Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Prameyaratnarnav
Front matter
PRAMEYA-RATNARNAVA
-
th
OF
ŚRI BĀLA-KRŞŅA BHATTA
Edited and Translated by
KEDAR NATH MISHRA
Lecturer,
Department of Philosophy,
Faculty of Arts,
Banaras Hindu University.
With a Foreword by
PROF. N. K. Bambhani,
Shetha Harjivandas Purushottamdas Professor
of Suddhādvaita Philosophy. * ( *kmędabad.).
ĀNANDA PRAKĀŠANA
VARANASI-1
Published by
ANANDA PRAKĀŠANA
B 2/178 A, Bbadaini,
VARANASI-I ( INDIA ).
Publisher,
First Edition, December 1971,
Price Rs. 10.00
Printers
GAURI SHANKAR PRESS
Madhyameshwar,
VARANASI.
शुद्धाद्वैतदर्शन एवं पुष्टिमार्ग में
सर्वप्रथम मेरी अभिरुचि जाग्रत करने वाले
अपने समादरणीय विद्यागुरु
आचार्य चन्द्रधर शर्मा
डी० फिल०, डी० लिट०, साहित्याचार्य,
प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, दर्शन-विभाग
जबलपुर विश्वविद्यालय
के करकमलों में
सादर समर्पित
विषयानुक्रमणिका पृष्ठसङ्ख्या 8 9 11 18 . २६ ४८ विषय पुस्तक में प्रयुक्त सकेतों का विवरण Foreword आमुस उपोदात प्रपञ्चविवेक जीवविवेक मूलरूपविवेक पुटिविवेक पुष्टिभक्त्यधिकार विवेक सर्वात्मभावविवेक पुटिमार्गीयफ्लविवेक ख्यातिविवेक नोट्स परिशिष्ट १ परिशिष्ट २ परिशिष्ट ३ परिशिष्ट ४ परिशिष्ट ५ पुस्तक में उद्धृत एवं उल्लिखित ग्रन्थों की सूची शुद्धिपत्र ११९ १४४ २११ २६३ २६५ २६७ २६८ २७० २७३ २७५ २७८ का० . पुस्तक में प्रयुक्त संकेतों का विवरण उ० पाउप. उपनिषद् ऐतरेयोप० ऐतरेयोपनिप कटोप० कठोपनिषद् कारिका कृष्णोप० कृष्णोपनिषद् गीता श्रीमद्भगवद्गीता गोपालपूर्वता गोपाल पूर्ववापिन्युपनिषद् गोपालोचरवा० गोपालोचरतापिन्युपनिषद् छान्दो० छान्दोग्य ( उपनिषद्) तैत्ति वैत्तिरीय ( उपनिषद्) नारा० मारायण ( उपनिषद्) निरोषल. निरोधलक्षणम् नृसिंहोत्तरता नृसिंहोत्तरतापिन्युपनिषद् पुष्टिप्र० पुष्टिप्रवाहमर्यादामेद प्रकाश (टीका) प्रश्नोप. प्रश्नोपनिषद् गृह गृहदारण्यक ( उपनिपद्) मा० या माप. भागवत ( श्रीमद्भागवतम्) भागवतार्थप्र. मागवतार्यप्रकरणम् महाना० महानारायण ( उपनिपद्) मुण्डक (उपनिपद्) साधार्थप्र. श्रीपुष्टिमा० श्रीपुष्टिमार्गलक्षणानि वेशी श्वेताश्वतर (उपनिषद्) सर्व निर्णयमा सनिर्णयप्रकरणम् सिद्धान्तमु. सिद्धान्तमुनावली मुयो० सोधिनी (श्रीमदमागयतटीका)। प्र० मुण्टा ভগ্নাগ FOREWORD It will be no exaggeration to say that the scriptural description of Parabrahman as Anoraniyan mahalo mahiyan can well apply to this Prameya-ratnarnava of Śrī Lālabbattaji. Onc very rarely comes across such a clear, compact, concise and yet comprehensive work. There is not a single important aspect of the religion and philosophy of Sri Vallabhâcārya which has got been lucidly treated in this little tract. The real excellence of the author lies in his very clear grasp and in an equally lucid presentation of essential principles. And it is a matter of po small joy that in Sri Kedar Nath Mishra, onc of my very brilliant students, we have found an equally worthy cditor and translator, whose grasp and presentation arc in no way less clear. The special feature of the present edition of the work lies in the fact that therein we find for the first time the indication of the sources of quotations and the completion of certain iacompletc ones. When one thinks of the time and troublc taken by the editor in tracing all these quotations, one cannot help Secling bigbly obliged to him. Morcover, the printing is almost absolutely flawless. This shows how very great care the editor has taken in correcting proofs. It gives mc genuine pleasure to recommend this edition. That a fcw works of Sri Bala-Krsøa Bhatia are to be bad in print is our great fortune, Ssi Vallabhā. cārya's Brahmasdite zubhaiyan and Bhangarefa-subodhini are well-knowo. The author's commentary on the first ?
10 प्रमेयरलार्णव thrcc Sūtras of the first and that on certain portions of the second are to be had in print. Besides these two commentaries we have in print bis two small works, Scrā Kaumudi and Nirnayārņava over and above the prescat Prameya-ratnārnava. la Nirnayāsnava he has very brilliantly pointed out certain misrcadings that have crept into the writings of Śr: Vallabhācārya through the want of proper carc on the part of scribes After doing so, he has suggested correct readings which make the sense of the line absolutely clear and consistent. This speaks volumes of his critical acumen. Whatever little our author has written is really a very rich contribution to the Şampradāyska literature. The definition Paricchedo h1 pândityam' fits him fully well. His clear grasp and simple and forth-right presentation are really admirablc. At times be shows wonderful originality. That we find, in our Pramcya-ratnārnava, jo bis treatment of such topics as Bhagavanmorta-soarapa-oicāra, Dehatmabuddha-soarapa-riveka, Turobhava svarapo-nerb pana, and Adhunika-liva.uz sayaka-cucara. I conclude this small Foreword of muc with humble obeisance to this mighty author and hearty congratulations to the editor-cum-translator for his excellent performance and very valuable scrvicc Campăranya-Madhuvana Ellis Bridge Ahmedabad-6. N. K. Bambhania 21-9-1971 आमुख प्रकार के यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि परब्रह्म का निरूपक श्रुतिवाक्य 'अणोरणीयान् महतो महोयान्' श्रीलालूभट्टजी के इस प्रमेय- रत्नार्णव पर भी मली-भाँति लागू हो सकता है । सुस्पष्ट, सुसंहत और संक्षिप्त होते हुए भी परिग्राही अन्य यदा-कदा ही मिल पाते हैं। श्रीवल्लभाचार्य के धर्म और दर्शन का ऐसा एक भी महत्त्वपूर्ण पक्ष नहीं है जिसका इस छोटी-सी कृति में विशद निरूपण न किया गया हो। ग्रन्थकार का वास्तविक वैशिष्ट्य सारभूत सिद्धान्तों को सुस्पष्ट रूप से हृदयङ्गम कर लेने तथा उन्हें उतनी ही स्पष्टता से उप- स्थापित कर देने में है; और यह कम प्रसन्नता की बात नहीं है कि मेरे एक अति तेजस्वी विद्यार्थी श्रीकेदारनाथ मिश्र के रूप में हमे एक उतने ही योग्य सम्पादक एव अनुवादक मिल गये हैं जिनका वाल्लभ सिद्धान्तों का अवबोध एव प्रत्युपस्थापन किसी भी रूप में कम स्पष्ट नहीं है। प्रस्तुत सस्करण की विशेषता यह है कि इसमें पहली बार उद्धरणों के मूल निर्दिष्ट कर दिये गये हैं एवं अपूर्ण उद्धरणों को पूरा कर किया गया है । इन सारे उद्धरणों का मूलस्थल खोजने में कितना समय और परि- अम लगा होगा यह सोचने पर किसी भी व्यक्ति को सम्पादक के प्रति कृतज्ञता की अनुभूति हुए विना न रहेगी। इतना ही नहीं, मुद्रण भी प्रायः पूर्णतया निर्दोष है। इससे पता चलता है कि सम्पादक ने प्रूफ संशोधन क्तिनी सावधानी से किया है। इस संस्करण की अनुशंसा करने में मुझे हार्दिक आनन्द का अनुमय होता है यह हमारे सौभाग्य की बात है कि प्रमेयरत्नार्णवकार की कुछ कृतियाँ छप गयी हैं। श्रीवल्लमाचार्य के ब्रह्मसूनाणुभाप्य और भागवत- 12 प्रमेयरलार्णव सुबोधिनी नामक सुविदित ग्रन्थों में से प्रथम के प्रारम्भिक तीन सूत्रों तथा द्वितीय के कुछ अशों पर उनकी टीका मुद्रित रूप में मिलती है। इन दोनों टीकाओं के अतिरिक्त, प्रस्तुत प्रमेयरलार्णव के साथ ही उनके दो अन्य लघुग्रन्थ सेवाकौमुदी तथा निर्णयार्णव भी मुद्रित हो चुके हैं। निर्णयार्णच में उन्होंने लिपिकारों के प्रमाद से श्रीवल्लभाचार्य की कृतियों में आये हुए अनेक अपपाठों का बड़ी निपुणता से निर्देश करके शुद्ध पाठ सुझाये हैं जिनसे पक्ति का भाव पूर्णतया सुस्पष्ट एव सुसंगत हो जाता है। यह उनकी समीक्षात्मक योग्यता का प्रभूत प्रमाण है। उन्होंने जो भी थोड़े से ग्रन्थ लिखे हैं वे वस्तुतः साम्प्रदायिक साहित्य को एक महती देन हैं। पाण्डित्य का लक्षण 'परिच्छेदो हि पाण्डित्यम्' उनके सम्बन्ध में अक्षरशः उपयुक्त है। उनका सिद्धान्तों का सुस्पष्ट अवोध तथा सरल एव निरचायक प्रत्युपस्थापन निस्सन्देह प्रशसनीय है। कभी-कभी उनमें अद्भुत नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिमा की झलक मिलती है जिसे प्रमेयरनार्णव में हम भगवन्मूर्तिस्वरूपविचार, देहात्म- बुद्धिस्वरूपविवेक, तिरोभावस्वरूपनिरूपण तथा आधुनिक जीवविषयक विचार जैसे विषयो के विवेचन मे पाते हैं। मैं अपने इस लघु आमुर को इस समर्थ ग्रन्थकार के प्रति विनम्न प्रणति तथा इस ग्रन्य के सम्पादक एव अनुवादक को उनके उत्कृष्ट कृतित्व एव अति मूल्यवान् सेवा के लिये हार्दिक बधाई के साथ समाप्त करता है। चम्पारण्य-मधुवन एलिस ब्रिज अहमदाबाद-६ नागरदास का वॉभणिया २९।९।१९७१ . उपोद्धात महाप्रभु श्रीमद्वल्लभाचार्य द्वारा प्रतिष्ठापित पुष्टिमार्ग एवं शुद्धाद्वैतवाद के मर्म को समझने की इच्छा रखने वाले प्रबुद्ध पाठकों के लाभार्थ वालम सिद्धान्त के तलस्पर्शी विद्वान् एवं समर्थ ग्रन्थकार श्रीबालकृष्ण- भट्ट द्वारा प्रणीत 'प्रमेयररनार्णवः' नामक इस प्राचीन ग्रन्थरल का मामाणिक हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत करते हुए हमें एक अनिर्वचनीय आत्मतोष का अनुभव हो रहा है । प्रमेयरलार्णवकार श्रीयालकृष्णभट्ट-जो वाल्लभ-सम्प्रदाय में श्रीलालू- भट्ट के नाम से प्रसिद्ध है-के विषय में हमारा ज्ञान बहुत सीमित है। श्रीमूलचन्द्र तेलीवाला और श्रीधैर्यलाल सांकलीया ने 'सेवाफलम्' की अपनी प्रस्तावना में उन्हें श्रीमधुसूदनभट्ट का पुत्र बताया है। तैलङ्गदेश के जिन सजातीय विद्वान् ब्राह्मणों को गोस्वामी विट्ठलनाथ दीक्षित ने गोकुल में बसा लिया था उनमें श्रीविश्वनाथभट्ट के गोविन्द एवं कृष्ण नामक दो पुत्र भी ये-जिनकी एक बहिन रुक्मिणी को श्रीविठ्ठलनाथ दीक्षित ने अपनी धर्मपत्नी के रूप में स्वीकार किया था। श्रीमधुसूदनभट्ट इन्हीं विश्वनाथमट्ट के वंशज थे' | अणुभाष्यम्', १. “केचिदाचार्यज्ञातिजनाः तैलङ्गदेशीया विद्वांसो ब्राह्मणाः श्रीमद्- विट्ठलेश्वरप्रभुचरणः गोकुले समानीताः । तैः सह श्रीमत्प्रभुचरणः कन्या- दानव्यवहारो रक्षितः। एतादृशेषु ब्राह्मणेषु द्वौ भ्रातरी गोविन्द-कृष्णभट्टी बभूवतुः ययोर्भगिनी श्रीरुक्मिणी श्रीमत्प्रभुचरणः स्वपत्नीत्वेन स्वीकृता । आत्रेयापस्तम्वविश्वनाथस्य पुत्रो होतो । विश्वनायभट्टवंश्येषु कश्चिमधु- सूदनभट्टो बभूव । तस्य मधुसूदन भट्टस्य सूनव एते लालूभट्टोपनामवालकृष्ण- दीक्षिताः।" ('सेवाफलम्' के प्रारम्भ में 'विवरणकृतां परिचयः' पृष्ठ ३)। ? "Lālūbhattaji was a descendant of Sri 14 प्रमेयरलाणव सेवाफलम् और सिद्धान्तरहस्यम् के सम्मादकीय में श्रीतेलीवाला एप श्रीसाकलीया ने लिखा है कि श्रीवल्लभाचार्य के वश की कन्याओं के वराज भट्ट कहे जाते हैं और श्रीलालूभट्ट भी इसीलिए भट्ट कहे जाते ये । 'दशम तामसफल प्रकरण सुबोधिनी योजना' के 'निवेदनम्' में श्रीतेलीवाला ने श्रीलालूभट्ट को चागरोदी दीक्षित और श्रीभाणेजभट्ट का पुन बताया है तथा उन्हें गोस्वामिवश का जामाता न मानने के श्रीकल्याणशास्त्री के मत का उल्लेख किया है। सम्भव है श्रीमधुसूदन- मह उसी प्रकार भाणेजम के नाम से प्रसिद्ध रहे हों जिस प्रकार श्रीबालकृष्णभट्ट लालूभट्ट के नाम से प्रसिद्ध थे । श्री तेलीवाला एव श्रीसाकलीया के अनुसार श्रीलालूभट्ट सम्राट सवाई जयसिंह (जन्म संवत् १६८८ वि० तथा मृत्यु सवत् १७२८ वि०) के आश्रित थे और इस दृष्टि से उन्हें. ईसा की सनहवीं शती के उत्तराई Vallabhacarya from the female side" ( Introduction, P 9 of श्रीमद्ब्रह्मसूत्राणुभाष्यम् ) १. "प्राय श्रीमगोस्वामिना दुहितृतो वश्या भट्टा इत्युच्यन्त, लालू. भट्टा अपि तयद ।" ('सेवाफलम्' के प्रारम्भ में, विवरणकृता परिचय', पृष्ठ ३)। २. "The other two are also descendants of Vallabhācārya from daughters and they are known as Bhattis or Lalais" ( "सिद्धान्तरहस्यम्', Editors Note, p II ) ३. "बागरोदीदीक्षितश्रीलालूमट्टकृवा योजनाधुना प्रकाश्यते । धोभाणेज भट्टसुतेत्यनेन लालूभट्टा न गोस्वामिजामावर अपि तु तत्पुत्रा इति कल्याणशास्त्रिण ।" ('दशमतामसफलप्रकरणसुबोधिनीयोजना' के अन्त में 'निवेदनम् पृष्ठ ४०)।
उपोदात 15 में विद्यमान होना चाहिए। सम्प्रदाय के विद्वान उन्हें गोस्वामी भी पुरुषोत्तम ( भन्म सवत् १७२४ वि०) का समसामयिक मानते हैं। श्री बालकृष्णमट्ट ने अपनी कृतियों में गोस्वामी श्रीपुरुषोत्तम का निस प्रकार उल्लेख किया है उससे उक्त धारणाओं की पुष्टि होती है। वे प्रायः राजस्थान के कोटा नगर में रहा करते थे, जहाँ उनका श्रीबाल- कृष्णप्रभु का मन्दिर आज भी विराजमान है । उन्होंने अपनी प्रायः समी कृतियों के प्रारम्भ में श्रीगिरिधारी' तथा श्रीबालकृष्ण- १. "एते लालूमट्टोपनामवालकृष्णदीक्षिताः सम्राटसवाईजयसिंहस्या- थिताः । सवाईजयसिंहस्तु संवत् १६८८ वर्षे प्रादुर्भूतः, १७२८ वर्षे पञ्चत्वं गतः, अतोऽस्मिन् समये लालूभट्टा विद्यमाना आसन् ।" ('सेवा, 'फलम्' के प्रारम्भ में, 'विवरणवृत्ता परिचयः', पृष्ठ ३)। २. "इमे श्रीमत्पुरुषोत्तमचरणसमये वैक्रमे चतुर्विशत्युत्तरे सप्तदश- शतके (१७२४ ) मासग्नितिसाम्प्रदायिकविद्वत्प्रसिद्धिः । 'वैदुष्यमहिम्ना चैते जयपुरपुरन्दरादिविविधमहाराजेभ्यः सम्मानमवापुः।" ('वादापलि.' के प्रारम्भ में श्रीरमानाथभट्टलिखित 'अन्यकर्तृपरिचयः', पृष्ठ ८)। ३. "अघुना तु श्रीमदाचार्यहस्ताक्षरपत्रात्कृतचिल्लब्धाच्छीपुरुषोत्तम- गोस्वामिभिः तदुत्तरग्रन्य मानीतोऽस्ति |"अत: "इत्यन्तो अन्यो गोस्वामि- पुरुषोत्तमानोतो लेख्यः ।" ("निर्णयार्णवः', पृष्ठ ११)। ४ "स्थितिस्त्वेतेया राजपुत्रप्रदेशे कोटानगरे आसीत् । सम्प्रत्यपि तेषा श्रीमद्वालकृष्णप्रभुमन्दिरं तत्रास्ति।" ('वादावलिः' के प्रारम्भ में श्रीरमानाथभट्टलिखित 'ग्रन्थकर्तृपरिचयः', पृष्ठ ८)। ५. (अ) श्रीगिरिधारी तनोतु मङ्गलानि । (निर्णयार्णवः' के प्रत्येक तरङ्ग, भक्तिद्धिनीविवृतिः' एवं 'प्रमेयरलार्णवः' के प्रारम्भ में)। श्रीगिरिधारी करोतु कुशलानि । ( 'दामतामसफल. प्रकरणसुबोधिनीयोजना के प्रारम्भ में)।
16 प्रमेयरलार्णव प्रभु की वन्दना की है और अनेक स्थलों पर श्रीबालकृष्ण को अपना . (ब) प्रत्येकसिद्धशृङ्गारमूतिमानन्दविग्रहम् । गोवर्द्धनघरं वन्दे घोरापाप्राणवल्लभम् ।। १ ॥ (सिद्धान्तमुक्तावलीयोजना' के प्रारम्भ में)। रासे राधिकया समं विहरतो मोदर्मुहर्नृत्यतः । श्रीगोवर्द्धनधारिणो भगवतः सेवेय पादद्वयम् ॥ ४ ॥ ( 'सिद्धान्तमुक्तावलीयोजना' के अन्त में)। वन्दे वेदशिरःसमीडितगुणं गोवर्द्धनेशं प्रभुम् ।। १ ।। (सिद्धान्तरहस्यटोका' के प्रारम्भ में)। श्रीगोवर्द्धनधारिणं शुभकरं शृङ्गारमूर्ति भजे ।। १ ३३ ('जन्मप्रकरणसुबोधिनीयोजना' के प्रारम्भ में ) । गोवर्द्धनघरं यन्दे वजराजकिशोरकम् ॥ १॥ ('सेवाफलटीका' के प्रारम्म)। गोपिकानयनानन्द गोवर्धनधरं भजे ॥ १ ॥ ('सेवाकौमुदी' के प्रारम्भ में)। श्रीगोवर्द्धनधारिणं रसिकहचोरं किशोरं भजे ॥ १ ॥ ('निर्णयार्णवः' के प्रारम्भ में)। देखिए, "निर्णयाणवः' के द्वितीय, तृतीय एवं चतुर्थ तरङ्गों तथा 'प्रमेयरत्नार्णव.' के पूर्वाई एवं उत्तरार्ध के प्रारम्भिक श्लोक । १. वन्दे नन्दपुराणपुण्यफलितं श्रीबालकृष्णं प्रभुम् ॥ १॥ (-'जन्मप्रकरणसुबोधिनीयोजना के प्रारम्भ में)। वन्दे श्रीवालकृष्णाख्यं प्रभुमानन्दमन्दिरम् ॥ २ ॥ ('प्रमेय रत्नार्णवः', उत्तरार्द के प्रारम्भ में)। चित्ते क्रीहतु नन्दगोपतनयः श्रीबालकृष्णः प्रभुः ॥२॥ ('निर्णयाणव.' के प्रारम्भ में)।
उपोदात 17 कुलदेवता' तथा अपने को 'बालकृष्णाहुनिसेवी' कहा है । अपने प्रायः सभी ग्रन्यों के प्रारम्भ में उन्होंने श्रीवल्लभाचार्य एव श्रीविठ्ठलनाथ की स्तुति की है तथा इतिश्री में अपने को 'श्रीगोवर्द्धनधर-श्रीवल्लमाचार्य- श्रीविट्टलेश्वरधरणानुचामेवक' कहा है। श्रीतेलीवाला एव श्रीमाकलीया यशादोत्सगसशोभिवालकृष्णं नमाम्यहम् ॥ १ ॥ ( 'निर्णयाणव' के चतुर्य तरङ्ग के प्रारम्भ में)। वेदवोधितङ्गारस्थायिभावात्मक मह । सुसाकार पर ब्रह्म बालकृष्णाभिध भजे ॥१॥ ( 'अणुभाष्यम्' को टीका के प्रारम्भ में)। १. यश्चिन्त्यो ब्रह्मरुद्रायवल्लवोजनचिन्नकः । अस्मत्कुलपति. श्रीमद्वालकृष्णः प्रसीदतु ॥ ५ ॥ (मिडातमुक्तावलीयोजना' के अन्त में)। श्रीबालकृष्णोऽस्मलुलपति. प्रसीदतु । ('निर्णयार्णव', पृष्ठ ४५)। श्रीबालकृष्ण: कुलदैवतं मे। ('प्रमेयरत्नार्णव', पूर्वाई, छोक २)। बालकृष्णो मम स्वामी महय भक्ति प्रयच्छतु ।। ('भक्तिसिनोविवृति' के अन्त में)। सेवा पुष्टिपथप्रोता कारयित्वा निजा फलम । ददातु प्रथम देवो वालकृष्णो मदीश्वर. ॥१॥ ( 'सेवाफलम्' की टीका के अन्त में)। २ यदुक्त वल्लभाचार्यविवृत विट्ठलेश्वर। कृतं तदनुसायतद् बालकृष्णाडिघ्रसेविना ॥१॥ ("सिद्धानमूनावलायाजना' के अन्त में) निखिलोपनिषदेद्यो बालकृष्णो व्रजाधिप । तदनौ बालकृष्णन सर्व समर्पितम् ॥ ( "सिद्धान्नरहस्यम्' के नवमश्लाक को टाका की समाप्ति में)। मया 18 प्रमेयरलाणव के अनुसार गोस्वामी श्रीगिरिधारी श्रीलालूभट के गुरु थे'; किन्तु भीलालूभट की कृतियों के प्रारम्भ में की गयी श्रीगिरिधारी की वन्दना गुरुवन्दना नहीं दी है। 'तत्वार्थदीपनिबन्धः' के 'शास्त्रार्थप्रकरणम्' के अपने उपोद्घात में हम बता चुके हैं कि अवबोध, चिन्तन और लेखन की स्पष्टता-स्वच्छता, समन्वयात्मकना-सुमम्बद्धता, प्रवाह एव प्राञ्जलता की दृष्टि से विचार करने पर श्री बालकृष्णभट्ट वाल्लभ मत के अप्रतिम व्याख्याता सिद्ध होते हैं। जिन्होंने इनके ग्रन्थों का अध्ययन किया है उन्हें इनके चैदुष्य और प्रस्तुत 'प्रमेयरलार्णवः' आदि ग्रन्थों की उपयोगिता के सम्बन्ध में शुद्धाद्वैतभूषण (स्व.) श्री रमानाथमट्ट का यह कथन अतिशयोक्तिपूर्ण भहीं लगेगा कि 'एनद्वैदुप्ये तु कृतमनेनैव यद्यदि गामविष्यन् प्रमेय- रत्नार्णवादय एतस्कृता ग्रन्थाः तहि नालप्स्यन्तैव पुष्टिसम्प्रदायसिद्धान्त विदुपां मतयः ।' ('वादावलिः', 'अन्यकर्तृ परिचयः', पृष्ठ ८)। वानम सिद्धान्त को जिज्ञासुओं को हृदयङ्गम कराने के लिए श्री पालकृष्णमट्ट ने सुस्पष्ट और सरल भाषा में श्रीमद्वल्लभाचार्य की कुछ कृतियों की टीका लिखी थी और साथ ही कुछ स्वतन्त्र ग्रन्थों की रचना भी की थी। प्रस्तुत 'प्रमेयानार्णवः', जिसमें वाल्लभ मत के प्रायः सभी पक्षों का संक्षेप में प्रामाणिक और सुगम विवेचन किया गया है, उनकी इसी प्रकार की एक स्वतन्त्र कृति है। 'प्रमेयरमार्णकः' के साथ ही श्री लालूम ने 'सेवाकौमुदी' और 'निर्णयार्णवः' नामक दो अन्य स्वतन्त्र मन्य भी लिखे हैं । 'सेवाकौमुदी' के प्रथम प्रकरण में पुष्टिभक्तिमागीय सेवा का निरूपण तथा दूसरे प्रकरण में उस सेवा के विषय का निर्धारण अर्थात् परमकाष्ठापन्न ब्रह्म के स्वरूप का निरूपण १ गोस्वामियोगिरिधारिणां शिष्याः। (सेवाफलम्' के प्रारम्भ में, 'विवरणकृती परिषयः', पृष्ट ३)1 २. देखिए, कपर पृष्ठ 16 टिप्पणी ५ (ब).
उपोदात 19 . किया गया है। उनकी यह कृति (श्रीरमानाथभट्टकृतहिन्दीमाषान्तर- सहित, वि० सं० १९७५ में, श्री बालकृष्ण शुद्धाद्वैत संस्कृत पुस्तकालय, बम्बई से) छर चुकी है। 'निर्णयार्गवः' के तीन चोयाई अंश में श्रीमद्वल्लभाचार्य को कृतियों के सम्बन्ध में तथा शेष चतुर्थाश में ओ विट्ठलनाय की कृतियों के सम्बन्ध में विमर्श उपलब्ध होता है। इस अन्य की रचना का उद्देश्य इन दोनों आचार्यों की कृतियों में होने वाले संशयों का समाधान कर उनके तात्पर्य को समझने की चेष्टा करना है। इमीलिए इस ग्रन्य में विवेच्य विशयों में कोई कम उपलब्ध नहीं होता। इममें श्रीपलभाचार्यकृत 'अणुमात्यम्', 'मुगधिनी', 'एका. दशस्कन्धार्थनिरूपणकारिकाः', 'तत्वाधं दोपनियन्धः', 'पनारलम्यनन्' 'पुरपोत्तमनामसहस्रम्' 'त्रिविधलीलानामावली' तथा पोडशग्रन्थान्तर्गत 'यमुनाष्टकम्' 'नवरत्नस्तोत्रम्' 'संन्यामनिर्णयः' एव निरोधलक्षणम्' और श्रीविठ्ठलनायकृत 'टिप्पणी', 'विद्धन्मण्डनम्' 'मक्तिहसः', 'नवरत्न- प्रकार:', 'गोकुलाष्टकम्', 'रससस्यम्' एव 'गुप्तरसः' आदि के सम्बन्ध में विचार किया गया है। 'निर्णयार्णयः' में 'प्रमेयररनार्णवः' का जिस प्रकार उल्लेख हुआ है उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि इसकी रचना १. नत्वा श्रीवल्लभाचार्य प्रभु धोविट्टलेश्वरम् । तदुक्योधसिद्धययं क्रियते निर्णयार्गवः ॥ ३॥ सुबोधिन्या निवन्धे च भाष्ये प्रकरणादिपु । टिप्पण्यां तथा विद्वन्मण्डनादिषु संशयाः ॥ ४ ॥ बुद्धिदोषादुद्भवन्ति तन्निरासो विधीयते । श्रीमद्गावदनायोशपदाम्भोजप्रसादतः ('निर्णयार्णवः', पृष्ठ.)। २. श्रीमदाचार्यवाणां विट्टलेशस्य च प्रभोः। वो बोयमितोच्छातः क्रमादिन विवक्षितः ॥ ६॥ ('निर्णयार्णवः पृष्ठ १)।
20 प्रमेयरलार्णव 'प्रमेयरत्नार्णवः' की रचना के बाद ही हुई है। हम कह चुके हैं कि श्रीलालूभट ने श्रीमद्वल्लभाचार्य की कुछ कृतियों पर टीका लिसी थी। श्री चल्लभाचार्य के 'तत्त्वार्थदीपनिबन्धः' पर उनके द्वारा लिखित 'नियन्धयोजना' टीका के होने का उल्लेख श्री सेलीवाला एव श्री सांकलीया तथा डॉ. सुरेन्द्रनाथ दासगुप्त आदि ने किया है। सेट नारायणदास तथा जेठानन्द आसनमल पुष्टिमार्गीय ग्रन्थमाला मे वि० स० १९९९ में प्रकाशित 'तत्त्वार्थदीपनिवन्धः' के श्री हरिशङ्कर शास्त्री द्वारा सम्पादित संस्करण में प्रथम प्रकरण (अर्थात् 'शास्त्रार्थप्रकरणम्' ) की योजना टीका मुद्रित हो चुकी है, किन्तु द्वितीय एवं तृतीय प्रकरणों ( अर्थात् 'सर्वनिर्णयप्रकरणम्' और 'मागवतार्थ- प्रकरणम्' ) पर श्री लालूभट्ट की टीका अभी नहीं उपलब्ध हो सकी है अतः यह यह सकना कठिन है कि उन्होंने तत्त्वार्थदीपनिबन्ध के तीनों प्रकरणी की टीका लिखी थी। इस सम्बन्ध में यह अवधेय है कि उनके 'निर्णयार्णवः' (की प्रथम तरङ्ग) में प्रायः सात पृष्ठों में शास्त्रार्थप्रकरणम्' के विभिन्न स्थलों का विवेचन है जो इस प्रकरण के उक्त सस्करण में प्रकाशित योजना टीका में तत्तत् स्थलों में साधारण पाठभेद के साथ ज्यों का-त्यों सन्निविष्ट मिलता है, यद्यपि (चतुर्थ तरङ्ग में उपलब्ध होने वाला) मायः चार पृष्ठ का विवेचन उक्त टीका में मुद्रित नहीं मिलता है। इसी प्रकार निर्णयार्णवः' (की द्वितीय और तृतीय तरकों में प्रायः १. एतत्तु मया प्रमेय रत्नार्णवै ख्यातिविवेके स्फुटीकृतम् । ("निर्णयार्णवः', पृष्ठ १७)। एतच्च ममा ख्यातिदिवेके प्रपश्चितम् । ('निर्णयार्णवः', पृष्ठ १८) २. 'सेवाफलम्' के प्रारम्भ में "विवरणकृता परिचयः' पृष्ठ ३ । ३. A History of Indian Philosophy, Vol. IV., p375. ४. श्रीवल्लभवंशवृक्ष तथा उत्तरभारतीय आन्ध्र (ला) भट्ट बंशवृक्ष ।
उपोदात 21 आधे-आधे पृष्ठों में तथा चतुर्थ तरङ्ग में प्रायः चार पृष्ठो) में 'सर्व- निर्णयप्रकरणम्' के कुछ स्थलों का विमर्श उपलब्ध होता है जो 'सर्व- निर्णयप्रकरणम्' (के उपर्युक्त ग्रन्थमाला में प्रकाशित सस्करण) मे मुद्रित नहीं मिलता। 'मागवतार्थप्रकरणम्' के सम्बन्ध में भी 'निर्णयार्णव' में दो स्थलों पर विचार किया गया है, एक तो द्वितीय तरन के प्रारम्भ में, जहाँ श्रीवल्लभाचार्य द्वारा नवमस्कन्धनिबन्ध की ७९वीं कारिका में कही गयी इस बात की पुष्टि के लिए कि श्रीरामचन्द्र का जन्म पुष्य नक्षत्र में हुआ था श्रीमद्वाल्मीकीयरामायण के अयोध्याकाण्ड के पन्द्रहवें सर्ग का एक श्लोक उद्धृत किया गया है और दूसरे नृतीय तरङ्ग में (पृष्ठ ४८-४९ पर), जहाँ पञ्चमस्कन्धनिबन्ध की मङ्गलाचरणकारिका के सम्बन्ध में विवेचन किया गया है। श्रीलालूभट्ट ने श्रीमद्भागवत की श्रीवल्लभाचार्यकृत 'सुबोधिनीटीका' की मी योजना नाम से एक व्याख्या लिखी थी जिसका उल्लेख अपने अन्यों मे पन-तत्र उन्होंने स्वय किया है' | दशमस्कन्ध के जन्मप्रकरण (अर्थात् अध्याय १-४) की सुबोधिनी की उनकी योजना (वि० स० १९८३ में श्री मनलाल शास्त्री एर श्रीहरिकृष्ण शास्त्री द्वारा, निर्णयसागर प्रेस से प्रकाशित) 'जन्मप्रकरणसुवाधिनी' में तथा तामस प्रमाण, प्रमेय और साधन प्रकरणों (अर्थात् अध्याय ५-२८) की उनकी योजना (वि० स० १९९३ में श्रीधैर्यलाल साकलीया द्वारा प्रकाशित ) सुयोधिनीविवरण- त्रयम् मे मुद्रित हुई थी। तामसपलप्रकरण ( अर्थात् अध्याय २९-३५) की सुबोधिनी की उनकी योजना श्रीमूलचन्द्र तेलीयाला तथा श्रीवाडी- लाल शाह ने (वि० सवत् १९८१ में 'गुजराती न्यूस' मुद्रणालय से मुद्रित करा कर) प्रकाशित की थी। इस प्रकरण के अन्तिम अध्याय की योजना सम्पादकों को उपलब्ध नहीं हो सकी थी अन यह इस पुस्तक में मुद्रित नहीं की जा सकी। यह टीका सक्षिप्त है और इसके प्रारम्भ में स्वय श्रीबालकृष्णभट्ट ने लिखा है कि 'इह पञ्चाध्यायीसुबोधिन्या अर्थः १. देखिए, पृष्ट २६६ पर परिशिष्ट २ का अन्तिम वाक्य ।
22 प्रमेयरलार्णव स्फुटवया' विस्तारेण च टिपण्यां निरूपित इति मया योजना शाः फक्किाः म विनियन्ते, किन्तु टिप्पण्या या फलिकाः न विवृताः वा एव योज्यन्त इत्याकसनीयम्' ।' श्रीवल्लभाचार्यकृत 'एकादशस्कन्धार्थनिरूपणकारिकाः' को श्री लालू- भट्ट 'सुबोधिनी' से भिन्न अन्य मानते हैं। इन कारिकाओं की उन्होंने विस्तृत व्याख्या लिखी है। जिसे 'निर्णयार्णवः' में सन्निविष्ट कर दिया है। 'पोडशमन्य' के नाम से प्रसिद्ध श्रीवल्लभाचार्यविरचित सोलह लघुग्रन्थों में से कुछ पर श्रीलालूभलिखित टीका मिलती है। इन कृतियों में आनेवाली 'सिद्धान्तमुक्तावली' नामक कृति की उनकी योजना' नाम से रिखी गयो टीका विक्रम संवत् १९४१ में 'सद्धर्म- स्मारकः' के द्वितीय वर्षा के प्रथम मास के अङ्क में छपी थी। श्री धैर्य- लाल साकलीया द्वारा वि० स० १९९६ में प्रकशित (छः टीकाओं तथा दो परिशिष्टों सहित)"सिद्धान्तमुक्तावली' में भी इस टीका का मुद्रण हो चुका है। वि० सं० २०१६ में गोस्वामी श्रीदीक्षितजी महाराज ने इसे अपनी 'विषमस्पलटिप्पणी' से विभूषित कर 'लधुव्यारयाग्रन्थ- समुच्चयः' में प्रकाशित किया है। "सिद्धान्तरहस्यम्', 'भक्तिवर्द्धिनी' और 'संवाफलम् की उनकी टीका भी तेलीवाला एवं श्री सांकलीया द्वारा प्रकाशित 'सिद्धान्तरहस्यम्' (एकादविवरणसमेतम, वि० सं० १९८० में), 'मनिवर्द्धिनी' (चतुर्दशविकृतिसमेता, वि० स० १९४७ में) और 'सेवाफलम्' (द्वादशविवरणसमेतम्, वि० स० १९७३ में) में मुद्रित हो चुकी है । 'नवरत्नस्तोत्रम्' पर उनकी कोई टीका उपलब्ध १. 'तामसफलप्रकरणसुबोधिनीयोजना', पृष्ट १ । २. एकादशस्कन्धार्थनिरूपणकारिका सुबोधिनीती मिन्नतयैवोपलम्य- मानाः सन्ति “अर्थतासा व्याख्या । ('निर्णयार्णवः' पृष्ठ २९-३०), ३. देखिए, 'निर्णयार्णव.', पृष्ठ २९-४० । . , 23 उपोदात नहीं है। श्री पुष्टिमार्गीय पुस्तकालय नहियाद से वि० सं० १९९८ में प्रशशित 'नगररनम्' में श्रीलाल्मलिसित एक परिशिष्टम्' (पृष्ठ ३८- ३९ पर ) रा है जो यस्तुतः उनके निर्णयाण:' की प्रथम तरा (फे पृष्ट १३-१५) मे उदृत नवरत्नविषयक विमर्श तथा द्वितीय तरा ( फे पृर २७-२९) से उदृत नवरत्नप्रकाश (नवरत्न की श्रीविठ्ठलनायत टीका) में मम्मद विनन दी है। वि० सं० २००७ में प्रकाशित "श्रीवाल्लमांचक्ष तथा उपरमागीय भाभ (AM) भट्ट यंशवृक्ष' (पृष्ठ १२ ) में उलिपित श्रीराल्भात 'गयरनस्टप' से भी सम्भवतः परिशिष्ट रूप में मुद्रित यह होगा ही अभिप्रेत है। इसी प्रकार वि० गं० २०१७ में प्रोसेमर गोपिन्दलाल हरगोविन्द मा वारा सम्मादित 'पायलम्पनम् में, 'पारतम्यनम्' की श्रीलालूमकृत किंगी टीका के अमाव में, निपाण::' में आये पनावलम्पनविषयक विमर्श पो पात- कृष्णमगिरग्नेि निर्णगागरे पायसन्यनप्रन्ययिम:' शीर्षक से परिशिष्ट फे रूप में (पृष्ठ ८०-८१ पर) मुद्रित किया गया है। इसी तरह 'यमुनाष्टरम्', 'मंन्यामनिर्णय' और 'निरोधक्षगम्' पर भी उनकी टीका टपलब्ध नहीं है यपि "निपाणन:' में इन तीनों कृतियों के सम्बन्ध में पिचार किया गया है। 'पोनप्रन्ध' के अन्तर्गत आने वाले 'यालयोध', 'पुष्टिप्रगहमर्यादामदः', 'भना.माणप्रयोध.', ' गिधैर्या- श्रयः', 'श्रीग याप्रयः', 'चा धोकी', 'जयमेदः' और ' पद्यानि' पर उनकी कोई टीग नहीं मिलनी है। "निर्णयार्णव.' में भी इन कृतियों के मान्य में कोई विनन नहीं मिलता। ऐमी स्थिति में किमी निश्वयात्मक प्रमाण के अभाव में हमारे लिए यह पद सफना पठिन है कि उन्होंने पोशान्य के अन्तर्गत आनेवाले सभी लघुमन्यों पी टीका लिपी है और इसीलिए 'चाफरलम्' के प्रारम्भ में 'विवरण- फुगां परिणय.' (पृ ३) में कहे गये, श्री तेलीवाला एवं श्रीमाक्लीया के, 'निर्णयार्णव-प्रमयरत्नार्णय पोदशप्रयिमरणादयो रहयो ग्रन्थास्तेषां प्रकाशातन् प्रतीक्षन्ते', इम याक्य में हुए पोदशग्रन्धविवरण के . .
प्रमेयरत्नाव उल्लेख का हम यही अभिप्राय समझते हैं कि श्री लालूभटट ने पोडश- मन्थ के अन्तर्गत आने वाले कुछ लघुग्रन्थों का विवरण लिखा है जिनके प्रकाशित होने की अपेक्षा है। इस सम्बन्ध में प. श्रीधर शर्मा पाठक तथा डॉ. सुरेन्द्रनाय दासगुस के कयनों का भी यही तात्पर्य समझना चाहिए। श्रीलालूभटट ने श्रीमदल्लभाचार्यविरचित 'ब्रह्मसूत्राणुमाष्यम्' पर भी एक टीका लिखी थी जिसका विभिन्न विद्वानों ने 'अणुमाध्य- निगूढार्थप्रकाशिकार", 'अणुमाध्यविवरणार्थप्रकाशिका' तथा 'योजना' नामों से उल्लेख किया है। श्रीतेलीवाला का मत है कि श्रीलालूभट्टने अणुभाष्य पर योजना नाम से टीका लिखना प्रारम्भ किया था- जिसे बाद में उन्होंने 'निगूढार्थप्रकाशिका' नाम दे दिया, किन्तु यह 'टीका वे पूरी नहीं कर सके । अणुभाष्य के त्रिसूत्रीपरिमित भाग की १. लालूभट्टाना ग्रन्या., 'पोडशग्रन्घटीकाश्च । ('श्रीमदणुभाष्यम्', भाग २, उपोद्घात:, पृष्ठ ४६ ) । A History of Indian Philosophy, Vol. IV., p. 375. २. देखिए, सेवाफलम् ( द्वादविवरणसमेतम् ) के प्रारम्भ में श्री तेलोवाला तथा श्री साकलीया द्वारा लिखित "विवरणकृता परिचयः' पृष्ठ ३ और S. N. Dasgupta: A History of Indian Philosophy, Vol. IV., p. 375. ३. श्रीवल्लभवशवृक्ष तथा उत्तरभारतीय आन्ध ( तेलङ्ग) मट्ट वंशवृक्ष, पृष्ठ १२। ४. "Lalibhattaji......has attempted to write a commentary on the Apu Bhāşqa, but has not completed the same. His commentary is named उपोद्धात 25 श्रीलालूभट्टकृतटीका का मुद्रण, 'गूढार्थदीपिका के नामसे (पुष्टिमार्ग- सिद्धान्तकार्यालय, बम्बई से सन् १९२१ में प्रकाशित, पञ्चटीकासहित अणुभाष्यके त्रिसूत्रीपरिमित भाग में ) हो चुका है। 'प्रमेयरत्नार्णवः' के पूर्वार्द्धमान का मूल चौखम्बा सत्कृत बुकडिपो बनारस से प्रकाशित होने वाले चौसम्बा सस्कृत सीरीज़ के ९७ वें गुच्छ के अन्तर्गत श्रीरामकृष्णभट्टविरचित-प्रकाशाख्यव्याख्यासंवलित 'शुद्धा- द्वैतमार्तण्यः' के साथ, जनवरी सन् १९०६ में, विद्याविलास प्रेस चनारस से छपा था, जिसका संशोधन शुद्धाद्वैत सम्प्रदाय के विद्वान् श्री रत्नगोपाल भट्ट ने किया था। इस संस्करण में न तो कोई भूमिका है और न परिशिष्ट । एक ही प्रकार के टाइप में पृष्ठों लम्बे अनुच्छेदों में गद्य-पद्य का भेद या अल्प-विराम, उद्धरण-चिह्न आदि का प्रयोग किये. विना ही सारी पुस्तक ४४ पृष्ठों में छाप डाली गयी है जिससे प्रबुद्ध पाठकों को भी अर्थ समझने में कठिनाई होती है क्योंकि अनेक ऐसे स्थल हैं जहाँ, उद्धरणों के मूलस्थल का कहीं भी निर्देश न होने के फारण, पाठक यह नहीं निश्चय कर पाता है कि वाक्य का कितना अंश उद्धरण है और कितना मूल ग्रन्थ का अंश । अन्य में संशोधन में परिश्रम किया गया है फिर भी मुद्रण की अनेक अशुद्धियाँ रह गयी है, जिनका शुद्धिपत्र देनेकी आवश्यकता नहीं समझी गयी है। इस पूर्वार्द्धमात्र के मूलमात्र का ही पुनः प्रकाशन साठ वर्ष बाद वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय के अनुसन्धान संस्थान से वल्लभवेदान्त- अन्यमाला के प्रथम पुष्य के रूप में (सप्रकाश 'शुद्धाद्वैतमार्तण्ड:' और श्रीहरिरायविरचित 'ब्रह्मवादः' के साथ,) सन् १९६६ में हुआ है, by him as योजना first and then as निगूढार्थप्रकाशिका". 'श्रीमग्रह्मसूत्राणुभाष्यम्' (रश्मिपरिवहितम् ); तृतीयाध्यायस्य तृतीयः 978: / Introduction, p. 9.
26 प्रमेयरलार्णव + . जिसके सम्मादक वाराणसेय सस्कृत विश्वविद्यालय में शुद्धाद्वैतवेदान्त के अध्यापक श्री सत्यनारायण मिश्र, न्यायवेदान्ताचार्य, एम० ए० हैं। इन दोनों सस्करणों का सक्षेप में निर्देश करने के लिए प्रस्तुन उपोदात मे हम कमश 'चौ० स०' और '२० स.' सकेतों का प्रयोग करेंगे तथा प्रस्तुत सस्करण का निर्देश 'प्र० स.' इस सस्त से करेंगे। याराणसेय सस्कृत विश्वविद्यालय में उपर्युक्त प्रकाशन में मुद्रित मप्रकाश 'शुद्धाशमार्तण्ड' तथा 'ब्रहामाद' सम्बन्ध में विचार के प्रकृत उपोद्वात मे अग्रामगिक और अनावश्यक होने के कारण हम इसमें छपे 'प्रमयरत्नाव' के बारे में अपना मत प्रकट करेंगे। व० स० दे प्रारम्भ मे याराणसेय सस्कृत विश्वविद्यालय के अनुसन्धान-सस्थान में सञ्चालक प० बलदेव उपाध्याय की दो पृष्ठा की प्रस्तावना है जिसमें कहा गया है कि, 'पपामेतपा प्रन्याना सम्पादन यारापसेयमम्तृत विश्वविद्याएये पगमवेदान्ताध्यापन घासस्य नारायण मिश्रेण शोभन व्यधायि । प्रन्यारम्भे च प्रमेयवहुला चैदुष्यपूर्णा भूमिक' निर्माय सस्करणस्यास्य महत्त्व समुन्नातम् ।' ('प्रास्ताविकम्', पृष्ठ 'स') तदनन्तर इन वाक्यों में प्रशसित सोलह पृष्ठों का एक 'उपोदात है जिसके अन्त में छपा है, निवेदक सत्यनारायणमिश्र यह उपोद्धात संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रकाशनों की गौरवपूण परम्परा से परिचित व्यक्ति को विचार करने के लिए बाध्य कर देत है । इसका प्रथम अनुच्छेद तो मानो कर्तृ गुप्त वाश्यां को समझने क अभ्याम कराने के लिए ही लिखा गया है, परवर्ती अनुच्छेदों में में वाक्यरचना के शैथिल्य के साथ ही 'विद्वन्मण्डनटीका हरतोषणी नाम तथा श्रीहरिराय चरणाना जन्म स. १६४७ वरमरे अभूगन्' जै अशुद्ध वाक्य भी मिल जाते है। हरितोषिणी टीका के प्रारम्भ श्लोक उद्धृत करते समय इतना भी ध्यान नहीं दिया गया है कि 'विट्टलेशाह नियुग्मकम् को 'विट्टलेशोर प्रियुग्मम् छाप देने से लो.
उपोद्धात 27 तो अशुद्ध हो ही जायेगा, पाठक नमस्य विहलेश को ही नमस्कर्ता समस बैठेगा और श्लोक का अर्थ न लगा पायेगा। 'प्रमेयरत्नार्णवः' और उसके लेखक के सम्बन्ध में सम्पादक महोदय को जो कुछ कहना है उसे उन्होंने एक छोटे से अनुच्छेद में कर डाला है जिसे हम यहाँ ज्यों का त्यों उद्धृत कर रहे हैं। 'प्रमेयरत्नावग्रन्थस्य रचयिता श्रीयालकृष्णमह भासीत् । एतस्य मन्था अपरेऽप्यनेके सन्ति । येषु श्रीमद्भागवतपुराणस्योपरि स्वतन्त्रा नियन्धाः सुप्रसिद्धाः। प्रमुख एको वनामझो ग्रन्थोऽप्येतस्यैव विराजते । तथाऽन्येऽपि यहवः स्वतन्त्रा निबन्धा वर्तन्ते । एतस्य महा- नुमावस्य विशेषसम्बन्धः पाठपीठेन सहासीत् ।' (उपोद्घातः, पृष्ठ घ)। उपर्युक्त कथन के अनुसार श्री बालकृष्ण भट्ट के 'अन्य भनेकों ग्रन्थ हैं जिनमें श्रीमद्भागवतपुराण पर स्वतन्त्र निबन्ध सुप्रसिद्ध है।' उनके अन्य 'बहुत से स्वतन्त्र निबन्ध भी है। किन्तु दैवदुर्विपाक से केवल हमें ही नहीं अपि तु वाल्लभमाहित्य के किसी भी अन्य लेसक, प्रकाशक या अनुयायी को भी आज तक श्री बालकृष्ण भट्ट द्वारा श्रीमद्भागवत पर लिखे गये इन 'सुप्रसिद्ध स्वतन्त्र निबन्धों' के दर्शन नहीं हुए हैं। न जाने क्यो इसमें से , किसी एक का भी नामोल्लेख तक करना उचित नहीं समझा गया। 'अन्य बहुत से स्वतन्त्र निवन्धों में से भी किसी का नामोल्लेख करने तक की आवश्यकता भी नहीं समझी गयी। इसी प्रकार पूर्वोद्धृत अनुच्छेद के बाद वाले अनुच्छेद में कहा गया है, 'समुपलभ्यन्ते हरिदासविरचिताः सहस्रशो ग्रन्थाः' अर्थात् गोस्वामिश्रीहरिराय के लिखे हजारों ग्रन्थ मिलते हैं। यदि यहीं पर यह भी लिख दिया जाता कि समुपलब्ध होने वाले श्रीहरिराय विरचित हजारों ग्रन्थ कौन कौन है तथा कहाँ मिलते हैं तो सचमुच वालम सिद्धान्त के अनुसन्धानकर्ताओं का बड़ा लाभ होता और प्रस्तावनालेखक का यह विश्वास सार्थक हो 28 प्रमेयरत्नार्णव . जाता कि इस प्रकाशन से जिज्ञासुओं एवं अध्यापकों का महा उपकार होगा, क्योंकि वालमसिद्धान्तविषयक उपलब्ध वाड्मय के समम अन्यों की सख्या भी अभी हजारों में नहीं पहुँच पायी है। इस 'उपोदात' के तीसरे पृष्ठ की चतुर्थ पति से लेकर सतर पंक्तियाँ श्री जयकृष्णदास हरिदास गुम दारा रि० स० १९८५ में प्रकाशित 'ब्रह्मवादसंग्रहा' की श्री हरिशकर शास्त्री द्वारा लिखित 'अयेद किश्चित् प्रस्तूयते' शीर्षक से मुद्रित प्रस्तावना के प्रथम पृष्ठ से अविकल रूप में ले ली गयी हैं, दोनों में अन्तर पेवल यही है कि श्री हरिशकर शास्त्री की प्रस्तावना में तैत्तिरीयोपनिषद् की भृगुवल्ली के प्रथम अनुवाफ के "यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यध्धयन्यभि- संविशन्ति" इस रूप में मुद्रित उद्धरण को उपर्युक्त उपोद्धात में दो भागों में विभाजित कर “यतो या इमानि भूतानि जायन्ने येन जातानि जीवन्ति", "यरप्रयन्त्यमिस विशन्ति" इस रूप में छापा गया है जिसका परिणाम यह होता है कि पढ़ने वाला यही समझता है कि ये भूति के विभिन्न स्थलों के स्वतन्न वाक्य है । इसी प्रकार पृष्ठ पद के प्रारम्भ से लेकर पृष्ठ 'द' की हकीसवीं पंक्ति तक की प्रायः पाँच पृष्ठों की सामग्री भी श्री हरिशकर शास्त्री की उपर्युक्त प्रस्तावना (के पृष्ठ ३-७) से (अशुद्धियों सहित ) अक्षरशः ले ली गयी है । अवधेय है कि इस उपोद्घात के इसी अश को दृष्टिगत करके 'प्रास्ताविकम्' में उपोद्धातलेखक के सम्बन्ध में कहा गया है कि, 'वेदान्तस्यतरप्रस्थानेभ्यो बल्लमवेदान्तस्य पार्थक्यसमीक्षणं सस्यतद्विष- यिर्णी शेमुपी निर्याधं प्रकटयतीति सोऽपि नितान्तमाशीदरम्यहणीयः।' ('प्रास्ताविकम्' पृष्ठ 'ख')। १. 'गुदाक्षरमुंद्रितमिदं ग्रन्थत्रयं शुद्धाद्वैतववजिज्ञासूना छात्राणाम- ध्यापकानाच भूशमुपकरिष्यतीति दृढं विश्वतिमि । ('प्रास्ताविकम्', "पृष्ठ 'घ')।
उपोदात 29 इस 'उपोशातः के पृष्ठ 'ड' की चौबीसवीं पंक्ति से लेकर पृष्ठ '" । बाईसवीं पंक्ति तक का प्रायः आठ पृष्ठों का वह अश जिसे बुद्धिस्य र प्रस्तावनालेखक ने मम्पादक महोदय की प्रशंसा करते हुए अपने रास्ताविकम् में कहा है कि 'भूमिकायां ग्रह्मणो जीवस्य जातश्च स्वरूप- वमर्शो नितरां स्पष्टतया विहितः', वस्तुतः (भाण्डारकर ओरिएण्टल (सर्च इन्स्टीट्यूट से सन् १९२६ में प्रकाशित बालयोधिनीसहितम् श्रीमदणुमाप्यम्' के द्वितीय भाग में मुद्रित) ५० श्रीधर शर्मा पाठक द्वारा लिखित पचपन पृष्ठ के विद्वत्तापूर्ण उपोद्धात के प्रथम छन्बीस के बीच-बीच के वाक्यों को अविकल रूप में गृहीत कर तैयार कर लिया गया है और इस अश में ऐसे वाक्य खोज सकना कठिन है जो श्री पाठक के उपोद्धात ( के प्रथम छब्बीस पृष्ठों के अश) से ज्यों के त्यों न ले लिये गये हों। इतना ही नहीं मूलस्थलनिर्देश भी केवल उन्हों उद्धरणों का किया गया है जिनका मूलस्थल श्री पाठक के उपोद्धात में निर्दिष्ट है। कहीं कहीं कुछ ऐसी नयी गलतियां भी की गयी हैं जिन्हें केवल प्रूफरीडिंग की भूलें कह सकना मुश्किल है। उदाहरणार्थ श्री पाठक के उपोद्धात के, “२ माज्यकारास्तु स्वमाहात्म्प- दर्शनार्थमेव ब्रह्मणात्मनः सकाशात् सर्वा सर्वविधा सृष्टिनिरमायि तेन न पूर्वोक्तपम्यदोष इति समादधुः" (पृष्ठ ४ ), "ज्ञोऽत एव (म. सू० २।३।१८) इति सूत्रप्रामाण्यात् (पृष्ठ ८), तथा "सर्व खल्विदं ब्रह्म सजलान्' इति श्रुत्या." (पृष्ठ १४) इत्यादि वाक्य इस उपोद्धात में क्रमशः, "(२) माध्यकारस्तु स्वमाहात्म्यप्रदर्शनार्थमेव प्रह्मणारमनः सकाशात् सर्वा सर्वविधा सृष्टिनिर्मायि तेन न पूर्वोक्त वैषम्यदोष इति समादधुः।" (पृष्ठ 'छ'), "जीव एव (२. सू. २।३।१८) इति सूत्रप्रामाण्यात्.." (पृष्ठ 'ज') तथा "सर्व परिवर्द मझा तजवानि' इति अत्या." (पृष्ठ 'अ') इत्यादि रूपों में छपे हैं। अन्तिम पृष्ठ 'द' के अन्तिम अनुच्छेद में सम्पादक ने पुस्तक के. प्रकाशन के लिए द्रव्य देने वाले टखनऊ के वैष्णवों तथा विविध ..."
30 प्रमेयरत्नाणव प्रकार से सहायता करने वाले अपने दो प्रिय शिष्यों को धन्यवाद देवे हुए भगवान् से उनकी समुचित उन्नति करने के लिए प्रार्थना की है। यह लिखते हुए हमें अत्यन्त संकोच और सेद का अनुभव हो रहा है कि जिनसे द्रव्य आदि की सहायता मिली उन्हें अपने उपोद्रात के अन्त में धन्यवाद देना न भूटते हुए भी सम्मादक महोदय ने उन लेखकों का अधमणंतास्वीकृनिपूर्वक उपकाररमरण करने या उन्हें धन्यवाद देने के साधारण शिष्टाचार का पालन करना तो दूर उनका नामोल्लेस तक करना आवश्यक नहीं समझा जिनके वाक्यों को अविरल रूप में मुद्रित कर उन्होंने अपने सोलह पृष्ठ के उपोद्घात के तेरह से अधिक पृष्ठ पूरे कर लिये हैं। चौ० सं० में मुद्रण की प्रक्रिया में कहीं-कहीं कुछ अग छपने से टूट गये हैं। पं० सं० में ऐसे सभी अश तो छूट ही गये है। ऐसे अनेक अन्य अश भी छपने से छूट गये हैं जो चौ० सं० में मुद्रित मिलते हैं। इनमें से कई छूटे तो छोटी होती हुए भी मूल को अव्याख्येय यना देने वाली हैं और कई कापी लम्बी तथा अनर्थकारिणीहै । यदि १. उदाहरणार्थ दखिए, चौ० स० पृष्ठ ३ पंक्ति १९ तथा प्र. सं. पृष्ठ १२; चौ० स० पृ. ४ पं० २३-२४ तथा प्र० स० पृ० १८ चौ० सं० पृष्ठ ९५०२८-२९ तया प्र० स० पृष्ठ ४०-४१; चौ० सं० पृष्ठ ४२ पक्ति १७ तथा प्र० सं० पृष्ठ १९९-२०० । २. मिलाइए, उपरिलिखित टिप्पणी तथा व० सं० पृ० ६८५० ७-८ पृ० ६९ ५० २०, पृ० ७५ पं० २३-२४; तथा पृ० १२०५० ४ ३. मिलाइए, पृष्ठ-पक्ति पृ०-पंक्ति पृ०-पक्ति पृ०-पंक्ति पृष्ठ-पक्ति चौ सं० २११७ ५२४-२५ १०११ ३१।२० ४३६१३ व० सं०६८०२१ ७११ ७६१ १०६१ १२११९-१० ४. उदाहरणार्थ देखिए, चौ० सं० ४२ पं. १७, २० स० पृ० १२० ५०४ तथा प्र० सं० पृ० १९९-२०० इत्यादि । ५. उदाहरणार्थ देखिए, चौ० सं०, पृ० ३ पंक्ति ११; व० सं०, पृ. ६८ पंक्ति ७-८ तथा प्र० स० पृष्ठ १२ इत्यादि।
उपोदात 31 . उद्धरणों को मूलस्थल में देख कर छापने की चेष्टा की जाती तो इनमें से बहुत-सी ग़लतियाँ बचायी जा सकती थीं। चौ० सं० मे उद्धरणों को न तो उद्धरणचिह्नों के अन्तर्गत रखा गया है, न उनके मूलस्थलों का निर्देश किया गया है और न उन्हें भिन्न प्रकार के टाइप में छापा ही गया है। य० सं० में भी उद्धरणों का टाइप-परिवर्तन या मूलस्थलनिर्देश नहीं किया गया है किन्तु कहीं-कहीं उद्धरणचिह्नों का प्रयोग अवश्य किया गया है और इस प्रक्रिया में न अनेक उद्धरणों को एक साथ एक ही टाइप मे एक ही उद्धरणचिन्ह के अन्तर्गत रखकर अनेक उद्धरणों को एक समझ लेने के भ्रम को अवकाश दिया गया है। अपितु कहीं मूलअन्य के वाक्यों को ही उद्धरणचिह्नों में रखकर और उन्हें उद्धरणों से जोड़कर प्रकृत ग्रन्य के उन अंशों के भी उद्धरण होने का भ्रम पैदा किया गया है तो कहीं उद्धरण के एक अंश को ही उद्धरणचिह्नों के अन्तर्गत रखकर आधे उद्धरण के बालकृष्णभट्टलिखित वाक्य होने का। संस्कृत पुस्तकों का केवल मूल सम्पादित करने और उसमें भी उद्धरणों के मूलस्थल का निर्देश करने की उपेक्षा करने वाला सम्पादक यदि प्रमादी और आलसी हुआ तो ग्रन्य का अर्थ समझना भी आवश्यक नहीं समझता। ऐसे सम्पादक को न तो उद्धरणों का अर्थ समझने की आवश्यकता का अनुभव होता है और न ठक को उनका अर्थ समझाने के दायित्व का बोध । ऐसी स्थिति में उद्धरणों के पाठ को शुद्ध करना भी उसके लिए अपरिहार्य नहीं रह जाता। किन्तु अन्य को समझ कर १. देखिए, व० सं० पृष्ठ ६५-६६, मिलाइए प्र० सं० पृष्ठ ३ । २. देखिए, व० सं० पृष्ठ ९७, "देवजीवेषु यं जीवं "प्रजायते"; मिलाइए, प्र० सं० पृष्ठ १२० । ३. उदाहरणार्थ देखिए, व० सं० पृष्ठ १२२ पंक्ति ३-४ तथा प्र० सं० पृष्ठ २०८।
82 प्रमेयरलार्णव उसका एक दूसरी भाषा में स्पष्टार्थ अनुवाद कर मूल और अनुवाद दोनों की भाषाओं को जानने वाले पाठक तक पहुँचाने के दायित्व को स्वेच्छया स्वीकार करने याले सम्पादक को उद्धरणों का मूलानुसारी, सम्प्रदायसम्मत शुद्ध पाठ निर्धारित करना ही पड़ता है और इसके लिए उन्हें उनके मूलस्थल में ग्वोजकर समझना अनिवार्य हो जाता है। 'प्रमेयरस्नार्णवः' के अद्यावधि प्रकाशित सस्करणों मे उद्धरणों के मूल- स्थल का निर्देश नहीं किया गया है। व० सं० में तो, सम्भवतः अर्थ समझने की अपरिहार्य आवश्यकता का अनुभव न करने के कारण, सम्पादक ने अनेक उद्धरण इस प्रकार मुद्रापित किये हैं कि उनका कुछ अर्थ ही नहीं रह गया है | कहीं-कहीं तो वे पेवल निरर्थक ही नहीं, अनर्थकर भी हो गये। पई उद्धरणों के भावात्मक वाक्यों को इस प्रकार छपाया गया है कि वे अभावात्मक हो गये हैं। उदाहरणार्थ व सं0 के पृष्ठ ८० पर 'प्रभुत्वेन हरेः स्फूर्ती लोकरचे न बदुद्भवः' छा है, नन कि इसे 'लोकत्वेन तदुद्भवः' होना चाहिए ( देखिए, प्र० स० पृष्ठ ५६)। कहीं कहीं तो एक साथ आये अनेक उद्धरणों को एक ही उद्धरण समझ लिया गया है, यहाँ तक कि विभिन्न श्लोकों के चरणों को , १. देखिए, चौ० सं० पृष्ठ ३ पक्ति १४, २० स० पृष्ठ ६९ पक्ति ४, प्र० सं० पृष्ठ १६, व० सं० ८७१२, प्र० स० पृष्ठ ८३; चौ० स० १८:१७, व० स० ८८।१८, प्र० स० पृष्ठ ९०, ३० स० ८९/६, प्र० स० पृष्ठ ९२-९३, व० स० ९३८, प्र० स० पृष्ठ १०६, चौ० स० ३४३१, व० सं० ११०८, प्र० स० पृछ १६१ तथा २० स० ११९॥२२ और प्र० स० पृष्ठ १९८ इत्यादि। २. देखिए, च० स० ८८४, प्र० स० पृष्ट ८७, व० स० ७५।१३, प्र० स० पृर ३८, ५० स० ७८६१९, प्र० स० पृष्ट ५०,व० स० ७९६१२, प्र० स० पृष्ट ५३, ५० सं० ८०१२०, प्र० स० पृष्ठ ५९, तथा ३०० ११०६ और प्र० सं० पृष्ठ १६० इत्यादि ।
उपोद्घात 38 क्रमशः मिलाकर एक श्लोक बना दिया गया है। उदाहरणार्थ व० सं० में पृष्ठ ६७ पर आये तीन उद्धरणों 'देहं मनोमानमिमं गृहीत्वा' (भाग ११:२३।५० प्रथम चरण), 'स्वय्युद्धवाश्रयति यस्त्रिविधः विकारो मायान्तरापतति नाद्यपवर्गयोर्यत् ।' (भाग० ११११९७ प्रथम एवं द्वितीय चरण) तथा 'स्वप्नाममस्तधिषणं पुरुदु:खदुःखम्' (भाग १०।१४।२२ द्वितीय चरण ) को एक ही उद्धरण बना कर छाप दिया गया है चौ० स० (पृष्ठ ३ प० ६-८) में ये तीनों उद्धरण अल्प- विराम द्वारा एक दूसरे से पृथक् कर तीन उद्धरणों के रूप में छापे गये हैं किन्नु व० सं० में इन्हें अधोलिखित रूप छापा गया है, देहं मनोमामिम गृहीत्वा त्वयुद्धवाश्रयति यस्विवियो रिकारः। मायान्त- राऽऽपतति नायपवर्गयोर्यत् स्वप्नाभमस्तधिषण पुरुदु खदुःखम् ।। उद्धरणों के पाठ को मूलस्थल में खोजकर शुद्ध करने के परिश्रम से कतराने का एक दुष्परिणाम यह मी हुआ है कि उनका पाठ ( और इसीलिए अर्थ भी ) उनके श्रीमदल्लभाचार्य द्वारा स्वीकृत तथा श्री लालूम द्वारा समाहत सम्प्रदायागत पाठ (तथा अर्थ) से भिन्न हो गया है। उदाहरणार्थ चौ० स० पृष्ठ ९ पक्ति ५ तथा व० सं० पृष्ठ ७४ पक्ति २५ में आये उद्धरण का पाठ 'भवानेक शिष्यते शेषसंज्ञः' है जब कि श्रीवल्लभाचार्य की सुबोधिनी के अनुसार (भाग १०३१२५ के) इस उद्धरण का पाठ 'मवानेक: शिप्यतेऽशंपसज्ञः' होना चाहिए (देखिए, प्र० सं० पृष्ठ ३६)। इसी प्रकार चौ० सं० पृ० १९ पक्ति २१ तथा व० सं० पृष्ठ ९० पं०६ में आये उद्धरण का पाठ 'गोकुल स्म' है किन्तु सुयोधिनी के अनुसार (भाग० २१७:३१ के) इस उद्धरण का पाठ 'गोकुलं स्वम्' होना चाहिए (देसिए, प्र० स० पृष्ठ ९५-९६)। इसी तरह चौ० सं० पृष्ठ ४२ पं० २४ तथा व० सं० प्रष्ठ १२० ५० १२ में आये उद्धरण का पाठ 'अनुग्रहोऽयं भवता कृतो हि नः' है, परन्तु (भाग० १०११६३४ के) इस उद्धरण का मुबोधिन्यनुमारी पाठ 'मनु- प्रहोऽयं भवता कृतोऽहिनः है ( देखिए, प्र० स० पृष्ठ २०१)।
प्रमयता 1 व० सं० में कहीं-कहीं चौ० मं० के शुद्ध पाठ को भी अशुद्ध समज्ञ कर शुद्ध करने की चेष्टा की गयी है और ऐसी स्थिति में भी उद्धरणों के मूलस्थल देखने की चिन्ता नहीं की गयी है। उदाहरणार्थ ची० स० पृष्ठ ३६ पक्ति ८-९ में छपे, कचिन्मायिकधर्माणां भगवति प्रीतिः मेहमादीनि वास्ताविस्यन्त्र निरूपिता, इस वाक्य को १० सं० पृष्ठ ११२ पति १-३ में, छचिन्मायिकधर्माणां भगवति प्रतीति: "मेहनादानि वास्तवौ" इत्यत्र निरूपिता, इस रूप में छापा गया है। यदि, 'एवं धाष्टर्यान्युशति कुरने मेहनादीनि वास्तौ' (भाग० १०८।३१) इस मूलश्लोक को खोज कर, सुपोधिनी टीका के प्रकाश में इसका अर्थ समझने का प्रयत्न किया जाता तो ऐसी गलती न होती ( देखिए, म० सं० पृष्ठ १६७-१६८)। व० सं० में कुछ ऐसे स्थल मी है जिन्हें देख कर ऐसा लगता है फि चौ० सं० में अशुद्ध रूप में छपे वाक्यों को सुधारने की चेष्टा की गयी है किन्तु इसमें सफलता नहीं मिली है और उनकी एक ग़लती सुधारने के प्रयत्न में दूसरी ग़लती कर दी गई है जिसका परिणाम यह हुआ है कि व० स० में भी वे वाक्य अशुद्ध रूप में ही मिलते हैं। चौ० सं० में शुद्ध छपे वाक्य घ० सं० में अनेकशः अशुद्ध रूप में छपे मिलते हैं। उदाहरणार्थ चौ० सं० पृ० ११५० १९-२० में छपा, १. देखिए, ३० सं० ९५।२३, १०३।१७; ११२१४ तथा १२१।२१ इत्यादि। २. उदाहरणार्थ देखिए, चौ० स० पृ. ३१ पंक्ति २३, व० सं० पृ० १०६ पक्ति ४ तथा प्र० स० पृ० १४७; चौ० सं० पृ० ३५ पंक्ति १५, व० सं० पृ० १११ पंक्ति २ तथा प्र० सं० पृष्ठ १६४ इत्यादि । ३. देखिए, व० सं०६६।९; ७६।२० ७९।१८, ८२१४, ८२।२१; ८४१३; ८५।४, ८६०,१०; ९२११६, ९३।१८, १०३।२०१०७।१३, १५ इत्यादि।
उपोद्धात 35 धर्मविधायकोपनिषदां चप्राकृत भ्रातधर्मविषयत्वमिति, यह वाक्याश घ० सं० पृ० ७८ ५० २१-२२ मे, धर्मविधायकोपनिषदा स्वप्राकृतीतधर्मा- विषयस्वमिति, इस रूप में छा है जो मूढवाक्य के विरोधी अर्थ का योधक है ( देखिए, प्र० मंः पृष्ठ ५१)। इसी प्रकार चौ० सं० पृ० ४३ ५० ३० में छपा, व्यसनसिद्धी गुणनाशे प्रझमावः, यह वाक्य व० i० पृ० १२२ १०३ में व्यसनसिदो गुणनाशे प्रहामावः; इस रूप में छपा है जिससे मूल वाक्य का अर्थ बदल जाता है ( देखिए, प्र० सं० पृष्ठ २०८)। चौ० सं० में अशुद्ध रूप में छपे वाक्यों को विचारपूर्वक शुद्ध करके छपाने के दायित्व की उपेचा कर उन्हें व० सं० में ज्यो का त्यों अशुद्ध रूप में छपा दिया गया है। व० स० में पद्यों को तो प्राय. गद्यांश की भांति छापा ही गया १२ अल्पविराम, पूर्णविराम, उद्धरण चिह्न आदि के प्रयोग में भी ऐसी लापरवाही की गयी है कि वे अनेक स्थानों पर अर्थ समझने में सहायक सिद्ध होने के बजाय बाधक हो जाते हैं । जिन पदों को दूर-दूर छापना चाहिए उन्हें एक में मिला कर छाप देने से कई जगह अर्थ बदल गया है। उदाहरणार्थ चौ० सं० पृष्ठ ३४ प० ६ के वाक्याश, मगवतः प्रपञ क्रोसा निरोधः, के व० सं० पृष्ठ १०९ १०६ में, मगवतः प्रपञ्चे क्रीडा- निरोधः, इस रूप में छाप दिये जाने से वहाँ अभीष्ट अर्थ नहीं निकल पाता । इसी प्रकार माया मोहितपुरपबुद्धावपि, इस वाक्यांश के (चौ० सं० पृष्ठ ३ पं० ३१ तथा) य० सं० पृष्ठ ६८ पं० २१ में, मायामोहित- १. उदाहरणार्थ देखिए, ३० म० ९१२, १४, ९२।२२; ११२।९; ११६१०, ११७१९ तथा ११९।२४-२५ इत्यादि । २. देसिए, ३० म०प० ९९, १०४, १०५, १०९, ११८ इत्यादि। ३. देखिए, ५० सं०६६।४-५: ७८।१०, ८११२३ तथा ११३३१८ इत्यादि।
36 प्रमेयरलार्णव - . पुरपदावपि, इस रूप में छापे जाने के कारण 'मायामोहितपुरपबुद्धी' के एक पद हो जाने से वाक्य कर्तृगुप्त हो गया है और अभीष्ट अर्थ नहीं दे पाता। ऐसे अनेक शब्दों को जिन्हें एक साथ समस्तपद के रूप में छापना चाहिये व० स० में एक दूसरे से दूर-दूर छापा गया है जिससे वाक्य का अर्थ समझ सकना कठिन हो गया है। उदाहरणार्थ ची० स० प. २३ ५० २५ २६ में छपे वाक्य, स्यागो ममताविरह , १० स० प० ९५५० १८ १९ में त्यागो ममता विरह, इस रूप में छापे जाने से पाक्य का अर्थ समझना कठिन हो जाता है। इसी प्रकार 'मत एक्तरी भिन्नी सान्ती मोक्षप्रवेशत' यह उद्धरण ३० स० पृष्ठ ७५५० १२ १३ में इस रूप में छपा है, अत एव तरी मिन्नी सान्ती माक्ष प्रवेशत १० स० में एक शुद्धिपत्र देकर उपर्युक्त अशुद्धियों में से अधिकाश को मुधार लेने में पाठकों की सहायता की जा सकती थी फिन्तु सम्पादक महोदय ने किन्हीं कारणों से ऐसा करना ठीक नहीं समझा। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि प्रमेयरत्नार्णव के पूर्वार्दमात्र का उपलब्ध २० स०, साठ वर्ष पूर्व छपे चौ० स० की अपेक्षा अच्छा किसी भी अर्थ में नहीं यहा सकता । प्रस्तुत सस्करण के पूर्वार्द का मूलपाठ तैयार करने में हमने इन दोनों सस्करणों का पूरा उपयोग किया है और इसके लिए हम इन दोनों सस्करणों के सम्पादकों के आभारी हैं। उत्तरार्द्ध के मूल का पाठ हमने आवश्यक सशोधनों के साथ (स्व०) श्री रमानाथ भट्ट द्वारा सम्पादित (बृहन्मदिरपुष्टिमार्ग सिद्धान्तकार्यालय से सन् १९२० में प्रकाशित) 'वादावलि ' से लिया है और एतदर्थ हम उनके कृतज्ञ हैं। १ देखिए, व० स० १० १०७।१८ ११११२०, ११३।१२ तथा १९८०१०-११ इत्यादि । २ देखिए, व. स. पृ० १६५०३, पृ० ११० १० १७ इत्यादि ।
उपोद्धात 37 , 'प्रमयरत्नाव' के प्रकाशन के इतिहास में प्रथम बार प्रस्तुत सस्करण में सम्पूर्ण ग्रन्थ (पूर्वार्द्ध एव उत्तरार्द्ध) का एकत्र ( एक ही जिल्द में) मुद्रण किया गया है। मूल संस्कृत के साथ ही शुद्ध, स्वच्छ और अच्छी हिन्दी में प्रवाहमयी भाषा में सुस्पष्ट, प्रामाणिक और सुगम अनुबाद भी दे दिया गया है जिससे पाठकों को मूलअन्य के भावगाम्भीर्य के साथ ही पक्तियों का स्पष्ट अर्थ समझने में सोकर्य हो । अर्थ एव भाव को खट तथा पुष्ट करने के लिए श्रीमद्वल्लभाचार्य तथा श्री लालूभट्ट आदि के विभिन ग्रन्यों से तत्सम्बन्धी विशद स्थलों को विस्तृत टिप्पणियों के रूप में उद्धृत कर दिया गया है । मूलग्रन्थ, उसके हिन्दी अनुवाद, मूल्ग्रन्थ में आये उद्धरणों, उनके हिन्दी अनुवाद, टिप्पणी तथा उसमें आये उद्धरणों के लिये जलग-अलग (छ. प्रकार के ) टाइप प्रयुक्त किये गये हैं जिससे उन्हें पढ़ने और समझने में सरलता हो । मूलग्रन्थ में आये अपूर्ण उद्धरणों को टिप्पणी में पूरा कर दिया गया है । सभी उद्धरणों को उद्धरणचिही के अन्तर्गत रखा गया है तथा उनके मूलस्थल का (अध्याय, श्लोक, सूत्र आदि की सख्या के उल्लेखपूर्वक) निर्देश कर दिया गया है। इस कार्य में प्रयुक्त सक्तों का विवरण पुस्तक के प्रारम्भ में ही (पृष्ठ 8 पर) दे दिया गया है। जहाँ ग्रन्थ में आये उद्धरणों तथा ( जिन ग्रन्थों के वे उद्धरण हैं उन ) मूलग्रन्यों के प्रका- शित सस्करणों के पाठों में भेद है वहाँ प्रस्तुत ग्रन्थ के पाठ को सुरक्षित रखते हुए टिप्पणी में प्रकाशित मूलग्रन्थों का पाठ भी दे दिया गया है। भागवत के जिस अश पर श्रीमद्वल्लभाचार्य की सुबोधिनी व्याख्या उपलब्ध है उस अश के उद्धरणों का सुबोधिन्यनुसारी पाठ एव अर्थ ही स्वीकृत किया नया है किन्तु सम्पूर्ण पुस्तक में एकरूपता बनाए रखने की दृष्टि से श्लोकों के अङ्क गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित 'श्रीमद्भागवत. महापुराणम्' (मूलमात्रम् ) के आधार पर दिये गये हैं। ब्रह्मसून के अङ्क श्रीमदणुभाष्यानुसारी दिये गये हैं। जो उपनिषद् सुलभ नहीं हैं उनके उद्धरणों का अङ्कनिर्देश करने में श्री गजानन शम्भु सादले द्वारा 38 प्रमेयरत्नाव सम्पादित 'उपनिषद्वाक्पमहाकोशः' का आश्रय लिया गया है। पुस्तक के अन्त में 'नोट्स' में उन उद्धरणों के मूलस्थल का निर्देश कर दिया गया है जिनका निर्देश किन्हीं कारणों से अन्य के कलेवर में नहीं हो पाया है। इस ग्रन्थ में मधेप में विवेचित विषयों का भी लालूभट्ट ने विशद विवेचन कहाँ किया है इसकी सूचना मी 'नोट्म' में दे दी गयी है। ऐसे कुछ महत्त्वपूर्ण विवेचनों को परिशिष्टम् के रूप में उद्धृत भी कर दिया गया है । पुस्तक में उद्धृत एवं उल्लिखित ग्रन्थों की अकारादिक्रम से सूची ( जिसमें उन अन्यों के प्रयुक्त सस्करणों का भी उल्लेख है) सनिविष्ट करने के साथ ही प्रस्तुत संस्करण में मुद्रण में हो गयी अशुद्धियों का एक शुद्धिपन भी जोड़ दिया गया है जिससे पाठक अपनी प्रति की साधारण अशुद्धियों को भी अनायास ही ठीक कर लें। इस प्रकार 'प्रमेयरत्नार्णका' को शुद्धाद्वैतवेदान्त और पुष्टिमार्ग के विद्यार्थियों तथा तत्त्वजिशासुओं के लिए समान रूप से उपयोगी बनाने का प्रयत्न किया गया है। अष्टछाप के कवियों-जिनमें श्रीवल्लभाचार्य के शिष्य सादास प्रमुख हैं--की कविता के मर्म को समझने के लिए श्रीवल्लभाचार्य के दार्शनिक एवं धार्मिक विचारों से सुपरिचित होना आवश्यक है और इस दृष्टि से प्रस्तुत संस्करण हिन्दी--विशेषतः सूर- साहित्य-के विद्यार्थियों एवं अध्यापकों के लिए बहुत ही उपादेय हो गया है। प्रस्तुत पुस्तक का मुद्रण पूरा हो जाने तथा इस उपोदात के कुछ अंश छप जाने पर इसे श्रीमदल्लभवशावतस विद्वत्तलज आचार्यवयं गोस्वामी श्री दीक्षित जी महाराज को दिखाने का अवसर इन पक्तियों के लेसक को मिला है। महाराजश्री ने पुस्तक को अपने पास छोड़ जाने को कहा और इसका अवलोकन करने के बाद हार्दिक सन्तोष एवं प्रसन्नता प्रकट करते हुए टेराक को सम्प्रदाय के भाष्यविद्धन्मण्डनादि - ओदात 39 अन्य विशिष्ट प्रन्यों का इसी प्रकार का उत्तम संस्करण प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित किया। गो. श्रीदीक्षित जी महाराज ने हमारा ध्यान इस बात की ओर आकृष्ट किया कि श्री बालकृष्ण भट्ट के 'पुरषोत्तमशब्दवाच्यं श्रीकृष्ण- स्वरूपमेकम् , अक्षरं द्वितीयम्, तत्र पूर्वोक्तरीत्या द्विधिधम्, इति ब्रह्मणो रूपत्रयं दर्शितम् । पुरपोत्तमस्य तस्यैव स्वरूपनियमनादिकार्यपिन सूर्यमण्डलादौ पृथिव्या अभिदेवादिषु स्थितं यदपं तदन्तर्यामिशब्द- वाध्यम्' ( देखिए, पृष्ठ ६२-६७ ) तथा 'मूलरूपस्य चन्वारि रूपाणि । तत्र एक पुरषोत्तमस्वरूपं श्रीकृष्णशब्दवाच्यम् । एकमक्षरं स्वरूपम्, तच पूर्वोत्तरीत्या द्विविधम् । एकमन्तामिरूपम् । एवं चातुर्विध्यं ज्ञेयम्' (देखिए, पृष्ठ ७२-७३) इत्यादि वाक्यों से साधारण पाठक को. यह भ्रम हो सकता है कि मूलरूप के चार रूपों में, अन्त में निरूपित अन्तर्यामी रूप-जिसे पुरुष, नारायण आदि दशब्दों से अभिहित किया जाता है'-पहले निरूपित अक्षररूप की अपेक्षा अवर है, किन्तु श्री लालूमह का अभिमत सिद्धान्त यही है कि अक्षररूप, अन्तर्यामी की अपेशा अवर है, अतः प्रस्तुत संस्करण में इस भ्रम की सम्भावना का निराकरण कर के सिद्धान्त को सष्ट कर दिया जाता तो अच्छा होता । उपोदान में इसकी चर्चा कर देने के हमारे प्रस्ताव से सहमति प्रकट करते हुए आचार्यश्री ने सिद्धान्त की व्याख्या करते हुए सष्ट किया कि मूलरूप पुरुशेत्तमशब्दवाच्य है। पुरुषोत्तम के लोकवेदातीतरूप में निरवधि धर्मभूत सत् , चित् और आनन्द तथा निरवधि स्वरूपभूत सत्, नित् एवं आनन्द हैं। उनका यह रूप रसात्मक है। श्रीवल्लभाचार्य ने चतुःश्लोकी के, सदा सर्वमावेन भजनीयो प्रजाधिपः । स्वस्यायमे धर्मो हि नान्यः शापि कदाचन ।। इत्यादि श्लोकों तथा श्रीविटनाथ ने भशुमाप्यम् के संहार में, १. देखिए, पृष्ठ ६७ .
प्रमेयरलाणव 'जानीत परम तत्वं गोदौरसङ्गमालितम्' इत्यादि श्लोक में इसी लोकवेदातीत रूप की ओर संकेत किया है। पुरुषोत्तम के लोकवेद प्रसिद्धरूप में भी धर्मभूत एवं स्वरूपभूत सत्, चित् एव आनन्द निरचधि है किन्तु उसमें रसात्मकता लोकवेदातीतरूप की अपेक्षा कुछ कम रहती है। इस लोकवेदप्रथितरूप से ही नारायणशन्दवाच्य अन्तर्यामी रूप का आविर्भाव होता है। मूलरूप फा यह दूसरा रूप पुरुषोत्तम का स्वरूपपरिणाम है और पुरुषोत्तम की ही भांति अगणितानन्द है। इसमें निरवधि धर्मभूत सत् , चित् एव आनन्द तथा निरवधि स्वरूपभूत सत् , चित् एवं आनन्द रहते है। पुरुपसूक्त के 'पुरष एवेदं सर्वम्' (ऋग्वेद ५०१९०२), श्रीमद्भागवत के 'सर्व पुरप पवेदम्' ( भाग० २।६।१५), श्वेताश्वतरोपनिपद् के 'वेदाहमेत पुरष महारतम्' (श्वेता० उप० ३१७) तथा गीता के 'उत्तमः पुरपस्त्वन्यः' (गीता १५।१७) इत्यादि वाक्यों में पुरुप शब्द से भगवान् का यही रूप अभिप्रेत है । नारायणशब्दवाच्य इस अन्तर्यामी रूप के अन्तर्यामित्व एव परब्रह्मत्व की पुष्टि महानारायणोपनिपद् के अधोलिखित वाक्यों से होती है, अम्भस्यपारे भुवनस्य मध्ये नाकस्य प्र महतो महीयान् । शुक्रेण ज्योतीपि समनुप्रविष्टः प्रजापतिश्चरति गर्ने भन्तः ।। येनावृतं खं च दियं मही च येनादित्यस्तपति तेजसा भ्राजमा छ। यदन्तःममुझे कवयो वयन्ति तदक्षरे परमे प्रजाः ॥ १३ । अतः परं नान्यदणीयसं हि परापरं यन्महतो महान्तम् ।। तदेवतं तदु सत्यमाहुस्तदेव बहा परमं कवीनाम् । १६ । पस्मारपरं नापामस्ति किचिद् यस्माजाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित् । १०॥४॥ नारायणः परं ब्रह्म तवं नारायणः परः। नारायणः परी ज्योतिरात्मा नारायणः परः ॥ १९१४ । १. पाठान्तरे, वदन्ति ।
उपोदात 41 , यञ्च किञ्चिजगत्यस्मिन् दृश्यते श्रूयतेऽपि वा । अन्तर्बहिश्च तरसर्व व्याप्य नारायणः स्थितः ॥ १११६ । इत्यादि । गीता में हुए मूलरूप के पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण, अन्तर्यामी, अक्षर तथा क्षर इस चातुर्विध्य के निरूपण में, इस अन्तर्यामी रूप को उत्तमः पुरपस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य विभयव्यय ईश्वरः ॥ (गीता १५।१७)। ईश्वरः सर्वभूतानां हृदेशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ (गीता १८६१)। इत्यादि वाक्यों में उत्तम पुरुष', 'परमात्मा' और 'ईश्वर' आदि शब्दों से अभिहित किया गया है। पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण द्वारा कहे गये इन वाक्यों में 'अन्य.' पद तथा 'य:' पद के प्रयोग से स्पष्ट है कि 'उत्तम पुरुष या 'अन्तर्यामी' उनका एक दूसरा रूप है। भागवत के जगृहे पौरपं रूपं भगवान् महदादिभिः । सम्भूतं पोडशकलमादौ लोकसिमक्षया ॥ यस्याम्मसि शयानस्य योगनिद्रां वितन्वतः । नामिहदाम्बुजादासीद् ब्रह्मा विश्वसृजां पतिः ॥ (भाग० १।३।१-२)। इत्यादि वाक्यों से सष्ट है कि सिसक्षा होने पर पुरुपोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण ('एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्' -भाग० १।३।२८) पहले इसी नारायणशब्दवाच्य अन्तर्यामी रूप में आविर्भूत होते हैं। यह भगवान् का पुरुष रूप ( भाग० १३१३) और विभिन्न अवतारों का बीज है।। अक्षर तत्त्व इसी नारायणशब्दवाच्य अन्तर्यामी रूप के निरवधि धर्मभूत सत् एवं चित् तथा सीमित धर्मभूत आनन्द की अभिव्यक्ति है। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि श्रीवल्लभाचार्यप्रति- पादित तथा श्रीलालूभट्टानुगृहीत वेदान्त सिद्धान्त के अनुसार अक्षर तत्त्व, १. देखिए, एतनानावताराणा निधानं पोजमव्ययम् । ( भाग १३५)। मिलाइए, प्र० सं० पृष्ठ ६६-६७ ।
प्रमेयरलार्णव मेरी धर्मरली श्रीमती स्नेहलता मिश्रा एम० ए० ने गृहस्थी की सारी झझटों को स्वर झेलते हुए भी पाण्डुलिपि के एक अश की मुद्रण- प्रति तैयार की है। उनके सक्रिय सहयोग से ही यह कार्य सफलतापूर्वक सम्पन्न हो सका है और इसके लिये वे धन्यवाद की पान हैं। पुस्तक के सुरुचिपूर्ण और शुद्ध मुद्रया के लिए गौरीशङ्कर प्रेस, मध्यमेश्वर, वाराणसी के सञ्चालक श्री सोमारू राम को धन्यवाद देना मैं अपना कर्तव्य समझता हूँ। यदि प्रस्तुत पुस्तक प्रबुद्ध पाठकों की वालमसिद्धान्तविषयक जिज्ञासा की अशतः पूर्ति करके उसे और अधिक उबुद्ध तथा तीव कर सकी तो इसका प्रकाशन सफल समझा जायेगा। "दोपा मनुष्य सहजा इति ते यदि स्युः अन्नापि, सन्तु, न हि तेन ममास्ति चिन्ता । नलगिकी खल गुणीकरणप्राणा शक्तिः सदा विजयते भुवि सजनानाम् ॥ "ये स्यात्मीयगुणप्रियाः परगुणे में वाप्यसूयामरा. तानेतान् कृतिनः कृताञ्जलिरहं याचे नमत्कन्धरः मात्सर्याशुचि मानसं क्षणमयाभ्युक्ष्यानुकम्पाम्मसा प्रेक्ष्यः गीतलयारशा सकृदपि अन्योऽयमामूलतः ॥" दर्शन विभाग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय विदुषामाश्रयः २५/१२११९७१ ई० केदारनाथमिश्नः " शुभाशंसनम् 1.H. Goswami Shree Dixhitji Maharaj TELEPHONE NO.334851 TELEGRAPHIC ADDRESS "HOLYWRIT" BADA MANDIR. 3RD THOIWADA BHULESHWAR, BOMBAY-2 Date 24/12/1971. श्रीमदल्लभाचार्यविरचित सम्प्रदाय के प्रधान प्रकरणग्रन्य तत्त्वार्थदीपनिबन्ध के प्रथम शास्त्रार्थप्रकरण पर श्रीयुत केदारनाथ मिश्र विरचित स्नेहप्रपूरणी नाम की व्याख्या का अवलोकन मैंने किया। श्रीमद्वल्लभाचार्य के ग्रन्थों पर सुसंस्कृत हिन्दी व्याख्या के अभाव के कारण साम्प्रदायिक तत्त्वज्ञान से भारत के अनेक हिन्दीभाषाभाषी प्रान्त वश्चित रहते थे। इस न्युनता की पूति विद्वद्रत्न श्रीयुत केदारनाथ मिश्र की इस कृति से निश्चितरूपेण हुई है यह लिखते हुए मुझे परम हर्ष हो रहा है क्योकि गुर्जरभाषा मे इन ग्रन्यों के अनुवाद हुए भी हैं किन्तु हिन्दी भाषा आज राष्ट्र की राष्ट्रभाषा है और भारत के अनेक प्रान्त इस भाषा से अपना व्यवहार चलाते हैं, उनको श्रीवल्लभाचार्य का तत्त्वज्ञान समझने . २ प्रमेयरलाणवे [पूर्वाद्ध नन्दानालालितवपत्रचन्द्रो चिधीशटुप्पापपदारविन्दः । विराजता मुनि मतिगम्य श्रीवालकृष्ण कुलदेवत मे ॥ २ ॥ आनन्दमूर्ति श्रुतिमू सिद्धम् श्रीकृष्णममायतधर्मयुक्तम् । य.प्रापय देवजनान् स्वपुष्टयाश्रीवल्लभत प्रभुमाश्रयामि ॥ ३ ॥ वेदान्तसिद्ध पुरपोत्तमस्य स्फुटीकृतं येन रसात्मकत्वम् । गोपादनाप्रेमनिमग्नचित्त श्रीविठ्ठल तं प्रणमामि भक्त्यै ॥४॥ अयसुबोधिनी-निवन्ध-साप्य-विद्धन्मण्डनादिपु स्थितानि गोवर्द्धनाधीश्वर भगवान् श्रीकृष्ण, जिन्ह श्रीमद्वल्लभाचार्य और श्रीविठ्ठल नाथ द्वारा प्रतिपादित प्रेमाक्ति प्रिय है और निन्हे उपनिषद् ( रसो धै स', तैत्ति उप० २१७ आदि वाक्यो मे) रमात्मा कहते हैं, की शरण में जाता हूँ ( उनकी भक्ति या सेवा करता है)।॥१॥ मैं, नन्द की पत्नी यशोदा द्वारा पारित मुसचन्द्र वाले अपने कुल देवता नीनालकृष्ण-जिन पदकमल नह्मा और शङ्कर को भी दुप्पाम्य हैं और जो फेवल भक्ति से ही जाने जा सकते (तथा प्राप्त किये जा मस्ते) है-को शिरसा नमस्कार करता है ॥ २ ॥ मैं उन महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्य की शरण में आता हूँ जिन्हान अनुग्रह कर देवी जीवो को आनन्दमूर्ति, उपनिपत्मिद्ध तथा समान धमों से युक्त श्रीकृष्ण की प्राप्ति करायी ॥ ३ ॥ मैं भक्ति की प्राप्ति (अर्थात् मक्तिमान की पुष्टि) लिये, गोपिया के प्रेम मे विमोर हृदय वाल गोस्वामी पिहलनाथ को-जिन्हाने पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण के उपनिषत्सद्ध (अर्थात् 'रसो के स', तैत्ति उप० १७ आदि वाक्यों में प्रतिपादित) रसात्मक रूप को स्फुट अर्थात् सष्ट रूप में उपपादित क्यिा-प्रणाम करता हूँ ॥ ४ ॥ अब में श्रीवल्लभाचार्य द्वारा चिरचित श्रीमद्भागवत की मुनोधिनी टीका, तत्त्वार्थदीपनिबन्ध तथा वेदान्तस्लीरे अणुमाध्य और गोरवामी चिट्ठलनाथकृत विद्वन्मण्डनम् आदि ग्रन्थों में प्रतिपादित प्रमेयो का, , प्रथमोऽध्यायः] प्रपञ्चविवेकः ३ प्रमेयानि रत्नानीव सचिनोमि । तन भगवद्गजनोपयोगितया प्रपञ्चस्वरूपभानस्य नियन्यो- करीत्या प्रथमं तदेव चिविच्यते । 'तदात्मानं स्वयमपुरुत ( तैत्ति० उ० २२७), 'स हैतावानास' (बृह० उप०१३), 'सवै सर्वमिदं जगत्', 'इदं सर्व यदयमात्मा' (वृह उप० ४।५।७), 'मात्मैवेदं सर्वम् (छान्दो० उप० ७।२५॥ २)स सर्व भवति', 'पुरुप एवेदं सर्वम्' (ऋग्वेद १०९०१२) इत्यादि श्रुतिभिः ब्रह्मात्मकः प्रपञ्चो ब्रह्मकार्य इति सिद्धान्तः, अविकृतपरिणामवादस्वीकारात्, तधोपपपादितं भाष्यकारे रत्नों का सञ्चय करने समान, मकरन करता हूँ अर्थात् उपर्युक्त ग्रन्यो में प्रतिपादित प्रमुख विषयोका, उन्ही कृतियोका अनुमरण करते हुए, मलेपमे विवेचन करता हूँ। उन विवेच्य विषयों में, प्रपञ्च या जगत्ये स्वरूपके सम्यक् ज्ञान के भगवद्गजनमे उपयोगी होने कारण मप्रथम उसीका विवेचन, वल्लभाचार्यकृत तत्वार्थदीपनिनन्धमे प्रतिपादित प्रकार किया जाता है। 'उसने स्वय अपने को (जगद्रूप से ) रचा' (तैत्ति० उप० २१७), 'वह इस परिमाण यारा हो गया' (वृत्० उप० १४१३), 'यह ही यह समग्र जगत् (हो गया) है, 'यह सय जो कुछ भी है, यह आत्मा (ही) है' (बृह० उप० ४।५।७), 'आत्मा ही यह सब है' (हान्दा उप० ७॥२५॥२), 'वह सब कुछ हो जाता है,' 'यह सब कुछ पुरप ही है' (ऋग्वेद १०१९०१२) इत्यादि श्रुतिवाक्यों में सूचित होता है कि श्रुति का प्रतिपाद्य सिद्धान्त यह है कि प्रपञ्च या जगत् ब्रह्मात्मक है और ब्रह्म का कार्य है क्योंकि इन वाक्यों में अविश्व परिणामयाद को स्वीकार किया गया है। ग्रहासून के अणुभाष्य के लेगक वल्लभाचार्य ने १'स इद सर्व भवति' (बृह० उप० १४१०) 'स य एवमेतत् साम सर्वस्मिन् प्रोत वेद सर्व ह भवति' (छान्दो० उप० २२२२२)।
प्रमेयरलार्णवे [पूर्वाद्ध 'आत्महते. परिणामात्' (ब्रह्मसूत्र १४॥२६) इत्यत्र । अतो न मायिको' न या भगवद्भिन्नः किन्तु सत्यत्वाद् आविर्भाच-तिरोभावशाली, न उत्पत्ति-विनाशवान्, 'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः' (गीता २१६) इति वाफ्यात् । . 'आत्मकृत परिणामात्' (ब्रह्ममून १।४।२६) इस सून अणुभाष्य में इम मिहान का प्रनिपाटन मी प में किया है। अतः जगत् न नो मायिक ही है और न भगवान् से भिन्न ही। प्रपञ्च मत्य है (न कि मिथ्या) और सत्य होने के कारण ही वि- शाली और निर्गभानशाली अर्थात् आविर्भूत और तिरोहित होने वाला है नवि उत्पन्न होने वाला और नए हो जाने वाला । श्रीमद्भगवद्गीता 'असत् कभी सन नहीं होता और सत् का कभी अमाव या नाश नहीं होता' (गीना २।१६) दम बास्य से सिद्ध होता है कि जगत्-जो. --का उत्पाद और नाम नहीं अपितु आर्भािव और तिरोभाव ही होता है। सत्य १. द्रष्टव्य, शास्त्रार्थप्रकरणप्रकाश, २३. २. 'यात्मकृतेः परिणामात्' (ब्रह्मसूत्र १।४।२६ ) के अणुभाष्य में वल्लभाचार्य ने यह प्रतिपादित किया है कि ब्रह्म जगत का समवामि- कारण हैं और जगत् ब्रह्म का अविकृत परिणाम है। वे लिखते है, ""तदात्मानं स्वयमकुरुत' (तत्ति० उप० २१७ ) इति स्वस्यैव कर्मवत- भावात । सुकृनन्ववचनाच्चालौकिकत्वम् । तथापि ज्ञानार्थमुपपत्तिमाह- परिणामात, परिणमते कार्याकारणेनि । अविकृतमेव परिणमते सुवर्ण, सर्वाणि च तेजसानि । पूर्वावस्याऽन्ययाभावस्तु कार्यश्रुत्यनुरोधादगी कर्तव्य , वक्ष्यति च 'श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वाद' (ब्रह्मसूत्र २।१।२७) इति 1... .. तस्माद्ब्रह्मपरिणामलक्षणं कार्यमिति जगत्समवायिकारणत्वं ब्रहण एवेति सिद्धम्" ( अणुभाष्यम् ११४१२६)।
प्रथमोऽध्याय ] प्रपश्वविवेक. एवञ्च प्रागभावादिचतुप्रयम् अपि नान इति नेयम् । ननु, 'प्रपञ्चस्य ब्रह्माभिन्नत्वेपि प्रापञ्चिकटपटादीनां. 'घटः पटोन' इत्यादिप्रतीतिसिद्धः अन्योऽन्यामावो दुनिवार, अन्यथा घटेन आचरणरूपं पदकार्य स्यात' इति चेत् न, 'बहु स्याम्' (तैत्ति० उप० २६) इतिश्रुतिमिद्धया इच्छया. घटे पटत्वादीनां सर्वपामेव तिरोभावात्, पास्य घटत्यस्य गव घटे आविर्भावात्, न कार्यान्तरसङ्करः । एवं मति सर्वर सर्व ब्रह्मधर्मा सन्तोपि तत्तद् यक्ती एग प्रकार जगत् का प्रागभाव जादि भी नहीं होता ऐसा समझना नाहिए । शुद्धाद्वैत ब्रह्मवाद के नाम से प्रसिर वालम सिद्धान्त में भार प्रागभार पाटि चार म्प म्वीकार नहीं किये गये हैं। पूर्वपक्षी यह मक्ता है कि प्रपञ्च को ब्रह्म में अभिन्न मान रेने पर भी घट, पट आदि प्रापचित पदार्थों में, 'घट पट नहीं है, दग प्रकार के प्रत्यक्ष अनुभर में मिद्ध होने पाले बन्योऽन्याभार को तो स्वीकार ही करना होगा, क्योकि यदि पर में पट का और पत्र में घः का अभाव न स्वीकार किया जाये तो पट द्वारा होने वाला दागेगच्छादन जादि कार्य घट ने भी हो माना चाहिए, पर ऐगा होता नहीं है। किन्तु उसका पेमा काना टीक ना होगा क्योंकि, 'मैं अनेक हो जाऊँ' (तेत्ति उप० २६) इत्यादि अनिवाक्यों ने गिद्ध होने वाली नहा की बहुभानेच्छा जान् अनेक हो जाने की इच्छा मे पट मे पट नादि मभी (घंतर पदायों) का निरोभाय हो जाना है। दस प्रकार घट में एपमान घटल का ही आरिमार होने पे कारण अन्य कारणों से उसका मकर नहीं होता। इस प्रकार यद्यपि अक्षा के सभी धर्म गर अर्थात् सभी पदार्थों में १. द्रष्टव्य, सर्वनिर्णयप्र० का० ११७ तथा उस पर प्रकाश और प्रस्थानरलाकरः, पृष्ठ १११-११६ ६ प्रमेयरत्नार्णवे [पूर्वाद्ध तत्ताकार्यकर्तृत्वस्य भगवता नियमितन्यात्, न कार्यान्तर कर्तुं समर्धा भवन्ति । अतः प्रमाणसिद्धाभ्याम् आविर्भाव- तिरोभावाभ्यां सर्वकार्यसिद्धो.न अन्योन्याभावः अङ्गीकर्तव्यः, 'सर्व सर्वमयम्' (नसिंहोत्तरता०९।४) इति तापनीयश्रुतेः। अतएव 'तबैतत्पश्यन् ऋपिर्वामदेयः प्रतिपदे, अहं मनुरभवं सूर्यश्च (बृह० उप० २०१०) इत्यादो उक्तः सर्वभावो युज्यते । एवम् अन्योऽन्याभावे निराकृते, पदार्थमात्रस्य सर्वरूपत्वेन, अत्यन्ताभाचोऽपि दूरीकृतो शेयः। तथाहि भूतले घटो नास्ति' है फिर भी भगवान् के द्वारा 'यह पदार्थ इस कार्य को उत्पन करे इस प्रकार नियमित कर दिये जाने के कारण पदार्थ अन्य कार्यों को उत्पन नहीं कर पाते । अत. अतिस्मृति आदि रूप प्रमाण से सिद्ध आविर्भाव और तिरोभान के द्वारा ही सारे कायों की सिद्धि हो जाने (अर्थात् सारे कार्यों के व्याख्यात हो जाने ) के कारण अन्योऽन्याभाव को स्वीकार करने की आवश्यक्ता नहीं है क्योकि नृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् के 'सनं सर्वमयम्' (गृसिंहोत्तरता० ९४ ) आदि वाक्यों में सभी पदार्थों को मर्ममा बताया गया है। इसीलिये वृहदारण्यकोपनिषद् के “उसे मात्मा के रूप में मपि वामदेव ने जाना, 'मैं मनु हुमा और सूर्य मी' (यह० उप० १।४।१०)," इत्यादि वाक्यो मे प्रतिपादित सर्वभार उपपन है। इस प्रकार जन्योऽन्याभाय का निराकरण हो जाने पर, पदार्थमान के सर्वस्प अर्थात् सर्वात्मक होने के कारण अत्यन्ताभाव को भी निरस्त हो गया समझना चाहिए। इस प्रकार 'भूतल पर घट नहीं है। इस १. आविर्भाव और तिरोभाव के लक्षण तथा उनकी सिद्धि के लिये देखें, सर्वनिर्णयप्र० का० १४०-१४२ तथा उस पर प्रकाश और विद्वन्मण्डनम्, पृष्ठ ८५-१२०.
प्रथमोऽध्याय:] प्रपञ्चविवेकः ७ इत्यत्र हि घटानुपलम्भेऽपि तद्भूतले वस्त्वन्तरम्य तृणादे- राकाशस्य वा विद्यमानाबात, तृणादिना आकाशेन वा घटस्थापि सन्चात, न अत्यन्ताभावः। अतः सर्वस्य सर्वरूपत्यात सर्वस्य सर्वत्र विद्यमानत्वात् च, सर्वस्य ब्रह्मत्वम् इति गुदो ब्रह्मवादः । कारणरूपस्य ब्रह्मणः कार्यरूपेण आविर्भावात, तत्मयुक्तं कार्यत्वं निखिलप्रपञ्चे, 'आत्मकृतेः परिणामात्' (ब्रह्मसूत्र १४॥ २६), 'पटयच' (ब्रह्ममत्र २२२११९) इति मत्राभ्याम् । कथन में (भूतल पर ) घट की उपलब्धि न होने पर भी उसी भूतल पर तृणादिरूप किसी अन्य पदार्थ या आकाश के विद्यमान होने के कारण, तृणादि या आकाग के ( सर्वमय होने के कारण, उनके) द्वारा (प्रकारान्तर से,) घट के भी विद्यमान होने से (घट का) अत्यन्ता- भार नहीं समझना चाहिए । अतः सभी पदार्थों के सर्वरूप होने के कारण और सभी (पदार्थों) में सर्वत्र ( अर्थात् सभी पदार्थों या स्थली में) विद्यमान होने के कारण, सभी पदार्थों का ब्रह्मत्व सिद्ध होता है और इस प्रकार शुद्ध ब्रह्मवाद की मिद्धि और पुष्टि होती है । 'आत्मकृतेः परिणामा' (ब्रह्मसूत्र १।४।२६)तथा पटवञ्च ब्रह्म- मूत्र २।१११९) सूत्रों से मिद्ध होता है कि कारणरूप ब्रह्म के जगद्रुप कार्य के रूप मे आविर्भूत होने के कारण सम्पूर्ण जगत् को ब्रह्म का कार्य मानना चाहिए। * 'आत्मकृतः परिणामात्' (ब्रह्मसून १।४।२६) का वल्लभाभिमत अर्थ यह है कि यह सृष्टि भगवान् की ही कृति है और वे स्वयं ही कृति के कर्म और कर्ता दोनों है तथा ( अविकृत रहते हुए भी) सृष्टि के १. मिलाइये, 'आत्मव तदिदं सर्व सृज्यते सृजति प्रभु. । प्रायते प्रति विश्वात्मा ह्रियते हरतीश्वरः ॥' (सर्वनिर्णयप्र० का० १८३)।
प्रमेयरत्नार्णवे ८ [पूर्वा पतदुक्तं निवन्धीयमर्वनिर्णयप्रकरणे,' 'प्रपञ्चमाया भगवत्येव लीनः प्रजटीभवति इति (गास्त्रार्थप्र० प्र०६८)। अवान्तरकार्यपु घटपटादिपु तु अयं प्रकारः। भगवदिञ्छ्या कारणरूपायांमृटि विद्यमानस्य भगवद्र्पघटम्य आविर्भावः। एवं सति; यस्मिन् भगवद्रूप रूपान्तरस्य आविर्भायः तत्का- रूप में परिणामित होने है अर्थात् जगत रूप कार्य नहा का परिणाम है और ब्रहा इसका समगायकारण भी है (द्रपन्य, ऊपर पृष्ठ ४, टिप्पणी २ म उद्धृत शुभाष्यम् १।४।२६)। 'पटव २ (नामून १९१९) गा पानर्थ वल्लभाचार्य के अणु- • भाष्य के अनुसार यह है कि जिस प्रकार मोटित पट मा व्यवस्प से ग्रहण नहीं होता किन्तु फैला दिये जाने पर उसी पट का स्पष्ट रूप से प्रत्यक्ष होने लगता है उसी मार जानिभान होने पर जगत् का ग्रहण या प्रत्यक्ष होता है और निगेभाव हो जाने पर नहीं होता ('यथा सवेशितः पटोन व्यक्त गृह्यने पितृतम्नु गृह्यते तथापिर्भावानाविभावन जगतोऽपि ।' अशुमाप्यम् २1१1१९)। तत्वदीपनिनन्ध के (सर्वनिर्णयप्रकरण' के) अधोलिसित वाक्य में यही बात कही गयी है 'जगत् भगवान् में ही लीन हो जाता है और उनसे ही भाविभूत या प्रकट होता है अथवा भगवान् में ही लोन और प्रकट होता है।' (शास्त्रार्थ प्र प्र०६८)। घटपटादिरूप अमान्तरकायों में आविर्भाव-तिरोभार का प्रकार अधोलिसित होता है। भगवान की इच्छा में कारणरूप मृत्तिा मे विद्यमान मगवद्रूप घट का नाविमांच होता है । इस प्रकार, जिस मगरद्रूप में किसी अन्य रूप का आरिभाव होता है उसे कारण वहा १. प्रस्तुत उद्धरण तत्वार्थदीपनिवन्ध के सर्वनिर्णयप्रकरण का नही अपितु शास्त्रार्थ प्रकरण का है (देविये, शास्त्रार्थप्रकरण प्र०६८)। २. मिलाइये, 'ओतं प्रोतं पटवद्यन विश्वम्' (माग० ६।३।१२) ।
प्रथमोऽध्याय.]
प्रपश्चविवेक
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रणम् , यथा मृद्. यस्य प्राकटय, तत् कार्य यथा घटः, इति
कार्यकारणव्यवस्था योध्या। तथोक्त निवन्धे, 'मृदादि
भगवद्रूप घटायाकारसयुतम् (सर्वनिर्णयप्र० का० १४२)
इति । अत 'सर्च सल्विद ब्रह्म' (छान्दो० उय०३१२४११)
इति श्रुत्युक्त ब्रह्मात्मकत्व निरावाधमेव।
'मनसा सा दृएया गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियै ।
अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुद्ध्यध्वमञ्जसा ॥' (भाग०
११।१३।२४) इति भागवतोपबृहणाच ।
परन्तु व्यामोहिका माया जीव व्यामोहयित्वा तदीयवुद्धो
जाता है, जैसे मृत्तिका और उसमें जिम रूपका आविर्भाव या प्राकश्य,
होता है उसे कार्य कहते है, जसे घट । कार्यकारण की व्यवस्था इसी
रूप म समझनी चाहिए।
तत्त्वार्थदीपनिबन्ध 7 सर्वनिर्णयप्रकरण में यही बात इस तरह कही
गयी है कि “घट भादि आकारों से युक्त मृत्तिका आदि मगढ़प है'
(सर्वनिर्णय प्र० का० १४२) । 'यह सय ब्रह्म है' (छान्दो उप०
२११४११) इत्यादि श्रुति वाक्यों म प्रतिपादित समग्र जगत् के ब्रह्मात्मक
होने का सिद्धान्त निधि अर्थात् उपपन ही है ।
श्रीमद्भागवतम् य, "मन, वाणी, दृष्टि राया अन्य इन्द्रियों द्वारा
मी जो कुछ गृहीत किया जाता है यह सब मैं ही हूँ, मुझसे मिन्न और
कुछ नहीं है, यह आप लोग समझ लीजिये" (भाग० ११११३१२४)
इत्यादि वाक्या मे दमी सिद्धान्त का उपबृहण होने से प्रपञ्च के
ब्रह्मात्मक होने 7 उपयुक्त मत की पुष्टि होती है।
रितु व्यामोहिका माया जीव को मोह में डालकर उसकी
१ द्रष्टव्य सर्वनिर्णयप्रकरण का
प्रकाश टीका।
१४१-१४२ तया उनकी
१० प्रमेयरलाणवे [पूर्वार्दै प्रापचिकसहस्तुसदृशं मायिकं पदार्धमुत्पाद्य पुर:स्थितविपये प्रक्षिपति । तदा पढार्थग्रहणे नस्यापि ग्रहणात तद्विशिष्टज्ञानं भ्रमात्मकं भवति । नथा सति, यस्तुग्रहे मायिकधर्माणामपि ग्रहणात्, 'यदिदै मनसा काचा चक्षुभ्यो श्रवणादिभिः । नवरं गृह्यमाणश्च विद्धि मायामनोमयम् ।। (भाग० १९१७१७), 'देहं मनोमानमिमं गृहीत्वा' (भाग० २४४२३५०), 'त्यग्युद्धवाश्रयति यतिविघः विकारो। मायान्तरापतति नाथपवर्गमोर्यत् ।। (भाग १९६१९।७), "स्वप्नाभमस्तधिपर्ण पुरुदुःखदुःखम् (भाग १०।१४।२२) 'इत्यादिवास्यानि सावकाशानि भवन्ति । सुद्धि मे जागतिक वास्तविक पदार्थों पे समान माथिक पदायों को उत्पन कर समुपस्थित पियों पर उन्हें प्रक्षित कर देती है और तन प्रापश्चिक पदार्थों का ग्रहण होने के समय वे मायिक पदार्थ भी गृहीत हो जाते हैं अत उन मायिक पदार्थों से विशिष्ट शान भ्रमात्मक हो जाता है । इस प्रकार, जागतिक पदायों का ग्रहण होने के समय उनमें मायिक पमा का भी ग्रहण हो जाने के कारण श्रीमद्भागवतम् के, उद्धव । यह जो कुछ भी मन, वाणी, नेत्र तथा श्रवणादि इन्द्रियों द्वारा गृहीत किया जाता है सय नश्वर, मायामय अर्थात् मिथ्या और मनो- मथ अर्थात् मन का विलास मात्र है, ऐसा समझो' (भाग० १११७७), "इस मनोमात्र अर्थात् मन करिपत शरीर को मैं और मेरा समझ कर' (भाग० १११२३४५०), 'हे उद्धव । त्रिविधविकारों को समष्टि रूप यह शरीर जो सर्वथा तुम्हारे आश्रित है, तथा जो पहले नहीं था और अन्स में नहीं रहेगा (काल श्रीच में ही दिखाई दे रहा है ), माया है' (भाग० ११५९७) तथा 'स्वप्न के समान, प्रज्ञानरूप और पर दुख देने वाला' (भाग० १०।१४।२०) इत्यादि धाक्य भी साब- प्रयमोऽध्यायः] प्रपञ्चविवेक इमानि तादृक्-प्रतीतिमूलकानि प्रमाणानि अवलम्ब्य विवादिवादानां प्रवृत्ति । पुराणादो तादृशवादमूलमायि- कत्लोक्ति घेराग्यार्थमुपयुज्यते इति व्यवस्थापितं तत्वदी। अन प्रतीतिरेव मुग्धानां मायिकी, न वस्तुनि कश्चिद् दोप म्वाभाविकः। अत एव ब्रह्माणं प्रति भगरता उक्तम्, 'रतेऽर्थ यत्प्रतीयेत, न प्रतीयेत चात्मनि । तद्विद्यादात्मनो माया, यथाऽऽभासो यथा तमः ॥ (भाग० १९६२३) इति । एतद्-व्याख्याने सुबोधिन्यामुक्तम्, काश हो जाते ह अर्थात् इन वाक्या की भी व्याख्या हो जाती है। इन शब्दप्रमाणरूप वाक्यों-जो देहादि प्रपञ्च के मायिक होने का प्रतिपादन करते प्रतीत होते ह-का अबलम्बन हेर, इनसे आधार पर ही मायावादी आदि दार्शनिक विवर्तवाद आदि मतों का प्रतिपादन करते है । पुराणादि में जगत् नै मायिक होने के कथन-जिसके आधार पर रिवर्तवाट आदि का प्रतिपादन किया जाता है का उपयोग पाल्लम सिद्धान्त में वैराग्य के लिये किया जाता है अर्थात् उसका उद्देश्य वैराग्य की भावना को उत्पन्न और पुष्ट करना है, इस सिद्धान्त का निरूपण वल्लभाचार्य ने अपने तत्त्वदीपनिबन्ध ( शास्त्रार्थप्रकरण) मे किया है। अत मुग्ध अर्थात् मोहनम्न लोगों को होने वाली प्रतीति ही मायिक है, यस्तु में कोई स्यामायिक दोष नहा होता अर्थात् बलुत प्रपञ्च मायिक या मिथ्या नहीं है। इसीलिये भगवान् श्रीकृष्ण ने ब्रह्मा से कहा था, 'वस्तु का अपने स्वरूप से अन्यथा प्रतीत होना और अपने वास्तविक स्वरूप में न गृहति होना, जर्जावां का व्यामोह में डालने वाला व्यामोहिका माया का कार्य है, जिस प्रकार विचन्द्रदर्शन आदि स्प भामास या अन्धकार' (भाग० २१९१३३) भागवत के इस श्लोक १. देखिये, तत्त्वार्थदीपनिबन्ध के शास्त्रार्थप्रकरण की कारिका ८९ और उसकी स्नेहमपूरणी न्यास्या (पृष्ठ ३०३-३०५ ) ।
प्रमेयरत्नाणवे [पूर्वाद्ध “तया व्यामोहिता धुदिः पदार्थान् अन्यथा मन्यत न तु पदार्था अन्यथा भवन्ति' (सुबोधिनी २०२६३३) इति । अग्रे चोकम्, "प्रमाणभूतो घेदः सर्च मल्विदं बाद' (छान्दो० उप० ३१४) इत्याह । ब्रह्मविदा प्रतीतिरपि तथा । आन्तप्रतीतेस्तु न अर्थानयाम- कन्वम्, अन्यथा प्रमदृष्टया गृहीत जगद्, अमरूपमेव स्यात् । अतो विषये विषयता काचित् स्वीकतव्या, यया दृष्टिः सविषया भवति । अन्यथा पदार्थानां स्थिरत्वाद् भ्रमष्टिनिविपया स्याद" (मुयोधिनी २।९।३३) इति। की व्याख्या करते हुए, वल्लभाचार्य ने अपनी सुयोधिनी का में कहा है कि "उस व्यामोहिका माया के द्वारा व्यामोहित पुद्धि पदार्थों को अन्यथा समझती ( अर्थात् अयथार्थरूप में ग्रहण करती ) है, न कि पदार्थ ही अन्यथा हो जाते है" (मुनोधिनी २।९।३३) । उक्त ग्लोफ की सुबोधिनी टीका में ही आगे चलकर बल्लभाचार्य कहते है, "प्रमाणभूत चेद कहते है कि 'यह सब ब्रहा है' (छान्दो० उप० ३ । १४ । १)। ब्रह्मवेत्ताओं का अनुभव भी ऐसा ही (अर्थात् 'सर्व खत्विदं ब्रह्म' (छान्दो० उप० ९ । १४ । १) दम श्रुतिवाश्य का पोपक) है। जिस व्यक्ति को भ्रम हो रहा है उसकी प्रीति को अर्थ- नियामक अर्थात् वस्तु के स्वरूप का निर्धारक नहीं माना जा सकता, अन्यथा जिस व्यक्ति को घुमनी (भमरिका ) के कारण चक्कर आ जाता है और चकर के कारण जगत् अपने चारों और तेजी से घमा जान पड़ता है, उसके द्वारा गृहीत हो रहे जगत् की उसके चारों और तेजी से धमता हुआ मानना होगा । अत: विषय में कोई विपयता स्वीकार करनी चाहिए जिसके कारण दृष्टि सविपया हो जाती है, अन्यथा (विषयता स्वीकार न करने पर ) उक्त व्यक्ति के चारों ओर के पदार्थों के स्थिर होने के कारण उन (पदार्थों ) के अपने चारों ओर घूम रहे होने का रस व्यक्ति का ज्ञान निर्विषय हो जायेगा !" (मुबोधिनी २।९।३३)।
प्रथमोऽध्याय:] प्रपञ्चविवेक. यत्पुनः तव एवमुपपाद्य स्पष्टीकर्तुं पुनः फलितमुक्तम् , 'विषयता मायाजन्या, विषयो भगवान्' (सुवो० २।९।३३) इति । एवं सति अब्रह्मविदां विपये विपयता च प्रतीयते इत्युक्तं भवति। यथा भ्राम्यतः पुरपस्य 'घटो भ्राम्यति' इति प्रत्यक्षे घट- गताकृत्यादिर्वस्तुभूता प्रतीयते, भ्रमणं तु विषयतारूपम्, विपयरूपम् भगवदात्मकं वस्तुभूतम् । उत्पत्ति-विनाश-कुत्सितत्व-अन्योऽन्याभाव-आदि प्रतीयते, तद्विषयतारूपं, भ्रमणवन्मायिकं भासते । तया घटपदादि- रूपं जगत प्रतीयते, न तु मायिकं बोध्यम् । इदमेव विविच्य इस प्रकार उपपादन कर वल्लभाचार्य ने स्पष्टता के लिये पुन निष्कर्ष का कथन किया है कि 'विषयता मायजन्य है भौर विपय मगवान् है' (मुनोचिनी २१९ । ३३)। इस प्रकार, उपर्युक्त कथन का आशय यही है कि ब्रह्मज्ञानविरहित व्यक्तियो को विषय मे ( अर्थात् विषय की प्रतीति के साथ ही) विषयता की प्रतीति भी होती है। जिस प्रकार घुमनी कर रहे (अर्थात् जपने स्थान पर ही धूम रहे ) पुरुष को होने वाले 'घट घम रहा है' इस प्रकार के प्रत्यक्ष में घट की वास्तविक आकृति आदि की प्रतीति होती है। यहाँ घट का घूमना विश्यतारूप है और भगवद्वात्मक घट पदार्थ विपयरूप है । उपयुक्त प्रत्यक्ष म होने वाली घट १ उत्पत्तिशील और विनागशील होने, अस्मिनत्व तथा ('घट, पट नहीं है' इत्यादिरूप ) अन्योऽन्याभाव आदि की प्रतीति विषयतारूप है और भ्रमरिकापरत पुस्प को होने वाली उमरे चारो गैर जगत् के तेजी से घूम रहे होने की प्रतीति के समान ही मायिक प्रतीति है। घट, पट आदि रूप वास्तविक जगत् की जो प्रतीति होती है उसे मायिक नहीं समझना चाहिए | यह प्रमेयरत्नार्णवे [ पूर्वाद्ध सुबोधिन्याम् 'भरतेऽथ यत्प्रतीयत' (भाग० २११३३ )-इत्यस्यैव व्याख्याने उत्तम्, "अतो विषयताजनितं ज्ञान गातम्, विषयजनित प्रमा इति" (सुबो० २।९।३३)। विषयता च द्विधा सुबोधिन्या विवृता, “सा च विषयता द्विधा, माच्छादिकंका, अन्यथाप्रतातिहेतुश्च अपरा" (सुयोग २।९।३३ ) इत्यारभ्य, "तस्माद् दाणे मुसजननयत् तेजोऽभावेऽ- घारजननवत् माया मोहितपुरुपबुद्धी अपि विपयताद्वयं जनयति इत्यर्थ." (सुयो० २।९।३३) इत्यन्तेन ग्रन्थेन । विपयताद्वयं कर्मभूतं माया जनयति इति फपि कार्थः। पुनर्विषयता-द्वयस्यापि स्वरूप निगमयितुम् अत्रे भणितम् , तत्रैका ब्रह्मरूपत्ता न प्रकाशयति, एका तु जगद्रपा विवेचन कर वल्लभाचार्य ने 'तऽथ पत्मीयत' (भाग० २१९६३३) इसी श्लोक की सुबोधिनी टीका में कहा है कि "विषयता जनित ज्ञान धान्त होता है और विपयजनित ज्ञान प्रमा (अर्थात् यथार्थ और प्रामाणिक) होता है' (सुबोधिनी २१९६३३) वल्लभाचार्य ने भागनत के उपर्युक्त ( भाग० २२९१३३) श्लोक की मुबोधिनी टीका मे विषयता में दो प्रकारों का विस्तार से निवेचन, "और वह विषयता दो प्रकार की होती है, एक आच्छादिका और दूसरी अन्यथा प्रतीति की हेतु भूत" (मुमोधिनी २।९।३३) इस वाक्य से प्रारम्भ कर, 'मत दर्पण में मुख की उत्पत्ति के समान, तथा प्रकाश के अमाव में अन्धकार की उत्पत्ति के समान, माया मोहित पुरप की बुद्धि में भी दो प्रकार की विषयता को उत्पस कर देती है," (सुरो० २।९।३३ ) दम वाक्य तक किया है । उपर्युक्त पत्रिका का तात्पर्य यही है कि माया दो प्रकार की विषयताओ को उत्पन्न करती है। तदनन्तर उपयुक्त दोनों विषयताओ का स्वरूप निरूपित करने के लिये वल्लभाचार्य आगे कहते हैं, उन दोनों विषयताओं में से एक ब्रह्मरूपता का प्रकाशन नहीं करती ( अर्थात् पदार्थ की ब्रह्मरूपता का - प्रथमोऽध्याय.] प्रपञ्चविवेक . विषयता" (सुयो० २१९६३३) इति । इह, "ब्रह्मरूपता न प्रका- शयति” (सुयो० २१९। ३३, ) इत्युक्त्या, 'ऋतेऽर्थ । यत्प्रतीयेत, न प्रतीयेत चात्मनि' (भाग० २०९३३) इत्यत्र, अर्थो न प्रतीयत' (सुबोधिनी २।९।३३) इति यदुक्तं तदुपपादितम् । "एका तु जगद्रूपा विषयता" (सुयो० २।९।२३) इत्युक्त्या, 'अर्थम् गते यत् प्रतीयेत' (सुबोधिनी २।२।३३) इति पूर्व यदुक्तम्, तत् समर्थितम् । 'जगद्र्पा विपयता' जगदिय सत्यमिव रूपं यस्याः सा जगद्रूपा, इति समासो शेयः । गोध नहीं होने देती), और दूसरा जगद्गा (अर्थात् सत्य जगत् । समान सत्य प्रतीत होने वाली) विषयता है" (सुनोधिनी २।९।३३)। यहाँ, 'ब्रह्मरूपता का प्रकाशन नहीं करती' (सुबोधिनी २।९।३३) इस कथन के द्वारा, 'इतेऽयं यत्प्रतीयत न प्रतायेत चात्मनि' (भाग० २।९।३३ ) इस इलोकार्द्ध की व्याख्या में आये 'अर्थो न प्रतीयते' (सुनोधिनी २।९।३३ ) अर्थात् 'यस्तुभूत पदार्थ की प्रताति नहीं होती' (सुनो० २१९१ ३३) इन वाक्य में कही गयी रात का उपपादन किया गया है तथा 'और एक जगपा विषयता है' (सुपोधिनी २१९ । ३३ ) इस कथन के द्वारा, उपर्युक्त व्याख्या मे आये 'अर्थम् मते यत् प्रतायत" (सुनोधिनी २ १९ । ३३) अर्थात् 'जो पदार्थ के अभाव मे भी (अर्थात् पदार्थ के स्वरूप से पृथक् या अतिरिक्त) प्रतीत होता है। (मुमोधिनी २ । ९ । ३३) इस वाक्य में कही गयी जात का समर्थन किया गया है। उपर्युक्त सुबोधिनी के 'जगपा विषयता' इस वाक्याश में प्रयुक्त समास का विग्रह, “जिसका रूप जगत् के समान अर्थात् सत्य के समान है, वह जगद्रूपा है। इस प्रकार का है, ऐसा समझना चाहिए। इसी का विवेचन भागवत के मूल १ उपलब्ध सुवोधिनी का पाठ 'अर्थमृते प्रतीयत इति' है ।
प्रमेयरलार्णवे [पूर्वाद्ध एतदेय "यथाऽऽभासो यथा तमः" (भाग० २१९॥३३) इति दृष्टान्तेन मूले विवेचितम् । न च 'जगद्मा विपयता' (मुयो० २।९।३३) इत्युस्त्या दृश्यमानस्य जगतो विषयतात्वं स्वीक्रियताम् , इति पाच्यम्'विपयो भगरान्' (सुबो० २०९।२३) 'रिपयता मायाजन्या' (सुवो० २।९।३३) इत्यनेन विषयरूपस्य जगतो विपयतायाः पृथक्त्वस्वीकारात्; अन्यथा, ब्रह्मणो विषयत्वस्य वक्तुमश- फ्यत्वात् जगतश्च विपयतारूपत्वाहीकारात्, "विपयो भगवान्' (सुवो० २।९।३३) इति-उक्तिरेव याधिता स्यात् । अतो श्लोक में 'यपाऽभासो यथा समः' (माग०.२ । ९ । ३३) अर्थात् 'जिस प्रकार आभास, ओर जिस प्रकार अन्धकार' ( भाग० २।९।३३) इस पाट में दृष्टान्त देकर किया गया है। पूर्व पक्षी या यह कहना भी ठीक न होगा मि मुबोधिनी की 'जगदपा विषयता' (मुनोधिनी २।९।३३) इस उत्तिः रे आधार पर ( अर्थात् इस वाक्य के प्रामाण्य मे) दृश्यमान जगत् को निषयता- रूप स्वीकार कर लेना चाहिए ( अर्थात् मुबोधिनी के 'जगदपा विषयता' इस वाक्य का अर्थ 'जगत् का विषयताम्प होना' मान लेना चाहिए.) क्योंकि उसी श्रोक की सुनोधिनी में "विषय मगवान् है' (मुसोधिनी २ । ९ । ३३) और 'विषयता मायाजन्य है' (मुगधिनी २।९।३३) इन वाक्यों द्वारा विषयरूप जगत् के विषयता में पृथक् होने की बात स्वीकार की गयी है; अन्यथा (अर्थात् 'जगहपर विषयता' का अर्थ जगत् का विपयनारूप होना मान लेने पर) ब्रहा के विषय होने की बात न कही जा सकने के कारण तथा जगत् में निषयताप होने के बात स्वीकार पर लेने के कारण मुगोधिनी की 'विषयो मगवान् अर्थात् विषय भगवान् है (सुबोधिनी २ । ९ । ३३) यह उक्ति ही बाधित हो जायेगी । अतः 'जगडपा विपयता' ( मुबोदिनी २ । ९३३) प्रयमोऽध्यायः] प्रपञ्चविवेकः १७ 'जगद्रपा विषयता' (सुबो० २।९।३३) इत्यस्य अस्मदुक्त एवार्थी शेयः। प्रापश्चिकनीलबस्तुसदृशं विपयतारूपं नीलं तमः प्रतीयते, इयमेव जगद्रुपा विपयता। इदं तु विशिष्य ज्ञेयम् । माया हि कुनचिद् विपयतारूप- धर्म सृजति, कुनचिद् धर्मिणं विषयतारूपम् । अमरिकाथा गृहीते घटे भ्रमणं रिपयतारूपम्, तेजोऽभावे तु धर्मी विषय- नारूपोऽन्धकारः। एवमुभयविधा विषयता जगत्समानासारा, अतएन 'जगपा' इत्युच्यते । एवञ्च विपयतया पदार्थानाम् अन्यथाभानम्, "न तु पदार्था अन्यथा" (सुबो० २।९।३३) इति निष्कपः, यतो विपयताद्वयम् आच्छादका अन्यथाप्रतीतिहेतु- इस वाक्याग का वही अर्थ टीम ममझना चाहिए जो हमने ऊपर प्रतिपादित किया है । जागतिक नील पदाथो के सहा विषयतारूप नील अन्धकार प्रतीत होता है, यही जगद्रूपा विषयता है। इस सम्बन्ध में यह बात विशेषरूप से जानने योग्य है कि माया कही तो विषयतारूप धर्म की सृष्टि करती है और पी विषयतारूप धर्मी की। भमरिका अर्थात् धुमनी की दशा में गृहीत होने वाले घट में जो घट (अपने चारों जोर) घूम रहे होने की प्रतीति होती यह (माया क) विषयतारूप (धर्म की सृष्टि करने का उदाहरण ) है ओर प्रकाश के अभाव में गृहीत या प्रतीत होने वाला अन्धकार (माया के ) विषयतारूप धर्मा (की सृष्टि करने का उदाहरण) है। इस प्रकार, दोनों प्रकार की विषयता जगत् के समान आकार वाली है और इसीलिये जगद्र्पा कही जाती है । इस प्रकार (वल्लभाचार्य का) निरपें यह है कि विषयता से पदाथों की अन्य या प्रतीति होती है 'न कि पदार्थ भन्यथा हो जाते हैं' (मुनोधिनी २१९३३) क्योंकि आच्छादक और अन्यथा प्रतीति की हेतुभूत इन दोगा विषयताओं का नाश बहाज्ञान से होता है, जैसा कि भागवत के उपर्यंत २ २८ [पूर्वाद्ध प्रमेयरलार्णवे रूपम् ब्रह्मशानन नाश्यते, तदुक्तं सुथोधिन्याम अथैव "तदुभय-व्यावृत्त्य सर्वाणि प्रमाणानि इति भावः” । सुघो० २२९३३) इति । अयं प्रपञ्चोऽधिकारभेदन विधा भासते । तत्र ग्रामृनानां ब्रह्मात्मक एव शुद्धो भासत्ते, यथा यस्मिन् क्षणे स एच गुलो गृह्यते तहत् । शास्त्रोत्पनशानिनां तु ब्रह्मधर्म-मायाधर्मयुक्तः तत्तद्धर्मसत्यत्यमिथ्यात्यविवेकपूर्यकं भासते; यथा पटस्वरूपी- पाधिकहरितत्वयुनपटे गृहीतेऽपि पटगताटात्यादीनां सत्यत्वम्, हरितताया मायिकत्वं बुध्यते, तद्वत् । अविवेकिनां तु ब्रह्मधर्म-मायाधर्मयुक्तः तत्तद्धर्माणामेकरूपज्ञानपुरःसरं लोक की सुबोधिनी में ही अन्तिम वाक्य में इस प्रकार कहा गया है कि, 'सारपर्य यह है कि सारं प्रमाण उपर्युक्त दोनों विपयतामों को व्यावृत्ति करने के लिये ही है अर्थात् गरे प्रमाणों का उपयोग, प्रयोजन या उद्देश्य इस द्विविध विषयता का उच्छेद परना ही है' (सुबोधिनी २२९४३३)। यह जगत् अधिकारी-भेद से विभिन्न प्रकार के अधिकारियों को तीन विभिन्न रूपो में प्रतीत होता है। ब्रह्मभूत ऋपियों को यह जगत् ब्रह्मात्मा और शुद्ध ही प्रतीत होता है, उसी प्रकार असे श्वेत प्रतीत होने के समय श्वेतपट । जिन्हें शास्त्राभ्यास में ज्ञान उत्पन्न हो गया है उन ज्ञानियों को यह प्रपत्र अझ के धमी के सत्य होने और माया के धर्मों के मिथ्या होने के विवेकपूर्वक, ब्रह्म और माया दोनों के धर्मा से युक्त प्रतीत होता है, उसी प्रकार जैस ( पट के अपने ) वरूप और औपाधिक हरीतिमा से युक्त पट के गृहीत होने पर भी गृहीता को पट की आकृति आदि के सत्य होने और हरीतिमा के मायिक होने का विवेक या ज्ञान रहता है। अविवेकी व्यक्तियों को प्रपञ्च ब्रह्म और मामा के घरों के एकरूप होने की प्रतीलिपूर्वक, अझ और मापा दोनो , प्रथमोऽध्यायः] प्रपश्चविवेक. १९ भासते; यथा हरितकाचोपनेनयुतचक्षुपा वालेन गृहीतः पटः तद्गताहत्याः भोपाधिकहरितन्वादेव सत्यत्वाचवोधपूर्वक भासते तथा। एवं सति, भान पव भेदो; न स्वरूपे । अत. प्रपञ्चस्य ब्रह्माभिन्नत्वात् सत्यत्वम् अङ्गीकार्य श्रुतिशरणैः । ये पुनः उत्पत्ति-विनाश-कुत्सितत्व-भेदादयो धर्माः प्रती. अन्ते, ने मायिकाः, इति सुधीभिराकलनीयम् । भगवन्नूादौ तु मिन्नः प्रकारः। तथा हि-भगवन्मूति पश्यतो भक्तिरहिनस्य युद्धो माया विषयतां सृजति, न तु के धर्मों मे युक्त प्रतीत होता है (अर्थान् उन्हें नम और माया के अमों में पिरोक नहीं होता), उसी प्रकार जमे हरे (रग के काँच से' युक्त) चश्मे को लगाये हुए बच्चे के द्वारा गृहीत हो रहा पट अपनी आकृति आदि ओर जाने जोपाधिद हरितल आदि दोनों के समान रूप से मत्य होने के ज्ञानपूर्वक गृहीत अर्थात् प्रतीत होता है। तात्पर्य पर है कि उस बच्चे को पट का ग्रहण अर्थात् प्रत्यक्ष ज्ञान पट की आवृति जोर उसकी हरीतिमा के मत्व होने पे ज्ञानपूर्वक ही होता है । उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भेद अर्थात् अन्तर प्रतीति में ही होना है, स्वरूप में नहीं। जत' प्रपञ्च में ब्रह्म से अभिन्न होने के कारण, श्रुति की शरण लेने वाले (अर्थात् वेदो मे जास्था रसने वाले) आस्तिो को प्रपञ्च की सत्यता स्वीकार करनी चाहिए। उत्पत्ति, विनाम, मुत्सितत्व और भेट आदि धर्म, जो प्रपञ्च में प्रतीत होते हैं, मायिक हैं, ऐसा बुद्धिमानो को ध्यान रखना चाहिए । भगवान् की प्रतिमा आदि के विषय में सत्यत्व और मापिरत्व का प्रकार घटपटादि अन्य प्रापचिक पदार्थों से भिन्न है । भत्तिरहित व्यक्ति जन भगवान् की मूर्ति को देसता है तो माया उसकी बुद्धि में विषयता उत्पन्न कर देती है । भगवान् की मूर्ति मे भगवान् के गुणों के २० प्रमेयरत्नाणवे [पूर्वाद भगवन्मृतौ विषयतांप्रक्षिपति. तत्र भगवद्गुणानामभिन्यत तया मायाया. प्रक्षेपसामर्थ्याभागात: किन्तु ताम्-दाटुः बुद्धौ आवरणस्य विद्यमानाचात् भगवन्मूर्ता अन्यथा भानम् । वस्तुतस्तु तर भगवतम् निर्दुष्टमेव । अतएच, "विष्णोर्ग वैष्णवाना रलिगलमने पादतीर्थेऽनुद्धिः" याशिवाय अन्यथा-वुनिन्दितन्वं श्रयते । अभिव्यक्त होने के कारण माया में भगवन्मूर्ति पर विषयता को प्रक्षिप्त पर सरने की सामर्थ्य न होने से वह भगवान की मूर्ति पर विषयता को प्रशित नहीं कर पानी ( ओर उसे भक्तिविरहित दर्गा की बुद्धि मे नो प्रक्षिप्त या सन कर देती है )। न्नु उग प्रकार के द्रश्या (अर्थात् मृति का दर्शन करने पाले भत्तिाररहित व्यक्ति ) की युद्धि में आचरण वे पिमान होने के कारण, उसे भगवान् की मूर्ति में अन्यया प्रतीनि ( अर्थात् भगवत्ता के अभायपृषक प्रतिमा मान का जान या उपरमि) होती है । यस्तुत तो मूति मे भगवत्य विद्यमान ही, है (अर्थात् मूर्ति भगवान् का निविकार स्वरूप ही है ), इसीरिये 'कलियुग के दोपों या पापों को नष्ट करने वाले विष्णु या वैष्णवों के चरणोदक को साधारण अल मात्र समझना' इत्यादि वाक्यों में अन्यथा बुद्धि की निन्दा की गयी है। १. पूरा पद्य अधोलिखित है, अर्चाविष्णौ शिलाधीगुरषु नरमतिर्वष्णवे जातिबुद्धि. विष्णोर्वा वैष्णवाना कलिमलमथने पादतीर्थेऽम्बुबुद्धि । शुद्धे तन्नाममन्ने पुस्कलुपहरे शब्दसामान्ययुद्धि. विष्णौ सर्वेश्वरेशे तदितरसमवीर्यस्य वा नारकी सः ।। देखिये, मृद्रवमलापर, पृष्ट ४८-४९ ।
प्रथमोऽध्यायः] प्रपत्रविवेकः २१ ar "शिलायुद्भिर्न कार्या च तत्र नारद ! कहिंचित् । ज्ञानानन्दात्मको विष्णुर्यत्र तिष्ठत्यचिन्त्यन् ॥" इत्यादिवचोभिः तत्र भगवदावेशकथनात प्रपञ्चवलमण्यम् मनीकार्यमा "मल्लिहमद्भक्तजनदर्शनस्पर्शनार्चनम्" (भाग० १११११॥३४) इत्येकादशवाफ्यात्, “पूजनं प्रतिमायां तु उत्तम परिकीर्तितम्" इति कालनिर्णयदीपिकास्थविष्णुधर्मवान्याञ्च । निवन्ये च, "तदभावे स्वयं वापि मूर्ति कृत्वा हरेः क्वचित् । परिचर्या सदा कुर्यात् तद्रपं तत्र च स्थितम् ॥" (सर्वनिर्णयप्र० फा०,२२८,) इत्यस्य व्याख्याने, “वस्तु: 'हे नारद ! जिसमें अचिन्त्य कमी के कर्ता चिदानन्दात्मक विष्णु स्थित हैं उस भगवन्मूर्ति को कमी भी (माधारण प्रस्तर या) शिला (मात्र ) न समझना चाहिए,' इत्यादि वाक्यों में, मूर्ति में भगवान् के आवेश का प्रतिपादन होने से भगनन्मृर्ति को प्रपञ्च (के अन्य घट- पटादि पदार्थों ) से विशिष्ट मान कर उसका जगत् से पैलक्षण्य स्वीकार करना चाहिए । भागवत के ग्यारहवे उन्ध के, 'मेरे लिग (अर्थात् प्रतीक) और मेरे मनों का दर्शन, स्पर्श और अर्चन' (भाग० ११११११३४ ) इत्यादि भगवदचनो तथा विष्णुधर्म के कालनिर्णय- दीपिका में मिलने वाले प्रतिमा में भगवरपूजन करना उत्तम कहा गया है' इत्यादि वाक्यो से भी भगवान् की मूर्तियो के (प्रपञ्च के घट- पटादि पदार्थों से ) विलक्षण होने के उपर्युक्त सिद्धान्त की पुष्टि होती है । वल्लभाचार्य के, तत्वोपनिबन्ध के सनिर्णयप्रकरण की, 'पूर्वोक्त कारिका में उल्लिखित प्रकार के गुरु के अमाव में, स्वयं किसी स्थान में भगवान् हरि की मूर्ति बना कर उसकी सदा सेवा करनी चाहिए। मूर्ति में मगवान् मूर्तिरूप से ही स्वरूपतः स्थित हैं' (सर्वनिर्णयप्र० का० २२८), इस पारिका की म्योपज्ञ प्रकाश व्याख्या में, 'वस्तु का २२ प्रमेयरत्नाणचे [ पूर्वार्ट पिचारे पर्यस्यापि भगवद्रूपत्वाद् विशेषस्त्वयम् । एनमुद्धरिग्यामि इति, तदा मृदादेः प्रादुर्भूत" ( सर्वनिर्णयप्र० प्र० २२८) इत्यादिना प्रपञ्चवलक्षण्यम्य उपपादितत्वाच। अत एव महता प्रवन्धेन मूर्तिपूजनं श्रीमद्भागवनैकादशरफन्धे भगग्ता श्रीमदुद्धवं प्रति उत्तम् इति दिक् । पवमेव यमुनागद्गादिजलेपु तुलसीगोपीचन्दनादिपु तादृश- भक्तपु साधारणवस्तुवैशिष्टयम् आसवाश्यवलेनैव भावर- णीयम्, तत्तन्सेवकैस्तन नत्रोद्धृत्युपयोगिधर्माणामुपलभ्य- मानत्वात । अत एवं भगवन्मूादिमम्बन्धाद् बहनां भगवत्प्राप्तिः पुराणादी स्मर्यते । विचार का नाममा पदार्थ भगवन है, फिर भी मृत में वाशष्टय यह है कि भगवान् 'इसका उद्धार करूँगा' इस प्रकार के सरपपूर्वक मृदादि मे प्रादुर्भूत होने हैं ( सर्वनिर्णयप्र० प्र०२२८) इत्यादि वाक्यों द्वाग भगन्मृति प्रापचिक पदार्थों में विलक्षण होने का प्रतिपादन करने से भी उपर्युक्त मन की पुष्टि होती है। इसीलिये श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कन्ध मे भगवान् ने उद्धव को विस्तार में मूर्तिपूजन का उपदेश दिया है । अतः दम विषय में इतना ही लिंब कर निग्न होते हैं। इसी प्रकार यमुना और गगा आदिके जल, तुलसी (पत्र और माला), गोपीचन्दन नादि तथा भगवद्भक्तो के (भी) माधारण प्रापञ्चिक पदार्थों से विशिष्ट और विलक्षण होने सिद्धान्त को आत- वास्या के बल से ही स्वीकार कर ममाहत करना चाहिए क्योंकि शास्त्री में जनेक स्थलों पर उन (भगपन्मुर्ति, यमुनाजल, गोपीचन्दन आदि) का भवन करने वालों में जीव व उद्धार के लिये उपयोगी धमों के पाये जाने का उल्लेख मिलता है। इसीलिये पुराणादि में भगवन्मृति आदि के सम्बन्ध से अनेक रोगी के भगवान को प्राप्त करने की बात कही गयी है।
प्रथमोऽध्याय.] प्रपश्चविवेकः २३ . चाचनिके शास्त्रे वाचनिकी एव व्यवस्था इति न शुप्फ- तभ्रमितव्यम् , इत्यलं लेसेन । ननु, सर्वस्य ब्रह्मात्मकत्वे सर्वान्तःपातिनो देहस्यापि तथात्वेन तत्र जायमानाया यात्मवुद्धःप्रमारवापातः । न च इष्टापत्तिः, देहात्मबुद्धः श्रीमद्भागवतादौ निन्दित्वात्, इति चेत्, सत्यम्, अजातब्रह्मज्ञानस्य देहं विकारवत्त्वेन पश्यतो माया- मोहवशाजाताया देहात्मवुद्धरेव सर्वशास्त्रेषु निन्दा । शब्द प्रमाण पर आधृत वैदिक शास्त्र मे सारे निर्णय श्रुतिस्मृति- याक्यों के आधार पर ही किये जाते है । अतः शुष्क ( अर्थात् जो वेदानुमारी नहीं है, ऐमे)तकों से भ्रमित नहीं होना चाहिए । इसीलिये इस विषय को यही समाप्त करते हैं। आचार्य वल्लभ ने शास्त्रार्थप्रकरण में प्रकाश में 'वैदिक शास्त्रे वाच. निकी एव व्यवस्था' (पृष्ठ १६० ) तथा 'अलौकिकेषु धर्मपु प्रमाणमेवा- नुसतव्य न तु लौकिकी युति' (पृष्ठ १६५) इत्यादि कह कर वैदिक शास्त्र के सिद्धान्तनिवारण में शब्द प्रमाण की सर्वातिशायिता का उप- पादन किया है। पूर्वपक्षी का क्थन है कि सभी पदाथों ये ब्रमात्मक होने की बात स्वीकार कर लेने) पर, देह के भी 'सर्व' अर्थात् उन सभी पदार्थों के ही अन्तर्गत आने के कारण ब्रह्मात्मक होनेमे, उसमे होने वाली आत्म- बुद्धि अर्थात् देहात्मबुद्वि को प्रमा अर्थात् प्रामाणिक और सत्य मानने का प्रमश उपस्थित होगा ! सिद्धान्ती यह भी नहीं कह सकता कि उसे दहात्मनुद्धि को प्रमा मानना इष्ट या स्वीकार है क्योंकि श्रीमद्भागवत आदि में देहात्मशुद्धि की निन्दा की गयी है । पूर्वपक्षी के उपर्युक्त कथन के मम्बन्ध में सिद्धान्ती का कहना है कि पूर्वपक्षी का यह कहना सत्य है कि भागवतादि में देहात्मबुद्धि की निन्दा की गयी है, किन्तु यह अवधेय है कि जिन्हें ब्रह्मज्ञान नहीं हुआ है और जो देह को विकारशील रूपमें २४ प्रमेय रत्नार्णवे [पूर्वाद्ध . सर्वत्र ब्रह्मत्वेन पश्यतः स्वदेहेऽपि तथा भानाद् भवन्तो आत्म- बुद्धिः प्रमारूपैव; तथाह भगवान्भाग्यकारः, 'आत्मकृतेः' (ब्रह्म- सूत्र शवा२६) इत्यत्र । देहात्मवुद्धिस्तु सत्यां विकारखुद्धौ दोप इति । ननु, "स्वय्यद्वितीये भगवनयं प्रमः” (भाग० १०५९।३०) इत्यादिवाक्यानां का गतिः, इति चेत्; अहन्ता-ममतात्मकस्य संसारस्य मिथ्याभूतस्य एतादृशवाक्यविषयत्वम् इति ही ग्रहण करते हैं उन लोगों को मायामोहवश होने वाली देहात्मबुद्धि की दी सारे शास्त्रो में निन्दा की गयी है; तथा जिसे सर्वत्र ब्रहा की ही अनुभूति होती है उस ब्रह्मज्ञानी को देह मे भी ब्रह्म की ही प्रतीति होगी पार फलस्वरूप उसे भी देह मे आत्मबुद्धि होगी ही, किन्तु उसकी कह देरात्मशुद्धि, जैसा कि भगवान् भाष्यकार श्रीवल्लभाचार्य ने 'आत्म- कुन परिणामान्' (ब्रह्मसूत्र १४५२६ ) इस सून के अणुभाष्य में कहा अर्थात् प्रतिपादित किया है, प्रमारूप ही है । तात्पर्य यह है कि देहात्मयुद्धि दोष उसी दशा में होती है जब देह मे विकारखुद्धि हो अर्थात् व्यक्ति देह को विकारगील और नगर समझते हुए भी आत्मा समझे। यदि पूर्वपक्षी यह प्रश्न करे कि जगत् को सत्य मान लेने पर, श्रीमद्भागवतादि के, "हे भगवन् ! अद्वितीय (अर्थात् अद्वयतत्त्वरूप) भाप में इस चराचर जगत् का भ्रम होता है' (भाग० १०१५९।३०) इत्यादि वाक्यो, (जिनमे चराचर जगत् को अद्वय भगवत्तत्व में होने बाला भ्रम मात्र अर्थात् भ्रमात्मक बताया गया है,) की क्या गति होगी अर्थात् उनकी क्या उपपत्ति या व्याख्या होगी तो सिद्धान्ती का उत्तर यह होगा कि उपर्युक्त (भाग० १० १५९ ! ३०) प्रकार के वाक्यो का विषय ( जगत् नही अपितु) अन्ताममतात्मक ससार है जो मिथ्याभूत है, ऐसा समझना चाहिए । इस प्रकार जगत् ब्रहात्मक है
प्रथमोऽध्याय:]
प्रपञ्चविवेकः
२५
बोद्धव्यम् । तथा च, प्रपञ्चो ब्रह्मात्मकः, संसारस्तु अहन्ता-
ममतात्मको मिथ्याभूत एव । एतच सुपिपादित निबन्धादिपु
इति विशेपजिज्ञासायां ततोऽवधेयम् इति दिक् ॥
इति श्रीमहोवर्धनधाश्रीवल्लभाचार्य श्रीविठ्ठलेश्वरचरणानुचरसेवकेन
लालमट्टोपनामवालकृष्णमटेन कृते प्रमेयरमाणवे
प्रपञ्चविवेक. सम्पूर्णः ॥१॥
किन्नु ससार अन्ताममतात्मक है और मिथ्या ही है। इस सिद्धान्त का
तत्वार्थदीपनिनन्ध आदि कृतियों में सम्यक् प्रतिपादन किया गया है,
अतः विशेष जिज्ञासा होने पर इसे उन्हीं ग्रन्थो से जानना चाहिए ।
श्रीगोनर्द्धनधर, श्रीवल्लभाचार्य तथा श्रीविठ्ठलनाय के चरणों के
अनुगामी (अथवा अनुचरों के ) सेवक लाल्भट्ट के नाम से प्रसिद्ध
बालकृष्णमट्ट के द्वारा विरचित प्रमेयरत्नार्णव का प्रपञ्चविवेक नामक
प्रथम अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३॥
जीवविवेकः (द्वितीयोऽध्यायः) अथ जीवस्वरूपं विचार्यते। तन्न तत्वमसि श्चतफेतो' (छान्दो० उप० ६८७), 'एपोऽणुरात्मा चेतसा घेदितव्यः' (मुण्ड उप० २१९), 'ममैवाशी जीवलोके' (गीता १५७), 'नागुरतच्छतेरिति चेनेतराधिकारात्' (ब्रह्मसूत्र २३२१), 'न भी पश्यन्ति कवयश्छिद्र जातु मनागपि' (भाग०४१३५४५२) इति श्रुति- गीताव्याससूत्रसमाधिभाषावाक्यः ब्रह्माभिन्नोऽणुव्रह्मांशो जीव इति राद्धान्तः। . जीव-विवेक (द्वितीय अध्याय) प्रपञ्च के स्वरूप का निरूपण करने के बाद अब जीव के स्वरूप का विवेचन प्रारम्भ करते हैं। जीव के सम्बन्ध में वैदिक ब्रहावाद का सिद्धान्त (अर्थात् सिद्धान्ती का मत ) यह है कि जीव ब्रह्म से अभिन्न, अणुपरिमाण तथा ब्रह्म का अश है। इस सिद्धान्त की सिद्धि श्रुति, श्रीमद्भगवद्गीता, व्यासमूत्र और श्रीमद्भागवत-जो व्यास की समाधि- भाषा है---के अधोलिसित पाक्यों में होती है। 'हे श्वेतकेतु ! तुम वह हो' (छान्दो उप०६।८।७), 'यह अणु आत्मताच चित्त के द्वारा जानने योग्य है' (मुण्ड० उप० ३ | १ |९), 'मेरा ही अंश जोवलोक में' (गीता १५10), "पूर्वपक्षी का यह कहना ठीक नहीं है कि 'स था एप महानज भारमा' (यह उप०४।४।२२) इत्यादि भुतिवाक्यों में भारमा के अणुस्व के विपरीत ग्यापकरव का प्रतिपादन द्वितीयोऽध्यायः] जीवविवेकः २७ तस्य च अवस्थात्रयम्, शुद्ध-संसारि-मुक्तभेदात् । नथा हि; कारणभूतादक्षरब्रह्मणः सकाशाद् 'यथाग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्ति' (बृह० उप० २११।२०) इति श्रुतेः, सञ्चिदानन्दा- ल्मकोऽणुरंशो निःसरति । ब्युच्चरणानन्तरं कारणरूपाक्षर- गतस्य, 'विशुद्धसत्त्वं तव धाम' शान्तम्' (भाग १०।२७।४) मिलने से सिद्ध होता है कि आत्मा अण नहीं है, क्यों कि उपर्युक श्रुतिवाक्य परमहा के अधिकार में आया है (अर्थात् परनहा के निरूपण के सन्दर्भ में ब्रह्म के व्यापरत्व के प्रतिपादन के लिये कहा गया है, न कि जीव के) (ब्रह्मसून २ । ३ । २१)। उपर्युक्त लक्षणं वाले जीव की तीन अवस्थाये होती है जिनके आधार पर जीव के शुद्ध, मसारी ओर मुक्त ये तीन भेद माने जाते है । जैसा कि 'जिस प्रकार अग्नि से छोटे छोटे स्पुलिग न्युश्चरित होते हैं अर्थात चिनगारियाँ निकलती है। (वृह उप० २ १ १ ।२०) इत्यादि वाक्यो से सिद्ध होता है, कारणभूत अक्षर ब्रह्म से सच्चिदानन्दात्मक अणु अश निःमृत होता है । व्युच्चरण के बाद, कारणरूप अक्षर में विद्यमान, भागवत के 'आपका धाम' (स्थान, तेज या स्वरूप) परम शान्त और विशुद्ध अप्राकृत सत्वमय है' (भाग० १० । २७ १ ४ ) इत्यादि वाक्यों १. 'विशुद्धमत्वं तव धाम' इति । शुद्धं रजस्तमोभ्यामसपृक्तं, विशेषेण शुद्धं सत्त्वेनाप्यसंपृक्तं तत् तव धाम स्थानं, 'सत्त्वं विशुद्धं वसुदेवशब्दितम्' ( भाग० ४ । ३ । २३ ) इति, तत्र भगवानाविर्भवतीति वासुदेवः । किञ्च धाम तेजोऽपि सात्विकमेव, भगवत्तेज सत्त्वमेव वा । किञ्च इदं सत्वं शुद्धसत्वान्तरेणाप्यमिश्रितं तज्जीवस्थ तरतमभावापन्तं भवति, अत इदं सत्त्वं परमकाष्ठापन्नमेव, तदाह शान्तम् इति । परमा शान्तिः धत्त्वोत्कर्पो, ज्ञानादयोऽवान्तरभेदा अल्पविक्षपरूपाः, अन्यथा कथं बोधयेत्, कथं वा त्यजेत्, कथं वा भजेत् ? अतः शान्तिरेव परमकाष्ठा ) (सुबोधिनी १० ॥ २४ ॥ ४) ।
२८ प्रमेयरलार्णवे [पूर्वा इत्यादिप्रमाणसिद्धस्य भगवद्धर्मात्मास्य विशुद्धलत्तस्य मंशभूतेन ताटक्सत्वेन भगदिच्छया प्रवलीरतेन आनन्दांश- स्तिरोभवति । तदा निम्पाधिकोऽणुरूपोऽक्षराशः चित्प्रधानः तिरोहितानन्दो जीवशन्दवान्यो भवति । तदुन वेदस्तुतिमुदो- धिन्याम्, 'सकतपुरेप्तमीषु' (भाग० १०८७।२०) इन्यन, 'जीवो नाम भगवतश्रिदश' (सुबो० १०८७१२० ) इति । स्फुटी- रुतञ्च भाष्ये, 'आनन्दांशस्तु पूर्वमेव तिरोहितो येन जीवभावः' (अणुभाष्यम् ॥२॥५) इति । अब 'पूर्वमेव' इत्यस्य भगवदै- श्यर्यायंशभूतैश्चर्यादितिरोभायात्पूर्वम् इत्यर्थः । नियन्धे च 'ततः सागरा भगवद्रूपा अपि उचनीचमाधेच्छया निर्गता इति निरा - से सिद्ध होने वाले भगनद्धर्मात्मक विशुद्ध सत्व रे जशभूत पार भगव- दिच्छा से प्रगल हो गये विशुद्ध सत्त्व से आनन्दारा तिरोहित हो जाता है । तन निरुपाधिक, अणुरूप, चित्प्रधान और तिरोहित आनन्द वाला अक्षर ब्रह्म का अश जीव शब्द का याच्य हो जाता है, अर्थात् जीव कहा जाता है । इमी का प्रतिपादन वेदस्तुति के 'स्वकृयपुरेप्वमीपु' (अर्थात् अपने ही द्वारा निर्मित इन पुरों अर्थात् शरीरों में) (भाग० ५०।८७ १२०) इस श्लोक की मुबोधिनी टीका मे, 'जीव मगगन के चिदंश का नाम है' (सुनोधिनी १० । ८७ । २०) इत्यादि वाक्यों में किया गया है और अणुभाष्य के 'भानन्दांश तो पहले ही तिरोहित हो चुका होता है, जिसके कारण भगवदश को जीवभाव प्राप्त होता है' (अणुभाष्यम् ३।२।५) इत्यादि पाक्यों में इसी सिद्धान्त को स्पष्ट किया गया है । अणुभाष्य में इस वाक्य मे आये 'पूर्वमेव' (अर्थात् पहले ही) इस पद का अर्थ है 'भगवान् के ऐश्वर्य आदि के अशभूत ऐश्वर्यादि के तिरोभाव से पहले ही' । तत्त्वार्थदीपनिबन्ध के शास्त्रार्थप्रकरण में भी 'तदनन्तर जीव साकार और मगवटप होते हुए भी निराकार (अर्थात् तिरोहित आनन्द वाले मा निरानन्द ) हो गये क्योंकि वे मस की उचनीचादि माना रूपों में .
द्वितीयोऽध्यायः] जीवविवेक. २६ कारा जाता.' (शास्त्रार्थप्र० प्र० २७) इत्युक्तम् । इह आकार- शब्देनानानन्दाकार उच्यते 'आनन्दो ब्रह्मवादे आकारसमक' (शास्त्रार्थप्र० प्र०४४) इति तत्र निर्णयात् । ननु, व्यापकाद् ब्रह्मणो व्युच्चरणं न सम्भवति इति चेत्, न । व्यापकत्वेऽपि विरुधर्माश्रयतया, 'व्युच्चरन्ति' (बृह० उप० २।१।२०) इति श्रुतिसिद्धस्य व्युच्चरणस्याङ्गीकारात् । एवं सति व्युच्चरणोपादानभूताद् ब्रह्मणो व्युच्चरतो ब्रह्मभूतस्य ब्रह्मभूते प्रदेशे ब्रह्मभूतं व्युच्चरणम्, इत्युक्ते न कश्चिद्दोप, 'सर्व खल्विदं ब्रह्म' (छान्दो० उप० ३३१४११) इति श्रुतेः। प्रस्ट होने की इच्छा से (ब्रह्म से) निसृत हुए थे' (शास्त्रार्थना प्र० २७) इत्याटि वाक्यों में यही बात कही गयी है । शास्त्रार्थप्रकरण की प्रकाश व्याख्या के दस याक्य में आया 'आकार' शब्द 'आनन्दाकार' का रोधक है, क्योकि आगे चल कर उसी ग्रन्थ मे, 'ब्रह्मवाद (सिद्धान्त) में आनन्द को ही भाकारसमर्पक माना गया है' (शास्त्रार्थप्र. प्र० ४४) इत्यादि वाक्यों मे आकार शब्द से आनन्दाकार के ही अभिप्रेत होने का निर्णय किया गया है। पूर्वपक्षी का यह कहना भी ठीक न होगा कि ब्रहा के व्यापक होने ये कारण उससे व्युचरण हो सकना सम्भव नहीं है, क्योंकि नहा के व्यापक होने के बावजूद, उसके विरद्धधर्माश्रय होने के कारण सिद्धान्ती 'युधरित होते हैं' (वृ० उप० २।१।२०) इत्यादि श्रुतिवाक्यो से सिद्ध होने वाले (ब्रह्म से) व्युचरण को स्वीकार करता है । इस प्रकार, 'व्युचरण के उपादानभूत ब्रह्म से व्युचरित होने वाले ब्रह्मभूत अश का राभूत प्रदेश में ब्रह्मभृत व्युचरण होता है। यह कहने में कोई दोष नहीं है, क्योंकि अति में कहा गया है कि 'यह मय ब्रहा है' (छान्दो उप० ३११४१)। १ द्रष्टव्य शास्त्रार्थ प्रकरण को स्नेह पूरणी व्याख्या, पृष्ठ ९८,१३९.४० ।
प्रमेयरत्नाणवे [पूर्वा तथैवोक्तं भागवते, 'यन येन यतो यस्य यस्मै यद्यद्यथा यदा। स्यादिदं भगवान् साक्षात् प्रधानपुरुपेश्वरः ॥' (भा० १०८पा४) इति । अतो व्युच्चरणे सति यानन्दांशतिरोधानाज्जीवत्वम् । युच्चरणोत्तरम्, आनन्दांशतिरोधाने सति अविद्यासम्बन्धात्- पूर्ववर्तिन्यामवस्थायां शुदजीव इति व्यवहारः, 'शुद्धसत्वव्यप- स्थितिः' (लक्ष्मीतन्त्रम् ) इति लक्ष्मीतम्यात् । जीवे शुद्धत्वं तु अविद्यासम्वन्धराहित्यम् । ततोऽस्मिीयरूपे भगवदंशे भगवदैश्वर्यादिपड्गुणांश- भूतानाम् ऐश्वर्यादीनां हरीच्छया तिरोभावः। 'पराभिध्यानातु भागपत के अधोलिखित लोक में इसी को इस प्रकार कहा गया है, 'जहाँ भी, जिस समय भी, जिसके द्वारा भी, जिससे भी, जिसके लिप भी और जिस रूप में भी जो कुछ भी होता है या रहता है, वह सय श्राप ही है (तात्पर्य यह है कि सभी कारकों और विभक्तियों के द्वारा वाच्य या बोध्य अर्थ आप ही हैं)। प्रकृति (के रूप में भोग्य ), पुरप (के रूप में भोक्ता ) और (उन दोनों के नियामक) ईश्वर, साक्षाद् मगवान् भाप ही है' (भाग० १०८५४)। अतः व्युच्चरण होने पर आनन्दांश का तिरोधान हो जाने से जीव सज्ञा होती है । व्युच्चरण पे बाद आनन्दांश का तिरोधान हो जाने के बाद से अविद्या से सम्बन्ध होने के पहले तक की अवस्था में उसके लिये शुद्ध जीव शब्द का व्यवहार होता है, जैसा कि लक्ष्मीतन्त्र के "शुद्धमचव्यवस्थिति.' इस वाक्य से सिद्ध होता है। जीव की शुद्धता से तात्पर्य उसके अविद्यासम्बन्धरहित होने से है । तदनन्तर इस जीवरूप ( अर्थात् जीव कहे जाने वाले) भगवदंदा में भगवान् के ऐश्वर्यादि छः गुणों के अशभूत ऐश्वर्यादि का भगवान की इच्छा से तिरोभाव हो जाता है, जैसाकि ब्रह्मसूत्र के 'पर के मामध्यान द्वितीयोऽध्यायः] जीवविवेका तिरोहितं ततो ह्यस्य बन्धविपर्ययो' (ब्रह्मसूत्र ३२२५) इति तत्त्वसूत्रात् । तदा तेषां मध्ये केचिजीचेपु रमणेच्छया विचारितस्य बहुभवनस्य सिद्धये उच्चभावेच्छाविपयीभूतं मुक्त्यधिकाररूपं सूक्ष्मसद्धासनाविशिष्टं देवत्वं सम्पादयति भगवान् । तदैव जोया मुक्तियोग्या भवन्ति, 'देवी नम्पद्विमोक्षाय' (गीता १६५) इति भगवद्वाफ्यात् । नतो हि अविद्यासम्बन्धाद्वन्धः, 'बन्धोऽस्याविद्यायानादिः' (भाग० १।२१।४) इति वाफ्यात् । अनादित्वं तु कार्यान्तरा- पंक्षया, अमरेवमरत्ववत् । तदुपपादितं चिद्वन्मण्डने । (अर्थात् भगवान् की इच्छा) से लीव के ऐश्वर्यादि तिरोहित हो जाते है, जिसके परिणामस्वरूप जीव यन्धन और अज्ञान से ग्रस्त हो जाता है', (ब्रह्मसून ३२५) इस कथन से सिद्ध होता है । तब भगवान् , रमण करने की इच्छा से सोचे गये अनेक हो जाने, के सकल्प की सिद्धि के लिये उन जीवों में से कुछ जीवों का टैवल्य सम्पादित कर देते है जो उच्चभाव की इच्छा का विषय, मुक्ति का अधिकाररूप और मूक्ष्म सद्वासना से विशिष्ट होता है। इस दैवीजीवत्व का सम्पादन हो जाने पर ही जीव मुक्ति के योग्य होते है, जैसा कि भगवान् के 'देवीसम्पद मोक्ष में उपकारक है' (गीता १६५) इत्यादि वाक्यों से सिद्ध होता है। तदनन्तर अविद्या से सम्बन्ध होने पर जीव का बन्धन होता है माकि 'अविद्या के द्वारा इस (अर्थात् जीय) का यन्धन होता:- सो अनादि है' (भाग० १११११।४) इत्यादि यास्यों से सिद्ध होता है। भागवत के इस श्लोक में बन्धन को अनादि कहा गया है। यह अनादित्य सापेक्ष अर्थात् अन्य कार्यों की अपेक्षा में ही है, उसी प्रकार जैसे अमरों अर्थात् देवताओं में अमरत्व सापेक्ष है। इस सिद्धान्त का ३२ प्रमेयरलाणवे [पूर्वाद्ध . - ततो देहेन्द्रियान्तःकरणाभ्यासाः स्वरूपविस्मृतिश्च इत्य- विद्यायाः पञ्चपर्याणि, तैर्वहो दुगिताः 'अस्य जीवसंसार उच्यते' (शास्त्रार्थप्र० का०२३) इति निबन्धात । 'उच्यते, न तु जायते, अभिमत्यात्मकत्वात्' (शास्त्रार्थप्र० प्र० २३)। ततः सूक्ष्मस्थलदेहसम्बन्धात् संसारिधर्मान् जन्ममरणा- दोन अनुभवन् भगवत्कृपया सत्सङ्गादि लन्धा पञ्चपर्वात्मिका विद्यां प्राप्य परमानन्दलक्षणां मुक्ति लभते; प्रतिपादन विट्ठलनाथ ने विद्धन्मण्डन मे विस्तार से किया है। तदनन्तर अर्थात् बन्धनग्रस्त होने के बाद जीय अविद्या के पाँच पों देहाध्यास, इन्द्रियाध्याम, प्राणाध्यास, अन्तःकरणाध्यास तथा स्वरूपविस्मति द्वारा (अर्थात् पञ्चपर्या अविद्या' द्वारा) यद होकर दुःस भोगता है, जैसाकि तत्यार्थदीपनिबन्ध के 'भगवान् की भयिया- शक्ति के कारण जीव के ( अहन्ताममतात्मक) संसार की बात कही जानी है' ( शास्त्रार्थप्र० का० २३) इत्यादि वाक्यों से सिद्ध है | इस कारिका की व्याख्या करते हुए पालभाचार्य कहते हैं कि 'भगवान् की भविद्या नामक शक्ति के कारण जीव के संसार की पात कही जाती है। जीव का (अहन्ताममतात्मक) यह संसार वस्तुतः उत्पन्न नहीं होता क्योंकि यह अमिमत्यात्मक अर्थात् काल्पनिक है (और इसकी गणना भागवतादि शास्त्रों मे अमद्रूप या मिथ्या पदार्थों में की गयी है)।' ( शास्त्रार्थप्र० प्र० २३)। तदनन्तर सूक्ष्म और स्थूल शरीरो से सम्बद्ध होने के कारण ससारी जीव के धर्मों जन्म, मरण आदि का अनुभव करता हुआ, भगवान् की कृपा से सत्सङ्ग आदि पाकर, पञ्चपर्वात्मिका विद्या को प्राप्त कर परमानन्दरूप मुक्ति को प्राप्त करता है जैसा कि तत्त्वार्थदीपनिबन्ध के १. देखिये, शास्त्रार्थप्रकरण को स्नेहप्रपूरणी व्याख्या, पृष्ठ ८७, २०४-१०६ ।
द्वितीयोऽध्यायः] जीवविवेकः 'वैराग्यं साख्य-योगौ च तपो भक्तिश्च केशरे। पश्चपर्वेति विद्येयं, यया विद्वान् हरि मिशेद् ।। (शास्त्रार्थप्र० का०४५-४६) इति याक्यात । तत्र, यावत्पञ्चपर्वात्मिकां विद्यां प्राप्नुयात् तानत संसारी इति व्यवहारः, तदने मुक्त इति शास्त्रीयो व्यवहारः। स च मुनजीवो द्विविधः, जीवन्मुक्तो मुक्तश्च इति। तत्र सनकादयो गताविद्याः ते जीवन्मुक्ता उच्यन्ते। ये तु व्यापि- चैकुण्ठेनरभगवल्लोकवासिनने मुक्ता इत्युच्यन्ते । ततः परमकृपया परममुक्तिः तत्र तु शुद्धाह्मत्वमेव इति निर्णयः। इस वाक्य से शात होता है कि 'वैराग्य, साहस, योग, तप और भगवान् कृष्ण की भकि, ये विद्या के पाँच पर्व हैं। इन पाँच पर्यो वाली विद्या. द्वारा यह का ज्ञान प्राप्त करने वाला ब्रह्म में प्रविष्ट होता है अर्थात् भगवान् को प्राप्त करना है।' (शास्वार्थप्र० फा० ४५-४६ )। जब तक जीव उपर्युक्त पञ्चपालिका विद्या की प्रानि नहीं कर लेता तन तक उसके लिये 'संसारी जीर' इस मशा का व्यवहार होता है और पञ्चपयां विद्या की प्राप्ति कर लेने के गद पी स्थिति में जीत के लिये शास्त्रों में 'मुक्त जीव' इस सज्ञा का प्रयोग मिलता है। उपर्युक्त मुक्त जीवों के दो प्रकार है, जीवन्मुक्त और मुक्त । अविद्या- विरहित (अर्थात् जिनकी अविद्या नष्ट हो गयी है ऐने) सनक आदि जीवन्मुक्त कहे जाते हरे, तथा भगवान् के व्यापि चैकुण्ट मे भिन्न तोक में निवास करने वाले जीव मुक्त कहलाते हैं । तदनन्नर भगवान् की परमहा होने पर परममुक्ति होती है। जैसा कि शास्त्रों में निर्णीत किया गया है परममुचि में जीव शुद्ध प्रा ही हो जाता है। १. द्रष्टव्य, शास्त्रार्थप्रकरण पृष्ठ १४-१४८; ३१६-३१८ । २. द्रष्टव्य, शास्त्रार्थप्रकरण की स्नेहपूरणी व्याख्या, पृष्ठ ४९-५१ । ३. द्रष्टव्य, पास्त्रार्यप्रकरण को स्नेह पूरणी व्याख्या, पृष्ट ११२-११३ । سه ३४ प्रमेयरलार्णवे 1 केचिद् उत्तमा देवास्तु सत्सङ्गादि प्राप्य मार्गचिजन्य- थवणादिसमुद्भूतस्वतन्तभक्त्या फलरूपया नित्यलीलायां प्रविशन्ति । स तेषां मोक्षः। ये तु देवीवेभ्यो व्यतिरिकाः तेपां पड्गुणतिरोधानानन्त- रम् अविद्यासम्बन्ध नीचभावेच्छाविपयीभूतं मुक्तिप्रतिवन्धकम् असद्धासनाविशिष्टम् आसुरत्वं सम्पादयति भगवान्, तदा ते भासुरजीवा उच्यन्ते । तेहि असद्धासनावशात तादृशं स्थूल. देहं प्राप्य निन्दितकर्मनिरता सन्तो नीचयोनिगा भवन्ति । ते सर्वदा संसारिण पर, युछ उत्तम कोटि के देवी जीव सत्सङ्ग आदि पार भक्तिमार्ग में हो जाने वाली रुचि के फलस्वरूप किये जाने वाले श्रवणादि से उत्पन्न होने बाली स्वतन्त्र भक्ति जो फ्लरूपा होती है-के द्वारा भगवान् की नित्यलीला में प्रवेश करते हैं। यह नित्यतीलाप्रवेश उन जीवोंका मोक्ष (कहा जाता) है। दैवी जीवों से मिन्न जीवों के छ: गुणों का तिरोधान हो जाने के बाद अविद्या से सम्बद्ध हो जाने पर भगवान् उनका आसुरत्व-जो निम्नकोटि का होने की इच्छा का विपय, मुक्ति का प्रतिबन्धक और दुर्वासना से विशिष्ट होता है-सम्पादित कर देते हैं और तब वे जीव 'आसुर जीव' कहलाते हैं। ये आसुर जीप दुर्वासनाओं के वश में होने के कारण तदनुरूप स्थूल शरीर को प्रात कर, निन्दित फर्मों में लगे रहते हैं और नीच योनि में उत्पन्न होते हैं । ये सदा संसारी ही रहते हैं। इस मत की सिद्धि श्रीमद्भगवद्गीता के अधोलिखित वाक्यों से होती है। १ द्रष्टव्य, सर्वनिर्णयप्रकरणका० १९६ तथा उस पर प्रकाश । २. द्रष्टव्य, 'ईश्वरेच्च्या जीवस्य भगवद्धर्मतिरोभाव | ऐश्वर्यतिरो- भावाद्दीनत्य पराधीनत्वम, वीर्यतिरोभावात्सर्वदृ.ससहनम्, यशस्तिरोभावा- सर्वहीनत्यम्, श्रीतिराभावाज्जन्मादिसर्वापद्विषयत्वम्, शानतिरोभावा- द्वितीयोऽध्यायः] जीवविवेकः ३५ 'क्षिपाम्यजसमशुभानासुरीप्येव योनिषु ॥ (गीता १६.१९) आसुरी योनिमापना मूढा जन्मनि जन्मनि । मामप्राप्यय कौन्तेय ततीयान्त्यधमां गतिम् ।। (गीता१२०) इति वाक्यात्। तेषां तु तदैव अविद्याफार्यनाशो यदा भगवान् आत्मरती- छुर्भवति। तदा भगवान् अविद्याकार्य संसारं सर्वत्र स्थित स्वयमेव जीवकृतसाधनानपेक्षो नाशयति । तदा तेपाम् मासुराणां सर्वदोपाणां नाशात् पुनः शुनजीवत्वं भवति । तत्र सर्थन जडजीमाप्रपञ्चेतिरोधानसतजात्यनाशार्थ 'मैं अशुम जीवों को सदा आसुरी योनियों में ही डालता हूँ। अर्जुन ! भासुरी योनि को प्राप्त हुए ये मूढ जीव एक जन्म के बाद दूसरा जन्म प्रहण करते हैं और मुझ (परमात्मा) को प्राप्त न कर अधम गति को प्राप्त होते हैं' (गीता १६ । १९-२०)। उन आसुर जीवों के ससार-जो अविद्या का कार्य है-का नाश तभी होता है जब भगवान् आत्मरमण की इच्छा करते हैं। आत्मरमण की इच्छा होने पर भगवान् अविद्या के कार्यरूप संसार--जो सर्वत्र स्थित होता है-को, जीवों के द्वारा किये जाने वाले साधनानुष्ठान की अपेक्षा न रखते हुए, स्वयं ही नष्ट कर देते हैं । तब उन आसुर जीवों के सभी दोपों का नाश हो जाता है और इसके परिणामस्वरूप वे पुनः शुद्ध ( अर्थात् अविद्यासम्बन्धरहित ) जीव हो जाते हैं। तिरोधान के द्वारा हुए वैजात्य या वैविध्य को नष्ट अर्थात् संहृत करने के लिये भगवान् जड-जीपात्मक निखिल अपञ्च में चित् और देहादिप्वबुद्धिः सर्वविपरीतज्ञानवापस्मारसहितस्यैव, वैराग्पतिरामाया- द्विपयामक्तिः । बन्धश्चतुर्गा कार्य विरयंयो द्वयोः। तिराभावादेववं मान्यया ।' (अणुभाष्यम् ३ । २१५)।
प्रमेयरत्नार्णवे [ पूर्वाद्ध चिदानन्दो प्रकटयति तदा पूर्वोक्त जीवेप्वपिर्थशद्वयग्राकटयम् । ततः प्रपञ्चो भगवति लीयते, तदैक एव भगवान् । अक्षरस्यापि पुरुषोत्तमाभिन्नतया स्थितिः, 'योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्। (भाग २।९।३२) इति भगवद्वाक्यात, 'भपानेकः शिप्यतेऽशेषसंज्ञा (भाग० १०३।२५) इति थीदेवकीवाल्याच्च सुबोधिन्यां तथैव न्याख्यातत्वाच्च, अतपय 'कृष्णस्यात्मरती त्वस्य लयः सर्व- जानन्द को प्रकट या आविर्भूत कर देते हैं और तम पूर्वोक्त जीवों में भी चिदंश और आनन्दाश प्रकट हो जाता है। इस दगा में प्रपञ्च भगवान् मे लीन हो जाता है और भगवान् एकाकी ही अवस्थित रहते है। उस समय अक्षर की स्थिति भी पुरुषोत्तम से भिन्न रूप में ही होती है (अर्थात् अक्षर पुम्पोत्तमचरणात्मक होता है)। इसकी सिद्धि भगवान् के 'जो बच रहे यह मै हुँ' (भाग० २ । ९ । ३२ ) तथा देवकी के 'हे भगवन् ! सभी संज्ञाओं वाले अर्थात् सर्वशब्दवाच्य' या सभी दादो के वाच्य 'एक्मान आप ही यच रहते हैं' (भाग० १० । ३ । २५) इत्यादि वाक्यों तथा मुबोधिनी में इन वाक्यों का इसी प्रकार का अर्थ' किये जाने से होती है। इसीलिये तत्वदीपनिबन्ध में आचार्य वल्लभ ने का है कि 'मगवान् वृष्ण की आरमरमण की इच्छा होने पर १. 'योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् इति । उद्भूतस्य सर्वस्य तिरोभाव- प्रापणे यत्तिरोभूत न भवति, तिरोभावस्तदाश्रयो वा, वंशभेदेन वा तदपि अहमस्मि इत्यनेन सर्वा एव किया तद्विपमध्चाहमिति ज्ञापयति । (सुवो- धिनी २ । २ । ३२)। एवमेव व्यक्तमव्यक्त प्रविष्टम्, तत्र प्रवेशे कालवेग एव हेतुः," एवं स्वयमप्यारे, अक्षर पुरषोत्तमे पुष्पोत्तमाभिन्ने वासरे, तदा भवानेवैकः शिष्यते ।... अशेपसंत: क्शेषा, सर्वा. यस्य सर्वशब्दवाच्यो भगवाने एवेति, एव एव शिष्यत इत्यर्थः ।' (सूबोधिनी १० ॥ ३ ॥ २५)। २. द्रष्टव्य, शास्त्रार्थप्रकरण की स्नेहप्रपूरणी व्याख्या, पृष्ठ ८४-८७ । . . सजा द्वितीयोऽध्यायः] जोवविवेकः ३७ सुम्बावहः (शाग्त्रार्थप्र० का०२४) इति निबन्धे उक्तम् । इदमन भेयम् । जीया द्विविधाः; देवाः, आसुराश्च । तत्र देवा अपि द्विविधा मर्यादामार्गीया, पुष्टिमार्गायाश्च । "तस्माजीवाः पुष्टिमार्गे भिन्ना एव न संशयः' (पुष्टिप्र० १२) इति पुष्टिप्रवाहमर्यादानिरूपणनन्धात् । भेदकस्तु नीजरूपी निरुपाधिको भावः। स च भगवता अविद्यासम्बन्धात् पूर्व देवत्वसम्पादनानन्तरं मयांदामागीयजीयेभ्यो भेत्तं विशेषा- नुग्रहेन्छया पुष्टिमागीयफलं प्रापयिष्यामि इत्येवम् । स तु उत्तरत्र अधिकार विवेके विवेचयिप्यते । मर्यादामार्गाया जीवास्तु शान-भक्ति-कर्मयोगादिभिः समी जीवों के लिये सुरपदायक प्रपशविलय अर्थात् इस जगत् का लय होता है (शास्त्रार्थप्र० का० २४)। इस सन्दर्भ में यह जानने योग्य है। जोय दो प्रकार के होते हैं, देव ओर आसुर । दैय जीव भी दो प्रकार के होते है, मर्यादामार्गीय और पुष्टिमागीय । यह भेद पुष्टि, प्रवाह और मर्यादा का निरूपण करने वाली वल्लभाचार्यकृत पुष्टिप्रवाहमर्यादाभेदः नामक पुस्तक के 'भतः पुष्टि- मागीय जीव अन्य ( अर्थात् प्रवाहमार्गीय ओर मर्यादामागीय) जीवों से मिन ही है, इसमें सन्देह नहीं है' (पुष्टिप्र० १२) इस कथन से सिद्ध होता है। उनका भेदक वीजरूप निरुपाधिक भाव है । यद्द भाव, भगवान् द्वारा, जीव के अविद्या से सम्बन होने के पहले ही, उसका देवत्व सम्पादित कर देने के बाद, मर्यादामागीय जीवोंसे उन्हें अर्थात् पुष्टि- भागीय जीरों को मिन्न या व्यावृत्त करने के लिये विशेष अनुग्रह की इन्छा से किया गया, 'इन्हें पुष्टिमागीय फल की प्राप्ति कराऊँगा' इस प्रकार का सङ्कल्प ही है। इसका विस्तृत विवेचन आगे चल पर पुष्टिमस्त्यधिकारविवेक नामक पञ्चम अध्याय में किया जायेगा। मर्यादामार्गीय जीव सच्छान्न अर्थात् वैदिक शास्त्रो में प्रतिपादित ૨૮ प्रमेयरत्तार्णवे [पूर्वा C सच्छास्त्रप्रतिपादितैर्यधायथं मिलिता यहुविधा शेयाः। तेऽपि मुक्तौ अधिकारिणः । अतो मुक्तिः पुष्टिमागीयाण मर्यादामार्गीयाणाञ्च, 'अत प्येतरी भित्रो सान्ती मोक्षप्रवेशतः' (पुष्टिप्र० ११) इत्याचार्यवाफ्यात् । परं तु मुक्तो यो भेदः स उत्तरत्र प्रपञ्चयिप्यते । ननु; इदं सर्व जीवस्य अणुत्वे सम्भवेत् , तत्त सर्वदेह- व्यापिचैतन्योपलब्ध्यन्यथानुपपत्तिसिद्धेन व्यापकत्वेन बाधि- तम्, इति चेत्, ज्ञान, भक्ति और कर्म आदि से समन्वित होने के आधार पर अनेक प्रकार के होते हैं। वे मर्यादामार्गीय जीव भी मुक्ति के अधिकारी है, अत: मुक्ति मर्यादामार्गीय और पुष्टि मार्गीय इन दोनों प्रकार के जीवों को प्रात होती है जैसा कि श्रीमद्वल्लभाचार्य के 'इसीलिये, भन्य दोनों ( अर्थात् मयांदामागीय और पुष्टिमागीय जीव ), प्रवाह- मागीय जीवों-जिनका असाधारण धर्म भगवद्वेष है-से मिन्न हैं। मर्यादामागीय जीवों वा जीग्माय मोक्ष (अर्थात् अक्षर प्राप्ति) से और पुष्टिमार्गीय जी का जीवभाव ( 'विशते तदनन्तरम्'-गीता १८ । ५५ इत्यादि वाक्यों मे सिद्ध ) पुरषोत्तम के स्वरूप में प्रवेश से निवृत्त हो जाता है अत. इन दोनों प्रकार के जीवों को सान्त कहा गया है' (पुटिन. ११) इम वाक्य से सिद्ध होता है। किन्नु इन दोनो प्रकार के जीनों की मुक्ति के स्वरूप में भेद है जिसका विस्तार से विवेचन बाद में किया जायेगा। पूर्वपक्षी का यह कहना भी ठीक नहीं होगा कि यह सब अर्थात्, ऊपर कही गयी सारी बातें तो जीव के अणुपरिमाण होने पर ही सम्भय हो सकती हैं, कितु जीव का अशुपरिमाण होना, सर्वदेहव्यापी चैतन्य की उपलब्धि के अन्यथा अनुपपन होने से सिद्ध होने वाले ब्यारक्त्व मे बाधित है (तात्पर्य यह है कि जीव को अशुपरिमाण द्वितीयोऽध्यायः जीवविवेकः न; 'अविरोघश्वनन्दनवत् (ब्रह्मसूत्र २२३२३) इति तस्यसूत्रे चन्दनदृष्टान्तेन अणुत्वेऽपि सर्वशरीरव्यापिचैतन्योपलव्धेः साधितत्वात् । ननु चन्दनस्यैकदेशवर्तित्वं प्रत्यक्षेण गृहीत्या, तच्छत्यं सकलशरीरं लभमानः तद्वलन एकादशस्थस्यापि चन्दनस्य ताटक सामर्थ्य फल्पयति; जीवे तु शरीरैकदेशवर्तित्वस्य मानने पर उसके चैतन्य के सारे शरीर में उपलब्ध होने की व्याख्या न हो सकेगी, उसकी उपपत्ति के लिये जीव को व्यापक मानना होगा और इससे जीव को अशुपरिमाण मानने के मत या बाध होगा ।, क्यों कि 'जीव के अणुपरिमाण हान और चैतन्य के सारे. पारीर में व्याप्त होने में कोई विरोध नहीं है, चन्दन के समान ( अर्थात् उगी प्रकार जैसे चन्दन फे शरीर के एकदेश में स्थित रहते भी सारे शरीर को गीतटता का सुग्य प्रदान करने में विरोध नहीं है)" (अहासून २।३ । २३), इस तत्त्वगून में चन्दन के दृष्टान्त द्वारा जीव के अणुपरिमाण होते हुए भी उसके चैतन्य के सारे गरीर में व्यात होने और सारे शरीर में उपलब्ध होने की सिद्धि की गयी है। पूर्वपक्षी का यह कहना भी ठीक न होगा कि, 'चन्दन के एकदेश- वती अर्थात् गरीर के एक भाग में लगे होने का प्रत्यक्ष द्वारा शान प्राप्त कर मारे शरीर में उसकी शीतलता की अनुभूति करने वाला व्यक्ति उम अनुभूति के बल गे एक देश में स्थित चन्दन में भी सारे दारीर को शीतलता प्रदान करने की सामर्थ्य होने का अनुमान कर १. 'अणुत्वे सर्वपारीरव्यापि पतन्यं न पटत इति विरोधो न भवति, चन्दनवत्, यथा चन्दनर्मदेशस्थितं सर्वदेहसूखं करोति महावत- नलस्थितं वा तापनिवृत्तिम् ।' (अणुभाष्यम् २ । ३ । २३)।
४० प्रमेयरत्नार्णवे [ पूर्वाद्ध 1 प्रत्यक्षेण अनिर्धारात् दृष्टान्तवैषम्येण ताशसामर्थ्यसिद्धय- मावात्, न पूर्वोक्तसमाहितिः, इति चेत्, न, प्रमाणवर्याभ्यः 'कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्योतिः पुरुषः" (यह उप० ४।३१७), "स वा एप आत्मा हृदि (छान्दो० उप० टाश ) हृदि होप आत्मा (प्रश्नोप० श६) इत्यादिश्रुतिभ्यः देता है, किन्तु प्रत्यक्ष द्वारा जीव के शरीर के किसी एक देश या भाग में विद्यमान होने का निश्चय नहीं किया जा सक्ता अतः चन्दन का दृष्टान्त विषम होने से अनुपयुक्त है तथा उसके बल पर जीव में चैतन्य के सारे शरीर में व्यास होने के सामर्थ्य की सिद्धि नहीं की जा सक्ती और इसलिये पूर्वोक्त सूत्र (ब्रासून २ । ३ । २३) मे दिया गया चन्दन के दृष्टान्त पर आधृत समाधान ठीक नहीं है, क्योंकि प्रमाणमूर्धन्य वेद के 'आरमा कौन सा है ? यह जो प्राणी में विज्ञानमय हृदय में स्थित ज्योति. स्वरूप पुरुष है' (बृह. उप. ४ । ३ । ७), 'यह (अर्थात् 'एप आत्मापहवपाप्मा'-छान्दो उप० ८। ११५ जादि में उल्लिसित) यह आत्मा हृदय में (स्थित) ह' (छान्दो० उप० ८ । ३ । ३), 'यह भारमा हृदय में (स्थित ) है' (प्रश्नोप० ३ । ६) इत्यादि वाक्या से आत्मा (अर्थात् जीव ) के १. "प्राणेषु इति व्यतिरेकप्रदर्शनार्या सप्तमी' प्राणेभ्यो व्यतिरिक्त इत्यर्थ हृदि तमेतत्स्यात तेनार्य हृद्यन्त- ज्योति.।" 'स एप पुरुपः स्वयमेव ज्योति स्वभाव. य व पृच्छसि 'कतम आत्मा ?' इति ।" (बृह० उप० ४।३।७ पर शाङ्करभाष्य) देखिये, 'स वा एप महानज आत्मा विज्ञानमयः प्राणेपु य एपो- ऽन्तईदय आकाशः तस्मिन्छेते।' (बृह० उप० ४ । ४ । २२)। २ 'हृदि ह्येप पुण्डरीकाकारमासपिण्डपरिच्छिन्ने हदयाकारा एप आरमा आत्मना सयुक्तो लिङ्गात्मा ।' (प्रश्नोप० ३।६ पर शाङ्करभाष्य) । अष्टन्य, 'स या एष आत्मा हृदि, तस्येतदेव निरुक्तं हृद्ययम् . ..... ..... ......
तीयोऽध्याय.] जीवविवेक देशस्थायित्वस्य निश्चयात् । एतदाह सूनकारः 'अवस्थिति- याद् इति चेतन, अभ्युपगमाद् हदि हि (ब्रह्मसून २।३।२४)। किञ्च, 'यथा वृक्षस्य संपुष्पितस्य दूराइन्धो वाति; एवं पुण्यस्य णो दूराद्गन्धो वाति (महाना० उप० ७।९; गारा० उप०११) [ श्रुतेः, गन्धस्य द्रव्याधिकदेशसमवर्तित्यम् , एवं चैतन्य- देश में स्थितिशील होने का निश्चय होता है। सूत्रकार ने इसे कहना ठीक न होगा कि अवस्थिति विशेष के कारण चन्दन की तलता के सारे शरीर में व्याप्त होने की पाद भले ही मान ली ये, जीव के चैतन्य के सारे शरीर में व्याप्त होने की बात नहीं नी जा सकती, क्योंकि (श्रुति मे) जीव के हृदय में स्थित होने की त स्वीकार की गयी है (हामूत्र २ । ३ । २४) इस सून कहा है। ओर 'जिस प्रकार पुप्पिस वृक्ष की गन्ध दूर तक जाती है उसी कार पुण्य या शुम कर्म की सुगन्ध भी दूर तक फैल जाती है। महाना० उप० ७।९; नारा० उप० ११) इस श्रुतिवाक्य से गन्ध के व्य की अपेक्षा अधिक देश में समवर्ती अर्थात् विद्यमान होने या पैल इति, तस्माद् हृदयम्, अहरहर्वा एवंवित् स्वर्ग लोकमेति' छान्दो० उप० ८।३ । ३) । तथा, 'तस्यैतस्य हृदयस्यैतदेव हृद्ययमात्मा वर्तत इति यस्मात् तस्माद् हृदयम् । हृदयनामनिर्वचनप्रसिद्धधापि स्वहृदय आत्मेत्य- वगन्तव्यमित्यभिप्रायः' (छान्दो० उप० ८१३१३ पर शाङ्करभाष्य )। १. "चन्दने अवस्थितिवशेष्यम् अनुपहतत्वचि सम्यक्तयावस्थानं तस्मात् त्वच एकत्वात् तत्र भवतु नाम, न तु प्रकृते तथा सम्मवति इति चेत्, ग, अभ्युपगमात्, अभ्युपगम्यते जीवस्यापि स्थानविशेष.। हदि हि हृदि जीवस्य स्थिति । 'गुहा प्रविष्टी..... ( मह्मसूत्र १।२।११) इति हि युक्ति ।" (अणुभाष्यम् २।३।२४)। निरुक्तं निर्वचनं नान्यत् ।
४२ प्रमेयरलाणवे [पूर्वाद्ध गुणोऽपि अधिकदेशवती। जीवस्य शरीरैकदेश-हृदय-स्थायित्वेऽपि सर्वदेहे चैतन्यो- पलम्भो भवत्येव, तदाह सूत्रकृत् 'व्यतिरेको गन्धवद्' (ब्रह्मसूत्र २२३२६ ) इति'। न च, 'चम्पकाद्यचयवानां सूक्ष्माणां दूरदेशे प्रसृतस्यात् तन गन्धोपलब्धिः सुवचा, इति वाच्यम्; हिग्यादरनेकचर्म- पुटादिवेष्टितत्वेन अवयवनिर्गमनाभावेऽपि गन्धग्रहणात् । जाने के सिद्धान्त की पुष्टि होती है। इसी प्रकार जीव का चैतन्य गुण भी अधिकदेशवर्ती अर्थात् सर्वदेहव्यापी है। जीव के शरीर के एकदेश- रूप हृदय में स्थित होते हुए भी उसके चैतन्य की उपलब्धि सारे शरीर में होती ही है । इसे सूत्रकार ने 'जीव का चैतन्य गुण गन्ध के समान द्रव्य की अपेक्षा अधिक देश में रहने वाला है' (ब्रह्मसूत्र २।३।२६ ) इस सूत्र में प्रतिपादित किया है। पूर्वपक्षी का यह रहना भी ठीक न होगा कि 'चम्मा आदि के पुष्प के (परागकण रूप) सूक्ष्म अवयव दूर तक फैल जाते हैं अतः उसकी सुगन्ध की उपलब्धि दूर तक होती है, ऐसा कहना ज्यादा ठीक होगा'; क्योंकि हिश (हींग) आदि के अनेक चर्मपुटो (कुप्पी ) आदि में छिपाकर सँभालकर रसने से उसरे अवयवो के बाहर न निकल सक्ने पर भी हींग आदि की गन्ध फी उपलब्धि तो होती ही है (तात्पर्य यह है कि गन्ध के अवयवों से रहित देश में भी गन्ध की उपलब्धि होने से 1 १. द्रष्एन्य, शास्त्रार्थ प्रकरण की स्नेहप्रपूरणी व्याख्या पृष्ठ १५७-१६० । देखिये, 'तथा च दर्शयति' (ब्रह्मसूत्र २३३२७) पर अणुभाष्य, "हृदयायवनम् अणुपरिमाणत्वञ्चात्मनोऽभिधाय तस्यैव 'आलोमभ्य आनसाग्रेभ्यः' (छान्दो० उप० ८८१) इति चतन्येन गुणेन समस्त- परोरण्यापित्वं दर्शयति" (अणुमाध्यम् २।३।२७) ।
द्वितीयोऽध्यायः] जीवविवेकः - लशुनस्पृशि फरादौ पहुधा क्षालनेन अवयवाभायेऽपि गन्धान- पायाच । पतञ्च, सुष्ट्रपपादितं प्रभुचरणविद्वन्मण्दने । न च, 'स वा एप महान आत्मा' (गृह० उप० ४ाधार२) इति श्रुतेः व्यापकत्यम् इति वात्र्यम् । 'नाणुरतच्छुतः इति चेत, न. इतराधिकाराव' (ब्रह्मान २।३।२१) इति तत्त्वसूत्रेण, सष्ट है कि पूर्वपक्षी या उपयुक्त मथन रामीचीन नहीं है)। जिग हाथ से लहसुन का समं कर लिया जाता है उमे पई बार धोने पर लहसुन के मुश्म अवयरों के धुल जाने ( और हाय में रिद्यमान न रह जाने) पर भी लहसुन की गन्ध हाथ से नहीं जाती है (अर्थात् हाथ में लहसुन के सश्म अवयरों की स्थिति न होते हुए भी गन्ध की उपलब्धि होने के कारण भी पूर्वपक्षी का उपर्युक्त कथन स्वीकार्य नहीं हो सकता)। विट्ठलनाथ ने विदन्मण्डन में इम विषय का मुन्दर विपनन र सिद्धान्त ग प्रतिपादन किया है। पृर्वपक्षी का य- पाना भी ठीक न होगा कि झुनि के 'वह यह महान् अजन्मा आग्मा' (यह उप० ४।४।२२) इस वाक्य से जीर के यापकत्व की सिद्धि होती है क्योंकि "जीव को भणु नहीं माना जा सकता क्योंकि 'स या एप महाना आरमा' (वृह उप० ४।४।२२) इस तिवाक्य से उसके भरिपरीत अर्थात् व्यापक होने का निश्चय होता है, यह कहना ठीक न होगा क्योंकि उपर्युक्त श्रुतिगास्य प्रा के अधिकार में भाता है अर्थात् उसका प्रतिपाद्य ब्रह्म है नीव नहीं" १. देखिये, विद्वन्मण्डनम् पृष्ठ १८६-१८९, क्या 'गुणाद्वा लोकवत्' (ब्रह्मसूत्र २१३।२५ ) पर अणुभाष्य । २. "जीवो नाणुः भवितुमर्हति । कुतः ? अतच्छुतेः, अणुत्वविपरीत. म्यापरत्यश्रुतेः 'सथा एपमहानज मात्मा योऽयं विज्ञानमयः' (वृह उप० ४।४।२२)। इति चेन्न, इतराधिकारात् । इतर. पर ब्रह्म, तस्याधिकारे 'महानज' (बह उप० ४।४।२२) इति वाक्यम् । प्रकरणेन प्रमेयरत्नावे [पूवार्द्ध ब्रह्म अधिकृत्त्य दयं श्रुतिः प्रवृत्ता इति प्रदऱ्या अणुन्यस्यैव साधितत्वात् । ननु, नित्य सर्वगत स्थाणुः अचतोऽय सतातन.. (गीता० २२४) इति भगवद्वाक्याद् व्यापकन्यम्', इति चेत् न, विद् प्रा एव भवति । मुण्ड० उप० ३।२।९) इति श्रुतेः ब्रह्मभावे सति भगवद्धर्माचशे जायमानस्य व्यापफरवस्य भगवडाक्य- विषयन्चात् । तदुक्तं निवन्धे, 'व्यापकत्वश्रुतिस्त्वस्य भगवत्स्वन युज्यते' (शालार्थप्र० का० ५३) इति । (ब्रह्मसू। २।३।२१) इस तत्त्वस्त के द्वारा 'स ना एप महान आत्मा' (० उप० ४।४।२२) इत्यादि श्रुति के बहाविषयक होने का प्रतिपादन कर जीन के अणुपरिमाण होने को मिद्धि की गयी है । पूर्वपभी यह कहना भी ठीक न होगा कि भगवान् के 'आमा नित्य, सर्वगत, स्थाणु अचल और मनापन है' (गीता २।२४ ) इस वाक्य के प्रामाण्य से जीय को व्यापक मान लेना चाहिए, क्योंकि भगवान पे उपर्युक्त गीतावाक्य का विषय यह व्यापकत्व है जो 'ब्रह्म को जाननेनाला मता ही हो जाता है' (मुण्ड० उ० ३१२९) इस श्रुति से सिद्ध होने वाले ब्रह्मभाव के हो जाने पर जीव मे भगवान् के धर्मों का आवेम हो जाने पर जीव में उत्पन्न ( हो गया कहा जाता है अर्थात् जीर में उपचरित ) होता है। यही वात तत्वार्थदीपनिबन्ध के सान्नार्थप्रकरण में इस प्रकार कही गयी है कि 'जीर को न्यापकता का प्रतिपादन करने पाली श्रुतियाँ जीव में भगवदावेश होने पर भगवान के ज्यापकत्यादि धों के जीव में उपचरिन होने के कारण सार्थक हैं" (शानार्थप्र. वाददाश्च नियम्यन्ते । अन्यपरा अपि योगेन ब्रह्मपरा भविष्यन्ति ।" (अणुभाष्यम् ।३।२१)! १. तात्पर्य यह है कि यद्यपि मापकत्वादि भगद्धों के जीव में होने की बात कही जाती है फिर भी जीव वस्तुत: व्यापक नहीं है । इस द्वितीयोऽध्यायः] जीवविवेक. तहि व्यापकतायामणुत्वस्य निवृत्तः अवास्तवम् अणुत्वम् रति चेत्, न; ब्रह्मणो विरुद्धधर्माश्रयत्वेन अणुरूपेऽपि व्यापक- ताया यदोपात् । एतदुपपादितं निबन्धे, 'अण्वपि चहा व्यापक भवति, यथा कृष्णो यशोदाकोडे स्थितोऽपि सर्वजगदाधारो भवति' (शास्त्रार्थप्र० प्र०५४) इत्यन्तेन । अतो जीवोऽणुरेव, तस्य चैतन्याख्यो गुणः सर्वदेहं व्यामोति । तदुक्तं नारदपञ्चराने लक्ष्मीतन्ने त्रयोदशाध्याये- 'चेतन्यमत्य धर्मो हि प्रभा भानोरियामला । तया स्फुरति जीवोऽसौ स्वत एवानुरूपया ।। इति । . का० ५३)। पूर्वपक्षी का यह कहना भी ठीक नहीं है कि जीव क ब्रहा हो जाने पर व्यापक हो जाने से उसके अणुत्व की निवृत्ति हो जायेगी जत. उसके अणुत्व को अवास्तविक मानना चाहिए क्योकि ब्रहा के विरुद्धधर्माश्रय होने के कारण अणुरूप होते हुए भी व्यापर होने में कोई दोष नहीं है । तत्त्वार्थदीपनिनन्ध के शास्त्रार्थप्रकरणम इस सिद्धान्त का प्रतिपादन ५४यी फारिका की प्रकाश व्याख्या के 'ब्रह्म भणु होते हुए भी व्यापक ह, जिस प्रकार कृष्ण यशोदा की गोद में रहते हुए भी निन्वित अगत् के आधार है'' (शास्त्रार्थप्र० प्र० ५४ ) इस वाक्य तक किया गया है । जतः जीर अणु ही है (व्यापक नहीं) और उसरा चैतन्य नामक गुण सारी देह मे व्याप्त रहता है, जैसा कि नारदपञ्चरान में लक्ष्मीतन्त्र के तेरहवं अध्याय के अधोलिखित श्लोर में कहा गया है, 'चैतन्य विषय के विवेचन के लिये देखें शास्त्रार्थप्रकरण की स्नेहापूरणी न्यारया पृष्ठ १६२-१६३ । १. इस विषय के विशेष विवेचन के लिये शास्त्रार्थ प्रकरण की स्नेह- प्रपूरणी व्याख्या के पृष्ठ १६४-१६५ देखें।
मूलरूपविवेकः ( तृतीयोऽध्यायः) अथ मूलरूपं विचार्यते । तत्र, 'कृषिभूवाचकः प्रोक्तो, णश्च निर्वृतिवाचः। तयोरैक्य परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते ।।' 'ॐ तत्सत्, परं ब्रह्म कृष्णात्मको नित्यानन्दैकसरूप. सोऽहम्, ॐ तगोपाल एव पर सत्यमबाधितम्' (गोपालोत्तरता० १) इति, 'परं मौतद् यो ध्यायति, रसति, भजति' (गोपालपूर्वता० १) इत्यादिश्रुतेः, 'मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय !' (गीता ७७), 'अक्षरादपि चोत्तमः' (गीता १५.१८) इति मूलरूप-विवेक (तृतीय अध्याय) अन मूल रूप का विचार किया जाना है । " 'कृष्ण' पद का घटक 'कृप' सत्ता का बोधक कहा गया है और णकार निर्वृति अर्थात् शान्ति और आनन्द का वाचक है । इन दोनों के संयोग से निप्पर 'कृष्ण' शब्द से सदानन्दरूप परब्रह्म का अभिधान किया जाता है," "ॐ वह सत् तच पर ब्रह्म कृष्णात्मक और नित्यानन्दैकस्वरूप है। मैं वह (अर्थात् उस तत्त्यसे अमिन्न ) हूँ। ॐ यह भवाधित परम सत्य रूप तत्व गोपाल ही हैं' (गोपालोत्तरतापिन्युपनिषद् १), 'जो इस पर ब्रदा का ध्यान करता है, इसका रस लेता है, इसका मजन करता है, (गोपालपूर्वतापिन्युपनिषद् १) इत्यादि श्रुतिवाक्यों तथा 'हे धनञ्जय ! मुझसे परतर कोई अन्य तत्त्व नहीं है' (गीता ७७) एव 'मैं अक्षर सत्त्व से मी उत्तम हूँ' (गीता १५/१८) आदि भगवद्वाक्यों से यह - तृतीयोऽध्यायः] मूलरूपविवेक: ४६ भगवद्वाफ्याच श्रीकृष्णः परं ब्रह्म इति निष्कर्षः। अतएव 'परं ब्रह्म तु कृष्णो हि' (सिद्धान्तमुक्तावली ३) इति मुक्तावल्यां श्रीमदाचायँरक्तम् । सच 'अपाणिपादो जननो ग्रहीता' (श्वेता० उप० ३३१९), 'भप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः' (मुण्ड० उप० २।१।२) इत्यादिश्रुतेः प्राकृतपाणिपादादिरहितः सच्चिदानन्दविग्रहः । 'आनन्दं ब्रह्मणो रूपम्', "सच्चिदानन्दरूपाय कृष्णायाक्लिप्टकर्मणे। नमो वेदान्तवेद्याय गुरवे बुद्धिसाक्षिणे ॥ (गोपालपूर्वता० मंगलश्लोक २), 'सर्वतः पाणिपादं तत्' (श्वेता उप० ३१६) इत्यादि श्रुतेः 'आनन्दमृर्तिमजहादतिदीर्घतापम्, आनन्दमात्र निष्कर्ष प्राप्त होता है कि भगवान् श्रीकृष्ण ही पर ब्रह्म ह । इसीलिये महाप्रभुश्रीमद्वल्लभाचार्य ने अपनी कृति सिद्धान्तमुक्तावली में कहा है कि 'कृष्ण निश्चय ही परब्रह्म है' (सिद्धान्तमुक्तावली ३)। 'पाणि और पाद से विरहित होते हुए भी वेगवान या तीव्रगामी और ग्रहण करने वाला' (श्वेता० उप० ३।१९) तथा 'अप्राण, मनोहीन एवं विशुद्ध' ( मुण्ड० उप० २१११२) इत्यादि श्रुतिवाक्यों से उस श्रीकृष्णात्मक पर ब्रह्म के प्राकृत पाणिपादादिरहित और सच्चिदा- नन्दविग्रह होने का बोध होता है । श्रुति के, 'आनन्द बह्म का रूप है, 'सच्चिदानन्दरूप, अक्लिष्टकर्मा, उपनिषद्वेध और बुद्धि के साक्षी गुरु श्रीकृष्ण को नमस्कार' (गोपालपूर्वतापिन्युपनिषद् , मङ्गल श्लोक २ ), 'वह तत्व समी और हाय-पैर वाला है' (श्वेता० उ० ३।१६ ) इत्यादि वाक्यों, पुराण के 'भानन्दमूर्तिमजहादतिदीर्घतापम् आदि वाक्यों एव तन्त्र के 'आनन्दमात्रकरपादमुखोदरादिः" (अर्थात् भगवान् के हाथ, १. निर्दोषपूर्णगुणविग्रह आन्मवन्तो निश्चेतनात्मकशरीरगुणश्च हीनः । आनन्दमात्रकरपादमुखोदरादिः सर्वत्र च त्रिविधभेदविजितात्मा । ४ प्रमेयरत्नार्णवे [पूर्वाद पादमुसोदरादिः' इत्यादि पुराण-तन्त्राभ्याम् आनन्दात्मककर णादिरूपः । 'निष्फलं निष्क्रिय शान्तम्' (श्वेता० उप० ६।१९), 'सर्वकामः सर्वगन्धः (छान्दो० उप० ३२१४।२), 'परास्य शक्तिविविधैव श्रूयते' (श्वेता० उप०६।८) इत्यादि श्रुतिभिः भप्राकृतधर्माधारः। तदुक्तं निवन्धे, 'सर्वाधारं वस्यमायम्, आनन्दाकारमुत्तमम् । प्रापञ्चिकपदार्थाना सर्वेषा तद् विलक्षणम् ॥' (शास्त्रार्थप्र० का०६७) इति । पैर, मुख और उदर आदि सारे अन आनन्दमय हैं ) आदि वाक्यों से • शात होता है कि श्रीकृष्णात्मक पर ब्रह्म की इन्द्रियाँ आदि आनन्दात्मक हैं। 'बह पर ग्रह निष्कळ ( कलाहीन ), निष्क्रिय (क्रियाहीन) आर शान्त है' (श्वेता उप० ६।१९), 'सर्वकाम, सर्वगन्ध' (छान्दो उप० ३।१४।२), 'उसकी पराशक्ति नाना प्रकार की ही सुनी जाती है' (श्वेता उप० ६१८) इत्यादि श्रुतियों से उस पर ब्रह्म के अप्राकृत धर्मों का आधार होने का बोध होता है। इसीलिये श्रीमदल्लभाचार्य ने अपने तत्त्वार्थदीपनिबन्ध के शास्त्रार्थप्रकरण में कहा है कि, ग्रहा सबका भाधार, माया को वश में रखनेवाला, भानन्दाकार, (अक्षर से मी) उत्तम देखिये, शास्त्रार्थप्रकरणकारिका ४४ तथा उसकी स्नेहप्रपूरणी व्याख्या पृष्ठ १३०-१४१. १. वह 'सर्वकाम' और 'सर्वगन्ध' है, यह स्पष्ट करते हुए शङ्करा- चार्य लिखते हैं, "सर्वकामः, सर्व कामा दोपरहिता अस्य इति सर्वकामः, 'धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि' (गोता ७११) इति स्मृते. 1 " सर्वगन्धः, सर्व गन्धाः सुखकरा अस्य सोऽय सर्वगन्धः, 'पुण्यो गन्यः पृथिव्याम्' (गीता ७।९) इति स्मृते.।" (छान्दो० उप० ॥१४॥२ पर शाङ्करभाष्य )। - 49100 तीयोऽध्याय ] मूलरूपविवेक तथा च, निषेधकश्रुतीनां प्रातीतिकप्रारतधर्मविपयत्वं, मिविधायकोपनिपदां तु अप्राकृत नित्य श्रोत-धर्मविषयत्वम् , ति व्यस्थया तु अविरोधोऽम्मत्सिद्धान्ते, यदाह भगवान् प्यकार , 'प्रतीतं च निपेयम्, नाप्रतीतं, न श्रुतिप्रतीतम्' अणुभाग्यम् ॥१२) इति । और समी भापचिक पदार्यों से विलक्षण है' (शास्त्रार्थप्र० का० ६७) । जिन श्रुतिवाक्यों में ब्रह्म मे धर्मों या गुणों के होने का निषेध उपलब्ध होता है उनका विषय प्रातीतिक अर्थात लोक में प्रतीत या उपलब्ध होने वाले लौकिक या प्राकृत धर्म या गुण है, तात्पर्य यह है के ब्रहा में गुणो के होने का निषेध करने वाले वाक्य उसमें प्राकृत या गैफिक गुणों के होने का ही निषध करते हैं (अप्राकृत, दिव्य या मलौकिक गुणों के होने का नहीं)। इसी प्रकार ब्रह्म में धर्मों या गुणों के होने का प्रतिपादन करने वाले श्रुतिवास्या का विषय अप्राकृत, नित्य पौर श्रौत धर्म हैं, तात्पर्य यह है कि ब्रह्म में धर्मों या गुणों के होने का विधान करने वाले उपनिषद्वाक्य उसमे अप्राकृत, अलौकिक, दिव्य नेत्य तथा श्रुतिप्रतिपादित धमों या गुणों के होने का ही विधान करते हैं (लौक्कि या प्राकृत धर्मों के होने का नहीं)। इस प्रकार सगुण और निर्गुण तत्त्व का निरूपण करने वाली श्रुतिया के अर्थ की व्यवस्था गरने के कारण हमारे ब्रह्मवाद मिटान्त में कोई अन्तर्विरोध नहीं है, जैसा के अशुभाष्य के रेसक महाप्रभु वल्लभाचार्य ने कहा है, 'ग्रह्म में धर्मा या गुणों का निषेध करन वाले वाक्यां का अभिप्राय ब्रह्म में रोक में प्रतात या उपलब्ध होने चारे (अर्थात् रौकिक, प्राकृत स्थूलत्वादि) गुणों का नषेध करना ही होता है, अप्रतीत (अर्थात् लोक में उपलब्ध न होने वाले अलौकिक, दिव्य गुणी) या श्रुतिप्रतीत (अर्थात् श्रुति में ब्रह्म के १ देखिये, शास्त्रार्थप्रकरण की स्नेहप्रपूरणी व्याख्या, पृष्ठ २११- प्रमेयरत्नार्णवे [ पूर्वाद्ध स च परमकाष्ठापन्नः पुरुपोत्तमशब्दवाच्यः कृष्णः सदा- प्रकटालौकिकसर्वधर्मा नित्यसर्यलीलः, 'दशमस्य विशुद्धयर्थ नगनामिह लक्षणम्' (भाग २२१०२) इति शुकवाफ्यात, 'यस्य लीलाः नारधाः स शुद्धः पुरुषोत्तमः' इति निवन्धात्, 'श्रीकृष्णं परमानन्द दशलीलायुतं सदा (भागवतार्थप्र० का०१) इति स्पष्टमेव श्रीभागवतप्रकरणारम्भे निरूपितत्वाञ्च । स हि द्विभुज-चतुर्भुजादिरूपैः वृहदन वृन्दायन-व्यापि- चैकुण्ठादिषु तत्तनतः सह रममाणः सर्वदा विजयते, धर्म के रूप में प्रतिपादित ) रमी या गुणों का निषेध करना नहीं।' (अणुभाप्य १११२)। उन परमपाठापन्न पुरुषोत्तमशब्दवाच्च श्रीकृष्ण के सभी अलौकिक धर्म सदा प्रकट रहते हैं और उनकी सारी लीलायें नित्य हैं, जैसाकि शुक्देव के 'महापुरुषो ने दशम की विशुद्धि (अर्थात् आश्रय के निरूपण) के लिये सर्गादि नौ पदार्थों का लक्षण या निरूपण किया है ( भागवत २।१०।२) इस वाक्य मे तथा श्रीवल्लभाचार्य के तत्त्वदीपनिबन्ध के जिसकी दस प्रकार की लीलार्य है वह शुद्ध पुरपोत्तम है', दस वाक्य से, तथा तत्वार्थदीपनिबन्ध के भागवतार्थप्पकरण के प्रारम्भ में 'हम सदा दस लीलाओं से युक्त परमानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण को नमस्कार करते हैं। (भागवतार्थम० का० १) इत्यादि वास्यों में स्पष्ट शब्दो मे निरूपित होने से गत होता है। वह भगवान् श्रीकृष्ण द्विभुज, चतुर्भुज आदि रूपों में बृहद्वन', वृन्दावन एवं व्यापिवेकुण्ट आदि में अपने उन उन (विशिष्ट) भत्तो पे साथ रमण करते हुए सदा विराजमान हे जैसा कि ब्रह्मवैवर्तपुराण के, १. बृहहन के उल्लेख के लिए देखें, भाग. १०१२१ इत्यादि ।
तृतीयोऽध्याय:] मूलरूपविवेकः । परिपूर्णतमः कृष्णो वैकुण्ठे गोकुले स्वयम् । चतुर्भुजश्व वैकुण्ठे गोकुले द्विभुजः स्वयम् ।। इति ब्रह्मवैवर्तात् । अत एव परमानन्दः, 'रसो वै सः' (तैत्ति० उप० २१७), 'एतमानन्दमयमात्मानमुपसंकामति' (तैत्ति० उप० २१८) इत्यादि- श्रुतेः, 'मानन्दमयोऽभ्यासात्' (ब्रह्मसूत्र १२१२११ ), 'पुरुषविधाऽ- न्वयोऽत्र चरमोऽनमयादिषु यः (भाग० १०८७।१७ ) इति तत्व- सूत्र-श्रीभागवतोयश्रुतिस्तुतिभ्याञ्च। एतय माप्य-सुबोधिन्योः - 'श्रीकृष्ण वैकुण्ठ और गोकुल मे परिपूर्णतम अर्थात् अपने पूर्णपुरपोत्तम- रूप में विद्यमान है । वे चैकुण्ठ में चतुर्भुज रूप में और गोकुल में द्विभुज- रूप में विराजमान हैं,' इस वाक्य से ज्ञात होता है। इसीलिये भगवान् कृष्ण को परमानन्दस्वरूप कहा गया है जैसा कि 'वह रस (अर्थात् रसमय, रसात्मक या रसस्वरूप) है' (तैत्ति० उप० २१७), 'इस आनन्दमय आत्मतत्त्व को प्राप्त होता है' (तैत्ति० उप० २।८) इत्यादि श्रुतिवाक्यो, 'परमात्मा आनन्दमय है क्योंकि उसे श्रुति में अनेकशः भानन्दमय कहा गया है। (ब्रह्मसूत्र १1१1११) इत्यादि ब्रह्मसूत्र तथा श्रीमद्भागवत में वेदस्तुति में आये, 'इस देह में जो पुरषाकार अनुगत है 'वह भन्नमयादि में अन्तिम अर्थात् आनन्दमय है' (भाग० १०१८७११७) इस वाक्य मे ज्ञात होता है। यह बात 'भानन्दमयोऽभ्यासात्' (ब्रह्मसूत्र १११।११) इस सूत्र के अणुमाप्य' तथा वेदतुति के 'पुरपविधोऽन्ययो- ऽत्र चरमोऽन्नमयादिपु यः' (माग० १०1८७११७) इम श्लोक की १. "आनन्दमयः परमात्मा ।""""कुतः ? अभ्यासात् अम्यस्यते पुनः पुनः कोर्यत इत्यभ्यासः तस्मात् । .... एवमभ्यासः श्रूयते, 'को ह्येवान्यत्क: प्राण्याद्यदेष आकाश मानन्दो न स्याद्, एप ह्येवा- नन्दयाति' (तैत्तिउप० २७)""| तस्मादानन्दमयं ब्रह्मव ।" (अणुमाष्यम् १२१११)।
प्रमेयरमाणवे [ पूर्वा ....... स्फुटम् । अतएव 'आत्मानन्दसमुद्रस्थ कृष्णमेव विचिन्तयेत्' (सिद्धान्तमुक्तावली, १५) इति मुक्तावल्यामुक्तम् । सुबोधिनी' टीका में स्पष्ट की गयी है। इसीलिए महाप्रभु श्रीमदल्लमा- चार्य ने सिद्धान्तमुक्तावली मे कहा है कि 'आत्मानन्द (अपने अर्थात् भगवदीय आनन्द) के समुद्र में स्थित श्रीकृष्ण का ही चिन्तन करना चाहिए (सिद्धान्तमुक्तावली १६)। १. "अत्र देहे पुरुषविघोऽन्वयो यः स भगवान् अन्नमयादिपु चरमः। ""ततोऽत्र देहे कश्चिदान्तरो वर्तते य एवंविधः, यदुपरि समागता अन्नरसाः पुरुषादयो भवन्ति ।..... ..."तस्य पुरुषविधताम- न्वयं पुरुपविधः' इति पुतौ तस्य भगवतः पुरुषप्रकारमेव लक्ष्यीकृत्य अपमन्नमयादिः पुरुपविध इति अस्य पुरुषविघत्वं भगयदन्वयनव निरूपितम् । पुरुषविधस्त्ववियो वशन्यायेन समागत इत्यर्थः । अन अन्नमया- दिपु यश्चरम इति । अन्नमय-प्राणमय-मनोमय-विज्ञानमयानन्दमयेषु चरम आनन्दमयः, स तु सर्वान्तरः | आनन्दमयत्वादेव न तस्य प्रयोजनमन्य- दस्ति । अन्यञ्च नापेक्षत इति सूचितम् । अन्तःस्थितो हाकारसमर्पको ....." भगश्चिानन्दमयः ।" (सुबोधिनी १०८७११७)। २. इस वाक्य को व्याख्या करते हुए श्रीबालकृष्णभट्ट लिखते है, "शुद्धपुष्टिमार्गीयनजसुन्दरीवृन्दविहारिणं कृष्णमेव निरवध्यामन्दं विशेपेण चिन्तयेत् मानसीसिद्धयर्थ लीलाविशिष्टभावनं कुर्यादिति भावः । अय- मेवार्यः श्रीमत्प्रभुचरणः टोकाया विवृतः 'कृष्णपदात्' इत्यारम्य 'आत्म- पदं भगवत्परम्' इत्यन्तेन ।" ( सिद्धान्तमुक्तावली-योजना १५) । यहाँ श्रीवालकृष्णभट्ट ने गोस्वामी विट्ठलनाय कृत सिद्धान्तमुक्तालीविवृतिः के जिस वापान को ओर सकेत किया है यह अघोलिखित है, 'आत्मानन्द- समुद्रस्थम् इति । श्रीकृष्णपदात् पुष्टिमार्गी सदा भक्तिप्रकटितनिरवध्या- नन्देषु विहरन्तम् इत्यर्थः । ते तु ब्रजरत्नात्मका इति मन्मति: । स आनन्दो भगवत्स्वरूपात्मक सहत एव । अत आत्मपदं भगवत्परम् ।' (सिद्धान्त- मुक्तावली विवृतिः १५)। भवति ।
नृतीयोऽध्यायः] मूलरूपविवेकः ५५ तस्यैव 'बहु स्यां प्रजायेय (तैत्ति० उप० २६, छान्दो० उप० २।३) इति श्रुत्युक्तया इच्छया सकलकारणकारणभूतं' रूपान्तरमाविर्भवति । तस्मिन् रूपे भगवद्धर्मात्मकसत्त्वेन आनन्दांशस्तिरोहित इव भवति । तदा तद्रूपम् अक्षरशन्दवाच्यं भवति । तद् अक्षरं ब्रह्म अधिकारिभेदेन द्विधा स्फुरति । तर भकानां पुरुषोत्तमधाम-व्यापिवैकुण्ठाघात्मकत्वादि- धर्मवत प्रतीयते, 'अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमा गतिम् । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥' (गीता दा२१) इति गीतावाक्यात, 'दर्शयामास लोकं स्वं गोपाना तमसः परम् । उसी की 'मै यहुत हो जाऊँ, अनेक प्रकार से उत्पन्न हो (तैत्ति. उप० २।६; छान्दो० उप० ६१२१३) इत्यादि श्रुतिवाक्यों में निरूपित इच्छा से, उसके एक अन्य रूप का आविर्भाव होता है जो सभी कारणों का कारण होना है । उस रूप मे,भगवद्धर्मात्मक अर्थात् भगवान् मे धर्मभूत सत्त्व से, आनन्दाश तिरोहित सा हो जाता है। तब वह रूप 'अक्षर' शब्द का वाच्य हो जाता है । यह अक्षर ( कहा जाने वाला) का अधिकाग्भेिद से नौ रूपों में स्फुरित होता है। भत्तो को यह अक्षर तत्त्व पुरुषोत्तमधाम, व्यापिपैकुण्ठ आदि के रूप में प्रतीत होता है, जैसा कि गीता के "अव्यक्त का अमिधान अक्षर इस पद से किया गया है और उसे परम गति कहा गया है। यह मेरा परम धाम है जिसे प्राप्त कर लेने पर व्यक्ति का पुनर्गन्म नहीं होता" (गीता० ८।२१), इस वाक्य तथा श्रीमद्भागवत के, "भगवान् ने गोपों १. 'तदाहुरक्षरं ब्रह्म सर्वकारणकारणम् । विष्णोर्धाम परं साक्षात्पुरुषस्य महात्मन.' ॥ (भाग० ३।११।४१)। २. देखिये, सर्वनिर्णयप्र० का० ९९.१०० तथा उनको प्रकाश टोका। , .
प्रमेयरत्नाणवे [पूर्वाद्ध सत्यं ज्ञानमनन्त यद् ब्रह्म ज्योतिः सनातनम् ॥" (भाग० २०२८।१४-१५) इति श्रीभागयताञ्च । अत एव उक्तं निरन्धे, 'प्रभुत्वेन हरे स्फूती लोकलेन तदुभव (सर्वनिर्णयप्र० का० १०२) इत्यादि । भक्तमत्यक्षविषयीभूते अस्मिन् अक्षररूपे को तम से पर या अतात अपन व्यापिकुण्ड नामक लोक या परम धाम के दर्शन कराय जा अक्षर, सच्चिदानन्दस्वरुप घंकुण्ठ कहा जाने वाला ब्रह्म ही हे तथा ज्याति स्वरूप एव सनातन है" (भाग १०२८1१४ १५) दस याक्य से ज्ञात होता है। इसीलिये श्रीवल्लभाचार्य ने तत्त्वार्थ दीपनिनन्ध ( सर्वनिर्णयप्रकरण) में कहा है कि भगवान् हरि के चैकुण्ठयासी प्रमु के रूप में स्फुरित होने पर उनके रोक के रप में अक्षर की प्रतीति होती है" ( सर्वनिर्णयप्र० का० १०२) इत्यादि । भक्तों १ "भगवतो वहय लोका सन्तीति तद्वधावृत्यर्षमाह-तमस. परम इति, प्रकृतेरप्युपरि, 'तम आसीत् तमसा गूढमने प्रकेतम्' (ग्वेद १०।१२९।३ ) इति श्रुते , तस्यापि तमसो वस्तुविचारेण भगवत्त्वमुक्त, ततोऽप्यने व्यापिवैकुण्ठाख्य तत प्रदर्शितवान् । मायोद्घाटनेन तस्य स्वरूपमाह 'सत्यम्' इति । अक्षररूप तत । यदा भगवानीश्वरत्वेन तेषा हृदये जात तदा अक्षरमपि लोकत्वेनाविर्भूतमन्यया तस्य कृत्रिमत्व स्यात् । स्वरूपच तस्य सत्यं ज्ञानमनन्त देशकालापरिच्छिन्नमवाधितज्ञानरूपता- परिच्छिन्नता चौता । अन्यानपि तत्रस्यान् गुणान् वक्तु प्रमाणमेवाति- दिशति यद्ब्रह्म इति । यद् वैकुण्ठास्य सर्ववेदान्तप्रत्यय यद् ब्रह्मव । अनेन वृहत्त्व बृहत्व चक्ति प्रामाणिकत्वय । गुणोपसहारन्यायेन सर्वे गुणाश्च । दोपाभावार्थमाह-ज्योति इति, तत् स्वप्रकाश कोटिसूर्याधिकाराशरूपम् । न चनदिदानीमेवैव जातमिति शङ्कनीय यत' सनातनम् अनादिसिमिदमता- दृशमेव ।" (सुबोधिनी १०॥ २८॥१४-१५)। २ मिलाइये, 'यदा भगवान् ईश्वरत्वेन तेपा हृदये जात तदा यक्षर मपि लोकत्वेनाविर्भूतम्' ( सुबोधिनी १०।२८।१४)।
तृतीयोऽध्यायः मूलरूपविवेकः इति केपाश्चिद् गुणानां माकट्यम्, अन्येषां भगवद्गुणानां तिरोधानम् एव, इति शेयम् । न च, तिरोभावस्य अशानमूलकतया न ब्रह्मणि सः, वाच्यम्; 'माविर्भाव-तिरोभावौ शती व मुरवैरिणः' (सर्वनिर्णयप्र० का० १४०) इति वाक्याद् भगवच्छक्तित्वात् । ननु, 'विद्यमानस्य प्रतीत्यविषयता तिरोभावः । तथा सति सर्वशे ब्रह्मणि न सम्भवस्तस्य । तदानीं जीवस्य अभाचात् तद्-युद्ध यभिप्रायेणापि न वक्तुं शक्यः।' इति चेत्, न; सतः पदार्थस्य स्वकार्याकारित्वं तिरोभाव इति लक्षणात् । अत पव ब्रह्मनिष्ठस्य प्रलयकर्तृत्वादेः प्रपञ्चस्थित्यवसरे स्वकार्या- के प्रत्यक्ष के विषय इस अक्षर रूप में भगवान् के कुछ गुण प्रकट रहते हैं, अन्य भगवदीय गुण तिरोहित ही रहते हैं, ऐसा समझना चाहिए । यह कहना ठीक न होगा कि तिरोमाव अज्ञानमूल्क होता है अतः ब्रह्म में उपपन्न नहीं हो सकता क्योकि श्रीमद्वल्लभाचार्य के तत्वार्थदीप- निबन्ध के 'भाषिर्माव और विरोमाव भगवान विष्णु की दो शक्यिों है' (सर्वनिर्णयप्र० का० १४०) इस वाक्य मे तिरोभाव को भगवान की शक्ति बताया गया है। 'विद्यमान पदार्थ का प्रतीतिविषय न होना तिरोभाव है । ऐसी स्थिति में सर्वश ब्रह्म में तिरोभाव सम्भव नहीं है अर्थात् ब्रहा के सर्वश होने के कारण उससे कुछ भी तिरोहित (या प्रतीति का अविषय ) नहीं हो सकता। उस समय जीव का अभाव होने के कारण यह भी नहीं कहा जा सकता कि जीव की बुद्धि के अभिप्राय से (अर्थात् जीव की दृष्टि से ) तिरोभार कामबन उपपरन होस ।' पूर्वपक्षी का यह रहना जीक नहीं है क्योकि तिरोभाव का लक्षण 'सत् पदार्थ का अपने कार्य को उत्पन्न न करना है। इसीलिये प्रपञ्च की स्थिति के समय ब्रहानिष्ट (अर्थात् ब्रा में विद्यमान) प्रलयकर्तृत्व आदि गुणों का जो तिरोमान ५८ प्रमेयरलाणवे [पूर्वाद कारित्वरूप एव तिरोभावः अङ्गीक्रियते । पचं सर्वन योध्यम् । सद्विषयकप्रतीत्यभावरूपः तु तिरोभाधो मायारुतो यद्ध- जीवधर्मः एतद्-भिन्नः, इति दिक् । प्रहतं यदामः । शानिनां तु सच्चिदानन्दत्य देशकालापरि- च्छिन्नत्व-स्वयंप्रकाशत्व-गुणातीतत्यादिस्यरूपं भासते', 'व्य- तिरेक्रतद्भावाभानिसात, न तु उपलब्धियत्' (ब्रह्मसून ३३५४) इत्यत्र भाप्ये अक्षरस्य इंधा स्फतिनिरूपणात् । अतो ज्ञानिनां प्रकाशमानक्षरे ब्रह्मणि सर्वपां धर्माणां स्वीकार किया जाता है उसका स्वरूप अपने कार्य को उत्पन्न न करना ही है। इसी प्रकार अन्य सभी स्थलों पर भी समझना चाहिये। जिस तिरोभाव का स्वरूप सत् पदार्य को प्रतीति का अभाव है यह मायाकृत है तथा बद्धजीय का धर्म है और इस उपर्युक्त तिरोभाव से भिन्न है। इसे इस प्रकार समझ लेने पर प्रतीयमान अन्तविरोध का मामाधान हो जाता है अत' इससे सम्बद्ध विवेचन को यहीं समात करते हैं। अन प्रकृत रात कहते हैं । शानियों को अक्षर ब्रह्म सचिदानन्द, देशकालापरिच्छिन, स्वयंप्रकाश और गुणातीत रूप में प्रतीत या स्फुरित होता है जैसा कि 'व्यतिरेकस्त दावामाविरवात्, न तूपलब्धियत्' (ब्रासून ३१३१५४) इस सूत्र के अणुभाष्य' में अक्षर से दो रूपों में स्फुरित होने का निरूपण मिलने से सात होता है। सानियों को प्रकाशित अर्थात् प्रतीत या स्फुरित होने वाले अक्षर १ एवं सति सच्चिदानन्दत्वदेशकालापरिच्छेदस्वयप्रकारात्वगुणातीत- स्वादिधर्मवत्त्वेनैव ज्ञानिनाम् अमरविज्ञानम्, भक्तानामेव पुरुषोत्तमाधिष्ठान- त्वेन तथा इति ज्ञेयम्, 'मल्लानामशनि: ( भाग० १०१४३६१७) इति एलोकोक्तरीत्या पुरुषोत्तमस्येव ।" (अणुभाष्यम ३२३५४)।
तृतीयोऽध्यायः] मूलरूपविवेकः ५९ तिरोभायाद एफस्याः तिरोधानशक्तः एव प्राकट्यात्, निर्द्धर्म- कम् इति व्यवतियते। 'संसुप्तवच्छून्यवद् अप्रतय॑म् , तन्मूलभूतं पदमामनन्ति' (भाग०१२।४।२१), "शब्दो न यत्र पुरुकारकवान् क्रियाओं, माया परत्यभिमुसे च विलजमाना। तव पदं भगवतः परमस्य पुंसो, ब्रह्मेति यद्विदुरजससुसं विशोकम् ॥"(भाग०२।७।४७-४८) महा मे सभी धर्मों का तिरोभाव होता है और केवल तिरोधान शक्ति ही प्रक्ट रहती है, अतः यह असर हा निधर्मक कहा जाता है । इस फयन की पुष्टि भागवत के अधोलिखित यापयो से होती है, 'शान्ट पुरष उस मूठभूत पद को संसुल के समान, शन्य के समान और वांगम्य मानते है' (भाग० १२४२१), 'परम पुरष भगवान् का वह पद गिसे ज्ञानी लोग प्रक्ष के रूप में जानते हैं किसी भी शन्द, कारक, प्रिया, धातु या प्रत्यय का अर्थ या विषय नहीं है। माया उसमें छज्जित होकर दूर भागती है। यह परमानन्दम्प एवं दुपामाररूप १. "पादस्वरूपं निरुपति, 'तद्वै पदं भगवतः परमस्य पुंसः' पति शाब्दिक व्यवहारं निराकरोति-'शब्दो न यत्र' इति । भगवत्पदे शर्मत्वाचमावाप्न कारपत्यम्, अक्रियारूपस्यात् तदस्यङ्गयत्वाद्वान धावत्यम्, बप्रमलरूपत्वा प्रत्ययार्यत्वम्, अनेन शन्दे प्रधानरूपत्वाभावे नामारयाता- प्रत्याभावादुपसर्गनिपातार्यत्वं दूरादेव निवारितम् । 'कारकवान किया इति । नामास्यातयोः सम्बन्धरपनाद्वारयापोऽपि न भवतीत्युतम् । भगर- दासया मायास्यवहायंत्ये जीवानामिवानानादिनियुत्तिद्वारा व्यवहार्यत्वं स्यात्, तदपि नास्तोत्याह-'माया परैति' दूरादेवापगच्छति । तस्या गमने हेतुः, विलनमाना इति । इयं परपदासी । जानरपरवाञ्च भगवतः । इयं मोहिका । अत एव तस्या जनम्यामोरपत्वं भगवान् प्रमेयरमाणवे [पूर्वार्द्ध इत्यादिवास्यात् । न तु श्रुत्युक्तधर्मशून्यम् , नया सति असतः सत्ता स्यात् । विश्वतधारुत विश्वतोमुग्यः' (श्वेता० उप०१३) इत्यादिथुत्युक्तधर्मस्वीकारे ओपाधिकपक्षो वा स्यात् । अतो वेदोक्तधर्माणां तिरोभावः एष, न तु अभावः। अभावास्तु अस्मन्मते तिरोभावातिरिक्ता न भवन्ति इति दितीयस्कन्ध- सुबोधिन्याम् । है।' (भाग २१७४७-४८) । यह वेदोक्त धमों से रहित नहीं है, क्योंकि उसे ऐमा मान लेने पर असत् में सत्ताशील होने की बात माननी होगी या 'वह सब ओर नेत्रों वाला और सब ओर मुख वाला है' (श्वेता उप० ३1३) इत्यादि श्रुतियों में कहे गये धर्मों को सीकार करने में पोपाधिक पक्ष सीकार करना होगा। अतः वेदोक्त धों का ब्रहा में तिरोभाव ही स्वीकार करना चाहिए, अभाव नहीं । हमारे मत ( अर्थात् वाल्लभ सिद्धान्त) मे भावों को तिगेमार से अतिरिक्त अर्थात् पृथक् और स्वतन्त्र नहीं माना गया है, यह बात भागवत के द्वितीय स्कन्ध की मुशेरिनी मे स्पष्ट रूप से प्रतिपादित की गयी है। जानातीति । ये वा अभिमुला चकारादनुचराश्च ज्ञानिनो भक्ताश वन सर्वव विलज्जमाना। विशेषतो रज्जा अशतोऽपि कार्याकरण द्योतयति । एव दशभिविशेषणं भगवत्पद लक्षयित्वा तस्य प्रसिद्धिमाह-ब्रह्मेति यद्विदुः इति । यद्भगवत्पदं सर्ववेदान्तविचारका ब्रह्मेति विदु.। तस्मिन्नेव ब्रह्मणि ईश्वरत्वेन कश्चिद्गच्छेत्तदा स भगवान्, पूर्वोक्त तु पदम् । स एव चेलियामको भवेत्तदा परमः, तत्पदम् । स एव चेद्भोक्ता तदा पुमान् । एवं विचारेण ब्रह्मविदोऽपि ब्रह्मेति तद्वन्ति । एवं तस्य प्रसिद्धिमुक्त्वा तस्य सहज फलमाह-अजस्रसुखं विशोकम् इति । परमानन्दो दुखा. भाव फल, सदुमयरूप सदित्यर्थः ।" (सुबोषिनी Asire-४८ ।
तृतीयोऽध्यायः] मूलरूपविवेकः न च एवं, ब्रह्मणि दुःखं नास्ति, इत्युक्तेः दुःसतिरोभाव- स्वीकाराद् दुःखसत्तापत्तिः, इति वाच्यम् । दुःसस्य मायिक- त्वेन मिथ्यात्वात् तदभावस्यापि मिथ्यात्वस्वीकारात् । अतएव कैश्चित् निर्धर्मवादिभिः स्थूलत्वाधभावानां मिथ्यात्वमगी- कृतम् । अन्यथा ह्यभावनिरूपितं द्वैतं स्यादिति । अतो मायिक- धर्माणां भ्रान्तप्रतीतिमारसिद्धानां दुःसादीनां मिथ्यात्वेन तभावस्यापि मिथ्यात्वं, बन्ध्यासुत-तदभावयत् । श्रुत्युक्त- धर्मप्रतियोगिका अभावास्तु तिरोभावात्मका इति विवेकः। अतः तिरोभावस्वीकारे न कश्चिद्दोपः। यह कहना भी ठीक न होगा कि अभाव को निर्गभाव से पृथा न मान कर तिरोभाव रूप ही मानने पर 'नहा में दुग नहीं है ( अर्थात् दुस का अभाव है), इस उक्ति से ब्रहा मे दुःस का तिरोभाव स्वीकार करने के कारण दुःस की सत्ता स्वीकार करने का अनिष्ट प्रसङ्ग उपस्थित होगा क्योंकि दुस के मायिक होने के कारण मिथ्या होने से उसके अभाव (अर्थात् दुपाभाव) को भी मिथ्या स्वीकार किया गया है। इसीलिये ब्रह्म को निधर्मक मानने वाले कुछ चिन्तकों ने स्थूलत्वादि धर्मों के अभाव को भी मिथ्या माना है क्योंकि ऐसा न मानने पर अभावनिरूपित द्वैत को स्वीकार करना होगा । जतः दुःसादि मायिन धर्मों-जिनका भ्रान्त प्रतीनि मान होना सिद्ध है या जिनकी उपलब्धि या सिद्धि पल भ्रान्त प्रतीति से ही होती है- मिथ्या होने के कारण दुःसादि का प्रभाव भी उसी प्रकार मिथ्या है जैसे वन्ध्यापुन और उसका अभाव दोनों समान रूप से मिथ्या हैं। जिन प्रतियोगी वेदोक्त धर्म है ये अमार तिरोभावात्मक है, यह भेद अवधेय है। अतः (उपर्युत प्रकार का विवेक परने के कारण) तिरोभाव स्वीकार करने मे (गिद्धान्ती ३ मत में) कोई दोपः नहीं है।
प्रमेयरत्नार्णवे [पूर्वाद्ध तदेवं तिरोहितसर्वशक्तिकं सर्वव्यवहारातीतम् एक ब्रह्मणो रूपम्। 'ये त्वक्षरमनिदश्यमव्यकं पयुपासते । मर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥” (गीता २२३३) इति गीतावाक्ये एतदेव स्वरूपमुकम् । तथा च पुरुषोत्तमशवाच्यं श्रीकृष्णस्वरूपम् एकम् । अक्षरं द्वितीयम्, तच पूक्तिरीत्या विविधम् , इति ब्रह्मणो रूपत्रयं दर्शितम्। पुरुषोत्तमस्य तस्यैव स्वरूपनियमनादिकार्यसिद्धयर्थं सूर्य- मण्डलादौ पृथिव्या अधिदेवादिपु स्थितं यद् रूपं तदन्तर्यामि- शब्दवाच्यम् । 'य आदित्ये तिष्ठन् मादित्याद् अन्तरो, यम् मादित्यो न वेद, यस्य आदित्यः शरीरम्, य आदित्यम् अन्तरो इस प्रकार ब्रह्म का एक रूप सर्वव्यवहारातीत है जिसकी सारी शक्तियाँ तिरोहित हैं । भगवद्गीता के 'जो लोग अनिर्देश्य, भव्यक्त, सर्वत्रगामी, अचित्य, कूठस्य, भचल और ध्रुव अक्षर तत्त्व की उपासना करते हैं' (गीता १२॥३) इस वाक्य मे इसी स्वरूप का उल्लेस या निरूपण किया गया है। उपयुक्त प्रकार से ब्रह्म का एक रूप तो श्रीकृष्णस्वरूप है जो पुरुपोत्तम शब्द से अभिहित किया जाता है और दूसरा अक्षर है जो पूर्वोक्त रीति से द्विविध है । इस प्रकार ब्रह्म के तीन रूपो का निरूपण किया गया। उपयुक्त पुरुषोत्तम के ही, स्वरूपनियमन आदि कार्यों की सिद्धि पे लिये सूर्यमण्डल आदि तथा पृथिवी के अधिदैव आदि में स्थित रूप को अन्तर्यामी शब्द से अभिहित किया जाता है जैसाकि, 'जो सूर्य में स्थित, सूर्य के भीतर है, जिसे सूर्य नहीं जानता, सूर्य जिसका शरीर है, जो सूर्य के अन्दर रहकर उसका नियमन करता है, यह तुम्हारा - तृतीयोऽध्यायः] मूलरूपवियेकः यमयति, एप त आत्मा अन्तर्याम्यमृतः' (बृह० उप० ३।७।९) इति श्रुतेः, 'भेदव्यपदेशाचान्यः' (ब्रह्मसूत्र १२१०२०) इति सूत्राञ्च । 'य इमं च लोकं, परं च लोकं, सर्वाणि भूतानि अन्तरो यमयति' (वृह० उप० ३७१) इत्युपक्रम्य, 'यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो, यं पृथिवी न वेद, यस्य पृथिवी शरीरं, यः पृथिवीमन्तरो यमयति, एष त आत्मा अन्तर्याम्यमृत' (गृह० उप० ३७३) इति श्रुतेः; 'अन्तर्याम्यधिदेवादिषु तद्धर्मव्यपदेशाद्' (ब्रह्मसूत्र १।२।१८) इति सूत्राच्च । अयं पुरुपशन्देनोच्यते, आरमा अन्तर्यामी अमृत है' (बृह० उप० ३१७९) इत्यादि श्रुति वाक्य तथा 'श्रुति में उसके मिन्न होने का कथन होने वह भन्य है", (ब्रह्मसून १।१।२०) इस ब्रह्मसून से ज्ञात होता है । इसी प्रकार 'जो इस लोक को, परलोक की तथा सम्पूर्ण भूतों को अन्तःस्थित होकर नियमित करता है। (यह० उप० ३७१) इस प्रकार उपक्रम करके कहे गये, 'जो पृथिवी में स्थित, पृथिवी के मीवर है, जिसे पृथिवी नहीं जानती, पृथिवी जिसका शरीर है, जो पृथिवी के अन्दर रहकर उसका नियमन करता है, वह तुम्हारा भारमा अन्तर्यामी अमृत है' ( बृह० उप० ३१७३) इत्यादि श्रुतिवाक्य तथा, 'अधिदेवादि में अन्तर्यामी भगवान ही है, उनके धर्मों का ग्यपदेश होने के कारण (ब्रासून १।२।१८) इस ब्रह्मसूत्र से भी उपर्युक्त मत की ही पुष्टि १. "इतोऽपि सूर्यमण्डलस्थः परमात्मा । भेदव्यपदेशात्, 'य भादित्ये तिष्ठानादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यः शरीर म मादित्यमन्तरी यमयत्येप त आत्मान्तर्याम्पमृत.' (वह० उप० ३१७१९) इति श्रुत्यन्तर माधिदैविकं सूर्यमण्डलाभिमानिम्या भेदेन निर्दिष्टम्, यद्यपि वनाकारो न श्रूयते तथापि हिरण्मयवाक्येनैव वाक्यत्वात्सर्वत्र साकारमेव प्रोति मन्त- ग्यम् ।" (अणुभाष्यम् १।१।२०)। 'अन्तर्याम्यधिदेवादिपु' । अघिदेवादिषु अन्तर्यामी भगवानेव २.
प्रमेयरत्नाणवे [पूर्वा 'विष्णोस्तु त्रीणि रूपाणि पुरुपाख्यान्यथो विदुः । प्रथमं महतः सष्ट्र, द्वितीयं त्वण्डसंस्थितम् । तृतीयं सर्वभूतस्य तानि ज्ञात्वा विमुच्यते ।' इतिवास्यात् । अयं हि सर्वपां लीलावतागणां मत्स्यादीनां भूलम् , 'लीला- वतारान् पुरुपस्य भूम्नः' (भाग० श६४५) इति द्वितीय- स्कन्धात् । 'ते च पुनरवताराः कस्य इत्ययेक्षाया यस्तु भूमा पुस्पो मलाण्डाद् अधिकोऽन्तमिरूपो द्वितीयध्यान उक्तः तस्यावतारा' होती है । इस अन्तर्यामी का अभिधान पुरुष शब्द से किया जाता है, जैसा कि 'ज्ञानियों ने विष्णु के पुरुष नामक तीन रूपों का ज्ञान प्राप्त किया है। इनमें से प्रथम महत्तत्व का स्रष्टा, द्वितीय भण्डसंस्थित और तृतीय सभी भूखों के भीतर स्थित है। इन तीनों रूपों को जान कर व्यक्ति मुक्त हो जाता है।' इस वाक्य से ज्ञात होता है । यह मत्स्य आदि सभी लीलावतारों का मूल है, जैसा कि भागवत के द्वितीय स्कन्ध के, 'भूमा पुरप के लोलावतारों को' ( भाग० २।६। ४५) इत्यादि वाक्य तथा सुनोधिनी में की गयी इस यास्य की, 'वे लीलावतार किस तत्त्व के हैं इस प्रकार की अपेक्षा या पिच्छा के उत्तर में कहते हैं कि वै लीलावतार उस भूमा पुरप के हैं जो ब्रह्माण्ड से भधिक और अन्तर्यामी रूप है था जिसका द्वितीय ध्यान में निरूपण नान्य. तादृशो भवितुमर्हति । ननु चोक्तं भगवति कयं निषिद्धकल्पनमिति तमाह-तद्धर्मव्यपदेशात् । तेषा धर्मा. तदर्मा. तत्प्रयुक्तिबोधकाः । ते विशेषेण भगवत्यपदिश्यन्ते । सर्वेपा तत्तत्कार्यसामथ्यं च भगवती न तु स्वतस्तेषामिति ।" ( अणुभाष्यम् ।।१८)। १. 'यद्यपि भगवत्सृष्टी एवमेवावताररूपम् इति मुरूपः पक्ष तथापि तादृशस्य अवतारत्वेन लोकप्रसिद्धधभावात् लोके यानवतारान् प्राधान्येन मुख्यतया वदन्ति तेषा लीलावतारेति नाम ।' (सुबोधिनी २०६४५)।
तृतीयोऽध्याय.] मूलरूपविवेक. (सुबोधिनी श६४५) इति सुबोधिन्यां व्याख्यातत्वाच्च । द्वितीयध्यानं तु, 'केचित्स्वदेहान्तर्हृदयावकाशे प्रादेशमा पुस्पं वसन्तम्' { भाग० २२२१८) इत्यत्र उक्तम् । एतद्व्याख्याने, "पुरुपादतिरिक्त रूपम् अतिरेकार्य भजन्ते । अतिरिक्तमपि पुरुषा- कारम् । वसन्त तृतीयं पुरुपम् (सुवो० २।२।८) इति सुबोधिन्या- मुक्तम् । एवं सति, 'तृतीयं सर्वभूतस्थम्' इत्यन उक्तम् अन्तर्यामि रूपम् इति सूचितम् । अत एव 'यत्रोद्यतः क्षितितलोद्धरणाय किया गया है, (सुबोधिनी २१६।४५) इस व्याख्या से सिद्ध होता है। द्वितीय ध्यान का निरूपण भागवत के 'कुछ लोग अपने शरीर के मोतर हृदयाकाश में विराजमान प्रादेशमान पुरष को ( धारणा के द्वारा स्मरण करते है ) (भाग० २।२।८) इत्यादि वाक्यों मे हुआ है। भागवत के इस श्लोर की व्याख्या करते हुए सुबोधिनी में कहा गया है कि 'अतिरेक के लिए ये ('अत्यतिष्ठदशाङ्गुलम्' ऋग्वेद १०९०१ इत्यादि वाक्यो से निरूपित ) पुरप से अतिरिक्त रूप का वर्णन करते है। यह अतिरिक्त रूप भी पुरपाकार है। विराजमान तृतीय पुरप को (रमरण करते हैं । (सुनोधिनी २१२१८) । इस प्रकार स्पष्ट है कि सुबोधिनी के उपरिलिखित 'वसन्त तृतीय पुरपं' दस याक्याश से यह सिद्ध होता है कि उपर्युक्त श्लोक (भाग० २।२।८) ओर उसकी सुबोधिनी टीका मे प्रयुक्त पुरप शब्द से 'तृतीय सर्वभूतस्थम्' (इस पाद) में निरूपित अन्तर्यामी रूप का उल्लेस ही अभिप्रेत है। इसीलिये भागवत के 'जहाँ पृथिवी के १. "भगवतो रूपाणि चत्वारि ध्येयानि | अगुष्ठमात्र, प्रादेशमानं पूर्वोक्तव । तत्र स्वनकटय प्रादेशमात्रस्यति । वैश्वानरविद्याया च सिद्ध- त्वात् शुद्ध च सहृदये मात शक्यत्वात् । अथवा "अत्यतिष्ठद्दशागुलम्' (मग्वेद १०१९०१ ) इति पुरुषादतिरिक्त रूपमतिरेकार्य मजन्ते । अति- रिक्तमपि पुरुषाकारम् । वसन्तं तृतीय पुरुषम् । तस्य स्यूलरूप वर्णयति- चतुर्भुजम् इति ।" (सुबोधिनी २।२।८)। । ५ प्रमेयरत्नार्णवे [पूर्वाद्ध विनद्(भाग० २२७।१ ) इत्यस्य आभासे, अन्तर्यामिस्वरूपे 'प्रादेशमात्रं पुरुष वसन्तम्' (भाग०२।२२८) इत्यादिपदेः यनिरूपित भगवत्स्वरूपम् , तस्य अत्र दशावतारा उच्यन्ते" (सुवो० २०७१ आमासे ) इति सुबोधिन्याम् उक्तम् । 'एते चाशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्' (भाग० २३२२८) उद्धार के लिए उद्यत पुरप ने वराह का शरीर धारण किया' ( भाग. २१७१७) इस श्लोक की सुनोधिनी टीका के प्रारम्भ में श्रीवल्लभाचार्य ने कहा है कि-"अन्तर्यामी के स्वरूप में प्रदेशमा पुरुष असन्तम्' (हृदयाकाश में विराजमान प्रादेशमार पुरुष को) इत्यादि पदों से मगवान के जिस स्वरूप का निरूपण किया गया है, उसी के दश अवतारों का यहाँ वर्णन किया गया है" ( सुबो० २१७१ का आभास )। 'यह उस पुरुष के अंश और उसकी कलायें हैं। कृष्ण स्वयं भगवान् (ही) (भाग० ११३१२८ ), इस वाक्य में पुरुष शब्द से १ अन्तर्यामिस्वरूपे 'प्रादेशमात्रं पुरुपं वसन्तम्' (भाग० २१२२८) इत्यादिपदः यनिरूपितं भगवत्स्वरूपं तस्यात्र पदशोऽवतारा उभ्यन्ते । तत्र प्रथमं प्रादेशमारवधर्मस्योत्पत्त्या यद्रूपं तत्प्रथममाह-यत्रोद्यत इति । ब्रह्मणो हि भूम्युद्धारे चिन्ता काचिदुत्पन्ना कथमैनां समुन्नेष्य इति । तदा भगवदधानादन्तर्यामी भगवान् यः प्रादेशमात्रः स आविर्भूत । स प्रादेश- मात्रोऽपि नासापुटनिर्गमनार्थमंगुष्ठशिरोमात्रो भूत्वा पश्चात्स्थूलो जात इति प्रादेशमात्र स्थानसापेक्षं न तु स्वाभाविकमिति व्याख्यातम् । यम एव स्थिती भगवाननन्तो देशकालाद्यपरिच्छिनः क्षितितलोद्धरणाम उद्यतः । यदव भगवानिति विचारितवान् 'भूमिमुन्नेष्यामि' इति तदेव रूपविभ्रत् । न हि तस्य रूपप्रणे देशकालवस्तवाद्यपेक्षा। यतोऽन्तःकरण एव ब्रह्मणः स्थित्वा भम्युतारेच्छयव तव रूपं गृहीतवान् । अतोऽन्तर्यामिणो रूपग्रहणे न काप्य- पेक्षेति सूचनार्थ प्रथममेव वराहावतार उक्तः । पत्रवोद्यत. तव विनत् धृतवान् इति योजना ।' (सुयोघिनो रा७१)।
तृतीयोऽध्यायः] मूलरूपविवेकः ६७ इत्यत्र एप पवान्तर्यामी पुं-शब्देन उक्तः, 'पुंसो नारायणस्य ब्रह्माण्डमृतेः अशाः कलाश्च' (सुवो० १॥३२२८) इति व्याख्या. तत्वात् । अत एव, ‘य आदित्ये तिष्ठन्' (वृह० उप० ३७९) इत्यारभ्य 'स ते आत्मा अन्तर्याम्यमृतः' (वृह० उप० ३७९) इत्यत्र उक्तस्य अन्तर्यामिणो नारायणत्वं म्मयते, 'ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः । केयूरवान्, मकरकुण्डलवान्, किरीटी,हारी,हिरण्मयवपुः धृतशङ्खचक्रः॥ (आदित्यहृद्य, ५५) इति । अतः पुरुषोत्तमस्य रूपान्तरम् अन्तर्यामिसंक्षकम् एकम् , सर्व तस्य अवताराः, 'एते चाशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्' (भाग० १॥३२२८) इति श्रीभागवतवाक्यात् । इसी अन्तर्यामी का उल्लेख किया गया है। इस कथन की पुष्टि इस वाक्य की सुनोधिनी मे 'पुरप के अथात् ब्रह्माण्डमूर्ति नारायण के भंश और उनकी कलायें ( सुबोधिनी १३१२८) इस प्रकार की व्याख्या की जाने में होती है। इसीलिये वृहदारण्यक उपनिषद् मे, 'जो सूर्य में स्थित होते हुए मी' (बृह० उप० ३७१९) इत्यादि वाक्य से प्रारम्भ कर, 'वह तुम्हारा भारमा अन्तर्यामी अमृत है' (वृह ० उप० ३१७४९) इत्यादि पाक्यों में प्रतिपादित जन्तर्यामी को धोलिखित वाक्यों में नारा- -यण के रूप मे स्मरण किया गया है। 'आदित्यमण्डल के मध्य विराजमान केयूर, मकराकृतिकुण्डल, किरीट, हार तथा शह एर घर धारण किये हुए, कमल के भासन पर स्थित, भानन्दात्मक शरीर वाले नारायण का सदैव ध्यान करना चाहिए। (आदित्यहृदय ५५)। अतः पुरुषोत्तम का अन्तर्यामी नामक एक रूपान्तर है ओर सब अवतार उसी के है, जैसाकि भागयत के 'यह उस पुरुष के मंश और उसकी कलायें है। कृग तो स्वय भगवान् (हा) है' (भाग० ११३ २८) इत्यादि वाक्य से ज्ञात होता है। १. द्रष्टव्य, (प० श्रीधर पाठक सम्पादित) अणुभाष्य १।१।१९ ।
६८ प्रमेयरत्नार्णवे [पूर्वाद्ध अक्षरानिर्गमनं येपामन्तर्यामिणाम् उक्तं ते तु पतस्य मुख्यान्तर्यामिणोऽशाः वोध्याः। ते हि आनन्दप्रधाना जीववत् प्रतिशरीरं भिन्ना नियतनियामकत्वधर्माणः तत्तजीवमात्र- नियामकाः। 'जडजीवान्तर्यामिपु एकैकाशप्राकट्याद्' ( अगुभाष्यम् ११११३ ) इति तत्तु समन्वयात्' (ब्रह्ममुन्न १२११३) इति सन- भाप्ये एते एष उक्ताः। अतः परं लीलावताराणां गुणावताराणां च स्वरूपं विविच्यते । तत्र, 'विशुद्धमत्त्वं तय धाम शान्तम्' (भाग० १०।२७।४), 'सत्वं यस्य प्रिया मूर्तिः' ( भाग० १०८।१८), जिन जन्तर्यामियों के अक्षर से निर्गमन की बात कही गयी है उन्हें इस मुख्य अन्तर्यामी के अश समझना चाहिए। वे आनन्दप्रधान, जीवों की ही भॉति प्रतिशरीरभिन्न और केवल उन जीवों के ही निया- मक होते हैं जिनमें वे अन्तर्यामी होते हैं । इस प्रकार उनका धर्म नियतनियामक्त्व है । 'तनु समन्वयात्' (ब्रह्मसून १।११३ ) इस सून के अणुभाप्य में 'जड, जीव और अन्तर्यामियों में क्रमशः सत्, चित्, और भानन्दांश इन एक-एक के ही प्रकट होने से' (अणुभाष्य १1१1३) इस बाक्य मे इन्हीं प्रतिशरीर भिन्न अन्तर्यामियों का उल्लेख किया गया है। अब लीलावतारों तथा गुणावतारों के स्वरूप का विवेचन किया आता है। भागवत के 'आप का धाम ( स्थान, एव तेज ) शान्त एवं विशुद्धसवमय है। (भाग० १०।२७।४), 'सत्व जिसकी प्रिय मूर्ति १. 'तुशब्द. पूर्वपदाव्यावृत्यर्थ । " तत् ग्रीव समवायिकारणम् । कुतः? समन्वयात् सम्यगनुवृत्तवादस्तिमातिप्रियत्वेन सच्चिदानन्दरूपेणान्वयात, नामम् पयोः कार्यम्पत्वात्, प्रकृतेरपि स्वमते तदात्वात् । "नानात्वं स्वैच्छिकमेव जडजीयान्तर्यामिष्वेवेककांशप्राकट्यात् ।' (अणुभाष्यम् १२३)। २. "विशुद्धसत्त्वं तब धाम' इति । शुद्धं रजस्तमोम्यामसम्पृक्तं,
तृतीयोऽध्यायः]
मूलम्पविवेकः
.
'गत्वं विशुद्ध श्रयते भवान् रिगती' (भाग० १०२।३४ ) इत्यादि-
वाक्येभ्यः. प्रारानसत्वाद् इनरद भगवदर्मान्मकंमत्तम् अम्नि,
एवं पाहतग्जम्नमोभ्यामितरं भगवतमात्मक रजम्तममी अपि
म्नः। शिशुमसत्व तव धाम शान्तम् (भाग००२७) इत्यस्य
सुयोधिन्याम् प्रयाणामन्यप्राशतन्वनिम्पणात ! 'मत्तं रवस्तम
है। (भाग० १०१८९।१८), 'आप (दिक धर्म की स्थिति के लिए
विशुद्ध मरग का भाशय लेग" ( भाग-१०३४): दिया
गे मान हो कि पारन गर से भिन्न ( अन्न) भगवसमालक
गर पालित्य (भी) गोमार प्रास्त गांगुनमा प्रारत
तमोगुण से भिन्न अन्य भगवान्मक रजोगुण पत गरमांमक
तमोगुनी। रम पमा पी मिति मागण, भारका धाम
(पान) arryiगुस्सयमय है (भाग 1912116)
गोरी मुधिनी व्यार में तीनों गुगी माना गने ग
निरूपण मिरममे होनी हामी प्रकार भागवत पे, 'सरप, राम भार
यिोपण गुसं गरवनाप्यमारत सा सर धाम स्थान, गवं विशुद्ध
यसुदेवादिदतम्' (भाग ४१२३) नि. तर मगपति इति
यामुय : नि पाम से मोऽपि गान्तिरमर भगवतेज सन्यमेष या ।
शिरमा गुरमत्यानरेगापि अमिरितं तरोन्म सलमान
भाति, अन दर गुग परमानमय, बह-मान्नमदति । परमा
ति. सपा, मनायादागरभंश माि. अग्यपारपं
योपश, पात, पप गा मजेत नः शानिरा परपराधा"
(मुबोधिनी १०१२७४)।
१. स्पिती मिरयम् (दिश्यमंस्पिरपम् मुगिनी )
यदा भवान् विगुरं गत्वं गारगुप ययते ।' (मुगपना १०३४)।
२ " गुणा ATESTमुश्विदानापमं प्रापया मिमा,
बसपा प्रतिविमि. मुरत गरयं पिम्मानिव निगर
७० प्रमेयरलाणवे (पूर्वार्द्ध इति निर्गुणस्य गुणाः प्रयः (भाग० २।५१८) इत्यत्र भगवद्- गुणत्वेन त्रयाणामुक्तः, सुवोधिन्यां' तथा व्याख्यातत्वाच्च । तन अप्राकृतसत्वं स्वचिफोर्पितमत्स्यावाति विधाय तत्र अयःपिण्डे वह्निरिवाविर्भूय तत्तत्कार्याणि करोति । अस्मिन् विशुद्धसत्वात्मके विग्रहे जगरिस्थतिकार्यचिकीर्षया यहय. तमस ये सीन निर्गुण पुरण के तीन गुण है' (भाग० २।५।१८) इरा श्लोक में तीनों के भगवान् का गुण कहे जाने से तथा इस श्लोक की सुबोधिनी व्याख्या में इनकी इसी प्रकार की व्याख्या उपलब्ध होने से भी उपर्युक्त कथन की पुष्टि होती है । भगवान् जन मत्स्यादि रूप में अवतरित होना चाहते है तो अप्राकृत सत्त्व को अपनी अभिलपित मत्स्यादि आकृति का कर के उसमे लौहपिण्ड या अयोगोलक में अमि के समान आविर्भूत होकर उस अवतार के द्वारा सम्पन्न किये जाने वाले कार्यों को करते हैं । इस विशुद्ध सत्तात्मक तस्यवाप्रसिद्धत्याद्, गुणावताराने भगवतोऽप्राकृता न भवेयुः ।" (सुबोधिनी १०१२७१४)। १. 'यथोर्णनामिः सृष्टयर्थमेवामूर्मामुद्वमते तथा भगवानपि विविध- सृष्टययं श्रीन गुणानुद्वमते । गुणरूपत्वाच्च गुणशब्दव्यवहारः। सद्रूपेण निर्गतं सत्त्वम् इत्युच्यते । देवलचिद्रूपेण निर्गत क्रियान्तिप्रधानत्वात् सदानन्दा- भावाच्च रज इत्युच्यते । आनन्दाशाच्च तमः । ते भगवद्रूपा एव भगवता सृष्टः । न च भगवति ते पूर्व स्थिताः तथा सति भगवदात्मकास्ते न भवेयुः । यथा कापस नहि सूत्रम, तदेव हि पश्चात् स्वावयवः पौर्वापर्यमा- पद्यमान सूत्रतामापद्यते । अत एव भगवानिर्गुणः ।' (सुबोधिनी २१५/१८) । २. 'ते नमो गुणाः ब्रह्मविष्णुशिवेष्वेव प्रतिष्टिताः। अतः सच्चिदा- नन्दधर्मस्वाद् यदा ब्रह्मादिवितरापेक्षा तदेतरभजनम् । सति सत्त्वं, चिति रज आनन्दस्तमसीति । भगवास्तु कदाचिद् विष्णोः सत्वमाधारत्वेन गृलाति, मदि न केवलः समायाति।' (सुबोधिनी १०२७४)।
तृतीयोऽध्याय ] मूलरूपविवेक . योगोलकन्यायेन आविश्य विष्णुसंशा भजते । स गुणाचतारो विष्णु । अप्राकृते रजसि विग्रहभूते वह्नययोगोलकन्यायेन प्रविश्य ब्रह्मसमा भजते । अप्राकृते तमसि विग्रहभूते वह्नय- योगोलकन्यायेन प्रविष्ट शिवशदवाच्यो भवति । एने प्रयो गुणावतारा अप्रास्तदेहा अपि, प्राकृतसत्त्व रजस्तमसा, 'सत्त्वं रजस्तम इति प्रतेर्गुणास्तैर्युक्त पर पुरुष" (भाग० ११२००३) इत्यादिप्रमाणसिद्धाना पूर्वोक्तमगरद्धर्म- सत्त्वादिभ्यो भिनाना नियामकतया सगुणा उच्यन्ते । अत पचैते पुराणादिपु परब्रह्मधर्मवत्त्वेन स्तूयन्ते, अशिना कृष्णेन विग्रह में जगत् की स्थिति ( अर्थात् प्रपञ्च का पालन-पोपण) करने की इच्छा से पहषयोगोलकन्याय से प्रविष्ट होकर वे 'विष्णु' इस नाम का धारण करते हैं। यह गुणावतार विष्णु कहा जाता है । विग्रहभूत अर्थात् शरीराकार म परिणत अप्राकृत रजोगुण म पहपयोगोलक न्याय से प्रविष्ट होकर वे ब्रह्मा' इस नाम को धारण करते है, तथा विग्रहभूत अर्थात् देहाकार म परिणत अप्राकृत तमोगुण में वहययोगोलक याय से प्रविष्ट होकर ये 'शिव' शब्द के याच्य हो जाते हैं। यह तीनों गुणावतार अप्राकृत शरीर वाले होते हुए भी, 'सत्त्व, रजस् और तमस् य प्रकृति के गुण है, उनसे युक्त परम पुरप (इम नगत् की स्थिति आदि के लिये हरि, विरिशि जोर हर जादि नाम धारण परता है) (भाग० ११२।२३) इत्यादि आतवाक्यों (अथात् बाट प्रमाण) से सिद्ध पर्योत्त भगवद्धर्म रूप सत्यादि से भिन्न सन्यादि गुणा के नियामक होने के कारण मगुण कहलात है । सीलिये पुराणादि म हा गुणायतारा की अपने अशी कृष्ण मे अमिा हाने र कारण परग्रहा १ सत्य रजस्तम इति प्रकृतेर्गुणास्तयुक्त पर पुरुष एक इहास्यपत्ते। स्थित्यादये हरि विरिबि-हरेति सना श्रेयोसितम सन सत्वननोनूगा स्यु । (भाग. १।२।२३)।
७२ प्रमैयरत्नाणवे [पूर्वा " ५ भाग अभेदात् । जन एताचान् विशेषः, त्रयाणां गुणायतारत्वेऽपि विष्णो चतुर्भुजाद्याकागणां पोताम्बर-चनमालादीनां पुरुषोत्तम धर्माणां पहना प्रकटत्वेन ब्राह्म-शिवापेक्षया उन्हावं यम् । अत एव 'श्रयासि तन सलु सत्त्वतनाणा स्यु १।२।२३) इति श्रीभागवत उक्तम् । एतावता ग्रन्थेन सिद्धमेतत् । मूलरूपस्य चत्वारि रूपाणि। के धर्मों से युक्त होने के रूप में स्तुनि उपलब्ध होती है । इस सन्दर्भ में एक विशेष अवषेय बात यह है कि यद्यपि विष्णु, ब्रहा और शिर तीनी ही गुणावतार है तथापि विष्णु में चतुर्भुजादि आकार, पीताम्बर तथा चनमाला आदि पुरुषोत्तम के अनेक धर्मों के प्रकट होने के कारण उन्हे ब्रह्मा और शिर गुणावतारी की अपेक्षा उत्कृष्ट समदाना चाहिए । इमी- लिये श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि 'उपर्युक तीनों गुणावतारों में से सत्त्वमूति विष्णु से मनुष्यों के श्रेय को सिद्धि होती है ( भाग० १२।२३)। उपर्युक्त विवेचन से यह सिद्ध हुआ कि मूल रूप से चार रूप १. "तथा अद्वते गुणा कार्याय करणत्वेन गृहीता अपि निरन्तरग्रहणाद् उपाधिरूपा जाता., तेन यद्भजन तदुपाधावेव पर्यवसित भवतीति सरवी- पाधिरेव सेव्य इत्यभिप्रायेणाह-श्रेयासि' इति । तय निर्णय सेवकः सेव्य यादृश रूप पश्यति स्वस्यापि तादृशं रूपं सम्पादयति । साधनानि च तानि यद्यपि अपहतपाप्मान भगवन्तमन्यथाकर्तुं न शक्नुवन्ति तथापि जीवमन्यथा कुर्वत्येव । ततश्च यादृशेन रूपेण सामनेन वा नान्यथाभाव. तादृशरूपवानेवेश्वर. सेव्य , नाशशद्वाभावात् । .. श्रेयासि शुभफलानि तत्र भजनीयरूपेषु खलु इति समति. सोपपत्तिका सा निरूपिता। 'सत्त्वतनो.' इति तनुशब्दात् दृष्टोपामित्वमुक्तम् । नृणा साधारण जीवानाम् ।" (सुबोधिनी १९२१२३)। २. दम्य, बालाघ', इलोक १०-१६ ।
तृतीयोऽध्याय:]
मूलस्पविवेकः
७३
नन पकं पुरुषोत्तमस्वरूपं श्रीकृष्णशब्दवाच्यम् । एकम् अक्षरं
स्वरूपम्, तय पूर्वोक्तरीत्या द्विविधम् । एकम् अन्तर्यामि-
रूपम् । पवं चातुर्विध्यं ज्ञेयम् । इदमलोकिकं प्रमेयं वेदान्त-
प्रतिपाद्यं भगवत्यापैकलभ्यं यथावुद्धि मया निरूपितम् ।
विशेषजिज्ञासायां तु भाग्य-सुबोधिनी-निवन्ध विद्वन्मण्डनादयो
ग्रन्था अवलोकनीया इत्यले लेखेन ।
इति श्रीमद्गोवर्धनधर-श्रीवल्लमाचार्य-श्रीविट्ठलेश्वरचरणानुचरसेवकन
लालमटोपनामवालकृष्णमटेन कृते प्रमेयरलाणवे
मूलरूपविवेकः सम्पूर्णः ॥ ३ ॥
है । इनमें से एक पुरुपोत्तम सरूप है ओर श्रीकृष्ण शब्द का वाच्य
है। एक अक्षर म्वरूप है जो पूर्वोक्त रीति से द्विविध है । एक अन्तर्यामी
रूप है । इस प्रकार चतुर्विध रूप समझने चाहिए। यह अलौकिक प्रमेय
वेदान्तप्रतिपाद्य है और केवल भगवत्कृपा से ही प्राप्त हो सकता है।
मैंने इस प्रमेय का अपनी बुद्धि के अनुसार निरूपण किया है। इस
विषय मे विशेष जिशामा होने पर अणुमाप्य, भागवत की सुबोधिनी टीका,
तत्त्वार्थदीपनिबन्ध तथा विद्वन्मण्टन आदि ग्रन्थ देगने चाहिए, अतः
इम विवेचन को यही समात पिया जाता है।
श्रीगोवर्द्धनधर, श्रीवल्लभाचार्य तथा श्रीनिहलनाथ के चरणो के
अनुगामी (अथवा अनुचरों के) सेवक, लालूभट्ट के नाम से प्रसिद्ध
यालकृष्णमट्ट के द्वारा विरचित प्रमेयरग्नार्णव का मूलरूपविवेक नामक
तृतीय अध्याय समाम दुआ ॥३॥
पुष्टिविवेकः (चतुर्थोऽध्यायः) अथे विचार्यते, का पुष्टिः कश्च पुष्टिमार्ग इति । तत्र, 'पोषण तदनुग्रहः' (भाग० २२१०४ ) इति शुकवास्यात् 'कृष्णानुग्रहरूपा हि पुष्टिः कालादियाधिका" (भागवतार्थप्र० का धार) इति नियन्योक्तत्वाच्च अनुग्रहरूपो भगवद्धर्मः पुष्टिः । पुष्टि-विवेक (चतुर्थ अध्याय) अब हम इस विषय का विचार करेंगे कि पुष्टि किसे कहते हैं और पुष्टिमार्ग कौन सा है । शुकदेव के 'पोपण भगवान् के अनुग्रह को कहते है' (भाग २।१०१४ ) तथा तत्त्वदीपनिबन्ध के 'कृष्णानुग्रहरूपा पुष्टि काल आदि का बाध करने वाली है' (भागवतार्थप्र का० ६२) इत्यादि वाक्यों से ज्ञात होता है कि अनुग्रहरूप भगवान् का धर्म ( अर्थात् भगवान् का अनुग्रहरूप धर्म) पुष्टि कहा जाता है । पुष्टि १. "पुष्टि लक्षयति-'तदतुग्रह' इति । तस्य वैकुण्ठस्य जितेपु स्वा. धौनीकृतेषु योऽयमनुग्रह तेषु मर्यादार्थ सप्त पृथक्कृत्य शिष्टेष्वनुग्रहः । महा- भूतैवारमट्टये च नानुग्रहः । तत्र मदिव।" (सुबोधिनी २०१०४)। 'प्रसादकृपादोन्यस्येव पर्याया.। एवञ्च कालादिनिवर्तकोऽनुग्रहापरनामा वीर्य- विशेषरूपी भगवद्धर्म. पुष्टिरित सिद्धम्। ( भागवतार्यप्र० योजना ६॥३)। २. रक्षा हिं त्रयोद्विषा स्वस्पमाननाशिका। पुष्टिस्तु तेषामपि स्थभावस्य वाधिका यया स्वरूपतः सन्तोऽपि न यो दिपन्ति, हताश्च मुक्ता भवन्ति । यतः प्रकारोऽपि बबालौकिक इत्पर्य ।' (भागवतार्थ- प्रकरण योजना हार)1 चतुर्थोऽध्याय ] पुष्टिविवेक. सा च विलक्षणा लोकिकालोकिफलसाधिका, अतोऽधिकारि- विशेषे निःसाधने श्लाघ्यफलं जनयन्ती तेनेव अनुमीयते । तदुक्तं निबन्धे, 'अनुपही लोकसिद्धो गूढभावानिरूपितः" (भाग यतार्थप्र० का० २) इति । अर्थस्तु-गूढभावाद् अनुग्रहस्य गूढत्वात् लोकसिद्ध लोके उत्तमफलजननेन प्रकटोभूतः, अनुग्रह निरूपित पप्ठस्कन्धे वर्णितः। तत्कार्य विवेचितम् टाविक एव अलौक्फि फ्लोकी सिद्धि या प्राप्ति का विलक्षण साधन है, जिसने निःसाधन अधिकारी को भी टलाध्य पल की प्राति होती है, अत पुष्टि का अनुमान नि साधन व्यक्ति के श्लाघनीय पली को प्रात करने प तथ्य से होता है । इसीलिये तत्त्वदीपनिनन्ध में कहा गया है कि 'अनुग्रह के गृह होने के कारण लोकप्रसिद्ध अनुग्रह का निरूपण किया गया है' (मागवतार्थप्र० पा० ६२)। निबन्ध में इस वाक्य का अर्थ यह है कि गूढमावात् अर्थात् अनुग्रह के गूढ होने के कारण, लोकसिद्ध भयात् लोर में उत्तम पलों को उत्पन्न करने या प्राप्त कराने के द्वारा प्रकट हुए अनुग्रह का निरूपण अर्थात् षष्ठ स्कन्ध में वर्णन किया गया है। अजामिल आदि की कथाओं में अनुग्रह के कार्य का १. "ननु, अनुग्रहस्य अप्रसिद्धत्वाल्लक्षणमसम्भवोरयाकाक्षायामाहु 'अनुग्रहो लोकसिद्ध' इति । अनुग्रह कृपापरपर्यायो मनस रमनो वा धर्मविशेष इच्छादिव्यतिरिक्तो, लोकसिद्ध इति लोके क्षोणधनस्याघमर्मणस्य उत्तमणे स्वल्पधनग्रहणेनानृणित्वसम्पादने, स्मृतो प्रायश्चितायतस्य पापनिवृत्तपे स्वल्पप्रायश्चित्तबोधने घ पार्षदनुग्रहत्वादिरूपेण प्रसिद्धोऽतो न लक्षणमसम्भवोत्यर्थ । ननु, अन्यथमो भगवति बुत उच्यत इत्यत आहे गुढेत्यादि । कम्पनाधिकरणविषयवारयेन प्रलयकर्तृत्वेन च भगवत रत्वा- बगमात् सन प्रसिद्धो वस्तुतस्त्वस्तीति गूढभावात् । अनुकृत्यधिकरणे सर्वस्य भगवदनुकारिताया सिद्धत्याल्लौकिकेन तेनानुमेय , सोऽत्र मूलरूपे कार्यद्वारा निश्चायित इत्यर्थ ।" (भागवतार्थप्र० योजना ६०२)। - ७६ प्रमेयरलार्णवे [पूर्वाद्ध अजामिलादिपु, यतो निन्दितकर्मनिरतः संकेतितभगवन्नाम्ना मोचितः, विश्वरूप-दधीचि-वृनाणां कर्मि-शानि भक्तानां हन्ता', अनिष्टफलभोगयोग्यः शमोऽपि पुष्टया रक्षितः, दितिगी वाहतोऽपि न मृतः प्रत्युत बहुत्वं सम्पन्नम् । अन एव उस्म्, .. . 'एवमिन्द्रे महापुष्टिः सर्ववाधा निरूपिता । सर्वपापकरूपा हि दैत्ये पुष्टिरयोच्यते ॥ (भागवतार्थप्र० विवेचन दिया गया है, क्योंकि वहाँ यह कहा गया हे निन्दित कर्म करने वाला अजामिल भगवान् ने नाम का उच्चारण करने मान से भगवान् द्वारा ( अनुग्रह कर) मुक्त कर दिया गया, कर्मनिष्ठ विश्वम्प, ज्ञानी दधीचि जार भक्तप्रपर वृत्र को मार डालने वाले और अनिष्ट पलों का भोग करने के योग्य इन्द्र की भी भगवान् ने जनुग्रह पे द्वारा रक्षा की गयी, तथा दिति का गर्भ दद्रे वनप्रहार मे भी मरा नहीं प्रत्युत उसके अनेक भाग हो गये । इसीलिये भागवतार्थप्रकरण में कहा गया है, 'इस प्रकार दयप्रकरण में इन्द्र के सन्दर्भ में सर्वबाश पुष्टि का निरूपण किया गया है और उसके बाद दैत्यप्रकरण में सर्वबाधकरूपा (अर्थात् काल, कर्म और स्वभाव का वाध करनेवाली) पुष्टि का निरूपण किया गया १. 'दिष्टया भवान् मे समुपस्थितो रिपु यो ब्रह्महा, गुहा, भ्रातृहा छ ।' (भाग० ६।११.१४)। २. अत्र च वेदतात्पर्यानभिनयमदूतताडनाद् धर्मालोक्कर्तुविश्वरूपस्य पापस्य वृत्रस्य च हननाद् दितिगर्भच्छेदनाच्च सामान्यरक्षणसमन्वय , एवम- जामिलदुष्कर्मण इन्द्रमृत्योर्वृनस्वभावकमणो, दितेः स्वभावस्थ, मरुता काल कर्मस्वभाना वाधनाच्च विशेषलक्षणसमन्वयः।' (भागवतार्थन० योजना "६३)। ३. "प्रकरणमुपसहरन्ति, 'एवम्' इत्यादि। एवमत्र साद्वैः सप्तत्रिशद्धि देवप्रकरण विचारितम् । अत' परमष्टभिः दैत्यप्रकरणं विचारयन्ति- ७७ चतुर्थोऽध्याय.] पुष्टिविवेक. का० ६।९१) । महापुष्टित्वं तु बलवत्प्रतियन्धनिवृत्तिपूर्वक- स्वपादाचाप्तिसाधकत्यम् । 'सर्वबाधा' इत्यन सर्वशब्देन काल- कर्म स्वभावा ग्राहाः। तदिह कुत्सितकर्मणामनिएफलाजनक त्वेन तद्वाध इन्द्रे स्पष्टः। दितिगर्भप्रसझे वज्रप्रहारस्य प्राण- वियोगसोधकत्वस्वभाववाधो शेयः, 'न ममार दितेर्गर्भ. श्रीनिवासानुकम्पया। बहुधा कुलिशक्षुण्णो, द्रोण्यस्वेण यथा भवान् ॥' (भाग० ६।१८६५) इति वाक्यात् । एवमन्यनापि योध्यम् । है।' (भागवतार्थप्र० का० ६९१)। महापुष्टि भगवान् के उस अनुग्रह को कहते हैं जो भगवत्यासि रे मार्ग मे जानेवाली बड़ी-बड़ी बाधाओं को दूर कर उसे भगवञ्चरणारपिन्दों की प्राप्ति करा देने का. साधन उनता है । श्लोक में प्रयुक्त 'सर्वदाधा' पद में आये 'सर्व' शब्द से काल, कर्म और स्वभाव का ग्रहण करना चाहिए । इस प्रकार इन्द्र पर अनुग्रह के प्रसङ्गमे इन्द्र के दुष्कमों के अनिष्ट पल की उत्पत्ति न होने देने के कारण, भगवान् के अनुग्रह से उन कर्मों का बाध होना स्पष्ट है। दिति के गर्भ पर अनुग्रह के प्रसङ्ग में भगवदनुग्रह से वज्रप्रहार के माणों को वियुक्त कर देने (अर्थात् मार डालने) के साधन होने के स्वभाव का नाध हुआ समझना चाहिए, जैसा कि भागवत के, "जिस प्रकार अश्वत्थामा के अस्त्र के प्रहार से आप नहीं मरे थे, उसी प्रकार इन्द्र के वज्र के प्रहार से टुकडे टुकडे हो जाने पर मी दिति के गर्म की मृत्यु नहीं हुई, क्योंकि उस पर भगवान् श्रीनिवास की कृपा थी' (भाग० ६।१८६५) इस वाक्य से ज्ञात होता है। इसी प्रकार अन्यन भी समझना चाहिए। 'सर्व' इत्यादि । "देत्ये' इति, दैत्यप्रकरणे 'सर्वबाधकरूपा' इति काल- कर्मस्वभाववाधिका । तेन पूर्वस्माद्विशेष उक्त । नामप्रकरणे कर्मवाधिका, रूपप्रकरणे हर्यश्वादोना कर्मवाधिका, वृत्रस्य स्वभाववाधिका इति ततोऽधिका अत्र तु मरुता त्रितयवाधिकेति ।" (भागवतार्थप्र० योजना ६।९१)।
प्रमेयरत्नार्णवे [ पूर्वा इयं च पुष्टिः चतुर्विधपुमर्थान् साधयति । अत एव सुवोधिन्याम् उक्तम् , 'सहस्रार्जुनो भगवदंशः पुष्टया राजा बभूव' इति । निवन्धे देवहतिमुक्तिश्च पुष्टिकारणिका निरूपिता। योगादीनां तु व्यापारत्वम् उक्तमेव, अजामिलादिपु नामा- दीनामिव । तदुक्तं निवन्धे, यह पुष्टि चार प्रकार के पुरुषार्थों की सिद्धि या प्राप्ति करा देती हैं। इसीलिये सुबोधिनीमें कहा गया है कि 'मगवदंश सहस्रार्जुन मगत्कृपा से राजा हुआ, तथा तत्त्वदीपनिबन्ध में देवहूति को भगवद्- नुग्रह से मुक्ति प्राप्त होने का निरूपण किया गया है। अजामिल आदि की कथाओं में नाम आदि के समान ही योगादि का व्यापारत्व तो (भागवत और तत्त्वदीपनिबन्ध मे, प्रकृत प्रकरण के) पहले ही निरूपित किया जा चुका है। इसीलिये निनन्ध मे गहा गया है कि, '(पुष्टि का कालादिवाधिका होना केवल मनुष्योंके लिये ही नहीं अपितु देवताओं के लिये भो दुज्ञेय है, यह बताने के लिये ) कालादिनिवर्तक के व्यापारभूत नामादि अर्यात् भगवन्नाम, भगवद्धधान तथा भगवदर्चन आदि का कालादिनिवर्तक के रूप में निरूपण किया गया है । नाम आदि मे जो कालादिनिवर्तकत्य प्रतिपादित किया गया है वह (नामत्वादि की दृष्टि से नहीं प्रत्युत ) नामादि में भगवान् के वीर्य की दृष्टि से ही। (भाग- १. "ननु अत्र कालादिनिवर्तकलं नामादिषु प्रतीयते न तु पुष्टी इति कथं तस्याः तपात्वमित्यत आहु , 'देव'-इत्यादि । न हि पुष्टे तथात्वं मनुष्या- गामेव दुञ्जयम विन्तु देवानामपि, इति देवगुह्यत्वज्ञापनार्थ सद्यापारभूतं नामादिकं तयात्वेन निरूप्यत इति शेष. । ननु कथमेतदवगम्यत इत्याका- झायामाहुः, 'पुर' इत्यादि । अत्र हि नामादिषु यत्तथात्वं निरूप्यते तन्न नामत्वादिकं पुरस्कृत्य किन्तु, 'नामव्याहरणं विष्णोः महापुरुष- पूजाया:सिद्धिः काम्यानुपनिकी' इत्यादिकथनाद्भगवद्वीयं पुरस्कृत्य इति तेनावगम्यत इत्यर्थ. " ( भागवताप्र० योजना ६३)।
चतुर्थोऽध्यायः] पुष्टिविवेकः ७९ 'नामध्यानार्चनादिक 1 पुरस्कृत्य हरे वीर्य नामादिषु निरुप्यते ॥ (भागवतार्थप्र० का० ६.३) इति । इदं सामान्यानुग्रहस्वरूपम् । पुष्टिविशेपस्तु केवलं भगवत्स्वरूपफलिकां भक्ति साध- यति । अतस्तजन्या भक्तिः पुष्टिभक्तिः इत्युच्यते । तदुक्तं सिद्धान्तमुकावल्याम् , 'अनुग्रहः पुष्टिमार्गे नियामक इति स्थितिः (सिद्धान्तमुक्तावली, १८) इति । 'पुष्टिमार्गे' पुष्टिभक्तिमार्ग इत्यर्थः । 'तदनुग्रहैकलभ्यां भक्ति च नुमस्तदीयांश्च' (भक्तिहेतु- वतार्थ प्र० का० ६.३)। यह सामान्य अनुग्रह का स्वरूप है । पुष्टि विशेष अर्थात् विशेष अनुग्रह ते भगवत्स्वरूप ( की उपलब्धि) रूप फल की देने वाली भक्ति सम्पादित या सिद्ध होती है, अतः उस विशेष अनुग्रह से उत्पन्न होनेवाली भक्ति पुष्टिभक्ति कही जाती है । इसीलिये सिद्धान्तमुक्तावली में श्रीवल्लभाचार्य ने कहा है, 'पुष्टिमार्ग में अनुग्रह ही नियामक है, ऐसी व्यवस्था है' (सिद्धान्तमुक्तावली १८)। इस श्लोकाध में प्रयुक्त 'पुष्टिमार्गे' इस पद का अर्थ है पुष्टिभक्तिमार्ग मे। भक्तिहेतुनिर्णय के प्रारम्भ में गोस्वामी विट्ठलनाथ ने भी 'हम केवल भगवान् कृष्ण के अनुग्रह से ही प्राप्त हो सकने वाली १. देवगुह्मत्वसिद्धयर्थ नामध्यानार्चनादिकम् । पुरस्कृत्य हरेर्योयं नामादिषु निरूप्यते ॥ (भागवतार्थप्र.का० ६१३) २. इस वाक्य का अर्थ करते हुए बालकृष्णभट्ट लिखते हैं, "पुष्टिमार्ग इति पुष्टिजन्यो भक्तिमार्ग इत्यर्थः । पुष्टिश्च 'पोषणं तदनुग्रहः' (भाग० २।१०।४) इति वाक्यादनुग्रहरूपी भगवद्धर्मः सर्वलोकिकोत्तम- फलसाधकः । तरजन्यत्वं पुष्टिभक्तो । अत्र पुष्टिशब्देन पुष्टिविशेषो प्राह्मः।" अतः साधारणानुग्रहो लौकिकफलसाधकः, विशेषानुग्रहस्तादृरभक्तिरिति निष्कर्षः।" पुष्टिजन्या भक्तिः पुष्टिभक्तिः । अत एवोक्तं श्रीमत्प्रभुचरण: 'तदनुग्रहकलम्या भक्ति च तुम' ( भक्ति-हेतुनिर्णयः, १) इति भक्ति- हैतुनिर्णये ।" ( सिद्धान्तमुक्तावलीयोजना १८)।
६० प्रमेयरत्नाणवे [पूर्वाद्ध . निर्णय ,१) इति भक्तिहेतुनिर्णयेऽपि । अत एव भक्त्या कार्य रूपया पुििवशेषोऽनुमीयते । तदुक्त पुष्टिप्रवाहमर्यादा निरूपणे', 'भचिमार्गस्य कथनाद पुष्टिरस्तीति निश्चय' (पुष्टिप्र० २) इति । अयमर्थ , 'मनागांतरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽ म्बुघी, (भाग० ३।०९।११) इत्यारभ्य, स एव भक्तियोगात्य मनि तथा भगवान कृष्ण क अनन्य भक्तों को नमस्कार करते हैं" (भत्ति हतुनिर्णय, १), इस श्लोक म इसी आशय को अभिव्यक्त किया है । इसीलिये कार्यरूप भक्ति य द्वारा पुष्टिविशेष अर्थात् विशेष अनुग्रह का अनुमान पिया जाता है। इसीलिये श्रीवल्लभाचार्यने पुष्टिप्रवाहमर्यादा भेद म कहा है कि, '(शास्त्रों म) मक्तिमार्ग का प्रतिपादन उपलब्ध होने से ( उस भक्ति की बीजभूत भगवद्धर्मरूप) पुष्टिक होने का निश्चय होता है' (पुष्प्रि०२)। श्रीवल्लभाचार्य के इस वाक्य का तात्पर्य यह है कि भागवत म य क प्रारम्भ में, 'जिस प्रकार गङ्गाजल पर्वतादि को पार कर के मी समुद्र में अविच्छिन्न रूप से गिरता है उसी प्रकार लौकिक और वैदिक प्रतिबन्धों को दूर कर मन को भगवान् में तैलधारा वदनवच्छिन्न रूप स कगा दमा (निर्गुण भक्तियाग का रक्षण कहा गया है), (भाग० ३।२९।११) इस श्लोक से प्रारम्भ कर, 'वहा १ द्रष्टव्य श्रीमत्पीताम्बरकृत पुष्टिप्रवाहमर्यादाभेदव्याख्या, २ । २ मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सबगुहाशये। मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसाम्बुधौ ।। ( भाग० ३।२९:११ ) ३ 'ब्रह्मादिदुलभकय रायामानापनोदक कृष्णम । तदनुग्रहक्लम्या भक्तिं च नुमस्तदीपाश्च ॥ (भक्तिहनिर्णय ,१) ४ 'सर्वगुहाशये मयि भगवति प्रतिवघरहिता अविच्छिन्ना या मनोगति । पवतादिभदनमपि कृत्वा यथा गङ्गाम्भोऽम्वुधौ गच्छति, तथा लौकिकवैदिकप्रतिव घान् दूरीकृत्य या भगवति मनसो गति । मनस इत्युपलक्षण, दुलभत्वाय वा यथा कायिकगतिर्गोपिकानाम | सा गति चतुर्थोऽध्यायः] पुष्टिविवेकः ८१ आत्यन्तिक उदाहृतः' (भाग० ३१२९।१४) इत्यन्तं, ग्रन्थादी भागवते भक्तिमार्गस्य निर्गुणस्य निरूपणाद् भक्तिसत्तायां सिद्धायां तादृश्या भक्त्या तत्कारणीभूता पुष्टिः अनुग्रहरूपा भगवति अस्ति इति निश्चय इत्यर्थः। सापि ईशानुकथा- शब्देन नवमस्कन्धे व्यवहियते । ईशस्य अनुगामिनां कथा भगवच्छ्रवणादिरूपं चरित्रम् इत्यर्थः । तञ्च द्विविधं मर्यादा- भक्तिरूपं, पुष्टिरूपं च । तर विशेषानुग्रहजन्या या भक्तिः सा पुष्टिभक्तिः। तल्लक्षणं तु भगवत्स्वरूपातिरिफ्तफलाकावा. भक्तियोग कहा जाता है और उसे ही आत्यन्तिक कहा गया है" (भाग० ३।२९।१४ ) इस श्लोक तक निर्गुण भक्तिमार्ग का निरूपण उपलब्ध होने से भक्ति की सत्ता सिद्ध हो जाने पर उस भक्ति से उसकी कारणभूत भगवदनुग्रहरूप पुष्टि के होने का निश्चय होता है। नवमस्कन्ध में उसके लिये ईशानुकथा शब्द का व्यवहार किया गया है। इंशानुकथा या अर्थ है ईश अर्थात् भगवान् के अनुगामियों अर्थात् भक्तों की कथा अर्थात् भगवान् (की लीलाओं) का श्रवण करना जादि रूप चरित्र या भक्ति | उसके दो भेद है, मर्यादाभक्ति और पुष्टिभक्ति । विशेष अनुग्रह से उत्पन ( अर्थात् प्रात ) होने वाली भत्ति पुष्टिभक्ति कही जाती है। उसका लक्षण है, 'भगवान् के स्वरूप निर्गुणस्य भक्तियोगस्य भगवति प्रेम्णो गतिः लक्षणं ज्ञापकमित्युत्तरेण सम्बन्ध' । (सुबोधिनी ३।२९।११)। १ इसी बात को बालकृष्ण भट्टजीने अन्यत्र इन शब्दो में कहा है, 'सा च नवमस्कन्धे सूर्यसोमवशीयवृत्तान्तकयनेन प्रपञ्चिता मर्यादापुष्टिभेदे- शानुकथाशन्देन व्यवह्रियते, ईशस्य अनुगामिना भक्ताना कथा भक्ति- रित्यर्थः। (सिद्धान्तमुक्तावलीयोजना १८)। २. 'भक्तियोग इति तस्यैव नाम | स एव आत्यन्तिक इति उदाहृतः।' (सुबोधिनी ३१२९।१४)।
८२ प्रमेयरलार्णवे [पूर्वाद्ध रहितरचे सति भगवत्स्वरूपात्मकफलाकाङ्क्षावत्त्वम्' । अत एव 'अक्षण्यता फलम् (भाग० १०१२११७) इत्यत्र स्वरूपस्यैव फलत्वं निरणायि । अतः पुष्टिमार्गीया न तदतिरिक्तं काम- यन्ते; 'न योगसिद्धी अपुनर्भवं वा मय्यपितात्मेच्छति मद्विनाऽन्यत्" (की प्राप्ति ) के अतिरिक्त किसी अन्य फल की आकाडक्षा न रखते हुए भगवत्स्वरूपात्मक फल की (प्राप्ति की) आकाक्षा करना। इसीलिये, 'चक्षुरादि इन्द्रियों से सम्पन्न व्यक्तियों के लिये ( चरम) फल यही है। (भाग० १०।२१।१७) इस श्लोक की सुबोधिनी में श्रीमद्वल्लभाचार्य ने भगवत्स्वरूपोपलब्धि के ही फल होने का निर्णय किया है । अतः जैसाकि भगवान् के 'जिसने अपने को मुझे समर्पित १. पुष्टिभक्ति का लक्षण बताते हुए अन्यत्र घीवालकृष्णभट्ट लिखते हैं, "भगवत्स्वरूपातिरिक्तफलाकाङ्क्षारहिता भक्तिः पुष्टिभक्ति इति पुष्टि- भक्तेलक्षण ज्ञेयम् । न च निष्काममर्यादा मक्तावतिव्याप्तिः; अत्र मोक्षात्मक- फलस्याकाक्षितत्वात । न च, 'मोक्षः स्वरूपात्मक एव' इति वाच्यम्, 'न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा समञ्जस त्वा विरहय्य काइ क्षे' ( भाग०६।११।२५ ) इति वृषवाक्ये स्वरूपातिरेककथनात् । अत एव पुष्टिमार्गीया: नैनं कामयन्ते । एतच्च 'अक्षण्वताम्' ( भाग० १०।२१७) इति एलोक विवृतो, 'वीक्ष्यालकावृतमुखम्' । भाग० १०।२९।३९) इत्यस्य सृयोधिन्या स्पष्टम् । अत एव मोक्षकामनापि काममध्ये विमृष्टा । मतः स्वरूपातिरिक्तफलावाङ्टारहिताः पुष्टिभक्ता एव इति सुधीभिर्विभा- वनीयम् ।" ( सिद्धान्तमुक्तावलीयाजना १८)। २. अक्षण्वता फलमिद न पर विदामः सत्य. पशूननु निवेशयतोर्वयस्यै. वक्त्रं व्रजेशसुनयोरनुवेणु जुष्ट या निपीतमनुरक्त कटाक्षमाशम् ।। ( भाग० १०१२१७)। २. न पारमेष्टधं न महेन्द्रधिष्ण्यं न सार्वभौम न रसाधिपत्यम् । न योगसिद्धीर पुनर्भव वा मय्यपितात्मेच्छति मद्विनान्यत् ॥ ( भाग० ११।१४।१४), मिलाइय, भाग० ६।११।२५ ।
चतुर्थोऽध्यायः] पुष्टिविवेकः ८३ (भाग० ११३१४।१४) इति भगवद्वाक्यात्, 'बीक्ष्यालकावृतमुसं तव कुण्डलश्रि (भाग० १०।२९।३९) इति पुष्टिभक्तवज- सुन्दरीवास्ये स्पष्टम् , भक्तिहंसे च निरूपितम् , 'भक्तौ च न स्वरूपातिरिक्तफलकत्वम्' (भक्तिहंसः, पृष्ठ २७ ) इत्यनेन । सा पुटिभक्तिधतुर्धा प्रवाहपुष्टिभक्ति-मर्यादापुष्टिभक्ति- पुष्टिपुष्टिभक्ति-शुद्धपुष्टिभक्तिभेदात्, 'पुष्टया विमिश्राः सर्वज्ञाः, प्रवाहेण क्रियारताः । मर्यादया गुणज्ञास्ते शुद्धाः प्रेम्णाऽतिदुर्लभाः ॥ (पुष्टिप्र०१४), कर दिया है वह मेरे सिवा योगसिद्धि या कैल्य आदि कुछ नहीं चाहता' (भाग० ११११४/१४) इस वाक्य से सिद्ध होता है पुष्टि- मागीय भक्त भगवत्स्वरूप से भिन्न किसी अन्य पदार्थ की कामना नहीं करते । यह पुष्टिभक्त तजसुन्दरियों के, 'कुण्डलों से सुशोभित तथा अलकों से आवृत तुम्हारे मुख को देख कर' (भाग० १०।२९४३९) इत्यादि वाक्यों से स्पष्ट हो जाता है तथा मक्तिहंस में भी भक्ति का भगवत्स्वरूप से मिन्न अन्य कोई फल नहीं है' ( भक्तिहस, पृष्ठ २७) इस वाक्य द्वारा इसी बात का प्रतिपादन किया गया है वह पुष्टिभक्ति प्रवाहपुष्टिभक्ति, मयांदापुष्ट्रिभक्ति, पुष्टिपुष्टिभक्ति तथा शुद्धपुष्टिमक्ति के भेद से चार प्रकार की होती है, जैसा कि श्रीवल्लभाचार्य के अधोलिखित कथन से ज्ञात होता है, 'उपर्युक्त चतुर्विध पुष्टिजीवो मे पुष्टिमिश्र जीव सर्वज्ञ, प्रयाहृमिश्र जीव क्रियारत एष मर्यादामिन जीव गुण होते हैं। शुद्ध जीव प्रेमप्रधान होते है १. वीक्ष्यालकावृतमुखं तव कुण्डलथि गण्डस्थलावरसुधं हसितावलोकम् । दताभयं च भुजदण्डयुग विलोक्य वक्षः श्रियंकरमणं च भवाम दास्य ॥ ( भाग०१०।२९।३९)। २. ते हि द्विधा शुद्ध-मिश्रभेदात, मिश्राः निवा पुनः । प्रवाहादिविभेदेन भगवत्कार्यसिद्धये ।। (पुष्टिप्र० १३)।
प्रमेयरलाणवे [पूर्वाद इति याश्यात् । 'पुष्टया" इत्यादि। ये पुष्टिभक्ताः पुनः पुष्टया विमिथाः अनुग्रहान्तरेण भजनोपयोगिगानजनकैन युक्ताः ते सर्वज्ञा भयन्ति । सर्वशब्देन प्रभु-तलीला तत्परिकर-प्रपञ्चस्वरूपादि ग्राह्यम् । सर्पवस्तनां यधोक्तस्वरूपं विदित्या ये भजन्ते ते पुष्टिभक्ता इत्यर्थः। (और उनका ज्ञापक या उपलश्चक मेम ही है)। ये शुद्ध जीव अति. दुर्लम है ।' ( पुष्टिप्र० १४)। 'पुष्टमा' इस पट मे प्रारम्भ होने वाले पूर्वोक्त उद्दरण के प्रथम चरण की व्याख्या करते हैं। जो पुष्ट्रिभक्त पुष्टि से संयलित अर्थात् भजनोपयोगी ज्ञान के उत्पादक अनुग्रहान्तर (अर्थात् एक अन्य अनुग्रह ) से युक्त हैं, वे सर्वन होते हैं। सर्वज्ञ शब्द के घटक सर्व शब्द से भगवान , उनकी लीला, उनके परिफर सथा प्रपञ्च के स्वरूप आदि का ग्रहण होता है। तात्पर्य यह है कि जो सभी पदार्थों का यथोक्त स्वरूप जान कर भगवान् की भक्ति करते हैं वे पुष्टिभक्त हैं। "पुष्टिजीवान् विभजन्ते, 'ते हि द्विधा' इति । ते पुष्टिजीवादयः । हि यतो हेतोः भगवत्कार्यस्य लीलावचिट्यस्य सिद्धयर्थम्, शुद्धमिश्रभेदेन द्विप्रकाराः । मिश्रा: पुन: प्रवाहमर्यादापुष्टीना यो विभेद. विशिष्टः शुद्धादतिरिक्तः सद्धीर्णो भेदः, तेन त्रिप्रकारा , प्रवामिश्राः, मर्यादामित्राः, पुष्टिमिश्रा इति ।" (पुष्टिप्र० व्याख्या १३)। १. "एते मामभिजानन्तु इत्यभिध्यापूर्विका या पुष्टिस्तया मिना ये पुष्टावङ्गीकृताः ते सर्वज्ञा यया तथा भगवत्स्वत्पशातारो भवन्ति । तेन सर्वज्ञत्वं तदभिशापकं लिङ्गम् । उदाहरण तु नारदपभादयः । ज्ञानमिधाः परमभक्ता इति यावत् । मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः । सुदुर्लभः प्रश्चान्तारमा कोटिष्वपि महामुने ॥ इत्यादिवाक्यानामते .
चतुर्थोऽध्याय.] पुष्टिविवेक ८५ 'प्रवाहेण" इति । प्रवाहस्य अहन्ताममतात्मकसंसार- प्रधानत्वात् तद्धर्मण केवलं कर्मरचयः, पुष्टिभक्तत्वाश भगवदु पयोगि क्रियायां प्रवर्तन्ते प्रवाहपुप्टिभक्ताः । 'मर्यादया" इति । मर्यादा हि जीवस्य रागतो विपयावृत्ति निराकृत्य निवृत्तिमार्गायधर्मपु योजयति । अतो मर्यादया मिश्रणाद् विषयासक्तिम् अविभाव्य भगवत्कथाश्रवणादी ये प्रवर्तन्ते ते मर्यादापुष्टिभक्ताः । पूर्वाक्त उद्धरण के 'प्रवाहेण' इस पद से प्रारम्भ होने वाले द्वितीय चरण की व्याख्या करते है । प्रवाह में अहन्ता ममतात्मक ससार का प्राधान्य होने से, उसके गुणों के कारण फल की ही रुचि रखने चाले प्रवाहमिश्र पुष्टि जीव पुप्रिभत्त होने के कारण भगवदुपयोगी निया म प्रवृत्त होते हैं। उपर्युक्त उद्धरण के 'मर्यादया' इस पद से प्रारम्भ होने वाले तृतीय पाद की व्याख्या करते हैं। मर्यादा जीव की राग के कारण होने वाली विषयों में प्रवृत्ति का निराकरण कर उसे निवृत्तिमागाय धर्मों में लगाती है । अत. मर्यादा से सयुक्त होने के कारण, विषयों में आसक्त होने की पात न सोच कर, भगवान् की कथा सुनने आदि में प्रवृत्त होने वाले मर्यादामिश्र पुष्टिजीव मर्यादापुष्टिभक्त कहे जाते हैं। विषमा"। ( पुष्टिप्र० व्यारूपा १४)। १ 'मदुपासनादिपरा एते भवन्तु इत्यभिध्यापूर्ववेण प्रवाहेण मिश्रा ये पुष्टावङ्गीता ते क्रियारता. भगवदुक्नुपञ्चरात्रादिप्रसिद्ध कर्मपरा, प्रावाहिफभवता इति यावत् । तादृशक्रियापरत्व तदभिज्ञापकम् । उदा- हरणम्, श्रुतदेव-निमिप्रभृतय ।' (पुष्टिप्र० व्याख्या १४ ) । २. 'मद्गुणान् जानन्तु इत्यभिध्यापूर्विका या मर्यादा भगवदुक्तब्रह्म- वादसरणिः तया मिधा ये पुटावङ्गीकृता ते गुणज्ञा भगवत उत्पन्नाना गुणाना मन्यादीना भगवदीयाना प्रष्टत्वश्वर्यादीना सातारो भवन्ति इति प्रमेयरत्नार्णवे [पूर्दोष 'शद्धाः प्रेग्णा" इति । केचलं प्रेमप्रधानाः परिचर्यागुण- गानादिकं स्नेहेनैव कुर्वन्ति । तेऽत्यन्तं दुर्लभाः, सर्वोत्कृष्टा इत्यर्थः। 'स्नेहोत्पत्त्यनन्तरं स्वव्यसनतः क्रियमाणः श्रवणादिरुत्तमः पुष्टिभक्ति." (भक्तिहंसः, पृष्ट ५४) इति भक्तिहंसे तेपामेव भक्तेः स्वरूपम् उक्तम्, न तु सामान्यतः पुष्टिभक्तिस्वरूपम्, स्नेहानन्तर्यकथनाद् उत्तमपदप्रयोगाश्च । उपर्युक्त उद्धरण के 'शुद्धाः प्रेग्णा' इत्यादि पदो से प्रारम्भ होने थाले चतुर्थ चरण की व्याख्या करते हैं। शुद्ध जीव केवल प्रेम प्रधान होते हैं। वे स्नेहवश ही भगवान् की परिचर्या और उनका गुणगान आदि करते हैं । वे अत्यन्त दुर्लभ अर्थात् सर्वोत्कृष्ट हैं ! भक्तिहंस मे, 'स्नेह की उत्पत्ति के बाद सहजमाव से स्वतः ( स्वतन्न पुरुषार्थ के रूप में ) किये जाने वाले श्रवणादि उत्तम है तथा उन्हें पुष्टिमक्ति कहा (भक्तिहस, पृष्ठ ५४ ), इत्यादि वाक्य मे इन शुद्ध पुष्टिभक्तो की भक्ति के स्वरूप का ही निरूपण किया गया है न कि सामान्य पुष्टि- भक्ति के स्वरूप का। यह बात मत्तिस के उपयुक्त वाक्य मे 'स्नेहो- त्पत्ति के अनन्तर' तथा 'उत्तम पदों के सन्निवेश से सिद्ध होती है। तदभिजापकम्, मार्यादिकभक्ता इति यावत् | उदाहरणम्, भीष्मादय.' (पुष्टिप्र० व्याख्या १४ । १. "शुद्धाः तु प्रेम्णा उपलक्षिता. निरुपधिप्रेमव तेपामभिज्ञापकः, ते अतिदुर्लभाः । तान् भगवान् कदापि न त्यजति । न च शानिभक्ता- पेक्षया तेषां निकर्षः शयः । अतिदुर्लभाः ब्रह्मादिदुरापचरणरेणवः, 'पष्टिवर्पसहस्त्राणि' इति बृहदामन पुराणवाक्यात् । अत्र येऽवान्तरमैदाः ते फलबलादूह्याः।"भक्तिभेदा भक्तिहंसाद्भावभेदा जलभेदादवगन्तव्याः।" ( पुष्टिप्र० व्याख्या १४)। २. उपलब्ध भक्निहंस का पाठ अधोलिग्विन है, 'स्नेहोत्पत्त्यनन्तरं जाता चतुर्थोऽध्यायः] पुष्टिविवेकः इदमत्र ज्ञेयम् । जोवैः पुष्टिपुष्टिभक्त्यर्थं यतनीयम् । भगवद्भक्त्युपयोगिज्ञानं सम्पाद्य भगवान भजनीयः । चतुर्थी शुद्धपुष्टिभक्तिस्तु भगवदत्ता प्राप्यते, भक्तिः शुद्धा स्वतन्त्रा च दुर्लभेति न सोच्यने" (सर्वनिर्णयप्र० का० १९६) इति निवन्धात। न च, अनुग्रहे चैलक्षण्याभावात् तजन्यभक्तो कथं नाना- त्वम् इति शङ्कयम्, इस विषय में यह अवधेय है । जीवो को पुष्टिपुष्टिभक्ति के लिये प्रयत्न करना चाहिए । भगवद्भक्ति के लिये उपयोगी ज्ञान का सम्पादन पर भगवान् का भजन करना चाहिए। उपर्युक्त चतुर्थ प्रकार की शुद्ध पुष्टिभक्ति भगवान् द्वारा प्रदान की जाने पर मिलती है, जेमा कि तत्त्वदीपनिनन्ध के, "शुद्ध एवं स्वतन्त्र (अर्थात् स्वतः पुरुषार्थरूप) भक्ति दुर्लभ है, भत. उसका (प्रकृत स्थल पर) निरूपण नहीं किया जा रहा है ( सर्वनिर्णयप्र० का० १९६), इस वाक्य से ज्ञात होता है। यह आशका करना भी ठीक न होगा कि 'अनुग्रह में बैलक्षण्य या पेशिष्टय न होने के कारण अनुग्रहजन्य भक्ति अर्थात् पुष्टिभक्ति में विविधता नहीं हो सक्ती और इसीलिए पुष्टिभक्ति का चातुर्विध्य उपपन्न नहीं है', क्योकि भागवत के अधोलिखित वाक्यों से भगवान् के अनुग्रह स्वव्यसनत. स्वतन्त्रपुरुषार्थत्वेन क्रियमाण उत्तम. पुटिम क्तिरूप.।'(भक्ति- हंस , पृष्ठ ५४)1 १. “एपा भक्तिः माहात्म्यज्ञानपूर्वकपरमस्नेहरूपा । तथाभूता सती भगवत्परिचर्यायुयता भवेत् । स्वतः पुरुषार्थरूपा सेवा चेत् सा भक्तिः स्वतन्त्रा इत्युच्यते । "एवं फलप्रवरणे ता सामान्यतो निरूप्य विशेषतो निरपणाभावे हेतुमाह, 'दुर्लभेति न सोच्यते' इति । सन्ति ब्रह्मभाव प्राप्ता न त्वेतादशा भक्ता इति ।" ( मर्वनिर्णयप्र० प्र० १९६)।
मद प्रमेयरत्नार्णवे [पूर्वाद्ध . 'नेम विरच्या न भवा न श्रीरप्यङ्गसप्रया । प्रसाद लामिरे गोपी यत् तत् प्राप विमुक्तिदात् ॥' (भाग०१०९।२०)। 'नाय भियोऽङ्ग उ नितान्तरते प्रसाद, स्वर्यापिता नलिनगधरुचा कृतोऽन्या । रासात्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीतकण्ठ लब्धाशिषा य उदगाद् ब्रजबल्लवानाम् ॥' (भाग० १०।०७।६०) इत्यादिवाक्य तथा अवधारणात् । म पैलझण्य या वैशिष्टय का होना सिद्ध होता है। जो अनिवचनीय कृपा प्रसाद मुक्तिदाता भगवान् श्रीकृष्ण से गोपाङ्गना यशोदा को उपलब्ध हुआ उस ( भगवान् के नाभिकमल में स्थित) ब्रहा (पुत्र हाते हुए भी न पा सक और भगवञ्चरणकमलाश्रित) महादेव तथा (भगवान् ये यक्ष स्थल की शोभा बढाने वाली जधाङ्गिनी ) लक्ष्मी भी न पा सका। (भाग० १०९।२०)। 'रासोसव क समय भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गले में बाह डार दन आदि स प्राप्त सौभाग्य का अनुभव करनेवाली नागनाओं को भगवान का जो प्रम प्रसाद प्राप्त हुभा वह भगवान की सहचरी रमा तथा कमर की सा सुगन्ध एर शोमा वाली स्वर्गाङ्गनाओं को भी नहा मिल सका फिर अन्य स्त्रिया की तो बात हो क्या कही जाय। (भाग १०/४७/६०)। १ इम प्रसाद न कश्चित पूर्व प्राप्तवान् । त्रयाणामपि गुणावताराणी यदुर्लभ तदयषा दुर्लभमेव । स क प्रसाद इत्याशय तमनुवदति, गोपी यत्तत्प्राप इति । जात्या स्वरूपतो हीना प्रसाद तमव प्रसिद्धो न तु केचिनिरूपित । न हि सदमोचक कश्चिदारमान बध्नाति, खदस्तु ज्ञानमपि दत्त्वा विदेहकैवल्य वा दत्त्वा मोचयितु शक्यने कि स्वय वधनन मत प्रसिद्ध प्रसादोऽयमव नाय इत्यथं ।' (सुबोधिनी १०१९२०)। न हि कदाचिदप्यनेकरूपाणि कृत्वा रमणायमेव रसाभिनिविष्टो २ चतुर्थोऽध्याय:] पुष्टिविवेकः अतः अनुग्रहविशेषेण पुष्टिभक्तिर्लभ्यते, तया भगवांस्त- दधीनो' भवति, वशीकुर्वन्ति मां भक्त्या' (भाग० ९।४।६६) इत्यादिवाक्यैः । 'कृष्णाधीना तु मर्यादा स्वाधीना पुष्टिरुन्यते' अतः अनुग्रह विशेष अर्थात् विशिष्ट अनुग्रह से पुष्टिभक्ति की उप- लब्धि होती है और उस (पुष्टिभक्ति) से भगवान्, जैसा कि उनके, 'मुझे मक्ति से वश में कर लेते है(भा० ९।४।६६ ) इत्यादि वाक्यों मे भवति । तत्रापि प्रजवल्लवीभिः सह । तास्तु असंवृताः दध्यादिविक्रये सर्वत्र पर्यटनपरा: । महतामपि प्रार्थनया कदाचिद्भगवानकं रूपं गृह्णाति महति कायें। आनन्दश्च तासा सर्वोतमः सम्पादितः, अनेकधा रसमुत्पाद्य । अतो ज्ञायते नैतादृश्यः काशन, नाप्येतादृशः क्वापि भगवत्प्रसाद इति । अतो ज्ञायतेऽत्रस्यापि तासा"सर्वोत्तमवेति । ( सुबोधिनी १०१४७१६०)। १. अहं भक्तपराधोनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज । साधुभिस्तहृदयो भक्तभक्तजनप्रियः ॥ ( भाग० ९।४।३९) । २. मयि निबंदहृदयाः साधवः समदर्शनाः। वशीकुर्वन्ति मां भक्त्या, सस्त्रियः सत्यति यया ।। (भाग०९।४।६६)। 'मयि अनन्यनिर्वद्धं अनन्यविषयत्वेन स्थिरोकृतं हृदयं यः ते अतएव समदर्शनाः सर्वस्य मदात्मकत्वदर्शिनः साधव: मद्भक्ता भक्त्या अनन्यप्रयोजनया मयि प्रोतिरूपया मां वशीकुर्वन्ति ।' (भाग० बाल- 'प्रबोधिनी ९।४१६६)। ३. ना अस्य मर्यादास्कन्धत्वाद् विरक्तस्य ब्रह्मविदः पश्चाहोगे प्रवृत्तस्म अस्य कपा (मर्यादामाद् ) विरुडा, इत्यत आह, कृष्णाधीना इति । तादृशस्य स्वतो भोगे प्रवृत्तौ हि मर्यादामङ्गः, भगवदधीनदया तथा करणं मर्यादैवेति (मर्यादामनाभावात् ) न विरोष इत्यर्थः । .( ननु एवं सति भगवानेव कृपया तं भोगे प्रवर्तितवान् इति पुष्टिरेच इयं ६० प्रमेयरत्नाणवे [पूर्वाद्ध (भागवतार्थप्र० का०५।२६ ) इति नियन्धोक्तश्च । इह पुष्टि- शब्देन पुष्टिभक्तिः, 'यत्र च भक्तस्य स्वातन्त्र्यं तदिन्छानुसारेण भगवत्कृतिः, यथा दामोदरलीलाया, सा पुष्टि' ( भागवतार्थप्र० प्र० ५।२६) इति व्याख्यास्वारस्यात् । 'पुष्टिः स्वार्था परार्था तु भक्तिः सानयमे मता" ( भागवतार्थप्र० ज्ञात होता है, उम (पुष्टिभक्त) के अधीन हो जाते है। तत्त्वार्थदीप- निनन्ध के भागवतार्थप्रकरण रे 'मर्यादा भगवान् कृष्ण के अधीन होती है और पुष्टि स्वाधीन कही जाती है' (भागवतार्थप्र० का० ५।२६) इस वाक्य से भी उपर्युक्त कथन की ही सिद्धि होती है। श्रीविठ्ठलनाथ ने अपनी प्रकाश व्याख्या में आचार्य वल्लभ के उपर्युक्त कथन का जो अर्थ किया है उसका स्वारस्य, सामञ्जस्य और औचित्य उपयुक्त श्लोक ( भागवतार्थम० का० ५।२६ ) में आये 'पुष्टि' शब्द का अर्थ पुष्टिभक्ति करने पर ही स्पष्ट या सिद्ध हो पाता है, क्योंकि वहाँ कहा गया है कि 'पुष्टि वह है जिसमें मक्त का स्वातन्त्र्य होता है अर्थात् मगवान् मक्त की इच्छा के अनुसार ही काम करते हैं, जैसे दामोदरलीला में भगवान् यशोदा की इच्छा के अनुसार ही स्वयं रस्सी में बँध गये थे' (भागव- 1० प्र० ५।२६), अतः भागवतार्थप्रकरण की उपर्युक्त कारिका में पाये 'पुष्टिः' पद से पुष्टिभक्ति का ही ग्रहण करना चाहिए । तत्त्वार्थदीपनिनन्ध पे, 'पुष्टि जीव के हित की साधिका है तथा प्रतोयते न मर्यादा इत्याशङ्कर पुष्टे. स्वरूपं मूले आहुः, स्वाधीना पुष्टि- रुच्यत इति । तदेव विवृण्वन्ति,) पर च भक्तस्य स्वातन्त्र्य, (स्वातन्य- स्वरूपमाह..) तदिच्छानुसारेण भगवत्कृतियंया दामोदरलीलाया सा पुष्टिः (तथा च उकारोतिकस्वाधीनत्वाभावान पुष्टि किन्तु मर्यादैवेति तयैदा- विरोध इत्यर्थः)।' (भागवतार्थप्र० प्रकाश एवं योजना ५/१६)। १. 'पुष्टिः' इत्यादि । अत्रोक्ता पुष्टिः स्वार्थी जीवहितकरी। भक्तिः तु परार्था भगवत्कार्योपयोगिनी ! सा अनवमे पूर्ण प्रसादे मता ।। तार्थप्र० चतुर्थोऽध्यायः] पुष्टिविवेकः का० ६१३) इत्यादिवाक्येषु पुष्टिशब्देन अनुग्रह एव ग्राह्यो, न पुष्टिभक्तिः, तथैव ग्रन्थार्थसिद्धेः। तदेवं सुबोधिनी-निवन्धादिषु पुष्टिशब्देन फचिदनुग्रहा, पवचित् तजन्या भक्तिरुच्यते । स एव च पुष्टिमार्ग इनि सहृदयविभाधनीयम् । नच, 'भगवत्स्वरूपातिरिक्तफलाकक्षारहितत्वं प्रवाहपुष्टि- भक्त्यादौ अव्याप्तं, ताहग्भावस्य शुद्धपुष्टिभक्तेष्वेव प्रसिद्ध इति वाच्यम्; शुद्धपुष्टिभक्ततरपुष्टिभक्तेषु अपि मोक्षान्तफला. काकाविरहस्य सिद्धत्वात्, मक्ति भगवत्कार्योपयोगिनी है और वह ( अर्थात् भक्ति, भगवान् की) पूर्ण कृपा होने पर होती है, (भागवतार्थप्र० का० ६/१३) इत्यादि याक्यो में प्रयुक्त पुष्टि शब्द में पुष्टिभक्ति का ग्रहण न कर अनुग्रह का ही ग्रहण करना चाहिए क्योंकि वहाँ ग्रन्थ के अर्थ की सिद्धि पुष्टि पद का अर्थ अनुग्रह मानने पर ही होती है। उपर्युक्त प्रकार से श्रीवल्लभाचार्य की मुबोधिनी, तत्वदीपनिबन्ध आदि कृतियों में पुष्टि शब्द से कही अनुग्रह और कहीं अनुग्रहजन्य भक्ति का निर्वचन किया गया है और वही पुष्टिमार्ग है ऐसा सहृदयों को समहाना चाहिए। यह कहना भी ठीक होगा कि “पुष्टिभक्ति का 'भगवान् के खरूप की प्राप्ति (अर्थात् भगवद्रूप फल) के अतिरिक्त किसी अन्य फल की आकांक्षा न रसना' यर लक्षण (पुष्टिभक्ति के एक प्रकार) प्रवाहपुष्टिभक्ति में अव्याप्त है क्योंकि इस लक्षण में प्रतिपादित वैशिष्टय का केवल शुद्धपुष्ट्रिभक्तों में ही उपलब्ध होना (शात्री में) प्रसिद्ध है।" उपर्युक्त कथन के ठीक न होने का कारण यह है कि श्रीरुद्रके तथा च कारणभेदात्कार्यभेदाच्च तस्या नैतत्स्कन्धार्थता । ( भागवतार्थप० योजना ६।१३ )।
९२ प्रमेयरलार्णवे [पूर्वाद्ध . 'नारायणपरा लोके न कृतवन बिभ्यति । स्वर्गापवर्गनरकेपपि तुल्यार्थदर्शिनः ॥ (भाग० ६।१७।२८) इति चाफ्यात् । इदं वाक्यं न गुडपुष्टिभक्तिपरम्, 'एतादृशस्तु पुरुषः कोटिप्वपि सुदुर्लभः' (सर्वनिर्णयप्र० का० २१९), इत्यस्य व्यात्याने निवन्धे भानमिश्रनिर्णयात् । 'न यागसिद्धीरपुनर्भवं वा समक्षस त्या विरहग्य काझे' (भाग० ६.१९२२५) इति घृत्र- 'स्वर्ग, मोक्ष और नाक को समान सममने वाले नारायणपर भगवान लोक में किसी से भी नहीं करते' (भाग० ६।१७।२८) इत्यादि वाक्यो से शुद्धपुष्टिभत्तों की ही भांति अन्य पुष्टिभक्तों के मी अर्थ, काम, और मोक्षरूप पलो की आकांक्षा से विरहित होने की सिद्धि होती है। अवधेय है कि यह वाक्य शुद्धपुष्टिभक्तिपरक नहीं है क्योंकि श्रीवल्लभा- चार्य ने नवार्थदीपनिबन्ध के 'इस प्रकार का पुरप तो करोड़ों में मी दुर्लम है' (मर्वनिर्णयप्र. या० २१९) इस वाक्य की प्रकाश व्याख्या में इसके शानमिनभक्तपरक होने का निर्णय किया है (अर्थात् नारायण- पर शब्द से जानमिश्रभक्त का ग्रहण किया है)। इसी प्रकार वृत्र ये, 'हे सर्व मौमाग्यसम्पन्न भगवन् ! आप को छोड़ कर मै योगसिद्धियों मा अपवर्ग की मी आकांक्षा नहीं करता' (भाग० ६।११।२५) इत्यादि १. 'स्वर्गादिप्वपि भक्तिसुखराहित्येन अरोचकत्वाविशेपेण तुल्योऽर्थः प्रमोजनमिति द्रष्टुं शीलं मेषा ते तथा।' (भाग घालप्रबोधिनी ६।१७ २८)। २. "एतादृशस्तु दुर्लभः' योऽग्रे वक्ष्यते । भागवते नारायणपरः प्रशान्तात्मैव लाके दुर्लभ उक्त, ज्ञानमिश्री भक्त.; प्रेमयुक्तस्तु ततोऽपि दुर्लभः । तनापि सदा प्रेमप्लुतः तस्य भगवत्सायुज्य भवतीति कि वक्तव्यमित्यर्थः ।" (सर्पनिर्णयप्र० प्र० २१९)। द्रष्टव्य, उपर्युक्त को भावरणभङ्गटोका। ३. 'हे समजस ! सर्वसौभाग्यसम्पन ! त्वा वा विरहट्य विहाय नाकपृष्ठं ध्रुवलोक पारमेष्टयं चतुराननयोकं सार्वभौमं सर्वभूमिराज्य चतुर्थोऽध्याय:] पुष्टिविवेकः वाफ्याद् वृत्रस्य शुद्धपुष्टित्वाभावात् । अतो लक्षणं सुस्थम् । श्रीहरिरायैस्तु शुद्धपुष्टिभक्तरेव स्वरूपंफारिकाभिर्विवृतम्, न तु पुष्टिर्लक्षिता, विचारे क्रियमाणे तथैवार्थस्फूर्तेः; अन्यथा सर्वसाधनरहित्यादिधर्माणां प्रवाहपुष्टिभक्ती अन्यानेश्व। अतो नेदमसाधारणं लक्षणम्, किन्तु शुद्धपुष्टिभक्तेर्धर्माणां निरूपणम् इति शेयम् । तथा हि, 'सर्वसाधनराहित्यं फलाप्तो यत्र साधनम् । फलं वा साधनं यत्र पुष्टिमार्गः स कथ्यते ॥' (श्रीपुष्टिमा०१)। वाक्यो मे भी ( सिद्धान्ती के) उपर्युक्त कथन की पुष्टि होती है क्योकि वृन शुद्ध पुष्टिभक्त नहीं था । अतः पुष्टिमक्ति का उपर्युक्त (पृष्ठ ८१-८२ तथा ९५ पर उल्लिखित) लक्षण निर्दोष है। श्रीहरिराय ने अपनी 'श्रीपुष्टिमार्गलक्षणानि' नामक कारिकाबद्ध कृति में पुष्टि का लक्षण न करके शुद्ध-पुष्टि भक्ति के स्वरूप का ही निरू- पण किया है क्योंकि विचार करनेपर उनके वाक्योंका जो अर्थ स्फुटित होता है उससे उपयुक्त मत की ही पुष्टि होती है। ऐसा न मानने पर सर्वसाधनराहित्य (अर्थात् सभी साधनों से विहीन होना) आदि धर्मों की प्रवाहपुधिभक्ति में अव्याप्ति होने का प्रसङ्ग भी उपस्थित होगा । अतः 'श्रीपुष्टिमार्गलक्षणानि' नामक कृति में पुष्टि का असाधारण लक्षण नहीं दिया गया है प्रत्युत शुद्ध पुष्टिभक्तिके धर्मों का ही निरूपण किया गया है ऐसा समझना चाहिए। "जिम मार्ग में फल की प्राप्ति में सभी साधनों का समाव ही साधन है अथवा जिस मार्ग में स्वयं फलरूप भगवान् ही भगवए फल की प्राप्तिके साधन हैं वह शुद्ध पुष्टिमक्तिमार्ग कहा जाता है" (श्रीपुष्टिमा०१)। रसाधिपत्यं विलस्वर्गसुखं योगसिद्धीः अणिमादिरूपाः, अपुनर्भवं जीव- स्वरूपप्राप्तिलक्षणं मोक्षं परवकुष्ठप्राप्तिरूपा मुक्ति वा न काक्षे नेच्छामि । (भाग० बालप्रबोधिनी ६।११।२५)।
प्रमेयरलार्णवे [पूर्वा 'सर्व' इत्यादि । यत्र फलस्य भगवतः, माप्ती, सर्वसाधना- मायः हेतुः, स शुद्धपुष्टिभक्तिमार्गः कथ्यते इत्यर्थः । तामस प्रकरणीयफलप्रकरणे अन्वेषण-गुणगानादिसाधनानि त्यक्त्या, रोदनेन दैन्ये प्रकटीकृते ब्रजवधूनां भगवदाप्तिकथनात् । एवं सति साधनाभावस्थापि साधनतायां, न निःसाधन- फलत्वं प्रभो सिद्धयति, इति अरुच्या पक्षान्तरमाहुः, 'फलं या' इत्यादिना । फलरूपो भगवान् एव स्वरूपात्मकफलाप्तौ साघ- नम् इत्यर्थः । अत एव श्रीमदाचायः उक्तम् , 'ततो भगवान् ब्रह्मा विष्णू रुद्रश्च भूत्वा पुनः कृष्ण एव जातः इत्याह' (सुयो० १०॥ ३२२) इति। 'सर्वसाधनराहित्यम्' इस पद से प्रारम्भ होनेवाली श्रीहरिराय की कारिका की व्याख्या करते हैं। तात्पर्य यह है कि जिस भक्तिमार्ग में फल अर्थात् भगवान् की प्राति में सभी साधनों के अभाव को हेतु माना गया है वह शुद्धपुष्टिभक्तिमार्ग कहलाता है। श्रीमद्भागवतमें ताममप्रकरण के फलप्रकरण (भाग० १०।२९-३५) में गोपियों के अन्वेषण, गुणगान आदि माधनों का परित्याग कर रोदन द्वारा दैन्य प्रकट करने पर उन्हे भगवान् की प्राप्ति होने का निरूपण मिलने से उपर्युक्त मत की पुष्टि होती है । साधनाभाव को फलप्राप्तिका साधन मान लेने पर प्रभु का निःसाधन- फलत्व सिद्ध न होगा ( अर्थात् प्रभुके साधन विरहित व्यक्तियों के प्राप्य फल होने के स्वरूप की सिद्धि नहीं होगी) अतः इस पक्ष मे रुचि न होने से दूसरे पक्षको ‘फल या' इत्यादि शब्दो से प्रारम्भ होने वाले पाद के द्वारा उपस्थित करते हैं । तात्पर्य यह है कि स्वय फलरूप भगवान् ही स्वरूपात्मक पल की प्राप्ति के साधन है । इसी लिये सुनो- धिनी { १०३२।२) में श्रीमद्वल्लभाचार्य ने कहा है कि "तदनन्तर मगवान ब्रह्मा, विष्णु एव रुद्र होकर पुनः कृष्ण ही हो गये, यह स्पष्ट करने के लिये भागवतकार कहते हैं 'तासामाविरभूच्छोरिः' इत्यादि।"
चतुर्योऽध्याय ] पुष्टिविवेक ६५ 'अनुग्रहेणैव सिदिली किकी यन वैदिकी। न यत्नाद्, अन्यथा विघ्न' पुष्टिमार्ग' स कथ्यते ॥ (श्रीपुष्टिमा०२)। 'अनुग्रहेण' इत्यादि । साधनान्तरनिरपेक्षेण अनुग्रहेण यत्र लोकिक वैदिकसिद्धि. सशुद्धपुष्टिभत्तिमार्ग। अतएव व्रजस्थानां तथैव वैकुण्टप्राप्ति , 'अहयात निशि शयानमतिश्रमेण लोक विकुण्ठमुपनेप्यति गोकुलं स्वम्" (भाग० १७३१), इति ब्रह्म- (सुमो० १०॥३२२)। "जिस भक्तिमार्ग में लौकिक और वैदिक पलों की सिद्धि प्रयत्न से नहीं अपितु भगवदनुग्रहमान से ही होती है अन्यथा भर्यात् भगव- अजन से मिन्न अन्य प्रयत्न या उपाय करने से विघ्नों की प्राप्ति होती है उसे शुद्धपुष्टिमार्ग कहते है" (श्रीपुष्टिमा० २)। 'अनुग्रहेण' इस पद से प्रारम्भ होने वारी कारिका की व्याख्या करते हैं। जिस भक्तिमार्ग में साधनान्तरनिरपेक्ष (अर्थात् जिसे अन्य साधनों की अपेक्षा नहीं है ऐसे) भगवदनुग्रह के द्वारा ही समस्त लौकिक और वैदिक सिद्धिया की प्राप्ति होती है उसे शुद्ध पुष्टिभक्तिमार्ग कहते हैं। इसीलिए व्रजवासियों को साधनान्तर निरपेक्ष अनुग्रह से ही वैकुण्ठ की प्राप्ति हुई थी, जैसा कि ब्रह्मा व अधोलिखित वाक्यों से ज्ञात होता है। दिन भर लौकिक कार्यों में लगे रहने वाले और इस प्रकार दिन में अत्यधिक परिश्रम करने से थक जाने के कारण रात में गहरी नींद में सो जाने वाले गोकुलवासियों को भगवान् स्वजन समझने के कारण अपन वैकुण्ठ लोक में ले जायेंगे' (भाग• २७३१)। १ 'अह्मयापृतम्' इति । अह्नि दिवसे आपूतं लौकिकक्रियया व्यामम । निशि शयानमतिश्रमेण' इति । निर्भरनिद्रया रात्री व्याप्तम । एवमहोरात्र परलोक्साधनरहित स्वमेव वैकुण्ठ व्यापिर्वकुण्ठम् उप समीप एव नेप्यति । स्वनिकट एव मापाजवनिया दूरीकृत्य वव कुण्ठ नीतवान् । इद चरिणम योगस्य, न मायया , न कालस्य, न मण्यादीनाम । - प्रमेयरलाणवे [पूर्वा वाफ्यात् । यत्ने कृते तु विघ्न एव भवेद् , एतच्च श्रीनन्दादीनाम् अम्विकावनयात्रामसङ्गे (भाग० १०॥३४) स्पष्टम् । 'यनाझीकरणे नैव योग्यतादिविचारणम् । अविलम्मः प्रभुकृतः पुष्टिमार्गः स कथ्यते ॥ (श्रीपुष्टिमा० ३)। 'यत्र' इत्यादि । प्रभुः जीचयोग्यताविचारम् अकृत्या एय यन शोनम् अगीकरोति स शुजपुष्टिभक्तिमार्गः। 'केवलेन हि भावेन गोप्यो गावः सगा मृगाः" (भाग १२॥१२॥८) इति वाफ्यात् । स्वरूपविचार तु शास्त्रस्थ पुरुषाधिकारकत्वेन पश्चादीनां मोक्षसम्भावनैव नास्ति इति प्रेयम् । प्रयत्न करने पर तो विघ्न ही होता है यह श्रीमद्भागवत में नन्द आदि 'के अम्बिका वन याना प्रसङ्ग (भाग १०३४ ) में स्पष्ट है। "जिस मतिमार्ग में मक्क को स्वीकार करने में भगवान उसकी योग्यता भादि का विचार नहीं करते और उसे स्वीकार करने में विलम्ब नहीं करते वह शुद्धपुष्टिमक्तिमार्ग कहा जाता है" (श्रीपुष्टिमा०३) 'यत्र' (जिस भक्तिमार्ग मे) इत्यादि शब्दों से प्रारम्भ होने वाली पारिका की व्याख्या करते हैं। भगवान् बिना जीव की योग्यता का विचार किये ही जिस भक्तिमार्ग में भक्त को शीघ्र ही स्वीकार कर देते हैं वह शुद्धपुष्टिभक्तिमार्ग कहा जाता है, जैसा कि भगवान् के 'केवळ माव (अर्यात् भक्ति) से ही गोपियों, गायों, पक्षियों और हरिणादि पशुओं इत्यादि ने मुझे प्राप्त किया' (भाग० ११११२।८), इस वाक्य से ज्ञात होता है । इस प्रसग में यह अवधेय है कि स्वरूपका विचार करने पर तो पशुओं आदि के मोक्ष की सम्भावना ही नहीं है अतो ब्रह्मचरित्रमेवंतत् । नयने हेतु स्वम् इति । आत्मत्वेन भगवान् तन् परिगृहीतवान् । (सुबोधिनी २२७३१) । १ कैवलेन हि भावेन गोप्यो गाव खगा भूगा । ज्ये मूषिको नाम सिता भामोयुएला । (भाग १) २७ क्तयोंऽध्यायः] पुष्टिविवेकः 'स्वरूपमात्रपरता तात्पर्यज्ञानपूर्वकम् । धर्मनिष्ठा यत्र नैव, पुष्टिमार्गः स कथ्यते ॥' (श्रीपुष्टिमा०४)। 'स्वरूप' इत्यादि। यत्र धर्मविधायकवाक्यानां भगव- धन्धे तात्पर्यमवगत्य फलाप्त्यवसरे तत्प्रतिवन्धकधर्मान् धर्मिपरतया स्थीयते, स शुद्धपप्टिभक्तिमार्गः। अतएव णाद् दर्शनाद् ध्यानात, मयि भावः" (भाग० १०।२९।२७) वाक्यतात्पर्यमवगत्य स्वरूपपरतया एवं स्थितं, न तु रुद्धं गृहगमनम् आचरितम् । के शास्त्रों में केवल पुरुप ही अधिकृत हैं अर्थात् शास्त्रों का उपयोग सक्ने की योग्यता फेवल मनुष्यों में ही है । "जिस भक्तिमार्ग में (धर्मविधायक वाक्यों के ) तात्पर्य का ज्ञान कर स्वरूपमात्रपर होकर स्थित हुआ जाता है और जिसमें धर्मनिष्टा नेतान्त अभाव है उसे शुद्धपुष्टिमकिमार्ग कहते हैं" (श्रीपुष्टिमा०४)। 'स्वरूप' इत्यादि शब्दो से प्रारम्भ होने वाली कारिका की व्याख्या है है। जिस भक्तिमार्ग में धर्मों का विधान करने वाले वाक्यों का गान् में तात्पर्य समझ कर फलप्राप्ति के समय उसके प्रतिबन्धक i का त्याग कर धर्मिपर अर्थात् स्वरूपनिष्ठ होकर रहा जाता है, शुद्धपुष्टिभक्तिमार्ग कहा जाता है; इसीलिए भगवान् के, 'भवण, न, एवं ध्यान से मुझमें माव होता है' (भाग० १०।२९।२७), वाक्य का तात्पर्य समझ कर गोपियाँ स्वरूपपर होने से वहीं रूपी और उन्होंने घर लौट जाने का तद्विरुद्ध आचरण नहीं किया। १. "मादो श्रवणं भगवद्वाचकानां पदवाक्यानां भगवति गतितापर्या- रणम् । तथा सति विषयो व्यावतितो भवति, अन्यथा अन्यत्रापि स्नेहः त् । तदनु दर्शनं तदर्थस्यानुभवः, कृपमा भगवत्साक्षात्कारो वा पत्कामार्थः नारदादेरिय। ततो ध्यान योगेन चिन्तनम् । एतरेव प भावो भवति । स चौत्पन्नो भावः अनुकीर्तनात् स्थिरो भवति ।' बोधिनी १०।२९।२७)। ७ प्रमेयरत्नाणवे [ पूर्वाद 'यत्र प्रभुकृती नैव गुणदोपविचारणम् । तत्कृतावृत्तमत्वज्ञा, पुष्टिमार्गः स कश्यते ॥' (श्रीपुष्टिमा०५)। 'यत्र' इत्यादि । यत्ररोदन-चोर्यादिरूपेचरित्रे हीनत्वबुद्धया न अनुपादेयत्वरूपदोपदृष्टिः। न वा कालीयदमनदायाग्निमो. क्षणादिपु माहात्म्यबोधनादिषु चरित्रान्तरेभ्यो चैशियबुद्धिा, किन्तु भगवत्कृतिमात्र उत्तमत्वज्ञानं सर्वत्र स पुष्टिमार्गः । 'न वेद-लाकसापेक्ष्य सर्वथा यन वर्तते । सापेक्षता स्वामिसुखे पुष्टिमार्गः स कथ्यते ॥ (श्रीपुष्टिमा०६)। 'न वेदलोक' इत्यादि। यतु स्वामिसुपार्थमेवाखिल- "जिस भक्तिमार्ग में भगवान् को किमी भी कृति में गुणदोष का विधार नहीं किया जाता और उनको प्रत्येक कृति को उत्तम समझा जाता है वह शुद्ध पुष्टिभक्तिमार्ग कहा जाता है" ( श्रीपुष्टिमा० ५)। 'यत्र' (जिस भक्तिमार्ग में) इत्यादि पदो से प्रारम्भ होने वाली कारिका की व्याख्या करते हैं। जिस भक्तिमार्ग में भगवान् के रोने, (नवनीत आदि को) चोरी करने आदि चरिनो मे हीनत्वबुद्धि नहीं रखी जाती अर्थात् इन्हें 'हीन होने से अग्राह्य (अनुपादेयत्वरूपदोप- युक्त नहीं माना जाता, एवं इसी प्रकार कालियदमन तथा दावाग्नि से मोक्ष आदि भगवान के माहात्म्य बोधक चरित्रो को उपयुक्त अन्य चरित्रों की अपेक्षा विशिष्ट भी नहीं समझा जाता प्रत्युत भगवान् के सभी चरित्रों, उनकी सभी कृतियों को सर्वदा सर्वत्र उत्तम ही माना जाता है, वह शुद्धपुष्टिभक्तिमार्ग कहा जाता है। "जिप्त मनिमार्ग में मक्त को किसी रौकिक या वैदिक (पार- लौकिक ) फल की सर्वथा अपेक्षा नहीं रहती और केवल अपने प्रभुके सुख की ही अपेक्षा रहती है उसे शुद्ध पुष्टिमक्तिमार्ग कहते है" (श्रीपुष्टिमा०६)। 'न वेदलोक......' इत्यादि शन्दो से प्रारम्भ होने वाली कारिका प्रभु चतुर्थोऽध्यायः] पुष्टिविवेकः ९९ चेप्टितं, न ऐहिक-पारलोकिकयलः, स शुनपुष्टिभक्तिमार्गः । 'दिष्टया पुत्रान् पतीन् देहान् सजनान् भवनानि च । हित्वा वृणीत यूयं यत् कृष्णास्यं पुरुपं परम् ॥' (भाग०१०४७।२६) इति वाक्यात् । 'वरणे दृश्यते यत्र हेतु गुरपि स्वतः। वरणं च निजेच्छातः पुष्टिमार्गः स कथ्यते ॥ (श्रीपुष्टिमा०७)। 'वरणे' इत्यादि । स्त्रीयत्वेन अङ्गीकृतो जीवकर्टफसाधनानां यत्र न कारणता, स शुद्धपुष्टिमार्गः, यतः साधनसम्पन्नेषु की व्याख्या करते हैं । जिम भक्तिमार्ग में भक्त की सारी चटाये फे मुख के लिये ही होती हैं और उगवा कोई भी प्रयत्न किसी अन्य ऐहिक या पारलौकिक फल की प्राप्ति के लिये नहीं होगा, वह शुद्ध- पुष्टिभक्तिमार्ग कहा जाता है, जैमा वि उदव के अधोलिखित कास्य से शात होता है, 'सचमुच यह कितने सामाग्य की बात है कि आप लोगों ने अपने-अपने पुर, पति, देह, स्वजन एवं घर को छोड़कर श्रीकृष्ण नामक परम पुरप का घरण किया है।' (भाग० १०४७।२६)। "जिस मनिमार्ग के अनुसार मगवान् के द्वारा भक्त के परण किये जाने में कोई अणुमान कारण मी ना (दिवाई देसा) तथा भगवान् स्वेच्छा से स्वत: जीव का यरण करते हैं, यह शुनपुष्टिमतिमार्ग कहा जाता है" (श्रीपुष्टिमा० ७)। 'वरण' इत्यादि पदी से प्रारम्भ होने वाली फारिसा की व्याख्या करते हैं । जिस भक्तिमार्ग मे जीनहरा उपाय भगवान् द्वारा वजन के रूप में स्वीकार किये जाने । अर्थात् कारण नहीं (माने जाते) है १. 'देहा स्वत्यैर यवस्थाभेदेन मिा नानाविषोपयोगा इमि तद. पेवाभावाय बहुरचना ! स्वाय विनियोगाभारात्याग । अन्यया भगयतः स्थाने गच्छेयुः । चिन्तु भायदामाइक्षामेव भावयमानास्तिष्ठन्तीति पुत्रादि- यद् देहत्यागोऽपि ।' (सुबोधिनो १०१४७।२६)। .
१०० . प्रमेयरलार्णवे [पूर्वार्दै अपि न तत्फलं, यद् अत्यन्तायोग्येषु पुलिन्द्यादिषु दीयते 'यमेवेप वृणुते तेन लभ्या (कठोप० ।।२३५ मुण्ड० उप० ३।२।३) इति श्रुतिरपि अन अनुसन्धेया। 'यत्र स्वतन्त्रता भतेराविर्भावानपेक्षणात्। सर्वानुभवरूपत्वं, पुष्टिमार्गः स कम्यते ।। (थीपुष्टिमा०८)। 'यन्त्र' इति । यत्र वियोगावस्थायां गुणगानादिरूपायाः भक्तेः एव स्वरूपानन्दात्मकफलदाने स्वतन्त्रता न स्वरूपा- विर्भावस्य संयोगरससम्बन्धिनः आकाङ्क्षा, प्रेमभरेण जायमानस्य श्रवणकीर्तनादेः एव सर्वमुखानुभवरूपत्वं, स शुद्धपुष्टिमार्गः। वह शुद्ध पुष्ट्रिभक्तिमार्ग है; क्योकि साधन-सम्पन्न व्यक्तियों को भी उस फल की प्राति नहीं होती जिसे भगवान् अत्यन्त अयोग्य पुलिन्दी (पुलिन्द जाति की स्त्री) आदि को प्रदान करते हैं। श्रुति के 'य भात्मतत्व (परमात्मा ) उसी के द्वारा प्राप्य है जिसको यह घरण कर लेता है' (फठोप० १।२।२३; मुगड उप० ३।२६३) इत्यादि वाक्यों से भी उपयुक्त मत की ही पुष्टि होती है। "जिस भक्तिमार्ग में भक्ति को आविर्भाव की अपेक्षा किये बिना ही स्वरूपानन्दात्मक फल देने को स्वतन्त्रता (प्राप्त) है क्या जिसमें श्रवण कीर्तनादिरूप मनिको ही ससुसानुमवरूप माना जाता है, उसे शुद्ध- पुष्टिमक्तिमार्ग कहते है" (श्रीपुष्टिमा०८)। 'यत्र' (जिस भक्तिमार्ग में) इत्यादि पदों से प्रारम्भ होने वाली कारिका की व्याख्या करते हैं। जिस भक्तिमार्ग में वियोगावस्था में भगवद्गुणगानादिरूप भक्ति की स्वरूपानन्दारमक फल देने में स्वतन्त्रता (मानी जाती ) है अर्थात् भक्ति को स्वरूपानन्दात्मक फल देने के लिए संयोगरससम्बन्धी स्वरूपाविर्भाव की अपेक्षा नहीं रहती; जिस मक्तिमार्ग में प्रेमातिशय से किये जाने वाले श्रवण कीर्तनादि ही सर्व- चतुर्थोऽध्यायः] पुष्टिविवेकः १०१ 'लोकवेदभयाभावो यत्र भावातिरेकतः । सर्वबाधकतारफूतिः, पुष्टिमार्गः स कथ्यते । (श्रीपुष्टिमा०९)। 'लोकवेद....' इत्यादि। यत्र भानातिरेकतः भगवद्भावा- धिक्यात् पतिपुत्रादिभयं पारलौकिकभयं च नास्ति । भगव- द्भाचे सर्वस्य कालकर्मस्वभावादेः वाधकोऽयमिति स्फूर्तिः स शुद्धपुष्टिभक्तिमार्ग इत्यर्थः । अत एव 'अस्वय॑म् अयशस्यं च" मुग्वानुभवरूप होते हैं अर्थात् भक्त को उन्हीं में सभी सुखो का अनुभव होता है, वह शुद्धपुष्टिभक्तिमार्ग कहा जाता है । "जिस भक्तिमार्ग में भाषातिरेक (अर्थात् मगवहिषयक प्रेमा- तिशय ) के कारण लोक और वेद का भय नहीं रहता और उस मस्ति- माय के काल, कर्मादि समी के बाधक होने की स्फूर्ति होती है उमे शुद्धपुष्टिमक्तिमार्ग कहते हैं " (श्रीपुष्टिमा० ९)। 'लोकवेद. ....... इत्यादि शब्दो से प्रारम्भ होने वाली कारिका की व्याख्या करते हैं। तात्पर्य यह है कि जिस भक्तिमार्ग में भायातिरेक अर्थात् भगवान् के प्रति भक्तिभाव के आधिक्य के कारण (लौकिक अर्थात् ) पतिपुत्रादि का एवं पारलौकिक भय नहीं होता तथा 'भगवद्भाव काल, कर्म और स्वभाव आदि सभी का बाधक है। इस प्रकार की स्फूर्ति होती है यह शुद्ध पुष्टिभक्तिमार्ग है। उपर्युक्त कारण से ही गोपियों के हृदय में, भगवान् के, 'परलोकनाराक तया अपयश १. अस्वय॑मयशस्यं च फल्गु कृच्छ्रे भयावहम् । जुगुप्सितं च सर्वत्र ह्योपपत्यं कुलस्त्रियः।। (भाग० १०।२९।२६)। 'हे कुल स्त्रयः । औपपत्यं जारसम्बन्धः तदसालमपि बहुदोपग्रस्तम् । तमत्यान् षड्दोषानाह । अस्वयं परलोकनाशकम्, पूर्व धर्मेण सिदोऽपि स्वर्गः तस्मिन् अपगच्छति । किञ्च इह लोकेऽपि यशो दूरोफरोति । च- कारात् मरकोऽपि ।' (सुयोधिनी १०।२९।२६)।
१०२ प्रमेयरत्नार्णवे [पूर्वा (भाग० २०१२९।२६) इत्यादिवाभ्यः वेदभयं, 'विचिन्वन्ति सापश्यन्त " ( १०।२९।२० ) इत्यादिभिः लोकभयं च न उत्पन्नम् । 'सम्बन्धः साधनं यत्र. फलं सम्बन्ध एव हि। सोऽपि कृष्णेच्छया जातः, पुष्टिमार्गःस कथ्यते॥ (श्रीपुष्टिमा०१०)। 'सम्बन्ध' इत्यादि । यत्र जीवानां भगवता सह देहज- भावजान्यतरसम्बन्धः फले साधनम, यत्र च सम्बन्धः सर्वन्द्रियाणां फैलाने वाले' (भाग० १०।२९।२६ ) इत्यादि याक्यो से वेद का भय तथा 'तुम्हे न देखकर सोज रहे होंगे' (भाग १०।२९।२०)। इत्यादि बाक्यों से लोकभय नहीं उत्पन्न हुना। "जिस मक्तिमार्ग में सम्बन्ध ही फल की प्राप्ति का साधन है और फल भी सम्बन्ध ही ( माना जाता) है तथा यह सम्बन्ध मी मगवान् कृष्ण की इच्छा से ही होता है (एमा माना जाता है) से शुद्धपुष्टि- मतिमार्ग कहते है" (श्रीपुष्टिमा० १०)। 'सम्बन्ध' इत्यादि पदोसे प्रारम्भ होने वाली कारिका की व्याख्या फरते हैं। जिस भत्तिमार्ग मे भगवान् के साथ जीवों का दैहिक या १. मातरः पितरः पुना भ्रातरः पतयश्च वः। विचिन्वन्ति ह्यपश्यन्तो मा कृवं बन्धुसाध्वसम् ।। ( भाग १०१२९।२०)। 'भवतीना मातरो नियामिका., तास्तु नागता', अतो भवतीनामन्वेषण- मपि करिष्यन्ति । अतः तासा साध्वसं भय मा कुवम् मा कुरुत । 'विचिन्वन्ति ह्यपश्यन्त' इति । ( हि शब्दस्यार्यमाहुः,) गोकुलानिर्ग- तानां कृष्णस्थानागमने मध्ये वरो मार्गा स्फुटिता. सन्ति । तत्र भगवन्माया तिष्ठति, यथा न कोऽपि भगवरसमीप गच्छप्ति मतो मार्गान्तरेणव गताः अपश्यन्तः सन्तः विचिन्वन्ति एव । बनेन स्थिती शद्वाभावोऽप्युक्तः ।" सर्व एवापश्यन्तः गृहे अदृष्ट्वा अवश्यं विचिन्वन्ति, ततो बहुकालमदृष्ट्वा नाश- शङ्कया अपहारशकया च भय प्राप्स्यन्ति ।' (सुबोधिनी १०।२९।२०)।
. चतुर्याऽध्याय ] पुष्टिविवेक १०३ प्रभुणा संगमः, स एव फल, स शुद्धपुष्टिमार्गः, 'भगवता सह तलापो दर्शन मिलितस्य च (सुबोधिनीका०१०१२११७१३)। किञ्च सम्बन्धोऽपि यन प्णेच्छया कृष्णस्य भक्तविषयिण्या इच्छया जातः स तथा, 'मदन्यत् ते न जानन्ति, नाह तेभ्यो मनागपि (भाग०९४६८) इति वाक्यात् । भावात्मक किसी भी प्रकार का सम्बन्ध फल की प्राप्ति का साधन है तथा जिस मार्ग में सम्बन्ध अर्थात् सभी इन्द्रियों का भगवान् के साथ गगम ही पल माना जाता है, वह शुद्धपुष्टिभक्तिमार्ग कहा जाता है; जैसा कि मुमोधिनी के, 'भगवान् मिल जाने पर उनका दर्शन एवं उनके साथ वार्तागप' (सुनोदिनी का० १०२१।७।३) इत्यादि वाक्यों से ज्ञात होता है । किञ्च शुद्धपुष्टिभक्तिमार्ग वह है जिसमे सम्बन्ध भी भगवान् कृष्ण की भक्तविषयक इच्छा से होता है, जैसा कि भगवान के 'मरे भक्त मुझमे अन्य और कुछ नहीं जानते तथा में उनके भतिरिक्त और कुछ भी नहीं जानता' (भाग० ९।४।६८) इत्यादि वाक्यों से ज्ञात होता है। भगवता सह सलापो दर्शन मिलितस्य च ॥ आश्वष सेवन चापि स्पशवापि तथाविध । अपरामृतपानश भोगो रोमोदमस्तथा ॥ तत्कूजिताना श्रवणमात्राण चापि सर्वत । तदन्तिकगतिनित्यमेव तद्भावन इदमेवद्रियवता फल मोक्षोऽपि नान्यथा। ययान्धकारे नियता स्थितिक्षिणो फल भवेत् ।। एव मोक्षोऽपोन्द्रियादियुक्ताना सर्वथा नहि। बाधयाना परित्यागे साधकाना न तद्भवेन् ।। ( सुबोधिनीका० १०१२१५७३७)। साधवो हृदयं मह्यं साधूना हृदयं त्वहम् । मदन्यत् ते न जानन्ति नातेभ्योमनाापि ! (भाग० ९१४६८)। १ सदा॥
१०४ प्रमेयरलार्णवे [पूर्वा 'तत्सम्बन्धिपु तानः तद्भिने विरोधिता। उदासीनेषु समता, पुरिमार्गः स कथ्यते ।। (श्रीपुष्टिमा०११)। 'तत्सम्बन्धिपु' इति । यन प्रभुसम्वन्धिषु भगवबुद्धिा, भिनोदासीनयोः विरोधि-समत्वबुद्धिः स पुष्टिमार्ग.। अत एव उद्धवदर्शने परमोत्साहः, 'इति स्म सर्वाः परिवनु रुत्सुकाः तमुत्तम- श्लोकपदाम्बुजाश्रयम्" (भाग० १०४७।२) इति वाक्यात् । "जिस भक्तिमार्ग में भगवान के सम्बन्धियों अर्थात् उनसे सम्बद्ध व्यक्तियों में मगरद्बुद्धि रखी जाती है, मगवमिस अर्थात् भगवद्विमुख व्यक्तियों को विरोधी समझा जाता है तथा भगवान के प्रति उदासीन व्यक्तियों के प्रति समस्यबुद्धि अर्थात् औदासीन्यबुद्ध रखी जाती है, वह 'शुद्धपुष्टिमक्तिमार्ग कहा जाता है" (श्रीपुष्टिमा० ११)। 'तत्सम्बन्धिपु' (भगवान् के सम्बन्धियो मे) इत्यादि पदों से प्रारम्भ होने वाली कारिका की व्याख्या करते हैं | जिस भक्तिमार्ग में भगवान् के सम्बन्धियों में भगवद्बुद्धि, भगवद्विमुसो मे विरोधीबुद्धि तथा भगवान् से उदासीन व्यक्तियों में समयबुद्धि अर्थात् औदासीन्यबुद्धि रखी जाती हैं वह शुद्धपुष्टिमक्तिमार्ग कहा जाता है। इसीलिये उद्धव को देखकर कि बहुना साधवो मद्भक्ताः मह्यं मम हृदयं हृदय्या इत्यर्थ., अत्यन्त- प्रियत्वेनाभेदनिर्देश. । साधूना तु हृदयं हृदय्यः अहम् एव ! एतदेव स्पष्टयति । ते मद्धता मत्त. अन्यत् किमपि न जानन्ति, तथा अहम् अपि तेभ्यो भक्तेभ्योऽन्यत् मनाग ईपद् अपि किञ्चित् प्रियं वस्तु न जानामि ।' (भाग० बाल प्रबोधिनी ९४/६८)। १. 'सर्वा एव परियव्र रुत्सुकाः । ननु ताया कि प्रयोजनम् ? तत्राह उत्सुका इति । औत्सुक्यस्वभावादेव कृष्णस्मारक इति कृणोत्सुक्याच त परितो वेष्टयामासुः ।"उत्तमश्लोकस्य पदाम्बुजमेवाश्रित्य तिष्यतीति भग- बच्चरणसेवकः भक्तिमार्गानुसारी । तत्रापि शास्त्रीय इत्यर्थ ।' (सुबोधिनी २०४७२)।
. यह कहती चतुर्थोऽध्यायः ] पुष्टिविवेकः १०५ 'विद्यमानस्य देहादेर्न स्वीयत्वेन भावनम् । परोक्षेऽपि तदर्थत्वं पुष्टिमार्गः स कथ्यते ॥ (श्रीपुष्टिमा० १२) । 'विद्यमानस्य' इति । यत्र देहादेः न स्वीयत्वबुद्धया रक्षणा. दिकम् अपि तु भगवदीयत्ववुया, स पुष्टिमार्गः । किञ्च, परोक्षेऽपि विरहावस्थायामपि भगवदुपयोग भाविनमालोच्य शरीरादिरक्षा स तथा, 'त्वयि धृतासवस्त्वा विचिन्वते' (भाग गोपियों में परम उत्साह का सञ्चार हो गया, जैसा कि हुई' उत्कण्ठित गोपियों ने भगवच्चरणानुचर श्रीउद्धव को सब ओर से घेर लिया' (भाग० १०/४७/२) इस वाक्य से ज्ञात होता है। "जिस भक्तिमार्ग में भक्त अपने वर्तमान शरीरादि में ममत्वबुद्धि नहीं रखते तथा परोक्ष अर्थात् भगवद्वियोगदशा में मी उन्हें भगवान् के उपयोग का समझाकर ही उनकी रक्षा आदि करते हैं यह शुद्धपुष्टिमक्विमार्ग कहा जाता है" (श्रींपुष्टिमा० १२) । “विद्यमानस्य' इत्यादि पदो से प्रारम्भ होने वाली कारिका की व्याख्या करते हैं। जिस भक्तिमार्ग में भक्त अपने शरीर आदि की रक्षा आदि उसमें स्वीयत्वबुद्धि ( अर्थात् ममत्वबुद्धि या 'यह मेरा है। इस प्रकार की बुद्धि) रसकर नहीं अपितु भगवदीयत्वबुद्धि रखकर ( अर्थात् इस शरीर पर भगवान् का अधिकार है, यह उनकी सम्पत्ति है, इस प्रकार की बुद्धि रसकर) करना है यह शुद्धपुष्टिभक्तिमार्ग कहा जाता है। इसी प्रकार शुद्धपुष्टिभक्तिमार्ग वह है जिसमें भक्त अपने दारीरादि की रक्षा परोक्ष अर्थात् भगवान के विरह की दशा में भी, 'यह भविष्य में भगवानके उपयोग में आयेगा' इस प्रकार की बुद्धि या भावना से करता है, जैसा कि भागवत के, 'हम गोपियों, जो तुम्हारे लिए ही प्राण धारण १. शुचिस्मितः कोऽयमपोज्यदर्शनः कुतश्च कस्याच्युतवेशभूषणः। इति स्म सर्वाः परिवगुरुत्सुकाः तमुत्तमश्लोकपदाम्बुजाश्रयम् ।। (भाग० १.१४७१२)।
१०६ प्रमेयरलार्णवे [पूर्वाद्ध १०।३१।१ ) इति चाफ्यात् , 'स्वदर्थमेव प्राणानां धारणम्" इति व्याख्यानात् । 'भजने या सेव्यस्य नोपकारकृतिः कचित् । पोपणं भारमानस्य पुष्टिमार्गः स कथ्यते ॥ (श्रीपुष्टिमा० १३)। 'भजने यन' इत्यादि । यन सेव्यस्य उपकारकृतिः अपेक्ष्यत्वेन नास्ति, यन च सेन्यकर्तृक सेवकाधिकरणकं भावपोपणं स किये हुए है, तुम्हें खाज रही है। ( भाग० १०1३१।१) इस वाक्य से ज्ञात होता है। सुबोधिनी में बल्लभाचार्य द्वारा इस इलोष के 'स्वमि तासवः' इन पदो का अर्थ, 'तुम्हारे लिए ही प्राणों को धारण किये हुए है" इस प्रकार करने से भी उपर्युक्त कथन की ही पुष्टि होती है। "जिस मक्तिमार्ग में मक्त या सेवक भगवान की भक्ति करने समय कमी मी ( उस भक्ति के पलम्वरूप ) मगवान् द्वारा उपकृत होने की अपेक्षा नहीं करता तथा भगवान् उसके भाव का ही पोपण करते हैं, यह शुद्धपुष्टिमक्तिमार्ग कहा जाता है" (श्रीपुष्टिमा० १३)। 'मजने यत्र' इत्यादि पदो से प्रारम्भ होने वाली कारिका की व्याख्या फरते हैं । जिस भक्तिमार्ग में भक्त या सेवक भगवान की भक्ति या सेवा करते समय ( उस भक्ति के फल के रूप में) भगवान से किसी फल या उपकार की अपेक्षा नहीं करता (अर्थात् वह यह नहीं सोचता कि भगवान इस भक्ति से प्रसन्न होकर मेरा अमुक उपकार कर देंगे या मुझे अमुक वर या फल प्रदान करेंगे ) तथा स्वय भगवान अपने सेवक या भक्त के हृदय में स्कुरित भगवद्विपयक भाव का पोपण करते हैं वह १. 'त्वयि घृतासव' इति । त्वदर्थमेव धृता असदः प्राणा यः । यदेव स्वदनुपयोगं ज्ञास्यन्ति तदैव त्यक्ष्यन्ति इति भावः । अत एव त्या विचिन्वते प्राणानाश्वसयितुम्, अल्पविलम्बेऽपि प्राणा गमिष्यन्तीति । अन्यथा बजे गच्छेयुः प्रातः त्वमेवायास्यसीति अन्वेषणं व्यर्थमेव स्यात् । (सुबोधिनी १०।३१०१)।
चतुर्थोऽध्याय.] पुष्टिविवेकः १०७ शुद्ध पुष्टिमार्गः। अत एव गोवर्द्धनमयासह अन्यभजनानिवृत्य स्वभजनयोजनेन भाववृद्धि कृतवान् प्रभुः इति शेयम् । 'भजनस्यापवादो न कियते फलदानतः। प्रभुणा यन तद्भावात् पुष्टिमार्गःस कथ्यते ॥ (श्रीपुटिमा० १४)। 'भजनस्यापनादः' इत्यादि । यन प्रभुणा भजनस्य फलदानेन अपवादो न क्रियते स शुद्धपुष्टिमार्गः । अयमर्थः । विरहानुभवार्थ भगयता वियोगे सम्पादिते गोपिकाः तजन्यं तापं भूयांसं प्राप्नुवत्यः । यदि तवस्थायां गुणगानादिना अन्तरेव प्रकटी- शुद्धपुष्टिभारतमार्ग कहा जाता है। इसीलिए गोवर्द्धनमस के प्रसङ्ग में भगवान् ने प्रजवासियो को अन्य (अर्थात् इन्द्र) का पूजन करने से विरत कर, अपनी भक्ति ( अर्थात् भगवद्भक्ति) मे लगा कर उनके भक्तिभाव की वृद्धि की ऐसा समझना चाहिये। "जिस मक्तिमार्ग में भगवान् भक्त को उसकी भक्ति का फल देकर उसका अपवाद नहीं करते, उसके उस भाव में बाधा नहीं डालते, वह शुद्धिपुष्टिभक्तिमार्ग कहा जाता है" (श्रीपुष्टिमा० १४)। 'मजनस्यापवाद.' इस पदसे प्रारम्भ होनेवाली कारिका का अर्थ करते हैं। जिस भक्तिमार्ग मे भगवान् भक्ति का फल देकर अपवाद नहीं करते वह शुद्धपुष्टिमक्तिमार्ग कहा जाता है | उपर्युक्त वाक्य का आशय अधोलिसित है। गोपियाँ भगवान के पिरह का अनुभव कर सके इस उद्देश्य से भगवान ने जन उन्हें वियोग की अवस्था प्राप्त करा दी (अर्थात् जब भगवान् ब्रज से मथुरा को चले गये ) तो गोपियो को पिरहजन्य तीन नाप का अनुभव हुआ। यदि ऐसी स्थिति मे भगवान् ( गोपियों द्वारा किये जाने वाले अपने ) गुणगान आदि से (प्रभावित होकर) बीच में ही प्रकट हो जाते ( अर्थात् मथुरा से लौट आते या गोपियों के हृदयम आविर्भूत हो जाते ) और इस प्रकार उन्हे ( सयोग का) सुख प्रदान १. द्रष्टव्य, सुबोधिनी १०१२४।२५,३०,३५ ।
१०८ प्रमेयरत्नार्णवे [पूर्वा भूय सुसं दद्यात्, ज्ञानमुत्पाद्य ज्ञानिनामिय वा सुसं दद्यात्, तदा पूर्णतापानुभवाभावेन उत्तरदलादानमेय स्यात्, अतो भगवान् न तथाकरोति, प्रत्युत तापमेव वर्धयति, 'कृष्णावेशात्म- विक्लवम" ( भाग० १०४७५७) इति वाफ्यात्, 'इहागतोऽहं विरहातुगत्मा (भाग० शा२०) इति प्रामोपदेशोद्धव- चाक्याचा कर देते अथवा उनमें जान उत्पन्न कर उन्हें ज्ञानियों को प्रास होने वाला सुख दे देते, तो उन्हें विरहजन्य पूर्ण ताप का अनुभव न हो पाता और उत्तरदल अर्थात् विरह का दान पूरा न हो पाता (अर्थात् विरहावस्था सम्पादित करने का मन्तव्य पूरा न हो पाता), इसीलिये भगवान् वैसा नहीं करते अपितु उनके विरहजन्य ताप को ही और अधिक बढ़ाते है जैसाकि 'कृष्ण के प्रेम में तन्मय होने के कारण देहादि की विकलता' ( भाग० १०/४७/५७), तथा भगवान् का उपदेश ग्रहण कर, उनके पास से आये हुए उद्धव के, 'मैं विरहातुरचित्त होकर यहाँ आया हूँ' १. दृष्ववमादिगोपीनां कृष्णावेशात्मविक्लवम् । उद्धवः परमप्रीत: ता नमस्यन्निदं जगौ ।। (भाग १०४७।५७) । 'प्रत्यहमुपदेशः प्रत्यहं वैवलपम् एतदुभयं दृष्ट्वा आत्मत्वेऽपि वहि:- संवेदनमात्रेणव तासां भगवदाकाक्षं बोत्पद्यते । पर निर्दुष्टा । एवं वासा भावं दृष्ट्वा कृष्णावेशेन आत्मनो देहस्य विक्लवं दृष्ट्वा, मन्तनिष्ठा वा विरहो वा द्वयमेव न तु तासामन्या लौकिकी अवस्था एवं दृष्ट्वा, परमप्रीतो जात एवमेव हि स्थातव्य भनेनेति । पश्चातासूभय दृष्ट्वा स्वस्मिप्लेकमेवति आधिक्यात् ता नमस्यन् नमने दोषशद्धामावाय तासा स्तुतिरूपम् इदं वक्ष्यमाणं जगौ।। सुबोधिनी १०४७५७)। २. स एवमाराधितपादतादधीततत्त्वात्मविवोधमार्गः । प्रणम्य पादौ परिवृत्य देवम् इहागतोऽहं विरहातुरात्मा ॥ (माग० ३।४।२०)।
चतुर्थोऽध्यायः] पुष्टिविवेकः १०९ 'यत्र वा सुससम्बन्धो वियोगे सङ्गमादपि । सर्वलीलानुभवतः पुष्टिमार्गः स कथ्यते ॥ (श्रीपुष्टिमा० १५) । 'यत्र' इत्यादि । यत्र वियोगावस्थायां संयोगावस्थातोऽ- प्यधिकं सुखम् , क्षणे क्षणे एवान्तालान्तरप्राकट्यात् , कस्या- चिल्लीलाया भावनेन प्रकटीभूताया अनुभवे, पुनरन्यस्या लीलाया दिदृक्षया तत्प्राप्तिसौकर्यात् । अत एव सुघोधिन्या-- मुक्तम् , 'आन्तरं तु परं फलम्' (सुबोधिनी का० १०।२९।१५) इति । अथवा में यहाँ आकर विरहविफल हो गया हूँ" (भाग० ३।४।२०) इत्यादि वाक्यों से ज्ञात होता है । "जिस मनिमार्ग में प्रभु के विरह की दशा में, उनकी समी लीलाओं का अनुमव होने से उनके सङ्गम की अवस्था में होने वाले सुख से मी अधिक आनन्द की अनुभूति होती है उसे शुद्धपुष्टिमक्तिमार्ग कहते है। (श्रीपुष्टिमा० १५)। 'यन्त्र' (जिस भक्तिमार्ग मे ) इत्यादि पदों से आरम्भ होने वाली कारिका की व्याख्या करते हैं। जिस भक्तिमार्ग मे भगवान् से वियोग की दशा में हृदय में प्रतिक्षण उनकी नयी नयी लीलाओं का आविर्भाव होते रहने के कारण, भावना करने पर आविर्भूत हुई उनकी किसी एक लीला का अनुभव होने पर, उसी क्षण किसी दूसरी लीला को देखने की इच्छा होने पर उसे देख सक्ना (अर्थात् हृदय में उसकी भावना करना) सुकर होने के कारण, भगवान के संयोग की दशा में होने वाले सुस से भी अधिक आनन्द की अनुभूति होती है वह शुद्धिपुष्टिभक्तिमार्ग है। इसीलिये श्रीमदल्लभाचार्य ने सुबोधिनीवारिकाओं में कहा है कि, १. एवं प्रकारेण भगवता ज्ञापितार्थोऽह पादौ प्रणम्य परिवृत्य विरहातुरात्मा इहागत इति सम्बन्धः । इहागत्य वा विरहातुरात्मा जात. इति ।' (सुबोधिनी ३।४।२०)।
प्रमेयरलार्णवे [पूर्वा 'फल च साधने चैव सर्वत्र विपरीतता। पर भाव साधन स पुष्टिमार्ग म कथ्यत ।।' (श्रीपुष्टिमा०१६)। 'फ्ल च' इत्यादि । यन साधनफलयो बेपरीत्य स शुद्ध- पुप्टिभक्तिमार्ग । तमेव स्पष्टयन्ति, 'फ्लम्' इत्यादिना। यत्र भाव निरुपधिस्नेह , फलम् प्राप्तव्यम् इत्यर्थ । स्वरूपानन्द प्राप्तिसाधनस्यापि भावस्य पूर्वप्रार्थनीयत्वेन फलत्वात् । स च भावो भगवदत्त एवं प्राप्यते, इति स फलरूपो,भगवान् एव तत्र साधनम् , इति स्फुटमेव साधनफल्योवैपरीत्यम् इति भाव । 'मन में भगवान् की लालाओं की अनुभूतिरूप आन्तर रमण परफल' अर्थात् परमानन्दस्वरूप है। (मुगोधिनीका० १०।२९।१।४५)। "जिस भक्तिमार्ग में पर और साधन में सर्वत्र विपरीतता होती है तथा स्वरूपानन्द की प्राप्ति का सावनरूप माघ अर्थात् भगवतिपयक निस्पधिस्नेह फल होता है और उसकी प्राप्ति के साधन स्वय भगवान होते है उस शुद्धपुष्टिमानमार्ग कहा ह" (श्रीपुष्टिमा० १६)। 'फले च' इत्यादि पदों से प्रारम्भ होने वाली पारिका की व्याख्या करते है । जिस मार्ग म सायन जोर पल म विपरीतता हो यह शुदपुष्टि भक्तिमार्ग कहा जाता है। इसी क्थन के आशय को 'पर भाव इत्यादि पदी से प्रारम्भ होने वाले पाद म स्पष्ट करते है। निस भक्ति मार्ग मे भाव अर्थात् भगवद्विषयक निरुपधिस्नेह पल अर्थात् प्राप्तव्य होता है । यद्यपि यह भाव स्वरूपानद की प्राप्ति का साधन है फिर भी पहले इसकी प्राप्ति की प्रार्थना या कामना की जाती है अत से पह कहा गया है। इस भाव की प्राप्ति तभी होती है जब भगवान इस प्रदान परें अत यह पल रूप कहा गया है । उपयुक्त भाव की प्राप्ति के एक- १ अतो हिं भगवान् कृष्ण स्त्रीपु रमे ह्यानिशम । बाह्याभ्य तरभदैन आतर तु पर फलम ।। (सुबोधिनीका० १०।२९।११४५)।
चतुर्थोऽध्यायः] पुष्टिविवेकः 'पश्चात्तापः सदा यत्र तत्सम्बन्धितावपि । देन्योरोपाय सततं, पुष्टिमार्गः स कथ्यते । (श्रीपुष्टिमा० १७)। 'पश्चात्तापः' इत्यादि । यत्र भगवत्सम्बन्धिकृतौ भगवल्लीलाया- मनुभूयमानायामपि पश्चात्तापः स शुद्धपुष्टिमार्गः। अयमर्थः । भगवतो ब्रजागमनादौ या व्रजमकानुगुणा रतिः तदानन्दम्, मात्र साधन भगवान ही हैं । इस प्रकार साधन और पल की विपरीतता स्पष्ट है। छभाव या भक्ति साधन है और भगवान् साध्य या प्राप्य है इस सामान्य क्रम की विपरीतता-जो शुद्ध पुष्टि भक्तिमार्ग का वैशिष्टय है- भागवत के वृत्रासुर के प्रत्यक्षमाप्त भगवान् से भगवद्विषयक भाव की ही याचना करने आदि के प्रसङ्गो में स्पष्ट है। "जिस भक्तिमार्ग में भगवान के कार्यों या चरित्रो अर्थात् भगवान की लीलाओं का अनुभव होते हुए मी दैन्य को जागृत करने (तथा जागृत रसने ) के लिये भक्त सदैव ( भगवान की अन्य लीलाओं के अनुभव से वञ्चित रहने का ) पश्चात्ताप किया करता है यह शुद्धपुष्टि- भक्तिमार्ग कहा जाता है" (श्रीपुष्टिमा० १७)। 'पश्चात्ताप' इस पद से प्रारम्भ होने वाली कारिका की व्याख्या करते हैं। जिस भक्तिमार्ग में भगवान के कार्यों या चरिनों अर्थात् भगवान् की लीलाओ का अनुभव हो रहे होने पर भी भक्त (अन्य लीलाओं के अनुभव से वञ्चित रहने का) पश्चात्ताप करते रहते हैं वह शुद्धपुष्टिभक्तिमार्ग है । उपर्युक्त कथन का आशय यह है । भगवान् के (दिन भर वन में पशुचारण करने के बाद लौटकर सायंकाल) ब्रज को आने पर, गोपियाँ उनकी ब्रजभक्तो के अनुकूल लीलाओं के आनन्द १. अहं हरे तव पादकमूलदासानुदासो भवितास्मि भूयः । मनः स्मरेतासुपते गुणास्ते गृणीत वाक् कर्म करोतु कायः ।। ( भाग०६।१११२४)।
११२ प्रमेयरत्नार्णवे [पूर्वाद्ध अनुभवन्त्यो चनरुतलीलान्तराननुभवजन्यं पश्चात्तापं कुर्चन्ति', तेन च दैन्यमाविर्भवति, न तु मानादि । अयं चैको विलक्षणो- ऽनुभवः, 'पीत्वा मुकुन्द (भाग० १०१५।४३) इत्यस्य व्याख्याने स्पष्टः । 'आविर्भावे नसापेक्ष दैन्यं यत्र हि साधनम् । फलं वियोगजं दैन्यम्, पुष्टिमार्गः स कथ्यते ॥' (श्रीपुष्टिमा०१८)। 'आविर्भावे' इत्यादि । यत्र जीवाधिकरणकं दैन्यम् अन्य- का अनुभव करती हुई भी, भगवान् द्वारा वन में की गयी (धेनुफवध आदि) अन्य लीलाओं के अनुभव के सौभाग्य से वञ्चित रह जाने से पश्चात्ताप करती हैं और इससे उनमें दैन्य का आविर्भाव होता है, न कि मान आदि का । यह एक विलक्षण अनुभव है जिसका विशद विवेचन 'पीच्या मुकुन्दमुससारधमक्षिमृत' अर्थात् 'गोपियों ने अपने नेत्ररूप अमरों से भगवन्मुखारविन्द का मकरन्दरस पान कर (भाग० १०॥ १५।४३) इत्यादि श्लोक की सुबोधिनी व्याख्या में मिलता है। "जिस भक्तिमार्ग में जीप का ( भगवान के दर्शन के पूर्व होने याला ) दैन्य भगवदाविर्भाव का निरपेक्ष साधन एवं भगवान के (दर्शन के बाद होने वाले उनके) वियोगसे उत्पन्न होने वाला दैन्य फल (माना जाता) है, यह शुद्धपुष्टिमक्तिमार्ग कहा जाता है" (श्रीपुष्टिमा० १८)। 'अविर्भावे' इत्यादि पदो से प्रारम्भ होने वाली कारिका की व्याख्या १. देखिये, भागवत १०११५१४२ की सुबोधिनी, "आगच्छन्तं भगवन्तं वर्णयति, 'तं गोरजश्छुरितकुन्तल...' (भाग० १०॥१५॥४२) इति । तं भगवन्तं गोप्योऽभ्यगमन् इति सम्बन्धः । पूर्व पुरुषार्थचतुष्टयसहिता दशरसयुना लीला च प्रदर्शिता, सा गोपिकाभिर्न दृष्टा इति गोपिकानो भवति सापः, अतः तनिवृत्त्ययं चतुर्दशधर्मयुक्तो भगवाना निरूप्यते ।" इत्यादि । २. द्रष्टव्य, सुबोधिनी १०११५४३ , वतुर्थोऽध्यायः] पुष्टिविवेका (पेक्षं भगवदाविर्भावे कारणं, स शुभपुष्टिमार्गः। पियोगे मिल- र्या तदसम्भवजं यदैन्यम् तद् यत्र फलं प्रार्थनीयम् अवा- रफलम् । विरहो हि दैन्यमुत्पादयति, संयोगो मानमिव, 'न्यं च भगवन्तम् आविर्भावयति, अतः प्रार्थनीयत्वात् सत्यम् । अत एव श्रीगोकुलनाथैः उक्तम् 'ता पा कुरु श! यया तदैन्यमाप्नुयाम्" (गोयुलनाशकृतविज्ञमिः, १) इति । 'समस्तविषयत्यागः सर्वभावेन यत्र हि। समर्पणं च देहादेः,पुष्टिमार्गःस कथ्यते ॥' (श्रीपुष्टिमा० १९)। हैं। जिस भक्तिमार्ग में जीव को दीनता, पिस मिली अन्य साधन अपेक्षा किये ही भगवान के आविर्भाव का हेतु बन जाती है यह शुद्ध- भक्तिमार्ग कहा जाता है । यह वह मार्ग है जिसमे वियोग की स्थिति मिलन की आकाक्षा और आतुरता रहने किन्तु उस दशा में मिलन पच न होने से उत्पन होने वाला दैन्य पल अर्थात् प्रार्थनीय अवान्तर (माना जाता है। जिस प्रकार सयोग मान को जन्म देता है । प्रकार विरह दैन्य को जन्म देता है तथा यह विरहजन्य दैन्य भग- का आविर्भाव कराता है, अत. वह दैन्य प्रार्थनीय है और प्रार्थनीय के कारण ही उमे पल कहा गया है। इसीलिये श्रीगोकुलनाथ ने है, राधेश ' मुझ पर वह रूपा कीजिये जिससे मै उस दैन्य को व कर सर ( जो आपयी कृपा का कारण हे और जो मुझमे जाणुमात्र नहीं है) (गोकुलनाथकृतविज्ञप्ति १)। "जिस भक्तिमार्ग में सर्वात्मना सारे विषयों का परित्याग कर ' जाता है तथा देहादि को भगवान् को समर्पित कर दिया जाता है, शुद्धपुष्टिमतिमार्ग कहा जाता है" ( श्रीपुष्टिमा० १९)। १. यद्देन्य स्वरकृपाहेतु न तदस्ति ममाप्यपि । ता कृपा पुरु राश। यया तद्दन्यमाप्नुयाम् ॥ कुलनायकृतविज्ञप्तिः, १)। मिलाइये, विट्ठलनायकृतविज्ञप्तिस्तोत्र ॥ ८ प्रमेयरलार्णवे [पूर्वा . 'समस्त'-इत्यादि । यत्र सकटलौकिकविपयाणां त्याग सानुरागग्रहणाभावः स शुद्धपुष्टिमार्ग | सर्वभावेन सर्वात्मना देहादेः यत्र समर्पणम् । अत एव ब्रजवरवधूभिरक्तम् 'सत्यज्य सर्वविपर्यास्तव पादमूलं प्राप्ता (भाग० १०।२९।३१ ) इति । 'विषयत्वेन तत्यागः स्वस्मिन् विषयता स्मृतेः । यन वै सर्वभावेन पुष्टिमार्ग. स कथ्यते ।" (श्रीपुष्टिमा०२०)। 'समस्तविपयत्याग' ( अर्थात् सारे विषयों का त्याग ) इस पाद से प्रारम्भ होने वाली कारिका की व्याख्या करते हैं। जिस भक्तिमार्ग में समस्त लौक्कि विषयों का परित्याग कर दिया जाता है अर्थात् उनका अनुरागपूर्वक ग्रहण नहीं किया जाता यह शुद्धपुष्टिभक्तिमार्ग है। यह वह मार्ग है जिसमें सर्वमावेन अर्थात् सर्वात्मना देहादि को भगवपित कर दिया जाता है। इसीलिये ब्रजाजनाओं ने भगवान से कहा था, 'हम समी विषयों का परित्याग कर आपके चरणों में आयी है (भाग० १०।२९।३१)। "जिस भकिमार्ग में पियों को विषय के रूप में त्याग दिया जाता है तथा जीव सर्वाग्मना गगवान् के स्मरण (अर्थात् भगवत्कर्तृक १ मैव विभोऽहंति भवान् गदितु नरास, सन्त्यज्य सर्वविषयास्तवपादमूलम प्रासा भजस्व दुरवग्रह मा त्यजास्मान, देवो यथादिपुरुषो मजतेमुमुन् । (भाग १०।२९।३१)। "यच्च भगवतोक 'वजस्यानामयम्' ( माग० १०।२९।१८) इति तदस्माक नोद्देश्यम्, यत सर्वविपयान् एव सन्त्यज्य तव पादमूलं प्राप्ता । अनेन त्यक्तार्थपरिग्रह अनुचित । नापि जारत्वेन समागतमिति निरूपितम | एकादशेद्रियाणामपि विपया त्यक्ता सवासना | तत्र विनि- गमक तव पादमूलं प्राप्ता. इति । अन्यथा पादमूलप्राप्तिरेव न स्यात । यदुक्त, 'धूतागमनकारणम्' (भाग० १०।२९।१८) इति, तत्राहु 'भजस्व' इति ।" (सुबोधिनी १०।२९।३१)।
चतुर्थोऽध्यायः] पुष्टिविवेकः 'विषयत्वेन'-इत्यादि । यत्र विषयलेन विषयाणां त्यागः ममताविरहो, भगवदीयत्वेन ग्रहणं स पुष्टिमार्गः । कृतात्म- निवेदनानां तावदंशस्यैव त्याज्यत्वात् । 'क्रीडार्थमात्मन इदं त्रिजगत्कृतं ते, स्वाम्यं तु तत्र कुधियोऽपर ईश कुर्यु" (भाग० ८१२२२२०) इति वाफ्यात् पदार्थमात्रस्य भगवदीयत्वेन स्मरण) का विषय बनता है यह गुद्धपुष्टिमतिमार्ग कहा जाता है" (श्रीपुटिमा० २०)। 'विषयत्वेन' ( अर्थात् विषय के रूप में) इस पद से प्रारम्भ होने वाली कारिका की व्याख्या करते हैं। जिस भक्तिमार्ग मे विषयो का विषय के रूप में परित्याग कर दिया जाता है (अर्थात् विषयों में विषय के रूप में ममत्व का अभाव रहता है ) तथा उन्हे भगवदीय के रूप में (अर्थात् वे भगवान् के हैं इस मुद्धि ते) गृहीत किया जाता है यह शुद्धपुष्टिभक्तिमार्ग कहा जाता है क्योकि जिन्होंने आत्मनिवेदन या आत्मसमर्पण कर दिया है उन (प्रपन जीवों) के लिए पेवल उतना अश (अर्थात् विषयो को विषयत्वेन ग्रहण करना) ही त्याज्य है । बलि की पत्नी बिन्ध्यावली के, 'हे मगरन् । इन तीनों लोकों की सृष्टि आपने अपनी लीला के लिये की है, किन्तु अन्य दुर्युद्धि लोग अपने को इनका स्वामी मान बैठते है। (भाग० ८।२२।२०), इस कथन से भगवदीयत्वेन पदार्थ- १. क्रोदार्थमात्मन इद निजगत्कृतं ते स्याम्य तु तत्र कुषियोऽपर ईश कुर्युः । यतुं प्रभोस्तव फिमस्पत भावहन्ति त्यक्तहियस्त्वदवरोपितकर्तृवादाः ।। (भाग० ८।२२।२०)। "सर्वसामयं सूचयन्ती सम्बोधयति ईश ! इति । ते त्वया, आत्मनः स्वस्य, क्रीडार्थम् इदं त्रिजगत् लोकत्रयात्मक प्रस्न जगत्, कृतं सृष्टम् । तम त्दनीडोपप रणोभूते जगति, अपरे केचित् स्वाम्यं स्वत्वयुद्धि कुर्यु: कुर्वन्ति । तया बुद्धि पत्वा वय दातार इति मन्यन्ते । सन्न घटत इत्याह, कर्तुः इति । कर्तुः जगत्सष्टुः प्रभोः पालकस्य, अस्यत. संहतुंच, तव तदा भक्तो . प्रमेयरत्नाणवे [ पूर्वा उत्तमत्वम्, तथा सति ममतामात्रस्यैव संसारत्वेन अनादर- णीयत्वम् । किञ्च, 'स्वस्मिन्” इत्यादि। यत्र 'सर्वभावेन' सर्वा- मना, स्वस्मिन् जीवे भगवत्स्मृतेः विषयता स शुद्धपुष्टिभक्तिमार्गः। अयमर्थः । भक्तो हि यदि भगवत्कर्टकस्मृतिविपयो भवति साफल्यम्, 'यदनुस्मयते काले स्वबुद्धयाऽभद्ररन्धन !" मात्र के उत्तम होने की सिद्धि होती है और ऐसी स्थिति में पदार्थों में ममतामान ही संसार के रूप में अनादरणीय एव हेय सिद्ध होती है। तात्पर्य यह है कि भगवदीयपदाथों में ममना रूप संसार ही हेय है। उपर्युक्त कारिका के 'स्वस्मिन् विपयता स्मृतेः' इस चरण की व्याख्या करते हैं । जिस मार्ग में जीव सर्वात्मना भगवान् के स्मरण (अर्थात् भगवत्क- ते किम आवहन्ति वि समर्पयन्ति ? न किमपि, स्वत्वस्यवाभावात् । तर्हि कुत एवमभिमानः वाह, कुधियः इति । लोकलज्जापि तस्त्यक्तत्याह- त्यह्रिय इति । वस्तुतस्तु त्वमेव मायाप्रेरणया अवरोपितः कर्तृवादो वयं स्वतन्नाः कर्तार इति वादमानं येषा ते । अयं भावः । त्वदीयमेव सर्व यथेच्छं गृहाण' इति वक्तव्ये, 'अहं त्रिलोकेशो मामुपेत्य जनः पुनरन्यत्र याचितुं नाहीत, त्वं तु वालिशमति: स्वल्पमेव याचसे' इत्युक्त्वा पुनः, 'लोकत्रयं मयापितं तृतीयपादाय देहं समय प्रतिश्रुतम् ऋतं करोमि' इति देहादिषु स्वाम्याविष्कारेण ब्रुवनयं वन्मायामोहितः कुर्बुद्धिः निलंजन, यतस्त्वमेव देहादिसर्वस्यापि स्वामी । यतो मन्दबुद्धिमेन केवलं कृपयंव विमुच्य पालय इति ।" ( बालप्रबोधिनी ८।२२।२०)। १. एतारत्व हिं विभिर्भाव्यं दोनेषु वत्सलः । यदनुस्मयते काले स्वबुद्धयाभद्रल्धन ।। (भाग० ४।३०।२८)। "हे अभद्ररन्धन ! अमङ्गलनाशन ! दोनेषु वत्सलः कृपालुभिः प्रभुमिः स्वामिभिः एवातद् एव भाव्यम् कार्यम् किं तद् इत्यपेक्षायामाहु, 'यद्' इति । एषोऽस्मदीय इति स्वबुद्धया काले सेवादिसमय अनुस्मयंते इति यत् ।" ( बालप्रबोधिनी ४।३०।२८) ।
चतुर्थोऽध्यायः ] पष्टिविवेकः (भाग० ४।३०।२८) इति प्रचेतोवाक्यात् । एतच 'नामभिः दूरगान् पशून् । कचिदाहयति प्रीत्या" (भाग० १०१५।१२) इत्यस्य व्याख्याने स्पष्टम् । एवमुक्त्या उपसंहरन्ति, 'एवंविधैविशेषेण प्रकारेस्तु सदाश्रितैः। हृदि कृत्या निजाचार्यान्, पुष्टिमार्गों हि बुद्ध्यताम् ।। (श्रीपुष्टिमा०२१)। 'एवम्' इत्यादिना । एवम् अन्यैरपि पुष्टिमार्गीयः शुद्धपुष्टी . ढकस्मरण) का विषय बनता है अर्थात् भगवान् द्वारा याद किया जाता है वह शुद्धपुष्टिभक्तिमार्ग कहा जाता है । इस कथन का आशय यह है । भक यदि भगवत्कर्तृक स्मरण का विषय बनता है अर्थात् यदि भगवान् भक्त को याद करते हैं तो भक्ति को सफल हो गयी समझना चाहिए, जैसा कि वरुण के, "हे अमलनाशक प्रभु ! दीनों पर दया करने वाले प्रभुओं को इतनी ही कृपा करनी चाहिए कि अवसर पर वे उन्हें 'यह मेरा है' इस प्रकार की स्वजन बुद्धि से स्मरण कर लें" (भाग ४१३०१२८) इस वाक्य से ज्ञात होता है । यह बात, 'कमी दूर चले गये पशुओं को उनका नाम लेकर प्रेम से 'पुकारते या बुझाते है' (भाग० १०।१५।१२) इस वाक्य की सुनोधिनी में स्पष्ट है । उपर्युक्त प्रकार से शुद्धपुष्टि भक्तिमार्ग का निरूपण कर श्रीहरिराय 'एवम्' इत्यादि शब्दों से प्रारम्भ होनेवाली अधोलिखित कारिका से अपनी श्रीपुष्टिमार्गलक्षणानि नामक कृति का उपसहार करते हैं, सदाश्रित अर्थात् सजनाश्रित या भगवदाश्रित व्यक्तियो को "विशेषतः उपर्युक प्रकार की विशेषताओं से सर्वदायुक्त पुष्टिमतिमार्गदो श्रीमदल्लमा चार्य को हृदय में धारण कर, समझना चाहिए" ( श्रीपुष्टिमा० २१)। इसी प्रकार ( अर्थात् श्रीहरिराय की ही भाँति) अन्य पुष्टिमागियों १. द्रष्टव्य, सुबोधिनी १०।१५।१२।
११४ प्रमेयरत्नार्णवे [पूर्वाद्ध श्रद्धाधिक्यात प्रायः तत्स्वरूपम् एव उच्यते, न तु सामान्यतः पुष्टिभक्तिस्वरूपम् । सामान्यलक्षणं तु पूर्वोक्तम् एव निवन्धादि- सिद्धम् इति कोविदा एव विदादुर्घन्तु ॥ इति श्रीगोवर्द्धनधर-धीवल्लभाचार्य-श्रीविट्रलेश्वरचरणानुचरसेवकेन कालमट्टोपनामवाल कृष्णभट्टेन कृते प्रमेयरत्नार्णवे पुष्टिविवेकः समाप्तिमगमत् ॥ ४ ॥ ने भी शुद्धपुष्टिभक्ति में अधिक श्रद्धा होने के कारण, समान्यतः पुष्टि- भक्ति के स्वरूप का निरूपण न कर प्रायः मुदपुष्टिभक्ति के स्वरूप का ही निरूपण किया है। विद्वानों को विदित हो कि पुष्टिभक्ति का तत्वदीप- निबन्ध आदि में प्रतिपादित सामान्यलक्षण तो यही है जो हमने पहले (ऊपर पृष्ठ ८१-८२ पर ) बताया है । श्रीगोवर्द्धनधर, श्रीवल्लभाचार्य तथा श्रीविठ्ठलनाथ के चरणों के अनुगामी (अथवा अनुचरों के ) सेवक, लालूभट्ट के नाम से प्रसिद्ध बालकृष्णम के द्वारा विरचित प्रमेयरस्मार्णव का पुष्टिनियेक नामक चतुर्भ अध्याय समाप्त हुआ ||४|| पुष्टिभक्त्यधिकारविवेकः (पञ्चमोऽध्यायः) अथ पुष्टिभक्तिमार्गाधिकारो विमृश्यते । 'तत्र, 'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवप वृणुते तेन लभ्यः' (कठोप० १।२।२३; मुण्ड० उप० ३२२३), इति श्रुतेः यस्मिन् भगवत्कृपा सोऽधिकारी। तत्र कृपाया अप्रत्यक्षत्वात् तत्कार्यरूपपुष्टिमार्गरुच्यासा अनुमीयते, यतः कृपां विना पुष्टिमार्गे रचिौदेति । तदुक्तं निवन्धे, . "कृपायुक्तस्य तु यथा सिध्येत् कारणमुच्यते' (सर्वनिर्णयप्र० का पुष्टिभक्त्यधिकार-विवेक (पञ्चम अध्याय) अन पुष्टिभक्तिमार्ग के अधिकारी का विचार किया जाता है । अति पे, 'इस भात्मतत्व की उपलब्धि न तो प्रवचन से हो सकती है, न मेधा से और न यहुश्रुत होने से हो। यह आरमतत्त्व तो उमी व्यक्ति के द्वारा प्राप्य है जिसका यह वरण करें' (क्टोर० १।२।२३, मुण्ड० उप० २१२१३) इत्यादिवाक्यो ने सिद्ध होता है कि पुष्टिमक्तिमार्ग का अधिकारी वही होता है जिन पर भगवान् की कृपा हो जाये । भगवान् की कृपा प्रत्यक्षगम्य नहीं है अतः अप्रत्यक्ष होने के कारण उसका अनुमान उसके कार्य के आधार पर किया जाता है और उस कृपा का अनुभाषक कार्य है पुष्टिमार्ग में व्यक्ति की अभिसनि, क्योकि भगवान की कृपा के बिना पुष्टिमार्ग में अभिरुचि नहीं होती । तत्वार्थदीपनिनन्ध के, 'कृपायुक (अर्थात् जिसको भगवत्कृपा को उपलब्धि हो गयी है उस) यहि को .
१२० प्रमेयरलार्णवे [पूर्वा .. २२६) इति; व्याख्याने 'कृपापरिज्ञानं च मार्गरुच्या निश्चीयते' (सर्वनिर्णयप्र० प्र० २२६) इति । एवञ्च, पुष्टिमार्गीयफलदित्सा- समुद्भूतभगवत्कृपाजन्यपुष्टिमार्गविषयकरुचिमान् अधिकारी इति शेयम् । तादृशरुच्युत्पत्तो प्रकार उच्यते। तथा हि, दैवजीवेषु यं जीवं पुष्टिमार्गे अगीकर्तु हरिः वाञ्छति, तस्य प्रभुकृपया सत्सङ्गे सति तत्कृपया परिचर्यादिना तत्प्रसङ्गाद् यथासम्भवं श्रवणतनुजसेवनादिरूपभजनानुभवाद् एतन्मार्ग रुचिरावि- र्भवति, 'एवं प्रवृत्तस्य विशुद्धचेतसस्तधर्म एवात्मरुचिः प्रजायते' फल की सिद्धि या प्राप्ति किस प्रकार होती है यह बताते हैं' (सर्वनिर्णय म. का० २२६) इस वाक्य तथा इसकी व्याख्या में कहे गये, “किमी व्यक्ति पर भगवान् की कृपा हो गयी है इस बात का निश्चयात्मक ज्ञान उस व्यक्ति की भक्तिमार्ग में भमिरुचि हो गयी है यह देख कर होता है' (सर्वनिर्णयप्र०प्र० २२६) इत्यादि वाक्य में इसी सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है । इस प्रकार पुष्टिमार्ग का अधिकारी यह व्यक्ति है जिसकी, पुष्टिमार्गीय फल प्रदान करने की इच्छा से होने वाली भगवत्कृपा के कारण, पुष्टिमार्ग में रुचि उत्पन्न हो गयी है, ऐसा समझना चाहिए । पुष्टिमार्ग में उपर्युक्त रुचि किस प्रकार उत्पन्न होती है, यह बताते हैं। देवी जीवो में से जिस जीवको भगवान् पुष्टिमार्ग में स्वीकार करना चाहते हैं उसकी, भगवत्कृपा से सत्सङ्ग की उपलब्धि होने पर उसकी कृपा से भगवद्भक्तों की परिचयां आदि का पवसर मिलने से प्रसङ्गवा यथासम्भव भगवत्कथाश्रवण एव तनुजा सेवा आदि रूप भक्ति का अनुभव होने से, इस मार्ग अर्थात् पुष्टि भक्तिमार्ग मे रुचि आविर्भूत अर्थात् जायत हो जाती है, जैसाकि श्रीमद्भागवत के 'इस प्रकार निरन्तर उन महात्माओं की सेवा करने से मेरा चित्त विशुद्ध हो गया और उन महारमाधों के (अपरिग्रह, सङ्गनिवृत्ति, श्रवण, कीर्तन एव भगवञ्चिन्तन . , पञ्चमोऽध्याय:] पुष्टिभरयधिकारविवेकः (भाग० १२५/२५) इतियास्यात् । पतारशचिमान अधिकारी पुष्टिमार्गे। ततो मार्गरुच्या क्रियमाणे श्रवणादो चित्ते भगवदावेशः, तदा चित्तशुद्धिः, ततः श्रवणाद्यनुवृत्तिः, तदुक्तं द्वितीयस्कन्धे, 'प्रविष्टः कर्णरन्प्रेण स्वाना भावसरोरुहम् । धुनोति शमलं कृष्णः सलिलस्य यथा शरत् ॥ घौतात्मा पुरुपः कृष्णपादमूलं न मुञ्चति । (भाग०२।८।५-६) इति । एवं श्रवणाद्यावृत्ती भगवति रुचिरुत्पद्यते, 'ताः श्रद्धया आदि रूप) धर्म में मेरी (आरमा की अर्थात् मन की) रचि अपने आप उत्पन हो गयो' (भाग० ११५/२५) इस वाक्य से ज्ञात होता है। इस प्रकार की रुचि वाला व्यक्ति ही पुष्टिमार्ग का अधिकारी है। तदनन्तर पुष्टिमार्ग में रुचि उत्पन्न हो जाने से श्रवणादि करने पर चित्त मे भगवान् का प्रवेश या प्राकट्य होता है और तन चित्त शुद्ध हो जाता है और फिर श्रवणादि की अनुवृत्ति होती है। श्रीमद्भागवत के द्वितीय स्कन्ध में परीक्षित ने यही बात अधोलिसित याक्यों में कही है, 'मगगन् कृष्ण कणरन्ध्र द्वारा अपने मक्तों के भावमय हृदयकमल पर आकर बैठ जाते हैं नथा उनके मनोमल को उसी प्रकार नष्ट कर देते हैं जिस प्रकार शरद् स्तु जल का गॅदलापन दूर कर देती है। जिसका अन्तःकरण शुद्ध हा जाता है यह श्रीकृष्ण के चरणकमलों को नहीं छोड़ता।' (भाग० २२८५-६)। इस प्रकार श्रवणादि की आवृत्ति शेने पर भगवान में रुचि उत्पन्न होती है, जैसा कि नारद के 'कृष्ण को मन.पों को अन्यायका प्रपेकन्याश्य, पद एक अक्षर कार्य समाते. १. द्रष्टव्य, भाग० २।८५-६ को प्रकाशसहिता सुबोधिनी तया बालप्रबोधिनी।
१२२ प्रमेयरलार्णवे [पूर्वाद्ध मेऽनुपदं विशृण्वतः प्रिय श्रवस्यङ्ग ममामवद् रचिः (भाग०१५।२६) इति वाक्यात् । इयम् अननुभूतविपया परोक्षरुचिरित्यभि- धीयते । इयं हि श्रवणादिना सत्पुरुपादरदर्शनादिना रुचिरावि- भवति इति प्रथमकक्षापन्ना शेया । यदनुभ्यासिना यता' (भाग० १२।१५) इति श्लोकव्यारयाने 'सर्वनालौकिरपु पदार्थेषु माहात्म्य- श्रवणाद् रुचिरुत्पद्यते' (सुयो० २२१५) इति सुधोधिन्याम् इयमेव रचिरक्ता इति बोध्यम् । सा भक्तिरेव, 'रुचि. श्रवणादिः प्रेम च इति भक्तित्रिविधा' इति प्रथमस्कन्धसुवोधिन्यामुक्त । ततोऽननुभूतविपयया भगवद्रच्या थवणादिरूपे भजने भक्तिवद्धिनीमकरणोक्तदिशा चोजरुपो भावः सूक्ष्मभक्तिः वृद्धि हुए सुनने से मियकीर्तियाले भगवान कृष्ण में मेरी रचि होगयी' (भाग: १/२६) इस वाक्य से ज्ञात होता है। विषय (अर्थात् भगवान् ) धे अपरोक्ष अनुभव से विरहित यह रुचि परोक्षरुचि कही जाती है । यह रुचि श्रवणादि, महापुरुषों का आदर-सत्कार करने एवं उनका दर्शन, सत्सङ्ग करने आदि से आविर्भूत होती है अत इसे प्रथम कक्षा की (अर्थात् प्रारम्भिक) रुचि समझना चाहिए । भागवत के 'जिनके निर- न्तर ध्यान रूप सङ्ग से युक्त विवेकी लोग' (भाग ११२।१५) इम श्लोक की मुबोधिनी व्याख्या में 'सर्वत्र भलौकिक पदार्थों में, उन अली किक पदार्थों का माहात्म्य सुनने से रचि उत्पन्न होती है' (सुरोधिनी १२।१५) इस वाक्य में इसी रुचि का प्रतिपादन किया गया है । यह रुचि भक्ति ही ( का नामान्तर ) है जैसाकि प्रथम स्कन्ध की सुबोधिनी टीका की 'मनि, रचि, श्रवणादि और प्रेम के भेद से निविध है। इस उक्ति से ज्ञात होता है। तदनन्तर भगवान् में होने वाली विषय (अर्थात् भगरान् ) म अनुभव से विरहित रुचि से श्रवणादिरूप भजन करनेपर श्रीमदल्लमाचार्य- १ द्रष्टव्य, भाग०१५।२६ को सुवोधिनी एव बालप्रबोधिनी ।
पञ्चमोऽध्यायः] पुष्टिभक्त्यधिकारविवेकः १२३ प्राप्नोति । स भावो भगवता पूर्वमेव जीवत्वसम्पादनोत्तरं पुष्टिमार्गायत्वसिद्धये सूक्ष्मरूपः स्थापित इति शेयम्'। स वीजभाव इत्युच्यते । स एप भावः परोक्षरुच्या श्रवणादि- सहकृतः अन्तर्भगवत्स्फूति करोति, 'श्रवणादिना तु स्वाभाविको भगवानाविर्भवति' (भागवतार्थप्र० प्र० २०१६) इति द्वितीय- स्कन्धनिबन्धात् । तथा सति अन्तर्भगवत्स्फूर्ती यत्किञ्चिदनु- भवाद् रुचिविशेप उत्पद्यते, स च अपरोक्षरुचिः इत्युच्यते । तया स एव भावो चीजरूपा श्रवणादिसाधनैर्वृद्धः सन् प्रेमरूपो भवति । स च स्नेहो हरीतर-विषय-राग-निवर्तकः, 'स्नेहाद्राग- कृत (पोडशग्रन्थान्तर्गत ) मनिवर्धिनी नामक (एकादशरलोकात्मक) प्रकरणग्रन्थ में प्रतिपादित प्रकार से बीजरूपभाव या सूक्ष्मभक्ति की वृद्धि होती है। अवधेय है कि यह सूक्ष्मरूप भाव भगवान् ने पहले ही, जीवत्व सम्पदित कर देने के बाद, जीव के पुष्टिमार्गीय होने की सिद्धि के लिये स्थापित कर दिया था और ( इसीलिये) यह बीजभाव कहा जाता है । श्रवणादि से युक्त होने पर यह बीजभाव उपर्युक्त परोक्ष- रुचि से अन्तस्तल में भगवान् की स्फूर्ति कराता है जैसा कि श्रीवल्लभा- चार्य के तत्त्वार्थदीपनिबन्ध के भागवतार्थप्रकरण की प्रकाश व्याख्या के 'श्रवणादि से स्वामाविक भगवान् आविर्भूत होते है' (भागवतार्य- म०प्र० २११६) इस वाक्य से ज्ञात होता है । तर अन्तस्तल में भगवान् के स्फुरित होने पर जो अनुभव होता है उससे एक विशेष रुचि उत्पन्न होती है । उस विशेष रुवि को सिद्धान्त में अपरोक्ष रुचि कहा जाता है । उस अपरोक्षरचि से उपर्युक्त बीजरूप भाव ही श्रवणादि साधनों द्वारा वृद्धिंगत होकर प्रेम बन जाता है। यह प्रेम या स्नेह भगवान् के अतिरिक्त अन्य सभी विषयों में होने वाले राग की निवृत्ति कर देता है जैसाकि श्रीवल्लभाचार्यकृत 'भत्तिवादिनी' के, 'स्नेह से राग १. द्रष्टव्य, कपर पृष्ठ ३७ . १२४ प्रमेयरत्नाणवे [पूर्वाद्ध विनाशः स्याद् (भक्तियडिनी, ४) इति भक्तिचर्शिनीग्रन्थात् । भगवद्भिनरागनिवर्तको भगवद्गायः स्नेहः इति कार्यलक्षणात् । ततः सेवा-श्रवणावृत्या बर्द्धमानः स पर आसक्तिरूपो भवति। स तु भगवत्सम्बन्धरहितपदार्थपु बाधकत्वं भासयति, 'आसक्त्या स्याद् गृहारुचिः' (भक्तिवद्धिनी, ४) इति भक्तिवद्धि- नीप्रकरणात् । यरुचिः न गच्यभावः किन्तु चिविरुद्धो भावः, विरोधार्थ नञः स्मरणात्', 'गृहस्थानों वाधकत्वमनात्मत्वं च का नाश होता है। (भतिवद्धिनी, ४) इस वाक्य मे सिद्ध होता है । स्नेह के 'भगवान् से भिन्न ( अन्य सभी) विषयों में विद्यमान राग या निवर्तक अर्थात् नाशक भगवद्भाय स्नेह कहा जाता है। इस कार्य लक्षण (अर्थात् स्नेह के कार्य की दृष्टि से की गयी स्नेह की परिभाषा) से उपर्युक्त कथन की पुष्टि होती है । तदनन्तर यह स्नेह या प्रेम ही भगवान् की सेवा और उनकी लीलाओं के श्रवण की पुनः पुनः आत्ति से बढ़ कर आसक्तिरूप हो जाता है और उसके कारण मक्त को भगवान् के सम्बन्ध से विरहित पदार्थ बाधक मतीत ( या ज्ञात ) होने लगते हैं जैसा कि भक्तिवानी के 'आसक्ति से गृह (आदि) में भरुचि हो जाती है' (भक्तिवर्द्धिनी, ४) इस वाक्य से ज्ञात होता है। भक्तिवर्द्धिनी के इस पाद में प्रयुक्त 'भरचि' शब्द का अर्थ 'रुचि का अभाव' नहीं प्रत्युत 'रुचिविरोधी भाव' है; (जरुचि का अर्थ सचिविरोधी भाव मानने में कोई अनुपपत्ति नहीं है ) फ्याँकि 'नन्' का विरोध के अर्थ में प्रयोग व्याकरणशास्त्र में प्रसिद्ध है और भक्तियर्द्धिनी के उपर्युक्त आशय को स्पष्ट करते हुए परवर्ती श्लोक म ही कहा गया है कि 'मगवान् में भासक्ति हो जाने पर घर में रहने गले (परिजन-पुरजन आदि) यापक और अनात्मस्वरूप जान पड़ने लगते १. तत्सादृश्यमभावश्च तदन्यत्वं सदल्पता । अप्राशस्त्यं विरोधश्च नअर्थाः पट प्रकीर्तिताः ॥ (माकरणभूषणसारे) पञ्चमोऽध्यायः] पुष्टिभक्त्यधिकारविवेकः भासते' (भक्तिवर्धिनी, ५) इति तत्रैव विवरणात् । तथा च भगवदितरविपयवाधकत्वस्फूर्तिसम्पादको भाव आसक्तिः इति लक्षणम् । ततः स एवं उत्तरोत्तरं वृद्धो व्यसनत्वं प्राप्नोति । विशेषण अस्यन्ते क्षिप्यन्ते दैहिका धर्मा अनेन इति व्यसनम् । सा व्यसनभावं प्राप्ता भक्तिः मानसी सेवा इत्युच्यते । 'सा परानुरक्तिः ईश्वरे (शाण्डिल्यभक्तिसूत्र १।१।२) इति भक्तिसूत्रात् । 'यदा स्याद् व्यसनं कृष्णे कृतार्थः स्यात् तदैव हि' (भक्तिवर्धिनी, इति भक्तिवर्जिन्याम् । 'घेतः तत्प्रवणं सेवा तत्सित्य तनुवित्तजा है' (भक्तिवद्धिनी, ५)। इस प्रकार आसक्ति का निष्कृष्ट लक्षण यह हुआ कि भगवान् के अतिरिक्त सभी विषयों के वाधक होने की अनुभूति का सम्पादन करा देने वाला भाव आसक्ति कहा जाता है। तदनन्तर उपर्युक्त आसक्तिरूप भाव ही उत्तरोत्तर वृद्धिगत होकर व्यसन हो जाता है। व्यसन शब्द का अर्थ है वह भाव जिससे दैहिक धर्मों का विशिष्ट रूप से निक्षेप हो जाता है। व्यसनभाव को पास भक्ति 'मानसी सेवा' कही जाती है। शाण्डिल्य- भक्तिसून के भक्ति के 'वह ( भक्ति) ईश्वर में परम अनुरक्ति है। (शाण्डिल्यभक्तिसून १।१।२) इस लक्षण से (भी) उपर्युक्त कयन की पुष्टि होती है। भक्तियर्द्धिनी में कहा गया है कि 'कृष्ण में व्यसन हो जाने पर भगा कृतार्थ हो जाता है' (भक्तिनर्द्धिनी, ५)। श्रीवल्लभाचार्य द्वारा सिद्धान्तमुत्तायटी के 'कृष्णायण चित्त (अर्थात् चित्तवृत्ति ) ही (मानसी) सेवा है। तनुजा मेवा और वित्तजा सेवा उपर्युन मानसी १. "सेवा लक्षयति, 'चेत.तत्पवणम्' (सिवातमुन्नावली, २) इति । तद शब्देन पूर्वोक्तः कृष्णः परामृश्यते । तथा च मानवणं चैत. सैया, देवाना गुणलिङ्गानाम् मानुयविककर्मणाम् । सत्त्व एवंकमनसो वृत्तिः स्वाभाविनी तु या ॥
१२६ प्रमेयरत्नार्णवे [पूर्वाद्ध (सिद्धान्तमुक्तावली, २) इति मुक्तावलीप्रकरणे तदर्थस्यैव स्फुटीकरणात् , मुक्तावलीप्रकाशे पतद्विवृती, 'ता नाविदन्मग्य- नुपनयद्धधियः स्वमात्मानमदस्तथेदम्' ( भाग० १।१२।१२ ) इत्येकादशवाफ्योपन्यासाचा सेवा की सिद्धि में साधक या सहायक हैं।' (सिद्धान्तमुक्तावली, २) इत्यादि श्लोक में इसी अभिप्राय के स्पष्ट किये जाने, तथा सिद्धान्त मुक्तावली के प्रथम श्लोक की विकृति नामक अपनी व्याख्या में विट्ठल- नाय द्वारा श्रीमद्भागवत के एकादशस्क्न्ध के 'मायातिरेक से मुझमें तन्मय हो गयी प्रज की उन गोपियों को, अपन कहलाने वाले पति-पुनादि की, अपने शरीर की, अपनी, परलोक की और इस लोक की भी सुध-बुध नहीं रह गयी थी' (भाग० ११।१२।१२), इस भगवद्वाक्य को उद्धृत करने एव भागवत के तृतीयस्कन्ध के अनिमिता भागवती मक्तिः सिद्धेगरीयसी । (भाग० ३।२५।३२-३३) इति लक्षणवाक्ये मनोवृत्तेरेव भक्तित्वेन कथना वृत्तेश्च कारणतानतिरेकात् । अतः तादृशी चित्तवृत्तिः मानसी सेवा इति फलितम् । 'यथा' इत्यारम्प 'एतदेव सेवास्वरूपम् इत्याहुः' (सिद्धान्तमुक्तावलोविवृति ,१) इत्यादि । अत एव आथर्वणे 'भक्तिरस्य भजनं तदिहामुत्रोपाधिनेरा- स्येन मन:कल्पनम्' इति धूयते । अत्रापि मनसः कल्पनं भक्ति इत्युक्त्या तादृचित्तस्यैव भक्तित्वमायाति । भक्तिमोमासासूत्रेऽपि 'सा परानुरक्ति- रीश्वरे' (शाण्डिल्यभक्तिसूत्र ११११२ ) इति लक्षणेन चित्तधर्मस्यानुराग- स्यव भक्तित्वम् उक्तं धर्मधर्मिणोरभेदात् । भक्तिशब्देन च सेवेव विवक्षिता, भज सेवायाम् इति धात्वर्यात्""भक्तिशब्देन मुख्यतया मानसी सेवा एव आयाति । सा केन साधनेन स्याद् इत्याकाक्षायामाहुः, 'तत्सि- द्धघे' इति । तनुजसेवाया: वित्तजायाच "उभयोश्च तथात्वावगतेः।" (सिद्धान्तमुक्तावली योजना, २)।
पञ्चमोऽध्यायः पुष्टिभक्त्यधिकारविवेकः १२७ 'मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाग्भसोऽम्युधौ । लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य दाह तम् ॥' (भाग०३३२९।११-१२) इति तृतीयस्कन्धे तादग्भक्तः लक्षितत्वाच्च । अत एव एतद्- व्याख्याने 'यथा कायिकगतिगोपिकानाम् (सुबोधिनी २२९।११) इत्यनेन मुख्यमका एव उदाहताः। अतो व्यसनपर्यन्तं साधनाचरणम् । अत एव सुबोधिनी-निवन्धयोः प्रमाण-प्रमेय- साधनास्यैः त्रिभिः प्रकरणः प्रेमासक्ति-व्यसनानि निरूप्य अग्ने फलं निरूपितम् । अतः श्रीमद्भागवतादौ श्रीमदाचार्योक्ती श्रीमविट्ठलेशोक्तौ च यत्र यत्र साधनानां प्रेमावधिकत्वं दृश्यते तत्र तत्र प्रेम-व्यसनयोः अभेदमादायोक्तम् इति शेयम् । 'प्रेम- . "जिस प्रकार गङ्गा का जल समुद्र में निरन्तर गिरता रहता है उसी प्रकार मन का भगवान में निर्वाध रूप से निरन्तर रमा रहना निर्गुण मनियोग का लक्षण कहा गया है' (भाग० ३।२९/११-१२), इस वाक्य में उसी प्रकार की भक्ति का लक्षण मिलने (अर्थात् भक्ति के उपर्युक्त स्वरूप का ही निरूपण होने ) से भी उपर्युक्त कथन की पुष्टि होती है। इसीलिए तृतीयस्कन्ध के इस श्लोक की मुबोधिनी व्याख्या में श्रीवल्लभाचार्य ने 'जिस प्रकार गोपियों की कायिक गति' (सुबोधिनी ३।२९।११) इत्यादि वाक्यों द्वारा मुख्य भक्तों का उदाहरण ही दिया है। अत: व्यसनपर्यन्त साधन का आचरण होता है। इसीलिये मुगो- धिनी तथा तत्त्वदीपनिनन्ध मे प्रमाण, प्रमेय एवं साधन नामक तीन प्रकरणों में प्रेम, आसक्ति और व्यसन का निरूपण करने के बाद फल का निरूपण किया गया है। अतः श्रीमद्भागवतादि मे तथा भीमद्वाल- भाचार्य एव श्रीविठ्ठलनाय की उक्तियों में जहां-जहाँ साधनों के प्रेमाव- धिक होने का उल्लेस है यहाँ प्रेम और व्यसन को अभिन मान कर ही वैशा कहा गया है { अर्थात् वहाँ प्रेम शब्द से अभिप्राय उपर्युक्त व्यसन से ही है) ऐसा समझना चाहिए । श्रीवल्लभाचार्य के 'प्रेमसेवा से मग- १२८ प्रमेयरलार्णवे [पूर्वा , सेवात एव स्याद् विशिष्टप्यक्तिरुत्तमा"(सर्वनिर्णयमका०९२)इत्या- दावपि प्रेमसेवाशब्देन मानसी सेवा व्यसनशब्दवाच्या झेया। एवं सति भगवढच्युत्पत्त्यनन्तरं क्रियमाणः श्रयणादिभिः साध्यायाः प्रेमभक्त प्रथमावस्था मेमशब्दवाच्या,ततो मध्यमा वस्था आसक्तिः, परिपाकावस्था व्यसनशन्दवाच्या, इत्येवम् अभेदात कुत्रचित् प्रेमशब्देन धासनिा, कुनचिद् व्यसनम् अभिधीयते इत्यर्थः स्वारस्याद् बोध्यः । मुख्यफलं तु व्यसनो. चरमेव, 'यदा स्याद् व्यसनं कृष्णे, कृतार्थः स्यात् तदैव हि' (भक्ति- वद्धिनी, ५) इत्यन एवकारेण अन्ययोगव्यवच्छेदात् । वान कृष्ण की उत्तम अभिव्यक्ति होती है अर्थात् भगवान् का प्राकट्य हाता है' (सर्वनिर्णयन ० का० ९२) इत्यादि वास्यो मे भी 'प्रेमसेवा' शब्द से अभिप्राय व्यसन गब्द से अभिहित की जाने वाली उपर्युक्त मानसी सेवा से ही है, ऐमा समझना चाहिये । इस प्रकार भगवान् में रुचि उत्पन होने के बाद क्येि जाने पाले श्रवणादि से साध्य प्रेमभक्ति की प्रथम या प्रारम्भिक अवस्था प्रेम शब्द से, (द्वितीय या ) मध्यम अवस्था आसक्ति शब्द से एघ परिपाक की अवस्था व्यसन शब्द से अभिहित की जाती है और इसीलिए प्रेम शब्द को यथावसर कहीं आसक्ति तथा कहीं व्यसन जहाँ जो अर्थ उपयुक्त का बोधक समझना चाहिये। मुख्यफल की प्राप्ति तो व्यसन के वाद ही होती है जैसा कि भक्तिवर्धिनी के, 'भक्त पृतार्थ तनी होता है जय कृष्ण में व्यमन हो जाता है। (भक्तिवधिनी, ५), इस पापय में १, "विशिष्टाभिव्यक्ती हेतुमाह-प्रेमसेवात इति । भक्तिशब्दस्य प्रत्ययार्थ प्रेम धात्वर्थ सेवा । 'भक्त्यय तुष्टिमयति' इति घाययात, 'पश्यन्ति ते मे ( भाग० ३।२५।३५) इति च । विशिष्टस्म कृष्णस्य कृतार्थविज्ञापनाय अभिव्यक्ति उत्तमा, न तु दैत्यवधामिव ।" (सर्वनिर्णयप्र० प्र० ९२)।
पञ्चमोऽध्यायः] पुष्टिभक्त्यधिकारविवेकः १२६ इयं व्यसनात्मिकैव भक्तिः भगवता देवहूति प्रति आत्यन्ति- कीत्वेन उक्ता, 'अहेतुक्यव्याहिता या भक्तिः पुरुषोत्तमे ॥ सालोक्यसाटिंसामीप्यसारूप्यैकत्वमप्युत । दीयमानं न गृहन्ति विना मत्सेक्नं जनाः ।। स एप भक्तियोगारव्य आत्यन्तिक उदाहृतः। (भाग० ३।२९।१२- १४) इति तृतीयस्कन्धात् । व्याख्यातं चाचायः, 'अत्यन्त. प्रेमोत्पत्तावेवं भवति' (सुबोधिनी २२९।१३-१४) इति । अतः प्रेमपरिपाकावस्था व्यसनम् । ततो व्यसनवशात् सर्वत्र पुरुपो- त्तमबुद्धौ सर्वत्रैव उत्कटनेहो भवति । स सर्वात्मभावशब्द- चाच्यः। 'एव' (तब ही) शब्द के प्रयोग से अन्य स्थितियों में कृतार्थ होने का निपेच सूचित किये जाने से ज्ञात होता है। भगवान् (कपिल) ने देवहूति को आत्यन्तिकी भक्ति के रूप में उप- र्युक्त व्यसनामिका भक्ति का ही उपदेश दिया था, जैसा कि भागवत के तृतीयस्कन्ध के 'पुरषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण में भर्थात् मुझमें मह. तुकी और भव्यवहित मक्ति (से सम्पन्न) मेरे नक्स, मेरी सेवा छोड़ कर सासरोक्य, मार्टि, सामीप्य, सारूप्य और एकत्य स्वीकार करने को मी प्रस्तुत नहीं होते। वह मस्तियोग ही आत्यन्तिक कहा गया है। (भाग० ३।२९।१२-१४), इन वाक्यों से ज्ञात होता है । उपर्युक्त की व्याख्या करते हुए श्रीवल्लभाचार्य ने कहा है कि, 'अत्यन्त प्रेम की उत्पति होने पर ऐसा होता है' (मुबोधिनी ३१२९१३-१४)। अतः प्रेम पी परिपाकावस्था ही व्यसन कही जाती है । तदनन्तर व्यसन के कारण सर्वन पुरुषोत्तमधुद्धि हो जाने पर सर्वत्र अर्थात् पदार्थमात्र में उत्कटस्नेह हो जाता है। यह उरकेटरनेट ही सर्वात्मभाव शब्द से अभिहित किया जाता है। ९ १३० प्रमेयरलार्णवे [पूर्वा तत्सिद्धौ पुरुषोत्तमाविर्भावो याह्याभ्यन्तरभेदेन' निरन्तरं सिद्धयति । ततः फलाघसरे सेवाफलप्रकरणोकरीत्या हि अलौकिकसामथ्य फलं भविष्यति इत्यलं विस्तरेण । एवमनेन प्रकारेण शुद्धपुष्टिभकानामधिकारः फलसहितो निरूपितः । फलं तु नित्यलोलान्तम्प्रवेशलक्षणम् , तदेव सेवा- फलविवरणे अलौकिकसामर्थ्यशब्देन उच्यते । आनन्दमया- धिकरणभाप्ये भगवता सह कामाशनाख्यं यत्फलम् उक्तं जीवस्य अत्यनुगृहीतस्य तदिदम् । पुष्टिप्रवाहमर्यादानिरूपण- इस सर्वात्मभाव की सिद्धि हो जाने पर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण का का बाह्य और आन्तर भेद से द्विविध आविर्भाव या प्राकट्य होता है । तदनन्तर फलप्रासि के समय श्रीवल्लभाचार्यविरचित सेवाफल नामक कृति में निरूपित रीति से अलौक्किसामर्थ्यरूप ( अर्थात् नित्यलीलान्तः प्रवेशरूप ) फल की प्राप्ति होती है। इस प्रकार इस विषय में और अधिक विस्तार में न जाकर यहों विराम करते हैं। इस तरह उपर्युक्त प्रकार से शुद्धिपुष्टिंभक्तों के अधिकार और फल का भी निरूपण किया गया। फल का लक्षण है 'नित्य लीला में प्रवेश'। सेवाफल विवरण में श्रीवल्लभाचार्य ने इस नित्य लीलान्तःप्रवेशरूप पाल को ही अलौकिक सामर्थ्य कह कर निरूपित किया है। ब्रासून के आनन्दमयाधिकरण के भाष्य (अणुभाष्य १/११११) में भगवान के द्वारा अत्यधिक अनुग्रहीत जीव का भगवान् के साथ भोगरूप जो फ्ल प्रतिपादित किया गया है वह भी यह नित्यलीलान्तःप्रवेशरूप फल ही १. द्रष्टव्य, सुवोधिन का० १०।२९।११४; १०।२९।४।२ । २. 'सेवायां फलनयम् अलौकिकसामर्थ्य सायुज्यं सेवोपयिको देहो वा वकुष्ठादिषु ।' (सेवाफलविवरणम्, पृष्ठ १५७)1 श्रीबालकृष्णभट्टः सम्मत पाठ के लिये देखें नीचे पृर १३७ ।
पञ्चमोऽध्यायः] पुष्टिभक्त्यधिकारविवेक; प्रन्थे 'भगवानेव हि फलम्' (पुष्टिप्र० १५) इत्यनेन स्वरूपस्यैव फलत्वम् उक्तं तदपि नित्यलीलान्तःप्रवेशरूपम् । तञ्च बहुप्रकारकं शेयम् । नित्यलीलायां हि केचन भक्त- रूपेण गो-पशु-पक्षि-वृक्षादिरूपेण नद्यादिरूपेण पुरुपोत्तमात्मक फलं निरवधि-आनन्दात्मकम् , आनन्दमयाधिकरणभाप्योक्त रोत्या तादृशमलौकिकं देहं प्राप्य देहेन्द्रियप्राणान्तःकरण- जीवेषु भगवदानन्दप्राकट्यात् ताशा भूत्वा अनुभवन्ति । अत एक, 'अहो ममी देववरामराचिंतम्' (भाग०१०।१५।५) इत्यादिभिः भगवता स्वलीलापरिकरस्वरूपं तादृशमेव निरूपितम् । पुष्टि- मागीयो जीवस्तु फलदशायां तत्परिकरमध्येऽन्यतमः कश्चिद् है। इसी प्रकार पुष्टिप्रवाहमर्यादाभेदनिरूपण नामक अपनी कृति में श्रीवल्लभाचार्य ने 'भगवान ही फल है' (पुष्टिप्र० १५) इस वाक्य में स्वरूप को ही फल कहा है, वह भी नित्यलीलान्तःप्रवेशरूप ही है। उपर्युक्त नित्यलीलाप्रवेश के अनेक प्रकार या रूप हैं । नित्यलीला में कुछ जीव भक्त के रूप में और कुछ गाय, पशु, पक्षी, वृक्ष, नदी आदि के रूप में, ब्रह्मसून के आनन्दमयाधिकरण के अणुभाष्य में प्रति- पादित प्रकारते, उस प्रकार का अलौकिक शरीर प्राप्त कर, देह, इन्द्रिय, प्राण, अन्तःकरण और जीव मे भगवदीय आनन्द के प्रकट हो जाने से उसी प्रकार के होकर असीम आनन्दात्मक पुरुषोत्तमात्मक पाल का अनुभव करते हैं । इसीलिये भगवान् ने 'हे देववर ! ये वृक्ष देवताओं द्वारा पूजित आपके चरणकमलों को शिरसा नमस्कार करते हैं। (भाग १०१५।५) इत्यादि वाक्यों द्वारा अपनी लीला के परिकर का उसी प्रकार का स्वरूप बताया है। पुष्टिमागीय जीव फलदशा में भगवान् के परिफर में कोई अन्यतम स्थान मात करता है अर्थात् किसी एक विशिष्ट । १. द्रष्टव्य, सुबोधिनी १०११५।५ ।
१३२ प्रमेयरलार्णवे [पूर्वाद्ध भविष्यति । तत्र भगवदिच्छा नियामिका । पुष्टिभक्तिः चतु- विधा, शुक्पुष्टि पुष्टि-पुष्टि-मर्यादापुष्टि-प्रवाहपुष्टिभेदात् । तत्र पुष्ट्रिभक्तित्वेन रूपेणक्येऽपि प्रकारभेदाभेदः । एवमेतत्फल- स्यापि नित्यलीलान्तःप्रवेशत्वेन ऐक्येऽपि प्रकारभेदो भक्त-गो- पशु-वृक्षादिरूपेण योध्यः। एतदेव तारतम्यं च । तथा सति सर्वेषां प्रवाहादिभेदभिन्नानां पुटिस्थानाम् एकमेव अलौकिक- सामर्थ्यरूपं फलं नित्यलीलान्त पातित्वशब्दवाच्यम् । तदापीते संसारव्यपदेशात्' (ब्रह्मसूत्र ४।२।८) इति तत्वसूत्रे, 'तदा नित्य- लीलान्तःपातलक्षणपुष्टिमागीयदशायाम् (अणुभाप्य धारा८) इति भाप्योक्तः। नित्यलीलाश्च शुद्धपुष्टिस्था अजसम्बन्धिन्यो शेयाः । तारशनित्यलीलान्तःपाते सति पुनः प्रकारविशेषस्तु रूप मे रहता है। इस सम्बन्ध में भगवान् की इच्छा ही नियामक है । शुद्धपुष्टि, पुष्टिपुष्टि, मर्यादापुष्टि और प्रवाहपुष्टि के भेद से पुष्टिभक्ति चार प्रकार की है । इन चारों में, पुष्टिभक्ति होने के रूप में अभेद होने पर भी, प्रकारभेद होने से भेद है। इसी प्रकार यद्यपि इन चारों का फल भी एक ही है, और वह है नित्यलीला में प्रवेश, किन्तु पुष्टिभक्ति के भेदों के अनुरूप ही उसमें भी भक्त, गाय, पशु, वृक्ष आदि के रूप में रहने का भेद हो जाता है और यही तारतम्य है । इस प्रकार प्रवाह, मर्यादा, पुष्टि और शुद्ध चारों प्रकार के पुष्टिभक्तों को प्राप्त होनेवाले एक ही अलौकिक सामर्थ्यरूप पल का अभिधान निन्यलीलान्त पातित्व' (अर्थात् मिल्यलीला में प्रवेश ) शब्द से किया जाता है, यह 'तदापीने संसारव्यपदेशात्' (ब्रह्मसूत्र ४।२।८) इस ब्रह्मसून के अणुभाष्य में 'तदा का अर्थ है तब भान् नित्यलीला में प्रवेश रूप पुष्टिमार्गीय दशा में' (अशुभाष्य ४।२।८) इस वाक्यसे ज्ञात होता है। शुद्धपुष्टिस्थ नित्यलीलायें अजसम्बन्धिनी हैं। उपर्युक्त प्रकार की नित्य हीरामें प्रवेश होने पर प्रकार विशेष अर्थात् किसी विशेष रूप में अवस्थिति तो जीव पञ्चमोऽध्यायः] पुष्टिभक्त्यधिकारविवेकः इष्ट एव, 'आसामहो चरणरेणुजुपामहं स्यां वृन्दायने किमपि गुल्मलतीपधीनाम् (भाग० १०१४७६१) इति वाक्यात् । अत आधिदैविके वृहद् वृन्दावनादा भक्तरूपेण गोपादिरूपेण वा स्थित्वा रसानुभवः । आधुनिकानामपि पुष्टिमार्गस्थितानां तादम्भगवरुपया पर्यवसाने फलरूपभावोत्पत्ती नित्यलीलान्तःपातो भविष्यति । तत्र ये आधुनिका होनाधिकारिणः पुष्टिमार्गीयाः तेषां चरम- जन्मामायाद् बहुभिर्जन्मभिः तादृशभायोत्पत्ती नित्यलीला- प्रवेशो भावी इति बोध्यम् । तृतीयस्कन्धे, 'देवाना गुणलिङ्गानाम्' (भा० ३।२५।३२ ) इत्यत्र सुबोधिन्याम् : 'अन्येषा तु यथाकथञ्चित् नियमाणा भगवति खण्डशो वृत्तिः अक्षय्यत्वाद् बहुभिः जन्मभिः पुष्टिं को इए ही है, यह बात उद्धव के 'मेरे लिये यह यहुत यड़ी यात होगी कि मैं इन गोपियों की चरणरज की अमिलापा रखनेवालो झाड़ियों, लताओं या ओपधियों में से कुछ हो जाऊँ' (भाग १०१४७६१) इत्यादि वाक्य से शत होती है । अतः पुष्टिजीय आधिदैविक महावन, वृन्दावन आदि में भक्त के रूप में या गोप आदि के रूप में स्थित होकर रसानुभूति करते हैं। आजकल के पुष्टिमार्गियों को भी मगवान् की कृपा से अन्त में पलरूप माव की उत्पत्ति होने पर नित्यलीला में प्रवेश प्रास होगा। यहां यह अवधेय है कि जो आधुनिक पुष्टिमार्गीय भक्त हीन अधिकारी हैं उनका यह अन्तिम जन्म नहीं है अत: उनका नित्यलीलाप्रवेश अनेक जन्मो (की साधना) के बाद फ्लरूप भाव (या भक्ति) की उत्पत्ति होने पर होगा। यह बात तृतीयस्वन्ध के, 'देवरूप ( अर्थात् आसुररूप इन्द्रियोंसे भिन्न ) इन्द्रियों की" (भाग० ३१२५/३२) इस श्लोक की सुबोधिनी व्याख्या के अधोलिखित वाक्य से ज्ञात होती है; 'अन्य लोगों की तो यथाकथशित् सम्पादित की गयी मगवान् में खण्डशः लगी १३४ प्रमेयरलाणंवे [पूर्वा गता अन्तिमजन्मनि भक्तिरूपा वृत्तिं जनयिष्यति इति न काप्यनु- पपत्तिः (सुधो० ३।२५।३२) इत्युक्तः । निवन्धे सेवाप्रकरणे 'भक्तिमार्गे मुख्याना' फलमाह' (सर्व- निर्णयप्र० प्र० २१८ आभासे) इत्युक्त्वा ये व्याख्याताः ते सर्वे मर्यादाभक्तिमार्गाया एव । 'अधुना तु' (सर्वनिर्णयप्र० का० २१२) इत्यारभ्य; 'सायुज्यं कृष्णदेवेन' (सर्वनिर्णयप्र० का०२१८) इत्यन्तेन गोणमुख्यभेदेन मर्यादाभक्तानां फलं' सायुज्यावधि निरूपितम्। अत एव 'मर्यादाभक्तिमार्गस्य काष्ठा चित्तवृत्ति अक्षय होने के कारण अनेक जन्मों में पुष्ट होकर अन्तिम जन्म मे मतिरूप वृत्ति को जन्म देगी, अत: उपर्युक्त कथन में कोई अनुपपत्ति नहीं है।' (सुबोधिनी २२५/३२)। तत्त्वार्थदीपनिबन्ध सर्वनिर्णयप्रकरण में सेवा अर्थात् भक्ति के विचारते प्रसङ्गमे (मर्यादा-)मक्तिमार्ग में मुरय अधिकारियों को क्या फल प्राप्त होता है, यह बताते हैं। यह कह कर जिन भत्तो के प्राप्य फल का निरूपण किया गया है ये सब मर्यादामक्तिमार्गीय ही है। वहाँ 'अधुना तु' (सर्वनिर्णयप्र० का० २१२) इत्यादि शब्दों से प्रारम्भ होने वाली कारिकासे प्रारम्भ कर, 'सायुज्यं कृष्णदेवेन' अर्थात् मगवान् श्रीकृष्ण से सायुज्य (सर्वनिर्णयप्र० का० २१८) इत्यादि पदो से पारम्भ होने वाली पक्ति तक गौण और मुख्य के भेद से मर्यादाभत्तों को प्राप्त होनेवाले सायुज्यावधि पल का निरूपण किया गया है। इसीलिये तत्वार्थदीपनिबन्ध नै भागवतार्थप्रकरणके 'मर्यादामक्तिमार्ग १. सर्वनिर्णय प्रकरण की आवरणमङ्गटीका के लेखक पुरुषोत्तम का मत इससे भिन्न है। उनके अनुसार प्रकाश का पाठ अधोलिखित है, 'भक्तिमार्गे अमुस्यानां मध्यमाधिकारिणा फलमाह इत्यर्थः ।' (बर्षनिर्णयप्र० प्र० २१८ आवरणमङ्गः, पृष्ठ, १६६) पञ्चमोऽध्यायः] पुष्टिभक्त्यधिकारविवेकः गङ्गा परा स्मृता' (भागवतार्थप्र० का० ९६५) इति निवन्धान गझायाः मर्यादाभक्तिरूपायाः सेवनात् सायुज्यं भवति इति, 'सायुज्यं वान्यथा तस्मिन् गङ्गातीरे न संशयः' (भागवतार्थप्र० का०९।७०) इति नवमनिवन्धे उक्तम् । सायुज्यं च एकत्व- रूपं भगवत्प्रवेशशब्दवाच्यम्, 'ततो मा तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्' (गीता १८०२५) इत्यादिवाक्यसिद्धम्। अने, 'तदभारे स्वयं वापि मूर्ति कृत्वा' (सर्वनिर्णयप्र० का० २२८) इत्यारभ्य, 'गृहस्थस्य प्रकीर्तितम्' (सर्वनिर्णयप्र० का० २४६) की पराकाटा गला कही गयी है' (भागवतार्थम० का० ९६५) इत्यादि वाक्य से मर्यादाभक्तिरूप सिद्ध होने वाली गङ्गा के सेवन से सायुज्य होने की बात भागयतार्थप्रकरण के ही नवमस्कन्धार्थ के 'देहभाव फेहद होने पर गहातट पर रह कर उसकी सेवा करने वालों का कृष्ण का दासत्व प्राप्त होता है अन्यथा भगवान् कृष्ण से सायुज्म प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं है" (भागवतार्थप्र० का० ९७०) इग वाक्य में कही गयी है। यह सायुज्य एकस्वरूप है और 'भगवत्प्रवेश' शब्द का वाच्य है तथा इसकी सिद्धि भगवद्गीताके 'फिर मुझे परवत: जानकर, तदनन्तर मुह में प्रवेश करता है' (गीता १८।२५) इत्यादि वाक्यों से होती है। आगे चल कर उसी सर्वनिर्णय प्रकरण में 'अथवा उपर्यु प्रकार के भमाय में स्वयं ही किसी स्थान पर भगवान् हरि की मूर्ति स्थापिग का' (सर्वनिर्णयप्र० का २२८) इत्यादि वाक्यों से प्रारम्भ पर 'गृहस्प का मुख्य धर्म निरूपित किया गया' (सर्वनिर्णयप्र० का. १. "देहाभाचे दुवे तु स्याद मकानां कृष्णदासता । सायुज्यं यान्यथा तस्मिन् गङ्गाठोरे न संशयः ॥" (भागवतापंप्र० का० ९७०)।
प्रमेयरत्नार्णवे [पूर्वा इत्यन्तेन पुष्टिभक्तिमार्गीयमकार उक्तः । विवरणे तु, एवं कुर्वन् सकुटुम्बो भगवत्सायुज्यमश्नुते' (सर्वनिर्णयप्र० प्र० २४६ ) इत्यत्र सायुज्यशन्देन अलौकिकसामर्थ्यम् एव । अत एव, आदिमृतिः कृष्ण एव सेव्यः सायुज्यकाम्यया' (शास्त्रार्थन० का० १३) इत्यस्य व्याख्याने, “महाविदाप्नोति परम्' (तैत्ति० उप० २११) इत्यन यत्सायुज्यं मुख्यतया निरूपितं तत्कामनाया कृष्ण एप सेव्यः" (शास्त्रार्थप्र० प्र० १३ ) इत्यनेन मर्यादामार्गीय- सायुज्यादं निरूप्य अलौकिकसामर्थ्यरूपतेव प्रदर्शिता। एतच्चानन्दमयाधिकरणभाप्ये स्पएतममुपलभ्यते इति ततो- ऽवधेयम्। २४६) इत्यादि वाक्य तक पुष्टिभक्तिमार्गीय प्रकार का निरूपण किया गया है । (२४६ वीं कारिका के) उपर्युक्त वाक्य की (प्रकाश) व्याख्या में 'इस प्रकार आचरण करता हुआ मा कुटुम्बसहित भगवक्ष- सायुज्य प्राप्त करता है (सर्वनिर्णयप्र० प्र० २४६ ) इस याक्य में आये सायुज्य शब्द से (उपर्युक्त नित्यलीलान्तम्भातरूप) अलौकिकसामर्थ्य ही अभिप्रेत है। इसीलिये शास्त्रार्थप्रकरण के 'सायुज्य की कामना होने पर तो आदिमूर्ति श्रीकृष्ण की ही सेवा करनी चाहिए' (शास्त्रार्थन का०१३) इस वाक्य की व्याख्या करते हुए श्रीवल्लभाचार्य ने 'ब्रह्म को जाननेवाला पर तत्व को प्राप्त करता है। (तैत्ति० उप० २1919) इस श्रुति- वाक्य में जिस सायुज्य का मुख्य फल के रूप में निरूपण हुआ है उस मायुज्य की कामना होने पर श्रीकृष्ण की ही सेवा करनी चाहिए" (शास्त्रार्थप्र० प्र० १३) इत्यादि वाक्य से प्रस्तुत सायुज्य का उपर्युक्त मर्यादामार्गीय सायुज्य से भेद पताकर इस सायुज्य के अलौकिक सामर्यरूप होने का ही प्रतिपादन किया है। इस विषय का विशद विवेचन आनन्दमयाधिकरण के अणुभाष्य में उपलब्ध होता है अतः जिज्ञासुओं को इसे वहीं से जानना चाहिए ।
पञ्चमोऽध्यायः] पुष्टिभक्त्यधिकारविवेकः १३७ सेवाफलग्रन्थव्याख्याने, 'अलौकिकसामर्थ्य मायुज्यं सेवोप- योगिदेहो वैकुण्ठादिपु" (सेवाफलविवरणम्, पृष्ठ १५७ ) इत्यनेन यत् फलत्रयमुक्तं तत्र थलोकिकसामर्थ्य पुष्टिमार्गीयाणां फलम् , शिष्टं फलद्धयं तु मर्यादाभक्तानामिति शेयम् । मूलेऽपि, 'यादृशी सेवना प्रोक्ता' (सेवाफलम् ,१) इत्यत्र सेवनाशब्देन मर्यादासेवा पुष्टिसेवा चोक्ता इति वोद्धव्यम् । यिवृतो फलत्रयं सेवाव्यस्य उक्तम् । तत्र प्रथमं पुष्टिसेवायाः, शिष्टं फलद्वयं मर्यादासेवायाः इति विवेकः । अत एव सायुज्यं सेवोपयोगि- देहमाप्तिश्च अन्यनापि मर्यादाभक्तस्य उक्ता; 'देहभाये दृढे तु स्याद् भक्ताना कृष्णदासता । श्रीवल्लभाचार्यने सेवाफलम् नामक अपनी कृति की व्याख्यारूप सेवाफलविवरणम् मे 'अलौकिक सामर्थ्य, सायुज्य तथा वैकुण्ठ मादि में भगवत्सेवोपयोगी देह' (सेवाफलविवरणम् ) इस वाक्य में जिन तीन पलोंका प्रतिपादन किया है उनमे से अलौकिकसामर्थ्य पुष्टिमार्गियों को प्राप्त होने वाला पल है तथा शेष दोनों पल मर्यादामार्गीय भक्तों को प्राप्त होनेवाले पल है, ऐसा समझना चाहिए। सेवाफ्लप्रकरण की प्रथम कारिका में जिस प्रकार की सेवा बतायो गयो है' (सेवाफलम् १), इत्यादि वाक्य में सेवना या सेवा शब्द से मर्यादा और पुष्टि इन दोनों प्रकार की सेवाओं या भक्तियों का ग्रहण अभिप्रेत है, ऐसा समझना चाहिए । सेवाफलविवरण में इन दोनो प्रकार की सेवाओं के तीन फल चताये गये हैं, जिनमें से प्रथम पल पुष्टिसेवा का है और शेष दोनों पल मर्यादा सेवा के हैं। इसीलिये अन्य स्थलों पर मी मर्यादा भक्त को सायुज्य एव सेवोपयोगी देह की प्राप्ति होने की बात कही गयी है, उदाहरणार्थ तत्त्वार्थदीपनिनन्द के भागवतार्थप्रकरण के नवमस्कन्धार्थ में श्रीवल्लभाचार्य ने कहा है कि, 'गङ्गा तट पर रह कर उसकी सेवा करने १. पाठान्तर के लिये देखें, ऊपर पृष्ठ १३० टिप्पणी २।
१३० प्रमेयरलार्णवे [पूर्वा , सायुज्यं वान्यथा तस्मिन् गगातीरे न संशयः।। (भागवतार्थ- प्र० का० २।७०) इति नवमस्कन्धनिवन्धे । तदविरोधाद् धनापि तत्फलद्वयं मर्यादाभक्तस्यैव इति निश्चयः। विद्यायाः पञ्चपर्वमध्ये या भक्तिरुक्ता सा मार्यादिकी एव इति, 'यया विद्वान् हरि विशेद (शास्त्रार्थप्र० का०४६) इति निवन्धात् । क्वचित् मार्यादिश्यां भक्तो प्रेम-शब्दव्यवहारो दृश्यते, तब भगवति मोचकत्वयुद्धया प्रेम अस्ति इति तत् सोपाधि प्रेम, न तु पुष्टिमागोयाणामिव निरुपाधिकम् , तदुक्तं तृतीया- ध्याये, 'गतेस्र्थवत्त्वमुभयथान्यथा हि विरोधः' (ब्रह्मसूत्र ३।३।२९) चालों को देहमाव के दृढ होने पर कृष्ण का दासत्व प्राप्त होता है, अन्यथा भगवान् कृष्ण से सायुज्य प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं है' (भागवतार्थप्र० का. ९९७०)। इन कथनो से अविरोध होने के कारण सेवापल के उपर्युक्त वाक्य मे भी सायुज्य एव सेवोपयोगी देह की प्राप्तिरूप दोनों पलों के मर्यादाभक्त को ही प्राप्त होने की बात कही गयी है, यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है। इसी प्रकार तत्त्वार्थदीप- निरन्ध के 'जिससे विद्वान् हरि में प्रविष्ट होते हैं" (शास्त्रार्थप्र० का० ४६ ) इस वाक्य से शत होता है कि विद्या के पाँच पवों में जिस भक्ति की गणना की गयी है यह मर्यादा भक्ति ही है। कहीं कहीं मर्यादा भक्तिके लिये भी प्रेम शब्द का प्रयोग उपलब्ध होता है। ऐसे स्थलों पर प्रेम शब्द का प्रयोग मोपाधिक प्रेम के लिये हुआ है। मयांदा भक्ति में भगवान् को मुक्ति प्रदान करने वाला मान कर इसी भाव से उनसे प्रेम किया जाता है अतः मर्यादाभक्ति में किया जाने वाला प्रेम सोपाधिक प्रेम है, पुष्टिमागीय भक्तों के प्रेम के समान निरुपाधिक नहीं। यह बात 'मर्यादा और पुष्टि के भेद से ज्ञान का फलजनकत्व उपपन्न है अन्यथा अर्थात् मर्यादा १ द्रव्य, ऊपर पृष्ठ ३३ एव स्नेहमपूरणी पृष्ठ १४४.१४७ । ।
पञ्चमोऽध्यायः] पुष्टिभक्त्यधिकारविवेकः १३६ इति तत्त्वसूत्रीयभाष्ये। मर्यादापुष्टिभेदेनाङ्गोकारे वैलक्षण्याद् आद्यायाम् अद्गीकृतानां मुमुक्षयैव श्रवणादौ प्रवृत्तिः तदातृत्वेन एव भगवति प्रेम अपि, न तु निरुपाधिः इति । 'आसन्यस्य होपि सेपया' (शाम्नार्थम० का० ३५) इत्यस्य व्याख्याने 'सायुज्यनामावो हरिसेवयैव भवतो नान्यसेवया' (शास्त्रार्थप्र० प्र० ३६) इत्यत्रापि सेवा मार्यादिकी इति शेयम् । अत एव मर्यादास्थानामेव सायुज्यं फलम्, पुष्टिस्थास्तु 'दीय और पुष्टि का भेद मान कर व्यवस्था न करने पर विरोध होगा" (बासूत्र ३२३२२९ ) इस सून के अणुभाष्य मे स्पष्ट की गयी है। भगवान् जीवों को मर्यादा और पुष्टि के भेद से अङ्गीकार करते हैं। अतः उन दोनो प्रकारो में भेद है। भगवान् जिन जीयो को मर्यादाभक्ति में अङ्गीकार करते हैं उनकी श्रवणादि में प्रवृत्ति मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा से ही होती है, और वे भगवान् को मोक्ष देने वाले के रूप में ही प्रेम करते है अतः उनका प्रेम निरुपाधिक नहीं होता प्रत्युत सोपाधिक ही होता है। 'आसन्य अर्थात् प्राण की उपासना से अथवा भगवान् हरि की सेवा से (शास्त्रार्थप्रका० ३५) इत्यादि पक्तियों की प्रकाश व्याख्या मे, 'सायुज्य और महामाव की प्राप्ति भगवान् हरि की सेवा से ही होती है किसी अन्य की सेवा से नही" (शास्त्रार्थप्र० प्र० ३६) इत्यादि वाक्यों में भी सेवा शब्द ते मर्यादाभक्ति ही अभिप्रेत है, ऐसा समझना चाहिए । इसीलिये सायुज्यरूपफल मर्यादामतिमार्ग में स्थित १ "गते. ज्ञानस्य, अर्थवत्त्वं फलजनवत्वम्, उभयथा मर्यादा- पुष्टिभेदेनेत्यर्थः । अन्यथा मर्यादापुष्टिभेदेन व्यवस्थाया अपने विरो- पाद हेतो. सयेत्यर्थ ।" (अणुभाष्यम् ३।३।२९)। २. द्रष्टव्य, अणुभाष्य ३।३।२९ । ३. एश्य, स्नेह्मपूरणी पृष्ठ १०९-११३ ।
१४० प्रमेयरत्नार्णवे [पूर्वाद्ध मानं न गृहन्ति विना मत्सेवन जना.' (भाग० ३१२९।१३) इत्यादि- वाक्येभ्यो नाद्रियन्ते सायुज्यान्तमुक्तिम् । एतच्च, 'वीक्ष्यालका- वृतमुसम्' (भाग०१०।२९।३९) इत्यस्य सुवोधिन्यां स्पष्टम् । तन हि 'प्रथम सारूप्यं मालोक्यं सामीप्य सायुज्यम् इति मोक्षभेदा' (सुवो० १०।२९।३९) इत्युक्त्वा, अग्ने अलकादिस्वरूप तत्फलं च व्याख्याय, 'हसितावलोकम् (भाग० १०॥२९॥३९) इत्यस्य व्याख्याने, 'ब्रह्मानन्दे प्रविष्टाना न भक्तिगिलास' (सुयो० १०।२९।३९) इत्यारभ्य, 'अनुभवरसो हि भिन्नतया स्थिती भवति' (सुवो० १०।२९।३९) इत्यन्तेन, सायुज्यं नाकाहितम् इत्युप पादितम् । अतः सायुज्यं प्राप्ताना, 'सायुज्ये तु रसाधिस्य भेदेनानु- जीवो को ही मिलता है; पुष्टिमार्गीय जीव तो, जैसा कि 'मेरे (पुष्टिमार्गीय) भक्त मैरी सेवा छोड कर, दी जाने पर मी, सालोक्य, सार्टि, सामीप्य, सारूप्य ओर एकत्व रूप मुक्ति तक लेने को तैयार नहीं होते' (भाग० ३।२९।१३) इत्यादि वाक्यों से ज्ञात होता है, सायुज्यमुक्तिपर्यन्त मुत्तियों को भी आदर नहीं देते। यह वात भागवत के 'भापके अलकों से ममावृत मुख को देख कर' (भाग० १०।२९।३९) इस श्लोक की मुगोधिनी टीका में स्पष्ट है। यहाँ 'प्रथमतः सारूप्य, सालोक्य, सामीप्य और सायुज्य ये मोक्ष के मद है' (सुबो० १०।२९।३९) यह कह कर, अलकों आदि के स्वरूप और पल की व्याख्या करके, मूलश्लोक के 'हसितावलोकम् (माग० १०।२९।३९) इस पद की व्याख्या में 'ब्रह्मानन्द में प्रविष्ट जीवों को भनि के विलास का अनुभव नहीं होता' (मुनो० १०।२९।३९) इस वाक्य से प्रारम्भ कर, 'अनुभवरस की अनुभूति तो पृथक् अवस्थित होने पर ही होती है' (सुबो० १०॥ २९.३९) इस वाक्य तक यह प्रतिपादित किया गया है कि गोपियों को सायुज्य की आकाक्षा नहीं है । अत. जैसा कि 'सायुज्य में अत्यधिक १. द्रष्टव्य, सुबोधिनी १०।२९।३९ ।
पञ्चमोऽध्यायः] पुष्टिभक्त्यधिकारविवेकः भवात् सदा' इति वाफ्याद् भवन्नपि परमानन्दानुभवः स्वस्व- रूपेणैव, न त्वलौकिकसामर्थ्य प्राप्तानामिव सर्वेन्द्रियरात्मना च, 'ब्रह्मानन्दे प्रविष्टानाम् मात्मनैव सुखप्रमा" (शास्त्रार्थप्र० फा० ५०) इति नियन्धात् । अतः सायुज्यं स्वरूपान्तःपातः, स नापेक्षितः पुष्टिभक्तानां, किन्तु नित्यलीलान्तःपात एव इति सुधीभिर्विभावनीयम्। पतद्भक्त्यधिकारो विशेपानुग्रहसाध्यः, 'यदा यस्यानुग्रहाति भगवानात्मभावितः। स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम् ॥ (भाग० रस की अनभूति होती है क्योंकि उसमें जीव को भगवान की अनुभूति अपने से मिल रूप में अर्थात् पृथक् होती है' इस वाक्य से ज्ञात होता है, जिन्हें सायुज्य प्राप्त हो गया है वे परम आनन्द का अनुभव अपने स्वरूप से ही करते हैं, अलौकिक सामर्थ्य को प्राप्त कर लेने वाले तथा सभी इन्द्रियों और आत्मा से भी आनन्द का अनुभव करने वाले जीवों की भॉति नही, इस बात का शान शास्त्रार्थप्रकरण के 'ब्रह्मानन्द में प्रविष्ट जीवों को ( केवल) आत्मा द्वारा ही सुख की अनुभूति होती है। (शास्त्रार्थप्र० का० ५० ) इस वाक्य से होता है। अतः सायुज्य का अर्थ है स्वरूपान्त-पात अर्थात् भगवान् के स्वरूप में प्रवेश | पुष्टिभक्त इस सायुज्य की नहीं प्रत्युत नित्यलीलामें प्रवेश की ही अपेक्षा अर्थात् आकाक्षा रखते हैं यह सुधीजनों को समझ लेना चाहिए । इस पुष्टिभक्ति का अधिकार भगवान् के विशेष अनुग्रह से ही प्रात हो सकता है, जैसा कि भागवत के, 'हृदय में यार-बार चिन्तन किये जाने पर भगान् जिस समय जिस जीव पर कृपा करते है (तभी और १. द्रष्टव्य, स्नेहप्रपूरणी, पृछ १५३-१५६ । 'ननु, यदि वेदवादिनोऽपि ब्रह्मादयो न जानन्ति सदा को वान्यो घेद इत्यपेक्षायामाह, यदा इति । यदा यं पुरुष भगवान् अनुगृह्णाति तदा २.
प्रमेयरलाणवे [पूर्वार्ट ४।२९।४६) इति वाफ्यात् । एतद्भक्तिप्रवर्तका ब्रजमका पव, 'भगवत्युत्तमरलोके भवतीभिरनुत्तमा । भक्तिः प्रवर्तिता दिएचा मुनीनामपि दुर्लभा ॥' (भाग० २०४७।२५) इति वाक्यात् । व्याख्यातं च श्रीमदाचायः एतेन शाखप्रसिद्धायां भक्तो दानादिसाधनानि श्रूयन्ते अस्या तु प्रसिद्धय- भावात् साधनमपि न पश्याम इति भावः सूचितः' (सुबोधिनी वही जीव भगवत्तत्व को जान पाता है तथा इस शान के बाद, निरन्तर भगवदेकनिष्ठ होने के कारण) उसकी लौकिक मर्यादा ( अर्थात् लौकिक व्यवहार) एवं वैदिक मर्यादा ( अर्थात् वैदिक कर्ममार्ग) में बदमूल आस्या निवृत्त हो जाती है' (भाग० ४।२९।४६), इस वाक्य से ज्ञात होता है । इस भक्ति के प्रवर्तक प्रजभक्त ही हैं जैसाकि गोपियों के प्रति उद्धव के 'यह बड़े सौभाग्य की बात है कि आप लोगों ने उत्तम-श्लोक भगवान् कृष्ण की उम अनुत्तम'मर्थान् सर्वोत्तम मक्ति का प्रवर्तन किया (अर्थात् आदर्श उपस्थित किया ) है जो मुनियों को मी दुर्लम है' (भाग १०४७/२५) इस कथन से सिद्ध होता है । इस श्लोक की व्याख्या करते हुए श्रीवल्लभाचार्य ने भी कहा है कि, 'उपर्युक्त कथन से यह भाव सूचित किया गया है कि शास्त्रों में शासप्रसिद्ध (अर्थात् मर्यादा) मक्कि के तो दान आदि साधन बताये गये है किन्तु इस भक्ति स भगवत्तत्त्वं वेद इति शेषः । एवं भगवदनुग्रहे को हेतुः, तबाह, आत्म- भावित इति अन्तःकरणे चिन्तित इत्यर्थः । तयानमेवानुग्रहे हेतुः इति भावः । भगवदनु गृहीतस्य तत्त्वज्ञस्य तद्भक्तस्य किं लक्षणमित्यपेक्षायामाह, स इति । निरन्तरं भगवदेकनिष्ठत्वेन लोके लोकमर्यादाया, वेदे वेद- मर्यादाया च नितरा स्थित मति स जहाति, द्विविधामपि मर्यादा नानुसन्चत्त इत्यर्थः । ( भाग० ४।२९।४६ की बालप्रबोधिनी)। १. 'न उत्तमा यस्याः भवदीयायाः अन्या भक्तिरस्ति, अतो ब्रह्मकल्प- मारम्याद्यप्रभृति भक्तिद्धाद्य पर्यवसिता।' (सुबोधिनी १०४७।२५)।
पञ्चमोऽध्यायः]
पुष्टिभवत्पषिकारविवेकः
१४३
१०४७.२५) इति । अतः सर्वोत्तमा इयं पुष्ट्रिभक्तिः इति
भाग्यवद्भिःयम् ॥
इति श्रीमद्गोवर्धनधर-श्रीवल्लभाचार्य-धीविट्ठलेदरचरणानुचरसेवकेन
लालभट्टोपनामाकृष्णमटेन कृते प्रमेयरमाणवे
पुष्टिमफ्त्यधिकारविर्वक समाप्तिमगात् ।। ५ ॥
को (शारों में ) प्रसिद्धि न होने के कारण इसकी प्राहि का कोई
साधन भी नहीं दिखाई देवा।' (सुबोधिनी १०१४७१२५)। अतः
भाग्यवान् (पुष्टिभक्त ) लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि यह भक्ति
सर्वोत्तम है।
श्रीगोवर्धनधर, श्रीवल्लभाचार्य तथा श्रीविठ्ठलनाथ के चरणों के
अनुगामी (अथवा अनुचरों के) सेवक, लालूमट्ट के नाम से प्रसिद्ध
यालकृष्णमट्ट के द्वारा विरचित प्रमेयरत्नार्णव का पुष्टिमक्त्यधिकार-
विवेक नामक पश्चम अध्याय समास हुआ ॥ ५ ॥
सर्वात्मभावविवेकः ( पष्ठोऽध्यायः) पुरुषोत्तमलाभे यो मुख्यहेतुतयोदितः। तस्य सर्वात्मभावस्य स्वरूपमिह वयते ॥ भगद्विपयको निरुपधिस्नेहो भक्तिविशेषः सर्वात्मभावः। तथाहि भावो नाम रतिः, 'रतिर्देवादिविपया भाव इत्यभिधीयते' इति वाफ्यात्। आत्मनो भाव आत्मभावः । यथा आत्मन्यात्मनो भावो निरुपधिरेव । 'न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति' (गृह उप० २।४।५, ४।५।६) इत्यादिश्रुतेः, 'नृप स्वात्मैव वल्लभः' (भाग० १०॥१४॥५०) इत्यादिवाक्याश्च । अतो यथात्मनि सर्वात्मभाव-विवेक (पष्ठ अध्याय) अब हम सर्वात्मभाव-जिसे पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण की प्रासि का मुख्य साधन कहा गया है-के स्वरूप का निरूपण करेंगे। सर्वात्मभाव भगवद्विषयक निरुपाधिक स्नेह अर्थात् एक विशिष्ट प्रकार की भक्ति को कहते हैं । 'देवादिविपयक रति को माय कहा जाता है' इत्यादि वाक्यों से ज्ञात होता है कि भाव रतिविशेप कर ही नामान्तर है। आत्मा का भाव आत्मभाव कहा जाता है। व्यक्ति को अपनी आत्मा से सहज, निरुपाधिक प्रेम होता है। 'मैनेयि ! पुत्र पुत्रों के लिये प्रिय नहीं होते' (बृह० उप० २।४/५, ४।५।६) इत्यादि श्रुतिवाक्यों तथा भागवत के, 'हे राजन् ! समी प्राणियों को अपनी मात्मा से ही निपाधिक, सहज प्रेम होता है। (भाग० १०११४५० ) इत्यादि, वाक्यों से (भी) पष्ठोऽध्याय.] पुष्टिभक्त्यधिकारविवेका शुद्धः स्नेहः तथा भगवति कर्तव्यः इति श्रुतितात्पर्यार्थः । अत एव, 'स त आत्मान्तर्याम्यमृतः, (बृह० उप० ३।७३-२३) इत्यादिना आत्मत्वं बोधयति । 'तत्त्वमसि' (छान्दो०, उप० ६८७) इत्यनापि तथैव भाशयः। एतच तच्चदीपे शास्त्रार्थ- प्रकरणे उपपादितम् । भगवता ब्रह्मरणं प्रति इदमेय अभाणि, 'महमात्मात्मना धातः! प्रेष्ठ सन् प्रेयसामपि । अतो मयि रतिं कुर्याद् देहादिर्यत्कृते प्रियः ।।' (भा० ३।९।४२) इति । अनेन भगद्वाक्येन श्रुतावपि आत्मत्वकयनं स्नेहार्थमेव उपर्युक्त कथन की ही पुष्टि होती है। अतः उपर्युक्त श्रुतिवाक्य आदि का तासर्य यही है कि जिस प्रकार व्यक्ति को अपनी आत्मा से शुद्ध स्नेह होता है उसी प्रकार उसे उसी प्रकार का शुद्ध स्नेह भगवान् से करना चाहिए । इसीलिये, 'वह तुम्हारा आरमा अन्तर्यामी और अमृत है' (बृह° उप० ३।७३-२३) इत्यादि वाक्यों से श्रुति यह सूचित करती है कि भगवान् ही ( जीवो की ) आत्मा हैं । 'तुम तदात्मक हो' (छान्दो उप० ६१८५७) इत्यादि श्रुतिवाक्यों का आशय भी यही है, यह श्रीरलभाचार्य ने तत्त्वार्थदीपनिनन्ध के शास्त्रार्थप्रकरण में प्रतिपादित किया है । भगवान् ने ब्रह्मा से यही बात कही थी, हे ब्रह्मन् ! मैं समी आत्माओं का आत्मा हूँ। मैं बीपुनादि प्रियों का मा यि हूँ। देहादिमी मेरे लिये ही प्रिय है अर्थात् मर सम्बन्ध से ही प्रिय लगते है । अत मुझसे ही प्रेम करना चाहिए ।' (भाग० ३।९।४२) । भगवान् के इस वाक्य म 'अत मुझसे प्रम करना चाहिए' (भाग० ३।९।४२) इस प्रकार कारणनिर्देशपूर्वक ( भगवान् से ) प्रेम करने का उपदेश उपलध होने से हम इस निर्णय या निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि श्रुति में भी ब्रम या भगवान् को आत्मा इसीलिये कहा गया है कि उनसे १. चाकरमाप्यसम्मत पाठ 'एप त मात्मान्तयाम्यमृत.' है।
प्रमेयरत्नाणवे [पूर्वाद्ध इति निर्णीयते, "मतो मयि रतिं कुर्याद्' (भा० ३२९।४२) इति हेतुफथनपूर्वकोपदेशात् । निर्णीतं च विधिना, तदुक्तं द्वितीय- स्कन्धे, 'भगवान् मह्म कात्स्न्येन निरन्वीक्ष्य मनीषया । तदध्यवस्यत् कूटस्थो, रतिरात्मन्यतो भवेद्।' (भाग० २।२।३४) इति । अत आत्मनो मावो भगवद्विपयोऽत्यादारेण सम्पादनीयः। तस्य सिद्धौ तिरोधाननाशे सर्वत्र पदार्थमात्रे वस्तुतोऽपि भगवद्रूपे परमानन्दरूपस्य पुरुषोत्तमस्य स्फूर्ती सर्वत्र आत्म- प्रेम किया जा सके अर्थात् उन्हें आत्मा कहने में श्रुति का प्रयोजन उनसे प्रेम करने का उपदेश देना है। स्वय ब्रह्मा भी इसी निर्णय पर पहुँचे थे । उनके इस निर्णय या निष्कर्ष का उल्लेख मागवत के अधो- लिखित वाक्य में मिलता है, 'मगवान् ब्रह्मा ने एकाग्रचित्त से सारे घेदों का तीन बार अनुशीलन कर अपनी विचारक बुद्धि से यही निश्चय किया कि जिससे सर्वारमा भगवान् श्रीकृष्ण में अनन्य मकि हो वही समीचीन साधन या सर्वश्रेष्ठ धर्म है। अर्थात् उन्होंने यही निश्चय किया कि भारमा फल है उसकी प्राप्ति का मुख्य साधन भफि है और शेष सम कुछ उस मगवद्विषयक प्रेम रूप मक्ति का साधन है। (भाग. २।२।३४ )। अत. भगवद्विषयक आत्मभाव का आदरपूर्वक सम्पादन करना चाहिए । इसके सम्पादित या सिद्ध हो जाने पर, तिरोधान का नाश हो जाने पर सर्वत्र सभी पदार्थो-जो वस्तुतः भगवद्रूप हैं-मैं १. द्रष्टव्य, भाग० वालप्रबोधिनी ॥३४॥ २. “राशीभूतवेद मनीषया विचारकबुद्ध्या आलोड्य फलत्वेना. स्मान विनिश्चित्य साधनविचारे क्रियमाणे 'यमेवेप वृणुते' ( कठोप० ११।२३, मुण्ड० उप० ३।३) इत्यादिवाक्य प्रोतिमेवावान्तरल्यापार ज्ञात्वा 'भक्त्यैव तुष्टिमभ्येति' इति विचार्य मुख्य साधनं भक्ति ज्ञात्वा तत्साधकत्वेनान्यद् इति अध्यवस्यत् ।" (सुबोधिनी २।२।३४)।
पष्ठोऽध्यायः] पुष्टिभक्त्यधिकारविवेकः भावो भवति । तथा च सर्वस्मिन् आत्मभावः' सर्वात्मभावः इति फलितम् । 'तव परि ये चरन्ति' (भा० १०८७।२७) इत्यस्य सुबोधिन्यां, "तव' इति षष्ट्या त्वत्सम्बन्धिने पदार्थ ये कञ्चन परिचरन्ति, परं सर्वात्मभावोऽपेक्ष्यते, 'मृत्योः स मृत्युमामोति य इह नानेव पश्यति' (यह उप० ४।४।१९) इति भेददर्शन एव मृत्युपराकमश्रवणाद (सुबो० १०८७।२७) इत्युक्तम् । एतेन सर्वात्मभावपदे सप्तमी- तत्पुरुषः । भगवत्स्फूर्तिरभेदेनैवाहता इत्यध्यवसीयते। आत्म- पदेन भगवत्प्रीति दावगाहिनी, न त्वधिष्ठानभेदसंस्था तन्त्रा- परमानन्दरूप पुरुषोत्तम की स्फूर्ति होने पर सर्वन आत्मभाव हो जाता है। इस प्रकार निष्कर्ष यह है कि सर्वन सभी में आत्मभाव होना ही सर्वात्मभाव है। 'जा आप की परिचर्या अर्थात् सेवा करते है' (भाग० १०८७।२७) इस श्लोक की सुबोधिनी टीका में श्रीवल्लभाचार्य ने कहा है कि "मूल श्लोक में आये 'तव' इस पष्ठमन्त पद से यह सूचित किया गया है कि जो मापसे सम्बद्ध किसी भी पदार्य की परिचर्या करते हैं वे मृत्यु के सिर को पदाक्रान्त करते हैं। पर सर्वात्ममाव अपेक्षित है क्योंकि जिस व्यक्ति की इस जगत् में नानास्वबुद्धि होती है वह पुनः पुनः मृत्यु को प्राप्त होता है अर्थात् पुनर्जन्म से छुटकारा नहीं पाता' (बृह० उप० ४।४।१९) इत्यादि श्रुतिवाक्यों में मैदबुद्धियुक्त व्यक्ति के ही पुनः पुनः मृत्यु द्वारा प्रस्त होने की बात कही गयी है।" (सुनोधिनी १०८७।२७)। इससे स्पष्ट है कि 'सर्वात्मभाव' पद में सप्तमीतत्पुरुष है और इसका अर्थ है सर्वन या सभी पदायों में आत्मभाव | इस प्रकार यह निश्चय होता है कि भगवान् की स्फूर्ति का अभेद से होना ही प्रशस्य समझा गया है । 'सर्वात्मभाव' शब्द में आये 'आत्म इस पद का उद्देश्य यह १. 'सर्वभूतेषु मन्मतिः' (भाग० ११।१९।२१)।
प्रमेयरलार्णवे [पूर्वा न्सरवत् । यत आत्मनि जायमानोभावो ज्ञानमप्यभेदेनैव वस्तु- महिम्नोत्पद्यते । भावपदेन च, "चिन्तयानो हृषीकेशम् अपश्यत् तन्मयं जगद्" (भाग० १०१।२४) इति वाफ्योक्ते तादग्भग- वत्स्फुरणे नातिप्रसक्तिः । द्वेषप्रयुक्ततया भावत्वाभावात् । तदेवोक्तं श्रीधरस्वामिभिः, 'सर्वात्मभाव एकान्तभक्तिः इति, 'एकान्तभक्तिर्गोविन्द यत् सर्वत्र तदीक्षणम्' इति तल्लक्षणाद् सूचित करना है कि सर्वात्मभाव में होने वाला भगवत्प्रेम अभेदावगाहक होता है न कि अधिष्ठानभेदमसृष्ट जैसा कि अन्य तन्त्रों में प्रतिपादित किया गया है क्योंकि आत्मा में होने वाला प्रेम और ज्ञान भी वस्तु अर्थात् भगवान् की महिमा (या प्रमेयबल) से ही उत्पन्न होता है । इसी प्रकार सर्वात्मभाव पद में आये 'भाव' शब्द से यह सूचित होता है कि भागवत के 'उठने-बैठते, खाते-पीते, सोते-जागते और चलते-फिरते हर समय, हर अवस्था में कृष्ण का ही चिन्तन करते हुए कस को सम्पूर्ण जगत् कृष्णमय दिखाई देने लगा' (भाग० १०।२।२४) इत्यादि वाक्यों में प्रतिपादित भगवान् के सर्वत्र दिखाई देने या स्फुरित होने के अनुभव को सर्वात्मभाव नहीं कहा जा सक्ता क्योंकि कस में भगवान् के प्रति भाव या प्रेम का अभाव था और उसने भगवान् को द्वेषबुद्धि के कारण (भयवश ही) सर्वन अनुभव किया था, प्रेम के कारण नहीं, अतः सर्वात्मभाव की सादि के उपर्युक्त अनुभवों मे अतिव्याप्ति नहीं है । इसी बात को श्रीधरस्वामी ने इस प्रकार कहा है, 'सर्वात्मभाव एकान्तमत्तिः को कहते हैं।' एकान्तभक्ति का लक्षण १ 'आसीन. संविशस्तिष्ठन् मुजान पर्यटन महीम् । चिन्तयानो हृषीकेशम् अपश्यत्तन्मय जगत् ॥' (भाग० १०।२।२४) ‘एवं सर्वावस्यासु सर्वक्रियासु हृषीकेशं चिन्तयानः । स्वदर्शनार्यमेव सर्वेन्द्रियस्वामी तथा प्रेरितवान्, यत. कृष्णमयमेव जगदपश्यत् ।' ( सुधौ० १०१२।२४)।
। पष्ठोऽध्यायः] पुष्टि भक्त्यधिकार विवेकः १४२ अस्मदुक्त्या सह ऐक्यं ज्ञेयम् । तथा सति सर्वस्मिन्नात्मभावः सर्वात्मभाव इति निष्कर्पः। सच मर्यादा-पुत्रिभेदेन द्विविधः। तत्राद्यो नवमस्कन्थे- भ्वरीपस्य उक्तः, 'सर्वात्मभावं विदधन्महीमिर्मा तनिष्ठविप्राभिहितः शशास ह" (भाग० ९।४।२१) इति । द्वितीयस्तु शुद्धपुष्टि- भक्तिमार्गीयाणां व्रजसुन्दरीणां दशमे निरूपितः। विप्रयोग- 'भगवान् गोविन्द में एकान्तमक्ति होने का अर्थ है उन्हें सर्वत्र विद्यमान देखना' इत्यादि किये जाने से श्रीधरस्वामी के कयन का हमारी उक्ति के साथ ऐक्य है, यह स्पष्ट हो जाता है। इस प्रकार निष्कर्ष यह निकलता है कि सभी में या सर्वत्र आत्ममाव ही सर्वात्मभाव है। उपर्युक्त सर्वात्मभाव मर्यादा और पुष्टि के भेद से दो प्रकार का होता है। इनमें से प्रथम प्रकार का सर्वात्मभाव वह है जो अम्बरीप को हुआ था और जिसका उल्लेख भागवत के नवमस्कन्ध मे, 'इम प्रकार अम्बरीप ने सर्वात्ममावयुक्त होकर भगवनिष्ठ ब्राह्मणों के निर्देशों के अनुसार इस पृथिवी का शासन या पालन किया' (भाग० ९।४।२१) इत्यादि वाक्यो में हुआ है, तथा द्वितीय प्रकार का सर्वात्मभाव वह है जो शुद्धपुष्टिभक्तिमार्गीय बजाङ्गनाओं को प्राप्त हुआ था और जिसका निरूपण भागवत के दशम स्कन्ध में उपलब्ध होता है। भगवद्वियोग १. एवं सदा फर्मकलापमात्मनः परेऽधियज्ञे भगवत्पधोऽक्षजे । सर्वात्ममावं विदधन्महीमिमा तस्तिष्ठविप्राभिहितः शशास ह ।।. ( माग० ९।४।२१)। "सदा प्रतिदिनम् आत्मनः स्वस्य अधिकार प्राप्त कर्मकलाप कर्मसमूहम्, तथा एवम् उक्तप्रकारेण भगवति सर्वात्मभावम्, 'तन्मनस्काः तदालापाः तद्विष्टा तदात्मिकाः। तद्गुणानेद गायन्त्यो नारमागाराणि सस्मरु.॥' (भाग० १०.३०।४४) इत्युक्तलक्षणं च विदधन् कुर्वन् तनिष्ठे. भगवद्भक्त: विप्रैः पमिशादिमिः १५० प्रमेयरलार्णवे. - [पूर्वाद्ध दशायां विगाढभावेन सर्वत्र भगवत्स्फूर्ती सर्वात्मभावः सिद्धयति । एतावान् विशेषः पूर्वस्मात्, एतासां श्रीकृष्ण शृङ्गाररससम्बन्धिभावानां बहूनां सम्भवात् तत्चद्भावसमाना- धिकरणः सर्वात्मभायो भजनानन्दानुभावनेऽत्यन्तं निपुणः इति शुद्धपुष्टिमार्गीयैः तोष्ट्रय्यते । तदाह भगवान् भाप्यकार: 'लिमभूयस्त्वात् तद्धि बलीयस्तदपि' (ब्रह्मसूत्र ३।३।४) इति सूत्रे । "एतेन सर्वात्मभावस्वरूपमेव विवृतं भवति । तत्र विरहमावे अति- विगाढभावेन सर्वत्र तदेव स्फुरति इति, स एवाधस्तात्' (छान्दो की दशा में भगवद्विषयक भाव या प्रेम के प्रगाढ़ होने से सर्वत्र भगवान् की स्फूर्ति होने पर सर्वात्मभाव की सिद्धि होती है । पूर्वोक्त मर्यादा मार्गीय सर्वात्मभाव की अपेक्षा इस पुष्टिमार्गीय सर्वात्मभाव में एक वैशिष्ट्य यह है कि गोपियों के हृदय में श्रीकृष्णविषयक शृंगाररस- सम्बन्धी अनेक भावों के होने की सम्भावना होने से उन सभी भावों के अनुरूप सर्वात्मभाव होता है जो भजनानन्द का अनुभव कराने में अत्यन्त उपकारक होता है, इसीलिये शुद्धपुष्टिभक्तिमार्गीय भक्तों को इसमें अत्यधिक तुष्टि का अनुभव होता है । इसी बात को श्रीविठ्ठलनाय ने 'लिङ्गभूयस्त्यात् नदि बलीयः तदपि' (ब्रह्मसूत्र ३।३।४) इस ब्रह्मसूत्र के अणुभाष्य में इस प्रकार कहा है । "इस (भूमा के कार्य- लक्षणनिरूपक वाक्य) से सर्वात्मभाव का स्वरूप ही स्पष्ट किया गया है । विरह होने पर भाव अर्थात् प्रेम के अत्यधिक प्रगाढ होने के कारण अभिहितः 'एवं कुरु एवं मा कार्षीः' इति शिक्षितः इमा सप्तद्वीपयती मही शशास पालयामास । राज्येऽधिकृतस्य तस्य एवं सर्वात्मभाव मात्रयमेव इत्याशयेनाह ह इति । एवं भगवति सर्वात्मभावस्य परमफल- हेतुत्वाद् दुर्लभत्यं सूचयन भगवन्तं विशिष्टि, परे परमेश्वरे, अधियज्ञे यशादिकर्मफलप्रदे, अधोक्षजे स्वेच्छा विना इन्द्रियजन्यज्ञानाविषये।" (माग• बालप्रबोधिनी ९।४।२१) !
49100 पष्ठोऽध्यायः] पुष्टिभक्त्यधिकारविवेकः १५१ उप०७२५१) इत्यादिना उक्त्वा, कदाचित् स्वस्मिन्नेव भगवरव- स्फूतिरपि भवति इति, 'अथातोऽहकारादेशः' (छान्दो० उप० ७।२५।१) इत्यादिना तामुक्त्वा, एतेषा व्यमिचारिभावत्वेन अनिय- तत्वं ज्ञापयितुं पुनः सर्वत्र भगवत्स्फूर्तिमाह, 'अथात आत्मादेश' (छान्दो० उप० ७।२५।२) इत्यादिना" (अणुभाष्यम् ३१३१४४) इत्यादि । अयं पुष्टिमार्गीयः सर्वात्मभावः शृङ्गाररसमध्यपाती। एतत्माप्ती शुद्धपुष्टिमकानामेवाधिकारः । भाप्ये त्वयमेव विशिष्य विवृतः। मर्यादामार्गीयस्तु श्रुतिस्तुतिसुबोधिन्युक्त- दिशा अम्बरीपादिभक्तगम्यः। उभयविधोऽपि उभयत्र परम- सर्वग्न यही स्फुरित होता है यह वात, 'वही नीचे है' (छान्दो० उप ७।२५।१) इत्यादि वाक्य से कह कर; कमी-कमी अपने में भी भगवत्व की स्फूर्ति होती है अत. उसका 'भव उसी में अक्षारादेश किया जाता है' (छान्दो० उप० ७॥२५॥१) इत्यादि वाक्य से उल्लेख कर, इन स्फूर्तियों का व्यमिधारी होने के कारण अनियतत्व ज्ञापित करने के लिये, 'भय भामरूप से भूमा का उपदेश किया जाता है' (छान्दो० उप० ७.२५।२) इत्यादि वाक्यों से सर्वत्र मगवरस्फूर्ति होने का निरूपण करते है" ( अणुभाष्य ३१३६४४ ) इत्यादि । यह पुष्टिमार्गीय सर्वात्म- भाव शृङ्गाररसमध्यपाती है अर्थात् शृङ्गाररस के अन्तर्गत आता है और इसकी प्राप्ति शुद्धपुष्टिभक्तो को ही होती है। अणुमाप्य में विशेष रूप से इस पुष्टिमार्गाय सर्वात्मभाव का ही निरूपण किया गया है। मर्यादामार्गाय सर्वात्मभाव वेदस्तुति की सुबोधिनी में प्रतिपादित रूप में होता है और उसे प्राप्त करने वाले अम्बरीप आदि भक्त हैं। मर्यादा- १. स एवापस्तारस पश्चात्स पुरस्तात्स दक्षिणतः स उत्तरतः स एवंदं सर्वम् इत्पपावोऽहकारादेश एवाहमेवापस्तादहमुपरिशादहं पत्रादहं पुरस्ता- दह दक्षिणतोऽहमुत्तरवोन्मेवेदं सर्वम् इति । (खान्दो० १० १२५।१)। २. एव्य, अपभाष्यप्रकार | प्रमेयरलार्णवे [पूर्वाद काष्ठापनभक्तिरूप इति कोविदा विदाइर्वन्तु । न च "भ्रमरगीतीयस्य, 'सर्वात्मभावोऽधिगतो भवतीनामघो- मजे" (भाग० १०॥४७॥२७ ) इति श्लोकस्य विवृती, 'सर्वो- ऽप्यात्मनो भाव? (सुबोधिनी १०१४७।२७) इति विवृतत्वान्न मार्गीय और पुष्टिमार्गीय दोनों प्रकार का सर्वात्मभाव उपर्युक्त दोनों मार्गों में परमकाष्ठापन्न भक्तिरूप है ऐसा सुधीजनों को समझना चाहिए। यह कहना भी ठीक न होगा कि "भ्रमरगीत में आये 'आप लोगों ने अधोऽक्षज भगवान् श्रीकृष्ण में सस्मिमाव प्राप्त किया है' (भाग १०४७।२७ ) इस श्लोक की मुबोधिनी व्याख्या में श्रीवल्लभाचार्य ने १. इस लोक का सुबोधिनीसम्मत पाठ 'सर्वात्मभावोऽधिकृतो' होना चाहिए और गीताप्रेस से प्रकाशित भागवत में यही पाठ स्वीकार किया गया है। यहाँ बालकृष्णभट्ट ने जो पाठ स्वीकार किया है वही तेलीवालासम्पादित सुबोधिनोसहकृत भागवत मे भो मिलता है । देखिये नीचे उद्धृत सुबोधिनी । "एवं भक्तिप्रपत्ती निरूप्य सर्वात्मभावं निरूपयति, सर्वात्मभावोऽविगतो भवतीनामधोक्षजे । विरहेण महाभागा महान्मेऽनुग्रहः कृतः ॥ (भाग० १०।४७।२७) 'सर्वात्मभाव' इति । तदुपपादितं दशघा ( भगवता सह संलापादि- दशप्रकारः सदा तद्भावनमिन्द्रियवतां फलमिति पूर्वम् (द्रष्टव्यं पूर्वम् १०३ पृष्ठे) उपपादितमित्यर्थः) । तत्रापि विशेषमाह, विरहेण इति । संयोगे भवेदपि तादृशी मतिः । सर्वोऽपि ( दशप्रकारकोऽपोत्यर्थः ) आत्मनः ( अन्तःकरणस्यैत्यर्थः ) भावः भगवत्येवाधिकृतः उत्तरोत्तरवृद्धिम् (प्राप यितुमिति रोपः) आरब्ध इव (वृद्धि प्रापयितुमेवाभिरारम्प इत्यर्थः) । विषयस्याप्यलौकिकत्वमाह,,'अधोक्षज' इति - अधः अक्षजं यस्मादिति । कोऽपि भावः तत्र कर्तुमराक्यः, वादृशे सर्वात्मभावो दुर्लभः ।" ( श्रीवल्लभ-. कृतलेखसमेता सुबोधिनी १०४११२५) : ...
पष्ठोऽध्यायः] पुष्टिभक्त्यधिकारविवेकः पूर्वोक्तं लक्षणम् इति" वाच्यम्, उद्धवोक्तौ पूर्वोक्तसारम- भावस्य अभावात् । किन्तु सर्वोऽपि आत्मनः अन्तःकरणस्य भावो' भवतीनां मम ज्ञानविषयोऽभूदु इत्यर्थात् । यद्यप्येताः पूर्वोक्तपुष्टिमार्गीयसर्वात्मभाववत्यः तथाप्युद्धवैः स न ज्ञातः, किन्तु तदुक्तटकाररससम्बन्धिभावमानं बुद्धम् इति शेयम् । 'मधुप कितववन्धो मा स्पृशाकिं सपल्या:' (भाग० १०४७।१२) इत्यादिवाग्विलासः घोपभूपणसीमन्तिनीभिः तदतिरिक्तस्यैव सर्वात्मभाव का अर्थ 'सम्पूर्ण आत्मभाव' किया है अतः सर्वात्मभाव का उपर्युक्त (पृष्ठ १४७ पर दिया गया) लक्षण ठीक नहीं है, क्योंकि उद्धव फा इस वाक्य में सर्वात्मभाव से अभिप्राय उक्तलक्षणलक्षित पुष्टिमागीय सर्वामभाव से नहीं था प्रत्युत उनके कथन का अर्थ फेवल यही था कि 'आप लोगों के अन्तःकरण का सारा भाव मैं समझ गया हूँ' । यहाँ यह अवधेय है कि यद्यपि प्रजाङ्गनाएँ पूर्वोक पुष्टिमार्गीय सर्यात्मभाव का अनुभय करने वाली हैं पर उद्धव इसे समझ नहीं सके। वे तो उन गोपियों द्वारा प्रकट किये गये श्रृंगाररससम्बन्धी भाव को ही जान पाये, क्योंकि मजाङ्गनाओं ने 'रे मधुप! तू कपटी का ससा है, इसलिये तू मी कपटी है, सू हमारे पैरों को मरा टू' (माग० १०४७११२) इत्यादि वाग्विलासों से अपने पुष्टिमार्गीय सर्वात्ममाव से भिन्न भावों १. यहां प्रयुक्त 'सर्वात्मभाव' पद के थोवल्लमाचार्याभिमत एवं उनके पोत्र श्रीवल्लभकृत अर्थ के लिये देखें, ऊपर पृष्ठ १५२ टिप्पणी ।। २. मधुप कितवन्धो ! मा स्पसाइघ्रि सपल्याः धुचविलुलितमालाकुद्रुमश्मश्रुभिः मघुपतिस्तन्मानिनोना प्रधाद पदुसदसि विडम्यं यस्य दूतस्त्वमोदक् ।। (भाग०1०1४२)" प्रमेयरलाणवे [पूर्वाद्ध स्फुटीकरणात् । न च, "मामेकमेव शरणम् आत्मानं सर्वदेहिनाम् । याहि सर्यात्मभावेन यास्यसे झकुतोभयम्॥ (भाग०११।१२।१५), इत्यन सर्वात्मभावेन मां शरणं याहि इत्युक्तत्वात् शरणसाधनी- भूतस्य सर्वात्मभावस्य न पूर्वोक्तरूपता", इति वाच्यम् । 'सर्वदेहिनाम् आत्मानं शरणं शरणभूतं मां सर्वात्मभावेन याहि' इत्यभिप्रायात्, सूत्रमाप्ये, 'अथवा' इति पक्षान्तरेण अस्यैवार्थस्य आइतत्वात् । एवं सर्वात्मभावस्य पूर्वोक्त एव महिमा, लक्षणं च पर्वोक्तमेव इत्यलं विस्तरेण । . को ही प्रकाशित किया था। यह कहना भी ठीक नहीं होगा कि "भागवत के 'अतः है. उद्धव ! समस्त देहधारियों के भामस्वरूप मुश एक की ही सर्वात्मभाव से दारण में आओ, ऐसा करने से तुम सर्वथा निर्मय हो जाओगे' (भागः ११।१२।१५) इत्यादि श्लोक मे 'सर्वात्मभाव मे मेरी शरण में आओ' ऐसा कहे जाने से सर्वात्मभाव के शरण के साधनभूत होने का ज्ञान होता है और इसलिये सर्वात्मभाव का स्वरूप वह नहीं माना जा सकता जो ऊपर (पृष्ठ १४७, १४९ पर) प्रतिपादित किया गया है," क्योंकि भागवत के उपर्युक्त इलोक में भगवान के कथन का अभिप्राय यही है कि 'हे उद्धव ! सभी देहधारियों के शरण्य मुश कृष्ण को सर्वात्मभाव से प्राप्त हो । इस बात की पुष्टि ब्रह्मसूत्र के अणुमाप्य में 'अथवा' इत्यादि से एक अन्य पक्ष का उपस्थापन कर इसी अर्थ के समाहत किये जाने से होती है । इस प्रकार सर्वात्मभाव का महत्त्व पूर्वोक्त ही है और उसका लक्षण भी वही है जिसका प्रतिपादन हमने ऊपर (पृष्ठ १४७, १४९ पर) किया है, अतः इस विषय का और अधिक विस्तार न कर इसे यहीं समास करते हैं।
पष्ठोऽध्यायः] पुष्टिभक्त्यधिकारविवेकः इति श्रीगोवर्द्धनघर-श्रीवल्लमाचार्य-श्रीविठ्ठलेश्वरचरणानुचरसेवकेन लालमट्टोपनामबालकृष्णभट्टेन कृते प्रमेयरलागवे सर्वात्ममावविवेकः समास.॥ ६॥ श्रीगोवर्धनधर, श्रीवल्लभाचार्य तया श्रीविठ्ठलनाथ के चरणों के अनुगामी (अथवा अनुचरों के ) सेवक, लालूमट्ट के नाम से प्रसिद्ध बालकृष्णमट्ट के द्वारा विरचित प्रमेयरलार्णव का सर्वात्ममावविवेक नामक पाठ अध्याय समास हुआ || ६ ॥ - पुष्टिमार्गीयफलविवेकः ( सप्तमोऽध्यायः) अथ पुष्टिमार्गीयाणां फलं विचार्यते । तत्र प्रथमम् । 'भगवत्युत्तमश्लोके भवतीभिरनुत्तमा । भकिः प्रवर्तिता दिष्टया मुनीनामपि दुर्लभा ॥ (भाग० १०४७।२५) इत्युद्धववाफ्यान्मागप्रवर्तकत्वेन मुख्यत्वात्तेषां नजभक्तानां फल- प्रकारो लिख्यते । तत्र 'निरोधोऽस्यानुशयनमात्मनः सह शक्तिभिः' (भाग० २०१६) इति द्वितीयस्कन्धीयशुकवाक्यात् शक्तिमिः सहि- पुष्टिमार्गीयफल-विवेक (सप्तम अध्याय) अब पुष्टिमार्गीय भक्तों को प्रास होने वाले फल का विचार किया जाता है । उद्धव के 'यह पडे सौभाग्य की यात है कि आप लोगों ने उत्तम-श्लोक मगवान् श्रीकृष्ण की उस अनुत्तम अर्थात् सर्वोत्तम भक्ति का प्रवर्तन किया है जो मुनियों को भी दुर्लभ है' (भाग० १०१४७।२५) इत्यादि वाक्यों से गोपियों के पुष्टिभक्तिमार्गप्रवर्तक होने का ज्ञान होता है । मार्गप्रवर्तक होने के कारण ब्रज के भक्त मुख्य भक्त हैं, अतः सर्प- प्रथम उन प्रजमत्तों को प्राप्त होने वाले फल का निरूपण करते हैं । श्रीमद्भागवत के द्वितीयस्कन्ध में आये श्रीशुक के, 'अपनी शक्तियाँ से युक्त परमात्मा को जगत् में की जाने वाली विमिन लीलाएँ निरोध कही जाती हैं। (भाग० २११०१६ ) इस यास्य से ज्ञात होता है कि 1 सप्तमोऽध्यायः] पुष्टिमार्गीयफलविवेकः तस्य भगवतः प्रपञ्चे क्रीडा निरोधः', आत्मशब्दस्य भगवद्- याचित्वात् ।। अनुशयशब्देन तत्तल्लीलानुरूपा स्थितिरुच्यते, न.तु निद्रा। पुरुषशब्दे पुरि शयनं पुरुपस्योच्यते, पुरि शेत इति व्युत्पत्त्या तत्र स्थितिरेव शोधातोरर्थः, न तुं निद्रा, एवमिहापि । अत एव सुबोधिन्यां निवन्धेच, शक्तियों से युक्त भगवान् की प्रपञ्च में की जाने वाली क्रीडा को निरोध कहते हैं, क्योंकि उपर्युक्त शुकवाक्य में प्रयुक्त 'भात्मन्' शब्द भगवद्वाचक है। पूर्वोक्त शुक्याक्य में आये 'भनुभय' शब्द का अर्थ निद्रा नहीं प्रत्युत 'चिकीर्पित लीलाओं के अनुरूप भगवान् की अवस्थिति है। 'पुरुष' शब्द 'पुरि शेते' (अर्थात् जो पुर या शरीर में शयन करता है) इस व्युत्पत्ति से पुर या शरीर मे शयन करने का सूचक है । इस प्रकार पुरुप शब्द में शीड धातु का अर्थ स्थिति ही है निद्रा नहीं। इसी प्रकार पूर्वोक्त शुकवाक्य में भी शीड घातु (से निष्पन्न शयन शब्द ) का अर्थ अवस्थिति ही है, निद्रा नहीं । इसीलिये श्रीवहाभाचार्य ने सुबोधिनी १. द्रष्टव्य, "निरोध लक्षयति, 'अस्यानुशयनम्' इति । अस्य भगवतः, अनु पश्चात्, शयनं शतीः शाययित्वा तद्भोगार्थ स्वस्य शयनम् । अस्य इति पुरोवर्ती आत्मत्वेन प्रकाशमानोऽगुल्या निर्दिश्यते । आत्मनः देहस्य । सह इत्युभयत्र ।" (सुबोधिनी २।१०।६); देखिये, सुबोधिनी- प्रकारा: २।१०।६। 'अस्य आत्मनः जीवात्मनः, शक्तिभिः इन्द्रियान्त करणादिभिः सह अनुशयनं भगवति लयः, तदेकपरतया संसारविस्मृतिश्च निरोधः, निरोधनिरूपके दशमस्कन्धे तथैव प्रतीतः। (बालप्रबोधिनी २१०१६)। २. उदाहरण के लिये देखें, 'येनैव हेतुनामात्मा भगवान् सुप्रसीदति' ( येतात्मा सुप्रसीदति' भाग० १११।११ की सुबोधिनी टोका)।
१५८ प्रमेयरलार्णवे [पूर्वाद्ध 'निरोघोऽस्यानुशयनं प्रपञ्चे कीडन हरेः। शक्तिभिर्दुविभाव्याभिः कृष्णस्येति हि लक्षणम् ॥' (भागवतार्थ- प्र० का० १०।१४-१५) इत्युक्तम् । सा भगवतो निरोघरूपा लीला त्रिविधा । निरोध्यभक्तानां तामसराजससात्त्विकमेदेन त्रिविधत्वात् तत्तन्मनोरोधकताये क्रियमाणा लोकानुसारिणी त्रिविधा भवति । 'स्वभावस्यान्यथाभावो न वे शक्यः कथञ्चन । मतस्त्रिविधजीयेषु त्रिविधा भगवत्कृतिः ॥ (सुबोधिनीका० १०५।११६) इति सुबोधिन्याम् । तया निविधलीलया क्रिय- माणा भकानां प्रपञ्चविस्मृतिपत्रिका भगवदासक्तिः, सापि निरोधशब्दवाच्या, नितरां रोधो निरोध इति व्युत्पत्तेः। और तत्त्वार्थदीपनिबन्ध में कहा है कि "मगवान् हरि का अनुशयन निरोध कहा जाता है। अपनी दुर्विमान्य शक्तियों से युक्त कृष्ण का प्रपञ्च में क्रीडा करना ही इस निरोध का लक्षण है।" (भागवतार्थमा फा० १०1१४-१५)। भगवान् की निरोधरूप उपर्युक्त लीला तीन प्रकार की है । निरोध्य भक्तों के तामस, राजस और साविक भेद से त्रिविध होने के कारण उन भक्तों के मनों के निरोध के लिये की जाने वाली भगवान् की लोकानुसारिणी लीला तीन प्रकार की होती है, जैसाकि सुबोधिनी के 'स्वभाव का अन्यथामाव किसी भी प्रकार नहीं हो सकता, अतः तीन प्रकार के जीवों के लिये भगवान् तीन प्रकार की लीला करते हैं' (मुबोधिनीका० १०५।११६) इत्यादि वाक्यों में कहा गया है । उस निविध लीला से होने वाली, भक्तों की प्रपञ्चविस्मृतिपूर्वक भगवान् में आसक्ति मी निरोध ही कही जाती है। इस अर्थ में प्रयुक्त निरोध शन्द की व्युत्पत्ति 'नितरां रोध.' (अर्थात् अत्यधिक रोघ) है। .
सप्तमोऽध्यायः] पुष्टिमार्गीयफलविवेकः रोधः कस्येत्यपेक्षायां भक्तानामिति पर्वस्कन्धसमस्या लभ्यते । अपादानापेक्षायां प्रपञ्चो ग्राह्यः । तथा सति प्रपञ्चा- द्रोधः इति सिद्धम्, 'भक्ताः पूर्व निर्दिष्टास्ते रोद्धव्या विमुक्तये । (भागवतार्थम० का० १०।१६) इति नियन्धात्, 'हरिणा ये विनिर्मुकास्ते मग्ना भवसागरे । ये निरुद्धास्त श्वान मोदमायान्त्यहनिशम् ।। (निरोघल० ११) इति निरोधलक्षणनन्याञ्च । निरोध शब्द में प्रयुक्त 'रोध' शब्द से किसका रोध अभिप्रेत है इस प्रकार की जिशासा होने पर पूर्वस्कन्ध की सङ्गति का विचार करने से 'भक्तों का निरोध अभिप्रेत है। यह उत्तर मिलता है। इसी प्रकार 'किससे निरोध अभिप्रेत है। इस प्रकार अपादान की जिज्ञासा होने पर 'प्रपञ्च से निरोध अभिप्रेत है' ऐसा समझना चाहिए । अतः सिद्ध हुआ कि निरोध 'प्रपञ्च से रोध' है। तत्त्वार्थदीपनिबन्ध के 'पहले भक्तों का निर्देश किया जा चुका है, उन्हीं मतों का उनकी मुक्ति के लिये निरोध फरना अपेक्षित है' (भागवतार्थप्र० का० १०१६) इत्यादि वास्य तया श्रीवल्लभाचार्य की निरोघलक्षण नामक कृति के 'भगवान् ने जिनका परित्याग कर दिया ये मवसागर में इव गये और जिनका निरोध कर दिया ये ही दिन-रात सुखी रहते है। (निरोधल० ११) इत्यादि वाक्य से भी यही सिद्ध होता है कि 'निरोध' शन्द से 'मत्तों का निरोध' ही अभिप्रेत है। १. 'भक्तानां प्रपयाभावो निरोधः।' (सुबोधिनी २२१०१)। २ 'अग्रिमे मुक्ति मध्येऽत्र निरोधः तपा प भक्ता एव मोरनीया इति सन्दशेन मुक्पयंमत्र मता एव निरोद्धव्या इरमाराति । "वस्मान भूभारस्य सत्कर्तुर्वा निरोपो वात्र विवक्षित इत्यपः। (भागवतार्यमा योजना १०१६-१७)।
१६० प्रमेयरलाणवे [पूर्वाद्ध - प्रपञ्चाद्रोधेऽपि, 'कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् । इन्द्रियार्थान् विमूढारमा मिश्याचारः स उच्यते ॥' (गीता ३६) इतिन्यायेन प्रपञ्चस्मरणं चेत् न भगवल्लीलानुभवे मुख्योऽधि- कारः स्याद् अतः प्रपञ्चविस्मरणमपेक्षितम् । तदुपसर्गेण लभ्यते । नितरां रोधो निरोध इति, प्रपञ्चास्फुर्तिरिति यावत् । फस्मिन् निरोध इत्यपेक्षायां भगवति निरोध इति । 'कृष्ण निरुद्धकरणा भक्ता मुक्ता भवन्ति हि (भागवतार्थन० फा० २०१६) इति निवन्धात्। स हि परमरुच्युत्पादकलीलाजन्यत्वेन परमसुखरूपत्वाद् प्रपञ्च से रोध हो जाने पर भी यदि व्यक्ति गीता के 'जो व्यक्ति कमेन्द्रियों को संयमित करके भी मन से उन इन्द्रियों के मोग्य विषयों का स्मरणचिन्तन करता रहता है वह मिथ्याचारी कहा जाता है' (गीता ३६) इत्यादि वाक्य मे प्रतिपादित न्याय से प्रपञ्च का स्मरण करता रहे तो वह भगवल्लीला का अनुभव करने का मुख्य अधिकारी न हो सकेगा अतः प्रपञ्च का विस्मरण अपेक्षित है और उसकी उपलब्धि 'निरोध' शब्द में प्रयुक्त 'नि' इस उपसर्ग से होती है । तात्पर्य यह है कि 'निरोध' शब्द के प्रारम्भ में आये "नि' उपसर्ग से यह सूचित होता है कि निरोध के लिये प्रपञ्च का विस्मरण अपेक्षित है। इस प्रकार निरोध का अर्थ हुआ अत्यधिक रोध अर्थात् प्रपञ्च का स्फुरित न होना । 'निरोध किसमें होता है ' इस जिज्ञासा का उत्तर है कि निरोध भगवान् मे। तत्त्वार्थदीपनिनन्ध के 'जिन भक्तों की इन्द्रियाँ आदि कृष्ण में। गयी हैं वे मुक्त हो जाते हैं। ( मागवतार्थप्र० का० १०194 वाक्यों से उपर्युक्त कथन की पुष्टि होती है। उपर्युक्त निरोध परम" पादक लीलाओं सप्तमोऽध्यायः] पुष्टिमार्गीयफलविवेकः आसक्तिरूपः, अन्यथा निग्रहमानं स्यात्, तत्तु न सुखकरम् , 'मनोनिग्रहकर्शिता' (भाग० १२२९।२) इति वाक्यात् । प्रपञ्च- विस्मृतावेव भगवत्सुखानुभवादासक्तिरूपत्वं सिद्धयति निरो- धस्य । अतः प्रपञ्चविस्मृतिपर्विका भगवदासक्तिनिरोधपद- वाच्येति । 'इति नन्दादयो गोपाः कृष्णरामकथां मुदा । कुर्वन्तो रममाणाश्च नाविन्दन् भववेदनाम् ॥' (भाग० १०११११५८) 'शय्याशनाटनालापक्रीडास्नानासनादिषु । के कारण परमसुखरूप होने से आसक्तिरूप होता है, यदि ऐसा न हो तो वह निग्रहमात्र हो जाये और जैसा कि 'मनोनिग्रहकर्शिता' (भाग. ११।२९।२ ) इत्यादि वाक्यों से सूचित होता है केवल निग्रह सुखकर नहीं होता। प्रपञ्चविस्मृति होने पर ही भगवत्सुख का अनुभव होने से निरोध का आसक्तिरूप होना सिद्ध हो जाता है। अतः निरोध पद का भर्थ है 'प्रपञ्चघिरमरणपूर्वक भगवान् में आसक्ति होना' । श्रीमद्भागवत के, 'इस प्रकार श्रीकृष्ण और बलराम की लीलाओं का वर्णन करते हुए और उनमें रमण करते हुए नन्द भादि गोपों को जागतिक कष्टों का भनुभव नहीं हुभा' (भाग० १०।११।५८), तथा 'यदुवंशियों- जिनका चित्त सदैव मगवान् कृष्ण में ही लगा रहता था--को सोने, १. 'एवं नन्दादीनां त्रिविधं ज्ञानं निरूप्य (भाग० १०।११।५५-५७) फलितं वदन भगवत्कृतं नन्दनिरोधमनूद्योपसंहरति । नन्दादयो गोपाः कृष्णरामकथां स्वतन्त्रतया फलत्वेन कुर्वन्तः तयव कथया जातया परम- निर्वत्या रममाणा: चकाराद् विस्मृतदेहा जातब्रह्मात्मानुभवावा भववेदनां ससारतापं नाविन्दन् न ज्ञातवन्तः । प्रपञ्चविस्मृतिः सर्वा तदासक्तिश निरोष इति भगवत्कृतं कार्य नन्दादिषु फलितम्।' (सुवोधिनी १०११११५८)। २. यह सुबोधिनीसम्मतपाठ है (देखिये नीचे पृष्ठ १६२ टिप्पणी १), प्रमेयरत्नार्णव का उपलब्धपाठ 'शयनासनाटनालापस्नानकोडायनादिपु' है।
१६२ प्रमेयरलाणवे [पूर्वाद्ध न विदुः सन्तमात्मानं वृष्णयः कृष्णचेतसः ॥' (भाग० १०१९०४६) इत्यादी तथैव निरूपितत्वात् । तथा च प्रपञ्चविस्मृतिपूर्वक- भगवदासक्तिसम्पादिका प्रपञ्चाधिकरणिका भगवरलीला निरोधपदयाच्या, सेयं भगवद्धर्मः; ताशलीलाजन्या प्रपञ्च- विस्मृतिपर्विका भगवदासक्तिनिरोधपदवाच्या, सा जीवधर्मः। तदुभयं दशमस्कन्धे प्रतिपाद्यते, खाने, धमने फिरने, योगने-खेलने, नहाने धोने और उठने बैठने भादि में मी ( अर्थात् किसी भी काम को करते समय) अपनी (देह की भी) सुधबुध नहीं रहती थी। तात्पर्य यह है कि उनकी समस्त शारीरिक क्रियाएँ यन्त्रवत् होती रहती थीं और उन्हें इस बात का पता या होश नहीं रहता था कि वे क्या कर रहे हैं। (भाग० १०१९०१४६) इत्यादि वाक्यों में निरोध का निरूपण उपर्युक्त प्रकार का ही होने से भी निरोध पद का पूर्वोक्त अर्थ मानने के मत की ही पुष्टि होती है । इस प्रकार निरोघ शब्द से भगवान् की, 'प्रपञ्चविस्मृतिपूर्वक भगवान् में आसक्ति' का सम्पादन कराने वाली उस लीला का ग्रहण या बोध होता है जो भगवान् का धर्म है और जिसफा अधिकरण (अर्थात् लीलास्थली) यह प्रपञ्च है । इस प्रकार की लीला से उत्पन्न होने वाली 'प्रपञ्चविस्मृति पूर्वक भगवान् में आसक्ति' (भी) निरोध कही जाती है और यह आसक्ति जीव का धर्म है। श्रीवल्लभाचार्य के तत्त्वार्थदीप निबन्ध के १. 'शय्या च अशनम् भोजनम । अटनम् परिभ्रम । आलाप. वार्ता । क्रीडा द्यूतादि । स्नानम आसनम् च । एते सप्तपदार्था प्रकारपरा 1 तत्र ऐश्वर्यादिधर्मा योजनीयाः। तथा सति प्रकारतामापद्यन्ते । किं बहुना सर्वावस्थासु आत्मानं यथास्थानस्थित न विदुः । अनेन प्रपञ्चविस्मृतिरुक्ता । तदासक्तिमाह, 'कृष्णचेतस' इति, कृष्ण एव घेतो येषाम् । गोकुलस्थाना तु पूर्वमेव निरूपितम् । स्त्रीणाञ्च राजसाना सात्त्वि- काना चाय निरोप इति सम्पूर्णानिरोधलीला।' (सुबोधिनी १०।९०।४६। .
सप्तमोऽध्याय.] पुष्टिमार्गीयफलविवेक. १६३६ 'समुदायो जन्मवाची क्रीडायुक्तस्य वै हरे । प्रपञ्चविस्मृति. सक्तिभक्तानां चापि योगत ।। (भागवतार्थप्र० का० १०२०) इति निबन्धात् । तत्र प्रथम तामसप्रकरणम् । 'सर्वक्रीडायुक्त श्रीहरि का समी लोगों के दर्शनार्थ पायजगत् में एकीमाव अवतार के समय जन्म कहा जाता है। उन कृष्ण में चित्त लगाने पर भक्तों को प्रपञ्च का विस्मरण हो जाता है और भगवान् में आसक्ति की उपलब्धि होती है' ( भागवतार्थ प्र० का० १०।२०) इत्यादि वाक्यों से ज्ञात होता है कि उपर्युक्त दोनो का प्रतिपादन भागवत के दशम स्कन्ध में किया गया है । निरोपनिरूपणपरक दशमस्कन्ध में (जमप्रकरण के १. "पूर्वकारिकाया नटवद रूपान्तर जमापरयर्याय स्वीकृत्य त्रिवि- घाना भक्ताना प्रपञ्च निवार्य निरोधात्मकमुद्धार करोति इति निश्चिता दशमस्कन्धार्थ उक्त । तथा सति अवतारसामयिकानामेव निरोधो भविष्यति मानवतारसामयिकाना, तदानी रूपान्तरस्वीकरणात्मकजन्मामावाद् इत्या- शक्षायामाहु, 'समुदायो जन्मवाची' इत्यकेन । भगवान् हि सर्वभक्त सम्बघिनी सर्वा लीला कुर्वन सदा विराजते, न तु तस्य स्वाभाविक जमास्ति, नापि लीलाना कादाचित्कत्वम इति सिद्धान्तात् सर्वक्रीडा- युक्तस्य हरे सर्वलोकदर्शनाय समुदाय एकोभावो वहियं सोऽवतार- समये जन्म उच्यते, तादृशे आसक्त्या तदानीन्तनाना यथा प्रपञ्चविस्मृत्यो- खार, एवमनवतारसमये यस्य भक्तस्य निरोध चिकोषित , सहृदय तस्यैव दर्शनायं सर्वक्रीडायुक्तस्य हरे समुदायो जन्म वक्ति इत्यथं । ततो हृदि प्रादुर्भूतरूपस्यैव सबलीलायुतत्य यदा निरन्तरचिन्तनध्यानादिना योगारूढत्व तदा तस्य रूपस्य समुदायो भक्तेन सह एकीभवन, स एव प्रपञ्चविस्मृतिपूर्वकभगवदासक्तिरूपो निरोध उच्यते । तथा च निरुत्सा यामनेककविषयत्वकृतो दर्शन च बाह्याम्पतरकृतश्चैव दिशेपोश्वतारानव सारदशाया नान्योऽपि कश्चिदिति न कोऽपि शङ्कालेश । एव सति भगवतो ऽयलोलावज्जमाप्येका लोला, सापि नित्यवति जमाष्टम्या तदभिनय प्रमेयरलार्णवे [पूर्वाद मजस्थाना तामसत्वं त्रिविधम् , अविहितमतिरसानुभवसाधन- रूपं पारिभाषिकमेकम् , धर्मविशेषरूपं द्वितीयम्, भगयन्माया- कृत तृतीयञ्च। तत्राद्य तु स्वमनोरथानुकूल्लोकसदृशभगय ल्लीलारचिमत्त्व चाह्यदर्शनकामिलापवत्त्व-स्ववियोगासहिष्णु त्यादिरूपम् । तामसा हि हटप्रधानास्तेपा यत्राग्रहः पतति स न गच्छति, ज्ञानरहिता मुग्धाश्च भवन्ति, ज्ञानराहित्यादेव लोकवेदोल्लरनं कुर्वन्ति । व्रजस्था अपि भगवति परमानहवन्तो लीलानुपयुक्तशानशून्या, 'एवं मदर्थोज्झितलोकवेदस्वानाम्" अनन्तर) पहले तामस प्रकरण आता है । व्रजवासियों का तामसत्व विविध है, प्रथम, अविहित भक्ति (अर्थात् मर्यादा भक्ति से मिन, पुष्टिभक्ति ) के रस के अनुभव का साधनरूप या पारिभाषिक तामसत्य, द्वितीय धर्मविशेषरूप और तृतीय भगवान् की माया से उत्पन्न होने याला | इनमें से प्रथम प्रकार के तामसत्व का रूप भक्त की अपनी आकाक्षाओं में अनुक्ल लोक्सदृश भगवल्लीलाओं में रचि होना, भगवान् को बहिर्देश में (न कि अन्तस्तल में ) देखने की दी अभिलाषा करना और उनके वियोग को न सह सकना आदि है । तामस व्यक्ति हठी, जिस बात का आग्रह कर लें उसने विरत न होने वाले, शानरहित और मुग्ध होते हैं तथा ज्ञानरहित होने के कारण ही वे लौकिक और वैदिक मर्यादाओं का उल्लङ्घन या अतिक्रमण (भी) कर जाते हैं । व्रजवासी भी भगवान् में परम आग्रह रसने वाले तथा लीलानुपयुक्त ज्ञानसे शून्य हैं। भगवान् के इस प्रकार मेरे लिये लोक, वैदिक भार्यमार्ग और पतिपुग्नादि आत्मीयों को छोड़ देने वाला' (भाग० १०१३।२१) सूपपन्न एवेति शेयम् ।" (निवन्धकठिनाशविवचनम, भागवतार्थप्र० का १०१२०)। दशमस्कधार्थनिर्णय के लिये देखें भागवतार्थप्र० का० १.११७-१९ तथा उनकी योजना। १. द्रष्टव्य, सुबोधिनी १०३२।२१ ।
सप्तमोऽध्यायः] पुष्टिमार्गीयफलविवेकः १६५ (भाग० १०॥३२२२१) इति वाक्याद्भगवदर्थे' लोकवेदोलवन- शीलाश्चेत्येतावद्धर्मसाम्येन तामसत्वमुच्यते परोक्षवादाय, 'परोक्षप्रिया इव हि देवाः' (ऐतरेयोप० १।३४) इति श्रुतेः, 'परोक्षं मम च प्रियम्' (भाग० ११॥२१॥३५) इति भगवद्- वाक्याच' । इदं तामसत्वं तामसप्रकरणे सर्वेपुभक्तप्वनुगतम् । द्वितीयं तु यत्र यत्रोद्गच्छति तत्र तत्र तादृशकार्य करोति, यथा, 'शरदुदाशये साधुजातसत्सरसिजोदरश्रीमुपा दृशा । सुरतनाथ ते शुल्कदासिका वरद निघ्नतो नेह कि वधः।।" (भाग० १०॥३१॥२) इत्यादिचाफ्यानि । इदं तामसत्वं भाव- इत्यादि वाक्यों से यह भी ज्ञात होता है कि ब्रजवासी भगवान् के लिये लोक और वेद का उल्लङ्घन करने वाले भी हैं। इस प्रकार तामस व्यक्तियों से उपर्युक्त धर्मों में साम्य होने के कारण व्रजभक्त तामस कहे गये हैं, किन्तु यह अवघेय है कि यह तामसत्य परोक्षवाद के लिये ही कहा गया है क्योंकि श्रुति कहती है कि 'देवता परोक्षप्रिय होते हैं' (ऐतरेयोप० १/३।४) ओर स्वय भगवान् ने भी कहा है कि 'मुझे परोक्ष प्रिय है' (भाग० ११।२१:३५)। यह तामसत्व तामसप्रकरण (भाग० १०१५-११, १५-३५) में सभी भक्तों मे अनुगत है । उपर्युक्त द्वितीय प्रकार के तामसत्व का जहाँ जहाँ उद्रेक होता है वहाँ वहाँ तदनुरूप कार्य होते हैं, उदाहरणार्थ भागवत के अधोलिखित वाक्यों में । "हे सुरतनाथ ! हे वरद ! शरत्कालीन पुष्करिणी में सम्यक् प्रकार से उत्पन्न कमल की अन्तर्तिनी श्री (या शोमा) को चुराने वाली दृष्टि से हम गोपियों को जो तुम्हारी शुल्कदासियाँ हैं-मारने वाले तुम्हें १. 'परोक्षवादा ऋषयः परोक्षञ्च हरिप्रियम् ।' ( सुबोधिनीका १०९।१५) २. गीताप्रेससंस्करणसम्मतपाठ 'तेऽशुल्कदासिकाः' है।
प्रमेयरलार्णवे
[पूर्वाद्ध
विशेषरूपम् । एवं राजसत्यसात्त्विकत्वे अपि भावविशेषरू
एव । अत एव तामसमकरणस्थाया एव कस्याश्चिद्राजसीत्वम
अन्यस्याः सात्त्विकीत्वम् , कस्याश्चिनिर्गुणात्वमुच्यते । अर
शायते इदं तामसत्वादिकं भावविशेष एव । अत एव 'मा
कितववाघों' (भाग० १०४७।१२) इत्यादो एतस्य तामसल
स्यानुवृत्ती राजसप्रकरणेऽपि दृश्यते ।
तृतीयं तु भगवन्मायाकार्यम् । मायात्र लीलासृष्टिस
जीवसम्पम्धिनी शेया, 'न वाऽपवर्ग मे मोहिती मम मायया ।
(भाग० १०॥३२३९) इत्यत्र 'इयं विशेषमाया' (सुयोधिर
क्या वध का दोष नहीं लगेगा ?" (भाग० १०१३१२)। यह ता
सत्व भावविशेषरूप है। इसी प्रकार राजसत्य और सात्विक्त्व :
भावविशेषरूप ही होते हैं, इसीलिये ( सुबोधिनी में) तामसप्रकरण
निरूपित गोपियों में से किसी को राजस, किसी को सात्त्विक और कि
को निर्गुण कहा गया है। इससे शात होता है कि यह तामसत्वा
भावविशेष ही है। इसीलिये राजसप्रकरण ( माग० १०॥३६-६३)
भी 'मधुप ' कितवयन्धो ! (भाग० १०१४७१२) इत्यादि वाक्यों
इस तामसत्व की अनुवृत्ति उपलब्ध होती है।
तृतीय प्रकार का तामसत्व भगवान् की माया का कार्य है
प्रकृत प्रसङ्ग में माया पद से अमिनाय लीला के लिये की ग
सृष्टि में अवस्थित जीव से सम्बद्ध माया से है जैसाकि भागवत
'मेरी माया से मोहित होकर तुम दोनों ने मुझसे मोक्ष न
माँगा' (भाग० १०३।३९) इस श्लोक की सुबोधिनी टीका
१. द्रष्टव्य, माग० १०।३।३९ की सुबोधिनी एवं श्रीविठ्ठलनाथ
टिप्पणी।
१२. यह सुबोधिन्यनुसारो अर्थ है, विशदता के लिये देखें, सुबोधि
१०१३RA -
। सप्तमोऽध्यायः] पुष्टिमार्गीयफलविवेकः १६७ १०३।३९) इत्यादिना सुबोधिन्यामतिरिक्तायाः प्रदर्शितत्वाद्, 'वैष्णवी व्यतनोन्मायाम् (भाग० १०८४३) इत्यत्र मूले वैष्णवी पदाच्च । अतः सा पशुपुत्रगृहाधासक्ति जनयति । तत्कार्य मजस्थेषु प्रतीयते, 'महयात निशि शयानमतिश्रमेण' (भाग० २।७।३१) इति वाफ्यात् । क्वचिद् भगवदिस्मृति जनयति, 'नवाशृणोदै रुदित सुतस्य सा' (भाग० १०७६) इति वाक्याद्, 'अतृप्तमुत्सृज्य जवेन सा ययौ' (भाग० १०९।५) इति वाफ्याञ्च । क्वचिन्मायिकधर्माणां भगवति प्रतीतिः, 'यह विशेषमाया भगवल्लीलासाधिका है" (सुबोधिनी १०१३०३९) इत्यादि वाक्यो में अतिरिक्त माया के निरूपित होने तथा भागवत के 'वैष्णवी माया का विस्तार किया' (माग० १०८४३) इत्यादि वाक्यों में माया के विशेषण के रूप में वैष्णवी पद के प्रयोग से शात होता है। अतः उपर्युक्त माया पशु, पुत्र और गृह आदि में आसक्ति उत्पन्न करती है । भागवत के, 'दिन मर छौकिक कार्यों में व्याप्त रहने के कारण अत्यधिक परिश्रम से थक कर रात में गहरी नींद में सो जाने वाले गोकुलवासियों को' ( भाग० २१७३१) इत्यादि वाक्यों से प्रजवासियों पर उपर्युक्त माया के कार्य या प्रभाव का शान होता है। 'नन्दपरनी ने पुत्र के रोने की आवाज नहीं सुनो' ( भाग० १०७६) इत्यादि वाक्यों तथा 'स्तन्यपान कर रहे पुत्र को अतृप्स छोड़ कर ही वह तेज़ी से मार्गा' (भाग० १०१९।५) इत्यादि वाक्यों से शात होता है कि उपर्युक्त माया कहीं-कहीं कभी-कभी भगवद्विषयक विस्मृति को भी उत्पन्न कर देती है अर्थात् भगवान् का विस्मरण करा देती है। इस मायाजन्य तामसत्व के कारण कभी-कभी भगवान में मायिक धर्मों की प्रतीति भी होती है, १. 'इयं विशेषमाया भगवल्लीलासाधिका, साधारणी तु शास्त्रा- नियर्तत एव' इत्यादि । (सुबो १०३।३९)। .
१६८ प्रमेयरलार्णवे [पूर्वाद्ध 'मेहनादीनि वास्तौ” (भाग० १०८।३१) इत्यत्र निरूपिता । 'यत् सम्परेतः पुनरेव पालक' (भाग० १०॥७१३२) इत्यादि. याफ्यान्यपि अशानमूलानि विशेपमायाकार्यभूतेन तामसत्वेन । अत एतस्य दोपपत्यम् । इदं मायाकार्यरूपं तामसत्वं भगवान् क्रमेण लीलाभिर्नाश यति । अमे निवर्तनीयस्यापि पूर्व स्थापनं त्वत्यन्तविरुद्ध- साधनवत्स्यपि ग्रह्मादिदुरापफलदानेन पुष्टिमार्गीयभगवन्महिम- स्थापनार्थमिति शेयम् । तामसप्रकरणीयलीलासमाप्तौ इदै इस बात का निरूपण 'यह वास्तुदेवताके पूजास्थान में' (अर्थात् सुन्दर मटकों आदि में या हमारे लिपे पुते स्वच्छ घरों में ) मूत्र विसर्जन आदि भी कर देता है। (भाग० १०८३१) इस श्लोक की सुबोधिनी टीका में किया गया है। जिससे यह पाकक मर कर (अर्थात् मृत्यु के मुख में जाकर ) मी पुनः आ उपस्थित हुआ है' ( भाग० ५०।७।३२) इत्यादि वाक्य भी अशनमूलक हैं और उपर्युक्त विशेष माया के कार्य- भूत तामसत्व के कारण ही ब्रजवासियों के मुख से निकले हैं। अतः माया का कार्यरूप यह तृतीय प्रकार का तामसत्व दोपरूप है । माया के कार्यरूप इस तृतीय प्रकार के तामधत्व को भगवान् क्रमश. अपनी लीलाओं द्वारा नष्ट कर देते हैं। जिस (तामसत्व ) की चाद में चल कर निवृत्ति करनी है उसकी भी पहले प्रतिष्ठा करने का प्रयोजन अत्यन्तविरुद्ध साधन वालों को भी ब्रह्मा आदि के द्वारा भी दुष्प्राप्य पल देकर भगवान् की पुष्टिमार्गीय महिमा का प्रख्यापन करना १. द्रष्टव्य, 'एवं धाष्टर्यान्युशति कुरुते मेहनादीनि वास्तौ' (भाग० १०८।३१) इत्यादि की सुयोधिनीटीका के 'उशति कमनीय भाण्डादौ च मेहनादीनि कुरुते, वास्तौ यत्र वास्तुदेवता पूजिता भवति' (सुबोधिनी १०८३१) इत्यादि वाक्य । २. थीभागवतसुधासागर १०८।११।
सप्तमोऽध्यायः] पुष्टिमार्गीयफलविवेकः मायाकार्य तामसत्वं निवृत्तम् । एवं तामसानां निरोघे जाते अग्रिमकार्यार्थचिकीर्पितलीलाप्रतियन्धकीभूतस्याद्यतामसत्वस्य वियोगासहिष्णुत्व-लोकदोलनशीलत्वादिरूपस्य निवारणम् । अत एव 'निवारयामः समुपेत्य माधवं किं नोऽकरिष्यन् कुलवृद्ध- वान्धवाः ।' (भाग० १०॥३९॥२८) इत्युक्त्वापि न कृतवत्यः, तामसभावस्य परिहतत्वात् । ततो राजसभावः। सच, 'विकुर्वन् क्रियया चाधिरनिवृत्तिश्च चेतसः । है ऐसा समझना चाहिए । तामसप्रकरणीय लीला की समाप्ति पर तामस भक्तों के, माया के कार्यरूप इस तामसत्व की निवृत्ति हो गयी। इस प्रकार तामस भक्तों के इस तामसत्व का निरोध सम्पन्न हो जाने पर आगे का कार्य करने के लिये की जाने वाली लीला के प्रतिबन्धकभूत अर्थात् बाधक उपर्युक्त प्रथम प्रकार के तामसत्व-जिसका स्वरूप नियोग को सहन न कर सफ्ना तथा लोक और वेद की मर्यादाओं का उलङ्घन करना आदि है है का निराकरण निरूपित किया गया है। इसीलिये, 'चलो हम सब स्वयं ही चल कर माधव को रोक लें, कुल के बड़े बूढ़े और बन्धु-बान्धव हमारा क्या कर लेंगे? (भाग० १०॥३९। २८) इत्यादि कह कर भी गोपियों ने वैसा किया नहों अर्थात् कृष्ण को रोका नहीं क्योंकि उनका तामसभाव दूर हो गया था । तदनन्तर राजसभाव का निरूपण हुआ है । राजसभाव मनोविक्षेप- १. 'स्वप्रवृत्तिवन्धकत्वेन बान्धवानुपालभन्त्यः तानवगणयन्ति 'निवारयामः' इति । सर्वाभिः सम्भूय भगवान निवारणीयः । तथा सति बान्धवाः कोपं करिष्यन्ति इति चेत् तमाहः, 'कि नोऽकरिष्यन्' इति । नः अस्मा किम् अकरिष्यन् इति । कि पूर्व कृतवन्तः करिष्यन्ति का? तथापि न सर्वासा सम्मतिरिति लौकिकालौकिकपरमार्थदृष्टियुकाभिर- प्रवृत्तमिति ।' (सुबोधिनी १०३९।२८)। , ....
१७० प्रमेयरलार्णवे [पूर्वाद्ध गात्रावास्यं मनोमान्त रज एतैनिशामय' ।। (भाग०१।२५।१७) इति वाफ्यान्मनोविक्षेपकर्ता। अत पय, 'भवतीना वियोगो मे न हि सर्वात्मना क्वचित् । (भाग०१०१४७१२९) 'आत्मत्वाद् भक्तवश्यत्वात् सत्यवाक्त्वात् स्यमावतः ।।" कर्ता है अर्थात् उसमें मन चञ्चल रहता है, जैसाकि भागवत के अधो- लिखित वाक्य में कहा गया है, 'काम करने में मानसिक उद्विग्नता, चित्त की निवृत्ति (अथवा निति ) का अभाव, शरीर को अस्वस्थता तथा मन की चलता आदि से रजोगुण के उदेक का ज्ञान होता है।' (भाग० ११।२५।१७)। इसीलिये उद्धव द्वारा भगवान् के गोपियों को भेजे गये, 'भाप लोगों का मुझसे (अर्थात् सर्वात्मा श्रीकृष्णसे) १. पूर्वार्द्ध का गोताप्रेस संस्करण सम्मतपाठ अघोलिखित है। 'विकुर्वन् क्रियया चापीरनिर्वृत्तिश्च चेतसाम् ।' (भाग० ११।२५।१७) । २. "वत्र द्वेषापि प्रतिजानीते भवतीनां वियोगो मम नास्ति, मम च वियोगो भवतीना नास्ति, एकत्र कृतघ्नता यपरत्र दु.खं च फलति । वस्तुस्वरूपेण वियोगाभावेऽपि एकदेशेन वृक्षकपिवियोगवत् कालभेदेन च स्त्रीपुरुषवच्च वियोगः सम्भवति, तदुमयं निपति, 'न हि सर्वात्मना' इति । क्वचिद् इति काले, सर्वात्मना केनाप्यंशेन इति देशे । एवं चतुर्धा भवति । अत्र प्रायेण साधनचतुष्टयप्रतिपादक अर्घमन्तरितमिति प्रतिभाति, 'आत्मत्वाद्भक्तवश्यत्वात्सत्यवाक्वात्स्वभावत:' इत्येवं रूपम् । गोपिकावियोगो भगवतो नास्ति भगवानात्मेति, भगवद्वियोगश्च न गोपिका- नाम्, भक्तवस्यत्वात् । कालभेदेनापि न वियोगः, 'न पारयेऽहम्' (भाग० १०।३२३२२ ) इति । न हि एतावदुक्त्वा एतावत्यर्थे तासामिच्छा किन पूरयेत्, भगवतश्चार्य स्वभाव: यन् स्त्रीपु कृपावान्, अतः केनाप्यंशेन ता न परित्यजतीति | विशेषहेतव एते चैद्भवन्ति ।" ( सुबो० १०४७।२९) ३. यह पलोकाध श्रीमद्भागवत में नहीं मिलता है। वल्लभाचार्य के मन्नध्याप] डिमार्योपरियेस (भाग १०४९) इत्यादिसन्देशोपदिशामझामसेतालो जावम् । तेन नाल्मा भगवाहियोग' इति पुनम्। 'ततत्ताः फन्दोहिला उपूपायलिल्लनमधोमव। (भाग०१००१६) इति वास्यात् । पवमात्मत्वेन ज्ञानाननारमपि मार वियोग कभी भी किसी भी प्रकार (कहाँ भी) नहीं हो सकता, स्मोकि मैं सब को मामा, मामें के परा में रहने वाm, सपनारी भोर स्नान से ही सियों पर कृपा करने वाला हूँ, (भाग १९) साद सन्देश का उपदेश दिये जाने पर गोपिशे को भान TAREET गया और जैसाकि, 'तदनन्तर उजव द्वारा गाये गोण के सन्देशों से हो गये विरहमर पाली गोपियों में कृष्ण को आशा रामशकर उद्धव की पूजा को (भाग० १.४७५३) यादि मारयों से बात होता है उस आत्मशान से उन्हें पद समक्ष में खा गया कि हमारा भगवान् से वियोग नहीं हुआ है। इस प्रकार कृष्ण को मारमा में जान लेने के बाद भी उदय पे उपदेशों से अपम गोगियों का भए अनुसार इसे उपर्युक्त लोया के ठीक पाप होगा पाहिए । लिगे, HATE टिप्पणी २ में उतृत सुपोधिनी १०१४७/२९) इसको माया मार श्रीवल्लभाचार्य ने बताया है कि यदि भगवान् गारमल, vasnala धों को प्रकट करें तो गोपियानुयोगिनः भगवत्प्रतियोगिता, मghtfन' गोपिकाप्रतियोगिक, कालिप और शिक पशुविध विगोग होता है जि! निषेध यहाँ अभिप्रेत है। १. "तत: कृष्णसन्देशः घरया पिदोपेण अपेपिरहगराः । ज्वराभावे दृष्टमेव द्वार जासमित्याह अपोक्षाजमारगान हालत | " ततो गुरूपदेशः प्राप्त इति साक्षाद्गुरत्यागाय:गि भूमशाग शाmafire गरणार्थस्य विद्यमानस्यात् ( 'गृणासीसि गुरुरिति योगाविrari N.) पूजयाश्यक, भारमायिदा या समाना करावय! | मना २७२ भमेयरत्नाणवे [पूर्वार्द्ध . गोपीनां कृष्णावेशात्मविक्रम' (भाग १०४७५७) इति वाक्यादुपदिएशानं तिरोभयति, रजोगुणेन विक्षेपकरणात् । तथा सति भगवद्विरहोऽस्तीति ज्ञानात् पुनः रोद एव । यायद्- राजसभावस्तावदुपदिष्टस्फूर्ती विरहाभावज्ञानात् सुखम् , उपदिष्टविस्मृतौ विरहशानाद् दुःपमित्युभयं वर्तत इति शेयम् । ततो राजसभावस्याऽपि निवृत्ती सत्त्वमुर्वरितम् , तदा सात्त्विका उच्यन्ते । तन हि सत्त्वात् सजायते ज्ञानम्' (गीता शान रजोगुणकृत विक्षेप से तिरोहित हो गया, जैसाकि 'इस प्रकार गोपियों के प्रेममाव तथा कृष्णावेश (अर्थात् कृष्ण के प्रेम में तन्मय हो जाने ) से होने वाले आरमवैक्लव्य (अर्थात् शरीर आदि की निकलता') को देखकर' (माग० १०४७५७) इत्यादि वाक्यों से ज्ञात होता है। ऐसी दशा में उन्हें फिर यह जान पड़ने लगा कि उनका भगवान् से विरह है और इस नवीन शान से उन्हें पुनः खेद होने लगा। जब तक राजसभाव विद्यमान रहा तब तक गोपियों को उद्धव द्वारा उपदिष्ट शान का स्फुरण होने पर भगवान् के विरह के अमाव का ज्ञान होने के कारण सुस का अनुभव होता था, किन्तु उद्धव द्वारा उपदिष्ट सन्देश के विस्मृत होते ही भगवान् के वियोग का अनुभव होने लगता या और वे दुःसी होने लगती थीं। इस प्रकार उन्हें राजसभाव विद्यमान रहने तक सुख और दुख दोनों का अनुभव होता रहा ऐसा समझना चाहिए। तदनन्तर राजसभाव के भी निवृत्त हो जाने और केवल सत्त्व के ही शेष रह जाने पर मज के उपर्युक्त (गोपिकादि) भक्त सात्त्विक कहे भिन्नतया ज्ञातवत्य , इदानीमात्मत्वेन, अग्रे तु तथैव भविष्यन्तीति ब्रह्म- भावयोग्यता निरूपिता तच्च नाभिलषित स्थात् वदा न पवेद् इत्युत्कठेच्छा ज्ञापयितुमुखवपूजा निरूपिता।" (सुबोधिनी १०।४७५३)। १. देखिये, ऊपर पृष्ठ १०८ टिप्पणी 1 सप्तमोऽध्यायः] पुष्टिमार्गीयफलविवेकः १७३ १४।१७) इति वाफ्याद् उद्धयोपदिष्टं ज्ञानं स्थिरमभूत् । अत एव कुरुक्षेत्रप्रसङ्गे गेह पामपि मनस्युदियात् सदा नः" (भाग० १०८२१४९ ) इत्येव प्रार्थितम्, अन्यथा पुरस्थिते भगवति बजे भगवदागमनं प्रार्थयेयुः। अतो भगवच्छास्त्रप्रकारेण भग- वन्मेलनं समीचीनं सार्वदिकं चेति तामिवुद्धमित्यध्यवसीयते । गये हैं। इस स्थिति में उनमें, जैसाकि गीता के 'सत्व से ज्ञान उत्पन्न होता है' (गीता १४।१७) इत्यादि वाक्यों से सिद्ध होता है, उद्धव के द्वारा उपदिष्ट ज्ञान स्थिर हो गया । इसीलिये कुरुक्षेत्र में कृष्ण का पुनः साक्षात्कार होने पर गोपियों ने उनसे केवल यही प्रार्थना की कि 'आपका यह चरणकमल घर-गृहस्थी के काम करते रहते पर भी हम समी गोपियों के मन में सदा स्फुरित होता रहे' (भाग० १०८२।४९), अन्यथा (अर्थात् यदि उद्धवोपदिष्ट ज्ञान उनके हृदय में स्थिर न हो गया होता तो) सम्मुस उपस्थित कृष्ण से वे वन में पुनः आने की ही याचना करती । अतः (गोपियों के कृष्ण से ब्रज में आने का आमह न कर उपर्युक्त प्रार्थना करने से ) ज्ञात होता है कि उनकी समन में बात आ गयी कि भगवान् के द्वारा उपदिष्ट (भगवच्छास्त्र मे प्रतिपादित) प्रकार से भगवान् से सयोग प्राप्त करना ही ठीक है और यह सयोग सार्वदिक अर्थात् नित्य है। १. "अत. आधिदैविके मनसि तवावतीर्णस्य पुरुषोत्तमस्य पादयुगलं मनसि सर्वदा स्फुरतु, तावतेयमवस्था स्थिरा भविष्यति ।" स्वस्य बाधा- न्तरसम्भावनामाहुः 'गेह पामपि' इति । देहो वर्तत इति देहभागिन. गृहे योजयिष्यन्ति । ततो गृहासक्त्या पूर्वरदेव प्राकृतत्वं भविष्यति, अयमेव च कूपे पात. । 'अपि' इति, कदाचित् त्वत्कृपया देहसम्बन्धो न भवेत, तदा न काचिच्चिन्ता इत्यपि सूचितम् । मनसि स्वयमेव उदियात् । नः अस्माकं सर्वासाम् । एवं निष्कामतया गोप्यो मुख्या भक्ता जाता. | काम- निवारणार्थञ्च ज्ञानोपदेश इति निरूपितम् ।" (सुबोधिनी १०1८२४९)। यह [पूर्वाद्ध - १७४ प्रमेयरलाणवे ततः सत्त्वनिवृत्ती निर्गुणावस्था । ततो भगवद्रुपतायां नित्यलीलाप्रवेशो मुक्तिः। 'मुक्तिहिखान्यथारूपं स्वरूपेण व्यव- स्थितिः" (भाग० २०१०१६, सुबोधिनीकारिफा १११११।४) इति । ततो रमणादिकमपि सर्वे पुरुषोत्तमात्मकमित्याधय- प्राप्तिरिति भगवदीयविभावनीयम् । अथ आधुनिकानां पुष्टिमार्गीयाणां फलं लिख्यते । तम तदनन्तर सत्त्व की भी निवृत्ति हो जाने पर निर्माणावस्था की प्राप्ति होती है । निर्गुणावस्था की प्राप्ति हो जाने पर भगवद्रूपता मम्पादित हो जाने पर भक्त को भगवान् की नित्यलीला में प्रवेश मिलता है जिसे मुक्ति कहा जाता है, जैसाकि 'अन्यरूपों का परित्याग कर स्वरूप से अवस्थित होना मुक्ति है। (भाग० २।१०।६) इत्यादि वाक्यों से ज्ञात होता है । तब जीव का रमणादि सब कुछ पुरुषोत्तमात्मक ही होता है और उसे आश्रय की प्राप्ति हो जाती है, ऐसा भगवदीयों को समझना चाहिए। अब आधुनिक पुष्टिमार्गियों के प्राप्य फल का निरूपण करते हैं। १. "मुक्ति लायति, हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः' इति । अन्यथारूपं तत्त्वरूपं तस्य परित्यागः स्वरूपमेकम् | अवस्था द्विविधा सामान्यविशेषभेदेन ('सामान्यावस्था देयोसम्पद्रूपा, विशेषावस्था मर्यादारूपा पुष्टिरूपा च, तेन इत्यर्थः ।'--प्रकाशः)। उभयत्र लक्षणं मिलितम् ('अवस्थाद्वये मुक्तिलक्षणमविशिष्टमित्यर्थः ।-प्रकाशः ) । ('ननु विशेषावस्थायामहन्तादिसद्भावस्यव दर्शनाटकथं लक्षणसमन्वय इत्यत आहुः, तत्रापि इत्यादि ।'-प्रकाशः)। तत्रापि ( 'तत्रापति पुष्टयवस्थायाम्'- '-प्रकाशः) पूर्व तत्त्वपरित्यागः । ('पञ्चविंशतितत्त्वपक्षे. ऽध्यायसंख्या न युज्यत इत्यतः सवपान्तरमाड:-प्रकाशः) तत्त्वान्यष्टा- विंशतिः । एवमेनिशद्भेदा भवन्ति ।" (सुबोधिनी २०१०१६)। "निष्प्रपञ्चाना स्वल्पलामो मुक्तिः । ( सुबोधिनी २११०१)।
. सप्तमोऽध्यायः] पुष्टिमार्गीयफलविवेकः श्रीमद्भागवते द्विधा योधोऽस्तीति शेयम् । तत्रैको वाचनिको द्वितीय आर्थिक आध्यात्मिकशब्दवाच्यः। तत्र वाचनिको हि शान्द्योधः मर्यादया जायते । द्वितीयस्तु लीलातात्पर्यादि. शानानन्तरं ज्ञानविशेषाजन्यते । तत्राद्यो यथा, 'महं भक्त- पराधीनः' (माग० ९।४।६३) इति नवमस्कन्धे भगवद्वाफ्य- श्रवणाद् भगवान् भक्ताधीन इत्यवगत्यात्मकः, द्वितीयस्तु 'गोपीमिः स्तोभितोऽनृत्यद्भगवान्" (भाग० १०१११७) इति वाफ्यात् ताशलीलायास्तात्पर्यज्ञानानन्तरं पुष्टिभक्तिपरवशत्वं भगवतो निर्धार्यते, तप शेयः। यथा या 'योपित्सङ्गापथा पुंसः' श्रीमद्भागवत में वाचनिक अर्थात् शाब्दिक और आर्थिक-जिसे आध्या- मिक शब्द से अभिहित किया गया है-भेद से, दो प्रकार से जान का निरूपण किया गया है, ऐसा समझना चाहिए । इनमें से प्रथम शान्दबोध अर्यात् याचनिक बोध (शब्दों की) मर्यादा से उत्पन्न होता है तथा दूसरा अर्थात् आर्थिक भगवान् की लीला के तात्पर्य आदि के ज्ञान के बाद उस शानविदोष से उत्पन्न होता है । उदाहरणार्थ नवमरकन्ध में भगवान् के 'मैं भक्तों के वश में हूँ' (भाग० ९।४।६३) इत्यादि वाक्यों को सुनने ' से भगवान् के भक्तों के अधीन होने का जो ज्ञान होता है वह वाचनिक योध है तथा 'भगवान् कमी-कमी गोपियों के फुसलाने से नाचने लगते थे (भाग० १०।११७) इत्यादि पाक्यों से भगवान् की नृत्यलीला के तात्पर्य का शान हो जाने पर भगवान् के पुष्टिमच्चों के अधीन होने का जो निधय या शान होता है वह आर्थिक या आध्यात्मिक बोध है। इसी प्रकार स्त्रियों के सहसे और स्त्रीराड़ियों के सङ्ग से पुरष को जैसा १. "नृत्यं कुरु भगवन् लहडकानि दास्यामि' इत्युक्तो नृत्यति । तापि स्तोभितः, 'कृष्ण एव सम्यड़ नृत्यं जानाति पतुं न रामः' इत्युक्तः, स्तोमा गून्यप्रसंसा यथा स्तोमातराणि मममेति, तपा गोपोमिा मया- पक्षित् स्तुतोऽनृत्यन् नृत्यं करोति, लह लइ ।" (सुबो० १०॥११॥७) ।
१७६ प्रमेयरलार्णवे [पूर्वा (भाग० ११.३०) इति बाचनिकः, 'वाचं दुहितरं तन्वी स्वयम्भूहरती मनः' (भाग० २०१२।२८) इत्यत्रार्थिकः। एवं सर्वत्रोह्यम् । सोऽयं सुबोधिनीनिबन्धादावाध्यात्मिकः पक्षा तचल्लोलामसङ्गे साधितोऽस्ति । एवं सति आधुनिकपुष्टिस्थानां कथं प्राप्तिरिति जिशासा- याम्, 'एवं धर्मनुष्याणासुद्धवात्मनिवेदिनाम् (भाग० १२१९।२४) इत्यादिभिःप्रकारलाभेऽपि, 'मा च योऽन्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान् समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते ।। (गोता १४।२६) नत्यादिवाक्यनैर्गुण्यावस्थानन्तरं फलप्राप्तिरित्याधाकारक- क्लेश और बन्धन होता है वैसा किसी अन्य फेसन से नहीं' (भाग. ११।१४।३०) इत्यादि वाक्यों से होने याला ज्ञान वाचनिक है और 'यशा अपनी मनोहारिणी कोमलाही दुहिता सरस्वती को देखकर कामा- भिभूत हो गये' (भाग० ३।१२।२८) इत्यादि वाक्यों ( में निरूपित कथानक के शान) से होने वाला वोध आर्थिक है। इसी तरह अन्य सभी स्थलों पर भी वाचनिक और आर्थिक भेदसै द्विविध बोध की कल्पना कर लेनी चाहिए। इस आर्थिक या आध्यात्मिक पक्ष की सिद्धि विभिन्न लीलाओं के निरूपण के प्रसङ्ग में श्रीवल्लभाचार्य ने अपनी सुबोधिनी टीका और तत्त्वार्थदीपनिबन्ध आदि कृतियों में की है। ऐसी स्थिति में, आधुनिक पुष्टिमार्गियों को फल की प्राप्ति कैसे होगी, इस प्रकार की जिज्ञासा के उत्तर में यही कहना है कि, 'हे उद्धव! इन उपर्युक्त धर्मों का पालन करते हुए मेरे प्रति भात्मसमर्पण कर देने वालों को मुझम भक्ति हो जाती है (भाग ११११९।२४) इत्यादि वाक्यों से उनकी पलमाप्ति के प्रकार का ज्ञान हो जाता है, तथा 'जो मक्त एकान्तनिष्ठ होकर मक्तियोग से मेरी उपासना करते है वे सत्त्वादि गुणों को पार कर ग्रझमाव की योग्यता प्राप्त कर लेते हैं। (गीता १४१२६) इत्यादि वाक्यों से नैगुण्य की अवस्था का सम्पादन सप्तमोऽध्यायः] पुष्टिमार्गीयफलविवेकः १७७ सिद्धान्तसिद्धावपिनैर्गुण्यानन्तरंफलमित्यार्थिकोऽपि सिद्धान्तः सम्पद्यते । सोऽयं भागवतमूलकयोः सुबोधिनोनिवन्धयोर्वर्तत इति, ततो बौधसौकर्यायोद्धृत्य लिख्यते । तत्र येषु जीवेषु भगवता पारमार्थिकफलविशेषसाधनार्थ- मलौकिकानुग्रहविशेषेण पुटिभक्तिर्वीजरूपा स्थापितास्ति ते पुष्टिमार्गायाः । तेषां साधनैः फलं भविष्यतोति प्रकारो निर्धार्यते । तत्र, 'त्रैगुण्यः सर्व एव हि" (भाग० १२।२५।३०) इति भगवद्वाफ्यात् ते मायाकार्यतामसादिगुणैाप्ताः सन्ति । यद्यपि सर्वेषु त्रयो गुणाः सन्ति तथापि 'प्राधान्येन व्यपदेशा हो जाने के बाद ही फल की प्राप्ति होती है। इस सिद्धान्त की सिद्धि हो जाती है, तथापि इस पाचनिक बोध के साथ ही, 'फलप्राप्ति नैर्गुण्य सम्पादन के बाद होती है। इस सिद्धान्त का आर्थिक या आध्यात्मिक बोध भी होता है । यह आर्थिक या आध्यात्मिक योध श्रीवल्लभाचार्य के भागवतमूलक दो विशिष्ट ग्रन्यों सुबोधिनीटीका और तत्वार्थदीप निबन्ध में निरूपित मिलता है अतः जिज्ञासुओं के बोधसोकर्य के लिये हम उसे वहाँ से उद्धृत कर यहाँ प्रतिपादित कर रहे हैं। भगवान् ने एक विशेष पारमार्थिक फल की प्राप्ति कराने के उद्देश्य से, विशेष प्रकार का अलौकिक अनुग्रह कर जिन जीवों में प्रारम्भ में ही बीजरूप पुष्टिमक्ति की स्थापना कर दी थी वे ही पुष्टिमार्गीय होते हैं । उनको साधनों के द्वारा फल की प्राप्ति होगी, वह किस प्रकार होगी यह बताते हैं । जैसाकि भगवान् के 'समी त्रिगुणात्मक है' (भाग. ११:२५:३०) इत्यादि वाक्यों से ज्ञात होता है उपर्युक्त पुष्टिमार्गीय जीव भी माया के कार्यरूप तामसत्व आदि से व्याप्त हैं । यद्यपि सभी जीवों में १. द्रव्यं देशः फलं कालो जाम कर्म च कारकः । श्रद्धावस्थाकृतिनिष्ठा गुण्यः सर्व एव हि ॥ (भाग० ११।२५।३०)। २. देखिये, कपर पृष्ठ ३७, १२२-१२३ ।
१७८ प्रमेयरत्नार्णवे [पूर्वाद्ध भयन्ति' इति न्यायेन यस्मिन् यस्य गुणस्याधिक्यं स तेन गुणेन व्यपदिश्यते । तत्र सात्त्विकाना सेवाथयणादिसाधनैः शीघ्र प्रेमोत्पत्तिः। अत एवोक्तं निवन्धे, 'सात्त्विका भगवद्भक्ता ये मुक्तावधिकारिणः ।' (शास्त्रार्थप्र० का०२) इति, निवन्धीय- सेवाप्रकरणे 'सात्त्विकानुपदिशति' (सर्वनिर्णयप्र० प्र० २२४ आमासे) इति च । अतस्ते प्रथमाधिकारिणः, शिष्टी मध्यम- होनौ । अत एव भक्तिस्कन्धीयभक्तपु होनमध्यमोत्तमाः सर्वेऽपि कथिताः। 'पुंसामीशकथाः प्रोक्ता हरेश्वास्यानुरर्तिनाम् ।' (भाग० सत्त्यादि समी अर्थात् तीनों गुण पाये जाते हैं तथापि 'व्यपदेश या अभि- धान प्रधानता के आधार पर किया जाता है' इस न्याय से जिस जीव में सत्यादि जिस गुण का आधिक्य होता है उसका साविक आदि अभिधान उसी गुण के नाम से सम्बद्ध कर के किया जाता है । इस प्रकार साच्चिक कहे जाने वाले अर्थात् सत्यप्रधान जीवों में भगवत्सेवा और भगवत्कथा- श्रवण आदि साधनों से शीन ही भगवत्प्रेम उत्पन्न हो जाता है। इसी- लिये श्रीवल्लभाचार्य ने तत्त्वार्थदीपनिबन्ध के शास्त्रार्थप्रकरण म 'साविक भगवद्भक्त जो मुक्ति के अधिकारी है' (शास्त्रार्थन० का०२) इत्यादि तथा सर्वनिर्णयप्रकरण में 'साविक भक्तों को उनके कर्तव्य का निर्देश करते हैं (सर्वनिर्णयप्र० प्र० २२४ ) इत्यादि कहा है। अतः सात्त्विक भगवद्भक्त प्रथम कोटि के अर्थात् उत्तम अधिकारी हैं और शेष मध्यम एव हीन अधिकारी । इसीलिये भक्तिस्कन्ध के भक्तों में हीन, मध्यम १. भागवत का पाठ अधोलिखित है, अवतारानुचरित हरेश्वास्यानुवर्तिनाम् । पुसामीशकथा प्रोक्ता नानाख्यानोपवृहिता ॥ (भाग० २।१०।५)। देखिये, सुबोधिनी २०१०५ । २ द्रष्टव्य, तत्त्वार्थदीपनिवन्ध. पृष्ठ ९ ।
सप्तमोऽध्याय.] पुष्टिमार्गीयफलविवेक: १७२ २२१०५) इत्यनेन सामान्यतः सर्वेषां भक्तत्वं सूचितम् अधुना तु कलिकालदोपान्मोहलोभादियुतास्तामसा राजसा वहवः सन्ति । ते हि पूर्वस्थापितस्य पुष्टिभक्तिवीजस्य अनश्वर- त्वेन सत्वाद् भगवत्परिचर्यादि कुर्वाणा अपि दोपप्रावल्याद् न प्रेमलक्षणां भक्ति लभन्ते, प्रतिवन्धकाभावस्य सर्वत्र कारण- त्वात् । तेपाम् , 'आदरः परिचर्यायाम्' (भाग० ११।१९।२१) इत्यादि भगवदुक्तसेवाश्रवणादिसाधनैर्वीजदार्य सति सेवयव क्रमेण तमोरजःसत्त्वानि निवर्तन्ते, "मा च योऽव्यभिचारेण भक्ति योगेन सेवते' (गीता १४।२६) इत्यादि वाफ्यात् । तदेतद् और उत्तम सभी कोटि के भक्तों का उल्लेख किया गया है। 'भगवान् के विभिन्न अवतारों तथा भगवान् के अनुवर्वी भक्तों के चरित्र 'ईशकथा' कह जाते है। (भाग० २११०१५) इत्यादि वाक्यों से सामान्यतः सभी का भक्त होना सूचित होता है | आजकल कलियुग के दोषों के कारण मोह, लोभ आदि से युक्त तामस और राजस जीवों की संख्या बहुत अधिक हो गयी है। भगवान द्वारा जीवों में पहले से ही स्थापित पुष्टि- भक्ति का बीज अविनश्वर होने के कारण उनमें भी विद्यमान है अतः भगवान् की परिचर्या आदि करते हैं किन्तु दोपी के प्रबल होने के कारण उन्हें प्रेमलक्षणा भक्ति की प्राप्ति नहीं हो पाती क्योंकि प्रतिबन्धक के अभाव की कारणता सर्वत्र स्वीकार की गयी भगवान् के 'मेरी परिचर्या में पादर अर्थात् मेरी सेवा-पूजा में मेम रखे' (भाग० ११११९।२१) इत्यादि वाक्यों में कहे गये भगयत्सेवा, भगवरकथाश्रवण आदि साधनों के द्वारा उपर्युक्त बीज के दृढ़ हो जाने पर सेवा के द्वारा ही उन जीवों के भी तमस् , रजम् और सत्व गुणों की क्रमशः निवृत्ति हो जाती है । इस कथन की पुष्टि भगवान् एकान्तनिष्ठ होकर मतियोगसे मेरी सवा करता है" (गीता १४/२६) इत्यादि वाक्यों से होती है। इस सिद्धान्त की सूचना गोकुलवासियों के - १८० प्रमेयरलाणवे [पूर्ति गोकुलस्थानां प्रसझे सूचितं च, यतस्तेषां पूर्व तमो निवृत्तम्, पश्चाद्जासत्त्वे। 'इतोऽपि चेरिर्गच्छेन्नीत्वा सर्वस्य तामसम् । राजसास्ते भविष्यन्ति गोकुलस्था न संशयः ॥ उभये च ततस्त्वमे सात्विकास्त्वगुणास्ततः। प्रयोऽपि सम्भविष्यन्ति मुक्ती तेषां निरूपणम् ।। (भागवतार्थम० का० १०११२६ १२७)। 'इतोऽपि चेद्' इत्यादि । ननु तामसप्रकरणीयलीलासमाप्ति- पर्यन्तं गोफुलस्थानां तामसत्वं स्थितमेव पवाद्गधन्मथुरा• मसत में भागवत और उसकी सुबोधिनीटीका में भी मिलती है क्योंकि वहाँ पहले गोकुल के (गोपिकादि) भक्तों के तामसत्व के निवृत्त होने का निरूपण हुआ है तदनन्तर राजसत्व और सात्त्विकत्व की निवृत्ति का। तत्त्वार्थदीपनिबन्ध में श्रीवल्लभाचार्य लिखते हैं कि 'यदि भगवान् प्रज से समी गोकुख्यासियों के सामसत्व को लेकर ( अर्थात् अपहृत कर, मथुरा चले) जायें तो समी गोकुलवासी राजस हो जायेंगे इसमें सन्देश नहीं है। उसके बाद दोनों (अर्थात् तामस और राजस, गोकुलवासी और मधुरावासी भक्त) सात्त्विक हो जायेंगे और वदनन्तर तीनों (अर्थात् तामस, राजस और सात्त्विक भक्त) निर्गुण हो जायेंगे। इन सब का निरूपण मुक्ति के लिये किया गया है।" (भागवतार्थप्र० का. १०1१२६-१२७)। 'इतोऽपि चेन्' इत्यादि पदों से प्रारम्भ होने वाली तत्यार्थदीपनिबन्ध की ऊपर उद्धृत की गयी कारिकाओं का तात्पर्य स्पष्ट करते हैं। तामस प्रकरण की लीला की समाप्ति होने तक गोकुलवासियों का तामसत्व तो बना ही रहता है और उसके बाद भगवान् के मथुरा चले जाने के बाद १. द्रष्टव्य, भागवतार्थप्र० योजना १०११२५-१२७ ।
सप्तमोऽध्यायः] पुष्टिमार्गीयफलविवेकः १८१ गमनानन्तरं लीलानां वाहतस्तिरोभावाच्छास्त्रीयसाधनानां च गोकुलस्थेऽभावात् कथं तामसभावनिवृत्तिः इत्याशङ्कय तन्नि वृत्तिप्रकारमाहुः, 'इतोऽपि चेद' इत्यादिना । अयमर्थः, यद्यपीह भक्तिशास्त्रीयमर्यादाविचारे तामसत्वनिवृत्तौ न किञ्चित् कारणम् , कारणाभावेऽपि यदि कार्योत्पत्तिस्तदा सर्वमयां- दोच्छेदः स्यात्, तथापि हरिश्चेत्तामसत्वं स्वयं गृहीत्वा गच्छेत् तदा शास्त्रीयमर्यादाया दुर्वलत्वात् तामसत्वं गच्छत्येव । अतः प्रमेययलस्यैव मुख्यत्वम् , न प्रमाणवलस्येति प्रमेयवलेन राजसास्ते भविष्यन्ति । अस्मिन्नर्थे संशयो नास्ति । अतो न गोकुल में होने वाली लीलाओं का हिदृष्टि से तिरोभाव हो जाता है फिर पलपाति के शास्त्रीय साधनों से विरहित गोकुलवासी भक्तों के तामसभाव की निवृत्ति किस प्रकार होती है ?" इस आशङ्का का समाधान करते हुए 'इतोऽपि चेद्' इत्यादि पदों से प्रारम्भ होने वाली कारिकाओं से गोकुलवासियों के तामसत्त्व की निवृत्ति का प्रकार बताते हैं । उपर्युक्त कारिकाओं का अभिप्राय यह है । यद्यपि भक्तिशास्त्र की मर्यादा की दृष्टि से विचार करने पर प्रकृत स्थल पर तापसत्व की निवृत्ति का कोई कारण उपलब्ध नहीं होता और कारण के अभाव में भी कार्य की उत्पत्ति स्वीकार करने से (विचार के नियों की) सारी मर्यादाओं के उच्छेद का अनिष्टप्रसङ्ग उपस्थित होगा, तथापि स्वय भगवान् के गोकुलवासियों के तामसत्य को लेकर (अर्थात् अपहृत कर, मथुरा) चले जाने की बात स्वीकार कर लेने पर, शास्त्रीय मर्यादा के (प्रमेयबल की अपेक्षा) दुर्घल होने के कारण, गोकुलवासियों के तामसत्य की निवृत्ति की व्याख्या हो जाती है। अत: तामसत्वकी निवृत्ति में भी प्राधान्य प्रमेयनल का ही है, प्रमाणनल का नहीं । प्रमेयवल के प्रमुख होने के कारण गोकुलवासी गोपिकादि मक्त उस प्रमेयवल से (तामसत्व से छुटकारा पावर) राजम हो पायेंगे यह मानने में सन्देह के लिये किश्चिमात्र भी १८२ प्रमेयरलार्णवे -[पूर्ण फश्चिद् विरोधा,न या मर्यादाभन्दः,प्रमाणवलविचार तथात्वेऽपि प्रमेयवलविचारेण समाधानादिति कारिकार्थः फलितः। यद्यपि लीलासृष्टिस्थभक्तास्तु, 'यो नन्दः परमानन्दो यशोदामुक्तिरूपिणी' (कृष्णोप०३), 'गोप्यो गाव प्रचस्तस्य' (कृष्णोप०८) इत्या- दिभिः कृष्णोपनिषत्स्वतिश्लाधितस्वरूपाः प्रापश्चिकविलक्षणाः तथाप्यंशविशेपे दृष्टान्तीकरणान्न दोषः । न च 'पुष्टिभ निर्गुणत्वात्तद्वतो राजसत्वं तामसत्त्वं च न सम्भवतीति' वाच्यम्, वृत्रे तामसर सत्वदर्शनात्, 'रजस्तमः- स्वभावस्य वान वृत्रस्य पाप्मनः" (भाग०६।१४।१) इतिवाक्यात, अवकाश नहीं है। अतः उपर्युक्त कारिका का अभिप्राय यह हुआ कि गोकुलवासियों के तामसत्त्व की निवृत्ति मानने में न तो कोई विरोध ही ही है और न मर्यादाभगकी ही आशङ्का है क्योकि यद्यपि प्रमाणबल तामसत्व की निवृत्ति मानने पर विरोध और मर्यादाभङ्ग का प्रसङ्ग उपस्थित होता है तथापि प्रमेयरल से तामसत्व की निवृत्ति मानने पर विरोध और मर्यादामन की आशङ्का दूर हो जाती है। यद्यपि लीला में लिये की गयी सृष्टि में अवस्थित भक्तों को प्रापचिक जीवों से विलक्षण बताते हुए कृष्णोपनिषद् में 'नन्द परमानन्दरूप है और यशोदा मुक्ति- रूपिणी है' (कृष्णोप० ३), तया 'गोपियाँ और गायें श्रुतिस्वरूप है' (कृष्णोप० ८) इत्यादि वाक्यों में उनके स्वरूप की अत्यधिक प्रशसा की गयी है फिर भी तामसत्य के निरूपण के लिये उनको दृष्टान्तरूप में स्वीकार करने में कोई दोष नहीं है क्योंकि अशविशेष की दृष्टि में ही दृष्टान्त देना अभिप्रेत है यह कहना भी ठीक न होगा कि पुष्टिभक्तिके निर्गुण होनेके कारण पुष्टिभक्तियुक्त जीवोंका राजसत्व और तामसत्व सम्भव या उपपन्न नही है क्योकि 'हे ब्रह्मन् । पापाचार के योग्य आसुर देह धारण करने वाले ११. "भक्त्यसम्भवे हेतुमाह, 'पाप्मन.' इति पापाचारयोग्यगृहीतासुर सप्तमोऽध्यायः] पुष्टिमार्गीयफलविवेकः 'अजातपक्षा इव मातर खगाः' (भाग० छा२६) इत्यादिवाक्यः वृत्रस्य पुष्टिभक्तत्वनिर्धारात् । अतो भनिर्गुणत्वेऽपि भक्तानां सगुणत्वमस्त्येव । अभिसन्धाय यो हिंसाम्" (भाग० ३२२९।८) इत्यादिवास्यस्तादृक्कामजन्याया एव भक्तः सगुणत्वम् , न त्यस्याः । अत इयं भक्तिनिर्गुणैय । भक्तानां तु प्रैविध्यं घर्तत एव। और इसीलिये रजागुणी एवं तमोगुणी स्वभाव वाले वृन्न की भगवान् नारायणमें दृढ़ भक्ति किस प्रकार हो गयी १' (भाग० ६।१४११) इत्यादि वाक्योंसे पत्र में तामसत्व के होने का बोध होता है और साथ ही जिस . प्रकार पक्षिशावक-जिनके ममी पर भी नहीं निकले होते है-अपनी माताओं को देखने के लिये समुत्सुक होकर उनकी बाट जोहते रहते हैं। ( भाग० ६।११।२६ ) इत्यादि याक्यों से उसके पुष्टिभक्त होने का भी निश्चय होता है । अतः भक्ति के निर्गुण होते हुए भी भक्तों के सगुण होने की बात उपपन्न है । 'जो भेददर्शी क्रोधी पुरुष शत्रुओं की हिंसा के उद्देश्य से • मेरी भक्ति करता है यह मेरा तामस भक्त है। (भाग० ३।२९।८ ) इत्यादि वाक्योसे उस प्रकार की अर्थात् शा की हिसा आदि की कामनाओं से की जाने वाली भक्ति के ही सगुण होने की सिद्धि होती है, पुष्टिभक्ति के सगुण होने की नहीं । अतः पुष्टिभत्ति तो निर्गुण ही है । पुष्ट्रिभक्तों के तामस, राजस और सात्त्विक के भेद से देहस्य अत एव रजस्तमःस्वभावस्य इति।" (भाग० ६।१४१ की बालप्रबोधिनी)। १. 'अभिमन्याय यो हिंसा दम्भ मात्सर्यमेव वा । संरम्भी भिन्नदग भावं मयि कुर्यात्य सामसः ॥ (भाग० ३।२९१८) 'शा हिंसाम् उद्दिश्य यः तु मयि भावं भक्ति पुर्यात् स नामस. तामसो भवति ।' (सुबोधिनी ३३२९२८)। देखिये, भाग० ३।२९४८ को बालप्रबोधिनी।
१८४ प्रमेयरत्नार्णवे [पूर्वाद्ध मत पर आधुनिकानां पुष्टिभकानां साधनसापेक्षरवादित सेवाश्रवणादिप्रकार तामसादिगुणनिवृत्तिप्रकार आध्यात्मिकरीत्या निरूप्यते। तथाहि, यथा लोलासृष्टौ तामस- प्रकरणारम्भे प्रथमाध्याये भगवदाविर्भावोत्सवस्तयेहापिसाघ- कस्य श्रीमूर्तराविर्भावोत्सवः। अत एव निबन्धे सेवाप्रकरणे, 'एनमुद्धरिष्यामीति तदा मृदादेः मादुर्भूत' (सर्वनिर्णयप्र० प्र० २२८) इत्युक्तम् । मूर्तिरूपेण प्रभोराविर्भाव एव अगीकृतस्तथा अत्रा यथा, 'नेह स्थैर्य बहुतिर्थ सन्त्युत्पाताश्च गोकुले' (भाग० त्रिविध होने का सिद्धान्त तो स्वीकार किया ही जा चुका है। अतः आधुनिक पुष्टिभक्तों को साधन की अपेक्षा होने के कारण अब हम यहाँ से प्रारम्भ कर इस अध्याय अन्त तक आध्यात्मिक रीति अथवा उपर्युक्त आर्थिक बोध की रीति से भगवत्सेवा, भगवत्कथा- श्रवण और तामसत्यादि की निवृत्ति के प्रकार का निरूपण करेंगे। जिस प्रकार भागवत के तामस प्रकरण के प्रारम्भ में प्रथम अध्याय (भाग० १०५) में लीला के लिये की गयी सृष्टि में भगवान् के जन्मोत्सव के मनाये जाने का वर्णन है उसी प्रकार आधुनिक पुष्टिमार्गीय साधक को भी भगवान् के स्वरूप या श्रीविग्रह के आविर्भाव का उत्सव मनाना चाहिये। इसीलिये श्रीवल्लभाचार्य ने तत्त्वार्थदीपनिबन्ध के सर्व- निर्णयप्रकरण के सेवाप्रकरण में कहा है कि "जय भगवान् 'इस जीव का उद्धार करूँगा' इस प्रकार का सकल्प करते हैं तो मृदादि से प्रादुर्भूत होते है" (सर्वनिर्णयप्र०प्र०२२८)। जिस प्रकार वहाँ कृष्णमूर्ति के रूप में प्रभु का आविर्भाव ही स्वीकार किया गया है उसी प्रकार आधुनिक पुष्टिमागियों को भी भगवन्मूर्ति में प्रभु का आविर्भाव ही स्वीकार करना चाहिए। जिस प्रकार वहाँ नन्द को वसुदेव के 'अब आप को यहाँ (मथुरा मैं) अधिक दिन नही रुकना चाहिये क्योंकि गोकुल में अनेक उत्पात हो सप्तमोऽध्यायः पुष्टिमार्गीयफलविवेकः २०५।३१ ) इत्यनेन प्रादुर्भूतभगवरसुखानुभवप्रतिवन्धकशाने वसुदेवस्य कारणता एवमत्रापि गुरोः सकाशाद् भक्तिमार्ग- प्रतिवन्धककानम् । ततः पूतनामरणम् , साचाविद्यारूपा, 'अविद्या पूतना नष्टा' (सुबोधिनीका० १०६।१४।१) इति वाफ्यात् । न च 'पूनना- चकादीनामविद्यादम्भादिरूपत्वे मानाभाव इति' वाच्यम् , 'लोभनाधादयो दैत्या' (कृष्णोप० ९) इति कृष्णोपनिपत्सु सर्वेषां दैत्यानां परिदृश्यमानस्वरूपातिरिक्तलोभादिरूपत्वेन प्रतिपादनात् । 'लोभकोधादयो दैत्या' (कृष्णोप० ९) इत्यन 'आदि' शब्देन सापां सङ्ग्रहात् । एतदुपनिपन्मूलिकैव धेनु- रहे है' (भाग १०१५।३१) इत्यादि वाक्यों से, प्रादुर्भूत हुए भगवान् के मुख के अनुभव के प्रतिबन्धक विघ्न का ज्ञान होने का उल्लेस है उसी प्रकार आधुनिक पुष्टिमार्गियों को गुरु से भक्तिमार्ग के प्रतिबन्धक विघ्नों का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए । तदनन्तर ( भाग० १०१६ में) पूतना की मृत्यु का निरूपण मिलता है। जैसा कि श्रीवल्लभाचार्य के विद्यारूपी पूतना नष्ट हो गयी' (मुबोधिनीका० १०।६।१४।१) इत्यादि वाक्यों से गात होता है पूतना अविद्यारूप है ' (अर्थात् पूतना अविद्या की प्रतीक या अविद्या का नामान्तर है)। पहना ठीक न होगा कि 'पूतना, वकामुर आदि को अविद्या, दम्भ आदि का प्रतीक या मूर्तरूप मानने के लिये कोई प्रमाण नहीं है' क्योंकि कृष्णोपनिषद् के 'लोम, फ्रोध आदि दैत्य' (कृष्णोर०९) इत्यादि वाक्यों में सभी दैत्यों के परिदृश्यमान स्वरूपों के अतिरिक्त लोभादिरूप होने का भी प्रतिपादन उपलब्ध होता है । 'लोम, ग्रोध भादि दैत्य' (कृष्णोप०९) इस पाक्य में प्रयुक्त 'भादि' शब्द से सभी १. 'अविद्या हि पापर्वा सा नाशिता, सकटः संसारारमको मतिः, अविधाकार्यरूपो मोहारमका तृणावर्तोमारितः।' (सुबोधिनी १०८१६)।
प्रमेयरलार्णवे. [पूर्वाद्ध कादी देहाध्यासत्वाद्यक्तिः सुयोधिन्याम्' इति शेयम् । एवं सति तत्र अविद्यारूपा पूतना नाशिता तथेहापि भगवद्वहि- मुखत्यसम्पादिका अविद्या सेव्यमानेन प्रभुणा नाश्यते', 'स- दिष्ट्वादिपुरुषम्' (भाग० ६१८६६) इति वाफ्यात् । तत्र यथा वसुदेवमुखादुत्पातश्रवणे, तनिवृत्त्यर्थे श्रीनन्देन 'हरि जगाम शरणम्' (भाग० १०६) इति वाक्यात् शरणा- दैत्यों का ग्रहण हो जाता है । सुबोधिनी में श्रीवल्लभाचार्य ने धेनुकासुर आदि को देहाध्यास आदि का प्रतीक या मूर्तरूप कहा है। उनके इस कथन का मूल आधार उपर्युक्त कृष्णोपनिषद् के वास्य ही हैं, ऐसा ममझना चाहिए । इस प्रकार पूतना के अविद्यारूप होने में कोई अनुप- पत्ति नहीं है और जिस प्रकार लीलासृष्टि में भगवान् ने अविद्यारूपी पूतना का नाश किया था उसी प्रकार आधुनिक पुष्टिभक्तों द्वारा सेवित होने पर वे उन भक्तोंके बहिर्मुखत्व का सम्पादन करने वाली अविद्या का भी नाश अवश्य ही कर देंगे, इस बात की पुष्टि भागवत के 'एक पार मी मगवान् नारायण की उपासना या पूजा करके' (भाग ६।१८।६६) इत्यादि वाक्यों से होती है। जिस प्रकार वसुदेव के मुख से गोकुल में उत्पात हो रहे होने की बात सुनकर, उन उत्सातों की निवृत्ति के लिये नन्द ने भगवान् की शरण ग्रहण की थी, जिसका ज्ञान 'मगवान् हरि की शरण में गये' (भाग' १०।६।१ ) इत्यादि वाक्यों से होता है,उसी प्रकार आधुनिक पुष्टिमार्गीय १. 'प्रथमं द्वादशोऽध्याये देहाध्यासो हि धेनुकः।। तद्वषो ज्ञानपूर्वो हि फलावधि निरूप्यते । कालीय इन्द्रियाण्याहुः विषयाः तद्विषं मतम् ।। ( सुबोधिनीका० १०.१५/१।४-५)। २. 'पञ्चपर्वामविद्या हि लोकानामपि नाशयेत् ।' - .. " ( सर्वोधिनी १०.९१ आभासे का० ६)। - सप्तमोऽध्यायः] पुष्टिमार्गीयफलविवेकः गमनं कृतं तथेह साधकेन गुरुद्वारा भक्तिमार्गप्रतिवन्धकानि श्रुत्वा तनिवृत्तये हरिशरणागमनं कार्यम् । तदुक्तं निवन्धे, 'आधे तु भगवन्मार्गे बाघकानि बहूनि हि। द्वितीये तदभावो हि हरिणेव भवेदिति ।। (भागवतार्थप्र० का० १०५२-५३) । तत्र यथा पूर्व सञ्चितम्वासक्तिविषयीभूतभगवदनुपयुक्त- गृहरूपशकटस्य भक्तिरूपचरणेन उत्क्षेपणमेवं साधकस्यापि भगवदनुपयुक्तवस्तुसम्बन्धो निवर्तते । तृणावर्तो भगवत्सा- क्षात्कारप्रतिवन्धरूपो रजोगुणात्मा हतः । एवमस्यापि भजन- प्रतिवन्धरूपो रजोगुणो नश्यति । ततो यथा श्रीयशोदाया साधकों को गुस्से भक्तिमार्ग के प्रतियन्धों का ज्ञान प्राप्त कर उन भक्ति-प्रतिबन्धक विघ्नों की निवृत्ति के लिये भगवान हरि की शरण में जाना चाहिए । इसीलिये श्रीवल्लभाचार्य ने तत्त्वार्थदीपनिबन्ध के भाग- यतार्थप्रकरण में कहा है कि 'तामस प्रकरण के प्रथम अध्याय (भाग० १०५) में यह बताया गया है कि भगवन्मार्ग में अनेक याधायें आती है और द्वितीय अध्याय ( भाग १०६) में यह यताया गया है कि उन विघ्न-याधामों की निवृत्ति मगवान् कृष्ण (पी कृपा) से ही हो सकती है' (भागवतार्यप्र० का० १०५२-५३)। जिस प्रकार तामस प्रकरण के तृतीय अध्याय (भाग० ३०१७) मे अपनी चिरसञ्चित्त आसक्ति के विषयभूत और भगवान के लिए अनुपयुक्त- गृहरूप शकट के भक्तिरूप (भगवान् के) चरणों से उलट दिये जाने का निरूपण हुआ है उसी प्रकार आधुनिक पुष्टिमार्गीय साधक का भी (मचि से) भगवान् के लिए अनुपयुक्त पदायाले सम्बन्ध समात हो जाता है । लीलावृष्टि में भगवान् ने भगवत्माशासार में प्रतिबन्धारूर अर्थात् विघ्नभूत रजोगुणी तृणावर्त को मार डाला था (भाग० १०७) उसी प्रकार माधुनिक पुष्टिमार्गीय सापकों के मजन का प्रतिबन्धकरूप २८८ प्रमेयरलाणवे [पूर्वाद्ध विश्वरूपदर्शनेन महिमशापनम्, तथेहापि साधकस्य सेन्य- स्वरूपे स्वमादिद्वारा कश्चिदनुमावो शाप्यते। ततो गर्गण एकान्ते भगवन्नामान्युक्तानि । तत्र रूपगुण- लीलावैशिष्टयं निरूपितम् । 'यहूनि सन्ति नामानि रूपाणि च सुतस्य ते । गुणकर्मानुरूपाणि तान्यहं वेद नो जनाः ॥' (भाग० १०८।१५) इत्यनेन 'सन्ति' इति प्रयोगेण तेषां नामरूपगुणकर्मणां नित्यत्वं बोधितम् । तथा च सिद्धमेतत्, साधकेन भगवदीय. मुखाद् गुणलीलाविशिष्टानां नाम्नां दुःसावर्जनपूर्वकं स्वरूप रजोगुण भी (भगवान की कृपा से ) नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार वहाँ भगवान् ने यशोदा को विश्वरूप दर्शन करा कर अपनी महिमा ज्ञापित की थी उसी प्रकार वे आधुनिक पुष्टिमार्गीय साधक को भी स्वप्नादि द्वारा उसके सेव्यस्वरूप के माहात्म्य का बोध कराते है। तदनन्तर तामस प्रकरण के चतुर्थ अध्याय (भाग० १०८) में गर्ग के द्वारा एकान्त में भगवान के नाम बताने (नामकरण) का वर्णन हुआ है। यहां भगवान् के रूप, गुण और उनकी लीलाओं के वैशिष्य का निरूपण किया गया है तथा 'तुम्हारे पुन्न के ( अन्य भी) पहुत से नाम हैं एवं रूप मी अनेक है। इनके (औदार्यादि) गुणों तथा ( कालियदमनादि अलौकिक ) कर्मों के अनुरूप ही इनके अनेक नाम है (जो अलौकिक हैं)। उन नामों को मैं तो जानता हूँ पर साधारण लोग नहीं जानते" (भाग १०1८1१५) इस श्लोक में 'सन्ति' इस पद के प्रयोग द्वारा यह सूचित किया गया है कि भगवान् छे वे नाम, रूप, गुण और कर्म नित्य हैं। इससे यह सिद्ध हुआ कि जाधुनिक पुष्टिमार्गीय साधक को, दुर्जनों की सङ्गति छोड कर, किसी भगवदीय के मुख से गुणों और लीलाओं से विशिष्ट भगवन्नामों वे १, द्रष्टव्य, सुबोधिनी १०८१५ !
सप्तमोऽध्यायः] पुष्टिमार्गीयफलविवेकः १८९ श्रुत्वा तत्तलीलासंयुतस्वरूपगुणस्मरणपूर्वकं तन्नाम ग्राह्यम् , यथा 'गोवर्धनोद्धरणधीर' इति नामग्रहणे गोवर्धनोद्धरणात्मक- लीलाविशिष्टं वामकरकमलधृतगोवर्धनं श्रीकृष्णस्वरूपं हृद्या- नेयमिति । एतच्च नामकरणप्रसङ्गसुबोधिन्यां विवृतं श्रीमदा- चार्यचरणः। ततो जानुरिङ्गणलीलायाम् , 'दे जानुनी सुतलं विश्वमूते" (भाग० २।१।२७) इति वाक्याजानुनोः सुतलाधिदैविकत्वात्, स्वरूप को सुन कर (अर्थात् जान कर या समझ कर ), उन-उन (अर्थात् किन्हीं विशेष) लीलाओं से सम्बद्ध स्वरूप और गुणों का स्मरण करते हुए, उन (के स्मारक ) नामों का जप, भजन या कीर्तन करना चाहिए, उदाहरणार्थ 'गोवर्द्धनोद्धरणधीर' यह नाम लेने के समय साधक को हृदय में, गोवर्द्धन धारण करने की लीला से विशिष्ट, कमल- कोमल बायें हाथ पर गोवर्द्धन धारण किये हुए श्रीकृष्ण की भावना करनी चाहिए। इस बात को श्रीवल्लभाचार्य ने नामकरण प्रसङ्ग की सुबोधिनी (सुबोधिनी १०1८1१५) व्याख्या में विशद रूप से प्रतिपादित किया है। तदनन्तर घुटनों के बल चलने की लीला में, जैसा कि 'विश्वमूर्ति भगवान् के दोनों घुटने सुतल है' (भाग० २।१।२७) इत्यादि वाक्यों १. "सुतलं द्वे जानुनी । जानुनीपदेनव जानुद्वये प्राप्त पुनः द्वि'-पदं तस्प लोकस्य द्विरूपताजापनार्पम्, अत एवाने 'सुतलं शुद्धम्' इति वक्ष्यति । साधारणस्थानं स्वस्थितिस्थानञ्च । यत्र पलिस्तिष्धति तच्छुद्धम् । प्रत एव तस्य प्रदर्शितं विश्वरूपमनुस्मारयति, 'विश्वमूर्तेः' इति ।" (सुबोधिनी १।२७)। 'विश्व मृ? यस्य तस्य भगवतो वे जानुनो सुतलं गृणन्ति पदन्ति । (वालप्रबोधिनी २०२०)।
१६० प्रमेयरत्नार्णवे पूर्वाद्ध तत्र च दैत्यानां निवासाजानुभ्यां गमनेन गुप्ततयैवालौकिक- प्रकारेण दैत्यमर्दनमाचरितम् । तथेहापि सेव्यमानो भगवान् अनेकधा स्थितान् अज्ञातानपि वहनासुरमायान् दूरीकरोति । चौर्यादिप्रसङ्गे प्रजसुन्दरीभिर्भगवतो दोपेपु निवेदितेपु महिमशानाभावेऽपि केवलस्नेहान्माचरणैः न दोषा गृहीताः', 'न ह्युपालन्धुमैच्छत्' (भाग० १०८।३१ ) इति वाफ्यात् । एवमेव भगवदीयो शानरहितोऽपि भजनस्वभावान्न भगवति दोपं गृहाति। से ज्ञात होता है, घुटनों के सुतलाधिदैविक होने और टैत्यों के वहीं (सुतल मे) निवास करने के कारण, भगवान् ने घुटनों के बल चल कर गुभ रूप से ही अलौकिक प्रकार से दैत्यों का सहार किया। इसी प्रकार आधुनिक साधकों के द्वारा सेवित होने पर भगवान् विविध रूपों में स्थित उनके अनेक ऐसे आसुर भावों को दूर कर देते हैं जिनका उन साधकों को स्वय ज्ञान नहीं होता है। कृष्ण द्वारा ( माखन इत्यादि की) चोरी करने आदि के प्रसङ्ग मे नजाङ्गनाओं द्वाग यशोदा के पास जाकर उनकी शिकायत करने पर, जैसाकि 'यशोदा ने कृष्ण को उलाहना देने की इच्छा मा नहीं की अर्थात् वे उन्हे डांटने फटकारने की बात भी नहीं सोच सकीं' भाग० १०८३१) इत्यादि वाक्यों से ज्ञात होता है, माता यशोदा ने कृष्ण की महिमा का ज्ञान न होने पर भी केवल स्नेहवश ही उनके दोषों की उपेक्षा कर दी। इसी प्रकार भगवदीय जन ज्ञानविरहित होते हुए भी, भक्ति के कारण भगवान् (अथवा उनके चरिनों) में दोष- दर्शन नहीं करते, मक्तिस्वभाव होने के कारण उन्हें भगवान् में दोष दिखाई ही नहीं देते। १. 'इयं तु लोकिकन्यायेन प्राप्तमनोरया लौकिकमावदाढदेिव दीपान् म गृहीतवती म माहात्म्यज्ञानात् ।' (सुबोधिनी १०1८३१) । , सप्तमोऽध्यायः]] पुष्टिमार्गीयफल विवेकः ततो मृद्भक्षणप्रसङ्गे, 'नाहं भक्षितवानम्ब' (भाग० १०८३५) इत्यादिना सर्वसाधारणरीत्या प्रतीतोऽशनरूपो धर्मों मयि नास्ति, 'क्षुत् सलु चै मनुष्यस्य भ्रातृन्यः' इति श्रुतेर्भक्षणफारणी- भूतक्षुधो मनुष्यासाधारणधर्मत्वेन मय्यभाचादित्युक्तं हरिणा । तथा च क्षुधितः सन्नानाति, भक्तिपूर्वकं भक्तेन दत्तमश्नात्येव, 'पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ।। (गीता ९।२६) इति वाक्यात्' । अशनं चात्र भोगः, न तु भक्षणमानम् , पुष्पादीनां सङ्ग्रहात्। तथा च सर्वमेव वासोभूपणनगादि तदनन्तर मृत्तिकामक्षण के प्रसङ्ग (भाग० ३०1८) में कृष्ण ने 'माँ ! मैने (मिट्टी) नहीं पायी है' (भाग० १०८।३५) इत्यादि वाक्यों से यह सूचित किया है कि अगनादिम्प धर्म उनमें नहीं हैं, यद्यपि साधारण लोगों को ये धर्म उनमे प्रतीत होते हैं। 'क्षुधा का मनुष्य का मतीजा कहा गया है' इत्यादि ध्रुतिवाक्यों से क्षुधा-जो भक्षण या साने की हेनुभूत है के मनुष्य का असाधारण धर्म होने का शान होता है। अतः कृष्ण में उसका अमाव होना स्वाभाविक ही है, इसीलिये उनका 'मैंने नहीं खायी है' इत्यादि उपर्युक्त कथन उपपन्न है। इस प्रकार यह सोचना ठीक नहीं है कि मगवान् भूस लगने पर (भूत मिटाने के लिये) साते हैं, यद्यपि जैसाकि गीता के 'म मक्ति- पूर्वक समर्पित किये गये, संयमी पुरष के पन, पुष्प, फल और जल प्रत्येक (अर्थात् किसी भी) पदार्थ को स्वीकार कर उसका उपभोग करता हूँ' (गीता ९।२६) इत्यादि वाक्यों से ज्ञात होता है, यह सत्य है कि भगवान् भक्तों के द्वारा भक्तिपूर्वक समर्पित पदार्थों को मदण र उनका उपभोग करते हैं।। गीता के इस श्लोक में 'पुष्प' आदि के भी 'भशन' की बात कही गयी है अतः स्पष्ट है कि यहाँ 'भान' का १. द्रष्टव्य, सुबोधिनी १०८३३५ ।
१९२ प्रमेयरत्नाणवे [पूर्वाद्ध भक्त्या दत्तं स्वीकरोति । अत इमं प्रकारं युद्ध्या नैवेद्यादि भक्त्येव समर्पणीयमिति लभ्यते स्म । एतत्तु मृगक्षणप्रसा- टिप्पण्यां स्फुटम् । श्रीमातृचरणानां साधारणरीत्याशनधर्म प्रतीते मुखं व्या- दाय विश्वरूपं प्रदर्य सर्वसाधारणनिपिलधर्माभावो वोधितः। अग्रे तु 'यन्माययेत्यं कुमतिः स मे गतिः" (भाग० १०८४२) इति वाफ्यात्, स्नेहस्य सर्वथा तिरोधाने, वैष्णवी व्यतनो- अर्थ केवल 'मक्षण' करना नहीं प्रत्युत 'मोग' करना है। इस प्रकार ( उपर्युक्त गीतावाक्य का आशय यही है कि ) भगवान् भक्त द्वारा भक्तिपूर्वक समर्पित किये गये वस्त्र, आभूषण, माला आदि सभी पदार्थों को स्वीकार करते हैं । इससे यह ज्ञात होता है कि उपर्युक्त रहस्य को समझ कर भगवान् को नैवेद्य आदि सदैव भक्तिपूर्वक ही समर्पित करना चाहिए। यह बात मृत्तिकामक्षणप्रसन की सुबोधिनी की टिप्पणी में स्पष्ट की गयी है। जब माता यशोदा को कृष्ण के, साधारण रीति से, अन्य लौकिक जनों की ही भाँति, अशनादिधर्मयुक्त होने की प्रतीति हुई तो भगवान् ने अपना मुँह फैलाकर उन्हें विश्वरूप का दर्शन करा कर, अपने में सभी साधारण धर्मों-जो जनसाधारण में पाये जाते हैं के अभाव होने का बोध कराया । तदनन्तर जैसा कि, “यह मैं (यशोदा ) हूँ और ये मेरे पति हैं तथा यह मेरा पुन है, साथ ही मैं ब्रजराज की समस्त सम्पत्ति की स्वामिनी धर्मपत्नी हूँ; ये गोपियां, गोप और गोपन मेरे (अधीन ) हैं, जिनकी मापासे मुझे इस प्रकार की कुमति धेरै हुए है, वे भगवान् हो मेरे एकमात्र आश्रय है, मैं उन्हीं की शरण में हूँ" (भाग० १०1८४२) इत्यादि वाक्यों से शांत होता है, तत्त्वज्ञान हो जाने पर यशोदा का कृष्ण मै पुनमाव जाता रहा और उनके कृष्ण- १. द्रष्टव्य, सुबोधिनी १०८४२ । , सप्तमोऽध्यायः] पुष्टिमार्गीयफलविवेकः मायाम् (भाग० १०८।४३) इति वाक्यालीलास्थजीवनिया. मिकया वैष्णव्या मायया मोहयित्वा स्नेहं वर्धितवान् । एवमस्यापि सेव्यस्वरूपे लौकिकभावस्फूर्ती तन्निरारुतये भागवताद्यर्थविशेषस्फुरणेन महिमानं बोधयति । तत्राप्यत्यन्त- महिमस्फूर्ती स्नेहोपचारशैथिल्ये स्नेहिभक्तसङ्गादिना महो- विषयक पुत्रस्नेह का सर्वया तिरोधान हो गया, तब जैसा कि, 'भगवान् ने वैष्णवी माया का विस्तार (अर्थात् यशोदा के हृदय में सञ्चार) किया' (भाग० १०८।४३) इस वाक्य से शत होता है, भगवान् ने यशोदा को लीलास्थित जीवोंका नियमन करने वाली अपनी वैष्णवी माया से मोहित कर उनके कृष्णविषयक पुत्रस्नेह का संवर्धन किया। इस प्रकार साधक को सेव्य के स्वरूप में लौकिक भावों की प्रतीति होने लगती है तो उसके निराकरण के लिये भगवान् भागवत आदि के विशेप अर्थ के स्फुरण द्वारा उसे अपनी महिमा का बोध कराते हैं और जब इससे साधक के हृदय में भगवान् की इतनी अधिक महिमा स्फुरित होने लगती है कि वह स्नेहपूर्वक उनकी पूजा-अर्चा करने में शिथिल हो जाता है तो भगवान् कृपा कर उसे भगवत्प्रेमी भक्तों की सङ्गति आदि प्रदान कर स्नेहपूर्वक भगवदुपासना करने में उसकी श्रद्धा १. "एवं जाने जाते भक्तिसुखं न प्राप्स्यति इति भक्त्यानन्दस्य ब्रह्मा- नन्दापेक्षया महत्त्वाद् भक्तार्थ दव्या मायया मोहितवान् "वैष्णवीम् आधिदैविकी स्नेहसम्वन्धिनी निरोधोपयोगिनी विशेषेण अतनोद्, यावदात्मीयतमा परमस्नेहे रस उत्पद्यते न वावदोश्वरभावेन, मयज्ञानस्य स्नेहप्रतिबन्धकत्वाद् । अत्र च लौकिकत्वेऽपि प्रजारूपेण स्नेह उचितो नान्मथा इत्यनन्तविघासु मायासु प्रजास्नेहमयीम् एव व्यतनोत् । ननु विरोधिज्ञानस्य जातस्वात् कथं प्रजावुद्धिः भगवति भविष्यति इत्याशङ्कचाह विभुः इति, स हि सर्वसमर्थः एकस्मिन्नेव वस्तुनि कोटियाबुद्धधुत्पादन- समर्षः अन्यथा पूर्वविरुद्धधर्मा उत्तरन न भवेयुः।" (सुबोधिनी १०८४३)। १३ ......
१६४ प्रमेयरत्नाणवे [पूर्वाद्ध पचारश्रद्धां द्रढयति भगवान् । ततः, 'द्रोणो वसूना प्रवरः' (भाग० १०८४८) इत्यादि प्रश्नोत्तराभ्यां श्रीनन्दयशोदयोभक्ती महापुरुपकृपैव कारण- मिति' सिद्धान्तितम् । एवमिहापि थीमदाचार्यचरणश्रीविट्ट- लेश्वरकृपातो भक्तिर्भवतीति शेयम् । ततो मातृचरणानां दधिमन्थनावसरे भगवद्गुणगानम् , 'दधिनिर्मथने काले स्मरन्ती तान्यगायत ॥' (भाग १०।९।२) इतिवास्यात् । एवं साधकेनापि गुणगानादि कुर्वतैव व्यापृतिः को दृढ करते हैं। तदनन्तर परीक्षित् के प्रश्न (भाग० १०८।४६-४७) और उसके श्रीशुक के 'यसुप्रवर द्रोण' (भाग० १०१८४८) इत्यादि वाक्यों (भाग० १०८४८-५२) द्वारा दिये गये उत्तर से यह प्रतिपादित किया गया है कि नन्द और यशोदा को भगवान् की भक्ति की उपलब्धि महापुरुष की कृपा के कारण ही हुई थी। इसी प्रकार श्रीवल्लभाचार्य और विट्ठलनाथ की कृपा से भगवान् में भक्ति होती है ऐसा समझना चाहिए। तदनन्तर माता यशोदा द्वारा दधिमन्यन करते समय भगवान के गुणो का गान करने का निरूपण 'माता यशोदा दधिमन्थन के समय मगवान् को लीलाओं का स्मरण करती हुई उन्हें गाती जाती थी और दही मथती जाती थीं' (भाग० १०।९।२) इत्यादि वाक्यों में हुआ है । इसी प्रकार आधुनिक साधों को भी भगवान् का गुणगान करते हुए १. "एतस्या एतावत्त्वं कथ न तु अन्यासाम् इति शड्का परिहरन् महापुरुषकृपामाह सममिः । 'नन्दः किमरोद्' (भाग० १०५८।४६ ) इति प्रश्नः।" (सुबोधिनी १०८।४६)। "अत्र महापुरुषकृपव कारणम् इति वक्तुम् उपाख्यानमारभते 'द्रोणः' (भाग. १०८०४८ ) इति पञ्चभिः ।" ( सुबोधिनी १०८०४८ }।
सप्तमोऽध्यायः] पुष्टिमार्गीयफलविवेकः १९५ कार्या। . ततो दधिमण्डभाजनभेदार, शिस्यस्थनवनीतस्य मर्कटेभ्यो दानम् । तदुभाभ्यामिदं सिद्धयति, 'भगवदावेशामावदशायां भगवदितरभोगोपयोगबुद्धया सम्पादितान पदार्थान्नानीकरोति ही सासारिक कार्यों में व्याप्त होना चाहिए अर्थात् 'लौकिक कार्यों में लगे होने के समय भी भगवान् का गुणगान करते रहना चाहिए।' तदनन्तर भगवान् द्वारा दधिमण्ड (अर्थात् तक्र, छाछ या महा) का मटका फोड़ दिये जाने तथा शिक्य ( अर्थात् छीके) पर रखे नवनीत के बन्दरों को बांट दिये जाने का निरूपण है । इन दोनों घटनाओं से यह सूचित होता है कि भगवान् उन पदार्थों को स्वीकार नहीं करते १. "एवं संसारव्यापृतिरपि भगवदीयानां भगवद्गुणगानार्थमेव जाता इत्याह--'यानि यानि' इति ।" "दघ्नो नितरा मयनं यस्मिन् काले भगवतो गुणगानस्य स एव काल:, यस्मिन् काले क्रियाशक्त माधिदैविकस्या- पोन्द्रियं मयितं भवति, तदाह, दघ्नो नितरां मथनं यस्मिन् काल इति । ननु कयं तस्यैव कालस्य गाने हेतुत्वमिति चेत्, तबाह, 'स्मरन्तो' इति । तानि गीतानि स्मरन्ती वहिमप्नेष काले गीताना स्मरणं भवतीति ।" (सुबोधिनी १०।९।२) । 'एवं प्रपञ्चासक्ता निर्ममन्य । (सुबोधिनी १०।९।३)। २. 'स जातकोपः स्फुरितारुणाघरं, सन्दश्य दद्भिः दधिमण्डमाजनम् । भित्त्वा मृपाश्रुपदश्मना रहो, हैयङ्गवमन्तरङ्गतः ॥' ( भाग० १०९।६)। ३. 'दधिमण्डभाजन भित्त्वा इति !""दघिमण्डः सक्रम, तदाधार- भूतं माण्डम्, नवनोतं तु मिन्नं जातमस्ति ।' (सुबोधिनी १०९।६) । गीताप्रेससंस्करण का पाठ दधिमन्यमाजनम्' है। । 1 जघास 1 प्रमेयरलाणये [पूर्वा भगवान् । एवं सति समर्पणीयस्य वस्तुनः सम्पादनदशा- मारभ्य भगवदुपयोगसमयावधि चित्तस्य कृष्णकपरतैव रक्ष णीयेति योद्धव्यं साधफेन । तत. श्रीयशोदा दाम्ना वर्ल्ड प्रवृत्ता, तथा न बद्ध , यदा योदं दृष्टवान् भगवॉस्तदा कृपया भक्तवश्यता सूचयन् बद्धोऽ- भूत् । तथा साधकोऽप्यनेफसभृतसपर्यया न पुरुषोचमं वशी- जिन्हें लोग भगवदावेश के अभाव की दशा में ('भगवान् इन पदार्थों का भोगरूपी उपयोग या भोग और उपयोग करेंगे' इस बुद्धि या भावना से सम्पादित न कर के) 'भगवान् से भिन अर्थात् अन्य लोग इनका भोगरूपी उपयोग या भोग और उपयोग करेंगे' इस बुद्धि से (अर्थात् इस भावना या उद्देश्य से) सम्पादित करते हैं। अतः साधक को यह यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि भगवन् को समर्पित की जाने वाली वस्तु के सम्पादन पे समय से लेकर भगवदुपयोग (अर्थात् भगवान् द्वारा या भगवान् के लिये उस वस्तु के उपयोग किये जाने) के समय तक चित्त की कृष्णक्परता की रक्षा करनी चाहिए अर्थात् चित्त को श्रीकृष्ण में ही लगाये रखना चाहिए। उसके बाद भगवान् कृष्ण की उलूखल-बन्धन लीला का निरूपण (भाग० १०।९।१२-२१) है। माता यशोदा कृष्ण को बाँधने चली पर कृष्ण नहीं बँधे, कि तु जब उहोंने यशोदा को खिन्न होते देखा तो कृपा करके अपनी भक्तवश्यता सूचित करते हुए स्वेच्छया बँध गये । इसी प्रकार साधक भी पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण को-अनेक प्रकार के पदार्थो १.भाग०१०१९/१२-१७। २. 'स्वमातु स्विन्नगात्राया विनस्तकबरलज । दृष्ट्वा परिश्रम कृष्ण कृपयासीत्स्यवघने । एव प्रदर्शिता ह्यङ्ग हरिणा भक्तवश्यता। स्वदशेनापि कृष्णेन यस्येद सेश्वर वशे ।' (माग० १०।९।१८ १९)३ सप्तमोऽध्यायः]] पुष्टिमार्गीयफलविवेकः १९७ कर्तुं शक्नोत्यपि तु भवत्यैव ।। ततो यमलार्जुनप्रसने भगवदीयनारदसमागमेन श्रीमद- रूपमहादोपजन्यस्त्रीसङ्गादिनिवृत्तौ बजे वृक्षदेहं प्राप्य स्थिती नलकूवरमणिग्रीचौ हरिमोचितवान् । तथापि तत्तथा साघ- यिष्यामि यद्गीतं तन्महात्मना' (भाग० १०१०१२५) इति भक्ता- नुगृहीती मोचयिष्यामि इत्युक्तवान् प्रभुः । भतो भकानां सहमः सकलपुमर्थसाधक इति सिद्धम् । ततः 'गोपीमिः स्तोभितोऽनृत्यत्' (भाग० १०।११।७) इत्यत्र भक्तिवश्यत्वं स्फुटमेव । को सम्पादित कर उन्हें भगवान् को समर्पित कर पूजा-अचों से नहीं, अपिनु-भक्ति से ही अपने वश में कर सकता है। तदनन्तर यमलार्जुन के मोक्ष की कथा का निरूपण (माग. १०।९।२२-१०११११६) है। भगवान् कृष्ण ने, अपने मक्त नारद के समागम से ( उनके द्वारा अनुग्रह करके दिये गये शाप के परिणाम- खरूप) श्रीमदरूप महादोष से उत्पन्न होने वाले स्रीसङ्ग आदि दोषों की निवृत्ति के लिये मज में अर्जुन नामक वृक्षों का शरीर प्राप्त कर अवस्थित, कुबेर के नलकूबर और मणिग्रीय नामक पुनों को मुक्ति प्रदान की। वहाँ भी भगवान ने, 'उन महारमा नारद ने (नलकूबर और मणिग्रीव को शाप देते समय) जो कुछ कहा था उसे में उसी प्रकार कार्यान्वितं करूँगा' (माग० १०/१०।२५) इत्यादि वाक्यों से यही बात कही थी कि मैं अपने भक्त नारद द्वारा अनुग्रहीत इन दोनों यक्षों को मुक्त करूँगा | इससे सिद्ध होता है कि भक्तों की सङ्गति और सन्निधि सारे पुरुपायों की प्राप्ति या सिद्धि का साधन है। उसके पाद १. 'न हामधनं निरूप्यते, किन्तु वक्ष्यता।' (सुघोधिनी १०९।२१)। देखिये, कपर पृष्ठ ८९, टिप्पणो १,२।
१९८ प्रमेयरलार्णवे [पूर्वा ततो वृन्दावनकोडा । तत्र 'चारयामासतुर्वत्सान्नानाकीडापरि- च्छदौ' (भाग० १०॥११॥३८) इति वाक्याद् 'प्रमरचक्रसूक्ष्मदण्ड- काष्ठमण्डवृत्रिमरथवादिनाकर्षणादीनि क्रीडापरिच्छदानि' (सुबो० १०।१२।३८) गृहीत्वा क्रीडति हरिः। एवं सति सेवायामपि तानि स्थापनीयानि । एवं ती लोकसिद्धाभिः नीडाभिश्चैरतुर्वने ।' (भाग०१०१०१६) इति पञ्चदशाध्याये वक्ष्यमाणत्वाच, के, 'गोपियों द्वारा फुसलाये जाने पर भगवान् नृत्य करने लगते" (भाग० १०1११७) इत्यादि वाक्य मे तो स्पष्ट ही है कि भगवान् भक्ति के द्वारा ही वश में किये जा सकते है। तदनन्तर वृन्दावनक्रीडा का निरूपण है । 'लने की विविध सामग्री साय लिये हुए वे दोनों (बलराम और कृष्ण ) व्रज के पास ही, ग्वाल- बालों के साथ अपने बछड़ों को चराते थे' (भाग० १०१११३८) इस वाक्य से भगवान् के 'भ्रमर' (भँवरा या लटू), चक्र ( खेलने की लकड़ी या मिट्टी की पहिया आदि), छोटी सी छड़ी, लकड़ी का टुकड़ा, कृत्रिम ( अर्थात् लकड़ी या मिट्टी का बना हुआ छोटा सा खेलने का) रय और वादिनाकर्षण भादि नाना प्रकार की खेल को सामग्री' (सुबोधिनी १०१११।३८) लेफर क्रीडा करने का ज्ञान होता है अतः भगवान् की सेवा करते समय भी इन्हें भगवान् को समर्पित करना चाहिए तथा भगवान् के स्वरूप के समीप रखना चलकर पन्द्रहवें अध्याय (गीताप्रेससस्करण के अनुसार अठारहवें अध्याय ) में, 'इस प्रकार बलराम और कृष्ण वृन्दावन की नदी, पर्वत, घाटी, कुजों आदि में वे समी खेल खेला करते थे जिन्हें लोक में १. द्रव्य, कपर पृष्ठ १०५ टिप्पणी १ । २. श्रीवल्लभाचार्य और उनके अनुयायी भागवत के दशमस्कन्ध के ग्यारहवें अध्याय के बाद के तीन अध्यायों (गीताप्रेससंस्करण के भाग. २०१२-१४) को प्रक्षित मानते है । | आगे सप्तमोऽध्यायः] पुष्टिमार्गीयफलविवेका २ 'यद्यदिष्टतमं लोके पंचांतिप्रियमात्मनः।। तत्तनिवेदयेन्मह्यं तदानन्त्याय कल्पते ॥' (भाग० १५३१११४१) इति भगवद्वाफ्याच । विवृतं चैतत्सेवाकौमुद्याम् । ततो वत्सासुरवधः । स हि वत्सचारणसामग्रीरूपाणां परसानां दोपरूपः । तस्य निवारणेन वत्साः निर्दोपाः कृताः । एवमिहापि सेवोपयोगिसामग्री प्रभुणा शोध्यते । तत्र यथा वयस्यानां भक्तानां दोपरुपो लोभानृतसहितदम्भात्मको साधारण बच्चे खेला करते हैं। (भाग० १०।१८।१६) इत्यादि वाक्यो के विवक्षित होने, तथा स्वय भगवान के, 'जिन वस्तुओं को लोक में अमीष्ट माना जाता है और जो अपने को अत्यधिक प्रिय हो उन्हें मुझे समर्पित करें। ऐसा करने से भक्त मोक्ष-प्राप्ति की योग्यता का सम्पादन कर लेता है' (माग० ११११११४१) इत्यादि याक्यों से भी उपर्युक्त कथन की पुष्टि होती है। इस विषय का विशद विवेचन हमने अपनी सेवाकौमुदी नामक स्वतन्त्र कृति में किया है। तदनन्तर वत्सासुर के यध का निरूपण ( भाग० १०११११४१-४५) है । यत्सासुर भगवान् की पत्सचारणलीला की सामग्रीभूत बछड़ो के दोष का प्रतीक या मूर्तरूप है और उसे मार कर भगवान ने बछड़ों के दोपों का निवारण कर उन्हें निर्दोष बना दिया। इसी प्रकार प्रभु पुष्टिमार्गीय भक्तों की भगवत्सेवा के लिये सम्पादित की गयी सामग्री का भी शोधन करते हैं। उसके बाद बकासुर के वध का निरूपण (भाग १०११११४६-५४) है। यकासुर भगवान के साथ वन में पछड़ों को १. 'पाल्यानां वत्साना दोषरूपं वत्सामुरं मारितवान् इत्युपास्मान- मारभते । प्राकृता एव हि सदोषांचारयन्ति निरोधापं प्रवृत्तस्तु निर्दोषा- नेव पालयति इति ज्ञापनापं तेषो वत्साना मिलितानां योऽयमासुरो भाव: स एकीभूतो वत्सासुर इति तद्वपो निरूप्यते।' ( सुबोधिनी १०११४१)। २. 'एवं यत्सानां दोषं परिहत्य पालानामपि दोपं परिहतुं दम्भारमकं २०० प्रमेयरलार्णवे [पूर्वाद्ध वको नाशितस्तथेहापि लोभानृतसहितो दम्भादिदोपः सेवया नश्यति । तत्र यथा 'इति नन्दादयो गोपाः' (भाग०१०।११।०८) इति वाक्याद् गुणगानं प्रेम च सूचितम् , तथा भगवदीयादि- रूपगुणगानम्। एवं प्रमाणप्रकरणसमाप्तौ यथा तेषां प्रेमपूर्णत्वं सिद्ध तथात्र साधकस्य एतावत्साधनसम्पत्तो प्रेमपूर्णत्वमुत्पद्यते । राने वाले ससाओं ( वयस्यों) के दोषों का प्रतीक मा मूर्त रूप है । यह दम्भात्मक कहा गया है और उसकी चोंच के ऊपर और नीचे ये दो भाग लोभ और अन्त के प्रतीक बताये गये हैं। भगवान् का बकासुर की चोंच फाडकर उसका वध कर देना लोभ और अन्त के साथ दम्भ का नाश कर देने का प्रतीक है और भगवान् की सेवा से आधुनिक पुष्टिमार्गियों के भी लोभ और अनृतसहित दम्भ आदि दोषों की निवृत्ति हो जाती है। उसके बाद, 'इस प्रकार नन्द भादि गोप" (भाग० १०११५८) इत्यादि वाक्यों से नन्द आदि गोपों द्वारा भगवान् के गुणों का गान करने और उनके भगवत्प्रेम आदि का निरूपण किया गया है। इसी प्रकार आधुनिक पुष्टिमागियों को भगवान् और उनके भक्तों के गुणों का गान करना चाहिए । इस तरह जैसे भागवत में तामस प्रकरण के अवान्तर प्रमाण प्रकरण ( भाग० १०५-११) की समाप्ति के समय तक ब्रजभक्तों के भगवत्प्रेम से पूर्ण हो जाने की सिद्धि की गयी है उसी प्रकार आधुनिक पुष्टिमार्गीय वक मारितवान् इत्युपाख्यानमारभते ।' (सुबोधिनी १०।११।४६ ) । 'बकरूपमेव च बिति । अत एव तरसा शोघ्रम् आगत्य कृष्णं सदानन्द लोमान्तरूपी सुण्डौ यस्य तादृशो बली क्रियाशक्तिप्रधानो ग्रास कृतवान् । मानन्दो हि लोग सध्यानवेन प्रत्यत एव।' (सुबोधिनी १०१११४८)। १.अहन्य, पर पूछ १६ टिममी।
सप्तमोऽध्यायः] पुष्टिमार्गीयफलविवेकः २०१ तत्र यथा देहाच्यासरूपो घेनुको नाशितस्तथाष सेवा- कर्तुदहस्य स्वकीयत्वाध्यासो गच्छति । यथा कालीयशिरांसि विषयसंस्टेन्द्रियरूपाणिरे चरणारविन्देन भक्तिरूपेण विमर्च शोधितानि, अनुयहोऽयं भवता कृतोऽहिनः" (भाग० १११॥३४) इति वाक्यात् , तथेहापि विषयोन्मुखानीन्द्रियाणि भजनेन संशोध्य भगवत्पराणि क्रियन्ते। सायक के ऊपर निरूपित साधनो का सम्पादन कर लेने पर उसका हृदय भगत्प्रेम से पूर्ण हो जाता है। जिस प्रकार भगवान् ने देहाध्यासरूप धेनुकासुर का नाश किया था (भाग० १०१५।२०-३९) उसी प्रकार भगवान् की सेवा करने वाले भक्त का शरीर को अपना समझने का भ्रम नष्ट हो जाता है । जिस प्रकार, जैसा कि नागपनियों के, 'आपने इस सर्पराग पर यह अनुग्रह किया है, (भाग० १०१२६१३४ ) इत्यादि पाक्यो से ज्ञात होता है, विश्य से ससृष्ट इन्द्रिय के प्रतीक या तद्रूप कालियनाग के शिर या फण भक्तिरूप भगवञ्चरणारविन्दों द्वारा मर्दित कर शुद्ध किये गये, उसी प्रकार आधुनिक पुष्टिमार्गीय साधकों को अपनी विषयोन्मुख इन्द्रियों को भगवद्भक्ति द्वारा शुद्ध और परिष्कृत कर के भगवत्परक बनाना चाहिए । १. 'प्रथमं द्वादोऽध्याये देहाध्यासो हि धेनुकः।' (सुबोधिनीका १०१५।१४)। २. 'कालोय इन्द्रियाण्याविषयाः सदियं मतम् ।' (सुवोषिनीका० १०।१५।११५)। ३. 'दण्ड एवायं न भवति किन्तु अनुग्रह एव इत्याहुः, 'अनुग्रहः' इति । भवता अयम् अनुग्रह एव कृतः, महिनः अहेः, मप्रमोजकत्वान- पुसकत्वम्, दतो मम, भद्रो वा अनुमहः । महीनो वा अनुग्रहः।' (सुबोधिनी १०११६३४)।
२०२ प्रमेयरत्नाणवे [ पूर्वार्दै । यथा इन्द्रियदोषाभिमानिनो दावाग्नेः सकाशात् सर्वेषां रक्षा,तथेहापीन्द्रियदोपनियामकादासुरभावाद् भक्तस्य रक्षा। यथा अन्तःकरणदोपात्मप्रलम्बो हत एवमिहापि सेवां र्वतोऽन्तःकरणदोपा निवर्तन्ते । यथा अज्ञानात्मा आत्मदोपो द्वितीयो दावाग्निः" तन्निवृत्तिः कृता, तहदापि स्वरूपा- जिस प्रकार भगवान् ने इन्द्रिय दोषों के अभिमानी दैत्य अर्थात् इन्द्रियदोपरूप दावाग्मि को पीकर सभी गोकुलवासियों की रक्षा की थी उसी प्रकार वे आधुनिक पुष्टिमार्गाय भक्तों की भी, उनके इन्द्रियदोपों के नियामक आसुरभाव से रक्षा करेंगे । जिस प्रकार अन्तःकरण के दोषों का प्रतीक या तद्रूप प्रलम्बासुर (भगवान् बलराम द्वारा) मार डाला गया, उसी प्रकार भगवत्सेनापरायण पुष्टिमार्गाय भक्तों के अन्तःकरण के सभी दोष निवृत्त अर्थात् समाप्त हो जाते हैं । जिस प्रकार भगवान् ने अज्ञानात्मक और आत्मदोषरूप दूसरी दावामि की निवृत्ति की (अर्थात् सरी दावाग्नि को पीकर गार्यों और गोपों की रक्षा की), उसी प्रकार १. "तदा कालोयाविष्टो दैत्यो दोपाभिमानी सर्वभक्षणार्थ स्थिता मृत्युश्चैकीभूय वह्निभूत्वा गोकुलवासिना दाहार्थमुद्गत इत्याह, 'तदा' ति ।" (सुबोधिनी १०११७१२१ )। २ द्रष्टव्य, भाग० १०११७।२१-२५ को सुबोधिनी । ३. 'मन्त करणदोषाभिमानिनी दैत्यभूता निवारयितुम् उपाख्यानम् सारभते । प्रलम्बोऽगाद् अन्त करणमेव रूपसमर्पकमिति गोपरूपी ! स कण लम्बो मुक्तिपर्यन्तमनुवर्तमान |' ( सुबोधिनी १०।१८।१७) । ४ "अन्त करणदोषश्च महानत्र निवय॑ते ।' (सुबोधिनीका० ०१८।११२)। ५ 'अज्ञानारमा ह्यात्मदोषो दवाग्निस्तनिवारणम् । पोडशे प्रोच्यते सम्पनिरोध सेत्स्यते यतः ॥' (मुबोधिनीका० १०।१९।१।१ )।
सप्तमोऽध्याय:]] पुष्टिमार्गीयफलविवेकः २०३ शाननिवृत्तिर्भवति । यथा भक्तानां भावविशेषेण गानम् यष्टा- दशाध्याये निरूपितम् , तथा इहापि सेवाया अनवसरे भग- वतः कीर्तनादिरूपं गानम् । तत इन्द्रयागभङ्ग कृत्वा स्वयागः कारितः। तत्र शक- कृतोपद्रवे गोवर्धनोद्धरणेन ब्रजो रक्षितः । तथा सति साधकः अन्याश्रयो न कर्तव्यः । एवं सति केवलभगवदाश्रये यदि वे अपने आधुनिक पुष्टिमार्गीय भक्तों के स्वरूपाशान की भी निवृत्ति करते हैं । जिस प्रकार अठारहवें अध्याय (भाग १०।२१) में ब्रजभक्तों (गोपियों) द्वारा भावविह्वल होकर वृन्दावनविहारी कृष्ण की क्रीडाओं का गान करने का निरूपण है उसी प्रकार आधुनिक पुष्टिमार्गीय भक्तों को भी, सेवा का अवसर न मिलने पर भगवान् की लीलायों का कीर्तनादिरूप गान करना चाहिए । तदनन्तर भगवान् ने नन्दादि गोपों द्वारा किये जाने वाले इन्द्रयाग को रोक कर अपना मज्ञ करवाया ( भाग० १०१२४), और इन्द्र द्वारा उपद्रव किये जाने पर गोवर्द्धन धारण कर प्रलयङ्करी वर्षा से मज की रक्षा की (भाग० १०।२५)। इससे यह सूचित होता है कि आधुनिक पुष्टिमागियों को भगवान् कृष्ण के अतिरिक्त किसी अन्य का आश्रय नहीं ग्रहण करना चाहिए और 'यदि केवल श्रीकृष्ण का ही आश्रय १. देखिये, 'भगवानपि सर्वनिरपेक्षोऽपि स्वार्थ तन यज्ञं कारितवान' (सुबोधिनी १०१२४११) तथा भाग० १०१२४।२५, ३५ इत्यादि । २. 'हतुके फलभोक्तायमिन्द्रो विघ्नं चकार है । वृष्टिरूपं ततः कृष्णः शलघारी बभूव ह ॥" द्वाविंश ते कृष्णए इन्द्रेण विनिपोटितम् । प्रजं गोवर्द्धनं धृत्वा सम्यक् पालितवानिति ।। (सुधो० का० १०।२५/१२,४,५)।
२०४ प्रमेयरत्नाणवे [पूर्वा कश्चिदुपद्वो भवेत् , तदा भगवान् पालयिष्यतीति विश्वासो रक्षणीयः । एवं भगवदुक्तवर्णाश्रमधर्माचरणेन परोपकारादि- धर्माचरणेन च वैष्णवान्नभक्षणेन अन्याश्रयत्यागेन भगवान् सेव्यः। ततः कुमारिकावतप्रसङ्गे यशपत्नीयतमसझे यथाश्या- त्मिक पक्षः सिद्धः तदुक्तं निवन्धे, 'कृष्णवाक्यं सदा कार्य, मायामोह निवार्य हि । वृक्षवत्तु स्थितिः कार्या शुद्धानेन च वर्तयेत् ।।' (भागवतार्थप्र० का० १०९२)। ग्रहण करने पर कोई उपद्रव या अनिष्ट होने का प्रसङ्ग उपस्थित होगा तो भगवान् उससे रक्षा करेंगे', इस प्रकार का विश्वास रखना चाहिए । इस प्रकार आधुनिक पुष्टिमागियों को भगवान् द्वारा बताये गये वर्णाश्रम- धर्म का आचरण करते हुए, परोपकारादि धमों का पालन करते हुए, वैष्णवों के ही अन्न का भोजन कर जीवनयापन करते हुए, अन्य सभी का आश्रय छोड कर, केवल श्रीकृष्ण का ही आश्रय लेकर उन भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा करनी चाहिए । गोपकुमारियों के व्रत' के प्रसङ्ग (भाग० १०।२२) और यश पर रहे ब्राह्मणों की पत्नियों के प्रसङ्ग (भाग० १०१२३ ) के निरूपण से जो आध्यात्मिक पक्ष सिद्ध होता है अर्थात् आध्यात्मिक अर्थ ज्ञात होता है, उसे श्रीवल्लभाचार्य ने तत्वार्थदीपनिबन्ध की, 'श्रीकृष्ण के आदेश का सदैव पालन करना चाहिए, माया-मोह का निवारण कर, वृक्ष की माँ ति (केवल परोपकारनिरत होकर) अवस्थित होना चाहिए और शुद्ध अन्न ग्रहण करके जीवनयापन करना चाहिए' (भागवतार्यप्र० १. 'हेमन्ते प्रपमे मासि नन्दगोपकुमारिकाः । पेहविष्म॑ भुजाना: कात्यायन्यनव्रतम्।। (भाग. १०१२२१)।
सप्तमोध्यायः] पुष्टिमार्गीयफलविवेकः २०५ अयमर्थः । व्रतप्रसने अग्निकुमारैलजां परित्यज्य सर्वे कृतम् । तेन भगवत्प्रसादोऽभूत् । अतो भगवद्वाक्यं सर्वथा कर्त्तव्यम् । तदन श्रुतिस्मृत्यादिरूपं कर्त्तव्यमिति फलितम् । 'मायामोहं निवार्थ वृक्षवत्तु स्थितिः कार्या' इति । मायया जातो यो मोहो ममेदमित्यज्ञानात्मकस्तं दूरीकृत्य वृक्षवत् केवलपरोप- कारतया स्येयम् , "अहो एयां वर जन्म' (भाग० १०१२२२३३) इत्यारभ्य, 'तोक्मः कामान् वितन्वते' (भाग० १०१२२३३४) का० १०।९२) इस फारिका में बताया है, जिसका आशय अघोलिखित है । व्रत के प्रसङ्ग में गोपकुमारियों (अग्निकुमारों') ने लजा लोड कर सब कुछ (अर्थात् भगवान् के प्रत्येक आदेश का पालन) किया जिसके फलस्वरूप भगवान् ने उन पर प्रसन्न होकर अनुग्रह किया। इससे यह ज्ञात होता है कि भगवान् के आदेश का सर्वथा पालन करना चाहिए । भगवान् का आदेश आधुनिक लोगों को श्रुति, स्मृति आदि के वाक्यों के रूप में उपलब्ध है। 'माया-मोह का निवारण कर वृक्ष के समान रहना चाहिए' इस वाक्यांश का अर्थ स्पष्ट करते हैं। माया से उत्पन्न हुए मोह-जिसका स्वरूप 'यह मेरा है' इत्यादिरूप अज्ञान ही है-को दूर कर वृक्ष की भाँति केवल परोपकारपरायण होकर रहना चाहिए । इस बात का शान भगवान द्वारा, 'महा ' इन्हीं का जीवन सबसे अच्छा है' (भाग० १०।२२।३३) इत्यादि श्लोक से प्रारम्भ कर, 'सोको ( अर्थात् अङ्कुयें और कोपलों) से लोगों की कामनाओं को पूरा करते हैं' (भाग० १०१२२॥३४) इत्यादि श्लोक १. 'एकोनविंशे भोग्याना कुमारीणा व्रतं यया । अन्त.स्थानां कुमाराणा तथा ज्ञानमिहोच्यते ॥ (सुबो का० १०२२१५-६)। २. 'तोक्मा: सूक्ष्मवृक्षाः शाखारूपाः(सुबोधिनी १०।२२।३४)।
२०६ प्रमेयरलार्णवे [पूर्वाद्ध इत्यनेन परोपकृतेः प्रभुणोपदिष्टत्वात् । 'शुद्धानेन च वर्तयेद्' इति । 'एघा वै बाघते क्षुनः (भाग ११२१) इति गोप- विज्ञापितः, 'मा ज्ञापयत पत्नीभ्य.' (भाग० १०।२३।१४) इत्युक्त्वा यज्ञपत्नीसन्निधौ प्रेषयित्वा ताभिरानीतेन अनेन गोपानां तृप्तिः सम्पादिता। ता हि भगवदीया, 'भगवत्युत्तमश्लोके दीर्घश्रुत- धृताशयाः (भाग० १०।२३।२०) इति वाक्यात् । अत इदमन लब्धम् , चैष्णवानामेवान्नं ग्राह्यम् । तत उक्तम्, 'शुद्धानेन च वर्तयेद्' इति । 1 तक के वाक्यों में परोपकार का उपदेश दिये जाने से होता है। 'शुद्ध अन्न ग्रहण करते हुए ही जावन यापन करना चाहिए' इत्यादि वाक्याश का अर्थ स्पष्ट करते हैं। गोपो के, 'हमें भूख सता रही है' (भाग० १०१२३११) इत्यादि कहने पर, भगवान् कृष्ण ने 'तुम लोग यज्ञ कर रह ब्राह्मणों की पत्नियों के पास जाओ और उनसे कहो कि बलराम के साथ कृष्ण यहाँ भाये है' (भाग० १०१२३।१४) इत्यादि कह कर, उन्हें यज्ञ कर रहे ब्राह्मणों की पत्नियों के पास भेज कर, उन महिलाओ द्वारा लाये गये अन्न से गोपोकी क्षुधा शान्त करने का प्रबन्ध किया | जैसा कि, 'दीर्घकाल से पवित्र कीर्ति, उत्तमश्लोक मगनान् श्रीकृष्ण के गुणों और लीलाओं आदि का वर्णन सुनती रहने वाली और इसीलिये मगवान् के चरणों में अपना हृदय निछावर कर देने वाली महिलायें (भाग० १०।२३।२०) इत्यादि वाक्यों से ज्ञात होता है, याशिकों की पत्नियाँ भगवदीय थीं। अत. इस प्रसङ्ग से यह ज्ञान प्रास होता है कि भक्तो को देवल वैष्णवों का ही अन्न ग्रहण करना चाहिए । इसीलिये श्रीवल्लभाचार्य ने कहा है कि 'शुद्ध अन्न ग्रहण करते हुए जीवनयापन करना चाहिए।' १. प्रष्टव्य, भाग० १०१२२॥३२-३५ ।
समोऽध्यायः पुष्टिमार्गीयफलविवेकः २०७ तता, 'एवं विघा मगवतो या वृन्दावनचारिणः । वर्णयन्त्यो मिथो गोप्यः क्रीडास्तन्मयता ययुः ।। भाग० १०१२१०२०) इति वाफ्याद्, यथा तासामासक्तिरेवं साधकस्याप्येतावत्साधनसम्पचावासक्तिः सिद्धधति । प्रति- न्धकपापनाशे भगवत्प्रसादे च क्रियमाणायाः श्रवणादि- रूपायाः पोपो वीजभावदायव्यसनभावरूपो भगवति भवति । तो वृद्धौ क्रमेण गुणानां नाशः । लीलासृष्टिस्थानां यथा, 'दर्शयामास लोकं सं गोपानां तमसः परम् । सत्यं ज्ञानमनन्तं यद् ब्रह्म ज्योतिः सनातनम् ॥' (भाग० ०२८।१४-१५) इति वाफ्याद् व्यापिवैकुण्ठात्मकाक्षरब्रह्मानु- 'वृन्दावनविहारी भगवान् श्रीकृष्ण को इस प्रकार की सारी लीलाओं का आपस में वर्णन करती हुई गोपियाँ (प्रेमाधिक्य के कारण) सन्मय हो जाती थी' (भाग० १०।२१।२०) इत्यादि वाक्यों से जिस प्रकार गोपियों की भगवान् में आसक्ति हो जाने की सिद्धि होती है उसी प्रकार उपर्युक्त साधनों को सम्पादित कर लेने पर आधुनिक साधक की भी भगवान् में आसक्ति हो जाती है। प्रतिबन्धक पापों के नष्ट हो जाने और भगवान् की कृपा होने पर, साधक द्वारा किये जाने वाले श्रवणादि का पोषण होता है जिसका स्वरूप बीजभाव की दृढतारूप व्यसन अर्थात् भगवान् में व्यसनभाव की प्राप्ति होता है। तदनन्तर उस भाव के और अधिक वृद्धिंगत होने पर क्रमशः तामसत्व, राजसत्व और सात्त्विक्त्व का नाश हो जाता है। जिस प्रकार 'मगवान् ने गोपों को सम से पार या अतीत अपने व्यापि-वैकुण्ठ नामक लोक या परमधाम के दर्शन कराये, जो अक्षर, सचिदानन्दस्वरूप वैकुण्ठ कहा जाने वाला ग्रा ही है तथा ज्योतिःस्वरूप एवं सनातन है" (भाग० १०॥२८॥ १. द्रष्टव्य, कपर पृष्ठ ५५-५६ ।
[पूर्वा २०० प्रमेयरत्नार्णवे भवस्तथा पूर्वोक्तरीत्या सेवया व्यसनसिद्धौ गुणनाशे ब्रह्मभावः, 'स एव भक्तियोगाख्य आत्यन्तिक उदाहृतः। येनातिव्रज्य विगुणं मनावायोपपद्यते ॥ (भाग० ३।२९।१४) इति वाक्यात् । ततः फलमकरणे यथा सर्वात्मभाववतीनां तासा भजना- नन्दानुभवस्तथेह साधकस्यापि सर्वात्मभावोत्पत्तौ सदैव पुरुषोत्तमाविर्भावात् सेवायां भजनानन्दानुभवः फलति । १४-१५) इत्यादि वाक्यों से लीलासृष्टिस्थ जीवों के व्यापिवैकुण्ठात्मक अक्षर ब्रह्म का अनुभव करने का बोध होता है, उसी प्रकार पूर्वोक्त रीति से सेवा करने पर, व्यसनभाव की सिद्धि हो जाने पर, गुणों का नाश हो जाने पर आधुनिक साधक को मी ब्रह्ममाव की प्राप्ति होगी, यह भगवान् के 'वह भक्तियोग ही आत्यन्तिक कहा गया है, जिसके द्वारा त्रिगुण को पार कर साधक भगवद्भाव के योग्य हो जाता है', (भाग० ३।२९।१४ ) इत्यादि वाक्यों से ज्ञात होता है । तदनन्तर, जिस प्रकार तामस फल प्रकरण ( भाग० १०२९-३५) में सर्वात्मभाव रखने वाली गोपियों को भजनानन्द का अनुभव होने का निरूपण मिलता है उसी प्रकार आधुनिक साधकों को भी सर्वात्म- भाय की उपलब्धि हो जाने पर, पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण के सदैव आविर्भूत १. 'भक्तियोग इति तस्यैव नाम । स एव आत्यन्तिक इति उदाहृतः । तस्य स्वावन्याय भगवत इव फलसाधकत्वमाह, 'येन' इति । येन भक्तियोगेन त्रिगुणम् अतिव्रज्य मद्भावाय भगवत्वाय उपपद्यते योग्यो भवति इत्यर्थः ।' (सुबोधिनी ३।२९।१४)। 'अतः स उक्तलक्षण एव भक्तियोगारुप आत्यन्तिक. मोक्षसाधनाना घरमकाष्ठापनः उदाहृतः पथितः । येन भनियोगेन पुषप., त्रिगणं गुणत्रयकार्यसुखदु समोहमयं ससारम् अतिनज्य अतिक्रम्य, मद्भावाय भगवत्त्वाय, उपपद्यते योग्यो भवतीत्यर्थः ।' (बालप्रबोधिनी २२९/१४)।
सप्तमोऽध्यायः पुष्टिमार्गीयफलविवेकः २०६ ततः, 'मोगेन वितरे क्षपयित्वाथ सम्पद्यते। (ब्रह्मसूत्र ४।१।१९) इति सूत्रभाष्योक्तरीत्या स्थूललिङ्गशरीरयो शे भगवल्लोलोप- योगिदेहं प्राप्य नित्यलीलायां प्रविशति । स एव मुक्तिपदार्थः, 'मुक्तिहित्यान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः' (भाग २२१०६) इति लक्षणात् । तत्र च, 'सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता' (तैत्ति उप० २०११) इति श्रुत्युक्तरीत्या पुरुपोत्तमेन रहने अर्थात् हृदय में निरन्तर स्फुरित होते रहने के फलस्वरूप, सेवा में भजनानन्द का अनुभव होता है। तदनन्तर, 'साधक स्थूल शरीर और लिङ्गशरीर का परित्याग कर, मगवल्लीलोपयोगी देह को प्राप्त कर, श्रुत्युक्त भोग से सम्पन्न हो जाता है' (ब्रह्मसूत्र ४/१/१९) इस सूत्र के अणुभाप्य में प्रतिपादित रीति से स्थूलशरीर तथा लिङ्गशरीर का नाश हो जाने पर, भगवल्लीलोपयोगी शरीर को प्राप्त कर, साधक भगवान् की नित्यलीला में प्रवेश करता है। जैसाकि मुक्ति के अन्य रूपों का परित्याग कर स्वरूप से अवस्थित होना मुक्ति है" ( भाग० २।१०।६) इत्यादि वाक्यों में दिये गये लक्षणों से ज्ञात होता है, यह नित्यलीलाप्रवेश ही 'मुक्ति' पद का अर्थ है । साधक वहाँ, नित्यलीलाप्रवेशरूप मुक्ति की स्थिति मे, 'वह ज्ञानानन्दरूप ब्रह्म के साथ ही सारे कामों का भोग करता है' (तैत्ति० उप० २।919) १. "पुष्टिमार्गीयफलप्रासो प्रतिवन्यामावं सोपपत्तिकमुक्त्वा तत्प्राप्ति- भकारमाह, इतरे अग्ने प्राप्यालोकिकदेहाद्भिन्ने स्थूललिङ्गशरीरे, क्षपयित्वा दूरीकरय, अथ भगवल्लीलोपयोगिदेहप्राप्त्यनन्तरं, भोगेन सम्पद्यते, 'सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता' (तत्ति० उप० २१) इति ध्रुत्युक्तेन भोगेन सम्पद्यते इत्यर्थः । श्रुत्यर्यस्त्वानन्दमयाधि- करणे निरूपितः । अलौकिकत्वं विना, उक्तदेहं विना च उक्तफलप्राप्तेयंव. वच्छेदकः तुशब्दः ।।" (अणुभाष्यम् ।।१।१९)। २. देखिये, ऊपर पृष्ठ १७४ टिप्पणी । १४ २१० प्रमेयरलाणवे [पूवार्द्ध सह पुरुषोत्तमात्मकानां पुरुषोचमात्मकभोगाशनमाभयप्राप्ति- रिति निष्कर्षः, 'निरोधलीलामुक्त्वाथ मुक्तिस्तदनुवर्ण्यते । मुचानामाश्रयः कृष्णो नान्येपामिति शाखतः। इति सुबोधिन्या:। इति श्रीगोवर्द्धनधर-श्रीवल्कमाचार्य-श्रीविटुलेश्वरचरणानुचरसेवकन लालमट्टोपनामबालकृष्णभटेन कृते प्रमेयरत्नार्णवे पुष्टिमागायफलविवेक समातिमफाणीत् ॥ ७ ॥ इत्यादि श्रुतिनाक्य में प्रतिपादित रीति से पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण के साथ पुरुषोत्तमात्मक पदार्थों का पुरुषोत्तमात्मक भोग करता है और उसे आश्रय' की प्राप्ति हो जाती है । इस निष्फर्प की पुष्टि सुबोधिनी के अधोलिखित पाक्य से होती है । 'निरोधलीला का निरूपण करने के याद मुक्ति का वर्णन किया गया है क्योंकि शास्त्र यह मानते हैं कि कृष्ण मुक्तों के भाश्रय है अन्य लोगों के नहीं।' श्रीगोवर्द्धनधर, श्रीयल्लभाचार्य तथा श्रीविठ्ठलनाथ के चरणों के अनुगामी (अथवा अनुचरों के) सेवक लालूभट्ट के नाम से प्रसिद्ध यालकृष्णमष्ट के द्वारा विरचित प्रमयरत्नाव का पुटिमागीयफलविवेक नामक सप्तम अध्याय समास हुआ ॥ ७ ॥ प्रमेयरत्नार्णव के पूर्वार्द्ध का हिन्दी अनुवाद समाप्त हुआ । १. 'मुक्ताना ब्रह्मस्वरूपेणावस्थानमाश्रय इति । (मुबोधिनो २।१०।१३
॥ थोगिरिधारी तनोतु मङ्गलानि ॥
श्रीवालकृष्णभट्टविरचितः
प्रमेयरत्नार्णवः
उत्तरार्द्धः
ख्यातिविवेकः
(प्रथमोऽध्यायः)
थीमद्गोवर्धनाधीशं
गोपिकाप्राणवसमम् ।
रासकीडारत चन्दे भजनानन्दलब्धये ॥१॥
प्रमेयरत्नार्णव के उत्तरार्द्ध का हिन्दी अनुवाद
ख्याति-विवेक
(प्रथम अध्याय)
प्रमेयरस्नार्णव उत्सराऽध्यायेऽद्वितीय निपुर्ण निय।
मुपोधिनीप्रासदिया पुन श्रीवाउणेन पिरिय सम्पा
पाते: मतस्याग्निनिरूपिषस्प प्यारया वा म्यागिरिकस्पा ।
सस्पानुपादं लिखतीह मिधः केदारनापः प्रतिमामहायः ॥२॥
में भजनानन्द की प्राप्ति के रिपे, रामटीला में रत, गोपियों के
प्राणप्रिय गोगनपारा श्रीहाण की वन्दना करता है।॥१॥
२१२ प्रमेयरत्नार्णवे [ उत्तराद्ध घोपसीमन्तिनीनेत्रचकोरचयवन्दिरम् चन्दे श्रीवालकृष्णाण्य प्रभुमानन्दमन्दिरम् ॥२॥ चन्द श्रीवल्लभाचार्यान् पुष्टिमार्गप्रवर्तकान् । श्रीविठ्ठलेशचरणान् आश्रये कृष्णतुष्टये ॥३॥ ये सक्षेपेण पूर्वार्द्ध पदार्था विनिरूपिताः। तथासं कर्तुमारब्धम् उत्तराद्ध मयाधुना ॥ ४ ॥ तन पूर्वाई पूर्व प्रपञ्चधिवेक उक्तः, तबादाय स्याति- स्वरूपनिरूपणम् आवश्यकम् , ख्यातियोधं विना प्रपञ्च- स्वरूपस्याकलयितुमशक्यत्वात् , अत. तृतीयस्कन्धसुबोधिनी- प्रदर्शितपद्धत्या पूर्व ख्यातिःविचार्यते । म गोपाङ्गनाओं के नेत्रों रूपी चकोरसमूह के चन्द्रमा, श्रीबालकृष्ण नामक आनन्दनिधान प्रभु की वन्दना करता हूँ ॥ २ ॥ मैं पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक श्रीवल्लभाचार्य की वन्दना करता हूँ, तथा भगवान् कृष्ण को प्रसन्न करने के लिये गोस्वामी श्रीविठ्ठलनाथ के चरणों की शरण में जाता हूँ ॥ ३ ॥ मेंने अपनी कृति प्रमेयरलार्णव के पूर्वार्द्ध मे जिन पदार्थों और विवेच्य विषयों का सक्षेप में निरूपण किया था उनका विस्तार (मे विवेचन) करने स लिये अब में उस ग्रन्थ के उत्तरार्द्ध की रचना (प्रारम्भ) करता हूँ ॥ ४ ॥ अपनी कृति प्रमेयरत्नार्णव से पूर्वार्द्ध के प्रारम्भ में हमने प्रपञ्चविवेक नामक प्रथम अध्याय मे प्रपन्च के स्वरूप का निरूपण किया है, उस विवेक को दृढ करने के लिये ख्याति के स्वरूप का निरूपण आवश्यक है क्योंकि ख्याति के शान के विना प्रपञ्च के स्वरूप को समझ सकना सम्भव नहीं है, अत इस उत्तरार्द्ध के प्रारम्भ में हम सर्वप्रथम भागवत पुराण के तृतीयस्कन्ध की श्रीवल्लभाचार्यकृत मुबोधिनी टीका में प्रदर्शित पद्धति से (अर्थात् सुबोधिनी में उपलब्ध विचर के आधार पर) प्रथमोऽध्यायः] ख्यातिविवेकः २१३ तत्र मनासंयुक्तचक्षुरिन्द्रियेण शुक्तः संयोगे, तज्जन्य सामान्यज्ञानमुत्पद्यते । इदं सामान्यज्ञानम् इन्द्रियार्थसंयोग- जन्यं संशयादीनां सर्वेषां ज्ञानानां पूर्व सम्भवति, नत उद्भूत- सत्त्वगुणस्य बुद्धया साहित्ये प्रमात्मकं ज्ञानं निश्चयशब्द- वाच्यम् उद्भवति । अत पय निवन्धे सर्वनिर्णय उत्तम् 'सत्त्व- सहिता बुद्धिः प्रमाणम्" (सर्वनिर्णयप्र० प्र० १४७ ) इति । ख्याति का विचार करेंगे। मन से सयुक्त चक्षुरिन्द्रिय से शुक्ति का सयोग होने पर उससे सामान्य ज्ञान उत्पन्न होता है । यह सामान्य ज्ञान इन्द्रिय और अर्थ के सयोग से अन्य ( अर्थात् उत्पन्न होने वाला ) होता है और सराय आदि सभी विशेष ज्ञानों के पूर्व उत्पन्न होता है । तदनन्तर सत्त्वगुण का उद्रेक होने पर और उसका बुद्धि से साहचर्य होने पर 'निश्चय' शब्द से अभिहित किया जाने वाला प्रमात्मक (विशेष:) शान उत्पन्न होता है । इसीलिये तत्वार्थदीपनिरन्ध के सर्वनिर्णयप्रकरण में श्रीवल्लभाचार्य ने कहा है कि 'सत्त्वसहित बुद्धि प्रमाण (अर्थात् प्रमा नामक ज्ञान- विशेष का साधन या उत्पादक ) है" (सर्वनिर्णयम०प्र० १४७) । १ "सत्त्वसहिता बुद्धिः प्रमाणम् । ( प्रमाणत्वे हेतुः, ) सत्वप्रवृद्धी अन्तःकरणं प्रमिति जनयति, 'सत्वात् सञ्जायते ज्ञानम्' (गीता १४।१७) इति । अन्यथा सत्त्वलये सब सामग्री भ्रमं जनयति । अतोऽन्वयज्यति- रेकाम्या सत्त्वमेव प्रमाणम्, तरकार्य मंत्र प्रामाणिकम्, रजः तु व्याव- हारिवम् (व्यवहारोपयोगि, 'पृयवत्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्'- गोता १८१२० इति गोतावाक्यादित्यर्थः) । तमस्तु भप्रमाणमेर । षतोऽन्यमिश्रणे तारतम्येन वस्तुयाथात्म्यस्फुरणम्, अतो लोके चक्षुषः कदाचित् प्रामाप्यं पदाचिन इति व्यवस्थाभावात् (गुणान्तरस्याप्रमाणत्वाद् गुणान्तरमिश्रणे सत्त्वस्योतरोतरमपकर्ष सति न वस्तुयाथात्म्यस्फुरणम्, ज्ञानिवनकरूपा प्रमा किन्तु रज.सत्त्वानुगृहीतः इन्द्रियैः व्यावहारिको प्रमा, - ૨૪ प्रमेयरत्नाणवे [उत्तराः . 'संशयोऽथ विपर्यासो निश्चयः स्मृतिरेव च । स्वाप इत्युच्यते बुद्धलक्षणं वृत्तितः पृथक् ।।' (भाग० ३।२६।३०) भगवान् कपिल के, 'वृत्तियों के मेद से संशय, विपर्यास (विपर्यय), निश्चय (प्रामाणिक ज्ञान ), स्मृति और स्वाप (स्वप्न ) मी बुद्धि के ही लक्षण कहे गये हैं' (भाग ३।२६।३०) इत्यादि वाक्यों द्वारा रजस्तमोभ्या सत्त्वोपम संशयः, तत्रापि तमसो बाहुल्यै भ्रम इत्येव जागवृत्तौ जायन्त इति व्यवस्थाभावात् ), लोकेन ( लोकानुसरणेन ) प्रमाणगणना नैयायिकादिभिरिव नास्माभिः कृता।" (आवरणभङ्गसहितः सर्वनिर्णयप्र० प्र० १४७)। गोता १४३११,१७,१८१३१,३२, भाग० १०२१३५ 'इत्यादिवाक्यः सत्त्वगुणस्य प्रमाजनकत्व, रजोगुणस्य प्रकाराशेऽपि प्रमाजनकत्वं, तमसस्तु भ्रममात्रजनकत्वमिति । ( सर्वनिर्णयप्र० प्र० १४७ पर कल्याणराय- कृतटिप्पणी)। १. 'द्रव्यस्फुरणतारतम्याद् बुद्धिनानाविधा ।"विपर्यासो भिन्नार्य- प्रतिपादकः ।" निश्चयो यथार्थानुभवः । अर्थो हि जानस्यामङ्गम्, अत एव स्मृतिनं निश्चयात्मिका, अर्थाभावात् ।'"स्मृतिः स्वतन्त्रा बुद्धिः संस्कारजनिका, स्वापः स्वप्नरूपः, भिन्नसृष्टिविषयत्वाप्न पूर्वोक्नष्यन्तर्भाव । सुषुप्तिस्तु न बुद्धिः ।"एवं पञ्चधा बुद्धेः वृत्तितो लक्षणं पृथक यमित्यर्थः ।' (सुबोधिनी ३।२६।३०)। 'द्रव्यस्फुरणमेव प्रपञ्चयति 'संशय' इति । संशयः एकस्मिन् घर्मिणि विरुद्धानेकप्रकारकं ज्ञानं यथा स्याणुर्वा पुरुषो वैति । विपर्यासशब्देन मिध्याज्ञानं, तद् द्विविधम्, धर्मान्तरस्य धर्मान्तरै प्रतीतिः यथा पीतशङ्ख प्रति, घयंन्तरस्य धम्यंन्तरत्वेन प्रतीतिश्च यथा पुक्तिशकले 'इदं रजतम्' इति । निश्चयः तद्वति तत्प्रकारकं प्रमारूपं ज्ञानम् । स्मृतिरनुभूतवस्तुविषयक ज्ञानम् । स्वापो निद्रा । एवं पृथक् असायण स्थिताभिः वृत्तिभिः बुद्धेः लक्षणम् उच्यते ।' (बालप्रबोधिनी ३१२६१३०) । .
प्रथमोऽध्यायः ख्यातिविनेकः २१५ ५ इति कपिलवाक्येन संशयादिज्ञानानां बुद्धिवृत्तित्वेन गणनाद् भागवतमते वुद्धेरेव विशिक्षानजनकत्वम्, 'द्रव्यस्फुरणविज्ञानम् इन्द्रियाणामनुग्रहः (भाग० ३३२६।२९) इति चुद्धिलक्षणात् । अतो मनःसंयुक्तचक्षुपा सामान्यज्ञाने जनिते पश्चात् सत्यादिगुणसहितया बुद्धया तारतम्येनानेकपकारकं जायमानं शानं संशयाधुच्यते । अत एव सुवोधिन्यामुक्तम्, 'द्रव्यस्य संशयादि की गणना बुद्धिवृत्ति के रूप में की गयी है अर्थात् संशयादि शानों को बुद्धिवृत्ति कहा गया है, अतः स्पष्ट है कि भागवत मत में विशिष्ट शान का उत्पादक या जनक बुद्धि को माना गया है। बुद्धि के, 'घटादि द्रव्यों के स्फुरित होने पर होने वाला विशेष ज्ञान बुद्धि का स्वरूपलक्षण है' और इन्द्रियों को अनुगृहीत करना कार्यानुसारी लक्षण है" (भाग० ३।२६।२९) इस भागवतोक्त लक्षण से भी इसी मत को पुष्टि होती है। अतः मन से संयुक्त चक्षुरिन्द्रिय द्वारा सामान्यज्ञान उत्पन्न होने के बाद सत्त्वादिगुणों से युक्त बुद्धि से तारतम्यपूर्वक उत्पन्न होने वाले अनेक प्रकार के ान संशय आदि कहे जाते हैं । इसीलिये श्रीमदल्लभा- १. 'द्रव्यस्फुरणविज्ञानम्' इति स्वरूपलक्षणम् । व्यस्य घटादेः स्फुरणे सति शब्देन, सस्कारेण, आलोकेन वा यद्विशिष्टज्ञानम्, यस्माकेवलं चक्षुषा शाने तारतम्यं न स्यात्, स्वतः स्फुरणं योगजधर्मादिभिरपि भवति, यतो द्रव्यस्फुरण एव विज्ञानं बुद्धेः लक्षणम् । (सुबोधिनी ३।२६।२९ )। २. "यथेन्द्रियप्रेरकत्वं मनसः तथा इन्द्रियानुग्राहकत्वं बुढेः । बुद्धव अनुगृहीतानि इन्द्रियाणि पश्यन्ति ('इद तु ज्ञानसामान्यार्यकम् -प्रकाश:), कुर्वन्ति च । अत एव ('बुद्धयधीनत्यादेव'--प्रकाशः) बुद्धितारतम्पेन इन्द्रियज्ञानक्रिययोस्तारतम्यम् । एतत् कार्यानुसारि लदाणम् ।" (सुबोधिनो ३।२६।२९)।
२१६ प्रमेयरलाणवे [ उत्तरार्द्ध घटादेः स्फुरणे सति शन्देन संस्कारेणालोकेन वा यद्विशिष्टज्ञान, यस्मात्केवलं चक्षुपा ज्ञाने तारतम्यं न स्याद' (सुबोधिनी ३२२६।२९) इति । अत एव लक्ष्मीतन्ने त्रयोदशाध्याय उत्तम् , 'चक्षुपालोच्य वस्तुनि विकल्प्य मनसा तथा । अहम्मत्याप्यहङ्कारापद्धव ह्यध्यवस्यति'।' (लक्ष्मीतन्त्रम् १३३३४) इति । अन्ये तु प्रत्यक्षज्ञानमात्रं प्रति मनइन्द्रियविषयाणां कार. णता, न तत्र वुद्धनिवेश इत्याहुः । अस्मन्मते तु भागवत. तृतीयस्कन्धीयवाफ्यात् संशयादीनि झानानि वुद्धिरुत्पादयति; अतःप्रत्यक्षशाने मनइन्द्रियविषयाणां सामान्यज्ञानोत्पादकत्वम्, चार्य ने सुबोधिनी में कहा है कि 'द्रव्य अर्थात् घटादि के स्फुरित होने पर शब्द, संस्कार या भालोक से जो विशिष्ट ज्ञान उत्पस होता है वह बुद्धि का लक्षण है । केवल चक्षुरादि से होने वाले ज्ञान में वारतम्य उपपन्न म होगा।' (सुबोधिनी ३।२६।२९) इत्यादि । इसीलिये लश्मीतन्त्र के तेरहवें अध्याय में कहा गया है कि 'पदार्थों का चक्षुरिन्द्रिय से आलोचन कर, मन से सकल्प कर और महङ्कार से अस्मिता की मावना करके व्यक्ति उनका अध्यवसाय बुद्धि से ही करता है।' (लक्ष्मीतन्त्र १३॥३४) कुछ अन्य लोगों का मत कि प्रत्यक्षज्ञानमात्र की उत्पत्ति में मन, इन्द्रिय और विपय ही कारण होते हैं और इसमें बुद्धि का कोई योगदान नहीं होता, किन्तु हमारे मत से भागयत के तृतीयस्कन्ध के वाक्यों से ज्ञात होता है कि मुशय आदि (विशेष-) शानों को बुद्धि उत्पन्न करती है, अतः प्रत्यक्ष ज्ञान में मन, इन्द्रिय और विपय सामान्य- १. लक्ष्मीतन्म का उपलब्ध पाठ अधोलिखित है, "चक्षुषालोक्य वस्तुनि विकल्प्य मनसा तथा । अभिमत्याप्यहवाराद् बुदभव ह्यभ्यवस्यति ।" ( लक्ष्मीतन्त्र १३:३४)।
प्रथमोऽध्याय.] ख्यातिविवेकः २१७ - , चुद्धिस्तु विशेषाकारेण संशयादिशब्दवाच्यानि ज्ञानानि जनयति इति तेभ्योऽयमितरोऽस्माकं पन्थाः । तत्र चक्षुःशुक्तिसंयोगे सामान्यज्ञानोत्तरं माया भगवतः शक्तिः तमोगुणोद्भवेन बुद्धि व्यामोहयति तदा 'इयं शुक्तिः' इति योधो न जन्यते, 'प्रमादमोही तमसो भवत्तोऽज्ञानमेव च' (गीता १।१७) इति भगवद्वाक्यात तमसा द्यज्ञानस्य उत्पादितत्वात् । तथा च पदार्थयाथात्म्यस्फुरणाभावान्मायामोहिता बुद्धी रजतसंस्कारमावल्याच्चाकचफ्यादिधर्मसादृश्यमादाय रजतं तत्र निर्माति, तदिदं योद्धमेव रजतं बुद्धया विषयीक्रियते, न तु सामान्यज्ञाने चक्षुर्विपयीभूतम् इति विवेकः, तदानी रजतस्या- ज्ञान के उत्पादक हैं और सशय आदि शब्दी से अभिहित किये जाने वाले विशेष ज्ञानों अर्थात् ज्ञान के विशिष्ट आकारों या रूपों की उत्पत्ति बुद्धि से होती है । इस प्रकार हमारा मत उन लोगों के मत से पृथक् है । चक्षुरिन्द्रिय का शुक्तिका के साथ सयोग होने पर सामान्य ज्ञान होने के बाद भगवान की शक्ति माया तमोगुण के उद्रेक से बुद्धि को मोह में डाल देती है और तर 'यह शुक्ति है। इस प्रकार का ज्ञान नहीं उत्पन्न होता क्योंकि जैसाकि भगवान् के 'तमोगुण से प्रमाद, मोह और अज्ञान की उत्पत्ति होती है' (गीता १४११७) इत्यादि वाक्य में बताया गया है, तमोगुण से अज्ञान की उसत्ति हो जाती है। पदार्थ (अर्थात् शुक्तिपदार्थ) के यथार्थस्वरूप का पुरण न होने से माया के द्वारा मोहित बुद्धि, रजत ये सस्कारों के प्रबल होने से, (शुक्तिका और रजन दोनों में पाये जाने चाले)चमा इत्यादि घमा की समानता को लेकर, वहाँ रजत को उत्पन्न कर देती है अर्थात् रजत की कल्पना कर लेती है । यह रजत बौद्ध अर्थात् बुद्रिकल्पित तया बुद्धिस्य या आन्तर ही होता है और बुद्धि के द्वारा ही गृहीत होता है। सामान्यज्ञान म इस रजत का अभाव होता है क्योकि यह तो सामान्य ज्ञान की उत्पत्ति २१८ प्रमेयरत्नाणवे [उत्तरा भावात्सामान्यज्ञानानन्तरं बुद्धया रजतोत्पादनात् । विशेपक्षाने तु रजतस्य फल्पितत्वेन आन्तरत्वावुद्धयैव ग्रहणं, न त्विन्द्रियः। अतः सामान्यशाने तु शुक्तिरेव विषयीभूता, तस्या एव सामान्यज्ञानम्। विशेषज्ञानं तु बुद्धिकृतम् इति तत्र वौद्ध- मेव रजतं विषयोभवतीति निष्कर्षः । तदुक्तम्, 'अनुमित- मन्तरा त्वयि विभाति मृपैकरसे' (भाग० १०८७।३७ ) इति । केबाट बुद्धि के द्वारा उत्पन्न या कल्पित किया जाता है अतः सामान्य- शान में यह रजत चक्षुरिन्द्रिय का विषय नहीं होता अर्थात् सामान्य शान होने के समय इस रजत का (अभाव होने के कारण इसका) चक्षुरिन्द्रिय के द्वारा ग्रहण नहीं होता, और विशेप शान की उत्पत्ति के समय इस रजत का बुद्धिपरिकल्पित होने के कारण आन्तर या बुद्धिस्थ होने से बुद्धि के द्वारा ही ग्रहण होता है न कि इन्द्रियों द्वारा । अतः निष्कर्ष यह निकलता है कि सामान्य ज्ञान में तो शुक्ति ही (चक्षुरिन्द्रिय का) विषय होती है और उसी का सामान्य ज्ञान होता है किन्तु विशेष शान तो बुद्धिकृत होता है अतः उसमें घौद अर्थात् बुद्धिपरिकल्पित और बुद्धिस्थ रजत ही (बुद्धि का) विषय होता है । इसीलिये श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि, 'एकरस अर्थात् सर्वदा एकरूप भाप में, (शुक्ति में रजत के समान ) अनुमित, प्रमातृचैतन्य और ब्रह्मचैतन्य के मध्य में यह जगत् मृषा या मिध्या ही प्रतीत होता है' १. 'अनुमितमन्तरा त्वयि विभाति मृपा' इति । इदं जगत् मृपा एव भाति । तत्र हेतु , 'त्वयि' इति । यद्धि यस्मिन् विद्यमाने अतिरिक्त भासते तत्त्वेन तन्मिथ्या इति सिद्धम्, यथा शक्तिकायां रजतम्, तथा 'सर्वमिद ब्रह्म' (इति ) श्रुत्या ब्रह्मविद्भिश्च निर्णीतम, तथापि यदन्यथा भासते जगत्त्वेन तन्मपंव भवितुमर्हतीत्यर्थः । हेत्वन्तरमप्याह, 'अनुमितमन्तरा' इति । प्रत्यक्षे तु रजतं न दृश्यते इन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य शक्तिविषयत्वात् । न हि रजतेन सह सन्निकर्षोऽस्ति, सतोरेव सयोगात् । - प्रथमोऽध्यायः] ख्यातिविवेकः २१९ - . अस्य सुबोधिन्याम् , 'रजतं तु तदनन्तरं वुझ्या जन्यते, विषयी- क्रियते च, तत्र सा बुद्धिरेव कारणम् । ....."इन्द्रियार्थयोर्मध्ये भाति तन्मृपा' (सुबोधिनी १०८७।३७) इति निरूपितम् । अत पर प्रथमस्कन्धे 'तेजोवारिमृदा यथा विनिमयः' (भाग० १११११) श्त्यस्य सुवोधिन्याम्', 'तेजसि वारिबुद्धिः मरीचितोये (सुवा- (भाग० १०1८७३७)। इस श्लोक की सुबोधिनी व्याख्या में 'रजत तो उसके बाद बुद्धि के द्वारा उत्पल ( अर्थात् फल्पित) लौर गृहीत किया जाता है और उसकी उत्पत्ति और गृहोति का करण (या कारण) बुद्धि ही होती है । इन्द्रिय और उसके अर्थ (अर्थात् आह्य विषय) के बीच में जो कुछ भी प्रतीत होता है, मिथ्या है (सुबोधिनी १०८७३७) इत्यादि वाक्यों में इस उपर्युक्त निष्कर्ष का ही निरूपण हुआ है । इसीलिये भागवत के प्रथम स्कन्ध के 'जिस प्रकार तेज, जल और पृथिवी तत्वों का विनिमय या व्यत्यय' (भाग० १1१1१) इस श्लोक की सुबोधिनी टीका में, "तेज को जक समझने का भ्रम, जैसे 'सत्संप्रयोगे पुरुपस्पैन्द्रियाणा बुद्धिजन्म तत्प्रत्यक्षम्' (मीमांसासूत्र ११११४) इति प्रत्यक्षलक्षणम् । रजतं तु तदनन्तरं बुद्धघा जन्यते विपयोक्रियते च । तर सा बुद्धिरेप करणम् , तेन 'जानकरणकं ज्ञानम् अनुमानम्' इति रजतमनुमितिविषयो भवति । किच, 'अन्तरा विभाति' इन्द्रियार्ययोर्मध्ये भाति तन्मपा । तया मत्रापि प्रमातृचतन्याह्म- चंतन्ययोमध्ये जगद् भाति इति । पावदेतयोर्न सम्यक् परीक्षा तावत्प्रति- भासते मतोऽन्तरंख विभाति ।"विश, 'एकरसे त्वयि' यमानाप्रकारण भाति तन्मपैवेति ज्ञातव्यम्, यर्यकस्मिन् चन्द्रे द्वतप्रतीतिन्त्यिा।" (सुबोधिनी १०1८३७)। १. 'पृपिन्यमेजसामन्योन्यस्मिन बन्योऽन्यावभासो यया मृपा द्रष्टुरेव तपावुद्धिजनक. न तु विषयस्तादृश इत्यर्प | तेजसि वारिद्धिःमरीचि- तोये, वारिणि पृथिवीबुद्धिः तमिलाया जलादौ, तपा मभ्यादिप्वग्निबुद्धिः, २२० प्रमेयरत्नार्णवे [ उत्तरार्दै धिनी १०१।१ ) इत्यारभ्य, 'शुक्तिरजतादिषु' (सुयोधिनी १।१।१) इन्यन्तेन नानाभ्रमानुस्त्वा भ्रमविषयाणां वुद्धिजन्यतोक्ता, 'यथा जीवानां बुद्धिकल्मिता' (सुवोधिनी १११११) इत्यनेन । निश्चयात्मके शाने तु इन्द्रियार्थ एव वुद्धथा गृह्यते, न तत्र बुद्धिकल्पितो विषयः । इन्द्रियतदर्थयोर्मध्ये यदुद्धावन्यदेव भाति तन्मृपा, तादृशं शानं भ्रमात्मकम् । एवं सति इन्द्रियेण गृह्यमाणाद्विपयाच्छुक्त्यादिरूपादन्यस्य रजतादेः स्यातिः अन्यख्यातिः इत्युच्यते । तदिदं भ्रमात्मक मरमरीचिका में जल की भ्रान्ति' (सुनोधिनी १1१12) इत्यादि वाक्यों से प्रारम्भ कर, 'सजातीय भ्रम, जैसे शुक्ति को रजत समझ लेना आदि' (सुबोधिनी १1१19) इस वाक्य तक विभिन्न भ्रमों का उल्लेख कर, "जिस प्रकार भ्रम के ये विपय जीवों की बुद्धि के द्वारा कल्पित होते हैं' (सुनोधिनी १११११) इत्यादि वाक्य द्वारा भ्रम के विषय के बुद्धिजन्य अर्थात् बुद्धि द्वारा कल्पित या मायिक होने का सिद्धान्त प्रतिपादित किया गया है। निश्चयात्मक ज्ञान (अर्थात् प्रमा) में तो इन्द्रिपार्थ (अर्थात् इन्द्रिय द्वारा गृहीत होने वाले पदार्थ या इन्द्रिय के विषय) का ही बुद्धि के द्वारा ग्रहण होता है, वहाँ बुद्धिकल्पित विषय नहीं होता | इन्द्रिय और उसके द्वारा ग्राह्य विषय या पदार्थ के बीच में जो अन्य ही पदार्थ बुद्धि में प्रतीत होता है यह मिथ्या होता है और उसका जान भ्रमात्मक होता है। इस प्रकार इन्द्रिय के द्वारा गृहीत हो रहे शुक्ति आदि रूप विपय से भिन्न रजत आदि रूप अन्य पदार्थ की ख्याति या प्रतीति अन्य- मृदि काचादी वारिबुद्धिः, मेघेषु चन्द्रबुद्धिः, चन्द्रकिरणे वस्त्रबुद्धि, सजातीयभ्रमाश्च शक्तिरजतादिषु । ते यथा जीवाना बुद्धिपरिकल्पिता, तथा च भगवति देहेन्द्रियान्त.करणवत्त्वम् अवतारादिषु मया ।' ( सुधी- 'पिनी ११११) । द्रष्टव्य, भाग० श१ की बालप्रबोधिनी ।
थमोऽध्यायः] ख्यातिविवेकः २२ निं वुद्धिवृत्तिरूपं विपर्यासशब्दवाच्यम् । अत एव 'विपर्यासो भेन्नार्थप्रतिपादक' (सुघोधिनी २२६।३०) इत्युक्तं सुबोधिभ्याम् । मिन्नार्थ (सुबोधिनीश२६।३०) इत्यत्र इन्द्रियसंयुक्तार्थाद्भिन्नोऽर्थ इत्यूहाम् । एतायता निरुपाधिभ्रमे इन्द्रियाणि सन्तमेवार्थ विषयीकुर्वन्ति, न त्वसन्तम्। अत एव उद्धवं प्रति उक्त भगवता, 'मनसा वचसा दृष्टया गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियः। अहमेव न मत्तोऽन्यद् इति बुद्धयध्वमञ्जसा ।। (भाग० १२१३। २४) इति । बुद्धिस्तु प्रमात्मके निश्चयापरपर्याये शाने सन्तं विपयोकरोति,विपर्यासशाने तु स्वकल्पितं रजतादिकं मायिक- मेव विषयीकरोति, अत इन्द्रियविषयो वाह्य एव । अत एव ख्याति कही जाती है। यह उपर्युक्त भ्रमात्मक ज्ञान बुद्धिवृत्तिरूप है और विपर्यास कहा जाता है। इसीलिये सुनोचिनी में कहा गया है कि 'विपर्यास मिन्नार्थप्रतिपादक होता है' (मुनोधिनी ३१२६।३०)। मुबोधिनी के 'मिन्नार्थप्रतिपादक' इस पद मे आया 'मिन्नाथ' यह शब्द इन्द्रियरयुक्त (अर्थात् इन्द्रियसन्निकृष्ट या इन्द्रिय द्वारा गृहीत हो रहे) पदार्थ से भिन्न पदार्थ का सूचक है ऐसा समम लेना चाहिए । इस उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि निरुपाधिक भ्रम के स्थल में इन्द्रियाँ विद्यमान पदार्थ का ही ग्रहण करती है, न कि अविद्यमान और अवास्तविक या मायिक पदार्थ का । इसीलिये भगवान् श्रीकृष्ण ने उद्भय से कहा था कि "मन, वाणी, दृष्टि तथा अन्य इन्द्रियों के द्वारा भी पो कुछ कुछ गृहीत किया जाता है, वह सब मै ही हूँ, मुक्ष से मिल और कुछ नहीं है', यह आप रोग समझ लीजिये।" (माग० ११११३।२४)। बुद्धि, निश्चय के नाम से अभिहित क्येि जाने वाले प्रमात्मक ज्ञान में विद्यमान पदार्थ को विषय बनाती अर्थात् ग्रहण करती है, किन्तु विपर्यास शान अर्थात् भ्रमस्थल में अपने ही द्वारा कल्पित रजत आदि--जो मायिक ही होते है-को विषय बनाती २२२ प्रमेयरलार्णवे [उत्तरार्दै 'सर्व पुरुप एवेदम् (भाग० श६१५) इति द्वितीयस्कन्धश्लोक- व्यारयान उक्तम् , 'इदमपि परिदृश्यमान जडात्मकं सर्व पुरुष एवं' (सुबोधिनी २६१५) इति । इन्द्रियतद्विषययोर्मध्ये माया- दूपितबुद्धया यो विषयीक्रियते स तु अवास्तव एव बुद्धि- कल्पित इति शेयम् । मायावादिनस्तु, "शुक्तिरूपाधिष्ठाने उत्पन्नेन अनिर्वच नीयेन रजतेन चक्षुःसन्निकर्ष 'रजतमिदम्' इति भ्रमो भवेत् , न तन शुक्तिसामान्यज्ञानस्य हेतुत्वं,प्रयोजनामावाद” इत्याहुः। तन्मन्दम्, शुक्तेश्चाकचफ्यादितियुद्धरुत्पादितत्यान, शुक्ति सामान्यज्ञानकारणतायाः निर्वचनीयत्वात् । अर्थात् ग्रहण करती है। अतः इन्द्रियों का विषय तो गाह्य पदार्थ ही होते हैं। इसीलिये भागवत के द्वितीय स्कन्च के 'यह सब पुरप ही है' ( माग० १६१५) इस श्लोक की सुबोधिनी व्याख्या में श्रीवल्लभा- चार्य ने कहा है कि 'यह परिदृश्यमान समस्त जडात्मक (जगत् ) मी पुरुप ही है। (सुचोयिनी ।६।१५)। इन्द्रिय और उसरे ग्राह्य विपय के मध्य मे जो आन्तरालिक पदार्थ माया के द्वारा दूषित बुद्धि से गृहीत होता है वह अवास्तविक और बुद्धिकल्पित ही होता है ऐसा समझना चाहिए। मायागादी दार्शनिक कहते हैं कि “शुचिरूप अधिष्ठान में उत्पन्न अनिर्वचनीय रजत से चक्षुरिन्द्रिय का सन्निकर्ष होने पर 'यह रजत है' ऐसा भ्रम होता है, ऐसा मानना चाहिए ओर शुक्ति ये सामान्य ज्ञान को इस भ्रम का कारण नहीं कहना चाहिए क्योंकि उसका कोई प्रयोजन नहीं है", किन्तु उनका यह कहना ठीक नहीं है क्योंकि शुक्ति में रजतबुद्धि (अर्थात् शुक्ति के रजत होने की भ्रान्ति ), शुक्ति की चमक आदि के ज्ञान के कारण ही उत्पन्न होती है 217 सामान्य ज्ञान को इस भ्रान्ति (या अनिर्वचनीय रजत शक्ति के प्रथमोऽध्यायः] ख्यातिविवेकः २२३ केचित्तु,'माययानिर्वचनीयमुत्पादितं रजतं चक्षुपोपलभ्यते- ऽतो न रजतभ्रमेऽधिष्ठानसामान्यज्ञानस्य हेतुत्वम्' इति वदन्ति । तदप्ययुक्तम् । मायोत्पादितरजतस्य विद्यमानत्वे तत्कृतशुक्तिशानप्रतिवन्धात् कदापि शुक्तिज्ञानं न भवेत् , रजतनाशहेतोरन्यस्याभावात् , कदापि रजतध्वंसाभावात् । 'रजतशाने सत्यपि शुक्तिज्ञानम्' इति तु अनुभवविरुद्धत्वान्ना- द्रियते विद्वद्भिः। तथा च अधिष्ठानरूपशुकिविषयकविशेष ज्ञानाभावात्कदापि रजतध्वंसो न स्यात् । एवं सति सदैव रजतप्रत्यय आपद्येत । यदि तु, 'मायया विरचितं माययैव कारण कहा जा सकता है। कुछ लोगों का कहना है कि 'रजतभ्रम के स्थल में माया द्वारा उत्पन्न किया गया अनिर्वचनीय रजत चक्षुरिन्द्रिय द्वारा गृहीत होता है अनः (शुक्तिकादिरूप) अधिष्ठान के सामान्य ज्ञान को उस रजत- भ्रम का कारण मानना ठीक नहीं है, किन्तु उन लोगों की यह बात भी अधोलिखित कारणों से युक्तियुक्त नहीं है। माया के द्वारा उत्पन्न किये गये (अनिर्वचनीय) रजत के विद्यमान होने पर उसके शुक्ति के ज्ञान के प्रतिनन्धक होने के कारण शुक्ति के ज्ञान में बाधा आ जाने से शुक्ति का ज्ञान कभी भी न हो सकेगा क्योंकि इस (मायाजन्य अनिर्वचनीय) रजत के नाश के किसी अन्य हेतु का अभाव होने से कारण इसका कभी नाश ही न होगा; और यदि वे यह कहे कि रजत रे ज्ञान के होते हुए भी शुक्ति का ज्ञान हो जायेगा तो उनकी यह यात अनुभवविरुद्ध होने के कारण विद्वानों के लिये आदरणीय या स्वीकार्य न होगी। इस प्रकार अधिष्ठानरूपशुक्तिविषयक विशेषज्ञान के अभाव में रजत का नाश कभी होगा ही नहीं और तर रजत की प्रतीति के सार्वकालिक या नित्य होने का प्रसङ्ग उपस्थित होगा । यदि मायायादी यह कहें कि वे माया द्वारा उत्पन्न दिये गये रजत का माया ।
२२४ प्रमेयरत्नार्णवे [उत्तरार्द्ध चस्यते' इत्युररीक्रियेत, तदा तु दाान्तिके प्रपञ्चे तथैव स्वीकार्यत्वान्मायाघटितः प्रपश्चो माययव नष्टो भविष्यति इति व्यर्थो ज्ञानप्रयासो वेदान्तशास्त्रवैयर्थ्यञ्च। 'ज्ञाननाश्यः प्रपञ्च' इति भवत्सिद्धान्तोऽपि नाशं प्राप इत्याकलनीयम् । अत एव आत्ममायायनं हरेः' (भाग० ३७।१६) इत्यस्य व्याख्याने 'मायया कृतो योऽन्तरासर्गः स त्वपार्थ एवाभाति । अन्तराभानात्तलस्पर्श च महायभानात्तदैव गच्छतीति निर्मलत्वम् (सुबोधिनी ३७१६) इत्याधुक्तम् । 'मध्यस्थमात्रानुवादो या के द्वारा ही नष्ट किया जाना स्वीकार करते हैं तो उन्हें दान्तिक प्रपञ्च अर्थात् इस जगत् के बारे में भी यही बात स्वीकार करनी पड़ेगी और मानना पड़ेगा कि माया द्वारा उत्पन्न प्रपञ्च माया के द्वारा ही नष्ट हो जायेगा। ऐसी दशा में ज्ञानप्राप्ति के लिये उनका प्रयल और समग्र वेदान्तशास्त्र सब व्यर्थ हो जायेंगे और उनका यह सिद्धान्त भी समाप्त हो जायेगा कि प्रपञ्च जाननाश्य है अर्थात् जगत् की निवृत्ति शान से होती है । इसीलिये श्रीमद्भागवत के 'अरममायायनं हरेः' (भाग० ३।७।१६) इस श्लोक' की सुबोधिनी व्याख्या में श्रीवल्लभाचार्य ने कहा है कि 'व्यामोहिका माया के द्वारा की गयी जो आन्तरालिकी सृष्टि प्रतीत होती है यह अपार्थ अर्थात् अवास्तविक ही है।"उसका माया के अतिरिक्त कोई अन्य मूल न होने के कारण और उसके आन्तरालिक प्रतीति मात्र होने के कारण तथा अधिष्ठान का स्पर्श करने पर ब्रह्म की प्रतीति होने से तरक्षण ही समाप्त हो जाने के कारण उसे निर्मूल कहा गया है।' १. साध्येतद्वघाहृतं विद्वप्नात्ममायायनं हरेः । मात्यपाषं निर्मूलं विश्वमूलं न महिः ॥ (भाग० ३।७।१६)। २. 'आत्ममायायनं हरेः' इति । हरेः सम्बन्धिनो य आत्मानौ जीवाः, वेपो या माया व्यामोहिका पूर्व चतुःश्लोक्यां निरूपिता तस्या मायाया अयनं स्यानं विषयाकारो ग्रह्म, जडत्वेन आत्मानात्मले यत् स्फुरति तद् प्रथमोऽध्यायः] ख्यातिविवेकः २२५ मायावादिवद्' (सुबोधिनी २७१६) इत्यप्युक्तम् । अतो शायत इन्द्रियविषययोः सम्बन्धे सामान्यज्ञाना- नन्तरं ययुद्धौ माया मायिक पदार्थ निर्माय बुद्धिविषयी. कारयति तद्वोदं शानं भ्रमात्मकम् , तद्विपयश्च मायिको वौद्धो घटादिः, अयमेव बुद्धौ भातः पदार्थ आन्तरालिकी सृष्टिरित्यु- (सुबोधिनी ३।७।१६) इत्यादि । इसी प्रकार उन्होंने यह भी कहा है कि 'अथवा मायावादी के समान यहाँ इस सृष्टि के मध्यस्थ मात्र होने की बात कही गयो है' (सुबोधिनी ३१७/१६)। इससे यह ज्ञात होता है कि इन्द्रिय और पदार्थ का सम्बन्ध अर्थात् सनिकर होने पर सामान्यज्ञान की उत्पत्ति के बाद माया बुद्धि में मायिक पदार्थ का निर्माण ( अर्थात् उसकी कल्पना) फर उसे बुद्धि का विषय बना देती है (अर्थात् यह पदार्थ बुद्धि द्वारा गृहीत होता है)। बुद्धि द्वारा होने वाला यह शान भ्रमात्मक होता है और इस शान का विषय भी मायिक एघ बुद्धिकल्पित बुद्धिस्थ घटादि ही होता है । बुद्धि में अपार्थम् एव स्फुरति । मायैव वा अयनं यस्य इति । मायाकृतो योऽन्तरा- सर्ग. स तु अपार्थम् एव आभाति । वस्तु दूरीकृत्य निविषयकमेव ज्ञान मायावृत यत्किञ्चिद्विपयत्वेन भाति । तहि सर्वदेव भायात, ततश्चानिर्मोक्ष- प्रसङ्ग इत्याशङ्कयाह-निर्मूलम् इति । मायातिरिक्तमूलामावाद् अन्तरा- भानात्, तलस्पर्शे ब्रह्मावमानात् तदैव गच्छतीति निर्मूलत्वम् । एवमेव हि शक्तिकाया रजतप्रतीतिरन्तरा भासते, तलस्पर्श च निवर्तत इति ।" जगद् भगवान् कर्तृत्वञ्च श्रुतिसिद्ध सत्यमेव । सृष्टस्य ब्रह्मस्वरूपस्य जगत तपात्वप्रतीतो व्यामोहिकया मायया मध्ये अन्यथैव प्रत्यास्मते ("विषयता- रूपं विकृतं जगत् कृत्वा ब्रह्मरूपे जगति जहमोहात्मकत्वं तुच्छत्वं प्रत्याप्यते, आत्मरूपेऽनारमत्व व प्रत्याय्यत इत्यर्थः', सुबोधिनीप्रकाश )। अविकृत कार्य कारणं कृतिय । युष्माकम् इति वचनाप्न सर्वेषामयमनुभव । (सुबोधिनी ३१६)।
२२६ प्रमेयरलार्णवे [उत्तरार्द्ध ध्यते,तस्यैव मिथ्यात्वम् , न तु भगवत्कृतप्रापञ्चिफघटपटादेः, अतो महता यत्नेन परिदृश्यमानप्रपञ्चस्य मिथ्यात्वं दूरीकृत- चान् भगवान् भाप्यकारः। औपाधिके 'घटो भ्राम्यति', 'शाः पीतः' इत्यादिभ्रमे तु चक्षुधे घटशहादौ भ्रमरिकाकामलाद्युपाधि पुरस्कृत्य भ्रमणपीतत्वादिरूपो मायिको धर्मों विषयतारूपो मायया सृज्यते । स च धर्मों धर्मिणां घटशहादीनां चाक्षुषे चक्षुपा गृह्यते । अत एवोक्तं सुयोधिन्याम् , 'विषयता मायाजन्या विपयो भगवान" (सुयोधिनी २।९।३३) इति । 'विपये विषयता काचित् प्रतीत होने वाला यह मायिक और बुद्धिपल्पित पदार्थ ही आन्तरालिकी सृष्टि कहा जाता है, तथा मिथ्या भी यह आन्तरालिक सृष्टि रूप मायिक पदार्थ ही होता है न कि भगवान् द्वारा सृष्ट प्रापचिक घटपटादिरूप यस्तुसमूह । इसीलिये भगवान् भाग्यकार ने बड़े परिश्रम से इस परि- दृश्यमान जगत् को मिय्या मानने के मत का निराकरण किया है। (भ्रमरिकाग्रस्त पुरुष को होने वाले,) 'घट ( मेरे चारों ओर तेजी से ) घूम रहा है' इस औपाधिक भ्रम, तथा (फामलारोग से प्रस्त व्यक्ति को होने वाले,) 'यह शड्स पीला है' इस औपाधिक भ्रम में माया, चक्षुरिन्द्रिय के ग्राह्य घट, शङ्ख आदि मे घुमनी (भ्रमरिका) और कामलारोग की उपाधिपूर्वक भ्रमण अर्थात् घट के घूम रहे होने ) और पीतत्व (अर्थात् शङ्ख के पीले होने ) आदि विषयतारूप मायिक धर्मों को उत्पन्न कर देती है और वे मायिक धर्म घट, शङ्ख आदि धर्मी पदार्थों के चक्षुरिन्द्रिय द्वारा गृहीत होने पर उनके साथ ही चक्षुरिन्द्रिय द्वारा गृहीत होते हैं। इसीलिये श्रीमद्वल्लभाचार्य ने सुबोधिनी में कहा है कि 'विपयता मायाजन्य है और विषय भगवान् (अर्थात् भगवद्प) है' (सुपोधिनी १९३३), 'अतः विषय में कोई १. द्रष्टव्य, कपर पृष्ठ १३ तथा सुवोषिनी प्रकाश, २।९।३३ ।
प्रथमोऽध्यायः] यांतिविवेक २२७ स्वी कर्तव्या... अन्यथा" "प्रेमहष्टिनिविषया- स्याद् (सुबोधिनी २२९॥३३) इति । 'विषयताजनितं ज्ञान भ्रमात्मकर, विषयजनित अमेति',(सुबोधिनी २१९/३३) च । तथा च तं भ्रमणपीतत्यादि रूपं मायिक धर्ममवलोक्य मायया मोहिता बुद्धिः धर्मिणं शहादिमिव पोतत्वादिकमपि वस्तुभूतं निर्धार्य तद्विशिष्टं शङ्ख स्वीकरोति, तदा तद्भ्रमात्मकं ज्ञानं भवति । एवं सति चुद्धया पीतत्ववैशिष्टयन कल्पित एवं शङ्को मायिकः, न तु चक्षुर्गृहीतः। विषयता स्वीकार करनी चाहिए, (जिसके कारण दृष्टि सविषया हो जाती है,) अन्यथा (विपयता स्वीकार न करने पर, भ्रमरिकामस्त व्यक्ति के चारों ओर के घटपटादि पदार्थों के स्थिर होने के कारण, उन घटपटादि पदार्थों के अपने चारों ओर घूम रहे होने का भ्रमरिकाग्रस्त पुरुष का) भ्रमात्मक ज्ञान निविषय हो जायेगा।' (सुबोधिनी २।९।३३); 'विषयता- जनित ज्ञान भ्रमात्मक अर्थात् प्रान्त होता है और विपयजनित ज्ञान प्रमा ( अर्थात् यथार्थ, प्रामाणिक और निश्चयात्मक होता है)। (सुबोधिनी २।९।३३)। उन उपर्युक्त भ्रमण, पीतत्व आदि रूप मायिक घों को देख कर माया के द्वारा मोहित बुद्धि, घट, शङ्ख आदि धर्मियों की ही भाँति भ्रमण, पीतत्व आदि धर्मों को भी वास्तविक समझ कर भ्रमणविशिष्ट घट एवं पीतत्वविशिष्ट शङ्ख का ग्रहण करती है और तब 'घट घूम रहा है, 'शङ्क पीला है' इत्यादिरूप भ्रमात्मक ज्ञान होता है । इस प्रकार बुद्धि के द्वारा पीतत्वविशिष्टरूप में कल्पित या गृहीत शस ( अर्थात् जिसे बुद्धि पीला समझ रही है वह पीला शव ) ही मायिक या मिथ्या है, न कि चक्षुरिन्द्रिय द्वारा गृहीत हो रहा प्रापश्चिक शङ्ख । १. द्रष्टव्य, कपर पृछ १२, वथा सुवोधिनीप्रकाश, २।९।३३ । २. उपलब्ध सुबोधिनी का पाठ 'भ्रान्तम' है। ३. द्रष्टव्य, ऊपर पृष्ठ १४, तथा सुबोधिनीप्रकाश, २१९३३३ ।
२२८ ममेयरलार्णवे [उत्तय न च 'चक्षुपा गृहीतस्य घटस्य भगवत्वं न सम्भवति, भगवत इन्द्रियामाहात्वाद्' इति वाच्यम्, 'न चक्षुषा गृह्यते' (मुण्ड० उप० ३।१०८) इत्यादिश्रुतीनां मूलरूपपरत्वाद् गृह्यमाण- घटस्य भगवतःसदंशत्याद् ग्राहकस्येन्द्रियस्यापि भगवत्सदंश- त्वेनादोषाच, ग्राह्यस्य घटस्य विषयतावैशिष्टयन शुद्धत्वा- भाववद् ग्राहकस्येन्द्रियस्यापि विषयतावैशिष्टयन तुल्यत्वाच्च । सोऽयमौपाधिकधों रजतादिभ्रमवनाधिष्ठाननाश्यः । कामलादिदोपो भ्रमरिकादोपश्च यदा नश्यति तदेव नश्यति । यह कहना भी ठीक न होगा कि 'भगवान् के इन्द्रियाग्राह्य और हन्द्रियातीत होने के कारण चक्षुरिन्द्रिय द्वारा गृहीत होने वाले घट का भगवत्त्व (अर्थात् भगवद्रूप होना ) सम्भव नहीं है, क्योंकि 'वह चक्षु. रिन्द्रिय द्वारा गृहीत नही होता ( अर्थात् दृष्टिगत नहीं होता) है (मुण्ड• उप० ३१८), इत्यादि श्रुतिवाक्य मूलरूपपरक (अर्थात् भगवान् के मूलरूप के निरूपक ) है और चक्षुरिन्द्रिय द्वारा गृह्यमाण प्रापञ्चिक घट तथा उस घट का ग्रहण करने वाली चक्षुरिन्द्रिय दोनों के भगवान् का सदश होने के कारण चक्षुरिन्द्रिय द्वारा भगवान् के सदश- रूप प्रापञ्चिक घटादि का ग्रहण होने के सिद्धान्त को मानने में कोई दोष नहीं है । ग्राह्य घट के विषयताविशिष्ट होने से शुद्ध न होने की ही भाँति, ग्रहण करने वाली इन्द्रिय के भी विषयताविशिष्ट होने से उसी के समान होने (अर्थात् शुद्ध न होने ) से भी सिद्धान्ती के उपर्युक्त पक्ष की ही पुष्टि होती है। यह ( भ्रमण, पीतत्व आदिरूप उपर्युक्त) औपाधिक धर्म (शुक्ति में होने वाले) 'यह रजत है। इस प्रकार के भ्रम की भाँति अधिष्ठान- नाश्य नहीं होता है, तात्पर्य यह है कि शुक्तिरजत के अधिष्ठान शुक्ति का ज्ञान हो जाने पर उसके रजत होने का भ्रम दूर हो जाता है, पर भ्रमण (घट का घूमना ) और पीतत्व (शङ्ख का पीला होना) आदि रूप प्रथमोऽध्यायः] ख्यातिविवेकः २२९ भ्रमरिकादशायां 'घटे भ्रमणं नास्ति' इति ज्ञानवतोऽपि 'भ्राम्यति' इति प्रतोतेः सार्वजनीनत्वात् । एवञ्च निरुपाधिके रजभुजहादिभ्रमे चक्षुषा सद्रुपैव रजुः गृह्यते, भुजगस्तु बुद्धिकल्पितो बुद्धया विषयीक्रियते, न चक्षुपा, बुद्धिकल्पितस्य भुजङ्गस्य बाह्य वाभावात् , दशमस्कन्धजन्म- प्रकरणचतुर्थाध्यायसुबोधिन्याम् 'यथानेवंविदो भेदः (भाग० १०।४।२०) इत्यस्य विवरणे 'घुझ्या बहिर्विपयोत्पादनासम्भवाद् औपाधिक धर्म इस प्रकार अर्थात् अधिष्ठान के शानमात्र से समात या नष्ट नहीं हो जाते प्रत्युत तभी समाप्त होते हैं जब धुमनी (भ्रमरिकादोष) और कामलारोग आदि समास हो जाते है, क्योंकि घुमनी की स्थिति में तो 'घट में घूम रहे होने का धर्म नहीं होता है' यह जानने वाले व्यक्ति को भी, 'घट घूम रहा है। इस प्रकार की प्रतीति होना सार्वजनीन (अर्थात् सार्वजनिक अनुभव का विषय ) है । इस प्रकार निरुसायिक रज्जुसादिके भ्रम में चक्षुरिन्द्रिय द्वारा सद्रूप रनु का दी ग्रहण होता है ( सई का नहीं ), सर्प तो बुद्धि कल्लित होता है और बुद्धि के द्वारा ही गृहीत होता है, चक्षुरिन्द्रिय द्वारा नहीं, क्योंकि बुद्धिकल्पित सर्प के बहिर्देश में न होने के कारण उसका इन्द्रिय द्वारा ' ग्रहण हो सकना सम्भव नहीं है । घुद्धिकल्पित सर्प के बाह्यत्व (अर्थात् बहिर्देश में हो सकने) की सम्भावना नहीं है इस बात की सिद्धि श्रीमद्भागवत के दशमस्कन्ध के जन्मप्रकरण के चतुर्थ अध्याय के जैसे ऊपर प्रतिपादित तन को इसी रूप में सम्यक् प्रकार से न जानने वाले । १. 'भेदस्तु द्वित्वसाध्यः, न हि एकस्मिन् भेदबुद्धिर्भवति, द्वित्व त्वपेसाबुद्धिजन्यम् । अतो द्वित्व न वस्तुनिष्ठं किन्तु बुद्धिस्थविषयकमेव, बुद्धया वहिविषयोसादनासम्भवात् । अतो ज्ञानकृत एव भेदो भवति, अपेक्षाविषयाणामभावात् ।' ( सुदोषिनी १४२०)।'
२३० प्रमेयरलार्णवे [उत्तराडे (सुबोधिनी १०४।२०) इत्युक्तरवात् । औपाधिकनमे तु चर्पा सद्पो घटो, मिथ्याभूतो विष यतारूपो भ्रमणधर्मश्च इत्युभय विपयोक्रियते, तदनन्तर सदोपयुद्धया 'घटो भ्रमणवान्' इति स्थाप्यत इति विशेष । इमामेव विषयता भ्रमणादिरूपा विपयेण सह गृह्यमाणाम् अमृश्य इन्द्रियग्राह्यस्यापि मिथ्यात्व क्वचिद्भागवते सुरो धिन्याञ्च उत्तम् , विपयेण घटेन सह विपयतारूपभ्रमणस्यापि चभुछत्वात् । अगापि योद्ध एव घटो मिथ्या, न तु प्रपञ्चा न्तर्वाति निष्कर्ष । व्यक्ति को भेदबुद्धि होती है' (भाग० १०४।२०) इस श्लोक की सुबोधिनी व्याख्या में कहे गये, श्रीवल्लभाचार्य के, 'बुद्धि के द्वारा पहिर्विषय भर्थात् याह्य या बहिर्देश में विद्यमान विषय को उत्पन्न कर सकना सम्भव न होने के कारण' (सुबोधिनी १०४।२०), इत्यादि वाक्यों से होती है। औपाधिक भ्रम म उपर्युक्त ( रज्जुसादिरूप) निरुपाधिक भ्रम की अपेक्षा वैशिष्टय यह होता है कि इसमें सद्रूप घट और मिथ्याभूत विषयतारूप भ्रमणधर्म ( अर्थात् घर का घूम रहा होना), दोनों गृहीत होते हैं और फिर सदोषबुद्धि के द्वारा 'घट भ्रमणशील है (अथात् घूम रहा है ) इस प्रकार की स्थापना की जाती है। (घादिरूप) विषय के साथ गृहीत की जाने वाली इस भ्रमणादिरूपविषयता को दृष्टिगत करके ही भागवत तथा उसकी सुबोधिनी व्याख्या मे कहीं कहीं इद्रिय ग्राह्य पदार्थों को भी मिथ्या कह दिया गया है, क्योंकि घटादिरूप विषय के साथ ही उसका विषयतारूप भ्रमण (घूम रहा होना) भी तो चक्षुरिन्द्रियग्राह्य होता ही है ! इसलिये हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि बौद्ध अर्थात् शुद्धिकल्पित और बुद्धिस्य घट ही मिथ्या है न कि प्रपञ्चान्तर्वर्ती घर प्रथमोऽध्याय.] पातिविवेक. २३१ इदमत्र शेयम् । प्रपञ्चविचारे भ्रमणवद्धट एव दृष्टान्तः । तत्र यथा घटस्य सत्यत्वं भ्रमणस्य मायिकत्वम् , एवं प्रपञ्च स्यापि सत्यत्वं तद्गतानां भेद-कुत्सितत्योत्पत्तिनाशादीनां मायिकत्वम् । अत एव उद्धवं प्रति उक्त भगवता, 'यदिदं मनसा याचा चक्षुभ्यो श्रवणादिभिः । नश्वरं गृह्यमाणञ्च विद्धि मायामनोमयम् ।।' (भाग० ११६७१७) इति । 'नश्वरम्' इति पदाद्यन्नश्वरं गृह्यते तदेव मायामयम् इतस्तु परं सत्यमेव इत्यर्थः स्फुटति । एतच्चौपाधिकभ्रमे स्फुटम् । अत एव 'नाशोत्पत्तिप्रतीतिर्धान्ता" (विद्वन्मण्डनम् , इस विषय में यह अवधेय है कि प्रपञ्च के स्वरूप के विचार दे प्रसङ्ग में भ्रमणशील (अर्थात् घूमते प्रतीत हो रहे ) घट का दृष्टान्त ही शास्त्रानुकूल है। जिस प्रकार प्रापचिक घट सत्य है और उसका भ्रमण मायिक है ( अर्थात् भ्रमरिकाग्रस्त व्यक्ति को होने वाली, 'घट धूम रहा है। यह प्रतीति मिथ्या है), उसी प्रकार प्रपञ्च भी सत्य है किन्तु प्रपञ्च में प्रतीत होने वाला भेद (अर्थात् नानात्व या वैविध्य ), कुत्सितत्व, उत्पत्ति, नाश आदि मायिक है । इसीलिये भगवान् श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा था कि 'हे उद्धव यह जो कुछ मी मन, वाणी, नेन तथा श्रवणादि इन्द्रियों द्वारा गृहीत किया जाता है सब नधर, मायामय (अर्थात् मिय्या) और मनोमय (अर्यात् मन का विलास मार) है, ऐसा समझो' (भाग० ११९७७)। इस श्लोक में आये 'नश्वरम्' पद से यह अर्थ सूचित होता है कि 'जो नश्वर गृहीत होता है वही (अर्थात् नश्वरत्व ही) मायामय है, इससे भिन तो परम सत्य ही है। यह बात औपाधिक भ्रम में सष्ट हो जाती है। इसीलिये श्रीनिहाय ने अपने पितामण्डनम् नामफ अन्य में यह प्रतिपादित १ द्रष्टव्य, 'यादिर्मावतिरोभावावेव श्रुत्यभिमतो, नाशोत्पत्तिप्रतीति- न्तिा इति । (विद्वन्मण्डनम्, चौखम्बा संस्करण, पृ० ३६ ) इत्यादि ।
२३४ प्रमेयरलार्णवे [उत्तरार्दै एव संसारिजीच शुद्धजीवयोरप्यवान्तवो भेदः संसाररूपो पाधिकृत एव, शुद्धजीवस्य भगवदशत्वेन ससारिजीवस्यापि तदभेदेन शुद्धब्रह्मरूपत्वात् । मिथ्यात्वं तु संसाररूपोपाधिपर्यचसन्नम् । अत एप निबन्ध उक्तम् , 'जीवससार उच्यते" (शास्त्रार्थप्र० का०२३) इति । 'उच्यते न तु जायते" (शास्त्रार्थप्र० प्र०२३) इति, 'मसत्त्वेनास्य गणनाद्' (शास्त्रार्थप्र० प्र०२३) इति व्याख्यातञ्च। इसी प्रकार ससारी जीव और शुद्ध जीव मे भी ससाररूपोपाधिकृत अवास्तविक भेद ही है क्योंकि शुद्ध जीव भगवदश है और ससारी जीव भी उससे अभिन्न होने के कारण शुद्धब्रह्मरूप ही है। मिथ्यात्व ससाररूप उपाधि में पर्यवसित होता है। इसीलिये तत्त्वार्थदीपनिबन्ध में श्रीवल्लभाचार्य ने कहा है कि भगवान् की अविद्या नामक शक्ति के कारण जीव के ससार की बात कहा जाती है' (शास्त्रार्थप्र० का० २३)। अपने इस कथन की व्याख्या उन्होंने अधोलिखित वाक्यों में की है । भगवान् की अविद्या नामक शक्ति के कारण जीव के ससार की बात कही जाती है। जीव का यह ( अहन्ता- ममतात्मक) ससार वस्तुत उत्पन्न नहीं होता क्योंकि यह भमिमत्या मक भर्यात् काल्पनिक है और इसकी गणना असद्रूप पदार्थों में की मायारूपम् अनुप्रवेशको जीव (पाठान्तरे, 'अनुप्रवेशतो जोवरूपम' ) इति सर्व जगत सर्वप्रकारेणाहमैवेति ज्ञात्वा स्वस्वरूपमपि तथा ज्ञातव्यम ।" (सुबोधिनी २१९/३२) । १ 'प्रपनी भगवत्कार्य तद्रूपो मापयाभवत् । तच्छपत्याविद्यया त्वस्य जीवसबार उच्यते ॥' (शास्त्रार्थन० का० २३)। २ 'अस्म भगवत शयत्या अविद्यया जीवस्य संसाद उच्यते, न तु जायते, अभिमत्यात्मकत्वादसत्त्वेनास्य गणमात । , - - नयमोऽध्यायः] ख्यातिविवेकः २३५ अत एव: य एव वैद्धः तस्यैव साधनसम्पत्तौ मुक्तिः इति पन्धमोक्षम्यवस्था च सम्यगुपपद्यते न च एवं जगत्कर्तृत्वादिविशिष्टतहितनह्मणोरपि औपा- धेकमेदाङ्गोकारे स्वसिद्धान्ताविरोध' इति वाच्यम् , 'यतो या मानि भूतानि जायन्ते (तैत्ति० उप० ३६१), 'तस्माद्वा एतस्मा- मात्मन आकाशः सम्भूतः' (तैत्ति० उप० २१), 'एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च' (मुण्ड० उप० २१॥३), 'तदात्मान स्वयमकुरुत' (तैत्ति उप० २७) इत्यादिश्रुतिसिद्धस्य जग स्कर्तृत्वादेनित्यसिदस्य धर्मस्योपाधित्वाभावात् । अतो जग- कर्तृत्वादिधौतधर्मविशिष्टं निरुपाधिकमेव, न तु सोपाधिकम् गयो है' (शास्त्रार्थप्र० प्र० २३)। इसीलिये 'जो बद्ध है उसी की, मुक्ति के साधन का सम्पादन कर लेने पर, मुक्ति होगी' यह मान कर बन्ध और मोक्ष की व्यवस्था भलीभाँति उपपन्न हो जाती है। यह कहना भी ठीक न होगा कि इसी प्रकार जगत्कर्तृत्वादि विशिष्ट ब्रह्म और जगत्कर्तृत्वादिरहित ब्रह्म का औपाधिक भेद स्वीकार कर लेने पर ब्रह्मवादी के अपने सिद्धान्त का विरोध न होगा क्योंकि, "जिससे निश्चय ही ये सय भूत उत्पन्न होते हैं' (तैत्ति० उप० ३११), 'इस भारमा से आकाश उत्पन्न हुआ है' (तैत्ति० उप० २११), 'प्राण, मन और सभी इन्द्रियाँ इसी से उत्पन्न होती हैं' (मुण्ड० उप० २।३।३) तथा 'उसने स्वयं अपने को (जगद्रूप से ) रचा' (तैत्ति० उप० २१७) इत्यादि श्रुतिवाक्यों से सिद्ध जगत्कर्तृत्वादि भगवान् के नित्यसिद्ध धर्म है और उन्हें उपाधि नहीं कहा जा सकता । अत. जगत्कर्तृत्वादिरूप श्रुतिप्रतिपादित धर्मों से विशिष्ट ब्रा भी निरुपाधिक ही है सोपाधिक असद् इत्यादिगन्दा अहं-ममेतिरूपे संसार एव प्रवर्तन्ते न तु प्रपञ्चे इत्ययं , तस्य ब्रह्मात्मकत्वात् ।' (शामार्थप्र० प्र० २३)। द्रष्टव्य, स्नेहपुरणी, पृष्ठ ७९-८०॥
प्रमेयरत्नाणवे [उत्तराई इति । न ब्रह्मणि सोपाधिकत्वनिरुपाधिकत्वकल्पनेत्यन्यत्र विस्तरः। तथा च सिद्धं विपयतावैशियन प्रपञ्चस्य सत्यत्वं मिथ्यात्यञ्च। एवं स्वमते प्रपञ्चस्य पारमार्थिकविचारे ब्रह्मा- स्मकत्वेन सत्यत्वम्, परमते तु व्यवहारे सत्यत्वं पारमार्थिके मृपात्वम् इति भेदो शेयः। ननु, “निरुपाधिके शुक्तौ 'इदं रजतम्' इति भ्रमे, पूर्वम् उत्पन्नसामान्यज्ञानानन्तरं बुद्धया रजतमुत्पाद्य विषयोक्रियते, तथा दान्तिके भगवदात्मकप्रपञ्चः चक्षुपा गृह्यते, माया- नहीं । ब्रह्म में सोपाधिकत्व और निरुपाधिकत्व की कल्पना करना ठीक नहीं है इस सिद्धान्त का विस्तार से विवेचन अन्यन किया गया है। इस तरह यह स्पष्ट किया गया कि विषयताविशिष्ट प्रपञ्च यद्यपि वस्तुतः सत्य होता है तथापि उसे विषयता को दृष्टिगत करके कहीं-कहीं मिथ्या कह दिया जाता है। इस प्रकार सिद्धान्ती के अपने मत में पारमार्थिक दृष्टि से विचार करने पर प्रपञ्च को बझारमक होने के कारण सत्य स्वीकार किया गया है किन्तु प्रतिपक्षी (मायावादी) के मत में उसे ( अर्थात् प्रपञ्च को) व्यवहार की दृष्टि से सत्य परन्तु पारमार्थिक दृष्टि से मृपा या मिथ्या माना गया है। सिद्धान्ती और मायावादी के प्रपञ्चसम्बन्धी मतो में यह मुख्य भेद है जो स्मरणीय है । पूर्वपक्षी का कहना है कि सिद्धान्ती यह मानता है कि "निरुपाधिक भ्रम के शुक्ति में 'यह रजत है' इस प्रकार का भ्रम होने के दृष्टान्तमें पहले उत्पन्न हुए सामान्यज्ञान के अनन्तर बुद्धि रजत को उत्पन्न (अर्थात् कल्पित) कर लेती है और उसे ज्ञान का विषय बनाती अर्थात् ग्रहण करती है। इसी प्रकार दान्तिक में पहले भगवदात्मक प्रपञ्च का चक्षुरिन्द्रिय से ग्रहण होता है सदनन्तर माया के द्वारा मोहित प्रथमोऽध्यायः] ख्यातिविवेकः २३७ . मोहितबुद्धिकल्पितोऽन्तरासों विषयीक्रियत" इति यदुक्तं तन्त्र सम्भवति, रजतसंस्कारवदान्तरालिकपदार्थसंस्कारोपलभ्य- भावाद्, इति चेत् ? न, पूर्वकल्पमारभ्यान्तरालिकपदार्था- नुभवसत्त्वेन तत्संस्कारस्य सुवचत्वात् । अतः सुखेन रजत- बदान्तरालिको चौद्धो घटादिरुत्पद्यते । किञ्च दृष्टान्ते यथा रजतभ्रमानन्तरं धर्मविशेषज्ञाने शुक्ति- रूपाधिष्ठाने झाते रजत चौई विलयमेति, तथात्र चक्षुः- बुद्धि अपने ही द्वारा कल्लित आन्तरालिकी सृष्टि को ज्ञान का विषय बनाती अर्थात् ग्रहण करती है"; किन्तु यह सम्भव नहीं है क्योंकि जिस प्रकार गुक्तिरजतभ्रम के स्थल में बुद्धि में रजत का सस्कार-(जिसके कारण शुक्ति में रजत का भ्रम होता है)-उपस्थित रहता है, उस प्रकार आन्तरालिफ पदार्थों का संस्कार बुद्धि में उपस्थित नहीं रहता। पूर्वपक्षी के इस आक्षेप के उत्तर में सिद्धान्ती का कहना है कि पूर्वपक्षी का यह मानना ठीक नहीं है कि 'आन्तरालिकी सृष्टि के संस्कार की उपलब्धि के अभाव के कारण आन्तगलिकी सृष्टि का ज्ञान होने का सिद्धान्त उपपन्न नहीं है, क्योंकि पूर्वकल्प से लेकर अब तक आन्तरालिक पदार्थों का अनुभव होते रहने के कारण बुद्धि में उसके (अर्थात् आन्तरालिकी सृष्टि के) सस्कार के उपस्थित होने की बात आसानी से कही (और समक्षी) जा सकती है। अतः (शुक्ति में प्रतीत होने वाले) रजत के ही समान, आन्तरालिक बुद्धिकल्पित बुद्धिस्य घटादि के उत्पन्न होने की बात सरलता से समझ मैं आ जाती है और उपपन्न है। जिस प्रकार शुक्तिरजत के दृष्टान्त में शुक्ति के रजत होने का भ्रम हो जाने के बाद धर्मविशेष ( अर्थात् शुक्ति के विशेष धर्मों) का ज्ञान होने पर, शुक्तिरूप अधिष्ठान के ज्ञात हो जाने पर बुद्धिकल्पित रजत विलीन हो जाता है उसी प्रकार चक्षुःसन्निकृष्ट (अर्थात् चक्षुरिन्द्रिय से २३८ प्रमेयरलार्णवे [ उत्तरार्दै संयुकप्रपञ्चविपयके ब्रहरवशाने उत्पन्ने बौद्ध एव प्रपञ्चो नयति न तु चक्षुर्ग्रहीतोऽयमित्यर्थः, दशमस्कन्धप्रक्षिप्ता. च्यायतृतीयाध्याये, 'रज्वामहे गभवाभवी यथा" (भाग० १०॥ १४॥२५) इत्यस्य सुयोधिन्याम्', "भवामवी' उत्पत्तिनाशी, 'सर्पोऽयं' 'नायं सर्प इति स्वद्धिकल्पितस्यैव नाती नान्यस्य' गृहीत होने वाले ) प्रपञ्च के भगवद्रूप होने का शान उत्पन्न हो जाने पर बौद्ध अर्थात् बुद्धिकल्पित प्रपञ्च का ही नाश होता है न कि चक्षुरिन्द्रिय से गृहीत होने वाले इस भगवद्रूप प्रपञ्च का, क्योंकि भागयत के दशम. स्कन्ध के प्रशिप्त अध्यायों (भाग० १०११२-१४) में से तीसरे अध्याय को, 'जिस प्रकार रज्जु में सर्प के शरीर की उत्पत्ति और उसका नारा' (माग० १०१४१२५) इस श्लोक यी सुनोधिनी व्याख्या में श्रीवल्लमा- चार्य ने कहा है कि 'रज्जु में कल्लित सर्पशरीर का उत्पन्न होना और नष्ट होना अर्थात् रज्य में यह सर्प है' इस प्रकार की भूमान्मक प्रतीति होने तथा उसके बाद 'यह सर्प नहीं है। इस प्रकार की प्रतीति होने पर, अपनी बुद्धि के द्वारा कल्पित सर्प का ही नाश होता है, भन्य का नहीं' १. मात्मानमेवात्मतया विजानता तेनैव जात निखिलं प्रश्चितम् । ज्ञानेन भूयोऽपि प तत् प्रलोयते रज्वामहे गभवाभवी यथा । (भाग० १०१९४२५)। २ "ते हि आत्मानमेवात्मतया जानन्ति, अतः तेनैव भ्रमाद् याव- जातं निखिलम् अपि प्रपश्चितं प्रपञ्चाकारेणात्मीयतया परिकल्पित ज्ञानेन भूयोऽपि तद् एव तावन्मानमेव लीयते न तु कृतिसाष्यम् । तम दृष्टान्तः, रज्ज्वाम् अहेः कल्पितस्यैव सर्पस्य भोगस्य कायस्य भवाभवो उत्पत्तिनाशी, सर्पोऽयं नाय सर्प इति स्वबुद्धिकल्पितस्यैव नाशो नान्यस्य जगतो भगवत्कृतस्य नापि स्वकृतस्य भ्रमात् सर्पदेहे रज्जुन पुनरावर्तते नायं सर्प इति ज्ञातेऽपि, अतोऽज्ञानकृतमेव नियतते नान्यद् इति महम्ममाभिमान एव गच्छति नान्यत् ।" (सुबोधिनी १०।१४।२५ ) .... प्रथमोऽध्यायः] ख्यातिविवेकः २३९ (सुबोधिनी १०।१४।२५) इत्युक्तत्वात् । अत एव, 'अयं प्रपञ्चो न प्राकृतः, नापि परमाणुजन्यः, नापि विवर्तात्मा किन्तु परम- काष्ठापनवस्तुरुतिसाध्या, तादृशोऽपि भगवद्रूप" (शास्त्रार्थप्रय म०२३) इति निवन्धोक्तियुज्यते, 'विषयो भगवान्' (सुबोधिनी २।९।३३) इत्युक्तिश्च । यत्तु 'आधिदैविकः प्रपञ्चो भिन्नः स भगवद्रूपः, अयं प्रतीयमानस्तु ततो मिन्नो मृपा एव' इत्याहुः, तन्न, माधि- दैविकस्यातीन्द्रियत्वेन चक्षुरादिग्राहहत्वाभावादधिष्ठानचाक्षुप- सामान्यज्ञानाभावेन चाक्षुपभ्रम एव न स्यात्, चाक्षुपभ्रमं (सुबो० १०११४१२५)। इसीलिये तत्वार्थदीपनिबन्ध का, 'यह प्रपञ्च प्राकृत अर्थात् प्रकृतिजन्य नहीं है । यह परमाणुजन्य मी नहीं है। यह विधर्त- रूप मी नहीं है अर्थात् ब्रह्म का अतात्विक अन्यथामाव मी नहीं है। किन्तु यह जगत् भगवान् का कार्य है। भगवान् परमकाष्ठापन्न वस्तु हैं और इस जगन् की सृष्टि उन्हीं प्रयत्न से हो सकती है। यह जगम् भगवान् का कार्य होते हुए भी भगवईप है' (शास्त्रार्थप्र० प्र० २३) यह क्यन तथा मुबोधिनी में कहा गया श्रीवल्लभाचार्य का विषय भग- वान् हैं' ( सुबोधिनी १९१३३ ) यह वाक्य भी उपपन्न है । कुछ लोग यह कहते हैं कि आधिदैनिक प्रपञ्च इस प्रतीयमान प्रपञ्च से भिन्न है और वह भगवद्रूप है किन्तु यह प्रतीयमान प्रपञ्च उससे भिन्न और मिथ्या ही है, लेकिन उन लोगों का यह कहना ठीक नहीं है क्योंकि आधिदैविक प्रपञ्च के अतीन्द्रिय होने के कारण चक्षुरादि इन्द्रियो के द्वारा ग्राह्य न होने से मिथ्यारूप में प्रतीत होने की सम्मा- वना ही नहीं रहती। चाक्षुपभ्रमरूप विशेषज्ञान की सम्भावना वहीं होगी जहाँ चाक्षुपानरूप सामान्य ज्ञान सम्भव हो, किन्तु आधिदैधिक १. द्रष्टव्य, तत्त्वार्थदीपनिवन्ध को स्नेहप्रपूरणो, पृष्ठ ७६ ।
२४० प्रमेयरलार्णवे [ उत्तरार्दै प्रति चाक्षुषसामान्यज्ञानस्य फारणत्वात् । तस्मादयमेवारम- दादीन्द्रियह्यमाणः प्रपञ्चो ब्रह्मात्मकः । अस्मिन्नेव प्रपञ्चे मायामोहितबुद्धद्या मायिकः प्रपञ्चः फल्यते, तस्यैव मिथ्या- त्वम् , स हि आन्तरो न वाह्यः, न तु अस्य (मिथ्यात्वम् ) अन्यथा सिद्धान्तमुक्तावल्याम्, 'अपरं तत्र पूर्वस्मिन् वादिनी बहुधा जगुः" (सिद्धान्तमुक्तावली, ४) इत्युक्त्वा, 'मायिक प्रपञ्चरूप अधिष्ठान के अतीन्द्रिय होने के कारण उसका चाक्षुपेश नरूप सामान्यज्ञान नहीं हो सकता और अधिष्ठान के चाक्षुषशान रूप सामान्यज्ञान के अभाव में चाक्षुपभ्रमरूप विशेषज्ञान के लिये अवकाश ही न रहेगा। अतः हम लोगों की इन्द्रियों द्वारा गृहीत हो रहा यह परिदृश्यमान प्रपञ्च ही ब्रह्मात्मक है। इसी प्रपञ्च में माया से मोहित बुद्धि द्वारा मायिक प्रपञ्च की फ्ल्पना की जाती है, और मिथ्या वह मायिक प्रपञ्च ही होता है जो आन्तर होता है बाह्य अर्थात् बहिर्देश में अवस्थित नहीं -न कि यह परिदृश्यमान प्रपञ्च । तात्पर्य यह है कि यह परिदृश्य- मान जगत् मिथ्या नहीं है। यदि इम प्रपञ्च को मिथ्या (मानने के उपर्युक्त मत को वल्लभाभिमत ) स्वीकार कर लिया जाये तो सिद्धान्त- मुक्तावली में कहे गये श्रीवल्लभाचार्य के उन पाक्यों का विरोध होगा जिनमें उन्होंने 'भक्षर ब्रह्म के उपर्युक्त दो रूपों में से प्रथम रूप (या प्रपञ्च रूप में आविर्भूत अक्षर ब्रह्म अर्थात् जगत् ) के सम्पन्ध में विभिन्न वादियों ने वैदिक मत से भिन्न मत का अनेक रूपों में प्रति. पादन किया है' ( मिद्धान्तमुक्तावली, ४) इत्यादि कह कर, 'मायावादी १. 'अपरं तत्र पूर्वस्मिन् वादिनो बहुधा जगुः । मायिकं सगुणं कार्य स्वतन्त्रं चेति नैकधा ॥' (सिद्धान्तमु०४ )। "विरोधपरिहाराय स्वसिद्धान्तं वक्तुं परमतान्याहुः, 'अपरम्' इति । वैदमताद् अपरं भिनं मत, पूर्वस्मिन् प्रपनरूपेणाविभूते, तत्र अक्षरे ब्रह्मणि इत्यर्थः । मायिकम् इति मायावादिनः, सगुणं गुणकार्यमिति प्रथमोऽध्यायः ख्यातिविवेकः २४१ सगुणम्" (सिद्धान्तमुक्तावली,४) इत्यादिना परमतान्युपन्यस्य, 'तदेवतत्प्रकारेण भवति' (सिद्धान्तमुक्तावली, ५) इत्यन्तोक्तिरपि विरुद्धयत, एवं तस्य मिथ्यात्वाङ्गीकार आधिदैविकस्य चक्षु. राविषयीभूतस्य सत्यत्वाझीकारेण परमतस्वमतयोभिन्न- विपयत्वेन निराकरणानहत्वात् । न हि परे आधिदैविकं प्रपञ्च इसे मापिक पाते हैं और साझम दानिक इसे सगुण अर्थात् गुणों का कार्य मानते हैं' ( सिद्धान्तमुक्तावली, ४) इत्यादि वाक्य द्वारा परपक्षियों के मतों को उपन्यरत कर, 'यह अक्षर मझ ही इस प्रपञ्च के रूप में भावित होता है' (सिद्धान्तमुत्तावली, ५) इत्यादि वाक्यों द्वारा इसी प्रपञ्च के ब्रह्मात्मक होने के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है, क्योंकि ( श्रीवल्लभाचार्य के) दृश्यमान प्रपञ्च को मिथ्या मानने और चक्षुरादि इन्द्रियों के द्वारा अग्राह्य, इन्द्रियातीत आधिदैविक प्रपञ्च को सत्य मानने पर तो (परपक्ष के परिदृश्यमान प्रपञ्च को मिय्या फहने और सिद्धान्ती के आधिदैविक प्रपञ्च को सत्य कहने की स्थिति में ) परपक्षी और सिद्धान्ती के विषयो के परस्पर भिन होने के कारण ( उनके द्वारा) परपक्षियों के मतों के निराकरण की कोई आवश्यकता ही नहीं होती । परपक्षी आधिदैविक प्रपञ्च को मिथ्या सांख्याः, कायं द्वमणुकादिक्रमेण ईश्वरकार्यमिति नमायिका, स्वतन्न न कदाचिदनीदृशं जगद् इति मीमांसका., चकारेण वैवाह्ममतानि सगृह्यन्ते ।" (पीविट्ठलनाथकृता सिद्धान्तमुक्तावलीविवृतिः, ४)। "इदं तु ब्रह्मणो भौतिक प्रपञ्चात्मकरूपं नाशोत्पत्तिमत्वेन भासमान- त्वात् मायिकं सगुणम् इत्याद्यज्ञानविलासः विकल्प्यते । वस्तुतस्तु इत्यादिश्रुतिन्यायजात अक्षरात्मकमुररीकार्यम्, तर नाशोत्पत्तिप्रतीति- भ्रान्त्या पाविर्भावतिरोमाववत्वेन नित्यत्वात् ।" (धीवालकृष्णभट्टकृता सिद्धान्तमुक्तावलीयोजना, ४)। १. देखिये, कपर पृष्ठ २४० टिप्पणी १ । .
२४२ प्रमेयरत्नाणवे [उत्तरा मृपों वदन्ति, यदुपरि दूपणानि स्युः। अपि च परिदृश्यमान- स्याविर्भावविरोभायौ स्थीरुत्य भाविकारप्रतीतेमिथ्यात्व- महीकृत्य एतस्य प्रपञ्चस्य ब्रह्माभिन्नत्वं भाष्य-नियन्ध विद्वन्म. ण्डनादौ सर्वत्र स्वीकृतं तदपि विरुद्धधेत, प्रतीयमानमपञ्चस्य मृपात्वाहीकारण तापप्रपञ्चे जायमानानां नाशोत्पत्त्यादि. प्रतीतीनामभ्रान्तत्वेन भ्रान्तत्यकथनस्यैव दृष्यत्वापत्ते, परि- दृश्यमानस्य मिथ्यात्वाङ्गीकारे दृप्यग्रन्थस्वग्रन्थयोरेक्यापत्तेश्च । अन्यच 'मुक्तिः कल्पितवान्यतः (शास्त्रार्थप्र० का० ७९) इत्यादिनिवन्धवाफ्यैः गुर्वादीनां कल्पितत्वञ्चापद्यतेत्यादिदूषण- नहीं कहते अतः यह नहीं कहा जा सकता कि (सिद्धान्तमुक्तावली, ५ मे) उनके मतों का सण्डन आधिदैविक प्रपञ्च के मिथ्यात्व के निराकरण के लिये किया गया है, उनके मत में दोर दिसाने का तात्पर्य यही है कि जिस परिदृश्यमान प्रपञ्च को वे मिथ्या कहते हैं, यह मिथ्या नहीं ब्रह्मात्मक है। इतना ही नहीं, अणुभाष्य, तत्त्वार्थदीपनिनन्ध और विद्वन्मण्डन आदि सभी ग्रन्थों में परिदृश्यमान प्रपञ्च के आरिभाव और तिरोभाव होने के सिद्धान्त को स्वीकार कर, इस जगत् की उत्पत्ति और नाश की प्रतीति को मिथ्या मान कर, इस प्रपञ्च के ब्रह्म से अभिन्न होने के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है । इस प्रपञ्च को मिथ्या मान लेने पर उन सभी वाक्यों का भी विरोध होगा क्योंकि प्रतीयमान प्रपञ्च को मिथ्या स्वीकार कर लेने पर, प्रपञ्च में होने वाली नाश और उत्पत्ति आदि की प्रतीतियों के अनान्त होने से उन्हें प्रान्त प्रतीतियाँ कहने मे दोप होगा । और भी, श्रीवल्लभाचार्य ने तत्त्वार्थदीप निबन्ध के, 'वे लोग फल्पित (गुरु के ) वाक्यों से मुक्ति होने के मव का प्रतिपादन काते हैं' (शास्त्रार्थप्र० का० ७९) इत्यादि वाक्यों द्वारा १. 'तस्य च मोक्ष तेनैव विद्यावत्वेनैव कल्पितगुरोरुपदेशवाक्याद् इति ।' ( शास्त्रार्थप्र० प्र० ७९)।
" प्रथमोऽध्यायः] ख्यातिविवेकः २४३ पुझानां परमत आपादितानां स्वमत आपत्तिः, अतः अस्य परिदृश्यमानजगतो मायिकत्वं नादर्तव्यं सुधीमिः । पुराणेषु कचिदान्तरालिकी सृष्टि, कचिद्विपयता, कचिद् अहन्ताममतात्मकं संसारमवलम्व्य मायिकत्योकिः, क्वचिद वैराग्यार्थञ्च, न वस्तुस्वरूपनिरूपणाय इति स्थितमाकरे । अतोऽयं प्रपञ्चो ब्रह्मात्मक इति सिद्धान्तो निर्दुष्ट एव । जगन्मिथ्यात्वनादी मायावादी के पक्ष में यह दोष दिखाया है कि प्रपञ्च को मिथ्या मानने से मायावादी को गुरु आदि को भी कल्पित मानना पड़ेगा, अत' इस प्रपञ्च मे मिथ्या होने की बात को (श्रीवल्लभाचार्य के द्वारा अनुमोदित) मान लेने पर, प्रतिपक्षी मत में उद्भावित उपर्युक्त दोष तथा इसी प्रकार के अन्य दोनों के सिद्धान्त में भी होने का अनिएप्रसङ्ग उपस्थित होगा अतः विद्वानों को इस परिदृश्यमान जगत् को मायिक मानने के मत का आदर नहीं करना चाहिए । पुराणो मे मायिकत्व की जो बात कही गयी है वह कहीं आन्तरालिकी सृष्टि को लक्ष्य कर, कही विषयता को दृष्टि में रखकर और कहीं अहन्ता-ममतात्मक ससार को लश्चित करने ही; कहीं कहीं वैराग्य की भावना को उद्दीप्त करने के उद्देश्य से भी मिथ्यात्व का निरूपण पुराणों में किया गया है, किन्तु (प्रापञ्चिक) वस्तुओं के स्वरूप के निरूपण करने के उद्देश्य से उन्हें मायिक कहीं नहीं कहा गया है, यह बात तत्त्वार्थदीपनिनन्धर, सुनोधिनी, अणुभाष्य और विद्वमण्डन आदि आकर अन्यों में भली भाँति प्रतिपादित मिलती है। अतः इस प्रपञ्च को १. जगन्मिथ्यात्व के खण्डन के लिये प्रमेयरलार्णवकार द्वारा पुरस्कृत तकों के विशद विवरण के लिये सिद्धान्तमुक्तावली की चतुर्ष कारिका को भोपालपट्टविरचित पोचलाटीका सदस्मारका, पर्ष २, मा १, पृष्ठ ५९-८७ मे मुद्रित ) देखें। २. द्रष्टव्य, स्नेहापूरणी, पृष्ठ २७२-२७६; ३०३-३०४ आदि।
प्रमेयरत्नावे [ उत्तरार्द्ध , नच, 'वुद्धिकरिपतमेव रजतं मायादोपादिवशाद्वहिनिःसृतं चक्षुषा गृह्यते ततःचक्षुहस्यापि रजतस्य मिथ्यात्वं कुतो न ?' इति याच्यम् , भुजगाधिष्ठानकरजुस्पार्शनभ्रमे व्यभिचारात् । तथा हि, तमःसवाते हस्तेन भुजङ्गस्पर्श स्पार्शनसामान्यज्ञाना- नन्तरं तमोगुणोद्रकेण माया जीवबुद्धि व्यामोहयति, तदा भुजङ्ग इति बोधो नोत्पद्यते, ततो रज्जुसंस्कारेण वुद्धी रज्जूं निर्माति; तद्वोद्धी रज्जुः बहिश्चेन्निस्सरेत्तर्हि करेण गृहोतेव, भुजङ्गस्य तु हस्तस्पर्शों न स्याद् , रज्या व्यवधानात् । तथा सति को वा दशेत् ? लोके तु ताशस्थले भुजङ्गस्पर्शस्तत्कृतो दशश्च यते । अतो बुद्धिकल्पिताया रज्जोरन्तःस्थितायाः ब्रह्मात्मक मानने का सिद्धान्त निदोष ही है। 'बुद्धि के द्वारा कल्पित किया गया (अर्थात् मिथ्या) रजत ही मायादोपादि के कारण बाहर निकल कर चक्षुरिन्द्रिय द्वारा गृहीत होता है, ऐसी स्थिति में चक्षुर्माह्य (प्रापश्चिक) रजत को भी मिभ्या क्यों न माना जाये" यह कहना, अधिष्ठानरूप सर्प को र समझ कर स्पर्श कर लेने के भ्रम में व्यभिचार होने के कारण ठीक नहीं है । घने अंधेरे में हाथ से सर्प का स्पर्श करने पर स्पर्श का सामान्य ज्ञान होने के बाद, तमोगुण के उद्गक से माया जीव की बुद्धि को व्यामोह में डाल देती है जिससे उस समय यह सर्प है। यह ज्ञान उत्पन्न नहीं होता, और तब रज्जु-सस्कार के कारण बुद्धि रज्जु का निर्माण कर लेती है, यह बुद्धिनिर्मित या बुद्धिकल्पित रन्जु यदि बाहर निकल कर बहिर्देश में अवस्थित हो तो इसका हाथ से ग्रहण अवश्य हो और इसके व्यवधान के कारण हाथ से सर्प का स्पर्श भी न हो, तथा ऐसा होने पर सर्पदश सम्भव ही न हो क्योंकि हाथ से सर्प का स्पर्श न होने पर हाथ में काटेगा मौन ? किन्तु लोक में इस प्रकार के ( अर्थात् सर्प को रस्सी समझ लेने के) भ्रम के स्थल में, सर्प के स्पर्श (अर्थात् सर्प को रस्सी समझ कर पकड़ - प्रथमोऽध्यायः] स्यातिविवेकः २४५ बुद्धिविपयत्वमेव, नेन्द्रियविपयत्वम् । इन्द्रियविषयस्तु अधि- धानरूपो भुजङ्ग एव इति शेयम् । अत एव देशमपठाध्याये, 'यथोरगं सुप्तमबुद्धिरज्जुधीः" (भाग० १०६८) इत्यस्य व्यारयाने, 'रज्जुबुद्धया गृहीतः सर्पः स्वसशेऽपि न ज्ञानं जनयति' (सुयो-' धिनी १०६८) इत्युक्त्याधिष्ठानरूपसर्पस्पर्श उक्तः । एवं शुक्तिरजतादिस्थलेऽपि बोध्यम् । एतेन शुक्रयाद्य- लेने) और उसके द्वारा काट लिये जाने की बात सुनी जाती है। अत: बुद्धिकल्पित रज्जु अन्त स्थित ही रहती है और यह बुद्धि का ही विषय होती है इन्द्रिय का नहीं, इन्द्रिय का विषय तो अधिष्ठानरूप सर्प ही होता है, ऐसा समझना चाहिए । इसीलिये श्रीवल्लभाचार्य ने श्रीमद्भा- गवत के दशम स्कन्ध के छठे अध्याय के आठवें श्लोक के, "जिस प्रकार कोई नासमझ व्यक्ति अज्ञानवश, सोये हुए सर्प को रस्सी समझ फर उठा ले' (भाग० १०६८) इस चतुर्थ चरण की अपनी सुरोधिनी व्याख्या में, 'रज्जु समझ कर गृहीत किया गया सर्प, अपना म्पर्श किये जाने पर मी, अपने सर्प होने का ज्ञान उत्पस नहीं करा' (सुबोधिनी १०१६।८) इत्यादि वास्यों द्वारा अधिष्ठानरूप सर्प के स्पर्श किये जाने की बात कही है। इसी प्रकार शुक्तिरजन आदि के भ्रम के स्थल पर भी समसना १. "ननु, मारोपणे क्रियाशक्ति प्रवृद्धा कयं न वाधिका जाता इत्याह, 'यथोरगं सुप्तम्' इति । सर्माणामतितामसत्वात् तैपामत्यन्त निद्रा, अतो मारणपर्यन्तं न क्रिया तेयु, तथा भगतोऽपि क्रिया सर्वथा नाविभूता। मनु, मणि ज्ञानशक्तिः तेजः कथं नाविर्भूतम्' इति चेत्, तबाह, 'मधुद्धि- रज्जुघोः' इति । अबुद्धथा अज्ञानेन, स4 रज्जुधीः यस्म, रज्जुः वन्धिका, सर्पो मारकः, स्नेहेन स्तने दत्ते मन्यनुरक्तो भविष्यवोत्यापतितो बुद्धिः, न तु मारकरयं जानाति, यया रज्जुदपा गृहीतः सः स्वस्सऽपिन शान जनपति, मतो भगवान वेजोऽपि स्पर्शन नाविभूतमित्यर्थः।" (सुबो० १०६८)' २४६ प्रमेयरलार्णवे [उत्तरा धिष्ठाने माययोत्पादितमनिर्वचनीयं रजतादिकं चक्षुरादीन्द्रि- यग्राह्यम् इति पदन्तोऽपि प्रत्युक्ताः । भुजहाधिष्ठानकरज्जुस्पा- निभ्रमे घनिर्वचनीयाया रजोः त्यगिन्द्रियेण ग्रहणाद् अधि- प्ठानरूपेण व्यालेन त्वक्सम्वन्धाभावाद् भुजङ्गस्तदंशाभाव- नियमापत्तेः, त्यगिन्द्रियगोलकयोरेकवस्तुसम्बन्धनियमात् त्व. गिन्द्रियगोलकाभ्यां रजोः सम्पन्धात् तस्या व्यावहारिकसत्ता- स्वीकारेण अर्थक्रियाकारितया तद्रजुकृताधिष्ठानव्यवधानाद् चाहिए । इस विवेचन से उन दार्शनिकों के मत का भी खण्डन हो गया (समझना चाहिए ) जो यह कहते हैं कि शुक्ति आदि अधिष्ठान में माया द्वारा उत्पन्न किये गये अनिर्वचनीय रजत आदि चक्षुरादि इन्द्रियों द्वारा गृहीत होते है क्योंकि सर्परूप अधिष्ठान में होने वाले 'यह रज्जु है' इस प्रकार के स्पार्शन भ्रम में अनिर्वचनीय रनु का त्वगिन्द्रिय से ग्रहण होता है यह मानने पर यह स्वीकार करना होगा कि अधिष्ठानरूप सर्प से त्वगिन्द्रिय का सम्बन्ध नहीं होता है और तब इस प्रकार के भ्रमस्थल में सर्प द्वारा काट लिये जाने की कोई सम्भावना या आशङ्का नहीं होती यह (अनुभवविरुद्ध) नियम मानने का प्रसङ्ग उपस्थित होगा । त्वक और त्वगिन्द्रियगोलक नियमत' सदैव एक ही वस्तु से सम्बद्ध रहते हैं अर्थात् जिस विषय या पदार्थ से त्वचा सम्बद्ध होती है उसी से त्वगिन्द्रियगोलक भी सम्बद्ध होता है । उपर्युक्त सर्प रज्जुभ्रम में त्वचा और त्वगिन्द्रियगोलक दोनो का (अनिर्वचनीय) रज्जु से सम्बन्ध होता है यह मानने पर रज्जु की व्यावहारिक सत्ता स्वीकार करने के कारण अर्थक्रियाकारित्व के सिद्धान्त के अनुसार उस रज्नु के द्वारा त्वचा और इन्द्रियगोलक अधिष्ठानरूपसर्प से व्यवहित कर दिये जायेंगे अर्थात् अधिष्ठानरूप सर्प, तथा त्वचा और इन्द्रियगोलक के बीच अनिर्वचनीयरज्जुरूप व्यवधान आ जायेगा फलत' अधिष्ठानरूप सर्प से त्वचा और त्वगिन्द्रियगोलक का सम्पर्क न हो सकेगा और सर्प- प्रथमोऽध्यायः ख्यातिविवेकः २४७ . इति दिक। न च, 'सर्पस्पर्श स्पार्शनरज्जुनमे याचभ्रमम् अनिर्यच- नीयया रज्ज्वा सह पुरुपहस्तादिसम्बन्धेऽपि भ्रमनिवृत्युत्तरं सर्पस्पर्शात् तररुतदंशे को दोपः ?' इति वाच्यम् , रजुशानो- त्पत्यव्यवहितसमयेभ्रमनिवृत्तरसम्भवाद्, अन्यथाभ्रमनिवृत्तिः अनुभूयेत । न च, 'सूक्ष्मकाले जायमाना भ्रमनिवृत्तिः नानुभव. योग्या तत्कालस्य शतपनवेधवदुर्लक्ष्यत्वाद', इति वाच्यम् , भ्रमनिवृत्तरधिष्ठानज्ञानसाध्यत्वेन तद्विरहे तस्या पयासम्भवात्। दश की सम्भावना समाप्त हो जायेगी। पूर्वपक्षी का यह कहना भी ठीक न होगा कि "सर्प का स्पर्श करने पर उसरे रज्जु होने का भ्रम होने के स्थल में भ्रम रहने के समय तक भ्रममस्त पुरुप के हाथ आदि का सम्बन्ध अनिर्वचनीय रज्जु के साथ होता है तथा भ्रम निवृत्त हो जाने के बाद सर्प के साथ, और तब सर्प का स्पर्श होने से सर्पदश (अर्थात् सर्प द्वारा काट लिया जाना) सम्भव होता है, यह मान लेने में क्या दोष है ।" क्योंकि जिस क्षण सर्प के रज्नु होने का शान उसन्न होता है उस क्षण से अव्यवहित क्षण में भ्रम की निवृत्ति हो सकना असम्भव है; यदि यह सम्भव होता तो उम समय भी भ्रम की निवृत्ति का अनुभव होता । पूर्वपक्षी यह मी नहीं कह सकता कि "लिस क्षण में श्रम की निवृत्ति होती है वह बहुत सूक्ष्म होता है अतः उसके शतपनवेध की तरह (जैसे भी पत्ते एक साथ ऊपर नीचे रखकर तीर इत्यादि से छेद दिये जाते हैं तो उनके अतिसूक्ष्मकाल में विद्ध हो जाने के कारण उनमें से एक विशेष पत्ता कब सिद्ध हुआ यह ज्ञात नहीं हो पाता उसी प्रकार) दुर्लक्ष्य होने के कारण उसमें होने वाली भ्रमनिवृत्ति का अनुभव नहीं हो पाता," क्योकि भ्रमनिवृत्ति की सिद्धि अधिष्ठान का ज्ञान होने पर ही हो सकने के कारण अधिष्ठान के शान के अमाव में (भ्रमनिवृत्ति) सम्भव ही नहीं हो सकती।
२४८ प्रमेयरलार्णवे [ उत्तराद्ध - न च, 'दंशातिरिक्तकारणेनाधिष्ठाने ज्ञाते भ्रमनिवृत्ती रज्जो शादधिष्ठानसंयोगे दंशः सुवचः', इति वाच्यम् , यत्र देशहेतुकमधिष्ठानज्ञानं तत्र दंशात्पूर्व नमनिवृत्तेचैतमशक्यत्वेन भ्रमसमय एव दंशस्वीकार्यत्वाद् दंशस्य त्वधिष्ठानसम्बन्ध हेतुकत्वाद् भ्रमावसर एव इन्द्रियाधिष्ठानयोः सम्बन्धप्राप्त भवद्राद्धान्तविरोधात् । एवं मायामोहितबुद्धिकल्पितो मिथ्या भूतः प्रपञ्चोऽपि तादृशवुद्धेरेव विषयो नेन्द्रियविषय इति विद्वद्भिविभावनीयम् । एवं साधितेऽपि स्वसिद्धान्ते एकादशस्कन्धोदितनवयोगि- पूर्वपक्षी का यह कहना भी ठीक न होगा कि "सर्पदश से भिन्न किसी अन्य हेतु के आधार पर रज्जु के अधिष्ठानभूत सर्प का ज्ञान हो जाने पर भ्रम की निवृत्ति हो जाने पर ( व्यवधानरूप) सपरष्णु के नष्ट हो जाने से (भ्रमग्रस्त पुरुष के हस्तादि का रज्जु के) अधिष्ठानरूप सर्प से सयोग होने पर सर्पदश होता है, यह मानकर सर्पदश के अनुभव की व्याख्या सरलतापूर्वक की जा सकती है, क्योंकि जहाँ रज्जु के अधि- ष्ठानभूत सर्प का ज्ञान सर्पदंश से होता है वहाँ सर्पदश से पूर्व भ्रमनिवृत्ति होने की बात नहीं कही का सक्ती अतः भ्रमकाल में ही सर्पदश होने की बात माननी होगी तथा ( भ्रमग्रस्त पुरुष के हस्तादि में होनेवाले) सर्पदश के (उस पुरुष के हस्तादि के,) अधिष्ठानभूत सर्प के सम्बन्ध में आने पर ही सम्भव होने के कारण भ्रमकाल में ही स्वगादि इन्द्रिय और (सर्परज्जु के ) अधिष्ठानभूत सर्प के सम्बन्ध की बात स्वीकार करनी होगी और इसे स्वीकार करने पर पूर्वपक्षी के सिद्धान्त का विरोध होगा। इसी प्रकार माया-मोहित बुद्धि के द्वारा कल्पित मिथ्याभूत प्रपञ्च भी माया के द्वारा मोहित बुद्धि का ही विषय है (अर्थात् बुद्धि द्वारा दी गृहीत होता है)न कि इन्द्रिय का ( अर्थात् चक्षुरादि इन्द्रियों द्वारा गृहीत नहीं होता) ऐसा विदानों को विचार करके समझ लेना चाहिए ।
प्रथमोऽध्यायः] ख्यातिविवेकः २४९ प्रसङ्गीयप्रश्नोत्तरवाक्येषु पदार्थशोधनाभावाद्भमः सम्भवति, तथा सति साधितोऽपि राद्धान्तः शिथिल इव प्रतिभायाद्, अतः साधितराद्धान्तदाढाय नवयोगिप्रसकीयप्रश्नोत्तर- वाक्यानां तत्रत्यसुबोधिनीवाश्यानाञ्चार्थः पूर्वपक्षोत्तरपक्ष- निरूपणपूर्वकं विमृश्यते । तथा हि, “एकादशे निमिनवयोगिप्रसझे, 'परस्य विष्णारीशस्य मायिनामपि मोहिनीम् । मायां वेदितुमिच्छामः' ( भाग० ११॥३३१ ) इति निमिना मायास्वरूपे पृष्ठे, अन्तरिक्षेण, 'एभिभूतानि भूतात्मा' (भाग० ११३३१३) इत्यादिना इस प्रकार सिद्धान्ती द्वारा अपने सिद्धान्त की सिद्धि कर दिये जाने के बाद भी, भागयत के ग्यारहवें स्कन्ध के नौ योगियों के प्रसङ्ग में निमि के प्रश्नों और योगियों द्वारा दिये गये उनके उत्तरों के वाक्यों में आये 'माया' पद के अर्थ के शोधन के अभाव में 'माया' के स्वरूप के सम्बन्ध में भ्रम होना सम्भव है और ऐसी स्थिति में ब्रहावादी द्वारा सिद्ध किये जाने के बावजूद भी उसका सिद्धान्त शिथिल प्रतीत हो सकता है अतः अब यहाँ पहले ही सिद्ध किये जा चुके सिमान्त को सुदृढ़ करने के लिये निमि और नौ योगियों के प्रसङ्ग के प्रश्नों और उत्तरों के वाक्यों तथा उनकी सुबोधिनी टीका के यायों के अर्थ का पूर्वपक्ष और उत्तर पक्ष के निरूपणपूर्वक विचार किया जाता है। यहाँ मायावादी अधोलिखित पूर्वपक्ष पुरस्कृत करता है । "भागवत के ग्यारहवें स्कन्ध में निमि और नी योगियों के प्रसङ्ग में निमि फे 'हम पूर्ण, परमेश्वर मगवान् विष्णु को ज्ञानियों को मो मोह में डाल देने वाली माया को जानना भर्थात् समझना चाह है" (भाग 0) इत्यादि पाय माया का स्वरूप पूछने पर, उनले १. द्रष्टव्य, भाग० ११॥३।१ को वशोपरफतप्रकाशसहित श्रीपर- स्थामिविरचित भावार्षदोपिका टीका।
प्रमेयरत्नार्णवे [उत्तरार्दै रूपिता । तेन मायायाः स्वरूपप्रश्नात् तदनुरूपमेवोत्त ध्यम् । इह तु प्रपञ्चोत्पत्तिरुत्तरे निरूपिता, अतो प्रपञ्चो मायाकार्य:, अन्यथा मायाप्रश्ने कृते प्रपञ्चम् घदेत् । तथा च प्रपञ्चनिरूपणे माया निरूपिता भवति यायाः कार्यलक्षणं सिद्धयति । एव सति प्रपञ्चस्य त्वमायाति न ब्रह्मता", इति पूर्वपक्षे, स्वसिद्धान्तं वक्तु में से एक अन्तरिक्ष के 'भूतात्मा अर्थात् भूतों के कारणरूप रुप ने (जिस शक्ति से ) इन स्वनिर्मित महाभूतों से उच्चावच प्राणियों) की सृष्टि की' (भाग० ११३३) इत्यादि वाक्यों है का निरूपण करने का वर्णन मिलता है। माया के स्वरूप- प्रश्न का उत्तर भी तदनुरूप ही होना चाहिए । यहाँ इस प्रश्न : भी तदनुरूप ही होना चाहिए । यहाँ इस प्रश्न के उत्तर में उत्पत्ति का निरूपण किया गया है। इससे ज्ञात होता है कि या का कार्य है (यह सिद्धान्त ही अन्तरिक्ष का प्रतिपाद्य है ), माया के स्वरूपसम्बन्धी प्रश्न के उत्तर में अन्तरिक्ष प्रपञ्च का न करते । (अन्तरिक्ष का अभिप्राय यह है कि) प्रपञ्च का करने से माया का निरूपण हो जाना है (तात्पर्य यह है कि | स्वरूपतः निरूपण असम्भव होने के कारण उसके अर्थात् माया प जगत् द्वारा उसका निरूपण किया जाता है) और इस साया के कार्यलक्षण (अर्थात् 'माया वह है जिसका कार्य यह ' इस लक्षण) की सिद्धि हो जाती है अर्थात् इस लक्षण पादन हो जाता है। इस प्रकार प्रपञ्च का मायिक होना ही नसम्मत सिद्धान्त) सिद्ध होता है, न कि ब्रह्मरूप होना।" द्रष्टव्य, भाग० १११३।३ को प्रकाशसहित भावार्थदीपिका टीका । "मायायाः स्वरूपतो निरूपणासम्भयात् सृश्यादिकार्यद्वारेण निरूप- ('मायाया नीरूपरवेन स्वरूपतो निरूपण न सम्भवति इति २५१ प्रथमोऽध्यायः] ख्यातिविवेकः प्रपञ्चस्य भगवदात्मकत्वसाधनाय श्रीमदाचार्यचरणा अन्तरिक्ष- दत्तोत्तराशय, विशदयितुं मायाशब्दस्य शक्ति निरूपयन्ति, 'मायाशब्दः शास्त्रेषु' (सुबोधिनी ११॥३॥३) इत्यारभ्य, 'तथा प्रयुक्तः शब्द' (सुवोधिनी १९३३३३) इत्यन्तेन' । तथा च, भगवतः सर्वभवनसामर्थ्य रूपा माया, व्यामोहिका माया, ऐन्द्रजालिकविद्या, कापट्यादिचेति चत्वारो मायाशब्दार्थाः । मायावादी द्वारा पूर्वोक्त रीति से पूर्वपक्ष प्रस्तुत करने पर, उसका खण्डन कर अपने सिद्धान्त का प्रतिपादन करनेके उद्देश्य से, प्रपञ्च के भगवदात्मक होने की सिद्धि करने के लिये, श्रीवल्लभाचार्य ने अपनी सुबोधिनी टीका में 'माया शब्द शास्त्रों में' (सुबो० ११:३१३) इत्यादि वाक्यांश से लेकर, 'उन विमिन भयों में (माया शब्द) प्रयुक्त किया गया है' (सुबो० ११३।३) इत्यादि वाक्यांश तक, अन्तरिक्ष द्वारा निमि को दिये गये उत्तर का आशय स्पष्ट करने के लिये माया शब्द की शक्ति का (अर्थात् माया शब्द का प्रयोग कितने अर्थों में होता है इसका) निरूपण किया है और यह बताया है कि माया शब्द के चार अर्थ हैं भगवान् की सर्वभवनसामर्थ्यरूप माया, व्यामोहिका माया, स्कृष्टयादिलक्षणं यन्मायाकार्यम् तद्द्वारेण तद्द्वारोफत्य मायां निरूप. यितुम् सृष्टयादि मायाकार्यमाह इत्यर्थ:-प्रकाशः)।" (भाग० १२३।३ को भावार्थदीपिका टीका )। मिलाइये, 'कार्यानुमेया सुधियव माया यया जगत्सर्वमिदं प्रसूयते।'(विवेकचूडामणि ११०) १. 'मायाकयने स्वपमसंसक्तोऽन्तरिक्ष उवाच । मायाशब्दः शास्त्रेपू लोके च बहुधा प्रयुक्तः, सर्वभवनसामथ्यं, व्यामोहिका च शक्तिः, जालिकविद्या च, कापटादि च तत्तद्रूपनिरूपणार्थ तथा तथा प्रयुक्तः शब्दः । समाचावपि एकव शक्तिमयकार्यरूपोक्ता । प्रवाहस्तु मन माया- शब्देन उच्यते । स च भगवत्कृतो भगवद्रूपश्च ।' (सुबोधिनी ११।३।३) द्रष्टव्य, सुबोधिनीप्रकाशः ११॥२३ । - २५२ प्रमेयरत्नार्णवे [उत्तरा . ननु अन भगवतः सर्वमयनसामर्थ्यरूपा माया, व्यामो- हिका माया च पृथगणिता। व्यासः समाधौ तु, 'अपश्यत्पुरुष पूर्ण मायाञ्च तदुपाश्रयाम् । यया सम्मोहितो जी" (भाग० १७४५) इति वाक्याद् व्यामोहिकामेव मायां दृष्टवान् । समाधेश्च मुख्यं प्रामाण्यम् । तथा च मायाया व्यामोहकत्वमेच, न सर्वभवनसामर्थ्यरूपता ऐन्द्रजालिक दिया और कपटता आदि । पूर्वपश्नी का कथन है कि सुबोधिनी के उपर्युक्त यायों में भगवान् की सर्वभयनसामर्थ्यरूपा माया और व्यामोहिका माया को अलग-अलग गिनाया गया है किन्तु जैसा कि भागवत के, 'ध्यास ने पूर्ण पुरषोत्तम मगवान् विष्णु को तथा उनकी भाधित उस माया को भी देखा जिसके द्वारा सम्मोहित जीव' (भाग० १७४-५) इत्यादि वाक्यों से शात होता है, व्यास ने समाधि में व्यामोहिका माया को ही देखा था और समाधि की प्रामाणिकता प्रमुस (अर्थात् अधिक ) है अत. माया को १. "तम यदृष्टवान् तदाह 'अपश्यद्' इति द्वयेन । साकार ब्रह्म शुद्धं हि माया तच्छनिरुत्तमा । तया सर्वत्र संमोहः साक्षाद्भक्तिश्च मोचिका || इति पूर्ण पुरुपं पुरुषोत्तम ( 'पुरा आस' इति व्युत्पत्या पुरुषपदेनैव पुरुषोत्तमप्राप्तः पूर्णपदमनतिप्रयोजनमित्यरुच्या पूर्णपदस्य प्रयोजनान्तर- माहः,) जीवराशिमिराकीर्ण ब्रह्माण्डकोटिभिर्वा मायाश्च अपश्यद् भग- वदेकशरणाम् । तस्या. कार्यवापश्यत् 'यया संमोहितः' इति । पर्याप प्रपञ्चोऽपि तस्या. काय तथापि तत्र कारणत्वेन तस्या अन्वय. समोहने तु कर्तृत्वेन स्वातन्ध्यात्, एतदेवाह, 'यया' इति । वस्तुता जोवाऽपि ब्रह्मव इति परोऽपि प्रकृतेनियामकोऽपि त्रिगुणात्मकं गुणत्रयभावापन्न जहरूपं मन्यते तत्कृतश्च अनर्थ जन्ममरणादि प्राप्नोति ।" (प्रकाशसहिता सुबोधिनी ११७४४-५) द्रष्टव्य, भाग० १।७।४-५ की पालप्रबोधिनी ।
प्रथमोऽध्यायः] ख्यातिविवेकः २५३ इत्याशङ्कय समादधते, 'समाधावपि (सुबोधिनी १९३३) इत्यादिना । सर्वभवनसामर्थ्यरूपाया मायाया एव रूपान्तरं व्यामोहिका माया अतो व्याससमाधावेकस्या एवोक्तिः, तयैव द्वितीयायायातीति न कश्चिद्दोपः। ननु अत्र तु प्रपञ्चसृष्टिरुत्तरे निरूपिता, न तु पूर्वोक्तपु चतुर्पु अन्यतरद्, इत्याशङ्कयाहुः, 'प्रवाहस्तु' (सुयोधिनी ११॥ ३१३) इति । तु शब्दः प्रकारान्तरबोधकः। तथा च अत्र माया- व्यामोहक ही मानना चाहिए, सर्वभवनसामर्थ्यरूप नहीं । पूर्वपक्षी की इस उपर्युक्त आशङ्का का समाधान श्रीवल्लभाचार्य 'समाधि में भी' (सुबोधिनी ११६३१३) इत्यादि वाक्य से करते हैं। उनके 'समाधावष्यकैव शक्तिस्मयकार्यरूपोना' (सुमो० ११३१३) इस कथन का तात्पर्य यही है कि व्यामोहिका माया सर्वभवनसामर्थ्यरूपा माया का ही रूपान्तर है अतः व्यास की समाधि में एक ही माया के दर्शन होने की बात कही गयी है और उसी के उल्लेस से दूसरी (अर्थात् सर्वभवनसामर्थ्यरूपा माया) भी अर्थोपात्त हो जाती है। इस प्रकार व्यास की समाधि में एक ही माया का उल्लेस होने पर भी पल्लभाचार्य के सर्वभवनसामर्थ्यरूपा माया और व्यामोहिका माया का अलग-अलग उल्लेख करने में कोई दोष नहीं है। "उपर्युक्त प्रसङ्ग (भाग० १११३ ) में निमि के माया के स्वरूप- विषयक प्रश्न के उत्तर में अन्तरिक्ष ने पूर्वोक्त सुबोधिनी के वाक्य (सुनो० ११३३ ) में उल्लिसित माया के चार रूपों में से किसी एक का भी निरूपण न कर प्रपञ्चसष्टि का निरूपण किया है", इस आशङ्का का समाधान करने के लिये कहते हैं 'प्रवाहस्तु भन मायाशब्देन उच्यते' अर्थात् प्रकृत प्रसङ्ग में माया शब्द से अभिप्राय प्रवाह (अर्थात् सर्वभवन- सामर्थ्यरूपा माया द्वारा की गयी सृष्टि ) से है। इस वाक्य में प्रयुक्त 'सु' शब्द प्रकारान्तर का बोधक है। तात्पर्य यह है कि प्रत प्रसङ्ग में २५४ प्रमेयरत्नार्णवे [उत्तरार्द्ध शन्देन सर्वभवनसामर्थ्यरूपमायाकरणकः सृष्टिप्रयाह उच्यत इत्यर्थः । अतः चतुर्वेयान्तर्भाव इति भावः। तस्य प्रवाहस्य स्वरूपमाहुः, 'म च भगवत्कृतो भगवद्रूपश्च' (सुबोधिनी ११३३२३) इति । आत्मानं सयमकुरुत' (तैति० उप०२।७) इत्यादिश्रुतिः । अत एव निरन्ध उक्तम् , 'प्रपञ्चो भगवत्कार्य तद्रूपः' (शास्त्रार्थप्र० का०२३) इति। ननु एवं प्रपञ्चस्य भगवद्रूपत्वे तन मायाशब्दप्रयोगो नोचित इत्याशङ्कयाहुः, 'विषयेभ व्यामुग्धाः सर्वे भवन्ति' (सुबोधिनी १॥३॥३) इति । तथा च विषयरूपस्य प्रपञ्चस्य विचित्रत्वेन माया शब्द से सर्वभवनसामर्थ्यरूप माया द्वारा किये जाने वाले सृष्टि- प्रवाह का बोध होता है अतः प्रपञ्चसृष्टिनिरूपण का भी माया के उपर्युक्त चार रूपों में ही अन्तर्भाव हो जाता है । उस सृष्टिप्रवाह का स्वरूप बताते हैं, 'वह सृष्टिप्रवाह अर्थात् प्रपज मगवत है और मगवद्रुप मी है' (सुनो० ११।३।३ ) । श्रुति में भी कहा गया है कि 'उसने स्वय अपने को ( जगद्रूप से) रचा' (तैत्ति० उप० २१७) इत्यादि । इसीलिये तत्त्वार्थदीपनिबन्ध में श्रीवल्लभाचार्य ने कहा है कि 'प्रपञ्च मगगन का कार्य है और भगवढप है' (शास्त्रार्थप्र० प्र० २३)। पूर्वपक्षी कहता है कि "यदि प्रपञ्च सचमुच भगवद्रूप है तो उसके लिये माया शब्द का (मागवतादि शास्त्रों में) प्रयोग उचित नहीं है। तात्पर्य यह है कि प्रपञ्च को भगवद्रूप मानने का सिद्धान्ती का मत स्वीकार कर लेने पर उसरे लिये भागवतादि शास्त्रों में माया शब्द का प्रयोग अन्याख्येय ओर अनुपपन्न हो जायेगा!" पूर्वपञ्ची की इस आशङ्का का समाधान करने के लिये श्रीवल्लभाचार्य कहते हैं कि 'विपयों ( अर्थात् विषयरूप प्रपञ्च ) से समी लोग घ्यामुग्ध अर्थात् मोहित हो जाते हैं' (सुबो० ११।३।३)। तात्पर्य यह है कि शास्त्रो में प्रपञ्च के लिये माया शब्द का प्रयोग उसको मायिक बताने के अभिप्राय प्रथमोऽध्यायः] ख्यातिविवेका २५५ व्यामोहकत्वात्प्रपञ्चे मायाशब्दः प्रयुक्तो न तु मायिकत्वममि. प्रेत्य इत्यर्थः। पवं सर्वभवनसामर्थ्य, व्यामोहिका माया, पेन्द्रजालिक- विद्या, कापट्यं, मायाकरणको भगवदात्मकः प्रपञ्चध इति पञ्चसु पदार्थपु मायाशब्दं शिष्टाः प्रयुञ्जन्ते, सेपु अत्र कोर्थों वाच्यत्वेन युक्त इत्याहुः 'अतोऽ" (सुबोधिनी १९६३३३) इति । सिद्धान्तमाहुः, 'माया शर्भिगवतः (सुबोधिनीका० ११।३।३।१) से नहीं प्रत्युत उसके ( अर्थात् विपयरूप प्रपञ्च के) विचिन होने के कारण व्यामोहक होने से किया गया है । इस प्रकार शिष्ट लोग माया शब्द का प्रयोग सर्वभवनसामर्थ्य, यामोहिका माया, ऐन्द्रजालिक विद्या, कपटता तथा मायाकरणक ( अर्थात् माया द्वारा सृष्ट) भगवदात्मक प्रपञ्च इन पाँच पदार्थों के बोधक के रूप में करते हैं । प्रकृत प्रसङ्ग में माया शब्द का वाच्यार्थ उपर्युक्त पांच पदार्थों में से कौन है यह बताने के लिये श्रीवल्लभाचार्य 'अतः प्रकृत प्रसङ्ग में माया शब्द का कौन सा अर्थ मानना ठीक है इस प्रश्न का उत्तर देते हैं। (मुत्री० ११:३३) इत्यादि वाक्य द्वारा अपने मत को ( कारिकानद्ध रूप में) पुरस्कृत करते हैं । श्रीवल्लभाचार्य 'माया मगवान् की शक्ति है (सुबो० का० ११।३।३।१) इत्यादि कारिकाओं द्वारा मायासम्बन्धी अपने ब्रह्मवादसिद्धान्त का उपपादन १. 'मतोऽत्र किं युक्तम् इति चेद् ? उच्यते, माया शक्तिभंगवतः नात्र कार्या विचारणा। समायौ तु तथा भानात् प्रयोगस्तु विचार्यते ॥ १ ॥ विचारे भगवद्वाक्यं लक्षणं कार्यगोचरम् । प्रतीतिधाप्रतीतिश्च साधिष्ठानस्य तद्धि हि ॥ २॥ सुवर्णजलवरकायें तया सह कृतिः क्वापिच्छादन वा सतोऽपि वा ॥३॥' (सुबोधिनी ११।३।३)। प्रक्रियेय पुराणगा।
नाए, 'सुः शक्त्यां मायाशब्दप्रयोग उचितः, अन राय 'विचारे' (सुवोधिनोका० १२३।३२) इति पहप, शब्दप्रयोग किम्प्रयोजकः किनियन्धन इति सतत "भगवद्वाक्यम्' (सुबोधिनीका० १२॥३।३।२)मर्यरूप. (गीता ७/१४) इत्यादि वाक्यों से ज्ञात हा०३म) प्रतीत ११३।३।१)।(तात्पर्य यह है कि गीतोप माग करने के लिये कहते है, 'समाधी तु' द्वारा समात हो व्यास द्वारा समाधि में माया का व्यासमम प्रपश्य या दाक्ति के लिये माया शब्द का प्रयोग जसमाधान करने का किस प्रयोजन की सिद्धि के लिये औरामस्वरूप ( जाता है। "विचारे' इस पद से प्राप्त करने के लिये २५६ प्रमेयरलार्णवे इति । 'मम माया दुरत्यया' (गीता ७१४) इति गोलं अत एव आहुः, 'नान कार्या' (सुबोधिनीका० १११, तर्हि विचारस्य क्योपयोग इत्याशङ्कयाहुः, 'समा धिनीका० १२१) इत्यादि । व्यासकृतसक मोहकत्वेन मायाया दर्शनात् तन तादृश्या, करते हैं। गीतोपनिषद् के 'मेरी माया दुरत्यार की शक्ति है, इसीलिये श्रीवल्लभाचार्य कहते (अर्थात् माया के भगवान् की शक्ति होने की आवश्यकता या सन्देह करने की गुञ्जा सिद्ध बात की विचार या तर्क से सिद्धि कर, और तर्क से इसका निराकरण भी सम्भ नहीं) तो विचार का उपयोग कहाँ है. किये जाने से वहाँ (अर्थात् भाग० भाग० १११३१३ आदि में ) सृष्टिप्रवाद (सुयो का० ११।३।३।२) का अ माग० २१९॥ স্বশ্বৰ থক २।९।३३ इस प्रकार (मु का निरूपण 'जगत् हरा व्यास ना चाहिए"। पूर प्रत्युत स्वय चमोऽध्यायः] . 'नेदं जगद् मानसामर्थ्यरूपा माया से इस स्वात्मस्वरूप (अर्थात् भगवद्रूप) ख्यातिविवेकः ग० २।९।३३) इति वाक्यमित्यर्थः । 'लक्षणम्' (सुबो- का० १२२२२) इति, व्यामोहिकामायाया ज्ञापकम् धः । लक्षणस्य स्वरूपमाहुः, 'कार्यगोचरम् (सुबोधिनीका० २२) इति, कार्यलक्षणमित्यर्थः । एवं व्यामोहिका- पायाः कार्यलक्षणमुक्तम्। ननु 'पतस्या व्यामोहिकाया एव कार्य जगद् इत्येव तव्यम् , वहुभिराहतत्वात् ततश्च एतस्य विश्वस्य मिथ्यात्व. । उररीकार्यम्', इत्याशङ्कय, व्यामोहिकायाः र्यमपि तु स्वसर्वभवनसामर्थ्यरूपमायया भगवानेव स्वात्म- रूपं जगन्निमिमीते' इत्याहुः, 'सुवर्णजलवत् कार्ये' (सुयो- । अर्य के विना मी (या अभाव में ) प्रतीत हो अर्थात् वस्तु का अपने रूप से अन्यथा प्रतीत होना' ( भाग० २।९।३३ ) इत्यादि भगवद्वाक्य मोहिका माया का कार्यलक्षण अर्थात् ज्ञापक ज्ञात होता है । उपर्युक्त 'रिका में प्रयुक्त कार्यगोचरम्' पद से लक्षण का स्वरूप बताते हुए कहा पा है कि 'स्तेऽथं यप्रतीयत' (माग० २।९।३३) इत्यादि भगवद्वाक्य मोहिका माया का कार्यरक्षण है। इस प्रकार (सुबो का० ११।३।३।२ ) व्यामोहिका माया के कार्यलक्षण का निरूपण किया गया है । पूर्वरक्षी का कहना है कि, "यह जगन् इन व्यामोहिका माया का । कार्य है' इस मत के अनेक लोगों द्वारा समाप्त होने के कारण इसे मान लेना चाहिए और हम समन प्रपञ्च का मिथ्या होगा' ही पीक सिद्धान्त है ऐसा स्वीकार कर लेना चाहिए"। पूर्वपक्षी की इस मागदा का उल्लेस कर इसका समाधान करने के उद्देश्य से 'यह नागत् व्यामोहिका माया का कार्य नहीं है प्रत्युत स्वय भगवान् ही अपनी जगत् का निर्माण करते हैं। यह प्रतिपादित करने के लिये श्रीवल्लभाचार्य १ द्रष्टव्य, ऊपर पृष्ठ ११ । १७ । 114 7.परनाव [उत्तरा घिनीका १३३३३३) इति । यथा सञ्चायकप्रतिमां मृदा निर्माय तत्र सुवर्णजलं निक्षिप्यते ततः सञ्चायकप्रतिमाकारा सुवर्णप्रतिमानायासेन सिद्धथति, तथा सर्वप्रतिकृतिरूपां मायां सञ्चायकस्थानापन्नां कृत्वा स्वात्मरूपं जगद् भगवान् विरच. ति, अतोन मायिकं किन्तु ब्रह्मात्मकमेव इत्यर्थः। एवं सति त्वत्पुराणेऽपि जगतो भगवत्त्वम् उक्तं परन्तु प्रकारभेदेन इत्या- चार्यवर्याणामाशयः। तत्र पुराणे या प्रकारः सोऽयं सञ्चा. यकदृष्टान्तेन 'सुवर्णजलवत्' (सुयोधिनीका० ११३३३३३३) इति कारिकया स्फुटीकृतः । तथा च मायायाः सञ्चायकत्वेन यहते हैं 'सुवर्णजलवत् कार्ये (मुबो० का ११।३।३३३) इत्यादि । तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार साँचे की प्रतिमा को मिट्टी से निर्मित कर अर्थात् प्रतिमा बनाने के लिये उसका मिट्टी का सञ्चायक या साँचा बना कर उसमें सुवर्णजल ( अर्थात् गर्म किया हुआ तरल सोना) डाला जाता है और तब साँचे (की मिट्टी की प्रतिमा ) के आकार की सुवर्णमयी प्रतिमा अनायास ही ( अर्थात् बिना किसी कटिन परिश्रम के, ढल कर ) तैयार हो जाती है, उसी प्रकार भगवान् सर्वप्रतिकृतिरूप माया को सॉचा ना कर स्वात्मरूप जगत् की रचना करते हैं (अर्थात् माया के साँचे में अपने को जगत् के रूप में ढाल देते हैं), अतः यह जगत् मायिक नहीं प्रत्युत ब्रह्मात्मक ही है। इस प्रकार श्रीवल्लभाचार्य का आशय यह है कि पूर्वपक्षी द्वारा उपन्यस्त पुराणवाक्यों ( माग ११।३।१-३) में भी (त्वत्पुराणेऽपि) जगत् को भगवद्रूप ही कहा गया है यद्यपि वहाँ प्रतिपादन करने का प्रकार दूसरा है । वहाँ जगत् के भगवद्रूप होने के प्रतिपादन का जो प्रकार अभिप्रेत है उसकी सुबोधिनी में साँचे का दृष्टान्त देकर 'सुवर्णजलवत्' इत्यादि शब्दों से प्रारम्भ होने वाली उपर्युक्त कारिका द्वारा सष्ट किया गया है । सृष्टिकार्य में भगवान् १. द्रष्टव्य, स्नेहप्रपूरणी, पृष्ठ ७७-७८। , प्रथमोऽध्यायः] ख्यातिविवेक २५६ सृष्टौ भगवताहीकृतत्वात् सृष्टिप्रवाहे मायाशब्दः प्रयुज्यते । तथा सति इह निर्मिगवयोगीश्वरप्रसङ्गे मायाशब्देन सृष्टिप्रवाह उच्यत इति निष्फर्पः । एवञ्च सुबोधिन्याम् 'अतोऽत्र किं युक्तम्' (सुबो० ११६३६३) इति पूर्वमुक्तया फक्किया कृतस्य मनस्य, 'सृष्टिप्रवाहो मायाशब्दवाच्यत्वेनास्मिन् प्रसङ्गे युक्त' इत्युत्तरं सम्पन्नम् । इत्थं मायाशब्दवाच्यस्य सृष्टिप्रवाहस्य सञ्चायकरीत्या निर्माणाद्भगवत्वम् । एतदभिसन्धायैव पूर्वम् उक्तम् , 'स च भगवत्कृतो भगवद्रूपश्च' (सुबोधिनी १९४३६३) इति । वेदे तु मायारूपसाधननैरपेक्ष्येण भगवान स्वात्मस्वरूपं द्वारा माया के साँचे के रूप में स्वीकार दिये जाने के कारण पुराणों ( भाग० ११/३ इत्यादि) के वाक्यों में माया गब्द का प्रयोग सष्टि- प्रवाह के लिये किया गया है । इस प्रकार निष्कर्ष यह निकला कि निमि और नौ योगियों के प्रश्नोत्तर के उपर्युक्त प्रसग में माया शब्द का प्रयोग सृष्टिप्रवाह के लिये किया गया है। इस तरह सुबोधिनी (सुयो० ११।३।३ ) में कारिकाओं के ठीक पहले, 'यहाँ माया शब्द के उपर्युक्त अर्थों में से कौन मा अर्थ ठीक या अभिप्रेत है ? (सुबो० ११३२३) इत्यादि वाक्य द्वारा किये गये प्रश्न का उत्तर यह प्राप्त हुआ कि 'इस प्रसङ्ग मे माया शब्द का वाच्य सृष्टि- प्रवाह को मानना ही ठीक है। इस प्रकार माया शब्द के पाच्य सृष्टिप्रवाह का सञ्चायफरीति (साँचे में ढाल कर बनाने की रीति ) से निर्माण होने के कारण उसका भगवद्रूप होना उपपन्न है । उसके भगवदात्मक होने के इस सिद्धान्त को दृष्टिगत करके ही श्रीवल्लभाचार्य ने (ऊपर पृष्ठ २५४ पर उद्धृत, सुबोधिनी के ) पूर्वोक्त वाक्य में कहा है कि 'वह सृष्टिप्रवाह अर्थात् प्रपञ्च भगवरकृत है और भगवद्रूप मी है' (सुनो० १११३१३)। वेदों में भगवान द्वारा, मायारूपसाधन की अपेक्षा किये बिना ही, स्वात्मस्वरूप जगत् की सृष्टि करने का प्रतिपादन है।
२१. प्रमेयरलार्णवे [उत्तराद्ध जगत्करोति इति विभेदः। एतदेव प्रथमस्कन्धे 'सदसद्रूपया चासो' (भाग० ११२।३०) इत्यस्य सुबोधिन्यां स्फुटमकोरि 'घटितपूरणपात्रभेदबद्वैदिक्पौराणिक्जगतोर्मेद.' (सुबोधिनी । ३०) इत्यनेन । तनैव सुबोधिन्यां सर्वप्रतिकृतिरूपत्वं मायाया निरूपितम्। तथा च घटितसुवर्णप्रतिमा यथा सुवर्णात्मिका मष्टिप्रवाह या प्रपञ्चसम्बन्धी वैदिक और पौराणिक सिद्धान्तों में यही भेद है और भागवत के प्रथम स्कन्ध के 'मदसहपया चासो' (भाग ११२।३०) इस श्लोक की सुनोधिनी टीका में श्रीवल्लभाचार्य ने 'वैदिक (अर्थात् वेदों में निरूपित) और पाराणिक (अर्थात् पुराणों में निरूपित) जगत् का मैद घरितपूरणपानमेद (अर्थात् घटितपान और पूरित पार के भेद ) ये समान है' (सुनो० १।२।३० ) इत्यादि वाक्य द्वारा इसी को स्पष्ट क्यिा है तथा यहीं ( अर्थात् उच्च श्लोक की सुबोधिनी मे दी) १ "भगवान् इति वैष्ण्वशास्त्रे एव इय (='मायाकरणिका'- प्रकाश ) प्रथमा सृष्टि । ('वैदिक्प्रथमसृष्टे सकासादस्या का भेद इत्यत बाहु'-प्रवाश वैदिक तु स्वधरवशक्ति वारकर्मस्वभावाना सृष्टि प्रपमा ('तथा च वेदे शोजननम, अस्या त सा करण, तेन सा सृष्टिरित प्राथमिको इत्यर्थ ।'-प्रकाश)। ('वैदिरूपौराणिक जगतोर्भगवद्रूपत्वारिशेपेऽपि यो भेद त प्रकार बोधयितुमाहु'-प्रकाश ) वैदे तु मायापाघनराहित्य नन स्वत एवात्मान जगद्रूप करोतीत्युच्यते । घटितपूरणपात्रभेदवः दिक पौराणिक जगतोर्भेद । व्यलोकपक्षस्तु न प्रामाणिक ।" (प्रकाशमहिता सुवोधिनी १०००)। देखिये, तत्त्वार्थदीपनिय घ की स्नेहपूरणी व्याख्या, पृष्ठ ७६-३८। २ मायास्वरपमाह-सदसद्रूपया इति । सा हि उच्चनोनसप्रति कृतिरूपा । सञ्चायकरूपा'--XII ) | तस्याम् आत्मान सयोज्य ('पूरयित्वा' -प्रकाश ) प्रकटीवुर्वन जगद्रूपेण जायते । एव सति सुगमा सृष्टिर्भवति, सुवर्णकाराणा प्रतिमादिनिर्माणवत् । (सुबो० १।२।३०)।
. प्रथमोऽध्यायः] ख्यातिविवेका २६१ तथा प्रितपतिमापि सुवर्णात्मिकैव । सञ्चायफरीत्या जग- निर्माणप्रयोजनम् अत्रैव सुवोधिन्याम् उक्तम् , एवं सति सृष्टिः सुगमा भवति' (सुबोधिनी ११२।३०) इति । सञ्चायकरीत्या प्रतिमानिर्माणे सोकर्य लोके स्फुटम् । एवं मायासाधननिर- पेझतया वेदे निरूपितं जगन्मायासञ्चायकत्येन पुराणे निरूपितं जगच भगवदात्मकमेव । एवं श्रुतिपुराणसिद्धोऽस्मसिद्धान्त इति मन्जुलमखिलम् । माया के सर्वप्रतिकृतिरूप होने का निरूपण किया है। जिस प्रकार घटितसुवर्णप्रतिमा (अर्थात् सुवर्णपिण्द से गढ़ कर बनायी गयी प्रतिमा) सुवर्णात्मक होती है उसी प्रकार पूरित सुवर्ण प्रतिमा (अर्थात् प्रतिमा के मिट्टी के साँचे में गर्म किया हुआ तरल सोना डाल कर, दाल कर बनायी गयी प्रतिमा) भी सुवर्णात्मक ही होती है । सञ्चायकरीति से ( ढलाई द्वारा) जगत् का निर्माण करने का प्रयोजन भी यहीं (अर्थात् भाग० ११२।३० की) सुबोधिनी में 'इस प्रकार सञ्चायकरीति से जगत् का निर्माण करने में सृष्टिरचना सुगम हो जाती हैं' (सुबो० ११२।३०) इत्यादि वाक्य द्वारा बताया गया है। मञ्चायकरीति से (ढलाई द्वारा) प्रतिमा का निर्माण करने मे (गढ़ाई करने की अपेक्षा) आसानी होती है यह लोक में स्पष्ट अनुभव किया जाता है । इस प्रकार वेदों में निरूपित परमकाष्ठापन्न ब्रहा द्वारा मायासाधननिरपेक्ष होकर रचित जगत् तथा पुराणों में निरूपिन मायारूपी सञ्चायक का उपयोग करके निमित जगत् भी भगवदात्मक ही है। इस तरह हमारे सिद्धान्त का अतियों और पुराणों में प्रतिपादित होना सिद्ध हो गया । अतः हमारा ब्रह्मवाद सिद्धान्त निरखा है तथा उपर्युक्त सारा विवेचन निर्दोष और सुन्दर है। १. देखिये, ऊपर पृष्ठ २६० को टिप्पणी २। .
२६२ प्रमेयरत्नाणवे [उत्तराद्ध इति श्रीमद्गोवर्धनधर-श्रीवल्लमाचार्य-श्रीविठ्ठलेश्वरचरणानुचरसेवकेन लालभट्टोपनामयाकृष्यामटेन विरचिते प्रमेयरलार्णवे उत्तराद्ध ख्यातिविवेक' समाप्तः ॥ १ ॥ (एतावानेव अन्य उपलब्धः।) श्रीगोवर्द्धनघर, श्रीवल्लभाचार्य तथा श्रीविठ्ठलनाथ के चरणों के अनुचर, लालूभट्ट के नाम से प्रसिद्ध यालकृष्णमट के द्वारा विरचित प्रमेयरत्नाव के उमराद्ध का ख्यातिविवेक नामक प्रथम अध्याय समास हुआ' ॥ १॥ बारावतीतिनाम्नि प्रथितजनपदे पुण्यसारेतसीम्नि, शाकद्वीपीयविधु विजयनगरेऽभूद् भरद्वाजगोत्र । सम्भोर्मतः भवानीपदयुगमधुलिविप्रपादानुरक्त, लक्ष्मीनारायणाख्य मुविदितमहिमा राजमान्यो मनीपी ।।१।। सूतोस्तस्यात्मजन्मा विमरमतिमाशङ्करस्य द्वितीयः, मिश्र कंदारनाथः सहृदयहृदयोऽध्यापको दर्शनानाम् , हिन्दूना प्राणभूते स्मरहरनगरी विश्वविद्यालयेऽस्मिन् , ग्रन्थस्यास्यात्मतुष्टय व्यरिखदिह मुदा राष्ट्रभाषानुवादम् ||२|| आपोगण्डात् पितृवदनिश पोपयन् प्रेमपूर्वम् , तु यो माम् उपचितगुण सर्वयत्नान्यकापीत् । सन्तुष्टः स्याद् अनुजरचित वीक्ष्य भाषानुवादम् , अग्रेजातः सुकविगिरिजाशङ्करो मिन एनम् ॥ ३ ॥ वस्वश्याकाशनेनेऽस्मिन् वीरविक्रमवत्सरे । पूर्ति भाषानुवादोऽय गुरुपूर्णातियावितः ॥ ४ ॥ १. यह अन्य हमें यही तक उपलब्ध हो सका है और हमारे लिये निश्चित रूप से यह कह सकना कठिन है कि श्रीबालकृष्णभट्ट ने इसके धागे कुछ अन्य विवेक (या अध्याय ) भी लिखे थे या नहीं।
नोट्स पृष्ठ ४ पंक्तियां ३-४ जगन्मिथ्यात्व के मत का विस्तार से खण्डन कर सिद्धान्त का प्रतिपादन श्रीबालकृष्णमट्ट ने सिद्धान्तमुक्तावली की अपनी योजना व्याख्या में किया है। देखिए, सिद्धान्तमुक्तावली- योजना ४॥ पृष्ठ २२ पंक्कि ३ भगवन्मूर्ति की प्रापञ्चिक पदार्थों से विलक्षणता के श्रीबालकृष्णभट्टकृत विवेचन के लिए देखिए परिशिष्टम् १ । पृष्ठ ३० पक्तियाँ ८ एवं २३. 'शुद्धसत्वव्यवस्थिति.' यह उद्धरण लश्मीतन्त्र १३३७ का है। पृष्ठ ४५ पंक्तियाँ ९-१० तथा पृष्ठ ४६ पंक्ति ८. प्रकाशित लक्ष्मी- तन्त्र के अनुसार इस उद्धरण के पूर्वाद्धं का पाठ 'चैतन्यमस्य धर्मो य प्रभा भानोरियामला' है और यह तेरहवें अध्याय के पच्चीसवें श्लोक का उत्तरार्द्ध है। प्रस्तुत उद्धरण का उत्तरार्द्ध प्रकाशित लक्ष्मी- तन्त्र क तेरहवें अध्याय के छब्बीसवें श्लोक का पूर्वार्द्ध है । पृष्ठ ४९ पंक्तियां १२ तथा २४ 'आनन्दमूर्तिमजहादतिदीर्घ- तापम्' यह पाद श्रीमद्भागवत के अधोलिखित श्लोक का चतुर्थ चरण है जिसका तात्पर्य यही है कि आनन्दमूर्ति भगवान् श्रीकृष्ण का आलि. गन कर कुजा ने अतिदीर्घ ताप (अर्थात् अतिदीर्घ निविध ताप अथवा अनेक जन्मों से अनुस्यूत होने के कारण अतिदीर्घ हो गये कामताप ) से छुटकारा पा लिया । ( देखिए, सुशेधिनी १०१४८७)। सानमतप्तकुचयो रसस्तथाणो. जिघ्रन्त्यनन्तचरणेन रुजो मृजन्ती। दोभ्यां स्तनान्तरगत परिरभ्य कान्तम् आनन्दमूर्तिमजहादतिदीर्घतापम् ॥ (भाग० १०१४८१७)।
प्रमेयरस्नाणवे पृष्ठ ५८ पंकि४ आविर्माव तिरोभावषाद पे भीबालकृष्णमट्टकत विस्तृत विवेचन के लिए देखिए निर्णयार्णवः, पृष्ठ ५३-५५ । पृष्ठ ६२ पंक्ति ६. अमरतत्त्व के श्रीवालकृष्णमहकत विवेचन के लिए देखिए निर्णयार्णवः, पृष्ठ ५१-५२ । पृष्ठ १४४ पंक्तियां ३-४. श्रीहरिराय ने 'सर्वात्मभावनिरूपणम्' नामक अपने लघु अन्य में सर्वात्मभाव का नो निरूपण किया है यह श्रीबालकृष्णमट्ट को प्रस्तुत अध्याय लिखने में प्राय उसी प्रकार बुद्धिस्य रहा है जिस प्रकार चतुर्थ अप्पाप लिसले समय उनका 'योपुष्टि- मार्गलक्षणानि' नामफ लघुग्रन्य । अत. पाठकों की सुविधा के लिए हमने श्रीहरिराय की यह कृति परिशिष्टम् ५ ये रूप में अन्त में यहाँ मुद्रित कर दी है। पृष्ठ १५७ पंक्ति २. 'निरोध' के श्रीमालकृष्णभट्टकृत विवेचन के लिए देखिए परिशिष्टम् २। पृष्ठ २१० पंक्तियां ४-५. यह सुबोधिनीकारिका नहीं अपितु श्रीमदल्लभाचार्यकृत एकादशस्वन्धार्थनिरूपणवारिका का प्रथम श्लोक है । जैसा कि स्वय श्रीबालकृष्णभट्टके 'एकादशस्कन्धार्थनिरूपण- कारिका, मुबोधिनीतो भिन्नतयैवोग्ल-यमाना मन्ति' (निर्णयार्णवः, पृष्ठ २९ ) इस वाक्य से स्पष्ट है एवादशस्वन्याय निरूपण- कारिवा' 'सुबोधिनी' से भिन्न कृति है। इस श्लोक की श्रीमालकृष्ण- भट्टकृत विस्तृत व्याख्या के लिए देखिए परिशिष्टम् ३ । पृष्ठ २१२ पंक्ति ११ अन्यथाख्याति एवं अन्यख्याति में भेद के श्रीबालकृष्णभट्टकृत विवेचन के लिए देखिए परिशिष्टम् ४, तथा ख्यातिसम्बन्धी वालम सिद्धान्त के विस्तृत विवेचन क लिए देखिए, श्रीरमानाथभट्ट द्वारा सम्पादित 'वादावलि.' (पृष्ठ ११९-१३० ) में मुद्रित गोस्वामी श्रीपुरुषोत्तमविरचित 'ख्यातिवाद.' ।
परिशिष्टम् १ अत्र हि प्रापश्चिकपदार्थेभ्यो भगवन्मूर्ती विशेषः प्रतिपादितः । अत्रेदं विचार्यते । ननु घटपटादौ यया चिदानन्दयोस्तिरोभावः तथैव भग- वन्मूर्तावपि । अत्रापि चिदानन्दयोरनुपलभ्यमानत्वाइटपटतः को या विशेषः स्फूर्नाविति चेत् । शृणु। घटपटादौ चिदानन्दयोस्तिरोभावो द्रष्न् प्रति, घटपटादीन् प्रत्यपि । न हि घटादयः स्वस्मिस्तिरोहितो चिदानन्दावुपलभन्ते, स्वनिष्ठशनानुभवाभावात् स्वकीयसुखानुभका- भावाच । श्रीमूर्तिस्तु स्वस्मिन् वर्तमानी चिदानन्दी स्वयमनुभवति । अत एव हरिमूर्तिः सर्वज्ञत्वेन सेवमानाय सकलाभीष्टं ददाति । न हि घट- पटादीनां स्वसेवनस्वावज्ञादिदोपयोधोऽस्ति । न वा दुःखानुभवः । अतस्तेषां जडत्वात्तेषु चिदानन्दयोस्तिरोभावोऽन्येषां विषयोऽस्ति । श्री- विग्रहे तु चिदानन्दतिरोभावो स्वेच्छयैवान्यान् प्रति जाती, अन्यान् प्रति विषयो, स्वस्य तु स्वनिप्टौ चिदानन्दी विषयाविति घटपटादिभ्यो बैल- क्षण्यम् । भगवन्मूर्ती ज्ञानशक्तिः सर्वापि विराजते । अत एव कस्मै- चिद्राग्यवते पुरुषाय उत्तमप्रकारेणाधमप्रकारेण वा सेवा वृत्तेति स्वप्नादौ ज्ञापयति । घटपटादयः परकीयविषयकस्वविषयकज्ञानशून्याः । अतश्चि- दानन्दतिरोभाववन्तो जडपदेन व्यवहियन्ते । हरिमूर्तिस्तु स्वविषयकपर- विषयकज्ञानवती दिव्याचिन्त्यालौकिकशानक्ती भूतमविण्यद्वर्तमानपदार्थ- विश्यकशानवती भगवानेवेति वेदशैर्व्यवहियते । तादृशसर्वशत्वं तु अचि- न्यपदार्थबोधनादचिन्त्यकार्यकरणाच्च ज्ञायते । अतोऽन्येषां बुद्धया भग- वन्मूतों चिदानन्दतिरोभावसत्वेऽपि न वस्तुतचिदानन्दतिरोभावः, जड- जीवयोस्तु वस्तुतश्चिदानन्दतिरोभावः । अत एव अस्मदादिष्वानन्दो नान्यैरनुभूयते, अस्माभिरपि न स्वकीय आनन्दोऽनुभूयते, अतो युक्त एवारमास्वानन्दतिरोभावः। एवं घटे चैतन्यमानन्दश्च नान्यज्ञान विषयो , प्रमेयरत्नाणवे न वा घटविषय इति तदुमयोस्तिरोभावाज्जडत्वम् । श्रीविग्रहेण तु स्वानन्दः स्वचैतन्यं विषयीक्रियत इति महालक्षाण्यान्न जडत्वलयोऽपि । एवमेव श्रीशालयामेऽपि । अत एव गोपालोत्तरतापिन्यारम्भे,' "विष्णोराया शिलाघीगुरुपु नरमतिर्देष्णवे आतिबुद्धिर, विष्णोवा वैष्णवानां कलिमलमयने पादतीर्थेऽम्बुघुद्धि मन्ने तन्नाम्नि विष्णोः पुरुषकलुपहे शब्दसामान्यबुद्धिः, विष्णी सर्वेश्वरेशे तदितरसमधीर्यस्य वा नारकी सः ॥" इत्यनेन भगवन्मूर्ती शिलाबुद्धिमतो नरकमाप्तिः श्रयते । 'विष्णोरायां शिलाधी:' इत्यादी शिलादिसामान्यबुद्धिरित्ययों वक्तव्यः । उत्तरार्दै 'शब्दसामान्यबुद्धिः' इत्यत्र सामान्यपदात्तदेकान्वयिनां तथैवार्थस्यो- चितत्यात् । तथा च शिलादिबुद्धिजदत्वनुद्धिर्यस्य स नारकी किन्तु सचिदानन्दरूप एव चिदानन्दतिरोमावरहितो भगवान् श्रीकृष्णो जीवो- द्धाराय मूर्तिरूपेण प्रकटसच्चिदानन्देनाविर्भूत इति बुद्धिमन्वो मक्काः पुरुषोत्तम प्राप्नुवन्तीत्यवदातो महानुभावानां मार्गः। भक्तिज्ञानरहिताना भगवन्मूर्ती चिदानन्दरपुरणाभावस्तु तस्यैव मूर्तिरूपस्य भगवत इच्छा- विशेषेणेति दिक् ॥ ( निर्णयार्णयः, पृष्ठ ६३-६५)। , GOASPR७०- १. ईशाद्यष्टोत्तरशतोपनिषदः मे मुद्रित गोपालोतरतापिन्युप. निपद् में हमें यह छोक नहीं मिला अतः (ऊपर पृष्ठ २० टिप्पणी १ मे) हमने इसे शूद्रकमलाकर से उद्धृत किया है । २. यह पद श्लोक को छन्दःशास्त्र की दृष्टि से अशुद्ध बना देता है अतः ऊपर बोसवें पृष्ठ पर हमने इसका 'अर्चाविष्णो' पाठ स्वीकार किया है।
t परिशिष्टम् २ ननु निरोधलक्षणमन्ये, 'यच्च दुःखं यशोदाया' (निरोधल०१) इत्यादिना श्रीमदाचार्यवयः भगवद्विरदादिसामयिकदुःखादि स्वयं याचि-- तम् । एतावता निरोधस्य किं लवणं सिद्धमिति चेत् ? शृणुत । भगवद्विरहे दुःसहदुःस भगवत्सयोगे परमाहादश्चेत्यादि कार्य निरोध- जन्यमेव, यतो निरुद्धानामेच भगवद्विरहे दुःस श्रूयते सयोगे महानन्दश्च, 'गोपीनां परमानन्द आसीदोविन्ददर्शने । क्षणं युगशतमिव यासां येन विनाभवद् ॥' (भाग० १०।१९।१६) इतिवाक्यात् । एव सति तादादु सादेनिरोधकार्यत्वात् कार्यलक्षणमन मुखसाध्यमित्याकलय । भगवद्विरहसामयिकपरमदुःखकारणत्व निरोधत्व, भगवत्सयोगसामयिकपरमानन्दसापकत्व निरोधत्त्वमित्यादिलक्षणानि निरो- धस्य सिद्धयन्ति । निरोधस्य निबन्धसुबोधिन्योर्बहुधा निरूपितस्य परस्पर- विरुद्धतया प्रतीयमानलक्षणस्य सम्यगविरोधप्रकारो मया सुबोधिनी- योजनाया (सुबो० का० १०।१।१।९-१० योजनाया ) विवृत इतिः विशेष जिज्ञासायां ततोऽवधेयम् । (निर्णयार्णयः, पृष्ठ २३-२४)।
परिशिष्टम् ३ . अथ श्रीमदाचार्यचरणा निरोधस्यैव परमफलप्रापकत्वेन अग्रिम- लीलयोवैयर्यमाशय उभयोः सार्थकत्वाय प्रयोजनं वर्णयन्तः उक्त- 'विवक्षितयोः सङ्गतिमाहुः, 'निरोघलीलामुक्त्वा' इत्यादिना। तिरोध- लीलाम् इति, स्वशक्तिभिः सह प्रपञ्चे भगवत्कर्तृ ककोडया निविध. जीवानां प्रपञ्चविस्मरणरूपामित्यर्थः । तदनुवर्ण्यत इति तदनुसारिणी मुक्तिः निरूप्यत इत्यर्थः । इह उक्त्वा इति क्त्वाप्रत्ययेन आनन्तर्य प्राप्तम्, अतः तदनु वयंते इत्यस्य तदनुसारी मोक्षो निरूप्यते इत्ययों शेयः । 'तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशद्' (तैत्ति उप० २।६) इति श्रुतौ क्त्वाप्रत्ययेन आनन्तर्यसिद्धी अनुप्राविशद् इति 'अनु'-उपसर्गस्य न आनन्तर्यमर्थः किन्त्वनुप्रवेशः कश्चित्सदार्थविशेष एव इति जन्मप्रकरणसुनी- पिन्यां स्थितम् । तददिह 'अनु'-उपसर्गस्य न आनन्तर्यमर्थः किन्तु आनुगुण्यमर्थः। निरोधानुगुण्यं तु यादृशो मर्यादापुष्टिमेदेन द्विविधी निरोकः तादृशी द्विविधा मुक्तिः इति । तत आश्रयः। निरोधलीलाया निरुद्धर्भक्तः यादृग्भगवत्सुखमनुभूत तागेव आश्रयप्राप्ती अनुभूयते, अतो निरोधस्याश्रयतुल्यत्यम् । परमेतावान् विशेषः । निरोधलीलाया सुस परिच्छिन्नम्, प्रपञ्चे जायमानत्वात् । अत एव यावत्यो रात्रयो वरत्वेन दत्ताः तायतीवेव फलप्रकरणे रमणम् | आश्रयलीलाया तु तदेव सुखमपरिच्छिन्नम्, व्यापिवैकुण्ठाधिकरणके आधिदैविकवृन्दावने प्रपञ्चा- तीते कालाधनधीने जायमानत्वात् । आश्रयप्राप्तिः तु न मुक्ति विना परिशिष्टम् ३ २६८ भवति इति मुक्तिनिरूप्यत इत्यर्थः। एवं निरोधमुक्त्योनिरूपणे संगति- मुक्त्वा मुक्त्याभययोनिरूपणे सङ्गतिमाहुः, 'मुक्कानामाश्रयः कृष्ण" इति । यतो 'मुक्कोपसृष्यव्यपदेशाद्' (ब्रह्मसूत्र १।३।२) इति न्यायेन मुक्तमात्रप्राप्यो भगवान् अतो मुक्ति निरूप्य आभयो निरूप्यत इत्यर्थः । स आश्रयः के इत्याकादक्षायामाहुः, आश्रयः कृष्ण इति । 'आभासश्च निरोधश्च यतश्चाध्यवसीयते । समाश्रयः परं ब्रह्म परमात्मेति शब्द्यते ॥' (भाग० २११०१७) इति शुकवाक्यात्परब्रहाण आश्रयत्वम् । परब्रह्मत्व कस्य इत्याकाक्षायां कृष्णस्य इति बोध्यम्, 'कृषिभूवाचकः शन्दो णश्च निवृतिवाचकः । तयोरक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते ।। इति गोपालतापिनीसमारम्भश्रुतेः, 'येषां गृहानावसतीति साक्षाद्गूढं परं ब्रह्म मनुष्यलिङ्गम्' (भाग०७।१०1४८) इति श्रीभागवतवाक्याच । नान्येपाम् इति । अन्येपाम् अमुक्तानाम् इत्यर्थः। अमुक्तैराश्रयत्वेन भगवान्न प्राप्यतेऽतः पूर्व मुस्रिपेक्षिता । ननु कस्यचिद्भक्तस्य मुक्ति विनापि भगवत्यातिः स्मयते, तत्कथ सेस्यति इत्याशय आहुः, शाखत इति । शास्वतः तु एवमेव व्यवस्था । प्रमेयबरेन मुक्ति पिनापि भगवत्प्रातिर्भयति, सा न केनापि निवार्या इति माव. ॥ (निर्णयार्णवः, पृष्ठ ३०-३२)।
परिशिष्टम् ४ दशमसुनोधिन्याम्, 'अज्ञानमन्यथाज्ञानं कृष्णगं विनिवार्यते।' (सुबो० का० १०१।१।२८) इति । इदमिह विमृश्यते । ननु अन्ययाशान न प्रमात्मकम्, अतो भ्रमरूप मन्तव्यम् । तथा सति अन्ययाख्यातिरेव स्यात् । सा तु 'संशयोऽथ विपर्यास' (माग० ३।२६।३०) इति तृतीयस्पन्धश्लोकसुयोधिन्या दूषिता, अन्यख्यातिरेय स्थापिता । सा अन्यथाज्ञानस्वीकारे विरुद्धयत इति चेत् । शृणु । 'संशयोऽय विपर्यास' (भाग० ३।२६।३०) इत्यत्र बुद्धिवृत्तिनोत्तो यो विपर्यासशब्दाभिधेयो भ्रम सा अन्यख्यातिरेव । तस्या अन्यख्याते. भ्रमशब्दवाच्याया विष- यस्य रजतादेः बुद्धिजन्यतास्वीकाराद् बाह्यत्वाभावेन फेवलमान्तरत्वेन बुदचैव गृह्यमाणतया इन्द्रियविपयाच्छुफ्त्यादिरूपादन्यस्य रजतादेः ख्यातिरन्यख्याति. इति सिद्धान्तात् । तदुक्त वेदस्तुतिविकृती, 'रजतं तु तदनन्तरं बुद्धया जन्यते विषयोनियते च' ( सुचो० १०८७।३७) इति । विवर्तमते मायाकल्पितमनिर्वचनीय रजत चक्षुषा गृह्यत इत्य- निर्वचनीयख्यातिस्तेषाम् । अस्मन्मते तु शुत्तिरेव नयनैर्विषयीक्रियते । रजत तु वुद्धयोत्पाद्यते बुद्धयव गृह्यत इति न चक्षुर्मास रजतम् । तत थाप्राह्यात् शुक्त्यादेरन्यस्य रजतादेः ख्याति. बुद्धिवृत्तिरूपा अन्यख्यातिः भ्रमशब्दवाच्या । अन्यथाज्ञान तु सशयविपर्यासादिभ्यो भिन्न मायिक ज्ञानान्तरमेव न तु भ्रम. | 'ऋतेऽयं यत्प्रतीयेत' (भाग० २।९।३३) इत्युपक्रम्य, 'तद् विद्यादात्मनो मायाम्' (भाग० २१९:३३) इति भगवद्वाक्यात् । अस्मिन्नन्यथाजाने मायाजन्यधर्मयुक्तो विषयो मासते । घटो भ्राम्यति, सिता कटवी, शङ्कः पीत इत्यादी घटस्य, सिताया., शसस्य च प्रत्ययो न बाध्यतेऽपि तु घटे भ्रमण, सिताया कटुत्व, शङ्ख पीतत्व विषयतारूपमधिक भाति इति स्थिरेऽपि घटे भ्राम्यत्त्वेन, मिष्टाया सिताया कटुत्वेन, श्वेते शङ्ख पीततया प्रत्ययान्मायिक- धर्मयुत्तो भगवद्रूपो घटादिपियो भवतीत्यन्यथाशनत्वमेतस्य । शुक्ति- रजतस्थले तु शुचिप्रत्ययवाधात् केवल रजतप्रत्ययो बुद्धौ भवतीति परिशिष्टमः४ इन्द्रियगृहीतायाः शुचरन्यस्य रजतस्य ख्यातिभवतीति नान्ययाशानं किन्त्वन्यशानमित्यन्यख्यातिरेय । सैव भ्रमशब्दवाच्या, बुद्धिवृत्तिरूप- स्वात, 'संशयोऽथ विपर्यासो निश्चयः स्मृतिरेव च' (भाग २६३०) इति वाक्ये विपर्यासरूपत्वेनोक्ताया बुद्धिवृत्तेरेव भ्रमत्वात् । तस्यां ख्याती विषयो रजतादिः बुद्धिकल्पितः, स आन्तर एव इत्युपपादितं ख्यातिविवेके । अन्ययाज्ञाने तु विषयो बाह्यश्चक्षुरादीन्द्रियगृहीतव्यः, यथा प्रमात्मरे ज्ञाने सितायां रमनेन्द्रियगृहीतायां तदीय वास्तवं मिष्टत्वं रसनया गृह्यते । एवं सिताया रसनेन्द्रियगृहीतायाम् उपाधिविशेषपित्तादिदोप- यशाद् आगन्तुकमवास्तवमपि कटुत्व विषयतारूपं गृह्यते । एवं मिष्टत्व- शानाभाय सम्पाय कटुत्वेन सितायाः प्रत्यय प्रस्टयन्ती माया स्वचम- स्कृति दर्शयति । तदेतदन्यथाज्ञानम् । अत एव सुबोधिन्या भणितम, 'अन्यस्मिन्नन्यविषयतां सम्पादयति' (मुबो० २।९।३३) इति । अन्यस्मिन् घटादौ अन्यस्य चक्षुषः विषयतारूपं भ्रमण सम्पादयति इत्यर्थः । तदुक्तं तय मुबोधिन्याम्, 'अन्यत्र स्थिता भ्रमिरन्यत्र आनीयते' (सुबो० २।९।३३) इति । 'तया व्यामोहिता बुद्धिः पदार्था- नन्यथा मन्यते' (सुयो० २।९।३३ ) इति च । अन्यथा यदि भ्रमटो भिन्न एव माययोत्पादितः स्यात्तदा 'अन्यत्र स्थिता भ्रमिरन्यत्रानीयते' ( सुबो० २१९६३३ ) इति नोक्तं स्यात् , भ्रमिसहितस्यैव माययोत्यादि- तत्यारपुन मेरानयने प्रयोजनाभावात् । 'विपये विपयता काचित्स्वी- कर्तव्या' (मुनो० २।९।३३) इत्यपि नोच्येत, भ्रमणविशिष्टस्य घटा- न्तरस्यैव त्वयानीकृतत्वाद् भ्रमदृष्टेः तादृशघटविषयत्वेन सविषयत्वान्निवि- परताया अनवसरपराहतत्वात् । अतो 'घटो भ्राम्यति' इत्यादिरूपे अन्यथाज्ञाने विषयः स एव घटः परं मायया विषयतारूप भ्रमणं तन निक्षिप्यते । ततो विषयताविशिष्ट घटं हवा 'घगे भ्राम्यति' इत्यन्यया- शानमुद्गवति । एवं प्रकृते श्रीकृष्णे परग्रह्मणि परमतत्त्वरूपे स्वेच्छया सकलदृग्गोचरेऽपि ये ज्ञानमतिरहितास्तेपामयं मनुष्य इति मनुष्यत्वेन बोधः, तदिदमन्ययाज्ञानम् । अत एव, 'मायामनुष्यस्य' (भाग० २७२ प्रमेयरलाणवे १०1१७) इति श्लोकमुबोधिन्या, 'तथा प्रतीतिविपयस्य' इत्युक्त्या अन्यथाज्ञानमुक्तं भगवद्विषयकम् । 'माययैव रूपान्तरम्' इत्यस्य टिप्पण्या रूपान्तरत्वेन भानम्' इति व्याख्याय अन्यथाज्ञान प्रद. र्शितम् । ये तु शास्त्रेण श्रीकृणा पर ब्रह्म जानन्ति तेषा भगवति मायया मनुष्यधर्मभानेऽपि बुद्धी न मनुष्यत्वनिर्धार इति न तेषा भ्रमः किन्तु अन्यथाज्ञानमान मायया। तदपि शास्त्रोत्येन परब्रह्मत्वोधेन बाध्यत एय | अतो बुद्धौ तु तेषा पुरुषोत्तमशान प्रमात्मकमेव । ये पुनर्वहिर्मुखाः तबुद्धर्मायया व्यामोहितस्वात् पुरुषोचमत्वनिर्धाराभावात् कैवलमनुष्यत्वेन मानाद् अन्यथाशानत्वमेव । एव सति सिद्धमेतत् । मायाकलितमिथ्याधर्मयुक्तस्य सत्यपदार्थस्य चक्षुरादिमिर्नहिभान यत् तदन्यथाज्ञान, बुद्धिकल्पितस्य रजतादे. कैवल- मन्तरेव भान भ्रमः, इत्यन्यथाज्ञानभ्रमयोविवेकः। तर अन्ययाज्ञान द्विविधम् , लौकिकालीकिकविषयभेदात् । ठोकिने 'शङ्खः पीत' इत्यादी पीतयेन भान मायानिमितपीतत्वप्टियन जायते, शझे पीतत्वस्य मायाकार्यत्वात् । भगवति परमणि श्रीकृष्णे यन्मनुष्यत्वेन भानं तदन्यथाशान, पर तत्र मायया न मनुष्यत्वमुत्पाद्यते किन्तु भगवानेव स्वमायया जीयाना बुद्धि व्यामोदयितास्वस्मिन् मनुष्यत्वज्ञान सम्पादयति । अती न भगति मनुष्यत्व न वा शरीरित्वम् । अत एव अन्तस्तद्धर्माधि- रणभाष्ये ब्रह्मण. शरीर नाङ्गीकृतम्, 'सर्वसमर्थस्व ब्रह्मण, का वा अनुपपत्ति. येन स्वस्यापि शरीरं कल्पयेत् किन्तु लोलार्थमन्यथा प्रदर्शयेन्नटवद्' (अशुभाष्यम् ११११५९) इत्युक्तम् । तेन भगवता प्रदर्शित मनुष्य जीवप्नत्ययगोचरो भवति । तदेतदन्यथाज्ञानम् । अतो न मायिक शरीर हरायट्टीतन्यम्, अपि तु वेवलानन्दविग्रह एव माय- यान्यथा प्रतीयते । तन्निवृत्तिप्रकार सुबोधिन्या पठितः, 'अज्ञानमन्य- थाज्ञानं कृष्णर्ग विनिवार्यते' (सुमो० का १०1१1१।२८) इत्यनेन इति निसिल निरवद्यम् । (निर्णयार्णवः, पृष्ठ ६५-६८)" परिशिष्टम् ५ गोस्वामिश्रीहरिरायविरचितम् सर्वात्मभावनिरूपणम् कृष्णस्य कृपया किञ्चिद् हृदयागतया मया। सर्वात्मभावशब्दार्थः कश्चनान विविच्यते ॥१॥ सर्वेषामिन्द्रियाणां हि देहादीनां तथा पुनः । आत्मभावो भगवति सर्वभावः स कथ्यते ॥ २ ॥ यात्मभावश्च सर्वत्र स्वसम्बन्धविचारणम् । स्वस्य सम्बन्धितास्फूतिरस्माकं भगवानिति ॥ ३॥ देहेन्द्रियाणां प्रत्येकमाकाहारहिता हो। याकांक्षायां तु विपये भावसत्त्वाप्न सर्वता ॥ ४ ॥ हि तनावे देहायस्फूर्तिरुच्यते । स्फूर्त्या तत्रापि चे भावो भवेत्पोपादिहेतुकः ॥ ५॥ तथैव विपयत्यागः सर्वतासाधनाय हि। काममावे कामफले भाचतो नहि सर्वता ॥६॥ 'महं भगवतः सर्व इति सर्यात्मभावनम् । "प्रभुममेति भावो हि कामभावो यतो मतः ॥७॥ अतो विवारकैद काम-सर्वात्मभावयोः। योद्धव्यः श्रीमदाचार्यरुपयातिविचक्षणः॥८॥ सर्वात्मभावसाध्यो हि स्वरूपानन्द उच्यते । तद्वतामत भावानन्दो निरूपितः ॥९॥ मावस्वरूपमेवास्ति भेश्योधन भिन्नता काममावे यहि स्थे तु स्पष्टा बुद्धधत भिन्नता ॥ १० ॥ अत पवाज २७४ प्रमेयरलाणवे अभेदोऽपि स्वरूपस्य कामाद्याश्रययोधनात् । फामभावफलं नित्यसंयोगः प्रभुणा मतम् ॥ ११ ॥ यतस्तथैव तत्रास्ति ह्यपेक्षा कामभावने । सर्यात्मभावे सततं सर्वत्यागात्मके मतम् ॥ १२ ॥ स्वस्य सम्बन्धितारूपे भावप्राप्ति फलं पुनः । अनपेक्षत्वतो नैव कामादि दीयते फलम् ॥ १३ ॥ स्वरूपमेव देयं हि, स भावः श्रुतिसम्मतः। अतः सर्वात्मभावस्य फलभावो न चान्यथा ॥१४॥ स चानपेक्षितारूपी यत्र नापेक्षिता हरेः। चिरहे भाववैलच्यात्सापेक्षत्वं कथञ्चन ॥१५॥ 'सन्त्यज्य सविषयान्' इत्यत्र निरपेक्षिता। स्वरूपनिरपेक्षत्वं वियोगे दृश्यते हरेः॥१६॥ अत एवोद्धवैरुक्तं दोत्येन मजमागतः। 'सर्वारममावोऽधिकृतो"विरहेणेति तद्वचः॥ १७॥ अतः सर्वात्मभावो हि त्यागात्मोपेक्षया युतः । भावस्वरूपफलका स्वसम्बन्धप्रकाशकः॥ १८ ॥ देहादिस्फूतिरहितो विषयत्यागपूर्वकः। भावात्मकामसम्बन्धिरमणादिक्रियः सदा ॥१९॥ स्वतन्त्रभक्तिशब्दाख्यः फलात्मा ज्ञायतां जनः । प्रवृत्तिः कामभावस्ति, निवृत्तिस्तु द्वितीयके। अधिक लेखितुं नैव शक्यते मन्दबुद्धितः ॥२०॥ स्वाचार्यरुपयाभिः सदा तद्भावभाधुकैः। सुयोधिनीदर्शकः स विज्ञेयस्तु स्वसो जनैः ॥ २१ ॥ इति श्रीमद्धरिरायकृत सर्वात्मभावनिरूपणं समाधम् ॥
पुस्तक में उद्धत एवं उल्लिखित ग्रन्थों की सूची
अणुमाष्यम्
(पुरुषोत्तमकृतप्रकाशव्याख्यासहित,
चौखम्बासस्करण)।
अनुमाध्यम्
(श्रीधरपाठककृतबालबोधिनीसहित)।
आयर्वणिकब्रह्मसूक्तम्
आदित्यहृदयम्
ग्वेदः
एकादशस्कन्धार्थनिरूपणकारिकाः (श्रीवल्लभाचार्यविरचिताः)।
ऐतरेयोपनिषद्
कठोपनिषद्
कालनिर्णयदीपिका
कृष्णोपनिषद्
गीता
(भीमद्भगवद्गीता)।
गोकुलनायकृतविज्ञप्तिः
गोपालपर्वतापिन्युपनिषद्
गोपालोत्तरतापिन्युपनिषद्
छान्दोग्योपनिषद्
तत्वार्थदीपनिबन्धः (श्रीवेदारनाथमिभकृतस्नेहप्रपरणीव्याख्यासहित,
भारतीयविद्याप्रकाशन वाराणसी से प्रकाशित)।
तैत्तिरीयोपनिषद्
नारायणोपनिषद्
निरोधलक्षणम्
नृसिंहोत्तरतापिन्युपनिषद्
पुष्टिप्रवाहमर्यादाभेदः (श्रीमत्पीताम्बरकृतव्याख्यासहित)।
प्रमोपनिषद्
२७६ प्रमेयरलाणवे . प्रस्थानरत्नाकरः (श्रीपुरुषोत्तमविरचित, चौखम्बासंस्करण)। बालबोधः बृहदारण्यकोपनिषद् ब्रह्मवैवर्तपुराणम् ब्रह्मसूनाणि भक्तिहेतुनिणयः (विवृतिसहित, गुजराती अनुवादयुक्त)। भक्तिहंस: (भक्तितरङ्गिणी, तीर्थ एवं विधक टीकाओं सहित)। भागवतार्थप्रकरणम् (प्रकाश, आवरणमङ्गः, योजना तथा निबन्ध कठिनाशविवेचनसहित)। महानारायणोपनिषद् मुण्डकोपनिषद् लक्ष्मीतन्त्रम् (पं० वी० कृष्णमाचार्यसम्पादित, अड्यार लाइब्रेरी मद्रास से १९५९ में प्रकाशित)। 'विट्ठलनाथकृतविज्ञप्तिस्तोत्रम् विदूमण्डनम् (सुवर्णसूत्रसहित, चौखम्बासंस्करण)। विद्वन्मण्डनम् (सुवर्णसूत्र, हरितोषिणी तथा गङ्गाधरभहीटीका सहित)। विवेकचूडामणिः विष्णुधर्म वैयाकरणभूषणसारः (चौखम्बासंस्करण)। शाङ्करभाष्य (उपनिषदों, ब्रह्मसूत्रों एवं गीता का श्रीशङ्कराचार्यकृतभाष्य)। शाण्डिल्यभक्तिसूत्राणि शाखार्थप्रकरणम् (प्रकाश, आवरणभङ्ग, टिप्पणी, योजना एवं सस्नेहभाजनसहित)। शूद्रकमलाकरः श्रीपुष्टिमार्गलक्षणानि ( गोस्वामिहरिरायविरचित)।
ग्रन्थसूची २७७ श्रीमागवतसुधासागर (भागरत का श्लोकानुसारी हिन्दी अनुवाद, गीताप्रेस से प्रकाशित)। श्रीमद्भागवतम् (सुबोधिनी, सुबोधिनीप्रकाश एच श्रीवल्लभकनलेखसहित)। श्रीमद्भागवतम् (श्रीधरस्वामिकृत भावार्थदीपिका, वशीधरकृतप्रकाश, सुबोधिनी, पुरुषोत्तमकृतप्रकाश, गोस्वामिगिरिघरकृत घालप्रबोधिनी आदि अनेक टीकाओं सहित, श्रीकृष्ण- शङ्करशुक्लसम्पादित)। श्वेताश्वतरोपनिषद् सर्वनिर्णयप्रकरणम् (प्रकाश, आवरणभङ्ग एव टिप्पणी सहित)। सिद्धान्तमुक्तावली ('सद्धर्मस्मारक' वर्ष २, मास १ के अङ्क में प्रकाशित विवृति, मकाश, योजना आदि अनेक टीकाओं सहित)। सुबोधिनी (श्रीवल्लभाचार्यकृत श्रीद्भागवत की टीका, पुरुषोत्तमकृत प्रकाश एवं श्रीवल्लभकृत लेख सहित)। सेवाकौमुदी (श्रीरमानाथभट्टसम्पादित)। सेवाफलम् (द्वादशविवरणसमेतम्)।
२० २१ ४१ मुद्रण में हो गयो अशुद्धियों का शुद्धिपत्र पृष्ठ पंक्ति मुद्रित पाठ अभीप्सित शुद्ध पाठ २ २२ उपनिषत्सद उपनिपत्सिद्ध १९ बझ- (ब्रह्म- १२ २० को को इति । ४ विद्यमानत्वात् विद्यमानत्वात् पृष्ठ पृष्ठ ४० ५ “स वा एष आत्मा हृदि 'स वा एप आत्मा ददि य यं इति । ६ चमक चम्पक ५ 'व्यापकत्वम्, ध्यापकत्वम्, ६ निधा द्विधा १९ तीन दो "एवं ६२ १६ कूटस्थ फटस्थ १५ दोने वह होने से वह १८ दस કર समतिः २२ प्रकारोऽपि प्रकारोऽपि १४ इन्द्र इति। ७८ १३ गहा कहा ७८ १५ मो २४ समतिः ७७ शुद्धिपत्रम् २७९ अभीप्सित शुद्ध पाठ सिद्धयर्थ पुष्टिभक्तिरूपं अक्षण्वता"परं 'वीश्यालकावृतमुखं एतच, ७ पंक्ति मुद्रित पाठ ७९ १८ सिद्धयर्थ ८ पुष्टिरूपं २३ अक्षण्वता पर २ वीक्ष्यालकावृतमुख ८९ २२ ननु ९१ फलाकडक्षा ९२ २० ६१७२८ ९३ ५ रहित्यादि ३ तामस २ सिद्धिलौकिकी ९५ २७ मायया: ९८ ४ चोर्यादि १०० ४ श्रुतिरपि अन १०३ २३,२४ ना १२१ ५ तदा १२५ १८ कणरन्ध्र १२२ ३-४ रित्यभिधीयते १२२ ५ यता १३० १८ नित्य लीला १३२ ३ पुष्टि-पुष्टि १३२ २१ अलौकिक सामथ्र्यरूप १३५ १४ का १४७ १४९ ५ म्बरीपस्य १५७ ४११ अनुशय १६१ शयना फलाकाङ्क्षा ६।१७।२८ राहित्यादि तामस- सिद्धिलौकिकी मायायाः चौर्यादि (पाठान्तरे,) अतिरनापि ना ततः कर्णरन्ध्र रित्युच्यते युक्ता नित्यलीला पुष्टिपुष्टि अलौकिकसामर्थ्यरूप को जो उम्बरीपस्य अनुशयन शय्या २८० प्रमेयरलाणवे अमीप्सित शुद पाठ उद्धवद्वारोपदिए रहने परिवर्याश्रवणादि इति । पृष्ठ पंक्ति मुद्रित पाठ १७३ २ उदवोपदिष्ट १७३ ११ रहते १०९ ५ परिचर्यादि १८० ८ १८४ २ अत एव १८४ २४ पुष्टिमागियों १८७ २६ ) १८७ २७ प्रतिवन्धक १९६ १२ को यह १९६ १३ भगवन् १९८ २२ अध्याय २०४ २.८ २०८ ॥ २०९ १२ हैं २५२ २४ वस्तुता जीवापि २२४ ८ स्पर्श २५२ २५ भावापन्न अत पुष्टिमागियों ), प्रतिबन्धक को भगवान् अध्याय इति । है वस्तुनो जीवोऽपि सरों भावापन्न नोट-प्रमादवश पृष्ठ १४५, १४७, १४९, १५१, १५३ और १५५ पर अध्याय का शीर्षक 'सर्वात्मभावविवेकः' के स्थान पर 'पुष्टि- भक्त्यधिकारविवेकः' छप गया है। पृष्ठ ४४ तथा ८६ पर 'पूर्वाद्ध', पृष्ठ ९७ पर 'चतर्थोऽध्यायः एव पन २२८ पर 'उत्तरार्द्ध' अशुद्धरूप में छपा है।