Donar
Samraat'uu Shubhaagamana
Front matter
No text on this page.
चक्रवर्ती तनूजाय सार्व भौमाय मंगलम्
श्रीमान्
सम्राट्-शुभागमन
जिसको
राजेंद्रनाथ पंडित.
संग्रहकर प्रकाशित किया.
बड़ोदा
श्री रामजन्म.
सम्वत १९६८.
बड़ोदा-श्री" गुजरात समाचार " प्रिं. प्रेसमें महाशंकर लल्लुभाई भटने प्रकाशकके लिये छापा.
SAMRAT-SHUBHAGAMANA
Collected and Published.
By
RAJENDRANATH PANDIT.
BARODA.
27th March.
1912 A. D.
**
.*०**..*.
**..**..**.
*.*k..**..**..**.
गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्ग नचवयः
अर्पण
श्रीमान्-महंत मथुरादासजी गुरुवर्य श्रीआत्मारामदासजी
महाराज-प्रधानमंत्री श्री वैष्णव साधु महामंडल, एवं सम्पादक
साधु-स्वस्थान-श्रीरामजी मंदिर बडोदा.
आप श्री कई वर्षोंसे तनमनधनसे साधु समुदायका महान
उपकारकर रहे हैं । तथा कई वर्षों से आपका हमारा विशेष परिचय
होनेसे स्नेह के उपहार स्वरूप यह " सम्राट-शुभागमन" पुस्तक
हम आप के करमे अर्पण कर अपनेको धन्यमानते हैं क्योकि
गुणा गुणज्ञेषु गुणा भवन्ती ते निर्गुणं प्राप्य भवन्ति दोषाः"
विनीत
राजेन्द्र
श्रीमान् महन्त श्रीमथुरादासजी गुरुवर्य श्रीआत्मारामदासजी महाराज
जागीरदार, प्रधानमंत्री-श्रीवैष्णव साधु महामंडल,
एवं " सम्पादक साधु " बड़ोदा.
Avir
सिंहासन स्थित प्रिया-युत सौख्यकारी,
सौदामिनी-सहित नारद-कान्ति हारी।
प्रलोक्यनाथ सुर-पूजित पाद पन,
श्ररािघवटें भजरे मन ? छोड़ उम्र ।।
[गु. स. d.]
No text on this page.
भूमिका । भूमिका. - दोहा. कृष्ण चरणको ध्यान करि, रमा पाद शिरनाय श्री सम्राट-शुभागमन, संग्रह करं चितलाय सकल गुणनिकी खानि हैं, सदाप्रसन्न, रमेश तिनके पद वन्दन करूं, जेहिं चाहत भूपेश रंभा सरिस ललाम तनु, अशित नैन शुखदैन सुरसुन्दरिं जेहिं लखिनमै, वन्दन करौं चित चैन. इंग्रेजी राज्यका महत्व वर्णन करना सूर्यको दीपकसे देखाने के वरोवर है । इसके संबन्धमें प्रथम जब श्रीमान् सम्राट मारतेश्वर सप्तम एडवर्डका लोकान्तर वास हुआ उस समय हमने “ सम्राट शोक शमन " नामक पुस्तक लिख हृदयं वेदना शान्तकी थी, और वह पुस्तक श्रीमहंत मथुरादासजी आत्मारामदासजी के तरफ से छपाकर पाच सौ पुस्तकै मुफत वांटी गई थी। उसमें पाच भाषा- ओंमें घोषणा पत्र और अनेक कवियोकी कविता थी। सीघ्रहीं हमे यह शुभ अवसर प्राप्त हुआ कि । श्रीमान् भारतेश्वर पंचम जार्ज भारतमे पधार क्रीट धारणोत्सब किया । इस महान् उत्सवकै प्रसं- गमे हम स्मरण स्वरूप करी क्या सक्ते हैं। तो भी यह महान उत्सव चिर स्मरण रहै इस उद्देशसे विशेष कर विद्यार्थी वर्ग इन उत्तम कविताओंको कंठस्थ कर राजनिष्ट हो येही प्रधान उद्देश है।
My Annnnn AAAAAAAAAAAAI AAAAAAMN. भूमिका। यह वात तो निश्चै हैं कि किसी महान प्रसंगको ताजा करने के लिये " कविता" मुख्य साधन है। हम लोगांका श्रीरामकृष्ण ऊपर क्यों अतुलनीय प्रेम है केवल कविता के लिये । यदि रामा- यण, भागवत, आदि ग्रन्थ न होते तो हम उनके गुण कैसे जानते इसी से हम कहते हैं कि इतिहास उसमें भी " पद्य " कीर्तिका मुख्य साधन है । इतिहास गद्य हो, तो एक वखत वांचलेनेपर फिर उसमे कमरुची होती है परन्तु पद्य कंठस्थ कर मनुष्य स्वभावसे ही चलते फिरते बोला करता है । इससे विशेष लाभ होता है। पहिले हमारा विचार था कि केवल संस्कृत कविताकी पुस्तक बने, फिर हमारे मनमें आया कि वह केवल संस्कृत जनोको ही आनन्द पद होगी इससे हिन्दी कविता भी ली जावें, जब हिन्दीका संग्रह किया तव यह बात निश्च हुई कि सभी देशकेस्कूलौमें छात्रांको और सर्व साधारणको अनुकूल पड़े इससे हमने कई भाषाओंके कविता का संग्रह किया । हमारी इच्छाथी कि इस पुस्तकमें पंजाबी, तेलगु तामिल, ओडिया, बंगाली, पंजाबी इत्यादि सभी भाषाओंमें राज्या- भिषेक संवन्धी कविता ली जायँ और इसके लिए हमने कई जगा लिखा भी उनमें से कई सभा सोसायटी एक भाषाकि हिमायत बालीथीं, मद्रास प्रान्तमें भी एक दो प्रतिष्ठित सज्जनोको लिखा परन्तु सम्पादक-पं. जगन्नाथप्रसादजी शुक मयाग, के अतिरिक्त और किसीने जबाब तक न दिया, आपने यथा साध्य कविता भेजने की अवस्य कृपा की जिस समय पत्रोंमें कविता छपने लगी, उस समय कार्य बस हमें ग्रामान्तर जानोपल इससे संग्रहमें हम पूर्ण कृत कार्य नहोसके तौ भी जो कुछ संग्रह किया है आपके सामने है । सुधानिधि " ६ भूमिका इस महान उत्सव के प्रसंगमें जिस्में जितना बुद्धी पलहोगा अवश्य कविता करनेमे त्रुटी नको होगी, संग्रह करनेमें भी हमने समयानुसार, कविताके छंदोको कमजास्ती कर लिया है, प्रथम कंवल कविता मात्र संग्रह करनेका विचार था, पीछे हमारे एक परिचित महाशय,श्रीयुत गोवर्धनदास मूलजीभाई महताके अनुरोधसे दिल्ली वर्णन, दर्शनीय स्थल, सम्राटको प्रवास आदि सामिल कर दिया। आपने प्रफ तपासनेमें भी सहायता की है कविताआंकी शुद्धी तपासना कठिन काम है तौभी जहांतक हमारा बस चला मूलपय ज्यांका त्यों रहने दिया है तौभी द्रष्टि दोससे. पुस्तकमेअशुाद्धया अवश्य हैं उनमें प्रधान अशुद्धियां जैसे पृष्ट १५ के फुटनोटमें १८०५ की जगह १७०५ इसीतरे ३१ पृष्ट की १४ पंक्तीमे भक्ति, पृष्ट ४३ में १७ पक्तीमे श्रीमन्मारताधीश और पृष्ट १४२ की १८ पंक्तिमें प्रशस्ति पढ़े तथा पृष्ट ९४ पंक्ति ९ मे चहुं के आगे ओर शब्द जोड़ें : अप्सावधानीसे गुजराती विभागमें एक मराठी कविता भी आगई है । और भी इसमें सैकड़ी भूल हैं कागज, स्याही, छपाई कुछ भी उत्तम नहीं हैं मात्र इसमें श्रीमान् सम्राट् और श्रीमती सामराज्ञीका यशोगान है वही उत्तम हैं । इनमें कुछ कविता ऐसी भी हैं कि जो दूसरे की बनाई दुसरे कवियों द्धारा पढ़ी गई हैं । अत:कई जगे पढभेवालेोका नाम छपा है । जिन पत्रोसे कविता ली गई, उनका नाम ऊपर और कवि, व पढ़ने वालेका नाम नीचे छाप दिया है, वेद मंत्रोका अनुवाद हिन्दी, अग्रेजी में, और पारसी धर्म पुस्तक "जिन्दवस्ता" का अनुवाद गुजरातीमे प्राप्त भया वही रख दिया है उस भाषा मे फेर फार करना हमने योग्य न समज्ञा । पनके नाम और कविता तथा भूमिका । लिखनेमें किसी प्रकारका अनुक्रम नही है जो जैसे प्राप्त हुये उसी तरे ले लिया है। प्रेसके कर्मचारियों ने भी जहांतक बना साव- धानी से कार्य किया है । यदि भूलसे प्रमाद वस अशुद्धी या नाम आगे पीछे या कोई नाम रह गया होय या जो कुछ कसर रही होय उसे हम क्षमाकरें इन चारऽक्षरोमें समाधान करते हैं यस्य प्रभावामुचनं शास्वते पथितिष्ठति । देवाःस जयति श्रीमान दंड धारो महीपतिः उन वर्तमान पत्रोंके नाम जिनकी कवितासे यह पुस्तक सुशोभित है। पत्रो. मंजुभाषिणी( संस्कृत ),भारत मित्र (हिन्दी ) हितवार्ता, शुभ चिन्तक,अभ्युदय, मिथिला मिहिर, शिक्षा, वैदिक सर्वस्व,सुधानिधि, साधु, सनातन धर्म पताका, श्री वेंकटेश्वर समाचार, लक्ष्मी, गृह लक्ष्मी, सरस्वती, भूमिहार ब्राह्मण पत्रिका, बुद्धिप्रकाश (गुजराती) महीकाठा रेवाकाठा गजट, धन्वतरि,कड़वा विजय,मुबई समाचार, सत्य विजय, गुजराती, एक पुस्तक ( मराठी ), मासिक मनोरंजन, चित्रमय जगत,लोक मित्र, संस्कृत कवितामे नीचे लिखे महाशयोके नाम हैं श्रीमान् अनन्ताचार्य स्वामीजी, प्रतिबादि। भयंकर. कांची, श्रीमान् राजगोपालाचार्य. चनपुरी, ना. रामनाथ शास्त्री.. मन्ना- गुंडि वि. उमामहेश्वर शास्त्री. हरिराम शास्त्री. औरंगाबाद, ति. च.
भूमिका श. ना. श्रीताताचार्य, कुंभकोणम्, नरहरी शर्मा, देवप्रयाग, देवरकोण्डS वाल सुब्रमण्य, ए.डी. हरिशर्मा,यस. राधाकृष्णाय्यर, सम्पादक, वागीश्वरीटोल. रामचंद्र योतिषी मंत्री. मा. ना. स. कलकत्ता. खापे. नागराज शर्मा, नृसिंहाचाया कोची, अनन्त शास्त्री. बदनावर, वाद्य सिद्धान्त रक्षिणी सभा सभ्य. रघुवरदयाल शास्त्री, नौधरा, नारायण पाठशालाके अध्यापक गण, रामचंद्र शर्मा आगरा. कुशेश्वर कुमार बाजितपुर, श्री सुरेश सर्मा, सीतलप्रसाद शर्मा छपरा, बुलाकीराम विद्यासागर अजमेर, शास्त्री श्रीनिवासा, चार्य बड़ोदा, हिंमतलाल मूलजीभाई महता भादरवा. पं. धर्म नारायण द्विवेदी, चन्द्र शेखर ओझा शास्त्री. गोस्वामी लक्ष्मणा- चार्यजी मथुरा. पं. मिहिर चंद्र शास्त्री, बन्नू महाराष्ट्र द. वि. तिनैकर, ए. पा. कुलकर्णी रेदालकर,ना. वा. तिलक श्रीयुत राधारमण दापोली, श्रीमती. सौ. लक्ष्मीबाई तिलक, अह- मदनगर, श्रीयुत, दत्तात्रय भिमाजी रणदिव-मिरजंगाम, श्रीयुत सदाशिव नारायण, ठोसर B. A. L. L. B. मुंबई,गोविन्द पांडु- रंग देवधर B. A, रावसाहेब पुरुषोत्तम बालकृष्ण जोषी B. A. हिन्दी कवितामें नीचे लिखे महाशयोंके नाम हैं पं. बालापसाद, पं. सीताराम, खुशालीराम, बड़वानी, वैद्य रामप्रसाद शुक्ल, परमानन्द जैन हीरापुर, राजा साहब फतहसिंह जूसाहब पुवाया, पं. राजधरलाल, मुरलीधर युगेंद्र शर्मा,शंकरराव शर्मा, २ सीताराम, प्राणशुख अध्यापक अलीगढ़,वसंतराम, नत्र. महंत लक्ष्मणदासजी, राजभट्ट, शिवाधीन ब्रह्ममट्ट, राय देवी प्रसाद, ९ भूमिका । (पूर्ण) कानपुर, मदनराज श्रीमाली रतलाम मंगलदोन उपाध्याय, राजापुर, रामनाथ, लष्कर ( ग्वालियर ) शिवदास पांड़े मस्तूरी श्री सुजान कवि, हल्दी. पन्नालाल, हरि गुलाम ठाकुर गोरखपुर, मुरलीधर शर्मा वदायु, शेठ जानकी प्रसादजी, सोहनलालजी. गुजराती कवितामें नीचे लिखे महाशयोंके नाम है H. D. K, बारोट केशवलाल श्यामजी, महा शुखमाई चुन्नीलाल वीसनगर, दुर्गाशंकर हरी शंकर व्यास महुआ, कंचनलाल छगललाल बक्षी, नादौद , अंबालाल आचार्य पाटन, जटाशंकर अलवेश्वर त्रिवेदी, लालजी केशवजी कराची. मड गामकर भावनगर, ८ - उर्दु नाझीम, मुन्सी गुलाम अलोगुलाम नवी, हाजी सय्यद तजम्मुल हुसैन nonww अंग्रेजी पं. रघुवीर नारायण शरन,केशवलाल V. भट्ट B. A. रघुवीर नारायण-छपरा भवति किल नृपालः शक्रवायवर्कपुत्ररविशुचिवरुणानां चन्द्रवि- तशयोश्च ॥वपुरिति मनुमुख्यधर्मशास्त्रे यदुक्तं तदनुसरति वर्षे भारते सज्जनौवः ॥ १॥ स्वामिन्पञ्चमजार्ज एहि महिषीमेरीयुतो भारते श्रद्धान्तः करणाः प्रजाः सुरधिया ते स्वागतं कुर्महे ॥ विद्याभिः मुकलादिभिर्विरहिता यद्यप्यहो दीनकाः स्वामिन् दीनदयापरोऽस्य- मलया भक्त्या प्रसीद प्रभो ॥२॥ सजेन्द्रनाथ पंडित भूमिका Anna PREFACE. India is well known for its loyalty from times immemorial. Thousands of kings had its possession, and its people have ever since rem ined loyal to them Among them Ramcbandra, Krishnachandra and Yudhishthira were and are worshiped by the people for their excellant systems of government. We have a feeling of reverence for them still continued also by the world-praised poems of Råmäyan, Bhagavat and Maha Bharuta. If we look carefully, the coronation of George V is of more importa' ice than that of Shri Krishnachandra. ( x 960 ) When He was crowned, He had only some portion of Dwarka in which the stayed with His family. As regards Yudhishthira also we find that his coronation took place after a blood shed slaughter of his relations in the war of eighteen days. And when we look to the Chakravartee Emperor Dasharath we come to learn that he had the possession of fifty crores of miles of land which according to our ancient books is the area of the whole earth. He has Once told to his Queen Kakavee ( यावदा वर्तते चक्र तावती À agret ) that the Sun nerer set on his empire, but when he mentions his protected states such as Dravid of a part of Madras ), Sindhu, ( a part of Karanchi ), Behar, Sauvir, Sourashtra, (a part of Katiawar. ) ( द्राविड़ाः सिन्धुसौवीरा सौराष्ट्रा दक्षिणापथा अगांग मगधा मत्स्या समृद्धा Efatiet CITEST ) we can clearlyy say that he did not possess the whole of Hindustan. That is to say, we do not find countries, mentiond those of the outside of India. Therefore I think he might have attempted to be considered a Chakravatin in the eyes of his Queen. • The King Dasharath did not possess, Madras ( HOTTT) भूमिका । 7 1 because Ravan had a military station at Nassik in Dandk rnya ( USA1104 ). Trishira, Khara and Dushan stayed thire. And for the military expences Trishira wis given Trichinapoli ATTITET ) district. There ale still found the images of Shiva and his son Ganesha placed by Trishira. Now when we look to Rama Raja we find that He (.TTH ) could not get the crown inspite of so many preparations, therefore I cannot but say that coronation Darbar (of Dehli) is superior to the former. In this Sumrat Shubhagamana सम्राट् शुभागमन have collected poems (Sanskrit, English, Urdoo, Gujarati, Bengali, Marathi etc.) published in several Newspapers of Indir. I have introduced Vadic Mantras and verses from Zinda vasta in addition to the the history of Delhi kings commencing from Yudhisthir to this day. I have also made a short description of the buildings of the ancient city. It would become a big volume like Ramayan or such other book if all the poems and songs from so many newspapers be collected and published. I had a wish. But I am helpless on account of pecuniary supply. If this book be introduced into schools for examination purposes, I am sure it will benifit them much and promote more of loyalty into the young minds. I earnistly wish that students would make a a repid use of these songs and poems full of 'Loyalty.' It is not sufficient how Greater we write in praise of their Imperial Majesties George V and Mary, who are more gracious than other kings and queens ever existed on the surface of the earth. Dated 27th March, Rajendranath Pandit. 1912. Sadhu Otice-Baroda
राजेन्द्रनाथ पंडित उर्फे राम-पन्नाचार्य
सहायकारी मंत्री, श्री वैष्णवसाधुमहा डल-बडोदा.
PRIMJHANIPAT
अहह ?
हृदय,
क्यों तू दीर्घ निश्वास लेता ?
दृढ बन अपने को क्यों नहीं धैर्य देता ।
जब सब सुख भोगे एकहीं साथ तूने.
तब अब जगके ये दुःख भी भोग दूने ॥ [ गु. स. प्रे. ब.]
No text on this page.
सम्राट् शुभागमन। इंद्रप्रस्थका इतिहास। महा भारत आदि पर्व २०८, वां अध्यायः-- जब युधिष्टिर प्रभृति पाण्डव गण द्रौपदीको लेकर द्रुपद पुरीसे हस्तिनापुर आये तब उनके पितृव्य ( काका ) महाराज धृतराष्ट्र ने युधिष्टिरजी से कहा कि-तुम राज्यका अर्थ भाग लेकर अपने भ्राताओं समेत खाण्डव प्रस्थमें जा बसो। जिस से तुम लोगांसे हमारा फिर विगाड़ न हो । युधिष्ठिरादि पाण्डवोंने हस्तिनापुर के राज्यका अर्ध भाग प्राप्त कर खाण्डव प्रस्थके पुण्य स्थानमें शान्ति कार्य करा कर एक नगर बसाया, जो कि भांति २ के मन्दिरों तथा अनेक सरोवर वापी आदि अनेक प्रकार से इन्द्रपुरीकी भांति शोभायमान हो गया । और इसका नाम इन्द्रप्रस्थ पड़ा। क्योंकि यह इन्द्रपुरीकी भांति ही सुंशोभित था। २२२ वां अध्याय:- श्री कृष्ण और अर्जुन इन्द्रप्रस्थमें यमुना नदीके तटपर आखेट (शिकार ) का आनन्द लेने लगे । ( सभा पर्व ) महाराजा युधि ष्टिरने चारों दिशाओंके राजाओंकों पराजित कर इन्द्र प्रस्थमें राज २ सम्राट् शुभागमन । V/v TV N TV My vv VVV सूय यज्ञ किया । ( शान्ति पर्व ) ४० वां अध्याय ) उसके पश्चात् कुरु क्षेत्रीय संग्राममें राजा दुर्योधन के पुत्रादिके विनाश होनेपर राजा युधिष्ठिर कौरवोंकी राजधानी हस्तिनापुरमें राज सिंहासन पर बैठे । और राज शासन करने लगे। (मैशल पर्व प्रथमा- ध्याय ) राजा युधिष्टिर का हस्तिनापुर राज तिलक होने के ३६वें • वर्ष प्रभास क्षेत्रमें यदुवंशियोंका नाश भया । ( ७ वा अध्याय ) तब अर्जुन वचे हुए बालक, वृद्ध और स्त्रियोंको द्वारका और प्रभास से ले आये । उन्होंने उनमेंसे बहुतेरों को कुरु क्षेत्रमें, बहुतेरों को मानिकावत नगरमें और बहुतेरों को सरस्वती के तटपर बसा कर अनिरुद्ध के पुत्र तथा कृष्णके प्रपौत्र वज्रको इन्द्रप्रस्थ का राज्य प्रदान किया । और विभाग क्रमसे बहुतेरे द्वारका वासियोंको वज्रके समीप इन्द्र प्रस्थमें स्थापित किया । ( आदि ब्रह्मपुराण के ९९ वें अध्यायमें देवी भागवतके द्वि- तीयस्कन्धके ८ वें अध्यायों और श्रीमद् भागवतके ११ वें स्कन्धके २१ वे अध्यायमें भी लिखा है कि अर्जुनने वज्रको इन्द्र प्रस्थका राज्य दिया।) ( महा प्रस्थानिक पर्व प्रथमाध्याय ) राजा युधिष्ठिरने धृत राष्ट्र के पुत्र ( वैश्या स्त्री से उत्पन्न ) युयुत्सुको राज्य भार देकर अर्जुन के.पात्र परीक्षितको हस्तिनापुरके राजसिंहासनपर बैठाया और भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव और द्रौपदीके साथ महा प्रस्थानको चल दिये। मत्स्य पुराण ५० वा अध्याय-रोजा परीक्षित के पश्चात् इस क्रमसे पाण्डु वंशीय राजा होंगे:- ३ www.navin , , -- सम्राट् शुभागमन । १-जनमेजय, २ शतानीक, ३ अधि सोम कृष्ण, ४ विवक्षु, ५ भूरि, ६ चित्र रथ, ७ सुचिद्रव, ८ वृष्णिवान, ९ सुषेण, १० सुनीथ ११ नृ चक्षु, १२ सुखीवल, १३ परिष्णव, १४ सुतपा, १५ मेधावी, १६ पुरंजय, १७ ऊर्व १८ तिग्मात्मा, १९ बृहद्रथ, २० वसुदामा, २१ शतानिक, २२ दयन, २३ वही नर, २४ दण्ड- पाणि, २५ निर्मित्र, और २६ क्षेमक । राजा क्षेमक के पश्चात् यह वंश नष्ट हो जायगा । श्रीमद् भागवत, ९ वां स्कन्ध २२ वां अध्याय-राजा परी क्षित के पश्चात् इस प्रकार पाण्डु वंशीय राजा होंगे १ जनमेजय, २ शतानीक, ३ सहवानीक, ४ अश्वध्वज, ५ असीम कृष्ण, ६ नेमि चक्र, ७ उप्त, ८ चित्र रथ, ९ कविरथ, १० वृष्णिमान् ११ सुषेण, १२ सुनीथ, १३ नृचक्षु, १४ मुखीनल, १५ परिप्लव, १६ सुनय, १७ मेधावी, १८ नृपंजय, १९ अर्व, २० तिमि, २१ वृहद्रथ, २२ सुदास, २३ शातानिक, २४ दुर्मन २५ वहीनर २६ दण्ड पाणि, २७ दुर्नेमि और २८ क्षेमक । छठे राजा नेमि चक्र के राज्यके समय जब हस्तिनापुर गंगामें डूब जायगा । तब वह राजा कौशाम्बी नगरीमें निवास करेगा। राजा क्षेमक के पश्चात् यह वंश समाप्त हो जायगा । पाण्डुबंशी राजाओंके पश्चात् तक्षक वंशी १४ राजाओंने इन्द्रप्रस्थमें ५०० वर्ष राज्य किया । १ विसर्व, २ सुषेण, ३ शीर्ष, ४ अहंशाल, ५ वर्जित, ६.दुर्वार, ७ सदापाल, ८ शूरसेन, ९ सिंहराज, १० अमरवाद, ११ अमरपाल, १२ सर्वाह, १३ पदराद् और १४ मदपाल ।
10 सम्राट शुभागमन । राजा मदपाल अपने मंत्रीके हाथसे मारागया। उसके पश्चात् गौतमवंशीय १५ राजाओंने इन्द्र प्रस्थका शासन किया- महाराजि, २ श्री सेन 3 महीपाल, ४ महावली, ५ श्रुतवत्ती, ६ नेत्रसेन, ७ सुमुख, ८ जितपाल, ९ कलंक, १० कुलमान, ११ श्रीमर्दन, १२ जयवङ्ग १३ हरगुज, १४ हर्षसेन, और १५ अस्तिन । गौतमवंशका अन्तिम राजा अस्तिन अपने मंत्रीको राज्यकाज सौंपकर आप विरक्त होगया। उसके पश्चात् इन्द्र अस्थमें मौर्यवंशी ९ राजा हुए। १ दुधसेन, २ सिद्धराज, ३ महागंग, ४ नन्द, ५ जीवन ६ उदय ७ जिहव्ल ८ आनन्द और ९ राजपाल । राजपालने, “जिसका दूसरा नाम दिल्लूथा। सन् ई० से लगभग ५० वर्ष पूर्व इन्द्रप्रस्थके पड़ोसमें कई मील दूर एक नगर वसाकर अपने नामके अनुसार उसका नाम दिल्ली रक्खा । तभीसे दिल्ली नाम प्रसिद्ध हुआ। राजा राजपालने कमाऊके राजा सुखवंतके राज्यपर, जिसका नाम शकादित्य भी था आक्रमण किया ।, राजपाल युद्ध में मारागया । सुखवंत इन्द्र प्रस्थका राजा हुआ । उसके पश्चात् उज्जैनके राजा विक्रमदित्यने सुखवंतको मार कर उसका राज्य लेलिया । विक्रमादित्यके समयसे भारतवर्ष की राजधानी उज्जैन होगई । और दिल्ली की अवनति होनेलगी। कुतुब मीनार के निकट सन्. ईस्वीके तीसरी या चीथी सदीका लोहस्तम्भ है । जिसपर उस समयके मतापी राजा धवका यश खोदकर लिखा हुआ है । सन् ७३५ में तोमर वंशीय राजा अनङ्ग पालने,
सम्रांट शुभागमन
जिसका दूसरा नाम बलवानदेव था दिल्लीको, जो बहुत कालसे
उजाड हो गईथी फिरसे बसाया । और उसने अपनी राजधानी
बनाया।
तोमर वंशका १४ वां राजा कुमारपाल और १५ वां राजा
द्वितीय-अनङ्गपाल हुआ। कन्नौजके राठोर राजपूतोंके मतापसे
दूसरे अनङ्ग पालसे पहिले दिल्ली की दशाहीन हो गईथी। किन्तु
उसके राज्यके समयसे दिल्ली की उन्नति होनेलगी। उसने
शहरको सुाधारा ओर चारों ओर किलाबंदीकी जो अबतक देखनेमें
आती है।
कुतुब मीनारके निकट राजा धावके स्तम्भके दूसरे लेखसे
जानपड़ता है कि सन् १०५२ में दूसरे अनङ्ग पालने दिल्लीको
बसाया।
सन् ईस्वीकी १२ वीं सदीमें दिल्लीके तोमरवंशीय १९ वां
राजा तृतीय- अनङ्गपाल हुआ। अजमेर के चौहानराजा
सोमेश्वरने, जिसे विशल देव भी कहते हैं अनङ्गपालको परास्त
करके अपने आधीनका राजा बनालिया। विशल देवके बनाये
हुए " हरकेलि " नामक नाटकका कुछ भाग सिलेके तखतोपर
खुदा हुआ अजमेर के ढाई दिनके झोपड़ेमें अबतक रक्षित है ।
लेख वर्तमान नागरीसे मिलता है । उनमे विक्रमीय सम्बत १२१०
लिखा है । राजा अनङ्ग पालके कोई पुत्र न था।
केवल दो पुत्रीयीं । जिसमें एक कन्नौजके राठोर राजासे
और दूसरी अजमेर के राजा सोमेश्वर से निवाही गई। अनङ्ग
पालकी बड्डी पुत्री से कन्नोजके राजा जयचन्द्रका और छोटी से
६ सम्राट् शुभागमन १ सन् ११४९ में अजमेरके पृथ्वीराजका जन्म हुआ। पृथ्वीराज सन् ११५५ में अपने नाना अनङ्ग पालके पास चला गया । और उनकी मृत्यु होनेपर ११६२ में उनका उत्तराधिकारी बना । इस भांति पृथ्वीराज अजमेर और दिल्लीको अधिक दृढ किया । सन् ११८५ में कन्नौजके राजा जय चन्द्रने राजसूय यज्ञका अनुष्ठान और अपनी कन्याका स्वयंवर किया। उसने पृथ्वी राजको छोड़ कर अन्य सब राजाओंको निमंत्रण किया था । और पृथ्वीराजकी स्वर्ण मूर्ति बनवाकर द्वार पालके स्थान पर रख दिया । राज कुमारी ने स्वयंवरमें स्वर्ण मूर्ति के गलेमें जय माला डालदी । उसी समय पृथ्वी राजने सभा अकस्मात् ओकर राजकुमारीको घोड़ेपर बैठा कर अपनी राजधानीको चल दिया । इस से राजा जयचंद्र काबड़ा अपमान हुआ। सन् ११९१ में अफगाणिस्तानके गोर शहरके रहनेवाले सहाबुद्दीनने, जो महम्मद गोरीके नामसे प्रसिद्ध है । भारत वर्षपर आक्रमण किया । पृथ्वी राजने उसको थानेश्वरमें परास्त करके ४० मील तक उसकी सेनाका पीछा किया । सन् ११९३ में सहाबुद्दी- नने भारी सेना लेकर फिर आक्रमण किया। लोग कहते हैं कि कन्नौजका राजा जय चन्द्र उसको चढालाया था। शहाबुद्दीन और पृथ्वी राजमें दृषद्वती ( घाघरा ) के किनारे बड़ा संग्राम हुआ। अन्य राजाआंसे वैमनस्य होने के कारण सहायता प्राप्त न होनेपर पृथ्वी राज परास्त होकर मारा गया । दिल्ली मुसलमानांके आधी १ इसका नाम " संयुक्ता " कई पुस्तकोमे है। २ रासामे कैद कर नेत्र हीन करना लिखा है और शब्द भेदी वाण से बादशाह पृथ्वी राज चंद भाटके आपुसमे मरनेकी बात है ।
सम्राट शुभागमन।
७
न हुई, हिन्दुको स्वाधीनता गई, और भारत वर्ष मुसलमानांके
हस्त गत हुआ।
शहाबुद्दीनने एक वर्षके भीतरही जयचन्द्रको संग्राममें मारकर
कन्नाजका राजभी ले लिया। उसने हिदुस्तानमें रह कर कभी
राज्य नहीं किया । वह कभी हिन्दुस्तानमें और कभी अपने देशमें
लड़ताथा।
गुलाम खान दानके १० बाद शाह,-१ कुतुबुद्दीन-यह
शहाबुद्दीन गोरीका सुवेदार था,जो उसके मरनेपर सन् १२०६ में
स्वतंत्र दिल्लीका बादशाह यनगया । इसीने दिल्लीके पास कुतुब
इसलाम मसजिद बनवाई। कहते हैं कि कुतुब मीनारका काम
इसीने आरम्भ किया।
२ आरामशाह-कुतुबुद्दीन के मरनेपरे उसका पुत्र आरामशाह सन्
१२१० म बादशाह हुआ।
३ अलतमस-यह कुतुबुद्दीनका जामाताथा । सैन् १२११
आरामशाहको तरव्तसे उतारकर बादशाह बनगया । यह गुलाम
खानदानके बादशाहोंमें सबसे अधिक प्रतापी हुआ। और सबसे
अधिक राज्य किया।
४ रुकनुहीन-फिरोजशाह-अलतमस की मृत्यु होनेपर उसका
पुत्र रुकनुद्दीन फीरोजशाह सन् १२३६ में तरन्तपर बैठा ।
५ रजिया बेगम रुकनुद्दीन फिरोजशाहके केवल ७ महोने
राज्य करने के पश्चात् सन् १२३६ में सर्दारांने उसको तरव्तसे
उतारकर अलतमस की बेटी रजिया बेगमको बैठाया। यह बड़ी
होशियारीसे राज्य करतीथी। परन्तु लगभग ४ वर्ष राज्य करने के
सम्राट शुभागमन
पश्चात् एक हवशी गुलामसे प्रेम होने के कारण सर्दारोंने उसे
मारडाला।
६वह रामशाह-रजिया बेगमके मारेजानेपर अलनमसका पुत्र
वहरामशाह सन् १२४० में बादशाह हुआ।
७ मसाउदशाह-यह रूकनुद्दीन फिरोजशाहका बेटा और
वहरामशाहका भतीजा था। राज्य के सर्दाराने सन् १२४२ में
वहरामशाहको कैदकर मशाउदशाहको तखतपर बैठाया।
८ नासिरुद्दीन महमूद-सन् १२४६ में लोगोंने मशाऊदशाहको
मारकर उसके काका नासिरुद्दीन महमूदको तखतपर बैठाया ।
९-गयासुद्दीन बलबन-नासिरुद्दीन महमूदके पश्चात् सन्
१२६६ में उसका वहनोई गयासुदीन बलवन बादशाह बना।
इसने मेवातके एकलाख रजपूतोंके शिर काटडाले ।
१० कै कुवाद-गयासुदीनके मरनेपर १२८७ में कुराखोका
पुत्र कैकुवाद तखतपर बैठा । जिसको सन् १२९० में दुशमनेने
जहर देकर मारडाला।
खिलजी खानदानके ४ बादशाह ।
१ जलालुद्दीन फिरोजशहा-गुलाम खानदानके अन्न होनेपर
सन् १२९० में जलालुद्दीन दिल्ली के तखतपर बैठा। इसका स्वभाव
सीधाथा।
२ अलाउद्दीन-सन् १२९६ में जलालुदीनका भतीजा
अलाउद्दीन अपने काकाको दगासे मारकर बादशाह बनगया ।
१ कई इतिहासोमें हवसीको लेकर भगजानेको, और कोईने ।
शानके घर उसके गहनेकी लालचसे मारेजानेकी बात है
.
९ NRNIMUVALUM" LIV.WAHU सम्राट् शुभागमन । इसने गुजरात देश और देवगढको लूटा । बड़ी सखतीसे अपना राज्य बढ़ाया। ३ मुबारकशाह-सन् १३१६ में अलाउद्दीनके मरनेपर उसका पुत्र बादशाह बना। ४ खुसरो वां-यह नीचजातीके हिन्दुसे मुसलमान होगयाथा । सन् १३२१ में अपने मालिक मुबारक शाहको मारकर तखतपर बैठगया। तुगलक खानदानके ११ बादशाह-~-१ गयासुद्दीन तुगलक- खिलजी खानदानके अन्त होनेपर सन् १३२१ में गयासुद्दीन तुगलक दिल्लीका बादशाह हुआ । जीसने तुगलका बादका किला बनवाया । वह अन्तमें मकानके नीचे दबकर मरगया। महम्मद आदिल तुगलक-गयासुद्दीन की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र महम्मद आदिल सन् १३२५ में गद्दीपर बैठा । इसने आदिलाबाद बसाकर उसमें एक किला बनवाया। और दिल्लीके निवासियोंको दक्षिणके दौलताबादमें बसानेका और रुपये के दाममें ताम्बेके सिक्के चलानेमें बड़ा उद्योग कियाथा। परन्तु आन्तमें उसका मनोरथ सफल नहीं हुआ। ३ फिरोज शाह तुगलक--महम्मद आदिलके मरनेपर सन् १३५१ में उसका पुत्र फिरोज शाह बादशाह हुआ। इसने फीरोजाबाद शहर बसाया । और अनेक परमार्थिक काम किये । जिनमें प्रधान यमुना नहर है। ४ गया सुद्दीन-दूसरे फिरोज शाहकी मृत्यु होनेपर उसका ४.vi.iN ANAMAVRAN सम्राट शुभागमन पुत्र गयासुद्दीन सन् १३८८ में तखतपर बैठा । यह ५ महीने राज्य करने के पश्चात् मारा गया । ५ अबूबकरशाह-गयासुद्दीन के पीछे उसका भतीजा अबूब- कर शाह सन् १३८९ में बादशाह बना, जो कैदखाने में मरा । ६ नासिरुद्दीन महम्मद-सन् १३९० ई. गयासुद्दीनका दूसरा भतीजा नासिरुद्दीन गद्दीपर बैठा । ७ हुमायुसिकन्दर-सन् १३९३ में नासिरुदीनका पुत्र हुमायु सिकन्दर बादशाह बना । जिसने केवल ४५ दिन राज किया। ८ महमूद शाह-सन् १३९३ में हुमायु सिकन्दर के पुत्र महमूद शाहको गद्दी मिली। ९ नसरत शाह-सन् १३९५ में बरामदवांका पुत्र. नसरत खां दिल्लीका बादशाह हुआ। सन् १३९८ में तैमूर तातारीने जि- सको तिमिर लिंग भी कहते हैं बडी सेना लेकर दिल्लीपर आक- मण किया । और, बाद शाहको परास्त करके ५ दिनोतक दिल्ली में आमकतल करवाया । लाशके ढेरेसे सड़कें बन्द होगई । उसकी फौज, दास बनाने के लिये बहुतेरी स्त्रियों और पुरुषांको ले गई दिल्ली में दो महीने तक अराजकता १० महमूदशाह-दूसरी बार सन् १४०० में हुमाय सिकन्दरका बेटा महमूदशाह फिर तखतपर बैग। ११ दौलतखां-महमदशाह के मरनेपर उसका पुत्र 'दौलतखां सन् १४१३ में बादशाह हुआ । रही।
सम्राट शुभागमन।
११
..
सैयद खानदानके ४ बादशाह-तुगलक खानदानके पीछे सैयद
मलिक लुभानका पुन विजय सन् १४१४ में बादशाह हुआ ।
( २ ) दूसरा मुबारकशाह-खि नशाह के मरने पर उसका पुत्र
मुवारकशाह सन् १४२१ में तखतपर बैठा।
( ३ ) मुबारकके मारे जानेपर उसका भतीजा महम्मदशाह
सन् १४३४ मे तलपर बैठा।
( ४ ) आलमशाह-महंमद के मरनेपर उसका पुत्र आलमशाह
१४४५ ई. मे तरन्तपर बैठा, सैयदोंके राज्य समय दिल्ली निर्वल
रही। आलमशाह अपना राज्य बहलोलखां लोदीको देकर आप
कुमायु चलागया और वही मरा।
लोदी खानदानके ३ बादशाह-ये सब अफगान थे,
(१) वह लोल लोदी-सन् १४५१
कला बहादुरका
पुत्र वहलोलखां गद्दीपर बैठा । इसने दिल्लीके राज्यको बढ़ाया ।
( २ ) सिकन्दर लोदीके मरनेपर उसका पुत्र इनाहिमलोदी
१५१७ ई. मे बादशाह बना यह आगरेमें रहताया। सन् १९२६ में
मुगलखानदानके वावरने इसे पानीपत के लड़ाई परास्त किया
और मारडाला गया और वहीं दफन किया गया ।
मुगल खानदानके १६ बादशाह-१ बाबर, यह तैमूर
तातारीके छठे पुस्तमें उमरशेख मिर्जाका पुत्र था, सन् १५२६ मे
इब्राहिम लोदीको परास्तकर दिल्ली में बादशाह बना . परन्तु
आगरेमें रहताथा सन् १९३० में ४५ वर्ष के उमरमें वहीं मरा
और वहीं दफन किया गया। उसकेबाद उसका बेटा हुमायुः
गद्दीपर बैठा, इझने इंद्रप्रस्थ के पुराने किलेको १५३३ ई. में
सुधारकर उसका नाम
"दीनपन्नाह " रक्खा।
१२
सम्राट् शुभागमन।
"
वंगालका हाकिम शेरशाह अफगान सन् १५४०
हुमायुको निकालकर आप दिल्लीका बादशाह बना, और
किलेकानाम “ सेरगढ़ " रक्खा, सेरशाहका लिंजरक किलेमें
आक्रमण करते समय ७२ वर्षक वयमें मारागया, इस्कवाद उसका
पुत्र शलीमशाह तरव्तपर बैठा इसने १५४६ ई. में “ सलीमगढ
बनवाया यह सन् १५५३ मे मरा, इसके बाद फिरोजशाह वाद
शाह बना जो कई महीने बाद अपने मामाके हाथसे मारागया।
इसके बाद निजामखांका पुत्र आदिलशाह तरव्तपर बैठा, इसके
वाद सेरशाहका चवेराभाई सुलतान इब्राहिम सन् १५५४ में और
दूसरा चचेराभाई सिकन्दरशाह सन् १५५५ में तखतपर बैठा ।
हुमायु सन् १५५५में फिर हिन्दको लौटा और भारी लड़ाई
कर फिर दिल्ली लेलिया, हुमायु आगरेमें तरब्तपर बैठा और ६
महिने राज्य करनेबाद सन् १५५६ को जानवरीमें सीढोसे गोरकर
मर गया।
अकबर-जब हुमायु हिन्दसे फारसको भागाजा रहाथा तक
अमरकोटके एक छोटे किलेमें सन १५४२ में उसक पुत्र अकबरका
जन्म हुआ सन १५५६ मे हुमायुके मरनेपर अकबर दिल्लीका
बादशाह बना।
अकबरने राज्यको बहुत बढ़ाया, उसने सन् १५६० से
वहरामखां सेनापतिसे राज्यभार आप लिया, सन् १५६१ से ६८
तक राजपूतराज्योंको अपने स्वाधीन करनेमें लगा रहा सन्.
१५७२ में गुजरातको अपने राजमें मिला लिया। सन् — १५७६
में दूसरी बार बंगालको जीतकर अपने राज्यमें मिला लिया सन्
१५८६ मे कश्मीरको अपने राजमें मिलालिया । सन् १५९२
सम्राट शुभागमन mm में सिन्धको जीता सन १५९४ में कन्धारको जीता, सन १५९४ में स्वयं अहमदनगरमें चढाई की सन १६०१ में खानदेशको अपने राज्यमें मिलालिया, सन १६०५ मे ६३ वर्षकी उमर.: आगरमें परा, उसका मकबरा आगरेके सिकन्दरामें है, अकबर बहुर रे संस्कृत ग्रन्थोको फारसीमें कराया । न्याय द्रष्टीमें हिन्दु मुसलमान समान थे, महाराज मानसिंह और कई राजांको उच्चपद दिया । राजा तोदड़ मलको अपना प्रधान बनाकर मालका बंदोबस्त और जमीन की सर्वैका कामभी दिया। अकबरके ४१५ उच्च पदाधिकारियोंमेसे ५१ हिन्दुथे, यह विशेष आगरेमें रहताथा और वही मरा सन् १५६६ में आगरेमें और १५७५ में प्रयागमें किला बनवाया, जहांगीर-अकबर की मृत्यु के पश्चात् १६०५ में उसका पुत्र सलीम जहांगीरके नामसे गद्दीपर बैठा। इसने अपने राज्यक बाईस वर्षका समय अपने पुत्रोंके बगावतोंको दबाने, अपनी स्त्रीके अखतियारात बढाने और ऐश करनेमें बिताया। सन् १६२७ में जब शाहजहां और बड़ा सर्दार महावतखां बिगड़ रहेथे, सत्तावन वर्षकी उम्र जहांगीर मर गया । और लाहोर के समीप शाह दरेमें दफन किया गया । शाहजहां-अपने बापके मरने पर १६२८ की जनवरीमें आगरेमें राजगद्दीपर बैठा, इसने बागियोंको मरवा डाला और नूरजहांकी पेंशिन मुकरिर्र करदी। इसने लाल किला, दिवाने आम, दिवाने खास, इत्यादिक इमारतें बनवाई । सन् १६५७ में जब बादशाह शाहजहां बीमार पड़ा तब इसके पुत्रांने तरव्त के लिये झगड़ा किया और अन्त में औरंगजेब जीतगया । १६५७ में शाहजहांको कैद करके औरंगजेब तरन्तपर बैठा । शाहजहां ७ वर्ष
१४
सम्राट शुभागमन ।
आगरेक किले में कैद रहकर १६६६ में ७४ वर्षकी उम्रमें मरा
और ताजमहलमें अपने स्त्री मुमताज महलके समीप दफन
कियागया।
औरंगजेब-सन् १६५८ में आलमगीर की पदवीसे बादशाह
हुआ । सन् १३५९ में इसने अपने बड़ेभाई दाराको मरवाडाला
और सन् १६६० मे दूसरे भाई सुजाको हिन्दुस्तानके बाहर
निकाल दिया। और सबसे छोटेभाई मुरादको कैद खाने में काल
करवाया । इसने हिन्दुओंपर १६७७ में निजिया नामक कर जारी
किया । अर्थात् जो मुसलमान नहीं है, उसे करदेना पड़ताथा ।
औरंगजेब १७०७ की फरवरीमें ८६ वर्षकी उम्रमें मरा । और
औरंगाबादमें दफन किया गया ।
आजम शाह-औरंगजेबके बाद १७०७ में आजम शाह गद्दी
पर बैठा । औरंगजेब के पुत्र से लढाईके समय यह धौलपुर के
समीप मारा गया।
बहादुर शाह-औरंगजेबका पुत्र मुअजिम रणभूमीमें अपने
भाई आजमको मार कर १७०७ में बहादुरशाहके नाम से गद्दीपर
बैठा जो शाह अलम भी कहलाता था। यह ६९ वर्षकी उम्र मरा।
जहांदार शाह--बहादुर शाहकी मृत्यु होनेपर उसका पुत्र जहां-
दार शाह सन् १७१३ में दिल्लीका बादशाह हुआ । ५२ वर्षकी
अवस्थानमें जहांदार शाह मारा गया।
फरक सियर-यह सन् १७१३ में अपने काका जहाँदार शा-
हको मार कर तख्तपर बैठा । सन् १७१९ में २ सय्यदेोंने फरक
सियरको जो ३४ वर्षका था मरवा डाला।
सम्राः सुभागमन १५ महम्मद शाह-फरक सियरके मारे जानेपर एक वर्ष में ४ बाद- शाह हो चुके थे । उसके बाद सन् १७२० में जहांदार शाहके पुत्र महम्मदशाहको गद्दी मिली सन १७३९ में पारसके नादिरशाहने कर्नालके पास महम्मदशाहको परास्त किया । और ११ मार्चको दिल्लीमें आम कतल का हुकुम दिया । सुर्योदयसे दोपहस्तक सम्पूर्ण शहरमें कतलं जारीरहा । ५८ दिनांतक दिल्लीको लूटा । उसके पश्चात् ३२ करोड़ की लूटकी सम्पत्ति, प्रसिद्ध कोहनूर हीरा और ताऊस तख्त लेकर अपने देशको लौटगया । १७४७ में अहमशाह दुर्रानीने हिन्दपर आक्रमण किया। महम्मदशाह ४६ वर्षकी अवस्थामें मरगया। अहमदशाह-महम्मद शाहके मरनेपर १७४८ में उसका पुत्र अहमदशाह दिल्लीका वादशाह हुआ । सन् १७५४ में अहमदशाह गद्दीसे उतार दिया गया। आलमगीर-अहमदशाहको तख्तसे उतार दिये जानेपर मग़रुदीन जहांदारशाहका पुत्र दूसरा आलमगीर सन् १७५४ में दिल्लीके तख्तपर बैठा । आलमगीरको उसके वजीर गयासुद्दीनने मरवा डाला । महाराष्ट्रका उत्तरीय भारतमें विजय और दिल्लीमें अधिकार हुआ। 'शाहआलम, दूसरा-आलमगीरके मारे जानेपर १७५९ में उसका पुत्र जलालुदीन शाह आलमके नामसे दिल्लीका बादशाह १ शाहआलम १७०५ मे दरबार कर लार्डलेक साहबको प्रत्युप कारमें उपाधि प्रदानकी, समसम -ई-दौलाह (राज्यकी तलवार ) अश जाह-उल-मुल्क (राज्यका योधा ) और खान दौराह ( समयका प्रधान पुरुष ) इत्यादि १६ सम्राट् शुभागमन हुआ । जो सन् १७७१ ई. तक इलाहाबादमें अंग्रेज महाराजका पेंशन भोक्ताथा । सन् १७७१ में शाह आलमके बाप दादाओं के राज्यका थोड़ा भाग उसको लाटा दिया । परन्तु बागियोंने बादशाहकी आंख फोडकर कटकर लिया। महाराष्ट्रांने उसको कैदसे छुड़ाया । सन् १७८९ में महदाजी सिन्धियाने दिल्लीको अपने काबू कर लिया । सन् १८०३ के सितम्बरमें दिल्ली और शाह आलम अंगरेज महाराज के हाथमें आये । सन् १८०४ के अक्टूबरमें हुल करने दिल्लीपर घेरा डाला था। परन्तु अंग्रेजी गवर्न मेंटने उसे बचाया । उस समय से दिल्ली अंग्रेज सरकारके आधीन हुई । किन्तु मुगल बादशाह नाम के लिये १८५७ तक बादशाह बने रहे । शाह आलम ७८ वर्षकी अवस्थामें मर गयो । अकबर, दूसरा-शाह आलम के मरनेपर उसका पुत्र अकबर सन् १८०६ में अंग्रेज महाराज के आधीन दिल्लीकी गद्दीपर बैठा, और ७७ वर्षकी उम्रमें मर गया । महम्मद बहादुर शाह-अकबरकी मृत्यु होनेपर उसका बेटा महम्मद बहादुर शाह सन् १८३७ में अंग्रेज महाराज के आधी न दिल्लीके तख्तपर बैठा । जो अंगरेजी गवर्नमेटेसे अस्सी हजार रुपये मासिक पेंशिन पाताथा । दिल्लीके दर्शनीयस्थल- वर्तमान दिल्ली के आसपास दूरतक बहुतेरी राजधानी हो चुकी हैं। वर्तमान शहरके चारों ओर खासकर दक्षिणसे राय पिथोरा और तुगलका बादके छोड़दिये हुए किलों तक १० मीलके सम्राट् शुभागमन। १७ अन्तरमें वरबादियां फैली हैं । १५ वर्ग मील के क्षेत्र फलमें पुराने शहरसें तथा राजा और जादशाहों की इमारत आदि वस्तुओंके चिन्ह फैले हुए देख पड़ते हैं। वर्तमान दिल्लीसे दो मील दक्षिण पाण्डवोंका बसाया हुआ इन्द्र प्रस्थके स्थानपर इन्द्रपाथका पुराना किला जर्जर होरहा है। दिल्लीसे १४३ मील आगरा ३४९ मील रेवारी, ३५२ मील लाहौर ३९० मील प्रयाग अहमदाबाद होकर ८८८ मील बंबई और पटना होकर ९५४ मील कलकत्ता है । अब दिल्ली भारतकी राजधानी हो गई है। कंपनीबाग-इसे सर्व साधारण विक्टोरिया बाग कहते हैं । विविध प्रकारके वृक्षलगे हैं, बागके पास एक पत्थरका हाथी खड़ा है, जिसके नीचे लिखा है कि बादशाह शाहजहानने इस हाथीको सन् १६४५ ई० में ग्वालियरसे लाया और नये महलके दक्षिण दरवाजेपर रक्खा । वस्तुसंग्रहालय-बागके पासहीं जादूघर है, जहां अनेक अभ्दुत चीजै दरवार गृह और पुस्तकालय है, पासही घड़ीकाबुर्ज (टावर ) है जो १२५ फिट ऊंचा है लालपत्थरका बना है। फतहपुरी मसजिद-इसे शाहजहान की स्त्री फतहपुरी बेगमने सन् १६५० मे बनबाया, इसके लालपत्थरके दो बुर्ज १०५ फिट ऊंचे हैं। जामा मसजिद-यह दिल्लीमें सबसे दर्शनीय इमारत हैं । बाद- • १ इसका पूर्व फाटक केवल बादशाहांके प्रवेशके लियेथा, अब भी राजकीय प्रधान सुरुषांके अतिरिक्त उसदरबाजेसे कोई प्रवेश नहीं करसक्ता सन् १८५७ के बलवेमें इंसी मसजिदमें खुतवा पढ़ागयाथ । - ३
१८
सन्नाद सुभागमन ।
शाह शाहजहानने सन् १६३२ से १६३८ तक इसको बनवाया
था, ५ हजार कारीगरोंने ६वर्षमें इसे तयार किया। इस मसजिदमें
कुफित और इमाम हुसेनका लिखा हुआ कुरान रक्खा है। इस
मसजिदमे ९१३ जा निमाज अर्थात् निमाज पढने की क्यारियां
हैं। इसके बुर्जपर चढने से सारा शहर देख पड़ता है, मसजिद
देखनेवालेको मुसलमान् कमेटीके सेक्रेटरीसे पास लेना चाहिये
जो विना पैसे सहजमें मिलजाता है।
जैनमंदिर-जमामसजिदके आगे अनारकी गलीके पास
हरमुखराय कागजीका बनवाया हुआ दर्शनीय मंदिर है, हाथीदांतके
चांदनीके नीचे पनिमा प्रतिष्ठित है ।
काली मसजिद-तुर्कमान दरवाजे के पास फिरोजशाह तुगलक
के समयकी सन् १३८६ की बनी मसजिद है । मसजिद ६६ फिट
ऊंची है, कालेरंगसे रंगने के लिये यह नाम पड़ा।
किला-इसे देखने के लिये ब्रिगेडियर साहेबसे पास लेना
चाहिये जो संहजमें मिलजाता है ३२०० सौ फिट लम्बा और
१६०० सौ फिट चौड़ो यह किला जो मुगलबादशाहका शाही
महलथा स्थित है।
शाहजहानने किले और इसके भीतरी इमारतोंको सन् १६३८
में ४८ ई. तक बनवाया उसके समयसे महम्मद बहादुरशाहके
कि "
खल्क खुदाका मुल्क बादशाहका हुकम बहादुर शाहका-बलवाई
इसी मसजिदमें इकठ्थे, विजयी सैन्यने इसके चारो तरफ उड़ादेने के
लिये तोप लगाया परन्तु अंगरेज अफिसरने मुसलमानी धर्मानकों
नुकसान पहुंचाना योग्य न समझा; इसका नाम है धर्मनीति मसजिद
बननेके समय बंगालीमन २ रु. बांड और ५ रु. मन घी था।
सम्राट् सुभागमन । १९ . समय अर्थात् १८५७ ई. तक यह शाही महल था। भीतर तीन बाग और १३ कचहरीथीं, अब केवल नौबतखाना, दिवानाम, दिवानेखास, मोतीमसजिद, औरभी दोचार छोटी छोटी इमारतें हैं। ४ दिबानआम-यह १८० फिट लम्बा और १५० फिट चौड़ा है, तीन तरफसे खुला हुआ ४६ खंभेपर स्थित है । मध्यमें १० फिट ऊंचा पत्थरका एक तख्त है । जिसके चार खंभे और चांदनी सफेद चमकीले पत्थरकी बनी है । और उसके ऊपर विविध रंगके फूल फल बने हैं। पीछे एक दरवाजा है जिसमें होकर बादशाह पीछेके कमरों में जाते थे। * दिवाने खास-इसकी लंबाई १५० फिट और चौड़ाई १०० फिट है । यह सफेद पत्थरकी सुन्दर इमारत है । यमुनाकी ओर सफेद पत्थरकी सुन्दर टट्टियां लगी हुई हैं । स्तम्भों में सुन्दर वेलबूटे और पच्चीकारीका काम है, और इसके बेलबूटे सोने केवों से बनाये गये हैं। इसकी कारीगरीको देखकर बड़े २ कलावेत्ताभी विस्मित होते हैं । इसकी छतमें चांदी जड़ीथी । जिसको सन् १७६० में महाराष्ट्र लोग उखाड़ ले गये । इसके बीचमें श्वत प्रस्तरकी एक बड़ी चौकी रक्खी है । इसीपर बादशाह शाहजहान का तख्ते ताऊस अर्थात् मयूरासन रहताथा । सम्मन बुर्ज-यह एक सुन्दर इमारत है । भीतर सुनहरा काम और बेलबूटे देखने लायक हैं । इसीसे लगा हुआ रंगमहल है ४ यदि भूमिपर स्वर्ग है-तो यही है - अगर फरदोवर रुये जमीनस्त हमीनस्तवा हमीनस्तवा हमीनस्त * छतपर जो चांदी जडीथी वह मराठे लोग १७६० ई. में उखाड ले गये, वह १७ लाखको थी हाल के भूत्यम ४० लाखकी होती हैं
सम्राट शुभागमन ।
जिसमें स्त्रियोंके रहनेकी कोठरियां सुनहरी वांसे मढ़ी हुई हैं।
इसके चारों ओर पहिले बगीचा और फव्वारे थे । यह सामान
यहांसे अब उठा दिया गया, और अंगोजी सिपाही रहते हैं।
स्नान गृह-यह १३५ फिट लम्बा और ६० फिट चौड़ा स्नान
घरहै । इसमें तीन कमरे बने हैं । प्रत्येक कमरेमें एक २ पानीका
होज़ है
मोती मसजिद-यह ७५ फिट लम्बी और उतनीही चौड़ी है
इसे औरंगजेबने १६३५ में बनवाया था ।
सुनहरी मसजिद-यह रोशन-उद्-दौलाकी बनाई हुई छोटी
मस्जिद है । इसके तीन गुम्मनों पर सोनेका मुलम्मा किया हुआ
। बादशाह मुहम्मदशाहके समय १७२१ ई. में यह बनी है।
लोह स्तम्भ-इसी मसजिदके मध्यमें लोहेका एक स्तम्भ
४ आम कतलके दिन नादिरशाह इसी मसजिदमे बैठा था, डरसे
मुख्य कर्म चारियोके अतिरिक्त कोई पास न आताथा जब,
बहादुरशाह सरदारोंको ले कर गया और सब जमीनतक झुक सलाम किये
तव नादिरशाह आनेका कारन पूछा, सरदारोने कहा आप अब क्षमा कर,
नादिरशाहने कहाकि मैं " बादशाहके लिये क्षमा करता हूं" बहादुरशाह
रोने लगा, उसी समय कतल बन्द की गई । इस मसजिदके दरवाजेको
खूनी दरवाजा कहते हैं।
१ किम्बदन्ती है कि एक ब्राह्मण अनंग पालसे कहा कि यह
लोहाकी खोली आपने इतनी गाडी है कि शेषनागके सिरमें गड़ी है ।
राजा आश्चर्य होकर उखड़वाकर देखा तो उसमें लोहू लग्गाथा । पछि
फिर गंडाया परन्तु ढीली रहनेसे नाम " दिल्ली "
ढीली भई, तोमर भयामति हीन""
पड़ा खीली तो
सम्राट् शुभागमन २१ खड़ा है । जिसको तीसरी, चोथी सदीमें राजा धवने स्थापित कि याथा । यह २८ फीट पृथ्वीमें गढ़ा है और २२ फीट भूमिके ऊपर खड़ा है । इसका व्यास १६ इंच है। स्तम्भ में कई स्थलोपर सं- स्कृत लेख हैं जिनमें राजा धव के प्रतापका वर्णन है । एक दूसरे लेखमें सन् १०५२ ई. के साथ दूसरे अनङ्गपाल का और आठवी सदीके पहिले अनङ्ग पालका नाम लिखा है। अलतमसका मकबरह-यह वर्तमान समयमें जर्जर अवस्थामें है। भीतर कुराने शरीफ के कलमें लिखे हुए हैं। अलतमस १२३६ में मरा और यहांही दफन किया गया । अलाई-मीनार-यह ८३ फीट ऊंचा गोलाकार मीनार है। यदि यह तयार होता तो ५०० फीट ऊंचा होता । किन्तु कामक आरम्भ होने के चार वर्ष पश्चात् सन् १३१५ ई. में अलाउद्दीन के मरनेपर इसका काम बन्द हो गया । लालकोट किला-यह किला उजाड़ पड़ा है । २rमीलके घेरेमें मिट्टीकी दीवार है। दिल्लीके राजा द्वितीय अनङ्गपालने सन् १०५२ में पुरानी दिल्लीको यमुनाके किनारे से हटाकर इस स्थानपर बसाया १०६० में किला बनवाया महाराज पृथ्वी राजने किले के चारों ओर पांच मील लम्बी दीवार बनवा कर किलेका नाम " रायपिथोरा " रक्वा । इसे लोग पुरानी दिल्ली कहते हैं । इसके दक्षिण महरबली गामके समीप कुतुबुद्दीन की दर गाह है। और एक बड़ी झील है। योग मायाका मन्दिर-प्रत्येक सप्ताहमें यहां देवीके दर्शनका मेला होता है । मन्दिर के एक ओर अलतमसका..उजड़ा हुआ सम्राट् शुभागमन। MAMAL महल दीख पड़ता है । मन्दिर दिल्लीके अजमेरी दरवाजेसे ८ कोस ग्रह दर्शक गृह; (अबज़र वेटरी)-दिल्लीके बादशाह महम्मदशा- हके राज्यके समय आँवेर के राजा सवाई जयसिंहने जिन्होंने सन् १७२८ में जयपुरको बसायाथा सन् १७२४ ई. में इसको बनवाया । इसमें ग्रहादिक देखने के लिये अनेक यन्त्र रक्खे हैं। शफदरजंगका मकबरह-अहमदशाहके बजीर शफदरजंग १७५३ में मरे, उनके पुत्र लखनऊ के प्रसिद्ध नवाब सुजाउद्दौलाने तीस लाख रुपयेके खर्चसे इसको बनवाया। इसीके भीतर वजीरकी बीबी खुजिस्ता बेगमकीभी कवर है । कुतुब मिनार-दिल्लीके अजमेरी फाटकसे लगभग १० मील कुतुब इस्लाम मसजिदके पास कुतुब मिनार खड़ा है। जिसको कुतुब लाटभी कहते हैं भारतवर्षमें इतनी ऊंची इमारत कहींभी नहीं है । मीनारकी नींव किसने दी यह विषय सन्देहास्पद है। अधिकांश मनुष्यांका विश्वास हैकि दिल्लीका राजा पृथ्वीराजने इसको बन- वाया था । किन्तु शिला लेखेसे जान पड़ता है कि कुतुबउद्दीन हबकने सन् १२०६ ई. में. इसके बनानेका कार्यारम्भ किया। फीरोजशाह तुगलकने सन् १३६८ में मीनारको भली भांति वन- २ इसी राजाने काशी, उज्जेन, जयपुर आदिमेंभी बंधाया । ३ मध्य भागमें लिखा है कि-हे द्रढ़ इसलामियो जुमा के दिन जब निमाज पढ़नेके लिये तुम बुलाये जाव तब खुदाको याद करो और व्यापार बन्द करना, खेल कूदसे खुदाका नाम श्रेष्ट है वही दुनियाको पूरा करता है ।
सम्राएं शुभागमन । वाया । सन् १८०३ की पहिली अगष्टके भूकम्प से इसका शिरी- भाग गिर गया । सन् १८२९ में फिरसे बनाया गया । पहिले २५० फिट ऊंचा था। अब २३८ फिट है। ऊपर चढ़ने के लिये ३७६ सीढ़ियां बनी हैं। चारोंऔर बादशाहोंके कीर्तिलेख हैं। समीपही अलाउद्दीन का, मीनार अपूर्ण खड़ा है। कुतुब इसलाम मसजिद-इसमें एक शिलालेख है जिससे मालुम पड़ता है कि शहाबुद्दीन के कर्मचारी कुतुबुद्दीन एक्कने जो १२०६ से १२१० तक राज्यभोक्ता रहा सन् ११९३ में इसका कार्यारम्भ किया। कहते हैं कि जिस चबूतरेपर पृथ्वीराजका देव मन्दिर था उसी चबूतरेपर यह मसजिद खड़ी है। इसमें १००० स्तम्भ लगे हैं । अलाउद्दीनने इसको सुधरवाया। किला कोना मसजिद-इसे शेर शाहने १५४१ ई. में बन- वाया । मसजिदमें “ कुराने शरीफ' के बहुत शिला लेख विद्य मान हैं। समीप ही में ७० फिट ऊंची " शेरशाह मण्डल" नामक अठ पहली इमारत है । सन् १५५५ में हुमायूने इसको अपन लायन्नेरी बनाया । और उसी रात्रिको सीढीसे गिर गया । और बहुत दिनों में अच्छा हुआ। निजा मुद्दीन औलियाका मकबरह-इसके चारों ओर अनेक कवरें और पवित्र इमारतें हैं। भीतर १८ फिट लम्बा और इतना ही चौड़ा निजामुद्दीन चिश्तीका मकबरह है । मकबरेको मीर मीरन १ चिस्तीके कवरके पास समयर पर बहुत नाचने गाने वालीदासी इकट्ठी होती हैं और गाती हैं कि " ट्वाजा लैलो ख़बारिया हमारी रे" MAN है २४ सम्राट शुभागमन। के पुत्रने बनवाया था। एक लेखमें सन् १६५२ लिखा है। घेरे के भीतरअमीर खुशरूकवि, का मकबरह । यह कवि इतना प्रसिद्ध था कि पारसका कवि सादी इसको देखने के लिये हिन्दु स्तानमें आया । खुशरूका दादा तुर्की था । सन् १३१५ में खुश- रूकवि दिल्ली में दफन किया गया। खुशरूके मकबरे के उत्तर दूसरे अकबरके पुत्र मिर्जा जहांगीरकी और दरवाजे के बायें मुह- म्मद शाहकी जो सन् १७२० से १७४८ तक दिल्लीका बादशाह और उनके दक्षिण शाहजहांकी पुत्री जहान-आराकी कबर है। और उसके बांये तरफ शाह आलमकं पुत्र अली गौहर मिर्जाकी और दहिने जमीलुन्नीसाकी कबर है । हुमायूका मकबरह-यह शहर सेतीन मील दक्षिण एक सुन्दर वाटिका के भीतर दिल्ली के बादशाह हुमायूका मकबरह खड़ा है । दरवाजाकी एक ओर लिखा है कि-"बादशाह हुमायूकी विधवा नवाब हमीदा बानू बेगमने जिसका द्वितीय नाम हाजी बेगम है। अपने पतिकी मृत्युके पश्चात् मकबरहको बनवाया " । सन् १५५५ हुमायू मरा। मकबरह १५००००० रुपये के खर्च से १६ वर्ष में तैयार हुआ। हमीदा बानू और बादशाह कुटुम्बके दूसरे लोग भी यहां दफन किये गये। अशोक स्तम्भ- यह स्तम्भ बौद्धराजा अशोकने प्रथम मेरठके समीप खड़ा कियाथा। बादशाह फिरोजशाहने सन् १३५६ ई. में लाकर कुस्क शिकार महलमें खड़ा करवाया । सन् १७१३ ई. में बाख्दकी मेघज़ीन उड़नेसे स्तम्भ पांच टुकड़े हो गये । सन् १८६७ में अंगरेजी सरकारने स्तम्भको फिरसे खड़ा किया। में VAR -MAMPA vnviroinnrvwarvinvww सम्राट भुभागमन। २५ फतहगढ-सन् १८५७ के वलवेके विजयकी यादगार के लिये अंगरेज महाराजका बनवाया हुआ अठ पहला ऊंचा बुर्ज है । जो अफसर यहां लडे और मारेगये उनके स्मरणार्थ यह बना । इसके ऊपर चढनेसे चारों तरफका उत्तम दृश्य दिखा पड़ते हैं । इसी जगह सन् १८७७ का दरबार हुआथा। फीरोजां वादका किला और अशोक स्तम्भ-दिल्ली दरवाजेसे 1 मील दक्षिण जेल है । वहांसे २५० गजपूर्व उजड़ा हुआ किला है। जिसको सन् १३५४ में बादशाह फिरोज तुगलगने बनवायाथा । इसके भीतर फीरोजशाहके उजड़े पुजडे महल हैं । यहींपर पत्थरका बहुत प्राचीन अशोक स्तम्भ खड़ा है। सन् १३५६ में फीरोज तुगलकने सिवालिक पहाडीके पाद मूलके निकट टोफरसे मंगवाकर अपने मकानके सिरपर खड़ा करवायाथा। तभीसे यह फिरोजशाहका स्तम्भ प्रसिद्ध है। स्तम्भ ३८ फिट ऊंचा और १० फिटका घेरा है । ऊपर कई नागरी लेख है । एक लेख सन् १५२४ का है जो दिल्लीमें ले आने के पश्चात् लिखागया है । एक लेख सन् ईस्वीके ३०० वर्ष पूर्वका पाली अक्षरों में है, जिसमें राजा अशोक की धर्माज्ञा है। एक लेखमें अजमेरके विशालदेवके प्रतापका वर्णन है । जिसमें सन् ११६२ लिखा है । इन्द्रपात-यह इन्द्र प्रस्थका अपभ्रंश है । इसको पुराना किला कहते हैं । यह राजा युधिष्टिर के पुराने स्थानपर है । सोरहवीं सदीमें, बादशाह हुमायूने इसकी मरम्मत कराकर इसका नाम "दीन पनाह" रक्खा । तुगलकाबादका किला-दिल्ली के बादशाह गयासुद्दीन तुगल- कने सन् १३२१ ई. से १३३२ तक इसे बनवाया, यह चार ।
सम्राट् शुभागमन। MAAVT vnAVIVIN . मीलके घेरेमे है। किलेके भीतर अब टूटे फूटे खण्डहर हैं। किलेमें ७ तालाब टूटी हालतमें हैं। गयासुद्दीनका मकबरह-किले और मकवरहके बीच २७ मह- रावियोंका ६०० फीट लम्बा पुल बना है। मकवरहके भीतर गयासुद्दीन तुगलक गयासुद्दीनकी स्त्री और उसके पुत्र जूनाखां जो पीछे महम्मदशाहके नामसे बादशाह हुआ, कबरें हैं । महम्मदशाह १३२५ से १३५१ तक दिल्लीका बादशाह रहा । सन् १८५७ का देशविप्ल- के मई मासमे मेरठकी फौज बागी होकर दिल्ली आई और दिल्लीकी देशी सैन्यभी उनमें मिलगई, और महम्मद बहादुर शाहको अपना नायक बनाया, अगरेज अफसर उस समय इतनाहीं किया कि मेघजीन उड़ादिया, दिल्ली प्रसिद्ध और बादशाही तरन्त होनेके कारन चारो तरफसे विद्रोहियोंका दलजमा होनेलगा। अगरेजी सरकारने तारीख ६ जूनको दिल्लीका घेराघाला, अगस्तमे जनरल निकल सन साहब पंजाबसे मददलेकर आये, ता. १४ सितम्बरको अगरेजी सेना शहरपर आक्रमण किया, छदिनतक लड़ाई होती रही, अगरेजी सेना आठहजारसे जास्ती नथी, और शहर पनाहके भीतर १४४ बड़ीतोपोंके साथ ३० हजारले अधिक हाथियारबन्द बागीये, परन्तु बागी परास्त हुए और अगरेज महाराज की विजयहुई। बेकायदे रिशालेके अध्यक्ष मेजर हाउस साहबने बूढ़े बादशाह महंमद बहादुर शाहको, दोशाहजादा सहित पकड़ लिया जो हुमायुके मकबरेमे छिपेथे. दोनो शाहजादोको योग्य दंडकर बूढे बादशाहको कैदकर रंगून भेज़दिया और अच्छी पेन्सन मुकर्रर करदिया वाद-
२७
सम्राट् शुभागमन।
शाह ८७ वर्षकी अवस्थामें १८६२ मे वहीं मरगये, पहिले दिल्ली
पश्चिमोत्तर सरकारके स्वाधीन थी, बलवेकवाद पंजाब गौरमेन्टके
स्वाधीन हुई, अब मुख्य राजधानी है।
सन् १८७७ की पहिली जनवरीको सर्वोच्च शक्तिमई महारानी
विक्टोरिया एम्मेंस अर्थात् राजराजेश्वरीके पद धारनका महान
दर्वार बड़ेसमारोहके साथ दिल्लीमें हुआ।
१८७७
मे पहिला शाहंशाही दरबार श्रीमान् लार्ड लिटनके समय
श्रीमती महारानीको " केशर हिन्द " का पद धारनके निमित्त
हुभा। इस दरिमें ६५ हजार जनप्तमुदाय एकत्रिनथे, जिनमे ७७
राजा महाराजा और ठाकुरों ३०० हिन्द के प्रतिष्ठित जन १५
हजार सैन्य, दर्बार १४ दिनतक चलाथा १६ हजार कैदी छोड़ेगये,
अनेक खेलतमासे और अधिकांश राजे. महाराजे नव्याबोको झंडे.
दियेगये और श्रीमती महारानीश्रीका ओज्ञा पत्र वांचागया।
१८०३
यह दूसरा दरवार स्वर्गीय संत्राट श्रीमान् सप्तम एडवर्ड के
राज्यपद धारणका आज्ञापत्र पढनेके लिये हुआ इस पहिली
जनवरीके दिन यह दरबार अदुतीय हुआ इसके साथ
एक महान प्रदर्शनभी भरागयाथा, कवायतमे ४० हजार
सिपाही हाजिरथे, हाथियोंका असाधारन ठाट देखने योग्य
था; उससमयके श्रीमान् ब्रायसराय गवरनर जनरल लार्ड
करजन साहवबहादुर दिसम्बरकी २ तारीखको संपूर्ण सुसा-
जित हाथीमे विराजकर और संपूर्ण राजे महाराजे नव्वाव सुसा.
२८
सम्राट् सुभागमन।
NAA
ज्जित हाथी घोडे गाड़ियोंमे बैठ जलूसमे निकले, इस दर्वारके संब
न्धमें एक विद्वान लिखा हैकि,
हमारी आंखेचकरखाय इसतरेके चलकती अनेक धातुओके
सिरपेच, माला,मोती, रंगबेरंगी, पगड़ी जरीके उत्तम पोशाक, हाथि-
योंकी झूल और उत्तम भालेवालेसे रक्षित हाथियों छोडोका ठाट
दर्शनीय था मततवकी पुरातन समृद्धी एकही भई दीखतीथी, यह
दर्बार बहुतही अपूर्वथा।
व्हनोवरवंश
श्रीमान् भारत सम्राट
पञ्चमजॉर्ज महोदय ।
इसवी सन् १७१४ में तारीख १ आगष्टके दिन श्रीमती
अॅनराणी की मृत्यु होनेपर हनोव्हर घरानेक जार्ज लुईस
महोदयको राजा किया। इसी बरससे इगलांडमें इस घराने के
राजालोग राज्य करनेलगे । इन प्रथम ज्यार्जने १७२७ पर्यन्त
राज्य किया । दूसरेने १७२७ से १७६० पर्यन्त । तीसरेने
१७६० से १८२० और चौथेने १८२० से १८३० पर्यन्त ।
पश्चात् चौथे जके बन्धु श्रीमान् चतुर्थ विलियम् सिंहासनारूढ़
हुए । उनके पुत्र नहोनेसे भतीजी श्रीमती विक्टोरिया महारानी
राज्य शासक हुई। पीछे आपके ज्येष्ट पुत्र श्रीमान् सप्तम एडवर्ड
महोदय बादशाह हुए । पश्चात् वर्तमान सम्राट श्रीमान् पञ्चमजार्ज
महोदय राज्या रूढ हुए।
तारीख ३ जून सन् १८६५ ई. शनिवार रातके १ बजकर १८
मिनट जानेपर वर्तमान सम्राटका जन्म हुआ। पिकी नाम करण
२९
नाम
सम्राट शुभागमन ।
विधि — वुइन्डेसर कॅसल नामक राज मासाद में हुई, आपका
"जॉर्ज फ्रेडरिक अर्नेस्ट आलबर्ट " रक्खा गयाथा ।
आप १ मासहीके थे कि एक दिन अकस्मात् आगल गजानेसे
भयङ्कर प्रसङ्ग गुजराथा । उस समय आपके पिताने अत्यन्त पुरु-
पार्थ कर रक्षण किया था।
सन् १८७७ के जून महिनेसे आपका शिक्षण 'ब्रिटानिया'
जहाजपर आरम्भ हुआ। शिक्षक श्रीमान् रेव्हरन्ड जानपील
डॉल्टन' आपके साथये ।
पश्चात् ई. सन् १८७९ से १८८१ पर्यन्त तीन वर्ष श्रीमान्ने
'बाकान्ट' सरकारी जहाज से जहाजी वैज्ञान प्राप्त करने के उद्देश
से पर्यटन किया।
ईसवी सन १८८५ में आपको ‘लेफ्टनेन्ट ' की पदवी दी
गई। और कई जहाजों में अधिकार दे देकर आप भेजे गये।
ई. सन १८८९ में एक स्वतन्त्र नम्बर ८९ के टाडोका
अधिकार आपको था। तब आपको पिता माताका बुला आ गया
था । तथापि आपने जहाजकी स्वतन्त्र व्यवस्था दक्षतासेकी
और धन्यवाद पाया।
ई. सन १८९० में आपके अधिकारमें " श्रस
नामका
आगवोट मिला । उसी समयमें जमेका बेटमें रानी सरकारके
नामसे एक आद्योगिक प्रदर्शन आपने खोला।
ई. सन १८९१ के दिसम्बरमें आप विषम ज्वर से व्यथित
हो गये थे । उस समय आप .संडिग हाम हाउस' में थे ।
तारीखं ६ जुलाई सन् १८९३ के दिन श्रीमानका विवाह
टेकके डयुककी कन्या श्रीमती मेरीके साथ हुआं ।
,
सम्राट शुभागमन।
ई० सन १८९१-१८९४ इन वर्षों में आपने इंग्लंड,
स्काटलंड, वेल्स, और आयलैंड इन संयुक्त राज्योंके मुख्य २
स्थान और शहर देखे।
सन् १८९४ के जून महिनेमें आपके प्रथम पुत्र हुआ।
§
.
जो वर्तमान युवराज है।
इ. सन् १९०१ में आपको । रियर आडमिरल ' नामक
बड़ी पदवी मिली
ई. सन् १९०२ में युवराज होनेके कारणसे आप बर्लिन'
में गयेथे । परन्तु सम्राटू एडवर्ड महोदय रुग्ण होजानेसे आप
लौट आये । और पिताके जगह रहकर कवायत देखी।
तारीख २६ जून सन् १९०२ के रोज श्रीमान् सप्तम एडवर्ड
के राज्यभिषेक नै मित्तिक ' मार्लबरो हाऊस" प्रसादमें १३०००
लड़कोंको भोजन कराया। ये लड़के लन्डन् शहरकी भिन्न २
शिक्षण संस्थाओंके थे।
तारीख २४ फरवरी सन् १९०३ ईसवीको एडवर्ड बादशाह
के राज्यभिषेकके स्मारक ( अस्पताल ) औषधालय स्थापित
करनेकी वार्षिक सभा हुई उसमें ६००००० पांडसे अधिक द्रव्य
आपने संगृहित प्रसिद्ध किया।
ई. सन् १९०५ के नवम्बरमें आप हिन्दुस्थान में श्रीमती मेरी
महोदया सहित युवराजत्वही के सम्बन्धसे आयेथे, और ६ महीने
आपको सुखमद पर्यट न हुआथा ।
तारीख ६ मई सन १९१०. ईसवीको परमपूज्य पिताके
एकाएक परलोक यात्रा होजानेपर आप युवराज पदसे पञ्चमजाज
नाम धारणकर राज्याभिषिक्त हुए।
सम्राट शुभागमन । तारीख २४ मई सन १९१० को पितृजन्य वियोग दुःख कर्तव्यसे पीछे हटकर प्रजाको अपना एक सन्देसा भेजा । और सन् १८५८ ई० और १९०८ में श्रीमती महारानी और श्रीमान्, पिताजीके भेजे हुए प्रसिद्धि पत्र-नहीं २-बादशाही सनदै- इसी पद्धतिसे स्वयं वर्त्तनेका वचन दिया । तारीख २३ जून सन १८९४ ई. को युवराज श्रीमान् एडवर्ड आल्बर्टका जन्म हुआ । और १४ दिसम्बर १९९५ को श्रीमान् आल्बर्ट फ्रेडरिकका जन्म हुआ। और ता. २५ अमेल सन १८९७ को श्रीमती विक्टोरिया अलेकझंड्राका और ता. ३१ मार्च सन् १९०० को श्रीमान् हेनरी बुलियम् और ता. २० दिसम्बर सन् १९०२ को श्रीमान् जार्ज एडवर्डका और ता. १२ जुलाई सन् १९०५ ई. को श्रीमान् जानचार्लसका जन्म हुआ । इस प्रकार ५ पुत्र और १ कन्या ऐसे ६ सन्तान श्रीमान् के भारतकी भाक्त जबसे श्रीमान् सम्राट पंचम जार्ज और श्रीमती महारानि मेरी महोदया इग्लैंड के सिंहासना रूढ़ हुये तभीसे भारतीय प्रजा प्रवल इच्छा कररहीथीकि श्रीमान्का मुकुट धारण महोत्सव भारत मेभी हो, और हमसब प्रजा दर्शन करक कृतार्थ हो । यद्यपि आजके पांच वर्ष पूर्व आप भारतमें पधारेथे, परन्तु उस समय और इस समयमें बहुत कुछ अन्तरथा । भारतमें श्रीमान् सम्राट महोदयका मुकुट म- होत्सव हो यह बात बहुतहीं असंभवथी, क्योंकि नतो स्वर्गीय श्रीम- ती महाराणी यहां.पधारी और न सम्राट पद प्राप्तकरनेपर स्वर्गीय श्रीमान् एडवर्ड महाराजही पधारे।'
३२ सम्राः शुभागमन । परन्तु यहबात असंभव होनेपरभी भारतके सभी वर्तमान पत्र और जन समुदायके सभी अवस्थाके जन श्रीमान् सम्राट पंचम जार्ज महाराजके दर्शनकी अभिलाषा करनेलगे। भारतवासियोके आवा. जकी ध्वनी सात समुद्र और तेरहनदी पारकर श्रीमान् सम्राट् और श्रीमती मेरी महोदयाके कानो तक पहुंची, उसी समय आप श्री, कृपावन्त होकर यह आज्ञादे दीकी हमारा अभिषेक भारतमे चलकर हम स्वयं जाहिर करेंगें, यद्यपि इसबातपर दोचार उच्च कर्मचारियों ने आना कानीभी की परन्तु श्रीमान् राज राजेश्वरकी आग्या कौन उलंघन करसक्ताथा, बात बातमे यह आग्या विजलीके माफिक भारत और सबद्रिप पुंजों में भी पहुंच गई, बारह महीने तक भारत स्वागतकी और इग्लंड विदायगीरीकी तयारीमें तत्पर होगये, धीरे धीरे समय नगीच आया 'मदोना' नामक धूपपोत राजसी तौरपर सजा- यागया उसीमें आप श्रीमती महाराज्ञि तथा भारत सचिब श्रीमान् लार्ड क्र और अनेक माननीय सहचर वर्ग सहित विलायतसे भार- तके लिये ११ नवेम्बरको प्रस्थान किया। मार्गमें अनेक राज्योंसे सलामी और महान सन्मान प्राप्तकरते हुये और अदनमे बहुमान प्राप्तकर आप आगे बढ़े, उसी दिनसे बंबईमे स्थित धूमपोत " हाई फ्लायर" ने विनातारके यंत्रद्वारा " मदीना " की कुशल पूछी, जब "मदीना " बंबईसे हजारमीलकी दूरीपर था, सबसे प्रथम जंगी जहाजी लार्ड श्रीमान् हिज एकसि- लेन्सी सर एडमंड स्लेडने मदीनाके अध्यक्षसे कुशल पूछी । ता. २ दिसंबरको " मदीना' चार रक्षक जहाजों सहित बंबई से तीन मीलपर मुकाम किया और तोप दाग कर नगरमें सूचना दी गई।
सम्राट शुभागमन ३३ प्रधान नेता और श्रीमान् वायसराय व श्रीमान् गवरनर साहब इत्यादि वहा जाकर कुशल पूछी और स्वागत के लिये जो मंडप बनाया गयाथा वहा श्रीपान श्रीमती सहित पधारे जिसमें ३००० निमंत्रित माननीय महोदय बैठये वहीपर आपने बंबईके प्रजा प्रतिनिधी श्रीमान् फिरोज शाह महतासे सन्मान पत्र ग्रहण कर योग्य उत्तर दिया,सनमान पत्र रखनेका डब्बा बहुतही सुन्दर पचीसहजारके व्यय से तयार हुआथा,स्वागत पंडप राजकीय प्रधान शिल्पी मि.विटेट के अध्यक्षतामें बनाथा । इसके बाद श्रीमान् सम्राट् और श्रीमती सामराज्ञि की सवारी बादशाही ठाट और पूर्ण भव्यतासे निकली बंबई लाखो मनुष्योका के द्रवनोथी ध्वजा पताका, शुभमूचक लेख और कमानोसे आच्छादित होनेसे सूर्य के दर्शन भी मुशकिलसे होते थे। नगर भ्रमण कर सबरी पीछे बन्दरपर गई और श्रीमान् मंदीतामें वापिस गये। रात्रिसमय महान रोशनी हुई उससमय बंब ई देखकर इन्द्रपुरी भी लज्जित होतीथी आतसवाजीका देखाव तथा पुरानी मुंबई नगरीका प्रदर्शन दर्शनीय था,श्रीमान् कई दिन अपनी प्रजाको दर्शन देकर और विश्राम कर ता. ५ दिसेम्बरको रात्रिों श्रीमान् की गाड़ी १० बजकर ४१ मिन्टपर बंब ईसे दिल्लीको रवाने हुई ६ दिसेम्बर मार्गमे व्यतीत कर ७ को दिनमे दिल्ली पहुंची सलीम गढ़ स्टेशनपर पग रखतेही १०१ दनादनदगी स्वागतका कहना ही क्या है बड़े बड़े राजे, महाराजे, नवाब, उच्चपदाधिकारी, सैन्य हाथी घोड़े इत्यादि इत्यादि सभी तैनातथे,यहापर देशी राजपति और रहीसोका परिचय होजानेपर सवारी शाही सडक होते जामा मसजिद होकर शाही केम्पको गई मार्गमें पाचहज़ार बालक भी -
सम्राट् शुभागमन ।
-
उपस्थित थे, दिल्लीमें भी आपको कई अभिनन्दन पत्रदिये गये, उन
सबको आपने योग्य उत्तर दिया आठमी तारीखको श्रीमान् स्वर्गीय
एडवर्ड स्मारक की नेवकी तख्ती रक्खी उसमे खोदाथा कि-
This Table was placed in Position by His Majesty
King George V. on the 8th December 1911.
इसके वाद १०१ तो पांकी सलामी हुई, राजे, महाराजे,
नवाब श्रीमान्से मिले और श्रीमती सामसज्ञि देशी स्त्रियांकी
मुलाकात की, देशी स्त्रियांने श्रीमती मेरी महोदयाको दो उत्तम भूषण
समर्पण किये, यह दिनभी आनन्दमें बीता ता. ११ को श्रीमान् ने
कई देशी पल्टनको झंडे अर्पण किये ।
आज ता. १२ है आज ही के लिये १२ महिनासे तयारिया
होर ही है। एक विशाल मंढप है जिस मे ११००० निमंत्रित
२०००० सैन्य, और ५०००० दर्शकांके बैठनेका स्थान है। सभी
समुदाय उपस्थित होनेपर १०१ तोपोको सलामी दगी। तब ज्ञात
भया कि श्रीमान् सम्राट और श्रीमती समराज्ञि पधारती हैं। बात
बातमे विगुल बजी और ३००० बाजे बालाने साथहीं बाजा
बजाया सैन्य गार्ड आफ आनर किया श्रीमान् सिंहासनारूढ
हुये और जय जयकार हुआ दिल्ली सनाथ हुई । श्रीमान् ने अपना
राजपद सूचित किया और राजे महाराजांने आधीनता स्वीकार
की यह कार्य पूर्ण होने पर श्रीमान् के.तरफसे श्रीमान् वायसराय.
महोदय भारतको उदारताका परिचय देकर सन मानित किया।
सातसौ के लगभग उपाधि वितरणकी गई।
1
संघ्राट् शुभागमन । ३५ दूसरे दिन सैन्य निरीक्षण, और कवायत देखे और आचा- ोका जलस और भारतके भिन्न भिन्न धर्मानुयायियोंकि गुरुके आसिरवाद ग्रहण कर आप नेपालको सिकारके लिये प्रस्थान कर गये, वहां पहिले ही ते पंद्रह लक्ष रुपये खर्चकर सिकारका प्रबन्ध किया गया था और ६५० हाथी इस काममें नियुक्तये वहां कोई १० जंगी वाघ कई गेडे और भालू आपने मारे । उसी अवसर पर श्रीमती महारानी मेरी महोदया' आगरा, जयपुर, कोटा, बूदी अजमेर, पुष्कर आदि मे भ्रमण कर अनेक दर्शनीय स्थल देख और अतीव सन्मान प्राप्त कर विहार प्रदेशमे श्रीमान और श्रीमती एकठे होकर कलकत्तेको विदा भये । कल- कत्ते के विषयमें कहना ही क्या वही तो भारतको राजधानी है, वहां के तैयारीका वर्णन करना सूर्यको दीपक देखाने के बरोबर है । कई दिन रहकर सनमान पत्र प्राप्त कर बंगाल नागपुर रेलसे बंबईके लिये आप विदा भये, मार्गमें तीन घंटे नागपुरमेभी आपने लोगोको दर्शन दिये, वहां से बंव ईमे आकर “ मदीना मारफत आप भारतसे विलायतके लिये विदा भये भारतमें आप एक मास और आठ दिन रहे। दिल्लीमें जहा,दरि हुआथा उसीस्थानपर जार्जाबाद बसानेकी नेव भी श्रीमान् रखदी, दिल्लीमें श्रीमानकी प्रतिमा स्थापन निमित्त महाराजा साहब बहादुर ग्वालियर एक लक्ष रुपये और श्रीमतीक पतिमा निमित्त महाराजा साहब बहादुर बीकानेरने लक्ष रुपये 'प्रदान किये। श्रीमान् के भ्रमण समय रेलगाडीमे जो,गलीचे आदि सामान था उसको श्रीमती भूपालकी बेगम साहिवाने खरीद कर लिया है।
सम्राट शुभागमन। Vvvv बहुत वर्षामें दिल्ली सनाथ होनेसे दरबारके उपलक्षमें बड़े नगरसे लेकर छोटे ग्रामतक उत्सवमें आनंदित हुये । अनेक पुस्तकालय, अनेक स्पताल, अनेक स्फूल आदि दर्वारके उपलक्षमें प्रजाभक्ति प्रदर्शित करने के लिये खोली। हजारो पुस्तकै बनी लाखो कविता पढ़ी गई। राज्यारोहण दिल्ली में राज्यारोहण समय, अनेक भाषाओंमें कविता बनाकर ग्राम, नगर, पुर सर्वत्र पढ़ी गईथी और वर्तमान पत्रोंमें छपीथीं, उनमें से कुछ कविताओंके नमूने देखिये, और वेदमंत्र सार्थ तथा जिन्दवस्तामें राज्यास्तुस्तिभी प्रथम पढिये। अभिषिक्त राजाकी स्तुति । आ त्वादापमन्तेरधि भुवास्तिष्ठाविचाचलिः । विशस्त्वा सर्वा वाञ्छन्तु मा त्वष्ट्रिामधिभ्रशत् ॥ १ ॥ इहै वैधि माष न्योष्ठाः पर्वत इवाविचाचलिः । इन्द्र इवेह ध्रुवस्तिष्ठेह राष्टमु धारय ॥ २ इममिन्द्रो अदीधर वं ध्रुवेश हविषा । तस्मै, सोमो अधिववत्तस्मा उ ब्रह्मणस्पतिः ध्रुवा द्यौर्धवा पृथिवी ध्रुवासः पर्वता इमे । * ऋग्वेदमण्डल १० अध्याय १२ सूक्त १७६ ..
सम्राट् शुभागमन । ३७ ध्रुवं विश्वमिदं जग दुवो राजा विशामयम् ॥ ४ ॥ ध्रुवं ते राजा वरुणो भुवं देवो बृहस्पतिः । ध्रुवं त इन्द्रश्चाग्निश्च राष्ट्र धारयतां ध्रुवम् ॥ ५॥ ध्रुवं ध्रुवेण हविषाभिशोमं मृशामसि । अथो त इन्द्रः केवलीविंशो बलिहृतस्करत् ॥ ६ ॥ (वेदार्थ) हे राजन्? हम तुमको हमारे राज्यका स्वामित्व सौंपते हैं?तुम हमारे स्वामी हो? द्रढ़ और अतिशय अचल होकर गादीमें स्थिर हो ! यही हमारे राजा होयँ, ऐसी इच्छा तुमारी सर्वे प्रजाकरो ? तुमारे हाथमेसे यह राज्य भ्रष्ट न हो? १ हे राजन्?यह राज्य तुम सदाभोगो? तुमारे हाथ से यह कदापि भ्रंश नहो? तुम पर्वतके माफिक अचल हो? जैसे इन्द्र स्वर्ग लोकमें स्थिर है ऐसे तुम इस लोकमे स्थिर होव? तुम राष्ट्रकी प्रजाको अपने अपने कर्मों में प्रबर्ताओ! २ निर्मित इविसे तृप्त भया इन्द्र अभिषिक्त राजाको उसके गादीपर स्थिर करो? यह हमारा है ऐसा सोम राजा प्रति उच्चारण करो! ३ आकाश स्थिर है, पृथ्वी स्थिर है, ए पर्वत स्थिर हैं, यह विश्व स्थिर है, यह जगत् स्थिर है, ऐसेही प्रजावांका यह राजा स्थिर हो? ४ ३८ सम्राट् शुभागमन । हे राजन् ? तुमारे राज्यको तेजस्वी वरुणदेव, स्थिरकरो? परोपकारी देव, बृहस्पति तुमारे राज्यको थिरकरो? इंद्र और अग्नि भी तुमारे राज्यको स्थिर करो ? ५ हम ऋत्विज पुरोडासादिसे युक्त सोम ( रस ) यज्ञमें देवोंको समर्पते हैं, इन्द्र तुमारी प्रजाको, तुम्हाराही भक्त बनावै? और उसे तुमको कर देनेवाली करै ( तुम, का ठीक शब्द " तू " है जो वाय बलमें केवल ईश्वरके लिये और भारतमे प्यारमे प्रयोग किया जाता है । ) 0 King ! place upon Thee the kingship of our Country ! Be Thou our Lord ! Mayest Thou occupy the Throne being fixed and exceedingly immoveable ! May all Thy Subjects desire Thee ! May not Thy Kingdom fall from Thy grasp ! 1 0 King ! do Thou rule this very Kingdom and may it not slip away from thee! Be Thou fixed like a Mountain ! Be Thou unchangeable here as Indra is ( in Haven ) ! Engage Thy people in their rspective duties ! 2 May Indra Pleased with constant oblations fix the Crowned King firmly in his seat. May Soma speak to him as his own and may the Lord of Hymns speak also ! 3 The Sky is fixed, the Earth is fixed, these Moun. tains are fixed, this Universe is fixed, this World is fixed; even so fixed be this Lord of the people ! 4 0 King ! May the resplendent Varúua rake Thy Kingdom fised !-May the beneficient Brahaspati make it fiixed ! May. Indra and kgni do the same ! 5 सन्नाद सुभागमन ३९ We( thu Priests ) offer to the Gods the eternal Soma combined with constant oblations. My Indra make Thy people solely devoted to You and make them pay Thee Taxes. 6 ( मुंबई समाचार-मुंबई ) ता. १-१२-११. नेमसेते अहुरमजद- नेमसेते आयो अहुरहेमजदाओ पुध अवस्ता-अषाउम अहुरमजद गइन्यु स्पेनिश्त दातरे वीस्प- याओ अपओनो स्तोइश अजेमयो मजदयशनो जरथुश्त्रिश नेमं घहा थ्वाम यिम पिता रेम, यासामि ( =जइध्येमि ) अषादाओ, मनं घहा वोहु आ मे अवघंहे जम्याओ, वा दायाओ में वा अशोषेम, मनं घहो तुम अहुरमजद, यतक्षथो तेमेम, पुरुधेम ज्योर जेम वहिश्त- मांध बरेजयेनी गुजराती अर्थ-अअ अनदीठ घणीज आ बादी करनार अशोनी तमाम खलकतना पेदा करनार अषो अहुरमजद ! हुं के जे मजदयश्न जरथोश्ती छु ते तुं पीताने नमनताइथी अर्ज गुजारुं के अमे अपोइना वक्षनार? मलां मननी मारफते, मारी मददने माटे तुं आव; अने तुं अअअहुरमजद ! खच्चित मने मननी मुराद बक्षके जे सौथी मोहोटा पादशाह पांचमां ज्योर्ज उपर श्रेष्ट मांथ्र मार्फते हुं दुआ शुजालं. अवस्ता-तुम यो पुख्धो जयो| हिन्दोश-वसो क्षश्रो वंध इवो खरे नहि जातो अहि तुम हुमतो मनाओं, हुरुतो वचामो, 30 सम्राट् सुभागमन । eina हवर्श तो ष्योथ्नो, रअवाओ खरेन घउ हवाओ, सुरो बेरेजाओ हुरओधो-पेरेप्रजास्तेमो, द्विघोश धातो तेमो, आकि वचस्तेमो अहिः पुख्ध ज्योर्ज क्षध मजओष ब्रीतनो अइययरन्द अस्य, अजेम यो आध्रव नवरोश नाम थ्वांम मांध्र यत जरथुश्त्रहे वचस्तशतिवत, बरेज्येनि, यत वेरेज वतच, वेरेथ्रदनय, त्वओषवतो, त्वषाओ तउर्वयन्तच, स हच द्रवन्ते मच, महखेमच. गुजराती अर्थ-तुंपांचमोज्योर्ज, हिंदु स्थाननो स्वतंत्र पादशाह भली कीर्तीमा जन्मेलो छे. तुं सारा विचारायला विचारवाळो, (तुं) सारा बोलायला सखुन वाळो, सारां कीधेलां कामवाळो, प्रकाशीत, खोरेहेमंद, बाहदुर, बुलंद दरज्जानो, खुबसुरत, घणोज फतेहमंद दरवीषोनो पाळणहार, दुआना सखुन बोलनारो छे. ग्रेटबिट अने आयरलेंडना पादशाह अओ पांचमां ज्यो ! हुं नवरोझ नामनो अथोरनान जरथोश्तना शब्द रचनावाळा नांथ्र के जे एजमती, फतेहमंद, दुख देनारना दुखोने तालनारा हुमला अने (कवख- तना) मोहोतथी दुर ( करनार ) ( अवा मांध छे तेनी मार्फते) तुंने आशिर्वाद दऊं छु.
सम्राट शुभागमन।
४१
( मञ्जुभाषिणी कांचिवरम्)
विजयतां महाराजचक्रवर्ती ।
स जयतु निखिलमहीपतिमकुटमणियोतरजितपदाब्जः ।
आस्माकचक्रवर्ती पञ्चमजार्जनभुस्सपत्नीकः ।।
दिशतु करुणापारावारः करिक्षितिभृत्पतिः
निखिलजगतीरक्षादीक्षो हरिः प्रणतार्तिहा ।
भरतधरणीसम्राऽजेस्मै प्रजाहितकांक्षिणे
शुभमविकलं मेरीनाथाय जाजमहीभृते ।
देवी यस्य पितामही गुणनिधिर्विक्टोरिया सत्यवाक
एड्व भूमिपतिश्च यस्य जनकश्शान्तिमतिष्ठापकः ।
वात्सल्यस्य निधिः पशान्तिनिलयः किं वय॑ते माहशैः
सोयं पञ्चमजार्जभूपतिरहो अपष्टभागेश्वरः ॥
अनेकशतयोजनेष्वधिवसन् पुरं लण्डनं
शताभ्यधिकमण्डलावनविधौ सदा व्याप्तः।
अचिन्तितमहाश्रमो मनसि चक्रवर्ती स्वयं
प्रजासु ननु वत्सलो भरतभूमिमघाश्चति ।।
चिरात्प्रजानां हृदयाब्जपीठान्यधिष्ठितोयद्य पुनश्च बाह्यम् ।
सिंहासने भारतमेत्य विन्दन् जीयाचिरं पञ्चमजार्जसम्राट् ॥
( प्रतिवादिभनङ्कर-अनन्ताचार्यस्य
mammar...
सम्राट सुभागमन । ॥ श्रीचक्रवर्त्यष्टकम् ।। १ क्षेमाय सर्वजगतामुदधिं महान्तं सन्तीय भारतमिदं भुवनं प्रविष्टम् । जाजमेरिसंज्ञकमपास्तसमस्तखेदं तश्चक्रवर्तिमिथुनं चिरमत्र जीयात् ।। २ यस्य भजाबनविधा इव वीक्षमाणो नैवास्तमेति सविता निखिलेपि देशे । यद्भारतीजनगणेषु दयाचित्तं तच्चक्रवर्ति मिथुनं चिरमत्र जीयात् ॥ ३ मान्यैर्महीपतिभिरात्तमहाभिषेक- सम्पत्तिशालिनि पुरे किल हस्तिनाम्नि । मूर्धाभिषेकमहमद्य समश्नुते यत् तच्चक्रवर्तिमिथुनं चिरमत्र जीयात् ।। ४ ऋद्धं पदं निजमपास्य गुरोनियोगात् यो भाषिराज्यवहनं परिचिन्त्य नूनम् । योग्यामिव क्लमकरं चरितं सिषेवे तं नाविकं नरपतिं बहु भावयामः॥ ५ तस्यानुरूपगुणशीलवयः प्रभावैः तुल्यां प्रिया कुमुदिनीमिव शीतभानोः । प्रेम्णा प्रजासु करुणामिव मूर्तिजुष्टां राज्ञी भजेम सुचिरायच मेरि संज्ञाम् ॥ ६ यद्वीक्षणं ह्यमृतवर्षनिभं प्रजानां यद्वाग्झरी सुरनदीव शमस्य दात्री। यत्पादपङ्कजनिपीडितमौलिरत्नाः
सम्राट शुभागमन।
भूपा वदन्ति नितरां कृतकृत्यभावम् ।
७ धात्री तथाच भरतान्वयपालितेयं
भूपैः कठोरचरितैः परिखिमपूर्वा ।
संमाप्य यत्पदसरोरुहलांछनानि
पूतां समर्थयति नैजतनुं प्रमोशद ॥
८ तस्मै प्रचाहितनिविष्टधिये नितान्तं
दीनानुरजनविधासु निचक्षणाय ।
श्रीचक्रवर्तिमिथुनाय सुदीर्घमायुः
आरोग्यमन्यदपि शर्म हरिः स देयात् ।।
( इमानि पद्यानि चेन्नपुर्ण अभिषेकदिवसे श्रीशिष्यसभायां सभाध्यक्षेण
श्रीराजगोपाला चार्येण प्रणीय पठितानि )
आशीर्वचनपत्रिका।
" जेजीयतां भारतसार्वभौमः"
श्रीमदारतभागधेय ! महतः स्थानादधः संपतत्समाप्यापि
तुरुष्कदावदहनं हन्त ! आगतं सार्थके । किं वेतो विकटोरियाङ्कमथ
तत्सूनोरुरस्तत्पुनस्तत्पुत्रांसमुपेत्य संप्रति चिरंजीया महीमण्डले ॥१॥
श्रीमन्मारतीवाश।
ऋषीणां पूर्वेषामावितथमिदं यत्प्रतिकृति स्समाराया साक्षा-
दनुभवितुकामैरिति वचः । न चेदेवं पूर्व मविकृतिसमाराधनपरा
भवन्तं प्रेक्षन्ते सपदि कथमीशं मुकृतिनः
॥ २॥
सम्राट् शुभागमन । Qự vệ vvvvvv ( रथबन्धः) अनवौः कृतासेवः समितिमल्स रैः । सन्तोषेण सहोत्तस्थावभिषेकमहोत्सवः ॥ ३ ॥ पारम्पयांगनायविह भरतधि सारं विवृण्वनागत्यैवात्र मये- प्रजमयमभिषेकोत्सवः मीणयनः। वो न्यारये च मार्गे सपदि नियम यन्याः प्रजाः पाज्यकति सत्राइ जानः सदारो भवतु भगवतो पाङ्गपाताच्चिरायुः ॥ ४ ॥ ( ना. रामनाथशास्त्री।) मकुटधारणमहोत्सव । अस्मै जार्जमहीन्द्राय पारम्परिक मङ्गलम् । ब्रह्माद्याः देवता- स्सर्वाः नित्यं कुर्वन्त्वतन्द्रिताः ॥ १ ॥ अमृतकरसमूहैनन्दिताशेषलोकैः हरि पदमनुयातः सद्गणान् घोतयंश्च । इह जलयहासं कर्तुमृद्धः कलाभिः परजल निधिमध्या- ज्जार्जराजा ह्यदेति ॥ २॥ गवां वृन्दैरन्धन्तमसमिह भिन्दन्नविरळं रमावासं पद्म भ्रमर- हितमाराद्विकचयन् । विशेषं चक्रं स्वं मुखयितुमिनो जार्ज नृपतिः गतश्छायां मेरी विलसति हि लब्धाम्बरबरः ॥ ३॥ अरोगतामाशु विरच्य शक्त्या नृणां प्रष्टुं सुखमात्तसारः । मह्याः पुरं जार्ज नृपोस्ति भास्वान् युगी अमेरोमवलम्प..मानः ||४|| असीदेड्वर्डनामा परिकलितगुणः पूर्ण शक्तिः प्रधानो योसौ चक्रे प्रधानं रस मिह सुलभ स्वीयनामानुगुण्यात् । साऽलक्साण्ड्रा सम्राट शुभागमन । ४५ च देवी शिव इव च शिवा मूत वीरं कुमारं जार्जाख्यं सोयमेवा ऽप्रतिहतमहिमा लोकरक्षां बिभर्ति ॥ ५॥ यदीयानां रक्षाविधिषु परमाश्चर्य मधुना ट्रेयिन्मोडामुख्यः बहुजनहिताः पुस्पकनिभाः । तपाल्तन्त्रयाद्यास्ते सुलभ तरचारत्व- मगमन् परं स्वस्था मार्गास्सुतर बहुसेतुश्च सरित् ॥ ६ ॥ महापुर्या पुर्यामविचलितदीपाश्चबहुशः निशीथे निनिद्रं पथि च रक्षार्थ सुभटाः । अहो मार्ग शुद्धिः प्रतिविशिख मम्भ प्रदमभूत महायन्त्रं तन्त्रात्तदिह बहुमानं जनगणे ॥ ७ ॥ यदीया कीर्तिस्सा बहुळदळदौर्भाग्य घटिका प्रतापो वैयर्थ्य रचयति रवेर्मण्डल मिषात् । जने रागो यस्य ध्वजवरशरीरं वितनुते नतं द्रष्टुं श्रोतुं प्रभवति हि चक्षुःश्रुतिरपि ॥ ८ ॥ दण्डश्च सापराधेषु कृपा च सर्वत्र सद्गुणे मनुजे । वर्णाश्रमा- विरोधं रक्षापि च यस्य मोदमुदहति ॥ ९॥ मकुटधरणकाले जार्जराजस्य कल्ये सदसि नृपमणीनां जार्ज- रत्ने महार्थे । विलसति चिरगी भूरपीतिप्रतीति त्व लभत दुरवारं श्लाघ्यरत्नान्यसूत ॥ १० ॥ अस्मिन् राज्ञि नृपासनं गतवति द्यौ निर्मला निर्मलाःकाष्टाः स्वच्छजला:तटाक निवहाःमन्दानिलोऽधूसरः वीणां केचन वादयन्ति कतिचिदंशं घटं केचन क्षित्यां पेशगणाश्च केचिदवशाः, नृत्यन्ति गाय-न्ति च ॥११॥ ( मन्नार्गुडि वि. उमामहेश्वरशास्त्रिणः ) ४६ सम्राट शुभागमन। श्रीनन्दनन्दनपदाम्बुजसन्नतोऽहम् । नात्युष्णो न च शीतलश्च पवनो याम्यः सुरम्यो यथा लोकान- न्दकरो मृदु श्च कठिनो भूत्वा स्वयं स्वप्रजाः । सं रक्ष्यखिलभूमिपैः स्तुतपदः सम्राट् स जार्जाभिधो जीयात् पुत्रकलत्रमित्रसहित स्वस्तारि- वर्गश्चिरम् ॥ १॥ श्रीजा| मनुजेन्द्रवन्दितपदो धर्मासने संस्थितो धर्मेणैव करोतु राज्यमखिलं क्षेत्रे शुभे भारते । कृष्णोयं धवळश्चमानव इति त्यक्त्वा च मेदं यथा चन्द्रोयं किरणैः करोति धवळां भूमि नतां चोन्न- ताम् ॥ २॥ यशो हि जार्जस्य सुधांशुना समं वदन्ति लोका रभसा मतं मम । कलंक युक्तः क्षययुक्नुधाकरो यशस्तु वृद्धं च कलंकितं न हि ॥३॥ इन्द्राण्या मघवा यथा गिरीजया युक्तो गिरिशो गिरौ चन्द्रश्च- न्द्रिकया तथा नृप वरो मेर्या महिष्या युतः । रम्ये विश्रुत हस्तिना- ख्यनगरे पट्टाभिषेकासने तिष्ठन् भारतभूपतिर्विजयतामाचन्द्रमातार- कम् ॥ ४ ॥ सुत्रामा भूरि वर्षे वितरतु भवतु प्रा-ज्यसस्या धरित्री क्षीरिण्यः सन्तु गावः प्रचुरधनयुताः समजाः सन्तु सर्वे । भूया द्धौ जनाना- मनवरतरतिाधिनाशः स मूलं भूपैर्युक्तो निझामो भवतु च सुख भाव जार्जमित्रं च नित्यम् ॥ ५॥ ( हरिरामशास्त्री) Sanskrit Pandit H. H: The Nijam's Go. t; High School, Aurangabad.
सम्राट् शुभागमन
४७
मङ्गल महोत्सव ।
सर्वोर्वीपतिमौलिरत्नमकुटोदश्चन्मयूखा बळीसन्नीराजितपादपीठ
किरणप्रद्योतिताशामुखः । मेर्या स्वात्मगुणानुरूपगुणया साकं महिष्या
स्वया श्रीमान् जार्जभिधान भाग्विजयतामाचन्द्रमातारकम् ।। १ ॥
विष्णुरिव यश्श्रियाप्ताशिव इव यस्सर्वमङ्गळोपेतः। विधिरिव
वाणीशो यस्सोऽयं जीयाचिरं राजा ॥२॥
श्रीमति हास्तिननगरे नरपतिभवने नवेन्दुविम्बरुचौ । नवरत्न
मण्डपेऽस्मिन् मणिमयमञ्चे विभुर्जीयात् ।। ३ ॥
माङ्गल्कैिकादशयुङनवतिशतोत्तरसहस्त्रतमवर्षे । मासे डिस-
म्बराख्ये द्वादश दिवसेऽवनीजदिवसयुते ॥ ४ ॥
पट्टाभिषेकाख्यमहे यदीये समस्त वादित्रमहानिनादैः। हेपार.
वैईस्तिसमूह घो षैस्समाकुलाभून्नगरी तदानीम् ॥ ५ ॥
तटिल्लताजित्वरहेमण्डच्छटाविराज करसोविदल्लैः । स्तुतस्व-
वंश्यावनिपाप दानविकासिनानाबिरुदावळीकैः ॥ ६ ॥
अनेकवैताळिकवन्दिवृन्दैस्समाकुलैरुद्ध पुरःप्रदेशः । लसत्कि-
रीटोज्वलमौळि भागो विराजमानाङ्गदवाहुश्रृङ्गः ॥ ७ ॥
सुचामरालङ्कृतपार्श्वभागस्सितातपत्रो ज्वलवक्त्रचन्द्राः ।
प्रत्युप्तभास्वन्नवरत्न जालैः प्रतप्तकार्तस्वरलुप्तपार्वैः ॥ ८ ॥
स्तम्भैश्चतुर्भिस्समुपास्यमानं मणीमय भोज्वलशृङ्गकोटि ।
मुक्तासराकल्पित जालकाठ्यप्रान्तोल्लसत्क्षौमवितानशोभि । ९
सिंहाननाञ्चञ्चतुरंघ्रिमूलं सिंहासनं सम्य गधिष्ठितोऽसौ । पट्टाभिषे-
कोत्सवमा ददानस्स भारतं वर्षमलंचकार ॥ १० ॥
अनेकदेशागतभूपवगैस्सम्पृच्छयमानः कुशलं महीपः । मन्द-
स्मितेनोत्तरमाद देसौ भवेदलब्धावसरों हि सम्म्राट् ॥ ११ ॥
सम्राट् शुभागमन।
अगायि हटैरथ गायकौधैस्सन्तुष्टुवे पौरजनैस्समन्तात् । दासी
गणैराननृते शतघ्रीश्शब्दापयन्ति स्म शतैकवारम् ॥ १२ ॥
कचित्समाहन्युरथात्र मेरी दध्मुश्च शंखानितरे प्रहृष्टाः । प्रवा-
दयन्ति स्म परेऽत्र वीणा एवन्ननन्दे सुमहोत्सवश्री। ॥ ॥ १३ ॥
जयति श्रीजार्जाख्यो डिल्यां साकं स्वभार्यया मेर्या । पट्टाभिषेकग-
मद्भारत वर्षे त्रिलोकमहितो यः ॥ १४ ॥
भूपेषु पूर्वमवनीपनृपादिशब्दायोगार्थतां विजहनो धृतरूढयो ये। सम्रा
जि सर्वनृपमण्डलसार्वभौमे योगार्थतामपि दधु स्सुगुणाकरेऽस्मिन् ।१५।
त्रैलोक्यरक्षणचणो रमया सजानित्राणाय सर्वजगतामवतीर्ण-
वान्सः । सोयं स्वत्तिमवलोक्य भुजे यदीये निद्रायते कमलया
किल दिव्यदेशे ॥ १६॥
अष्टाभिरेव नृपतिः किलकल्प्यतें शैस्स्वस्थो ह्यभूदिति विमृश्य
दिगीशवर्गः । सङ्क्रान्तमात्मगुणराशिमसौ समस्तं दृष्ट्वा विभाविह
दिगन्तमगादिदानीम् ॥ १७ ॥
सदा द्विजेशक्षयकारिणस्ते सुरेन्द्रमुख्या विदशा धुलोके ।
रसातलञ्चाहिभयं विधत्ते नैतादृशी रीतिरिह व्यलोकि ॥ १८ ॥
आस्माकपुण्यैरियमेव भूमी राजन्वती पार्थिवशेखरेण । यस्याः।
पतिस्सर्वगुणा करोऽसौ सामन्तराजार्चितपादपीठः ॥ १९ ॥
अस्त्वायुर्निगमोदितं शितिपतौ राज्यं चिरस्थापितं भूयात्पुत्र-
कळत्रमित्रसहितस्स साडसौ वर्तताम् । अस्त्वारोग्यमनेक सस्यनिवहै:
पूर्णा समुद्राम्बरेत्येवं कोमळ वल्लिकासहचर संघार्थ्यते प्रत्यहम् ॥२०॥
श्रीशैलान्वयजन्मनश्शतमखप्रख्यातिमासेदुपस्तजेशाध्युतना-
यकाधिपगुरोस्ततार्यनाम्नोऽन्वये । जातोयं कमलासहर निते
कर्तुस्तनूसम्भवस्तातार्यश्शुभपाट्ट रार्यविशिखां श्रीकुम्भघोणे श्रितः॥२१॥
सम्राट् शुभागमन ४९ त्रयीशिखादेशिकसम्पदायाविवर्द्विनी नामसमाधिपोऽयम् । विनिर्ममे विंशतिमस्य तुष्टयै मेरीपतेर्जाभिधानभाजः ॥ २२ ।। (ति. च. श. ना. श्रीताताचार्यः । कुम्भयोगम् ।) भद्रं भद्रं भूयात् ।' धारावारायते ऽसावनिशनुपचितोनन्त हर्षप्रकर्षो ध्वान्तायन्तेच दुःखान्यपगमित दयं शत्रुभिर्वर्धितानि । पद्मायन्तेऽरिवर्गा बहु जिनकरा भारतीनां मजानामिन्द्रमस्थो दयाद्रावुदयति नितरां शर्मदे जार्जचन्द्रे ॥ धन्या मान्या भारतीय धरित्रीदिष्ट्या पूर्णोत्कण्ठितानां शुभाशा मेरी देवी राज राजेश्वरीयं भत्रैदानी नन्दयत्यत्र लोकान् ।। यशस्त्रिलोकी द्विषतश्च शोको मोहः प्रजालोकहितं ज लोभः । कोधश्चदन्ड्या नितरान्प्रयाति त्यक्त्वा मुनीन्द्रानिव जाज भूपम् ।। यो सौ समाराधिनसर्वकर्तृकः सन्तोषिताशेषजनो बृहच्छ्वाः । मेरीसहायो जन रजनोत्सुको डिल्लयां महा है र भिषिच्यते मुद्दा ।। क क्रियाधिकविवार्धेतलक्ष्मीरेष वैरि दळदारणधीरः । केयमे धितदरिद्रमहाधा भारती विधिवशाबलहीना । स्वामिने निखिलदुःखहराय स्वागताय किमसावुपकर्तुम् । सक्नुयाननु तथागतत्तिः स्निग्धकण्ठजयशब्दकृतार्था लण्डनाधिपति राइपचारं भक्तिमात्र मुरीचरिकर्ता । ईश्वरः स्वसमनुग्रहशीलो भक्तिमौक्यनिजभक्तिकृतार्चः ।। अचित प्रतिगृहाणाहि हार्दै भक्तिभाव परिकलितमेतत् । नान्यदास्ति परितोष करं ते मन्यते हि नृपतिर्वहु भक्तिम् ।। बा
सम्राहम
सर्वलोकपरिपीडनकारि वान्त शान्त निरताय लवित्रे ।
मानवैः स्वतनुरक्षण मात्रेशक्नुवन्दिरपि किं खलु देयम् ।।
पूर्णतापियमिहाकतायाः प्राप्नुया दखिल भरणार्हः । येन
तेन करुणामृत पूरसारितेत नसनेन विलोक्य ॥
कीर्तियांत दिगन्तरागविणरापचिराधीयतां विस्ती येत कुलेन
राज्यविभवेनाऽऽलम्ब्यतामाततिः । व]त प्रजया सुखाधिकतया
राडूभक्तिराधीयतां श्रीमेरी सहितस्य जार्जनृपतेरायश्चिरं वर्धताम् ।।
(भ, शु. चि. नरहरिशर्मादेवप्रयाग--गढवाल ।।
हन्त हन्त महोत्सवः।
बाल्ये सोयं बहुविधकलाकोविदोभूत्पुरस्तादेड्वई पुत्रो
विनयमहितो वीक्षणीयानिरीक्ष्य । दवाब्दाल्ये गतवति तदा
न्यस्तभूभार आसीत् जार्जारव्योयं क्षिलिपति शिरोभूषणं भासतेस्मात् १
आज्ञा यस्य नरेन्द्रमूनि सतत पालेभारतप्रत्यर्थिक्षिति-
पालगर्वदमने (दलने) कीतिः कुठाशयते। मेरीमानसपङ्कजस्य स-
ततं हंसायते यद्वचस्सोयं जार्जभिधानभूपति मणि भाति
भूमात्रहो ॥ २ ॥
जगदीपे भूपे गतवति परं लोकमधुना पुरन्धी सा लक्ष्मीजल
निधिभुताचञ्जलमनाः । शिनीन्द्रे जाजारव्ये विहितरतिरास्ते गुणवति
पुरन्धीणां चित्तं पुरुपगुणविज्ञानरावमुखम् ॥ ३ ॥
प्रत्यमिक्षितिपालसम्भूनकरैस्संशोभि तमागणो लण्डन्नारव्य-
विहारमन्दिरलसल्ला मालिङ्गितः ! मेरीवल्लभया कलासुषुमया
कीर्त्या सुधाज्योत्स्नया ( धारया) श्लिष्टो जार्ज मिंधानभूपर्तिमणि
भाति भचन्द्रमाः ॥४॥
सम्राट शुभागमन पटाभिषेकमङ्गळमधुमत्ताजगति मानुषास्तस्य । रामायण- कविकल्पित ( दर्शित ) नारायणचरितनिस्पृहा भान्ति ॥ ५ ॥ पृथ्वीमेनामावृतां भूमिपालै जोजी यो भूतपात्री पालः । कृत्वाभाती त्यद्भुतंमर्त्यलोके भूयात्तत्यादयोध्य शतायुः ।। ६ ॥ बहुविधगुणयुक्ते बालकेन प्रणीते नृपतिनुतिऋतौ ये प्रायश- स्सन्ति दोषाः । विबुधमतिगृहीतास्तांस्तथा विक्षमध्वं नहि नहि मतिहानिर्जायते पण्डितानाम् । ( देवरकोण्ड S. बालमुब्रह्मण्यः ।) शुभंभवतु। ओं भद्रं कर्णेभिः श्रृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षिभिर्यजत्राः । स्थिरैरंगैस्तुष्टुवां सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः । शुभं भवतु । एड्वर्डसप्तमभूमिपाल लालयस्सत्यमबीणस्सतामाब्यस्सर्वसुसम्मत- स्मुविजयी मादेन को पर्तते । श्रीमरीवरकल्पवल्लिसहितः श्रीजार्जि भूपालकस्सामोदं जयतु लिली पर शतं संवत्सरं श्रीयुतः ॥ १ ॥ जयतु जयतु राजो जार्जिसच्चक्रवर्ती जयतु जयतु राज्ञो मेरि देवी चिराय । परमिद जयतां तौ दम्पती लीनचित्तौ परम भगवति स्याइम्पतिभ्यां सुभव्यम् ।। २ ॥ श्रीमतिमेरीयुक्तः पञ्चमजार्जियथासुख भूतौ। श्रीपतिकृपया मुचिरं श्रीयुतवान् सदापि जीयात् शम् ॥ ३ ॥ (ए. डि. हरिशर्मणः।)
५२ सम्राट सुभागमन कीटवारणोत्राब। स्वागतं स्वागतं जायशश्चन्द्रमाः राजतेऽराजते सत्पदं चाश्रयन् । पालितापालिताशेषङ्मानस स्वोत्सवं सोत्सहं तन्वतः श्रीनिघे ॥१॥ श्रीमल्लण्डन कालबाल विलसत्सान्ताकी वल्लरी नित्यानन्द नि- लिपनाथरमणी कर्णावतंसायते । तस्यास्सुन्दर पञ्जरी दलफलस्वच्छा स्वसुगुच्छागलच्छ्री मासांचित पुष्पराजमधु किं भृङ्गैर्न सङ्गीयते ॥ २॥ श्रीरामानुग्रहेण प्रगुण मलुभवंश्चायुरा रोग्य भाग्यं श्रीपुष्टस्त्रीय नष्टाधिभय विषय जाशेषशिष्टातितुष्टः । श्रीमज्जा भूपवर्या नतविशयशोरा शीनीशारिताशः श्रीमत्यामेरिपन्या सहविहर चिरं पुत्रपौत्रैश्चरक्षन् ॥ ३ ॥ कावेरी कूल परिमण्डित कुम्भा घोण वास्तव्य भागवत रङ्ग- कबीडयवाग्भिः । आनन्द सागर सुमनहदा सभेयं भक्तिं हि सूचयति भारतराजराजे ॥ ४ ॥ ( यस. राधाकृष्णय्यर, लोकानुकूलन्पत्राधिपः। सर्व मङ्गल मङ्गलम् । चिरं जीवन्तु सम्राज सम्राझ्या प्रजया सह । साम्राज्य चापि भुजन्तु भवन्तु जयिनः सदा ।। वैराज विमलं विलोचनयुगं हित्वा निमेवं सदा यद्राज्यान्य- सिंवीक्षितुं लिति सुना दुधापना दान्तथे । ध्वान्त ध्वंस यितुं च चकारता चंक्रभ्यतेऽसौ सुख सन्नाट पंचमजार्ज खण्डविजयी वो भूयतां भूतले ।
सम्राट् शुभागमन ।
५
संकेतैर्विबुधाश्रमाद्रिनटिनी वृतथा वापिभिर्यद्राज्यं सुकृता-
श्रयं क्षितितले निर्माय धात्रा पुरा । सिन्धूवेष्टनया विभाजितमयो
पापान्विताद्राज्यतः सोऽयं पंच जजैन नविजयो वो भूयतां भूतले ।।
यत्साम्राज्यसुखायरत्ननिवहं धात्रामुधा वाहितं पर्याप्तं नहि
सञ्चितं नु धरणी गर्भ पुनः स्थापितम् । तत्रापूर्णमनोरथेन निहितं
नागाभ्रवेणुष्वसौ श्रीमान् पंचम जर्जजस्रविजयी संराजतां राजसु॥
विज्ञानोन्नतिकल्पनाहितचिता यदाज्य रङ्गाङ्गणे धात्रा व्योम-
रितानके 5 नुरचितं नक्षत्रहारादिकम् । ज्योतिश्चक्रमजस्रविभ्रमिव
इद्दत्तं निदर्शान्तरं सोऽयं पंचमजर्ज खण्डविजयी वो भूयतां भूतले ॥
यद्राज्ये जनतारुजोपशमने भैषज्यजालं महत् धात्रा मन्दर-
गन्धमाधनहिमायकेषु सम्पादितम् । यत्साफल्यविनाशनाय च विषं
व्यालाननेष्वादधे सोऽयं पंचमजर्जखण्डविजयी वो भूयतां भूतले ॥
सम्भावयाम्येवमशेषविश्वं विशां पतेः प्रीतिविवर्धनाथ । धात्रा
गेन मुधा न मन्दोऽपि करोति किंचित् ।।
वदन्ति सत्यं सुधियो ऽन्यहेतुं संसार सृष्टेयदि, बुद्धियोगात् ।
न साधु मन्ये नवमोदमत्तस्तथाहि सम्भिनरुचिर्मनुष्यः॥
( वागीश्वरीटोलसम्पादकस्य शालिकोठानिवासिनः ।)
विसृष्टं ममतानु
अभिनन्दनपत्रम् ।
रक्षा हेनोः प्रजानां त्रिविधगुणयुतां विष्णुशक्तिं दधानः
कामानां, भूरि वृष्टेः क्षितितल जनता नन्ददाता विडौ जाः ।
दुष्टानां दण्डकर्ता यम इव विभवाधीश्वरः किनरेशः श्रीमान् राजा-
धिराजः सजयतु विजयी पञ्चमो जार्ज भूपः ॥ १ ॥
सम्राट भुभागमन शान्तौ माऽगः स्थिरत्वे वलिरिव वि धृता वाशुतोषे गिरीशः भानो स्तुल्यः प्रतापे यशसि शशिसमो ह्यजने राज राजः। ऐश्वर्ये सत्यसन्धो दशरथ तनयो विक्रमे विक्रमार्कः श्रीमान् राजा धिराजः स जयतु विजयो पञ्चमो जार्ज भूपः ।। २॥ मान्धाता मानवेन्द्रः कृतयुगसमये सप्तसिन्धु क्षितीशः त्रेतायां रामचन्द्रो जलनिधितरणेसेतुबन्धप्रबन्धम् । य श्चक्रे वानरभ्य: कुरुकुल तिलको द्वापरे ऽजातशत्रुः श्रीमान् राजाधिराजः कलि युगसमये पंचमो जार्ज भूपः ॥ ३ ॥ गङ्गातीरमवाहैर्नहरमुपगतैर्मेदिनी सिंचयन् सन् इन्द्रं लज्जी- कुर्वन् सुपथिक मनुजान प्रापयन् धूमयानैः । एकान्हा देश देशं निषध पतिमुखान् यानिकान् रुपयन् सन् श्रीमान् राजाधि राजः सजयतु विजयी मेरि राजी समेतः॥४॥ रात्री विद्युत्प्रकाशै दिनमिव धवली सम्प्रकुर्वन समन्तात क्षोणी सङ्काशयन् सन् बहुळ नृप युतां मन्दयन् रात्रि नाथम् । विद्यादान- प्रभावै दिशि दिशि विदितै न्यूनयन् भोजराजं दस्खौ विस्मारयन् सन् त्रिदिव मुएगता बोषधीनां प्रदानैः॥ ५ ॥ स्थाने स्थाने नराणां झटिति सुल भनै स्तार दूतैः सुतारैः सम्यग्रोधं प्रकु बन् सुरसदन सदा भसंयन् बाइनानि । भानोरश्वं विहङ्गं दितिज कुलरिपोः केकिन इण्मुखस्य जिष्णो नर्जागं वृषेन्द्र त्रिपुर सुर रिपो रत्रिसुनोः कुरङ्गम् ॥ ६॥ देशे देशे नराणां सपदि हृदिगतं प्रेषयंस्तत्क्षणेन डाक द्वारैः सुचारै विंग लित भयकै रेक कार्षापणेन । स्वीयै सतेजः प्रतापैः मुविवल यशसा खेदयन् पुष्प वन्तौ श्रीमान् राजाधिराजः सजयतु विजयी पञ्चमो जार्ज भूपः ॥ ७ ॥ ।
सन्नाट मुभागमन ।
रक्षन् धर्मान् प्रजानां प्रतिदिन मनिशं सर्व वर्णाश्रमाणां
विद्यागारान् प्रकुर्वन् सुनमिव जनतां शिक्षय नीति मार्गम् । वार्ता
वृत्तौ प्रवीणान् विपुल धरचयै वर्द्धयन् व्यावहारैः नीति स्थानुच्च-
देशं परिषदिगमयन् दण्डयन् दण्डनाहान् ॥ ८॥
दुःष्टाःसन्तु पराहताः सुजरिताः सन्तु प्रसन्नोदयाः दोषास्सन्तु
तिरोहिता ननु गुणाः सन्तु प्रभातास्तथा । देशाःसन्तु निरामयाः
सुमुदिताः सन्तु प्रशस्ताः श्रियः श्रीमान् पञ्चम जार्ज सन्तु
महितास्ते ते विचारास्सदा ॥ ९ ॥
पाषेमासे शुक्लपक्षे दशभ्यां नागर्लक ग्लाविते वैक्रमाब्दे ।
श्रीमान् जाजः पञ्चमो मारवाडै बिप्रैः समया दीपया संस्तुतो
भूत ॥ १० ॥
( रामचन्द्रजोषी।)
(मन्त्री मारवाडी ब्राह्मण सभा, कलकत्ता)
मालाचतुष्टयम्।
भूपप्रपन्नपरिपालनलग्नलक्ष्य स्वीयप्रयत्नयमितारिवरिष्ठरिष्टः।
श्रीशक्रशर्वशरदीश यशस्यशस्यः वीरस्वरम्यरतिरेव शिवस्तुवश्ये॥१॥
पालान्मालाललामो बरखरकरणान्लीलया लब्धलक्ष्यान् भेजे
रेजे विजेतावनजन मनसां प्रेमधामत्व मत्र । श्रीला जासजाय
स्सहि महितहितश्रीयुतो युक्तयुक्ति जीया जायाहियालं पतिमतिर-
तितस्सेवते वज्रिवर्यम् ॥ २ ॥
किं चित्रं चित्तचिन्ताविमलमतिमता भूरहो रनरम्या थेनेयं
नेत्रनेत्रा नहि बहि रहितं साविता विप्रविद्धा । श्रीमानामाति
मानः किल बलेबलदो गोपतिः पठ्य पद्यः पालो नीलोतिलोल:
विनतनतिनगः पालको लक्ष्मलक्ष्मीः ॥ ३ ॥
सँम्राट् शुभागमन
पाताजातारितापः परवरहरणे पावनो वयंवत्रः लोकेशोकेनकेतु
प्रचयचलचलर वैरिस्वरिष्टः । सारा धारा रराज प्रतिहतिरिति
नो भारतारस्वरक्षः श्रीजा जासजायो महितहिनहितः दीनदान-
स्वनम्रः॥४॥
( खापे. नागराजशर्मणः ।)
श्रीजार्जमहाराजविजयः ।
श्रीजार्जसार्वभौमं मेरीदेवीममुष्य महिषां च । अपि चैतदीय
राज्यं पायात्सततं स वेंकटेशानः ॥
श्रीजार्जराज एषश्श्रीमेरीवल्लभा चतस्यैषा । तस्यैतदपि च
राज्यं जयता दाचन्द्रतारकं जगति ॥ १ ॥
श्रीमानत्र महीतले विजयतां श्रीजार्ज पृथ्वीपतिस्संरक्षन जनता
मिमां चिरतरं मेर्या समं भार्यया । यःपूर्व युवराडपि स्वजनकाद्य-
क्षुण्णमा प्रजासौख्यासौख्य विचारणाय कुतुकात्मागापिमामिण्डि-
थाम् ॥
आलंकानगरादशेषसुगमादाचापि शीताचलान्नानाद्वीपवृतामिमां
वसुमती राजन्वती सर्वतः । कुर्वाणो निजशाननैरभि मतैस्सर्वस्ट
लोकस्य च श्रीजाजः पृथिवी पतिश्विरतरं धन्यो विजेजीयताम् ॥३॥
कामं सन्तु सहस्रशो नृपतयो भुमण्डलेस्मिन् परं जार्जस्यास्य
नकोपि भूपतिमणेरारोढुमोष्टे तुलाम् । दीपत्वं समुपेत्य भीत इव स
स्वेनैव नित्योजवस्तद्रक्षाविषये प्रकाशियति यद्देशं सदा भास्करः॥४
मनस्मिन् किल चक्रवर्तितिलके जानें दयाम्भोनिधौ प्रत्यथि-
प्रभुपड्-क्तिपूजितपदे विन्यस्य भूमीझरम् । प्रत्यात्तिविधौ ध्रुवं सच
हरिश्शेते श्रमादम्बुधौ नोचेदेष कुतो बसेज्जलनिधौ सत्याभियत्यां
भुवि ॥ ५॥
सम्राट् भुभागमन। श्रीमन्नार्जमहीमहेन्द्रमकुटीनिक्षेपणोदञ्चितश्रीडिल्लीनगरीमहोत्स वकथासन्दर्भ मानन्ददम् । प्रत्याख्यातपुरातनाखिलमही पालाभि षकोत्सवं कोवा वर्गयितुं पदुर्यदि भवेत्साक्षात्सहवाननः ॥ ६ ॥ नानादिक्तटगजराजिमकुटीनीराजितांघ्रयम्बुजश्रीमेरीदयितस्य जार्जनृपते; पट्टाभिषकोत्सवे । श्रीडिल्लीनगरीमिपामगिनवालंकार मालोज्जलां मन्ये श्रीरघुनायकोत्सव कथारम्यानयोध्यापुरीम् ॥७॥ वर्तन्तामिह कोटिशो भुवि जनाः किं तैस्स्वसझांगणे निद्राणै- रनिरीक्षितमभुमणि श्रीजाजराज्योत्सवैः । डिस्लीमेत्यच वीक्ष्य जार्ज नृपति सिंहासने मुस्थित यो ले भेऽक्षिकलं तमेव कृतिनं धन्यं च मन्यामहे ॥८॥ नानाजातिभवा नबाप्पभृतयः पूर्व नृपालाश्चिरादेनद्राज्यमपाल यानिति कथा ज्ञातैव सर्वैरपि । कोवा हूगनरेन्द्रवज्जन ममुं पाति म साहोर्निजनिष्कापव्यमुदीर्यतां ननु समालोच्यापि बुद्धया दृढम् ।।९।। अन्य देशमिह स्थितस्य यदि ते गन्तुं मनीषा भवे द्विद्ध येनं गत मेव देशमचिरा द॑दृष्टांश्च तत्र स्थितान् । यस्माभ्दूपलिभिनवोद्यदतुल प्रज्ञाविशेषोज्ज्वलैरेभिर्मारुत वेगधूमशकटी क्लुप्ता बभूबाधुना ॥१०॥ येवा केचन भूसुरा विजहति प्रज्ञा स्स्वनि यक्रिया विनाधिक्य वशेषन धूम शकटीसंरोहणप्रक्रियाम् । तेषां चापि बभूव हन्त सुगम काश्यादिपुण्यस्थलं य द्रथ्या विदधेय ‘सान्द्रविटपिच्छन्नातपा भासुरा ॥११॥ कल्याणं यदि सम्भवैत्तवं गृहे सद्यः पुरातर्कितं काशी वा • तव बान्धवोधिगत वान् देशं.दविष्ठं ततः। तन्त्रया ज्ञापित एव नैव गणयन्' वित्तव्ययं वा भृशं त• कालेत्र समागतो मुझमयं चाप्नोति तद्वा कथम् ॥ १२ ॥ - ANAMRAPAAAAAAN सम्राट् शुभागमन। आस्तां नाम धनव्ययैकसुलभा तन्त्री त्वरावेदिनी निस्स्वस्यापि सुदूरवृत्तकलने स्याचेन्मतिर्मादृशः । सद्यः पादकलांवि तीर्य सहसा पत्रं लिखन् वासरैर्जानायैव किलाल्पकैर्बदतमो:कस्मादिदं ज्ञायते॥१३ काशी मोहमयीयथापि कलिकोतारव्यां च मादी पुरी किं वाक्यैरफलैरमीभि रधिकीपान्तरं वा पुनः । लोकानामधि तस्थु- पायतितरां गाने पटूनां मुदा पश्यामः किल पाटवं वयममी प्रत्यक्ष- 'बत्तत्कथम् ॥१४॥ राज्ये हूणसमेध्यमानविभवे यःकश्चि दज्ञानतः कस्याप्यालयमेत्य तत्र यदि च स्पृश्यात्तृणं चाकरात् । सद्यस्तं परिवध्य हस्तयुगळे- प्याताड्य चारक्षिणः कारागार मवापयन्ति हि पुरा रीतिः कचैतादशी ॥१५॥ नव्यं पुस्तकमस्ति यस्य निकटे तत्रैव दृश्यं हि तन्नान्यत्रास्य विलोकन हि सु लभं प्राचां प्रभुत्वे किल । अद्यत्वेपि चपुस्तकानि सुबहून्यानाय्य कोशालये मुद्रा प्याखिलदृश्यतामगमयन् पोत्या किलेत ज्जने ॥१६॥ द्रष्टुश्रोतमनोविनोदनकरीमत्यन्तसौ ख्यास्पदामेतादृक्प्रमुखी स्वबुद्धिविभवै रुद्योतितां नूतनैः । परव्याप्यात्मजकौशली मपि जनान् पापथ्य हर्ष मुख को हुणा दपरो नृपात्स्वयमपि प्रान्पोति हस्सुखम् ॥१७॥ बूमः किं वयमस्य दीनजनतासंरक्षणं भूपतेस्तद्देवे सुरनायकेपि मुतरां ताटस्थ्य मातस्थुषि । दैभिक्ष्यात्सकलेपि ताम्यति जने नौभिः पदार्थान् बहून् वस्वीभिस्स- मवाप्य रक्षति किल द्वीपान्तरे- योपि यत् ॥१८॥ अन्यायात्परवित्तमल्पमपि वा गृहाति नासौ बलान ब्रूतेह्ययथार्थ
सम्रोट शुभागमन
वाचमपि वा क्लिभाति न पाणिनः । रक्षत्येव जनान् यथार्हमखिला-
नागस्विनश्शिक्षते बतास्या वनिनायकस्य सदृशो दृष्टश्श्रुतो वा
नृपः ॥१९॥
श्रीमद्वेकटनायकस्य कृपया श्लध्यै शताननीयेगापि जनस्य
चास्य धरणी सौभाग्यभाग्येन च । एड्वर्डस्मपितेव तस्थ जननी
रव्याता यथा वाजया जाजों ऽयं च सपुत्रपौत्रनिती राजा चिरं
वर्ष- ताम् ॥ २० ॥
श्रीजार्जराजमकुटीधारणसमये बुधो- उज्वले सदसि । कोचा
नृसिंहशर्मा समुप न्यस्येत्यतोषयत्सकलान् ।
( नरसिंहाचार्य-कोच्चा.)
मकुटधारंणोत्सवः।
श्रीयुक्ता भुवि भारते विजयतेऽसौ हस्तिनारव्या पुरी मान
काचिदपीह राज नगरी यस्या समं नागमत् । नन्दश्रेष्ठ सुतावता-
रसमयेऽस्या मेव पाण्डोः सुतैः पञ्चभ्रातृभिरानतीकृतधरापै राजसूयः
कृतः ॥१॥
चक्रुहिन्दुमहीभुजा मनु चिरं साम्राज्य मिस्लामिनः मह्मद्गो-
रिकुतुदिनप्रभृतयोऽस्यामेव देहल्यां पुरि। जाहङ्गोरस्य पितु: समाः
मुयशसो येषां कुले सम्बभु जन्योत्करथं मोङ्गलैरपि कृतं साम्राज्य
मत्रैव तैः ॥ २॥
भासा या निजया तिरस्कृत मरुत्त्व द्राजधानीद्युतिः रम्या
यांगलराजराजनगरी भुमण्डलामण्डना । तस्या विश्रुत लण्डना-
भिधपुरः सौभाग्यमाप्तं यथा चत्वार्यद्य मुखानि वेत्तदपिको दिल्ल्याः
क्षमो वर्णने ॥३॥
MAP AAAAAAAnn AuranAAMANA सम्राट् भुभागमन । क्रयायैः सुखदैः पुरेग्लिशमहासाम्राज्य साधस्य यः वरयैः लेह मुखैः सुकोण दृषदो न्यासः समापादितः । तीर्थीभूत शरीरया ऽहतमया विक्टोरिये त्याख्याया यावत्पौरसुखैच्छया तदुपरि मसाद आरोपितः ॥४॥ वर्यचड्वरडः स्वकीयजननी विक्टोरियामेवय चक्रे स्वीयच रित्रनिर्मिति विधावादर्शरूपां स्वयम् ।द्रव्यं रक्षणशिक्षणादिषु ददल्लो- कामिनन्धक्रमः दिव्याहर्म्य विनिर्मितिः किसु न सा साम्राज्य सौधो परि ॥ ५॥ वाचा वक्तुमिहं चरित्रपतुलं नो शक्य मभ्यर्हितं कल्पद्रुपति- मस्य सज्जन जने दोने दयाया निधेः । रोदस्योत्कृति मोहिते खलजने दण्डये कुनान्तात्मनः विष्वरभूपतिवन्दितांधिकमलश्रीजार्ज नाम्नः प्रभोः ॥ ६॥ जम्बूका इव दुष्क्रिया अमतयो ये राजविद्रोहिणः यन्मत्तारि- गजौघमेदनविधौ कण्ठीरवत्वं ते श्रुत्वैव तु चण्ड शासनममुं भीता निलिस्युः स्वयं तस्या सौ महिमा चकोरसमसचिते शशाङ्का- यते ॥ ७॥ राज्ये भारतवासिनायविकल नित्यं जनानां शुभं नन्वन् तां स्वपितामही मनुसरन् तस्या अनुज्ञांस्मरन् स्यादौनात्य गिरेरुपर्यथ समारूढं यथा भारतं सौम्ये नैव यथा तथाऽवनिमसौ सम्राट् चिरं रक्षताम् ॥ ८॥ मुक्त्वाऽमु मुकुटोत्सवं कलियुगे कस्यापि सम्राट् प्रभोः कुत्रापीह न भारते समभवद्राही सहाध्यासिनो । उकाराद्धनुषः पुराहंतरिवू रामो यथा सीतया धाम्ना ऽसावधिक तथा, विलसतादाझ्याच मेयाहया ।। ९॥ गतम् ।
सम्राट् शुभागमन। ६१ रम्यो निस्तुलवैभवो निरुपमः कुत्राप्यदृष्टश्रुतः पूर्णोवर्णयतुं मयाऽयमतिना ऽशक्यः किरीटोत्सवः। वात्सल्यांबुनिधि चराचर- पतिं श्रीशं ततः प्रार्थये वो भूपतिभूषणो विजयता माचन्द्र मातरकम् ॥ १०॥ ( अनन्तशास्त्रिणः धाराराज्याश्रितस्य बदनावरवासिनः) ( भारत मित्र कलकत्ता) अभिनन्दनपत्रम् । जयतु जयतु देवो भूतनाथोमहेशः जयतु जयतु देवो भव्यकर्त्ता गणेशः । जयतु जयतु देवः पद्मबन्धुर्दिनेशो जयतु जयतु देवो जार्जनामा नृपेशः ॥१॥ धन्यं धन्यमिदं नृपेन्द्र! सुदिनं यत्र त्वदीयागमो वर्षे भारतनाम्रि सूर्यशशनृवंश्यः प्रजावल्लभैः। राजर्षिपवरैरधिष्टितचरेऽपूर्वश्रिया शोभिते शक्रपस्थपुरेऽधिरोहुमनघं साम्राज्यसिंहासनम् ॥२॥ अस्माकं चिरवान्छितं भगवतान्तय्यामिणा पूरितं पश्यामो मधुराकृर्ति निजदृशा यम्दारताधीश्वरम् । नानोपायनपाणिाभिर्नु पगणै राराधितं सादरं श्रीमेरीसहितं विभूषितहरिमीयसिंहासनम् ॥ ३ ॥ दुर्दान्तैर्यवनेश्वरैर्बहुविधं सन्तापिता ये पुरा कांक्षन्तश्विरमावसन्नययुतां राज्यप्रति सदा । किं बमस्तव शासनस्य गुरुतां स्वे स्वेऽधिकारे स्थिता ब्रह्मक्षत्रविशस्तयेतरजनाः स्वस्थाः शुख शेरते ॥ ४ ॥ .
सम्राट् शुभागमन। इन्द्राणया सजयन्तयाऽ मरपतिः स्वर्गे यथा देवताः श्रीदेव्या सह सीतया रघुपतिः श्रीरामचन्द्रो यथा । पाञ्चाल्या सहितो मुरारिकृपया सरक्षितो धर्मराट् श्रीमेरीसहितस्तथा त्वमपि नः शाधि प्रजाः स्वा इव ॥ ४ ॥ भिन्दन् शत्रु तमांसि बन्धुकमलान्यु लासयन् मित्रवत् सन्तापं शमयन् सुनीत्यु दकतः प्रावृतडित्वानिव । विद्याज्ञानकलाकलापकुमुदान् प्रोल्लासयंश्चन्द्रवत् पाह्यस्मान् विविधान्तरायनिवहात् भूपालचूडामणे ॥ ६ ॥ दुर्भिक्ष विलयं प्रयातु भवतात् देशे सुभिक्षं सदा दुष्कर्माणि च नो भवन्तु नितरां तिष्ठन्तु धर्मे प्रजाः । विद्याज्ञानकला भवन्तु वितता मौख्य लयं गच्छतात् भूयासुःसुखिनो जना धनयुतास्तत्पाज्यराज्योदये ॥ ७ ॥ हिन्दुस्थाननिवासिषु प्रतिदिनं प्रेमप्रकर्षोऽस्तु ते हिन्दुस्थाननिवासिनां च भवतु त्वय्यस्तदोषा रतिः ॥ त्वं ह्यस्मान् सुखयंश्चिरं सुमहितो जीव्या शतं वत्सरान् कल्याणं परम प्रयाम च वयं त्वत्स्त्रे हसंवद्धिताः ॥ ८ ॥ गोपायितारं सर्वेषां शरण्यं शरणैषिणाम् । रक्षक नीतिधर्माणां राजराजेश्वरं प्रभुम् ॥ ९ ॥ तत्कृपाकल्पवृक्षस्य तले प्रच्छायशीतले । निवसन्तः स्वकं धम्मीमचरन्तः सदैव हि ॥ १०॥ आशीर्भिरभिनन्दयैनं प्रार्थयामो महेश्वरम् । चिरं राज्ञीसमेतोऽसी जीव्यात् संरज्जन् प्रजाः ॥ ११ ॥ इति प्रार्थयितारो- ( वयकसिद्धान्तसंरक्षिगीसभासव्याः।) R-Mata सम्राट् शुभागमन ( हितधाती-कलकत्ता ।) आशीर्वादावलिः। महीनाथः शान्तः पृथुल यशसा यो विलसित प्रजाभा दाता नयसरणि दक्षो नृपपतिः । सदाधारा यस्य प्रसरति सदा वाक्यनिवहे, सजार्जा लोकेशो जयतु जयताद् भूरिविभव ॥ १॥ महाराणी मेरी परमरमणाया सुरमणी, सुशीला साध्वी श्रीमति चरणपूजारतमना,। प्रजानां तोषार्थ जननिरिव याता स्वयमपि, अनन्तं सौभाग्यं प्रचुर समयं सैतु मुदिता ॥ २ ॥ शत्रु शत्त गजेन्द्र नाशनहरी राजन्वतो येन भू, यस्मिन् शासति जीवनं पिवति ही सिंहेन साध वृषः । सोयं पञ्चम् जार्जनामनृपतिः श्रीएडवर्डात्मजो, जीव्याद् धार्मिक भारतीय जनतामोदप्रदानोत्सवः ॥ ३ ॥ महीपन्दवन्दितः सुरेशभूतवैभवः । महेशतुत्यविक्रमो रतीशतुल्यसुन्दरः॥ ४ ॥ समस्तभूमिनायको दिगन्तवित्तकीर्तिकः। अशेषशास्वदर्शकः सुनीतिमार्गलुब्धकः ॥ ५॥ कलत्रबन्धुसंयुतः सुपुत्रपौत्रवर्धितः मुजार्जराजपञ्चम् श्चिरं वसेद्धरातले ॥ ६ ॥ इत्याशीर्वादावृन्दो भवताद् भवतां भूतये सदैव । रघुवरदयालुशाणा कृतो राज्याभिषेकोत्सवेमुदा ॥ ७ ॥ रघुवरदयालु वैद्यशास्त्री, नौधरा, कानपुर ।) prembeARIOmtomHEEN vvvv ६४ सम्राः शुभागमन । ( शुभाचंतक प्रयाग) दरबारात्सवका कविता। गुणानुरागी गुणिनांदयायुतो, युवानृपः पंचमजार्ज संज्ञितः पितुःपदंमाप्य स पार्लिमेण्टसत्, सभाजनैर्मोदित माश्वशोभत ॥१॥ डिसम्बरे द्वादशवासरे शुभे, नमत्सुभूपेषु स भारताधिपः । समेत्यंदिल्ली कुरुतेमहोत्सवम्, स्वराज्यरोहस्य परंपरागतम् ॥२॥ नृपस्यतस्या खिलदेशजाः प्रजाः, नवावतारस्य निशापतेरिख । समुन्नति पौनतनेत्रपंक्तयो, दिदूक्षवो मोदमवाप्नुवन्परम् ॥३॥ वसुन्धरा यद्यपि पूर्वराजभि, मान्यैःसुचुक्ता रमणीवसंततम् । तथापि जार्जे भरताधिपे चिरात्, अनन्यपूर्वा सुभगेवसंश्रिता ॥४॥ मुदाद्यसर्वैर्भरतांग्लवासिभि, पैःप्रजाभिः क्रियतेसदुत्सवः । समेत्य नारायणदीक्षितादयो, ऽप्यतःप्रयागेभिसजोऽत्रतत्पराः ॥५॥ स पूर्वजेभ्यो ऽप्यधिक मतापवान्, प्रजासुदक्षः समभावमाचरन् । दयांनिधीराज्यधुरं वहन्जयी, भवेत्समेरीमहिषीसमावृतः ॥६॥ नवेराज्याधीशेभवतुनवथाभक्तिरधुना, जगद्वंद्येजार्जेनृपतिपतिपूज्येऽद्यजगताम् । समारोहेडद्येविनयनतिलभ्येतुपरमा; जनोभूपादस्मात्कुशलसुभगोहर्षनिवहात् ॥ १ ॥ मुखात्सौराज्यात्तेकरुणतरुणाधीश्वरविभो, जगत्कीर्तेरीवावनिकुलपतेरद्यमहती । चिरावख्यातास्वाधिनयविपुलापाठसरणिः प्रमोदोवालानांजयतु मधुरसस्वादन नितः.॥ २ ॥ जाजःस्मितास्निग्धशामजास्तथापश्यन्यजानाथइबापरःप्रभुः । शनैर्जगानाथयुधिष्ठरस्य सपुरंपहेन्द्रालयसंनिभंनृपः
सम्राट् शुभागमन
श्री लण्डनेशवसुधाधिपचक्रवर्ती जार्जीमुदाविजयतेकुरुराजधान्याम्।
यस्यागमोत्सवविलोकनजातहर्षाः संत्यज्यसर्वविषयान्ययुद्धभारा २॥
गुरुण्डराजानमुपागतंनृपाः कलिङ्गवङ्गानामुमध्यवर्तिनः ।
सर्वेषुयानैरशुवर्जितैर्ययुर्मुदापहर्षोत्कलिताननःश्रियः ॥३॥
(वैष्णव नारायण पाठशाले के अध्यापकों ने इन पद्यों को उक्त
पढ़ा था।)
उत्सव
में
( अभ्युदय प्रयाग)
श्रीजार्जाष्टकम् ।
जयतु जयतु सम्राफिफ्तजौर्जस्सदारः
किमग्निः किंभानुः किमुकुसुमधन्वा धृततनु-
हरिः प्रादुर्भूतः किमशिवमपाकर्तुमखिलम् ।
विहर्तुं वाऽऽयातः किमुसुरपतिनन्दनवनात्-
प्रसुवाऽयं जाों नरपतिपतिः पञ्चम इह ॥१॥
शचीयं वा किंवागिरिपतिसुता सर्वशरणा--
रमा किंवा सीता किमुपरम सौन्दर्यलहरी ।
तडिद्वातारा वा किमु सुरसरिद्वाहिमलता-
ऽथवा राज्ञी मेरी सकलजनमाता गुणायुता ॥२॥
यथावृक्षावल्यां विलसति सदा देवविटप-
स्सुरेन्द्रोदेवालौ विधुरतिगर्ने तारकगणे ।
तथाराज्ञांपंतावमि मधुरवाग्राज्यतिलको--
.त्सवे श्रीमज्जाों विलसति सदार सुहृदयः ॥ ३ ॥
सम्राट् शुभागमन । य इन्दुस्ताराणमिव नरपतिनामधिपति- र्यमालिर्विज्ञानां कथयतिसुरेन्द्रोयमितिवै। कृतोऽधीनो येनामितगुणगणैर्भारतजन- स्सदायस्पैदेवा अपिकुशलमिच्छन्ति मनसा ॥४॥ रवि तोयस्मादतिहतछविश्शान्तहृदयो- महाराज्येयस्यक्षणमपि नयात्यस्तभवनम् । गुणाःसर्वेयस्मिन्नवनरपती सन्ति सुखदा- हरे ! दारायुक्तस्समुविसुखदोजीवतुसदा ॥ ५ ॥ सुभायावद्गङ्गा अविभयहरा पुण्यपददा- पतिवल्लक्षम्या ललितहृदयोरक्षतिधराम् । सदादारायुक्तो जनपतिशिरः पूजितपदा- म्वुजस्तावत्सम्राति सरलचेता जयतु बै-॥६॥ यावद्व्योम्नि शशिप्रभाकरसुभायावच्चभ श्रेणयो- यावद्दाशरथेर्यशोरघुपतेर्यावम्मुनीनांसुगीः । यावद्योगिजनेशकृष्णारचितागीतेहवैविधते जीयात्तावदिहप्रमोदसहितो जार्जस्सुधीः पञ्चमः ॥ ७॥ हेकृष्णचन्द्र ! करुणाकर दीनवन्धो ! हे रामचन्द्र ! चरणै; कृतपुणलोक । हे.पर्वताधिप सुतेश शरीरभाजां- खामी सदार इह जीवतु फित्फ जाजः॥८॥ ( वैद्य रामचन्द्र शर्मा-आगरा ) सम्राट शुभागमन ६७ ६ -- ( मिथिलामिहिर, दरभंगा ) श्रीमान् जार्जाशीर्वादाष्टक । कल्याण दात्री भुवनस्य धात्री, कोरोतु भव्यं शरदिन्दु, गात्री ॥ जार्जस्य नित्यं मम पञ्चमस्य, शिवारमागीश्चम हीश्वरस्य ॥१॥ रुद्राणी मणि मण्डितस्यचरणा, वाणी गुणाधीश्वरी। कल्याणं कमलालया वितनुतां, जार्जस्य भूभृत्पतेः बुद्धिः शुद्धतराप्रजापतिसमस्यास्तु प्रजा पालने । दीर्घायुष्ट्वमथो यथोचितिमिति, प्राज्य प्रतापावलेः ॥ २ ॥ प्रतापराजी विलसत्प्रकाश; प्रजावलीनां बहुपूरिताशः ॥ महीश्वरः पञ्चम्जार्ज कोऽसौ, सुख चिरञ्जीवतुवन्धुवगैः ॥ ३॥ राजानं भगवन्तमार्य चरितं, जार्जाय संपायकिं । मन्ये धन्य तमास्वमत्रभवती, राजन्वती जानती ॥ द्राक्सर्वत्रशुभावहाऽर्थ, निवहा सम्पूर्णसस्योन्नता । विद्यान्दो लन तुंदिला सुजनता, मोदाकुलाऽभूदिला ॥ ४ ॥ विभोते प्रतापं निशम्यात्रलोके, सुसन्ती द्विपन्तश्चकुर्वन्तु नित्यं ॥ प्रहर्ष विलापं सदेत्यर्थयेऽहम्-प्रफुल्लाननेभ्योजनेभ्यः प्रहति ॥५॥ तवैवविज्ञाय शुभाहिकंविभो-स्वपालनासेचनक महोत्सवम् ।। स्थले स्थले सर्वजनानुमोदिनी, तनोति हर्षखलु बीरमेदिनी ॥६॥ धन्या दीक्लीवयं धन्या, धन्यंभारत अण्डलम् ।। धन्यश्चनिखिलं विश्वं, जापादसमर्पणात् ॥ ७ ॥ मतिहीनीऽप्यहंवक्तु-माशिपन्न कथं क्षमः ॥ हर्षान्धोन्मुक्तबन्धानां, प्रवन्धेकी विचारणा ॥ ८ ॥ .( बाजितपुर निवासी श्रीकुशेश्वर कुमार)
सम्राट् शुभागमन
सम्राट् सुयशोवर्णनं ।
शौर्योदाय विचारसिन्धु जयशश्चन्द्रांशु शश्वन्मिलत्फुल्लन्मा-
नसकैरवाः सुमनसो यत्पीतिमाशासते यत्र श्रीरपि भारती प्रणयिनी
शान्त्योजसी तादृशी सम्राट पञ्चमजार्ज भूपति पतिः श्रीमान् सजी.
यात्मभुः ॥ १ ॥ सर्वशक्ति मदधीश्वरादिभोरेतदेववरमर्थयामहे ।।
आधिपत्यमदसीयमेधतां शाश्वतं सकल सौख्यमुन्नतम् ॥ २ ॥
यवलव्धमपि पूर्वपूरुषैः स्वप्नवद्भिरपि नान्वभूयत ॥ भारतेश तिल
कोत्सबोद्गतं तत्सुखंवयमिहाबलम्भितः ॥ ३ ॥ पौषमास्यसितपक्ष
सङ्गता भास्वती तिथिरु पेतमङ्गला ॥ अद्य तत्र परमोत्सबोयतः
सूचितः प्रभु मनोगतंततः ॥ ४ ॥ पोषयाम्यसित भारत प्रजाः
स्वाः प्रजाः प्रियतमाः सिता इव ॥ भास्वती रपिकरोम्य
मीप्सितैरपि तैरपि सुमङ्गलाइति ॥ ५ ॥ वक्तु मद्भुतकृति
किमीशतेकेपिकुत्रचिदमुष्यशासने भूमियानजलया तोऽधिकंदर्शित
गगनयानमभ्दु, तम् ॥६॥ स्वस्वधर्मपरिपालनं नृणां जायते
विहत विन मीप्सि-तम् ॥ एक लस्य धनिनोपि नोभयं सझनीव
विपिनेपि निर्जने ॥ ७ ॥ सबएवहिनृणां दवीयसां वाचिकंवदति
विद्युदद्भुतम,सर्वदैव समयं बदरीयन्त्रमेतदभितो विराजते॥८॥एकमे
मधिकाधिक प्रजा हेतबे विविधअर्पित हितम् । मर्पयिष्यति पुनः प्रियं
प्रभुस्तत्तदीय शुभमस्तु सर्वथा ॥ ९॥ मएडलेश करपद्म सम्पुटं
तन्वतास्मितसुधां पहिवता धिन्वताश्रितदृशश्चकोरवद्भूयते प्रभु-
मुखेन्दुना धुना ॥ १० ॥ अद्यसिद्धसुमनोरथोद्भतालापिनी-
भवति भारती प्रजा । श्रीरमेश्वर पदैक सेवकः कश्चिदालपतितत्स-
मुत्सक ॥ ११॥
सम्राट् शुभागमन। देवदेविदिवानिशं बहुश विधेहि वरे । राज राज रमेश पञ्चम जार्ज नीति परे ।। भारतादि महा महा विषयान वत्य समे । राम विक्रमातोऽधिकं सुयशः श्रिते परमे ॥ भक्तभारत वासिनां स्वयमेत्य दर्शन दे । रामया रंमया समं जगतीश्वरे शुखदे ॥ अद्य हृद्य महोत्सवे जयतादसौसदये। श्रीरमेश्वरा सिंहसेवि सुरेश मोदमये ॥ १ ॥ (श्रीसुरेश शर्मा । ) श्री हरिः। कारुण्यसिन्धोः जगदेकबन्धोः महेश्वरात्समप्रति मार्थयामः ॥ तवैव स्टष्टेः परिरक्षकोऽसौ जीयान्न्द पःपञ्चम जार्ज नामा ॥ १ ॥ श्रीमन् महाभाग भारतसम्राट् ! पुराभिषिक्ता भवतः पितामही ॥ विक्टोरिया मूर्ति मतीव देवता निः शेष भूमीमुपरिक्ष्यमाणया तयाऽवतस्थे सुमनायमानया । २ । विशेषतो भारतभङ्गस्नाय रक्षाविधानं बिबिधं बितेने ॥ अशेषतीर्थान्भ्रामायसंघः निर्मापयमकलायनम ॥३॥ धम्मै कसारानपि भारतीयान आत्मीयपुत्रानिव रक्षयन्तो कमैं कमूलं सुखशान्तिहेतुम् वेदादि शिक्षा प्रथमाम्बभूव ॥४॥ तीर्थाघनर्थ विनिवारयन्ती प्रामे तथा तस्करदस्युभीति समान दृष्टया बलिनोऽबलाश्च सुशासती शान्तिमजीजनत्सा भवत्पितानाति चिराय चक्रे राज्यतथात्रापिसुशासने ७० सम्राट् शुभागमन। सम्धीनयन्भारतवर्षमेनम् सुखाम्बुधौ मज्जयतिस्मसर्वम् । ६। अस्मान्मारतवासिनो जनगणान्मक्तान् रक्तान हितान् । श्री मन्न्यस्त समस्तजीवन भरान्धर्मार्थशिक्षार्थिनः ॥ पुत्रान् स्वानिव पालयन्मतिदिनं त्वं दीर्घ जीवी भवन् । भूया सन्ततमन्त ङ्ग सहितो श्री शीतलस्या शिषा ॥ ७ ॥ ( शीतल प्रसाद शर्मणः छपरा.) (शिक्षा आरा.) श्रीमती राजराजेश्वरी भारताधीश्वरी श्री १०८ श्रीमैरी सम्राज्ञी सेवायां स्वागताशिषः। इङ्गलैएडतो भारतवर्षमेत्य, कृत्वाभिषेकोत्सवमिन्द्रप्रस्थे । प्राचीनचौहानसुकीर्तिशेषे, यद्राजपुत्रायणकेन्द्रभूते ॥ अजयमेरुमध्ये राजपुत्रान् कुलीनान्, प्रथितलार्डमेयोकालिजे पाठयमानान् । बृटिशराजभक्तौ धर्मनीती प्रवीणांन, मुदितमानसासौ द्रष्टुमायाति राज्ञी ॥ 'अतो वयं श्रीपरमात्मानो सुदा, अभ्यर्थनां स्वच्छहृदा तदीयसौभाग्यसुखैकहेतवे, सम्राचिरायुष्यसमृद्धिवृद्धये ॥ प्रकुर्महे ।
७१
WWWDA
सन्नाट शुभागमन ।
सर्वेपां निजधर्मकर्ममतिदा विद्यामचारोत्सुका,
लोकोद्धारपरा विशेषसुखदा सर्वत्र शान्तिप्रिया ।
श्रीमल्लण्डनराज्यराजमहिषी श्रीभारताधीश्वरी,
श्रीमैरी पतिपुत्रवान्धवयुता जीयाचिरं सौख्यभाक
दीनान् रक्षयितुं नृपान्नमियितुं पातुं धरामुत्सको,
दुष्टान् मर्दयितुं बलेन सुजनान् चातुं दृढपक्रमः ।
साधून सेवयितुं प्रजाः सुखयितुं नित्यं समुत्कंठितः,
सम्राट्पञ्चमजार्ज ईशकृपया जीयाचिरं सौख्यभान
सम्पत्तिः प्रथतां यशःमसरतां धर्मसदा वर्द्धताम्,
कल्याणं भवतात् प्रजाप्रणमनाच्छत्रुक्षयोजायताम्
राज्यं विस्तृणुयात्तव प्रतिदर्श लक्ष्मीपतिः सर्वदा,
सम्राट् पञ्चमजार्ज! जीवशतशः स्त्रीपुत्रयुक्तःसमः
बुद्धौ लाभे कीर्ती राज्ये मत्यां स्यात्ते शश्वद्धिः ।
एषामाद्यैवनाम्रो भक्तया सन्त्वा शीर्वादा मे ॥
(मेयोकालेज-धर्मशिक्षक-पञ्चाम्बुभूषण-विद्यासागर-शास्त्रिणः।.)
..
॥ श्रीसम्राट् पञ्चकम् ॥
इन्द्रप्रस्थ पुरी सुरेन्द्र महिता भूमण्डले मण्डनम् ।
यत्र श्रीमद जात शत्रुरभिषि क्तोऽभून्नृपाधीश्वरः ॥
तत्रा साद्य परोह्यजातरिपुक सिंहासनाधिष्ठितो।
मेरी संयुत पञ्चपोनृपवरो जाचिरं नन्दताम् ॥ १॥
७२
सम्राट् शुभागमन।
vw
कालापकम् ।
चेदेनं तुलयामि भानु विभुनाऽसौराहुणाग्रस्यते ।
विनौषध्यधिराट विधुः क्षयकलो रात्रिचर श्चाङ्क भाक् ।।
चेदेनं भवदाम्य सौतितितले ह्या खण्डलोऽखण्ड राट् ।
दध्यञ्चादि परामु दुर्यशयुत श्वाचार्यत्रादिहा ॥ २ ॥
चेदेनं प्रवदापि मानुषमणि नैतादशो मानुषः ।
केनेमं समता नयामिसुनृपं सर्वाशमाज स्मरन् ।
सर्वेषामधि नायक श्शुभगुणो विष्णुर्यथा निश्चितः
क्षीरोदार्णव कन्याया स्वमनसा निश्चित्य चाङ्गीकृतः ॥ ३ ॥
श्रीशस्सर्व गुणा करोझनुपमो श्रीसम्प्रदायो ह्यहम् ।
श्रीशंचेत् प्रवदामि राजमुकुटं युक्तोह्ययुक्तोऽथवा ॥ ४ ॥
युक्तः श्रीवच नैरुदाहृत मिति नृणांनरेशोह्यहम् ।
संचिन्त्याऽमुमधिष्टितं नृपनृपं श्रीविष्णुना तोलये ॥
श्रीविष्णुःस्वविभूतिमेन मवतात्सार्च सुतैश्चाश्रितैः ।
श्रीविष्णुस्वममीहयच्छतु इदं स्वाशी:सहस्त्रं ददे ॥ ५॥
(ये श्लोक बड़ोदा साधु कर्यालयमे, मुकुट धारण महोत्सवके दिन
शास्त्री श्रीनिवासाचार्यजी पढाथा)
श्रीजॉर्ज पंचकम् ।
श्रीमान् महा महिम पञ्चम जार्ज सम्राट्,
सामन्त मौलिमणि चर्चित पादपीठः ।
शस्त्रास्त्र सज्ज चतुरङ्ग बलै रुपेतो,
जीयाचिरं भुवि सुमन्त्रि गणैः समेतः ॥१॥
सम्राट् शुभागमन ७३ यस्य प्रताप मतुल भुवनैक वेचं, दृष्ट्वापरां मुद मुपैति नृणां समूहः । वर्णैवतुः परिमितै रथ सम्प्रदायैः कृत्स्नैस्सदैव निज धर्मरतस्सदा स्यात् ॥ २ ॥ त्यत्त्वा सर्व भयं जनाः प्रमुदिता राज्ये वसन्तोऽनिशं । स्वे स्वे कर्मणि स्वेछया 55 तमनसः सर्वेऽपि धर्मरताः॥ नैता दृक् समभूत् पुराण समये भाविन्यथो वस्यति । तम्वै पातु सरस्वती सुमतिदा श्री राजराज सदा ॥३॥ श्रीमान् पञ्चस जार्ज मेरि सहितं मापाल चडामणिं । सद्धर्म प्रतिपन्थि कुञ्जरं घटा प्रोदाम कण्ठी रवम् ॥ श्रीमद्धार्डिजलार्ड संज्ञक महा साचिव्य युक्तं मुदा । पायाच्छश्वदनश्वर श्रि बिलसत् पादारविन्दः प्रभुः ॥४॥ श्रीमान् पञ्चम ज्याज भूपति वरः स्वीया महिष्यायुतः । स्वीयै स्सूनु सुतादि सर्व विभवै स्सर्वाधिकारै व्रतः ॥ शास्तु क्ष्मामखिलां यथा दिवि विशु व त्रारि रास्ते तथा । जीयाद्वर्धतु नो विवर्धयतु शं स्वस्त्या सहा नन्दतु (यह पंचक भद्रपुर दरबारोत्सबके दिन छात्र हिम्मतलाल मूलजीभाई महता पढ़ाथा) (वैदिक सर्वस्व प्रयाग) सम्राटका राज्याभिषेक श्रीपति यदुनायक बुध शुखदायक सर्वेड़ित सर्वेशम् हृदि. सन्निधाय भारतं शुखाय मति वर्धनाय भूपेशम् ।। १०
७४
सम्राट् शुभागमन ।
भवनाय विभव विद्यार्थ शिल्य विज्ञानधर्म मुविचारैः
सर्वत्र सदात्मज यार्थ चयोन्नति रविगति नीति प्रचारैः ॥ १ ॥
सर्वप्रिय नृपवर श्री राजेश्वर पञ्चमजार्ज कृतोशः
सदयो ददतोध्वि परेत्रचयः सुविभाति सतामव नीशः ॥
तस्याभिषेक जनितोत्सवोच्च मङ्गल सुखाधि राकेशः
मित्रेण मित्रतः संविराजते चित्र मितीह विशेषः ॥२॥
किं निशा दिवा करतो निशाकरो दिवा त्रनिशा करतोवा ॥
राज्याभिषेक तो. मात्र प्रेमतो भूमौ भूमि सुतोवा ॥
एवं प्रकार सुविचार तोथ कौतुक मवलोक्य बुधेशः
जिन मात्र भाशया किमपि वदति नृपराज चरित्र मशेषः ॥ ३ ॥
( पं. धर्मनारायण द्विवेदी )
(सुधानिधि, प्रयाग )
राजराजेश्वराभिनन्दनम् ।
एहेयहि भारत महीतल चक्र वर्तिन्
सुस्वागतम् विर चितम् सुमना गृहाण ।
विस्मेर भक्ति कुसुमै विहितेन सश्वत्
हृद्येन नाथ विनया ञ्जलिना निकामम् ॥१॥
निसर्ग शुद्धेषु विनीत वृक्षौप्तन्नेषु भक्ति मुमनः सुयदस्ति
किञ्चित् ॥
तेनाऽधुनाहि मधुना रचितां सपर्या भावेन भाव विवशः
स्त्वरित प्रतीच्छ ॥ २॥
प्रेम संस्तरण सज्जितम् महत्नाथनो हृदय मण्डलम् मृदु
आसनंहि भक्ते प्रकल्पितमास्यैतां ननु कथम् विलम्ब्यते ॥३॥
सम्राट् शुभागमन
७५
प्रसादय सुहृज्जनम् प्रकृति मण्डलम् रञ्जय
विनोदय मनः सतांननु शुभम् समासादय ॥
महेन्द्र जगती तलम् वशय शासनैः शोभनैः
शतक्रतु समस्सदा रिपु कुलम् क्षयम् प्रापय ॥ ४ ॥
दारिद्र्य विग्न मनसोऽपि वयम् समर्थाः
नाथम् भवन्त मनु रञ्जयितुम् नरेन्द्र ?
दिग्वास सोपि शिशवः पितु रन्तरङ्गम्
धिन्वन्ति किनहि प्रियैः खलु शुद्ध भावै ॥ ५ ॥
उपकृतं महदद्यत्वया प्रभो, दयितया सहितेन नरेश्वर
यदधुना किल भारत मण्डलं निज शुभागमनेन कृतार्थितम्॥६॥
श्री मत्पञ्जमजाज! भारत मिदं त्वदर्शनोत्थं सुखं
वक्तुं न क्षमते कथन्नु हृदया नन्दः प्रकाशं ब्रजेत्
इत्थं साधु विचिन्त्य नाथभवते कारुण्य पूर्णात्मने
निःशंक्य प्रमदम हृष्ट मनसा स्वात्मासमा वेदितः ॥७॥
महाराज्ञी महाराजो जीवतां शरदां शतम्
इत्य जस्र भगवतः प्रार्थयामो हृदा मुदा ॥५॥
( चन्द्रशेखरओझा शास्त्री )
( साधु बड़ोदा)
आनन्दोल्लासः
स्वस्ति स्तात्सर्वतो राज राज ! !
रवीन्द्र शमनप्रभृत्य मरवृन्द तेजो दधन्
नराधिपति रप्यहं कृष्ण काक्यात्सहि ॥ १॥
सम्राट् शुभागमना सभारतनिवासिनां रति विलास रजावनि रनस्त रवि भूपति जयति जार्जनामा तृपः ॥ २॥ आयाते निजदेशतोऽद्य नृपतौ वर्षन्त्वि यम्भारतम् श्रीमत्पंचम जार्ज नाम्नि महिषी युक्ते दया सागरे । देशेवा नगरेऽथवा जनपदे गेहे जने सर्वतो- ह्यानन्दः किल मूर्तिमानिह भृशं नृत्यं त्यथा नन्दतः॥ ३ ॥ श्रीधी भूमिः सखायो बल मथ सचिवा राज संसत्सदस्याः पौर श्रेणी तथाच प्रतिनिधि रथच स्त्री सुत भ्रात वर्गः। एतैः सम्बर्द्धमानैः सह वहु मुदितः स्वाः प्रजा राजभक्ताः रक्ष न्दीगायु रस्तु प्रवल तर महा: पंचम श्रील जार्ज॥४॥ अ षष्णव चन्द्राब्दः पौषः पक्षोऽसितः कुजः । सप्तमी हृदये प्रीत्या लेख्याः स्वर्णाक्षरै दले ॥ ५ ॥ ( गोस्वामी लक्ष्मणाचार्यजी मथुरा ) ( सनातन धर्म पताका, मुरादाबाद ।) पद्यपंचमालिका। अहो अहो महोन्मदं महो महोद्धतः स्वयं प्रमोदयत्ययं न कं नकं जगद्गत जनम् । विलोचनोत्पलोत्करं चिराय कोरकायितं- विकासहासभासि चापि कस्यनो तनोत्ययम् ॥१॥ प्रबोधलब्ध बोध साधु भाग धेयमद्य न:- कला कलाकरस्य वर्द्धते यथा सिते तथा । यदायजाजपंचमो नितान्तमाजवान्वितो- महीमहेन्द्र इन्दिराकराभिषेकमंचति ॥२॥ 6 सम्राटू शुभागमन । ७७ चकोरचित्तकोरकं चकोरवान्धवो यथा- यथा च भानुरुन्मनीकरोति पुष्करं करैः । तथा जनाननाम्बुजातजातमुन्मदायित प्रजेश एष देशभीतिभेषजः प्रकल्पयेत् ॥३॥ सदा सदारदारकः सदा स दारको द्विषा- मनन्यभावभावितप्रजाशिरुत्मभावितः । प्रमोदमन्दिरान्तरराधिवासभासितानन- श्चिराय जायतामधिप्रज हि जापंचमः ॥४॥ अलङ्करोति भारतानुशासनानृपासनं सनाथयन्त्रिमाः मजास्तु जार्ज पंचमोऽधुना । अमानिमानिमानदः प्रजाहिताभिकः सदा- मनोऽरविन्दवृन्दमेष नो विनोदयिष्याति पद्यपंचतयीयं मे सुमनःस्रगिवोज्ज्वला । राजतां राजराजस्य कण्ठेऽकुण्ठित सौरभा (पं. मिहिरचन्द्र शास्त्री प्रथम संस्कृताध्यापकः बन्नूनगरीय मिशन महापाठशालायाः)
सम्राट् शुभागमन ।
AANANAMA
AAAAAAAN
श्रीवेंकटेश्वर समाचार मुम्बई
सम्राटका स्वागत-दरवारकी बधाई ।
[हिन्दि पद्य । ]
शुभदिन शुभघड़ि आज कीन्ह पदार्पण हिन्दमें ।
जार्ज नृपति महराज, लगि भारत-हित-कामना ।
सादर स्वागत भारत करता, देत वधाई मन भरके ।
शुभ दिन आज पधारत पञ्चम, जार्ज राजराजेश्वरके ॥
स्वागत, स्वागत, स्वागत, स्वामिन् ! लेओ आशिर्वचन अपार ।
पुण्य पवित्रा महिके सारे, जन करते हैं बारम्बार ॥
स्वागत, भारत-मङ्गलदाता, स्वागत, भाजन उत्सवके ।
कर्मभूमि भारतके स्वामी, स्वामी, नरपति पुंगवके
स्वागत, स्वागत, पुनि तव स्वागत, करनेको मन चाहता है।
सादर मानिय स्वामिन् ! यह मन, रुकने में नहीं आता है ।
स्वागत, सर्व-शिरोमणि राजन् ! मस्तक-महिम-मुकुटधारी ।
खागत, आगल-अवनीश्वर तुम, स्वागत, स्वामिन् ! सुखकारी ॥
स्वागत, भारत-राजेश्वर ! तब, राजा-परजा-हितकारी।
स्वागत, जल-थल-शासनकर्त्ता, स्वागत भूमि-भार-धारी ॥
स्वागत, भारत-सर-सरोजके. सूर्य प्रताप-किरणवारे ।
सब जन-चक्षु-चकोर सुधानिधि, स्वागत, चन्द्रिक-यश-धारें ।।
भारत-जन-कुमुदिनि-वन-रजक, स्वागत, शशि शोभनवारे ।
स्वागत, भारत-राज-मजाक महाराज जारज प्यारे ॥
७९
VnVvvvv
सम्राट् शुभागमन।
परम्पनासे भारत-जन हैं, राजभक्त होते आये ।
भूत समयकी नीति अखिलमें, राजभक्ति दरशा आये ।।
भारतेशका स्वागत कर अब, अवसि भक्ति दिखलावेंगे।
काल-भविष्यतमें भी आशा, डिडिम् यही वजावेंगे ।
जबसे पितामहीने निजकर, भारत-शासन-भार लिया ।
तबसे उनने जो जो उन्नति, अरु भारत-उपकार किया ।
कभी न हम उनको भूलेंगे, नितप्रति मनमें रखते हैं ।
बृटिश-राज्यके रसमय फल नित, नूतन नूतन चखते हैं ।
भारत-युद्ध हुआ अवनीपर, अकर्मण्यता फैल गई।
कर्म-ब्याप्त भारत-धरणीसे, कर्म-वासना लोप गई ।
पितामही तब पिता कुशलने, कर्मवीजको फिर बोया ।
वीजांकुरकी रक्षा करके, भारत-चिर-कलंक धोया ।
अहो भाग्य हैं आज हमारे, हर्ष-विषय है अतिभारी।
परम पुनीतात्मा उनहीके, योग्य तात तुम अधिकारी ।।
पूज्य पूर्वजन-कर्म अनुष्ठित, देखा कठिण बड़ा भारी ।
तो भारतमें स्वयम् पधारे, त्वहि पूरण करन विचारी ।।
उस वीजांकुरको अब झटही, वृक्षरूपमें लाने ।
भारतकी डिगती धरणीको, ठीक किनारे थावेंगे।
भक्ति-प्रेमसे भारत-जनकी, आशिष अधिकी पावेंगे।
चिरंजीव आयुष भोगी हो, नीति दक्ष कहलावेगे ॥
राजनीति-कौशल-दृष्टीमें, दिल्ली भारत- रजधानी ।
पड़ा रहा जिसका सिंहासन, खाली अबतक अनजानी ॥
करि दरबार उसी दिल्लीमें, प्रेम सहित अपनाते हैं।
राजभक्तिके बदले हमको, प्रजा- प्रेम दिखलाते हैं ।
८०
सम्राट् शुभागमन
ऐसे अवसरके समय, क्यों न उत्सव हम करै।
चिरंजीव हो नृपति कहि, प्रेम- छवि दर्शन करै ॥
( बालाप्रसाद । )
दोहा ।
याही मंगलवारको, मंगलदायक मानु ।
प्रगटयो भारत गगनमें, मंगलरूपी भानु ।
दिनकर सदा प्रकाश हैं, जासु नृपतिके देश ।
तिन्हें जो तुलय दिनेश सम, उपमा कछु न विशेष ॥
सोरठा।
कौन्हें पञ्चमजार्ज, आर्य अवनि पगु धारिके।
प्रसुदित सकल समाज, धन्य धन्य शुभ आगमन ।।
.
सवैया छन्द ।
सबको हिय हर्ष बढ़ावन है प्रभु पञ्चम जार्जको भारत आवन ।
भवलोक विलोकं विशोक चहूँदिशि मंगलदायक साज सोहावन ॥
प्रजा सरिता सुखवारिबढ़ी अरु 'श्याम सराहि लगीं यश गावन ।
यों आज अनन्द अमीं वरसे तरसे लखि जाहि पयोनिधि पावन ॥
दोहा।
विविध भाँति फूले सुमन, प्रगट जार्ज ऋतुराज ।
रसिक अलिनपहँ करि गमन, पवन देत सुधि आज ।।
राजत राज समाज महँ, सिंहासनपर जार्ज ।
नभ नक्षत्रके गध्यमें, जनु सोहत निशिराज ॥.
दिल्ली तिलक स्थान छवि, 'इमाम ' सके को गाय ।
इतनाहीसे जानिये, सुरपुर देखि सिहाय ॥
८१ सम्राट् शुभागमन । राजदम्पतिको बधाई। दोहा । - आज दिवस आनन्दको, अतिशय हर्ष अगार । राजतिलक महराज कर, अति मंगल दातार ॥१॥ अति आनन्द महान हर्पकर, दिवस दियो जगराई । सिंहासनपै भये आजु थिन, नृपनायक इत आई ॥ २॥ करि अतिकृपा महान दया कर, भारत मोहिं पधारे । जित देखहु तित आनन्दकेरे, बाजन आजु नगारे ॥३॥ करि अतिकृपा महान दिखाय प्रेम बहु, मुत सम हमकहें जानी । नृपनायक यहि देश पधारे, प्रेमपात्र अनुमानी ॥४॥ धन्य धन्य भारतको निश्चय, भाग्य महान अपारा । लह्यो आजु दर्शन भूपतिके, अति आनन्द दतारा राजतिलक उत्सव सुखदानी, आजु हर्षपद भारी। जित देखहु तित कहत धन्य धनि, भारतके नर नारी ॥६॥ हे जगदीश्वर मांगत तुमसे, यही जोरि दोउ हाथा । चिरंजीव महराज रहैं नित, हर्ष सहित नरनाथा ॥७॥ हम सब प्रजावर्ग आनन्दयुत, निरखें हर्ष समेता। महाराजकेरो शुभ शासन, अति शुभदायक नेता ॥८॥ सदाकाल प्रभुवरको लखिकै, शासन मोद अगारा । हम सब प्रजा रहैं प्रमुदित चित, भाष जयति सुवारा ॥९॥ राजतिलक उत्सव आनन्दयद, होहि सदा मुखदाई । चिरंजीव रहिये नरनायक, ओनन्द सहित सदाई ॥१०॥ धन्य भाग्य दिल्ली नगरीके, जित नरनायक आई। राजत आजु प्रीति भारतपै, अति महान दरसाई ॥११॥ ११ सम्राट् शुभागमन दोहा धन्य धन्य दिन धन्य यह, घड़ी मोद दातार । राजतिलककर जो भयो, उत्सव यश आगार ॥१२॥ भारतवासी जानत प्रभुको, निश्चय पिता समाना। जानत ईश्वर अंश भूपवह, सत्य सत्य परमाना ॥१३॥ ईश्वर के दर्शन सम मानत, ईश्वर दर्शन काहीं । सदाकाल हिय मांहि प्रेम अति, राखत शंसय नाहीं ॥१४॥ सत्य सत्य हम चाहत नितपति, प्रभुवरको कल्याना । रहहु सुखी नित हे राजेश्वर, नृपवर भूप प्रधाना ॥१५॥ सदा रहिय मुद सहित नित, रहै न्यायकी खानी । प्रजावर्ग हित आनन्ददानी, श्री मेरी महरानी ॥१६॥ रहै भूप परिवार हर्ष युक्त, आधि व्याधि परिहारी। नितपति रहैं मुखी दम्पति प्रभु, प्रजावर्ग हितकारी ॥१७॥ शत्रुवर्ग जो चहत भूपकर, हिन मांही अपकारा । ते शठ होहिं नाश कॉपहिं मन, निरखि प्रभाव अपारा ॥ १८ ॥ सब भारतवासी हर्षित मन, देते आजु बधाई ॥ राजतिलक उत्सव भूपति कर, होय महा मुददाई धन्य धन्य जो प्रधान कहें, देखी फस्यो आनन्दा दर्शन दियो आप राजेश्वर, हरनहार दुखद्रन्दा ॥ २०॥ जैसो प्रेम प्रजनपै प्रभुवर, करि करुणा दरशायो। तैसो प्रेम आजुलौं है प्रभु, कोज नाहिं दिखायो ॥ २१॥ आजु मगन मन इत उत विचारत, फूले भारतवासी करत विविध विधिके शुभ 'उत्सव, परम भोद परकासी ॥२२॥ - सहाः शुभागमन ८३ जिमि करि कृपा आय भारतमह, राज मुकुट शिर धारयो। ताही भांति दयानिधि हम कह कबहुं नाहिं विसरयो ॥२३॥ नौशेरवां सरिस न्यायी व्है, शिवि समान कै दानी । हरिश्चन्द्र सम सत्यवान अरु, रन्तिदेव सम ज्ञानी ॥ २४ ॥ धर्मराज सम धर्म विज्ञ है, पालहु प्रजा भुवारा । प्रजावर्ग आसीस देत यह, प्रमुदित वारहि वारा ॥ २५ ॥ इंग्लिश-राज्यमांहिं हम निश्चय, महामोद प्रधु पार्य यामहँ कछुक चापलूसी नृप, नहि कृपालु दरसा ॥ २६ ॥ अवसर पाय विनय हमहूं इक, करत नाथ कर जोरी । पुरवहु नाथ कीर्ति हो निश्चय, वारहि वार निहोरी ॥२७॥ अधिक कहहिं का आपु दयानिधि, धर्मविज्ञ मति खानी । ताते दीननकी विनती कहं, लेहि अल्पम हूँ जानी ॥ २८॥ कहहु सकल आनन्दित हियते, भारत के नर नारी। रहिये सदा काल प्रमुदित चित, भूपति श्रेष्ठ सुखारी ॥ २९ ॥ दोहा । सदाकाल आनन्द लहि, कोजिय राज उदार। उत्सव शुभ यह होहिं प्रभु, यह आसीस हमार (शिवदास पाण्डेय, मस्त्री ।) सम्राटकी बधाई। मास दिसम्बर वारहीं, दिल्ली ताज समाज । श्रीयुत पंचम जार्जको, देत बाई आज ॥
सम्राट शुभागमन । कवित्त सुखद सरन सन भूमि विधु ग्रह चन्द, वारह दिसम्बर विशेष मन भाये हैं । वार भूमिसुवन सुमंगल दातार ऋक्ष, पूरवा पुनीत शुभ सवहीं सुहाये हैं। पञ्चम श्रीजार्ज महाराज राजतिलक- को, आज साज देहली सुजान छविछाये हैं। अचल अशेष आयु चाहत परेशते, चहूँघा देशदेशते नरेश जुरि आये हैं ॥१॥ घरघर आनन्दवधावरे बजत बेस, मंगलको साज साजि मोद भीजियतु हैं । चिरजीवे महाराज पञ्चम श्रीजार्ज आज, विनती परेशते विशेष कीजियतु हैं ।। बारह दिसम्बरकी महिमा महान यों सुजान सबै प्रेमपूरे नाम लीजियतु हैं। भीर भारतीनकी सुहाई देहलीमें महा,-राजकी अवाई वधाई दीजियतु हैं ॥ २ ॥ उमँग अथाय बढ़े हरष वलित हिन्द, सलिल सुखद पाय मुखी मनु मीन भो । गेह गेह मंगल मनावत सनेह छके, सफल मनोरथ सुजान सबै दीन भो ॥ पंचम श्रीजार्जजू पधारे आज भारतमें, टिनको प्रवल प्रकाश प्रेम पीन भो । बखत बलन्द भरे वारह दिसम्बरको, महाराज देहलीमें तखतनसीन भो ॥ ३ ॥ है । सवैया । आप हुते जब वेल्सको प्रिन्स, सनेह तबेही महासरसायो । उन्निससौ सन पांचमें हिन्द-निवासिनको निज रूप दिखायो । आज अनन्दको सीव नहीं सबहीको सुजान भयो मनभायो । राजको ताज जोरावरे सीसपै भारत आपने हाथ सजायो ॥४॥ स्वर्गिय श्रीविकटोरियालो प्रजापालन प्रेमते कीवने करो, न्यायके काजमें त्यों पितुलौं मुद्रते कलकीरति लीवो करो।। सानद आशिष देत सुजान सुशासनपै चित दीव करो। श्रीयुत पञ्चम जारजजू सम्रा शुभागमन । ८५ N/AAN Am/NAANANA/ANNAINA.NPAAAAAAP जगतीतलमें चिरजीवो करो ॥ ५॥ (श्रीकवि सुजान,-हल्दी) ॥ कुण्डलिया ॥ जारज केसरहिंद नृप, शाहनशा इङ्गलेंड । राजसिंहासन ब्राजि या, प्रजा भई आनन्द ॥ प्रजा भई आनन्द खुशी घर घरमें होई । रागरङ्ग उछरङ्ग सजै श्रृङ्गारस कोई ॥ महता कहै उमेद चरण जीवो अखिलेश्वर । तेज प्रताप प्रचंड रहो मालक हिंदकेसर ॥ १ ॥ शुकरगुजारी करत सब, घरघर मङ्गलचार । शाहनशाह पधा- रिया, दिल्लीरे दरबार ॥ दिल्लीरे दरवार हिन्दभूपति सब आया तेरै तेज प्रताप छाप सू हुकम उठाया ॥ महता कहै उमेद आपकी कारगुजारी। मानत हैं अहसान करत सव शुकरगुजारी २ कवित्त। सम्राट जार्ज पञ्चम पधारे देश हिन्दमें हैं, साथमें हमारी मात मेरी महारानी हैं । दीन देश भारतके आरत विनाश हुए, हुई धरा परम पवित्र राजधानी है ॥ स्वागतको शोर चहुँ ओर रहो छायो अति, छाई ध्वनि जै जयकी गगन गुंजानी है। बहुत दिनों से शाह दर्शनकी प्यासी प्रजा, पायशुभ दर्श आज फूली न समाती है ॥ १ ॥ ( पन्नालाल ।) तिलकोत्सव । { तिलकोत्सबकी बधाई-छप्पय ) पति पग परसन हेतु पुलकि रहि भारत भूमी। पितु दरशन कह पुत्र मजा चख चञ्चल धूमी ॥
सम्राट् शुभागमन
पुनि अश्वासन वचन सुनन सुश्रोनन झूमी ।
रसना गुन गन गान निमित लोलुप इव दूमी ॥
सुयश सुगंधप मधुप, कवि वृन्द विन्दु गुंजारहीं।
जयति पञ्चम जार्ज नृथ, सब भारतीय जुहारहीं
( हरि गुलाम ठाकुर-गोरखपुर)
सम्राटको बधाई-प्रभाती।
जयजय प्रभु पञ्च जार्ज, भारत हितकारी ॥ टेक ॥
शीश मुकुट धरत आज, भारत के राज काज ।।
युग युग प्रभु करहुँ राज, कीर्ति हो तुम्हारी ॥
जय जय प्रभु पञ्च जार्ज, भारत हितकारी ॥१॥
महिमा क्या हुई अपार, जगह जगह रेल तार ।।
विद्यालयकी बहार, कीन्ही जग सारी॥
जयजय प्रभु पञ्च जार्ज, भारत हितकारी ॥२॥
दीनवन्धु हो कृपाल, भारतक रक्षपाल ।
चोरांका दुख विशाल, देखें प्रभु टारी ।।
जयजय प्रभु पञ्चजार्ज, भारत हितकारी ।
चिरंजीव होवे प्रान, मांगे ईश्वरसे दान ।
शङ्कर यह करत गान, अल्प बुद्धिकारी ॥
जयजय प्रभु पञ्चजार्ज, भारत हितकारी ॥३॥
विनयपत्र छन्द।
पवन मन्द सुगन्ध शीतल वहति निर्मल पावनी ।
को जानि कहि आनन्द यमुना कूल दिल्ली मुहावनी ॥१॥
८७ सम्राएं शुभागमन । दर्वार बिलोकि विचित्र रचना रुचिता मुनि मन हरे । निज पान श्री हार्डिज साहब आन सिंहासन धरे ॥ २ ॥ अब कुशल पद पंकज दिलोकहु जार्ज पञ्चम सेव्यते । सुखधाम पूरण काम पञ्चम जार्ज नाम नाममिते ॥ ३ ॥ दर्वार पञ्चम जार्ज आये निरखि छवि उर लाइये । गुणधाम हैं श्रीकुइन मेरी विमल यश बतलाइये ॥ ४ ॥ सम्राट जार्ज सुजान पञ्चम शील रूप उजागरे । श्री एडवर्ड दयालु सप्तमसे अधिक गुण आगरे ।। ५ ॥ केहि भांति वरणौ नाथ गुण श्रीमान है त्रिभुवन धनी । अति हर्ष राज समाज चहुँदिश दुन्दुभी बाजहिं घनी ॥ ६ ॥ निज गिरा पावन करण कारण जार्ज यश मुरली कयो । श्री जार्ज पञ्चमके चरित संसारसागरमें छयो ॥ ७ ॥ दर्बार देहली उछाह मङ्गल सुनहिं सादर गावहीं । सम्राट जार्ज प्रसाद ते जन सर्वदा सुख पावहीं ॥ ८ ॥ करुणा निधान कृपाल रघुवर आज यह वर मागहूँ। चिरंजीव हों श्री जार्ज कैसर कमल पद अनुरागहुँ ॥ ९ ॥ ( मुरलीधर शर्मा-बदायूं।) श्री जार्ज पञ्चक। धन्य ग्रेटब्रिटन हनोवरको बंश धन्य, धन्य श्री विजैनी विश्वकीरति विलासी हैं धन्य शांतिकारी सुरलोक अधिकारी, देव, एडवर्ड सप्तम महान तेजरासी हैं । - ८८ सम्राट् शुभागमन। तिनके सपूत पूत भारत पुनीत कीन्हा, उई चहुओर मानो पुण्य चंद्रिका सी हैं । राजे महाराजे कै विलासी कै उदासी सबै, धन्य अति धन्य आज भारतके वासी हैं ॥१॥ पूरि रह्यो भूमि उतसाह महीमण्डलमें, आनंद वधाये देवलोकहू में बाजे हैं, दिल्लीके तखतको सनाह आज होत जानि, मंगलप्रमोदसाज भारतने साजे हैं । विस्तृत महान राज अस्त नाहिं होत भान, जाके राना राजे अनगनित नेवाजे हैं। भूप सिरताज महाराज राजराज आज, जार्ज देव पञ्चम सिंहासनपै राजे हैं ॥ २ ॥ आये आप भारत सुहावने सिंहासनकी, सोभाको बढ़ावने स्वप्रीति दिखरावने नीच द्वेष कीच निज तेजसों सुखावने, विरागआगि दयादृष्टि बृष्टिसों बुझावने ॥ कहालौं बखाने भूप प्रीति औ प्रतीति गति, अविचल भक्ति जनमन सरसावने । अवधि करी है प्रजावत्सल महत्त्वकेरी, जार्ज देव पञ्चम महान अनुभावने ॥३॥ राजनके राज महाराजनके महाराज, प्रतिनिधि अंश हैं विशेष भगवान के। अचल निवरस कीन्हे प्रीति परकासी श्रिय, जाके गुण देखि धारी नीरमें कृपानके ।
सम्राट् शुभागमन । ८९ .MAA.AAAAAAA सारथ बनायो भूपनाथ निज देवपद, देवके समान प्रतिपालक जहानके। शीलके समुद्र महासागर दयालुताके, गुणके निधान महावीर दान मानके ॥ ४ ॥ भारतके पुण्यको दिनेस भासमान भयो, तम ज्यों कलेस दुरि भागो देश देसको। इंग्लैंड ड समान निज मानको प्रमान पाय, गौरव गुमान जम्यो हियेमें हमेसको ॥ तीस कोटि मुखन असीस देत हिंद आज, राज रहे अचल' मनावत महेसको। वनिकै नकीव भूप बोलत बिरद, "दरे दौलत दराज जार्ज पञ्चम नरेसको"॥५॥ (सीताराम ) 6 दोहा श्रीमान् सम ईश्वरी, करहु अचल महि- राज ॥ झम्मनलाल पुकारि कहि, सदा सहारौ काज ।। सवैया। श्रीमान् आगमन आप कियो, जबसे हमारो हर्षात हियो । अब दर्शन देहु महाहितकारी, जो भारत आप प्रवेश कियो । श्रीमान् समान नहीं जगमें, जिन बहुतक दान आजान दियो। धनि धन्य महारानी मेरी, जिन जगमें यश कर आप लियो।
सम्राट शुभागमन। दोहा । क्रीट मुकट मस्तक धरा, लेत ईशका नाम । झम्मन सब संसारम, स्वामी ही से काम ।। कवित्त श्रीमान्को नाम सुनो जबसे, तबसे चित अत्य प्रसन्न भयो है । अब आश लगी स्वामिहि देखनकी, मम दर्शनको हर्षात हियों है । अब क्रोध नहीं तनमें कुछ भी, अषु भारतको उपकार किया है। यो झम्मनलाल पुकारि कहैं, नेकीको वृक्ष सदाही हरयो है ।। येहु मन भायो है। दिल्ली मे दरवार राज मुन, भारत मङ्गल छायो है। बाल युवा अरु वृद्धवृन्द उर, आगम जार्ज सुहायो है ॥ देश देशके भूपवृन्द मिल, स्वागत छिप हरषायो है । छायो सुखद विशाल राज, दरबार येहु मन भायो है॥१॥ भारतवासी दीन लखत, अनमोल समय हम पायो है । शिक्षा ध्यान आत्मसुख पूरण, अहो ! समय प्रभु लायो है ॥ तिमिर शूल अज्ञान विरण, अहा ! येहु प्रगटायो है । नीति न्याय सुखदायक पालन, भलो येहु मन भायो है ॥२॥ विविध भांतिस सजे समानें, प्रेम वारि वरसायो है। औसर छविता काज साज मिल, नेह अवनिमें छायो है ॥ अनुपम मोद छयो भारतमें, सुन संदेश शुभ पायो है । क्या हिन्दू क्या जैनी मुसलिम्ड, आज येहु मन भायो है।।३।। स्वाति आश जिमि रटै पपीहा, आगम ऐसो छायो है । ठौर ठौर गृह ग्राम ग्राम डूं, मङ्गल गीत उछायो है ।
सम्राट् शुभागमन। ९१. विभुसे आश पुकार यही है, करो सुफल शुभ पायो है। चिरजीवहिं महाराजा रानी, नन्द येहु मन भायो है ॥४|| सम्राटकी महिमा। कात्ति। धन्य महाराज घिराज पञ्चम जार्ज स्वामी, तुम्हरो यश प्रबल प्रताप जग छायो है । पश्चिमसे पूरब अरु पूरबसे पश्चिम लों, भारी साम्राज्य मही चहूँ ओर पायो है । बृटिश सम्राज्यकी महिमा करूं क्या गान, मूर्य अस्त होवे नहिं तेरो यश गायो है । लंदन राजधानीमें राज्यअभिषेक करा, जूनी राजधानी हिन्द दिल्लीबिच आयो है ॥१॥ उन्नीससौ ग्यारह सन्-मास दिसम्बरहिं बीच, तिथी साल गुरुवार दिल्लीमें पधारे हैं। शुभ दिन शुभ घड़ी माहिं बारवीं दिसम्बरको, महागनी " मेरी" सह तरन्त पग धारे हैं । लपिके आसीन तख्त ऊपर सब हर्खित भये, “ नेश्नल ऐन्थम " राग शुभ उच्चारे हैं। किलेसे सलामी तोप एकसौ एकहू की, शूर- वीर गोलंदाज हर्षसे उतारे हैं ॥ २ ॥ लखि तव दिव्यरूप हर्षित हो दे अशीश ईशसे मना कर जोड़ सकल प्रजागण । जिरंजीव र नाथ भोगें निष्कंट राज, चक्रवर्ती होवें अरु पावें ये पुष्कलधन ॥ जिसके रामराज वाघ औ बकरी सभी एक घाट पानी पियें वैर हमें अपने मन । उनके प्रतापपर तन मन धन वारि डारे, निज निज सब धरम पालें हैं सदा निर्भय मन ॥३॥ ।
९२ सम्राट शुभागमन । . भारत सम्राट तेरी कीर्ति क्या बखानूं मैं, तेरे इहि राज्यमें प्रजहिं दुःख भारी है । देशाटन करन हेतु वाणिजकी बृद्धि हेतु, सड़कें बनवाई नित रेल तार जारी है। बने शमाखाने डाकखाने सब ठौर ठौर. रोगको निबारै अरु समाचार जारी हैं । खोली पाठशाला बड़ी बड़ी, विद्या पहावै चातुर होवें नर नारी हैं ॥ ४ ॥ चौकी अरु थाने ग्राम ग्राम बैठारदीन्हें, रक्खी है पुलिस रक्षा करत नित हमारी है । खोले न्याया- लय जहं बैठकर न्यायाधीश, करत है न्याय मुन्सिफ जज्ज न्याय कारी है ॥ औरह अनेक यत्न करत सब प्रजा हेतु काममें लावें जेते साधन शुखकारी है। राज अधिकारी जिनकी बुद्धि बलिहारी है, राज्यको संभालें उन चातुरता न्यारी है ॥ ५॥ कलियुगमें जेते बादशाहे हुए भारतमें, काहू के समय येतो सुक्ख नहीं पायो है । काहूके समय लूट काहू के समय कूट, कोहू के समय धूम रिपूगण मचायो है ॥ तेरेही समय एक चैन और शान्तीसे, पृथकपृथक ज्ञाती समय हिलमिल वितायो है । प्रभुसे मनावै "राम" यही राज्य प्रलय तलक, कायम रहै हिन्दमांही प्रजा. मन भायो ( खुशालीराम, बडवानी ) है ॥६॥ बधाई है। मुमन सुवासनपै, खगन कलापनपै, वेलिन विताननपै, सुखमा मुहाई है। कानन, दिशाननपै, रवि शशि आननपै, सुजल तड़ाग- नपै, शोभा सरसाई है । शुक्ल नरन्ारिनपै, बालवृद्ध ज्वामनपै; मूर्ख और ज्ञानिनपै, हर्ष अधिकाई है। सुकवि समाजनपै, देशी महारानपै, भारतभुवाल हेत यमरी वधाई है ॥ १ ॥ " सम्राट् शुभागमन । ९३ स्वागत समाज सुखसाज राज काज सजे महाराज जारज सम्राजकी निकाई है। छकित छपाकर लपानो छवि देखि छिति छीन लीन्ही छनिक सु छत्र छवि छाई है। मेरी महारानी भारतेश सँग आई है, मानो युगजोरी अमरैयनस जाई है । विधिने बनाई तिहुँ लोकन निकाई सोई; भारतमैं आई सुखदाई बधाई है॥२॥ ( वैद्य रामप्रसाद शुक्ल ।) . सम्राटकी जय । लंदन ये नाम नाम नामनम नाम एक, देश देश देशन विदेशनमें छायो है। दीप दीपनमें दीपचहुँ वारि हैं घिराव, बारिष अगम्य लांघ वैभव बढ़ायो है । इङ्गलिशसी चेनल डोवर जिब्राटर, भूमध्य स्वेजपार ध्वजाको उड़ायो है । छायो है प्रताप तेज अहो नन्द आज ऐसो, जार्ज मेरी राज राज भारत उछायो है । वृष्टिश सम्राट राज राजनमें राज एक, शिरताजनमें श्रेष्ठ ऐसो हिन्दमें सुहायो है । छाई छवि छटाज्योति देशनहूं देश देश, तेज पुञ्ज मंजुळ प्रकासरवि छायो है । रटत पपीहा भांति औसर सनूप पाय, पेखो दरबार राज भारत जु पायो है । चिरजीवी होय जग जार्ज महाराजा रानी, मङ्गल उमङ्ग पूर्ण अवनिमें गायोहै। इङ्गलेंडकें बसैया दुःख भारत मिटैया मोदप्रकटैया तुम हिन्दीके रखैया हो। बंग भङ्गके जुड़ेया रजधानीके बनैया, भूपनके भूप शिरताजके धरैया हो । ज्ञानदानके दिवैया दरबारके करैया, दर्शक दिखैया शुक्र द्वन्दन नसैया हो । अशान्तिता बुझैया पत्र घोषणा पठेया, ऐसे राजदम्पति करुणाके करैया हो । (परमानन्द जैन हारापुर सागर ) ९४ सम्राट शुमाग्नमन ( शार्दूल विक्रीडित) राजा पञ्चमजा वीर विजयो, आजानुबाहू बली । धर्मात्मा गुणखानि शुद्ध हृदयी, सत्कीर्ति पाई भली ॥ विद्यासिंधु प्रवीण नीति विनयी, साधू महा निर्छली । फूली देखि नृपास्य चन्द्र उदयी श्रेणी फफूलाकली ॥१॥ सवैया भूप अशंख्य प्रमोद भरे पुर लन्दनमें छवि छाजति हैं। तोप भुशुण्डि निनाद सुने अरिसेन सशङ्कित भाजति हैं । पावक खेल छुटैओर मनोहर बाजन बाजति हैं । भानु शशी सम किङ्ग प्रताप सुकीर्ति अहर्निश राजति हैं ॥ २ ॥ चन्द्र समान चमत्कृत कान्ति लसी महराज वराननमें। सागर सा उमड़ा लखिके सुख मानस राजन राननमें || भानुमयी चपला- दयुति छाय रही सब ओर मकाननमें । लन्दन भूप महा अभिषेक जयध्वनि है संब थाननमें ॥ ३ ॥ ( राजा फतहसिंह-पुंवाया शाहजहांपुर) राजदम्पतिको बधाई। श्रीहरिं परमानन्द मुपदेष्टारमीश्वरम् । व्यापकं सर्वलोकानां कारणतन्नमाम्यम् ।। दोहा। प्रजावर्ग मानस विमस, आनँद भयो अथाह ॥ मुदिन राज अभिषेक लखि, भारत शाहनशाह ॥
सम्राट् शुभागमन । जिसकी प्रतीक्षा कर रही भारतप्रजा बहुकालसे । आज सो शुभदिन उपस्थित है अनोखे चालसे ॥ आनद् मङ्गल घर सुभग तन मोद युत विचरत सही । प्रति सदन चित्ताकर्ष अलकापुर मनो सोभित मही॥ दोहा। तोप ध्वनी उत्साह युत, गगन सुचुम्बन लेत । सैन दुर्ग सन्तापकी, नदिपति बोरन हेत ॥ छन्। चहुँ ओर छुटती गगनभेदी तोप सौ सौ वार हैं । प्रति आन आनँदके समूह को करें उदगार हैं ।। वायु विच अगनित पताका उड़ रहीं शोभा मई । हरित पथकन बिमल मानस रंग रंगत निज नई॥ दोहा सुद्गरता युत राजहीं, ऊंचे सब सुख रास। दिव दैवनके शोभज्यों, मानो विजन विलास ॥ छद्र। बहुभांतिसे उत्सव मनावत आज नर अरु नारि हैं । दे वस्त्र भूषण असन दीनन याचकन निज द्वार हैं ।। विचरत प्रफुल्लित म- नोमय नहिं अङ्ग अङ्ग समावहीं । श्रीराज राज महेन्द्र गुणगण जार्ज कीर्ति सुगावहीं॥ दोहा । सारे भारतवर्षमे, निज पौरुष अनुकूल खुशी मनावत है प्रजा, मनो वृत्ति निज भूल ।।
सम्राट् शुभागमन। कवित्त। छात्रनके छत्र छत्र धारणके छत्रपति. छाजत छटान क्षिति क्षेमके छवैया हो ॥ कहे कविराज सो प्रभावके प्रभाकरसे, दया दरियाव और धर्मके रखैया हो ॥ दीननके प्रतिपाल मान मर्यादा सिंधु, कीर्ति अकलंक कुल चन्दके थमैया हो ॥ पुहमीके राज राज राजनके महाराज, जीवो चिरकाल सर्व सम्पति रमैया हो छन्द। उपमा यथारथ भी न जिनकी श्रेष्ट कवियोंको मिली । निर्दोष निर्मल कीर्तिरूपी कौमुदी जिनकी खिली ॥ मानो दिवाकर तुल्य जिनका तेज भेष हमेश है । सो आज श्रीमहाराजके सर हिन्दको अभिशेष है ॥ दोहा। धर्म धीरता विनयता, साव्य शील आचार जे ते.शुभ गुण विश्वमें, सबके श्रीभण्डार ॥ सवैया। तेजनिधाननमें रवि ज्यों छविवंतनमें विधु ज्यों छवि छाजे । शैलनमें ज्यों सुमेरु लसे वर वृक्षनमें कलपद्रुम साजे ॥ दैवनमें कविराज कहें मघवा ज्यों शोभित सिद्ध समाजे। धरनीनके त्यो धरनी पतिमे धरनीधर पञ्चम जार्ज सुभ्राजे ॥ छन् । जगमें असको नरनाथ अहें, मिय माणहुसे नर नारि चहें । प्रजाहित साधनमें मन हैं, दिन रैन वसी जियमें धनि है । नर तुच्छ कहा सुरको डर है, विश्राम न लेत दिवाकर है ।।
सम्राट् शुभागमन
दोहा ।
श्रीकीरति वारिधि सरिस, को कवि सकै वखान ।
कोटि यत्न नहिं बनि सकै, कलश उदधि घट जान ।।
कवित्त।
जौवलों या महिमें शशि सूर्यको प्रकाश होय, जौलेां ईश
शीश प्रवाह गङ्गपानीको । जौले नभमण्डल में थान रहे तारणको,
जौलों जगवीच है विचार वर वानीको ॥ जौले फण शेशपै
सुधरनी विराजत है जौलो है जहानमें निशान कर्ण दानीको,
तौलों चिरजीवे राज सकुटुम्ब अवनीपै लन्दननरेश सुप्रख्यात
राजधानीको ॥
( राजवरलाल )
॥ पद।
जागे भाग दीन भारतके, आये श्रीपति अति सुखदाई ।
उघरे दृग अब सुधरे कारज, जनक जननिके दरशन पाई ॥ जिनकी
जाश भरी नीतीकी निरखि निरखि अरि जात सुखाई। ते नरेन्द्र
निज प्रजहि लखनहित, दिहली तखत विराजे आई ॥
आशीर्वाद ।
.
जौली इन्दु भानु आसमान बाच.. शामनाय. शपफणा
शीश मणि धरा धरा भ्रााज ह । जाला पदानाभका विलास रह
अनगहत सांजि है। जोली शम्भु अद्ध
रमा संगे, रती धाय सेजram
१३
सम्राट् शुभागमन । अङ्ग अम्बिका विभासमान, नारदादि गान देवलोक मध्य गाजि है। तौलों भारतेश महाराजको अखण्ड राज, वृद्धि पा युगेन्द्र शुद्ध नीतिसों विराजि है। (मुरलाधर युगेन्द्र, शर्मा ॥छप्पय॥ जारज मञ्चम शाह, तेजधारी तपमारी। जारज पञ्चम शाह, नीति सब जग सुखकारी ।। जारज पञ्चम शाह, नामवर कीनों नीको । जारज पञ्चम शाह, भूप सबही शिर टीको ।। जारज पञ्चम शाह यह, प्रजापाल परदुःख हरो। महता कहै उमेदसिंह, क्रोड जुगां राजस करो। ( महता उमेदसिंह, अखिलेश्वर ) . - दोहा । ब्रिटिश महामभु आगये, भारतके शिरताज । जुगजुग जीवहु हे प्रभु, करहु अचल तुम राज द्वादश तारिखके दिवस, आनंदको नहिं पार । नगर नगर घरघरनमें, मङ्गल होत अपार ताज सहित दरवारमें, शोभित भानु समान । जार्ज महाप्रभु करहु नित, भारतको कल्यान रामराज्य सम राज्य है, कहतक करहुं बयान अजर अमर कीरति रहै, राजाकी भगवान ॥ २॥ ॥३॥ .
SARNAMAAV/- सम्राट् शुभागमन । वर्षा सम विद्या प्रभू, दिन दिन करें प्रचार । तास भारतकी प्रजा, उन्नति लहें अपार शिल्पकला कौशल्यमें, उन्नति नित्य नवीन । रहे लाभ व्यापारमें, पावें मान प्रवीन धन्य धन्य इङ्गलेण्ड रवि, अधिक कियो उपकार । जनम जनम नहिं पासकें, यशको पारावार भारतके सब भूपती, प्रजा सहित हर बार । जय बोलो श्रीजानकी, बाढ़े प्रेम अपार ( शंकरराव शर्मा राजतिलकोत्सव । अमित अनंदित भये हैं लोग देखिवेको, मुनिर भारतमें आपकी अवाई है । ज्यों२ नगचात महाराजको 'मदीना' त्यों, अधिक अधिकात मुख संजम सवाई है उमडि उछाहके प्रवाह रह्यो भारतमें, देखतै बनत चहुओरकी सजाई है । सीताराम सन्तत मनावै सब देवीदेव, दरदर देत मिलि आनँद बंधाई है ॥ १॥ केतेलोग आशके समुद्रमें हिलोरें लेत, तेलोग बम्बईके बन्दरलों धायगो। केतेलोग दिल्लीदरबारकी प्रतीक्षा करें, केते हाट बाटमें मनोरथ पुरायमो ।
सम्राट शूभागमन । धन्य भई भारतकी भूलि हूँ अभागी अब, बृटिशनरेशको जहाँपै परि पायगो सीताराम बहुत दिनोंपै आज पूरीभई, महाराज कुशल समेत आज आयगो ॥ २ ॥ तेज रहै प्रबल प्रचण्ड मारतण्ड सम, साहबी सुरेशते हमेशही बढ़ी रहै । खचित खजाने रहैं खूब मनमाने भरे, प्रीति नीतिरीतिपर ऐसिये चढीरहै ।। उमँग उछाहको प्रवाह नित बाढीरहै, बैरिन बिनाशहित पूरित गढीरहै । सीताराम संतत मना4 जार्ज पश्चमकी, कीरती अखड महीमंडल मढीरहै ॥३॥ जगिरहै जगमें उजागर दयाकी दृष्टि, शत्रुपै शनीचरसी भृकुटी तनीरहै । सजग सचेतबुद्धि विमल सभेत सदा, बृटिशमजाके हितहेतही ठनी रहै । प्रबल प्रताप मारतंडलों प्रचंड रहै, अमित अखंड गुण गरिमा गनी रहै । उमर दराज महाराज जार्ज पञ्चमकी, युग२ साहबी सलामत बनी रहै ॥४॥ युगर राज जार्ज पंचम तिहारो रहै, अरुज बिहारो सदा मुमति लसी रहै । बांके बीर सुभट पिनाके जय ताके रहै, सन्मुख समर सैन शत्रन सी है।
१०१
सम्राट् शुभागमन
मजन जहानमध्य महिमा महान रहै,
तेरी बुद्धि विभव विभूषित वसी रहै ।
सीताराम दम्पति तिहारो धन्य वाद धुनी,
व्योमवीच महिते पताललौं घसीरहै !! ५ ॥
।
सीताराम.
सनातन धर्मपताका, मुरादावाद
भारतीय अभिषेक
फूलि रहे गैंदा और गुलाब बाग बागन में,
पुन्नग सुलोध पुष्प मन को लुभा रहे ।
ठोर २ लुब्ध भौंर अँड मंजु गुंज रहे,
मानों मदमत्त भये मोद गीत गा रहे ।।
दीखै हरियाली चहूं ओर जहां जाय दृष्टि,
खेतन में गैहूं और जौ लहलहा रहे ।
कानन कुरंग चारु चौकड़ी लगाय रहे,
पुलकी पखेरू पेड़ २ चहचहा रहे ॥ १ ॥
पंथ माहिं पंकरेणु दीखै लवलेश नाहिं,
कांकरी कठोर कुश कंटकाविला रहे ।
भूमि हू करति पहुनाई काहू पाहुने की,
सिंचित सुमन मय मारग जता रहे ॥
शीतल सुगंध युत मारुत वहत मंद,
सरिता सरन वारि विमल दिखारहे ।
भानु भगवान को हू आतप सतावत ना,,
किये नीचे शीस कैसे वेग र जा रहे ॥ २ ॥
१०२
सम्राटू शुभागमन।
प्राकृतिक दृश्य हू बने हैं ये मनोहर जो,
जानत हो कारण विशेष क्या जता रहे ।
ईश अंशावतार जारज महाराज फिफ्थ,
मेरी महारानी सह भारत में आरहे ।
जिनके विशाल राज अस्त रवि होत नाहि,
मुयश प्रकाश ते हिमाकर छिपा रहे ।
अहो भाग सोई समराट आज दिल्ली माहिं,
प्रजा रुचि पाय तिलकोत्सव करा रहे ॥३॥
जिनके प्रताप ते स्वतंत्र निज पंथ चले,
भारत भविष्य भले फेरि दृष्टि आ रहे ।
साम दाम दंड भेद नीति न्याय अपने सो,
शेर बकरी को एक घाट जल प्या रहे ।
सतयुग में मानधाता त्रेता में रामचन्द्र,
द्वापर युधिष्टिर सुकीरति सिवा रहे ।
ग्रहमें दिनेश ज्यों सुरेश सब देवन में,
कलि के महीपन त्यों आपकी प्रभा रहे ॥ ४॥
याही ते हाट वाट दीखत अनेक ठाट,
मंदिरन सुन्दर पताक फहरा रहे।
काहू के भवन झाड़ फानुस टगे हैं आज,
चूना पुतवाय कोई चित्र चिपटा रहे ॥
बांधत बँदनवार स्वस्तिवाक्य द्वार कोई,
दिव्य दीपजोति दीपमालिका दिपा रहे।
माने खल खंड करि ध्वंस गढ़ लंक करि,
जानकी समेत औध रामचन्द्र आ रहे ॥ ५ ॥
सम्राट् शुभागमन गाँव गाँव ठाँच ठाँव दीखत है उत्सव ही, गान नृत्य होय कहीं धन ही लुटा रहे । गामन के ग्वाल सँग गोरुन के जंगल में, मटकि मटकि हर्षभाव जतला रहे ॥ गावत हैं गीत नारि शंखध्वनि मंदिर में, पंडितसमूह स्वस्तिवाचन करा रहे । जोरि के किसान पट्टीदारन को कहूँ कहूँ, देखो पटवारी राजसूचना सुना रहे ॥ ६ ॥ नग्र प्रति भूमिपति देव से एकत्र भये, बैठे जिलाधीश करि इन्द्र ज्यों सभा रहे । बालवृन्द के मुखारविन्द है अमन्द हर्ष, शाहीध्वज रूप बने जैधुनि लगा रहे । अग्निक्रीड छूटत वसंत सो दिखात व्योम, कविताकलाप कहुँ कवि हैं सुना रहे । वाजत है बैंड कहूँ तोप की दनादन है, कोइ कहुँ तमगा मिठाई हैं बँटा रहे ॥ ७ ॥ रोगी और अपाहज अनाथ भे अनंद आज, वन्दीगण काराग्रह दुख को भुला रहे । आश निज पूरी भई जानिके प्रजा के लोग, हाथयुग ऊँचे करि दै यों दुआ रहे ॥ जो लों नभमंडल में तारे दुति दामिन में, जौ लो शेष नाग शीस धारण धरा रहे । जौ सिन्धु गंगा और जमुना में नीर बहे, तौले राज जारज कों अटल बना रहे ॥८॥ (पं. प्राणसुख अध्यापक तहशीली स्कूल अलीगढ़)
१०४
सन्नाट शुभागमन।
.
शुभचिंतक प्रयाग
भारतेश्वर स्तुति ।
दोहा-प्रभा भानु स्वाहा अनल, रमा समेत रमेस ।
रोहिणि विधु रति मार मनु, सोभित सची सुरेस ।
सिंहासन राजत भये, पञ्चम जार्ज नरेश ।
मेरी सँग सोभा बरनि, सक न सारदा सेस ।।
चौ०-तव स्वस्तयन भूप तिन कीना । आनंद रोम रोम महँ भीना।।
पद पंकज महं सीस नवाये । नयन सफल अपने करि पाये।
त्रिमणी-वाजी सहनाई अति सुखदाई जन मन भाई छबि छाई ।
अनँद परकासै सब दुख नासै धुनि दस आसै महँ धाई ॥
नकारे बज्जै जनु घन गज्ज तड़िता लज्जै सुनत तहां ।
अरिवर उर फारै गर्वहि गारै मुख संचार करत जहां ॥
दोहा-इहि विधि आनंद निरखि कै, सकल भूप समुदाय ।
भारतेश अस्तुति करत, वाजे विविध वजाय ।।
सोरठा-मण्डलीक सरदार, सब मिलि के अस्तुति करत ।
भारतपति महाराज, सुनत मुदित मन चित दिये ।।
छप्पै-जयति धरम धुरि धरन धनम पालन पुनीत पन ।
जयति पर्व शर्वरी नाथ मुख गर्व विभञ्जन ।।
जय भारतपति सील सिन्धु सुन्दर सुसील मन ।
जय भारत के ईश दुःख दारिद्र बिहण्डन ॥
जय जयति जान पञ्चम नृपतिः, सरमागत पालन करन ।
जय जयति २ जय भूप वर, अरु" मेरी" चिन्ता हरन ॥
-
सम्राटशुभागमन। १०५ कवित विधि तें मनावों जोरि हायरु नवाय सीस साहवी धरापे सदा रावरी बनी रहै राका रजनी समान नित्त प्रति जागै जोति परम सुदिव्य चार दिव्यता सनी रहै ।। यश की पताका ताकी सुन्दर सलाका सुचि अवनि अकास बीच तार सी तनी रहै । जांचत हौं कृपा की निकाई वानि रावरे की सोई गुनताई यहि देश पै बनी रहै ॥ १ ॥ जैसो धर्म राख्यो हरिचन्द्र नृप एक भयो पृथुल दिलीप आदि कितने गिनाइये । शिवि औ दधीचि बसि परम प्रमाणिक जे तेऊ भये आगे नहिं वैसो अव पाइये। द्वापर में कर्न एक धर्म को निवाद्यो जौन ताहू को कथा में कहूं नाम सुन पाइये ।। कलि में महीप मान जैसो भयो सुनी कान सोई गुन आज एक आप ही में पाइये ॥ २ ॥ (बसन्तराम ) राज्याभिषेक। मजिगन मंडे विराज सीरू मोरपच्छ, कहना को कोह सदा रावरी कियो करै,। अलक झलक झलकाय झुकि भूमि,गाय, सम्नाद शुभागमन। -- बनशी बजाय चाय चौगुनी जियो करै ।। मोहन महान मुदमंगल की दीठ तेरी, राजन समाज माहि मिलन दियो करै। यशुदा के नन्दन विदारि दुख दारिद, सुपरजा प्रतिपालन को सुमति हियो करै ॥ १ ॥ एही नृप जार्ज महाराजा देश देशन में, अतुल प्रताप तेरो होवे अखंड राज । गावे गंधरव गुन गान करि चहूं ओर, पावें त्यों मान गुनी जन हूं तेरी समाज ।। दिशविदिशान माहिं यश को प्रकाश करें, सुकवि सुजान हूं सदा जौन सिरताज । भारत वसुंधरा को नेह भरपूर ऐसो, हिय को करै दराज तेरो राज बृजराज ॥२॥ लांघि सात सिंधु वीच जल के जहाज चदि, व्यापन चहत विधु मंडल अवासा है । घूमि घेर घरन दिगंतन में अन्त लियो, वन उपबन गिर कन्दर के पासा है । बानी बुधि मन में विराजै रोम रोमन में, हरषि हजार सेस फन पै प्रकासा है। एहो नृप जार्ज महाराज धनि धन्य आज, करत तिहारी यश अजब तपासा है ॥ ३ ॥ ॥३॥ ( नम्र ) साधु बडोदा सिंहासना रुढ़का महोत्सवः । हे सज्जनो यह आज है उत्तम दिवस इस देशका
सम्राट् शुभागमन
१०७
सब इस लिये कर लीजिये धन्यवाद उस सर्वेशका ॥
क्योंकि जो है शुभ इन्द्रप्रस्थ व हिन्दका वर राजस्थान ।
कहता है जग दिल्ली जिसे जिस्में हुए हैं नृप प्रधान ॥
नृपये युधिष्टिर पूर्व में चक्रवति उत्तम शान्तवान् ।
कई हो गये नैतिज्ञ फिर भूपेन्द्र हिन्दू बुद्धिमान ॥
वह था जमाना अन्तका जबथे पृथ्वी राजा चव्हान् ।
वस होगई रजनी हमारी गड़ा यवनांका निशान् ॥
फिरहो गये औरंगजेब औअक्यरादिक बादशाह ।
संसारमें जिनके भी शासन की हुईथी खूब वाह ॥
शासन हटा कुछ अल्पही समयों में इनका भी वहां ।
होने लगे दारुण उपद्रव अनसहन सब दिश यहां ॥
करके कृपा जगदीशने भेजी सुगोरी कम्पनी ।
जिसने इस भारतपर दया कर शान्तिकीनी थी धनी ॥
जब लिया शासन हाथमें माता विमल विकटोरिया ।
तबहीं से छाने लग गया सुख प्रेम सबके भर हिया ॥
क्योंकि सुमाताने मुदित यह घोषणाकी थी उदार ।
की हर प्रजाके धर्म में नहिं हाथ डालेगी सरकार ।।
यह नीति मा निकटोरियाकी हुई अतिप्यारीजहान ।
बस इसलिये यह होगया आधीन उनके हिन्दुस्थान ॥
शुभ एडवर्ड नृपेशका पश्चात् छिटका वह प्रकाश ।
जिससे विविध पाखंडियोंकां होगया सब तमविनाश ।।
इनने भी माताके वचन का बड़ाही आदरकिया।
हम हर किसीके धर्मको छेड़ेंगे ना यह कह दिया ।
इत अब हुए है बृटिश पश्चम ज्यर्ज न्यायी बादशाह ।
जिनकेसु शासनकी प्रणाली अहै सागरसी अथाह ।।
.
VVM
१०८
सम्राट भुभागमनं ।
जबसे बृटिश शाहीका शुभ आसन लिया है आपने ।
तबसे सभी बदमाश दुनियाके लगे हैं कांपने ।।
जब हुआथा अभिषेक पहिला तभी फरमायाथा यह ।
कि हम नहीं छेड़ेंगे हर कोमांको मजहबकी जगह ।।
यह सुनके भारत की प्रजाके हृदय अति सुख छागया
जानाकि यह श्रीरामके शासनके फिर दिन आगया ।।
है हिन्दकी सारी प्रजा अपने प्रभूकी भक्तिवान् ।
मेरी सहित महाराजके रक्खें कुशल करुणा निधान ।।
सड़कें सुहावन प थाने और सुन्दर अस्पताल ।
ये हैं अनेकां काम ऐसे महाराजाके विशाल ॥
अब यही पञ्चम जार्ज जो हैं धीर महाराजा धिराज ।
सो शोभते हैं देहलीमें सहित अपनी नृप समाज ॥
उप्स देहलीकी छटा अनुपम छारही जो आज है ।
कहलां कोई वर्णन करै अति सुघड़ सकल समाज है ।
है दुर्ग बांका तहांका खाई हैं चारो दिशिविशाल ।
है धरा जहां तख्त वह जिसमें जड़े माणिक व लाल ।
पश्चिममें श्री जमुना तरंगों को रही हर्षित उछाल ।
बन बागमें लहरा रहे विधि विध के तरु कदमों रसाल ॥
है नगर दिल्ली आजजो अनुपम रुचिरतासे सजा!
उसके लखे सुरराजका ऐश्वर्य जाता है लजा ॥
राजे महाराजे सभी दल बल सहित राजे वहां ।
क्योंकि वे पञ्चमजॉर्ज बैठे हैं सिंहासन पर तहां ।
शुभ पौष कृष्णकी सप्तमी और वार मंगल आज है ।
इसही मुहूर्त तख्तपर राजतं नृपति शिर ताज है ।
सम्राट् शुभागमन ।
१०९
शत एक तोपेकी हुई है बाढ़ नभ घहरा गया ।
जपकारका मुद शब्द चारों दिशामें द्रुत छा गया ॥
पुष्पांकी वर्षा हो रही गजरा नरेशों के सजे ।
बहु वाय मनहर जोरसे शुर थलेमें लगने बजे ॥
मुजनांकी होगई भेट औ न्यव छाव होने लगी।
पदवी मिलीं नृपवरोंको शुभ प्रीतिकी शक्ति हु जगी ॥
मित्रो नृपेश्वरको सदा प्राणेसे प्यारा जानियो ।
उनके मुहितके अर्थ ईश्वरसे विनय नित ठानियो ।
बस आज धांसा बज गया भारतमें शाही आजका ।
इससेही यह जलसा सभामें हुआ उत्तम कार्जका ॥
सब एक चित्तसे बोलिये जय जयश्री जगदीशकी ।।
जय जय ब्रटीश सरकारकी जय जार्जश्री नुपवीशकी ॥
जय जय जगत्कर्ता प्रभो जय जय कोसलाधी शकी।
जय जय कही श्री कृष्णकी गोविन्दकी बज ईशकी ।
( महंत लक्ष्मणदासजी)
आनन्द, लखनऊ
भाक्त कुसुमावलि।
मुदित भारती भूमि बहु चहुं दिश करत अनन्द ।
विक्टोरिया समुद्र से उदित भयो नवचन्द ॥ १॥
जार्ज आय्ये पंचम सुभग जाकी किरण अनूप ।
छिटकी इत उत सुखद सब धारि दयो को रूप ॥ २ ।
जिनकी कृपा कटाक्षसो दुख संघ नसजाते ।
ऐसो शुभ समराट लखि कौन न हिय हर्षात ॥ ३ ॥
११०
सम्राट् शुभागमन।
कोऊ को ईरान कोऊ रूम वंश को नेम ।
पै हिन्दू सन्तान को वृटिश जाति सो प्रेम ॥ ४ ॥
हिन्दुन चिर सन्तप्त रह पाए कष्ट अपार ।
दुख महा सागर परें डूवि रहे मझधार ॥ ५ ॥
ऐसे अवसर पर सुघर विक्टोरिया सुमात ।
शासन पोत चलाय करि कियो जगत उद्धार ॥ ६ ॥
उनके पूत सपूत वर एडवरड गुण धाम ।
शान्त रूप आनन्द धन नीति रीति की खान ॥ ७॥
ऐसे पूजित वंश को अंश धारे समराट ।
प्रगट भये नररूप में पंचम जार्ज विराट ॥ ८॥
वहु कृतज्ञ भारत प्रजा क्यों न करे सत्कार ।
जिनके घर आए स्वयं राजा परम उदार ॥९॥
उनकी प्रिय सहधर्मणी मेरी मेरु समान ।
अचल दया की स्त्रोतसी रानी सुख की खान ॥ १० ॥
देखि देखि जिनकी प्रभा प्रजा मुदित आनन्द ।
करत उछाह जहां तहां विनवत परमानन्द ॥ ११ ॥
चिरंजी वै सम्राट जू रानी सहित समाज ।
इनकी सरणागत भयो भारत लाज जहाज ॥ १२ ॥
बहुत काल से राज मुख देखन की चितचाह ।
आज भई पूरित प्रगट घर घर करी उछाह ॥ १३ ॥
'हिन्दुन के वर इन्दु शुभ जार्ज महा समराट ।
जिनके चरण सरोज नित ध्यावे अगनित लाट ॥ १४ ॥
वह आए भारत अवनि मेटे शकल कलेश ।
उन कीरत की धुरि घना फहरै सुखद हमेश ॥१५॥
सम्राट् शुभागमन शिक्षा हित हित आप को बिदित भयो संसार । अर्द्ध कोटि मुद्रा दये दानी परम उदार ॥ १६ ॥ दिल्ली दिल्लूराज की फिर से बनी प्रवीन । भई राजधानी विमल धारे प्रभा नवीन ॥ १७ ॥ धन्य देश धनि धाम वह जहां प्रगट्यो नरनाथ । पंचम जार्ज महा विशद जिन किय देश सनाथ ॥ १८ ॥ बन्दी छूटे जेल के बने अनन्दी आज । देत अशीसें चित्त से चिरंजी वै सरताज ॥ १९ ॥ शिक्षा, आरा । सार छन्द । आजु लखौ चहुं दिसि भारत पे माच्यो महा अनन्दा । सुखमय मंगल साज सँवारत नगर नारि नर वृन्दा ॥ भांति भांति फरहरै फरहरे रंग विरंग पताके । ललित लरी लरकें फूलन की बनवारहु छविछाके ॥ १ ॥ भारत की प्राचीन पुरी दिल्ली जु अहै रजधानी। तहं दरबार अपार मोदमय बरनि सकै नहिं वानी ।। भारतपति पांचवें जार्ज को इत आगमन सुहायो । मुनि सुनिधाइ धाइ नृपगन अरु प्रजा परम सुख पायो॥२॥ बृटिशराज शुभराज मांहि यह आज अपूरब साजा । घर घर पुर नर नारि कहत जै जै भारत महराजा ।। चाइति चिर सो रही चित्त 'सों पुरयो आजु सो साधा । अब सनाथ जान्यो अपने को भारतभूमि अवाधा ॥ ३ ॥ अब शकुन्तला सी भारत महि विनवति तुम सों एही ।
११२ सम्राट शुभागमन । भूलौ जनि यह नेह नाथ दुष्यन्तराज सों ने ही ।। प्रजा सुतन के सुख दुख देखत चित दै सुनौ पुकारा । सुमति मनावै हमहु रावरौ सुखमय जयजय कारा ॥ ४ ॥ लावनी। गानो गाओ मिलि आजु सबै शुभ गाना । भारत में भारतराज उहि महानीला टेक॥ जै जै जगदीश्वर सकल देव सिरताजा । जै जै यह भारतराज जार्ज महराजा।। जै जै अंगरेजी राज काज सुखदाई। जै जै मेरी भारत वसुन्धरा माई ॥ जै लाट कलक्टर भूप रूप जगत्राना । गाओ गाओ मिलि आजु सबे शुभगाना ॥ भारत० जै सदा सनातन भारत धर्म सुहाई । जै सदा सचाई सने सुमति समुदाई ।। जै जै कृतज्ञता राजभक्ति उत्साहा । जै जै सुराज जै राजनीति निर्वाहा ।। जै प्रजाहितेषी हाकिम हुकुम विधाना । गाओ गाओ मिलि आजु सबै शुभगाना॥ भारत०॥२॥ मेरे महरोज धिराज है परम उदारा। मेरे महराजविराज सदो मुविचारा ॥ मेरे कृपाल ये शील सनेह संवारे । मेरे ये हैं दृढ़ नेम छेममय प्यारे । गम्भीर धीर गुन कलारोह विद्वाना।
सम्राशुभागमन। ११३ --- गाओ गाओ मिलि आजु सवै शुभ गाना || भारत० ॥३॥ इन के सुराज्य कब रबि अस्त न होही ।। इन के सुराज्य कल रेल तार मुख सोही ।। इन के सुराज्य नहिं निवलाई सबल सलावें। नहिं द्वैधरमी आपस में जंग मचावें। बेरोकटोक मजहबी नेम सब ठाना । गाओगाओ मिलि आजु सबै शुभगाना। भारत० ॥ ४ ॥ दिल्ली में महा प्रधान उन्या दरबारा । राजा रईस हुकमहुं जुरे अपारा॥ नाना उत्सव सों सजे नगर घर खोरी । वह अमरपुरी सी राजि गयी चहुं ओरी ॥ आये मेरे महराजधिराज सुजाना । गाओगाओमिलि आजु सबै शुभ गाना ॥भारत में ॥ ५ ॥ सजि धजा पताका सबै सजौ निज नेहा । सजि हाटबाट पट अटा खोरि औ खेहा ।। सजि मंगलमय घट तोरन बन्दनवारा । सजि शीश रौशनी करहु रैन उजियारा ॥ सजि मंगल वेष बजावहु नवल निशाना । गावहु गावहु मिलि आजु सबै शुभ गानो॥भारत में०॥६॥ सब मिलि व्है हर्षिन हरि सो आय मनाओ। हरि भारत सन्नाटहिं चिरजीव बनाओ। यह सदा हमन हितहीं की रुचि राखे । हमहूं कृतज्ञता राजभक्ति सुख चाख ॥ १५ सम्राट् शुभागमन। wom.vowwww आओ आओ सजि साजन सुमति सुजना । गाओगाओ मिलि आजु सवै शुभ गाना ॥ भारत में० ॥७॥ (पं. शिवप्रसाद पाण्डेय) चलो प्यारे करो स्वागत मेरे सम्राट आते हैं। यहां के रङ्क राजा सब बधाई आज गाते हैं । दिवाकर अस्त होता है नहीं सुख राज्यमें जिस के वही गुणवान राजेश्वर तुम्हें मुखडा दिखाते हैं ।। नहीं अमरावती भी कर सके समता सु दिल्लीकी । जहां पर जार्ज पञ्चम आ स्वयम् डेरा गिराते हैं । दया औ दानमें इनके बराबर कौन है जग में । गरीबांके घरों पर जा कली दिलकी खिलाते हैं । मृगों की पक्षियोंका वा मनुज की कौन गिनती है । पवन पावक जलधि परबत इन्हें जब सर भुकाते हैं ।। जहाज औ तार रेले कलकी जब सुधनेक आती है। तो कहता हूं विधाता हैं नयी दुनिया बनाते हैं । इन्हें तुम धर्मका औतार जानो अपने मन बच से । इक वाघ बकरी को सदा पानी पिलाते हैं । नहीं इनकी प्रशंसा कोइ कर सकता है भूतल जहां प्रतिभा नहीं जाती वहां अनुभव दिखाते हैं । (बाबू ब्रजनन्दन सहाय ) में।
सम्राट् , शुभागमन ।
पञ्चमजार्ज राज राजेश्वर, मेरे परम पियारे ।
अले बजेण्डरा महारानी के, नैनन के प्रिय तारे ।
सहित श्री मती मेरी प्यारी, परिजन साज संवारे ।
बड़े भाग हैं, मो घर जो करि, कृपा आजु पशु धारे ।
तुम हो दुर्लभ परम पाहुने, हम हैं परम भिखारी ।
तुमरे स्वागत योग भोग ले, क्या हम करै तयारी॥
इन दुखियन अंखियन के आंसुन तुमरो पांव पखारो।
अति अयोग, पै भक्ति पूत हिय, आसन घरों सवारो ॥
आवहु नाथ साथ पिय परिजन, यहि पै आय विराजो ।
एक प्रेम उपहार ग्रहण करि, हम पै नाथ निवाजो ।।
" श्री कवि" हाथ जोर हम विनती, करौं नाथ इक एही ।
लखि निज ओर हमें न विसारहु, जानि दोन निज नेही ।।
( पण्डित विजयानन्द त्रिपाठी )
अभ्युदय प्रयाग
प्रजा का उत्साह।
मङ्गलकामना ।
श्रीभारत सम्राट के स्वागत हित सौभाग ।
भयो प्राप्त भारत प्रजै प्रगटसि निज अनुराग ।।
श्रीनारायण तुव कृपा हमरे पंचम जार्ज ।
दीर्घायु गहि सुजस जग लहैं करें शुभ कार्ज ॥
दमोदक छन्द ।
युतं नीतिः करै निज राज्य भलौ,
गुण लोग य महाराजनु के से ।
११६
१
सम्राट् शुभागमन ।
जुरि राजसभा शिर क्षत्र धरै,
शुभ साज सजें
महराजनु
के से ।।
लवलीन पजा हितचिन्तन में,
लखि शीश लजें
महराजनु
कह सोहन हर्ष निशान सदा,
बनें
महराजनु
के से।
तिहि द्वार
के से ॥
सोरठा।
प्रभु ये विनय हमारि, करहिं राज्य चिर कास लौं।
भारत प्रजा सुखारि, ताकर छाया तर बसै ॥
( सोहन शर्मा, डिबाई )
।
सम्राट्र को बधाई ।
स्वस्ति स्वस्ति स्वस्ति आवो मेरे सम्राट् राज कैसी सुखदाई
यह रावरी अबाई है । दीन दुखियान दुख संकट टरेंगे अब, कैसी
दिन फेरि यह भाग्य उदयाई है । बरसि बरसि शुभ शिक्षा सों
प्रपूर नीति, सींचिये त्रिवेदी राज्य बाटिका मुहाई है ॥ धन्य
धन्य हस्तिनानगर तोहि धन्य धन्य, भारत में आजु तोहि घर घर
वधाई है ॥१॥
आनंदकीसीमा कही ना जाति कौन्यू भांति, भारती कहै लगै
तौहू थकि जाई है। शेष कहै पावें नहीं पार कोटि कल्पन में,
नारद की गति नहिं करिये केताई है ॥ धन्य धन्य भारत के
बासीगण आज तुम्हें, तुम्हरे शुभ देश सम्राट् की अवाई है । नगरन
में गावन में गलिन में, गैलन में, भारत में घर घर में बाजत बधाई
है ॥२॥
सम्राट् शुभागमन। ११७ vvv धन्य घरी जौनी तिथि ऐसे महाराज इत, धन्य तिथि जौनी घरी पूरण अवाई है । धन्य मास जौने वर्ष इज्जत अनेक पायो, धन्य वर्ष जामैं पग धारियो बुहाई है । धन्य धन्य वे जो अवलोके इन आखिनसो, धन्य धन्य दरशन की आशा जे लगाई है। धन्य धन्य धन्य कानन से सुने जे सुधा से वैन, धन्य धन्य बोलें जे बधाई है बधाई है ॥ ३ ॥ एहैं महाराज महारानी के समेत जानि, राख्यो रचिनीको शुभ मंडप सोहाई है । मुदित अनन्द ना उमात आजु चित्तन में, कैसी यह हर्ष फुलबाई फूलि आई है ।। लालसा लगी ही हुती पूरण भले ही भई, लखि बहु पत्रन में पूरण अवाई है। रसना यह चाहैं कछु महिमा बखान करें, श्रोण कहैं सुनें तो बधाई है बधाई है ॥ ४॥ जौ लौ नभ मंडल दिनेश विधु तारागण, जौ लो भुवि भागीरथी भानुजा मुहाई है । जौ लौ सहसानन के सीस धरा धरी रहै, जौ लौ संसार की अचल थिरताई है ॥ मारकणडेय सी उपरि दराज होय, राज जाके प्रजा मन मोद अधिकाई है । निर्मा जुगजुग दोनौ करौ राज्य कल्पकल्प, नितही बधाई है बधाई है बधाई है। ( सेठ जानकी प्रसाद) । सम्राटको बधाई धनि धनि पञ्चम जार्ज मम, धनि महरानी मात । धन्य आज शुभ दिन घरी, अजर अमर रहु तात ॥ लार्ड अरु, धन्य सेक्रेटरी स्टेट । धन्य प्रजा भारत अहै, भई स्वामि ते भेंट । धन्य हार्डिन ११८ सम्राट् शुभागमन। ।। कवित्त ।। धन्य प्रजा बंबई की सबसे निहारी पूर्व, स्टीमर 'मदीना' ते सवारी आत रावरी । नारी कहैं नरन्हि को चलो बेगि देखें हम, बोलें नर नारीह को बेगि बेगि धावरी । आनि कै बिराजी तहां मेरी महारानी साथ, निरखी अपूर्व छटा दंपति उतावरी । देवराज भाई जार्ज पञ्चम पधारे आज, सङ्ग महरानी मेरी आनन्द बधावरी ॥ १॥ ॥ दोहा॥ चारि दिवस दर्शन दिये, फिरे मात अरु सांझ । एड्रेश दिय बम्बइ नरन, रहे मदीना माझ॥ दोय दिसम्बरको भयो, शुभागमन इह ठौर । पाँच दिसम्बरको लौं रहे, रात गमन किय और ॥ स्पेशल मह जुरि गई, दश गाड़िन की जोर । महरानी महराज सह, बैठे निज निज ठौर स्टेट सेक्रेटरी पास की, गाड़िन में किये चैन । लार्ड आल सव तियन सह, बैठि गये मुख लन | कवित्त ।। सीटी दे चली है ट्रेन स्पेशल बनी है खूब, ऐं जिनह धक धक धन्य यों पुकारे हैं । सप्तम दिसम्बर के प्रात ही पधारी खूब, आनन्द तें दिल्ली,देवराज यां उचारै हैं ।
सन्नाट शुभागमन । बड़े लाट राजे महाराजे औ नव ब सेठ, साहूकार औफीसर स्टेशन पधारे हैं। स्वागत भयौ है ओज धन्य महराज मेरी, खूब ही जलूस साथ किल्ले को सिधारे हैं ॥ २ ॥ 11 सवैया । उत्सव कीन्ह अनेक यहां अरु, खेलहु देखि लिये मन भाये । फौज कवायद कीन्ह वहै, निरखी निज नैनन्हि ते चित चाये। राजन केर मिलाप भयो, सब तें कर बात हिये हरषाये । लंदन ते चलि पञ्चम जार्ज, जय ध्वनि साथ दिली महँ आये ॥३॥ उन्निस सौ सन ग्यारह ईस्वी, द्यौस दिसम्बर बारह, आयगो। मङ्गलवार किये सब मङ्गल, नॉमउ दङ्गलहू को उड़ायगो। भारतभूमि निहारति राह प्रजा जन उत्सव खूब बधायगो। पंचम जार्ज दिलीपति आज, भये सबठाँ आनन्द छायगो॥ ४ ॥ || कवित्त ॥ इन्द्रप्रस्थ हस्तिनापुर ऐसे सुनाम जाके,। अन्य बादशाह ताहि दिल्ली करि चीन्ही है। पृथ्वीराज आदि जाके हिन्दू महाराज भये, ऐसी बीर भूमि को चितारि अब लीन्ही है। नेक मंत्री मंडली को नेक मंत्र मानि जार्ज, पञ्चम सम्राट् देव दीठ धारि दीन्ही है। दिल्ली कौं फकीरौं जोग भाषी सब लोग ताकौं, राजधानी ठानि के अमीरौं जोग कीन्ही हैं ॥ ५ ॥ दिल्लीपति पादशाह केउक भये हैं यों तो,.
१२० सम्राट् शुभागमन। रावरी अनोखी बात कौनसी दिलात हैं। आजुलौं न देखी काहू बेगम विराजी तख्त, स्वामी साथ आनि प्रजा आनन्द मनात है । याही काज राजाही को कहै लोग माततात, तात साथ लाये हो हमारी महामात है वैठि कै जुगल जोरी दिल्ली राज पाय तख्त, कीन्हौं दरवार देवराज यौं लिखात है ॥६॥ श्री मुख उचारे बैन कैसे सुख देन भये, फूली फूली फिरै मजा आनन्द मनाती है । दीन्हे हैं पचास लाख, विद्यादानकाज याकौ, हर्ष है अपार बोलि मुख से जनाती है। बङ्ग को सुधार भयौ यात सब बङ्गबासी, कैसे हैं प्रसन्न एक निड्डा का गनाती है। कोऊ उपकार कीन्ह दिल्ली दरबार मांझ जियो जार्ज पञ्चम ये आसिष मनाती है ॥ ७ ॥ कौन ऐसौ ना आज भारत की भूमि पै है, जाके जिय माझ नाहि आनन्द उछाह है। जितै देखौ तित झुण्ड नारी नर बाल बच्चे सबही प्रसन्न सच्चे बाढी चित चाह है। कोऊ गये वर्ष बीति नई नई देखी नीति, अब तौ निहायौ हमारो नरनाह है। आम कौं सुनाई स्पीच पालिसी दिखाई, खूब सभी कहैं वाह वाह वाह वाह है ॥ ८ ॥ पंडित देवराज पंचानन शास्त्री )
सम्राट् शुभागमन
१२१
लक्ष्मी, गया
मुबारकबाद, कसीदा
जब तलक प्रेम चकोरीका रहै चंदापर ।
जब तलक हिन्दमे वहती रहै गंगाकीधार ।।
जब तलक प्रेम सहित लोहको खींचै चुम्बक ।
जब तलक पड़ती हिमालय पै रहै शीत तुषार ।।
जब तलक हाइडजन आकसिजन मिलमिलकर।
प्रेम संयुक्त बनाया करें शीतल जलधार ।
जब तलक सींगशशाकेनलखै बंध्यापूत ।
जब तलक शीश पै है शेषके पृथ्वीका भार ॥
जब तलक वायु बहै सूर्य सितारे चमकै ।
जब तलक रात व दिनका रहै दुनियामें प्रचार ।।
तब तलक ' जार्ज ' महाराज व रानी" मेरी"!
राज्य शुखभोग करें मोदलहैं सह परिवार ।।
चित्तमें चाह प्रजा जनकी भलाई की रहै।
न्यायमें प्रीती रहै, कार्यमें ब्यौहार उदार ।।
चिन्तना चित्तमें भारतकी भलाई की रहै ।
'दीन' भारतको मुबारकहो य दिल्ली दरबार ॥
गृह लक्ष्मी, प्रयाग
सोरठा।
जग नक्षाके" हेत, जाहि' पठायो ‘विधिबिर चि
है समुद्र - निकेतकी, विभूति
हरि रूप न र
जा के करकी छांहू, सुखीं 'मजा विपदाभ. जी
य
१२२
सम्राट् शुभागमन।
र हत सोह नरनाह, मोद मनावत नित्य न व
जल जिमि सूर सुखाड, बरसावत अमरित मन हु
पंडित-नृपकर पाइ, त्यहि प्रजा पालत ध रा
च तुर भूप असजानि, सुनेउ मजा प्रतिनिधि अर ज
म हादान अनुमानि विद्याहित दिये द्रव्य व हु
नृ पको प्रवल प्रताप, जय जस विमल कवींद्र भ जु
प रकाशत विनुताप, चहुं दिप्ति तो निहुंकाल ज ग
ति हूं लोकके माहिं, नहिं जनम्यो बैरी प्रब ल
ज गत जगह असनाहि, जहन छ ई तत्र जस प्र भा
य है। कहव फर आहि, तव राज्यहिं आठौं पह र
मे हमानी जनु खोहि, नहि.अथवत रवि नितरह त
री ति नृपनकी येह, हरै सदा दुखदीन के
म न करुणा को गेंह, दया द्रवै दुखके दर सु
ह रि निज देश दुरास, करि प्रबन्ध बहु देहि सु ख
रा खत हिये हुलास, निज अरु रय्यत के स दा
नि त विनवत युगपानि, जोरि हरिहि कवि सीसम नि
( राज्य भट्ट)
कवित्त
राजै दिनेश अकाश जितेदिन जन्हु सुताजलधार घनेरी।
मध्यमही हिमशैल रहै, जवलौं धरतीकि करै शशिफेरी।
दानी दयानिधिको विनबौं, प्रभु ! जीवें सुखी वरसैं बहुतेरी ।
सज्जन-नायक जार्ज महीपति मेरी सुरानि गुसाइनि मेरी।
सम्राट् शुभागमन
दोहा
गौरी सुत विघनन हरें, मंगलदेहिं महेश ।
डगै पैजनहिं पुहुमि पै. मुद्रह करै अचलेश ।।
रहै प्रताप दिनेश सम, सकल भुवन यहछोय ॥
सव सुरनर शुभ करनमें, तुम्हरे होहि सहाय ।।
(शिवाधीन ब्रह्मभट्ट)
भूमिहार ब्राह्मण पत्रिका, छपरा
सम्राटका स्वागत
जारज पञ्चम राज महान, ब्रिटन देशके अत्र भवान ।
पत्नी मेरी सहित स्वकीय, पुरुष प्रकृत जनु कियो द्वितीय ।
आवत भारत चन्द्र समान, उमहत नयन सकल निजमान ।
दैव होत जब परम दयाल, पावत दर्शन प्रजा भुआळ ।
गुरुजन परम तोषको पाय, देते दर्शन लघु गृह आय ।
ऐसा आया अवसर जान, भारत भाग्य लिखा कल्यान ।
धर्म राजने स्वानुष्ठान, साधा जहां परम मनमान ।
उसी दिल्लीके भीतर आज, रहा वधावा मङ्गल वाज ।
देश देशके नृपति स्वाधीन, जाते वहां प्रेम मन भीन :
प्रान्त प्रान्तके सूवेदार, जाय रहे हैं सब तैयार ।
भारतका यह सुभ संयोग, स्वर्णाक्षरमें लिखने योग।
.
.
सम्राट् शुभागमन ।
सरस्वती-प्रयाग
दरबारदर्शन ।
१-नगरसे कई मील था दूर बसा भारी दरबारी कैम्प ।
निशामें देतेथे वां चारु छटा बिजलीके अगणित लैम्प ॥
महाराजा ओंके छविवन्त रावटी, तम्बू और वितान ।
सजेथे थोडीथोडी दूर, धन्य वह दिल्लीका मैदान ।।
२-जहांथा किसी समय सुनसान, वहां है वस्ती शोभा-धाम।
दिया जलताथा जहां न एक वहांसे तम हटगया तमाम ||
जहांपर रहतेथे न किसान वहां हैं भूपेोके रनवास ।
विहंगमबोले जहां कुशब्द, रसायन गायन हैं सुखरास ।।
३-गवरनर जनरल आदिक उच्च कर्मचारी कमाण्डर चीफ ।
बड़े आदरके रूलिंग चीफ महाराजा, नौबाब, शरीफ ॥
धनी हिंदुस्तानी अंगरेज, बिलूचिस्तानी, वर्मीलोग ।
सिकिम भूटान-चीन-जपान-निवासी-गण क,था संयोग।
४-वस्त्रही की बसतीमें भूप जार्ज पञ्चमका था सुखवास ।
सहित श्री मेरी हृदय उदार राज-रानी श्री-शील-निवास ॥
नहोगी कुछभी अनुचित उक्तिकहूंजोमै करके कुछ मर्व ।
जगतके धन-बल-यश-सौदर्य पधारे हुए वहींथे सर्व ।।
५-प्रातसे अर्धरात पर्यन्त लगा रहताथा ताता तोर ।
फिटन,टांगे अरु मोटरकार-"टनन्""""चलोबचो"काशो॥
तीर्थमें पर्वसमय जन-वृन्द यथा जुड़ते हैं संख्यातीत ।
हुई त्यों भारत-प्रजा-प्रजेन्द्र-सन्धि-संक्रान्ति अनूप प्रतीत ॥
६-डाकघर, रेल, तार, नलनीर, सभीका था पूरा आराम ।
सकल दिन घूम घामकर लोग रातको जातेथे निज धाम ।।
-
सन्नाट शुभागमन । १२५ सभी भूलेथे सारे काज यही कहतेथे " भाई! आज | गयेथक करते करते सैर पुनः अब देखेंगे कल साज ॥ ७-भूप-एडवर्ड-मिमोरियल-कृत्य,खेल पोलो,'हाकी, फुटबाल । "फैजिको रंगोंका उपहार," चर्च में "सर्विस" आदि विशाल || हुए जो अवसर उनमें भूप हमारे आये गये सहर्ष । मजाने पाये वार अनेक राज दम्पति-दर्शन-उत्कर्ष ॥ ८-" वादशाही" मेलेका दृश्य प्रजा-दल-रजन था भरपूर । सभीने देखे होकर पास राज दम्पति-हुजुर पुरनूर ।। सातसेले सोलह-पर्यन्त रहे दिल्लीमें भारत-भूप । जयन्ती रही महा-मुद-पात्र यथा अवसर नवरात्र अनूप ।। (राय देवीप्रसाद, पूर्ण ) श्री भारतेश्वराष्टकम् [ स्फुट पद्य] श्री मद्पाल मणिमौक्तिक कण्ठमाल । है सर्व-भौम नृप भारतवर्ष-पाल ॥ नीतिज्ञ सर्व गुणयुक्त ' सुधर्म । धीर । श्री जार्ज पंचम महाशय दोन वीर ॥१॥ प्रभु वर तव कीर्तिः मैं कहां लो बखानू । परम सुखद राज्यं पायके हर्ष मानू ॥ नृप बहुत भये हैं भूमि तेज धारी। नहि सब विध शान्ति थी पूजा में सुखारी ॥ २॥ था राज्य काल, मुगलान, महादुखारी।
१२६ सम्राट् शुभागमैन । देते अनेक विध कष्ट, सदा अपारी ॥ नीतिज्ञ विप्र-निज नेम, जिन्हें न भाते । कर्ते उपद्रव विशेष हिये सुहाते ॥३॥ कीन्ही अनेक थल में प्रभु ! मूर्ति भंग । इस्लामि धर्म हित कीन्ह अनेक जंग थी पूर्ण दुःख सहिता, अबला विचारी। चीन्ही न पुत्रि नयते हियमें सुधारी ॥ ४ ॥ हा हा प्रजा करत नित्य, सुने न कोई। दीन्हां अनेक जनने, निज प्राण खोई ॥ नोभी न शान्ति भइ, भारत भो दुखारो। ये सत्य बात हियमें, सबही विचारो ॥ ५ ॥ हा हा सुनो सकल को, प्रभु आर्तनाद । कीन्हो यथा मकर तें गज में प्रसाद ॥ वैसे भयो ब्रिटिश राज, सुचक्रधारी । आनन्द शान्ति भइ हैं, सब को सुखारी ॥ ६ ॥ विद्या प्रचार तब, राज्य विषे अपार । कीन्ही कला जगत में, अतिही प्रचार । होके प्रवीण सब दें, हियतें अशीश । दीर्घायु होउ नृप ! भारत के अधीश ॥ ७ ॥ दानी परमदयालु । स्वधर्म रागी परोपकारी है ॥ श्री चक्रवति नृपकी । आयुः कीर्ति स्सदा बढो जगमें ॥८॥ विष्णु चरण अनुरागी । मालव रत्नावती-निवासी है। मदनराज श्रीमाली । हेतू सुत ने समर्पिपा कविता ॥ ९॥ ( पण्डित मदनराज श्रीमाली रतलाम.) .
सम्राट् शुभागमन । १२७ कवित धनाक्षरी द्वादस दिसम्बर ओनीससतरूद्र सन सहज हिवेरे सब लोगन विसारे हैं ॥ महाराज पंचम जार्ज राज्य अभिषेक मुनि हिलमिल आपुसमें प्रेमपर चारे हैं ॥ असन बसन बहुदान दै गरी- वनको मंगलप्रसाद रातरोसनी सवारे हैं ॥ जोवै जुगजुग सुख दीवै दोन भारतको कविता प्रवीन यह आसिप उचारे हैं ॥ । सवैया ॥ साज समाज सुराज्यकरो जालौनभमूरज चन्द्र निसानी ॥ वंस तुम्हार अपार बढ़े यह आसिष मंगल दीन वखानी। सत्रु रहैं न जहान कोई भगवान क्रपाते सुनो सुखदानी ।। पंचम जार्ज महीपति पै अनुकूल सदा जगदन्न भवानी ॥ (पं. मंगलदीन उपाध्याय, राजापुर-बादा) आशिरवाद । जुग जुग जीवो पञ्चम जार्ज टेक- महारानी नित रहो अनन्दमें और सबी युवराज । इस भारतके तुम रखवारे, तुम हमरी आंखनके तारे जुग जुग जीवो ॥१॥ नित सत्रनको विजप करो तुम भारतको दुख दरद हरो तुम राखो शरणागतकी लाज, जुग जुग जीवो ॥२॥ विजय नगारे बजो तुमारे' सुन सुन कर हम होय सुखारे दिल्ली अटल रहो तवराज, जुगजुग जीवो ॥ ३ ॥ तुमतो होगे पाण्डव प्यारे माघों कहिये सखा तुम्हारे मेरी और महाराज, १२८ सम्राशुभागमन। , युधिष्टिर संग यथा वृजराज, जुगजुमः जीवो ॥ ४ ॥ भारत बासिन की यह इच्छा इश्वर करे आपकी रक्षा रहो सदा जैसे ही आज, जुगजुग जीवो ॥२॥ आप नृपन सङ्गसोहो ऐसे देवन सङ्ग पुरन्दर जैसे इन्द्र प्रस्थ लख सुरपुर लाज, जुगजुा जीवो ॥ ६ ॥ आप राम प्रतिनिधि स्वरूप हैं महारानी जानकी रूप हैं लवकुश सद्स सबी युवराज रामनाथ दोऊकर जोरी हे वृजेन्द्र यह विनती मोरी अटल रर्दै जारज सिरताज, जुगजा जीवो पञ्चम जार्ज ॥५॥ ( रामनाथ लशकर, ग्वालियर स्टेट ) जुगजुग जीवो ।। ७। lun ""
सम्राट् शुभागमन ।
१२९
बुद्धीप्रकाश अमदाबाद
अभिषकाष्टक,
[गुजराती पद्य]
हरिगीत.
दरबार दिल्लीमां हवो, द्वादशी अकादश अकनी,
अगीआर ओगणी अडसटी, द्वय साल अ अभिषेकनी;
महाराणी मेरीने मळो, हमेश दिन सुख मोजनो,
आ जग विषे वळी जुग जुगे, जय थजो पंचम ज्योर्जनो. १
जेहना प्रौढ प्रतापथी, सुख शांति स्थिरता पामिया,
जेहना निर्मळ न्यायथी, अन्याय विग्रह वामिया
ते देशना महाराजनो, जयकार उचरो सौ जनो,
आ जग विषे वळी जुग जुगे, जय थजो पंचम ज्योर्जनो. २
" रैयत सुखे सुखीयां अमे, " शुभ मुत्र जे वडियाइनु,
पाब्यु पिताए प्रेमथी, ते समजीने सुखदायर्नु
ते पाळवानो धर्म पोते, मानता बहु बोजनो,
आ जग विषे वळी जुग जुगे, जय थजो पंचम ज्योर्जनो. ३
सुख आप, दुःख कापवं वळी पाळवू पण आपणु,
छे क्षात्रतानी पात्रता, सुपात्रने सवलं घj
ते काज सधळां काज करवा,राज नियमज रोजनो,
आ जग विषे वळी जुग जुगे, जय थजो पंचम. ज्योर्जनो, ४
,
१३०
सम्राट् शुभागमन ।
विद्या विष व्यासंग राखी, राज रीति नीतिने,
प्रीति थकी जे पामिया, समजी सकज कळ स्थितिने;
अभ्यास कीधो कष्टथी, नाविक नौका फोजनो,
आ जग विषे वळी जुग जुगे, जय थजो पंचम ज्योजनो. ५
परियटन पृथ्वी पर कयु, वळी अटन हिंदुस्तानन,
महाराज राणा राजवीनी, भेठ ए कृत्य माननु;
खरी रीति भाति जाणवाने, लाभ लीधो खोजनो,
आ जग विषे वळी जुग जुगे, जय थजो पंचम जार्जनो ६
कीधा सुधारा ने वधार्या लोकना हक राजमां,
नीति नियमो न्याय नियमितपणु, सघळा काजमां;
अंग्रेजनी ए खुबीए, प्रसों प्रतापज राजनो
आ जग विषे वळी जुग जुगे, जय थजो पंचम ज्योर्जनो. ७
जड जुलम ने अज्ञान केरी, काढी झाडी झाडीने,
विज्ञान करी सौ जातने, बहु भात शाळा काढीने,
शुं वखत विद्या वृद्धिनो आ, जनक विक्रम भोजनो ?
आ जग विषे वळी जुग जुगे, जय थजो पंचम ज्योर्जनो.८
दोहरे.
महाराजा महाराणीने, देजे सुख जगदिश,
मळी मंडळी दरबारमां, आपे छे आशीश.
( H. D. K.)
महीकाठां रेवाकाठा गजेट, अमदाबाद,
गायन.
बादशाही द्रढे ब्रीटीश राज्यनी, रसिक हिन्ह अंदर रहेजो;-टेक०
-
सन्नाटू शुभागमन ।
शहेनशाह पांचमा ज्योजने, दीर्घ आयु इश्वर देजो.
जेना अमलनी थतां जमावट, भागी जोर जुल्मनी भीतिः
प्रचलित थइ छे पुण्य प्रभावे, निर्मळ सहुस्थळमां नीति;
विश्वमही वखणाइ रही छे, राजकीय जेनी रीति. बादशाहो.
तेज भर्यो प्रभु ताज हिन्दनो, एने शिर अविचळ राखो;
भारतनां संतान भलां फळ, एना अमल तळे चाखो;
उन्नति थाजो केशव एनी, अवनीमां आ भव आखो. बाद .
( बारोट केशवलाल श्यामजी.)
,
धन्त्रतरी, विसनगर
विश्वे पंचम ज्यॉर्ज भूपति तणी गादी
रहो शाश्वती.
( शार्दूलविक्रीडित वृत्त.)
आनंदाद्र प्रजातणांहृदय छे, शु दृष्टि आनंदनी ?
खातिविंदुसुधाथी चातकतणी संपूर्ण इच्छा बनी;
शांति सांथ महोत्सवे वसुमती हर्षस्वरे गाजती,
विश्वे पंचम ज्यॉर्ज भूपति तणी गादी रहो शाश्वती. १
विद्यावृद्धि खिली रही भूमिपरे, शुं पूर्णिमांचंद्रिका ?
विद्याद्वार ग्रही सुधारस मुखी भासे भली भूमिका;
सूर्ये जेम सरोज तेम सहुनी सद्बुद्धि विकासती,
विश्वे पंचम ज्यार्ज भूपति तशी गादी रहो शाश्वती. २
स्पी वासित वृक्ष वायुलहरी दिशा दशे व्यापती,
ठामे ठाम तमाम सेम जगमा ख्याति सदा जामती
w
१३२
सम्राट् शुभागमन !
शांति शीतळ राज्यछायनी नीचे आर्यप्रजा पामती,
विश्व पंचम ज्याज भूपति तणी गादी रहो शाश्वती. ३
पाळे सर्व प्रजा धरी हृदयमां द्विरेफपद्म प्रीति,
जग्ते कार्यकळा समाज सकळे छे न्याय नीति रीति;
पामे हुन्नर वृद्धि जेम व्रतति फाले वसंते अति.
विश्वे पंचम ज्याज भूपति तणी गादी रहो शाश्वती. ४
वर्षामां सरति सरित सरखी आत्मे दया सा वशी,
न्याये घातक चोर जेम गगने निस्तेज सूर्ये शशी;
पक्षे कृष्ण शशीकळाक्षय समी शत्रु दशा दीसती,
विश्वे पंचम ज्यॉर्ज भूपति तणी गदी रहो शाश्वती. ५
रिद्धि सिद्धि महान शक्ति जगमा सर्वोपरी पामजो,
शत्रुओ शिर नामी पाय पडता सामासहू आवजो;
खंडे खंड अखंड राज्यनी धजा जगते रहो उडती,
विश्वे पंचम ज्याज भूपति तणी गादी रहो शाश्वती. ६
जेवा शांति सुखे सहु उजवीए राज्याभिषेकोत्सवो;
तेवा श्वेत अने सुवर्णज हजो चिंतामणी उत्सवो;
दीर्घायषी रहो महा सुखमही देवांशी पृथ्वीपति,
विश्व पंचम ज्याज भूपति तणी गादी रहो शाश्वती. ७
( महासुखभाई चुनीलाल, विसनगर )
कड़वाविजय, विरमगाम
दील्ली दरबार प्रसंग तथा प्रभू प्रार्थना.
दोहरा.
वंदी आ अवसरं विभूः उच्चरुं धरी उत्साह:
सम्राट्.शुभागमन ।
-
,
राज्याख्वपदे थया, भारत शाहनशाह.
सन ओगणिअगिआर शुभ महिनो तारिख बार;
वळी शुभ मंगळवार दिन, दील्लीनो दरबार.
( सवैया-एकत्रीसा.)
दील्ली आ अवसर अलबेली, इंद्रपुरीसम बनी अनूप,
ताज धरी शिर आज विराज्या, जोर्ज पांचमा ईंद्र स्वरुप:
श्री शाहनशा 'वानुमेरी , संगे इंद्राणी अनुसार,
उचरे आर्य प्रजा उछरंगे, जोर्ज पांचमानो जयकार,
भारतना सहु भूप पधार्या, युरोपना आव्या उमराव.
अरजदारो सरदारो आव्या, दीप्यो देवंशी दरबार.
उचरे आर्य प्रजा उछरंगे, जोर्ज पांचमानो जयकार.
नाथ निरंजन भवभयभंजन, करी मन रंजन पूर्या कोड,
आप क्रपाथी आंहि पधारी शाहनशाह तणी शुभ जोड;
क्रिया ताज पोषीनी कीधी, शुभ रीते पाम्यो सत्कार.
उचरे आर्य प्रजा उछरंगे, जोर्ज पांचमानो जयकार.
भाग्यवंत भारतने मळीआ. स्वामी परमेश्वरना अंश,
शाणी म्हाराणी जाणीती, विक्टोरिआ माताना वंश
सूत सातमा एडवर्डना, हाल थया छे ते हकदार,
उचरे आर्य प्रजा उछरंगे, जोर्ज पांचमानो जयकार.
आखो हिंद बन्यो आनंदित, सर्व स्थळो दीशे सुखकंद,
भाषे सघळां शहेर शुषोभित, मंगळगान को जन बंदः
विजय वावटा चोदिश चमके, ब्रिटिश राज्यनी छे बलिहार,
उचर आर्य मजा उछरंगे, जोर्ज पांचपानो जयकार.
जुलमी कंइक प्रथमना राजा, देता स्यतने बहु दुःख,
NNI AN.AM
vvvvvv\\ \ : 1tr/vv , , , , ,
१३४
सम्राट् शुभागमन।
राम राज्य सम आज राज्यमां, सर्व प्रजा पामे छे सूख;
धर्म कर्म धन विषे स्वतंतर, रहे निरंतर नर में
नार,
उचरे आर्य मजा उछरंगे; जोर्ज पांचमानो जयकार.
इंग्लिश राज्य थवाथी अहिआं, प्रजा केळवणी पामी बेश,
विद्या हुन्नर वध्यां विशेषे, वळी उन्नती थाय विशेषः
सर्व कोम संपीने चाले, अदल न्याय आपे सरकार,
उचरे आर्य प्रजा उछरंगे, जो पांचमानो जयकार.
न्यायी आ नरवरखें निशदिन, रक्षण करजो हे जगराय.
मित्र पूत्र परिवार सहोदर, सुख शांतिथी रहे सदाय,
दिर्घायुष्य दईदुख हरजो, वंश तणो करजो विस्तार.
उचरे आर्य प्रजा उछरंगे, जोर्ज पांचमानो जयकार.
दुश्मन दीनता दारिद्रता डर, रोग दोष सहु करजो दूर,
कळा कुशलता कीर्ति कांत्ति, भाव धरी करजो भरपूर;
राजताज सुखसाज वधारी, भरजो लक्ष्मीथी भंडार,
उचरे आर्य प्रजा उछरंगे, जार्ज पांचमानो जयकार.
बुद्धिवंत बळवंत वनावो, करे सदा हितकारी काम,
गुणियल कविवरो गुण गाइ, देश बधे दीपावो नामः
मजा पूत्रसम गणीने पाळे, हक लायक आपे निरधार,
उचरे आर्य प्रजा उछरंगे, जोर्ज पांचमानो जयकार.
मन वांच्छीत महोत्सव इश्वर, पूरण कीधो रुडीपेर,
दान मान सन्मानो दीयां म्माराजाए आणी म्हेर;
निर्विध्ने निज देश सिधावे, करुणा ए करजी किरतार,
उचरे आर्य प्रजा उछरंगे, जोर्ज पांचमानो जयकार.
सम्राट् शुभागमन
राज्य अविचळ अमपर राखी सकळ मनोरथ करजो सिद्ध,
प्रजापाळ भूपाळ अमारा, पूरण रीते थाय प्रसिद्ध
छगन" वचन श्रवणे प्रभु धरजो, एज अमारा छे उदगार,
उचरे आर्य प्रजा उछरंगे,जोर्ज पांचमानो जयकार.
मुम्बई समाचार, मुंबई
भुजंगी।
अहो देवना देव आनंद दाता, अमारा खरा आप छो मात्र त्राता;
अमारी रुडी याचना आ स्वीकारो, भला ज्यॉर्जनी कीती विश्वे वधारो
अमारी अने एमनी भावनाओ, तमारी कृपाथी सदा पुर्ण थाओ;
अमारा भला भावमां आप व्यापो भला ज्याजने कीर्ती आयुष्य आपो
महाराणी मेरी वळी साथ आव्यां, प्रजाए पुरा प्रेम पुष्पे वधाव्या;
तमे हस्त बेने शीरे नाथ स्थापो, भला ज्यार्जने कीती आयुष्य आपो.
,
वसंत तीलका छंद.
ईद्रासने अवनीमां नीज पाद धारी,
भुपेंद्र जार्ज जगनो लइ नीज स्वारी;
हैये धरी हरपने हींदमां पधारे,
पुष्पो लइ मीयवदी जन सौ वधावे.
पुजे प्रजा नरपती अती नेह आणी.
साथे उभां सती समा गुणी मेरी राणी
शोभी रहे सुरपती सुर मध्य जेम,
नीर्खा तमे नृपमणी जन मध्म तेमः
कुन्ता कुमार सम छे बलमां बलीष्ट,
सम्राट् शुभागमन ।
इच्छे सदा रैयतनुं नीषदीन इष्ट.
सत्ये बीजो शीवीसमो करजोज सेवा,
राजेद्र जार्ज दीसता जगनाज देवा.
आजे जुवो अहीं रुडा भुप भोज आव्या,
मुर्ती बीजी वीषे धरीनेज लाव्या;
आदीत्य ईंग्लंडतणो चळकी रह्यो छे,
स्पर्धा करी पृथवीमां स्थीर ते थयो छे.
जेवा रुडा रघुपती रथमां बीराजे,
भुपेंद्रने नीरखवा जन सर्व गाजे
नेत्रोतणी- नीमीपने बळी चुकी जातां;
उत्सुक ते अती वनी युथमा भराता.
आमात्य उत्तम सहु नीज पास उभा,
वीवेकने वीनयथी बळी शहेर सुवा;
वातु करे वीगतथी लइ तार तंत्रो.
मंत्री करे मसलतो मुकीनेज मंत्रो,
हीन्दी प्रजा हरषथी अहीं सौ उभी छे.
भकतीतणा भुवनमा नीरखी रही छे
वीश्वांस ने वचनथी धरी पुर्ण प्यार,
द्रष्टी दयातणी करो कहु हे नुपाल.
हे भुप जार्ज, जगमी यशनेज लेजो,
कील्लो रुडो कीरतीनो नकी बांधी देजो
ख्याती रहे खलकमां, नही जाय नाम,
आशीप अंतर थकी दुरगाज राम.
( दुर्गाशंकर हरिशंकर व्यास-महुवा )
Amature
सम्राट् शुभागमन ।
१३७
मुंबई समाचार, मुंबई।
पद्य।
आ ! दीव्य गान साथे बहु क्यम पुष्प टी थाय छे ?
भारत वीषे आनंदमां जन बहु क्यम देखाय छे ?
शीद हर्ष बहु उभराय आ ? रसरंग आशा कारणे ?
रे ! आज भारतनो पनोतो पीय आवे बारणे.
सौ भारत नीवासी स्नेह थापी पुंज कंकु भरी लावजो,
महा अमर कीर्ती श्रीफळ साथे मोती बहु जमावजो;
रे! धन्य भारत मात आजे जाय प्रीय वधाववा,
ते साथ चालो सर्व आपण राज्यभक्ती बताववा.
अमृत पद तम पुजवाने कयु नथी कंइए अमे,
तदपी मानो प्रेम प्रजानो दीव्य अंतरथी तमे;
दातार पीता छो अमारा एम जाणी उर फुलीये,
व्हाला ! पधारो बारणे तम दर्शने दुःख भुलीये.
तम राज्य अमपर तपो नीशदीन दीव्य आ प्रकाशमां
तम आत्म वृत आहाल्लादथी गुंथो अमारा श्वासमां
हे ! पीता माता ! आत्मनां अम नमन आ स्वीकारजो,
तम भावपूर्ण शुछत्र शीरपर हमारा धारजो;
दीनरात कंचन मजा साथ वीनती करे छे हे प्रभु !
जुग जुग जीवाडो ज्योर्जने करवा अमल अमपर वीभु.
( कंचनलाल छगनलाल बक्षी-नांदोट )
10
सम्राटू शुभागमन।
PWM
.
राग प्रभात.
आज मुंबइनां, भाग्य उदय थयां, भाळीने भुपती ज्योर्ज राजा,
ताप त्रीवीधीना, सर्व आजे टळयां, सांभळी ज्योर्जनां गीत वाजां.
लोक टोळे मळी, जाय छे दर्शने, हींदना स्वामी श्री ज्योर्ज केरा,
सर्व उत्साहमां, प्रेम धेला बन्यां, दर्शने हर्ष पामी घणेरा. १
दोहरा ( साखी.)
गृह गण शोभे भानुथी, नीशा शशी सुखदाइ;
शोभे राजा-ज्योर्जथी, मनहर आ मुंबाइ.
मनहर छंद.
देवराज ईद्र जेम, सुरनी समाज मध्य,
ताज तणा तेजथी समाजने शोभावतो,
राज तणा राज, महाराज ज्योर्ज राज तणो,
ताज आज मुंबइना, साजने दीपावतो,
भुली कामकाज महाराज तणा "झाझ" मध्य,
प्रजा वर्ग प्रेम थकी, द्रगने दोडावतो.
सुरनी समेत आसमानमा अद्रष्य रही,
ईद्रराज आज अत्र पुष्प वरसावतो.
दोहरा (साखी.)
जेम पतीने पामता, सजे नार शणगार,
प्रजा भुपने भाळतां, हैडे हर्ष अपार.
अवीचळ हो अवनी परे, राज्य, अने शुभ ताज,
जगमा जश पामी, घणु-जीवो ज्योर्ज महाराज.,
( अंबालाल लज्याशंकर आचार्य पाटण-गुजरात.)
सम्राट् शुभागमन
१३९
मालीनी.
धन्य धन्य धन्य उग्यो मुर्य हेमंतनो ?
रवी नीज कर हेमे आजनो शोभतो शू?
धन्य धन्य धन्य आवे हीदनो नाथ प्यारो,
झटपट झट राजा पांचमाजी पधारो. १
धन्य धन्य धन्य धाएं हीत हैये प्रजार्नु,
अचळ अमल जामो वाक्य ए छे मजान
अखील जग्तमां आ राजनो न्याय सारो,
झटपट झट राजा पांचमाजी पधारो. २
सवैया.
भरतखंडना भुप पधारो, मजा तमारी करे प्रणाम,
मुंबापुरीमा प्रथम पधारी, थजो पनोता देश तमाम,
प्रजाहितमा खुब खरचजो, आज आपर्नु तन मन धन,
भले पधार्या भुप हींदना, ज्योज पांचमा ओ राजन. १
नीती नामनुं नाव बनावी, न्याय धर्मनो धरजो सढ,
दया तणो दरबार भरीने, खुब दीपावो दील्लीगढ,
मजा उपरे पीता तणा जे, धर्म पाळवा करो मनन,
भले पधार्या भुप हीदना, ज्योर्ज पांचमा ओ राजन, २
आप पीताने पीता महीनो, शीलो पकडजो ओ राजन,
पुनः वारमा हीद आवता, नाम दीपावो आ राजन,
करी जातरा आर्य वृतनी, पुण्यदानमां धरजो मन,
भले पधार्मा भुप हौंदना, ज्योज पांचमा ओ राजन. ३
वीव विभु ओ वीश्व वीधाता, अम उपर कंइ करजो मेर,
आज हमारा शहनशाहना, सकळ शत्रुने करो ठेर,
-
6
१४०
सम्राट् शुभागमन।
शुभ दीसे छे राज एमर्नु, बधा राजमां वधो वजन,
भले पधार्या भुप हींदना, ज्योज पांचमा ओ राजन. ४
सत्य तेजना बळे प्रकाशो, प्रथम पोरज्यम प्रगटे भाण,
बधी प्रजाने पडे आकरां, माफ करो सउ एवां दाण,
धर्मरायनी धजा फरकजो, आ देशे परदेश गगन,
भले पधार्या भुप हीदना, ज्योन पांचमा ओ राजन. ५
( जटांशकर अळवेश्वर, त्रीवेदी.)
हरीगीत छंद
स्वीकारजो प्रभु प्रार्थना, करे हींद बाळको आजनी,
आश उरमां एवी नीशदीन अचळता रहे ताजनी.
महाराज ज्योर्ज पांचमानी आयु बहु लंबावजो,
अम भरतवासीओ सहु परे नीत्य ताज तेज तपावजो. १
अम हृदयमां आनंद वाध्यो आजनो कंइ अती घणो,
वरणाय नही स्वमुखे तेह आनंदनो सागर गणो.
दरशन दुर्लभ जे हतां तेह आप तो आवी मळ्या,
वधु बाळको आशु वदे, अम हृदय तेथी उछळ्यां. २
नीती अने प्रीती बतावी दील दया बहु लावतां,
अम बाळकोने नीज गण्या श्री हस्तीनापुर आवतां.
झा देशने गणी आपनो ने बाळको अम अपनां,
नहीं दोष जुओ अमतणा हे ! ज्योर्ज राजा पांचमा ३
प्रजा प्रीतेथी हीन्दनी प्रेमे प्रणमे आपने,
ब्रीटीश न्यायी राज्यमां स्वतंत्र पाडी छापने.
हींद गादी हस्त करीने चक्रवर्ती पद पामीयां,
सम्राट् शुभागमन ।. १४१
कर्या कार्य परमार्थी घणां जेथी जुगे जश जामीयां. ४
तम दरशने अम दीलमां कंइ नुतन तेज प्रगटावीयुं,
दुष्काळे दूरखी देशने सुख स्वप्न तो देखाडीयु.
तम भावी मुखनी आश राखे देशना आ बाळको,
शुभ कार्य करवा स्हाय थाये आपने दुःख टाळको. ५
भरतखंडनी भुमी फळ द्रुप रमणीय ने रसाळ छे,
समृद्धी सहु तेमां भरेली ग्रहे-नारा क्यांज छे ?
कळा-कौशल्यथी करीने भुमी आ खेडावशो,
महाराज ज्योर्ज पांचमा सुखो अमुलां आपशो. ६
तम-प्रशंसा अम मुखथी वरणी न जाय हे ! राजवी ?
देखोडीयुं तेवु व्हाल राखो अम परे हे ! राजवी.
वीवेकमां कंइ दोष जाणो लेश नही हृदये धरो
कहेवाइए बाळक तम तणां मीठी नझर तेथी करो. ७
सह कुटुंब सुखीयां थइ जुग जुग जीवोने शहेनशाह,
तख्त साथे इश आपने अचळ राखे पादशाह.
होय रीपु नाश थाये फरी नही जन्म कदा,
इच्छीए उरथी एटलु तम सुखमां रहोने सदा. ८
( लालजी केशवजी जोड्यावाळा, करांची )
सत्यविजय, अमदाबाद.
राज्याभिषेक प्रसंगर्नु यशोगान.
सदा नृप ज्योर्ज जगमांहि, दयानां बहु करो कार्यो;
मजापर प्रेम राखीने, दीपावो शहेनशाहीने
२ ३ ४ सम्राट् शुभागमन । गरीबोनां हृदय ल्हुशो, गरीबोनां हरो दुःखो; निहाळी ऐक्य दृष्टिथी, दीपावो शहेनशाहीने. करो परमार्थनां कार्यो, हृहयमां साम्यने धारी; वधारी सृष्टिमां शान्ति, दीपावो शहेनशाहीने. भलामां भाग लेवाने, जीवन सघल वहो निर्मल प्रजानां दुःख छेदीने, दीपावो शहेनशाहीने. सदा रहो राज्यमा शान्ति, प्रजामांहि रहो शान्ति दयाना मेघ वर्षाची, दीपायो शहेनशाहीने. प्रजाथी शोभतो राजा, उडुगणमां यथा चन्द्रज; प्रजापर रहेम राखीने, दीपावो शहेनशाहीने. सदा सद्गुणथी शोभो, तमारु दील दुनियामां; पशु पंखी बचावीने, दीपावो शहेनशाहीने. सकलने न्याय छे सरखो, मनुष्योनुं करो रक्षण; प्रतापी पुण्यना योगे, दीपावो शहेनशाहीने. सकल भारततणा जैनो, सफरमा शान्तिने इच्छे बुद्धयब्धि " धर्मना लाभे दीपावो शहेनशाहीने. ९ w ८ hun लोकमित्र, खानपुर. प्रशीस्त. नृप-गण-मणि-भूषा चक्रवर्ती नृपाल । अवन करिं प्रजेचं तातसा हीस पाल || सकल गुण निधी तूं राजनीतिज्ञहोसी । चतुर, कुशलज्ञाता, सौख्य देगा अम्हांसी ॥१॥ मुदित, भरत-भर्मी जाहली धन्य वाटे।
सम्राट् शुभागमन। १४३ तब चरण-धुलीने राहिले दैन्य कोठे? ॥ भुवनि निशि तमाचा वास जो इन्दु नाहीं । निशिपति उदयाये चद्रिका केविं राही ॥२॥ तब धवल यशाचा दुंदुभी घोष होवो। खल अरि समुदाया कंपत्वन्नाम देवो ॥ अतुल विभवभोगें पुत्र-दारे-सहीत । सदनि तव रमेचा बास होवो नितांत ॥३॥ मरिचि न कर्षि लोपे राज्य सेसे अफाट । पवन, सलिल, वन्ही, जाहले कीर्ति-भाठ ॥ तुज सम नृप कोठे नाहिं सारया महीत । प्रभु-वर बहुदेवो आयु, ठेवो सुखांत ॥ ४ ॥ (आंकार भटुजोशी-पाचोरा) गुजराती, मुंबई. राजगीत. दोहरा अने हरिंगीत १ अहोभाग्य ! देशना. शिरपर घरवा ताज, आज पधारे हिन्दमां, चक्रवर्ति महाराज. महाराज आज पधारतां आनंद मंगल थाप छे, घर घर विषे सौ हरखमां आजे अहो ! उभराय छे; १ इस पद्यके लिये लेखकको १९० ) रु. का पुरुष्कार रा. रा. जहांगीरशाह अ, तालियारखान के तरफसे मुंबईमे मिला
१४४
सन्नाट शुभागमन।
छलकाय छे उर सर्वनां-नरनारीनां हांसे अति,
आयुष्य हे ! प्रभु दीर्घ दे, सुख दे अति ए विनति.
हे ! प्रभु तुं आ जगतमां, दे अधिकआनन्द,
चक्रवर्ति महाराजने, सदा करो सुखवन्त.
आनन्द आपो सर्वने, ए विनति हुं इश्वर करूं,
अन्तःकरणनी लागणीथी, आप आगळ उचलं;
देवाधि एवा देव हमने अविचळे सुख आपजो,
शान्ति विषे रही सर्वदा, संकष्ट सौनां कापजो.
संकट कापी सर्वनां, वर्तावो जयकार,
प्रेम-मग्न रैयत बने, शहेनशाह सुखकार.
सुखकार सर्वे धाय ने, दुःख जाय दूरे सर्वथा,
मतिमान ए गुणवान ने, विद्वान ने, न्यायी तथा;
नीतिवान एवा नर बनी, रैयततणी संभाळ ले,
आ गरीब.हिन्दुस्तानने, हांसे करी उद्धारी ले.
उद्धारी ले हिन्दने, पाळे पुत्रनी पेर,
महाराणी विक्टोरिया धन्य स्वर्गसुख ल्हेर.
विक्टोरिया महाराणीजीनी बुद्धि ने उदारता,
आ विश्वमां गाजी रही, धी अडवर्डनी पण सदा;
जे उपकारो ओमना रैयत विषे जामी गया,
तेथी सवाया जामवा आ "जोर्ज" पर करशो मया.
जश पामो आ जगतमां, पामो अविचळ मान,
कीर्ति अखंड गजावता, शोभो देव समान.
ए देवना जेवी घरे, शोभा सदाए अंगमां.
कल्याणनां कामो करे, हम्मैश रही उछरंगमां;
१४५
सम्राट् शुभागमन ।
रैयततणा पालक बनी, आ खलकमां खेले सदा,
इश्वर कहुं छ-एटलं, आपीश नहि लव आपदा.
नव आपे तुं आपदा, रहो सुखी शीरताज,
कुटुम्ब साथे सर्वदा, ए माणू महाराज.
महाराज म्हारी विनति आ उरमां हमे होंसे धरो,
ए ताजना उज्ज्वल प्रतापे तेज अधिकुं वापरो
सौ बंड, टंटा ने फिशादो नाम सुणी नाशी जजो,
सर्वत्र शान्ति-शान्तिमां आ दिवस सौ वां जजो.
आ शान्तिना दिवसो, सदा बनो सुखकार,
महाराजाना नामनो, थाओ सदा जयकार.
जयकार थाओ जगतमां महाराजना आ ताजनो,
उपकार तो भूलाय नहि, किंचित् कदा आ राज्यनो;
मुखनां बधां साधन दइ, आ हिन्दने उद्धारवा,
करशो मति ईश्वर हमे, आ समय छे सुख पामवा.
सुख पामे सर्वदा, हिन्द गरीबनवाज,
तारा मध्ये चन्द्रमा, त्यम शोभो आ राज.
आ राज्य शोभे मंडळे आकाशमां ज्यम चन्द्रमा,
ने अमल अवो सजड शोभे, मूर्यनी जेवी प्रभा;
सवितातणां किरणो सदा फेलाय छे दिगन्तमां,
तेवी रहे किर्ति सदा, आ राज्यनी शुभ शान्तिमां.
बधां राज्यमां अमनु, श्रेष्ठ गणाये राज,
वाधे यश, धन, श्रीपति, करशो अवां काज.
करशो हमे प्रभुजी सदा, आ देश सारं थवा,
अनुकुळ आवा समयमां के लाभ मांडया पामवा%B
राज्याभिषेके आपणो, आनन्द उरमा माय ना,
सम्राट् शुभागमन।
सौ हर्षयी जयकार बोलो, देवगण यश गाय हा.
जश गाये सा देवता, वीवे शुभ दृष्ट,
जोर्ज-मेरीसह पांचना, सदा हरो सौकष्ट.
धी "मेरी" अमारां राज्यमाता, धी "ज्योर्ज" छे पितासमा,
रैयत वधी आ पुत्रसम, संपे रहो ए सर्वदा;
मातापितानो प्रेम हम्मेशां रहो रैयत परे,
रेयत कदि पण अंतरेथी, गुण नहि मुले अरे !
राज्यभक्तिनु सूत्र छे, प्रेमभक्ति भरपूर,
एक वीजानी मददमां, प्रेम भयु व्हो उर.
गत समय सा भुलावजो, गादीपति थातां नवा,
सारा सयमना बाय वायु, आळती जाजो कया;
सा नव-नवीने, भातभातें, उत्सवें दिवसो जवा,
आ विनति म्हारी सांभळी ल्यो उरविषे हे ! इश्वरा.
हे ! इश्वर आ सांभळी, लाव्य दया दिल मांय,
गादीपति सुखीया थवा, अमी दृष्टि वरसाव्य;
अमी दृष्टिथी प्रभु पोषजे, रैयत अने राजा तणां,-
सौनां कुटुंबो मुखमां संतोषमां पण ना मणा;
आनन्दथी दिवसो गुजारे, प्रेममग्न वनी बनी,
इश्वर सदा आबाद राखे,सर्वने ए श्रीपति.
शिखरिणि.
महाराजा केरुं अविचळ तमो राज्य जगमां,
सदा आनन्दोना दिवस सबळा जाय सुखमां;
हमारी पासे हुं करगरि कहुं हे ! जगपति,
वधारो कीर्तिने, जुगजुग जीवो ए नरपति.
( मढडाकर-नागर, भावनगर.)
न
सम्राट शुभागमन । १४७ am 'ANAMVAAAAAN एक मराठी पुस्तकसे [ मराठी पद्य] श्रीमान् राजाधिराज प्रभुवर विजयी भूपते भाग्यशाली । होसी सत्ताधिकारी, सकल जनमने ऐकुनी तुष्ट झालीं। शोभे सिंहासनी बा, सुरुचिर तनु ही, पांचवे जार्ज नाम । द्यावें दीर्घायु देखें विपुल बलयशा पूर्ण होवोत काम ।। पद्य विजय असो भूपाला ! अखंड सुख दे ईश त्याला ॥ विजय असो ॥ धृ० ॥ शत्रुपराक्रम विलया जावो । कीति तयाची त्रिजगी होवो । अभिष्ट त्याचे सिद्धी पावो । हीच विनती तवपदकमला ॥ विजय असो॥१॥ पद (मांड-दादरा.) स्वस्ति असो संतत तुज जार्जनृपमणी । न्यायनीति निपुण पूर्ण करुण सद्गुणी ॥ धृ० ॥ हिंदवासि सकल तुझ्या या प्रजागणी । प्रेम-लक्ष ठेउनि त्या स्वसुतसे गेणी ॥ जनक जसा पुत्राची पुरवि मागणी।
१४८ सम्राट् शुभागमन तूंहि तसा होइ अह्मा हीच विनवणी ॥ १॥ सरल चतुर बहु उदार तूं सुलक्षणी। तव मति नित दक्ष असो न्यायरक्षणी। सद्यश तव गाउं आमी हे क्षणोक्षणी। सर्वेश्वर अवन करो तुज नृपाग्रणी ॥ २ ॥ (द. वि. तिनकर,) भूपाल पांचवे जार्ज बैसले तक्ती। त्यां सुख होवो ही विबुधजनाची उक्ती ॥धृ० ।। या हिंदप्रजेचे भाग्य काय वर्णावें । मधु गीत नृपाचे यानि मुखाने गावें ॥ पुष्प उपवनी मुग्ध असे दिन कांहीं ॥ प्रफुल्ल झाले गन्ध विखरितें पाहीं ॥ चाल ॥ हा सुवास गुणकीर्तीचा । संचरे । हे द्विरेफ गाती सारे । मुदभरें । हा पवन गन्ध संचारी । वनि वनीं ।। की बाल-रवीचा प्रकाश देई तृप्ती । हे भारत-वासी भाट होउनी गाती ॥ भूपाल० ॥१॥ तें पद ( चाल-कवणे तुज०) पंचम नृप जॉर्ज ! जनां रमविं गुणबलें करि गंधित सकल दिशा कीर्ति-परिमलें ! धृत चढतां विधु उदयाचलि द 20 सन्नाट शुभागमन। १४९ हास्य करी कुमुदावलि बालरवी येतां वरि गाय विहगकुल अंबरिं अभ्युदयें तव बुधजन तेविं तोषले १ अवनतिपंकांत बुडे दीन भरतभूमि रडे उद्धरणक्षम दुसरा न दिसे तुजविण नृवरा ! तव सुयशोमधुपानी चित्त लोभलें ॥ २ ॥ नम्रवृत्ति, विभव अचल बुधसंस्तुत कीर्ति विमल प्रजाप्रेम, नय परता सन्मति शुभगुण निरता अवलोकुनी मोहित मन बहुत जाहले ३ विद्यामृत दान करी दीनव्यसनांसि हरी मुखशांती भरि भुवनीं वितार मोद अखिल जनी कविगण शिरिं मुदित धरिल चरित तब भलें ॥४॥ (ए. पा. कुळकर्णी रेंदाळकर ) चाल-मूर्तिमंत भीत्ति उभी सार्वभौम सकल, मान्य, असति जार्ज भूपवि ॥धृ० ॥ शांत मुशिल भाग्यवान, कृपावंत मार्त ती।
१५० सम्राट शूभागमन। WWW चतुर बहुत कार्यदक्ष, वीर शूर गर्जती: विविध कला न्यायनीति, शांति कीर्ति गाजती ॥ सार्वभौम० ॥ १ राग भूप, ताल-धुमाळी. भो परमेश्वर, करुणासागर, जगदीशा । सकल शुभाकर देवा ॥ श्रीमज्जॉर्ज वराधिपतीतें । भवपथ सुखमय । कर, दे अक्षय । आयुर्बलजय । भो परमेश्वर, करुणासागर, जगदीशा । सकल शुभाकर देवा ॥१॥ सदया, अमुच्या वादशहांचे । अरि निर्दाछन । कर संरक्षण । तूं रात्रंदिन । भो परमेश्वर, करुणासागर, जगदीशा । सकल शुभाकर देवा ! ॥२॥ आंग्लभूमि, हिंदभूमिचे नातें प्रेमल । मधुतर निर्मल । कर दृढ बहुबल। भो परमेश्वर, करुणासांगर, जगदीशा । सकलशुभाकर देवा !॥३॥ राज्य जगत्संग्रहकारी है । अनुपम सुखकर । परिवर्धित कर । ह्या अवनीवर । भो परमेश्वर, करुणासागर, जगदीशा । सकल शुभाकर देवा !॥४॥ राग मांड (मित्र ), ताल-एका. परमात्मन् ! परमवरद ! रक्ष. रक्ष परमवंद्य, सार्वभौम राजधा सदैव दे जया ! सतत तुझी वितत असो ईश्वरा ! दया.
सम्रा शुभागमन।
१५१
२
तव दया अपार, शुद्ध, परमशुभमया ! ॥धृ०॥
तदधिकृती । शुभद अती । कर महाशया !
सदैव दे जया !
सतत तुझी विनत असो ईश्वरा ! दया.
आयुर्वलधनसुखास
सन्तत दे
भूवरास;
धन्य धन्य ही जगती । वरून पती । हा असो सती !
पूर्ण फलवती !
सदैव दे जया !
सतत तुझी वितत असो ईश्वरा ! दया.
निहत करी । सकल अरी। गिरिकुहरी । खल दड़ोत की !
सदा खल दढोत की !
बहुवदान्य । नृप अनन्य । अग्रगण्य ! लोकनायकी,
असो भूपनायकी !
सदैव दे जया !
सतत तुझी बितत असो ईश्वरा दया.
प्रीति नीति शान्ति दान्ति कान्तिमंडिता,
कीर्ति. वसो स्फुर्तिमद जगिं अखंडिता !
सर्व धरा एक पदी कर विभो ! युता !
परमात्मन् ! परमवरद ! रक्ष रक्ष परमवंद्य, सार्वभौम राजया
सदैव, दे जया !
( ना. वा टिळक. )
१५२
सम्राट् शुभागमन
पंचमजॉर्जाभिनंदन.
येई, ये ई पंचम जॉर्जा ! सार्वभौम भूपाला !
उत्सुक आह्मी आहेसखया ! स्वागत तव करण्याला.
प्रेमल, सात्विक, नयनमोनहर, उदात्त तब वदनेंदु
पाहुनि, सांगे, उचंबळेल न कोणाचा हृसिंधू
बघुनी तूंतें सत्वर अमुचे हृदयकुमुद उलतील.
फुटतिल पान्हे प्रीतिस वेगें, हर्षमणी झरतील.
उल्हासाचा, भक्तिरसाचा कडेलोट होइल.
जेथे तेथे जनता सारी वेडावुनि जाईल.
कविरायांच्या दिव्य कल्पना-लहरिस येइल भरती
करितिल नया हर्षोन्मादें खग पशु वृक्ष व्रतती. १०
कोण आसा जो मंगल समया ऐशा मलिन करील ?
विश्वशत्रुही द्वेष आपुलायेये क्षण विसरेल ?
अपूर्व अवसर असें पातला, तया साजरा करूं या
आली लक्ष्मी दूर लोटतां हांसे होईल जगिं या.
याहो ह्मणुनी हिंदु मुसल्मान् ! खिस्ती जनहो या. या.
हिंदी जितु के सगळे झणि या, विलंब न करा वायां.
चढा ओढिनें स्वागत करणे अपुल्या भूपाळाचें-'
नव्ड्रे-हितावें, वात्सल्याचे, उज्ज्वल दाक्षिण्याचे.
इतर कसेही असोत; अपुला राजा निर्मळ आहे.
जनहित साधनि उत्साहाने सदैव तत्पर राहे: .
जन-सेवा ही ईश्वर-सेवा-नित्य मनी तो-वाहे
२०
सम्राट शुभागमन।
नृप-भक्ति ही ईश्वर-भक्ति-भाव आमुचा आहे.
येई भूपा. माय भारती पुराण काळाची ही
अंकी ध्याया तुजला हर्षे सिद्ध असे वा ! पाही.
अनेक राष्ट्रं मोठ मोठाली देखिली असती तीनें;
भोजविक्रमासम नृपरनां खेळविलेसे प्रेमें.
महाभारतासमयीचे ते प्रतापशाली योद्धे
पाहुनि हीच्या मधुर मुखाला पायि लागति मोदें.
पुरे, पत्तने सुंदर सुंदर सोज्वळ रत्नमण्यांची
बांधुनि हीतें सजविति हर्षेः शोभा ये स्वर्गाची
गंगा, यमुना, तापि, नर्मदा-नांमें किति मी घ्यावी-
माळा करुनी घाली कंठी तयां भारती देवी
जिकडे तिकडे हंसे समृद्धी, अविरत नांदे शांति,
प्रीति नीतिने राहे जनता, अखंड गाजे कीर्ति,
आहे पश्चिमदिशेस येथुनि दूर देश इंग्लंड;
तेथुनि आले राज्य कराया वीरां चेनववृंद
दृष्टिस पडतां भव्य येथले ज्ञानाचें-भांडार
मुग्ध जहाले; ह्मणूं लागले, “ करूं यांत संचार
" सोडुं हवे तर एक वेळ हो आह्मी इंग्लंदोला !
वाटे परिना सोडसे भारतिच्या पायांला
" राहुनि येथे हळु हळु आर्या उत्तम शिक्षण देऊ
होतां कार्यक्षम त्यां हर्षे राज्य देउनी जाऊं
सम्राट् शुभागमन।
'हेच आमुचे ध्येय, हीज हो ईशेच्छेची पूर्ति
न्यावें परिणतिकडे जगाला, यांतच आमुची किर्ति"
याहुनि आहे अन्य कोणात सांगा हेतु उदात्त :
ऐशा ठायी जीवें भावे कोण न हो अनुरक्त !
यत आपुला भूपति ? येथे राहील का तो सतत
नोहे नोहे-क्षणभर चटका लाउनि जाइल परत
स्वपरि मग अमुचा सारा खटाटोप होईल ? -
नाहीं नाहीं-जागृत नित तो हृन्मंदिर राहील
विस्मरणाचें नांव कशाला ? जरी एकदा त्यासी
तुह्मीं पाहिले, अक्षय ठसला हृदिं तो तेजोराशी
गाई पंचम सुरांत कोकिळ होउनि तन्मय जेवी
तुमिही पंचम जॉर्जी रमुनी गाल खचित हो तेंवी
गाणे तुमचे मग ते व्यापुनि दाहि दिशा राहील
स्वामिभक्तिचे सत्लीतीचे स्मारक जाग होईल
( गोविंद पांडुरंग देवधर बी. ए.)
.
श्लाक-( पृथ्वीवृत.
प्रभो नव नृपावरी सतत सौख्य -वृष्टी करी
प्रियसह तयांवरी निजलवाबितांना धरी ।।
शरत्शन निरामय प्रचुर आयु देई,तयां।
स्मतातजननीपरी अधुर घालवो तो क्या
सम्राट् शुभागमन ।
मासिक मनोरंजन-मुंबई.
ओवाळणी.
भारतमहिला जमूंचला, ओंवाळाया भूपतिला;
प्रिय भूपाला, राज्ञीला, मंगल गीते गायाला.
शुद्ध अक्षता प्रेमाच्या, घाला पात्री हृदयाच्या;
विश्वासाचे कुटुंम ध्या, चला पूढे व्हाग अवघ्या
आशेची उधळा सुमने धुवुनीयां हर्षाश्रूने;
ऋद्भिसिद्धिला बोलावा, निश्चयदीपावलि लावा.
उदंड आयुष्या देवो, कीर्ति दिगंताला ने वो;
भरतभूमिच्या नाथची, इश्वर अपुल्या भक्ताची.
( श्रीमती सौ लक्ष्मीबाई टिळक, अहमदनगर.)
समादाभिनंदन.
भूप-दादरा
नित्य तुझा विजय असो जार्ज नृपवरा!
धन्य धन्य तूंचि जनीं नृपति भास्करा! ॥ ध्रु.॥
विद्या मुखकमलिं वसे, करकमलीं श्री विलसे,
राजन! तवपार नसे राज्यविस्तरा !
नित्य तुझा विजय असो जार्ज नृपवरा!
धन्य धन्य तूंचि जनीं नृपति भास्करा!
अगणित सामंत सतत पूज्य चरणयुगि तयनत,
स्वन्भंगलं कीर्ति वितत भरित अंबरा!
नित्य तुझा विजय असो जाई.नुपवरा!
सम्राट् शुभागमन
धन्य धन्य तूंचि जनीं नृपति भास्करा!
सलिल शयवर्धितबल, सततोदित रवि मंडल,
शतदल तव राष्ट्रकमल शोभवि धरा!
नित्य तुझा विजय असो जार्ज नृपवरा!
धन्य धन्य तूंचि जनीं नृपति भास्करा!
सार्वभौमराज्ययोग, दीर्घकाल राजभोग,
राजेन्द्रा वपुविरोग, दे परात्परा!
नित्य तुझा विजय असो जार्ज नृपवरा!
धन्य धन्य तूंचि जनीं नृपति भास्करा!
( श्रीयुत 'राधारमण ' दापोली.)
,
राजगीत.
घनशाम सुंदरा श्रीधरा अरुणोदय जाहला. या चालीवर,
मित्रोदय,दे जसा सारसा, जार्ज नृपाला ! तसा
तव सुंदर वदनारविंद आनंद हिंद-मानसा.
होय भूमि ही सफल नृपा! तब ललित चरणतल-रजे,
भजलि न कधिही कुणा नृपाला अशो, अशी तुजभजे.
पडतां तिजवर तव ममतेची-समतेची सावली,
रसिक-शिखी-जलधरा! घराही अमित तोष पावली!
नप-करुणालय तव शुभ गुणयचय गाय मधुरही मुखें,
करि परिपालन हिचे नृपाला! दीर्घकाल तूं सुखें,
शुचि-ललनागण-ललाम-लसना मेरीसह तोषदा,
अचल नृपश्री-विलास-लीला भोगि नृपाला! सदा.
सम्राट् शुभागमन। १५७ विमल चंद्रिका तुल्य यशें तव निखित धरातल भरो! नृपशतनत राजा धिराज! तुचिर विजयश्री वरो! ( श्रीयुत दत्तात्रय भिमाजी रणदिव, मिरजगांव.) भारत भाग्यदिन. ( राग बिहाग-ताल दादरा.) सुखकर अति धन्य सुदिन भारतीजनां चक्रवर्ति जार्ज मेरी देती दर्शना ! ॥ ध्रु० ॥ चिच्छक्ती देहातें, ज्योती की दीपातें माय धेनु वत्सातें, हीच भावना ! सुखकर अति धन्य सुदिन भारती जनां ! चक्रवर्ति जार्ज मेरी देती दर्शना ! (श्रीयुत सदाशिव नारायण ठोसर, बी. ए. एल. एल. बी. मुंबई ) अभीष्ट चिंतन. चाल-आज मी ब्रह्म पाहिले. परात्पर रक्षां राजाला, परम पूज्य श्री जार्ज नृपाला हिंदभूमिच्या प्रिय नाथला ! अनुच्या नात्याला. ॥ धृ०॥ आयुर्बलज्य वैभव देवो, अशुभ लबाही विलया नेवो, जगीं सर्वदा अशीच वाहो, कोर्ति नदी विमला. ।। १ ।। सौभाग्याची केवळ खाणी, देवा, अमुची माता राणी, राख सुखी दे कुल भूषविती पुत्र पात्र माला. ॥ २ ॥ वर्धिति कर अधिकार तयांचा, नित्य असी तव आशीर्वाचा, सम्राट् शुभागमन। सदया देवा सविनय अमुचा अर्ज असा तुजला ॥ ३ ॥ ( श्रीयुत रे. नारायण वामन टिळक, अहमदनगर.) - चित्रमयजगत-पुना. राज्याभिषेकोत्सव. जयजयजय जार्ज नृपा भरतभूवरा ॥ इंदिरा न कधी त्यजो राजमंदिरा ॥ धृ० ।। मार्गशीर्ष पुन्य मास आर्य मानिती ! ॥ सार्व भामराज्यपद प्रथन संस्कृती ॥ आज घडति, शांति भूति लोक चिंतिती ।। आंग्ल भौम राजनिति विबुध वर्णिती ॥ (चाल) प्रजा उभविती ध्वजा, स्तविनि ईश्वरा ॥ करी चिरायू जॉर्ज नृपा भुवन सुंदरा ॥ १ ॥ ॥ धृ० ॥ जयजयजय जॉर्ज नुपा० ॥ दिल्लीपुरि चंदनमय स्यंदनि किती है। वंदनार्थ नंदनार्थ नृपति मिरवती ! ॥ भरतभूमि-मंत्रिसुधा-वाणि वर्षती ॥ आंग्लनृपा देवकृपा कुशल वांछिती ।। (चाल) स्तवुनि मुखें पार्थिति जन संध ईश्वरा ।। शांति असो पुष्टि असो जार्ज भूवरा ॥ २॥ धृ० जय० ॥ भरतखंडवासिजनां भेट द्यावया ॥ मार्गशीर्ष पुण्यमास एथ यात्रया ।। नियोजिशी प्रियेनिशी राज राजया ॥ आम्हां वरी लोभ खरा अंतरी दया ।।
सम्राट् शुभागमन। १५९ (चाल) माय बाप बंधुमित्र अससि तूंखरा ।। भरतखंडवासिजनां थोर आसरा ॥ ३ ॥ ।। धृ० ॥ जयजयजय जार्ज नृपा०॥ ( रावसाहेब पुरुषोत्तम बाळकृष्ण जोशी [बंगाली पद्य] सब सम स्वरे एक तार तरे गावो सम्राट सम्राज्ञीन जयअरे ॥ शुभदिने आजी ऐस सबेसाजि अनमी विभूपदे मङ्गलतरे ॥ पुरवासी जन शंखनाद घनकरो सम्माबने दोहें सोहागभरे ॥ विपुल विधाने दम्पति सन्माने करे आयो जना अतिपीवि दुयारे ।। अगनित दीपे मालागांध स्तूपे भूपेर यशोराशि घोषण करे ॥ आजिकारे दिने दिल्ली पुण्यस्थाने बसे सम्राट सम्राज्ञी मञ्चपरे ॥ जेजन शासने वङ्गवासी गने मुजे शुखराशी सदा परानभरे ॥ अभु जगतपति पदे एई विनती मारकण्ड दीर्घाआयु. दानेदो हरे ॥
१६०
सम्रादशुभागमन.
SANSAR
मुंबई समाचार. मुंबई
कसीदा तारीखी.
[उरदू पद्य]
इदे कुरबां की हुइ जलवागरी, अहले दी को हो मुबारक ये खुशी.
नीकळे है पढकर दुगाना दीनदार, रुख से शौकत हए आयांइसलामकी,
हए मोअत्तर कुचा कुचा शहर का, इत्रमें पोशाक हए सबकी बसी.
मील रहे हैं कीस मोहब्बतसे गले, खील रही हए हीलकी यारों के कली,
मच रही हए आमदे कएसरकी धुम, इद के दीन इद हए एक दुसरी,
की गइ हए इसतरह आरासता, अपनी खुबीपर हए नाजां बम्बइ,
आ गइ हए वो बहार जां फझा, बन गइ हए बागे जन्नत हर गली.
शहर हए अएसे करीने से सजो, एक दुलहन हर एक कोठी बनगइ.
शाह की ओर शाहबेगम की शबीह, जाबजा हएकएसी खुबीसे लगी.
झीबो झीनत और आरायश की वाह, बात कोइ भी नहींबाकीरही,
एकझीबीशन में वो कोहे दीलफ रेब, नकल में हए शानपुरीअस्लकी.
आ गया नामी मदीना आगबोट, धुम एशरत की हएसाहीलपरमची,
आ गया वो कएसरे हींदुस्तां, जीसको हए शौंके रेआयापरवरी.
आ गया वो सरवरे आली हशम, मुसतनद हए जीसकीआलीहीम्मती.
आ गया वो खुसरवे फखरे झमन, धाक हए जीसकीझमानेमेबंधी
आ गया वो ताजदारे नामवार, आसमां करता हएनीसकीचाकरी.
आ गया वो बादशाहे रहम दील, धुम हए जीसके अताओरहमकी.
आ गया वो शहरीयारे नामंदारः बख्ते अहल होदने की यावरी.
.
.
-
- सम्राटू शुभागमन | १६१ ईडीया में होरहा हए जलवगर, परचमे एकवाले बखते कएसरी. ये वो शहेनाशाहे आलीजाह हए, जीसका शाहों में नहींहमसरकोइ. झेन के लायक हऐ अखलाके हजुर, फन के काबील है हालेजीदगी. हर सोवन से तमकनत हएआशकार, हए अयां चेहरेसेशानेबरतरी. जो नहीं इस प्यारे शहेनशाह में,खल्क में ऐसी हए खुबी कौनसी. गर न होता हीद वालों काखीयाल.औहक्याथीवजहेतशरीफावरी. मुनअकीद दरबार देहली में कीया, ता हो हमको ताजपोशीकोखुशी. इनतेहा का ये रेआयापर हए लुत्फ, बेने हायत ये करमहएवाकेइ. आज मनझर होगा वो पेशे नीगाह,खस्कहए मुशत क जीस के दीदकी सुब्हसे जीसका हमे था इनतेझार,वकत वो आया वो आपहोंचो घडी. जीस तरफसे आने वाला हएजलुस,आंख सबकीहये उसीजानीबलगी. चोझ देते हएं तमाशाइ तमाम, हए लवोपर नखरे खुश आमदो देख लो दीदार शाहनशाह का,कर लो यारो हो सके जीतनीखुशी. चारसु से देखो उठो उंगलीया, जार्ज पंजुम की सवारी आ गइ. मरहबा कीतनाहए पुरशोक्त जलुस,मरहवा कीतनीहयेदीलचसपी भरी. क्यारीसालांकी हए वरदी जर्क बर्क,आंव झपकीजाती हएखुरशीदकी. 'देख कर ये अझमतो जाहो जलाल,खल्क हए मसरुरभी मरउब भी. देखा इस शोक्तका शाहाना जलुस, ये हमारी नसीवी हए वडी. शहर के हर कुचओ बाजार में, भुमसे कल शवको होगी रौशनी. फीर इसी शौक्तसे नीकलेंगे होझुर,फोरमीलेगी हमको दौलत दीदकी. हीझ मॅजेस्टी जानें पंजुमकी सना, हए हमारा एक फो मनसत्री. आपके अहदे हुमायुं में हये, हरतरह की हए मोयस्सर खुररमी. कोइ बंदेश हए न कोइ रोक टोके,पुरी आझदी हए हासीलमझहवी. अहदमें जीस के ये राहतहो नसीब.उसकी,उलफतक्यों नहोदीलमें भर , २१ १६२ सम्राट् शुभागमन आजगरलीखवन मदहेशाह हम,काम फीर आएगी कीसदीनशाएंरी. अए खुदा कएसर हमारे खुश रहें, हो तरक्की दौलतो एकबाल की. धुम से देहली में वो दरवार हो, हो रही जीसकी तैयारी बडी, कुल रेआया और शाहनशाह को, हो मुबारक ताजपोशी की खुशी. वो इनायत शाहकी मबझुल हो, हीद वाले खुश रहें ता झेन्दगी. पाऐं खातीर वाहहम दीलकी मुराद,शान और अझमतबढेइगलेंडकी. चएनसे उमरे रेआया हो बसर, झीरे झेल्ले इलतेफाते खुसरवी. जब मीले ये मौकए अयशो तरब, क्यों न रौनक होदुबाला इदकी. सालेहीजरी अए तजम्मुल तुमलीखोसबके दीलकोयेहुइ दोहरी खुश ( हाजी सैयद तजम्मुलहुसैन " तजम्मुल " जलालपुरी.) महफेलमें शबकी माहका जबतक सेराज हो ! दोन्या रस्मे-एश्कका जबतक रेवाज हो ! मएशुक दहर ता मोतलव्वेन मेझाज हो ! जब तकके एन्सोरोंमें यहां एम्तेझाज हो ! जब तक सरे सेपहारका खोरशीद ताज हो ! ब्रीतानीयांके शाहका भारतमें राज हो ! ॥१॥ जब तक फेराकका हो झमाना जेगरगोदाझ, जब तक के हेज्रका हो फसोना जेगरगोदाझ, ता नारे एश्कका हो झमाना जेगरगोदाझ, ता अन्दलीवका हो तराना जेगरगोदाझ. जब तक सरे सेपहरका,खोरशीद ताज़ हो ! बीतानीयाके शाहका भारतमें राज हो ! ॥२॥ हीलीका कुचा कुका हय रश्के चमन बना !
सन्नाट शुभागमन । दील्लीका झररा झररा हय दोररे अदन बना ! दील्लोका खारभी तो हय गोल पयरहन बना ! हरएक इस तरेहसे हय गरमे सोखन बना ! जब तक सरे सेपहरका खोरशीद ताज हो ! ब्रीतानीयाके शाहका भारतमें राज हो ! ॥ ३ ॥ इन्दरपुरी हय आज बनी मेस्ले नव अरुस ! फशे झरीन वहां हय जहां कलथा घास फुस ! हींदी वफा शेआरीसे होते हंय पाय बुस ! हरजा यही सदाएं हय बजता हय तब्लो कुस ! जब तक सरे सेपहरका खोरशीद ताज हो ! बीतानीयाके शाहका भारतमें राज हो ! ॥ ४ ॥ हर कुचेमें खुशी हय तो हय हर मकांमे धुम ! हय शहकी ताजपुशीकी हीन्दोस्तांमें धुम ! अयशो तरबकी आज हय सारे जहां में ! घुम ! बुलबुल मचा रही हय यही बुस्तांमें धुम ! जब तक सरे सेपहरका खोरशोद ताज हो ! ब्रीतानीयाके शाहका भारतमें राज हो ! ॥ ५ ॥ पहनेगा " ज्याज " धुमसे ताजे शहाना आज; अकबरका याद आएगा सबको झमाना आज ! रख्खो कोइ खुशीका दकीका उठा ना आज ! सब गाओ मीलके खोरदो कलां येह तराना आज जब तक सरे सेपहारका खोरशीद ताज हो ! ब्रीतानीयाके शाहका भारतमें राज हो ! ॥ ६ ॥ वोह शाह-जीस्के अदलका हुष झौ-फेगन सेराज, ! !
सम्राट् शुभागमन । वोह शाह-जीस्का दहरमें सबसे बडा हय राज, वोह शाह-अपने फर्कपे रख्खेगा आज ताज, करती हय सेदक देलसे रेआया दोआ ये आजः जब तक सरे सेपहरका खोरशीद ताज हो ! ब्रीतानीयाके शाहका भारतमें राज हो ! ॥ ७ ॥ सबकी दोआ हय शाह ! तुजे कोइ गम न हो ! तुजको कीसी तरेहका जहां में अलम न हो ! हेन्दोस्तांपे कम तेरा लोत्फो करम न हो ! दारा" ओ "जम" से कम तेरा जाहो हशम न हो ! जब तक सरे सेपहरको खोरशीद ताज हो ! ब्रीतानीयाके शाहका भारतमें राज हो ! ॥ ८ ॥ दोन्याको अपने अदलसे अय शाह राम कर, " नौशीरवां" की तरहेसे मशहुर नाम कर, होस्ने-अमलसे अपने जहांको गोलाम कर, सब थक झवां येह होके कहे तु वो काम कर; जब तक सरे सेपहरका खोरशीद ताज हो ! ब्रीतानीयाके शाहका भारतमें राज हो!॥९॥ अय शाह हो झमानेको तेरी अदा पसंद ? बा अदल तु हो-तेरी रआया वफा पसंद ! अलकेस्से कर वोह काम के जो हो खोदा पसंद ! हरदम दोआ येह हमको हो सबसे सेवा पसंद ! जब तक सरे सेपहारका खोरशीद ताज हो ! ब्रीतानीयाके शाहका भारतमें राज हो: ॥१०॥ हरसुसे आज आती हय हरदम सदा यही ! करते हंय अहले हीन्द बदील एलतेजा यही !
१६५
सम्राट् शुभागमन ।
फरमां-रवाये-हीद रहे बादशाह यही !
" नाझीम" भी बम्बइसे हय देता दोआ यही !
जब तक सरे सेपहारका खोरशीद ताज हो !
ब्रीतानीयाके शाहका भारतमें राज हो !
( नाझीम.)
मदाह आपके हें सारी जहान वाले,
दिलीसे दुआ हे देते हीन्दुस्तान वाले,
इन्सान हो केह हयवां इन्साफ पारेह हें,
ख्वाह बेझबान हो वोह या हो झवान वाले,
मुदतके बाद देहली दरबार येह दुवा हय,
हो आपको मुबारीक अय इझझो शान वाले,
येह जश्नभी जहां में एक यादगार होगा,
होंगे जुलुमें तेरे सब आन वान वाले,
येह आरझु हय मेरी ओर शाह ज्या पंजुम,
कायम रहें जहांमें नामो नीशान वाले,.
बद ख्वाहसे बचाना अय मालीके हकीकी,
तु हय हफीझो नासीर अय आसमीन वाले,
मकबुल यह दुआ हो मुन्शीकी या इलाही,
तु हय बसीरो साम्ए कोनो मकान वाले.
(मुन्शी गुलामअली गुलाम नबी.)
सम्राट् शुभागमन
spessores des de
Spesies
काठियावाड़ महीकांठा गजट, अमदाबाद
[ इंग्रेजी पद्य]
King-Emperor's Song.
“ Live Long King Emperor Goerge Long live
And thrive in every way;
To heart's content your aims achieve;
We all to God thus pray.
Live long King Emperor George.
Take Hind and Britain sisters twin,
As common father be;
Their equal constant love you win,
Let none in misery.
Live long King Emperor George.
Defender of The faith wealth-life,
Rule both the realms in peace;
And hold their helms bereft of strife;
With Queen Empress in bliss.
Live long King Emperor George.
Pise you for ever our fortune's guide,
With rule benign and wise;
And glory in your crown, abide,
Get fame that mount the skies.
Live long King Emperor George.
सम्रा शुभागमन
१६७
May God pour blessings choicest-Dear !
May He all evils scourge;
A gain we pray with pride and cheer,
"God, save King-Emperor George
Live long King Emperor George.
( KESIIAVLAL V. BHATT. B. A.)
PETET, BTTTT
CORONATION SONG.
I.
From the land of Victoria the Noble and Great,
From the lap of Fair Albion who rules in her state
Over realms that extend to the far polar seas,
O'er regions perfumed by the bland vernal breeze,
O'er the oceans that quake,
As her thunders expand,
Over channels that shake
At her regal command,
And o'er seas that are held by the Oaks of her parks
With their corals & pearls, with their monsters & sharks,-
You are welcome to Ind-to-her valley and gorge,
Thrice Gracious Queen Mary and Mighty King George !
II
From the land of King Edward, the Peaceful and Kind
And the sweet Alexandra of virtues refined,
Who, 'from over the sea, ' from the land of the Danes,
With her beauty enchanted the rich English plains,
१६८ सम्राट् शुभागमन । From the birth-land of fighters, Renown'd for their feats, Of high thinkers and writers Like Shakespeare and Keats, Where Lore often girdles the sharp-cutting brand Anil renounces her laurel to fight for her land, You are welcome to us froin your valley and gorge Thrice Gracious Qeen Mary and Mighty King George IlI Oh ! we welcome you fain to the Garden of Earth The abode of enchantment, of learning and Worth, Where the Ganges she surges with gold' neath her tide And the Indus and Brahmputra roll in their pride, To the shades of our neens and our peepals high grown, That are water'd by streams, Like the Poonpoon and Sone, To our jungles where wild peoples savagely dance To the wild-swelling strains of some sylvan romance, To each mead and each moor, to each valley and gorge- You are welcome, Queen Mary and Gracious King George IV Oh ! we welcome you fain to our rich floral glens, To our fields and our farms, to our groves and our dens, To our towns and our hamlets, our hills and our mounts, To the banks of our rills and our brisk-gushing founts, To the lofty Himal, Emblematic of Time, With his pine and his sol, in his grandeur sublinie, सम्राट् शुभागमन । १६९ To our wild bushy jungles our forefathers trod Where the cypress and banyan they whisper and nod, To each mead and each moor, to each valley and gorge, You are welcome, Queen Mary and gracious King George! To the wonders of Ind like the Taj and Minar To the land which was first, both in learning and war, To the land which is warm'd by the sun's merry glance, To the throne of the fearless and warlike Pathans, To the Great Akbar's state, Of wich poets have sedate, To the splendour sung, Of the mighty Aurang, You are welcome, O Emp'ror and Empress of nations;- We send you our greetings and blithe salutations From town and from hamlet, froin valley and gorge Our Benign Empress Mary and Great Emp'ror George, VI From the country of faith where the Vedas were sung, Where Religion first grew on the banks of the Gung, From the land of Gaurang and the great Mahabir, Of Shri Ramanand, Nanak and peerless Kabir, From the plains of Behar, From the gay Hindustan, Which has brought forth a star Like the godly Bhagwan, From the hand, of Lord Budha, the teacher of nations, We send you our greetings and blithe salutations, From town' and from hamlet, from 'Valley and gorge, Our benigo Empress Mary and good Emp'ror George १७० सम्राट् शुभागमन। VII. Oh ! upraise our poor country-she prays for your gracem And her children expectant they gaze at your face, while their eyes,full of tears, swim in brightness & sheen As they witness enraptured their King and their en, From their Fanes' blessed ground where in numbers they throng, while the churches resound wity a joyous ding-dong. The devoutly pronounce henidictions on you, And they pour forth their bosoms, soloyal and true, In a ringing acclaim from each plain and each gorge, Our Benign Finpress Mary and Good Emp'ror George ! VIII 'Tis a blessed occasion-moment like this- When our country is plunged in an ocean of bliss, When her fond eye of hope is expectant of boons That must brighten her huts and her princely saloons- From the cot of the poor, To the dome of the grand, From the low tracts of moor To the hills of her land. From the heights of Himal to the far Travancore, She will dance in her mirth and her Gratitude pour, And will sing from each plain, from each valley & gorge, "Heaven bless Empress Mary and good Emp'ror Georges RAGHUBIR NARAYANA SHARAN; Author of A Tale of Behar. Scenes from the Ramayana. &c., &c., &c.
सम्राट् शुभागमन १७१ CORONATION SONG. Once again the plains of India Garb themselves in princely sheen; Once again imperial Delhi Glories in her King and Queen ! 2 Once again the flowers of India Run to kiss the sacred Throne- And Remembrance rakes up visions From the wrecks of ages flown ! 3 Visions of imperial grandeur wake with all their gay romance And the phantom from of Moghuls Flit before our eyes and dance ! 4 Prithviraj's and Khurrum's splendour, Mighty Akber's glorious reign, And the good old days of Bharat,- For a moment live again, 5 As, in regal pomp and grandeur, Hail'd with greetings warm and loyal, Fmpöror George and Empress Mary Place Their feet. ou indian Soil,
सम्राट् शुभागमन ।
6
Blessed is the ancient city
where our Emp'ror wears His crown!
Blessed, we who do Him homage
Through the ruler of our town !
7
Let us sing the song which rises
from each plain and vale and gorge
"God protect our Empress Mary!
Heaven defend our Emp'ror George !
CORONATION SONG.
From the land of good Victoria,
where the bleams of Fortune shine
And the spoils of Science and Valour
In a graceful whole combine
From the realm of Peaceful Edward
With its wealth of floral sheen,
Over which He reiga'd in glory
With his graceful Danish Queen -
Emp'ror George and Empress Mary
They are welcome to our Plaips,
Where the King of vernal season
In his freshness breathes and reigns !
To the land of wörth and Greatness,
Thinkers bold and singers grand !
To the glúries of our Mountains,
सम्रा शुभागमन १७३ and the wonders of our land l- Welcome to our eyes expectant Eyes that fain swim in fearful sheen- Eyes that fain for e'er would linger On their smiling King and Queen We are Theirs !-and Theirs our Country - Theirs the Proud imperial crowd, Worn in splendour by the Hindus And the Moghuls of renown! Let us pray and sing in rapture From each laughing plain and gorge: * God protect our Empress Mary! Heaven defend our Emp'ror George ! RAGHUBIR NARAYANA ( Author of ' A Tale of Behar ' and other poems ) Offg. Asstt. Master Zila School, Chapra. राष्ट्रगीत. ( बेंडकी चाल.) गाइ सेव्ह अवर ग्रेशस् किंग्! लाँग लिह अवर नोबलू किंग्! गाइ सेव्ह द् किंग्! सेंड हिम् व्हिक्टोरियस्! ह्यापि अँड् ग्लोरियस्! लाँग दु रेन ओव्हर अस् गाड सेव्हू द् किंग
१७४
सम्राट् शुभागमन।
**
घोषणापत्र ।
महाराजाधिराज राजराजेश्वर की तरफसे
शहिाइश्तिहार ।
श्रीमान् महाराजाधिराज-राजराजेश्वरके राज्यमें श्रीमान्
के राजतिलक की रस्मके होजाने की सूचना देनेके लिये ।
श्रीमान् जार्ज पंचम महाराजा धिराज राजराजेश्वर ।
जो कि हमने अपने राज्यके पहिले वर्ष में सन् उन्नीस
सौदस ई० की उन्नीसवी जुलाई और सातवीं नवम्बर के
अपने शाही इश्तिहारोंके ज़रिये से अपने इस शाही इरादःको
जाहिर और प्रकाशित कियाथा कि सर्व शक्तिमान् परमेश्वर
की कृपा और दयासे हम अपने राज तिलककी रस्म सन्
उन्नीससौ ग्यारह ई० की बाईसवींजून को करेंगे;
और जो कि सर्व शक्तिमान् परमेश्वर की कृपा और
दयासे हमने पिछली बाईसवींजून बृहस्पति वारको वह रस्म
करली है;
और जो कि हमने अपने राज्यके पहिले वर्षमें अपने
शाही इश्तिहारके ज़रियेसे जो सन् उन्नीस सौ ग्यारह ई० की
बाईसवीं मार्चको जारी हुआथा यह जाहिर किया था कि
हमारी यह इच्छा और मज़ों है कि हम खुद अपनी उन सब
0.XX.
सम्राट शुभागमन।
-
deste se blesfeleslelese testerste slesterste slesle ble sle sle blesic
प्रेमी प्रजापर जो हमारे हिन्दुस्थान के राज्यमें हैं यह जाहिर
करें कि वह रस्म करली गई, और अपने गवर्नरों और
लेटिनेन्ट-गवर्नरे और अपने दूसरे ओहदादारांको, और
उन हिन्दुस्थानी रियासतों के वालियान और रईस और
अमीरोंको जो हमारी रक्षामें हैं और अपने हिंदु स्थान के
राज्य के सबम्बों के मुख्य २ लोगों को अपने हजरमें बुलाये;
इस लिये अब हम अपने इस शाही इश्तिहार के ज़रिये से,
यह ज़ाहिर करते हैं कि हमारे राज तिलककी रस्म होगई,
और हम अपनी महाराजाधिराज और राजराजेश्वरकी हैसि
यतसे अपने सब ओहदादारोका और मब वालियान-मुल्क
और रईसका और सब कोमेका जो इस वक्त दिल्लीमें जमा
हैं स्वागत करते हैं, और उन सबका इसका यकीन दिलाते
हैं कि हमको अपने हिन्दुस्तान के राज्यसे गहरा प्रेम है, और
हम हरवक्त उसको भलाई और खुशहाली चाहते रहते हैं
और ऐसेही सदा चाहते रहेंगे।
यह इश्तिहार हमारे राज्य के दूसरे वर्ष में बारहवीं दिसम्बर
सन् उन्नीस सौ ग्यारह ई. को हमारो राज सभा, मुकाम दिल्ली,
से जारी हुआ ॥
परमात्मा महा राजाधिराज-राजराजेश्वरको सलामत रकावें ॥
mer-Roomin
Georoccajeejaje spoojare screer Eye Sik
१७६
सम्राट् शुभागमन ।
Reoroof000000
000000
Aashirma
पुस्तक मिलनेका पता
राजेंद्रनाथ पंडित
ठि. साम सवाई मंदिर
पो. डभोई-(बड़ोदा)
तथा
C000000
साधु
कार्यालय
बड़ोदा (गुजरात)
pooooo
on
Jooloolo0000000000000000000000000
No text on this page.