Digamber Jain Atishay Kshetra, Jain Vidhya Sansthan Library, Shri Mahaveer Ji, (karauli )

Shri Sarvodiya Tirth Granth

Shri Abhi Nandan Maharaj · 2010/09

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प्रकाशकीय । राजस्थान और विशेषत' जयपुर प्रान्त मे दि० जैन मन्दिरों मे बहुत सा प्राचीन साहित्य अज्ञात प्रवस्था में पड़ा हुआ है, किन्तु किम किस मन्दिर एवं ग्रन्थ भण्डार में कितनी संख्या मे कौन कौन से शास्त्र वराजमान है, हमारे पास इतनी भी सूचना का संकलन नहीं है। इन प्रन्य भण्डारो मे जो अमूल्य साहित्य बखरा पड़ा है वह अपने उद्धार की वाट देख रहा है। राजस्थान मे उपलब्ध जैन साहित्य के प्रकाशन एव शोध की नितान्त आवश्यकता को ध्यान में रखकर दि० जैन अतिशय क्षेत्र श्री महावीरजी की प्रवन्ध कारिणि कमेटी ने अनुसंधान विभाग खोलने का विचार किया। सबसे पहिले प्रबन्ध समिति ने राजस्थान के नहीं, तो कम से कम जयपुर के जेन भण्डारो की एक संक्षिप्त सूची बनवाने तथा उनमे उपलब्ध उपयोगी साहित्य का प्रकाशन कराने का कार्य प्रारंभ किया। इसी के फलस्वरूप आमेर शास्त्र भण्डार जो भारत के प्रसिद्ध शास्त्र भण्डारो मे गिना जाता है उसकी एक विस्तृत सूची प्रकाशित की गयी। यह प्रशस्ति सग्रह भी इसी विभाग द्वारा प्रकाशित किय जा रहा है। इसमे केवल आमेर शास्त्र भण्डार के ही संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रश और हिन्दी भाषा के उपलब्ध ग्रन्थों की प्रशस्तियो का ही सकलन है पन्थ प्रशस्तियो के साथ २ लेवक प्रशस्ति भी जोड दी गयी है जिससे ग्रन्थ के समय आदि के निर्णय मे काफी सहायता मिलेगी। अपभ्रंश साहित्य की ४० से अधिक ग्रन्धों की प्रशस्तिया इस सग्रह मे मिलेगी जो इस साहित्य के महत्व को प्रकट करने मे काफी सहायता देगी। इस संग्रह के प्रकाशन से जैन साहित्य की सोज मे कितनी सहायता प्राप्त होगी इसका अनुमान तो विद्वानगण हो कर सकेगे। इस प्रकाशन के अतिरिक्त प० अखयराज कृत 'चतुदेश गुणस्थान चर्चा' शीघ्र ही पाठकों के सामने आने वाली है । अपभ्रंश भाषा के प्रसिद्ध महाकवि नयनन्दि कृत 'सुदर्शन चरित्र' का भी सम्पादन हो रहा है और उसके प्रकाशन का कार्य शुरू होने वाला है। जयपुर और राजस्थान के दि० जैन शास्त्र भण्डारों की विस्तृत सूची का कार्य भी प्रारम्भ होने वाला है जिससे कम से कम उपलब्ध प्रन्थों का साधारण परिचय तो प्रान हो सकेगा। प्रवन्ध कारिणि के सामने साहित्य प्रकाशन की बहुत बड़ी योजना है। तामिल, तेलगू और कन्नड भाषा मे जो महत्त्वपूर्ण साहित्य अप्रकाशित अवस्था मे है उसे भी प्रकाशित करवा कर जन साधारण के लिये सुलभ बना देने की हार्दिक इच्छा है। इस दिशा मे श्री० सी० एस० मल्लिनाथजी, भूतपूर्व सम्पादक अग्रेजी जैनगजट द्वारा भी कार्य शुरू कर दिया है। इधर जैन समाज के प्रसिद्ध साहित्य सेवी बाबू जुगलकिशोरजी साहव मुख्तार देववाद वालो से उनका श्री वीर सेवा मन्दिर श्री महावीर जी मे लाने तथा वहीं बैठकर साहित्यो. द्धार का कार्य करने की बातचीत चल रही है। यदि वह वातचीत सफल हो गयी तो यह कार्य और भी तेजी से हो सकेगा-ऐसी आशा है। साहित्योद्धार का कार्य कितना उपयोगी एवं आवश्यक है यह सब कुछ जानते हुये भी नैन समाज की इस सम्बन्ध मे घोर उदासीनता बड़े दुःख की बात है। जो समाज देव शास्त्र गुरु का घराबर का दरजा प्रकाशकीय -- , है राजस्थान और विशेषत' जयपुर प्रान्त मे दि जैन मन्दिरों में बहुत सा प्राचीन साहित्य प्रतान अवस्था में पड़ा हुआ है, किन्तु किम किम मन्दिर एवं ग्रन्थ भण्डार में कितनी सख्या मे कौन कौन से शास्त्र विराजमान है, हमारे पास इतनी भी सूचना का संकलन नहीं है। इन प्रन्थ भण्डारों में जो अमूल्य साहित्य बिखरा पडा है वह अपने उद्वार की बाट देख रहा है। राजस्थान मे उपलब्ध जैन साहित्य के प्रकाशन एव शोध की नितान्त आवश्यकता को ध्यान में रखकर दि० जैन अतिशय क्षेत्र श्री महावीरजी की प्रबन्ध कारिणि कमेटी ने अनुसधान विभाग खोलने का विचार किया। सबसे पहिले प्रबन्ध समिति ने राजस्थान के नहीं, तो कम से कम जयपुर के जैन भण्डारो की एक संक्षिप्त सूची बनवाने तथा उनमे उपलब्ध उपयोगी साहित्य का प्रकाशन कराने का कार्य प्रारभ किया। इसी के फलस्वरूप आमेर शास्त्र भण्डार जो भारत के प्रसिद्ध शास्त्र भण्डारों में गिना जाता उसकी एक विस्तृत सूची प्रकाशित की गयी। यह प्रशस्ति सग्रह भी उसी विभाग द्वारा प्रकाशित किय जा रहा है। इसमें केवल 'ग्रामर गान्त्र भण्डार के ही संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रश और हिन्दी भाषा के उपलब्ध ग्रन्थों की प्रशस्तियों का ही सफलन है। ग्रन्थ प्रशस्तियों के साथ २ लवक प्रशस्ति भी जोड दी गयी है जिससे ग्रन्थ के समय प्रालि के निणय में काफी सहायता मिलेगी। अपभ्रंश साहित्य की ४० से अधिक प्रन्धों की प्रशस्तियां इस संग्रह मे मिलेगी जो टम साहित्य के महत्व को प्रकट करने में काफी सहायता देगी। इस सग्रह के प्रकाशन से जैन माहित्य की नोज मे कितनी सहायता प्राप्त होगी इसका अनुमान तो विद्वानगण हो कर सकेंगे। इस प्रकाशन के अतिरिक प० असयराज कृत 'चतुदेश गुणम्थान चर्चा' शीघ्र ही पाठकों के मामने आने वाली है । अपभ्रंश भापा के प्रसिद्ध महाकवि नयनन्दि कृत 'सुदर्शन चरित्र' का भी सम्पादन हो रहा है और उसके प्रकाशन का कार्य शुरू होने वाला है। जयपुर और राजस्थान के दि० जैन शास्त्र भण्डारी की विस्तृत सूची का कार्य भी प्रारम्भ होने वाला है जिससे कम से कम उपलव्य प्रन्धों का साधारण परिचय नी प्राम हो सकेगा। प्रवन्ध कारिणि के सामने साहित्य प्रकाशन की बहुत बडी योजना है। तामिल, तेलगू, और कन्नट भाषा मे जो महत्त्वपूर्ण साहित्य अप्रकाशित अवस्था मे है उसे भी प्रकाशित करवा कर जन साधारण के लिने सुलभ बना देने की हार्दिक इच्छा है। इस दिशा मे श्री० सी० एस० मल्लिनाथजी, भूतपूर्व सपाटक "अग्रेजी जैनगजट द्वारा भी कार्य शुरू कर दिया है। इधर जैन समाज के प्रसिद्व माहित्य सेवी वाचू जुगलकिशोरजी साहब मुख्तार देवचंद बालो से उनका श्री वीर सेवा मन्दिर श्री मावीरजी मे लाने नया वहीं बैटरर माहिती. द्धार का कार्य करने की बातचीत चल रही है। यदि वह बातचीत सफल हो गयी तो यह कार्य और नेनी से हो सकेगा-ऐमी प्राशा है। साहित्योद्धार का कार्य कितना उपयोगी एवं आवश्यक है यह मर पुर जानने ये भी जैन समाज की इस सम्बन्ध मे घोर उदासीनता बरे दुःख की बात है। जो समाज देव शास्त्र गुम का पराबर का हाल -- ) प्रस्तावना प्राचीन काल मे मुद्रण यन्त्र (छापाखाना) के आविष्कार के पहिले मनुष्य ने पत्रों (ताम्रपत्र व ताडपत्र) तथा कागजों पर हाथ मे लिम्व लिम्ब कर ही अपने साहित्य एव ज्ञान की वृद्धि की थी। उम ममय भी भारत मे सैकडो एव हजारों विद्वानों ने जन्म लिया और अपनी लेखनी से भारतीय साहित्य के सभी अंगो को पूर्ण किया। हाथ से लिपपने के म युग मे शास्त्र भण्डारों एवं पुस्तकालयों की संख्या पर्याप्त थी।' प्रत्येक नगर एव गाव मे मन्दिरों तथा अन्य धर्मस्थानों में शास्त्र भण्डार होते थे जिनका प्रत्येक मनुष्य पठन पाठन के लिये उपयोग कर सकता था। जैनाचार्यों ने दान के चार भेदो मे शास्त्रदान को सम्मिलित किया और हमी के सहारे नान के विशिष्ट साधन पुस्तकों के लिग्बने लिखवाने को श्रावकों के दैनिक जीवन में उतारा । जिस तरह मन्दिरी को बनवाने एवं प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा करवाने मे पुण्यलाभ बतलाया उसी प्रकार शास्त्रों को लिखकर अश्या लिग्रवा कर शास्त्रभण्डारो को भेट करने मे भी कम पुण्यलाभ नहीं बतलाया। यही नहीं, किन्तु जितनी भक्ति व श्रद्धा उपास्य देवताओं मे रखने के लिये उपदेश दिया उतनी ही श्रद्धा व भक्ति शास्त्रों के प्रति भी प्रदर्शित करने को कहा । जैनाचार्या के इस उच्चतम उपदेश के कारण ही आज हमे प्रत्येक मन्दिर में शास्त्रभण्डार के दर्शन होते है अन्यथा हजारो वर्षा से राज्याश्रयहीन जैन धर्म का साहित्य आज उम विशाल मात्रा में नजर नहीं आता। श्रद्धालु श्रावकों ने प्राचार्यों के इस उपदेश को अक्षरश पालन किया और अपने जीवन अथवा द्रव्य का बहुत भाग इस पुण्य कार्य में भी व्यतीत किया । शास्त्र लिखने और लिग्ववाने मे साधुओं और गृहस्थों का समान हाय रहा है। माधुओं ने हजारों शास्त्र लिखकर जैन वाड्मय की वृद्धि की तथा श्रावकों ने शास्त्रो की प्रतिलिपिया करवाकर उसका 'प्रत्याधिक प्रचार किया और साधुओं से अनुरोध करके नवीने साहित्य का निर्माण भी करवाया । जैनों का अधिराम अपभ्रंश एव हिन्दी साहित्य का निर्माण इन्हीं श्रावकों के अनुरोध एव भक्ति का परिणाम है। दो प्रकार की प्रशत्तिया इम मग्रह मे दी गई है। एक तो वे जो स्वय करि अथवा प्रन्थकनी द्वारा लिखी गयी है तथा इमरी वे जो लिपिकारों ने लिपी है । पहिली का नाम प्रन्य प्रशस्ति तथा दूसरी का नाम लेखक प्रशस्ति है । अन्य प्रशस्ति मे कवि का परिचय, भट्टारक परम्परा का उल्लम्ब, तत्कालीन भट्टारक का नाम ; देश व स्थान व समय का निर्देश तथा वहां के शामक का परिचय प्रादि दिये हुये होते है। लेखक प्रशस्ति मे सबसे पहिले समग्र फिर प्राम व नगर का नाम, यहा के शासक का नाम, उसके पश्चान भट्टार परम्परा का उल्लेख तथा तत्कालीन भारत का नाम, उसके पश्चात लिपि करवाने वाले का विस्तृत यश परि नय. लिपि किस निमित्त से करायी गयी और अन्त मे लिपि का नाम दिया हुआ मिलता है । दिनी पनि में निर्दिष्ट बातों से कम अथवा ज्यादा का भी वर्णन मिल जाता है। प्रन्य मा जेब माधु अथवा भट्टारक होने है तो ये अपना वंश परिचय नीनियने रिहाना अधवा भट्टारक के शिष्य होते हैं उनका परिचय लिम्बने हैं। मन्कन प्रन्यों की परिकामा प्रत्यानिमी ।

- माता है। अब तीनों भागों का संक्षिप्त परिचय पाठको के सामने उपस्थित किया जाता है- संस्कृत विभाग- इसमे ५९ मन्थ-प्रशस्तियों एव ५० लेखक-प्रशस्तियों का माह है। इन प्रशस्तियों मे जिनसेन, अमितिगति ण्व प्राशाधर आदि प्राचीन प्राचार्या को छोड कर शेप १५वीं शताब्दी से लेकर १८वीं शताब्दी तक के विद्वानों द्वारा निर्मित ग्रन्थों की प्रशस्तियों का ही संकलन है। इन विद्वानों मे सकलकीर्ति, शुभचन्द्र, सकलभूपण, नानभूषण, धर्मकीर्ति, मेधावी, सोनकीर्ति, रायमल्ल, नेमिदत्त, जिनदास. नानकीर्ति आदि प्रमुख है । इन विद्वानों का बहुत कुछ परिचय इन प्रशस्तियों के आधार पर एकत्रित किया जा सकता है । अधिकांश विद्वानों ने साधु अवस्था धारण करने के पश्चात ग्रन्थ निर्माण किया था इसलिये अपनी गृहस्थ अवस्था का परिचय कुछ भी नहीं लिया । गत ५०० वर्षो मे इन विद्वानों ने संस्कृत साहित्य की अत्यधिक सेवा की है। हिन्दी के लगातार जनप्रिय बनते रहने पर भी इन विद्वानों ने संस्कृत साहित्य का निर्माण करके सस्कृत पठन पाठन के प्रति प्रेम ही प्रदर्शित नहीं किया किन्तु अपनी विद्वत्ता का भी परिचय दिया। इस युग मे पुरागण एवं कथा साहित्य ही अधिक लिखा गया । इससे ऐमा मालूम होता है कि उस युग मे भी नाधारण जनना सिद्वान्त ग्रन्थों के स्वाध्याय मे उतनी दिलचस्पी नहीं लेती थी जितनी पुराण एवं कथा साहित्य के पठन पाठन मे लेती थी। इसी से विद्वानों ने भी इस प्रकार साहित्य के द्वारा ही सिद्धान्त एव पौराणिक ज्ञान को जीवित रखने का एकमात्र उपाय समझा । प्राकृत अपभ्रंश- विभाग- हिन्दी भाषा के पूर्व अपभ्रश बोलचाल की भाषा होने के कारण जैनाचार्यों ने श्रावकों के अनुरोध से इस भाषा मे अपरिमित माहित्य का निर्माण किया । इसलिये जितना अपभ्रश साहित्य जैनाचार्यों द्वाग लिखा गया है उसका एकाश भी अन्य विद्वानों द्वारा लिखा हुआ नहीं मिलता। इस मग्रह मे अपभ्रश के ४९ ग्रन्थों की प्रशस्तियां दी गयी है । इन अन्य प्रशस्तियों मे अपभ्रंश भाषा के प्रायः सभी विद्वानों का परिचय मिल सकता है। अपभ्रश भाषा के इन आचार्यो मे म्बयभु, पुष्पदत, पद्मकीर्ति, वीर. नयनन्दि, श्रीधर, श्रीचन्द, हरिपेण, अमरकीर्ति, यश कीर्ति, धनपाल, श्रुतकीर्ति, रइधू, माणिक्कराज आदि प्रमुग्य है। अपभ्रंश भाषा फे साहित्य का अधिकाश निर्माण १३वीं शताब्दी तक ही हुपा है यापि इसके पश्चात् भी रइधृ. या कोनि, धनपाल, श्रुत कीर्ति, और माणिक्कराज ने १६वी शताब्दी तक इस भाषा मे स्वृव माहित्य नित्य है । भण्डार में अपभ्रश अन्थो की जितनी प्रतिया है वे प्राय सभी १७वीं शताब्दी तक की है। अधिकांश प्रतिया १६वी 'tr १७वीं शताब्दी की है। यह उस समय भी अपभ्रंश का जनप्रिय मना रहना सिद्ध करता है। अन्य प्रशस्तिका प्रायः सभी विपद एवं विस्तृत है। मभी कवियों ने अपने प्रात्रयदाता धायकों का विशद र मुन्नर परिचर लिसा है। अपभ्रंश भाषा के प्रधिकतर विद्वान गृहस्थ थे इमलिये उन्होंने अपने कुल एवं जाति का भी प्रा परिचय लिया है। पामेरशान्त्र भण्डार 'अपभ्रंश-साहित्य-सग्रह के लिये भारत मे मनसे पागे है। हम भाटा मे किमी प्रन्ध की तो दस दस प्रतियां तक मिलती है। कुद ऐमी भी प्रतिया है जो भारत के अन्य ।

( ७ ) है। संग्रह मे अधिकाश प्रशस्तियां एव लेखक-प्रशस्तिया आचार्य कुन्दकुन्द, भट्टारक पद्मनन्दि तथा शुभचन्द्र आम्नाय मे - होने वाले भट्टारकों द्वारा लिखी हुई मिलती है । यद्यपि इनमे भी आगे चलकर कितनी ही नवीन भट्टारक परम्पराओं का जन्म होता है. उदाहरणार्थ भट्टारक सकलकीर्ति ने प्राचार्य कुन्दकुन्द एवं भट्टारक -- पद्मनन्दि को - ही आदि मान कर एक नवीन परम्परा को जन्म दिया तथा इसके पश्चात होने वाले सकलकीत्ति के सभी पट्टधर शिष्यों ने उसी प्रकार भट्टारक परम्परा का उल्लेग्य किया। इसके अतिरिक्त सेनगण, पुष्करगण एव विवागण मे होने वाले भट्टारकों का भी काफी अच्छा परिचय उपलब्ध होता है। जैन समाज की प्रमुस जातियां- उत्तर भारत में ग्रएडेलवाल और अप्रवाल इन्ही दो जातियों का जैन साहित्य की रना एवं वृद्धि मे विशेप हाथ रहा है। राजस्थान मे प्रारम्भ से ही खण्डेलवाल जाति का प्रभुत्व रहा इसलिये यहां के साहित्य निर्माण एव प्रचार का अधिकाश श्रेय इसी जाति को है । अग्रवाल जाति का दिल्ली, आगरा, ग्वालियर आदि स्थानों में व्यापक प्रभाव रहा है। अपभ्रंश साहित्य के निर्माण का अधिकांश श्रेय इसी जाति को दिया जा सकता है । अपभ्रंश ग्रन्थों के बहुत से लेखक भी इसी जाति में उत्पन्न हुये थे। प्राचीन काल मे अप्रवाल जाति के लोगों का सारे भारत पर प्रभाव था। पूस जाति का एक हजार वर्ष का इतिहास तो प्रशस्तियों के आधार पर तैयार किया जा सकता है। श्रीयर ने १२वीं शताब्दी की रचना मे जिस नहल साह की प्रशसा की है उसने भी इस जाति को सुशोभित किया था। कवि के अनुसार नट्टल साह का प्रभाव कलिग, द्राविड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पचाल. सिंधु, गौर प्रादि सभी दशों मे व्याम था ! महा पंडित रइधू ने अपनी अधिकाश रचनायें इसी जाति में अपन्न होने वाले श्रावको के अनुरोध से की थी । इन दोनो जातियों के अनिरित बघेरवाल, श्रीमाल, पुरवाल, लमेच जमवाल 'प्रादि जातियों मे उत्पन्न श्रावकों द्वारा भेट दिया हुप्रा मारित्य भी काफी सरया मे मिलता है । इसी प्रकार इक्ष्वाकु. तोमर, चालुक्य. राठौर श्रादि जत्रिय शक 3 कायस्थ, माथुर प्राटि गान्य जातियों के महानुभावो ने भी साहित्य प्रचार में काफी सस्योग दिया। पाठको की माधारगा जानकारी के लिये प्रशस्ति-सग्रह में पाये हुये प्राचार्य लवको सब रियो का प्रति सचिप्त परिचय भी उपस्थित किया जारहा है- - संस्कृत भाषा के विद्वान् १. भट्टाफलंकदेर-जैनधर्म के विरयात मैद्धान्तिक एवं दानिक प्राचार्या में नाप मार है। 'प्रारके जीवन के सम्बन्ध में अनेक कहानिया प्रचलित हैं। याद न रे काल में पापने जैन दर्गन को जीवित ही नहीं मा चिन्तु से 'गजेग य उत्कर्दमय बना दिया। मापने सम्मान में प्रमों की रचना की है। उनकी राजगानिक, अशनी, न्यायधिनिययालकार 'प्रादि प्रमित पचना मिलती हैं।

(१) - प्रनिष्ठाता पद्मप्रभसूरि थे । टीका का नाम सुबोधिका टीका है। ९. चन्द्रकीर्ति-काष्टामय मे होने वाले भट्टारक रामसेन की परम्परा मे ये श्री विद्याभूषण के शिष्य थे । इन्होंने पद्मपुराण की रचना इन्हीं के पास रह कर की थी। चन्द्रकीर्ति मुनि थे । १० चारित्रसुन्दर गणि--कवि ने सर्वप्रथम विजयेन्द्र मूरि को स्नरण किया है उनके पश्चान होने वाले शियों का उल्लंग करते हुये इन्होंने अपने को रत्नसिंह सूरि का शिष्य लिखा है । महीपाल चरित्र को कवि ने १५२५ के पास पास समाप्त किया था। यह काव्य जामनगर से प्रकाशित हो चुका है । ११. जिनसेनाचार्य-हरिवश पुराण के कर्ता प्राचार्य जिनसेन पुन्नाट मघ के प्राचार्य थे । इनके गुरु का नाम कीर्तिपेण एव दादा गुरु का नाम जिनसेन था। इन्होंने हरिवंश पुराण को वर्द्धमानपुर मे शके संवत् ७.५ मे समान किया था। हरिवंश पुराण की गणना जैन पुराणों मे सर्वोपरि है । इसका प्रन्य परिमागा बारह हजार श्लोक प्रमाण है । पूरा पुराग ६६ मर्गी मे सम्मान होता है । जिनसेनाचार्य ने अपनी रचना के ६६वे सा में भगवान महावीर से लेकर लोहाचार्य तक की प्राचार्य परम्पर का उल्लेख किया है। १२. जानकीर्ति-- यशोधर चरित्र के रचयिता श्री ज्ञानकीति यति वादिभूषण के शिष्य थे। उन्होंने उस काव्य की रचना श्री नान के अाग्रह से की थी। नानू उस समय वगाल के गवर्नर (राजपाल) महाराजा मानसिंह के प्रधान अमात्य थे । जब प्रधान अमात्य सम्मेद शिखर की यात्रा पर गये तो वहा उन्होंने जीर्णोद्धार भी कराया था । कवि स्वय बगाल प्रान्त के अकन्छरपुर नामक नगर के रहने वाले थे । उन्होंने प्रन्ध को सवत १६५६ में समाप्त करके प्रधान मत्री को भेट किया था। १३. ज्ञानभूपण---भट्टारक सकलकीर्ति के प्रशिष्य एव भुवनकोनि के शिष्य थे। नानभूपरण मस्कत, हिन्दी और गुजराती के अच्छे विद्वान थे। इनका मूल निवास स्थान गुजरात था । उन्होंने भट्टारक बनने के पश्चात् अहीर, बागड, तौलव, नैलग द्राविड, व महाराष्ट्र श्रादि दक्षिण के प्रान्ना पर गांवों में ही विकार नहीं किया किन्तु उत्तरी भारत मे भी घूम २ कर जैनधर्म का प्रचार किया । इनके द्वारा रचिन तत्त्वज्ञान-तर गिनी सुन्दर एघ सरस रचना है । आपने मिद्वान्तसारभाप्य व कर्मकाण्ड टीका भी लिपी है। हिन्दी भाषा में भी आपकी कई रचनायें मिलती है इनमे आदीश्वरफाग उल्लेखनीय है । आपका ममय १५२५ से १५७५ तक अनुमानित किया गया है। तत्त्वज्ञान तर गिणी का रचना काल सवन १५६० है । १४. धर्मकीर्ति-उन्होंने पद्मपुराण को रचना सरोजपुरी (मालवा ) में की थी । भट्टारक लनितीनि इनके गुरु थे । धर्मकीर्ति का नामोल्लेख अनेक प्रशस्तियों में हुआ है। उन्होंने फनन्य को नंबन १६६५ में समाप्त किया था। सपत १६७० की प्रति में लिपिकार ने इनरी महारक नाम से मनोधित किया है मन ज्ञात होता है कि पद्मपुराण की रचना के पश्चात च भारफ पने थे । १५. आचार्य नरेन्द्रसेन-नने सिदान्नसारगंमा की रचना की है। चार वीमेन के irart गुणमेन के शिष्य थे।

- ( ११ ) काव्य भी है जिसकी पद्य सख्या १०१ है । इन्होंने अपने को प्रभाचन्द्र का शिष्य लिखा है । २३. विवेकनन्दि-इनका जन्म घरवाल जाति मे हुआ था। इनके नाना श्री नारायण तथा माना निजोणी थीं। त्रिभंगीसार की टीका पहिले श्रुतमुनि ने कर्णाटक भाषा मे लिखी उसके पश्चात् सोमदेव ने उसका लाटी भाषा में परिवर्तन किया उसी के आधार पर इन्होंने संस्कृत मे टीका का निर्माण किया था। २४. ब्रह्म कामरान इनके गुरु का नाम पद्मनन्दि था और इन्हीं के उपदेश से इन्होंने जयकुमार पुराण की रचना की। कवि ने सफल कीति की भट्टारक परम्परा मे होने वाले भट्टारकों की अच्छी नामावली दी है। प्रशस्ति मे इन्होंने अपने को भट्टारक नरेन्द्रकीति का भी शिष्य लिखा है । पण्डित जोवराज ने उक्त प्रन्थ को कवि से अनुरोध करके लिखवाया और फिर मन्दिर मे स्थापित किया । २५. ब्रह्मजिनदास- भट्टारक सकलकीर्ति के प्रमुग्य शिष्य थे। अपने गुरु के समान इन्होंने भी हिन्दी सस्कृत, गुजराती आदि भाषाओं में रचनाये लिखी है। सस्कृत में इन्होंने १२ से अधिक ग्रन्थ रचना की है जिनमे हरिचश पुराण, पद्मपुराण, जम्यूस्वामी चरित्र, हनुमच्चरित्र, बनकथा कोय आदि उल्लेखनीय हैं। हिन्दी मे आदिनाथपुराण, श्रेणिक चरित्र, सम्यक्त्वरास, यशोवररास, धनपालरास, व्रतकथाकोष आदि रचनाय उल्ले- रखनीय है । इन पर गुजराती का अत्यधिक प्रभाव झलकता है। २६. ब्रह्म नेमिदत्त-ये अग्रवाल जाति के थे । गोयल उनका गोत्र था। मालब देश मे प्राधानगर के रहने वाले थे । भट्टारक मल्लिभूपण इनके गुरु थे। सवत् १५८५ मे इन्होंने श्रीपाल चरित्र की श्री गोनिदाम के अनुरोध से रचना की थी। इसके अतिरिक्त सुदर्शनचरित्र एव नेमिनायपुराण प्रादि ग्रथों की भी आपने रचना की है । सुर्दशनचरित्र में इन्होंने प्रथ समाप्ति के समय 'मल्लिभूपण शिष्याचार्य श्री सिंहनन्दि' यह विशे- पण नहीं लगाया है और शेप दो में यह विशेपण मिलता है इससे यह मालूम पडता है कि मुर्दशनचरित्र इनकी सबसे पहिले की रचना थी। २७. ब्रह्मरायमल्ल हवड जाति में इनका जन्म हुप्रा या । इनके पिता का नाम महीय एव माना या नाम चपा था। समुद्र तट पर स्थित प्रीवापुर में इन्होंने भाकामर स्तोत्र की वृत्ति को समान किया था। मयत १६६७ मे रचित इस रचना के अतिरिक्त लेखक की अन्य रचना उपलब्ध नहीं है। २८. ब्रह्मजित--सुरेन्द्रकीत्ति के प्रशिष्य एवं विद्यानदि के शिष्य थे । श्रापका जन्म गोलभगार जाति में हुपा था। इनके पिता का नाम वीरसिंह तथा माता का नाम पीया या। हनुमच्चरित्र इनकी लंबीररचना है। २९. भट्टारक सोमसेन- सेनगा के प्राचार्य गुणभद्र के शिष्य थे । इन्होंने पद्मपुराण की रचना घराठ (जयपुर) प्रान्त के जितुरनगर में की थी । अरु ग्रन्थ को इन्हनि शक मयन १६५६ में निर्माण किस सा वर्णन मिलता है । लेकिन इमी की एक लेखक प्रशस्ति मे शक मयत १६१६ दे रग है। ३०, सकलकीर्ति-१५ वीं शताब्दी के बड़े भारी रिद्वान् एवं माहित्य मंत्री थे। गने गमन, प्राकृत. 'अपभ्रंश. हिन्दी, गुजराती मादि भाषाओं का गहन अध्ययन किया था। इन्होंने धरने 'वारको भट्टार ( १३ ) - मारुतदेव तथा माता का नाम पद्मिनि था । इनका सबसे छोटा पुत्र त्रिभुवन स्वयमु था। स्वयभु ने गृहस्थावस्था में ही साहित्य निर्माण किया । इन्होंने तथा त्रिभुवन स्वयभु ने मिलकर तीन ग्रन्यों की रचना की - पञ्मचरिय, रिट्टणेमिचरिउ या हरिवगपुराण, पंचमिचरिउ । तीसरा ग्रन्थ अभी तक उपलब्ध नहीं हो सका है । अपभ्रश भाषा के उपलब्ध साहित्य मे स्वयम्भु की रचनायें सबसे प्राचीन है। रचनायें साहित्य की सभी प्टियो से परिपूर्ण मानी जाती है । ये कवि रविपणाचार्य के पीछे हुर है । विद्वानों ने इनको एवीं शताब्दी का फनि माना है। ३८. पद्मकीर्ति --माधवसेन के प्रशिष्य एव जिनसेन के शिष्य थे। ये मुनि थे। मयन ९९९ मे उन्होंने पार्श्वनाथ-चरित्र की रचना समाप्त की थी। अपभ्रंश भाषा का यह बहुत पुराना काव्य है । उसमें १८ सधिया है। संवत् १४६६ की लिखित उसकी एक प्रति भण्डार में है। ३९. पुष्पदंत--अपभ्रंश भापा के सर्व श्रेष्ठ महाकवि माने जाते है। ये काश्यप गोत्रीय बामण थे। इनके पिता का नाम केशवभट्ट और माता का नाम मुग्धा देवी था । राष्ट्रकूटों की राजधानी मान्यखेट में रहकर इन्होंने साहित्य निर्माण का पवित्र कार्य किया था। कवि के ग्याश्रयदाता महामात्य भरत और नन्न थे। ये दोनों पिता पुत्र थे और महाराजा कृष्णराज (तृतीय) के महामात्य थे। अभिमानमेझ, अभिमानचिन्ह, काव्यरत्नाकर, कविकुलतिलक सरस्वतीनिलय श्रादि इनकी पदवियाँ थीं । महाकवि की तीन रचनाये मिलती है। महापुराण के दो खड है एक श्रादिपुराण और दूमरा उत्तरपुराण । नागकुमार चरित्र एक रयण्ड काव्य है और यशोधर चरित्र भी इसी तरह एक खन्ड काव्य है। विद्वानों ने इनको ११वों शताब्दी का विद्वान माना है । ४०. हरिपेण-- इन्होंने अमितिगति के २२ वर्ष पहिले सवत् १८४४ में धर्मपरीना को समाप्त किया था। ये मेवाड़ दश मे श्रीउजपुर प्राम के रहने वाले थे। इनके पितामह का नाम कुसलु, पिता का नाम गोवर्द्धन एव माता का नाम धनवती था। सिद्धसेन उनके गुरु थे । इन्होंने मगलाचरण मे चतुर्मुग्य, स्वयमु, तथा पुप्पदत का भी स्मरण किया है। धर्मपरीक्षा में कुल ११ सधियां हैं तथा यह अपभ्रंश भ.पा की उत्तम रचना है। ४१ महाकवि वीर--कवि वीर के पिता गुटखंड देश के निवासी थे। इनका वंश अथवा गोत्र लाड चागढ या । यह काष्ठा मंच की एक शाखा है। इनके पिता का नाम देवदत्त था। करियर का पटुन माय राज्यकार्य, धर्म और श्री की चर्चा में समाप्त होता था। इसलिये करि को जम्वृस्त्रानी चरित्र लिने मे एक वर्ष लगा था । कवि ने इमको मापन १०७६ माघ शुक्ला दशमी के दिन ममान किया था। परिभाषित रस के प्रेमी भी थे। इन्होंने मेचमन मे पत्थर का एक विशाल जिनमन्दिर बनवाया था । एन । स्त्रिया जिनवती, श्रोमावती, लीलावती, पोर जरादेवी पौर नेमिचन्द्र नामका पत्र भी था! ४२ श्रीचन्द-ये १२वी शताब्दी के कवि थे। उन्होंने रनरको गन् ११३८मान किया था। चे गुनी थे और मी पवस्था में इन्होंने अपने प्रन्य से मनाप्त किया था । सेगमपुरा का ( १५ ) ~ - -- पाण्डवपुराण को इन्होंने संवत् ११७६ कार्तिक शुक्ला अष्टमी के दिन समाप्त किया था। इस काव्य को अग्रवाल वश मे उत्पन्न साधु चील्हा के सुपुत्र श्री हेमराज ने नवगायपुर में लिखवाया था। चन्द्रप्रभचरित्र गुज्जरदेश के निवासी सिद्धपाल के अनुरोध से लिया गया था। ये गुणकीर्ति के शिप्य थे। चन्द्रप्रभचरित्र में इन्होंने 'महाकवि विपण से अपने आपको अलकृत किया है। ४८-पं० लाख इन्होंने सवत १२७५ में जिनदत्त चरित्र को समाप्त किया था। ये सवाल जाति मे उत्पन्न हुये थे। इनके पिता का नाम साहु साहुल था । इनका दूसरा नाम लक्खए भी था । 'पापका सन्मान करने वालों मे श्रीधर श्रावक उल्लेखनीय है और इन्हीं के अनुरोध के कारण ५० लाय ने जिनदन चरित्र की रचना की थी। श्रीधर उस समय काफी प्रसिद्ध थे। ४९-गणिदेवसेन अपभ्रश भाषा मे इन्होंने सुलोचना चरित्र लिया है। ये विमलसेन के शिप्य थे। सुलोचना चरित्र अपभ्रंश की प्राचीन रचना है। ५०-जयमित्रहल इन्होंने अपभ्रंश मे वर्द्धमान चरित्र लिसा है । इनके पिता का नाम सहदेव था। कवि ने पाल्लाउद्दीन खिलजी के शासन का उल्लेख किया है। इस आधार पर कवि का समय १३ वी शताब्दी होता है। इनके गुरु मुनि पद्मनन्दि थे । ५१-धर्मदासगणि प्राकृत भापा मे इनके द्वारा रचित प्रदेशमाला श्वेताम्बर और दिगम्बर दोनों सम्प्रदायों मे ही बहुत निय रही है। उऊ रचना पर २२ से अधिक टीकायें मिलती है इसमे ही कृनि की प्रियता जानी जा सकती है। धर्मदासगणि का समय १० वीं शताब्दी या उससे भी पूर्व का माना जाता ५२--नरसेन वर्द्धमान कया और श्रीपालचरित्र इन दो काव्यों की इन रचना की है । करिन रचनायो मे नाम के अतिरिक्त अपना अधिक परिचय नहीं दिया । नरसेन स्वय पंडित थे और गृहस्थाचम्या मे ही रहकर काव्य रचना की थी। ये १४ ची प्रथना १५ वी शताब्दी या इससे पूर्व के कवि होंगे. क्योकि समह मे १५१२ मे लिग्नी हुई श्रीपाल चरित्र की एक प्रति मिलती है। ५३-महाकवि सिंह या सिद्ध- इनके पिता का नाम रल्हण था । करि गुजर कुल के मर्य थे । प्रद्युम्न चरित्र को उन्होंने अपनी माता के अनुरोध से बनाया था। जति अमृतचन्द्र (मित्रचन्द्र ) के शिष्य थे। ५४-महाकवि धनराल-ये १५वी शताब्दी के कवि थे। उनके द्वारा लिखित वानिरव नया भविपरदनचरित्र १५वीं शताब्दी की रचनाये है । महाकवि ने चाबलि चरित कार में प्रार नथा “अन्न मे यहुन मुन्दर प्रगति लिपी है ।ये गुर्जर देश के सने गाने रि मनर स्थान था। उस समय चार बीमलदेव राजा राज्य करने थे। न पिना मनम देर नया ५ नान गाता था । ये पार जानि में इन्पन्न हुये थे । इमाने दिली । गोगन:पुर . । ।

( १७ ) उन्होंने मृगांकलेसा चरित्र लिखा है । जिसको संवत् १७०० मे समान किया था। यह अपभ्रंश भापा का अन्तिम काव्य है। ये हिन्दी के अच्छे विद्वान् थे । हिन्दी में इनकी २० से अधिक रचनाये मिलती है। हिन्दी साहित्य के कवि एव लेखक ६०-किशनसिंह कवि रामपुर के निवासी सगही कल्याण के पौत्र तथा प्रानन्दसिंह के पुत्र थे। ये सण्डेलवाल जाति मे उत्पन्न हुये थे तथा पाटनी इनका गोत्र था। कवि रामपुर को छोड कर सांगानेर आकर रहने लगे थे और यहों पर त्रेपनक्रियाकोश को संवत १७८४ समान किया था। इस रचना के अतिरिक भद्रबाहुचरित्र एव रात्रिभोजनकथा भी इन्हीं के द्वारा लिखी हुई है । ६१----कुमुदचन्द्र ये भट्टारक रत्नकीर्ति के शिष्य थे। इन्होंने भी वेपनक्रियाविनती, ऋपभविवाहलो भरतबाहुबलिछन्द आदि रचनायें लिखी हैं। भरनबाहुबलिछन्द कवि की सुन्दर रचना है इसको इन्होंने संग १६०७ मे समापन किया था। ६२-- कुसुललाभगणि सवत १६१६ मे जैसलमेर मे उन्होंने 'माधगनलचौराई को पूर्व की थी। ये श्वेताम्बर सम्प्रदाय के साधु थे। ६३----खडगसेन- ये लाभपुर (लाहोर) के निवासी थे । लाहोर मे उस समय कोर निजान रहते थे। उन्हीं की संगति से उनको लिखने की इच्छा उत्पन्न हुई । इनके पिता का नाम तय करे पूर्वज रहते नारनोल मे रहा करते थे । यहीं से लाहौर जाकर रहने लगे थे। नारनोल रह रत्नों के पास कि प्राप्त कर तथा अनेक ग्रन्थों का अध्ययन करके त्रिलोकदर्पण को संवत् । शरिया था। ६४-- खुशालचन्द काला--- भट्टारक लक्ष्मीदास के पास इन्दस्यिया । इक निवास स्थान देहली था। लेोकेन सागानेर भी कभीर मात्र हा मरे बिना का माता का नाम अभिधा था। इन्होंने हरिवंशपुराण (१७८०), पर उन्नावरकर वस्थाकोश यादि अन्यों की रचना की है। ६५---- चतुरूमल ये ग्वालियर के निवासी जन- मे नेमीश्वर गौतको ममान मिया था। इनके : ननीश्वर गीत एक साधारण रचना है। ६६. छीतर टोलिया-मोज समाप्त की थी। उस समय जयपुर ६७. जयसागर-ये For + - M A M म ( १६ ) रचनायें लिखी है। ७६-देवेन्द्रकीति- ये भट्टारक सकलकीर्ति की शिष्य परम्परा में होने वाले भट्टारक पद्मनन्दि के शिष्य थे । इन्होंने सूरत निवासी सघपति श्री क्षेमजी के अनुरोध से महेश्वरनगर मे प्रद्युम्नप्रबन्ध को संवत् १७२२ में समाप्त किया था । प्रबन्ध की भाषा साधारण है। ७७-दिलाराम-इनके पूर्वज खडेले के रहने वाले थे । वहा से वू दी नरेश के अनुरोध से बूदी शाकर रहने लगे थे । इनका गोत्र पाटणी था। कवि ने वू दी नगर तथा यहां के राजवश की खूब प्रशमा लिखी है । इसके अतिरिक्त अपने वश का भी अच्छा परिचय लिखा है । इन्होंने दिलारामबिलास और आत्म- द्वादशी ये दो रचनाये लिखी है । कवि ने दिलारामविलास को सबत् १७६८ मे समाप्त किया था। इनकी वर्णन शैली अच्छी है। ७८-धर्मदास- कवि बारहमनी ( द्वादशश्रेणी ) जाति मे उत्पन्न हुये थे । इनके पूर्वज अपने प्रान्त मे बहुत ही प्रतिष्ठित थे। इनके पिता का नाम राम और माता का नाम शियी था। कवि ने धर्मोपदेशश्रावकाचार को १५७८ मे समान किया था । रचना को भापा बडी सुन्दर है। इसमे जैन धर्म के मुख्य २ सिद्धान्तों को बड़ी ही अन्छी तरह से समझाया गया है । ७८. नथमल विलाला- ये मूल निवासी प्रागरे के थे किन्तु बाद मे भरतपुर मे और अन्त में हीरापुर 'प्राकर रहने लगे थे । इनके पिता के नाम शोभाचन्द था । इनने सिद्वान्तसारदीपक की रचना भरतपुर मे सुखराम की महायता से की थी और भक्तामर की भाषा हीरापुर मे १० लालचन्द जी की सहायता से की थी। उनके अतिरिस जिनगुणविलास, नागकुमारचरित्र, जीवधरचरित्र, जन्यस्वामीचरित्र आदि भी प्रापकी ही नियां हैं। ७९. नरेन्द्रकीर्ति- भट्टारक शुभचन्द्र के प्रशिष्य । सुमतिनीति के शिष्य थे। उन्होंने नेनीश्वर चन्द्रायण लिया है जो एक साधारण कृति है। नेमिचन्द- ये भट्टारक जगत्कीत्ति के शिष्य थे। ग्रामेर इनरा निवास स्थान था। सन १७५३ में इन्होंने हरिवशपुराण की रचना की थी। कवि ने श्रामेर का बदन सुन्दर वर्णन किया है। पाटे भाई का नाम भगद । उनका गोत्र सेठी या । कवि के स्पचन्द, रागरसी, लक्ष्मीदास. दोदराजादिमिय। ८१. -- प्रभाचन्द्र मुनि--- इन्दाने परने को मुनि धर्मचन्द्र या शिवलिया है। प्रभावन ने नत्यायन को हिन्दी टीका लिसी है । इनके समय के मन्वय मे विशेष मान नहीं हो मरा है त्यावदान माग। एक प्रति सपत् १८८३ की लिसी र ई मार भार में है।

( २१ ) कवि ने हीरामणि के उपदेश से धर्मपरीक्षा की रचना की थी। श्रागरा निवासी सालिवाहण, हिसार के जगदत्तमिश्र तथा उसी नगर में रहने वाले गंगराज के अनुरोध से धर्म परीक्षा की रचना की गयी थी। ९०. राजमल्ल उपलब्ध हिन्दी जैन गद्य के सबसे प्राचीन लेखक हैं। इन्होंने संवत १६०० के शस पास समयसार की हिन्दी टीका लिखी थी। समयसार के पठन पाठन को इन्होंने ही टीका लिख कर सुगम बनाया था। महाकवि बनारसीदास ने भी इन्हीं की टीका के आधार पर समयसार नाटक की रचना की थी। ९१. रूपचंद-- कविवर रुपचंद पाडे रुपचन्दजी से भिन्न है । इनको महाकवि बनारसीदास ने गुरु के समान माना है। आप एक उच्च कोटि के कावे थे। करिता की भ.पा और शैली बहुत ही उत्कृष्ट है। कवि की अभी तक परमार्थ दोहा शतक, परनाथगीत, पदसंग्रह, गीतपरमार्थी, पंचमंगल एव नेमिनाथरासो श्रादि रचनायें उपलब्ध हुई है। आप भी आगरे के ही रहने वाले थे। ९२. लम्वरुचि-ये विद्यारुचि के शिष्य थे। उन्होंने चन्दनृपरास नामक एक रचना लिखी है जिसको इन्होंने संवत् १७१३ मे समाप्त की थी। इनकी भापा पर गुजराती का अत्यधिक प्रभाव है। इन्होंने प्रशस्ति मे भट्टारक परम्परा एवं अपनी गुरू परम्परा का अच्छा उल्लेख किया है। ९३. लोइट-इनका जन्म वघेरवाल वंश में हुआ था। इनके पिता का नाम धर्मा था। ये तीन भाई थे। हींग और सुन्दर दोनों इनसे बडे थे । पहिले ये सांभर रहते थे और फिर यू दी श्राकर रहने लगे थे। फवि ने बूदी का सुन्दर वर्णन किया है ।दी के राजवंश का भी वर्णन पठनीय है । कवि के समय में राय भावसिंह जी का राज्य था। संस्कृत भाषा मे श्री पद्मनाभ द्वारा रचित यशोधरचरित का हिन्दी पद्य अनुवाद इन्होंने सवत् १७२१मे समाप्त किया था। ९४.लक्ष्मीदास-- पंडित लक्ष्मीदास भट्टारक देवेन्द्रकीर्ति के शिष्य थे। ये सांगानेर के रहने वाले थे। इस समय महाराजा जयसिंह जी राज्य करते थे। पहिनजी ने यशोधर चरित्र की रचना भट्टारक सालकीन और पानाम की रचना के प्राधार पर की है। यशोधरचरित्र सपत् १७८१ की रचना है। कयिता साधारण है। ६५. ब्रह्म रामनल-ये जयपुर राज्य के निवासी थे इन्होंने अपनी रचनाओ को भिन्न • न्यानों पर तिमी थी। इनमें हरसोर गढ, रणथम्भोर एवं सांगानेर प्रसिद्ध है । रायमल्ल 'अन्त में कर सागानेर ही रहने लगे थे। ये मुनि अनन्तकीर्ति के शिष्य थे। इन्होंने हिन्दी में अनेक रचनायें लिया है. इनमें नमीवर रास. हनुमंतफया, प्रगन्नचरित्र, सुदर्शनरास, श्रीपालराम भविष्यदत्त कथा आदि उल्ले पनीय है । प्रचार की और प्रमुष ध्यान होने से इन्होंने सरल एव साधारण भाषा में माहित्य लिखा है। ६६.ब्रहम मुलाल- ये ग्वालियर के रहने वाले थे । भट्टारक जगए के तिष्य थे।की की अधीनता मे रह फर कबिता किया करते थे। वेपनक्रिया को इन्होंने मंकर १६ ५ मे समान की भी। ग्यालियर पर ए समय सलीम (जहागीर) का राज्य था।

( २३ । - शुद्धाशुद्धिपत्र - S पृष्ठ तथा पति अशुद्ध ससारभीमुखे . १X शुद्ध संसारभीमुपे भयेंदु 'अपभ्रश प्रार्थनातो २४८ २४ १३ ३४३० -- भयडु प्राकृत प्रार्थना ते प्रणित - चंचद्रयः । . प्रीणित ३४.५ चचद्र च. ५४-१५ । --पष्ट्यधिकाः फवाधिक पहनयग्नि 'यहन्यग्नि ८x२५ सदस्यो तत्पुराणं रास्दस्य तत्पुराण १३ ४.६. मंद ta १३४ १८.४३ २१४२ २ त्रिभगसार सयौरजनः घर्णता सर्वकारसंतान प्रख्यामननपा वीरनाथ प्रकन्दरपुर भन्यौवनिस्तारकः - त्रिभगीसार सपोरजनः वर्णना सवकर्मारिसतान प्रख्यातमनीपा “वीरनाथ अकयरपुर भन्योपनिनारकः वा तद्रामा जैसालान्ये ५६४२१ ५.४२१ ६० x २ ६२४२ घातद्रामा समालान्वये ६५y १७ अभरट ६.x या अजित ६९४२ ४ प्रभपद याजित तनीय मगिणि चवत ८१४ तदीय भामिगि मधनं गुणिदागह गरयात २ যুই পা ও पावसु परचनु विषय-अनुक्रम नाम पृष्ठ संख्या नान पृष्ट संख्या प्रकाशकीय वक्तव्य १ २ " سد महावीर पुराण करकण्डु चरित्र ६ ८ ४६ ६ १० प्रस्तावना शुद्वाशुद्धिपत्र संस्कृत आदिपुराण (जिनसेनाचार्य) आदिनाथपुराण (मालकीर्ति) उत्तरपुराण सटीक (प्रभाचन्द्राचार्य) उपदेशरत्नमाला (सफलभूपण) (शुभचन्द्र) कर्मकाण्ड सटीक (ज्ञानभूपण) चन्द्रप्रभचरित्र (शुभचन्द्र) जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसंग्रह (सुरेन्द्रकीर्ति) जम्बूस्वामीचरित्र (जिनदास) जयकुमारपुराण (फामराज) जिनसहस्रनामसटीक (श्रुतसागर) जीवंधर चरित्र (शुभचन्द्र) झानसूर्योदय नाटक (चादिचन्द्रमूरि) तत्त्वज्ञानतरंगिनी (ज्ञानभूपण) त्रिभगीसार टीका (विवेकनन्दि) दुर्गपदप्रयोध (घल्लभगणि) धन्यकुमारचरित्र (सफलकीर्ति) धर्मपरीक्षा अमितिगति) धर्मसंग्रह प्रावकाचार (मेधावी) नेमिनाथपुराण (नेमिदत्त) যন্ত (सोमसेन) (चन्नकोनि) ( धर्मकीर्ति) प्रतिष्ठापाठ (गशाधर) प्रद्युम्नचरित्र (सोमोति) १३ प्रवचनसार प्राभृत वृत्ति (नमरत्नदेव) पाण्डवपुराण (शुभचन्द्र) ३७ पुण्याभवकथाकोश (रामचन्द्र) पुराणसारसंग्रह (सफलकीर्ति) ४१ भकामरस्तोत्रवृत्ति (गुणसुदर) (रायमल्ल) ४३ (प्रमर भमूरि) ४३ भोजप्रबन्ध (रत्नमन्दिरगणि) ४४ (श्रागाधर) ४४ महीपाल चरित्र (चारित्रसुन्दरगणि) ४५ मुनिसुव्रत पुराण (कृष्णदाम) ४७ मेघदूतावचूरि (सुमतिविजय) मेघदूत टीका (मेघराज) यशोधर चरित्र (शानीति) ४६ पद्मनाभ ५१ यशोधर चरित्र (मरलकीर्ति) योगचितामणि (हर्षकीति) राजवार्तिक (अकलंकदेव) वरांगचरित्र (बर्द्धमान देव) वर्द्धमानपुराण (मरलकीति) श्रावकाचारसार (पद्मनन्दि मुनि) ५७ श्रीपालचरित्र (नेमिदत्त) श्रेणिफचरित्र (शुभचन्द्र) सम्यस्त्व कौमुदी ६३ गुणाकरमूरि सारवत चन्द्रिका सटीक (चन्द्रगति) सिद्धान्नमार मंप्रा (नरेन्द्रसेन) सिन्दुर प्रकरण (मोगरमापूरि) মুনি ঘান্ত (नेमिना स्थानीगनिमानुपत्रा सदीर (मनन्द्र) १४ १६ १६ १८ १६ १६ २७ ३० ३१ ३३ (२७ ) + + पृष्ठसल्या 4 (कमलकीर्ति), २०३ (ब्राजिनदास), २०३ नाम आदिनाथस्तुति : आदिपुराण आदित्यवारकथा । आदीश्वरफाग आराधना प्रतिवोध पभविवाहलो - 1 - कर्ण मृतपुराण " -- कल्याणमन्दिरस्तोत्र कथाकोश संग्रह चतुर्दशी चौपई। चरचासमाधान चन्द्रनृपरास चिविलास चेतन कर्म चरित्र चौदह गुणस्थानचर्चा छदशिरोमणि जम्यूस्वामी चरित्र (ज्ञानभूपण) २०५ (सकल कीर्ति) २०६ (कुमुदचन्द्र) २०६ (विजयकीर्ति) २०७ (बनारसीदास) २०७ (जिनदास) २०८ - (टीकम) • (भूवरदास) २०६ (लब्धरुचि) २.४ (दीपचट काशलीवाल)२११ (भगरतीदास) २१२ (अखयराज) २१२ (शोभानाथ) २१२ (जिनदास) २१३ (भूधरदास) २१४ (प्रभाचन्द्र) २१५ (गगादास) २१६ (सडगसेन) २१६ (ग्राम गुलाल)२१६ (किशनसिंह) २२० (कुमुदचन्द्र) २२१ ज्ञानमागर) २२२ नाग पुए सल्या धर्मगसो (प्रचलचि) धर्मोपदेशश्रावकाचार (धर्मदास) नयचक्रमापा (हेमराज) नेमीश्वर गीत (चतुरुमल) नेमीयरचंद्रायाए (नरेन्द्रकीर्ति). २३२ पद्मनन्दिपंचवितिका (जगतराय) पंचेदियबोल (ठकुरसी) पंचास्तिकायभापा (हेमराज) परमार्धदोहा (रूपचन्द) प्रद्यम्तप्रध ( देवेन्द्रकीर्ति), २६ प्रवचनसार प्रगुम्नरासो (रायमल्ल ) २३६ पार्श्वनाथ चौपई (महेन्द्रकीर्ति) पाश्वनाथपुराण (भूवरदास) २९० - पोसहरास (तान भूपाए बनारसी बिलाम (घनारमीदाम) २४१ चाशिठिया बोलरो स्तवन (कान्निसागर) भरतवा पलि छद (कुमुदचन्द्र) २४३ भविष्यदत्तकया (रायमल्ल) भामरस्तोत्रमापा (नयमलपिलाला) ४४ मृगावती चरित्र (ममयासुन्दरगाग) २४७ माधरानल चौरई (कुमललामगाणे) २४७ मिन्यादुकट (जिनाम) অনীশ্বৰ বন্তি মাঘ শান্ত (लनीटाम) यशोधर चौराई (लोहट) योगीरानो (गटेनिनाम) रत्नपानरामो (रषद) (मालः निल... राधिभोजनस्था (मनमः) जैन शतक तत्त्वार्थसूत्रभाषा त्रिभुवननी वीनती त्रिलोकदर्पण पनक्रिया त्रेपनक्रियाकोश पनकिया बिनती दशलन्तरणरतकथा दिलाराम पिलाए और श्रात्मवादशी धनपालरास धर्मपरीक्षा धर्मस्वस्प (दिलाराम) २२२ (बा जिनदास। २.४ (मनोहरदाम २२३ (प्रा गुलाल) २२७ राजल पीनी आमेर शास्त्र भंडार, जयपुर के ग्रन्थों का प्रशस्ति-संग्रह १. श्रादिपुराण। रचयिता श्री जिनसेनाचाय तथा गुणभद्राचार्य। भाषा संस्कृत। माहन १६४४ाल। पत्र संख्या ३६६. लिपि संवत् १८०३ माघ सुदी १५. प्रति में रखें सगे नक प्राचार्य जिनमेन का नाम दे स्या है तथा अन्तिम पांच सगो मे प्राचार्य गुणभद्र का नाम दे रखा है । प्रति गुन्दा तथा स्पष्ट है। मंगलाचरण- श्रीमते सकलज्ञानसाम्राज्यपदमीयुपे । धर्मचक्रभृते भर्ने नमः संसारभीमुरंग ॥1॥ मन्तिम पाठ- थी नाभेस्तनयोपि विश्वविदुषां पूज्यः स्वधरिति, व्यक्ताशेषपरिप्रहोपि मुधिया स्वामीति यः शव्यते । मयोऽपि विने यसत्वसमितेरेवोपकारीमतो, निनोपियुषेपास्यचरणो या मोन्तुवःशांनये ॥ यापं भगवद्गुणभद्राचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलापमहापुराणसम प्रथमतीवर चार पुराण- परिसमाप्त सप्तचत्वारिंशतमपटर्च समानः । संवग १८०३ वर्षे मात्र सुदी १५. गरी श्री मूलसंघ यल घारगण परतीग पुदकुशाचाया- वये महारकशीविश्वभूपण तन्निध्य प्रनामीबिनयमारजी तकिय ग श्रीहर्ष मागरजी तगुरुमाता पडित हरिकृष्ण को तय ६० जीवनरामती तानुचर ६० हेमगजन्या पुस्ता पहन पनि इरिफपणन देत। प्रतिन...पा संन्या. माइज १२५ सक्त १५८६ वर्षे मामं बुद्धि २ मोमवामरे श्रीगृलाई बलाकारगणे मग ना. मानार्यान्वे भट्टारक पी पाननिवासी भारत शानदेवाना भट्टारा मानना प्रशस्ति-सग्रह ३ ] पक्ति प्रति पृष्ठ १० तथा अक्षर प्रति पक्ति ३६-४२. अपभ्रंश भाषा के ग्रन्थ पटोपदेशरत्नमाला के श्राधार पर उक्त मंय की रचना हुई है। प्रति पूर्ण तथा सुन्दर है। रचना संवत् १६२५. लिपि मवन् १८२६. मगलाचरण- वंदे श्रीवृपभ देव दिव्यलक्षणलक्षितं । प्रणितमाणिसवर्ग युगादिपुरुषोत्तमं ॥१॥ प्रशस्ति तथा अन्तिम पाठ- धीमूलसंधतिलके चरनन्दिगच्छे गच्छ सरस्वतिसुनाग्नि जगत्प्रसिद्ध । श्रीकुदकु दगुरुपरपर या श्रीपद्मनन्दिमुनियः समभूजिताक्षः ॥११॥ तत्पट्टधारी जनचित्तहारी पुराणमुस्योत्तमशास्त्रकारी। भट्टारकः श्रीसक्लादिकीर्तिः प्रसिद्धनामाजनिपुण्यमृतिः ।।।। भुवनकीत्तिगुरुततउर्जितो, भुवनभासनशासनमहनः । अनि तीव्रतपश्चरणक्षमो, विविधधर्मसमृद्धिसुदेशकः ।।३।। श्रीज्ञानभूपापरिभूषिनागः, प्रसिद्ध गांडित्यकलानिधान । भोज्ञानभूपारस्यगुरुस्तदीयपट्टोदयागाविव भानुगसीन् ।।४।। भट्टारकनीविजयादिकत्तिस्तदीयप वरलब्धशीतिः । महामना मोतमुखामिलापी बभूव जैनावनियार्त्यपादः ॥५॥ भट्टारकधीशुभचन्द्र सूरिस्तत्वट्टपकेरुहातग्मास्मि । वैविधानद्य. सफ्लप्रसिद्धो चादीभसिहो जयनारिया ॥६ पटे तस्य मीणितमाणिवर्ग: जातोदांतः शीलगालीमुधीमान । जीयामूरिः यो मुमत्यादिनीतिः गन्दाधीश. सम्रातिलाशन || सायाभून्च गुराधाता नाम्ना मानभूषणः । सूरिजिनमने लीनगनाः मंतोपोपर ॥८॥ तेनोपदेशनालगालानेशो मनोहर. 1 कृतः प्रतिजनानंदनिमिने ग्रंथ एकः ।। भीनमिनद्रागाचाटियतीनास प्रहार। मानाना नाति प्रार्थना न भवपकः ॥१०॥ nary. Moonam Www movememmame- * प्रशस्ति-संग्रह ५] गोत्रे माह श्री माधो, साह श्री टोडर, सोनी गोने माह श्री जमा. 'प्रजमेरा गोत्रे साह श्री पृग ते मा. भट्टारक श्री जगत्कीर्तिदेवातच्छात्र ब्रमचारि नाथूराम संज्ञाय तद्भ्रातानुज सुधी झगह सजाय ताभ्यामिट पुस्तक न'मपटकर्मोपदेशरत्नमालाप्रथं मर्वे श्रावकाः लिखाप्य ब्रम श्री नाथूगमाय घटापित । ५. करकण्डुचरित्र । रचयिता भट्टारक श्री शुभचाद तथा मुनि श्री सकल भूपण । भाषा संस्कृत। पत्र मस्या १०६ । मायज १०.४५ इन्च । प्रत्येक पृष्ठ पर १००क्तियां तथा प्रति पंक्ति मे ३३-३६ अक्षर | रचना सवत १६११. लिपि सन् १८६१ प्रारम्भ के४ पृष्ट नहीं है। प्रशस्ति- -- जीमूलसघे जनि पद्मनदी तत्पट्टधारी सकलादिकोति- कीर्ति कृता येन च समर्त्यलोके शास्त्रार्थवको संकला पवित्र ॥१॥ भुवनकीतिरभूभवनाधिपो भवनभासनभूरिमतिस्त्रुतः। दरतपश्चरणोद्यतमानसो भवनयाहि खगेट क्षितिभूतमः ।। २ ।। x x x x x x x + पट्टे तस्य गुणाधिन तघरो धीमान गरीयान्वरः श्रीमली शुभचन्द्रएप विदितो वादीभसिदो महान । तेनेदं चरितं विचारुरुचिरं चाकारि चंचद्रयः श्रीमन्छी फरकंडनाम रतिः नीत्यानरस्ततिपं ॥३॥ चन्द्रनाथचरितं चरितार्थ प्रानाभ चरितं शुभचन्द्रः। न्मथस्य चरितं च सुचारं जीयकस्य चरितं चकार ।।४।। वंदनायाः कथा येन ए या नादीश्वरी तथा। आशाधर कृतार्चाया धृत्तिः सवृत्तशालिनी ॥५॥ त्रिशन्चतुविशतिपूजनयः वृद्ध च सिद्धार्चन माविधत्त। सारस्वतीयार्चनमत्रपि चिंतामणीया नगुमचरितु ॥६॥ श्रीपम्मदाह विधिर्व रसिद्धसेना नानागुणोधगणनाथसगरीनं च। श्रीपानाधव काव्यमुपजिना घ घ. मसर शुभचन्द्रगतीचंद्रः॥७॥ जधापनमपिष्टा पल्योपायचित्र । चारिना र तमश्च जरिवारमात्मनः ॥८॥ m vemeneurtara-drenge emantarMJindain KHUN Latememynecene Acetammandu * प्रशस्ति-संग्रह ७] ---- -- --- - । प्रशस्ति- श्रीमृलसंघमहामाधुर्लक्ष्मीचंद्रोयतीश्वरः । तस्य पट्टे च वीरेंदुर्विवुधो विश्ववंदितः॥१॥ तदन्वये दयानोधिनिभूपोगुणाकरः । टीम हि कर्मकारस्य च सुमतिकीर्तियुक ।।२।। इति भट्टारक श्री ज्ञानभूपणनामाकिता सूरी श्रोसुमतिक ति विचिता कर्मकांडम्य टीका समाप्तः। संवत् १७७७ वर्षे द्वितीय अपाढ सुदी ६ भीमदिने श्रीमद्भट्टारक श्री १०८ देवेंद्र तिं तच्छिष्य पंडितकिशनतामस्य वाचन र्थे लिखितं महात्मा धनराजेन श्री प्रधावतीमध्ये श्री साईजयसिंहजी विजयराज्ये । ७. चन्द्रप्रभचरित्र । रचयिता आचार्य शुभचन्द्र। भाषा सस्कृत । पत्र संख्या ७२ । प्रत्येक पृष्ठ पर १० पंक्तियां तया प्रति पक्ति मे, ३८-४२ अक्षर । विपय-पाठवें तीर्थकर श्री चन्द्रप्रभु का जीवन चरित्र । प्रति पूर्ण नया नवीन है। मगलाचरण- भीयूपं वपम वंदे पृरदं वृपभाकित । वपभादिसभाशिष्ट पादद्वितयपकजं ॥१॥ चन्द्रमभनिनं स्तौमि चन्द्रकांत सुचंद्रक । चद्रांक चेहितं चश्चदिपाहततामस ।। २ ।। अन्तिम पाठ तथा प्रशस्ति- त्रैलोक्यमारादिसुलोकम धान, सद्गोम्मटाढीन वरदीबहेनन । सत्तर्कशास्त्राप्तसहस्यधीशान्नो वेभ यह मोहयशो कृतांतः ॥१॥ तथाविधोपि प्रगुणजिनेश, स्तुवर च सद्धि मरले परैश्च । म्यः सदा कोपगणे विहाय, वाल्ये जने को हिशुभ न दशान ।।२।। श्रीमलसर्प जान पानन्दी. सत्सधारी सकलादिवोतिः । सत्पपारी भुवनादिकीर्ति, जीयाचिरं धर्मधुरीणदक्षः ॥ ३ ॥ तस्सटे ननिरोघवुनिपलन्यायादिशास्त्रार्थ- परिचन्द्र पामृतपानलालममतिः श्रीमानभूपोजगी । जीयान् पंचमरालपशिसरी तरघारी चिरं, भीमन्त्री विजयादिकीर्तिमुनियो भूयाचयावाविन ॥४॥ - -- KAHArted * प्रशस्ति-संग्रह १] New श्रीमवलात्कारगणे सुरम्ये सरस्वतीगच्छमुनींद्रपूज्ये । श्रोकुदकुन्दान्वयक सरोजे देवेंद्रकीर्तिः प्रवर्भूवभानुः ।। ३ ।। भट्टारकानां च शिरोमणिय स्तरपट्टके मृत्यमदीद्रकीर्ति.। मेंद्रकीर्तिममवै गुरुयो भूम्या ततोऽभूत्तामा सुधीरः ॥ ४ ॥ - x x x x x x x X x x इति जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसप्रहे भट्टारक श्री सुरेन्द्रकीर्तिविरचिते प्रमाणपरिच्छेदो नाम त्रयोदशरिच्छद. समाप्तः। है. जम्यूस्वामिचरित्र। रचयिता ब्रह्म भी जिनदास । भाषा संस्कन । पत्र संख्या १०५.. साइज १०||x? इछन् । प्रत्येक पृष्ट पर १० पंक्तिया तथा प्रति पक्ति मैं २८-३१ अक्षर । विषय-अन्तिम केवली श्री जम्बूस्वामि का जीवनचरित्र । - लिपि सवत १६६३. mom मंगलाचरण-- श्रीवर्द्धमानतीर्थेश वंदे. मुक्तिवधूवरं । कारुण्यजलधि देवं देवाधिपनमस्कृत ॥१॥ अन्तिम पाठ तथा प्रशस्ति- श्रीकुन्दकुन्दान्वयमौलिरत्ने, श्रीपद्मनन्दिविदितः पृथिव्या । सरस्वतोगच्छविभूपणं च, बभूव भव्यालिसरोजसे ॥६ तोऽभवत्तस्य जगत्पसिद्ध, पमनोज्ञ सेरादिकीर्ति । महाकविः शुद्धचरिधारी, नियरोंना जंगति प्रतापी 10॥ जयति सालकोतिः पट्टकजभानुः जयति भुवनौतिः विश्वविख्याततिः । पतिजनयुगों मुकिमार्गमयोता. पुसुमशः विजेता भव्यसन्न नेता ॥३॥ वियुधजननिषेव्य: सहनाने कराव्यः, परमगुनियाम, सद्भुतालीविलाम. ! विजितारणमारः प्रसंसारपारः, स सातु गतदोषः शमणे वः सतोर.॥४॥ परमादेस्तपसो विधाता. क्षमाभिधः मीनिलयं धरियां । KAN remaina MAHAwakarne women प्रशस्ति-संग्रह ११] 0 - मंगलाचरगा- श्रीमंतं त्रिजगन्नाथं वृषभ नृसुराञ्चितं । भवभीतिनिहंतारं वंदे नित्यं शिशाप्तये ।।१।। नमः श्री शातिनाथाय शांतिकमारये निशं। पचभ्यस्सद्गुरूभ्योस्तु प्रणामोभीष्टसाधकः ॥२॥ अन्तिम पाठ नथा प्रशस्ति- इति पूर्ण जयाख्यस्य पुराण योगिनो वरं। पठनपाठनंभोत्शीलानो जयपुण्यद ।। १ ।। प्राप्नशिवो जयीदेयाज्जयोस्माभिः स्तुतः श्रुत.। युस्माभिः पुराणस्य व्याभाद्रत्नत्रयं वचः॥२॥ प्रकथ्यतेऽन्वयोऽथोत्र प्रथक यमक्तजः । मूलसंघे वरे वीरपारंपर्याच्चतुगंणे ।। ३ ।। अभूद्गणो बलातार पद्मनंद्य दि पंचसु । नामास्मिनच मुनिग्रीव शारदा बलवाचकः ॥ ४ ॥ आचार्या कुदकुदाख्यात्तस्मादनुक्रमादभूत् । सकलकोतियोगीशो सानो भट्टारकेश्वरः॥५॥ येनाधृतोगतो धर्मो गुर्जरे वाग्वगादिक । निमथे न पवित्वादिगुणे न वाहता पुरा ।। ६ ।। तस्माद् भुवनकीर्ति श्रीज्ञानभूपणयोगीगट। विजयकीर्तयोऽभवन भट्टारर पदेशिनः ।।७।। 'तेभ्यः की शुभचंद्रश्री सुमतिकीर्ति संयमि । गुणकोहिया प्रासन बलात्कारगणेश्वर.1॥ ततः धी गुणको यपदव्योमदिवाकरः । वादिनां भूपणो भट्टारको भूत् यादिभूपण. ॥१॥ 'तत्तदाधीश्वरो विश्वव्यापिनी श्वेतरोचिंधृत् । रामकीर्तिरभूदस्य रामो वा मुखदो गुणः ॥ १० ॥ तस्मात् स्वगन्नतिरस्ति म पमनन्दी। निष्णातफोन्मुसबारकपद्मनन्दी। मट्टारको जिनमतांम्पमनन्दी श्रीराम निपदभूधरपानन्दी ।। १६ ।। . PARA PremA Asm -- -LATAMANN Harumm4 39- Time MAR -Prem MPA RA *प्रशस्ति-सग्रह १३] P-m- -------- -- - भूयात्पुराणरचना भवपुण्यतो मे, मम्यकपदेन सहितो भवसौख्यवर्गात । अन्योत्थर्मजनकातिमुवस्य काचि- शारित्ररत्ननिचयो न हितस्ततोग्य ॥२१ ।। अमृतवाद्धि ख भूमि सुदर्शनो विजयनामनगाचलमदिरचपनका । समूहोः सहिताः इमे जयतु यावदिदं भुवनत्रये ॥२॥ शिल्पिरत्वादयत्येव निनर्विवं तथा कविः। शास्त्रं तन्मान्यतामेति मान्यं तन्मानित जनोः ।। २३ ।। राद्रस्यो तत्तुराणं शकमनुजयतेमंदपाटस्यमुरये। पश्चात् सवत्सरस्य प्ररचितमरतः पच पचाशतोहि । अभ्राभ्राक्षोक संवत्सरनिकरयुजः फागुणे मासि पूर्णे। द्रप्रेयोचोदयारये सुविाचनयिनो लालजिष्टोन वाक्यात ॥२४॥ मकलकत्तिकृत पुरुदेवजं समवलोक्य पुराणमियकृति । जयमुनेर्गुणपालसुतस्य च वृहदल जिनसेनकृतकृता ॥५॥ दति श्री जयाके जयनाम्निपुगणे भट्टारक श्री पद्मनन्दिगुरूपदेश नमकामगनविचिते १० जीवराज- महाय्यात त्रयोदशमः सर्गः॥ प्रति न०२ पत्र संख्या ८५. साइज ११४४|| हश्च । प्रत्येक पृष्ठ पर १ पक्तिया तथा प्रति पनि में ३७-४२ अक्षा | प्रति पूर्ण है। सवत १६६१ वर्षे भादवा चुदी ३ शुक' भीमूळ सघे सरस्वतिगन्छे पलात्कारगणे मी रा. पायर्यान्वये भट्टारक भी सकलकीतिदेवास्तदन्वये भट्टारक श्री वादिभूषणदेवास्नसह मट्टारक, श्री राम पीनिया रतद्पी भट्टारफ श्री पानदीस्तनाम्नाये श्री गुर्जरदेशे भी सूरतविंदार धी वामपू यत्यानये चार जात र साह श्री संतोपी भ्राता माह जीवराज तयोः जननी आर्यिका बाई करमा नया न्यपिगमार्य भी नीति तिमिप्य महामो लाट्या तच्चियमा भी फामराजाय जगपुगणं लिसाप्य रत्न | संवत् १७३० वर्षे मा० शामराजेन म्याभिष्ट शिष्य २० बाघजीष्टने जयपुगतामा। ११. जिनमहमनाम सटीक ! गुलर पापा जिगतेन 1 टीसागर पाचार्य श्री रतमागर । मापा नाहन पर 5. ' सारा १२x11 प्रति पूरा नय सुन्दर है। - मरन -Prmona AP "प्रशस्ति-संग्रह . १५] ----------- चारे गीप्यतिके त्रयोदशतिथी सन्नूतने पत्तने, श्री चन्द्रप्रभचाम्नि वे विरचितं चेद मया तोपत. ॥२॥ इति श्री जीवंधरस्वामिचरिते जीपंधरस्वामिमोक्षगमनवर्णननामत्रयोदशो भलः । - सवत १६३६ वर्ष अपाढ सुदी १३ सोमवारे सापणाप्रामे राय श्री सुरजमजी प्रवत्तेमाने श्री मूलसंघे नंद्याम्नाये बलात्कारगणे सरस्वतीगच्छे श्री कुदकुंदाचार्यान्वये भट्टारक श्री पद्मनन्दिदेवारतपट्टे भट्टारक श्री शुभचन्द्रदेवास्तत्पट्टे भट्टारक श्री जिनचन्द्रदेवास्तन्? भट्टारफ श्री प्रभाचन्द्रदेवातच्छिष्य. मंडलाचार्यश्रीधर्मचन्द्रदेवास्तन्छिप्य मटलाचार्य श्री लजितकीर्तिदेवास्तच्छिष्य मटलाचार्य श्री चन्द्र. कीर्तिदेवास्तदाम्नाये खडेलवालान्वये साहगोत्रे साह श्री कमा तद्भार्या छ प्रथम भार्या करणादे द्वितीया लहुही। तयोः पुत्रा. पच । प्रथम पुत्र साह उदा, वि० सा. माधु. सा० माधु चतुर्थ सा. चाटु पंचम मा. कालु । सा. उदा तद्भाया उत्पिदे तयोः पुत्रो हो। प्रथम पुत्र जिनपूजापुरंदरान् , दानगुणे श्रेयास, फीत्ति. गुण रामचन्द्र, शीलगुणे सुदर्शन, प्रभावनागे वनकुमार, इत्याचनेकगुगाल कृतगानान साह श्री भीसा तद्भायो दानशीलतपभावना भावलदे तयोः पुत्राः चत्वारिः। प्रथम पुत्र साह जैसा भार्या जममादे, वि० पुत्र मोटा, तृतीय चि० वेणा चतुर्थ चि० हरीदास ! द्वितीय पुत्र साह सेसा तद्भार्यातिन्त्र. प्र० भा० शृंगारदे तयोः पुत्र चि० तेजा। द्वितीया भार्या सक्तादे। तृतीया भार्या संकरदे । सा. माधु भार्या मुक्कादे तयोः पुत्राः पंच । प्रथम पुत्र सा. बीतु भार्या चीतादे तयो पुत्रास्त्रयः प्रमथ पुत्र सीमा द्वितीय पुत्र लागा। तृतीय पुत्र माल्हा । द्वितीय पुत्र धर्मा भार्या धारादे तत्पुत्र तालह । तृतीय पुत्र लासा भार्या लग्यमादे । चतुर्थ पुन परयन भार्या पाटमदे। पंचम पुत्र नानू भार्या नारंगदे । सा साधु भाया पदमपती। माद चाद भार्या गनशीलतप- भावना सुहाणीचांदणदे तयो 'पुत्रा चत्वारः। प्रथम पुत्र उलमटन मा श्रिया ताभार्या प्रथम मुहाग वि० भार्या लाहुडी । द्वितीय पुत्र हीरा भार्या हीरादे तृ० पुत्र बोहिय भार्या यरगदे चतुर्थ पुत्र होला भार्या हरपमदे। साह काल भार्या प्रथम केलरदे, बिनीया भार्या मोतिगर्द तयोः पुत्राः चस्मारः। प्रथम पुरमा० धारसा भाया प्रहंकारदे दि० पुत्र चि० देवा तृतीय पुत्र गहमाल चतुर्व पुत्र बालप एनेपा मन्त्र जिनपूजा. पुरंदरान , राजसभागारहारोपमान , सौम्यगुणचद्रम' प्रतापगुग्णमूर्य नमः प्रतापगणमूर्यममा गमीगुणगुदतु यान सत्यागनेक गुणगरणालंकनगावान माद भी उता तन्युन फुलण्डन साह मेसा नेनेः क्षयाई जी परित्र लिलाप्य प०वी पसारथपठनाय द । -- १३. ज्ञानोदय नाट। पगिता भी चानिजमुरि। मारामत। भया.. मन Teltxvi | प्रसार पर १ पतियां तथा प्रति पनि मे ४०-पक्षा।पना मका सिनियर ३५ की मार सरसतिगर फे पाचार्य थे तब ५० प्रमानन्द्र के या नाटकमीगर । eminerateachhatantraram.NAA -प्रशस्ति-संग्रह १७ ] । A - ये च विक्रमातीताः शतपचदशाधिः। पष्टिसवत्सराः जातानदेय निर्मिताकृतिः॥३॥ प्राधसख्यात्रविज्ञेया. लेखके. पाठकै किन्न । पत्रिंशदविका पंचश्ती श्रोतृजनैरपि ॥४॥ इति मुमुक्षुभट्टारकत्रीज्ञानभूपणविरचिताया रस्त्रज्ञानतरंगिण्या शुचिद्रपप्राप्तिममप्रतिपादकोऽष्टा दशोध्यायः। संवत् १८२५ लिखत मागि चदमहात्मना सवाई पुरमध्रे । १५. त्रिभंगीसार टीका । टोकाकार श्री विवेकनन्दि । भाषा प्राकृत संस्कृत । पत्र संख्या ३५. साइन ११४४|| इन्न । मंगलाचरण- सर्वज्ञ फ्रुग र्णवं त्रिभुवनाधीशा~पादं विभु । य जीवादिपदार्थमाथव लने लब्धप्रशंसं सदा ॥१॥ पर्मद्रुमोन्मूलनादारींद्र सिद्धांतपाथो नघिदृष्टपारं । पटाशनाचार्यगुणे. प्रयुक्त नमाम्यह श्रीगुणभद्रसूरिं ।। या पूतमुनिना टीका कर्णाटम्भापया विहिता। लाटीयभापया सा विख्यते सोमदेवेन। x X x x पिपत्य नामचन्द्र पभाद्यान् विपश्चिमान् जिनान् मकान । ६१ये स्वभापयाई विशदा टीका त्रिभग्याया। अन्तिमपाठ तथा प्रशस्ति- यथा नरेंद्रस्य पुनोमपुत्रा प्रयानारायणस्या यमुना बभूव । तथा तदेवस्य विजोणिनाम्नी प्रिया सुधा सुगरणा सुशीला |||| तयोः सुतः सद्गुणवान मधुन मोमोभिधः फोमुदतिारी। व्याघ्रग्वालावुनिधि सुरत्नं जोयाचियरं मर्यजनानगृत्ति ॥२॥ सीमानिनोकान समजमानि शास्त्राणि लेभे म यधात्मIRE धीमूलसंघान्धि विवर्सनटो. लीपू-यपद अनुमत्यम दान् । ३, X x x x सीपनांद्रियगे जिनस्य नितीन शिवरा सोम. मद्गुरामाउन विमानाने रू. - + +प्रशस्ति-सग्रह १६] momen . -- बंधा सुता १७. धन्यकुमार नन्त्रि । रचयिता भट्टारक श्री सकलकीर्ति । भाषा संस्कृत । पत्र संख्या ३४ । साइज ११४४ इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर ११ पक्तिया तथा प्रत्ति पक्ति में ३६-४४ अक्षर । प्रति प्राचीन है। उक्त चरित्र हिन्दी अनुवाद सहित बनारस से प्रकाशित हो चुका है। मगलाचरण नम श्री बद्ध मानाय पंचय न्योरणभागिने । जिनाय विश्व याय मुक्तिभर्ने गुणाधये ॥१॥ अन्तिमपाठ- सर्वे तीर्थकरा जगत्रयहिताः सिद्धाः अनंताविदः पचाचारपरायणाचगणिन. साठका साधवः। स्वगुवस्यादिसु साधकावरत्तपो युक्ताव भव्याघेश्च मया दिशतु शिवह मन्मंगल मेमतः॥ १ ॥ भवेयुः श्रीमतोधन्यकुमारख्यसुयोगिनः । चरित्रस्यासिला: लोकाः सार्धाष्टशतसस्यका ॥२॥ इति धन्यकुमार परिने भट्टारक श्री पद्मनन्दिदेवस्तस्य शिष्यमुनिसफलफोर्ति विरचिते धन्यकुमारतपः सबोधमिद्धि गमनो नाम सप्तमो सघिः । सवत १५३३ वर्ष पोप सुदी ३ गुगे श्रवण नक्षत्रे श्री नयनपुरे सुरवागा गयामुद्देन राचे प्रमाने श्रीमूलसंघे वलात्कारगणे सरस्वतिगच्छे श्री कुदकुंदाचार्यान्वये भट्टारफ प्रानन्दिदेवास्तत्वहे भट्टारर भी जिनचंद्रदेवास्तपट्टे भट्टारक श्री सिहकात्तिदेवा सच्चप्य मुनि स्नभूपण ननिमित्ते चटेलनालान्वये माप नाथू तार्या नैरणसिरी तयोः पुत्राः पचायण भावुसरी। माह तेजा भार्या तेजसिरी। तत्पुत्र मा. गर। साह गोल्हा भार्या गोल्हसिरी तयो पुत्री माह टासा तयोः 'नजलानावरणीयकर्म नया गिर्द धन्यामा परि स्वहस्तेन प्रता १८, धर्मपरीक्षा। रचयिता भी मिनाति । भाषा संस्कार मामा १० मा १.xT! पर १२ पंसिया तथा प्रति पति मे ३५-४- अक्षर चिना सन १४७० लि १५३३ प्रनि मामा अवस्था मेध सा हो चुरा है। भगनावरण- धीमत्रलयतुम जाया गया.! मनातो कालचते घडीयो भानु नगरा: नियन Srasharame-mahemeternama *MANA-arra- [५६ * प्रशस्ति-संग्रह। तपो पुत्र साह जगलाम तस्य भार्या हमीरदे तयो पुत्र साह जगमाल तस्य भार्या जौणादे द्वितीय पुत्र - माझू तृतीय पुत्र कल्याण तस्य भार्या करुणादे एतेषां मध्ये साह हरपा तस्य भार्या हरषभदे लिख..। शास्त्रवरांगचरित्रं जेठजिणवरवत प्रद्योतनाथ भार्या श्री शुभचद्राय दतः । प्रति न० ३. पत्र सख्या ७३. साइज १३४५ इञ्च । लिपि सवत १८७३. सवत् १८७३ वर्षे आश्विन कृष्णपक्षे ५ बुधवासरे श्रीमत् ग्वालेरमुत्सललसकर महाराज दौलतरावसिध्या राज्यप्रवर्त्तमाने श्रा आदिनाथचैत्यालये धर्मोलसन्मानसचतुसघ युते वाद्यगीत मगर प्रवर्द्धित नित्योत्सवे श्रीमूलसघे नद्याम्नाये बलात्कारगणे सरस्वतीगच्छे श्री कुदकुाचार्यान्वये अबावतो सुप सकलभट्टारक शिरोमणि भट्ट रक श्री महेन्द्रकीर्ति जिष्णुना पट्टोदयाद्रि सहस्ररश्मिसन्निभ भट्टारक श्री क्षेमेन्द्रकीर्तिजिविभौमानां पट्ट लकारललापमान भट्टारका श्रीसुरेन्द्रकीर्ति तदाम्नाये खंडेलवालान टोंग्या गोत्रे धर्मशिरोमणि साहजी श्री जिणदासजी तस्य पत्नीकुक्षौ पुत्रास्त्रयः ज्येष्ठ पुत्र रतनचंद मध्यपुत्रः फतेचदजी तस्य पुत्रौ द्वौ ज्येष्ठ पुत्र रामलालजी लधु पुत्र केवलरामजी तस्य पितृत्व वश सहस्ररश्मि सदृश धर्मभारधुरधर सेठजी श्री मनीरामजी तस्य पनि कुक्षौ पुत्र लक्ष्मीचद्र रेतेपामा ज्ञानावरणीयकर्मक्षयार्थ वरांगचरित्र पथ घटापित । ४५. बद्धमानपुराण । र यता भट्टारक श्री सकलकीर्ति । भापा सस्कृत। पत्र संख्या ८० साइज ११४५। इश्च । प्रत्य पृष्ठ पर १३ पक्तिया तथा प्रति पक्ति मे ५२-५६ अक्षर। प्रति नवीन तथा सुन्दर है । लिपि सवत् १८०४. मगलाचारण- जिनेशे विश्वनाथाय ह्यनतगुणसिद्धये । धर्मचक्रभृते मूर्द्धना श्री वीरस्वामिने नमः ॥१॥ अन्तिम पद्य- जल्पितेन बहुना किमाश्रयेद्वीरनार्थ इह यो मया स्तुतः। मे ददातु कृपया असोद्भुतान् , मुक्तये निजगुणान् स्वशर्मणे ॥१॥ निसहस्त्राधिकापञ्चत्रिंशश्लोकाः भवन्ति ।

* प्रशस्ति-संग्रह
प्रशस्ति-
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यस्य तीर्थकरस्येव महिमाभुवनातिगः ।
रत्नकीर्तिर्यतिस्तुत्यः स नेकपामशेपवित् ।। १ ।।
अहकारस्फारी भवमतवेदांतविवुधो,
सवातश्रेणी क्षपणनिपुणोतिद्युतिभरः।
अधीती जैनेन्द्र जनि रजनिनाथप्रतिनिधिः,
प्रभाचद्र सांद्रोदयशमिततापव्यतिकरः॥२॥
महाबतिपुरंदरः प्रशमदग्धरागांकुरः स्फुरत्परमपौरुषः स्थितिरशेषशास्त्रार्थवित् ।
यशोभरमनोहारी कृतसमस्तविश्वंभरः परोपकृतितत्परो जयति पद्मनंदीश्वरः ।।
श्रीमत्प्रमेदु प्रभुपादसेवा हे वाकिचेताऽप्रसरत्प्रभावः।
सच्छावकाचारमुदारमेन श्रीपानन्दी रचयांचकार ।।
श्रालंबकचुककुले विततातरिक्षे, कुर्वनस्वांधवसरोजविकाशलक्ष्मीः ।।
लुपन् विपक्षकुमुदब्रजभूरिकांति, गोकर्णहेलिरुदियापलसत्प्रभावः ॥ ४ ॥
भुवि सूपकारसारं पुण्यवता येन निर्ममे कम्म ।
भीम इव सोमदेवो गोकत्तिोभवत् पुत्र ।
सती मतल्लिका तस्य यशकुसुमल्लिका पत्नो,
श्री सोमदेवस्य प्रेमाप्रेमपरायणा ||५||
विशुद्धयोः स्वभावेन ज्ञानलक्ष्मीजिनेंद्रयो.।
नया इवा भवन सप्तगभीरास्तनयास्तयोः॥६॥
वासाधरहरिगजो प्रह्लादः शुद्धधीश्चमहागजः।
भवराजो रत्न ख्यः स तनयाख्यश्वत्यमीसप्त ॥ ७॥
वासाधरस्याद्भुतभाग्यराशेमिात्तयोर्वेश्मान कल्पवृक्षः...
अगएयपुण्योदयतोऽवती! वितीणचेतोऽभिमतार्थसार्थः ।। - ॥
वासाधरेण सुधिया गाभीर्यायदि तृणीकृतोनाब्धिः ।
कथमन्यथा स वडवावलनसूत्रस्थितोवलति ॥ १० ॥
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द्वितोयोप्यद्वितीयो भूद्ध यौदायर्यादिभिर्गुणे।
पुत्र श्री सोमदेवस्य हरिराजाभिव. सुघोः ।। १० ।।
गुणै सदास्मप्रतिपक्षभूतैः सगीकरोत्येप विवेकचक्षु ।
इतीव शिष्ये हरिराजसाधु दोपैरवालोकि न शीलसिंधुः ॥ ११ ॥

[६० * प्रशस्ति-संग्रह तत् शिष्यो गुणरत्नराजितमतिः श्रीसिंहनन्दीगुरुः, सद्रत्नत्रयमडितोतिनितरां भव्यौयनिस्तारकः । तेषां पादपयो न मुग्धमधुपः श्री नेमिदत्तायते, चक्र चारुचरित्रमेतदुचित श्रीपालज संक्रियात् ।। २ ।। श्रयोत्तोत्तमवशण्डनमणिः स ब्रह्मचारीशुभः श्री भट्टारकमल्लिभूषणगुरोः पादाब्जसेवारतः। जीय दत्र महेंद्रदत्त सुयती सज्ञानवान्निर्मल: सूरि श्री श्रुतसागरादितिन सेवा परः सन्मतिः॥३॥ ख्याते मालवदेशस्थे पूर्णाशानगरे वरे श्री मदादिजिनागारे सिद्ध शास्त्रमिदशुभं ॥४॥ सवत् सद्धि सहस्त्रे च पचाशीति समुत्तरे । आषाढशुक्ला पचम्यां संपूर्ण रविवासरे ॥५॥ इति श्री सिद्धचक्रपूजातिशयं प्राप्ते श्रीपालमहाराजचरिते भट्टारक श्री मल्लिभूषणशिष्याचाय श्री सिहनन्दि ब्रह्म श्री शांतिदासानुमोदिते ब्रह्म नेमिदत्तविरचिते श्रीपालमहामुनींद्र निर्वाणगमनोनाम नवमोधिकारः समाप्तः। श्रीमदग्रोतान्वये यो गोत्रेगोयलमंडितः । स श्री.रामादासाख्यो तत्तनूजो गुणाग्रणी ॥ १ ॥ सुरा पगादितार्थेषु स्नानेषु यः सदारतः। सः श्रीमान् क्षेमदासोभूत क्षमादिगुणसागरः॥२॥ हरेरा गुरोभक्तिः दाबतत्परमानसः । नृवाना हृदथिद्वात्ती सौधीयया सुखावह ॥३॥ महागुणवतीरम्या सुचरित्रापतिव्रता। क्षेमश्री नाम तस्यासीद्भार्या लावन्यसुन्दरी ।।४।। तयोः पुत्राः समुत्पन्ना त्रयः रत्नत्रयोपमा । निजवृत्तेषु ये लोनाः भूपैः सन्मानिताः सदा ॥५॥ ज्येष्ठोति च गुणश्रेष्ठो धर्मज्ञो धर्मवत्सलः। निजाचारेषु यो लीनो : श्रीकेशवनामभाक् ॥६॥ मृवागी कोमल पीमानसे करूणान्विता ।

६२] * प्रशस्ति-संग्रह . - - - - अन्तिम पाठ तथा प्रशस्ति- जयतु जित विपक्षो मूलसघः सुपक्षो हरतु तिमिर भारभारती गच्छ वारः नयतु सुगतिमार्गा' शासन शुद्ववर्ग जयतु च शुभचन्द्रः कुन्दकुन्दोमुनींद्रः॥१॥ पुराणकाल्यार्थ विदांवरत्व विकासयन् मुक्तिविदावरत्व । विभातु वीरः सकलाधकीर्तिः कृताय केनोतो सकलाद्यकीर्तिः ॥२॥ भुवन कीर्तियति जयताद्यमी, भुवनपूरित कीर्तिचयः सदा । भवनबिब जिनागम कारणो, भवन वा दवातभरः परः ।।३।। तत्पट्टोदय पर्वते रविरभूद् भव्यांबुज भासयन् , सन्नेत्रासहर तमो विघटयन्नानाकरै र्भासुरः । भव्यांनंतगतश्च विग्रहमत. श्री ज्ञानभूषः सदा, चित्रं चंद्रक संगतः शुभकरं श्री वद्ध मानोदयः॥४॥ जयति विजयकीर्तिः पुण्यमूर्तिः सुकीति- जयतु च यतिराजो भूमिपैः स्पृष्टपादः। नयनलिनहिमांशु ज्ञानभूमस्यपट्टे, विविध पर विवादिक्ष्माघरे वज्रपात्तः॥५॥ तच्छिष्येण शुभेदुना शुभमनः श्री ज्ञान भावेन वै, पूतं पुण्यपुराण मानुषभवं ससारविध्वसक। नो कीर्त्या व्यरचि प्रमोहवशतो जैनेमते केवल, नाहंकारवशात्कवित्वमदतः श्री पद्मनाभेहितं ॥६॥ इदं चरित्रं पठतः शिवं वै श्रोतुश्चपद्मश्वरवत्पवित्र । भविष्णुससारसुख नृ देव समुज्य सम्यक्त्वफलप्रदीपं ॥७॥ चद्राकहेमगिरिसागरभूविमान, जगानदीगगनसिद्धशिलाश्च लोके। तिष्ठन्ति यावदभितो वरमर्त्य सेवा, तिष्ठंतु कोविद मनोबुजमध्यभूताः ॥८॥ सवत् १७६६ वर्षे कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा शशिवासरे लिपिकृतं विंदरावति नगरे पं० विहादारीसेन प्रति नं० २. पत्र सख्या ६६. साइज १०४४|| इन्च । लिपि संवत् १७३०.

(६४ * प्रशस्ति-संग्रह है प्रति न० ३. पत्र संख्या ३३ साईज १३४४।। इञ्च । प्रारम्भ के १२ पृष्ठ नहीं है। लिपि सवत् १६२५. सवत् १६२५ वर्षे शाके १४६० प्रवर्तमाने दक्षिणायेन मार्गशीपंशुक्लपचे अष्टम्या दिवसे श्री कुभमेरुदुर्गे श्री उदयसिंहराज्ये श्रीखरतरगच्छे श्री गुणलाभमहोपाध्यायैः स्ववाचाथ लिखापितासौ वाच्यमाना चिर नदतात् । ५०: सम्यक्त्व कौमुदी। रचयिता श्री गुणाकर सूरि भाषा संस्कृत। पत्र संख्या ३५. साइन ११४४|| इञ्च । रचना संवत् १५०४. लिपि सवत् १६११. -- 4 मगलाचरण- तस्मै नित्य चिदानद स्वरूपायाहते नमः । यदागमरसास्वद तत्त्व विज्ञायते नरः॥१॥ युगादौ जगदे येन श्रेयः श्रेयस्करानृ णा ।' स भूयाद्भविना भूत्यैनाभिजन्मा जिनेश्वरः ॥२॥ अन्तिम- पूर्वर्षिभि या रचिता कथेयमग्रेऽपि काव्ये सुभाषितेश्च । श्लोकै मया सा'ग्रथिता प्रमोदाहोदाभ्रबाणेदुमितेत्रवर्षे ॥ १॥ इति चैत्रगच्छोयैः श्री गुणो करसूरभिः । चक्र श्लोक नवारम्या कथा सम्यक्त्वकौमुदी ।।२।। पुप्फदतौ स्थिरौ यावद्यावच्च ध्रुवमडल । वाच्यमाना बुधै स्तावज्जोयात्म्यक्त्व कौमुदो ।। ३ ।। इति सम्यक्त्व कौमुदी समाप्ता। सवत् १६११ वर्षे भादवा सुदी ४ दिने मेडता मध्ये उपाध्याय श्री कर्मतिलक तत् शिष्य वा० श्री ज्ञानतिलक लिखावत' सम्यक्त्व कौमुदी आत्मर्थे ५१. सारस्वत चन्द्रिका सटीक । टीकाकार श्री चन्द्रकीर्ति । भाषा सस्कृत । पत्र संख्या १६६ साइज elx४ इन्च । प्रत्येक पृष्ठ पर १७ पक्तिया तथा प्रति पक्ति मे ४०-४२ अक्षर । लिपि सवत् १७४६. मगलाचर- नमोस्तु सर्वकल्याणपद्मकाननभास्वते । जगश्रितमनायाय पराय परमात्मने । . ~~

६६-]
* प्रशस्ति-सग्रह म
५२. सिद्धान्तसार संग्रह।
र यता आचार्य श्री नरेन्द्रसेन । भाषा संस्कृत । पत्र संख्या ६३ साइज १२४५ इश्च । लिपि
सवत १८०३. लिपि स्थान जयपुर । प्रति जीण शीर्ण हो चुकी है।
प्रारम्भ-
-
भूर्भुवः स्वस्त्रयीनाथ त्रिगुणात्सत्रयात्मक ।
त्रिभिः प्राप्तपरंधाम वंदे विश्वस्तकल्मष ॥ १॥
प्रशस्ति-
श्रीवीरसेनस्य गुणादिमेनो जातः सुशिष्यो गुणिनां विशेष्यः ।
शिष्यातदीयोऽजनि चारुचित्तः सदृष्टिचित्तोऽत्र नरेंद्रसेनः॥१॥
गुणसेनोदयमेनाऽजयसेना संबभूवुरतिवर्याः ।
तेषां श्री गुणसेनः सूरिर्जातः कलाभूरिः ॥ २॥
अतिदुःखमानिकटवर्तिनिकालयोगे,
नष्ट जिनेंद्र शिव वर्मनि यो वभूव ।
आचार्य नाम विरतोऽत्र नरेंद्रसेन-
स्तेनेदमागमक्चो विशद, निवद्ध ॥ ३॥
इति सिद्धांतसारसग्रहे प्राचार्यश्रीनरेंद्रसेन विचिते ४ दशमः परिच्छेदः समाप्तः ।
५३. सिन्दूर प्रकरण ।
रचयिता श्री सोमप्रभसूर ।'भाषा सस्कृत । पत्र संख्या ११. साइज १२४५ इञ्च । पद्य संख्या ६६.
लिसिसवत् १८८६.
।
प्रारम्भ-
सिदूरप्रमकरतिपकरशिरः क्रोडे कषायाटबी,
दाव चिनिचयः प्रबोध दिवस प्रारभसूर्यादयः ।
मुक्तिस्त्रीकुचकुमकुकुसरसः श्रेयस्तरोपल्लयः,
प्रोल्लासः क्रमयोर्न वद्युतिभरः पार्थप्रभो. पातु वः ।,
प्रशस्ति-
सोमपभाचार्यमशासयन्नपुसां तमः पंकमपारोति।
तटप्यमुस्मिन् मुपदेशलेशे निशम्य माने निशमेतिनाशं ॥१॥

[६८ * प्रशस्ति-संग्रह * गुरूणामुपदेशेन सच्चरित्रमिद शुभं। नेमिदत्तो व्रती भक्त्या भावयामाश शम्मदं ॥६॥ इति श्री सुदर्शनचरित्रे पंचनमस्कारमहात्म्यप्रदर्शके ब्रह्म श्री नेमिदत्तविरचिते सुदर्शनमहामुनि मोक्षलक्ष्मी संप्राप्ति व्यावरणनो नाम द्वादशमोऽधिकारः।। इति सुदर्शन चरित्रं संपूर्ण । ५५. स्वामीकार्तिकेयानुप्रेक्षा सटीक । मूलकर्ता स्वामी कार्तिकेय । टीकाकार आचार्य शुभचन्द्र । भाषा प्राकृत संस्कृत । टीका संवत् १६०१. लिपि सवत् १७२१, प्रारम्भ के ७३ पृष्ठ नहा है । ग्रन्थ प्रकाशित हो चुका है। प्रशस्ति- श्रीमूलसंघेऽजनि नदिसधः, वराबलात्कारगणः प्रसिद्धः । श्री कुन्दकुन्दोवरसूरिवर्यः, विभातिभाभूषणभूषितांगः ॥१॥ तदन्वये श्रीमुनिपद्मनंदी, ततोऽभवछीसकलादिकीर्तिः। तदन्वये श्री भुवनादिकीर्तिः श्रीज्ञानभूषोवरवित्तिभूषः ॥२॥ तदन्वये श्री विजयादिकोतिः, तत्पट्टधारी शुभचंद्रदेवः। तेनेयमाकारि विशुद्धटीका श्रीमत्सुमत्यादि सुकीर्तिकीर्तेः ॥३॥ सूरिश्रीशुभचन्द्र गण वादिपर्वतवज्रिणा । त्रिविद्येनाऽनुप्रेक्षायावृत्ति विरचितावरा ॥४॥ श्रीमत विक्रमभूपतेः परमिते वर्षे शते षोडशे, माघे मासिदशामवह्निहिते ख्याते दशम्या तिथौ श्रीमछ्रोमहीसार सारनगरे चैत्यालये श्रीपुरोः, श्रीमछ्रीशुभचन्द्र देवविहिता टीका सदा नन्दतु ॥५॥ वर्णी श्रीक्षीमचन्द्रण विनेयेन कृतप्रार्थना । शुभचंद्र-गुरो स्वामिन कुरु टीकां मनोहरां ॥६॥ तेन श्रीशुभचन्द्रण त्रैवेद्यन गणेशिना । कार्तिकेयानुप्रेक्षाया वृत्तिविरचितावरा ॥ ७ ॥ तथा साधु सुमत्यादिना कृतप्रार्थना । सार्थीकृतीसार्थेन शुभचन्द्रण सूरिणा ॥ ८ ॥ लक्ष्मीचन्द्रगुरु स्वामीशिष्यातस्यसुधीयशा। वृत्तिर्विस्तरितातेन श्री शुभेदुप्रसादतः ।। ६ - । ७० * प्रशस्ति-संग्रह * --- विशदशीलस्वधुनीसिलातलैकगजहसोत्सवायक्रीडनः प्रियः, स्वमतसिंधुवद्धनप्रकृष्टयामिनी न पीनतेजसोद्भुत प्रभामितः । सुरेद्रकीर्तिशिष्य विद्यादिनद्यनगमदनकपंडितः कलाधर स्तदीप देशनामवाप्यशुद्धबोधमाश्रित्तो जितेंद्रियस्य भक्तितः ।। गोलशृगारवशे नभसि दिनमणि नीरसिंहोविश्चित् , भार्या पीथा प्रीतीता तनुरुहविदितो ब्रह्मदीक्षाश्रितोऽभूत। तेनोच्चैरेष ग्रंथ कृत इति सुतरा शैलराजस्य सूरेः, श्री विद्यानदिदेशात्सुकृतविधिवशात्सर्वसिद्धिप्रसिद्धय ।। श्री शैलराजस्य चरितं दुरितापहं । रचितं भृगु कच्छे च श्री नेमिजिनमन्दिरं ।। धम्मोर्थी लभते भृषं धनुयुतो वृद्धि च निःस्वाधनं, पुत्रार्थी सुकुलोचितं च तनयं कामांश्च कामी लभेत् । मोक्षार्थी वरमोक्षमाश्चलभते प्राक्तन सांद्रेण किं, ह्य तत् शैलमुनींद्रराजचरित सर्वार्थसिद्धिप ।। पठकः पाठकश्चैव वक्ता श्रोता च भावकः । चिरं नंद्यादयं प्रथम्तेन साद्ध युगाविधि ।। प्रमाणमस्य प्रथस्य द्विसहस्रमित बुधैः । श्लोकानामिह मंतव्यं हनूमक्चरिते शुभे ।। इति श्री हनूच्चरिते ब्रह्मजितविरचिते द्वादशः सर्गः ।। सवत् १६८० वर्षे मार्गसिर सुदी पचमी दीतवार पुस्तक लिखापित जैसी श्रीपति । ५८. हरिवंशपुराण। रचयिता भट्टारक श्री सकलकीर्ति के शिष्य ब्रह्मचारि श्री जिनदास । भाषा सस्कृत । पत्र संख्य २२३. साइज १२:४५। इश्च । प्रत्येक पृष्ठ पर १२ पक्तिया तथा प्रति पंक्ति मे ४६-५० अक्षर । प्रति लिा सवत् १८०३ प्रति शुद्ध तथा सुन्दर है। मगलाचरण- सिद्ध संपूर्णभव्याथे सिद्ध कारणमुत्तमं । प्रशस्तदर्शनशानचारित्रप्रतिपादन ॥ १ ॥ सुरेन्द्रमुकटाश्लिष्टपादपद्माशुकेशर । प्रणमामि महावीर लोकत्रितयमगल ।।२।। - [७२ * प्रशस्ति-संग्रह * कर्मक्षयं बोधिचरित्रलाभ, शुभां गतिं चेह न चान्पदेवः॥ ११ ॥ यङ्किचिदन्न स्वरसंधिजात, पदादिकिचस्खलित प्रमादात् । क्षमस्व तद्भारतितुच्छबुद्ध, ममाशुनो मुह्यति कः श्रुताब्धौ ।। १२ ।। तथा च धीमझिरिद विशोध्यं, मुनीश्वरै निर्मलचित्तयुक्तः । कृत्वानुकंपां मयि जैन शास्र- विशारदैः सर्वकपायमुक्तः॥ १३ ॥ यावन्महोमेरु नगः पृथिव्या शशी च सूर्यः परमाणवश्च । श्रीमजिनेस्द्रय गिरश्च तावन्नदविदं नेमिचरित्र मार्य ॥ १४ ॥ रक्षा सघस्य कुर्वतु जिनशासनदेवताः। पालयतोऽखिल लोकं भव्यसज्जनवत्सलः॥१५॥ इति श्री हरिवशे भट्टारक श्री सकलकीर्तिशिष्य ब्रह्मचारि श्री जिनदास विरचिते श्री नेमिनाथ- निवाण वर्णनो नामैकोनचत्वारिंशत्तमः सर्गः॥ ३६ ।। संवत् १८२७ वर्षे मितो ज्येष्ठ बुदि ५ चंद्रवासरे सवाई जयपुरमध्ये चंद्रप्रभुचैत्यालये पडितो- त्मपडित श्री चोखचदजी तत् शिष्य पडितोत्मपडित श्री रायचदजी तत् शिष्येण सेवक सवाई रामेण इदं त्रटित प्रथ पूर्ण कृत। प्रति नं० २. पत्र संख्या ३५५. साइज १२४५ इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर , पक्तियां तथा प्रति पक्ति में ३६-४० अक्षर । प्रति मे दो तरह की लिखावट है । प्रति सुन्दर तथा शुद्ध है शुभ संवत् १६६१ वर्षे ज्येष्ठ मासे शुक्लपक्षे चतुथी दिने राजमहलनगरे श्री पार्श्वनाथचैत्यालये महाराजाधिराज श्री मानसिंहजी राज्य प्रवर्तमाने श्री मूलसघे नद्याम्नाये वलात्कारगणे सरस्वतीगच्छे श्री कुन्दकुन्दाचार्यान्वये भट्टारक श्री पद्मनन्दिदेवा तत्पी भट्टारक श्री शुभचन्द्रदेवास्तत्पी भट्टारक श्री जिनचद्र- देवास्तव भट्टारक श्री प्रभाचन्द्रदेवास्तत्पी भट्टारक श्री चन्द्रकीर्ति तदाम्नाये खडेलवालान्वये गोघा गोत्रे याचकजनसंदोहकल्पवृक्ष श्रावकाचारवरणनिरतचित्त साह श्री धनराज तार्या शीलातोयतरगिणी विनय- वागेश्वरी धनसिरि तयो पुत्रः त्रयः प्रथम पुत्र धर्मधुरा धरणधीर साह श्री रुपा तद्भार्या दानशीलगुण- भूपणभूषितगात्रा नाम्ना गूजरि तयो- पुत्र राजसभागारहार स्वप्रतापदिनकर मुकुलिकृत शत्रुमुखकुमुदाय स्वसनिसाकारहादित कुवलय दान गुण . - [७४ * प्रशस्ति-संग्रह An- . . - 7 अन्तिम पाठ तथा प्रशस्ति- ततस्त्रिलोक प्रतिवर्षमादरात प्रसिद्धदीपालिककयात्र भारते। समुद्यतः पूजयितु जिनेश्वरं जिनेन्द्रनिर्वाणविभूतिभक्तिभाक् ॥१॥ त्रयः क्रमास्केलिनो जिनात्सरे विपष्टिवर्षान्तरभाविनोऽभवत् । ततः परे पंचसमस्तपूनिए स्तपोधना वपशतान्तरे गताः ॥ २ ॥ व्यशीतिके वर्षशते तु रुपयुक् दशैव गीता दशपूभिणः शते । न्ये च विशेगभृतोपि पच ते शते च साष्टदशरु चर्तुमुनिः ।। ३ ।। गुरु सुभद्रो जय भद्रनामा परो यशो बाहुरनततरस्ततः । महाहलोहार्य गुमश्च ये दधुः प्रसिद्वमाच रमहागमत्र ते ॥ ४ ॥ महातगो विनय वरश्रुतामृषिश्रति गुप्तपदाधि हादधत् । मुनीश्वरोन्य. शिवगुप्त सज्ञको गुणैः स्वमर्हवलिरप्यधात्पदं ॥५॥ समदराजोऽपि च मित्रवी विगुरु तथान्यौ वलदेव मित्रको । विवद्ध मानाय निरत्न सयुतः श्रियान्वितः सिंहवलश्चवीरवित् ॥ ६ ॥ सपद्मसेनो गुणपद्मखडभृत गुणाग्रणीव्याघ्रपदादिहस्तकः । स न गहस्तोजित दड्नामभृत्सनदिपेणः प्रभुदायसेनकः ॥ ७ ॥ तपोधन श्रीधरसैननामकः सुधर्मसेनोऽपि च सिंहसेनक । -सुनान्दपेणेश्वरसेनकोप्रभु सुनदिपेणाभयसेन नामकौ ।। ८ ।। स सिद्धसनोऽभयभीमसनको गुरुपरौ तौ जिनशांतिपेणको । अखङ पटखड मखडितस्थिति. समस्तसिद्धातमधत्तयोर्थः ॥ ६ ॥ दधार कर्मप्रकृनिश्रुतिच यो जिताक्षवृत्तिजय सनसद्गुरुः । प्रसिद्धवैयाकरणप्रभानवानशेपराद्वातसमुद्रपारगः ।। १० ।। तदीयशिष्यो मितसेन सद्गुरुः पवित्र पुन्नाटगणाग्रणो गुणी । जिनेद्र सच्छाशनवत्सलात्मना त गोभृता वर्प शताधिज विना ॥ ११ ॥ सुशास्त्रदानेन वदान्यत मुना वदान्यमुख्येन भुविप्रकाशिता । तदग्रजो धर्मसहोदर · समो समग्रवोद्धर्म इवान्तिचिंग्रहः ।। १२ ।। तपोमयो काति मशेपदिक्षु य. क्षिपन्वभौ कीर्तितीत्तिपेणमा.। तदशिष्येण शिवाग्रसौख्यभागारष्ट नमीश्वर भक्तिभारिणा ।। १३ ।। स्वशक्तिभाजा जिनसन सूरिणा धिय ल्पयोक्ता हरिवशपद्धति.। यदत्र किंचद्रचित प्रमादतः परस्यव्याहृतिदोपदूपित ।। १४ ।। तदपमादास्तु पुराण कोविदा. सृजतु जतुस्थिति शक्तिवेदिनः । प्रशस्तवशो हरिवशपर्वत. क्व मे मति क्याल्पतराल्पशक्तिका ।। १५ ।। - - * प्रशस्ति-संग्रह न [७६ जयन्ति देवासुर संघसेविताः प्रजातिशांतिप्रदशातिशासनाः। विशुद्धकैवल्यविनिद्रदृष्टयः सुदृष्टतन्वा भुवनेजिनेश्वराः॥३१॥ जयन्त्वजयपाजिनधर्मसततिः प्रजास्विह क्षेममुभिक्षमस्वतः । सुखाय भूयात्प्रतिवषवर्षणैः सुजात सस्था वसुधा सुधारिणां ॥ ३२ ॥ शाके बन्दशतेषुमतसदिशं पंचोत्तरेपूत्तरा, पातीद्रायुध नाम्नि कृष्णनृपजे श्री बल्लभेदक्षिणां। पूव्यो श्रीमदति भूभृतिनृपे वत्सादि राज्ये परा, सूर्याणामधि मडल जययुते वीरे वराहेवनि ।। ३३ ।। कल्याणैः परिवर्द्धमानविपुल श्री वर्द्धमाने पुरे, श्री पालियननराजवशतोपर्याप्तशेपःपुरा । पश्चाछौस्तटिका प्रजाप्रजनित प्राज्यार्चना चचने, शांतेः शातिगृहे जिनेसुरचिते वशोहरीणामयं ॥ ३४॥ व्युत्सृष्टापरसघसंततिवृहत्पुन्नाटसघान्वये, प्राप्त श्री जिनसेनसूरिकविना लाभाय वोधे पुनः । दृष्टोऽयं हरिखशपुण्यपरितः श्री पर्वतो सर्वतो, व्याप्ताशा मुखमंडलस्थिरतरस्थेयात् पृथिव्या चिरं ॥३५॥ इत्यरिष्टनेमिपुराणसग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यस्य कृतौ गुरुपर्वकमल वर्णनो नाम पर पष्टितमः सगः। इति श्री हरिवशपुराणसमाप्तमिद । सवत् १६६२ वर्षे पौष सितपचम्या तिथौ सग्रामपुरवास्तव्ये महाराजाश्रीमानसिह राज्यप्रवतमाने श्रीधर्मनाथचत्यालये श्रीमूलसधे नद्याम्न ये वलात्कारगणे सरस्वतीगच्छे कुदकुदार्चायान्वये भट्टारक श्रीपद्मनन्दि देवास्तत्प? भट्टारक श्रीशुभचन्द्रदेवास्तत्पट्टे भट्टारक जिनचद्रदेवास्तत्प? भट्टारक श्रीप्रभाचन्द्रदेवास्तपट्टे भट्टारक श्रीचन्द्रकीत्तिदेवास्तत्प? भट्टारक श्रीदेवेन्द्रकीतिदेवास्तदाम्नाये खडेलवालान्वये चांदवाडगोत्रे सा० श्री जाटू तद् भार्या जौणादे स्तयो. पुत्राश्चत्वारः प्रथम सा० लालू तद्भार्या ललतादे स्तयोः पुत्राः सप्त । प्रथम सा० गढमल तद्भार्या गौरादे वि० चि० भरथा तृतीय चि० वेणा भार्या बहुरगदे, चतुर्थ चि० मनोहर, पष्ट चि० दयाल सप्तम धीनड । प्रथम देवदत्त, वि० सा० कुमा तद्भार्या कोडमदे स्तयो पुत्र चि० दासा ततीय सा० मानू तद्भार्या लाडमदे स्तयोः पुत्रौ द्वौ प्रथम चि० वीठल हि चि० गोइद । चतुर्थ सा० कल्याण तभाया कल्याणदे एतेपा मध्ये चतुर्विधदानवितरणसमर्थः सा० कल्याण तद्भार्या कल्याणदे तया इद हरिवंश पुराणाख्य शास्त्र पल्यवतउद्योतनाथ भट्टारक श्रीदेवेन्द्रकीर्तये घटापित। ~-

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10 * प्रशस्ति-संग्रह * . महिवीढिपहाणउ गुणवरिछ सुरहविमण विभउजाइछ। वरतिगिणसालमंडिठपवितु गां इह पंडिउ सुरपारपत्त । रुहियासुविणामे चणिउइट्ट अरियणजणाह हियसल्लुकठ्ठ । जहिं सहहिणिरतर जणणिकेय पंडुरसुवरणधयसुद्दसमे सट्टालसतोरणाजत्थहम्म, मणासुहसदायण ण सुकम्म। चउहट्टयचञ्चरदामजत्थ वणिवर ववहरहिविजहिं पयस्थ । मगणगणकोलाहलसमत्थ जहिजणणिवसहि संपुराण भत्थ । जहि श्रावणम्मिथियविविहभंड कसवट्टिहिं कसियहिं भम्मखड। जहिं विसहि महायणसुद्धवोह णिच्चचियपूयादाणसोह। जहिं वियरहिवरचउ वगणलोय , पुराणेणपयासियदिव्वभोय । ववहारवार सपुराणसव्व जर्दिसत्तवसामयहीभव्य । सोहम्गपिालयजियाधम्मसील जहिं माणिागिरामागा महग्घली । जहिं चोरचाडकुसुमालदुट्ठ दुजणसखुद्दखलपिसुणधिट्ठ । णविहीसहिकहिमहिदुहियहीणा , पेम्माणुरत्तसव्वजिपवीण। जहि रेहहिहयपयदलिलमग्गु तं वोलरंगरगियधरग्गु। - . - , पत्तो - -- सुहलच्छिजसायरु ग रयणायरु, वुहयणजुउणइदउरु । सत्यत्थहिसोहिउ जणमणमोहिउ, णं वरणयरहएहुगुरु । तहि साहिसिन्कदरुमामिसालु , णियपइपालइ अरियणभयालु तं रजिवसइ वणिवरुपहाणु दुत्थियजणपोसणु गुणणिहाणु । जो अइरवालु कुलकमलभाणु , सिंघलकुवलयहुविसेयभाणु । मिच्छत्तवसणवासणविरन्तु जिणसासरिमगंधहपायभत्तु । चउचरियणामचीमासतोसु जो वसहमडणु सुयणपोसु । तं भामिणि गुणगणसीलखाणि, माल्दाहीणामे महुरवाणि । तंणदणुणिरुवमगुणशिवासु चउधरिय करमचदु अरुहदासु । जिणधम्मोवरिजेंवद्वगाहु शिवहियइइठ्ठ पुरयणहणाहु । जिणचरणोदएणविजोपवित्तु , श्रायमरसरत्तउजासुचित्तु । उद्धरिउ चउब्विहसंघभारु आयरिउविसावयचरिउचारु । चउदाणवतु णं गंवहत्यि वियरेइणिचजोधम्मपथि।

- ८२] * प्रशस्ति-सग्रह + अन्तिम पाठ तथा ग्रन्थकार की प्रशस्ति- गदउ जिणवरसासगासारउ जिवाणीविकुमग्गवियारउ । गांदउ वुहयणसमयपरिट्ठिय गांदउ सजणजेविसविट्टिय । गांदर णरवइपयरखंत गायमगुनोयह दरिसतउ। सतिवियंभउ पुट्टिवियभर तुहिवियभउ दुरिउणिसुभउ। सेणिउणिग्गउ गरयणिवासहु जिणाधम्मुविपण्डउ भवचासहु । जिं मच्छरु मोहविपरिहरियउ सुयज्झणिजे णिय मणुधरियउ हेमचदु आयरिउ बरिहा नहु सीसु वितवतेयगरिठ्ठल। पोमगांधर गांदउ मुषिवरु देवांदि तहु मीसु महीवरु। एयारह पडिमउ धारतड़ गयरोसमयमोहहगांतउ। सुहमाणे उवसमुभावत: गांदउ वभलोलु समर्वतउ। तह पासजिणेदहगिहर वगण वेपडियणिवसर्सिहरणयवराशा ! गरुवउ जसमलु गुणागणणिहाणु वींयउ नहु बंधउ भव्यजाणु । सिरि सतिदास गथत्थजाणु चव्वइ सिरि पारसुविगयमाणु । गांदउ पुणु दिवराउ जसाहिउ पुत्तकलत्तपउक्त विसाहिङ । घता रोहियासिपुरिवासि सयलुलो उसहणदउ। पासजिणाहुपयसरय णाणाथोत्तविदिर। पुणु णामावलि भगाउ विसारी दायहु केरी वरणविसारी अइरवालु सुपसिद्ध विभासिंउ सिंघल गोत्तिउ सुपणसमासिउ । चूल्हाणिवि अहिहाणे भणि जे गिायतेए कुलु संताधि । करमचन्दु चउवरिय गुणावर दिवर्चदही भजहि विमणहरु । तस्स तगुरुह तिगिण विजाया गा पंडवइशा तिरिणसमाया। पढमउ सत्यप्रत्थरसभाया महशाचदुगाउइयउधरहणु। तवणियापेमाहीसारी पुत्तच्चाफिजुवमार्ग। अग्गिमुचाणेंसेयसिड उज्जनजसचरिश्रो विजयसि। असुवरुपहरतियहिविरत्तउ जं असम्वुकइयाउ उत्तउ । दिउराजुजिगामहहिमल्ल गोणाहीतियरमणुविभल्ल । तहुकुखिपिधिमुत्ताहलाहलाइ इप्पणाइवेसुपरिउसलाइ । पहिलारउणियकुलह विदीउ हरिचालुणामु गुणगाविदीउ ।

[८४ * प्रशस्ति-संग्रह * - दोदाहीकामिणी प्रारजइ ज सुहिमरणे सग्गिगमिज्जा। जोजाअवरु वि गंदणुसारउ लखमगुणाम पडिय हारउ । मल्लाहीकामिणी तहु णादणु हीरणामे जामशाणादणु । घत्ता अवरु वि णदगुतीयड, ताल्हूणा में भसिउ । वाल्हाही मशहारु वेसुयताहसमासिउ । पढमउ पोमकतिदाम्सुहो इच्छाही भामिणी दिएणउसुहो। महदासुवि तहु पुत्तपियाउ पुणु दिवदासु वीरमणहारउ । साधारणही भज्जमणोहरु घणमलु गणदणु तहुपुणुसुहयरु । जगमलही कामिणी तहुसारी चायमल्लु सुयपोसणयारी। इय दिवराजह वसुपयासिउ काराविउ सत्तुजि रससारउ । कोहमोहमय माणावियारउ जं अक्खरुण किंपि विणणसिउ । सुपसाए विविरुद्ध उभासिउ त सरसइ महु खमउभडारी। वीरजिशाहो मुह णिग्गयसारी हेम पोमायरियवससि वभज्जुणगुणगणिणणिहीसें। मइकसवट्टियवंरणवरेष्पिा कव्यसुवणहु लीहविदेप्पिणु । मत्त अत्थ सोहागुखिनेविणु अत्थविरुद्धकिटिकट्टेविणु। सोहिउ एहु विमणुणाएविणु होउ चिराउ सुकन्चुरसायणु । विक्कमरायहु ववगयकालइ लेसुमुणीविसरश्रकालइ । धरणि अफमहुचइभविमासे सणिवारे सुयपचामिदिवस । कित्तियणरकत्तसुहजोय हुउ पुरणउसुविसुत्तहजोय। ... घत्ता हो वीरजिणेसर जगपरमेसर एत्तिउ लहुमहुदिजउ । जहिं कोकुगामाणु आवणजाणु सासयपउमहुदिजइ । इस महाराय सिरि अमरमण चरिए चउवग्ग सुकहकहामयरसेगासभरिए सिरि पंडिय मणि मागि- कविरइण साधु महणासु चउरी देवगज णामकिए सिरि अमरसेगा." गमगावराण गाम सत्तमइमपरिच्छेय सम्मत्त । प्रतिलिपि कार की प्रशस्तिथ सवत्मरेऽस्मिन् श्री नृपतिः विक्रमादित्यगताब्दः सवत् १५७७ ८६] * प्रशस्ति-सग्रह * तस्य शिष्य श्री प्रचण्डकीर्ति देवान्तस्य शिष्यमंडलाचार्य श्री सिहनन्दि इद आत्मसबोधग्रन्थ लिख्यत कम शयनिमित्त। प्रति न० २ । पत्र संख्या ४० साइज १४४३ इञ्च । लिपि सवत् १६०७ । लिपिकार की प्रेशस्ति- - सवत् १६०७ वर्षे अपाढ वुदि ८ शनिवारे रेवती नक्षत्र श्री सलीमसाहराज्ये रावणपाश्वनाथ चैत्यालये श्री मूलसघे भट्टारक श्री प्रभाचन्द्रदेवास्तपट्टे भट्टारक श्री धर्मकीर्तिदेवास्तत् शिष्य निवाइसपूरि श्रावक., गोधा गोत्रे सगहो भीष अर्जुन । सजनपुत्र सोनपाल पुत्र ३ वस्तु, पूरू, राउ । भतिजा बहुडु जिणदास श्रावकाः वाइसपूर निमित्यर्थ घटापित : । ... ४. आदि पुराण । रचयिता महाकवि पुष्पदन्त । भाषा अपभ्र श। पत्र संख्या २१८ । साइज १२४३ इञ्च । प्रत्येक पृथ्ठ पर १२ पक्तिया तथा प्रति पक्ति मे ५०-५६ अक्षर । लिपि सवत् १६६२ । विपय-पुराण । - मगलाचरण- सिद्धि वहूमणरंजणु परमणिरजणु भुवणकमलसरणेसरु । पविवि विग्यविणासणु णिरूवमसासणु रिसहणाहु परमेसरु । अन्तिम पाठ- गउभरहु वि मोक्खवि शुद्धमइ विविहकम्मवधेहि चुओ। फणिखेयरकिन्नरपवरनर पुप्फदत गणसथओ ॥ इय महापुराणेति सट्ठिमहापुरिसगुणालकारे महाकइपुष्पदंत विरइए महाभव्यभरहाणुमुणि महाकव्वे सगणहररिसहनाभरह णिबाणगमणं नाम सत्ततीसमोपरिछेउ सम्मत्तो। लिपिकार की प्रशस्ति- सवत् १६६२ वर्षे विक्रमादित्य राज्ये. सा नरसिंह तद्भाया चाउ द्वितीया भाउ । नरसिंह प्रथम पुत्र सा० गुणिया भार्या विल्हो तत्पुत्राश्चत्वारः । प्रथम पुत्र देवगुरुशास्त्र- भक्त सा० नरपति भार्या ठकुरी तत्पुत्र सा . ज्ञानचन्द । गुणिया द्वितीय पुत्र सा० मोलू भार्या चदणी । तृतीय पुत्र सा० दिउचन्द । चतुर्थ पुत्र सा० दुलू । सा० नरसिंह द्वितीय पुत्र सा० तालू भार्या जिणो। तत्पुत्री द्वौ प्रथम पुत्र सा० रावण तद्भार्या वीधो तत्पुत्र सा० विमलू। तील्हा द्वितीय पुत्र सा० भोला ताया दीपो तत्पुत्र सा० दोचा । सा नरसिंह तृतीय तुत्र सा० हेमा तद्भार्या उलो । सा० नरसिह चतुर्थ पुत्र सा० तिहुण तद्भार्या जीवो तत्पुत्र सा० उदा सा० नरसिंह पचमपुत्र तेजू भार्या सोभी। सा० नरसिंह पष्ठम पुत्र सा० बस्तू भार्या कुसूरी । सा० सीधर द्वितीय पुत्र मा० देवीदास भार्या गल्हा तत्पुत्र सा० छाजू 60 पल्हो । सा० सीधर तृतीय पुत्र सा० लोल तद्भायर्या जल्पही तत्पुत्री द्वौ प्रथम पुत्र सा० दृढा द्वितीय गूजर - [८८ * प्रशस्त-सग्रह । तत्पुत्रौ भुविज ज्ञाते नाथू कालू च धीधनौ । लाडी धवेद्र राज्याख्यो धणराजपिताभौ ॥ १४ ॥ पचमोऽभयराजाबो भाया दुरादे पतिः । चूहड कुसलाभिख्यो तत्पुत्रौ च वभूवतुः ॥ १५ ।। अजौ राजो राइसिंहपिताऽ जाइवदेप्रभुः धीत पिता अखेराजः प्रियाऽहीकारदेधवः ॥ १६ ।। छोतर धोनड तात प्रिया कल्याणदे प्रियः । कल्याणाहवोऽष्टमो रेजे नवमो मनराजकः ॥ १७ ॥ तम्य प्रिये तु ज्ञाते लाडी च मन सौख्यदे । जिनवेश्म कृत येन सूप्रदुर्गे सनोरम ॥ १८॥ द्वितीयो गढमल्लाख्य स्त्रिभार्यस्त्रिपुत्रकः । दयालऋषभाहू सु दरैश्च विराजते ॥ १६ ॥ तृतीय पासी नामा ड्यागदे पारदे पतिः । टोडरस्यपितरिजे जगरुपपितामहः ॥ २० ॥ तुर्यों ज़टमल्लाख्यो भूतजौणारे मत कः पर । पचम साहिमल्लश्च दुरगादे रमणः सुधी. ॥२१ ।। वल्हू विराजते षष्ट. भर्ता बहुरगदे स्त्रियः। मत्रीशः पेमराजख्य. उग्रसिंहमहीपते. सघेश पेमराजस्य चोहि महीपते. मत्रींशस्य वभौ काता सुधारदे च तामतः ॥ २३ ॥ सीतेव रामराजस्य पाडो. कुतोव सुदारी , दानत कल्याणवल्लीव रेजे भीव सुता शुभा ।। २४ ।। तेनेद शास्त्र लिखाप्य नरेशाय मुनये च दत्त । कर्मक्षयार्थ वें चिर नदतुः भूतले ॥ २५ ॥ प्रति नं० २ पत्र संख्या २७१ साइज ११४५ इन्च । प्रति मे तीन प्रतियो के पत्र मिनाये गये है। लिपि सवत् १५६४। ॥ २२ ॥ लिपिकोर को प्रशस्ति- सवत् १५६४ बर्षे श्रावण सुदी ३ मगलवारे राणापुर नाम नगरे रायश्री हेमकरणराज्ये श्री मुलसधे वलात्कारगणे सरस्वती गच्छे श्री कुन्दकुन्दाचार्यान्वये भट्टारक श्री पद्मनन्दिदेवास्तत्पट्टे भट्टारक श्री प्रभाचन्द्र- देवास्तत् शिष्यमडलाचार्य श्री धमचन्द्रदेवास्तदाम्नाये खडेलवालान्वये ट्रोंग्या गोने nu [६० * प्रशस्ति-सग्रह * ~ 14 - - - ५. उत्तरपुराण उत्तरपुगण । रचयिता महाकनि पुष्पदत । भाषा अपभ्रंश । पत्र सख्या ३६८। साइज १४४४ इञ्च प्रत्येक पृष्ठ पर १० पक्तिया तथा प्रति पक्ति मे ४० । ४८ अक्षर । प्रति बहुत प्राचीन है। उक्त ग्रन्थ अपभ्रंश भाषा का सबसे प्रसिद्ध ग्रन्थ माना जाता है । इसमे ६३ शालाओ के महापुरुषो का जीवन चरित्र वर्णित है। ग्रन्थ के अन्त म महाकवि ने अपना विस्तृत परिचय लिखा है । भगलाचरणr rat महो गभालयमामियहो, ईसहो ईसरचदहो। , अजियहो जियकामहो कामयहा पणावेनि पामजिगिदहो । प्रशस्ति तथा ग्रथ का अन्तिम भाग- " कयतिजोएसुगिरोहुँ अशिठ्ठिउ । किरियाछिरागाई मामिण परिट्ठिउ । शिहिय"अघाइचउक्कु |देहउ । वसुसमगुगांसरीमणिराणहउ' रिसिसहसेगा समउ अरिछिदणु । सिंद्धउ जिणुसिद्धत्यहाँ गादणु । अग्दिगहि अचिउ सिहिजालहिं । अमरिंदहि गावकुवलयमालहिं । णिव्वुए वोरेगलियमयगयउ । इदभूइ ., गणि ववलि जायड सो गिउलइरिहे गउ णिव्वाणाहो । कम्मविमुक्कउ मापयठाणहो । तहिं वासरे उप्पण्णउ केवलु । मुणिहे सुधम्महो पक्खालियमलु । त णिव्याणहो जबृणामहो पचमु दिव्वु गाणु हयकामहो । गदि सु णदिमित्तु अवरु वि मुणि। गोवद्धणु चउत्थु जलहरझुगिा । ए पच्चए -समत्थ -सुअपारय । गिरसियमिच्छामनयभय णीरय । पुणु वि साहुजय पोटिलु ग्यत्तिउ । जउ गाउ वि मिद्धत्थु हयत्तिउ । दिहिसेणकु विजउ वुद्धिलउ । गगु धम्मम्मेणु वि णीसल्लउ । पुणु णक्खराउ पुणु जसवालउ । .. पडु णामउ धुअमेणु गुणालउ । धत्ता:- प्राणुकपर अपर जिणेवि थिउ । पुणु, सुत्छु' जिगासुत्रहरु जस भछु अखछु अमदमइ । णाणणीवइगगाहरूमा १ ॥ मछवाहुं "लोहकुं भडार 10 श्रीयारंगधारि जगमार ॥ एयहि सव्वु मत्थु'मणि गाणिउ । सेंसेंट्दिा एक्कु सु परियाणिउ ।। जिणमणेण - वीरसेणेणविः । जिणमासणु सेविउ मयगिरिप वि ।। पुययाति णिसुणिय सुइभरहे । राऐं वहुरिउ दोषियविरहे पुग्णु . सयरेया.....सध्यवीरके....-पुहईसेगा......सगुत्तससके 1. 1 II ६२] प्रशस्ति-सग्रह . जिणापयामणविचलियगव्यह । होउ सति गोसेसह मन्त्रह ।। घत्ता - जय दिव्यहो कन्वहो तणउ फलु, लहु निणणाहु पयच्छउ । सिरि भरहहो अरुहहो जहिं गमगु, पुप्यतु तहिं गच्छउ । सिद्धिविलासिणिमणहारदय मुद्धाएवीतणुसभूए ॥ गिद्धणसधणलोपममचित्ते सध्वजीवणि कारणमित्ते ।। मछमलिल परिवढ़ियसोने केसवात्तं कासवगोत्ते ॥ वमन्नस सिइजणियविलास सुगण भरण देवउणिवासे || कालमलपावपडलपरिभत्ते णिग्घरेण णिधुत्त जत्ते ॥ णयवावीतलायकयराहाणे जरच वरवक्कलपरिहागा ॥ धीरे धूनीधूसरियगे द्वरुझिय दुजणससगन । महिसयणयले करपंगुरणे मग्गिय पडियपडिय मरगण ॥ मल्लखेडपुरवरे निवर्मत मणे अरहतधम्मु झापते । भरहमणजे णयणिलएं कव्ववधपयणियजाणपुलए । कोहणासवच्छरे ग्रामाढए. दहमइ दियह चद रुइरुढइ । - । घत्ता 'लिरि गिरहो भरहहो बहु गुणाहो, कइकुलतिलए मालिउ । सुपहाणु पुराणु तिसिद्धिहि मि पुरिसह चरिउ समासिड ॥ इस महापुराण तिसिट्टिमहापुरिसगुणालकार महाकइपुष्पयतविग्इए महाभब्वभरहाणुमगिणए महाकव्ये वीरगाह शिव्याणगमण भावितिसहिपुरिस वरणगा णाम दिउत्तरुसय सवी समत्तो। सात्मरेऽस्मिन श्री विक्रमादित्याताब्दाः संवत् १३६१ वर्षे ज्येष्ठ बुदि ६ गुरुवासरे अयह श्री योगिनीपुरे ममसगजावलि शिरोमुकुटमणिक्यखचित नखरश्मी सुग्त्राण श्री मम्मदसाहि नाम्नि मही विभ्रति सति अस्मिन् राज्ये योगिनीपुरस्थिना अग्रोतकान्वय नभः शशाक सा० महिपाल पुनः जिनचरणकमलचचरी के सा खेत् फेरा साढा महाराजा तूपा ऐतैः सा० खेत् पुत्र गल्हा आजा एतौसा० फेरा पुत्र वीद्या हेमराज एतैः वर्म कर्मणि सदोद्यमपरै ज्ञानावरणीयकर्मक्षयाय भव्यजनाना पठनाय उत्तर पुराण पुस्तक लिखापित । लिखित गोगान्वय कायस्थ पडित गर्व पुत्र वाहड राजदेवेन ।

[६४ * प्रशस्ति-सग्रह ५ संवत् १६२३ व पोप बुदी २ शुक्रवासरे श्री पार्श्वनाथचैत्यालये गढचपावतीमध्ये महाराजाधिराज श्री भारमलकछवाहा राज्ये श्री मूलसघे वलात्कारगणे सरस्वती गच्छे कुदकुदाचार्यान्वये भट्टारक श्री पद्मनन्द देवा स्तत्पट्टे भट्टारक श्री शुभचन्द्रदेवा स्तत्पट्टे भट्टारक श्री जिणचद्रदेवा स्तत्प? भट्टारक श्री प्रभाचन्द्रदेवा रत शिष्यमडलाचार्य धर्म चन्द्रः तत् शिष्य मडलाचार्य श्री ललित कीर्तिस्तदानाये खडेनवालान्वये अजमेरा गोने साहा चापा तद् भार्या सोना तत् पुत्रौ द्वौ प्रथमपुत्र सधभारधुरंधर जिनपूजापुरदर साह जाटा द्वितीय साह दासा। मा० जाटा भार्या जैसिरी तत्पुन ३ साह नेता भार्या नारिंगदे तत्पुत्र चि० नानु मा० खेता भार्या खेतलले । तत्पुत्र २ चि० वेणा गोपाजसाह । चैहथ भार्या चादणदे तत्पुत्र धर्मदास । साह दासा भार्या दौडदे तत्पुत्र चि० पदारथ भार्या पाटमदे तत्पुत्रौ तौ पीथाग्रिथा दुतिय पुत्र बरहथ भार्या सरदे एतेषां मध्ये इद शास्त्र लिखापित शील शालिनी देवगुरुभक्ति बहू श्री जैसिरी । अर्जिका श्री मुक्ति दत्त । प्रति न० २। पत्र संख्या २६ । साइज १०३४४३ इञ्च । संवत् १६१२ वर्षे भाद्रपदमासे शुभशुक्लपक्षे अष्टमीदिवसे प्रीतयोगे तक्षकगढमहादुर्ग महाराजाधिगन श्रीरामचन्द्रराज्यप्रवर्तमाने श्री आदिनाथचैत्यालये श्रीमूनसघे नद्यान्नाये बलात्कारगणे सरस्वतीगच्छे कुदकुदा चार्यान्वये भट्टारक श्री पद्मनन्दिदेवास्तत्पट्टे भट्टारक श्री शुभचन्द्रदेवा । तत्पट्टे भट्टारक श्री जिनचद्रदेवा स्तत्प? भट्टारक श्री प्रभाचन्द्रदेवास्तव शिष्यमडलाचार्य श्री घर्मचद्रदेवा तत् शिष्यमडलाचार्य श्री ललितकीर्ति दवा स्तदानाये खण्डेलवालान्वये अजमेरा गोत्रे साह लोहट तद्भार्या शीला तत्पुत्रास्त्रयः प्रथम सा० गोइद द्वितीय सा० दामा तृतीय सा० गोकल । सा० गोइद भार्या सोढी तत्पुत्राश्चत्वारः । प्रथम सा० पासा दु० सा० आसा तृ० सा० आल्हा चतुर्थ सा० पचाइण । सा० पासा भार्या पाटमदेः तत्पुत्रास्त्रयः। प्रथम सा० कवग भार्या कवलश्री द्वि० विगेह तृ० चिरजी हरा । सा० आसा० भार्या प्रासलदे तत्पुत्रौ द्वौं प्रथम श्रीपाल भार्या श्रियाटे द्वि० बाछा, तृतीय सा० श्राल्हा भार्या सुहागदे । तत्पुत्रौ द्वौ प्रथम सोहा भार्या शृगारदे, द्वि० चि० हेगा। चतुर्थ सा० पचाइणाभार्या पोसीर तत्सुत्रौ द्वौ। प्रथम चि० वीरदास. द्वि० धनेड । द्वि० सा० भार्या चांदी तत्पुत्रौ द्वौ प्रथम सा० वोहिथ, द्वि० सा० वाला, सा० वोहिथ भार्या बालहदे तत्पुत्रौ द्वौ प्रथम साह सुरत्राण द्वि० साह साधु । सुरत्राण भार्ये द्वे प्र० सिंगारदे द्वि० सुरत्राणदे तत्पुत्रौ द्वौ प्रथम चि० गोपाल चि० गढमल द्वि० सा० साणु भार्या साहिबदे । द्वि० सा० वाला भार्या बहुरगदे । तत्पुत्रौ द्वौ प्रथम चि० सारग द्वि० माधो। तृतीय सा० गोकल भार्ये द्वे प्रथम उदी द्वि० नोलादे । तत्पुत्रौ द्वौ प्रथम सा० कुभा द्वि० सहया। प्रथम सा० कुभा भार्या कुभलदे तत्पुत्रौ द्वौ० प्रथम चित्राण तु० चि० पदमा । द्वि० सा० सहमल भार्या सिंगारदे एलेपा मध्ये साह वोहिथ भार्या वालहदे इद शास्त्र कल्याणकव्रतउद्यापनार्थ आर्यनरसिंघाय दत्त । ८. करकण्डुचरित्र । रचयिता श्री मुनि कनकामर । भाषा अपभ्रश। पत्र संख्या ६२। साइज १०x४ इन्च । प्रत्येक पृष्ठ पर ११ पक्तियां तथा प्रति पक्ति मे ४०-४६ अक्षर । प्रति स्पष्ट तथा सुन्दर है विषय-महाराजा करकण्डु का जीवन ।

[६६ *प्रशस्ति-सग्रह * फित्तिममतियकवणथकइ , जसुगुण लिंती सरग्मइ सकइ । तहो सुय आहुलग्ल्हेगहुल , मुगिणफणयामर पयउवाहुल । वत्ता तहु अणुगएयर चरिउ , मइजणवए पयडिउ मणहरउ । ते वधवपुत्तफलत्तसहु चिरुणदउ जार विससिहरउ ॥ इय करकडुमहरायचरिए मुणि क्णयामर विरइए भव्यायण करणावयसो पचरुल्लाणविहाणकप्प तरुफलसपत्तो करकडु सव्यत्यसिद्धिलाहो शाम दहमो परिछेउं समत्तो । सवत् १५८१ वर्षे चैत्र बुदि ६ गुरुवासरे घठ्याली नाम नगरे गउ श्री रामचन्द्रराज्यप्रवर्त्तमाने श्री मूलसघे नद्याम्नाये बनात्कारगणे सरस्वती गच्छे श्री कुन्दकुन्दाचार्यान्वये भट्टारक श्री पद्मनन्दिदेवास्तत्प? भट्टारक श्री शुभचन्द्रदेवास्तस्पट्टे भट्टारक श्रीचन्द्रदेवास्तत्पट्टे भट्टारक श्री प्रभाचन्द्रदेवान्तदाम्नाये खडेलवाला- न्वये कासलीवाल गोने चतुर्विधदानवितरणकल्पवृक्ष साह काविन तद्भार्या कावलदे तयो पुत्रास्त्रय प्रथम साह गूजर द्वितीय साह राघौ जिनचरणकमलचचरीकान् दानपूजा समुद्यतान् परोपकार निरतान् प्रस्वस्तिचित्तान सम्यक्त्वमतिपालकान श्री मनोक्तधर्मान जितचेतसान कुटुबसाधारकान् रत्नत्रयालकृतदिव्यदेहान् श्राहारी- पधा भयशास्त्रदानसमुन्नितान् त्रयो सह बराज तद्भार्या प्रतिप्रतापद्म तम्य पुत्र परमश्रावक साह पचाइण तद्भार्या सीलवती प्रतापदे तत्पुत्रा सा० दुलह एतेषा मध्ये साह वछराज इद शस्त्र हिप्प र पालाय ह्य भोजा जोगी दत्तं ज्ञानावरयाक्षयाथ । ६. कर्मप्रकृति मुलकर्त्ता प्राचार्य नमिचन्द्र । टीकाकार अज्ञात । भापा प्राकृत | सस्कृत । लिपि संवत् १७७७ विषय-मिद्धान्त । मडलाचार्य श्री वर्भचन्द्र के शासनकान मे नागपुर मे ग्रन्थ की प्रतिलिपि की गयी। ग्रन्थ समाप्ति इति प्रायः श्री गोम्मटसारमूलात् टोका च' निकाश्य क्रमेण एकीकृत्य लिखिता। श्री नेमिचन्द्र सिद्धान्त चक्रवर्ती विरचित कर्मप्रकृतिग्रन्थस्य टीका समाप्ता । संवत् १५७७ वर्षे आपाढ सुदी ३ श्रीमूलसंघे नद्याम्नाये बलात्कारगणे सरस्वतीगच्छे श्रीकुदकुदा- चार्यान्वये भट्टारक भी पद्मनन्दिदेवास्तत्पट्टे भट्टा क श्री शुभचन्द्रदेवास्तत्पट्टे भट्टारक श्री जिनचद्रदेवास्तत्प? भट्टारक श्री प्रभाचन्द्रदेवास्तत् शिष्य धर्मचंद्रस्तदाम्नाये खडेलवालान्वये डेह वास्तव्ये पहाड्या गोत्रे सा० ऊधा तद भायां लाडी तत्पुत्र सा० फलहु भायां गुणासिरि तत्पुत्र पचाइण इद शास्त्र नागपुर मध्ये लिखाप्प प्रदत्ता [EE * प्रशस्ति-सग्रह * प्रत्येक पृष्ठ पर ६ पक्तियां तथा प्रति पक्ति में ३३-३६ अक्षर | टीकाकार श्री पडित प्रभाचन्द्र । प्रति मे मूलभाग कम है और टीका भाग अधिक है । प्रति सुन्दर तथा स्पष्ट नहीं है । सवत् १५७७ वर्षे वंशाख बुदी ४ शुक्रवासरे भट्टारक श्री पद्मनन्दिदेवारतत्प? भट्टारक श्री शुभचन्द्र- देवास्तत्पट्टे भट्टारक भी जिनचद्रदेवास्तत्प? भट्टारक श्री प्रभाचन्द्रदेवास्तदाम्नाये खटकडिपुरे व श्री गव नरवददेवराज्ये वघेरवालान्वये कोट्वागोत्रे सा० गणा तद् भार्या वाल्हू तत्पुत्रौ साह भीखू साह माधौ भीख भार्या सीलव्रतसयमगुणादिसयुक्ता पाल्ही तत्पुत्राः तोलू साह वोहिथ साह खेता नामानस्त्रयः । भोलू भार्या मदना वोहिथ भार्या गज) प्रथमा न्यासंगू तत्पुत्राः साह लाला जीणा चापा, लाखा, । लाला भार्या कान्हू तत्पुत्र उधरण । जीणा भार्या देउ तत्पुत्र नरसिंह । खेता भार्या करमैती एतैः शास्त्र लिखाप्यं सत्पात्राय मुनि माघन दिने दत्तं । १३ चन्द्रप्रभ चरित्र । रचयिता महाकवि यशःकीर्ति । भाषा अपभ्रंश | पत्र संख्या १२० । साइज १०x४|| इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर ११ पक्तिया तया प्रति पक्ति मे ३०-३४ अक्षर । विषय--चरित्र । 7 - -- मगलाचरणा- नमिऊगा विमलकेवलच्छी सव्वगदिगणपरिरंभ । लोयालोयपयास चप्पसामियं सिरसा ॥ १ ॥ तिकालवळमाण पचवि परमेट्ठिए ति सुद्धोह । तह नमिऊण भणिस्स चदप्पह सामिणो चरियं ॥२॥ अन्तिम पाठ तथा प्रशस्ति- घत्ता इय सयलवि सुरवइ जिणसथुइ परभत्तिभयभरसजा पचमकल्ल राहो सुक्ख णिहागाहो करिवि ठाणिसपत्ता ॥ ज सुधु,असुद्धउ गथचारु सारु साउ न जियावागणी खमउ सव्वु महुकविहिलहो विलमउ अगव्वु । जे परमेसर जाणहि अपार ते सोहिवि सोहि वि कुशाहुँ सारु । मुगिजापडिय मेल्लिवि कसाउ मोहतु मुगिण व इह मुहपसाउ गुजादेसह उमत्तगामु तहिं छदासुउहुउ दोणयामु सिद्धउ तहो गदगु भव्ववधु जिणधम्मु भारि ज दिएणु खधु तहु सुर जिट्ठठ बहुदवुभव्यु जि धम्मकजि विवालिउ दब्बु तहु लहु जायउ सिरिकुमरसिंह कलिकाल करिंदही हाणसीहु ज बहुपयारु । -- -- *प्रशस्ति-संग्रह * [१०० १४ जम्बूस्वामि चरित्र। रचयिता श्री वीर | भाषा अपभ्रश । पत्र संख्या ७६ । साइज ११४४|| इञ्च प्रत्येक पृष्ठ पर १४ पक्तिया तथा प्रति पक्ति मे ३६-३६ अन्नर ! ६२ वा पृष्ठ नहीं है। रचना सवत् १०७६ लिपि सवत् १५१६ । विषय अन्तिम केवली श्री जम्बू स्वामी के जीवन चरित्र का वर्णन । मगलाचरण- विजयतु वीग्चग्याग्गि चपि मदिराम थरहरिए । कजसु बलततो ए सुतरणि लग्गत विंदु छकारा ॥ १ ॥ ग्रन्थ समाप्ति - इय जबूसामिचारिए सिंगारवीरे महाकव्वे महाकइदेवयत्तसुय वीर विरइय बारहअणुपेहाउ भावणाए विज्जुच्चरस्स सव्वह सिद्धिगमण नाम एयारसमोसंबी परिछेउ सम्मतो। प्रशस्ति- वोरसाणसयचउपके सत्तरिजुत्त जिणेदवीरस्स । पिव्वाण उववरणे विक्कमकालस्स उप्पत्ती ॥ १ ॥ विक्कमणिवकालाउ छाहत्तरदससए सु वरिसाण । माहम्मि' सुद्धपक्खे दसम्मी दिवसम्मी संत्तम्मि ॥२॥ सुणिय पायरियपर पाराए वीरेण वीरणिदिटुं । बहुलत्थपथपय पवरमिण चरिय मुद्धरिय ॥ ३ ॥ इत्थेवदिणेमेहवणापट्टणे वछमाणजिण पडिमा तेणावि महाकणा वीरेण पयट्ठिया पवरा बहुरायकजधम्मस्थ कामग्गोट्ठीविहत्तसमयस्स । वीरस्स चरियकरणे इक्को संवत्मरो लग्गो ॥ ५ ॥ जस्स कयदेवयत्तो जाणोसच्चरियलद्धमाहप्पो । सुहसीलसुद्ववंसो जागाणी सिरिसतुआभणिया ।। ६ ।। जस्सय पसरणावयणा नहुणो सुमइससहोयगतिपिण। सोहलत लखाका जसइणामेत्तिविखाया ॥ ७॥ जाया जस्स मणिट्ठा जिणचइ पोमावइ पुणोचीया। लीलावइ तितईया पच्छिमभन्जा जयादेवी पढमकजत्त गरुहो सत्ताण कयत्तविडविपारो हो । विणयगुणमणिणिहाणो तपाउ तह णोमिचदोति ॥8॥ सो जयउकयवीरो, वीरजिणंदस्स करियं जेया पाहाणामयं भवण पियल्दे सेगा मेहवणे ॥ १०॥ .

- [१०२ *प्रशास्त-संग्रह * N . - पचयणबयणामय पाणपोट्ट, श्रवमयमहामइदलियदुट्छ । जिणगहवणच्चण पृयामयत्तु, अहिणाणियणिहि लविराणायवित्त । मेच्छत्तछत्तछेयणाछइल्लु गभोरपरमणिमयमइल्लु जिगोपरिभावणउच्छल्लमल्लु सम्मत्ता हरणामजमहल्लु किल्लिल्लबेल्लिकिल्लूरणिल्लु, भायरसुवलक्खणणेह गिल्लु । परिवारभारउद्धरणधीरु, जिणगन्धवारिपावणसरीरु॥ पविहियतियालवेदणविसुद्धि, सुवमत्थभावभावणअमुद्ध बहुसेवयणरसिरघट्टपाय, वदीगाहदीणहदिगणचाय || भोयणिहियपोसियसूरिखंदु, सउलामग्वहकयचदुवदु। घत्ता ५- - तहो सोहणहो रसालहो भोयपराजहो,- कलकणिट्ठच्छसहोयर। चाहबिमहामइ सोहणरिउवल सोहण- गुणरोहणविहियायर ॥१॥ गाहुलु साहुलु सोहणमइल्लु, तह रयणु गयण सतगु जिच्छइल्लु । च्छहमहिभायर अल्हणहोभत्त, च्छहमविहो माणासत्तचित्त । च्छहमवितहो पयपयरुहदुरेह, च्छहमयणोवयवामदेह । साहु लहु सुपियपिययममणुज्ज, णामे जयताकयणिजयकन्ज । ताह जियांदणु लक्खणु सलक्खु, लक्खेण लक्खिउ सयदादलक्खु । विनसियविलासरसगलियगव्य, ते तिहुश्रण गरि णिवसतिसव्व । सो तिहुवणगिरिभग्गड जनेण, पित्तउ वलेण मिच्छाहि वेणा । लक्खणु सव्वाउसमाणुसाउ, विच्छोयउ विहिणा जगियराउ | सोइत्थ तथाहिंडतु पत्त, पुरे विल्लरामि लक्खणु सुपन। लोक्खणहो समउ सो करइ पाउ, विदा गंदणु सम्माणघणा । दिणि दिणि त अइसय वुच्छिजंतु, तहि जिसणेहु णिभरुमहतु । मसरालवारिपोसियसरीरु, भद्दवए पवुट्टए मेहुणीरु। तइ यहाउ णिभरु तुसारु, ज एयारहमए मासिफारु । ज जिट्ठइ गिट्टरु तवइ सुरुः खर कर पयंडवम्हडपरु । चिरु वट्ठइ भोकह चित्त तं जि, सुवणहो सुवणेसहु णेहुजजि । .

[१०४ * प्रशस्ति-सग्रह * अणुहु जिवि संसारिय सुहाइ, सव्वइ दिव्वइ पयलिय दुहाइ । उच्चहि याहिल सुह रस पयासि, पत्थइ गत्थइ णिव्वुइ णिवासि । -- 3 , . घत्ता बारहसय सत्तरय पचोयत्तर, विक्कम कानि विइत्तउ । पढम पाक्खि गवि वारइच्छट्टि सहारइ, पूसमासे सम्मत्तिउ ॥३॥ जो भुवणसरण समसरणसामिणि, सामि सालसुविसाज । सिरिहरहोतेमहता अरहंतादि तु कुल्लाण ॥ १ ॥ जे सुपसिद्ध सुद्धद्धिरिद्धि या बुद्धिबद्धणुद्धारा। धर धीरधम्मधत्थाते सिद्धासद्धिनहोदितु ॥ २ ॥ जसरममंडकोंबडदडउछडकंडखंडणया। णिच्चड गुणकरडातिसूरिदितुस्ससुहं ॥ ३ ॥ हिस्सारसारसंसारसायरेतरणतारणतरडा । ते तस्स महियमोहावोहद्धीदितुउज्झाया ॥४॥ णदुट्ठमयकट्ठभट्ठायातिहगठिणिवणा। गिहाएसिट्ठियगा ते साहू दितु मगलयं ।। ५॥ डुमिदियकम्महियसम्मसामयमयणिम्महणहरिणराउसिवमग्गदावतु । ससागडइणिविडविडवियडतोडणसपावउ । सम्मछसणणाणणिरु सम्मच्चरियविसालु । तरयणत्तउ सिरिहरहो अहिरक्खउ चिरुकालु ॥ ६॥ इति पडित लाखू विरचित जितदत्तशास्त्र समाप्त । संवत् १६११ चैत्र वुदि ११ सोमवासरे श्रवणनक्षत्रे सिद्धि नामा योगे आम्रगढमहादुर्गे श्री नेमीश्वर चंत्यालये राज श्री भारमल राज्य प्रवर्त्तमाने श्रीमजसंघे बलात्कारगणे सरस्वती गच्छे नंद्याम्राये श्री कुन्दकुन्दा- चार्यान्वये ...शिष्यमडलाचार्य श्री धर्मचन्द्रदेवा तदानाये खडेलवालान्वये भट्टारक श्री प्रभाचन्द्रदेवा तत् शिष्य ब्रह्म वेगो इद शास्त्रं भीवीपाय पठयार्थ दत्तं । १६. धनकुमारचरित्र । रचिता श्री पं० रइधु । भाषा अपभ्रंश । पत्र सख्या ५१ साइज ६x४|| इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर है पंक्तिया तथा प्रत्येक पक्ति मे २८-३२ असार । प्रति अस्पष्ट है । लिपि संवत् १६३६, ग्रन्थ कत्ता ने प्रारम्भ और अन्त दोनों स्थान पर प्रशस्ति लिखी है।

[१०६
*प्रशस्तुि-सग्रह *
है
-
तहु भज्जा सील गुणस्स खाणि, सम्वहियणाइ तिथयरवाणि ।
तिहुवण सिरि मुणियण पविणीय, सिरि हरसिरिजिमराहबहुीय ।
एयहें सजणिया चारिपुत्त, लक्खण लक्ख.कय विण यजुत्त ।
णियकुलमयकु पुणु पदमु ता,
भुल्लाजमाहु पयडउ जलाह ।
वीयउ पुणु कुहयणजणनिव सु, सिरि सूले णामे जसपयासु।
तइयड़ रणदणु मृयणात्य रु,
सिरि कामराजु णामेण साहु।
चउथत गंदणु आसरिणवासु, आसलु णामे सो कुल पयासु।
एयहिं जो पढ़मउ गुणगरिट्ट सिरि भुल्लगुणामे साहु सिद्ध ।
घन्ता
आरउणपुरवरे सुहलत्थीघरे, तहि पहुबइरिणिकदणु ।
तोमर कुलमडणु अरि सरिखडणु, सिरि गणेस णिवणांदणु ।। ३ ।।
अन्तिम पाठ तथा प्रशस्ति-
घत्ता
एवंदउ जिणसासणु दिरियविणासुणु सहसयसासणु गुणभरि उ ।
अरु सत्थसमिधउ वएणहिसुघउ एदउ महियाल इहु
चार उ ॥४॥
गदउ महिवइ णाएपवीणु, णंदउ सज्जण्यणु भरियदीणु ।
णदउ सुधम्मु सिवसोत्यारि, णदहु जइवरवयभारधारि ।
इक्खायवसमंडणमयकु, सिरि पुण्णपालसुउ विगयसकु।
णन भुल्लणु णामेण साह णिउरादेवल्लहु दोहवा हु ।
महुहोज्जउ विमलसमाहिवोहि, जादुग्गइ गमणहु पाहणिरोहि।
णियकालें वरमउ मेहमाल, 'गिहि समुहु मगल वमाल ।
वहु अथसमिद्धउ चरिउ एहु, परिपुरणकरि-विसवेयगेहु ।
पतिएणसमाप्मउ पावणासु,
भुल्लगहुथिपडियपयासु।
तेण जिणिय सीसिचडाविऊण, पुणु पंडिउ पुजिउ पणमिऊण ।।
लेहाविविवहुपुथयजितेण, महिविथारिउ पुणउ सुवेण ।
घत्ता
गुणमुणिहु पसाएं पयडियराए सिर कमर सायणु ।
सोवाइ जतउ अथ सयतउ, वट्टउ सुहस्यभायणु ॥४॥

[१०८ * प्रशस्ति-सग्रह * सवत् १६३६ वर्षे फाल्गुन म से शुक्लपक्षे सताम्यां तिथौ अक्कवासरे श्री जिनचैत्यालयादि मूलनायक श्री चन्द्रप्रभस्वामी विराजमाने मारवाड देशे श्री मेदनीपुरुवरे अज्ञानांतमरदिनकर विधुरिजिन- शरणमन्जनानद नृश्वर लक्ष्म वल्लभे राज श्री पातिसाह श्री अक्कव्वर जलालदीमहंमदराज्ये । पायदामह- मदखानराज्ये श्री मूनसधे नद्याम्नायै बलात्कारगणे सरस्वतीगछे श्री कुन्दकुन्दाचार्यान्वये उभयभाषाप्रवीण भट्ट रक श्री पद्मनन्ददेवास्त पट्टे सिद्धान्तजलसमुद्रविवेककल.कमलिनीविकाशनमर्ताण्ड भट्टारक श्री शुभचन्द्रदेवास्तत्पट्ट विद्याप्रधानचारुचारित्रोवहनभट्टारक श्री जिनचन्द्रदेवा स्तत्पट्टे वादीभकुभविदारणैक केश। भट्टारक श्री प्रभाचन्देवा स्तत् द्वितीय शिष्य दुद्धरपचमहाव्रतधारणकप्रचड श्रीमत् मडलाचार्य श्री रत्नक र्ति तत् शिष्य पचाचारचरण चतुगन् भेदाभेदरत्नत्रय आराधकान् स्मरसारगविदारणकमृगेंद्रान् श्रीमत् भुवनकीर्ति तम्य 'शष्य मडलाचाय श्री धर्मकार्ति भव्यकुमुदविकाशनेक निशाकर द्वितीय शिष्प मंडलाच य श्री विशालक सिः तस्य शिष्य दुर्द्धपचमहाव्रतधारणैक प्रचड श्रीमत् मंडलाचार्य श्री लक्ष्मीचन्द्र स्तदाम्नाये खडेलवालवशे पहाड्योगोत्रे पूजापुरन्दर साह फाल्हा भ र्या फूलमदे पुत्र चत्वारि प्रथम पुत्र साह वीहड द्वितीय पुत्र माह जोधा तृतीय पुत्र साह मन्न' चतुर्थ पुत्र साह मेहा तस्प तृतीय पुत्रः सीलव्रतावगाढ परिपालान श्रीमत् सुदशनावतार साह श्री लूणा तस्य भार्या लूणादे तस्य पुत्र साह श्रीवत भार्या सुहलालदे तस्य पुत्र द्वितीय साह चि० वीदा द्वितीयपुर चिरजीव धनराजेन साह मन्ना भार्या मयणश्री पुत्र साह श्रा लूणाकेन पुण्यार्थेन पुस्तक लि प कायित बाई श्री करामाई केन घटापित। १७. धर्मपरीक्षा। रायता प० हरिपेण । भषा अपभ्रंश। पत्र संख्या ८८ साइज ११४५ इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर १२ पक्तिया तथा प्रति पक्ति मे ३०-३५ अक्षर । विषय-धार्मिक । प्रथम पृष्ट नहीं है। प्रारम्भिक पठ- सिद्धि पुरधिहिं कतु, सुद्धे तणु मणवयणे। भत्तिए जिणु पणवेवि, चिंतिउ वुहहरिसेणे ॥१॥ मणुए जम्मि बुद्धिए कि किजइ, मणहरजाइ कव्वुणरइज्जइ। त करत अवियाणिय आरिस, होसुलाहि भडरणि गय पोरिस। चउमुह कव्वु विरणि सयभुवि, पुप्फयंतु अण्णाणु णिसुभित्रि । तिरिणविजोय जेण तं सीसइ, चउमुह मुहथियतावसरासइ । ते एव विहहउ जडमाणन, तह च्छंदालकार विहीण। कव्वुकरतुमणविलमि, तह विसेस पियजणकिह रजामि। तो वि जिणिद धम्मअणुरायइ, वुहसिरिसिद्धसेरासुपसाइ । करमि सइ जिलिणिदलथिउजलु, अणुहरेइ णिरुवमु मुत्ताहलु । १ सुलहहिरणे २ सय ३ जेन १ २ ३ [११० * प्रशस्ति-सग्रह * १ ते णदहु जे भत्तियभावहि, तेदहु जे लहहि लहाब'ह। २ णिय परदुह दूरि लुढावाहि, ताण णिरतर सोक्खड सुहडहि, जो पुणु केविहु पढहि पढावहि । एयहु अत्थुकेविजे पयाहिं। ३ जे णिसुणेविपरिक्खहि भत्तिए, सयल पाणि वग्गहो दुहुहिजउ, परहिय करणिं मिहडिय अहहो, ते हुँ जहिं णिम्मन मइ सत्तिए । सोसमिट्टिए महिसोहिजउ । होउ जिणत्तणु चविह संघहो।' 8 पयडिय पहुपयावारिवारिं, धम्मपवत्तोणणदुइहारें, रणदउ भुवइ सहो परिवारि। णंदहु पयवहु अइवबहारें। घत्ता र संखदुसहसुसयाहिउ सदरसयाहिट, इउकहरयणु अग्गठवह । जाहरिसेणधराधर वहि-गयणुधर, तामजणउं सुह भव्वहं ।। इथ धम्मपरिक्खाए चउवग्गाहिटियाए वुह हरिसेण कयाए एयारसमो सधि परिछेद सम्मत्तो। १८. नागकुमार चरित्र रचयिता श्री महाकति पुष्पदत। भाषा अपभ्रश। पत्र संख्या ७०. साइज ११४५ इञ्च । प्रत पृष्ठ पर १० पंक्तिया तथा प्रति पंक्ति मे ३३-३७ अक्षर । लिपि सवत् १६१२. मंगलाचरण- पणवैदिपणु भावं पचगुरु, कलिमलवजित गुणभरिउ । पाहामि सुयपचमिहिं फलु, एयकुमारचारुचरिउ ॥ध्रुवक ।। महाकवि ने पारम्भ मे अपना परिचय इस प्रकार लिखा है- - धत्ता सिस्किन्हरायकरयलि णिहियां, असिजलवाहिणि दुग्गयरै। धवलहरसिहरहयमेहउले, पविउल मएणखेडणयरे ॥ १॥ १ दाहि २ हरे ३ जेजु ४ आरिवार ५ संखए दुसहसुसाहिउ इय कयरयणु अगवह । जो हरिसेण' घराप्परउ यहिंगर्याणवर ताममणहु मूहु सन्वहं ।

[११२ *प्रशस्त-संग्रह L पहु भत्तिए हंगु वसुमाणु दिछु, पर णएणु ण वाणरु णरु विसिछ । गेंगेउ सच्चे जणियतुहि, पर गएणु ण वहरिहिं देऊ पुट्टि। धम्मेण जु हिट्ठिलु धम्मरत्तु, पर णण्णु पत्रासदुहिंण चत्तु । चाएण कण्णु जणेदिएणचाउ, पर णण्णु न बधुहु देइ घाउ । कतीए मणोंहरु छणसंसकु, पर एण्ड ण उ दी इकलकु । गंरुयत्ति महसुविसुद्धचरिउ, पर एणु ण किडिदाढइ धरिउ । सुथरत्तै मेरु भणति जोई, पर गएणु पुरिसु पत्थरुण होई। सायरु व गहीलं कायरोहिं, पर णण्णु णे मथिउ सुम्वरेहि । घता जो वेरिणउ वरिणउ वरकइहिं, भावे णियमणि भावहि । तहु णण्णुहु केरउरणामु तुहु, सुललियफन्नि चडावहि ॥४ णिच्चेलत्तणु केसालु चणु, णिच्चणि मेजादेहाउचणु। नहाणविवजणु दताधोवणु, कालॅइ णोरसु परवसु भोयेणु ।। धरणिसयणु रइरससकोयणु, दुसहदसमपयमुहसिंघणु । पिसुणाकोसणु ताडणु बघणु, चडुयायवलकपवणइ ।। धाराहरजल धारासत्रणइ, सिसि साकणहरमरु वेंयई। हिमपडणइ निदट्टतणु तेयई, उन्हइ सोसियंगरसभेयई। वणतरुणिहसण सिहि सिहव गणई, गुहगय भीमीयरसहवसणई। कठोलवियविसहरचलणइ, सीहावग्घजीहादलघुलणा कोजघोरघोणाणिल्लुणणई, सर्वरगयगंडयर्डयकंडुर्यगई। एव माइदुक्खाइ सहेपिएँ, रएिणवंसेप्पणु-भिक्खचरैपिणु। सत्तु वि मित्त वि मरिसु गणेपिणु, मिउ भुं जेपिणु गिजिणेपिणु । भोयभुयंगच्चिउ सुमरेप्पिणु, मणिजगभगुंरत्तु भावप्पिणु सुक्कज्माणु मणि भाऊरेप्पिणु, मोहमहारि राउ मिल्लेपिणु । कम्मफसायराय त डेप्पिणु, दढकम्मट्ठगठि मिल्लेप्पिणु । जुत्तायारु तिगुत्तिहिं गुत्तउ, चउहु मि तेहिं रिसिहि सजुत्तउ ॥ 1- मति श्रेणगु अणगु हुई, पुंष्फयतसुरणमियपहु, घत्ता पत्त मोक्खं अणंगवियारउ । पसिया गायकुमार भडास्उ ।। -- [११४ प्रशस्ति-सग्रह * है उपरणउ दीवा उरिरवएणु। वुहु माणिकु णामे वुइहि मण्णु। तत्थरि सावउ इक्कुपत्तु । वयदाणसीलसियमेणजुत्त । वुयणरजणु गुणगरणविसालु। विछिएणवत्थदिप्पतभालु। धमत्थामसेवतु सतु। तस जीवदयात्र सिरिमहंतु ।। मेरुवधीरु गुणगणगहीरु । जिणगधो वारणम्मलसरीरु ।। गरवइ सहमडणु सबभासि । गोहाणगोहु सुयसीलरासि । चदुव्यभुवणसतावहारि। वररूवमउरणउ ण मुरारि । छहाग वहूसिउ ण महेसु । मदारयपुजिउ णमहेसु। जिणपयसी सकिउ णीलकेसु । रमदसणपाल उ सुयणतोस । सिरि ठाकुराणि जिण धम्मधुरधरु। सुरवइ करभुयजुयलेहि विमलु । सिरि जइसवाल इक्खाक्कुवस। चउजगसीणदणु सुच्छवंस । टोडरूमलुणामे घरपयलु। ज कित्ति तिलोयह पूरिथिरु ।। घत्ता ते आइ वि जिणहरि णयणाणंदणि, अइणाहु जिणवदिया पुणु दिट्ठउ पडिउ भवियणमडिउ, अविणय अभत्थियउ।। अष्टमी सधी परिच्छेद के वाद- जइसवाल कुलसपन्नो, दानपूयपरायणः । जगसी नदनः श्रीमान्, टोडरमल्लु चिरजियः।। वस्तुपाल इव ख्यातो, मध्यलोके वभूव यः। टोडरमल्लु ते साध्वी, वद्धता काम्रलोचने ।। अन्तिम पाठ- सिरि णायकुमारचरिउ खालु, पाणउ कइयणपुनहि । जो भव्यहमासइ लिहइ सुण ३ मई ते सिवसुह माणिक्क लहहि ।। इय णायकुमारचारु चरिये विवुचित्तारजणु पडिय सिरिमणिक्कराज विरइए च धरी जगसी पुत्त राइरजण टोडरमल्लणामकिए सिरि णायकुमार वालि महाबालि छेया भेया णियाण गमण एवमो सघि परिछेउ समत्तो। प्रशस्ति- गदउजिणवरिंद जिणसाप्तणु। दय धम्मु विभवह पासासणु। णंदउ परवई पइपालतउ । गदंउ मुणिगणु सुत उतवंतउ । पदउ जिण सुहमाग्गीचरतः। भवियणु दाणपूयविरयतउ । ---

[११६
* प्रशस्ति-सग्रह
अथ सवत्सरेऽस्मिन् श्र' नृपतिविक्रमादित्यराज्ये सवत् १५६२ तत्र पोष मासे कृष्णपक्षे पचम्या
तिथो भौमपामरे श्री गलव शुपस्थाने श्री पातसाहि हुमायू राज्यप्रतिमाने श्री काष्ठासघे माथुरान्वये पुष्कर-
गणे श्र भट्टारक श्री मत्तयकीर्तिदेवान तत्प? भट्टारक श्री गुणभद्रदेवान तत्प? मुनि क्षीमकर्तिदेवान् तदा-
म्नाये मुनि श्री थमभूषणदेवान् तदाम्नाये ब्रह्मचार। मुनि छाजू तत् शिष्य श्री मुनि ब्रह्मचारि पण्णा एतत्
इक्ष्वाकुवंशे श्री गोत्रे भडारी प्री जयमवाल वशाम्नाये श्री पचदेशलाक्षणी कव्रतपालकोन पचमी उद्धरण
घोर साघुवस्थावसे तस्य भार्या शोलतोयतरगिनी विनय वागेश्वरी तस्य नाम सुनखो। तत्पुत्र तृतीग ज्येष्ठ
पुत्र गुण गरिष्ठ साधू दासु-
-
२०. पद्मपुराण ।
रचयिता श्री,प० रइधू । भापा अपभ्र श। पत्र संख्या ६०. साइज १०॥४४ इञ्च । प्रत्यक पृष्ठ पर
१३ पक्तिया तथा पति पक्ति मे ५०-५४ अक्षर। विषय-पुराण । प्रति जीर्ण अवस्था मे है। लिपि
सवत् १५५१ ग्रन्थ का दूसरा नाम बलभद्र पुराण भी है।
मगलाचरण
परणयविद्ध सणु मुणिसुधयजिणु,
सिरि रामहु केरउ सुक्खजणेरउ,
पणविवि बहुगुणगण भरिउ ।
सह लक्खण पयामि चरिउ ।
ग्रन्थकत्तो की प्रशस्ति-
सिरिश्राइणाहु भव्व्यणइट।
पुणु समिपहु धम्मामयसवतु,
तहि सति वि जीवदयापहाणु,
पुणु बदमाणु चर मल्लुदेउ,
पुणु ताह वाणिज्झाए विचित्ति,
पुणु इदभूति गणहरु णवेत्रि,
पुणु ताह अणुक्कसि देवसेणु,
पुणु विमल सेणु तह धम्मसेणु,
तह सहसकित्ति आयमपहाणु,
गच्छह नाइकु सिहि गुण मुणिंदु,
पण वेप्पिणु लोयत्तयवग्छि ।
भव्ययणहु भवतएहासमतु ।
जि भासिउ महियलि विमलणाणु ।
सो
सयह जीवहं के रऊ,सेड़।
लोयत्तमगामिणि वएणदित्ति ।
सो धम्मु वि ज़वूसामि तेव।
इदियभुयगणिद्दलणवेणु ।
मिरि भावसेणु गय गतरेणु।
तह पहिरिण सन्न उ गुणनिहाणु ।
सदत्यपयासणु ,विगतदु ।
घत्ता
तहु पट्टि जईसरु णिहयर ईमरु
तहु सिस्सु पहाण उ तवयठाणउ,
जसकित्ति वि मुणियणतिल उ ।
खेमंचदु आयमणिलउ ॥ १॥

[११८ * प्रशस्ति-सग्रह * णरूमाल पाविवि करणीउ एम चित्तिव्बउ दसणु णाणु इछ,, धम्मु जि दहलक्खणलोयसारू, विणु धम्मे जीउ ण सुनिख थाई, इह चिंतिवि पुणु गउ साहु तत्थ, वहु विणएं पुणु विएणतु तेण, भो रइधू पडिव गुणणिहाण, सिरिपाल्ह वम्ह आयरियसीस, सोढत णिमित्ति णेमिहि पुराणु, तह रामचरिनु विमहु भणोहि, मुहु साणुराउँ कहमिरजेण, मुहु णांमु लिहाह चद विमाणि, भवदहिणिवडणुणो होइजेम । चरणु वि पुणु लोयत्तय वरिष्ठ । से विव्वउ एवु भवएणसारू। ति विणु केरचडिल विसयलु जाइ। अच्छा पिडिउ जिणगेहि तत्थ। कर आरोप्पेरिणु णियसरेण । पोमावइ वरवसह पह ण। महुवयणु सुणहि भावुह गरीस! विरय उ जहपइ जण विहियमाणु । लक्खण समेउ इउणि मुणोहि । विएणतिम अवहारि तेण । इय वयणु सुद्ध णिचित्तिठाणु। - - धत्ता इय णितुणिविई झपियसवणई, पडियण ताउत्तउ। हो हो किं वुत एहु अजुत्तउ, हउगह कम्मे गुत्तउ ।।४।। अन्तिम पाठ तथा प्रशस्ति- भन्मह गुणणंदउ कियसु कम्मु, अरु णदउ जिणवर भाणउ धम्मु । राउवि णदउँसुह पयसमाणु, णदउ गोवगिरि अचलठाणु। णदउ पुणु हरसौहंसाहु एत्यु, जि भाविउ चेयण गुण पयत्थु । सह अगिमंतु जसु फुरइ चित्ति, कलिकालपरियजित्राणि सत्ति। सिरि रामु चरित्त विजेणएहु, काराविउ सव्वहं जणिय णेहु। तहु णंदणु णामें करमसीहु, मिच्छतमहाउयदलणसीहु। सो पुणु णंदउ जिणचलणभत्त, जोरायमहायणि माणु पुत्त । सिरि योमावइ परवालवंसु, णदउ हरसी सघवी जससु । धत्ता वालोहमहणसिह चिरुणदउ इह, रइधू कइतीयउविधरा। मोल्लिक्क सम्माणउ कलगुणजाणउ, णदउ सहियलि सोवियरा। इय वलहद्द पुराणे वुइयणविदेहि लद्धसम्माणे सिरि पडिय रइधू विरइय पाइयवघेण अथ विहिसहिए [१२० *प्रशस्ति-सग्रह * प्रियछदाणुग मिनी वधू जटो तयो पुत्र दुइ प्रथमपुत्र दयालदास तस्य भार्या सुन्दरी द्वित य पुत्र रामदास तस्य भार्या सुदरी । साह खिउपाल तृतीय पुत्र जिनशासन उद्योतकारी जिनप्रतिष्ठाकरण इद्रस्वररावतारात भूपति सभा शृगारहार चद्रमा इव द्योतकारी विवेकसुदर साधुमनोहर तस्य भा मणा प्रियछदाणुगामिणं भार्या नगीना तयो पुत्र चतुरभुज तस्य भायो भागऊतो एतेपा मध्ये साह खिउपाल तस्यपुत्र चतुर्विधदान- दायक साह अगरमल्ल तेनेद शास्त्र बल भद्रपुराण लिखापित । लिखाय करि वाई जिंदो नैदत्त पठनाथ । लिखत पाडे केना। शुभ भवतु । २१. परमेष्ठि प्रकाशसार । अपभ्रंश। पत्र सख्या १८८ साइज ४ इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर ८ पंक्तियां तथा प्रति पक्ति मे ३३ ३६ अक्षर । प्रथम दो तथा १८७ का पृष्ट नहीं है। विपय धम । प्रति प्राचीन है। तृतीय पृष्ठ का प्रारम्भ- घत्ता गयसासयठाणइ सिद्धपहाणइ, इय पणपरमिट्ठिहिं केवल दिदिहि, कम्मरहिय गुणहजुवा। रयणत्तयलहिकम्मचुवा।। अन्तिम पाठ तथा प्रशस्ति- घत्ता -- 1 इय सिट्टिसरुवइ सिवसुहदूवइ, सुयणाणणिरिक्खिवि, इय परमिट्टि पचजगसारइं। तह गुणपयडइ जिणवरवाणी। गणहरदेवपमुहमुणिरायइ ।। इदपमुह जे सुरवरवग्गइ। तह पडिविवतिजयजहजत्थइ ।। तह अणु मग्गमुणिविदई। तह गुणपूयरयहि जे भन्बई। जे तहिं थुत्त पढहि तयक लइ। ते तह णाम जबहि एकग्गाइ। हो हि अमरणर सुक्खविरायइ। णिसुणि वि जेणिच्छउ करहें। सुमणिहरि वि धम्मु अहिसाते घरहें ॥१॥ भवियह जे भवदुत्तरतारइ ।। जा तयलोयपवित्तपहाणी ॥ पयडहिं ते चहुरिद्धिविरायइ ।। मुरिणहिणे तह गुणगणइणि सग्गइ ।। सुरणरअक्चहि ते सुपसत्थइ ।। पुजणिज ते तिहुयण चंदइ । पूयहिं ते हि ण रामरसम्बई ॥ तह थुइ करहिं अमरसरालई ।। जे तह धम्मचित्त अणुरायइ॥ जे तह धम्मु पसंसहिं चिशई॥ .

[१२२ *प्रशस्ति-सग्रह * तेहि लिहाइ णाणगथइ । विरइय पढमतिमहि विस्थारिय। पढहिं भव्वजह पडिय लोइयई। इय हरिवसपमुहसुपसत्थइ । चम्मपरिक्खपमुहमणहारिय। सातहोइ सुणि अत्थमणोयइ। पत्तो - पुरणयरणरेसह गोमह देसह- मुणिगणसावयलोयस हैं। धणुकंणु मणिसारइ धम्मद्धारइ करहि सति परमिट्ठपहो।। इय परमिट्टिएयाससारे अरुहादिगुणेहि वएणणाणलकारो अप्पसुद सुदकित्ति जहासत्ति महाक विरयतो णाम सप्तमो परिछेउ संमत्तो इति परमेष्ठिप्रकाशसार प्रथ समाप्तः। २१. पाण्डवपुराण । रचयिता मुनि श्री यश-कीत्ति । भ षा अपभ्र श ! पत्र संख्या ३४७. माइज १०॥४४॥ इश्च । प्रत्ये पृष्ठ पर ११ पक्तिया तथा प्रति पक्ति मे ३८) ४२ अक्षर । लिपि सवत् १६३६ रचना सवत् । प्रारम्भिक भाग- वोयसु सरधयरट्ठहो गयधयरट्ठहो सिरिलालमु सोरट्ठहो। पणवेवि काम जिणिट्ठहो णुयवलविठ्ठहो कह पंडवधयरहो। ग्रन्थ के प्रारम्भ मे दो हुई प्रशस्ति- x x सिरिसरवण उक्वणगिरि बिसालु, गंभीरपरिह उत्तगसालु। तहि निवसइ जालपु साहु भव्वु, णिउजी भज्जाल किउ अगव्वु । सिरिअयरव ल वसह पहाणु, जो सघहं वच्छलु विगयमाणु। तहो णदणु वाल्हागयपमाउ, नवगावनयरे सो सइ जिआउ । आवप्पिणु हितमक्खानु दिटछु, तेणवी सम्माणित किउ विदिछ । घेनाही तहो पियणाम सिह, गुरुदेवभत्तपारयणह इ8। तहो णदणु णंदणु हेमराउ, जिणधम्मो वरि जसु णिच्चभाउ । सुरतानममारखताईरज्ज, मतित्तणे थिउ पियभारकज्जे । घत्ता जे अरहंतु देउ मणिभाविउ, जासु पहुत्ते को वि ण ताविउ ।

1. [१२४ * प्रशस्ति-सग्रह * त णिसुणिवि जपिउ मुणि परिदु पडव चरित्तु अइगहणु जइवि, ता तहो वयणें गुणगणमहतु, सज्जणदुज्जणभउ परिहरेवि चगउ पुच्छिउ चुरयणह चदु । तुव उवरोहें हउ कहमि तइवि । पारभिउ सदत्यह फुरतु। णियणियसहाचरतविदोवि । घत्ता सज्जणु वि सहावु अकुडिल भावु, परदोस पयासिरू अवगुणमामिरू, ससिमेहु व उवयारमइ। दुज्जणुसाधु व कुडिलग३ । अन्तिम भाग- पढमहिं वीरजिंणदे अक्खि , सोहम्मे पुणु जसामें, णदिमित्त अवरजिय णाहें. एमपरंपराइ अणुलग्गउ, सुरणेसंक्खेवसुत्त अवहारिउ, पद्धडिया छदो सुमणोहरू, करेवि पुण्णु भयह वक्वाणिसं, जं हीणाही उ किंपिविसाहिलं, जो इहु चरिउ वि पढइ पढावइ, जो पुणु सद्दहेइ समभावे, जो भायरइति सुद्धि करेप्पिणु, जो पुणु एय चित्तु रणसुणेसइ, एउ पुराणु भवियह आसासइ, वइरिउ मित्तत्तणु रिसावई, पियकल पुत्तत्यिउ त पुणु, इट्ठ समागमु धणु सपावई, लाह सुहाथि उ लाह सुहाइवि, साणुग्गहगहसयलपयट्टहि, पढ़इ गोयमेण ण उ रक्खि उ । विण्हुकुमारे णिग्गयणामे। गोवद्धणेण सुभद्धसहावें। आयरियाह मुहाउ अपग्गउ । मुणिजमकित्तिमहिहि वित्वारिउ, भवियणजणमणसवणसुहकरू । दिदुमिछत्तु मोहु अवमाणिउं । तं सुयदेवि खमउ अवरहिउं । वक्खाणेपिणु भवियणदावई। सो मुच्चइ पुवकियपावें। सो सिउ लहइकम्मछिदेप्पिणु । सगु मोक्खु सोसिन्धुलहेसइ। अ युविद्धि जसुरिद्धि पयासइ । रज्जस्थिउ विरज्जु संपावइ । रज्जभट्ट, पुणु रज्जु चउग्गुणु । गउ परसु सिग्घु घरु प्रावइ । देव देहिवरू मच्छरू। मुचिति । मिला भावखणखें तुहिं। घत्ता आवई मबई जाहि वउ सपड सुहधरि पडसहिं। पडवचरिउ सुणताह विवाहविलासई विलसहि ।।

[१२६ * प्रशस्ति-सग्रह केसवदामराज्यप्रतिम ने छावडान्वये स. रेडा तद्रभार्या रयणेद तत्पुत्रौ तौ । प्र० सा० पदाथ वि० सा. जिणदाम । सा० पदार्थ भार्या पौसरि तत्पुत्रास्त्रय, प्रथम सा० नाथू वि० सा० श्री राणा तृतीय सा० हरदास सा० नाथू भार्या तूनी तत्पुत्र स० गोपाल भायो प्रथम गोरादे वि० सुहागदे तृतीय लाडी, तत्पुत्रास्त्रयः प्रथम चि० र मसिह वि० सकरदास तृतीय चि० उदयराज । द्वितीय सा० श्री राणा भार्ये व प्रथम रयणादे द्वितीय लाडमदे तत्पुत्रौ द्वौ प्रथम सा० रूपसी वि० मा० मेखा, सा० रूपसी भा० तु प्रथम सुरुपदे द्वि० उछग्गदे तत्पुत्रास्त्रय चि० त्रामसी चि० खीवसी चि० साहमल्ल । वि० सा० शेषा भार्ये प्र० सुहलालदे वि० कोडिमदे तत्पुत्र चि० दुगादास । तृ० सा० हरदास भार्या हषमदे तत्पुत्रास्त्रयः सा० पूरण सा० नेतस। सा० साधू। सा० पूर्ण भार्या कपूरदे तत्पुत्र चि० प्रतापसिंह । सा० नेतसो भार्या नवलादे तत्पुत्रास्त्रय चि० नारायण चि० मानसिंह चि० सुरत्राण साधू भार्या सुजाणदे वि०, सा० जिणदास भार्या ० प्रथम मनी सफलादे तत्पुत्र पच सा० कूजा भार्या कुसुभदे, वि० स० करणा भार्या करणादे तृतीय सा० भाप रभायां सावलदे चतुर्थ कान्हड एतेषा मध्ये सा० राणा भार्या लाडमदे हरदास भार्या हरषमदे एताभ्या इद पाडव पुराणशास्त्र लिखाप्य आचार्य श्री हेमचन्द्राय घटापित पोडशकारणव्रतोघापनार्थे । प्रति न० २ पत्र सख्या ४७१ साइज १०|| || इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर १० पक्तिया तथा प्रत पत्ति अक्षर । प्रति पूर्ण स्पष्ट और सुन्दर है। लिपि सत् १६१६ । सवत् १६१६ वर्प भाद्रपदमासे शुक्लपक्षे चतुर्दशी तिथो वुद्धवामरे घनिष्ठान ने आमेरमहादुर्गे श्री नेमीनाथ जिनचैत्यालये श्री राजधिराज भारमल्ल राज्यप्रवर्त्तमाने श्री मलसधे नंघाम्नाये बलात्कारगणे सरस्वतोगच्छे श्री कुंदकुदाचार्यान्वये भ० श्री पद्मनन्दिदेवास्तत्प? मट्टारक श्री शुभचन्द्रदेवास्तत्पट्टे भट्टारक श्री जिनचन्द्रदेवास्तत्पट्ट भट्टारक श्री प्रभाचन्द्रदेवास्तच्छिष्य मडलाचाय श्री धमचन्द्रदेवास्तच्छिष्य मडला चार्य श्री ललितकीर्तिस्तदाम्नाये खडेलवालान्वये गोधा गोत्रे सा० झाझू तद्भार्या होली तत्पुत्राश्चत्वारः प्रथम सा० ठाकुर वि० सा० छाहड तृतीय साह थेल्हा चतुर्थ सा० चाचा । सा० ठाकुर भार्ये प्रथम डीडी वि० लाछि तत्पुत्राः सप्त प्रथम चतुर्विधदान वितरण कल्पवृक्ष जिनपूजापुरदर सोलगागेव साह तेजा द्वि० कल्हा तृतीय सा० लूणा, चतुर्थ सा० हष्यौराज पचम साह उदा षष्ट साह बोहिथ सप्तम सा० रेखा । साह श्री तेजा भार्ये व प्रथम त्रिभुवनदे द्वि० ल्होकन तत्पुत्रौ द्वौ प्रथम साह लोहट वि० श्रगारदे। वि० हळू, भर्या हरखमेद । वि० साह केल्हा भार्या केवलदे तत्पुत्रा पच प्रथम सा० नारायण वि० नरवद तृतीय गोपाल चतुथ चिरजीव सारग पचम साह पदारथ । साह नारायण भाया नारगदे, साह नरव दभार्या नरवददे तत्पुत्र चि० धीनड, सा० गोपाल भार्या गौरादे, तृतीय साह लूणा भार्या ललितादे तत्पुत्रौ द्वौ० प्रथम साह हूलु वि० भूणां । साह हूलु भार्या हुलसिरी। प० साह ऊदा भार्ये ० प्रथम उत्पोदे वि० लाडी पष्ट साह वोहिथ भार्या बहुरगदे तत्पुत्र चिरजीव देवा वि० साह छाहड भार्या छाइडदे तृतीय थेल्हा भार्या विल्हसिरी तत्पुत्रास्त्रय प्रथम साह हीरा वि० साह हेमा तृतीय साह नाथू। साह हारा भार्ये प्रथम [१२८ * प्रशस्ति-सग्रह * सिरिभाहवसेणु महाणुभाउ, तसु मुव्वसिणेहिं पउकित्ति, ते जिणवरसासणाविएण, गा खमयदोमविजिएण, तकइत्त विजणेसुकइत्तहोड, जइ अम्हिहि चुक्किवि किपि कुत्त, घृत्ता जिणुसेणुसीसु पुणु त सु जाउ । उप्पण्णु सीसु जणु जासुचित्ति । कह विरइय जिणमणहोमएण। अक्खरपयजोडियलज्जिएण। जइ सुरणहि भावइ लोइ । खामयवउ सुयणहि तणिरूत्त । १ २ रिसिगुरुदेवासाए कहिउ अमेसुविचरिउ मइ। पउमकित्तिमुणिमुणपु गवहो देउ जिणेसरू बिमलमडू ॥ इति पार्श्वनाथचरित्त समाप्त । जयविरूद्ध एयं णियाणवध जिणिंदतुहसमए । तह वितहयचलणकित्तिण जउ पोमकित्तिस्स ।। १ ।। इयं पासपुराण भामयापुंहबीजिणालयांदट्ठ । एवहि जीवियमरणे हरिसविसाउणपउमस्स ॥ २ ॥ सावयकुलमिज्जम्मो जिण चरणाराहण कइ कइत्त च । एयाइ तिरिणजिणवरभवे भवे होतु पउमस्स ।। ३ ।। एयसयइ वाणऊरा त्तियमासे अमावसीदिवसे। लिहियं पासपुराण कइणा इह पउम णामेण ॥४॥ सवत् १६११ वर्षे अषाढ वुदि ६ दिने शुक्रवासरे आल्हणपुरग्थाने श्री मल्लिनाथ चैत्यालये श्री मृतसंघे नघाम्नाये बलात्कारगणे सरस्वतीगच्छे श्री कुन्दकुन्दाचार्यान्वये भट्टारक श्री पद्मनन्दिदेवास्ता ? भट्टारक श्री शुभचन्द्रदेवास्तत्प? भट्टारक श्री जिनचन्द्रदेवास्तत्प? भट्टारक श्री प्रभाचन्द्रदेवास्तशिष्य वसुधराचार्य श्री धर्मचन्द्रदेवास्तदाम्नाये खडेलवालान्वये चौवरी गोत्रे साह गोगा तद्भार्या गारबदे तत्पुत्रा वो प्रथम पुत्र साह भादा वि० साई महाराज । साह भादा भार्या भावलदे तयो. पुत्र चिरंजीव वूचा तद्भार्या बहुरगदे। सा० महाराज तद्भार्या सैणा तयो पुत्र सद्गुरूपदेशनिर्वाहक चतुर्विध दान कल्पवृक्ष साह घेल्हा मायां हरपमदे तयो पुत्रौ द्वो प्रथम चिरंजीव सुरत्राण वि० भीमसी एतेषा मध्ये साह महाराज तेनेदंपार्श्वनाथचरित्र पोडशकारणव्रतोघापनार्थ वसुन्धराच र्य ना धमनन्द्राय दत्त। प्रति न० २. पत्र संख्या १०८ संवत् १०x४ इन्च । प्रत्येक पृष्ठ पर ११ पक्तिया तथा प्रति पक्ति १ गवसयएउवागुइए २ णामं पउमस्स [१३० * प्रशस्ति-संग्रह यस्यागजो जान सुधीरिहराधवाख्यो ज्यायानमंदमतिरूझिनसवेदोषः अग्रोतकान्वयनभोगणपावणेदु श्रीमाननेम्गुणरजितचारूचेतः ।।२।। ततोभवत्सोढलनामधेयः सुतो द्वितीयो तूषत मजेयः । धम्मार्थ। मतृतये विदग्धो तिनाधिपप्रोक्तवृषेन मुग्धः ।। ३ ।। पश्चानुभूव शशिमडलम समानः ख्य तः क्षितीयश्वरजनादपिलब्धमानः । सद्दशनामृतरसायनप नपुष्टः श्री नट्टल शुभमनाक्षपितारिदुष्ट ।। ४ ।। तेन्दमुक्तमधिया प्रविचिन्त्या चित्त स्वप्नोपमं शेषमसारभुतं । श्री पार्श्वनायचरित दुरित पनोदि म क्षायकारितमितेनमुद व्यलेखि ॥५॥ अहो जणणिचनलु चित्त करेवि. भिससिए सुभमतुधरेवि । राणक्क पयपि र मज्झ सुरणेहु, कुभावइ सव्वई हों तह णेहु । इहस्थि पसिद्धउ ढिल्लिाह इक्क, गरूत्तमु ण अवइएण सम्कु । समर खमि तुम्हह त सु गुणाई, सुरासुररायमणोहरणाई। ससकसुहामकित्तिहे धामु, सुरायले किएणगाइयणामु। मणोहर माणि णिरंजणकाम, महामहिमालउ लोयह वामु। जियोसम्पायसरोयदुरेहु. विसुद्धमणोगइ गित्तइ सुरेहु । सयागुरूभत्तु गिरिंदुवधोरू, सुह सुह ओजलाहव्वगहीरू। अदुमणु सज्जणमुक्खपयासु, वियाणियमागतोयपयासु । असेसहसज्जणज्झि मणुज्ज, णरितह चित्तपयासिय चोज्जु । महामस्वतह भाव तेम, सरोयणराह रसायणु जेम। सबसणह गणभासणसूरू, सवधव वग्गमणिच्छियपूरू। सुहोह पयासणु धम्मुयमुत्त , वियाणियजिणवर श्रायमसुत्त, दयालयवट्टण जीवणवाहु, खलाणणचन्दषयासणराहु। पिया अइवल्लहवालिदेणाहु, घचा बहुगुणगणजुत्तहो जिणपयभत्तहो जो भासइ गुणनट्टलहो । सो पयहिं राहगणु रमियवरगणु, लघइ सिरिहरहयखल हो। पंचाणुन यधरणुससयल सुअणह सुहकारणु। जिणमयपहसचाणु विसमविसयासावारणु ।। मुढभावपरिहरणु मोहहिहरणिदारणु । Art १३२] * प्रशस्ति-संग्रह * शिष्य मुनि धर्मचन्द्रस्तदाम्नाये खण्डेलवालान्वये पहाड्यागोत्रे साह ऊधा तद्भार्या लाडा तत्पुत्र साह फ० हू वि० गजर । फलहू भायो सफलादे साह गजर भार्या गुण सगै तत्पुत्र पचाइण इद शास्त्र न गपुर मध्य लिखाप्य मुनिधर्मचन्द्र य दत्त । २४, पचास्तिकायप्राभृत । मूलकर्ता श्री कुन्दकुन्दाचार्य । टीकाकार श्री अमृतचन्द्राचाय । भाषा प्राकृत-सस्कृत । पत्र संख्या १४८. साइज ||x४ इञ्च प्रति पूर्ण तथा सुन्दर है। विषय-सिद्धात । लेखक पशस्ति- सवत् १६३७ वर्षे अषाढ बुदि १४ दिवसे शनिव'सरे मगि'सर नक्षत्रे श्री मूलसघे नद्याम्नाये बलात्कारगणे सरस्वतीगच्छे श्री कुन्दकुन्दाचायोन्वये ' भट्टारके 'श्री प्राचन्द्रदेवात् शिष्यमडलाचाय श्री धर्मचन्द्रदेवारतत् शिष्यमडलाचाय श्री ललितकीर्तिदेवान्तत् शिष्यमर्डलाचार्य श्रीचन्द्रकीर्तिदेवास्तद म्नाये खडेलवालान्वये गोधा गोत्रे सा० पचायण नायर्या पाढमदे तयोः पुत्रो द्वौ प्रथम जिनपूतापुरदर सघभार धुरधर चतुर्विध दान वितरण ल्पवृक्ष सा० श्री नूना तद्भार्यो नुनोमरि तयोः पुत्रा श्चत्वार नद्भार्या ल्होकन, द्वित'य जिणदाम तद्भार्ये व प्रथम मरुप द्वि. लहुडो । तृतोय सा० चिमला तद्भार्या बहुरगदे तयोः पुत्रास्त्रयः प्रथम सा० जीवा'तेद्भार्या जीवलदे तयोः पुत्र चि० दुग्गा ।४० सा० डीहा तद्भार्या डिडिसिरि, तृतीय चि० किसनदास चतुथ सा० चौड्य तद्भार्ये प्रथम चादणदे वि० लहुडा तया पुत्रौ वो प्रथम चि० कौजू वि० चि० दशरथ । द्वितीय पूना तद्भार्या पुनसिरि। तयो पुत्रास्त्रय प्रथम सा० जाटू तद्भ र्या जौणादे, दि० सा० नेता नद्भार्या नेतलदे तृतीय चि० जणदत्त द्वि० सा० बरु तद्भार्या कौतिगदे एतेषा मध्ये सा० जिणदास तद्भार्या स्वरूपदे इद शास्त्र लिम्वाप्य उत्तमपात्र य दत्त । २०. प्रद्युम्नचरित्र । रचियता महाकवि श्री सिंह सिद्ध । भाषा अपभ्रंश । पत्र संख्या १७५. साइज १२४५ इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर : पक्तिया तथा प्रति पक्ति मे ३२४३५ अक्षर । प्रति प्राचीन है। पत्रो का रंग बदल गया है। मोटे हैं। प्रथम मा वीरु T अक्षर मगलाचरण। । खमदमयमनिलयहो, तिहुयणतिलोयहो, वियलयिम्मकलं हो घुइ करमि ससत्तिए, अइणिरूभत्तिए हरिकुलगयणससकहो।। अन्तिम पाठ- इय पज्जुएणकहाए पडियधम्मत्यकाममोक्खाए वुहरल्हणसुव,, कइसीह विरइयाए पञ्जुरण संवु भाणु अरिणरूणिव्वाणगमन णाम पएणारहमो सधी, परिच्छेड़, सम्मत्तो।

[१३४ * प्रशस्ति-सग्रह * खुज्जु होवि तालहलु वछमि । गेय सुणणि वहिरोवि इच्छरो। रिणसुणि सिद्ध जपइ सरासई। मज्मु वयणु एउ दिदुकरहि । कव्वु किपि त तुहु करहिं ॥२॥ तेण विहिणि चिंततु अच्छमि, अधुहोवि णवणट्टपिच्छिरो, त सुणेवि जाजययमहासुई, घत्ता आलसु सकिल्लहिं हियउ म मेल्लहि, हउ मुणिवरवसे कहमिविसेसे, ता मलधारिदेव मुणिपुगमु, माहवचन्दु आसि सुपसिद्धउ, तासु सीसु तवतेयदिवायरू, तक्मलहरि झकोलियपरमउ, जासु भुवणो दूर तरू वकिवि, अमयचन्दु णामेण भडारउ, सरिसरणंदण वणसंछण्ण उ, वंभणवाडउ णामे पट्टणु, जो भु जइ अरिणरखयकालाहो, जासु भिच्चु दुज्जणमणसल्लणु, तहिं सपत्त मुणीसरू जावहि, ग पच्चक्खु धम्मु उपसमुदमु। जो खमदमजमणियमसमिद्धउ । वयतवणियमसील रयणायरू । वरवायरणपउरपसरियपउ । न ठिउ पच्छण्णु मयणु ांसकिवि । सो विहरंतु पत्तु वुहसारउ । मठविहारांजणभवणरवएणउ । अरिणरणाहसेणदलवट्टणु । रणधोरियहो सुयहो वल्लालहो । खत्तिउ गुहिलपुन गहि भुल्लणु । भव्वलोउ आणदिउतावहिं । घत्ता णियगुण अपससेवि मुरिणहि णमसवि, जो लोएहि अदुगुच्छियउ। णयविणयसमिद्ध पुणु कइसिद्ध, सो जइवरू आउच्छियउ॥३॥ x x X इय देवय णंदणु अवियण जणमणणयणाणदणु। वुहयणजणपयपकय छप्पउ भणइ सिद्ध परमप्पउ ।। अन्तिम प्रशस्ति- कृत कल्मपवृक्षस्य शास्त्र शास्त्र सुधीमता। सिंहेन सिंहभूतेन पापसामजभंजनम् ॥१॥ कामस्य काम्य कमनीयवृत्तेः वृत्त कृत्त कीर्तिमता कवीनां । १ थिउ २ कुतः १३६] * प्रशस्ति-संग्रह में २ जणं वच्छलु सज्जणंजाणि हरिसुं, उप्पणु सहोयरू तासु अवेरू, साहारणु लहु वउ तासु जाउ, तहो अणुवउ मह एउवि सु सारू, जावच्छहि चत्तारि सुभाय, एक्कहिं दिणि गुरूणा भणिउ वच्छ, भोवाल | सरासई गुणसमीह; चउविह पुसित्यर सोहारउ, कइ सिद्ध हो विरयतहो विणासु, महु वयण करेहि किं तुब गुणेण, सुई सत्यनिविह इराय सारसु। णामेण सुहकरू गुगाह पवरू ।। धम्माणरत्तु अई दिवाउ। सविणोउ विणसरू कुसुमसारू || पर-उवयारिय जजणियराय । णिसुणहि च्छप्यय कइरायदच्छ । कि अविणोवइ दिगमहि सीह । णिवाहि एउ पज्जुण्ण चरिउ ।। सप्पणउ क्म्म वसेए तासु । संतेण कूउ छाया समेण ।। पत्तो ३ . है कि तेण पहूवइ बहुधणई, जं विडियहण उद्धरइ । कन्वेण तेण कि कइयणेण, ज णछइल्लहं मणुहरई ॥ गुरूणो पुणो पउत्त पवियप्प पुत्त माधरहिचित्त । गुणिणा गुण लहे पिणु जइ लोगो दूसण थवइ ।। की वारंइ सर्विसेस खुदो खुद्दत्तणं १ वियरतों। सुवणी छुडु ममत्थो अमुणं तोणियंसहाबच ।। सभवइ बहुविग्ध मणुयाण समय मग्गलग्गाणं । मा होहि कजसि'ढलो विरयहि कव्व वर तोवि ।। सुह असुह ण बियाणावि चित्तं धीरेवि तेजए वण्णा । परकज परकन्ना विडत जेहिं उद्धरिय ।। अमियमंइदगुण आएस लहेवि झत्ति इय केव्च । णियसइणा णिमविय पद: ससिदिणमणी जाम ।। को लेक्खइ सत्थम्मे दुजणं पित्र सुइयर । सुयणं सुद्ध सहाव करमउ लिरए वि पत्थामि ।। ज किंपि हीण अहियं विउसा सोहतु त पि इह कन्वे। धिद्वत्तणेण रइय खमंतुं सव्वेवि मुह गुरूणो । १ सुइवंतु २ अणुधउ ३ उवयरइ ।

sw- (१३८ * प्रशस्ति-सग्रह * सवत् १५६५ वर्षे भाद्रपद सुदी १३ दिने श्री मूलसघे नंद्यान्नाये बलात्कारगणे सरस्वतीगच्छे * कुन्दकुन्दाचार्यान्वये भट्टारक श्री पद्मनन्दिदेवास्तपट्टे भट्टारक श्री शुभचन्द्रदेवास्तपट्टे भट्टारक श्री जिनचन्द्र देवास्तपट्टे भट्टारक श्री प्रभाचन्द्रदेवास्तत् शिष्यमडलाचार्य श्री धर्मचन्द्रदेवास्तदाम्नाये अजमेर वास्तव्ये खडेलवालान्वये अजमेरा गोत्रे सा झालाण तस्य भार्या पीथी तयोः पुत्राः साह पट्टिराज द्वितीय सा० सुजिन तृतीय साह ईमर । साह पट्टिराज भार्या पउसिरी तत्पुत्र साह घणराज साह सुरजिन भार्या दानशीलवंती सुनखती । साह घणराज भार्या लाडी तत्पुत्र पारस द्वितीय लोहर एतेषा मध्ये साह सुरजन भार्या पतिवृता द्विगुणयुक्ता सुनखत इद शास्त्र प्रद्युम्रचरित्र लिखाप्य दशलाक्षणिक व्रतोद्यापनार्थ अजिका विनयश्रीवै दत्त । प्रेति न० ३. पत्र संख्या ६५, साइज ११||४५ इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर ११ पक्तिया तथा प्रति पक्ति मे ५०४५४ अक्षर । प्रति प्राचीन है तथा पूर्ण है। संवत्सरे ५५१८ वर्षे शाके १३८३ पद्यन्दमध्ये सव्वधारिनाम्नि सवत्सरे उत्तरायने ज्येष्ठ मासे शुक्लपक्षे ६ षष्टम्या तिथौ शुक्रवासरे घटिका ४१ पुष्यनक्षत्रे घटिका ४६ सिद्धिनाम्नियोगे घाटका ४५ श्री नेणवाहपत्तने सुरत्राण अलावदोन राज्यप्रवर्त्तमाने श्री मुलसघे वलात्कारगणे सरस्वती गच्छे कुदकुंदाचार्यान्वये भट्टारक श्री पद्मनन्दिदेवास्तत्पट्टे भट्टारक श्री शुभचन्द्रदेवास्तत्पी भट्टारक श्री जिनचन्द्रदेवा । भट्टारक श्री पद्मनन्दिदेवास्तशिष्य मुनि मदनकीर्तिदेवारतत शिष्य मुनि नेत्रानंदिदेवा । तत् शिष्य ब्रह्म गाल्हा खण्डेल वालान्वये साह राऊ तद् भायो साध्वी रावश्री तयोः पुत्राः साह छाजू कर्मसी धर्मसी । साह छाजू तद् भार्या साध्वी छाहिणी तस्य पुत्राः साह धाना गंगा, गजा, एतेषा मध्ये साह कील्हा तद् भार्या साध्वी पतिव्रतानार्थ पुत्रपौत्रक्ल्याणवृद्धिप्राप्त्यर्थ इद प्रघुम्नशास्त्रं लिखाग्य ब्रह्मगाल्हा सुहस्ते प्रदत्तं । २६. बाहुबलिचरित्र । रचयिता महाकवि धनपाल । भाषा अपभ्रंश । पृष्ठ संख्या २७२. साइज ||३|| इश्व । प्रत्येक पृष्ट पर पंक्तिया और प्रति पक्ति मे ३३४३८ अक्षर । रचना सवत् १४५४ लिपि संवत् १५८६ । प्रारम्भिक पाठ- सिरिरिसहणाह जिणपयजुयलु पण विवि णसियकलिमलु । पुणु पढमकामए वहो चरिउ, आहासमिक यमंगलु। प्रारम्भ मे दिया हुआ कवि परिचय- गुज्जरदेसमझि णयवट्टणु, बसइ विउलु पल्हण पुरु पट्टणु । वीसलएउ राउ पयपालन, कुवलयमडलु सयलु व मालउ । तहि पुरवाडसजायामल, अगणियपुव्वपुरिसणिम्मलकुल । पुणु हुउराय सैहि जिणभत्तउ, भोवई णामे दयगुणजुत्तउ।

+mar १४०] * प्रशस्ति-सग्रह * तहो सुउ सोमएउ सोमाणणु, तहो पेमसिरिभज्ज विक्खाइय, एयहि , सन्त , पुत्त सजाया, पढमु ताहदय वल्ली सुरतरू, जो दिवहाडिय चाउ पसिद्धउ, पुणु वीयउ परवारि सहोयरू, तइवउ सुउ पल्हाउ सलक्खणु, पुणु तुरियउ महराउ विसुद्धउ, पंचमु भामराउ मोहायरू, सत्तमु सयल वधुजण वल्लहु, एयहिं सत्तहिं सुपहिं पसाहित, जो पढमउ णदणु वासाहरू, पेक्खे विणु सारगरिंदे, रज्जधुराधरू णियमणिजाणिवि. अप्पि विदेसु कोसुवणु परियां, कुणयगईदविंदपंचायणु। पिययमसीलगुणेहि विराइय। एंजिणगिरए तव विक्खाया। सघाहिउ णामे वासद्धरू। गट्टभजु णिवमतसमिद्धउ । विणयकिउ हरिराउ मणोहरू । सजायउ आणदिय सज्जणु । गुणमडिय तणु हुउ जसलुद्धउ । छट्टउ तगउरणाम.रयणायरू। सतणु णाम जाउ अइ दुल्लहु । सोमएउ ण णयहिं जिणहिउ । सयलकलाभउ रण करणससहरू । काहुवाणकुल कइरवचन्दे। मतिपयम्मिठावउ सम्माणिवि । मुजइ रज्जु सोक्खु णिच्चलमणु । - सो सुअणु गुणायरू वुहविहियायरू, दुत्थियजणण्वकप्यतरू । जिरणपयपकयमहुयरू सिरिवासद्धरू, जा अच्छइ तहिं दुरिय हरू ॥३॥ ता पेक्खिवि पडिय धणवाले, विहसि वि भणिउ वुद्धिविसाले। भो,सम्मत्त रयणरयणायर, वासद्धर हरिरायसहोयरू। बिणयगुणालकिय हिम्मछर, पडियजणमण रजरणकोछर । करि.वि पइह भन्वजणु रजित, जे तित्ययरगोत्त आविज्छ । धएणउं तुहु गुरूमात्तिमयायर, मइसुरकित्ति तर गिणि सायर। जिणवरपायपउरहमहुयर, सयल जीव रक्खणसुदयायर । दुस्समालपहावगुरूक्कउ, जिणवर वम्ममग्गिजणुवंकउ । दुजणपउलोड अकयायरू, विरलड़ सजणु गुरिणबिहियायक } असहारहो, जगिकोविणमरणई, धामपहावे लम्भ३, उएणइ। धम्महोणु जणु जहिं जहिं गच्छइ, तहि तहिं सम्मुह को विण पच्छइ। ते कब्ज धम्मायक फिज्जइ, धम्महीणु ण-कया कयात्रिहविना। इय धम्महो पहाउ उर धुट्ठउ, णिसुरिणवि वासाधर सतुट्ठउ ।

१४२] * प्रशस्ति-सग्रह . सिरि वज्जसूरि गणिगुणणिहाणु, महसेण महामइ विउसमहिउ, रविसेणें पउमचरित्त वुत्त मुणि जडिलि जडत्तणिवारणत्यु, दिणयरसेणे कंदप्पचरिउ, जिणपासचरिउ अइसयवसेण, अमियाराहण विरइय विचित्त, चदप्पह चरिउ मणोहिरामु, धणयत्तारउ चडवग्गमारू, मुणि सीहाद सहयवासु, णवयारणेहु णरदेववुत्त, सिरिसिद्धसेण पत्रयणनिणोउ, गोविदु कइ सणकुमारू, जयधवल सिद्धगुणमुरिगाउं भेउ, वर पउमचरिउ किउ सुकइ सेढि, विरइउ महछदसणपमाणु। घणणाय सुजोयण चरिउ कहिउ । जिणसेणे हरिवंसुवि पवित्तु । एवरग चरिउ खडणु पयत्थु । वित्थरिउ महिहिं णवरसहं भरिउ। विरइउ मुणि पुगव -पउमसेण । गणि अवंसेण भवदोसचत्त। मुणि विल्हुसेण किउ घम्मु धामु अवरेहिं विहिउ णाणापयारू । अणुपेहा कह सरप्पणासु। कइ असगविहिउ वीरहोचरित्त । जिणसेणे विरइउ आरिसेउ । वह रयण सुमुद्दहो लदयारू ! सुयसालिहत्य कइजीव देउ । इय अवर जाय घरवलय वीढ। घत्ता चउमुहु दोणु सयंभुकइ, पुष्पयंतु पुणु वीरू भणु । ते पाणदुमणिउज्जोयकर, हउ दीवोवमुहाणु गुणु ॥ ६ ॥ त णिसुरिणवि वासाहरू जंपइ, किं तुह वुहचिंताउलु संपइ। जइ मयकु किरणहिं धवलइ भुवि, तोखज्जोउ ण छंडइ णियछवि । जइ खयराउ गयणे गमु सज्जइ, तो सहडि किं णियकमु वज्जइ। जइ कप्पयरू अमियफलकप्पइ, तो किं तरू लज्जई णिय सपइ । जसु जे त्तिउ मइ पमरू पवट्टइ, सो तेत्तिउ धरणिय ले पयट्टइ। इय णिसुणिवि संघाहिव वुत्त उ, कइणाधणवालेण पउत्तउ। तुम्ह भत्ति भारेण दायवर, विराम कामचरिउ गुणसायर । पर दुज्जरण भइ मधित कायरु, खलहु ण छुट्टइ गणिणि सायरू। कुडिलु गमणु परछिद्द णिहालउ, गयणायणु दुज्जोहु विसालउ। अह पह गामिंउ परदुह दरिसर, णिहरू पिसुणु भुअगम सेरिसर । गयरसु जडवाईव दुरासत, दोसायरू रक्खसु वपलासउ ।

[१४४ * प्रशस्ति-सग्रह २ - अ तरवेइमभि धणरिद्धउ, वीरखाणिउत्पत्ति पवित्त, सूर सेणु गवई तहो णंदणु, तहो पइवयर्पियपापियारो, दसदसौरतहिं णदायी, सायरविजउ पढमुउ विणीयउ, तुइय उअमियासउ सिरिवल्लहु, विज उणामु पंचमु सुइ वदणु, सत्तमु णाम पसिद्ध उधारणु, सुउ अहिचदुणवमु पुणु जाणहु, एयह लहुअ कोतिमदीवर, समुदविजउ सूरी पुरि थपिन, तहो सुउ रोहिणेउ अग्गिजाणु, तहो सताण कोडिकुल लक्खई, पुणु सभरि णरिद महिमु जिय, आसर्वभु चहुवाणु पुहइपहु, पहु गणपत्ति हुअउ धरणोर्याल, साहुणाम गोकणुमंती तहु, हुउ सभरि णरिंदु महिवालाउ, सोमदेउ तहो मात मेयोहरू, तहि काविट्ठविसउ सुपसिद्धउ । सूगारू जणपरिपालतउ। अर्धय वद्विराउ रिउमद्दणु। णाम रहदा देवि भंडारी। वीवित्तितिहु अणविखाया। पुणअवस्खोहुणाम हुउ वीयरें। पुणु हिमवंतु तुरिउ जणदुलहु। छट्टर्ड अचलुद्ध सरदणु। पुणु अट्ठमउ तणुभउ पूरणु । दहमउ सुउ वसुए उपमाणहु। लावरण णिजिंजय अमग्छर, चंदवाडु वसुदेवडो अप्पिा देवइणदणु अणु जणलणु । सजाया केलि पच्चकवई। जायव सुब्भव ते रजिय। तहु मतिउ जदुवणि उ जसरहु। प्रासाउरि सुरिपय पाय अलि । जिणवरचरणं भोरूह महुलिहु । वराहदेउ णाम पयपालउ । सयलकला लकि उणं ससहरू। - - घत्ता पुणु सारगु रिदु अभयचन्दु तहो गदणु । तहोसुउ हुउ जयंचदु रामचहुँ रणामे पुणु ॥ १ ॥ णिवसारंगरजि समयंकिङ, णियपहुरज्ज भादिढकघर, एकुजि परमप्पउ जो झवड, जोतिकाल रयणतंउ अंच, जो परमेट्टि पच आराहइ, बासाहरुमंतिउणीसपिउ विबुडविदतरु पोमणक्यका वे ववहार सुद्धणयभावइ । च गियरूइ कहवि णं मुच्चइ । जो पर्चगमतमहि साइ।

[१४४ + प्रस्ति-सग्रह अतरवेइमभि धणरिद्धउ, वीरखाणिउप्पत्ति पवित्त, सूरसेणु रणग्वई तहो णदणु, तहो पइवयपियपाणपियारो, दसदसौरतहिं णंदणजाया, सायरविजउ पढमुउ विणीयउ, तइय उअमियासउ सिरिवल्लहु, विज उणामु पंचमु सुइ वडणु, सत्तमु णाम पसिद्ध उधारणु, सुउ अहिचदुणवमु पुणु जागहु, एयह लहुअ कौतिमहीवर, समुदविजउ सूरी पुरि थप्पिन, तहो सुउ रोहिणेउ अग्गिजणु, तहो संताण कोडिकुल लक्खई, पुणु सभरि णरिद महिमु जिय, आसर्वभु चहुवाणु पुहइपहु पहु गणपत्ति हुअउ धरणोर्याल, साहुणाम गोफणुमंती तहु, सभरि णरिंदु महिवालउ, सोमदेउ तहो मति मयोहरू, तहि काविट्ठविसउ सुपसि द्वउ । सूरी रूं जणपरिपालतउ। अंर्धय वढिराउ रिउमद्दणु। णाम रहा देवि भंडारी। वीवित्तितिहु अणविक्खाया। पुणअक्खोहुणाम हुन वीय पुणु हिमवंतु तुरिउ जणदुल्लहु । छट्टउ अचलुरिंद्ध सरदणु। पुणु अट्ठमउ तणुभउ पूरणु । दहमउ सुउ वसुए उपमाणहु । लावणे णिज्जिय अमग्छर, चदवाडु वसुदेवहो अप्पिर देवडणदणु अणु जणछणु । सजाया केवलि पच्चक्त्वई। जायव सुब्भव ते जिय । तहु मतिउ जदुवणि उ जसरहु । प्रासाउरि सुरिपय पकय अलि । जिणवरचरणं भोरूह महुलिहु । वराहदेउ णाम पयपालउ । सयलकला लंपिउणं ससहरू। घत्ता पुणु सारगु रिदु अभयचन्दु तहो पदणु । तहोसुउ हुउ जयचंदु रामचद् णामे पुणु ।। १ ।। णिवसारंगरज्जि समयंकिङ, णियपहुरज्ज भारदिढकघर, एकुजि परमप्पउ जो झ वड, जो तिमाल रयणत्तउ अचइ, जो परमेट्टि पच आराहा, वासोहरुमतिणीसक्ति। विवुइविदतरु पोमणक्या वे ववहार सुद्धरणयभावइ । चणि ध्यरूइ कहवि ण मुंचा। जो पर्चगमतमहि साहई। , - ४६ * प्रशर्सत-संग्रह * पत्ता - लक्खर्णमत्ता छंदगणहीणहिउ ज भणिउ मई। त खमउ सयलु अबराहु वाएसरि सिवहसगई ।।३।। . विक्कमणरिद प्रकिय समए, पंचास वरिस चउअहियगणि, साईणक्खत्ते परिट्ठियइ, सासवासरे रासिमयकतुजे, चउवग्गसहिउ णवरसभरित, गुज्जरपुर वाडवसतिलाउ, तहो मणहर छाया गहिणिया, तहो उवरि जाउ वहुविणयजुई, तहो विरिण तणुभव विउलगुण, थरुअरुह धम्मु जो महिबलए, कणयहि जाम वसुहा अचलु, जो पठइ पठावइ गुण भरिउ, सताणसिद्धि वित्थरइतहो, बाहुबलि सामिगुरुगण सभरणु, चउदहसय सवच्छरह गए। वसाहहो सियतेरसिसुदिणि । वरसिद्धि जोगणामें वियई। गोलग्गे मुत्ति सुक्कसवले। वाहुलिदेव सिद्धां चरिउ । सिरि सुहळु सेठि गुण गणणिलउ। ई सुहडाएवी णामे भणिया । घणवालु विसु णामेण हुई। सतोसुतहयहरिराउपुण। सायरंजलु जा सुरसरिभिलिए। वोसर होछउ ताम कुलु। जों लिहइ लिहावइ वर चरिउ । मणवंछिउ पूरइ संयतुं सुहो। महुणांसउ जम्म जरामरणु । पत्तो - जो दे लिहाइ वि पत्तहो वायइ सुणइ सुणावइ । सो रिद्धिविद्धि संपय लहिवि, पछइ सिवपउ पावः ॥४॥ अ मत्प्रभाचद्रपदप्रसादादवाप्त बुद्धया धनपालदक्षः। श्रीसाधु वासाधरनामधेय स्त्रकाव्यसौधेयकलसीकरोति। इति वाहुबलि चरित्र समाप्तं । शुभं भूयात् । सवत १५८६ वर्षे वैशाख सुदि ७ दिने बुधवासरे श्री मूलसघे बलात्कारगणे सरस्वतीगच्छे नद्याम्नाये श्री कुदकुदाचार्यान्वये भट्टारकं श्री पद्मनन्दिदेवास्तत्प? भट्टारक श्री शुभचद्रदेवारतत्पट्टे भट्टारक श्री जिनचद्रदेवास्तत्पी भट्टारक श्री' प्रभार्चन्द्रदेवा रतनकीर्तिशिष्येण ब्रह्मरतनेनं लिखापितम्। प्रति न० २. पत्र संख्या २३७. साइज १०x४ इञ्च । प्रारम्भ के १३७. पृष्ठ नहीं हैं । शेष के पृष्ठ श्री १४८] * प्रस्ति-सग्रह * ३ अणुमोएं ताहें तिहु सपएणगुणंतरेण ।। अरि उरि अइरावइ दीहरछि धणयत्तहो गेहिणि धणयलच्छि । उज्जमिय ताए चिरु सजुएण, भाविय धणमित्ते तहिं सुएण । तहिं रित्तिसेण णामुज्जयाइ, अणुमोइय वजो अरसुअाए । तहो फलेण ताइ तिरिणविजणाइ, चउथइ विसिबलोगहो गया। पहिलइ धणयत्तहो घणयदित्ति, इयरइ विएिणवि धमित्त कित्ति । विजइ भवि पकय सिरि सरुव, सुर भविसयत्तु भविमाण रुव । तियलिंगुहणेवि विएिणविसुतेय, पहचूल रयण चूलाइ देव । नइयएभविमत्त वि कणय तेउ, हुउ दहमइ तेहे जि विमाणे दे। चोत्थएभवि सुवपचमि फलेण, णिद्दछु क्म्मु झाणाणलेण। घत्ता - - चार्यान्वये भट्टारक णिसुणत पढसह परिचितंतह अप्पाहिया। घणवाले तेण, पंचमि पंचपयार किया । इस धनपालकृत पचमी भविष्यदत्तस्य समाप्नोति। लेखक प्रशस्ति- सबत् १५६५ माघमासे शुक्लपक्षे तिथौ १५ रविवासरे नक्षत्र अश्लेखा गजाधराज पछवा करमचद मोजाबाद मध्ये लिख्यतं रामदास । श्री मूलसंघे नद्याम्नाये वलात्क रगणे सरस्वती गच्छे श्रा कुदकुद श्री पद्मनन्दिदेवास्तत्पट्टे भट्टारक श्री शुभचन्द्रदेवास्तसट्टे भट्टारक श्री जिनचन्द्रदेवास्तत्प भट्टारक श्री प्रभाचन्द्रदेवास्तत् शिष्य मडलाचार्य श्री धमचन्द्रदेव स्तदाम्नाये खंडेलवालालान्वये पटणो को सागानेर वास्तव्ये साह हेमा भार्या केल्ल पुत्रास्त्रय. प्रथम साह सखण भार्या लाडो तयोः पुत्रा स ह डा भार्या ऊदी तयोः पुत्रौ राणौ द्वितीय रामदास । द्वितीय गोविंद भायो गौरी तृतीय टेह भायो टिहुसिर द्वितीय साह हीरा भार्णा त्तपरू तयोः पुत्राः त्रयः प्रथम दुग द्वितीय पखत तृतीय गोना डूगर भायो धरम पुत्रौ द्वौ म० सा० चाचा वि० घोराज पखत भार्या पूना तयोः पुत्रो को प्रथम सोढा वि० छाजू। गोना भाय गगा तयोः पुत्र माधव । तृतीय सा० तेजा भार्या दामा। हीरा नाम्ना इद शास्त्र लिखाप्य ज्ञानपालाय वा कोल्हाय दत्त । प्रति न० २ । पत्र संख्या १४ । साइज १०४ ४॥ इश्च । प्रत्येत पृष्ठ पर , पक्तिया तथा प्रति पक्ति मे ३६।४० अक्षर। अन्तिम पृष्ठ नहीं होने से प्रशस्ति अधूरी है। ६ तिगिणम।

१५०] * प्रशस्ति-सग्रह * मुलसधे सरस्वतीगच्छे बलात्कारगणे श्री कुन्दकुंदाचार्यान्वये भट्टारक श्री सकलकोत्तिस्तत्प भट्टारक श्री भुवनकीर्तिस्तस्पट्टे भट्टारक श्री ज्ञानभूषण गुरूपदेशात मुनि श्री रत्नकीर्ति पठानार्थ खडेलवालजातीय साह लाला भार्या ललतादे सुत साह वीरम भार्या वील्हणदे भात परवत भार्या पुहसिरि तत्पुत्रवलराजेन ज्ञाना- वरणकर्मक्षयार्थ लेखायित्वा दत्त' । २७. भविष्यदत्त चरित्र । रचियता प० श्रीधर । भाषा अपभ्रंश । पत्र संख्या ६४. साइज ११॥४५ इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर १० पंक्तिया तथा तथा प्रति पंक्ति मे ३०४३७ अक्षर । रचनो सवत १२३० मगलाचरण- ससिपहजिणचरणइ सिवसुहकरणई पणविवि णिम्मलगुणभरिउ । आहासमि पविमलु सुअपंचमिफलु भविसयत्तकुमरहो चरिउ ॥ प्रारम्भ मे दी हुई प्रशस्ति- - सिरि चन्दवारणयर ट्ठिएण, माहुरकुल गयण तमीहरेण, णारायण देह समुन्भवेण, सिरिखासुएच गुरूभायरेण, णीसेसवलक्खगुणालयएण, विणएण भणिउं जोडेवि पाणी, इह दुलहु होइ जीवहें णरत्त , जइ फहव लहइ दइयेहो वसेरण, ता विलउ जाइ गम्भेवि तेम, प्रहलहइ जम्मु ता बहु विहेहिं, जिणधम्मकरण उक्कंठि एण। विवुयण सुयण मणघणहरेण । मणवयणकायगिदियभवेण । भवजलणिहि णिवडणकायरेण । मइवर सुपट्टाणामालएण। भत्तिए कइसिरिहरू भव्वापाणि । णीसेस सह संसाहिय पर। चगइ भमंतु जिउ सहसरेण । वायाहरणहे सरयम्भु जेम। रोयहिं पीडिज्जइ दुहगिहेहि। , M घत्ता A - जइ णिदय मायरि अय खामोरि अवहरेइ णियमणि अणिसु । पयपारण विहीण उ जायइ दोउ ता सो वि जीवेइ सिसु ॥२॥ हा प्रायइ मायइ महमइएमई, सई परिपालिउ मंथरगइए। कप्पयस्व वउलासए सयावि, दुल्लहु रयणु व पुण्णण पावि । जइ एवहि विरयमि णोक्यारू, उग्घाडिय सिवसउ हलयवारू। Maar [१५२ * प्रशस्ति-सग्रह। - तहो माढी णाम धरिणि जाय, कोयल इव सुहयर ललियवाणि, तहो गम्भे समुप्पएणउ रवण्णु, पढमउ परियाणिय णाय मग्गु, वीयउ णारायणु णयणि उत्त, हिम्मलयर जसलच्छी णिहणु, मइवंत संत्तु पाविय पससु, करूणालउ किारयावतु साहु. तह रूपियणि णामे जाय मज्ज, णावइ लच्छो सयमेव आय। पविरइय कन्ज जाणे वि जाणि । सोहारणु सुउ गवकणयवण्णु। जिणधम्मकम्मसाहिय सुमग्गु । मणे परियाणिय जिणभणिय सुत्त । माहुरगयणहयलसेय भाणु। जिणवर कह कय करणावतसु । सुद्धासउ मयरहरून अगाहु । सिरिहरहो सिरिवजाणियसकज्ज । घत्ता सज्जरणसुहयारिणि पावणिवारिणि पविमलसीलालंकरिया। वधवह पियारी थीयणसारी विणयाइय गुण गणरिया ।।२।। तहो पढमु सुउ पटुणामे, हुउ णं अप्पउ दर्रास कामे। माणवरूउ लएप्पिणु लोयहो, धम्मपह वें माणिय भोयहो। बीयउ वासुएउ संजायउ, वासुएउ जिह तिह विक्खायउ। तज्जउ पुणु जसएव पवुच्चई, जो णीसेसह वधुहु रूच्चई। लोहडु तुरिउ समासहिं पियरहि, आवज्जिय हिम्मलगुण पियरहि। पचमु लक्खण कलिउ सलक्खयणु, कमलवयणु कज्जेसु थियक्खणु। पंचवि णं मासय हो सिलीमुह, पवि बघवयण विरइयसुह । पंचवि मय मयगण पचाणण, पचवि पिसुण जणोह भयाणण । ताह मज्झे जो सुप्पडु भायरू, वर वछल्ला दिय गहयरू। जिणपय पुग्जकरण उच्छुल्लर, परियाणिय सस्थत्थर सुल्लउ । जिणवरभासिय धम्मगहिल्लर, लीलागइ जिय पोडल पिल्लत । घत्ता तेणेहु मणोहरू तिमिरतमीहरू णि यजणणी णामंकियउ । अभत्थेवि सिरिहरू कइगुणसिरिहरू पचमि सत्थुकराविउ ॥३॥ सुप्पट तर्णय जाणणि जासुहमइ, तियरण विणिवारय कुसमयरइ । धम्मपसत हे मज्मखामहो, गुरुयण भत्तहें रुपिणि णामहो। होउ ममाहि वोहि रयहारिणी, अट्ठम महि लच्छी सुहकारिणी।

(१५४ * प्रशस्ति-संग्रह in. MANA --- - . - अध्ययणपियारी हरिसजणेरी नेदउ चविहसघह ।। इय मयणयराज यचरिए हरिएवाइ बिरइए मयणपायपराजय नामहु इज्जउ परिच्छे उ सम्मत्तो। लेखक प्रशस्ति- सवत् १५७६ वर्षे कार्तिक सुदी १३ श्री मूलसंधे वलात्कारगणे सरस्वती गच्छे नद्याम्नाये कुदकुद चार्यान्वये भट्टारक श्री पद्मनन्दिदेवास्तत्पट्टे भट्ठारक श्री शुभचन्द्रदेवास्तपट्टे भट्टारक श्री जिनचन्द्रदेवास्ता भट्टारक श्री प्रभाचन्द्रदेवास्तदाम्नाये खडेलवालान्वये गगवाल गोत्रे सा डावर तस्य भार्या माल्ही तयोः पुर स्त्रयः सा दूदा, सा भोल्हु सो डुंगर | सा दूदा भार्या चाहू तयोः पुत्रों सा० रणमल द्वितीय सा० चोखा स रणमल भार्या जिणसी। सी चोखा भार्या ऊदा। सा दूदाख्येन लिखापित कम्मक्षयानिमित्त । २६. मृगांकलेखाचरित्र । रचयिता श्री पडित भगवतीदास । भाषा अभ्रश । पत्र संख्या ७४. साइज १०॥ ४ ५ इश्च । पृष्ठ पर ११ पंक्तिया तथा प्रति पक्ति में ३२४३६ अक्षर । प्रति स्पष्ट है। मगलाचरण करने के पहिले लिपिका ने भट्टारक माहेन्द्रसेन को नमस्कार किया है। बीच २ हिन्दी भाषा के पद्य भी लिखे हुये है। रचन सवात् एव लिपि संवत् १७०० ग्रन्थ का दूसरा नाम चन्द्रलेखा कथा भी हैं। प्रारम्भिक पाठ- पणविवि जिणवीरं गाणगहीरं तिहुवणवइरिसिगइजई। णिरूवमविसअथ सीलपसत्थ भणमिमहाससिलेहसई ।। अन्तिम पाठ तथा प्रशस्ति- दोहा प्रत्येक । ससिलेहा णियकत सम धारइ संमजमु सारु । जम्मणमरण जलजलो दाण सुयगुं भवतार ।।१।। करितणि तपु सिवपुर गयउ, सोणि सागर चन्द । ससिलेही सुरवरूं भई तजि तिय तणु अतिणिदु ॥२॥ लहि णरमउ णिरवाण पद, पावसि सुदर सोइ । कवि सु भगौतीदास कहि पुणु भव ममणु ण होई ॥३॥ सील वडा संसार महि'सोलि सरहिं सब काज । इह भवि परभव सुइ लहई आसि भणहिं मुणिराज ||४|| कट्ठासंघसु माहुरगच्छए, जिणवाणी पुवग्ग सयौधरू, पुष्करगणि णिम्मल वयसच्छए। अवइएणउ रणावइ जणिगणहरू ।

१५६] ५ प्रशस्ति-सग्रह * महुरी भासउ देस करि भणिउ भगौतीदासि ।। जावगेयणि रवि ससि मह जाव लरह थिरू खित्तु । ससिलेहा सुदिर भई णद उ ताउ चरित्त । इयसिरिचन्दलेहाकहाए रजियवुचित्तमहाए भट्टारगमिरिमुणिमादसेण सीसहभगवडदास विरइए। पसि तेहा मग्गिमणु इत्यियलिगछेउ इंदपयोपय्पण सायरचन्द णिव्वाणगमण तवदीखासाहण ण म च उत्थो सधि परिछे उ समतो। इति श्री भगवतीदाम कृत मृगाकले खाचरित्रंसपूर्ण । अब सवत्सरेस्मिन् श्री नृपति विक्रमादित्य राज्ये सवतु मत्रहसतसपूर्ण १७०० फाल्गुणमासे शुक्ला पक्षे सप्तम्या रविवासरे श्री साहिजहाराज्यपवर्तमाने श्री काष्टासधे माथुरान्वये पुकरगणे श्री लोहाचार्यान्वये भट्टारक तो यशः कोर्तिदेवास्तेपट्टे भट्टारक श्रो गुणचन्द्रदेवास्तततत्प? भट्टारक भ्रा सकलचन्द्रः तत्पी भट्टारक श्री महेन्द्र पेण पदाम्नाये हिंसारिवास्तव्ये अग्रोतकान्वये गर्गगोत्रे सेठो पारस तस्य भार्या सेठाणी परोज तस्य पुत्र हो ज्येष्ठ पुत्र सेठो पाथु सेठो सुखनन्द तस्यभर्या सठ णी घनो तस्य पुत्र युग्म प्रथम पुत्र तारा वन्द वि० पुत्र जगरूर, पेठो पार्थ पुत्रो शोलतोत परगिण। विनय पागेश्वरी माधम्मिणो जीपणो अपर अग्रोत मान्वये गोयल गोत्रे आसोवाल चौधरी वन तस्य भार्या सा० जमो तस्य पुत्र अर्जुन तम्य भरिनी शोलतोयतरगिणा दानगुणे रेवतो सामिणो दयालो तेन दौ० साधम्मिणी दशलाखिणी ब्रत उद्यापनार्थ मृगाकलेखाचरित्र लिखापित हिमार नगरे श्री व रबद्ध मानचैत्यालये पचगोष्ठे तस्थिति अबोधजीव सबोधिनी बाई माथुरी जोग्य घटापित । ३०. मेघेश्वर चरित्र। रचयिता श्री प० रइधू । भाषा अपभ्रश पत्र संख्या १५६. साइज १०||x४|| इश्च । प्रत्येक पृष्ठ पर ११ पक्तिया तथा प्रति पक्ति मे ३३ । ३६ अक्षर । प्रति जोण शीर्ण अवस्था मे है। प्रारम्भ के ५ पत्रों का आधा भाग कितनी ही जगह स फटा हुआ है । प्रारम्भ मे कवि ने अपना विस्तृत वश परिचय लिखा है लेकिन अक्षर घिमिल होने के कारण पढने मे नहीं आती। वि० पुत्र अन्ति पठ- इय सेणियायहो कयअणुरायहो गोयमेण जसविप्फुरिउ । मेहेसरचरिय उ नहुगुण भरिय: अक्खिउ वुइयण आयेरियउ । प्रशस्ति- १ पदउ आइजिणेसर सासणु, णदउ सायवायविहि जुत्ती पदउ परवइ णीइवियारउ गदउ सुरयणु धम्मपयासणु। भारइ देवी जयत्तसवित्ती। गद उ भत्रलोयगुण सारउ । १ पुरयणु १५८] * प्रशस्ति-सग्रह . । . देवसत्वगुरुमतिकयायरू; वोल्हाही पिय यम तहु सारी, ताहि.तणुभउ वुहमण जणु, जिण,समयाणु भत्ति अणु राय3, तहु भज्जा धसिरि गुणवती, णदण चारि ताई उरि जाया, चारि दाण ण पायड भूयलि, ताह पढमु गुणमणिरयणायरू, रतणपाल ही तासु जि भामिणि, उद्धरणाहि हाणु हुउणदणु, तहु पह जिणि जिणि मयको, सुरतरूण दुथियजेणपोसणु, मपणपालही तासु जि भज्जा, सोणपालु तहि णदणु णदउ, पंजणसाहु गामें णियमायरू) सोलाहरण विहूसणधारी। जाचय जण दालिद्द विहजणु । - खेऊमाहु णाम विक्खा यउ । चन्दहु रोहिणी विपहवती। चरिपाण ण जीव सहाय । चारि वि दिग्गय ण जस णिम्म ल । सहसराजु कुलकमल दिवायरू। णियभत्तारचित्त अणुगामिणि । परियणंजण चित्त आणदणु। वीयउ पहराज गय सका। परउवयारसारसुपयासणु । दाणपूर्जावहिं करणमणोज्जा। णिच्चे जिंगिदसूरपिय वदउ । - - घत्ता कोडणामा, सुउ खेमकरू, पुणु सुउ तहु तीय र अइव विणीयउ जिणसासणरहधुरधणु। रइपतिरयणोवमु पालियकुलकमु दुस्थिय जणदुहमरहरणु ॥ रंइपति भामिणि, कुलंगिहसमिणि। पूरियकामा। सुक्खरिवखरू। तुरिउ वि पुत्तो, गुणगंणजुत्तो। पवरजसासिउ। विज्जामंदरू, वैसहुँ चदिरू। वुई चूडामणि, णिम्मच्छरू गुणि। होल पायडु, सयलरलापडू। तासु कलत्ता, सररूहवत्ता। भणिय सरास३, विणउ पयासई। संसि व कलालउ, चदपालु हुउ । इहु परियण धुउ, साहु हु भासिउ, - १६० * प्रशस्ति-संग्रह * प्रारम्भिक पाठ- तिहुअणसिरिकतहो अइसयवतहो अरहतहो हयवम्महहो। पणवेवि परमेट्ठिहो पविमलदिहिहो चरणजुअल णयसयमहहो। कोडेलगोत्तणहदिणयरासु. वल्लहणरिंदधरमध्यरासु। णएणहो मदिर णिवसतु सतु, अहिमामेरू पाइ पुप्फयतु। चिंतइ इहु धणणारीकह ए, पज्जुत्तउ कयदुक्कियपहाए। कह धम्मणिवद्धी का वि कर्हाम, कहियाइ जाइ सिवसोक्खु लहमि । पचसु पसु पंचसु महीसु, उप्पज्जइ धम्मु दया महीसु । धुउ पंचसु दसमु विणासु गाइ, पंधिवखइ पुणु पुणु वि होइ। काला विक्खए पढमिल्लु देउ, इय धम्मवाइ सियवसहकेउ । पुरूदेउ सामिरायाहि राउ, आणदिय चउ सुरवर णिकाउ। १ वत्त गुट्टणे जणु धणदाणे, पइ पोसिउ तुहु खत्तधरू । तवचरणविहाणे केवलणाणे, तुहु परमप्पउ परमपरु । अन्तिम पाठ- किउ उबराहे जस्म कइमइ एउ भवतर। नहो भबहु णामु पायडमि पयड उ घर ॥२६ ।। चिरू पट्टण छगे साहु साहु, तहो सुउ खेला गुणवंतु साहु । तहो तणुरुहु बीसलु णाम लाहु, वीरो साहुणियहि सुलहु णाहु ।। सोयारू सुणाणगुणगणसणाहु, इक्कइय चिंतइ चित्ति लाहु । हो पडियठक्कुर कण्हपुत्त, उवयारियवल्लहपरममित्त ।। कइ पुप्फर्यात जसहररित्त, किउ सुट्ठ सद्दलक्खणविचित्त पेसहि तहि राउलु कउलु अज्जु, असहरविवाहु नह जणियचोज्जु ।। सयलह भवभमणभवतराइ, महु वधिउ करहि रिणरंतराइ । ता साहु समोहिउ कियउ सव्वु राउलुविवाहु भवभमण भव्यु ।। वक्खारिणउ पुरउ हवेइ जाम, सतुट्ठउ बीसलु साहु ताम | जोइणिपुरवरि णिवसतु सिछु, साहुहि घरे सुस्थियणहु घुट्ट, ।। पणसहि सहिय तेरहसयाई, णिविक्कम सवछर गयाइ । १ यह मूल ग्रन्थ कार का पाठ नहीं है । अन्य रचना के पश्चात् जोडा १३६५ हुश्या है।

ܓ * १६२] < प्रशस्ति-संग्रह * णच्चउ कामिण। पसरउ मगलु। दुक्ख णिसुभउ। सहु णरणाहें। चिलसउ गोमिणि, धुन्मउं मदलु, सति वियभउ, धम्मच्छाहें, सुहु णंदउ पय, जय जय जिणवर, विमलसु केवलु, महु उप्पज्जउ, मई अमुणाति, जं हीणाहिउ, जय परमपय। जय भवमयहर गाणुमुज्जलु। एत्ति दिज्ज। कन्च करति। काई मि साहिउ। ३ घत्ता तं माय महासइ देवि सरासइ, रिणयसयल सदेहदुह । महु खमउ भडारी तिहुअणसारी, पुप्फयंत जिणवणयह ॥ इय जसहरमहारायचरिए महामहल्लणएणकणाहरणे महाकइपुष्फयंतविरइए महाकव्वे चंडमारि देवय मारिदत्तरायधम्मलाहो अणेविसगागमणं णाम चउत्थो परिछेउ सम्मत्तो। संवत् १६१२ वर्षे आसोज मासे कृष्णपक्षे द्वादशीदिवसे गुरुवारे अश्लेखानक्षत्रे तक्षकगढमहादुर्गे महाराजाधिराज राउ श्री रामचन्द्रराज्यप्रवर्तमाने श्र आदिनाथचैत्यालये श्री मूलसंघे नंद्याम्नाये बलात्कारगणे सरस्वतीगच्छे श्री कुन्दकुन्दाचार्यान्वये भट्टारकत्रीपद्मनन्दिदेवास्तत्पट्टे भट्टारकोशुभचन्द्रदेवास्तत्प? भट्टारक श्री जिनचन्द्रदेवारतत्प? भट्टारकश्रीप्रभाचन्द्रदेवास्तत् शिष्यमडलाचार्य श्रीधर्मचन्द्रदेवास्तत शिष्यमडलाचार्य श्रीललितकीर्निदेवास्तदाम्नाये खडेलवालान्वये छाबडा गोने सा सोढा तद् मार्या सुहागदे तत्पुत्राश्चत्वारः प्रथम सा० चाहड वि० सा० दूलह, तृतीय सा० देवा, चतुर्थ सा० पूना । प्रथम सा० चाहड भार्या मदना, द्वि० दूलह भार्या दूलइदे तत्पुत्रास्त्रयः । प्रथम सा० पोया वि० सा० थेल्हा तृतीय मा० श्रोपाल । प्रथम सा० पोय भार्या पांसरि तत्पुत्रौ द्वौ, प्रथम सा० सुरभाण द्वितीय चि० पचाइण । प्र० सा० सुरत्राण भाया सुरत्राणदे। वि० सा थेभाल्हार्ये प्रथम थेल्हश्री द्वितीय कौतिगदे तत्पुत्रास्त्रयः प्र० सा० डूगरसी वि० चि० भेला, तृतीय सा० तोल्हा । प्र० सा० डूगर मार्या दाड्यौदे । तृ० सा० श्रीपाल भार्ये । प्र० स्वरूपदे द्वि० ल्होकन तत्पुत्रौ को प्र० चि० रूपा वि० वि० धर्मदास । तृ० सा० देवा भार्थे द्वे प्रथम द्योसरि द्वितीय स्वरूपदे तत्पुत्रौ द्वौ प्र० सा० सरवण वि० सा० ईसर । प्रथम सा० सरवण भार्या सुहागदे, तत्पुत्र चि० हेमराज द्वितीय सा० ईसर भार्या अहंकारदे चतुर्थ सा० पूजा भार्या वाली एतेपा मध्ये सा० पूजा भायो वाली इद यशोधरचरित्रं लिखाप्य सोलहकारणवतोद्यापनार्थ मडलाचाय श्रीललितकार्शये दत्त।

-~ १६१]] * प्रशस्ति-सग्रह संवत् १५८० वर्षांसोज सुदी १० शनिदिने श्रवण नक्षत्रे श्री यथानामनगरे तत्पावें सिंकराव द शुभस्थाने सुलितान साहि इब्राहिमराज्यप्रवत्त माने श्री मूलसघे वल कारगणे सरस्वतीगच्छे श्रीकुन्दकुन्दाची. यान्वये भट्टारक श्रीपद्मनन्दिदेवास्तत्पष्टुं भट्टारक श्राशुभचन्द्रदेवास्तत्पी भट्टारक श्री जिनचन्द्रदेवास्तत्पी पूर्वाचल्दनर्माण षट्ततार्किकचूडामणि वादिमदद्विपसिंह विवुधवादिमददलनवादिकंदकुहाल सकलजीव अबुधप्रतिबोध के भट्टारक श्रीप्रभाचन्द्रदेवास्तत् शिष्य तर्क व्यकरणछंदोलकारसाहित्यसिद्वांतज्योतिषवै दक संगीत शास्त्रपारंगत जिनकथित सूक्ष्म सप्नंनत्व नैवपदार्थ षद्रव्यपातिकाय अध्यात्मग्रंथसमुद्रमध्यमहरिल- मायनिरतिचार सीलव्रतसागर संपूर्णेकादशप्रतिमापरिपालक श्री 'प्रभाचन्द्र गुरूस्वामिवरणस्मरणेण हषित- चित्तशति तितकीभूत ब्रह्म वौडा तदम्निाये खंडेलवालान्वये परमश्रावक सो क्रिता तस्य भार्या मीता तयोः पुस्त्रियः। प्रथम सा देवू तस्य भार्या राणी । द्वितीय पुत्र सा० नरसिंधु भार्या पामणि तृतीय पुत्र सी धणेसी भार्या राणी देवू पुत्र सा दोदूं तस्य भार्या संबोरी तपोत्पुत्र चत्वारः प्रथम पुत्र सा,धरमू भार्या देवले । द्वितीय पुत्र सा० दासा तस्य भाया सूहो । तृतीय साह विमलू चतुर्थ पुत्र गजपालु एतेषां मध्ये साह दोदू इदै यशोधरशास्त्र लिखाप्य धर्मक्षयनिमित्त ब्रहावीडाय दत्त । ३२. रत्नकरएड शास्त्र। रचयिता श्री पंडिताचार्य श्रीचद । भाषा अपभ्रंश पत्र संख्या १४५. साईज ११५४|| इंश्च । प्रत्येक पृष्ठ पर '११ पक्तिया तथा प्रतिपक्त में ४०१४४ अक्षर प्रति पूर्ण होने के साथ २ सुन्दर भी है। अन्तिम पृष्ठे नहीं है। रचना संवन् ११२० लिपि संवत् १६४० २ - 1 मगलाचरण- सौर्यउ जयन्मिजणों, पढमो पढम पयोसिउ जेण। कुंगईसु पड़ताण दिणे कालवणा धम्मो॥१॥ सो जयेउ संतिणाही, विग्घसहासाइ णाम मित्तण जरसीवहथिंऊण, पाविजइ ईहिया सिद्धी ॥२॥ जयउ सिरिवीरइदो, अम्लको अक्खउ हिरवारणो। हिम्मलकेवलजोएडा उज्जोइय सयल भुवण यत्नो ॥ ३ ॥ सिद्धिविद्धि जयवुद्धि, तुहि पुहि पीयकर । सिद्ध सरूव जयतु, चउवीसवि तित्थकर ॥४॥ प्रारम्भ मे कवि ने आचार्यों का इस प्रकार स्मरण किया है- पणवेपिणु जिणवयणुग्गया, विमलइ पयाई-सुयदेवयाहै। १ अणावरणो।

१९६] * प्रशस्त-संग्रह * चारु गुणोह रयणरयणाय । इदिन चचल सयह मयाहिउ । सिचदुज्जल जसु सजायउ। चाउरंग गण वछल्लायरु॥ च उकसाय सारग मिगाहिउ॥ णामे सहमकित्ति विक्ख यड ॥ घता तहो देवकित्ति पुरू सीसु हुउ, वो यउ अहो वासिणि मुण । वारिंदु उदकित्ति वि तहासुहइदु वि पचमउ भणि ॥ जो चरणकमलायमपुराणु । आइरिथ महागुणग़णसमिद्ध । तहो बोर इदुमुणि पंचसासु । सउजएण महामाणिकाखाणि । सिरिचदुणाम सोहण मुणीसु। तेणेउ अणेयरियधामु। किन कव्वु विहिय रयणोधामु । जो पढइ पढ़ानइ एय चित्त । आयएएई मरणइं जो पलत्थ । जिप्पइ ण कसायहि इद्रि एहिं । तहो दुक्किय कम्मु असेसु जाइ । जिणणाह चरणजुय भत्तएण। ज काईवि लक्खण छदहीणु। गायत्त इ बहु सायमसमाणु ॥ बछल्लमहोबांह जय पसिद्ध । दूझिय दुम्मइ गुण णवासु ॥ वयसालालकिउ दिव्ववाणि ॥ सजायउ पडिउ पढम ससु॥ दमणकह रयणरंडु णामु॥ ललियरक्खरु सुयणमणोहिराम । -सइ लिहइ 'लहावइ जो णिरूत्तु ॥ परिभावइ अहिणिसु एउ सत्थु ।। तो लियइ रण सो पासंडिएहिं ।। सो लहइ मोक्ख सुक्खुम्भावइ ।। अमुणते कत्थु करत एण ।। मई बुत्त इत्थ अह अहिउ हीणु।। पत्तो त खमउ सव्वु महु जणणमिय, सुयदेवय अण्णाणमई। जगपुज्जजि सिरिचदमइ, तय भडारी विउस सह ।।१।। एयारह ते चीसा यासमयाविकामस्स हरवइणो। जइया गयाहु तइया समणियं सुदरं एय ॥२॥ करमणरिदहो रजिसुहि सिरिसिरिवालपुरम्मि । वुइसिरि चदे एउ किउ णदउ कव्वु जयम्मि ॥ जय जिणवरु जय जिणघन्मु, जिणवयणुवि जयउ जई । जयउ साहु सतइ सुहकर पणवंतहो भव्वयण कुणङ जयहो सासुहपरंपर ।

- १६८] * प्रशस्ति-संग्रह . प्रारम्भिक पाठ- पणवेवि अणिंदहो चरमजिणिंदहो वीरहो इसणणाणवहा । सोरणयहो णरिंदहु कुवलयचंदहो, णिसुणहो भवियहो पवरकहा । अन्तिमपाठ तथा प्रशस्ति- २ ४ जयदेवादिदेव तित्थंकर, बिरूवमकरणरसोयणु धरणउं, सो णंदउ जो णियमणिभावइ, सोणंदउ जो लिहइ लिहावइ, जो पयत्थु पयडेइ सुभ०.ह. णदउ देवरामणदंणुवर, एहु चरित्त जेण पित्यारित, होउ सति णिसेसह अन्वहं, वरिसउ सयल पुहमि धरवारह, घरि घरि मगलु होउ सउण उ, होउ सति चउविजिणसघह, णंदउ सासणु वीर जिणेसहो, मदर सिहार होउ ज मुछउ, होउ सयल पुरत मणोरह, अमियविडउ सहएवह णंदणु, विएणवेइ सम्मय दय विजउ, अल्हसाहु साह सुमहुणदणु, होहु चिराउ सणियकुलमडण. होउ सति सयलह परिवारह, पउमणंदि मुणिणाह गणिंदहु, जं होणाहिउ कव्वु रसढई, त सुयणाण देवि जगसारी, वड्ढमाणजिणमव्वसुहकर। कन्खु रयणु कुडल भ3 पुराण वीर चरित्त विमलु पालावइ । रस रसद्द जो पढइ पढाई। माणसदृणु करेइ सुकव्वहं । होतिवम्मु कण्णुवउ णयकर । लेहाविव गुणियणउवयारिउ । जिणपयभत्तहं बिलियगबह । मेहजालु पावसवसु धारहं। दिणि दिण धणधरणह सपुण्णउ । देस वास णरणाह दुलघह । णिग्गउ सेणिउ णरयणि वासहो। घरि घरि दुदुहि सछु अतुछउ । परमाणंदु पवडढउ इह सह । जगि जगमित्त वि दुरियाण कदणु । सासय सुहु णिवासु महुदिजउ । सज्जणजणमणणयणाणंदणु। मग्गजणदुहरोरविहहण । भत्तिय बड्ढउ गुरूवय धारहे। चरण सरणु गुरू कई हरि इंदहु। पउ विरइउ सम्मइ अवियढइ। महु अवराहु खम उ भडारी। घत्ता दयधम्मु पवत्तणु विमलु सुकित्तणु णिसुणतहो जिण इदहो। १ मण्णइ २ श्रायरणई ३ पयडे ४ घणघण्णाई।

१७० ] * प्रशस्ति-संग्रह * wamirror - सवत् १५६३ वर्षे ज्येष्ठ सुदि ५ बृहस्पतिवारे श्री मूलसंघे सरस्वती गच्छे बलात्कारगणे कुदकुदा- चार्यान्वये भट्टारक श्री पवान्दिदेवास्तत्प? भट्टारक श्री शुभचन्द्रदेवास्तत्प? भट्टारक श्री जिनचन्द्रदेवास्तपट्टे भट्टारक, श्री प्रभाचन्द्रदेवास्तशिष्य मडलाचार्य श्री धर्मचन्द्रदेवास्तदाम्नाये खडेलवालान्वये अजमेग गोत्रे साह नाथू तस्य भार्या तोला तत्पुत्र तिहुण तस्य भार्या चोखी तत्पुत्र धाना पारस । धाना भार्या नेमी तत्पुत्र कचमल, हेमराज, वील्हा, भरथा, श्रीवत । कचा भार्या गागी, हेम भार्या पूरा, पारस भायो करमा, वि. भार्या गेगी एतेषा मध्ये इदं शास्त्रं लिखाप्य नेमी आयको विनयसिरी जोग्यदत्त । प्रति न०.३ पत्र संख्या ६२. साइज-११४४।। इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर ११ पक्तिया तथा प्रति पक्ति मे ३५४४० अक्षर । प्रात नवीन है तथा पूर्ण है। "सेवेत १६३१ वषे म हदि ११ शुक्रवारे श्री मुलेसघे नंद्याम्नाये बलात्कारगणे सरस्वतीगच्छे श्री कुदकुंदाचार्यान्वये भट्टारक पद्मनन्दिस्तस्पट्ट भट्टारक श्री प्रभाचंद्रस्तत शिष्य मडलाचार्य श्री धर्मचंद्रग्तत् शिष्य मडलाचार्य श्री ललितकीर्तिस्तदाम्नाये खंडेलवालान्वये रांवका गोत्रे साह देवा भार्या रानादे तस्य पुत्रं तृताय साई खेमा तस्य पुत्र घाटमल्ल वि पुत्रं साह वील्हा भार्या लालीतिस्य पुत्र साह थेल्हा भार्या तिहणश्री तस्य पुत्र ना.नग । तृतीय पुत्र सौहाँ खेता तस्य भार्ये तु. प्रथम महरखु वि० मान तस्या पुत्र चत्वारः प्रथम पुत्र नानू विपुत्र हीरा तृतीय पुत्र विइरा चतुर्थ पुत्र पाला। हीरा भार्या हीरादे तस्य पुत्र बुधमल्ल । पाला भार्या प्रतापदे. तत्पुत्रौ पुत्र-वौ प्रथमा हेमराज व्रतीक नेमदास । एतेषामध्ये इद शास्त्रं घटापित साह होग दृशलाक्षणीक तकनिमित्त्य मुनिश्रीरत्नानि ? मालपुरा मध्ये साहे धान, चपा, हेमा, हीरा, के देहुरा (मदिर) श्री भगवानदास राज्ये। . प्रति न०४ पत्रं सख्या ५६. साइज १०४४ इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर १२ पंक्तिया तथा प्रति पक्ति ३/४४८ अक्षर। प्रति सुन्दर और स्पष्ट हैं। सवत् १५४५ वर्षे वैशाख सुदी २ रविवारे कृतिका नक्षत्रे लाडणूपुरवरे आदिनाथचैत्यालये पेरोज- खान राज्ये श्री मुलसघे बलात्कारगणे सरस्वती गच्छे श्री कुदकु दाचार्यान्वये भट्टारक श्री पद्मनन्दिदेवास्तत्प? भट्टारक श्री शुभचन्द्रदेवास्तत्प? भट्टारक श्री जिणचन्द्रदेवास्तत्त शिष्य मुनि जयनंदि तत् शिष्य ब्रह्म अचल लिखितं कर्मक्षयार्थं ब्रह्म वीराय दत्त । ३३. बद्धमान कथा। रचयिता श्री नरसेन । भाषा अपभ्रश। पत्र संख्या १७ साइज १०|| इख। प्रत्येक पृष्ठ पर ३२ पक्तिया तथा प्रति पक्ति में ३२४३८ अक्षर। लिपि सुन्दर है। प्रति प्राचीन है। मगलाचरण- तवसिरिभत्तारहो णिज्जियमारहो पणविवि अम्मइं जिणवरहों।

१७२] * प्रशस्ति-सग्रह * छक्कम्मिहिं पसत्ति मणिजम्मइ, छक्कम्मिहिं पसद्धि जणि लगभइ, छक्कम्मिहि वसिजायहिं णरवर, छक्कम्मिहि वलिउ संपज्जइ, छक्कम्मिहिं उपज्जइ केवलु, छक्मम्मिहि सुरणय रिहि गम्मइ ॥ छक्क म्मिहिं तिहुयणु खणि खुम्भइ। छम्मिहि देववि आणायर ।। छक्कम्मिहिं सुरदु दुहि वज्जा। छका म्मिहि लाइ सुहु अवियलु ॥ घत्ता छक्कमइ जो णीसल्लमणु, भविउ भवाहि विजिउ पालइ। १ सो जिणणाहें देसियउ मोक्खन्मग्गु थिरदिहि णिहालई ।। गाथा विहियाएं सवुद्धोए एयाई मए गिहत्थकम्माई। अमुणतेण सुअत्थ जिणणाहपयासिय सम्म ।। ताइ मुणिहि सोहेवि णिरंतरु, हीणाहिउ विरूद्ध णिहियक्खरु । फेडिव्वउममत्तु भावंतिहिं, अम्हह उपरि बुद्धिमहतिहि ।। छक्कम्मो वएसु एहु भत्रियहि, वक्खाणिव्बउ भत्तिए 'मयह। अवपसाए चच्चिणि पुत्रों, गिहछक्कम्मपवित्तिपवित्तें। गुणवालहो सुएण विरयाविउ, अवरेहिमि णियाण सभात्रिः । २ १२७४ वारहसयहिं ससत्तचयालिहिं, गयहिमि भद्दवयहो पक्वतार, एक्के मासें एहु समात्यउ, विक्कम सबछाहो विसालिहि ।। गुरूवारम्मि चउद्दस वासार । सई लिहियउ आलसु अवस्थिउं ।। ३ यंदउ परसासण पिण्णासणु, गदउ अणिसु देवि वाएसार, णंदउ धम्मु जिणिदि भासिउ, णंदउ महिवइ धम्मासत्तउ, णंदउ भवियणु णिम्मलु दंसणु, णंदउ अव पसाउ वियक्खणु, गदउ अवरुवि जिण पय भत्तन, सयलकालजिणणाहहो सासणु। जिणमुहकमलुभवपरमेसरि ।। णंदउ संघु सुसील विहुसिउ । पयपग्यिालण शायमहंतउ । धक्कमीहिं पाविय जिण मासणु। अमरसूरि लहु बंधु वियक्खणु ।। विबुदेवग्गु माविय रयणत्तउ । ७ सय बमयादतासत्तवयालि ३ कालि।

१७४] ५ प्रशस्ति-संग्रह श्रो वास्तव्या साधु यजने भार्या दौसिरि पुत्र जौत गुजर। जोत् भार्या सगे पुत्र वाधू तस्य भार्या जोल्हा हो वि. सुहाग पुत्र थाढा एतेषां मध्ये साधू जौतू भायाँ सरो तया निजज्ञानावरणीयकर्मक्षयनिमित्त इदं षट् कर्मोपदेशशास्त्र लिखाप्य बांई जौतसिरि शिष्या बाई विमलसिरि तस्या देवशास्त्रगुरुपूजाविधान महामहोत्सवेन बाई विमल श्री योग्य सम्मर्पित। लिखित पडत रामचन्द्र । इद शास्त्र ब्रह्म पेमा तेन २० इश्वरविमल दासाय समर्पित । - पर पाहुउ सटीक । ३५. पर पाहुउ मुलकर्ता श्री कु दकु दाचार्य। टीकाकार श्री श्रतस गर । भाषा प्राकृत सस्कृत । पत्र संख्या १६५ प्रत्येक पृष्ठ पर ५१ पक्ति या तथा प्रति पक्ति मे ४४४४८ अक्षर। प्रशस्ति- संवत्सरे वाणरसमुनीदुमिते १५६५ माघमासे शुक्लपक्ष पंचमी तिथौ पुनर्वसुनक्षत्रे वनोपान- दीधिकासरोनदीप्रसादशोभिते चतुर्विधसंघकृतगीतवाद्यप्रभावन निरंतरप्रवर्द्धितनित्योत्सवे .. बगरू नगरे श्री चन्द्रप्रभ चैत्यालये श्री मूलसधे नद्याम्नाये बलात्कारगणे सरस्वतं गच्छे श्री कुदकु दाचार्यान्वये भट्टारक श्री देवेन्द्रकीर्ति श्रीमद् जगत्कीर्तिजितः शासनकारी निजवचनचातुरी पाडित्यगुणजित नागरलोकवृदः पंडित श्री छीतरमल्लः तत् शिष्यः स्वशीलपडित्यवदान्यलोकरजकत्व धैर्यगाभीर्यसौंदर्यप्रमुख गुण रत्नरोहणचलः पडितचैतोगजायत्तीकरणमृणि. प्रख्यः पडित श्री हीरनद तत् शिष्येण चौखचद्रेण स्वशयेनेदं पट पाहुंडशास्त्र सलिख्य भट्टारक श्री जगतकोतिशिष्यार्य श्री दोदरांजाय प्रदत्तम् । प्रति न० २ पत्र संख्या १८९ साइज ११||४५ इञ्च । लिपि सवत् १५८५ । संवत् १५८५ वर्षे महाबुदी ४ श्री मुलसघे नद्याम्नाये बलाकारणे सरस्वतीगच्छे श्री कुदकु दा चार्यान्वये भट्टारक श्री पद्मनन्दिदेवास्तत्प? भट्टारक श्री शुभचन्द्रदेवास्तत्प? भट्टारक श्री जिनचन्द्रदेवास्तत्प? भट्टारक श्री प्रभाचन्द्रदेवास्तत् शिष्य मंडलाचार्य श्री धर्मचन्द्रस्तदान ये खडेलबालान्वये वाकलीवालगोत्रे साह चाचा भार्या चौसिरि तत्पुत्र साह नेमा भायो सवीरी वि० कोडमेट तयोः पुत्र साह द्योपाल सात रूपा । साह द्योपाल भार्या दानसिरि। साह सात् भार्या बाई माह रुपा भार्या दामा एतेषां मध्ये कोडमदे रोहिणी व्रतोद्योतनार्थ इद शास्त्र लिखाप्य भक्त्या मुनि श्री धर्मचद्राय ज्ञानपात्राय दत्त । प्रति न ३ पत्र संख्या १९ साइज ११|शा इञ्च । संवत् १६०२, वर्षे वैशाखसुदी १०, तिथौ . रविवासरे उत्तराफाल्गुननक्षत्रे राजाधिरोजशाह आलम, राज्ये नगरपचावती मध्ये, श्री पाश्वनाथचैत्यालये श्री मूलसंधे नंद्याम्नाये वलात्कारगणेसरस्वतीगच्छे भट्टारक श्री कुदकुदाचार्यान्वये भट्टारक श्री पद्मनन्देिवास्तत्प? भट्टारक श्री शुभचन्द्रदेवास्तत्पट्टे भट्टारक श्री mare १७६] * प्रशस्ति-सग्रह * ३७. श्रीपाल चरित्र। रचयिता श्री पं० नरसेन। भाषा अपभ्रंश। पृष्ठ सख्या २६ साइज १२४।। इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर १२ पक्तिया तथा प्रति पक्ति मे ४४५४८ अक्षर । प्रति प्राचीन है मंगलाचरण- - सिद्धचक्कविहिरिद्धिय गुणहसमिद्धय पणवेप्पिणु सिद्धमुणीसरहो। पुणु अक्खमि णिम्मलु भवियहमगलु सिद्वमहापुरसामियहो ।। अन्तिम पाठ तथा प्रशस्ति- घत्ता इय रज्जु करतउ पुणु वि विरत्तउ देविसयलु णियपुत्त हो। ससारहो सकिउ पुणु दिखकि उ मतिपुरोहियजुत्तहो।। घुहवीपालुहु रज्जु समप्पिउ, अप्प उराय महाव्वइ थप्यिउ । मयणासुदरिपमुहते उर, हरडोर उत्तारिय णेउर। सयल विसंजइ यउ सजायउ, दुविहिं तवयरणेहि विरायउ । महासुक्क सुरइदुह वोप्पिणु, गइय देव तियलिंगुह णोप्पिणु। अंगरक्खजहिं जहिं वउ भायत, तहि तहिं देवत्तणुसुहु पाविउ । सयल कि णरणरवइ समदेप्पिणु, घार वीरू तवयरणु चरेप्पिणु। गउ सिरिपाल परमणियाणहो, सिद्धचक्कफलु भवियहु जाण हो। अवरु वि नरुनारिज्जु करेसइ, एव माइ सो फलु पावेसइ। सग्गि सुराहिव सुहु भु जेसइ, सुक्खएएह सिहु कील करेसई । कत्तिय आसाढहि फागुणमासहि, ते णंदीसर दीउ गवेसहि । बहु भत्ति हिं जिणपूयकरें सहि, सिद्ध चक्कफलु सुहु भुजेसइ । जिणइ अकित्तिमाई वदेसइ, पुणु महियाल चक्कवइ हवेसहिं। करि विरज्ज पुणु मोक्खु लहे सहिं, घत्ता सिद्धचक्क विहि रइयमई, णरसेण भणइ णियसत्तिए। भवियणजणाणदयरे, करिवि जिणेसर भत्तिए ।। इय सिद्धचक्ककहाए महारायसिरिपालमयणासुदरिदेविचरिए पंडितसिरिणरसेण विरइए इह

१७८]
५ प्रशस्ति-संग्रह ५
सर्वज्ञोक्तधर्मजितचेतमान कुटुबभारधरधुरान माधु श्री नीकमु तद्भार्या शीलतोयतरगिनी हीरा तयो. पुत्र
सर्वगुणालकृत देवशास्त्रंगुरविनयवत सर्वजीवदयाप्रतिपालकान् उद्धरणधीरान् दानश्रेयासावतारान् आभार-
मेरान परमश्रावक महासधु श्री महे सुतेनेद श्रीपालनामशास्त्र कर्मक्षयनिमित्त लिखापित। लिखितं पर
वीरसिधु। बाई मानिकी योग्य प्रदानार्थ ।
प्रति नं०४ पत्र सख्या ३७ साइज ११४५ इञ्च ।
लेखक प्रशास्त-
सवत् १६३२ वर्पे वैशास.
अमावस्यां तिथौ भौमवासरे शावरतपगच्छे प० न्यास, श्री प०
नयरत्नशिष्य प० न्यास न्यास विद्यासुन्दरगणि लिख्यत चाटसमध्ये ।
श्री पार्श्वनार्थचैत्यालये चपावत्तीमहादुर्गे महाराजाधिराजराव श्रीभगवानदासराज्ये श्री मूलसधे
नद्याम्नाये बलात्कारगणे सरस्वतीगच्छे श्री कुदकु दाचार्यान्वये भट्टारक श्री पद्मनन्दिदेवास्तत्प? भट्टारक श्री
शुभचन्द्रदेवास्तप्पट्टे भट्टारक श्री जिनचन्द्रदेवास्तत्पी भट्टारक श्री प्रभाचन्द्रदेवा तत् शिष्यमडलाचार्य श्री
धर्मचन्द्रदेवा तदाम्नाये तत्पट्टे मडलाचार्य श्री ललितकात्तिदेवा तत् शिष्य चन्द्रकीत्तिदेवा खडेलवालान्वये
साह गोत्रे साह टेहू भाया वाहू । तत्पुत्र माह नानू भार्या नारगदे। वि. भार्या दिबू । नानू पुत्राः पच
प्रथम पुत्र साह कपूरा भार्या नमी। तत्पुत्र गुणराज। वि. पुत्र साह श्रवण भार्या साहिबेद तत्पुत्र
हारिल
.।
३८, श्रीपाल चरित्र ।
रचियता प० रइधू। भाषा अपभ्रश। पत्र संख्या १२८ साइज ११४४|| इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर
ह पक्तिया तथा प्रति पक्ति मे २६४३२ अक्षर | प्रति शुद्ध तथा स्पष्ट है।
मगलाचरण-
-
मिद्धहं सुपसिद्धहं वसुगुणरिद्धह, हियइ कमले धारे वि निरु।
अक्खीम पुणु सारउ सुहसयसारउ, सिद्वचक्क माहप्पुवरु ।।
अन्तिम पाठ-
M
इय चरिउ सुहायरू वुहयणमणहरू नंदउ महियाल गुणभरिउ ।
भवभमणविणासणु दुरियपणासणु अस्थपसस्थहि विष्फुरिउ ।।
सत्यं वदति व्रतानि कुरुते शास्त्र पठत्यादरात् ।
मोह मुश्चति गच्छति स्वसमय धत्ते निरीहपद ||
पापु लुपति पाति जीवनिवह ध्यान समालबते।
सोऽयं नदतु सावुरेव हरसी पुष्णति धर्म सदा ॥१॥

१८० * प्रशस्ति-संग्रह - - ग जो पुणु वाटूसाहु पयासि, हरसी साहु नामु महि पायडु, तहु'फलत्त परियणहा पहाणी देवसत्थ गुरू वयणकलायर, वाई भज्जा पुणु वील्हाही,' त'नदणु पुणु कइयण वणि उ, नामें करम सीहु सो नदउ जंउ णाही तहुतिय सुपसिद्धो, पुणु हरसीहहु पुत्ति पउत्ती, जोइ अखंडु सोलु व पालिउ, पुणु विननो तहुलहु सुयसोरी, एहुगोतु नदनु महि मलि, एयह सव्वह मरिस पहाणउ, कलिकाले जित्लाणु द्धरियर, तरिकाल रयणत्तउ अंचई, जिवलहई पुराणं सुहरू, सो हरसीह साहुचिरू नदउ, . तहु'चउत्थु नदणु विजयासिउ । जो जिणं भर्णिय सेछ अत्यहु पडु । जिह सिरि रामहु सोया जाणो। दिवचदही नाम नेहायर । न गोविंदुहु लछिपसाई जो डूगररायं निरूमणि 3 । अनिसु-जिणवर चरणइदिउ । बिहु कुल सुद्ध रूवगुणरिद्धि। न मानतमई गुणजुत्ती। कलिमलु असुहासचित्तहु-खालिउ । सयलहु परिवारहु सुपियारी। जा रवि सांस निवसहि आहंडलि । सत्थ पुराण भेय वुह जाण उ । चेयणु गुणु अखडु विप्फुरियउ । सुद्ध धम्मु-जो अहर्निसु सचइ। कारा विय पयत्त मणहरू । सजण चित्तहु जणिया णदउ । । घत्ता पोमावड पुरवाई वसिउ वणउ कुत्ततिलउ । हरसिघ सघविहु पुत्तु रइधू कइगुण गणनिल उ॥ इति श्रीप लसिद्धचक्र चरित्रं रइघू पंडितकृत समाप्त। सवत १६३१ वर्षे कार्तिक वुदी : शुकवासरे पुष्यनक्षत्रे सोधानामयोगे श्री मूलसघे नद्यम्नाये बलात्कारगणे सरस्वतीगच्छे श्री कुदकुंदाचार्यान्वये षड्विशद् गुणविराजमान' व्याकरणछटोलकारसाहित्य- तांगमादिशास्त्रार्णवपारंप्राप्तान भट्टारकं श्री पद्मनदिदेवास्तत्तट्टे भेट्टारक श्री शुभचन्द्रदेवास्तत्पी भट्टारक श्रो जिनचन्द्रदेवास्तत्प? भट्टारकै श्री प्रभाचन्द्रदेवास्तत् शिष्यमंडलाचार्य श्री चन्द्रकोत्तिदेवास्तत् भ्राता आचार्य श्री हेमचन्द्र तदाम्नाये खडेलवालान्वये पुस्तिका लिखापित नागरचालमध्ये टौक समीपे साखिणा नगरे पातसाह श्री अकारविजयराज्ये सोलकी महाराय श्री सुरजन साह कमा भार्या करणादे पुत्र चिंरजीव साह उदा भार्या उत्पौदे पुत्र द्वि० चि० साह भौरवां ।' साह भीरवा भार्या भावलदे पुत्र जैसा दि० पुत्र मोटा । साह सीखा भायो सिंगारदे पुत्र चिं, तेजपाल साह माधू भार्या मुक्तादे पुत्र साह छोत . श्री साह गोत्रे १८२ * प्रशस्ति-संग्रह घरि घरि वीयराउ अवज्जइ । - सावयवग्गु वि पुण्णसमग्गु वि, मिच्छातम भरू अव्वह खिज्जउ, मुणि जसकित्तिहु सिस्स गुणायर, मुणि तह पाल्ह वभुए णदहु, देवराज सघाहिव णदणु, पोमावई कुलकम दवायरू, जस्स धरि जि रइधू वहु जायउ, वरिउ एहु णदउ चिरू भूयलि, खेमचन्द हरिसेण तवायर । तिाएण वि पावहु भरू णिक्कदहु । हरिसिंघु वुहयणकुलआणदणु। सोविसु णदउ इत्थु जसायरू । देव सत्थ गुरूपयअणु राय । पाढि ज रूपन दृइ इह काल । . घत्ता णेणगिरि दुग्गहि खयर बग्गहि सुक्खयरे । गोउर चउ दारहिं तोरणफारहिं वुहयणमनसतोसयरे ।। धर्यालहमेहहिं जिणवरगेहहिं, मणिगणदिरि णयणा दिरि । जिणु पुज्जिज्जइ धम्मुसुणिज्जई, णिच्चजिजाह थक्क अवस्थहि । तव ता विज्जइ भवमलु खियजइ, पुणु पुणु परि धरि घण कं वरण भरि । मंगलगिहि उछवकिज्जहिं, सावय लोयहि मणहु पमोवहिं । तिविहं पत्तहं गुणगरणजुत्तह, दाणई दिज्जइ पुण्णई लिज्जइ। घरि घरि सद्द सणु भाविज्जइ, तसु भावणाई कम्ममलु खिज्जइ । आवणि आवणि वरकचण मणि, विक्कहि वणिवर स्वेजियसर। करि करदाणे जहिं अपमाणे, पंथ सित्तई अलिआसत्तइ । दह दिह पविय कत्थरणमाविय, तहि पुहइसरू णाई सुरेसरू रूवें ण सरू कतिए ससिहरू, लच्छहि आयरू रणावइ सायरू। कर करवालो अरिखयकालो, तोमर वसहु लद्ध पसंसहु। उज्जोयणयरू कुलसंतयधरू, डुगरू अरियण खययरू। तासु जि रज्जहिं मई हिरवज्जहिं, जिणहरिठति सुहमइ वति। विरयउ कठवो एहु जि भन्बो, पुव्याहयरियहं पट्टि गुणायरू । अणु कमेण सठिउ वयसायरू, णामें घता मिच्छित तिमिरहरु णाइसहसयरू आयमस्थ हरू तवणिलउँ ।

* प्रशस्ति-सग्रह * १८४] सहजो भवगुणमणिरयणायरु, सहजपालु पढमउ जय वल्लहु, णिरुवम रुवसीलवयसज्जा, युरिमरयणउ पाय णरखाणी, तिविह पत्त दाणेण कयायरु। तेजू इयरु विवुह जण दुल्लहु । ही पढमिल्लहु भय । सचित्तजि परहु उवसमवाणी। ..... घत्ता तहिं उगरि उवएणा लक्खणपुरणा छह णदण आणदयर । ण जिणवर भासियं कव्व सुहासिय णं अदरसजणपोसयर ।। ताह पढमु वरकीत्तिलयाहरू, दुहिय जणाण दुक्खघणखयमरु । दाणु णय करुणं सुक्खर करु परिवारहु पोसणे सुरभूरहु। जिणपूयाविहि करणपुरदरु, णियकुलमदिर वहु सोहाहरु । भूरि दव्वु वर्वसाएँ अजिजाब, लछि सहा चवलु पडि बज्जिाव । जिणणाहहु पइट्ट काराविवि, मणइ छिय दाणवहु दावित्रि । तित्थयरत्तु गोत्तु जिं वद्धत, सहि उ सहदेउ जसदः । धामाहिय तहु भामिणिभासिय, जिणदासहु सुवस्सणेहामिय । कुमरपालयि जिणदासह पिय, बहु उमिज्जइ तहिं सीलहु सिय। भामणु झाइय जिणपय मला, तिणि पुत्त हुयतांह गुणाला । पढमउवाय उ तीयउअमला, वछरजुसाभु नामाला। घत्ता सहजपाल सुडउ यउ पुणु हुउ छीतमु गयतमु विमल जसु । दुहियण दुहखडणु णि यकुलमडणु, गुणवरणरण कोई सुत ॥ तासु पियखिम गुणसोल अतुल्ली, जायण जण आसातरु वल्ली। खि धरहिय अहि हाणें साहिय, ताहिं गम्भिहुय पुत्त गुणाहिय । छह पमाण भूलि सुम्माणिय, गुरुयण जेहि णिच्च सम्माणिय। वणिवर यट्टह जो मुक्खेसरु, पीयराय पय पकय महुयरु । वीरदेउ पढमउं गुणमदिरु, दाणु णाय करु जो नांग सुदरु वोय हेमाहेमु व दुल्लहु, णियपरियणयणम्मि अइबाल्लहु । लउदी णामे भासिउ तीयउ, देव सत्यगुरपाय विण यउ । रूपा रुवें जिय मय रउ, जि महियलि जसु विम्मलुलद्धउ ।

१८६] ५ प्रशस्ति-संग्रह सहजासाहु हिं पमुहहिर वणु, सिरि सेट्ठिवांस उप्पणु धण्णु, तहु पिय जालपहिय वएणणीय, तहिं गाम्भिउ वएणासुयपुरिण, तुरिया वि पुत्ति जा पुण्णमुत्ति, क्षेमी ण मा चरसीलजुत्त, सा परिणिय तेण गुणायरेण, णिय भायर णदणु गुण णिउत्त, हेमा सामे परिवारभत्तुः भायर चउक्कजु उपुणु वियणु । तेजा साहु जि णामे पसएणु । परिवारभत्त मीलेणसीय। राजसपालु दारू जि तिरिण। एिणच्चजि विरइय जिणणाह भत्त। कोकइ वएणइ तहिं गुणह कित्ति । बहुकालि जति सायरेण । मग्मेपिणु मिबिहउ कमलवत्तु । तहु घरहु भारदेप्पिणु विरत्तु । x x x x परवारलोड, जिण वयधारण उक्कठएण, ससारू असारुउ मुणिमणेण । जगणी जणु वि सयलह विषमावणु कार विसोउ। अपुणु वि खसेप्पिणु तक्खणेण, जिणवेसुधरिउ णीसल्लएण । जसकित्तिमुणिदहु णवि विपाय, अणुवयधारिय ति विगयमाय । तासड णदणु दिवराजु अण्णु, सा घाहिय पियणेहि पसगणु। परिवारभत्त गुण सेरिणजुत्त, णियवसगयण उज्जोमित्त । सच्चावइ भासि सच्चेवलीणु, जिणधम्मज्जिकारणयत्रीणु। तहु णदणजाया दुरिणवीर, जिणधम्मधुरधरगुणगहीर।' चदुव्वकालयरू सिखरचन्दु, पढमउ सज्जगह जगइ अगदु। वीयउ पुणु णामे मल्लिद सु, व सेगूणहु जिणवरहु दासु। तोसडहु-पुत्ति पुणु विरिणजाय, जिणधम्मि कम्मि रयविगम माय । जोठी णामे जीवो जिउत्त, जिणपयगयोवयणिञ्चसित्ता वर्याणयमसीलपालणसमग्ग, जिएसमयहु भरू धरणअभग्ग । लहुडी णामे सेल्ही पवित, विहुं परिवारहं जा णिच्चभत्त । सेले सोहगो सिय समाण, णिरू पत्तहं चउविह देइ दाण । तहिं पदणहू याविरिणसज्ज, माडा तेजा पामे मणुन । पच वि भयरह जि अएणसुया, जालही वीरो पमुहाइ हुया। इह परियणु वुत्तउ सजसपवित्तउ, जा कणयायलु सूरससि । जावहि महिं मंडलु दिवे आहंडलु, णदउ तावहि सजसवसि।। - १८८] * प्रशस्ति-सग्रह १ णामे सिद्धस्थे सजएण, पुणु विजयसेण पुठिल्लएण, पुणु धम्मसेण णक्खत्तएण, पडुवु ध्र वसेणे जियमएण, भद्दे जय भद्दे पुगमेण, विदिसेणें तबसिरिर जिएण । पुणु गगएव णामिल्लएण। जइपाले मुणिजय पत्त एण। पुणु कसायरियं गयभएण। लोहज्जे सिवकोडियकमेण । , पत्ता २ गणहरएव मुनिंदहि कुवलयचदहें एयहि अवरहिं अविचलु । आहासिउ पवयणे जहं मइभवियणितह पचणमोकारहो फ्लु ॥ ४ ६ जिणिदस्स वीरस्स तित्थे वहत्ते, सुसिक्खाहिहाणें तहा पोमणदी, जिणुदिह, धम्म धुराणं विसुद्वो, भव वोहि पोउं महीविरस णदी, जिणिंदागमाहासणे एयचित्तो, एरिदामीरदाहिवाणदवदी, असेसाणगंथम्मि पारमिपत्तो, गुणायास भूवोसु तिल्लोक्कणदी, महाकुंदकुदाणए एतसते। पुणो विसहुणदी तउ णदणंदी। कयाणेय गधो जयते पसिद्धो। खमाजुत्तसिद्ध तिउं विसहणदो। तवायाणिट्ठाइ लद्धाइ जुत्तो। हुउ तस्स सीसो गणीरामणदी। तवे अगवी भवराईवमितो। महापंडि अतम्स माणिक्कणदी। घत्ता पढमसी सुतहो जायउ, जगविक्खायउ मुणिणयणदि आरिणदिउ । चरिउ सुदमण णाहहो तेण, अवाह हो विरइउ वुहअहिणदिउ । 'प्राराम गाम पुरवरणिवेसि, सुपसिद्ध अवती णाम देसि । सुरवइ पुरिन विवुइयणइट्ठ, तहि अस्थि धारणयरी गरिह। रणिदुद्धर अरिवर सेलवज्जु, रिद्धियदेवासुरजणियचोज्जु । तिहुयणु णारायण सिरिणि केउ, तहिाणरवइ पुगमु भोयदेउ। मणिगणपहसिय रविगभित्ये, तहि जिणवर वधु विहारु अस्थि । १ पोठिल्लाण २ अवियलु ३ मइभवेयणेतिह ४ पंचणमोकारह फल ५ महाकुन्दकुन्दण्ण ६ मसिर बाहि, सुरहाखारि, ७ मोदि ८ महीविसह, महावित ६ भूउ ।

२० वीरमदे तत्पुत्र सा० लाला तत्पुत्रौं वो सा० रामा कर्मा तद्भार्या रैणादे तत्पुत्र सा० पर्वत तत्पुत्रास्त्रयः सा० आशा तद्भार्या असलदे द्वितीय सा० कर्मा तद्भार्या करणादे तृतीय पुत्र सा० लूणा तद्भार्या ललितादे तत्पुत्रै द्वौ प्रथम सा० नारायण तद्भार्या नौलादे द्वितीय पुत्र सा० केसोदास तभार्या केसरीदे एतेषां मध्ये सा० देवू तद्भार्या दाडौदे तत्पुत्र सुदरदास श्यामदास इदं शास्त्र सुदर्शनाभिधानं लिखाप्य षोडशकारण व्रतोद्यापनार्थ दत्त क्मक्षयनिमित्त श्री १०८ देवेन्द्र कीर्त थे प्रति न० २. पत्र संख्या ६५. साइज १०॥४४॥ इञ्च । प्रत्येक पृव पर १३ पक्तिया तथा प्रति में ३३-३८ अक्षर लिपि सवत् १५०४. प्रशस्ति- सवत् १५०४ वर्षे मार्गसुदी ६ शुक्लपक्षे गुरुवासरे श्री काष्ठा संघे पुष्करगणे भट्टारक श्री गुणकीति. वास्तत्पी श्री यशकीर्तिदेवाः तस्य शिष्य श्री भवसेनदेवाः तस्य शिष्य भुवनकीर्तिदेवा । स० हुमामनि तस्य भर्ज गुनविराजमान चतुर्विधदानसयुक्त मनगातास्य डालु अर्ज दौसिरी तस्य लघु भ्राता गुजरु। तस्य भार्या गुनसिरि तस्य पुत्र उत्यन पदमा तस्य लघु भाता नादा तस्य भार्जनरक पुत्र जिनदास तस्य भगिनि वइ धम्मिणि कर्मसनिमित्त इद सुदर्शन चरित्र लिखापित। प्रति न० ३. पत्र संख्या १०६ साइज १०x४ इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर पक्तिया तथा प्रति पक्ति -- पर २५-२८ अतर। संवत् १६३२ वर्षे चैत्र मासे शुक्लपक्ष चतुर्दशी दिवसे हस्तनक्षत्रे भी चन्द्रप्रमचैत्यालये वला. कारगणे सरस्वतीगच्छे श्री कुन्दकुन्दाचार्यन्वये भट्टारकं श्री पद्मनन्दिदेवास्तत्पट्टे भट्टारक श्री शुभचन्द्रदेवा स्तत्पट्टे भट्टारक श्री जिनचन्द्रदेवांस्तत्पट्ट भेट्टारक श्री प्रभाचन्द्रदेवास्तत् शिष्यमडलाचार्य श्री धर्मचन्द्रदेवा स्तत् शिष्यमडलाचार्य श्री ललितकीर्तिदेवा स्तत शिष्याचाय श्री तदाम्नाये खएडेल. वालवशे निवाई वास्तव्वे सेठी गोत्रे सा० बाछु तद्भार्या राजी तत्पुत्रास्त्रयः प्रथम ठाकुर ति० देवा तृतीय सा० पहराज ! सा० ठाकुर भार्या देउ तत्पुत्र साह महणा तद्भार्ये प्रथम बोखी द्वि० लाडमदे तत्पुत्रास्नय प्रथम सा० हीरा भार्या हीरादे द्वितीय रामदास ४० चि० शेशादेव भार्या देवलदे तत्पुत्रौ नौ । प्रथम चि० कोजू । साह पहराज भार्या पाटमदे एतेषा मध्ये साह पहराजेन इद शास्त्र सुदर्शन चरित्र लिखाप्य आचार्य हेमचन्द्राय धटापित। ४१, सुलोचनाचरित्र । रचयिता महाकवि गणिदेवसेन । भाषा अपभ्रंश । पृष्ठ संख्या २४८ साइज १०x४|| ईश्छ । प्रत्येक पृष्ठ पर ११ पंक्तिया तथा प्रति पक्ति मे ३४-४० अक्षर । लिपि संवत् १५६०. प्रारम्भिक पाठ- - १०] * प्रशस्ति-सग्रह तासु सीसु णिधि मयणुभाउ, कहिय धम्मु परिपालियसजमु, सच्छपरिग्गहु णिहयकुसीलउ, उबसम णिलउ चरिय रयरयणत्तउ. देवसेण णामे मुणि गणहरू, असुण तेण किंपि होणाहिउ, सयलु विखगउ देवाएसरि, फुडु वुहयणु मोहेणिणु भल्ल तउ, रक्खस सवत्सरे वुहदिवसए, चरिउ सुलोयणाहि णिप्पउ, पत्तो गुरु उत्रएसें रिणवाहियतउ । अवियरमलरविरिणणासियतमु । धम्मकहाए पहावणः सीलउ । सोम्मु सुयणु जिणु गुणअणुरत्तउ । विरइउ एउ कञ्चु ते मणहरु । सुत्तविरुद्धउंकाई मिसाहिउ । तिहुयण जणनंदिय परमेसरि । केरंतु पउदेउणवल्लउ। सुक्क चउदसि सावणमासए। सअथवणयसंपुणउ । णवि मइकवित्त गवेणकियउ, अवरुण केणवि लाहें। कि उ जिणधम्मडो अणुत्तर गुहमणे कयधमुलहें ।। अथ सवत्सरेऽस्मिन् श्री नृतिविक्रमादित्यराज्ये सवत १५७७ वर्षे पोसमासे कृष्णपक्षे नवम्या तिधौ सोमवासरे अश्वनी नक्षत्रे श्री योगिनी प्रत्यासने श्री कानिंदीतहे श्रो फेरोजाबाददुर्गे गुणिजनबतिससव्यमान विवज्जनहितनिवासाया भव्यजनाध्यासपवित्रिताखि ननिवासिमनप्रवृत्तवासाया जिनधर्मरत्नाकारप्रियायां दुस्थितस्वस्थोकरणकृमाया प्रतापपरमेश्वर महाराजाधिराज राजश्री इबराहिमशाहि रक्षमाणार्या जैनबौद्ध- वार्वाक साख्य नैयायिक शैवादि षट दर्शना द ससव्यताया जयवत श्री काष्ठासघे माथुरान्वये पुष्करगणे वादिकविभजनभट्टारक श्री ३ गुणकीर्तिदेवास्तत्प? भट्टारक श्री यशःकीर्तिदेवास्तत्प? भट्टारक श्रीमलय- कीर्तिदेवास्तस्पट्टोदयाद्रिभास्वद् भट्टारक श्री गुणभद्रसूरिदेवा स्तदाम्नाये अप्रोतकान्वये गर्गगोत्रे श्री योगिनीपुरेवास्तव्यः सुश्रावक साधुनानिग तस्य भायो साध्वी महीघरही लखणसी भार्या देवराजही तत्पुत्र वीरदास तस्य भार्या धनराजही तृतीय पुत्र साधु हेमा तस्य भार्या वेगाही एतेपा मध्ये चउधरी लखणसो तस्य भार्या शीलतोय तरगिणी प्रिया नाम दिउराजही तत्पुत्र वीरदास दिक्षाना पचमहाव्रतधारकः विवेकगुण- सपन्नः विवजनसभारंजनाभव्य जीवप्रतिबोधकः मुनि श्री ३ विमलाकीर्तिदेवैरिद सुलोचना चरित्र लिखा- पित निजद्रव्योपार्जित कर्मक्षयनिमित्वर्थ सद्भावतत्परेण लिखापित आत्मपठनार्थ । ४२. सुकुमाल चरित्र । रचियता मुनि श्री पूर्णभद्र । भाषा अपभ्रंश । पत्र संख्या ४५ साइज १०५|| इश्च । प्रत्येक पृष्ठ पर ११ पंक्तिया तथा प्रति पंक्ति मे ३१४३३ अक्षर । प्रारम्भ के २ पृष्ठ से ३० पृष्ठ तक पत्र नहीं है।

१६४] *प्रशस्ति-सग्रह -- पीथे . ' गुरुभत्तिय परिणमिय मुणीसर, णामे साहु रजाणु वरणीसर । तहो गल्हु णामेण पियारी, गहिणि रणामणदिय सुहयारी। पविमलसीलाहरण विहूसिय, सुहि सज्जण वुझ्यणहपसंसिय । ताह तगूरूह जायउ, जणसुईयरू महिर्याल विक्खायउ। अवरू महेंदो वुच्चइ वीयत, वुहयणु मणहरू तिक्कउ तइयउ। जाल्हणु णामें भणिय चउत्थर, वुणु विसलक्खणु दाणमहत्थउ । छट्टउ सुवसं पुरणहु यउ जह, समुदपालु सत्तमउ भयउतह। अट्ठमु'सुवणइ पालु समासिउ, विणया इय गुणहि परिभूसिउ । पढमहु पियणामेण सलक्खण, खणकलिय सरीर वियम्खण। तहि कुमारू णामेण तणुरुहु, जायउ पकय जेम सरोरुहु। । विणयविहूसण भूसिय कायउ, महियलिमय मिच्छत्त परिचत्त। घत्ता णाणू अवरू वीयउ पवरूकुमरहो हुथ वरणेहिणि ! पउमा भणयासुयणहि गणिय जिणमय रयवहु णेहणि ।। तहि पाल्ह णामेंण पहूयउ, पठमु पुत्त णं मथण सरूवउ । वीयउ साल्हणु जो जिणु पुज्जई, जसु ख्वैण णमणसिउपुज्जइ । तइ यउ वलि जाणिव जणिजइ, वधव सयणह सम्माणिज्जइ । तुरियउ जायउ सूपटु णामे, गावइ णियसवुदर सियकामें। एयहणासेसह कम्मक्खन, जिणमयरयहो दोउ दुक्खक्खंड 3 मज्झ वि एउ जि कजण अएगण, ससारिय सुहणेसुरवरण। पउविहु सघु महीलि णदर, जिणवरपयपंकयए वदउ। खयहु जाउ पिसुणु खलु दुज्जणु, दुट्ठदुरासउरिणदिय सज्जणु। एउ सत्थु मुगिवरह पढिज्जड, भत्तियवियणेहि णिसुणिज्जउ । जामणहगणि चददिवायर, कुलगिरिमेरू महीयलसायर । पीथे वसु ताम अहिणदउ, सज्जणसुहिमपाइआरणदउ । वारहसयइ गयइ कय हरिसइ, अट्ठोत्तरइ महीयलि वरिसइ। कसहापक्ख आगहणों जायए, तिज दिवसि ससि वामेरि माय. घत्ता -- , w- वाहर सइय गत्य कहइ पद्धदिएहिर वएण। -- १९६ ] * प्रशस्ति-संग्रह * " सुरसरिजउणाणइ भतरालि, तहि णयरु अभयपुरि महिरवण्णु, इक्वारसगोरस ककणाइ, पहियणं पोसिय पयसालजस्थ, चउवएणतमिद्धउ वसइ लोउ, जहि पूरिउ वहु मयणाह वासु, णरणारिमणीहरगेहगेह, धन्माणु रत्त जण वसइ जत्थ, घत्तो तरुसोमखेतधणकणविसालि। सुरणाहु ववहुवुिहिमएणुण्णु। तलहलइ रमालइ वणघणाई। समविसमछुहातिसकस्थिजस्था सुरसत्थुवमण्णइ विविह भोउ मणइछिय मरणहिरई विलासु णावइ सुरसछेर 'अइसणेह। चउ दाणय हरइवपसस्था प चेयालयवेवि अइउत्तंग चिसाल तहि । धवलियासहरगमडिय कण कलसजहि ॥ १ ॥ णंदणवणु वसवणबहुमडिय, घम्मणिलय पावारि विहंडिय। धयतोरण उल्लोवयंसोहिय, पिछिमहुछउ सुरणरमोहिय। कित्तिमपडिमा कित्तिमजेहिय, जिम कइलासह दोसहितेहिय। मंगलगीय महुछउ किज्जइ, दु हि सरुवहु थु िरज्जइ। एक्कु कट्ठमघह चेईहरू, धम्मसंचुणिएणासिय भवडरु। सत्यपुराण पूय जिणणाहर, विमवएणमिसिवलछिसणाहहु । घसा 1 सावय पुरवाड णिवाहिया गेहधम्मभन । वयचाई समय तिविह पत्तउएणतकरु॥२॥ तहिं वीयउ पसिद्ध जिणमदिन, भवियण जण मण णयणा णदिरु। मूलसंघजिणसासणसारउ, रविविवुवतमणियरणिवारउ। गुज्जरगोटि धम्मभर ख चउ, णियधणुपुरणणिमित्ते संचिउ । सोहइ सहचउ सघसमिद्धउ, मुणितवतेउ वरिद्धिहरिद्धउ। चिरु सामिउ सिरिगोयमुगणहरू, तहु सतइ अणेयणिज्जियसरु । कुदकुशायरियगरिक, अगपुत्रधरु प्रायमसिहउ। तासु पट्टि अणुक्रमेण कुरुक्कर, धमकित्ति मुणिवर मलमुक्कउ ।। तासु सिक्खसिक्खिणियअणेयवि, महवयअणुवय वुह बहु भेववि ।

[१६८ * प्रशस्ति-सग्रह घत्ता -- . तहु गेहिउवएण वेविपुत्त ण चदरवि । सिउ गणु पढमिल्लु अयसमही हरणाइंपवि ॥५॥ लहु भीषमु पुण्णालये खभुअ, धन्यधरारहसिचणप्रभु। सिउगणतिय रुपारुवहरइ, दाणपु एणचेलणियमहासइ॥ भीखमभज्जपटोगुणजुत्तिय, सीलाणकेयजणय ण पुत्तिय । सिगुणतणय वेविकुलमडण, मीणुवीउ भाउ अहखडण । माणभज्ज पाथुल मणमोहण, मुह ससिहर सिकिरण गिरोहण । चदू बंधु म चिरु भासिउ, जासु सुजसु वुहयण सुपयासिउ । तासु भज्ज पदमागुणसारी, रुबरासि वल्लहसुपिपारी। वीई मुद्ध कुवरि णामकिय, जा सोहग्ग रुवरइ संकिय । सीलाहरणविहूसियदेहिय, मुणिवर विणयदाणसुसणेहिय । कुरिउयरसुव तिरिणउ वरणाइ, सुजसपुंज कव्वह वरणेकइ। गरयणत्तय धम्महु कारण, कप्पतरुवजण दुक्खरिणवारण । दादू साहु पढमसुउ भासिउ, जें सुय णाणु दाणु सुपयासिउ। जसहरु बीउ भुवणि जस सायरू, गयण सोहु तहु लहु वउभायरु । दादू णारिउ हयसु मणोहरि, गरइ पीइ वेवि कामहु घरि । पढम भज्ज रुइ सासुय खण। लोछ पक्खि अगसुह लक्खण । खिउ सिरिणाम अवर सुपहाणी, सिमुह जिम इदहु इदाणी। दाणमाण सम्मत्त सुरेवइ, रइ सोहग्ग सुजस णदेवइ । अतिहि दाणु अणु दिणु बहु दिज्जई, चविह सघ विणउ विरइज्जइ। तासु सरीरि पुत्तु उप्पण्णउ, माणससरिह सुवसु मण्णुएणउ । पासकएणु णामेण मणोहरू, चिरु णदउ जै माडउणिवधरु । गेहणितासु रुवगुणसारी, रणाम राइ सिरिपइसुपियारी। परियणु अवरु जा परिणज्जइ, तउ वीयउ पुराणु विरजइ। एयह ममि गरउ पुरिसत्तणु, वणिउ जासु सुयण गुण कित्तणु । दादू साहु जिणेमरि भत्तउ, पुरिससीहु वय सीलपवित्तउ । अभयाहारसत्य पुणु श्रीसहु, तिविह पत्तपीणियसंतोसहु। पत्ता लेदाविउ एहु गुणणिहाणु कल्लोलणिहि । - [२०० * प्रशस्ति-संग्रह * सवत् १५८३ वर्षे आसोजमासे शुक्लपक्षे दशम्या तिथौ शनिवारे उत्तराषाढनक्षत्रे अतिगंजनामजोगे श्रीमूलसंघे नद्याम्नाये बलात्कारगणे सरस्वतीगच्छे श्री कुन्दकुन्दाचायोन्वये भट्टारक श्री पद्मनन्देिवास्तत्पट्टे भट्टारक श्री शुभचन्द्रदेवास्तपट्टे भट्टारक श्री जिनचन्द्रदेवास्तत्प? श्री प्रभाचन्द्रदेवास्तत् शिष्यमंडलाचार्य श्री धर्मचन्द्रः तदाम्नाये पोरवाडगोने साह कुभा भार्या पुरी तत्पुत्र हे तस्य भायो हिवसिरी, द्वितीय पुत्र रातु तस्य भार्या वाई चोखी, तृतीय पुत्र दीता तस्य भार्या सहजू, चतुर्थ दासा तस्य भार्या दौडादे तस्य पुत्र पदार्थ द्वितीय साह वोथु तस्य भार्या राता तस्यः पुन पाथ्यू तस्य भार्या लाडी तस्य पुत्र चोखा इदं शास्त्र लिखापित । बाई पदमसिरि जोग। - [२०२ * प्रशस्ति-संग्रह * विधन हरन सब शुभ करन, नमो नमो भा देव ।। अन्तिम पाठ- भात पुन अवतंस कहि, कुल अवतस सुज़ानि । सोग्ह वरिष है सु जो, अभिनव कद बखानि ।। मार्गसीर्ष दशमी रवौ असित पक्ष सुभ जानि। अब्द अठारसै वरसि अपरि चौबीस मानि। पढन काज लिख प्रेम कर नद किसोर द्विवेद। ज्ञानी लेहु सुधारि कार अक्षर ही को भेद। ३. अष्टाह्निका कथा। रचयिता श्री जीवणराम गोधा । भाषा हिन्दी (पद्य) । पत्र संख्या ६ साइज ११४४॥ इश्च । प्रत्येक पृष्ठे पर ११ पक्तिया तथा प्रति पक्ति 'मे ३८-४२ अक्षर रचना सवत् १८७१. - मगलाचरण- प्रथम देवगुरु सारदा नमिहुं मन वचं काय । वरत अठाई की कथा करु प्रथ अनुमारि ।। प्रशस्ति- रामचंद्रादि मुनीश्वर जेम, कथा करी हिरदै-धरि,प्रेम । गोधो जीवणराम सुजान, वरत करै विधि सु अभिराम। ताकै कया कथा-या कही, -या कुं बुधजन सोधो सही। रेणी नगर कसबो सुभ ठाम, बनवाडी.बापी अभिराम ! पार्श्व जिनालय-सोभै सदा, पूरन करी कथा हम,यदा । ..|| दोहा ॥ अठारह से इकैतर-या भादव उजली तीज । वार वहस्पतिवार नै सतगुरु कथा कहीज॥ ४. अष्टाहिका कथा। रचयिता श्री खुशालचन्द । भाषा हिन्दी । पत्र संख्या ५. पद्य सख्या ११७, रचना सवत् १७७४. मंगलाचरण- आदि जिनेसुर बंद फिरि, वर्धमान जिनराय। कहुं अठाई की कथा, सुण ज्यौ भवि मन लाय। - [२०४ * प्रशस्ति-संग्रह है मुनी भुवनकोर्ति गुरु बंदसौहजला रासकरीसीहरू बडो। तव परसादे सार, श्री आदि जीणद गुण वणवु चारित्र जोडू भवतार || - अन्तिम पाठ तथा प्रशस्ति रास कोयो मे नोर्मलोए, आदपुराण जोई करीए, पढे गुणे जे साभलए, मनबाछीत फल ते लहए, लखे लखावे रु वडोए, तेह ने नवनीध सपजेए, जे भवियण विस्तार करए, जिनवर गणधर मुनीवर, तीर्थकर श्री वृषभ जीन ए, जुगल्या धर्मनी वरो यो उ, पट कर्म स्वामी थापी पाए, मुगति रमणी प्रगट कोयो ए, तेह गुण मे जाणी या ए, भवि २ स्वामी सेवसु ए, आदि जिनेसर २ तणो मेरा ए, एक चित भाव आणीए, जिनसासण गुण अणत जाणीए, मुनी भुवनकीरति भवतार, भाव सहित वीसालतो। सुगम कीयो मे गुणमाल तो। तेह ने पुन्य अपारतो। मुगति रमणी बसी होय तो। करे ज्ञ न उधार तो मुगति रमणी होय हार तो। तेह ने पुन्य अपार तो। गुण गुथ्यां मे सार तो। कीयो पर उपगार तो लोक कियो जयवत तो। धमाधर्म वीचार तो। त्रिभुवन जय २ कारतो। सद गुरु तणो पसावतो। नागु सह गुरु पाय तो। कीयो सार सोहामणो। पढे गुणे जे साभले । श्री सकल कीत्ति गुरु प्रणमीने । ब्रह्म जिनदास कहे निमलो। रास कीयो मे सार। दोहा वखाणे जे रु वडा सभा माहि गुणवत। रुचि सहित जे साभले ने ह ने पुन्य महत । समकीत गुण उपजे वरत नीमवली सार। तत्व पदारथ जाणीये ज्ञान उपजे भवतार ।।

[२०६ * प्रशस्ति-संग्रह र आहे नारीय नर जे भाव धरी नित गाइसिंइ एह । इन्द्रादिक पद पामीय शिवपुर जासिई तेह । आहे एकाएउ अधिका शत पंच सलोक प्रमाण । सूणउ भणिसिई लिखसिई ते नर अतिहिं सुजाण । इति भट्टारक श्री ज्ञानभूपणविरचित श्री आदीश्वर फाग समाप्त। संवत् १६३४ वर्षे पौष बुदी १० बुधवार लिखितमिदं शास्त्र । मालपुरा मध्ये पाडे श्री डूगा लिखावितं । । ६. आराधना प्रतिवोध । रचयिता श्री भट्टारक सकलकीर्ति भाषा हिन्दी (पद्य)। पत्र संख्या ४ पद्य सख्या ५५-३६ नम्बर के गुटके मे ४६ से ५२ पृष्ठ तक हैं । विषय-आराधना । अराधनासार का संक्षिप्त भाव दिया हुआ है। मगलाचरण- श्री जिनवरवाणी नमेवि गुरु निग्रन्थ पाय प्रणमेवि । कहु आराधना सुविचार सक्षेपि सारोद्वार । अन्तिम- जे भणई सुणइ नरनार, ते जाई भवि नेइ पारि । श्री सकलकीर्ति का विचार आराधना प्रतिबोधसार ।। १०. ऋषभविवाहलो। रचयिता श्री कुमुदचन्द्र । भाषा हिन्दी (पद्य)। पत्र संख्या ८. साइज Exशा इञ्च । गुटका ५३. नं० गुटके के २२७ २३४ पृष्ठ तक है। से मगलाचरण- समर वीसरसतीद्योमउ शुभमती करों वरवाणी पसार लोए। प्रथम तीर्थकर आदि जिनेश्वर धरणावु तास विवाहलोए ।।१।। अन्तिम पा8- सवत् सोल अठोतरे ए मास आसाढे धनसार सु । ऊजलो बीज रलो आमरलीए लक्ष्मीचंद्र पाटे निरमलो ए, अभय चन्द्र मुनिराय । तस पट्टे अभय .... रतन कीरति शुभकाय । कुमदुचन्द्रे मन ऊजलोएं, [२०८ * प्रशस्ति-सग्रह * १३. कथा कोश सग्रह। रचयिता ब्रह्म श्री जिनदास । भापा गुजरातो मिश्रित हिन्दी (पद्य)। पत्र संख्या ६७ साइज ६४५ इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर ६ पक्तिया तथा प्रति पक्ति मे १६-२० अक्षर । कथा कोश मे दश लक्षण व्रत कथा, निर्दोष सप्तमी व्रत कथा, चादण पष्टि व्रत कथा, आकश पचमी व्रत कथा, मोक्ष सप्तमी व्रत कथा, पच परमेष्ठो गुण वणन का सपा है। गुटका नवोन है। मंगला चरण तथा अन्तिम पाठ प्रत्येक का अलग २ है दश लक्षण व्रत कथा का मगलाचरण इस प्रकार है- - - स्वामी नमस्कार, मगलाचरण- श्री वीर जिणवर पाय, पाय प्रणामवि सरस्वती । स्वामिणी बलीस्तवु , बुद्धि सार हू वेगि मांग ॥१॥ वलि गणधर श्री सफल कीरति पाय वदतु। रास करीस्यू हू निरमलो, ब्रह्म जिणदास भणे मार ॥२॥ अन्तिम पाठ-(पच परमेष्ठो गुण वणन ) श्री सकल कीरति पाय प्रणमीने, श्री भुवन कीरति भवतार । ब्रह्म जिणदास गुण वरणया, पच परम गुण सार ।। १५ पढे गुणे जे साभले, मनि धरी निरमल भाउ। मन वांछत फलरुरखा, पावें शिवपुर उठा ॥२॥ इति श्री पंच परमेष्ठी गुणवर्णनरास समाप्त । १४. चतुर्दशी चौपई। रचयिता श्री टोकम। भाषा हिन्दी पद्य । पत्र सल्या २० साइज १२४५।।। इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर ११ पक्तिया तथा प्रनि पक्ति मे १२-३४ अक्षर । रचना सवत् १७१२. लिपि सरत् १७६३. विपय-अनन्त चतुदर्शी व्रत की कथा। - मगलाचरण- प्रथम वदि पाचं जिनदेव, तोनि जगत जाकी करे सेव । रिद्धि सिद्धि बर सुख दातार, बालपणे जीत्यो जिहि मार ।। प्रशस्ति सतरह से बारहत्तरै फागुण तेरसि जाणि। वो छौ अधिको शुद्ध करि, पडित कहै वखारिए ॥१॥ बुद्धि सार टीकम कहै, काल पमा है बास ।

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[२१२ * प्रशस्ति-संग्रह है सबत् १८४३ वर्षे क्यारमासे कृष्णपक्षे मिती क्वार बुदी १४ शुक्रवारे मट्टारक श्री रत्नकीति जी तत् शिष्य पडित गणेशरामेन चेतन हर्म वरित्र लिखायो शेरगढमध्ये श्री पार्श्वनाथचैत्यालये। १६. चौदह गुणस्थान चर्चा। रचयिता श्री अखयराज श्रीमाल । भाषा हिन्दो गद्य । पत्र संख्या ६६. साइज filxशा इञ्च । लिपि सवत १८०३. अन्तिम पाठ- यह चौदह गुणस्थान का स्वरूप सक्षेप मात्र कह्या। जिनवाणी अनुमारि कथन करि पूरन किया। जौ कहीं भूल चूरू भइ होइ तौ जो पडित जिनवानी मे प्रवीन होइ सो सुधारि पढियो। ॥ दोहा ॥ चौदह गुणस्थान: कथन भापा सुनि सुख होई । अखैगज श्रीमाल 'ने करो जया मति जोइः।। इति श्री गुणस्थान की चर्चा सपूर्ण । अथ कर्ता माह अखैराज श्रीमाल शुभ भवतु । लिपि कत्ता साह सहरदास स्वामा चाटसू का । सवत् १८०३ मिता वैशाख सुदी ७ बुधबार सपूर्ण भयो। २०. छदशिरोमणि। रचयिता कवि शिरोमणि श्री शोभानाय । भाषा हिन्दी (पद्य)। पत्र संख्या ३०. साइज Ex५ इन्च । द्य सख्या २००. रचना सवत् १८२५ लिपि सवत् १८२६ प्रशस्ति- श्री गुरु रसिक किसोर की, कृपा चाहि अभिराम । सोभनाय पडित कियो, छद शिरोमणि नाम ॥ १ ॥ - SU X x सवत् अठारह सतक ता पर वरप पचोस । जेष्ठ मास सुदि सुदन लहि, भयो प्रय यह गीस ॥२॥ सूरनि कुल आमेर पति, नृप जन को सरताज'। इक छित राज छत्र चरि, पृथ्वोस्यव महाराज ।। ३ ।। ताके तीछन नेज ते, गारति होत गनीम । पीवल नृप माधव तने, हे वल की मम॥४॥ ताको चारयो चक्क के, नृपति नवावें सीस।

[२१४ * प्रशस्ति-संग्रह * तिन यह कथा करी मनलाय, पुन्य हेत उपचार कराय ।। पढे सुने मन लावै कोय, मनवाछित फल पावै सोय । जब लग मेरु सुर सांस रहे, तब लग खीर समुद जल वहै। जल लग तारा गन अरु चदं, जब लग सूर उद्योत करत । जब लग जैन धम अवलोई, स्वामी कथा पढो सब कोई। सवैया सवन सत्रैहसै इक्यावन फागुन 'ज बुधि दि भाइ, अतिम केवली देरी कथा रचिकै जिनदास विचित्र बनाई। सो यह लाल विनोदी लिखी अपने हित वाचन कौमनुभाई, तद्यपि भव्यन को उपदेशन हेतु करहु महासुखदाई ।। ॥ दोहा ॥ अन्तिम देवली की कया, वरनी परम पवित्र । और ले आपुन तरे, पावन परम विचित्र॥ इति श्रीजवृस्वामीचरित्रे भाषा पाडे जिनदासविचिते कथा सपूर्ण। संवत् १८४३ पौषमासे शुक्ल. पक्षे गुरुवासरे शेरगढ़मध्ये अष्ठमी जाटू लिखित । प्रति न० २. पत्र संख्या ३४ साइज ११।।४५ इञ्च । लिपि सबत् १७६३ सवत् १७६३ का वर्षे सावणमासे शुक्लपक्षे तीज वृहस्पतिवारे जिहांनाबादजेंसिंहपुरामध्ये श्री वर्द्धमान चैत्यालये श्रीमुलसधे नद्याम्नाये बलात्कारगणे सरस्वती गच्छे कुदकु दाचार्यान्वये भट्टारक श्री १०८ देवेन्द्रकीत्ति जी तत्पट्टोदयादिनमणिप्रख्यः भट्टारक श्री महेन्द्रकीर्तिजा तदाज्ञानुवर्णी पं० दयारामेन जबूस्वामी प्रथ भाषा चौपई स्वहस्तेन लिपि कृपा । २२. जैनशतक । रचयिता प० भूधरदास । भाषा हिन्दो पद्य । पत्र संख्या १४. साइज ६x४|| इञ्च । पद्य सख्या १०७ रचना सवन् १७८१. । मगलोचरण- ग्यान जिहाज वैठि गणपति से गुणपयोधि जिस नांहि तरे हैं। अमर समूह आन अवनी सौ बसि बसि सीस प्रणाम करे है ।। किधी भाल कु करम की रेसा दूरि करण को बुधि धरै है।

* प्रशस्ति-संग्रह * [२१६ प्रति नं २. पत्र सख्या १५५. साइज ११॥४४ इञ्च । सवत् १७८२ का ! भट्टारक श्री देवेन्द्रकीर्ति जी का सिष्य दयाराम लिखित । मिति वैशाख सुदो ३ दीतवार के दिन सपुरण करो। २४. त्रिभुवननी विनती। रचयिता श्री गगादास । भाषा हिन्दी गुजरातो। (पद्य)। पत्र संख्या २७ पद्य संख्या ६३ ६ पक्तियों का एक पद्य माना गया है। गहन मही मे मगलाचरण- गभीरार्णन, बिंदुना नभ तारा सख्या ! वृक्ष जे तृण ते पण लेख्या ॥ दारिद भजणा अकलदेव मिल ज्ञान पेख्या। सत्यवचन जिन स्वामिना, गणधर गुण भाख्या। करथा कविता घणा ए, ते मिइ किंपिन थाय। हित पर दिउ मुझ सारदा, थोडि बहु बोलाय ॥१॥ प्रशस्ति- महापुराण समुद्र थी, मइ कान्या मोती। खरा करो निकठ करी, मणि माला मोती। सूरत नगर सोहामणउ, वणिकोत्तम वास। नरसिंहपुरा न्यातिमा, जिन धर्म अभ्यास। परवत सुत कविता कहइ. गगादास गुणवत। भणइ भणावए पय करी, तेहन पुण्य महंत ॥ २॥ २५. त्रिलोक दर्पण। रचयिता कविवर श्री खड्गसेन । भापा हिन्दी पद्य । पत्र सख्या १५७. साइज १२४५ इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर ११ पंक्तिया तथा प्रति पक्ति मे ३१-३३ अक्षर। रचना सवत् १७१३. मंगलाचरण- ॐ नम सिद्ध नमू जिनराय, हुवा और होसी कर भाय । सावु सकल जे सम्यक् सार, सरस्वति आदि नमु सिरधार,।। प्रशस्ति तथा अन्तिम पाठ- यही लाभपुर नगर में, प्रावण परम सुजाण। सब मिलि करि चरचा करै, जाकी जो उनमान || - २१८ -१८ - 17 * प्रशस्ति-संग्रह * -प्रशस्ति-संग्रह । यवधि सी॥ सा की माल काबुलरीय नरिद समान सम, तहा बौठि यह कियो विनोद,.. बहण करि पूरब विधिविनोहरो यह कथा पद, धौर कठ, उघडे पलक तिमरे मिटि जाये, उखडलऊतिरम। सभा' मध्य वडा गुणव सर्भा सिंगार हार मुख स र... वाणी सुगत पति नहि होय सुर ता उप? अति गुणवत, तिन का नाम सुण"तुम पडित हीरानंद प्रवीण, मेघवी जग जीवन गुण खाण, रतनपाल ग्याता पंचत, अबराय अनूपम रूप, दामोदर दसण "गुण लीन, हीरोनद हिरदै. परगास, विपनदास qधि तीपण सरी, मोहनदास महा गुण लोन, कुंदन कनक नारायणदास, पाडें 'हिरदै पूजा करै, हृदय राम भी जग हितकार, ए संब' ग्याता अति गुणवंत, सव श्रावक अति ही गुणवन्त, तोन लोक का है यह मोद। रंचा मोल वापसी मुक्ति श्री लाव कठ। वैद तखापरभाय ॥ मिसर गिरधर जगत प्रमाण ग्रन्थ' बखाण सुरतवत ।। सुणत सबै रजै चित्तधार । अमृत वचन पावें सहु कोय ॥ अपणी बुधि अनुसार लहत । भूर पुण्य उपजेतही सीधा चौदह विद्या में लय तीन । सकले शास्त्र मय अरथे सुजाण ॥ हिरदै म्यान केली गुणवत। बाल पणौ जिम साहै भूप ।। माघोदीस. मधुरं प्रवीण। तिलोकचंद तहा ग्याने विलास ॥ प्रतापमल्ले पूरण मति'धरी। हसराज जि हिरदे 'प्रवीन ।। ग्यान केला आगम परवास। हिरदै हरेप सेव' चित्त धरै ।। सेवा करै सुजिन गुणधार । जिनगुणे सुणे महा विकसत ।। सुर्णे अन्य पावै 'विरतंत। - . । d, - - - T । A X x x x X X x साहि जहा सुलितान महान, छत्रपति सेवै तसु पाय, सवतसर विक्रमत्त आदि, चैत्रशुक्ल पचमी प्रमाण, २ फेरी चहु चक्क मे आन। चकत्ता चकवै सुभीहांन । सतरह से तैरहै सुखस्वाद। यह त्रिलोक' दरपण सुपुराण ।। x x X x x x वागड देश महा विसतारे, नारनोल तहां नगर निवास ।

(२२० + प्रशस्ति-संग्रह है . - प्रथम परम मंगल जिन चर्चनु, दुरित तुरित तजि भाजै हो। कोटि विधन नासन अरिनदन, लोक सिखरि सुख राजे हो। सुमिरि सरस्वति श्री जिनउद्भव, सिद्ध कवित सुभ बानी हो। गन गधर्व जत्थ मुनि इद्रनि , तोनि भुवन जन मानी हो। अतिम पाठ- ए त्रेपन विधि रहु क्रिया भवि पाप समूहनि चूरे हो । सोरह से पेसाठ समच्छर कातिग तीज अधियारी हो। भट्टारक जग भूषन चेला ब्रह्म गुलाल विचारी हो। ब्रह्म गुलाल विचारि वनाई गढ गोपाचल थाने । छत्रपती चहु चक्र विराजे साहि सलेम मुगलाने ॥ १ ॥ २७. पनक्रियाकोष । रचयिता श्री विशनसिह । भाषा हिन्दी पद्य । पत्र संख्या ७५. साइज १०४६ इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर १७ पक्तिया तथा प्रति पक्ति से ३५-४० अक्षर । २चना संवत् १७८४. लिपि सवत् १८२६. मगलाचरण समवसरण लछमी सहित, वर्धमान जिनराय। नमो विवुध बदित चरण, भविजन कू सुखदाय ॥ प्रशस्ति- - खडेलीवाल वंसविमाल नागरचालं देसथिय । रामापुरवास देवनिवासं धर्म प्रकास प्रगटकिय ॥ सगही कल्याणं सवगुणजाण गोत्र पाटणी सुजसलिय। पूजाजिनरायं श्रुतगुरूपाय नमै समति निज दानदिय ॥ १ ॥ तसु सुन दुय एवं गुरुमुखदेव लहुरो आणंदसिंघसुणौ । सुखदेव सुनंदन जिनपदवंदन थान मान किसनेस सुणौ ॥ किसन इह कीनी कथा नवीनी निजहित वीनी सुरपद की। सुखदायक्रियाभनि यह मनवचननि सुद्धपलें दुरगति पदकी ॥ २ ॥ माथुरराय वंसत को जानै सकल जिहान । तसु प्रधान सुत को तनुज किसनसिंघ मतिमान।। ३ ।। अडिल्लछदं क्षेत्रविपाकी कर्म उदै नब आईया, निजपुर तान के सांगानेरि वसाईया।

રિરર * प्रशस्ति-सग्रह जे नर नारी गावसे ए वीनती सुचंग । ते मन वंछित पावसे नित्य नित्य मंगल तरंग ।।३।। २६. दशलक्षणव्रतकथा । रचयिता ब्रह्म ज्ञानसागर । भाषा हिन्दी (पद्य)। पत्र संख्या ४. साइज १०९४॥ इश्च । पद्य सख्या ५५. लिपि सवत् १८३८. - मगलाचरण- प्रथम नमन जिन वरने करू सारदा गणधर पद अनुसरु । दश लक्षण व्रत कथा विचार, भाखु जिन अगम अनुसार ।। प्रशस्ति- भट्टाररु श्री भूषणधीर सकल शास्त्र पूरण गभीर । तसु पद प्रणमो बोले सार, ब्रह्म ज्ञान सागर सुविचार ॥ १ ॥ सवत् १८३८. श्रवाणमासे शुक्लपक्षे सप्तम्या पट्टणनगरे भट्टारक सुरेंद्रकीर्तिना लिखित । ३०. दिलारामविलास औरत्रात्मद्वादशी। रचयिता श्री दिलाराम । भाया हिन्दी पद्य । साइज Ex|| इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर १२ पंक्तिया तथा प्रति पक्ति मे २७-३० अक्षर । प्रति पूर्ण है। मगलाचरण- -- परम पुरुप परमात्मा परमेसुर परब्रह्म प्रभु सवै काल के सिध सहु जा प्रसाद जग विस्तरौ परम जोति परधान । पूजो परम पुरान ॥ १ ॥ नमौ सदा पद तास। यह दिलाराम विलास ॥ प्रशस्ति तथा अन्तिम पाठ- - राजवंशावलिवर्णन- ससि वंश चौहाण हाडा कहाये कीयो राज बूदी मवासेदहाये, भये भोज नामी बडे राव वंसो त रत्न साचे भये रतन असी। भये नाथ गौपी न टीके बिराजे भये छत्रसाले तिन्है राज साजे, लखै राजधानी सबै शत्रु कंप चहू चक के चकत्रै सास जपे। भये तास के देवता राव भाऊ सबै देस मैं दक्ष नीभौ पुजाऊँ, लहो भाग ते पाट अनुरुद्ध लाको वन्यो देश में राज आतंक ताको ।

(२२४ •५ प्रशस्ति-संग्रह * सहसकत समजिन पर भाषा कछु एक कवि कला मबै काल के सिघि महु जा प्रसाद जग विस्तरो धनि सम यो धनि वा घडी अनुभव करण सुर पूजिये बहूत गये मिथ्यात मों थानां सु दल वोनती पराक्रित गम नाहि । ची अथ या माहि ॥ नमो जौरि पद तास । यह दिलाराम विलास ।। धनि वा बार मिलाय। गोगि सधर्मी पाय॥ अजहू' नांहि अघाय। मेरो वेगि बलाई॥ ३१. धनपालरास । रचयिता ब्रह्म जिनदास । भाषा हिन्दी । पत्र ६ साइज ११॥ ५ इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर १२ पंक्तिया तथा प्रति पक्ति मे ३८-४२ अक्षर। मगलाचरण- वीर जिनवर २'नमु ते सार, तीर्थकर चोवीस मो। वंछित फन बहु दान दातार, सारद सामिण वीनवु।। अन्तिम पाठ तथा प्रशस्ति- श्री सकल कीरति गुरु प्रणमीन, श्रीभवन कीरति भवतार । दानतणा फल वरणव्या, ब्रह्म जिणदास कहें सार॥ १॥ पढे गुणे जो साभले, मनधरी निरमल भाऊ । मनछत फलरु वडा, लाभे शिवपुर ठा3 ॥२॥ इति श्री दानफलमहात्म्ये ब्रह्म जिणदासविचिते प्राकृतवधे धनपालघनमतीरास संपूर्ण । संवत १८२८ वर्षे श्रावण सुदी १ प्रतिपत्तियौ रविवासरे पाडे रूपचन्दजी तस्य वाचनार्थे । ३२. धर्मपरीक्षा। रचयिता श्री मनोहरदास। भापा हिन्दी पद्य । पत्र सख्या १२४. साइज १२४५।। इश्च । सम्पूर्ण पद्य सख्या ३०००. मगलाचरण- प्रणमुअरिहतंदेव गुरु निरपन्य दया धरम । भवदवि तारन एव अवर सफल मिथ्यात मणि ॥

[२२६ २२ प्रशस्ति-संग्रह * सदन सौ निसि अजोध्या को गमन कोनौं अजोध्या के सेठ उह उछिम करावे थो॥ अपनी बराबरि को करि नाना भांति सेती देकर बडाई निज थान को पठायौ थो। जैसे हम वासू साह राखे निज बांह देके कहै मनौहर हम पुनि जोग्य पायौ थौ।। ॥ दोहा ॥ सातौ पहुंचे शुभग गति बारो सुभग बजाई। विधी चद सुख भोगवे धर्म ध्यान चित्त लाई। हीरामणि उपदेश तैं भयौ शास्त्र शुभ सार । दुष्ट लोग को प्रति हंसे हरदै धरी विकार ।। ।। सवैया ॥ राउति सालवाहण आगरै! को बुधिवंत हिरदै सरल तिन ज्ञान रस पीयो है । जगदत्त मिश्र गौड हिसारको बासी शुभ विद्यावलि जगत मे सरजस लीयौ है। गेगुराज वाभण पंडित है नगर माहि जौतिया को पाठी सरस्वती वर दीयो है। इतने साई भये दोही जिनराज जू की तब मै विचार करि भापा बुधि कीयो है। ॥दोहा ।। दया सम ब्रह्मदालीया भयौ दूसरौ नाव । निरलोभी मन को सरल. दया धर्म शुभ गाव ।। सो भी हम प्रेरक भयौ दिन मे वारंवार । तब हम यह भापा करी लघु वुधि छारि विकार॥ ॥ छप्पय ॥ नगर धामपुर मांहि करी भाषा बुधि सारु धम परीक्षा मित्र अर्थि विजन परि वारु ।। ना कळू कीर्ति हेति न कुछ अरति धनु वचन जया जुक्त मडली रची पद २ रस चदन ।। पढे सुणे उपजे सुवुधि है कल्याण शुभ सुख धरण । मनरसि मनौहर इम कहै सकल संघ मगल करण । संवत् १८०२ वर्षे श्रावणमासे शुकलपक्षे तिथौ पूणिमा वार वृहस्पतिवार श्री सवाई जेपुरमध्ये ईश्वरीसिंह राज्ये श्री चन्द्रप्रभचैत्यालये भट्टारकजी महेन्द्रकीर्ति जी प्रवर्तमानेतत् समीपे पं० दयारामेण लिपिकतम् ।

[२२८ * प्रशस्ति-संग्रह ५ रसेण कुल सहर नगर सुभ थान मे, कुण भट्टारिक आमनाय ॥१॥ श्री काष्ठाये सघनायक गच्छराय, भट्टारिक भवि जण रंजण । श्री कुत्रर केवल दिणद, विद्या वचन .गुण वारिधि । रतन कीरति तस सीप सुजाण, दिली मंडलाचायें दीपता। आज्ञा कारी तस आचार्य जाणि, अचलकीरति अवगाह के धरम रासौ कीयो धरि सुभ ध्यान, अारमा पर उपगाहु ॥ पढत सुणत सुख सपदा होइ, सुरग मुकति सुख सास्वता ॥२॥ ३५. धर्मोपदेश श्रावकाचार । रचयिता श्री धर्मदास । माषा हिन्दी पद्य । पत्र संख्या ४६. साइज ६x४ इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर १३ पंक्तियां तथा प्रति पक्ति मे २८-३० अक्षर । रचना सवत् १५७८. प्रथम पृष्ठ नहीं है। विषय-आचार धर्म दूसरे पत्र का प्रारम्भिक पाठ-- पणवहु भविजन शोतलनाहु, शीतलगुन निज अधिक अगाहु । दह भेय जिन भास्यौ सव्व, बदहु ताहि सयल तजि गव्य ॥ प्रशस्ति- सुध असुध मात्र करि हीन, पद्रहसे अट्ठहत्तरि वरिसु, सवच्छरु कुसलह कन सरसु । निर्मल वैसाखी अपतोज, वुधवार गुनियहु जानीज ॥ ता दिन पूरो कियो यहु ग्रंथ, निर्मल धर्म भनौ जो पथ । मगल करु अरु विर्धान हरनु, परम सुख भवियन कहु करणु । अच्छाससवदछद करि हीन, किंचितु मात्र मै जुयहु कीन । सो मो मद बुधि जानेहु, तातें बहुजन पिमा करेहु। इहु प्रमाद ज्ञान मे कीन । सो सब समहुँ देवि सरसुती, जान ही मोहि वालक सममती। वारहसैनी उत्तम जाति, मुल सघ श्रावग विख्यात। जिनवर पय भत्तउ होरिल साहु, सो जु दान पूज को पवाहू । धर्म शीलवतु जानेह। त.सु पुत्र जेठो करमसी, जिनमति सुमति जासु मन वसी। दया आदि देवम हि लीन, परमविवेकी पाप विहीन । पदम नाम ताकै भो पूत, कवियन वैदरु कला सजूतु । अवरु बहुत गुन गहिर समान, महा सुमति अति चतुर सुजानु । तासु मन् सत्य जस गेह, [२३० * प्रशस्ति-सग्रह ५ जिन सासन दुर्लभ जानेहु, पायौ तो दूर करि मानेछ । जिन पूजहु जिनवर धुनहु, गुरु निनथ सत्ये करि मुनहु । जिन सिद्धात जु कह्यो विचार, सो पालहु त्रिभुवन महि सार । कहै धर्म कवि वेर जोडि, पडित जन मन लावहु खोडि । मति सारु हम कीनौ एहु, कपटु मुनि विमान दया करेहु । जह अट्ठ तह सुद्ध करहु, अपनी सजनत विस्तरहु। साधु नित नौ भाउ वह नित्त, पर उपगारु घरहिं ते चित्त । इति धर्मोपदेशश्रावकाचार पं० धर्मदास विरचित समाप्त । मिति मार्गशीर्ष शुक्लसप्तम्या तिथौ शनिवासरे समाप्तोऽय प्रयो। पं० शत्योदयेन मुनिना लिखितमिति । -- ३६. नयचक्र भापा भाषाकार श्री हेमराज । भापा हिन्दी गद्य । पत्र संख्या २४. माइज Ex४ इञ्च। रचना सबत् १७२६ विषय-नेगमादि सात नयो का वर्णन । - मगलाचरण- वदौ श्री जिनके वचन, स्यादवाद नय मूल । ताहि सुनत अनुभव तहीं, है मिथ्यात निरमल ॥ ता कारन नयचक्र की, सरल व नका कीन। अधिक हीन अवलोकि के, करहु सुद्ध परवीन ॥ अन्तिम पाठ प्रशस्ति- सिरीमाल गच्छ खरतर, जिनप्रभु सूरि सतानि । लवधी रग उनझाय मुनी, तिनके शिष्य सुजान। विवुध नारायण दास ने, यह अरज जो नयचक्र सटीक है, पढे सवे परवीन । तिने प्रसन्न के सही, भली भली यह बात। तब हमह उदगम कियो, रची वर्चानका भाव । हेमराज की वीनती, सुनियो सुकवि सुजान। यहु भाषा नय चक्रकी, रची सुवुधि उनमान। सत्रहसेर छवीस को, संवत् फागुण मास। उजल तिथ दप्तमी जहा, कीनो वचन विलास। इति श्री प० नारायनदासोपदेसेन साह हेमराज कृत नयचक्र को सामान्य वनिका समाप्त । हम कोना 7

-Ramdarmane
(२३२
* प्रशस्ति-संग्रह *
-
३८. नेमीश्वर चंद्रायण-
रचयिता श्री भट्टारक नरेन्द्रकीर्ति। भाषा हिन्दी पद्य । पत्र संख्या ८. साइज ६x४ इश्च । पद्य स
१०४। लिपि संवत् १६६० । विषय-ने मनाय का जीवन ।
मंगलाचरण-
परम चिदानंद मन्यधरी अनि प्रणमी श्री गुरु पाय ।
हरष णिदि सु स्तबु श्री नेमीश्वर जिनराय ।। १ ।।
प्रशस्ति-
महीयल महिमिमावत वखाणो, श्री मूजसघ गछपात जाणो।
विजय कीरति सुरि नमित नरेन्द्र, तत्पट्ट दायक श्री शुभचन्द्र ।।
तत्पट्ट पकंज सुर समान, सुमति कारति सुरी गुण निधान ।
ते चरण चित्त धरी रे विशाल, नरेंद्रकीत्ति कहि रे रसाल ॥
नरेंद्रकीरति पाठक कहि अनि नेमिचंद्रायणसार ।
भाव सहित भणिं सांभलि, ते पावे भव पार ।।
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संवत् १६६० वर्षे भादवा सुदी १ रवौ श्री मूलमंघे सरस्वती गच्छे बलात्कारगणे कुदकुदःचायान्वये
भट्टारक श्री वादिभूपणदेता तत्प? भट्टारक श्री राममोत्तिदेवा तत्पट्टे भट्टारक श्री पद्मनन्दि गुरुपदेशात् तत्
गुरु भ्राता मुनि श्री देवकीर्ति तत् शिष्य मुनि श्री कल्याण कीर्ति तत् शिष्य ब्रह्मसिहजी लिखित ।
-
३६. नेमीश्वर रास
रचयिता श्री ब्रह्मरायमल । भाषा हिन्दी पद्य । पत्र संख्या २२, साइज ७४६ इञ्च । सम्पूण पद्य
सख्या १२६. उक्त रचना गुटक मे है। गुटके के ११६ से १६० तक के पृष्ठो मे है। रचना सवत् १६१५,
लिपि सवत् १६८१.
मगलाचरण--
स्वामी हो नेमोसर जिननाथ, चरणं वर्दै धरि मस्तक हाथ ।
मन अरु वचन काया थुणो, सोभा जी सावला वर्ण सरीर ॥२॥
अन्तिम पाठ-
अहो: मूल सगि मुनि सरस्वति गच्छु,लोडि हो चार कपायनि निहि।
अन्तकोर्ति गुरु वदितै अहो तास तणों सस्ती कीयो वखाण ।
राइम ब्रह्म सो जाणिज्यो, स्वामी हो पारसनाथ के वानि ॥ १॥

२३४, * प्रशस्ति-संग्रह पदमनदि की बांनि गंभीर, ताको अर्थ लहै कोइ धीर । भाषा पढतै न है खेद, मूरख जन पुनि जानै भेद । सहर आगरो है सुख थान, परतपि दोसै स्वग विमा। धारौ वरन रहै सुख पाइ, तहा पहु शास्त्र रच्यो सुखदाइ। सवत् सतरासे वावीस, फागुण मासि सुविपक्ष जगीस । तिथि दशमी पुष्य मगलवार, ग्रन्थ समाप्त भयो जयकार। नवखंड मे है जाकी आन, तेजवत दोपै जिन भान । राज करै श्री अवरंग साहि; जाके नही किसी परवाहि। न भई भीति कछु ताके राज, धर्मी भविजन पढन के काजि । निजमति के अनुसारे यह, भाषा कीनी मन धरि के नेह । ॥छप्पय॥ पाठक अतिहि प्रवीन पुण्य हर्प गणि दीपै। आगम युगति अनेक भेद करि वादी जीप्पे । कीनी भाषा एह जगतराय जिहि विधि भापी। पडित महामति मत वीरदास जु है सापी। वा बहुविधि सकल पाप संताप हर। इहुं प्रय सतनि के सुनहु करौ वोनति जोरि कर ।। चौपई सुजान सिघ नदलाल सुनद, जगराय सुत है टेकचद। जौ लो सागर ससि दिनकार तो लौ अविचल ए परिवार ।। सोरठा अभय कुसल आनंद पदमनदि पचवीसि की। भाषा भई निरदद सुनियो भविजन सर्वदा।। इति श्री जगतराय विरचिताया पद्मनदिपचविशिफाया भापा समाप्ता सवत् १८११ वर्षे मिति ४१ पंचेन्द्रिय बोल रचयिता कवि घेल्ह । मापा हिन्दी। पत्र संख्या ७. साइज ७४७ इञ्च । पद्य संख्या ६. रचना संवत १५८५. लिपि सवत् १६८८. पाच इन्द्रियों की बात चीत । प्रशास्ति- कवि घेल्ह सुजन गुण ठावो, तो चेलि सरस गुण गाया, जगि प्रगट ठकुरसी नावों। चित चतुर मुरिख समझया ।

२३६] * प्रगस्ति-सग्रह १ आपुन जे सिवपुर गये, भव्यनि पथ दिखाइ ।। ४४. प्रद्य म्न प्रबंध। रचयिता भट्टारक श्री देवेन्द्रकात्ति । भाषा हिन्दी पद्य । पत्र संख्या ३७. साइज १०॥४४॥ इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर ११ पक्तिया तथा प्रति पक्ति मे ३८-४२ अक्षर। रचना सवत् १७२२. विषय-जीवन चरित्र। मगलाचरण- सकल भव्य सुख नेमि जिनेश्वर पाय । यदुकुल कमल दिवसपति प्रणमु तेह ना पाय ॥ १ ॥ प्रशस्ति- - श्री मूलसघ मुटमणि श्री सकल कीति गुरु पायो । भुवनकीर्ति तेइ निपाटि, बहु भूपति पूजित पायरे ।। १ ।। तास पटाबर दिनमणीह वा ज्ञान भूरण भवतार रे । विजयकीर्ति तस पटघारी, प्रगट्या पूरण सुखकार रे ।। २ ।। तेह यह कुमुद पूरण समी, शुभचन्द्र भवतार रे । न्याय प्रमाण प्रचड थी गुरुवादी जल दशमीर रे ॥ ३ ॥ तस पट्टोधर प्रगटीया श्री सुमतिकीर्ति जयकार रे। तस पट्ट धारक भट्टारक, गुणकीर्त्ति गुणगण धार रे ॥ ४ ॥ तेह तणि पारि प्रसिद्ध धणी श्रीयवादि भूषण सूरी सत रे । रामकीर्ति तेहनि पाटि, प्रगट्यो गुरु विद्यावत रे ।।५।। तस पट धारी पूरण मतो श्री पद्मनंदी सूरीस रे। विद्यावाद विनोदथी जेहिं नामि नरवर शीस रे ॥ ६ ॥ तस पट कमल कमन वधु, श्री देवेंद्रकोत्ति गच्छ ईशरे। प्रद्युमन प्रवध रच्यो तिणिं भवियण भणयो निश दिश रे ॥ ७॥ सबत् सत्तर बाबीसि सुदि चैत्र तोज बुधवार रे। महेश्वर माहि रचना रचि, रहि चंद्रनाथ गृहद्वार रे॥८॥ सूरत वासी सघपती क्षेजि सूरजि दातार रे । तेह आग्रह थी प्रद्यमन नो ए प्रवध रच्यो मनोहार रे ।।६।। ॥ दोहा ॥ मनोहार प्रवध ए गुथ्यो करि विवेक । प्रद्युमन गुण सूत्रिंकरी, सब वन कुसूम अनेक ।। १० ॥

२३८] * प्रशस्ति-सग्रह Dec जौ कहूँ मेरी चुक ह, वरण छद कौ देखि के, यहा मित्र हरिनामजी, ताकी सगति जो करी, लीज्यो सत! सुधारि। गुण औगुण' सुविचारि ॥ रही सदा सुखरूप। पायो काव्य सरूप ॥ सवैय्या- कोई देवी खेतपाल वीद्यासनिमांनत है, केई सती पित्र सीतला सो कहै मेरा है। कोई कहै सावलौ कवीर पद कोई गारो, केई दादू पी होय परे मोह घेरा है। कोई ख्वाजे परमान कोई पथी नानिग के. केई कहै महाबाहु महारुद्र चेग है। याही बारा पथ मे भमि रह्यौ सबै लोक, कहै जोघ अहो जिन तेरापथी तेरा हे। x x X x X X इति श्री प्रवचनसार सिद्धान्ते जोवराज गोदीका विचिते रवि वर्णन नाम द्वादश प्रभाव सवत् १८४६ का कार्तिक सुदी १२ शुक्रवार सवाई जयपुर मे लिख्यौ अमल महाराजाधिराज श्री सवा प्रतापसिंहजी का मे पुस्तक जोधराज गोदीका की है सवत् १७२६ को लिख्यौ तीसु लिखो पुस्तक जीवण राम गोधा रैणी का को। लिखत कन्दोराम बाकलीवाल सपतरामगोधा। । ४६. प्रवचनसार। भापा प्राकृत सस्कृत-हिन्दी(गद्य )। पत्र सख्या ४४ साइज १२४४|| इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर पक्तिय तथा प्रति पक्ति मे ३८-४२ अक्षर । लिपि सवत् १७२७. प्रस्तुत ग्रथ मे प्राकृत और सस्कृत मूल ही दिय हुआ है। हिन्दी मे प्रत्येक गाथा मे वर्णित विषय का सकेत दिया गया है। इसके अतिरिक्त हिन्दी म फुटर टीकाभी दी हुई है। भापा परिमार्जित है - भापाका प्रारम्भ- आगे श्री कुन्दकुन्दाचार्य प्रथम ही प्रारभ वि मगलाचरण निमित्त नमस्कार करें है। ... 1 आगे आत्मा के शुभ अशुभ शुद्ध असे तीन भावनि को ठीकता करें है। फुटकर टोका की भापा- स्निग्य रुक्ष गुणवियं अनन्त अश भेद है । एक परमाणु दूजे परमाणु सौं तव वधै जब दोइ अश अधिक स्निग्ध अथवा क्ष गुण का परिणाम होइ

२४०]
+ प्रशस्ति-संग्रह
सब श्रावक पूजे जिनधर्म, करें भक्ति पावै बहु शम्म।
कर्मक्षय पारणशुभहेत पाश्वनाथ चौपई समेत ।
पडित लाखो लाख समान
सेबो धर्म लहौ सुख थान ॥
भट्टाररु श्री देवेन्द्रकोत्ति जो का शिष्य पाडे दयाराम नरायणा का बासी जाति सोनी । भट्टारक श्री
महेन्द्रकीर्ति का राजपट विषै दिल्ली का जैसिहपुरा का देहुरा में पार्श्वनाथ चौपई लिखी।
४६. पार्श्वनाथपुराण ।
रचयिता श्री भूधरदाम । भाषा हिन्दी पद्य । पत्र सख्या ६१. साइज १०||४४।। इञ्च । रचना सवत्
१७८६. रचना प्रकाशित हो चुकी है।
मंगलाचरण-
मोह महातम दलिनदिन तरलक्ष्मी भरतार ।
ते पारस परमेस मुझ होहु सुमति दातार ।।
अन्तिम पाठ-
ମସ୍ତ
चरित्र मिस किमपि यह कोनो जिन गुन गान ।
श्री पारम परमेस को पूरन भयौ पुरान ।।
पूरव चरित विलोकि के भूधर बुधि समान |
प्रवध यह कियौ आगर थान ।।
भाषा वध
X
x
x
दोहा-
संबत सत्रेस समै और
निवासी नीन ।
सुदि अषाढ तिथ पचमी, ग्रंथ समापित कीन ।।
इति पाश्वनाथपुराण की भाषा सपूण । लिखावित साहजी श्री चैनरामजी ठोल्या सवाई माधोपुर
मध्ये । महाराजाधिराज श्री साई जगतसिंहजो विजयराज्ये लिपीकृत जतो अमरचन्द्रण वासी कोटा फा।
५०. पोसहरास ।
रचयिता भट्टारक श्री ज्ञानभूपण । भापा हिन्दी ( पद्य ) पद्य सख्या ११५
मंगलाचरण-
सरसति चरण युगल प्रणमी सहि गुरु आए ।
वार बरत महि साह वरत पोसहवरे काणू ॥ १ ॥
पाठमि चउदसि नीम सहित नित पोस लीजे।
उत्तम मध्यम अवम भेदि बिहु विधि जाणी जे ॥२॥

* प्रशस्ति-संग्रह * सी जानि एक ठौर भीनी सब भाषा जोरि ताको नाम धरयो यो बनारसी विलास है ।। दोहां ॥ सनहसे एकोत्तरे समै चैत सित पाख । दुआसौ पूरन भई इह बन रसी भाष ॥ १ ॥ सवत् १८२१ मिति फागुण सुदी ५ आदित्यवार लिखापित पडित जोधराज जी वृदावती मध्ये सहि शम्भूराम बाकलीवाल प्रांवाका लिपि कृतं । ५२. वाशिठिया चोलरो स्तवन । रचयिता मुनि श्री कान्तिसार। भाषा हिन्दी पद्य,। पत्र संख्या १४, साइज ८४३॥ इञ्च । प्रत्ये पृष्ठ पर ११ पक्तिया तथा प्रति पक्ति मे २६-३० अक्षर । रचना सवत् १७८३. विपय-सिद्धान्त मगलाचरण श्री गुरुवचनलही करी आगमें नै अणुसार। वोल वाशिठिया मार्गनों, द्वार तणो सुविचार ।। वाठि बोल कथा जिनै, धन ते जिन चौवीश । ते माह वाशिठिया बोलत वन पभणीश ॥ अन्तिम पाठ तथा प्रशस्ति- सवत् सतरै त्रयाशिया वरसै, नगर उदयपुर मांहि रे। नर नारि समझावण देते एह त वन करयो उचाहि रे। तपगच्छ माहि सुर शिरोमणि श्री विजयक्षमा सुहिरायो रे गुणवता जयवता वर तो जस अनैतेज जस वायो रे। कान्तिसागर पडित सुपसाया जसवत सागरराय रे। इम घुण्यो जिनवर सयल सुसकर तीर्थंकर चोवीस ए। वासिठ बोले अमिय तोले जे क्या जगदीस ए। जमवत सागर सुनस आगर, जिनेंद्रसागर शिष्य ए। नवनिधि होये सघ नै घर दिएं इम आसिश ए॥ इति श्री वाशिठियां योलरो स्तवन संपूर्ण । मुनि मोहनविजय वाचनार्थ।

[२४४ * प्रशस्ति-संग्रह * मगलाचरण- स्वामी चन्द्रप्रभ जिणनाथ, नौं चरणर्धार मस्तक हाथ । लछिन यण्यौ चद्र माता सु, काया उज्जन अधिक उजासु।। अन्तिम पाठ तथा प्रशस्ति- मुल सघ शारद शुभ गछि, छोडी चार कपाय निरभछि। अनत कीति मुनि गुणह निधान, ता सुत ने सिख कोयो बखाण । ब्रह्म रायनल थोडि बुधि, अखिरपद की न लदै सुधि । जेमी मति दीने औकास, व्रत पचमी को कोयौ परकाश ।। केवल पाइ तहिने फुरै। जो इह कथा सुणे दे कान, काल लहिविपहुचै निरवान । सोलह से तेंतोसा सार, कातिग सुदी चौदसि सनिवार । स्वाति नक्षत्र सिद्धि शुभजोग, पंडा ख न व्याप रोग ।। देस द ढाहड सोभा घणी, पुर्ज तहा बाल मण तणी। निमल तले नदी बहु फिर, सुख स वमै बहु सांगानेर । चहु दिशि बाण्या भला बजार, भरे पटोला मोनी हार । भवन उत्तुग जिनेश्वर तणा, सोभे चदवा तोरण घणा। राजा राजे भाव तदास, गजकवर सेव' बहु तास । परजा लोग सुखी सुख बस, दुखी दलिद्री पुरवै आस। श्रावक लोग बसै धनवत, पुजा करहि जयहि अरहंत। उपराउ परी वैरन कास, जिह अहिमिद सुगे सुख वास ।। मगन श्री मगल अनतकीर्ति मुणिंद। मंगल पढइ कई बखाण, मगल ब्रह्म राइमल सुजाण ।। दूसरी प्रति का भिन्न पाठ- अक्षिर मात जु भूतौ होय, पडित जन सहु खमिज्यो माहि। अति प्रयाण मति थोडी भई, फया पचमी व्रत की कही। बारबार नवि भणे पसार, जामें जीव दया व्रतसार । जो नर जीव दया को पाल, रोग मोगान व्याप काल ॥ संवत १६६० वर्षे भादवा बुढी १ शुक्रवारे पोथी लिखी सा० जता पाटणी दानुकाकी लिखी आगरा मध्ये साहिमी जहा की हवेला श्री जलाखाकोरची की मध्ये वास जैता पाटणी । अरहत जिणि, * प्रशस्ति-संग्रह . खडेलवाल वर वंस मैं गोत विलाला जग विदित। अनोदक कारत पायकै बसै भरतपुर में सुखित ॥ नंदन सोमाचन्द को नथमल निपट अयान। छदं कोस पिंगल तनों ग्यान अस नहिं जान॥ अन्नोदक के जोग ते सो हीरापुर आय। सुख सौ तह निर्वसत भयो कछु इक काल गाय ॥ तही मिल्यों कौरन भलो पुन्य तर्ने परभाय मगर करौली सौं जहां पंडित लाल सु आय॥ सकल कला में निपुन प्रति कविता करत असेंस। नथमल के ऊपर सदा करत सनेह विशेष ॥ भगतामर जी की कथा तिन जिन भवन मझार। बाची तक सुनि के भयो मो मन हरप अपार ।। सुनि नथमल बचन कौं उर में कियो विचार। मूल प्रथ अति कठिन है पंडित कर उचार॥ लालचन्द सौ तक कही नथमन हर्षित होये। जौ याकी भाषा बनै तो समझे सब कोय।। जो लग रचिये छद को अर्थ वरन सुविचार । जो लौहे सुभ ध्यान की प्रापति सुख दातार ॥ निज पर हेत विचार नथमल लाल विशेष । दोऊ मिलि भाषा रची रायमल्ल कृत देख ।। सवत अधदश संत जना तापै पुनि उनतीस प्रवान । जेठ सुकल दशमी बुधवार पूरन कथा करी सुखकार ।। परमदेव इस जगत मे श्रादि रिपम अवतार। जवंतो परतौं सदा अवजल तारनहार॥ भवजलतारनहार कर्मभूविवि दरसाई! दयासिंधु जग तात सम्ल जीवन सुखदाई ।। सुखदाई संसार में कधिन एक जिन को धरम। नयमन साल सुन मात हे देहु भगति अपनी परम ।। इति भी भक्तामरस्तोत्र ऋद्विमत्र कायछंद कथा सपूर्ण। मिति माह सुदी १४ शुक्रवार सवत् १:५३ का परी लिखो करोतीदास !

* प्रशस्ति-सग्रह * रावल मालि सुपाट धरि, विरचिएह सिणगारसि, कुवर श्री हरिराज। तास कतुहल काज। ५८, मिथ्या दुकड। रचयिता ब्रह्म श्री जिनदाम । भाषा हिन्दी । पद्य संख्या २३. लिपि सवत् १७६२. मगलाचरण- - अादि जिणेसर भुवि परमेसर सयल दुख विणासणो। मुवि कमन दिणेसर मोह तिमर हर तत्त्व पदारय भासणो॥१॥ हूँ विनती करु हवे आपणोय । तू त्रिभूवन स्वामी सुणि धणीय ।। जे पाप करया ते कहूँ अनुझ । ते मिथ्या टुकड होउ नमझ ।। २ ।। अन्तिम पाठ- जिनवर स्वामी मुगति हिं गामी सिद्धि नयर मडणो। भव बधण खीणो समर सलीणो, ब्रह्म जिनदास पाय बंदणो॥१॥ ५६. यशोधर परित्र। रचयिता ब्रह्म श्री जिनदास । भापागुजराती मिश्रित हिन्दी (५५) पत्र संख्या २५. साइज १०||४| इश्च । प्रत्येक पृष्ठ पर १२ पक्तिया तथा प्रति पक्ति मे ३६-४० अक्षर। लिपि संवत् १८२६. पडित रूपचद के पढने के लिये ग्रन्थ की प्रतिलिपि की गयी। मगलाचरण- अन्तिम पाठ- मुनिसुव्रत निन मुनिसुव्रत जी नतवु ते सार । तीथकर जे वीसमु वाछित बहु दान दातार ।। सारदा स्वामिणि वलीस्तवु, जिमिबुद्धि सार हु वेगी मागु। गणधर स्वामिनमस्करू , वली सालकीरति गुरु भवतार ।। तास चरण प्रणमीनें, करें सुरासुर सार ।। राय यसोधर २ तणु जे रास जीवदयानु पीहर । पाप मिथ्यात निकदसार, रागमोह विहडणु ॥ गुणहतणु भडार सुरिणइ, जेनर अनुदिन भणे हिय में धरी बहुभाव, ब्रह्म जिणदास इम परिभणं तेहनें शिवपुरे हाम॥

२५० २ प्रशस्ति-संग्रह 7 दिल्ली सहिर वि भलो जेसिहपुर जानु घम सथान समांनया अनि थानन मानू॥ सुन्दर नद खुस्यालए रचना ठहरानी। भव्य धगै निज चित्त में, भगवन की वांनी॥ संवत सतरासै भले अरु और इक्यांसी। जे पढिसी सुणिसी सदा, ते ही सुख पासी॥ कातिक पष्टो भावती, ससि के उजियारै। भव्य जीव सुणि जे पर्छ, वे ही विसतारै।। जैन धर्म परभाव सौ सबही सुख होई। तातै धम सुधारिहै, तौ ता सम कोई॥ अथ शुभ सवत्सरेस्मिन् श्रीमन्नृपति विक्रमादित्यराज्यात् सवत् १८०१ का वर्षे शाके १६६४ प्रवर्स- माने कार्तिक मासे कृष्णपक्षे नवम्या वृहस्पतिवासरे असलेखा नक्षत्रे जिहानाबादस्थ जेसिहपुरामध्ये श्री महावीर चैत्यालये पातिसाह श्री महम्मदसाह विजयछत्रे महाराजाधिराज श्री सवाई ईसरीसिंहजी राज्ये श्री मूलसघे नंद्याम्नाये वलात्कारगणे सरस्वती गच्छे कुदकुदाचार्यान्वये भट्टारक जी श्री १०८ श्री देवेन्द्रकीतिजा तत्सट्ट' भट्टारक श्री १०८ श्री महेंद्रकीर्तिजी तदाम्नाये प्राचार्यजी श्री नेमीचन्द्र तत् शिष्य पडित श्री रूपचदजी तत् शिष्य पडित दयारामेण इद पुस्तक हस्तेन लिखित । ६१, यशोघर चौपई बंध कथा । मूलका कायस्थ श्री पद्मनाभ । भाषाकर्ता साह लोहट । भाषा हिन्दी पद्य । पत्र संख्या १३३. साइज Ex५ इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर १० पक्तिया तथा प्रति पंक्ति मे २३-२६ अक्षर। रचना सवत १७२१ लिपि सवत् १८०३ मगलाचरण- - तीर्थकर जिन वींसमौ मन मनसुव्रत बंदि । ता समया की या कथा हिरदें धरि पानद ।। प्रशस्ति- बाव नवर खेराडे महंत, तामै गत बुंदी सुभ थान, महाराज राजा सिरताज, राव रतन गुन रतन समान, हांडाती वर देस कहत। इंद्रपुरी सम सोभे भान ।। 'पतिसाही वामनदधिपाज। सुरभान ।

[२५२ * प्रशस्ति-संग्रह धौलहर घाम घर घर मे विचित्र वाम, नर कामदेव केसे सेव सुखसर मै ।। वापी बाग वारुण बजार वीथी, विद्या वेद विवुध विनोद । वानी वोले मुखि नरमै, तहा करै राज राव भावस्थघ महाराज ॥ हिंदु धर्म लाज पाति सही आज कर मै ।। १३ ।। ।। चौपई ॥ श्रावक लोग वसै धर्म वत पुजाकर जप अरिहत । तिनको सनक लोहट साह, करो चौपई धरी सुभ लाह । वस वषेर वाल भोवाल, दुगैरथा बरगो भचि साल । धरम धुरंधर धरमौ धीर, ता सुत तीन महा वरवीर। हीरो सुन्दर बड़े सुजान, लघु लोहट बुधि कौनिधान । श्री जिनदेव सगुरको दास, कीनौ भाषा अन्य प्रकास। लघु दारघ गण अगण विचार मात छद विस्तार । सब्द शास्त्र को लझौ न भेद, तातै बुधि मति करो न खेद । x X x x वरषा रिति आगम सुभ सार, मास असाढ तीज गुरवार । पाख उजाल पुरी भई सरल, अरय भाषा निरमई ।। सवत सत्रास इकईस करी चोपई फली जगीस। मन अभिलाप सपूरन भए, जिन गुरु चग्न सीस धरि लए। इति श्री राव जसोधर को चउपई वध कथा सपूर्ण । प्रन्थ कर्ता श्री पद्मनाभ दतनुसारेण साह लोहट दुगरयौ गोने धर्मा सुत बघेरवाल वासिगढ दो राजराव श्री भावसिंहजी विजयराज्ये । ६२. योगीरासो। र यता पाडे श्री जिनदास । भाषा (प)! पत्र सख्या २. साइन xx|| इञ्च | पृष्ठ पर १२ पक्तिया तवा प्रति पक्ति मे ४६-५० अक्षर । मंगलाचरण- आदि पुत्प जो श्रादि जु गौतम आदि जती आदिनायो । तास परपरहुवा मुनिवर दिर्गवर सहताणी कुदकुदाचारिजगुरुमेगा ॥१

(२५४
* प्रशस्ति-संग्रह में
इति रत्नपाल श्रेष्टिनो रास सपूर्णम् । संवत् १८२३ वर्षे पोष बुदि १३ सोमवारे श्री
मूलस
सरस्वति गच्छे बलात्कारगणे कुदकुदाचार्यान्वये श्री सुरतवदिरे आदीश्वरचैत्यालये भट्टारक श्री विद्यानदंज
तत्पट्टे भट्टारफ जी श्री १०८ देवेन्द्रकीर्ति जी लिखापितं ।
६४. राजुल पच्चीसी।
रचयिता लालचन्द विनोदीलाल। भाषा हिन्दी ( पद्य)। पत्र संख्या ४. साइज ६x४ इञ्च । पर
सख्या २५
मगलाचरण---
प्रथमहि सुसरु जादौराय, पुनि सारद हि मनावस्यौ जीव वे।
वंदौ अपने गुरु के पाय, राजमती गुण गायस्यो जीव वे ॥१॥
अन्तिम पाठ-
इह लालचन्द विनोद गावे, सुनत सब जन गह वरौ।
राजुल पति श्री नेमि जिन सब संव को मगल करौ॥
६५. रात्रिभोजनकथा।
रचयिता ब्रह्म श्री वीर भाषा हिन्दी । पन सख्या ५, पद्य सख्या १५
मंगलाचरण-
श्री गुरुभक्ति करो मन लाय, वचन सुणी मन उलटो थाय।
रात्रि भोजन कहुं निहाल, साभल ज्यो सहुँ बाल गोपाल
अन्तिम पाठ-
भोला काई भ्रमे पडो जीत्यो जू उ महार।
रात्री भोजन परहरो जेम पावो भवपार ॥ १॥
मूल सघ महल मणी सरस्वती गच्छे राय।
भट्टारक शुभचन्द्र शिष्य ब्रह्म वीरजी गुणगाय ॥२॥
६६, रात्रिभोजनकया।
रचयिता श्री कि 'नसिंह। भाषा हिन्दी ( पद्य) पत्र संख्या २६. साइज ६४४ इन्च । पर्य
सल्या४१५
॥
मगलाचरण-
समोसरण सोमा सहित जगतपूज्य जिनराज।
नौ त्रिविय भवधिनको तरण विकट जिहाज ॥१॥

[२५६ * प्रस्ति-सग्रह * - सुनि के दोलति वेल सुवेन, मन धरि गायो मारग जैन नदौ विरधौ जिन मतसार, सुखपावो घउ संघ अपार । दौलति वेल नहो निज बोध, होहु होहु सब को प्रतिवोध । सवत् १८०८ कार्तिक मासे शुक्लपक्षे तियो १४ भौमवासरे उदयपुर मध्ये सेवकालुवालालजी सुख जी की बहु वाई मोठी तथा राजवाई ने लिखा ६८. व्रतकथाकोष। रचयिता श्री खुशालचन्द काला । भाषा हिन्दी पद्य । पत्र संख्या ११४ साइज १२४५ इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर ११ पक्तिया तथा प्रति पक्ति मे ३४-३८ अक्षर । रचना सवत् १७८७. लिप सवत् १८२०, मगलाचरण- सिद्धारथ नृप प्रशस्ति- आदिनाथ यदू जिनराय, कर्मकलक रहित सुकधाय। १॥ धनुष पच जाकी काय, वृष लक्षण सोभे अधिकाम । बर्द्धमान बंदौ जिनदेव, प्रियकारिणी मात सुत एव ।।२॥ सप्त हस्त तन हेम समान, को सुत जान ।।२॥ ॥ दोहा ॥ दक्षिण दिसि की कूट मे जो सु कयौ आवास । तिस मदिर मांही रहै पंडित लिखमीदास ॥१॥ ॥ सवैया ॥ देव इन्द्र कीरति भयेजु मूलस्यंघ भट्टारक को पदम्य जाको सोहितु है। पूजारु प्रतिष्ठा करवाई भतिसर्मकार मोहनी सुमूरति लखेत मोहितु है । जाही के सुगच्छ माहि पढिनश्रीय जु दास बानी कामधेनु त सुग्यान दोहि इतु है। खिमावान ग्यानवान पडित विवेकवान राति घोस अागम विचार टोहि इतु है ॥२॥ x x x x x असे लिखमीदाम ढिग मैं कुछ पन्यो सुग्यान । पठन कीयो मो वुध्य नौं वै तो ग्यान निवान ।। तिनिहीं के उपदेम ते भाषा सार बनाम । श्रुत सागर ब्रह्मचार को सुभ अनुसार सुनाय ।। ॥ चौपई ॥ सांगानेर की इकवार, मैं आयो दिल्ली सुममारि । श्री जिनराज तणीं बरसक, करिहूँ सुखदा मनवच एव ।।

[२५८ * प्रशस्ति-संग्रह बलात्कारगणे सरस्वती गच्छे भट्टारक श्री चन्द्रकीर्ति आम्नाये खण्डेलवालान्वये शेरपुरा को श्राविका लिख मुक्तावली व्रतोद्यापनार्थ उपदेश बाई धनाई। लिखत पाडे कैसोसाह मान्या सुत सगही पूरा सगुणदत्त देहुर। को पाडे लिखी। ७१ समयसार नाटक । रचयिता महाकवि बनारसीदास । भाषा हिन्दी पद्य । पत्र संख्या ११८. साइज १०४५६ इञ्च । रचना सवत् १६६३. प्रशस्ति- नाटक भापा भयो सु असे। अमृतचन्द्र टीका के करता। टीका सहित संसकृत बानी । अलपमती को अरथन सूझै। समैसार नाटक के मर्मी। यालाबोध सुगमकरिदीनी। समै पाइ अध्यातम सैली घर घर नाटक कथा वखानी। कारन पाइ भये बहु ज्ञाता। निसिदिन ग्यान कथा रस भीने । अव यह बात कही है जैसे, कुदकुद मुनिमूल उथरता, समैसार नाटक सुखदानो, पडित पढे मुढमति बुझे, पाडे राजमल्लजिनधर्मी, तिह्री गरंथ की टीका कीनी, इहि विधि बोध वचनिमा फैली, प्रगटी जगत माहि जिनवानी, नगर आगरे माहि विख्याता, पच पुरुप अति निपुन प्रवीने, ।। दोहा ।। रूपचद पडित प्रथम, तृतीय भगौतीदास नर, घरमदास ए पच जन, परमारय चरचा क्रै, कयहाँ नाटक रस सुनहि. कवहीं विग बनाई के, वास हमारा टोडो जानि, फर जिहानाबाद मनारि, महावीर को मन्दिर जहा, चित की रागरु घरम धरु, यतुर भाव विरता भए, दुतीय चतुर्भुज जान। कौरपाल गुणधाम ॥ मिलि बैठहि इक ठोर। इन्हीं के कथन न और ।। कवहाँ और सिवत। कहै वोव वितत ॥ सागनेरि बसे पुनि आनि। आप रदै जैस्यंध पुरिसार ।। सकल पच जन आवे तहा। सुमति भगौती पास रूपचद परगास ।।

[२६०
प्रशस्ति-सग्रह ५
॥ दोहा ॥
समैसार आतम दरव,
नाटक भान अनत।
सोह आगम नाम मैं,
परमारथ विरतत ॥
इति परमागम समयसारनाटक नाम सिद्वात पूर्णम् ।
७२. समयसारनाटक भोषा।
भापाकार श्री रूपचद । भाषा हिन्दी गद्य। पत्र संख्या १३७. साइज १२॥४५॥ इञ्च । पद्य संख्या
७२४. महाकवि बनारसीदास द्वारा रचित समयमार नाटक के पद्यों का गद्य मे अर्थ लिखा गया है।
रचना सवत् १७००.
मगलाचरण-
श्री जिन वचन समुद्र को,
रूपचन्द नौहु लखै,
को लग होय वखान।
अपनी मति अनुमान ॥
प्रशस्ति-
भासू मास आदि
मैं
मे
पृथ्वीपति विक्रम के राज मरजाद लीन्हे,
सत्रहसै वीते परिठानु श्राव रस मै।
घौंसु सपूरन अन्यकन्ही,
वारतिक करिकै उदारससिमै ।
जो पं यहु भाषा अन्य सबद सुबोध या को,
ठोह विनु सप्रदाय नावै तत्व वस
यात ग्यान लाम जाति सबनि को बैन मानि,
बात रूप ग्रन्थ लिख्ये महा शात रस
॥ १॥
खरतर गच्छनार्य विद्यमान भट्टारक,
जिनभक्ति सूरि जू के धर्मराज धुर में
समसाखमाडि जिनहर्ष
जू
वैसगी,
कवि शिष्य सुम्बबद्ध शिरोमनि सधम मैं।
ताके शिष्य दयासिव गणी गुणवत,
मेरे परम पाचारिज विल्यात अत धर मे।
ताको परमाद पाइ रूपचद यानद सौं,
पुस्तक बनायो यह सोणगिरि पुर में॥२॥

{२६२ * प्रशस्ति-संग्रह * ... मा १ सागानेर सुथान मे देश दुढाहडि. सार। ता सम नहि कौ और पुर, देखे सहर हजार ।। अमर पुत जिनवर भगत, जोधराज कवि नाम । वासी सागानेर को करी कथा सुखधाम ॥ धर्मदास को पूत लघु जाति लुहाड्यौ जोय। नाम कल्याण सु जानिये कवि को मामौ सोय॥ ताके पढिवे कारने, कियो अन्य यह जोध। नाम समकित कौमुदी, दायक केवल बोधता इहै सकित कौमुदी जो नर पढे- सुभाय- सो सुर नर सुख पाय अनोकरमि सिव जाय ।। ॥ चौपई ॥ सवत सत्रासै चौवीस फागुन बुदि तेरस शुभ दोस। सुकरवार सो पूरन भई इहै कथा समकित गुन ठई ॥ ॥ दोहा ।। ग्यारासे अठहत्तरि इदै छद चौपई जान । कयौ कौमुदी ग्रंथ को जोध सुमति अनुमान ॥ महाराम के हेतो सौ राखे अपने पास। काम खजाना को दयौ नथमल कौं सुखरास ।। पुनि भापा रचना विष धारयो मैं उपयोग। पै सहाय विन होय नहीं, तवहि मिल्यो इक जोग। कारन विन शुभकाज की सिद्ध न होय लगाया तातै सो कारन सुनौ, वुध जन सुख करनार । . - -- -- ॥ चौपई॥ श्री सुखराम सकल गुन खान, बीजामत सु गछ नभ भान । यसवा नौम नगर सुखधाम, मूलवास जानौ अभिराम ।। अनोदक के लोग साया वसुवा तजें भरतपुर आय। जिनन्दिर मे कियो निवास, मूलबास जानौं अभिराम ।।

(२६४ * प्रशस्ति-संग्रह ७५. सिद्धान्तसारदीपक। रचयिता श्री नवमान विलाला । भाषा हिन्दी (पद्य ) पत्र संख्या १६६ साइज १२४६ इञ्च । प्रत्येक पृष्ठ पर १७ पक्तिया तथा प्रति पक्ति मे ३८-४२ अक्षर । भट्टारक सफलकीर्ति की सिद्धान्तसार नामक रचना के आधार पर भापा लिखी गयी है। सर्वदर्शी सर्वज्ञ महत सफल अर्थ दीपक श्रीमंत । गणधर पद वदित जगनाथ, वदौ चरण जोरि जुग हाथ ।।१।। . अन्तिमपाठ तथा प्रशस्ति- जिहिं विधि भाषा ग्रंथ यह, भयो परम हितकार । सो वरतन बुधजन सुनो, करि निज चित्त इक ठार ॥१॥ || चापई॥ नगर भागरो परमपुनोत, साधर्मीजन वसै विनीता जहां जेठमल साह सुजान, गुन गन मंडित परम निधान ।। ताके तनुज दोय गुनवान, निजकुल कमल प्रकाशन भान । जेठो सोभा चंद उदार, लघु सुत गोकुलचद विचार ।। वस खण्डेवाल अवदात, गोत विलाला जग विख्यात । अन्नोदक को कारण पाय, वसे भरतपुर माही आय। ॥ दोहा ।। नदन सोमाचंद को, नयमल निपट अयान। छद कोस पिंगल तो ज्ञान अस नहीं जान ।। 1| चौपई॥ सगही चादूबाड प्रसिद्धि, केमोदास चरत बहु रिद्वि मयाराम ताको सुत सही, पोतदार जानै सब मही। मोदी.... 'महाराज जाकों सनमान दोहनौ, फतेचद पृथ्वीराज पुत्र वनमाल के। फतेचद जूके पुत्र जसरूप जगन्नाथ, गौतमानधर में धरैयामुभवाल के । जगन्नाद जू के बुमिनके हेतु, हम व्यौरी के मुगम कीन्हे वचन दयाल के । मैं - (૨૬૬ * प्रशस्ति-सुग्रह सवत् १८६० आसोजमासे कृष्णपक्षे तिथी १३ मंगलवासरे जिख्यत महात्मा गुमानी नासरोदा मध्ये ७६. सिन्दूर प्रकरण । रचयिता कौरपाल बनारसीदास । भाषा हिन्दो पद्य । पत्र संख्या १२. साइज ६५४ इश्च । पद्य स १०४. रचना सवत १६६१. मगलाचरण- सोभित तप गजराज सीस सिन्दूर पूर छवि, विविध दिवस आरम्भकरन कारन उद्योत रवि मगल तरु पल्लव कपाय कंभार हुतासन बहुगुन रत्ननिधान मुक्ति कमला कमलासन इहि विधि उपमा सहित अरुन वरन सताप हर । जिनराय पाय नपजोतिभर नमत वनारसी जोरिकर ॥ प्रशस्ति- - कौरपाल बनारसी मित्र युगल इक चित्त । तिन गरथ भापा कियौ बहुविध छंद कविता ॥ नाम सुक्ति मुक्तावली द्वाविंशति अधिकार । शत शिलोक परवान सक, इति गरंथ विस्तार ॥ सोलासे ईक्यान स्तुि ग्रीपम वैशाख । सोमवार एकादशी र नक्षत्र मित पाप ।। त 7 ७७. मोताचरित्र। रचयिता कविवर रायचंद । भाषा हिन्दी पद्य । पत्र संख्या १४४. साइज १२४५।। इश्च । प्रत्येक पृ पर ११ पतिया तथा प्रति पक्ति मे ३०-३३ अक्षर । रघुना सवत् १५१३. लिपि सत्रत् १६१६. प्रति पूर्ण है। मगलाचरण- प्रणमौ परम पुनीत नर लोकालोक प्रकास तस वर्षमान जिनदेव। करें समकिती सेव ।। १ ।। प्रशस्ति- कियो ग्रन्ध रविपेण ने रघु पुराण लिय जांच! वहे अरब ईप में कयौ रायद उर आण ॥

[२६८ * प्रशस्ति-संग्रह -- -- ។ वादोचन्द्र वाद बहु जीत्या घट सरती गुणमाल जी। महीचन्द्र मुनि जन मन मोहन, वाणी जेह वीस्तार जी। परवादी नामा नमु काव्या गर्नन करो भगार जी। मेरुचन्द्र तस पटे सोहे, मोहे भवीयण मन्न जी। व्यास्याय वाणी अमीयसमाणी, साभलोए के मन जी॥ गोर महीचन्द्र मोप जयसागर, रच्यो सीता हरण नो रास जी। नरनारि जे भण छे सूण छे तस घरे जय जय कार जी। हूंबड वसी रामां संतोपी. रामादे तेह नो नार जी। तेह तणो पूत्र से तस घरे जय जय कार जी। तेह तणे आदे सासी हरणे, कीघु मन उलास जो। साभल भांगा ता सूख हो सी, सीता सील विलास जी। संवत सतरवत्रीसावरसे वैसाख सुदी वीज सार जी। बूधवारे परिपूर्ण ज चरयु, सूर तनय रयमार जी ।। आदी जिणेसर तणे प्रसादी पद्मावती पसाय जी। साभलता गातां ए सहून, मन मां आनद थाये जी।। महापुराण तणे अणुसारी, की से मनोहार जी। कवि जिन दोप में देसो कोई, सोषजो तमे सूखकार जी ।। मुझ आलसूने उजय घढयु, सारदा ए मती दाध जी। तेह प्रसादे अन्य ए कीपो, स्यामदासे जसलो जी॥ सीता सील तणो ए महीना, गाउ सह नरनार जी। भावधार जे गाए महीना, तस घर मगल च्यार जी।। ॥ दोहा ।। भावधार जे भणे सूणे सीता सीलविलास । जयसागर रई उचरे यह चेतस मन नी आस ।। इति भट्टारक महीचन्द्र शिष्य ब्रझ जयसागर विरचिते सीता हरणाख्याने श्री रामचन्द्र मुक्तिगमन- बबन नाम पष्टमोऽधिकार समाप्त । संवत १६२५ वर्षे पोपवुदो २ शुक्रवासरे गाम श्री देवदनगरे पद्मप्रभचैत्यालये श्री मुलसचे सर- मतीगच्छे बलात्कारगणे श्री कुदकुदाचार्यान्वये भट्टारक श्री रत्नचन्दजी तपट्टे भट्टारक श्री देवचन्द्रजी तपट्टे महारक श्री धर्मचन्द्रजी तत् शिष्य नाम गोलजी तल्लघु नाता ब्रह्ममेघजी लिखित स्वहस्त ।

રિહo प्रगस्ति-संग्रह श्री पदमनन्दि पाट हुवा भुवनकोत्ति तपमूर्ति श्री विनय कीर्ति पाटि उपज्या भव्य कुमुदचंद्रजसो आम्नाय गुरु श्री शुभचद्रती अध्यात्म गुरुकर्मसी ब्रह्म, अवर शास्त्र कवित गुरु, जेण धर्म उपदेश दियो ते सहु गुरु हुवा मुमतणां, गुरु गुण नविलोपिये, सुम हृदय पदम माहि, मोह तिमर दूरै हरी, सामंतभद्रसूरी कृत, आसाघर पंडित कृत, सकलकीर्ति भव तारतो. श्री ज्ञानभूपण ज्ञान घारतो। भट्टारक श्री शुभचद्रतो॥ कुवादी गजमृगेंद्रतो। आगम गुरु मुनिचद्र तो। शिष्य गुरु हीर ब्रह्मिद्रतो।। ब्रह्मचारी श्री जिणदास तो। शास्त्र श्लोक पट भापती॥ कर जोडि करू प्रणाम तो। गुरु लोपी पापी नाम तो गुरु भानु वाणी किरण तो। गुरु तारण तरण तो॥ वसुनन्दि श्रावकाचारतो सकल कीरति कृत सारतो।। ते x x वानवार देश सोहामणि, हाट हार मदिर मालीया, श्री आदिनाय तीरथ तणों, समोसरण कल्याण वय आदि, शाकपुर नयर ममारि तो। प्रजा वासि वर्ण च्यारतो।। सोहै जिन प्रासाद तो। जिनविय करि आह्लादतो ।। X X x x x x X ओपनक्रिया रास जेणे कायो, जेणे कीयो ध्यानामृत रासतो। श्री महावीर रास कोयो, तेणि कीयो एह भासतो , कर जोडि पद मों कहै, श्रावका चार कीयो रासतो। निज बुद्धि ने अनुसार, साह्यकारी मित्र जिणदास तो।। x सवत संख्या जिन भावना, संवच्छर सख्या प्रमाद तो। मास माहि सुहामणों, भादवा सुदि मर्याद तो॥ तिन सरया चारित्र भेदो, रस संख्या शुभ वारतो। शुभ नक्षत्र शुभ योनि, कीयो में श्रावका वार तो।। x प्रावकाचार तयो धावसाचार तो रास कियों मैं एणा- x K X X [२७२ * प्रशस्ति-सग्रह है बदौ गुरु कोयौ चौपई बध प्रवान। फेरि सवारौ गुणियन बीन ॥ बुधिजन मोहि देहु मति खोरि । जापमाय नासै अध कर्म जिनके होय ग्यान को जाते सुमति होय अतिघनी। नवरस महिमा उतिन कर्न । चदौ धर्म बुद्धि वर नाम । पूर) ....... तासु महिन बुद्धि नहि आन, होय अशुद्ध जहाँ पदहीन, वार वार जौं करि जोर, वदौ जिन सासन को धम्म, जे गुण के मूर, वौ माता सीह वाहिनी, वदौ मुनियन जे गुन धम्म, चंदौ सज्जन कुल सुख धाम, महिमा सागर महा सुजान, जाकै हृदें दया को वास, ताकै एक अपूरव रीति, मे जल पीचे तृणा खाय, तिनको सक सीह मनि धरै, मारसबद मुख थे नहि चवैः नवी रिद्वि पूरण भडार, नृप अनेक सेवे दरवार, सुखी भये जिनसए पाय, परनारी परधन अति आहि, सत्तराज महि महल तेन, सुख अकबर के ते डरै। जीवन कवह देयन नास । सुरही सौ अति राखै मोति। अपणे मारग श्रावै जाय। आयस एक छत्र महि मडल तवै। हय गय वाहण अगणे अपार । दुःखी दीदन को आधार । विमुख भये दुख लहै अवाय ॥ तिन तन कोउ सकयन चाहि । सुरपति हू थै अधिकमतेज । इति श्री श्रीपाल जी को चरित्र चौपई वर्ध परिमल्ल कृत मपूर्ण । सवत् १७६४ वर्षे पोप सुदी १० भोमासरे तनूदिने इद पुस्तक लिखी जोसीजी पाटन मध्ये वास्तव्य । तदिने इद पुस्तक लिखायत बाई तुलसा पठनार्थ। ८२. श्रीपालरास। रचयिता ब्रह्म श्री रायमल । भाषा हिन्दी पद्य। पत्र संख्या ४०. माइज ७४६ इञ्च । सम्पूर्ण पद्य सत्या २६७. रचना सवत् १६३०, लिपि संमत १६५६ मगलाचरण- हो म्वामी प्रणमो श्रादि जिणंद, बंदी अजित हॉई आनंदे । समी बंदी जुगति स्यो, हो अभिनंदन ॥ प्रणमो पाई।

। २७४ * प्रशस्ति-सग्रह सुभ कहियो श्री सरस्वती गछ गण बलात्कारान्वय कुदकुद महान । नद्यम्नाय भव्यचित कमलसु पदमन्दि जिम भान ॥१॥ तिनके पटि श्री सफलफीत्ति मुनि भवि जीव समोद दिवाइ। सुकवि सरल वानी करि महीयल बुधजन मन रजवाइ ॥२॥ तिनके पटि श्री भुवनकीर्ति तसकीत्ति भवनपसरान । ज्ञातातत्वपूरान काव्य करता जिन बिंब प्रतिष्ठा विधान ॥४॥ तिह पर श्री ज्ञान भूपण विराजे परकासन सुभ ग्यान । निज वचनै दिन कर सम उदयै अद्युत मनास भव्यान ॥५॥ तिन पट विजय कीर्ति जैवतं गुरु अन्यमती परवत समान । स्यावाद वजे करि फौडत तिन सिष्य शुभचन्द्र जान ॥ ६॥ जिन पुनी पुरुष पुरान पवित्र सुभग बखान । ना कवि मद थे न कोर्ति अहसार निज मत प्रमोद लहान ॥ ७ ॥ निज अघहण कारन ग्रंथ सस्कृत ता मुनि सशेप आनि भापा करी ढाल चौवन मे लिखमीदास ठान ॥८॥ सुनौ भवी भावीक जिन गुण गान ।। ॥ दोहा ।। श्री शुभचद्राचार्य तिन्ह, कायो सहसकृतसार । ते सुनि, लक्षमोदास भनि, भापा ढाल पियार ॥१॥ ना मै देख्या प्रथ कौऊ, व्याकरण छद न जानि । तुच्छ मति रह भापा रची, बुधजन मत्तीह सवान ।। १० ।। घागम चूक पनीसात, उदीर के धन जूत कंपनतनूर । तासा मित्रापन अधिक, प्रति पर सपरस मान । फूसलसीव करनी उचित, ताकी सम नही पानी ॥ ११ ॥ पडित जसरथ सुत सुभग, उदानद तस नामा ता उपदेम भाषा रची, भविजन को विसराम ।। १२ ।। सवत सत्तरासें उपरि तेतीस जेठ सु पास। पचमी ता दिन पूर्ण लहि मगल कारी भाप। फेरि लिखी गुनचास में लक्ष्मीदास निज बोय। भूली चूको सवर कोउ बुधजन लीज्यो सोधि।

[२७६ ' प्रशस्ति-संग्रह ४ रितु वसंत मास वैशाख नौमि सनोसर कृष्ण हि पक्ष । x x x x x X स्व मी सुत्रत नाय जिनत, न.सै पाप भली मति होड, समरत होइ सिद्धि प्राणद। नमौसीत जोडे फर दो।। ८६. हरिवशपुराण भापा । रचयिता श्री खुलाशचन्द । भाषा हिन्दी पए। पत्र संख्या २४६. साइज १२४५|| इश्य । प्रत्येक पृष्ठ पर १० पक्तिया तथा प्रति पक्ति मे ४०-४२ भतर । रचना सवत १७८०. सिपि सवत् १८६०. लिलि सुन्दर इद्रादिक करि तिनसेव । ते गंदी जिनाराज अनूप ॥१॥ तिहु जगरि पद अधाया। मब जिन नाम बदौ गुणघाम ।। मगलाचरण- महावीर बदौ जिनदेव, तीन लोक में मंगल रुर, नेमिसुर वदी चित. लाय, पाप विनाशन हे जिन नाम, अन्तिम पाठ.- नेमनाथ जिनके अपन, तहां ब्रह्म जिनदाम जू, ताही श्री जिनदासगी, सो अनुसार खुस्याल ले, प्रशस्ति- मेरी यात सुनो श्रा, क ली जाति नुस्याल जा सघ जीवन सुखदाय। करि लीही अघिका ॥१॥ प्रन्य रत्यौ इह सार। क्यो भविक सुखकार ।।२।। - - || दोध ॥ भन्योव मन शाय। सुन्दर सुत जिनराय॥ अमिंदगाव, देश टुडादर जागौ सार, विसनसिंघ सुत देशतनो महिना प्रतिपनी जिन मंदिर भत्रि पूजा करे, जनमदिनकरन नना रव जात्रादि होत बहु बहा, ॥ चौपई ॥ तामें धरम तणु अधिकार। राजको मनकू सुखदाय ।। जिन हा करि अति ही बनी। इक व्रत ले केहरु धर। सुरंग विना तनी वर लवा। पुन्य उपावन भविपन तहां।

[૨૭= * प्रशस्ति-संग्रह है अन्य तनी भाषा रची, जिन सेवक 'प्रनुसार। जसको कारिज ना करयो, करयो भविक उपगार ।। १२ ।। ॥ चौपई ॥ अंसी जानि भविक सुखदाय, पढिजे सुनिजे मनवचकाय । काला जाति खुस्याल सुनाम, भाषा रची परम सुन घाम ।। १३ ।। मवत् सतरासै अरु असी, सुदी वैशाख तोज वर लसी। सुकरवार अति ही वर जोग, सार नख्यतर को संजोग ॥ १४ ॥ पहर डोढ दिन वाकी रह्यो, भाषा पूरण करि सुख नह्यो। कसर देखि पडित जन कौय, सुन कर लीज्यो अक्षर सोय ॥१५॥ मैं तो ग्रन्थ पढे कछु नाहि सार विचार नहीं मुझ माहि । यात दोष न दीजो कोय, अलप घणो गुण लीज्यौ जोय ।। १६ ।। जिनवर चरित सुवर्णते, उपजे पुन्य अपार । जे भवि सुमरै भाव सौं, ते पावै शिवसार ।। १७ ।। हरिवश महत्शास्त्र तस्य भापा विनिर्मित। नाम्ना खुस्यालचद्रेण भव्याना खलु शर्मदा ।।१८।। सवत् १८६० का भादवमासे शुभे शुक्लपक्षे तिथो लिखते वैष्णव चेतनदास नासरोदा नगर मध्ये शुभ भवतु। - ८७. हरिवशपुराण । रचयिता श्री नेमीचन्द । भाषा हिन्दी पद्य। पत्र संख्या ७७. साइज १२४५ इञ्च । सम्पूर्ण पद्य सख्या १३०५ रचना सवत १७६६. लिपि सवत् १७६३. प्रति पूर्ण है। इसका दूसरा नाम नेमीश्वर रास भी है। मगलाचरण- श्री भगवान जी बीनउ, अरहत देव निरदोष अठारती। योचातीस गुण शोभता, शोभे हो चौतीस अतिशय सारतो।। प्रशस्ति नवा अन्तिम पाठ- देस टु टाइड सोमिती नाना विधि वृच्छ भला मुसार तो। कनपछिकी वोपमा जसी मन वाछित फल का दत्तारती ॥ १ ॥ यह दिसि सरवर वापिका नदी कुवा श्रर फुड पार तो। निरमज पाणी न्यों भरया, कमल उपरि श्रम कर गुजार ती॥२॥ । meas- (२८० * प्रशस्ति-संग्रह मरसत्ति गछ महा सोभिता, कुदकुंद भट्टारक भणों, सूत्र सिधात ल्याया तबै, ता पाछै कमि क्रमि भया, पंच महावत पालवें, भट्टारक सब उपरै, कीरति चहुं दिस विस्तरी, प्रमत्त मैं जीते नहीं, खिमा खडग स्में जीतिया, ताको सिप नेमचद जी, सेठी गोत पदमावत्या, नेमचद के सिख भला, पडित चतुर विवेक सब, लिखमीदास दोदराज जी, ज्या दीयो उपदेस नै, देव गुरु शास्त्रप्रसाद थी, रच्यौ रास श्री नेम को, प्राचार्य ब्रह्म वाई मवे, नेमचद विनती करे, सतरासै गुणहत्तर, रास रच्यो श्री नेमि को, दोय सवेया दीपता, दोइ से माठि दोहा क्या, एमहनार दम दाल की, वार्ता टाम पेत्तीस में, गाथा दोहा मोरठा, वात्ता परि जाणि र्या, कुदकुंदा अवतार ।।१६।। जिहि नै विदेह ले गया देवते । प्रगट वात जाणे सव एव तौ ॥ १७ ॥ भट्टारक गुरगधामा आचार अभिराम ।। १८ ।। जग कीरति जग जोति अपारतो पाच आचार पाले सुभसारतौ ॥ १६ ।। चहु दिसि मै सब ताकी आणतो चौराणवे पट नायक भाणतौ ॥ २० ।। लघु भ्राता तसु झगडु जाणितौ। खडेलवाल तसुवै सब खाणितौ ॥२१॥ ॥ दोहा ॥ डू गरमी रुपचद। सील तणा सब कद |॥ २२॥ पडित सब मनमंसिर मौरतो रासौ रच्या विविध स्यौ दोरती ॥ २३ ॥ सरसति माता तणौ पसावतो नेमिचंद मनि धरकरि भावतो ॥ २४ ॥ पडित मवयन स्यों मनहारितो। कवियन सबही लेहु सुधारितौ ।। २५ ।। सुदि आसोज दसे रवि जाणती । बुधि सार में कीयो वारणतौ ॥ २६ ॥ सोरठा कहिय तक्षा पचीस तो। एकादास कड सैर जगीमती॥२७॥ गाथा कही सबै शुभ शुद्ध कहे अधिकार उत्तीस प्रसिद्ध ती॥ समिति कया तेरासे श्राठती। मत्र प्रब डाईस सेलि पाटमो॥ २६ ॥ सो परिशिष्ट १. पउमचरिय। रचयिता महाकवि स्वयभु त्रिभुवनस्वयभु । भाषा अपभ्रंश। पत्र संख्या ३७५. साइज ११४४।। इञ्च प्रत्येक पृष्ठ पर १३ पक्तियां तथा प्रति पक्ति मे ३८-४२ अक्षर । लिपि सवत् १५४१ बैशाख सुदो १२ । प्रारम्भिक अश- (१) णमह णव कमल-कोमल-मणहर वर-बहल-कति-सोहिल्ला उसहस्स पायकमल ससुरासुरादय सिरसा ॥ १ ॥ चउमुहमुहम्मि सदो दती सद्द च मणहरो अत्यो। विरिण वि सयभुकवे कि कोरइ कइयणो सेसो॥२॥ चउमुहएवस्स सहो सयभुएवरस मणहरा जीहा। भहस्स य गोग्गहण अज्जवि कइणो ण पावते ॥ ३ ॥ जलकोलाए सयभु चमुहएव च गोग्गहकहाए । भह च मच्छवेहे अजवि कइणो ण पावति ॥४॥ तावच्चि य सच्छंदो भमइ वभस-मच्च मायगो। जाव ण सयभु-वायरण- अकुसो पडइ ॥५॥ सच्छद-वियउ-दाढो छदालकार-णहर-दुप्पिच्छो। वायरण-केसरड्ढो सयभुपचाणणो जयउ ॥६॥ दोहर-समास-णालं सददल अत्यकेसरग्वविया। वुह-महुयर-पीयरस सयभु-कन्वुप्पलं जयउ॥७॥ (२) बढमाण-मुह-कुदर विणिग्गय, रामकहाणए एकमागय । अक्सरवास-जलोहमयोहर, सुयलकार-छंदमच्छोहर । वोह-समास पवाहाफिय, सक्कय-पायय पुलिणालकिय । देसीभामा-उभय-तन्नल, कविदुमरवण सदसिजायन । प्रत्यवहल करनोलारिपट्टय, श्रामोसय-सम तहपरिदिय । - [२४ * प्रशस्ति-संग्रह । । - तिहुयणसयंभु णवर एक्को कइरायचक्मिणुप्पणो। पउमरियस चूडामणि व्व सेसं कयं जेण ॥ कइरायस्स विजयसेसियस्मवित्थारिओ जमो मुवणे। तिहुयणसयंभुणा पोमचरियसेसेण णिस्सेसो।। तिहुयणसयमुधवलस्स को गुणो वर्षिणउ जए तरइ। वालेण वि जेण सयभुकत्रभारो समुन्बबूढो । वायरणढक्खधो आगमगोपमाणेवियडपो। तिहुयणसयभुधवलो जिणतित्ये वहउ कव्यभर । चउमुइसयभुवाएण वणियत्वं अवक्खमाणेण । तिहुयणसयभुरइय पंचामचरिय महच्छरिय ॥ सव्वे वि सुयापजर सुयवप ढअखराइसिक्खति। कइरागस्स सुप्रो पुणसुयत्रसुइगम्भसंभूओ॥. तिहुअणसयभु जइ णहो हतुणदणो सिरिसयंभुदेवस्स। कव्वं कुलं कवित्त तो पच्छको समुद्धरइ ।। जइ ण हुन च्छदचूडामणिस्स तिहुयणसयलहुतणउ । तो पडियाकव्वं सिरिपचमि को समारेउ ।। मन्यो वि जणो गिएहइणियतायविढत्तदव्वसत्तारण । तिहुयणसयभुणा पुणुगहियं वसुरुइत्तदवसत्ताण।। तिहुयणसयंभुमेक्क मोत्त ण सयमुकत्रमयरहरो। को तरइ गंतुमतं मझेणिस्सेसमीसाण ॥ इय चारुपोमचरियं सयमुएवेण रइयसमत्त । तिहुयणसयभुणा त समाणिय परिसममिण । चेष्टितमयण चरित करण चारित्रमित्यमोयशब्दापेढया। या रामायणमित्युक्त तेन चेष्टित रामस्यबोधपति॥ शृणोति जन तम्यायु द्वि मोयते पुण्यं वा। श्रीकृष्णखगहस्तारिपुरपि ण करोति ३रमुपसमेति|| मो वरसुमिन्भूिकइ रायतणयकयपामारय अवसेस। मपुरण यदइउलहुमपुरण गोदंदमयणसुयणतविरइय ।। बदद पढमतएप्त बच्छत्व दाएं तिहुयंगसयभुगारदयं ।। माययं वदयणागसिरिपालपहुइ भययणसमूहस्स ।

[२८६ * प्रशस्ति-संग्रह ----- --- घत्ता परांणदाणि हलेसलठणु, कलिकदल अवि गुणगरूव, परदिपमुहगुणजझवित्त, मा चारु चायसुहडत्तणेण, वभेगा भुनणु कालो ण भन्बु, परुसेण परुपरा मेहयात, करणेण कणयकोडिहि क यत्य, चाएणविदुत्विय कविरामु, तख्यरक्खणे गरुडहो अभा], दिएणउ सिवेण सापहोपससु, जेणिहु दवीइणा अट्टिदिएण, सदवदरत्ता ट्ठिय। मइ मुएविकसुसाठय ॥३॥ मनोविकित्तिण उ किवरत्त । अह हवइ सरस सुइित्तणेण गयकणखले दिएण उ दियहसव्वु । त्तियहणेवि दिएणयह रित्ति । यतित्तचित्त विप्पाण सत्य । हारचदु चदारणयिणाम्। जीमयवाहणेणावि अगु। दद्द खणमसरीरमसु। को पावइ तिहुयणे तहो पइएण । घत्ता तहो चासत्राय चलहालय. अनधिजगणियारणदभरे, णिकलककिजिया जुत्तवीरवित्तियाए, कुभुकुभयएणसु भु सारणो सुशोणिसुभु, जुवुज ववभुतारुणीलुमारुदकुमारु, दोणु भीममो असंगु दुद्वरो लिगुतुगु, अ-जणो गिया रजून 'पासवामु आसपूरु. पाहवे अदिक्षिणपिदिकालसणु पचहुट्टि, काउली तदेन मुच्चु सूरबोमणिप्पचु, कुटुनटुडि'इए उ सहयएणु खदएउ, साहमीउ माथिल्लु भीमण्उ माइमल्लु, निधनो महामन्घु घुग्घु सोमनग्घु रग्घु. सिंचाइ सुम्बइउ नत्तिविव०3, प्रामणोइ भानण यु पट्टहाद योविहत्यु, सुदसु वीरगद करामामु अगाव, कितिरमणिविभयार। भणइ भुवण भवरणतरे ॥४॥ देवदाणवाहसल्लु रावणो जगेममल्लु । इंदई महिंददक्खु अक्खो गवस्खु वक्खु लक्खणो विवक्खतासु रामचदु सप्पयासु । साउहो विसल्लु सल्लु भीमसेणु भोममल्लु कोण्हु कसि कृसणासु दुरिटकालपासु । पामो तनप्पहरि खुएणस्य,रोपहारि । वकिपीरि उम्मियकु संकुकेसरी रिणयकु । वामउ मोराए के घोसुसावलेउ । इट्ट सलादु गुल्लु देवई उ देवतुल्लु । रोमसोमरोमजंघु रिच्छहिताहिजघु । चडइट इमम् मुहिउ मणिमु रंमु। बोसलोविसालवत्थु इत्थिवच्छु सुदरत्यु । मालिबागयो रसिल्लु कुतली सुकुतलिल्लु।

शताब्दी के अनुसार ग्रन्थों की प्रतिलिपियों की सूची १४ वीं शताब्दी अपभ्रश नाम रचनाकाल १. उत्तरपुराण २. क्रियाकलाय [पुष्पदंत] [ अज्ञात] लेखनकाल १३६१ ज्येष्ठ बुदी । गुरुवार १३६६ फाल्गुन सुदी ५ शुक्रवार १५ वीं शताब्दो अपभ्रंश १८ ३. पादिपुराण [पुष्पदंत] १४६१ भादवा वुदी १ बुधवार ४. पार्श्वनाथचरित्र [पद्मकीर्ति ] १४६४ भादवा सुदी २ शनिवार ५. पटकमोपदेशरत्नमाला [ अमरकीर्ति ] १४७६ अपाढ सुदी ५ वु वार १६ वीं शताब्दी संस्कृत १२७४ 050 १०७० १५४१ ६. आदिपुराण [जिनसेनाचार्य] ७. उत्तरपुगण सटीक [प्रभाचन्द्राचार्य] 1. धन्यकुमारचरित्र[सात कीर्ति १. धर्मपरीक्षा [ अमितिगति ] १०. धर्मसमभावाचार [ मेवावी ] ११. प्रतिष्ठापाठ [श्राशाचर] १२ प्रवचनसाराभूतवृत्ति [३० रलदेव } १३. १४. राजपातिक [भट्टारलकदेव । १८. विचारसार [पानन्दि मुनि ] १६. मायक्त कौनदी मात १५८७ मर्गामर चुदी २ मोमबार १५७७ प्रापाढ बुरा करववार १५३३ पोप सुदी ३ गुरुवार १५६९ पोपसुदो शुक्रवार १५४२ कातिक मुदो ५गुरु १५१० वैगाम्य सुदी १५ शनि. १५७४ अषाढ मुदी ३ १५४३ भदवा सुदी। १५८२ अप द युगो १३ १५६४ वैशाम्य मुदी ७ मोमबार १५८. फागुण सुदी १४ 4 10 - प्रशस्ति-सग्रह । ४६. " " ४४. रत्नकरडशास्त्र [श्रीचन्द] १५८२ शक १४४७ ११२० ४५. वद्ध मान चरित्र [जयमित्रइल] १५६३ ज्येष्ठ सुदी५ वृहस्पतिवार १५४५ वैशाख सुदी २ रविवार ४७ पटकर्मापदेशरत्नमाला [अमरकीर्ति १५६२ कार्तिक बुदी ५ शनिवार १५५८ चैत्र सुदी १० सोमवार १५५३ ज्येष्ठ सुदी ५ मगल पार ५०. पदपाहुड सटीक { कुन्दकुन्दाचार्य] १५८९ माघ वुदा४ ५१. १५६४ माघ सुदा २ बुधवार ५२. श्रीपालचरित्र [ तरसेन] १५१२ चैत्र वुदी १२ मगलवार ५३ १५८४ शक १४४६ भादवा बुदो ८ रविवार ५४. १५७६ मंसिर सुदी २ बुधवार ५५. सकलविधिविधानकाव्य [ नयनन्दि] १५८० चैत्र बुदी ४ गुरुवार ५६. सुदर्शनचरित्र [नयनन्दि १५६७ माघ वुदी २ बुधवार ११०० २५०४ मगसिर सुदी १ गुरुवार ५८ सुलोचनाचरित्र [गणिदेवसेन] १५८७ पोप वुदी ६ सोमवार २६. सुकुमाल चरित्र [श्नीधर] १५४६ ज्येष्ठ सुदी ६ बुधवार १२०० ६० हरिपेण चरित्र [अज्ञात ] १५८३ प्रासोज सुदी १० शनिवार १७ वीं शताब्दी संस्कृत ६१. जम्बूस्वामीचरित्र [ब्रह्म जिनदास] १६६३ ६२. जयकुमारपुराया [ब्रह्म कामराज] १६६१ भादवा सुदो ३ शुक्रवार ६३. जीनवरचरित्र [शुभचन्द्र ] १६३६ अपाढ सुदी १३ मोमनार ६४ दुर्गपदप्रबोध । श्री बलमगणि] १६८१ कार्तिक सुदी ७ चमपरीक्षा [बामनिति] १६६६ कात्तिक मुदो ३ शुक्रवार ६६. नेमिनावपुराण [न० मिदत्त । १६४३ शक १५०८ फाल्गुन वुढी , मोमबार १६७४ फाल्गुन बुद्दी ७ शुक्रवार पपुगए [बकोति] १६०० ६५ भवानरस्तोगति [गुपदर] १६५४ कार्तिक मुदा १४ १५६६ (१४ प्रशस्ति-संग्रह १७२४ १५०. सम्यात्तकौमुदी कथा [ जोवगज गोदाका ] १७६३ ज्येष्ठ शु० १४ बुधवार १५१. जोपाल चरित्र [ परिमल ] १७६४ पोप सुदी १० मगलबार १५२ हरिवशपुराण [ नेमीचन्द] १७६३ १७६६ १६ वीं शताब्दी संस्कृत १५३ आदिपुगण [ जिनसेनाचार्य १५४ श्रादिनाथपुराण (सकल की त्ति ] १५५ उपदेशरत्नमाला [ मालभूपण ] १५६. करमण्डुचरित्र [शुभचन्द्र] १५७. ज्ञानसूर्योदय नाटक [पादिचन्द्र ] १५८. दुर्गपदप्रबोध । बल्लभगांण ) १५६. पाडवपुराण [शुभचन्द्र ] १६० पुराणसार साह [ : कल कीर्ति ] २६१. १६२. भोजप्रबन्ध [रत्नमन्दिरगणि] १६३ महीलचरित्र [ चारित्रसुन्दरगाण] १६४ मुनिसुवतपुराण [ रायकृपादास] १६५ वरागचारन [वर्षमानदेव ] १६६. वर्तमानपुराण [सालकीर्ति ] सिद्धान्तमारसह [नरेन्द्रसेन ] १६८ मिन्दूरप्रकरण [ सोमभसूरि] १६४ हरवशपुराण [३० जिनदाम] १७० आनन्दाचार [लक्ष्मीचन्द्र] १८०३ माघ सुदी १५ वृहस्पतिवार १८३३ भादवा शुक्लपक्ष १८२६ मगसिर सुदी २ वृहस्पतिवार १८६१ १८३५ अपाढ सुदी १३ सोमवार १-१२ पौष सुदी १० रविवार १८३१ वैशाख सुदी ६ रविवार १८२२ कार्तिक बुदा ८ सोमवार १८२४ मसिर सुदो ८ शनिवार १८०५ चैत सुदी ११ १८२५ ज्येष्ठ कृष्णा १८५० पोप सुदा ५ सोमबार १८७३ यासोज वुदी ५ बुधवार १८०४ माघ सुदी १४ वृहस्पतिवार १८०३ १८८६ भादवा सुदी २ वृहस्पतिवार १८२७ ज्येछ बुढी ५ मोमवार १८२१ फ गुण बुढ़ी ५ रविवार हिन्दी १६ १०१. प्रादिपुर १.२. पदशिरोमति १७३. अन्यूमागीचरित्र [वाजिनदाम] [शोभाना] [पाडे जिनदाम] १८५६ मगसिर सुदी ३ १८२६ फागुण सुदी १० शनिवार १८४३ पोप शुक्ला वृद्धापनिवार ग्राम नगर व शासकों की सयमयानुसार सूची ग्राम नगर का नाम शासक का नाम समय पृष्ठ तथा पक्ति विशेष x सवत् १५६७ ३४४१२ अदेहवारपल्लानगर अजमेर राव श्री जगमल १५८६ १४६४१ x १३८x२ अकबरनगर [वगाल] महाराजा मानसिंह १५६५ १६६२ १६२२ ५०४१५ महाराजा मानमिह बगाल के राज्यपाल थे नागरा अकबर ६७४७ १६४२ २१३४१२ २१५४५ x १७८१ औरगजेब [अवरगसाह] १७२२ २३४४८ x " २४१४१५ १७७१ १६६० २४४४२६ X X १७६३ २५६४१२ आमेर [अवावती] सवाई जयसिंह राजाधिराज भारमल ७७४२ १७७७ १६१६ १६११ १६१६ १८२५ १०४४२१ दूसरा नाम भाम्रगढ " पृथ्वीसिंह १२६४१५ २१२४२३ आल्हापुर १६११ १७६८ उदयपुर महाराणा जगतसिंह १२८x१३ २१६४२१ x x २५५४२७ २५५४४ रोझो xx १८२४ २४६४ हावत हुभनेर [भनमे] १०१० १६०४ १८-१ सादुरमिह こり ३५४१६ [२६८ +प्रशस्ति-सग्रह - जिहानाबाद श्रागरा x १७६३ २१४४१५ जैसिंहपुरा का नामोल्लख. हुआ है। २०३४४ जयसिंहपुरा [दिल्ली। ४ १७७४ x १७६३ २०६x४ [आगग] मुहम्मदसाह १८०१ २५०x१० महाराजा ईश्वररीसिंह। शासन भी लिखा है x जेसिहपुरा [देहली] मिनाय टोक २५०४१ ७७४१२ महाराजा कुशलसिह x १७८१ १७८५ १८२५ १५७६ १८०३ ४७४५ X X १७७२१० २१५४२७ डामा x १७५७ २४८ तक्षकगढ[टोडारायसिह] महाराजा जगन्नाथ १६६४ ८६x४ यह गढ जयपुर प्रात मे स्थित है। राजाधिराज राव श्रीरामचन्द्र १६१२ ११३४४ सलीम [जहागीर १६१० १८२६ १६.४१६ १६३४१३ २१३४१० देवपुरी देहली X १९८१ १२६४१३ कवि न ढिल्ली' नाम स सम्बोधित किया है। औरगजेत्र १७३४ २३६४२६ २५८४ १७७४२४ २२५४३ दौलतपुर घामपुर नयनपुर नरसिंहपुरा नागपुर गयासुद्दीन १५३३ x सूरत प्रात में स्थित फिरोजखा महाराजा विजयसिंह १६-१७ २१:४१८ २३४५ ४२४२७ १५४१ १८२४ X १५०७ १५६. १६-५ नारनोल मादकतन २६४२६ १३०४२ २१-४00 २३६४१२ मानानदीन tane [३०० * प्रशस्ति-संग्रह है -- रामपुर x १७-४ १७२७ x २२०४१६ २३६४१ २२५४६ ८८x२२ x x राणापुर रावरवत्ता रेणी हेमकरण राजाधिराजडूगरसिंह x १५६४ १५१२ १८७१ १६१६ १५७६ १७६४२ २०२४१६ १५६४१५ ८०४१६ रोहतक अकबर सिस्न्दर लोदी अकबर १६५६ ११६४२४ " वाण पचवारा प्रान्त मे स्थित है १x१६ २१६४२८ x १७५१ १७१३ १८१२ नाभपुर বাবা ८x११ महाराजा रतापसिह हुमायू गयासुदीन १५६४ २६४१५ बहादुरपुर चारापता मेवात मे स्थित है। १५५६ १६५४५ x १७३२ सानदेश मे स्थित है चुरहानपुर नंगट दावन x २२७४१६ २६४३ १६४१६ ६६४६ १८३५ रावराजा विप्युमिह सूर्यमल १६०३ चौहान वंशजों का राज्यवा। x १८२१ १८४३ x २१२४२ गगट शेरपुर महागजा जगन्नाव १६६५ x १५३ ४०४३ २५८४१ १४६४१० १५८० साहीन करानरेन्द्र १६६४२५ वालपुर मरापुरी मदारनपुर १६६ ३०४२७ पापर महाराजा नानमिद १३७ .६४२१ 3" बागद देश में वित गय नी मुरजन 212 आचार्य-मुनि-भट्टारक-लेखकों की सूची अकलक प्रखरराज अचन कीर्ति १४,५४,१६४,१६५,२८७ २१२ २२७,२२८ ६६ १८,३५,२३२,२३, २४ ,२६६ १८५ २८६,२०७,२२१,२४३ २१० १६८ अजित (ब्रह्म) २४७ कुमारसेन कुमुदचन्द्र कुशलचन्द्र कुसुमभद्र कुसललाभगणि केशवदास केशवसेन केसर कौरपाल खडगसेन ह अनतकीर्ति अभयकोत्ति अभयचन्द्र श्रमरप्रभसूरि अमरकीर्ति अमरेन्द्रकीति २५७ ६६ . २६६ २१६ खुशालचन्द २५६ १७१,१७३ ४१ १३२,०३५,२५७ १४२ २४,२३,४४,२७० १०,११६ ४३ खेता गगदेव १८८ गगादास अमृतचन्द्र अासनगणि प्राशर इन्द्रभूति उद्वरमेन याकत्ति Fमा कति मितिक त्यामागर १०७११६ गाल्हा २३: गुणीति २०२ गुपचन्द्र गुगभद्र गुणभद्रसूरि गुग्णाकरमरि २१६ १३८ ८५,१०५.१२५,१२६,१३७,१४६ १५६,१७३,१६०,१६२,२३६ ४२,४७,१५१,१५६ १,२६,६७,११६,१६५ ८५,१३७,१४३,१५,१२,१६३ ६४ ६६ ४७ तिनागर गुणा सेन १०,१३ २२०,२४ शिन ર गुणसुन्दर ন্যাসি गुणलाभगागि Siriन चन्द्रकचि १५,२८,३०,३१,३४,४१,४३,१३, Popurwww [३.४ * प्रशास्त-सग्रह। देवनगाण तितराम नेमीचन्द्र नपाल २०,१४ ३,१७,६२,६७१२६,२७८ १३८ २६,२७,५६,८७,६८ १३,७६,८२,१३८,१६८,१८७, १८८,२८१,२३४ चनमज घमचन्द्र २७१२७,१२८ १०३,१६०,११२ नेमिचन्द्र २१५ १३८,१४२,१४६,१४८ नेत्रानन्दि रेमिदत्त (ब्रह्मा) २,१५,३६,४१,५३,५५,७३,८८, पद्मदि ११४३,,१०४,२१३,१२५, १२६.१२७,१२८,१३१,१३२, पदाकात्ति १३८,१४८,२४६,१६२,१६६, पदान'द (मुनि) १७०,१७४ १७१,१७८,१८०, पहानाभ १८०,१६०,२०० पदारभसूरि २०,२१,३१,३०,३३,८५,१०८, पहासन १६२,१६६ परिमल १०,२२८ प्रचण्डकोति १३ प्रभाचन्द्र १६ १७३ २५० कात्ति ६५ ७३,१४२ २७१ माग गणि बम पण ३०,११६,१६,१३,१४६, १८३२८ १३४ १८८ २,१५,१६,२०,२८,५४,५५,६३, ६७,७२,७३,७६,८५,८७,८३ ६४,६६,९८,६६,१०४,१०८,११३ १२५,१०६,१२७,१२८,१३१, १३२,१३,१४६,१४७.१४८, १४८,१५४,१६२,१६३,१६४, १६५,१६६,१७०,१७३,१७४, १७५,१४७,१५८,१८०,१८६ १६०,२००,२६५,२६७ ४४ ८५,९०,१२,१०८,११०,११२, १४२,१५४,१६२,१६५,२८७ - न.नामिनाला ०४५,०६४ प्रयागदाम २०५ पुप्पदत १८ १८१,१०० . पूरचन्द्र पूर्णभद्र बनारमीदान गलामणि भगवतीदाम ++ १.०,११,१७३ १६२,१६३ २०७,२४१,२६६ २८ १४४,१५१ ६०,१८७ भद्रबाहु {३०६ प्रशस्ति-सग्रह : लागू लयका लाभरगणि लोहार्य वनसूर वचनन मुन्दि १०१ विजयसेन १३ विष्णुदत्त ६३ विजयप्रभसूरि ७४,६०,१५६,२८८ विनोदोलाल १३६ वीर वीरसेन २४,४०,६३,२७० वीरनदि २२०,२२७ वीरचन्द्र ६,१०,७१,२०३,२०८,२२४,२६३ वेगो २३२२३६,२४३,२४५,२६६,२७२ दृपभदास १५,१६,०४५,२६८ वर्धमानदेव ११,१३ शकीर्ति ४० शिवगुप्त ५८,१४२,२४४१४५ शुभचन्द्र १७३,१८८,२१० १८७,१८८ २१० २५४ १००,२५४ २०,६६,६०,१६५,१६१ १६५ २६७ १०४ बदा गुलान ना जिनदास नारायमन वादिचन्द्र वादिभूपण व'दीभसिंह घामाघर विनयमागर विदागद जनशत्ति मासन १ ६,१४,१८,३४,३५,६७७०,१६५ २७,३५,३८,३६,६२,६८,२०७ ३०,११६,११६,१३७,१४६,१-३ ६३ पिन ४६ ६७ शोभानाव जियेन्द्रनि बिना पित inimiz बिगनीति १,२,१५,२०,२१,२३,२८,३६, ५४,५५,६३,७२,७३,७६,७७, ८६,६४,९६,४८६,१०८,११३ १२६,१२७,१२८,१३१,१३८ १४६,१४७,१४८,१४६,१५४, १६२,१६३,१६४,१६७,२६६, १७०, १७४,१७५,१७७,१७८ १-०,१८९,१६०,१६५,२००, २०१,२२२,२३६,२५७,२७० २१२ १२०,१५,१६५,१६५ १३ १२०,१५०,१५३,१६५,१८३ ७३, १६४,१६५ ४१,४८,५६,५७,५,११६,११६, ११८,२७१ अनकारि अतमागर २३.३०,४१.१८३ सीर 1 बोयरमेन १ १६०,११,१.३ १,१,३५,२५,२३२ . त्ति चनिन्द्रीत नाममा न New MOR--m कुल-वंश-जाति आदि की सूची ३ २९ - अग्रवाल-६२,१७,११७.१२२,१३०,१५७,१७३,२०५ वेद ३३ गोयल ६०,८२,८५,१३५ भीमा गग ११६,१३७,१४६,१५६,१६२ रात्रका १०० वासन ६७ लुहाड्या सिघल ८,२३३ साह ४,१५,१६,६३,६६,१३८,१६३, इश्वाकु १०५,१०६,११४ सठा ४,१६०,२८० कायस्थ २५० सोनी ४ कामच ६२,११२ सीगाणो ४४,७७ खएडेलवाल- सावधा ११३ अजमेरा ४,२८,५५,८४,६४,१२७,१३८,१६३.१७० गुजर १३५ काला ५९,२०२,२५६ गोलशृगार पासलीवाल ५५,७३,६६.२११ चालुक्य १६१ गगवान २०,६४,१५४ चन्द्रपि गोत्र ६५ गोदोका २३७,२३८,२६१ जैसवान ६५.१०१.१०५,११३ ७२,१२६,१३२,२०२,२३८ तोमर १७६,१८२ चौधरी १२८ धक्कतवश १४७ पादचाद ७६ परमार बानडा ४,१२६.१६२ पुरवाढ १३८,१०,१६३,१६६,२५० टॉग्या ५६,१७७ पद्मावतीपुरवाल ११८,१८२ नायक 58 बारहसेनी २२८ पाटणी २,४,४१,४८,५३,२४,२२३ माथुर १५० पाया ४,१६३ यादव १३३ साध्या १६,१०० যায় पाटोदी १७५ नमेचू ५८,१७७ पीवाल २१३ व्यारवान १७,३४,६८,२४७ ५६१७४.१७५,२३८ वाडास १४६ १-०,501 वोर ६३ • रेनिन 1,132.१.१.३२ श्रीमान २१२ हु वन १३,४३,५७,२४५ गोधा मान 8 १० Iti गीर -( देवली) सूची के सम्पादक का प्रयत्न सराहनीय है जिन्होने प्रयत्न और परिश्रम से प्राचीन ग्रन्थों को जनता के मामने उपस्थित किया । आशा है शास्त्रो की प्राचीन प्रतिया सो साहित्य एव इतिहास प्रेमी विद्वानों को अनुसधान मे काफी सहायता मिलेगी। विद्वानो को ऐसी पुस्तको की सूची अवश्य देखना चाहिये । fa 1773 ( 70 71 7475 - The Mahavir Kshetra Committee Jarpur deserves congra tulations on publication a catalogue of the ancient manuscripts as old as 1334 संवत् १३३४ तक के प्राचीन प्रतिलिपि वाले ग्रन्थों की सूची प्रकाशन के लिये श्री महावीर क्षेत्र कमेटी धन्यवाद की पात्र है। डाक्टर ए श्रन उपाध्याय कोल्हापर, लिखते हैं-y bringing to light the valuable contents of the Amer Bhandar you liave lughly obliged the students of India i literature and those of Juin literature in particular. It is a lughly useful Catalogue necessary that wide publicity should be given to the contents of the Amer Bhandar and I shall do iny best on that direction आमेर शास्त्र भण्डार के बहुमूल्य ग्रन्थों को प्रकाश में लाकर आपने भारतीय साहित्यिको तथा विशेषत जैन माहित्यसेवियों के लिये बड़ा उपकार किया है । ग्रन्थ सूची बहुत उपयोगी है । आमेर शास्त्र भण्डार के ग्रन्यो पर विस्तृत प्रकाश डालना आवश्यक है और मैं भी इस दिशा में सभी प्रयत्न करने के लिये तैयार रह गा। पो• गमसिद तोमर, दनाद शिवि पालय, लिपते है -भण्डारी मे बहुत ही महत्त्वपूर्ण सामग्री है । इस मामनी से आपने उम ग्रन्थ द्वारा मान्यविगा अनुसन्धान मे मचि रखने वाले जगत् का परिचय कराया है। इसके लिये ग्राप बधाई पात्र हैं। ग्रापने बडा महत्त्वपूर्ण कार्य किया है और इसके लिये आपकी जिननी भी प्रशना की जाय कम ही होगी। नामानि जनरल गिर्न मामाइटी ( बनारम )- अापन सगोवन विभाग कोम्थापना करके 'अयुना वार्य किया। सी चिया ही आगे जाकर माहित्य के इतिहास को लिखने में बहुत काम को सिगती है। इस मरत्वपूर्ण कार्य के लिए आपको धन्यवाद देता। दी...टाने यापने दम उपयोगी महत्वपूर्ण काम को हाथ में लाकर दि० ' में अनुरोग बार्ग अन्थिन किया है। प्रशान्त ममा उप रही है. यह जानकर और भी १५०,११,शान विभाग को जारी रख जयपुर के ममन्न भएटारा का निरीवा काया ५.१,३०,१.८२२ पूर्ण प्रन्यों का प्रागन कम्याच । यापम दिशा में यह महान महायता प्राप्त होगा। १२

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Shri Sarvodiya Tirth Granth

Author
Shri Abhi Nandan Maharaj
Title
Shri Sarvodiya Tirth Granth
File name
Shri Sarvodiya Tirth Granth
Text
OCR done
Citation
1956
Published
2010/09
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
154
Library
Digamber Jain Atishay Kshetra, Jain Vidhya Sansthan Library, Shri Mahaveer Ji, (karauli )
DLI number
327408
Barcode
99999990002280.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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Hrd6ZXkDFc1
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