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Shree Acharayacharitam

Shree Shree Acharaya Charit · 25.06.06

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श्रीः श्रीश्रीआचार्यचरितम् Pramom भाषाटीकासहितम् । *: श्रीश्रीराधाकृष्णाभ्यानमः । श्रीमते भगवनिम्बार्काय नमः । भक्तार्तिघ्नमहौषधं भवभयध्वंसैकदिव्यौषधं, तापानर्थकरौषधं निजजने संजीवनकौषधम् । व्यामोहोद्वलनौषधं मुनिमनोवृत्तिप्रवौषधं, कृष्णप्राप्तिकरौषधंपिवमनोनिम्बार्कनामौषधम् भक्तों की पीड़ा को दूर करनेवाले औषध, भवभय के ध्वंस करनेवाले प्रधान दिव्यौषध, तापों के अनर्थ करनेवाले औषध, निजजनों में सञ्जीवन के एकमात्र औषध, व्यामोह के दलन करनेवाले औषध, मुनियों की मनोवृत्तियों के प्रवर्तक औषध, और श्रीकृष्ण की प्राप्ति करनेवाले औषध, ऐसे निम्बार्क-नाम औषध को हेमन! तू पान कर ॥१॥ माथुरे मथुरायां च पुण्यद्रुमलताये। नानापक्षिगणाकीणे पुण्यसत्त्वनिषेविते ॥२॥ मायुरमण्डल की श्रीमथुरापुरी में, पवित्र वृक्षावलियों और लतानों के आश्रय में, अनेक पक्षियों और पवित्र जन्तुओं से सेवित ॥२॥ (१) न.

वैष्णवसर्वस्व । ~~ wmom vA ध्रुवक्षेत्रे महापुण्ये यत्र सिद्धि ध्रुवो गतः । तत्रोसीनं गुरु श्रीमद्धरिव्यासं महामुनिम् ॥३॥ महापवित्र श्रीध्रुवक्षेत्र में, जहां श्रीध्रुवजी सिद्धि को प्राप्त हुए थे, वहां पर विराजमान गुरुवर श्रीमद्हरिव्यासदेव महामुनि को ॥३॥ सर्वतत्त्वोपदेष्टारं ज्ञानभक्तिप्रवर्तकम् । योगाधीशंत्रिकालज्ञं संप्रदायप्रवर्तकम् ॥ ४ ॥ जो सब तत्त्वों के उपदेष्टा, ज्ञान और भक्ति के प्रवर्तक, योगाधीश, त्रिकालज्ञ और सम्प्रदाय के प्रवर्तक थे ॥ ४ ॥ दीक्षिता चंडिका येन ज्ञानभक्तिप्रभावतः । व्यासदेव इति प्राहुस्तं देवा हरिशब्दतः ॥ ५॥ जिन्होंने निजज्ञान और भक्ति के प्रभाव से चण्डिका को चेली किया और जिन्हें देवता 'श्रीहरिव्यासदेवजी' के नाम से पुकारते थे ॥ ५ ॥ सर्वे परशुरामाद्याः स्वभूदेवादयोपरे । सर्वे सर्वविदो धीराः पप्रच्छुरिदमादरात् ॥६॥ उन श्रीहरिव्यासदेवजी से श्रीपरशुराम आदिक तथा श्रीस्वभूदेवादिक सर्वविद् धीरों ने आदरपूर्वक यह पूछा ॥ ६॥ भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वधर्मप्रवर्तक । ब्रूहि नःश्रदधानानामाचार्यचरितं शुभम् ॥७॥ हे भगवन्, हे सर्वधर्मज्ञ, हे सर्वधर्मप्रवर्तक, श्रीप्राचार्यचरित। AAMANA.MAA vvvv हम श्रद्धावानों को आप शुभ और कल्याणकारक श्रीआचार्यचरित सुनाइए ॥ ७ ॥ श्रीमनिम्बार्कमाचार्यमस्माकंकुलदैवतम् । सुदर्शनावतारं हि प्राहुराO: प्रमाणतः ॥८॥ पार्यों ने शास्त्रों के प्रमाणों से हमारे कुलदेव सुदर्शनावतार श्रीमनिम्बार्काचार्य को कहा है ॥८॥ वयं तद्विस्तरात्सर्वं श्रोतुमिच्छामहे प्रभो । श्रीमन्त्रिम्बार्कदेवस्य चरितंत्रवणामृतम्॥॥ हे प्रभो ! श्रीमनिम्बार्कदेव के श्रवणामृतचरित को हमलोग विस्तारपूर्वक सुनने की इच्छा करते हैं ॥६॥ इतिजिज्ञासुभिः शिष्यैः संपृष्टः सर्वतत्त्ववित् । कृपया परया युक्तो हरिव्यासो महामुनिः ॥१०॥ इस प्रकार जिज्ञासु शिष्यों के पूछने पर सर्व- तत्त्ववित् और परमकृपायुक्त महामुनि श्रीहरिव्यास- देवजी ने ॥ १० ॥ हार्ट्स तेषां तु विज्ञाय स्मृत्वाचार्यपदाम्बुजम् । प्रेमगद्गदया वाचा प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥११॥ जन शिष्यों के हृद्गत भाव को जानकर और श्रीमदाचार्यचरण का स्मरण कर प्रेमगद्गद-बाणी से चरित कहने का विचार किया ॥ ११ ॥ श्रीराधिकामाधधकेलिकुज्जे, प्राप्ताभिषेकं निजदेशिकं वै।

, ४ वैष्णवसर्वस्व । श्रीभहदेवं प्रणिपत्य भूयो, वक्ष्ये चरित्रं परमं पवित्रम् ॥१२॥ श्रीराधामाधव के केलिकुञ्ज में अभिषेकप्राप्त निजगुरु श्रीभट्टदेवजी को प्रणाम करके पुनः परम पवित्र चरित कहते हैं.॥ १२ ॥ श्रीहंसं श्रीकुमाराँश्च नारदं निम्बभास्करम्। भाष्यकारं प्रणम्याथ वक्ष्ये तच्चरितं शुभम् ॥१३॥ श्रीहंसभगवान्, श्रीसनकादिक, श्रीनारद, श्रीनिम्बार्काचार्य तथा भाष्यकार श्रीश्रीनिवासाचार्य को प्रणाम करके मङ्गलचरित कहते हैं ॥ १३ ॥ यदा यदा हि धर्मस्व क्षयो वृद्धिश्च पाप्मनः । तदा तुभगवानीश आत्मानं सृजते हरिः ॥१४॥ जब जब धर्म का क्षय और पाप की वृद्धि होती तब तब हरि, ईश, भगवान् अपने को प्रकट करते हैं ॥ १४ ॥ अवतारा ह्यसंख्याता भूभारक्षपणाय च । आत्मज्ञानोपदेशाय धर्मसंरक्षणाय च ॥१५॥ श्रीभगवान् के असंख्य अवतार भूभार के दूर करने के लिये, आत्मज्ञान के उपदेश करने के लिये और धर्म की रक्षा करने के लिये होते रहते हैं ॥१५॥ यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥१६॥ हे भारत ! जब जब धर्म की ग्लानि होती है श्रीनाचार्यचरित। ५ और अधर्म का उत्थान होता है, तब तब हम अपने को प्रकट करते हैं ॥ १६ ॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥१०॥ साधुओं के परित्राण के . लिये, दुरात्माओं के विनाश के लिये और धर्म के संस्थापन के लिये हम युग युग में प्रकट होते हैं ॥ १७ ॥ इदं भगवतादिष्टं स्वभक्तायार्जुनाय च । तत्त्वज्ञानोपदेशायावतारा बहुधा मता ॥१८॥ यह उपदेश अपने भक्त अर्जुन को श्रीभगवान् ने किया था, अतएव तत्त्वज्ञान के उपदेश के लिए श्रीभगवान् के बहुत प्रकार के अवतार हैं ॥ १८ ॥ देवहूतिसुतं हंसं सनकं नारदं तथा । ऋपनं च पृथं व्यास नरनारायणावृषी॥१॥ कपिल, हंस, सनक, नारद, ऋषभ, पृथु, व्यास, नरनारायण ऋषी ॥ १ ॥ दत्तं सुदर्शनं विद्धि धर्मसंरक्षणाय वै । आत्मज्ञानोपदेशाय ह्यवतीर्ण हरि स्वयम् ॥२०॥ दत्तात्रेय और श्रीसुदर्शन को श्रीहरि का अव- तार जानो, जो धर्म की रक्षा के लिये और आत्म- ज्ञान के उपदेश के लिए हुए हैं ॥ २० ॥ हंसस्वरूप्यवददच्युत आत्मयोगं, दत्त: कुमार ऋषभो भगवान् पिता नः ।

वैष्णवसर्वस्व । JVvvvvvvvi विष्णुः शिवाय जगतामिति शास्त्रमारा- नारायणो रुचिर हंसवपुर्बभूव ॥२१॥ श्रीनारदजी ने श्रीवसुदेवजी से कहा है कि श्री हंसस्वरूप अच्युत भगवान् ने आत्मयोग कहा है और दत्तात्रेय, चतुःसन, ऋषभदेव, और हमारे पिता ब्रह्मा ने भी प्रात्मयोग कहा है। जगत् के कल्याण के लिये मधुसूदन श्रीविष्णु अवतार धारण कर मधु दैत्य द्वारा हरी गई श्रुतियां ले आए थे ॥ २१॥ अत्र हंसावतारस्तु कुमारानुग्रहाय वै । तत्वज्ञानोपदेशाय श्रीमदभागवते तथा ॥२२॥ यहां पर श्रीकुमारों के अनुग्रह के लिये जो श्रीहंसावतार तत्त्वज्ञानोपदेश के लिये हुआ है, वह कहते हैं; जैसा कि श्रीमद्भागवत में है ॥ २२ ॥ तनं तपो विविधलोकसिमक्षया मे, आदौ सनात्स्वतपसः स चतुःसनोऽभूत् । प्राक्कल्पसंख्लवविनष्टमिहात्मतत्वं, सम्यग्जगाद मुनयो यदचक्षतात्मन् ॥२३॥ श्रीब्रह्माजी का वचन है कि हमने विविध लोकों की रचना के लिये सृष्टि के मादि में तप किया और उस तप को भगवान् के अर्पण करने से उस तप के प्रभाव से प्रादि में स्वयम् भगवान् ही चतुः- सनकादिरूप से अवतीर्ण हुए । उन्होंने प्राक्कल्प के प्रलयकाल में विनष्ट हुए मात्त्मतत्त्वज्ञान को

श्रीपाचायंचरित।
JVN
दुश्चर ब्रह्मचर्य
पुनः भलीभांति प्रकाशित किया, जिसे मुनियों ने
भी अपने आत्मा में देखा ॥ २३ ॥
स एष प्रथमं देवः कौमारं सर्गमास्थितः ।
चचार दुःश्चरं ब्रह्मा ब्रह्मचर्यमखंडितं॥ २४॥
वे श्रीब्रह्माजी प्रथम कौमारसर्ग में स्थित होकर
अखण्डित ब्रह्मचर्य धारण करते हुए ॥२४॥
कार्तिके शुक्ल पक्षे वै नवम्यांशुभवासरे।
ब्रह्मणो मनसो जाताश्चत्वार:सनकादयः ॥२५॥
कार्तिक
शुक्ला
नवमी के दिन शुभ वासर में
ब्रह्मा के मन से चारों सनकादिक प्रकट हुए ॥२५॥
कारुण्यामृतसागरोतिविवशाजीवानवोधा-
वृतान्पश्यन्नात्मदयावशेन् भगवान्कौमारवेशं
व्यधात् । यो वै ज्ञानविरागभक्तिसहितं तत्वं
परं चादिशत्तं सर्वार्थविधायकं भवहरं श्रीमत्
कुमारं भजे ॥ २६ ॥
अति विवश और अबोध से आवृत्त जीवों को
देखकर कारुण्यामृतसागर श्रीभगवान् ने अपनी दया
के वशवर्ती होकर कौमारवेश को धारण किया,
जिन्होंने ज्ञान, वैराग्य, और भक्ति के सहित परम
तत्त्व का उपदेश किया; उन सर्वार्थदाता और भव-
भय के हरनेवाले श्रीकुमारों को हम भजते हैं ॥२६॥
साक्षात् भगवता प्रोक्तमापन्नायोटुबाय च ।
लीलावतारचरितं श्रीमद्भागवते स्फुटम् ॥२७॥

वैष्णवसर्वस्व । Nov V साक्षात् श्रीभगवान् ने शरणागत उद्धव से श्रीहंसावतारचरित को कहा है, जो श्रीमद्भागवत वर्णित है ॥२७॥ श्रीभगवानवाच एतावान् योग आदिष्टो मच्छिष्यैः सनकादिभिः सर्वतोमन आकृष्य मययद्धावेष्यते यथा ॥८॥ श्रीभगवान् ने कहा,- हे उद्धव ! हमारे शिष्य सनिकादिकों ने भी यही उपदेश किया है कि सब ओर से मन को खींचकर हम में लगावे ॥२८॥ इति भागवते स्कन्दे द्वितीये ब्रह्मवाक्यतः । श्रीहंसस्यावतारत्वप्रसिद्धिःसर्वसम्मता ॥२॥ इस प्रकार भागवत् के द्वितीय स्कन्द में ब्रह्मा के वाक्य से श्रीहंसावतार की प्रसिद्धि सर्वसम्मत है॥२४॥ एकादशे उद्धव उवाच। यदा त्वं सनकादिभ्यो येन रूपेण केशव। योगमादिष्टवानेतद्रूपमिच्छामि वेदितुम् ॥३०॥ श्रीउद्धवजी ने कहा,-हे केशव ! आपने जब और जिस रूप से सनकादिकों को परमात्मतत्त्व का उपदेश किया, आपके उस रूप के जानने की मेरी इच्छा है ॥३०॥ aman + श्रीहंसावतारचरित पुस्तकाकार छपकर तयार है । चार आने भेजकर श्रीसुदर्शन प्रेत, वृन्दावन से मगा लीजिए ।

श्रीनाचार्यचरित। ट श्रीभगवानुवाच । पुत्रा हिरण्यगर्भस्य मानसाः सनकादयः । पप्रच्छु:पितरं सूक्ष्मां योगस्यैकान्तिकी गतिम्३१ श्रीभगवाल ने कहा कि हे उद्धक! ब्रह्मा के मानस- पुत्र सनकादिकों ने अपने पिता (ब्रह्मा) से भगव- तत्त्व-विषयक योग के सूक्ष्म साधन को पूछा ॥३१॥ सनकादय ऊचुः। गुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्चेतसि च प्रभो । कथमन्योन्यसंत्यागो मुमुक्षोरतितितीर्थोः ३२ श्रीसनकादिकों ने ब्रह्मा से पूछा कि हे प्रभो ! गुणों में चित्त का प्रवेश होता है और वे गुण चित्त प्रविष्ट होते हैं, ऐसी अवस्था में संसार से मुक्त होने की इच्छा करनेवाले मनुष्यों के चित्त और विषयों का परस्पर छुटकारा कैसे होसकता है ॥३२॥ श्रीभगवानुवाच । एवं पृष्टो महादेवः स्वयंभूर्भूतभावनः । ध्यायमानःप्रश्नवीजं नाभ्यपद्यत कर्मधीः ३३ श्रीभगवान् ने कहा, हे उद्धव ! सनकादिकों के ऐसे आश्चर्यजनक तथा अश्रुतपूर्व प्रश्न को सुनकर सृष्टि के रचनेवाले, देवाधिदेव, स्वयम्भू (ब्रह्मा) यह विचारने लगे कि 'इस प्रश्न का क्या उत्तर है !' किन्तु कर्म में आसक्त बुद्धि होने के कारण वे उस प्रश्न के हेतु को नहीं जान सके ॥३३॥ ,

१०
वैष्णवसर्वस्व ।
स मामचिन्तयद्वेवः प्रश्नपारतितीर्षया ।
तस्याहं हंसरूपेण सकाशमगमं तदा ॥ ३४ ॥
उस समय उस प्रश्न से पार होने की इच्छा से
ब्रह्मा ने हमारा चिन्तन किया, तब हम हंसरूप से
ब्रह्मा के सन्मुख प्राप्त हुए ॥३४॥
सनत्कुमारागमे च ।
उज सिते नवभ्यां च हंसो जातः स्वयं हरिः ।
तत्वज्ञानोपदेशाय सर्वलोकहिताय च ॥ ३५॥
सनत्कुमार-आगम में लिखा है कि कार्तिक-
शुक्ला नवमी (अक्षयनवमी) के दिन स्वयम् श्रीहरि ने
तत्त्वज्ञान के उपदेश और सब लोगों के हित के लिये
हंसस्वरूप धारण किया ॥३५॥
शुद्धस्फाटिकदिव्यचारुवपुषं,दिव्याङ्गभूषाम्बरम्
पक्षालङ्कृतचारुबाहुनिकर,ब्रह्मेशशेषार्चितम्॥
तत्वातत्त्वविवेचनाय निपुणं,कारुण्यसिन्धं
तंशीमाधवमादिवीजमनिशं,हंसावतारं भजे ॥
श्रीहंसभगवान् का ध्यान यह है,-शुद्धस्फटिक
के समान सुन्दर शुक्ल वर्ण, दिव्य अङ्गों में सुन्दर
भूषण और वसन धारण किए हुए,पक्षालंकृत, शोभाय-
मान चारों वाहु, ब्रह्मा शिव और शेष से पूजित,
तत्त्व और अतत्व के विचार करने में परम कुशल,
करुणासागर, आदिवीज, श्रीमाधव, हंसावतार का
हम नित्य भजन करते हैं ॥३६॥

আলাদাখছি। NrNMAVA AM पुनः श्रीभागवत एव । मां दृष्ट्वा त उपव्रज्य कृत्वा पादाभिवन्दनम् । ब्रमाणमग्रतः कृत्वा पमच्छु: कोभवानिति॥३७॥ श्रीमद्भागवत में श्रीभगवान् का वचन है कि सनकादिकों ने हमें देख, हमारे समीप आ, हमारे चरणारविन्द की वन्दना कर और ब्रह्मा को आगे करके "को भवान्" अर्थात् “आप कौन हैं" ऐसा प्रश्न किया ॥ ३७॥ इत्यहं मुनिभिपृष्ठस्तत्त्वजिज्ञासुभिस्तदा । यदवोचमहं तेभ्यस्तदुद्धव निवोध मे ॥ ३८ ॥ श्रीभगवान् कहते हैं कि हे उद्धव, जब तस्व- जिज्ञासु मुनियों ने हमसे इस प्रकार घूछा, कि, "श्राप कौन हैं ?" तब हमने उनके इस प्रश्न का जो कुछ उत्तर दिया, उसे तुम सुनो ॥ ३८ ॥ वस्तुलो यद्यनानात्वमात्मनः प्रश्न ईदृशः ॥ कथं घटेत बो विपा बक्तुर्वा मे क आश्रयः ॥३॥ श्रीभगवान् कहते हैं कि हमने सनकादिकों से कहा कि हे ब्राह्मणो ! तुम्हारा आत्मसम्बन्धी ऐसा, अर्थात् बहुतों के मध्य में एक को निर्धारण करने- वाला-"को भवान्"-अर्थात् “माप कौन है ?"- यह प्रश्न. कैसे सम्भव होसकता है ? और फिर हम ही किस आश्रय से उत्तर देसकते हैं ? ॥ ३ ॥ पज्जात्मकेषु भूतेषु समानेषु च वस्तुतः । को भयानिति वः प्रश्नो वाचारम्भो ह्यनर्थकः ४० १२ वैष्णवमर्वस्व । Anime - यदि तुम्हारा यह प्रश्न प्राकृतिक देहविषयक हो, तब तो यह प्रश्न वाग्जालमात्र ही है, क्योंकि भौतिक सभी देह समान ही हैं, ॥ ४० ॥ मनसा वचसा दृष्या गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियैः । अहमेव न मत्तोन्यदिति बुध्यध्वमजसा ॥४१॥ अतएव मन से, वाणी से, दृष्टि से, तथा अन्य इन्द्रियों से भी जो ग्रहण किया जाता है, वह हम से पृथक कुछ नहीं है, यह तुम भलीभांति जानी ४१ गुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्चेतसि च प्रजाः । जीवस्य देह उभयं गुणाश्चेतोमदात्मनः ॥४२॥ हे पुत्रो ! गुणों (विषयों) में चित्त प्रविष्ट होता रहता है और वे गुण चित्त में प्रविष्ट होते रहते हैं। ये दोनो ( गुण और चित्त) हमारे अंश जीव के देह हैं ॥ ४२ ॥ गुणेषु चाविशच्चित्तमभीक्ष्णं गुणसेवया । गुणाश्चचित्तप्रभवा मद्रूप उभयं त्यजेत् ॥४३॥ गुण के सेवन करने से वारंवार चित्त गुणों में प्रविष्ट होता रहता है। योंही चित्त से जायमान गुण भी चित्त में प्रविष्ट होते रहते हैं । सो यद्यपि ये दोनो परस्पर अथित होरहे हैं, तथापि यह जीव हमारा अंश है, यह जानकर और हमारे रूप में मन लगाकर उनदोनों (गुण और चित्त) को छोड़े ॥ ५३॥ वे

श्रीआचार्यचरित।
१३
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तं च गुणतो बुद्धिवृत्तयः ।
तासां विलक्षणो जीवःसाक्षित्वेनविनिश्चितः ४४
जाग्रत्, स्वप्न, और सुषुप्ति, ये तीनों वृत्तियां
जीव के सत्त्व, रज, और तम-इन तीनों गुणों से
होती हैं। ये तीनों अवस्थाएं बुद्धि की वृत्तियां हैं,-
अर्थात् ये श्राप ही होती रहती हैं; किन्तु जीव इन
वृत्तियों का साक्षी और द्रष्टा है, अतएव जीव इन
वृत्तियों से भिन्न है ॥४४॥
मयैतदुक्तं वो विप्रा गुह्यं यत्सांख्ययोगयोः ।
जानीत मागतं यज्ञं युष्मद्धर्मविवक्षया ॥ ४५ ॥
हेविप्रो ! सांख्य और योग में जो गुह्य तत्त्व
कहा है, उसे हमने तुमसे कहा । तुम हमको साक्षात्
यज्ञ (परमात्मा) जानों । हम तुम्हें धर्मोपदेश देने
के लिए आए हैं ॥ ४५ ॥
इति तानुपदिश्याथ प्रार्थितः सनकादिभिः ।
ज्ञानं भक्तिरस्यं च विज्ञानं शरणागतिम् ॥१६॥
अथादशाक्षरं तेभ्य उपदिश्य स्वयं प्रभुः ।
ब्रह्मणा सत्कृतः प्रीत्या तत्रैवांतरधीयत ॥४७॥
श्रीसनकादिकों की प्रार्थना से उन्हें धर्मोपदेश
देकर तथा ज्ञान, भक्ति के रहस्य, विज्ञान और
शरणागति को देकर श्रीप्रभूजी ने स्वयं उन
सनकादिकों को अष्टादशाक्षर श्रीगोपालमन्त्र का
उपदेश किया। तदनन्तर ब्रह्मा से पूजित होकर
हंस भगवान् वहीं अन्तर्धान होगए ॥ ४६ ॥४७॥

वैष्णावसर्वस्व । श्रीनकादिसिद्धानां गुरुः कृष्णो गतिप्रदः । कृष्णो भक्तकृपाकारी संप्रदायप्रवर्तकः ॥४८॥ श्रीसनकादिसिद्धों के गुरु सद्गति के देनेवाले श्रीकृष्ण ही हैं। ये श्रीकृष्ण भक्तों पर कृपा करनेवाले और सम्प्रदाय के प्रवर्तक हैं ॥४८॥ मन्त्रीपदेशप्रमाणमाह ऊर्धाम्नायतन्त्रे शिवेनोक्तम् । नारायणमुखाम्भोजान्मन्त्रस्त्वष्टादशाक्षरः । आविर्भूतः कुमारैस्तु गृहीत्या नारदाय च॥४॥ उपदिष्टःस्वशिष्याय निम्बार्काय च तेनतु। एवं परम्परापाप्तो मन्त्रस्त्वष्टादशाक्षरः ॥५०॥ विष्णुयामलवाक्येन श्रीमन्तः सनकादयः । ज्ञानविज्ञानसम्पन्ना हंसशिष्याः प्रकीर्तिताः ५१ इत्यूदर्धाम्नायतन्त्रे च समाम्नातं पिनाकिना। लोकानुग्रहकामेन भक्तराजेन धीमता ॥ ५२ ॥ मन्त्रोपदेश का प्रमाण कहते हैं । उर्धाम्नाय- तन्त्र में श्रीशिवजी ने पार्वती से कहा है,-श्रीनारायण के मुखकमल से अष्टादशाक्षर मन्त्रराज प्रकट हुए, जिन्हें श्रीहंसभगवान् से चारो सनकादिकों ने ग्रहण करके श्रीनारदजी को दिया; और श्रीनारदभगवान् मे स्वशिष्य श्रीनिम्बार्काचार्य को उपदेश किया। इसी प्रकार यह अष्टादशाक्षर मन्त्र परम्परा से प्राप्त हुना। विष्णुयामल के वाक्य से श्रीसनकादिमुनीश्चर

मीनाचार्यचरित।
१५
RAM
-
ज्ञानविक्षान से युक्त थे और श्रीहंसभगवान् के शिष्य
थे। इस प्रकार ऊर्धाम्नायतन्त्र में लोगों पर
अनुग्रह करके भक्तराज धीमान् श्रीशिवजी ने कहा
है॥४८॥ ५० ॥ ५१ ॥ ५२ ॥
ततः श्रीनारदावतारप्रमाणमाह
स्वापन्नातिविनाशाय तत्त्वसंरक्षणाय च ।
वैष्णव्या कलयोद्भूतो नारदो मुनिसत्तमः ५३
तदनन्तर श्रीनारदावतार का प्रमाण कहते हैं,-
निज शरणागत जन की पीड़ा के दूर करने के लिये
तथा तत्त्वों की रक्षा के लिये श्रीविष्णुभगवान् के
अंश से मुनिवर्य श्रीनारदजी प्रकट हुए ॥ ५३ ॥
उत्सङ्गान्नारदो जज्ञे ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ।
मार्गशुक्ने शुभः च द्वादश्यां शुभवासरे ॥५४ ॥
श्रीब्रह्माजी के उत्सङ्ग से श्रीनारदजी अग्रहण
शुक्ला द्वादशी के दिन शुभ नक्षत्र और शुभ वासर में
प्रकट हुए ॥ ५४ ॥
श्रीमद्भागवते।
तृतीयमृषिसगं वै देवर्षित्वमुपेत्य सः ।
तंत्र सात्वतमाचष्टे नैष्कयं कर्मणां यतः ॥५॥
श्रीमद्भागवत
में
कहा है कि तृतीय ऋषिसर्ग
में श्रीभगवान् ने देवर्षि श्रीनारदजी का अवतार धारण
कर भागवतधर्म का प्रचार किया, जिससे कर्मों
की निष्कामता होती है ॥ ५५ ॥

१६
वैष्णवसर्वस्व।
कमलजसुतमीशं प्रोल्लसतपप्रवक्त्रं,
सुललितकचजूटं स्वर्णयज्ञोपवीतम् ।
अजिनवसनधानं नारदं ब्रह्मरूपं,
जलनिधिसुतकान्तं कृपणदासं नमामि ॥६॥
श्रीब्रह्मा के पुत्र, सुन्दरमुखारविन्द, ललित
केशों का जूड़ा बांधे हुए, पीतयज्ञोपवीतधारी;
मृगचर्म धारण किए, चन्द्रकान्त, ब्रह्मरूप, कृष्ण-
दास, श्रीनारदजी को हम प्रणाम करते हैं ॥ ५६ ॥
उपदेशमकुर्वंस्ते नारदं मुनिसत्तमाः ।
कुमारसंहितायां वैकुमारा हरयो हरिम् ॥५७ ॥
श्रीसनत्कुमारसंहिता में लिखा है कि श्रीहरि के
रूप सनकादिकों ने श्रीभगवान् के रूप श्रीनारदजी
को भागवतधर्म का उपदेश किया॥७॥
सनत्कुमारं योगीन्द्रंसिद्धाश्रमनिवासिनम् ।
ब्रह्मनिष्ठं मुनि शांतमुदयादित्यवर्चसम् ॥ ५८ ॥
विनयेनोपसंगम्य शिरसा प्रणिपत्य च ।
नारदः परिपप्रच्छ ब्रह्मर्षि सर्वकालवित् ॥५६॥
योगीन्द्र, सिद्धाश्रमनिवासी, ब्रह्मनिष्ठ, उदय-
काल के सूर्य के समान तेजस्वी, शांत, मुनि श्रीसन-
स्कुमारजी के शरण में विनयपूर्वक प्राप्त होकर और
सिर झुका कर दण्डवत् प्रणाम करके सर्वकालवित्
श्रीनारदजी ने यों पूछा ॥ १८ ॥५॥

श्रीप्राचार्यचरित। anema I , , भगवन्योगिनां श्रेष्ठ भवसागरतारक । श्रुतानि सर्वशास्त्राणि मया त्वत्तोविशेषतः ६० हे भगवन्' हे योगियों में श्रेष्ठ, हे भवसागर से तारनेवाले, हमने आपसे सब शास्त्र विशेषरूप से सुने ॥ ६० ॥ अपरोक्षमिदं जातं जगद् ब्रह्मपरं तथा। इदानीं श्रोतुमिच्छामि मंत्र सर्वोत्तमोत्तमम् ६१ जिनसे यह ब्रह्मपरक जगत् हमें प्रत्यक्ष होगया है। अब हम आपसे परमोत्तम मन्त्र को श्रवण किया चाहते हैं ॥१॥ इति संप्रार्थितस्तेन नारदेन च धीमता। सनत्कुमारो भगवानवोचन्नारदंप्रति ॥ ६२ ॥ इस प्रकार धीमान् श्रीनारदजी की प्रार्थना सुनकर भगवान् श्रीसनत्कुमारजी ने उनसे कहा ॥६२ साधु पृष्टं त्वया ब्रह्मसर्वभूतहितैषिणा। श्रीमद्धंसमुखांभोजाच्छु तं यत्तद्वदामि ते ॥६३॥ हे ब्रह्मन्, सब प्राणियों के हित चाहनेवाले तुमने अच्छा प्रश्न किया। हमने श्रीहंसभगवान् के मुख से जो मंत्र सुना है, वह तुमसे कहते हैं ॥ ६३ ॥ गोपालविषया मंत्रास्त्रयस्त्रिंशत्प्रभेदतः । तेषु सर्वेषु मंत्रेषु मंत्रराजमिमं शृणु ॥ ६४ ॥ श्रीगोपालजी के विषय के मंत्रों के तेंतीस भेद हैं। उन सब मंत्रों में इस मंत्रराज को तुम सुनो॥६४ ॥ (३) न.

१८
वैष्णवमर्वस्व
CRPARuminimiteanta
अष्टादशाक्षरं मंत्रं दुर्लभं भुवनत्रये।
समाहितमना भूत्वा शृणु वक्ष्यामि नारद ।श
है नारद, तुम एकाग्रचित होकर सुनो। त्रैलोक्य
में दुर्लभ अष्टादशाक्षर मन्त्र को हम कहते हैं ॥६॥
तथा संमोहनतंत्र पार्वतीहरसंयादे।
अष्टादशाक्षरो मन्त्रो व्यापको लोकपावनः ।
सप्तकोटिमहामन्त्रशेखरो देवशेश्वरः ॥ ६६ ॥
यही बात सम्मोहनतन्त्र में श्रीमहादेय और
पार्वती के संवाद में कही है। यथा, --सप्तकोटि
महामन्त्र का मस्तकरूप, देवशेखर, लोकपावन,
और व्यापक यह अष्टादशाक्षर मन्त्र है ॥ ६६ ॥
अमु पञ्चपदं मनुमावर्त्तयेद्यः सयात्यनायासत्तः
केवलं तत्पदं तदितिगोपालतापिनीश्रुतेः ॥६॥
जो कोई इन पांच पदों के मन्त्र को वारंवार
कहते हैं, वे अनायास ही साक्षात् मोक्षपद को प्राप्त
करते हैं, ऐसा गोपालतापिती श्रुति में कहा है ॥६॥
अर्धाम्नायतन्त्रे च।
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि रहस्यं परमं महत्।
कृष्णमङ्गलमूर्तिश्च मन्त्रस्त्वष्टादशाक्षरः ॥६॥
अर्धाम्नायतन्द्र में श्रीशिवजी ने श्रीपार्वतीजी
से कहा है कि, है देवि ! तुम इश महान् रहस्य
को सुनो, हम कहते हैं, अादशाक्षर महामन्त्र
साक्षात् मनसा मूर्ति श्रीकृष्ण का स्वरूप ही है ॥६॥

शीनाचार्यचरित। १८ कृष्णशत्कोठिमन्त्राणां मन्त्रशक्तिप्रदायकः । कृष्णशत्कोटिमन्त्राणां शेखरोऽष्टादशाक्षरः६६ যন্তু সাহহাব শাসন স্কু ল মন- कोटि मन्त्रों का मस्तक है और श्रीकृष्ण के शत- कोटि मन्त्रों को शक्ति देनेवाला है ॥ ६ ॥ तं कृष्णस्य महाभागे मन्त्रगजेश्वरेश्वम् । अष्टादशाक्षरं मन्त्रं जपामि धयानमध्यगः ७० अतः हे महाभागे ! श्रीकृष्ण के उस मन्त्र- राजेश्वरेश्वर अष्टादशाक्षर श्रीगोपालमन्त्र का जप हम ध्यान में किया करते हैं ॥ ७० ॥ श्रीमद्गोपालमंत्रस्य युक्तस्याष्टादशाक्षरैः। मंत्रराजत्वविख्यातिः सर्वशास्त्रेषु सम्मताः ७१ अष्टादशाक्षरों से युक्त श्रीगोपालमन्त्र के मन्त्र- राजत्व की ख्याति सब शास्त्रों में कही है ॥ ७१ ॥ तथा श्रीमद्भागवते चतुर्थस्कंदे, रुद्रः प्रचेतान् प्रति। स्वधर्मनिष्ठः शतजन्मभिः पुमान् विरजितामेति ततः परं हि मां। अव्याकृतं भागवतोऽथ वैष्णवम् पदं यथाहं विबुधाकलात्यये ॥ ७२ ॥ तथा श्रीमद्भागवत के चतुर्थस्कन्ध में श्रीमहा- देवजी ने दश प्रचेतों से कहा है कि, स्वधर्मनिष्ट मनुष्य बैंकड़ों जन्मों के अनार ग्रामपद को प्राप्त

वैष्णवसर्वस्व ।
करता है; तदनन्तर हमको पाता है। इसके पश्चात्
वह भगवद्भक्त अविकृत वैष्णवपद को प्राप्त करता है,
जिस पद को कि हम देवकला त्यागने के पश्चात्
पाते हैं ॥ ७२ ॥
इत्यादिश्योपदिश्याथ बनविद्यां सनातनीम् ।
भूमविद्यामात्मविद्यां कृतकृत्यं चकार ह ॥७३॥
इस प्रकार कहकर और सनातनी ब्रह्मविद्या,
भूमविद्या और आत्मविद्या का उपदेश देकर श्रीसन-
कुमारजी ने श्रीनारदजी को कृतकृत्य कर दिया ॥३॥
श्रुत्वा तस्य मुखाम्भोजाद्विद्यामानन्ददायिनीम्
ततः प्रोवाच भगवानारदो मुनिसत्तमः ॥७४ ॥
श्रीसनत्कुमारजी के मुखकमल से मानन्द-
दायिनी विद्या को सुनकर फिर मुनिसत्तम भगवान्
श्रीनारदजी यों बोले ॥ १४ ॥
घन्योस्म्यऽनुग्रहीतोऽस्मि भवद्भिः करुणात्मभिः
कृपया मे समादिष्टो मंत्रमूर्तिःस्वयं हरिः ॥७॥
हम धन्य हुए, करुणावान् आपने हमें अनुग्रहीत
किया; इसलिये कि नापने कृपाकर मन्त्रमूर्ति स्वयं
श्रीहरि का हमें उपदेश किया ॥ १५ ॥
इत्युक्त्वा प्रणिपत्याथ दंडवत्तत्पदाम्बुजे।
ब्रह्मलोकंस भगवान्नारदः प्रययौ मुनिः ॥७६ ॥
इस प्रकार कह और श्रीसनत्कुमारजी के
चरणारविन्दों में दण्डवत्प्रणाम कर वे भगवान्
श्रीनारद मुनि ब्रह्मलोक को गए ॥ ७६ ॥

emon श्रीप्राचार्यचरित। २१ इत्याधुक्तप्रकारेण नारदो मुनिसत्तमः । श्रीमत्कुमारशिष्यो वै प्रमाणेभ्यो निरूपितः ७७ इत्यादि प्रकारों तथा प्रमाणों से यह निरूपण किया गया कि मुनिसत्तम श्रीनारदजी श्रीसनत्कुमार जी के शिष्य हुए थे ॥ ७७ ॥ इत्याचार्यचरित्रस्य पूर्वविशाम ईरितः । यत्राचार्यत्रयाणांचाबतारत्वं प्रकीर्तितम् ॥८॥ इस प्रकार आचार्यचरित का प्रथम विश्राम कहा गया, जिसमें तीनों प्राचार्यों ( श्रीहंस, श्रीसनकादिक और श्रीनारद ) के अवतार धारण करने का प्रसङ्ग कहा गया ॥ ७८ ॥ इतिश्रीमदाचार्यचरितस्य प्रथमो विश्रामः समाप्तः ॥१॥ ॥ ७८॥ .

वैष्णवसर्वस्व । RAMANARules श्रीः अथाचार्यत्रयाणां च वक्ष्ये स्तोत्रत्रयी शुभा। पापापहारिणीदिव्याभुक्तिमुक्तिप्रदायिनी॥१॥ अब तीनों प्राचार्यों (सीहंस,श्रीसनकादिक और श्रीनारदजी) के कल्याणकारक, पापापहारक, दिव्य और भुक्ति-मुक्ति-प्रदायक स्तोत्रों को कहते हैं ॥१॥ अथसम्प्रदायप्रवर्तक-श्रीहंसमणिपत्तिस्तोत्रम् । हूंसस्वरूपं रुचिरं विधाय, यः सम्प्रदायस्य प्रवर्तनार्थम् ॥ स्वतत्त्वमाख्यात्सनकादिकेभ्यो, नारायणं तं शरणं प्रपद्ये ॥१॥ जिन्होंने रमणीय 'हंस'-स्वरूप धारण करके 'मम्प्रदाय' प्रचलित करने के लिए चतुःसनकादिकों से निज 'तत्त्व' को कहा, उन श्रीनारायण के शरण में हम प्राप्त होते हैं ॥१॥ यदीयपादाम्बुजभृङ्गभावं, जनो दधानो जगतीतलेऽस्मिन् ॥ स्वर्गापवर्गों मनुतेऽतितुच्छौ, श्रियः पति तं शरणं प्रपद्ये ॥२॥ जिनके चरणारबिन्द के मधुकर-भाव को प्राप्त होकर अनुष्य इस संसार में स्वर्ग और अपवर्य (मोक्ष) श्रीआचार्यचरित। २३ को तुच्छ समझने लगता है, उन श्रीपति के शरण में हम प्राप्त होते हैं ॥२॥ कारुण्यपीयूषसरित्पत्तित्वं, स्वकीयभक्तेषु सदा दधानम् ॥ मनोज्ञलीलं कमनीयशीलं, निया निकेतं शरणं प्रपद्ये ॥३॥ निज भक्तों एर सदा कारुण्यरूपिणी सुधानदी के स्वामित्व के भाव को धारण करनेवाले, अर्थात् मिज भक्तों के लिए करुणासागर, मनोहर लीला करनेदाले और बाञ्छनीय स्वभाववाले श्रीनिवास के शरण में हम प्राप्त होते हैं ॥३॥ सतां परित्राण-परायणो यः, करोति नानाविध-मर्त्यलीलाम् ॥ स्वधर्म-संस्थापन-सक्तचित्तं, तं देवदेवं शरणं प्रपद्ये ॥४॥ सज्जनों की रक्षा में तत्पर होकर जो नाना प्रकार की मनुव्यलीलाएं करते हैं, उन स्वधर्म- संस्थापन में प्रासक्त-चित्त, देवाधिदेव के शरण में हम प्राप्त होते हैं ॥ ४ ॥ न धर्म निष्ठां दधदस्मि नात्म- विज्ञानवानस्मि न भक्तिमांश्च ॥

. वैष्णवसर्वस्व । mada rvsna - ANANVI NAL/ M V MARA अतीव दीनो भगवन् ! सदाऽहं, त्वां दीनबन्धुं शरणं प्रपद्ये ॥५॥ हे भगवन् ! हम न तो धर्म में निष्ठा रखते हैं, न हममें आत्मज्ञान ही है और न हम भक्तियुक्त ही हैं; हम सदा से अत्यन्त दीन हैं, (इस लिये ) मापको दीनबन्धु जानकर शरणागत होते हैं ॥५॥ तरङ्गभागस्मि सताञ्च सङ्गे, गाङ्गेयवर्णाम्बर ! 'ते प्रसङ्गे ॥ मनो न लग्नं' मम देहभड़े, कोहरगतिः स्याद तां न जाने॥६॥ हे शुक्लाम्बर ! सत्सङ्ग के समय तो हम अत्यन्त चञ्चल होते रहते हैं और आपकी कथा के प्रसङ्ग में हमारा मन नहीं लगता; तब बताइये,-देहपात होने पर हमारी क्या गति होगी, यह हम नहीं जानते ॥६॥ लोकत्रये यान्यसदीहितानि, तान्येव सर्वाणि मया कृतानि ॥ तदीयपाकायसरं विसोढु- मशक्नुवन् देवमुपैमि नाथ ! ॥ ७ ॥ हे नाथ ! त्रैलोक्य में जितने कुत्सित कर्म हैं, वे सभी हमारे किए हुए हैं, किन्तु उन कुकर्मों के फल भोगने के अवसर को वहन करने में असमर्थ यौनाचार्यचरित २५ anmolice होकर हे देव ! हम दीन भाव से आप के शरण में आए हैं॥७॥ वशीकृति यान्ति न हीन्द्रियाणि, बुद्धिर्न शुद्धि समुपैति तस्मात् ॥ न साधनं मेऽस्ति तव प्रसादे, दयालुभावेन बिना हरे ! ते ॥८॥ इति श्रीहंसप्रणिपत्तिस्तोत्रं समाप्तम् ॥ हे हरे ! इन्द्रियगण हमारे वश में नहीं आते, अतः हमारी बुद्धि भी शुद्धा नहीं होती; इस लिये अब आपकी दयालुता के विना हमारे पास ऐसा कोई साधन नहीं है, जिससे हम आपको प्रसन्न कर सके। इतिश्रीहंसप्रणिपत्तिस्तोत्र की भाषाटीका समाप्त हुई। (४) म.

वैष्णवसर्वस्व । nam ~~~ श्री: अथसम्प्रदायप्रवर्तक-श्रीसनकादि- प्रणिपत्तिस्तोत्रम् ॥ कुमारभावेन विधाय वेषं, यो ब्रह्मचर्य सुदृढं व्यधत्त ॥ परिस्फुरदगारिममण्डिता, नमाम्यहं श्रीसनकादिकं तम् ॥ १॥ कौमारवेश धारण करके जिन्होंने अखण्ड ब्रह्मचर्यब्रत को धारण किया, उन गरिमामण्डित सनकादिकों को हम प्रणाम करते हैं ॥१॥ यदगतः श्रीभगवान् रमेशो, हंसस्वरूपं कुतुकेन कृत्वा ॥ तवं स्वकीयं विवृतं व्यतानी- नमाम्यहं श्रीसनकादिकं तम् ॥ २॥ जिनके सन्मुख श्रीरमापति भगवान् भगवान ने कौतुक से हंसरूप धारण करके प्रकट होकर निज (परमात्म) तत्व को विशदरूप से कहा, उन सनकादिकों को इम प्रणाम करते हैं ॥२॥ यदीयपादाब्जयुगं स्मरन्ती, जना लभन्ते हरिभक्तिमुग्राम् ॥ -- श्रीआचार्यचरित। v वशीकृतत्वं दधतो मुरारे:, नमाम्यहं श्रीसनकादिकं तम् ॥३॥ जिनके युगल चरणारविन्दों का स्मरण करके मनुष्य परमोत्तम हरिभक्ति को प्राप्त करते हैं, और जिन्होंने श्रीभगवान् को अपने वश में कर लिया है, उन श्रीसनकादिकों को हम प्रणाम करते हैं ॥३॥ यः श्रीलनिम्बार्कमवेक्ष्य लोका- तीतप्रभावान्वितभावभाजम् ॥ प्रवर्तयामास च तेन रम्यं, श्रीकृष्णसेव्यं निजसम्प्रदायम् ॥ ४॥ जिन्होंने, लोकातीतप्रभाव से युक्त शीनिम्बार्क भगवान् को जानकर उन ( श्रीनिम्बार्क) के द्वारा श्रीकृष्णसेव्य और रमणीय निज सम्प्रदाय का प्रचार कराया॥४॥ श्रीमाँश्च निम्बार्कसमीडितो यो, लीलावतारः पुरुषोत्तमस्य । तं भक्तिविज्ञानविधानताढ्यं, दयासमुद्रंसनकादिमीडे ॥५॥ और जो श्रीमान् (सनकादिक) श्रीनिम्बार्का- चार्य के द्वारा स्तुत हुए, तथा जो पुरुषोत्तम भगवान के लीलावतार हैं, उन भक्ति और विज्ञान के वैष्णवसर्वस्व । २८ -- विधानों से युक्त तथा दया के समुद्र श्रीसनकादिकों की हम स्तुति करते हैं ॥५॥ महानुभावाश्रितपादपद्मो, मनोबचोतीतगुणाभिरामः ॥ गोपालमन्त्राश्रितसम्प्रदायो, मयि प्रसन्नः सनकादिरस्तु ॥ ६॥ महानुभावों ने जिनके चरणारविन्दो का आश्रय लिया है, जो मन और वाणी के प्रतीतगुणों से शोभित हैं, और जिनका सम्प्रदाय श्रीगोपाल- मन्त्र के आधार पर है, वे श्रीसनकादिक हम पर प्रसन्न हों ॥६॥ यस्कोपलेशादवशत्वमेत्य, जयेन साकं विजयश्च्युतोऽभूत् ॥ वैकुण्ठतःश्रीभगवत्समीपात्, प्रभाविनं तं सनकादिमीडे॥ ७ ॥ जिनके कोप के कारण श्रीभगवान् के समीप रहने पर भी निरुपाय होकर जय के साथ विजय बैकुण्ठ से नीचे गिरे, उन महामभाववान् श्रीसन- कादिकों की हम स्तुति करते हैं ॥ ७॥ यदीयपादाब्जयुगाश्रयेण, भक्तिर्वरिष्ठत्ववती विशुद्धा ॥ -- श्रीआचार्यचरित। २८ MUNANDED -~~ उदञ्चती श्रीभगवत्यजत्रं, नमाम्यहं त्रीसनकादिकं तम् ॥८॥ इतिश्रीसनकादिप्रणिपत्तिस्तोत्रं समाप्तम् ॥ जिनके युगल चरणारविन्दों का आश्रय लेने से श्रीभगवान् में शुद्ध और परमश्रेष्ठ भक्ति का निरन्तर उदय होता है, उन श्रीसनकादिकों को हम प्रणाम करते हैं ॥८॥ इतिथीसमकादिप्रणिपत्तिस्तोत्र की भाषाटीका समाप्त हुई ॥

३० ঐশষ। ~ . श्री: अथसम्पदायप्रवर्तक-श्रीनारद- प्रणिपत्तिस्तोत्रम् ॥ यः सर्वलोकस्य हितं विधातुं, समुद्यदव्याजदयातिरेकात् ॥ सत्पञ्चरात्रागमद् बभूव, श्रीनारदं तं शरणं व्रजामि ॥१॥ जो निश्छलदया के प्राधिक्य से सब लोगों के कल्याण करने के लिये प्रकट हुए, और जिन्होंने पत् पञ्चराग पागम कीरचना की, उन श्रीनारदजी के शरण में हम प्राप्त होते हैं ॥ १॥ यो व्यासदेवं परमं विषादं, चेतःपुसादानुदयावजन्तम् ॥ अधीकरदागवताख्यशास्त्रं, श्रीनारदं तं शरणं व्रजामि ॥२॥ जिन्होंने परमविषादग्रस्त वेदव्यास के चित्त को प्रसन्न कर उन ( व्यास ) के द्वारा श्रीमद्भागवत शास्त्र की रचना कराई, उन श्रीनारदजी के शरण में हम प्राप्त होते हैं ॥२॥ यो देवदत्तां रुचिरां विपञ्जी- मादाय गायन् मधुरासुधायाः ॥

श्रीप्राचार्यचरित।
कीर्ति हरेर्मोदयति त्रिलोकी,
श्रीनारदं तं शरणं व्रजामि ॥३॥
जो देवदत्त रमणीय वीणा को ले, और उसे
बजाकर सुधा मधुर श्रीहरि के यश का गान करते
हुए त्रैलोक्य को आनन्दित करते रहते हैं, उन
श्रीनारदजी के शरण में हम प्राप्त होते हैं ॥३॥
सुधाकरस्वच्छतनुत्वभाजं,
स्वर्णोपवीतत्वमुपैति वासं ॥
प्रवर्तयन्तं हरिभक्तियोग,
श्रीनारदं तं शरणं व्रजामि ॥१॥
जो चन्द्रवत् कान्तियुक्त, स्वर्ण यज्ञोपवीत
और पीताम्बरधारी और हरिभक्ति के प्रवर्तक हैं,
उन श्रीनारदजी के शरण में हम प्राप्त होते हैं ॥४॥
गायन मुकुन्दस्य यशोऽमलं यः,
सदा त्रिलोकीमटति प्रसन्नः ॥
उदारभावो विदितप्रभाव:,
श्रीनारदंतं शरणं व्रजामि ॥५॥
जो श्रीभगवान् के अमल यश का गान करते
हुए त्रैलोक्य में अमण किया करते हैं, उन उदारभाव
और विदितमभाव श्रीनारदजी के शरण में हम
माप्त होते हैं ॥५॥

-- ३२ Meanwhileem ~ ३ वैष्णवसर्वस्व । यदेवकार्येषु परानुरक्ति-, स्तस्मात्मजल्पन्त्यसुराः सदैव ॥ "श्रीनारदोऽयं कलहमियो वै," श्रीनारदं तं शरणं व्रजामि ॥६॥ श्रीनारदजी सदा देवकार्य में तत्पर रहा करते हैं, इस लिये कुढ़कर असुरलोग उन ( श्रीनारदजी) को "कलहमिय" कहा करते हैं, उन श्रीनारदजी के शरण में हम प्राप्त होते हैं ॥ ६ ॥ (+) श्रीभक्तिसूत्रार्णवपारश्वा, देवर्षिवर्योऽतुलितमभायः॥ हरिपियो व्यासगुरुगरिष्ठः, श्रीनारदं तं शरणं ब्रजामि ॥ ७ ॥ श्रीभक्तिसूत्र के समुद्र के पार जाने-वाले, देवर्षिवर्य, अतुलप्रभात्र, हरिप्रिय, श्रीवेदव्यासजी के श्रेष्ठ गुरु, श्रीनारदजी के शरण में हम प्राप्त होते हैं ॥ ७॥ ww ( + ) यही बात पुगणान्तरों में भी कही है, यथा,- "देवर्षि रदः प्रोक्तो देवकार्ये सदा रतः । तस्मादेवासुरैः मोर 'नारदः कलहमियः ॥"

श्रीप्राचार्यचरित। ३३ M - श्रीमन्त्रराजस्य विशारदोऽयं, तदभाष्यकारोऽमलकीर्चिगाधः । जगद्गुरुः श्रीहरिदासबर्यः, श्रीनारदं तं शरणं व्रजामि ॥ ८॥ इतिश्रीनारदप्रणिपत्तिस्तोत्रं समाप्तम् ॥ श्रीमन्त्रराज ( श्रीगोपालमन्त्र )के पूर्णज्ञाता और उस (मन्त्रराज) पर भाष्य रचने-वाले, निर्मल- चरित्र, जगद्गुरु, श्रीहरिदासवर्य, श्रीनारदजी के शरण में हम प्राप्त होते हैं ॥८॥ इतिश्रीनारदप्रणिपत्तिस्तोत्र की भाषाटीका समाप्त हुई। इत्याचार्यचरित्रस्य विश्रामस्तु द्वितीयकः । यत्राचार्यत्रयाणां च प्रोक्ता स्तोत्रत्रयी शुभा१ इस प्रकार श्रीश्राचार्यचरित का दूसरा विश्राम समाप्त हुना, जिसमें तीन प्राचार्यों के तीन स्तोत्र कहे गए ॥१॥ भुक्तिमुक्तिप्रदा नित्यं महाक्लेशविनाशिनी । पठनाच्छ्रवणात्सद्यो हरिभक्तिविधायिनी॥२॥ ये तीनो स्तोत्र पढ़ने और सुनने से तुरन्त महाक्लेशों का विनाश करते, भुक्ति-मुक्ति को देते, और हरिभक्ति को प्रदान करते हैं ॥२॥ इतिश्रीमदाचार्यचरितस्य द्वितीयो विश्रामः समाप्त ॥२॥ ॥ १०५ ॥ 4 (५) न० वैष्णवसर्वस्व । watewanapan श्रीश्रीकृष्णाय नमः। हविर्सानाभिधं रत्नमनिरुद्धं सुदर्शनम् । जयन्तिशुक्तिसंभूतं श्रीनिम्बार्कमहं भजे ॥१॥ श्रीमुदर्शनजी को श्रीअनिरुद्धजी ही जानो। ये हविर्धान-नाम के रत्न हैं और इनकी उत्पत्ति जयन्ती-नाम्नी शुक्ति से हुई है (१) ये ही श्रीनिम्बार्कभगवान् हैं, इनका हम भजन करते हैं ॥१॥ अनिरुद्धस्य सुदर्शनत्वं यथा नारदपञ्चरात्रे,- शङ्खः साक्षाद्वासुदेवो गदा सङ्कर्षणः स्वयम् । बभूव पद्म प्रद्युम्नोऽनिरुद्धस्तु सुदर्शनः ॥२॥ श्रीअनिरुद्धजी श्रीसुदर्शनजी ही हैं, यह बात श्रीनारदपञ्चरात्र में लिखी है; यथा,-साक्षात् श्रीवासुदेव शंख हैं, शीसङ्कर्षण गदा हैं, श्रीप्रद्युम्न पद्म हैं और श्रीननिरुद्ध सुदर्शन हैं ॥२॥ सुदर्शनस्य हविर्सानाभिधत्वं नैमिषखण्डे,- कल्पत्रयादपि प्राक् च विष्णुक्षेत्रे द्विजा हरिम् । त्रेतायुगे गतप्रायेऽयजंताऽसुरकुण्ठिताः ॥३॥ श्रीमदर्शन का ही नाम हविर्धान है, यह बात नैमिषखण्ड में भी कही है। यथा,-श्रीश्वेतवाराह- कल्प के तीन कल्प पूर्व त्रेता युग के अन्त में,असुरों से भयभीत होकर ब्राह्मण लोग श्रीविष्णुक्षेत्र अर्थात् माथुर-मण्डल में श्रीहरि का यजन करते थे ॥३॥ (१) यहा पर पत्न' और 'शुक्ति' से रूपकालङ्कार दमाया है। wearni श्रीआचार्यचरित। ३५ मेरोर्मूर्द्वन्यपर्यन्ते ब्रह्माणं शरणं ययुः । तेन ध्यातो हरिश्चक्रमर्पयन्मुनिरक्षणे ॥ ४ ॥ फिर वे ब्राह्मण लोग असुरों से सतार जानेपर सुमेरु पर्वत के शिखर पर स्थित ब्रह्मलोक में ब्रह्मा के शरण में गए। तदनन्तर जब ब्रह्मा ने श्रीहरिभगवान् का ध्यान किया, तब भगवान ने मुनियों की रक्षा के लिये अपनो सुदर्शन चक्र दिया ॥४॥ तदाविरासीत्स्वांतस्थं मुनिरूपं दधार तत् । हविभनेति विख्यातो नियमानन्द इत्यपि ५ तब वे श्रीसुदर्शन-भगवान् मुनिरूप धारण करके प्रकट हुए । उस समय उन मुनिवर्य का नाम 'हविर्धान तथा नियमानन्द हुभा ॥ ५ ॥ हवींषि धारयन् पुष्णन् हबिर्सान इतीर्थ्यते । वेदानानन्दयद्यस्मानियमानंद ईय॑ते॥६॥ "हविष" के धारण और पोपण करने से वे हविर्धान कहाए, और वेदों को मानन्दित करने से नियमानन्द कहे गए ॥ ६ ॥ औदुम्बरसंहितायां च,- गोवर्द्धनसमीपे तु निम्बग्रामे द्विजोत्तमाः । जगन्नाथस्य पत्न्यां वै जयन्त्यां प्रथमे युगे ॥७॥ वैशाखे शुक्लपक्षे च तृतीयायां तिथौ पुनः । साक्षात्सुदर्शनो लोके निम्बादित्यो बभूव ह । औदुम्बर संहिता में कहा है कि,-हे ब्राह्मणी !

वैष्णवसर्वस्व।
निम्बग्राम में श्रीजगन्नाथशर्मा की पत्नी जयन्ती
देवी से प्रथम युग, अर्थात् सत्ययुग में,
वैशाखमास
के शुक्लपक्ष की तृतीया (अक्षयतृतीया) को साक्षात्
श्रीसुदर्शन श्रीनिम्बादित्य-रूप से प्रकट हुए ॥७॥८॥
त्रेतायामपि चक्रस्यावतारः सर्वविश्रुतः ।
माघस्य शुक्लपञ्चम्यां शुभवारान्वितेऽमले ॥६॥
त्रेतायुग में भी चक्रराज का अवतार सर्वत्र
ख्यात है, जो माघमास के शुक्ल पक्ष की पञ्चमी
तिथि को शुभ वासर में हुआ था ॥८॥
द्वापरेऽपि तथा जातोवतारस्तस्यधीमतः ।
कार्तिकस्य सिते पक्षे पौर्णिमायां शुभे दिने १०
उन श्रीमान् चक्रराज का अवतार द्वापर में भी
कार्तिक शुक्ला पूर्णिमा के शुभ दिन में हुआ था ॥१०॥
कलावपि स्वभूदेवनाम्ना तस्य महात्मनः ।
अवतारोऽभवत्येव नरमुक्तिप्रदायकः ॥११॥
उन महानुभाव चक्रराज का अवतार श्रीस्वभूदेव
के नाम से कलियुग में भी हुमा है, जो मनुष्यों को
मुक्ति का देनेवाला है ॥११॥
एवं प्रतियुगं ज्ञेया व्यवस्था परमात्मनः ।
नानारूपधरस्यास्य धर्मरक्षणकाम्यया ॥१२॥
नाना प्रकार के रूप धारण करनेवाले श्रीभगवान्
की यह अवतार धारण करनेवाली व्यवस्था धर्म की
रक्षा के लिये प्रतियुग में जाननी चाहिए ॥१२॥

श्रीनाचार्यचरित V~ यदा यदा हि भगवानायातीह महीतले। तदा तस्य समायान्ति सायुधा पार्षदा अपि१३ जब जब श्रीभगवान् इस भूमण्डल में अवतार धारण करके पधारते हैं, तब तब उन श्रीभगवान् के दिव्य आयुध और पार्षद भी अवतार धारण करते हैं ॥१३॥ नैमिषखण्डे च,-- आम्नायरसमुद्धृत्य विप्रपालं सुदर्शनम् । स्वया भाषा गृहासन्न ग्राहयामास नारदः॥१४ नैमिषखण्ड में लिखा है कि, ब्राह्मणों के प्रति- पालक तथा निज भाश्रम में स्थित श्रीसुदर्शनजी को श्रीनारदजी ने स्वकीया भाषा से वेद का रस उद्धृत त करके ग्रहण कराया ॥ १४ ॥ काजीखण्डे च ॥ वीणापाणेर्गुरोर्लब्ध्वा मोक्षोपायं सुदर्शनः । वेदान्तवेद्यं सद्धर्म संजग्राह च वर्गशः ॥ १५ ॥ काञ्चीखण्ड में कहा है कि,-वीणापाणि, गुरु श्रीनारदजी से मोक्ष के उपाय, अर्थात् दीक्षा आदि ग्रहण करके श्रीसुदर्शन ने वेदान्तवेद्य सद्धर्म का यथाविभाग संग्रह किया ॥१५॥ संमोहनतंत्रे च,- हविर्धनाभिधानस्तु चक्रमासीन्महामुनिः । सोऽतप्यत तपस्तीव्र निम्बक्याथैकभोजनः १६ वैष्णवसर्वस्व । VVVANI आशु सिद्धिकरं मंत्रंविशल्पणं च जप्तवान् । अनंतरंमारवीजाद्यन्यारूढं नदेव तु ॥ १७॥ दध्यौ वृन्दावने रम्ये माधवीमण्डपे प्रभुः । राधिका रुक्मवर्णागी हरिगोपालरूपिणम्१८ सम्मोहनतन्त्र में भी कहा है कि, महामुनि श्रीनिम्बार्क सुदर्शनचक्र के अवतार हैं। इन्हीं का नाम हविर्धान भी है। ये एक समय नीम के काथ (काढ़े ) को भोजन करके महा तप करते हुए। उस समय ये अष्टादशाक्षर श्रीगोपालमन्त्र का जप करते हुए। वे महाप्रभु श्रीवृन्दावन के माधवीकुल्ल में तपस्या करते तथा गौरवर्णाङ्गी श्रीराधा एवं गोपालरूपी श्रीकृष्ण का ध्यान करते थे ॥१६॥१७॥१८॥ । भविष्ये च,-- पुरुषार्थप्रवर्षित्वात्सेवांगीकृतया स्वयम् । कर्मणा मोक्षरूपेण निम्बार्क इति बिश्रुतः ॥१८ भविष्यपुराण में लिखा है कि,-पुरुषार्थ के प्रवर्षण करने से, स्वयं भगवत्सेवा के अङ्गीकार करने से, तया मोक्षरूप कर्म करने से आप श्रीनिम्बार्क नाम से विख्यात हुए ॥ १८ ॥ कृष्णोनिषदि॥ गोप्योगाव ऋचस्तस्य यष्टिका देहसंज्ञिनी। मित्रभावे स्तोककृष्णः सखीत्वे रङ्गदेविका २० श्रीनाचार्यचरित। गोषु धूसरिका चैव वंशी नृत्ये सुदर्शनः । कान्तिरूपेण राधायां चक्ररूपेण केशवे ॥२१॥ श्रीकृष्णोपनिषत् में लिखा है कि श्रीकृष्ण की गोपियां और गौवें ऋचाएं हैं, तथा देहसंगिनी यष्टिका, मित्रभाव में स्तोक कृष्ण, सखीभाव में रङ्गदेवी, गौवों में धूसरिका, नृत्य में वंशी, सुदर्शन हो हैं । ये श्रीराधा में कान्तिरूप से, तथा श्रीकृष्ण में चक्ररूप से स्थित हैं ॥ २० ॥ २१ ॥ द्वापरे ह्यवतीर्याथ तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम् । कलौ निम्बार्करूपेण संप्रदायप्रवर्तकः ॥.२२ ॥ श्रीसुदर्शनचक्र द्वापर में अवतार धारण कर, तथा दुश्चर तप करने के उपरान्त कलियुग में श्रीनिम्बार्क- रूप से सम्प्रदाय के प्रवर्तक हुए ॥ २२ ॥ हविर्सानाभिधानस्य चरितं परमाद्भुतम् । पठनाच्छवणात्सद्यः सर्वपापप्रणाशनम् ॥२३ हविर्धान नामक चक्रराज श्रीसुदर्शनजी का यह परम अद्भुत चरित पढ़ने और सुनने से सब यापों का नाश कर देता है ॥ २३ ॥ वामने,- कर्णकस्य शुभे क्षेत्रे बदर्याश्रममण्डले । ऐरावत्यां क्वचिज्जातः प्राक्कल्प इति मे श्रुतम्२४ वामनपुराण में सूतजी ने कहा है कि, वाश्रम-मण्डल में कर्णक ( कनखल ) (१) क्षेत्र (१)" कर्णक " प्रयाग को मो कहते हैं।

४०
वैष्णवसर्वस्व ।
meen
से बढ़कर न कोई तीर्थ
में ऐरावती के समीप श्रीसुदर्शन भगवान् पूर्वकल्प में
कभी प्रकट हुए थे, ऐसा मैंने सुना है ॥२४॥
पाने, उत्तरखण्डे, निम्बार्कदेवतीर्थ-
नामाध्याये,-
श्रीनिम्बार्कात्परंतीर्थं न भूतंन भविष्यति ।
यत्रस्नात्वा च पीत्वा च मुक्तिभागी भवेद ध्रुवम्
पद्मपुराण के उत्तर खण्ड में श्रीनिम्बार्कदेवतीर्य-
नामक अध्याय में लिखा है कि,-योनिम्बार्कतीर्थ
हुमा
और न होगा। जहां
पर स्नान करने और जहां के जलपान करने से
मनुष्य अवश्यमेव मुक्ति का भागी होता है ॥ २५॥
एतच्चरितमाख्यातं हविर्सानाभिधस्य च ।
कल्पत्रयात्पुरावृत्तमधुनापि यथाशृणु ॥ २६॥
यह हविर्धान नामक श्रीसुदर्शन भगवान् का
चरित कहा गया, जो कल्पत्रय के पूर्व का है।
अब इस कल्प के चरित को सुनो ॥ २६ ॥
इत्याचार्यचरित्रस्य विश्रामेऽथ तृतीयके।
तस्य चक्रावतारत्वे प्रमाणा: परिकीर्तिताः २७
इस प्रकार श्रीआचार्यचरित के तृतीय विश्राम
में श्रीनिम्बार्क भगवान् के श्रीसुदर्शनचक्र के अवतार
होने में प्रमाण दिए गए ॥२७॥
इतिश्रीमदाचार्यचरितस्य तृतीयो
विश्रामः समाप्तः ॥३॥

श्रीआचार्यचरित। ४१ A ANJA श्रीश्रीकृष्णाय नमः। दिनकरशतदीप्तिं कोटिकन्दर्पमूर्ति, सजलघनशरीरं भक्तपक्षे ह्यधीरम् । हरिकरकृतवासं त्यक्तमायाविलास, कृतमुनिबरवेषं नौमि निम्बार्कमीशम्॥१॥ सैकड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान, कडोरों कामदेवों के समान सुन्दर, जलभरे मेघों के से अङ्ग, भक्तों के लिये अधीर, श्रीहरि के कमनीय कोमल कर में निवास करनेवाले, माया के विलास में न भूलनेवाले, मुनिवर-रूप, ईश्वर-समान, श्रीनिम्बार्क- भगवान् को हम प्रणाम करते हैं ॥१॥ श्रीमद्भागवताच्चैव श्रीमद्विष्णुपुराणतः । तथा ग्रंथान्तरेभ्यश्च सारमुद्धृत्य यत्नतः ॥२॥ वामनाच्च भविष्याच्च काञ्चीनैमिषखण्डतः । औदुम्बरर्षिवाक्याच्च संक्षेपादुपचीयते ॥३॥ श्रीमद्भागवत, श्रीविष्णुपुराण, तथा अन्यान्य ग्रन्थों से यत्नपूर्वक सारसंग्रह करके, तथा वामनपुराण से, भविष्यपुराण से, काञ्चीखण्ड से, नैमिषखण्ड से और औदुम्बर ऋषि के वाक्य (औदुम्बरसंहिता) से संक्षेप ही में श्रीमदाचार्यचरणों ( श्रीनिम्बार्क) के चरित का हम संग्रह करते हैं ॥२॥३॥ श्रुतिप्रत्यक्षमैतिद्यमनुमानं चतुष्टयम् । प्रमाणं सर्वलोकानां तान्विचार्य ब्रवीम्यहम्। २० (६)

४२
वैष्णवसर्वस्व।
cue
श्रुतिप्रमाण,
प्रत्यक्षप्रमाण,
ऐतिह्मप्रमाण,
और अनुमानप्रमाण,-सब लोगों के ये चार प्रमाण
हैं, इन चारों प्रमाणों का विचार करके हम
श्रीमदाचार्यचरित का वर्णन करते हैं ॥४॥
एकदा मुनयः सर्वे कर्मसूत्पन्नसंशयाः ।
विबदन्तोऽवजानंतो ब्रह्माणं शरणं ययुः॥५॥
एक समय सब मुनीश्वरों के मन में कर्मों के
विषय में संशय ( सन्देह ) उत्पन्न हुए; तब वे उसके
तत्त्व के न जानने के कारण परस्पर विवाद करते
हुए श्रीब्रह्माजी के शरण में गए ॥५॥
तत्र गत्वा समासीनं ब्रह्माणं कमलासनम् ।
प्रणम्य तुष्टुवुः सर्वे पप्रच्छुर्नेिजसंशयम् ॥६॥
वहां (ब्रह्मलोक में ) जाकर और कमल के
आसन पर विराजमान श्रीब्रह्माजी को प्रणाम करके
उन सब मुनीश्वरों ने उनका स्तवन करते करते
उनसे अपने सन्देह की बात पूछी ॥६॥
ऋषय ऊचुः।
जगद्धातर्नमस्तेऽस्तु सृष्टिस्थित्यन्तकारक ।
त्वमेकः सर्वभूतानामाधारः परमो गुरुः ॥७॥
ऋषियों ने कहा कि,-हे सृष्टि, स्थिति और
अन्त के करने वाले जगत् के विधाता ! आपको
प्रणाम है। एक प्रापही समस्त प्राणियों के माधार
और प्रधान गुरु हैं ॥७॥

श्रीश्राचार्यचरित।
४३
प्रवृत्तं च निवृत्तं च द्विविध कर्म वैदिकम् ।
प्रवतत निवर्तत यतस्ततो वद प्रभो ॥६॥
हे प्रभो ! हमलोग यह बात जानते हैं कि
धैदिककर्म दो प्रकार के हैं, -एक प्रवृत्तिकर्म, और
दूसरा निवृत्तिकर्म । तो अब भाप यह हमको बताइए
कि प्रवृत्तिमार्ग का अवलम्बन करना चाहिए,
अथवा निवृत्तिमार्ग का ? ॥८॥
विधिस्तराईमाज्ञाय जगाम ऋषिभिः सह ।
क्षीराब्धौ यत्र संशेते ह्यनिरुद्धः स्वयं प्रभुः ॥९॥
श्रीब्रह्माजी उन ऋषियों के हृदयगत अभिप्राय
को जानकर उन सभी के साथ क्षीरसागर को
पधारे, जहां पर साक्षात् प्रभु श्रीअनिरुद्धजी
विराजते हैं ।
अनिरुद्धो मनोनेता मोक्षोपायं श्रुतिं पुरा
मनसोल्पादयित्वा स्वान्मोचयामास संसृतेः १०
श्रीअनिरुद्ध जी मन के अधिष्ठाता देवता हैं।
आपने पूर्वकाल में अपने मन से श्रुतियों को प्रकट
करके निजभक्तों को संसार के बन्धनों से छुड़ाया था१०
न वै निरुध्यते कैश्चित्सत्वादिभिरुपाधिभिः।
निरुपाधिस्त्वगुणतो ह्यनिरुद्ध इति स्मृतः ११
किसी भी, सत्त्व, रज, तम आदि उपाधियों से
निरुद्ध न होने के कारण, तथा अगुण होने के
कारण, आप निरुपाधि (उपाधि-रहित) बने रहते
हैं, अतएव आप अनिरुद्ध कहाते हैं ॥११॥

४४ वैष्णवसर्वस्व । ANN N/V तत्र गत्वा प्रणम्याथ हरि क्षीराब्धिशायिनम्। कृताञ्जलिः प्रतुष्टाव विधिरेकायमानसः ॥१२॥ प्रस्तु, वहां जाकर और क्षीरसागर में शयन करनेवाले श्रीहरि भगवान् को प्रणाम करके हाथ जोड़कर श्रीब्रह्माजी एकाग्रमन से उनकी स्तुति करने लगे ॥१२॥ ब्रह्मोवाच । खं वायुमग्निं सलिलं महीं च, संपाद्य कर्माणि करोत्यकर्ता। हिरण्मयाण्डं विनिवृत्य शेषे, मंतश्चरो वायुरिवात्मसाक्षी॥ १३ ॥ श्रीब्रह्माजी ने कहा कि,-हे भगवन् ! आप आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को बनाकर अकर्ता होने पर भी लोकशिक्षार्थ कर्म करते रहते हैं; तथा इस सुवर्णमय अण्ड (ब्रह्माण्ड) को बना कर वायु के समान इसके भीतर संचार करते हुए इसमें शयन (निवास) करते हैं, क्योंकि श्राप आत्मा के साक्षी हैं ॥१३॥ प्रवृत्तं च निवृत्तं च त्वयैवोत्पादितं प्रभो। नाधुना कोऽपि जानाति कर्मणो गतिरीहशी१४ प्रभो ! प्रवृत्तकर्म और निवृत्तकर्म,-इन दो प्रकार के कर्मों को आप ही ने उत्पन्न किया है, अतएव प्रापके अतिरिक्त आजकल यह कोई भी

श्रीप्राचार्यचरित।
४५
नहीं जानता कि कर्मों की गति ऐसी है ॥१४॥
इत्यभिष्ट्रयमाने वै खे वागाहाशरीरिणी।
निवृत्ती राधिता मे च कुमारैर्नारदादिभिः १५
इस प्रकार स्तुति किए जाने पर अशरीरिणी
वाणी ने आकाश मार्ग से ब्रह्मा को यह उत्तर दिया
कि हमको, तया हमारे भक्त चारों सनकादिकों,
और नारदादि महर्षियों को निवृत्ति कर्म ही अधिक
मान्य है ॥१५॥
तेषां निदेशपात्रा येतेऽपितत्राधिकारिणः ।
अधुना वर्तयिष्यामीत्युक्त्वा सा बिरराम ह१६
तथा च, जो उन चतुः सनकादिकों तथा
नारदादि-महर्षियों के निदेश (आज्ञा वा उपदेश) के
पात्र हैं, वे भी निवृत्तिमार्ग के अधिकारी हैं। और
अब हम पुनः निवृत्तिमार्ग का प्रचार करेंगे। यों
कहकर आकाशवाणी अन्तर्धान हुई ॥१६॥
श्रुत्वा संछिन्नसंदेहा ब्रह्माद्याः स्वानमान् गताः
भगवानाह विश्वात्मा स्वांशभूतं सुदर्शनम् ॥१७॥
यों सुनकर निज सन्देह के दूर होने पर
ब्रह्मादिक देवता अपने अपने स्थान को पधार
गए । तब विश्व के प्रात्मा श्रीभगवान् ने अपने
अंश से उत्पन्न श्रीसुदर्शनजी से यों कहा ॥१॥
कालेन महता तात नष्टप्रायं शुभावहम् ।
निवृत्तिलक्षणं धर्म ब्रूहि भागवतं परम् ॥१८॥

वैष्णवसर्वस्व - हे तात ! बहुत काल से शुभकारक, श्रेष्ठ, निवृत्तिलक्षण भागवतधर्म नष्टप्राय होरहा है, उसका तुम संसार में पुनः प्रचार करो ॥१८॥ यमुनायास्तटे पुण्ये माथुरे विषये शुभे। रमणीयतमं धाम मम तेजोऽशसम्भवम् ॥१८॥ शुभ माथुर-मण्डल में, श्रीयमुना के पवित्र तट पर, हमारे तेजांश से उत्पन्न महारमणीय हमारा. धाम श्रीवृन्दावन है ॥८॥ वनं वृन्दावनं नाम पशव्यं नव काननम् । गोपगोपीगवां सेव्यं पुण्याद्रिढणवीरुधम् २० पशुओं के योग्य, नवीन कानन, गोप, गोपी और गौवों के सेवन करने योग्य, पवित्र पर्वत ( गोवर्द्धन ) और नवीन तृण तथा वृक्षावलियों से युक्त हमारा धाम श्रीवृन्दावन नाम का वन है ॥२०॥ आश्रमं वर्त्तते दिव्यं महर्षेररुणस्य हि । तपश्चरन्ति यत्रस्था ऋषयः शंशितव्रताः २१ वहां पर महर्षि अरुण का रमणीय आश्रम है, जहां पर निवास करके शंशितनत ऋषिगण तपस्या करते हैं ॥२१॥ सत्रावतीर्य मटुर्मानारदाढवदर्शनात.। लब्ध्वा भूम्यां वन्यस्व नष्टप्रायान् ममाज्ञया२२ उन अरुण ऋषि के यहां तुम अवतार धारण करके, तया देवर्षि नारद से हमारे भागवतधर्म की , श्रीनाचार्यचरित। WW से शिक्षा को प्राप्त करके नष्टप्राय धर्म का हमारी आज्ञा पुनः भूमण्डल में प्रचार करो ॥२२॥ त्रिः परिक्रम्य यत्नेन भुवः सर्वास्त्वयानघ । विजित्याधार्मिकान्सर्वान्धर्मःस्थाप्यः प्रयत्नतः हे अनघ ! यत्नपूर्वक सारी पृथ्वी की तीन परिक्रमा करके, तथा सब श्रधर्मियों को परास्त करके विधिपूर्वक भागवतधर्म का स्थापन करी ॥२३॥ अहमप्यागमिष्यामि धर्मसंस्थापनाय हि । वृन्दावने यशोदायाः संभवामि गृहेश्मले ॥२१॥ धर्म संस्थापन करने के लिये हम भी भागे । श्रीवृन्दावन में, श्रीयशोदा के पुनीत घर में हम प्रकट होंगे ॥ २४ ॥ माथुरे नैमिषारण्ये द्वारावत्यां ममात्रमे । कपिलस्याशमादीच स्थितिःकात्वियानघ माथुरमण्डल में, नैमिषारण्य में, द्वारकापुरी में, हमारे पाश्रम ( वदरिकाशम ) में, और कपिलाश्रम ( गङ्गासागर-सङ्गम ) आदि पुनीत स्थानों में तुम कुछ काल लों निवास करना ॥२५॥ ओमित्यादेशमादाय भगवान् श्रीसुदर्शनः । भक्ताभीष्टप्रदः साक्षादवतीर्णो महीतले॥ २६ ॥ श्रीभगवान् के बचन कोसुन और-"जो माज्ञा" ऐसा कहकर भक्तों के मनोरथ पूरे करनेवाले साक्षात् श्रीसुदर्शन-भगवान् ने भूमण्डल में अवतार धारण .

वैष्णवसर्वस्व ।
किया ॥ २६ ॥
आसीत्तपोनिधिान्तोब्राह्मणः सर्वधर्मवित् ।
नाम्नारुण इति ख्यातो वेदवेदांगपारगः ॥२७॥
सब धर्मों के जाननेवाले, श्रेष्ठ, तपोधन, अरुण
नाम के एक वेदवेदाङ्ग में पारङ्गत ब्राह्मण थे ॥२७॥
वृन्दावने महापुण्ये तपश्चर्यापरायणः।
भार्या च तादृशी तस्य जयन्ती पतिदेवता २८.
वे महर्षि परमतपस्वी थे और परमपावन
श्रीवृन्दावन में निवास करते थे। उनकी पतिदेवता
जयन्ती नाम की भार्या भी अपने पति (अरुणऋषि)
के अनुरूप ही पुण्यशीला थीं ॥ २८ ॥
समाहितं तेन तेजो विष्णुचक्रसमुद्भवम् ।
दधार मनसा देवी जयन्ती शुभलक्षणा ॥२॥
उन अरुण ऋषि ने श्रीविष्णु के चक्र (सुदर्शन)
के जिस तेज को प्राप्त किया. उस तेज को शुभलक्षणा
जयन्ती देवी ने अपने मन से धारण किया ॥ २ ॥
अथ सर्वगुणोपेते काले परमशोभने ।
कार्तिकस्य सिते पक्षे पूर्णिमायां तिथौ खलु ३०
चन्द्रे च वृषराशिस्थे उच्चस्थे ग्रहपञ्चके ।
कृत्तिकाख्ये च नक्षत्रे सर्वभूतसुखावहें॥ ३१ ॥
सूर्य्यावसानसमये मेषलग्ने निशामुखे।
जयंत्यां जयरूपिण्यां जजान जगदीश्वरः॥३२॥

আলামনি। धर्ट अनन्तर कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तिथि को, जब सब गुणों से युक्त परम शोभायमान समय पाकर पास हुना, तब वषराशि के चन्द्रमा में, पांच उच्च ग्रहों के रहते, सब प्राणियों को सुखके देनेवाले कृत्तिकानक्षत्र में सूर्यास्त के समय, सायङ्काल को, भेषलग्न में जयरूपिणी श्रीजयन्ती देवी से जगदीश्वर श्रीसुदर्शन भगवान् प्रकट हुए ॥ ३० ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ आविरासी पुष्पवृष्टिर्जयशब्दोऽभवद्दिवि । ऋषयो मुनयश्चैव धुदारमनसोऽभवन् ॥३३॥ उस समय "जयजयकार" के साथ ही साथ आकाश से फूलों की वर्षा हुई और ऋषि तथा मुनिजन परम आनन्दित हुए ॥ ३३ ॥ दृष्ट्वामृतं बालकमम्बुजाक्षं, गृहांधकारान्तकर प्रशांतम् । बालार्कवहीन्दुतिरस्करांग, श्यामावदातं हरिमाह बाला॥३४॥ तब कमलनेत्र, प्रशान्त, अपनी अङ्गप्रभा से बालप्रभाकर, अग्नि, तथा चन्द्रमा को फीका करने वाले, गृहन्धिकार के दूर करनेवाले, श्यामस्वरूप अद्भुत बालक, श्रीहरि से श्रीजयन्ती देवी ने यों कहा ॥ ३४ ॥ देवाधिदेवोऽथ दिवाकरो वा, - २० (७ वैष्णवसर्वस्व । "दिव्यांबरों देवगणाधिपः वा। कस्त्वं मदीये जठरेऽभिजातो, ब्रूचंग वंदे तव पादपद्मम् ॥ ३५ ॥ हे अङ्ग! तुम देवाधिदेव (महादेव) हौ, या साक्षात् सूर्य हो; अथवा दिव्य अम्बर धारण करने वाले गणेशजी हौ ? तुम कौन हो, जो मेरे उदर से प्रकट हुए ? बताओ, मैं तुम्हारे चरणारविन्दों की बन्दना करती हूं ॥ ३५ ॥ इति श्रुतबा बच्चो मातुः स बालोऽमृतदर्शनः । वाण्या मधुरया स्नेहं वर्द्धयन्निजगाद ह ॥३६॥ इस प्रकार सोता ( श्रीजयन्तीदेवी ) के बचन सुनकर वे अद्भुतदर्शन बालक ( श्रीसुदर्शन ) मधुर वाणी से निज जननी का स्नेह बढ़ाते हुए इस प्रकार बोले ॥ ३६॥ एरावत्यां पुरा कल्पे हविर्धान इति श्रुतः । बभूवाद्य पुनर्जातस्तव प्रेमनिबंधनात् ॥३७॥ हे मातः ! तुमने सुना होगा कि पूर्व कल्प में ऐरावती में "हविर्धान" नाम के एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए थे। वेही (हम) आज पुनः तुम्हारे प्रेम के वशीभूत होकर तुम्हारे यहां प्रकट हुए ॥ ३७॥ अरुणोऽपि वचः श्रुत्वा गतवान् सूतिकागृहम्। धन्योल्मीति बन्नस्तौद्विरा गद्गदया सुतम्३८ अरुण ऋषि ने भी जब ये बचन सुने, तब वे

श्रीप्राचार्यचरित।
५१
सूतिकागार में जाकर अपने को "धन्य धन्य" कहते
हुए प्रेमगद्गदवाणी से यों स्तुति करने लगे ॥३८॥
अरूण उवाच।
अवजलधरकांति कोटिलायमूर्ति,
दिनकरशतभासं कोटिचन्द्र प्रकाशन
चिदचिदखिलविश्व भासया भासयंतं,
शरणमुपगतोहं गुप्तवेषं सुवेषम् ॥३९॥
नवजलधरकान्ति, कोटिलावण्यमूर्ति, सैकड़ों
सूर्यों के समान द्युतिविशिष्ट, कडोरों चन्द्रों के तुल्य
प्रकाशमान, सम्पूर्ण चिचिद् विश्व को अपने तेज से
प्रभावान करनेवाले, गुरवेष, और सुन्दर वेष धारण
करनेवाले आपके शरण में हम प्राप्त हुए हैं ॥ ३८ ॥
स्तुत्वा नत्वालब्धवरोऽरुणशात्मसुतस्य च।
जातकर्म चकाराथ ब्राहावेदपारगैः ॥ ४० ॥
इस प्रकार स्तुति और नकार कर, तथा वरों
को प्राप्त कर अरु मुनि ने वेदपारग ब्राह्मणों के साथ
अपने पुत्र (श्रीसुदशेन) का जातकर्म संस्कार किया ४०
इत्याचार्यचरित्रस्य विनामेऽथ चतुर्थ के।
श्रोमनिम्बार्कदेवस्यावतारः परिकीर्तितः॥४१॥
इस प्रकार श्रीमदाचार्यचरित के चतुर्थ विश्राम
में श्रीमनिम्बार्कदेव के अवतार धारण करने का वर्णन
किया गया ॥४१॥
इनिधोगदाचार्यचरित्रम्य चतुर्थो विश्रामः समाप्तः ॥१७३॥

वैष्णवसर्वस्व । a श्रीश्रीकृष्णाय नमः। सायं स्वाश्रममागताय यतये, ऽप्यस्तं गते भास्करे । निम्बक्षोणिरुहे निदर्य तरणिं, येनाप्रमेयात्मना ॥ लोकेस्मिन् महिमाप्यदर्शि नियमे- नानन्दयन् सज्जनान् । सोऽयं निम्बविभावसुर्विजयता- माचार्यवर्यः सदा ॥१॥ सायंकाल में निज आश्रम में आए हुए यति को, रवि के अस्त होने पर भी निम्ब-वृक्ष के ऊपर सूर्य को दिखलाकर जिन महात्मा ने इस लोक में अपनी महिमा प्रकट की, और सज्जनों को नियम से आनन्दित किया, वे प्राचार्यवयं श्रीनिम्बार्क भगवान् सदैव विजय को प्राप्त हों ॥१॥ सुदर्शनावतारस्य श्रुत्वा वृत्तांतमद्गुतम् । आनंदमतुलं लेभे ब्रह्मा लोकपितामहः ॥२॥ श्रीसुदर्शनावतार के अद्भुत वृत्तान्त को सुनकर लोकपितामह श्रीब्रह्माजी परमानन्द को मात्र हुए ॥२॥ कदाचिदृषिवर्य तु क्वापियाते बिधिः स्वयम् । यतिरूषधरो यातो बालदर्शनलालसः ॥ ३॥ एक समय, जब कि ऋषिवर्य अरुणमुनि कहीं बाहर गए हुए थे, तब स्वयं श्रीब्रह्माजी यति का रूप श्रीनाचार्यचरित। v ChM AMIN- धारण करके बालक ( पांच वर्ष के श्रीमुदर्शन ) के दर्शन करने की लालसा से उनके पाश्रम में पधारे ॥३॥ क तन्मात्रा सत्कृतोभत्तया भोजनाय च प्रार्थितः अतिकालं विचिंत्याथ यतिगतं मनो दधे ॥१॥ तब उनकी माता श्रीजयन्ती देवी ने भक्तिभाव से उन यति (ब्रह्मा) का सत्कार किया और उनसे भोजन करने की प्रार्थना की । यह सुन और अतिकाल अर्थात् सूर्यास्त का समय जान कर यति ने भोजन करना अस्वीकार कर वहांसे चले जाने की इच्छा की ॥४॥ संध्याकाले च संप्राप्त कर्म चत्वारि वर्जयेन् । आहारं मैथुनंनिद्रां स्वाध्यायंचविशेषतः ५ क्योंकि संध्याकाल में आहार,निद्रा,मैथुन और विशेषकर वेदाध्ययन,-इन चार कामों को नहीं करना चाहिए ॥ ५॥ आहाराज्जायते व्याधिर्गर्भो दुष्टश्च मैथुने निद्रया हयते लक्ष्मी: स्वाध्याये मरणं ध्रुवम् ६ इसको कारण यह है कि साहार से व्याधि की उत्पत्ति होती है, मैथुन से दुष्ट गर्भ रह जाता है, निद्रा से लक्ष्मी का नाश होता है और स्वाध्याय से अवश्यमेव मृत्यु होती है ॥ ६ ॥ इति दोघं विचिंत्यासीयदा गंतु मनोदधे ।

५४ वैष्णवसर्वस्व । दर्शयिष्यन् स्वमाहात्म्यं मानयन्धर्ममुत्तमम्। आह बालस्तदाऽऽगत्य कृत्वा पादाभिवंदनम् । भोजनं कुरु भो स्वामिन् पश्य निम्बे दिवाकरम् इस प्रकार दोष का स्मरण करके जब वे यति ( ब्रह्मा ) जाने लगे, तब उत्तम धर्म के मान रखने के लिये अपने माहात्म्य को दिखलाते हुए, बालक श्रीसुदर्शनजी ) ने उन यतिजी के समीप जाकर और उनके चरणारविन्द की वन्दना करके यों कहा कि,-“हे स्वामिन् ! आप कृपा कर भोजन कीजिए, क्योंकि अभी निम्बवृक्षपर सूर्यनारायण हैं, यह देख लीजिए" ॥ ७ ॥८॥ इत्युक्त्वा दर्शयामास निम्बस्योपरि भास्करम् श्रद्धाय वाक्यं स यतिभोजनार्थ विवेश ह ॥९॥ इतना कहकर श्रीसुदर्शनजी ने यतिजी को नीम के पेड़ के ऊपर स्थित सूर्य का दर्शन कराया। तब वे यतिजी उन बालमूर्ति श्रीसुदर्शनजी के वचन को मानकर भोजन करने के लिये विराजेाटा अन्नं चतुर्विधं स्वादुभुक्त्वा पीत्वा जलं शुचिः भोजनादुत्थितोऽपश्यद्रात्रिं दण्डचतुष्टयाम्१० भक्ष्य, भोज्य, लेा, पेय,-इन चतुर्विध प्रकार के सुस्वादु भोजन को कर तथा पवित्र श्रीयमुनाजल पान करके जब यतिजी भोजन करके उठे, तब उन्होंने क्या देखा कि,-'रात्रि चार दण्ड व्यतीत श्रीआचार्यचरित। પષ - VV vM होगई है ! ॥१०॥ आश्चर्यमतुलं दृष्ट्वाविस्मयाविष्टमानसः । ध्यानप्राप्त विष्णुचक्रं तुष्टाव स कृताञ्जलिः ११ ऐसे आश्चर्यमय वृत्तान्त को देख यतिजी के मन में बड़ा विस्मय हुमा । तब उनके ध्यान · में श्रीसुदर्शनजी प्राप्त हुए। यह देख वे हाथ जोड़कर श्रीसुदर्शनजी की स्तुति करने लगे ॥ ११ ॥ यतिरुवाच । सुदर्शन महाबाहो कोटिसूर्यसमप्रभ । अज्ञानतिमिरांधानां विष्णोर्मागें प्रदर्शय॥१२॥ श्रीयतिजी ने कहा,-'हे सुदर्शन, हे महावाही, हे कडोरों सूर्यों के समान प्रभावान ! जो संसारी जीव अज्ञानरूपी अन्धकार से अन्धे होरहे हैं, उन्हें तुम श्रीविष्णुभगवान् का मार्ग(भक्तिमार्ग) दिखलानो १२ यदर्थमवतीणोसि तत्साधय सुसांप्रतम् । इतोऽचिरेण कालेन नारदश्चागमिष्यति ॥१३॥ तुमने जिस कार्य के लिये अवतार धारण किया है, उस काम को अब भलीभांति पूरा करो । अब थोड़े ही दिनों में श्रीनारदजी तुम्हारे यहां भावेंगे ॥१३॥ तेन लब्ध्वा परं ज्ञानं भक्तिभावसमन्वितम्। अक्षयं निर्मलं रम्यं कृतकृत्यो भविष्यसि ॥१४॥ उन श्रीनारदजी से भक्तिभाव-युक्त, अक्षर, निर्मल, रमणीय, और श्रेष्ठ ज्ञान को लाभ करके -- .

नि वैष्णवसर्वस्व । तुम कृतार्थ होजानोगे ॥१४॥ निम्बे मे दर्शितश्चार्कस्ततो निम्बार्कनामवान्। भविष्यसीति विख्यातो लोके शास्त्रे विशेषतः१५ तुमने हमें निम्ब के ऊपर अर्क दिखाया, इस लिये आज से लोकों और विशेषकर शास्त्रों में तुम "निम्बार्क" नाम से विख्यात होगे ॥ १५ ॥ आरुणिस्त्वरुणाज्जातोजायन्तेयो जयन्तिजा वेदार्थव हणत्वाच्च नियमानंद इत्यपि ॥ १६॥ अरुण ऋषि के पुत्र होने के कारण "मारुणि, जयन्तीनन्दन होने के हेतु "जायन्तेय" और वेदार्थ के विस्तार करने के अर्थ तुम "नियमानन्द" नाम से प्रख्यात होगे ॥१६॥ बहूनि संति नामानि रूपाणि च युगे युगे। ऋषिभिः परिगीतानीत्युक्त्वाचांतर्हितो विधिः युग युग में तुम्हारे नाम और रूप बहुत से होते रहते हैं, जिन्हें ऋषिमुनि गाया करते हैं । यों कहकर श्रीब्रह्माजी अन्तर्धान होगए ॥१७॥ इत्याचार्यचरित्रस्य विश्रामश्चैव पञ्चमः ।.. यत्राचार्यवरस्यास्य चरितं कीर्तितं परम्॥१८॥ इस प्रकार श्रीमदाचार्यचरित्र का पञ्चम विश्राम समाप्त हुआ, जिसमें इन आचार्यवर्य श्रीनिम्बार्क- भगवान के श्रेष्ठ चरित कहे गए ॥१८॥ इंतिमीमदाचार्यचरितस्य पंचमो विधामः समाप्तः १८१ 4 enternatandonmanma malinor श्रीसाचार्यचरित। ५७ w श्रीश्रीकृष्णाय नमः। अथ निम्बार्कदेवस्य वक्ष्यामि चरितं शुभम्। यथा नारद आगत्य ब्रह्मविद्यामुपादिशत्॥१॥ अब यहां पर श्रीनिम्बार्कभगवान् का और एक शुभ चरित कहते हैं, जिस प्रकार से श्रीनारद भगवान् ने प्राकर उन ( निम्बार्क) को ब्रह्मविद्या का उपदेश किया था ॥१॥ कदाचिदटमानस्तु नारदो देवदर्शनः । सुदर्शनाश्रमे प्रागाद्यत्रारुणिरभूदृषिः ॥ २ ॥ एक समय ममण करते हुए देवदर्शन श्रीनारदजी श्रीसुदर्शनाश्रम में भाए, जहां पर श्रीअरुण ऋषि के पुत्र ( मारुणि ) हुए थे ॥ २ ॥ तमागतं स विज्ञाय देवर्षिमकुतोभयम् । अरुणः सहसोत्थाय विधिवत्प्रणनाम ह॥३॥ उन निर्भय, देवर्षि श्रीनारदजी को प्राते हुए देखकर अरुण ऋषि ने सहसा उठकर विधिपूर्वक उन्हें प्रणाम किया ॥३॥ आरुणिश्चापि तं दृष्ट्वा महाभागवतं ऋषिम् । चिन्तयामास हृदये कोयमद्धा समागतः ॥४॥ अरुणऋषि के पुत्र ( मारुणि ) ने भी महा- भागवत ऋषि को देखकर मन में चिन्तन किया कि इस समय ये कौन आए ॥४॥ (८) २० ५८ वैष्णवसर्वस्व । - . शङ्खन्दुकुन्दधवलं सकलागमनं, सौदामिनीततिपिशंगजटाकलापम् । कृष्णांघ्रिपंकजगतामचलां च भक्तिं, यच्छंतमाशु विगतान्यसमस्तसंगम् ॥ ५ ॥ नानाविधश्रुतिगणान्वितसप्तराग- ग्रामत्रयोगतिमनोहरमूर्छनाभिः । संप्रोणयंतमुदिताभिरमुं मुकुन्दं, संचिंत्य धातृतनयं नमनं चकार ॥ ६ ॥ शंख, चन्द्रमा और कुन्द के समान गौरवर्ण, समस्त भागमों के ज्ञाता, विद्युत्समूह के समान शुभजटा के धारण करनेवाले, श्रीकृष्ण परमात्मा के चरणारविन्द में अचला भक्ति करनेवाले और शीघ्र उस ( भक्ति) के देनेवाले, समस्त सङ्गों से रहित, तथा नाना प्रकार के श्रुतिगणों से युक्त, सन्त स्वरों और तीनों ग्रामों की गति के सहित प्रगट की हुई मनोहर मूर्च्छनानों से श्री मुकुन्दभगवान् को प्रसन्न करनेवाले ये ब्रह्मपुत्र श्रीनारदजी हैं,-ऐसा जानकर श्रीनिम्बार्कभगवान् ने भी उन्हें प्रणाम किया ॥५-६॥ पाद्यार्थ्याचमनीयाद्यैः सत्कृत्याथ प्रणम्य च । सिंहासने समासीनं नारदं सुरपूजितम ॥७॥ कृष्णाज्ञयाऽऽगतं ज्ञात्वा संपूज्य च पुनः पुनः। दण्डवत्प्रणिपत्याथ पप्रच्छ निजवांछितम्॥८॥ सिंहासनपर विराजमान, सुरपूजित,श्रीनारदजी ourmen Avvv श्रीभाचार्यचरित। પૂર્વ का पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय आदि पूजोपकरणों से सत्कार कर तथा प्रणाम करके -और यह जानकर कि ये श्रीकृष्णभगवान् की नाज्ञा से पधारे हैं, बारंबार उनका पूजन और उन्हें दण्डवत्प्रणाम करके श्रीनिम्बार्क मुनि ने उनसे अपने अभिलषित विषय को पूछा ॥ ७ ॥८॥ यत्तत्वं ब्रह्मपुत्रेभ्यः कुमारेभ्यस्त्वया शुतम् । कृपया वद तन्मह्यं यतस्त्वं दीनवत्सलः ॥६॥ हे ब्रह्मन् ! जो तत्त्व मापने ब्रह्मनन्दन श्रीचतुः सनकादिकों से सुने हैं, उन्हें कृपाकर मेरे लिये कहिए, क्योंकि भाप दीनवत्सल हैं ॥६॥ म बिना गुरुसम्बन्धं ज्ञानस्याधिगमः कृतः। गुरुः पारयिता तस्य ज्ञानं प्लवमिहोच्यते॥१०॥ क्योंकि श्रीगुरुदेव के सम्बन्ध के बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती, कारण यह कि इस संसार में श्रीगुरुदेव ही शिष्य को पार करनेवाले हैं, और उनका ज्ञान नौका-स्वरूप है, ऐसा महज्जनों ने कहा है mor इत्यभिव्याहृतं तस्य श्रुत्वा संप्रीतमानसः । उवाच श्लक्ष्णया वाचा नारदोऽध्यात्मतत्त्ववित् अध्यात्म-तत्त्ववित् श्रीनारदजी ने श्रीनिम्बार्क- भगवान् के कथन को सुन, प्रसन्न होकर मीठी बाणी से यों कहा ॥ ११ ॥ भवान् जानाति तत्सर्वं नैव लौकिकमानुए - ६० vv v vvv Vvvv ~~~~~ PA वैष्णवसर्वस्व । सुदर्शनावतारस्त्वं कृष्णाज्ञापरिपालकः॥१२॥ अरुणनन्दन ! तुम तो उन सब तत्त्वों को जानते ही हो, क्योंकि तुम कोई लौकिक मनुष्य नहीं हो। तुम श्रीकृष्णभगवान् की आज्ञा का प्रतिपालन करनेवाले साक्षात् सुदर्शन के अवतार हो ॥ १२॥ अथापि कारयिष्यामि संस्कारं विधिपूर्वकम्। असंस्कृतस्य जीवस्य कृतं सर्वं निरर्थकम् ॥१३॥ अद्य पित्रा तवाद्धाहं यमुनायास्तटेऽमले। यज्ञोपवीतसंस्कारं करिष्ये विधिवद् द्विजः १४ ततः परं प्रदास्यामि ज्ञानं परमदुर्लभम् । वैराग्यसहितं नित्यं हरिभक्तिसमन्वितस् ॥१५॥ अच्छा, तौभीप्रथम हम श्रीयमुनाजी के निर्मल तर पर नाज तुम्हारे पिता के द्वारा तुम्हारा विधिपूर्वक यज्ञोपवीतसंस्कार कराते हैं । क्योंकि भसंस्कृत जोव के किए हुए सब कर्म व्यर्थ होते हैं, अतर 'व हे द्विज ! प्रथम हम तुम्हारा विधिपूर्वक यज्ञोपवीत संस्कार करेंगे। तदनन्तर वैराग्य-सहित तया श्रीहरिभक्तियुक्त परमदुर्लभ ज्ञान को तुम्हें करेंगे ॥ १३ ॥ १४ ॥ १५ ॥ इत्युक्तवास मुनिश्रेष्ठः सावित्रं ह्यर्थगर्भितम्। कारपूर्वक मंत्रं तस्मै झुपदिदेश ह ॥१६॥ ख्यां प्रददौ प्रेम्णा निम्बार्क नारदःस्वयम् । प्रदान

की
मीनाचार्यचरित।
woman
मदाज्ञया भवाशु त्वं हरिदासो हरिप्रियः॥१७॥
यों कहकर उन मुनिश्रेष्ठ श्रीनारदजी ने यज्ञो-
पवीत संस्कार कराकर अर्थगर्भित सावित्रमंत्र
( गायत्रीमंत्र ) का उन श्रीनिम्बार्क को उपदेश
किया, और प्रेम से स्वयं श्रीनारदजी ने श्रीनिम्बार्क
को यह आख्यादी कि हमारी आज्ञा से तुम शीघ्र
ही हरिप्रिय हरिदास हो जानो ॥ १६ ॥ १७ ॥
ततः परं ददौ तस्मै इमं मंत्रं सुटुर्लभम् ।
न्यासध्यानसमायुक्तं विनियोगपुरस्सरम्॥१८॥
विष्णुभक्तिरहस्यं च ज्ञानं चैवात्मदर्शनम् ।
सहोपनिषदान्वेदान्सर्वानुपदिदेश च ॥ १६ ॥
इसके अनन्तर श्रीनारदजी ने श्रीनिम्बार्क
को न्यास और ध्यान से युक्त, तथा विनियोग-
पुरस्सर, निम्नलिखित सुदुर्नभ इस मंत्र, श्रीविष्णु-
भक्ति के रहस्य, आत्मदर्शन ज्ञान, तथा समस्त
उपनिषदों के सहित चारों वेदों का उपदेश
किया ॥ १८॥१८॥
ऋषिच्छंद-समायुक्तं मन्त्रमष्टादशोक्षरम् ।
यथोक्तविधिना प्रादात् पञ्चसंस्कारपूर्वकम् २०
फिर पंचसंस्कार कराकार ऋषि और छन्द से
युक्त, ऊपर कहे गए अष्टादशाक्षर मन्त्रराज
( श्रीगोपालमन्त्र ) का यथोक्तविधि से उपदेश
किया, अर्थात् उनको मन्त्रशिष्य किया ॥ २० ॥

ms- वैष्णवसर्वस्व । विद्यां पञ्चपदीं प्राप्य ब्रह्मविद्यां सनातनीम्। प्रणिपत्य गुरुभूयो नारदं भगवत्प्रियम् ॥२१॥ इस प्रकार गुरुदेव श्रीनारदजी से पञ्चपदी विद्या. तथा सनातनी ब्रह्मविद्या को प्राप्त करके, प्रणाम कर पुनः श्रीनिम्बार्कदेव ने भगवान् के प्पारे श्रीनारदजी को प्रणाम किया ॥ २१ ॥ उपोच भगवन् किं वा वेदांतस्य रहस्यकम् । नारदोऽपितथावोचच्छित्वा तत्सर्वसंशयान्२२ और यों कहा कि हे भगवन् ! वेदान्त का रहस्य क्या है ? यह सुनकर श्रीनारदजी ने वेदान्त का रहस्य कहकर उनके समस्त संशयों को दूर किया ॥२२॥ जानीहि तत्त्वं त्रिविधं चेतनाचेतनात्मकम् । द्विविधं चेतनं त्वेकविधं प्राहुरचेतनम् ॥ २३ ॥ श्रीनारदजी ने कहा, हे पाहणे ! तुम यह जानो कि 'तत्त्व' तीन प्रकार के हैं। उनके दो भेद हैं, अर्थात् चेतन तत्व और अचेतन तत्त्व । चेतनतत्त्व दो प्रकार के हैं और अचेतन एक प्रकार का ॥२३॥ जीवात्मा-परमात्मा च चेतनत्वेन चेरितः माथादिपढ्याच्यं तदचेतनमुदाहृतम् ॥ २४ ॥ जीवात्मा और परमात्मा, ये दो चेतनतत्व हैं। और मायादि-पदवाच्य दृश्य जगत् अचेतन तत्त्व कहाते हैं ॥२४॥ परमात्मा एक एव जीवात्मानेक एव च।

श्रीप्राचार्यचरित। ६३ - nhrAnmol जानीह्यचेतनं दृश्यं मायादिपदशब्दितम् ॥२५॥ परमात्मा एक है, जीवात्मा अनेक, अर्थात् प्रति शरीर में भिन्न है; और दृश्य-जगत्, काल तथा अप्राकृत-लोकादि माया-पदवाच्य अचेतनं तत्त्व है ॥ २५ ॥ स भेदाभेदसम्बन्धो जगतः परमात्मनः। इति वैदिकसिद्धान्तः सर्वर्षिगणसम्मतः ॥२६॥ इस प्रकार परमात्मा और जगत् का स्वाभाविक भेदाभेद सम्बन्ध है, अर्थात् नामरूपादि से तो इस जगत् का परमात्मा से भेद है, परन्तु परमात्मा के विना इस दृश्यादृश्य जगत् की स्थिति-प्रवृति नहीं रह सकती, अतएव परमात्मा के साथ इस (जगत्) का अभेद है; यही स्वाभाविक भेदाभेद-सम्बन्ध है। यह वैदिक सिद्धान्त समस्त ऋषिगणों का समस्त है ॥ २६ ॥ ततस्तु कथयामास संवादं ब्रह्मसम्मितम् । श्रीहंसस्य कुमाराणां नारदो भगवत्प्रियः॥२०॥ तदनन्तर श्रीभगवान् के प्यारे श्रीनारदजी ने श्रीनिम्बार्क से श्रीहंसभगवान् तथा चारों सनकादि कुमारों का ब्रह्मसम्मित संवाद कह सुनाया ॥२७॥ मुनेश्चक्रावतारस्य संवादं ब्रह्मसंमितम् । गोष्ठीरहस्यकं नाम वैराग्यादि चतुष्कदम्॥८॥ श्रीनारदजी तथा निम्बार्कभगवान् का यह गोष्ठीरहस्य' नामक संवाद ब्रह्मसम्मित है।

वैष्णवसर्वस्व ।
यह वैराग्य आदि, अर्थात् बैराग्य १ ज्ञान २ भक्ति ३
मुक्ति ४ इन चारों पदार्थों का देनेवाला है ॥ २८ ॥
यावतं कृतवान्प्रश्नान्भगवान् श्रीसुदर्शनः ।
उपदिश्यक्रमात्सर्वान् ययौ यादृच्छिको मुनिः२६
फिर तो श्रीनिम्बार्कभगवान् ने जितने प्रश्न
किए, उन सभों का यथायोग्य उपदेश देकर मनस्वी
श्रीनारदजी पधार गए ॥ २८॥
ऋषिवर्योऽरुणश्चापि पुत्रादाध्यात्मिकी गति
ज्ञात्वा शान्तः परं तत्त्वं विचचार महीतले॥३०॥
ऋषिवर्य अरुणमुनि भी निजपुत्र से परमतत्त्व
और आध्यात्मिकी गति को जान कर शान्त हुए
और भूमण्डल में परिभ्रमण करने लगे ॥ ३० ॥
स्वयं वृहदव्रतधरो नैष्ठिको ब्रह्मचर्यवान् ।
मात्रे धर्मानुपदिशन्नुबास कतिचित्समाः॥३१॥
स्वयं श्रीनिम्बार्कभगवान् वृहद्-व्रत धारण
करके नैष्ठिक ब्रह्मचारी हुए। फिर उन्होंने कई वर्ष
तक निज आश्रम में निवास करके अपनी माता
श्रीजयन्ती देवी को तत्त्वज्ञान का उपदेश किया था३१
इत्याचार्यचरित्रस्य षष्ठो विश्राम ईरितः ।
यत्र श्रीनारदेनास्य संस्कारस्तु कृतोऽखिल:३२
इस प्रकार श्रीनाचार्यचरित का छठा विश्राम
कहा गया, जिसमें श्रीनारदजी ने इन (श्रीनिम्बार्क)
का समस्त संस्कार किया था ॥३२॥
इतिश्रीमदाचार्यचरितस्य षष्ठोः विश्रामःसमाप्तः ॥२२३॥

श्रीनाचार्यचरित। WWWMVw श्रीश्रीकृष्णायनमः। अथापरं प्रवक्ष्यामि चरितं तस्य पावनम् । भक्तानां सुखदं नित्य हरिभक्तिप्रदं नृणाम् । श्रीनिम्बार्कभगवान् के अब और पुनीत चरित का वर्णन करते हैं, जो.(चरित ) भक्तजनों को नित्य ही सुख और हरिभक्ति के देनेवाले हैं ॥१॥ एकदा प्रातरुत्थाय श्रीनिम्बार्को मुनीश्वरः । सूर्यपुत्रीं नदी यातः मानाय कृतमङ्गलः ॥२॥ एक दिन श्रीनिम्बार्कमुनीवर प्रातःकाल उठ कर मङ्गलाचरण करते हुए श्रीयमुनास्नान के लिये पधारे ॥२॥ यदा खातुं निमग्नोऽभूज्जले तस्य महात्मनः। तदा पादौ समागत्य कोऽपि पस्पर्श कच्छपः३ जब स्नान के लिये उन महात्मा (श्रीनिम्बार्क) ने यमुना में गोता लगाया,तब किसी कच्छप ने आकर उनके चरणों का स्पर्श किया ॥३॥ स तस्य चरणाम्भोजयुगस्पर्शहताशुभः । कूर्मरूपं परित्यज्य दिव्यरूपो बभूव ह ॥४॥ श्रीनिम्बार्कदेव के युगलचरणारविन्दों के स्पर्श करने से उस कच्छप के समस्त पातक दूर होगए, और उसने कछुए के रूप को छोड़कर दिव्यरूप धारण किया ॥४॥ दिव्याम्बरं दिव्यरूपं दिव्यभूषणभूषितम् । (8) ननगी VAN वैष्णवसर्वस्व । दृष्ट्वा तंपुरुषं श्रीमानपच्छन्मुनिसत्तमः ॥५॥ उस दिव्य अम्बरधारी,दिव्य आभरणों से भूषित और दिव्य रूप को देखकर मुनिश्रेष्ठ, श्रीमान्, श्रीनिम्बार्कभगवान् ने उस पुरुष से यो पूछा ॥ ५॥ को भवान्दिव्यरूपेण प्रभामण्डितविग्रहः। निन्दितामीदृशीं योनि प्रापितः केन कर्मणा ॥६॥ प्रभा से भूषित-कलेवर, तथा दिव्यरूप धारण करनेवालेनाप कौन हैं, और किस कर्म से मापने ऐसी निन्दित ( कछुए की ) योनि पाई ? ॥ ६ ॥ इति श्रुत्वा वचस्तस्य मूर्धा तच्चरणं स्पृशन् । पूर्यशापं स संस्मृत्य कृताञ्जलिरभाषत ॥ ७ ॥ श्रीनिम्बार्कभगवान् के ऐसे वचन सुन और अपने मस्तक से उनके चरणों का स्पर्श करके पूर्व शाप को स्मरण करते हुए उस दिव्यरूप पुरुष ने हाथ जोड़कर यों कहा ॥ ७॥ जानासि भगवन् सर्व भूतानां वहिरंतरम् । गुप्तोऽसि नरलोकेऽस्मिन् लोकधर्ममनुव्रतः ॥८॥ हे भगवन् ! श्राप समस्त प्राणियों के बाहर- भीतर का सब वृत्तान्त जानते हैं । इस जीवलोक में सम्प्रति आप मनुष्यधर्म का आचरण करते हुए अपने को छिपाए हुए हैं ॥८॥ तथापि कथये सर्व भवदाज्ञानियंत्रितः । पूर्वजन्मनि भो स्वामिन्यत्कृतं दुष्कृतंमया र

ww
श्रीप्राचार्यचरित।
अतएव हे स्वामिन् ! यद्यपि प्राप सर्वज्ञ हैं,
तथापि आपकी आज्ञा का वशवत्ती होकर मैं सब
वृत्तान्त कहता हूं, जो कि पूर्वजन्म में मैंने दुष्कर्म
किया था ॥८॥
अहं पुराऽभवं कश्चित्पतङ्ग इति संज्ञितः ।
मुनिर्विज्ञानसम्पन्नस्तपस्वी ब्रह्मवित्तम! ॥१०॥
हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ ! पूर्व समय में 'पतङ्ग'
नामक ज्ञान-विज्ञान-सम्पन्न तपस्वी (मुनि ) मैं
हुमा था ॥ १०॥
एतस्या यमुनायाश्च एकस्मिन् रोधसि प्रभोः।
ममाश्रमोऽभूद्वेनाथ द्वितीये कुम्भजन्मनः ॥११॥
हे प्रभो! हे नाथ ! इसी यमुना के एक तट पर
मेरा आश्रम था,और दूसरे फूल पर अगस्त्यमुनि का
प्राश्रम था॥ ११ ॥
एवनिवसतोरस्या रोधसोरुभयोरपि ।
कालोमहान्व्यतीयाय कुर्वतोस्तप उत्तमम् ॥१२॥
इस प्रकार इस यमु. के दोनों तटों पर निवास
कर के उत्तम तप करते हुए हम-दोनों को बहुत काल
बीत गए थे ॥१२॥
एकस्मिन्समये सामानगस्त्यः स्नातुमागतः।
परब्रह्म हृदिध्यायन् जलांतःप्राविशद्यदा॥१३॥
तदाहमागतः स्नातुं निमज्ज्याम्बुनि कूर्मवत् ।
गृहीत्वा चरणौतस्य चकर्षविधिमोहितः॥१४॥

६८ वैष्णवसर्वस्व। VINR एक समय श्रीमान् अगस्त्यमुनि हृदय में परब्रह्म काचिन्तन करते हुए स्नान करने आए। सो जब वे जल में घुसे, तब मैं भी स्नान के लिये पाया और विधिमोहित होकर मैने उनके दोनोंचरणोंको फूर्मपत् पकड़ कर उन्हें जल में खींच लिया ॥१३-१४॥ दृष्ट्वा तन्मम दौरात्म्यं मुनिः क्रोधवशं गतः । कूर्मतां कर्मणानेन प्रयाहीति शशाप माम् ॥१५॥ मेरे इस दौरात्म्य को देखकर अगस्त्यजी महा कुपित हुए और उन्होंने मुझे यह शाप दिया कि, 'तू इस कुकर्म के करने से कच्छप की योनि को प्राप्त कर' ॥ १५ ॥ तं श्रुत्वा दुस्सहं शापमहमुद्विग्नमानसः । पतित्वा चरणोपान्ते प्रार्थयामास तं मुनिम्१६ उस दुःसह शाप को सुनकर मैं महा उद्विग्न हुन्ना और उन मुनिराज के चरणों पर गिरकर उनकी प्रार्थना करने लगा ॥ १६ ॥ क्षमस्व मम दौजन्यं कृपयस्व महामुने । मया दैवहतेनायमपराधः कृतस्तव ॥ १७ ॥ मैंने कहा कि हे महामुने! आप मेरी इस दुष्टता को क्षमा कीजिए और मुझपर कृपा कीजिए; क्योंकि मैंने भाग्यहीनता के कारण आपका यह अपराध किया है ॥ १७ ॥ इति दीनवचः श्रुत्वा करुणोद्रमना मुनिः ।

श्रीप्राचार्यचरित। . प्रीणयन् लक्ष्णया वाचा कृपयन्मामुवाच सः१८ इस प्रकार मेरे दीन वचनों को सुन और करुणासे आर्द्रमन होकर उन मुनिजी ने कृपापूर्वक मुझे प्रसन्न करने के लिये मधुर वाणी से यों कहा ॥ १८ ॥ न जाने त्वां महाभाग पतङ्गाख्यं महामुनिम्। अज्ञात्वैव मया दत्तःशापस्तत् क्षन्तुमर्हसि १९ हे महाभाग ! तुम पतङ्ग नामक मुनि हो, यह बात हमने पहिले नहीं जानी थी, इसलिये अनजानते में हमने वह शाप तुम्हें देदिया, इसके लिये तुम हमको क्षमा करो ॥१८॥ चिन्तां माकुरु देवर्षे भगवान् श्रीसुदर्शनः । इतोऽचिरेण कालेन भूमाववतरिष्यति ॥ २० ॥ संस्थापनाय धर्मस्य प्रशमायेतरस्य च । हरिभक्तप्रचाराय सर्वभूतहिताय च ॥ २१ ॥ हे देवर्षे ! तुम कुछ चिन्ता न करो, क्यों कि श्रीसुदर्शनभगवान् अबझे थोड़े ही दिनों के भीतर इस पृथ्वो पर धर्म के संस्थापन, अधर्म के नाश, हरिभक्ति के प्रचार और समस्त प्राणियों के कल्याण के लिये अवतार धारण करेंगे॥ २०॥ २१॥ एकदाप्रातरुत्थाय श्रीमान् स्नानाय यास्यति। तत्पादस्पर्शनादेव हताशेषाघबन्धनः । दिव्यरूपधरो भूत्वा हरेर्लोकं प्रयास्यसि ॥२२॥ एक दिन प्रातःकाल के समय श्रीमान् निम्बार्क ७० AARAM वैष्णवसर्वस्व । भगवान् स्नान करने के लिये यहां भावेंगे। उस समय तुम उनके चरणों का स्पर्श करके समस्त पापों के बन्धनों से छुटकारा पाकर दिव्यरूप धारण करके वैकुण्ठ पधारोगे ॥ २२ ॥ इत्युक्त्वा मां स देवर्षिर्भगवान्कुंभसंभवः । स्नात्वाऽस्यां यमुनायां च जगाम स्वीयमाश्रमम् अहं च दैववशतः प्रापितो गतिमीदृशीम् । उवासात्र बहूनब्दांश्चिन्तयन्त्वत्पदाम्बुजम् २४ इस प्रकार मुझसे कह और यमुना में स्नान करके वे देवर्षि भगवान् अगस्त्यमुनि अपने प्राश्रम को गए। और मैं दुर्भाग्यवश इस गति को पाकर आपके चरणारविन्दों का चिन्तन करता हुआ बहुत बर्षों से यहां पर पड़ा हुना हूं ॥ २३ ॥ २४ ॥ नित्यमेव भवानत्रायाति स्नानाय किन्त्वहम्। दूर एव स्थितोऽपश्यं भवन्तं शापमोहितः॥२५॥ आप नित्य ही यहां पर स्नान करने के लिये प्राया करते हैं, किन्तु के मोह में ग्रस्त रहने के कारण दूर ही आपको देखा करता था॥२॥ अधुना त्वत्पदाम्भोजस्पर्शनाद्गतकल्मषः । यास्यामि पुनरावृत्तेरहितं पदमुत्तमम् ॥२६॥ आज आपके चरणारविन्दों के स्पर्श से समस्त पापों से छूटकर मैं उस परमपद को जाता हूं, जहां जाकर पुनः कोई संसार में नहीं माता ॥२६॥ शाप

७१
श्रीप्राचार्यचरित।
इत्युक्त्वा चरणोपान्ते पतित्वा प्रेमविहुलः ।
उत्थायाऽथ प्रतुशाय गुणकर्माणि वर्णयन् ॥२०॥
यों कह और प्रेम से बिह्वल हो, तथा श्रीनिम्बार्क
भगवान् के चरणों में गिरकर, एवं फिर उठकर उनके
गुणों और कर्मों का वर्णन कर के वह दिव्यपुरुष
उनकी निम्नलिखित प्रकार से स्तुति करने लगा॥२७॥
कज्जाक्षं परमाचार्य कम्युग्रीवं महाभुजम् ।
तमालश्यामलाङ्गं तं वन्दे निम्बार्कमीश्वरम् २८
कमलनयन,कम्बुग्रीव,महाभुज,तमाल के समान
श्यामवर्ण, परमाचार्य श्रीनिम्बार्कभगवान् को मैं
प्रणाम करता हूं ॥२८॥
किशोरं सुन्दरं रम्यं लावण्यादिगुणाकरम् ।
पीताम्बरधरं शान्तं वंदे निम्बार्कमीश्वरम् २६
किशोर अवस्थावाले, सुन्दरस्वरूप, रमणीय-
कान्तिविशिष्ट, लावण्य आदि गुणों के आकर,
पीताम्बरधारी और शान्त प्रकृति श्रीनिम्बार्क-
भगवान् को मैं प्रणाम करता हूं ॥ २ ॥
पक्कबिम्बाधरं सौम्यं सुकपोलं सुनासिकम् ।
सुकेशं चारुसर्वाङ्गं वंदे निम्बार्कमीश्वरम् ३०
पके विम्ब के सदृश अधरोष्ठवाले, सौम्यरूप,
सुन्दर कपोलों से युक्त, सुन्दर नासिकावाले, सुन्दर
केशवाले और, सर्वाङ्गसुन्दर श्रीनिम्बार्कभगवान्
को मैं प्रणाम करता हूं ॥३० ॥

७२ वैष्णवसर्वस्व । M N/NAV vvv ~ lvAvM उन पीनोरस्कं निम्ननाभिं बलिवल्गुदलोदरम् । तुलसीदामशोभाव्यं वंदे निम्बार्कमीश्वरम्॥३१॥ जिनके वक्षस्थल पुष्ट, नाभि गभीर, त्रिवलीयुक्त उदर और कण्ठ तुलसीमाला से विभूषित हैं, श्रीनिम्बार्कभगवान् को मैं प्रणाम करता हूं ॥३१॥ रक्तपङ्कज पादाब्ज स्वस्तिकासनसंस्थितम् । ज्ञानमुद्राधरं धीरं वंदे निम्बार्कमीश्वरम् ॥१२॥ लाल कमल के समान चरणकमलवाले,स्वस्तिक आसन से विराजमान, शानमुद्राधारी, और धीर श्रीनिम्बार्कभगवान् को मैं प्रणाम करता हूं ॥३२॥ निम्बग्रामकृतावासं निम्बइमलताश्रयम् । निम्बक्याथैकभोक्तारं वंदे निम्बार्कमीश्वरम निम्बग्राम के निवासी, निम्बवृक्ष की लता के आश्रय और केवल निम्बवाय के भोक्ता श्रीनिम्बार्क- भगवान् को मैं प्रणाम करता हूं ॥ ३३ ॥ सर्वविद्याप्रदं सर्वकामदं दुःखनाशनम् । सच्चिदानन्दरूपं तं वंदे निम्बार्कमीश्वरम् ॥३४॥ समस्त विद्याओं के दाता, सब कामनाओं के पूर्णकर्ता, सम्पूर्ण दुःखों के दूर करनेवाले और सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनिम्बार्कभगवान् को मैं प्रणाम करता हूं॥३४॥ कालातीतं भवातीतं दिव्यमाङ्गल्यविग्रहम् । कान्तातीतंगुणातीतं वंदे निम्बार्कमीश्वरम् ३५ ७४ वैष्णवसर्वस्व। wamane wrmarwaranpur Aw के दाता, संसारदुःखशमनाय सुदर्शनाय, कृष्णाला काय शिवराय नमो नम्वरले ॥२९ ज्ञानवरूप, ज्ञानरूपी घर के दाता, सलों के विनाशक, भक्ति महारानी पाई लि- के नाशकर्ता, भक्तों के विविध गायों के वाले, श्रीहरि के प्रिय, श्रीकृष्ण के चरणा-या मान्य के मकरन्द के समर; शुद्धान्तःकरण, शुद्धशरीर, वरी कालस्वरूप, काल के परिचालन करनेवाले, भय के अन्तक, संसार के दुःखों के कर्ता, श्रीकृष्णस्वरूप, कल्याणकारक, श्रीदन भगवान् को वारंवार प्रणाम है ॥३८-३८॥ यो राधावर पादपजमुगल- ध्यानानुशको मुजि- भक्तिज्ञानविरागयोगकिरणे- मौहान्धकारान्तकृत् ॥ लोकानामत एव निम्बघटितां, चादित्यनामानुगं। निम्बादित्यगुरुतमेव मनसा, बंदेगिर कर्मणा ॥ ४० ॥ जो मुनिवर श्रीराधाकृष्ण के युगल-चरणार- विन्दों के ध्यान में निरत रहते हैं, जो ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के किरणों से मोहरूपी अन्धकार का नाश कर देते हैं, और लोगों में जो निम्ब के पर्याय- श्रीआचार्यचरित। ७५ ~~ MVVNA वाची शब्दों के साथ साथ सूर्य के पर्यायवाचक शब्दों से युक्त नामों विख्यात हैं, उन श्रीनिम्बादित्य गुरुवर को मैं मनसा, वाचा, कर्मणा प्रणाम करता हूं ॥ ४० ॥ पापण्डद्र प्रदावतीक्ष्णदहनो, बौद्धदिखण्डाशनि- श्शावकारख्यातनोनिरासकमणि- जैनममन्थारणिः॥ मायायादमहाहिमहू विपति- सदश्वयूडामणिः, राधाकृष्णजयध्वजो विजयते, निम्बार्कनामा मुनिः ॥११॥ पापण्डरूपी वृक्ष के दहन करने के लिये भयानक अग्नि के समान, कोरूमी पर्वत के चूर्ख कारने के के শ্বাশাক খ ম জ करने के लिये मखितुल्य, अन्दरूपी गजके वश करने के लिए अङ्कुश जैसे, मायाकादरूपी सप के भङ्ग करने के लिये गड़-खेडे, थोराधाकृष्ण के विजयध्वजरूप श्रीनिम्बार्क नामक मुनीश्वर सदैव विजय को प्राप्त हों ॥४१॥ यल्लीलया निखिलमेव थरीकरोति, विश्व विभोः स्वझलया च वरीबरोति'। मोमोक्तिजीवमशुभं च जरीहरीति, लिये बन , ७६ वैष्णवसर्वस्व। निम्बार्कपादयुगलं प्रणतो नवीमि ॥४२॥ जिनकी लीला से सम्पूर्ण विश्व होते हैं, जो अपनी कला से समस्त विश्व को धारण किए हुए हैं, और जो सब जीवों के पातकों को दूर करके उनको मुक्त करते हैं, उन श्रीनिम्बार्कभगवान् के युगल चरणों में अति नम्रता से मैं प्रणत होता हूं ॥४॥ हे निम्बार्क दयानिधे गुणनिधे, हेभक्तचिन्तामणे। हे आचार्यशिरोमणे मुनिगणे- रामृग्यपादाम्बुज ॥ हे सृष्टिस्थितिपालकप्रभवन, हेनाथमायाधिप। हे गोवर्द्धनकन्दरालय विभो, मां पाहि सर्वेश्वर ॥ ४३॥ हे निम्बार्क ! हे दयानिधे ! हे गुणनिधे ! हे भक्तचिन्तामणे ! हे प्राचार्य-शिरोमणे ! हे मुनियों द्वारा ढूंढ़े हुए चरणकमल ! हे सृष्टि-स्थिति-पालन के प्रधानभवन ! हे नाथ ! हे मायाधिप ! हे गोवर्द्धन की कन्दरा में निवास करनेवाले ! हेविभो ! हे सर्वेश्वर ! आप हमारी रक्षा कीजिए ॥ ४३ ॥ पतितं दुर्विनीतं मां देहेन्द्रियमनोमयम् । ज्ञात्वाकुरुकृपांस्वामिन्छिन्धि पाशंचमोहजम् देह, इन्द्रिय, और मन में डूबे हुए मुझे दुर्विनीत ,

~~~ ~~~~~
श्रीपाचार्यचरित।
और पतित जानकर, हेस्वामिन् ! आप मुझपर कृपा
कीजिए और मेरे मोह से जायमान पाश को काट
डालिए ॥ ४४ ॥
स्तवैस्तुत्वा नमस्कृत्य विमानमधिरुह्य सः ।
पश्यतां सर्वभूतानां जगाम पदमुत्तमम् ॥४॥
इस प्रकार वह दिव्यपुरुष श्रीनिम्बार्कभगवान्
की स्तवों से स्तुति कर और प्रणाम करके विमान
पर चढ़कर सब लोगों के देखते देखते परमपद को
चला गया॥४५ ।।
इत्याचार्यचरित्रस्य विनामे सप्तसंज्ञके ।
श्रीमनिम्बार्कदेवस्य महिमा ह्यनुवर्णिता॥४६॥
इस प्रकार श्रीमदाचार्यचरित के सप्तम विश्राम
में श्रीमान् श्रीनिम्बार्कभगवान् की महिमा गाई
गई ॥४६॥
इतिश्रीश्रीमदाचार्यचरितस्य सप्तमो विश्रामः
समाप्तः ॥ ७॥
॥ २६८॥

वैष्णवसर्वस्व ।
श्रीश्रीकृष्णाय नमः।
अथापरं महापुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् ।
मारचरितं दिव्यं निम्बार्कस्य शृणु द्विज ॥१॥
हे द्विज ! अब महर्षि श्रीनिम्बार्क भगवान के
सर्व-पाप-विनाशक, महापवित्र, अपर दिव्य चरित
सुनो ॥१॥
चरित्वा सर्वतीर्थानि त्रिःपरिणम्य भारतम् ।
उपदिश्य यथाकामंधनान्भागवतान् शुभान् २
स्वमात्र समागत्य राधाकृष्णपरायणः ।
दुष्करं यजुषां तद्धि चकार परमं तपः ॥ ३॥
श्रीराधाकृष्ण के अनन्य-उपासक श्रीनिम्बार्क
भगवान् सव तीर्थों में भ्रमण कर, भारतवर्ष की तीन
যজিষ। যাহ কাযা পালন লা লা
भांति प्रकार कर, और फिर अपने आश्रम में प्राकर
सेवा महत्तप करते हुए, जो अन्य मनुष्यों को
अत्यात दुष्कार है ॥ २ ॥ ३ ॥
तीर्थयात्रामा राव जोतं यदगुतम् ।
चरितं तच्छृणु नेणा रवाचार्यरय महात्मनः?
निजाचाय, महानुभाव, श्रीनिम्बार्कभगवान् की
तीर्थ यात्रा के अवसर पर जो अद्भुत चरित हुए थे,
उन्हें प्रेमपूर्वक सुनी ॥ ४ ॥
एकदा पर्यटल्लोकान् सैतुदर्शनमुत्तमम् ।
मन्यमानो जगांमाशु दक्षिणाशां महातपाः ॥५॥

७४ श्रीनाचार्यचरित। एक समय महातपस्वी श्रीनिम्बार्फभगवान् लोकों में पर्यटन करते हुए सेतुबन्ध के दर्शन की उत्समकामना करके शीघ्र ही दक्षिण दिशा की ओर पधारे ॥ ५॥ तत्रतत्रोपसङ्गल्य तत्तद्रुशनिवासिभिः । तास्तानपूरयत्काभैभक्तिज्ञानविरहिमः ।.६५ उस यात्राप्रसङ्ग में जहां जहां आप पधारे, वहां वहां के निवासीजन आपके शरण में आए। तब मापने ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के उपदेशद्वारा उन शरणागतों की मनोकामना पूरी कर दी ॥६॥ सेतोश्च दर्शनं कृत्वा गुर्जर शक्तिमुत्तमाम् । संस्थाप्य चागमद्यत्र नारायणसरःशुभम् ॥७॥ तदनन्तर सेतु का दर्शन कर और फिर गुर्जर (गुजरातमान्त ) में श्रीहरिभक्ति का विधिपूर्वक प्रचार करके श्राप वहां पधारे, जहां कल्याणकारक श्रीनारायण-सरोवर है ॥ ७ ॥ चण्डीयुद्धे मृता ये वै राक्षसाश्च महीतले । कलौ जाता द्विजास्ते तु तुलसीरिक्तकण्ठकाः॥८॥ पूर्वकाल में चण्डी (श्रीदुर्गा ) के साथ युद्ध करके भूमण्डल में जितने राक्षस.मारे गए थे, वे सब, कलिकाल माने पर दक्षिणदेश के ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होते हुए; जिनके कण्ठ तुलसी की माला से रहित ये ॥८॥ आसुरी योनिमापन्नाः कृष्णनिन्दनतत्पराः ।

वैष्णवसर्वस्व ।
? MVVVVV
~~
NAA
चरन्ति नास्तिका लोके बहवो द्विजमानिनः
श्रीमदाचार्यचरण ने क्या देखा कि वे सब नास्तिक,
जो पासुरी योनि में आकर जन्मे हैं, अपने को
द्विज मानते हैं, और इधर उधर श्रीकृष्णभगवान्
की निन्दा करते फिरते हैं ! ॥६॥
तेषामसुरत्वं यथा पद्मपुराणे-
राक्षसाः कलिमासाद्य जायन्ते ब्रह्मयोनिषु ।
निदन्ति तस्यभजनं कृष्णस्य परमात्मनः॥१०॥
वे ब्राह्मण असुर हैं,इसका प्रमाण पद्मपुराण में
है।
। पुराणकार लिखते हैं कि कलिकाल के आने पर
राक्षसलोग ब्राह्मण योनि में जन्म लेते हैं, और
वे परमात्मा श्रीकृष्णभगवान् के भजन की निन्दा
किया करते हैं ॥ १०॥
संस्थाप्य तत्र चक्रादिचिन्हं तदुःशवासिनाम् ।
त्याजयित्वासुरंभावं वैष्णवं धर्ममादिशत् ॥११॥
श्रीमदाचार्यचरण ने यह दुर्दशा देखकर उन उन
देशों के निवासियों के सासुर-भाव को दूर करके,
तथा भगवान् के सुदर्शनचक्र आदि, अर्थात् चक्र,
शंख,गदा,पद्म श्रादि,-दिव्य प्रायुधों की स्थापना
करके उन द्विजों को वैष्णवधर्म का • उपदेश
किया ॥ ११॥
पाषण्डान् शमयन् दुष्टान् दमयन् हादयन् सतः।
ग्राहयन् भगवद्धर्माल्लोकानुग्रहकाम्यया ॥१२॥

wwION AMA श्रीनाचार्यचरित। तीर्थयात्रामिषेणेव सम्प्राप्त कुरुजाङ्गले । वायुर्ददीतिविख्यातस्तत्र वासमचीकरत् ॥१३॥ श्रीनिम्बार्क भगवान् पाषण्डों को शमन, दुष्टों को दमन और सज्जनों को प्रसन्न करते, लोगों के कल्याण की कामना से तीर्थयात्रा के व्याज से कुरुजाङ्गल देश के 'वायुर्ददी'नाम से विख्यात स्थान में जाकर वहां कुछ दिनो तक निवास करते हुए ॥१२-१३॥ अन्तःशाता बहिःशैवाः सभायां वैष्णवा मताः नानोरूपधराः कौला विचरन्ति महीतले॥१४॥ प्रोमदाचार्यचरणों ने देखा कि, वहांके लोग भीतर से तोशाक्त हैं,बाहर से शैव हैं और सभाओं में वैष्णवों का सा ढोंगरचते हैं ! ऐसे बहुरूपिये कौल (अष्टाचारी) भूमण्डल में विचरते हैं !' ॥ १४ ॥ शास्त्राचार्यविहीनाँस्तानिरीक्ष्य करुणानिधिः औदुंबरं पदास्पृष्ठा तस्मै ज्ञानमुवाच ह॥१५॥ करुणासागर श्रीनिम्बार्कभगवान् ने उन शास्त्रा- चार्यविहीन कौलों को देखकर निज शिष्य औदुम्बर ऋषि को चरण से स्पर्श कर के ( १.) उन्हें तत्त्वज्ञान का उपदेश दिया ॥ १५ ॥ औदुंवर इति ख्यात आचार्यस्त्वं भविष्यसि। स्वनाम्ना संहितां ब्रूहि ह्यधुनैव ममाज्ञयो॥१६॥ (१) चरण के स्पर्श से अपना नैज औदुम्बर ऋषि के हृदय पहुंचा दिया,-यह भाव चरणस्पर्श का है। मा मे (११) न० ८२ वैष्णवसर्वस्व । श्रीमदाचार्यचरणों ने कहा कि हे मौदुम्बर! तुम इस (औदुम्बर) नाम के प्रख्यात भाचार्य होगे,अतएव हमारी आज्ञा से तुम शीघ्र अपने नामानुसार एक संहिता (औदुम्बर-संहिता) की (१) रचना करो॥१६॥ अविरुद्धं मतं स्थाप्य भक्तिमार्ग प्रवर्तय। येनेमे सकलालोकाः कृतार्थाः स्युर्विशेषतः॥१७॥ उस संहिता में अविरुद्ध मत का स्थापन करके तुम भक्तिमार्ग का प्रचार करो, जिससे ये सब लोग विशेष रूप से कृतार्थ होजायं ॥ १७ ॥ सोप्युत्थाय परिक्रम्य भक्तिनम्मेण चेतसा । दण्डवत्प्रणिपत्यास्तीत्स्यगुरु पितरं प्रभुम्॥१८॥ श्रीमदाचार्यचरणों की ऐसी प्राज्ञा सुनकर औदुम्बरऋषि उठ खड़े हुए। फिर वे भक्तिनम्रचित्त से अपने पिता,गुरु, एवं प्रभु श्रीनिम्बार्कभगवान् की परिक्रमा कर तथा दण्डवत्प्रणाम करके श्रीगुरुदेव की स्तुति करने लगे ॥ १८ ॥ श्रीमतेः सर्वविद्यानां प्रभवाय सुब्रह्मणे । आचार्याय मुनीन्द्राय निम्बार्काय नमो नमः१९ श्रीमान , सब विद्यानों के उत्पत्ति-स्थान, ब्रह्मस्वरूप, आचार्य, मुनीन्द्र, श्रीनिम्बार्कभगवान् (१) जिन सजनों के पास "औदुम्बरसंहिता" हो, वे कृपाकर उसे शीघ्र "सुदर्शनप्रेस-वृन्दावन" के अध्यक्ष के पास भेज दें तो भाषाटीफा के साथ वह छाप दी जाय और भेजनेवाले सजन का नाम अमइ होजाय, तथा सम्प्रदाय का महोपकार भी हो।

श्रीप्राचार्यचरित। VVVVVVVVVVVVV ww न को वारंवार प्रणाम है ॥१८॥ निभ्यादित्याय देवाय जगज्जन्मादिहेतवे । सुदर्शनावताराय नमस्ते चक्ररूपिणे ॥ २० ॥ देव, जगत् के जन्मादि के हेतु, श्रीमुदीना- वतार, चक्ररूपी श्रीनिम्बार्कभगवान को वारंवार प्रणाम है ॥ २० ॥ नमः कल्याणरूपाय निर्दोषगुणशालिने । प्रज्ञानघनरूपाय शुद्ध सत्त्वाय ते नमः ॥ २१ ॥ कल्याणस्वरूप,निर्दोषगुणों के भाकर, प्रज्ञान- घनरूप, शुद्ध सत्त्व, श्रीनिम्बार्कभगवान् को वारंवार प्रणाम है ॥२१॥ सूर्यकोटिप्रकाशाय कोटीन्दुशीतलाय च । शेषानिश्चिततत्त्वाय तत्त्वरूपाय ते नमः॥२२॥ कोटि सूर्यों के समान प्रकाशमान, कोटिचन्द्रों के समान शीतल, शेषभगवान से भी जिनका तत्त्व मिश्चित न हो सका, ऐसे तत्त्वस्वरूप श्रीनिम्बार्क- भगवान को वारंवार प्रणाम है ॥ २२ ॥ वितताय पवित्रीय नियमानन्दरूपिणे । प्रवर्तकाय शास्त्राणां नमस्ते शास्त्रयोनये २३ वितत,पवित्र,नियमानन्दरूप,शास्त्रों के प्रवर्तक तथा शास्त्रयोनि श्रीनिम्बार्कभगवान को पारंवार प्रणाम है ॥ २३ ॥ वसतां नैमिषारण्ये मुनीनां कार्यकारिणे । भू वैष्णवसर्वस्व । Marner तन्मध्ये मुनिरूपेण वसते प्रभवे नमः ॥ २४ ॥ नैमिषारण्य में वास करनेवाले मुनियों के कार्यों के कर्ता,उन मुनियों के मध्य में विराजमान महाप्रभु श्रीनिम्बा भगवान को वारंवार प्रणाम है ॥ २४ ॥ लोलां पश्यति योनित्यं कृष्णस्यय परमात्मनः। निम्बग्रामनिवासाय विश्वेशाय नमो नमः॥२५॥ जो परमात्मा श्रीकृष्ण की लीलाओं को नित्य ही देखा करते हैं, उन निम्बग्राम के निवासी विश्वेश्वर श्रीनिम्बार्कभगवान को वारंवार प्रणाम है ॥ २५ ॥ बप्तमुद्रास्थापकाय द्वारावत्यां युगे युगे। निम्बार्काय नमस्तसौ दुष्कृतामन्तकारिणे ॥२६॥ प्रतियुग में श्रीद्वारिकापुरी में तप्तमुद्रा धारण करने के व्यवस्थापक(१) और दुराचारियों के अन्तक श्रीनिम्बार्कभगवान को वारंवार प्रणाम है ॥ २६ ॥ य इदं पठति स्तोत्रं निम्बादित्यस्य बुद्धिमान्। तस्य कापि भयं नास्ति तमसेव दिवामणेः ॥२७॥ जो बुद्धिमान श्रीनिम्बार्कभगवान के इस स्तोत्र को पढ़ते हैं, उनको कहीं भी भय नहीं होता; जैसे सूर्य के रहते अन्धकार का भय नहीं रहता ॥ २७ ॥ स्तोत्रेणानेन संस्तूय विष्णुचक्र सुदर्शनम् । स्वनाम्ना संहितां चक्रे यत्र धर्मः सनातनः ॥२८॥ (१) इस सप्रदाय में "शीतलमुद्रा" का विधान है। तप्तमुद्रा का धारण करना श्रीद्वारकापुरी में विहित है। उसमें भी लेने की व्यवस्था इच्छानुसार ही की गई है।

श्रीनाचार्यचरित। इस स्तोत्र से विष्णुचक्र श्रीसुदर्शनभगवान की स्तुति करके सोनौदुम्बराचार्य ने अपने नामानुसार एक संहिता (ौदुम्बरसंहिता)रची,जिसमें सनातनधर्म की विशद व्याख्या की गई है ॥ २८॥ श्रोनिम्पाकोऽपि भगवानेवमौर्युवराभिधम् । अनुराध मुनि भूमौ विचचार सतां गतिः।२। इस प्रकार सज्जनों के आश्रय श्रीनिम्बार्क भगवान औदुम्बरनामक मुनि पर अनुग्रह करके पृथ्वी में विचरण करते हुए ॥ २६ ॥ स्थापयन्वैष्णवान्धर्मातएप्रायान् सनातनान् नैमिषारण्यके प्रागाटु ब्रह्मर्षिगणसेविते॥३०॥ नष्टप्राय,सनातन, वैष्णवधर्म का स्थापन करते हुए श्रीनिम्बार्कभगवान ब्रह्मर्षियों से सेवित नैमि. पारण्य में पधारे ॥३०॥ दृष्ट्वा तवासिनः सबै शौनकाद्या महर्षयः। प्रोचुः प्राजलयःप्रीत्या हर्षगद्दया गिरा॥३१॥ नैमिषारण्य के निवासी शौनक आदि सम्पूर्ण महर्षियों ने श्रीनिम्बार्क भगवान का दर्शन करके प्रीतिपूर्वक हाथ जोड़कर गद्गदवाणी से इस प्रकार कहा ॥ ३१॥ अहोभाग्यमहोभाग्यं नैमिषारण्यवासिनाम् । यदाशया तपस्तप्त सोऽयं दर्शनगोचरः ॥३२॥ नैमिषारण्यवासियों के अहोभाग्य हैं कि जिस ८६ वैष्णवसर्वस्व vvvvv , अभिप्राय से यहांके निवासियों ने तपस्या की थी,वह आज पूरी हुई; अर्थात् आपके दर्शन हुए ॥ ३२ ॥ वयं तेऽनुग्रहेणैव ह्यत्र सत्राय दीक्षिताः । दानवा ववश्वात्रविघ्नान् कुर्वन्ति नित्यशः॥३३॥ हेभगवन ! हमलोग प्रापके अनुगह के ऊपर निर्भर करके ही यहां पर यज्ञ में दीक्षित हुए हैं; किन्तु यहां पर नित्य ही बहुतेरे दानव यज्ञ में विघ्न करते हैं ॥३॥ यदर्थमवतीर्णोसि भूतलेऽस्मिन् हरिप्रिय ! धर्मान् भागवतान् ब्रूहि तान्यैः संप्रीयते हरिः ३४ हे हरित्रिय ! इस भूमण्डल में जिस लिये आप प्रधतीर्ण हुए हैं, वह कीजिए; अर्थात् उस भागवत धर्म का वर्णन कीजिए जिससे श्रीहरिभगवान् अत्यन्त प्रसन्न होते हैं ॥ ३४ ॥ ऋषिभिर्वहुधा गीतंछंदोभिर्विविधैः पृथक् । सर्वतःसारमादाय संक्षेपा ब्रूहि नःप्रभो॥३॥ .जिस भागवत धर्म का गुणगान अनेक महर्षियों ने विविध छन्दों में पृथक पृथक् किया है, उन सभों के सारभाग को ग्रहण करके हमलोगों के आगे संक्षेप में वर्णन कीजिए ॥ ३५ ॥ ' इति श्रुत्वा वचस्तेषां नैमिषारण्यवासिनाम् । तत्सर्व वर्णयामासविस्तरात्सर्वतत्त्ववित् ॥३६॥ ऋषिभिर्य कृताःप्रश्ना देहात्मविषयाः पृथक् ।

श्रीप्राचार्यचरित। ANNNN N vv समाधानाय तेषां वै ब्यवसत्कतिचित्समाः॥३०॥ इस प्रकार नैमिषारण्य के निवासी मुनियों के वचन को सुनकर सर्वतत्त्ववित् श्रीनिम्बार्क ने विस्तार पूर्वक उनके आगे सनातनधर्म की व्याख्या की अर्थात् उन ऋषियों ने जो देहात्मविषयक प्रश्न किए थे, उन प्रश्नों के उत्तर देकर उन मुनियों के समाधान करने के लिये श्रीनिम्बार्कभगवान् कुछ वर्षों तक नैमिषारण्य में रहे ॥३६ ॥ ३ ॥ तत्र गौरमुखादिभ्यः परंतत्वं प्रकाश्य च । बदर्याश्रमके प्रागाद् द्वापरान्त इति श्रुतम्॥३८॥ ऐसा सुनने में आया है कि वहांपर गौरमुख आदि महर्षियों को परम तत्त्व का उपदेश देकर श्रीनिम्बार्कभगवान् द्वापरान्त में बदर्याश्रम को पधारे थे ॥३८॥ निवसन् तत्र व्यासेन साकंच कतिचित्समाः। चकार ब्रह्मसूत्रस्य व्याख्यानंप्रथमं मुनिः ॥३॥ वहां ( वदर्याश्रम में ) श्रीवेदव्यास महामुनि के साथ कई वर्षों तक रहकर महामुनि श्रीनिम्बार्क- भगवान् ने वादरायण ( वेदव्यार) रचित ब्रह्मसूत्र" का सर्वप्रथम भाष्य बनाया था ॥ ३८ ॥ धरया प्रार्थितः कृष्णः प्रेषयामास चोद्धवम् । निम्बोदित्यस्तपोरूढःप्रेषणीयोनिजस्थले। पुरा गोबर्द्धने रम्ये मल्लीलादर्शनोत्सुकः ।

वैष्णवसर्वस्व। MANAMANNA hm.nnr VA अवात्सीदधुना सोऽस्ति वदर्यात्राममण्डले ॥४१॥ पृथ्वी की प्रार्थना से श्रीभगवान ने उद्धवजी को यह कह कर वदर्याश्रम की ओर भेजा कि, 'निम्बादित्य आजकल बदरी खण्ड में तपस्या कर रहे हैं, उन्हें तुम निज स्थान ( श्रीवृन्दावन-निम्ब- ग्राम ) को भेजदो।' क्योंकि पहिले वह (निम्बार्क) हमारी लीला देखने की उत्कण्ठा से निज स्थान श्रीगोवर्द्धन (वृन्दावन) में रहते थे, परन्तु आजकल बदरीखण्ड में हैं॥ ४० ॥ ४१ ॥ इति श्रुत्वा वचस्तस्य कृष्णस्य परमात्मन:। गत्वा तत्रोद्धवः सर्व निम्बार्कायाब्रवीदिदम् ४२ परमात्मा श्रीकृष्ण के ऐसे बचन को सुनकर उद्धवजी वदर्याश्रम को गए और वहां जाकर उन्होंने श्रीनिम्बार्काचार्य से यों कहा ॥ ४२ ॥ गच्छनिम्बार्क शोघ्र त्वं व्रजंकृष्णाज्ञयाधुना। विधातं बैष्णवं मार्ग संप्रदायं पुरातनम्॥४॥ कलिनाऽधर्ममित्रण नष्टप्राय दिने दिने। कुरु कार्यहरे सर्व भक्तिभावसमन्वितम् ॥४॥ हे निम्बार्क ! अब तुम अतिशीघु श्रीकृष्ण की आज्ञा से पुरातन सम्प्रदाय-वैष्णवमार्ग का विधान करने के लिये ब्रज को जानो। क्यों कि अधर्म के मित्र कलियुग के कारण दिन दिन वह मार्ग नष्टप्राय होरहा है। इसलिये वहां जाकर तुम ट sameramantrona श्रीनाचार्यचरित। भक्ति-युक्त हरि के कार्यों का सम्पादन करो ॥४३॥४४॥ निम्बादित्योऽपि तद्वाक्यामृतपानपरिप्लुतः । निम्बग्रामं समासाद्य तत्तथैव चकारह॥४॥ श्रीउद्धवजी के बचनामृत के पान करने से तृप्त, होकर मीनिम्बार्कभगवान् निम्वग्राम में प्राकर भीभगवान् की आज्ञा का यथोचित पालन करतेतुए; अर्थात् विधिपूर्वक भागवतधर्म का प्रचारकरते हुए ४५ सदा नन्दादयस्तन विमा भागवतोत्तमाः । आजम्मुरुत्सुका हृष्टास्तुष्टुवुः स्वगुरुं प्रभुम्॥४६॥ निस्वग्राम में श्रीनिम्बार्कभगवान् के समीप श्रीनन्दादिका गोप,तथा प्रधान प्रधान भगवद्भक्तजन परमोत्साहित होकर नित्यही आते और अत्यन्त प्रसन्न होकर वे सब अपने गुरू और प्रभु श्रीनिम्बार्क भगवान् की स्तुति किया करते थे ॥ ४६ ॥ परमपुरुषमाद्यं सच्चिदानन्दरूपं, चिदचिदखिलविश्वंभासया भासयन्तम्। विधिशिवसुरराजैर्वन्दितांघ्रि शिरोभिः, • शरणमुपगतोऽहं माधवं गोपवेषम्।।४॥ ( उनकी स्तुति,अर्थात् स्तोत्र निम्नलिखित है) परमपुरुष, सबके सादि,सच्चिदानन्दस्वरूप,चित् (जीव) और अचित (माया) मय सम्पूर्ण विश्व को अपने तेज से प्रकाशित करनेवाले, ब्रह्मा, शिव और इन्द्र के मस्तकों से वन्दित:चरण-कमल,गोपवेषधारी, (१२) २० to वैष्णवसर्वस्व । masomeoseute , श्रीमाधवभगवान के शरण में हम प्राप्त होते हैं ॥७॥ जगदमयदमूर्त्तिवैदपद्मप्रकाशी, सदभितगुणसिंधुहे यशून्यः परेशः । परमपदविहारः सुन्दरो रुक्मवर्णी, मम हृदयनिवासं निम्बभानुः करोतु॥४॥ जगत् को अभय देनेवाले स्वरूप, वेदरूपी पद्म के प्रकाशक, अमित सद्गुणों के समुद्र, हेयगुणों से रहित, परेश, श्रीभगवान् के चरणारबिन्द में बिहार करनेवाले, सुन्दर, श्यामस्वरूप, श्रीनिव्याभगवान् हमारे हृदय में निवास करें ॥४८॥ नलिनरुचिरपादः कृष्णपादाब्जचित्तः, परमकरुणमूर्तिब्रहारुद्रादिरोव्यः । ब्रजपतिकरगस्तद्वाममार्गानुदर्शी, मम हृदयनिवासं निम्बभानुः करोतु ॥४॥ कमल के समान सुन्दर चरणवाले, श्रीकृष्ण के चरणारविन्द में चित्त लगानेवाले, परम कारुणिक, ब्रह्मा, महादेव श्रादि देवताओं से सेव्य, श्रीहरि के कर कमल में विराजमान, अर्थात् सुदर्शनचक्र, और श्रीभगवद्धाम को मात करानेवाले श्रीनिम्यार्कभगवान् हमारे हृदय में निवास करें॥४८॥ परभजनलतानां पोषकश्चन्द्रशीलः, स्वमतपरमबोधी तत्वदीपप्रकाशी। परमतगिरिबन काम्यकर्माहिताक्ष्यों, - श्रीओचार्यचरित। ८१ -~~ मम हृदयनिवासं निम्बभानुकरोतु॥५०॥ श्रीकृष्ण की भजनरूपिणी लता को चन्द्रमा के समान पोषण करनेवाले,श्रीभगवान के श्रेष्ठ सिद्धान्तों को समझानेवाले, तत्त्वरूपी दीप के प्रकाशक, पर मत रूपी पर्वत के लिये बज्र के समान, समान, काम्य- कर्म रूपी सर्प के लिये गरुड़ के समान, श्रीनिम्बार्क- भगवान् हमारे हृदय में निवास करें ॥ ५० ॥ मुनिवरहितकारी नैमिषारण्ययासी, मुनिवरकृतबोधः श्रीनिवासोपदेश। भवरुजहरणे योनिम्बतुल्यः स देवो, मम हृदयनिवासं निबनगनुः करोतु॥५१॥ मुनिधर अर्शटर वेदव्यास (ह्मसूत्र के व्याख्यान करने के कारण ) के हितकारी, नैमिषा- रण्य के ऋषियों पर कृपा करके वहां पर कुछ काल तक निवास करनेवाले, मुनिवर अर्थात् श्रीनारदजी ने जिनको बोध कराया अर्थात् दिव्यज्ञान प्रदान किया,श्रीमोनिवामाचार्य के उपदेष्टा,भयरूपी रोग के हरण करने के लिये जो निम्ब के तुल्य हैं, वे देव श्रीनिम्बार्कभगवान् हमारे हृदय में निवास करे ॥५१॥ भवजलधिनिमग्नं जीवजात रिमीक्ष", धृतगुरुवरमूर्तिः : शास्वत अतन्वन। सुरजरमुनिवृन्दैः स्तूयमानांघ्रिपद्मो, मम हृदयनिबासं निम्बभानुः करोतु २ .

दर
वैष्णसर्वस्व ।
Armeroennetsamanamasomeone
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भवसागर में डूबे हुए समस्त जीवधारियों को
देखकर शान के तत्त्व को विस्तार करने के लिये
गुरुघर मूर्ति को जिन्होंने धारण किया और जिनके
चरणारविन्दों की स्तुति सुर, नर और मुनियों के
समूह किया करते हैं, वे श्रीनिम्बार्कभगवान् हमारे
हृदय में निवास करें ॥५२॥
जगति निगमपमं फुल्लयन् भानुरूपः,
कुमतितिमिरजालं नाशयन्वीयदीप्त्या।
खपदनलिनभृङ्गान् हर्षयन् ज्ञानगन्धै-
मम दयनिवासं निम्बभानुः करोतु ॥५३॥
संसार में वेदरूपी कमल के उत्फुल्ल करने के लिये
भूर्य के समान,तथा अपने तेज से कुमतिरूपी अन्धकार
के विनाशकर्ता, निजचरणकमल के मधुकरों अर्थात्
भगवद्भक्तों को ज्ञानरूपी मुगन्धि से हर्षित करनेवाले
श्रीनिम्बार्कभगवान् हमारे हृदय में निवास करें ॥५३॥
सदसदखिलविश्वं जायते यत्परस्मात् ,
परमितगुपायुक्तं नामरूपैर्विभक्तम् ।
विटपिन इव वीजाबामरूपादिभाजी,
मम हृदयनिवासं निम्बभानुः करोतु॥५४॥
जिस नामरूपादिभाजी परतत्त्व से .परमित-
गुणों से युक्त और नाम रूप आदि से विभक्त यह
संपूर्ण सद् और असद् विश्व-बीज से वृक्ष के समान-
उत्पन्न होता है,वह श्रीनिम्बार्कभगवान् हमारे हृदय
निवास करें ॥ ५४॥

श्रीनाचार्यचरित। ६३ , vượt qua चिदचिदखिलविश्वं स्वात्मकं पाति विष्णु- निखिल्लचिदचिदीशः सूर्यकोटिप्रकाशः । प्रकृतिपुरुषभिन्नाभिन्नरूपः स्वभावान् , मम हृदयनिवासं निम्बभानुः करोतु ॥५५॥ स्वभाव ही से प्रकृति और पुरुष से भिन्नाभिन्न रूष, कडोरों सूर्यों के समान प्रकाशमान, जो ईस विष्णु अखिल स्वात्मक चिद् अचिद् विश्व का पालन करते हैं,वे श्रीनिम्बार्कभगवान् हमारे हृदय में निवास करें ॥ ५५ ॥ त्वयि परमस्वरूपे शास्त्रयोनौ ह्यनन्ते, . सरित इव समुद्रे नामरूपैर्विहीनाः । मधुनि रस इवास्तौं याति विश्वसदादी, मम हृदयनियासं निम्बभानुः करोतु॥५६॥ आदि में सदैव, अर्थात् प्रतिकल्प में, जिन अनन्त, शास्त्रयोनि और परस स्वरूप प्राप में मधु में रस के समान तथा समुद्र में नदियों के समान- नामरूपविहीन यह समस्त विश्व अस्त रहता अर्थात् छिपा रहता है, वे श्रीनिम्बार्कभगवान् हमारे हृदय में निवास करें॥ ५६ ॥ परमपुरुषविष्णोनिम्बभानोः कृपालोः, कृतमिदमतिगुह्यं स्तोत्ररूपं रहस्यम् । हरिगुरुचरणाब्जध्यानतत्त्वप्रकाशी, मम हृदयनिवासं निम्बभानुः करोतु 30 ट वैष्णवसर्वस्व । 4WW परमपुरुष,साक्षात् श्रीविष्णु, कृपालुश्रीनिम्बार्क भगवान का यह प्रतिगुह्य स्तोत्र रूप रहस्य महानुभावों के द्वारा किया गया है। अतएव श्रीहरि औरगुरुदेव के चरणारविन्द के ध्यान तत्त्व के प्रकाशक श्रीनिम्बार्कभगवान् हमारे हृदय में निवासकरें ॥७॥ संसाररोगशमने खलु निम्बवद्यो, हान्धिकारहरणेऽर्कवदेवयश्च । श्रीकृष्णपादपरिचारणतुष्टचेता, निम्बार्कदेशिकवरःस हि मे गतिःस्यात्५८ संसाररूपी रोग के दूर करने में जो निश्चय ही निम्ब के तुल्य हैं और हृदय के अन्धकार के दूर करने में जो सूर्य के समान हैं,वे श्रीकृष्ण की चरणपरिचर्या से सन्तुष्ट श्रीनिम्बार्काचार्यवर्य ही हमारी गति अर्थात् प्राधार हैं ॥५॥ इति स्तुत्वा स्तवैर्दिव्यैःश्रीनिम्बार्क मुनीश्वरम्। सदा नन्दोदयः सर्वे प्रणेमुर्जातकौतुकाः ॥५॥ इस प्रकार सदैव कौतुकयुक्त सम्पूर्ण श्रीनन्दादिक गोप और प्रधान प्रधान भगवद्भक्त विमजन दिव्य स्तोत्रों से श्रीनिम्बार्कमुनीवर की स्तुति करके उन्हें प्रणाम किया करते थे॥ १८॥ इत्येवं श्रीभदाचार्यश्रीनिम्बार्को महामुनिः। विजित्य च दिशः सर्वास्त्रि: परिक्रम्य भारतम् ६० धर्मं भागवतं स्थाप्य देशे देशे जने जने ।

श्रीप्राचार्यचरित।
८५
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ब्रह्मसूत्रस्य व्याख्यानं कृत्वासाङ्गसुन्दरम् ६१
निम्बगामे स्थितो नित्यं हरिध्यानपरायणः ।
चकार चाप्रमेयात्मा तपः परमदुदेकरम् ॥६२॥
इस प्रकार अप्रमेयात्मा, हरिध्यान परायण,
महामुनि, श्रीमदाचार्यवर्य श्रीनिम्बार्कभगवान् सम
दिशाओं को जीत और भारतवर्ष की तीन परिक्रमा
कर, तथा प्रत्येक देश और प्रत्येक मनुष्य के हृदय
में सनातन भागवत धर्म का स्थापन कर, एवं
ब्रह्मसूत्र का सर्वाङ्गसुन्दर व्याख्यान करके,निम्बग्राम
में नित्य ही स्थित रहकर परमदुष्कर तप को करते
हुए ॥ १०॥ ६१ ॥ ६२॥
मंगलं श्रीरमाकान्तः सच्चिदानन्दविग्रहः ।
मंगलं नियमानन्दो ज्ञानभक्ति प्रदोनृणाम् ६३
सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीरमाकान्त मङ्गल करें
और मनुष्यों को ज्ञान तथा भक्ति के देने वाले
श्रीनियमानन्द अर्थात् श्रीनिम्बार्कभगवान् भङ्गल
करें॥ ६ ॥
इत्याचार्यचरित्रस्य विश्रामे ह्यष्टमे मया।
निगमानन्ददेवस्य महिमा ह्यनुवर्णिता॥६४॥
इस प्रकार श्रीआचार्य चरित के आठवें विश्राम
में हमने श्रीनियमानन्ददेव अर्थात् श्रीनिम्बार्क
भगवान् की महिमा का वर्णन किया ॥६॥
इति श्रीमदाचार्यचरितस्याष्टमो विश्राम समाप्तः ॥८॥

८६
वैष्णवसर्वस्व।
~
णाय नमः।
श्रीश्रीकृष्ण
हरिकरकृतवासं श्वेतकुन्देन्दुभास,
निखिलजननिर्वास वेदपद्मप्रकाशम् ।
जगदमयदपादं सत्यका विवादं,
कृतमुनिवररूपं भक्तभूपं प्रपद्ये ॥१॥
श्रीहरि के हस्तकमल में निवास करनेवाले,श्वेतं
कुन्द और चन्द्र के समान गौर वर्ण, सम्पूर्ण जीवों के
निवासस्थान, वेदरूपी पद्म के प्रकाशक, समस्त
संसार को अभय देने में समर्थ,सत्यकार्यों में निश्चित
मति,मुनिवर रूप तथा भक्तवृन्दों के भूप श्रीश्रीनि-
वासाचार्यवर्य के शरण में हम प्राप्त होते हैं ॥१॥
श्रीनिम्बार्ककुलाम्भोधावासीद्रत्नशिरोमणिः ।
वासुदेवांशसंभूतः प्राञ्चजन्यो वरप्रदः ॥२॥
माघशुक्लस्य पञ्चम्यां नक्षत्राणां शुभोदये।
सुदर्शनाश्रमे क्षेत्रे प्रादुर्भूतो दिनोदये ॥ ३ ॥
श्रीनिम्बार्क कुलरूपी सागर में उत्पन्न रत्न-
शिरोमणि, श्रीवासुदेवभगवान् के अंश से जायमान,
श्रीपाञ्चजन्यावतार, घरदाता, भाष्यकार भगवान्
श्रीश्रीनिवासाचार्य माघ शुक्ला पञ्चमी के दिन, शुभ
नक्षत्रों के उदय में श्रीसुदर्शनाश्रम (श्रीनिम्बग्राम)क्षेत्र
में प्रातःकाल के समय प्रकट होते हुए ॥२॥३॥
द्विजत्याधिगतः सोऽपि सन्यस्य गृहसम्पदः।
दिग्जयाय मतिं चक्रे खनाथं हृदि चिन्तयन्॥४॥

श्रीनाचार्यचरित। ८० permanand v वे अर्थात् श्रीश्रीनिवासाचार्य द्विजस्व अर्यात् द्विजाति-संस्कार को प्राप्त हो और गृह की सम्पत्तियों को त्याग करके निज नाय श्रीनिम्बार्कभगवान् को हृदय में चिन्तन करते करते दिग्विजय की इच्छा करते हुए ॥४॥ शैवान्पाशुपतान्शाक्तानास्तिकान्यौटुसंशयान् विजित्य मथुरामेत्य निम्बग्रोममुपाविशत् ॥५॥ इस प्रकार के दिग्विजय को पधार और शैव, पाशुपत, शाक्त, नास्तिक तथा मौद्ध आदिकों को जीत कर मयुरा को लौट आए और वहांसे फिर निम्बग्राम में लौट गए ॥५॥ गुरु सुश्रूषयामास श्रीनिम्बार्क महामुनिम्। तस्य सेवारतोनित्यं भक्त्याऽविचलया स्वया वे निम्बग्राम में लौट के आकर निजगुरु श्रीनिम्बार्कमहामुनि की सुश्रूषा करने लगे। वे अपनी अविचल भक्ति से बराबर निजगुरुदेव की सेवा में तत्पर हुए ॥ ६ ॥ अथास्य च पितुर्वन्धं चरितं परमागुतम् । ब्रवीमि प्रथमं पश्चाद्वक्ष्ये पुत्रस्य तस्य च ॥७॥ अब इन (श्रीनिवासाचार्य) के पिता का परमा- और बन्दनीय चरित पहिले कहते हैं। इसके पश्चात् उनके पुत्र अर्थात् श्रीनिवासाचार्य का चरित कहेंगे ॥७॥ ।

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वैष्णवसर्वस्व ।
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आसीत्कश्चित्पुरा विद्वान् स्मार्त्तधर्मरतः सदा।
नानाशास्त्रपुराणज्ञो तर्कशास्त्रविचक्षणः॥८॥
पूर्वकाल में, सदा स्मार्तधर्म में रत एक विद्वान्
होते हुए; जो अनेक पुराणों के जाननेवाले और
तर्क शास्त्र के अच्छे ज्ञाता थे ॥८॥
आचार्यपाद इत्याख्याख्यातश्च भुवि सर्वतः।
कृत्वा दिग्विजयं सोऽपिनिम्बगाममुपागतः
वे संसार में सर्वत्र "आचार्यपाद" इस नामसे
विख्यात थे। दैवसंयोग से एक समय दिग्विजय करते
हुए वे निम्बग्राम में पाए ॥८॥
शिष्यैरसंख्यैः सहितो गुन्थयानशतैर्वृतः ।
आगत्वोवाच निम्बार्क तपश्चर्यापरायणम् १०
उस समय उन (प्राचार्यपाद) के साथ असंख्य
शिष्य और सैंकड़ों गाड़ी भरे ग्रन्थरत्न थे सो वे
नाशम में आकर तपस्या में रत श्रौनिम्बार्कभगवान्
से यों बोले ॥ १० ॥
सस्त्रीकोऽहं मुने प्राप्तश्चाश्रमे तेऽतिथिः प्रभो!
आज्ञां देहि निवासार्थ श्वो गमिष्यामि कुत्रचित्
हे प्रभो ! हेमुने ! हम निज भार्या के सहित
अतिथि रूप से श्राप के आश्रम में आपहुंचे हैं इसलिये
हमें आप आज इस माश्रम में निवास करने की
आज्ञा दीजिए । प्रातःकाल हम यहांसे कहीं चले
जायंगे ॥ १२॥

श्रीनाचार्यचरित। မင် VVVVVVVVVV अन्तर्वत्नी च मे पत्नी रात्रिरेषा समागता। इदानीं क्व गमिष्यामि तस्मात्स्थानं दद प्रभो१२ हमारी पत्नी गर्भवती है और यह रात्रि का समय हो आया, ऐसी अवस्था में इस समय हम कहां जाय; अतएव हे प्रभो ! रात्रिभर निवास करने के लिये हमें स्थान प्रदान कीजिए ॥ १२ ॥ इति श्रुत्वातिथेाक्यमोमित्युक्त्वाब्रवीत्प्रभुः। तिष्ठातिथ्यं गृहाणाशु सानुगस्त्वं मदर्पितम् १३ इस प्रकार अतिथि के बचन को सुनकर प्रभु श्रीनिम्बार्क ने "अच्छा"कहकर फिर यों कहा-अच्छा, तुम यहां निवास करो और हमारे दिए हुए प्रातिथ्य को अति शीघ्र अपने अनुचरों के साथ ग्रहण करो॥१३॥ इतिश्रुत्वा मुनेर्वाक्यं श्रीनिम्बार्कस्य धीमतः । स उवाचातिथिर्विद्वान् पश्य पश्याधुना मुने १४ सायंकालोऽयमस्माकं भोज्यानहक्षणं सभी ! प्रातःकाले ग्रहीष्यामि चातिथ्यं तव सुनत १५ इस प्रकार धीमान् श्रीनिम्बार्कमहामुनि के वचन को सुनकर उस विद्वान् अतिथि ने यों कहा, हेमुने ! देखिए,देखिए,-हेप्रभो! यह सायंकाल का समय है, अतएव यह समय हमलोगों के भोजन के लिये वर्जित । अतएव हे सुव्रत ! हम आज इस समय आपके आथिथ्य को ग्रहण न करेंगे; हां प्रातःकाल आपके आतिथ्य को अवश्यमेव ग्रहण करेंगे ॥ १४ ॥ १५ ॥ .

१०० वैष्णवसर्वस्व । Vvvv इति श्रुत्वातिथेर्वाक्यं प्रहस्य च महाप्रभुः । तमुवाच महातेजा वास्तं यातोऽधुना रविः१६ इस प्रकार अतिथि के वचनों को सुन कर महातेजा एवं महाप्रभु श्रीनिम्बार्कभगवान् ने हँस कर सन्न अतिथि से यों कहा,-"अभी सूर्य कहां अस्त हैं ?" ॥ १६ ॥ श्रुत्वा मुनिवचो विद्वान् दृष्ट्वा निम्बे तथा रविम् महाश्चर्य महाश्चर्यमित्युक्त्वा विरराम ह १७ महामुनि श्रीनिम्बार्कदेव के ऐसे बचन को सुन तथा निम्बवृक्ष के उपर सूर्य को देखकर वह विद्वान् अतिथि,-"महा प्राश्चर्य !! महा आश्चर्य !!!" यों कहकर चुप होगर ॥ १७ ॥ निम्बक्षोणीरुहे दृष्टा भास्वंतं चातिथिस्तदा । निम्बार्कण समानीतं स्वादु भैक्ष्यं बुभोज सः१८ फिर तो उस अतिथि ने निम्बवृक्ष के ऊपर सूर्य को देखकर श्रीनिम्बार्क भगवान् के दिए हुए सुस्वादु भोजन को अपने अनुचरों के सहित ग्रहण किया, अर्थात् भोजन किया ॥ १८ ॥ मोजनांते निशायां च घटिका वै यदा गता। तदाश्चर्यमयं ज्ञात्वा तुष्टाव च सुदर्शनम् १९ भोजन कर चुकने पर जब निम्बवृक्ष पर से सूर्यदेवता अन्तर्धान होगर,तब उस अतिथि ने यह बात भली भांति जान ली कि घड़ी भर रात्रि

श्रीआचार्यचरित।
१०१
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व्यतीत होचुकी है ! इस आश्चर्यमय दृश्य को देख
कर तथा श्रीमदाचार्य वर्य की महिमा के तत्त्व को
दिव्य दृष्टि से देख कर वह श्रीसुदर्शनभगवान् की
निम्नलिखित प्रकार से स्तुति करने लगे ॥ १८ ॥
जयतामिगितज्ञाता नियमानन्द आत्मवान् ।
नियमेन वशे कुर्वन्भगवन्मार्गदर्शकः ॥ २० ॥
इङ्गित के जानने वाले, आत्मवान् श्रीनियमा-
नन्दभगवान् (प्राप) जय को प्राप्त हों, जो नियम
से जगत् को अपने वश में करके श्रीभगवान के
नित्य मार्ग का दर्शन कराते हैं ॥२०॥
पाषण्डद्रुमखण्डानां दाहकः पावकोत्तमः ।
गर्वपर्वतदम्भोलिः काम्यकर्माहिपक्षिराट् २१
भगवन् ! आप पाषाण्डरूपी वृक्षसमूहों के दहन
करने के लिये उत्तम पावक के समान हैं, एवं गर्व
रूपी पर्वतों के चूर्ण करने के लिये बजू के सदृश हैं,
तथा काम्य कर्मरूपी सपों के लिये गरुड़ के तुल्य
हैं ॥ २१॥
मतवादिगजेन्द्राणां पञ्चाननमहोज्वलः।
कामादिविषयाब्धीनां शोषणे कुम्भसम्भवः २२
आप मतवादी रूप गजेन्द्रने के लिये महा
तेजस्वी सिंह के समान हैं,तथा काम आदि, अर्थात
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मार, अहङ्कार,
दम्भ, छल, पैशून्य आदि हि - को समुद्रों के
सोखने के लिये अगस्त्य ऋषिक समान हैं ॥२२॥

૧૦૨ वैष्णवसर्वस्व । - भक्तोषधिलतानां च पोषणे चन्द्रशीतलः । सम्प्रदायप्रवोधार्थ दीपको धवान्तनाशक: २३ आप भक्तरूपिणी लता के पोषण करने में चन्द्रमा के समान शीतल हैं और साम्प्रदायिक तत्त्वों के जानने के लिये अन्धकार विनाशक दीपक के समान हैं ॥ २३ ॥ संसारकूपमग्नानां करालम्बप्रदायकः । सुशीतलमना नित्यं माधुर्येण विराजते २४ पाप संसाररूपी कूपों में डूबते हुए मनुष्यों के लिये हाथ का सहारा देनेवाले हैं, एवं आप नित्य ही सुमसन्नचित्त हैं और मधुरता से सदैव विराजमान रहते हैं ॥ २४ ॥ सुखदाता भवच्छेत्तातापत्रयविनाशकः । श्रीकृष्णपूजनानन्दी सर्वदा शुद्धवेषवान् २५ श्राप सदैव ही सभी को सुख देने वाले हैं, संसार के दूर कराने वाले हैं,तीन तापों-अर्थात् प्राध्यात्मिक, प्राधिभौतिक और आधिदैविक-इन तीनों तापों के दूर करनेवाले हैं,आप सदा शुद्ध वेश में रहनेवाले हैं और श्रीकृष्ण की पूजा में श्राप परम आनन्दित रहते हैं ॥ २५ ॥ आनन्दात्रुकलापूर्णः प्रेमाब्धिकृतमज्जनः । अहंममेति दौजन्यनाशको बुद्धिदः सताम् २६ माप प्रानन्दाश्रुकला से सदा परिपूर्ण रहते हैं श्रीनाचार्यचरित । १०३ ~~~~~~~~ NAVRAN~- और भगवत्मेमरूपी सागर में स्नान करते रहते हैं। आप "हमारा-तुम्हारा"इस निकृष्ट भावना के नाश करनेवाले हैं तथा सज्जनों को निर्मल बुद्धि देने वाले हैं ॥ २६ ॥ निर्जितस्वास्थलावण्यपूर्णचन्द्रोऽनुवर्त्तिनाम् । नितरां शाठाहंता च धाता सर्वभयापहः २७ आपने अपने सुन्दर मुखारविन्द की प्रभा से पूर्ण चन्द्र की सुन्दरता को जीत लिया है और श्राप अपने अनुचरों की शठता को हरण करके सदैव उनका पालन करते तथा उनके समस्त भयोंको दूर करते रहते हैं ॥ २७ ॥ अमानी मानदो मान्यो भावुको भावधारक सर्वसंशयभेत्ता च सर्वागमविशारदः ॥ ८ ॥ आप स्वयं अमानी हैं, किन्तु औरों को मान देते हैं। आप मान्य हैं,आप भावुक हैं,आप भाव के धारण करनेवाले हैं, आप सब संशयों के छेदन करने वाले हैं और आप समस्त प्रागों के, विशारद हैं ॥ २८॥ कालकर्मगुणातीतः सर्वदाचारतत्परः । श्रीकृष्णस्य कृपापात्रः प्रेमसंपुटपुष्करलः ॥२६॥ आप काल, कर्म और गुण से परे हैं, आर? सदैव "प्राचार " में, जो प्रधान धर्म है, (१) (१), "आचारः प्रथमो धर्मः " इति भगवद्वाक्यम् ।

१०४
वैष्णवसर्धस्व।
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~
तत्पर रहते हैं, आप श्रीकृष्ण के पूर्ण कृपापात्र हैं
और आप प्रेमरूपी सम्पुट के पुष्कर हैं ॥२८॥
तारुण्यं वयसा प्राप्तो न विकारमना:क्वचित् ।
ईदरमहिमवान् कोऽपि दृश्यते विरलो भुवि३०
यद्यपि प्राप तरुण अवस्था को प्राप्त होचुके
हैं, तथापि आपके मन में किञ्चन्मान भी विकार.
नहीं है। ऐसी महिमा वाले कोई विरले ही मनुष्य
संसार में दिखलाई देते हैं। अर्थात् साम्प्रत काल
में आपके भमान अन्य कोई जन भी नहीं है ॥३०॥
किं दुरापादनं तेषां विष्णुमार्गानुदर्शिनाम् ।
असिद्धमपि सिद्ध स्यात्तत्कृपापाङ्गवीक्षणैः३१
जो भगवदीयजन भगवान् श्रीविष्णु के मार्ग के
अनुगामी हैं, उनके लिये ऐसा होना कोई आश्चर्य की
बात नहीं है। क्योंकि श्रीभगवान् के कृपाकटाक्ष से ही
भावज्जनों के प्रसिद्ध कर्म भी सिद्ध होजाते हैं ॥३१॥
स्तन दुराचारः कृष्णचर्यापरिग्रहः ।
भावनाशुद्धसर्वस्वः पक्षपातविवर्जितः॥ ३२ ॥
आप समस्त दुराचारों से दूर हैं, श्रीकृष्ण की सेवा
ही आपका काम है, उत्तमभावना से आपका सभी
कुछ शुद्ध होगया है, प्रतएव
पाप पक्षपात से
रहित हैं ॥ ३२ ॥
सत्यवाक् सत्यसङ्कल्पः कृतसिद्धान्तनिर्णयः ।
वृद्धसेवी वृद्धिकर्ता भर्ता सर्वस्य पालकः ॥३३॥

श्रीप्राचार्यचरित। १०५ w आप सत्यवादी हैं, सत्यसंकल्प हैं, सिद्धान्त का निर्णय कर चुके हैं,वृद्धसेवी हैं,वृद्धि के कर्ता हैं तथा सभों के पालनपोषण करनेवाले हैं ॥ ३३॥ मंदानां शाठानिवृत्या सर्वसौभाग्यदायकः । आचारवैरिणां हंता कार्यसिद्धिप्रदायकः ॥३०॥ आप अभागे जनों की शठता को दूर करके उन्हें समस्त सौभाग्यों के देनेवाले हैं, प्राचार के वैरियों के हनन करने वाले हैं, और कार्यों में सिद्धि के दाता हैं ॥ ३४ ॥ आचोरभ्रष्टजीवानां शनैर्युक्त्या प्रबोधकः । भगवन्मार्गशुद्ध्या च कृतार्थीकृतभूतलः॥३५॥ हमने जो अभी यह कहा कि,--"आप आचार के वैरियों के हनन करनेवाले हैं; यह अभिप्राय नहीं है कि आप उनका बध करते हैं, -बरन उन प्राचारमष्ट जीवों को अपनी युक्तियों से धीरे धीरे प्रबोध कराकर उन्हें सन्मार्ग में लाते हैं और इसी श्रीभगवान के सत्यमार्ग की शुद्धि के बल से आपने भूमण्डल को कृतकृत्य कर दिया है ॥ ३५ ॥ हतोऽयं मानुषो लोको यदाचार्यस्वरूपिणि । विभावसी वर्तमाने जायशीतेन पीडझते ३६ यदि आचार्यस्वरूपमापके वर्तमान रहते संसारी जीव अपने को कृतार्य न कर सकें तो यह कहना पड़ेगा कि सचमुच यह लोक (मनुष्यलोक) रसातल इस कथन का ॥ (१४) न०

Jamiend
काल से
१०६
वैष्णवसर्वस्व ।
को गया! क्योंकि यह बड़ेही आश्चर्य और परिताप
की बात है कि सूर्य के रहते भी कोई जाड़े पाले
की पीड़ा को सहता रहे ! ॥३६॥
वाक्यं सत्यं च शृणुत त्यक्त्या तर्कवितर्कताम्
आचाचं शरणं यात लौनिस्तारहेतवे ॥३७॥
इस प्रकार श्रीनिम्बार्क भगवान की इतनी
स्तुति करके उन प्राचार्यपाद नामक विद्वान ने
अपने अनुचरों की ओर देखकर उनसे यों कहा,
सु सब हमारी इस सच्ची बात को सुनो,-वह यह
कि अब समस्त तर्कवितों को छोड़कर इस कलि-
छुटकारा पाने के लिये इन श्रीमदाचार्यवर्य
के शरण में मानो।।३७ ।।
भक्तानुग्रहकर्ता च सर्वोत्यप्रदः शुभः ।
बालबोधी कृपादृष्टया प्रवृत्तिरहितः परः ॥३॥
ये प्राचार्य महाप्रभु भक्तों पर अनुग्रह करनेवाले
और समस्त सुखों के देनेवाले हैं। ये परम श्रेष्ठ
तथा प्रवृत्तिकों से रहित हैं, एवं निज कृपादृष्टि से
अजजनों को भलीभांति ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं ॥३८॥
आकारो भक्तिमार्गस्थ वेदरत्नसमन्वितः।
अनन्तपादभक्तिश्च लभ्यतेऽत्र समाहितः ३६
ये प्राचार्यवर्य बेदरत्न के सहित भक्तिमार्ग के
स्वरूप ही हैं । अतएव इनके शरण में जो भावेंगे,
वे श्रीभगवान की भक्ति को अवश्यमेव पावेंगे ॥३८॥

श्रीप्राचार्यचरित।
१०७
स्वार्थहीनः परार्थश्च महोदारदयानिधिः ।
यौवनैश्वर्यसामग्री येन विष्मी स्वेिदिता
ये भाचार्यवर्य स्वार्थरहित हैं और परमार्थ
से युक्त हैं। ये महा उदार और दया के समूह हैं ।
इन्होंने अपनी सम्पूर्ण यौवनैश्वर्य-मामगी श्रीकृष्ण
के चरणारविन्द में अर्पित करदी है॥ ४० ॥
अस्य दर्शनमात्रेण गर्यो मे विगतो महान्।
प्राप्तोऽहं शरणं चास्य जाता बुद्धिस्तु निर्मला ४१
इनके दर्शनमात्र से हमारा महान गर्व दूर हो
गया, हमारी बुद्धि निर्मल होगई और हम इनके
शरण में प्राप्त हुए हैं ॥ १ ॥
युष्माभिः सहितरचाहमीवास्य जगद्गुरो।
ब्रजामि शरणं देवं प्रभुं निम्बार्कमीश्वरम ४२
अतः तुमलोगों के साथ हम भाजही इन जगद्
गुरु, प्रभु, ईश्वर, श्रीमन्निम्बार्कदेव के शरण में प्राप्त
होते हैं ॥४॥
अस्माकमयमाचार्यों भक्त्या पूज्यश्च सर्वदा।
स्वप्नेऽपि नावमन्तव्यो गुरुरेव स्वयं हरिः॥४॥
आज ये श्रीनिम्बार्कदेव हमलोगों के प्राचार्य
हुए, अतएव आज से हमलोगों को चाहिए कि
सदैव भक्तिपूर्वक इनकी परिचर्या किया करें।
इनका कभी स्वप्न में भी अपमान न करना चाहिए,
क्योंकि गुरु साक्षात् परमेश्वर ही है ॥ ४३ ॥

१०८ वैष्णवसर्वस्व । VVV, Vy Numnhvve आचार्यों विष्णुरूपो हि पुराणेष्वितिनियः । निग्रहानुगृहाभ्यां च श्रीकृष्णेन समानता ४४ आचार्य साक्षात् विष्णुस्वरूप है, ऐसा पुराणों में निश्चय किया गया है। अतएव निग्रह और अनुग्रह में प्राचार्य श्रीकृष्ण के समान ही है॥४४॥ हरौ रुष्टे गुरुस्खाता गुरौ रुष्टे न कश्चन । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन प्रसाद्यः सर्वदेहिनाम् ॥४॥ कहीं कहीं गुरुदेव भगवान् से बढ़कर हैं, ऐसा भी जानो। जैसे कि यदि किसीसे हरिभगवान् रुष्ट होजाय तो उसका परित्राण गुरुदेव कर देते हैं, किन्तु यदि गुरुदेव किसी पर रुष्ट होजाय तो उस व्यक्ति की रक्षा जगदीश्वर भी नहीं कर सकते । इसलिए सब मनुष्यों को चाहिए कि सब भांति से श्रीगुरुदेव को प्रसन्न रक्खें ॥४५॥ आचार्य मानुषी बुद्धिर्न कर्त्तव्या कदाचन । मानुषैः श्रेय इच्छद्विर्यतः स्थानं हि श्रेयसाम४६ अपने कल्याण के चाहनेवालों की प्राचार्य में मानुषी बुद्धि कदापि नहीं करनी चाहिए, क्यों कि श्रीनाचार्य ही सम्पूर्ण कल्याण गुणोंके आकर हैं ॥४६॥ यस्मिन्नहनि यौव करोति कृपयात्मसात् । तीव सर्वसिद्धिस्यान कांक्षा तिथिवारयोः ४७ जिसदिन, जभी श्रीगुरुदेव कृपापूर्वक अपना तिसी दिन, तभी सर्वसिद्धि दायक योग समझना श्रीआचार्यचरित। १०८ चाहिए, और तिथि, वार, अर्थात् पञ्चाङ्गघुद्धि का विचार नहीं करना चाहिए ।। ४७ ।। पञसंस्कारदायी च तथोद्धर्ता भवार्णवात् । तस्य प्रत्युपकाराही न कोऽपि जगतीतले ४८ जो गुरुदेव पञ्जसंस्कार के देनेवाले तथा संसारसागर से उद्धार करनेवाले हैं, उनके इस उपकार का प्रत्युपकार करनेवाला संसार में कोई भी नहीं है॥४८॥ भगवन् कामग्रस्तोऽहमविद्याग्रंथिपीडितः । मामुद्धर जगन्नाथ चिरकालस्य दुःखिनम् ॥४॥ आचार्यपाद अपने अनुगामियों से थों कहकर पुनः श्रीनिम्बार्कभगवान् से कहने लगे-हेभगवन् ! हम कामगुस्त तथा अविद्यारूपिणी गन्थि से ग्रथित हैं । अतएव हेजगन्नाथ ! हम चिरकाल के दुःखी हैं, इसलिये आप मेरा उद्धार कीजिए ॥४८॥ किंकरोमिक्कगच्छामि त्वत्तोऽन्य न हि दैवतम् सबै स्वार्थपरिमष्टा दृश्यन्ते जगतीतले ॥३०॥ अब हम क्या करें,या कहांजाय ? क्योंकि आपके अतिरिक्त हमारा कोई दैव अर्थात् भाग्यविधाता नहीं है; कारण यह कि हम जिधर देखते हैं, ही संसार में सभी जन अपने स्वार्थ में फंसे ही दिखलाई देते हैं ॥ ५० ॥ अनन्यशरणत्राता रक्षणे रक्षको मतः । उधर mammeend v ११० वैष्णवसर्वस्व संसाराम्बुधिमग्नानामुद्धर्तासि नृणां प्रभो ५१ हे प्रभो! आप अनन्यधरणों के शरण और उनके रक्षक प्रख्यात हैं, क्योंकि आप संसारसागर में डूबे हुए मनुष्यों के उद्धार करनेवाले हैं ॥ ११ ॥ अहं नाथ निमग्नोऽस्मि घोरेऽस्मिन्भववारिधी निरयनशसंत्रस्त आगतोऽस्मि तवान्तिके ५२ इसलिये हेनाय ! हमभी इस भयानक संसार समुद्र में डूब रहे और नरक के दुःख से संत्रस्त होरते हैं,इसीसे आपके शरण में प्राकर प्राप्त हुए हैं। ५२॥ यथा नाश्नामि देवेश गर्भसंभववेदनाम् । तथा साधय मां नाथ पाहि पाहि कृपानिधेः५३ हे देवेश ! जिसमें हम अब पुनः गर्भवास की पीड़ा को न पावें,वैसा प्रयत्न कीजिए ! हेकृपानिधे ! हेनाथ ! हमारी रक्षा कीजिए, हमें बचाइए ॥ ५३ ॥ विध्यविधीनजानामि न जानामि त्वदर्चनम् । स्वीयानुग्रहभावेन मनःकामं प्रपूरय ॥ ५४ ॥ हेभगवन् ! हम विधि और निषेध को नहीं जानते और आपकी सेवा करनी भी नहीं जानते इसलिये आप अपने अनुग्रह से हमारी मनोकामना पूरी कीजिए ॥ ५४॥ नियमाचारहीनोऽहं कामुको लोभलंपटः । दासोऽयमिति मां ज्ञात्वा कृपयस्व महामुने ५५ हेमहामुने ! हम नियम और भाचार से हीन ११२ वैष्णव सर्वस्व । NvMAM द्वंद्वातीतस्वभावश्च कार्पण्यहरणोत्सुकः ॥६॥ हे गम्भीरमति ! हेगोस्वामिन् ! आप निज शरणागतों के सुखदाता हैं, आपका स्वभाष द्वंद्व- भावों अर्थात् सुखदुःख आदि के भावों से रहित है और निजदाशों के कार्पण्यभाव के दूर करने में सदैव उत्सुक रहते हैं ॥ ५॥ वेदाध्ययनविख्यातः परमार्थपरायणः । श्रीकृष्णप्रियदासश्च श्रीकृष्णे कृतमानसः ६० आप विख्यात वेदाध्ययनशील हैं,आप परमार्थ परायण हैं, आप श्रीकृष्ण के प्रिय सेवक हैं, और श्रीकष्ण में ही प्रापका मन लगा रहता है।६०॥ वैष्णवैः नाघनीयश्च वैष्णवानां प्रियङ्करः । वैष्णवप्रियसर्वार्थी वैष्णवेक परायणः ॥ ६१॥ आप वैष्णवों में परमश्लाघनीय हैं और वैष्णवों के हित करनेवाले हैं। आप वैष्णवों के प्यारे सर्वस्व और बैष्णवों के परायण हैं ॥६॥ वैष्णवोद्वगहारी च सदा वैष्णवदुःखहा। शोभायो वैष्णवाकीर्ण उडुराडिवशोभते॥६॥ आप वैष्णवों के उद्वेग के हरण करने वाले हैं, आप सदैव वैष्णवों के दुःख के हरण करने वाले हैं, साप शोभाढ्य हैं, और श्राप वैष्णवों से ऐसे घिरे रहते हैं, जैसे तारागणों से चन्द्रमा ॥ ६२॥ बालोलाल्यस्त्वया स्वामिन् देशकालविमोहितः न जानामि न जानामि कीदृशी महिमा तव ६३ श्रीनाचार्यचरित। ११३ VAAN हे स्वामिन् ! देशकाल से विमोहित हम नितान्त बालक हैं, अतएव आप हमारा पालन करिए। प्रभो! आपकी महिमा कैसी है, इसे हम नहीं जानते, नहीं जानते ॥३॥ लघुस्तवेन भो नाथ भो आचार्यशिरोमणे । दासोऽयमिति मां ज्ञात्वा भक्तिं देहि पदाम्बुजे६४ हेनाथ ! हे प्राचार्यशिरोमणे ! हमारे इस छोटे से स्तोत्र से भाप हमें निजदास जानकर अपने चरण- रबिन्द की भक्ति दीजिए ॥६॥ इति स्तुतः स भगवान् श्रीनिम्बार्को मुनीश्वरः । तं तदा कृपयांचवे शरणागतवत्सलः ॥ ५ ॥ इस प्रकार प्राचार्यपाद विद्वान् से स्तूयमान हो कर भगवान् श्रीनिम्बार्कमहामुनीश्वर ने उनपर बड़ी कृपा की, क्योंकि भाप अतीव शरणागतवत्सल हैं ॥६५॥ उवाच च महातेजाः श्रीनिम्बार्को मुनीश्वरः । दिष्ट्या समागतोऽसित्यंतिष्ठ श्रेयो भविष्यति६६ ग्रीनाचार्य पाद के बचनो को सुनकर मूहा- तेजस्वी श्रीनिम्बार्कमहामुनीश्वर ने उनसे यों कहा कि,-तुम बड़े भाग्य से यहां प्रागए, ठहरो, तुम्हारा कल्याण होगा ॥ ६६ ॥ इतिश्रीमदाचार्य चरितस्य नवमो विश्रामः समाप्तः॥ ३८६ है (२५)न.

वैष्णवनर्वस्व ।
श्रीश्रीकृष्णाय नमः।
इत्युक्त्वा पुनराहैवं, श्रीनिम्बार्कोमहामुनिः ।
आचार्यपादं प्रणतं, शरणागतवत्सलः ॥१॥
सरणागतवत्सल,महामुनि, श्रीनिम्बार्क भगवान्
ने प्रणत आचार्यपाद से यों कह कर फिर इस
प्रकार कहा ॥ १॥
शृणु विद्वन कथां दिव्यां रहस्यग्रथितां शुभां ।
यां ज्ञात्वा त्वं महाभाग मुक्तिभागो भविष्यसि २
हेविद्वन् ! रहस्यमयी, कल्याणकारिणी, दिव्य
कथा को तुम सुनो; हेमहाभाग ! इस कथा के मर्म
को जानकर तुम मुक्ति के अधिकारी होजानोगे २
धन्योऽसि कृतकृत्योऽसि यस्य भार्यदृशी सती।
भविष्यति परं प्रेयो ह्यत्रागमनकारणात् ॥३॥
तुम धन्य हो, तुम कृतकृत्य हो, इसलिये कि
तुम्हारी भार्या ऐसी सती साध्वी पतिव्रता है। यहां
पाने के कारण तुम्हारा परम कल्याण होगा॥ ३ ॥
त्वयोक्तं 'गर्भिणीभार्या' तत्सत्यं द्विजसत्तम ।
तस्या गर्भ परं तेजो वैष्णवं वर्तते
शुभम् ॥४॥
हेद्विजसत्तम् ! तुमने जो यह कहा कि, 'हमारी
भार्या गर्भवती है -यह वार्ता सत्य है। उसके गर्भ में
कल्याणकारक परम वैष्णव तेज वर्तमान है ॥ ४॥
अस्मिन् कलियुगे छोरे बजनाभे प्रशास्तरि।
भविष्यति द्विज क्षिप्रं यो बालोऽगुतविक्रमः॥५॥

श्रीप्राचार्यचरित। - VI धाता पाता विधाता च परित्राता भवार्णवात्। स एवाद्यो महाचार्यों 'भाध्यकारो' भविष्यति ६ हेद्विज ! इस घोर कलिकाल में, जब कि मथुरा के साशनकर्ता श्रीकृष्ण के प्रपौत्र श्रीवजनाभजी हैं, जो अद्भुत बालक शीघ्र ही होने वाला है, वही कलिकाल में श्रीवैष्णवधर्म का आद्याचार्य, ब्रह्मसूत्र का प्रादि भाष्यकार, एवं संसारी जीवों का धाता, पालनकर्ता और विधाता, तथा संसारसागर से पार करनेवाला होगा ॥ ५ ॥ ६ ॥ तं जानीहि महाभाग पाजजन्यावतारकम् । वासुदेवांशसम्भूतं सम्प्रदायप्रवर्तकम् ॥ ७ ॥ हेमहाभाग ! उस बालक को तुम साक्षात् श्रीवासुदेव भगवान् के अंश पाञ्चजन्य ( शङ्ख) का अवतार जानो; वहीं कलिकाल में लुप्त श्रीवैष्णव- सम्प्रदाय का प्रवर्तक होगा॥७॥ त्वं चापि तस्य बालस्य जनकत्वेन सुव्रत । धरिण्यां देवरूपिण्यां नृभिः पूज्यो भविष्यसि हेसुव्रत ! तुम भी उस बालक के पिता होने के कारण देवरूपिणी धरिणी (पृथ्वी ) में मनुष्यों के द्वारा पूजित होगे ॥८॥ इत्युक्त्याचार्यपादाख्यं सानुगं ब्रह्मवित्तमम् । शिष्यं कृत्वा समीपे स्वे वासयामास सः प्रभुः यों कहकर महाप्रभु श्रीनिम्बार्कमहामुनीश्वर ने वैष्णवसर्वस्व । v ब्रह्मविदों में श्रेष्ठ आचार्यपाद नामक बामण को उनके अनुयायियों के सहित अपना शिष्य करके उनको अपने आश्रम में रक्खा ॥ ॥४॥ सोऽपि विद्वान् मुदा युक्तो मुनिपूजापरायणः। न्यवसत्तत्र पूतात्मा सस्त्रीकः सानुगः सुधीः॥१०॥ वह पवित्र हृदय, निर्मलबुद्धि,विद्वान् आचार्य - पाद भी अत्यन्त आनन्दित होकर श्रीनिम्बार्क- भगवान् की सेवा करते हुए, अपनी स्त्री तथा अनुचर- वर्गों के साथ श्रीमहामुनि ( निम्बार्क) के आश्रम (निम्बग्राम) में निवास करते हुए ॥ १० ॥ अथ कालेन चाल्पेन विद्वत्पत्नी महोदया । लोकमातेति विख्याता सर्वशाखविशारदा ॥११॥ दिव्ये सर्वगुणोपेते काले परमशोभने । सुधुवे तनयं दिव्यं पाञ्चजन्यावतारकम् ॥१२॥ अब थोड़े ही दिनों के अनन्तर वह चिर- सौभाग्यवती विद्वत्पत्नी, जो 'लोकमाता' इसनाम से विख्या थी और सर्व शास्त्रों के जाननेवाली यों,-परमशोभन, सर्वगुणसम्पन्न, दिव्य समय में पाञ्चजन्यावतार सुन्दर वालक को प्रसव करती हुई ॥ ११ ॥ १२ ॥ विद्वानात्मज उत्पन्ने जाताड्डादो महामनाः । आहूय देवं निम्बार्कस्नातः शुचिरलंकृतः॥१३॥ कृत्वा स्वस्त्ययनं रम्यं पितृदेवार्चनं तथा ।

श्रीआचार्यचरित। ११७ ने पुत्र चकार विधिवत्सर्व जातकर्मात्मजस्यह ॥१४॥ उदारहृदय, मानन्दंयुक्त, विद्वान् प्राचार्यपाद के उत्पन्न होने पर स्नान कर, पवित्र हो,तथा वस्त्राभरणों से अलंकृत होकर, एवं श्रीनिम्बार्क- मुनीश्वर को बुलाकर रमणीय स्वस्तिवाचनपूर्वक पितरों और देवताओं का यथाविधि पूजन करके अपने पुत्र का विधिपूर्वक जातकर्म संस्कार किया ॥ १३ ॥ १४ ॥ लगा, शुक्लपक्षे यथा चन्द्रः स बालो मुनिवेश्मनि। एधाम्बभूव मेधावी पुष्टाङ्गश्च दिने दिने १५ धह मेधावी बालक महामुनि श्रीनिम्बार्कदेव के आश्रम में पुष्टाङ्ग होता हुआ दिन दिन ऐसे बढ़ने शुक्लपक्ष में प्रतिदिन चन्द्रमाबुष्टाङ्ग होता हुआ बढ़ता रहता है ॥ १५ ॥ पञ्चमेऽब्दे तु सम्प्राप्त बालस्यास्य महामुनिः। यज्ञोपवीतसंस्कारं चकार विधिना शुभम् १६ महामुनि श्रीनिम्बार्क पञ्चम का कल्याणकारी यज्ञोपवीत संस्कार विधिपूर्वक करते हुए ॥१६॥ संस्कारपञ्चकं तस्य विधाय कृपया मुनिः । नारदोद्दिष्टमार्गेण ब्रह्मविद्यामदात्तदा ॥ १० ॥ मुनिवर श्रीनिम्बार्कदेव ने कृपापूर्वक उस बालक का पञ्चसंस्कार करके नारदोपदिष्ट मार्ग से ब्रह्म- विद्या उसे प्रदान की ॥ १७ ॥ वर्ष में उस बालक ११८ वैष्णवसर्वस्व । वैष्णवीं च तथा दत्वा दीक्षां सर्वार्थसाधिनीम् मन्त्रराजं ददौ प्रेम्णा पञ्चसंस्कार(१)पूर्वकम्१८ इसी प्रकार श्रीनिम्बार्कभगवान् ने साधिनी वैष्णवी दीक्षा उस बालक को देकर सर्वार्थ- - (१) तत्र पञ्चकालानुवर्तन नाम । अभिगम्यमुपादन योग: स्वाध्याय एव च । इज्या पञ्चप्रकारार्चा क्रमेण कथिता मया ॥ इति गौतमी. यादभिगमनादिशातव्यम् । तत्राभिगमन नाम स्वदेहकृत्य देवगृह- मार्जनादि-तुलसीपुष्पनैवेद्यादिचयनमुपादान, गन्धादिना देवार्चन- मिज्या, बलप्रदासिद्धान्तज्ञानपूर्वकस्तोत्रादिपाठः स्वाध्यायः । एकागबुद्ध्या देवस्वरूपादिचिन्तन ध्यानमिति धामार्थः। चाङ्गं नामपद्धत्यादि। पद्धति पटलं धर्म स्तवराज चतुर्थकम्। तथा सहस्त्र- नामाख्य पञ्चांगं मंत्रसिद्धये॥ इति तंत्रान्तरे । पञ्चयज्ञो नाम मात्मयज्ञादि । आत्मयशो द्रव्ययज्ञो जपयज्ञस्ततः परम्॥ स्वाध्यायो योगयज्ञश्च पचयक्षाः प्रकीर्तिताः इति । पञ्चायं नाम उपास्य- रूपमित्यादि । पनमाश्रमं नाम ॥ ब्रह्मचारी गृस्थश्च वानप्रस्थ- म्तथा यतिः । चत्वारो पिहिता शारे पञ्चमो मद्यपाश्रयः॥ इति पञ्चरात्रे भगवद्वचनाद् शेयम् । पुनस्तत्रैव । ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थस्तथैव च । परिवाटच चतुर्थोत्र पचमो नोपपद्यते॥ चत्वारः प्राकृतास्त्वते तादशोऽन्यो न विद्यते । वैष्णवस्तद्गुणातीतो ह्यतः प्रोक्तोऽस्ति पत्रमः॥ इतिभगवदचनम्। पुनरपि पंचरात्र। बह्मचारी गृहम्यश्च वानप्रस्थो यनिस्तथा । चत्वार आश्रमा पते पंचमो मद् व्यपाश्रयः॥ इति। स्कान्दे छ । पचास्त्राकाः पचसंस्कारयुक्ताः,पचा. र्थज्ञाः पञ्चमोऽपापनिष्ठा ! ते वर्णानां पंचमाश्चाश्रमाणां विष्णोक्ताः पचकालप्रपन्नाः॥इति। सत्यमेतन्मुनिश्रेष्ठ! चत्वारोये त्वयोदिताः। आश्रास्तेभ्य श्वाय पचमो हिममाश्रयः ॥ इति । हारीते च । एक- धर्णैकगात्रास्ते सन्ति सर्वेऽपि वैष्णवाः। रहिताः पूर्ववर्णेन स्वामी. गोत्राहि किङ्कराः॥ स्वामीगोत्र इत्यनेन नैष्ठिको शेयः। गुरवे सन्यसेद हमिति । शरीरं चासु विज्ञानं वासः कर्मगुणान् वसून् । गुर्थे धारयेद्यस्तु सशिष्योऽनन्तरः स्मृतः ॥ इति च पचनात् । । ..

--vr श्रीश्राचार्यचरित। ११८ पञ्चसंस्कारपूर्वक प्रेम से मन्त्रराज (श्रीगोपालमन्त्र) को प्रदान किया ॥१८॥ वेदशास्त्रमयीं विद्या ब्रह्मविद्यां परां शुभाम् । दत्वा विधिवदाचार्यः प्रोवाच मुनिसत्तमः१८ इस प्रकार मुनिश्रेष्ठ श्रीनिम्बार्काचार्य ने वेद- शास्त्रमयी विद्या तथा पूरा ब्रह्मविद्या को विधि- पूर्वक प्रदान करके उस बालक से यों कहा ॥ १८ ॥ पुत्र,धन्योऽसि तिष्ठात्र कृतार्थोसि महाप्रभ । आद्याचार्यो भवाशुत्वं भाष्यकारो ममाज्ञया २० हे पुत्र ! तू धन्य है; हे तेजस्वी बालक ! तू कृतार्थ हुआ; तू यहीं निवास कर और हमारी आज्ञा से शीघ्र वैष्णवधर्म का साम्प्रतकाल में आद्या- चार्य तथा ब्रह्मसूत्र का आदि भाष्यकार हो॥२०॥ इति शुन्या गुरोर्वाक्यं दण्डवत्प्रणिपत्य च। लोमहर्षसमायुक्तो वाष्पपर्याकुलेक्षणः ॥२१॥ प्राप्य पचपदी विद्यां सर्वाविद्यानिकन्तनीम्। नैष्ठिकं व्रतमास्थाय स्वशरीरं न्यवेदयत् ॥२२॥ इस प्रकार गुरुदेव श्रीनिम्बार्कभगवान् के वचनो को सुनकर उस बालक अर्थात् श्रीश्रीनिवासाचार्य के रोएं मारे मानन्द के खड़े होगए और आंखों में प्रेम के प्रांसू छागए। फिर उन्होंने निज श्रीगुरुदेव को दंडवत्प्रणाम कर और सम्पूर्ण अविद्याओं के नाश करनेवाली पञ्चपदी विद्या को श्रीगुरुदेव से 16 १२० VMVVMV -~- वैष्णवसर्वस्व । पाकर,एवं नैष्ठिकब्रह्मचर्य व्रत का अवलम्बन करके अपना शरीर श्रीगुरुदेव के अर्पण कर दिया, अर्थात् आत्मनिवेदन करके उनके अनन्य सेवक होगए ॥ २१ ॥ २२ ॥ आचार्योऽपि स्वयं प्रीत्या पञ्चकालानुवर्त्तनम् पञ्चाङ्गं पञ्चयज्ञं च पञ्चा) पचमाश्रमम्॥ २३ ॥ वेदान्तपारिजातादिसौरमांतं ददौ मुनिः। यत्र वाक्यार्थरूपेण सर्ववेदार्थसंग्रहः ॥२४॥ दर्शितो ब्रह्मसूत्राणां भिन्नाभिन्लानयो हरिः। शास्त्रार्थकामधेनुं च दशश्लोकी पुनर्ददौ । २५॥ तय तो श्रीनिम्बार्क महामुनि ने स्वयं ही श्रीश्रीनिवासाचार्य को प्रीतिपूर्वक पञ्चका... पद्धति, श्रीराधा तथा श्रीगोपालजी का पर, पञ्चयज्ञविधि, पञ्चार्य,तथा पञ्चमाश्रम अर्थात् परम- हंसाधन प्रदान किया। फिर बह्मसूत्र अर्थात् पाल्यार्थरूप निजकृत वेदान्तपारिजात- सौरभ ' को दिया, जिसमें ब्रह्मसूत्र के वाण्यार्थरूप से सम्पूर्ण वेदार्थों का संग्रह है, और जिसके द्वारा यह सिद्ध किया गया है कि श्रीभगवान् 'भिन्न पार अभिन्न के प्राश्रय' हैं, अर्थात् 'द्वैताद्वैतसिद्धान्त ' स्पष्ट किया गया है। इसके अनन्तर श्रीआचार्य महाप्रभु ने श्रीश्रीनिवासाचार्य को 'शास्त्रार्थकाम- धेनु' और 'दशश्लोकी' प्रदान किया ॥ २३ ॥२४॥२५॥ उवाच राधाकुण्डाख्ये स्थिनिः कार्या वयानघ की वृत्ति -- श्रीआचार्यचरित। १२१ यथाराधाप्रिया विष्णोः कुण्डस्तस्यास्तथो प्रियः इसके अनन्तर श्रीमदाचार्यचरणों ने श्रीश्री- निवासाचार्य से यों कहा,-हेनिष्पाप! अब तुम कुछ दिन लों श्रीराधाकुण्ड पर जाकर निवास करो। श्रीकृष्ण को श्रीराधा जैसी प्यारी हैं,उनका अर्थात् श्रीराधा का कुण्ड भी वैसा ही प्रिय है अतएव अब कुछ दिन तुम वहां जाकर भजन करो ॥ २६ ॥ त्वमिदं जप भद्रं ते राधाष्टकमनुत्तमम् । राधया माधवं देवं शीघ्र द्रक्ष्यसि चक्षुषा॥२७॥ वहां जाकर तुस हमारे दिए हुए इस परमोत्तम 'श्रीराधाष्टक' का जप करो; इससे तुम्हारा कल्याण होगा, अर्थात् तुम शोघ ही इन्हीं नेत्रों से श्रीराधा- माधव का दर्शन पानोगे ॥ २७ ॥ यदा द्रक्ष्यसि श्रीराधां श्रीकृष्णप्रियगेहिनीम्। तदात्वं पुत्र विश्वेऽस्मिन् जीवन्मुक्तो भविष्यसि हेपुत्र ! श्रीकृष्ण की प्यारी घरनी श्रीराधा का दशन जब तुम पाओगे, तब इस संसार में जीवन्मुक्त होजाओगे ॥ २८ ॥ इत्याचार्यचरित्रस्य विश्रामे दशमेऽधुना। श्रीनिवासायंदेवस्य महिमा वर्णिता परा॥२॥ इस प्रकार अबश्रीनाचार्यचरित के दशम विश्राम में श्रीश्रीनिवासाचार्यवर्य की परा महिमा कही गई २८ इतिश्रीमदाचार्य चरितस्य दशमो विशामः समाप्तः। (१६)न.

१२२ वैष्णवसर्वस्व । श्रीश्रीराधाकृष्णाभ्यानमः । अथ श्रीश्रीराधाष्टकम्। श्रीसुदर्शन उवाच । नमस्ते श्रियै राधिकायै परायै, नमस्ते नमस्ते मुकुन्दप्रियायै । सदानन्दरूपे प्रसीद त्वमन्तः- प्रकाशे स्फुरन्ती मुकुन्देन सार्द्धम् ॥१॥ श्रीदेवी (१) को नमस्कार है,परादेवी श्रीराधाजी को नमस्कार है, श्रीमुकुन्दभगवान् की मियाजी को नमस्कारहै,नमस्कार है । हे सदानन्दरूपे ! आप मान्न हों, क्योंकि आप अन्तःकरण में प्रकाश करनेवाली हैं और उसी प्रकाश में श्रीमुकुन्दभगवान् के साथ आप प्रकट दर्शन देती हैं ॥१॥ स्ववासोपहारं यशोदासुतं बा, स्वदध्यादिचौरं समाराधयन्तीम् । स्वदाम्नोदरे या बबन्धाशु नीव्याः, प्रपद्येनु दामोदरप्रेयसी ताम् ॥२॥ अपनी नीबी के दाम (डोर) से जिनने श्रीदामोदर भगवान् के उदर को शीघ्र ही बांधा था,उन श्रीयशोदा जी के नन्दन का भाप भलीभांति नाराधन करती हैं। (१) वृन्दावन के प्रसङ्ग मे श्रीशब्द सं राधा का ही बोध होता है। यथा, लक्ष्मीरत्यत्र द्रेची तु राधा वृन्दावगे स्मृता।

श्रीआचार्यचरित। १२३ "Vv Wwwvr. JVV VYA वे श्रीदामोदरभगवान् श्रापके वस्त्रों के अपहरण करने वाले और आपके दधि,माखन आदि के चुरानेवाले हैं । अतः श्रीदामोदरभगवान् की उन्हीं प्रियतमा (आप) के शरण में हम प्राप्त होते हैं ॥ २ ॥ दुराराध्यमाराध्य कृष्णं वशे तं, महाप्रेमपूरेण राधाभिधाभूः । स्वयं नामकीा हरौप्रेमयच्छ, प्रपन्नाय मे कृष्णरूपे समक्षम् ॥ ३॥ अपरिमित प्रेम से दुराराध्य श्रीकृष्ण का माराधन करके आपने उन्हें अपने वश में कर लिया है,इसीसे आपका नाम श्रीराधा हुआ है (२) अतएव प्राप अपने श्रीराधा नाम की कीर्ति से ही श्रीकृष्ण का प्रत्यक्ष प्रेम हमें दीजिए । हे कृष्णरूपे ! हम साक्षात् आपके शरण में प्राए हुए हैं ॥ ३ ॥ मुकुन्दस्त्वया प्रेमडोरेण बद्धाः, पतङ्गो यथा त्वामनुभाम्यमाणः । उपक्रोडयन्हार्दमेवानुगच्छन् , कृपां वर्त्तते कारयातो मयीष्टिम् ॥४॥ श्रीमुकुन्दभगवान् आपके प्रेमरूपी डोर से बँधे हुए इस प्रकार आपके पीछे लगे हुए डोला (२) राधेत्यत्र राधससिद्धौ धातुः । राधनोति कृष्णमिति राधा । कृष्णाराधनतो जाता राधा कृष्णस्वरूपिणी इति शास्त्र- वचनात् ।

१२४
वैष्णवसर्वस्व।
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करते हैं, जैसे पतङ्ग। वे आपके संग क्रीड़ा किया
करते और आपके हृदयगत भावों के अनुफूलही चलते
हुए आपके समीप स्थित रहते हैं। अतएव हमपर
उनकी वह कृपा कराइए, जो हमें इष्ट है ॥ ४ ॥
व्रजन्तीं स्थवृन्दावने नित्यकालं,
मुकुन्देन सोकं विधायाङ्कमालाम् ।
समामोक्षमाणानुकम्पाकटाक्षः,
श्रियं चिन्तये सच्चिदानन्दरूपाम् ॥५॥
आप अङ्कमाला धारणकर नित्यप्रति निज वृन्दा-
बन में कृपाकटाक्ष से मुक्ति वितरण करती हुई मुकुन्द
के साथ विचरती रहती हैं, ऐसी सच्चिदानन्दरूपा
श्रीराधा (आप) का चिन्तन हम किया करते हैं ॥५॥
मुकुन्दानुरागेण रोमाञ्चिताङ्गै-
रहं देप्यमानां तनुखेदबिन्दुम् ।
महाहार्दवृष्ट्या कृपापाङ्गदृष्या,
समालोकयन्ती कदा त्वां विचक्षे ॥६॥
श्रीमुकुन्दभगवान् के अनुराग से आपके अङ्गों में
जब रोमाञ्च हो पाते हैं और आप सात्विक भावों
के उदय होने से निज अङ्गों में कम्प एवं स्वेदबिंदुओं
को धारण करलेती हैं और उसी अवस्था में प्राप
महाहार्द की वृष्टि एवं कृपापाङ्ग की दृष्टि कर उन
श्रीमुकुन्दभगवान् की भोर अवलोकन करने लगती
हैं,-मापके ऐसे दर्शन को हम कब पावैगे ? ॥६॥

श्रीनाचार्यचरित।
१२५
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यदकावलोके महालालसौघ,
मुकुन्दः करोति स्वयं ध्येयपादः।
पदं राधिके ते सदा दर्शयान्त-
हृदा तं नमन्तं, किरद्रोचिषं माम् ॥७॥
जिन श्रीमुकुन्दभगवान् के चरणों का आप ध्यान
किया करती हैं, वे श्रीमुकुन्दभगवान् स्वयं आपके
चरणचिह्न को देखतेही आपके मिलने की महालालसा
के वेग को धारण करते हैं। अतएव,हेश्रीराधिके !
आप अपने महाप्रभावान उन्हीं श्रीचरणारविन्दों
का दर्शन अन्तर्हृदय से हमें सदैव कराया कीजिए,
क्योंकि हम आपके उन चरणारबिंदों में प्रणाम
कर रहे हैं ॥७॥
सदा राधिकानाम जिहाग्रतः स्तात्
सदा राधिकारूपमक्ष्यय आस्तात् ।
श्रुतौ राधिकाकीर्तिरन्तःस्वभावे,
गुणा राधिकायाः श्रिया एतदीहे ॥८॥
हम तो यही बाञ्छा करते हैं कि हमारीजिह्वा
पर सदा पोराधिका का नाम रहे, सर्वदा हमारी
प्रांखों के आगे श्रीराधिका का रूप बिराजे, हमारे
कानों में सदैव श्रीराधिका की कीर्ति पहुंचती रहे
और श्रीरूपिणी श्रीराधिका के गुण हमारे अन्त:-
करण में नित्यही स्वभाव से ही स्फुरित होते रहें,
यही प्रार्थना है ॥८॥

१२६ वैष्णसर्वस्व । mum Avvvvv इदं त्वष्टक राधिकायाः प्रियायाः, पठेयुः सदैवं हि दामोदरस्य । सुतिष्ठन्ति वृन्दावने कृष्णधाम्नि, सखीमूर्तयो युग्मसैवानुकूलाः ॥ ६ ॥ श्रीदामोदरभगवान् की श्रीप्रियाजी,श्रीराधिकाजी के इस अष्टक ( स्तोत्र ) को जो लोग सदैव ही पढ़ा करेंगे,वे श्रीकृष्ण के निजधाम श्रीवृन्दादन में मानन्द- पूर्वक निवास कर सकेंगे और अन्त में सेवानुकूला नित्यसखी श्रीललितादिक के समान दिव्य स्खीरूप धारण करके श्रीयुगलमूर्ति अर्थात् श्रीराधा-कृष्ण कोनित्य एवं अन्तरङ्ग सेवा में पहुंच जायंगे ॥८॥ मोहं निर्दलयन्मदं कवलय- बुन्मूलयज्जायताम् । बुद्धि निर्मलयन् दयां प्रवलयन् , हृद्रोगमुत्सादयन् ॥ भूतानां भवभीतिमाशु शमय- बुदीपयन् शिष्टताम् । भक्तिज्ञानविरागसाधनमिदं, राधाष्टक पावनम् ॥ १० ॥ यह परम पवित्र श्रीराधाष्टक मोह को दलन करता, मद को खाता, जड़ता को उखाड़ फेंकता, बुद्धि को निर्मल करता,हृदय के रोग-कामवाधा को श्रीमार्यचरित । १२७ दूर करता,शिष्टता को उद्दीपित करता और मनुष्यों के जन्म-मरण-जन्य भय को मिटाता हुन्मा, भक्ति, ज्ञान एवं वैराग्य का एकमात्र साधनकर्ता है ॥१०॥ इति राधाष्टकं दिव्यं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् । यः पठेत्परयो भक्त्या तयोः सः प्रियतां ब्रजेत् ११ इस प्रकार दिव्य और भुक्ति-मुक्ति के देनेवाले इस श्रीराधाष्टक को जो लोग परा भक्ति से पढ़ेंगे, वे उन दोनो-श्रीराधा एवं श्रीकष्ण के प्यारे होजायंगे, ॥ ११॥ इतियोश्रीनिम्बार्काचार्यविरचितं श्रीराधाष्टक सम्पूर्णम् । इत्याचार्यचरित्रस्य विनामे रुद्रसंज्ञके। श्रीनिम्बार्ककृतं दिव्यं राधाष्टकमुदीरितम् ॥१२॥ इस प्रकार श्रीआचार्यचरित के ग्यारहवें विश्राम में श्रीश्रीनिम्बार्काचार्यकृत श्रीश्रीराधाष्टक का वर्णन किया गया ॥ १२॥ इतिश्रीश्रीमदाचार्यचरितस्य एकादशो विश्रामः समाप्तः ॥११॥ ॥ ४३७॥ SE १२८ वैष्णवसर्वस्व । - ~~~ ran श्रीश्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः । इति राधाष्टकं दिव्यमुपदिश्य मुनीश्वरः । आज्ञां कुर्वन्नथोवाच शरणागतवत्सलः॥१॥ शरणागतवत्सल, महामुनीश्वर श्रीनिम्बार्क- भगवान् इस प्रकार दिव्य श्रीराधाष्टक का उपदेश करके आज्ञा देते हुए यों बोले ॥१॥ पुत्रनं जप भद्र ते सर्वा विद्यामवाप्स्यसि । छन्दांस्ययातयामानि भविष्यन्ति तवानघः२ हेपुत्र ! तू इस श्रीराधाष्टक का जप कर, तेरा कल्याण होगा, और तू श्रीराधाकृष्ण की कृपासे बिना पढ़ेही सम्पूर्ण विद्यानों को पाजायगा । हे निष्पाप ! तेरे लिये वेद ऐसे अभ्यस्त होजायंगे,मानो उन्हें तूने तत्क्षण पढ़ाहो ॥२॥ वेदशास्त्रपुराणानां तत्वानि हृदये तव । उदेष्यन्ति स्वयं वत्स राधाकृष्णप्रसादतः ॥३॥ हे वत्स ! श्रीराधाकृष्ण की कृपा से वेद,शास्त्र, एवं पुराणों के सम्पूर्ण तत्त्व स्वयं ही तेरे हृदय में उदय होजायंगे ॥३॥ सिद्ध मन्त्रे कुरु क्षिप्रं वाक्याथै भाष्यमुत्तमम्। ममाज्ञया कलौ नष्टं सम्प्रदायं प्रकाशय ॥४॥ अस्तु, जब यह मंत्र सिद्ध होजाय,तब तू शीघ्र ही ब्रह्मसूत्र पर जो हमारा वाक्यार्थ है,उसपर भाष्य की रचना करियो और हमारी आज्ञा से कलिकाल श्रीनाचार्यचरित। १२८ में नष्ट वैष्णव सम्प्रदाय का पुनः प्रकाशन करियो॥४॥ ओमित्यानम्य मूर्धानं बध्वाभक्त्याजिल मुदा। श्रीश्रीनिवास आचार्यो पुनः पप्रच्छ सादरम् ५ शीश्रीनिवासाचार्य ने श्रीनिम्बार्कभगवान् की आज्ञा को सुनकर, नानन्द से हाथ जोड़, सिर झुका और “जो आज्ञा कहकर पुनः इस प्रकार प्रश्न किया ॥५॥ भगवन् भवता प्रोक्ता युगलोपासना परा। किन्तु मध्ये तयोर्ब्रह्मन् स्तोत्रमेकं प्रकाशितम् ६ *. हेभगवन् ! आपने “ श्रीराधाकृष्ण" की युगल उपासना को श्रेष्ठ कहा है किन्तु हेब्रह्मन् ! श्रीराधा और श्रीकृष्ण इन दोनो में केवल आपने एक ही स्तोत्र (श्रीराधाष्टक) प्रकट किया है ॥ ६ ॥ यथा राधाष्टकं दत्तं परया भवता मुदा । तथैव देहि में ब्रह्मन् श्रीकृष्णाष्टकमुत्तमम् ॥७॥ हे ब्रह्मन् ! जैसे प्रापने परमानन्द-पूर्वक मुझे श्रीराधाष्टक" को दिया, उसी प्रकार कृपाकर श्रीकृष्णाष्टक " को भी प्रदान कीजिए ॥ ७ ॥ इति श्रुत्या विहस्याथ ग्रोवाच मुनिसत्तमः । धन्योऽसि कृतकृत्योऽसि गृहाणगदितंमयो॥८॥ श्रीनिम्बार्कभगवान् ने श्रीश्रीनिवासाचार्य के ऐसे विनीत बचनों को सुन, हंसकर यों कहा,- हे वत्स ! तू धन्य है, तू कृतकृत्य हुना । ले, हम "श्रीकृष्णाष्टक" को प्रकाशित करते हैं, उसे तू ग्रहण कर ॥८॥ (१७) न.

१३० বঙ্গবন। ON श्रीश्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः । अथ श्रीश्रीकृष्णाष्टकम्। श्रीसुदर्शन उवाच। नमामीश्वरं सच्चिदानन्दरूपं लसत्कुण्डलं गोकुले भ्राजमानम् । यशोदाभियोलूखलाडावमानं, परामृष्टमत्यन्ततो द्रुत्य गोप्या ॥१॥ श्रीसुदर्शन-भगवान् ( श्रीनिम्बार्काचार्य ) ने कहा,-जो श्रीकृष्ण उलूखल पर से उतर कर श्रीयशोदाजी के भय से भागे थे, किन्तु उन्हें श्रीयशोदाजी ने दौड़कर पकड़ लिया था, उन,- श्रीगोकुल में शोभायमान,युगल कुण्डलों से विभूषित, सच्चिदानन्दस्वरूप, जगदीश्वर श्रीकृष्ण को हम प्रणाम करते हैं ॥१॥ रुदन्तं मुहुनैत्रयुग्मं मृजन्त, कराम्भोजयुग्मेन सातङ्कनेत्रम् । मुहुः स्वालकं यत्त्रिरेखाकण्ठ- स्थितं चैव दामोदरं भक्तिबद्धम् ॥२॥ समय-विलोचन, रोदन करते हुए, दोनो कर- कमलों से अपने उभय नेत्रों को तथा त्रिरेखायुक्त कण्ठ में लपटी हुई अपनी अलकावली को बारम्बार मीजते हुए, भक्ति से बँधे हुए श्रीदामोदर ( श्रीकृष्ण ) भगवान् को हम प्रणाम करते हैं ॥ २ ॥ - श्रीप्राचार्यचरित। 400 इतीहक् स्वलीलाभिरोनन्दकुण्डे, स्वघोषंनिमज्जन्तमाख्यापयन्तम तदीयेप्सितज्ञेषु भक्तैर्जितं त्वां, पुनः प्रेमतस्त शतावृत्ति बन्दे ॥३॥ इस प्रकार की अपनी अचिन्त्य लीलाओं से अपने ब्रजवासियों को मानन्द के कुण्ड में गोते देने वाले तथा उनकी प्रख्याति करनेवाले, एवं अपने भक्तजनों की इच्छा के जाननेवाले और उन्हीं भक्तों के वश में प्राप्त श्रीकष्ण को हम बारम्बार प्रेमपूर्वक सैकड़ों,वार प्रणाम करते हैं ॥ ३ ॥ वरं देव मोक्ष न मोक्षावधि वा, न चान्यं वृणेऽहं वरेशादपीह । इदं ते वपुर्बालगोपालबालं, सदामे नमस्याचिरास्तांकिमन्यैः ॥४ हे देव ! (हे श्रीकष्ण) आप वरों के देनेवाले हैं, इसलिये हम आपसे न तो मोक्ष चाहते हैं, न मोक्ष की अवधि ही चाहते हैं। यहांतक कि यह आप निश्चय जाने कि हम अन्य किसी प्रकार का भी कोई वर आपसे नहीं चाहते। किन्तु हां इतना तो हम अवश्य चाहते हैं, चाहे आप इसे वर ही समझलें-कि आपके इस बालगोपाल स्वरूप को हम सदा मणाम किया करें । बस, अन्य वरों से हमें कुछ काम नहीं है ॥ ४ ॥ ,

वैष्णवसर्वस्व
इदं ते मुखाम्भोजमत्यन्तनीलै-
कृतं कुण्डलैः स्निग्धवक्त्रैश्च गोप्या
मुहुश्चुम्बितं विम्बरहाधर मे,
मनस्याविरास्तामलं लक्षलाभैः ॥५॥
हे भगवन् ! हमें और कुछ न पाहिए, केवल
इसी में हमें लाखों पदार्थों के लाभ जैसा सुख प्राप्त
होजायगा, यदि हम अत्यन्त श्याम अलकाबलियों
से युक्त, कुण्डलों से शोभित और गोपियों के
स्नेहमय मुखारबिन्दों से चुम्बित आपके रक्ताधर
विशिष्ट इश मुखारबिन्द को प्रणाम कर सकेंगे;
अर्थात् यदि आप हमें प्रणाम करने के समय अपना
मानस दर्शन दिया करेंगे तो हम अत्यन्त कृतकृत्य
होजायंगे ॥ ५॥
नमो देव दामोदरानन्त विचलो,
प्रसीद प्रभो दुःखजालाब्धिमग्नम्
कृपादृष्टिवृष्टयातिदीनं बतानु-
ग्रहाणेश मामद्य मेप्यक्षिदृश्य: ॥६॥
हे देव ! हे दामोदर ! हे अनन्त ! हे कृष्ण !
हे प्रभो ! हम आपको प्रणाम करते हैं, आप प्रसन्न
होइए और अनुग्रहपूर्वक निज कृपादृष्टि की वृष्टि
से अतिदीन और दुःख-जञ्जाल-रूपी सागर में निमग्न
हमारा अब हर्षपूर्वक उद्धार करके हे ईश ! आप
शीघ्र ही हमारे नेत्रगोचर होइए, अर्थात् प्रत्यक्ष
दर्शन दीजिर ॥६॥

श्रीनाचार्यचरित। १३३ vUv कुबेरात्मजौ बहमूत्यैव यव- स्वया मोचितौ भक्तिभाजी कृतीच। तथा प्रेमभक्तिं स्वकां मे प्रयच्छ, न मोक्षायहो मेऽस्ति दामोदरेह ॥७॥ देखिए, बद्धों को मुक्त करना यह पापही का काम है । कुबेर के दोनों पुत्रों ( नलकूवर और मणिग्रीव ) कर बद्धावस्था में ही,अर्थात् जब वे वृक्ष योनि में प्राप्त थे, तभी जैसे नापने उन दोनों को मुक्त किया और निज भक्ति का अधिकारी बनाया, उसी प्रकार निज प्रेमलक्षणा भक्ति हमें भी दीजिए। क्योंकि हे दामोदर ! इस संसार में हमारा मोक्ष हो, यह आग्रह अर्थात मोक्षाग्रह हमको नहीं हैं ॥ ७ ॥ नमस्तेऽस्तु दाम्ने स्फुरदीप्तिधाम्ने, त्वदीयोदरायाथ विश्वस्य धाम्ने । नमो राधिकायै त्वदीयप्रियायै, नमोऽनन्तलीलाय देवाय तुभ्यम् ॥८॥ चञ्चत्मभा के धाम आपके दाम को नमस्कार है, विश्व ( संसार ) के धाम आपके उदर को प्रणाम है, आपकी प्रियतमा श्रीराधिकाजी को साष्टाङ्ग दण्डवत्प्रणति है और अनन्तलीलामों के करनेवाले देव (आप) को बारम्बार नमस्कृति है ॥८॥ इदं त्वष्टकं माधवस्य प्रियस्य, पठेयुः सदैवं हि ये राधिकायाः।

१३४ v वैष्णव सर्वस्व । सुतिष्ठन्ति वृन्दाबने नित्यधान्नि, सलीमूर्तयो युग्मसेवानुकूलाः ॥ ६ ॥ श्रीराधिकाजी के प्रिय श्रीमाधवभगवान् के इस अटक को जो लोग सदैव ही पढ़ा करेंगे, वे नित्यधाम श्रीवृन्दावन में सुखपूर्वक निवास कर सकेंगे, और अन्त में दिव्य सखीमूर्ति को धारण करके श्रीयुगल अर्थात् श्रीराधा तथा श्रीकृष्ण की सेवा के अधिकारी होजायंगे ॥६॥ अज्ञानं दलयत्तमः कवलय- प्रोन्मूलयन्मूढताम् । चित्तं निर्मलयद्विवेकमुदय- च्छोकाधिमुत्सादयत् ॥ भक्तानां वृजिनार्त्तिमाशुशमय- च्चोद्दीपयन्साधुताम् । राधाकृष्णवशप्रसाधनमिदं- कृष्णाष्टकं पावनम् ॥ १० ॥ अज्ञान को दलन करता हुना, तमोगुण को खाता हुमा, सूढ़ता को उखाड़ता हुमा, चित्त को निर्मल करता हुमा, विवेक का उदय करता हुआ, शोक की व्याधि को दूर करता हुमा, भक्तों की संसार-जन्य व्याधियों को अतिशीघ्र ही मिटाता हुआ, और साधुता (महानुभावता) का उदय करता श्रीकृष्णाष्टक " श्रीराधा हुमा, यह परमपवित्र ४

श्रीपाचायचरित।
१३५
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11
और श्रीकृष्ण को अपने वश में कर लेने का बड़ा
भारी साधन है ॥ १० ॥
इति कृष्णाष्टकं दिव्यं सर्वसितविधायकम् ।
यः पठेत्परया भत्त्या तयोः स प्रियतां ब्रजेत् ११
समस्त इच्छाओं को पूर्ण करनेवाला यह
श्रीकृष्णाष्टक परम दिव्य पदार्थ है। जो लोग परम
भक्ति-पूर्वक नित्य ही इसका पाठ करते हैं, वे श्रीराधा
और श्रीकृष्ण के बड़े प्यारे होजाते हैं ॥ ११ ॥
इत्याचार्यचरित्रस्य विशाने सूर्य संज्ञके।
श्रीनिम्बार्ककृतं दिव्यं कृष्णाष्टकमुदीरितम् १२
इस प्रकार श्रीनाचार्यचरित के बारहवें विश्राम
ঈ স্বীষ্মীনিন্ধৰিামৰ স্মষ্মীরূদ্যোজ জা ঘন
किया गया ॥ १२ ॥ २० ॥
নিখীলাম্বানি দুহম্মী
विश्रामः समायः ॥ १२ ॥

वैष्णवसवस्व । ~~~M ~~~~~~~~~ স্বীকাল:। ततःप्रोवाच भगवान् श्रीनिम्बार्को मुनीश्वरः। गच्छाधुनाशु भद्न्ते नियोगं मे प्रपालय ॥१॥ इसके अनन्तर भगवान् श्रीनिम्बार्क महा- मुनीश्वर ने श्रीश्रीनिवासाचार्य से यों कहाकिहे वत्स ! अब तू शीघ वहां जा । तेरा कल्याण होगा। मेरी आज्ञा का तू पालन कर ॥१॥ श्रुतवा श्रीमद्गुरोर्याक्यं दण्डवत्प्रणिपत्य च। निदेशं शिरसाधाय त्रि:परिक्रम्य भक्तितः॥२॥ श्रीश्रीनिवास आचार्यो गत्वा गोवर्द्धने त्वरित् श्रीराधाकृष्णकुण्डस्थ समीपेन्यवसत्सुखम्॥३॥ स्नात्वा प्रतिदिनं तत्र त्रिकालं नियमेन च । उभयोः स्तवयोः सम्यक चार जपमुत्तम् ॥४॥ इस प्रकार श्रीश्रीनिवासाचार्य श्रीमद्गुरुदेव के बचनों को सुन, उन्हें दण्डवत्प्रणाम कर, उनकी आज्ञा को सिर पर चढ़ा, उनकी तीन परिक्रमा कर शीघु ही श्रीगोवर्द्धन को जा और श्रीराधाकुण्ड एवं श्रीकृष्णकुण्ड के समीप आनंद से निवास कर एवं उन कुण्डों में निकाल स्नान कर श्रीगुरुदेव के उपदिष्ट दोनो स्लोचों का उत्तमरीति से जप करते हुए ॥ २ ॥ ३ ॥ ४ ॥ सिद्धे मन्त्रे तमाहाशु दिव्यवागशरीरिणी। सिद्धोऽसि द्रक्ष्यसि क्षिप्रं राधाकृष्णं वचक्षुषा ५ , श्रीनाचार्यचरित। कि, 6 श्रीश्रीनिवासाचार्य के जप का मन्त्र जब सिद्ध होगया, तब उनसे 'प्राकाशवाणी' ने यों कहा अब तू सिद्ध होगया, इसलिये शीघ्र ही तू श्रीराधाकृष्ण का प्रत्यक्ष दर्शन पावेगा" ॥ ५॥ इति रम्य वचः श्रुत्वा परमानन्दसंघलुतः । श्रीश्रीनिवास आचार्यो हरितुष्टाव सप्रियम् ६ ऐसे रमणीय वचन को सुनकर शीश्रीनिवासा- चार्य परमानन्द को प्राप्त हुए और श्रीराधाकृष्ण की स्तुति करने लगे ॥ ६॥ (श्रीश्रीनिवासाचार्य उवाच ।) हे है जनार्दन मुकुन्द हरे मुरारे, भक्तप्रियाशु वृजनाहिर प्रसीद । नै प्रियासहितमत्र मनोहरं मे, सन्दर्शनं परमदुर्लभमेहि देहि ॥ ७ ॥ जनार्दन ! हे मुकुन्द ! हेहरे ! हेमुरारे ! हे भक्तप्रिय ! हेवृजिनातिहर ! भाप मुझपर शीघ्र प्रसन्न होइए । यहां माइए और ग्रीमियाजी के सहित अपना परमदुर्लभ और मनोहर दर्शन मुझे दीजिए ॥ ७॥ नैवास्त्रि शक्तिरतुला न तपः परं से , नैव श्रुतं परममालविधेकरम्यम् । सन्त्याशिषार्ममगुरोरमितप्रभावाः, दिव्यायुधस्य तव कारुणिफस्यभूमन् ॥८॥ %3D ( १८) न०

वैष्णव सर्वस्व ।
INDI
Now
हे भूमन् ! (परमात्मन् । ) मुझ में न तो तुला
शक्ति (सामर्थ्य) हो है,न परम तपस्या ही है और न
आपका परमज्ञान जिस शास्त्र से प्राप्त हो,
वेदान्त शास्त्र का ज्ञान ही है। मेरे पास जो
कुछ भी हैं, वे परम कारुणिक, प्राप के दिव्यायुध
(श्रीसुदर्शनभगवान्) और मेरे श्रीगुरुदेव (श्रीनिम्बार्क)
के अमित प्रभाव आशीर्वाद ही हैं ॥८॥
त्वत्पादपममकरन्दमधुव्रतोऽहं,
नान्यागतिस्त्वदितरेति वदामि सत्यम् ।
पापस्त्वहं त्वमसि माधव ! पापनाशी,
तस्माद्यथेच्छसि तथैव कुरुष्व नाथ!॥९॥
हे माधव ! मैं आपके चरणारविन्द के मकरन्द
का अमर हूं, अतएव आपके अतिरिक्त मेरी और
दूसरी कोई गति नहीं है, यह सत्य कहता हूं। मैं
मूर्त्तिमान् पाप हूं और आप पापों के नाश करने
वाले हैं, इसलिये हेनाथ ! अब आप जैसा उचित
समझिए, वैसा ही कीजिए ॥८॥
एवं तु बदतस्तस्य श्रीनिवासस्य धीमतः ।
अये प्रादुरभूच्छीमान् राधिकासहितो हरिः १०
इस प्रकार• धीमान् श्रीश्रीनिवासाचार्य स्तुति
कर ही रहे थे कि उनके सन्मुख श्रीराधिकाजी के
साथ श्रीकृष्ण प्रकट होगए ॥१०॥
दृष्ट्वा तमद्भुतं रूपं कोटिसूर्यसमप्रभम् ।
पपात चरणोपान्ते वाष्प पपर्याकुलेक्षणः ॥११॥

সাম্পানি। v Paude नाशकन् प्रेमवेगेन स्तोतुं गदगदया गिरा। तवास्मि नाथ! दासोऽहमित्युक्ता प्ररुरीद ह १२ कड़ोरों सूर्यों के समान प्रभावान् श्रीश्रीराधा कृष्ण के अद्युत रूप का दर्शन करके श्रीश्रीनिदासा- चार्य की आंखों में प्रेम के प्रांसू उभंग भार । वे प्रेम के वेग के कारण और वाणी के गद्द होजाने के हेतु से श्रीभगवान् की स्तुति न कर सके और- " हेनाय ! मैं तेरा ही दास हूं"-यों कहकर प्रभु के चरणों में गिर पड़े और रोदन करने लगे १२॥१२ तमुत्याप्य महामार्ग तस्य नेत्रे प्रमृज्य च । विहस्योवाच भगवान् प्रियोऽसि मम सुव्रत ! १३ किमिच्छसि बदाशु त्वं वरं ते वितराम्यहं । मां प्राप्य नानुशोचन्तिमदावा मामकाःक्यचित् श्रीभगवान् महाभाग श्रीश्रीनिवासाचार्य को उठाकर और उनके नेत्रों के प्रांसुओं को पोछकर हंसकर यों बोले कि, " हेसुव्रत ! तू हमारा प्यारा है। शीघ्र बता कि तू क्या चाहता है ? हम अभी तुझे वर देते हैं। क्योंकि हमारी भावना में लगे हुए हमारे निज जन हमको पाकर फिर कभी भी शोक को नहीं पाते हैं ॥१३॥१४॥ इति श्रुत्वा हरेर्वाक्यं श्रीनिवास उवाच तम् । नाहं वृणे वरं चान्यं यत्स्वत्तो त्वदनुग्रहात् ॥१३' श्रीभगवान् के ऐसे वचनों को सुनकर श्रीश्री- .

वैष्णवसर्वस्व।
निवासाचार्य ने उनसे यों कहा कि हे भगवन् ! मैं
आपसे "आपके अनुग्रह के अतिरिक्त" और कोई
भी अन्य वरों की या नहीं करता ॥१५॥
बिहस्योवाच भगवान् “तथास्तु" श्टणु मामक!
धन्योऽसि कृतकृत्योऽसि मयुक्तोऽसि प्रियोऽसि में
छन्दांस्ययातयामागि भविघयन्तीह तत्र च ।
भाष्यकारोभवाशुत्वं कलिकाले समाज्ञया॥१७॥
संस्थापयाशु भद्ते धर्भ भागवतं मम ।
तेन कीर्ति परांप्रीतिकाले प्राप्स्यसि पुत्रक. १८
श्रीश्रीनिवासाचार्य के ऐसे वचन को सुनकर
श्रीभगवान् ने उनचे "तथास्तु" कहा और यों कहा
कि हे मेरे प्यारे ! सुन,-तू धन्य है, तू कृतकृत्य है,
तू मेरा भक्त है और तू मेरा प्रिय है। तुझे सारे
छन्द (वेद) ऐसे स्मरण होजायंगे कि मानो उन्हें
अभी पढ़ा हो। सो यह बात इस लोक में और परम
धाम में मेरे समीप रहने पर भी बनी रहेगी। अब
मेरी लाज्ञा से तू ब्रह्मदर्शन का प्रबदि भाष्यकार हो
और कलिकाल में हमारे भागवतधर्म का संस्थापन
कर । इससे तेरा कल्याण होगा और यथासमय
परमा कीर्ति और हमारी परमा प्रीति को, हेयुध !
तू प्राप्त करेगा ॥१६॥१७॥१८॥
इत्युक्त्वान्तर्दधेक्षिप्रं श्रीमान् राधिकया सह।
भगवानप्रमेयात्मा सर्वभूतहृदि स्थितः ॥ १६ ॥

श्रीनाचार्यचरित।
१४१
MOVI
यों कहकर शीघ्रही श्रीराधिकाजी के साथ
श्रीमान् श्रीभगवान् अन्तर्धान होगए; क्योंकि आप
अप्रमेयात्मा और सब प्राणिमात्रों के हृदयों में
स्थित रहते हैं । ( उनकी महिमा को कौन जान
सकता है। क्योंकि जो अप्रमेयात्मा भगवान् सब
जीवों के
हृदय में स्थित रहते हैं, वही सर्वशक्तिमान्
यदि अनुग्रह पूर्वक अपने अनन्य भक्तों को दर्शन दे
देवें, तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। क्यों
कि सारा विश्व ब्रह्माण्ड भगवान् के अधीन है
और स्वयं भगवान् भक्तों के प्राधीन हैं। ऐसा ही
आपका वचन भी है कि,-"अहं भक्तपराधीनः") १८
अन्तर्ह ते भगवति श्रीनिवासोमनीश्वरः,
ददर्श सम्मुखे देवं गुरु निम्बार्कमीश्वरम् ॥२०॥
मन्दं मन्दं हसन्तं वं शिष्यं पश्यन्तमादरात्,
वदन्तं "तात!धन्योऽसिहरिर्जातोऽक्षिगोचरः"२१
श्रीभगवान् के अन्तर्धान होने पर मुनीश्वर
श्रीश्रीनिवासाचार्य ने अपने श्रीगुरुदेव साक्षात्
परमेश्वर श्रीनिम्बार्काचार्य को देखा ! किस प्रकार
देखा कि वे ( श्रीनिम्बार्क ) मन्द मन्द हँस रहे हैं,
अपने शिष्य ( मुझे अर्थात् श्रीनिवासाचार्य को)
आदर पूर्वक देख रहे हैं और यों कह रहे हैं कि,
"हे तात ! (हे पुत्र !) तू धन्य है, क्योंकि श्रीभगवान्
तेरे नेत्रगोचर हुए, अर्थात् तूने श्रीराधाकृष्ण का
प्रत्यक्ष दर्शन पाया ॥२०॥२१॥

१४२ वैष्णवसवस्व । दृष्ट्वा गुरुवरं देवं प्रसादसुमुखं प्रभुम् । पतित्वा चरणोपान्ले श्रीनिवासो महामुनिः २२ प्रोवाच परया भया नाथ ! तेऽनुग्रहादहम् । कृतार्थोऽस्मि प्रसादाच हरिर्जातोऽक्षिगोचरः २३ प्रसाद मुख, प्रभु, देव, निज श्रीगुरुवर को देखकर श्रीश्रीनिवासाचार्य महामुनि उनके चरणों में गिर पड़े और परमभक्ति पूर्वक यों कहने लगे कि,-" हे नाथ ! आपके अनुग्रह और प्रसाद (प्रसन्नता) से श्रीभगवान् ने मुझे प्रत्यक्ष दर्शन दिया, अतएव मैं अब कृतार्य होगया ॥२२॥२३॥ श्रुत्वा शिष्यवचः श्रीखानुवाच परमं वचः । त्वद्विधं शिष्यमादाय जातोऽहमपि धन्यकः २४ निज शिष्य के ऐसे वचन को सुनकर श्रीमान् ( श्रीनिम्बार्क भगवान् ) ऐसे श्रेष्ठ वचन को कहने लगे कि हे पुत्र ! तेरे समान शिष्य को पाकर प्राण हम भी धन्य हुए ॥२४॥ इदानीं कुरु ताताशु वोक्याथै भाष्यमुत्तमम् । ममाज्ञया कलौ नष्टं सम्प्रदायं प्रकाशय ॥२५॥ हे तात ! (हे पुत्र !) अब तू हमारी आज्ञा से "श्रीब्रह्मसूत्र" पर जो हमारा "वाक्यार्थ" है, उस पर अपूर्व "भाष्य" की रचना कर और कलिकाल में नष्ट वैष्ण वसम्प्रदाय को पुनः प्रकाशित कर ॥२५॥ इत्युक्त्वान्तर्दधे श्रीमान् श्रीनिम्बा मुनीश्वरः श्रीश्रानिवास आचार्यों गोवर्धनगिरौ शुभे २६ श्रीप्राचार्यचरित। १४३ ne श्रीराधाकृष्णकुण्डस्य समीपेन्यवसासुखम् । आज्ञाहरेर्गुरोश्चैव यथाविधि समाकरोत् ॥२७॥ यों कहकर श्रीनिम्बार्क महामुनीश्वर अन्त- र्धान होगए। तब श्रीश्रीनिवासाचार्य श्रीराधाकुण्ड- श्रीकृष्णकुण्ड के समीप कल्याणकारक श्रीगोवर्द्धन गिरि में सुखपूर्वक निवास करते हुए और श्रीहरि की तथा श्रीगुरुदेव की प्राज्ञा का यथाविधि पालन करते हुए ॥२६॥२०॥ बेदान्तपारिजातस्य भाषयं वेदान्तकौस्तुभम् । गीतोपनिषदादीनां सारं भाष्यतया व्यधात् २८ इस प्रकार श्रीश्रीनिवासाचार्य ने श्रीब्रह्मसूत्र पर जो श्रीनिम्बार्क भगवान् का "वेदान्तपारिजात" नामक 'वाक्यार्थ' है, उस पर "वेदान्तकौस्तुभ" नामक भाष्य बनाया, तथर गीता एवं अन्य अष्टादशो- पनिषदों का भाध्य बनाया ॥२८॥ श्रुतिस्मृप्यविरोधं हि भिन्नाभिन्न प्रकाशयन् । विश्वाचार्याधनन्तैश्च शिष्यैर्दिग्विजये ययौरस श्रुतिस्मृति से अविरोध जो सत्य भिन्नाभिन्न ( द्वैताद्वैत ) मत है, उसका प्रकाशन करके श्रीश्रीनिवासाचार्य निज श्रीविश्वाचार्य आदि अनन्त (अगणित) शिष्यों के साथ दिग्विजय करने अर्थात् पाषण्डमत का मर्दन करके अनादि पैदिक वैष्णव-सत्सम्प्रदाय का यथावत् प्रचार करने के लिये अपने आश्रम से पधारे ॥२८॥ - , वैष्णवसर्वस्व। 11 कृत्वा दिग्विजय पूर्ण त्रिः परिक्रम्य भारतम्। सर्वानधार्मिकान् जित्या स्थाप्य धर्म सनातनम् तत्र तत्र स्वकान् शिष्यान् संस्थाप्य च यथाविधि गुरोः सकाशमागत्य प्रणिपत्य पुनः पुनः ॥३१॥ गोवर्द्धनं समासाद्य विष्णुभक्तो जितेन्द्रियः । शिष्यानध्यापयामास श्रीनिवासोमुनीश्वरः ३२ मुनीश्वर, जितेन्द्रिय,विष्णुभक्त,श्रीश्रीनिवासा- चार्य पूर्णरूप से दिग्विजय कर, भारतवर्ष की तीन परिक्रमा कर, समस्त अधार्मिकों को जीत, वैष्णव धर्म का भलीभांति प्रचार कर, स्थान स्थान में अपने शिष्यों को विधिपूर्वक नियत कर, निज गुरुदेव श्रीनिम्बार्क महामुनि के समीप श्रा, और उन्हें वारंबार दण्डवत्प्रणाम करके अपने श्रीगोवर्द्धन में आकर शिष्यों को वेदादि सच्छाखों का अध्ययन कराने लगे ॥३०॥३१॥३२॥ इत्याचार्यचरित्रस्य विशामे विश्वसंज्ञके। श्रीनिवासार्यवर्यस्य दिग्जयः कथितःशुभः॥३३॥ इस प्रकार श्रीमदाचार्य चरित के त्रयोदश विश्राम में श्रीश्रीनिवासाचार्य धर्य का शुभ दिग्विजय कहा गया ॥३३॥ इतिश्री श्रीमदाचार्यचरितस्य त्रयोदशो विश्रामः समाप्तः ॥ १३ ॥ ॥४०॥ आश्रम श्रीश्राचार्यचरित। ~M/Vvvve Mumminen श्रीश्रीराधाकृष्णाभ्यान्नमः । एवं श्रीश्रीनिवासस्य कथिता महिमा मया । श्लोकत्रयो च तस्यैव प्रोच्यते स्तुतिरूपिका १ इस प्रकार श्रीश्रीनिवासाचार्य की महिमा का वर्णन मैने किया। उनकी स्तुतिवाली "लोकत्रयी" सुनो ॥ १॥ शंखावतारः पुरुषोरामस्य, यस्य ध्वनिः शास्त्रमचिन्त्यशक्त:। यत्स्पर्शमात्राटु ध्रुव आत्मकाम- स्तं श्रीनिवासं शरणं प्रपद्ये ॥२॥१॥ जिन अचिन्त्यशक्ति पुरुषोत्तम भगवान् के शंख की ध्वनि ही शास्त्र है और जिस शंख के स्पर्शमात्र से ध्रुवजी अपने सम्पूर्ण मनोरयों को पा गए थे, उन्हीं शंख के अवतार श्रीश्रीनिवासाचार्य के शरण में हम प्राप्त होते हैं ॥२॥१॥ श्रीमनिम्बदिवाकरांनियुगल- ध्यानामृताऽपानतो, वेदान्ताम्बुधिमाकलय्य सहसा, वालोझ स्वाभाविकम् । भिन्नाभिन्नमतामृतं चिदचित- श्वापाययत्स्वाश्रिताँ- स्तं सर्वज्ञमनन्तशक्तिकमहं, श्रीश्रीनिवासं भजे ॥३॥ २॥ (१९) न.

१४६ वैष्णवसर्वस्व । .. श्रीनिम्बार्क भगवान् के युगल चरणारबिन्दों के ध्यानरूपी अमृत के पान करने से अनायास ही वेदान्तरूपी समुद्र का मयन करके जिन महानुभाव ने चित् और अचित् के " स्वाभाविक भेदाभेद" सिद्धान्तरूपी अमृत को निजजनों को पिलाया, उन अनन्त-शक्तियुक्त, सर्वज्ञ, श्रीश्रीनिवासाचार्य का हम भजन करते हैं ॥३॥२॥ यो वै भारतखण्डमण्डलगतान्, पाषण्डवादान्वितान् । श्रीमदव्यासमुखाब्जजामृतरसं, युक्त्या परं दूषकान् । वेदान्तार्थविरुद्धवादरचनैः, सिद्धान्तविप्लावकान् । जित्वा भागवतं च येन विततं, तं श्रीनिवासं भजे ॥४॥३॥ सारे भारतवर्ष में फैले हुए पाषण्डमतवालों को, जो कि श्रीमद्वेदव्यासजी के मुखारविन्द से निकले हुए अमृत (ब्रह्मसूत्र) में अपनी तुच्छ युक्तियों से दूषण दे रहे थे, तथा वेदान्तसिद्धान्त के विरुद्ध बाद-विवाद खड़ा करके सत्यसिद्धान्त को डुवा रहे थे, उन कुतर्कपरायण नास्तिकों को बाद में जीत कर जिन्होंने समस्त भारतवर्ष में " भागवतधर्म" का विस्तार किया, उन श्रीग्रीनिवासाचार्य का श्रीप्राचार्यचरित। १४७ VIJN से ॥ तत्त्व हम भजन करते हैं ॥४॥३॥ विश्वाचायण कथितं स्तोत्रं पठति यः सदा। स नरः श्रीनिवासस्य कृपया तत्त्वभाग्यभवेत्५ श्रीश्रीविश्वाचार्य के कहे हुए इस स्तोत्र को जो लोग नित्य पढ़ते हैं, वे लोग श्रीश्रीनिवासाचार्य की कृपा ज्ञान को पा जाते हैं ॥५॥ चरितं श्रीनिवासस्य प्रोक्तं संक्षेपतोऽधुना। विस्तरं तु पुनर्बक्ष्ये तस्य दिग्विजये शुभे ॥६॥ श्रीचीनिवासाचार्य का चरित यहां पर तो बहुत ही संक्षेप में कहा गया है; किन्तु उनके विस्तृत चरित को फिर से उनके कल्याण-कारक "दिग्विजय" नामक ' खण्ड ' में कहेंगे ॥६॥ इत्याचार्यचरित्रस्य विशामेऽथ चतुर्दशे । श्रीनिवासार्यदेवस्य स्तोत्रमेतदुदीरितम्॥७॥ इस प्रकार 'श्रीनाचार्यचरित' के चौदहवें विश्राम में श्रीश्रीनिवासाचार्यदेव का यह 'लोकत्रयी' नामक स्तोत्र कहा गया ॥ ७ ॥ इतिश्रीश्रीमदाचार्यचरितस्य चतुर्दशी विश्रामः समाप्तः ॥ १४ ॥ ॥४८७ वैष्णवसर्वस्व । NNN श्रीश्रीराधाकृष्णाभ्यानमः । पाषण्डपादपविदाहकचण्डवहि, श्रुत्यन्तपुष्करविकासनभानुरूपम् । वादप्रगल्भगिरिखण्डनबज्जतुल्यं, श्रीश्रीनिवासमनिशं गुरुवर्यमीडे ॥१॥ पाषण्डरूपी वृक्ष के भस्म कर डालने के लिये प्रचण्ड अग्निस्वरूप, अतिसिद्धान्तरूपी पुष्कर के प्रफुल्ल करने के लिये सूर्यस्वरूप और विवाद करने में ढीठ, वादीरूप पर्वत के विदारण करने में बज्र के समान, गुरुवर्य श्रीश्रीनिवासाचार्य की हम निरन्तर स्तुति करते हैं ॥१॥ वादप्रगल्भमतवादिमहागजानां, साक्षान्मृगेन्द्रसदृशं श्रतिवादनादम् । क्लेशाद्यपारजलधेर्घटयोनिमग्य, श्रीश्रीनिवासमनिशं गुरुवर्यमीडे ॥ २ ॥ विवाद करने में महा ढीठ,मतवादी गजेन्द्रों के लिये साक्षात् श्रुतिवाद का नाद करते हुए मृगेन्द्र के और क्लेश आदि अपार समुद्र के सोखने के लिये साक्षात् अगस्त्यमुनि के समान, गुरुवर्य श्रीश्रीनिवासाचार्य की हम निरन्तर स्तुति करते हैं ॥३॥ प्रड्डादवेदपरिताडनतत्परस्य, दैत्याधिपस्य परतर्कमहामतस्य । सदृश, १४८ গ্রীষ্মানি। मायादिवादकुशलस्य नृसिंहरूपं, श्रीश्रीनिवासमनिशं गुरुवर्यमीडे॥३॥ प्रल्हादरूपी वेद के विनष्ट करने के लिये तत्पर, परतकरूप महामतवाले, मायादि वाद करने में कुशल, दैत्यराज (हिरण्यकशिपु ) के लिये जो नसिंहभगवान् के समान हैं, उन गुरुवर्य श्रीश्री- निवासाचार्य की हम निरन्तर स्तुति करते हैं ॥३॥ संसारतापशमनाय निजाश्रितानां, रक्षादिपञ्चकरणादिसुधाकरं वै। स्वापनकर्मभुजगस्य हि वैनतेयं, श्रीश्रीनिवासमनिशं गुरुवर्यमीडे ॥४॥ अपने आश्रित जनों के संसाररूपी ताप को दूर करने के लिये पञ्चप्रकार संस्कारादिक से रक्षा करनेवाले चन्द्रमा के समान, तथा स्वार्थमयकर्मरूपी सर्प के लिये साक्षात् गरुडस्वरूप, गुरुवर्य श्रीश्री- निवासाचार्य की हम निरन्तर स्तुति करते हैं ॥४॥ ज्ञानामृतार्णवसुधाकरमद्वितीय, सटुक्तवृन्दपरिरक्षणतत्परं च । ब्रह्मस्वरूपमपरं हरिदासदेवं, श्रीश्रीनिवासमनिशं गुरुवर्यमीडे ॥५॥ ज्ञानामृतसागर के अद्वितीय चन्द्रमा, सद्भा- वृन्दों की रक्षा में तत्पर, अपर ब्रह्मस्वरूप, हरिदासों के देवता, गुरुवर्य श्रीश्रीनिवासाचार्य की हम

१५०
भक्तिरूप समुद्र
वैष्णवसर्वस्व ।
निरन्तर स्तुति करते हैं ॥ ५ ॥
भत्त्यर्णवाम्बुजविभाकरमप्रमेय
सत्कर्मपद्ममकरन्दमधुव्रताग्यम् ।
पद्मासनस्थमखिलागमबोधसिन्धं,
श्रीश्रीनिवासमनिशं गुरुवर्यमीडे ॥६॥
के कमल के
प्रफुल्ल करने के
लिये अप्रतिम सूर्य, सत्कर्मरूपी कमल के मकरन्द
के प्रधान अमर, पद्मासन से विराजमान, सम्पूर्ण
भागमों के ज्ञान के सागर,गुरुवर्य श्रीश्रीनिवासाचार्य
की हम स्तुति करते हैं ॥ ६ ॥
राधाप्रियस्य नबवारिजलोचनस्य,
कृष्णस्य भक्तपरिरक्षणतत्परस्य।
सेवाविधौ परमतत्परचित्तवृत्तिम्,
श्रीश्रीनिवासमनिशं गुरुवर्यमीडे ॥ ७ ॥
भक्तों की रक्षा में लगे हुए, नव कमलदल
लोधन, श्रीराधिकाजी के प्यारे, श्रीकृष्ण की सेवा
विधि में जिनकी चित्तवृत्ति पूर्णरूप से लगी हुई है,
उन गुरुवर्य श्रीश्रीनिवासाचार्य की हम वारंवार
स्तुति करते हैं ॥ ७॥
वेदव्रतं मुनिवरं परमं वरिष्ठं,
निम्बार्कशिष्यमपरं हरिरूपरूपम् ।
संसारतापशमनं सुखदं सुरम्यं,
श्रीओनिवासमनिशं गुरुवर्यमीडे ॥ ८॥

१५१ - -~~ v vvvvvvvv vv श्रीआचार्यचरित। वेदव्रत, मुनिवर, परमश्रेष्ठ, श्रीनिम्बार्क भगवान् के शिष्य, श्रीहरि के दूसरे रूप, संसार के तीनों तापों के दूर करनेवाले, सुख के दाता, तथा परम रमणीय, गुरुवर्य श्रीश्रीनिवासाचार्य की हम वारंवार स्तुति किया करते हैं ॥८॥ इत्यष्टकं मुनिवरस्य मुकुन्दमूर्तः, सदुक्तिदं परमशोभनमद्वितीयम् । नित्यं पठन्ति भुबि ये मनुजाश्च धन्या- स्ते प्राप्नुवन्ति हरिभक्तिमुदारभावाम् । मुकुन्द भगवान् की मूर्ति, मुनिवर श्रीश्री- निवासाचार्य का यह " परमशोभन, अद्वितीय और सद्भक्ति का देनेवाला है। संसार में इसे जो लोग नित्यप्रति पढ़ते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं और वे उदारभावा श्रीहरिभक्ति को पा जाते हैं। श्रीहंसं सनकादींश्च नारदं निम्बभास्करम् । श्रीश्रीनिवासमाचार्य भाष्यकोरंभजेनिशम् १० श्रीहंस, श्रीचतुःसन, श्रीनारद, श्रीनिम्बार्क और भगवान् भाष्यकार श्रीश्रीनिवासाचार्य का हम निरन्तर भजन करते हैं ॥ १० ॥ श्रीमनिम्बदिवाकरांधिजलज, तापत्रयोन्मूलनम्। वेदान्ताम्बुजमाधुरीरससुधा- मतालिभिः सेवितम् ॥ अष्टक

Shree Acharayacharitam

Author
Shree Shree Acharaya Charit
Title
Shree Acharayacharitam
File name
Shree Acharayacharitam
Text
OCR done
Citation
1911
Published
25.06.06
Publisher
B.r Ghanchakar Press Kashmir
Language
Sanskrit
Pages
149
Library
University Liberey Allahabad
Classification
Literature (snskrit)
DLI number
485397
Barcode
5990010098446.00
Scanning centre
IIIT, Allahabad
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