Sringeri Sharada Peetham
Kalu Kaumudi
Front matter
कालु-कौमुदी
(पूर्वार्द्धम् )
:
रचयिता
मुनिश्री चौथमल्लजी
प्रकाशक:
भाद िसाहित्य संच
सरदारशहर ( राजस्थान)
FOREWORD This manual of Sanskrit grammer Kalukaum udi bears in its title the name of the eighth Acharya of the Terapanthi 'Sect of the Swetambara Jains Sri Sri Kaluramji Swami who was an eminent Sanskrit scholar trying incessantly, throughout his career as the Supreme Head of a religious order, to diffuse Sanskrit learning amongst his followers. Thie Kaumudi is an outcome of the Acharya's desire to bring Sanskrit grammar within the easy reach of the young learners Muni Sri Chauthmalji the learned disciple of the Acharya first prepared a bigger work on graminar called Bhikshusabdanusasana which deals in a full manner with the linguistic phenomena of diverse nature observable in the vast compass of Sanskrit language. The present work is a later composition of the same author. Though abridged and rendered free from the intricacies and abstruseness generally associated with grammatical discussions, the work is complete in itself in every way. The erudite author, proficient in different systems of Sanskrit grammar as he is, liad applied his accumulated knowledge to the specific work of simplifying the grammatical rules of Sanskrit and acquitte hiinself of tlie task creditably.
[6] Both of his treatises, the Sabdqpygasaga and the Kaumudị have been in circulation in their manu. script forms for several years, and the Jain students have been studying them with profit. The smaller work Kaumudi is now being published by the Adarsha Sahitya Sangha for the benefit of a wider community of students with the hope that this new treatise on Sanskrit grammar will contribute to the easy diffusion of the language. There is a section of people among us who are for Şanskrit, but for Sanskrit without tears. without grammar. A course of Sanskrit study contemplated in this mentality, if adopted, would make the foundation very weak and ineffective. Thorough mastery of a language presupposes a knowledge of the essentials of its grammar. It may not be advisable for every Student of to-day to prosecute the study of grammar as assiduously as it was done in ancient Iridia des. cribed in the accounts of the Chinese pilgrim I-tsing, but a good knowledge of the simple grammatical rules as set forth in the Kalukaumudi is indispens. able for understanding the structure of Sanskrit language The publication of a new Sanskrit grammar written in Sanskrit, and that too for meeting the practical requirements of the present generation of students, is certainly considered remarkable in these days, pointing, as it does, to the fact that: Sanskrit is not dead". like Latin and Greek. To draw an *--I-tsing by J, Takakasu, P., 175 [7] analogy between Sanskrit and the classical languages of Europe is hardly fair, There are still in this country about 10,000 Patha salas catering for lakhs of students solely devoted to the study of Sanskrit in its different branches, and thousands of people in India are still able to speak Sanskrit fluently. It is Sanskrit which even now has often to serve as a national language, forming the only means of communication of idea between people living as far apart as Bengal is from Malabar or Bombay. It must be gratifying to all lovers of Sanskrit that d'evoted workers of the Terapanthi Jain order under tlie august and inspiring guidance of their ninth Acharya Sri Sri Tulsiramji Swami are striving for the propagation of Sanskrit learning. They fully realise that the importance of Sanskrit does not lie only in its being the fountain-head of the regional languages of India, nor in its playing the role of a unifying force in the life of the nation throughout the ages, but also in its possessing a store-house of knowledge and wisdom which alone can restore the religious and spiritual values to a world throwii out of gear by liatred, strife and violence Prof.Durgamohan Bhattacharyya, M. A. Kavya-Sankhya-Puranatirtha. Lecturer, Calcutta University and Head of the Department of Sanskrit. Scotish Church College, Calcutta .. *प्रस्तावना कालुकौमुदी नामक यह. संस्कृत-व्याकरण-पुस्तक, जैन श्वेताम्बर तेरापन्धके अष्टम आचार्य श्री श्री कालूरामजी स्वामी, जो स्वयं संस्कृतके प्रौढ़ विद्वान् थे तथा जिन्होंने अपने आचार्य-कालमें अपने अनुयायियोंमें संस्कृत विद्याके प्रसारके लिए अनवरत, यल किया; के नाम पर है। प्राचार्यश्रीकी यह इच्छा थी कि कोई ऐसी कृति हो, जिससे नव शिक्षार्थी संस्कृत-व्याकरण सरलतासे. अधिगत कर सकें और यह कौमुदी. उसी इच्छाका सुफल है । प्राचार्य श्री विद्वान् शिष्य मुनिश्री चौथमल्लजीने पहले व्याकरण शास्त्र पर भिक्षुशब्दानुशासन नामक विशाल ग्रन्थका प्रणयन किया, जो संस्कृत-भाषाकी विशाल परिधिमें अवस्थित भाषा-विज्ञान-सम्बन्धी विविध पहलुओंका परिपूर्ण रूपमें विश्लेषण करता है। प्रस्तुत. कृति (कौमुदी) उन्हींकी बादकी रचना है। यद्यपि यह एक संक्षिप्त प्रक्रिया-ग्रन्थ है और यह व्याकरण-सम्बन्धी विवेचन पूर्ण चर्चामें आम- तौरसे पाई जानेवाली गुत्थियों और उलझनोंसे उन्मुक्त है तथापि यह हर तरहसे अपने आपमें परिपूर्ण है। व्युत्पन्न लेखक, जो संस्कृत- * मूल अंग्रेजी प्रस्तावनाका हिन्दी अनुवाद ।
व्याकरणकी विविध शाखाओंके पारगामी विद्वान् हैं, ने संस्कृत-व्याकरण के नियमोंको सरल बनाने के विलक्षण कार्य में अपने अजित पाण्डित्यका उपयोग किया है और उनको इस कार्य में गौरवपूर्ण सफलता मिली है। उनकी दोनों कृतियां-शब्दानुशासन और कौमुदी कई वर्षोंसे हस्तलिखित रूपमें प्रचलित हैं और जैन-विद्यार्थी उनका अध्ययन कर लाभार्जन कर रहे हैं। इस संक्षिप्त पुस्तक-कालुकौमुदी का आदर्श-साहित्य-संघके द्वारा विद्यार्थीवर्गके लाभके लिए इस प्राशाके साथ कि संस्कृत- व्याकरण-विषयक यह अभिनव कृति संस्कृत-भाषाके सरलतापूर्ण प्रसारमें योग दे सकेगी, प्रकाशन किया जा रहा है। कठिन परिश्रमसाध्य व्याकरणके बिना ही संस्कृतका अध्ययन हो-ऐसे विचार रखनेवाला एक संस्कृत-समर्थक वर्ग हमारेमें हैं। इस मनोवृत्तिके अनुसार आयोजित संस्कृतका अध्ययनक्रम यदि ग्रहण कर लिया जाय तो इससे संस्कृतकी नींव दुर्बल और नि:सार हो जायेगी। भाषा पर पूर्ण आधिपत्य पाने के लिए यह पूर्वापेक्षित है कि उसके व्याकरणका सारभूत ज्ञान किया जाय । प्राजके प्रत्येक विद्यार्थी के लिए यह नहीं कहा जा सकता कि वह व्याकरणका उतने परिश्रमसे लम्बे समय तक अध्ययन करे जैसे कि प्राचीन भारत में किया जाता था, जिसका चीनी यात्री इ-त्सिग* ने अपने संस्मरणोंमें उल्लेख किया है; परन्तु व्याकरण-सम्बन्धी सरल नियमोंका पर्याप्त * I-tsing by J. Takakasu P 175 [१०] मान, जैसा कि कालुकौमुदी में निहित है, संस्कृतका स्वरूप समझनेके लिए अनिवार्यतः अपेक्षित है। संस्कृतमें लिखी हुई एक ऐसी नई संस्कृत-व्याकरण जो वर्तमान- कालीन छात्र-वर्गकी व्यावहारिक आवश्यकताओंको पूर्ण करती है, का आजके समय प्रकाशन निश्चिततया प्रशंसनीय है एवं यह इस तथ्यकी ओर संकेत करता है कि संस्कृत टिन और ग्रीककी तरह 'मृत-भाषा' नहीं है। संस्कृत और योरपकी प्राचीन भाषाओंमें समानता आंकना अन्यायपूर्ण होगा। आज भी इस देशमें लगभग दश हजार ऐसी पाठशालाएं हैं, जिनमें लाखों विद्यार्थी संस्कृत-विद्याकी विविध शाखाओंके अध्ययनमें सम्पूर्ण निरत होते हुए आश्रय पा रहे हैं और भारतवर्ष में सहस्रों ऐसे व्यक्ति भी हैं, जो धारा-प्रवाह संस्कृत बोल सकते हैं। संस्कृतकी ही यह विशेषता है कि वह आज भी दूरवर्ती लोगों-जैसे बंगाल, मलावार या बम्बईसे है, के विचारोंके आदान- प्रदानका साधन बनती हुई बहुधा एक राष्ट्रीय भाषाका काम करती है। समस्त संस्कृत-प्रेमियोंको यह जान कर हर्ष होगा कि तेरापन्थ. जैन-संघके कर्मठ कार्यकर्ता अपने नवम आचार्य श्री श्री तुलसीरामजी स्वामीके प्रतापपूर्ण एवं स्फूर्तिमय नेतृत्वमें संस्कृत विद्याके प्रसार के लिए यत्नशील हैं। वे इसे पूर्णतया जानते हैं कि संस्कृतका महत्त्व केवल इसीलिए नहीं कि वह भारतकी प्रादेशिक भाषाओंका उद्गम है और न इसीलिए है कि वह युग-युग पर्यन्त राष्ट्र के जीवन में ऐक्य-शक्तिका [ ११ ] संचार करनेवाली है परन्तु इसलिए है कि उसमें ज्ञान तथा विचारोंकी वह निधि है, जो द्वेष, संघर्ष और हिंसा द्वारा विशृंखलित संसारके लिए धार्मिक और आध्यात्मिक मूल्योंका पुनः संस्थापन कर सकती है। (Sd.) प्रो० दुर्गामोहन भट्टाचार्य एम० ए० काव्य-सांख्य-पुराण-तीर्थ लेक्चरार-कलकत्ता-विश्वविद्यालय अध्यक्ष- - संस्कृत-विभाग, स्कॉटिश चर्च कालेज, कलकत्ता।
प्राग ज्ञातव्यम् 'विद्ययामृतमश्नुते' इति सूक्तिनटी येषां हृदयाङ्गणे नरीनर्ति, ते विदुषां मौलिमणयः कलिकलहाऽहिकवलितानां पुंसां विद्याऽऽ- श्रितं पीयूपमेव प्राणरक्षणार्थं परमौषधं मन्यन्ते । यद्यपि सा विद्या केवलमर्थरूपंव, तथापि शब्दसमवेतत्वात् शब्दविना नाधिगम्यते, इति अर्थार्थिभिरनभिलषिता अपि शब्दा इक्षुरसेच्छुभिरिक्षकाण्डा इव आश्रीयन्ते। तेषामर्थात्मकानां शब्दानां संग्रह एव ग्रन्थः, तस्येति ग्रन्थ- पाथोधेर्मन्थनेन विना न सुलभं विद्याऽमृतमिति शास्त्रसञ्चयो रत्न- राशिरिव सुरक्षाभाजनं भवति । एतां शास्त्रमञ्जूषापरित्रातामेव विद्यामधिकृत्य अत्रत्या; पण्डिताः सकलगुणमण्डिता भवन्तो नाना- देशानां गुरुपदमलञ्चक्रः। उत्तमपि- एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः । स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः ॥ दैवदुर्विपाकेन यवनैराक्रान्तायाममुष्यामार्यमेदिन्यां संस्कृतिमपि निर्मूलत उन्मूलयितुं तैस्तैरस्मत्पूर्वपुरुषोपार्जिता ग्रन्थकोटिः कपिभिः [ १३ ] कुसुममालेव दुरलावि । अन्तरिक्ष विलीनस्य तस्याऽगाधबोधो- दधेरर्घार्थं स्वकीयाऽश्रुश्रेणिमेव विसृजामः । तदनन्तरं राजलक्ष्मी परिणयद्भिौरैरपि अस्मान् विद्यामातृ- विरहवह्निना दग्धुमस्माकं संस्कृतभाषा निराशापदे स्थापिता । स्तनन्धया अपि स्वजनन्याः स्तन्यपानतो विमुखतां लेभिमहे । अनाग्ला वयमागलमाङ्गलभाषागिलनाथ विवशा अभूम । काल- त्रयेऽपि मर्तुमनुचिताऽस्माकममरभाषा मृतेव घोषिता । विदेशिनो नरेशाः संस्कृतभाषाकामधेनुं पीयूषपयो दोहं दोहं स्वदेशं प्रेषया- मासुः। अद्यतनी स्थितिः गान्धिबुद्धया पञ्चत्वं प्राप्तेऽपि पारतन्त्र्ये पारे पारावारं गते- ध्वपि च गौरेषु गौरगिरा नाद्यावधि संस्कृतस्योरःस्थलावरोहतीति विस्मयमया भवामः । चतुर्दशविद्यानां चतुःषष्टिकलानाञ्च अस्म- भाषापुष्पवाटिकायामेव विश्रामोऽभूदिति सर्वथा सत्ये केऽपीतिहास- विदुरा न संशरते। व्याकरणस्य प्रयोजकत्वम् साहित्यस्वर्गस्य शब्दशास्त्रमेव सोपानपथमिति व्याकरणमत्या- दरणीयं वस्तु । अवैयाकरणा नैयायिका अपि यथा पशवस्तथा तृणव इति कथयन्तो न शोभन्ते । पूर्वप्रयोगानुसारीणीति व्याकर- णानि-इति तेषां निष्प्रयोजनत्वमेव-स्वतः सिद्धस्य साहित्यस्य सिद्धरनावश्यकत्वादिति नोट्टङ्कनीयम्,जगतःप्रवाहस्याऽनादित्वाद्धेतो - । १४ ] को हि वृक्षवीजयोरिव साहित्यव्याकरणयोरेकतस्याऽऽद्यत्वनिर्णया- र्थमव्यवस्थामालिङ्गत्। यादृशं सर्वरूपसम्पन्नं गीर्वाणगिरो व्याकरणं लभ्यते नतादृशमन्यत्रेति संस्कृतस्याऽद्वितीयत्वं प्रतीयते । अस्य सूत्रचक्रव्यूह भेत्तुं कोऽप्यपशब्दसपत्नः समर्थो न भवतीति पाणिनिप्रभृतीन् को न पणायेत् । शाब्दिकानां स्मृतिः के के शाब्दिका अत्र अपारविद्यासिन्धुसेतुनिर्माणे नलनीला जाता इति तान् वयं नाम्ना संख्यातुमक्षमास्तथापि एकं पद्यमुपपद्य कांश्चिदेवं स्मरामः। यथा- इन्द्रश्चन्द्रः काशकृत्स्नापिशली शाकटायनः । णिन्यमरजनन्द्रा जयन्त्यष्टादिशाब्दिकाः।। सारस्वतकारेण अनुभूतिस्वरूपाचार्येणाऽपि “इन्द्रादयोऽपि यस्यान्तमिति" इन्द्रादय एव निरदेशिषत । एतेषु कः कतमं समय मलकरोतिस्म इति प्रश्न समाधातुं कोऽप्यैतिहासिकः साहसं न सृजति। पूर्वपद्धतिमेव प्रपन्ना नवीनाःशाब्दिकाः सुगमशैलिसम्पन्नाः सन्तः स्वेन स्वेन यशसा जगद्धवलीकुर्वन्तीति न कश्चन सन्देहः । परिवर्तनस्य रूपरेखा 'इको' यणचीति' प्राचीनपाणिनिप्रत्याहारगणनापरिश्रान्तचेता नवीनानुभूतिस्वरूषाचार्यरचितैः “इयं' स्वरे, उवम्, रम्, लुलम्" इति सूत्रः सरलतामालम्ब्य को न शान्तिमाश्रयते। १-सिद्धान्त कौमुदी ६ । १ । ७७ । २-सारस्वत व्याकरणे सन्धिप्रकरणम् ।
[ १५ ] व्याकरणानां तुलनात्मकमध्ययनम् प्राचीनेषु अर्वाचीनेषु कतमो व्याकरणग्रन्थोऽत्युत्तम इति निन्दास्तुतिपूर्वकं विवेचनन्त्वनुचितम्, स्वस्वदृष्टिकोणेन सर्वेषामेव ग्राह्यत्वात् । को हि चिनुयात् त्रिकटुगतानां शुण्ठीमरिचकृष्णा- नामन्यतमस्योत्तमत्वम् । तथापि व्याकृतय आरम्भे स्वल्पसलिला: सरित इव उत्तरोत्तरं वर्द्धन्ते इत्यत्र संशवो नावकाशं भजति । प्राच्यान् परिपूज्यानेव मन्यामहे तथापि कविकुलकिरीठस्य कालिदासस्य "पुराणमित्येव' न साधु सर्वम्” इति सुभाषितं स्मारं स्मारं नवनवैर्निर्माणकुसुमैः साहित्योद्यानं विकसितं दिदृक्षामः । साम्प्रतं पाणिनीयमेव पूजास्पदं प्राप्तमिति सर्वेषामेव विदुषां हर्षविषयः, किन्तु तत्प्राच्यत्वमेव पूजायां प्रमाणमिति नाङ्गीकुर्मः शाकटायतादीनां तत्पूर्वजातत्वात् । पाणिनिनाऽपि “लङः शाक- टायनस्यैव" । ३।४। १११ इति स्फुटमेव शाकटायनस्य पूर्वत्वं प्रकटितम् । अतः पाणिनेरबिकलमेव सूत्र, खलं बुधजनमनो- मोहनाय अलम् । पाणिनीयं हैमशब्दानुशासनश्च यद्यपि पाणिनीयस्य पाणिनिरेव प्राणाऽऽधारस्तथापि कतिपयैः कात्यायनबार्तिकः पतञ्जलिभाष्येन च विना नैतत्पूर्ति प्राप्नोतीति मुनित्रयविरचितमेव प्रतीयये । सिद्धान्तकौमुदीनिर्मात्रा भट्टोजि- दीक्षितेनाऽपि “मुनित्रयं नमस्कृत्य" इत्यादिना एष एव पक्षः कक्षी- १-मालविकाग्निमित्रम ।
[ १६ ] कृतः । मुनित्रयेणैव निष्पन्नमिति व्याकरणमाक्षिप्य हैमशब्दानु- शासनस्य विधाता हेमचन्द्रः केनचित् कविनाऽमुना प्रकारेण स्तुतः। कि स्तुमः शब्दपाथोधेहेमचन्द्रयतेर्मतिम् । एकेनाऽपि हि येनेदृक् कृतं शब्दानुशासनम् ।। अध्ययन-परिपाटी व्याकरणाध्ययनं द्विविधम्-अष्टाध्यायीसूत्रक्रमेण, कौमुद्याः सिद्रिक्रमेण च । एकस्तृतीयोऽपि क्रमो गौरगुरुप्रसादादवगतो यत्र सिद्धिमातुः कुक्षिमकाक्षित्वैव शब्दधातुरूपाऽपत्यानि कर्णवदुत्प- द्यन्ते। उपर्युक्तयोरुभयोरपि क्रमयोः कतरः कल्पतरुः कतरश्च किङ्किरात इति वितण्डादोर्दण्डखण्डितपाण्डित्यावयं स्याद्वादस्यैव शरणमाश्रित्य सुखं श्वसिमः। तृतीयक्रमानुगास्तु सूत्रक्रमहिमगिरे- गंभीरगुहागमनं विनैव विशुद्धसंस्कृतसोमस्य स्वरसं पातुमुद्घाटि- तानना भवन्तो लोकोपहृतामुपहासश्रियमेवाऽऽश्लिष्यन्ति । केचिद् व्याकरणबंकुण्ठस्योपकण्ठमपि नवा विष्कृतवस्तूनां संज्ञासुधासिद्धर- भावं दर्शयित्वा देवभाषां निन्दन्तो दितिसुतानपि अतिक्रामन्ति, ते धातुपाठस्य भास्वत इव प्रकाशे नवसंज्ञासृष्टिनिर्मातॄणां विधातृ- सदृशानां विविधधातूनां दर्शनार्थ कथमुलूकायन्त इति महदाश्चर्यम् । विद्यायास्त्ररूप्यम् अध्ययनमध्यापनं निर्माणञ्चति विद्यायास्त्ररूप्यमिति निर्माणं विना न तस्याः सर्वतोमुखी सिद्धिस्ततो निर्माणनैरन्तर्यमपि महदा- , [ १७ ] वश्यकं वर्तते । पूर्वकृतान्येव व्याकरणानि पर्याप्तानीति न सन्तोषः स्वागतमर्हति, अम्भसा सत्यप्यगाधेऽम्भोधौ जलाऽऽगमाऽनवरो- धात् । राष्ट्रभाषामणिमालाऽलंकृतायां हिन्यां क नग्नाय संस्कृताय सम्मानमिति विचारो न बुद्धिनिःश्रेणिमारोहति, हिन्दीगङ्गायाः संस्कृतहिमवत एव प्रभवत्वात् । आत्मैव विशुद्धः सन् परमात्मा भवतीति व्याकृतिपरिष्कृता हिन्दी संस्कृतत्वमवाप्स्यतीति आशा न वारिबुबुदोपमा । भिक्षुशब्दानुशासनस्य निर्माणम् आंगलयुगं भोजयुगे परिणमन् पुण्यपयसा पवित्रगानो जैन- श्वेताम्बरतेरापन्थाधिपः कालुरामाऽऽचार्यो निरस्ताऽज्ञानतृणे स्वसाधुसङ्घक्षेत्रे देवभाषाकल्पवल्ल्या बीजमवपत् । आयाससलिल- सिक्तायास्तस्याश्चिरकालेन तच्छिष्येण चौथमल्लमुनिना भिक्षु- शब्दानुशासनं नाम एकं मधुरं फलं प्राप्तं तदमरफलं गुरवे च निवेदितम् । तेनाऽपरिमितेन गुरुणा वितीर्यमाणेन अखण्डपाण्डित्यमादाय साधुसमुदाय उर्वीतलं ध्वस्तध्वान्तं करोति । भिक्षुशब्दानुशासनस्य क्रमपार्थक्यनिदर्शनम् यस्य च शब्दशास्त्रस्य त्रिवेण्यात्मके सूत्रप्रयागे पाणिनिसुरा- पगायाः कात्यायनकालिन्द्याः पतञ्जलिसरस्वत्याश्च पबित्रपाठपायो- भिरेकत्रैव स्नानं वितन्यते । यथा- - [ १८ ] पाणिनिः प्राह-शिल्पिनिष्वुन्' ३।१।१४५। कात्यायनः कथयति-'नृतिखनिरञ्जिभ्य एव' भाष्यञ्च (पतञ्जलेः) भणति- 'भूतिखनिभ्यामेव वुन्' उणादौ कनि पुंयोगेन रजकीति । भिक्षु- शब्दानुशासनं शास्ति-नृतिखनिरञ्जिभ्यः शिल्पिन्यकट्' ।।१।७६ तथा च-पाणिनिः-गापोष्टक् ३। २। ८ । कात्यायनः 'पिबतेः सुराशीध्वोरिति वाच्यम्' भिक्षुशब्दानुशासनम्-'अनुप- सर्गाद गायष्टक्' ।५।२।३ । सुराशीध्वोः पिबः । ५ । २।४। यस्मिंश्च कचित् सौगम्यं गम्यते । यथा-णत्वविधाने हेमचंद्रः पुरगादीनुपेक्ष्य केवलेन' वण इति निर्देशनैव णत्वं विदधाति । भिक्षुशब्दानुशासनेन “पुरगामिश्रकासिध्रकासारिकाकोटरेभ्यो वनस्य । २।२।७२ इति बननकारस्य णत्वं विधाय सुगमताऽकारि । एवमेव कचिद् यद् भिक्षुशब्दानुशासनं पाणिनीयहैमशब्दानु- शासनयोर्गणगृहितं गहनगगनायमाने द्वन्द्वसमासे पूर्व परं वा निपततां पतत्रिणामिव शब्दानां सूत्रसंग्रहेण सीमानं निर्धारयति । यथा-'बिम्बोष्ठादिषु वा' । ३ । १ । १६७, 'शकृन्मूत्रादिषु वा' ३।१।१६६, 'न जायापत्यादिषु' ३। १ । १७१, 'गुणवृद्धयादिषुवा' ३ । १ । १७२, 'न शूद्राऽऽर्यादिषु' ३ । १ । १७४, 'नोदूखलमुसला- दिषु' ३ । १ । १७७, 'समीरणाग्नथादिषु वा' ३ । ११७८, 'न नर- नारायणादिषु' ३ । १ । १८०, 'वसन्तग्रीष्मादिषु वा' ३।१ । १८३, टिप्पणम् १-कोटरमिश्रकसिध्र कपुरगसारिकस्य वणे । ३ । २ । ७६ -सिद्धहमशब्दानुशासनम्
[ १९ ]
'न पाण्डुधृतराष्ट्रादिषु' ३ । १ । १८४, 'भीमसेनार्जुनादिषु वा'
३।१।१८५, 'न पुष्यपुनर्वस्वादिषु'३ । १ । १८६ ।
कालुकौमुदी
तदेव सफलतान्वेषकं भिक्षशब्दानुशासनं बुद्धिविकलेषु लोकेषु
प्रवेशमिच्छत् सीताभिलाषुकोऽनेकभटजटिले लङ्कापुरे प्रविविक्षुर्हनू-
मानिव स्वमेव कायं कालुकौमुदीमिषेण लघीयांसमकार्षीत् ।
सुरदेशेऽपि सुरभाषाप्रसाराय सुरेशस्य स्वीक्रियमाणे आमंत्रणे
कालुरामाचार्यः स्वपदव्यामभिषिक्तवान् स्वतुल्यतुलसीरामाचार्यम् ।
अगणितगुणविभूषितनवनवमाचाऽऽचार्यविभावसुविभासितायां
भारतभुवि गुर्वनुगृहीतसर्वसाधुसाध्वोसमधिकृतभारतीभाण्डागारात्
मिलिन्देनाऽरविन्दान्मरन्दबिन्दुरिवसाधुशास्त्रधारणरीतिमनुल्लङ्ध्यैव
सर्वसाधारणध्वान्तमपहा कार्यकुशलेन आदर्शसाहित्यसंधेन
कालुकौमुदी अवगता प्रकाशिता च ।
सेयं कालुकौमुदी अदूषितं वैदुष्यं दर्शयन्ती छात्राणां हृदये
अहिंसा इव अपवर्णोदयं करिष्यतीति अनिशमाशास्महे ।
-:
दीपावल्याम, २००७
हांसी (पंजाब)
पं० रघुनन्दन शर्मा 'भिषगाचार्यः
अलीगढ़ान्तर्गतसोनामयीनिवासी
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जीवन-परिचय: मुनिश्रीचौथमल्लस्वामीनां जन्म साहित्यसंस्कृतिकलानां कमनीये केन्द्र मालवप्रदेशे जावद'नाग्नि नगरे १६५० विक्रमाब्दे कार्तिक- शुक्लप्रतिपदि 'चोरडिया'न्वयेऽभूत् । एतेषां पितुर्नाम 'श्रीप्यारचंद्र' महोदयो मातुश्च 'सुन्दरबाई' इत्यासीत् । कुले चैतेषां नैसर्गिकी धर्मनिष्ठा सहजा धर्मश्रद्धा च विलसति। तत्त्वज्ञाने चाप्येतेषां पारिवारिका जनाः प्रशस्यरुचिमन्तः समाजे प्रचुरप्रतिष्ठावन्तश्च सन्ति। नगरसम्बन्धिषु समाजसम्बन्धिषु च समग्रषु कार्य- जातेषु तेषां ( पारिवारिकजनानां ) प्रामुख्यं विराजते । मुनिश्रीचौथल्लस्वामिषु शैशव एव प्रखरप्रतिभाशालित्वं समु- ज्ज्वलायतिद्योतकलक्ष्मसाम्राज्यं च प्रकटितमासीत् । तस्मिन्नेव वयसि चैतेषां प्रकृष्टा धर्माभिरुचिः सर्वान् चमत्कृतानिव विधा- तिस्म । सांसारिकेषु पदार्थजातेषु पृथगजनोचित्तां सरसतां सुखदतां रमणीयताञ्चाननुभवन्तोऽत्रभवन्तः स्वीयया धर्मनिष्ठा- नुरञ्जितया प्रकृत्या विराजमाना आसन् । प्रतिपलं प्रवर्धमानेयं धर्माभिरुचिश्चैनं सीमानं सम्प्राप्तवती यदिमेऽसारमियं संसार परित्यज्य सन्यासव्रतं-भागवती दीक्षा ग्रहीतुं स्वभव्यभावनां [ २१ ] प्रकटीचः। श्रुत्वैव चेमामाकस्मिकीमसंभाव्यां च स्वकुलनन्दन- गिरं हितैषिणः स्वजनाश्चमत्कृता विस्मयान्विता इव तस्थुरूचुश्च- भोः! सुकुमारेऽस्मिन् वयसि दीक्षा ! नैतत् कदापि संभव । सांसारिकमोहवशात् पारिवारिकास्ते जना विविधैः प्रलोभनैः प्रकारैश्चैतान् स्वभव्यभावनाभावितपथाचालयितुं दुरीकर्तुं च भृशमचेष्टन्त, साधुजीवनस्य कष्टसाध्यसाधनायाचित्रमप्युपस्थापित- वन्त एषामग्रो किन्तु मनस्वी कार्यार्थी न गणयति सुखं न च दुःखमिति न्यायादेते स्वढिष्ठनिश्चयोपरि हिमाद्रिरिव दृढ़तया तिष्ठन्तः स्वभव्यभावनायास्तिलमात्रमपि न विचेलुः। स्वकृता विविधाश्चेष्टा निष्फला विज्ञाय यदा तैः सांसारिक- हितकामुनिर्णीतं नायं बालः कदाचन गृहे ( गार्हस्थ्ये ) स्थास्यति, चेदयं बलादेनं गृहे रोर्बु प्रयतिष्यामहे, शुभोदकं भविष्यतीति । तदा ते तत्समयविराजमानांस्तपःपूतकायांस्तेरापन्थसंघस्य सप्तमा- चार्यान् श्रीडालचन्द्रगणिवर्यान् स्वबालस्य दीक्षायं प्रार्थयामासुः । पूज्यपादैराचार्य्यवय्ये रेतेषां (श्री चौथममल्लहाभागानाम् ) जीवनं निरीक्ष्य वैराग्वभावश्च परीक्ष्य योग्यत्वञ्चावगत्यैतेभ्यो दीक्षास्वोकृतिः प्रादायि। १६६५ विक्रमाब्दे चैत्रशुक्लदशम्यां राजस्थानप्रान्तान्तर्गतलाडनूंनगर एतैर्दीक्षासंस्कारः पूज्यपादेम्यः समलम्भि। आधिक्येनतेषामध्ययनादिकं स्वनामधन्यानां विद्याविभूषितानां श्रीकालुरामाचार्य्यवर्याणां सेवायां समभूत्। एते जैनागमाति- रिक्त ल्यायसाहित्यदर्शनव्याकरणकोशकाठ्यादिविविधिशास्त्राणि । २२ ] साङ्गोपाङ्गमधीत्य तत्तद्विषयेषु प्रौढं पाण्डित्यमलभन्त । व्याकरण- चैतेषां सर्वाधिकप्रियविषय आसीत् । एतः पाणिनीयशाकटायन- हैमकलापसारस्वतसिद्धान्तचन्द्रिकामुग्धबोधसारकौमुदीजैनेन्द्रादि- विविधव्याकरणानां गम्भीरं मननं सविवेचनमनुशीलनञ्च प्रकृत्या- गाधशब्दशास्त्रपाथोनिधिरनायासेनैव तीणः ।' पूज्यपादानांश्रीकालुरामाचार्य्यवराणामेषा, संप्रधारणाऽसीत.- "संस्कृतभाषायाः कश्चन सरलः सुबोधः समयोपयोगी च व्याकरण- ग्रन्थश्चेत् स्यात् तर्हि संस्कृतशिक्षार्थिनां कृते महत् सौकर्य सौविध्यञ्च समुपजायते”ति । यतो वर्तमानोपलभ्यमानेषु प्रचल- द्र पेषु च व्याकरणग्रन्थेषु सारस्वतचन्द्रिकेऽधिकं संक्षिप्त, सिद्धांत- कौमुदी च वार्तिकफक्किकाद्याधिक्यवशाजटिला हैमशब्दानु- शासनस्य रचनापद्धतिश्च काठिन्यान्विता वरीवति । आचार्य्यवर्याणां विद्वद्वरिष्ठः सुशिष्यैर्मुनिश्रीचौथमल्लस्वामिभिः स्वगुरुचरणानामुपयुक्तभावनायै सारूप्यं प्रादायि । एतैः १६८० विक्रमाब्दात् १६८८ यावन्नववत्सरपर्यन्तमहर्निशमनवरतञ्च परिश्रम्य तेरापन्थप्रवर्तकाद्याचार्याणामुषोवन्दनीयानां श्रीभिक्षु- गणिवाणां नामोपरि भिक्षुशब्दानुशासनं नाम सर्वांगसुन्दर- मभिनवव्याकरणं प्राणायि, यस्मिंश्चोणादिपाठधातुपाठन्यायदर्पणा- दीन्यपि साधु सन्निवेशितानि सन्ति । महति चास्मिन् कार्ये - लीगढ़ान्तर्गत--सोनामई-वास्तव्य--साहित्य-सेवि--आशुकविरत्न- पंडितरघुनन्दनशआयुर्वेदाचार्येणापि सुष्ठु सहयोगायितम् । भिक्षुशब्दानुशासनस्य विस्तृतत्वात् प्रारम्भिकाः शिक्षार्थिनस्त- [ २३ ] तस्मादधिकलाभार्जनं कर्तुं नाहन्तीति कृत्वैभिर्मुनिवय्यः पूर्ण वर्ष परिश्रम्यास्यैव महाव्याकरणस्य स्वगुरुचरणानां श्रीकालुरामाचार्य- वराणां पावननाम्ना पवित्रीकृता कालुकौमुदी नाम संक्षिप्तप्रक्रिया प्राणायि। कालुकौमुदी संक्षिप्ता सत्यप्येकं सर्वांगसम्पन्नं परिपूर्णञ्च व्याकरणमस्ति। केवलमस्यैकस्यैव ग्रन्थस्याध्ययनेन संस्कृतव्याकरणस्य पर्याप्तबोधो लब्धुं शक्येतऽध्येतृभिः । तेरापन्थसंधे स्वरचनाकालत एवायं ग्रन्थः पठनपाठनयोः प्रयुज्यमानो विलसतितराम् । अस्या ध्ययनोपरमे भिक्षुशब्दानुशासनस्य पठनं चलति साधुसंधे । मुनिवर्याणां श्रीचौथमल्लस्वामिनां जीवने विद्वत्तातिरिक्तं सौम्यतासरलताभद्रतादिगुणनिचया अपि मूर्तिमत्तयेव राजन्ते । मुखमुद्रायाश्चैषां हार्दिक्यर्जुता स्पष्टतो निर्भरतीव । स्वदीक्षाकालत एवैत तत्तदाचार्यवराणां सेवायां स्थितेः सौभाग्यमाप्नुवन्तो विराजन्ते। प्रातस्मरणीयानां श्रीडालचन्द्रा- चार्यवाणां श्रीकालुरामाचार्य्यवाणाञ्चैभिस्तत्तत्स्वर्गारोहण- कालपर्यन्तमनवरत सेवाकारि। सम्प्रति च तरुणतपस्विनां विश्व- बन्द्यानां श्रीतुलसीरामाचार्यवाणां सेवायां समर्पितमनोवपुषो विराजन्त एते। आत्मीययाऽगाधगुरुभक्त्या शासनसेवया च प्रसन्नीभूतैः पूज्यपादैः श्रीकालुरामाचार्य्यवय्य रेते बहुशः पुरस्कृताः। प्रौढया विद्वत्तया, श्रद्धासुमण्डितया गुरुसेवया च सहैतेषूत्कृष्टकवित्वं वक्तृत्वञ्चापि सुतरां चकास्ति ।
[ २४ ] एतेषां ज्यायांसो भ्रातरः श्रीकुन्दनमल्लस्वामिनः सरलप्रकृति- सम्पन्ना योग्यविद्वांसस्तत्त्वविदश्च सन्त आसन् । तत्त्वज्ञानशिक्षणे च तेषां शैल्यतिसुरम्या सुरुचिपूर्णा चासीत् । मुनिश्रीकुन्दनमल्लस्वामिनः १६६२ विक्रमाब्दे पूज्यपादानां श्रीडालचन्द्राचार्यवाणां करकमलैर्दीक्षिता आसन्। तेषां लेखनकलासम्बन्धिदाक्ष्यं वस्तुतश्चमत्कार्यत्यद्भुतञ्चासीत् । तैः स्वहस्तद्वारैकैकपत्रे क्रमशः ७००, १७००, २५००, श्लोका अलेखि यञ्च लेखनकलायाः परमोत्कृष्टनिदर्शममस्ति । प्रतिपत्रस्य विस्तारः ६३" x ४१" इति वर्तते । तेरापन्थशासने सर्वप्रथमं तैरेवेयत्सूक्ष्म- लेखनं प्राकारि। अध्यात्मप्रेरकतया कुशललेखकतया च सह तेषूतमचित्रकला- पाटवमपि शुशुभे। २००२ विक्रमाब्दे पौषकृष्णकादश्यां राजस्थानान्तर्गतमोमासर ग्रामे तेषां स्वर्गवासः सञ्जातः । तैर्याया निष्ठयाऽनवरतजागरूकतया च सह या शासनसेवा सुविहिता साऽनुकृतियोग्याऽस्ति । स्वज्येष्ठभ्रातेव मुनिश्रीचौथमल्लस्वामिनः तेरापन्थशासनस्य यां प्रशस्यां सेवां विद्धति सा तेरापन्थस्येतिहासे सदा स्वर्णाक्षरै- रङ्किता स्थास्यति । भिक्षुशब्दानुशासनकालुकौमुद्यौ व्याकरणजगति एतेषामद्भुते प्रदेये वर्तते । भारतीयवाङ्मयं आशंसोपचितहृदयं सदेतान् निनिमेष समवलोकयते। अलमिति विस्तरेण । कलिकाता छगनलाल शास्त्री आश्विनशुक्ल द्वितीयायाम् २००८, काव्यतीर्थः सा० रत्नम् जीवन-परिचय मुनिश्री चौथमल्लजीका जन्म साहित्य, कला व संस्कृतिके महान् केन्द्र मालव-प्रदेशमें-जावद नामक शहरमें संवत् १६५० कार्तिक शुक्ला १ को ओसवाल-चोड़रिया वंशमें हुआ। आपके पिताजीका नाम श्रीप्यारचन्दजी व माताजीका नाम श्रीसुन्दरबाई था। आपका परिवार धार्मिक निष्ठा व श्रद्धाके लिए सुप्रसिद्ध है। आपके परिवारके सदस्य तत्त्वज्ञानमें भी अच्छी अभिरुचि रखनेवाले हैं। धर्मनिष्ठा व तत्त्वरुचिके अतिरिक्त आपके परिवार की समाजमें बड़ी अच्छी प्रतिष्ठा है। समाजके-शहरके प्रत्येक सार्वजनिक कार्यमें उनका मुख्य हाथ रहता है । बाल्यावस्थासे ही आप एक तीव्रबुद्धि व होनहार बालक धार्मिक बातोंकी ओर आपकी अधिक अभिरुचि थी। सांसारिक वस्तुओंमें आपको विशेष सरसता अनुभव नहीं होती थी। यह धार्मिक रुचि बढ़ते-बढ़ते इस सीमा तक पहुंच गई कि आपने इस असार संसारको छोड़ सन्यासव्रत-दीक्षा ग्रहण करनेकी इच्छा व्यक्त की। घरवालोंने जब अपने होनहार बालकके मुंहसे यह बात सुनी तो वे दंग रह गये। उन्होंने कहा-इस सुकुमार वय थे [ २६ ] में दीक्षा ! यह कभी सम्भव नहीं होगा। उन्होंने इनको बहुत समझाया-बुझाया। साधु-जीवनकी कठिन साधनाका चित्र इनके सामने प्रस्तुत किया किन्तु-'मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दुःखम् न च सुखम्'-आप --आप अपने दृढ़ निश्चय पर अडिग रहे। जब अभि- भावकोंको यह विश्वास हो गया कि यह बालक घरमें नहीं रहेगा, और यदि बलात् इसे रक्खा जायगा तो इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा। तब तेरापन्थके तत्कालीन आचार्य श्रीडालगणी (सप्तमाचार्य ) के सन्मुख आपकी दीक्षाके लिए प्रार्थनाकी गई । आचार्यवरने आपके जीवनका निरीक्षण किया। आपके वैराग्य- भावका परीक्षण किया। आपको योग्य जान दीक्षाकी स्वीकृति प्रदान की। सम्वत् १६६५ चैत्रशुक्ला १० को लाडनूं-राजस्थानमें आपका दीक्षा-संस्कार सम्पन्न हुआ। आपका अध्ययन अधिकांशतः आचार्यश्री कालुगणीकी सेवा में सम्पन्न हुआ। आपने जैन आगमोंके अतिरिक्त साहित्य, न्याय, दर्शन, व्याकरण, कोश आदि विविध विषयोंका सांगोपांग अध्ययन किया। व्याकरण आपका सर्वाधिक प्रिय विषय रहा। आपने सारस्वत, सिद्धान्त-चन्द्रिका, पाणिनीय, शाकटायन, हैम, कलाप, मुग्धवोध, सारकौमुदी तथा जनेन्द्र आदि विभिन्न व्याकरणोंका गम्भीर मनन व विवेचनापूर्ण अनुशीलन किया । आचार्यश्री कालुगणीकी यह भावना थी कि संस्कृत-व्याकरण का एक समयोपयोगी सरल व सुबोध ग्रन्थ तैयार हो तो संस्कृतके विद्यार्थियोंके लिए बड़ी सुविधा हो सकती है। क्योंकि वर्तमानमें २७ ] उपलब्ध व्याकरणोंमें सारस्वत-चन्द्रिका अधिक संक्षिप्त है। सिद्धान्तकौमुदी वार्तिक, फक्किका आदिकी अधिकताके कारण जटिल है। हैम-शब्दानुशासनकी रचना-पद्धति कठिन आचार्यश्रीके सुशिष्य विद्वद्वर मुनिश्री चौथमल्लजीने आपकी भावनाको साकार रूप दिया। आपने सम्वत् १९८० से १६८८ तक अहर्निश अनवरत परिश्रम करके तेरापन्थके प्रवर्तक आद्य आचार्य श्रीभिक्षुगणीके नामपर भिक्षु-शब्दानुशासन नामक साग-सुन्दर व्याकरण तैयार किया, जिसमें उणादिपाठ, धातुपाठ तथा न्यायदर्पण आदिका भी सुन्दर समावेश है । इस महान कार्य में सोनामई-अलीगढ़निवासी आशुकविरत्न पं० रघुनन्दनजी शर्मा आयुर्वेदाचार्यका भी सहयोग रहा। भिक्षु-शब्दानुशासनके विस्तृत होनेके कारण प्रारम्भिक छात्र उससे अधिक लाभ नहीं उठा सकते, यह सोच आपने एक वर्षके अनवरत परिश्रमसे आचार्यश्री कालुगणीके नाम पर कालुकौमुदी नामक संक्षित प्रक्रिया तैयार की। कालुकौमुदी एक संक्षिप्त पर अपनेआपमें परिपूर्ण व्याकरण । केवल इस एक पुस्तकके पढ़नेसे संस्कृत-व्याकरणका सामान्यतः बोध हो सकता है। तेरापंथ-संघमें इसका पठन-पाठन इसके रचनाकालसे ही चालू है। इसके पठनके पश्चात् भिक्षु- शब्दानुशासनका अध्ययन चलता है। एक मंजे हुए विद्वान् होनेके साथ-साथ मुनिश्रीका जीवन सौम्यता, सरलता तथा भद्रताका साकार निदर्शन है। आपकी | २८ ] मुख-मुद्रासे आपके हृदयकी ऋजुता स्पष्टतः अनुमेय है। आपको अपने दीक्षाकालसे ही आचार्योंकी सेवामें रहनेका सौभाग्य प्राप्त होता आ रहा है। आपने सप्तमाचार्य श्री डालगणी व अष्टमाचार्य श्री कालुगणीकी उनके स्वर्गारोहण पर्यन्त सेवा की। वर्तमानमें आचार्यश्री तुलसीगणीकी सेवामें अपना तन-मन अर्पण किये हुए हैं। आपकी अटूट गुरुभक्ति व शासन-सेवासे प्रसन्न होकर आचार्यश्री कालुगणीने आपको विविधरूपमें पुरस्कृत किया। प्रौढ़ विद्वान्, श्रद्धापरायण गुरुसेवी, आदर्श साधक होनेके साथ-साथ आप उत्कृष्ट वक्ता तथा कवि भी हैं। आपके बड़े भाई मुनिश्री कुन्दनमलजी एक सरल प्रकृति, योग्य विद्वान् व तत्त्वज्ञानी सन्त थे। तत्त्व-ज्ञान-शिक्षणकी उनकी शैली बहुत सुन्दर तथा सुरुचिपूर्ण थी। मुनिश्री कुन्दनमलजी सम्वत् १९६२ में सप्तमाचार्य श्री डाल- गणीके कर-कमलोंसे दीक्षित हुए थे। उनकी लेखन-कला-सम्बन्धी दक्षता वास्तवमें अनूठी थी। उन्होंने अपने हाथसे एक-एक पत्रमें क्रमशः ७००, १७०० तथा २५०० श्लोक लिखे, जो लेखन- कलाके उत्कृष्ट नमूने हैं। पत्रकी लम्बाई ६॥ इञ्च व चौड़ाई ४। इञ्च है। तेरापंथ-शासनमें सर्वप्रथम उन्होंने ही इतने सूक्ष्म पत्र लिखे। अध्यात्म-प्रेरक सन्त तथा कुशल लेखक होनेके साथ-साथ वे उत्तम चित्रकार भी थे।
[ २९ ]
उनका स्वर्गवास संवत् २००२ पौष कृष्णा ११ को मोमासर
(राजस्थान) में हुआ।
उन्होंने आजीवन जिस निष्ठा व सतत चेष्टाके साथ शासन
की सेवा की, वह वास्तवमें अनुकरणीय है।
अपने ज्येष्ठ भ्राताकी तरह मुनिश्री चौथमल्लजी शासनकी जो
प्रशंसनीय सेवा कर रहे हैं, वह तेरापंथके इतिहासमें स्वर्णाक्षरों में
अङ्कित रहेगी।
भिक्षु-शब्दानुशासन तथा कालुकौमुदी व्याकरण-जगतके लिए
आपकी अनूठी देन है। भारतीय वाङमयको आपसे बहुत
बड़ी आशाएं हैं।
छगनलाल शास्त्री
दीपावली, सं० २००७,
हांसी (पंजाब)
काव्यतीर्थ, साहित्यरत्न
प्रकाशकीयम् पुरातनं भारतीयं वाङ्मयं बाहुल्येन संस्कृतभाषानिबद्धमिति केषामपि विदुषामदृष्टिगोचरं नास्ति। अतएव भारतीयसंस्कृत्या ज्ञानायाऽनुशीलनाय च गीर्वाणवाण्या अध्ययनं सुतरामपेक्षित वरीवति । तहते संस्कृत्या हृदयं स्पष्मपि दुःशकम् । गीर्वाणवाणी च प्रचुरश्रमसमयसाध्यकठिनव्याकरणपरिज्ञानसापेक्षेति सुस्पष्टं तज्ज्ञानां विदुषाम् । इमां कठिनतां दुरूहताश्चापाकतुं प्रौढवैया- करणैर्मुनिश्रीचौथमल्लस्वामिभिः स्वगुरुचरणानां तेरापन्थाष्टमा- चार्याणां श्रीकालुरामगणिवर्याणां पूतनाम्ना पवित्रीकृतं भिक्षु- शब्दानुशासनप्रक्रियारूपं 'काल-कौमुदी' नामाभिनवं व्याकरण- मध्येतू णां सौविध्याय सौकाय च प्राणायि यत् संक्षिप्तं सदपि स्वस्मिन्ने परिपूर्ण व्याकरणमस्ति । तञ्चादर्शसाहित्यसंघनाडात्म- शिक्षणमालायाः षष्ठपुष्परूपेण प्रकाश्यं नीयते । ग्रन्थस्यास्यास्य सुसम्पादने प्रौढसाहित्यिकऽ|शुकविरत्नपण्डित रघुनन्दनशआयुर्वेदाचार्येण बहु सहयोगायितं तत्कृते चादर्श- साहित्यसंघः पण्डितवरिष्ठायाऽस्मै शतशः साधुवादान् समर्पयन् परां मुदमनुभवति ।
[ ३१ ] कलिकाता विश्वविद्यालयप्रक्त्रा स्कॉटिशचर्चकालेजीयसंस्कृत- विभागाध्यक्षेन महायानसूत्र (बौद्धदर्शन ) मुक्ताफलच्छान्दोग्य- मन्त्रभाष्यादिविविधग्रन्थसम्पादकेन सुप्रसिद्धविदुषा श्रीदुर्गामोहन- भट्टाचार्य एम० ए० सांख्यकाव्यपुराणतीर्थेन व्याकरणजगदपूर्व- ग्रन्थस्यास्य विद्वत्तापूर्णप्रस्तावनालेखनद्वारा या सहृदयता प्रादर्शि, तत्कृत आदर्शसाहित्यसंघः सहर्षमाभार प्रदर्शयति। संस्कृताध्येतारो ग्रन्थादस्मात् संस्कृतव्याकरणाध्ययने सौगम्येन सारल्येन च सफलतां लप्स्यन्त इत्याशास्महे । -प्रकाशनमन्त्री . .
-- ६ 'कालुकोमुदी' आत्मशिक्षणमालायाः पष्ठं पुष्पं वरिवर्ति यस्योद्देश्यञ्च विलसति सरलेन स्वल्पश्रमसाध्येन च विधिना संस्कृतव्याकरणज्ञापनद्वारा भारतीयवाङ्मयप्रवेशपथदर्शनम् । कौमुद्या अस्याः सुशृङ्खलिते प्रकाशने चूरू (राजस्थान) वास्तव्या- ऽनन्यसाहित्यप्रेमिश्रीहनूतमलसुरानामहोदयेन स्वदिवंगतपितृ- चरणानां श्रीमुन्नालालमहोदयानां स्मृतौ नैतिकसहयोगेन सहाऽर्थिक योग प्रदाय या सांस्कृतिकी साहित्यिकी च सुरुचिः प्रकटीकृता, सा सर्वेषां कृतेऽनुकृतियोग्याऽस्ति । आदर्शसाहित्यसंघ एतत्कृते तं प्रति सहर्षमाभारं प्रकटी करोति । -प्रकाशनमन्त्री कालुकौमुदीपूर्वाधस्थविषयानुक्रमः क्रमाङ्कः पृष्ठम् १ ५ २ १३ न २४ विषयः संज्ञाप्रकरणम् सन्धिप्रकरणम् क-स्वरसन्धिः ख-प्रकृतिभावः ग-हस-सन्धिः घ-विसर्ग-सन्धिः स्यादिप्रकरणम् क-स्वरान्तपुलिंङ्गाः ख-स्वरान्तस्त्रीलिंगाः ग-स्वरान्तनपुंसकलिङ्गाः घ-हसान्तपुल्लिंङ्गाः ङ-हसान्तस्त्रीलिङ्गाः च-हसान्तनपुंसकलिङ्गाः छ-अलिङ्गौयुष्मदस्मच्छन्दो अव्ययप्रकरणम् स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् कारकप्रकरणम् समासप्रकरणम् क-अव्ययीभावः ३५ ३६ ५२ ५४ ५८ 7 m ६६ 40- ७७ [ ३४ ] क्रमाङ्क: ८ १८ विषयः पृष्ठम् ख-तत्पुरुषः ग-बहुव्रीहिः ८८. घ-द्वन्द्वः ६१ कु-अलुक्समासः ६३ च-समासाश्रयविधिः तद्धितप्रकरणम् क-अपत्याधिकारः ख-रक्ताद्यर्थाधिकारः ग-शेषाधिकारः ध-इकणधिकारः - यादिप्रत्ययाधिकार: १११ च-भावकर्मार्थाः ११३ छ-क्षेत्राद्यर्थकाः ज-मत्वर्थीयाः झ-स्वार्थिकाः १२० दिरक्तप्रक्रिया १२६ परिशिष्टम् (क) सूत्राणामकारादिवर्णानुक्रमसूची १३३ (ख) शुद्धिपत्रम् १७२ १८ ★कालुकौमुदी ★ maraneprOON- PuzuMRODAMOHARATI भक्तः फलमासन्नं, क्रियते भगवत्प्रसादमासाद्य । श्रुतिरिति चरितार्थेयं, कालुकौमुद्यु पागता हस्ते ॥१॥ श्रीकालोः सा फलदा, शुभहक श्लाघ्या हि केन सद्विधिना । औदायं यस्या इति, मम हस्ते लसति कौमुदी रम्या ।।२।। -मुनिः चौथमल्लः ARDARIDDITIANE MANENT FrmalaenseeMANI * ॐ नमः सिद्ध भ्यः * श्रीमत्कालु गुरुं नत्वा, भिक्षुशब्दानुशासनम् । कृत्वा तत्र प्रवेशाय, क्रियते कालुकौमुदी ॥१॥ संज्ञा-प्रकरणम् (१) ॐ ॥ १।१।१। ओमित्येतदक्षरम्. अहंदशरोर्याचार्योपाध्यायमनीनामाद्याक्षररूप मङ्गलार्थं ग्रन्थस्यादौ प्रणिधेयम् । (२) सिद्धिरनेकान्तात् ॥ १।१।२। नित्याऽनित्याद्यने कः अन्त: स्वभावो यस्मिन् सोऽयमनेकान्तः, तस्मात् प्रकृताना शब्दानां सिद्धिनिष्पत्तितिव्या। (३) अइल-एऐओऔ-हयवरल-अणनङम-झढधधभ-जडद- गब-खफछठथ-चटतकप-शषसः ॥ १।१।४। प्रत्याहारसूत्रमेतद् असादिसंज्ञार्थम्, अत्र स्पष्टतार्थ स्वराणां सन्धि- रविवक्षितः । हकारादिष्वकार उच्चारणार्थः । ४) आद्यन्ताभ्यां प्रत्याहारे ॥ १।१।५। प्रत्याहारे गृह्य माणा वर्णा आद्यन्ताभ्यां सह गृह्यन्ते । यथा-
६
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
अलप्रत्याहारे अइउऋएऐओऔहयवरल इति । झभप्रत्याहारे झड.
धघभ इति । एवं सर्वत्र ।
(५) औदन्ताः स्वराः॥१।१।६।
अकाराद्या औकारान्ता वर्णाः स्वरसंज्ञकाः स्युः ।
(६) एकद्वित्रिमात्रा ह्रखदीर्घप्लुताः ॥ १।१।७।
मात्रा कालविशेषः । एक द्वित्र्युच्चारणमात्रा प्रौदन्ताः स्वराः क्रमेण
हस्वदीघंप्लु तसंज्ञकाः स्युः । एकमात्रो हस्वः, अ इ उ ऋ लु इति ।
द्विमात्री दीर्घः, आ ई ऊ ऋ ल. ए ऐ ओ औ इति । त्रिमात्र: प्लुतः,
आ ३ ई ३ ऊ ३ इत्यादि । व्यञ्जनं त्वर्धमात्रिकम् ।
(७) अवर्जा नामिनः ।। १।१।८।
अवर्णवर्जा: स्वरा नामिसंशकाः स्युः ।
(८) लदन्ताः समानाः ॥१।१।।
लृदन्ताः स्वराः समानसंज्ञकाः स्युः ।
(8) एऐओऔ संध्यक्षराणि ॥ १ । १ । १० ।
एते स्वराः सध्यक्षरसंज्ञकाः स्युः ।
(१०) अं अनुस्वारः॥ १।१ । ११ ।
अं इति अनुस्वारसंज्ञक: स्यात्, प्रकार उच्चारणार्थः ।
(११) अः विसर्गः॥१।१।१२।
अः इति विसर्गसंज्ञकः स्यात् ।
(१२) ह्रखो लघुः॥ १।१ । १३ ।
हस्वा लघुसज्ञक: स्यात् ।
(१३) संयोगे गुरुः ॥१।१।१४ ।
संज्ञा-प्रकरणम् संयोगे परे हवो गुरुसंज्ञक: स्यात् । (१४) दीर्घः ॥ १।१।१५ ॥ दीर्घो गुरुसंज्ञकः स्यात् । (१५) कुचुटुतुपु वर्गाः ।। १ । १ । १६ । एते वर्गसंज्ञकाः स्युः, कु इति कखगघङ, चु इति चछजझा। एवं सर्वत्र । (१६) स्वरानन्तरिता हसाः संयोगः ॥ १।१ । १७ । स्वरैरनन्तरिता अव्यवहिता हसाः संयोगसंज्ञकाः स्युः । (१७) तुल्यस्थानाऽभ्यन्तरप्रयत्नः सवर्णः ॥ १।१ । १८ । तुल्यौ स्थानाभ्यन्तरप्रयत्नौ येषां ते परस्परं सवर्णसंज्ञकाः स्युः । स्थानं कण्ठादि । अष्टौ स्थानानि वर्णाना-मुरः कण्ठ: शिरस्तथा । जिह्वामूलं च दन्ताश्च, नासिकोष्ठौ च तालु च ॥१॥ तत्र अकुहविसर्गाः कण्ठ्याः, इचयशास्तालव्याः, ऋटुरषा मूर्धन्याः, लतुलसा दन्त्याः, उपूपध्मानीया ओष्ठ्याः, एदैतौ कण्ठतालव्यौ, ओदौतौ कण्ठोष्ठ्यौ, वकारो दन्तौष्ठ्यः, जिह्वामूलीयो जिह्वयः, अनुस्वारो नासिक्य:, अणनङमा: स्वस्थाननासिकास्थानाः। वर्गपञ्चमान्तस्थ- र्युक्तो हकार उरस्यः । आभ्यन्तरप्रयत्नश्चतुर्विध:-स्पृष्टः, ईषत्स्पृष्टः, विवृतः, ईषद्वि- वृतश्च । तत्र वर्याः स्पृष्टाः, यरलवा ईषत्स्पृष्टाः, स्वरा विवृताः, शषसहा ईषद्विवृताः। ४क इति जिह्वामूलीयः, ( प इति उपध्मा- नीयः, कपावुच्चारणाौं । यरलवा अन्तःस्थाः । शषसहा ऊष्माणः । . - ८ कालुकौमुदी पूर्वार्धे प्रत्येक सानुना- ।. अकारस्त्रिविध:-उदात्तानुदात्तस्वरितभेदात् । सिकनिरनुनासिकभेदात् षोढा । एते हस्वस्य भेदाः । एवं दीर्घप्लुतयो- रपि । तथा चाष्टादशभेदा अवर्णस्य ज्ञातव्याः । एवमिवर्णादीनामपि । सन्ध्यक्षराणां ह्रस्वा न सन्तीति तेषां द्वादशभेदाः । वर्यो वर्येण सवर्णः, हस्वदीर्घप्लुतभेदाः सवर्णाः । यवला द्विधा-सानुनासिका निरनुनासि- काश्च । मित्रवदागमः, शत्रुवदादेशः । वर्णग्रहणे सवर्णग्रहणम् । कार- ग्रहणं केवल ग्रहणम् । तपरकरणं तावन्मात्रार्थम् । (१८) अन्त्यस्वरादिष्टिः॥ १।१। ३४ । अन्त्यस्वरप्रभृतिवर्णष्टिसंज्ञकः स्यात् । (१६) अन्त्यात् पूर्व उपधा ॥ १।१ । ३५ । अन्त्याद् वर्णात्पूर्वो यो वर्णः स उपधासंज्ञकः स्यात् । (२०) आदेदीदारो वृद्धिः ॥ १।१ । ३६ । आत्, ऐत्, प्रौत्, आर् इत्येते वृद्धिसंज्ञकाः स्युः । (२१) एदोदरो गुणः ।। १।१३७ । एत्, ओत् . अर्, इत्येते गुणसंज्ञकाः स्युः । ( २२) सितिबादिविभक्तिः ॥१।१ । २१ । स्यादयस्तिबादयश्च प्रत्यया विभक्तिसंज्ञकाः स्युः । (२३) तदन्तं पदम् ॥ १।१ । २२ । स्याद्यन्तं तिबाद्यन्तं च शब्दरूपं पदसंज्ञं स्यात् । (२४) कार्यायेत् ।।१।१ । ३८ । कस्मैचित् कार्याय निर्दिष्टो वर्ण इत्संज्ञकः स्यात् । (२५) तस्य लोपः ॥ १।१।३१। .
संज्ञा-प्रकरणम् ९ १ ३ यस्वेत्संज्ञा तस्य लोप: स्यात् । (२६) चादयो निपातः ॥ १।१।४०। चादिगणो निपातसंज्ञः स्यात् । च, वा,हप्रह, एय, एवम्, नूनम्, शश्वत्, कच्चित् हन्त, माङ्, ने, नम्, स्वधा, स्वाहा, प्रलम्, हि,१५ अथ,१६ . १० मा, - .. १-च-- अन्वयसमाहारेतरेतरयोगसमुच्चयेषु । २----वा--विकल्पोपमानयोः । ३-ह-अबधारणपादपूरणयोः । ४.-अह-निर्देशविनियोगकिलार्थेष । ५-एक-~-अवधारणपृथक्त्वपरिमाणेषु । ६-एवम् ---उपमानोपदेशप्रश्नावधारणप्रतिज्ञानेषु । ७-तनम्-तार्थ निश्चययोः । ८-शश्वत्-नित्यपुन:पुनरर्थयोः । ९-कच्चित्-इष्टप्रश्ने । १०-हन्त-प्रीतिविषादसंप्रतिदानेषु । ११-मा, माङ्, न, नम्-एते निषेधे । १२--स्वधा -पितृबलौ। १३---स्वाहा-हविने । १४---अल म्-भूषएपर्याप्तवारणेषु । १५-हि-~-हितावधारणयोः । १६-अथ-मङ्गलानन्तरारम्भप्रश्न कात्न्येषु ।
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
३
४
९
.
ओम्,' अथो, नो, भोस्, भगोस्, अघोस् अघो, हंहो, हो, अहो,
आहो, उताहो, हा, ही, हे, है, अयि, अररे, अरे, ननु, उम्, कम्,
किम्,' चिद्,' उत, बत, इव, नु, कच्चन, किमुत, किल,१८
१-~ओम्-ब्रह्माभ्यादानाप्रतिश्रवणाभिमुखीकरणेषु ।
२-अथो-अन्वादेशादी।
३.-नो-निषेधे।
४-भोस्, भगोस्, अघोस्, अघो, हंहो, हो, अहो, आहो, उताहो, हे,
है, अयि, अररे, अरे-एते सर्वेऽपि सम्बोधने ।
५-हा-विषादशून्यकीर्तिषु ।
६-ही-विस्मये।
७-ननु-विरोधोक्त्यन्वयादिषु ।
८-उर-अस्तिसत्वररोषोक्तिषु ।
९- कम्-उदकसुखाकाशेषु ।
१०-किम्-प्रश्नवितर्कयोः
११-चिद्-प्रश्नावधारणयोः ।
१२--उत-विकल्पे ।
१३-बत--खेदानुकम्पासन्तोषविस्मयामन्त्रणेषु ।
१४-इव-उपमावधारणयोः ।
१५-नु-वितर्कपादपूरणयोः ।
१६-कच्चन-इष्टप्रश्ने ।
१७-किमुत-विकल्पे ।
१८-किल-संप्रश्नवार्तयोः।
संज्ञा-प्रकरणम्
नवा,' खलु, यदा, जातु, यदि, यथा, तथा, पुरा, दिष्ट्या, स्म,
इति, सह, अमा,१२ साकम्,१३ सार्धम्, अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ,
ऋ, लु, ल., ए, ऐ, ओ, औ, प्र, परा, अप, सम्, अनु, अव, निस्, निर्,
दुस्, दुर्, वि, आङ्, नि, अधि, प्रति, परि, उप, अति, अपि, अभि, सु,
उद् इत्यादि । सूत्रे बहुवचनादाकृतिगणोऽयम् ।
(२७) प्रादिरुपसर्गः क्रियायोगे ॥१।१।४१ ।
चायन्तगंणः प्रादिः क्रियायोगे उपसर्गसंज्ञः स्यात् ।
५--यदि-
१-नवा-विभाषायाम् ।
२-खलु-निषेधवाक्यालङ्कारजिज्ञासानुनयार्थेषु ।
३-यदा-देशाद्यधिकरणे ।
४-जातु-अवधारणपादपूरणयोः ।
-पक्षान्तरे।
६-यथा-योग्यतावीप्सार्थानतिवृत्तिसादृश्ये ।
७-तथा-साम्ये।
८-दिष्ट्या-प्रतिसेवनसभाजनप्रतिलोम्येषु ।
९-स्म-अतीतपादपूरणयोः ।
१०-इति-पुराश्रुतौ।
११-सह-तुल्ययोगविद्यमानयोः ।
१२-अमा-सहार्थसमीपयोः ।
१३-~~-साकम्-सर्धिम्-द्वावपि सहार्थे ।
१४-~-अ, आ"-एते चतुर्दशापि पादपूरणभर्त्सनामन्त्रणनिषेधेषु ।
१२
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
(२८) लोकात् ॥ १।१।३ ।
उक्तातिरिक्तानां संज्ञानां न्यायानां च सिद्धिः शास्त्रप्रवृत्तये
लोकाद् वेदित व्या।
इति संज्ञा-प्रकरणम्
सन्धि-प्रकरणम् अथ स्वर-सन्धिः - दाधि आनय इत्यवस्थायाम्- (२६) इवर्णादीनां स्वरे यवरलाः ।। १।२। १ । इवर्णोवर्णऋवर्णलवर्णानां स्थाने स्वरे परे यथासंख्यं य, व, र, ल इत्येते आदेशाः स्युः । इति इकारस्य यत्त्वे । (३०) अदीर्घादवसानैकहसयोः॥ १।३ । २७ । अदीर्घात् स्वरात् परो रेफजितो यसोऽनुद्विर्वा स्यात् अवसाने एक- हसे च परे। इति धस्य द्वित्वे । (३१) झवे जबा मसानाम् ।। १।३।४३ । झसानां झबे परे जबाः स्युः । इति पूर्वधस्य दत्वे च । स्वरहीन परेण संयोज्यम् । दद्धयानय । पक्षे दध्यानय । एवं गौरी+अत्र गौर्यत्र । जलतुम्धिकान्यायेन रेफस्योर्ध्वगमनम् । मधु+अम मध्वत्र, पितृ+अर्थः = पित्रर्थः, ल+अनुबन्धः= लनुबन्धः । %3- . १४ कालुकोमुदी-पूर्वार्धे (३२) ह्रस्वोऽपदे वा ॥१।२।२। इवर्णादीनां ह्रस्वो वा स्यात् स्वरे परे न चैकपदे । नदि एषा, दधि अत्र, मधु अत्र, कर्तृ इदम् । पक्षे नद्येषा इत्यादि । हस्वस्यापि हस्वः पर्जन्यवल्लक्षणप्रवृत्तेः। ह्रस्वविधानसामर्थ्याच्च कार्यान्तरं न स्यात् । अपदे इति किम्- नद्यौ, वध्वौ, नधुदकम्, वध्वाननम् । (३३) एदैतोरयायौ॥ १।२।३। एकारकारयोः स्थाने स्वरे परे यथासंख्यम् अय, आय इत्यादेशी स्याताम् । ने+अनम् = नयनम्, नै+अक: नायकः । (३४) ओदौतोरवावौ ॥१।२।४। बोकारोकारयोः स्थाने स्वरे परे यथासंख्यम् अव, आव् इत्यादेशौ स्याताम् । भो+अनम् = भवनम्, पौ+अक:=पावकः । (३५) स्वरे वाऽसन्धिश्च ॥ १।३। ५३ । अवर्ण-भो-भगो-अघोरयः परयोः पदान्ते वर्तमानयोर्यकारवकार- योर्लोपो वा स्यात् स्वरे परे न च सन्धिः । त आगताः, तयागताः, तस्मा इदम्, तस्मायिदम्, पट इह, पटविह, ता इमो, ताविमौ । (३६) समानानां सवर्णे दीर्घः सहः॥ १।२। १२ । समानसंज्ञकानां वर्णानां सवर्णे परे परेण सह दीर्घः स्यात् । दण्डाग्रम्, श्रीशः, भानूदयः, होत कारः । (३७) लवर्णों वा ॥१।१ । १६ । ऋलवर्णी परस्परं सवर्णों वा स्तः । होतृ+लकारः होतृ कारः । (३८) अवर्णस्येवर्णादावेदोदरलः ॥ १।२।१३ । अवर्णस्य स्थाने इवर्ण, उवर्ण, ऋवर्ण, लवर्ण इत्येतेषु परेषु परेण . -
सन्धि-प्रकरणम्
१५
सह यथासंख्यम् एत्, ओत्, अर्, अल् इत्येते आदेशाः स्युः। जिनेन्द्रः,
गङ्गेयम्, नवोदकम्, रमोपमा, जिद्धिः ।
(३६) मसानां भसे सवर्णे॥१।३। ६३ ।
हसात् परेषां झसानां लोपो वा स्यात् सवर्णे झसे । जिनधिः,
तवल्कारः ।
स्यात् ।
(४०) एदेतोरेत् ॥ १।२ । १६ ।
अवर्णस्य एकारे ऐकारे च परे परेण सह ऐकारः स्यात् । तवैषा,
जिनैश्वर्यम् ।
(४१) ओदौतोरौत् ।। १ ।२ । २२ ।
अवर्णस्य प्रकारे औकारे च परे परेण
सह
औकार:
श्रमणौघः, चैत्रौत्कण्ठ्यम् ।
(४२) ऋणे प्रवसनकम्बलदशार्णवत्सरवत्सतरस्यार् ॥१।२।१४
प्रादीनामवर्णस्य ऋणे परे परेण सह प्रार् स्यात् । प्रार्णम्, वसना-
र्णम्, कम्बलार्णम्, दशार्णम्, ऋणार्णम्, वत्सरार्णम्, वत्सतरार्णम् ।
(४३) मृत्युपसर्गस्य ॥ १।२ । १६ ।
उपसर्गस्यावर्णस्य ऋकारादौ धातौ परे परेण सह आर् स्यात् ।
प्रार्छति ।
(४४) एदोतोऽतः पदान्ते ॥ १।२।३२ ।
एदोद्भ्यां परस्यातो लोपः स्यात् पदान्ते । तेऽत्र, पटोऽत्र ।
(४५) गवः स्वरेऽनक्षे ॥ १।२।७।
गोशब्दस्य गव इत्यादेशो वा स्यात् अक्षवजिते स्वरे परे पदान्ते ।
(४६) षष्ठ्यान्त्यस्य ।। ८।४। १२३ ।
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
सूत्रे पष्च्या निर्दिष्टं यत्कार्यमुच्यते तत्तस्य अन्त्यस्य वर्णस्य
स्यात् न तु सर्वस्य । इत्यो कारस्यैव आदेशे प्राप्ते ।
(४७) शिदनेकवर्णः सर्वस्य ।। ८।४। १२४ ।
शिदादेशः अनेकवर्णादेशश्च षष्ठ्या निर्दिष्टस्य सर्वस्य स्थाने
स्यात् । गवानम्, गवाजिनम् । पक्षे-गोऽग्रम्, गोऽजिनम् । अनक्षे
इति किम् -गोऽक्षम् ।
(४८) इन्द्र ।।१।२।८।
गोशब्दस्य गवादेशो नित्यं स्यादिन्द्रे परे। गवेन्द्रः ।
(४६) एदोतोरुपसर्गस्य लोपः॥१।२ । २६ ।
उपसर्गस्यावर्णस्य लोपः स्यात् धातोरेदोतो: परयोः । प्रेजते, उपो-
षति ।
(५०) नैत्येपत्योः ॥ १।२ । २७ ।
उपसर्गस्यावर्णस्य लोपो न स्यात् एत्येधत्योः परयोः। उपति,
उपैधते ।
(५१) एवेऽनवधारणे ॥ १।२।२६ ।
अवर्णस्य लोपः स्यात् अनवधारणेऽर्थे एवे परे। अद्येव गच्छ ।
अवधारणे त्वचैव।
( ५२ ) ओष्ठौत्वोः समासे वा ।। १ ।२। ३१ ।
अवर्णस्य लोपो वा स्यात् समासे प्रोष्ठौत्वोः परयोः । बिम्बोष्ठी,
बिम्बोष्ठो, स्थूलोतुः, स्थूलौतु:
(५३ ) शकादीनां टेरन्ध्वादिषु ॥ १।२ । ११ ।
शकादीनां टेर्लोपः स्यात् अन्ध्वादिषु परेषु ।
सन्धि-प्रकरणम्
शकन्धुः, कर्कन्धुः, कुलटा, हलीषा, लाङ्गलीषा, मनीषा ।
इति स्वर-सन्धिः
अथ प्रकृतिभावः
(५४) असंधिरदसोमुमी ॥ १।२।३५ ।
अदस् शब्दसम्बन्धिनौ मु, मी इत्येतो असंधी स्याताम् । अमुम ईचा,
अमी अश्वाः।
(५५) ईदृदेद् द्विवचनं स्वरे ॥ १।२। ३६ ।
ईत् ऊत् एत् इत्येतदन्तं द्विवचनान्तं स्वरे परे असंघि स्यात् ।
मुनी एतो, साधू इमौ, माले आनय, पचेते प्रत्र ।
(५६) मणीवादीनां वा ॥ १।२ । ३७ ।
मणीवादीनां द्विवचनमसंधि वा स्यात् । मणी इव, मणीव, दंपती
इव, दंपतीव ।
(५७) ओन्निपातः ॥ १।२। ३८ ।
ओदन्तो निपातः असंधिः स्यात् । अहो अत्र, उताहो अत्र ।
(५८) धावोदितौ ॥ १।२ । ४२ ।
घिविषये प्रोदन्तः इतौ परेऽसंधिर्वा स्यात् । साधो इति, साविति ।
इति प्रकृतिभावः
अथ हस-सन्धिः
(५६) झसा जबाः॥२।१।१०८।
पदान्ते वर्तमाना झसा जबाः स्युः। बाक्+ईशः वागीशः, षट्+
अत्र-षडत्र।
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे (६०) अमे जबा ममावा पदान्ते ॥ १।३।१। पदान्ते वर्तमाना जबा अमे परे ञमा वा स्युः। एतन्मुरारिः, एतद् मुरारिः, वाङ् मधुरा, वाग् मधुरा। पदान्ते इति किम्- - विधः। प्रासन्न- (६१) प्रत्यये ॥ १।३।२। पदान्ते वर्तमाना जबा नित्यं अमाः स्युः प्रत्यये अमे परे । षण्णाम्, वाङ्मयम् । (६२) जबाद्धो झभाः॥ १।३।४। पदान्ते स्थिताज्जबात्परस्य हकारस्य झभा वा स्युः। स्वात् यद्वर्गगो जबस्तद्वर्गगो झभः स्यात् । तद्धितम्, तहितम्, वाग्धरिः, वारहरिः। (६३) स्तोःश्चुभिःश्चुः ।। १।३।५। शकारचवर्गाभ्यां योगे सकारतवर्गयोः स्थाने शकारचवर्गो स्तः। यथासंख्यमनुदेशः समानाम् । सकारस्य शकारः, तवर्गस्य चवर्गः। कश्शेते, तच्चित्रम्, भवाञ शेते । (६४) शात् ॥ १।३।६। शकारात्परस्य तवर्गस्य चुत्वं न स्यात् । विश्नः (६५) ष्टुभिः ष्टुः ॥ १।३।६। षकारटवर्गाभ्यां योगे सकारतवर्गयोः स्थाने षकारटव! स्तः । कष्षष्ठः, तट्टीकते, ईट्टे । (६६) न पदान्ताट्टोरनाम्नवतिनगरीणाम् ॥ १।३।७। पदान्ते वर्तमानाट्टवर्गात्परयोः सकारतवर्गयोः षकारटवर्गों न स्तः । प्रश्नः, :।
सन्धि-प्रकरणम्
नाम्नवतिनगरीणां तु स्यादेव । षड् नयनम्, षट् सीदन्ति । अनाम्-
नवतिनगरीणामिति किम्-षण्णाम्, षण्ण वतिः, षण्ण गर्यः ।
(६७) तोः पि ॥ १।३।८।
षकारे परे तवर्गस्य टुत्वं न स्यात् । भवान् षष्ठः ।
(६८) लि लः ।। १।३।१०।
तवर्गस्य लकारे परे लकारः स्यात् । तल्लुनाति, विद्वालि लखति,
नकारस्य सानुनासिको लकारः।
(६६) उदःस्थास्तम्भोः सः॥ १।३। ६४ ।
उदः परयोः स्थास्तम्भोः सस्य लोप: स्यात् । उत्थानम्, उत्तम्भनम् ।
(७०) आद्यन्तौ दिकतौ ॥ १।१। ६२ ।
टिकितौ यस्योक्तौ तस्य क्रमादाद्यन्ताववयवौ स्तः ।
( ७१ ) शे चग्वा नोऽश्चे ॥ १।३ । २१ ।
नान्तस्य पदस्य शे परे चगागमो वा स्यात् न तु रचे परे । भवाञ
च शूरः, भवान, शूरः । अश्चे इति किम्-भवान् श्च्योतति ।
(७२) खसे चपा भथानाम् ॥ १।३।४०।
झथानां खसे परे चपाः स्युः। तत् शान्तिः, तच् शान्तिः ।
(७३) चपाच्छश्छोऽमे वा ॥ १।३।३।
पदान्ते वर्तमानाच्चपात् परस्य शकारस्य छो वा स्यात् अमे परे ।
तच्छान्तिः, वाक् शूरः, वाक् छूरः। अमे इति किम्-वाक् श्च्योतति ।
(७४) पनो ह्रस्वाद् द्विः स्वरे ॥ १।३। २२ ।
ह्रस्वात् परे पदान्ते स्थिता कारण कारनकारा द्विः स्यः स्वरे
परे । प्रत्यङ्दिम्, सुगणिह, कुर्वन्नास्ते ।
२०
कालुकौमुदी-पूर्वार्ध
.
(७५) स्वरात् ॥ १।३।२५।
स्वरात्परश्छकारो द्विः स्यात् । तवच्छत्रम्, इच्छति. हीच्छति ।
(७६) अनाङमाङो दीर्घाद् वा छः॥१।३ । २३ ।
आङ्मा जितादीर्घात् पदान्तात् परश्छकारो द्विर्वा स्यात् ।
लक्ष्मीच्छाया, लक्ष्मीछाया, वधूच्छत्रम्, वधूछत्रम् । अनाङ्माङ इति
किम्-आच्छादयति, माच्छिदत् । पूर्वेण नित्यमेव ।
(७७) मोऽनुस्वारयमौ हसे सवर्णौ ॥ १।३ । १८ ।
पदान्ते मकारस्य हसे परे अनुस्वारयमौ हसस्यैव सवर्णो पर्यायण
स्त: । त्वं करोसि, त्वङ्करोसि, त्वं चरसि, त्वञ्चरसि, त्वं पचसि,
त्वम्पचसि, संवत्सरः, सँव्वत्सरः। हसे इति किम्-किमत्र ।
(७८) सम्राट् ॥१।३।२० ।
समो मस्यानुस्वाराभावे सम्राट् इति निपात्यते । सम्राट् भरतः ।
(७६) म्नां झपे बमः सवर्णोऽपदान्ते ।। १।३।३४ ।
अपदान्ते मकारनकारयोः स्थाने झपे परे झपस्यैव सवर्णो चमोऽनु-
स्यात् ।
गन्ता, शहिता, अञ्चिता, नन्दिता, कम्पिता। झपे इति
किम्
गम्यते, हन्यते । अपदान्ते इति किम्-भवान् करोति ।
(८०) हशसेऽनुस्वारः ॥१।३ । ३५ ।
अपदान्ते मकारनकारयोः स्थाने हकारे शसे च परेऽनुस्वारोऽनु -
स्यात् । स्वनड्वां हि, यशांसि, पुंसि। अपदान्ते इति किम्-भवान्
-
.
.
साधुः।
(८१) नोऽप्रशानःसक् छतेऽमपरेऽनुनासिकश्च वा ।। १ । ३ । १३ ।
अम्परे छते प्रशान्वजितस्य नान्तस्य पदस्य सगागमः स्यात्
सन्धि-प्रकरणम्
२१
अप्रशान इति
तस्याऽनुनासिकश्च वा। भवास्तनोति, भवांस्तनोति ।
किम्-प्रशान् तनोति ।
इति हस-सन्धिः
अथ विसर्गसन्धिः
(८२) विसर्गस्य सश्छते ॥१।३।४४ ।
विसर्गस्य सकारादेशः स्यात् छते परे। कस्तरति, कश्चरति,
कष्टीकते। छते इति किम्-कः करोति, कः पचति ।
(८३) वा शसे ॥१।३।४५
शसे परे विसर्गस्य सो वा स्यात् । शुद्धस्साधुः, शुद्धः साधुः,
पुत्रश्शेते, पुत्रःशेते।
(८४) अतोऽत्युः ॥ १।३ । ४६ ।
अकारात्परस्य विसर्गस्य उकारादेश: स्यात् अकारे परे। कोऽत्र,
जिनोऽर्यः। अत इति किम्-देवा अत्र ।
(८५) हवे ॥१।३।५०।
अकारात्परस्य विसर्गस्य उकारादेशः स्यात् हबे परे। जिनो
वन्द्यः, धर्मो जयति ।
(८६) अवर्णभोभगोअघोभ्यो लोपः ॥१३ । ५१ ।
अवर्णादिभ्यः परस्य विसर्गस्य लोपः स्यात् हबे परे ।
गच्छन्ति, भो गच्छसि, भगो हससि, अघो यासि । एते आमन्त्रणार्थाः
सकारान्ता अव्ययाः। हबे इति किम्-कुमाराः क्रीडन्ति ।
"
श्रमणा
.
२२
कालुकौमुदी-पूर्वार्ध
(८७) यो विसर्गस्य ॥ १।३।५४ ।
अवर्णादिभ्यः परस्य विसर्गस्य यः स्यात् स्वरे परे। स्वरे
वाऽसन्धिश्चेति-देवा इह, देवायिह, भो एहि, भोहि, भगो अत्र,
भगोयत्र, अघो इहि, अघोयिहि ।
(८८) सोऽतः ।।२।१ । १०५।
अहन् शब्दस्य सकारोऽन्तादेशः स्यात् पदान्ते ।
(८६) स्रोविसर्गः॥२।१ । १०३।
सकाररेफयोविसर्गादेशः स्यात् पदान्ते । अहो राजते, अहो
रूपम्।
(६०) रोऽरस्यादिभे ॥२।१। १०६ ।
अहन् शब्दस्य रेफोऽन्तादेशः
स्यात्
रेफस्यादिभवजिते परे पदान्ते ।
स्रोविसर्ग इति विसर्गे।
(६१) रः ॥१।३।५६ ।
रेफप्रकृतिकस्य विसर्गस्य रेफः स्यात् अबे परे । अहरहः, अहगंणः,
अहर्भवः, प्रातरत्र, अन्तर्गतः। रेफप्रकृतिकस्येति किम्-~-देवो गतः
(१२) वाऽहर्पत्यादयः॥ १।३ । ५७ ।
अहर्पत्यादयः शब्दाः कृतरकारान्ता वा निपात्यन्ते । अहर्गतिः,
अहः पतिः, गीपतिः, गीः पतिः, धूर्पतिः, धूः पतिः ।
(१३) नामिनो रोऽबे ॥ १।३।५५ ।
नामिनः परस्य विसर्गस्य रेफः स्यात् अबे परे। मुनिरत्र, साधु-
वंदति । नामिन इति किम्-चैत्रो गच्छति । अबे इति किम्-
मुनिः शेते।
-
सन्धि-प्रकरणम् २३ (६४) रो रि लोपो दीर्घश्चादिदुतः ॥१।३।३६ । रेफस्य रेफे परे लोपः स्यात् अकारेकारोकाराणां दीर्घश्च । पुना रमते, प्राता रौति, नीरक्तम्, दूरक्तम् । (६५) सैषाद्धसे लोपः॥१।३ । ६०। सैषाभ्यां परस्य विसर्गस्य लोप: स्यात् हसे परे । स याति, एष गच्छति । हसे इति किम्-सोऽत्र । (१६) नाग्नसमासे ॥१।३। ६१ । अकि नभ समासे च सैषाभ्यां परस्य विसर्गस्य लोपो न स्यात् हसे परे। सको राजा, एषको मन्त्री, असो याति, अनेषो गच्छति । (६७) तदः सेः स्वरे पादपूरणं चेत् ॥ १।३। ६५ । तदः परस्य सेर्लोपः स्यात् स्वरे परे पादश्चेल्लोपे पूर्येत । सैष दाशरथी रामः, सैष राजा युधिष्ठिरः । सैष का महात्यागी, संष भीमो महाबलः ॥ १ ॥ पादपूरणं चेदिति किम्-स एष भरतो राजा। सन्धिरेकपदे नित्यो, नित्यो धातूपसर्गयोः । नित्यः समासे वाक्ये तु, स विवक्षामपेक्षते ॥ १ ।। . इति सन्धि-प्रकरणे विसर्ग-सन्धिः इति सन्धि-प्रकरणम्।
स्यादि-प्रकरणम् अथ स्वरान्ताः पुल्लिँङ्गाः (६८) अर्थवदधातुविभक्तिवाक्यं नाम ।।१।१।३१ । धातुविभक्तिवाक्यवर्जितम् अर्थवच्छब्दरूपं नामसंज्ञं स्यात् । नाम्नः पराः स्यादयः सप्त विभक्तयः स्युः । (88) सि औ जस्-अम् औ शस्-टा भ्यां भिस्-डे भ्यां भ्यस्- ङसि भ्यां भ्यस्-ङस् ओस् आम्-ङि ओस् सुपां त्रीणि त्रीणि प्रथमादिः ॥१।४।१। स्यादीनां त्रीणि त्रीणि वचनानि यथासंख्यं प्रथमादिसंज्ञानि स्युः । (१००) एकद्विबहुषु ॥१।४।२। स्यादीनां त्रीणि त्रीणि वचनान्युक्तानि, तान्येकत्वद्वित्त्वबहुत्त्वेष्व- थेषु यथाक्रमं स्युः । तत्र प्रथमाया एकवचने-जिन+सि इति स्थिते, इकार उच्चारणार्थः, स्रोविसर्गः, जिनः। द्विवचने-जिन+जिन+औ इति स्थिते । (१०१) स्यादावसंरव्येयः ॥३।१ । १३५ । सर्वस्मिन् स्यादौ समानानां तुल्यरूपाणां सहोक्तो गम्यमानायाम्
त्यादि-प्रकरणम्
२५
एकशेष: स्यात् संख्येयवाचिशब्दरूपं वर्जयित्वा । जिनौ । असंख्येय
इति किम्-एकश्च एकश्च । बहुवचने-जसो जकार एदोज्ज सीति
विशेषणार्थः ।
(१०२ ) अदेतोरपदान्तेऽतः ॥२।१।३१ ।
अपदान्ते स्थितस्य प्रकारस्य लोप: स्यादकारे एकारे च परे । इति
अकास्य लोपे प्राप्ते ।
(१०३) अतो जस्भ्यांये ॥ १।४।८।
नाम्नोऽकारस्य आकारादेशः स्यात् जस्, भ्याम्, य इत्येतेषु परेषु ।
जिनाः।
(१०४) समानादमः।।१।४। ७१ ।
समानात् परस्या मोऽकारस्य लोप: स्यात् । जिनम्, जिनौ। शसः
शकारः शसोऽतेति विशेषणार्थः ।
(१०५) शसोऽता दीर्घः सश्च नः पुंसि ॥ १।४। ७२ ।
शसोऽकारेण सह समानस्य दीर्घः स्यात् तत्सन्नियोगे पुल्लिङ्गविषये
शमः सकारस्य नकारादेशश्च । जिनान् ।
(१०६) टेनः ॥ १।४।१५।
अकारात्परष्टा इनः स्यात् । जिनेन, जिनाभ्याम् ।
( १०७ ) भिस् ऐस् ॥ १।४।६।
अकारात्परस्य भिस ऐसादेशः स्यात् । अनेकवर्णत्वात् सर्वस्य ।
जिनः।
(१०८) डेयः ॥ १।४।१६।
अकारात्परो डेयः स्यात् । जिनाय, जिनाभ्याम् ।
.
कालुकौमुदी-पूर्वार्ध
(१०६) एबहुस्भे ॥१।४ ११ ।
अकारस्य एकारः स्यात् बह्वर्थे सकारे भकारे च परे । जिनेभ्यः ।
(११०) ङसिराद् ॥ १।४।१३ ।
अकारात्परो सिराद् स्यात् । जिनाद् ।
(१११) वावसाने ॥१।३। ४१ ।
अवसाने झथानां चपा वा स्युः । जिनात्, जिनाभ्याम्, जिनेभ्यः ।
(११२) डस् स्यः ॥१।४।१४।
अकारात्परो ङस् स्यः स्यात् । जिनस्य ।
(११३ ) ओसि ॥१।४।१२।
अकारस्य ओसि परे एत्वं स्यात् । जिनयोः ।
(११४) हस्खापश्च ॥ १।४।३७ ।
हस्वान्तादाबन्तान्नित्यस्त्रीदूदन्ताच्च परस्यामो नुडागमः स्यात् ।
(११५) नुट्यतिमृचतस्रोः ॥१।४। ७३ ।
नुटि परे समानस्य दीर्घः स्यात् तिसृचतसृशब्दी वर्जयित्वा । जिना-
नाम्, जिने, जिनयोः । सुपः पकारो न र: सुपीति विशेषणार्थ ।
(११६) किलादेकपदेऽपदान्ते कृतस्य सस्य ।। २ । २ १४ ।
कवर्गादिलाच्च परस्याऽपदान्ते वर्तमानस्य कृतस्य
स्यादेकपदे । जिनेषु ।
( ११७ ) सिधिरामन्त्रणे ॥ १।१।५६ ।
आमन्त्रणेऽर्थे सिधिसंज्ञः स्यात् ।
(११८) अदेतोध्यमोर्लोपः ॥१।४। ६६ ।
अकारान्तादेकारान्ताच्च परस्य धेस्तदादेशस्यामश्च कोपः स्यात् ।
सस्य
स्यादि प्रकरणम् २७ , हे जिन, हे जिनौ, हे जिनाः। एवं वीररामकृष्णदेवादयः । सर्वादीनां तु विशेषः। सर्व, विश्व, उभ, उभयट्, अन्य, अन्यतर, इतर, डतर, डतम, त्वत्, त्व, नेम, समसिमी सर्वार्थ, पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराध- राणि दिग्देशकालेषु, स्वमज्ञातिधनाख्यायाम, अन्तरमपुरिबहियोगे परि- धाने च, त्यद्, तद् यद् अदस्, इदम् एतद्, एक, द्वि, युष्मद्, अस्मद्, भवतु, किम् इत्यसंज्ञायां सर्वादिः । एते सर्वादयस्त्रिलिङ्गाः । सर्वः, सा। (११६) जस इश्॥१।४।१६। सर्वादरकारान्त सम्बन्धिनो जस इश् स्यात् । शकारः सर्वादेशार्थः । सर्व, सर्वम्, सर्वो, सर्वान् । (१२० ) एकपदे रष्मृवर्णान्नो णो ऽपदान्ते ॥२।२। ६६ । रेफषकारऋवणेभ्यः परस्य नस्य णः स्यादेकपदे न तु पदान्ते । (१२१) अवकुप्वनुस्खारविसर्गजिह्वामूलीयोपध्मानीयैरन्तरेऽपि ।। २।२।७०। इत्येतव्यं वधानेऽपि रेफषकारऋवणेभ्यः परस्य नस्य ण: स्यात् । सर्वेण, सर्वाभ्याम्, सर्वैः । ( १२२) सर्वादेः स्मैः ।। १।४।१७। सर्वादेरकारान्तसम्बन्धिः स्मः स्यात् । सर्वस्मै, सर्वाभ्याम्, सर्वेभ्यः। (१२३ ) सिङयोः स्मास्मिनौ ॥ १।४ । १८ । सर्वादेरकारान्तसम्बन्धिनोर्डसिङ्योर्यथासंख्यं स्मात्स्मिनी स्तः। सर्वस्मात्, सर्वाभ्याम्, सर्वेभ्यः, सर्वस्य, सर्वयोः । -
२८
"
कालुकौमुदी-पूर्वार्ध
(१२४ ) अवर्णस्यामः सुट् ॥ १।३ । २३ ।
अवर्णान्तसर्वादेः सम्बन्धिन आमः सुडागमः स्यात् । सर्वेषाम्,
सर्व स्मिन्, सर्वयोः, सर्वेषु, हे सर्व, हे सर्वी, हे सर्वे। असंज्ञायामिति
किम्-सर्वो नाम कश्चित्, तस्मै सर्वाय । एवं विश्वादयोऽप्यका-
रान्ताः । उभशब्दो नित्यं द्विवचनान्तः । उभौ, उभौ, उभाभ्याम् उभा-
भ्याम्, उभाभ्याम्, उभयोः, उभयोः । इतरडतमौ प्रत्ययो, तदन्ताः शब्दा
ग्राह्याः । कतरः, कतरौ, कतरे, कतमः, कतमौ, कतमे ।
(१२५) पूर्वादिभ्यो नवभ्यः इश्मास्मिनः ॥ १।४ । २२ ।
पूर्वादिभ्यो नवभ्यः यथास्थानमुक्ता इश्स्मास्मिन इत्यादेशा वा
स्यः। पूर्वे, पूर्वाः, पूर्वस्मात, पूर्वात्, पूर्वस्मिन्, पूर्वे । शेषं सर्ववत् ।
एवं परादयः।
(१२६ ) द्वन्द्व न सर्वादिः ।। १ । ४ । २४ ।
द्वन्द्वसमासे सर्वादीनां सर्वादिसंज्ञा न स्यात् । पूर्वापराय, पूर्वापरा-
धराणाम् ।
(१२७ ) द्वन्द्व ॥१। ४ । २१ ।
द्वन्द्वसमासे सर्वादेरकारान्तसम्बन्धिनो जस इश् वा स्यात् । पूर्वा-
परे, पूर्वापराः, वर्णाश्रमेतरे, वर्णाश्रमेतराः ।
(१२८)नेमाल्पप्रथमचरमतयडयडर्धकतिपयानांवा॥ १।४।२०।
एषां जस इश्वा स्यात् । नेमे, नेमाः। शेषं सर्ववत् । अल्पे,
अल्पाः । शेषं जिनवत् । तयडयटौ प्रत्ययौ, तदन्ताः शब्दा ग्राह्याः ।
द्वितये, द्वितयाः, द्वये, द्वयाः।
स्यादि-प्रकरणम् २९ (१२६) ङिति तीयस्य वा ॥१।४ । २६ । तीयप्रत्ययान्तस्य डिति परे सर्वादिसंज्ञा वा स्यात् । द्वितीयस्म, द्वितीयाय, द्वितीयस्मात्, द्वितीयात्, द्वितीयस्मिन्, द्वितीये। शेष जिनवत् । (१३०) मासनिशासनस्य शसादौ वा लोपः ।। २ । १२३ । एषामन्त्यस्य लोपो वा स्यात् शसादौ । मासः मासाः । (१३१) नाम सिदयहसे ।।१।१। २३ । सिति यकारवजिते हसादौ च प्रत्यये परे पूर्व नाम पदसंज्ञं स्यात् । माभ्याम्, माभिः, मासे, माभ्याम्, माभ्यः, मासः, माभ्याम्, माभ्यः, मासः, मासोः, मासाम्, मासि, मासोः, मास्सु । पक्षे जिनवत् । (१३२) शिस्थुट् ॥ १।१ । ५४ । जस् शसादेशः शिस्थुःसंज्ञक: स्यात् । (१३३) पुस्त्रियोः स्यमौजस् ॥ १।१ । ५५ । पुल्लिङ्गे स्त्रीलिङ्गे च सि, प्रो, जस्, अम्, औ इत्येते प्रत्य- यास्थुट्संज्ञकाः स्युः । (१३४ ) अनोऽतोऽवमयुक्तात् ॥ २ । १ । २८ । वकारमकारान्तसंयोगवर्जितात् परस्य अनोऽतो लोप: स्यात ईपि थड्वजिते स्यादिस्वरे च परे। पास्न:, प्रास्ना। (१३५) नानो नोऽनह्नः ॥२।१ । १२१ । अहन्शब्दवजितस्य नाम्नो नस्य लोप: स्यात् पदान्ते, स च स्यादि- विधावसिद्धः । आसभ्याम्, आसभिः । न लोपस्याऽसिद्धत्वान्न स्यादि- कार्यम् ।
३ कालुकौमुदी-पूर्वार्ध (१३६) वेङयोः ॥२।१ । २६ । वकारमकारान्त संयोगवर्जितात् परस्यानोऽतो लोपो वा स्यात् ई, ङि इत्येतयोः परयोः । आस्नि, आसनि । ( १३७) पाददन्तनासिकाहृद्यासृज्यूषोदकदोर्यकृच्छकृत्पृतनासा- नूनां पन्नोहृदसन्यूषन्नुदन्दोषन्यकञ्शकन्पृतनवः ॥ २।१। २४॥ पादादीनां यथासंख्यं पदादय आदेशा वा स्युः शसादौ पादस्य- पद् । पदः, पदा, पद्भ्याम्, पद्भिः, पत्सु । दन्तस्य-दत् । दतः, दता । यूषस्य-यूषन् । अवकुप्वनुस्वारेति णत्वे । (१३८) णषमसिद्ध परे स्यादिविधौ च ॥२।१।६१ । इतः परकार्ये कर्तव्ये पूर्वस्मिश्च स्यादिविधौ विधातव्ये णकारष. कारौ असिद्धौ स्याताम् । इति णत्वस्याऽसिद्धत्वादनोऽतोऽवमयुक्तादि त्यकारलोपः । यूष्णः, यूष्णा, यूषभिः । पक्षे जिनवत् । पदादयः पृथक्. शब्दा इत्ये के । सोमपाः, सोमपी, सोमपाः, सोमपाम्, सोमपौ । (१३६ ) आतोऽनापो लोपः स्वरे ॥२।१।२५ । आवजितस्य आकारस्य लोपः स्यात् शसादौ स्वरे परे । सोमपः, सोमपा, सोमपाभ्यामित्यादि । एवं विश्वपा, शङ्खध्मा, हाहा इत्या- दयः । मुनिः । (१४० ) इदुतोऽस्त्रेरौरीदुत् ॥१।४।४१ । इदुद्भ्यां पर औः ईदूतौ स्तः स्त्रिशब्दं वर्जयित्वा । मुनी । अस्त्रेः इति किम्-सुस्त्रियौ पुरुषो।
स्यादि-प्रकरणम्
३१
३
१
(१४१) एदोजसि ॥ १।४।४३ ।
इदुतोरेदोतौ स्तः जसि परे। मुनयः । मुनिम्, मुनी, मुनीन् ।
(१४२) टा नाः पुंसिः॥१।४।४२ ।
इदुद्भ्यां परष्टा नाः स्यात् पुल्लिङ्गविषये। मुनिना। मुनि-
भ्याम्, मुनिभिः।
(१४३) ङित्यदिति ॥१।४।४४ ।
इदुतोरेदोतौ स्त: अदिति ङिति परे । मुनये । मुनिभ्याम् । मुनिभ्यः ।
(१४४) एदोतो ङसिङसोरतः ॥१।४। ७० ।
एदोद्भ्यां परस्य ङसिङसोरकारस्य लोप: स्यात् । मुनेः । मुनि-
भ्याम्, मुनिभ्यः, मुनेः, मुन्योः, मुनीनाम् ।
(१४५) उडौंः ॥ १।४।४५ ।
इदुद्भ्यां परस्य उडा: स्यात् ।
(१४६) डिति टेः ॥ ८।४। ८४ ।
डिति परे टेर्लोप: स्यात् । मुनौ । मुन्योः, मनिषु ।
(१४७) हस्वस्य गुणो धिना ।। १।४।३६ ।
हस्वस्य धिना सह गुणः स्यात् । हे मुने, हे मुनी, हे मुनयः ।
एवमग्निगिरिरविकविप्रभृतयः ।
(१४८ ) मृदुशनस्पुरुदंशोऽनेहसश्च सेरघेर्डाः ॥ १।४। ८६ ।
ऋकारान्तात् उशनस, पुरुदंशस्, अने हस् इत्येतेभ्य: इकारान्तात्
सखिशब्दाच्च परस्य धिवजितस्य सेर्डाः स्यात् । सखा ।
(१४६) ऐः सख्युरितोऽशि धौ ॥१।४। ८५ ॥
इकारान्तस्य सखिशब्दस्य शिवजिते धिवजिते च थुटि परे
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
-
सख्या।
ऐकारादेशः स्यात् । सखायौ, सखायः । हे सखे, हे सखायौ, हे सखायः,
सखायम्, सखायौ, सखीन् । टा नाः पुंसीति प्राप्ते ।
(१५०) न टा नाः ॥ १।४।४८ ।
इदन्ताभ्यां केवलसखिपतिभ्यां परष्टा ना न स्यात् ।
इित्यदितीति प्राप्ते ।
(१५१ ) कित्येत् ॥ १।४।४६ ।
इदन्तयोः केवलसखिपत्योङिति परे एकारो न स्यात् । सख्ये ।
सि इवर्णस्य यत्त्वे कृते ।
(१५२ ) खितिखीतीयाद् ङसिङसोरत उः॥१।४।५० ।
खितिखोतीसम्बन्धिनो यकारात्परयोर्डसिङसोरकारस्य
उकार:
"
"
स्यात् । सख्युः, सख्यः ।
(१५३ ) केवलसखिपतेरौः ॥१।४ । ४७ ।
इदन्ताभ्यां केवलसखिपतिभ्यां परस्य उरी: स्यात् । सख्यौ। शेष
मुनिवत् । पतिः पती, पतयः, पत्या, पत्ये, पत्युः २, पत्यौ। केवलेति
विशेषणात् समासे तु मुनिवत् । भूपतिः, भूपती, भूपतयः इत्यादि ।
एवं सुसखा, सुसखायो, सुसखायः, सुसखायम्, सुसखायौ । शेषं मुनिवत् ।
(१५४) आद्वष्टेरः ।।२।१ । ७७ ।
द्विपर्यन्तानां त्यदादीनां टेरकारादेशः स्यात् स्यादौ परे। द्वौ, द्वौ,
द्वाभ्याम् ३, द्वयोः २। त्रयः, त्रीन्, त्रिभिः, त्रिभ्यः २ ।
(१५५) संख्यायास्त्रेस्त्रयो नुटि ॥१।४ । ३ ।
संख्यावाचित्रिशब्दस्यं त्रयः इत्यादेशः स्यात् नुटि परे । त्रयाणाम्,
त्रिषु । कतिशब्दो नित्यं बहुवचनान्तः ।
स्यादि-प्रकरणम् - (१५६ ) जस्शसोर्डतिष्णो लुक् ॥ १।४।४। डतिप्रत्ययान्तात् षकारान्तात् नकारान्ताच्च संख्यावाचिन: परयो- जैसशसोलुंक् स्यात् । लोपेनैव सिद्धे लुग्विधानं स्थानिवद्भावबाधना- र्थम् । तेन एदोज्जसीति एत्वं न । कति, कति, कतिभिः, कतिभ्यः, कतिभ्यः, कतीनाम्, कतिषु । नयतीति नियःक्विपि-विववन्ताः शब्दा धातुत्वं नोज्झन्ति नामत्वं च प्रतिपद्यन्ते । नीः । (१५७) धातोरिवर्णोवर्णयोरियुवौ स्वरे प्रत्यये ।। २ । १ । १३ । धातोरिवर्णोवर्णयोः स्वरादौ प्रत्यये परे इयुवौ स्तः । नियो, नियः, नियम्, नियः, निया, निये, नियः २ । (१५८) निय आम् ।। १।४।४६ । नीशब्दात्परस्य रामादेश: स्यात् । नियाम् । सेनानीः । (१५६) किपसमासस्याऽसुधियस्तौ ।।२।१ । २१ । क्विप्प्रत्ययान्तेनैव यः समासस्तत्सम्बन्धिनो धातोरिवर्णोवर्णयोः स्थाने तो यकारवकारौ इयुवोर पवादौ स्तः स्वरादौ स्यादौ परे न तु सुधियः। सेनान्यो, सेनान्यः । विवप्समासस्येति किम्-परमनियो, परमनियः । असुधिय इति किम्-सुधियो, सुधियः। एवं ग्रामणी- प्रभृतयः । यवक्रीः। (१६०) संयोगात् ॥ २॥ १ । १५ । धातोरेव संयोगात्परयोर्धातोरिवर्णोवर्णयोरियुवौ य्वोरपवादौ स्त: स्वरादौ प्रत्यये परे । यवक्रियौ, यवक्रियः इत्यादि । धातोरेव संयोगवि- शेषणान्नेह-उन्न्यो, उन्न्यः। साधुः, साधू, साधवः, साधुम्, साधू, साधून, साधुना, साधुभ्याम्, साधुभिः, साधवे, साधो: २, साध्वोः, .
३४ कालुकौमुदी-पूर्वार्धे साधूनाम्, साधी, साधुषु, हे साधो । एवं भिक्षुभानुविष्णुवायुप्रभृतयः । (१६१) क्रोष्टुस्तृजवत् पुंस्यधौ ॥ १।४।८७ । क्रोष्टुशब्दस्य तृच्प्रत्ययान्तवद्रूपं स्यात् धिवजिते थुटि परे पुल्लिङ्ग- विषये। ऋदुशनसिति सेर्डाः । क्रोष्टा । (१६२) तृस्वसृनप्तनेष्टुत्वष्टक्षतृहोतृपोतृप्रशास्तृ णामार ।। १।४।५४। तृच्तृन्प्रत्ययान्तस्य स्वस्रादीनां च ऋकारस्य प्रार् स्यात् थुटि परे। कोष्टारो, कोष्टारः, कोष्टारम्, क्रोष्टून् । (१६३ ) टादौ स्वरे वा ॥१।४। ८८ । क्रोष्टुशब्दस्य तृज्वद्रूपं वा स्यात् स्वरादौ टादौ परे पुंसि । क्रोष्ट्रा, क्रोष्टना, क्रोष्टुभ्याम, क्रोष्टुभिः, क्रोष्ट्र, क्रोष्टवे । (१६४) तो डुः ।।१।४।५१ । ऋदन्तात्परस्य ङसिङसोरकारस्य डुः स्यात् । क्रोष्टुः २, क्रोष्टो: २, क्रोष्ट्रोः, क्रोष्ट्वोः । कृताकृतप्रसङ्गो नित्यः, नित्यत्वात् पूर्वमेव नुटि कृते-क्रोष्ट्रनाम् । (१६५) अौं ।। १।४ । ५२ । ऋकारस्य अर् स्यात् ङौ परे। क्रोष्टरि, क्रोष्टौ, क्रोष्टुषु । धौ तृवभावाऽभावात्-हे क्रोष्टो, हे क्रोष्टारो, हे क्रोष्टारः। खलपूः, खलप्वौ, खलप्वः, सेनानीवत् । एवमुल्लूसुल्वादयः । वर्षाभूः । ( १६६ ) वर्षापुन नकारागुवः ॥२। १ । २२ । वर्षादिभ्यः परस्यैव भुव उकारस्य वकारः स्यात् नान्येभ्यः स्वरादी म्यादौ परे । वर्षाम्बी, वर्षाभ्वः । एवं पुनवों, पुनर्वः। वर्षादिभ्य
स्यादि-प्रकरणम्
३५
एवेति नियमान्नेह-स्वयंभुवी, स्वयंभुवः । पिता।
(१६७) थुटि ॥१।४। ५३ ।
ऋकारस्य अर् स्यात् थुटि परे । पितरौ, पितरः, पितरम्, पितृ न्,
पित्रा, पित्रे, पितुः, २, पित्रोः २, पितृ णाम्, पितरि, पितृषु, हे
पितः । एवं जामातृभ्रात्रादयः । ना, नरौ, नरः ।
(१६८) नुर्वा ॥ १।४ । ७४ ।
नृशब्दस्य दीर्घो वा स्यान्नुटि परे । नृणाम्, नृणाम् । कर्ता
तृस्वस्त्रिति आर् । कर्तारौ, कर्तारः । एवं नप्त्रादयः।
(१६) रायो हसे ॥ १।४।७।
रैशब्दस्य आकारोऽन्तादेशः स्यात् हसादौ स्यादौ परे । राः, रायौ,
रायः, राभ्याम्, रासु।
(१७० ) ओत औः ॥१।४। ८३ ।
ओकारस्य औकारः स्यात् थुटि परे । गौः, गावौ, गावः ।
(१७१ ) आ अम्शसोऽता ॥ १।४। ८४ ।
प्रोकारस्य अम्शसोऽकारेण सह आः स्यात् । गाम्, गावो, गाः,
गवा, गवे, गोः २, गवोः, गवाम्, गवि, गोषु। ग्लौः, ग्लावी, ग्लावः
इत्यादि।
इति स्वरान्ताः पुल्लिँङ्गाः।
.
.
अथ स्वरान्ताः स्त्रीलिङ्गाः
(१७२) आपः॥१।४।२८ ।
आबन्तात् परस्य सेर्लोप: स्यात् । सीता ।
३
कालुकोमुदी-पूर्वार्धे
१७३ ) औरिः ॥१।४।३२ ॥
आबन्तात्पर औः इ: स्यात् । सीते, सीताः, सीताम्, सीते,
.
सीताः।
,
१७४) एर्धिटौस्सु ॥ १।४।३१ ।
आबन्तस्य ए: स्यात् धि, टा, ओस् इत्येतेषु परेषु । सीतया, सीता-
भ्याम्, सीताभिः ।
( १७५ ) ङितां यैयास्यास्यामः ॥१। ४ । २६ ।
आबन्तात्परेषां ङितां स्थाने ये, यास्, यास्, याम् इत्येते आदेशाः
स्युः। सीताय, सीतायाः २, सीतयोः २, सीतानाम्, सीतायाम्, सीतासु,
हे सीते, हे सीते, हे सीताः। एवं सुभद्रागङ्गाशालामालारमाश्रद्धामेधा-
दुर्गादयः ।
( १७६ ) नित्यदिद्विस्वराऽम्बार्थानां ह्रस्वः ॥ १।४।४० ।
नित्यं दैदासादय प्रादेशा येभ्यस्तेषां द्विस्वराऽम्बार्थानां च धिना
सह ह्रस्वः स्यात् । हे अम्ब, हे अत्रक, हे अल्ल । शेष सीतावत् । सर्वा,
सर्वे, सर्वाः। डिति ये इत्याद्यादेशेषु कृतेषु ।
(१७७ ) सर्वादेर्यस्य सुडापोऽञ्च ॥ १।४ । ३० ।
सर्वादिसम्बन्धिन आबन्तात् परस्य ङितां यकारस्य सुडागमः स्यात्
तद्योगे आपोऽकारादेशश्च । सर्वस्यै, सर्वस्याः २, सर्वासाम्, सर्वस्याम् ।
शेष सीतावत् । एवं विश्वादयोऽप्याबन्ताः । ङिति तीयस्य वेति-
द्वितीयस्य , द्वितीयाय, द्वितीयस्याः २, द्वितीयाया: २, द्वितीयस्याम,
द्वितीयायाम् । शेषं सीतावत् । जरा।
स्यादि-प्रकरणम् ३ . , . (१७८) जराया जरस्वा ॥२।१।८६ । जराशब्दस्य जरस इत्यादेशो वा स्यात् स्वरादौ स्यादौ परे । जरसौ, जरे, जरसः, जराः, जरसम्, जराम्, जरसा. जरया इत्यादि । निशा, निशे, निशाः, निशाम्, निशे, शसादौ वान्तलोपे निशः, निशाः, निशा, निशया। (१७४)शराजभ्राज्यसृज्मृध्रस्नश्चपरिवाजांषः।।२।१।११७ शान्तस्य राजादीनां च षोऽन्तादेशः स्यात् झसे पदान्ते च । षस्य झसा जबा इति डत्वे-निड्भ्याम्, निभिः, निट्सु । पक्षे सीतावत् । नासिकाया:-नस् । नसः, नासिकाः, नसा, नासिकया, नोभ्याम्, नासिकाभ्याम् । पृतनाया:-पृत् । पृतः, पृता, पृद्भ्याम्, पृत्सु । बुद्धिः, बुद्धी, बुद्धयः, बुद्धिम्, बुद्धी, बुद्धीः, बुद्धया, बुद्धिभ्याम्, बुद्धिभिः । ( १८० ) स्त्रीदुद्भ्यां ङितां दैदास्दास्दामो वा ॥१। ४ । ३३ । स्त्रीलिङ्गाभ्यामिदुद्भ्यां परेषां ङितां स्थाने दै, दास्, दास्, दाम् इत्येते आदेशा वा स्यः। दकारो ङित्यदितीति विशेषणार्थः। बुढ्यै, बुद्धये, बुद्धयाः २, बुद्धेः २, बुद्धीनाम्, बुद्धयाम्, बुद्धौ, बुद्धयोः, बुद्धिषु, हे बुद्धे, हे बुद्धी, हे बुद्धयः । एवं मतिधृतिकीतिकान्तिप्रभृतयः । द्वेरत्त्वे सत्याप् । द्वे, द्वे, द्वाभ्याम् ३, द्वयोः २ । (१८१ ) त्रिचतुरः स्त्रियां तिसूचतह स्यादौ ।।२।१। ८७॥ स्त्रियां वर्तमानयोस्त्रिचतुरो: तिसृ, चतसृ इत्यादेशौ स्तः स्यादौ परे । (१८२) भृतो रः स्वरेऽनि ॥२।१।८८ । तिसृ, चतसृ इत्येतयोः ऋतो रेफादेशः स्यात् स्यादौ स्वरे परे नका-
३८
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
रविषयादन्यत्र । तिस्रः २, तिसृभिः, तिसृभ्यः २, तिसृषु। अनीति
किम्-तिसृणाम् ।
( १८३ ) हसेपः सेर्लोपः॥१।४।२७ ।
हसान्तादीबन्ताच्च परस्य सेर्लोप: स्यात् । नदी, नद्यौ, नद्यः,
नदीम्, नदीः, नद्या, नदीभ्याम्, नदीभिः ।
(१८४) नित्यत्रीदूतः ।। १ । ३ । ३४ ।
नित्यस्त्रीलिङ्गाभ्यामीभ्यां परेषां ङितां स्थाने दे, दास्, दास्,
दाम् इत्येते आदेशाः स्युः। नर्वे, नद्याः२, नद्योः, नदीनाम्, नद्याम्, हे
नदि।
(१८५) स्त्रियाम् ॥ १।४।८६ ।
स्त्रियां वर्तमान: क्रोष्टुशब्दस्तृजवत् स्यात् । ऋकारान्तत्वात् नृतो
स्वस्रादेरिति वक्ष्यमाणसूत्रेए ईप् । कोष्ट्री, क्रोष्ट्रयौ। एवं कुमारीगौरी
बहुश्रेयस्यादयः । स्त्री।
(१८६ ) स्त्रियाः ॥२।१ । १७ ।
स्त्रीशब्दस्यवर्णस्य इयादेशः स्यात् स्वरादौ प्रत्यये परे। स्त्रियो,
स्त्रियः ।
(१८७) वाम् शसि ॥२।१ । १८ ।
स्त्रीशब्दस्येवर्णस्य इयादेशो वा स्यात् अमि शसि च परे । स्त्रियम्,
स्त्रीम्, स्त्रियः, स्त्री:, स्त्रिया, स्त्रिय, स्त्रियाः २, स्त्रियोः २। आमि
तु इय: प्रागेव नुट् । स्त्रीणाम्, स्त्रियाम्, स्त्रीषु, हे स्त्रि । इतीबन्ताः ।
लक्ष्मीशब्दस्य अनीबन्तत्वान्न सिलोपः । लक्ष्मीः । शेषं नदीवत् ।
अवीलक्ष्मीतरीतन्त्री - श्रीहीधीनामुणादितः।
स्यादि-प्रकरणम् ३ अपि स्त्रीलिङ्गवृत्तीनां, सिलोपो न कदाचन ॥ १ ॥ श्री:, थियौ, श्रियः, श्रियम्, श्रियः । (१८८) वेयुवोऽस्त्रियाः॥१।४।३५ । इयुत्स्थानिनौ यो नित्यस्त्रीलिङ्गस्य ईदूतौ तदन्तात् परेषां डितां स्थाने दै, दास्, दास्, दाम् इत्येते आदेशा वा स्युः स्त्रीशब्दं वर्जयित्वा । श्रिय, श्रिये, श्रियाः, श्रियः, श्रियाः, श्रियः । (१८६) नुडामः ॥ १।४।३६ । इयुवस्थानिनौ यो नित्यस्त्रीलिङ्गस्य ईदूतौ तदन्तात् परस्यामो नुट् वा स्यात् स्त्रीशब्दं वर्जयित्वा। श्रीणाम्, श्रियाम्, श्रियि, श्रियाम्, हे श्रीः । एवं सुश्रीह्रीधीप्रभृतयः। सुधीः, सुधियौ, सुधियः । धेनुर्बुद्धि- वत् । धेनुः, धेनू, धेनवः, हे धेनो । एवं चञ्चरज्जुप्रभृतयः । भ्रूः । (१६० ) नुब्रुवोः ॥२। १ । १६ । संयोगात्परस्य नुप्रत्ययस्य भ्रूशब्दस्य चोवर्णस्य उवादेशः स्यात् स्वरादी प्रत्यये परे। भ्रुवो, भ्रवः । शेषं श्रीवत् साध्यम् । स्वयंभूः पुंवत् । वधूजम्वादयो नदीवत् । खलपूः पुंवत् । स्वस्रादिभ्यो नेप् । स्वसा, स्वसारौ। शसि - स्वसः। शेषं कर्तृवत् । मातरौ। शसि-मातृ : । शेष पितृवत् । रैः पुंवत् । नौग्लॊवत् । इति स्वरान्ताः स्त्रीलिङ्गाः। . माता, अथ स्वरान्ता नपुंसकलिङ्गाः (१६१) अतोऽम् ।। २।१।४। अकारान्तनपुंसकसम्बन्धिनोः स्यमोरमादेशः स्यात् । रत्नम् ।
४० कालुकौमुदी-पूर्वार्धे (११२) ईरौः॥२।१।६ । नपुंसकसम्बन्धी औः ई: स्यात् । रत्ने । (१६३) जसूशसोः शिः॥२।१।७। नपुंसकसम्बन्धिनोर्जस्शसो: शिः स्यात् । (१६४) नुम् हझसातः शौ॥२।१।८। हकारान्तस्य झसान्तस्य अकारान्तस्य च नपुंसकस्य नुमागमः स्यात् शौ परे। (१६५) मिदन्त्यस्वरात्परः ॥ १।१ । ६३ । मिदागमः प्रत्ययो बा अन्त्यस्वरात्परः स्यात् । ( १६६) नोपधाया नुटि चाधौ दीर्घः ॥ १।४ । ६३ । नान्तस्योपधाया दीर्घः स्यान्नुटि धिवजिते थुटि च परे। रत्नानि, पुनरपि रत्नम्, रत्ने, रत्नानि । शंषं जिनवत् । एवं धनवनमूल फल- कमलादयः । सर्वम्, सर्वे, सर्वाणि । पुनस्तद्वत् । हे सर्व, हे सर्वे, हे सर्वाणि । शेषं पुंवत् । एवं विश्वादयोऽकारान्ताः । ( १९७) दुशन्यादेरनेकतरस्य पञ्चकस्य ॥२।१।५। नपुंसकानामन्यान्यतरेतरडतरडतमानां पञ्चकानां स्यमोर्दुशादेश: स्यात् एकतरं वर्जयित्वा । उकार उच्चारणार्थः । अन्यद्, अन्यत्, अन्ये, अन्यानि । सम्बोधने तु ध्यादेशस्य अम एव लोपत्वात् दुशो लोपो न । हे अन्यद् । अनेकतरस्येति किम्-एकतरम् । शेषं सर्ववत् । (१९८) नपुंसके ॥२।३ । ११३ । नपुंसके वर्तमानस्य नाम्नो हस्वः स्यात् । सोमपम्, सोमपे, सोम- पानि ।
स्यादि-प्रकरणम्
४१
(१६६) नपुंसकस्य स्यमो क्॥२१ । १।
नपुंसकस्य स्यमो क् स्यात् । वारि ।
(२०० ) नामिनः खरेऽनामि ॥२।१। १० ।
नाम्यन्तस्य नपुंसकस्य नुमागम: स्यात् आम्वजिते स्वरे परे ।
वारिणी, वारीणि, पुनस्तद्वत् । वारिणा, वारिणे, वारिणः २, बारिणोः
२, वारीणाम्, वारिणि, वारिषु ।
(२०१ ) नामिनो लोपः ॥२।१।३।
नाम्यन्तस्य नपुंसकस्य स्यमोर्लोपो वा स्यात्। लोपे स्थानिवद्भावात्
'हस्वस्य गुणो धिने'ति गुणः । हे वारे। पक्षे लुक्, लुकि न स्थानिवद्-
भावः। हे वारि, हे वारिन, हे वारीरिण । हसादौ तु मुनिवत् रूपाणि ।
(२०२) अच्चास्थिदधिसक्थ्यक्ष्णां टादौ ॥२।१ । ११ ।
एषां नपुंसकानां नुमागमः स्यात् इकारस्य चाकारः टादौ स्वरे
परे। दध्ना, दध्ने, दन: २, दध्नोः २, दध्नाम्, दधिन, दधनि, शेषं
बारिवत् । एवमस्थिसक्थ्यक्षिप्रभृतयः । ग्रामणि ।
(२०३) भाषितपुंस्कं* पुंवद्वा ।।२।१ । १२ ।
नाम्यन्तं भाषितपुंस्कं नपुंसकं पुंवद्वा स्यात् टादौ स्वरे परे ।
ग्रामण्या, ग्रामणिना, ग्रामण्ये, ग्रामणिने । यवक्रिया, यवक्रिरणा इत्यादि।
मधु, मधुनी, मधूनि, पुनस्तद्वत्, मधुना, मधुने, हे मघो, हे मधु, धात,
धातृणी, धात्रा, धातृणा, हे धातः, हे धातृ । एवं ज्ञातृकादयः ।
इति स्वरान्ता नपुंसकलिङ्गाः ।
* यन्निमित्तमुपादाय, पुंसि शब्द: प्रवर्तते ।
नपुंसके तदेव स्या-दुक्तपुंस्कं तदुच्यते ।।
.
४२ कालुकौमुदी-पूर्वार्धे अथ हसान्ताः पुल्लिँङ्गाः (२०४ ) अनडुहः ॥ १।४ । ७६ । अनडु शब्दस्य आमागम: स्यात् थुटि परे । (२०५) सौ नुम् ।। १।४।८०॥ अनडु शब्दस्य नुमागमः स्यात् सौ परे । (२०६ ) संयोगस्य ॥२ । १ । ११६ । संयोगान्तस्य लोप: स्यात् पदान्ते स च परे स्यादिविधौ च पूर्व- स्मिन्नसिद्धः। अनड्वान्, अनड्वाहौ, अनड्वाहः, अनड्वाहम्, अनड्वाही, अनडुहः, अनडुहा। (२०७ ) कस्स्स्रस्ध्वंस्भ्रसनडुहां दः ।। २ । १ । ६६ । एषां दोन्तादेशः स्यात् पदान्ते । अनडुद्भ्याम्, अनडुद्भिः अनडुत्सु । (२०८) उभयोर्धावम् ॥ १।४। ८१ । चतुरनडुहोरमागमः स्यात् धौ परे । हे अनड्वन् । ( २०६) होढो झसपदान्तयोः ।।२।१।११२ । हस्य ढः स्यात् झसे प्रत्यये पदान्ते च । मलिट्, मधुलिड्, मधु- लिहौ, मलिहः, मधुलिड्भ्याम्, मधुलिट्सु । (२१० ) भ्वादेर्दादेर्घः ॥२।१। ११३ । दकारादेर्धातोहस्य घ: स्यात् झसे पदान्ते च । (२११) आदिडबानां झभान्तस्यैकस्वरस्य ढभाः स्वोः प्रत्यययोश्च ॥२।१ । १०६ । एकस्वरस्य झभान्तस्य धातुरूपाऽवयवस्यादिडबानां ढभाः स्युः
स्यादि-प्रकरणम्
पदान्ते स्ध्वोश्च परयोः । गोधुक, गोधुग, गोदुही, गोदुहः, गोधुग्भ्याम् ।
कषसंयोगे क्षः। गोधुक्षु ।
(२१२) द्रुमुहष्णुष्णिहां वा ॥२।। १ । ११४ ।
एषां हस्य धो वा स्यात् झसे पदान्ते च । पक्षे ढत्त्वम् । ध्रुक, ध्रुग्,
ध्रुट्, ध्रुड्, ध्रुग्भ्याम्, ध्रुड्भ्याम्, ध्रुक्षु, ध्रुट्सु । एवं मुहष्णुणि हाम् ।
(२१३ ) सहेः साडः ॥२।२ । ३८ ।
सारूपस्य सहेः सस्य षः स्यात् । तुरापाट, तुराषाड्, तुरासाही,
तुरासाहः, तुरापाड्भ्यामित्यादि ।
(२१४) चतुर आम् ॥१।४। ७८ ।
चतुर आमागमः स्यात् थुटि परे । चत्वारः, चतुरः, चतुभिः, चतुर्यः २ ।
(२१५) संख्यायाफ्रः ॥ १।४।३८ ।
रकारषकारनकारान्तसंख्यासम्बन्धिन आमो नुट् स्यात् । चतुर्णाम् ।
(२१६ ) नरः सुपि ।। २ । १ । १०४ ।
रेफान्तस्य विसर्गो न स्यात् सुपि परे । चतुषु । राजा, राजानी,
राजानः, राजानम्, राजानौ। उपधालोपे नस्य चुत्वे जनसंयोगे च
राजः, राज्ञा, राजभ्याम्, राजभिः, राजे, राज्ञः २, राज्ञोः २, राज्ञाम्,
राज्ञि, राजनि, राजसु ।
( २१७) न धौ॥२। १ । १२२ ।
नाम्नो नस्य लोपो न स्यात् धौ परे । हे राजन् । यज्वा, यज्वानौ ।
अनोऽतोऽवमयुक्तादित्यनोऽतो लोपो न । यज्वनः, यज्वना । आत्मा,
आत्मानौ, आत्मनः, आत्मना। सुधर्मा, सुधर्माणी, सुधर्माण: इत्यादि ।
श्वा, श्वानो, श्वानः, श्वानम्, श्वानी।
।
४४
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
(२१८ ) श्वन् युवन्मघोनामीपस्याद्यथुटि व उः॥२।१।२६ ।
एषां सस्वरवकार उ: स्यात् ईपि थुड्वजिते स्यादिस्वरे च परे ।
शुन:, शुना, श्वभ्याम्, श्वभिः। एवं युवा, युवानी, यूनः, यूना, मघवा,
मधवानी, मघोनः, मघोना।
(२१६ ) पथिन्मथिनृभुक्षामितोऽत् ॥१।४।७५ ।
एषामिकारस्य अकारः स्यात् थुटि परे ।
(२२०) थो नुट ।। १।४। ७६ ।
पथ्यादीनां थस्य नुडागमः स्यात् थुटि परे ।
(२२१) आः सौ॥१।४।७७ ।
पथ्यादीनामाकारोऽन्तादेशः स्यात् सौ परे। पन्थाः, पन्थानौ,
पन्थानः, पन्थानम्,
पन्थानौ।
(२२२) पथिन्मथिनृभुक्षा टेर्लोपः ॥२।१। २७ ।
एषां टेर्लोप: स्यात् ईपि थुड्वजिते स्यादिस्वरे च परे । पथः, पथा,
पथिभ्यामित्यादि । एवं मन्थाः, ऋभुक्षा: ।
( २२३ ) इन्हन्पूषन्नर्यम्णां सौ च ॥ १।४। ६८ ।
इन्नन्तस्य हनादीनां चोपधाया दीर्घः स्यात् शौ धिवजिते सौ च परे
नान्यत्र । दण्डी, दण्डिनौ, दण्डिनः, हे दण्डिन् । एवं मुसलिन्, हलिन्,
यशस्विन् प्रभृतयः । वृत्रहा ।
(२२४) क्वेकस्वरवतः।।२।२। ८४ ।
पूर्वपदस्थानिमित्तात्परस्य कवर्गवत एकस्वरवतश्चोत्तरपदस्य
नामान्तस्य नुमागमस्य स्यादेश्च नस्य ण: स्यात् ।
वृत्रणी,
वृत्रणः।
.
स्यादि-प्रकरणम् ४५ . (२२५) हनो ह्रो नः ॥२।१।३८ । हन्तेह्न इति रूपस्य घ्नादेशः स्यात् । (२२६ ) हनो घेन ।। २।२ । १०४ । हन्धातोर्नस्य कारेणान्तरे णो न स्यात् । वृत्रघ्नः, वृत्रघ्ना, वृत्र- हभ्यामित्यादि। एवं पूषन् , अर्यमन् इत्यादि । पञ्च, पञ्च, पञ्चभिः, पञ्चभ्यः २, पञ्चानाम्, पञ्चसु । एवं सप्तन्, नवन्, दशन् प्रभृतयः । ( २२७ ) वाष्टन आः स्यादौ ॥ १।४।६। अष्टन्शब्दस्य आकारोऽन्तादेशो वा स्यात् स्यादौ परे । (२२८) औशष्टः॥१।४।५। अष्टाशब्दात्परयोर्जस्शसोः औशादेशः स्यात् । अष्टौ २, अष्टाभिः, अष्टाभ्यः २, अष्टानाम् , अष्टासु । पक्षे अष्ट २ । शेषं पञ्चवत् । (२२६ ) मो.नो वमोश्च ।।२।१ । १८ । धातोर्मस्य नः स्यात् वमयोः परयोः पदान्ते च स च परेऽसिद्धः । प्रशान् । असिद्धत्वान्नस्य लोपो न । प्रशामौ, प्रशान्भ्याम्, प्रशान्सु । (२३०) किमः कः॥२।१ । ७६ । किमः कः स्यात् स्यादौ । कः, को, के । शेषं सर्ववत् । (२३१) सावयं पुंसि ॥२।१।७३ । इदमोऽयम् स्यात् सौ परे पुंसि । अयम् । (२३२) दोमः स्यादौ ।।२।१ । ७५ । इदमो दस्य म: स्यात् स्यादौ । इमो, इमे, इमम्, इमो, इमान् । (२३३) अनष्टौ सोः ।। २ । १ । ७२ । अग्रहितस्येदमः अनादेशः स्यात् टोसोः परयोः । अनेन । अनक .
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे इति किम्-इमकेन । (२३४) अनकः ॥२।१।७१। अग्रहितस्येदमः प्रशादेशः स्यात् हसादौ स्यादौ । आभ्याम् । अनक इति किम्-इमकाभ्याम् । (२३५) इदमदसोऽक्येव ॥१।४।१०। एतयोरक्येव सति भिस ऐस् स्यात् नान्यथा । एभिः। अकि तु इमकः । अस्मै, अस्मात्, अस्य, अनयोः, एषाम्, अस्मिन्, एषु । (२३६) इदमः ॥२।१।६६ । इदम: एनदादेशः स्यात् अन्वादेशे द्वितीयायां टायामोसि च परे । कथितानुकथनमन्वादेशः । एनम्, एनौ, एनान्, एनेन, एनयोः २ । यथा अनेनावश्यकमधीतमेनं व्याकरणमध्यापय । तत्त्वभुत्, तत्त्वभुद्, तत्त्व- बुधौ, तत्त्वभुझ्याम्, तत्त्वभुत्सु । सम्राट्, सम्राजौ, सम्राजः, सम्राड्- भ्याम्, सम्राट्सु। (२३७) वसुराटोः ॥ ३।२। ८३ । विश्वस्य दीर्घः स्यात् वसुराटोः परयोः। विश्वाराट्, विश्वाराड्, विश्वराजौ, विश्वाराड्भ्याम्, विश्वाराट्सु । (२३८) स्कोः संयोगाद्योर्लोपः॥२। १ । ११८ । संयोगाद्योः *सकारककारयोर्लोप: स्यात् झसे पदान्ते च । वृक्षवृट्, वृक्षवृड्, वृक्षवृश्चौ, वृक्षवृड्भ्याम् इत्यादि । ( २३६) तः सौ सः ॥२ । १ । ७८ । * नकारजावनुस्वार-अमौ धातो झसे परे। सकारजः शकारश्चे-ट्टिवर्गस्तवर्गजः ।।१।।
स्यादि-प्रकरणम् ४७ द्विपर्यन्तानां त्यदादीनां तस्य सः स्यात् सौ परे। स्यः, त्यौ, त्ये, सः, तो, ते, यः, यौ, ये, एषः, एतौ, एते । (२४०) एनत्त्यदादेरेतदो द्वितीयाटौस्वसमासान्ते ॥२।१।६८ । त्यदादेरेतदो द्वितीयायां टायामोसि च परे एनदादेशः स्यात् अन्वा- देशे न तु समासान्ते । एनम्, एनौ, एनान्, एनेन, एनयोः, एनयोः । असमासान्ते इति किम्-अथो परमैतं पश्य ।। सुशीलौ एतौ, एनौ गुरुवो मानयन्ति । अग्निमत्, अग्निमद्, अग्निमथौ, अग्निमद्भ्याम्, अग्निमत्सु । प्रत्यञ्चतीति क्विपि कृते । ( २४१) अनिदितोहसस्योपधाया नोलोपः क्ङिति॥४।२।३६ । हसान्तस्य अनिदितो धातोरु पधाया नस्य लोपः स्यात् विङति परे। (२४२) अचः॥ १।४।५६ । लुप्तनकारस्याऽञ्चतेर्नुमागमः स्यात् थुटि परे । (२४३ ) अञ्चुयुजिक्र ञ्चां नो ङः॥२।१ । १०२ । एषां नस्य ङः स्यात् पदान्ते। प्रत्यङ्, प्रत्यञ्चौ, प्रत्यञ्चः, प्रत्य- ञ्चम्, प्रत्यञ्चौ। (२४४ ) अचेः पूर्वदीर्घश्चाऽनिक्यथुटि यस्वरे ॥२ । १३२ । लुप्तनकारस्याऽञ्चतेरकारस्य लोपः स्यात् पूर्वस्य च दीर्घः शिक्थ- थुडजिते यकारे स्वरे च परे । प्रतीचः, प्रतीचा। (२४५) चजोः कगौ ।।२।१ । ११६ । चजोः कगौ स्तः झसे पदान्ते च । प्रत्यग्भ्याम्, प्रत्यक्षु । तिर्यङ्, तिर्यञ्चो।
४८
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
(२४६) तिर्यचस्तिरश्चः ॥२।१। ३४ ।
तिर्यचस्तिरश्चादेशः स्यात् निवयथुड्वजिते यकारे स्वरे च परे ।
अकार उच्चारणार्थः । तिरश्चः, तिरश्चा, तिर्यग्भ्याम् ।
(२४७) अदद्रयचो वा ॥२।१। ८५ ।
*अदद्रयच्शब्दस्य दस्य मो वा स्यात् ।
(२४८) मादुवर्णोऽनु ॥२।१ । ८१ ।
अदसो मात्परस्य वर्णमात्रस्य उवर्ण आसन्नः स्यात् अनु कार्यान्तरस्य
पश्चात् । हस्वस्य ह्रस्वः, दीर्घस्य दीर्घः इत्यर्थः । अमुमयङ्,
अमुमुयञ्चौ, अमु मुईचा, अमुमुयग्भ्याम् । पक्षे-अदद्रयङ्, अदद्रयञ्चो,
अदद्रयग्भ्याम् इत्यादि । जलमुक्, जलमुचौ, जलमुग्भ्याम् । मरुत्,
मरुद्भ्याम् । काष्ठचित्, काष्ठचित्सु । ऋदित् महच्छब्दः ।
(२४६) उहदितो नुम् ॥ १।४।५८ ।
उकारानुबन्धस्य ऋकारानुबन्धस्य च नमागमः स्यात् थुटि परे ।
(२५०)न्स्महतः॥ १।४।६४।
न्सन्तस्य महत्शब्दस्य चोपधाया दीर्घः स्यात् धिवजिते थुटि परे ।
महान, महान्तौ, महान्तः, महन् । उदित् भवच्छब्दस्य ।
.
हे
.
* अमुमञ्चतीतिविग्रहे' अदस्-अञ्च्' इत्यवस्थायां 'सर्वादिविष्वग्दे-
वानां टेरद्रयञ्चतो क्वावि'त्यादिना अदसष्टेरद्रयादेशे-अदद्रयच् ।
" परतः केचिदिच्छन्ति, केचिदिच्छन्ति पूर्वतः ।
उभयोः केचिदिच्छन्ति, केचिदिच्छन्ति नोभयोः ।।
अदमुयङ्, अदभुयञ्चौ, अदमुयग्भ्याम् । अमुद्रयङ्, अमुद्र घञ्चो,
अमुद्र यग्भ्याम् इत्यादीन्यपि मतान्तरे ।
स्यादि-प्रकरणम् ( २५१ ) अत्वसोरभ्वादेः सौ॥ १।४।६७। भ्वादिवजितस्य अत्वन्तस्य असन्तस्य चोपधाया दीर्घः स्यात् अधी सौ परे। भवान्, भवन्तो, हे भवन् । शत्रन्तस्य तु अत्वन्तत्वाभावान्न दीर्घः । भवन्, भवन्तौ, भवन्तः । धीमान्, धीमन्तो, हे धीमन् । (२५२) दिदृशुस्पृश्मश्धुषुष्णिस्रऋत्विजां गः॥२।१।१००। एषां गोऽन्तादेशः स्यात् पदान्ते । तादृग्, तादृशौ, तादृशः, तादृ- ग्भ्याम् , तादृक्षु । एवं यादृगादयः । विद्, विड्, विशी, विड्भ्याम्, विट्सु । रत्नमुटु, रत्नमुड्, रत्नमुषो, रत्नमृड्भ्याम् । षट्, षड्, षड्भिः, षड्भ्यः २, षण्णाम्, षट्सु । (२५३) इसुस् सजुषाम् ।। २ । १ । १०७ । एषां रेफान्तादेशः स्यात् पदान्ते। रेफविधानं दीर्घार्थम् । (२५४) पदान्ते ॥२।१।६५। धातोरिकारोकारयोः दीर्घः स्यात् पदान्ते वर्तमानयोः रेफवकारयोः परयोः । सजूः, सजुषौ, सजूाम् । (२५५) नुम् विसर्गशसान्तरेऽपि ॥२।२ । १५ । नुमादिना व्यवधानेऽपि क्विलात्परस्य कृतस्य सस्य षः स्यात् । सजूःषु । णषमसिद्धमिति षत्वस्यासिद्धत्वात् इसुस् लक्षणो रः । पिपठी:, पिपठिषौ, पिपठीाम्, पिपठीःषु । दोष्शब्दस्य षत्वस्यासिद्धत्वात्, स्रोविसर्गः। दोः, दोषौ, दोषः। शसादौ दोषन वा। दोषः, दोष्णः, दोषा, दोष्णा, दोभ्याम्, दोषभ्याम्, दोःषु, दोष्षु, दोषसु । (२५६ ) पुंसोः पुमन्सः ॥ १।४ । ५७ । पुंस्शब्दस्य पुमन्स इत्यादेशः स्यात् थुटि परे। अकार उच्चार- -
५०
कालुकौमुदी-पूर्वार्षे
,
.
"
.
णार्थः । पुमान्, पुमांसौ, पुमांसः, हे पुमन्, पुमांसी, पुंसः, पुंसा, पुंभ्याम्,
पुसे, पुंसः, पुंसि, पुंसु । क्वसोरुदित्वानुम् । विद्वान्, विद्वांसौ, विद्वांसः,
हे विद्वन्, विद्वांसम्, विद्वांसो ।
(२५७) कस उष् मतौ च ॥२।१।३७ ।
क्वस उष् स्यात् मतौ जिक्यथुड्वजिते यकारे स्वरे च परे ।
विदुषः, विदुषा, विद्वद्भ्याम्, विदुषे,विदुषः, विदुषोः, विदुषाम्, विदुषि,
विद्वत्सु । चन्द्रमाः, चन्द्रमसौ, चन्द्रमोभ्याम्, चन्द्रमसः, चन्द्रमसि,
चन्द्रमःसु, हे चन्द्रमः ।
( २५८) अदसो दा सेस्तु डौः॥२।१ । ७६ ।
अदसो दस्य. सौ परे सः स्यात् सेस्तु डौः । असौ । आईरित्यत्वे कृते ।
( २५६ ) दोमोऽवर्णस्य ॥२।१ । ८४ ।
अवर्णान्तस्य अदसो दस्य म: स्यात् । अमू ।
(२६० ) एरीबहुत्वे ॥२।१।८३ ।
अदसो मात्पर एकारः इ: स्यात् बहुत्वे । अमी, अमुम्, अमू,
अमून् । इनादेशे प्राप्ते ।
(२६१) प्रागिनात् ॥२।१। ८२ ।
अदसो मात्परस्य वर्णमात्रस्य इनादेशात् प्रागेव उ: स्यात् । अमुना,
अमूभ्याम्, अमीभिः, अमुष्म, अमूभ्याम्. अमीभ्यः, अमुष्मात्, अमुष्य,
अमुयोः २, अमीषाम्, अमुष्मिन्, अमीषु ।
.
.
इति हसान्ताः पुल्लिँङ्गाः।
स्यादि-प्रकरणम् अथ हसान्ताः स्त्रीलिङ्गाः (२६२ ) नहो धः॥२।१।११५ । नहो हस्य ध: स्यात् झसे प्रत्यये पदान्ते च । उपानद, उपानही, उपानद्याम्, उपानत्सु । दिशदृशित्यादिना गत्वे-उष्णिग, उष्णि- ग्भ्याम् । गीः गिरौ, गिरः, गीpम्, गीर्षु । एवं पुर्धरादयः । चतस्रः, चतसृणाम् । का, के, काः । सर्वावत् । (२६३) इयं स्त्रियाम् ।।२।१।७४ । इदम इयमित्यादेशः स्यात् स्त्रियां सौ परे । इयम्, इमे, इमाः, इमाम्, इमे, इमाः, अनया, आभ्याम्, प्राभिः, अस्यै, अस्याः २, अनयोः २, प्रासाम्, अस्याम्, प्रासु। अन्वादेशे-एनाम्, एने, एनाः, एनया, एनयोः २। समिद्, समित्, समिधौ, समिद्भ्याम्, समित्सु । ककुब्, ककुप्, ककुभौ, ककुब्भ्याम्, ककुप्सु । सक, सजौ, स्रग्भ्याम्, स्रक्षु । स्या, त्ये, त्याः। एवं तद्, यद्, एतद् । वाक्, वाचौ, वाग्भ्याम्, वाक्षु । त्वक्, त्वचौ । ऋक्, ऋचौ। अपशब्दो नित्यं बहुवचनान्तः । (२६४) अपः ॥ १।४। ६५ । अपशब्दस्योपधाया दीर्घः स्यात् धिजिते थुटि परे । आपः, अपः (२६५) भिदपाम् ॥२।१।१०। अपशब्दस्य भकारे परे दकारादेशः स्यात् । अद्भिः, अद्भ्यः २, अपाम्, अप्सु । दिक्, दिशौ, दिशः, दिग्भ्याम्, दिक्ष । प्राशीः, आशिषौ, आशीाम् । असो, अम, अमू:, अमम्, अमू, अमः, अमुया, अमूभ्याम् अमूभिः, अमुष्य, अमुष्याः २, अम यौः २, अमूषाम्, अमुष्याम्, अमूषु । इति हसान्ताः स्त्रीलिङ्गाः
५२
कालुकोमुदी-पूर्वार्धे
अथ हसान्ता नपुंसकलिङ्गाः
.
-
.
.
वाः, वारी, वारि, वार्ष्याम्, वार्षु। चत्वारि २, अहः, अह्नी,
अहनी, अहानि, पुनस्तद्वत्, अह्ना, अहोभ्याम्. अह्न, अह्नः २, अह्रोः
२, अह्नाम्, अह्नि, अहनि, अहःसु, हे अहः। नाम, नाम्नी, मामनी,
नामानि ।
(२६६) नपुंसके वा ॥२।१ । १२३ ।
नपुंसके वर्तमानस्य नाम्नो नस्य लोपो वा स्यात् धौ परे । हे नाम,
हे नामन् ।
ब्रह्म, ब्रह्मणी, ब्रह्माणि । एवं वर्मन्, चर्मन्, कर्मन्,
धन्वनादयः। दण्डि, दण्डिनी, दण्डी नि, हे दण्डि, हे दण्डिन् । स्रग्वि,
स्रग्विणी, स्रग्बीणि। किम्, के, कानि । इदम्, इमे, इमानि ।
अन्वादेशे-एनत्, एने, एनानि । त्यद्, त्ये, त्यानि, तत्, ते, तानि ।
यत् ये, यानि । एतद्, एते, एतानि । जगत्, जगती, जगन्ति । महत्,
महती, महान्ति । तुदत् ।
(२६७) अवर्णादनः शतुर्वेपोः॥ १।४। ६१ ।
नावजितादवरात्परस्य शतुर्नुम् वा स्यात् ईकारे ईपि च परे ।
तुदन्ती, तुदती, तुदन्ति । पचत् ।
(२६८) अब्यनः ॥ १।४। ६२ ।
अब् यन् इत्येताभ्यां परस्य शतुर्नुम् नित्यं स्यात् ईकारे ईपि च
परे। पचन्ती, पचन्ति ।
(२६६ ) भ्वादेरिदुतोदीं?र्वोहसे ॥२।१।६४ ।
धातोरिकारोकारयोः दीर्घः स्यात् रेफवकारयोर्हसपरयोः । दीव्यत्,
.
स्यादि-प्रकरणम्
५३
दीव्यन्ती, दीयन्ति । धनुः धनुषी, धनूंषि, धनुषा, धनुभ्याम् ।
एवं चक्षुर्ह विरादयः । पयः, पयसी, पयांसि। यशः, यशसी, यशांसि ।
वचः, वचसी, वचांसि ।
अदः, अमू, अमूनि । नामिनः स्वरे नामीति
नम्-अमुना।
इति स्यादिप्रकरणे हसान्ता नपुंसकलिङ्गाः
इति स्यादिप्रकरणम्
.
अथालिङ्गौ युष्मदस्मच्छब्दौ
(२७० ) त्वमहं सिनाऽकः प्राक् च ॥२।१।४५।
युष्मदस्मदोः सिना सह क्रमेण त्वम्, अहम् इत्यादेशौ स्तः तो
चाकः प्रागेव । त्वम्, अहम् । अकः प्रागिति किम्-त्वकम्, अहकम् ।
(२७१ ) मान्तयोर्युवावौ द्वित्त्वे ॥२।१।४३ ।
द्वयर्थवाचिनो युष्मदस्मदोर्मकारपर्यन्तयोर्युव, आव इत्यादेशो स्त:
स्यादी। अदेतोरपदान्तेऽतः इत्यकारलोपः ।
(२७२ ) युष्मदस्मदोोपः स्यादौ ॥२।१।४१ ।
अनयोरन्तस्य लोप: स्यात् स्यादो।
( २७३ ) आमौः ॥२।१ । ४६ ।
युष्मदस्मद्भ्यां पर प्रौः आम् स्यात् । युवाम्, आवाम् । मान्तयो-
रिति किम्-युवकाम्, आवकाम् । अत्र साको माभूत् ।
(२७४) यूयं वयं जसा ॥२।१।४६ ।
युष्मदस्मदोर्जसा सह यूयम्, वयम् इत्यादेशौ स्तः तो चाकः प्रागेव ।
यूयम्, वयम् । अक: प्रागिति किम्-यूयकम्, वयकम् ।
युप्मदस्मत्प्रकरणम् ५५ (२७५) त्वमौ प्रत्ययोत्तरपदे चैकत्वे ॥२।१।४४ । मकारपर्यन्तयोर्युष्मदस्मदोस्त्व,म इत्यादेशौ स्तः एकत्वे गम्ये स्यादौ प्रत्यये उत्तरपदे च । अन्त्यस्य दस्य लोपे प्राप्ते । (२७६ ) आ अम्हसयोः॥२।१।५४ । युष्मदस्मदोराकारादेशः स्यात् अमि हसादी च स्यादौ परे। त्वाम्, माम्, युवाम्, आवाम् । (२७७ ) शसो नश् ।। २।१।५० । युष्मदस्मद्भ्यां परस्य शसो नशादेशः स्यात् । अकार उच्चार- णार्थः। युष्मान्, अस्मान् । (२७८ ) टाङयोसि यः॥२।१।५५ । युष्मदस्मदोर्यकारादेशः स्यात् टा, डि, प्रोस् इत्येतेषु परेषु । त्वया, मया, युवाभ्याम्, आवाभ्याम्, युष्माभिः, अस्माभिः । (२७६ ) तुभ्यं मह्यं ड्या ॥२।१।४७ । युष्मदस्मदोर्डया सह तुभ्यम्, मह्यम् इत्यादेशौ स्तः प्राक् चाकः । तुभ्यम, मह्यम् । अक: प्रागिति किम्-तुभ्यकम, माकम् । युवाभ्याम, आवाभ्याम् । (२८०) भ्यसोऽभ्यम् ॥२।१।५२ । युष्मदस्मद्भ्यां परस्य भ्यसः अभ्यम् स्यात् । युष्मभ्यम, अस्मभ्यम् । (२८१) ङसिभ्यसोरद् ॥२। १ । ५१ । युष्मदस्मद्भ्यां परस्य ङसेस्तत्सहचरितपञ्चम्या भ्यसश्च स्थाने अदादेशः स्यात् । त्वद्, मद्, युवाभ्याम, आवाभ्याम, युष्मद्, अस्मद् ।
.
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
(२८२) तव मम डसा॥२।४।४८ ।
युष्मदस्मदोङसा सह तव, मम इत्यादेशौ स्तः प्राक् चाकः । तव,
मम । अकः प्रागिति किम --तवक, ममक, युवयोः आवयोः ।
(२८३) आम आकम् ।।२।१ । ५३ ।
युष्मदस्मद्भ्यां परस्य आमः आकम् स्यात् । युष्माकम, अस्मा-
कम , त्वयि, मयि, युवयोः, आवयोः, युष्मासु, अस्मासु ।
(२८४) सविशेषणमेकाख्यातं वाक्यम् ॥ १।१।३०।
विशेषणेन सहितमेकमेवाख्यातं वाक्यसंज्ञं स्यात् ।
( २८५ ) पदादेकवाक्ये द्वितीयाचतुर्थीषष्ठीभिर्वस्नसौ बहुत्वे वा
॥२।१ । ५६ ।
एकवाक्ये पदात्परयोर्युष्मदस्मदोद्वितीयाचतुर्थीषष्ठीसहितयोर्वस्-
नसादेशौ वा स्तः बहुत्वे । धर्मो वः युष्मान् वा रक्षतु, धर्मो नः अस्मान्
वा रक्षतु, ज्ञानं वः युष्मभ्यं वा दीयते, ज्ञानं नः अस्मभ्यं वा दीयते,
शीलं वः युष्माकं वा स्वम्, शीलं नः अस्माकं वा स्वम् पदादिति किम्
-युष्मान् अस्मान् वा धर्मो रक्षतु । एकवाक्ये इति किम्-प्रोदनं
पचत-युष्माकं भविष्यति ।
(२८६ ) वाम् नौ द्वित्त्वे ॥२।१ । ५७ ।
स्पष्टम् । धर्मों वां युवां वा रक्षतु, धर्मो नौ आवां वा रक्षतु,
ज्ञानं वां युवाभ्यां वा दीयते, ज्ञानं नौ प्रावाभ्यां वा दीयते, शीलं वां
युक्योः वा स्वम्, शीलं नौ आवयोः वा स्वम् ।
(२८७ ) ते मे डेडसा ॥२।१।५८ ।
पदादेकवाक्ये डेङसासहितयोर्युष्मदस्मदोस्ते, मे इत्यादेशो वा
युप्मदस्मत्प्रकरणम् ५७ स्तः । ज्ञानं ते तुभ्यं वा दीयते, ज्ञानं मे मह्यं वा दीयते, शीलं ते तव वा स्वम्, शीलं मे मम वा स्वम् । (२८८) त्वामामा ।।२।१।५६ । पदादेकवाक्ये अमासहितयोर्युष्मदस्मदोस्त्वा, मा इत्यादेशो वा स्तः। धर्मस्त्वा त्वां वा रक्षतु, धर्मो मा मां वा रक्षतु । (२८६ ) नित्यमन्वादेशे॥२।१।६६ । पदात्परयोर्युष्मदस्मदोर्वस्नसादयोऽन्वादेशे नित्यं स्युः । यूयं सुशीला। अथो वो गुरवो मानयन्ति । वयं विनीता अत उपाध्याया नो मानयन्ति। (२६०)न पादाद्योः॥२॥१। ६३ । पदात्परयोः पादस्यादिभूतयोर्युष्मदस्मदोर्वस्नसादयो न स्युः । बीरो विश्वेश्वरो देवो, युष्माकं भवतारकः । स एव नाथो भगवान्, अस्माकं पापनाशनः ॥ १॥ पादाद्योरिति किम्- पातु बो देशनाकाले, जैनेन्द्रं वचनामृतम् । ( २६१ ) चवाहाऽहैवयोगे ।।२।१।६४ । चादिभिर्योगे युष्मदस्मदोर्यदुक्तं तन्न स्यात्- आवयोर्युवयोश्चेशो, वेशो हेशस्तथैव च । अहेश आवयोरेव, वीरो मामेव रक्षतु ॥१॥ - इति युष्मदस्मत्-प्रकरणम् अथ अव्यय-प्रकरणम् ( २९२) निपातस्वरादयोऽव्ययम् ॥ १।१।४८ । निपाताश्चादयः स्वरा दयश्च शब्दा अव्ययसंज्ञकाः स्युः। स्वर्, अन्तर्, अत्, प्रातर्, पुनर, सत्यम्, नक्तम्, अस्तम्, दिवा, दोषा, ह्यस्, श्वस्, शम्, भृशम्, सपदि, आशु, शीघ्रम्, झटिति, तूर्णम्, स्वस्ति, समया, अन्तरा, बहिस्, अधस्, अद्धा, ऋतम्, सत्यम्, मुधा, मृषा, वृथा, मिथ्या, मिथो, मिथस्, अनिशम्, महुस्, अभीक्ष्णम्, उच्चस्, नीचस्, शनस् , अवश्यम्, पृथक्, धिक, मनाक्, ईषत्, तूष्णीम्, प्रकामम्, अरम्, वरम्, परम्, आरात्, तिरस्, नमस्, भूयस्, प्रायस्, स्वयम्, अतीव, सुष्ठु, दुष्ठु, ऋते, साक्षात्, विना, नाना, सहसा, युगपत्, प्राविस्, प्रादुस्, अकस्मात्, अस्ति, नास्ति, अस्तु इत्यादि । (२६३) क्त्वाकृन्मान्तम् ॥ १।१।४६ । क्त्वाप्रत्ययः मान्ताश्च कृत्प्रत्यया अव्ययसंज्ञकाः स्युः। कृत्वा, प्रकृत्य, कर्तुम्, हर्तुम्, स्मारस्मारम् । तसादिप्रत्ययान्ताश्च अव्यय- संज्ञकाः स्युः। ततः, तत्र, इह, कुह, क्व, कदा, एतर्हि, अधुना, इदानीम्, कथम्, पञ्चधा, एकधा, पञ्चकृत्वः, द्विः, सकृत्, शुक्लीकरोति, अग्निसात्करोति, बहुशो ददाति, मुनि वत्, उच्चस्तराम् इत्यादि । यथा, अव्यय-प्रकरणम् १ (२६४) अव्ययस्य ।।३।२।७। अव्ययसम्बन्धिविभक्तेलृक् स्यात् । उक्तं च- सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु, सर्वासु च विभक्तिषु । वचनेषु च सर्वेषु, यन्न व्येति तदव्ययम् ।। १ ।। इत्यव्ययप्रकरणम्
अथ स्त्री-प्रत्यय-प्रकरण
ज्येष्ठा,
(२६५) आवतः खियाम् ॥२।३।१।
स्त्रियां वर्तमानादकारान्तान्नाम्नः आप् प्रत्यय: स्यात् । सीता,
सर्वा, माला, शाला, गंगा।
(२६६) अजादेः ॥२।३।२।
अजादिभ्यः स्त्रियामाप् स्यात् । वाधकवाधनार्थम् । अजा, एडका,
अश्वा, कोकिला, चटका, मूषिका, बाला, वत्सा, मन्दा,
कनिष्ठा, मध्यमा।
(२६७) अत इदनित्काप्ययत्तङ्क्षिपकादीनाम् ॥ २।३ । ६५ ।
यदादिवर्जितस्य नाम्नोऽकारस्य इकार: स्यात् अनित् कापि परे ।
कारिका, पाचिका, पाठिका, सविका, मुण्डिका। अत इति किम -
गोका, नौका। कापीति किम - -कारकः । निद्वर्जनं किम् -
जीवका । यदादिवर्जनं किम्-यका, सका, क्षिपका, कन्यका,
चटका इत्यादि।
(२६८) ह्रस्वश्वाभाषितपुंस्कात् ॥ २।३ । १०४ ।
अभाषितपुंस्कशब्दात्परस्यापः इकारो इस्वश्च वा स्यात् अनित्
स्त्री-प्रत्यय-प्रकरणम् ६१ - कापि परे । गङ्गिका, गङ्गका, गङ्गाका, खट्विका, खट्वका, खट्वाका अभाषितपुंस्कादिति किम -सर्विका । (२88) नृतोऽस्वस्रादेः॥२।३।७। नकारान्तात् ऋकारान्ताच्च स्वस्रादिवर्जितात् स्त्रियामीप् स्यात् । दण्डिनी, शुनी, की, ही। अस्वस्रादेरिति किम-स्वसा । स्वस्त्रादयो यथा- स्वसा तिस्रश्चतस्रश्च, ननान्दा दुहिता तथा । याता मातेति सप्तव, स्वस्रादय उदाहृता ॥१॥ (३००) उदृदितोऽधातोः॥२।३।८। धातुवजितादुकारानुबंधात् ऋकारानुबंधाच्च स्त्रियामीप् स्यात् । भवती, गोमती, विदुषी। पचन्ती, पठन्ती। (३०१ ) मनो डाब् वा ॥२।३।४। मन्नन्तात् स्त्रियां डाप् वा स्यात् । सीमा, सीमे, सीमाः । (३०२) अनो बहुव्रीहेः ॥२।३।५। अन्नन्तात् बहुव्रीहेः स्त्रियां डाप् वा स्यात् । सुप:, सुपर्वे, सुपर्वाः। पक्षे नान्तत्वादीपि प्राप्ते । (३०३) ताभ्यां नेप् ॥२।३।६। मन्नन्तादनन्ताच्च बहुव्रीहेः स्त्रियामीप् न स्यात् । सीमा, सीमानी, सीमानः। सुपर्वा, सुपर्वाणो, सुपर्वाणः । (३०४) उपधालोपिनो वा ॥२।३। १४ । उपधालोपिनः अनन्ताद् . बहुव्रीहेः स्त्रियामीप् वा स्यात् । पक्ष डाड्विकल्पोऽपि । बहुराज्ञी, बडुराज्यौ, बहुराज्ञयः । बहुराजा,
कालुकौमुदी-पूर्वार्ध
-
बहुपजे, बहुराजाः । बहुराजा, बहुराजानौ, बहुराजानः ।
(३०५) अञ्चः॥२।३।६।
अञ्चूत्तरपदात् स्त्रियामीप् स्यात् । प्राची, प्रतीची।
(३०६) मुख्यात् षिट्टिदणन स्नधयेकणीकणकरपः॥२।३।२०।
षानुबन्धाट्टानुबन्धात् अणादिप्रत्ययान्ताच्च मुख्यात् स्त्रियामीप्
स्यात् ।
(३०७) ईप्यतः॥८।४। ७२ ।
अतो लोप: स्यात् ईपि परे। वराकी, कुरुचरी, औपगवी, वैदी।
मुख्यादिति किम्-बहुवराका नगरी ।
(३०८ ) गौरादिभ्यः॥२।३ । २७ ।
गौरादिभ्यः स्त्रियामीप् स्यात् । गौरी, नदी, शबली, गवयी,
हयी, अनडुही, अनड्वाही ।
(३०६) मत्स्यस्य यः॥८।४। ७३ ।
मत्स्यस्य यस्य लोपः स्यादीपि । गौरादित्वादाप् । मत्सी ।
(३१० ) हसात्तद्धितस्य ॥ ८१४।७४ ।
हसात्परस्य तद्धितयस्य लोपः स्यादीपि । मनुषी ।
(३११) वयस्यचरमेतः॥२।३ । २५ ।
अचरमे वयसि वर्तमानादकारान्तात् स्त्रियामीप् स्यात् । कुमारी,
किशोरी, तरुणी । अचरमे इति किम्-वृद्धा, स्थविरा ।
(३१२) शोणाः॥२॥३॥ ३४ ।
शोणादिभ्य ईप वा स्यात् स्त्रियाम् । शोणी, शोणा, चण्डी,
J
~
चण्डा।
स्त्री-प्रत्यय-प्रकरणम् ६३ . (३१३) जातेरयोपधनित्यत्रीशूद्रात् ॥ २।३ । ३६ । *जातिवाचिनोऽकारान्तात् स्त्रियामीप् स्यात् न चेत्तद्योपनित्य- स्त्रीजातिवाची शूद्रशब्दो वा स्यात् । मृगी, हंसी, ब्राह्मणी, नाडायमी, कठी । योपधादिवर्जनं किम्-क्षत्रिया, वैश्या, मक्षिका, थूका, शूद्रा। अत इति किम्-आखुः । (३१४ ) द्विगोः समाहारात्॥२।३। ४१ । समाहारद्विगोरदन्तात् स्त्रियामीप् स्यात् । पञ्चामामजानां समाहारः पञ्चाजी । त्रिलोकी। (३१५) भर्तृ योगादपालकान्तात् ॥२ । ३ । ५१ । भर्तृयोगादकारान्तात् स्त्रियामीप् स्यात् न तु पालकान्तात् । गणकी, गोपी । पालकान्तात्त गोपालिका। (३१६) इन्द्रवरुणभवशवरुद्रमृडानामानुक् च ।। २।३। ५५ । एभ्यः स्त्रियामीप् स्यात् भर्तृ योगे प्रानुगागमश्चैषाम् । इन्द्राणी, वरुणानी, भवानी, शर्वाणी, रुद्राणी, मृडानी । (३१७ ) मातुलाचार्योपाध्यायाद् वा ॥२।३ । ५६ । एभ्यः स्त्रियामीप् स्यात् भर्तृ योगे आनुगागमश्च वा । मातुलानी, मातुली। (३१८) क्षुभ्नादीनाम् ।। २।२।१०६ । क्षुभ्नादीनां नस्य णो न स्यात् । इति णत्वनिषेधे-प्राचार्यानी, आचार्टी, उपाध्यायानी, उपाध्यायी। * आकृतिग्रहणा जाति-लिङ्गानां च न सर्वभाक् । सकृदाख्यातनिर्याह्या, गोत्रं च चरणैः सह ॥ १॥ - :
।
कालकौमुदी-पूर्वार्धे
(३१६ ) आर्यक्षत्रियाद् वा ॥२।३। ६० ।
आभ्यां स्त्रियामीप् वा स्यात् तद्योगे आनुगागमश्च । आर्याणी,
आर्या, क्षत्रियाणी, क्षत्रिया ।
(३२०) साह्मविद्यमानपूर्वपदात् साझाकोटादिभ्यः
॥२।३।४५॥
सहना विद्यमानवजितपूर्वपदं यत् स्वाङ्ग* तदन्तात् क्रोडादि-
वर्जितादकारान्तात् स्त्रियामीप् वा स्यात् । पीनस्तनी, पीनस्तना,
अतिकेशी, अतिकेशा। असहननित्यादि किम्-सहकेशा, अकेशा,
विद्यमानकेशा। अक्रोडादिभ्य इति किम् -कल्याणक्रोडा, सुभगा,
भव्यभाला, दीर्घबाला,।
(३२१ ) नासिकोदरौष्ठजधादन्तकर्णशृङ्गाङ्गगात्रकण्ठात्
॥२।३।४६ ।
असहादिपूर्वपदेभ्य एभ्यः स्वाङ्गेभ्यः स्त्रियामीप् वा स्यात् ।
सुनासिकी, सुनासिका, कृशोदरी, कृशोदरा, बिम्बोष्ठी, बिम्बोष्ठेत्यादि।
सहादिपूर्वात्तु सहनासिकेत्यादि । पूर्वेणैव सिद्ध नियमाथं तेन सुललाटा
इत्यादी बहुस्वरान। कल्याणगुल्फा इत्यादौ संयोगोपधान्न ।
(३२२) पुच्छात् ॥२।३।१८।
असहादिपूर्वात् पुच्छशब्दात् स्त्रियामीप् वा स्यात् । दीर्घपुच्छी,
दीर्घपुच्छा, सुपुच्छी, सुपुच्छा। सहादिपूर्वात्तु-सपुच्छा, अपुच्छा
इत्यादि ।
* अद्रवं मूर्तिमत्स्वाङ्ग, प्राणिस्थमविकारजम् ।
च्युतं च प्राणिनस्तत्त-निभं च प्रतिमादिषु ।। १ ।।
-
स्त्री-प्रत्यय-प्रकरणम्
६५
.
.
(३२३) कबरमणिविषशरादेः ॥२।३।४६ ।
कबरादिपूर्वात् पुच्छात् स्त्रियामीप् स्यात् । कबरपुच्छी, मणिपुच्छी,
विषपुच्छी, शरपुच्छी।
(३२४ ) इतोऽक्त्यर्थाद्वा ।। २।३ । ७५ ।
क्त्यर्थप्रत्ययान्तजितादिकारान्तान्नाम्नः स्त्रियामीप् वा स्यात् ।
रांत्री, रात्रिः, धूली, धूलिः, भूमी, भूमिः । अक्त्यर्थादिति किम्-कृतिः,
अजननिः।
(३२५) नारी सखी ।।२।३।७४।
इत्येतो ईबन्तौ निपात्येते। नारी, सखी ।
(३२६) सपल्यादौ ।। २ । ३ । ७६ ।
सपत्न्यादिषु पतिशब्दात् स्त्रियामीप् स्यात् नोऽन्तादेशश्च । समान:
पतिर्यस्याः सपत्नी, एकपत्नी, वीरपत्नी।
(३२७ ) उतो गुणादखरुसंयोगोपधात् ।। २ । ३। ७८ ।
खरुशब्दवजितात् संयोगोपधजिताच्च उकारान्तात् गुणवाचिन:*
स्त्रियामीप् वा स्यात् । पट्वी, पटुः, साध्वी, साधुः, लघ्वी, लघुः,
मृद्वी, मृदुः, । गुणादिति किम्-आखुःस्त्री। अखरुसंयोगोपधादिति
किम्-खरुरियं ब्राह्मणी, पाण्डुरियं भूमिः ।
(३२८) यूनस्तिः॥२ । ३। ८६ ।
युवनशब्दात् स्त्रियां ति:प्रत्ययः स्यात् । युवतिः ।
इति स्त्री-प्रत्यय-प्रकरणम्
* सत्त्वे निविशतेऽपति, पृथग् जातिषु दृश्यते ।
आधेयश्चाक्रियाजश्च, सोऽसत्त्वप्रकृतिर्गुणः ॥ १॥
अथ कारक-प्रकरणम्
,
(३२६ ) क्रियानिमित्त कारकम् ।।२।४।१।
क्रियाया निमित्तं कादि कारकसंज्ञं स्यात् ।
(३३० ) स्वतन्त्रः कर्ता ॥२।४।२।
यः क्रियासिद्धौ प्राधान्येन विवक्ष्यते स कारकः कर्तृसंज्ञः स्यात् ।
(३३१) नाम्नःप्रथमा ॥२।४।४४।
नाम्नः प्रथमा विभक्तिः स्यात् । जिन:, श्रीः, ज्ञानम्, द्रोणः,
खारी, आढकम्, एकः,
द्वौ, बहवः।
(३३२) आमन्त्रणे ॥२।४।४५ ।
आमन्त्रणमभिमुखीकरणम् । आमन्त्रणेऽर्थे नाम्नः प्रथमा विभक्तिः
स्यात् । हे जिन, हे जिनौ, हे जिनाः ।
(३३३ ) कर्तुाप्यं कर्म ॥२।४।३।
कर्ता क्रियया यद् व्याप्तुमिष्यते, तद् व्याप्यं कारकं कर्मसंज्ञं स्यात्।
(३३४) गौणात् ॥२।४।४६ ।
अधिकारसूत्रमेतत् । त्यादिभिरनुबतो गौणः। अग्रे वक्ष्यमाणा
द्वितीयादयो विभक्तयो गौणानाम्न एव स्युरिति वेदितव्यम् ।
कारक-प्रकरणम् (३३५) कर्मणि द्वितीया ।।२।४।४७ । कर्मणि कारके गौणानाम्नो द्वितीया विभक्तिः स्यात् । कटं करोति, काष्ठं दहति, कूपं पश्यति । गौणादिति किम्-घटः क्रियते, कृष्णेन कंसो हतः। (३३६ ) क्रियाविशेषणात् ।।२।४।४८ । क्रियाविशेषणानाम्नो द्वितीया विभक्तिः स्यात् । मन्दं गच्छति, मृदु पचति । (३३७ ) स्मृत्यर्थदयेशां वा ।। २।४।४। एषां व्याप्यं कर्मसंज्ञं वा स्यात् । पक्षे शेषषष्ठी। मातुः स्मरति, मातरं स्मरति, सपिषो दयते, सर्पिर्दयते, लोकानामीष्टे, लोकानीष्टे । (३३८) अधेःशीस्थासामाधारः॥२।४ । १४ । अधेः परेषामेषामाधारः कर्मसंज्ञः स्यात् । ग्राममधिशेते, अधि- तिष्ठति, अध्यास्ते वा मुनिः। अधेरिति किम्-शयने शेते । (३३६) अन्वध्याभ्यो वसः॥२।४ । १५ । अन्वादिपूर्वकस्य वसतेराधारः कर्मसंज्ञः स्यात् । ग्राममनुवसति, अधिवसति, आवसति वा साधुः । (३४०) उपान्निवासे ॥२।४।१६ । निवासेऽर्थे उपात्परस्य वसतेराधारः कर्मसंज्ञः स्यात् । ग्राममुप- वसति, निवासं करोतीत्यर्थः। निवासे इति किम्-वने उपवसति, उपवासं करोतीत्यर्थः । (३४१) दुहाद्यर्थानामविवक्षितम् ॥२।४ । १६ । दुहादीनां तदर्थानाञ्च धातूनां योगे अविवक्षितं कारक सम्बन्धो :
६८ . कालुकौमुदी-पूर्वार्धे वा कर्मसंज्ञं स्यात् । · गां दोग्धि, स्रावयति, क्षारयति वा पय इत्यादि । दुहिः पचिर्याचिरूधी च दण्डिः, पृच्छिमथिब्रूचिजिशास् मुषश्च । नीकृषबहिह निति चाप्यमीषा- मर्थे गताः स्युर्युगकर्मयुक्ताः ॥ १ ॥ (३४२) गतिबोधाहारशब्दार्थाऽकर्मणाम् ॥ २ । ४ । २१ । गत्याद्यर्थानामकर्मणाञ्च धातूनामजिन्नवस्थायां यः कर्ता स ौ सति कर्मसंज्ञः स्यात् । गच्छति मैत्रो ग्रामम्, गमयति मंत्रं ग्रामम्, बुध्यते शिष्यो धर्मम्, बोधयति शिष्यं धर्म म्, भुङक्ते शिशुरोदनम्, जयति शिशुमोदनम्, जल्पति मंत्रो मन्त्रम्, जल्पयति मैत्रं मन्त्रम्, आस्ते मैत्रः, प्रासयति मंत्रं चैत्रः। गत्यर्थादीनामिति किम्-पचति प्रोदनं चैत्रः, पाचयति ओदनं चत्रेण मंत्रः । (३४३ ) न नीखाद्यदिह्वाशब्दायक्रन्दाम् ॥२।४।२६। एषामजिनः कर्ता जौ कर्मसंज्ञो न स्यात् । माययति भारं भृत्येन, खादयति अन्नं मंत्रेण, आदयति अपूपं पुत्रेण, ह्वाययति, शब्दाययति, क्रन्दयति वा मैत्रं चैत्रेण । (३४४) निकषासमयाहाधिगन्तरान्तरेणातियेनतेनैः।। २।४।४। एभिर्युक्तानाम्नो द्वितीया स्यात् । निकषा ग्रामम्, समया पर्वतम्, हा चैत्रम्, धिक् मिथ्यादृष्टिम्, अन्तरा निषधं नीलवन्तं च मेरुः, जिनदर्शनमन्तरेण किम्, अतिकुरुन् पाण्डुसेना, येन तेन वा पश्चिमां गतः।
कारक-प्रकरणम्
६९
(३४५) सर्वोभयाभिपरिभिस्तसन्तैः ॥२।४।५० ।
एभिस्तसन्तैर्युक्तानाम्नो द्वितीया स्यात् । सर्वतः, उभयतः, अभितः,
परितो वा ग्राम पर्वताः।
(३४६) उपर्यधोऽधिभित्त्वेि ॥२।४। ५१ ।
एभिर्द्विरुक्तैर्युक्तानाम्नो द्वितीया स्यात् । उपर्युपरि ग्रामम्,
अधोऽधो ग्रामम् , अध्यधि ग्रामम् ।
(३४७ ) उपेन चोत्कृष्ट ॥२।४ । ५५ ।
उत्कृष्टेऽर्थे वर्तमाना दुपेन अनुना च युक्तानाम्नो द्वितीया स्यात् ।
उपसर्वशं शूराः, अन्वाचार्य साधवः, तस्माद्धीना इत्यर्थः ।
(३४८) कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे॥२।४।५६ ।
काले अध्वनि च वर्तमानान्नाम्नो द्वितीया स्यात् अत्यन्तसंयोगे
मासमधीते, क्रोशं पर्वतः।
(३४६) अपवर्गे तृतीया ॥२।४।५७ ।
अपवर्गः फलप्राप्तिः। कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे तृतीया स्यात्
अपवर्मे। मासेनावश्यकमधी तम्, क्रोशेन शाकुन्तलमधीतम् । अपवर्ग
इति किम्-मासमधीतो नायातः ।
(३५० ) कर्तृ साधनहेत्वित्थंभूतलक्षणेषु ।। २।४।५८ ।
एष्वर्थेषु वर्तमानानाम्नस्तृतीया स्यात् । चैत्रेण कृतम्,
लुनाति, दानेन कीर्तिः। केनचिद् विशेषेण भूतः-प्राप्तः इत्थंभूतः ।
कमण्डलुना छात्रमद्राक्षीत् ।
( ३५१ ) सहार्थे ॥२।४।५६ ।
सहार्थे गम्ये नाम्नस्तृतीया स्यात् । शिष्येण सह, साकम् , समम्,
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
सार्धम् वा मतो गुरुः।
(३५२) येनाङ्गिविकारः ।। २।४ । ६० ।
येन विकृतेनाङ्गेनाङ्गिनो विकारो लक्ष्यते ततस्तृतीया स्यात् ।
अक्ष्णा काणः, पादेन खञ्जः ।
(३५३ ) निषेधार्थकृताद्यः॥२।४।६१ ।
निषेधार्थः कृतादिभिर्युक्तानाम्नस्तृतीया स्यात् । कृतं तेन, अल
श्रमेण, कि गतेन ।
(३५४) प्रकृत्यादय आख्यायाम् ॥२।४।२६ ।
प्रकृत्यादयः शब्दाः साधनसंज्ञकाः स्युः आख्यायां गम्यमानायाम् ।
साधनत्वात् तृतीया। प्रकृत्या चारुः, प्रायेण धार्मिकः, नाम्ना चैत्रः,
जात्या क्षत्रियः, वर्णेन गौरः ।
( ३५५ ) कर्मक्रियाभिप्रेयो दानपात्रम् ॥ २।४ । ३२ ।
कर्मणा क्रियया वा यभिप्रेयते स कारक: दानपात्रसंशः स्यात् ।
( ३५६) दानपात्रे चतुर्थी ।। २।४। ६३ ।
दानपात्रसंज्ञकान्नाम्नश्चतुर्थी स्यात् । साधुभ्यो भिक्षां ददाति.
गुरवे कार्य निवेदयति । दानपात्रे इति किम्-रजकस्य वस्त्रं ददाति ।
(३५७ ) रुच्यर्थानां प्रीयमाणः ।।२।४ । ३३ ।
रुच्यर्थधातूनां योगे प्रीयमाणो योऽर्थस्तत्कारकं दानपात्रसंज्ञं स्यात् ।
मैत्राय रोचते मोदकः, चैत्राय स्वदते दधि ।
(३५८) श्लाघह्न स्थाशपां ज्ञीप्स्यमानः ।।२।४। ३४।
ज्ञीप्स्यमानो ज्ञापयितुमिष्यमाणः । श्लाघादीनां धातूनां योगे
ज्ञीप्स्यमानो योऽर्थस्तत्कारकं दानपात्रसंशं स्यात् । गुरवे श्लाघते,
कारक-प्रकरणम् ७१ - हते, तिष्ठते, शपते वा। गुरुं ज्ञापयतीत्यर्थः । (३५६ ) क्रुदुहेासूयार्थानां यं प्रतिकोपः ॥ २।४। ३७ । क्रुधाद्यर्थानां धातूनां योगे यं प्रति कोपस्तत्कारकं दानपात्रसंज्ञं स्यात् । मैत्राय क्रुध्यति, द्रुह्यति, ईमंति, असूयति वा चैत्रः । (३६०) तादर्थ्ये ।। २।४। ६४। तादर्थ्य सम्बन्धविशेषद्योत्ये चतुर्थी स्यात् । घटाय मृत्तिका, कुण्डलाय हिरण्यम्, यूपाय दारु । (३६१) समर्थार्थनमःस्वस्तिस्वाहास्वधावषड्भिः ॥२।४।६७ । एभिर्युक्तानाम्नश्चतुर्थी स्यात् । समर्थोऽलं शक्तः क्षमः प्रभु मल्लो मल्लाय । नमो जिनेन्द्राय, स्वस्ति पूज्याय, स्वाहा अग्नये, स्वधा पितृभ्यः, वषड् इन्द्राय । उपपदविभक्तेः कारकविभक्तिर्बली- यसीति नमस्करोति जिनान् । (३६२ ) गतेरप्राप्ते वा ॥ २।४ । ७० । गतेरप्राप्ते कर्मणि चतुर्थी वा स्यात् । गति: पादविहरणम् । ग्राम ग्रामाय वा गच्छति, नगरं नगराय वा व्रजति । गतेरिति किम्-आदित्यं पश्यति । अप्राप्ते इति किम्-ग्रामं गतः । (३६३) हितसुखाभ्याम् ।।२। ४ । ७२ । आभ्यां योगे चतुर्थी वा स्यात् । पक्षे शेषषष्ठी। ग्रामाय ग्रामस्य वा हितं सुखं वा। (३६४ ) अपायेऽवधिरपादानम् ॥२।४ । ४२ । अपायो विश्लेषस्तत्र योऽवधिविवक्षितः तत्कारकमपादानसंज्ञं स्यात् ।
७२
कालकौमुदी-पूर्वार्धे
.
(३६५) पञ्चम्यपादाने ॥२।४।७५ ।
अपादाने वर्तमानानाम्नः पंचमी स्यात् । ग्रामादायाति, धावतोऽ-
श्वात्पतति, चोरेभ्यो विभेति, यवेभ्यो गां निषेधयति, कूपादन्धं वारयति,
अधर्माद् जुगुप्सते, धर्मात् प्रमाद्यति, उपाध्यायादन्तर्धत्ते, अध्ययनात्
पराजयते ।
(३६६ ) प्रभृत्यन्यारादिशब्दैः ॥२।४ । ८१ ।
एभिर्युक्तानाम्नः पंचमी स्यात् । कार्तिक्याः प्रभृति, आरभ्य
ग्रीष्मात्, अन्यो मंत्रात, भिन्नश्चत्रात् । आराद् दूरसमीपयोः-भारात्
ग्रामात्, पूर्वो ग्रीष्माद् वसन्तः, पश्चिमो रामात् युधिष्ठिरः ।
वर्जने ॥२।४। ७६ ।
प्राभ्यां युक्तात् वर्जनेऽर्थे वर्तमानानाम्नः पंचमी स्यात् । परि
त्रिगर्तेभ्यः अपत्रिगर्तेभ्यो वा वृष्टो मेघः,
त्रिगर्त
मुक्त्वा
इत्यर्थः ।
(३६८) आङावधौ ॥२।४।७७ ।
*आङा युक्तादवधौ वर्तमानानाम्नः पंचमी स्यात् । आबालेभ्यो
जिनभक्तिः।
(३६६) आख्यातर्युपयोगे ॥२।४।७८ ।
आख्याता वक्ता। नियमपूर्वक विद्याध्ययनमुपयोगः । आख्यातृ-
वाचिनो नाम्नः पञ्चमी स्यात् उपयोगविषये । उपाध्यायादधीते
शिष्यः। उपयोगे इति किम्-नटस्य गाथां शृणोति ।
(३६७) पर्यपाभ्यां
ईषदर्थे क्रियायोगे, मर्यादाभिविधौ च यः ।
एतमातं ङितं विद्या- क्यिस्मरणयोरङित् ॥१॥
कारक-प्रकरणम् mr (३७० ) दूरान्तिकार्थबहिर्भिः ॥२।४। ८४ । एभिर्योगे नाम्नः पञ्चमी स्यात् । पक्षे षष्ठी। दूरम्, विप्रकृष्टम्, अन्तिकम्, सन्निकृष्टम् , बहिर्वा ग्रामात् ग्रामस्य वा । (३७१ ) शेषे ॥२।४।८७ । कर्मादिभ्योऽन्यः स्वस्वामिभावादिसम्बन्धः शेषः । तत्र वर्तमाना- नाम्नः षष्ठी स्यात् । राज्ञः पुरुषः, गुरूणां वचनं पथ्यम् । ( ३७२ ) ऋतकर्मणोः कृति ।। २।४ । ८६ । कृत्प्रत्यययोगे कर्तरि कर्मणि च षष्ठी स्यात् । चैत्रस्य भोजनम्, मैत्रस्य पठनम्, विश्वस्य ज्ञाता, तीर्थस्य कर्ता, यवानां लावकः, प्रोदनस्य भोजकः। (३७३ ) उभयप्राप्तौ कर्तरि वा ॥२।४।१०। उभयोः कर्तृकर्मणोः प्राप्तियस्मिन् -कृति तत्र कर्तरि षष्ठी वा स्यात् । शब्दानामनुशासनमाचार्येणाचार्यस्य वा। (३७४ ) तृन्नुदन्ताव्ययवस्वानशतृक्तवतुकिखलानाम् ॥२४॥६५॥ तन्नादिप्रत्ययसम्बन्धिनोः कर्तृकर्मणोः प्राप्ता षष्ठी न स्यात् । वदिता जनापवादान्, जिनं दिदृक्षुः, शत्रून् जिष्णुः, कटं कृत्वा, ओदनं भोक्तुम्, तपः तेपिवान्, शास्त्र विद्वान्, घटं चक्राणः, पटं कुर्वन्, कटं कृतवान्, कटं चक्रिः, सुकरो घटस्त्वया । कारकषष्ठयाः प्रतिषेधोऽयम् । सम्बन्धे तु षष्ठी स्यादेव। शत्रोजिष्णुः, चैत्रस्य कुर्वन् किङ्कर इत्यर्थः। (३७५) अकमेरुकस्य ॥२।४।६६ । कमिवजितस्य उकप्रत्ययान्तस्य योगे कर्मणि षष्ठी न स्यात् ।
७४
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
भोगानभिलाषुकः। अकमेरिति किम्-दास्याः कामुकः।
(३७६ ) द्विषः शतुर्वा ॥२।४।१६ ।
शतृप्रत्ययान्तस्य द्विष्धातोः कर्मणि षष्ठी वा स्यात् । चौरस्य
चौरं वा द्विषन् ।
(३७७ ) क्तस्य वर्तमानाधारयोः॥२।४।१००।
वर्तमाने आधारे चैव विहितस्य क्तस्य कर्तृ कर्मणोः षष्ठी स्यात्
नान्यत्र । राज्ञां मतः, इदमेषां शयितम् । वर्तमानाधारयोरिति किम्
--कुलालेन घटः कृतः ।
(३७८) भावे वा ।।२।४।१०१।
भावे विहितस्य क्तस्य कर्तरि षष्ठी वा स्यात् । छात्रस्य छात्रेण
वा हसितम् ।
(३७६ ) कृत्यानां कर्तरि वा ॥२।४।६३ ।
कृत्यप्रत्ययानां प्रयोगे कर्तरि षष्ठी वा स्यात् । पक्षे तृतीया ।
कर्तव्यः, करणीयः, कृत्यः, कार्यो वा उद्यमो भवतः भवता वा ।
(३८०) आधारे सप्तमी ॥२।४ । १०२।
आधारे वर्तमानान्नाम्नःसप्तमी स्यात् । स च षोढा-औपश्लेषिकः,
सामीप्यकः, अतिव्यापकः, वैषयिकः, नैमित्तिकः, औपचारिकश्च ।
कटे शेते, वटे गावः, तिलेषु तैलम्, दिवि देवाः, युद्धे सन्नह्यते, अङ्ग ल्यग्ने
करिशतम् ।
(३८१) यस्य भावेन भावलक्षणम् ।।४।२।१०६ ।
भाव: क्रिया । यस्य क्रियया अन्या क्रिया लक्ष्यते ततः सप्तमी
स्यात् । वर्षति देवे चैत्रो गतः, गोषु दुह्यमानासु पागतः ।
.
कारक-प्रकरणम् ७५ (३८२) षष्ठयनादरे॥२।४ । १११ । अनादरयुक्ते भावलक्षणे वर्तमानान्नाम्नः षष्ठी वा स्यात् । पक्षे पूर्वेण सप्तमी। रुदति रुदतो वा प्रावाजीत् । (३८३ ) निमित्तात्कर्मसंयुक्तात् ॥२।४ । १०८ । कर्मसंयुक्तानिमित्तान्नाम्नः सप्तमी स्यात् । चर्मणि द्वीपिनं हन्ति, दन्तयोर्हन्ति कुञ्जरम् । केशेषु चमरी हन्ति, सीम्नि पुष्कलको हतः ॥१॥ कर्मसंयुक्तादिति किम्-वेतनेन धान्यं लुनाति । (३८४ ) साध्वसाधुभ्याम् ॥२।४ । १०५। आभ्यां युक्तानाम्नः सप्तमी स्यात् । साधुमैत्रो मातरि, असाधु- मातुले। ( ३८५) निर्धारणेऽविभागे सप्तमी च ॥२।४।११२ । निर्धारणे वर्तमानानाम्नः षष्ठीसप्तम्यौ स्तः अविभागे गम्यमाने । नृणां नषु वा क्षत्रियः शूरः, गवां गोषु वा कृष्णा बहुक्षीरा, गच्छतां गच्छत्सु वा घावन्तः शीघ्रतमाः। अविभागे इति किम्-माथुरा: पाटलिपुत्रकेभ्य आढयतराः । (३८६) स्वामीश्वराधिपतिदायादसाक्षिप्रतिभूप्रसूतैर्वा ॥२।४।११३। एभिर्युक्तानाम्नः सप्तमी वा स्यात् । पक्षे शेषषष्ठी। गवां गोषु वा स्वामी, ईश्वरः, अधिपतिः, दायादः, साक्षी, प्रतिभूः, प्रसूतो वा । ( ३८७) तुल्याईस्तृतीयाषष्ठयौ ।। २।४ । १२२ । जिनेन जिनस्य वा तुल्यः, समः, सदृशो वा कालुरामाचार्यः ।
७६
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
(३८८) ऋते द्वितीयापञ्चम्यौ॥२।४ । १२४ ।
ऋते वर्जनार्थ कमव्ययम् । तद्योगे नाम्नो द्वितीयापञ्चम्यौ स्तः ।
ऋते धर्म धर्माद् वा कुतः सुखम् ।
(३८६ ) विना तृतीया च ॥२।४ । १२५ ।
विना शब्देन युक्तानाम्नस्तृतीया द्वितीयापञ्चम्यौ च स्याताम् ।
विना पापेन पापं पापाद् वा सर्वं फलति ।
(३६०) दूरान्तिकार्थादसत्त्वात्सप्तमी ताश्च ।।२।४ । १२६ ।
दूरान्तिकार्थादसत्त्व वाचिन: सातमी द्वितीयातृतीयापञ्चम्यश्च
स्यः । दूरे, दूरम् , दूरेण, दूरात् वा ग्रामात् ग्रामस्य वा वसति । एवं
विप्रकृष्टात्, अन्ति कात्, सन्निकृष्टादपि ।
(३६१ ) हेत्वर्थस्तृतीयाद्याः ।।२।४। १२७ ।
हेतुनिमित्तम् । तदर्थैः शब्दर्युक्तात् तैरेव समानाधिकरणात् नाम्न-
स्तृतीयाद्या विभक्तयः स्युः । धनेन हेतुना, धनाय हेतवे, धनाढेतोः,
धनस्य हेतोः, धने हेतौ वा वसति । एवं निमित्तकारण प्रयोजनादयः
प्रयोक्तव्या:।
(३६२) सर्वादेश्व सर्वाः॥२।४। १२८ ।
हेत्वथैर्युक्तात् तैरेव समानाधिकरणात् सर्वार्दर्नाम्नः सर्वा विभक्तयः
स्युः। को हेतुः, कं हेतुम, केन हेतुना, कस्मै हेतवे, कस्माद्धेतोः, कस्य
हेतोः, कस्मिन् हेतौ वा बसति । एवं निमित्तादीनां योगेऽपि ।
कर्ता कर्म तथा चोक्तं, साधनं तु तृतीयकम् ।
दानपात्रमपादान-माधारःकारकाणि षट् ॥ १॥
अथ समास-प्रकरणम् समासेषु अव्ययीभावः (३६३) नाम नाम्नैकाक्षं समासो बहुलम् ॥३।१ । १६ । . नाम नाम्ना सहकार्ये सति *बहुलं समस्यते । स च समाससंज्ञक: स्यात् । स चतुर्धा-अव्ययीभावतत्पुरुषबहुव्रीहिद्वन्द्वभेदात् । द्विगुकर्म- धारयौ तत्पुरुषभेदावेद । (३६४) अव्ययं कारकसमीपसमृद्धयसंप्रत्यर्थाभावाऽत्ययाऽसंपत्ति- ख्यातिपश्चाद्योग्यतावीप्सापदार्थानतिवृत्तिसादृश्यसदृशयोगपद्या- नुपूर्व्यसंपत्तिसाकल्यान्तेषु पूर्वार्थे ॥ ३। १ । २३ । कारकाद्यर्थेषु यदव्ययं तन्नाम्ना सह ऐकायें सति पूर्वपदार्थे समस्यते सोऽव्ययीभावसमासः स्यात् । स्त्री+सुप्+अधि इत्यलौकिके विग्रहवाक्ये सप्तम्यर्थद्योतकर्माध अव्ययं स्त्रीनाम्ना सह समस्तम् । (३६५) समासप्रत्यययोः ।। ३।२। ६ । * क्वचित् प्रवृत्तिः क्वचिदप्रवृत्तिः, क्वचिद् विभाषा क्वचिदन्यदेव । विविधानं बहुधा समीक्ष्य, चतुर्विधं बाहुलकं वदन्ति ।। १ ।।
७८ कालुकौमुदी-पूर्वार्धे समासे सति प्रत्यये च परे विभक्तेलक स्यात् । इति विभक्तेलुकि सति स्त्री अधि इति स्थिते । (३६६) प्रथमोक्तं प्राक् ॥३।१।१५६ । अत्र समासमात्रे सूत्रे प्रथमान्तपदेन यदुक्तं तत्प्राक् प्रयोक्तव्यम् । अव्ययीभावशिनन्ते, कृत्यक्तानखलन्तकम् । त्वाद्यन्तंत्वमभिव्याप्य, भावे द्वन्द्वकता तथा ॥ १॥ इति लिङ्गानुशासनात् नपुंसकत्वम् । नपुंसके इति हस्वे--अधिस्त्रि । (३६७) अनतो लुक् ॥ ३।२।५। अव्ययीभावात् स्यादेर्लुक् स्यात् न त्वदन्तात् । इति सर्वत्र समानरूपाणि । एवं कुमार्यामिति-अधिकुमारि । समीपे-कुम्भस्य समीपमिति विग्रहे । (३६८) अव्ययीभावस्यातोऽमपञ्चम्याः ॥३।२।२। अदन्ताव्ययीभावात् स्यादेरमादेशः स्यात् पञ्चमी त्यक्त्वा । उपकुम्भं तिष्ठति, पश्यति देहि वा सर्वत्राऽम् । अपञ्चम्या इति किम्-उपकुम्भात् । (३६६) वा तृतीयासप्तम्योः ॥ ३।२।३। अदन्ताव्ययीभावात् तृतीयासप्तम्योरमादेशो वा स्यात् । उपकुम्भम् उपकुम्भेन वा कृतम् । उपकुम्भम्, उपकुम्भे वा स्थितम् । एवं मद्राणां समृद्धिः सुमद्रम्, निद्रा सम्प्रति न युज्यते इत्यतिनिद्रम्, मक्षिका- गामभावो निर्मक्षिकम् । प्रत्ययो विनाशः। हिमस्य अतिहिमम्, यवनानामसंपत्तिर्दुर्यवनम्, भिक्षोः ख्यातिरितिभिक्षु, जिनस्य पश्चात् अनुजिनम्, रूपस्य योग्यम् अनुरूपं चेष्टते। बहूनां सजातीयानां अत्ययः समास-प्रकरणम् क्रियादिना साकल्येन व्याप्तुमिच्छ। वीप्सा। अर्थमथं प्रति प्रत्यर्थम् । शक्तिमनतिक्रम्य यथाशक्ति । (४००) अकालेऽव्ययीभावे ।।३।२ । १२७ । अव्ययीभावे सहस्य सादेशः स्यात् अकालवाचिन्युत्तरपदे । शीलस्य सादृश्यं सशीलमनयोः, व्रतेन सदृशमिति सव्रतम्, चक्रेण सह गदां घेहीति सचक्रम्, ज्येष्ठस्यानुक्रमेण इति अनुज्येष्ठम्, क्षत्राणां संपत्तिरिति सक्षत्रम्, सतृणमभ्यवहरति, न किञ्चित्त्यजतीत्यर्थः, सपिण्डषणमधीते, पिण्डषणापर्यन्तमधीते इत्यर्थः । (४०१) यथाऽसादृश्ये ॥३।१।२४ । असादृश्येऽर्थे यथा इत्यव्ययं समस्यते सोऽव्ययीभावसमासः स्यात् । यथावृद्धमर्चय, ये ये वृद्धास्तान्नित्यर्थः। असादृश्य इति किम्-यथा ऋषभस्तथा वीरः। (४०२) शरदादेरव्ययीभावात् ॥ ८।३ । २७ । शरदाद्यन्तादव्ययीभावाट्टः समासान्तः स्यात् । उपशरदम्, उप- त्यदम् । अव्ययीभावस्य नपुंसकलिङ्गत्वाट्टान्तस्य स्त्रियां वृत्तिर्न । (४०३) जराया जरश्च ।। ८।३।२६ । जराशब्दान्तादव्ययीभावाट्टः स्यात् जराया जरसादेशश्च । उपजर- सम्, प्रतिजरसम् । राज्ञः समीपमित्यत्र तु- (४०४) अनः॥८।३।३१ । यन्नन्तादव्ययीभावाट्टः स्यात् । (४०५) वृत्त्यन्तः ॥ १। १ । २६ । वृत्तिः पदसमुदायसमासादिरूपा । तस्या अन्तः पदसंज्ञो न स्यात् ।
कालुकौमुदी-पूर्वार्धं अन्तर्वतिन्या विभक्तेः स्थानिवद्भावेन उभयत्र पदत्वे प्राप्ते अन्त्यस्य निषेधार्थ वचनम् । (४०६ ) नोऽपदस्य तद्धिते ॥ ८।४। ६२ । अपदस्य नान्तस्य टेर्लोप: स्यात् तद्धिते। उपराजम्, उपतक्षम्, प्रत्यात्मम् । इत्यव्ययीभावः अथ तत्पुरुषः (४०७) श्रितादिभिः॥३।१।४५ । द्वितीयान्तं नाम श्रितादिभिः सह वा समस्यते स तत्पुरुषसमासः स्यात् । जिनं श्रित:-जिनश्रितः। एवं संसारातीतः, नरक पतितः, ग्रामंगतः, नरकगामीत्यादिः। पक्षे वाक्यमेव । (४०८ ) ऊनार्थपूर्वादिभिः॥३।१। ५० । तृतीयान्तं नाम ऊनार्थः पूर्वादिभिश्च सह वा समस्यते स तत्पुरुष- समासः स्यात् । मासेनोनम्-मासोनम्, मासविकलम्, मासपूर्वः, वाग्निपुणः, धान्यार्थः इत्यादि । (४०६) कर्तृ साधने कृता ।। ३ । १ । ५२ । कर्तरि साधने च यत्तृतीयान्तं नाम तत् कृदन्तेन सह वा समस्यते स तत्पुरुषसमासः स्यात् । आत्मना कृतम्-आत्मकृतम्, अहिदष्टः, नखभिन्नः, परशुच्छिन्नः। (४१०) तुम्क्त्वाक्तवतुभिः॥३।१।५५ । तृतीयान्तं नाम एभिः सह न समस्यते । पूर्वापवादः । परशुना छेत्तुम्, परशुना छित्त्वा, दात्रेण लूनवान् । .
समास-प्रकरणम्
८१
(४११) चतुर्थी प्रकृत्या ॥३।१।५६ ।
चतुर्थ्यन्तं नाम प्रकृतिवाचिना सह वा समस्यते स तत्पुरुषसमासः
स्यात् । प्रकृतिर्मूलकारणम् । घटाय मृत्तिका-घटमृत्तिका। एवं
कुण्डलहिरण्यम्, यूपदारु ।
(४१२) हितादिभिः ।।३।१। ५७ ।
चतुर्थ्यन्तं नाम हितादिभिः सह वा समस्यते स तत्पुरुषसमासः
स्यात् । साधुभ्यो हितम्-साधुहितम्, श्राद्धसुखम्, भूतबलिरित्यादि ।
(४१३) पञ्चमी भयादिभिः॥३।१। ६० ।
पञ्चम्यन्तं नाम भयादिभिः सह वा समस्यते स तत्पुरुषसमासः
स्यात् । व्याघ्राद् भयम्-व्याघ्रभयम्, वृकभीतिः, ग्रामनिर्गतः,
चक्रमुक्तः ।
(४१४) षष्ठययत्नाच्छषे ।।३।१।६३ ।
शेषे या षष्ठी तदन्तं नाम नाम्ना सह वा समस्यते स तत्पुरुषसमासः
स्यात् । न चेत् स शेषो यत्नाद् विहितः स्यात् । राज्ञः पुरुषः-
राजपुरुषः, गवां क्षीरम्-गोक्षीरम् ।
अयत्लादिति किम्-मातुः
स्मारकः । शेषे इति किम्-रुदतः प्रवजितः, नराणां क्षत्रियः शूरः ।
(४१५) कृति ।।३।१।६४ ।
कृत्प्रत्ययनिमित्ता या षष्ठी तदन्तं नाम नाम्ना सह वा समस्यते
स तत्पुरुषसमासः स्यात् । सिद्धसेनस्य कृति:-सिद्धसेनकृतिः,
गणधरोक्तिः, पलाशशातनः ।
(४१६) पूरणशतृशानाव्ययतृप्ताथैः ॥ ३।१।७४ ।
एभिः सह षष्ठयन्तं नाम न समस्यते। तीर्थङ्कराणां षोडशः शान्तिः,
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८२
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
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चैत्रस्य पठन्, मैत्रस्य पचमानः, चैत्रस्य कृत्वा, फलानां तृप्तः, सुहितो
वा। सर्वत्र सम्बन्ध षष्ठी।
(४१७ ) सप्तमी शौण्डादिभिः ।।३।१ । ७७ ।
सप्तम्यन्तं नाम शौण्डादिभिः सह वा समस्यते स तत्पुरुषसमासः
स्यात् । अक्षेषु शौण्ड:-अक्षशौण्डः, शिरःशेखरः, हस्तकटक इत्यादि ।
(४१८) काकादिभिः क्षेपे ॥३।१।७८ ।
तीर्थे काक इव तीर्थकाकः । एवं तीर्थवायसः, तीर्थश्वा । उपमया
चात्र क्षेपो गम्यते । क्षेप इति किम्-तीर्थे काकस्तिष्ठति ।
(४१६ ) सिंहादिभिः पूजायाम् ।।३।१ । ७६ ।
समरे सिंह इव-समरसिंहः, रणव्याघ्रः, कलिगौतमः ।
(४२०) नञ्तत्पुरुषः॥३। १३४ ।
नमिति नाम्ना सह समस्यते स तत्पुरुषसमासः स्यात् ।
(४२१) नषत् ॥३।२।६७।
नम्न प्रकारादेशः स्यात् उत्तरपदे । न ब्राह्मण:-अब्राह्मणः,
असाधः, अहिंसा, असत्यम् ।
(४२२) अन् स्वरे ॥३।२।१०१ ।
नञित्यस्य अनादेशः स्यात् स्वरादावुत्तरपदे । न अश्वः-अनश्वः,
अनजः, अनन्तः ।
(४२३) नखादयः ।।३।२। १०० ।
नखादयः शब्दा अकृतनाकाराद्यादेशा निपात्यन्ते ।
नास्य खं
विद्यते इति नखः, न गच्छतीति नगः । एवं नकुलः, नपुंसकः, नक्षत्रम्
नक्रः, नाकः, नग्नः इत्यादि।
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"
समास-प्रकरणम्
(४२४) सप्तम्युक्तं कृता ।३ । १ । ६८1
कृत्प्रत्ययविधायके सूत्रं सप्तम्यन्तेन यदुक्तं तत्सप्तम्युक्तम् ।
सप्तम्युक्तं नाम कृदन्तेन सह नित्यं समस्यते स तत्पुरुषसमासः स्यात् ।
कुम्भं करोतीति कुम्भकारः, शरलावः ।
(४२५) ऊर्याद्यनुकरणोपसर्गच्चिडाचो गतिर्धातोः प्राक् च
॥३।१।१।
ऊर्यादयः शब्दा गतिसंज्ञकाः स्युः धातोश्च प्रागेव प्रयुज्यन्ते ।
(४२६ ) गतिः॥३।१। ८७ ।
गतिसंज्ञक नाम नाम्ना सह नित्यं समस्यते स तत्पुरुषसमासः
स्यात् । विहारः, प्रहारः, व्याघ्रः।
(४२७) कुः पापाल्पयोनित्यम् ॥ ३ । १ । ८६ ।
पापे अल्पे चार्थे कुरिति नित्यं समस्यते स तत्पुरुषसमासः स्यात् ।
कुत्सितो ब्राह्मण:-कुब्राह्मणः ।
(४२८) कोः कत्तत्पुरुषे ॥३।२। १०२ ।
स्वरादावुत्तरपदे परे कुशब्दस्य कदादेशः स्यात्तत्पुरुष । कुत्सित.
मन्नम-कदन्नम्, कदश्वः ।
(४२६) अल्पे ॥३।२।१०६ ।
अल्पेऽर्थे कुशब्दस्य कादेशः स्यादुत्तरपदे परे। ईषन् मधुरम्-
कामधुरम् ।
(४३०) पुरुषे वा ॥३।२।१०७ ।
कुत्सितः पुरुषः-कापुरुषः, कु पुरुषः ।
(४३१) कवोश्चोष्णे ॥३।२। १०८ ।
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८४ कालुकौमुदी-पूर्वाध कुशब्दस्य कव, का इत्यादेशौ वा स्त: उष्णे परे। पक्षे यथा- प्राप्तम् । ईषदुष्णम्-कवोष्णम्, कोष्णम्, क दुष्णम् । (४३२ ) प्रादयो गताद्यर्थे प्रथमया ॥३।१।१२। प्रादयः शब्दा गताद्यर्थे प्रथमान्तेन सह समस्यन्ते स तत्पुरुषसमासः स्यात् । प्रगतः आचार्य:-प्राचार्यः, संगतोऽर्थः-समर्थः, विरुद्धः पक्षः- विपक्षः, प्रत्यर्थी पक्ष:-प्रतिपक्षः इत्यादि । (४३३) अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयया ।। ३ । १ । १३ । अतिक्रान्तः खट्वामिति विग्रहे । (४३४ ) अन्यार्थे स्त्रीप्रत्ययगोरन्त्यस्याऽक्किपोऽनंशिसमासेयोबहु- ब्रीहौ ॥२।३। ११५। अन्यार्थे वर्तमानस्य अन्त्यस्य स्त्रीप्रत्ययस्य गोशब्दस्य च ह्रस्वादेश: स्यात् न तु क्विबन्तस्य न चेदंशिसमासान्त ईयस्वन्तबहुव्रीह्यन्तो वा स्यात् । अतिखट्वः । एवमतिमालः, अतिगङ्गः, प्रतिगतोऽक्षम्-- प्रत्यक्ष: इत्यादि । (४३५ ) अवादयः ऋष्टाद्यर्थे तृतीयया ॥३।१।१४। अवष्टम् कोकिलया--अवकोकिलम्, अनुगतमर्थेन-~अन्वर्थम्, संगतमक्षेण-समक्षम्, वियुक्तमर्थेन-व्यर्थम् इत्यादि । (४३६) पर्यादयो ग्लानाद्यर्थे चतुर्थ्यां ॥३।१।१५। परिग्लानोऽध्ययनाय-पर्यध्ययनः, अलंकुमार्य-अलंकुमारि: इत्यादि। (४३७) निरादयो गताद्यर्थे पञ्चम्या ॥३।१।६६ । निर्गतः कौशाम्ब्या:-निष्कौशाम्बिः, अपगतः शाखाया:-अपशाखः, उत्क्रान्तं कुलात्-उत्कुलम् । एवमुच्छृङ्खलादयः ।
समास-प्रकरणम् ८५ उत्तर- - (४३८) पूर्वापराधरोत्तरमभिन्नेनांशिना ॥३।१।३५ । पूर्वादयः शब्दा अभिन्ननाशिना सह वा समस्यन्ते तत्पुरुषश्च समासः स्यात् । पूर्वः कायस्य- -पूर्वकायः । एवमपरकायः, अधरकायः, कायः। अभिन्नेनेति किम्-पूर्वश्छात्राणाम् । (४३६ ) अधं समेंऽशे वा ।।३। १ । ३७ । समांशवाच्यर्धशब्दो वा समस्यते समासश्च प्राग्वत् । अर्धं पिप्पल्याः -अर्धपिप्पली । पक्षे पिप्पल्यमिति षष्ठीसमासोऽपि । समेंऽशे इति किम-ग्रामाः। (४४०) सायालादयः।।३।१।३६ । एते कृततत्पुरुषसमासा निपात्यन्ते । सायमरः,-सायाह्नः, मध्याह्नः, मध्यरात्र इत्यादि । (४४१) विशेषणं विशेष्येण तुल्यार्थे कर्मधारयश्च ।। ३ । १ १०० विशेषणवाचि नाम विशेष्यवाचिनाम्ना सह तुल्यार्थे वा समस्यते स कर्मधारयः तत्पुरुषश्च समास: स्यात् । नीलं च तद् उत्पलं च नीलो- त्पलम् । एवं रक्तकम्बलः । (४४२) पुंवत् कर्मधारये ॥ ३।२।६१ । भाषितपुंस्कादनूङः स्त्रियाः पुंवत् स्यात् कर्मधारये । एका शाटी- एकशाटी, रक्तलता, ब्राह्मणभार्या, चन्द्रमुखभार्या । (४४३) अवेस्तुल्यार्थजातीययोः ॥ ३ । २ । ७१ । अच्व्यन्तस्य महच्छन्दस्य डा इत्यादेशः स्यात् तुल्यार्थे जातीयप्रत्यये च परे। महावीरः, महापुरुषः, महादेवः। अच्वेरिति किम्- अमहान्महान्भूतो महद्भूतश्चन्द्रमाः ।
८६ कालुकौमुदी पूर्वार्धे (४४४) शाकपार्थिवादीनां मध्यमपदलोपश्च ।। ३।१।११० । एषां मध्यमपदस्य लोपः स्यात् कर्मधारयश्च समासः । शाकप्रियः पार्थिवः-शाकपार्थिवः, देवानां पूजको ब्राह्मणः-देवब्राह्मणः। (४४५) कुत्सितानि कुत्सनैरपापाद्यः॥३। १। १०२ । कुत्सितवाचि नाम पापादिवजितैः कुत्सनवाचिभिः सह तुल्यार्थे वा समस्यते कर्मधारयश्च समासः स्यात् । मुनिश्चासौ धूर्तश्च-मुनिधूर्तः, क्षत्रियभीरुः, वैयाकरणखसूचिः। अपापा_रिति किम्-पापवैयाकरणः, दुष्टामात्यः, क्षुद्रतापसः। (४४६ ) उपमानानि सामान्यैः ।। ३। १ । १०३ । उपमानोपमेययोः साधारणो धर्मः सामान्यम् । उपमानवाचि नाम सामान्यवाचिभिर्नामभिः सह वा समस्यते समासश्च पूर्ववत् । धन इव श्यामः-घनश्यामः, मृगचपला। सामान्य रिति किम्-अग्निरिव .. माणवकः। (४४७ ) उपमेयानि व्याघ्रादिभिः सामान्याप्रयोगे ।।३।१।१०४। पुरुषो व्याघ्र इव-पुरुषव्याघ्रः, पुरुषसिंहः, पुरुषवृषभः । सामा- न्याप्रयोगे इति किम्-पुरुषो व्याघ्र इव शूरः । (४४८) अधिकं च तद्धितोत्तरपदसमाहारेषु ॥ ३ । १ । १२३ । तद्धितविषये उत्तरपदे च परतः समाहारे च वाच्ये अधिकशब्दो दिक्संख्ये च तुल्यार्थे वा समस्यन्ते समासश्च प्राग्वत् । अधिकया षष्ट्या क्रीतः अधिकषाष्टिकः । पूर्वस्यां शालायां भवः पौर्वशालः । (४४६) संख्यापूर्वो द्विगुश्च ।।३। १ । १२४ । पूर्वसूत्रोक्तः संख्यापूर्वः समासः द्विगुसंज्ञकोऽपि स्यात् । पञ्चसु समास-प्रकरणम् कपालेषु संस्कृतः पञ्चकपाल:* । अधिकं धनं प्रियं यस्य सः अधिक- धनप्रियः । एवं पूर्वराष्ट्रप्रियः । पञ्चग्रामधनः । अनेकस्य कथंचिदेकत्वं समाहारः। समाहारे दिगधिको न संभवतः । पञ्चानां पात्राणां समा- हारः पञ्चपात्रम् । (४५०) सखेष्टः ॥ ८।३।६। सखिशब्दान्तात्तत्पुरुषाः स्यात् । (४५१ ) इवर्णावर्णस्य ॥ ८।४।७१ । इवर्णस्य अवर्णस्य चाऽपदसंज्ञकस्य लोपः स्यात् तद्धिते परे । राज- सखः, महासखः, पञ्चसखः । (४५२) राज्ञोऽस्त्रियाम् ॥ ८।३ । ७। राजन्शब्दान्तात् तत्पुरुषात् ट: स्यात् न तु स्त्रियाम् । देवराजः, महाराजः । अस्त्रियामिति किम्- अस्त्रियामिति किम्-महाराज्ञी । (४५३) कि क्षेपे ॥३। १ । ११४ । किम् शब्दस्तुल्यार्थे नाम्ना सह समस्यते क्षेपे तत्पुरुषकर्मधारयश्च समासः स्यात् । को राजा इति विग्रह-समासान्ते टे प्राप्ते । (४५४) न किमः क्षेपे ॥ ८।३।२। क्षेपे वर्तमानात् किम् शब्दात् परः समासान्तो न स्यात् । किं राजा यो न रक्षति। एवं कि सखा योऽभिद्रुह्यति । क्षेपे इति किम्- केषां राजा किंराज:, किसखः । (४५५) नमस्तत्पुरुषात् ।। ८।३।५। * 'संस्कृते भक्ष्य' इत्यरण, तस्य द्विगोरनपत्ये यस्वरादे गद्विरिति - लुक च।
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
ना पूर्वात् तत्पुरुषात् समासान्तो न स्यात् । न राजा-अराजा,
प्रसखा।
(४५६ ) अह्नः ॥ ८।३।८।
अहन्शब्दान्तात् तत्पुरुषात् टः स्यात् । परमाहः, उत्तमाहः ।
(४५७ ) साशसंख्याव्ययात् ॥८।३।१०।
एभ्यः परो यः अहन्शब्दस्तदन्तात् तत्पुरुषात् ट: स्यात् तस्य च
अह्लादेशः।
(४५८) अतोऽह्रस्य ।।२।२। ७७ ।
अदन्तात् पूर्वपदस्थात् निमित्तात्परस्य अह्नस्य नस्य णः स्यात् ।
सर्वालः, पूर्वाह्नः ।
(४५६ ) साशसंख्यातपुण्यवर्षादीर्घाञ्च रात्रेः ॥ ८।३ । ५५ ।
एभ्यः संख्याव्ययेभ्यश्च परो यो रात्रिशब्दस्तदन्तात् तत्पुरुषात् अः
स्यात् । सर्वरात्रः, पूर्वरात्रः, अपररात्रः, संख्यातरात्रः, पुण्यरात्रः,
वर्षारात्रः, दीर्घरात्रः, द्विरात्रः, अतिरात्रः ।
.
इति तत्पुरुषः
अथ बहुव्रीहिः
(४६०) तुल्यार्थं चानेकं च ॥३। १ । १२८ ।
एकमनेकं च तुल्यार्थं नाम अव्ययं च नाम्ना सह द्वितीयाद्यन्यार्थे
समस्यते स च बहुव्रीहिसमासः स्यात् । आरूढो वानरो यमिति
विग्रहे।
(४६१) शेषे ॥३।१।१६८ ।
प्रहरणादन्यत्र शेषः। शेषे बहुव्रीहिसमासे क्तप्रत्ययान्तं नाम
समास-प्रकरणम् ८९ . प्राग्निपतति। आरूढवानरो वृक्षः, ऊढो रथो येन स ऊढरथोऽनड्वान्, उपहृतो बलियस्मै स उपहृत बलिर्यक्षः, भीताः शत्रवो यस्मात् स भीत- शत्रुर्नृपः। चित्रा गावो यस्येति विग्रहे । (४६२) विशेषणम्॥३।१ । १६१ । बहुव्रीहिसमासे विशेषणं प्राग निपतति । (४६३) पुंवद्भाषितपुंस्कादनूङ स्त्रियास्तुल्यार्थे स्त्रियाम् ॥३।२।४८॥ भाषितपुंस्कात्परस्य अवजितस्त्रीप्रत्ययस्य पुंवत् स्यात् तुल्यार्थे स्त्रीलिङ्गे परे। 'अन्यार्थे स्त्रीप्रत्यय' इत्यादिना गोशब्दस्य हस्वे, सन्ध्यक्षराणा ह्रस्वादेशे स्थानसाम्यादिदुतौ। चित्रगुः । एवं दर्शनीयभार्यः, पटुभार्यः, शोभन भार्यः, वीराः पुरुषाः सन्ति यस्मिन् स वीरपुरुषो ग्रामः । अनेक च-आरूढा बहवो वानरा यं स आरूढबहुवानर इत्यादि । अव्ययम्- उच्चर्मुखमस्य स उच्चैर्मुखः । एवं नीचैर्मुखः । (४६४) हंसगमनादयः ।।३।१ । १२६ । हंसगमनादयः शब्दा बहुव्रीहिसमासान्ता निपात्यन्ते। हंसस्य गमनमिव गमनं यस्या सा हंसगमना। एवं चन्द्रवदना, उष्ट्रमुखः, वृषस्कन्धः इत्यादि। (४६५) तेन सहः ॥३।१।१३० । सहेति नाम तृतीयान्तेन सह वा समस्यते अन्यार्थे स च बहुव्रीहि स्यात् । (४६६) सहस्य सो वा बहुव्रीहौ ॥३।२। १२४ । -
९०
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
उत्तरपदे परे बहुव्रीही सहस्य सादेशो वा स्यात् ।
सह पुत्रेणेति
सहपुत्रः सपुत्रो वा, सधनः, सहधनः, समदः सहमदः ।
(४६७) सर्वादिश्च बहुव्रीहौ ॥३ । १ । १६० ।
बहुव्रीहिसमासे सर्वादिः संख्या च प्राग्निपतति । सर्वशुक्लः,
विश्वमित्रः, चतुर्ह स्वः, पञ्चदीर्घः ।
(४६८) सप्तम्यन्तम् ॥३।१ । १६३ ।
बहुव्रीहिसमासे सप्तम्यन्तं प्राग्निपतति । हंसगमनादित्वात् समासः
कण्ठेकाल:, उदरेमणिः, उरसिलोमा। अत्र सप्तम्या अलुक ।
(४६६) नेन्द्रादिभ्यः ॥३।१ । १६५ ।
बहुव्रीहिसमासे इन्द्वादिभ्यः सप्तम्यन्तं प्राग् न निपतति । इन्दु.
मैलौ यस्य स इन्दुमौलि:, शशिशेखरः, पद्महस्तः ।
(४७० ) प्रहरणेभ्यः।।३।१ । १६६ ।
प्रहरणवाचिभ्यः सप्तम्यन्तं प्राग् न निपतति । दण्डपाणि:,
चक्रपाणिः, वजपाणि:, धनुर्हस्तः ।
(४७१ ) स्वाङ्गादीपो जातेश्चामानिनि ॥३।२। ६० ।
स्वाङ्गात् परस्येपः जातेश्च स्त्रिया: प्राप्तः पुंवन्न स्यात् अमानिन्यु-
त्तरपदे । चन्द्रमुखीभार्यः, दीर्घ केशीभार्यः, ब्राह्मणी भार्यः, शूद्राभार्यः ।
अमानिनीति किम-दीर्घ केशमानिनी।
(४७२) द्विपदाद्धर्मादन् ॥ ८।३।७४ ।
धर्मशब्दान्तात् द्विपदाद् बहुव्रीहेरन् स्यात् । सुधर्मा, कल्याणधर्मा।
द्विपदादिति किम्-~~परमस्वधर्मः ।
(४७३ ) उपसर्गात् ॥ ८।३। ८५ ।
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समास-प्रकरणम्
उपसर्गात्परस्य नासिकाया बहुव्रीही नस इत्यादेश: स्यात् । प्रगता
नासिका अस्येति अनेन नसादेशे।
(४७४) नसस्य ॥२।२।७५।
पूर्वपदस्थान्निमित्तात्परस्य नसस्य नस्य णः स्यात् । प्रणसंमुखम्,
निर्णसं मुखम् ।
(४७५) जायाया जानिः॥८।३। ८८ ।
जायाशब्दस्य बडुव्रीही जानिरादेशः स्यात् । युवजानिः ।
(४७६) सुहृदुह दो मित्रामित्रयोः ॥ ८।३ । १०४ ।
सुहृन्मित्रम्, दुहूं दमित्रः । अन्यत्र सुहृदयो मुनिः।
(४७७) स्त्रियामिनः ।। ८ । ३ । १०८ ।
इन्नन्ताद् बहुव्रीहेः कप् स्यात् स्त्रियाम् । बहुदण्डिका सेना,
बहुस्वामिका पुरी।
(४७८) सुन्नित्यदितः ॥ ८।३।१०६ ।
ऋकारान्तान्नित्यं दिदादेशो यस्मात्तदन्ताच्च बहुव्रीहेः कप् स्यात् ।
बहु कर्तृकः । बह्वयः कुमार्यो यस्य इत्यत्र तु-
(४७६ ) ईबादीदूतां के ।। २ । ३ । १०६ ।
एषां हस्वः स्यात् कप्रत्यये परे । इतीपो हस्ते प्राप्ते ।
(४८०) न कपि ॥२।३ । ११० ।
पूर्वेण प्राप्तो हस्वो न स्यात् कपि परे। बहुकुमारीकः ।
इति बहुव्रीहिः
अथ द्वन्द्वः
(४८१ ) चार्थे द्वन्द्वः सहोक्तौ ।। ३। १ । १३३ ।
९२ कालुकौमुदी-पूर्वार्धे सहोक्तिविषये चार्थे वर्तमानं नाम नाम्ना सह वा समस्यते स च द्वन्द्वसमासः स्यात् । समुच्चयान्वाचयेतरेतरयोगसमाहाराश्चार्थाः । तत्र परस्परनिरपेक्षस्याऽनेकस्य क्रियाकारकादेरेकस्मिन्नन्वयः समुच्चयः । चैत्रः पचति पठति च, चैत्रो मंत्रश्च पठति । समुच्चये एवान्यतरस्य गौणत्वेऽन्वाचयः। बटो! भिक्षामट गां चानय । मिलितानामन्वय इतरेतरयोगः। चैत्रश्च मैत्रश्च चैत्रमैत्री गच्छतः । संहतिः समाहारः। समाहारे एकवद्भावः । धवश्च खदिरश्च पलाशश्च धवखदिरपलाशं तिष्ठति । अत्राद्ययोः सहोक्त्य भावात् समासो न । (४८२ ) द्वन्द्व लव्वक्षरमेकम् ।।३। १ । १६८ । द्वन्द्वे लध्वक्षरं नाम प्राग निपतति यत्र चानकं तत्रैकमेव । तिल- माषौ, घटशङ्खपटाः, पटशङ्खघटाः । (४८३) इदुदन्तमसखि ॥३।१ । १७० । पतिसुतौ, पटुगुप्तौ। असखीति किम्-सुतसखायौ। (४८४) स्वराद्यदन्तम् ॥३।१ । १७३ । अश्वखरौ, इन्द्रचन्द्रौ। (४८५) अल्पस्वरम् ॥ ३ । १ । १७६ । धवखदिरौ, वागर्थों। (४८६ ) अर्चितम् ॥ ३ । १ । १७६ । देवदैत्यौ, मातापितरौ। (४८७) मासर्तुभ्रातृनक्षत्राण्यानुपूर्येण ॥ ३ । १ । १८२ । इत्येतद्वाचिशब्दरूपमानपूर्येण प्राग निपतति द्वन्द्वे । फाल्गुनचंत्री, हेमन्तवसन्ती, बलदेववासुदेवौ, कृत्तिकारोहिण्यौ ।
समास-प्रकरणम् (४८८) वर्णाः ।। ३ । १। १८७ । द्वन्द्वे वर्णवाचीन्यानुपूर्येण प्राग् निपतन्ति । ब्राह्मणक्षत्रियो, विट्शूद्रौ। पूर्वोक्तानां पूर्वनिपातः क्वचिद्वा। गुणवृद्धी, वृद्धिगुणी, धर्मार्थी, अर्थधर्मी, समीरणाग्नी, अग्निसमी रणौ, वसन्तग्रीष्मी, ग्रीष्म- वसन्ती, भीमसेनार्जुनौ, अर्जुनभीमसेनौ । क्वचिन्न-जाया पती, जंपती, दंपती, भार्यापती, पुत्रपती, शूद्रा?, उलूखलमूसले, नरनारायणौ, पाण्डुधृतराष्ट्रौ, पुष्य पुनर्वसू । (४८६ ) नित्यवैरिणाम् ॥३।१ । १५२ । एषां द्वन्द्व एकत्वं स्यात् । अहिनकुलम्, अश्वमहिषम्, मार्जार- मूषकम् । (४६०) विरोधिनामद्रव्याणाम् ॥ ३।१ । १६० । अद्रव्यवृत्तीनां विरोधिवाचिनां द्वन्द्वमेकत्वं वा स्यात् । सुखदुःखम्, सुखदुःखे, लाभालाभम् . लाभालाभो। विरोधिनामिति किम्-काम- क्रोधौ। अद्रव्याणामिति किम्-शीतोष्णे जले । (४६१) आ द्वन्द्व ॥३।२ । ३६ । विद्यायोनिसम्बन्धिनामृकारान्तानां द्वन्द्वे उत्तरपदे परे प्राकारादेशः स्यात् । होतापोतारी, मातापितरौ । (४६२ ) पुत्रे ॥३।२।४०। मातापुत्रौ, पिता पुत्री। इति द्वन्द्वः अथ अलुक-समासः (४६३) आत्मनः पूरणे ॥ ३ । २। १४ ।
कालुकौमुदी-पूर्वार्ध आत्मनः परस्य तृतीयाया लुग् न स्यात् पूरणप्रत्ययान्ते परे । प्रात्मनाचतुर्थः, प्रात्मनाषष्ठः। पूर्वादित्वात् समासः । (४६४) परात्मभ्यां चतुर्थ्याः॥३।२ । १७ । आभ्यां परस्याश्चतुर्थ या लुग् न स्यात् संज्ञायामुत्तरपदे परे । परस्मैपदम्, आत्मनेपदम् । हितादित्वात्समासः । (४६५) मूर्खे देवानां प्रियः॥३।२। ३४ । अन्यत्र देवप्रियः। (४६६) अमूर्धमस्तकात्स्वाङ्गादकामे ॥३।२ । २१ । मूर्धमस्तकवर्जिताददन्तात् हसान्ताच्च स्वाङ्गवाचिनः परस्याः सप्तम्या लुग् न स्यात् कामवजिते उत्तरपदे परे। कण्ठेकालः, उदरे- मणिः, शिरसिशिखः। अमूर्धमस्तकादिति किम्-मूर्धशिखः, मस्तक- शिखः। अकाम इति किम्----मुखे कामोऽस्य मुखकामः । (४६७) तत्पुरुषे कृति ॥३।२ । २२ । अदन्तात् हसान्ताच्च परस्याः सप्तम्या लुग् न स्यात् कृदन्ते उत्तरपदे तत्पुरुषसमासे । स्तम्बरमः, कर्णेजपः । इत्यलुक्समासः अथ समासाश्रयविधिः (४६८) ईपः ।।३।२।६५। *तरादिषु परेषु भाषितपुंस्कात्परस्येपो हस्वः स्यात् तुल्यार्थे । गौरितरा, कुमारिकल्पा। * तरतमरूपकल्पचेलड्ब्रुवगोत्रमतहत इति तरादिः ।
समास-प्रकरणम् ) (४६६) घज्युपसर्गस्य बहुलम् ॥ ३ । २ । ८७ । घान्ते उत्तरपदे उपसर्गस्य बहुलं दीर्घः स्यात् । नीमेदः, नीवारः, प्रावारः, प्रासादः, प्राकारः । क्वचिद्वा-परिणामः, परीणामः । क्वचिन्न-प्रतापः, प्रभावः । (५०० ) एकादशषोडशषोडषोढाषड्ढाः ॥३।२।१४ । एते कृतसमासा निपात्यन्ते । एकोत्तरा दश, एकं च दश च वा एकादश, षोडश । एवं षड् दन्ता अस्य षोडन्, षड्भिः प्रकार: षोढा षड्ढा वा। (५०१) द्विव्यष्टानां द्वात्रयोऽष्टाः प्राक् शतादनशीति बहुव्रीहौ ॥३।२।६५॥ द्वयादीनां द्वादय प्रादेशाः स्युः प्राक् शतात् संख्यायामुत्तरपदे अशीति बहुव्रीहिसमासविषयं चोत्तरपदं वर्जयित्वा । द्वाभ्यामधिका दश, द्वौ च दश चेति वा द्वादश । एवं त्रयोदश, अष्टादश । प्राक् शतादिति किम्-द्विशतम् । अनशीति बहुव्रीहाविति किम्-द्वयशीतिः, द्वौ वा त्रयो वा द्वित्राः । (५०२) चत्वारिंशदादौ वा ॥३।२।६६ । द्वाचत्वारिंशत्, द्विचत्वारिंशत्, त्रयश्चत्वारिंशत्, त्रिचत्वारिंशत्, अष्टाचत्वारिंशत्, अष्टचत्वारिंशत् । (५०३) खित्यनव्ययस्वरान्तारुषां मुम् ह्रस्वश्च ॥३।२।१३६ । अव्ययवजितस्वरान्तस्य अरुषश्च मुमागमः स्यात् यथाप्राप्तहस्वश्च खिदन्ते परे। कालिमन्या, हरिणि मन्या, मेघंकरः, प्रियंवदः, अरंतुदः ।
९६
कालुकौमुदी-पूर्वार्ध
(५०४ ) कृत्येऽवश्यमो लोपः ।।३।२ । १४७ ।
कृत्यप्रत्ययान्ते परे अवश्यमो लोप: स्यात् । · अवश्यकार्य स्तुत्यं
देयं कर्तव्यं करणीयं वा। कृत्ये इति किम्- अवश्यंलावकः ।
(५०५) समो हितततयोर्वा ।। ३।२।१४८ ।
सहितम्, संहितम्, सततम्, सन्ततम् ।
(५०६) काममनसोस्तुमश्च ॥ ३ । २ । १४६ ।
कर्तुकामः, हर्तुमनाः, सकामः, समनाः ।
(५०७ ) अन्यस्य दुगीयकारके ।। ३ । २ । १५५ ।
ईयप्रत्यये कारकशब्दे च परे अन्यस्य दुगागमः स्यात् ।
.
अन्यस्य
कारकः-अन्यत्कारकः ।
(५०८) अर्थे वा ।।३।२। १५७ ।
अन्यदर्थः, अन्यार्थः ।
(५०६ ) हग्क्षेषु ।। ३ । २ । १३३ ।
दृगादिषु परेषु समानस्य सः स्यात् । सदृक, सदृशः, सदृक्षः ।
(५१० ) अन्यत्यदादेराः ।। ३।२। १३४ ।
अन्यस्य त्यदादेश्च प्राकारादेशः स्यात् दृगादिषु परेषु । अन्यादृक्,
अन्यादृशः, अन्यादृक्षः । एवं तादृक्, यादृक्, त्वादृक, मादृक्, भवादृक् ।
अदसोऽनेनात्वे मादुवर्णोऽनु इति दीर्घ ऊकारे च। अमूदृक् ।
( ५११ ) किमिदमोः कीशीशौ।।३।२। १३५ ।
अनयोगादिषु परेषु कीशीशौ स्तः । कीदृक्, कीदृशः, कीदृक्षः ।
ईदृक्, ईदृशः, ईदृक्षः।
(५१२ ) तस्करादयश्चोरादिषु ॥३ । २ । १५६ ।
समास-प्रकरणम् - एते चोरादिष्वर्थेषु निपात्यन्ते । तस्करश्चोरः, वृहस्पतिर्देवता । अन्यत्र तत्करः, वृहत्पतिः । (५१३) पृषोदरादयः॥३।२। १५८ । पृषोदरादयः शब्दा निपातनात् सिध्यन्ति । पृषदुदरे अस्य- पृषोदरः, जीवनस्य मृतः-जीमूतः, वारिणो वाहक:-बलाहकः, मह्यां रौतीति मयूरः, हिनस्तीति सिंहः, भ्रमन् रौतीति भ्रमरः । वर्णागमो वर्णविपर्ययश्च, द्वौ चापरौ वर्णविकारनाशौ । धातोस्तदर्थातिशयेन योग- स्तदुच्यते पञ्चविधं निरुक्तम् ॥ १ ॥ वर्णागमाद् भवेद्धसः, सिंहो वर्णविपर्ययात् । गूढोत्मा वर्णविकृते-वर्णनाशात् पृषोदरः ॥ २॥ वर्णनाशविकाराभ्यां, धातोरतिशयेन यः । योगस्तदुच्यते प्राज्ञ-मयूरभ्रमरादिषु ॥ ३ ॥ इति समासेषु समासाश्रयविधिः इति समास-प्रकरणम् अथ तद्धित-प्रकरणम् तद्धितेषु अपत्याधिकारः (५१४) तद्धिताः ॥ ६ ।२।१। इतो वक्ष्यमाणाः प्रत्ययास्तद्धितसंज्ञका: स्युः । (५१५) प्राग्दीव्यतेरण् ॥६।२।१४ । तेन दीव्यतीत्यतः प्राग् अण् अधिक्रियते । (५१६) तस्यापत्ये ॥ ६।२।३१ । षष्ठयन्तानाम्नोऽपत्येऽर्थे अणादयः प्रत्ययाः स्युः। भानोः अपत्य- मिति विग्रहे। (५१७) उवर्णस्यास्वयंभुवोऽव् ॥ ८।४। ६६ । स्वयंभूवजितस्योवर्णान्तस्य अपदस्य तद्धिते परे अव् स्यात् । दशरथस्यापत्यम् । (५१८) अत इम् ।। ६।२ । ३४ । अदन्तात् षष्ठयन्तादपत्यार्थे इञ् स्यात् । (५१६ ) वृद्धिः स्वराणामादेणिति तद्धिते ।। ८।४।१। भानवः ।
तद्धित-प्रकरणम् स्वराणां मध्ये आदिस्वरस्य वृद्धिः स्यात् जिति णिति च तद्धिते परे। दाशरथिः। (५२०) शिवादेरण ॥६।२।४२ । शैवः, प्रौष्ठः। (५२१ ) ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यः ।। ६।२४४। ऋष्यादिवाचिभ्योऽपत्ये अण् स्यात् । वाशिष्ठः, श्वा फल्कः, वासुदेवः, नाकुलः। (५२२) कन्यायाः कनीनश्च ।। ६ । २।४६ । कन्याया अपत्यम्-कानीनः, व्यासः कर्णों वा। (५२३) गोत्रे बिदादेः पौत्रादौ ।। ६।२। ५६ । बिदादिभ्यो गोत्रे पौत्रादावपत्ये अन स्यात् । बिदस्य पौत्राद्य- पत्यम्-बंदः, काश्यपः। ( ५२४ ) गर्गादेर्यम् ॥ ६।२। ५७ । गोत्रे एव । गार्य:, वात्स्यः । (५२५ ) यमनोऽश्यापर्णान्तगोपवनादेः॥६।२। १३६ । गोत्रेऽर्थे बहुत्वे वर्तमानयोः या, अञ इत्येतयोलक् स्यात् अस्त्रियां न तु श्यापणान्तगोपवनादिभ्यः। गर्गाः, बिदाः। गोपवना- दिबिदाद्यन्तर्गणस्तद्वर्जनान्नेह-गौपवनाः, श्यापरः। अस्त्रियामिति किम्-गार्यः स्त्रियः। (५२६ ) नडादिभ्य आयनण् ।। ६ । २।६८ । नाडायनः, चारायणः। सर्वत्र अनन्तरापत्ये तु इओव। बैदिः, गार्गिः, नाडिः।
१००
कालुकौमुदी-पूर्वा
(५२७ ) द्विस्वरादनद्याः ॥६।२।८६ ।
द्विस्वरात् स्त्रीप्रत्ययान्तादनद्यादपत्ये एयण् स्यात् । दात्तेयः,
गौप्तेयः।
अनद्या इति किम्-संप्रः।
(५२८ ) क्षुद्राभ्यो वा ॥६।२ । १०४ ।
अङ्गहीनाः शीलहीना वा स्त्रियः क्षुद्राः। ताभ्योऽपत्ये एरण् वा
स्यात् । पक्षे पूर्वेण एयण-काणेरः, काणेयः, दासेरः, दासेयः ।
(५२६ ) स्वसुरीयः ॥ ६ ।२।१०६ ।
स्वस्नीयः।
(५३०) भ्रातुर्व्यश्च ॥ ६।२ । १०७ ।
चादीयः। भ्रातृव्यः, भ्रात्रीयः ।
(५३१) श्वशुरायः ॥६।२।११४ ।
श्वशुर्यः।
(५३२ ) राज्ञो जातौ ॥ ६ । १ । ११५ ।
राजन् शब्दादपत्यऽर्थे यः स्याज्जाती। नो पदस्येति टेलोपे
प्राप्ते ।
(५३३) अनोऽट्य ये ॥८।४।५२ ।
अन्नन्तस्य टेलोपो न स्यात् ट्यवजिते ये परे ।
राजन्यः । अन्यत्र
*राजनः।
(५३४) क्षत्रादियः॥६।२।११६ ।
जातावेव । क्षत्रियो जातिश्चेत् । क्षात्रिरन्यः ।
(५३५) मनोर्याणौ षुक् च ।। ६ । २।११७ ।
* अणीति टिलोपो न ।
तद्धित-प्रकरणम्
-
मनुशब्दादपत्ये याणी स्तः अस्य षुगागमश्च जाती। मनुष्यः,
मानुषः। जाताविति किम्-मानवः ।
(५३६ ) इतोऽनिमः ॥६।२।१०।
इअन्तजितात् द्विस्वरादिदन्तात् अपत्ये एयण् स्यात् । नाभेस
आहेयः। इत इति किम्-दाक्षिः।
(५३७ ) कुलादीनः ॥६।२। ११६ ।
कुलादपत्ये ईनः स्यात् । कुलीनः, राजकुलीनः ।
(५३८) दुष्कुलादेयण ॥६।२। १२२ ।
Fol
अस्मादपत्ये एयण् वा स्यात् । पक्षे ईनः। दोक्लेस)
दुष्कुलीनः।
(५३६) प्राग्वतोऽग्निकलेरेयण्॥ ६ । २ । २७ JPER
वतः प्राग येऽर्थास्तेषु अग्निकलिभ्यामेयण् स्यात् । अग्रपत्यम्-
आग्नेयः, कालेयः ।
IFPIBE
(५४०) स्त्रीपुंसाभ्यां न स्नौ ॥ ६।२।२।।
प्राग्वतोऽर्थे आभ्यां नत्र स्नो स्तः । स्त्रिया अपत्यम् +ram
पौंस्नः।
vgy)
(५४१) गोः स्वरे यः॥ ६ । २ । ३७ FIR iPy
गोशब्दात् स्वरादितद्धितप्रसङ्गे यः स्यात् । PEETS FIT
(५४२) येऽयकि॥ १।२।५ (58)
यग्वजिते येप्रत्यये परे प्रोकारौकारयोः अव, प्रालित्यापोस्तः ।
गोरपत्यम्-गव्यः।
, IFFIFE का
इति-अपत्याधिकारः। IFai
कालुकौमुदी-पूर्वा
अथ रक्ताद्यर्थाधिकारः
(५४३) तेन रक्ते रागात् ॥ ६।३।१।
रज्यतेऽनेनेति रागः । तृतीयान्तात् रागवाचिनो रक्तेऽर्थे अणादयः
स्युः । कुसुम्भन रक्तम्-कौसुम्भम्, हारिद्रम्, कोङ्क मम् । रागादिति
किम्-देवदत्तेन रक्तम् ।
(५४४ ) तस्य समूहे ॥ ६ । ३ । १० ।
षष्ठयन्तात् समूहेऽर्थे अणादयः स्युः।
काकानां समूहः-काकम्,
बाकम्, शौकम्, यौवतम्, स्त्रणम्, पौंस्नम्, गव्यम् ।
(५४५) गोत्रोक्षोष्ट्रोरभ्रराजराजन्यराजपुत्रवत्साजमनुष्यवृद्धादकम्
॥६।३।१३।
गोत्रप्रत्ययान्तात् उक्षादेश्च तस्य समूहे अका स्यात् ।
(५४६ ) तद्धितेऽनातियस्वरे॥ ८।४ । ७८ ।
हसात्परस्याऽपत्ययकारस्य लोप: स्यात् यकारे आवजिते स्वरे च
तद्धिते। गर्गाणां समूहः-गार्गकम्, प्रोक्षकम्, औष्ट्रकम्, औरभ्रकम्,
राजकम्।
(५४७) राजन्यमनुष्ययूनामके ।। ८।४।५१ ।
एषां प्राप्तो लोपो न स्यात् अके परे। राजन्यकम्, राजपुत्रकम्,
वात्सकम्, आजकम्, मानुष्यकम्, वार्धकम् ।
(५४८) कवचिहस्त्यचित्ताच्चेकण् ॥ ६।३ । १५ ।
कवचिन्, हस्तिन् इत्येताभ्यामचित्तवाचिभ्यःकेदाराच्च समूहे इकरण
स्यात् । कवचिनां समूहः-कावचिकम्, हास्तिकम्, आपूपिकम्,
कैदारिकम् ।
तद्धित-प्रकरणम्
(५४६ ) धेनोरनमः ॥ ६।३। १६ ।
अन पूर्वाद्धेनशब्दात्समूहे इकण् स्यात् ।
(५५० ) भृवर्णोवणेसुर्दोभ्य इकस्येतः ॥८।४। ८० ।
ऋवर्ण, उवर्ण, इस्, उस्, इत्येतदन्तात् दोषशब्दाच्च परस्य
इकस्येकारस्य लोप: स्यात् । धेनूनां समूहः-धनुकम् ।
(५५१) अश्वादीयो वा ॥६।३।२०।
अश्वीयः । पक्षे अण्-प्राश्वम् ।
(५५२) ग्रामजनबन्धुगजसहायेभ्यस्तल् ॥ ६ । ३ । २६ ।
ग्रामता, जनता, बन्धुता, गजता,
सहायता। लित्वात्
स्त्रीत्वम् ।
(५५३ ) विकारे ।। ६ । ३ । ३३ ।
षष्ठयन्तात् विकारेऽर्थे यथाविहितः प्रत्यय: स्यात् । सुवर्णस्य
विकार:-सौवणं कुण्डलम् ।
(५५४ ) पितृमातृभ्यां व्यडुलौ भ्रातरि ।।६।३ । ३० ।
प्राभ्यां भ्रात्रर्थे व्यडली स्तः। पितुर्धाता-पितृव्यः, मातुर्धाता-
मातुलः।
(५५५) पित्रोर्डामहट् ॥ ६।३। ३१ ।
प्राभ्यां पितृमात्रोरर्थयोर्डामहट् स्यात् । पितुः पिता माता वा-
पितामहः, पितामही, मातुः पिता माता वा-मातामहः, मातामही ।
(५५६ ) गाः पुरीषे ॥ ६ । ३ । ५२ ।
गोशब्दात् पुरीषेऽर्थे मयट् स्यात् । गो: पुरीषम्-गोमयम् ।
(५५७) पुरुषात् कृतहितवधविकारसमूहेष्वेयन् ॥ ६ । ३६४ ।
--
१०४
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
पुरुषेण कृतः-पौरुषेयो ग्रन्थः, पुरुषाय हितम्-पौरुषेयं पथ्यम्,
पुरुषाणां वधः, विकारः, समूहो वा-पौरुषेयः ।
(५५८) निष्फले तिलात् पिञ्जपेजौ ॥ ६।३। ६५ ।
निष्फलस्तिल:-तिलपिञ्जः, तिलपेजः।
(५५६) सास्य देवता ॥ ६।३ । ६६ ।
प्रथमान्तात् षष्ठयर्थे यथाविहितः प्रत्ययः स्यात् यत्प्रथमान्तं देवता
चेत् स्यात् । जिनो देवताऽस्य स जैनः। एवं शैवः, बौद्धः, आग्नेयः ।
(५६०) ऋतुवायुपित्रुषसो यः ॥६।३ । ७३ ।
ऋतुर्देवता अस्य-ऋतव्यम्, वायव्यम् ।
(५६१) भृतो रस्तद्धिते ये ॥ १।२। ३३ ।
ऋतो रेफादेशः स्यात् तद्धिते ये परे। पित्र्यम्, उषस्यम् ।
(५६२) तद्वत्त्यधीते ॥ ६।३। ८५ ।
द्वितीयान्तात् वेत्ति, अधीते इत्यर्थयोर्यथाविहितः प्रत्यय: स्यात् । सूत्र
वेत्त्यधीते वा-सौत्रः, व्याकरणं वेत्त्यधीते वेत्यत्रादिस्वरस्य वृद्धिप्रसङ्गे।
(५६३ ) संधिय्वोरैडौट च ॥ ८।४।२३ ।
संधिजाभ्यां यकारवकाराभ्यां परस्यादिस्वरस्य प्राप्ता वृद्धिर्न
स्यात् किन्तु तयोः ऐट्, औट् इत्यागमो स्तः। वैयाकरणः ।
(५६४) न्यायादेरिकण् ॥ ६।३। ८६ ।
नैयायिकः, नैमित्तिकः, मौहूर्तिकः ।
(५६५) तेन छन्ने रथे ॥ ६ । ३। ६६ ।
तृतीयान्तात् छन्ने रथेऽर्थे यथाविहितः प्रत्ययः स्यात् । वस्त्रेण
छन्नो हम वास्त्रः, काम्बलः।
तद्धित-प्रकरणम्
(५६६) अणि ॥ ८।४।५३ ।
अन्नन्तस्य टेर्लोपो न स्यात् तद्धिते अणि परे। चर्मणा छन्नो
रथ:-चार्मणः।
(५६७ ) संस्कृते भक्ष्ये ।। ६ । ३ । १०७ ।
सप्तम्यन्तात् संस्कृते भक्ष्ये अण् स्यात् ।
(५६८) द्विगोरनपत्ये यस्वरादेलुंगद्विः॥ ६ । २।२६ ।
अपत्यादिन्यस्मिन् प्राग् दीव्यतीयेऽर्थे उत्पन्नस्य द्विगो: परस्य
यकारादेः स्वरादेश्च प्रत्ययस्य सकुल्लुम् भवति । पञ्चसु कपालेषु
संस्कृत:-पञ्चकपालः ।
इति रक्ताद्यर्थाधिकारः।
अथ शेषाधिकारः
(५६६) शेषे ॥ ६।४।१।
उक्तादन्यः शेषः।
अत ऊध्वं यान् प्रत्ययान् वक्ष्यामस्ते शेषेऽर्थे
वेदितव्याः।
(५७०) राष्ट्रादियः ।। ६।४।२।
राष्ट्रे जातः, भवः, क्रीतः, कुशलो वा-राष्ट्रियः ।
(५७१) ग्रामादीनञ् च ॥ ६।४।५।
अस्माच्छेषेऽर्थे ईनन चाद्यश्च प्रत्ययौ स्तः। ग्रामीणः, ग्राम्यः ।
(५७२ ) नद्यादेरेयण ॥ ६।४।६।
नादेयः, माहेयः ।
(५७३) कामेहत्रतसस्त्यप् ॥ ६ । ४ । १५ ।
१०६ कालुकौमुदी-पूर्वाधं एभ्यः शेषेऽर्थे त्यप् स्यात् । क्वत्यः, अमात्यः, इहत्यः, कुत्रत्यः, यत्रत्यः, कुत्तस्त्यः, ततस्त्यः । (५७४) दक्षिणापश्चात्पुरसस्त्यण् ।। ६।४।१०। दाक्षिणात्यः, पाश्चात्त्यः, पौरस्त्यः । (५७५) णोऽरण्यात् ॥ ६।४ । २१ । आरण्याः पशवः। (५७६ ) भन तोरिकणीयसौ ॥ ६।४।३०। भवत्शब्दात् शेषेऽर्थे इकणीयसौ स्तः । (५७७ ) तोऽशश्वदकस्मात् ॥ ८।४। ८१ । शश्वदकस्मार्जितात् तान्तात्परस्य इक इकारस्य लोप: स्यात् । भवतः इदम्-भावत्कम्, भवदीयम् । सकारो नामसिदय हसे इति पद- त्वार्थः। (५७८ ) परजनराज्ञोऽकीयः।। ६।४ । ३१ । परकीयः, जनकीयः, राजकीयः। (५७६ ) संज्ञावृद्धं वा॥ ६।२।६। या संज्ञा व्यवहाराय नियुज्यते सा वृद्धसंज्ञा वा स्यात् । (५८०) त्यदादिः।। ६ । २।१०। त्यदादिगणो वृद्धसंज्ञः स्यात् । (५८१) वृद्धादीयः॥ ६ । ४ । ३२ । वृद्धसंज्ञकाच्छेषेऽर्थे ईय: स्यात् । चैत्रीयः, मंत्रीयः, तदीयः यदीयः । १५४२) गहादिभ्यः ॥ ६।४। ६५ ।
तद्धित-प्रकरणम् १०७ गहीयः । अन्यस्य दुगागमे अन्यदीयः, स्वकात्-स्वकीयः, देवकात् ---देवकीयः। (५८३ ) वा युष्मदस्मदोऽजीनगौ युष्माकास्माकौ च ॥६४।६।। युष्मदस्मद्भ्यां शेषेऽर्थे अभीनधी वा स्तः, अनयोर्युष्माक, अस्माक इत्यादेशौ च । युवयोर्युष्माकं वा इदम्-यौष्माकम्, यौष्माकीणम् । पक्षे युष्मदीयम् । आस्माकम्, प्रास्माकीनम्, अस्मदीयम् । (५८४) तवकममकावेकत्वे ।। ६ । ४।७० । एकत्वे अधीनधौ वा स्त: अनयोस्तवकममको च । तावकम्, ताव- कीनम् । पक्षे त्वदीयम् । मामकम्, मामकीनम्, मदीयम् । (५८५) अन्तादिमध्यान्मः ॥ ६।४।७६ । अन्तमः, आदिमः, मध्यमः । (५८६ ) पश्चादप्रान्तादिमः ॥ ६।४।७८ । एभ्यः शेषेऽर्थे इमः स्यात् । (५८७ ) अनाराच्छश्वस्पृथगोऽव्ययस्य ॥ ८।४।६६ । आरादिवर्जितस्य अव्ययस्य टेर्लोपः स्यात् तद्धिते परे । पश्चिमः, अनिमः, अन्तिमः। (५८८ ) वर्षाकालेभ्य इकण्॥६।४ । ८१ । वार्षिकः, मासिकः, सांवत्सरिकः, देवसिकः । (५८६) ऋतुनक्षत्रसंध्यादेरण् ॥ ६ । ४ । ८६ । एभ्यः शेषेऽर्थे अण् स्यात् । पूर्वापवादः । ग्रीष्मे भवः-प्रेष्मः, . वासन्तः। (५६०) तिष्यपुष्ययोनक्षत्रेऽणि ॥ ८।४।७६ ।
कालुकौमुदी-पूर्वार्ध
नक्षत्रवाचिनोरनयोर्यस्य लोप: स्यात् अणि परे । तिष्ये भवः-तैषः,
पौषः, सन्ध्यायां भवः-सान्ध्यः ।
(५६१) तत्र जाते॥७॥१।१।
सप्तम्यन्ताज्जातेऽर्थे यथाविहितं प्रत्ययाः स्युः। सुघ्ने जात:-सोनः,
माथुरः, आग्नेयः, कालेयः, स्त्रणः, पौंस्नः, राष्ट्रियः, ग्रामीणः, ग्राम्यः ।
(५१२) कृतलब्धक्रीतसंभूतेषु ।।७।१।१७
सप्तम्यन्तात् कृतादिष्वर्थेषु यथाविहिताः प्रत्ययाः स्युः । सुघ्ने कृतो,
लब्धः, क्रीतः, संभूतो वा-स्रोघ्न इत्यादि ।
(५६३) कुशले ॥७।१।१८ ।
स्रुध्ने कुशल:--स्रोघ्नः, माथुरः ।
(५६४) भवे ॥७।३। ३१ ।
स्रुध्ने भवः-लौघ्नः, माथुरः ।
(५६५) दिगादेयः ।।७। १ । ३२ ।
दिशि भवो-दिश्यः, वर्यः, आद्यः, अन्त्यः ।
(५६६) शरीरावयवात् ॥७।१।३३।
दन्ते भव:-दन्त्यः, कर्ण्यः, प्रोष्ठ्यः, मुख्यः मूर्धन्यः ।
(५६७ ) दृतिकुक्षिकलशिवस्त्यहेरेयण ॥७।१ । ३५ ।
दातेयं जलम्, कौक्षयो व्याधिः, कालशेयं तक्रम्, वास्तेयं मूत्रम्,
| आहेयं विषम् ।
(५६८) मध्यादिनण्णेया मुम् चास्य ॥७।१।४८।
अस्मात् भवेऽर्थे दिनण, ण, ईय इत्येते प्रत्ययाः स्युः, अस्य मुमाग.
मश्च । मध्ये भव:--माध्यन्दिनः, माध्यमः, माध्यमीयः।
तद्धित-प्रकरणम्
(५६E ) ईयो मत्वर्थजिह्वामूला लिभ्यश्च ।।७।१।४६ ।
एभ्यो मध्यशब्दाच्च भवेऽर्थे ईयः स्यात् । मत्वर्थीयः, जिह्वामूलीयः,
अङ्ग लीयः, मध्यीयः।
(६००) वर्गान्तात् ॥७।१।५० ।
कवर्गीयः, पवर्गीयः।
(६०१) प्रभवति ॥७।१।६६ ।
पञ्चम्यन्तात् प्रभवतीत्यर्थे यथाविहितं प्रत्ययाः स्युः। हिमवतः
प्रभवतीति हैमवती गंगा।
(६०२) अधिकृत्य कृते गन्थे ॥७॥१।७४ ।
द्वितीयान्तात् अधिकृत्य कृते ग्रन्थेऽर्थे यथाविहितं प्रत्ययाः स्युः ।
सुभद्रामधिकृत्य कृतो ग्रन्थ:-सौभद्रः, सौतारः, भाद्रः ।
(६०३) तेन प्रोक्त ॥७।१।६१ ।
तृतीयान्तात् प्रोक्तेऽर्थे यथाविहितं प्रत्ययाः स्युः । गणधरेण प्रोक्तम्
--माणधरं द्वादशाङ्गम् ।
(६०४ ) कृते ॥७।१।१०६ ।
शिवेन कृतो ग्रन्थः-शेवः, सिद्धसेनीयः स्तवः, इष्टकाभिः कृतः
प्रासाद:-ऐष्टकः।
(६०५) तस्येदम् ॥७॥१। ११२ ।
षष्ठयन्तादिदमर्थे यथाविहितं प्रत्ययाः स्युः। भैक्षवम्, स्रोधनम्,
माथुरम्, आग्नेयम्, स्त्रणम्, पौंस्नम्, गव्यम्, नादेयम्, स्वस्येदम्-
सौवम्, दैवम् ।
इति शेषाधिकारः
-
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
अथ इकणधिकारः
t
(६०६) इकण ॥ ७ ॥२।१।
इत इकणधिकारो वेदितव्यः ।
(६०७) तेन दीव्यतिखनतिजयतिजितेषुः ॥ ७।२।२।
तृतीयान्ताद्दीव्यत्यादिष्वर्थेषु इकण् स्यात् । अक्षदीव्यति-आक्षिकः,
कुद्दालेन खनति-कौद्दालिकः, अक्षर्जयति-आक्षिकः, अजितम् -
आक्षिकम् ।
(६०८) संस्कृते॥७॥२।८।
दधना संस्कृतम्-दाधिकम्
(६०६) तरति ॥७।२।१०।
गोपुच्छेन तरति-गौपुच्छिकः, औडुपिकः।
(६१०) नौ द्विस्वरादिकः ॥७। २ । ११ ।
नाविकः, बाहुकः।
(६११) चरति ॥ ७।२ । १२ ।
हस्तिना चरति हास्तिकः, शाकटिकः ।
(६१२) पादेरिकट् ॥ ७।२।१३ ।
पण चरति-पपिकः, पपिकी, अश्विकः, रथिकः ।
(६१३) पक्षिमत्स्यमृगाख्येभ्यो हन्ति ।। ७ । २ । ३८ ।
आख्यशब्देन स्वरूपस्य पर्यायाणां विशेषाणां च ग्रहणम् । द्विती-
यान्तेभ्यः पश्यादिवाचिभ्यो हन्तीत्यर्थे इकण् स्यात् । पक्षिणो हन्ति-
। १२
-
* येन पीठेन पङ्गवश्चरन्ति स पर्पः।
-
तद्धित-प्रकरणम्
पाक्षिकः, शाकुनिकः, मात्स्यिकः, मैनिकः, मार्गिकः, हारिणिकः ।
(६१४) धर्माधर्माभ्यां चरति ।।७।२।४३।
धर्म चरति-धार्मिकः, पार्मिकः ।
(६१५) निकटादिषु वसति ॥ ७।२।८२ ।
एभ्यः सप्तम्यन्तेभ्यो वसतीत्यर्थे इकण् स्यात् । निकटे वसति-
नेकटिको भिक्षुः, वाक्षमूलिकः, श्माशानिकः ।
(६१६) सतीर्थ्यः॥ ७।२।८३ ।
समान तीर्थे वसतीति सतीथ्यः ।
(६१७) मूल्यैः क्रीते ॥७।२ । १०५ ।
तृतीयान्तान्मूल्यवाचिनः क्रीतेऽर्थे यथाविहितं प्रत्ययाः स्युः ।
प्रस्थेन क्रीतम्-प्रास्थिकम्, साप्ततिकम् ।
(६१८) अर्हति ॥ ७।२। १३२ ।
द्वितीयान्तादहतीत्यर्थे यथोक्तं प्रत्ययः स्यात् । छत्रमर्हति-छात्रिका,
चामरिकः, वास्त्रिकः।
(६१६ ) शोभते ।। ७।२ । १७३ ।
तृतीयान्तात् शोभते इत्यर्थे इकण् स्यात् । आचार्येण शोभते-
आचायिकः, शीलेन शोभते-शैलिकी सीता।
इति-इकणधिकारः
अथ यादिप्रत्ययाधिकारः
(६२०) तत्र साधौ॥ ७।३। १५ ।
तत्रेति सप्तम्बन्तात् साधावणे यः स्यात् । कर्मणि साधुः कर्मण्यः,
सभायां सभ्यः।
११२ कालुकौमुदी-पूर्वा (६२१) पर्षदो ण्यणौ ॥७।३ । १८ । पर्षदि साधुः-पार्षद्यः, पार्षदः । (६२२) कथादेरिकण ॥७।३।२१ । कथायां साधु:-काथिकः, वैकथिकः । (६२३) तस्मै हिते॥७।३।३।। चतुर्य्यन्तात् हितेऽर्थे ईयः स्यात् । वत्साय हितः वात्सीयः, पित्रीयः, मात्रीयः, गव्यम्, स्वस्मै हितम्-स्वीयम् । (६२४) गरीरावयवाधः।।७।३।३७ । दन्त्यम्, कर्ण्यम् । (६२५) अजाविभ्यां थ्यः॥७।३ । ३६ । प्रजेभ्यो हितम्-अजथ्यम्, अविथ्यम् । नामग्रहणे लिङ्गविशिष्ट- स्यापि ग्रहणात् अजाभ्यो हितमित्यत्र तु। (६२६) मानिक्यकतखतरतमचरट्कल्पदेश्यरूपपाशथ्येथट्थट्- तिथटप्लुक्षु ॥३।२।४६ । मानिनि क्यादि च परे भाषितपुंस्कादनूङः स्त्रियाः पुंवत् स्यात् । अजथ्यम् । इति यादिप्रत्ययाधिकारः। अथ भावकर्मार्थाः (६२७ ) तस्याहे क्रियायां वत् ॥ ७ । ३ ५२ । षष्ठयन्तादर्हेऽर्थे वत् स्यात् अहं चेत् क्रिया स्यात् । साधोरह साधुवत् वृत्तमस्य साधोः। (६२८) स्यादेरिवे ॥७।३।५३ ।
तद्धित-प्रकरणम् ११३ स्याद्यन्तादिवाथै बत् स्यात् तच्चत् सादृश्यक्रियाविषयः स्यात् । अश्ववद् धावति चैत्रः, देववत् पश्यति मुनिम् । (६२६) तत्र ।।७।३।५४ । सप्तम्यन्तादिवार्थे वत् स्यात् । मथुरायामिव-मथुरावत् पाटलिपुत्रे प्रासादाः। (६३०) तस्य ॥७।३।५५ । षष्ठ्यन्तादिवार्थे वत् स्यात् । चैत्रस्येव-चैत्रवत् मैत्रस्य गावः । (६३१ ) भावे त्वतलौ॥७।३। ५६ । षष्ठयन्ताद् भावेऽर्थे त्वतलो स्तः। शब्दस्यार्थे प्रवृत्तिहेतुर्गुणो भावः। गोशब्दस्य भावः-गोत्वम्, गोता, शुक्लत्वम्, शुक्लता, कारक- त्वम्, कारकता, दण्डित्वम्, दण्डिता। (६३२) पृथ्वादेरिमन् वा॥७।३ । ५६ । एभ्यो भावेऽर्थे इमन् वा स्यात् । (६३३) पृथुमृदुभृशकृशदृढपरिवृढस्य ऋतो रः ॥ ८।४।४६ । एषामृकारस्य रेफ: स्यात् इमनिजीष्ठेयस्सु च परेषु । (६३४) टेः॥ ८।४।४४ । टेलोप: स्यात् इमनिजीष्ठेयस्सु च परेषु । पृथोर्भाव:-प्रथिमा। पक्षे यथाप्राप्त पृथुत्वम्, पृथुता। एवं प्रदिमा, मृदुत्वम्, मृदुता । प्रियस्य भाव इत्यत्र तु । (६३५) प्रियस्थिरस्फिरोरुगुरुबहुलतृप्रदीर्घह्रस्ववृद्धवृन्दारकाणामि- मन्यपि प्रस्थस्फवरगरबहत्रपद्राघहसवर्षवृन्दाः ॥ ८।४।३८ । प्रियादीनां यथासंख्यं प्रादयः आदेशाः स्युः यथासंभवमिमनिमी-
११४
कालुकोमुदी-पूर्वार्धे
ष्ठेयस्सु च परेषु । इति प्रादेशे, टेरिति टेलोपे प्राप्ते ।
(६३६) नैकस्वरस्य ॥ ८।४। ४५ ।
एकस्वरस्य टेलोपो न स्यात् इमनादिषु परेषु। प्रेमा, स्थिरस्य
स्थेमा, उरोर्वरिमा, गुरोर्गरिमा, बहुलस्य बंहिमा, तृप्रस्य अपिमा,
दीर्घस्य द्वाघिमा, हस्वस्य हसिमा, वृद्धस्य वर्षिमा, वृन्दारकस्य वृन्दिमा ।
(६३७) भू.पश्चेवर्णस्य ।। ८।४।४१ ।
बहोरीयसी इमनि च परे भूरादेशः स्यात् अनयोरिवर्णस्य लोपश्च ।
भूमा।
-
(६३८) वर्णदृढादिभ्यष्टयण च ॥७।३। ६० ।
वर्णवाचिभ्यो दृढादिभ्यश्च भावे ट्यण् इमन् च प्रत्ययो वा स्याताम् ।
शौक्लयम्, शुक्लिमा, शुक्लत्वम्, शुक्लता, कार्षण्यम्, कृष्णिमा,
कृष्णत्वम्, कृष्णता, दाढयम्, द्रढिमा, दृढत्वम्, दृढता, वैमत्यम्, विमतिमा,
विमतित्वम्, विमतिता इत्यादि ।
(६३६ ) पतिराजान्तगुणाङ्गराजादिभ्यः कर्मणि च ।। ७।३।६१।
एभ्यः कर्मणि भावे च ट्यण् स्यात् । अधिपतेः कर्म भावो वा---
आधिपत्यम्, नारपत्यम्, आधिराज्यम्, यौवराज्यम्, मौढयम्, वैदुष्यम्,
राज्यम्, काव्यम् वाणिज्यम् इत्यादि ।
(६४०) सखिदूतवणिग्भ्यो यः।। ७।३। ६४ ।
सख्युः कर्म भावो वा-सख्यम्, दूत्यम्, वणिज्यम् ।
(६४१) युवादेरण ।।७।३। ६८।
यौवनम्, स्थाविरम् ।
(६४२) लघुपूर्वाद् य्वृवर्णात् ॥ ७।३ । ७२ ।
ताद्धत-प्रकरणम् ११५ लध्वक्षरपूर्वादिवर्णान्ताद् उवर्णान्ताद् ऋवर्णान्ताच्च कर्मणि भावे चाण् स्यात् । मुनेः कर्म भावो वा----मौनम्, पाटवम्, पत्रम् । अधिकार- त्वात् पक्षे सर्वत्र त्वतलो। (६४३) त्विग्भ्य ईयः॥ ७ । ३ । ७७। मैत्रावरुणस्य कर्म भावो वा-मत्रावरुणीयम् । (६४४) ब्रह्मणस्त्वः ७।३। ७८ । पूर्वापवादः । ब्रह्मणो भावः कर्म वा-ब्रह्मत्वम् । इति भावकर्मार्थाः अथ क्षेत्राद्यर्थकाः (६४५) क्षेत्रे शाकटशांकिनौ ।। ७ । ३ । ७६ । इथूणां क्षेत्रम् ---- इक्षुशाक टम्, शाकशाकिनम् । (६४६) तेन वित्त चञ्चुचणौ ॥७।४ । १६ । तृतीयान्ताद्वित्तेऽर्थे चञ्चुचणौ स्तः। विद्यया वित्तो ज्ञात:-विद्या- चञ्चुः, विद्याचणः । (६४७ ) अवेः संघातविस्तारयोः कटपटौ॥७।४ । २५ । यथासंख्यं कटपटौ स्याताम् । प्रवीनां संघातः - अविकटः, प्रवीनां विस्तार:-अविपटः। (६४८) तदस्य सञ्जातं तारकादिभ्य इतः॥७।४ । ३१ । प्रथमान्तेभ्यस्तारकादिभ्यः षष्ठ्यर्थे इतः स्यात् तत् प्रथमान्तं सञ्जातं चेत् स्यात् । तारकाः सञाता अस्य-तारकितं नमः, पुष्पित- स्तरुः, बुभुक्षितः, पिपासितः । ।
११६
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
(६४६) प्रमाणान्मात्रट ।। ७।४। ३३ ।
प्रथमान्तात् प्रमाणवाचिन: षष्ठ्यर्थे मात्रट् स्यात् । जानुनी प्रमा-
णमस्य-जानुमात्र जलम्, जानुमात्री परिखा, रज्जुमात्री भूमिः।
(६५० ) ऊर्ध्व दन्नड्वयसटौ।।७।४।३५ ।
ऊर्ध्वप्रमाणवाचिनो दध्नड्वयसटौ वा स्तः । ऊरुःप्रमाणमस्य-ऊरु-
दघ्नम्, ऊरुद्वयसम्, ऊरुमात्र वा जलम् । ऊर्ध्वमिति किम्-रज्जुमात्री
भूमिः।
(६५१ ) इदं किमोऽतुरिकिय चास्य ।। ७।४।४१ ।
प्राभ्यां मानवृत्तिभ्यां मेयेऽर्थे अतुः स्यात् अनयोरिकियादेशौ च ।
इदं मानमस्य-इयान् पटः। किं मानमस्य-कियान् पटः ।
(६५२) यत्तदेतदो डावट् च ॥ ७।४।४२ ।
एभ्यः प्रथमान्तेभ्यो मानवृत्तिभ्यः षष्ठ्यर्थे प्रतुः स्यात् तस्य च
डावडागमः। यत्तदेतद्वा प्रमाणमस्य-यावान्, तावान्, एतावान् वा पटः ।
(६५३) यत्तत्किमः संख्याया डतिर्वा ।।७।४।४३ ।
संख्यारूपमानवृत्तिभ्यो यदादिभ्यः प्रथमान्तेभ्यः षष्ठ्यर्थे डतिर्वा
स्यात् । या, सा, का संख्या मानमेषाम् -यति, तति, कति । पक्षे यावन्तः,
तावन्त:, कियन्तः।
(६५४) अवयवात्तयत् ।। ७।४।४४ ।
संख्यावाचिनः प्रथमान्तादवयवे वर्तमानात् षष्ठ्यर्थे तयट् स्यात् ।
(६५५) ह्रस्वान्नामिनस्ते ।।२।२।३६ ।
हस्वान्नामिनः परस्य सस्य षः स्यात् तादो तद्धिते । चत्वारोऽवयवा
अस्य स चतुष्टयः, एवं पञ्चतयो यमः, दशतयो धर्मः, द्वादशतयःसिद्धान्तः ।
तद्धित-प्रकरणम्
११७
(६५६ ) द्वित्रिभ्यामयड्वा ।।७।४।४५।
द्वौ अवयवो अस्य-द्वयम्, द्वितयं वा तपः, त्रयम्, त्रितयं वा जगत् ।
(६५७ ) संख्यापूरणे डट् ॥७।४।४८ ।
संख्यावाचिनः संख्या पूर्यते येनेत्यर्थे डट् स्यात् । एकादशानां पूरण:
-एकादशः, द्वादशः, त्रयोदशी, चतुर्दशी।
(६५८) विंशत्यादेर्वा तमट् ।। ७।४।४६ ।
विंशतेः पूरण:-विंशतितमः। पक्षे डटि।
(६५६) विंशतेस्तेर्डिति ॥ ८।४।६८ ।
विंशतेस्तेर्लोपः स्यात् डिति तद्धिते । विंशः, त्रिंशत्तमः, त्रिंशः ।
(६६०) नोमट ।।७।४।५२ ।
असंख्यादेर्नान्तसंख्यायाः संख्यापूरणे मट् स्यात् । पञ्चमः, सप्तमः,
अष्टमः, नवमः, दशमः । असंख्यादेरिति किम्-एकादशः, द्वादशः ।
(६६१) द्वस्तीयः ।। ७।४।५५ ।
द्वितीयः।
(६६२) त्रेस्तु च ॥७।४। ५६ ।
तृतीयः।
(६६३) चतुरो येयौ च लोपश्च ॥ ७।४।५७ ।
तुर्यः, तुरीयः।
(६६४) षट्कतिकतिपयाच्च थट् ॥७।४।५८ ।
एभ्यश्चतुर्शब्दाच्च संख्यापूरणे थट् स्यात् । नामसिदयहसे इति
पदत्वे प्राप्ते ।
(६६५) थटि ॥१।१।२८॥
११८ कालुकौमुदी-पूर्वार्धे थटि परे पूर्व नाम पदसंज्ञं न स्यात् । पदत्वाभावाज्जबो न । षष्ठः, षष्ठी, कतिथः, कतिपयथः, चतुर्थः, चतुर्थी, अत्र विसर्गो न । इति क्षेत्राद्यर्थकाः। । अथ मत्वर्थीयाः (६६६) तदस्यास्मिन्नस्तीति मतुः ।।८।१।१। प्रथमान्तात् षष्ठ्यर्थे सप्तम्यर्थे वा मतुः स्यात् प्रथमान्तं तच्चेद- स्तीति स्वात् । गावोऽस्य सन्तोति गोमान्, तरवो यस्मिन् सन्तीति तरुमान् । (६६७ ) मावर्णान्तोपधातुः॥ ८।१।२ । मान्तात् मोपधात् अवर्णान्तादवर्णोपधाच्चास्त्यर्थे वतुः स्यात् । किंवान्, लक्ष्मीवान्, ज्ञानवान्, विद्यावान् । यशस्-वत् इत्यत्र नाम सिदयेति पदत्वाद् विसर्गे प्राप्ते । (६६८) नस्ते मत्वर्थे ।। १ । १ । २६ । सान्तं तान्तञ्च नाम मत्वर्थे परे पदसंज्ञं न स्यात् । यशस्वान्, भास्वान् । (६६६) झपात् ॥ ८।१।३। झपान्तादस्त्यर्थे वतुः स्यात् । तडित्वान्, मरुत्वान् । अत्रापि पद- त्वप्रतिषेधाद् जबत्वं न । (६७० ) अस्तपोमायामेधास्रजो विन् वा ॥ ८।१।६। असन्तेभ्यस्तपसादिभ्यश्च मत्वर्थे विन् वा स्यात् । यशस्वी, तपस्वी, मायावी, मेधावी, त्रग्वी । पक्षे यशस्वानित्यादि ।
तद्धित-प्रकरणम्
-
.
(६७१) नावादेरिकः॥८।१।१०।
इको वा स्यात् । नाविकः, नौमान् ।
(६७२) शिखादिभ्य इन् ॥ ८।१।११।
इन् वा स्यात् । शिखी, शिखावान्, माली, मालावान् ।
(६७३ ) ब्रीह्यादिभ्यस्तौ ।।८।१ । १२ ।
ताविति इकेनौ वा स्याताम् । व्रीहिकः, व्रीही, व्रीहिमान्, मायिक:
मायी, मायावान् ।
(६७४) अतोऽनेकस्वरात् ।। ८ । १।१३।
अकारान्तादने कस्वरात् मत्वर्थे इकेनौ वा स्तः । दण्डिकः, दण्डी,
दण्डवान्, छत्रिकः, छत्री, छत्रवान् । अत इति किम्-मालावान् ।
अनेकस्वरादिति किम्-खवान् ।
(६७५) न द्रव्यादिभ्यः॥ ८।४। १८ ।
द्रव्यादिभ्यो मत्वर्थे इकेनौ न स्तः ।
द्रव्यवान्, धान्यवान्,
पुण्यवान्।
(६७६ ) वातातीसारपिशाचानां कुक् च ।। ८ । १ । २८ ।
एभ्यो मत्वर्थे इन् स्यात् एषां कुगागमश्च । वातको, अतिसारकी,
पिशाचकी।
( ६७७ ) सुखादेः ।। ८।१।३० ।
सुखादिभ्यो मत्वर्थे इन्नेव स्यात् । सुखी, दुःखी ।
(६७८) वाच आलाटौ॥ ८॥ १।४६ ।
वाचो मत्वर्थे आलाटौ स्तः क्षेपे । वाचाल:, वाचाट।
(६७६) दन्तादुन्नतात् ॥८।१।१६ ।
१२०
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
अस्मात् डुरः स्यात् मत्वर्थे । उन्नता दन्ता अस्य-दन्तुरः । अन्यत्र
दन्तवान् ।
(६८०) कृपाहृदयाद्वालुः॥८।१।७४ ।
कृपालुः, हृदयालुः। पक्षे कृपावान्, हृदयवानित्यादि ।
(६८१) स्वामिन्नीशे॥८।१।८० ।
निपात्यते । स्वामी ईशश्चेत् । अन्यत्र स्ववान् ।
इति मत्वर्थीयाः।
अथ स्वार्थिकाः
(६८२) विनयादिभ्य इकण् ॥७।४। ८४ ।
एभ्यः स्वार्थे इकण् स्यात् । विनय एव वैनयिकम्, सामयिकम् ।
(६८३) प्रज्ञादिभ्यः ।।७।४। ८८ ।
एभ्यः स्वार्थे अण् स्यात् । प्रज्ञ एव प्राज्ञः, वणिगेव वाणिजः ।
(६८४) भेषजादिभ्यो यण् ॥७।४ । १४ ।
भेषजमेव भैषज्यम्, आनन्त्यम् ।
(६८५) चतुर्वर्णादिभ्यष्टयण ॥ ७।४। ६५ ।
चातुर्वर्ण्यम्, सामीप्यम्, माणिक्यम् ।
(६८६) देवात्तल् ॥७।४।१६।
देव एव देवता। लित्वात् स्त्रीत्वम् ।
(६८७) मृदस्तिकः ॥७।४।६७ ।
मृदेव मृत्तिका ।
(६८८) वर्णाव्ययात् स्वरूपे कारः।।७।४।६।
तद्धित-प्रकरणम् १२१ -- एभ्यः स्वरूपार्थवृत्तिभ्यः कारः स्यात् । अकारः, ककारः, ओङ्कारः, नमस्कारः, चकारः। (६८६) रादेफो वा ।। ७।४। १०० । रेफः, रकारः। (६६०) नामरूपभागेभ्यो धेयः॥ ७।४।१०१ । नामधेयम्, रूपधेयम्, भागधेयम् । (६६१) मादिभ्यो यः॥७।४ । १०२ । मत एव मर्त्यः, सूर्यः । (६६२) नवादीनतनत्नञ्च नू चास्य ।। ७।४ । १०३ । नवात् स्वार्थे ईन, तन, न, य इत्येते प्रत्ययाः स्युः नवस्य नू इत्या- देशश्च । * नवीनम, नूतनम्, नूनम्, नव्यम् । (६६३) प्रकारे जातीयः॥ ८।१।१२। प्रथमान्तात् षष्ठ्यर्थे जातीयः स्यात् तत्प्रथमान्तं प्रकारश्चेत् स्यात् । -पटुजातीयः, मृदुजातीयः। (६६४ ) जातीयदेशीययोः ॥ ३१२। ६२ । भाषितपुंस्कादनूङः स्त्रिया: पुंवत् स्यादनयोः परयोः। पट्वी प्रकारोऽस्या:-पटुजातीया । (६६५) भूतपूर्वे चरट् ॥ ६ । १ । ६५ । भूतपूर्व आढयः-प्राढयचरः, आढयचरी । (६६६) अहीयरुहोऽपादाने ॥ ८।१ । १०५ । अपादाने विहितपञ्चम्यन्तात् तसुः स्यात् तदपादानं हीयरुहोः * उवर्णस्यास्वयंभुवोऽव् । पटुः प्रकारोऽस्य-
१२२
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
सम्बन्धि न चेत् । ग्रामत आगच्छति, चोरतो बिभेति । अहीयरहोरिति
किम्-सार्थाद्धीनः, पर्वतादवरोहति ।
(६६७) किमद्वयादिसर्वाधवैपुल्यबहोस्तस् ।। ८ । १ । १०६ ।
एभ्यः पञ्चम्यन्तेभ्यस्तस् स्यात् । कस्मादिति किम् - तस् ।
(६६८) इतोऽतः कुतः ।।८।१ । १०७ ।
एते तसन्ता निपात्याः । निपातनात् कुतः । सर्वस्मादिति-सर्वतः,
विश्वतः।
(६६६) तसादिः स्यादिवत् ॥८।१ । १२१ ।
तसादयः थापर्यन्ताः प्रत्ययाः स्यादिवत् स्युः । स्यादित्वाट्टेरत्वम् ।
तस्मादिति-ततः, यतः, प्रस्मात्- इतः, एतस्मात्-अतः, बहुभ्यः-
बहुतः। बहोर्वैपुल्यप्रतिषेधः किम्-बड़ोः सूपात् ।
(७००) सप्तम्याः ॥ ८।१।११० ।
किमादिभ्यः सप्तम्यन्तेभ्यस्त्रः स्यात् ।
(७०१) कुत्रात्रककुहेह॥८।१।१११ ।
एते त्रान्ता निपात्याः ! कस्मिन्-कुत्र, क्व, कुह, सर्वस्मिन् - सर्वत्र,
तत्र, यत्र, एतस्मिन्---अत्र, अस्मिन्-इह ।
(७०२ ) किमन्यैकसर्वयत्तदः काले दा ॥ ८।१ । ११२ ।
एभ्यः सप्तम्यन्तेभ्यः कालेऽर्थे दा स्यात् । त्रापवादः। कस्मिन्
काले-कदा, अन्यदा, एकदा, सर्वदा, यदा, तदा ।
(७०३ ) सदाऽधुनेदानीं तदानीमेतहि ॥ ८।१ । ११३ ।
कालेऽर्थे एते निपात्याः । सर्वस्मिन् काले-सदा, अस्मिन् काले-
अधुना, इदानीम्, एतर्हि, तस्मिन् काले-तदानीम् ।
.
.
तद्धित-प्रकरणम् १२३ -- - , (७०४) प्रकारे था।८।१।११६ । सर्वेण प्रकारेण सर्वथा, यथा, तथा, अन्यथा । (७०५) कथमित्थम् ।।८।१ । १२० । एतौ प्रकारे निपात्यते । केन प्रकारेण- -कथम्, अनेन प्रकारेण- इत्थम् । (७०६) संख्याया धा ।।८।१ । १२२ । संख्यायाः प्रकारेऽर्थे धा स्यात् । एकधा, द्विधा, विधा, पञ्चधा । षोढा-षड्ढा इति तु निपातनात् । (७०७) डत्यतुसंख्यावत् ॥ १।१।५७ । डत्यन्तमत्वन्तञ्च नाम संख्यावत् स्यात् । कतिधा, कियद्धा, यतिधा, यावद्धा। (७०८) विचाले च ।। ८।१ । १२३ । द्रव्यस्य संख्यान्तरापादनं विचालस्तत्र प्रकारे च संख्याया था स्यात् । एक राशि पञ्चधा कुरु । (७०६ ) वैकाद् ध्यमुम् ।। ८ । १ । १२४ । एकशब्दात् प्रकारे विचाले च ध्यमुञ् वा स्यात् । एकेन प्रकारेण- ऐकध्यमेकधा वा भुङ्क्ते । अनेकमेकं करोति-ऐकध्यमेकधा वा करोति । (७१०) द्विवर्धमुधौ ॥८1१ । १२५ । आभ्यां प्रकारे विचाले च धमुधौ वा स्तः । द्वधम्, त्रैधम्, द्वेधा, धा। पक्षे-द्विधा, विधा। (७११ ) वारे कृत्वस् ।।८।१ । १२७ । - १२४ कालुकौमुदी-पूर्वार्धे संख्याया वारे कृत्वस् स्यात् । पञ्चवारं भुङ्क्ते-पञ्चकृत्वो भुङ्क्ते । एवं षट्कृत्वः, सप्तकृत्वः । (७१२ ) द्वित्रिचतुर्थ्यः सुचू ॥ ८॥१। १२८ । द्विवारमिति-द्विभुङ्क्ते विर्भुङ्क्ते, चतुर्भुङ्क्ते । (७१३) एकात् सकृचास्य ।। ८।१। १२६ । वारे सुच् स्यात् अस्य च सकृदादेशः। संयोगस्येति सलोपे । एकवारमिति-सकृद् भुङ्क्ते । (७१४) प्रकृष्ट तमः ।।८।२।१। नाम्नः प्रकृष्टेऽर्थे तमः स्यात् । अयमेषां प्रकृष्टः शुक्ल:-शुक्लतमः, साधकतमः, कारकतमः। (७१५) द्वयोविभज्ये च तरः॥८।२।२। द्वयोः प्रकृष्ट विभज्ये प्रकृष्टे च नाम्नस्तरः स्यात् । अयमनयोः प्रकृष्टः पटुः-पटुतरः, पाचकतरः, सांकाश्य केभ्यः पाटलिपुत्रका: आढय- तराः, अभिरूपतराः। (७१६ ) त्यादिकिमेदव्ययेभ्यस्ताभ्यामामद्रव्ये ॥८॥२।४। त्याद्यन्त, किम्, एदन्त, अव्यय इत्येतेभ्यः पराभ्यां तमतराभ्यामाम् स्यात् अद्रव्ये। पचतितमाम्, पचतितराम्, किन्तमाम्, किन्तराम्, अग्रेतमाम, अग्रेतराम, उच्चस्तमाम्, उच्चस्तराम् । एभ्य इति किम्- शीघ्रतरं गच्छति। अद्रव्य इति किम्-किन्तरं दारु । (७१७ ) गुणाङ्गादिष्ठेयसू तदर्थे वा ।। ८।२।५। गुणाङ्गे वर्तमानात् तमतरार्थे इष्ठेयसू प्रत्ययौ वा स्तः । तमार्थे इष्ठः, टेरिति टेर्लोपे-पटिष्ठः, पटुतमः । तरार्थे ईयसुः-पटीयान्, पटुतरः।
तद्धिव-प्रकरणम् १२५ (७१८) बहोर्नीष्ठे भूय् ॥ ८॥४।४० । बहोनीष्ठयोः परयोः भूय् इत्यादेशः स्यात् । भूयिष्ठः । भूर्लोप- श्चेति ईयसो-भूयान् । (७१६ ) प्रशस्यस्य श्रः ॥८।४।३४ । प्रशस्यशब्दस्य श्रादेशः स्यात् भीष्ठेयस्सु परतः । श्रेष्ठः, श्रेयान् । (७२०) वृद्धस्य च ज्यः ॥ ८।४।३५ । वृद्धस्य प्रशस्यस्य च ज्यादेशः स्यात् जीष्ठेयस्सु परतः। ज्येष्ठः । (७२१) ज़्यायान् ॥ ८।४।३६ । ईयसौ वृद्धप्रशस्ययोः ज्यादेशे ज्यायान् इति निपात्यते। ज्यायान्, ज्यायसी। (७२२) युवाल्पयोः कन् वा ॥ ८।४ । ३३ । अनयोः कनादेशो वा स्यात् भीष्ठेयस्सु परतः । अतिशयन युवा अल्पो वा-कनिष्ठः, कनीयान् । पक्षे- (७२३ ) स्थूलदूरयुवक्षिप्रक्षुद्राणां यलादेर्नामिनो गुणश्च ॥८॥४॥४२॥ एषामिमनि भीष्ठेयस्सु च परेषु यलादेरवयवस्य लोपो नामिनश्च गुणः स्यात् । यविष्ठः, यवीयान्, अल्पिष्ठः, अल्पीयान्, गरिष्ठः, गरीयान् । (७२४) त्यादेश्व प्रशंसायां रूपः ।। ८।२।६। त्यायन्तात् नाम्नश्च प्रशंसायां रूपः स्यात् । प्रशस्तं पति-पचति- रूपम्, पश्यतिरूपम्, प्रशस्तो वैयाकरण:-वैयाकरणरूपः, नैयायिकरूपः । (७२५) अतमादेरीषदसमाप्त कल्पदेश्यदेशीयाः ।। ८।२१७ १२६ कालुकौमुदी-पूर्वार्धे तमाद्यन्तजितात् त्याद्यन्तात् नाम्नश्च ईषदसमाप्तेऽर्थे कल्प, देश्य, देशीय इत्येते प्रत्ययाः स्युः । स्युः। ईषदसमाप्तं पचति-पचतिकल्पम्, पचतिदेश्यम्, पचतिदेशीयम् । एवं पटुकल्पः, पटुदेश्यः, पटुदेशीयः । (७२६ ) नानः प्राग बहुर्वा ॥ ८।२।८। ईषदसमाप्तेऽर्थे नाम्नः प्राग् बहुप्रत्ययो वा स्यात् । ईषदसमाप्तः पटुः-बहुपटुः, बहुभुक्तम् । (७२७ ) पाशः क्षेपे॥८।२।११। कुत्सितो वैयाकरण:-वैयाकरणपाशः। एवं याज्ञिकपाशः । (७२८) बह्वल्पार्थात् कारकादिष्टानिष्ट शस् ॥ ८।१ । १२ । कारकवाचिभ्यां बह्वल्पाभ्यां यथासंख्यमिष्टेऽनिष्टे च शस्प्रत्ययः स्यात् । बहुभ्यो ददाति-बहुशो ददाति । बहुषु वसति-बहुशो वसति । एवमल्पशो ददाति, अल्पशो वसति । कारकादिति किम्-बहूनां स्वामी । (७२६) प्रकृते मयट ।। ८।२। १५ । प्राचुर्येण प्राधान्येन वा कृतम्-प्रकृतम् । प्रकृतेऽर्थे वर्तमानात् नाम्नो मयट् स्यात्। प्रचुरमन्नम्---अन्नमयम्,प्रधानं घृतम्-घृतमयम्, दधिमयम् । (७३०) अस्मिन् ॥ ८।२।१६ । प्रकृतेऽर्थे वर्तमानात् नाम्नः सप्तम्यर्थे मयट् स्यात् । अन्नं प्रकृत- मस्मिन्-अन्नमयं भोजनम्, अपूपमयं पर्व । (७३१) अभूततद्भावे कृम्वस्तिभ्यां कर्मकर्तृभ्यां चिः ॥८।२।१८। कम करोतिना योगे कर्थाच्च भ्वस्तिभ्यां योगे अभूततद्भावे- ऽर्थे विप्रत्ययः स्यात् ।
तद्धित-प्रकरणम्
१२७
(७३२) ईश्च्चाववर्णस्याऽनन्ययस्य ॥४।१। ६० । .
अव्ययवजितस्य अवर्णान्तस्य ईः स्यात् च्वौ परे ।
(७३३ ) वेर्लोपः॥४।४।४८ ।
विप्रत्ययस्य लोप: स्यात् सर्वत्र । अशुक्ल शुक्लं करोति-शुक्ली.
करोति पटम्, शुक्लीभवति, शुक्लीस्यात् वस्त्रम् ।
(७३४ ) च्वियग्यङ्यादादियक्येषु ॥४।१ । ५१ ।
च्व्यादिषु परेषु पूर्वस्य दीर्घः स्यात् । शुचीकरोति, शुचीभवति,
पटूकरोति, पटूभवति ।
(७३५) कार्ये साद्वा ॥८।२ । २२ ।
कात्स्न्ये गम्ये च्व्यर्थे सात्प्रत्ययो वा स्यात् ।
(७३६ ) सात्सुगोः ॥२।२६७ ।
सात्प्रत्ययस्य सुगागमस्य च सस्य प्राप्तं षत्वं न स्यात् । सर्व
काष्ठमनग्निमग्निं करोति-अग्निसात् करोति, अग्निसाद् भवति स्याद्वा।
(७३७) प्राग्यावात् कच् ।।८।२। ४२ ।
यावशब्दात् प्राग् येऽस्तेिषु कजधिकारो वेदितव्यः ।
(७३८) कुत्सिताल्पाज्ञातेषु ।। ८ । २ । ४७ ।
कुत्सितोऽल्पोऽज्ञातो वाऽश्व:-अश्वकः। एवं घृतकम्, तैलकम् ।
(७३६ ) ह्रस्वे ॥८।२।६०।
हस्वः पट:--पटकः, वृक्षक:।
(७४०) त्यादिसर्वादेरक प्राक् टेः ॥ ८।२ । ४३ ।
कचोऽपवादः। कुत्सितमल्पमज्ञातं पचति-पचतकि, सर्वकः,
विश्वकः।
१२८
कालुकौमुदी-पूर्वार्ध
(४५) युष्मदस्मदोरनोत्सभादेः स्यादेः ।। ८ । २। ४४ ।
अनयोः परस्य ओकारसकारभकारादिवजितस्य स्यादेष्टः प्राग
स्यात् । त्वयका, मंयका, युष्माककम्, अस्माककम् । अनोत्सभादेरिति
किम्-युवकयोंः, युष्मकासु, युवकाभ्याम् ।
(७४२) वैकाद् द्वयोनिर्धार्ये डतरः ॥ ८॥२।६६ ।
एकतरो भवतोः पटुः। पक्षे एककः । द्वयोरिति किम्-एको.
ऽस्मिन् ग्रामे राजा। निर्धार्य इति किम् -एकोऽनयोमियोः स्वामी।
(७४३) यत्तत्किमन्येभ्यः ।। ८।२।६७ ।
यतरो भवतोः पटुः ततर आगच्छतु, कतरोऽन्यतरो वा भवतोः
पटुः।
(७४४) बहूनां प्रश्ने उतमश्च वा ॥८।२।६८ ।
यदादिभ्यो बहूनां मध्ये निर्धार्येऽर्थे प्रश्नविषये डतमडतरौ वा स्तः ।
यतमो यतरो वा भवतां पटुः ततमः ततरो वा आगच्छतु, कतमः, कतरः,
अन्यतमः, अन्यतरः । पक्षे यकः, सकः, ककः, अन्यकः ।
(७४५) यावादिभ्यः कः ।।८।२। ७२ ।
एभ्यः
याव एव यावकः, मणिकः, भिक्षुकः ।
इति स्वार्थिकाः। इति तद्धितेषु स्वार्थिकाः ।
इति तद्धिताः
स्वार्थे क: स्यात् ।
अथ द्विरुक्तप्रक्रिया (७४६) भृशाभीक्ष्ण्यसातत्यवीप्सासु द्विः प्राक् तमादेः ॥८॥४॥८॥ क्रियायाः साकल्यं भृशार्थः । पौनःपुन्यमाभीक्ष्ण्यम् । क्रियान्तरैर- व्यवधानं सातत्यम् । व्याप्तुमिच्छा वीप्सा। भूशादिष्वर्थेषु यत्पदं वाक्यं वा तत् तमादिप्रत्ययेभ्यः प्रागेव द्विः स्यात् । लुनी हि लुनीहि इत्येवायं लुनाति, भोज भोज व्रजति,पचति पचति, वृक्षं वृक्षं सिञ्चति । प्राक् तमादेरिति किम्-पचति पचतितमाम्, पचति पचतितराम् । (७४७ ) सम्भ्रमे यावद्बोधम् ॥ ८।४।६३ । सम्भ्रमे द्योत्ये यत्पदं वाक्यं वा यावरोधं द्विः स्यात् । सर्पः ३, बुध्यस्व ३॥ (७४८) अधोऽध्युपरि सामीप्ये ॥ ८।४।६४ । अधस्, अधि, उपरि इत्येतानि द्विः स्युः सामीप्ये गये। अघोऽधो ग्रामम्-ग्रामस्य अधस्तात् समीपदेश इत्यर्थः । अध्यधि ग्रामम्, उपर्यु- परि ग्रामम् । सामीप्ये इति किम्-अधः पन्नगाः, उपरि चन्द्रमाः । - १३० कालुकौमुदी-पूर्वार्ध (७४६ ) आधिक्यानुपूर्ये ।। ८।४। ६६ । माधिक्ये आनु पूर्थे च शब्दरूपं द्विः स्यात् । नमो नमः-अधिक नम इत्यर्थः । ज्येष्ठज्येष्ठमनुप्रवेशय--पानुपूर्येणेत्यर्थः । (७५०) प्रोपोत्समः पादपूरणे ॥ ८।४।६५। एते उपसर्गा द्विः स्युः तेन चेत् पादः पूर्येत । प्रप्रशान्तकषायाग्ने-रुपोपप्लववर्जितम् । उदुज्ज्वलं तपो यस्य, संसंश्रयत तं जिनम् ॥१॥ पादपूरणे इति किम्-प्रणम्य सच्छासनवर्धमानम् । (७५१ ) द्वन्द्वंवा ॥८।४।१० द्विरुक्तस्य द्विशब्दस्य द्वन्द्वमिति वीप्सायां वा निपात्यते । द्वन्द्वं द्वौ द्वौ वा तिष्ठतः, द्वन्द्वं युद्धं द्वयोर्द्वयोर्युद्धं वा प्रवर्तते, द्वन्द्वं द्वाभ्यां द्वाभ्यां वा कृतम् । द्वन्द्वः समासः, द्वन्द्वः कलहः, द्वन्द्वं युद्धमिति तु शब्दान्तरम् । इति द्विरुक्तप्रक्रिया इति श्रीमत्तेरापन्थगणगगनाङ्गण-गगनमणि-सकलस्वपरसमय- पारावारपारीण-सार्वसार्वज्ञशासनसार्वभौम-कोविदकुलालङ्कार-तीर्थ- चूडामणि-विश्वविजय-श्रीमत्कालुरामाचार्यचरणाम्भोजचञ्चरीकाय- माणान्तेवासिमुनिचौथमल्लविरचितायां कालुकौमुद्यां पूर्वार्ध समाप्तम् ।
परिशिष्टम् १
कालुकौमुदीपूर्वार्धस्थसूत्राणामकारादिवर्णानुक्रमसूची
सूत्राङ्कः
सूत्रम्
३ अइउलएऐ०॥१।१।४।
१० अं अनुस्वारः॥१।१।११।
११ अःविसर्गः ॥१।१।१२।
३७५ अकमेरुकस्य ॥२।४। ६६ ।
४०० अकालेऽव्ययीभावे॥३।२। १२७ ॥
२४२ अचः ॥१।४।५8 ।
२४४ अचेः पूर्वदीर्घश्चा० ॥२।१ । ३२ ।
२०२ अञ्चास्थिघिसक्थ्य० ॥२॥१। ११ ।
४४३ अच्वेस्तुल्यार्थजाती० ॥३।२।७१ ।
२६६ अजादेः ।।२।३।२।
६२५ अजाविभ्यां थ्यः।।७।३।३६ ।
३०५ अञ्चः ॥२।३।।
२४३ अञ्चुयुजिञ्चां नो० ॥२।१ । १०२ ।
१३४
कालुकौमुदी-पूर्वार्ध
सूत्रम्
५६६ अणि ॥ ८।४।५३ ।
५१८ अत इञ् ६।२।३४॥
२६७ अत इदनित्काप्य० ॥२।३।१५।
७२५ अतमादेरीषद०॥८॥२।७।
१०३ अतो जस्भ्यांये॥१।४।८।
८४ अतोऽत्युः ॥ १।३ । ४६ ।
६७४ अतोऽनेकस्वरात् ।। ८।१ । १३ ।
१६१ अतोऽम् ।।२। १।४।
४५८ अतोऽहस्य ।।२।२। ७७ ।
४३३ अत्यादयः क्रान्ताद्य० ॥३।१।६३ ।
२५१ अत्वसोरभ्वादेः सौ॥१।४।६७ ।
२४७ अदद्रयचो वा ॥२।१।८५।
२५८ अदसो दः सेस्तु डौः॥२।१ । ७६ ।
३० अदीर्घादवसानै० ॥१।३ । २७ ।
११८ अदेतोध्यमोर्लोपः ।। १।४। ६६ ।
१०२ अदेतोरपदान्ते०॥२।१।३१ ।
४४८ अधिकं च तद्धितो० ।।३।१। १२३ ।
६०२ अधिकृत्य कृते ग्र०॥७।१।७४।
३३८ अधेः शीस्थासामा० ॥२।४।१४ ।
७४८ अधोऽध्युपरि सामी० ॥ ८।४।६४ ।
४०४ अनः ।।८।३।३१ ।
परिशिष्टम्
१३५
सूत्राङ्कः सूत्रम्
२३४ अनकः।।२।१। ७१ ।
२०४ अनडुहः ॥ १।४।७६ ।
३६७ अनतो लुक्॥३।२।५।
२३३ अनष्टौसोः॥२।१।७२ ।
७६ अनाङमाङो दीर्घाद्वा० ।।१।३ । २३ ।
२४१ अनिदितो हसस्यो०॥४।२।३६ ।
५८७ अनाराच्छश्वत् पृथ० ॥८।४। ६६ ।
५३३ अनोऽध्ये ये॥८।४।५२ ।
१३४ अनोऽतोऽवमयुक्तात् ।।२।१।२८ ।
३०२ अनो बहुव्रीहेः॥२।३।५।
५८५ अन्तादिमध्यान्मः ॥ ६।४।७६ ।
१८ अन्त्यस्वरादिष्टिः ॥ १।१।३४ ।
१६ अन्त्यात् पूर्व उपधा ।। १ । १३५ ।
५१० अन्यत्यदादेराः ।। ३ । २। १३४ ।
५०७ अन्यस्य दुगीयका० ॥३।२। १५५ ।
४३४ अन्यार्थे स्त्रीप्रत्यय० ॥२।३।११५ ।
३३६ अन्वध्याभ्यो वसः॥२।४ । १५ ।
४२२ अन् स्वरे ॥३।२। १०१ ।
२६४ अपः ॥१।४।६५।
३४६ अपवर्गे तृतीया ॥२।४।५७ ।
३६४ अपायेऽवधिरपा० ॥२।४ । ४२।
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
सूत्राङ्कः सूत्रम्
२६८ अब् यनः॥१।४। ६२ ।
७३१ अभूततद्भावेकृ०॥ ८।२।१८।
४६६ अमूर्धमस्तकात्स्वा० ॥३। २ । २१ ।
१६५ अौं ॥ १। ४ । ५२ ।
४८६ अर्चितम् ॥३।१।१७६ ।
६८ अर्थवदधातुविभ० ॥१।१।३१ ।
५०८ अर्थे वा ॥३।२ । १५७ ।
४३६ अधं समेंऽशे वा ॥ ३ । १ । ३७ ।
६१८ अर्हति ॥७।२ । १३२ ।
४८५ अल्पस्वरम् ।।३।१।१७६ ।
४२६ अल्पे ।।३।२।१०६ ।
१२१ अवकुप्वनुस्वार०॥२।२।७०।
६५४ अवयवात्तयट् ।।७।४।४४।
७ अवर्जा नामिनः॥१।१।८।
८६
अवर्णभोभगोअ० ॥ १।३ । ५१ ।
१२४ अवर्णस्यामः सुट ।। १।३ । २३ ।
३८ अवर्णस्येवर्णादा०॥ १।२ । १३ ।
२६७ अवर्णादनः शतु०॥ १।४।६१ ।
४३५ अवादयः ऋष्टाद्य०॥३।१।६४।
६४७ अवेः संघातविस्ता०॥७।४।२५।
३६४ अव्ययं कारकस०॥३।१ । २३ ।
परिशिष्टम्
सूत्राङ्कः सूत्रम्
२१४ अव्ययस्य ॥३।२।७।
३६८ अव्ययीभावस्यातो० ॥३।२।२।
५५१ अश्वादीयो वा ।। ६ । ३ । २० ।
५४ असन्धिरदसोमु० ॥ १।२ । ३५ ।
३२० असहनविद्यमा० ॥२।३।४५।
६७० अस्तपोमायामेधा० ।। ८।१।६।
७३० अस्मिन् ॥ ८।२। १६ ।
६९६ अहीयरुहोऽपादाने ॥ ८।१ । १०५ ।
४५६ अह्नः ॥ ८।३।८।
।
आ
१७१ आ अम् शोऽता ॥ १।४। ८४ ।
२७६ आ अम्हसयोः॥२।१। ५४ ।
२२१ आः सौ ॥ १।४। ७७।
३६६ आख्यातर्युपयोगे॥२।४ । ७८ ।
३६८ आङावधौ ।।२।४ । ७७ ।
१३६ आतोऽनापो लोपःस्व० ॥२।१ । २५ ।
४६३ आत्मनः पूरणे ।। ३ । २। १४ ।
२११ आदिडबानां भभा० ।।२।१।१०६ ।
२० आदैदौदारो वृद्धिः ।। १ । ३ । ३६ ।
४ आद्यन्ताभ्यां प्रत्याहा०॥१।१।५।
१३८
कालुकौमुदी-पूर्वाधं
सूत्राङ्कः सूत्रम्
७० आद्यन्तौ टिकतौ ॥ १।१। ६२ ।
४६१ आद्वन्द्व ।।३।२।३६ ।
१५४ आद्वष्टेरः ।।२।१। ७७ ।
३८० आधारे सप्तमी ।।२।४ । १०२ ।
७४६ आधिक्यानुपू] ॥ ८।४।६६ ।
१७२ आपः ॥ १।४।२८।
२६५ आवतः स्त्रियाम् ॥२।३।१।
२८३ आम आकम् ।।२।१।५३।
३३२ आमन्त्रणे ॥२ ।४।४५।
२७३ आमौः ।।२।१।४६ ।
३१६ आर्यक्षत्रियाद्वा ।। २ । ३। ६० ।
hor
६०६ इकण् ।।७।२।१।
३२४ इतोऽक्त्यर्थाद्वा ॥२।३। ७५ ।
६६८ इतोऽतःकुतः॥ ८।१ । १०७ ।
५३६ इतोऽनियः ॥ ६।२।१०।
६५१ इदं किमोऽतुरिकिय० ॥७।४ । ४१।
२३६ इदमः ॥२।१। ६६ ।
२३५ इदमदसोऽक्येव ॥१।४।१०।
१४० इदुतोऽस्त्रेरौरीदूत् ॥१। ४ । ४१ ।
परिशिष्टम्
सूत्राङ्कः सूत्रम्
४८३ इदुदन्तमसखि ॥३।१। १७०।
३१६ इन्द्रवरुणभव० ॥२ । ३।५५।
४८ इन्द्र ।।१।२।८।
२२३ इन्हन्पूषन्नर्यम्णां० ॥१।४। ६८ ।
२६३ इयं स्त्रियाम् ॥२।१।७४ ।
२६ इवर्णादीनां स्वरे० ॥ १।२।१।
४५१ इवर्णावर्णस्य ॥ ८।४। ७१ ।
२५३ इसुस्सजुषाम् ।। २.१ । १०७ ।
chor
५५ ईदूदेद् द्विवचनं०॥ १।२ । ३६ ।
४६८ ईपः॥३।२।६।।
३०७ ईप्यतः॥ ८।४। ७२ ।
४७६ ईबादीदूतां के॥२।३ । १०६ ।
१९२ ईरौः ।।२।१।६।
५६६ ईयो मत्वर्थजिह्वा० ॥ ७ ॥ १।४६ ।
७३२ ईश्च्वाववर्णस्यान०॥४।१ । ६० ।
उ
३२७ उतोगुणादखरु० ॥२।३।७८ ।
६६ उदःस्थास्तम्भोः सः॥ १।३।६४ ।
१४०
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
सूत्राङ्कः सूत्रम्
३०० उहदितोऽधातोः ।। २।३।८।
२४६ उहदितो नुम् ॥ १।४।५८ ।
३०४ उपधालोपिनो वा ॥२।३ । १४ ।
४४६ उपमानानि सामा०॥३।१।१०३ ।
४४७ उपमेयानि व्याघ्रा॥३।१।१०४।
३४६ उपर्यधोऽधिभिर्द्विः ।। २।४।५१ ।
४७३ उपसर्गात् ।। ८।३। ८५।
३४० उपान्निवासे ॥२।४। १६ ।
३४७ उपेन चोत्कृष्टे ॥२।४।५५ ।
३७३ उभयप्राप्तौ कर्तः ॥२।४।१०।
२०८ उभयोर्धावम् ॥१।४। ८१ ।
५१७ उवर्णस्याऽस्वयंभु०॥८।४। ६६ ।
४०८ ऊनार्थपूर्वादिभिः ॥३।१।५० ।
६५०. ऊवं दन्नड्वयसः ।।७।४। ३५
४२५ अर्याद्यनुकरणोठ॥३।१।१।
ऋ
३७
ऋलवौँ वा ॥ १।१।१६ ।
४२ भृणे प्रवसनक०॥ १।२।१४ !
परिशिष्टम्
१४१
डः
सूत्रम्
५८६ ऋतुनक्षत्रसन्ध्या० ॥ ६।४ । ८६ ।
५६० ऋतुवायुपित्रुष०॥ ६ । ३ । १३ ।
३८८ ऋते द्वितीयापञ्चः ॥२।४। १२४ !
१६४ ऋतो
॥१।४५१।
१८२ मृतो : स्वरेऽनि ॥२।१। ८८ !
५६१ भृतो रस्तद्धिते ये ॥ १।२३३ ।
४३ मृत्युपसर्गस्य ॥ १।२ । १६ ।
६४३ ऋत्विग्भ्य ईयः॥ ५। ३ । ७७ ।
१४८ दुशनस्पुरुदं ॥१।४। ८६ ।
४७८ ऋन्नित्यदितः।। ८।३ । १०६ ।
५५० वर्णोवणेसुर्दो० ॥ ८।४। ८० ।
५२१ ष्यन्धकवृष्णिकु० ॥ ६ । २।४।।
ल
८ लदन्ताः समानाः॥१।१।६।
ए
है एऐओऔ संध्यक्षः ॥ १।१ । १० ।
६ एकद्वित्रिमात्रा ह्र० ।।१।१।७।
१०० एकद्विबहुषु ॥ १।४।२।
१२० एकपदेरष्मृवर्णा० ॥२ । २। ६६ ।
१४२
कालुकौमुदी-पूर्वार्ध
सूत्राङ्कः सूत्रम्
७१३ एकात्सकृञ्चास्य ।।८।१।१२६ ।
५०० एकादशषोडश०॥३।२।६४।
३३ एदेतोरयायौ ॥१।२।३।
४० एदेतोरेत् ॥ १।२ । १६ ।
१४१ एदोज्जसि ॥१।४।४३ ।
१४४ एदोतो ङसिङसो०॥१।४।७० ।
४४ एदोतोऽतः पदान्ते ॥ १।२।३२ ।
४६ एदोतोरुपसर्गस्य ॥१।२ । २६ ।
२१ एदोदरो गुणः॥१।१ । ३७ ।
२४० एनत्त्यदादेरेत० ॥२।१।६८।
२६० एरीबहुत्वे ॥२।१ । ८३ ।
१७४ एपिटौस्सु ॥१।४।३१।
१०६ एबहुस्भे ॥१।४।११।
५१ एवेऽनवधारणे ।। १।२।२६ ।
ऐ
१४६ ऐः सख्युरितोऽशिधौ ॥१।४। ८५ ।
ओ
१७० ओत औः ॥ १।४। ८३ ।
३४ ओदौतोरवावौ ॥१।२।४।
परिशिष्टम्
१४३
सूत्राङ्कः सूत्रम्
४१ ओदौतोरौत् ॥ १।२। २२ ।
५७ ओन्निपातः॥ १।२।३८ ।
१ ओम् ॥ १।१।१।
५२ ओष्ठौत्वोः समासे वा ॥१।२।३१ ।
११३ ओसि ॥ १।४१२ ।
औ
५ औदन्ताः स्वराः ।।१।१।६।
१७३ औरिः॥१।४ । ३२ ।
२२८ औशष्टः॥ १।४।५।
क
७०५ कथमित्थम् ।।८।१ । १२० ।
६२२ कथादेरिकण् ।। ७ । ३ । २१ ।
५२२ कन्यायाः कनीनश्च ।। ६ । २।४६ ।
३२३ कबरमणिविष०॥२।३।४६ ।
३३३ कर्तुाप्यं कर्म ।। २।४।३।
३७२ कतृकर्मणोः कृति ॥ २।४।८ ।
३५० कर्तृ साधनहेत्वि०॥२।४।५८ ।
४०६ कर्तृ साधने कृता॥३।१। ५२ ।
३५५ कर्मक्रियाभिप्रेयो० ॥२।४ । ३२ ।
..
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
सूत्राङ्क सूत्रम्
३३५ कर्मणि द्वितीया ॥२।४।४७।
५४८ कवचिहस्त्यचित्ता०॥६। ३ । १५ ।
४३१ कवश्चोष्णे ॥३।२। १०८ ।
४१८ काकादिभिः क्षेपे ॥३।१ । ७८ ।
५०६ काममनसोस्तुमः ॥ ३ । २ । १४६ ।
७३५ कार्ये साद्वा ॥ ८।२। २२ ।
२४ कार्यायेत् ॥ १।१।३८ ।
३४८ कालाध्वनोरत्यन्त० ॥२।४।५६ ।
४५३ किं क्षेपे ॥३।१ । ११४ ।
२३० किमः कः॥२।१ । ७६ ।
६६७ किमद्वयादिसर्वाद्य० ॥८।१ । १०६ ।
७०२ किमन्यैकसर्वय० ॥ ८।१ । ११२ ।
५११ किमिदमोः कीशीशौ।।३।२।१३५ ।
४२७ कुः पापाल्पयोनित्यम् ॥३।१। ८६ ।
१५ कुचुटुतुपु वर्गाः॥१।१ । १६ ।
७०१ कुत्रात्रककुहेह ॥ ८।१।१११ ।
४४५ कुत्सितानि कुत्सनै० ॥३।१।१०२ ।
७३८ कुत्सिताल्पाज्ञातेषु ॥ ८।२। ४७ ।
५३७ कुलादीनः ।।६।२।११६ ।
५६३ कुशले ॥ ७।१।१८।
५१२ कृतलब्धक्रीतसं०॥७।१।१७ ।
सूत्राङ्कः सुत्रम् ४१५ कृति ॥ ३॥ १।६। ६०४ कृते ॥ ७११।१०६ । ३७६ कृत्यानां कर्तरिवा ॥२॥४।१३। ५०४ कृत्येऽवश्यमो लोपः ॥ ३१२। १४७ । ६८० कृपाहृदयाद्वालुः॥ ८॥११७४। १५३ केवलसखिपतेरौः॥१४॥४७॥ ४२८ कोः कत्तत्पुरुषे ॥३।२।१०२ । ३७७ क्तस्य वर्तमानाधा०॥२।४।१०१। २६३ त्त्वाकृन्मान्तम् ॥ १।१।४६ ३२६ क्रियानिमित्त कार० ॥२॥४॥१॥ ३३६ क्रियाविशेषणात् ॥२१४। ४८ ३५६ क्रूधुदुहेासूयार्था० ॥२॥४॥३७॥ १६१ क्रोष्ट स्तृजवत् पुंस्यधौ॥ ११४ ॥ ८७.॥ २५७ कस उष्मतौ च ॥ २॥१।३७ । २०७ कस्स्स्र ध्वंसनसनडु०॥२॥ १।१६। ५७३ कामेहत्रतसस्त्यप् ॥ ६॥ ४ ॥ १५ ॥ १५६ क्विपसमासस्यासुधि०॥२॥ १ ॥२१ ॥ ११६ किलादेकपदेऽप० ॥२॥२॥ १४ ॥ २२४ ककस्वरक्तः ॥२१२१८४ ५३४ क्षत्रादियः॥६।२।११६ ॥ ५२८ क्षुद्राभ्यो वा ॥६।२।१०।
कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
सूत्राङ्क: सूत्रम्
. ३१८ शुभ्नादीनाम् ।। २।२।१०६ ।
६४५ क्षेत्रे शाकटशाकि०॥ ७।३।७४।
ख
७२. खसे चपा झथानाम् ।। १।३।४०।
१५२ खितिखीतीयाद् ङसि० ॥ १।४। ५०।
५०३ खित्यनव्ययस्वरा०॥ ३।२। १३६ ।
४२६ गतिः ।। ३।१।८७।
३४२ भतिबोधाहारश०॥२।४।२१ ।
३६२ गतेरप्राप्त वा ।।२।४।७० ।
५२४ गर्गादेयम् ।। ६ । २ । ५७ ।
४५. गवः स्वरेऽनक्षे॥१।२।७।
५८२ गहादिभ्यः ॥ ६।४।
७१७ गुणाङ्गादिष्ठे यसू०।। ८।२।५।
५५६ गोः पुरीषे॥ ६।३। ५२ ।
५४१ गोः स्वरे यः ॥ ६ । २ । ३० ।
५२३ गोत्रे बिदादेः पौत्रा०॥ ६ । २। ५६ ।
५४५ गोत्रोक्षोष्ट्रोरभ्ररा०॥ ६ । ३ । १३ ।
३३४ गौणात् ।। २।४।४६
३०८ गौरादिभ्यः ।। २ । ३ । २७ ।
परिशिष्टम्
१९४७
सूत्राङ्कः सूत्रम्
५५२ ग्रामजनबन्धुग०॥६।३।२६ ।
५७१ ग्रामादीनञ् च ।। ६।४।५।
घ
४६६ घड्युपसर्गस्य ब० ॥३।२।८७ ।
१२३ ङसिङयोः स्मास्मिनौ ।।१।४।१८।
२८१ ङसिभ्यसोरद् ॥२।१।११।
११० ङसिराद् ॥ १।४। १३ ।
११२ डस् स्यः ॥ १।४।१४।
१७५ डितां ययास्यास्यामः ॥१।४।२६ ।
१२६ डिति तीयस्य वा॥१।४।२६।
१४३ कित्यदिति ॥१।४।४४ ।
१५१ डित्येत् ॥ १।४।४६ ।
१४५ डेडौंः ॥ १।४।४५॥
१०८ उन्र्यः ।। १ । ४।१६।
७४ पनो ह्रस्वाद् द्विः स्वरे ॥ १।३ । २२ ।
च
२४५ चजोः कगौ ।। २।१। ११६ ।
२६४ चतुर आम् ॥ १।४। ७८ ।
re कालुकौमुदी-पूर्वार्षे सूत्रम् ६६३ चतुरो येयौ च लो॥७॥४॥३७॥ ४११. चतुर्थी प्रकृत्या ।।३।१।५६ । ६८५ चतुर्वर्णादिभ्यष्टयण् ।। ७ । ४ । ६५ । ५०२ चत्वारिंशदादौ वा ॥३।२।१६। ७३. चपाच्छश्छोऽमे वा ।। १ । ३ । ३ । ६११ चरति ॥७।२।१२। २६१ चाहावयोरे ॥२।१।६४। २६ चादयो निपातः ॥ १।१।४०। ४८१ चार्थे द्वन्द्वः सहोक्तौ ।।३।१११३३ । ७३४ चियग्यङ्यादादिय०॥४।१।५१ । ६२ जबाद्धो अभाः ।। १।३।४। ४०३ जराया जरस् च ।।८।३।२६। १७८ जराया जरस् वा ।।२।१।८६ । ११६ जस इश् ।। १।४।१६ । १६३ जस्शसोः शिः ।।२।१।७ १५६ जस्शसोर्डतिष्णोलुक् ॥ १।४।४। ६६४ जातीयदेशीययोः ।।३।२। ६२ । ३१३ जातेरयोपधनि०॥२।३।३६ । ४७५ जायाया जानिः।।८।३।८८ । ७२१ ज्यायान् ॥८॥४।३६।
परिशिष्टम सूत्राङ्कः सूत्रम् शं ६६६ झपात् ॥८।१।३।। ३१ झबे जबा झसानाम् ॥ १।३।४३ । ५६ झसा जबाः॥२।१ । १०८। ३६ झसानां झसे सव० ॥ १।३ । ६३ । ६० बमे जबा मा वा ॥ १।३।१। ट २७८ टाङयोसि यः॥२।१।५५ । १६३ टादौ स्वरे वा ॥ १।४।८८ । १४२ टा नाः पुंसि ॥१।४। ४२ । ६३४ टेः॥ ८।४।४४ । १०६ टेनः॥१।४।१५। ड डत्यतु संख्यावत् ॥ १।१।५७ । १४६ डिति टेः॥ ८।४। ८४ । ७०७ ण १३८ णषमसिद्धं परे० ॥२॥ १ ॥ ११ ॥ ५७५ णोऽरण्यात् ॥६।४ । २१ ।
१५०
कालुकौमुदी-पूर्वाध
सूत्राङ्कः
सूत्रम्
त
२३६ तः सः॥२।१। ७८॥
४६७ तत्पुरुषे कृति ॥३।२ । २२ ।
६२६ तत्र ।। ७।३।५४ ।
५६१ तत्र जाते ।। ७।१।१।
६२० तत्र साधौ ॥७।३ । १५ ।
१७ तदः सेः स्वरे पाद०॥ १।३। ६५ ।
२३ तदन्तं पदम् ।। १।१ । २२ ।
६४८ तदस्य संजातं ता०॥७।४।३१ ।
६६६ तदस्यास्मिन्नस्तीति०॥ ८।१।१।
५६२ तद्वत्त्यधीते ॥ ६।३। ८५ ।
५१४ तद्धिताः ॥ ६ । २ । १ ।
५४६ तद्धितेऽनातियस्व०॥ ८।४। ७८ ।
६०६ तरति ॥ ७।२।१०।
५८४ तवकममकावे०॥ ६ । ४ । ७०।
२८२ तवमम डसा॥२।४।४८।
६६६ तसादिः स्यादिवत् ।।८।१ । १२१ ।
५१२ तस्करादयश्चोरा०॥३।२ । १५६ ।
६२३ तस्मै हिते ।। ७।३ । ३५ ।
६३० तस्य ।।७।३। ५५ ।
तस्य लोपः ॥ १।१।२६ ।
परिशिष्टम्
१५१
.
सूत्राङ्क: सूत्रम्
५४४ तस्य समूहे ॥६।३।१०।
५१६ तस्यापत्ये ॥ ६ । २ । ३१ ।
६२७ तस्या क्रियायां वत् ।।७।३। ५२ ।
६०५ तस्येदम् ॥ ७।१ । ११२ ।
३६० तादर्थ्य ॥२।४।६४।
३०३ ताभ्यां नेप् ।।२।३।६।
२४६ तिर्यचस्तिरश्चः ।।२।१ । ३४ ।
५६० तिष्यपुष्ययोर्नक्ष० ॥ ८।४।७६ ।
२७६ तुभ्यंमा ज्या ॥२।१।४७ ।
४१० तुम्क्त्वाक्तवतुभिः॥३। १ । ५५ ।
१७ तुल्यस्थानाभ्यन्तर०॥ १।१ । १८ ।
४६० तुल्यार्थं चानेकञ्च ॥३।१ । १२८ ।
३८७ तुल्यार्थस्तृतीयाद्याः॥२। ४ । १२२ ।
३७४ तृन्नुदन्ताव्ययक०॥ २।४।१५। .
१६२ तृस्वसृनप्तनेष्ट० ।। १ । ४ । ५४ ।
५६५ तेन छन्ने रथे ॥ ६ । ३।६६ ।
६०७ तेन दीव्यतिखन० ।।७।२।२ ।
६०३ तेन.प्रोक्त ।। ७ । १।६१।
५४३ तेन रक्त रागात् ॥ ६।३।१।
६४६ तेन वित्ते चञ्चुच०॥७।४ । १६ ।
४६५ तेन सहः।।३।१ । १३० ।
कालूकोसुदी-पूर्वार्ध सूत्राङ्कः सूत्रम् २८७ ते मे डेडसा ॥१८॥ ५७७ तोशश्वदकस्मात् ॥ ८॥४॥ ८१ । ६७ तोः पि ॥ १।३।६। ५८० त्यदादिः॥६।२।१०। ७१६ त्यादिकिमेदव्यये०॥८।२।४। ७४० त्यादिसर्वादेरक् प्रा०।८।२।४३ । ७२४ त्यादेश्च प्रशंसायां०॥ ८।२।६। १८१ त्रिचतुरः स्त्रियां ति०॥२।१। ८७ । ६६२ रेस्तु च ।।७।४ । ५६ । २७० त्वमहं सिनाकः प्रा०॥२।१।४५ । २७५ त्वमौ प्रत्ययोत्तर०॥२।१।४४ । २८८ त्वामामा॥२।१। ५8 । थ ६६५ थटि ॥१।१। २८ । १६७ थुटि ॥१।४। ५३ । २२० थो नुट् ॥ १।४। ७६ । द ५७४ दक्षिणापश्चात्पुरु०॥६।४।१०। ६७६ दन्तादुन्नतात् ॥८॥१।५६ । ३५६ दानपात्रे चतुर्थी ॥ २१४ । ६३ । ५६५ दिगादेर्यः॥ ७॥१॥ ३२ ।
परिशिष्टम्
सूत्राङ्कः सूत्रम्
२५२ दिहशस्पृशभृशदधूषु० ॥२॥ १।१००।
दीर्घः ॥ १।१।१५।
१६७ दुशन्यादेरनेक० ॥२।१।५।
५३८ दुष्कुलादेयण ।। ६।२ । १२२ ।
३४१ दुहाद्यर्थानामवि० ॥२।४ । १६ ।
३७० दूरान्तिकार्थबहिः ॥२।४। ८४ ।
३६० दूरान्तिकार्थादस०॥२।४ । १२६ ।
५०६ गृहक्षेषु ।। ३।२। १३३ ।
५६७ दृतिकुक्षिकलशि० ॥७।१।३५ ।
६८६ देवात्तल् ॥७।४ । ६६ ।
२३२ दोमः स्यादौ ॥२।१।७५ ।
२५६ दोमोऽवर्णस्य ॥ २॥ १। ८४ ।
२१२ द्रुमुहष्णुहृष्णिहां वा ॥२।१ । ११४ ।
७५१ द्वन्द्व वा।।८।४।१०।
१२७ द्वन्द्व ॥१।४।२१ ।
१२६ द्वन्द्व न सर्वादिः॥१।४।२४ ।
४८२ इन्दू लध्वक्षरमे०॥३।१।१६८ ।
७१५ द्वयोविभज्ये च तरः।। ८।२।२।
३१४ द्विगोः समाहारात् ।। २।३। ४१ ।
५६८ द्विगोरनपत्ये य० ॥ ६ । २ । २६ ।
७१२ द्वित्रिचतुर्थ्यः सुच् ॥ ८१ १ । १२८ ।
१५४
कालुकौमुदी-पूर्वाध
सूत्राङ्कः सूत्रम्
६५६. द्वित्रिभ्यामयड् वा ॥७।४। ४५ ।
७१० द्विवर्धमुधौ ॥ ८।१। १२५ ।
५०१ द्वित्यष्टानां द्वात्रयो०॥३।२। ६५ ।
४७२ द्विपदाद्धर्माद: ॥८।३।७४ ।
३७६ द्विषः शतुर्वा ॥ २।४।६६ ।
५२७ द्विस्वरादनद्याः॥ ६।२। ८६ ।
६६१ द्वस्तीयः ॥७।४।५५ ।
ध
६१४ धर्माधर्माभ्यां चर० ।। ७ । २ । ४३ ।
१५७ धातोरिवर्णोवर्ण० ॥२।१ । १३ ।
५८ धावोदितौ ॥ १।२ । ४२ ।
५४६ धेनोरनञः॥ ६ । ३ १६ ।
न कपि ॥२।३।११० ।
४५४ न किमः क्षेपे ॥ ८।३।२।
४२३ नखादयः ।।३।२। १०० ।
४२१ नव्यत् ॥ ३।२।६७।
४५५ ननस्तत्पुरुषात् ।।८।३।५।
४२० नन् तत्पुरुषः॥३।१३४ ।
१५० नटा नाः॥१।४।४८।
५२६ नडादिभ्य आयनण् ॥ ६ । २। ६८ ।
---
परिशिष्टम्
सूत्राङ्कः सूत्रम्
५७२ नद्यादेरेयण ॥ ६।४।।
६७५ न द्रव्यादिभ्यः ॥८।४। १८ ।
२१७ नधौ ॥२।१। १२२ ।
३४३ ननीखाद्यदिह्वाशब्दा० ।।२।४।२६ ।
६६ न पदान्तादोरना० ॥ १।३।७।
२६० न पादाद्योः॥२।१। ६३ ।
१६६ नपुंसकस्य स्यमो० ॥२।१।१।
१६८ नपुंसके ।।२।३ । ११३ ।
२६६ नपुंसके वा ।।२। १ । १२३ ।
२१६ नरः सुपि ॥२।१। १०४ ।
६९२ नवादीनतननं०॥७।४। १०३ ।
४७४ नसस्य ।।२।२।७५॥
६६८ नस्ते मत्वर्थे ॥ १ । १ । २६ ।
२६२ नहो धः ।। २।१ । ११५ ।
६६ नाग्नञ् समासे ॥१।३।६१ ।
३१३ नाम नाम्नकाक्षं स०॥३।१।१६ ।
६६० नामरूपभागेभ्यो० ॥७।४। १०१ ।
१३१ नाम सिदयहसे॥ १ । १ । २३ ।
२०० नामिनः स्वरेऽनामि ॥२॥ १। १० ।
१३ नामिनो रोऽबे ॥ १।३। ५५ ।
२०१ नामिनो लोपः॥२।१।३।
कालुकौमुदी-पूर्वार्षे
सूत्राङ्कः सूत्रम्
३३१ नाम्नः प्रथमा॥२|४|४४।
७२६ नाम्नः प्राग बहुर्वा ॥८।२।८।
१३५. नानो नोऽनह्नः॥२।१।१२१ ।
६७१ नावादेरिकः ।।८।१।१०।
३२५ नारी सखी ॥२।३। ७४ ।
३२१ नासिकोदरौष्ठज०।।२।३ । ४६ ।
६१५ निकटादिषु वसति ।।७।२ । ८२ ।
३४४ निकषासमयाहा०॥२।४।४६ ।
१७६ नित्यदिद्विस्वराम्बा० ।।१।४। ४० ।
२८६ नित्यमन्वादेशे।।२।१। ६६ ।
४८६ नित्यवैरिणाम् ॥३।१ । १५२ ।
१८४ नित्यस्त्रीदूतः ॥१।३ । ३४ ।
२६२ निपातस्वरादयो ०॥ १।१।४८ ।
३८३ निमित्तात्कर्मसंयु० ॥२।४।१०८ ।
१५८ निय आम् ॥ १।४।४६ ।
४३७ निरादयो गताद्य० ॥३।१।६६ ।
३८५ निर्धारणेऽविभागे॥२।४। ११२॥
३५३ निषेधार्थकृताधः।।२।४।६१ ।
५५८ निष्फले तिलात् पिञ्ज० ।। ६।३। ६५ ।
११५ नुट्यतिसूचतस्रोः ।।१।४ । ७३ ।
१८६ नुडामः ।।१।४।३६ ।
परिशिष्टम् सूत्राङ्कः सुत्रम् १६० नुभ्रुवोः ॥२।१ । १६ । २५५ नुम् विसर्गशसान्त० ॥२।२ । १५ ॥ १६४ नुम् हमसातः सौ ॥२॥१८॥ १६८ नुर्वा ॥१।४।७४ । २६६ नृतोऽस्वस्रादेः॥२।३।७। ४६६ नेन्द्वादिभ्यः ।।३।१ । १६५ । १२८ नेमाल्पप्रथमच०॥१।४।२०। ६३६ नैकस्वरस्य ॥ ८।४।४५ ॥ ५० नैत्येधत्योः ॥ १।२ । २७ । ४०६ नोऽपदस्य तद्धिते ॥ ८।४ । ६२ । १६६ नोपधाया नुटि चा०॥१।४। ६३ । ८१ नोप्रशानः सक् छते ॥१।३। १३ । ६६० नो मट् ॥ ७।४।१२। ६१० नौ द्विस्वरादिकः ॥७।२।११। ५६४ न्यायादेरिकण ।। ६ । ३ । ८६ । २५० स्महतः॥ १।४।६४। प ६१३ पक्षिमत्स्यमृगाख्ये०॥७।२।३८ । ४१३ पञ्चमी भयादिभिः ।।३।१।६०। ३६५ पञ्चम्यपादाने॥२।४।७५ । ६३६ पतिराजान्तगुणा०॥७॥३।६१ ॥ ar
१५८
कालुकौमुदी-पूर्वार्ध
सूत्राङ्कः सूत्रम्
२१६ पथिन्मथिनृभुक्षा० ॥ १।४। ७५ ।
२२२ पथिन्मथिनृभुक्षां० ।।२।१।२७ ।
२८५ पदादेकवाक्ये द्वि०॥२।१।५६ ।
२५४ पदान्ते ।।२।१। ६५ ।
५७८ परजनराज्ञोऽकीयः ।।६।४।३१।
४६४ परात्मभ्यां चतुर्थ्याः।।३।२।१७।
६१२ पदे रिकट ।। ७।२। १३ ।
३६७ पर्यपाभ्यां वर्जने ॥ २।४ । ७६।
४३६ पर्यादयो ग्लानाद्य० ॥३।१।६।
६२१ पर्षदो ण्यणौ ।।७।३।१८ ।
५८६ पश्चादग्रान्तादिमः॥६।४। ७८ ।
१३७ पाददन्तनासिका०॥२।१।२४ ।
७२७ पाशः क्षेपे ।। ८।२। ११ ।
५५४ पितृमातृभ्यां व्यडु० ॥६।३।३० ।
५५५ पित्रोर्डामहट् ॥६।३। ३१ ।
४४२ पुंवत् कर्मधारये ॥ ३ । २। ६१ ।
४६३ पुंवद् भाषितपुंस्का०॥३।२।४८ ।
२५६ पुंसोः पुमन्सः॥ १।४। ५७ ।
१३३ पुंस्त्रियोः स्यमौजस् ॥ १।१ । ५५ ।
३२२ पुच्छात् ।।२।३।४८।
४१२ पुत्रे ॥३।२।४०।।
परिशिष्टम्
१५९
सूत्राङ्कः सूत्रम्
५५७ पुरुषात् कृतहित०॥६।३। ६४।
४३० पुरुषे वा ॥३।२। १०७ ।
४१६ पूरणशतृशाना० ॥३।१।७४।
१२५ पूर्वादिभ्यो नवभ्य० ॥ १।४।२२ ।
४३८ पूर्वापराधरोत्तर० ॥३।१।३५ ।
६३३ पृथुमृदुभृशकृ०॥ ८।४।४६ ।
६३२ पृथ्वादेरिमन् वा ॥७।३ । ५६ ।
५१३ पृषोदरादयः ॥ ३ । २ । १५८ ।
६६३ प्रकारे जातीयः ।।८।१।१२।
७०४ प्रकारे था॥ ८।१ । ११६ ।
७२६ प्रकृते मयट् ।।८।२।१५।
३५४ प्रकृत्यादय आख्या० ॥२।४ । २६ ।
७१४ प्रकृष्टे तमः ॥ ८।२।१।
६८३ प्रज्ञादिभ्यः ।।७।४। ८८ ॥
६१ प्रत्यये ।।१।३।२॥
३६६ प्रथमोक्तं प्राक् ॥ ३ । १ । १६५ ।
६०१ प्रभवति ।। ७।१ । ६६ ।
३६६ प्रभृत्यन्याराद्दि० ॥२।४ । ८१ ।
६४६ प्रमाणान्मात्रट ।।७।४ । ३३ ।
७१६ प्रशस्यस्य श्रः॥८।४।३४।
४७० प्रहरणेभ्यः॥३। १ । १६६ ।
१६०
कालुकोमुदी-पूर्वार्ध
सूत्राङ्क: सूत्रम्
२६१ प्रागिनात् ॥२॥१। ८२ ।
५१५ प्राग्दीव्यतरण ॥६।२। १४ ।
७३७ प्राग्यावात्कचू।।८।२।४२।
५३६ प्राग्वतोऽग्निकलेरे०॥ ६ । २ । २७ ।
४३२ प्रादयो गताधर्थे० ॥३।१।१२।
२७ प्रादिरुपसर्गः क्रि०॥ १।१ । ४१ ।
६३५ प्रियस्थिरस्फिरोरु०॥ ८।४।३८ ।
७५० प्रोपोत्समः पादपू०॥ ८।४।६५ ।
ब
७४४ बहूना प्रश्ने डत० ॥ ८।२।६८।
७१८ बहोीष्ठे भूय् ॥ ८।४।४० ।
७२८ बह्वल्पार्थात्कारका०॥ ८।१।१२।
६४४ ब्रह्मणस्त्वः ।।७।३। ७८ ।
भ
३१५ भर्तृ योगादपाल० ॥२।३। ५१ ।
५७६ भवतोरिकणीय०॥६।४ । ३० ।
५६४ भवे ।।७।१।३१ ।
६३१ भावे त्वतलौ ।। ७ । ३।५६ ।
३७८ भावे वा ॥२।४ । १०१ ।
२०३ भाषितपुरकं पुंव० ॥२।१ । १२ ।
परिशिष्टम्
१६१
-
सूत्राङ्कः सूत्रम्
२६५ भि दपाम् ।। २ । १ । ६० ।
१०७, भिस ऐस् ॥ १।४।।
६६५ भूतपूर्वे चरट् ।।६।१।६५ ।
६३७ भूलॊपश्चेवर्णस्य ।। ८ । ४ । ४१ ।
७४६ भृशाभीक्ष्ण्यसातत्य० ॥ ८।४। ८५ ।
६८४ भेषजादिभ्यो यण् ॥ ७।४।१४।
२८० भ्यसोऽभ्यम् ।। २।१ । १२ ।
५३० भ्रातुर्व्यश्च ।। ६ । २। १०७ ।
२६६ भ्वादेरिदुतो?० ॥२।१।१४ ।
२१० भ्वादेर्दादेघः ॥२।१ । ११३ ।
-
T
५६ मणीवादीनां वा॥ १।२ । ३७ ।
३०६ मत्स्यस्य यः॥८॥४।७३ ।
५६८ मध्यादिनण्णेया०॥७।१ । ४८ ।
३०१ मनो डाब् वा ॥२।३।४।
५३५ मनोर्याणौ षुक् च ॥ ६।२ । ११७ ।
६६१ मर्तादिभ्यो यः ॥७।४ । १०२ ।
३१७ मातुलाचार्योपाध्या० ॥२ । ३।५६ ।
२४८ मादुवर्णोऽनु ॥२।१ । ८१ ।
६२६ मानिक्यङ्कच्तस्त्रत०॥३।२।४६ ।
२७१ मान्तयोर्युवावौ द्वि०॥२।१।४३ ।
कालुकोमुदी-पूर्वार्धे
७७
.
सूत्रम्
६६७ मावर्णान्तोपधाद्व०॥८।१।२।
१३० मासनिशासनस्य० ॥२।१।२३ ।
४८७ मासर्तुभ्रातृनक्ष०॥३।१ । १८२ ।
१६५ मिदन्त्यस्वरात्परः ।।१।१। ६३ ।
३०६ मुख्यात्षिट्टिदणभूनञ्॥२।३ । २० ।
४६५ मूर्खे देवानांप्रियः॥ ३ । २ । ३४ ।
६१७ मूल्यैः क्रीते ॥ ७२ । १०५ ।
६८७ मृदस्तिकः।।७।४।६७ ।
मोऽनुस्वारयमौ ह ॥१।३।१८ ।
२२६ मो नो वमोश्च ।।२।१।६८।
नां झपे यमः सव०॥ १।३१३४।
य
५२५ यमयोऽश्यापर्णान्त०॥६।२।१३६ ।
६५३ यत्तत्किमः संख्याया० ।। ७।४। ४३ ।
७४३ यत्तत्किमन्येभ्यः॥ ८।२।६७।
६५२ यत्तदेतदो डावट ।। ७।४।४२ ।
१०१ यथाऽसादृश्ये ॥३।१।२४ ।
३८१ यस्य भावेन भाव ॥४।२।१०६
७४५ यावादिभ्यः कः ।।८।२। ७२ ।
६४१ युवादेरण ।। ७ । ३। ६८ ।
७२२ युवाल्पयोः कन् वा ।। ८।४।३३।
परिशिष्टम्
सूत्राङ्क सूत्रम्
७४१ युष्मदस्मदोरनो० ॥ ८।२।४४ ।
२७२ युष्मदस्मदोर्लोपः०॥२।१ । ४१ ।
३२८ यूनस्तिः ॥२।३ । ८६ ।
२७४ यूयं वयं जसा ।।२।१।४६।
३५२ येनाङ्गिविकारः ॥२।४।६० ।
५४२ येऽयकि॥१।२।५।
यो विसर्गस्य ॥१। ३ । ५४ ।
र
६१ रः॥ १।३।५६ ।
५४७ राजन्यमनुष्ययू० ।। ८।४। ५१ ।
५३२ राज्ञो जातौ ॥ ६।१ । ११५ ।
४५२ राज्ञोऽस्त्रियाम् ॥ ८।३।७।
६८६ रादेफो वा ॥७।४ । १०० ।
१६९ रायो हसे ॥ १।४।७।
५७० राष्ट्रादियः॥ ६।४।२।
३५७ रुच्यर्थानां प्रीयमा० ।।२।४ । ३३ ।
१० रोऽरस्यादिभे॥२।१।१०६ ।
१४ रो रि लोपो दीर्घश्वा० ॥ १।३ । ३६ ।
६४२ लघुपूर्वाद् वृवर्णात् ।। ७।३ । ७२ ।
१६४
कालुकौमुदी पूर्वार्ध
H
६८८
६८ लि लः ॥ १।३।१०।
२८ लोकात् ॥ १।१।३ ।
व
३११ वयस्यचरमेऽतः ॥ २।३।२५ ।
६०० वर्गान्तात् ॥ ७।१।५० ।
३३८ वर्णदृढादिभ्यष्ट्यण्० ॥७।३। ६० ।
४८८ वर्णाः ॥३।१।१८७ ।
वर्णाव्ययात्स्वरूपे॥७।४।६।
५८८ वर्षाकालेभ्य इकण् ।। ६ । ४।६१ ।
१६६ वर्षापुनई नकारा० ॥२।१ । २२ ।
२३७ वसुराटोः ।।३।२।८३ ।
६७८ वाच आलाटौ ॥८।१।४६ ।
६७६ वातातीसारपिशा० ॥ ८ । ११ २८ ।
३६६ वा तृतीयासप्तम्योः ॥३।२।३।
२८६ वाग्नौ द्वित्त्वे ॥२।१।५७ ।
१८७ वामशसि ॥२।१।१८।
५८३ वा युष्मदस्मदोऽनी ।। ६।४। ६६ ।
७११ वारे कृत्वस् ।।८।१ । १२७
१११ वावसाने ॥ १।३।४१।
८३ वा शसे ।। १।३।४५।
२२७. वाष्दन आः स्यादौ ॥१।४।
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.
परिशिष्टम्
भ
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'
सूत्राङ्क: सुत्रम्
१२ वाहर्पत्यादयः ॥ १।३ । ५७ ।
६५४ विशतेस्तेर्डिति ॥८।४।६८।
६५८ विंशत्यादेर्वा तमट् ।। ७।४।४६ ।
५५३ विकारे ।। ६ । ३ । ३३ ।
७०८ विचाले च ॥ ८।१ । १२३ ।
६८२ विनयादिभ्य इकण ॥७।४। ८४ ।
३८६ विना तृतीया च ॥ २।४ । १२५ ।
४६० विरोधिनामद्रव्या०॥३। १ । १६० ।
४४१ विशेषणं विशेष्ये ॥३।१ । १०० ।
४६२ विशेषणम् ॥३।१ । १६१ ।
८२ विसर्गस्य सश्छते ।।१।३। ४४ ।
४०५ वृत्त्यन्तः॥१
७२० वृद्धस्य च ज्यः॥ ८।४।३५ ।
५८१ वृद्धादीयः॥ ६।४।३२ ।
५१६ वृद्धिः स्वराणामादे०।८।४।१।
१३६ वेङयोः ।।२।१।२६ ।
१८८ वेयुवोऽस्त्रियाः॥१।४।३५ ।
७३३ वेर्लोपः॥४।४।४८
७४२ वैकाद् द्वयोनिर्धार्य० ॥ ८।२। ६६ ।
७०६ वैकाद् ध्यमुम् ॥ ८।१ । १२४ ।
६७३ ब्रीह्यादिभ्यस्तौ ॥ ८ ॥ १. १२ ।
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कालुकौमुदी-पूर्वार्धे
सूत्राङ्कः
सूत्रम्
५३ शकादीनां टेरन्ध्वा० ॥ १।२। ११ ।
४०२ शरदादेरव्ययीभावात् ॥ ८।३ । २७ ।
१७६ शराभ्राजयज्मृमृध्रस्०।२।१। ११७ ।
५६६ शरीरावयवात् ।।७।१। ३३ ।
६२४ शरीरावयवाद्यः ॥ ७।३। ३७ ।
१०५ शसोऽता दीर्घः सश्च० ॥१।४। ७२ ।
२७७ शसो नश् ॥२।१।५० ।
४४४ शाकपार्थिवादीनां०॥३।१ । ११० ।
६४ शात् ।।१।३।६।
६७२ शिखादिभ्य इन् ॥ ८।१।११।
१७ शिदनेकवर्णः स०॥८।४ । १२४ ।
५२० शिवादेरण ।। ६ । २।४२।
१३२ शिस्थुः ॥ १।१। ५४ ।
७१ शे चग्वा नोश्चे॥१।३।२१ ।
३७१ शेषे ।।२।४। ८७ ।
४६१ शेषे ।।३। १ । १३८ ।
५६६ शेषे ॥ ६।४।१।
३१२ शोणादेः॥२।३। ३४ ।
६१६ शोभते ॥ ७।२ । १७३ ।
४०७ श्रितादिभिः॥३।१।४५।
।
परिशिष्टम्
सूत्राङ्कः सूत्रम्
३५८ श्लाघह्न स्थाशपां शी० ॥२।४ । ३४ ।
२१८ श्वन् युवन्मघोनामी० ॥२।१।२६ ।
५३१ श्वशुराद्यः ।।६।२।११४ ।
ष
६६४ षट्कतिकतिपया०॥७।४।५८।
३८२ षष्ठ्यनादरे॥२।४।१११ ।
४१४ षष्ठ्ययत्नाच्छषे॥३।१।६३
४६ षष्ठ्यान्त्यस्य ।।८।४।१२३।
६५ ष्टुभिःष्टुः ॥ १।३। ६ ।
स
६५७ संख्यापूरणे डट् ॥७।४।४८ ।
४४६ संख्यापूर्वो द्विगुश्च ॥ ३ । १ । १२४ ।
७०६ संख्याया धा॥८।१। १२२ ।
२१५ संख्याया णः ॥ १।४।३८ ।
१५५ संख्यायालेखले नु० ॥१।४।३।
५७६ संज्ञा वृद्धं वा ॥६।२ ।।।
५६३ सन्धिय्वोरैडौट् च ।।८।४। २३ ।
७४७ संभ्रमे यावद्वोधम् ॥ ८।४।६३ ।
२०६ संयोगस्य ।।२।१।११६ ।
१६० संयोगात् ।।२।१ । १५ ।
१६८
कालुकौमुदी-पूर्वार्ध
।'
सूत्राङ्कः सूत्रम्
१३ संयोगे गुरुः ॥ १।१। १४ ।
६०८ संस्कृते ॥७।२।८।
५६७ संस्कृते भक्ष्ये ॥ ६ । ३ । १०७ ।
६४० सखिदूतवणिग्भ्यो० ॥७।३ । ६४।
४५० सखेष्टः ।।८।३।६।
६१६ सतीर्थ्यः ॥ ७ । २ । ८३ ।
७०३ सदाधुनेदानीं त०॥८।१।११३ । ...
३२६ सपन्यादौ ।।२।३। ६६ ।
४१७ सप्तमी शौण्डादिभिः॥३।१ । ७७ ।
४६८ सप्तम्यन्तम् ।।३।१। ६३ ।
७०० सप्तम्याः॥८।१।११०।
४२४ सप्तम्युक्तं कृता॥३।१।६८ ।
३६१ समर्थार्थनमस्व०॥२।४।६७ ।
३६ समानानां सवर्णे ॥ १।२ । १२ ।
१०४ समानादमः ।।१।४।७१ ।
३६५ समासप्रत्यययोः ।।३।२।६।
५०५ समो हितततयोर्वा ॥ ३ । २ । १४८ ।
७८ सम्राट् ॥ १।३।२०।
४५६ साशसंख्यातपु० ॥ ८।३। ५५ ।
४५७ साशसंख्याव्ययात् ।। ८।३।१०।
४६७ सर्वादिश्च बहुव्री०॥३।१।१६० ।
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..
परिशिष्टम्
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+
सूत्राङ्कः सूत्रम्
१२२ सादेः स्मैः ॥ १।४। १७ ।
१७७ सर्वादेर्यस्य सुडा० ॥ १।४ । ३०
३६२ साद्देश्च सर्वाः॥२ । ४ । १२८ ।
३४५ सर्वोभयाभिपरि० ॥२ । ४ । ५० ।
२८४ सविशेषणमेका० ॥ १।१ । ३० ।
४६६ सहस्य सो वा बहु० ॥ ३
वा बहु० ॥ ३।२ । १२४ ॥
३५१ सहार्थे ।।२।४ । ५६ ।
२१३ सहेः साडः ॥ २।२। ३८ ।
७३६ सात्सुगोः ।। २ ।.२ । ६७ ।
३८४ साध्वसाधुभ्याम् ॥ २।४। १०५ ।
४४० सायाह्नादयः ।।३ । १ । ३६ ।
२३१ सावयं पुंसि ।।२।१ । ७३ ।
५५६ सास्य देवता ।। ६ । ३। ६६ ।
६४ सि औ जस्-अम् औ शस्-टा० ॥१।४।१।
४१६ सिंहादिभिः पूजायाम् ॥ ३ । १ । ७६ ।
२२
सितिबादिविभक्तिः ।। १ । १ । २१ ।
२ सिद्धिरनेकान्तात् ॥ १।१ । २।
११७ सिर्धिरामन्त्रणे ॥ १।१ । ५६ ।
६७७ सुखादेः ।। ८ । १ । ३० ।
४७६ सुहृदुहृदौ मित्रा०॥८।३ । १०४ ।
सैषाद्धसे लोपः ॥ १।३।६०।
कालुकौमुदी-पूर्वार्ध
८८
सूत्राङ्कः सूत्रम्
सोऽहः ॥२।१ । १०५ ।
२०५ सौ नुम् ॥ १।४। ८०।
२३८ स्कोः संयोगायोलोपः ।। २।१।११८ ।
स्तोः श्चुभिः श्चुः । १।३।५।
१८६ स्त्रियाः ।। २ । १ । १७ ॥
१८५ स्त्रियाम् ॥ १।४। ८६ ।
४७७ स्त्रियामिनः ॥ ८।३.१०८।
१८० स्त्रीदुद्भया डितां दै दास् ॥ १। ४ । ३३ ।
५४० स्त्रीपुंसाभ्यां ननौ ।। ६ । २।२८ ।
७२३ स्थूलदूरयुवक्षि० ॥ ८।४ । ४२ ।
३३७ स्मृत्यर्थदयेशां वा ।।२।४।४।
१०१ स्यादावसंख्येयः ।।३।१।१३५ ।
८६ स्रोविसर्गः ॥२ । १ । १०३ ।
६२८ स्यादेरिवे ।। ७।३ । ५३ ।
३३० स्वतन्त्रः कर्ता ।।२।४।२।
७५ स्वरात् ।। १।३।२५ ।
४८४ स्वराद्यदन्तम् ।। ३।१।१७३ ।
१६ स्वरानन्तरिता ह० ॥ १।१ । १७ ।
३५ स्वरे वाऽसन्धिश्च ॥ १।३ । ५३ ।
५२६ स्वसुरीयः ।। ६ । २। १०६ ।
४७१ स्वाङ्गादीपो जातेश्वा० ।।३।२।६०।
परिशिष्टम्
सूत्राङ्कः सूत्रम्
६८१ स्वामिन्नीशे ।। ८।१।८० ।
३८६ स्वामीश्वराधिपति० ।। २।४। ११३ ॥
ह
४६४ हंसगमनादयः ॥३।१ । १२६ ।
२२६ हनो घेन ।।२।२ । १०४ ।
२२५ हनो होनः॥२।११३८ ।
८५ हबे ॥ १।३। ५० ।
८० हशसेऽनुस्वारः।। १ । ३ । ३५ ।
३१० हसात्तद्धितस्य ।।८।४।७४।
१८३ हसेपः सेलोपः ॥ १।४।२७ ।
३६३ हितसुखाभ्याम् ।।२।४।७२ ।
४१२ हितादिभिः ।।३।११५७ ।
३६१ हेत्वर्थस्तृतीयाद्याः ।।२।४। १२७ ।
२०१ हो ढो झसपदान्तयोः ॥२।१।११२३
२६८ ह्रस्वश्चाभाषितपुं० ॥ २।३ । १०४ ।
१४७ ह्रस्वस्य गुणो धिना ॥१।४।३६
६५५ ह्रस्वान्नाम्नस्ते ॥२।२ । ३६ ।
११४ ह्रस्वापश्च ।।१।४।३७ ।
७३६ ह्रस्वे ॥ ८।२।६०।
३२ ह्रस्वोऽपदे वा ॥ १।२।२।
१२ ह्रस्वो लघुः ॥ १।१ । १३ ।
इति परिशिष्टम्