मे-क्षेत्र मे तथा प्रावास स्थान में और तनु मे हे सुब्रतो । सर्वदा निवास किया करती है। यह समस्त शास्त्रो का पालौडन करके अर्थात् गहराई से सब शास्त्रो को देखकर तथा बार-बार भली भांति विचार करके यह निर्णय किया गया है ॥६॥१०॥११॥ यही एक बात सिद्ध हुई है कि सदा नारायण काही ध्यान करना चाहिए। बहुत से मन्त्री के जाप से क्या लाभ है और मधिक प्रमो से फिर क्या प्रयोजन है । एक 'नमो नारायणाय-यही मन्त्र सम्पूर्ण प्रों का साधन करने वाला होता है । इसलिये समस्त कालो में "नमा नारायणाय"-इमो मन्त्र का जाप करना चाहिए । है विप्रेन्द्रो । वह मनुष्य अपन बान्धवो के सहित विष्णु लोक का चला जाया करता है। हे मुनियो । अब देवों के देव भगवान् के अन्य मन्त्र के विषय मे प्राप लोग प्रवरण करो ॥२॥१३॥१४॥ मंत्रो मया पुराभ्यस्त सर्ववेदार्थसाधकः। द्वादशाक्षरसयुक्तो द्वादशाला पुरातनः ।।१५ तस्यवेह च माहात्म्य सक्षेमत्प्रवदामिव । पश्चिद्धिजो महाप्राज्ञस्तपस्तत्वा कथचन ॥१६ पुत्रमेव तमोत्पाद्य संस्कारश्च ययाक्रमम् । योजयित्वा पयावालं कृतोपनयन पुन ॥१. प्रध्यापयामास तदा मच नोवाच विचन गु-अष्टाक्षर० ] [२१५ न जिह्वा संदते तस्य दुःखितोऽभूद्विजोत्तमः ।।१८ वासुदेवेति नियतमैतरेयो वदत्यसो । पिता तस्य तथा चान्या परिणीय यथाविधि II पुत्रानुत्पादयामास तथैव विधिपूर्वकम् । वेदानधोत्य संपन्ना बभूवुः सर्वसमताः॥२० पहिले मेरे अभ्यास मे पाया हुआ एक मन्त्र है जो सम्पूर्ण वेदो के अर्थों का साधन करने वाला है । वह द्वादश प्रात्मा वाला पुरातन बारह अक्षरो से सयुक्त मन्न होता है ॥१५॥ अब मैं यहां पर उसी मन्त्र का माहात्म्य आपके सामने राक्षेप मे बतलाता हूं। किसी महान् पएिडस ब्राह्मण ने तपस्या करके किसी प्रकार से एक पुत्र का उत्पादन किया था । उसके क्रमानुसार उसने समस्त सस्कार कराये थे जिन सस्कारो का जो समय था वे उसी समय मे करा दिये थे। इनके अनन्तर प्रवरार प्रास होने पर उसग उपनयन सस्कार भी कराया था ॥१६॥१७॥ फिर उस- का प्रध्यापन किया था किन्तु वह कुछ भी नहीं बोलना था। उसकी जिह्वा बिल्कुल भी स्पन्दन नही करती थी। इस कारण से उरा ब्राह्मण को परम दुख हुपा था । ॥१८॥ यह ऐतरेय ( सापत्न भ्राता । मन्त्र का एक देवा वासुदेव-यह ही बोलता था। उसके पिता ने यथाविधि भन्य गार्या का परिणय किया था ॥१६॥ और उस अन्य भार्या में विधि पूर्वक पुत्रो को उत्पन्न किया था। वे सब वेदो का अध्ययन करके सर्वसम्मत एव सम्पन्न हो गये थे ॥२०॥ ऐतरेयस्य सा माता दुखिता शोकमूच्छिना। उवाच पुत्रा. संपन्ना वेदवेदागपारगाः ॥१ ब्राह्मणः पूज्यमाना व मोदयंति घ मातरम् । ममत्व भाग्यहोनाया. पुत्रो जातो निराकृतिः ॥२२ ममा निधन श्रयो न कथवन जीवितम् । इत्युक्तः स च निगम्य यशवाट जगाम वै ॥२३ तस्मिायाते द्विजाना तु न मंग्रा. प्रतिपेदिरे । ऐतरेये स्थिते तत्र ब्राह्मणा मोहितास्तदा ॥२४ २१६ ] [लिन पुराण ततो वाणी समुद्भता वासुदेवेति कीर्तनात् । ऐतरेयस्य ते वित्राः प्रणिपत्य यथातथम् ॥२५ पूजा चक्र स्ततो यज्ञं स्वयमेव समागतम् । ततः समाप्य तं यज्ञमैतरेयो धनादिभि. ॥२६ सर्ववेदान्सदस्याह स पडंगान् समाहिताः । तुष्टुवुश्च तथा विप्रा ब्रह्माद्याश्च तथा द्विजाः ॥२७ ससर्जुःपुष्पवर्षाणि खेचरा. सिद्धचारणाः । एव समाप्य वै यज्ञमैतरेयो द्विजोत्तमाः ॥२८ ऐतरेय की जो माता थी वह विचारी बहुत ही दुखित एव शोक से मूच्छित थी। वह अपने पुत्र से बोली-सम्पन्न एव वेद-वेदाङ्गो के पार- गामी पुष ब्राह्मणो के द्वारा पूज्यमान होते हुए अपनी माता को मानन्द देते हैं । मेरे भाग्य हीना के तू ऐसा निराकृति पुत्र उत्पन्न हुमा है ॥२१॥ ॥२२॥ इस दुख से तो मेरी मृत्यु हो जावे-यही अच्छी है । इस दुखमय जीवन से किसी भी प्रकार से कोई लाभ नहीं है । ऐसा कहने पर वह निकल कर यज्ञ वाट मे चला गया था ।।२३।। उस ऐतरेय के वहां पहुंचने पर जो वहाँ यज्ञ वाट मे ऋत्विज विप्र थे उन्हे उस समय कोई भी मन्त्र अवगत नहीं हुए थे। ऐतरेय के यहां स्थित होने पर वे सब ब्राह्मण मोहित हो गये थे। इसके अनन्तर वासुदेव-इसके कीर्तन से ऐतरेय की वाणी समुद्भूत हुई थी । तब तो उस सगस्त माहारणो ने ऐतरेय को प्रणिपात करके उसको यथाविधि पूजा की थी । इसके अनन्तर यश स्वयमेव समागत हुमा या। उस पत्र को ऐतरेय ने पनादि के द्वारा समाप्त किया था। उसने उस सभा मे पडङ्ग समस्त वेदो को पहा । फिर तो समस्त विप्र मौर ब्रह्माद्य द्विजो ने स्तवन दिया था ॥२४॥२शा२६॥२७॥ सेचर और सिद्ध चारणो ने पुष्पों की वर्षा वो थी । हे द्विजोत्तमो! इस प्रकार से उस ऐतरेय ने यज्ञ को समाप्त किया था ॥२८॥ भातरं पूजयित्वा तु विष्णो. स्थानं जगाम ह । एतद्वं कथितं सर्व द्वादशाक्षरवंभवम् ।।२६ पठता शृण्वता नित्यं महापातकनाशनम् ।
शिवपडाक्षर मत्र ] जपेद्य. पुरुषो नित्यं द्वादशाक्षरमव्ययम् ।।३० स याति दिव्यमतुलं विष्णोस्तत्वरमं पदम् । अपि पापसमाचारो द्वादशाक्षरतत्परः ॥३१ प्राप्नोति परम स्थानं मात्र कार्या विचारणा । कि पनये स्वधर्मस्था वासुदेवपरायणाः ॥३२ 'दिव्य स्थाने महात्मानः प्राप्नुवतीति सुप्रताः ।।३३ इसके उपरान्त उसने अपनी माता का अर्चन किया था और फिर भगवान् विष्णु के स्थान को चला गया था। यह मैंने आप लोगो के समक्ष में द्वादशाक्षर मन्त्र का वैभव बतला दिया है ॥२६॥ इसके पठन 'करने से तथा श्रवण करने से नित्य ही महा पातको का नाश होता है। जो पुरप इस द्वादशाक्षर अध्यय मन्त्र का नित्य जाप करता है पह परम दिव्य एप प्रतुल भगवान् विष्णु के परम पद को जाता है । पापो के समाचरण करने वाला भी हो और वह द्वादशाक्षर मन्त्र के जप मे तत्पर रहता हो तो अवश्य ही परम पद की प्राप्ति कर लेता है-इसमे कुछ विचारणा नहीं करनी चाहिए । और जो अपने धर्म-कर्म मे स्थित रहबर हो वासुदेव मे परायण हो उनके विपय मे तो कहा ही क्या जावे ॥३०॥ ॥३१।।३२।। महान् आत्मा वाले पुरुप हे सुन्दर प्रत वालो | दिव्य स्थान की प्राप्ति किया करते हैं ॥३३॥ ॥ ७७- -शिवपडाक्षर मंत्र अष्टाक्षरो द्विजष्ठा नमो नारायणेति च । द्व दशाक्षरमवश्व परम. परमात्मनः ॥१ मत्र. पडक्षरो विप्रा. सववेदार्थसंचयः । यश्चोनम. शिवायेति ममः सर्वार्थमाधक. तथा शिवतरायेति दिव्यः पंचाक्षर शुभः। मयस्कराय चेत्येव नमस्ते शकराय च ॥३ सप्ताक्षरोय रुद्रस्य प्रधानपुरपस्य वै ब्रह्मा च भगवान्विष्णुः सर्ने देवाः सवासवा: ॥ 1 २१८ [ लिङ्ग पुराण मंत्ररेतद्विजष्ठा मुनयश्च यजति तम् । शंकरं देवदेवेशं मयस्करमजोद्भवम् ।।५ शिवं च शंकरं रुद्र देवदेवमुमापतिम् । प्राहर्नमः शिवायेति नमस्ते शंकराय च ॥६ मयस्कराय रुद्राय तथा शिवतराय च । जप्त्वा मुच्येत गे विप्रो ब्रह्महत्यादिभिः क्षणात् ।।७ इस अध्याय मे विष्णु मन्त्रो से भी श्रेण शिव मन्य होने हैं-यह निरूपण करते हुए पडक्षर मन्त्र का इतिहास परिणत किया जाता है । सूतजी ने रहा- है द्विजो मै श्रेष्ठ वृन्द ! 'नमो नारायणाय'-यह अष्टाक्षर मन्त्र और 'नों नमो भगवते वासुदेवाय'-यह द्वादशाक्षर मन्म प म त्मा विष्णु के परम श्रेष्ठतम मन्न है किन्तु हे विप्रगण ! शिव का पडक्षर मन्त्र "मोम् नमो शिवाय" यह सर्व वेदो के अर्थ का सचय स्वरूप है और समस्त प्रर्थों का साधक होता है ॥ ॥२॥ तथा शिव तराय-यह पांच अक्षर वाला परम शुभ एव दिव्य मन्त्र होता है और मयस्कराय नभस्ते शङ्कराय-यह सप्ताक्षर मन्त्र प्रधान पुरुष रुद्रदेव का होता है । ब्रह्मा- विष्णु भगवान और इन्द्र के सहित सम्पूर्ण देवगण हे द्विजीटो ! इन मन्त्री से उस शिव का यजनार्चन किया करते हैं। देवो के भी देवेश्वर- भयस्कर-मजोद्भव-शिव-शङ्कर-रुद्र-देवदेव उमापति शिव शङ्कर प्रापको नमस्कार है-ऐसा कहते हैं भयस्कर-रुद्र तथा शिव तर के लिये नमस्कार है-ऐसा जाप करके विप्र तत्क्षण ही ब्रह्म हत्यादि पापो से मुक्त हो जाया करता है ॥३॥४॥५॥६॥७॥ पुरा कश्चिद्विजः शक्तो धुंधुमूक इति श्रुतः। आसीत तीये चेतायामावत्त च मनो. प्रभोः । मेघवाहनकल्पे में ब्रह्मण. परमात्मनः । मेधो भूत्वा महादेवं कृत्तिवाससमोश्वरम् ।। बहुमानेन नै रुद्र देवदेवो जनार्दन.। खिन्नोऽतिभाराद् द्रस्य नि.श्वासोच्छ वासवर्जितः ॥१० विज्ञाप्य शितिकंठाय तपश्वक बुजेक्षणः ।
गिवडाक्षर मंत्र ]
[२१६
तपमा पग्मैश्वर्य बल चंव तयाहुलम् ॥११
सन्धवान्परमेगानाधारासरमात्मनः।
तस्मात्यलास्तदा लागी-मेघवानमनग ॥१२
तस्मिन्यल्प मुनेःशापा घुमूकसमुद्भवः ।
चुधुमूकात्मजस्तेन दुरात्मा न बभूव मः ॥१३
धुंधुमूकः पुरामक्तो मायंपा सह मोहितः ।
तस्यां पं स्थापितो गर्भःकामामयतेन चेनमा ॥१४
पुगने समय मे पहिले प्रभु मनु के पारी में तोगरे प्रेतायुग में मोई
गुंगु मम नाम वाला समय नि भनपा पा 11 मेप वाहन पर मे
परमारमामा पाप होकर सियामा भर परमो देवदेय जगान
पहमान से बदन मले प्रौर में प्रयाग भार में
गिर
नि:सामोरयाग मे न हो म । राय प्रचुर समान नेत्रों या
AMERो मिति तारिया था। उस सातद्वारा
परम ऐच नया पापा बा I frया पाको ति परमारमा परमान
पर गे हो पाया था। इस पारण में उम गमर मेप पान-गगाम में
Trintin११॥ उमा मनिपु
गूगगना। मो भुपु पापा मारा
गा ॥१॥ पुनम पो पानी मार गाय पापागल एवं
inागर मिल में म मा inter
farm.४॥
२२.] । लिङ्ग पुराण पुषस्तवासौं दुवुद्विरपि मुच्यति किल्विपात् । दु.खितो धुधुमूकोऽसौ दृष्ट्वा पुत्रमनस्थितम् ॥१६ जातकर्मादिक वृत्ता विधिवत्स्वयमेव च । अध्यापयामारा च तं विधिनैव द्विजोत्तमाः ॥२० तेनाधीतं ययान्यायं धौंधुमूकेन सुक्ताः । कृतोद्वाहस्तदा गत्वा गुरुशुश्र पणे रतः ॥२१ अमावस्या के दिन में ही रुद्र दैवत मुहूर्त मे उसी समय में उसने अपनी भार्या का उपभोग किया था और वह उसकी भार्या गर्भवती होगई यी ॥१५॥ उस की भार्या ने जिसका नाम विशत्या था, पुन का प्रयक थडे ही प्रयत्न से किया था । हे मुनिश्रेष्ठो! यह प्रसव भी मन्द के द्वारा थीक्षित रुद्र मुहूर्त में हुआ था ॥१६॥ वह पुन अपने लिये तथा माता और पिता के लिये अरिष्ट कारक उत्पन्न हुआ था। उस समय मे ऋपियो ने परस्पर मे उसको धु धुभूक कहा था ॥१७॥ मित्रावरुण नाम वाले सत्तम उसे दुप्पुत्र कहते थे । वसिष्ठ ने कहा था कि यह नीच भी है ग्नुि वृहस्पति के प्रभाव से यह दुष्ट बुद्धि वाला भी किल्विप से मुक्त हो जायगा । यह धुधुमूक अवस्थित पुत्र को देखकर अत्यन्त दुखित हुआ था ॥१८॥१६॥ हे द्विजोत्तमो ! फिर उस धुघुमूक ने उस पुत्र का जातकर्म मादि सस्कार विधि पूर्वक कराकर स्वय ही विधि से अध्यापन कराने लगा था ॥२०॥ उरा धु घुमूक के पुत्र ने यथा न्याय अध्ययन किया था। गुरु को शुमू पा मे रत होने वाले इस का विवाह भी हो गया था ॥२१॥ अनेनैव मुनिश्रेष्ठा धौधुमकेन दुर्मदाद । भुक्त्वान्या वृषली दृष्ट्वा स्वभार्यावद्दिवानिगम् ॥२२ एकशयासनगतो धौधुमूको द्विजाधमः । तथा चचार दुर्बुद्धिस्त्यक्त्वा धर्मगति पराम् ॥२३ माध्वी पीता तया सार्थ तेन रागविवृद्धये । केनापि कारणेनैव तामुद्दिश्य द्विजोत्तमा.॥२४ निहता सा च पापेन वृषली गतमगला । ततस्तस्यास्तदा तस्य भ्रातृभिनिहतः पिता ॥२५ 1 शिवपड क्षर मंत्र] २२१ : माता च तस्म दुर्बुद्ध धौन्धुमूकस्य शोभना । भार्या च तस्म दुव॑द्धः श्यालास्ते चापि सुप्रताः ॥२६ राजा क्षरणादहो नष्टं कुलं तस्याश्च तस्य च । गत्वासो धौधुमकश्च येन केनापि लीलया ॥२७ दृष्ट्वा तु तं मुनिश्रेष्ठ रुद्रजाप्यपरायणम् । लवा पाशुपत त पुरा देवान्महेश्वरात् ॥२८ लब्वा पंचाक्षरं चैव पडक्षरमनुत्तमम् । पुन: पंचाक्षरं चैव जप्त्वा लक्ष पृथक् पृथक् ।। नतं कृत्वा च विधिना दिव्यं द्वादशमासिकम् । कालधर्म गतः कल्पे पूजितम्न यमेन वै 150 है मुनियोटो ! इस धौ धुमूक ने दुमंद होने के कारण से एक अन्य वृपली को देखकर उसका रात दिन भार्या के समान उपभोग करने की प्रवृत्ति करली थी ॥२२॥ यह घौधुमूक ने पर धर्म की गति का त्याग फरके दुष्ट बुद्धि वाला होकर एक ही शवासन पर स्थित होकर भाचरण करने लग गया था। ॥२३॥ उस पुष्ट ने उस वृपली के साथ राग की वृद्धि के लिये माध्वी का पान किया था। किसी अन्यागम वित्त के लाभ आदि के कारण से उम पापी ने मङ्गल रहिता उस वृपली का वध कर दिया था। इसके अनन्तर उसके भाइयो ने उस धौधुमूक के पिता का निहनन कर दिया था ॥२४॥२५॥। उ दुर्बुद्धि की माता और बहुत शोभना भर्या तथा उसके साले सभी निहत कर दिये गये थे ॥२६॥ राजा के द्वारा इस तरह से उस वृषली का तथा उस धौंयुमूक का सम्पूर्ण पुल नष्ट कर दिया गया था। फिर यह धौघुमूक जिम किसी भी प्रकार से प्रारब्ध की गति से वहां से निकल गया था ॥२७॥ फिर यह वृहस्पति मुनि के पास पहुंचा जो मुनिश्रेष्ठ म्द्र मन्त्र के जप मे तत्पर रहते थे। उनसे इसने पाशुवत व्रत प्राप्त किया था जो कि पहिले महेश्वर देव से मिला था । पञ्चाक्षर और पडक्षर मान प्राप्त किया था। इन दोनो मन्त्रों फा पृथक् २ लक्ष जाप करके तथा बारह मास का विधि-विधान के सहित व्रत करके वह धौंधुमूक कल्प मे काल धर्म को प्राप्त हुमा यम के द्वारा २२२ ] [ लिङ्ग पुराण । पूजित हुआ था ॥२८॥२६॥ उद्धृता च तथा माता पिता श्यालाश्च सुवताः पत्नी च सुभगा जाता सुस्मिता च पतिव्रता ॥३१ ताभिविमानमारुह्य देव सेंद्र रभिष्टुत.। गाणपत्यमनु प्राप्त रुद्रस्य दयितोऽभवत् ॥३२ तस्मादष्टाक्षरात्मप्रात्तया वे द्वादशाक्षरात् । भवेकोटिगुण पुण्यं नात्र कार्या विचारणा ॥३३ तस्माजपेद्धियो नित्यं प्रागुक्तेन विधानत । शक्तिबीजसमायुक्त स याति परमा गतिम् ॥३४ एतद्व कथित सर्वं कथामर्वस्वमुत्तमम् । यः पठेच्छग्गुयाद्वापि श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान् ॥३५ स याति ब्रह्मलोकं तु रुद्र जाप्यमनुत्तमम् ॥३६ फिर इसने अपने माता-पिता का सुभगा पत्नी का और सालों का सब का उद्धार कर दिया था और वह उसकी शुचिस्मित वाली पत्नी पतिव्रता एव अच्छे भाग वाली हो गई थी ॥३१॥ फिर इन सब के साथ विमान मे वह वैठकर इन्द्रादि देवो से अभिष्टुत होकर गाणपत्य को प्राप्त कर रुद्रदेव का परम प्रिय हो गया था॥३२।। उस अष्टाक्षर मन्त्र से तथा द्वादशाक्षर मन्त्र से करोड गुना पुण्य होता है - इसमे कुछ भी विचारणा को आवश्यकता नही है ॥३३॥ इसलिये पहिले बताये हुए विधि-विधान से शक्ति बीज से समायुक्त इस मन्त्र का बुद्धिमान् पुरुष को जाप करना चाहिए। इस मन्त्र का जापा पुरुष परमगति को प्राप्त होता है ॥३४॥ यह हमने सम्पूर्ण कथा का सर्वस्व तुम्हारे सामने भली-भांति वर्णन कर दिया है। जो भी कोई इसका पठन करेगा या श्रवण करेगा तथा इसको विसी द्विजोत्तम को श्रवण करायेगा वह इस परम श्रेष्ठ रुद्र मन्त्र के जप के प्रभाव से ब्रह्मलोर को प्राप्त करता है ॥३५॥३६॥ --शिव का पशुपतित्व कथन । देवैः पुग वृतं दिव्य व्रत पाशुपत शुभम् ।
--
[२२९
का पशुपतित्व कथन ]
ब्रह्मरणा च स्वय सून कृष्णेनालिष्टामगा?
पतितेन च विप्रेण धीघुमूकेन ये तथा।
कृत्वा जप्त्वा गतिः प्राप्ता कथं पाशुपतं यतम् ॥२
कथं पशुपतिर्देवः शकरः परमेश्वरः ।
यक्तुमहसि चाम्माक परं कौतूहलं हि नः ।।
पुरा शापाद्विनिर्मुक्तो ब्रह्मपुत्रो महायशाः ।
पदस्य देवदेवस्य ममदेशादिहागतः ।।४
त्यक्त्वा प्रसादा दस्य उष्टदेहमजाशया 1
शिलादपुत्रमासाद्य नमस्कृत्य विधानतः ।।
मेरुपृष्ठे मुनिवरः श्रुत्वा धर्मगनुतमम् ।
गाहेश्वर मुनिष्ठा ह्यपृच्छच पुनः पुनः॥६
नंदिनं प्रणिपत्यनं कथं पशुपतिः प्रभुः ।
वगतुमर्हसि चास्मापा तत्सर्वं च तदाह गः ॥७
तरसर्व थ तवान् व्यामः गृष्णद्वैपायनः प्रभुः ।
तस्मादानुमथुत्य युष्माय प्रवदामि ।
सर्वे शृण्वत बचन नमस्त्य महेश्वरम् ।
यथं गुपतिदय: पायः ये प्रयोतिता. IME
फ: पशस्ते निवध्यते यिमुच्यते पते पयम् ।
गरमार वक्ष्यामि समेतचपासपम् ११०
२२४ ] [ लिङ्ग पुराण है । सूतजी ने कहा-पहिले ब्रह्मा के पुत्र सनत्कुमार जिनका कि महान् यश है शाप से विनिमुक्त हुए थे और वह शाप देवो के भी देव भगवान् रुद्र का था। फिर रुद्र के ही प्रसाद से उष्ट्र देह का त्याग कर मरुदेश से यहां पर आ गये थे ॥३॥४॥ ब्रह्मा को पाना से शिलाद के पुत्र के पास प्राप्त हुए थे और विधिपूर्वक उनको प्रणाम किया था ॥५॥ मुनिवर ने मेरु के पृष्ठ पर इस परमोत्तम धर्म के विषय मे श्रवण किया था । उसी को वार बार माहेश्वर व्रत को पूछा थाभगवान् नन्दी को प्रणाम करके यही पूछा था कि प्रभु पशुपति कैसे कहे गये हैं- यह सब हमको आप बताने की कृपा करे । तब उस नन्दी ने उससे कहा था । उस सब को कृष्ण द्वैपायन व्यास ने श्रवण किया था। उनसे मैंने अनुश्रवण किया था । उसे ही अब आप लोगो को बनलाता हूँ। आप लोग सब भगवान् महेश्वर को प्रणाम करके इसका श्रवण करो। सनत्कुमार ने शैलादि से प्रार्थना की थी देव पशुपति किस प्रकार से हैं और पशु कौन से हैं ? किन पाशों के द्वारा वे निवद्ध किये जाया करते है और फिर किस रीति मुक्त होते हैं ? शैलादि ने कहा- हे सनत्कुमार ! मैं इस सा को यथार्थ रूप से आपको बताऊगा ॥७॥१०॥ रुद्रभक्तस्प शातस्य तव वल्याणचेतम । ब्रह्माद्या स्थावराताश्च देवदेवस्य धीमत ॥११ पशव परिकीत्यंते ससारवशवर्तिनः । तेपा पतित्वाद्भगवान् रुद्र पशुपति स्मृत ॥१२ अनादिधनो धाता भगवान्विष्णुरव्यय । मायापाशेन बध्नाति यमुवत्सरमेश्वर । १३ स एव मोचकम्तेपा ज्ञानयोगेन सेविन । अविद्यापाराबद्धाना नान्यो मोचक इष्यते ॥१४ तमृते परमात्मान शकर परमेश्वरम् । चतुविशतितत्त्वानि पाशा हि परमेष्ठिनः ॥१५ तःप शमादयत्येकः शिवो जोवरपासित । far ति पशूनेवश्च विशतिपाश. ॥१६ शिव का पशुपतित्व कथन ] [२२५ स एव भगवाजुद्रो मोचयत्यपि सेवितः । दशेद्रियमय पारितःकरणसंभव. ॥१७ भूततन्मात्रपाशैश्च पशून्मोचयति प्रभुः। इद्रियार्थमयः पाशंर्वद्धा विषयिण प्रभु ।।१८ पाप भगवान् रुद्र के भक्त परम शान्त योर व ल्याण को चित्त मे धारण करने वाले हैं। धमान् देवो के देव के ब्रह्मा से ग्रादि लेकर स्थावर पर्यन्त सब ससार मे वत्तन करने वाले पशु कहे जाते हैं । भग- वान् रुद्र उन सब के पति हैं इसी लिये वे पशुपति कहे गये हैं ॥११॥ ॥२॥ अनादि और निधन रहित धाता-अव्यय भगवान् विष्णु परमे- श्वर माया के पास से पशु की भांति ही वांधते है और वही ज्ञान योग के द्वारा सेवित होने पर उनके मोचन करने लेि होते हैं। अविद्या के पाश से बद्ध पुरुषो वा अन्य कोई भी मोचक नही होता है । ।।१३॥१४॥ उन परमात्मा परम ईश्वर शङ्कर के पिना परमेष्टी के ये चौबीस तत्व पाश हैं ॥१५।। जीवो के द्वारा उपासना किये गये भगवान् एक शिव ही उन पाशो से मोचन किया करते हैं । और एक चोवीस तत्व स्वरूप पासो से पशुप्रो को निवद्ध किया करता है ।। ६॥ वह ही भगवान् रुद्र सेवित होकर मोचन किया करते हैं जो कि अन्तःकरण में रहने वाले दश ( कर्मेन्द्रिय-ज्ञानेन्द्रिय स्वरूप ) इन्द्रियो के पाश होते हैं। और पच भून तया पर तन्मात्रा स्वरूप भी पाश हैं उन सब से भी प्रभु मोचन किया करने हैं। प्रभु इन्द्रिया के अर्थ अर्थात् विषय स्वरूप पाशो के द्वारा विपदो के सेवन करने वाले जीवो को वद्ध करते है। वे ही विषयी प्रारणी परमेश्वर की सेवा से बहुत ही शीघ्र फिर परम भक्त हो जाया करते हैं । भज्-यह धातु सेवा के अर्थ मे ही कहा गया है ॥१७॥१८॥ आशु भक्ता भवत्येव परमेश्वरसेवया । भज इत्यैप घातु सेवाया परिकीतिन ॥१६ तस्मात्सेवा बुध प्रोक्ता भक्तिशब्देन भूयसी। ब्रह्मादिस्तवपर्यत पशून्यद्धा महेश्वर ॥२० त्रिभिर्गुणमयैः पाशः कार्य कारयति स्वयम् ।
२२६ ] [लिङ्ग पुराण हढेन भक्तियोगेन पशुभिः समुपासितः ।।२१ मोचयत्येव तान्सद्य. शकरः परमेश्वरः। भजन भक्तिरित्युक्ता वाङमनःकायकर्मभिः ॥२२ सर्वकार्येण हेतुत्वात्पाशच्छेदपटीयसी। सत्यः सर्वग इत्यादि शिवस्य गुरणचिंतना ॥२३ रूपोपादानचिता च मानस भजनं विदुः । वाचिकं भजन धीराः प्रणवादिजपं विदुः ॥२४ कायिकं भजन सद्भिः प्राणायामादि कथ्यते । धर्माधर्ममय. पाशैबंधनं देहिनामिदम् ॥२५ इसीलिये वुध लोगो ने भक्ति शब्द के द्वारा जो कि भज् से वायाम् इस धातु से बनता है, बहुत बड़ी सेवा ही कही गई है । ब्रह्मा से प्रादि लेकर स्तम्ब पर्यन्त महेश्वर तीन गुण । सत्त्व-रज-तम । स्वरूप पाशो से पशुप्रों को बद्ध किया करते हैं और इस कार्य को वे स्वयं ही कराते हैं। जव उन पशुओ का जो कि निबद्ध हुए हैं, अतिहढ भक्ति का योग होता है और उसके द्वारा जिस समय भगवान् शङ्कर समुपासित उनके द्वारा होते हैं तो फिर वे परमेश्वर तुरन्त ही उन जीवो का मोचन कर दिया करते हैं । वाक्-मन और शरीर के द्वारा जो भजन अर्थात् सेवन है वही भक्ति कही गई है ।।१६॥२०॥ समस्त कार्यों के करने में हेतु होने से वह पाशी के छेदन करने में बहुन मी पटु है। उसका स्वरूप यही है कि शिव के स्वरूप को परम सत्य और सर्वत्र गमन करने वाला-ऐसा विचि- न्तन करता रहे ।।२१।।२२।। उनके स्वरूप तथा उपादानो का जो चिन्तन है वही मानम भजन कहा जाता है । प्रणव प्रादि का जाप करने को धीर पुरुष वाश्चिक भजन कहा करते हैं ।।२३।।२४।। यायिक भजन सत्पुरुपो के द्वारा प्राणायाम आदि का करना बताया जाता है । धर्म तथा अधर्म स्वरूप वाले पाशो से देह धारियो का यह बन्धन होता है ॥२५॥ मोनकः शिव एवैको भगवान्परमेश्वरः । चतुविशतितत्त्वानि मायाकर्म गुणा इति ॥२६ कीत्यते विपयाश्चेति पाशा जीवनिबंधनात् ।
[२२७ शिव का पशुपतित्व कथन ] तैबंद्धा शिवभक्त्यैव मुच्यते सर्वदेहिन ॥२७ पवक्लेशमय पाशै पशू-बध्नाति शकर । स एव मोचकस्तेपा भक्त्या सम्यगुपासित ॥ अविद्यामस्मिता रामद्वष च द्विपदा वरा । वदत्यभिनिवेश च क्लेशापाशत्वमागताद ।। ६ तमोमोहो महामोहस्नामिस्र इति पडिता । अधतामिस्र इत्याहुरविद्या पचधा स्थिताम् ॥३० ताजोवान्मुनिशार्दूला सर्वांश्चवाप्यविद्यया । शिवो मोवयति श्रामानान्य कश्चिद्विमोचक ||३१ अविद्या तम इत्याहुरस्मिता मोह इत्यपि । महामोह इति प्राज्ञा राग योगपरायणा ॥३२ भगवान् एक शिव ही परमेश्वर है और वही इन पाशो से मोचन करने वाला है । चौवीस तत्व माया के कर्मगुण हैं और ये विषय कहे जाते हैं । जौको के निब धन से ये पाश होते हैं । उनके द्वारा निवद्ध समस्त देहधारी शिव की भक्ति से ही मुक्त हुमा करते हैं ॥२६॥२७॥ भगवान् शबर पांच क्लेश मय पाशो से पशुप्रो का निबन्धन किया करते हैं । जो निवद्ध करने वाले हैं वे ही अच्छी तरह भक्ति पूर्वक सेवमान होने पर तथा समुपाशित होकर उन सब का मोचा भी हुआ करते हैं ॥२८॥ थे पुष्प पाव को प्राप्त होने वाले पांच कशा को कहते हैं जिनम अविद्या-मस्मिता राग द्वैप और अभिनिवेश ये पांच बने होते हैं ॥२६॥ तम मोह महामोह तामिस्र मौर अघताभित्र इनको ही पण्डित लोग पोव प्रकार की स्थित अविद्या कहते हैं ।।३०।। हे मुनिशाद लो। अविद्या से युक्त उन समस्त जीयो को इस विद्या से वेवर एव शिव ही मोगन रिया परते हैं। इन अतिरिक्त मय पोई भी विमोचन करने वारा नहीं है ॥३१॥ देहादि मे जो कि प्रनाम स्वरुप हैं सामाभिमान परना जो तम है उसे हो मविद्या कहते हैं और अस्मिता का मोह भी पदा हैं । योग परायण प्राग लोग राग को महामोह कहते हैं ॥३२॥ द्वप तामिस्र इत्याहुरधतामित्र इत्यपि ।
२२८ ] [ लिङ्ग पुराण तथैवाभिनिवेशं च मिथ्याजानं विवेकिनः ॥३३ तमसोऽष्टविधा भेदा मोहश्वाष्टविधः स्मृतः । महामोहप्रभेदाश्च धर्दश विचितिताः ॥३४ अष्टादशविधं चाहुस्तामिस्र च विचक्षणाः । अधतामिस्रभेदाश्च तथाष्टादशधा स्मृताः ॥३५ अविद्यपास्य संबंधो नातीतो नास्त्यनागतः । भवेद्रागेण देवस्य शंमोरंगनिवासिनः ॥३६ कालेषु त्रिपु संबधस्तस्य द्वेपेण नो भवेत् । मायातीतस्य देवस्य स्थाणो. पशुपतेविभोः ॥३७ तथवाभिनिवेशेन संबंधो न कदाचन । शंकरस्य शरण्यस्य शिवस्य परमात्मनः ॥३८ कुशलाकुशलस्तस्य सवधो नैव कर्मभिः । भवेकालत्रये शंभोरविद्यामतिवर्तिनः ।।३६ विपाकै. कर्मणां वापि न भवेदेव संगमः। कालेषु त्रिपु सर्वस्य शिवस्य शिवदायिन. ॥४० द्वप को तामिस्र और अन्धनामिस्र भी कहते हैं । प्रस्तुत विषय के विधात होने पर जो कोय होता है उसे तामिस्र कहा जाता है और . ममता के स्थान स्वरूप के रक्षण करने का जो अभिनिवेश होता है उसे अन्धतामिस्र कहते हैं । विवेकी के मिथ्याज्ञान को भी कहा जाता है १३३।। इस तरह तम के पाठ प्रकार होते हैं और मोह भी आठ प्रकार का होता है । वुम लोगो ने महामोह के दश प्रकार विचिन्तित किये हैं ॥३४॥ विचक्षण लोगो ने तामिस्र को अट्ठारह तरह का बताया है । इसी प्रकार से अन्यतामिस्र के भेद भी अट्ठारह कहे गये हैं । ॥३५।। अविद्या से इमका प्रतीत और अनागत सम्बन्ध नही है । अङ्ग निवासी शम्भुदेव के राप से होता है ॥३६॥ तीनो कालो मे उ का द्वेग से सम्ब- ग्ध नहीं होता है। क्योकि पशुपति विभु स्थाणु देव माया से प्रतीत होते हैं ॥३७॥ उसी प्रकार से अभिनिवेश के साथ भी कभी कोई सम्बन्ध 'नहीं होता है। राथर शिव स्वरूप परम आत्मा पोर शरण्य हैं । ॥३८।।
शिव का पशुपतित्व कथन ] [ २२६ तीनो काल म अविद्या का प्रति वर्तन करने वाले शम्भु का कुशल और अकुशल कमों से भी कोई सम्ब ध नही है ॥३६॥ तीनो कालो मे सब का प्रदान करने वाले शिवदायी शिव का कर्मों के विपाको के साथ भी सङ्गन नहीं होता है ।।४।। सृग्यदु सरसस्पृश्य पालत्रितयतिभि । स तैविनश्वरै शभुर्वाधान दात्मक पर ।।४१ प्राशयरपरामृष्ट कालस्तियगाचरं । घिया पति स्वभूरेप महादेवो महेश्वर ॥४२ अस्पृश्य कर्मसस्कारै कालतियतिभि । तथैव भोगमस्कारभगवानतकातक ॥४३ पु विशेषपगे देवो भगवा-परमेश्वर । चेतनाचेतनायुक्तप्रपवादखिलात्पर ॥४४ लोके सातिशयत्वेन ज्ञानेश्वर्य विलोक्यते। शिवेनातिशयत्वेन शिव प्राहुर्मनीपिण ॥१५ प्रतिसर्ग प्रसूताना ब्रह्मणा शास्त्रविस्तरम् । उपदेष्टा स एवादी कालावन्दतिनाम् ।।४६ वालावच्छेदयक्ताना गुरूणामप्यसो गुरु । सर्वेषामेव सर्वेश कालावच्छेदवजित ॥e बाल वितय म अर्थात् भूत भविष्यत् वत्त मान इन तीना काला मे वरतने वाले मुस दुसा से वह प्रसस्पृश्य अर्थात् स्पश न करने के योग्य हैं योनि य सब विनश्वर होते हैं और शम्भु पर एव बोधान दात्मर होते हैं । ॥४१॥ तीनो काता मे गोचर माराया स बुद्धि के स्वामी स्वभू यह श्वर महादेव अपरामृट होते हैं ।।४ ।। यह अन ता कान्तक भगवान पान प्रितम यी रो से सस्तारा से तथा भोगा के सस्तारो से भी सा न करने के योग्य हाते हैं ।।४।। भगवान् परमेश्वर पु विशेष पर दव हैं जो इस चेन और अचेतन से युक्त सम्पूर्ण प्रपच स परे है ॥४४॥ सोम मतिय के साथ ज्ञानेश्वयं दे जाता है और शिव (कल्याण) २ मति दायत्य होने से हो मगोपीगण उन भगवान् को 'शिव' इस शुभ २३.] [ लिन पुराण नाम से पुकारा करते हैं ।।४।। प्रत्येक सगं ये समुत्पन्न कालावच्छेद घर्ती ब्रह्मानो को शास्त्र का पूर्ण विस्तार वह ही भगवान् शिव उपदेश करने वाले होते हैं ॥४६॥ कालावच्छेद वर्ती गुरुग्रा का भी यह शिव गुरु होते हैं । और कालावच्छेद से रहित होते हुए वह शिव सभी का सर्वेश्वर है ॥४७॥ अनादिरेप सबधो विज्ञानोत्कर्पयो पर । स्थिनयोरीहश सर्व परिशुद्ध स्वभावतः ।।४८ पात्मप्रयोजनाभावे परानुग्रह एव हि । प्रयोजन समस्ताना कार्याणा परमेश्वर ॥४६ प्रणवो वाचकम्तस्थ शिवस्य परमात्मनः । शिवरुद्रादिशब्दाना प्रणवोपि पर स्मृत ।।५० शभो प्रणववाच्यस्य भावना तज्जपादपि । या सिद्धि स्वपराप्राप्या भवत्येव न सशय ॥५१ ज्ञानतत्त्व प्रयत्नेन योग पाशुपत पर । उक्तस्तु देवदेवेन सर्वेषामनुक पया ॥५२ यह विज्ञान और उप का पर एव अनादि सम्बन्ध है। इन दोनो स्थित होने वालो का यह सम्बध स्वभाव से ही सम्पूर्ण इस प्रकार का परिशुद्ध होता है ॥४८0 अपना कोई प्रयोजन न होने पर यह दूसरो पर अनुग्रह स्वरूप ही है और परमेश्वर समस्त कार्यों का प्रयोजन स्वरूप होते हैं ॥४६॥ उस परमात्मा शिव का वाचक प्रणव है । शिव और रुद्र मादि शब्दा के मध्य म प्रणव भी परम थे कहा गया है ॥५०॥ प्रणव के द्वारा वाच्य शिव को भावना उस के जाप से ही की जाती है। यह जो सिदि होती है वह प्रणव के अतिरिक्त अन्य से अप्राप्य होती है-इस में कुछ भी सराय नहीं है ॥५१॥ सव के ऊपर अनुकमा से देवो के देव ने अर्थात् प्रादित्य रुप शिव ने परम पाशुपत ज्ञान तत्व यत्न से अर्थात् याज्ञवल्क्य के परम तप से कहा है ।।५२१॥ स होवाचैव याज्ञवल्क्यो यदक्षर गार्ययोगिन । अभिवदति स्थूलमनत महाश्चर्यमदीर्घमलोहितममस्तकमासा.
शिव का पशुपतित्व कयन ] [२३१ यमत एवो पुनारसमसंगमगंधमरसमचक्षुष्कमश्रोत्रमवाड म- नोतेजस्कमप्रमाणमनुसुखमनामगोत्रममरमजरमनामयममृत- मोशब्दममृतमसंवृतमपूर्वमनपर मनंतमबाह्य तदभाति कि- चन न तदाश्नाति किचन ।।५३ एतत्कालव्यये ज्ञात्वा पर पाशुपत प्रभुम् । योगे पाशुपते चास्मिन् यस्यार्थः किल उत्तमे ।।५४ कृत्वोंकार प्रदीप मृगय गृहपति सूक्ष्ममाद्यतरस्थ संयम्य द्व रवासं पवनपटुतर नायक चेद्रियाणाम् । वाग्जाले. कस्य हेतोविभटसि तु भय दृश्यते नैव किंचिद्दे हस्थ पश्य शभुभ्रमसि किमु परे शास्त्रजालेन्धकारे ।।१५ एवं सम्यग्बुधात्वा मुनीनामथ चोक्त शिवेन । असमरस पचवा कृत्वाभयं चात्मनि योजयेत् ।।१६ वह प्रसिद्ध सूर्योपदिष्ट याज्ञवल्क्य ने कहा ही है अर्थात् निश्चय के साथ बोला है । हे जागि ! जो कि अयोगी का नाश शून्य शिव वस्तु स्थूल विराट् रूप है। योगी तो उसे अनन्त महदाश्चर्य कहकर अभिवन्दना किया करते है । वे श्रुति की भांति वर्णन किया करते हैं वह लम्बल से शून्य है पारक्त वर्ग से रहित-उपरि भाग से वजित-अस्तमित रूप वाला अतएव नित्यानन्द रस रूप-स्पर्श शून्य-अगन्ध-प्ररस-प्रचक्षुष्क अथात् रूप रहित-शब्द शू-य-मन और वाणी से अतीत-प्रदाहक-अन्य प्रमाण से शन्य-सुखकारक नाम एव गोत्र से रहित-मृति विरहित रोग शून्य-वय को हानि से रहित-मोक्ष स्वरूप-सुधा रूप-अनाच्छादित-भाग से रहित-अन्त से शून्य वहिर्देश से रहित एव प्रोकार शब्द के द्वारा प्रति- पाद्य वह ब्रह्म सब का भोग किया करता है और किसी कर्म का भोग नहीं किया करता है ।।५३।। यह ऐसा पाशुपत योग है । इस परमोत्तम पाशुपत योग मे जिस पुरुष की प्रास्था एवं प्रयोजन हो वह इस का ज्ञान प्रास करके अन्त समय में प्रभु के ही सानिध्य मे पहुंच कर उसी में प्रवेश किया करता है ॥५४॥ यदि इस प्रकार का वह परमेश कहां पर विराज- मान रहता है-यदि शका है तो उसका यही उत्तर है कि प्रोकार
३२]
[लिङ्ग पुराण
प्रदीप बनाकर उस गृहपति अन्तर्यामी परम सूक्ष्म का अन्वेषण करना
चाहिए और पवन से भी शीघ्रगामी इन्द्रियों के द्वार पर निवास करने
वाले अपने मन को चश पे करके ही उसका अन्वेषण किया जा सकता
है । वाग्जालो से इस विषय मे विवाद नही करके उगकी खोज करो।
इसमे कुछ भी भय नहीं होता है। अपने ही देह मे स्थित भगवान् शम्भु
का दर्शन प्राप्त करलो। तादि के अन्धकार स्वरूप इन शास्त्रों के जाल
में अपने मन को भ्रान्त मत करो ॥५५॥ इस प्रकार से भगवान शिव के
द्वारा मुनियो के लिये कहे हुए अर्थ को वुध लोग भली-भांति विचार करके
प्रानन्द रूप आत्म स्वरूप को पञ्च कोश रूप करके यात्मा में अभय रूप
मोक्ष की प्राप्ति करें ।।५।।
॥७६-शिवजी प्रकृति से जीव का बंधन ॥
भूय एव ममाचक्ष्व महिमानमुमापतेः।
भवभक्त महाप्राज्ञ भगवन्नंदिकेश्वर ॥१
सनत्कुमार संक्षेपात्तव वक्ष्याम्यशेषतः।
महिमान महेशस्य भवस्य परमेष्ठिनः ॥२
नास्य प्रकृतिबंधोऽभूवुद्धि वंधो न कश्चन ।
न चाहंकारवंधश्च मनोबंधश्च नोऽभवत् ॥३
चित्तबन्धो न तस्याभूच्छ्रोत्रबंधो न चाभवत् ।
न त्वचा चक्षुषां वापि बंधो जज्ञे कदाचन ।।४
जिह्व बधो न तस्याभूद्माणबधो न कश्चन ।
पादबंध: पाणिवधो वाग्बंधश्च व सुव्रत १५
उपस्थेद्रिय बंधश्च भूततन्मात्रवं धनम् ।
नित्यशुद्धस्वभावेन नित्यबुद्धो निसर्गतः ।।
नित्यमुक्त इति प्रोक्तो मुनिभिस्तत्त्ववेदिभिः।
अनादि मध्यनिष्ठस्य शिवस्य परमेष्ठिनः ॥७
बुद्धि सूते नियोगेन प्रकृतिः पुरुषस्य च ।
महकारं प्रसूतेऽस्या बुद्धिस्तस्य नियोगतः ॥
शिवजो प्रकृतिक [ २३३ इस अध्याय में शिव का प्राकृत वध और उनकी प्राशा से सब का समें तथा सर्व कार्य का प्रवर्तन निरूपित किया जाता है । सनत्कुमार ने कहा - हे भगवन् नन्दिकेश्वर ! प्राप तो गगन भव के परम भक्त हैं और पाप महान् पण्डित हैं। अत: पुन: भगवान् उमापति शिव की महिमा को कृपा कर परिणत कीजिए ॥१॥ शैलादि ने कहा-हे रामत्कु. मार | मैं परमेष्टी महान् ईश भव की महिमा तुम्हारे सामने सम्पूर्ण सक्षेप मे कहता हूँ ॥२॥ भगवान् शिव को प्रकृति का कोई बन्ध नहीं हुमा था और कोई भी वुद्धि-बन्ध भी नहीं होता है । प्रहकार वन्ध तथा मनोवन्ध भी नहीं हुआ है ।।३।। चित्त बन्ध-श्रोन वध त्वचारो का बन्ध और चक्षुबन्ध उनको कोई भी नहीं हुअा था ॥४॥ जिह्वाबन्ध-घ्राण बन्ध-पाद पाणि बन्ध-वाग्बन्ध-उपस्थेन्द्रिय बन्ध तया भूतो और तन्मात्रा- मो का बन्ध तात्पर्य यह है कि किसी प्रकार का भी कोई प्राकृतिक बन्ध शिव को नही होता है। वह नित्य शुद्ध स्वभाव से निसर्ग से ही नित्य बुद्ध होते हैं ॥५॥६॥ तत्त्व के वेशा मुनियो के द्वारा वह भगवान् शिव निस्य मुक्त कहे गये है । अनादि मध्य में निष्ठ परमेटी पुरुष शिव की माज्ञा से प्रति बुद्धि को प्रसूत करती है । शिव के नियोग से इस प्रकृति की बुद्धि फिर प्रकार का प्रसव किया करती है ।।७॥८॥ अतर्यामाति देखेपु प्रसिद्धस्य स्वयभुवः । इद्रियाणि दणक च तन्मात्राणि च शासनात् । प्रहकारातिससून शिवस्य परमेष्ठिनः । तन्मात्राणि नियोगेन तस्य संसुवते प्रभोः ॥१० महाभूतान्यशेपेण महादेवस्य धीमतः । ब्रह्मादोना तृगातं हि देहिनां देहसंगतिम् ॥११ महाभूतान्यशेपारिण जनयति शिवाज्ञया। अध्यबस्थति सन्बुिद्धिस्तस्याज्ञया विभोः ॥१२ अंतर्यामीति देहेपु प्रसिद्धस्य स्वयंभुवः । स्वभावसिद्धमैश्वर्य स्वभावादेव भूतयः ॥१३ तस्याज्ञया समस्तानिहकारोऽतिमन्यते ।
शिवजी प्रकृति] [ २३४ अवकाशमशेपारणा भूतानां सत्रयच्छति । आकाश सर्वदा तस्य परमस्यैव शासनात् ।।२१ उसी देव के शासन से वाणी वनन वोला करती है समस्त शरीरों फे सम्पूर्ण कार्य उम देव की प्राज्ञा से ही हुमा करते हैं ॥१६॥ देहधा- रियो का हाथ केवल मासान का ही कार्य करता है गति का काम नहीं करता है-इस तरह से पेपा के नियम एवं शासन से ही राम जन्तुप्रो के कार्य हुमा करते हैं जो भी उसने जैसा कुछ नियम बना दिया है उसी के अनुसार होता है ॥१७॥ पैर विहार ही पिया करते हैं उत्सर्ग ग्रादि काम नही करते हैं । यह भी सब देहियो का कार्य शिव के ही नियोग से हुमा करता है । इन्द्रियो वा अपना २ कार्य ही सब किया करती हैं । एक दूसरे के कार्य को कभी नहीं करती है । पायु मलोत्सर्ग करने वाली इन्द्रिय केवल अपना कार्य मल का त्याग करने का ही करती है और चोलने का पाम नही परती है । यह ऐसा नियम उत्पन्न होने वाले जातु या शिध ही की प्राज्ञा से हुपा करता है ।।१६उपस्थेन्द्रिय केवल धानन्द का ही उपभोग क्यिा करती है अन्य घुछ भी देहधारी का कार्य नहीं करती है-यह भी शिव के ही नियोग के कारण ही ऐसा किया करती है ।।२०। यह प्राकाश समस्त प्राणियो को अवकास का प्रदान सदा उसी प्रभु को मात्रा से दिया करता है ॥२१॥ निर्देशन शिवस्यैव भेद प्राणादिभिनिज । विर्भात सवभूताना शरीराणि प्रभजन. ।। २ निर्देशाद्देवदेवस्य समस्कधगतो मरुत् । लोकयात्रा वहत्येव भेदै स्वरावहादिभिः ॥२३ नागाद्य पनभिभदै शरीरेषु प्रवतते । अपदेशेन देवस्य परमस्य समोरम. २४ हव्य वहति देवाना कव्य कठयाशिनामपि । पाकं च कुरुते वह्निः शकरस्यव शासनात् ॥५ भुक्तमाहारजातं यत्पचते देहिनां तथा । उदरस्थः सदा वह्निविश्वेश्वरनियोगत: २६ .
२६ } [ लिङ्ग पुराण संजीवयंत्यशेषाणि भूतान्याप स्तदाज्ञया । अविलध्या हि सर्वेपामाशा तस्य गरीयसी ॥२७ चराचराणि भतानि विभयेव तदाज्ञया । माज्ञया तस्य देवस्य देवदेवः पुरंदरः॥२. जीवतां व्याधिभि पीडां मृगाना यातनाशते. । विश्वंभरः सदार ललोकै. सर्वेरलंध्यया IRE देवान्पात्य सुरादहति त्रैलोक्यमखिलं स्थितः। अधार्मिकाणा व नाश करोति शिवशासनात ॥३० यह प्रभज्जन वायु ) अपने प्राण-अपान यादि भेदों के द्वारा सब शरीर धारियो के शरीरो वा भरण प्रमु को ही प्राज्ञा से दिया करता है ॥२२॥ सात सन्यो मे रहने वाला यह मत स्वच्छन्द आवहनो के भेदो के द्वारा सब लोक यात्रा का वहन किया करता है ।।२३।। नाग-धर्म श्रादि पांच भेदो के द्वारा यह वायु उसी परमेश चे नियोग से शरीरो में प्रवृत हमा करता है ॥२४॥ भगवान् शकर के शासन से ही यह उदर में स्थित वह्नि देह पारियो के आहार मात्र का पाचन किया करता है। यह अग्नि कव्य के प्रशन करने वाले देवतायो को हव्य और कव्य का वहन करके उन्हे पहुंचा देता है तथा पाक भी भगवान् शकर के ही शासन से यह अग्नि विया करता है । ॥२॥॥२६॥ उसी की आज्ञा से जल समस्त प्राशियो को सजीवित किया करता है। महेश्वर भगवान की भाज्ञा सबसे अधिक महत्व रखने वाली है और वह सब के ही लिये लङ्गन न करने के योग्य हुमा करती है ॥२७॥ चर और अचर प्राणी समस्त उसकी प्राज्ञा से ही भरत किया करते है। देवराज इन्द्रदेव भी शिव की आज्ञा से ही अपने प्राप्त हुए अधिकारो मे प्रवृत्त होता है 1॥२८समस्त लोको के द्वारा अलपनीय शिव की आज्ञा से भगवान् विश्वम्भर सदा काल में जीवितो को सैकडो व्याधियों के द्वारा तथा मृतको को नरको सैकडो प्रकार की यातनों से दण्डित किया करता है ॥२६॥ शिव के मासन से वह देवो की रक्षा करते हैं और असुरो का हनन किया करते हैं तथा सम्पूर्ण प्रैलोक्य मे स्थित रहते हैं। जो भी प्रधाम्मिक पुरुष हैं उनका शिवजी प्रकृति [२३० नाश किया करते हैं ॥३०॥ वरुणः सलिलोकान्सभावयति शासनात् । मज्जयत्याज्ञया नस्य पाशैर्बध्नाति चासुरान् ॥३१ पुण्यानुरूप सर्वपा प्राणिना सप्रयच्छति । वित्त वित्तेश्वरस्तस्य शासनात्परमेष्ठिन, ॥३२ उदयास्तमये कुन्कुराते कालम ज्ञया । आदित्यस्तस्य नित्यस्य सत्यस्य परमात्मन ॥३३ पुष्पाप्यौषधिजातानि प्रह्लादयति च प्रजा । अमृताशु क्लाधार कालकालस्य शामनात् ।।४ आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनी मरुतस्तथा । अन्याश्च देवताः सर्वास्तच्छामनविनिर्मिता ॥३५ गधर्वा देवसपाल मिद्ध साध्याश्च चारगा.। यक्षरक्षा पिशाचाश्च स्थित. शाम्पु वेधस ॥३६ ग्रहनक्षत्रताराश्च यज्ञा वेदास्तमि च । ऋषीणा च गरणा सर्व शासन तस्य धिष्ठिता ॥३. पव्याशिना गरणा सप्तसमुदा गिरिसिंघव । शासने तस्य वर्तन्ते काननानि सरासि च ॥३८ वला काष्ठा निमेषाश्च मुहूर्ता दिवपा. क्षपा । स्त्वन्दपक्षमासान नियागात्तस्य धिमिता ॥३६ युगमन्वनर यस्य शभोस्तिष्ठति शापनात् । पराश्चैव परार्धाश्च कालभेदास्तथापरे ।।४० महेश्वर के शासन से ही वरुणदेव सलिल के द्वारा लोगो को समा. वित करते हैं मात् पालन किया करते हैं और उन्ही की माशा से सोको दो ही वरुणदेव निमवित यरते हैं मोर उमरे पागो से मसुरों का पन्धन परता है ॥३१॥ उस परमेटी ने मादेश से विसो वर यक्षराज पुण्यो रे प्रतुल रामस्त प्राणियो यो पन देता है ॥३२॥ निरय सत्य परमारमा को पाशा से मादित्य उदय घोर भरत के सनम तया पाल मोरिया करता है ॥३३॥ उस पाल के भी पाल के शासन २३८] [ लिङ्ग पुराण से क्ला को धारण करने वाला अमृतासु (चन्द्रमा) पुष्प और सम्पूर्ण भोपधियों को तथा प्रजा को प्राङ्गादित किया करता है ॥३४॥ प्रादित्य- वसु-रुद्र-अश्विनीकुमार तथा मरत् एवं अन्य देवगण समस्त उसी के शासन से विनिर्मित हुए हैं ॥३५॥ गन्धर्व-देव सघ-सिद्ध-साध्य चारण- यक्ष-राक्षस-पिशाच ये सब वेघा के शासन मे स्थित रहा करते हैं ॥३६॥ ग्रह-नक्षत्र-तारा- वेद-तप और सम्पूर्ण ऋपियो के गण उसी शिव के शासन मे अधिरित रहा करते हैं ।।३७) का का उपभोग करने वाले सब पितृगण-सातो ममुद्र गिरि सिन्धु-कानन और सरोवर ये सभी उस महेश्वर भगवान के ही शासन मे रहते हैं ॥३८।। कला काठा-मुहूर्त- दिवस रात्रि-नु-व-पक्ष माम ये सम्पूर्ण उस परमेश्वर के नियोग से अधिष्ठित होते हैं ॥३६॥ युग-मन्वन्तर भी इस भगवान् शम्भु के ही शासन से स्थित होते है । तथा पर और पराध जो समस्त काल के भेद होते हैं, वे सभी शिव के नियोग से ही हुमा करते हैं ।।४।। देवाना जातयश्चाटो तिरश्वा पंच जातय । मनुष्याश्च प्रवर्तते देवदेवस्य धीमतः॥४१ जातानि भूनदृदानि चतुर्दशसु योनिषु । सर्वलोकनिषण्णानि तिष्ठत्यस्यैव शासनात् ।।४२ चतुर्दशसु लोकेषु स्थिता जाता. प्रजा: प्रभोः। सर्वेश्वरस्य तरयव नियोगवशवर्तिनः ४३ पातालानि समस्तानि भुरनान्यस्य शासनात् । ब्रह्माडानि च शेषारिण तथा सावरणानि च । ४६ चर्तमानानि सर्वाणि ब्रह्माडानि तदाज्ञया। वर्तते सर्वभूगो, समेनानि समनत.॥४५ अतीतान्यप्यसत्यानि ब्रह्माडानि तदाज्ञया। प्रवृत्तानि पदार्थोघे सहितानि समंततः ॥४६ ब्रह्माडानि भविष्यति सह वस्तुमिरात्मरते । करिष्यति शिवस्याज्ञा सवैरावरणः सह ।।४७ देवों की प्राठ प्रकार की जामियां-निषा योनि कानो को पांव उमामहेश्वर को श्रेष्ठ विभूति । [२२६ सातियां तथा सब मनुष्य श्रीमान् देवो के भी देव के शासन से प्रवृत्त हुमा करते हैं ॥४१॥ चौदह प्रकार की योनियो मे समुत्पन्न होने वाले भूतो के वृन्द जो कि सब लोगो मे निपरण रहा करते हैं इसी के शासन से स्थित हैं ।।०२।। चौदह लोको में स्थित तथा उद्भूत होने वाली प्रजा मभु सर्वेश्वर उसके ही नियोग के वश वर्ती होते हैं 41४३।। पाताल मादि समस्त सातो लोक और भुवन शेप ब्रह्माण्ड तथा साधारण वर्तमान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जो कि सब भूनो से समन्वित है उस की प्राशा से वर्त- मान रहा करते हैं ।।४४१४५।। जो प्रसस्प ब्रह्माण्ड प्रतीत हो चुके हैं सम्पूर्ण पदार्थों के समूह से सयुत होकर सभी अोर से प्रवृत्त हुए थे वे भी उस परमेश्वर देव की पासा प्राप्त कर हुए थे ॥४६॥ जो ब्रह्म एड भागे भविष्य मे भी अपनी सम्पूर्ण वस्तुप्रो के सहित समुत्पन्न होंगे वे सब प्रावरणरे के साथ शिव की मात्रा का पालन ररने पाले हो होंगे ॥४७॥ 1८०-उमामहेश्वर को श्रेष्ठ विभूति ।। विभूती शिवयोमह्यमानव स्व गणाधिप । परापरविदा श्रेष्ठ परमेश्वरभावित पर हंत ते कथयिष्यामि विभूनी शिवयोरहम् । सनत्कुमार योगी ब्रह्मणस्तनयोतम।२ परमात्मा शिवः प्रोक्त शिवा सा च प्रकीर्तिता। शिवमेवेश्वर प्राहुर्माया गोरी विदुर्वाधार पुष्पं सार प्राहुगोरी च प्रकृति द्विजाः । अयं शभु शिवा वाणो दिवमोऽज शिवा निशा || समततुमहादेवो कहाणी दक्षिणा स्मृता । पाराशं करो देव पृषिवी कारप्रिया ।। समुद्रो भगवान् रद्रो वेसा दशैलेन्द्राया। वृक्ष शून पुपो देवः शूलपाणिप्रिया लता ॥ महा होपि सावित्री शंकराशरीरिणी।
परमेश्वर भगवान् २४० ] [ लिङ्ग पुराण विष्णु महेश्वरो लक्ष्मोर्भवानी परमेश्वरो ॥७ इस अध्याय मे महेश्वर की श्रेष्ठ विभूति का पृथक् वर्णन तथा भक्ति के वर्धक लिङ्गार्चन वा निरूपण किया जाता है । सनत्कुमार ने कहा-हे गणाधिप ! प्राप तो पर और अपर सब के ज्ञाता हैं और के परम भावित श्रेष्ठ भक्त हैं । अब पार कृपा करके शिव और उमा को पृथक २ विभूनियो का वर्णन कर हमको बतलाइये ॥१॥ तब नन्दिकेश्वर ने कहा- अच्छा, बडे हर्ष की बात है, अब मैं उमा महेश्वर की विभूतियो का वर्णन करता हूं। हे सनत्कुमार ! प्राप तो इस सब के श्रवण करने के योग्य पात्र हैं क्योकि परम योगीन्द्र हैं योर ब्रह्मा के उत्तम प्रात्मज हैं ॥२॥ शिव ही परमात्मा-इस शुभ नाम कहे गये हैं और उमादेवी शिवा इस शुभ नाम से प्रकीत्तिन हुई हैं। भगवान शिव को ही ईश्वर कहा करते हैं। और बुध लोग गौरी को माया कहते हैं ।।३।। हे द्विजवृन्द । भगवान् शार को ही पुरुष नाम से कहा जाता है तथा जगज्जननी गोरी को प्रकृति कहते है। शिवा पाणी है तो शम्भु उस वाणी का अर्थ है वह अज दिवस है तो शिवा निशा है ॥४॥ महादेव सप्त तन्तु ( यज्ञ ) हैं और रुद्राणी देव उस यज्ञ की दक्षिणा हैं-ऐसा कहा गया है। भगवान् शकर पाराश स्वरूप हैं और वह शंकर की प्रिया देवी पृथिवी के रूप वाली हैं ।।५।। भगवान् रुद्र समुद्र हैं तो उस सागर की वेला शैलेन्द्र की कन्या पार्वती हैं । शूल के आयुध धारण करने वाले प्रभु शम्भु वृक्ष है तो मूलपाणि की प्रियतमा देवी लता स्थानीया है जो उस वृक्ष के ही समाश्रित रहने वाली है ।।६।। हर ही ब्रह्मा है और शकर की अर्धाङ्गिनी पार्वती सावित्री के समान है । महेश्वर देव विष्णु है उस समय परमेश्वरी भवानी साक्षात् महा- लक्ष्मी के स्वरूप वाली है ॥७॥ वज्रपाणिर्महादेव शची शैलेंद्र कन्यका । जातवेदा. स्वय स्द्र. स्वाहा शधिकायि।। यमस्त्रियवको देवसात्प्रिया गिरिकन्यका । वरुणो भगवान् रुद्रो गौरी मर्थिदायिनी ॥
उमामहेश्वर को श्रेष्ठविभूति ] [२.१ बालेंदुशेखरो वायुः शिवा शिवमनोगमा । चद्राध मौलियक्षेद्र स्वयमृदिः शिवा स्मृता ।।१० चंद्रा,शेखरश्चंद्रो रोहिणी रुद्रवल्लभा । सतसप्ति शिवः पाता उमादेवी सुवचला । ११ पण्मुखरिपुरध्वसो देवसेना हरप्रिया । उमा प्रसूती जया दक्षो देवो महेश्वरः ॥१. पुरपार माख्यो मनुः राभु शतरूपा शिवप्रिया। विदुभंवानीमावति रुचि च परमेश्वरम् ॥१३ भृगुभंगाक्षिदा देव स्यातित्रिनयनप्रिया । मरीविभंगवार गभत्यिल्लमा विगे १५ महादेव जिम समय में यसपाणि महेन्द्र होते हैं उस समय दोनद्र सगया पार्यती ची ये इन्द्राणी से ) स्वरप में अवस्थित रहा करती है । स्वय हो रटदेव जानवेद । पग्निदेय ) होते हैं तो वार्धागिनी जगदम्बा म पतिमी प्रिया स्याहा होती हैं प्रियाया देव यम के स्वरूप में जय प्रयस्थित होते हैं तो गिरिपन्या भवानी उगनी प्रिया पेर में रहा करती है। भगवान् र याण + पाप परिपत हो। है तो गोगे सयांगों के प्रान रग्म पानी होती हैं 10 बारे यो मरतर म पारण परायाभगवान नप जय पायु होता है तो लिया सियी मनोरमाती, । पाहा मोनि नि) याराज तो गिया साय उगपी प्रति ग्वाल म सिपापा बरती ॥१॥ पर्यघाट पो पाया भगमन गिर में रहते तो मोगमा पाने महापणी। गिय ग| मूर्य ) ? तो उमा गोमाग परती ॥१॥गिरा करने निक नगरे सनम होने तोहमा पानी का मामी या परतीमा पनि शा पाहिए और दस RIA RT में देव मोर को गममा पार II पुरनारा मन पाभुकोगिरोपिदिनोran २४२] [ लिङ्ग पुरास को रुचि जान लेना चाहिए ।।१३।। भग की अक्षियो के हनन करने वाले शम्भु भृगु हैं तो त्रिनयन की प्रिया पार्वती ख्याति हैं। भगवान रुद्र मरीचि ऋषि है तो विभु की वल्लभा गौरी सभूति होती हैं ||१४|| विदुर्भवानी रुचिरा कवि च परमेश्वरम् । गंगाधरोगिरा ज्ञेयः स्मृतिः साक्षादुमा स्मृता ॥१५ पुलस्त्यः शशभृन्मौलिः प्रीतिः कांता पिनाकिनः । पुलस्निपुरध्वसी दया कालरिपुप्रिया ॥१६ कतुर्दक्षकतुध्वंसो संनर्दियिता विमोः। त्रिनेत्रोऽत्रिरुमा साक्षादनसूया स्मृता बुधै ॥१७ ऊर्जामाहुरुमा वृद्धां यसिष्ठ च महेश्वरम् । संकरः पुरुषाः सर्वे खियः सर्वा महेश्वरी ॥१२ पुल्लिंगशब्दवाच्या ये ते च रुद्राः प्रकीर्तिताः। स्त्रीलिंगशब्दवाच्या याः सर्वा गोर्या विभूतयः ।।१६ सर्वे स्त्रीपुरुषाः प्रोक्तास्तयोरेव विभूतयः । पदार्थशक्तयो यायास्ता गौरीति विदुर्बुधाः ॥२० सासा विश्वेश्वरी देवी स च सर्वो महेश्वरः। शक्तिमतः पदार्था ये स च सर्वो महेश्वरः ॥२१ भधानी को रुचिरा तो परमेश्वर को कवि पुछ लोग जानते हैं । गंगा को शिर पर धारण घरने वाले शिव मिरा हैं तो उमा साक्षात् उसकी स्मृति स्वरूपिणी होती हैं ॥५) पाशभृत् पुलस्त्य है तो उस दशा में पिनाकी प्रिया प्रीति होती है। त्रिपुर के ध्वंस करने वाले पुलह होते हैं सो कालारिषु वी प्रिया दया होती है ॥१६॥ दधा के ऋतु को ध्वंस करने वाले शिव जब ऋतु के स्वरूप में होते हैं उस समय मे विभु की दयिता रानति होती हैं । त्रिनेत्र पनि है तो उमा साक्षार अनुसूया बुधो फे द्वारा कही गयी हैं ॥१७॥ उमा को वृद्धा कर्जा पोर महेश्वर यो पशिष्ट कहते हैं। ये समस्त पुरुप पर के स्वरूप वाले हैं पौर राय खिया महेश्वरी के रूप पाली होती हैं ॥१८जो भी कोई लोगो में परिवाद द्वारा वाध्य होते है ये सब छ ही के स्वरूप माहे गमे उमामहेश्वर की श्रेष्ठविभूति ] [२४३ हैं और जो स्त्री लिङ्ग शब्दों के द्वारा कहे जाते हैं वे सभी देवी गोरी की ही विभूतियां होती हैं ॥१९॥ ये सब स्त्री और पुरुष उन दोनो शिव और उमा की ही विभूतियाँ होते हैं । जो जो भी पदार्थों की शक्तियां होती है उन सब को बुध लोग गौरी ही कहा करते हैं । वह शक्ति जितनी भी है वे सब विश्वेश्वरी देवी है और वे सब पदार्थ जो दातियों के धारण करने वाले होते है सम्पूर्ण महेश्वर है ॥२०॥२१॥ अष्टौ प्रकृतयो देव्या मूर्तयः परिकीनिताः । तथा विकृतपस्तस्या देहबद्धविभूतयः ।।२ विस्फुलिंगा यथा तावदरतौ च वहघा स्मृताः । जीवाः सर्वे तथा शवों द्वंद्वमत्त्वमुपागतः ।।२३ गौरीरूपाणि सर्वाणि शरीराणि शरीरिणाम् । शरीरिणस्तथा मर्ये शकराशा व्यवस्थिता ॥२४ श्राव्यं सर्वमुमारूपं श्रोता देवो महेश्वरः। विपयित्वं विभुते विषय रमकतामुमा ।।२५ स्रष्टव्य वस्तुजातं तु धत्ते शकरवल्लभा । स्रष्टा स एव विश्व मा बालचद्रा,शेखर ॥२६ दृश्यवस्तु प्रजारूपं बिभर्ति भुवनेश्वगे। द्रष्टा विश्वेश्वगे देवः शशिपंडशिखामणिः ॥२७ रसजातमुमारूपं यजात च मर्वशः। देवो रसविना शभु ाता च भुवनेश्वरः ।। पाठ प्रवृतियाँ देवी की मूत्तियों वही गई है । तथा देह पी नाति विभूतियो उमको विकृतियाँ होती है ॥२२॥ जिप प्रकार से अग्नि मे वहुत-सारे विस्पुलिङ्ग पहे गये हैं उसी तरह से ये समस्त जीवात्मा होने है और शिव द्वन्द्वसल को प्राप्त हो जाते हैं ॥२॥ इन सारीर के धारण करने वाले प्राणियो जो सम्पूर्ण शरीर हैं ये सभी गौरी के स्वरूप वाले ही होते हैं और सब शरीरी पङ्कर भगवान् के मा व्यव• स्थित होते हैं । ॥२४॥ जो भी बुध पाप विषय है वह सब ही देवी उमा का स्वरूप है और उसरा श्रोता पर्यत् अपए ररने पासा महेश्वर २४४] [ लिङ्ग पुराण देव हैं । विषयित्व के स्वरूप को विभु महेश्वर धारण करते हैं और उमा देवी विषयो के स्वरूप को प्राप्त किया करती है ॥२२॥ सूजन करने के योग्य जो समस्त यस्तु जात है उन सब का स्वरूप शङ्कर को प्रियतमा धारण किया करती है और उन सब का सृजन करने वाला विश्वारमा वालचन्द्र को मस्तक पर धारण करने वाले प्रभु शिव हैं ॥२६॥ प्रजा के रूप वाली जो भी कोई दृश्य वस्तु उन सब को भूवने. श्वरी धारण किया करती है और उन सघ को देखने वाला द्रष्टा साक्षात् देव शशि के खण्ड को मस्तक मे मरिण की भांति धारण करने पाले शिव होते है ॥२७॥ मम्पूर्ण रस जात और सब सू घने के योग्य घस्नु मात्र उमा का ही स्वरूप है । उन रस युक्त वस्तुप्रो के प्रानन्द को प्रहण करने वाले तथा प्राता भुवनेश्वर माक्षात् शम्भु ही होते है ॥२८॥ मंतष्यवस्तुतां धत्ते महादेवी महेश्वरी। मता स एव विश्वात्मा महादेवो महेश्वरः ॥२६ बोद्धव्य वस्तु रूप च विति भववल्लभा । देव. स एव भगवान् बोढा बालेन्दुशेवर ॥३० पीठाकृतिरुमा देवो लिंगरू|श्व शकर । प्रतिष्ठ प्य प्रयत्नेन पूजयति सुरासुग ॥३१ येये पदार्था गाास्तेते शर्व विभूतयः । प्रर्था भगाकिता येये तेते गौर्या विभूतय ॥३२ स्वर्गपाताललोवातब्रह्माडावरणाष्टकम् । ज्ञय मर्वमुमारूप ज्ञाता देवो महेश्व:॥६३ विनि क्षेत्रता देवी त्रिपुरातकवलमा । क्षेत्रजस्वमथो धत्ते भगवानधकातक ॥३४ शिवलिंग समुत्सृज्य यजन्ते चान्यदेवता.। स नृपः सह देशेन रोरवं नरकं व्रजेत् ॥३५ महादेवी महेश्वरी मनव्य वस्तुता के स्वरूप को धारण रिया फरती है और उन सब का मन्ता विश्वात्मा महेश्वर महादेव ही होते ॥२६॥ भव की बल्लभा उमादेवी बोध करने के योग्य वस्तुओं के उमामहेश्वर की भविभूति ] [२४५ रूप को धारण किया करती हैं और बालेन्दु शेखर भगवान् शिव उन सब का वोद्धा होते हैं ॥३०॥ पीठ के आकार में स्थित उमादेवी हैं और लिङ्ग के स्वरूप में साक्षात् शङ्कर होते हैं जो उस पीठ पर ऊपर विराजमान हैं। सुर और असुर प्रयत्न करके ही उसकी प्रतिष्ठा करके फिर यजनार्चन किया करते हैं ॥३१॥ जो जो पदार्थ लिङ्ग के प्रक वाले होते है ये सब ही शिव को ही विभूति होती हैं और भगांक वाले जो-जो भी पदार्थ है ये सब गौरी की विभूतियाँ हुमा करती हैं ॥३२॥ स्वर्ग से पाताल लोक के अन्त तक ब्रह्माण्ड का अष्टा वरण सब ज्ञान करने के योग्य उमा का ही स्वरूप होता है और उन सब का ज्ञाता महेश्वर देव होते हैं ॥३३॥ देवी क्षेत्रता के स्वरूप को धारण किया करती है जो कि भगवान् पिपुरान्तक की वल्लभा है और भगवान अन्धकान्तक शिव क्षेत्रज्ञत्व के स्वरूप वाले होते हैं ॥३४॥ भगवान् शिव के लिङ्ग का त्याग करके जो अन्य देवो का भजनाचन किया करते हैं। उस देश का राजा अपनी समस्त प्रजा के साथ रोरव नरक को जाया करता है ॥३५॥ शिवभक्तो न यो राजा भक्तोऽन्येषु सुरेषु यः । स्वपनि गुवतिस्त्यक्त्वा यथा जारेपु राजते॥३६ ब्रह्मादयः मुराः सर्वे राजानश्च महद्धिकाः । मानवा मुनयन्नं च सर्वे लिंग यजति च ॥३७ विष्णुना रावण हत्वा ससैन्यं ब्रह्मणः सुतम् । स्थापितं विधिवद्भक्त्या लिंग तीरे नदोपतः ।।.८ फुत्रा पापमहल णि हत्वा विप्रगतं तथा। भावात्मम श्रितो रुद्रमुन्नते नात्र संशयः ॥६ सय लिगमया लोकाः सर्वेलिगे प्रनिधि तस्मादम्मच येलिगं पदाच्ऐन्छाश्वत पदम् ॥४० सारी स्पितानोनःधेयोऽयिमिः शिवा। पूजनीयौ नमस्कायो चितनीयो प सर्वदा ।।१ जो रामा सिरा मत न हार अन्य देशों का परन पिया २४६ ] [ लिङ्ग पुराण करता है और अन्य देवो का भक्त बन जाता है वह इसी भांति होता है जैसे कोई युवती अपने पति का त्याग करके ज्वर के साथ प्रणय किया करती है ॥३६॥ ब्रह्मा से आदि नकर सब देवता महान् समृद्ध राजा लोग तथा धनिक मानव और मुनिगण सभी लिङ्ग का यजन किया करते हैं । ॥३७॥ भगवान् विष्णु ने ब्रह्मा के पुत्र रावण को सेना के सहित हनन करके नदियो के स्वामी समुद्र के तट पर विधिवत् शिव के लिङ्ग की स्थापना भक्तिपूर्वक की थी ॥८॥ महस्रो प्रकार के पापो को करके तथा सैकडो विश्शे का हनन भी करके जो भक्ति के भाव से भगवान रुद्र का समाश्रय ग्रहण कर लेता वह सभी पापो से मुक्त हो जाया करता है-इसमे कुछ भी सशय नही है ॥ ६॥ यदि शाश्वत पद की इच्छा करता है तो उसे केवल लिङ्ग का ही यजन करना चाहिए क्योकि सभी लिङ्ग मय कहे गये हैं और सभी लिङ्ग मे प्रतिटित होते हैं ।।४।। सम्पूर्ण आकार में स्थित ये दोनो शिव और शिवा जो हैं उनका श्रेय क चाहने वाले पुरुषो को पूजन करना चाहिए। इन दोनो का ही चिन्तन पौर सर्वदा नमस्कार करना चाहिए। ॥४१॥ ॥ १-शिव फा जगत उत्पत्ति कारण । मूर्तयोऽटी ममाचक्ष्व शंकरस्य महात्मनः । विश्वरूपस्य देवस्य गणेश्वर महामते ॥१ हंत ते कथयिष्यामि महिमानमुमापतेः । विश्व रूपस्य देवस्य सरोजभवसंभव र भूरापोग्निमरव्योम भास्करो दीक्षितः शशी । भवस्य मूर्तय प्रेक्ताः शिवस्य परमेष्ठिन. ॥३ सात्मेदुवह्निमू मोघरा: पवन इत्यपि । सस्या मूर्तयः प्रोक्ता देवदेवस्य धीमत.॥४ अरि होपिते तेन सूर्यात्मनि महात्मनि । तदिभूतीस्तथा सर्वे देवास्तृप्यति सर्वदा ॥५ वृक्षस्य मूलसेकेन यया शासोपशाषिताः।
शिव का जगत०] [२४७ तथा तस्यार्चया दवास्नथा स्युस्व द्विभूतय ॥६ तस्य द्वादशधा भिन्न रूप सूर्यात्मक प्रभो । सर्वदेवात्मक याज्य यजति मुनिपुगवा । ७ इस अध्याय म महेश की पाठ मूर्तियो को ही विशेष रूप से इस विश्व के उत्पादन का कारण प्रकीर्तित किया जाता है । सनत्कुमार कहा- महान आत्मा वाले भगवान् शङ्कर की प्राठ मूत्तियो के विषय में हम लोगो को आप बताइये । हे गणो के ईश्वर ! आप तो महान मति वाले हैं और देवो के भी देव विश्वरूप प्रभु महेश्वर के गण के अधि- पति हैं ॥१॥ नन्दिकेश्वर ने कहा- मैं भगवान् उमापति की महिमा तुम्हारे सामने कहूंगा। मुझे बडी ही इस प्रश्न से प्रसन्नता होती है । माप तो कमल से उदभव ग्रहण करने वाले ब्रह्मा के पुत्र हैं और विश्व- रूप देर के भक्त हैं । ।। २॥ परमेश्री शिर की भूमि-जन अनि मस्त ब्योम- भास्वर दीक्षित और शशि ये पाठ मूत्तियां हैं ॥३॥ उस धीमान देवो के देव की अन्तरिक्ष जीवात्मा इदु वह्नि सूर्य जल-भूमि और पवन ये भी माठ मूत्तियाँ कही गई हैं ।।।। अग्निहोत्र में सूयस्वरूप महात्मा परमा- स्मा वे प्रर्पित होने पर वृक्ष शाखा उपशाखा सदृश उसको विभूतियां मर्थात् उस अश सब का प्रदान करने वाले देवता तृप्त हो जाया करते हैं । जिस प्रकार वृप के मूल के सीनने से उसकी सभी शाखा और उपशासापो को उस सिंचन से तृप्ति हो जाया करती है उसी भांति उस एक ही शिव यो मर्चना से उसकी विभूति स्वरूप समस्त देवो की तृप्ति हुमा करती है ॥६॥ उस प्रभु के सूर्य स्वरूप भिन्न द्वादश रूप हाते हैं भोर वह सव देव स्वरूप है अतएव येप मुनिगण उस पूज्य का यजन दिया परते हैं ॥७॥ अमृताख्या कला तस्य सर्वस्यादित्यस्पिगा । भूतसजीवनी चेष्टा लोकेस्मिन् पीयते सदा ।। पद्रामकिरणास्तस्य पूर्जटे स्परात्मन । मोपधोना विवृद्धयर्थ हिमवृष्टि वितन्वते । गुल्लार या रपमयस्तस्य सभोतिमपिरणः।
२४८ ] [ लिङ्ग पुराण धर्म वितन्वते लोके सस्यपाकादिकारणम् ॥१० दिवाकरात्मनस्तस्य हरिकेशाह्वय. कर । नक्षत्र पोषकश्च व प्रमिद्धः परमेष्ठिनः ॥११ विश्वकर्माह्वयतस्य किरणो वुधपोषकः । सर्वेश्वरस्य देवम्य मप्तसतिस्वरूपिणः ।।१२ विश्व व्यच इति रुपात किरणस्तस्य शूलिनः । शुक्रपोषकभावेन प्रतीतः सूर्यरूपिण ॥१३ संयद्वसुरिति ख्यातो -स्य रश्मिलिशूलिनः । लोहितागं प्रपुष्णाति सहस्रकिरणात्मन. ।।१४ सम्पूर्ण प्रादित्य के रूप वाले उस शिव की अमृत नाम वाली बला भूतो को सजीवन देने वाली इष्ट होती है और इस लोक मे सर्वदा पान की जाया करती है । भास्कर के स्वरूप वाले भगवान् शिव की चन्द्र नामक पिरणे ओषधियो को विशेष वृद्धि के लिये हिम की वृष्टि का विस्तार पिया करती हैं ॥६॥ उस मार्तण्ड रूपी शम्भु की शुक्ल नाम याली किरण सस्यो के परिपाक करने के कारण स्वरूप धर्म ( घाम) पा विस्तार किया करती हैं ॥१०॥ दिवाकर के स्वरूप वाले उस पर- मेछी शिव की हरिकेश नाम वाली फिरण नक्षत्रो का पोपण करने वाली प्रसिद्ध है ॥११॥ विश्वकर्मा नाम वाली उसकी किरण बुध की पोषक होती है जो वि सूर्य के स्वरूप वाले मब के ईश्वर पोर देवों के भी देव शिव हैं ॥१२॥ उस शूली की एक विरण विश्व व्यच इस नाम से प्रसिद्ध है और सूर्यरूप वारे शिव की वह किरण शुक्र के पोषक भाव से प्रतीत की गई है ।।१ ॥ जिस त्रिशूली थी जो कि सहस्र हिरण ये स्वरूप पाले हैं. एक रिण स ३गु इम नाम से बात होती है जो कि लोहितान पा पोपण करन वाली है ॥१४॥ प्रविरिति ख्यातो रश्मिस्तस्य पिनाकिनः । वृहस्पति प्रपुष्णाति सर्वदा तपनात्मनः ॥१५ स्वगहिनि समारयानः शिवस्यांशुः गनेश्वरम् । हग्दिश्वात्मनस्तस्य प्रपुष्णाति दिवानिशम् ।।१३ शिव का जगत०] [२४९ सूर्यात्मकस्य देवस्य विश्वयोनेरुमापते. । सुषुम्ण ख्यः सदा रहिमः पुष्णाति शिशिरद्युतिम् ॥१७ सौम्यानां वसुजातानां प्रकृतित्वमुपागता। तस्य सोगाह्वया मूर्तिः शंकरस्य जगद्गुरोः ।।१८ तस्य सरेमात्मक रूप शुक्रत्वेन व्यवस्थितम् । शरीरभाजां सर्वेषां देवस्यांतक शामिनः ।। शरीरिणामशेषाणां मनस्येव व्यवस्थितम् । वपुः सोमात्मक शंभोस्तस्य सर्व जगद्गुरोः ॥२० शंभोः पोडशधाभिन्ना स्थितामृतकलात्मनः । सर्वभूतशरीरेपु सोमाख्या मूर्तिरुत्तमा १ एक तपनात्मा पिनाकी को एक अविमु नाम वाली किरण प्रसिद्ध है वह सर्वदा वृहस्पति का पोषण किया करती है ॥१५॥ हरि दश्वात्मा उस शिव की 'स्वगट्' -इस नाम से ख्यात होने वाली किरण महर्निश शनैश्वर का पोपरत दिया करती है ॥१६॥ विश्व की योनि उमापति सूर्य के स्वरूप में स्थित देवकी सुषुम्णा नाम वाली रश्मि । किरण) सर्वदा शिशिर द्युति का पोपगा करती है ॥१७॥ इस जगत् के गुरु भगवान् पावर की सौम्य वसु जातो की अर्थात् सकल मयूरवो की प्रकृतित्व को प्राप्त होने वाली सोम नाम वाली मूत्ति है ॥१८॥ उसका सोमात्मक रूप शुकत्व से व्यवस्थित है और वह अन्तक काझामन करने वाले देव का समस्त शरीर धारियो को होता है ॥१६॥ समस्त जगत् के गुरु भगवान् दाम्भु का वह सोमात्मक शरीर समस्त शरीर पारियो के मन मे ही व्यव- स्थित है ॥२०॥ अमृत कलात्मा शम्भु की सोलह प्रकार से भिन्न स्थित रहने वाली उत्तम मूर्ति सगस्त शरीरो मे सोम नाम वाली होती है ॥२९॥ देवापतृश्व पुष्णानि सुधयामृतवा सदा । मूर्तिः सोमाया तस्य देवदेवस्य शासितुः ॥२२ पुष्णात्योपधिजातानि देहिनामात्मशुद्धये । सोमाह्वया तनुस्तस्य भवानी मिति निदिशेत् ।।२३ २५० ] [ लिङ्ग पुराण यनाना पतिभावेन जीवाना तपसामपि। प्रसिद्धरूपमेतद्वै सोम त्मक मुमापते ॥२४ जलानामोषधीना च पनिभावेन विश्रुतम् । सोमात्मक वपुस्तस्य शभोभंगवत प्रभो. ॥५५ देवो हिरण्मयो मृष्ट परस्पर विवेकिन । करणानामशेषारणा देवताना निराकृनि ॥.६ जीवत्वेन स्थित तस्मिन्छिवे सोमात्मके प्रभो। मधुरा विलय याति सर्वलोकैकरक्षिणी ।।२७ यजमानाह्वया मूर्ति शैवी व्यर, निशम् । पुष्णाति दवता सर्वा क्व्य पितृगणानपि ॥२८ उस शासिता देवो के देव की सोम नाम वाली मूति सदा सुधा से अमृत के द्वारा देवो को और पितृगण का पोषित किया करती है ।।२२।। उसकी सोम नाम वाली मूति, जिसको भवानी देखना चाहिए, देहधा- रियो की प्रात्म शुद्धि के लिये भोषधि जातो की पुष्टि किया करती है ॥२३॥ यज्ञो का-जीवो का तथा तपो का पतिभाव से उमापति का यह सोमाभक रूप प्रसिद्ध है ॥२४॥ भगवान् प्रभु शम्भु का सोमात्मक वपु जल और पोषवियो के पति भाव से विश्रुत है ॥२॥ परस्पर मे प्रात्मा को प्रारमा विचार वाले का विचारित देव शिव समस्त चक्षुरादि करणो के तदभिमानी सूर्यादि देवो का बिना प्राकृति वाला हिरण्मय अग्राह्य होता है ॥२६॥ सोमात्मा उस प्रभु के शिव के जीवत्व रूप से स्थित होने पर सर्वलोको की एक ही रक्षा करने वाली मथुग विल्य को प्राप्त हो जाती है । ॥२७॥ शिव की यजमान नाम वाली मूर्ति प्रहनिश हन्यो के द्वारा सम्पूर्ण देवो का तथा कव्यो के द्वारा समस्त पितृगणो का पोपण दिया करती है ॥२८॥ यजमानाह्वया या सा तनुश्चाहुतिजा तया। वृष्ध्या भावयति स्पप्ट सबमेव परापरम् ।।२६ अत स्थ च बहि स्थ च ब्रह्माडाना स्थित जलम् । भूताता च शरीरस्थ शमोम तिगरीयसी ॥३० शिव का जगत [२५१ नदीनाममृतं साक्षान्नदानामपि सर्वदा। समुद्राणां च सर्वत्र व्यापी सर्वमुमापतिः ।।३१ संजीविनी समस्तानां भूतानामेव पाविनो। अविका प्राणसंस्या या मूर्तिरंबुमयी परा ॥३३ अंत.स्थश्च बहिम्म्यश्च ब्रह्मांडानां विभावसुः । यज्ञानां च शरीरस्थः शंभोम तिगरीयसी ॥३३ शरीरस्था च भूतानां श्रेयसी मूतिरेश्वरी । भतिः पावक संस्था या शंभोरत्यंतपूजिता ॥३४ भेदा एकोनपंचाशदविद्भिरुदाहृताः । हव्यं वहति देवानां शंभीर्यज्ञात्मकं वपुः ।।३५ यजमानाख्या अर्थात् यजमान नाम वाली जो मूत्ति है उसके द्वारा आहूतिजा जो तनु है वह वृष्टि से सम्पूर्ण परापर को स्पष्ट रूप से भावित करती है ।न्दिा अन्तःस्थ और बाहिर में स्थित तथा ब्रह्माण्ड मे स्थित जो जल है एव भूतो के शरीर मे स्थित जल शम्भु की अधिक बड़ी मूत्ति है ॥३०॥ सर्वदा नदियो का नशे का और सर्वत्र सरगर का व्यापी अमृत सब उमापति है ॥३१॥ स जीविनी तथा सम्पूर्ण भूतो की पाविनी प्रारण संस्था जो परा अम्बुमयी मत्ति है वह अम्बिका है HER अन्तःस्थ और वहि.स्थ ब्रह्माण्डो का विभावसु तथा यशो का शरीर में स्थित रहने वाला विभावसु शम्भु भगवान् को मरीयसी मूर्ति है ॥३३॥ भूतो के शरीर मे स्थित रहने वाली ईश्वर की कल्याणमयी मूर्ति है । पावक मे संस्थित जो शम्भु की मूत्ति है वह प्रत्यन्त पूजित होती है ॥३४॥ वेद के वेसामों ने उनचास इसके भेद बताये हैं। शम्भु का यज्ञ स्वरूप वधु देवो के हव्य का वहन किया करता है ॥३॥ कव्य पितृगणानां च हूयमानं द्विजातिभिः । सर्वदेवमयं शंभोः श्रेष्ठमग्यात्मक वपुः ॥६६ वदंति वेदशास्त्रज्ञा यजति च यथाविधि । प्रत.स्थो जगदंडानां बहिःस्थश्च समोरणः ॥३७ शरीरस्थश्च भूतानां शैवी मूर्तिः पटीयसी।
२५२ ] [ लिङ्ग पुराण प्राणाद्या नागकूर्माद्या प्रवहाद्याश्च वायव ॥३८ ईशानमूर्तेरेकस्य भेदा सर्वे प्रकीर्तिता अत स्थ जगदडाना बहिःस्थ च विय द्विभो. ६E शरीरस्थ च भूताना शभोमूनिगरीयसी। शभोविश्व भरा मूर्ति. सर्वब्रह्माधिदेवता ॥४० चराचराणा भूताना सर्वेपा धारणे मता। चराचराणा भूताना शरीर रिण विदुर्बुधा ॥४१ पंकेनेशमूर्तीना सम रब्धानि सर्वथा । पचभूतानि चद्रार्कावात्मेति मुनिपु गवा. ॥४२ भगवान् शम्भु का यज्ञात्मक वपु द्विजाति के द्वारा हूयमान होकर पितृगण के कम्य का वहन किया करता है। शम्भु का सर्व देवमय अग्नि के स्वरूप वाला वपु प्रति श्रेष्ठ है ॥३६॥ वेदो के तमा शास्त्र के ज्ञाता ऐसा कहते हैं और विधि के अनुसार यजन किया करते हैं । जगत् के भएडो का अन्दर मे रहने वाला तथा वाहिर मे स्थित समोरण पवन) तथा शरीर में भूतो के रहने वाला पवन भगवान शिव को पटीयसी मूत्ति है । प्राण अपान आदि तथा नाग-कूर्म वृकल आदि एव प्रावहादि जो वायु हैं ये सब एक ही ईशान मूर्ति के भेद बताये गये हैं । जग दएडो के अन्त स्थ और वहि स्थ और भूतो के शरीर में स्थित विभु का जो विद्यत् (गगन ) है वह शम्भु की एक अधिक बड़ी मूर्ति होती है । सर्व ब्रह्म की अधि देवता शम्भु की विश्व का भरण करने वाली मूर्ति है ॥३७॥३८॥३६॥४०॥ चर और अचर अर्थात् स्थावर जङ्गम समस्त भूतो के धारण करने मे मानी हुई जा मूत्ति है उसे बुध लोग जो चराचरो के शरीर हैं सर्वथा पृथिव्यादि पच भूतो के द्वारा उत्पादित जाना करते हैं । ॥४॥ यह पांच भूतो का पञ्चक ईश को ही मूत्तियों का है जिन से कि भूतो के शरीर समारस्य होते हैं । ये पांच पृथिव्यादि भूत चन्द्र म(सूर्य) पौर प्रात्मा ये कुल पाठ शिव की मूत्तियाँ होती हैं जैसा कि पूर्व मे भी बताया जा चुगा है ॥४२॥ मृतंयोऽटो शिवस्याहुर्देवदेवस्य धीमत ।
राकर की पृयक्-पृयक ] [ २५३ आत्मा तस्याष्टमीमतिर्यजमानाह्वया परा ॥४३ चराचर शरीरेषु सर्वेष्वेव स्थिता तदा । दीक्षितं ब्रह्मरण प्राहुरात्मानं च मुनीश्वराः ।।४४ यजमानाह्वया मूर्ति. शिवस्य शिवदायिनः । मूर्तयोऽटो शिवस्यैता वंदनीयाः प्रयत्नतः ।।४५ योथिभिनरनित्यं श्रेयसामेकहेतवः ॥४६ ये पाठों मूत्तियाँ धीमान् देवों के भी देव भगवान् शम्भु की हैं- ऐसा ही कहा गया है । प्रात्मा इसकी पाठवी मूत्ति होती है जो कि पर यजमान के नाम से कही जाती है ॥४३॥ ये चराचर के शरीरों में सभी मे ही स्थित है उस समय मुनीश्वर लोग दीक्षित ब्राह्मण और प्रात्मा को पहते हैं ।।४४।। कल्याण के दाता शिव की यजमान नाम वाली मूत्ति होती है । ये सप शिव की पाठो ही मूर्तियाँ प्रयत्नपूर्वक वन्दना करने के योग्य हैं। ये सव श्रेय के एकमात्र कारण स्वरूप हैं प्रतः जो श्रेय फा सम्पादन करने के इन्छक मनुष्य हैं उनको इनकी बन्दना मवश्य हो परनी चाहिए ॥४॥४६॥ ।। ८२-शंकर को पृथक-पृथक् मूर्ति वर्णन ॥ भूयोऽपि वद मे नंदिन् महिमानमुमापते अष्टमूर्तमहेशस्य शिवस्य परमेष्ठिनः ।।१ वक्ष्यामि त महेशस्य महिमानमुमापते । प्रष्टमूर्तर्जगद्वय प्य स्थितस्य परमेष्ठिनः ॥२ चराचराणां भूतानां धाता विश्व भरात्मकः । सर्व इत्युच्यते देवः सर्वशास्त्रायंगारंगै १३ विश्वभर स्मनसस्य सर्वस्य परमेष्ठिनः । विफेशो मध्यते पत्नी तापोंगारक स्मृतः॥४ भव इत्युच्यते देवो भगवान्वदेवादिभिः। संजीयनस्य लोकाना मवस्य परमात्मनः ॥५ उमा संकीर्तिता देवी गुतः गमन मूरिमिः ।
२५४] । लिङ्गपुरात सप्तलोकांडकव्यापी सर्वलोककरक्षिता वह्नयारमा भगवान्देवः स्मृतः पशुपतिर्बुधः । स्वाहा पत्त्यात्मनस्तस्य प्रोक्ता पशुतिः प्रिया 19 इस अध्याय में भगवान पदर को पृथक् २ मूतियों का वर्णन किया जाता है । सनत्कुमार ने कहा-हे गन्दिन ! श्राप परमेष्ठी महेश शिव जिनको कि अष्ट मूतियां होती हैं उन उमा के पति की महिमा को और भी फिर वर्णन परिये और मुझे श्रवण कराने को कृपा कीजिए ॥१॥ नन्दिकेश्वर ने कहा-मैं माफको उमा के पति महेश की महिमा का वर्णन करूंगा। परमेष्टी इनकी ये माठ मूत्तियां इस जगत् को व्याप्त करके स्थित रहती हैं ॥२॥ जो समस्त शास्त्रों के पारगामी मनीपोगरण हैं उनके द्वारा यह देव सम्पूर्ण चराचरों के पाता विश्वम्भर स्वरूप वाले सर्व-इस शुभ नाम से कहे जाया करते हैं ।।३।। उस विश्वम्भरात्मा पर- मेष्ठी की विवेशी पत्नी और अङ्गारक तनय कहा गया है ॥४॥ वेद वादी विद्वानों के द्वारा भगवान देव भव इस नाम से कहे जाते हैं । सलिना- त्मक जल देहधारी देव को भव कहा जाया करता है। वह परमात्मा भव लोकों का संजीवन होता है ॥५॥ सूरिगण के द्वारा उमादेवी कही गई है और तुक सुत बताया गया है। जो कि सात लोकों के अण्डकों में व्यापक है और समस्त लोकों का एक ही रक्षा करने वाला है ॥६॥ अग्नि के स्वरूप वाले जो भगवान देव हैं वे बुधों के द्वारा पशुपति कहे गये हैं। उसकी अपनी प्रिया पशुपति को स्वाहा बनाई गई है ॥७॥ पण्मुखो भगवान्देवो बुधै. पुत्र उदाहृतः । समस्तभुवनव्यापी भर्ता सर्वशरोरिणाम् ।। पवनात्मा बुधव ईशान इति कीत्यंते ईशानस्य जगत्कतु देवस्य पवनात्मनः IRE शिवा देवो बुधरुक्ता पुनश्चास्य मनोजवः । चराचराणां भूतानां सर्वेषां सर्व कामदः ॥१० व्योमात्मा भगवान्देवो भीम इत्युच्यते बुधैः । महामहिम्नो देवस्य भीमस्य गगनात्मनः ।।११ राङ्कर को पृथक्-पृथक्-] [ २५५ दिशो दश स्मृता देव्यः सुतः सर्गश्च सूरिभिः । सूर्यान्मा भगवान्देवः सर्वेषा च विभूनिद. ॥१२ रुद्र इत्युच्यते देवभगवान् भुक्तिमुक्तिदः । सूर्यात्मकस्य रुद्रस्य भक्ताना भक्तिदायिनः ॥१३ सुवर्चना स्मृ । देवी सुतश्चास्य शनश्चरः । समस्तसौम्यवस्तू । प्रकृतित्वेन विश्रु तः ॥१४ पण्डितो के द्वारा भगवान् पण्मुख देय पुत्र कहे गये हैं जो कि सम्पूर्ण भुवनो में व्यापक रहने वाला तथा समस्त शरीर पारियो का भर्ना है 11८॥पयनात्मक अर्थात् पवन के स्वरूप वाले जो शिव हैं उसे बुध लोगो पे दारा ईमान-ऐगा कहा जाता है। यह ईमान इस जगत् के करने याले पयन के स्वरूप में स्थित देव हैं ॥६वुधो पे दारा उनकी प्रिया शिया देवी सही गई है पोर इनका पुत्र गनो जब होता है । जो समस्त पर एव मनर भूतो क सय वामनानी के प्रदान करनेयाला है। ॥१०॥ उन गिय की माठ मूतियो म जो एप मोम स्याप वाली मूति है उसे युधो के द्वारा 'भीम' -ग नाम से वहा जाता है । उग गगनात्मा देव भीम की महान् महिमा होती है ॥११॥ उस देव की देवियां मूरिगणने ear दिए यताई है और सर्ग उस गुत पहा गया है । मूर्य के स्व. रूप पाने जो भगवार देव ह ये सभी को विभूति प्रदान करने वाले होने १॥ भुक्ति पोर मुशि दोनों को प्रदान करने वाले देव ";".. ग नाम यारे बहे जाते है । या भगवान का भी निपने भागों को सिर प्रान परने गाने होते है. उसी मुदगला नाम पाती देयो र पोर नभर पुत्र हो । समग्न गौम्य पस्तुपों जो नियमे ही विधुत होता है ॥१॥ सोगामको वर्षदेगे मराति मृत । गोमागमम्मदेवार प्रायम्य मूरिमि ॥१५ पिता रोहिणी प्रोतागतः। परम्पम्पिनि मुनि राना यजमानारमहोदयो महादेयो युधः प्रभु ।
२५६ } I लिङ्ग पुराण उग्र इत्युच्यते सद्भिरोशानश्चेति चापर. ॥१७ उग्राह्वयस्थ देवस्य यजमानात्मनः प्रभोः । दीक्षा पत्नी बुधैरुक्ता संतानास्यः सुतस्तथा ॥१. शरीरिणां शरीरेषु कठिनं कोंकणादिवत् । पापियं तद्वपुर्जय शर्वतत्त्वं बुभुत्सुमिः ।।१६ देहेदेहे तु देवेशो देहमाजां यदव्ययम् । वस्तुद्रव्यात्मक तस्य भवस्य परमात्मनः ॥२० ज्ञेयं च तत्वविद्भिर्व सर्ववेदार्थपाग. । आग्नेयः परिणामो यो विग्रहेषु शरीरिण म् ।।२१ मूर्तिः पशुपतिज्ञेया सा तत्त्वं वेत्त मिच्छुभिः । वायव्यः परिणामो यः शरीरेपु शरीरिणाम् ॥२२ यह सोमात्मक अर्थात् सोम के स्वरूप वाले देव बुधों के द्वारा 'महा- देव'-इस नाम से कहे गये हैं। उन सोम स्वरूप धारी महादेव देव की दीयता सूरियों के द्वारा रोहिणी बनाई गई है और बुम उनका पुत्र वहा गया है । जो हव्य तथा कव्य का प्रशन करने वाले देव एवं पितर होते हैं उनकी हव्य-कव्य की स्थिति या करते हुए यजमानात्मक प्रभु देव महादेव कहा गया है और बुरा लोगो ने ऐमा कहा है । सत्पुरुषो के द्वारा वह "उग्न" - ऐसा तथा अपर लोगों के द्वारा 'ईशान" - यह कहा जाता है ॥१२॥१६॥१७) उग्र-इस शुभ नाम वाले जो देव हैं उन यजमान स्वरूप वाले प्रभु को पत्नी वुधों ने दीक्षा बताई है और उनका'सुत सन्तान नाम वाला कहा गया है ॥१८॥ तक उन भगवान शिव की माठ मूर्तियो । नाम और उनकी पुत्री तथा पुत्रो का नाम प्रादि बता- कर अब उनके शरीर के तक्तभागो को बतलाते हैं शरीर धारियो के शरीरों में उनका पार्थिव शरीर अत्यन्त ही कठिन है जो कि शर्व के तत्व के जिज्ञासु पुरुषों को कोकण आदि की भांति जान लेना चाहिए। कोकण-यह एक देश के भाग विशेष का नाम है ।।१६। देह धारियो के देह देह में देवेश हैं और जो अषय वस्तु द्रव्यात्मक है वह उस परमात्मा भव का ही स्वरूप है ॥२०॥ सम्पूर्ण वेदो के पारगामी तत्वों के वेतामो शङ्कर की पृथक-पृथक् ] [२५७ के द्वारा उसे जान लेना चाहिए। शरीर धारियो के शरीरो मे जो प्राग्नेय परिणाम है अर्थात् अग्नि के द्वारा अग्नि जैसा परिपाक होता है वह पशुपति की ही मूत्ति तत्वों के जानने की इच्छा वालो को समझनी चाहिए । तात्पर्य यह है कि शरीर मे भोज्य वस्तु का परिपाक आदि जो अग्नि क्यिा करती है वह शम्भु का ही स्वरूप होता है । इसी प्रकार से शरीरियो के शरीरो मे वायुकृत भी परिणाम हुअा करता है ।।२१॥२२॥ बध रीशेति सा तस्य तनुज्ञेया न संशयः । सुपर यच्छरीरस्थमशेषाणां शरीरिणाम् ।।२३ भीमस्य सा तनुज्ञेया तत्त्वविज्ञानांक्षिभिः । चक्षुरादिगन तेजो यच्छरीरस्थमंगिनाम् ।।२४ रुद्रस्यापि तनुज्ञेया परमार्थ बुभुत्सुभिः । सर्वभू शरीरेषु मनश्चद्र त्मक हि यत् ॥ ५ महादेवस्य सा मूनि बर्बोद्धव्या तत्त्वचिंतक । आत्मा यो यजमानाख्यः सर्वभूशरीरंग ॥२६ मूनिग्रस्य सा ज्ञेगा परमात्मबुभुत्सुभि । जात नां सर्वभूताना चतुर्दशसु योनिषु ॥ ७ अष्टमूर्तेरनन्यत्वं वदत परम्प ।। सममूर्तिमयान्याहुरीशस्यागानि देहिनाम् ।। उस वाया परिणाम का बुथ लोगो ने ईशा-यह तनु बताया है और उन्हे इसी भांति समझ लेना चाहिए इ. मे वृछ भी सशय नही है । समस्त शरीग्यिो के शरीर मे स्थित जो सुपिर होता है उसे तत्वो के विज्ञान की प्राकाक्षा रखने वालो को भीम का ही शरीर समझना च हिए । अङ्गधारियो के शरीर मे स्थित जो चक्षु प्रादि मे गत तेज होता है वह परमार्थ के जिज्ञासुप्रो को भगवान् रुद्र का ही तेजोमय दारीर समझना चाहिए। समस्त भूतो के शगैरो मे जो एक मन के स्वरूप याला मन्द्रात्मक होता है उसे भी तत्त्व विन्तको के द्वारा एक महादेव को ही मूत्ति जाननी चाहिए । जो सभी प्राणियों के शरीरो में रहने वाला जीवात्मा है जिसका कि यजमान-यह नाम होता है । ॥२३ २५%] [ लिङ्ग पुराण ॥२४॥२५॥२६।। उसे परमात्मा के तत्व के जानने को जिज्ञासा रखने वालो को उस को मूत्ति ही समझनी चाहिए। चतुर्दश योनियो मे समु. स्पन प्राणियो के मन्दर परमपि लोग यब मूति का अनन्यत्व बतलाते हैं । देहधारियो के अङ्ग ईश को सात मूत्तियो से परिपूर्ण हुमा करते हैं ॥२७॥२८॥ आत्मा तस्याष्टमी मूर्ति सर्वभूतशरीरगा। अष्टमूर्तिममु देवं सर्वलोकात्मक विभुम् ॥२६ भजस्व सर्वभावेन श्रेय प्राप्तुं यदीच्छसि । प्राणिनो यम्य कस्यापि क्रियते यद्यनुग्रह ॥ अष्टमूर्तमहेशस्य कृतमाराधन भवेत् । निग्रहश्चेत् कृतो लोके दहिनो यस्य कस्यचित् ॥१ अष्टमूर्तमहेशस्य स एव विहितो भवेत् । यद्यवज्ञा कृता लोके यस्य कस्य चिदगिन ॥३२ अष्टमूर्तेर्महेशस्य विहिता सा भवेद्विभो । अभय यत् प्रात्त स्य दगिनो यस्य कस्यचित् ।।६३ पारावन वृतं तस्मादष्टभूर्तेर्न सशय । सर्वोपकारकरण प्रदानमभयस्य च ॥३४ पाराधन तु देवस्य अष्टमूनि सशय । सर्वोपकारकरण सर्वानुग्रह एव च ॥३५ तदर्चन पर प्र हुरटमूर्ते मुनीश्वरा । अनुग्रहणमन्येपा विधातव्य त्ययागिनाम् ।.६ सर्वाभयप्रदान च शिवाराधनमिच्छना ॥२७ पह जीवात्मा उस महेश्वर को पाठवी मूति है जो कि समस्त प्रा. पियो में शरीरों म गमनशील रहता है । इस प्रकार से इन माठ मूर्तियो वाले सब लोवामा विभु देव सर्वत्रो भाव से भजन परो यदि इस सपार में रहार श्रेय प्राप्त करने की इच्या रस्ते हो । मति में विश्राप हैन से उसपे मारापन करने का प्रसार यसलाया जाता है । जिस from प्राणी पर यदि वह मनुग्रह करते है तो अवश्य ही येय की
शिव का सवंतत्वात्मक० ]
[ २५६
प्राप्ति हो जाती है ॥२६॥३०॥ भतएव मष्टमूत्ति महेश का माराधन
परना ही चाहिए । यदि किसी भी प्राणी पर कोई निग्रह इस लोर मे
परना है तो यह भी मटमूर्ति महेश केही द्वारा यह दएड भी पिया
हुमा होता है । जिग सिी देहगारी की मोर में अवमा की गई है तो
यह भी परमूर्ति महेश को ही पी ही है। जिस रिसी मनधारी
कोषमप यदि दिया हा होता है तो यह भी उसी प्रष्ट मूर्ति विभ.पा
होता है। प्राएव भगवान् पटर्शि के रिय इए पारायन से यह सभी
पृध होता है-इगमें समय नहीं है । सब प्रारमरगी (सायनों)
पा परना प्रार प्राश परना और भय मा प्रदान परला यह पाष्टमूर्ति
यारे देय में ही पारापन से हो पा परता है-इन में संशमात्र भी
राय नहीं है। र उपमारी पा सरना मोर सय मनुग्रह
प्रार बरना-इन लिये मुगौनरी ने मम्मूर्ति भगवान का मन परना
ही पर ITRA निग में पारापना को रन वाले गुझे भी
मागे पस्नुहोर गय प्रसार में प्रमय या दान परमा
पाहिए ॥३२॥३१॥10॥७॥
[लिज पुराण भोक्ता प्रकृतिवर्गस्य भोग्यम्येशानराजितः॥६ स्थागोस्तत्पुरपारूपा च द्वितीया मूतिरुच्यते । प्रकृति. सा हि विभेया परमात्मगुहामिया !! (निय या रायतस्वारमय स्वरूप ) इस अध्याय मे पर ब्रह्म स्वरूप थाले दाम्भु का समस्त तत्वो के स्वरूप याला स्पुट स्यापा निश्परा दिया जाता है। रानस्युमार ने यहा-हे गणों मे परम ध नन्दिन् ! माप मुझे श्रेय के रण भूत और शारीर धारियो पे लिये परम पवित्र पञ्च ब्रह्मों को बताने की कृपा पीजिए ॥१॥ नन्दिरेश्वर ने यहा - हे पप योनि ग्रह्मा के थे। पुत्र ! ये पच ग्रह नाम याले शिव के ही स्वरूप होते हैं उन्हे मैं तुमको बतलाता हूँ भौर यया तत्व वहूंगा ।।२।। समस्त लोगो का ए राहार करने वाला सम्पूर्ण लोको पा एम रक्षा करने पाला भोर सब लोगो का एक निर्माण करने वाला शिव पच ब्रह्मारमा होते हैं । वह समस्त लोको का एक ही उपादान कारण और निमित्त कारण भी होता है। इस प्रभार से यह शिव पाच प्रकार पे बहे गये है ॥३॥॥ समस्त लोगो के शरएय ( रक्षार) परमात्मा शिव की पांच मूर्तियां विख्यात है। पांच ब्रह्म नाम वाली परा हैं III परमेष्टी शिव को प्रथमा मूत्ति क्षेत्रज्ञ है । ईशान सज्ञा वाला भोगने के योग्य प्रकृति वर्ग के भोक्ता है । ६ स्थाणु को तत्पुरुष नाम बाली द्वितीया मूर्ति कही जाती है । वह प्रकृति परमात्मा की मुख्य प्रधिकरण भूत जागती चाहिए ॥७॥ अघोराख्या तृतीया च शभोम् निगरोयसी। बुद्ध. मा ममिरित्युक्ता धर्माद्यष्टांगसंयुता। चतुर्थी वामदेवाल्या मूतिः शमोगरीयसी । अहकारात्मकत्वेन व्याय सर्व व्यरस्थिता । सद्योजाताह्वया शो पचमी मूरिच्यते । मनस्तत्त्वात्मकत्वेन स्थिता सर्वशरीरिघु। १० ईशान परमो देव परमेष्ठी सनातन । श्रोत्रे द्रयात्मकत्वेन सर्वभूतेष्ववस्थित ॥११ शिव का सर्व:त्वात्मक. ] स्थितस्तत्पुरुषो देव. शरीरेपु शरीरिणाम् । त्वगिद्रियात्मकत्वेन तत्त्वविद्भिरुदाहृतः ।।१२ अघोर महादेवश्चक्षुरात्मतया बुध । कीनिन: मर्वभूताना शरीरेषु व्यवस्थितः ।।१३ जिद्रिय त्मकत्वेन वामदेवोपि विश्रु तः । भाजामशेपारण मगेपु परिधिष्ठितः ॥१४ शम्भु की अघोर नाम वाली तीसरी मूत्ति है जो कि गरीयसी होती है। वह मूत्ति बुद्धि की कही गई है जो कि धर्म प्रादि अष्टाङ्ग-सयुत होती है ।।८।। शम्भु की चौथी गरीयसी अर्थात् अधिक बड़ी यामदेव इस अभिधान वाली मूर्ति होती है । यह मूत्ति अहङ्कारात्मक होने से सब को व्याप्त करके व्यवस्थित होती है 18 सद्योजाता- इस नाम वाली भगवान् दाम्भु की पांचवी मूत्ति यही जाया करती है। जो समस्त त्वात्मक होने से सम्पूर्ण शरीर धारियो में स्थित रहा करती है ।।१०।। ईशान परम देव परमेष्टी और सनातन हैं और थोत्रेन्द्रियात्मकत्व होने से गब भूतो में अवस्थिन रहने हैं ॥११॥ पारीरियो के सरीरो मे त्वगिन्द्रियात्मक होने तत्पुरुप देव स्थित रहते हैं - ऐसा तत्त्वो के वेत्ताप्रो के द्वारा कहा गया है ।।१।। चक्षुरात्मयत्व होने से अघोर देव भी समस्त भूतो के शारीरो मै व्यवस्थित रहते हैं-ऐमा वुधो के द्वारा कात्तिन किया गया है ।।१।। वामदेव भी जिह्वा इन्द्रिय के स्वरूप से अङ्ग वालो के अरोप मङ्गों में परिधिरित होने वाले प्रसिद्ध हैं ॥१४॥ घाणेद्रियात्मकत्वेन सद्योजातः स्मृनो बुधः । प्राणभाजां गमस्ताना विग्रहेषु व्यवस्थितः ।।१५ सर्यवेव शरीरेषु प्रारणभाजा प्रतिष्ठितः । चागिद्रियात्मकत्वेग युधरोशान उच्यते ॥१६ पाणी दगत्मकत्वेन स्थितस्तत्पुरुषो चु4. । उच्यते विप्रहेप्नेय सविप्रहपारिपाम् ॥१७ सर्वविहिरण देहे हायोगेपि व्यवस्थितः। पाद्रियात्मरत्वेन योनितस्तत्त्ववेदिभिः ॥१८ २६२ ] [लिङ्ग पुराण पारिवद्रियात्मकत्वेन वामदेवो व्यवस्थितः । सर्वभूतनिकायाना कायेपु मुनिभिः स्मृतः ।। उपस्थात्मतया देवः सद्योजातः स्थितः प्रभुः। इष्यते वेदशास्जदहेपु प्राणधारिणाम् ॥२० ईशानं प्राणिना देवं शन्दतमात्ररूपिणम् । प्राकाशजनक प्राहमुनिवृदारकप्रजा. १२१ सद्योजात नाणेन्द्रिय के स्वरूप से समस्त प्राण धारियो के शरीरो में व्यवस्थित रहते हैं ऐसा बुधजनो के द्वारा कहा गया है ॥१५॥ ईशान वागिन्द्रियात्मकतया समस्त प्राणियो के शरीरो मे प्रतिष्ठित हैं यह बुधो के द्वारा कहा जाता है ।।१६॥ सम्पूर्ण विग्रह ( शरीर धारियो के शरीरो मे पाणीन्द्रिय के स्वरूपता से तत्पुरुष स्थित रहते हैं ऐसा मनी- पियो के द्वारा कहा जाग करता है। ॥१७॥ तत्वो के वेता लोगो के द्वारा कीर्तित किया गया है कि अघोर भी समस्त विग्रह धारियो के देहो मे पादेन्द्रियात्मकत्व से स्थित हैं । ॥१८॥ वामदेव पायु ( मलोत्सर्ग करने वाली ) इन्द्रिय के स्वरूप से समस्त प्राणियो के निकायों के शरीर मे स्थित हैं । ऐसा मुनियो ने प्रतिपादन किया है ॥१९॥ सद्योजात प्रभु प्रारिए धारियों के देहो मे उपस्थात्मता से ( जननेन्द्रिय के स्वरूप से) अवस्थित रहा करते हैं । मुनिणे के द्वारा, जो कि वेदो और शास्त्रों के पूर्ण ज्ञाता है, ऐसा प्रतिपादन पिया जाता है ।।२०।। मुनि वृन्दारक प्रजा यह कहते हैं कि शब्द तन्मात्र के रूप वाले प्राणियो के देव ईशान हैं जो कि प्राकारा के जनक हैं ॥२१॥ प्रास्तत्पुरुष देवं स्पर्शतन्मात्रकात्मकम् । समीरजनक प्राहुभंगवतं मुनीश्वराः ॥२ रूपतन्मात्रक देवमघोरमपि घोरकम् । प्राहुर्वेदविदो मुख्या जनक जातवेदस. १२३ रसतम्मानरूपत्वात् प्रथितं तत्त्ववेदिन । वामदेवमपा प्राहुर्जनकत्वेन सस्थितम् ॥२४ सद्योजात महादेवं गघतन्मात्ररूपिरणम् ।
शिव का सर्वतत्वात्मक. ] { २६३ भूम्यात्मानं प्रशंसंति सर्वतत्वार्थवेदिनः ॥२५ आकाशात्मानमीशानमादिदेवं मुनीश्वराः । परमेण महत्त्वेन संभूत प्राहुरद्भुतम् ।।२६ प्रभु तत्पापं देवं पवनं पवनात्मकम् । समस्ततोगापित्वात्प्रथितं सूरयो विदुः ।।२७ प्रथाचिततया ख्यातमघोरं दहनात्मकम् । कथयंति महात्मानं वेदवाक्यार्थवेदिनः ॥२८ तत्पुरुप देव को स्पर्श तन्मान के स्वरूप वाला कहते हैं । मुनीश्वर भगवान् को समीर का जन्म देने वाला कहते हैं । ॥२२॥ घोरक देव अघोर को भी रूप तन्मात्रा के स्वरूप में रहने वाला वेदो के ज्ञाता लोग जो कि परम प्रमुख हैं कहा करते हैं जो कि जातवेदा को समुत्पन्न करने वाला होता है ॥२३॥ वामदेव भगवान् को रस की तन्मात्रा के स्वरूप वाला होने से तत्त्व वेदी पुरुप उसे जलो का जनक बतलाते हैं ॥२४॥ सद्योजात को गन्ध की तन्तात्रा के रूप वाला कहते हैं और उसे सर्व तत्वार्थ के ज्ञाता लोग भूम्यात्मा एव भूमि को जनन प्रदान करन वाला कहा करते हैं ॥२५॥ मुनीश्वर लोग ईशान को आकाशात्मा कहते हैं जो कि प्रादिदेव है और इसे परम महत्त्व से सम्भव होने वाला अद्भुत बत- लाते हैं ॥२६॥ तत्पुरुष देव प्रभु को पवनात्मक पवन पाहते है जो कि सूरियो के द्वारा सर्वलोक व्यापित्व होने वाला प्रसिद्ध है ॥२७॥ अचितत्व होने से अघोर दहनात्मक प्रसिद्ध होते हैं। जो वैदो के वाक्यार्थ के ज्ञाता पुरुष है वे इन महान मारमा वाले को ऐसा ही कहते हैं ।।२।। तोयात्मकं महादेव वामदेव मनोरमम् । जगत्संजीवनत्वेन कथितं मुनयो विदुः ॥६ विश्व भरात्मक देवं सद्योजातं जगद्गुरुम् । चराचरंक भर्तारं परं कविवरा विदुः ॥३० पंचब्रह्मात्मकं सर्व जगत्स्थावरजंगमम् । शिवानंद तदित्याहुमुनयस्तत्त्वदर्शिनः ॥३१ पंचविशतितत्त्वात्मा प्रपंचे यः प्रदृश्यते ।
०६४ ] [ लिङ्ग पुराण पचब्रह्मात्मवत्वन स शिवो नान्यता गतः ॥३२ पविशतितत्वात्मा पनब्रह्मात्मक शिव । श्रेयोथिभिरतो नित्य चितनीय प्रयत्नतः ॥३३ परम मनोरम वामदेव को सम्पूर्ण जगत् थे सजीयनत्व होने से मुनीश्वर लोग तोपात्मर कहा करते हैं ॥२६॥ सद्योजात देव को विश्व- म्भरात्मय जगद्गुरु तथा चराचर का एा ही भरण करने वाला परम स्वामी कवियर पहते हैं 101 यह सम्पूर्ण स्थावर जगातक जगत् पच ब्रह्मात्मक है । तत्वनी मुनीश्वर पृन्द उसे शिवानन्द कहा परते हैं ॥३१॥ जो पचीस तत्वो के स्वरूप वाला इस जगत् के प्रपच मे दिखलाई दिया करता है वह पर ब्रह्मात्मक रूप से शिव ही है अन्य कोई भी नहीं है ॥३२॥ पचविंशतितत्वात्मा पच ब्रह्मात्मक शिव ही है अतएव श्रेय सम्पादन करने की इच्छा रखने वालो को उसका प्रयत्नपूर्वक निस्य ही चिन्तन करना चाहिए ॥३३॥ ॥४-श्री महेश्वर का सर्व स्वरूप ।। भूयोऽपि शिवमाहात्म्य समाचक्ष्व महामते । सवज्ञो ह्यसि भूताना मधिनाथ महागुण ।।१ शिवमाहात्म्यमेकाग्र शृणु वक्ष्यामि ते मुने । बहुभिर्बहुधा शब्द कोरित मुनिसत्तमै ॥र सदसद्रू पमित्याहु सदमत्पतिरित्यपि । तं शिव मुनय केचित्प्रवदति च सूरय ॥३ भूतभावविकारेण द्वितीयेन स उच्यते । वनक्त तेन विहीनत्वादव्यक्तमसदिस्यपि । ४ उभे ते शिवरूपे हि शिवादन्य न विद्यते तयो पनित्वाच्च शिव सदसत्पतिरच्यते ॥५ क्षराक्षरात्मक प्राहुः क्षराक्षरपर तथा ! शिव महेश्वर केचिन्मुनयस्तत्त्वचिंतका ॥६ उक्तमक्षरमव्यक्त व्यक्त क्षरमुदाहृतम् ।
श्री महेश्वर या सर्व० ] [२६५ स्पे ते शकरस्यैव तस्मान्न पर उच्यते ॥७ गहेश्वर या सर्व स्वरुप । इस अध्याय मे सर्व रूप महेश्वर को प्रपियो ने बहुत प्रकार से वर्णिन किया है अत: उसी तत्तत् सज्ञा वा वर्णन किया जाता है । सनत्युमार ने कहा-हे महान् मति वाले प्राप पुनरपि भगवान शिव का माहात्म्प वर्णन वीजिए । पाप तो सभी पुछ के शाता है, समस्त प्राणियों के अधिनाय हैं और महान् गुणो पाले हैं। दौलादि ने महा-है मुनिवर | बाप एपाय मन वाले होवर श्रवण करो, मैं पाप से भगवान् शिव या माहात्म्य कहता हूं। इस माहात्म्य को पोष्ठ मुनिगणो ने बहुत प्रकार से मना शब्दो के द्वारा कहा है ॥१॥ ।।२।। उम शिर को कुछ मुनिगण ने सद् और प्रमद् रूप वाला कहा है--निएय मुनियों ने सत् तथा असत् का पति भी उसको बतलाया है ॥३।। द्वितीय भूतभाव विकार से वह व्यक्त सदप कहा जाता है और उससे विहीन होन के कारण रौ अव्यक्त प्रमत् भी यह रहै जाने हैं ।।४।। और असत् दोनो ही शिव के ही हैं। शिन से अन्य पुछ भी नही है । उन दोनो । सत् पौर असत् ) ये पति होने से भगवान शिव सदसपति य है जाते हैं । ५॥ पर सारपसन के मत मनुसार बताया जाना है-मुछ तत्व मे चिन्ता परने वाले मुनिगण उस महायर शिव मोक्षर रापा पार स्यम्प याला तथा राक्षर से पर करते हैं। ॥६॥ पार पो भव्यक्त प्रौर क्षर को पक्त बनाया गया है। ये दोना ही रूप भगवान शहर ये ही होते हैं मत उससे पर नही यहा जाता है ॥७॥ तयो पर शिव गात धराधारपरो युधः । उपते परमार्यन महादेयो महेनर - समस्तध्यक्तरूप तु ततः स्मृत्वा स मुच्यते । ममहिस्यापि तु ममष्टिम्पटिगारगम् पदति ये निवाचार्या शिवं परमारणम् । गर्मा विदुरध्यक्त व्यष्टि व्यक्त मुनीभरा १० रूप से गदिते समोनस्रिपन्यदस्तुगमयम् । तयो मारणभावेन पियो हि परमेशर ॥११ २६६ ] [लिङ्ग पुराण उच्यते योगशास्त्रज्ञः समष्टिव्यष्टिकारणम् । क्षेत्रक्षेत्रज्ञरूपी च शिव. कैश्चिदुदाहृतः ॥१२ परमात्मा परं ज्योतिर्भगवान्परमेश्वरः । चतुर्विशतितत्त्वानि क्षेत्रशब्देन सूरयः ।।१३ प्राहुः क्षेत्रज्ञशब्देन भोक्तारं पुरपं तथा । क्षेप्रक्षेत्रविदावेते रूपे तस्य स्वयंभुवः ।।१४ बुधजनों के द्वारा महान् देव महेश्वर परमार्य रूप से क्षर-मक्षर से पर-परम शान्त एव शिव अर्थात् रल्याणमय कहे जाया करते हैं। सम्पूर्ण प्राणिमय क्षर होता है और यूटस्य प्रक्षर वहा जाता है । उस सकल भूतो के स्वरूप वाले भगवान शिव का स्मरण करके यह जीव मुक्त हो जाता है । अब योगियों के मत से यताते हैं-कुछ मत्स्पे- न्द्रादि प्राचार्यगए उन शिव को समोर व्यष्टि के स्वरूप याला तथा इस रामटि एवं व्यष्टि का पारण रूप बतलाते हैं मुष प्राचार्य- परण उस शिव यो परम धारण कहा करते हैं। मुनीश्वर भव्यक्त को ही समरि तया व्यक्त को व्यटिकहते है ॥१॥ ये दोनों ही शिव के ही रूप है और शिय से भिन्न अन्य वस्तु से होने वाला कोई भी इस बगद का पारण नही हैं ॥११॥ कुछ योग पास्त्र के गातामों के द्वारा इस समय समय मोर प्यार का कारण क्षेत्र क्षेत्र के रूप वाला यह भगमन नियहीबहा गया है ॥१२॥ मूरिगण मयांत महा मनीषी सोग नगे परम पारमा-गरम ज्योनि-भगवान् घोर परमेश्वर कहते हैं। ये पौधोस तरय हो ोत्र सम के द्वारा बहे जाते है ॥१॥का-ग रामद राम गय का भोला पुष्प पहा गया है। ये क्षेत्र और टोर में माता उय रयान पे ही दोनों होते है ॥१॥ नदिगिम जियानन्यदिति प्राहुर्मनीषिणः । पपरयगारा परमाणामक जिया ॥१५ गिटाहमहादेवमनादि नियनं प्रमुग। भूतियति.पणापानविषयामम् ॥१६ प्रपा fafe पर ला विदामाम् ।
[२६७ श्री महेश्वर का सव० ] ब्रह्मरणी ते महेशस्य शिवस्यास्य स्वयंभुवः ॥१७ शकरस्य परस्यैव शिवादन्यन्न विद्यते। विद्याविद्यास्वरूपी च शकर: कैश्चिदुच्यते ॥१८ धाता विधाता लोकानामादिदेवो महेश्वरः। विद्येति च तमेव'हरविद्येति मुनीश्वराः ।।१६ प्रपंचजातमखिलं ते स्वरूपे स्वयभुव. । भ्रातिविद्या परं चेनि शिवरूपमनुत्तमम् ॥२० अवापुर्मुनयो योगात्केचिदागमवेदिन । प्रर्थेषु बहुरूपेषु विज्ञान भ्रातिरच्यते ॥२१ महा मनीपीगण तो यही कहते है कि शिव के अतिरिक्त अन्य कोई भी वस्तु है ही नहीं। उसी को शाव्द ब्रह्मादि का स्वरूप तथा उसी शिव को पर ब्रह्मात्मक कहा जाता है ।।१५। कुछ लोग उसे अनादि निधन अर्थात् प्रादि तथा अन्त से रहित-महान् देव-प्रभु और जीवो के इन्द्रियाँ तथा अन्त करण जो हैं उनके शब्दादिक विषयो के स्वरूप वाले शिव को बताते हैं ॥१६॥ अपर ब्रह्म और चिदात्मक प्रर्थाद ज्ञानस्वरूप परब्रह्म निर्दिष्ट किये गये हैं। वे दोनो ही ब्रह्म पर पोर अपर स्वयम्भू इस महेश शिव के ही स्वरूप है ॥१७॥ यह शङ्कर ही पर है । इस शिव रो अन्य चुछ भी नहीं होता है । कुछ के विद्या और अविद्या के रूप घाला शङ्कर कहे जाते हैं ।।१८।। इन समस्त लोको का धाता-विधाता तथा प्रादिदेव महेश्वर ही विद्या-इस शब्द द्वारा कहा जाता है । मुनीश्वर इसी को विद्या कहते हैं ||१९| यह सम्पूर्ण प्रपच जात भी शिव का ही एक स्व- रूप है । भ्रान्ति-विद्या भोर पर ये सब परम उत्तम शिव के ही स्वरूप होते हैं । क्योकि उस शिव के अतिरिक्त अन्य तो कोई भी वस्तु है ही नहीं ॥२०॥ कुछ-मुनिगण उसे योग के द्वारा प्राप्त किया करते है और कुछ प्रागमो क महान् ज्ञाता होते हैं। इस प्रकार से बहुत-से रूप वाले अर्थों मे जो विशेष प्रकार का ज्ञान होता है वही भ्रान्ति कही जाती है ॥२१॥ मात्माकारेण संवित्तिबुंधविद्येति कोयते ।
{ लिङ्ग पुराण विकल्परहित तत्त्वं परमित्यभिधीयते ॥२२ तृतीयरूपमीशस्य नान्यरिकचन सवत । व्यक्ताव्यक्तज्ञल्पीति शिव कैश्चिाग्निगद्यते ॥३ विधाता सर्वलोवाना धाता च परमेश्वर । प्रयोविंशतितत्वानि व्यक्तशब्देन सूरय ॥२॥ वदत्यव्यक्तशब्देन प्रकृति च परा तथा । कथयतिज्ञशब्देन पुरुष गुणभोगिनम् ।।२५ तत्रय शावर रूप मान्यत्तिचिदशाकरम् ।०६ जो भात्माार स सवित्ति होती है उसे दुधजनो के द्वारा विद्या-इस नाम के द्वारा कहा जाता है। जो विकल्प से विल्कुल रहित तत्त्व हाता है वह ही परम इस शब्द के द्वारा पषित किया जाता है ।।२२।। उस ईश का तीसरा अन्य कुछ भी प नही होता है । यह सब प्रकार से देख लिया गया है। कुछ के द्वारा व्यक्त और अध्यक्त का ज्ञाता ही शिव का रूप है- एसा भी यहा जाता है ॥२३॥ सम्पूर्ण लोको का विधाता ( रचयिता) और धाता ( पोषक ) एव परमेश्वर तथा तईस तत्वो का समुदाय ये सब व्यक्त शब्द के द्वारा सूरि ( विद्वान् ) गण से स्पष्ट कहा गया है ॥२४॥ यह तीनो का समुदाय सब शगर का ही स्वरूप हाता है। प्रशाङ्कर अर्थात् शङ्कर से भिन्न तो कुछ भी है ही नहीं ॥२५॥२६॥ ।। ८५-शिव के पृथक-पृथक नाम-रूप ।। पुनरेव महाबुद्ध श्रोतुमिच्छामि तत्त्वत । बहुभिर्वहुधा शब्दै शब्दितानि मुनोश्वरै ॥१ पुन पुन प्रवक्ष्यामि शिवरूपाणि ते मुने। बबिहुधा शब्दै शब्दितानि मुनीश्वरै ॥र क्षेत्रज्ञ प्रकृतियक्त कालात्मेति मुनीश्वरै । उच्यते कैश्विदाचार्येरागमार्गवपारगै ॥३ क्षेत्रज्ञ पुरुष प्राह प्रधान प्रकृति बुधा । विकारजात नि शेष प्रकृतेर्व्यक्तमित्यपि ॥४ शिव के पृथक् पृथक् ] प्रधानव्यक्तयो काल परिणामैकवारणम् । त्तच्चतुष्टयमीशस्य रूपाणा हि चतुष्टयम् ।।५ हिरण्यगर्भ पुरष प्रध न व्यक्तरूपिणम् । कथयति शिव केचिदाचार्या परमेश्वरम् ॥६ हिरण्यगर्भ कर्तास्य भोक्ता विश्वस्य पूरुष । विकारजात व्यक्ताख्य प्रधान कारण परम् ॥७ शिव के पृथक २ नाम तथा रूप । इस अध्याय मे बहुत से मुनि- गणो कद्वारा परिणत भगवाम् शिव के अनेक नाम तथा रूपो को ही चतलाया जाता है । सनत्कुमार बोले-हे महान बुद्धि वाले । मुनीश्वरो ने अनेक प्रकार से विभिन्न बहुत शब्दो के द्वारा शिव स्वरूप तथा उनक नाम लित किये हैं। मैं तो रत्त्व स्वरूप से उनका पुन श्रवण करने की इच्छा करता हूँ। शैलादि ने कहा-हे मुनिवर 1 मैं आपके समक्ष में जो मुनीश्वरो ने वहुधा वहुत से शब्दो के द्वारा उनको कहा है बार-बार बताऊँगा ॥१॥२॥ वेद रूपी सागर के पारगामी मर्यात् वेदाथ तत्वा के परिपूण झाता मुनीश्वरा 7 जो कि महान प्राचाय हुए हैं। ऐस कुछ ने क्षेत्रज्ञ प्रकृति व्यक्तबालात्मा इन नामो से उसका वणन किया है ॥३॥ बुध लोग क्षेवन पुरप को कहत हैं और प्रकृति को प्रधान पहा करते हैं । सम्पूर्ण विहति से समुत्पन्न यह दृश्य स्वरूप को प्रकृति का व्यक्त रूप भी कहा जाता है ॥४॥ प्रधान और व्यक्त का परिणाम का एक पारण काल है यह चौगडडा मर्यात् चारो का समुदाय ही ईश के स्पो या चतुष्य होता है । ५। कुछ प्राचाय्य गरग उस परमश्वर शिव को हिरण्यगम पुरुष प्रधान मोर व्यक्त प याना इन प्रय चार प्रकार पी सज्ञाम्रो वाला कहते हैं ॥६॥ हिरण्यगम तो इस ममूग विश्व का वर्ता प्रर्यात मष्टा है और पुरुष इमक भोग करन वाला भोक्ता होता है । जितना भी विकृति से समुत्पन्न यह समस्त प्रपच है वही व्यक्त इस नाम से कहा जाता है एवं प्रधान इस सब वा परम कारण होता है ॥७॥ तेपा चतुष्टय युद्धे शिवरूपचतुभ्यम् । प्रोच्यत शवराद यदस्ति वस्तु न चिन । ८ २७० ] [ लिङ्ग पुराण पिंडजातिस्वरूपोतु कथ्यते कश्चिदीश्वरः। चराचरशरीराणि पिंडाख्यात्यखिलान्यपि ॥ सामान्यानि समस्तानि महासामान्यमेव च । कथ्यंते जातिशब्देन तानि रूपाणि धीमतः॥१० विराट् हिरण्यगर्मात्मा कैश्चिदीशो निगद्यते । हिरण्यगर्भो लोकाना हेतुर्लोकात्मको विराट् ॥११ सूत्राव्याकृतरूपं त शिव शंसंति केचन । अव्याकृतं प्रधान हि तद्र पं परमेष्ठिन. ॥१२ लोकायेनेव तिष्ठति सूत्रे मणिगणा इव । तत्सूत्रमिति विज्ञयं रूपमद्भुत विक्रमम् ।।१३ अतर्यामी परः कैश्विकैश्चिदीशः प्रकोयते । स्वयंज्योतिः स्वयंवेद्यः शिव. शंभुमहेश्वरः ।।१४ यह चतुष्टय अर्थात् हिरण्यगर्भ मादि चारों का समुदाय एक बुद्धि का चतुष्टय है और यह शिव के स्वरूप के चार भिन्न भेद होते हैं तथा इनमे भी भगवान् शार से पृथक् अन्य कुछ भी नहीं है। ॥८॥ कतिपय महापुरुषों के द्वारा वह ईश्वर पिण्ड जाति के स्वरूप वाला कहा जाता है । ये समस्त चर और अचर के स्वरूप वाले पिण्ड इस नाम वाले रहे गये हैं ॥६सम्पूर्ण सामान्य पार्थिवत्व द्रव्यत्वादि और महा सामान्य द्रव्यादि त्रिक वृत्ति सत्त्वरूप जाति शब्द से कहे गये हैं वे उस धीमान के रूप होते हैं ॥१०॥ कुछ विद्वानों के द्वारा हिरण्य गर्भात्मा विराट् ईश कहा जाता है । लोकात्मक विराट् हिरण्यगर्भ लोकों का हेतु है ॥११॥ कुछ लोग उस शिव को सूत्राव्याकृत रूप कहते हैं । परमी का अव्याकृत प्रधान तद्र है ।।१२।। ये समस्त लोक जिसके द्वारा हो सूत्र मे मणियो' के समूह की भांति स्थित रहते हैं । उस सूत्र को अद्भुत विक्रम वाला रूप समझना चाहिए । ॥१३।। कुछ लोग उसे पर अन्तर्यामी और पति- पय विद्वान् पुरुषो के ट रा यह ईश कहा जाता है । महेश्वर शम्भु शिव स्वय वेद्य अर्थात् जानने के योग्य हैं और स्वय ज्योति स्वरूप है ॥१४॥ सर्वेषामेव भनानामतर्यामी शिवः स्मृतः।
शिव के पृथक् पृथक् ]
[७१
सर्वेपामेव भूताना परत्वात्पर उच्यते ॥१५
परमात्मा शिव शभु शकर परमेश्वर ।
प्राजतजसविश्वारय तस्य रूपत्रय विदु ॥१६
सुपुप्तिस्वप्नजाग्रनमवस्थात्रय मेव तत् ।
विराट् हिरण्यगर्भाख्यमव्याकुतपदाह्वयम् ॥१७
तुरीयस्य शिवस्यास्त्र अवस्थात्रयगामिन ।
हिरण्यगम पुरुष काल इत्येव कोतिता. १०
तिस्राऽवस्था जगत्सृष्टिस्थितिसहारहेतव ।
भवविष्णुविरिचाख्यमवस्थात्रयमोशितु ||१६
प्राराध्य भक्त्या मुक्ति च प्राप्नुवति शरीरिण ।
वर्ता क्रिया च कार्य च करण चेति सूरिभि ॥२०
शमोश्चत्वारि रूपाणि कोत्यंते परमेष्ठिन. ।
प्रमाता च प्रमाण च प्रमेय प्रमि स्तथा । २१
समस्त प्राणियो के हृदय में स्थित अन्तयामी शिव कहे गये हैं।
समस्त भूतो से परत्व होने के कारण यह पर कहे जाते हैं ॥१५॥ शम्भु
परमात्मा शिव शार और परमेश्वर हैं। उसके प्राज्ञ तेजस और विश्वारूप
य तीन रूप जाने गय है ।।.६ये सुपुष्ठि स्वप्न और जाग्रत तोन प्रव-
स्थाएं ही होती हैं । विराट हिरण्यगर्भाय और अध्याकृत यदाह्वय
अर्थात् अम्याकृत पद के नाम वाले होते हैं ॥१७॥ तीनो अवस्थामो मे
गमन करने वाल इम तुरीय शिव पे हिरण्यर्ग-पुरुष और काल ये ही
नाम प्रकीर्तित हुए हैं ॥१८॥ तीन अवस्याएं हैं जो जगत् का सृजन-
जगत् की स्थिति या पालन और सहार का कारण नामो वाली हैं । उस
ईशिता के ही भव विष्णु और विचि नाम वाली तीन अवस्थाएं होती हैं
जिनमे क्रम से सहार स्थिति और सृजन का पृथक् कर्मों का सम्पादन
होता है ।।१६। इसका समाराधन भक्ति से करके शरीर धारी प्राणी
मुक्ति को प्राप्त किया करते हैं । सूरिगण के द्वारा यह कर्ता-वार्य क्रिया
और करण कहा जाता है ॥२०॥ उस परमे। ये चार रूप कीर्तित किये
जाते हैं जिनके नाम प्रमाता प्रमाण प्रमेय और प्रमिति होते हैं ॥२१॥
२७२ । । लिङ्ग पुराण चत्वार्यतानि रूपाणि शिवस्यैव न संशय । ईश्वराव्याकृतप्राणविराट भूतेंद्रियात्मकम् ।।२२ शिवस्यैव विकारोऽय समुद्रस्येव वीचय । ईश्वर जगतामानिमित्त कारण तथा ॥२३ अव्याकृत प्रधान हि तदुक्तं वेदवादिभिः । हिरण्यगर्भ. प्राणाख्यो विराट् लोकात्मक स्मृतः ॥२४ महा भूतानि भूतानि कार्याणि इन्द्रियाणि च । शिवस्यैतानि रूपाणि शसति मुनिमत्तमाः २५ परमात्मा शिवादन्यो नास्तीति कवयो विदु । शिवजातानि तत्त्वानि परविशन्मनोषिमि ॥२६ रक्तानि न तदन्यानि सलिलादूमिवृदवत् । पचविंशत्पदार्थम्य शिवतत्त्व परं विदु ॥२७ तानि तम्मादनन्यानि सुवर्णकट कादिवत् । मदाशिवेश्वराणानि तत्त्वानि शिवतत्त्वत ॥ जातानि न तदन्यानि मृद्रव्य कुभमेश्वत् । माया विद्या क्रिया शक्ति नशक्ति क्रियामयो । जाता शिवान्न सदेह किरणा इव सूर्यत । सर्वात्मक शिव देव सर्वाश्रयवि पायिनम् ।।३० भजस्व सर्वभावेन श्रेयश्चेत्प्र तुमिच्छसि ॥३१ ये चारो रूप ईश्वर अव्याकृत प्राण विराट् तथा भूतेन्द्रियात्मक शिव के ही होते हैं - इसमे कुछ भी सशय नही है । ॥२२॥ समुद्र की तरङ्गा के समान यह भगवान् शिव का ही विकार है । वह सम्पूर्ण जगतो का ईश्वर जाना गया है तथा निमित्त कारण भी है ॥२३॥ वेदो के वादियो के द्वारा वह मव्याकृत प्रधान कहा गया है । हिरण्य गर्भ प्राणास्य लोकात्मा विराट् कहा गया है ।।२। मुनिश्प्रगण महाभूत- भूत प्रौर इन्द्रियो य सब उसके भगवान् शिव के ही रूप एवं कार्य करते हैं ॥२३॥ शिव से अन्य कोई परमात्मा नही है ऐसा यि लोग उसको हो पर यहते हैं । मनोपियो के द्वारा पचीस तत्वो वो शिव से समूतान रुद्र के विग्रह.] [२७३ कहा जाता है ॥२६॥ उनसे अन्यों को सलिल से अभियो के समूह के समान ही कहा गया है । इन पच विशति ( पचीस) पदार्थों से शिव तत्त्व पर जाना गया है ।।२७।। वे सब उगसे अन्य नहीं होते हैं जैसे सुवर्ण से कटक स्वरूप मे भिन्नाकृति वाना होकर भी सुवर्ण से अन्य पदार्य कभी नही होता है। सदाशिव पानि तत्त्व शिव तत्व से ही उत्पन्न हुए हैं और उससे अनन्य हैं अर्थात् मन्य नही हुआ करते है जिस प्रकार से मिट्टी का द्रव्य कुम्भ आदि भेद हुमा करता है । मिट्टी से समुत्पन्न होकर कुम्भ इस नाम से एक विशेष भेद वाला कुम्भ यह नाम मात्र होने पर भी मिट्टी से वह अन्य नहीं होता है । माया-विद्या क्रिया शक्ति-किया मयी ज्ञानशक्ति ये सब शिव से समुत्पन्न हुई है और सूर्य से उत्पन्न उसकी किरणो के हो तुल्य होती है - इसमे कुछ भी सशय नहीं है । शिव सर्वा- त्मक और सब के प्राश्रयो पा करने वाला देव है ॥२८॥२६॥३०॥ यदि श्रेय प्राप्त करने की इच्छा करते हो तो उसी को सर्वतो भाव से भजन करो ॥३२॥ ॥८६-रुद्र के विग्रह से विश्वोत्पत्ति ।। भूयो देवगणश्रेष्ठ शिवमाहात्म्यमुत्तमम् । शृण्वतो नास्ति मे तृप्तिस्त्वद्वाक्यामृतपानत ॥१ क्थ शरीरी भगवान् कस्माद्र प्रतापव न् । सर्वात्मा च कथ शम्भु कथ पशुपत ब्रम् ॥२ कथ चा देवमुख्यश्च श्रुनो दृष्टश्च शकर । अव्यक्तादभवत्स्थ णु शिव परमव रणम् ॥३ स सर्वकारणापेन ऋषिविश्व धिक प्रभु । देयाना प्रथम देव जायम न मुम्बाम्बजात् ॥४ ददर्श चाग्रे ब्रह्म ण चाज्ञया तमवक्षत । दृष्टो रुद्रण देवेश ससर्ज सकल च स ॥५ वर्णाश्रमव्यवस्थाश्च स्थापयामास वै विराट् । सोम ससर्ज यज्ञर्थ सोमादिदमजायत ॥६ २५४ ] [ लिङ्ग पुराण चरुश्च वह्नियंज्ञश्च वज्रपाणि शचीपति । विष्णुर्नारायणः श्रीमान् सर्व सोममय जगत् ।।७ रुद्र के विग्रह से विश्वोत्पत्ति ) इस अध्याय मे सगुण रुद्र भगवान् के विग्रह से इस विश्व की उत्पत्ति और देवो को उपदेश वरिणत किया गया है । सनत्युमार ने कहा-हे देव के गणो मे श्रेष्ठ । प्राप के मुखनि मृत याक्यामृत के पान करने स अभी मुझे तृप्ति नहीं हुई है। यद्यपि मैंने सब श्रवण किया है उस परमोत्तम भगवान शिव के माहात्म्य को पुन श्रवण पराा चाहता हूँ ॥१॥ भगवान से शरीरधारी हुए और रुद्र किस तरह प्रताप याले बने ? सर्वात्मा सम्मु किस तरह हैं और पाशुपत प्रत विस प्रकार का है । मुस्य देवो ने शवर उसे किस भौति श्रवण किया था सपा देशा पा ? दोलादि ने कहा- परम कारण शम्भु स्थाणु अध्यत्त से हुए थे ॥१॥२॥ जो नि सब ये परम करण स्यरूप इस ससार रूप मण्डप पे स्तम्भ-पल्यापारमा शिव प्रभु मुखाम्युज से समस्त देवतामों के पहिल समुतन हुए थे ॥४॥ पपी मामने उ7 शिव प्रभु ने ग्रह्मा यो देसा पा पोर पारमेश्वरी भागा ये राहित हरिपाल दिया था। ये हाराहट (दंगे गय) उम देवेश ने सबन जात् का मजा रिया या ॥५॥ उग विराट ने वरणों और पाश्रमो यो व्यवस्था स्थापित की थी पौर या लिये मोम का गृजा पिया था और फिर सम से यह उमहमा पापा यहि या वय हाथ में धारण परापाले इन्द्र देव जोशमी स्वामी है मौर श्रीमान् विष्णु नारायण-ये सब जगह ग प्रसर से साममा रदाध्यायेन से देवा रद तुष्टुयुगेश्वरम् । प्रममयदनाम्यो देवाना मध्यन प्रभु । पादस्य च विधानमेपामेव मरेश्वरः। देवशायदास देव को भय निति नाम् । पत्रवीभगवानुग्दा वामेका पुराता । पाम प्रपम एका यामि मुगामा १० भविष्य मिप गोरेगमसा नायः मुनश्चन ।
रुद्र के विग्रह [२७५ व्यतिरिक्त न मत्तोऽस्ति नान्यत्किचित्सुरोत्तमा ११ नित्योऽनित्योऽहमनधो ब्रह्माह ब्रह्मणस्पति । दिशश्च विदिशश्चाह प्रकृतिश्च पुमानहम् ।।१२ त्रिष्टुब्जगत्यनुष्टुप् च च्छदोह तन्मय शिव । सत्योह सवंग शातम्नेताग्निगौरव गुरु ॥१३ गौरह गह्वरश्वाह नित्य गहनमानर । ज्येष्ठोह सर्वतत्त्वाना वरिष्ठोहमपा पति ॥ ४ उन देवगरण ने रुद्राध्याय के द्वारा ईश्वर रुद्र का स्तवन किया था। उस समय में प्रभु रद्रदेव प्रसन्न मुख वाले होकर सम्पूर्ण देवो के मध्य मे स्थित हो रहे थे। ।।८।। महेश्वर देव न इन सब का विशेष ज्ञान का उस समय अपहरण करके ही अपनी स्थिति बनाई थी। समस्त देवो ने भग वान् शकर से पूछा था 'पाप कौन हैं ? तब भगवान् रुद्र ने उन से कहा था-मैं एक परम पुरातन था, हे सूरोत्तमो ! मैं ही मबसे प्रथम यह वतन किया करता हूँ॥१०॥ हे श्रेष्ठ देवगण इस लोग म मैं ही होऊगा और मुझमे अन्य कही भी कोई नहीं है । गुझसे व्यतिरिक्त भी अन्य कुछ नहीं है ॥११॥ मैं नित्य प्रनित्य मैं हूँ। ब्रह्मणस्पति अनध ब्रह्मा मैं हूँ - दिशा और विदिशा प्रकृति और पुमान् में है ॥१२॥ त्रिष्टुप् जगती और अनुष्टुप् तमय शिव मैं ही छ द स्वरूप हूँ । सत्य- सवत्र गमन करने वाला शान्त श्रेताग्नि गौरव गुरु मैं हूं ॥१२॥ मैं ही गो हूँ मोर गहन गोचर नित्य गह्वर भी मैं हूं। मैं समस्त तत्वो सबसे ज्येष्ठ ( बडा) और वरिष्ठ अपाम्यति हूँ ॥१४॥ प्रापोह भगव नीश-तजोह वेदिरप्यहम् । ऋग्वेदोह यजुर्वेद सामवेशेहमात्मभू ॥१५ अथर्वरगोह मोह तथा चागिरमा वर । इतिहासपुराणानि कल्पोह कल्पनाप्यहम् ।। ६ अक्षर च क्षर चाहक्षाति शातिरह क्षमा । गुह्योह सववेदेपु वरेण्योहमजोप्यहम् ॥१७ पुष्कर च पवित्र च मध्य चाह तत परम् ।
२७६ ] [ लिङ्ग पुराण बहिश्चाई तथा चांतः पुरस्तादहमव्ययः ।। ज्योतिश्वाह तमश्चाहं ब्रह्मा विष्णुमहेश्वरः । बुद्धिश्चाहमहकारस्तन्मात्राणीद्रियाणि च ॥१६ एव सर्व च मामेव यो वेद सुरसत्तमाः। स एव सर्ववित्सर्वं सत्मिा परमेश्वरः ।।२० गां गोभिर्ब्राह्मणान्स ग्राह्मण्येन हवी पि च । प्रायुपायस्तथा सत्य सत्येन सुरसत्तमा. ॥२१ धर्म धर्मेण सर्वाश्च तर्पयामि स्वतेजसा । इत्यादी भगवानुक्त्वा तत्रैवानरधीयत ॥२२ नापश्यंत ततो देवं रुद्र परमकारणम् । ते देवाः परमात्मानं रुद्र ध्यायति शंकरम् ।।२२ सनारायणका देवाः सेंद्राश्च मुनयस्तथा । तथोलबाहवो देवा रुद्र स्तुन्वति शकरम् ।।४ मै ही जल हूँ तथा भगवान् ईश-तेज तथा वेदि भी मैं ही हूँ। ऋग्वेद यजुर्वेद एव सामवेद और प्रात्मभू मै हूँ ॥१५॥ मै अङ्गिरसो मे श्रेष्ठ चतुर्थ वेद स्वरूप अथर्वरण मन्त्र में हूं-इतिहास भारतादि रूप-कर्म प्रयोग रचनात्मक कल्प तथा जगत्प्रकलुप्ति कल्पना भी मैं ही हूँ॥१६॥ अक्षर क्षर-क्षान्ति शान्ति क्षमा मै ही हूँ । समग्र वेदों में परम गुह्य-वरेण्य और प्रज भी मै हूँ ॥१७॥ पवित्र पुष्कर अर्थात् हृत्सरोज रूप तथा उस- का मध्यभाग-वहिर्भाग-अन्तर्भाग-पुरस्तात् और अव्यय में ही हूँ॥१८॥ ज्योति-तम-ब्रह्मा, विष्णु पौर महेश्वर भी मैं हूँ। बुद्धि-अहङ्कार-तन्मात्रा और समस्त इन्द्रियगरण मै हूँ ॥१॥ है सुरश्रेयो ! इस तरह से सभी पुछ जो मुझ को ही जानता है वह ही सर्ववेत्ता-सर्व-सर्वात्मा और परमे- श्वर है ।।२०।। मै वाणी को वेदो के द्वारा, ब्राह्मण्य से सम्पूर्ण ब्राह्मणो को पौर हवियो को, प्रायु से प्रायु को, सत्य से सत्य को मै तृप्त करता हूँ। हे मुरसत्तमो ! धर्म से धर्म को और अपने तेज से सब का तर्पण विया करता हूँ-इतना कहकर भगवान् वहाँ पर ही अन्तहित हो गये थे ॥२१॥२२॥ इसके पश्चात् देवो ने उस परम कारण रुद्रदेव को नही ब्रह्मादि देवो द्वारा०] [२७७ देखा था। वे देवगरण परमात्मा रुद्र स्वरूप शवर का ध्यान दिया करते हैं । नारायण के सहित तथा इन्द्र के साथ देवगरा तथा मुनिवृद सब ऊपर को वाहु वाले होकर भगवान् रुद्र श र का स्तवन करते हैं ॥२३॥२४॥ ।। ८७-ब्रह्मादि देवों द्वारा महेश स्तुति ।। य एष भगवान रुद्रो ब्रह्म विष्णुमहेश्वरा । स्कदश्चापि तथा चेद्रो भुवनानि चतुर्दश । अश्विनी ग्रहताराच नक्षत्राणि च स दिश ॥१ भूतानि च तथा सूर्य सोमश्चानी ग्रहास्तथा । प्रारण कालो यमो मृत्युरमृत परमेश्वर ॥२ भूत भव्य भविष्यच्च वतमान महेश्वरः । विश्व कृत्स्न जगत्सर्व सत्य तस्मै नमोनम ॥३ स्वमादौ च तथा भूतो भूर्भुव स्वस्तथैव च । अ ते त्व विश्वरूपोऽसि शपं तु जगत सदा ॥४ ब्रह्मास्त्व द्विविधार्थमधश्च स्व सुरेश्वर शातिश्च त्व तथा पुष्टिस्तुश्विाप्पहुत हुतम् ॥५ विश्व चैव तथाविश्व दत्त बादत्तमीश्वरम् । कृत चाप्यकृत देव पर प्यपर ध्रुवम् । परायण सता चैव ह्यमतामपि शकरम् ॥६ प्रपामसोमममृता अभूमागन्म ज्योतिरविदाम देवान् । किं नूनमस्मा-कृणवदराति किमु धूतिरमृत मर्त्यस्य ॥७ (ब्रह्मादि देवो के द्वारा महेश स्तति) इस अध्याय में ब्रह्मादि देव- ता के द्वारा की हुई शकर की स्तुति पाशुपत व्रत और उनके प्रसाद का निरूपण किया जाता है । देवो ने कहा-~जो यह भगवान् रुद्र है वही ब्रह्मा विपशु तथा महश्वर हैं और वही स्कन्द-इन्द्र एव चौदह भुवन हैं । अश्विनीकुमार ग्रह तारा नक्षत्र-अन्तरिक्ष दिशाएं -सम्पूरण भूत सूर्य सोम एव माठ ग्रह प्राण-काल-यम-मृत्यु अमृत-परमेश्वर-भूत-भव्य और वर्तमान २७८ ] [ लिङ्ग पुराण आदि यह सम्पूर्ण विश्व एव समस्त जगत् भगवान् महेश्वर ही का स्व- रूप है उस सत्य रूप के लिये हमारा सब का नमस्कार है और बारम्बार प्रणाम है ॥१॥२॥३॥ हे महेश्वर देव ! पाप ही प्रादि हैं तथा भूर्भुवः स्व. भी प्राप ही हैं । पाप अन्त मे विश्वरूप हैं और सवंदा इस जगत् के शीर्ष हैं ॥४॥ माप अद्वितीय ब्रह्म हैं जिसके कि प्रकृति एव पुरुप हो तथा ब्रह्मा-विष्णु और महेश्वर तीन रूप अर्थ होते हैं अर्थात् उसी अद्वितीय एक के ये सर स्वरूप होते हैं । हे सुरेदवर ' तुम सब के आधार हो, पाप शान्ति-पुष्टि तुष्टि-दुत और अदुत भी हो ॥५॥ माप विश्व प्रविश्व, दत्त-प्रदत्त और ईश्वर हैं । पाप कृत-प्रवृत, परदेव-अपर, ध्रुव सत्पुरुषो के परायण और असत्पुरयो के भी परायण शकर हैं ॥६॥ हमने नेत्रो से इस शिव स्वरूप भमृत का पान दिया था। उस अमृत पान से हम लोग मुक्त हो गये । शव ज्योति के घाम यो जाना चाहिए क्योकि वामादि के विजिगीषु देवो वो नही जानते हैं। यह शिवाराधन के शत्रु कामादि हम को क्या कर देंगे। इस विनाश शील पारीर प्रादि वाले मानव की इस विनाश शीलता का मिट जाना अमृत कहा गया है या कुछ भी नहीं एतज्जगद्वितं दिव्यमक्षरं सूक्ष्ममव्यवम् ।। प्राजापत्यं पवित्रं च सौम्यमग्राह्यमव्ययम् । अग्राह्यणापि वा ग्राह्य वायव्येन समोरणः ।। सौम्येन सौम्यं ग्रमति तेजमा स्वेन लीलया। तस्मै नमोऽरसंह महाग्रासाय शूलिने ॥१० इंदिस्था देवताः सर्वा हृदि प्रारणे प्रतिष्ठिता। हृदि त्वमसि योनित्य तिस्रो मात्रा पास्तु सः ।।११ गिरनोत्तरतश्नं व पादौ दक्षिणतस्तथा । यो चोत्तरत. माक्षात्स प्रोकार सनातनः ।।१२ प्रोकारो यः स एवेह प्रणवो व्याप्य तिष्ठति । अनंतस्तारमूक्ष्म च गुलिं वंद्युतमेव च ॥१३ परं ग्रह स ईशान एपो रुद्रः स एव च ।
ब्रह्मादि देवों द्वारा० ]
[२७६
भवान्महेश्वरः साक्षान्महादेवो न सशयः ॥१४
ऊर्ध्वमुन्नामयत्येव स ओंकारः प्रकीर्तितः ।
प्राणानवति यस्तस्मात् प्रणवः परिकोर्तितः॥१५
यह शिव स्वरूप जगत् का हित-दिव्य-अक्षर सूक्ष्म और अव्यय है
॥८॥ यह प्राजापत्य अर्थात् सब वा जगक-पावन-शान्त-वायु सम्बन्धी
स्पर्श गुण से वायु की भांति अग्राह्य मन से ग्राह्य भी स्वकीय सौम्य
चन्द्र तेज से परम शान्त अपने भक्त के अन्तकरण को अपने मे लीन
करता है उस मह तत्व वो भी ग्रस ने वाले अपसहर्ता भगवान् शूली के
लिये नमस्कार है । VIE१०॥ हृदय में स्थित समस्त देवता हैं और
हृदयाधिकरण प्राण में प्रतिष्ठित हैं जो कि प्राण स्वरूप प्राप हृदय मे
नित्य रहते हो और वह नादाख्य मात्रा रूप है ॥११॥ अब उस मोद्धार
रूप का वर्णन किया जाता है -शिर मूर्ध स्थानापन्न प्रकार उत्तर भाग
है तथा पाद पर्यात् पादस्वामापन मकार साक्षात् मध्यभाग दक्षिण में
है । जो उकार उत्तर भाग मे सश्लिष्ट है वह सनातन प्रोडार शिव हैं।
वह ही प्रोकार प्रणव है जो यहां व्याप्य होकर स्थित होता है। वह
अनन्त-तार-सूक्ष्म वैद्य त-शुक्ल परब्रह्म-ईशान और एक प्रणव परिकी-
तित किया गया है । ॥१२॥१३॥१४||१५||
सर्व व्याप्नोति यस्तस्मात्सर्वव्यापी सनातनः ।
ब्रह्मा हरिश्च भगवानाधत नोपलब्धवान् ॥१६
तथान्ये च ततोऽनंतो रुद्रः परमकारणम् ।
यस्तारयति ससागत्तार इत्यभिधीयते ॥१७
सूक्ष्मो भूत्वा शरीराणि सर्वदा ह्यधितिष्ठति ।
तस्मात्सूक्ष्मः समाख्यातो भगवान्नोललोहितः ॥१८
नीलश्च लोहितश्चैव प्रधानपुरुषान्वयात् ।
स्कंदतेऽस्य यतः शुक्र तथा शुक्रमपति च ।।१६
विद्योतयति यस्तस्माद शु तः परिगीयते ।
बृहत्वाबृहणत्वाच्च बृहते च परापरे ॥२०
तस्माद्धृहति यस्माद्धि परं ब्रह्मति कीर्तितम् ।
२८० [लिज पुराण प्रद्वितीयोऽथ भावास्तुरीय परमेश्वर.॥२१ वह उच्चार्य माण प्रोपर सम्पूर्ण शरीर को ऊपर को उन्नमित किया करता है-प्राणों की रक्षा करता है प्रतएव यह 'प्रणय' - इम नाम से कहा गया है । वह राम को व्याप्त पर स्थित रहता है इसी धारण से वह गनातन एव सर्वपापी है । ब्रह्मा हरि भगवान ने उसरे प्रायन्त को प्राप्त नहीं दिया था ॥१६॥ तथा अन्यो ने भी विमो ने उसे प्राय नहीं दिया है इसीलिये वह मनन्त है और रद्रा परम कारण है। जो इस समार से सन्तारण करता है प्रतएव यह 'तार'-इरा नाम वाला रहा जाया करता है ॥१७॥ वह मूक्ष्म होपर समस्त शरीरी मे व्याप्त होता हुआ मवंदा पधिष्ठित रहता है । मोलिये वह भगवान् नौल लोहित सूक्ष्म' - इस माम से समात्यात होत है ॥१८॥ प्रधान पुरुष के सयोग से नील और रोहित इसरा शुक्र स्थन्दित होरर पर स्थान को जाता है प्रतएव गुक'-इम नाम से कहा गया है ॥१६॥ जो विद्यो- तित किया करता है इसीलिये उसे 'वैद्युत -इस नाम वाला परिगीत किया जाता है । परावर ऐहिका मुकिक रूप मे जो रि वृहत है यह वृहित अर्थात् पोषित किया करता है इसी कारण से उसे 'अम'-इस नाम से कहा गया है। वह तुगेप भगवान् परमेश्वर अदिनीय है ॥२०॥२१॥ ईशानमस्य जगत स्वईशा चक्षुरोश्वरम् । ईशानमिद्रसूरय सर्वपामपि सर्वदा ॥२२ ईशान सर्वविद्याना यत्तदीशान उच्यते। यदीक्षते च भगवानिरीक्ष्यमिति चाज्ञया ॥२३ आत्मज्ञान महादेवो योग गमयति स्वयम् । भगवाश्चोच्यते देवो देवदेवो महेश्वर ॥२४ सर्वालोकान्क्रमेणव यो गृह्णाति महेश्वर । विसृजत्येष देवेशो वासयत्यपि लीलया १२५ एपो हि देव प्रदिशोऽनुसर्वा पूर्वो हि जातः स उ गर्भे अंत । स एव जात स जनिष्यमाण प्रत्यड मुखास्तिष्ठति सर्वतोमुख ।२६ २८० [ लिज पुराग प्रद्वितीयोऽय भगवास्तुरीय परमेश्वर ॥२१ पह उमार्य माण प्रोफार सपूर्ण शरीर को ऊपर को उन्नमित किया करता है-प्राणों की रक्षा करता है प्रतएय वह प्रणव नाम से कहा गया है । वह सब को व्यास रखे स्थित रहता है इगी पारण से वह सनातन एव सर्वव्यापी है । ब्रह्मा हरि भगवान् ने उसके प्राधन्त को प्राप्त नहीं दिया था ॥१६॥ तथा प्रन्यो ने भी विसी ने उसे प्रास नहीं लिया है इसीलिए वह मनत है भोर रुद्र र परम कारण है। जो इस समार से सन्तारण करता है अतएव वह 'तार'-इरा नाम वाला यहा जाया करता है ॥१७॥ वह मूक्ष्म होकर समस्त परोरा में ध्यास होता हुप्रा मर्वदा मधिष्टिन रहता है । इगीलिये वह भगवान् नील लोहित 'मूक्ष्म' - इस नाम से समास्यात होते हैं ॥१८॥ प्रधान पुरुष के सयोग से नील पोर रोहित इसका शुक्र स्थन्दित होकर पर स्थान को जाता है अतएव शुक'-इस नाम से कहा गया है ॥१६॥ जो वह विद्या- तित किया करता है इसीलिये उसे 'वैद्य त-इस नाम वाला परिगीत किया जाता है । परादर ऐहिला मुक्किक रूप मे जो वि वहद है वह वृहित अथात् पोषित विणा करता है इसी कारण से उसे 'मम'-इस नाम से कहा गया है। वह तुरीय भगवान् परमेश्वर अद्वितीय हैं ॥२०॥२१॥ ईशानमस्य जगत स्वशा चक्षुरोश्वरम् । ईशानमिद्रसूरय सर्वेषामपि सर्वदा ॥२२ ईशान सर्वविद्याना यत्तीशान उच्यते। यदीक्षते च भगवानिरीक्ष्यमिति चाज्ञया ॥२३ आत्मज्ञान महादेवो योग गमयति स्वयम् । भगवाश्चोच्यते देवो देवदेवो महेश्वर ॥२४ सर्वांलोकान्क्रमेणव यो गृल्लाति महेश्वरः । विसृजत्येष देवेशा वासयत्यपि लीलया १२५ एषो हि देव प्रदिशोऽनुसर्वा पूर्वो हि जातः स उ गर्ने मत । स एव जात स जनिष्यमाण प्रत्यड मुखास्तिष्ठति सर्वतोमुख ।२६ ब्रह्मादि देवो द्वारा०] २८१ उपामितव्यं यत्नेन तदेतत्सद्भिरव्ययम् । यतो वाचो निवर्तते ह्यप्र प्य मनसा सह ॥२७ तदग्रहणमेवेह यवाग्वदति यत्नतः । अपर च परं वेति परायणमिति स्वयम् ॥२८ इम जगत् के ईशान स्वामी को स्वर्गलोक के देखने वालो के नेत्रों के सदृश नियन्ता को इन्द्र प्रमुख सूरिंगण सर्वदा सब का ईशान कहते हैं सर। समस्त विद्यापो के ईशान स्वामी हैं इस कारण से भी वह *ईशान' - इस नाम से कहे जाते है । यह शिव की ईशा सजा का हेतु निरूपिन दिया गया है। अब इनकी जो भगवत् यह सज्ञा होती है उस- का हेतु बतलाते हैं-देखने के योग्य भावो को देखते हैं । महादेव स्वय प्रात्म ज्ञान योग का अवगमन करते हैं अतएव देवो के देव महेश्वर भग- पान '- इस नाम वाले कहे जाते हैं ॥२३॥२४॥ जो सम्पूर्ण लोगो को क्रम मे ही ग्रहण किया करते हैं इसलिये महेश्वर हैं । यह देवेश सब का विसृजन करते है और लोला से ही उनको निवासित भी किया करते हैं ।।२५।। यह देव विश्वरूप से क्रीडा वरते हुए समस्त दिशाम्रो के स्वरूप वाले हैं । अर्थात् सम्पूर्ण दिशाम्रो मै व्याप्त रहने वाले हैं । यह इसी प्रसार से बाल व्यापक भी हैं क्योषि अनादि सिद्ध प्रभु ब्रह्माण्डोहर मे प्रविष्ट होकर यह स्वय ही उत्पन्न हुए हैं और पह ही जनिप्यमाए होते हुए सर्व वाल व्यापक होकर स्थित रहा करते हैं ।।२६॥ जहाँ मन के माथ वाणी भी निवृत्त होती है और किसी को भी पहुंच वहाँ तक नही होती है ऐसे अध्यय स्वरूप उस प्रभु की सत्पुरुषों को सदा प्रयत्नपूर्वक उपासना करनी चाहिए ।।.७॥ वाणी पडे यान से उसके विषय मे कहती है तो भी वह यहाँ ग्रहण नहीं दिया जाता है । वह पर है अथवा अपर है या स्वय परायण है ॥२८॥ वदंति वाचः सर्वज्ञ शंकर नीललोहितम् । एप सर्यो नमस्तस्मै पुरुष. पिंगल. शिवः । २६ स एप स महारुद्रो विश्व भूतं भविष्यति । भुवनं बहुधा जात जायमानमितस्तत ॥३० २८२) [ निङ्ग पुराण हिरण्यवाहभंगवान हिरण्यपतिरीश्वरः । अंबिकापतिरीशानो हेमरेता वृपध्वजः ।।३१ उमापतिविरूपाक्षो विश्वसृग्विश्ववाहनः । ब्रह्म एवं विदधे योऽसौ पुत्रमने सनातनम् ॥.२ प्रतिपाति स्म तस्यैव ज्ञानमात्मप्रकाशकम् । तमेक पुस्पं रुद्रपुरुहूतं पुरुष्टुतम् ॥३३ वालाग्रमा हृदयस्य मध्ये विश्व देव वह्निम्प वरेण्यम् । तमात्मस्थ येऽनुपश्यति धीरास्नेपा शाति. शाश्वती नेतरेपाम् ३४ महतो यो महीयाश्व हरणोरप्यग्गुरव्ययः । गुहाया निहि-श्चात्मा जोरस्य महेश्वरः ॥३५ वाणी नील लोहित शर को सर्वज्ञ पहनी हैं । यह ब्रह्मात्मक पिङ्गल पुरुष शिव स्वरूप है उनके लिये नमस्कार है ।।२६। यह महारुद्र जो यह विश्व प्रचेतन जड मूटि स्वरूप है मोर भूत चेतनात्मक है और चौदह भुवनो के स्वरूप में बहुत रूपो में समुत्पन्न होकर वर्तमान हैं ॥३०॥ हिरण्य वाहु भगवान् हिरण्य पति-ईश्वर मम्बिार पति-ईशान हेम- रेता-वृपध्वज उमापति-विरूपाक्ष विश्व सक्-विश्व वाहन इन नामो वाला जो प्रभु है उसने पहिले सनातन ब्रह्मा को पुत्र बनाया था । उमको हो प्रारमा के प्रकाश कर देने वाला ज्ञान प्रदान किया था वह एक पुरुष रुद्र-पुरुहूत-पुरुष्टुत-बालाग्रमान हृदय के मध्य में विश्व देव-वह्नि रूप- वरेण्य और प्रारमा मे स्थित उसको जो घोर देखते हैं उनको शाश्वती शान्ति हुआ करती है अन्य किन्ही को नही होती है ।।.११॥३२॥३॥ ॥३४॥ जो महान् से भी महीयान् है और जो अणु से भी अणु है- अव्यय है । वह महेश्वर इस जन्नु के गुहा में निहित प्रात्मा स्वरूप है ॥३५॥ वेश्मभूतोऽस्य विश्वस्य कमलस्थो हुदि स्वयम् । गह्वर गहन तत्स्थं तस्यातश्चोर्ध्वत. स्थित 1३६ तत्रापि दह्रगमनमोकार परमेश्वरम् । बालागमान तन्मध्ये ऋतं परमकारणम् ॥३३ ब्रह्मादि देवों द्वारा० ] [२८३ सत्य ब्रह्म महादेव पुरुष कृष्णपिगलम् । ऊर्ध्वरेतसमीशानं विरूपाक्षमजोद्भवम् ।।३८ अधितिष्ठति योनि यो योनि व.चैक ईश्वरः । देहं पवविधं येन तमोशाने पुरातनम् ॥३६ प्राणप्वंतर्मनसो लिंगमाहर्यस्मिन्क्रोधो या च तृष्णा क्षमा च । तृष्णां छित्त्वा हेतुजालस्त्र मूल बुद्धयाचित्यं स्थापयित्वा च रा४० एक तमाहुर्वे रुद्र शाश्वतं परमेश्वरम् । परात्परतरं वापि परात्परतरं ध्रुवम् ।।४१ ब्रह्मणो जनक विष्णोर्वयोः सदाशिवम् । ध्यात्वाग्निना च शोध्यांग विशोव्य च पृथक्पृथक् ॥ २ इस विश्व का वेश्म (घर) भूत हृदय मे स्वयं कमल मे स्थित है। उसके अन्दर और ार उममे स्थित गह्वर गहन है। वहाँ पर भी चालाममात्र दहर सज्ञा वाला गगन है और उसके मध्य में परमार्थ रूप से सत्य एव परम कारण प्रणव स्वरूप परमेश्वर शिव स्थित हैं ॥१६॥ ॥३७॥ सत्य-ब्रह्म-महादेव-पुरुष-कृष्ण पिङ्गल-ऊर्ध्वरेता-ईशान-विरूपाक्षा- अजोद्भः प्रौर योनि मे जो अधिष्ठित होता है वह सकल योनि में एक ही ईश्वर हाता है जिम योनि के प्रवेश के द्वारा पंच कोशात्मक देह को प्रहण किया करता है । उसी पुरप के देखने से स्थायी शान्ति प्राप्त होती है। प्राणियो मे मन के अलर में वह लिङ्ग रूप कहा गया है । जिसमे क्रोध और जो तृष्णा तथा क्षमा है। उम तृष्णा का छेदन करके बुद्धि से हेतुजात के मूल रूप जो अचिन्त्य है उसे रुद्र मे स्थापित करे ॥३॥ ॥३६॥४०॥ उस रुद्र को एक ही कहते हैं। वह रुद्र शाश्वत-परमेश्वर और परात्परतर एय ध्रुव है ॥४॥ वह सदाशिव ब्रह्मा-विष्रगु-वायु और वह्नि का जनक होता है। र बीज स्वरूप पग्नि के द्वारा पृथक्- पृथक् ध्यान करके अङ्गो का संशोधन करना चाहिए ॥२॥ पंचभूतानि सेयम्य मात्राविधिगुणकमात् । मात्राःपंच चतस्रश्च तिमात्रादिस्ततः परम् ॥४३ एकमात्रममात्र हि द्वादशति व्यवस्थितम् ।
२८४ ] [ लिङ्ग पुराण स्थित्वा स्थाप्यामृतो भूत्वा व्रतं पाशुपतं चरेत् ।।४४ एतद्व तं पाशुपतं चरिष्यामि समासतः। अग्निमाधाय विधिवग्यजु. सामसंभवैः ॥४५ उपोपितः शुचिः स्नात. शुक्लांबरधरः स्वयम् । शुक्लयज्ञोपवीतीच शुक्लमाल्यानुलेपनः ।।४६ जुया द्वरजो विद्वान् विरजाश्च भविष्यति । वायव. पच शुध्यंत वाङ मनश्चरणादयः ॥४७ श्रोत्रं जिह्वा ततः प्रारणस्ततो बुद्धिस्तथैव च । शिरः पाणिस्तया पार्श्व पृष्ठोदरमनंतरम् ॥४८ जधे शिभमुपस्थं च पायुमेंढ़ तथैव च । त्वचा च रुधिरं मेदोऽस्थोनि तथैव च ॥४६ शब्द. स्पर्श च रुपं च रसो गंधस्तथैव च । भूतानि चैव शुध्यतां देहे मेदादयस्तथा ॥५० अन्न प्राणे मनो ज्ञान शुध्यता व शिवे च्छया। हुत्वाज्येन समिभिश्च चरुणा च यथाक्रमम् ।।५१ उपसहृत्य रुद्राग्नि गहीत्वा भस्म यत्नतः। अग्निरित्यादिना धोमान् विमृज्यांगानि संस्पृशेत् ॥५२ अपने देह के प्रारम्भक जो पच भूत हैं उनका मानाविधि क्रम से अर्थात् शब्दादि गुणो की उत्पत्ति के क्रम से प्रविलापन करे । पथिव्यादि पांच मात्रा है-वे चार हो-फिर तीन मोर दो होकर एक हो तथा मात्रा रहित हो जावे तथा द्वादश तत्त्वो के अन्त तक हो । इस प्रकार से व्यवस्थित होर मृत हो जाये मोर ऐसी स्थिति मे होगर फिर पाशुपत व्रत समाचरण करना चाहिए ॥४॥४४यजु और सामवेद के मन्त्रों के द्वारा विधि-विधान के साथ अग्नि का प्राधान करके इस पाशुपत प्रत यो सदोष से यरूंगा। ऐमा प्रत या संग्ल्प है 1 पाशुपत व्रत परने वाला उपवास परे शुचि होवे-स्नान करे और फिर स्वयं गुरास बस धारण परे शुक्ल यज्ञोपवीत वाला मोर गुरल माला तपा अनुलेपन से युक्त होकर हवन करे । विरजा दीक्षा युग एवं भग्म का प्रह्मादि देवों द्वारा [२८५ धारण करना भी विद्वान होना चाहिए तभी इस पाशुपत व्रत की पात्रता सम्पन्न होती है । अपने सम्पूर्ण प्रङ्गियाङ्गों की शुद्धि इस प्रकार करे- मेरी पांचो वायु शुद्ध होवें वाक्-मन और चरण प्रादि शुद्ध हो-।।४।। ॥४६॥४७॥ प्रोव-जिह्वा-प्राण-बुद्धि शिर-पाणि-पार्श्वभाग-पृष्ठभाग- सदर-दोनों जां-शिम्नोपस्थ-पायु-मेढू-स्वचा-मांस-रुधिर-भेद-अस्थि- या-सन्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध-समस्त मन तथा देह में जो भेदादि हैं वे सब शुद्धि को प्रास होवें। भगवान् को शिव की इच्छा से मेरे अन्न- प्राण-मन और ज्ञान के समस्त कोश शुद्ध हो । समिधानो और घृत से अग्नि में हवन कर करके तया चरु से क्रमानुमार पाहूनियां देकर मद्राग्नि का उपस हार करे एवं यत्नपूर्वक फिर भस्म ग्रहण करे । 'अग्नि'- इत्यादि मन्त्रों के द्वारा बुद्धिमान् पुरुष को प्रङ्गो का विमार्जन कर उस असम से संस्पर्श करना चाहिए ॥४८॥४६॥५०॥५१॥५२॥ एतत्पाशुपत दिव्यं व्रतं पाशविमोचनम् ग्राह्मणानां हित प्रोक्त क्षत्रियारणा तथैव च ।।५३ वैश्यानामपि योग्यानां यतीना तु विशेषतः । वानप्रस्थाश्रमस्याना गृहस्थाना सतामपि ।।५४ विमुक्तिविधिनानेन दृष्ट्वा वै ब्रह्मचारिणाम् । अग्निरियादिना मस्म गृहीत्वा ह्मग्निहोत्रजम् । ५५ सोऽपि प शुतो विप्रो विमृज्यांगानि संस्पृशेत् । भस्मच्छन्ना द्विजो विद्वान् महापातकसभवः । ५६ पापविमुच्यते सद्यो मुच्यते च न संशयः । वीर्यमग्नेयतो मस्म वीर्यवान्भस्मसंयुतः ॥५७ भस्मस्नानरतो विप्रो भस्मशायी जितेंद्रिय । सर्वपापविनिमुक्तः शिवसायुजम प्नुयात् {ly: इस प्रकार से यह पाशुपत प्रत होता है जो पाशों या विमोचन करने वाला है । यह पाशुपत प्रत प्राणों को यहन रित परने पाला है तथा क्षत्रिय प्रौर वैश्यो का भी हित सम्पादक होता है जो इस करने के योग्य होते हैं । यतियों के लिये तो यह प्रत विशेष रूप से हिन को .
२८६ ] [ लिङ्ग पुराण वाला है । जो वानप्रस्य आश्रम में स्थित हैं या जो सत्पुरुष गार्हस्थ्य श्राश्रम मे स्थित हैं उन सब के हित का सम्पादन करने वाला यह पाशुपत अत होता है । ॥५३॥५४।। ब्रह्मचारियो की इस विधि से विमुक्ति देखकर "अग्नि" इत्यादि मन्त्र के द्वारा अग्निहोत्र समुत्पन्न भस्म ग्रहण करें और वह पाशुपत व्रत करने वाला विप्र विमार्जन कर अङ्गो का संस्पर्श करे । भस्म से च्छन्न विद्वान् द्विज महान पातो से तथा पापो से तुरन्त ही विमुक्त हो जाया करता है इसमे तनिक भी सशप नही है । यह मस्म अग्नि का वीर्य है । इसके संस्पर्श से भस्म सयुत पुरुप भी वीर्यवान हो जाता है ॥५५।।५६।। भस्म के द्वारा स्नान करने मे रति रखने वाला विप्र-भस्म मे दायन करने वाला और इन्द्रियो को जीत लेने वाला विष समस्त प्रकार के पापो से विमुक्त होकर अन्त मे भगवान शिव के सायुज्य की प्राप्ति करता है 11५७।।५८।। तस्मात्सर्वप्रयलेन भूत्यंग पूजयेद्बुधः। रेरेकारो न कर्तव्यस्तुतुकारस्तथैव च ॥५६ न तत्क्षमनि देवेशो ब्रह्मा वा यदि केगव. । मम पुत्रो भस्मधारो गणेशश्च वरानने ॥६० तेपा विरुद्ध यत्त्याज्यं स याति नरकार्णवम् । गृहस्थो ब्रह्महीनोपि त्रिपुड़ यो न कारयेत् ॥६१ पूजा कर्म क्रिया तस्य द न स्न नं तथैव च । निष्फल जायते सर्व यथा भम्मनि वै हुतम् ।।३२ तम्माच मर्वक र्येषु त्रिधारयेवुध । इत्युक्त्वा भगवान्ब्रह्मा स्तुता देवं. समं प्रभु ॥६३ भस्मच्छन्ने स्वय छन्नो विरराम विशापते । प्रय तेषां प्रमादार्थ पशना पनिगेश्वर ॥६४ सगरणश्यांश्या साधं स निध्यमकरोत्प्रभु । अथ संनिहितं रद्र तुष्टुवुः म् पुंगवम् ॥६५ रुद्राध्यायेन मर्वेशं देवदेव मुमापतिम् । देवोपि देवानालोक्य घृणया वृषभध्वज. ॥६६ ।
रविमडल मे उमा महेश० ] [२७ तुष्टोस्मीत्याह देवेभ्यो वर दातुसुरारिहा ॥६७ इमलिये सब प्रयत्नो के द्वारा बुध पुरुष को भूति के द्वारा अङ्गो का पूजन करना चाहिए तथा रेरेकार एव तु तु कार नहीं करना चाहिए ॥५६॥ भगवान् शिव देवी भस्म के धारण करने वाले की महिमा कहते हुए बतलाते हैं कि हे वरानने ! इसे देवो के ईश ब्रह्मा-केशव और भस्म धारण करने याला मेरा पुत्र गणेश भी उसको क्षमा नहीं करते हैं श्रत उनके जो विरुद्ध हो उसे त्याग देना चाहिए अन्यथा वह पुरुप नर- पाणंव में जाकर गिरा परता है । तप आदि से शून्य भी गृहस्थ पुम्प जो त्रिपुराड़ को धारण नहीं करता है उसकी सम्पूर्ण अर्चन क्यिा कर्म- दान-स्नान प्रादि निष्फल हो जाम करते हैं। उसका सभी कुछ किया हमा इसी भांति होता है जैसे भस्म मे दिया हुप्रा हवन विफल होता है ११५६।।६०।६१॥ २॥ इसलिये समस्त कार्यों में बुध पुरुष को त्रिपुराष्ट्र धारण पराा चाहिए । इतना कहकर भगवान् प्रभु ब्रह्मा देवी के साथ स्तवन करके जो कि सब भस्म से छन थे हे विशाम्पने । रबर भी भस्म से छन्न होकर विरत हो गये थे। ॥६३॥ इदे मनन्तर 7 सब के प्रसाद ५ लिये पशुप्रो पति ईश्वर प्रभु ने समस्त गणो के तथा जग- दम्बा क साथ सानिध्य किया था। फिर सुरी मे परम श्रेष्ठ रानिहित भगवान् रुद्र यी सब स्तुति करने लगे ॥६४॥६॥ सब स्वामी देवा के देव उमा के पति वा स्तवन रुद्राध्याय से दिया था । भगवान् वृषभध्वज शिव भी देवा का यही स्तुति करते हुए दसार कृपा वर यो-॥६॥ सुरा ये शत्रुमा वा हनन परने वाले प्रभु शिव न देवा को वरदान प्रदान परने किये उनस पहा- मैं तुम से परम प्रसप्प एप स.]ट हूँ ॥१७॥ ॥८८-रविमंडल मे उमा महेश पूजा-विधि ।। स प्रभु प्रीतमनस प्रणिपत्य वृषध्यजम् । मपृच्छ-मुनयो देवा प्रोनिपटस्तित्वच , भगवन् केन मार्गेण पूजनीयो द्विजातिभि । पुन वा पेन रूपेण यक्तुमर्हसि शरर .
२०८ } [लिङ्ग पुराण कस्याधिकारः पूजायां ब्राह्मणस्य कथ प्रभो। क्षत्रियाणां कथं देव वैश्याना वृषभध्वज ।।३ स्त्रीशूद्राणां कथं वापि कुडगोलादिनां तु वा। हिताय जगतां सर्वमस्माकं वक्तुमर्हसि ॥४ तेषा भाव समालोक्य मुनीनां नीललोहितः । प्राह गभीरया वाचा मंडलस्थः सदाशिवः ।। मंडले चाग्रतो पश्यन्देवदेव सहोमया । देवाश्च मुनयः सर्वे विद्युत्कोटिस-प्रभम् ॥६ अष्टबाहु चतुर्वक्त्र द्वादशाक्षं महाभुजम् । अर्ध नागेश्वर देवं जटामुकुटधारिणम् ॥७ ( रविमण्डल मे उमा-महेश की पूजा विधि ) इस अध्याय मै मुनि और देवो के द्वारा पूछे गये भगवान् महेश्वर से रवि के मण्डल मे ज्ञात पूजन की विधि का निरूपण किया जाता है । शलादि ने कहा-प्रीति से सयुत मन वाले वृषभध्वज प्रभु को प्रणाम करके प्रेम से रोमाञ्चित शरीर वाले देवगण और मुनियो ने उनसे पूछा था ॥१॥ देवो ने कहा- हे भगवन् ! हे शङ्कर ! द्विजातियो को किस मार्ग के द्वारा अर्थात् किस विधान से वही पर और विस रुप से पूजा करनी चाहिए - इसे आप बताने के योग्य होते हैं ॥२॥ हे प्रभो ! किस ब्राह्मण का पूजा करने में अधिकार होता है । हे वृसभध्वज ! क्षत्रियो तथा वैश्यो को किस प्रकार से पूजा करनी चाहिए ? ॥३॥ स्त्री तथा शूद्रो को एव कुण्ड और गोलक प्रादि को किस प्रकार से अर्चना करनी चाहिए ( पति के होते हुए पर पुरुप से और पति के अभाव मे जार से समुत्पन्न सन्तति गोलक वुटक कही जाती है)। है प्रभो ! समस्त जगतो के हित के लिये यह प्राप हम बता देने के योग्य होते हैं ॥४॥ सूतजी ने कहा- भगवान् नील लोहित शिव ने उनके भावो को भली-भांति समझ कर मण्डल मे स्थित भावान सदाशिव प्रभु गम्भीर वाणी से वोले-1|| मण्डल में आगे उमा के सहित देवो के भो देव का दर्शन करते हुए समस्त मुनिगण और देवो ने देखा कि सामने विद्युत्कोटि के समान प्रभा से युक्त पाठ वाहुप्रो रविमंडल में उमा महेश० ] [२८६ वाले चार मुखो से संयुत-बारह नेत्रों वाले तथा महान् भुजानो से सग- वित प्रभु विद्यमान हैं । वे अर्ध नारीश्वर देव जटा तथा मुकुट के धारण करने वाले हैं ॥६॥७॥ सर्वाभरगसंयुक्त रक्तमालगनुलेपनम् । रक्तांबरधरं सृष्टिस्थितिसंहारकाराम् ।। तस्य पूर्वमुख पीतं प्रसन्न पुरुपात्मकम् । अयोर दक्षिणं वन नी नाजनचयोपमम् ।। दंष्ट्राकरालमत्युग्र ज्वालामालासमावृतम् । रक्तश्मश्रुजटायुक्त चोत्तरे विद्रमप्रभम् ॥१० प्रसन्न वामदेव.ख्य वरदं विश्वरूपणम् । पश्चिमं वदन तस्य गोक्षीरधवलं शुभम् ।।११ मुक्ताफलमयहरिभूपितं निलकोज्यलम् । सद्योजातमुखं दिव्यं भास्करस्य स्मरारिणः ।।१२ प्रादित्यमग्रतो पश्यापूर्ववच्चतुराननम् । भास्कर पुरतो देव चतुर्वक च पूर्ववत् ॥१३ भानु दक्षिणतो देवं चतुर्वका च पूर्ववत् । रविमुत्तरतोऽपश्यत्पूर्व उच्चतुराननम् ॥१४ वह समस्त प्रकार के आभूपणो से युक्त हैं रक्त वर्ण की माला और अनुनैपन वाले हैं। - रक्त वस्त्र धारण किये हुए हैं-इस गम्पूर्ण मटि की स्थिति और सहार के घरने वाले हैं 151 उनका पूर्व मुप पोन. प्रसन्न और तत्पुष्प रूप है । दक्षिण मुस प्रपोर मोर नील प्रजन के ढेर के समान है || दष्ट्रा से पराल, अत्यन्त उन मोर ज्वालाकी माला से समान रक्तश्पर मे युक्त जटा से समन्धित तया विद्रुम को प्रभा के समान प्रभा वाला उत्तर में है ॥१०॥ परम प्रसन्न वामदेव नाम वाला-पर देने वाला-विश्व के रप से युक्त मोर गोरे दुग्ध एवं शुभ उसया पश्चिम मुल है ।।११॥ मुत्ता फ.सी से परिपूर्ण हारों से विभूषित-तिसर से प्रत्यन्त समगावल-स्मर में परि भास्कर का सद्योजात मग परम दिव्य है ।।१२।। अव उनके परिवार देवों को बतलाया जाता वे. तुल्य वेत २६.] [ लिङ्ग पुराण है--शिव के ही सदृश आगे प्रादित्य जो कि चार मुख वाले हैं उमको देख रहे हैं। सामने पूर्ववत् अर्थात् शिव के ही समान चार मुख वाले भास्कर देव हैं ॥१३॥ पूर्व की भौति चार मुखो से युक्त दक्षिण मे भानु देव हैं । उत्तर मे शिव के ही तुल्य चतुरानन रवि हैं जिनको कि देखा था ॥१४॥ विस्तारा मडले पूर्व उत्तरा दक्षिणे स्थिताम् । बोधनी पश्चिमे भागे मडलस्य प्रजापते ॥१५ अध्यायनी च कोवेर्यामेकवक्त्रा चतुर्भुजाम् । सर्वाभरणसपना. शक्तय सर्वसमताः॥१६ ब्रह्मपण दक्षिणे भागे विष्णु वामे जनार्दनम् । ऋग्यजु माममार्गेण मूर्ति त्रयमय शिवम् ।।१७ ईशान वरद देवमोशन परमेश्वरम् । ब्रह्मासनस्थ वरद धर्मज्ञानासनोपरि ॥१८ वैराग्यश्वयंसयक्त प्रभूते विमले तथा । सार सर्वेश्वर देवमाराध्य परम सुम्पम् ॥१६ सितपाजमध्यस्थ दीप्त धैरभिसंवृतम् । दोहा दीपशिखाकाग सूक्ष्मा विद्युत्प्रभा शुभाम् ॥२० जयामग्निशिखारा प्रभा वनक्सप्रभाम् । विभूति विद्र मप्रख्या विमला पद्म निभाम् ॥२१ प्रमोधा करिणकाकारा विद्युत विश्ववणिनीम् । चतुवया चतुर्वरी देवी चे सर्वतोमुग्वीम् ॥२२ पूर्व मण्डल म विस्तारा-दक्षिण में स्थित उत्तर-पश्चिम भाग में प्रजापति के मण्डल को बोधनी पौर विदी मे चार भुजामो वाली और एक वत्र से युक्त अध्यायती इस प्रकार से सम्पूर्ण प्रामगो से मायन एव सर्वसम्मत शक्तियां हैं ॥१५॥१६ दक्षिण भाग में आ वाम भाग म जाादन विष्णु तथा ऋ, यजु पोर साम ये मार्ग से तीन मूत्तियों से परिपूर्ण शिव हैं ॥१७॥ यर प्रदान करने वाल ईनास देर परमेश्वर ईमान धर्म पीर तान के पासन पे आर वरद ब्रह्मासन पर सस्थिा है|१८ रविमंडल में उमा महेश. ] [ २६१ वैराग्य और ऐश्वयं से संयुक्त-प्रभूत एवं विमल प्रासन पर हैं जो सार स्वरूप प्राराधना करने के योग्य एवं परम सुख स्वरूप देव हैं ॥१६॥ श्वेत पंकज के मध्य भाग में सस्थित और दीप्ताद्य पहिने बताई हुई नो शक्तियों से अभिसवृत हैं ! दीप्ता-दीप की शिखा ये प्राचार वाली मूक्ष्मा. विद्य प्रभा-शुभा-जया अग्नि की गिन्या के प्राकार वाली-भा-वनकमप्रभा. विभूति-विद्र मप्रख्या विमला-पम सनिभा-प्रमोघा-करिण के प्रार से युक्ता विद्युत्-विश्व पणिनी चार मुष पालो-चार पणों से रायुत पोर सर्वतोमुखी देवी को देखा था ॥२१॥२२।। सामम गारकं देवं युधं वृद्धिमतां वरम् । बृहस्पति वृहद द्धि भार्गवं तेजसा निधिम् ।।२३ मदं मदगति चैव समंत्तस्य ते सदा। सूर्यः शिवो जगन्नायः सोमः साक्ष'दुमा स्वयम् ॥२४ पनभूनानि शेषाणि तन्मयं च चराचरम् । दृष्टुं व मुनयः सर्वे देवदेवमुमापतिम् ।।२५ कृतांजलिपुटा: सर्वे मुनयो देवतास्तथा । अस्तुवन्वामिरिष्माभिर्वरदं नोललोहितम् ।।.६ नमः शिवाय स्द्राय कद् द्राय प्रचेतसे । मीदु:माय मर्याय लिपिविष्टाय रहमे ॥२७ प्रभूते विकले रा रे पाय रे पग्मे मुमे । मवशरत्यावृत देवं पयस्य भासारं प्रभुम् ।।२% उसो नारी पोर सदा मोम-प्रसारक देव युदमानो मे परम थे चुप-वृक्ष बुद्धि वाले वृहस्पनि-तेजो मी सान भागंध (शुरु एव मन्दगति रो चलने वाले पनीर को देना था । मूर्य-निय-जगत्राय गोम और शायं उमा तथा शेर भोलि यह ए वाले पंचना गगनादि ममरा पर घोर पर तमा है । इस प्रकार से समस्त मुनियों ने देयों के भी देर उमा पनि प्रभु रा दमंग परके हाय जोर रिये देव पोर मुनियों ने घर भगवान नोस लोहित प्रानो इष्ट पारियों के द्वारा स्तुनि पीपी । ॥२६॥२४॥२॥२६॥ प्रापियों ने वहा भगवान् नयामव १२] [ लिङ्ग पुराण शिव रुद्र-कद्द प्रचेता के लिये हमारा सब का नमार है । मोदुष्टम. सव शिपि विष्ट रह के लिये नमस्कार है ॥२७॥ प्रभूत विमल मार परम सुख आधार पर सस्थित नव शक्तियो से समावृत पमपर स्थित भास्कर प्रभु देव को हमारा प्रणाम है ।।२।। आदित्य भास्कर भानु रवि देव दिवाकरम् । उमा प्रभा तथा प्रज्ञा सध्या सावित्रिकामपि । विस्तारामुत्तरा देवी बोधनी प्रणमाम्यहम् । प्राप्यायनी च वरदा ब्रह्माण केशव हरम् । ३० सोमादि द च यथाक्रमेण सपूज्य म नैविहितक्रमेण । म्मरामि देव रविमडलस्थ सदाशिव शकरमादिदेवम् ॥३१ इन्द्रादिदेवाश्च तथेश्वराश्च नारायण पद्मजमादिदेवम् । प्रागाद्यवोवं च यथाक्रमेण वनादिपन च तथा स्मरामि ३२ सिंदूरवर्णाय समडलाय सुवरण वज्राभरणाय तुभम् । पमाभनेत्राय सपकजाय ब्रह्मद्रनारायणकारणाय ॥३३ रथ च सप्ताश्वमनूरुवीर गणं तथा समविध क्रमेण । ऋतुपवाहेण व वानविल्यास्मरामि मदेहगरणक्षय च ॥३॥ हुत्वा तिलाद्यविविधस्तथाग्नौ पुन सम प्यैव तथैव सर्वम् । उद्वास्प ह पफजमध्यसस्थ स्मरामि बिंब तव देवदेव ।।३५ प्रादित्य भास्कर भानु रवि-नेव दिवाकर को हमारा नमस्कार है। उमा-प्रभा प्रज्ञा सन्ध्या सावि त्रिका विस्तारा उत्तरा देवी और वोधनी को में प्रणाम करता हूँ। प्राप्यायनी वरदा को मेरा प्रणाम है । ब्रह्मा केशव हर और सोमादि के वृन्द की यथा विधि एव क्रम के अनुसार विहित क्रम से भली भांति मत्रो के द्वारा पूजन करके रवि के मण्डल म सस्थित आदिदेव सदाशिव शङ्कर का मै स्मरण करता हूँ । २६ । ।३१।। इन्द्रादि देवा का-तथा ईश्वरा का-नारायण-पद्मज-प्रादिदेव-यथाक्रम से प्रागादि अधोवं तथा वनादि पद्म का मै स्मरण करता हूं ।। ३२।। सिन्दूर जैसे वरण वाले-मण्डन से युक्त और सुवरण वन के प्राभरण वान आप के लिये में प्रणाम करता हूं तथा स्मररा करता हूँ 1 पद्माभ नेम रविमंडल में उमा महेश० ] वाले-पपइज-ब्रह्मा, इन्द्र और नारायण के भी कारण स्वरूप के लिये नमसार है ॥३२॥३३॥ सात अक्ष्वो से युक्त रथ-अनूरुवीर गरा तथा वसन्तादि के दम से सात प्रकार के गण जो कि ऋतुमो के प्रवाह से हौन हैं और मदेह गण क्षय अर्थात् तन्नामक असुर नाशक एव वाल सिल्पा का मै स्मरण करता हूं ॥३४॥ है देवदेव ! तिल आदि विविध पदार्थों के द्वारा अग्नि मे पाहूतियाँ देकर और फिर सम्पूर्ण कृत्य को उसी भांति समाप्त करके आपके मण्डन विश्व को जो कि हृदय कमल के मध्य में सस्थित है निकाल पर मै स्मरण करता हूँ ॥३५।। स्मरामि विबानि यथाक्रमेण रक्तानि पद्मामललोचनानि । पद्म व मध्ये वरद च वामे करे तथा भूषितभूषणानि ॥३६ दंष्ट्राकराल तव दिव्यवक्त्र विद्युत्प्रभ दैत्यभयकर च । स्मरामि रक्षाभिरत द्विजाना मदेह रोगणभसन च ॥३७ सोम सित भूमिजमग्निवर्णं चामीगभ बुधमिदुसनुम् । वृहस्पति काचनस निकाश शुकसित कृप्यतरं च मदम् ॥३८ स्मरामि सत्यमभय वाममुरुगत वरम,' सर्वेषा मदपर्यतं महादेवं च भास्करम ॥३६ पूर्णेदुवर्णेन च पुष्पगधप्रस्थेन तोयने शुभेन पूर्णम । पान दृढ ताम्रय प्रकल्प्य दास्ये तवाध्य भगवप्रसीद ॥४० नम शिवाय देवाय ईश्वराय कपदिने । रुद्राय विष्णवे तुभ्य ब्रह्मणे सूर्यमूतये ॥४१ य शिव मडले देव सपूज्यैव समाहिन । प्रातमध्याह्नमायाह्न पठेत्स्तवमनुत्तमम ॥४२ इत्थ शिवेन सायुज्य लभते नात्र सशय ॥४३ मै पद्मामललोचन यथाक्रम से रक्त विम्बो का स्मरण करता हूँ । दक्षिण मे पद्म को और वाम कर में वरद वो तथा भूपित भूषणो का स्मरण करता हूं ॥३६॥ अापका दिव्य मुख दष्ट्रानो से कराल है और यह विद्य तु के तुल्य प्रभा स युक्त है एव दैत्यो को भय समुत्पन्न करने वाला है । मन्देह नामक राक्षसो के समुदाय का नाश करने वाला एव भत्र्सना ६४ ] [सिद्न पुराण दन बाला है और द्विजो की रक्षा वरन मे निरत है उसका में स्मरण करता हूं । ॥३७॥ सित वर्ण वाले सोम-अग्नि के समान मङ्गल सुवर्ण को तुल्य इदु के पुत्र युर काश्चन के सदृश वृहस्पति-श्वेत शुक्र और अत्यन्त कृष्ण चरण वाले शनि-अभय सव्य तथा सरगत वर वाम-मन्दपर्यंत सब के कारण स्वरूप भाार महादेव का मैं स्मरण करता हूँ॥८॥ ॥३६॥ पूर्ण इन्दु के वर्ण वाले पुएय एवं गन्ध प्रस्थ से युक्त शुभ तोय के द्वारा हट ताम्रमय पात्र यो प्रकल्पित करके ह भगवन् ! मैं प्रापवो अध्य देता हूं माप प्रसन होइए ॥४०॥ शिव देव प लिय नमस्कार है । ईश्वर कपर्दी रुद्र-विष्णु-सूर्य की मूत्ति वाले ब्रह्म अापके लिये नमस्कार है ॥४१॥ सूतजी ने कहा- जो इस प्रकार से मण्डल में समाहित होकर शिव देव का भली भांति पूजनाचन करके प्रात मध्याह्न और सायशाल म इस सर्वोत्तम स्तव का पाठ किया करता है वह इस प्रकार से भगवान् शिव के सायुज्य को प्राप्त होता है - इसमे कुछ भी सक्षय नहीं है। ॥४२॥४३॥ ॥८६-महेश्वर पूजा मे अधिकार निरूपण ॥ अथ रुद्रो महादेवो मडलस्थ पितामह । पूज्यो वै ब्राह्मणाना च क्षत्रियाणा विशेषत ॥१ वैश्याना नैव शूद्राणा शुश्रू पा पूजकस्य च । स्त्रीणा नवाधिकारोऽस्ति पूजादिपु न सशय 0 सोशूदारणा द्विजेन्द्रश्च पूजया तत्फल भवेत् । नृपाण मुपकारार्थ ब्राह्मणाविशेषत ॥३ एव सपूजयेयुर्वे ब्राह्मणाद्या पदाशिवम् । इत्युक्त्वा भगवान् रुद्रस्तत्रवातरधात्स्वयम् ॥४ ते देवा मुनय सर्वे शिवमुद्दिश्य शकरम् । प्रणे मुश्च महात्मानो रुद्रध्यानेन विह्वला ॥५ जग्मुर्यथागत देवा मुनयश्च तपोधना । तस्मादम्यचंयेनित्यमादित्य शिवरूपिणम् ॥६ महेश्वर पूजा में अधिकार० ] [२६५ धर्म कामार्थमुक्त्यर्थं मनसा कर्मणा गिरा। रोमहर्षण सर्वज्ञ सर्वशास्त्रभृतां वर ७ व्यासशिष्य महाभाग वाह्रयं वद साप्रतम् । शिवेन देवदेवेन भक्ताना हितकाम्यया । (महेश्वर पूजा के अधिकार निरुपण ) इस अध्याय मे मण्डलार्चन में शिव के द्वारा अधिकारी बताये गये हैं और अग्नियोक्त विधान से शैव दीक्षा का निरूपण किया जाता है। सूतजी ने कहा - इसके मनन्तर मण्डल में स्थित पितामह रुद्र महादेव ब्राह्मणो का और विशेष कर क्षत्रियो का और वैश्यो का पूज्य होता है ।॥ शूदो को इस प्रकार से पूज्य नहीं होता है और खियो को भी इस विधि से पूजा करने का अधिकार नहीं है । इनको तो जो मण्डल की पूजा करने का अधिकारी है उमकी शुभ पा से ही मण्डल पूजा का फल प्राप्त होता है । स्त्री और शूद्रो को द्विजे द्रो के द्वारा की हुई पूजा के द्वारा ही फल प्राप्ति हुया करती है । राजाओ के उपकार के लिये ब्राह्मणादि के द्वारा पजन कराने से अपने आप से किये हुए से भी अधिक फल वाली होती है ॥२॥३॥ इस प्रकार से ब्राह्मण प्रादि लोगो को सदा सदाशिव का पूजन करना चाहिए -इतना कहकर भगवान् रुद्र स्वय वहां पर ही अन्तर्धान हो गये ये ॥४॥ वे समस्त देवगण और मुनिगण भगवान शिव का उद्देश्य करके महात्मा रुद्र के ध्यान मे विकुल होते हुए प्रणाम करने लगे ॥५॥ वय के धन वाले देव और मुनि लोग जैसे हो पाये थे चले गये थे । इस लिये शिव स्वरूप वाले भगवान् मादित्य का नित्य ही अर्चन करना चाहिए ॥६॥ धर्म काम अर्थ और मुक्ति के लिये मन-कर्म और वाणी के द्वारा यजन करना चाहिए 1 ऋषियों ने कहा-हे रोमहर्पण । आप तो सभी कुच के ज्ञाता हैं मोर समस्त शास्त्रो को धारण करने वालो मे परम थेष्ठ हैं । हे महान् भाग्य वाले थी व्यास देव के शिष्य ! अब आप हमारे सामने वाह्रय विधान का वर्णन कीजिए जिसे देवो के देव भगवान् शिव ने अपने भक्तो की हित-कामना से कहा है कि वेदात पडंगादुद्धृत्य सांख्ययोगाच्च सर्वतः ।
२६६ ] [ लिङ्ग पुराण तपश्च विपुल तप्त्वा देवदानवदुश्चरम् ।। अथदेशादिमयुक्त गूढमज्ञाननिदितम् । वर्णाश्रमकृतमविपरीत कचित्समम् ।।१० शिवेन कथित शास्त्र धर्मकामार्थ मुक्तये । शतकोटिप्रमाणेन तत्र पूजा क्थ विमो ॥११ स्नानयोगादयो वापि श्रोतु कौतूहल हि । पुरा सनत्कुमारेण मेरुपृष्ठे सुशोभने । २ पृष्टो नदीश्वरो देव शैलादि शिवसमत. 1 पृष्टोय परिणपत्यैव मुनिमुस्यैश्च सर्वत. ॥१३ तस्मै सनत्कुमाराय नदिना कुलदिना । कथित च्छि पज्ञान शृण्वतु मुनिपुङ्गवा ॥१४ भगवान शिव ने इसे पडङ्गा वाले वेद से उद्धृत करके और सब ओर से सास्य योग से इसका उद्धरण करके कहा है । देव तथा दानवो के द्वारा भी परम दुश्वर बहुत तप करके अर्थ देश मादि से सयुक्त गूढ और अज्ञान निन्दित तथा वर्णाश्रम कृत धमों से विपरीत और कही पर उनके ही समान भगवान् शिव ने धर्म-काम-मर्थ और मुक्ति के लिये इस शास्त्र का कथन किया है । वहाँ पर शत कोटि प्रमाण से विभु की पूजा कैसे होती है ॥६॥१॥११॥ हमको स्नान योग मादि सब के श्रवण करने का महान् कौतूहल हो रहा है। सूतजी ने कहा- पहिले परम शोभन मैरु पृष्ठ पर सनत्कुमार ने शिव के परम सम्मत देव शैलादि नन्दीश्वर से पूछा था । मुनियो मे परम प्रमुखो के द्वारा प्रणिपात करके उनसे इस प्रकार पूछा गया था ॥१२॥१ ।। उस सनत्कुमार से कुलनन्दी नन्दी ने जो शिव का ज्ञान कहा था है मुनिश्रेो । उसका प्रव प्राप लोग अवरण करें ॥१४॥ शव सक्षिप्य वेदोक्त शिवेन परिभाषितम् । स्तुतिनिन्दादिरहित सध. प्रत्ययकारकम् ॥१५ गुरुप्रसादज दिव्यमनायासेन मुक्तिदम् । भगवन्सर्वभूतेश नंदीश्वर महेश्वर ॥१६ महेश्वर पूजा में अधिकार. २७ कथं पूजदय. शभोधर्मकामार्थमुक्तये । वक्तुमर्हसि शैनादे विनयेनागताय मे ॥१॥ सप्रेक्ष्य भगवान्नदो निशम्य वचन पुनः । कालवेलाविकाराद्यमवदद्वदता वरः ॥१८ गुरुतः शास्त्रतश्च वमधिकार प्रवीम्यहम् । गौरवानेव संशंषा शिवाचार्यस्य नान्यथा ॥१६ स्वयमाचरते यस्तु प्राचारे स्थापयत्यपि । प्राचिनोति च शास्त्रार्थानाचार्यस्तेन चोच्यते ।।२० तस्माद्वेवार्यतत्त्वज्ञमाचार्य भस्मशायिनम । गुरुमन्वेपयेद्भक्त सुभग प्रियदर्शनम् ॥२१ भगवान शिव ने उस बेद मे बहे हुए शेव ज्ञान को सक्षिप्त करके कहा था। वह स्तुति भोर निन्दा प्रादि से रहित है तथा तुरन्त ही विश्वास बाराने वाला है ॥१५॥ गुर के प्रसाद से उत्पन्न होने वाला परम कम है और बिना ही रिसी पायाम के मुक्ति का प्रदान करने वाला है । सनत्कुमार ने कहा-है भगवन् । है समस्त भूतो के स्वामिन् । है नन्दीश्वर ! हे महेचर' हे अलादे | विनय पूर्वक पाये हुए मुझे माप धर्म वामार्य पौर मुक्ति के लिये शम्भु की पूजा प्रादि को बताने वे यय होते हैं ॥१६॥१७॥ सूतजी ने कहा--भगवान् नन्दी ने भली-भांति देखकर भौर पुन, वचन का श्रवण करये बोलने वाली में परम ने काल वेलाधिकार से जिससो रहा था ॥१८॥ सैनादि ने रहा-म गुरु से पोर माग्न से इस प्रकार से अधिकार को बताता हूँ। शिवाचार्य के गौरव से यह समारे अन्यथा नहीं है ।।१६४ जो स्वय पाचरण किया परता है पौर भन्यो सो भी भारार म स्थापित बरखा है तथा शास्त्र प्रयों का सब पोर से चपन रिया ररता है वह व्यक्ति हो 'प्राचार्य'- इस नाम से बहा जाता है ॥२०॥ इस कारण से वेदो के प्रों के जो से शाता-भस्म में रायन सरने वाले गुरु प्राचार्य का भक्त का अन्वेपार परना चाहिए जो कि मुभग एवं दे ने मे भी प्रिय लगता है ॥२१॥ प्रतिपम जनानंद श्रुतिस्मृतिपणानुगम, 1
२९८ ]
[ लिङ्ग पुराण
विद्ययाभयदातार लोत्यचापल्यवजितम् ॥२२
प्राचारपालकं धीर समयेषु कृतास्पदम् ।
त दृष्ट्वा सर्वभावेन पूजयेच्छिववद्गुरुम ॥२३
प्रात्मना च धनेनैव श्रद्धावित्तानुसारतः ।
तावदाराधयेच्छिष्य: प्रसन्नोऽमो यथा भवेत् ॥२४
सुप्रमन्ने महाभागे सद्य पाशक्षयो भवेत् ।
गुरुन्यिो गुरुः पूज्यो गुरुरेव सदाशिवः ।।२५
सवत्सरनय वाय शिष्यान्विप्रान्परीक्षयेत् ।
प्राणद्रव्यप्रदानेन प्रादेशश्च इतस्तन ॥२६
उत्तमश्चाघमे योज्यो नोच उत्तमवस्तुपु।
आकृष्टास्ताडिता वापि ये विषाद न याति वै ॥७
ते योग्या शिवमिष्ठा. शिवधर्मपरायणा ।
सयता धर्मसपना श्रुतिस्मृतिपथानुगा ॥२८
प्राचार्य ऐसा ही होना चाहिए जो प्रतिपन अर्थात् शरणागति में
मा गये हैं उन पुरुषो को आनन्द प्रदान करने वाला हो और श्रुति तथा
स्मृति के मार्ग का अनुगमन करने वाला हो। प्राचार्य सर्वदा अपनी
विद्या के द्वारा अभय के देने वाला होता है तथा चचलता एव अस्थिरता
से रहित होना चाहिए ॥२२॥ सत्पुरुषो के प्राचार का पूर्णतया पालन
करने वाला तथा समयो पर अर्थात् सन्ध्या प्रादि के काल पर समुचित
स्थानो पर स्थित रहने वाले हो-ऐसे उपयुक्त गुणो से विशिष्ट प्राचार्य
को प्राप्त कर उस गुरुदेव की शिव की भांति पूजा करनी चाहिए । २३॥
अपने शरीर और मन से और श्रद्धा तथा वित्त के अनुमार धन के द्वारा
भी शिष्य को तब तक गुरु की समाराधना करनी चाहिए जब तक वह
पूर्णतया प्रसन्नता प्राप्त कर लेवें ॥२४॥ महाभाग गुरु के प्रसन्न हो जाने
पर तुरन्त ही सम्पूर्ण पापो का क्षय हो जाया करता है । गुरु परम मान्य
एव पूजा के योग्य होते हैं और गुरु हो साक्षात् सदाशिव हैं ॥२५॥ गुरु
देव प्राचार्य को प्रारम्भ मे तीन वर्ष तक विप्र शिष्यो की भली-भांति
परीक्षा करनी चाहिए। प्राण द्रव्य के प्रदान के द्वारा तथा इधर-उधर
महेश्वर पूजा मे अधिकार० ] [ २६४ के भनेको प्रादेशो के देने के द्वारा जांच करे ॥२६॥ उत्तम तथा प्रथम प्रकार के कार्यों में योजित करे और उत्तम एव प्रधम वस्तुग्रो मे उन्हें आकृष्ट करे । ताहना देने पर भी जो शिप्य विपाद को प्राप्त नहीं होत हैं अर्थात् गुरु ने द्वारा ताडित होकर भी खिन्नता नहीं होती है ॥२७॥ दे ही शिष्य वस्तुत शिष्य धर्म के पाला परने ये योग्य प्रापरते हैं । ऐसे शिष्य शिव धर्म में मिश्रित होते हैं और शिव धर्म में परायण भी होते हैं । परम मयत-धर्म स मम्पस एवं श्रुति-स्मृति मार्ग के अनुयायी हुमा वरने हैं ॥२८॥ सर्वद्व द्वसहापोरा नित्यमुधुक्तचेतस । परोपकारनिरता गुरुशुश्र पणे रता 1.६ प्राजवा मार्दवा स्वस्था अनुकूला प्रियवदाः । प्रमानिनो बुद्धि मतस्त्यत्तस्पर्धा गतस्पृहाः ॥३० शो वाचारगुणोपेता दम्ममात्सयंवजिता । याया एव द्विजा सर्व शिवभक्तिपरायणा ३१ एववृत्तममोपेता वाड्नन वायवर्ममि । शोध्या एव विधाश्च व तत्त्वाना च विशुद्धये ॥३२ शुदा विनयसपनो मिध्याक्टुाजित । गुर्वाज्ञापालकश्च व शिप्योऽनुग्रहमहति ॥३३ गुमश्च पास्त्रविमानस्नपन्थी जनवमल । लोमाचाररतो ह्य व तत्त्वावमाद. स्मृा।३१ सर्वलधारणसपन्न सर्वशारविशारद । सर्वोपायविधानशस्तत्त्वहीनस्य निफनम ॥३५ सय प्रकार 421 को गहन परा काम-धीर-निस्य दो उपक चित्त पाल-दूमरो में उपार में निरत रहने याल तथा गुफको याम अनुराग करने वाले परल ति से सुगमन प्यपहार पानोरोग. पारन प्रिय योला पासे पमा) युतिमान् म्पर्धा भाप को छोरो याने रिसी भी प्रकार की प्रधान रगो पाने-गौच एप पाचार गुरखो से समर्माना दम सपा सरगला या रसाम बाले मसार स ३७० } [ लिङ्ग पुराण योग्य और शिव की भक्ति में जो परायण द्विज हो वे ही शिष्यता के प्राप्त करन के अधिकारी हुप्रा करते है ॥२६॥३०॥३१॥ इस प्रकार के प्राचरण से युक्त मन-वाणी और कर्म के द्वारा हो ऐसे ही तत्त्वो को विशुद्धि लिये शोधन करन वे योग्य अधिकारी होते हैं ॥३२।। जो शुद्ध विनय से सम्पन्न मिथ्या भाषण और क्टूक्ति करने वाला न हो तथा गुरु की आज्ञा का पूर्ण पालन करने वाला हो वह ही शिष्य गुरु चरण की अनुकम्पानुग्रह का वास्तविक पात्र हुआ करता है ॥३३॥ और गुरु भी शास्त्रो का वेत्ता-प्राम-तपस्वी सब साधारण शिध्यो पर वात्सल्य रसने वाला लौकिक प्राचारो मे रति रसने वाला मोक्ष का दाता तथा तत्त्वो का ज्ञान रखने वाला बताया गया है । जो गुरु हो उसमे उपयुक्त गुगा सभी होने चाहिए। ॥३४॥ गुरु सभी लक्षणो से सुसम्मन्न तथा समस्त शास्त्रो का पण्डित होना चाहिए । सब प्रकार के उपायों के विधानो का ज्ञाता गुरु होवे । जो तत्त्वहीन है वह तो निष्फल हो होता है ।।३॥ स्वसंवेद्ये परे तत्त्वे निश्चयो यस्य नात्मनि । आत्मनोऽनुग्रहो नास्ति परस्यानुग्रहः कथम् ॥३६ प्रबुद्धस्तु द्विजो यस्तु स शुद्धः साधयत्यपि । तत्त्वहीने कुनो बाध कुतो ह्यात्मपरिग्रह. ।। ७ परिग्रहविनिमुक्तास्ते सर्वे पशवोदिता.। पशुभिः प्रेरिता ये तु सर्वे ते पशवः स्मृताः ॥३८ तस्मात्तत्त्वविदो ये तु ते मुक्ता मोचयत्यपि । सवित्तिजननं तत्त्वं परानंदसमुद्भवम् ॥३६ तत्त्वं तु विदित येन म एवानददर्शकः । न पुनर्नाममानेण संवित्तिर हितस्तु यः॥४० अन्योऽन्यं तारयेनय कि शिला तारयेच्छिलाम् । येषां तन्नाममात्रैण मुक्ति नाममात्रिका ॥४१ योगिना दर्शनाद्वापि स्पर्शनाद्भापरणादपि । सद्यः संजायते चाज्ञा पाशोपक्षयकारिणी ॥४२ .
[ ३०१ महेश्वर पूजा में अधिकार० ] जिसको प्रात्मा में स्वसंवेद्य पर तत्व में निश्रय नहीं होता है वह स्वयं अपने कार ही अनुग्रह करने अर्थात् अपना श्रेय सम्पादन करने में अममर्थ होता है तो फिर दूसरे । शिष्य ) का फैसे अनुग्रह (वल्याण ) कर सकता है ? ॥३६॥ जो द्विज प्रबुद्ध है और शुद्ध है वह तो साधन भी कर सकता है किन्तु जो तस्वहीन है उसमे वोध कैसे हो सकता है और रया उरातो पास्म परिग्रह हो सकता है ? ॥३७॥ जो प्रात्म परिग्रह अर्थात् प्रारम-ज्ञान से रहित हैं वे सब पशु ही कह गये हैं और ऐसे पशु स्वरूप गुरुपो से सो प्रेरणा प्राप्त करने वाले ये भ पशु हो रहे गये है ११३८।। इसलिये अपने और पराये वल्याण के लिये तत्वज्ञान परमावश्यक है । जो पुष्प तत्त्व वेत्ता है ये स्वय भी मुक्त हो चुनते हैं और फिर अन्य शिष्यों को भी मुक्त कर दिया करते हैं । संवित्ति का उत्पन्न हो जाना ही तत्त्व होता है जो कि परानन्द को उत्पादित पिया करता है । जिसने तत्त्व का ज्ञान प्राप्त कर लिया है वह ही मानन्द का दर्शक होता है। जो राविति से रहित होता है वह केवल नाम मात्र से प्रानन्द पो दिखाने याना नही हो सकता है ॥४०॥ परस्पर में ऐसा पुरप कभी उसार नहीं दिया करता है क्या कोई शिला पिसी शिला को तार सकती है ? जिनके नाम मात्र से ही नाम मात्र को ही मुक्ति होती है वास्तविको भी नही हुमा करती है ॥४१॥ योगियो के दर्शन से-स्पर्श करने से अपवा उनो साथ भाप मे भी पाशो ये उपाय पुग्ने पाती प्राज्ञा मर्यात् अनुग्रह तुरन्त ही होती है ॥४२॥ अथवा योगमार्गण शिप्यदेह प्रविश्य च । बोधयेदेव योगेन सर्वतत्त्वानि शोध्य च ॥४३ पडधंशुद्धिविहिता ज्ञानयोगेन योगिनाम् । शिष्य परीक्ष्य धर्मज्ञ धनिक वेदपारगम् ।।४ ब्राह्मणं क्षत्रियं पश्य बहुदोपविजितम् । ज्ञानेन शेयमालोक्य कति कर्णागतेन तु ॥४५ दीपाहोपो यया चान्यः संपरेविधिवद्गुरः । भौवनं च पद व वरिय मानमुत्तमम् ।।४६ ३०२ ] [लिङ्ग पुराए कालाध्वरं महाभाग तत्त्व ख्यं सर्वसंमतम् । भिद्यते यस्य सामर्शदाज्ञामात्रेण सर्वतः ॥४७ तस्य सिद्धिश्च मुक्तिश्च गुरुकारुण्यसंभवा । पृथिव्यादीनि भूत.नि प्राविशंति च भोवने ।।४८ शब्दः स्पर्शस्तथा रूप रसो गश्च भावतः । पद वर्णाख्यक विप्र बुद्धौद्रियविकल्पनम् ॥४६ कर्मेन्द्रियारिण मात्र हि मनो वृद्धिरतः परम् । अहकारमथाव्यक्त कालाधरमिति स्मृतम् ।।५० पुरुषादिविरिच्यतमुन्मनत्वं परात्परम् । तथेशत्वमिति प्रोक्त सर्वनत्त्वार्थ बोधकम् ॥५१ अयोगी नैव जानाति तत्त्वशुद्धि शिवात्मिकाम् ॥५२ गुरु का सामर्थ्य -समन्वित क्तव्य बताते हुए कहते हैं-अथवा गुरु देव योग के मार्ग के द्वारा स्वय शिष्य के देह मे प्रवेश करके उसकी शुद्धि करके योग से ही समस्त तत्वो को बोधित कर दिया करते हैं ॥४३॥ योगियो के ज्ञान योग से पडर्ध अर्थात् गुण त्रय की शुद्धि हो जाती है । शिष्य को गुरु को परीक्षा कर लेनी चाहिए कि वह धर्म का ज्ञाता धर्म का आचरण करने वाला-वेदो के ज्ञान का पारगानी है ॥४४॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य कोई भी इनमे द्विजातियो मे से हो जो कि बहुत-मे दोषो से वजित हो फिर कान से कान में प्राये हुए प्रर्यात् गुरु परम्परा के मार्ग से प्राप्त होने वाने ज्ञान के द्वारा ज्ञेय का अवलोकन करे ॥४५॥ जिस प्रकार से एक दीपक से दूसरा दीपक जला दिया जाता है वैसे ही गुरु को विधि-विधान से सचरण करना चाहिए । भुवन में होने वाला पद वर्ण नाम वाला उत्तम मात्र होता है ॥४६॥ हे महाभाग सनत्कुमार ! कालाधर मब का सम्मन तत्त्वाख्य अर्यात, सकल नत्वो को सज्ञा वाला होता है । उनकी शक्ति के प्रभाव से सर्व गुरु की आज्ञा मान से जिस शिष्य को भिद्यमान होता है उस शिष्य की सिद्धि और मुक्ति तो गुरुदेव की करु गानुमा से ही उत्पन्न होने वाली होती हैं। भौवन पद में प्रथिवी आदि भूत प्राविष्ट हुआ करते हैं ॥४७॥४८॥ शब्द स्पर्श-रूप- [२०६ संत्रोक्त शिव दीक्षा विधि ] रा और गन्ध स्वभाव से हे सनत्कुमार विप्र ! पांच ज्ञानेन्द्रियों का विक- ल्पम वर्णात्य यह होता है १४६॥ कर्मेन्द्रिय मात्र उस संना वाली हैं और मन बुद्धि प्रादि का चतुष्टय कालावर कहा गया है ॥५०॥ मानुप मानन्द रो मारम्भ करके ब्रह्म पद पर्यन्त परात्पर श्रेष्ठ मनस्कत्त्व होता है चह समस्त तत्त्वों का अव बोधक ईशात्य कहा गया है । जो योगी नहीं है पह सिव स्वरूपा तत्व शुद्धि को नही जान सकते हैं जो कि कल्याए रूपा होती है ॥५१॥५२॥ ।। ६०-संत्रोक्त शिव दीक्षा विधि । परीक्ष्य भूमि विधिवद्गंधव रसादिभिः । अलंकृत्य वितानाद्यरोश्वरावाहनक्षमाम् ।। एकहस्तप्रमाणेन मडलं परिकल्पयेत् । प्रालिसेकम मध्ये पंचरत्नसमन्वितम् ॥२ चूर ग्टदलं वृत्त सितं वा रक्तमेव च । परिवारेण संयुक्त बहुशोभाममन्वितम् ॥३ आवाह्य कणिकायां तु शिनं परमकारणम् । अर्जयेत्सर्वयत्नेन यथाविभवविस्तरम् ।।४ दलेपु सिद्धय. प्र.क्त कणिकायां सहामुने । पैराग्यमाननातं च धर्मकंदं मनोरमम् ॥५ वामा ज्येष्टा च रोद्री च कालो विकरणी तया। बलविकरणी व बलप्रमपिनो कमात् ॥६ गर्वभूनस्य दमनी फैमरेपु च शक्तयः । मनोन्मनी महाया कम्गिकायां गिवामने ॥७ (लोत शिव-दीक्षा विरि इस प्रयाप मेरोक्षामोतोग मिति और गिय पूजा पे शुभ नियमो का निण निश जाना है गया जगार भी बसाया जाता है। गूगजी ने परा अपनगी गप- पर्ग और माहिरो भूमि की विधि ये माप परीक्षा परनी चाहिएगा रात वितानादि द्वारा उग भूमि यो गमत करे जो yिा ०६ ] [ लिङ्ग पुराण सद्यमप्रकारेण प्रभिद्य च कलामयम धामं त्रयोदशाविधंविभिद्य वितत प्रभुम ॥२१ अघोरमष्टधा कृत्वा कलारूपेण सस्थितम । पुरुपं च चतुर्धा वै विभज्य च कलामयम् ॥२२ ईशान पंचधा कृत्वा पचमा व्यवस्थितम । हरहमेति मंत्रेण शिवभक्त्या समन्वितम् । २३ शिव-पदाशिव और देव महेश्वर इससे भी पर रुद्र विष्णु और विरचि को मर्ग, स्थिति और लय के क्रम से भावना का आधार बनावे ॥१५॥ अव गगन आदि पांच भूतो के विग्रह का स्तवन करने वाले पांच मन्त्रों को कहते हैं -- रुद्ररूप वाले शिव शान्त्यतीत शम्भु शान्त-शात दैत्य चन्द्रमा के लिये नमस्कार है ॥१६}} वैध-विधा के प्राधार-वह्नि वह्नि- घर्चम-काल-प्रतिष्ठा-नारक दैत्य के अन्तक के लिये नमस्कार है ॥१७॥ निवृत्ति-धनदेव-धारा-धारणा-इन मन्त्रो के द्वारा महाभूतविग्रह श्री सदा- शिव ईशान मुकुट, देव, पुरातन, पुरुषास्य अघोर हृदय-हृष्ट-वाम गुह्य- महेश्वर-सद्यमूत्ति-देव का स्मरण करना चाहिए जो सस् और असत् व्यक्ति का कारण है, जिसके पांच मुख हैं-दश भुजाएं हैं और जो अड- तीस कलाप्रो से परिपूर्ण है ॥१८॥१६॥२०॥ उस सध व लामय प्रभु का पाठ प्रकार से प्रभेद करे तथा वितत प्रभु वाम का तेरह प्राारो से विभे- दन करे । अघोर को पाठ प्रकार से विभिन्न करे जो लिवाला रूप से मस्थित है। कलामय पुरप का चार प्रधागे से प्रभेद करे तथा ईशान पो पाच प्रराये मे प्रभिन्न करे जो पांच मूतियो मे व्यवस्थित रहा करता है। शिय की भक्ति से समन्वित हस हम' - इस मन्त्र के द्वारा करे । "हम हमाय विघ्नहे परम हमाय धीमहि । ततो हमः प्रचोदयात् "- यह हम गायत्री मन्त्र होता है ॥२॥२२॥२॥ योकारमात्रमोकारमकार ममरूपिणाम पाई ऊ ए तथा प्रयानुकमेणामरूपिणम् । २८ प्रधानसहित देयं प्रलयोत्पत्तिवर्जितम् । मणोरणोयासमज महतोऽपि महत्तमम ॥२५
तंत्रोक्त शिव दीक्षा विधि ]
[ ३०७
उर्ध्वरेतसमीशानं विरूपाक्षमुमापतिम ।
सहस्रशिरसं देवं सहस्राक्ष सनातनम २६
सहस्रहस्तचरणं नादातं नादविग्रहम ।
खद्योतसदृशाकारं चद्ररेखाकृति प्रभुम, 19
द्वादशाते भ्र बोर्मध्ये तालुमध्ये गले क्रम त् ।
हृद्देशेऽवस्थितं देव स्वानदममृतं शिवम । २८
विद्युद्वलयसकाशं विद्युत्कोटिसमप्रभम ।
श्यामं रक्त कलाकार शक्तियकृतासनम । २६
सदाशिव स्मरेद्देवं तत्त्वमयसमन्वितम्
विद्यामूर्तिमय देव पूजयेन्च यथाक्रमात् । ३०
मोकार मान अर्थात् प्रणव से जिसको भोरमान किया जाता है
उसका जो प्राण करता है वह प्रोद्वार मात्र ब्रह्म रूप है । प्रकार मकार
सम ब्रह्म तुल्य रूप वाला सम रुरी अर्थात् सगुण रूप वाला है। प्रा-ई-ऊ
और ए-ये चारो वर्ण चतुकोश रूप देवता के वाचक हैं । ए-अम्बा है
इसी प्रकार के अनुक्रम से देवी-गणेश-सूर्य और विष्णु के क्रम से पचाय-
ततरूप विग्रह से युक्त हैं । ऐसे प्रात्मरूपी-प्रलयता उत्पति से रहित
प्रधान के सहित देव हैं। जो अणु से भी प्रणीमान् -प्रजन्पा-महान से
भी महत्तम अध्वरेता-ईशान विरूपाक्ष सत्य शिगे वाने सहस नेनो से
युत्त-सनातन उमा के पति सहस्र हाथो और चरणो वाले-प्रन्त मे नाद
वाले अर्थात् प्रणव स्वरूप नाद के द्वारा प्रतिपाद्य विग्रह वाले सूर्य के
सहश प्राकार वाले एवं चन्द्र के समान प्राकृति से समन्वित प्रभु यो
द्वादशान्त परतत्व मे भ्रूथो के मन्ध मे तालु मध्य में-क्रम से गले में
और स्वानन्द, अमृत, शिव देव को जो कि हृदेश में अवस्थित रहते हैं
विद्य तु के बलय के तुल्य हैं, विद्युत्कोटि के समान प्रभा से युक्त है,
श्याम-रक्त, बलाकार एव तीनो शक्तियो का प्रासन करने वाले और तत्व
प्रय से समन्वित देव सदाशिव हैं उनका स्मरण करना चाहिए और यथा-
क्रम विद्या की मूत्ति से पूर्ण देव को पूजार्चना करनी चाहिए ॥१४॥
॥२॥२६॥२७॥२८॥२६॥३०॥
३०८ ] [लिङ्ग पुराण लोपालोस्तथालेण पूर्वाधान्यूजयेत् पृथक चरच विधिनासाद्य शिवाय विनिवेदयेत् ॥३१ अर्ध शिवाय दत्त्वैव शेप धेन तु होमयेत् । अघोरेणाथ शिप्याय दापयेभोक्तुमुत्तमम् ॥.२ उपस्पृश्य शुचिर्भूत्वा पुरुष विधिना यजेत् । पनगव्य ततः प्राश्य ईशानेनाभिमप्रितम् ॥३३ वामदेवेन भस्मागी भस्मनोधूलयेक्रमात् । फर्णयोश्च जपेद्दवी गायत्रो रुद्रदेवताम् ॥३४ ससून सपिघ न च वरुयुग्मेन वेष्टितम् । तत्पूर्व हेमरलीधर्वासित व हिरण्मयम् ॥३५ वलशान्विन्यसेत्पच पचभिवािगस्ततः । होम च चरुणा कुर्याद्ययाविभवविस्तरम् ॥३६ शिष्य च वासयेद्भक्त दक्षिणे मड नस्य तु । दर्भशय्यासमारूढ शिवध्यानपरायणम् ॥३७ अधारेण यथान्यायमष्टोतरशत पुन । घृतेन हुत्वा दुस्वप्न प्रभाते शोधयेन्मलम् ॥३८ अस्को से युक्त पूर्वाद्य इन्द्रादि लोक पालो का पृथक् पूजन करे और घरु प्राप्त करके विधि के सहित शिव को समर्पित करना चाहिए ॥१॥ आधा चरु का भाग तो शिय को निवेदित करे तथा शेषार्ध भाग से होम परना चाहिए । होम के अनन्तर जो दुत शेष चरु हो उसे शिष्य को भोजन करने लिये दिला देना चाहिए ॥३२॥ उपस्पर्शन परके तथा पूर्णतया शुचि होकर विधि विधान से पुस्य वा यजन करना चाहिए। ईशान मत्र से अभिमन्त्रित करके पचगव्य का प्राशन करे ॥३३॥ वाम देव मत्र से भस्म पूर्ण प्रङ्गो वाला बनें और क्रम मे भस्म मे उलित करना चाहिए और कानो मे रुद्र देवता वाली गायत्री देवी का जाप करे ॥३४॥ होम के पूर्व पिये जाने वाले कृत्य बतलाते हैं सूत्र से युक्त तथा ढक्कन के सहित वस्त्र युग्म से भली भांति वेष्टित एव इसके पूर्व हम र नो के समूह से वासित हिरण्मय पांच क्लशों को विन्यास करे। अपने तत्रोक्त शिव दीक्षा विधि ) [ २०६ वैभव के विस्तार के अनुमार पांच ब्राह्मणो के द्वारा चरु से होम करना चाहिए ॥३५॥३६॥ मण्डल के दक्षिण भाग में शिष्य का स्वायन करे । वह शिष्य परम भक्त और शिव के ध्यान मे परायण होना चाहिए। उसे दो की दाय्या निमित पर उस पर समारट परे। प्रातःकाल में प्रधार मन्त्र के द्वारा घृत से एएसौ पाठ वार माहुतियां देकर दुःस्वप्न मल पाशोधन परे। ॥३७॥३८॥ एवं चोपोषितं शिप्य स्नातं भूपितविग्रहम् । नववस्रोत्तरीयं च मोष्णोपं कृतमगलम् ॥३६ दुकूलाधन वस्त्रण ने बद्धा प्रवेशयेत् । सुवर्णपुष्पस मिथ यथाविमनविस्तरम् ॥४० ईशानेन च मंत्रेण कुर्यात्पूप्पांजलि प्रभोः । प्रदक्षिणायं कृत्वा रद्राध्यायेन वा पुनः॥४१ क्यलं प्रणवेनाथ शिवध्यानपरायण । ध्यात्वा तु देवदेवेशमोगाने सक्षिपेत्स्वयम् ॥1 यस्मिन्मने पतेत्पुरप तन्मस्तस्य सिध्यनि । शिवांभसा तु मंस्पृश्य अघोरेण न मम्मना ।। ३ शिप्यमूर्धनि विन्यस्य गंधाधे शिप्यमर्चयेत् । पारण परमं थोष्ट द्वार वेगवरिगनाम् ॥४१ क्षत्रियाणा विशेषेण द्वारं वै पश्चिम स्मृतम् । नेवायरण मुन्मुच्य मंडस दर्शयेत्तत ॥४५ इस प्रकार से जो उपोपित मिष्य है उगगो स्नान पराशर तया उससे शरीर भूषित परारे, नशेत यग्न और उत्तरोम में उपशीप (शिरो परर) ये महिर मान लिये जाने पाले नियन मारिवार से नेग वापपर प्रवेश परा पाहिए । पिर पानी पर की शक्ति पे अगुगार गया से गुरु पुर प्रहए र ईशान मात्र के द्वारा प्रभु पो पुतलि समरिम परें। पिर पाय द्वारा धान परि- प्रमा परे Remonmun शिव ६ प्यान मे पाय पसरा होर पेयन प्रराय से हो र यो के दंगरापान परेपौर में मुक्त पर - ३१० [लिङ्ग पुराण सक्षिप्त बरे ॥४२॥ मन्त्र की सिद्धि के अनुमायक के विषय में कहते हैं कि जिम मन्त्र में पुष्य का पात हो जावे वही मन्त्र उसको सिद्ध हो जाता है । मङ्गलादेक और अधोर भस्म से सस्पर्श करके शिष्य के मस्तक पर अपने हाथ को रखकर गन्धादि प्रमुख पूजनोपचारो के द्वारा शिष्य का समर्चन करे। प्रवेश द्वार के विषय में बताते हैं वि समस्त वर्ण वालो के लिये वरुण द्वार परम श्रेट होता है ॥४३॥४॥क्षत्रियो के लिये विशेष रूप से पश्चिम द्वारा बताया गया है। नत्रो को जो वस्त्र से प्रावृत किया था उसे प्रावरण के वस्त्र को हटाकर मण्डल का दर्शन करा देना चाहिए ॥४॥ कुशासने तु मस्थाप्य दक्षिणामूर्तिमास्थित.। तत्वशुद्धि तत कुर्यात्पंचतत्त्वप्रकारत. ॥४६ निवृत्त्या रुद्र पर्यतमडमडोद्भवात्मज । प्रतिष्ठया तवं च यावदव्यक्तगोचरम् ।।४७ विश्वेश्वरात वै विद्या कलामात्रेण सुव्रत । तदुर्वमार्ग संशोध्य शिवभक्त्या शिवं नयेत् ॥४८ समर्चनाय तत्वस्य तस्य भोगेश्वरस्य वै। तत्वत्रयप्रभेदेन चतुभिरुन वा तथा ।।४६ होमयेदग मत्रेण शात्यत्तीतं सदाशिवम् । सद्यादिभिस्तु शात्यंत चतुभिः कलया पृथक् ।।५० शात्यतीतं मुनिश्रेष्ठ ईशानेनाथवा पुन । प्रत्येक मष्टोत्तरशत दिशाहोम तु कारयेत् ॥५१ ईशान्या पंचमेनाथ प्रधान परिगीयते । समिदाज्यचरूल्लाजानसर्पपाश्च यवास्तिलान् ।।५२ द्रव्याणि सप्त होतव्यं स्वाहात प्रवादिकम् । तेषां पूर्णाहुतिविप्र ईशानेन विधीयते ॥५३ दक्षिणा मूति सज्ञा वाले शिव के ध्यान में समास्थित होकर नुशा के पासन पर शिष्य को सन्निवेशित करके फिर पच तत्वो के प्रकार से तत्व शुद्धि परे ॥४६॥ पार्थिवादि लय पर्यन्त क्रम से महङ्कारा बधि तत्रोक्त शिव दीक्षा विधि ] [ ३११ वाले रुद्र पर्यन्त हे ब्रह्माण्डोद्भव के पागज ! निवृत्ति द्वारा तथा ग्रह- झार के ऊपर प्रकृति पर्यन्त स्थिति के द्वारा हे सुव्रत ! ज्ञान की कला की पूर्णता से पुरुष पर्यन्त ज्ञान प्राप्त करके उसके भी ऊपर भगवान् शिव के प्राप्ति पथ को शिव की भक्ति के द्वारा ही सशोषित करके अर्थात् शिव की परम भक्ति से निरावरण कराके तुरोय शिव की प्राप्ति शिष्य को करानी चाहिए ॥४७॥४८॥ योगेश्वर उसके ताव की समर्चना के लिये पुरुष प्रकृति और ईश के तत्त्व त्रय के क्रम से अथवा अहङ्काराद्वि चारो द्वारा शान्त्यतीत सद्यादि चार के द्वारा शान्त्यन्त सदाशिव का हे मुनिश्रे'। ईशान मन्त्र से होम करे। फिर प्रत्येक दिग्देवता का अष्टोत्तरशत दिशा होम करना चाहिए ॥४६॥५०॥५१॥ ईशान दिशा में पचम ईशान मन्त्र से प्रधान याग परिगीत किया जाता है । समिधा-घृत- चर-लाजा-सपंय-यव-तिल इन सात द्रव्यो का आदि मे प्रणव तथा अन्त मे स्वाहा के द्वारा हवन करना चाहिए । हे विप्र । उनकी पूर्णाहुति ईशान मान के द्वारा ही की जाती है । ॥१२॥५३॥ सहसेन यथान्याय प्रणवाद्येन सुप्रत । अघोरेण च मत्रेण प्रायश्चित्त विधीयते ॥५४ जयादिस्विष्टपर्यंतमग्निकार्य क्रमेण तु । गुण संख्याप्रकारेण प्रधानेन च योजयेत् ।।५५ भूतानि ब्रह्मभिर्वापि मौनी बीजादिभिस्तथा । अथ प्रधानमात्रेण प्राणापानौ नियम्य च ।।५६ पठेन भेदयेदात्मप्रणवात कुलाकुलम् । अन्योऽन्यमुपसंहृत्य ब्रह्माण केशव हरम् ॥५७ रुद्र रुद्र तमीशाने शिवे देवं महेश्वरम् । तस्मात्सृष्टिप्रकारेण भावयेद्भवनाशनम् ॥५८ स्थाप्यात्मानममुजीवंताडन द्वारदर्शनम् । दीपनं ग्रहण चव बंधनं पूजया सह ।।५६ अमृतीकरण चैव कारयेद्विधिपूर्वकम् । पटात सद्यसयुक्त तृतीयेन समन्वितम् ॥६०
[ लिङ्ग पुराण
३१२
फडत सहृति प्रोक्ता पंचभूनप्रकारत ।
सद्याद्य पष्ठमहित शिखातं सफडतकम् ॥६१
ताडन कथित द्वार तत्वानामपि योगिन
प्रधान सपूटो कृत्य तृतीयेन च दीपनम् ।।६२
हे सुव्रत ! अादि मे प्रणव लगाकर हस गायत्री मन्त्र के सहित
अघोर मन्त्र से प्रायश्चित्त किया जाता है ॥५४॥ जयाभ्यातानादि होम से
युक्त स्विष्ट कृत के अन्त तक अग्नि का कार्य क्रम से तीन प्रकार से और
पूर्वोक्त प्रधान होम से युक्त करना चाहिए ॥५५॥ अब दीक्षा विधि का
उपस हार बताया जाता है । गुरु को मौन म युक्त हाकर पृथिवी आदि
भूतो को सद्याजातादि मन के द्वारा केवल ईशान मन्त्र से प्राणायानो
को नियमित करक पष्ठ 'नमाहिरण्य वाहवे"-इस मत्र से प्रात्म
वाचक गणव के अन्त नाद से व्याप्त ब्रह्मन्ध्र का भेदन करना चाहिए।
ब्रह्मा केशव और हर का प्रन्योन्य उपसहार करे। सहार मूति रुद्र को
रुद्र मे, महेश्वर देव का ईशान शिव मे सृधि के प्रकार स भाव नाशन रुद्र
का चि तन करना चाहिए ॥५६॥५ ।।५८॥ इम शिष्य जीव को रुद्र
सस्थापित करके ताडन द्वार दशन दीपन ग्रहण पूजा वे माथ बन्धन और
अमृती करण शिष्प के द्वारा विधि पूर्वक कराना चाहिए । उपसहनि
का प्रकार बतलाते हुए कहते हैं कि स्य सना वाले मन्त्र का प्राद्य जो
कि तृतीय अघार मन्त्र से सर्मा वत है पट् जिसके अन्त में होता है इस
प्रकार की प्रथिवी आदि पर भूत प्रकार से सहृति कही गई है। योगी-
जन दीक्षा के योग वाले आदि मे रहने वाले सद्य पत्र के सहित शिलान्त
और सफड तक ताडन एव तत्त्वो का द्वार भी पहा गया है । तीसरे
अघोर सन्त्र से सम्पुटित करके प्रधान ईशान मन्त्र ही दीपन कहा गया
है ॥५६॥६०॥६१॥६२॥
सत्रोक्त शिव दीक्षा विधि ] T१३ प्रतिष्ठा व निवृत्तिश्च कलासक्रपरणं स्मृता । तत्त्ववर्णक्लायुक्त भुवनेन यथाक्रमम् ॥६५ मन्त्र पादः स्तवं कुर्याद्विशोध्य च यथाविधि । आद्यन योनिबोजेन क्ल्पयित्वा च पूर्ववत् ॥६६ पूजासंप्रोक्षरा विद्धि ताडन हरणं तथा। सहतस्य च सयोग विक्षेपं च यथानमम् ॥६७ अर्चना च तथा गर्भधारण जनन पुनः । अधिकारो भवेद्भानोल यश्चैव विशेषतः॥६८ उत्तमाद्य तथास्येन योनिवीजेन सुप्रत । उद्धारे प्रोक्षणे चैव ताडने च गहामने ॥६॥ घोरेण फतेन संसृतिश्च न सशयः। प्रतितत्त्व क्रमो ह्यप योग मार्गेण सुद्रतः ।।७० श्राय सध मन्त्र से सम्पुटी करण परके प्रधान मन्त्र जो होता है वहीं ग्रहण कहा जाता है । जहाँ पूर्व की भांति ही प्रथम मन्त्र से ही प्रधान का सम्पुटी करण होता है वहाँ बन्धन होता हो जाता है और रामग्र अमृत से ज्यम्बक मन्त्र से नवन एप अमृती कारण होता है। इस पूर्वोक्त विधि के मनन्सर शान्त्यतीता प्रतिष्ठा नाम कला अमला विद्या है और शान्ति निवृत्ति नाम क्ला बताई गई है । प्रतिष्ठा और निवृत्ति कला सक्रमण कहा गया है । तत्त्व वर्ण कला अर्थात् प्रकार से प्रादि लेकर विसर्ग के अन्त तक पोडश को भुवनाष्टक के साथ यथाक्रम पूर्वोक्त कलामो का सक्रमण करना चाहिए ॥६॥६४॥६५॥ पादो से अर्थात् शिव के प्रति- पादको मन्त्री से विशोधन करके विधि के अनुसार स्तवन करे और इसके पूर्व "ही" इस योनि वीज से पूर्व की तरह पल्पना कर लेये ॥६॥ पूजा-सम्प्रोक्षण ताडन-हरण-अत्यन्त शुद्ध मन का सयोग भौर यथाक्रम विक्षेप-अर्चना वागीशी गर्भ मे स्थापन मोर पुनः जनन भानु का अधिकार पौर विशेष रूप से तत्सदृश ज्ञान निवारक तया अविद्या नाश होता है-- ऐसा जानो ॥६॥६८|| हे सुग्रत ! हे महामुने ! हे सनत्कुमार! जिसमे उत्तम ईशान मन्त्र अन्तिम योनि बीज के साथ हो उसे उदार-प्रोक्षण
३१४ ]
[लिङ्ग पुराण
और ताडन में जानना चाहिए। अघोर फडन्त से ससृति होती है-इसमे
सशय नहीं है यह योग मार्ग से प्रति तत्व क्रम होता है ।।६९।७०॥
मुष्टिना चैव यावच्च तावत्कालं नयेत्क्रमात् ।
विषुवेण तु योगेन निवृत्त्यादि शिवातिकम् ॥७१
एका समता याति नान्यथा तु पृथक्पृथक् ।
नासाग्रे द्वादशातेन पृष्ठेन सह योगिनाम् ।।७२
क्षंतव्यमिति विप्रेद्र दवदेवस्य शासनम् ।
हेमराजतताम्रा_विधिना कल्पितेन च ॥७३
सकूर्चेन सवस्त्रेण ततुना वेष्टितेन च ।
तीर्थावुपूरितेनैव रत्नगर्भण सुव्रत ॥७४
सहितामत्रितेनैव रुद्राध्यायस्तुतेन च ।
सेचयेच्च ततः शिष्य शिवभक्त च धार्मिकम् ।।५
सोऽपि शिष्य. शिवस्याग्ने गुरोरग्रे च सादरम् ।
वह्नश्च दीक्षा कुति दीक्षितश्च तथाचरेत् ॥७६
वरं प्राणपरित्यागश्छेदनं शिरसोऽपि वा।
न त्वनभ्यर्य भुजीयाद्भगवत सदाशिवम् ॥७७
मुष्टि से अर्थात् तत्सदृश प्राणायाम से जब तक स्थिति रहे उनने
काल पर्यन्त विपुव योग से निवृत्ति प्रादि शिवान्तिक को प्राप्त करना
चाहिए ।।७। एक ही स्थान मे तुल्यता को प्राप्त होता है पृथक् २ अन्य
स्थानो मे नही होता है । नासिका के अग्रभाग मे योगियो के चरमावयव
भूत द्वादशान्त परम तत्व शिव के साथ समता के प्राप्त करने को सुल्यता.
प्राप्ति कहा गया है ॥७२॥ हे विप्रेन्द्र ! सुख दुःखादि के द्वन्द्र को दीक्षित
के द्वारा सहन करना चाहिए-यह देवो के देव भगवान् शिव का नियोग
है । भव शिष्य की दीक्षाभिषेक की विधि को बतलाते हैं - सुवर्ण बोदी
अथवा ताम्रादि धातु वे विधिपूर्वक निर्मित पात्र हो जो नि यू के सहित
एव वस्त्र से युक्त होना चाहिए तथा तन्तु वेष्टित भी होवे। जिसके
मध्य मे रल हो और तीयों के जल से परिपूर्ण पिया जावे । सहिता के
मन्त्री से मभिमन्त्रित और रुद्राध्याय के द्वारा सस्तुत करके उस पात्र से
सोक्त शिव दीक्षा विधि शिव के भक्त परम भामिक मिप्य या रोचन करना चाहिए ।।७३॥७॥ ७५|| वह शिष्य भी भगवान् शिव के आगे गुरु और वह्नि प्रागे पादर सहित दीक्षा ग्रहण परे और फिर दीक्षित होकर उसी प्रकार या प्राचरण भी परे॥७६ पणो को त्याग करना पड़े तो यह अधिक उत्तम है और मस्तक का छेदन भी होता हो तो उसे भी स्वीकार कर लेना ज्यादा अच्छा है मितु भगवान् शिव की अभ्यर्चना करने के पूर भोजन करना उचित नही है अर्थात् बिना शिव के पूजन किये सभी भोजन नही करना चाहिए ।।७७॥ एवं दीक्षा प्रकर्तव्या पूजा चैव यथाकमम् निकालमेककाल वा पूजपेपरमेश्वरम् ॥५८ अग्निहोम च वेदान यज्ञान बहुदक्षिणा । शिवलिंगार्चनस्यते कलासेनापिनो समाः ॥७६ सदा यजति यज्ञेन सदा दान प्रयच्छति । सदा च च युनक्षश्न सकृयोऽभ्यर्चयेच्छिवम् ।।८० एककाल द्विकाल वा त्रिकाल नित्यमेव वा । न्येऽचयति महादेव ते रद्रा नात्र सराय ।।८१ नारुद्रस्तु स्पृशेद्र नारुद्रो रुद्रमर्च येत् । नारुद्र कीर्तयेन्द्र नारदो रुद्रमाप्नुयात् ।।२ एव सक्षेपतः प्रोक्तो लधिकारिविधिकम । शिवार्चनार्थ धर्मार्थकाममोक्षफलप्रद । ६३ इसी प्ररार से दीक्षा करनी चाहिए और ग्रम के अनुसार पूमा भी परनी चाहिए । परमेश्वर का पूजन प्रतिदिन तीन बार अपवा एष हो समय में प्रवश्य ही पूजन करना चाहिए ॥७८॥ भग्निहोत्र-मद यश जिन- में कि बहुत अधिक दक्षिणा दी जाती है-ये समी भगवान शिव के लिङ्ग की मर्चना के एक पलाश को भी रामता नही कर समत्त हैं । जो भक्त एक बार भी शिव लिङ्गकी पर्चना परता है यह सदा ही यज्ञ या यजन किया करता है-शिव पूजर सर्वदा ही दान दिया करता है पौर यह सदा वायुमा भक्षण करने वाला ही होता है 1500 एक समय मे.
३१६ ॥
। लिङ्ग पुराण
दो काल में तथा तीनों कालों मे नित्य ही जो महादेव की अर्चना किया
करते हैं वे साक्षात् रुद्र ही होते हैं - इसमे तनिक भी संशय नहीं है
1८१॥ जो रुद्र से भिन्न है वह फनी रुद्र का स्पर्श नही किया करता है
मोर अरुद्र कभी रुद्र वी अर्चना भी नहीं करता है। प्ररद्र रुद्र का कभी
कीर्तन नहीं करता है और जो रुद्र नहीं है वह रुद्र की प्राप्ति भी नहीं
करता है ॥१२॥ इस प्रकार से यह संक्षेप में अधिकारी और विधि का
क्रम बता दिया गया है जो कि शिव की अर्चना करने के लिये है और
धर्म अर्थ काम तथा मोक्ष का प्रदान करने वाला है ।।
॥६१-सौर स्नान विधि निरूपण ।।
स्नानयागादिकर्माणि कृत्वा वै भास्करस्य च ।
शिवस्नानं ततः कुर्यादभस्मस्नान शिवार्चनम् । १
पष्ठेन मृदमादाय भक्त्या भूमौ न्यसेन्मृदम् ।
द्वितीयेन तथान्युक्ष्य तृतीयेन च शोधयेत् ॥
चतुर्थेनैव विभजेन्मलमेकेन शोधयेत् ।
स्नात्वा पष्ठेन तच्छेषां गृदं हस्तगतां पुनः॥३
विधा विभज्य सर्व च चतुभिर्मध्यमं पुनः ।
पष्ठेन सप्तवाराणि वामं मूलेन चालभेत् ।
दशवारं च षष्ठेन दिशो वंथः प्रकीर्तितः ।।४
वामेन तीर्थं सव्येन शरीरमनुलिप्य च ।
स्नात्वा सर्वे. स्मरन् भानुमभिपेकं समाचरेत् ॥५
शृंगेए पर्णपुटके: पालाशेन दलेन वा।
सौर रेभिश्न विविध. सर्वसिद्धिकरः शुभैः ।।६
सौराणि च प्रवक्ष्यामि बाकलाद्यानि सुक्त।
अङ्गानि सर्वदेवेषु सारभूतानि सर्वतः ।।
ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः
ॐ सत्यम् ॐ ऋतम् ॐ ब्रह्म ।
मवाक्षरमयं मंत्र बाष्कलं परिकीर्तितम् ।
- " सौर स्नान विधि निरूपण] न क्षरतीति लोकानि ऋत्तमक्षरमुच्यते । सत्यमक्षरभित्युक्त प्रणवादिनमोतकम् । (सौर स्नान विधि निरूपण)-इस अध्याय मे यथा विधि सौर स्नान और पाकलादि मनुमो के द्वारा भास्कर भगवान को पर्चा का निरूपरा किया जाता है - सैलादि ने यहा--शिव के अर्चन करने का अधिकार तभी प्राप्त होता है जब पहिले भगवान् मास्कर का अर्मन मानव पूर्ण कर लिया करता है। प्रतएव भास्कर का याग स्नान प्रादि कर्मों फो करके हो फिर शिव स्लान-भस्म स्नान और शिवार्चन आदि करे ॥१॥ सौर स्नान की विधि बताते हुए कहते हैं पष्ठ मन्त्र से (ग्रोम् तप) मिट्टी लेकर भक्ति से उसे भूमि मे स्थापित करे। द्वितीय १४ भुवः"- इस मन्त्र मे अम्युषण करके फिर तृतीय ॐ स्व इम मन्य से शोधन करना चाहिए ।।।सा फिर चौथे "ॐ महः" इस मन्त्र से मल का विभाजन करे और प्रथम 'ॐ भू" इस मन्त्र के द्वारा शोधन करना चाहिए । फिर छटे “ॐ तप"-इस मन्त्र से स्नान करके उस शेप मृत्तिका को पुन, हाथ मे लेकर तीन बार विभाग करचे फिर चारो मन्त्री से मध्यम । विभक्त करे। छटे मन्त्र के द्वारा सात बार बांये हाथ को मूल मन्त्र से पालन करे और दश वार छटे मन्त्र से दिशामो का बन्ध पताया गया है ॥३॥४॥ वाम से तीर्थ का पालभन करके फिर सध्य अर्थात् दाहिने हाथ से शरीर का अनुलेपन परे और स्नान करके समान भन्यो के द्वारा भगवान सूर्य का स्मरण करते हुए तीर्थ जल का अभि- चेक करना चाहिए ॥।॥ शृङ्ग से यतो वे पुटको क द्वारा अथवा पलाश फे दल से अभिषेक करना चाहिए । फिर इन विविध 'ॐ भू ॐ भुव' इत्यादि परम शुभ तथा समस्त सिद्धियो के करने वाले मन्त्रों के द्वारा अभिषेक करे ।।६।। है सुव्रत । समस्त देवो मे परम सार भून वाकलादि पड़ों को मैं बतलाऊगा ॥9॥ ॐ भू-ॐ भुव ॐ स्व ॐ मह -ॐ जनः- ॐता ॐ सत्यम् ॐ ऋतम्-ॐ ब्रह्म ये नवाक्षर मन वास्कल कहे गये हैं। इसकी यौगिताक्षर सज्ञा बताते हैं-सात लोक प्रलय की अवधि ता क्षरित दि नष्ट नहीं होते हैं और ऋत मर्थात् अक्षर कहा जाग है।
लिङ्ग पुराए। प्रणव से प्रादि लेकर नमः-इसके अन्त तक सत्य अक्षर कहा गया है । ॐ भूर्भुवः सुवः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धिया यो नः प्रचोदयात् । ॐ नमः सूर्याय खखोल्काय नमः 76 मूलमंत्रमिद प्रोक्त भास्करस्य महात्मनः । नवाक्षरेण दीप्तास्यं मूलमंत्रण भास्करम् ॥ पूजयेदगमंत्राणि कथयामि यथाक्रमम् । वेदादिभिः प्रभूताद्य प्रणवेन च मध्यमम् ।।११ भूः ब्रह्म हृदयाय ॐ भुवः विष्णुशिरसे स्वः रुद्रशिखायै ॐभूभुव. स्वः ज्वाला मालिनीशिखायै ॐ महः महेश्वराय कवचाय ॐजन. शिवाय नेत्रे ॐतप: तापकायप्राय फट: मारिए कथितान्येवं सौराणि विविधानि च । एतैः शृङ्गादिभिः पात्र स्वात्मानमभिपेचयेत् ।।२ ताम्रकुभेन वा विप्न क्षत्रियो वैश्य एव च । सकुशेन सपुष्पेण मंत्र. सर्वेः समाहितः ॥१३ रक्तवस्त्रारोधानः स्वाचामेद्विधिपूर्वकम् । सूर्यश्चेति दिवा रात्रौ चाग्निश्चेति द्विजोत्तमः ॥१४ अब मूल मन्त्र बताते हैं-'ॐ भूर्भुवः सुव. तत्सवितुर्वरेण्य भों देवस्य धीमहि । धियो योन. प्रचोदयात् । ॐ नमः सूर्याय खखोल्माया नम." ॥६यह भगवान् भास्कर का मूल मन्त्र बताया गया है । इस नवाक्षर मूल मन्त्र से दीप्त मुख वाले महात्मा भास्कर का पूजन करना चाहिए अब अङ्ग मात्रो का क्रम के अनुमार कहता हूं जो कि प्रणव से प्रभून पाय वाला प्रोर वेदादि व्याहृतियो से मध्यम है ॥१ना२१॥ साता अङ्ग मन्त्र ये होते हैं-ॐ भू ब्रह्म हृदयाय-ॐ भुव, विष्णु शिरसे-ॐ स्वः रुद्र शिखायै ॐ भूर्भुव. स्वः ज्वाला मालिनी शिखाय-ॐ महः महेश्वराय कवचाय ॐ जन शिवाय नेभ्य -ॐ तारकाय अस्त्राय फट । ये सौर विविध मन्त्र बता दिये गये हैं। इन मन्त्रो से शृङ्गादि पात्रो के द्वारा स्वात्मा का अभिपेचन करना चाहिए ॥१२॥ विप्र-क्षत्रिय पोर वैश्य हो सौर स्नान विधि निरूपण ] [ ३१६ अर्थात् मुद्रादि को छोडवर शो और पुटपो के सहित अथवा ताम कुम्म से समाहित होकर इन समस्त मन्यो से पभिषेक करें ॥१॥ रक्त वर्ण के वस्त्र का परिधान करने वाला द्विजोतम "सूर्यच"-इत्यादि मन्त्र से दिन मे और मिलि- इत्यादि मन्त्र से सायङ्काल मे विधि पूर्वक पाचमन परे ॥१४॥ भाप पुनत मध्याह्न मत्राचमनमुच्यते । पप्ठेन शुद्धि कृत्यैव जपेदाधमनुत्तमम् ॥१५ चौपडत तथा मूलं नवाक्षरमनुत्तमम् । करशाम्बा तथागुष्ठमध्यमानामिकां न्यसेत् ॥१६ तले च तर्जन्यगृष्ट मुष्टिभागानि विन्यसेत् । नवाक्षरमय देह कृत्वागैरपि पावितम् ॥७ सूर्योऽहमिति सचित्य मंत्ररेसर्ययाक्रमम् । वामहस्तगतैरद्धिसिद्धार्थ कान्वित ॥१८ कुशपूजेन चाम्युक्ष्य मूलारष्टया स्थितं. । पापो हिहादिमिन व शेयमाप्राय वे जलम् ॥१६ चामनामापुटेनैव देहे संभावयेच्छिवम् । अर्यमादाय देहस्य सध्यनासापुटेन च १२० कृष्णवन बायस्पं भावयेच शिला गतम् । तयेत्सबंदेवेन्य ऋषिभ्यश्च विशेषतः ॥२१ भूतेभ्या पितृभ्यन विधिनाय च दापयेत् । यापिनी च परा ज्योत्स्ना संध्या सम्यगुणासयेत् ११२२ मध्याह्न के समय में प्राप पुन्नु'-स्यादि मन्त्र के रा मान- मन करना बताया जाता है । १४ मन्त्र स पुटि रहे हो मार सर्वोत्तम चौपडन्त नयाधर 37 एक प्रहर ता माप घरमा पाहिए ॥१॥ फर सास बताते हुए बहने हैं-बर को गासाऐ जो मुट-मध्यमा. पनामिका तर्बनी तल और मुखि भाग हैं 374 पिन्याग परना चाहिए। यह देह नवादार मय है-ऐसा करने पोत घा मन्त्रों द्वारा पादिन परना चाहिए ॥१॥१७॥ मैं स्वय मूर्य , ऐसा दिला पहा ३२० Fलिङ्ग पुरा मन्त्रों के द्वारा यथा क्रम से गन्ध और सिद्धार्थक से युक्त पाये हाथ में रहने वाले जल से कुश पुंज के द्वारा मूलाग्न पाठ प्रकार से स्थित "प्रायोदिष्ठा मयो भुवः"-इत्यादि मन्त्रो से अभ्युक्षण करे और शेष जल को वाम नासा पुट से सूप कर देह मे शिव का चिन्तन करना चाहिए । उस माघ्राण जल को लेकर जो कि अपने देह मे स्थित प्रज्ञान है उसे कृपण वर्ण वाले ष्ठाय पुरुष के सहित वाम नासिका के पुट के द्वारा वाहास्थ करके शिला गत होने की भावना करनी चाहिए। फिर सम्पूर्ण देवों का तथा विशेष रूप से ऋषियो का तर्पसा करना चाहिए ॥१८॥ ॥१६॥२०॥२१॥ भूतों के लिये और पितृगण के लिये विधि के साथ अर्घ्य देना चाहिए । फिर परा व्यापिनी ज्योत्स्ना सन्ध्या की भली-भांति उपासना करे ।।२२। प्रातमध्याह्नमायाह्न अर्घ्य चैव निवेदयेत् । रक्तचंदनतोयेन हस्तमात्रेण मंडलम् ।।२३ सुवृत्त कल्पयेद्भूमौ प्रार्थयेत द्विजोत्तमा । प्राङ्मुखस्ताम्रपानं च सगध प्रस्थपूरितम् ॥२४ पूरयेद्गंधतोयेन रक्तचंदनकेन । रक्तपुप्पंस्तिलेश्च व कुशाक्षतसमन्विते. ॥२५. दूर्वापामार्गगव्येन केवलेन घृतेन च । आपूर्य मूलमंत्रेण नवाक्षरमयेन च । जानुभ्या धरणी गत्वा देवदेवं नमस्य च ॥२६ कृत्वा शिरसि तत्पात्रमध्यं मूलेन दापयेत् । अश्वमेधायुतं कृत्वा यत्फलं परिकीर्तितम् ।। ७ तत्फलं लभते दत्त्वा सौराऱ्या सर्वसमतम् । दत्त्वैवाध्यं यजेद्भक्त्या देवदेवं त्रियंबकम् ॥ ८ प्रतिदिन तीन वार प्रात:काल-मध्याह्न और सायकाल में अध्य समर्पित करना चाहिए । अब सौर अध्यं को विधि बतलाते हुए कहते हैं कि भूमि मे रक्त चन्दन के जल से एक हाथ भर के प्रमाण वाला सुवृत्त मण्डल की कल्पना करे और प्रार्थना करनी चाहिए। पूर्व की ओर मुख सौर स्नान विधि निरूपण ] [ ३२१ करके स्थित हो प्रस्थ पूरित गन्ध से युक्त ताम्र पात्र को रक्त चन्दन वाले गन्ध जल से पूरित कर देवे । उसपे रक्त वर्ण के पुष्प-तिल-कुश- अक्षत दूर्वा अपामार्ग-गव्य अथवा केवल घृन से ही भरकर रखखे । इसकी पूति नवाक्षर मय मूल मन्त्र से करे। घुनो को पृथ्वी पर टेककर देवो के देव को नमस्कार करके शिर पर उप पात्र को करके मूल मन्त्र के द्वारा अर्घ्य देना चाहिए । इसका पल एक प्रयुत मश्वमेध के समान बताया गया है ॥२३॥२४॥२५॥२६॥२७॥ अयुत ( दश सहन ) अश्व- मेध यज्ञो के तुल्य ही सौर मर्य का सर्वसम्मत फर देने वाला प्राप्त किया करता है । इस अर्घ्य को देकर फिर भक्ति भाव के साथ भगवान देवदेव यम्त्रक का यजन करना चाहिए ॥२८॥ अयवा भास्कर चेष्ट्वा प्राग्नेय स्नानमाचरेत् । पूर्व व गिवस्नानं मंत्रमात्रैरण भेदितम् ।।२६ दधावनपूर्व च स्नानं सौर च शाकरम् । विघ्नेश वरुणं चैव गुरु तीर्थे समर्चयेत् ।।३० बद्धा पद्मामनं तीथें तथा तीर्थं समर्च पेत् । तीर्थ सगृह्य विधिना पूजास्थान प्रविश्य च ॥३१ म गैरणार्य रविरेण तदाक्रम्य च पादुकम् । पूर्ववत्करविन्यास देहविन्यासमाचरेत् ॥३२ अय॑स्य सादन च समामात्परिकीतितम् । बद्धा पद्मा न योगो प्राणायाम समम्मेत् ॥३३ रत्तपुष्पाणि सगृह्य कमलाद्यानि भावयेत् । प्रात्मनो दक्षिणे स्थप जलभादच वामतः ॥३४ ताम्रानारिणौरा ए सव कामार्थमिद्धरे। अध्यात्र सम दाय प्रक्षाल्य च यथाविधि ॥३५ माकर वो समर्चना के अनतर सबसे पूर्व शिपाचंन करना चाहिए और उसके लिये शिव स्नान करे। उसी स्नान की विधि यताते हुए यहा जाता है कि सूर्य का पजन करके प्राग्नेय स्नान करे। सोर स्नान वी भौतिही शिव स्नान भी मन्त्र द्वारा पूर्ववत् होता है वेवा मन्त्रो पा ३२२ ] [ लिङ्ग पुराण हो भेद होता है ॥२६॥ पूर्व मे दन्त धापन प्रादि शारीरिक कृत्य समाप्त करके सौर तथा फिर पावर स्नान करना चाहिए । विघ्नी के स्वामी गणेश-वरुण पौर गुरुपा मचंन तीर्थ मे करे ॥३०॥ तीर्थ में पद्मासन बांध कर स्थित हो जाये और फिर तीर्थ को मना करनी चाहिए । विधि के साप तौर्ष वा सप्रइ परे और फिर पूजा के स्थान में प्रवेश परना चाहिए ॥३१॥ मध्य से पवित्र मार्ग के द्वारा तथा पादुवाएँ धारण कर वहां प्राप्त होते । पूर्व में बताये हुए परल्यास तथा पङ्गो के विन्यास करने चाहिए ॥३२॥ अध्यं का सादन सोप से कीतित किया गया है। योगी को पपासन वाधार प्राणायाम करने का प्रयास करना पाहिए ॥३३॥ रक्त वर्ष के पुप्पो वा सग्रह वरके तथा बमल मादि को भावना करनी चाहिए। इन पुप्पो को मपने दाहिनी मोर रक्खें मोर जल के पात्र को याई मोर स्थापित करना चाहिए ॥३४॥ सौर ताम्र पात्र सम्पूर्ण कामो की सिद्धि के लिये होते हैं। अयं पात्र को लेकर उसे विधि के अनुसार प्रक्षालन करे ॥३॥ पूर्वोक्तनाबुना सार्ध जलभाडे तथैव च । अखोदवेन च वाऱ्यामध्यद्रव्यसमन्वितम् ॥३६ सहितामवित कृत्वा मपूज्य प्रथमेन च । तुरोयेण वगु ठ्य व स्थापयेदात्मनो परि ॥३७ पाद्यमाचमनीय च गपुष्पसमन्धितम् । प्रभसा शोधिते पाने स्थापयेत्पूर्ववत्पृथक् । सहितां चैव विन्यस्य कवचेनावगु घ्य च ॥३८ अाबुना समभ्युक्ष्य द्रव्याणि च विशेषत । मादित्य व जपेद्दव सवदेवनमस्कृतम् ॥३६ प्रादित्यो व तेज ऊो बल यश मिनधति । इत्यादिना नमस्कृत्य करूपयेदासन प्रभो ॥४० पहिले कहे हुए जल के साथ उसी प्रकार से जन रे पात्र में प्रय ट्रम्पो से युक्त प्रर्य को प्रस्त्रोदक से देना चाहिए ।।३।। स हता ये मन्त्र से अभित्रित कसे तथा प्रथम मन्त्र से भली भांति पूजन करके एवं सौर स्नान विधि निरूपण ] [ ३२३ तुरीय मन्त्र से अवगुण्ठन करके अपने ऊपर स्थापित करना चाहिए ॥३७॥ पाद्य तथा प्राचमनीय को गध एव पुष्पो से समन्वित करके पूर्व को भौति जल से शोधित रिये हुए पात्र मे पृथक् स्थापित करें। सहिता का विन्यास करके और क्वच से अवगुण्ठित करके अध्यं के जल से विशेष तौर पर द्रव्यो फा अम्युक्षण करे । फिर समस्त देवो के द्वारा बद्यमान मादित्य देव का जाप करना चाहिए ॥३॥३क्षा प्रादित्य निश्चय ही तेज ऊज बल और यश को विशेष रूप से बढाते हैं-इत्यादि के द्वारा नमसार करके प्रभु के पासन की कल्पना करनी चाहिए ॥४०॥ प्रभूत विमल सारमाराध्य परम सुखम् । आग्नेय्पादिपु कोरणेपु मध्यमात हुदा न्यसेत् ॥४१ अग प्रविन्यसेच व बीजमकुरमेव च । नाल सुपि-सयुक्त सूत्रकटकसयुतम् ॥४२ दल दल र सु वेत हेमाम रक्तमेव च । करिणकामगेपेत दीसाधे शक्तिभितम् ॥४२ दीमा सूक्ष्मा जया भद्रा विभूतिविमला क्रमात् । अघोरा विकृता चैव टीप्ताद्याश्च शक्तय १४४ भास्कराभिमुखा सर्वा । कृताजलिपुटा शुभा । अथवा पद्महस्ता वा सर्वाभरणभपि ४५ मध्यतो वरदा देवी स्थापयेत्सर्वतोमुत्रम् । आवाहोत्ततो देवों मावर परमेश्वरम् ॥४६ नवाक्षरेण मण बालोक्तेन भास्करम् । आवाहने च सान्निध्यमनेनव विधीयते ॥४७ प्रभूत विमल सार माराव्य परम सुष प्रामनो को माग्नेय आदि कोणो में और मध्यमान्त पर्यात महरन्त व्याहृति मनुष्य को हृदय से न्यास करना चाहिए |४|| पूर्वोक्त प्रङ्गनायास परेपर वीज धर्म पद रूप प्रपुर नियुक्त गान सूत्र वएटा स सपुत दल मुश्वेत, रत्ताभ हमाम दलान और दीप्ता आदि शक्तियों से युक्त तथा वाणिवा ३२४ ] [लिङ्ग पुराण एव सर से समन्वित कमल का चिन्तन करना चाहिए ॥४२॥४३।। अब दीमा मादि माठ शक्तियो को बतलाते हैं-उन पाठो पाक्तियो के नाम ये हैं-दीप्ता-सूक्ष्मा-जया भद्रा-विभूति-विमला-अघोरा और विकृता ये पाठ शक्तियां हैं ॥४४॥ ये समस्त शक्ति भास्कर के मभिमुख रहने वाली हैं । ये परम शुभ एष प्रालि पुट को बांधे हुए रहा करती हैं । अथवा ये पर हाथो मे लिये रहती हैं और सम्पूर्ण पाभरणो से विभूषित होती हैं ।।४५।। इन सब के मध्य मे सर्वतोमुखी-परदा गायत्री देवी को स्थापित परे और इसके मनन्तर देवो का माषाहन करे । परमेश्वर भास्कर देव को बाफलोत नवाक्षर मन्त्र के द्वारा प्रावाहन मे सानिध्य करे ॥४६॥४७॥ मुद्रा च पामुद्राख्या भास्करस्य महात्मन । मूलेनाध्यं ततो दद्यारपाचमाचमन पृथक् ॥४८ पुनर ध्यप्रदानेन वाकलेन ययाविधि । रक्तपमा नि पुष्पाणि रक्तवदनमेव च ।VE दीपधूपादिनैवेद्य मुखघासादिरेव च । तावूल तिर्द प द्य बाष्प लेन विधीयते । ५० प्रग्नेय्या च तयैशान्या नैऋत्या वायुगोचरे । पूर्वस्या पश्चिमे चैव पप्रकार विध यते ।।५१ नेत्रात विधिनाऽभ्यच्यं प्रवादिनमोनकम् । कणिकाया वि यस्य रूपकध्यान माचरेत् ।।१२ सर्वे विद्युत्प्रभा शाता रौद्रमा प्रकीर्तितम् । दष्ट्राकरालवदन घष्टमूति भयकरम् ॥१३ वरद दक्षिण हस्त वाम पद्मविभूपितम् । सर्वाभरणमरमा रक्तस्र गनुलेपना १४ रक्ताबरधरा सर्वा मतयस्नस्य सस्थिता । समडलो महादेवः सिदूरारुण विग्रह ॥५५ महान् प्रात्मा वाले भगवान भास्कर की पद्ममुद्रा माम वाली मुद्रा है । इसके अनतर मूल मन्त्र से अर्घ्य देना चाहिए भोर पाच तथा सौर स्नान विधि निरूपण ] [ ३२५ पाचमन पृथक देवे ॥४२॥ पुनः अर्ध्य प्रदान के द्वारा जो कि वाजल से यथा विधि हो जाना चाहिए। रक्त चन्दन-रक्त वरणं वाले पुप्प एव कमल धूप दीप-नवेद्य मुख वामादि ताम्बूल और आत्ति दी। प्रादि वाकल मन्त्र से ही की जाती है ॥४६॥५०॥छ प्रकार का यजन किया जाता है- पूर्व पश्चिम-ग्रामयी-ऐशानी नैऋत्य और वायव्य दिशोपदिशामो मे किया जाता है ॥५१॥ प्रणव से प्रादि लेकर नम.-इसके अन्त तक विधि से तत्तद वयव शब्दो के द्वारा नेशान तक अभ्यर्चन करके अपने हृदय कमल की परिणका में विन्यास करे और फिर प्रतिबिम्ब पा ध्यान करना चाहिए ॥५२॥ सम्पूर्ण हृदय भादि परम शान्त और विद्युत् के समान प्रभा से परिपूर्ण हैं और रोद्र महज है। छष्ट्रा से विकराल वदन वाले- आठ मूत्तियो (शक्तियो ) से युक्त भयङ्कर हैं ॥५३।। दक्षिण हाय से वरदान देने वाले और वाम हस्त मे पर शोभित हो रहा है । उसको समस्त मूर्तियां सम्पूर्ण भूपणो से विभूषित हैं तथा रक्त सम् भौर रक्त अनुलेपन से युक्त हैं। सभी रक्त वर्ग के वस्त्र धारण किये हुए है । इस प्रकार से सस्थित मूत्तियो का ध्यान करना चाहिए । सिन्दूर से मरुण विग्रह वाले मण्डल से युक्त महादेव है ।।५।। पमहस्तोऽमृताव द्विहस्तनयनः प्रभुः । रक्ताभरएसयुक्तो रतनगनुलेपनः ।।५६ इत्थरूपधरं ध्यायेद्भास्कर भुवनेश्वरम् । पयवाह्य शुभं चान मडलेषु समंतत ॥५७ सोममगारक चंव बुध बुद्धिमतावरम् । वृहस्पति महायुद्धि रुद्रपय च भागवम् ॥५८ शनैश्वरं तथा राहु केतु धूम्रप्रकोर्तितम् । सर्वे द्विनेपा द्विभुजा राहुश्चोवंशरीरभृत् ॥५६ विवृत्तास्योजलि कृत्वा भ्र बुटीकुटिलेक्षणः । निश्चरश्च दंशस्यो यरदामयहरुफ ॥६० स्वःस्वर्भावं. स्वनाम्ना न प्रयवादिनमातरम् । पूजनीयाः प्रयत्नेन धर्मकामापंसिद्धये ॥६१ ३२६ ] [ लिङ्ग पुराण सप्तसप्तगणांश्च व बहिर्देवस्य पूजयेत् । ऋषयो देवगंधर्वाः पन्नगाप्सरसां गणाः ॥६२ ग्रामण्यो यातुधानाश्च तथा यक्षाश्च मुख्यतः । सप्ताश्वान् पूजयेदग्रे सप्तच्छदोमयान विभोः ॥६३ वालखिल्यगरण चैव निर्माल्यग्रहणं विभोः । पूजयेदासनं मूतैर्देवतामपि पूजयेत् । ६४ भुवनेश्वर भगवान भाार का ध्यान इस प्रकार से करना चाहिए कि उनके हस्त में पन है भोर वे अमृत मुख वाले हैं। उनके दो हस्त तथा दो नयन हैं और रक्त प्राभरण से युक्त एवं लाल माला और अनु. लेपन वाले हैं ॥५६॥ ऐसे स्वरूप वाले सूर्य देव का ध्यान करे। चारों मोर मण्डलो मे इनके पास है जो कि परम शुभ हैं ॥५७॥ सूर्य देव के भास पास अन्य सोम भौम बुध जो कि बुद्धिमानो मे अतिश्रेष्ठ है-महान् बुद्धिशाली बृहस्पति रुद्र पुत्र भार्गव-शनैश्चर राहु केतु और धूम्र स्थित हैं । ये सभी दो नेत्र और दो भुजा वाले हैं । राहु ऊध्वं शरीर के धारण करने वाला है ॥५॥५६॥ मण्डलो मे इन सब की पूजा करनी चाहिए । राहु विवृत ( खुले हुए । मुख घाला है और प्रालि करके भृकुटियो से कुटिल दृष्टि वाला है । शनैश्चर दष्ट्रा से युक्त मुख वाला तथा वर और अभय हाथो मे धारण करने वाला है ॥६॥ अपने २ भावो से तथा अपने उनके नाम से प्रणव से लेकर नम इस के अन्त तक धर्म काम और अर्थ की सिद्धि के लिये प्रयल पूर्वक ये सभी पूजा करने के योग्य हैं ॥६१॥ देव के बहिर्भाग मे सात-सात गणो की पूजा करे। ऋषि देव गन्धर्व-यन्मग-अप्सराम्रो के गण हैं। मामणी-यातुधान तथा मुख्यतया यक्ष इनके गण है । पहिले विभु के छन्दोमय सात प्रश्रो का पूजन करे ॥६२॥६३।। विभु के निर्माल्य ग्रहण करने वाले वाल्यखिल्य गए का यजन करे । मूर्ति के पासन को तथा देवता का भी पूजन करना चाहिए ॥४॥ मध्यं च दापयेत्त पां पृथगेव विधानतः। आवाहने च पूजाते तेषामुद्वासने तथा ॥६५ सौर स्नान विधि निरूपण [ ३२७ पृथक् विधान सहस्र वा तदर्थं वा शतमष्टोत्तरं तु वा। बाष्कलं च जपेदने दशाशेन च योजयेत् ॥६६ बुडं च पश्चिमे कुर्याद्वतुल चैत्र मेखलम् । चतुरंगुनमानेन चोत्सेधाद्विस्तरादपि ॥६७ एक हस्तप्रम रणेन नित्ये नैमित्तिके तथा । कृ-वाश्वत्थ इलाकारं नाभि कु डे दशागुलम् ॥६८ तदर्धन पुरस्तात्त गजोष्ठसदृशं स्मृतम् । गलमेकागुलं चैव शेष द्विगुणविस्तरम् ।।६६ तत्त्रमाणेन कुडस्य त्यक्त्वा कुर्वीत मेखलाम् । यत्नेन साधयित्वैव पश्चाद्धोमं च कारयेत् ॥७० उनको मध्य देना चाहिए । उन सूर्यादि के मावाहन मे और पूजा के अन्त मे उद्वासन में एक सहस्र-पास सौ अथवा अष्टोतर शत यावल मन्त्र का मागे जाप करे और उसका दशाश हवन करना चाहिए ॥६५॥६६॥ अव हवन की विधि बताई जाती है -- मण्डल के पश्चात् भाग मे कुण्ड की रचना करे जो कि वर्तुल होना चाहिए । सँचाई और विस्तार मे चार म गुल प्रमाण से युक्त होवे ॥६७॥ नित्य नमि- तिक कर्म में एक हाथ प्रमाण वाला बनावे जो कि पीपल के पते का माकार वाला होना चाहिए। उस कुण्ड मे दश म गुल को नाभि करनी चाहिए ॥६॥ इसके माथे प्रमाण वाला अर्थात् पाँच प्रगुल से युक्त गज के प्रोठ के समान गल की रचना करे । एक म गुल और शेप द्विगुण विस्तार वाला बनावे ॥६६। कुण्ड के दो अगुल प्रमाण भाग को त्याग करके मेखला की रचना करे । इस प्रकार से यत्न से साधन करके पीछे होम करना चाहिए ॥७॥ पठनोल्लेखन कुर्यात्प्रोक्षयेद्वारिणा पुन । प्रासन कल्पयेन्मध्ये प्रथमेन समाहितः ।।७१ प्रभावती तत. शक्तिमाय नैव तु विन्यसेत् । बाष्कलेनैव संपूज्य गंवपुषादिभिः क्रमाद ६२ वाप्यालेनैव मप्रेण क्रियां प्रति यत्पृषक् ।
३२८ ] [लिन पुराण मूलमंत्रण विधिना पश्चात्पुर्णाहुतिर्भवेत् ।।७३ कमादेव विधानेन सूर्या ग्नर्जनितो भवेत् । पूर्वोक्त न विधानेन प्रागुक्त कमल न्यसेत् ॥७४ मुखोपरि समभ्यर्च्य पूर्ववद्भास्करं प्रभुम् । दर्शवाहुतयो देया बाष्कलेन गहामुने 11७५ अगाना च तथैकक संहिताभि पृथक् पुनः । जादिस्विष्टपर्यंत मिमप्रक्षेपमेव च ॥७६ सामान्य सर्वम गेषु पारपर्यक्रमेण च । निवेद्य देवदेवाय भास्करायामितात्मने ॥७७ पूजाहोमादिक सर्वं दत्त्वाध्यं च प्रदक्षिणम् । अंगे. संपूज्य संक्षिप्य हृद्युद्वास्य नमस्य च ७८ पष्ट से उल्लेखन करे पोर जल से प्रोक्षण करे और पूर्णतया समा. हित होर प्रथम से मध्य मे प्रासन की कल्पना करनी चाहिए भोर आद्य के द्वारा ही प्रभावतो शक्ति का यहां पर विन्यास करना चाहिए । फिर बाक्ल मन्त्र के द्वारा ही गन्धाक्षत पुष्पादि से क्रम पूर्वक यजन करना चाहिए । इसो पावात् मूल मन्त्र से पूर्णाहुति होनी चाहिए । ॥७१॥७२॥७३॥ क्रम से इस प्रकार पे विधान से सूर्याग्नि जनित होती है। पहिले बहे हुए विधान से प्रथमोक्त यमल का न्यास करना चाहिए 11७४।। है महामुने ! मुस के कार पूर्व की भांति भास्कर प्रभु की मम्य- नारे और फिर बाल मन्त्र से दा माहूतियां देनी चाहिए ॥७॥ साहिता की ऋषामो से पिर मङ्गों की पर एक-एष माहुति देखें। जयादि से स्पिष्ट पर्यन्त पारम्पयं नम से सयंमागों में सामान्य इमा प्रोप परे ।।७६॥ देयो पे देव प्रमित मारमा पाले भासार ये लिये पूजा सया होम मादि सब को नियेदित परे मोर मम्मे दर प्राविणारे । पड़ो के द्वारा भली भांति पूजा बरसे फिर उपाहार गरे । हृदय समस मे विसर्जन पर नमस्सार रे॥ शियपूजा तत पुर्यादामा सिद्धये । एवं पित. प्रोक्त यजनं भास्करस्य च IISE सौर स्नान विधि निरूपण ] [ ३२९ य मकृद्वा यजेद्देव देवदेव जगद्गुरुम् । भास्कर परमात्मान स याति परमा गतिम् ।1८० सर्वपापविनिर्मुक्त सर्वपाप विवजित । स्चेश्वर्यसमोपेतम्तेजसाप्रतिमश्च स. ॥१ पत्रपौत्रादिमित्रश्च बाधवश्व समतत.। भुक्त्वैव विपलान् भोगानिहैव धनधान्यवान् ।।८२ यानवाहनसपन्नो भूषणैविविधरपि । काल गतोपि सूर्येरण मोदते कालमक्षयम् ।।८३ पुनस्तस्मादिहागत्य राजा भवति धार्मिक । वेदवेदागसपन्नो ब्राह्मणो वान जायते ॥८४ पुन प्राग्वासनायोगाद्धामिको वेदपारग । सूर्यमेव ममभ्यर्च्य सूर्य सायुज्यमाप्नुयात् ।।८५ इसके अनन्तर भगवान शिव की पूजा धर्म और कामार्थ की सिद्धि के लिये करनी चाहिए । इस प्रकार से भगवान् भास्कर देव के यजन को प्रति सक्षेप से कह दिया है ।।७६॥ जो कोई पुरुष देवो के देव जगत् के गुरु परमात्मा भास्कर देव का यजन एकवार किया करता है वह परम गति को प्राप्त किया करता है 10॥ भास्कर का याजक भक्त समस्त प्रकार के पापो से छुटकारा पाने वाला हो जाया करता है और चह सभी पापो से सर्वदा रहित होता है । भास्कर के पूजन करने वाला सब ऐश्वर्यों से सयुक्त और तज से अनुपम हुमा करता है ॥१॥ भासार भक्त पुत्र पौत्र प्रादि मियो तथा बान्धवो के सहित पारो मोर यहाँ पर बहुत से भोगो का उपभोग करके धन धान्य से सयुत होकर, यानो मोर वाहनो सम्पन्न होता हुमा एय अनेक प्रब र के भूपणो से विभूपित होकर मृत्यु को प्राप्त होकर भी सूर्यदेव के द्वारा मक्षय काल पर्पत मोद को प्रास होता है ॥२॥३॥ पुन यहाँ रासार में उत्पन्न होपर परम धर्म निष्ठ राजा हुमा करता है अथवा येद तथा वेद के सम्पूर्ण मङ्गों में शान पाला ग्राह्मण होता है । ॥८४|| चाहे क्षत्रिय रज या मे समुत्पन्न होरर या वेद वेदाग का ज्ञाता माहाग बुल मे जन्म ग्रहण करके पूर्व जाम
३३० ]
[ लिन पुराण
पुष्पहस्त प्रविश्याय
को बासना के योग से वेदो या पारगामी धार्मिक पुर इस जम में भी
वह सूर्य की अचना परखे अन्त में सूप ये सायुज्य पो प्राप्त होता है।८५॥
॥६२-अंग मंत्र-विद्या सहित शंकराचन ।।
अय ते सप्रवक्ष्यामि शिवार्चनमनुत्तमम् ।
प्रिसयमचयेदोशमग्निकार्य च शक्तित ॥१
शिवस्नान पुरा कृत्वा तत्त्वशुद्धि च पूर्ववत् ।
पूजास्य न समाहित ॥२
प्राणायामप्रय त्वा दाहनाप्लावनानि च ।
गधादिवासितकरो महामुद्रा प्रविन्यसेत् ॥३
विज्ञानेन तनु हत्वा ब्रह्माग्नेरपि यत्लत ।
अव्ययुद्धघहवारतन्मात्रासभवा तनुम् ॥४
शिवामृतेन सपूत शिवस्य च यथातथम ।
अधोनिष्ठया वितस्त्या तु नाम्यामुपरि तिष्ठति ॥५
हृदय तद्विजानीयाद्विश्वस्यायतन महत् ।
हत्पद्यकरिणवाया तु देव साक्षात्सदाशिवम् ॥६
पचवक्न दशभुजं सर्वाभरणभूपितम् ।
प्रतिवर विनेत्र च शशाक शेखरम् 11७
बद्धपद्मासनासीन शुद्धस्फटिकसनिमम ।
ऊवं वक्त्र सित व्यायेत्पूर्व कु कुमसनिमम ॥
नोलाभ दक्षिण वक्त्रमतिरक्त तथोतरम् ।
गोक्षीरधवल दिव्य पश्चिम परमेष्ठिन ||
(अङ्ग मात्र विद्या सहित शिवाचन )-इस अध्याय में मूत्ति विद्या
के सहित अङ्ग मन्त्रा के द्वारा मास शिवार्चन का निरूपण दिया जाता
है। शैलादि ने कहा-इसके अनतर में सर्वोत्तम शिव के अचन को
बताऊँगा तीनो स घ्यायो के समय मे ईश का अचन करे और शक्ति से
अग्नि याय वरना चाहिए ।।१॥ पहिले शिव स्नान करके फिर पूर्व की
भाति तत्त्वा की शुद्धि करनी चाहिए। हाथो मे पुष लकर पूजा
श्रङ्ग मन्त्र-विद्या सहित] [ ३३१ । स्थान में प्रवेश करे और समाहित होकर तीन प्राणायाम करे तथा भूत शुद्धि मे कहे हुए दाहन प्लावन करे और गन्धादि से सुवासित करो घाला होकर महामुद्रा का विन्यास करना चाहिए । ॥२॥३॥ अव्यक्त बुद्धि अहसार और तन्मानानो से समुत्पन्न तनु को शुद्ध शान से यत्न पूर्वक दम्ब करे और ब्रह्मज्ञान की अग्नि से भी उसे दग्ध करे ॥४॥ अत्यन्त कल्याण अमृत से सपूत और शिव के योग्य ग्रीवा वन्ध से नीचे नाभि मे ऊपर वितस्नि मे विश्व का महत् पायतन स्थित रहता है ऐसा जानना चाहिए | हृदय कमल को पणिका मे मध्य मे क्रीडा करते हुए साक्षात् देव सदाशिव का ध्यान करना चाहिए ॥६॥ सदाशिव के ध्यान मे उनका स्वरूप पांच मुसो वाला दश भुजानो से युक्त तथा सम्पूर्ण प्राभरणो से सभूपित है । सदाशिव के प्रत्येक मुस मे तीन नेत्र हैं तथा चन्द्रशेखर वाले है ।।७॥ पद्मासन वाँध कर विराजमान और शुद्ध स्फटिक मरिण क तुल्य वर्ण वाले हैं। ऊर्ध्व मुख का श्वेत वर्ण है ऐसा ध्यान करना चाहिए । पूर्व की ओर रहने वाला मुस कु कुम के समान श्राभा से युक्त है । दक्षिण मुख नीली प्राभा से सम्पन्न है और उत्तर को और गुस प्रत्यधिक रक्त वर्ण वाला है । परमेष्ठी का पश्चिम की ओर चाला मुस गौ के दुग्ध के तुल्य दिव्य एव धवल है ||८|| शूल परशुखङ्गच वज्रशक्ति च दक्षिणे। वामे पाशाकुश घटा नाग नाराचमुतमम् ।।१० वरदाभयहस्त वा शेष पूर्व पदव तु । सर्वाभरणमंयुक्त चित्रावरघर शिवम् ।।११ ब्रह्मागविग्रह देव सर्वदेवोत्तमोत्तमम् । पूजयेत्सर्वमावेन ब्रह्माग ह्मणः पतिम् ॥१२ उक्तानि पच ब्रह्मारिण शिवागानि शृणुष्व मे । दाक्ति भूतानि च तथा हृदयादीनि सुव्रत ॥१३ ॐ ईशान. सर्वविद्याना हृदयाय शक्तिबीजाय नमः । ॐ ईश्वरः सर्वभूतानाममृताय शिरसे नमः ॥१४ सदाशिव के दक्षिण हस्त में धूल-परशुराग-यच-शक्ति प्रापुष ३. [नि पुराण । गोभिा । शरि द्वारा पागम मुग-धारा-नाग पोर राम माराप विराजमान है पापपूषा परवान रामा प्रमदान देने वाले शिय समरत प्रसार के पामरणों में गम और पित्र पर से धारणा करणे यारो १ ॥१॥ गोमासे विशिष्ट विपद यात पासपूर्ण देयों में मातम देय हा फै पतिमा भाय से प्रागलो से पूजन परला पाहिए ॥१॥ है गुर! सियाग रहे गये है। उनसे युग मुनगे अयण परी। पौरातिभूत हरयादियो गुन १॥ मायाय पात-मोर सर्य पियामों के ईशान शक्ति पोज हा सिपे गमार । मयं भूतों में ईश्वर भगृत निरपे लिये गमवार ॥१४॥ ॐ ब्रह्माधिपतये मालाग्निरूपाय शिषाय नमः। ॐ ग्रहह्मणोधिपतये पालघहमारताय कवाय नमः ॥१५ * ब्रह्मरणे वृहणाय भानमूर्तये नेत्राय नमः। *शिवाय सदाशिवाय पापनासाय प्रप्रतिहताय फट्पट १६ ॐसद्योजाताय भयेमवेनानि भवे- भवन्य मां भवोद्भयाय नियमूर्तये नमः । ॐ हंसशिसाय विद्यादेहाय मात्मस्वरूपाय- परापराय शिवाय शिवतमाय नमः ॥१७ कथितानि शिवांगानि मतिविद्या च तस्य । ब्रह्मांगत विद्यांगसहितां शिवशासने ॥१८ सौराणि च प्रवक्ष्यामि वास्कलाद्यानि सुयत । प्रगानि सर्ववेदेषु सारभूतानि सूबत ॥१६ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जन:- तप. ॐ सत्यम् ॐ प्रतम् ॐ ब्रह्म । नवाक्षरमय मंत्र वाष्कलं परिकीर्तितम् । न क्षरतीति लोकेऽस्मिस्ततो ह्यक्षरमुच्यते । सत्यमक्षरमित्युक्त प्रवादिनमोतकम् ॥२० ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि ।
अङ्ग मन्त्र-विद्या सहित० ] [३३३ धियो यो नः प्रचोदयात् । नमः सूर्याय खखोल्काय नमः ।.१ ॐ ब्रह्म के अधिपति कालाग्नि के स्वरूप वाले शिसा के लिये नम- स्कार है । ॐ ब्रह्म के अधिपति वाल चराड मारुत कवच के लिये नम- स्कार है ॥१५॥ ॐ ब्रह्मा वृहण ज्ञान मूत्ति नेत्र के लिये नमस्कार है। प्रो शिव सदाशिव पाशुपत अस्त्र वाले प्रति हत के लिये फट् फ्ट है ।।१६।। ये छ प्रङ्गो का ग्यास प्रकार है। अब मूत्ति का कथन किया जाता है । ॐ सद्योजात-प्रत्येा जन्म मे जाम के प्रतिभव वाले-इस ससार के भी कारण स्वरूप शिष मूक्ति के लिये नमस्कार है । विद्या का निरू. पण करते है-मोम् हम शिख के लिये विद्या (ज्ञान ) यो देह वाले- प्रात्म स्वरूप-पर से भी पर-परम कल्याण शिव के लिये नमस्कार है ॥१७॥ शिव के प्रग-शिव को मूत्ति और उम शिव को विद्या कथित कर दी गई है । शिव शामन मे विद्याग सहित ब्रह्माङ्ग मूति को जानना चाहिए ॥१८॥ हे सुव्रत | बाप्पलादि सौर अङ्ग जो कि वेदो मे सार भूत हैं उनको बताऊ गा ।।१६।। प्रब नवाक्षर मन्त्र का स्वरूप वरिंगत किया जाता है - "ॐ भू-ॐ भुन. ॐ स्व ॐ मह ॐ जन ॐ तप * सत्यम्-ॐ ऋतम् ॐ ग्रहा-यह नव प्रक्षरमय वाकल मन्त्र परिकीत्तित किया गया है। जिसका क्षरण नहीं होता है उसे इस लोक मे अक्षर पहा जाता है । जिसके मादि मे प्रणव और अन्त में 'नम.'-यह होता है उसे 'सत्य अक्षरम्' कहा गया है ॥१६॥२०॥ ॐ भूर्भुव स्व तत्सवितु. वरेण्य भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो न प्रचोदयात् । नम सूर्याप रायोलाय नम.-यह महारमा मात्र देय का मूल मन्त्र कहा गया है। नयाक्षर मूल मन्त्र के सहित दोमादि शक्ति के मन्त्र हैं जो कि मन मन्त्र कहे जाते हैं उनसे भगवान भासर का पूजन घरमा पाहिए ॥२१॥ मूलमयमिति प्रोक्त भास्करस्य महात्मनः । नवाक्षरेण दीप्ताद्या मूलमंत्रेण भाारम् ॥२२ पूजरेदं माणि कथयामि समासतः। वेदादिभि: प्रभूताद्य प्रणवेन तु मध्यमम् ॥२३ २३४ ] लिङ्ग पुराण ॐ भू ब्रह्मणे हृदयाय नम । ॐ भुत विष्णवे शिरसे नम । ॐ स्व रुद्राय शिखाय नम ॐ भूर्भुव स्व ज्वाला- मालिन्य देवाय नम ॐ महः महेश्वराय कवचाय नम । ॐजन शिवाय नेनेभ्यो नम । ॐतपस्तापनायत्राय नम । एव प्रसगादेवेह सौराणि कथितानि ह। शवानि च समासेन न्यास योगेन सुव्रत }}.४ इत्थ मरमय देव पूजयेद्धृदयाबुजे । नाभौ होम तु कर्तव्य जनवित्वा यथाक्रनम् ।।२५४ मनमा सर्वाणि शिव ग्नौ देवमीश्वरम् । पवब्रह्मागसभूत शिवमूर्ति सदाशिवम् ॥२६ रक्तपद्मासनासीन सकलीकृत्य यत्नन । मूलेन मूर्तिमनेण ब्रह्मागाद्यैस्तु सव्रत ॥२७ समिदाज्याहुनाह त्वा मनसा चद्रमडलात् । चद्रस्थानात्समुत्पना पूणधारामनुस्मरेत् ।।२८ पूर्णाहुतिविधानेन ज्ञानिना शिवशायने । शिव वक्तगत ध्यायेत जोमान च शारम् ॥२६ ललाटे देवदेवेश भ्रमध्ये वा स्मरेत्पुन । यम हृत्वमले सर्व समाध्य विधिविस्तरम् ॥३० शुद्धदापशिखाकार भावयेद्भवनाशनम् । लिगे च पूजयेद्देव स्थडिले वा सदाशिवम् ॥३१ वेदादि से प्रभूताय और प्रणव से मध्यम वो मैं सक्षेप से कहता हूँ ॥२२॥२३॥ प्रोम् भू ब्रह्मा हृदय के लिये नमस्कार है । भोम् भुन विष्णु शिर के लिये मस्तार है । ॐ स्वद शिसा के लिये नमार है । ॐ भूव स्व ज्या मातिनी देव के लिये नमस्कार है। मह- श्वर करव पे निर नमार है। ॐ जन शिव के लिये, नेत्रो लिये १ नमत र है । ता तापन प्रस्न के लिये नमस्कार है ! इस प्रार स तन्त्रोक्त विधान से शिवार्चन ] यहाँ पर प्रसङ्ग से ही सौर मन्त्र कहे हैं और हे सुनत्त । न्यास योग से सक्षेप मे दोय मन्य कहे गये हैं ॥२४ा इस प्रकार रो मन्त्रमय देय मा हृदय वमल मे पूजन करना चाहिए। प्रय मानस होम वी विधि पा पर्णन किया जाता है-नाभि के स्थान में विधि पूर्वक अग्नि को उत्पन्न पर होम करना चाहिए ॥२॥ मन वे द्वारा ही समस्त कार्य करने पाहिए और शिवाग्नि मे पच ब्रह्मानगभूत शिव मूत्ति सदाशिव ईश्वर देय का जो दि रक्त पद पर सस्थित हैं, यस्न पूर्वर रावली परण परके मूल मूति मात्र से और ग्रहाङ्गादि मन्यो से समिधा एप पृा वी पाह- नियाँ देवर हवन करे फिर मन से ही चन्द्र मण्डल से चन्द्र पे स्थान से समुत्पन्न पूर्ण धारा का मनुस्मरण करना चाहिए ॥२६॥२४ारमा भा- नियो ये शिय शासन मे पूर्ण माहुति के विधान से मुरा गाशिव या तथा तेजोमय दाङ्कर का ध्यान करे ।।२६ ललाट में पी मध्य स्थल में शिप में तेज का स्मरण गरे । पहिले बताया हुमा जो यमल में समग्र विधि का विस्तार है उग सब यो समाप्त बरये पिर सासारिख बाधामो पे नाम परो पाले शुभ दीप पो शिता भागार पै समाए है उनमा चिन्तन परना महिए। पिज में मयया स्थगिया मे मदागिर देव की पना परनी चाहिए । पारसमे पानियो को मुग्य मापा बनार प्र. में प्रतिमा रा पगाची बताया गया है ॥३०॥३१॥ ॥६३-तंत्रोक्त विधान से शिवाचन ।। ध्यारया पूजाविधानस्य प्रवदामि समासा.। शिवभारोत्तमार्गगग शियन पापिन पुरा ? प्रपोभी पदचिणी Eii वनिया मति. विद्याशिवानि जप्त्या पंगासिनिधि माना मनिपादिममतस्यामितीयारा तुर्गम मगुप्टेनाना- गि नग ससदया नगुमना ग राTIR प्रमोगरा पुनरपि गाजपा गेये पटप REET.
। लिङ्ग पुराण मित्युच्यते ॥२ शिवार्चना तेन हस्तेन कार्या ।। ३ तत्त्वगतमारमानं व्यवस्य प्य तत्त्वशुद्धि पूर्ववत् ।।? माम्मोग्निवायुयोमांतं पचचतःशुद्ध कोट्य ते धारासहितेन व्यवस्थाप्य तत्त्वशुद्धि पूर्वं कुर्यात् ।।५ तत्त्वशुद्धि षष्ठेन सद्येन तृतीयेन फडताद्धाशुद्धि ॥६ पष्ठसहितेन सद्येन तृतीयेन फडन्नेन बारितत्त्वशुद्धि. 19 ( तन्त्रोक्त विधान से शिवार्चन ) इस अध्याय में विशेष रूप से तान्त्रिकोक्त विधि-विधान से श्री भगवान् शङ्कर की अर्चा का पद्य एवं गद्य के द्वारा निरूपण किया जाता है । शैलादि ने कहा-मैं अब पूजा के विधान की व्याख्या सक्षेप से बताता हूँ । यह पहिले भगवान शिव ने कहा था । मैं उमी शिव शास्त्रोक्त मार्ग के द्वारा इस समय बता रहा हूँ ॥१॥ शिव स्नान और भस्म स्नान के अन्तर दोनो हाथो को चन्दन से चचित कर लेवे और फिर वौषट् अन्त से बाधाञ्जलि करके पूर्वोक्त मूत्ति विद्या और शिवादि अर्थात् शैवाङ्गो का जाप करे। इसके अनन्तर अगुष्ट से लेकर पानिष्ठिका के अन्त तक ईशानादि पांच मन्त्रो का न्यारा करना चाहिए । न्यास करने का क्रम यह है कि कनिष्ठिका जिसमे प्रादि है और तर्जनी मध्यमा जिसमे अन्त है तथा हृदय जिसमे प्रादि है और तीसरा अघोर मन्त्र जिममे अन्त है इस प्रकार से करे । अगुष्ठ के साथ तुरीय तत्पुरुष मन्त्र यो प्रनामिका से पञ्चम को प्रोर तल द्वय से षष्ठ मन्त्र को जपकर फिर तर्जनी और अडगुष्ट से नाराचास्त्र प्रयोग के द्वारा मूल पचाक्षर मन्त्र कर जर बरे फिर चतुर्थ मन्त्र से अवगुण्ठन करे यह शव हस्त-इस नाम से कहा जाता है। उस हस्त शिव की अर्चना करनी चाहिए ॥२॥३॥ प्रात्मा को तत्व गर अर्थात् तत्त्वो मे व्यवस्थापित परे और पूर्व की भांति हो तव शुद्धि करनी चाहिए। यह तत्व शुद्धि पहिले करे । पृथ्वी-जल अग्नि वायु धार व्योम इन पापी तथा प्रहार मह- सत्य प्रकृति और ब्रह्म रूप धारो में कोटि के अन्त में अमृतधारा से युक्त मुषुम्ना मार्ग मे पवस्थापित पसे तत्त्वो की शुद्धि करनी चाहिए तन्त्रोक्त विधान से शिवार्चन ] [३३७ ॥४॥शा अब पृथिवी आदि तत्वों की शुद्धि को विस्तृत रूप से बतलाते हैं - "नमोहिरएय वाहव" इस पत्र मन्त्र से-राद्य तृतीय अघोर मन्त्र से और फडन्त से धरा की शुद्धि करे ॥६॥ पर से युक्त सघ तृतीय फडन्त मन्त्र से वारि तत्व की शुद्धि की जाती है ।।७।। बाह्न यतृतीयेन फडतेनाग्मिशुद्धिः।। वायव्यचतुर्थेन यष्टमाहितेन फडतेन वायुशुद्धि II पष्ठेन ससद्य न तृतीयेन फडतेनाकाशशुद्धिः ।।१० उपसंहृत्यैवं सद्यपप्ठेन तृतीयेन मलेन फहतेन ताटन ततीयेन संपु- टीकृत्य ग्रहण मलमेव योनियोजेन संपुटीकृत्वा व नं वधः ।।११ एवं क्षातानीताादनिवृत्तिर्यंत पूर्ववत्कृत्वा प्रणवेन तत्त्वत्रयकमनु- ध्याय आत्मानं दीपशिखाकार पुर्यष्टकर्मा त त्रयातीतं शक्तिक्षो. भेरणामृतधारा सुपुम्गाया ध्यात्वा ॥१२ शांत्यतीतादिनिवृत्तिपयंताना चात विद्वकारोकारमकारांत शिवं सदाशिव रुद्रविष्णुब्रह्मानं सृष्टिक्रमेणामृतीकरणं ब्रह्मन्यास कृत्वा पंचवक्त्रेषु पक्दशनयन विन्यस्य मूलेन पादादिवेशात महामुद्रामपि बद्धा शिवोहमिति ध्यात्वा शक्त्यादीनि विन्यस्य हृदि शक्त्यावीजांकुरानतरात्मसुपिरसूत्रकंटकपत्रकेसरधर्मश न. वैराग्येश्वयंसूर्य सोमानवामाज्येष्ठा रौद्राकानीकालविकरणीय धि- करणोबलप्रयमनीमर्वभादमनी. के परेषु कणिकाया मनामनो- मपि ध्यत्वा ।।१३ फडन्त वाहय तृतीय मन्त्र से प्रग्नि की शुद्धि होती है। पर के सहित वायत्य चौथे फट् जिसके मन्त्र मे है ऐसे मन्त्र से वायु को र सुद्धि होती है ॥३॥ सद्य के महित तृतीय और पष्ट पडन्त से पापारा यी शुद्धि होती है ॥१०॥ अब ताडा-ग्रहण बपनो को बताते हैं । हम तरह पूर्जत प्रवार से उपसहार बरके सथ से युक्त पत्र सहित तृतीग पडन्त मूल मन्त्र से ताडन मर-मून को तृतीय से मम्पुटोवरण करके ग्रहण और मूल को ही योनि वीज ही' इस बीज से सम्पुटीवरण परके शिवाय करना चाहिए ॥१॥ इस तरह से पहिले यीसवें अध्याय में ३३८ ]] [लिङ्ग पुराण वहे हुए की भांति क्षातातीत प्रादि की निवृत्ति पर्यन्त करके प्रणव के द्वारा ब्रह्मा विष्णु रुद्र रूप तत्त्व अय का ध्यान करयो दीप शिखा को मा. कार वाले योग शास्त्रोक्त मूलाधारादि स्वरूप प्रष्टक से सहित विश्वादि जय से परे कुण्डली के प्रयोघ द्वारा यात्मा का और सुपुम्णा मे अमृत धारा का ध्यान करे ॥१२॥ शान्त्यतीतादि निवृत्ति पर्यन्त व लाना में मध्य मे नाद विन्दु अकार-उकार और मकार के अवसान वाले उस रुद्र- विष्णु ब्रह्मान्त सदाशिव शिव का ध्यान करे और सृष्टि के क्रम से अमृती करण यान्यास करके मूल मन्त्र से पांच मुखो मे नेत्री का विन्यास घरे। फिर पद से लेकर वे शो के अन्त पर्यन्त महामुद्रा को बांध कर मैं शिव हूँ'-- ऐसा ध्यान करके हृदयावास में सक्ति के सहित बिना किसी व्यवधान के बीजारो का ध्यान करे जिनमे सुपिर सूत्र व एटक पत्र धेसर धर्म ज्ञान वैराग्य ऐश्वर्य सूर्य सोम अग्नि इन सब का ध्यान बरे और केसरो में वामा ज्येष्ठा रौद्री-काली-कल विकरणी बल विफरपी- बल प्रथमनी और सर्व भुत दमनी इन अठारह शक्तियों का तथा करिएका मे मनोमनी का ध्यान करे॥१३॥ प्रासन परिकल्प्यैव सर्वोपचारसहित बहियोगोपचारेणातः- करण कृत्वा नामी वह्निकु डे पूर्ववदासन परिकल्प्य सदाशिव ध्यात्वा बिदुतोऽमृधारा शिवमडले विपतिता ध्यात्वा ललाटे महेश्वर दीपशिखाक र ध्यात्वा प्रात्मशुद्धिरित्य प्राणापानी सपम्य समगया वायु व्यवस्थाप्न पठेन तालुमुद्रा कृत्वा दिग्वध कृत्वा पष्ठेन स्थानशुद्धिर्वस्त्रादि पूतातरयपात्रादिषु प्रणवेन तत्त्वज्य विन्यस्य तदुपरि बिंदु ध्यात्वा त्वभमा विपूर्य द्रव्याणि च विधाय अमृतप्लावन कृत्वा प धपानादिपु तेपामध्यवदासन परिकल्प माहितयाभिमरायनान्यच्य द्वितोयेगमतीवृत्त्वा तृतीयेन विशाध्यचतुर्थेनावर व्य पचमेनावलोव पष्ठेन रक्षा विधाय चतुर्थेन बुशपु ना मसाभ्युक्ष्य आत्म नमपि द्रव्यारिण पुनरभिताभ्युक्ष्य सपुष्पेण सर्वद्रव्याणि पृथक्पृथक् शापयेत्।। ४ सद्यन गए चामेन वनम् । - तन्त्रोक्त विधान से शिवार्चन ] [ ३३६ अघोरेण अामरणं पुरुपेरण नैवेद्यम् । ईशानेन पुष्पाणि अथाभिमंत्रयेत् ॥१५ शिवगायत्र्या शेपं प्रोक्षयेत् ॥१६ पंचामृतपंचगव्यादीनि ब्रह्मागमूलाध रनि नयेत् ।।१७ पृयकपृयड मूलेनाय॑ धूप दत्त्वाचमनीय च तेषामपि धेनुमुद्रा च दर्शयित्वा ववचेनावगु ठ्याखेण रक्षा च विधाय द्रव्यशुद्धि कुर्यात् ॥१८ अर्योदकम ग्रे हुदा गंधमादायारेण विशोध्य पूजाप्रभृति करणं रक्षात कृत्वैव द्रव्यशुद्धि पूजासमर्पणांतं मौनमास्थाय पुप्पाजलि दत्त्वा सर्वमन्त्राणि प्रणयादिनमोताजपित्वा पुष्पांजलि त्यजेन्मंत्र भुद्धिरित्यम् ॥१६ अग्रे सामान्यार्थ्यपान पयगापूर्य गंधपुष्पादिना संहितयाभिमंत्र्य धेनुमुद्रा दत्वा कवनावगुंठ्यास्त्रेण रक्षयेत् । पूजा पयु'पितां गायन्या समभ्यच्यं सामान्यायं दत्त्वा गधपुप्पधू- पाचमनीयं स्वधात नमात वा दत्वा ब्रह्मभि. पृथक्पृथक्पुष्पाजलि दत्वा फडंना निमल्यिं आपोह्य ईशान्या चडमभ्यसन- मूनि चई सामान्यारण लिंगपीठं शिवं पशुपतासंग विशोन्य मूनि पुष्प निधाय पूजयेलिंगशुदः ॥२० परमात्म-गुखिया प्रकार यतनाया जाना है इनम स्थान और द्रय नि या भी विधान है-हियोगोपचार से मन मामयी गरे परित वाये हुए प्रगर मे सपचार सक्षिा मामन को परिसरमा पर- ग नाभि म यहि पुषः म पूर्णबत् प्रामन का पति परे और उस पर भगवान् मशपिया ध्यान परे। सनाट दी। यी शिया के पार वाले महेश्वर रा ध्यान रे छोर हिन्दु से शिय मदर में मामी धारा को पिनिग होती हु । ध्यान पर-इस विधि से मारन कि परनी चाहिए। प्राण प्रौर प्रपान यातुपों का समय बरसे मुगुम्ना । या सोपस्थानित मरेर मन्त्र से रान मुमा तथा सेयरी पर शरीर-मौर स्पान गुमिरे। पार में द्वार मम भाग को गुमन ३४० ] [ लिङ्ग पुराण पवित्र करके अयं पात्रादि में तत्त्वत्रय का विन्यास करके उन तत्त्वादि के पाद्य पात्रादि मे अमृत प्लावन करे। पुष्पो के महित जल से पूजा समस्त द्रव्यो को पृथक् २ शोधन करना चाहिए । अयं की भांति प्रासन को कल्पना करके सहिता के द्वारा अभिमन्त्रित करे । प्राध से अभ्यर्चना करे-द्वितीय से अमृती कररा करे तृतीय से विशोधन करे चतुर्थ से अवगुएठन करे-पचम से अवलोकन और पष्ठ से रक्षण करे । चतुर्थ से कुरा पुञ्ज से अर्घ्य जल के द्वारा अभ्युक्षरा करे ॥१४॥ अव गन्धादि अभिमन्त्रण की विधि बताई जाती है । इसके अनन्तर सद्यादि के द्वारा गन्धादि को अभिमन्त्रित करे-सद्य से गन्ध को-वाम से वस्त्र को- अघोर से प्राभरण को-पुरुष से नैवेद्य को और ईशान से पुष्पो को अभि- मन्त्रित करना चाहिए ॥१॥ शिव गायनी से शेप को प्रोक्षित करे ॥१६॥ ब्रह्माङ्ग मूलादि अर्थात पवाक्षर बीजो से पचामृत और पच गव्य प्रादि को अभिमन्त्रित करना चाहिए ॥१७॥ पृथक पृथक् मूल मन्त्र से अयं धूप और पाचमनीय देकर तथा उनको धेनु मुद्रा दिखावर क्यच से अवगुएठन करके और अस्त्र से रक्षा करके द्रव्य शुद्धि करनी चाहिए ॥१८॥ अन्न मन्त्र शुद्धि का निरूपण किया जाता है -सर्व प्रथम अध्य गन्ध वो हृदय म-ब से लेकर प्रस्र से उसका विसोवन करे और पूजा से लकर समर्पण के अन्त ता मौन रहार पुष्पाञ्जलि देवे तथा सम्पूर्ण मत्रो को प्रयास से लेकर नम पयात जप करे फिर पुष्पाञ्जलि छाडे-स प्रभार से मन्त्र सुद्धि की जाती है । ॥१६॥ लिङ्ग सुद्धि की विधि बताई जाती है-पागे साधारण मध्य-पात्र को पप से भरपर गन्ध पुष्पादि से साहिता के द्वारा अभिमन्त्रित पर भेनु मुद्रा दिलाकर यवच से प्रवाण्ठन परे भौर पम्ब से रक्षा करनी चाहिए । पपित पूजा को गागी मन्न से समम्पर्चना परये मध्य दवे । पिर स्नधान्न या नमोर गाय पुल-धूप और मानमनीय देवर ब्रह्मो के द्वारा पृथप २ पुष्पाञ्जलि दार परन्तारन से निर्माल्य या यामोहन करे और शानो दिशा में एटा मापन पर्म पासा मुक्ति चएको सामान्यास्त्र स लिन पोट शिय वा पशु पताम्ब से विज्ञापन करणे मस्तर पर पुष्प पर पूजा परनी चाहिए- तन्त्रोक्त विधान से शिवाचंन ] [३४१ यह लिङ्ग शुद्धि होती है ॥२०॥ श्रासन कूम मिलाया बोजाकुर तदुपरि ब्रह्मशिलायामनतनाल- सुपिरे सूत्रपत्रकट कणिकाकेमरधर्मज्ञानवैराग्यश्वर्यसूर्यमोमाग्नि- केपरशक्ति मनोन्मनी परिणकाया मनोन्मनेनानतामनायेति समा. सनासन परिकल्प्य तदुपरि निवृत्त्यादिकलामय पड विधसहित कर्मक्लागदह सदाशिव भावयेत् ।।.र उभाम्या सपुष्पाम्या हस्नाभ्यामगुप्ठेन पुष्पमापीड्य प्र वाहनमुद्र- या शनं शनै हृदय दिमस्तवातमारोप हुदा सह मूल प्लुनमुच्चार्य सद्येन दुिस्थानादभ्यधिक दीपशिखागार सर्वतोमुग्रहस्त व्याप्य- व्यापव मावाह्य स्यापयेत् ॥२२ पूर्वदा शिवशक्तिममायेन परमीकरणममृतीकरण हृदयादि- मूलेन सद्य नावाहन हा मूलोपरि वामेन स्थापन हुदा मूलोपार अघोरेण सन्निराध हुदा मूलोपरि पुरुपेण सान्निध्य हुदा मूलेन ईशानेन पूजयदिति उपदेश ॥३ पचमत्रसहितन यथापूर्वमात्मनो देहनिर्माण तथा देवस्यापि वह- श्व व मुपदेश ।।२४ पर पूजा की विधि बताते हैं-यूर्म पृष्ठ पर मारान उसये उपर पोजाइपुर मोर उस कार ब्रह्मशिसा म पन त नाT-गुपिर म गून पत्र. मटर पणिका गिर धर्म मान, एश्वय घेराम्य, सूर्य-सोम पोर मगि पौर यामा. पूर्योत पाठ गरियो तया परिणाम में मोगी या मनो. ग्मनेन से ध्यान परे । रामे से प्रनतारा नम'-यादिमों में द्वारा प्रासा परिस्मिन परे। उस कार नियापिता प्रपुर पट का युग वर्ग पसा पनों वाले पदों पर से ममाशिव भग- यान पनि पराा पाहिए ॥२१॥ पर मायाह और स्मात विधि nfirm -पुष्पा सपा दोनो हायों में प्रगुपये द्वारा पुरा मापापोड़ा पर मोर पाहा को मुझ मे धीरे धीरे से भरर मतपत सर पारोपण र हरम र माप पपरा मराय सर से उबाररा 7 frIT भी ।
३४२ ] [ लिङ्ग पुराण अधिक दीपक की शिखा के ग्रावार वाले सब पोर मुग्व और हस्त से युक्त व्याध्य व्यापक का प्रावाहन करके स्थापन करे ॥२२॥ पहिले हृदय मन्त्र से शिव शक्ति समवाय से अर्थात् तादात्य से एकीकरण अमृती करण, फिर हृदय मन्त्र पूर्वक मूल मन के सहित सद्य से अावाहन हृदय मन से मूल मत्र के ऊपर धाम मत्र से म्यापन और इसी प्रकार में सक्षि- थी कारण करके हृदय और मूल मन के सहित ईशान मत्र मे पूजन करना चाहिए-यह उपदेश है ॥२३॥ पहिले जिस प्रकार से पच मत्र पे सहित से भारत के देह का निर्माण किया जाता है उसी प्रकार से देव का और वह्नि का भी करे यह उपदेश है ॥२४॥ रूपकध्यान कृत्या मूलेन नमस्कारातमापाद्य स्वधातमाचमनीयं सर्व नमस्कारात वा स्वाहाकारातमध्यं मूलेन पुष्पाजलिं वौषड- तेन सर्व नमस्कारात हृदा वा ईशानेन वा रुद्रगायच्या ॐ नमः शिवायेति मूलमत्रेण वा पूजयेत् ॥२५ पुष्पाजलि दत्त्वा पुनवू पाचमनीय पष्ठेन पुष्पावसरण विसर्जन मन्त्रोदकेन मलेत सस्तरप्य सर्वद्रव्यामिपेक्मीशानेन प्रतिद्रव्यमष्ट. पुष्प दत्वैवमयं च गधपुष्पधूपाचमनीय फटतावरण पूजापसरए शुद्धोदकेन मूलेन सस्नाय पिटामलकादिभिः ॥७६ उप्णोदकेन हरिद्राये न लिंगमति पीठ सहिता पिशोध्य गयोदव- हिरण्योदकमत्रोदकेन रुद्राध्याय पठमान, नीलरुद्रत्वरितरुद्रपन. ब्रह्मादिमि नम शिवायेति स्नापयेत् ॥ मूनि पुष्प निधायेव न य लिंगमस्तक कुर्यादा श्लोक II प्रतिविम्व का ध्यान करये फिर मूर से नमस्कार के अन्त तव पर- स्वधान्त नाचमनीय भयवा नमस्कार के अन्त तक सब-स्वाहा पारात अध्यं मून मन्त्र से पुप्पाञ्जलि चौपदन्त से सब नमस्कार ये मन्त र हृदय मन्त्र से पयवा ईशारा या रुद्र गायगी से विम्या "ॐ नम शियाय" इस मूल मान से पूजा करना चाहिए ॥२॥ पुष्पाञ्जलि समर्पित परवे पिर पप-माधमनीय पठ मान से पुष्पा वसरण विसर्जन परये मूल मन्यादर से सस्नपा के समस्त इथ्य पछामृतादि या भिरेर पर- तन्त्रोक्त विधान से शिवार्चन ] [३४३ ईशान मन्त्र से प्रति द्रव्य पाठ पुष्प वाला अर्घ्य गन्ध पुष्प धूप प्राचम- नीय देकर पूजा का अपसरण करके पिसे हुए आंवले प्रादि के साथ शुद्ध जल से स्नयन करावे ॥२६॥ पंचामृत प्रादि के स्नान के अनन्तर अभि- पेश की विधि बनाते हैं - हरिद्रा प्रादि के चूर्ण के सहित उपए जल से मूल मन्त्र के द्वारा पीठ के सहित लिङ्ग मूत्ति का विशाधन करे फिर गन्धोदक-हिरण्योदक और मन्त्रोदक से रुद्राध्याय का पाठ करते हुए नील रुद्रत्वरित रुद्र पच ब्रह्मादि से 'नम. शिवाय'-इससे स्नयन कराना चाहिए ॥२॥ इस प्रकार से पूर्वोक्त अभिषेक करके मस्तक पर पुष्प रक्पे और लिङ्ग के मस्तक को शून्य न करे-इस विषय मे श्लोक है-॥२८॥ यस्य राष्ट्र तु लिंगस्य मस्तकं शून्यलक्षणम् । तस्यालक्ष्मीमहारोगो दुर्भिक्ष वाहनक्षयः ।।६ तस्मात्परिहरेद्राजा धर्मकामार्थमुक्तये । शून्ये लिंगे स्वयं राजा राष्ट्र चैव प्रणश्यति ॥३० एवं सुस्नाप्यायं च दत्त्वा संमृज्य वस्त्रेण गंधपुष्पवस्त्रालंका- रादीश्च मलेन दद्यात् ।।३१ धूपाचमनीयदीपनवेद्यादीव मूलेन प्रधानेनोपरि पूजन पवि- त्रीकरणमित्युक्तम् ॥३२ पारातिदीपादीश्च व धेनुमुद्रामुद्रितानि कवचेनावगुठिनानि पष्ठेन रक्षितानि लिंगोपरि लिंगे च लिंगस्याधः साधारणं च दर्शयेत् ॥३३ जिसके राष्ट्र मे शून्य लक्षण वाला लिङ्ग का मस्तक होता है उसको अलक्ष्मी, महान् रोग, दुभिक्ष और वाहनों का क्षय होता है ॥२६॥ इस- लिये राजा को धर्म-अर्थ-काम और मुक्ति के लिये इस धा परिहार करना चाहिए। लिङ्ग के शून्य रहने पर स्वय राजा और उसका राष्ट्र प्रनष्ट हो जाया करता है ॥३०॥ इस प्रकार से जो कि पहिले भली-भांति विधि सहित बताया गया है सस्नयन फराफर-अर्घ्य देकर-यस्त्र से समान फरके मूल मन्त्र से गन्धाक्षत पुष्प वस्त्र प्रादि का समर्पण परे ॥३१॥ धूप-माचमनीप-दीप घोर नवेद्य मादि वा मूल मन्य से, प्रणव से लिङ्ग [ लिङ्ग पुराण अधिक दीपक की शिक्षा के शावार वाले सव मोर मुख पोर हस्त युक्त व्याप्य व्यापक का प्रावाहन करके स्थापन करे ॥२॥ पहिले हृदय मन्त्र से शिव शक्ति समवाय से अर्थात् तादात्म्य से एको करण-अमृती हृदय मन्त्र पूर्वक मूल मन के सहित मद्य से शावाहन-हृदय मन से मूल मन के ऊपर वाम मन से म्यापन और इसी प्रकार मे सन्नि- करण करके हृदय और मूल मत्र के सहित ईशान मन में पूजन करना चाहिए [-यह उपदेश है ॥२॥ पहिले जिस प्रकार से पच मन के सहित में प्रात्मा के देह का निर्माण किया जाता है उसी प्रकार से देव का और वह्नि का भी करे यह उपदेश है ॥२४॥ रूपकध्यान कृत्वा मूलेन नमस्कारातमापाद्य स्वधातमाचमनीयं सर्व नमस्कारात वा स्वाहाकारातमध्यं मूलेन पुष्पाजलि चोपड. तेन सर्व नमस्कागत हदा वा ईशानेन वा रुद्रगायच्या ॐ नमः शिवायेति मलमत्रेण वा पूजयेत् ।।२५ पुष्पाजलि दत्त्वा पुनधूपानमनीय पष्ठ ने पुष्पावसरण विसर्जन मन्बोदकेन मूलेन सस्नाप्य सर्वद्रव्याभिषेकमीशानेन प्रतिद्रव्यमष्ट. पुष्प दत्वैवमर्थ्य च गधपुष्पधूपानमनीय फडताना पूजापसरण शुद्धोदकेन मूलेन सस्नाप्य पिष्टामलकादिभिः ॥६ उष्णोदकेन हरिद्राये न लिंगमति पीठ सहिता विशोध्य गरोदर- हिरण्योदकमबोदकेन रुद्राध्याय पठमानः नीलरुद्रत्वरितरुद्रपच- ब्रह्मादिमि नम शिवायेति स्नापयेत् ।।२७ मूनि पुष्पं निधाय न -य लिंगमस्तक कुर्यादन श्लोक २८ प्रतिविम्य का ध्यान करके पिर मून से नमस्कार वे पन्त तव पर- स्वमान्त प्रापमनीय प्रथया नमस्कार के अन्त तक सब-स्वाहा गारान्त अध्यं पूल मय से पुष्पाञ्जनि-चौपडत से राव नमावार के अन्त तक हृदय मन्म में प्रयवा ईशान या रुद्र गायगी से विम्या "ॐ नमः शिवाय" इस मूस मन से पूजन करना चाहिए ॥२॥ पुप्पाञ्जलि समर्पित धरणे पिर पूप-प्रारमनीय-१३ मन्म से पुष्पा यसरण विसर्जन परसे मानोर से सुग्नयन ररके यमस्त द्रव्य पागृतादि का प्रशियर पसे- तन्त्रोक्त विधान से शिवार्चन ] [३४३ ईशान मन्त्र से प्रति द्रव्य पाठ पुष्प वाला अर्घ्य गन्ध पुष्प धूप पाचम. नीय देकर पूजा का अपसरण करके पिसे हुए प्रांवले आदि के साय शुद्ध जल से स्नपन करावे ॥२६॥ पचामृत आदि के स्नान के अनन्तर अभि- घर की विधि बनाते हैं - हरिद्रा ग्रादि के चूर्ण के सहित उपए जल से मूल मन्त्र के द्वारा पीठ के सहित लिङ्ग मूत्ति का विशोधन करे फिर गन्धोदक-हिरण्योदक और मन्नोदक से रुद्राध्याय का पाठ करते हुए नील रुद्रत्वरित रद पच ब्रह्मादि से 'नम शिवाय' इससे स्नयन कराना चाहिए ॥२७॥ इस प्रकार से पूर्वोक्त अभिषेक करके मस्तर पर पुष्प रक्से और लिङ्ग के मस्तक को शून्य न करे-इम विषय मे श्लोक है--॥२८॥ यस्य राष्ट्र तु लिंगस्य मस्तकं शून्यलक्षणम् । तस्यालक्ष्मीमहारोगो दुर्भिक्ष वाहनक्षयः। तस्मात्परिहरेद्रा ना धर्मकामार्थमुक्तये । शून्ये लिंगे स्वय राजा राष्ट्र चैव प्रणश्यति ॥३० एवं सुस्नाप्याध्यं च दत्त्वा समृज्य वरेण गवपुष्पवस्त्रालंका. रादींश्च मूलेन दद्यात् ॥३१ धूपाचमनीयदीपनैवेद्यादीश्च मूलेन प्रधानेनोपरि पूजन पवि- श्रीकरणमित्युक्तम् ॥३२ प्रारातिदीपादीव धेनुमुद्रामुद्रितानि कवचेनावगुठिनानि पष्ठेन रक्षितानि लिंगोपरि लिगे च लिंगस्याधः साधारण च दर्शयेत् ॥३३ जिसके राष्ट्र मे गून्य लक्षण वाला लिङ्ग का मस्तक होता है उसको अलक्ष्मी, महान रोग, दुर्मिक्ष पोर याह्नो या क्षय होता है ।।२। इस- लिये राजा यो धर्म-अर्थ-नाम पोर मृत्ति के लिये इरा या परिहार करना पाहिए । लिङ्ग ये शून्य रहने पर स्वय राजा और उसका राष्ट्र प्रनष्ट हो माया परता है ॥३०॥ इम प्राार से जो नि पहिो भली-भांति निधि सहित बताया गया है सस्नयन करारर-सप्पं द्वार-यस्त्र में रामार्जन पर मूल मन्त्र से गापारात पुटप यग्न प्रादि पा सम्परा परे ॥३१॥ पूप-माधमनीप-दीप भोर नषेध मादि या मूस मन से, मराय से लिङ्ग [ लिङ्ग पुराण के मस्तक के ऊपर पवित्री करण और पूजन कह दिया गया है ।।३२।। भारति दीप मादि-धेनु मुद्रा मुदित को क्वच से अवगुण्ठित एव पष्ठ मन्त्र से रक्षित करके लिङ्ग के ऊपर-लिङ्ग के मध्य मे-लिङ्ग के नीचे साधारण रूप से जिस तरह से पैसे दिखाना चाहिए ॥३३॥ मूलेन नमस्कार विज्ञाप्यावाहनस्थापन सन्निरोधसान्निध्यपा- द्याचमनीया_गपुष्पधूपनवेद्याचमनीयहस्तोतन मुपवासा- धुपचारयुक्त ब्रह्मागभोगमार्गण पूजयेत् ।।३४ सरलध्यान निकलस्मरण परावरध्यानं मूलमत्र जपः । दशांश ब्रह्मागजपसमर्पणमात्मनिवेदनस्तुतिनमस्कारादयश्च गुरुपूजा च पूर्वतो दक्षिणे विनायकस्य ॥३५ प्रादौ चाते च सपूज्यो विघ्नेशो जगदीश्वरः। देवतश्च द्विजे व सर्वकर्मार्थसिद्धये ॥३६ य. शिव पूजयेदेव लिगे वा स्थडिलेपि वा। स याति शिवमायुज्यं वर्षमाप्रेरण कर्मणा ॥३७ लिंगार्चाश्च पण्मासानाय कार्या विचारणा ! सत प्रदक्षिणा कृत्वा दडवत्प्रणमेवुधः ॥३८ प्रदक्षिणक्रमपादेन प्रश्वमेघ फलं शतम् । तस्मात्सजयेन्नित्य सर्वकर्मासिसये १३६ भोगार्थी भोगमाप्नोति राज्यार्थी राज्यम प्नुयात् । पुत्रार्थी तनयं थे रोगो रोगात्प्रमुच्यते ॥४० यायश्चितयते यामांस्तांस्तान्प्राप्नोति मानव. ॥४१ मूल मन्त्र से नमस्कार को विज्ञापित परे पिर मावाहन-स्थापना गनिरोध निधी करण-गाध माच मनोमयं गाय पुष-पूप-दीप-गवेग- तोतं नामप याम तम्यूगदिया गक्ति परपे यार मात्र रुप पारि मगोरे उपपार प्रम से पूजन परे॥३॥पूर्ण ध्यान-निरस शारगर. रण-परापर -मम मन्त्र का बार-दशांश सण- मादि- war प्राण-प्रारम दिन-सयन और ममकार प्रापिा पहिले गुफा मन मोर दक्षिण में गशपापमा पाला पादिए त्रिविध अग्नि कार्य १ [३४५ ॥३१आदि और अन्त मे जगत् ईश्वर विघ्नो के स्वामी गणेश का पूजन करना चाहिए। दवत और द्विजो को समस्त कर्मों के अर्थ की सिद्धि के लिये करना चाहिए ॥३६॥ जो पुरुष इस विधि से लिङ्ग अथवा स्थण्डिल मे शिव का पूजन किया करता है वह एक ही वर्ष के कम से भगवान शिव के सायुज्य की प्राप्ति किया करता है ॥३७॥ जो शिव लिङ्ग की अर्चना करने वाला है वह कै मास मे ही शिव सायुज्य का लाभ कर लेता है-इसमे कुछ भी विचारणा नहीं करनी चाहिए ! चुघ पुस्प को सात प्रदक्षिणा करके दण्ड की भांति भूमि पर गिर कर प्रणाम करना चाहिए । ॥३८॥ प्रदक्षिणा के करने में एक २ पद पर सो अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है । अतएव समग्र कर्मों के अर्थ की सिद्धि के लिये नित्य ही सम्यक् रूप से पूजा करनी चाहिए । जो भोगो के प्राप्त करने को इच्छा वाला पुरप है यह भोगो की प्राप्ति चरता है - राजा लाभ का इच्छुक राज्य प्राप्त करता है-पुत्र प्राप्त करने की अभिलाषा पाला थेट पुत्र प्राप्त करता है और रोग प्रसित मानव रोग से छुटकारा पा जाया करता है ॥४०॥ इनके अतिरिक्त मनुष्य जिन-जिन कामनानी को चिन्ता परता है उन-उन सब की प्राप्ति किया करता है ।।४१॥ ॥६४-विविध अग्नि कार्य प्रतिपादन ।। शिवाग्निकार्य वक्ष्यामि शिवेन परिभापितम् । जनयित्वाग्रत प्राची शुभे देशे सुसस्कृते ॥१ पूर्वानमुत्तरान च कुर्यात्सूयत्रय शुभम् । चतुरस्रीकृते क्षेने कुर्यात्कुडानि यत्नत.॥२ नित्यहोमाग्निकुटु च त्रिमेखलसमायुतम् । चतुखिन्धंगुलायामा मेखला हस्त मात्रतः॥३ हस्तमान भवेत्कुडं योनिःप्रादेशमात्रतः। अश्वत्यपवद्योनि मेसलोपरि कल्पयेत् ॥४ कुंडमध्ये तु नाभिः स्यादष्टपन सणिकम् ।
३४६ ] [ लिङ्ग पुराण प्रादेशमान विधिना कारयेद्ब्रह्मण, सुन ।।। घष्ठेनोल्लेखन प्रोक्त प्रोक्षणं वर्मणा स्मृतम् । नेत्रणालोक्य वै कुड पड़े खा. कारयेद्बुधः ।।६ प्रागायतेन विप्रेद्र ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः । उत्तराग्रा. शिवा रेखा: प्रोक्षयेद्वर्मणा पुनः ॥७ इस अध्याय मे भगवान् शिव के द्वारा कथित तीन प्रकार का पद्य गयो से परम शोमन अग्नि-कार्य वणित किया जाता है । शलादि ने कहा- अब में भगवान् शिव के द्वारा परिणत शिवाग्नि कार्य को बता- कगा। सर्व प्रथम प्राची दिशा का साधन करे। किसी परम शुभ एवं भली-भाँति सस्कार किये हुए भाग मे शुभ पूर्वाग्र और उत्तराय सूत्र प्रय को करे। चौकोर किये हुए क्षेत्र में यल पूर्वक कुण्ड निर्मित करे ||१|| ॥२॥ नित्य होमाग्नि कुण्ड को तीन मेखलामो से युक्त बनाना चाहिए । एक हाथ के प्रमाण वाली दो-तीन और चार मंगुल याम वाली मेखला बनाये ॥३॥ कुण्ड एक हाय प्रमाण वाला होना चाहिए और उसके प्रादेश मात्र में योनि की रचना करे । मेसला के ऊपर पीपल वृक्ष के पतं के आकार के तुल्य योनि की रचना की जावे ॥४॥ कुएड के मध्य में अष्ट पत्र और कणिका के सहित प्रादेश प्रमाण वाली नाभि को विधि से करना चाहिए ॥५॥ यष्ट मल मन्त्र से उल्लेखन बताया गया है और कवच मन्त्र के द्वारा प्रोक्षण कहा गया है। बुध को नेत्र से कुण्ड का मालोकन करके छ रेखा करनी चाहिए ॥६॥ प्रागायत रेखा त्रय के सहित उत्तराप शिव रेखाएँ जो कि ब्रह्मा-विष्णु और महेश्वर के रूप वाली हैं उन का कवच मन से प्रोक्षण करना चाहिए ॥७॥ शमोपिप्पलसंभूतामरणी पोडशागुलाम् । मधित्वा वह्निबीजेन शक्तिन्यास हृदैव तु ॥ प्रक्षिपेद्विधिना वह्निमवाधाय यथाविधि । तूष्णी प्रादेशमाग्रस्तु याज्ञिक. शकले. शुभ. IIE परिसंमोहन कुर्याज्जलेनाष्टसु दिक्षु वै । परिस्तीयं विधानेन प्रागाधे वमनुक्रमात ॥१० त्रिविध अग्नि कार्य० ] उत्तरान पुरस्ताद्धि प्रागन दक्षिणे पुनः । पश्चिमे चोत्तरातु सौम्ये पूर्वाग्रमेव तु ॥११ ऐन्द्र चन्द्राग्नमावाह्य याम्य एवं विधीयते सौम्यस्योपरि चाद्राग्नं वारुणाग्नमधस्तत ।।१२ द्वद्वरूपेण पात्रारिण बहिःष्वासाद्य सृव्रत । अधोमुखानि सर्वाणि द्रव्याणि च तथोत्तरे ॥१३ तस्योपरि न्यसेदर्भाञ्छिव दक्षिणतो न्यसेत् । पूजयेन्मूलमंत्रेण पश्चाद्धोम समाचरेत् ।।१४ शमी और पीपल मे समुत्पन्न प्ररणी को सोलह प्रडगुल लेकर उस- का वह्नि "रम्"- इस चीज से मथन करे और हृदू मन्त्र शक्ति न्यास करे तथा विधि के अनुसार अन्वाधान करके वह्नि का प्रक्षेपण करे । तूष्णो भाव से प्रादेश मात्र शुभ याज्ञिक शकलो से योजित करना चाहिए NERI इस प्रकार से प्रागादि के अनुक्रम से विधान से परिस्तरण कर- के आठो दिशानो मे जल से परि सम्मोहन करना चाहिए ॥१०॥ अब परि स्तरण करने की विधि को बतलाते हैं-पहिले उत्तराग्र फिर प्रार और पुन दक्षिण तथा तदनन्तर पश्चिम मे करे । सौम्य मे उत्तराम और पूर्वाग्र का करे ॥११॥ दिशाओ के देवतामो का आवाहन बताते हैं- पूर्वदिग्भाग मे इन्द्राग्नि देवत का-दक्षिण दिग्भाग मे यामाग्नि देवत का- उत्तर दिग्भाग मे चान्द्राग्नि दैवत का और इसके अनन्तर पूर्वदिग्भाग से नीचे पश्चिम दिग्भाग मे वारुणाग्न देवत का प्राधाहन करना चाहिए ॥१२॥ पात्रासादन विधि को बताया जाता है कि हे सुव्रत ! वहियो मे द्वन्द्व रूप से पात्रो का प्रासादन करके समस्त द्रव्यो को उत्तर मे मधोमुख करे ।।१३।। उसके ऊपर दक्षिण मे शिव दर्शों का न्यास करे और मूल मन्म से पूजन करके पीछे होम करना चाहिए ॥१४॥ प्रोक्षणोपात्रमादाय पूरयेदबुना पुनः प्रादेशमात्रौ तु कुशौ स्थापयेदुदको परि ॥१५ प्लावयेच कुशान तु वसोः सूर्यस्य रश्मिभि.। विकीयं सर्वपायाणि सुसंप्रोक्ष्य विधानत ॥१६ ३४८ ] लिङ्ग पुराण प्रणीतापात्रमादाय पूरयेदबुना पुनः । अन्योदककुशाग्रे स्तु सम्यगाच्छाद्य सुव्रत ॥१७ हस्ताभ्या नासिक पात्रमैशान्यां दिशि विन्यसेत् । प्राज्याधिश्रयणं कुर्यात्पश्चिमोत्तरत: शुभम् ॥१८ भस्ममिश्रास्तथागारान् ग्राहयेत्सकलेन वै। पश्चिमोत्तरतो नीत्वा तत्र चाज्य प्रतापयेत् ॥१६ कुशानग्नौ तु प्रत्त्राल्य पर्यग्नि निभिराचरेत् । तानमस्तित्र निःक्षिप्य चाग्रे चाज्यं निधापयेत् ॥२० अंगुष्ठमात्रौ तु कुशौ प्रक्षाल्य विधिनंव तु । पर्यग्नि च तत. कुर्यात्त रेव नवभिः पुन. ॥२१ फिर प्रोक्षणी पात्र का ग्रहण कर जल से पूर्ण करे और प्रादेश मात्र कुशामो को उदक के ऊपर स्थापित करै । ॥१५॥ कुशाग्र का वसु सूर्य की रश्मियो से प्लावित परे और सम्पूर्ण पात्रो को विकीरणं करके विधान से सम्प्रोक्षरण करे ॥१६॥ फिर प्रपीता पात्र को लेकर जल से प्रपूरित करे और अन्योदक युक्त कुशा वे पर भागो से भली-भांति समाच्छादन करना चाहिए ।।।७हाथो से प्रणीता पात्र को नासिका के समीप तक लाकर फिर ऐशाती दिशा मे उसया विन्यास पर देवे तथा पश्चिमोत्तर में प्राज्य (घृत) का शुभ स्यापन करना चाहिए ॥१८॥ उपवेप से भम्म से मिश्रित पङ्गारो का ग्रहण करे और पश्चिमोत्तर से मेवर पाज्य को तपावे ॥१६॥ अग्नि मे गुशाम्रो को प्रश्यलित करके प्रति के चारों और तीन वार परि चरण करे। उन सब को यहाँ डाल कर माग मे भाग्य को निधायित करना चाहिए ॥२०॥ विधि से मडगुष्ट मात्र दो पुरानो का प्रदालन पर मनिने पारो मोर करे । उनसे ही फिर नौ से करना चाहिए ॥२१॥ पमि च पुनः कुर्यात्तदाज्यमवरोपयेत् । अयापरयेत् पार्म क्रमेणोतरपश्चिम ॥२२ संयुज्य चाग्नि काप्टेन प्रक्षाल्यारोप्य पश्चिमे। प्रापस्योत्पवनं गुत्पिवित्राम्यां सहैव तु ॥२३ विविध अग्नि कार्य . [३४९ पृथगादाय हाताम्यां प्रवाहेण यथाक्रमम् । अंगुष्ठानामिकाभ्यां तु उभाभ्यां मूलविद्यया ॥२४ अम्युक्ष्य दापयेदग्नी पवित्रे घृतपकिते । सौवर्ण स क्स व कुर्याद्रनिमात्रैण सुव्रत ।।२५ राजत वा यथान्यायं सर्वलक्षणसंयुतम् । अथवा याज्ञिवृक्ष कर्तव्यो स क्स वा चुभो ।।२६ अरनिमात्रमायाम तत्पोत्रे तु बिल भवेत् । पडंगुलपरीणाहं दडमूल महामुने १०७ तदर्ध कठनालं स्यात्पुष्करं मूलबद्भवेत् । गोवालसदृश दडं र बाम नामिकासमम् ॥ पिर पर्यग्नि करे-इस क्रिया से दो यार पर्यग्नि करण समझना चाहिए । तब प्राज्य का अवरोपा करे। इसके अनन्तर क्रम से उत्तर पश्चिम मे पाप का अपवर्षण करे ॥२२॥ उपवेष से अग्नि का सयोजन करके पश्चिम में प्रारोपण करे और उपवेप का निरसन कर धोकर जल का उपस्पर्शन करे पवित्र सज्ञा वाले धर्मों के सहित अगुलियों से प्राज्य का उत्पवन करना चाहिए ॥२३॥ यथाक्रम याज्ञिकोक्त मार्ग से हाथो से पृषक लेकर मूल विद्या से अङ्गुष्ठ-अनामिका दोनो से अभ्युक्षरा करके घृत पक्ति पवित्र अग्नि में दिलाना चाहिए। हे सुव्रत । अनि मात्र से स्त्र क् और सवा को सौवर्ण करे ॥२४॥२५ । अथवा समग्न लक्षणो मे मयुत यथाविधि स क स वा को चाँदी का बनवावे । किम्या ये दोनो याजिर वृक्षो से बनवाने चाहिए ॥२६॥ इनवा पायाम अररिन मात्र हाना चाहिए और मुख मे एक विल होना चाहिए । हे महामुन । दक का मूल छ अगुल परीणाह वाला होना नाहिए ॥२७॥ उसके प्राधे अर्थात् तीन प्रगुल परीगाह वाला यण्ठनाल तथा पुष्कर अर्थात् मुख गोधुच्छ सारा होये । सस स स भाल नासिका के समान परावे ॥२८॥ पुटद्वयसमायुक्त मुक्ताद्यन प्रपूरितम् । पशिदंगुलायाममधागुलसविस्तरम् ॥२६
३५० ]
[ लिङ्ग पुराण
उत्सेधस्तु तदर्घ स्यात्सूत्रेण समितं ततः।
सप्तागुल भवेदास्यं विस्तरायामतः पुनः ।।३०
विभागकं भवेदग्रं कत्वा शेषं परित्यजेत् ।
कंठं च द्वय गुलायामं विस्तार चतुरंगुलम् ॥३१
वेदिरष्टागुलायामा विस्तारस्तत्प्रमारगत.।
तस्य मध्ये दिलं कुर्याच्चतुरगुलमानतः॥३२
बिल सुवर्तित कुर्यादष्टपा सुकणिकम् ।
परितो विलबाह्य तु पट्टिका गुलेन तु ॥३३
तद्वाह्य च विनिद्र तु पनपत्रविचिनितम् ।
यवद्वयप्रमाणेन तद्वाह्य पट्टिका भवेत् ॥३४
वेदिकामध्यतो रध कनिष्ठागुलमानतः।
खातं यावन्मुखात स्याद्विलमानं तु निम्नगम ॥३५
अब पूर्णाहुति आदि वृहत् सुव के विधान को बताते हैं-युट द्वय
से
समायुक्त
और मुक्ता प्रादि से प्रयूरित जिस का आयाम छत्तीस अगुल
होता है और विस्तार पाठ अगुल का होता है । उसको अचाई उससे
प्राधी अर्थात् चार अगुल होती है। सूत्र से समित सात अगुल का मुख
विस्तार और आयाम से होता है ॥२९॥३०॥ तीन भागो में से एक
भाग अर्थात् बारह अगुल उसका अग्र भाग होता है । शेष दो भाग मो
प्रय बाह्य करने के लिये त्याग देना चाहिए । दो अगुल के आयाम वाला
कण्ठ और चार अगुल का विस्तार होता है ॥३१॥ पाठ अगुल
आयाम से युक्त वेदि होती है और उसके प्रमाण से ही विस्तार भी होता
है । उसके मध्य मे चार प्रगुल का विल होता है ॥३२॥ बिल पाठ
पत्रो वाला सु-दर कणिका से युक्त सुनत्तित बनवाना चाहिए । बिल के
वाह्य भाग में चारो ओर अर्घाडगुल की पट्टिया बनावे ॥३३।। उस बिल
के वाह्य भाग में पत्रो से विचित्र विकसित पा बनाना चाहिए। उस
पम के वहिर्भाग मे दो यवो के परिमारण वाली पट्टिका हानी चाहिए
॥३४॥ वेदिका के मध्य मे कनियागुल मान वाला रध्र जब तक मुखान्त
हो तब तक विल रा मान गम्भीर प्रवाह निम्नग खात होवे ॥१५॥
विविध अग्नि कार्य] [ ३२१ दडं पडगुलं नालं दंडाने दंडिकारयम् । अर्धागुलविवृद्धया तु कर्तव्यं चतुरंगुलम् ॥३६ घयोदशागुलायाम दंडमूले घटं भवेत् । द्यगुलस्तु भवेत्कु भो नाभि विद्याद्दशांगुलम् ।।३७ चेदिमध्ये तथा कृत्वा पाद कुर्याच द्वयं गलम् । पद्मपृष्टममाकार पादं वे करिणकाकृतिम् ॥३८ गजोष्ठसहशाकारं तस्य पृकृतिर्भवेत् । अभिचादिकार्येषु कुत्कृिष्णायसेन तु ॥३६ पचविंशत्कुशेनैव स स वी मर्जयेत्पुनः । अग्रमप्रेरण सशोध्य मध्यं मध्येन मुवन ॥४० मूलं मूलेन विधिना अग्नौ ताप्य हुदा पुन. । प्राज्यस्थाली प्रणीता च प्रोक्षणी तिस्र एव च । ४१ सौवर्णी राजती वापि ताम्रो वा मृन्मयी तु वा । अन्यथा नैव वर्तव्य शातिके पौष्टिके शुभे ।।४२ नाल दण्ड मूल दएड छ भगुल का बनाये । दएड के अग्र मे चार अगुल और अर्धाङ्गुल की विवृद्धि से बलो त्रय करना चाहिए ॥३६॥ त्रयोदश अगुल के प्रायाम बाला दण्ड के अग्र भाग मे घट अर्थात् शिर करना चाहिए। दो अगुल के प्रायाम वाला कुम्भ प्रर्थात वम्बु ग्रीव और दश अ गुल वाला नाभि जानना चाहिए ॥७॥ वेदि के मध्य मे पद्य के पृष्ठ के समान प्राकार से युक्त यागुल नाभि करके फिर कविका के माकृति वाला दो प्र गुल पाद करना चाहिए ॥३८)। उस स व को पृष्ठ की प्राकृति गज के अोठ के आकार के समान होनी चाहिए। अभि- चार के कर्मों में अर्थात् जारण-मारणादि के प्रयोगा में इस की रचना वृपण लोहे से करानी चाहिए ॥३६॥ हे सुग्रत । फिर सके और व का मार्बन मस्कार पीस कुशागो मे करे । अग्र भाग से अन को और मध्य भाग से मध्य भाग का सशोधन करे ॥४०॥ अब अागे पात्र या विधान निरूपित किया जाता है-मूल विधि से मूल को और फिर हुन् मन्त्र से प्रग्नि में तपावे। माज्य स्थाली-प्रणीता और प्रोक्षणी ये तीनो - ३५२ ![ लिङ्ग पुराण ही केवल अभिचार कर्मों में लोहे की बनावे अन्यथा अन्य शुभ कर्मों में सुवर्ण चादी-ताम्र अथवा मृन्मयो निर्मित करानी चाहिए । इनके प्रति रिक्त पौष्टिक शुभ कर्मों में अन्य किसी की नहीं करानी चाहिए ॥४१॥४२॥ आयसो त्वभिचारे तु शांतिके मृन्मयो त वा। पडगुलं सुविस्तीर्ण पात्राणां मुखमुच्यते ।।४३ प्रोक्षणी द्वय गुलोत्सेधा प्रणीता द्वगुलाधिका । प्राज्यस्थाली ततस्तस्या उत्सेधा द्वय गुलाधिकः ।।४४ यः समिद्भिहतं प्रोक्त तैरेव परिधिभवेत् । मध्यांगुलपरीगाहा अवका निर्बणाः समाः ॥४५ द्वात्रिंशदंगुलायामास्तिस्रः परिधयः स्मृताः । द्वात्रिंशदगुलायामैत्रिशद्दर्भः परिस्तरेत् ॥५६ चतुरंगुलमध्ये तु ग्रथितं तु प्रदक्षिणम् । अभिचारादिकार्यपु शिवाग्न्याधान वर्जितम् ।१४७ प्रकोमलाः स्थिरा विप्र समाधास्त्वाभिनारिके। समग्राः सुममाः स्थूलाः कनिष्टांगुलसमिताः ॥१८ अवका निणाः स्निग्या द्वादशागुलसंमिताः। समिधस्थं प्रमाण हि सर्व कार्येषु सुव्रत 116 प्रभिचार में प्रायमी मर्यात लोहे का निमित होवे भौर पाान्तिका पर्म में मृतिका से निर्मित होनी चाहिए । पात्रो या मुम्प पगुल वाला सुविस्तीर्ण पहा जाता है । ॥४३॥ प्रोक्षणी पात्र दो मंगुरा उरगेध (ऊंचाई ) घाला होये पौर प्रणी पार दो प गुल पधिर होना चाहिए । प्राय पायो पात्रका मेध गगे भी दो गुम अपित होना पाहिए | जिन समिपापो के द्वारा हपन पताया गया जही में परिपि होती है। गणियाएँ मध्यमा गुलि नारायण धामी-गोधी यिना या पानी और गमान होनी चाहिए तीम अंगुन र मापा पानी तीर परिधिमा बसाई गई है। योग गुर के पास पुरा हीमो में परिवारमा पादिर 40 पार
.
त्रिविध अग्नि कार्य
[ ३५३
घंगुल मध्य मे प्रदक्षिण अथित करे किन्तु जय अभिचार प्रादि के कर्म
करते हो तो उनमे शिवाग्नि का प्राधान वजित होता है ॥४७॥ पाभि-
चारिक अर्थात् मारण प्रभृति यमों में हे चित्र ! समिधाएं योमलता से
रहिन अर्थात् यठोर प्रौर स्थिर संगृहीत करनी चाहिए । समग्र गुममान
अर्थात् एक-सी, स्यूल पार गनिर गुलि के समित ममिधाएं होनी
चाहिएं ।।1८1 है मुक्त ! समस्त अन्य कार्यों में समिधामो का प्रमाण
दादा प्रगुल होता है । मभिचार के अतिरिक्त अन्य कर्मो मे समिधाएं
सीधी सभा से रहित-निर्यण और स्निग्ध रखनी चाहिए ।।४।।
गव्य घृतं ततः | कापिल तु तमोऽधिकम् ।
प्राहुतीना प्रमाणं तु स वं पूर्ण यथा भवेत् ।।५०
अन्नपक्षप्रमाण स्यारछु क्तमात्रेण ये तिलः ।
यवानां च दर्ष स्यात्फलानां स्वप्रमागतः॥५१
क्षीरस्य मधुनो दध्न. प्रमाणे पनवदमवेत ।
३५४ ] [लिङ्ग पुराण प्रादि कर्मों मे लौकिक अग्नि मे हवन करे । हे सुव्रत ! अन्य समस्त कर्मों मे शिवाग्नि को उत्पन्न करके हवन करना चाहिए । ॥५४॥ शिवा- ग्नि मे सात जिह्वानो को प्रकल्पना करके सम्पूर्ण कार्य करे । अथवा समस्त कार्य साधक के जिह्वानो की सम्पूर्णता से सिद्ध होते हैं। हे विप्रेन्द्रो! साधक को जिह्वा मात्र से शिवाग्नि की सिद्धि होती है । ॥५५॥५६॥ ॐ बहुरूपाय मध्यजिह्वाय अनेकवर्णाय दक्षिणोत्तरमध्यगायै शानिकपौष्टिकमोक्षादिफलप्रदाय स्वाहा ।।५७ ॐ हिरण्याय चामो कराभायै ईशानजिह्वाय ज्ञानप्रदाय स्वाहा ।।५८ ॐ कनकार्य कनकनिभाय रम्याय ऐद्रजिह्वायै स्वाग ॐ रक्ताय रक्तवरणीय आग्नेयजिह्वाय अनेकवर्णायै विद्वपण मोहनायै स्वाहा ।।६० ॐ कृष्णाय नै तजिह्वाय मारणाय स्वाहा ।।६१ ॐ सुप्रभ'यै पश्चिमजिह्वाय मुक्ताफलाये शानिकाय. पौष्टिकाये स्व हा ॥६. ॐ अभिव्यक्त'ये वायप्रजिह्वाय शकुच्चाटनाय स्वाहा ॥६३ ॐ वह्नये तेजस्विने स्वाहा । ६४ अम सप्त जिह्वानो को कल्पना को बताते हैं-मान जिह्वानो के भिन्न २ मन्त्र निम्न प्रकार से दिये जाते हैं--प्रोम् बहुत रूपो वाली- मध्य जिह्वा से सम्पन्न विभिन्न वर्गों से युक्त-दक्षिणोत्तर के मध्य में गमन करने वालो-शान्ति, पौष्टिक और मोक्ष प्रादि के फल को प्रदान करने वाली के लिये स्वाहा मर्थात् नमस्कार है ॥५७॥ ॐ हिरण्य स्वरूपा सुवर्ण के समान प्राभा वाली ईशान जिह्वा तथा ज्ञान प्रदान करने वाली के लिये स्वाहा है ॥५६॥ ॐ कनक स्वरूपा-क्ना (सुवर्ण) के सहशी रम्य स्पा और ऐन्द्र जिह्वा वाली के लिये स्वाहा है ॥५॥ * रक्त वर्णा रक्ता-प्राग्नेय दिशा में जिह्वा वानी-अनेक वर्षों से सयुक्त तया विपण पौर मोहन कर देने वाली के लिये स्वाहा है ॥६०॥ * कृष्णानत जिह्वा प्रौर मारण कर देने वानी के लिये स्वाहा है त्रिविध अग्नि कार्य] [ ३५५ ॥६१॥ ॐ सुन्दर प्रभा वाली-पश्चिम दिशा की ओर जिह्वा बाली-मुता फला शान्तिका तथा पौष्टिका के लिये स्वाहा है ॥६२।। ॐ अभि व्यक्ता. वायव्य जिह्वा और शत्रुनो के उच्चाटन कर देने वाली के लिये स्वाहा है ।।३॥ सातो जिह्वा मन्त्री को कहकर प्रधान मन्त्र बताते हैं-"ॐ यह्नये तेजस्विने स्वाहा"-अर्थात् वह्नि स्वरूप तेजो युक्त के लिये स्वाहा अर्थात् नमस्कार है ॥६४॥ एतावद्वह्निसंस्कारमथवा वह्निकर्मसु । नैमित्तिके च विधिना शिवाग्नि कारयेत्युन. ॥६५ निरीक्षण प्रोक्षण ताडनं च पष्ठेन फडतेन अभ्युक्षणं चतुर्थेन खननोकिरणं पष्ठेन पूरण समीकरणमाद्यन सेचनं वौषडतेन कुट्टनं पप्ठेन संमार्जोपलेपने तुरीयेरण कुडपरिकल्पनं निवृत्त्या त्रिभिरेव कुडपरिधान चतुर्थेन कु डार्चनमाये न रेखाचतुष्टयसपा- दन पण्ठेन फडतेन वज्रोकरणं चतुष्पदापादनमायेन एवं कुड. संस्कारमष्टादशविधम् ॥६६ कु डसंस्कारानंतरमक्ष गटन पष्ठेन विष्टरन्यासमायेन वज्रासने वागीश्वर्यावाहनम् ।।६७ ॐ ह्रीं वागीश्वरी श्यामवरण विशालाक्षी यौवनोन्मत्तविग्रहाम् । ऋतुमती वागीश्वरशक्तिमावाहयामि ।। वागेश्वरी पूजयामि ।।६६ पुनर्वागीश्वगवाहनम् । ७० इस तरह से पूर्व मे कथित इतना वह्न का रास्कार को अथवा वह्नि कमों में और नैमित्तिक कर्म मे विधि के स हैत शिवाग्नि को करना चाहिए ॥५॥ अय शिवाग्नि विधि बताई जाती है इस में अठारह प्रकार के कुण्ड के सस्कार होते है पष्ट मन्त्र से निरीक्षण-प्रोक्षण और ताइन करे, फडात से अभ्युक्षण करे चतुर्थ मन्त्र से खननोरिकरण करना चाहिए । पष्ठ से पूरण एव समी करण करे-प्राध से सेचन-वोपडन्त से ग्रहन पष्ठ से समार्जन पौर उपनेपन करे तुरीय मन्त्र से कुण्ड परि कल्पन- प्राति लोम से तीनो घोर, वाम और सद्य से कुएड परिधान प्रर्थात् [ लिङ्ग पुराण मेखला करण-चतुर्थ से बुण्डानन-प्राद्य मन्त्र से रेखा चतुष्टय का सम्पादन. पडन्त पाठ से ज्यीकरण तथा चतुष्पदा पादन और इसी प्रकार से माद्य मन्म से पुराड सस्कार करना चाहिए ॥६६॥ पुण्ड सरकार के पश्चाद अक्षयाटन-पाठ से विष्टा ग्यास प्राध से बज और नासन-वागीश्वरी मन्त्र से मावाहन करना चाहिए ॥६७ा वागीश्वरी मन्त्र * वाणी की ईश्वरी- श्याम वर्ण वाला विशाल नेत्रो से युक्ता यौवन से उन्मत्त शरीर के धारण करने वाली और ऋतु से युत्ता वाक् को ईश्वर पाक्ति का मैं आवाहन करता हूँ ॥६॥ वागीश्वरी का पूजन करता हूं ॥६६। फिर घागोश्वर का प्रावाहन है। 11001 एकववत्र चतुर्भुज शुद्धस्फटिकाम वरदाभयहस्तं परशुमृगधरे जटामुकुटमडित सर्वाभरणभूषितमावाहयामि ॥७१ ॐई वागीश्वराय नमः । श्रावाहनस्थापनसन्निधानसन्निरोधपूजातं वागीश्वरी संभाव्य गर्भा- धानबाह्निसम्कारम ।।७२ अरणीजनित कातोद्भवंवा अग्निहोत्रजवा ताम्रपानेशरावेवा भानीय निरीक्षणताडनाभ्युक्षणप्रक्षालनमायेनक्रव्यादा शिवपरि- स्यागोपि प्रथमेन वह्न कारण जठरभ्र मध्यादावाह्याग्नि वैकारणम वाग्नेयेन उद्दापनमाद्यन पुरुपेरण सहितया धारणा धेनुमुद्रा तुरे येरगावगुध्य जानुभ्यामनि गत्वा शरावोत्यापन कुडोपरि निधाय प्रदक्षि गमावर्त्य तरीयेगात्मसम्मुखा वागीश्वरी गर्भ नाड्या गर्भाधानातरीयेरण कमलप्रदानमाद्यन वोपडतेन कुशा- यं दत्त्वा इंधनप्रदानमाद्यन प्रज्वालन गर्भाधान सद्यनाद्यन पूजन पु सधन वामेन पूजन हितायेन सोमतोन्नयनमघोरेण तृती- येन पूजनम् ।।७३ अन्न वागोश्वर के प्रावाहन करने का मन्त्र बतलाया जाता है-एक मुख बाले-चार भुजानो से सम्पन्न विशुद्ध स्फटिक मणि के समान प्रामा से युक्त वरदान और मभय प्रदान करने वाले हाथों वाल परशु तथा मृग यो धारण करने वाले-जटा और मुकुट को मस्तक पर धारण करने विविध अग्नि कार्य० ] [ ३५७ - वाले और सम्पूर्ण आभूषणों से समलड्कृत का मैं अावाहन करता हूँ ॥७१।। फिर उक्त मन्त्र से आवाहन करके 'ॐ ई वामीश्वरीय नम इस मन्त्र से समुचित मुद्रामो को प्रदर्शित करते हुए प्रावाहन-स्थापन- सन्निधान सनिरोध करके पूजा की समाप्ति पर्यन्त वागीश्वरी का सत्कार करके गर्भाधान वह्नि-सस्कार करना चाहिए ॥७२।। अब वह्नि को सस्त्रार-विधि का निरूपण किया जाता है परणी लता को लकडी के पारस्परिक संघर्ष करके समुत्पन की हुई-सूर्य कान्त मरिण के सयोग से समुत्पादित अथवा विसी श्रोत्रिय वे अग्निहोत्र से उत्पन्न उसके घर से लाई हुई अग्नि को ताम्र पार या शराव (सकोरा-एक मिट्टी का पन ) मे लाकर प्राद्य मन्त्र से निरीक्षण ताडन-अम्युक्षण-प्रक्षालन-अग्नि का प्राव्यादा शिव परित्याग करके फिर प्रिवर्ग साधन जठर भू मध्य से मावाहन प्रावाहित मूर्ति मे माग्नेय मन्त्र से उद्दीपन करे । साध के सहित पुरुष सहिता से धेनुगुद्रा करनी चाहिए । तुरीय मन्त्र से अवगुण्ठन करे। दूसरे पात्र से आच्छादन करे। फिर शराब को उठाकर एड के ऊपर रखे, तुरीय मन्त्र से प्रदक्षिणा करके अपने सामने वागीश्वरी पा ध्यान करे। गर्भ नाल में गर्भाधान मध्यकाल बौपडन्त माद्य मन्त्र के द्वारा कमल प्रदान करे। फिर कुशा का अध्यं देकर पाय के द्वारा इन्धन प्रदान करना चाहिए । सद्याध से अग्नि का प्रदीप्त करण गर्भाधान पूजन- वामन मे पुंसवन पोर द्वितीय से सीमन्तोन्नयन भौर अघोर मन्त्र से समचंन करना चाहिए ॥७३॥ अवयवव्याप्तिवक्त्रोद्धाटनं वक्त्रनिष्कृतिरिति तृतीयेन गर्भजात- कर्मपुरुपेण पूजनं तुरीयेण पष्ठेन प्रोक्षण सूतक शुद्धये चाग्निसूनु- रक्षाकुशाण वक्त्रेणानौ मूलमीशान नैऋतिमूल वायव्यान वायव्यमूलमीशानमिनि कुशास्तरणमितिपूर्वोक्त मिममग्रमल- ताक्त लालापनोदाय पष्ठेन जुहुयात् ॥ पंचपूर्वातिकमेरा परिपिविष्टरन्यासोऽपि मायेन विष्टरोपरि हिर- ण्यगर्भ हरनारायणानपि पूजयेत् ।।७५ इन्द्रादिलोकपालांश्च पूजयेत् ।।७६ ३५८ ] [ लिङ्ग पुराण वज्रावर्तपर्यंतानपि पूजयेत् ।।७७ वागोश्वरवागीश्वरोपूनाये नमुद्वास्य हतं विमर्जयेत् ॥ इसके अनन्तर अवयव व्याप्ति वयोद्धाटन वक्त्र निष्कृति इस पूर्व मे कहे हुए प्रकार से तृतीय मन्त्र से करे । गर्मजात कर्म तुरीय रो पूजन- पष्ट से सूतक शुद्धि के लिये प्रोक्षण वक्त्र से अग्निरूप पुत्र को कुश युक्त अस्त्र मन्त्र से रक्षा करनी चाहिए। प्राग्नेयी दिशा मे मूल ऐशाली मे ईशाग्र नैऋति मूल-वायव्य मे अग्र इस पूर्वोक्त प्रकार से कुशायो का मास्तरण परे । इसी सरह पूर्व कथित रीति से घृत में अग्र मूल को मक्त करके लालापनोदन के लिये पष्ठ मन्त्र से हवन करे ॥७४|| सद्योजातादि पांचो मे पूर्व के प्रतिकम से अर्थात् कामादि चार मन्त्रो से परिधि युक्त विष्टर का न्यास करना चाहिए। माद्य के द्वारा भद्रासन के ऊपर हिरण्य- गर्भ हरनारायणो का भी पूजन करना चाहिए ||७इन्द्र आदि लोक पालो का भी पूजन करे । ॥७६॥ बज से लेकर त्रिशूल पर्यन्त आठो लोकपालो के प्रायुध विशेषो का भी यजनार्चन करना चाहिए | वागीश्वर-वागीश्वरी की पूजा प्रादि करके भौर इसको उद्वासित करके होम द्रव्य को विसजित परे अर्थात् हवन करे ॥७॥ स्नु च वसस्कारमथो निरीक्षणप्रोक्षणताडनान्युक्षणादोनि पूर्व. वत् स क स वं च हस्तद्वये गृहीत्वा सस्थापनमायेन ताडनमपि स स वोपरि दर्भानुलेखनमूलमध्यमाऽग्नेण वित्वेन स शक्ति सवमपि शभुदक्षिणपार्वे कुशोपरि शक्तये नम शभवे नम. ७६ ततो ह्यन्तिसूत्रेण स कल वो तुरीयेण वेष्टयेदर्चयेच्च ।।६० धेनुमुद्रा दर्शयित्वा तुरीयेणावगुंठ्य पष्ठेन रक्षा विधाय स्र.क्- स्र वसस्कार पूर्व मेवोक्त ।। पुनराज्यसस्कार पूर्वमेवोक्त निरोक्षएप्रोक्षणनाडनाम्युक्षणादीनि पूर्ववत् ॥ आज्यप्रतापनमैशान्या वा यष्ठेन वेद्युपरि विन्यस्य घृतपान वित- स्तिमात्रं कुशपवित्रं वामहस्तागुष्ठानामिकाग्र गृहीत्वा दक्षिणागु- छानामिका मूल गृहीत्वाग्निज्वालोत्पवन स्वाहांतेन तुरीयण पुनः त्रिविध अग्नि कार्य० ] [३६ मे पदर्भान गृहीत्या पूर्ववत्स्वात्मसंनयन स्वहातेनायेन कुशद्वय- पवित्रबधन चाद्येन घृते न्यसेदिति पवित्रीकरणम् ।।८३ दभद्वय प्रगृह्याग्निप्रज्वालन घृत निघा वर्तयेत् । मप्रोक्ष्याग्नौ निधापयेदिति नीराजनम् ।।८४ इसके अनन्तर स क और स्रव का संस्कार करे। इन दोनो को हाथ ग्रहण करके पूर्व की भांति निरीक्षण-प्रोक्षण ताडन और अम्यु- क्षण प्रादि करे फिर माद्य मन्य से क्रम से सस्थापन भोर ताडन भी फरे । स क स्रव के ऊपर मूल मध्यमान से तीन प्रकार के दर्शों से अनु. लेखन करके स्र क शक्ति-स्र व को भी और शम्भु को दक्षिण पार्श्व मे कुशा के ऊपर 'शक्तये नम -शम्भवे नम -इन दो म-यो से न्यास करना चाहिए ॥७९॥ इसके पश्चात् समीप वर्ती सूत्र से स क स्रव को तुरीय मन्त्र के द्वारा वेष्टित वरे और अर्चन करे ॥८०॥ धेनुमुद्रा को दिखाकर तुरीय मन्त्र से अवगुएठन करे और पष्ठ से रक्षा करके स क पौर सुव का सस्कार पहिले बताया हुन्मा ही करना चाहिए ।।१।। फिर पूर्व में कथित पूर्व की ही भांति निरीक्षण-प्रोक्षण-नाइन मम्युक्षणादि के द्वारा राज्य सस्कार करना चाहिए ॥२॥ ऐशानी दिशा में प्राज्य का प्रतापन उस दिशा में पष्ठ मन्त्र से वेदि के ऊपर न्यास करके पवित्री वरण करे। एक विलस्त प्रमाण पाला कुशा या पवित्र को वाये के प्रनामिका के अप्र भाग को तथा दक्षिण हस्त के अंगूठे मोर अनामिन के मूल को ग्रहण करके प्रग्नि ज्वाला मे उत्पवन मोर स्वाहा पन्त में लगा कर तुरीय मन्त्र से फिर छ दर्शों को ग्रहण कर स्वदेह मे मप्लयन तथा स्वाहात माद्य मन्त्र से दो कुशामों के द्वारा पवित्र यायन और माद्य से घृत मे न्यास करे-यह पवित्री करण है ।1८३॥ दो दर्म ग्रहण करके मग्नि प्रज्वालन पृत को तीन बार परिभ्रमण को । मन्त्रोक्षण फर मग्नि मे निधापित बरे-यह नीराजन है ॥४॥ पुनदर्भान् गृहीत्वा कोटकादि निरीक्ष्याध्यण सप्रोदय दमाननी निधाय इत्यवद्योतनम् ।।८५ दर्भद्वय गृहीत्वाग्निज्वालया घृतं निरीक्षयेत् । पडगुष्ठ और
३६० ]
[ लिन पुराण
दर्भरण गृहीत्वा तेनाद्वयन शुरूपक्षद्वयनायेनेति कृष्णपक्षपंपानं
धृतं त्रिभागेन विभज्य व वेणेक भागेनाज्यनारनो स्याहा द्वितीये.
नाग्येन सोमाय स्वाहा भाज्येन ॐ अग्नीपोमाभ्यां स्वाहा
ग्राज्येनाग्नये स्विष्टकृते स्वाहा ॥८७
पुनः पुरोन गृहीत्या सहिताभिमंगेश नमोन्तेनाभिमत्रयेत् ॥
अभिमप धेनुमद्राप्रदर्शनका नावाठनाले रक्षाम् ।
मथ सस्कृने निधापयेत् प्राज्यममार
माज्येन व ग्वदनेन नामाभिधारण शक्तिबीजादोवानमूतंगे स्वाहा।
पूर्ववत्पुरुषववशय स्वाहा अधोरदयाय स्वारा बामदेवाय गुह्याय
माहा सद्योजानपूर्तये स्वाहा।
नि योद्धाटनम 10
त्रिविध प्रग्नि कार्य.]
स्क के मुख मे स्थापित घृत से चक्रावधारण हवि को अर्थात द्रव्य मे
चक्र के सदृश अभिधारण किया हुमा "ईशान मूर्तये स्याहा"--पूर्ववत्
'पुरुष वक्त्राय स्वाहा"-"अघोर हृदयाय स्वाहा"-"वाम देवाय गुह्याय
स्वाहा"-' सद्योजात मूर्तये स्वाहा"-इत्यादि मन्त्रो के द्वारा हवन करना
चाहिए। यह वस्त्रोद्धाटन है ||
ईशानमूर्तये तत्पुरुषवयाय स्वाहा तत्पुरुपवक्त्राय भघोरहृदयाय
स्वाहा अधोरहृदयाय वामगुह्याय सद्योजातमूर्तये स्वाहा इति
वक्त्रसधानम् ॥६१
ईशानमूर्तये तत्पुरुषाय वक्त्राय अघोरहृदयाय चामदेवाय गुह्याय
सद्योजाताय स्वाहा इति वक्ौक्यकरणम् ।।६२
शिवाग्नि जनयित्वैव सर्वकर्माणि कारयेत् ।
केवलं जिह्वया वापि सातिकाद्यानि सर्वदा ॥६३
गर्भाधानादिकार्येषु वह्न प्रत्येकमव्यय ।
दश पाहतयो देया योनियोजेन पचधा ॥६४
शिवाग्नी कल्पयेहिव्य पूर्ववत्परमासनम् ।
आवाहन तथा न्यासं यथा देवे तथार्चनम् ।।६५
मूलमर्म सकृज्जप्त्वा देवदेव प्रणम्य च ।
प्राणायाम त्रयं कृत्वा सगर्भ सर्वसमतम् ॥६६
परिपेच पूर्व च तदिध्ममभिधार्य च।
जुहुयादग्निमध्ये तु ज्वलितेऽथ महामुने ॥६७
माघागवपि चाधाय चाज्येनैव तु पण्मुखे ।
आज्यभागी तु जुहयाद्विधिनैव घृतेन च ॥६८
'पपत्र सन्धान बतलाया नाता है-"ईशान मूति-तत्पुरुष पका-
अघोर हृदय वाले अघोर हृदय वाम गुण और सद्योजात मूर्ति के लिये
स्वाहा है-यह इस प्रकार से वक्त्र का सन्यान दिया जाता है । पुनः
इसी उक्त प्रकार के मन्त्र से ईशानमूर्तये इत्यादि से सद्योगात मूर्तये
इत्यन्त पर्यन्त मोसार भातुति देते हए क्युक्य वरण करना वहिए
२॥ इस प्रकार से शिव की अग्नि का जनन करको सम्पूर्ण मं
३६२ | तिङ्गपुराण करने चाहिए । यस जिह्वा से सर्वदा पान्तिकादि कर्म करे ॥१३॥ गर्भाधान मादि कार्यों में पग्नि में दस या योनि बीज से पांच प्रकार की माहुतियां देनी चाहिए ॥१४॥ शिवाग्नि में पूर्व की भांति परम प्रासन की कल्पना फरें। जिस तरह से देव का प्रचंन होता है चसी प्रकार से मावाहन और न्यारा करना चाहिए । मूल मन्य का एक बार जाप करणे और देवों के देव को प्रतम करे। तीन बार प्राणायाम सगर्भ सर्व सम्मत परके हे महामुने ! परिपेचन पूर्वक उस इम का अभिधारण कर प्रज्वलित मरिन ये मध्य में हवन करना चाहिए IIMSVIE७॥ साधारोमा भी प्राशन करके छ सद्योजातादि जिसके मुष के समान हैं उसमे विपि पूर्वव पृत से भाग्य मागो का हवन बरे ॥६ चक्षुषी चाज्यभागो तु चाग्नये च तथोत्तरे। मात्मनो दक्षिण चव सोमायेति द्विजोत्तम NEE प्रत्यङ्मुखस्य देवस्य शिवाग्नेब्रह्मण. सुत । शक्षि व दक्षिण चंद चोत्तरं चोत्तरं तथा ॥१०० दक्षिणं तु महामाग भवत्येव न संशयः । प्राज्येनाहु तयस्तत्र मूलेनैव दर्शव तु॥१०१ चणा च यथावद्धि समिद्भिश्च तथा स्मृतम् । पूर्णाहुति ततो दद्यान्मूलमंत्रण सुव्रत ।।१०२ सर्वावरणदेवानां पंचपचंब पूर्ववत् । ईशानादिक्रमेणव शक्तिबीजक्रमेण च ॥१०३ प्रायश्चित्तमघोरेग स्वेष्टातं पूर्ववत्स्मृतम् । निप्रकारं मया प्रोक्तमग्निकार्य सुशोभनम् ॥१०४ यथावसरमेवं हि कुन्नित्यं महामुने। जोविताते लभेत्स्वर्ग लभते अग्निदीपनम् ।।१०५ नरकं चैव नाप्नोति यस्य कस्यापि कर्मणः । अहिंसक चरेद्धोम साधको मुक्तिकाक्षकः ॥१०६ हृदिस्यं चितयेदग्नि ध्यानयज्ञन होमयेत् । देहस्थं सर्वभूताना शिवं सर्वजगत्पतिम् ॥१०७ शिव लिङ्ग अघोर० ]. [ ३६३ त ज्ञात्वा होमयेद्भमत्या प्राणायामेन नित्यशः । बाह्यहोमप्रदाता तु पापारणे ददुरो भवेत् ॥१०८ है द्विजोत्तम ! अपने उत्तर भाग मे दोनों माज्य भागों का अग्नि के लिये और दक्षिण भाप मे सोम के लिये हपन करना चाहिए ॥६॥ उक्त पय सव्य होम का कारण बताते हैं-है ब्रह्मा के पुत्र ! प्रत्यङ्मुख देव शिवाग्नि की दक्षिण मक्षि ( नेत्र ) और उत्तर-उत्तर उसी प्रकार से दक्षिण होता ही है। हे महाभाग ! इसमे सराय नही है। यहाँ पर मूल मन्त्र के द्वारा भाग्य की दश माहुतियां देनी चाहिए ।।१०।१०१॥ ये यथावत् चरु से तथा समिधामो से कही गई हैं । हे सुव्रत ! इसके मन- न्तर मूल मन्त्र मे पूर्णाहुति देनी चाहिए ॥१०२॥ समस्त प्रावरण देवों की पूर्व की भांति पांच-पांच ही ईशानादि कम से पोर शक्ति मोज के क्रम से देवे ।।१०३॥ प्रायश्चित्त स्वेष्टान्त तक प्रधोर मन्त्र से पूर्व के ही समान बताया गया है । इस तरह मैंने तीन प्रकार का सुशोभन मान- कार्या कहा है ।।१०४॥ हे महामुने ! अवसर के अनुसार इस प्रकार से नित्य ही करना चाहिए । जीवन के अन्त मे ऐसा करने वाला मानव स्वर्ग को प्राप्ति करता है और मग्नि दीपन का लाभ किया करता है ॥१०॥ जिस रिसी फम्र्म के करने पर भी कभी मरक की प्राति नहीं किया करता है। जो मुक्ति की इच्छा रखने वाले सापक को अहिंसक होम मा समाचरण करना चाहिए ॥१०॥ हृदय में प्रग्नि का चिन्तन करे मोर ध्यान क यज्ञ से होम करना चाहिए। देह में स्थित-समस्त भूतो के शिव मोर सम्पूर्ण जगतों के पति का ध्यान करे । ऐसे प्रभु को पहिचान फरके भक्ति-भाव के साप होम करे पोर नित्य ही प्राणायाम के द्वारा करे । जो वाह होम के प्रदान करने वाला होता है वह पापाण में सर होता है ॥१०॥१०८।। ।। ६५-शिव लिङ्ग अघोर अर्चन विधि । अपवा देवमीशानं लिंगे संपूजयेच्छिवम् । साहाणः शिवभक्त शिवध्यानपरापरण.॥
[ लिङ्ग पगमा
अग्निरित्यादिना भस्म गृहीत्वा ह्यग्निहोत्रजम् ।
उधूलयेद्धि सर्वाङ्गमापादतलमस्तकम् ॥२
पानामेद्ब्रह्मतीर्थेन ब्रह्मसूत्री ह्य दङ मुखः ।
प्रथोंनमः शिवायेति तनुकृत्वात्मनः पुनः ॥३
देव च तेन मंत्रेण पूजयेत्प्रणवेन च ।
सर्वस्मादधिका पूजा अघारेशस्य शूलिनः ।।४
सामान्य यजनं सर्वमग्नि कार्य च मुव्रत ।
मत्रभेदः प्रमोस्तस्य अघोरध्यानमेव च ॥५
अघोरेभ्योऽय घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्यः
सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः॥६
अघोरेभ्यः प्रशांतहृदयाय नमः ।
अथ घोरेभ्यः सर्वात्मब्रह्मशिरसे स्वाहा ।
घोरघोरतरेभ्यः ज्वालामालिनी शिखायै वषट् ।
सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यः पिंगलकवचाय हुम् ।
नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः नेत्रत्रयाय वषट् ।
सहस्राक्षाय दुर्भदाय पाशुपताखाय हुं फट ।
स्नात्वाचम्य तनु कृत्वा समभ्युक्ष्याघमर्षणम् ।
तपणं विधिना चाध्य भानवे भानुपूजनम् ७
समं चाघोरपूजाया मंत्रमात्रेण भेदितम् ।
मागशुद्धिस्तथा द्वारि पूजां वास्त्वधिपस्य च ॥
(शिव लिङ्ग अघोर-अर्चन विधि वर्णन ) इस अध्याय मे उत्तम
अधौरान का वर्णन किया जाता है-प्रथवा ईशान शिय देव का लिङ्ग
मे समर्चन करे । ब्रह्म और शिव का भक्त शिव के ध्यान में परायण
होकर पूजन करे ॥१॥ 'अग्नि' - इत्यादि मन्त्र के द्वारा पनि होम से
समुत्पन्न भस्म का ग्रहण कर पाद तल से लेकर मस्तक पर्यन्त सम्पूर्ण
अङ्गको उदयूलित करे अर्थात् सव शरीर मे मस्म लगावे ॥२॥ ब्रह्म
सूत्री उत्तर की ओर मुख करके ब्रह्म तोपं से भाचमन करे । इसके अन.
स्तर पुनः "मोम् नम. शिवाय"-इस मन्त्र से अपने शरीर को पवित्र
शिव लिङ्ग अघोर० 1 ३६१ - करे ।।३।। इसी मन्त्र से अथवा कैडल प्रणव से. देव का मन करता चाहिए । अघोरेश खूली की पूजा सबसे अधिक महत्त्व वाली होती है ४॥ हे सुव्रत ! अन्य सम्पूर्ण यजन और पनि कार्य सामान्य होता है। उस प्रभु का मन्त्र भेद होता है और अघोर का ध्यान उसमें किया जाता है ॥५॥ उमका मन्न यह है-"मघोरों के लिये-घोरों के लिये-घोर तरों के लिये सब सों के लिये-रुद्र रूपो के लिये नमस्कार होवे" || भब इसके न्यास बताते है-जिस मङ्ग का न्यास हो उसी प्रङ्ग पर हस्त रखना चाहिए 'पपोरेभ्यः प्रशान्त हृदयाय नम'- इससे हृदय पर न्यास करे । 'घोरेभ्यः सर्वात्म ब्रह्म शिरसे स्वाहा'-इमसे सिर पर न्यास करे। 'घोर धोर तरेभ्यः ज्वाला मालिनी शिखाय वषट्"-इससे शिखा पर न्यास करे । "सर्वेभ्यः सर्व शभ्यः पिङ्गल कवचाय हुम्"-इससे पा. हुमों पर न्यास करे। 'नमस्ते प्रस्तु रुद्र रूपेभ्यः नेत्र प्रयाय वपट्"- इससे नेत्रों पर न्यास करे। सहस्राक्षाय दुर्भदाय पाशुपतास्त्राय हु फट्"- इससे कर तल न्यास करे । प्रब पूजा की विधि को बतलाया जाता है- स्नान फरशे-पाचमन कारक तथा शरीर का प्रभ्युमण करके अपमपंग- तर्पण भोर भानु के लिये अर्घ्य मोर पूजन समान रूप से पूर्व तुल्य करके अघोर की पूजा मे मन्त्र मात्र से भिन्न करना चाहिए । मार्ग को एरि स्था द्वार पर वास्तु के प्रधिय की पूजा करे ७nn कृत्वा कर विशोध्याने स शुभासनमास्थितः । नासापकमले स्थाप्य दग्याक्षः क्षुभिकरग्निना ।। घायुना प्रेयं तद्भविशोध्य च शुभाभसा । सक्त्यामृतमये ब्रह्मकला तत्र प्रकल्पयेत् ॥१० अघोरं पंचधा कृत्वा पवांगसहितं पुनः । इत्थ ज्ञानक्रियामेव विन्यस्य च विधानतः ॥११ न्यासखिने त्रसहितो हदि ध्यात्वा परासने। नाभौ पहिगत स्मृत्वा 5 मध्ये दोपवत्प्रभुम् ॥१२ शांत्या बोजांकुरानरुधर्माध रपि मंयुते। सोमसूर्याग्निसंपन्ने मूर्तित्रयसमन्विते ॥१३ ३६६ ] [ लिङ्ग पुराण वामादिभिश्च सहिते मनोन्मन्याप्यधिष्ठिते । शिवासनेत्ममूर्तिस्थमक्षयाकार रूपिणम् ।।१४ अष्टशिकलादेहं वितत्वसहित शिवम् । प्रष्टादशभुजं देव गजचर्मोत्तरीयकम् ॥१५ शुभ मासन पर समासीन होकर सबसे पूर्व हाथ को विशुद्ध करे फिर नासान के समीप हस्त कमल में भस्म को स्थापित करके शुभवाग्नि से दग्ध व्यवहार बाले यायु मे प्रेयं उस भस्म को शुभ जल से विशोधित फरे । ब्रह्ममय उस भस्म में शक्ति के साथ ब्रह्म कला की कल्पना करे MPा पोर सशा वाले मन्त्र को पांच प्रकार का परके पचाङ्ग भस्म से विलेपन युक्त करे। इस प्रकार से विधि-विधान से ज्ञान युक्ता क्रिया का विन्यास करके हे वरानने ! अघोर मूति के सहित न्यास करना चाहिए । हृदय के घंध मासन पर ध्यान करके नाभि मे वह्निगत का स्मरण करके भौहो के मध्य मे दीप की शिखा की भांति प्रभु का चिन्तन करे ॥११॥१२॥ अब ध्यान का प्रकार बताते हैं शान्ति और बीजाकुर मनन्त धर्माद्यो से सयुत सोम सूर्णग्नि से समन्वित मूति त्रय से युक्त वामादि से सयुत पोर मनोन्मनी से अधिष्ठत शिवासन पर भारम मूर्ति मे सस्थित मक्षय ग्राकार और रूप बाले-अडतीस कला से युक्त देह पाले-तीन तत्वो के सहित गिव का ध्यान करे जिनकी अठारह भुजाएं हैं पोर जो गज के चर्म के उत्तरीय वाले देव हैं ॥१३॥१४॥१५॥ सिंहाजिनाबरधरमघोर परमेश्वरम् । द्वात्रिंशाक्षररूपेण द्वात्रिंशच्छक्तिभितम् ॥१६ सर्वाभरणसंयुक्त मर्वदेवनमस्कृतम् । कपालमालाभरण सर्ववृश्चिकभूषणम् ।। ७ पूर्णदेवदनं मौम्य चद्रकोटिसमप्रभम् । चंद्ररेखाघर शक्त्या सहित नीलरूणिम् ॥ ८ हाते खङ्ग खेटकं पाशमेके रत्नचित्र चांकुशं नागकक्षाम् । शरासन पाशुपत तयार दड च बटवागमथापरे च ॥१६ तंत्री च घटा विपुलं च शूलं तथापरे डामरुल च दिव्यम् ।
[ ३६७ शव लिङ्ग अधारक वज्रगदा टकमेकं च दोन समुद्गरं हस्तमथास्प शंभरे । २० वरदाभयहस्तं च वरेण्यं परमेश्वरम् । भावयेत्पूजयेचापि वह्नौ होमं च कारयेत् ॥२१ यह देव सिंह के चर्म का वसपारण करने वाले हैं । अघोर स्वरूप- परमेश्वर बत्तीस प्रक्षरो के रूप से बत्तीस शक्तियो से समावृत हैं ॥१६॥ सम्पूर्ण भाभरणो से समलकृत-समस्त देवो के द्वारा वन्धमान-कपाल अर्थात भर गुराडो को माला के भूपण से विभूषित समझ बिच्छुयो को भूषा से सुशोभित हैं ॥१७॥ पूर्स चन्द्र के तुल्य मुख बाले-परम सौम्य स्वरूप-करोडो चन्द्रमानो की प्रभा के तुल्य प्रभा मे सम्पन-चन्द्र की रेखा के धारण करने वाले-शक्ति के सहित और नोल रूप वाले हैं ॥१८॥ एक हाथ मे खङ्ग है मौर एक हस्त मे खेटक तथा पास लिये हुए है। किसी हाय मे रत्नो से जटित परम चिधित अकुश है तो किसो हाय में नाग कक्षा है । सूरासन पाशुपत प्रस्त्र, दण्ड भोर खट्वाङ्ग धारण किये हुए हैं। तन्त्री घण्टा-विपुल शूल और दूसरे हाथ मे दिव्य हागरुक लिये हुए हैं । वत्र गदा-रङ्क दीप्त मृद्गर शम्भो के हाथ में विराजमान हैं ॥१६॥२०॥ वरदान अभय दोनो हाथो मे रखने वाले परम वरेण्य-परमे- भर की भावना करे और फिर पूजन करनी चाहिए मोर होम करे ।।११ होमश्न पूर्ववत्सों मत्रभेदश्व कीर्तितः । अष्टपुष्पादि गधादि पूनास्तुतिनिवेदनम् १२२ अतर्वलि च कुडस्य वाढे येन विधानत: मंडलं विधिना कृत्वा मऔरतर्ययाक्रमम् ॥२३ रुद्भ्यो मातृगणेभ्यो यक्षेभ्योऽपुरेभ्यो ग्रहेन्यो रामसेप्यो नागेभ्यो नक्षम्यो विश्वगरोभ्य क्षेत्रर लेभ्य, प्रप वायुवर- दिग्भागे क्षेत्रपाल बलि क्षिपेत् । अयं गंधं पुष्पं च धूप दीप च सुव्रना। नैवेद्यं मुसवासादि निदेव वै यथाविधि । विज्ञाप्येव विसृज्माय अष्टपुष्पश्च पूजनम् । सर्वसामान्यमेतद्धि पूजायां मुनिपुगया ॥२४ ३६ } [लिङ्ग पुराण एवं सक्षेपतः प्रोक्तमघोरार्चादि सुव्रत । अघोरा विधानं च लिगे वा स्थडिलेऽपि वा ॥२६ स्थंडिलात्कोटिमुरिगत लिंगानमनुत्तमम् । लिगार्चनरतो विप्रो महापातकसमवे. ॥२९ पापरपिन लिप्येत पापत्रमिवाममा। लिंगस्य दर्शनं पुष्यं दर्शनात्स्पर्शनं वरम् । अर्चनाधिक नास्ति ब्रह्मपुत्र न संशयः । एव सक्षेपत प्रोक्तमघागर्चनमुत्तमम् ॥२६ वर्षकोटिशतेनापि विस्तरेण न शक्यते ॥३० होम करने का वही प्रकार होता है जो पहिले बता दिया गया है केवल मन्त्रो का ही सिर्फ भेद होता है। प्रष्ट पुष्पादि और गन्धादि से पूजा तथा फिर स्तवन का निवेदन करना चाहिए । ॥२२॥ वह्नि पुराण में वरिणत विधान से कुण्ड की अन्तलि होम करना चाहिए । इन मन्त्री से क्रमानुसार विधि पूर्वक मण्डल करे ।।२३॥ रुद्रो के लिये मातृगरण-यक्ष. असुर प्रह-राक्षस-नाग नक्षत्र विश्वगण क्षेत्रपाल बलि देवे और वायु वरुण दिमाग में क्षेत्रपाल की बलि देनी चाहिए । हे सुव्रतो । अयं गन्ध पुष्प- धूप-दीप-नैवेद्य और मुख वास प्रादि यथाविधि समर्पित करे ।।२४। इस प्रकार से विशेष ज्ञान कर प्रौ' विमजन करके हे मुनिश्री । पूजा में पाठ पुप्पो से यह पृजन मर्व सामान्य होता है ॥२शा हे सुव्रत । इम सरह से अघोरादि मक्षेप से कह दिया गया है। प्रधोरा का विधान लिङ्ग मे तथा स्थण्डिल मे दोनो प्रकार का होता है ॥२६॥ स्थण्डिल से करोडो गुणा उत्तम लिङ्गार्चन माना जाता है । लिङ्गान मे निरत रहने वाला पुरुष महा पातको से होने वाले पापो से भी जल से पप्रपत्र को भौति लिप्त नहीं हुमा करता है । लिङ्ग के दर्शन से महा पुण्य हाता है मौर दर्शन से भी स्पर्श करना परम श्रेष्ठ होता है ॥२७॥२८॥ लिङ्ग के अर्थन से अधिक तो हे ब्रह्मपुत्र घुछ भी अन्य ठतम नहीं होता है- इसमे सशय नहीं है। इस प्रकार से सक्षेर स उत्तर प्रपोरान का विधान निरूपित कर दिया है। इसका विस्तार पूर्वक वर्णन यदि कोई श्री जयामिक वर्णन ] [ ३६६ . करना चाहे तो करोड़ों वर्षों में भी नहीं किया जा सकता है ॥२६॥३०॥ ॥६६-श्री जयाभिषेक वर्णन ।। प्रभावो नंदिन व लिंगपूजाफलं च तम् । श्रनिभिः संमितं सर्व गेमहर्षण सुव्रत ॥१ जयाभिषेक ईशेन कथितो मनवे पुरा । हिताय मेरुशिखरे क्षत्रियारणा निशूलिना ॥२ तत्कथ पोडशविध महादानं च शोभनम् । वक्तुमर्हसि चास्मा सूत बुद्धिमतावर ॥३ जीवच्छूद्ध पुरा कृत्वा मनु स्वायभुव. प्रभु.। मेरुमासाद्य देवेशमस्त बीनाललोहितम् ॥ तपसा च विनीताय प्रहृष्टः प्रददो भवः । दिव्यं दर्शनमीशानस्तेनापश्यत्तमव्ययम् । नत्वा संपूज्य विधिना कृनाजलि पुटः स्थित । हर्षगद्गदया वाचा प्रोवाच च ननाम च ॥६ देवदेव जगन्नाथ नमस्ते भुवनेश्वर । जीवच्छ द्ध महादेव प्रसादेन विनिर्मितम् ।। पूजितश्च ततो दवो दृष्टश्च व मयाधुना । शक्राय कथित पूर्व धर्मकामार्थमोक्षदम ।। जयाभिषेक देवेश वक्तुमर्हसि मे प्रभो। तस्मै देवो महादेवो भगव नीललोहितः ।। जपाभिषेक वणन । इप्त अध्याय मे मनु के लिये परम सन्तुष्ट महेश के द्वारा वलित जयाभिपक का निरूपण किया जाता है। प्रपियो ने कहा-हे सुव्रत रोमहर्षण! नन्दी का प्रभाव और यति से समित सम्पूर्ण लिङ्ग पूजा का फल हमने प्रवण कर लिया है ॥१॥ मेरु शिखर मे क्षत्रि. यो के कल्याण के लिये पहिले समय में भगवान् महेश त्रिशूली के द्वारा जयाभिषेक का वर्णन किया गया है ॥२॥ हे बुद्धिमानो में परम धेष्ठ सूतजी । वह परम शोभन सोलह प्रकार का महादान पिस प्रकार पा ३७.] [लिङ्ग पुगए . होता है यह भाप हमारे सामने दर्शन करने की योग्य होते हैं । ॥३॥ सूतजी ने कहा-प्राचीन काल में प्रभु स्वायम्भुव मनु ने जीपच्छाद्ध करके मेरु शिखर में प्राप्त हुए और वहाँ देवेश भगवान् नौल लोहित का स्तयन किया था ॥४॥ तपश्चर्या से परम विनय से युक्त मनु को भगवान भव ने परम प्रहृष्ट होकर अपना दिव्य दर्शन दिया था। इससे उन अध्यय ईशान को मनु ने देखा था ॥५।। मनु ने उन को प्रणाम किया था और भली-भांति से पूजन करके हाथ जोडकर भगवान के समक्ष मे मनु स्थित हो गमे । उन्होने प्रणाम किया और हर्ष से गद्गद वाणी मे बोले ॥६॥ है देवो के भी देव ! माप समस्त भुवनी के ईश्वर और इस जगत् स्वामी हैं । महादेव के प्रसाद से मैंने जीवित रहते हुए श्राद्ध किया है 11७॥ और इसके अनन्तर देव का पूजन किया है मोर इस समय मैंने आपका दर्शन भी प्राप्त कर लिया है । पहिले समय मे इन्द्रदेव के लिये जो धर्मार्थ काम तथा मोक्ष का प्रदान करने वाला जयाभिषेक कहा था । हे देवेश! वही अब मुझे बताने की कृपा कीजिए । सूतजी ने कहा- उस समय में नील लोहित भगवान महादेव ने उसको यह सम्पूर्ण जयाभिषेक स्वय ही कहा था। जयाभिषेकमखिलमवदत्परमेश्वरः। जयाभिषेक वक्ष्यामि नृपाणां हितकाम्यया ॥१० अपमृत्युजयार्थ च सर्व शत्रुजयाय न । युद्धकाले तु संप्राप्त वृत्ववभिपेचनम् ।।११ स्वपति चाभिषिच्य व गच्छेद्योधुरणाजिरे। विधिना मडप कृत्वा प्रपा वा क्रूटमेव वा ॥१२ नवधा स्थापयति व हागो वेदपारगः । ततः सर्वाभिषेकार्प सूत्रपातं च वारयेत् ॥१३ प्रागाद्य वर्णमूरं च दक्षिणा तथा पुनः । सहस्राणां द्वय तय दाताना च चतुष्टयम् ॥१४ दोयमेव शुभं गोधतेषु कोतु मेहरेद । बाह्य पोथ्यां पदं चर्क समंतादुपसहरेत् ।।१५ श्री जयाभिषेक वर्णन ] [३५१ अगसूत्राणि सगृह्य विधिना पृथगेव तु । प्रागाद्य वर्णसूत्र च दक्षिणाद्यं तथा पुनः ।।१६ प्रागाद्य दक्षिणाय च पनिशरसहरेत्क्रमात् । प्रागाद्या. पंक्तयः सप्त दक्षिणाद्यास्तथा पुनः ।।१७ भगवान श्री महादेव ने कहा -प्रव में इस जयाभिषे या वर्णन राजामों के हित की कामना से तुम्हारे ममक्ष में बरू गा॥१०॥ जिम समय युद्ध या बाल उपस्थित हो जाता है तो उस समय में अपमृत्यु जप करने के लिये और शत्रुप्रो पर पूर्णतया जप प्राम करने के लिये इस अभिषेक को करे पहिले अपने स्वामी विवाभिषेचन फरके फिर रणदोत्र में युद्ध करने के लिये जाना चाहिए । विधि पूर्व मण्डप की रचना करे उममे पानीय शाला या निभ्रल स्थान का निर्माण करना चाहिए ॥१२॥ वेदों में पारगामी ग्राह्मा यो वहिनीनी प्रकार से स्थापना करनी चाहिए। इसके प्रनन्तर सब प्रभिक के लिये सूत्रपास परे मर्याद रेग्या वरण करे ॥१॥ प्रागार और दक्षिणाय वर्ण मग जिस तरह होवे से दो सहस मोर चार सौ शेष शुभ र शेप भागों में मध्य स्थान करना चाहिए। रोष्ठ के वाहिर के भाग में बीपी मे चारो पोर एम पद की उपलना परनी चाहिए ॥१४॥५॥ भवान्तर सूत्रोमा सग्रह सरपे विधि से पृथर ही प्रागाय पोर शिरणाय पणं मूत्र के साप पत्तीम पाएँ पर । प्रागाय मात तपा दक्षिurer गात पनियो करनी चाहिए ॥१६॥१७॥ तस्मादेकोनपवाससक्तय परितोतिताः । नय पंक्ती हरेन्मध्ये गधगोमयवाणि ममल चालिसेत्तर इस्तमाण गमिनम् । पटपम सित वृत्त कगिरायमराचिनम्।। मष्टागुलप्रमाणन गरिएका हेममनिभा। धतुरगुनमानेन केसरस्थासमुच्यते ॥ घमासानंच गम्योपागमम। पारनेपादिपु पागोपु स्थापयेत्प्रणयेन तु ॥१ उक्त ३७२ ] { लिङ्ग पुराण अव्यक्तादीनि वै दिक्षु गात्राकारेण वै न्यसेत् । अव्यक्त नियतः कालः काली चेति चतुष्टयम् ।।२२ सितरक्तहिरण्याभकृष्णा धर्मादयः क्रमात् । हंसाकारेण घे गात्रं हेमाभासेन सुव्रताः ॥२३ आधारशक्तिमध्ये तु कमल सृष्टिकारणम् । बिंदुमा कलामध्ये नादाकारमतः परम् ।।२४ नादोपरि शिवं ध्यायेदोंकाराख्य जगद्गुरुम् । मनोन्मनी च पनाम महादेवं च भावयेत् ॥२५ इस प्रकार से उनचास पंक्तियां परिकीत्तित की गई हैं। मध्य भाग में गन्ध गोमय मोर जल से लिप्त करके नौ पक्तियां ग्रहण करनी चाहिएँ ॥१८॥ उसमें एक हाथ के प्रमाण वाला परम शोभन कमल का पाले. खन करे जिस कमल में सित एव वृत्त पाठ पत्र हो और कणिका भी केसर से युक्त होनी चाहिए ॥१९॥ वह फरिणका हेम के सहश पाठ अगुल के प्रमाण वाली विरचित करे। चार अगुल के प्रमाण से युक्त केसर का स्थान कहा जाता है ॥२०॥ प्रणव के द्वारा यथाक्रम धर्म ज्ञान- वैराग्य मौर ऐश्वर्य प्राग्नेयादि कोणो में स्थापित करे ।।२१।। वाह्य पत्रा कार से दिशाओ मे अव्यक्त प्रादि का न्यास करना चाहिए । अव्यक्त नियत काल है और चतुष्टय काली हाता है ॥२२॥ धर्म अर्थ मादि का क्रम से वर्ण सित-रक्त-हिरण्याम और कृष्ण होता है । गात्र की कल्पना हेमाम हंसा कार से करे । ॥२३॥ प्राधार शक्ति के मध्य मे कमल सृष्टि का कारण माना गया है । कला मध्य मे विन्दु मात्र नाद का प्राकार है। इससे पर नाद के अपर मोटार नाम वाले जगत् के गुरु भगवान् शिव का ध्यान करना चाहिए। मनोमनी पद्माभ हादेव की भावना फरनी चाहिए ॥२४॥२५॥ वामादयः क्रमेणेत्र प्रागाद्या. केसरेषु । पामा ज्येष्ठा तथा रोद्री काली विकरणी तथा।। ६ चला प्रमथिनी देवी दमनी च यथाक्रमम् । वामदेवादिभिः सार्धं प्रणवेनैव विन्यसेत् ॥२७ श्री जयाभिषेक वर्णन ] [३७३ नमोऽस्तु वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय शूलिने ॥२८ रुद्राय कालरूपाय कलाविकरणाय च । बलाय च तथा सर्वभूतस्य दमनाय च ॥२६ मनोन्मनाय देवाय मनोत्मन्यै नमोनमः । मरेतयथान्याय पूजयेत्परिमंडलम् ॥३० प्रथमावरण प्रोक्तं द्वितीयावरण शृणु। द्विनौयावरणे चैव शत्तय षोडशव तु ||३१ तृतीयावरणे चैव चतुविशदनुक्रमात् । पिशाच वीथि मध्ये नाभिवी थिः समंततः ॥३२ केसरों में प्रागाद्या वामा आदि क्रम से ही विन्यस्त करे । वामा- ज्येशा-रोदी-काली-विकरणो-वला-प्रमथिनी-देवी-पौर दमनी इनका क्रम के अनुसार वामादि के साथ ही प्रणव के द्वारा विन्यास करना चाहिए ॥२६॥२॥ वामदेव के लिये नमस्कार है-ज्येष्ठ शूली के लिये नमस्कार है ॥२८॥ कालरूप रुद्र के लिये वला विकरण के लिये बल तथा सर्व भूतो के दमन करने वाले के लिये मनोन्मन देव तथा मनोन्मनी के लिये बारम्बार नमस्कार है । इन मन्त्रों के द्वारा परिमण्डल का पूजन करना चाहिए ॥२६॥३०॥ अब तक प्रथम मावरण का निरूपण किया गया है । अब द्वितीय प्राबरण का श्रवण करो। द्वितीय भावरण में सोलह ही शनियां हैं ।।३१॥ तीसरे प्रावरण मे क्रमानुमार चौबीस हैं । मध्य मे पिशाच वीथी है और चारो मोर नाभि वीथी है ॥३२॥ मनरेतयथ न्याय पिशाचानां प्रकोनिता। अष्टोत्तरसहस्र तु पदमष्टारसंयुतम् ॥३३ तेपुतेपु पृथक्त्वेन पदेषु कमल क्रमात् । कल्पयेच्छालिनीवारगोधूमैश्च यवादिभिः ॥४ तंडुलंश्च निर्लथि गौरसपंपसंयुतः । मथवा पाल्पयेदेतयंपाकालं विधानतः॥३५ अष्टपत्र लिखेत्तं पु कणिकाकेसरान्वितम् । शालीनामाढक प्रोक्त कमलानां पृथक पृषक ॥३६ ३७४] [ लिङ्ग पुराण तालाना तदर्घ स्यात्तदधं च यवादय । द्रोण प्रधानकु मस्य तदधं तहलाः स्मृता ॥३७ तिलानामादक मध्ये यवाना न तदर्धकम् । अथामसा समन्युक्ष्य कमल प्रसवेन तु ॥३८ इन वक्ष्य माण मन्त्रों के द्वारा पिशाचो की पूजा कही गई है। माठ कोणो वाले एक सहस्र पाठ स्थान करना चाहिए ॥३३॥ उन-उन प्रत्येक स्थानो मे शालिगोवार गोधूप-यव भादि से कपल की पृषक रूप से पल्पना करे ।।३४॥ तण्डुल-तिल गौर सपंप आदि से सयुत इन के द्वारा इनसे यथा काल विधान से कल्पना गरे ॥३॥ उन कमलों में कणिका पौर केसर से वित प्रष्ट पत्र की रचना करे । प्रत्येक कमल की रचना करने के लिये एक मात्र शाली का परिमाण होना चाहिए यदि तण्डुलो से रचना की जावे तो इनका मान शाली से माधा होना चाहिए । मोर यब से काम लिये जावे तो इनका प्रमाण तण्डुल से प्राधा होना चाहिए । प्रधान कुम्भ का चतुरण द्रोण है उसका प्राधा भाग तएल कहे गये हैं ॥३६॥३७॥ तिलो का परिमाण एक मादक है और मध्य मे यव उसके मध भाग होने चाहिए। इसके अनन्तर जन से प्रणव के द्वारा कमल का अभ्युक्षरण करे ॥३८॥ तेषु सर्वेषु विधिना प्रणव विन्यसेत्कमात् । एव समाप्य धाभ्यक्ष्य पदसाहस्रमुत्तमम् । ३६ कलशाना सहस्राणि हैमानि च शुमानि च । उक्तलक्षणयुक्तानि कारयेद्राजतानि वा ॥४० ताम्रजानि यथान्याय प्रणवेनाध्यवारिणा। द्वादशागलविम्नारमुदरे समुदाहृतम् ।।४१ वर्तित तु तदर्धन नाभिस्तस्य विधीयते । कठ तु व्ध गुलोत्सेध विस्तर चतुरगुलम् ॥४२ ओष्ठ व व्धगुलोत्सेध निर्गम द्वय गुल स्मृतम् । तत्तकै द्विगुण दिव्य शिवकुभे प्रकीर्तितम् ॥४३ पवमानातर सम्यक्त तुना वेष्टयेद्धि में ।
1 [ ३७५ श्री जयाभिषेक वर्णन ] अवगुठ्य तथाभ्युदय कुशोपरि यथाविधि ॥४४ पूर्ववत्प्रणवेनैव पूरयेद्गधवारिणा । स्थापयेच्छिवकुभाव्य वर्धनी च विधानतः।।४५ मध्यपद्मस्य मध्ये तु सकूचं साक्षत क्रमात् । प्रावेष्ट्य व युग्मेन प्रच्छाद्य कमलेन तु ॥४६ हैमेन चित्ररत्नेन महस्रकलशं पृयक् । शिवकुभे शिव स्थाप्य गायत्र्या प्रणवेन च ॥४७ उन-उन समस्त कमलो में विधि पूर्वक प्रणव का विन्यास करना चाहिए । इस प्रकार से उत्तम एक सहस्र पद का प्रभ्युक्षण पूरा समाप्त करे ।।१६। इसके उपरान्त एक सहस्र परम शुभ सुवर्ण के कलश अथवा उक्त लक्षण से युक्त चादी के कलशो का निर्माण करावे ॥४०॥ अथवा ताम्र के न्याय के अनुसार बनवावे और प्रणव के द्वारा अध्यं के जल से प्रोक्षण करे। उदर मे कलश का विस्तार बारह अगुल होना चाहिए ॥४१॥ उस का आधा परिमाण वाली वृत्ताकार नाभि की जाती है । दो मंगुल ऊंचाई वाला और चार म गुल विस्तार से युक्त कण्ठ होना चाहिए । ॥४२॥ दो प्र गुल उत्सेध याला मोष्ठ कल्पित करे पौर दो अगुल वाला निगम कहा गया है । वह शिव कुम्भ मे दिव्य और द्विगुण बताया गया है ॥४३॥ यय के प्रमाण के अन्तर पर भली-भांति तन्तु मे वेष्टित करे । भवगुण्ठन करके तथा प्रभ्युदाण करके यथाविधि कुशा के ऊपर पूर्व की भांति गन्ध युक्त जल से पूरित करना चाहिए । शिव कुम्भ से समृद्ध वर्धनी अर्थात् खङ्ग रूपिणी को विधान से स्थापित करे ॥४४॥४५॥ मध्य मे जिसके पय है ऐसे मध्य पम कुम्भ के मध्य मे पूर्च और अक्षतो के सहित जसे हो वरो दो घरो से क्रम से मावेष्टित करके हैम चित्र रत्न कमल से सहस्र कलश को पृषक परिच्छादन करे। गायत्री पोर प्रणव से शिव कुम्भ में शिव को स्थापना करे॥४६॥४॥ विद्महे पुरुषायव महादेवाय धीमहि । तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥४८ मंगानेन रुद्रस्य सान्निध्यं सर्वदा स्मृतम् ।
३७४ ] [.लिङ्ग पुराण संडुनानां तदध स्वात्तदधं च यमदयः । द्रोण प्रधानकु भस्य तदर्घ तंडुलाः स्मृता. 133 तिलानामाढक मध्ये यवाना च तदर्धकम् । अथाभसा समभ्युक्ष्य कमल प्रणवेन तु ॥३८ इन वक्ष्य माण मन्त्रों के द्वारा पिशापों की पूजा कही गई है । पाठ कोणो वाले एक सहन पाठ स्थान करना चाहिए ।।३३। उन-उन प्रत्येक स्थानो मे शालिनीवार गोधुय-यव प्रादि से कमल की पृथक् रूप से कल्पना करे ॥३४॥ तण्डुल-तिल गौर सर्पय मादि से सयुत इन के द्वारा इनसे यथा कात विधान से पल्पना करे ॥३५॥ उन कयलो में करिणका और केसर से पवित प्रष्ट पत्र की रचना करे। प्रत्येक कमन की रचना करने के लिये एक माढक शाली का परिमाण होना चाहिए यदि तण्डुलो से रचना की जावे तो इनका मान शाली से प्राधा होना चाहिए। मोर यब से काम लिये जाये तो इनका प्रमाण तरल से प्रापा होना चाहिए। प्रधान कुम्भ का चतुर्गुण द्रोण है उसका मापा भाग तण्डुल कहे गये हैं ।। ३६॥३७॥ तिलो का परिमाण एक पाढक है पौर मध्य मे यव उसके प्रर्ध भाग होने चाहिए। इसके अनन्तर जल से प्रणव के द्वारा कमल का प्रभ्युक्षण करे ॥३॥ तेषु सर्वेषु विधिना प्रणवं विन्यसेत्कमात् । एवं समाप्य चाम्यक्ष्य पदसाहस्रमुत्तमम् । ३६ कलशानां सहस्राणि हैमानिन शुभानि च । उक्तलक्षणयुक्तानि कारयेद्राजतानि वा ॥४० ताम्रजानि यथान्याय प्रणवेतार्थ्यवारिणा। द्वादशांगुलविस्तारमुदरे समुदाहृतम् ॥४१ वर्तितं तु तदर्धन नाभिस्तस्य विधीयते । कंठं तु व्ध गुलोत्सेध विस्तरं चतुरगुलम् १४२ मोष्टच ब्यंगुलोत्सेधं निर्गम द्वघं गुलं स्मृतम् । तत्तहे द्विगुण दिव्यं शिवकु' प्रकीर्तितम् ॥४३ सवमात्रातरं सम्यक्त तुना वेष्टयेद्धि ।
-- श्री जयाभिषेक वर्णन ] [ ३७५ अवगुठ्य तथाभ्युस्य कुशोपरि यथाविधि ॥४४ पूर्ववत्प्रणवेनैव पूरयेद्गधवारिणा । स्थापयेच्छिवकुमाढ्य वर्धनों च विधानतः ।।४५ मध्यपग्रस्प मध्ये तु सकूचं साक्षत क्रमात् । आवेष्टय वलयुग्मेन प्रच्छाद्य कमलेन तु ॥४६ हैमेन चित्ररत्नेन महस्रकलशं पृयक। शिवकुभे शिव स्थाप्य गायत्र्या प्रणवैन च ॥४७ उन-उन समस्त कमलों में विधि पूर्वक प्रणव का विन्यारा करना चाहिए । इस प्रकार से उत्तम एक सहस्र पद का मन्युक्षण पूरा समाप्त करे ।।३६॥ इसके उपरान्त एक सहस्र परम शुभ सुवर्ण के कलश अथवा उक्त लक्षण से युक्त चांदी के कलशों का निर्माण करावे ॥४०॥ अथवा ताम्र के न्याय के अनुसार बनवावे मोर प्रणव के द्वारा मध्यं के जल से प्रोक्षण करे। उदर में कला का विस्तार बारह मंगुल होना चाहिए ॥४१॥ उम का पाधा परिमाण वाली वृत्ताकार नाभि की जाती है । दो गुल ऊँचाई वाला और चार अंगुल विस्तार से युक्त कण्ठ होना चाहिए । ॥४२॥ दो म गुस उत्सेप याला पोष्ठ कल्पित करे पोर दो मंगुल याला निगम कहा गया है । यह शिव मुम्भ में दिव्य मोर दिगुण बताया गया है ।।४३॥ पव के प्रमाण के अन्तर पर भली-भांति सन्तु मे वेष्टित करे । भवगुण्ठन करके तथा अभ्युदास करके ययाविधि कुना के कार पूर्व की भांति गन्ध युक्त जल से पूरित करना पाहिए । शिय गुम्भ से समृद्ध वर्षनी मर्यात सङ्ग रूपिणी को विधान से स्थापित करे uxurn मध्य में जिस पप है ऐसे मध्य पप मुम्म के मध्य में पूर्ष और ममतो मे सहित जमे हो घरो दो वस्त्रों में कम से पारित करके हम पित्र रन कमस से सहस कसा को पृयक परिष्यादन करे। गायत्री और प्रसव से शिय बुम्म में शिव को स्थापना करे ||७|| विपहे पुरुपायेय महादेवाय धीमहि । तनो रुद्रः प्रचोदयाद॥४८ मानेन रुद्रस्य साग्निभ्य सवंदा स्मृतम् ।
३७६ ] [लिङ्ग पुराण वर्धयां देविनायच्या देवी संम्य प्य पूजयेत् 1४६ गणाविकार्य विद्महे महातपाय धीमहि । तन्नो गोरी प्रचोदयात् ॥३० प्रथमावरणे चव धामाद्याः परिकीर्तिताः । प्रथमावरण प्रोक्त द्वितीय वरणं शृणु १५१ शक्तयः जेडीवात्र पूर्वाद्यतेषु सुव्रत । ऐंद्र व्यू स्य मध्ये तु सुभद्रां स्थ प्य पूजयेत् ॥५२ भद्रामाम्नेयक तु याम्ये तु कनकांडजाम् । प्रविकां नैऋते व्यूहे मध्यकु भे तु पूजयेत् ।।५३ श्रीदेवी बाहरणे भागे वागोशां वायुगोचरे । गोमुखी सौम्यभागे तु मध्यकु भै तु पूजयेत् ।।१४ "पुरुपाय विघ्न हे महादेवाम धीमहि, तन्नो करः प्रचोदयात्" यह रुद्र गायत्री मन्त्र है अर्थात् हम पुरुष का ज्ञान प्राप्त करते हैं और महा- देव का ध्यान करते हैं। वह रुद्रदेव हम को प्रेरणा प्रदान करें। इस मन्त्र से रुद्र का सान्निध्य सर्वदा बताया गया है। यधनी मे देवि गायत्री से देवी को संस्थापित कर उस का पूजन करना चाहिए ॥४iven देवि गायत्री मन्त्र यह होता है-"गणाधिकार्य विघ्न हे महा तपार्य धीमहि । तनो गौरी प्रचोदयात्"। अर्थात गणों की अम्बिका को ज्ञान द्वारा प्राप्त करते हैं और महा सपा का हम ध्यान किया करते हैं। वह देवी गोरी हमको प्रेरणा प्रदान करे ॥५०॥ प्रथम मायरण मे यामाचा परिकीतित की गई हैं। इस तरह प्रथम प्रावरण तो बता दिया गया है अब द्वितीय भावरण के विषय मे श्रवण परो-॥५१॥ है सुव्रत । इस द्वितीय प्रावरण में पूधिन्तो मे शक्तियां तो सोलह हो होती हैं । ऐन्द्र के मध्य में सुभद्रा की स्थापना करके पूजन करना चाहिए ॥५२॥ माग्नेय चक्र में भद्रा को पौर याम्य में पानयाण्डमा को नंत में प्रग्यि. का को बुम्भ के मध्य में प्यूह में पूजन करे ॥५३॥ दापण भाग में श्री देवी कोन्यायुगोचर में वागीचा को-सौम्य भाग मे गो मुसो से मध्य कुम्भ में पूभित दरमा चाहिए |
श्री जयाभिषेक वर्णन ]
[ ३७
रुद्रव्यहस्म मध्ये त्तु भद्रकों समर्च येत् ।
ऐ द्राग्निविदिशामध्ये पूजयेदरिणमा शुभाम् ॥५५
य म्यपावकयोमध्ये लघिमां कमले न्यसेत् ।
राक्षसातकयोमध्ये महिमां मध्यतो यजेत् ॥५६
बालासुरयोर्मध्ये प्रामि व मध्यतो यजेत् ।
वरुणानिलयोर्मध्ये प्राकाम्य कमले न्यसेत् ॥५७
वित्तशानिलयोर्मध्ये ईशित्व स्थाप्य पूजयेत् ।
बित्ते शेशानयोमध्ये वशित्वं स्थाप्य पूजयेत् ॥५८
ऐंद्रे शेशानयोर्मध्ये यजेत्कामावसायकम् ।
द्वितीयावरणं प्रोक्त तृतीयावरणं शृणु ।'५६
शक्तयस्तु चतुर्विशत्प्रधानकलशेषु च ।
पूजयेन्यूहमध्ये तु पूर्ववद्विधिपूर्वकम् ।।६०
दीक्षां दीक्षायिका चैव चडां चंडांशुनायिकाम् ।
सुमतिं सुमत्यायी च गोपा गोपायिका तथा । ६१
अथ नंद च नदायी पितामहमतः परम् ।
पितामहायीं पूर्वाद्य विधिना स्थाप्य पूजयेत् ।।६२
रद्र व्यूह के मध्य मे भद्र करर्णा का अर्चन करे । ऐन्द्राग्नि विदिशामों
के मध्य मे शुभा परिणमा का यजन परे ॥५५॥ याम्य भोर पायक
विदिशामो वे मध्य में कमल मे लघिमा का ज्यास करे। राक्षस भोर
पन्तक विदिदारमो के मध्य में मध्य मे महिमा का पूजन करना चाहिए ।
वरुणा सुगे के मध्य मे प्राप्ति का पूजन करे और यरणानिलों के मध्य
मे कमल में प्राकाम्य सिद्धि का न्यास करे ॥५६॥५७॥ वित्तश और
अनिल के मध्य मे ईशित्व को स्थापित कर उसका पूजन करे । वित्तश
पौर ईशान के मध्य मे वदात्व सिद्धि को स्थापना करके उसका समर्चन
करना चाहिए ।।५८॥ ऐन्द्र मौर ईशान दिशामों के मध्य भाग में कामा.
पसायक का मर्चन करे । यह द्वितीय प्रापरण भी बतला दिया गया है ।
इसपे पनन्तर भब तीसरे भावरण को गुनो ॥५६॥ इसमे चोवीस शक्ति
या है और प्रधान कलशों मे व्यूह के मध्य में पूर्व की भांति विधि विधान
३७८ । लिङ्ग पुराण के साथ पूजन करना चाहिए ॥६०॥ दीक्षा दीक्षायिका चण्डा चण्डाशु नायिका-सुमति-सुमत्यायी-गोपा-गोपायिका नन्द-नन्दायो पितामह-पिताम- हायी इनको पूर्वाद्य विधि से स्थापित करसे मर्चन करे ॥६॥६२॥ एवं संपूज्य विधिना तृतीयावरणं शुभम् । सौभद्र व्यूहमास ध प्रयमावरणे क्रमात् । ६३ प्रागाद्य विधिना स्थाप्य शक्त्यष्टकमनुकमात् । द्वितीयावरणे चैव प्रागाचं शृणु शक्तयः ॥६४ पोडशव तु अभ्यच्यं पद्ममुद्रां तु दर्शयेत् । बिंदुका बिंदुगर्भा च नादिनी नादगर्भजा ॥६५ शक्तिका शक्तिगर्भा च परा चैव परापरा । प्रथमावरोऽष्टौ च शक्तयः परिकी निना: ॥६६ घडा चंडमुखी चैव चंडवेगा मनोजवा । चंडाक्षो चडन@षा भृकुटी चडनायिका ॥६७ मनोत्सेधा मनोध्यक्षा मानसी माननायिका। मनोहरी मनोल दी मन.प्रीतिमहेश्वरी।'६८ द्वितीयावरणे चैव पोटशैव प्रकीर्तिता.. सौभद्रः कथितो व्यहो भद्रव्यूह शृणुष्व मे ।।६६ ऐद्री होताशनी याम्या नैऋतो वारुणी तथा । वायव्या चंव कोवेरी ऐशानी चाटशक्तय.७० इस तरह से विधि के साथ शुम तृतीयावररा का पूजन करके प्रथ- मावरण मे बम से सौभद्र व्यूह को प्राप्त करके विधि पूर्वक प्रागाय को स्थापित करके शक्तियों के प्रष्टाक को अनुक्रम से पूजन करे । प्रब द्विती- यावरण में प्रागाध शक्तियो का श्रवण करो ॥६३॥६४॥ सोलह प्रागाच का अभ्यर्थन करके पम मुद्रा को दिखलाना चाहिए। बिन्दुवा-विन्दुगर्भा- नादिनी-नाद गर्मजा-शक्ति का-शक्ति गर्भा वरा प्रौर परापरा पे प्रथम प्रावरण मे पाठ ही पाक्तियां कीतित की गई है ॥६॥६॥ पण्डा- चण्ड मुखो बण्ड वेगा-मनोजया-बण्डाक्षी-पएर निर्थोपा भृकुटी-चण्ड नायि- मा-मनोसेघा-मनोध्यछा-मानमो•मान नापिका-मनोहरी-मनोवादी यज.
श्री जयाभिषेक चरम् । [ ३t प्रीति और महेश्वरी-ये द्वितीय प्रावरण में सोलह परि कत्तित की गई हैं। सौभद्र व्यूह कहा गया है। मब भद्र व्यूह को मुझ से सुनो। ६७।। ॥ ६८॥६६॥ ऐन्द्री-होतासनी-पाम्यानंती-वारुणी-वायव्या-कोवेरी- और ऐशानी ये पाठ शक्तियां होती हैं ॥७०॥ प्रथमावरण प्रोक्त द्वितीयावरण शृणु। हरिणो च सुव च काचनी हाटकी तथा ।।७१ रुक्मिणी सत्यभामा च सुभमा जंबुनायिका । वाग्भवा वापथा वारपी भीमा चित्ररथा सुधो. 11७२ येदमाता हिरण्याक्षी द्वितीयावरणे स्मृता। भद्राख्य. कथितो व्यूहः कनकाख्य शृणुष्व मे ॥७३ व शक्ति च दंदं च खड्न पाश ध्वज तथा । गदा त्रिशूलं क्रमशः प्रथमावरणे स्मृताः ॥७४ युद्धा प्रबुद्धा चडा च मुंडा चैव कपालिनी। मृत्युहनी विरूपाक्षो कपर्दा यमलासना ।। ५ दष्ट्रिणी रगिणो चव लगाक्षी कंकभूपणो । सभावा भाविनी चव पोडशव प्रकीर्तिताः ॥७६ कथित कनकव्यू हो ह्यम्बिकास्य शृणुष्व में। मेचरी चात्मना सा च भवानी वह्निरूपिणी ॥७७ वहिनी वह्निनामा च महिमामृत लालसा। प्रथमावगणचाटोशक्तय. सर्वसमता: 11ss प्रथम प्रावरण कह दिया गया है मग दिसीय भावरण का प्रवाए सो। हरिणी-सुवर्णा-वाचनी-हाटगी-रुक्मिणी-सत्यभामा सुमगा-जम्बु. नापिका-याग्भवा-याक्यथा वाणी-भीमा-चित्ररपा-गुपी वेदमाता-हिरएया- सो-ये द्वितीय पावरण में बताई गई है । भन नाम वाला प्यूह कहा गया है। पर बना नामर को मुमरो गुन मो॥७९॥७२॥७॥ पयति -राज-पारा म्वन-गदा-त्रिशूल-ये प्रम में प्रथम प्रायरण में रहे ये ४॥ युसरा प्रभुमा भाडा मुण्डा पानिनी-मृत्यु हन्नी-विरूपातील स्पर्दा-कमगस्ना-हिसारभिणी माशी-पी-एमावा मारिनी ३८ । लिङ्ग पुराण ये सोलह कोक्तित गई हैं ।।७५११७६॥ कनका व्यूह वणित किया गया है । मय प्रागे अम्बिकास्य व्यूह को पाप लोग मुझसे श्रवण कर लो। खेवरी-मात्मना-भवानी-वहि रूपिणी-वहिनी-वह्निनामा मद्विमा-अमृत लालसा-ये प्रथम पावरसा में माठ शक्तियां सब के सम्मत होती हैं। ७७॥७॥ क्षमा च शिखरा देवी ऋतुरला शिला तथा । छाया भूतपनो धन्या इंद्र माता च वैष्णयो॥७६ तृष्णा रागवतो मोहा कामकोपा महोत्कटा । इन्द्रा च बघिरा देवो पोडशैताः प्रकीर्तिताः150 कथितश्वांबिका व्यू श्रीव्यूहं शृणु सक्त । स्पर्शा स्पर्शवती गंधा प्राणापाना सम निका १८१ उदाना व्याननामा व प्रथमावर स्मृताः । तमोहता प्रभामोधा तेजिनी पहिनी तथा ८२ भीमास्या जालिनी चोपा शोपियो रुद्रनायिका। वीरभद्रा गणाध्यक्षा चंद्रहासा च गह्वरा ९३ गरणमातांबिका चैव शक्तयः सर्वसंमताः । द्वितीयावरण प्रोक्ताः पोडशव यथाक्रमात् ।।८४ श्रीव्यूहः कथितो भद्र वागीशं शृणु सुव्रत । धारावारिधरा चैव वह्निको नाशकी तथा ८५ मातीता महामाया वत्रिणी कामधेनुका । प्रथमावरणेऽप्येवं शक्तयोऽष्टौ प्रकीर्तिताः ॥६ पयोष्णो वारुगो शांता जयंती च वरप्रदा। प्लापिनी जलमाता च पयोमाता महांबिका 11८७ रक्ता करालो चंडाक्षी महोच्छुष्मा पयस्विनी। माया विद्येन्चरी कालो कालिका च ययाकमम् ॥ पोडशेव समाख्याताः शक्तयः सर्वसंमताः। व्यहो वागीश्वरः प्रोक्तो गोमुखो व्यूह उच्यते ॥e शैकिनी हालिनी चैव लंकावरणाच कल्किनी।
जयाभिषेक वर्णन ] [ ३१ यक्षिरसो मालिनी चैव वमनी च रसात्मनी ।।६० प्रथमावरणे चैव सक्तयोऽष्टौ प्रकीर्तिताः। चडा घंटा महानादा सुमुखी दुर्मुखी बला ।।६१ रेवती प्रथमा घोरा सैन्या लीना महाबला । जया च विजया चैव अपरा चापराजिता ॥६२ द्वितीयावररणे व शक्तय. पोडशैव तु . कथितो गोमुखीव्यूटो भरकर्णी शृणुष्व मे ६३ क्षमा-शिखरा-देवी ऋतुरत्ना-शिला छाया सूतपिनी-धन्या-इन्द्रमाता. पैष्णवी-तृष्णा-रागमती-मोहा-काम कोपा-महोत्कटा-इन्द्रा वथिरा-और दे- वी-ये षोडश बताई गई है ॥७६८७॥ यह अम्बिका प्यूह निरूपित पर दिया गया है। आगे प्रय हे सुबत ! श्री व्यूह को सुनो । स्पर्शा- स्पर्शवती-गन्धा-प्रारणापाना-समानिष्का-उद.पा-व्यान नामा ये प्रथम भाव- रण में परिणत की गई है। तमोहता-प्रभामोधा तेजिनी दहिनी भीमास्था- जालिनी-चापा-शोपिणी-कद्र नायिका-वीरभदा-गणाध्यक्षा पन्द्रहासा-गह- रा-गण माता और अम्बिका ये शक्तियां सर्व सम्मत है । वितीय प्रावरण में यथा क्रम सोलह ही बताई गई हैं सा८२८1८४ा हे सुबत्त ! यह श्री व्युह बता दिया है । भद भद्र बामोश व्यूह का श्रवण करो। धारा-बारिधरा-वहिको नाशकी-मानीता महा माया वचिणी कामधेनु- -ये प्रथम प्रावरण मे पाठ शक्तियां पीर्तित की गई हैं ।।१५।।६।। पयोष्णी-धारणी-शान्ता-जयन्ती-वरप्रदा-प्लाविनी-जलमाता पयोमाता महाम्बिका । रक्ता-कराली-चरडाक्षी-महोच्छुप्मा-पयस्विनी-माया- विद्य श्ररी-काली और यथाक्रम कालिरा ये वोहम ही शक्तियां सप द्वारा सम्मत समाख्यात हो गई है। यह पायोश्वर प्यूह निरूपित कर दिया गया है । अब गोमुरा प्यूह कहा जाता है NEETE पालिनी हालिनी-सहाय-व मिनी-यक्षिणी-मालिनी-धमनी-रसात्मवी-दे. यम प्रादरण में पाठ हो पतिया कही गई है । चन्द्रा पएटा-महानादा. गुमुखी-दुर्मुसी-बला-रेवती-प्रथगा-धोरा-संन्या-नीना-महाबला-जया- विजया-अपरा-अपराजिता- ये द्वितीय भावरण मे सोनह ही पतिया ३०२ [लिङ्ग पुराण होती हैं । यह गोमुखी व्यूह तो यह दिया गया है। प्रागे भद्रकणी व्यूह को मुझ से तुम श्रवण कर लो | IIEIRE३॥ महाजया विरूपाक्षी शुक्लाभाकाशमातृका । संहारी जातहारी च दंष्ट्राली शुष्करेवती ।।१४ प्रथमावरणे चाष्टो शक्तयः परिकोनिता। पिपीलिका पूष्पहारी अशनी सर्वहारिणी ॥६५ भद्रहा विश्वहागे च हिमा योगेश्वरी तथा । छिद्रा भानुमती छिद्रा सहिको सुरभी समा ६६ सर्वभव्या च धेगास्या शक्तयः पाडशैव तु । महाव्यूहाष्टकं प्रोक्तमुपव्यूहाष्टवं शृणु ॥६॥ प्रणिमाव्य रमावेध्य प्रथमावरणे क्रमात् । ऐंद्रा तु चित्रभानुश्च वारुणी दडिरेव च ॥६८ प्राणरूपी तथा हसः स्वात्मशक्ति. पितामहः । प्रथमावरणं प्रोक्त द्वितीया वरण गृणु HEE केशवो भगवान् रुद्रश्चंद्रमा भास्करस्तथा। महात्मा च तथा ह्यात्मा ह्य'तरात्मा महेश्वर ॥१०० परमात्मा ह्यणुर्जी: पिंगल: पुरुष पशु । भोक्ता भूतपतिर्भीमो द्वितीयावरणे स्मृता ॥१०१ महाजया, विरूपायो, शुक्लाभा, प्राकाश मातृका, सहारी, जातहारी दष्ट्राली, शुष्क रेवती-ये प्रथम मावरण में पाठ शक्तियाँ परिकीर्तित की गई हैं। पिपीलिका, पुण्य हारी, प्रशनी, सवारिणी, भद्रका, विहार, हिमा, योगश्वरी, छिद्रा, भानुमती, छिटा मैहिकी, सुग्भी, समा, सर्वभव्या और देगाख्या-ये सोलह हो शकिर्ग हती हैं। महा व्यूहाष्टक कह दिया गया है । मागे प्रय उप व्यूहाटक नाश्रममा करो IIIEI Mn प्रथम प्रावरण मे कम से मणिमा व्यह को प्रावेष्टित पररी ऐन्द्रा, चित्रभानु, वाणी, दरिड, प्राण रूपो, हम, बारम शक्ति, पितामह, यह प्रथमा धरण कहा गया है । मागे शिशीय प्रापरए को सुनो। केराव, भगवान्, रुद्र, चन्द्रमा, भास्वर महात्मा, प्रात्मा, अन्तरात्मा, महे- श्री जयाभिषेक वर्णन ] [.२८३ . । श्वर, परमात्मा, भराड, जीव, पिङ्गल, पुरुष, पशु, भोक्ता, भूतपति और भीम ये द्वित्तीय प्रापरण मे कहे गये हैं ।।१०।१०१॥ कवितश्चारिणभाव्यहो लघिमाख्यं वदामि ते । श्रीकठोतश्च सूक्ष्मश्च त्रिमूर्तिः शशकस्तथा ॥१०२ अमरेशः स्थितीशश्च दारतश्च तपाष्टमः। प्रथमावरणं प्रोक्त द्वितीयावरणं शृणु ॥१०३, स्थाणुहर्रश्च दंडेशो भोक्तीशः सुरपुगवः । सद्योजातोऽनुग्रहेशः क रसेनः सुरेश्वरः ॥१०४ क्रोधीशश्च तथा चड. प्रचंड: सिव एव च । एकरुद्रस्तथा कूमश्वं कनेत्रश्चतुर्मुखः ॥१०५ द्वितीयावरणे रुद्राः पोडशव प्रकीर्तिताः । कथितो लघिमाटो महिमां शृणु सुव्रत ।।१०६ अजेशः क्षेमरुद्रश्च सोमोऽशो लागलो तथा । दडाश्चाधनारी च एकांतश्वांत एव च । पाली भुजंगनामा च पिनाको खगिरेव च । काम ईशस्तथा श्वेतो भृगु. पोडश व स्मृता ।।.०८ कथितो महिमाव्यूः प्रमिव्यू ई शृणुष्व मे। संवतो लकुलीशश्च वाडयो हास्तरेव च ॥१०८ घडयक्षो गणपतिर्महात्मा भृगुजोऽष्टमः । प्रथमावरण प्राक्त द्वितीयावरण मगु ॥११० परिणमा व्यूह तो निरूपित कर दिया गया है प्रागे मव में समिमा नामक व्यूह को रतलाता है। श्री ठ, मन्तः, सूक्ष्म, वित्ति, दाशक, अमरेश, स्थितीग, मोर दारत मटम होता है। यह प्रयम पावरए पता दिया गया है। मागे हितोय मावरण का प्रवरण रो॥१०२१om स्था, हर, दएडेश, भौक्तीश, मुरपुङ्गव, सपोआत, पनुप्रदेश, करसेन, सुरेधर, रेपीश, पण्ड, प्रचण्ड, शिव एक रु. पूर्म, एक नेत्र और चतु- मुस ये रितीय प्रावरण में पोडश ही रुटोतिर दिये गये हैं। यह लभिमा नामक म्यूह तो पता दिया गया है। इसमें पागे हे
३४)
[लिङ्ग पुराण
तुम महिमा नामक व्यूह का श्रवण करों। मजेश, क्षेम रुद्र, सोम, प्रश,
लाङ्गली, दण्डार, अर्ध नारी, एकान्त, पन्त, पाली, भुजङ्ग नामा, पिना-
की, खङ्गि, काम, ईश, श्वेत, भृगु ये सोलह कहे गये हैं। यह महिमा
घ्यूह कह दिया गया है। इम के आगे मुझसे प्राप लोग प्राप्ति व्यूह का
पवरण करो । सवतः-लकुलीरा-वाडव-हस्ति-चण्डयक्ष-गणपति-महात्मा
और पाठवा भृगुज होता है। यह प्रथम प्रावरण कह दिया है । इसके
भागे द्वितीय मावरण सुनो १० से ११० तक।
त्रिविक्रमो महाजिह्वां सक्षः श्रीभद्र एव च ।
महादेवो दधीचश्च कुमारश्च परावरः ॥१११
महादंष्ट्रः करालश्च सूचकश्च सुवर्धनः ।
महाध्यांना महानंदो दंडी गोपालकस्तथा ॥११२
प्राप्तिव्यूहः समाख्यातः प्रकाम्यं शृणु सुव्रत ।
पुष्पदंतो महान,गो विपुलानंदकारकः । ११३
शुक्लो विशालः कमलो बिल्वश्चारुण एव च ।
प्रथमावरणं प्रोक्त द्वितीयावरणं शृणु ॥११४
रतिप्रियः सुरेशानश्चित्रागश्च सुदुर्जयः ।
विनायकः क्षेत्रपालो महामोहश्च जगलः ॥११५
वत्सपुत्रो महापुत्रो ग्रामदेशाधिपस्तथा।
सर्वावस्थाधिपो देवो मेघनादः प्रचंडकः॥१६
कालदूतश्च कथितो द्वितीयावरणं स्मृतम् ।
प्राकाम्यः कथितो व्यह ऐश्वर्य कथयामि ते ॥११७
त्रिविक्रम, महाजिह्व. ऋक्ष, श्रीभद्र, महादेव, धीच, कुमार, परावर
महादंष्ट्र, कराल, सूचक, सुवर्धन, महावास, महानन्द, दण्डी, गोपालक,
यह प्राप्ति व्यूह कह दिया है । इसके अनन्तर हे सुवत ! प्राकाम्य व्यूह
को सुनो। पुष्पदन्त, महा नाग, विपुलानन्द कारक, शुक्ल, विशाल,
काल दिल्ड प्राणा-यह प्रथम प्रावरणा महागा है. इसके समी
इसका द्वितीय भावरण सुनो ॥१११॥११२॥११३॥११॥ रति प्रिय,
सुरेशान, चित्राङ्ग. सुदुर्जय, विनायक, क्षेत्रपाल, महामोह, जंगल, परस.
श्री जयाभिषेक वर्णन ] पुन, महापुन, ग्रामदेशाधिय, सर्वावस्थाधिय, देव, मेघनाद, प्रचण्डक और काल दूत, यह द्वितीय प्रावरण बताया गया है। प्राकाम्य व्यूह भी कह दिया गया है । इसके मनन्तर ऐश्वर्य को तुम्हारे प्रागे मैं बतलाता है। ॥११॥११६॥११॥ मंगला चचिका चैव योगेशा हरदायिका । भासुरा सुरमाता च सुदरी मातृकाष्टमी ॥११८ प्रथमावररणे प्रोक्ता द्वितीयावरणे शृणु। गणाधिपश्च मंत्रज्ञो वरदेवः पडाननः ।।११६ विदग्धश्च विनियमच अमोघो मोघ एव च । अश्वी रुद्रश्च सोमेशश्चोतमोबस्तथा ॥१० नारसिंहश्च विजयस्तथा इन्द्रगुहः प्रभुः। अपांपतिश्च विधिना द्वितीयावरणं स्मृतम् ।। २१ ऐश्वर्यः कथितो व्यहो वशित्वं पुनरुच्यते । गगनो भवनश्चय विजयो ह्यजयस्तथा ।।..२ महाजयस्तथा गागे व्यंगारश्न महायशाः। प्रथमावर प्रोक्ता द्वितीयावरणे शणु ॥ २३ सुदरश्च प्रचडेशो महावर्णो महासुरः । महारोमा महाग प्रथमः कनकस्तथा ॥ २४ खरजो गरुडश्चैव मेघनादोऽथ गर्जक । गजश्च च्छेदको वाहविशिस्त्रो मारिरेव च ।।१२५ वशित्वं कथितो व्यह शृणु कामावसायिकम् । विनादो विकटश्व धसनोऽभय एव च ॥ २६ विद्युन्महाबलम्चै । रमलो दमनस्तथा । प्रपमावरणं प्रोक्नं द्वितीयावरणं शरणु ।। १२७ मसला, पविता, योगेगा, हरदामिश, भासुरा, सुरमाता, मुदी और पानी पारा पाठ शक्तिया है ॥१८॥ प्रथम मावरण यह दिया है। प्रय होय मावरण में सुनो। गणाधिप, मात्रा, वरदेव, परानन, विप, विपिन, ममोप, मोप, मश्वी, रस, सोमेश, उतम,
३६६
[लिङ्ग पुराण
उदुम्बर, नारसिंह, विजय, इन्द्रगृह, प्रभु और प्रपांपति- ये विधि से
गरा पावरण पहा गया है ॥१६॥२०॥२१॥ यह ऐश्वयं प्यूह कहा गया
है। अब मागे वशित्व कहा जाता है। गगन, भयन, विजय अजय,
महाजय, प्रहार, व्यहार, महापा, महाजय-ये प्रपम पावरण मे
कहे गये हैं। द्वितीय पापरा में श्रवण करो ॥२२सारा सुन्दर, प्रच.
ण्डेश, महापरणं, महासुर, महारोमा, महागर्भ, प्रथम, कनक, सरज, गाड,
मेघनाद, गर्जक, गज, केदक, याहु, निशिस भोर मारि-पशित्व व्यूह
निरूपित कर दिया है। माग कामावसायिक को सुनो। विनाद, विकट,
वसन्त, अभय, विद्य ए, महावल, कमल, दमन-यह प्रथम प्रावरण
कहा गया है । इसके उपरान्त दूसरा पायरण सुनो ।।१२४ से १२७॥
धर्मश्चातिबलः सर्पो महाकायो महाहनुः ।
सबलश्चैव भस्मागो दुर्जयो दुरक्रिमः ११९८
वेतालो रौरवश्चंव दुधरो भोग एव च ।
वनः कालाग्निरुद्रश्च सद्योन दो महागुहः ।।१२६
द्वितीयावरणं प्रोक्त व्यू:श्चवावसायिकः ।
फथितः पोडशो व्यूडो द्वितीयावरण शृणु ।।१३०
द्वितीयावरणे चैव दक्षयू च शक्तयः ।
प्रथमावरणे चाष्टो बाह्य पोडश एव च ॥३१
मनोहरा महानादा चित्रा चित्ररथा तथा ।
रोहिणी चंब चित्रांगी चित्ररेखा विचित्रिका ॥३२
प्रथमावरणे प्रोक्ता द्वितीयावरणं शृणु।
चित्रा विचित्ररूपा च शुभदा कामदा शुभा ॥३३
करा च पिंगला देवो खङ्गिका लबिकासती ।
दंष्ट्राली राक्षसो ध्वंसो लालुपा लोहितामुखी ॥३४
द्वितीयावरणे प्रोक्ताः पोडशेव समासतः ।
दक्षव्यूहः समाख्यातो दाक्षव्यहं शृणुष्व मे ॥३५
सर्वासती विश्वरूप. लंग्टा चाामपप्रिया ।
दीघदष्ट्रा च वज्रा च लबोष्ठो प्राणहारिणी ॥३६
श्री जयाभिषेक वर्णन ] [ ३८७ प्रथमावरण प्रोक्तं द्वितीयावरण शृणु गजकरश्वकर्णा च महाकाली सुभीषणा !:७ वातवेगरवा घोरा धनाधनरवा तथा । वरघोषा महावर सुघंटा घोटका तथा । घंटेश्वरी महाघोरा घोरा चैवातिघौरिका। द्वितीयावरणे चव पोडशव प्रकीर्तिता धर्म-पतिपल-सर्प-महाकाय-महाहनु-मवल-मम्माङ्गी दुर्जय-दुरति क्रम वेताल रौरव दुघर-भोग-वच-कालाग्नि रद सोनाद-महा गुह-द्वितीय प्रा- वरण बता दिया है और चावसायिक व्यह कह दिया है । घोटस म्यूह कहा गया है। द्वितीय भावरण सुनो 21 द्वितीय प्रापरण में और दक्ष व्यूह में शक्तियां हैं-प्रथम भावरण में माठ और बाह्य मे सोलह हैं ॥३१॥ उन पाठ शक्तियो के ये नाप होते है--मनोहरा-महा गावा-पिना-चित्र रपा-रोहिणी चित्राङ्गी-विन रेमा विधिविरा ये प्रथम मावरण में निरूपित की गई है। दूसरे मावरण मुनो-चित्रा-विचित्र रूपा शुभदा-बामदा-शुभा-ग-पगला-देवीनगडिया लम्बिा मती ६- धाती-राक्षसी-वसी-सोनुपा-साहिता मुग्गी- ये दूसरे पायरण सोलह मोप में इतलाई गई है। दाव्या समास्यात है। मामे दाक्ष म्यूह मुझ मे श्रवणरो॥३॥३५॥ मर्या सती-विश्वसम्परा. पापिपरिया-दीपदष्टा-क्या-सम्बोटो प्राण हारिणी - यह प्रथमावर पहा है । दितीय मावराण गु- गरम-गर्मा-महारासो मुभीष- गावात येणग्या पोरा पनापन रवा-पर पापा-महादर्णा गुपष्टा-पष्टिा. पटेवरी-महापोरा पोरा-प्रतिधोरिया- हिमोय पान सोलह हो रही गई।१६ मे १६॥ दाक्षम्यूहः समानामहरपुर मे। घतिपटा पातिधोरा पगला परमा तयार विभूति गरायोति मषितो शाहमोग्मृता । प्रमाणे प्रोसा लियापर : पोि गांजरी योगमाया गुरा।
३८८ ] [.लिङ्ग पुराण रक्ता मालांशुका चीरा संहारी मांसहारिणी ॥४२ फलहारी जीवहारी स्वेच्छाहारीच तु डिका। रेवती रगिरणी संगा द्वितीये पोडशंय तु ॥४३ चंडव्यूहः समाख्यातच डाव्यूहस्तथो च्यते । चंडी चंडमुखी चंडा चडवेगा महारवा ।।४४ भ्र कुटी चंडभूश्च व चडरूपाष्टमी स्मृता । प्रथमावरगा प्रोक्त द्वितीयावरण सृणु ।।४५ चंद्रमाणाबला चैव बलजिह्वा बलेश्वरी। बलवेगा महाकाया महाकोपा च विद्युता ॥४६ कंकाली कलशो चैव विद्युता चत्वापिका । महाघोषा महारावा चडभाऽनगचडिका 1.७ घडायर्या कथित व्यहो हवृह शृणुष्य मे। चडाक्षो कामटा देवी सूकरी कुक्कुटानना। ४८ गाधारी दभी दुर्गा सौमित्रा चाष्टमी स्मृता । प्रथमावरण प्रोक्त द्वितीयावरण शृणु ।।१४६ दाक्ष व्यूह तो निरूपित कर दिया है अब मुझसे पाप लोग चण्ड व्यूह श्रवण करो ॥४॥ प्रतिघण्टा अतिधोरा-वराला-करभा-विभूति- भोगदा-कान्ति और पाठवी शालिनी कही गई है। ये प्रथमावरण मे कही गई है। आगे दूसरे प्रावरण मे सुनो ॥४१॥ पत्रिणी गान्धारी- योगमाता-सुपीवरा रता-माला शुका-वीरा-सहारी-मास हारिणी फलहारी जीवहारी-स्वेच्छाहारी सुण्डिका-रेवनी-रपिणी-सगा- ये दूसरे प्रावरण में सोलह हैं ॥४२॥४३॥ वह व्यूह तो कह दिया है । मन रडा न्यूह कहा जाता है । चडी, चण्डमुखी, चण्डा, घण्ट वेगा, महारवा, भ्र कुटी, चण्डभू, चण्डरूपा पाठवी है । इसका प्रथम प्रावरण कह दिया है । दुसरा प्रावरण सुनो-11४४॥५॥ चन्द्रघ्राणा, बला, बल जिह्वा, तेश्ररी, बल येगा, महा काया, महा कोपा, विद्यता, कालो, क्लशी, वेद्य ता, चण्ड घोपिया, महा पोपा, महारावा, घण्डभा, अनङ्ग चण्डिया इस प्रकार से यह चण्डा प्यूह का निरूपण कर दिया है। इसके मागे ।
श्री जयाभिषेक वर्णन ]
[३८६
अब हरव्यूह को सुनो । चण्डाक्षी, यामदा, देवी, सूकरी, कुक्कुटासना,
गान्धारी, दुन्दुभी, दुर्गा और माठवी सौमित्रा यही जाती है । इस व्यूह
का यह प्रथम प्रावरण कह दिया है । अब दूसरे प्रावरण की नामावलि
का श्रवण करो ॥१४६॥४७॥१४८।१४६॥
मृतोद्भवा महालक्ष्मावर्णदा जीवरक्षिणी।
हरिणी क्षीणजीवा च दडवया चतुर्भुजा ॥१५०
व्योमचारो व्योमरूपा व्योमव्यापो शुभोदया ।
गृहचारो सुचारी च विपाहारी विषातिहा ।।५१
हरव्यूहः समाख्यातो हराया व्यूह उच्यते ।
जभाच्युता च कंकारी देविका दुर्धरावहा ॥५२
च डिका चपला चेति प्रथमावरणे स्मृताः।
चडिका चामरी चव भडिका च शुभानना ।।५३
पिडिका मुडिनो मुडा शाकिनी शाङ्करी तथा।
कर्तरी भर्तरी चव भागिनी यशदायिनी ॥५४
यमदष्ट्रा महादंष्ट्रा कराला चेति शक्तयः ।
हरायाः कथितो व्यूह शौंडव्यहं शृणुष्व मे । ५५
विकराली कराली च कालजंघा यशस्विनी।
वेगा वेगवती यज्ञा वेदांगा चाष्टमी स्मृता ।।५६
प्रथमावरणं प्रोक्त द्वितीयावरणं शृणु ।
वज्रा शंखातिशखा वा बला चैवाबला तथा ५७
अजनी मोहिनी माया विकटागी नली तथा।
गंडको दडकी घोरणा शोरणा सत्यवतो तथा ॥५८
कल्लोला चेति क्रमश. पोडशव यथाविधि।
शोडव्यूह समाख्यातः शोडाया व्यूह उच्यते ।।१५६
मृतोद्भवा, महालक्ष्मी, वर्णदा, जीपाक्षिणी, हरिणी, क्षीण जीवा,
दएडवक्त्रा, चतुर्भुजा, व्योमचारी, व्योमरूपा, व्योम व्यापी, शुभोदया,
गृहपारी, सुचारी, दिपाहारी, विपत्तिहा-यह हर व्यूह वणित किया गया
है । मब हराका, व्यूह कहा जाता है । जम्भाच्युता, कंकारी, देविका,
३६. ] [लिङ्ग पुगण । दुर्धरावहा, पण्डिा, चपला ये प्रथम प्रावरण में बताई गई हैं। चडिका चामरी, भण्डिका, शुभानना, पिण्डिका, मुण्डिनी मुण्डा, शाकिनी, शाङ्करी, रत्तरी, भतरी, भगिनी, यज्ञ दायिनी, यमदष्ट्रा, महादष्ट्रा और कराला ये द्वितीय प्रावरण की शक्तियां हैं। यह हा का व्यूह भी कह दिया है। अब आप लोग मुझ से शोण्ड व्यूह को सुनो ॥५०॥RIYAR ॥५३॥५४॥५५॥ विकराली, कराली काल जवा, यशस्विनी, वेगा, वेग वती, यज्ञा और इस पावरा मे माठवी वेदाङ्गा शक्ति होती है ।।५६॥ प्रथमावरण इसका वलित कर दिया है । इसका दूसरा पावरण सुनो। वचा, शखा प्रति शखा, बला, अबला, प्रजनी, मोहिनी, माया, विक- टागो गली, गण्डकी, दएडकी, घोगा, तोरणा, सत्यवती और कल्लोला ये यथाविधि पोडा ही हैं। यह शौण्ड व्यूह भी धणित हो गया है । इस के आगे शोण्डा का व्यह सुनो जो कि कहा जा रहा है ।।१५७ से १५६।। दतुग शैद्रभागा च अमृता सकुला शुभा चलजिह्वायनेत्रा च रूपिणी दारिका तथा ॥१६० प्रथमावरण प्रोक्तं द्वितीयावरण शृणु। खादिका रूपनामा च संहारो च क्षमातका ॥६१ कोडिनी पेषिणी चे व महावासा कृतातिका। दंडिनी किंवरो बिवा वणिनी चामलागिनो ॥६२ द्रविणी द्राविनी चव शक्तय पोडशैव तु । कथितो हि मनोरम्य: शौंडाया व्यूह उत्तमः । ६३ प्रथमाख्यं प्रवक्ष्यामि व्यूह परमशोमनम् । लविनी प्लावनी शोभा मदा चव मदोत्कटा ॥६४ मदाऽक्षेपा मादेवी प्रथमावरण स्मृताः । कामसदीपिनी देवी प्रतिरूपा मनोहरा॥६५ महावमा मदनाहा विह्वला मदविह्वला । अरुणा शोषणा दिव्या रेवती भाडनायिका ॥६६ स्तभिनी घोररताक्षी स्मररूपा सुघोषणा । प्यूहः प्रथम प्रारुपातः स्वायंभुव यथा तथा ॥३७ श्री जयाभिषेक वर्णन ] . , [३६१ कथित प्रथमव्यूह प्रवक्ष्यामि शृणुष्व मे । पोरा घोरतराघोग प्रतियोगधनायिका ॥१६८ दन्तुग, रौद्रभागा, अमृता, सकुला, सुभा, घन जिह्वा, प्रार्थनेत्रा; रुपिणी, दारिका ये प्रथमावरण की शक्तियां वह दी गई हैं। प्रव दूसरे प्रावरण की शक्तियो के नाम सुनो सादिशश, रूप नामा, सहारी; समातका; पण्डिनी, पेपिणी, महापासा, वृतातिया, दण्डिनी, विद्वरी विम्या, वणिनी, चामलागिनी, द्रविणी और द्राविणी ये सोलह हो शक्तियां होती हैं । यह परम मनोरम्य एव उत्तम चौडा या प्यूह पहा गया है । भव प्रथमारूप परम भन व्यूह बतलाऊगा । यिनी प्लावि- नो-शोभा-मादा मदोत्कटा-मन्ना माशेपी-महादेवी-ये प्रथम म परण में पक्तियां होती है। काम सन्दीयिनी देवी प्रतिरपा-मनोहरा-महावदा माहा- विह्वमा- T-महविह्वला-प्ररणा झोपणा दिव्या-रेवती भाण्ड ना- यिका स्तम्भिनी पोर रक्ताधी स्मर स्पा-सुघोपरगा यह प्रथम प्यूह रहा गया है जमा रयायम्भुव है उसी तरह है। पथित प्रथम प्यूह को यता. गा। उसे मुभमे श्रवण बरो॥१६० से १६॥ पावनी प्रोष्टया मुंडा चामी परियोतिता। प्रयमावरण प्रेक्त द्विवीयावरण गृणु । २६६ भीमा भोमतरा भीमा यस्ता घय सुयतुंला। ग्रामिनी रोदनी रोद्रा रदयस्परा पना 10 मावला महापानि ता गिनिया। वृक्षा महानारा पोहर्मय प्रतिता ॥७॥ प्रपमाया. मम रातो मामय उसयो। सासरी प मासा पस्यो र पिमा गिया २ तिमि प्रतिाप प्रगापण रमना । याति पुटिनगरमा यmingle 1.३ माम मा गोमा रोजिनो भागमा धर्मा पासोमा पनि RE.तोमो मम्मपापा राणा में।
३६२ ] [लिङ्ग पुराण धर्मरक्षा विधाना च धर्मा धर्मवती तथा ॥७५ सुमतिदुर्मतिर्मेधा विमला चाष्टमी स्मृता। प्रथमावरणं प्रोक्त द्वितीयावरणं शृणु ॥१७६ घोरा घोरतरा-अघोरा-प्रतिघोरा-पद्यनायिका-धावनी-क्रोष्टुका-मुण्डा पाठ ये शक्तियां हैं जो कि कीर्तित की गई हैं । यह इस व्यूह का प्रथम प्रावरण कहा गया है । अब इसका दूसरा प्रावरण सुनो ॥६६॥ भीमा- भीम तरा भीमा-शस्ता-सुवर्तना-स्तम्भिनो-रोदनी-रोद्रा रुद्रवती-प्रचला. चला-महाबला महा शान्ति-शाला शान्ता-शिवाशिवा बृहत्कक्षा-महानासा- ये सोलह शक्तियों कोतित की गई हैं ।।७०।७१॥ यह प्रथमा का व्यूह तो बता दिया गया है अब मन्मथ व्यूह कहा जा रहा है । तालकी- वसा-कल्याणी-कपिला-शिवा इष्टि-तुष्टि-प्रतिज्ञा ये प्रथम प्रावरण मे कही गई हैं । ख्याति पुष्टिकरी तुष्टि-जला श्रृति-धुति-कामदा-शुभदा सौम्या- तेजिनी-काम तत्रिका-धर्मा धर्म वशा-शीला-पापहा-धर्म वपिनी यह इस प्रकार से मन्मय व्यूह की शक्तियां बताई गई है। अब मन्मथा के व्यूह को मुझसे सुनो। धर्मरक्षा-विधावा-धर्मा धर्मवती-सुमति-दुर्मति मेघा और मष्टम शक्ति इस व्यूह मे विमला होती है । इस व्यूह का यह प्रथम भाव- रण कहा गया है । भागे दूसरा प्रावरण सुनो ।।१७२ से १७६।। शुद्धिवं द्धिद्युति कातिवतुला मोहवधिनी। बला चातिबला भीमा प्राणवृद्धिकरी तथा ॥७७ निर्लज्जा निघृणा मदा सर्वपापक्षयंकरी। कपिला चातिविधुरा पोडता प्रकीर्तिता. ॥७८ मन्मथायिक उक्तस्ते भीमव्यूह वदामि च । रक्ता चैव विरक्ता च उद्वेगा शोकधिनी काम तृष्णा क्षुधा मोहा चाष्टमी परिकीर्तिता। प्रथमावरण प्राक्तं द्वितीयावरण शृगु १८० जया निद्रा भयालस्या जलतृष्णोदरी दरा। कृष्णा कृष्णागिनी वृद्धा शुद्धोच्छिष्टाशनो वृषा ८१ कामना शोमिनो दग्धा द.खदा सखदावली।
श्री जयाभिषेक वर्सन ] [ ३t भीमव्यूह समाख्यातो भीमाय व्यूह उच्यते ।।८२ मानदा च सुनंदा च महानंदा शुभंकरी । चीतरागा महोत्साहा जितरागा मनोरथा ॥८३ प्रथमावरण प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृसु । मनोन्मनी मनःक्षोभा मदोन्मत्ता मदाकुला ।।२४ मदगर्भा महाभासा कामानंदा सुविह्वला। महावेगा सुवेगा च महाभोगा क्षया वहा ।।५ ऋमिगी फ्रामिणी वका द्वितीयावरणे स्मृताः । कथित तव भीमाय व्यूह परमशोभनम् ॥१८६ शुद्धि बुद्धि-ध नि-कान्ति-वर्तुला-मोह धिनी बला-प्रति बला-भीमा- प्राण वृद्धिकरी-निलंज्जा निघृणा-मन्दा सर्व पाप क्षयरी-कपिला-प्रति विधुरा ये सोलह शक्तियां द्वितीय प्रावरण मे कही गई हैं ॥७॥७॥ यहाँ तक मन्मथायिक व्यूह बताया गया है अब भीम प्यूह मैं घताता हूँ। रक्ता पिरता उद्वेगा शोक वर्षिनी-कामा-तृष्णा क्षुघा-मोहा ये पाठ कही गई हैं । यह प्रथमावरण हा गया है। द्वितीयावरण इस व्यूह का सुनो || जया-निद्रा-भया-पालस्या-जल तृष्णोदगे दरा-कृष्णा कृष्णा- गिनी-बृद्धा सुद्धा उच्छिष्टाशिनी वृषा-कामना-दा भिनी-दम्पा दु खदा सुख- दावली यह इस प्रकार से भीम व्यूह की शक्तियां बतादी गई हैं। मन भौमायी व्यूह कहा जाता है-१।०२।। मानन्दा-सुनन्दा-महानन्दा- शुभकरी वीतरागा-महोत्ताहा जितरागा-मनोरया-यह प्रथम भावरण कह दिया गया है। द्वितीयावरण इस व्यूह का सुनो-मनोन्मनी मन क्षोभा- मदोन्मत्ता मदाबुला-मन्दगर्भा-महाभासा-कामानन्दा-सुविह्वला-महावेगा- सुवेगा महाभोगा क्षदावहा कमिणी-क्रामणी-वक्त्रा-ये द्वितीय भावरण की शक्तियां होती हैं । भीमायो नाम वाला परम शोभन प्यूह कह दिया है। १८३ से १८॥ शाकुनं कथयाम्यद्य स्वायंभुव मनोत्सूकम् । योगा वेगा सुवेगा च प्रतिवेगा सुवासिनी॥१-७ देवी मनोरया वेगा जलावर्ताच घीमती। - ३६४] । लिङ्ग पुरास प्रथमावरणं प्रोक्त द्वितीयावरणं शृणु ॥८८ रोधिनी क्षोभिणी बाला विप्राशेपासुशोपिरणी। विद्य ता भासिनी देवी मनोवेगाच चापला IRE विद्युज्जिह्वा महाजिहा भृकुटीकुटिलानना । फुल्लज्वाला महाज्वाला सुज्वाला च क्षयांतिका1180 शाकुनः कथितो व्यूहः शाकुनायाः शृणुष्व मे । ज्वालिनी चंच भस्मामी तथा भस्मांतगा तता भाविनी च प्रजा विद्या ख्यातिश्च वाष्टमी स्मृता । प्रथमावरणं प्रोक्त द्वितीयावरणं शृणु ॥६२ उल्लेखा च पताका च भोगाभोगवती खगा। भोगभोगव्रता योगा भोगाख्या योगपारगा॥३ ऋद्धिबुद्धि घृतिः कांति: स्मृतिः साक्षाच्छुतिधरा। शाकुनाया महाव्यू: कथितः कामदायकः॥४ स्वायंभुव शृणु व्यह सुमत्याख्यं सुशोमनम् । परेष्टा च परा दृष्टा हमृता फलनाशिनी ॥५ हिरण्याक्षी सुवर्णाक्षी देवी साक्षात्कपिजला। कामरेखा च कथित प्रथमावरणं शृणु ।।.६ रत्नद्वोपा च सुदीपा रत्लदा रत्नमालिनी। रत्नशोमा सुशोभा च महाशोभा महाद्युतिः ॥६७ शांबरो बंधुरा ग्रंथिः पादक करानना । ह्यग्रीवा च जिह्वा च सर्वभासेति शक्तयः ॥६८ कथितः सुमतिव्यहः सुमत्या व्यूह उच्यते । सर्वाशी च महाभक्षा महादंष्ट्रातिरोरवा IIRE विस्फुलिंगा विलिंगा च कृतांता भास्करानना । प्रथमावरणं प्रोक्त द्वितीयावरणं शृणु ॥२०० पर स्वायम्भुव मनोत्सुक शकुन म्यूह कहता हूँ-योगा देगा-सुगर- प्रति वेगा-सुवासिनी देवी-मनोरथा-वेगा-बला पता-पीमतो-यह प्रथमा- वरण हुमा । इसका दूसरा मावरण सुनो रोधिनी क्षोभिणी बाला-विला.
श्री जयाभिषेक वर्णन शेषा-सुशोपिणी-विध ता मासिनी देवी-मनोवेगा-पापला-विध जिह्वा-म- हाजिह्वा-भृकुटी-कुष्टिलानना-फुल्लज्याला-महाज्वाला-सुज्वाला-क्षयान्तिका, यह शाकुन व्यूह कहा गया है । अथ शाकुमा का ध्यूह सुनो-ज्वालिनी- भमागी भस्मान्तगा-तसा-भाविनी प्रजा विद्यारयाति-ये पाठ शक्तियाँ हैं। प्रथमावरण कहा गया है। इसका दूसरा पावररा अक्स करो-उल्ले- खा-पताका-भोगा-भोगपती-खगा-भोग भोग घतान्योगा-भोगाख्या-योग पारगा-ऋद्धि बुद्धि पनि कान्ति स्मृति-साक्षाच्छ ति-घरा-यह शाकुना का कामदायक महान् व्यूह कहा गया है । अब सुमायास्य एव परम सुशोभन स्यायम्भुव च्यूह का श्रवण करो-परेष्टा, परा, दृष्टा, अमृता, फलनाशिनी हिरण्याक्षी, सुवक्षो, देची, साक्षाक्त पिञ्जला और कामरेखा ये पाठ शाक्तियां प्रथमावरण की कही गई हैं । रत्नदीपा, सुदीपा, रलदा, रल मालिनी, रत्न शोभा, सुशोमा, महा शोमा, महा धुति, शाम्बरी, वन्धुरा, अन्थि, पादक, वरानना, हयग्रीषा, जिह्वा, सर्वभासा-ये शक्तियाँ होती हैं । सुमति व्यूह बता दिया है अब सुमत्या ध्यह सुनो-सर्वाशी, महाभक्षा, महादष्ट्रा, अतिरीरवा, विस्फुलिङ्गा, विलिङ्गा कृतान्ता, भास्क- रानना, यह प्रथमापरण कहा गया है। इस म्यूह का दूसरा प्रावरण सुनो।॥१८० से २०० तक। रागा रगवती थीष्ठा महाकोवा च गैरवा । क्रोधनी वमनो चैव कलहा व महाबला ॥२०१ कलतिका चतुर्भदा दुर्गा चै दुर्गमानिनी । नाली सुनाली सौम्या च इत्येयं कथितं मया ॥२०२ गोप व्यूह वदाम्यत्र शृणु स्वायंभुवाखिलम् । 'पाटलीपादवी चव पाटी विटिपिटा तथा ।।२०३ कंकटा सुपटा चैव प्रघटा च घटोद्भवा । प्रथमावरमंचात्र भापया कथितं मया ॥२०४ नादाक्षी नादरूपा च सर्वकारी गमागमा। अनुचारी सुचारी च चंडनाडी सुवाहिनी ।।२०५ सुयोगा च वियोगा व हंसात्या च विलासिनी।
३६६ [ लिङ्ग पुराण सर्वगा सुविचारा च क्वनी चेति शक्तयः ।।२०६ गोपव्यूह. समाख्यातो गोपायीव्यूह उच्यते । भेदिनी च्छेदिनी चैव सर्वकारी क्षुधाशनी ॥२०७ उच्छुष्मा चव गाधारी भस्माशो वडवानला। प्रथमावरण चैव द्वितीयावरण शृणु ।।२०८ अधा बाह्वासिनी बाला दोक्षपामा तथैव च । अक्षा यक्षा च हल्लेखा हद्गता मायिकापरा २०६ आमयासादिनी मिल्ली सह्यासह्या सरस्वती। रुद्रशक्तिर्महाशक्तिमहामोहा च गोनदी R10 गोपायी कथितो व्यूहो नदव्यूह वदामि ते । नदिनी च त्तिश्च प्रसिधा च यथाझपम् ॥२११ विद्यानासा खग्रसिनी चामु डा प्रियदशिनी। प्रथमावरण प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु ॥२१२ रागा, रगवती, श्रेष्ठा, महाक्रोपा, रोरवा, क्रोधनी, वसनी, कलहा, महाबला, कलन्तिका, चतुर्भदा, दुर्गा, दुर्ग मानिनी, नाली, सुनाली, सौम्या, ये इतनी मैंने कहदी हैं । यहाँ गोप व्यूह बतलाता हूँ उस स्वाय- म्भुवाखिल को सुनो। पाटली, पाटवी, पाटी, विटपिटा, कादा. सुपटा, प्रघटा, घटोद्भवा-यह यहाँ पर मैंने प्रथमावरण भाषा के द्वारा बह दिया है । नादाक्षी, नादरूपा, सर्वकागे, गमा, अगमा, मनुसारी, सुचारी, पण्ड नाडी, सुवाहिनी, सुपोगा, नियोगा, हसाख्या, विलासिनी, सवंगा, सुविचारा और वञ्चिनी ये सोलह शक्तियां हैं ॥२०१ से २०६॥ गोप ध्यूह समास्यात हो गया है । पर गोपायी व्यूह कहा जाता है-भेदिनी, छेदिनी, सर्ववारी, क्षुधासनी, उच्छुप्मा, गान्धारी भम्माशी, वडवानला- यह प्रथमावरण रहा गया है। इसका द्वितीयावरण सुनो-मन्या, माह्वासिनी वाला, दोक्षफामा, प्रक्षा, भ्यक्षा, हल्लेला, हृदुगता, मापिका परा, भाममासादिनी, भिल्ली, सहा, भसहा, सरस्वती, रुद्र पाक्ति, महाशक्ति, महापोहा, गो नदी-यह गोपापी व्यूह कहा गया है । पय तुम म नन्द न्यूह बतलाता है- नन्दिनी, निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या नासा, श्री जयाभिषेक वरणैन ] [३४७ खग्रमिनी, चामुण्डा, प्रियदर्शिनी पह प्रथमावरण थी शक्तियां बताई गई हैं। दूसरा प्रावरण सुनो-॥२०७ से २१२।। गृह्या नारायणी मोहा प्रजा देवी घ चक्रिणी। ककटा च तपा कालो शिवाद्योपा तत परम् ॥२१३ विरामा या स वागीशी वाहिनी भीपली तथा। सुगमा चैव निर्दिष्टा द्वितीयावरणे स्मृता ।।१४ नंदव्यूही मया रुपानी नदाया व्यूह उच्यते । विनायकी पूर्गिगमा च रकारी कुडली तथा ॥१५ इच्छा कपालिनी अव द्वोदिनी च जघतिका । प्रथमावरपे चाटौ शत्तपःपरिक मिना ॥१. प्रथमावर रस प्रोक्तं द्वितीयावरण शृणु। पावनी चाधिका चैव सर्वात्मा पूतना तथा ॥१, गली मोदिनी साक्षादेवी तंबोदरी न्या। संहारी कालिनी रेव कुसुमा च यथाक्रमम् ॥१८ शुक्रा तारा तथा जाना किया गायत्रिका तथा । सावित्री चेति विधिना द्वितीयावरण स्मृतम् ॥ नंदाया कपितो पूह पैतामहमत. परम् । नदिनी चैत्र पसारो कोषाहमा पढगुला ॥२. मानदा वसुदुर्गा च सहाग घमृताष्टमी। प्रथम वरएं प्रोक्त हिनीयावरण गु॥२१ नारायणी मोहा, गा, देवी पत्रिणी, साटर पाली, शिवायोपा, पिरामा, वार्ग शो, याहिनी, मीपणी, पोर गुगमा, एव निदिया ये दूसरे भावरण में कही गई है ॥१४॥ ने नन्द प्यूह तो बना दिया है । अब नाश या म्यूह महा जाता है-दिनायसी, पणिमा, रपारी, यूएस्ती, इन्धा, मालिनी, नी, नाि- प्रपम पावरण में पाठको सतिपातिापी गई है। यह प्रपमापररा पक्षा पासमा पर मरा मापा गुमो-पाणी मपिता, सा, पूगा, एगो, मोदिती, साशायी, सामोरी, हारी, पाणिनी, गृत्या, लिङ्ग पुराण कुसुमा, शुका, तारा शाना, क्रिया, गायत्रिका, तथा सावित्री-यह विधि से द्वितीयावरण कहा गया है ॥१५॥१६॥१७॥१८॥१६॥ नन्दा का व्यूह कहा गया है । इमसे मामे पैतामह व्यह बताते हैनन्दिनी, फेरकारी, क्रोपा, हसा, पगुला मानन्दा; वमुः दुर्गा; सहारा और भावी शक्ति अमृता होती है। पह प्रथमावरा बताया गया है । मागे दूसरा माकर सुनो ॥२२॥२१॥ कुलांतिकानला चैव प्रचंडा मदिनी तथा। सर्व भूताभया व दया च बडकामुखी ॥२२५ लंपटा पन्गा देको कुपुमा विपुलातका। वेदारा च तथा दुरिता मदरोदरी ॥२३ खङ्गतिविधिना द्वितीयावरण स्मृतम् । व्यूडः पैतामह. प्रोक्तो धर्मकामार्थमुक्तिद ॥२४ पितामहाया व्यूह के कथयामि शृणुष्व मे वनाच नदनाशावाराविका रिपुभेदिनी ॥२५ रूपा चतुर्था योगा व प्रथमावरणे स्मृताः । भूता नादा महाबाला खपरा च तया परा ॥६ भस्मा काता तथा वृष्टिद्विभुजा ब्रह्मरूपिणी । सह्या वैकारिका जाता कर्ममोटी तथापग ।। महामोहा महामाया माघारी पुष्पमालिनी। शब्दापी च महाघोषा पोडशव तांतिमे २८ कुलान्तिका, अमला; प्रचण्या, मदिती; सर्वभूताभया, दया यहवा मुखी, लम्पटा; पनगा; देवी; कुसुमा, विपुलान्ता; केदारा, दूर्मा, दुरिता, मन्दोदरी और खड्ग चक्रा-इस विधि से दूसरा प्रावरण कहा गया है। धर्म काम अर्थ और मक्ष का प्रदान करने वाला यह पतामह ध्यूह कह दिया गया है । अब पितामहा का व्यूह कहता हूँ। उसे मुभसे याण करो-इमा-नन्दना-शाया राधिका-रिपुदिनी-रूपा चतुर्षा- मौर योगा ये प्रथमावरण मे कही गई है। भूता-नादा-महा बाला- सपंरा-परा-भस्मा-बान्ता-वृष्टि द्विभुजा-ब्रह्मरूपिणी-सह्या वैधारिका
श्री जयाभिषेक वर्णन ]
[ २६
माता-कर्ममोटी-अपरा-महामोहा महामाया-गान्धारी-पुष्प मालिनी-
शब्दापी-महाघोपा ये सोलह ही शक्तियां हैं ॥२२२ से २२८१
सर्वाश्च द्विभुजा देव्यो वालमास्करसन्निभाः।
पशखघरा: शांता रक्तस्रग्ववभूषणा. ॥२०६
सर्वाभरणसंपूर्णा मुकुटाद्यैरलंकृताः ।
मुक्ताफलमर्यदिव्य रत्नचित्रमनोरमैः ॥३०
विभूपिता गौरवर्णा ध्येया देव्यः पृथक्पृथक् ।
एव सहस्रकलश ताम्नजं मृन्मय तु वा ॥३१
पूर्वोक्तलक्षणयुक्त रुद्रक्षेत्रे प्रतिष्ठितम् ।
भवाद्येविष्णुना प्रोक्त नाम्नां चैव सह्मकः ॥३२
संपूज्य विन्यसेदमे सेचयेद्वारणविग्रहम् ।
प्रमिपिच्य च विज्ञाप्य सेचयेत्पृथिवीपतिम् ।।२३३
ये सभी देवियां दो भुजाप्रो वाली है और माल भातर ममान
प्रकाश पूर्ण हैं । पन शख धारण करने वाली-परम शान्त तथा रक्त
वर्ण की माला धारण करने वाली और रक्त भूपण तथा यत्रों से
विभूपित हैं ॥२९॥ समस्त माभूपणो से समलन तथा मुफूट प्रादि से
सुभूपित हैं। मुक्ता फल से परिपूर्ण परम दिध एक मनोरम विचित्र
रनो से विभूषित है ॥२३०॥ ये सब गोर वगं वाली हैं । इनका मलग.
अलग ध्यान करना चाहिए। इस बार मे पर महम ताम्र ये पथया
मृतिरा ये कला पूर्व में रहे हुए लारणो से सम्मन्न क्षेत्र मे प्रतिनि
परे।पिणु के द्वारा प्रोक्त भवादि के सहम नामो से उमा भली-भांति
पूजन परे । मागे मे विन्यास करे और बालिका सेवन करे।
पभिषेचन करणे विज्ञापन परे पौर दिनो मे स्यामी का रोषन करना
पाहिए ॥२३१ से २३॥
एवं सहय कला मनिरप्रदम् १२.४
पत्यारितामहारपाई गयंमक्षणमक्षितम् ।
तपादनकगंमुमा देवस्य पृरिताः।
तरेण वाप दप्ता या पंपगम्येन या पुनः ॥३६
207 लिङ्गपुराण ब्रह्मपन वा मध्यमभिपको विधीयते। रुद्राध्यागेन रुद्रस्य नृपतेः गणु सत्तम ।।३७ अधोरेभ्योऽय घोरेभ्यो घोरधोरतरेभ्यः । सर्वेभ्यः सर्वशवेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः ।।३८ मोमानेन राजानं सेचयेटभिपेचितम् । होमं च मत्रेणानेन अधारेणापहारिणा ॥२३६ सम्पूर्ण लक्षालों से लक्षित यह चालीस महाव्यूह से युक्त इस प्रकार सहस कलश वाला अभिपंचन सम्पूर्ण सिद्धियो के प्रदान करने वाला से है ॥३४॥३५॥ तथा सम्पूर्ण कलश कनक से युक्त मोर देव के पूरित होने चाहिए । शेर-दधि पयगव्य अथवा प्रहाकूर्व से मध्याभिषेक किया जाता है। द का अभिषेक रुद्राध्याय से किया जाता है। गजा के अभिषेक के विषय में सुनो। ॥६॥३७॥ अधोरेन्यो य घोरे) घोर पोर तरेभ्य. । सर्वेभ्य. मवंशवेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्र रूपेभ्यः"- (इसका शन्दा पहिले वरिणय दिया जा चुका है) इस मन्त्र से अभिषेधित राजा का अभिषेक करना चाहिए। मघों के हरण करने वा मन्त्र से होम करे ।।२३८॥२३६।। प्रागाद्यं देवकुडे वा स्थंडिले दा घृतादिभिः । समिदायक साजशालिनीवारतंडुलः ॥२४० प्रष्टोत्तरशतं हुत्वा राजानमधिवासयेत् । पुण्याहं स्वस्ति रुद्राय कौतुकं हेमनिमितम् ॥११ भसितं च मृण लेन बंधयेद्दक्षिणे करे। त्र्यंबकं यजामहे सुधिं पुष्टिवर्धनम् ॥४२ उर्वारुकमिव बनान्मृत्योर्मुक्षाय मामृतात् । मंत्रेरणानेन राजानं सेचयेद्वाथ होमयेत् ॥४२ सर्वद्रव्याभिषेकं च होमहव्यर्यथाक्मम् । प्रागाधं ब्रह्माभि.प्रोक्त सवंद्रध्ययथाक्रमम् ॥४४ सत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि । तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥४५ ।
भये मयेनानिये भवन भयोमाय नमः। स्पाहांग जमामो मोगाने धिमान् ॥२॥ श्री जयाभिषेक वर्णन ] [४०१ स्वाहांतं पुरुपेणवं प्राक्कुण्डं होमयेद्विजः । अघोरेण च याम्ये-च होमयेत्कृष्णवाससा ।। ६ वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः । इत्याधुक्तकमेणंव जुयात्पश्चिमे नरः ।।४७ सद्येन पश्चिमे होमः सर्वद्रव्पर्य यामम् । सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमः ॥ ४८ देव कुण्ड मे अथवा स्थण्डिल मे घृतादि से भक्त लाज शालिनीवार तण्डुलौं के सहित समिधा एव माग्य घर की मष्टोत्तर शत माहुतिया देकर प्रागाद्य मर्यात् प्रमुख राजा का अधिधाम करना चाहिए । पुष्पाह वाचन-स्वस्ति पाचन और रुद्राय वाचन कराके हेम से विनिर्मित कौतुक (यण) मृणाल पे सहित भसित दक्षिण कर में बांधना चाहिए । फिर 'यम्बक यजामहे सुगन्धि पुष्टि वर्षनम्"-इस त्र्यम्बक मन्त्र से राजा का सेचन परे अथवा होम करे ॥४॥४१॥४२॥ उर्वा रक भिव बन्धना ग्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्"-इम मन्त्र से गजा का सेचन बरे तथा होम परे । ॥२४३। क्रम के अनुमार लाना चादि होम दम्यो मे सर्व द्रव्या- भिषेक करे । 'ब्रह्मभिः" इत्यादि पान ब्रह्म ग-यो से ममस्त यो पथाक्रम प्रागाच हवन करना चाहिए ॥२४४॥ प्रयत्न की विधि घालाते हैं-द्विज पो "नास्पाय विद्महे, महादयाय धीमहि, तन्नो रुटः प्रचोदयात्" - इम मात्र से प्रान में स्वाहा' इसे लगाार तरह से प्राण्ड में होम करना चाहिए । पपोर मन्त्र में कृष्ण यस पाले मापा- पं द्वारा याम्य दिगा मयन करना मारिए ॥४६॥ बामदेवाय पाउसवम से नम-ज्पेशप नम श्रेप्राय नम हाय नम पदो पत्रिम में हमन परला पाहिए |आग पत्र से यमा सम्पूर्ण दमों से पत्रिम में हयन रहे। सोनाव प्रादामि गयो जाता पै.मम."-यह मान है । इसा पर्प-गोगा में गरण में उस सदोबारातिरेनमार॥२४॥ - मनु- । लिङ्ग पुराण ४०२] आग्नेय्यां व विधानेन ऋचा रोद्रेण होमयेत् । जातवेदसे सुनवाम सोममित्यादिना ततः । नैऋते पूर्ववद्रव्ये. सर्वोमो विधीयते ।।५० मानेन दिव्येन सर्वसिद्धिकरेण च । निमि निशि दिश स्वाहा खङ्ग राक्षस भेदन ॥५१ रुधिराज्यानं नमत्य स्वाहा नमः स्वधानमः । यथेष्टं विधिना द्रव्यर्मणानेन होमयेत् ॥५२ यम्या हि विविध व्यरीशानेन द्विजोत्तमाः। ईशान्यामथ पूर्वोक्तद्रव्यहोममथाचरेत् ॥५३ इशानाय कद् द्राय प्रचेतसे त्र्यंबकाय शर्वाय तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥५४ प्रधान पूर्ववद्रव्यरोगानेन द्विजोत्तमाः। प्रतिद्रव्यं सहस्रेण जुड्यान्नृपमनिधी ॥२५५ "भवे भवे नाति भवे भवस्व मा भवोद्भवाय नम."-अर्थात ससार में जन्म लेकर मैं प्रति भव को प्राप्त हो रहा हूँ मेरा उद्धार करो । इस ससार के उत्पत्ति स्वरूप आपके लिये मेरा नमस्कार है । इस मन्त्र के अन्त मे 'स्वाहा'-इसे लगाकर इससे बुद्धिमान को प्रग्नि मे हवन करना चाहिए ॥४६॥ प्रानेपी दिशा मे रौद्र ऋचा से विधान के साथ होम करे "जातवेद से सुनवाम सोमम्" - इत्यादि मन्त्र से नैऋत दिशा में पूर्व की ही भांति समस्न द्रव्थो से होम करना चाहिए ॥५०॥ यह समस्त सिद्धियो के करने वाला परम दिव्य मन्त्र है-इससे होम मरे । 'निमि निशि दिश स्वाहा सङ्ग राक्षस भेदन । रुधिराज्या-नत्य स्वाहा नम. स्वधा नम:"-हरा मन्त्र से यथेष्ट विधि से द्रव्यों से होम भरना चाहिए ! ॥५१॥५२॥ हे द्विजोत्तमो ! चायव्य दिशा में ईशान मन्म मे अनेक दमों के द्वारा होम करे। ईशानी दिशा में पूर्वोक्त द्रव्यों से होम का पाचरण करे ॥५३॥ "ईशानाय कद्रदाय प्रचेतसे सम्बकाय शर्वाय सप्तो चद्रः प्रचोदय द" '--पह ईशान मन्त्र है । इम मुरुष को पूर्ववत से प्रति मध एक सहन ग्राहुतियां नृप की सनिधि में देखें। ."
श्री जयाभिषेक वर्णन ] { ४०३ ॥२४॥२५५॥ स्वय वा जुहुयादग्नी भूपति शिववत्सलः । ईशान सर्वविद्यानामीश्वर सर्वभूताना ब्रह्माधिपतिव्रह्मरगो- ऽधिपति ह्मा शिवो मे अस्तु मदाशिवाम् ॥२५६ प्रायश्चित्तमघारेण शेप सामान्यमाचरेत् । ताधिवास राजान शख भेर्यादिनिस्वन १५७ जयशब्दरवैदिव्यर्वेदघोष सुशोगनै । सेचयेत्कूर्चनोयेन प्रोक्षयेद्वा नृपोत्तमम् ।।५८ रुद्राध्यायेन विधिना रुद्रभस्मागधारिणम् । शम्वचामरभेर्याद्य छन चद्र समप्रभम् ।।५. शिविका वैजयनी च साधयन्नुपने शुभाम् । राज्याभिषेकयुक्ताय क्षत्रियायेश्वगय वा ।। ० नृपचिह्नानि नान्येपा क्षत्रियाणा विधीयते । प्रमाण चव सपा द्वादशागुलमुन्यने । ५१ पलाशोदु बगश्वत्यवटा पूर्वादित कमात् । तोरणाद्यानि वै तत्र पट्टमाग पट्टिया ॥५२ प्रष्टमागुलसयुक्तदर्भमा नासमावृतम् । दिग्ध्वज ष्टरमयुक्त द्वारकु भै सुशोभनम् ॥२.३ अथवा शिव का प्रेमी राजा स्वय भी अग्नि में हवन कर। समस्त विद्यामा के स्वामी सम्पूण भूनो के ईश्वर ब्रह्मा के स्वामी ब्रह्म पे अधि पति ब्रह्मा और शिव मेरे लिये शिवोऽम् हा अर्थात् कल्याण परने वाले हो ॥५६॥ अघोर मात्र म प्रायश्चित्त करे मोर शेष सामाय का माचरण करना चाहिए। मधिवास करने वाले राजा का सेचन शस भेरी मादि यायो की ध्वनि जय शन और वेद म त्रोचारण के घोष के सहित जो वि परम शोभा है, कूपं जल से बरे अथवा नृपोत्तम का प्रोक्षण करना चाहिए ।।५७॥५८॥ रुद्राध्याय मे द्वारा विधिपूषा सम्पूण मङ्गो म रुद्र भस्म के धारण करने वाले शप चमर भेरी भादि छन चन्द्र की प्रभा समान प्रभा यात्रा लिविया और शुभ वैजय ती मादि से राजा को ४०४ ] [ लिङ्ग पुराण ज्जा करे । यह सब उसी के लिये करे जो राज्याभिषेक के लिये योग्य क्षत्रिय स्वामी हो और देव तुल्य हो ॥५६॥६॥ राजा के ये चिह्न क्षत्रिय कुल मे समुत्पन्नों के ही होते हैं मन्यो के नहीं होते है । इन सब का प्रमाण द्वादश अडगुल कहा जाता है जो कि पलाश-उदुम्बर मश्वत्य पौर वट की शाखाएँ पूर्वादि कम से होती हैं इनको बाँधे । वहाँ मभि- पेक मण्डप मे तोरण प्रादि पट्टिवा दुकूल से ही करनी चाहिए ।।६१।। १६२॥ द्वार स्थित कुम्भो को पाठ पड गुल दर्भ माला मे समावृत और दिग्ध्वजाष्टक से सयुक्त परम सुशोमन करे ।।२६३॥ हेमतोरणकु भैश्च भूषित स्नापयेन्नुपम् । सर्वोपरि समामीनं शिवकु भेन सेचयेत् ।।२६४ तन्महेशाय विद्महे वाग्विशुद्धाय धीमहि । तन्न शिवः प्रचोदयात् ॥६५ मंनेगानेन विधिना धन्या गौरिगीतया। रुद्राध्यायेन वा सर्वमघोरायाथ वा पुन ॥६६ दिव्यराभरणः शुक्लमुकुट द्यः सुकल्पिते । क्षोमवस्त्रैश्च गजान तोषयेनियत शनै ।।३७ अष्टाष्टिपलेनैव हेम्ना कृत्वा सुदर्शनम् । नवरत्नरलत्य दद्य ? दक्षिणा गुगे ॥६८ दशधेनु सवस्त्र च दद्यात्क्षेत्र सुशोशनम् । शतदारणनिल चव शद्रोणाश्च तडुनान् ॥३६ शयन वाहन शम्श सोपधाना प्रापयेत् । योगिना चव सर्वेपा निशत्पलमुदाहृतम् ॥७० अशेषाश्च तदर्धन शिवभक्तास्तदर्धत । महापूजा तत कुर्यान्महादेवस्य वै नृप. १२.१ इस प्रकार से हेम कुम्भ तोरण प्रादि से मूर्षित नृप पा स्नयन करना चाहिए । सब के आर समास्थित राजा शिव पुम्भ से सेचन करे ॥६४॥ "वन्महेशाय विधहे वाग्वि शुशाय धीमहि । तमः शिष. ग्योदयान". '-इस मन से विधि से साप-वधनी गौरी गायत्री से- विद्युन्माली हिरण्य क्षो विष्णुमय वितिजितः । ५ स्पदेन तारपापा योशियया पुरावया । साविप्रोच तपा लक्ष्मीदेवी कात्यायनी तथा। श्री जयाभिषेक वर्णन ] [४०५ रुद्राध्याय से अथवा सब अघोर मन्त्र से करे ॥६५॥६६॥ दिव्य प्राभरण मोर शुगल मुकुट प्रादि से जो कि भली-भांति निर्मित किये गये हो तथा धोम वस्त्रो नियत रूप से धीरे से राजा को तोप देना चाहिए ॥६७।। महाठ पल सुवणं से बहुत सुदर्शनीय वनवा कर तथा नौ रत्नो से विभू. पित करपे गुरु को दक्षिणा देनी चाहिए ॥६॥ दश धेनु जो कि वस्रों के राहित हों-परम शोभन क्षेत्र एक सौ द्रोण तिल सौ द्रोण तण्डुल- रायन वाहन उपधान के सहित शय्या दिलानी चाहिए । समस्त योगियो को तीस पल कहा गया है ॥२६॥२७॥ शेष भन्यो को उमसे प्राधा देवे और जो शिव के भत हो उनको इनसे भी भाषा भाग दक्षिणा के रूप में देना चाहिए । इसके मनन्तर राजा को महादेव की महापूजा एव समासतः प्रोक्त जयसेचनमुत्तमम् । एव पुराभिपिक्तस्तु शकः शकत्वमागतः ॥२७२ ब्रह्मा ब्रह्मत्वमापना विष्णुविष्णुत्वमागतः । माविका चाथियात्व च मौभाग्यमतुल तथा ।।७३ परनी चाहिए ॥२७१॥ नादिनाथ पुरा मृत्यू रुद्राध्यायेग ये जितः ।।७४ अभिषिक्तोऽसुरः पूर्व तारण यो महायमः । मृगिहन पुरायो हिरण्ययसिह ः। गुदोपसुक्ष्तनयो जितो देर पूजिता। यादेय गदेवा तु निहतो रपया ॥२७, ४६ } [ लिङ्ग पुराण प्रकार से अपने २ पदो की प्राप्ति को यो। पहिले नन्दिनाप ने साध्याय पे द्वारा ही मृत्यु को जीत लिया था ७२|७३।७४॥ महायसरान तारक नाम वाले मार को पहिले पभिषिक्त रिया या पौर विद्यमाती यह देवो ये धारा भी भय हो गया था। भगवान विष्णु ने स्नान योग से ही हिरण्यास पो विनिजित किया था। इसी योग के प्रभाव से सिंह ने हिरण्यकशिपु दैत्य का हनन लिया था। सन्द ने तारक मादि दरसो को सपा पहिले कोशिकी मम्बा देवी ने दायेन्द्रो के द्वारा पूजित गुन्द उपसुन्द ये पुत्रो को जोता पाया ने यमुदेव पौर सुदेय को हत रिया पा॥२७॥२७॥ स्नानयोगेन विधिना ग्रह्मणा निमितेन तु । देवासुरे दितिसुता जिता देवरनिदिता . स्नायव सर्वभूपेश तथान्यरपि भूसुरैः । प्रामाश्च मिद्धयो दिव्या नात्र सार्या विचारणा IL पोऽभिपेकमाहात्म्यमहो शुद्धसुभाषितम् । येनेवमभिषिशेन सिद्ध मस्युजितस्विनि ८० पल्पकाटिमतेनापि या समुत्रितम् । स्नात्य मुध्यते राजा सयंपापनं संशयः । ध्यापितो मुध्यते गा यमुमादिभि पुन । सनित्यं विजयो भूत्या पुत्रपौत्रादिमित: 11 जनानुरागसंपन्नो देवराज वापर । मोदते पाहोना प्रियमा पनिछपा ८३ उद्देमात्रमपित पस परमसोमनम् ।
रुद्रादि देवता स्थापन० ] [४०७ है जिसके द्वारा इस प्रकार से अभिषेक करने से सिद्धि को प्राप्त करने वालो ने मृत्यु को भी जीत लिया था II II सैकडो करोड वल्पो मे भी जो-जो पाप किया गया है उससे इस विधान से अभिषेचन करके राजा सभी पाणे से मुक्त हो जाता है. इसमें कुछ भी संशय नही है ।।८१॥ ध्याधि से युक्त राजा क्षय कुष्ठ प्रादि रोगो से छुटकारा पा जाता है और वह नित्य विजयो होकर पुष पौत्रादि से समन्वित होता है ।।२।। समस्त पनो के अनुराग का पात्र होकर दूसरे देवराज के तुल्य पाप हीन होकर धर्म मे मिटा वाली भार्या के साथ प्रसन्न होता है । हे स्वायम्भुव मनो! मैंने नृपो के उपचार के लिये थोडा सा कुछ कहा है । इसका फल तो परम शोमन होता है ॥२८॥२८॥ ॥६७-रुद्रादि देवता स्थापन विधि ।। रुद्रादित्यवसूना च शक दीना च सुप्रत ॥१ प्रतिष्ठा कोदृशो भोलिंगमूतश्च शोभना १२ विष्णो शक्रस्य देवस्य ग्रह्मणश्च महात्मनः । अग्नेयमस्य नितेरुणस्य महाद्युते ॥३ वायोः सोमस्य यक्षस्य दुवेरस्यामितात्मनः । ईशानस्य घरायाश्च श्रीप्रतिवाय या फयम् ॥४ दुर्गाशियाप्रतिष्ठा च हैमवत्याच सोमना। स्वादस्य गणराजस्य नदिन विशेषतः ॥५ तपाम्येषां च देवानां गणानार्माप वा पुनः । प्रतिष्ठालक्षण सयं विस्तराद्वस्तुमहंसि ॥ भयानमर्थितत्वशो रद्रमतच मुघन । गप्पदैपायनस्यासि साक्षात्मपरा तनु ।
४०८ ] [ लिङ्ग पुराण वायु सोम-यक्ष अमित प्रात्मा वाले कुवेर-ईशान-और घरा की प्रतिष्ठा कैसे की जाती है ? सारा॥३॥४॥ दुर्गा शिव्य और हैमवती को शोमन प्रतिष्ठा-स्कन्द तथा गणराज और विशेष रूप से नन्दी की प्रतिष्ठा एवं अन्य देव तथा गरयो की प्रतिष्ठा का लक्षण सब कृपा करके विस्तार के साथ आप बताने को योग्य होते हैं ॥५॥६॥ हे सुधत ! भाप सम्पूर्ण तत्त्वो के ज्ञाता और रुद्र के परम भक्त हैं । मार भगवान कृष्ण पायन के तो एक दमरे शरीर ही हैं ॥७॥ सुमतुजे मनिश्चैव पैलश्च परमर्पयः । गुरुभक्ति तथा कर्तुं समर्थो रोमहर्पणः ॥८ इति व्यासस्य विपुला गाथा भागीरथीतटे। एक: समा वा भिन्नो वा शिष्यस्तस्य महाद्युतेः 16 वंशपायनतुल्योऽसि व्यासशिष्येमनले। तस्मादस्मा मखिलं वक्तुमर्हसि सांप्रतम् ॥१० एवमुक्त्वा स्थितेष्वेव तेषु सर्वेषु ता च । बभूव विस्मयोऽतीय मुनीनां तस्य चाग्रतः.११ प्रथानरिक्षे विपुला साक्षादेवी सरस्वती। प्रलं मुनीनां प्रश्नोऽयमिति वाचा बभव ह ।।१२ सर्व लिङ्गमयं लोकं सर्व निगे प्रतिष्ठितम् । तस्मात्सर्व परित्यज्य स्थापयेत्पू नयेच तत् ॥१३ लिंगस्थापनसन्मार्गनिहितम्चायतासिना । प्राशु ब्रह्मारमुद्भिद्य निगच्छेदविशकया ।।१४ परम ऋषिगरण सुमन्तु-जैमिनि मोर पेल जैसे हैं वैसे ही गुरु की भक्ति परने में समर्थ रोमहर्पण हैं || भागीरथी के तट पर भगवान व्यासदेय को बहुत सी गापा हुई हैं। प्राप एक ही उनके समान सपा पभिन्न तद्रूप वाले उन महान् इति वाले के शिष्य हैं ॥६ग भूतल मे व्यासदेय के शिष्यों में वैशम्पायन के सुल्य माप है। इसलिये मय हमारे सामने सम्पूर्ण वर्णन करने के योग्य होते हैं ॥१०॥ इस प्रकार से कहकर वहाँ पर उन पर नियत होने पर उनके प्रागे एमा गुनियों रुद्रादि देवता स्यान [t बड़ा भारी विस्मम या था। इसके अनन्तर माकार में साक्षा- द देवी सरस्वती प्रादुर्भुत हुई और याणी से बोली-यह मुनियों का प्रभ बहुत ही अच्छा है ॥१२॥ यह समस्त सोक लिजमर है और सभी कुछ लिस मे ही प्रतिक्षित है । इमलिये राब स परित्याग पर लिङ्गकी स्थापना गरे मोर उसको पर्चा करनी चाहिए ॥१३॥ लिङ्ग के स्थापन- मार्ग में स्थापित जो विस्ताप श है उससे ब्रह्माण्ड का परदा फरसे बिना किसी पासा के स्थापन मुक्त हो जाता है ॥१४॥ उपेद्रांभोजगभेद्रयमांबुधनदेश्वराः । सथान्ये पशि स्याप्य लिंगमति महेश्वरमा स्वेपुम्वेषु च पक्षेपु प्रधानास्ते यथा द्विजाः । ब्रह्मा हरम भगवाचियो रमा घरा ॥१६ लक्ष्मीतिः स्मृतिः प्रशा धरा दुर्गा पानी समार रद्राय वमवः सो दिनास पास एक य॥१७ नंगमेश भगीलोपासा पहारतया। रावं नदिपुरोगाम गणा गणपतिः प्रभुः ॥१८ पितगे गुना: मयें गुवेराद्यान मप्रमाः । मारिया यसय: सारमा अधिनोप भिषग्वरी १ विश्वेदेया माध्यान पयः पक्षिणो मृगाः । ब्रह्मारिस्पायरोरा प ग गिगे प्रतिनितम् ॥२० सामारपये पशियन्य धापर्यागमध्ययम्। यत्नेन स्थापितं मर्ग पूजितं पूजयेदि ॥२१
[ लिङ्ग पुराण
पशुगण-पक्षि वृन्द और मृग ब्रह्मा से लेकर स्थावर पर्यन्त सभी लिङ्ग में
प्रतिप्रित होते हैं। इस लिये सब पा त्याग कसे अव्यय एक लिङ्गको
स्थापना करनी चाहिए। पल पूर्वक लिन की स्थापना करके उसका
पूजन करे ॥१५ से २॥
..॥६-लिंग स्थापन और फल श्रुति ॥
इति निशम्य कृतांजलय स्तदा दिवि महामुनयः कृतनिश्चयाः ।
शिवतरं शिवमीपरमव्ययं मनसि लिंगमयं प्रणिपत्य ते ॥१
सकलदेवपतिभंगवानजो हरिरशेषपति गुरुणा स्वयम् ।
मुनिवराच गपाश सुरासुरा नरपरा: शिवलिंगमयाः पुनः ॥र
श्रुत्वैवं मुनयः सर्वे षटकुलोयाः समाहिताः ।
संत्यज्य सर्व देवस्य प्रतिष्ठां कतु मुद्यताः ॥३
प्रपृच्छन्सूतमनघ हर्षगद्गदया गिरा।
लिंगप्रतिष्ठा विपुलां सर्वे ते शसितयताः ॥४
प्रतिष्ठा लिंगमूर्तों यथावदनुपूर्वशः।
प्रवक्ष्यामि समासेन धर्मकामार्थमुक्तये ॥५
कृत्वैव लिग विधिना भुवि लिगेषु यत्नतः ।
लिंगमेकतमं शीलं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम् ॥६
हेमरलमयं वापि राजतं ताम्रजंतु वा।
सवेदिकं ससूत्र च सम्यग्विस्तृ नमस्तकम् १७
विशोध्य स्थापयेद्भक्त्या सवेदिकमनुत्तमम् ।
लिंगवेदी उमा देवी लिगं साक्षामहेश्वरः15
तयोः सपूजनादेव देवी देवश्च पूजिती।
प्रतिष्ठया च देवेशो देव्या सार्घ प्रतिष्ठितः ॥
लिङ्ग स्थापन फलश्रुति इतना अवरण करके उस समय मैं माकाश
मैं निधरण करने वाले महा मुनिगरा ने शिव तट अव्यय ईश्वर लिङ्गमय
शिव का मन में प्रणिपात किया या समस्त देवो के स्वामी भगवान
मज-अशेषों के पति हरि स्वयं गुरु मोर मुनिवर-गण-सुरासुर मौर नरपर
.
लिंग स्थापन और फन श्रुति ) सब लिङ्गमय है-इस प्रकार से अयण कर पट् कुलो मे समुत्पन्न मुनिगण समाहित हुए और जो प्रतिमा सम्पूर्ण देव की करने को उद्यत थे उस परित्याग करके निप्पाप सूतजी से उन्होने हपं से गद्गद याणी से पूछा था कि लिङ्ग की प्रतिष्ठा स्मि प्रकार से की जाती है क्योकि ये सभी सशित प्रत वाले थे ||३||४॥ भूतजी ने कहा-मैं भानुपूर्वी के सहित यथावत् पाप लोगो को लिङ्ग मृत्ति को प्रतिष्ठा को धर्मार्थ शाम पौर मोक्ष की प्राप्ति के लिये संक्षेप से बतलाता हूँ ॥१॥ भूलोक मे पागे बत- लाये जाने वाले शैलादि लिनो मे से विधि-विधान के साथ कोई-सा एक लिङ्ग ब्रह्मा-विष्णु और शिवात्मक लिन की रचना करावे ॥६॥ यह लिङ्ग हेम पौर रलो के द्वारा निर्मित हो पाहे पांदी या तान धातु से विरचित कराया गया हो किन्तु परिनालिको पेत पोर पंच मूत्रादि से युक्त विस्तृत मस्त । वाला होना पाहिए। ऐसी निङ्ग मूत्ति यनवा कर उसवा भली-भाति विशोधन परे बैटिक फे सहित उस उतम लिङ्ग मति की स्थापना करनी चाहिए। अब उस लिङ्ग का माहात्म्य बनसाते है-- लिङ्ग वेदो देवी उमा है पोर लिग साक्षात् महेश्वर हैं ॥७॥६उन दोनो मे भली-भांति पूजन करने से देवी पौर देय का पूजन हो जाता है। प्रतिष्ठा के द्वारा देवी के साथ ही देव प्रतिष्ठिन होते है | तस्मात्सवेदिकं लिगं स्थापयेत्स्यापकोत्तम ॥१. मूले ग्रह्मा वमनि भगवान्मध्यभागे च विष्णुः सर्वेशानः पशुगतिरजो रदमूर्ति घरेण्यः। तस्मालिंग गुरुतरतर पूजयेत्स्थापयेद्वा यस्मारपूज्यो गणपतिरसो देवमुख्यं. समस्तैः ॥ १ गंधैः स्रग्धूपदीपः स्नपनहुतयलि स्तोत्रमंत्रोपहारंनित्य येऽयचंयंति विदशवरतनु लिंगमूर्ति महेशम् । गर्भपानादिनाशायभयरहिता देवगंधर्भमुरुपः सियार पूज्या गरगपरनमितास्ते भयंत्यप्रमेयाः ॥१२ तस्मादभरत्योपचारेण स्थापयेपरमेश्वरम् । पूजयेश विदोषेण सिंग सर्यि सिस्ये १३
[ लिङ्ग पुराए
समच्यं स्थापलिंग तीमध्ये शिवासने ।
कूर्चवखादिमिलिगमाच्छाद्य कलशे पुनः॥१४
लोकपालादिदेवत्यै सकूचे साक्षते शुभ ।
उत्कूर्च स्वस्तिकाद्यं च चित्रतत्र वेरित ॥१५
वनादिकायुघोपेतं सवस्नै सपिधानकै ।
लक्षयेत्परितो लिंग मीशानेन प्रतिष्ठितम् ॥१६
इसलिये उत्तम स्थापना करने वाले पुरुष को सवेदिक लिङ्ग को
स्थापना करनी चाहिए ॥१०॥। इसके मूल मे ब्रह्मा निवास किया करते
हैं-मध्य भाग में भगवान विष्णु का निवास होता है और सब ईशान
पशुपति अज परम वरेण्य रुद्र मुक्ति का निवास होता है। इस लिये लिंग
सबसे गुरुतर होता है। इसको स्थापना करे और इसका पूजन करना
चाहिए । इससे सम्पूर्ण देव मुरूषों के द्वारा गणपति पूज्य होते हैं ॥१॥
जो लोग नित्य ही गन्य माला धूप दीप-स्नपन हुत बलि स्तोत मन्त्र पौर
उपहारो के द्वारा विदशो भर्थात् देवो मे श्रेष्ठतम लिङ्ग मूर्ति महेश का
अभ्यर्चन किया करते हैं वे गर्भाधानादि नाश से रहित एव सब प्रकार के
सय के भय से विमुक्त होते हैं तथा देव गन्धर्व और सिद्धो के द्वारा भी
वन्दनीय होते हैं पूजा के योग्य बन जाते हैं तथा गण वरों से नमित मोर
अप्रमेय हो जाया करते हैं ॥१२॥ इस लिये परम भक्ति से सम्पूर्ण उप-
धागे के द्वारा परमेश्वर की स्थापना करनी चाहिए तथा उसको भर्चना
करे। धर्मादि सब प्रकार की सिद्धि के लिये लिङ्ग को विशेष रूप से
पूजा करनी चाहिए ॥१३॥ क्षेत्र के मध्य मे शिवासन अर्थात् वेदिका में
लिङ्ग मूत्ति की स्थापना करे तथा पूजन करना चाहिए। कूर्व वस्त्रादि से
लिङ्ग का समाच्छादन करे और लोकपाल प्रादि देवत्य वाले कलशो की
स्थापना करे जो कि कूर्च के तथा शुभ प्रक्षतो के सहित होने चाहिए।
“लिङ्ग मूति के चारो भोर ईशान के द्वारा प्रतिष्ठित वहिनिगत कूर्च वाले
स्वस्तिकादि मूल भूत से युक्त चित्र सन्तुक से वेष्टित वच मादि प्रायुधों
से समर्मावत-बस और विधान के सहित ये समस्त कलश होने पाहिए।
॥१४॥५॥१६॥
[४१६ पौरमपए से सपा माटमण्डलों से सम- लिंग स्थापन और फल श्रुति ] धूपदीपसगोपेत वितानविततांबरम् । लोकपालध्वजश्चव गजादिमहिपादिभिः ॥१७ चित्रितः पूजित श्यं व दर्भमाला च शोभना ! सर्वलक्षणसंपूर्णा तथा बाह्य च वेष्टयेत् ॥१८ सतोधिवासयेत्तोये धूपदीपसमन्विते । पंचाहं वा पहं वाथ एक सत्रमथापि वा ।।१६ वेदाध्ययनसंपन्नो नृत्यगीतादिमंगलैः । किंकिणीरवकोपेतं तानवीगारवैरपि ॥ ईक्षयेत्काल मव्यग्रो यजमानः समाहितः । उत्थ.प्य स्वस्तिकं ध्यायेन्मंडो लक्ष गान्विो ॥१ संस्कृते वेदिसंयुक्ते नवकुडेन संवृते । पूर्वोक्त विधिना युक्ते सर्वलक्षगामयुते ।।२ प्रमडलसयुक्ते दिग्व जाहकसयते । पूर्वोक्त लक्षणोपेतैः कुटः प्रागादितः क्रमान् ॥२३ पर पायाश में एक वितान विनारिया जावे और धूप-दीप पादि पुन हो । वही लोपालो की ध्वनाएं लगाई जायें गज पोर महिप मादि के द्वारा चित्रित एव पूजित पिया जावे । परम पोभन दों की माला जो कि मभी लक्षणों से युक्त हो। हमसे माहिर पे भाग मे वेष्टन लिया जावे ॥१७॥१८॥ म ममम्त प्राार को गना से समन्धित धूप- तोप से युक्त मण्डप मे जल में देयदेय पापियाम पांच दिन तीन दिन मपया देवल एक रात्रि मे परे ॥१६॥ यजमान को उम पधिवास के समय में परम सावधान रहते हुए वेशाप्यपन से गुसम्पम होना चाहिए मया नाय-गोत मादि की मास पनि किरणी पनि से युक्त साम- योलाको पनि मारि यहाँ पर होये । हम प्रकार से वह गमय मध्यप्रता से यापन करना चाहिए । पिर लटारर उग गपं मारा समन्वित मारप पुष्पार पापन रे ॥२०॥२१॥ यह पूर्व में पता विपि पे TET En 0 मनाएँ मगी हो ऐगे पूर्व में लि से गात गुरु ४१४ ] । लिङ्ग पुराएर लक्षणो से सयुत कुण्डो की रचना होनी चाहिए जिन की स्थिति प्रागादि के कम से की जावे ॥२२॥२३॥ प्रधान कुडमीशान्या चतुरस्र विधीयते । अथवा पकुडेक स्थडिल चंकमेव च ॥२४ यज्ञोपकरण सर्व शिवार्चाया हि भूषणे । वेदिमध्ये महाशय्या पचतूलीप्रकल्पिताम् ॥२५ कल्पये काचनोपेता सितववावा ठिताम् । प्रकल्प्येव शिव चंब स्थापयेत्परमेश्वरम् ।। ६ प्राकशिरकं न्यसेटिंगमोशानेन यथाविधि। रत्नन्यासे कृते पूर्व केवल कलश न्यसेत् ।।५७ लिंगमाच्छ ध वसन्या कूर्चेन च समंततः । रत्नन्यासे प्रसक्तेऽथ वामाद्या नव शक्तयः ।।२८ नवरत्न हिरण्याचे पचगव्येन सयुते । सर्वधान्यसमोपेत शिलायामपि विन्यसेत् ॥२९ स्थापयेबालिग हि शिवगायत्रिसयुतम् । केवल प्रगवेनापि स्थापयेच्छिवमव्ययम् ॥३० ब्रह्मजज्ञानमत्रेण ब्रह्मभाग प्रभोस्तथा। विष्णुगायत्रिया भाग वैष्णव त्वथ विन्यसेत् ।।३१ इनमे प्रधान युण्ड ईशानी दिशा में चौकोर बनाया जाता है अथवा पाच कुण्डों का एक ही पुएड और एक ही व्यएिडल बनाया जाने ॥२४॥ इस शिव की अर्चना में समस्त भूपण एव मभी यश के उपारणों से युक्त वेदि के मध्य मे पान तूलियों से प्रकल्पित मर्धात प्रत्युध महाशय्या घी कल्पना बरे जो वि सुवर्ण की पट्टिा से युक्त होनी चाहिए तथा श्वेत वस्त्र से अवगुएिटन होवे। इस प्रकार से परि सल्पित करके उस पर परमेश्वर शिव की स्थापना घरे ॥२५॥२६॥ विधिपूर्वर ईशान के द्वारा पूर्व मे चिर पाने लिङ्ग या न्याम परे । पहिले रत्न न्यास करने पर वेधन मुख्य रला वा न्यास मरना चाहिए ॥२०॥ वस्त्रों से तपा पूर्व से चरो प्रोरा लिङ्ग यो समाच्छादित करे और रल न्यास के मोरपारों मोर पांव या मन्त्रों के द्वारा पलशों की स्थापना करे। पूर्व में परिणत विधान से सबको बेदि के मध्य में विन्यस्त करे। मग लिंग स्थापन और फल श्रुति ] [ ४१५ प्रसक्त होने पर वामादि नौ सक्तियों की स्थापना करनी चाहिए । पञ्च गम्य से युक्त हिरण्य प्रादि के साथ समस्त धान्य से समोपेत नवरत्नो की जो माधार शिला है उस पर विन्यास करना चाहिए ॥२८॥२६॥ ब्रह्म लिङ्ग को शिव गायत्री से संयुत स्थापित करे । अथवा केवल प्रणव से ही भव्यय भगयान् शिव की स्थापना करनी चाहिए ॥३०॥ ब्रह्मजज्ञान मन्त्र से प्रभु प्रह्म भाग को वेदिका के प्रधो भाग में तथा विष्णु गायत्री से वैष्णव भाग का विन्यास करे ॥३१॥ सूत्रे तत्त्वग्रयोपेते प्रणवेन प्रविन्यसेत् । सर्व नमः शिवायेति नमो हंसः शिवाय च ॥३२ रुद्राध्यायेन वा सर्व परिमृज्य च विन्यसेत् । स्थापयेद्ब्रह्मभिश्च व कलशान्वै ममंततः ॥३३ वेदिमध्ये न्यसेत्सर्वान्पूर्वोक्तविधिसंयुतान् । मध्यकुभे शिवं देवी दक्षिणे परमेश्वरीम् ॥३४ स्कंद तयोश्च मध्ये तु स्कंदकुभे सुचित्रिते । ब्रह्माणं स्कंदपु भे वा ईशकुम्भे हरि तथा ।।३५ अथवा शिवकुभे च ब्रह्मांगानि च विन्यसेत् । शिवो महेश्वर व छद्रो विपुः पितामहः ॥३६ प्रह्मण्येव समासेन हृदयादीनि चांबिका। वेदिमध्ये न्यसेत्सर्वान्पूर्वोक्तविविसंयुतान् ।।३७ वर्धन्यां स्थापयेद्देवी गधतोमेन पूर्य च ॥३८ वर्धन्यामपि यत्लेन गायत्र्यगश्च सुप्रताः। विद्येश्वरान्दिशा कुभे ब्रह्मकून पूरिते ॥३६ तीन तत्वो से समुपेत सूत्र में जो कि वेटिका के ऊध्वं पूर्व पश्चिम भाग रूप है, केवल प्रणव के द्वारा विन्यास करे । 'नम: शिवाय:-'नमो हम शिवाय' इन मन्त्रो से विन्यास करने का भी एक मन्य पक्ष है ॥३२॥ अथवा रुद्राध्याय से सब का परिगृजन करके विन्यास करना चाहिए।
लिङ्गपुराण स्थित कुम्भ में भगवान शिव तथा जगदम्बा का मौर दक्षिण में परमे- श्वरी का विन्स करे । ॥३४॥ सुनिमित स्कन्द के कुम्भ मे उन दोनों के मध्य में स्कन्द का विन्याम करना चाहिए। स्वाद के कुम्भ मे ब्रह्मा का अथवा ईश के कुम्भ मे हरिका विम्बा शिव कुम्भ मे ब्रह्माङ्गों का विन्यास करना चाहिए। शिव-महेश्वर-रुद्र-विष्णु-पितामह ये सब ब्रह्मांग हो हैं । ॥३५॥३६॥ इस प्रकार मे सभेप से ब्रह्मो को तथा हृदयादि भङ्ग उमा इन सब को पूर्व वणित विवि से युक्त वेदि के मध्य मे विन्य- स्त करे ॥३७॥ खङ्गाकारा वर्षनी में देवी को स्थापित करे । सुगन्धित जल से पूरित करके हिरण्य-रजत और रल शिर के कुम्भ में विन्यस्त करे ॥३८॥ वर्षनी कुम्भ में भी यत्न पूर्वक गायत्री के प्रङ्ग मन्त्रों के द्वारा हिरण्यादि विद्यश्वर पाठो को ग्रह्मपूर्व से परित दिशा कुम्भ मे विन्यस्त करना चाहिए ॥३६॥ अंनतेशादिदेवांश्च श्णवादिनमीतकम् । नववस्त्र प्रतिघटमष्टा भेषु दापयेत् ।। विद्येश्वराणां कु भेषु हेमरत्नादि विन्यसेत् । वक्त्र क्रमेण होतव्य गायव्यंगक्रमेण च ।।४१ जयादिस्विष्टपर्यंत सर्व पूर्ववदाचरेत् । सेचयेच्छिवकुभेन वर्धन्या वैष्णवेन च ७२ पतामहेन कुभेन प्रह्ममागं विशेषतः। विधेश्वराणा कुमश्च से वयेत्परमेश्वरम् ।।४३ विन्यसेत्सर्वमंत्राणि पूर्ववत्पुममाहितः । पूजयेत्स्नपनं कृत्वा सहमादिपु संभवः ॥४४ दक्षिणा च प्रदातव्या मह्मणमुत्तमम् । इतरेप सदध स्यात्तर वा विधीयते ॥४५ प्रावमादि में सगापरतया 'नम:'-इसे पस्त में जोरर मनाते- हादि देवो गोदियान को मोर इन पाटों पुम्मों में प्रत्यारो नवीन बस दिलाना चाहिए ॥४॥ विसरों के मुम्मों में हेम और सामादिरा विन्यास करना चाहिए । विभर पाठविपासों के
लिंग स्थापन और फल श्रुति ]
[ ४१७
लिये ईशानादि मुख के क्रम से तथा गायत्री के प्रङ्ग क्रम से हवन करना
चाहिए ॥४१॥ जय से प्रादि लेकर स्विष्ट पर्यन्त सम्पूर्ण पूर्व की भांति
करना चाहिए । शिव कुम्भ से-देवी कुम्भ से और विष्णु कुम्भ से सेचन
करना चाहिए ॥४२॥ पतामह कुम्भ से विशेष रूप से ब्रह्म भाग को भोर
विद्यश्वरो के कुम्भो से परमेश्वर वा सेचन वरे ।।१३। ईशान दि सम्पूर्ण
मन्त्री को पूर्व की भांति सुसमाहित होकर विन्याम वर । सहा मुरयो मे
यथोपन कुम्भो के द्वारा स्नपन करके पूजन करे ॥४४॥ उत्तम स्वादि
सहस्र कर्प दक्षिणा देनी चाहिए । इतरो को उसका प्राधा अर्थात् सह
स्थापित अन्य देवो को उसके अर्ध भाग का विधान होता है ।।४।।
वनाणि च प्रधानस्य क्षेवभूषणगोधनम् ।
उत्सवश्व प्रकर्तव्यो होमयागलः क्रमात् ॥४६
नवाह वापि सप्ताहमेकाहं च व्यहं तथा ।
होमश्च पूर्ववत्प्रोक्तो नित्यमभ्यर्थे शकरम् ।।२७
देवाना भास्करादाना होम पूर्ववदेव तु ।
अभ्यतरे तथा बाह्य वह्नी नित्यं समर्चयेन् ।।४
य एव स्थापयलिंग स एव परमेश्वः ।
तेन देवगणा रुद्रा टपयोऽपरसस्तथा ॥४६
स्थापिता पूजिता व लोक्य सवराचरम् ॥५॥
प्रधान शिव धो क्षेत्र गोधन भूपण मोर वस्त्रो का करके
कम से होम-याग और बलि से युक उस्मव करना चाहिए । ॥४॥
निरय प्रति भगवान् शङ्कर पी अभ्यर्चना करके यह उत्सय नौ दिन वा.
सात दिन वाला-तीन दिवम वा पोर एक दिन करे। तथा होम पूर्व मे
पायित विधि से ही करे ॥७॥ भासार प्रादि देवो वा होम पूर्व के
समान ही करे सपा सभ्यन्तर एव वाह वह्नि मे नित्य समर्थन करना
पाहिए ॥४८॥ जो इस प्रकार से लिङ्गको स्थापना करता है यह ही
परमेश्वर है । उससे सब देवगण-सम्पूर्ण स्ट-गमस्त ऋषि और मप्सराएँ
एप पराचर प्रैलोक्य स्पापित यमा पूजित हो जाने हैं ॥६॥५॥
४१८] [ लिङ्गपुराण ॥६-सर्व देवता स्थापन विधि निरूपण ॥ सर्वेषामपि देवाना प्रतिष्ठापि विस्तराद । स्वमर्यागकुट न विन्य य, कमेव च ॥१ स्थापयेदुरूव कृत्वा पूजयेच विधानतः । भानो पंचाग्निना कार्य द्वादशाग्निक्रमेण पार सर्गकुडानि वृत्तानि पन काराणि सुव्रताः। अबाया योनिकु स्याद्वर्धन्येका विधीयते ।।३ शक्तीना सर्वकार्येषु योनिकुडं विधीयते । गायत्री कल्पयेच्छभो सबै पामपि यत्नतः । सर्वे रुद्राशजा यस्मात्संक्षेपेरण वदामि वः ॥४ तत्पुरुषाय विद्महे वाग्विशुद्धाय घोमहि । तन्नः शिव प्रचोदयात् ॥ गरांबिकाय विद्महे वमंसिद्धय च धीमहि । तन्नो गोरी प्रचोदयात् ॥६ तत्पुरुषाय विचहे महादेवाय धीमहि । तन्नो रद्रः प्रचोदयात् ।।७ सर्व देवता स्थापन विधि निरूपण । सूतजी ने कहा-रामस्त देवों की प्रतिमा को भी विस्तार से बतलाता है। अपने उनके मन्त्रों के द्वारा याग कुण्डो वा विन्यास करके एक-एक देवता की स्थापना करे ॥१॥ स्थापना करने व उपरान्त उत्सव फरसे विधि विधान से उनका पूजन करना चाहिए । है मुवतो ! मातु को स्थापना करे। पञ्चाग्नि पश्वा बादशानि के कम से करना चाहिए । समा कुण्ड वृत्त और पम के समान माकार वाले रतिर परे। घा का योनि कुण्ड करे और एक वर्षनी की जाती है ॥२॥ ॥ शक्तियो का सम्पूर्ण कार्यों मे योनि कुण्ड का विधान किया जाता है। शम्भु की और सभी की गायत्रो वा यन पूर्वक कल्पना करे। सर रुद्र के घश से समुत्पन्न हैं इसलिये सक्षेप में मारको बतलाता हूँ ॥४॥ प्रब गायत्री के भेद बसलाये जाते हैं शिव की गायत्री यह है- "तत्पुरुषाय विद्महे वाग्दि सुदाय धीमहि । तनः सर्व देवता स्थापन० ] [ ४१६ शिवः प्रचोदयात्" ॥५॥ गौरी गायत्री यह है-"गणाम्बिकाय विद्महे । कगं सिद्धय च धीमहि । तन्नो गोरी प्रचोदयात्"-हम गणों को अम्बि. का का ज्ञान प्राप्त करते हैं और क्मों की सिद्धि के लिये उनका हम ध्यान करते हैं । वह भगवती गौरी हमको प्रेरणा प्रदान परे ॥६॥ रद गायत्री यह है-"तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि । तन्नो रद्र प्रपो. दयात्" । ॥७॥ तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुडाय धीमहि । तन्नो दंति: प्रचोदयात् ॥ महासेनाय विद्महे वाग्विशुद्धाय धीमहि । तन्न. स्कंदः प्रचोदयात् IIE तीक्ष्णशृगाय विद्महे वेदपादाय धीमहि । स्नो वृपः प्रचोदयात् । १० रिवक्त्राय विद्महे रुद्रवक्त्राय धीमहि । तन्नो नंदी प्रचोदयात् ।।११ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि । तन्नो विष्णु प्रचोदयात् ।। महांबिकाय विद्महे कर्म मिद्धं घ च धीमहि । तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॥१३ समुद्धृताय विद्महे विष्णु केन धीमहि । तन्नो धन प्रचोदयात् ॥१४ अब दती गायत्री बतलाते हैं-"तत्पुरुषाय विद्महै, वक्र तुण्डाय धीमहि । तन्नो दलि: प्रचोदयात" in स्कन्द गायत्री यह है-"महा सेनाय विद्महै । याम्मिशुदाय धीमहि । तन्नः स्कन्दः प्रचोदयात्" मधं तो सभी गायत्रियों को समान ही होता है । केवल देवता के नाम का ही भेद होता है ॥६॥ वृष गायत्री यह है- तोरण शृङ्गाय विगहे, वैद पादाय धीमहि । सप्तो वृषः प्रचोदयात्" ! इसके मनन्तर नन्दी गायत्री है-"हरियकत्राप वियदे । रुख वक्त्राय धीमहि । तन्नो नन्दी प्रचोदयात्" इसके उपरान्त विष्णु गायत्री है-"नारायणाय विहे । पासुदेवाय धी.
४२० ]
[लिङ्ग पुराण
महि । तलो विष्णुः प्रचोदयात्" । प्रत्येक गायत्री के तीन भाग होते
हैं । इनमे जिस देवता का नाम है उसके भागे चतुर्षी विभक्ति होती है
और जानते हैं-ध्यान करते हैं और प्रेरणा करो-ये सब मे होता है ।१०
॥११॥१२॥ लक्ष्मी गायत्रो यह है-"महाम्बिकायै विपहे। पर्म सिद्ध
प धीमहि । सन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्" । मय यह धग गायत्री है-"समु-
धुताय विधरे। विधानकेन धीमहि । तन्नो घरा प्रचोदयात् ।।१३-१४॥
वैनतेयाय विद्महे सुवर्णपक्षाय धीमहि ।
तनो गरुडः प्रचोदयात् ।।१५
पोद्भवाय विद्महे वेदवाय धीमहि।
तमः स्रष्टा प्रचोदयात् ।।१६
शिवास्यजाय विद्महे देवरूपाय धीमहि ।
तन्नो वाचा प्रचोदयात् । १०
देवराजाय विद्महे वजहस्ताय धीमहि ।
तन्नः शम: प्रचोदयात् ॥१८
रुद्रनेत्राय विद्महे शक्तिहस्ताय धीमहि ।
सन्नो वह्निः प्रचोदयात् ॥१६
अवस्वताय विद्महे दंडहस्ताय धीमहि ।
तन्नो यमः प्रचोदयात् ।।२०
निशाचराय विद्महे खङ्गहस्ताय धीमहि ।
त नो निति प्रचोदयात् ॥२१
इसके अनन्तर गरुड गायत्री बताते हैं-"वननेयाय विद्महे । सुवर्ण
पक्षाय धीमहि । तन्नो गरुड प्रचोदयात्" ॥१५॥ स्रष्टा गायत्री यह है-
'पभोद्भवाय विभो । वेद वक्त्राय धीमहि । ततः स्रष्टा प्रचोदयात्" ।
॥१६॥ मब वाचा गायत्री है-"शिवस्यजाय विपहे। देव रूपाय धीमहि ।
वन्नो बाचा प्रचोदयात्" ॥१७॥ अर्थात् इन्द्र गायत्री है-"देवराजाय
विद्महे । वय हस्ताय धीमहि । तरः शरु: प्रचोदयात्॥१८यब बहि
गायत्री यह है-"रुद्रनेत्राय विद्महे । शक्ति हस्ताय धीमहि । तनो यह्निः
भचोदपाद" | इसके पश्चात् यम गायत्री यह है- वैवस्वताय वि.
सर्व देवता स्थापन० ] [ ४२१ अहे । दण्ड हस्ताय धीमहि । तन्नो यमः प्रचोदयात्" ॥२०॥ अब निऋ- ति गायत्री बताई जाती है-"निशाचराय विद्महे । सङ्ग हस्ताय धीमहि । तन्नो निऋतिः प्रचोदयात्" ॥२१॥ शुद्धहस्ताय विद्महे पाशहस्ताय धीमहि । तन्नो वरुणः प्रचोदयात् ॥२२ सर्वप्राणाय विद्महे यष्टिहस्ताय धीमहि । तन्नो वायुः प्रचोदयात् ॥३ यक्षेश्वराय विद्महे गदाहस्ताय धीमहि । तन्नो यक्षः प्रचोदयात् ।।२४ सर्वेश्वराय विद्महे शूलहस्ताय धीमहि । तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ।।२५ कात्यायन्यै विद्महे कन्याकुमायें धोमहि । तन्नो दुर्गा प्रचोदयात् ।।२६ एवं प्रभिद्य गायत्री तत्तदेवानुरूपतः । पूजयेत् स्थापयेत्तेषामासनं प्रणवं स्मृतम् ॥२७ अथवा विष्णुमतुल सूक्तेन पुरुपेण वा । विष्णु चैव महाविष्णु सदाविष्णुमनुकमात् ।।२८ यह वरुण गायत्री है-"शुद्धहस्ताय विद्महे । पाश हस्ताय धीमहि । तन्नो वरुणः प्रचोदपाव" मव वायु गायत्री यतलाई जाती है-'सर्व प्राणाय विद्महे । यष्टि हस्ताय धीमहि । तन्नो वायुः प्रचोदयात्" ॥२२॥ ॥२३॥ इसके अनन्तर यदा गायत्री है-"यक्षेश्वराय विपहे। गदा हस्ताय धीमहि । तन्नो यक्षः प्रचोदयात्" । ॥२४॥ रुद्र गायत्री यह है-"सर्वे- श्वराय विद्महे । सूल हस्ताय धीमहि । तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्" ॥२॥ इसके पश्चात् दुर्गा गायत्री बताई जाती है- 'कात्यायन्य विद्महे । कन्या दुमाय धीमहि । तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्" । ॥२६॥ इस प्रकार से तत्तत गायत्री को भिन्नता करके उन देवो के लिये प्रणय का मनुरूप मासन कहा गया है । उनको स्थापना करे पोर फिर पूजन करना चाहिए ॥२७॥ अथवा प्रतुस विष्णु का पुरुष सूक्त से भौर अनुभम से विष्णु. देव के - [ लिङ्ग पुराण *महाविष्णु और सदाविष्णु को स्थापित करे॥२८॥ स्थापये वगायच्या परिकल्प्य विधानतः । यासुदेवः प्रधानस्तु तत: मंकपरणः स्वयम् ॥२६ प्रद्युम्नो ह्यनिरुद्धश्च मूर्तिभेदास्नु वं प्रभोः । बहुनि विविधानीह तस्य शापोद्भवानि च ॥३० सर्वावर्तेपु रूपाणि जगतां च हिताय वै। मत्स्यः कूर्मोऽय वाराहो नारसिंहोऽय वामनः ॥३१ रामो रामश्व कृष्णन वौद्ध वल्को तथैव च । तथान्यानि न देवस्य हरेः शापोद्भवानि च ॥३२ तेपामपि च गायत्री कृत्वा स्थाप्य च पूजयेद । गुह्यानि देवदेवस्य हरेनारायणस्य च ॥३३ विज्ञानानि च ययारिण मंत्रोपनिपदानि च । पच ब्रह्मांगजानीह पंचमतमयानि च ॥३४ नमो नारायणायेति मंत्र: परमशोभनः। हरेराक्षरागोह प्रणवैन समासतः ।।३५ ओं नमो वासुदेवाय नमः संकर्षणाय च । प्रद्युम्नाय प्रधानाय अनिरुद्धाय नमः ॥३६ देव गायत्री से परि कल्पन करके विधान से स्थापना करे । विष्ण्वा- दि ध्यूह में वासुदेव प्रधान है। इसके पश्चात् स्वयं सहपरा है तथा प्रद्युम्न और अनिरुद्ध ये सब प्रभु के ही मूत्ति भेद है । इस संसार मे साप से उत्पन्न होने वाले अनेक रूप है ॥२६॥३011 समस्त कृत युग मादि पावतों में इनके ये स्वरूप जगतो के हित के ही लिये हैं , भगवान विविध स्वरूपो में ही रम्प-कर्म-वराह नारसिंह वामन-राम-परसुराम- बलराम-कृष्ण-बोट और कल्की ये रूप हैं । तथा देव हरि के इनके प्रति- रिक्त भी शापोद्भव रूप हैं ॥३१॥३॥ उनको भी गायत्री की कल्पना करके स्थापना तथा उनकी पूजा करनी चाहिए । देवो के देव हरि नारायण के विज्ञान यन्त्र पौर मन्त्रोपनिषद् अत्यन्त गुह्य हैं । जो प्रसिद्ध है वे पाँच ब्रह्माज मर्यात सद्योजातादि स्वरूप है और पांच पायिवादि ।
श्री जयामिक वर्णन ] [ ४२३ प हैं । इन द्वारा स्थापन करके पूजन करे ॥३३॥३४॥ अव नागयण प्रादि मुख्य मन्त्रो को बनाते हैं- 'नमो नारायणाय"-यह नारायण का परम शोमन मात्र है। प्रणय के महित हरि का प्रष्टाक्षरीय मन्त्र हो। है- 'पोम् नमो वासुदेवाय"-इमी प्रकार से "प्रोम् नम"-यह जोडकर सपंगाय-अद्य म्नाय-प्रधानाय पनिरुद्धाय-इन शब्दो से भी मन्त्रों की रमना होती है ॥३॥३६॥ एवमैरेन मप्रेण स्थापयेत्परमेश्वरम् । ग्निानि यानि देवम्य शिवस्य परमेठिन ॥३७ प्रतिज्ञा चंच पूजा च लिङ्गमुनिमत्तमा । रत्नविन्याससहित कौतुक नि हरेपि ॥३८ पवले कारयेरमय चलेप्येव विधानतः। तन्नेत्रोन्मीलनं युग्निरमण सुग्रता ॥३६ क्षेत्रप्रदक्षिण व पारामस्य पुरस्य च । जलाधिवासन पंव पूर्ववत्सरिपोनितम् ॥४० पुटगडपनिर्माण शयन गविधीयते । हरसा नवा नमागेन नाटे यथाविधि ।'४' पपया पप टेपु प्रगाने वेवलेऽय था। प्रतिक्षा पिता दिशपारपर्यक्रमागता ॥५२ निनादमयानां श्विानां वितामागस्य या पुन, सापियागन प्रोपर टाय प्रशसिनम् । ४.
४२४ ] [ सिजपुराण चाहिए ॥४०॥ फुण्ड और मण्डप को रचना तथा शयन का विधान करे। 'नो कुण्डो नौ अग्नि के भाग से हवन यथा विधि करे ॥४१॥ अथवा पाँच कुण्डों में ही केवल प्रधान मे परम्परा से समागत दिन प्रतिष्ठा कही गई है ॥४२॥ शिलोद्भब जो पाषाण मूर्तियां होती हैं उनका शक्ताशक्त विवेक के द्वारा जल में अधिवास प्रादि किया जाता है। जो चित्रमयी मूतियां हैं उनका जलाधिवास नही बताया गया है। वृषेन्द्र का तो जला- घिवामन निश्चय ही कहा गया है ॥४३॥ प्रासादस्य प्रतिष्ठायां प्रतिष्ठा परिकीर्तिता। प्रासादांगस्य सर्वस्य यथांगानां तनोरिव ॥४४ वृषाग्निमातृविघ्नेशकुमारानपि यत्नतः । थोष्ठां दुर्गा तथा चंडी गायया वै यथाविधि ॥४५ प्रागाद्यं स्थापयेच्छंभोरावरणमुत्तमम् । लोकपालगणेशाद्यानपि शभोः प्रविन्यसेत् ।।४६ उमा चडी व नंदी च महाकालो महामुनिः । विघ्नेश्वगे मह भृङ्गो स्कदः सौम्यादितः प्रमात् ॥gs इद्रादीन्स्वेपु'स्थानेषु ब्रह्माण च जनार्दनम् । स्थापयेचंव यत्नेन क्षेत्रेश वैशगोचरे ॥४ सिंहासने एनंतादीन् विद्य शामपि च क्रमाद । स्थापयेत्प्रणवेनैव गुह्यांगादोनि पंकजे Iive एवं संक्षेपन. प्रोक्त चलस्यानसुत्तमम् । सर्वेषामपि देवाना देवीनां च विशेषतः ।।५० अब देव प्रसाद की प्रतिष्ठा की विधि के विषय में बताया जाता है कि प्रासाद की प्रतिष्ठा तो वोतित कर दी गई है। जिस तरह इस शरीर के मङ्ग होते हैं उसी भांति प्रासाद के भी मङ्गों को भी सब की प्रतिष्ठा मादि की जाती है ॥४४॥ अब भाउ माधरण देवो के विषय में कहते हैं कि पृषाग्नि मातृ विघ्नेश भोर कुमार मादि का सपा ४ दुर्गा और चण्डो का गायत्री मन्त्र के द्वारा विधि पूर्वक विन्यास एवं स्थापना प्रादि करने चाहिए ॥४॥ शम्भु के लोकपाल-रुद्रगण गणेगादि प्रमयगण अघोर रूपो शिव को प्रतिष्ठा ] [४२५ मापियो या जो कि परमोत्तम माठ प्रावरण है प्रागाद्य विन्यास तथा मापन परना चाहिए ॥६॥ उमा चण्डो-नन्दी-महाकाल-महामुनि- शिमेश्वर-महाभृतो सन्द इनका उत्तर दिशा प्रादि के अम से विन्यास पग्गा चाहिए ॥४७॥ अपने-अपने स्थानो में इन्द्र मादिया तथा प्रह्मा और जनादेश एवं त्राल या ईशान दिग्भाग में यत्न पूर्वक स्थापन गरे रामिहासन पर मनन्त प्रादि वी पौर प्रमरो वागीवरी की पौर पत्र में गुह्याम धर्मादि यो प्रणय के हो द्वारा स्थापना करे । इस प्रसार रो मागंर से पत्र बिम्बों को स्थापना-विधि यतादी गई है। मी तरह से समाज देयो राया विशेप करके देवियों की स्थापना की मापाती है ॥५०॥ ।। १००-अघोर रूपो शिव को प्रतिया ॥ अघोरेशम्प माहारम्पं भवतापित पुरा । पूजा प्रतित दगम्य भगवयग तुमहगि १ पारगाग गुमलेन यिपिया योपतः । प्रतिनिगविधिना नान्गमा गुनिपुगपाः २ रापासपूमा पंगुर्याधपा पूजा रायप। सागपाया तमोगराया ॥३ Fril zोपिमा Righ । Pariगरमानमार it R मंगोमा भगा। གr༑ གrs:4:1༣ atfitxts༣ iir [ लिङ्ग पुराण को बताया जाता है । ऋपियों ने कहा है सूतजी, मापने पहिले अघोर शिव की महिमा बतलाई थी हे भगवन् ! अब उन मघोर रूपी देव शिव की पूजा की पद्धति तथा प्रतिष्ठा के बता देने की कृपा कीजिए ॥१॥ सूतजी ने कहा हे मुनियो। हृदयादि प्रङ्गो से युक्त अघोर के द्वारा विधिवत् जिस प्रकार लिङ्ग की प्रतिष्ठा और पूजा होती है उसी विशेष प्रकार से यह भी की जाती है और अन्य इसका कोई विशेष प्रकार नहीं है ॥२॥ जैसे लिङ्गादि पूजा है वैसे ही अग्नि मे पूजा होती है । उसे निश्चय रूप से करना चाहिए। एक सहस्र या इसका अर्थ भाग अथवा प्रष्टोत्तर शत मधु-दधि और घृत से युक्त तिलो के द्वारा होम करना चाहिए। घृत-मवतु (सतुमा ) और मधु के द्वारा हवन सम्पूर्ण दुःखो का मिटा देने वाला होता है ॥२॥३॥ ४॥ यह हो । ममस्त व्याधियो के नाश करने वाला होता है । तिलो के द्वारा किया हुआ होम भूति (वैभव) के प्रदान करने वाला होता है । एक सहस अघोर मन्त्र के जाप से महा विभूति की प्राप्ति होती है और एक शत के जप से व्याधि का नाश होता है । ॥५॥ अघोर मन्त्र के जप से सम्पूर्ण प्रकार के दु खो से छुटकारा हो जाया करता है-इसमे कुछ भी सशय नही है । तीनों कालो मे अष्टो. तर शत हो विधि के सहित जप करना चाहिए ॥६॥ मष्टोत्तर सहस्त्र जप से छे माम मे राज्य मण्डनियो को भी सिद्धियां होती है-इसमे तनिक भी सन्देह नहीं है ॥७॥ सहस्रण ज्वरो याति क्षीरेण च जुहोति यम् । त्रिकाल मासमेकं तु सहस्र जुहुयात्पयः15 मासेन सिद्धयते तस्य महासौभाग्यमुत्तमम् । सिद्धयते चाब्दहोमेन क्षौद्राज्यदधिसंयुनम् || यवक्षीराज्यहोमेन जातितडुलकेन वा। प्रीयेत भगवानीशो घोरः परमेश्वरः ।।१० दघ्ना पुष्टि पारणां च क्षीरहोमैन शांतिकम् । पण्मासं तु घृतं हत्वा सर्वव्याधिविनाशनम् ॥११ राजयक्ष्मा तिलोमानश्यते वत्सरेण तु ।
अघोर रूपी शिव को प्रतिष्ठा ] [४७ यवहोमेन चायुष्य घृतेन च जयस्तदा ॥१२ जिस उद्देश्य का लेकर भोर से हवन करे तो एक सहस्र पाहुतियो स ज्वर चला जाता है । तीनो कालो मे एक मास पर्यन्त एक सहस्र दूध को पाहुतियां देनी चाहिए या एक मास मे उसको महान् उत्तम सौभा- ग्य की सिद्धि हो जाती है। मधु घृत और दधि से युक्त एक वर्ष पर्यन्त होम करे अथवा जो दुग्ध और घृत से किम्बा जातिपुष्प और तण्डुलों से हवन परे तो भगवान् ईश परमेश्वर अघोर परम प्रसन्न हो जाते हैं ।। ॥१०॥ दही से नृपो की पुष्टि होती है और क्षीर के होम से परम शान्ति का लाभ होता है और छ मास तक पृत का हवन करने से समस्त प्रकार की व्याधियो का विनाश हो जाता है ॥११॥ राजयक्ष्मा की भया. नक बीमारी भी एक वर्ष तक तिलो के द्वारा हवन करने से नष्ट हो भाया करती है । यवो के होप से प्रायु की वृद्धि होती है तथा पूत के होम से सर्वदा एव सर्वत्र जय की प्राप्ति हुमा करती है ॥१२॥ मर्वकुष्ठक्षयार्थं च मधुनावतश्च तडुलै । जुयादयुत नित्य पण्मासानियत. सदा ।।१३ आज्य क्षीर मधुश्च व मधुरभयमुच्यते। समस्त तुष्यते तस्य नाशयेद्व भगदरम् । ११ केवल घृतहोमेन सर्वरोगक्षय स्मृत । सर्वव्याधि र पान स्थापन विधिनार्चनम् ॥१५ एव सक्षेपत प्रोक्तमघोरस्य महात्मन । प्रतिष्ठा यजन सर्व नदिना कथित पुरा ॥१६ ब्रह्मपुत्राय शिष्याय तेन व्यामाय सुबता ॥१७ समस्त प्रकार के कुष्टो के विनाश करने पे लिये मधु से भक्त तण्डुलो से नित्यप्रति नियत होकर छ मास तक दश सहस्र प्राहुतियां देवे ॥१३॥ घृत क्षीर मौर मघु इन तीनो का नाम मधुर जय कहा जाता है । इसके द्वारा यजन करने वाले व्यक्ति से समस्त विश्व परम तुष्टि को प्राप्त होता है। यह मपुर त्रय भगदर रोग को नाश कर देता है ॥१मा केवल के होम करने से ही समस्त रोगो का क्षय हो जाता है। सय प्रकार --
४८ }
[ लिन पुराण
माधिोim Tru पोरगिपिपूर मार गे होग
॥१॥ग प्रर मे मनाना प्रपोरगी प्रमिशा तया यजमाना
गोपिहिने नदी ने पहले धो गोमाको घनाई गई है। है गुगलो!
मनी मे महापुरसिप्प पास गोया पो।।१७॥
॥ १०१-अघोरेशा-प्राराधन निग्रह ।।
निग्रहः पिरास्तेग निययाग शूमिना ।
गृानापराधिना संत महंगि सना
त्यानयिदिनास्ति नोतिन वैदिकं तया।
श्रोत स्मात महामाग रोगहरण सुयन।'
पुरा भृगुमुतेनोक्ती हिरा र सुमना ।
निग्रहोऽधोरनिष्येण गुकोणाशयतेजमा ३
तस्प प्रसादाई त्येंद्रो हिरण्याक्ष प्रतापवान् ।
लोक्यमविल जित्वा सदेवासुरमानुपम् ।।
उत्साय पूरा गरगप चाधकं चारविक्रमम् ।
राज लोके देवेन वराहेण निपूदित १५
स्त्रीबाघा बालयाचाच गवामपि विशेषतः।
युर्वतो नास्ति विजयो मार्गरणानेन भूतले ॥६
तन देत्येन सा देवी धरा नीता रसातलम् ।
तेनाघोरेण देवेन निष्फलो निग्रह वृनः ॥७
इस अध्याय मे भगवान् प्रपोरेश के पारायन से जुन प्रोक्त निग्रह
विधि का निरूपण किया जाता है। ऋषियो ने वहा-शिववक्त्र शूली
के द्वारा मापने निग्रह तो परिणत कर दिया है । भर माप कृपा करके
कृतापराधियो के निग्रह की विधि को बताने के योग्य हवे हैं । हे सुप्रत
रोमहर्षण । हे महान भाग वाले ! लौकिक वैदिव और स्मात मापको
जात न हो ऐसा तो है ही नहीं प्रर्थात् सभी कुछ भली-भांति जानते हैं।
मूतजी ने कहा है सुव्रतो । पहिले भृगु सुत ने इसे हिरण्याक्ष को बताया
था क्योकि मधोरेश भगवान के शुक्राचार्य परम शिष्य थे और मक्षय तेज
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अघोरेश आराधन निग्रह ]] [४६ पाले थे ॥१॥२॥३॥ उसी के प्रसाद का यह प्रभाव था कि देत्येन्द्र परम प्रतापी हिरण्याक्ष सम्पूर्ण प्रैलोक्य को जिससे देव प्रसुर और मनु य सभी थे जीत लिया था। वह चारु विक्रम वाले गणप भन्धक पुत्र को उत्पन्न वरचे लोक में सुशोभित हुमा था । अन्त मे भगवान् वराह देव के द्वारा मारा गया पा ॥४॥शा इस निग्रह विधि में जो वाधक होते हैं उन्हे बतलाते हैं-इसमे तीन पाधाएँ हैं लो यापा, बाल वापा चोर विशेष वरचे गो वापा हुमा बरती है । इस भूतन इनको य ने वारे या विजय नही होता है और इसी कारण से यह हिरण्याक्ष मारा गया था ॥६॥ म देय न देवी धरा को पाताल मे पहुंग दिया था । पतएव उम पपोर देव ने यह निग्रह निप्पल पर दिया था |७|| सवत्सर सहस्राते वराहेण च सूदिनः । तस्मादपोमिद्धयर्थ य हाणान्नेव वापयेत् ।। कोणामपि विछोपेगा गवामपि न कारयेत् । गुह्याद्गृह्य म गोप्यमतिगृह्य वदामि व पानतायिनमुद्दिश्य कर्तव्य नृपमत्तमै । प्रहारगम्यो न व तंव्य स्वरादास्य या पुन. ॥१२ प्रतीव दुजरे प्रप्ते बले गर्द निपूदिन । अधर्मयुद्ध सपने पुर्ण धिमनुतमम् ॥११ अग्गेनं TT पुरणेनेच पारयेत् । नमाये न स हो निग्रह सज यो २ सक्षम म2001 पोर पारमपित दगार शिपिना हावा निमेन द्विजसत्तमा ११ मपूग्य मापुष्पेग सितेन विधिपूर्वकम् । यानिध्यमा यही दक्षिणामूर्तिमा १४ एम mai भान गा मा nirurt पनि पोको गभी या मह wilme fadne मिको रामों को भी शापित म पारिए RET पद पर Miami प्रतिमा - ४३० ] [लिश पुरस रहा हूँ IIEI इसे राजापों के द्वारा जो माततायो पति मारने को बचत हो उसी का उद्देश्य से कर करना चाहिए । ब्राह्मणों के लिये पौर अपने राष्ट्र के स्वामी के लिये इमे कभी नहीं करना वाहिए ना इस परम उत्तम विधि को उसी समय करे वर कि यह देखने कश्यना हो दुर्जय प्राप्त हो गग है पीर सम्पूर्ण बल का प हो गया है तथा धर्म पुर मम्प्राप्त हो गया है ।।११। इस विधि को कर के द्वारा ही करना चाहिए और रियो कार अाहाण के द्वारा होमरामा भी चाहिए पनि यह एक पान पर ही होता है। इसमें कोई भी सन्देह नहीं है कि इम पारने मात्र से ही निग्रह गमुत्पन्न हो जाय परता है ॥१२॥ है जिसरामो ! म पोरकर याने पचोर मन एER माप करके फिर म जापा पुल योजा के भार विधिपूर्वक तिलों के द्वारा कर संख्यामा भाग 1 हपन करना चाहिए Intमरे पनातर माण मिल मे पक्ष्या यहि में दक्षिणा मूति मा पारित होकर एमपुर मे विधि यो गहिरम करने से मात्र मि mm अघोरेश-पाराधन निग्रह ] [ ४३१ पाह्मण इसे करे। शिव का भक्त ब्राह्मण केवल गुरु के प्रसाद आदि से मन्त्र सिद्ध धीमान् को चाहिए इस विधि का उपयोग अपने लिये या राजा के उपकारार्थ हो करे । अब निग्रह का विधान बतलाते है पूर्वादि दिशा के स्वामियों के अन्त तक शूलाष्टक का न्यास करे । किस प्रकार का पूलाष्टक होना चाहिए-इसके विषय में कहते हैं वह तीन शिखा पाला मूल होना चाहिए और चौबीस जिसके अग्र भागो मे शिखाएँ होनी पाहिए । फिर दीरासम प्रादि के द्वारा अपने शरीर को सवुचित करके भयकर विग्रह सर्वनाश कर शरीर बनाकर ही प्रलयकारक अघोरेश का ध्यान करे और समस्त कर्म करे करावे । कालाग्नि कोटि के समान ही पपने भी शरीर की भावना करनी चाहिए ॥१५॥१६॥१७॥१८॥१६॥ शूलं कपाल पाशं च दडं चैव शरासनम् । बाण उमरुकं खङ्गमष्टायुधमनुक्रम त् ।। अष्टहस्तश्च वरदो नोलकठा दिगबर.। पचतत्त्वसमारूढा ह्यर्धचद्रधर प्रभु ॥२१ दष्ट्र'करालवदना रौद्रदृष्टिभंयकरः । हुफटकारमहाशब्दशब्दिताखिलदिड्मुखः ॥ २ प्रिय नागपाशेन सुबद्धमुकुट स्त्रयम् । सर्वाभरणसपन्न प्रेतभस्मावगुठिनम् ॥२३ भूत प्रेत पिशाचश्च डाकिनाभिश्च राक्षस । सवृत गजकृत्त्या च सर्पभूपणभूषितम् ।।२४ वृश्चाभरण देव नीलनीरदानस्वनम् । नोलाजन दिपकाश सिंहचर्मोतरायवम् ।।२५ ध्यायेदेवमपोरेश घरपोरतर शिवम् । पत्रिंशदुतमाताभि प्राणायामेन मुन । ॥६ महामुद्रासम युक्त गर्वकर्माणि कारयेत् । सिद्धमंत्रश्चितामाया प्रेतस्याने यपारिधि प्रय पपोरेग प्रभुरामा म मनाया जाता है-अपरेश प्रभु से पाठ हाप, उनमें कम से पास पागदएर रामा-याण-म ४३२ ] [ लिङ्गपुराग मोर खड्न धारण किये हुए हैं। प्रष्ट हस्त वरदान प्रदान करने की मुद्रा में विराजमान हैं। प्रभु का वएठ नील वर्ण का है और प्राप स्वय दिग- म्बर हैं । पांच तत्वो पर समारूढ है । नन्दिकेश्वर में पृथिव्यादि पांचो तत्त्व विद्यमान हैं। मस्तक पर अधं चन्द्र धारण किये हुए हैं ॥२०॥ ॥२१॥ दानो से विकराल मुख वाले हैं। रोद हर्टि से युक्त अत्यन्त भयङ्कर स्वरूप वाले हैं। हुझार और फ्ट इन महान् शब्दो के द्वारा समस्त दिशामा के मुखो को शब्दायमान करने व ले हैं ॥२२॥ तीन नेत्रो से युक्त हैं और नाग रूपी पाश से स्वय अपना मकुट बांधे हुए हैं । सम्पूर्ण प्राभरणो से समन्वित और श्मशान को भस्म से अवगुण्ठित शरीर वाला प्रापका समस्त शरीर है ।।२। उनके चारा ओर प्रेत भूत- पिशाच डाकिनी और राक्षस घिरे हुए हैं । गज चमं धारण किये हुए तथा सपों के भूपगो से भूपित वपु वाल हैं ॥२४॥ बिच्छुयो के पाभरण धारण करने वाले नील नीरद के समान ध्वनि वाले तथा नीलाञ्जन गिरि के सदृश और सिंह चर्म का उत्तरीयक धारण करने वाले हैं। ऐसे घोर से भी महाघोर स्वरूप वाले प्रभु अधोरेश शिव का ध्यान करना चाहिए, हे सुव्रतो । पूरक कुम्भक और रेचक के भेद से छत्तीस मात्रा से समन्वित प्राणायाम के द्वारा भगवान का ध्यान करना चाहिए ॥२॥२६॥ महा मुद्रा से समायुक्त होर सब कर्म करने कराने चाहिए। चिन्ता को अग्नि मे अथवा प्रेतो के स्थान इशान में विधि पूर्वक करने से यह मन्त्र सिद्ध होता है ।।२७। स्थापये-मध्य दशे तु ऐद्र याम्ये च वारुणे । कावेर्ण विधिवत्कृत्वा होमडानि शाखन ॥२८ प्राचार्यो कु डे तु साधकाश्च दिशासु व । परिस्तीर्य विलोमेन पूर्ववच्छूलसभृत ॥२९ कालागिपीठमध्यस्य स्वय शिष्यश्च ता हो । ध्यात्वा पोरमधोरेश द्वानिशाक्षरमयुगम् ॥३, विभीनवेन वै कृत्वा द्वादशागुलमानत । पटेनाम्य नृपेद्रम्य शत्रुमगारवेण तु ॥१ गि सपा पाम में प्रदर्शनी में ममान्दाहम पात्र से उत्पन्न अघोरेश-आराधन निग्रह ] [ ४३३ कुडस्याधः खनेच्छत्रु' ब्राह्मणः क्रोधमूच्छितः । अधोमुखोर्ध्वपादं तु सर्वकुडेपु यत्नतः ॥३२ श्मशानांगारमानीय तुपेण सह दाहयेत् तत्राग्नि स्थापयेत्त ष्णी ब्रह्मचर्यपरायणः ॥३३ मायूरास्त्रेण नाम्या तु ज्वलन दीपयेततः। कचुक तुपसंयुक्त. कापसास्थिसमन्विते. ॥३४ रक्तवनमम मिश्र मद्रव्यविशेषतः । हस्तयंत्रोद्भवस्तले. सह होमं तु कारयेत् ॥ ५ अब पंच पुएडो के विधान को बतलाते हैं- प्राचार्य को मध्य कुण्ड मे और साधक अन्य स्विजो को चारो दिशामो के कुण्डों मे हवन कर. ना चाहिए । पाँचो कुण्डो मे मध्य देश में और ऐन्द्र-वारण याम्य तथा फोवेरी दिशानो मे चार कुण्ड विधि पूर्वक शास्त्र की पद्धति के अनुसार निर्मित करावे ॥२८॥ प्रातिलोम्य क्रम से पूर्व की भौति शूलो से सवेधित होकर स्थिति होवे ॥२६॥ वालाग्नि पीठ के मध्य में स्थित होकर स्वयं और उसी प्रकार के शिष्यो मे सयुग आशिदक्षरी से युक्त तेतीग वरण? धाले घोर अघोश का ध्यान करे ॥३०॥ मव शत्रु के निग्रह को कैसे करे। इसका प्रकार बताया जाता है-विभीतक ( भिलावा ) वी सरडी से नपेन्द्र के शत्रु की प्रतिमा बारह अड्गुन प्रमाण वानी बनध वे और उसे महारक के द्वारा पीठ मे विन्यस्त बरे ॥३१॥ इसके पश्चन मोघ से मूरिछन होकर ब्राह्मण युण्ड में नीचे शत्रु का सनन परे । इस तरह समस्त कुपनो मे यत्न पूर्वक नीचे की मोर मुख तथा ऊपर की पौर पर धाला परे ॥३२॥ कि मशान तो चिना का प्रकार लाकर पों के साथ उमा दाह पर देवे । यो पर मोग रहते हुए ब्रह्मयं में पराया होर अग्नि वा ग्यापित वरना नाहिए ॥३मयूराम से नाभि में अग्नि पादान गरे । रत्ल वन से मान र पुर को धारण करता तपाय निति होम मे दान भरना माहिए ॥३॥ पटोत्तरगहन तु होमवेदनुपूर्वगः ।
४३४] । लिङ्ग पुराण कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां समारभ्य यथाक्रमम् ॥३६ अष्टम्पंत तांगारमंडलस्थानवजितः । एव कृते नृपेंद्रस्य शत्रवः कुलज. सह ॥३७ सर्वदुःखसमोपेताः प्रयोति यमसादनम् । मंगानेन चादाय नृकपाले नख तथा ॥३८ केश नृणां तथागारं तृपं कंचकमेव च । चीरच्छटा राजधूली गृहसमार्जनस्य वा । ३६ विषमर्पस्य दंतानि वृपदंनानि यानि तु । गवा चैव क्रमेणैव व्याघ्रदसनखानि च ॥४० तथा कृष्णमृगारणा च बिडालस्य च पूर्ववत् । नकुलम्य च नानि वराहस्य विशेषत ॥४१ दष्ट्राणि साधयित्वा तु मणानेन सुव्रताः । जपेदष्टोत्तरशत मंत्र चापोर मुत्तमम् ॥४. कृपए पक्ष की चतुर्दशी से प्रारम्भ करके यथाक्रम मष्टमी पर्यन्त भङ्गार मण्डल के स्थान को वर्जित करने वाले प्राचार्य को प्रष्टोत्तर सह- स्त्र प्रातियो द्वारा होम करना चाहिए । ऐमे विधाम से करने पर नृपेन्द्र के शत्रु कुलजों के सहित सय तरह के दुखो से पूर्ण होकर यमसादन का प्रचाण कर जाते हैं। अब एमरा शत्रु के विनाशन का विधान बतलाया जाता है - इस अघोर मन्त्र से मृत मनुष्य के मस्तक के कपाल मे नख. मनुष्यो के केश-प्रङ्गार तुप केचुली-वस्त्राञ्चल-राजमार्ग की पूलि-घर के समाज की धूलि विष सर्प के दांत बैल के दांत वराह की दाद इन सब को इस मन्त्र से साधित करके उक्त अघोर मात्र का अष्टोतर शन जाप करे । इन उक्त वस्तुपो के साथ गोदन. याघ्र के दांत और नाखून-काले हिरनो के दात तथा विडाल के दांत नकुल (न्यौला । दांत भी रक्खे । ॥४०॥४१॥४२॥ सरकापालं नाव क्षेत्र गृहे, वा मारेऽपि वा। प्रेतस्थानेऽपि वा राष्ट्र मृतवाण वेष्टयेत् ॥४३ शोरटमराशी वा परिविष्टे दिवाकरे।
अधोरेश-आराधन निग्रह ] [ ४३५ सोमे वा परिविष्टे तु मरणानेन सुव्रताः ॥४४ स्थाननाशो भवेत्तस्य शत्रोशिश्च जायते । शत्रुराज्ञ. समालिख्य गमने समवस्थिते ॥४५ भूतले दर्पणप्रख्ये वितानोपरि शोभिते । चतुस्तोरणसयुक्ते दर्भमालासमावृते ॥४६ वेदाध्ययनसपन्ने र ष्ट्र वृद्धिप्रकाशके । दक्षिणेन तु प देन मूनि सतायेत्स्वयम् ॥४७ एव कृते नृपेंद्रस्य शत्रुनाशो भविष्यति । स्वराष्ट्रपतिमुद्दिश्य य. कुर्यादाभियारिकम् ॥ ८ स आत्मान निहत्येव स्वकुल नाशयेत्कुधीः । तस्मात्स्वराष्ट्रगातार नृपनि पारयेत्सदा ॥४E मयोपविक्यिाद्यश्च सर्व परनेन सर्वदा। एतद्रहस्य कथित न देय यस्य कस्यचित् ।।५० इस पूर्वोक्त वपाल को परिपूर्ण वरात्र के क्षेत्रादि मे भटम राशि में सूर्य प्रथया चन्द्र वे परिविष्ट होने पर मथवा राहु ग्रस्त होने पर गृह- क्षेत्र नगर-प्रेत स्थान अथवा राष्ट्र मे हे सुप्रतो | इस मन्त्र से मृत यम्ब के द्वारा वैटिन परे ॥४॥४ा उसपे स्थान का माग होता है और त्रु षा नाग भी हो जाता है। मय निग्रह का तीसरा विधान बताते हैं - विजय परने के लिए गमन वे सम्प्राप्त होने पर भूतल मे दर्पण प्रग्य. विसान के कार शोभित-चार सोरणों से सयुत्त-दों की माला से समा. यावेदाध्ययन से ममान मोर माया राष्ट्र में दक्षिण पादस स्वप नरति उम की सिगित प्रतिमा मस्तर में गन्ताना र ४|४||४इरा प्रसार गे करने पर मुपेन्द्र या नाग हो जायगा। जो अपने राष्ट्रपति या य प स सरम प्रभिः पारिश करेगा तो वह युरो युधियाना परनी हो पाया निहनन गोपने दुल का नाग बरेगा। गमिरे अपने राष्ट्र के रहर नृपति पा सदा पाता रमा पाहि Intn म. पोपि मोर in पारिसे गाविसमा परम गोपनीय मयंदा गभीर [ लिङ्ग पुराण से रखना चाहिए । मैंने तुमको यह बता दिया है किन्तु इसे जिस किसी पाहे जिसको कभी नहीं बताना चाहिए ॥५०॥ ।। १०२-पाराशर वरदान वर्णन ।। राक्षसो रुधिरो नाम वसिष्ठस्य सुतं पुरा ॥ शक्ति स भक्षयामास शक्ते शापात्महानुज. ॥२ वसिष्ठयाज्यं विप्रेन्द्रास्तदादिश्यैव भूगतिम् । कल्माषपाद रुधिरो विश्व मिनेण चोदिक.॥ भक्षिन. स इति श्रु त्वा मिष्ठस्तेन रक्षसा । शक्ति शक्तिमना श्रेष्धे भ तृभिः सह धर्मवित् ॥४ हा पुन पुत्र पुति कंदमाना मुहुर्मुहुः । अरु धत्या सह मुनि पपान भुवि दुखितः ।।। नष्टं कुलमिति श्रुत्वा माँ चके मति तदा । स्मरपुत्रशतं चैव शक्तिम्येष्ठं न शक्तिमन् ॥६ न तं विनाहं जीविष्ये इति निश्चित्य दुःखितः ॥७ प्रारुह्य मूर्धानमजात्मजोशी तयात्मवान् सर्वविदात्मविच्च । घराघरस्यैव तदा धराया पपा पल्या सहमाशु दृष्टि सूरजी ने कहा-चाचीन काल मे रुधिर नाम वाला एक रापस हुमा था। उसने वसिट मुनि के पुत्र शक्ति का भक्षण कर लिया था। विशड्बु के यज्ञ निमाण अवसर पर विश्वामित्र दत्त शक्ति शाप के कारण सानुज भक्षण किया य । इस कथा का विशेष विवरण बाल्मी- कीय रामायण में दिया गया है ॥॥२॥ है विप्रगरण । उन समय मे फल्माप पाद भूपति को वसिष्ट याज्य र अपय में प्रादेश देकर ही विश्वा- मित्र ने रुधिर नामक रक्षम को प्रेरणा प्रदान की थी अर्थात् प्रेरित दिया था ॥३॥ शक्ति धारियों म परम धर्म का माता शक्ति प्रान भाइयों के सहित उम रुपिर नाम वाले राक्षम के द्वारा भक्षण कर लिया गया है-यह जब वसिम मुनि ने श्रवण किया था तो वह ' हा पुत्र हा पुत्र ।"-इस प्रकार से बारम्बार कदन करने लगे और पुत्र वियोग के .
पाराशर वरदान वर्णन ] [ ४३७ महान पोर से प्राविष्ट होकर अरुन्धती पे सहित परम दुखित होते हुए भूमि पर गिर पड़े थे ।।३।।शा मेरा सम्पूर्ण पुल ही नष्ट हो गया है- यह सुनकर उस समय में वसिष्ठ मुनि न मरन का निश्चय किया था । उन्हें बार-बार अपने सौ पुत्रो का स्मरण होता था जिन मे पाक्ति सबसे ज्येष्ट या मोर बहुत हो शक्तिशाली या ॥६॥ वशिष्ट गुनि ने उस समय मस्यन्त दुसित होर यही निश्चय frया था कि मैं उसके बिना जीवित नहीं रहूँगा ॥७॥ ब्रह्मा के मानस पुत्र वसिष्ठ यद्यपि मातम वेता पौर सर्व वैत्ता थे तो भी शोकाकुन होर पवन की चोटी पर चढ़ार अपनी मालो गे मापू बहाते हुए अपनी पत्नी के सहित सहसा पृथ्वी पर गिर पहे॥८॥ घराघरात पहित घरा तदा दधार तयापि विचित्रमण्ठी। यरोगभ्या करियलग मिनी रदन्तमादाय रोद सा च ॥ सदा तस्प स्नुपा प्राह पत्नो शयतेमहामुनिम् । धनिष्ठ वदत प्रेती भयावहता ॥१० भगवान ह्मण छ तय देहमिद शुभम् । पालयस्य विभो द्रष्टु ल्व पोन ममारम जम् ॥११ न त्याज्य तय विप्रेन्द्र देहमेनरमुगोभनम् । गर्भस्यो मम सपिंगाधर तिनो गम. १२ एयमुक्त्व य धर्मशागराक्षणा। उस्याप्य श्वगुर नया नेगे सगृप वारिग्गा ॥१३ गिताविपरित्रात भर दलित सदा। पा.पती परस्पारणी प्रापयामासnि५ उम TRY गिन की नु । पुत्र को पायो EDIT [लिङ्ग पुराण और वहाँ पर ही करिके समान गमन करने वाली विचित्र षण्ठो ने (पुत्र वधू ने । पाने पर कालो से रोते हुए उनको पकड लिया था और स्त्रय भी वह रोने लगी थी||११| फिर उसने कहा-हे विप्रेन्द्र । पापका यह शरीर प्रत्यन्त शोमन है प्रतएव इसका त्याग प्रापको नही करना चाहिए क्योरि मेरे गर्भ मे स्थित शक्ति मेरे पति देव का पुत्र विद्यमान है । वह समस्त प्रयों का साधन करने वाला होगा ॥१२॥ इस तरह से कह पर कमल के समान सुन्दर नेत्रो वाली उस पुत्र वधू ने जो कि धर्म के ज्ञान वाली थी, हाथो से वशुर (वसिष्ठ) पो उठाकर प्रणाम किया था और जल से नेनो को धोकर स्वयं अन्यन्त दुखित होते हुए भी उस समय मे दुखित श्वशुर की रक्षा करने के लिये अनि दुखित कल्या- रणी अरुन्धती से उसने प्रार्थना की थी॥१३॥१४॥ स्तुगवाक्य तत श्रुत्वा वसिष्ठोत्याय भूतलात् । सज्ञामवाच्य चालिंग्य सा पपात सुदु खिता।।२५ अरु धनी कगम्या ता सम्पृश्य स कुलेक्षणाम् । रुरोद मुनिशार्दूलो भार्यया सुनवत्सल. ॥१६ अथ नाम्यबुजे विष्णोर्यथा तस्याश्चतुर्मुख । पासीनो गर्भशय्याया कुमार ऋवमाह स ||१७ ततो निशम्य भगवान्वसिष्ठ चमादरात् । केनोक्तमिति सचित्य तदातिष्ठत्समाहितः ॥१८ योमागरणस्थोथ हरि पुंडरीकनिभेक्षण । वसिष्ठमाह विश्वात्मा घृणया स घृणानिधि ॥१५ भो वत्सवत्स विप्रेद्र वसिष्ठ सुतवत्सल । तव पौत्रमुखाभोजागेपाद्य विनि सृता ।। मत्समस्तव पौत्रासो शक्तिज शक्तिमान्मुने। तस्मादुत्तिष्ठ सत्यस्य शोक ब्रह्मसुतोत्तम ॥२॥ पानी पुत्र वधू के वाक्य का श्रवण कर फिर वसिष्ठ मुनि भूतल से उठ गये थे और होश में प्राकर भरती का उन्होंने पालिङ्गन किया था। प्रसुपो से भरे हुए नेत्रो वाली प्रतएव किसी को देखने में असमर्थ पाराशर वरदान वर्णन ] [४३६ उस अरुन्धती का हाथों से स्पर्श करके फिर अपनी भार्या के सहित वसिष्ठ रुदन करने लगे तथा न देखती हुई वह अरुन्धती भूमि पर गिर पड़ी थी। ॥१५॥१६॥ इसके अनन्तर नाभि कमल अर्थात् प्रणेव शायी भगवान् विष्णु की नाभि से समुत्पन्न कमल मे जिस प्रकार से चार मुख वाले ब्रह्मा जी थे उसी भांति उस वसिष्ठ की पुत्र वधू के गर्भ की शय्या में समामीन उस कुमार ने वेद की ऋचा बोली थी ॥१७॥ इसके पश्चात् चसिष्ठ महामुनि ने उस ऋषा का श्रवण बहुत ही मादर के साथ किया था और मन मे यह विचार किया था कि यह वेद की ऋचा किसने घोली है और फिर यह समाहित होकर स्थित हो गये थे ।।१८। इसके अनन्तर अन्तरिक्ष के प्रांगन मे स्थित पुण्डरीक के सहश सुन्दर नेत्रों वाले भगवान हरि ने जो कि इस सम्पूर्ण विश्व को आत्मा और अनुकम्पा के भागार है कृपा करके वसिष्ठ महा मुनीन्द्र से बोले-~॥१६॥ हे वत्स ! हे वसिष्ठ | तुम तो विप्रो मे परम श्रेष्ठ एवं शिरोमणि हो और अपने पुत्र पर अत्यन्त प्यार करने वाले हो। इस समय तुम्हारे ही गर्भ मे स्थित पौत्र के मुख से यह वेद को ऋचा निकली है ॥२०॥ हे महामुने ! यह शक्ति का प्रा-मज अापका पौत्र बहुत ही शक्तिशाली है और यह मेरे ही समान है । हे ब्रह्मा के परमोत्तम पुत्र ! इसलिये इस पुत्र मरण से समु- स्पन शोक का त्याग करके उठ जामो ।। २ ।। रुद्रभक्तश्च गर्भस्थो रुद्रपूजापरायणः । रुद्रदेवप्रभावेगा कुलं ते संतरिष्यति ॥२ एवमुक्त्वा घृणो विप्रं भगवान् पुरुषोत्तमः । वसिष्ठ मुनिशार्दूलं तत्रैवान्तरधीयत । २३ ततः प्रणम्य शिरमा वसिष्ठो वारिजेक्षणम् । अदृश्यंत्या महातेजाः पस्पर्शो दरमादरात् ।।२४ हा पुत्र पुत्र पुवेति पपात च सुदु खितः। ललापारुंधती प्रेक्ष्य तदासौ रुदती द्विजाः ॥२५ स्वपुयं च स्मरन् दुखात्पुनरेह्य हि पुत्रक। तव पुत्रमिमं दृष्ट्वा भो शक्ते कुलधारणम् ।।२६
४४० ]
[लिङ्ग पुराण
तवांतिक गमिष्यामि तव मामा न संशय ।
एवमुक्त्वा रुदविप्र आलिंग्या धनी तदा ॥२९
पप त नाडयनीव स्वस्य कुक्षो करण वै ।
अदृश्यंती जपानाथ शक्तिजस्याल्य शुभा ॥२८
स्वोदर दुखिता भूमो ललाप च पपात च ।
प्रम घती तदा भीता वमिष्ठश्च महामनि ॥२६
समुत्याध स्नुषा बालाचतुर्भयविह्वनौ ।
यह तुम्हारी पुत्र वधू के गर्भ मे स्थिा वालक भगवान् रुद्र देव का
परम भक्त है और रुद्र देव की पूजा में ही सतत तत्पर रहने वाला है ।
रुद्रदेव के प्रभाव तुम्हारा कुल सन्तीणं हो जायगा ॥२२॥ इस प्रकार से
परम कृपालु पुरुषोत्तम भगवान् विष वसिय से कहकर वहां पर अन्तर्ध्यान
हो गये थे ।।२३। इसके अनन्तर वसिष्ठ मुनि ने कमल के सदृश नेत्रो
वाले भगवान् विष्णु को प्रणाम शिर से किया था और फिर महान तेज-
स्वी मुनि ने परम पादर से अदृश्यन्ती का स्पर्श किया था ॥२४॥ फिर
"हा पुत्र ! हा पुत्र "-यह कहते हुए अत्यन्त शोक से दुखित होकर
गिर पडे । है द्विजगण । उस समय यह रुदन करती हुई अरुन्धती को
देखकर बोले-॥२शा प्रपने पुत्र का स्मरण करते हुए दुख से बार बार
हे पुत्र | यहाँ प्रानो ऐमा कहती हो सो शक्ति के कुल का पारण ने
वाले तुम अपने इस पुत्र को देखो । ॥२६॥ मैं तुम्हारे ही समीप मे
तुम्हारी माता अरुन्धती के साथ मा जाऊगा-इसमे कुछ भी सशय नहीं
है। सूरजी ने कहा-इस प्रकार से कहकर हे विप्र । उस समय में रुदन
करती हुई अरुन्धती का प्रालिङ्गन किया था ॥२७। इसके मनन्तर हाथ
से अपने कुक्षियो को ताडिन करती हुई वह गिर पडी थी। उस शुमा
प्रहरती ने शक्ति के प्रालय का हनन किया था ॥२८॥ अपने उदर
को पीटती हुई वह अत्यन्त दुखित होकर मालाप करने लगी और फिर
भूमि मे गिर पड़ी थी। उस समय मरुपती बहुत भयभीत हुई मौर
बसने तथा महान मति वाले वसिष्ठ मुनि ने अपनी पुन वधू का उठाकर
भय से विल्लल होकर दोनो ने उस वाला से कहा था ।।२६॥३०॥
[४४१ पाराशर वरदान वर्शन ] विचारमुग्धे सब गर्भमंडलं करांदुजाभ्या विनिहत्य दुर्लभम् । बुल वसिष्ठस्य समस्तमप्यहो निहंतुमा यथमुद्यता वद ॥३१ तवात्मजं शक्तिमुक्तं च दृष्ट्वा चास्वाद्य वक्त्रामृतमार्यसूनोः । धातुं यतो देहमिमं मुनीद्र सुनिश्चितः पाहि ततः शरीरम्।।३२ एव स्तुपामुपालभ्य मुनि चाधती स्थिता । अरु धती वसिष्ठस्य प्राह चातेतिविह्वला ॥३३ त्वय्येव जीवित चास्य मुनेयंत्सुनते मम । जीवितं रक्ष देहस्य धागो च कुरु यद्धितम् ॥३४ मया यदि मुनिश्रेष्ठो बानुवै मिश्रितं स्वकम् । ममाशुभ शुभ देह कार्यचित्पालयाम्यहम् ॥३५ प्रियदु खम्ह प्रामा घसती नात्र संशयः । मुने दुखादहं दग्या यनः पुत्री मुने तव ॥३६ अहोर्न मया दृष्ट दु खपात्रो ह्यहं विभो। दुखयाता भव ब्रह्मन्ब्रह्मसूनो जगद्गुरो ॥३७ हे विचार करने में मुग्धता धारण करने वाली ! तू अपने कर पमलों से अपने इस दुर्लभ गर्न मण्डल का हनन परके हे प्रायें ! वसिष्ठ के समस्त कुल का नाश करने के लिये क्यों उद्यत हो रही है ? यह हमें बतलादे ॥३१॥ शक्ति का पुत्र इस तेरे प्रात्मज को देखकर और प्रार्य पुत्र थे मुख रूपी अमृत का पान करके मनोन्द्र में इस अपने पारीर की रक्षा करने का निश्चय कर चुरा हूं। अतएव तू भी अपने परीर की रक्षा पर ।।१२।। सूतत्री ने कहा-प्रभन्धती ने इस तरह से अपनी स्नुपा अर्थात् पूत्र वयू को उपालम्भ देकर मोर मुनि वसिष्ठ से बह कर वहाँ परपित हो गई थी। उसने फिर कहा-हे सुयते ! इस गर्म में स्थित रासर मा-मनि वसिष्ठ का भोर मेरा जीवन तुझ में ही है अर्थात् रे ही जीपन रहने से हम सयरा जीवन रह सकता है। प्रतएव अपने जोयन की रक्षा करो पोर धात्री जो हित हो उमी को बगे ॥३३॥१४॥ भारपती ने सहा-यदि मनिष्ठ वसिष्ठ मेरे ही द्वारा अपने देह पोर जीवन की रक्षा करने को सुनिश्चित हो चुके हैं सो में अपने इस युग
४६२ ]
[ लिङ्ग पुराण
अथवा पगुम देह की किसी भी प्रकार से रक्षा बरूंगी ॥३५॥ मैं अपने
परम प्रिय पति के वियोग जन्य दुःख को प्रास हो गई हूं और में प्रमती
हूँ-इममें तनिक भी संशय नहीं है । हे मुनिवर ! मैं दुःख से दग्य हो गई
हूँ किन्तु अपको मैं पुत्री हूँ ॥६॥ हे विभो ! मैंने यह अत्यन्त प्रद्भुत
देखा है और मैं दु.ख की पात्री हूँ । है ब्रह्मन ! आप तो ब्रह्मा के पुत्र है
और इम जगत् के गुरु हैं। आप मेरे दुःख के त्राता बनें ।।३७॥
तथापि भर्तृ रहिता दीना नारी भवेदिह ।
पाहि मां तत मार्येन्द्र परिभूता भविष्यति ॥३८
पिता माता च पुत्राश्च पौत्रा: श्वशुर एव च ।
एते न बांधवाः स्त्रीणां भर्ता बंधुः परा गतिः॥३६
आत्मनो यद्धि कथितमध्यमिति पंडितः।
तदप्यत्र मृपा ह्यासोद्गतः शक्तिरहं स्थिना ॥४०
अहो ममात्र काठिन्य मनमो मुनिपुंगव ।
पति प्रारणसमं त्यक्त्वा स्थिता यत्र क्षणं यतः ॥२१
वसिष्ठाश्वत्थमाश्रित्य ह्यमृता तु यथा लता।
निर्मूलाप्यमृता मी त्यक्ता दीना स्थिताप्यहम् ॥४२
स्नुषा वाक्य निशम्यैव वसिष्ठो भार्यया सह ।
तदा चक्र मति धीमान यातु स्वाश्रममाश्रमी ।।४३
कृच्छात्सभार्यो भगवान्वसिष्ठः स्वाश्रम क्षणात् ।
अदृश्यत्या च पुण्यात्मा सविवेश स चितयन् ।४४
इस ससार मे अपने स्वामी से रहित नारी बहुत ही दीन-हुमा
करती है तो भी प्राप मेरी रक्षा करें। हे भार्येन्द्र ! परिभूत हो जायगी
॥३८ ससार मे खियो के माता-पिता, पुत्रपौत्र मौर श्वशुर ये सब
याघव नही हुमा करते हैं। स्त्रियो का एक मात्र पति ही परम वधु
मौर परम गति होता है ॥३६॥ पण्डित जनो के द्वारा जो मात्मा का
अधर्म कहा गया है वह भी यहाँ पर मिथ्या हो गया था क्योकि मेरे
स्वामी सक्ति तो परलोक प्रवासी हो गये है मौर में इस संसार में
जीवित स्थित हूँ॥४०॥ हे मुनियो मे परम पोष्ट ! महो! यह भी मेरे
पाराशर वरदान वर्णन ]
[४३
मन की यहाँ पर एक प्रकार की कठिनता ही है कि अपने प्राणों के तुल्य
पति के अनुगमन करने का त्याग करके यहां संमार में इन क्षणों में
जीवित रहती हुई विद्यमान हूं ॥४१॥ वसिष्ठ रूपी अश्वत्थ (पीपल)
वृक्ष का प्राश्रय ग्रहण करके न मुरझाने वाली लता के समान बिना मूल
वाली भी स्वामी के द्वारा व्यक्त दीन-हीन मैं जीवित यहां पर स्थित हूँ
१४२।। वसिष्ठ मुनि ने अपनी भार्या अरुन्धती के सहिन प्रपनी पुत्र वधू
के इन वचनों का अचरण कर पाम बुद्धिनान् पाश्रमी वसिष्ठ ने अपने
माश्रम में जाने का विचार किया था। ॥४३॥ बड़ी क्लेश की कठिनाई
के साथ भार्या के सहित अदृश्यन्ती को साथ में लेकर पुण्यात्मा भगवान्
वसिष्ठ ने मन मे चिन्तन करते हुए अपने प्राश्रम में प्रवेश किया था १४४॥
मा गर्भ पालयामास कयंचिन्मुनिपुगवाः ।
कुलसंधारणार्थाय शक्ति पत्नी पतिव्रता १४५
ततः सासून तनयं दशमे मासि सुप्रभम् ।
शक्तिपत्नी यथा शक्ति शक्तिमतमरुध ॥४६
प्रसूत सादिति विष्णु यथा स्वाहा गुहं सुतम् ।
अग्नि यथाररिणः पत्नी शक्तेः साक्षात्पराशरम् ।।४७
यदा तदा शाक्तसूनुरवतीर्णो महीतले ।
शक्तिस्त्यक्त्वा तदा दु.खं पितृणां समतां ययौ ॥४८
भ्रातृभिः सह पुण्यात्मा प्रादित्यरिव भास्करः ।
रराज पितृलाकस्था वासिष्ठो मुनिपु गवाः ॥४६
जगुस्तदा च पितरो ननृतुश्च पितामहाः ।
प्रपितामहाश्च विप्रेन्द्रा ह्यवतीर्णे पराशरे ॥५०
ये ब्रह्मवादिनो भूमौ ननृतुर्दिवि देवताः
पुष्कराद्याश्च ससृजुः पुष्पवर्ष च खेचराः ॥५१
पुरेपु राक्षमानां च प्रणादं विपमं द्विजाः।
पाश्रमस्थाश्च मुनयः समूहहपसंततिम् ॥५२
हे मुनिश्रेष्ठो! परम पतिव्रता उस पक्ति की पत्नी ने अपने कुल
के संधारण करने के लिये किसी प्रकार से बड़ी कठिनाई के साथ अपने
४४४ ] [ लिङ्ग पुराण उदरस्थ गर्भ का पालन किया था ॥४॥ इसके अनन्तर उस शक्ति की पत्नी ने दश मास में जिस तरह से भरुन्धती वसिष्ठ की पत्नी ने शक्ति मान को समुत्पन्न किया था उसी भौति सुन्दर प्रभा से मम्पन्न पुत्र को प्रसूत किया था ॥४६॥ उस शक्ति को पलो ने दिति ने विष्णु की भौति स्वाहा ने अपने सुत गुह के समान और अरणि ने भग्नि के सृत्य साक्षात् पराशर पुत्र को जन्म प्रदान किया था ॥४७॥ जिस समय में इस मही. तल मे शक्ति का पुत्र पराशर भवती हुमा था उस समय में शक्ति ने दुख को त्याग कर के पितृ गणो की समता को ग्रहण किया था ||४|| हे मुनियो मे परम श्रेष्ठगण ! वह पुण्यात्मा वसिष्ठ का पुत्र भास्कर मादित्यो के साथ जैसे दीतिमान होता है वैसे ही अपने भाइयों के साथ पितृ लोक मे स्थित होकर दोसि से युक्त हुए थे ॥४६॥ उस समय में समस्त पितृगण मानन्द में मग्न होकर गायन करने लगे है विप्रेन्द्रो! पराशर के इस संसार में प्रवतीर्ण होने पर पितामहो का समुदाय हर्ष से नृत्य करने लगा था और जो प्रपितामहो का गण था वह भी हर्षातिरेक में निमग्न हो गया था ॥५०॥ इस क्षिति तल में जो ब्रह्मवादी लोग थे वे भोर स्वर्गलोक मे देवगण भी परम प्रमन्नता से उस समय नृत्य करने लगे थे । पुष्कर पादि जो सेचर थे वे अन्तरिक्ष से पुष्पो को दृष्टि करने लगे थे ॥५१॥ गिद्ध भादि पक्षी राक्षसों के नगरों मे ममङ्गल शब्द कर रहे थे। पाश्रमो मे स्थित रहने वाले मुनिगण अत्यन्त हर्ष प्रकट कर रहे थे॥५२॥ अवतीयों यथा ह्यडाद्भानु: सोषि पराशरः। मदृश्यंत्याश्चतुर्वक्मो मेघजालादिवाकरः ॥५३ सुखं च दु.खमभवददृश्यत्यास्तथा द्विजाः । दृष्ट्वा पुत्रं पति स्मृत्वा अरु धत्या मुनेस्तथा ॥५४ दृष्ट्वा च तनयं बाला पराशरमति द्युतिम् । ललाप विह्वला बाला सन्मकंठी पपात च ॥५५ सा पराशरमहो महामति देवदानवगणश्च पूजितम् । जातमात्रमनघं शुचि स्मिता बुध्य साश्रु नयना ललाप च ।।५६ 11म प्रारभरमयन्ती विनापरने पनन्नरमनिया में पाराशर वरदान वर्णन ] [ ४४५ हा वसिष्ठसुत फुत्रचिद्गतः पश्य पुत्रमनध तवात्मजम् । स्यज्य दीनवदना वनान्तरे पुत्र दर्शनपरामिमां प्रभो ॥५७ शक्ते स्व च सुतं पश्य भ्रातृभिः सह षण्मुखम् । यथा महेश्वरोपश्यत्सगणो हृषिताननः ।।५८ अय तस्यास्तदालाप वसिष्ठो मुनिसत्तमः । धु त्वा स्नुपामुबाचेद मारोदोरिति दुम्वितः ।। भाज्ञया तस्य सा शोकं वसिष्ठस्य कुलांगना । स्यक्त्वा ह्यप लयद्वालं बाला बालमृगेमणा ॥६० जिस प्रकार से अण्ड से चार मुख वाने ब्रह्मा समुत्पन्न हुए थे उमी भांति अदृश्यन्ती के गर्भ से यह पराशर भी प्रयतीणं हुए ये मानो मेघो की घटा मे से निकलकर सूर्य ने अपनी प्रभा का प्रकाश फैला दिया हा ॥५३॥ हे द्विजगरण ! उस समय मे पराशर को माता ग्रहश्यन्ती को अपने पुत्र का मुखावलोरन कर पति का स्मरण हो जाने में गुग्न और दुख दोनो ही हुए थे। इसी तरह मुनि वसिष्ठ को एव परन्धती को भी पौत्र को देखकर तो सुख हुमा पिन्तु पुत्र का स्मरण हो पाने से हृदय म दु.स भी हुमा था ॥५४॥ उस बाला ने अत्यन्त अपित पति पाले अपने पुत्र परागर को देवार बहुत ही विह्वल होते हुए विलाप दिया था और पह सन्त कण्ठ पाली होकर भूमि पर गिर पड़ी थी ॥५५॥ उमने महा मति बाले-देवगणों के द्वारा पूजित निषा उत्पन्न हुए ही पुत्र को जान कर शुचि स्मित वाली मावो में मामू भरकर वह विलाप से लगी थी ॥५६॥ हा पप्ठि मनि पुत्र ! भाप हो गले गये हैं। प्राने इप अपाहिन पुत्र को तो देग लो। पुत्र के दर्शन मे पगपण दोन मुम यानी इसको। मुझे स्याग परके बनान्तर में पाप रही पने गये है ? ॥५॥ हे शाक्त ! जिस तरह गणो के हित प्रसन्न मग वाने महशर भाइयो के साप पामुरा को देगते हैं उमी मानि प्राप इम पपने पुत्र को देख वसिष्ठ ने सो इस विसापरा यया पर अपनी पुर यपू से PER और महा हो पिग दुगा ए-हे पुत्र !
४४६ ] [ लिङ्ग पुराण रुदन मत कर ॥५६॥ उस वसिष्ठ मुनि की प्राज्ञा से कुलाङ्गना ने शोक पो त्याग दिया था और बालमृग के तुल्य सुन्दर नेत्रो वाली उस बाला ने अपने बालक का पालन किया था। ॥६॥ दृष्ट्वा तामवला प्राह मङ्गनाभरगविना ! पासीनामाकुला साध्वी ब पपर्याकुलेक्षणाम् ॥६१ व मालविभूपर्णविना देहयष्टिरमधे न शामते । वक्तुमहमि तवाद्य क रण चद्रविरहितेव शर्वरो ॥६२ मातमन ३थ त्यकामा मगलाभरणानि वै । आसोना भर्तु होनेव वक्तुमर्हसि शोभने ॥६३ अदृश्य ती तमा वाक्य थ त्वा तस्य मुतस्य सा। न किंचिदनोत्पुत्र शुभ वा यदि वेतरत् ।।६४ अदृश्यती पुन: प्राह शाक्तेयो भगवान्मम । मतः कुत्र महातेजा पिता वद वदेति ताम् ॥ ५ श्रुत्वा सरोद सा वाश्य पुत्रस्यातीव विह्वला। भक्षितो रक्षसा तातस्तवेति निपपात च ॥६६ भूत्वा वसिष्ठोपि पपात भूमौ पौत्रस्य वाक्य स रुदन्दयालु । अरु धती चाश्रमवासिनस्तदा मुनर्वसिष्टस्य मुनीश्वराश्च ॥ ७ उम बालक पराशर ने अपनी माता उस अक्ला को मङ्गलमय आभरणो से रहित देखकर उस से कहा जो कि अपनी आँखो में प्राप्त भरे हुए बहुत ही वैचैन सानो बैटो हुई थी॥६१॥ शक्ति के पुत्र शाक्तय अर्थात् पराशर ने कहा-हे अनधे । हे माता । प्रापका यह परम सुन्दर शरीर भूपणो के मिना शोभा नहीं देता है । हे माता । माप मुझे इसका धास्तविक कारण बनाइये । प्रार बिना अलङ्कारो के तो चन्द्र के बिम्ब के बिना अंधेरी रात के समान दिखलाई दे रही हैं ।।६।। हे माता आपने ये परम मङ्गलमय आभरणो को शे त्याग दिया है ? हे शोभने । प्राप स्मामी से हीना के समान क्यो बैठी हुई हैं । इस सब का जो भी कारण हो मुझे स्पष्ट बताने के योग्य हैं ॥३॥ उस समय में अदृश्य ती ने उस अपने वाला पुत्र के वचन सुनार फिर उस बालक से उसने शुभ पाराशर वरदान वर्णन ] [४४७ अथवा अशुभ कुछ भी नहीं बताया था। इसके पश्चात् शाक्त य (पराशर) ने फिर अदृश्यन्ती अपनी माता से कहा-हे माता ! मुझे यह बतायो कि महान् तेजस्वी मेरे भगवान् पिता जी कहाँ पर है ॥६॥६५।। वह मह. श्यन्ती वसिष्ठ की पुत्र वधू पुत्र के इस वाक्य को सुनकर अत्यन्त विह्वल हो गई और रुदन करने लगी थी। उसने अपने पुत्र से कहा-बेटा! तुम्हारे पिता को राक्षम ने खा लिया था और वह मृत्यु को प्राप्त हो गये थे ॥६६॥ अपने पोत्र के इस वाक्य का श्रवण कर परम दयालु वसिष्ठ भी रुदन करते हुए भूमि पर गिर पड़े थे। अरुन्धती और वसिष्ठ मुनि के समस्त माधम मे निवास करने वाले मुनीश्वर भी रुदन करते हुए क्षिति सल पर गिर गये थे॥६७॥ भक्षितो रक्षा म'तुः पिता तव मुखादिति । श्रुत्वा पराशगे धीमान्प्राह चास्राविलेक्षण. ॥६८ मभ्यर्च्य देवदेवेश त्रैलोक्य सचराचरम् । क्षणेन मातः पितरं दर्शयामीति मे मतिः ॥६६ सा निशम्य वचनं तदा शुभं सस्मिता तनयमाह विस्मिता । तथ्यमे तदिति तं निरीक्ष्य सा पुत्रपुत्र भवमर्चयेति च ।।७० ज्ञात्वा शक्तिमुतस्यास्य संकल्प मुनिपुगवः । पसिष्ठो भगवान्प्राह पौन धीमान् घृणानिधि. ७१ स्थाने पौत्र मुनिष्ठ सकल्पस्तव मुव्रत । तथापि शृणु लोकस्य क्षयं कतुन चाहमि ।।७२ र क्षमानामभावा। कुरु सर्वेश्वरार्चनम् । तोक्य शृणु शक्ति य अपराधति किं तव ।।७३ ततस्तस्य वसस्य नियोग.च्छ क्तनंदनः । राक्षपानाम भाव य मति चक्र महामतिः । १ तेरे पिता को राम ने माण कर लिया था - इस उत्तर वाक्य को माता के मुख से सुनकर परम बुद्धिगन् परागर के नेत्र भी प्रश्र यो से मनीन हो गये थे । ६८॥ पराशर ने कहा-है माता ! में चराचर लोक्य को दाध करके देवेश भगवान् भय या अभ्यर्चन करके एक क्षण ४४८ ] [ लिङ्ग पुराण - में ही पिता को दिखा देता हूँ-ऐसी मेरी बुद्धि होती है ॥६६॥ उस समय में पराशर के इस शुभ वचन का श्रवण कर स्मित से युक्त परम विस्मय के साथ वह अहस्यन्तो अपने पुत्र से बोली-क्या यह तथ्य है- ऐसा कहकर पुत्र की भोर देखकर फिर उसने पहा- बेटा, तुम भव की अभ्यर्चना करो ॥७॥ शक्ति के पुत्र पराशर के इस सत्य साल्प को जान कर मुनियों में श्रेष्ठ प्रत्यन्त बुद्धिमान् और दया के निघि वसिष्ठ ने अपने पौत्र से कहा-हे सुन्दर वन वाले | हे मुनियों मे थे पृतम ! तुम्हारा यह सङ्कल्प बहुत ही समुचित है तो भी मेरा यह कथन है जिस को तुम श्रवण कर लो। तुम को इस लोका क्षय नहीं करना चाहिये ।।७१॥ ॥७२॥ केवल राक्षसो के प्रभान या नाश के लिये ही तुम सर्वेश्वर का अर्चन करो। हे शाक्त य ! तुम यह तो विचार करो भला समस्त लो- क्य ने तुम्हारा क्या अपराध किया है। ॥७॥ इसके अनन्तर वसिष्ठ महामुनि के नियोग से उस शक्ति के पुत्र ने जो कि महान् मति से सम्पन थो, फेवल राक्षसो के नाश के लिये ही शिवार्चन करने का विचार स्थिर किया था ।।७४॥ घदृश्यंती वसिष्ठं च प्रणम्यारुन्धती ततः। कृत्वैकलिगं क्षणिक पांसुना मुनिसन्निधौ । ५ संपूज्य शिवसूक्तेन त्र्यंबकेन शुभेन च । जप्त्वा स्वरित रुद्रच शिवसंकल्पमेव च ॥७६ नोलरुद्र' च शक्त यस्तथा रुद्रघ शोभनम् । वामीयं पवम नं व पंचब्रह्म तथैव च ॥९७ होतार लिंगमुक्त च अयवंशिर एव च । अष्टांगमध्यं रुद्राय दत्वाभ्यच्यं यथाविधि 11 ८ भगवनक्षमा रुद्र भक्षनो रुधिरेण वै। पिता मम महातेजा भ्रातृभि. सः शंकर ॥७६ द्रष्टुमिच्छामि भावन् पितरं भ्रातृभि सह । एवं विज्ञापयलिङ्ग परिगपत्य मुहुमुहः॥८० हा रद्र रद्रगति गरोद निपपात च।
पाराशर वरदान वर्णन ] [ ४४६ तं दृष्ट्वा भगवान दो देवीमाह च शंकरः । ८१ पश्य बाल महाभागे बाष्पपर्याकुलेक्षणम् । ममानुम्मरणे युवतं मदाराधनतत्परम् ।।२ इसके प्रनन्तर शाक्त य ने सर्वप्रथम प्रपनी माता अदृश्यन्ती को प्रणाम किया था, उसके पश्चात् वसिष्ठ मुनि और अरुन्धती को प्रणाम करके फिर मुनि के समीप मे ही मृत्तिका से क्षणिक एक लिङ्ग अर्थात् पार्थिव शिव लिङ्ग का निर्माण करके उसका शिव सूक्त से एव परम शुभ ध्यम्बक सूक्त से भली-भांति पूजन किया था। फिर त्वरित रुद्र और शिव सकल्प का तथा नील रुद्र का जाप किया था। शोभन रुद्र-वामीय-पदमान और पञ्च ब्रह्म का जाप किया था। ॥७५॥७६।।७७॥ होता-लिङ्ग सूक्त तथा अथर्व शिर को जप कर रुट को अष्टाङ्ग अध्यं समर्पित कर यथा विधि उसका प्रभ्यर्चन किया था ॥७॥ फिर पराशर ने भगवान् भव से प्रार्थना की थी। पराशर ने कहा-हे भगवन् ! हे शङ्कर ! है रुद्रदेव ! दुष्ट राक्षस ने मेरे महान् तेजस्वी पिता का भाइयो के साथ भक्षण कर रुधिर का पान किया है ॥६॥ हे भगवन् । अब मैं अपने पिता को अपने भाइयो के सहित देखने की उरस्ट इच्छा रखता हूँ। इस प्रकार से उस शाक्त य ने रुद्रदेव के लिङ्ग के समक्ष में सविनय निवेदन करते हुए धार-बार प्रणाम किया था ॥५०॥ और फिर हा रुद्र । हा रुद्र !'-यक्ष उच्चारण करते हुए रुद्र को पापिय लिङ्ग मूत्ति के सामने रुदन किया भोर क्षिति तल मे गिर पड़ा था। उस शाक्त य का इस दशा में देखकर भगवान् शङ्कर रुद्रदेव देवी से पोले-हे महाभागे ! इस बालक को देखो जिसके नत्र प्रश्न प्रो से समाकुलित हो गये हैं मोर यह मेरी धना करने में परायण तथा मेरा स्मरण करने मे युक्त हो रहा है । शा॥ सा च दृष्ट्वा महादेवी पराशरमनिन्दिता। दु खात्सलिनसर्वाङ्गमय कुलविलोचनम् ॥८३ लिंगाचं विधौ सक्त हर रुद्रति वादिनम् । प्राह भ रिमीशान शंकरं जगतामुमा ८४ भारा- ४५.] [लिङ्ग पुराण ईसित यच्छ सक्ल प्रसीद परमेश्वर। निशम्य वचन तस्या शकर परमेश्वर ॥८५ भार्यामार्यामुमा प्राह ततो हाल हलाशन । रक्षाम्येन द्विज वाल फुल्लेदावरलोचनम् ।।६ ददामि दृष्टि मद्र पदशनक्षम एप दे। एवमुक्त्वा गणदिव्यभंगवानीललोहित II ब्रह्मेन्द्र विष्णुरुद्राय सवृत परमेश्वर । ददौ च दर्शन तस्मै मुनिपुराय धीमते ॥८८ सोपि दृष्ट्वा महादेवमानन्दानाविलेक्षण । निपपात च हृष्टात्मा पादयोस्तस्य सादगम् ॥ प्रति श्लाघ्य उप महादेवी ने पराशर को देखा था जो कि दुख से क्लिन्न अङ्गों वाला और प्रासुनो से भरे तथा मलीन नेत्रा वाला था । 11८३|| देवी ने देखा था कि वह पराशर पार्थिव लिङ्ग अर्चन करने में पूर्णतया सलग्न हो रहा था और बार बार हा रुद्र । हा रुद्र -इस तरह बोलकर भगवान शिव यो पुगार रहा था। यह देखकर समस्त जगतो के ईश अपने स्वामी भगवान् शङ्कर से उमादेवी ने कहा-11४11 हे परमे श्वर | इस दीन पर वृपा करिये और इसकी अभीष्ट वस्तु इसे प्रदान कर दीजिए । भगवान् शङ्कर ने उस उमादेवी के इस बचन को सुनार अपनी पत्नी प्रिय उमा से हालाहल के पान करने वाले शङ्कर ने कहा- विकसित कमलो के समान सुन्दर नो वाले दम द्विज बालक को मैं रक्षा करता हूं11८५-६|| सब प्रथम में इसका वह रियर प्रदान करता हूँ जिससे यह मेरे रूप के दशन करने मे समय हो जावे । यह इस तरह से उमादेषो से कहकर नीत लोहित भगवान् शहर अपने दिव्यगण और ब्रह्मा विष्णु दद्र तथा रुद्र प्रादि के साथ सवृत होकर वहाँ । मुति बाला के पास पहुंचे तथा घोमान उस मुनि पुत्र को अपना दान दिया था ।1८11८८।। उस मुनि पुत्र ने भी महादेव का दशन प्राप्त किया या और वह अपार मानन्द के अध्र प्रा यो नेत्रो म भरकर परग प्रसन होर बहुत ही पादर ये साथ उनके चरणों मे गिर पहा था l पाराशर वरदान वर्णन ] [१५१ पुनर्भवान्याः पादौ च नंदिनश्च महात्मनः । सफलं जीवित मेद्य ब्रह्म'द्यास्तां म्नदाह सः ।।६० रक्षार्थमागतस्त्वद्य मम बालेन्दुभूषणः । कोन्यः समो मया लोके देवो वा दानवोपि वा ॥६१ अथ तस्मिन्क्षणादेव ददर्श दिवि सस्थितम् । पितरं भ्रातृभिः सार्ध शाक्त यस्तु पराशर ॥६२ सूर्यमंडलसकाशे विमाने विश्वतो मुग्वे । भ्रातृभिः सहित दृष्ट्वा ननाम च जहर्प च ।।६३ तदा वृपध्वजो देव. सभार्यः सगरणेश्वरः । वसिष्ठपुत्रं प्राहेदं पुदर्शनतरारम् ।।१४ शक्त पश्य सुत वालमानन्दास विलक्षणम् । अदृश्यन्नी च विप्रेन्द्र वसिष्ठ पितर तव ।।६५ अरुन्धती महाभागा कल्याणी देवोपमाम् । मातरं पितर चोभौ नमस्कुरु महामते ॥६६ तदा हरं प्रणम्याशु देवदेवमुमा तथा । वमिष्ठ च तदा श्रष्ट शक्तिर्वे शंकराज्ञया ।। मातर च महाभागा कल्याणी पतिदेवताम् । अरुंधती जगन्नाथनियोगात्प्राह शक्तिपान् ।।.८ इसके अनन्तर फिर वह भवानी के चरणो मे तथा महान् प्रात्मा वाले नन्दी के चरणो मे गिर गया था उस समय ब्रह्मा प्रादि जो देवगण शिव के साथ थे उनसे बोला-पान मेरा जीवन सफल हो गया है ॥९॥ आज बाल चन्द्र के भूपण वाले भगवान् गिव स्वय मेगे क्षा करने के लिये यहाँ पर आ गये हैं। इस समय लोग मेरे समान बडभागीय कौन होगा चाहे कोई भी देव तथा दानद यो न हो अर्थात् ऐमा भाग्य. शाली अन्य कोई भी नही है ॥३१॥ इमने अनन्तर उस शक्ति के पुन पराशर ने एक क्षण मात्र मे हो दिव लोक में सस्थित अपने पिता को भाइयो के साथ देखा था ॥६२॥ सूर्य मण्डल के समान विश्व तो मुख विमान मे भाइयो वे सहित अपने पिता शक्ति को देखकर पराशर को
लिङ्ग पुराण
बहुत अधिक प्रसन्नता हुई थी और उसने अपने पिता को प्रणाम किया
था। इसके मनन्तर अपनी भार्या उमा और समस्त गणों के साथ
यहाँ पर सस्थित भगवान् मृपध्वज देव ने उस समय में पुत्र के दर्शन मे
तत्पर वसिष्ठ के पुत्र शक्ति से यह रहा था श्री देव ने कहा-हे शक्ते ।
मानन्द के मासुमो के बहाने वाले अपने बालक पुल को देख नो । हे
विप्रेन्द्र । अपनी पत्नी अदृश्यन्ती मौर अपने पिता वसिष्ठ को भी देख
लो। हे महा मति वाले । देवता के समान परम पूज्या कल्पण कारिणी
माता मावती का दर्शन भी करलो तथा अपने इन दोनो माता मोर
पिता को नमस्कार करो MENIENIE६उस समय मे भगवान देवो के
देव शिव को शीघ्र ही प्रणाम करके शक्ति ने उमादेवी को प्रणाम दिया
पा। भगवान् पाङ्कर भी भाशा से परम श्रेष्ठ अपने पिता वसि तथा
पति को ही देवता के समान मानने वाली परम पल्याण कारिणी महा•
भागा माता अरुन्धती को प्रणाम किया था। फिर जगत् के स्वामी की
पाशा से वह शक्तिमान् अपनी माता अरुन्धती के सामने बोला-
1७1181
भो वरसवत्स विप्रेन्द्र पराशर महाद्यते ।
रक्षितोह त्वया तान गर्भस्थेन महात्मना IIEL
अणिमादिगणश्वयं मया वत्स पराशर ।
लन्धमद्यानन दृष्ट तव बाल ममाज्ञया ।।१00
अदृश्यन्ती महामागां रक्ष वत्स महामते ।
अरु धती च पितर वरिष्ठ मम सर्वदा ।१-१
धन्वय सालोवत्स मम मतारितस्त्वया।
पुत्रेण लोक जयतोत्युक्त सद्धि सदैव हि ॥ ०२
ईप्सित व.येशानं जगता प्रभव प्रभुम् ।
गमिष्याम्पभिववेश भ्र तृभि सह शंकरम् ॥.०३
एवं पुत्रमुपामध्य प्रणम्य च महेश्वरम् ।
निरोक्ष्य भा सदसि जगाम पितर वशी ||१४
गप्त दृष्ट्वाथ पितर तदाभ्यर्थव शपरम् ।
1 पाराशर वरदान वर्णन ]] [४५३ तुष्टाव वाग्मिरिष्टाभिः शाक्त यः शशि भूपणम् ॥१०५ वासिष्ठ ने कहा हे वत्स ! हे परागर ! तुम विप्रो में शिरोमरिण हो पौर महान् धु ति वाले हो । हे तात ! अपनी माता के गर्भ मे ही स्थित रहते हुए महात्मा तूने मेरी रक्षा की है । ६ वत्स पराशर ! इस समय में मैंने परिणमा प्रादि के गुणो से युक्त ऐश्वयं प्राप्त कर लिया है कि हे बच्चे ! अाज तुम्हारा मुख मैंने देख लिया है। अब मेरी प्राज्ञा से हे महामते ! हे वत्स ! महाभागा इस अदृश्यन्ती की रक्षा करना। और सर्वदा मेरी माता अरुन्धती पिता वमिष्ठ की भी रक्षा तुम करना ॥१०॥ ॥१०१॥ हे वत्स | तूने मेरा सम्पूर्ण वश ही तार दिया है । सत्पुरुषो के द्वारा सर्वदा यही कहा गया है कि सत्पुत्र के द्वारा मानव लोको मे जप प्राप्त किया करता है ॥१०॥ अब तू ममस्त जगतो के समुत्पन्न करने वाले ईशान प्रभु से अपना इच्छित वरदान प्राप्त करले। मै तो अपने भाइयो के सहित ईश शकर भगवान् की वन्दना करके चला जाऊंगा। ॥१०॥ इस तरह से अपने पुत्र को परामर्श देकर पौर महेश्वर को प्रणाम करके तथा अपनी भार्या को वहां सभा मे स्थित देखकर वह वशी पितृ लोक मे चला गया था ॥१०४॥ अपने पिता को गया हुना देखकर भगवान शंकर की पराशर ने मम्यर्चना की थी और शाक्य ने मत्यभीष्ट वाणियो के द्वारा शशिभूषण शिव का स्तवन किया था ।।१०।। ततस्तुष्टो महादेवो मन्मथाधकमदनः । अनुगृह्याथ शाक्त यं तत्रैवांतरधीयत ॥१०६ गते महेश्वरे साचे प्रणम्य च महेश्वरम् । ददाह राक्षसाना तु कुलं मण मंयवित् ।।१०७ तदाह पौन धर्मज्ञो वसिष्ठो मुनिभितः । पलमत्यतकोपेन तात मन्युमिम जहि ॥१०% राक्षसा नापराध्यन्ति पितुस्ते विहित तथा । मूढानामेव भवति क्रोधो बुद्धिमतां न हि ॥१०६ हन्यते तात कः वेन यतः स्वकृतभुक्पुमान् । संचितस्यातिमहता वत्स वनेशेन मानवः ।।११० ४५४ ] [ लिङ्ग पुराण यशसस्तपसश्चंय क्रोधो नाशकरः स्मृतः । प्रलं हि राक्षसैदग्धीन रनपाधिभिः ॥१११ सत्रं ते विरमत्वेनरक्षमासाग हि साधवः । एवं वसिवाक्येन शाक्त यो मुनिपुंगवः ॥११२ उपसंहृतवान् सनं सधस्तद्वार गौरवात् । ततः प्रोतश्च भगवान्वमिष्ठो मुनिसत्तमः ।।. इसके अनन्तर गगवान् शिव परम मन्तुष्ट होकर जिन्होने मन्मथ (कामदेव और अन्धक का मर्दन कर दिया था, शक्ति के पुत्र पर अपनी पूर्ण कृपा की वृष्टि करके वही पर अन्तहित हो गये थे ।।१०६॥ भगवान महेश्वर के चले जाने पर साम्ब महेश्वर को प्रणाम करके उस मन्त्रों के ज्ञाता पराशर ने मन्त्र के द्वारा राक्षमों के कुल का दाह कर दिया था ॥१०७॥ उस मवसर पर धर्म के ज्ञान वाले तथा अन्य मुनियों से परि. वृत ( घिरे हुए ) वसिष्ठ ने अपने पौत्र परासर से कहा-है तात ! प्रत्य- न्त कोप मत करो। अब इस क्रोध का परित्याग करदी ।।१०।। तुम्हारे पिता को जो उस प्रकार से हुआ था उसमे ये समस्त राक्षस को कोई मपराध नहीं है । क्रोध तो मूढपुरुषों को ही हुमा करता है । बुद्धिमान लोगो को कोध कभी नही होता है ।१०६।। हे तात ! कौन किस के द्वारा मारा जाता है ? अर्थात् कोई भी किसी को नहीं मारता है क्योकि यहां सभी जीव अपने पिये हुए कर्मों का भोग ही भोगा करते हैं । मानव अपने सचिन को - को ही बडे क्लेश से भोगते हैं ॥११०॥ क्रोष यश और तपश्चर्या दोनों का ही नाश करने वाला बताया गया है । मब तुम इन विचारे निरपराध दोन राक्षसों को दम्प करना छोड दो॥१११॥ अब तुम्हारा राक्षसो के दाह करने का यह सत्र समाप्त हो जाना चाहिए क्योंकि साधु पुरुष तो मदा क्षमा के सार रखने वाले होते हैं। इस प्रकार से वसिष्ठ मुनि के वाक्य से मुनियो में अंध शाक्त य ने अपने पितामह के वचनों के गौरव को रक्षा करते हुए अपने राक्षसों के सत्र को समाप्त कर दिया था। उस समय मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ उस पर परम प्रसन्न हुए थे।॥११३॥ २ होवे ११६॥ इसलिये हे महान् साग्य दाने! मै तुमको एक मरि महान् जानोगे । मापने कम होकर जो मेरी सन्तति का उच्छेद किया है वहन पाराशर वरदान वर्णन ] [ ४५५ संप्रातश्च तदा सत्र पुलस्त्यो ब्रह्मगः सुनः । वसिष्ठेन तु इत्ता. कृनासनपरिग्रह. ॥११४ पराशरमुवाचेदं प्रणिपत्य स्थित मुनिः । वैरे महति यद्वाक्याद्गुरोरद्याश्रिताक्षमा ॥११५ त्वया तस्मात्समस्तानि भवाञ्छाखाणि वेत्स्यति । संततमम न च्छेदः क द्धनानि यत. कृतः ॥११६ क्या तम्मारमहाभाग ददाम्यन्यं महावरम् । पुराणसंहिताकर्ता भवान्वत्स भविष्यति ।।१४७ देवतापरमार्थ च यथावद्वत्स्यते भवान् । प्रवृत्तौ वा निवृत्ती वा कर्मणस्तेऽमला मतिः ॥११८ मत्प्रमादादसदिग्धा तव वत्स भविष्यति । ततश्च प्राह भगवान्वसिष्ठो वदतां वरः ॥११६ पुलस्त्येन यदुक्त ते सर्वमेतद्भविष्यति प्रथ तस्य पुलस्त्यस्य वमिष्ठस्य च धीमतः ।।१२० प्रसादाद्वैष्णवं चक्र पुरणं वै पराशरः। पटप्रकारं समस्नार्थम धक ज्ञानसंचयम् ।।१२१ पट्साहस्र मतं सर्व वेदार्थेन च सयुनम् । चतुर्थ हि पुगणानां महितासु सुशोभनम् ॥१२२ एप व. कथितः सर्वो वासिष्ठाना समामतः । प्रभवः शक्तिसूनोश्च प्रभावो मुनिपु गवाः ।।१२३ उस समय में ब्रह्मा के पुत्र पुलस्त्य मुनि उस सत्र मे मा गये थे। पसिष्ठ मुनि ने उनको मध्यं समर्पित विश था और फिर भासन दिया पा। उस समय मे पासन पर स्थित होकर पलस्त्य मुनि ने प्रणाम करके पराशर से यह यवन कहा-हे तात ! महान् वैर के होने पर भी तुमने गुरुदेव वसिप के वचनो से जो इस समय क्षमा को ग्रहण किया है। इस का परिणाम यह होगा कि भाप समस्त शास्त्रों को भली-भांति जान ४५६ ] [ लिङ्ग पुराण घरदान देता हूँ हे वरस ! माप पुराण सहिता के करने वाले होगे ॥११७॥ माप वास्तव स्वरूप को यथावत् जान लेगे। प्रवृधि मार्ग में मोर निवृत्ति मार्ग मे ग्राप जो भी कर्म करेंगे उसमे भाप की मति मल रहित होगी ॥११॥ हे वत्स ! यह मेरी अनु मा होगी कि आपकी बुद्धि सर्वदा सन्देह से रहित रहा करेगी अर्थात् मापको कभी भी किसी विषय मे सदिग्धता नही होगी। इतना पुलस्त्य के कहने के अनन्तर बोलने वालो मे परम श्रेष्ठ वमिष्ठ मुनि ने कहा- हे वत्स ! पुलस्त्य मुनि जो कुछ भी इस ममय कहा है यह निश्चय ही सभी कुछ होगा-इसमें कुछ भी मन्देह नही है । इसके अनन्तर धीमान् पुलस्त्य और वसिष्ठ की कृपा एवं प्रसाद से पराशर ने वैष्णव पुराण की रचना की थी। वह पुराण पट् अंश रूप वाला था और सम्पूर्ण मायं का साधन करने वाला एवं ज्ञान का एक सचित भण्डार था। ॥११॥१२०॥१२१॥ यह सब छ सहस्र युक्त और वेदार्थ से समन्वित था। यह परम शोभन संहिता पुराणो मे चौथे नम्बर को यो । ॥१२२॥ यह सम्पूर्ण वासिष्ठों का रार्ग संक्षेप मे वर्णन कर दिया गया है। हे मुनिश्रेष्टो! इममे शक्ति के पुत्र का जन्म और प्रभाव भी वणित कर दिया गया है । ।।१२३॥ ॥ १०३-त्रिपुर निवासी दैत्यों का देव पोड़न ।। समासाद्विस्तराच्चैव सर्गः प्रोक्तस्त्वया शुभः । कथ पशुपतिश्चासीत्पुर दग्धु महेश्वरः ॥१ कथ च पशवश्चासन्देवाः सब्रह्मकाः प्रभोः। मयस्य तपसा पूर्व सुदुर्ग निर्मितं पुरम् ॥२ हैमं च राजतं दिगमयस्मय मनुत्तमम् । सुदुर्ग देवदेवेन दम्पमित्येव नः श्रुतम् ॥३ पथं ददाह भगवान् भगनेत्रनिपातनः । एकेनेपुनिपातेन दिव्येनापि तदा कपम् ।।४ विष्णुनोत्पादित तैनं दग्पं तत्पुरत्रयम् । पुरस्य सभवः मर्यो वरलामः पुरा घुतः ॥५ सख्या ये
त्रिपुर निवासी दैत्यो०]
[४५७
इदानी दल सर्व वक्तुमर्हसि सुव्रत ।
तेणं तद्वचनं श्रुत्वा सूतः पौराणिकोत्तमः॥६
यया धृत तथा प्राह व्यासाद्विश्वार्थ सूचकात् ।
त्रैलोक्यस्यास्य शापाद्धि मनोवावरायसभवात् ।।७
निहते तारके देत्ये तारपुने सबांधवे ।
स्कदेन वा प्रप्लेन तस्य पुत्रा महाबलाः॥
विद्यम्माली तारकाक्ष कमलाक्षश्च वीर्यवान् ।
तपस्तेपुमहात्मानो महावलपराममा.us
इस अध्याय में त्रिपुगैरसों का चरित मौर उन के नाश पे लिये
देवतामों में समस्त यत्नों का निरूपण किया जाता है । पापियो ने यहा-
मापने राशेप से तपा विस्तार से शुभ सर्ग या निरूपण पर दिया है।
पब यह बताइये कि पशुपति महेश्वर ने पुर को दग्ध वैसे पिया था ?
पौर ब्रह्मा के सहित समस्त देवता पशु कैसे हो गये थे ? प्रभुमय की
अपस्या से पहिले सुन्दर दुर्ग याला पुर निमित किया गया था। यह सुन्दर
दुर्ग सुगंमय रजतमय और सौहमय परयात उत्तम था । उसको देने के
ने दर पर दिया था-यही हम सगो ने सुना है ॥१॥२॥३॥ ग मे
गैत्रों को निपतित परने वाले भगवान ने उन पुर यो से दम्प पिया पा
पौर पे पल एक ही दिय व निपात से उस समय में उसे से
पना दिया पाf Eरा उपतरिय हुए भनो द्वारा
?
४५८ ] [ लिङ्ग पुराण पराक्रम वालों ने तपस्या का तपन किया था । तप उन समास्थाय नियमे परमे स्थिताः। तपसा कर्शयामासुदेहान् स्वान्दानवोत्तमा.॥१० तेपा पितामहः प्रीतो वरद प्रददौ वरम् । अवध्यत्व सर्वेषा सर्वभूतेषु सर्वदा ॥११ सहिता वरयामासु सर्वलोकपितामहम् । तानप्रवीत्तदा देवो लोकाना प्रभुख्ययः ।।१२ नास्ति समिरत्वं वै निवर्त ध्वमतोसुराः। अन्यं वरं वृणीध्वं वं यादृश सप्ररोचते ॥१३ ततस्ते सहिता देत्या सप्रशायं परस्परम् । ब्रह्माणमव बन्दैत्याः प्ररिगपत्य जगद्गुरुम् ॥१. वय पुराणि श्रीण्येव समास्थाय महोमिमाम् । विचरिष्याम लोवेश त्वत्प्रसाद उजगद्गुरो॥१५ ये मत्यन्त उग्र तप में समास्थित होपर परम नियम मे स्थित ए थे। इन उत्तम दानवों ने तपस्या के द्वारा अपने शरीरो या वृता पर दिया पा॥१०॥ उनकी तपस्या से पितामह बहुत प्रसन्न हुए पोर पर देने वाले ने वरदान प्रदान किया था। दैत्यों ने कहा सदा समस्त प्राणियों में सबका मध्यस्व सहित सर्व लोकों में पितामह से घरमा मांगा था। तब सोरो प्रभु मोर मध्यम देय ने उनमे यहा पा ॥११॥ ॥१२॥ सय को ममरस्य नही हमारा है मतः हासे हे मगुरो ! प्राप सोग निवृत्त हो जामो। इस अतिरिक्त कोई मन्य र मागो शाकि भापको रुचि पर होता हो । सगे 37 गमरा रियों ने परस्पर में भली-भांति विषार पूर्व निभय परोपे दरय मगर गुरु महावीरो प्रणाम मरणे प्रत से बोले । हम इस भूमण्डल में तीन पुर समापित पर हैं सोच! हे जगद्गुरो। पापो प्रसाद विपरण से। १४॥१॥ तया वराहपु समेष्यामः परस्परम् । एगोमा गमिप्यति पुरानानि पान५॥१६ मिपुर निवासी दैत्यों ] [ १५६ समागतानि चतानि यो हन्याद्भगवस्तदा। एकेनैवेषुणा देवः स नो मृत्युभविष्यति ।।७ एवमन्त्विति तान्देव. प्रत्युक्त्वा प्राविशद्दिवम् । ततो मयः स्वरूपसा चक्र वीरः राण्यथ ॥१८ काचन दिवि तपासोदतरिक्षे च राजतम् । प्रायसं चाभवद्भूमौ पुर तेषां महात्मनाम् ॥१६ एकैकं योजनशत विस्तारायामतः समम् । कावनं तारकाक्षस्य कमलाक्षस्य राजतम् ।।२० विद्युन्मालेश्चायस वै त्रिविध दुर्गमुत्तमम् । मयश्च बलवास्तत्र दैत्यदानवपूजितः।।२१ हैरण्ये राजते चव कृष्णायसमये तथा । मालयं चात्मन कृत्वा तत्रास्ते बलवास्तदा ।।२२ एवं वभूवु दैत्यानामतिदुर्गाणि सुव्रताः । पुगरिण पीरिण विप्रेद्रास्त्रैलोक्यमिव चापरम् ।।२३ पुरत्रये तदा जाते सर्वे दैत्या जगये। पुत्रय प्रविश्यव बभूवुस्ते वलाधिका. ॥२४ हे मनघ ! तथा एक सहस्र वर्षों मे परस्पर मे पायेंगे मोर ये पुर एकी भाव को प्राप्त होंगे ॥१६॥ समागत इनको है भगवर ! उस समय मे जो कोई हनन करेगा वह देव हमारे एक ही वाण से मृत्युगत हो जायगा ॥१७॥ "ऐसा ही होव"-यह वरदान देवर देव दिव लो वो पले गये थे। इसके अनन्तर वीरमय ने अपने पो यस से पुरोको दिया या॥१८॥ उन महात्मामो के तीन पुर पे-सुवर्ण का पुर दिय सोग में था, मन्तरिक्ष में राजत माद चांदी मा पुर पा मोर भूमि मे उनप मायस पर्यात् लोह निर्मित पुर थापा एक-एक विस्तार मोर मायाम मेसोपोजनमा समान था। जो पाचन पुर था वह सारा पापा, राजत समसाक्ष का था और विनम्मामी रा पापरा पा ऐसे ये तीन प्रसार के सर्योतम दुर्ग थे । यसवान देय पोर दानवों के द्वारा वामान भय यहाँ पर हा पा ॥२॥२१॥ हैरएर रास्त परिणाम पर - ४६० [ लिङ्ग पुराण पुर में अपना पालय बनाकर उस समय में यहां पर वह बलवान हा करता या॥२२॥ हे सुद्रत वालो ! इस प्रकार से दैत्यो के ये अतिदुग थे। ये तीन पुर हे विप्रेन्द्रगण ! दूसरे बैलोक्य के समान थे ।।२३।। उस समय मे इन तीन पुरो के हो जाने पर जगत् अप सास्त दैत्यगरा पुर प्रय मे प्रवेश करके ही वे अत्यन्त अधिक बल वाले हो गये थे ॥२४॥ शास्त्र च शास्ता सर्वेषामकरोकामरूपधृक् । सर्वसंमोहनं मायो दृष्टप्रत्ययसंयुतम् ॥५ एतत्स्वांगमवायच पुरषायोपदिश्य तु । मायी मायामयं शास्त्रं नथपोडशलक्षकम् ॥२६ धौतस्मातविरुद्धच वर्णाश्रमविजितम् । इहैव स्वगनरकं प्रत्ययं नान्यथा पुनः ॥२७ तच्छास्त्रमुपदिश्येव पुरुपायाच्युतः स्वयम् । पुरत्रयविनाशाय प्राहेनं पुरष हरिः॥२८ वीधर्म चाकरोलीगा दुश्वारफलसिद्धिदम् । चक्र स्ताः सर्वदा लब्ध्वा सद्य एव फलं वियः ॥२६ जनासक्ता बभूवुस्ता विनिंद्य पतिदेवताः । अद्यापि गौरवात्तस्य नारदस्य कलो मुनेः ॥३० मायश्चरति सत्यज्य भर्तृन्स्वैर वृथाधमाः। खोयां माता पिता बबुः मया मित्रं च बांधवः ॥३१ भर्ता एव न संदेहस्तथाप्यासहमायया। कृत्वापि सुमहत्व पै या भतु: प्रेमसंयुता ॥३२ तब भगवान ने एक मायामय मनुष्य उन दैत्यो के विनाश के उद्देश्य से प्रकट किया। उसने देपो के पास मार पहा कि अपनी इच्छा से रूप पारण करने वाले तथा माया से परिपूर्ण भगवान सब के शासन परमे पाले हैं। उन्होंने दए प्रत्यय (विश्वास) से रायुत भाएर सबको मोहन करने वाला शास्त्र मनाया था ॥२५॥ इस शास्त्र का प्रपने मङ्ग से समुत्पन्न पुरष को माया से भरा हुमा यह सोलह सा वाला प्रत्य का 17 दिया था ॥२६॥ जिसमें प्रतिपादन वि गया था कि यहाँ पर यही पायएड पूर्णतया स्थापित हो गया था और विपुर वासिया ने सब चिपुर निवासी दैत्यो.] [४६१ ही स्वर्ग और नरक है । इसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी प्रत्यय नहीं हैं। यह शास्त्र श्रौत तथा स्मात्तं धर्म के बिलकुल विपरीत था और वर्ण एव पाश्रम के नियमो से रहित था ॥२७॥ इस शास्त्र का अच्युत भगवान ने स्वय ही उस पुरुष को पुर त्रय विनाश के लिये उपदेश किया था और फिर हरि भगवान् ने उस पुरुष से कहा था ॥२८॥ तब माया से परिपूर्ण यह पुरुप वहां पहुंच कर त्रिपुर में अपने उपदेस से दुश्वार से फल की सिद्धि देने वाला स्त्रियो का धर्म पर दिया था और उन स्त्रियो ने सद्य एव ( तुरन्त ही ) फन को प्राप्त कर वैमा ही किया था ॥२६॥ ये अपने पति और देवता की बुराई कर जनो मे आसक्त हो गई थी। अब भी कलियुग मे उस मायो नारद मुनि के गौरव से अधम स्त्रियां अपने स्वामि- यो का त्याग कर स्वच्छ दता से प्रापरण कया करती है । स्त्रिया का माता पिता ब धु सखा मिम और बान्धव भर्ता ही है । उस अराह माया से वे महान् पाप कर्म करने अपने भर्ता के प्रेम से सयुत रहा करती हैं 1.011३१॥३२॥ पापडे ख्यापिते तेन रिप्णुग विश्व गेनिना । त्यक्त महेश्वरे दैत्यस्त्यक्त लिगाचने तथा ॥३३ स्त्रीधर्मे निखिले नष्टे दुगचारे व्यवस्थिते । कृतार्थ इव देवेशो देव सार्धमुमापतिम् ॥३४ तपमा प्राप्य सर्वज्ञ तुष्टान पुस्पोत्तम । महेश्वराय देवाय नमस्ते परमात्मने ॥३५ नारायणाय शर्वाप ब्रह्मण ब्रह्मरूपिणे । शाश्वताय हननाय अव्यक्त य च ते नम ॥६ एव स्तुत्वा महादेव दडवत्परिणपत्य च । जजाप रुद्र' भगवान्कोटिवार जले स्थित ॥३७ देवाश्च म ते देव तुष्टुवु परमेश्वरम् । सेंद्रा ससाध्या सयमा सरदा समगद्गरणा ॥३८ इस प्रभार से विश्व के योनि अर्थात् कारण विष्णु भगवान् में द्वारा ४६२ । [ लिङ्ग पुराण दैत्यो ने महेश्वर देव का त्याग कर दिया था तथा लिङ्गार्चन करना भी सर्वथा छोड दिया था ॥३३॥ स्त्रियो का धर्म पूर्ण तथा नष्ट भ्रष्ट हो गया था और दुराधर सर्वत्र छट गया था। ऐसा जब हो गया तो इसके होने पर देवेश विष्णु कृतार्थ जैसे हो गये थे और फिर वे समस्त देवों को साथ मे लेकर भगवान् उमापनि के प्रसन्न करने के कार्य मे प्रवृत्त हो गये थे ॥३४॥ तपस्या के द्वारा सर्वज महेश्वर को प्राप्त करके पुरुषोत्तम भग- वान् ने उनका स्तवन किया था थी भगवान ने कहा - महेश्वर देव एव परमारमा प्रापके लिये नमस्कार है। श्राप साक्षात् नारायण हे सर्व ब्रह्म और ब्रह्म रूपी हैं। आप शाश्वत स्वरूप वाले हैं तथा अनन्त एव अव्यक्त है ऐसे अापके लिये नमस्कार है ॥३४॥३६॥ सूतजी ने कहा- इस तरह से विष्णु ने स्तुति करके उनको दएर की भांति भूमि पड कर प्रणाम किया था और इसके अनन्तर भगवान ने जल मे स्थित होकर एक करोड रुद्र मन्त्र का जप किया था |॥३७॥ उन समस्त देव गण ने इन्द्र साध्य- यम-रुद्र और मस्दगए के सहित परमेश्वर शिव का स्तवन दिया था।३८॥ स्तुतस्त्वेव सुरविष्णोर्जपेन च महेश्वर. । सोमः सोमामथालिग्य नदि दत्तकरः स्मयन् ॥३६ प्राह गभीरया वाचा देवानालोक्य शकर । ज्ञात मयेदमधुना देवकार्य सुरेश्वरा ॥४० विष्णोर्मायाबल चैक नारदस्य च धीमत । तेपामधर्मनिष्ठाना दैत्याना देवसत्तमाः ॥४१ पुरत्रयविन श च करिष्येह सुरातम।। अय सब्रह्माा देवा सेंद्रोपेंद्राः समागता ।।१२ एतस्मिन्नतरे तेपा श्रुत्वा शब्दाननेकश । कुभोस्रो महातेजा दडेनाताडयत्सुरान् ।।४३ दुदु वुस्ते भयाविटा देवा ह हेतिवादिनः । अपतन्मुनयश्चान्ये देवान धरणीनले ॥४४ अहो विधेबल चेति मुनयः कश्यपादय । दृष्ट्वापि देवदेवेश देवानां चासुरहिपाम् ।।४५ त्रिपुर निवासी दैत्यों 2 इस प्रकार से सुरगण के द्वारा स्तुत होने वाले तथा भगवान् विष्णु के द्वारा किये हुए जप से प्रसन्न महेश्वर उमा का प्रालिङ्गन करके उमा के सहित नन्दी के ऊपर अपने हाथ को रखकर मुस्कराते हुए आये।।३९॥ और वहां शङ्कर ने देवो को देखकर अत्यन्त गम्भीर वाणी से कहा-है सुरोत्तमो ! अब मैंने देवो के कार्य को समझ लिया है ॥४०॥ भगवान विष्णु के तथा घीमान् नारद वे माया के बल को भी मैंने जान लिया है । देव श्रेष्ठो! वे अधर्म मे निशा रखने वाले जो दैत्य हैं उनके तीनो पुगे का विनाश मैं करू गा ॥४१॥ इमके अनन्तर ब्रह्मा और विष्णु के सहित देवगण आ गये थे ।१४२।। इसी बीच मे उन देवगणो के शब्दो पा श्रवण करके जो कि उनके मुख से शकर भगवान के स्तवन तथा प्रसन्न महेश्वर के आश्वासन से प्रानन्द के अनेक शब्द निकल रहे थे, कुम्भोदर महान तेज से युक्त वहाँ मा गया था और दण्ड से उसने देवी को ताडित किया था ॥४३॥ वे देवता सब हाहाकार करते हुए भय से माविष्ट होकर वहां से भाग गये थे और अन्य मुनिगण तथा देव भूमि पर गिर गये ये ॥४४॥ तब कश्यप मादि मुनिगण कहने लगे कि विधाता का बल पंसा प्रहुत है । असुरो के शत्रु देवो को देवो के देव का दर्शन भी हो गया तो भी इनकी कमी दुर्दशा है ।।४।। अभाग्य. समानतु कार्यमित्यपरे द्विजाः। प्रोचुनम शिवायेति पूज्य चाल्पतरं हृदि ।४६ तत कपर्दी नदीशो महादेवप्रियो मुनिः। शूली माली तथा हाली कुंडली वलयी गदी ।।४७ वृपमारुह्य सुश्वेतं ययौ तस्याशया तदा। सतो वै नदिनं दृष्ट्वा गण. कु भोदपि सः ॥४८ प्रणम्य नदिन मूर्ना सह तेन त्वरन्ययो। नदी भाति महातेजा वृषपृष्ठे वृपध्वजः ||४६ तुष्टुवुगरणपेशानं देवदेवमिवापरम् । नमस्ते रद्रभक्ताय रुद्र जाप्यरताय च ।।५० रुद्रभक्तातिनाशाय रौद्रकर्मरताय ते ।
४६४ ] { लिङ्ग पुराण कूष्मांडगरगनाथाय योगिनां पतये नमः १ सर्वदाय शरण्याय सर्वज्ञायातिहारिणे । वेदाना पतये चव वेदवेद्याय ते नमः॥५२ है द्विजो ! अन्य कह रहे थे कि इनके अभाग्य से ही यह कार्य पूर्ण- सया समाप्त नहीं हुमा है । सब हृदय में थोडा समर्थन करके 'नमः शिवाय' अर्थात् शिव के लिये नमस्वार है-यह कहने लगे थे ॥४६।। इस को अनन्तर महादेव के प्रिय मुनि कपर्दी नन्दीश शूली माली-हाली-कुण्डली यलयी गदी श्वेत वृष पर समारोहण फरके उस समय मे उसकी प्राज्ञा से गये थे । उम समय उस कुम्भोदर ने भी नन्दी को देखा था और उसने नन्दी को प्रणाम शिर से किया था और शीघ्रता करते हुए उसके साथ ही चला गया था। वृपध्वज नन्दी वृप के पृष्ट पर महान तेजस्वी विशेष रूप से दीतिमान हो रहे थे ॥४७॥४८॥४६॥ देवो ने स्तवन करते हुए कहा-रद्र के जाप्य मे रति रखने वाले रुद्र के भक्त प्रापको हमारा नम- स्मार है ॥५०॥ माप रुद्र के भक्तो को पीडा के नाश करने वाले हैं और रौद्र कर्म में रति रखने वाले हैं । कूष्माण्ड गण के स्वामी तथा योगियों के पति आपके लिये हमारा नमस्कार है ॥५१॥ पाप सब कुछ प्रदान करने वाले शरण मे आये हुओं की रक्षा करने वाले सभी कुछ के ज्ञाता और प्राति के हरण करने वाले हैं। पाप वेदो के पति और वेदो के द्वारा जानने के योग्य है ऐसे पापको नमस्कार है ॥५२॥ वचिणे वज्रदंष्ट्राय वज्रिवज्रनिवारिणे । बचालकुनदेहाय वविणाराधिताय ते ॥५३ रक्ताय रक्तनेत्राय रक्ताबरधराय ते । रक्तानां भवपादाब्जे रुद्रलोकप्रदायिते ॥५४ नम. सेनाधिपतये रुद्राणां पतये ना ! भूनाना भुवनेशानां पतये पापहारिणे ॥५५ रुद्राय रुद्रपतये रौद्रपापहराय ते। नमः शिवाय सौम्याय रुद्रभक्ताय ते नमः ।। तत प्रीतो गणाध्यक्ष प्रा देवाश्छिनात्मजः ।
शिवजी का युद्ध अभियान ] [ ४६५ रथं च सारथि शंभोः कामुकं शरमुत्तमम् ॥५७ कर्तुमर्हथ यत्नेन नष्टं मत्वा पुरत्रयम् । 'अथ ते ब्रह्मणा साध तथा वै विश्वकर्मणा ॥५८ पाप पत्र धारण करने वाले हैं-वज के तुल्य दष्ट्रा थाने हैं इन्द्र के वच को भी निवारण करने वाले-वन से अलङ्कृत देह वाले हैं और बच्ची ( इन्द्र ) के द्वारा पाराधित है ऐसे प्रापगे हमारा नमस्कार है ॥५३॥ रक्त वणं से युक्त रक्त नेत्र वाले-रक्त वस्त्र धारण करने वाले प्रापको नमस्कार है। भव के चरण कमल मे अनुराग करने वालो को रुद्र लोक प्रदान करने वाले प्रापको हमारा नमस्कार है ॥५४।। सेवा के अधिपति और रुद्रो के पति आपके लिये नमस्कार है । भूदो के तथा भुव- नेशो के स्वामी और पापो के हरण करने वाले आपके लिये प्रणाम है ॥५शा रुद्र रुद्रो के पति तथा रौद्र पापो के हरण करने वाले प्रापको नमस्कार है । शिव सौम्य और रुद्र भक्त आपके लिये नमसार है ॥५६।। सूतजी ने कहा - इस प्रकार से स्तवन करने के अनन्तर गपाध्यक्ष बहुत ही प्रसन्न हुए थे और शिलात्मज देवो से बोले-शम्भु के रथ-सारथि- कामुक और उत्तम शर यत्न से करने के योग्य होते हैं और पुरणय को विनष्ट हुप्रा मान ले ॥५७॥ इसके अनन्तर उन्होने ब्रह्मा तथा विश्व कर्मा के साथ सुसरब्ध होकर धीमान देवो के देव के लिये रथ किया था ॥५॥ ॥ १०४-शिवजी का युद्ध-अभियान और त्रिपुर का ध्वंस ।। अथ रुद्रस्य देवस्य निर्मितो विश्वकर्मणा। सर्वलोकमयो दियो रथो यत्नेन सादरम् ॥१ सर्वभूतमयश्च व सर्वदेवनमस्कृतः। सर्वदेवमयश्च व सौवर्ण. स.वसमतः ॥२ रथागं दक्षिणं सूर्यो वामाग मोम एव च । दक्षिरणं द्वादशार हि पोडशारं तयोत्तरम् । ३ अरेपु तेषु विप्रेद्राश्चादित्या द्वादर्शव शशिन पोडशारेषु क्ला वामस्य मुमताः ।।४ १६६ ] | लिन पुराण ऋक्षाणि च तदा तस्य वामस्यैव तु भूषणम् । नेम्यः पटतव श्च व तयोर्वे विप्रपु गवाः १५ पुष्करं चांतरिक्ष वै स्यनीडश्च मंदरः। प्रस्ताद्रिरुदयादिश्च उभौ तौ कूवरी स्मृती॥६ अधिष्ठ न महामेरुराश्रया. केसराचलाः । वेगः संवत्सरस्तस्य अयने चक्रसंगमौ ॥७ इस अध्याय मे महान् प्रारोप से शिव का यान निपुर के नाश करने के लिये तथा कार्य की सिद्धि प्रादि का निरूपण किया जाता है । सूतजी ने कहा- इसके प्रनन्तर देवो के देव भगवान् रुद्र का सर्व लोरमय परम दिव्य रथ विश्वकर्मा के द्वारा भादर के माप बडे यल पूर्वक निर्मित किया गया था। यह रथ सर्वभूनमय-समस्त देवो से नमस्कृत-सर्वदेव मय- सुवर्ण रचित और सर्व सम्मत था॥२॥ दक्षिण सूर्य रथाङ्ग है अर्थात् दाहिना रथ का चक्क सूर्य है और चन्द्र बाया रय का चक्र है । दक्षिण द्वादश परो वाला है तथा वाम सोलह अरो से युक्त है ॥३॥ है विप्रेन्द्र धृन्द ! उन द्वादश अरो मे द्वादश ही प्रादिःय है और चन्द्र के सोलह परों में सोलह कलाएँ हैं ।।४।। नक्षत्र उस समय मे उस वाम चक्र के ही भूपण थे। हे विप्र श्रेष्टो ! उन दोनो की नेमिया षट् ऋतुएँ ही थीं ॥५॥ अवकाश अन्तरिक्ष या मोर सारथि के स्थान में मन्दराचल पा । पूर्व और अपर पुगन्धर अस्ताचल और उदयाद्रि पर्वत व हे गये हैं । उसका मुख्य स्थान पूज्य सुमेरु पर्वत था और मेरु के प्राश्रय के शराचल प्रत्यन्त पर्वत थे। उसका वेग मम्वत्सर था तथा उसके चक्र सगम अयन थे ॥णा मुहूर्ना बंधुरास्तस्य शम्याश्च व कला स्मृताः । तस्य काष्ठ': स्मृता घोणा नाक्षदडा क्षणाश्च 14 निमेपाच नुकश्चि ईष चास्य लवाः स्मृताः । धौर्वस्थ रथस्यास्य स्वर्गमोक्ष युभी ध्वजो 18 धर्मो विसों दंडोस्य यज्ञ' दंडाथाः स्मृताः। दक्षिणा: संघयस्तस्य लोहा: पंचाशदग्नय .. युगातकोटी तो तस्य धर्मकामावुमो स्मृती।
। शिवजी का युद्ध-अभियान० ] [४६७ ईपादंडस्तथाव्यक्त वुद्धिस्तस्यैव नड्वलः ।।११ कोणस्तथा हमारो भूतानि च बलं स्मृतम् इद्रियाणि च तस्यैव भूषणानि समंततः ।।१२ श्रद्धा च गतिरस्यैव वेदास्तस्य हया, स्मृताः । पदानि भूपरणान्येव पडंगा न्युषभूषणम् ॥१३ पुराणन्यायमीमासाधर्मशास्त्राणि सुव्रताः । वालाश्रया पटाश्च व सर्वलक्षगगसंयुता.॥१४ उस रथ के तल्य मुहूतं ये पार उसकी बत्तुल पट्टिका तीस कला थी। उसकी नासिका काटा थी और क्षण प्रदादण्ड थे। 1८। उसके अघ स्थदारु निमेष थे तथा प्रक्षियो के स्पन्दकाल ईपा एव लव बहे गये है। इस रप का धरुय द्यो था तथा स्वर्ग चौर मोक्ष ये इस रथ की ध्व. जाएँ थी 1 धर्म विरागं इसका दण्ड तथा यज्ञ दण्ड के पाश्रय थे । दक्षिणा इमको सन्धियां थी और पचास अनियाँ पायस वीलक थे ॥१०॥ उस रप की दो युगान्त कोटि धर्म और काम ये दोनो कहे गये हैं । उस- का ईषा दण्ड अव्यक्त था तथा बुद्धि नड्वल या ॥११॥ अहसार योण था तथा गगनादि भूत उसका यल बताया गया है । उम रथ पे भूपण इन्द्रियों थी जो उसके चारो प्रोर हैं ।।१२।। श्रद्धा इस रथ की गति थी तथा वेद इस के अधूर बताये गये हैं । वेद के पद विभाग शिक्षादि पडा उपभूषण थे ॥१३॥ पुराण न्याय मीमांसा और धर्म शास्त्र ये उसक यालाथय पट थे जो कि सर्व लक्षणो से सयुत थे॥१४॥ मत्रा घटा स्मृला स्तेगा वर्णा पादास्थाश्रमा । प्रवच्छेश ह्यनतस्तु सहस्रफणभूपित. ॥१५ दिश पादा रथस्यास्य तथा गोपदिशश्च है। पुष्कराद्या पताकाश्च सौवर्णा रत भूपिता ॥१६ समुद्रास्तस्य चत्वारो रथकालिकाः स्मृता. । गग द्या. सरित श्रेष्ठा सर्वाभरण भूषिता ॥१७ चामरासक्तहस्तायाः सर्वा स्त्रीरूपशोभिता । तत्रतत्र स्थाना सोमयांनक्रिरे रयम् ॥१८ ४६८ ] [ लिङ्ग पुराण प्रावहाद्यास्तथा सप्त सोपानं हेममुत्तमम् । सारथिभंगवान्ब्रह्मा देवाभीपुधराः स्मृताः ॥१६ प्रतोदो ब्रह्मणस्तस्य प्रणवो ब्रह्मदैवतम् । लोकालोका चलस्तस्य ससोपान: समंततः ॥२० विपमश्च तदाबाद्यो मानसाद्रिः सुशोभनः । नासा. समंततस्तस्य सर्व एवाचलाः स्मृताः ॥२१ उस रथ के घण्टा मन्त्र थे। उसके वर्णादि और पाद छन्द वा पतुर्थ भाग आश्रम ये सब कम्बलो के घण्टा कहे गये हैं । उसका बन्धन रत्नु भोप था जो कि एका महस्र फनो से भूपित है ॥१५॥ दिशाएं और उपदिशाएं इस रथ के पाद थे । पुष्करादि जो मेघ थे ये ही इसके रत्नो से भूपित सुवर्ण को पतानाऐ थी ।।१६।। चारो समुद्र उस रथ की वाह्य कम्बल थे । गङ्गा प्रादि श्रेष्ठ सरिताएँ समस्त प्राभरणो से भूपित हाथो फे अग्र भाग मे चमर लिये हुए सब स्त्री रूप मे शोभित थी। वहाँ-वहाँ अपना स्थान बनाकर उस रथ को शोभा को कर रही थी ॥१७॥१८॥ प्रावहाद्य सात वायु नेमियों सुवर्ण को सोपान थी। भगवान ब्रह्मा इसके मारथि थे और देवता रथ को रश्मियो के ग्रहण करने वाले थे ॥१६॥ उसका प्रतोद ब्रह्म दैवत ब्रह्मा का प्रणव था। सात वायु स्वन्धात्मक सोपान से समन्वित सम प्रमाण से विस्तृत लोका लोकानल था ॥२०॥ उस रथ का पाम्यन्तर विषम अर्थात् पाद न्यासापोभाग सुन्दर मनसाद्रि था। उस रथ के चारो पोर समस्त पर्यत नाता कहे गये हैं ॥२॥ तला: कपोना कापोताः सर्वे तलनिवासिनः। मेरुरेव महाछत्र मदरः पार्डिडिमः ॥२२ शलेद्रः कामुक चैव ज्या भुजगाधिपः स्वयम् । कालर व्या तथैवेह तपेन्द्रधनुषा पुनः ॥२३ घंटा सरस्वती देवी धनुपः श्रुतिर पिणी । इपुविष्णुमहातेजा. शत्यं सोम. शरस्य च ॥२४ कालाग्निस्तच्चरस्यैव माक्षात्तीक्षा. सुगरण । अनेक विषसभूतं वायवो वाजवाः स्मृ: ॥२५ समय में शिव पियो के द्वारा स्तुति रिये गये थे और वही गण के द्वारा धन्धमान हुए थे। पाराऐ उनके समक्ष में नस्य करनी थी जो कि मुकुट प्रादिरण के मण्डन धारण करने वाले भव रामस्त देयगणों से शिवजी का युद्ध-अभियान० ] [४६६ एवं कृत्वा रथं दिव्यं कामुकं च शरं तथा । साथि जगतां चैन ब्रह्माण प्रभुमीश्वरम् । २६ प्रारोह रथ दिव्यं रणमंडनधृष्भवः । सर्वदेवाणयुक्त कपयन्निव रोदसी ॥२७ ऋषिभि. स्तूयमानश्च वद्यमानश्च वंदिभिः । उपनृत्यश्चाप्सरसां गणनृत्यविशारदः ।।२८ साततल मञ्जन थे और सम्पूर्ण तलवामी कपोत पक्षियों के समान थे जो कि प्राय: यूपादि दरियों में रहा करते हैं । मेरु पर्वत ही इसका महान् कान है और मन्दर पर्वत इसका पृष्ठ वाद्य है ॥२२॥ शैलो का स्वामी का प्रभु वासुकि इसका स्वयं धनुष की ज्या अर्थात् मौर्वी है जो कि कालरात्रि और इन्द्र के धनुप के साथ होती है ।।२३।। अतियो के रूप वाली सरस्वती देवी धनुष के घण्टा हैं। महान तेज वाले विष्णु वाण हैं और शर का शल्य मर्थात् प्रायस निर्मित अग्रभाग चन्द्र है ॥२४॥ प्रलय को अग्नि उस शर का निशित अग्रभाग याला कालकूट विष से समुत्पन्न अनीक अर्थात् बल है । भावहाद्य यायु उसके विच्छ पहे गये हैं ॥२५॥ इस प्रकार से देवो के द्वारा परम दिव्य रथ धनुप धार भौर जगत् के प्रभु ब्रह्मा को सारपि बनाकर प्रस्तुत किया गया था। उस पर पथच. मेरु-भुजङ्गो युक्त समग्र रोदसी को कम्पित करते हुए भारुढ हुए थे ॥२६॥२७॥ जरा नृत्य कला को महान् पण्डित थीं ॥२८॥ सुशोममानो यरद सप्रेक्ष्येय च सारपिम् । तस्मिन्नारोहति रथं कहिपस लोकगभृतम् ॥२६ शिरोमिः पतिता भूमि तुरगा येदरामयाः । अपाघस्ताद्रयस्यास्य भगवान धरणीधरः ॥३० वृपेन्द्ररूपी पोरयाप्य स्थापयामास यं धाम।। क्षणांतरे वृद्रोपि जानुभ्यामगमदराम १ के पन्तर ४७० ] [लित पुराण अभीपुहस्तो भगवानुद्यस्य च हयान् विभुः । स्थापयामास देवस्य वचनाद रथ शुम् । ३२ ततोश्वाश्चोदयामास मनोमातरंहसः। पुराण्युद्दिश्य स्वस्थानि दानवानां तरस्विनाम् ॥३३ अथाह भगवान् रुद्रो देवानालोक्य शंकरः। पशूनामाधिपत्य मे दत हन्मि ततोऽसुरान् ॥३४ पृयकरशुत्व देवानां तथान्येषां सुरोत्तमाः। कल्लयित्वव वध्यास्ते नान्यथा नैव सत्तमाः ॥३५ परम सुन्दर शोभा से सम्पन्न होते हुए वरद प्रभु शकर सारथि को देखकर ही उस लोक संभृत कल्पित रथ पर मारोहण कर रहे थे। वेदों से सम्भूत तुग्ग शिरो से भूमि पर गिर गये थे। इसके अनन्तर भगवान् घरणी घर इस रथ के नीचे के भाग मे थे उन वृपेन्द्र रूपी शेष ने रथ के नीचे से उठाकर क्षण में स्थापित किया था। एक क्षण मे वृषेन्द्र भी जानुमों से घरा मे चले गये थे ॥२६॥३०॥३१॥ प्रभोपु हस्त वाले विभु भगवान् ने हयो को उद्यन करके देव के वपन से उस शुभ रथ को स्थापित किया था ।।३२।। इसके अनन्तर मन और वायु के समान वेग वाले उन प्रश्वो को सम्प्रेरित किया था और प्राकाश में स्थित परम तरस्वी दानवों के पुरों को उद्देश्य करके उसी मोर रथ प्रेरित किया गया था ॥३३॥ इसके मनन्तर भगवान् रुट शङ्कर ने देवो को देखकर कहा था-मैंने ही पशुओं का प्राधियत्य दिया था अब मैं उन मसुरों का हनन करता हूँ ॥३४॥ अब हे सुरोत्तमो! अन्य देवो का पृथक् पशुत्व कल्पित करके उनका वध किया जाना चाहिए । अन्य किसी प्रकार से उनका वध नहीं होगा ॥३५|| इति श्रुत्वा वचः सर्व देवदेवस्य धीमतः । विषादमगमन् सर्वे पशुत्वं प्रति शंकिताः ॥३६ तेपा भाव ततो ज्ञात्वा देवस्तानिदमब्रवीत् । मा वोल्नु पशुमावेस्मिन् भयं विबुधसत्तमाः ॥३७ श्रू यतो पशुभावस्य विमोक्षः क्रियतां च सः।
शिवजी का युद्ध-अभियान. ] [ ४७१ यो वै पाशुपत दिव्यं चरिष्यति स मोक्ष्यति ॥३८ पशुत्वादिति सत्यं च प्रतिज्ञातं ममाहिताः । ये च प्रन्ये चरिष्यति व्रत पाशुपतं मम ||३६ म क्ष्यति ते न सदेह. पशुत्वात्सुर सत्तमाः। नप्तिकं द्वादशाब्दं वा तदधं वर्षकत्रयम् ॥४० शुश्रूषां कारयेद्यस्तु स पशुत्वाद्विमुच्यते । तस्मात्सरमिदं दिव्यं चरिष्यथ सुरोत्तमाः ॥४१ तथेति चाव वन्देवा: शिवे लोकनमस्कृते । तस्म'द्वं पशव. सर्वे देवासुरनराः प्रभोः ।। २ देवो के देव धीमान् भगवान् शङ्कर के इस समस्त वचन को सुनकर समस्त देवगण पशुत्व के प्रति शङ्कित होते हुए अत्यन्त विषाद से युक्त हो गये थे ॥३८॥ इसके उपरान्त उन देवतानों के भाव को जानकर शङ्कर देव उनसे बोले-हे विबुध श्रेयो। इस पशुभाव मे पापको भय नही करना चाहिए । ॥३७॥ अब शुभाव का विमोक्ष प्राप लोग श्रवण करलो और फिर उसे करना चाहिए। जो पाशुपत दिव्य यत का चरण करेगा वह ही उसका भोग करेगा ॥३८॥ पशुत्व से समाहित होकर सत्य की प्रतिज्ञा की गई है। अन्य भी जो कोई मेरे इस पाशुपत प्रत का चरण करेगा वे पशुन्य से मुक्त हो जायगे- इसमे कुछ भी मन्देह नहीं है। वह नष्ठिक द्वादश वर्ष का है उसरा प्राधा मोर तीन वर्ष का भी है । जो सुथ पा परावेगा वह पशुत्व मे मुक्त हो जायगा । इसलिये हे देवी मे थेहो! इस परम दिव्य वा पाप लोग समाचरण करेंगे ॥३६॥४०॥ ॥४१॥ समस्त देवों ने ऐसा ही होगा-यह सर्व लोको के द्वारा नमस्कृत शिव के विषय में यह कहा था। इससे प्रभु के समस्त देवता-मसुर मोर नर पशु हैं ॥४२॥ रुद्र. पशुपतिश्च व पशुपाशविमोचकः । यः पशुस्तत्पशुत्व प यतेनानेन संत्यजेत् ।।४३ सत्कृत्वा न च पापीयानिति शाखस्य निश्चयः । ततो विनायकः साक्षावालोखालपराक्रमः ॥४४ ४७२ ] [ लिङ्ग पुराण अपूजितस्तदा देवं प्राह देवानिवारयन् । मामपूज्य जगत्यस्मिन् भक्ष्यभोज्यादिशि शुभै ॥४५ क पुमान्सिद्धिमाप्नोति देवो वा दानवोपि वा। ततस्तस्मिन् क्षणादेव देवकार्ये मुरेश्वरा. ४६ विघ्नं करिष्ये देवेश क्थ कर्नु, समुद्यता । तत सेद्रा सुराः सर्वे भीता सपूज्य त प्रभुम् ।।४७ अय निरीक्ष्य सुरेश्वरमीश्वरं सगणमद्रिसुतासहित तदा । त्रिपुर रंगत लोपरि सस्थित सुरगणोनु जगाम स्वयं तथा ॥४८ जगत्रय समिवापर तत् पुरश्य तम विभाति सम्यक् । नरेश्वरैश्च व गणश्च देव सुरेतरश्च त्रिविधमुनीद्रा ॥४६ पशुपति रुद्र पशुपा के विमोचन करने वाले हैं । जो पशु है वह इस पशुत्व को इस प्रत से त्याग देवे ॥४३॥ इस पर वह पापीयान नही रहा करता है-यह शास्त्र का निश्चय है। इसके मनन्तर बाल स्वरूप भी विनायक महान् पराक्रम वाले हैं ॥४४॥ उस समय मे देवो के द्वारा पूजित न होरर देवो पो निवारण करते हुए विनायर ने कहा--श्री वि. नायक ने कहा-शुम भक्ष्य पोर भोज्य मादि पदार्थों के द्वारा इस जगर में मुझको न पूजकर पीन पुरुष देव हो या दानव हो सिद्धि को प्राप्त करता है । हे सुरेश्वरो ! इमरे पश्चन भए भर में ही देव कार्य में विघ्न कर दू गा । है देवेश । प्राप लोग कैसे करने को समुद्यत हो गये हैं। इसवे मनन्तर इन्द्र में सहित समस्त देवगण भयभीत हो गये थे और उस प्रभु की उन्होंने भली-भांति पूजा की थी॥४५॥४६॥४७॥ इसपे मनन्तर उस समय में गणों ये सहित तथा मदि सुता पार्वती से युक्त सुगंगे ईश्वर भगवान ईधर को देसार त्रिपुर के रगतस के ऊपर स्थित देयो का गए स्थय पोछे चला गया था। यह पुरमय यही पर दूसरे मम्पूर्ण जगत् अपनी ही भांति प्रछी तरह से प्रकाशित हो रहा है। है मुरेन्द्र गए! यहाँ नरेश्वर गदा-देव तीनों प्रकार फ अगुर सभी से यह युरा पा ॥४६॥ प्रय सभ्यं धनु मृत्वा सावं. संघाप त पारम् ।
८
[४७३
शिवजी या युद्ध अभियान
युक्त्वा पशुपतास्त्रेग यिपुर समचितयत् ॥५०
तस्मिस्थिते महादेवे र विततकामुके।
पुराणि तेन काले । जग्मुरेयत्वमाशु वै ॥५१
एकोभावं ते चंद्र त्रिपुरे समुपागते ।
यभव तमुलो हो देवताना महात्मनाम् ।।१२
ततो देवगणाः सर्वे मिद्धाश्न परमर्पय ।
जयेनि वाचो मुमुच संस्तृवंतोष्टमूर्तिनम् १९५३
अथाह भगवा ब्रह्मा भगनेत्रनिपातनम् ।
पुष्ययोगेपि संप्राप्ने लोलावामुमापतिम् ॥५४
स्थाने तय महादेव चेप्टेय परमेश्वर ।
पूर्वदेवारच देवाइन समास्तव यतःप्रभो ॥५५
तथापि देवा मिष्ठाः पूर्वदेवाच पापिनः ।
यस्तम्माजानाय लीला त्यातुमिहामि ।।५६
४७४ ]
[लिङ्ग पुराण
इषुणा भूनसंघश्च विष्णुना च मया प्रभो ॥५७
पुष्ययोगे वनुप्राप्त पुर दग्घुमिहाहंसि ।
यावन्न यांति देवेश वियोगं तावदेव तु ॥५८
दग्धुमर्हसि शोघ्रत्व त्रीण्येतानि पुराणि वै।
अथ देवो महादेवः सर्वज्ञस्तदवेक्षन ||
पुरत्रयं विरूपाक्षस्तत्क्षणाद्भस्म वै कृतम् ।
सोमश्च भगवान्विष्णुः कालाग्निर्वायुरेव च ॥६०
शरे व्यवस्थिताः सर्वे देवमूचुः प्रणम्य तम् ।
दग्धमप्यथ देवेश वीक्षरणेन पुरत्रयम् ॥६१
अस्मद्धितार्थ देवेश शर मोक्तुमिहाहमि ।
अथ संमृज्य धनुपो ज्यां हसन् विपुरादनः ॥६२
मुमोच बारणं विप्रेद्रा व्याकृप्यारणमीश्वरः ।
तत्क्षणाधिपुरं दग्ध्वा ग्रिपुरांतकरः शरः॥६३
देवदेवं समासाद्य नमस्कृत्वा व्यवस्थितः ।
रेजे पुरत्रयं दग्धं दैत्यकोटिशतवृतम् ॥६४
हे प्रभो ! हे ईश ! पुरत्रय को दग्ध करने के लिये भापको रथ मौर
ध्वजा से क्या प्रयोजन है ! बाण से-भूतों के संपो से-विष्णु से मोर
मुझसे पुष्प नक्षत्र के योग अनुप्राप्त हो जाने पर इस पुर को माप दग्य
परने के लिये योग्य हैं। हे देवेश, जब तक वियोग नहीं होता है तभी
तक माप शीघ्र इन तीन पुरो को दग्ध करने को योग्य होते है । इसके
पश्चात् सर्वश महादेव देव ने उसे देसा पा ॥५॥५६॥५६॥ विरूपारा ने
उसी क्षण में पुरत्रय को भस्म कर दिया था। सोम-भगगन विष्णु-
कालाग्नि-वायुये सब घर मे व्यवस्थित थे। उन्होंने देव को प्रणाम करके
पहा-हे देवेश ! यह पुरत्रय ता पारके वीक्षण से ही दाप हो गया है
॥॥११॥ हे देवेश! हमारे हित के लिये पाप इस पर दो मुरत ने
रे योग्य होते हैं । इसके मनन्तर त्रिपुरादन ने पनुप को मती मावि पुल
करके हंसते हुए को पड़ा पर गिरा ! भगवान शिर ने
पणं पन्त पार पाए पोपोट दिया था। उगो ममय में त्रिपुरान्तर
शिवजी का युद्ध-अभियान० ] [ ४७ के कर वाला शर त्रिपुर मे पहुंचा और तुरन्त उसे दग्ध करके फिर वा- पिस देवेस के आ गया था और महादेव को नमस्कार करके स्थित हो गया था शत करोड दैत्यो से युक्त वह पुरत्रय दग्ध होकर दीति वालर हमा पा ॥६२१६३॥६४|| इपुरणा तेन कल्पाते रुद्रणेव जगत्त्रयम् । ये पूजयंति तत्रापि दैत्या रुद्र' सबाधवाः ।।६५ गाणपत्यं तदा शभोर्ययुः पूजाविधेर्वलात् । न किंचिदन वन्देवा: सेद्रोपेंद्रा गणेश्वराः ॥६६ भयावं निरीक्ष्यैव देवी हिमवतः सुताम् । दृष्ट्वा भीत तदानीक देवानां देवपुंगवः ॥६७ कि चेत्याह तदा देवान्प्ररणेमुस्त समंततः ॥६८ ववदिरे नंदिनमिदुभूषण ववदिरे पर्वतराजसंभवाम् । चवंदिरे चाद्रिसुतासुतं प्रभु ववंदिरे देवगरणा महेश्वरम् ।।६६ तुष्टाव हृदये ब्रह्मा देवैः सह समाहितः । विष्णुना च भवं देव त्रिपुरारातिमीश्वरम् ।।७० कल्पान्त मे रुद्र से जगत् त्रय की भांति उस इपु से जो बान्धवो के सहित देन्य वहां पर भी पूजा किया करते हैं उस समय शम्भु की पूजा विधि के बल से गाणपत्य पद को प्राप्त हो गये थे और इन्द्र या उपेन्द्र के सहित गणेश्वर देव कुछ भी नहीं बोले ॥६५॥॥६६॥ इस प्रकार से देव पुङ्गव शिव ने देव को भौर हिमवान् की सुता को देखकर उस समय में देवों की भनीक को भीत देखा ॥६७) और देवो से कहा, उन देवो ने उसको प्रणाम किया था ॥६८॥ इन्दु सूपण चाले नन्दी की वन्दना को सया पर्वत राज की पुत्री की बन्दना की थी। और अद्रि सुता सुत प्रभु की वन्दना की थी तथा देवगणों ने महेश्वर की वन्दना की थी १६६॥ देवताओं के सहित ब्रह्मा ने पूर्णतया समाहित होकर हृदय मे स्तवन किया था और विष्णु ने भी त्रिपुर के माराठि ईश्वर भव देव का स्तवन किया था॥७॥ के
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[लिङ्ग पुराण
॥१०५-लिंगार्चन और लिंग पूजा फल ।
गते महेश्वरे देवे दरध्वा च त्रिपूरं क्षणात् ।
सदस्याह सुरेंद्राणां भगवान्पद्मसंभवः ॥2
संत्यज्य देवदेवेश लिंगमति महेश्वरम् ।
तारपौत्रो महातेजास्तारकस्य सुतो चलो ॥२
तारकाक्षोपि दितिज: कमलाक्षश्च वीर्यवान् ।
विद्युन्माली च दैत्येशः अन्ये चापि सबांधवाः ॥३
त्यक्त्वा देव महादेवं मायया च हरेःप्रभोः ।
सवें विनष्टाः प्रध्यस्ताः स्वपुरैः पुर संभवः ॥४
तस्मात्सदा पूजनीयो लिंगमूर्तिः सदाशिवः ।
यावत्पूजा सुरेशानां तावदेव स्थितियतः ।।५
पूजनीयः शिवो नित्यं श्रद्धया देवपुगवः।
सलिंगमयो लोकः स लिगे प्रतिष्ठितम् । ६
तस्मात्सपूजयेल्लिंगं य इच्छेसिद्धिमात्मनः ।
सवें लिंगानादेव देवा देत्याश्च दानवाः ।।
इस अध्याय में देवो को ब्रह्मा के द्वारा पहा हुमा लिलाधन की
विधि मौर उसका फल निरूपित पिया जाता है । मूतजी ने कहा-क्षण
भर में मिपुर रा दाह परके देव पर महादेय रे पसे जाने पर पप
सम्भय भगया मासा देयों को सभा में पाया तामह बोले-
देयों ये भी देवेग लिजति महेश्वर का त्याग कर. तारापोत्र
महाद तेज पाला प्रति वालवान् तारकपुर-दिति रो जन्म लेने वाला
पारस भोर वीर्यवान मसाथ सपा दरयेश विद्यमानी मोर पाल्पयों
सहित मन्य भी प्रभु हरि की माया से महादेव देव या पाग बरसे
समविनष्ट हो गये थे मोर पुर में होने गाले एप रोपे माम पूर्णमा
विस्त हो गये पे लिये नि ति मायाद समातिय
पून काम पाहिए। मोकि जय ता गुरेजीको पूजा
प्रम है तभी तम रिपति है ॥५॥ देव पुजयांगो पति या form
नियम रमा पादिर। यह सोरम विजय और गय
. लिंगार्चन और लिंग पूजा फल ] [ ४७७ लिङ्ग में ही प्रतिष्ठित है ॥६॥ जो अपनी कोई सिद्धि की इच्छा करता है तो लिङ्ग की पूजा करे । लिङ्ग पूजा से ही समस्त देव-दत्य और दानव सिद्धि को प्राप्त हुए हैं ।।७।। यक्षा विद्याधरा: सिद्धा राक्षसाः पिशिताशनाः । पितरो मुनयश्चापि पिशाचाः किन्नरादयः ।। अर्चयित्वा लिंगमूर्ति मंसिद्धा नात्र संशयः । तस्मालिंगं यजेन्नित्यं येन केनापि घा सुराः ।। पशवश्च वयं तस्य देवदेवस्य धीमतः। पशुत्वं च परित्यज्य कृत्वा पाशुपतं ततः ॥१० पूजनीयो महादवो लिंगमूर्तिः सनातनः । विशोध्य चैव भूतानि पचभिः प्रणवः समम् ॥११ प्राणायामैः समायुक्त. पंचभि सुरपुंगवा: । चतुभि प्रणवैश्च व प्राणायामपरायण ॥१२ त्रिभिश्च प्रणवर्देवाः प्राणायामैम्तयाविधैः । द्विधा न्यस्य तथाकार प्राणायामपरायणः ॥१३ ततश्चोंकारमुच्चार्य प्राणापानौ नियम्य च । ज्ञानामृतेन सर्वांगान्या पूर्य प्रणधेन च ॥१४ यक्ष विद्याधर-सिद्ध और मान भोजी राक्षस-पितृगण-मुनि लोग- पिशाच और मिनर गण प्रादि सब भगवान शिव की लिङ्ग मूर्ति का अर्चन करके ससिद्ध हुए हैं-इममे कुछ भी सराय नही है । इस कारण से सुरो मे जिस किसी को भी नित्य ही लिङ्ग को समर्वना अवश्य परनी चाहिए ॥८॥६॥ उम देवो के देव धीमान् के हम सब पशु हैं और पशुत्व का त्याग करक पाशुपत करना चाहिए । पाँच प्रणयों के द्वारा भूनो की विशुद्धि करके रानातन शिव को लिङ्ग मूर्ति को पूजा करनी ही चाहिए ॥१०॥११॥ भव प्रत का प्रभार बताते हुए रहते हैं कि गगनादि जो पांच महाभूत हैं उन्हे पांच प्रगगो के समायुक्त प्राणायावे द्वारा वि. सोधन करे । चार प्रणवों से युक्त प्राणायागो द्वारा-नयाविष तीन प्रणव युक्त प्राणायामो से-दो वार ही प्रणव महित प्राणायाम से तया मोझार ४७८ ] [ लिङ्ग पुराण का उच्चारण कर और प्राणापान को नियमित कर और ज्ञानामृत प्रणव से समस्त प्रङ्गो को प्रापूरित करे ॥१२॥१३॥१४॥ गुणत्रयं चतुर्धाख्यमहंकार च सुव्रताः। तन्मात्राणि च भूतानि तथा बुद्धीद्रियाणि च ॥१५ कर्मेद्रियाणि सशोध्य पुरुष युगलं तथा । चिदात्मान तनु कृत्वा चाग्निर्भस्मेति सस्पृशेत् ॥१६ वायुभस्मेति च व्योम तथाभो पृथिवी तथा । नियायुषं त्रिसध्य च धूलयेद्भसितेन य ॥१७ स योगी सर्वतत्त्वज्ञो व्रतं पाशुपत त्विदम् । भवेन पाशमोक्षार्थ कथित देवसत्तमा ॥१% एव पाशुपत कृत्वा सपूज्य परमेश्वरम् । लिंगे पुरा मया दृष्टे विष्णुना च महात्मना । पशवो नैव जायते वर्षमात्रेण दवताः। अस्माभि. सर्वकार्याणा देवमभ्ययं यत्नत ॥२० बाह्य चाम्यतरे चैव मन्ये कर्तव्यमोश्वरम् । प्रतिज्ञा मम विष्पोश्च दिव्यपा सुरसत्तमा ॥२१ तीनो गुण चतुर्यास्य अर्थात् मन, बुद्धि, महद्वार मोर चित को तया यहवार को पश्चतन्मात्रा-पचमूत ज्ञानेन्द्रिया-कन्द्रियाँ इन सब का सशोधन करके तैजस प्राज्ञ दोनो प्रकार के युगल पुरुष का सशोधन करे । चैतन्य रूप तनु को भावना करखे 'मग्नि'-इत्यादि मन्त्रो से भस्म का स्पर्श करना चाहिए ॥१॥१६॥ वायु-व्योम-अम्भ पोर पृथ्वी को त्रिया- युप जमदग्ने -इत्यादि मन्त्रों के द्वारा तीनो सन्च्या काल में भस्म से जो धूलित करता है वह सर्व नवमाता योगी है यह पाशुपत व्रत है। हे देव सत्तमो । यह भव देव ने पाश के मोक्षा के लिये कहा है ॥१॥१८इस प्रकार से पाशुपत ग्रत कर मेरे द्वारा पोर महात्मा विष्णु के द्वारा प्रथम दृष्ट लिङ्ग में परमश्वर का पूजा करे तो एक वर्ष में देवता पशु नहीं होगे। हम ब्रह्मा विष्णु पौर रुद्रो के साथ बाह्य और माम्यन्तर में ईश्वर वी अभ्यर्चना करके समस्त कार्यों की पत्तं व्यता होती है यह
इच्छा रखते हैं तथा देवो के स्थान में राज्य की कामना करते हैं उन्हें
लिंगार्चन और लिंग पूजा फल ]
[४७e
मानते हैं । हे सुरथेष्ठो ! मेरी और विष्णु की यह दिध्य प्रतिज्ञा है और
मुनियों की भी ऐसी ही प्रतिज्ञा है । इसमें कुछ भी सन्देह नही है । इससे
शिव का पूजन करना ही चाहिए ॥१९॥२०॥२१॥
मुनीनां च न संदेहस्तस्मात्संपूजयेच्छिवम् ।
सा हानिस्तन्महच्छिद्रस मोहः सा च मूकता । २२
यत्क्षरणं वा मुहूर्त वा शिवमेकं न चिंतयेत् ।
भवभक्तिपरा ये च भवप्रातचेतसः ॥२३
भवसंस्मरणोद्युक्ता न ते दु खस्य भाजनम् ।
भवनानि मनोज्ञानि दिव्यमाभरण स्त्रियः ॥२४
धनं वा तुष्टिपर्यंत शिवपूजाविधे. फलम् ।
ये वांछति महाभोगान् राज्य च त्रिदशालये ।
तेऽचंयतु सदा कालं लिंगमूर्ति महेश्वरम् ॥२५
हत्वा भित्त्वा च भूतानि दग्ध्वा सवमिद जगत् ॥२६
यजेदेक विरूपाक्ष न पापैः स प्रलिप्यते ।
शैलंलिगं मदीयं हि सर्वदवनमस्कृतम् ॥२७
इत्युक्त्वा पूर्वमभ्यर्च्य रुद्र त्रिभुवनेश्वरम् ।
तुष्टाव वारिमरिष्टाभि देवदेव त्रियंबकम् ॥
तदाप्रभृति शक्राद्याः पूजयामासूरीश्वरम् ।
माक्षात्पाशुपतं कृत्वा भस्मोद्धूलितविग्रहाः ।।
वह हानि है महान् छिद्र है-वह मोह है और वह मूकता है जिस
क्षण और मुहूर्त मे एक शिव का चिन्तन नहीं करता है । जो भव की
भक्ति मे परायण हैं और भव के चरणो मे जिनका चित्त प्रणव रहता है
तथा भव के सदा संस्मरण मे जो उद्युक्त रहते हैं वे कभी भी दुःख के
भाजन नही हुआ करते हैं । भव भक्तो के भवन परम मनोज होते है-
दिव्य प्राभरण-स्त्रियाँ और तुष्टि पर्यन्त धन इन सब का होना शिव को
पूजा का प्रत्यक्ष फल होता है । जो पुरुष महान् भोगो के प्राप्त करने यो
सर्वकाल मे लिङ्ग मुक्ति महेश्वर की पूजा करनी चाहिए ॥२२॥२३॥
४०० ] [ लिङ्ग पुराण इस ॥२॥ भूतो का हनन और भेदन करके और इस समस्त जगत् को दग्ध करके भी एक भगवान् विरूपाक्ष का जो यजन करता है वह कभी भी पापो से प्रलिप नही होता है। मेरा शिलामय सर्व देवो से नमस्कृत लिङ्ग है-यह कहकर पहिले त्रिभुवनेश्वर रुद्र को अभ्यर्चना करे और फिर इष्ट व गियो के द्वारा त्रियम्बक देव का स्तवन करे । ब्रह्मा उपदेश काल से प्रारम्भ करके इन्द्र श्रादि देवो ने ईश्वर की पूजा की थी और साक्षात् पाशुपत व्रत करके भस्म से उधूलित विग्रह वाले हुए थे। ॥२६॥२७॥२६॥२६॥ ॥ १०६-वज्रवाहिनिका विद्या निरूपण ॥ निग्रहोऽघोररूपोय कथितोऽम्माकमुत्तमम् । वजवाहनिका विद्या वक्तुमर्हसि सत्तम ॥१ वज्रवाहनिका नाम सर्वशनुभयकरी। अनया सेचयेद्वज नृपाणा साधयेत्तथा । वज्र कृत्वा विधानेन तद्वज्रमभिपिच्य च। अनया विद्यया तस्मिन्विन्यसेत्काचनेन च ॥३ ततश्चाक्षरलक्ष च जपेद्विद्वान्समाहितः । वजी दशाश जुहुयाद्वजकु डे घृतादिभिः ॥४ तद्वन गोपयेन्नित्य दापयेन्नृपतेस्तत । तेन बजे ण वै गच्छन्छजीयाद्रणाजिरे ।।५ पुग पिता महेनैव लब्धा विद्या प्रयत्नत । दयी शनोपकारार्थ साक्षाद्वज्रेश्वरी तथा ॥६ नापियो ने कहा-हे श्रेष्ठतम । आपने यह अघोर रूप निग्रह हम लोगो के समक्ष मे बता दिया है जो कि अति उत्तम है । मब बववाह- निका विद्या के बताने वे आप योग्य होते हैं ॥१॥ सूतजी ने कहा वध वाहनिका विद्या समस्त अनुप्रो व लिये भय के उत्पन्न करन वानी है। इसके द्वारा वज का सेवन करे तया नपो को उस प्रकार का वज सम- विठ कर देना चाहिए ॥२॥ विधि-विधान से वच्च की रचना कराकर वज्रवाहिनिका विद्या निरूपण ] [४८१ उस वन का अभिषेक करे फिर इस विद्या के द्वारा उस पर सुवणं से विन्गस रे अर्थात् लिखना चाहिए ।।३। इसके अनन्तर वज्र से विशिष्ट विद्वान् समाहित होकर अक्षर लक्ष जाप करे अर्थात् मन्त्र के जितने वर्ण हो उतने ही लाख सख्या वाला जप होना चाहिए। जप सम्या या दशवां भाग वज्र कुण्ड में घृत प्रादि से हवन करना चाहिए ॥४॥ फिर उसकी नित्य रक्षा करे और राजा को दिला देवे। उम च को साथ लेकर जाने वाला राजा रण क्षेत्र में विजय प्राप्त दिया करता है || अव इस विद्या के प्राप्त होने की प्रकार बताया जाता है-पहिले प्राचीन काल यह वर्चश्वरी महा विद्या पितामह ब्रह्मा ने भगवान् महेश्वर से बहुत प्रयत्न से प्राप्त की थी और इन्द्र के उपनारायं इम साक्षात् ययेश्वरी विद्या देवी का उपयोग किया गया था ॥६॥ पुरा त्वष्टा प्रजानायो हतपुर: मुरेश्वरात् । विद्यया हरत सोममिंद्रवरेण सुव्रता ॥3 तस्मिन्यज्ञ ययाप्राप्त विधिनोपवृत हवि । तदच्छन महावाहुविश्वरूपविमदन 15 मत्पुत्रमवयो शक न दास्ये तव शोभनम् । भाग भाग हता नैव विश्वमोहनम्त्वया ॥2 इत्युक्त्वा चाथम सर्व माहयाम स मायग। ततो माया विनिभिद्य विश्वरूपविमदन १० प्रमा सोमम पियत्सगणश्च शचीपति । ततस्तच्छेषमादाय कोषाविष्ट प्रजापति ॥११ पहिने समय मे विश्वोपरिष्ट विद्या से सोम । हामी वान सुरेश्वर से हतपुत्र स्पष्टा प्रजानाप उस सोमयाग में यया प्राप्त विपि , अपात हवि महायाहु विश्वरूप विमदन ने इस्पा को भी ॥७॥ राम ! मेरे पुत्र या हना दिया है और पापो गोभन भाग को नही देगा। हे गुबतो! पाNिET वा मा गिया है। भाग से प्राम परने की योग्यता पाने में नहीं रह एमपी और में रहार माया से यापूर्ण माधम को गोहिल दिया था। दो अनावर पापा का भेदन ४८२] [ लिङ्ग पुराण कर विश्वरूप के यिमन करने वाले शची के पति इन्द्र ने बलात् गणों के सहित सोम का पान किया था। उस शेष मोम को लाकर प्रजापति क्रोध मे भर गये थे ॥१०॥११॥ इंद्रस्य शत्रो वर्धस्व स्वाहेत्यग्नौ जुहाव है। ततः कालाग्निसकागो वर्तनादृत्रसंज्ञित. ॥१२ प्रादुरासीत्सुरेशारिर्दुद्राव च वृषातकः । ततः किरीटी भगवान्परित्यज्य दिवं क्षणात् ॥१३ सहस्रनेत्रः सगरगो दुद्राव भयविह्वलः। तदा तमाह स विभुह धो ब्रह्मा च विश्वसृट् ।।१४ त्यक्त्वा वच तमेतेन जहोत्यारिमरिंदमः । सोऽपि सन्नह्म देवेद्रो देवैः साधं महाभुजः ॥१५ निहत्य चाप्रयत्नेन गतवान्विगतज्वरः। तस्माद्वजेश्वरीविद्या सर्वशत्रुभयकरी ॥१६ मंदेवा राक्षसा नित्य विजिता विद्ययेव तु । तां विद्यां संप्रवक्ष्यामि सर्वपापप्रमोचनीम् ॥७ ॐ भूर्भुवस्व तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो न: प्रचोदयात् । ॐ फट जहि हु फट् छिघि भिघि जहि हनहन स्वाहा । विद्या वजेश्वरीत्येषा सर्वशत्रुभयंकरो। अनया संहतिः शंभोविंद्य या मुनिपुंगवाः ॥१८ फिर "इन्द्रस्य शत्रो वर्षस्व स्वाहा"- इस सन्म से अग्नि मे होम किया था। इसके पश्चात् कालाग्नि के सदृश व्यवहार वाला होने से वृत्र संज्ञा वाला देव शत्रु प्रादुर्भूत हुमा था । उस समय किरीटी वृपा- तक भगवान् तुरन्त स्वर्ग को छोड़कर भय से विह्वल होते हुए इन्द्र सहस्र नेय वाला गणो के सहित भाग खड़े हुए थे। उस समय में विश्व के मष्टा विभु ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर उससे कहा था ॥१२॥१३॥१४॥ इस वज्रेश्वरी मन्त्र से वन को त्याग कर प्रति वज मे इस मन्त्र का प्रयोग कर इस शत्रु का वध करो। उस देवेन्द्र ने जिसकी बड़ी २ भुजाएं थी
ऋषियों ने कहा-हे सूतजी! हम लोगो ने इन्द्र के उपकार करने
गायत्री मंत्र पूर्वक० ]
[४५३
देवो के साथ सनद्ध होकर उसका वध बिना ही विशेष प्रयत्न के करके
दु.ख रहित हुए थे। इससे यह वजेश्वरी विद्या समस्त शत्रुनों के लिये
महा भयङ्करी है ॥१२॥१६॥ मन्देह नाम वाले राक्षस इसी विद्या के
द्वारा निहत एव विजित हुए थे। अब मैं उसी सम्पूर्ण पापो के विमोचन
करने वाली विद्या को भली भांति वरिणत क्रू गा ॥१५॥ वह वर्चश्वरी
मन्त्र का आकार स्वरूप यह है-"ॐ भूर्भुवः स्व तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गों
देवस्य धीमहि । धियो यो न. प्रचोदयात् । ॐ फट जहि हु फट् छिन्दि
भिन्दि जहि हन हन स्वाहा" यही वजेश्वरी विद्या का मन्त्र है जो
समस्त शत्रुप्रो वो भय करने वाली है। इसी विद्या के द्वारा भगवान्
शम्भु का सहार होता है । हे मुनिश्रेष्ठो । यही शम्भु की विद्या है जिस
से प्रलय हुआ करता है ।१८।।
॥ १०७-गायत्री मंत्र पूर्वक वज्र वरी विद्या ॥
श्रता वज्रेश्वरी विद्या ब्रह्मी शक्रोपकारिणी।
अनया सर्वकार्याणि नृपाणामिति न. श्रुतम् ॥१
विनियोगं वदस्वास्या विद्याया रोम हर्षण ।
वश्यमाकर्षण चैव विद्वेषणमत परम् ॥र
उच्चाटनं स्तभनं च मोहन ताडनं तथा ।
उत्सादन तथा छेद मारणं प्रतिबधनम् ॥३
सेनास्तभनकादीनि साविया सर्वमाचरेत् ।
प्रागच्छ वरदे देवि भूम्या पवनमूर्धनि ॥४
ब्रह्मणेभ्यो ह्यनुज्ञाता गच्छ देवि यथासुखम् ।
उद्वास्थगनेन मण गतव्य नान्यथा द्विजा ॥
प्रतिकार्य तथा बाह्य वृत्वा वश्यादिका क्रियाम् ।
उद्वास्य वह्निमाधाय पुनरम्य यथाविधि।
देवीमावाह्य च पुनर्जपेत्सपूजयेत्पुनः
होम च विपिना वह्नौ पुनरेव समाचरेत् ॥
४०४ ] । लिङ्ग पुराण - वाली यह ब्राह्मी वर्चश्वरी विद्या का भली-भांति श्रवण कर लिया है और यह भी सुन लिया है कि इस विद्या के द्वारा नृपो के सम्पूर्ण कार्य सिद्ध हुप्रा करते हैं ॥१॥ हे रोम हर्पण । भव इस महा विद्या विनियोग किम तरह किया जाता है-यह कृपा करने वतलाइये । सूतजी ने कहा- वश्य अर्थात् किसी का भी वशीकरण ( वश मे कर लेना) आकर्षण (अपनी प्रोर खीचवर बुला लेना }-विद्वेषण पर्थात् किन्ही दो मे देप भाव उत्पन्न करा देना-इसके प्रागे उच्चारन अर्थात् किसी के भी मनमे स्थिरता का नाश कर स्थान के त्याग की भावना उत्पन कर देना- स्तम्भन (जहां के तहां स्तम्भित कर देना अर्थात निया शून्य बना देना)- मोहन अर्थात् मोहित बना देना ताडन-उत्सान छेग्न मारण और प्रति. बन्धन तथा सेना का स्तम्भन प्रादि करना ये सम्पूर्ण कार्य सावित्री के द्वारा ही करने चाहिए । इस सावित्री के प्रावाहन करने का मात्र यह है- "पागच्छ वरदे देवि भूम्यो पर्वत मूर्धनि"। अर्थात् हे वर देने वाली है देवि । भूमि में पर्वन के शिखर पर प्रायो। फिर इस देवी के विमर्जन कर देने का मात्र यह है - ब्राह्मणेभ्यो ह्यनुनाता गच्छ देवि यथा सुम्पम्" अर्थात् ब्राह्मणो के द्वारा अनुज्ञात होती हुई माप है देवि । सुख पूर्वक पचारो। हे द्विजगरण । इमी मात्र से देवी का उद्वासन करके जाना चाहिए अन्यथा नहीं जाना चाहिए । अर्थात् पूर्वोक्त शनु के वश्याकर्षण प्रादिरिया वरखे इस मन्त्र के द्वारा पूर्ण काम हाते हुए जाना उचित है । प्रत्येक कार्य में प्रति वश्यादित कार्य की प्रिया में देवी का विसजन पसे पिर वह्नि मे निस्य प्रति हवन परे। पुन पुन देवो पा पावाहन पूजन हवन और अन्त म विसर्जन पिया वरे ||२ || सर्वकार्यागि धिना साधयेद्विद्यया पुन । जातीपुप्पश्च वक्ष्यार्थी जुन्य दयुनत्रयम् ।। घृतेन करवीरण कु दिशपर्पण द्विना । विद्वे पण विशेपेण युल्लिागलयस्य च ॥ लेनोच्चाटन प्रोक्त स्तमन मधुना म्मृतम् । डिलेन मोहन प्रोक्त ताडन रधिरेण व ॥१० गायत्री मत्र पूर्वक० ] [४८५ खरस्य च गजस्याथ उष्ट्रस्य च यथाक्रमम् । स्तंभन सर्पपेणापि पाटन च कुशेन च ॥११ मारणोच्चाटने चैव रोहीवीजेन सुव्रता । व न त्वहिपत्रेण सेनारतगमत परम् ॥१२ इमी विधि विधान से इस विद्या के द्वारा समस्त कार्यों का साधन करना चाहिए । कामनाऐ भिन २ प्रकार की हुआ करती हैं । अतएव उनके भेद के अनुसार हान के द्रव्य भी भिन्न २ होते हैं। उन्हें अब बतलाते हैं - जो किसी को अपने वश में करना चाहता है वह उस वशी- करण ये करने के लिये जाती के पुष्पो से तीन अयुत अति तीस हजार पाहुतियाँ देवे ।।८।। द्विजो । यदि अाकर्पण वरना है तो करवीर के पुष्प और घृत से हवन करे । अगर किन्ही दो मे विद्व पण करना अभीष्ट हो तो लाङ्गल लता के पुप्पो मे होम करना चाहिए ॥६॥ उच्चाटन की क्रिया के लिये तैल से और स्तम्भन के वास्ते मधु से पाहुतियां देनी चाहिए-ऐसा बताया गया है । तिलो से हवन कग्न से मोहन होता है और रुधिर के द्वारा होम से ताडा क्रिया सम्पन हुप्रा करती है ॥१०॥ गधा-हाथी और उट इन तीन के रुधिर स यथाक्रन हवन का क्रम बताया गया है । स्तम्भन सरसो के हवन से भी होता है और पाटन कुश के होम से सम्पन्न हुआ करता है ॥११॥ हे सुव्रत वालो | रोही अर्थात् रक्त रोहिड इस प्रसिद्ध औषधि के बीजा से हवन करने पर मारण तथा उच्चाटन हुमा करते हैं। नाग वल्ली के पत्रो से हवन करने से सेना का स्तम्भन हो जाता है अर्थात् सेना विल्कुम निश्चेत्र एव क्रिया शून्य जैसी की तसी रह जाया करती है ॥१२॥ कुनटया नियत विद्यात्पूजयेत्परमेश्वरीम् । घृतेन सर्वसिद्धि. स्यात्पयमा वा विशुढयते ॥१३ तिलन रोगनाशश्च कमलेन धन भवेत् । कातिर्मधूक्पुप्पेण सावित्र्या ह्ययुतत्रयम् ॥१४ जयादिप्रभृतीन्सर्वान् स्विष्टांत पूर्ववत्स्मृतम् । एवं सक्षेपतः प्रोक्तो विनियोगोतिविस्तृतः ॥१५ ४६६ ] [ लिङ्ग पुरण जपेद्वा केवला विद्यां संपूज्य च विधानतः । सर्वसिद्धिमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥१६ खुनटी अर्थात् मैनसिल के द्वारा हवन करने से भी सेना का स्तम्भन होता है। नियम पूर्वक परमेश्वरी का पूजन करे । उपर्युक्त कामनाएं दूसरो को पीडा पहुंचाने वाली होने से प्रसात्विक होती हैं। यदि सात्त्विक कामनाएँ ही हो तो केवल घृत से हवन करे। इस से सर्व सिद्धि होती है और पय (दूध ) से विशुद्धि हुमा करती है । ॥१३॥ तिलो से प्रालियां देने से रोग का नाश और कमला के दलो से हवन करने पर धन की वृद्धि होती है । तीन प्रयुन ( दश हजार को अयुत कहते हैं) सावित्री मन्त्र के द्वारा मधूक के पुष्षो से हवन करने पर कान्ति को वृद्धि होती है ॥१४॥ जयादि प्रभृति सब को करके पूर्व की भांति स्विष्टा- न्त अर्थात् स्विष्ट कृत् के अन्त तक अग्नि सायं कहा गया है । इस प्रकार से इसका प्रति विस्तृत विनियोग भी मैंने सक्षेप से हो वणित किया है ॥१५॥ अथवा केवल विद्या का भली-भांति पूजन करके विधान मे जप करे तो समस्त सिद्धियां प्राप्त होती हैं - इसमे कुछ भी विचार नहीं करना चाहिए ॥१६॥ ॥ १०८-मृत्युजय और त्र्यंबक महामंत्र॥ मृत्युजयविधि सूत ब्रह्मक्षत्रविशामपि । वक्तुमर्हसि चास्माकं सर्वज्ञोऽसि महामते ॥१ मृत्युजयविधि वक्ष्ये बहना किं द्विजोत्तमाः। रुद्राध्यायेन विधिना धृतेन नियुतं क्रमात् ।।२ सघृतेन तिलेनैव कमलेन प्रयत्नत. । दूवया धृतगोक्षीरमिश्रया मधुना तथा ।।३ चरणा सधृतनव केयल पयसापि वा। जुहुयात्काल मृत्योर्वा प्रतीकारः प्रकीर्तितः ।।४ श्रियंवकरण मंत्रेण देवदेव त्रियंबकम् । पूजयेद्वाणलिंगे वा स्वयभूतेऽपि वा पुनः १५ मृत्युजय और त्र्यंबक महामंत्र ] [४८७ ऋपियो ने कहा-हे सूतजी ! माप तो महतो मति वाले हैं मोर सभी पुछ के पूर्ण ज्ञाता भी है। ब्राह्मण-क्षत्रिय मोर वेश्यों के लिये मृत्युञ्जय की विधि हो उसे पाकर बतलाइये, हम बहुत इच्छुक हैं ॥१॥ सूतजी ने कहा-हे द्विजोत्तमो ! अब मैं मधिक क्या बताऊँ माप लोगों के ममक्ष में मृत्युञ्जय की विधि बतलाऊगा रुद्राध्याय के द्वारा विधि पूर्वक क्रम से घृत एक नियुत हवन करे। रुद्राध्याय का तात्पर्य शिव रहस्य दामाशादि विधान से होता है ॥२॥ पूत के सहित तिलों से-कमल के दलो से दूर्वा । दूभ ) से-घृत, गाय का दूध से मिश्रित मधु से पूत के सहित चरु से पोर येवल दूध से हवन करने से काल मृत्यु का प्रतीकार याहा गया है। घृतादि का होम मृत्यु के निगस करने वाला मोर शिव को तोप उत्पन्न करने वाला होता है। जप से प्रपयर्ग की प्राप्ति होती है मौर रुद्राध्याय से रक्षा होती है ॥३॥४॥ मूतजी ने कहा-त्रियम्बर मंत्र से देवो के देव भगवान् त्रियम्बक या याण लिमे अपवा स्वयम्भू लिङ्ग मे पूजन करना चाहिए ।।६।। मायुर्वेदविदापि ययावदनुपर्वशः। मष्टोत्तरसहस्रेण पुडगरेण शकरम् ।६ फमलेन सहस्रण तया नीलोत्पलेन वा । संपूज्य पायसं दत्त्वा मघृतं चौदनं पुनः॥७ मुद्गान्नं मघुना युक्त भक्ष्याम्गि सुभोणि च । अग्नी होमश्च विपुलो यथावदनुपूवा. 15 पूर्वोक्त र पि पुष्पंश्च परुणा च यिोपन. । जपेद्वं नियुत सम्पक ममाप्य च यथाक्रमम् ॥ ग्राहाणाना सहस प भोजये सदक्षिणम् । गवा सहस्र त्या तु हिरण्यमपि दापयेत् ॥१० एतद्व. कथित सर्व सरहस्यं समागतः। शिधेन देवदेवेन दागारमुपनमिना ॥१॥ पापितं मेरुतिपरे सामागिनते नरो। स्संदेन देवदेवेन प्रारमाय धीमते ॥१२ [ सिङ्ग पुराण ४८ ] साक्षात्सनत्कुमारेण सर्वलोकहितपिणा। पाराशर्याय कथित पारर्यक्रम गतम् ।।१३ आयु वेद के ज्ञाना अर्थात् प्रायु के वर्धन के उपायो को जानने वाले द्विजो के द्वारा यथाविधि अनुपूर्वश प्रोतर सहस्र भगवान् शङ्कर के नामो मे अष्टोतर महस्र श्वेत कमलो से-महल पद पयो से प्रथवा अटो- त्तर महस्र नीलोत्पलो से भली भांति अर्चना करे । घृत के सहित पायस ( खीर ) प्रोदन-मधु से युक्त मुद्गान्न और अन्य लेह्य, चोष्य, पेय, भक्ष्य सुस्वादु एव सुगन्ध समन्धित पदार्थ समषित करे । फिर पूर्वोक्त घृतादि द्रव्यो के कम से यथाविधि पुण्डरीक आदि पुष्पो के सहित चरु से होम करे तथा नियम पूर्वक नियुत जाप करे। इस तरह क्रम पे अनुसार भली-भांति समाप्त परक एक सहस्र ब्राह्मणो को दक्षिणा के सहित भो- जन करावे । एक सहस गोदान परे पौर सुवर्ण का भी दान कराना चाहिए 104|१०॥ यह सम्पूर्ण रहस्य ये सहित संक्षेप में तुमको बता दिया है । यह उप मूनी देवो ये भी यदिनीय देव सवं शिव ने मेरु के शिखर पर अपरिमित तेज वाले सान्द को बताया था। देवदेव स्वामी सन्द ने परम बुद्धिमान ब्रह्मा ये पुत्र से कहा था । सम्पूर्ण लोकों के हित यी बामना से युक्त मा सनत्कुमार ने पारावार्य को इसे बताया था। इस तरह से यह परम्परा से ज्ञान प्राप्त होता ला पाया है ॥११॥ ॥१२॥१३॥ शुके गते परधाम दृष्ट्वा रुद्र प्रियवकम् । गनशोको महाभागो व्यास पर पि. प्रभु ॥१॥ स्वदस्य समव श्रुत्वा स्थिताय च महात्मने। पियंवयस्य माहात्म्य मनस्य च विपत ॥१५ यापित पहुचा तम्मै वृपा पायनाय । तत्सम्पयिष्यामि प्रमादाय तस्य वै॥१६ देश सपूज्य विधिना जपेन्मंत्र प्रिपरकम् । मुच्यते सर्वपापंच रामजन्मनरपि ॥१७ संग्राम विजय सन्ध्या सौमाग्यमतुन भये ।
चाति दुरात्तपा तस्य गपःमभोमहात्मनः ॥२५ मृत्युजय और व्यवक महामंत्र ] [४५६ लक्षहोमेन राज्यार्थी राज्य लब्ध्वा सुखी भवेत् ॥१८ त्रियम्बक भगवान् रुद्र का दर्शन पर शुक्र मुनि ये परम धाम घले माने पर शोक को प्राप्त होने वाले परम प्रापि महाभाग प्यास मुनि ने स्वामी स्पन्द पा जन्म श्रवरा परके सस्थित महान् पात्मा पाले कृष्ण पाग्न से त्रियम्बक का माहास्य और विशेष रूप से मन्त्र कहा था। प्रब उन्ही के प्रसाद से प्राप्त हुआ वह सब कुछ तुमको बतलाता हूं ॥१४॥ ॥१५॥१६॥ इस तरह विधि दे सहित देव का पूजन करके प्रियम्बव के मन्त्र का जप वसा चाहिए । इमो जाप से सात जन्मो के दिये हुए भी पापो से मुक्ति हो जाया करती है ।।१७। सग्राम मे विजय प्राप्त करने इसके कर से मानव प्रतुल सौभाग्य की प्राप्ति पिया परता है । त्रियम्बर मन्त्र से एक लक्ष माहुतियां देने से राज्य प्राप्त मरो की इच्छा पाला राज्य का लाभ कर परम सुख को प्राप्त करता है ॥१॥ पुत्रार्थी पुत्रमाप्नोति नियुतेन न सराय । धनार्थी प्रयुतेनैव जपेदेव न सशय ।।१६ धनधान्यादिभि सर्व. सपूर्ण सर्वमगल । कोडते पुत्रपौत्रश्च मृन स्वर्ग प्रजायते ।। नानेन सदृशो मत्रा लोके घेदे च समता । तस्मानियवक देव तेन नित्य प्रपूजयेत् ॥२१ अग्निष्टोमस्य यजम्य फलमष्टगुग्ग भयेत् । प्रयाणामपि लोकाना गुणानामपि प प्रमु । वेदानामपि देवाना ब्रह्माप्रविगापि। अवारोबारमवाराणा मावागामपि पाना २३ तपा सोमस्य मूर्यस्य वह नित्रपम्प प । अया उमा महाइयो व यरस्त प्रियवर २४ सुपुष्पितस्य वृक्षम्य यया गघ गुशोभन.। सम्मात्मुगधो भगवान्गपारयनि मारः। यांचरव महादेयो देवानामपि सीलया २६ ४६० ] [ लिन पुराण पुत्र की चाहना रखने वाला एक नियुन जाप करने से पुत्र की प्राप्ति यरता है-इसमे कुछ भी संशय नही है । जो धन का अर्थी होता है उसको एक प्रयुत जप करने से ही निस्सन्देह उसकी प्राप्ति होती है । इस मन्म के जप करने वाला धन-धान्यादि समस्त मङ्गल पदार्थों से परिपूर्ण होकर पुत्र-पौत्रादि के सहित ग्रानन्द क्रीडा करता है और अन्त मे मर पर वह स्वर्ग वा निवास पाता है ॥१६॥२०॥ हे सुत्रतो ! ससार में और वेद मे इसके समान दूसरा कोई भी मन्त्र नदी है। इसलिये श्रिय- म्वक देव को इम मन्त्र से नित्य ही पूजना चाहिए ॥२१॥ इससे पग्नि- होम यज्ञ वा जो फल है टमसे अठ गुना फल होता है । अब 'त्रियम्बक'- इस पद के विभिन्न प्रों को बताया जाता है-'श्रयाणा भूरादीना लोकाना-सत्त्वादि गुणाना-ऋगादि वेदाना ब्रह्मादि देवाना मम्बरः अतए । प्रभु' अर्थात् भूभुव मादि तीनो लोको क-सत्व, रज घोर तम-इन तीना गुणो के ऋग्वेदादि समस्त वेदो वे और सम्पूर्ण ब्रह्मा आदि देवो के प्रम्बक यह पिता हैं । 'त्र्यम्बक'-इस शब्द का दूपरा अर्थ यह होता है- प्रकार उकार और मकार ये तीन अम्ब अर्थात् शब्द जिससे होते हैं वह त्र्यम्बक है। इसमे 'क' सजा में प्रत्यय होकर यम्बक शब्द को सिद्धि होती है। यह मायामो वा भी वाचक होता है ॥२२॥॥२३॥ त्र्यम्बक- इस शब्द के अन्य अर्थ किये जाते हैं सोम-सूर्य वह्नि ये तीन अम्त्रक पर्थात् नेत्र जिसके हैं वह त्र्यम्बक शिव हैं। तीनो को अम्बा जननी जिसकी स्त्री है वह त्र्यम्बक शिव हैं-यह भी एक प्रर्थान्तर होता है ॥२४॥ जिस प्रकार से सुन्दर पुष्पो से युक्त वृक्ष को बहुत अच्छी गन्ध होती है उसी भांति उस महान् प्रात्मा वाले शम्भु की गन्ध भी दूर से ही होती है । इसलिये भगवान् शम्भु सुगन्ध कहे जाते हैं। इसकी व्युत्पत्ति यह होती सुष्ठु तद्ग गीत च सुगदधातीति-सुगन्ध । महादेव का नाम गान्धार होता है । इस की व्युत्पत्ति यह है गा गायन रूपा वाणी को धारण करने वाले हैं इसे देवो को भी लीला से पोषित किया करते हैं। ॥२५॥२६॥ सुगधस्तस्य लोकेस्मिन्वायुर्वाति नभस्तले ।
मृत्युजय और त्र्यंबक महामंत्र ] [२१ तस्मात्सुगंधिस्तं देवं सुगंधि पुष्टिवर्धनम् ॥२७ यस्य रेतः पुरर शंभोर्हरेर्योनौ प्रतिष्ठितम् । तस्य वीर्यादभूदडं हिरण्मयमजोद्भवम् MEE चद्रादित्यो सनक्षत्री भूर्भुवःस्वर्महस्तपः। सत्यलोकमतिक्रम्य पुष्टिर्वीर्यस्य तस्य २६ पचभूतान्यहंकारो बुद्धि. प्रकृतिरेव च । प्पुष्टिींजस्य तस्यव तस्माद पुष्टिवर्धनः ॥३० त पुष्टिवर्धन देव घृतेन पयसा तथा । मधुना यवगोधममापविल्वकलेन च ॥३१ कुमुदाकंशमीपत्रगौरस्पपशालिभिः । हत्या लिंगे यथान्यायं भक्त्या देवं यजामहे ॥३२ उस भगवान शिव का सुगन्ध वायु इस लोक में और नम स्तल में चहन करता है। इसलिये उस देव को सुगन्धि कहते हैं । इसमें इरार समामाल हो जाता है । पहिले जिरा गम्भु या वीर्य हरि को नामि स्व. रूप योनि में प्रतिष्ठित होता था। उसके वीर्य से पज का उत्पति स्यान हिरण्मय दण्ड हुया था। नात्रो के सहित चन्द और सूय्यं-भूभुव. स्वर्महस्तप और सत्य लोक का प्रतिक्रमण करके उसके वीर्य की पुष्टि होती है। पांच भूत-प्रहार-बुद्धि और प्रति सब उम शम्भु के हो चार्य की पुष्टि है प्रतएप शिव का गाम पुष्टि वर्धन होता है ॥२७॥२८॥ ॥२६॥३०॥ मय 'यजामहे' -हम शम्द का प्रयं बतलाते हैं - उस पुष्टि फे वर्धन परने पाले देय का पृतन्दुग्ध-मधु-यय-गोधूम-माय बिल्य फल- पुमुद भर्फ शमी पत्र-गौर सपंय (मरसो) पौर सालो से लिय मे पपन परके यथा ग्याप भक्ति भाव के साथ यमन (अपनाते है। ११॥३२॥ तेनानेन मां पाशापनासमंगोगतः। मृत्योश्च बंधनाव मुक्षीय भव तेजसा ॥३३ उपाए पकानां यथा गालादापुन । तव याला संघातो मनुगा सेन यरनमः ॥३४ ४६० ] [ लिङ्ग पुराण पुन की चाहना रखने वाला एक नियुन जाप करने से पुत्र की प्राप्ति परता है- इसमे कुछ भी संशय नहीं है। जो धन पा प्रों होता है उसको एक प्रयुत जप करने से ही निस्सन्देह उसकी प्राप्ति होती है । इस मन्त्र के जप करने वाला धन-धान्यादि समस्त मङ्गल पदार्थों से परिपूर्ण होकर पुत्र-पौत्रादि के सहित आनन्द सोडा वरता है और अन्त मे मर वर वह स्वर्ग का निवास पाता है ॥१६॥२०॥ हे सुग्रतो । ससार में और वेद मे इसके समान दूमरा योई भी मन्न नगे है । इसलिये निय- म्बक देव को इस मन्त्र से नित्य ही पूजना चाहिए ॥२१॥ इससे अग्नि- होम यज्ञ का जो फल है उससे अठ गुना फल होता है । अब 'त्रियम्बक'- इस पद के विभिन्न अर्थों को बताया जाता है'प्रयाणा भूरादीना लोकाना सत्त्यादि गुणाना-ऋगादि वेदाना ब्रह्मादि देवाना मम्बकः अतए। प्रभु' अर्थात् भूर्भुव मादि तीनो लोको क-सत्त्व, रज घोर तम-इन तीनो गुणो के ऋग्वेदादि समस्त वेदो के और सम्पूर्ण ब्रह्मा आदि देवो के अम्बक यह पिता हैं । 'त्र्यम्बक'-इस शब्द का दूपरा अर्थ यह होता है- प्रकार उकार और मकार ये तीन अम्प पर्थात शब्द जिससे होते हैं वह त्र्यम्बक है। इसमे 'क' सज्ञा मे प्रत्यय होकर त्र्यम्बक शब्द की सिद्धि होती है। यह मात्रामो का भी वाचक होता है ॥२२॥२३॥ त्र्यम्बक- इस शब्द के अन्य अर्थ किय जाते हैं सोम सूर्य वह्नि ये तीन सम्बक अर्थात् नेत्र जिमके हैं वह पम्बक शिव है। तीनो की अम्बा जननी जिसकी स्त्री है वह त्र्यम्बक शिव हैं-यह भी एक प्रर्थान्तर होता है ।।२४॥ जिस प्रकार से सुन्दर पुष्पो से युक्त वृक्ष को बहुत अच्छी गन्ध होती है उसी भांति उस महान प्रात्मा वाले शम्भु की भी से ही होती है। इसलिये भगवान् शम्भु सुगन्ध कहे जाते हैं । इसको व्युत्पत्ति यह होती सुष्ठु तद्ग गीत च सुगदधातीति-सुगन्ध । महादेव का नाम गाधार होता है। इस की व्युत्पत्ति यह है गा गायन रूपा वाणी को धारण करने वाले हैं इसे देवो की भी लीला से पोपित किया करते हैं। ॥२५॥२६॥ सुगधस्वस्य लोकेस्मिन्वायुर्वाति नभस्तले। गन्ध मृत्योश्च वधनाव मुक्षीय भव तेजसा ३३ उतिकारणां पकाना यथा पालादभूत्पुनः। तथैव पाल, राप्राप्त मनुना तेन यत्नत. ॥३४ मृत्युजय और त्र्यंबक महामंत्र ] [२१ तस्म मुगंधिस्त देवं सुगधि पुष्टिवर्धनम् ॥२७ यस्य रेत पुरस शभोहरेर्योनौ प्रतिष्ठितम् । तस्य वीर्यादभूदडं हिरण्मयमजोद्भवम् IIRE चद्रादित्यो सनक्षत्रौ भूर्भुव स्वर्महस्तपः । सत्यलोकमतिकम्य पुष्टिर्वीर्यस्य तस्य चै ॥२६ पचभूतान्यहंकारो बुद्धि प्रकृतिरेव च । पुष्टिींजस्य तस्यैव तस्माद्वै पुष्टिवर्धनः १३० त पुष्टिवर्धन देव घृतेन पयसा तथा । मधुना यवगोधममापबिल्वफलेन च ॥३१ कुमुदाकशमीपत्रगौरपंपशालिभिः । हत्वा लिंगे यथान्याय भक्त्या देघ यजामहे ।।३२ उस भगवान शिव का सुगन्ध वायु इस लोक मे और नभ स्तल में पहन करता है। इसलिये उस देव को सुगन्धि कहते है । इसमे इकार समासान्त हो जाता है । पहिले जिस शम्भु या वीर्य हरि को नाभि स्व. रूप योनि में प्रतिष्ठित होता था। उसके वीर्य से अज वा उत्पत्ति स्थान हिरण्मय दण्ड हुअा था। नक्षत्रो के सहित चन्द्र और सूर्य-भूर्भुव स्वमंहस्तप और सत्य लोफ का अतिक्रमण करके उसके वीर्य की पुष्टि होती है। पांच भूत अहङ्कार-बुद्धि और प्रकृति सब उस शम्भु के ही पौर्य की पुष्टि है अतएम शिव का नाम पुष्टि वर्धन होता है ॥२७॥२८॥ ॥२६॥३०॥ मय 'यजामहे' -- इस शब्द का अर्थ बतलाते हैं - उस पुष्टि के वर्धन करने पाले देव या पृत-दुग्ध-मघु-यच गोधूम-माप बिल्म फल- कुमुद भर्फ पामी पत्र-गौर सर्पय ( सरसो ) और पाली से लिङ्ग मे हदन परके यथा न्याय भक्ति भाव के साथ यजन अर्चना ) करते हैं। ३१॥३२॥ ऋतेनानेन मा पाशा धनात्तमयोगतः ।
४६२ ]
[ लिङ्ग पुराए
--
एवं मंत्रविधि ज्ञात्वा शिवलिंग समर्चयेत् ।
तस्य पाशक्षयोऽतीव योगिनो मृत्युनिग्रहः ।।३५
त्रियंबकसमो नास्ति देवो वा घृणयान्वितः ।
प्रसादशील: प्रीतश्च तथा मंत्रोपि सुव्रताः ॥३६
तस्मात्सर्वं परित्यज्य त्रियंबकमुमापतिम् ।
त्रियबकैराण मरण पूजयेत्सुममा हतः ॥३७
सविस्थां गतो वापि मुक्तोऽयं सर्वपातकैः।
शिवध्यानान्न संदेहो यथा रुद्रस्तथा स्वयम् ॥३८
हत्वा भित्वा च भूतानि भुक्त्वा चान्यायतोऽपि वा।
शिवमेकं सकृत्स्मृत्वा सर्वप पं. प्रमुच्यते ||३६
अव 'ऋतादित्य' का अर्थ स्पष्ट किया जाता है--हे भव ! इस ऋत
तेज से मुझ को धर्म योग के पाश बन्धन से-मृत्यु से और बन्धन से मुक्त
करदो ॥ ३३ ।। अब 'उर्वारुकम्'--
'--दस का अर्थ दिखाया जाता है--
उर्वारुक पक्वो का जिस तरह काल से पुनः हुमा था उसी प्रकार का
काल उस मनु ने यत्न से प्राप्त कर लिया है ॥३४॥ इस तरह से मन्त्र
की विधि को जान कर शिव लिङ्ग का यजन करे। मन्त्र प्रादि के योग
से उसका मृत्यु निग्रह और अतीव पाप क्षय होता है ॥३५॥ कोई भी
देव कृपा से पूर्णतया समन्वित शिव के समान नहीं है । हे सुवतो !
प्रियम्बक प्रसन्न शीघ्र होने के स्वभाव वाले हैं। सर्वदा परम प्रसन्न देव
हैं और मन्त्र स्वरूप भी है ॥३६॥ अतएव सब का परित्याग करके प्रति
समाहित होकर श्रियम्बक मन्त्र से उमा के स्वामी वियम्बक का पूजन
करना चाहिए ॥३७॥ यह श्रियम्बक का पूजक सभी अवस्थामो मे रहते
हुए भी सम्पूर्ण पातको से वियुक्त हो जाता है शिव के ध्यान से पूर्णतया
छुटकारा हो जाया करता है । यह शिव के ध्यान की महिमा है। इसमे
लेश मात्र भी सन्देह नहीं है, वह उसी भांति हो जाता है जैसे स्वय रुद्र
होते हैं । हनन करके मेदन करके और मूतों को अन्याय से साकर पा
भोग करके भी एक बार शिव का स्मरण करने से समस्त पापों से मुक्त
हो जाता है ।।३८॥३॥
[४६३ शिवार्चन में अहिंसा० ] ॥ १०६-शिवार्चन में अहिंसा को महत्व ।। वस्त्रपूतेन तोयेन कार्य चैवोपलेपनम् । शिवक्षेने मुनिश्रेष्ठा नान्यथा सिद्धिरिष्यते ॥१ प्रापः पूता भवत्येता वस्त्रपूताः समुद्धृताः। प्रफेना मुनिशाला नादेयाश्च विशेषतः ॥२ तस्माद्व सर्वकार्याणि दैविकानि द्विजोत्तमाः। अद्भिः कार्याणि पूताभिः सर्वकार्यप्रसिद्धये ॥३ जंतुभिमिश्रिता ह्यापः सूक्ष्माभिस्तानिहत्य तु । यत्पापं सकल चाभिरपूताभिश्चिरं तभेत् ।।४ समार्जने तथा नृणा मार्जने च विशेषतः। अग्नी कडनके चैव पेपणे तोयसंग्रहे ।।५ हिमा सदा गृहस्थाना तस्माद्धिमा विवजयेत् । अहिंसेयं परो धर्मः सर्वेषां प्राणिना द्विजा. ॥६ तस्मात्मर्वप्रयत्नेन वस्त्रपूतं समाचरेत् । तहानमभय पुण्य सर्वदानोत्तमोत्तमम् ।।७ इस अध्याय मे वस्त्र से पवित्र किये हुए जल से समस्त क्रियानो का सथा अहिंसा की भक्ति वा महत्त्व निरूपित किया गया है । सूतजी ने कहा-हे मुनिश्रेष्ठो ! शिव के क्षेत्र मे वस्त्र द्वारा पूत जल से उपलेपन करना चाहिए । अन्यथा सिद्धि इष्ट नहीं होती है ॥१॥ हे मुनिशार्दूलो ! ये जल वस्त्र से पूत करके समुद्धृत किये हुए पवित्र होते हैं । जल फेन से रहित होने चाहिए नदी के जल विशेष पवित मार गये है ॥२॥ इस कारण से दैविक समस्त कार्य मा प्रकार के कार्यों की सिसि के लिये परम पवित्र जल से ही करने चाहिए ॥३॥ जल सूक्ष्म जन्तुषों से मिश्रित होते हैं उनको मारकर अपन जा से सम्पूर्ण पाप प्राप्त होता है क्योकि सूक्ष्म जन्तुओं को वहां हिंसा हो जाती है ॥४॥ गृहस्थो वो सम्मान में तया विशेष कर मार्जन में अर्थात् घर की सफाई करने मे-अग्नि जलाने मे-छड़ने मे-पोसने मे मोर जल के सग्रह करने मे नित्य प्रति सदा हिंसा शादी करती है अतएव इस हिंसा का त्याग करना चाहिए । हे द्वियो।
४६४ । लिङ्ग पुराण यह अहिंसा समस्त प्राणियो का परम धर्म होती है ।शा६॥ इसलिये सब प्रकार के प्रयत्न से जल को वस्त्र से छान कर पवित्र अवश्य ही कर लेना चाहिए । अभय का दान बडा भारी पुण्य होता है और अन्य सवा तरह के दानो में यह उत्तम दान होता है ॥७॥ तस्मात्तु परिर्तव्या हिंसा सर्वत्र सर्वदा। मनसा कर्मणा वाचा सर्वदाहिंसकं नरम् ॥८ रक्षति जनव. सवें हिंसकं बाधयंति च । त्रैलोक्यमखिलं दत्त्वा यत्फल वेदपारगे IME तत्फल कोटिगुरिणतं लभतेऽहिमको नर. । मनसा कर्मणा वाचा सर्वभूतहिते रताः ॥१० दयादशितपंथानो रुद्रलोक व्रजति च । स्वामिवत्परिरक्षति बहुनि विविधानि च ॥११ ये पुनपौत्रवत्स्नेहा द्रलोकं यजति ते। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन वस्त्रपूतेन वारिणा ॥१२ कार्यमभ्युक्षण नित्यं स्नपन च विशेषत । त्रैलोक्यमखिलं हत्वा यत्फलं परिकोयते ॥१३ शिवालये निहत्यैकमपि तत्सकलं लभेत् ।।१४ इसलिये सर्वत्र और सर्वदा हिंसा का परिहार करना चाहिए। मन से-कर्म से और वचन से जो मनुष्य अहिंमक होता है उसकी सभी जन्तु रक्षा किया करते हैं और जो हिंसा करने वाला होता है उसको सभी बाधा पहुंचाया करते हैं । रिसी वेद के पारगामी विद्वान् को मम्पूर्ण त्रैलोक्य का दान करके जो फल प्राप्त होता है उस पल से भी कोटि गुना फत सदा अहिंसक मानव प्राप्त किया करता है । अतएव मन के द्वारा- वचन से तथा कम से मदा समस्त प्राणियो के हित मे अनुराग रखने के अनुराग वाले पुरुष सद्गति को प्राप्त किया करते हैं |८||१०॥ दया से मार्ग यो दिसनाने वाले लोग सीधी रुद्र लो में जाया करते हैं। जो पुरुष बहुत और अनेक प्रगर के प्राणियो घी एक सच्चे स्वामी की भांति रक्ष किया करते हैं और जो अपने पुत्र तथा पौत्रो के समान स्नेह या समुत्पन्न हैं और सब परम पवित्र हुप्रा करती है ।।१७। एक स्त्री का वध करने से ब्रह्महत्या के समान ही पाप होता है। इसलिये सभी स्त्रियो का, चाहे वे पाप कर्म मे भी रति रखने वाली होवें, कभी हनन नहीं करना चाहिए ॥१८॥ मलित और रूा लावण्य से गुक्त-विरूप तथा मलिन बस धारण करने वाली इन सभी को सदा शिव के समान शङ्का से मनु। को कभी भी हनन नहीं करना चाहिए ॥१६॥२०॥ जो वेद से वाहन तथा प्राचार वाले हैं तथा श्रोत एवं समान कमों में भी शिवार्चन में अहिंसा० ] [ ४५५ सब प्राणियों में व्यवहार करते हैं वे पुरुष सीधे रुद्र लोक को चले जाते हैं । इसलिये सभी प्रयत्नों से वस्त्र द्वारा छाने हुए जल से अभ्युक्षण तथा विशेष रूप से नित्य स्पन करना चाहिए। समस्त प्रैलोक्य का हनन परके जो चुरा फल कहा जाता है वह शिवालय में एक के हनन करने से पूर्ण कुरा फल मिला करता है।।११॥१२॥१३॥१४॥ शिवाथं सर्वदा कार्या पुष्पहिंसा द्विजोत्तमाः॥१५ यतस्तस्मान्न हतव्या निषिद्धानां निपेवणात् । सर्वकर्माणि विन्यस्य संन्यस्ता ब्रह्मवादिनः ।।१६ न हंनयाः सदा पूज्या: पापकर्मरता अपि । पवित्रास्तु स्त्रियः सर्वा अत्रेश्च कुलसंभवाः ।।१७ ब्रह्महत्यासम पापमानेगी विनिहत्य च ॥१८ त्रियः सर्वा न हव्याः पापकर्मरताः अपि । मलिना रूपवत्यश्च विरूपा मलिनाबराः। न हतव्या सदा मत्य शिववच्छ कया तथा ॥२० वेदबाह्यवताचारा श्रौतस्मार्त बहिष्कृताः । पापंडिन इति ख्याता न सभाध्या द्विजातिभिः ॥२१ हे द्विज श्रेष्ठो । शिव के लिये सर्वदा पुष्प हिंसा करनी चाहिए ॥१५॥ इसलिये किसी को भी हिंसा नहीं करनी चाहिए । निषिद्ध वस्तु श्रो के निषेवण से समस्त कर्मों को विशेष रूप से त्याग करके ब्रह्मवादी लोग सन्यस्त हो जाते हैं ।।१६।। स्त्रियाँ पाप कर्मों मे ग्त भी हो तो भी सदा पूज्य होती हैं । इनको नही मारना चाहिए स्त्रियाँ अत्रि के से + कुल
४६६ }
[लिङ्ग पुराण
और पापण्डी कहे जाते हैं इनके साथ द्विजातियों को कभी भी सम्भापण
नहीं करना चाहिए ॥२१॥
न स्पृष्टव्या न द्रष्टव्या दृष्ट्वा भानु समीक्षते।
तथापि तेन वध्याश्च नृपरन्यंश्च जंतुभिः ।।२२
प्रसंगाद्वापि यो मर्त्यः सतां सकृदहो द्विजाः ।
रुद्रलोकमवाप्नोति समभ्यर्य महेश्वरम् ॥२३
भवंति दु सिताः सर्वे निदया मुनिसत्तमाः।
भक्तिहोना नराः सवें भवे परमकारणे ॥२४
ये भक्ता देवदेवस्य शिवस्य परमेष्ठिनः ।
भाग्यवतो विमुच्यते भुक्त्वा भोगानिहैव ते ॥१५
पुरेपु दारेषु गृहेषु नृणा भक्तं यथा चित्तमथादिदेवे।
सकृत्प्रसगातितापसानां तेषां न दूर. परमेशलोकः ।।२६
यदि पाखण्डी पुरुष का दर्शन भी कही हो जाता है तो भी उसका
प्रायश्चित्त करना चाहिए और वह सूर्य दर्शन करना ही अति सरल होता
है । तो भी वे पाखण्डी पुरुष राजानो के द्वारा या अन्य पुरषो के द्वारा
वध करने के योग्य नहीं हैं ॥२२॥ सत्पुरुपो के प्रसङ्ग से जो कोई पुरुष
एक बार भी महेश्वर की अभ्यर्चना करके रुट लोक की प्राप्ति कर लेता
है । यह महेश्वर की पूजा की महा महिमा है । ॥२३॥ है मुनि सत्तमो !
दया रहित और भव की भक्ति से हीन पुरुष सब दुःखित रहा करते हैं ।
भगवान् भव तो सव के परम कारण होते हैं ॥२४॥ देवो के भी देव
परमेश्री शिव के जो भक्त होते है वे बडे ही भाग्यशाली हुप्रा करते हैं
और वे यहां पर ही समस्त सुखद भोगो का उपभोग करके अन्त में मुक्त
हो जाया करते हैं ॥२॥ जिस तरह मनुष्यो की भक्ति यहाँ ससार में
अपने पुत्रो मे-स्त्रियो मे और गृह ग्रादि मे होती है उसी प्रकार की भक्ति
आदि देव भगवान् भव मे होनी चाहिए मोर चित्त शिव भक्ति में लगाना
चाहिए । जो यति और तपस्त्री हैं वे एक बार के प्रसङ्ग से हो परमेश के
लोक को प्राप्त कर लेते हैं और वह उनको कुछ भी दूर नहीं रहता
है ॥२६॥
योगमार्ग से व्यवक ध्यान
[ ४६७
११०-योगमार्ग से व्यंवफ ध्यान-लिंगपुराण अवरण पठन फल
कथं नियवको देवो देवदेवो वृषध्वजः ।
ध्येय. सर्वार्थमिद्धयर्थ योगमार्ग सुत्रा?
पूर्वमेवापि निखिल श्रुत श्रुतिमम पुन ।
विस्तरेण च तत्सर्व सोपादक्तुमर्हसि ॥
एव पैतामहेनेव नदी दिनकर प्रभः ।
मेरपृष्ठे पग पृटो मुनिसधै समावृतः ॥३
मोऽपि तम्मै कुमाराय ब्रह्मपुत्राय सुत्र ।
मिथः प्रोवान भगवान्प्रयाताय ममाहितः।।?
एवं पुरा महादेवो भगवानोललोहित. ।
गिरिपुयावया देव्या भगवन्यशिपया ॥५
पृष्ट कलाशियरे मटपुटत नाह
योग निविन प्रोक्तम्तस वोहाम॥६
मानब गोक्षद दिध्य मुच्यते येन जाय ।
प्रथमो मगयोग योगो द्वितीयr..
भावयोगस्तृतीयः स्यादन या चतुर्पर ।
सोनमो महायो नमः परियोनि
४८८]
[ लिङ्ग पुराण
प्रश्न पहिले मोल लोहित भगवान् महादेव से उनकी शय्या मे एक ही
साथ स्थित होकर गिरिजा भगवती जगदम्बा देवी ने पूछा था जब कि
कैलास पर्वत पर भगवान् शिव परम प्रसन्न विराज रहे थे। श्री देवी ने
कहा-है भगवान् | योग कितने प्रकार का कहा गया है और वह किस
प्रकार का होता है तथा कैसा है ? जो योग ज्ञान परम दिव्य ज्ञान तथा
मोक्ष के प्रदान करने वाला कहा जाता है जिसको प्राप्त कर जीवात्मा
मुक्त हुमा करते हैं। श्री भगवान् ने कहा 'पहिला तो मन्त्र योग होता
है और दूसरा स्पर्श योग है ।।श६|| भाव योग तीसरा है और चौथा
प्रभाव योग ह ता है। सबसे प्रत्युत्तम महायोग होता है जो पांचवा
होता है ।।६।।
ध्यानयुक्तो जपाभ्यामा मनयोग प्रकीर्तित ।
नाडीशुद्धयधिको यस्तु रेचकादिक्रमान्वितः
समस्तव्यस्तयोगेन जो वायो प्रकीर्तित ।
बलस्थिरक्रियायुक्तो धारणाद्यंश्च शोमन. ।।१०
धारणानयसदोप्तो भेदत्रयविशोधकः ।
कुंभकावस्थितोऽभ्यास स्पर्शयोग प्रकीर्तितः ॥११
मनस्पर्शविनिर्मुक्तो महादर समाश्रित ।
बहिरतविभागम्यस्फुरत्सहरणात्मकः ॥१२
भावयोग समाख्यानाश्चित्तशुद्धिप्रदायक।
विलीनावयव म जगत्स्थावरजगमम् ।।१३
शू य म निराभास स्वरूप या पित्यते ।
प्रभावयोग मप्रोक्तश्वित्तनिर्वाणकारक ॥१४
ध्यान से युक्त और जिमम जप करने का अभ्यास पिया जाता है
यह मन्त्र योग कहा गया है। अब स्पर्श योग को बनाने -जिसमे विशेष
रूप से मुपुम्ना नाडी को शुद्धि होती है और जिसम समस्त और व्यस्त
योग से वायु का प्रधान रूप से अप दिया जाता है तथा वस्त्री प्रादि
साधनो के द्वारा बल के स्थिर करने को विया होती है जो परम शोभन
धारणा प्रादि अङ्गो से युक्त है एव सारिवादि तीन धारणाम्रो स सदीत
प्रव महायोग का निस्पण दिया जाना है-जिसमे रूप से शून्य- मद्वितीय-निर्मल-स्वच्छन्दता के सदि परम गोभन मर्यात् अत्यन्त रमणीय थुनियो के द्वारा भी जिग का स्वरूप निदेश नहीं दिया जा सरना है ऐसा मप्रमेय-सवंदा प्रराशमान-स्वयं ही जानने के पोग्य-समानता के साथ योगमार्ग से त्र्यंबक ध्यान ] [ ४६६ है और विश्व प्राज्ञ तंजस इन तीनो का विशोधक है अर्थात् कुम्भय निमलता का करने वाला ध्यान का अभ्यास होता है वह स्पर्श योग कहा जाता है ॥६॥१०॥११॥ मन्त्र योग और स्पर्श योग इन दोनो से प्रतीत जो कि केवल महादेव के ही समाश्रित होता है। बाहिर तथा अन्दर स्फुर भाग मन मे विलसमान भावो के सहार करन के स्वरूप वाला भाव योग कहा गया है जो चित की शुद्धि करने वाला है । अव प्रभाव योग को बतलाया जाता है-जिस मे समस्त अवयव विलीन होने वाला सम्पूर्ण स्थावर जङ्गम यह जगत् सम्पूर्ण शून्य विश्वरूप निराभास मर्यात् भेदा- भास से रहित चिन्तन किया जाता है वह अभाव योग होता है और यह वित्त के निर्वाण का करने वाला होता है । ॥१२॥१॥ ४॥ नीरूप. केवल शुद्ध स्वच्छदं च सुशोमनः । अनिर्देश्यः सदालोमः स्वयवेद्य. समततः ॥१५ स्वभावो भासते यत्र महायोग प्रकोर्तितः । त्यिोदितः स्वयंज्योति. सर्वचित्तसमुत्थितः।।.६ निर्मलः केवलो ह्यात्मा महायाग इति स्मृतः । अणिमादिप्रदाः सर्वेसर्वे ज्ञानस्य दायका ॥१७ उत्तरोत्तर वैशिष्टयमेषु योगेष्वनुक्रमात् । अह सग विनिमुक्तो महाकाशापम. पर ॥१८ सर्वावरणनिमुक्तो ह्यचित्य स्वरसेन तु । ज्ञयमेतत्ममाख्यातमग्राह्यमपि देवतं ॥१६ प्रविलीनो महान्सम्यक् स्त्रयवेद्य स्वपाक्षिय । चकाम्त्य नदवपुपा तेन शेयमिद मतम् ॥२० परीक्षिताय शिष्य य ब्राह्मणायाहित गये धामिकायाकृतघ्नाय दातव्य क्रमपूर्वकम् ॥१ १०० ] [ लिङ्ग पुराण विस्तृत अर्थात् सर्व व्यापी-अपनी प्रात्मा की पूर्व विशेषण विशिष्ट सत्ता अब भासित होने वाला हो वह महायोग कहा गया है । पुनः उसी महा- योग प्रकारान्तर से बताते हैं कि वह नित्य प्रकाश मान-स्वयमेव प्रकाश मान-सम्पूर्ण चित्तो के उत्थापित करने वाला और निर्मल केवल प्रात्मा पर शिव ही महायोग वहा गया है । ये समस्त योग परिणमा-महिमा मादि अष्ट सिद्धियो के प्रदान करने वाले और सभी ज्ञान के देने वाले होते हैं ।।१२।१६॥१७॥ इन योगो मे क्रम से उत्तरोत्तर विशेषता होती है । मोक्षद शान अह शब्द से विनिमुक्त सबसे पर महाकाश की उपमा घाला होता है ॥१८॥ याथ्य तथ्य रूप से चिन्तन न पर सबने के योग्य शान वाला है । सर्व प्रापरणो से विनिर्मुक्त होता है । यह मैंने समास्यात कर दिया है जो कि देवो के द्वारा भी ग्रहण करने के योग्य नहीं है। प्रविलीन-महान सम्यक स्वय ही जानने के योग्य और अपने से ही साक्षी वाला है । प्रानन्द के स्वरूप वाले शरीर से प्रकाशित होता है। इसी से क्षेय यह माना गया है ॥१६॥२०॥ इसके ज्ञान को पूर्णतया परसे हुए प्राह्मण शिष्य को जो कि प्राहिताग्नि हो तथा परम धार्मिक एवं प्रवृतघ्न हो उमे ही क्रम पूर्वक देना चाहिए ॥२१॥ गुरुदैवतभक्ताय अन्यथा नैव दापयेत् । निदितो व्याधितोल्पायुस्तया चैव प्रजायते ।।२२ दातुरप्येवमनघे तस्माजस्त्वैव दापयेत् । सर्यसविनिर्मुक्तो मद्भक्तो मत्परायण. ॥२३ साधको ज्ञानसंयुक्त श्रोतस्मातविशारदः । गुरुभक्तश्च पुण्यात्मा य.ग्या योगरतः सदा ॥२४ एव देवि सम पाता योगमार्गः सनातनः। सर्ववेदागमाभोजमकरंद. मुमध्यमे ॥ पोत्या योगामृतं योगी मुध्यते ग्रह्मवितम । एवं पाशुपत योग योगश्वयमनुत्तमम् ।।.६ जो निष्प अपने गुर या सपा देवता का भक्त को उगे ही देखें । प्रलपा से किसी से भी नहीं देना चाहिए। यदि ोि गये प्राधि- योगमाग से त्र्यंबक ध्यान० ] [ ५०१ कारी को दे दिया जाता है तो वह देने वाला समार में प्रत्यन्त निन्दित और रोग सम्पन्न तथा अल्प प्रायु वाला हो जाया करता है ॥२२॥ इस प्रकार से देने वाले को भी इस का दण्ड भोगना होता है । प्रयएव जो निप्पाप हो उरो हो भली-भांति समझ बूझ कर ही इस विद्या को देना चाहिए । मेरा जो भी कोई भक्त होता है यह समस्त प्रकार के गमों से विनिमुक्त होता है और केवल मुझ मे ही परायण रहा करता है ॥२३॥ ज्ञान से सयुक्त रहने वाला साधा और एव स्मृति परिणत धर्म तथा ज्ञान का परम पण्डिन तथा गुरु के चरणों में प्रगाढ भक्ति-भार रसने वाला-पुण्यात्मा अत्यन्त योग्य तथा योग में सर्वदा रति रसने वाला हुमा करता है ॥२४।। इस प्रकार से हे देवि परमेश पम्भु ने जगज्ज- गनी गौरी से कहा कि मैंने यह योगो या मागं जो सियंदा से पला मा रहा है वह तुम्हारे सामने कह दिया है । हे गुन्दर मध्यभाग वाली ! यह योग मार्ग सम्पूर्ण वेद मोर पागम स्वरर यमलो पा मारत है ॥२५॥ योगाभ्यामी पुरप इस मकरन्द या पान के प्रति इम योगा. स्मा प्रमृन यो पीर ग्रहा ये येता गमत वचनों से गुटगारा पाजाया परता है । इस तरह से यह पागुपन-योग योग की सवं ऐश्वर्य होगा है ॥२६॥ अत्यायमिदं शय मुक्तये वेन सम्यते । तस्मादिष्टं समाना शिवाचनरत प्रिये ॥२॥ इत्युक्त्वा भगवान्देवीमनुन र पधजः। शंकरणं समामाद्य सुयोजामानमारमनि ॥२८ तस्मात्वरि योगी योगाम्यामरतो भव । स्थयभुय परा मूनिनून ब्रह्ममयो यरा तस्मात्मप्रयत्नेन मोक्षार्गी पुरषोतमः । भस्मस्नायो मनिय योगे पागुगो रसः ।। या पामेरायगयो पस: पग। माहेशरी परा पधारनप या पाझमम् ॥३॥ गोगेवराय या निमा गंगा महाय यति ॥२ इम प्रसार ५०२ ] [ लिङ्ग पुराण एवं शिलादपुत्रेण नंदिना कुलनन्दिना । योगः पाशुपतः प्रोक्तो भस्मनिष्ठेन धीमता ॥३३ सनत्कुमारो भगवान्व्यासायामिततेजसे। तस्मादहमपि श्रुत्वा नियोगात्सत्रिणामपि ॥३४ कृतकृत्योऽस्मि विप्रेभ्यो नमो यज्ञेभ्य एव च । नमः शिवाय शांताय व्यामाय मुनये नमः ।।३५ से यह पूर्व वरिणत योग रूपी वैभव आश्रमों की अपेक्षा न करते हुए जानने के योग्य होता है इसलिये इ2 समाचरण वाले सम्पूर्ण प्राणियो के हितों के समादक विश्वेश्वर की समार्चना मे सदा तत्पर रहने वाले व्यक्तियो से हो हे प्रिये ! यह किसी अनिर्वचनीय भाग्योदय के प्रभाव से ही मुक्ति के लिये प्रास किया जाया करता है ॥२७॥ इस तरह से भगवान् शम्भु वृपभध्वज ने देवी जगदम्बा पार्वती को अनुज्ञापित करके शंकुकर्ण नाम वाले गण को द्वारदेश मे निवेशिन पर अपने पापको प्रात्मा नन्दानुभव करने मे युक्त कर दिया था अर्थात् ध्यानावस्थित हो गये थे। २८॥ शैलादि ने कहा- हे योगीन्द्र ! प्रतएय तुम भी योग के अभ्यास करने में रत हो जामो । स्वयम्भू की परा मूत्ति निश्चय ही परम श्रेष्ठ एवं ब्रह्ममयो है ॥२६ । इसलिये परम प्रयलो से मोक्ष की इच्छा रखने वाला श्रेष्ठ पुरुप को नित्य ही भस्म से स्नान करने वाला अर्थात् शरीराङ्गो पर भस्म लगाने वाला होना चाहिए तथा पाशुपत योग में रति रखने वाला रहना चाहिए ॥३०॥ क्रम के अनुसार ही वैष्णवी का ध्यान करे इसके अनन्तर परा माहेश्वरी का ध्यान करे। योगेश्वर को जो निष्ठा है वह मैंने संहृत करके भली-भांति वणित कर दी है ॥३१॥३२॥ सूतजी ने कहा-कुल को आनन्द देने वाले शिलाद के पुत्र भगवान् नन्दी ने जो कि भस्म मे परम निष्ठा रखने वाला और परम धीमान् थे यह पाशुपत योग मार्ग बतलाया था ॥३३॥ फिर इस योग मार्ग के ज्ञान को भगवान् सनत्कुमार ने अपरिमित तेज वाले महा मुनीन्द्र व्यास जी को बतलाया था। उन्ही व्यास देव से इसका श्रवण मैंने किया था। मव इन सत्र धारियों के नियोग से अर्थात् भाप सब लोगों को इसे [५०३ योगमार्ग से श्यंक ध्यान० ] यताकर परम पृत कृत्य हो गया है। मय मा सम्पूर्ण त्रिो से सपा यमो को मेरा बारम्बार प्रणाम है । मैं मान मूर्ति भगवान शिव के लिये नमस्कार करता हूँ तथा गुरदेव महा मुनीन्द्र याम देव में तिये मेरा प्रणाम: ॥३॥५॥ ब्रह्मा स्वयंभूभंगवान्दिं वचनमब्रवीत् । लंगमातपिल य. पठेन गुयादपि ॥६ द्विजेन्य. श्रावयेद्वापि स यानि परमां गतिम् । तपसा चर यज्ञन दानेनाध्ययन ग ॥३७ या गतिस्तस्य विपुला वासविद्याप वैदियो। कर्मणा चापि मिश्रण मेरलं विद्यारिया ॥३८ निवृत्तिवास्य विप्रस्य मतिभनी। मयि नारायणे दे श्रद्धा नास्नु महात्मनः । २६ यस्य चाक्षया विद्याशाप्रमान मयंन । इत्याना ब्रह्मास्तरमातम मयं महात्मनः॥४. पेः मूतस्य नारमाय मेतेषामपि नाग । मारदस्प पया मिनिम्तीयंदापारतम्य ॥१ प्रोनि चिला गम्गामार गेमपंग ।। मा गदास्तु विपरमादा गर्मम । एगमुक्तं विपु नारतो मग पराया गुगुभाषायां गृत fami सारस्यस्तु मा रो माmture पमा तयार पारमा नाfru