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Ath Gorakshpaddhati

Sharma,mahidhar · 2012/08

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" " प्रस्तावना. देव, खंड, कापालिक, तारानाथ इत्यादि योगसिद्धि पायकर योगाचार्य हैं. योगहीके प्रभावसे महासिद्ध अखंडऐश्वर्यवान होकर मृत्युको जीत ब्रह्मानंदमें मन्न रह ब्रह्मांड में विचरतेहैं. इनमेंसे मुख्य मत्स्येंद्रनाथ गोरक्षनाथ योगविद्याके आचार्य भये, गोरक्षनाथ मुमुक्षुजनोंके उपकारार्थ राजयोग, हठयोग आदि बहुविस्तार एवं बहुसाधनासाध्य जानकर, "यह गोरक्ष- पद्धति" नामा ग्रंथ २०० श्लोकमें सर्वसमुच्चय सारभूत प्रक- टकिपा सर्वसाधारणके सुबोधार्थ महीधरधर्म राजधरनरी टोहरी जिला गढवालनिवासाने इसका भापानुवाद करके प्रकाशितकिया. इसग्रंथके प्रथम मंगलाचारणसे (५) श्लोक, विषयप्र- योजन संबंध अधिकारी कहेहैं. (१)में योगान्यासका फल, (१) में पडंगके नाम, (५) में आसन, (१२) में पट्च- कनिरूपण, (८) में दशनाडी स्थानोंसहित, (१४) में दश- वायु, (१०) में शक्तिचालन, (२६) में महामुद्राआदि, (७) में प्रणवाक्यास, प्राणायामप्रशंसा, (४)में प्राणायामका प्रकार, (८) में नाडीशोधन, इतने विपय पूर्वशतकमें, तथा (२१) में प्राणयामका विस्तार, (३०) में प्रत्याहारंविधि, (९) में धारणा, (२४) में ध्यान, (१३) में समाधि, (१) में मुक्तिसोपान, योगशास्त्रान्यासका फल, इतने विषय, उत्तरशतकम कहहै. ऐसी यह गोरक्षपद्धति योगमार्ग जाननेया- 'लोको अतिवनम तथा सुगम है. योगमार्गका प्रयोजन 'सभी प्रस्तावना (३) शाखोंमें पडताहै. विशेषतः संध्या, पूजनआदि द्विजन्माऑके नित्यकर्मभी विना इसके सिद्ध नहींहोते जैसे संध्या प्रथम " बद्धपद्मासनो मौनी प्राणायामत्रयं चरेत् " तथा पूजनमें " स्नातः शुचिः प्राङ्मुखोपविश्य प्राणानायम्य " इत्यादि सर्व- विधिवचन है, यदि योग न जाने तो प्राणायाम पद्मासनआदि कहांसे जाने. इनके न जाननेंसे समस्त संध्यावंदनादिसाधन निरर्थक है. इससमयमें बहुधा लोग नाकपर हाथ लगानेको प्राणायाम समझतेहैं. पन्नासनादियाका तो नामजी नहींहै. तय कहांसे सिद्विहोवै इसीहेतु नास्तिकलोग असिद्ध तथा पोप (उग ) आदि निंद्यशब्दोंसे अपने मुखविवरोंको दूपित करते हैं यदि योगान्यास करें तो सिद्धि प्रत्यक्ष होकर अपना उद्धार हो तथा दृषकोंके उन विवरों में मिट्टी पडे. और योगग्रंथ बहुत तथा कठिन हैं. ये २ शतक थोडेहीमें ज्ञान देतेहैं इसहेतु मैंने जापा- टीका किया कि सभीसजन इसे देख थोडाही गुरूपदिष्ट होकर सर्वार्थसाधनयोगमार्गकी महिमा जानजायगे. पाठकोंके सुयो- धार्थ मैंने अनेकमसिद्ध योगग्रंथोंसे इसे बठायकर गोरक्षपद्धति करदिया. और यह ग्रंथ “लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर" छापाखाने के अधिकारी-गंगाविष्णु श्रीकृष्णदासजीको सर्वहक्कसहित देदियाहै जो यह उन्होंने आपके छापाखानेमें छपाकर प्रसिद्धकियाहै. सही- पंडित-महीधरशर्मा, जिला-गढवाल, राजधानी-टीहरी जाहिरात संस्कृतादि पुस्तकप्रकाशक-"लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर " नाम मुद्रायन्त्रमें संस्कृत भापाटीकासहित अनेकानेक ग्रन्थ जैसे वैदिक, वेदान्त, पुराहा, धर्मशाख, काव्य, छन्द, नीति, चम्पू, नाटक, स्तोत्र, वैद्यक, स्मृति, कोप, इतिहास, श्रीरामानुज- साम्प्रदायी तथा हिन्दीनापाके सब रकम ग्रन्थ सर्वकाल बि- कनेको तय्यार रहतेहैं जो अन्यत्र नहीं मिलसक्के. खुलापत्राकार तथा किताबों सपुष्ट रेशमी विलायतो चित्रित जिल्द बधीह पुस्तकोंकी रचना और शुद्धता इसछापेकी उत्तम है कि, देखनेसे चित्त प्रसन्न होजाय. जिनका दूसरा बडा सूचीपत्र है. (आध आनेका टिकट भेजनेसे शीघ्र रवाना होता है ) पुस्तकें मिलनेका ठिकाना- गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास "लक्ष्मीवेंकटेश्वर” छापाखाना कल्याण-(मुंबई)

श्रीगणेशाय नमः।
अथ
भाषानुवादसहिता-
गोरक्षपद्धतिः.
-
श्रीमादिनार्थ स्वगुरु हरि मुनि
गोरक्षशास्त्रस्य प्रणम्य योगिनम्।
भापाविवृत्ति कुरुते महीधरो
योगे सुवोधः खलु जायते यया ॥१॥
श्री ( आदिनाथ ) शिवजी, तथा निजगुरु, हरिमुनि
योगीको प्रणाम करके महीधरनामा गोरक्षयोगशास्त्र जो यो-
गोद्रगोरक्षनाथनें दोशतकमें शिष्योपकारार्थ बनायाहै. उसकी
भापार्टीका करताहै, जिससे योगमार्गमें सभीको सुगमतासे यो-
ध होताहे. योगपदका अर्थ मेल है जैसे 'ह' का अर्थ सूर्ये
'ठ का चंद्रमा है इनके (योग) मेलको (हठयोग) कह-
तेहै. इसीको राजयोगमी कहते हैं, प्राण, अपानवायु जिनकी
मूर्यचंइमा संज्ञा है, इनका ऐक्य करनेवाला जो प्राणायाम
उसे हहयोग कहते हैं ॥१॥
श्रीगुरुं परमानन्दं वन्दे स्वानन्दविग्रहम् ।
यस्य सान्निध्यमात्रेण चिदानन्दायते तनुः ॥२॥

(२) गोरक्षपद्धति- शिष्यको आत्माके तत्त्ववोधनिमित्त गुरुस्वरूप धारणकर परमगुरु श्रीपरमात्माको सहस्रदलकमलमें भावनापूर्वक प्रथ- म यथारंभमें विनश्चिातार्थ प्रणाम करतेहैं, कि जीवनलकी पे- क्यता योगशास्त्रका प्रयोजन है. मद्रुके समीप भक्तिपूर्वक रहने- से शिप्यका पांचशौतिक शरीग्नी आनंदमय होजाताहै. आनं- दही परब्रह्मका रूप है जैसे श्रुतिभी कहती है कि"आनन्दो ब्रह्म- णो रूपम्" यदि ऐसा न हो तो उसकी पैठानभी नहींहोसके पाँ कि " नरूपमस्येह तथोपलायते नान्तोन चादिन च संमतिष्ठा इत्यादि गीता । एवं वेदांतग्रंथोंमें लिखाहै कि उसका रूप तथा जन्म, मरण, मध्य ओर रंग चिह्न मूर्तिआदि कुछ नहींहै. के. वल आनंदमय स्वयंप्रकाशमान है. तथा, निर्विकल्प आनंदमय होजानेकोही मुक्ति कहतेहैं. ऐसे परमआनंदस्वरूप परब्रह्मको (जिसका शरीरभी आनदही है ) वदना करके प्रथारंभ कर- तेहैं जिमके सानिध्य (सम्मुख ) होनेंसे, अर्थात् (केवला- नुभवानंद ) वह आनंदात्मा परमात्मा केवल मनके मनन अ- नुभव विचार करनेसे अपनेही बीच पायाजाताहै. न कि इतस्त- तर तीर्थयात्रादि फिरनेसे, यह अनुभव केवल योगहीसे सा- ध्य है. यह ज्ञानको प्रथम भूमिका है. नाडीशोधन, वायुशोधन, ध्यान धारणा आविविना एवं गुरु रुपारिना नहीं मिलता. वि. ना ज्ञानके मुक्ति नहीं मिलती श्रुतिमी कहतीहे कि ते वातान्न मुक्तिः" मुक्तिपदार्थ वही आनदमय होजाताहै. योगसे ज्ञान पापके जीवपरमात्माका एकमाव होने में वह आनंदस्वरूप पर- भाषानुवाद । श०३ ब्रह्म साक्षात्कार होताहै इस ज्ञानगम्पके प्रत्यक्षमात्र होनहाँसे परमचिदानंदमय आपही योगी होजाताहै. जैसे जानकी सा- त भूमिका है. ज्ञानतूमिप विचारणा २ तनुमानसा ३ सत्त्वापत्ति ४ संप्ततिनामिका ५ पदार्थानाविनी ६ तुर्यगा ७ ये सात हैं. विवेक वैराग्य हैं प्रथम जिसमें ऐसी तीव्र मुमुक्षारूप पहिली. श्र- वणमननरूपा दूसरी. मनमें अनेकअर्थ संकल्प विकल्प उत्पन्न तथा नाश होते हैं. इन सभीको छोडके, (स) एकार्थमें वृत्ति होनी. (तनुमानसा ) तीसरी, ये तीन साधनभूमि हैं इनसे जब अंतःकरण शुद्ध हो तब अहं ब्रह्मास्मि " में ब्रह्म है ऐसा योगी कहताहै.समस्त साधन पूजनजपादिकमें " अहं ब्रह्मास्मीति चिर भावयेत्" लिखाहै,यह भावनाविना उक्त तीन सूमिका साधे- होतेही नहीं इसलिये विना मार्गके कुछभी साधन नहींहोताहै चौथी, सत्त्वापत्ति ज्ञानामि यही फलमि है इसमें जब योगी प्राप्तहो तब ब्रह्मवित् कहाताहै. इसी सत्त्वापत्तिनूमिमें समीपही उही जो सिद्धि उसमें आसक्त न होना,इसे असंसक्तिनाम पांचवी ज्ञानतृमि कहतेहैं. इसमें जब योगी प्राप्त हो तो उसे ब- झविदर कहतेहैं. जिसमें परब्रह्मसे व्यतिरिक्त अर्थको भाव- ना न करे वह परार्थनाविनी छरी ज्ञानभूमि है इसमें जब योगी प्रातहोताहै तो वह दूसरेके बोधन करनेसे मात्र प्रबुद्ध होताह. नहींतो एकान्याकारही रहनाहै उसे ब्रह्मविद्ध- रीयान् कहतेहै. दूर्गमा नाम सातवी भूमि है इसमें योगी प्राप्त होनसे ब्रह्मविद्वरिष्ठ कहत हैं. इतने साधनाओंसे स्वात्माराम " " (४) गोरक्षपद्धति- चिदानंद,परमानंद, चिन्मय, आदियोगी आपही होजाताहै. का. लरहित होताहै. " अन्तनिश्चलितात्मदीपकलिकास्वाधारबन्धा- दिमियों योगी युगकल्पकालकलनात्तत्त्वं च जेगीयते । ज्ञाना- मोदमहोदधिः समभवद्यत्रादिनाथः स्वयं व्यक्ताव्यक्तगुणा विकं तमनिश श्रीमीननाथ भजे " जो मीननाथयोगीश्व- र मूलाधारबंध, उड्डीयानबंध, जालंधरबंध, आदि योगाया- ससे हृदयकमलमें निश्चलदीपककी ज्योतिसरीखी परमा- त्माकी कला साक्षात्कार करके श्वासा, पला, घटी, प्र- हर, दिन, मास, ऋतु, अयन, वर्ष, युग, मन्वंतर, कल्प, आ. दि, निरंतर पुनः पुनः फिरनेवाला है स्वरूप जिसका ऐसे काल- को, तथा जलादि २५ तत्त्वोंको पहिचानके योगात्याससे जी- तताहै तथा ज्ञानानंदरूपी समुद्र होकर गुप्तप्रकट अर्थात् सगुण निर्गुण होनेकी सामर्थ्य रखनेवाला (आदिनाथ) शिवस्वरूप- की भावना नित्यकरनेके अभ्याससे, आपही साक्षात् शिव हो- गयाहै. ऐसे योगीश्वर श्रीमीननाथको दिनरात नमस्काररूप से- चन करताहूं ॥२॥ नमस्कृत्य गुरुं भक्त्या गोरक्षो ज्ञानमुत्तमम् ।. अभीएं योगिनां त्रूते परमानन्दकारकम् ॥३॥ योगी गोरक्षनाथ भक्तिपूर्वक गुरुको प्रणाम करके पूर्वजन्म- के योगसेवनसे इस जन्ममें पूर्णयोगमार्गका बोध देनेवालायोग- शाख कहतह, जिससे योगियोंको 'अमीर' मनोवांछित मिल- ताह तथा परमयोगानंद या प्रशानंद होता है. कर्म और मनिसे

भाषानुवाद । श०१ (५)
जब चित्त शुद्ध होवै तब योगशास्त्र में अधिकारी होताहै ॥३॥
गोरक्षसंहितां वक्ति योगिनां हितकाम्यया ।
ध्रुवं यस्यावबोधेन जायते परमं पदम् ॥४॥
योगिजनोंके हितकेलिये योगींद्र गोरक्षनाथ गोरक्षसंहिता
प्रयोगशास्त्र कहताहै, जिसका बोध होनेसे योगीको (परमपद)
निजनोस होताहै यद्वा वह मिलताहै जिसमें पहुँचकर पुन-
शमन करता हटिआना नहींहोता ॥ ४ ॥
आसनं प्रक्तिसोपानमेतत्कालस्य वञ्चनम् ।
ध्यानं समा मनो भोगादासक्तं परमात्मनि ॥५॥
तसे मन विषयोगांसे हठजानेकर परमात्मा
(ईश्वर) में, आसक्त होजावै तब योगी काल तथा मुत्युको
जीतकर (जरा) बुढापा ( मुत्यु) मरणको जीतताहै. मुक्तिके
(सोपान)सीटी यही कर्म है.और कालकी वंचनाभी यही है।५
द्विजसेवितशाखस्य श्रुतिकल्पतरोः फलम् ।
शमनं भवतापस्य योगं भजत सत्तमाः ॥ ६॥
सजनको संवोधन करके, गोरक्षनाथ कहतेहै कि,हे सत्तमाः!
भेष्टजनों! वेदरूपी कल्पवृक्षके फल इसयोगशास्त्रका सेवन करो
जिमके ( शारवा ) रैनियां योगिरूपी ( द्विज ) पति अथवा मु-
चलष्टि सेषित्र हैं और संसारके तीन प्रकारके (ताप) केशोंको
२) दरवाजेहे ॥ ६॥
खाताई. यहााणसंरोधः प्रत्याहारथ धारणा ।
लकर मोक्षमा परेतानि योगाङ्गानि वदन्ति षट् ॥७॥

गोरक्षपद्धति- प्रथम आसन सिद्धकरके क्रमशः प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधिका आयास करना ये योग छः अंग हैं. इनके पृथक् विस्तार आगे कहेंगे, यमनियमसंपन्न योगीको क्रमपूर्वक आयासकरके समाधिका लाज होताहै जिससे निर्षि- कल्प समाधिसे राजयोग सिद्ध होताहे. तद चिदानंदस्वरूप भाप ही होके योगानंदको प्रातहोताहै ॥७॥ ॥ अथासनानि ॥ आसनानि च तावन्ति यावन्तो जीवजन्तवः । एतेपामखिलान् भेदान् विजानाति महेश्वरः॥८॥ आसनोंका विस्तार कहतेहैं कि, जितने जीवमात्र अर्थात चौराशी लक्ष योनि हैं इतनेही आसनभी उन्हींक शरीरचेष्टानु- सार हैं इनके प्रत्येकोदोंके जाननेहारे केवल शिवजी मात्र है और कोई नहींजानता ।। ८॥ चतुराशीतिलक्षाणामकैकं समुदाहृतम् । ततः शिवेन पीठानां पोडशोनं शतं कृतम् ॥९॥ चौराशीलक्ष आसनोंके भेद मनुष्यसि नजानेजायंगे इसप- कार करुणामय शिवजीने सर्वसाधारणके उपकारस्तु चोरी (८४) मात्र आसन योगशास्त्रम प्रगटकिये. यही सूर्वजन्म- वालायोग- आसनेभ्यः समस्तेभ्यो द्वयमेतदुदाहतांछित मिल- एक सिहासनं प्रोक्तं द्वितीय कमलार्म और भक्ति से भाषानुवाद। श० इन ८४ भासनोंमेंजी बहुत विस्तार होनेसे योगधारण क- रनेवालोंके उपकारहेतु दोही आसन मुस्य कहेहैं. इससे इसग्रंथमें मुगमताकेलिये सर्वसंमत एक सिद्धासन दूसरा पद्मासन सचिस्तार कहाजाताहै ॥१०॥ योनिस्थानकमनिमूलपटितं कृत्वा दृढ़ विन्यसे. न्मेद्रे पादमथैकमेव हृदये कृत्वा हनुं सुस्थिरम् । स्थाणुः संयमितेन्द्रियो चलहशा पश्येद्धवोरन्तरं' ह्येतन्मोक्षकपाटभेदजनक सिद्धासनं प्रोच्यते॥११॥ सर्वोत्कृष्ट दो आसनामसे प्रथम सिद्धासनकी विधि कहते हैं कि, गुदा और लिंगके बीच में योनि (कुंडलिनीका) स्थान है. इसको वामपादके एडीसे दृत पीडन ( दबाव ) करे दाहिने पैर- के एडी लिंगके ऊपर लगाकर दयाचे दोनहूं पैरॉकी एडियां नीचे ऊपर बराबर होजातीहं तथा दोनहूं पैरोंके अंगुष्ठ जंघा और गुल्फोंके बीच नीच उिपजातेहैं इनके दवायसे योनिस्था- नके तले ऊपरके दो इंद्रिय गुदा, उपस्थ रुकजातेहैं. तदनंतर हृदयके चार अंगुल ऊपर (चिबुक) होडी स्थिरकरे और समस्तइंद्रियोंसे हटाकर एकाग्रचित्त करे तथा दोनहूं नेत्रोंसे अ- चलदृष्टि कर (अकुटि) भूमध्य देखतारहै यह मोझरूपी (वा- र) दरवाजे (कपाट ) के किंवाडोके खोलकर मोक्षमार्ग दि- साताहै. यदा जो कुंडनीमे रुकाहुबा सुपुग्णादार टसे खो- लकर मोक्षमार्ग (सुपुम्मा ) के द्वारा मोक्षस्थान सहस्रदलक- ,

(८)
गोरक्षपद्धति-
मलकर्णिकांतर्गत परमात्मामें पहुँचानेका यन करताहै यह
सिद्धासन है ॥ ११ ॥
वामोरूपरि दक्षिणं च चरणं संस्थाप्य वाम तथा
दक्षोरूपरि पश्चिमेन विधिना धृत्वा कराभ्यां दृढम् ।
अङ्गुष्ठौ हृदये निधाय चिवुकन्नासायमालोकये-
देतव्याधिविकारनाशनकरं पद्मासनं प्रोच्यते ॥१२॥
बाय (ऊरु ) जानुमूलमें दाहिना पैर उत्तानकरके तथा
दक्षिण (ऊरु ) जानुमूले वामपाद वैसेही स्थापनकरके दाहिने
हाथको पीठपीछे घुमायके दाहिने पैरके अँगुटेको ग्रहणकरे त-
था बायें हाथको पीठपीछे घुमायके दाहिने हाथ ऊपरसे
लेजायकर बांयें पैरके अंगुष्ठको ग्रहण करे. तद (चिबुक) हो-
डीको छातिस लगाय, दोनहू नेत्रसे नासिकाका अग्रभाग निरं-
तर देखतारहै. यह पोपियोंके समस्तरोगविकार नाश करनेवा-
ला बद्धपद्मासन है ।। १२॥
'प्रकारांतरसेमी पन्नासन कहाहै इसलिये मैं ग्रंथांतरमतसे
मत्स्पंद्रनाथके मतकाजी लिखताहूं'-
" उत्तानो चरणो कृत्वा उरुसंस्थौ प्रयत्नतः।
अरुमध्ये तथोत्तानो पाणी कृत्वा ततो दृशौ ॥१
नासाग्रे विन्यसेद्राजदन्तमूले तु जिदया।
उत्तम्भ्य चिबुकं वक्षस्युत्थाप्य पवनं शनैः ॥२॥
इदं पद्मासनं प्रोक्तं सर्वव्याधिविनाशनम् ।
दुर्लभं येन केनापि धीमता लभ्यते बुधैः " ॥३॥

भाषानुवाद । श०१ (९) (अरु) जानमूलमें पूर्वोक्तप्रकारसे चरण (जैसे दक्षिण- ऊरुभै वाम, वाममें दक्षिणचरण, उत्तान अर्थाद, पैरोंके पीठ जानुपर लगी रह.) स्थापन करके दोनहूँ हात सी एडियोंके ऊपर नीचे वामऊपर दक्षिणहस्त रखके दृष्टि नासिकाके अपनानपर निश्चल रक्खे तदनंतर (राजदंत) जाढोंके मूल दक्षिणवाम दोनई- में जिताकर ऊर्द्धस्तंभन करे ( यह जिह्वाबंध गुरुमुखसे जान- नाचाहिये) (जिह्वाबंध मूलबंधका विस्तार ५७१ ५८ श्लोकमें कहेंग) तथा (चिबुक ) ढोडिको चार अंगुल अंतर छोडकर छातिसे लगाय मंदमंदवायुको उठावै. यह मूलबंध है. (यहनी गुरुमुखबोध्य है) यह पद्मासन मत्स्येन्द्रनाथके मतका है. संपूर्ण- रोगोंको नष्ट करताहै. जो संसारमें भाग्यहीन हैं उनको दुर्लभ है. बुद्धिमान एवं पुण्यवान् पुरुषोंको गुरुकपासे मिलताहै। १।२॥३॥ ॥अथ षट्चक्रनिरूपणम् ॥ पदचक्र पोडशाधारं द्विलक्ष्यं व्योमपञ्चकम् । स्वदेहे ये नजानन्ति कथं सिद्धयन्ति योगिनः॥१३॥ विषमवासनासे मन चंचल रहताहै रोकेसे रुकता नहीं चिना मन रोके योगसिद्धि नहींहोतो. मन रोकनेकेलिये कुछ निमित्त (अवलंबन ) अवश्य होनाचाहिये. इसहेतु छःचक्र , सोलह आधार, दो लक्ष्य, पांच आकाश, ये चार प्रकारभेद (सर्वउन- तीस ) कहतेहैं, कि मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा ये छःचक हैं इनका विस्तार आगे कहेंगे आधार (१०) गोरक्षपद्धति- सोलह हैं इनके विशेषविस्तार अतिगुह्य होनेसे श्रीगोरक्षनाथनें यहां प्रगट नहींकहे और इनके प्रकटताविना सर्वसाधारणको वोध होना असंभव है इसलिये जैसा गुरुरूपासे जाना. यहाँ ग्रंथां- तरीयमतसे प्रकटकरताहूं. प्रथम आधार पादांगुष्ठ है इसपर एका- प्रदृष्टि करके ज्योतिचैतन्य करै इससे दृष्टि स्थिर होतीहै १ दू- सरा आधार मूलाधार. इसे पापोंकी एडिसे अचेतन करना इससे अनिदीप्त होतीहै २ तीसरा गुह्याधार. इसके संकोचविकाशके भन्यास करनेसे अपना वायु फिरके बजगनाडौंमें प्रवेश कर विदुचक्रमें जाता है इससे शुक्रस्तंभन एवं (बजोली ) रेत यो- निमें पात न करके पुनः आकोचनक्रमसे वज्रनाडीद्वारा बिंदुस्था- नमें प्राप्तकरनेकी सामर्थ्य होतीपंचम उड्डीयानबंध आधा- र है. पश्चिमतान आसन बांधके गुदाको संकोचन करे इससे मल मूत्र कमिका नाश होताहै ५ छठा नाभिमंडलाधार. जिसमें चै- तन्य ज्योतिःस्वरूपका ध्यान करनेसे एवं प्रणवके जपसे नाद उप्तन्नहोताहै। सातवां हृदयाघार. इसमें प्राणवायुको रोध करनेसे हृदयकमल विकासित होताहै ७ आठवां कंठाधार, इसमें दीडी हृदयपर दृढ लगायके ध्यान करे तो इडा-पिंगलामें वहताहुआ वायु स्थिर होताहै ८ नवम क्षुद्रपंरिकामार कठमूल है इसमें क- परसे जो दो लिंगाकार ऊपरसे लटकतीहैं उन निहापौटाव तो ब्रह्मरंध्रमें चंद्रमंडलसे वहताहुआ अमृतग्स मिलताहै ९ दशम निद्वामूलाधार. इसमें सेचरीमुद्राके प्रकारसे जिहाप्रसे मथन क. रे, तो सेचरीसिद्धि होतीहै १० ग्यारहवां जिहाका अधोमा- ।

भाषानुवाद । श०१ गाधार, जिसमें जिह्वायसे मथनकरके दिव्यकविताशक्ति होताहै ११ बारहवां ऊर्द्धदंत मूलाधार. जिसमें जिवायस्थापनके आयाससे रोगशांति होतीहै १२ तेरहवां नाशिकामाधार. जिसमें दृष्टि स्थिरकरनेसे मन स्थिर होताहै १३ चौदहवां नासिकामूलाधार. जिसमें दृष्टि स्थिर करनेसे छः महीनेके निरंतर आयासकरके ज्योति प्रत्यक्ष होतीहै १४ पंद्र- हवां झूमध्याधार. जिसमें दृष्टि अचलदृष्टिके अग्यासकरके सूर्यकिरणोंके समान ज्योति प्रकाश होतीहै इसीआयासके दृढ होनेपर सूर्याकाशमें मनका लय होताहै १५ सोलहवां नेत्रा- धार. जिनके मूलमें अंगुलिसे भीच में बर्तुलाकार बिंदुसमान इंद्रधनुषके समान रंगकी ज्योति है इसज्योतिके देखनेका अन्या- सकरके ज्योति प्रत्यक्ष होतीहै १६ ये सोलह आधार हैं. अथ- वा मूलाधार १ स्वाधिष्ठान २ मणिपूर ३ अनाहत ४ विशुद्ध ५ आज्ञाचक्र ६ बिंदु ७ अर्दैदु ८ रोधिनी ९ नाद १० नादांत ११ शक्ति १२ व्यापिका १३समनी १४ रोधिनी १५ ध्रुवमं- डल १६ ये सोलह ( १६ ) आधार हैं ब्रह्म तथा अपनेंमें अोद समझकर भावना करनेसे सिद्धि होतीहै अब (दो) लक्ष्य कहते हैं ये दो प्रकार बाह्य आत्यंतरीय हैं देखने के उपयोगी नासिका तथा भूमध्ये इत्यादि बाह्यलक्ष्य हैं मूलाधारचक्र, त्दयक- मल इत्यादि आत्यंतरलक्ष्य हैं, अथ पांच आकाश इसमकार है कि प्रथम श्वेतवर्ण ज्योतिरूप आकाश है इसके भीतर रक्त- वर्ण ज्योतिरूप प्रकाश है इसके भीतर धूम्रवर्ण ज्योतिरूप महा- - गोरक्षपद्धति- काश है इसके भीतर नीलवर्ण ज्योतिस्वरूप तत्त्वाकाश है इसके भीतर (विद्युत् ) बिजुलीके वर्णका ज्योतिस्वरूप सूर्य्या- काश है ये पांच आकाश हैं इतने ६ चक्र १६ आधार २ लक्ष्य ५ आकाश शरीरमें हैं इन्हे जो योगी नहींपहचानता उसको योगसिद्धि नहींहोती ॥ १३ ॥ एकस्तम्भं नवद्वारं गृहं पञ्चाधिदैवतम् । स्वदेहे ये न जानन्ति कथं सिद्धयन्ति योगिनः||१४|| शरीरस्तंभरूपी गृह है इसमें सकलवासनाओंका आश्रय मन है यही खभारूप होकर समस्तशरीरको थामे रहताहै जिस- के मुख ३ नेत्र २ नाशिका २ कर्ण २ गुह्य १ लिंग १ ये ९ द्वार हैं तथा पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकास, पंचतत्त्वोंके ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर, सदाशिव अधिदेवता है ऐसे शरीररू पी गृहको जो योगाभ्यासी नहींजानता वह योगसिद्धि कैसे पायसकताहै ॥१४॥ चतुर्दलं स्यादाधारं स्वाधिष्टानं च पड्दलम् । नाभो दशदलं पद्मं सूर्यसंख्यादलं हृदि ॥ १५ ॥ कण्ठे स्यात् पोडशदलं भूमध्ये द्विदलं तथा। सहस्रदलमाख्यातं ब्रह्मरन्धे महापथे।॥ १६॥ पट्चक्रोंके पृथक् वर्णन ह कि प्रथम मूलाधारचक्र गुदद्वारमें पीले वर्णका अधोमुख कमल है जिसे ४ दलमि व, श, प, स, बीज शोभित, आठों दिशामें आठ गलोसे वेष्टित पीतवर्ण मध्ये कणिकामें चतुष्कोण हाथीके ऊपर आता " भाषानुवाद । श०१ (१३) जिसके पाी बगल में लं बीज है और चार हाथ चार मुखका ब्रह्मा कोटिसूर्यसमान प्रकाशमान एवं डाकिनीशक्तिसे युक्त है वहीं देदीप्यमान निकोणाकार कामाख्या पीठ है तिसके मध्य- में पश्चिममुख स्वयंत लिंग है उसके बीचमें विजुली समान च- मकवाली साडेतीन फेरे (वृत्त ) से वेष्टित होकर, सुषुम्णाके द्वा- रको रोकके सोयाहुआ सर्प जैसा कुण्डलिनी महाशक्ति है जैसे पृथ्वीआधार शेष तैसेही शरीरका आधार यह है विना इसके जागे और उपाय योगके व्यर्थ है. इसलिये प्रथम इसका घोधन करना मुख्य है १ दूसरा स्वाधिष्ठानचक्र, लिंगमूलमें रक्तवर्ण ऊर्द्धमुख षड्दल घ, भ, म, य, र, ल, इन ६ वर्णसे शोभित कमल है शुक्रवर्णकर्णिकामें अईचंद्राकार जलमंडल है इसके बीचमें () बीज है जिसके (पार्थ) बगलमें श्रीवत्सकौस्तुभ- पीतांबर वनमालाओंसे शोजित चतुर्भुज विष्णु शाकिनीशक्ति- साहित हैं २ तीसरा मणिपूरचक्र नाभिमूलमें नीलवर्ण ऊर्द्धमुख दशदलकमल ड, ढ, या, त, थ, द, ध, न, प, फ, इन १०. गौसे शोभित है मध्यकर्णिकामें स्वस्तिकाकार तेजोमंडल है. इसके मध्यमें सूर्यके समान तेजधारी मेषवाहन (२) बीज चतुर्स- ज है इसके पार्श्वमें रक्तवर्ण विततिभूषित, नीलवर्ण, चतुर्भुज लाकिनीशनिसहित महारुद्र हैं ३ चौथा अनाहतचक. हृदयमें द्वादशदलकमल द्रमुख क, ख, ग, घ ङ, च, छ, ज, झ,ञ, द, ठ, इन ३२ बोजोंसे शोषित है उसके कर्णिकामें धूम्रवर्ण, 'टकोण वायुमंडलके मध्यमें चूम्रवर्ण, चतुर्बाहु, कृष्णमृगवाहन - , " (१४) गोरक्षपद्धति- यं) बीज है. इसके पार्थमें अभयमुद्रा धारणकरके काकि- नीशक्तिसहित ईश्वर हैं कर्णिकाके त्रिकोणमें सुवर्णवर्णवाण- लिंग है यह पूर्णागिरि पीठ कहाताहै ४पांचवां विशुद्धचक्र.कंठ- स्थानमें रक्तवर्ण, ऊर्द्धमुख, पोडशदलकमल अ,आ, इ,ई,उ, ऊ, ऋ, ऋ,ल, ल, ए, ऐ, ओ, औ, अं अः, इन १६ वर्गोंसे शो- मित है स्फटिकवर्णकर्णिका वर्तलाकार आकाशमंडल जिसमें निष्कलंक पूर्णचंद्रमा है इसके मध्यमें श्वेतहाथी वाहन, पाश, अभय, वर, अंकुश, भरणकरता आकाश बीज (है) इसके पार्श्वमें शाकिनीशक्तिसहित सदाशिव हैं यह जालंधरपीट कहा- ताहै ५ छठा आजाचक.चूमध्यमें श्वेतवर्ण ऊर्द्धमुख द्विदल ह, क्ष, इन २ वीजोंसे शोभित कमल है इसके कर्णिकामें हाकिनी- शक्तिसहित शिव है कर्णिकाके त्रिकोणमें, (इतरलिंग ) नामा शिवलिंग है. यही मनका स्थान है उड्डीयानपीठती इसीको कहते है ६ इसके ऊपर सहस्रदलकमल ब्रह्मरंध्रमें श्वेतवर्ण पूर्ण- चंद्रसमान मुख परमानंदस्वरूप ह, के, क्ष इन ३ वर्णोसे शो- मित है विकोणकर्णिकामे पूर्णचंद्रमंडल जिसके मध्यमें बिजुली- के समान चमकोला परमआनंदरूप देदीप्यमान ज्योति है इसमें चिदानंदस्वरूप परमशिव विराजमान हैं इनके पाश्रम सहनमू- यके समान तेजधारी प्रबोधस्वरूप अईचंद्राकार निर्माणकला विराजमान है. इसके बीच कोटिसूर्यसमान तेजधारी रोम- समान मूक्ष्म निर्वाणशक्ति विराजमान है इनके मध्यमें मन तथा वचनसे अगम्य केवल योगसे गम्य चिदानंदस्वरूपसे पर क्या जापानुवाद । श.१ (१५) अतिपर परमशिवपद है जिसको परब्रह्मपद कहतेहैं विराजमान हैं जिसके निमिपोन्मिष अर्थात् पलक खोलने मीचनेमें सृष्टि उत्पन्न और नष्ट होता है ।। १५॥ १६ ॥ आधारं प्रथमं चक्र स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम् । योनिस्थान द्वयोर्मध्ये कामरूपं निगद्यते ॥ १७॥ पहिला मूलाधार स्वाधिष्ठान इन दो चक्रोंके बीच योनि- स्थान है यही कामरूप पीठ है. अर्थात् मूलाधारके कर्णिकाम कामरूप पीठ है ।। १७॥ आधाराख्ये गुदस्थाने पङ्कजं च चतुर्दलम् । तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्धवन्दिता॥१८॥ मुलाधार (गुदा) में जो चतुर्दलकमल विख्यात है उसके मध्यमें त्रिकोणाकार योनि है जिसकी वंदना समरतसिद्धजन क- रतेहैं पंचाशत् वर्णसे बनी ई कामाख्या पीठ कहातहि ॥३८॥ योनिमध्ये महालिङ्गं पश्चिमाभिमुखस्थितम् । मस्तके मणिवद्विम् यो जानाति स योगवित्॥१९॥ पूर्वोक्त त्रिकोणाकारयोनिमें सुपुम्णाद्वारके संमुख स्वयं नाम करके जो महालिंग है उसके शिरमें माणकेसमान देदी- प्यमान बिंब है यही कुंडलिनी जीवाधार शरीराधार मोक्षद्वार है इसे जो सम्यक् प्रकारसे जानताहै. उसे योगवित कहतेहैं १९ तप्तचामीकराभासं तडिल्लेखेव विस्फरत । त्रिकोणं तत्पुरं वढेरघो मेड़ापतिष्ठितम् ॥२०॥ (मेड़) लिंगस्थानसे नीचे मूलाधारकर्णिकामें रहता तपा- (१६) गोरक्षपद्धति- हुआ सुवर्णके समान वर्ण,एवं विजुलीके समान चमकदमकवा- ला जो त्रिकोण है वही कालामिका स्थान है ।। २०॥ यत्समाधौ परंज्योतिरनन्तं विश्वतोमुखम् । तस्मिन् दृष्टे महायोगे यातायातान विन्दते ॥२१॥ इसी त्रिकोणविपय समाधि अनंत (विश्व ) संसारमें व्याप्त होनेहारी परमज्योति प्रकट होता है वही कालामिका रूप है जब योगी ध्यान, धारणा, समाधिकरके उक्त ज्योतिको देखने लगताहो तो उसको जन्ममरण नहींहोते अर्थात् अजरामर होजाताहै ।। २१ ॥ स्वशब्देन भवेत्प्राणः स्वाधिष्ठानं तदाश्रयः। स्वाधिष्ठानाश्रयादस्मान्मेमेवाभिधीयते ॥ २२॥ स्वशब्द ( प्राण ) हंसका बोधक है इसका आश्रय (स्वाधिष्ठान ) लिंगमूल है प्राणका अधिष्ठान होनेसे इसेही मेंद्र कहाजाताहै ।। २२॥ तन्तुना माणिवत्मोतो यत्र कन्दः सुपुम्णया । तन्नाभिमण्डलं चक्र प्रोच्यते मणिपूरकम् ॥ २३ ॥ नाभिमें एक कंद है. जिसे सागव्यापिनी (सिरा) नसें नि- कलाह जैसे १० नसें उपरको है जो शब्द, रस, गंध, श्वास मुंगा, क्षुधा, तृपा, डकार, नेत्रदृष्टि, (धारणा ) भगजशक्ति इन दश कामोको अपने २ स्थानोंमें दीपन करता तथा १० नसे नीचेको हैं वात, मूत्र, मल, शुक्र, अन्न, पान, रसको नीचे पहुँचाना इनका काम है और चार जिनकी तिौँ गति है. - . भाषानुवाद । श०१ (दो) दाहिने बगल (दो) बायें बगल होकर अगणित सुक्ष्मशा- खा वनके सागमें जालेके नाई रोमरोम प्रति पूरित हैं उनहींके मुखोंसे प्रस्वेद देहके बाहर रोमोंमें होके आताहै. तथा उन्हींके मागोंसे लेप, मर्दनादि पदार्थ भीतर प्रवेश करतेहैं. इसप्रकारका नानिकंद जैसे मत्रमें मणि पिरोया रहताहै ऐसेही सुषुम्णानाडीमें पिरोयाहै इसे मणिपूरचक्र, नानिमंडलमें कहतेहैं ॥ २३ ॥ द्वादशारे महाचक्रे पुण्यपापविवर्जिते । तावजीवो भ्रमत्येव यावत्तत्त्वं न विन्दति ॥२४॥ हृदयों द्वादशदल अनाहत चक्र है जिसमें (तत्त्वातीत) सत्त्व- रज तमोगुणरहित जीव है गुणातीत होनेसे पुण्यपापसेमी रहित है परंतु जब तत्त्वकी पहिचान योगान्याससे होजावै तब ये गुण जीवमें आतेहै विना तत्त्वज्ञान जीव संमृतिमें भ्रमणही करता- रहताहै ॥ २४ ॥ ॥अथ दशनाडीवर्णनम् ॥ ऊ मेढाधो नाभः कन्दो योनिः खगाण्डवत् । तत्र नाड्यः समुत्पन्ना सहस्राणां द्विसप्ततिः॥२६॥ लिंगमूलसे ऊपर नामिते कुछ नीचे कंदके सदृश समस्तना- डियोंका ( मूल )उत्पनिस्थान पक्षिके अंडेकेसमान आकार है इससे बहत्तर ७२ हजार नाडी ऊपर नीचे तिर्छ होकर सर्वांग याप्त हैं ।। २५॥ तेषु नाडीसहस्रेषु द्विसप्ततिरुदाहृताः।

(१८) गोरक्षपद्धति- प्रधानाः प्राणवाहिन्योभूयस्तासु दश स्मृताः॥२६॥ उक्त ७२ हजार नाडियोंमें मुख्य७२ बहत्तरही हैं इनमें भी (पाणवाहिनी) वायुचलानेहारी प्रधान दशही नाडी है ॥२६॥ इडा च पिङ्गला चैव सुषुम्णा च तृतीयका। गान्धारी हस्तिजिह्वा च पूषा चैव यशस्विनी॥२७॥ अलम्बुषा कुहूश्चैव शविनी दशमी स्मृता। एतन्नाडीमयं चक्र ज्ञातव्यं योगिभिः सदा॥२८॥ इडा १ पिंगला २ सुषुम्णा ३ गांधारी ४ हस्तिजिह्वा ५ पूमा ६ यशस्विनी ७ अलंबुपा ८ कुहू ९ शंखिनी १० ये उ- क्त मुख्यनाडियोंके नाम हैं. यह नाडीमय चक्र योगाश्यासीको अवश्य जाननायोग्य है तदनतर इन नाडीयों में चलनेवाले वा- युको जानना तव प्राणायामसे नाडीशोधन होताहै।२७॥२८॥ इडा वामे स्थिता भागे पिङ्गला दक्षिणे स्थिता। सुपुग्णा मध्यदेशे तु गान्धारी वामचक्षुपि ॥२९॥ दक्षिणे हस्तिजिह्वा च पूपा कर्णे च दक्षिणे। यशस्विनी वामकणे ह्यानने चाप्यलम्बुपा ॥३०॥ नासिकाके वामनागमे इडा, दक्षिणभागमें पिंगला नाडी वहती है इनके मध्यम सुपुम्णा नाडी रहतीहे इन तीनीकी जड़ मूलाधाग्चक्रके कर्णिकाका त्रिकोण है. जिसके वामकोणसे इडा, दक्षिणकोणसे पिंगला और पश्चिमकोणसें सुषुम्णा नाडी. उत्पन्न हुईहैं ये तीनों नाडी उक्तचक्रको अंकमाल कियेहैं अ. पने २ ओग्के नासिकाछिद्रसे वहतीहे मध्य सुषुम्णा मूलाधारसे भापानुवाद । श०१ (१९) ब्रह्मरंध्रपर्यंत है अन्य नाडी उक्तचक्के कदसे उत्पन्न होकर प्र- त्येक रंध्रमें है जैसे वामनेत्रमें गांधारी, दक्षिण नेत्रमें हस्तिजि- हा, दक्षिणकर्ण में पूषा, वामकर्णमें यशस्विनी, मुखमें अलं- बुपा है ॥ २९ ॥३०॥ कुहूश्च लिङ्गदेशे तु मूलस्थाने च शशिनी। एवं द्वारं समाश्रित्य तिष्ठन्ति दश नाडयः॥३३॥ लिंगदेशमें कुहू, मूलस्थानमें शंखिनी ये दो उसकंदसे अ- धोमुख होकर नीचेको गईहै और ऊईमुख होकर ऊपरको हैं इसप्रकार ये दश नाडी प्राणवायुके एक एक मार्गमें आश्रय करके स्थितहैं ॥ ३३॥ इडापिङ्गलासुपुम्णाः प्राणमार्गे समाश्रिताः। सततं प्राणवाहिन्यः सोमसूर्याग्निदेवताः ॥३२॥ चंद्रमा, सूर्य और अग्नि हैं देवता जिनके ऐसे इडा, पिंगला, सुपुम्णा ये तीन नाडी प्राणवायुके मार्ग हैं ॥ ३२॥ ॥अथ दशवायवः॥ प्राणोपानसमानश्चोदानव्यानौ च वायवः । नांगः कूमोऽथ कृकलो देवदत्तो धनंजयः॥३३॥ प्राण १ अपान २ समान ३ उदान ४ व्यान ५ नाग ६ ७ ककल ८ देवदत्त ९ धनंजय १० ये दश वायु शरी- में हैं ॥ ३३॥ हदि प्राणो वसेन्नित्यमपानो गुदमण्डले। में (२०) गोरक्षपद्धति- समानो नाभिदेशे तु उदानः कण्ठमध्यतः॥३४॥ व्यानो व्यापी शरीरेषु प्रधानाः पञ्च वायवः। प्राणायाः पञ्च विख्याता नागाद्याः पञ्च वायवः३५। प्राणवायु हृदयमें रहकर श्वास बाहर भीतर निकालता तथा अन्नपानादिकोंका परिपाक करताहै १ अपानवायु मूलाधारमें मलमूत्र वाहर निकालनेका काम करताहै २ समानवायु ना- भिमें शरको (शुष्क ) अर्थात् यथास्थान रखने का काम क- रताहै ३ उदानवायु कंठमें रहकर शरीरकी वृद्धि करताहै ? व्यानवायु सर्वशरीरमें लना, छोडनाआदि अंगधर्म कराताहै ५ घायु तो १० हैं परंतु इनमें प्रधान ये पांचहीं हैं शिवयोगशास्त्र- के मतसे मुख. नासिका, हृदय, नाभिमें कुंडलिनीके चारों ओर तथा पादांगुष्टमें सर्वदा प्राणवायु रहताहै । गुह्य, लिंग, ऊरु, जानु, उदर, पेड़, कटि, नाभि इनमें अपानवायु रहताहैर कर्ण, नेत्र, कंठ, नाक, मुख, कपोल, मणिबंधों व्यानवायु रहताहै ३ सर्वसंधि तथा हात पैरोंमें उदानवायु रहताहै ४ उ- दानिके कलाको लेकर सवागमें समानवायु रहताहै ५ इस कारणसे प्राणादि पांच वायु प्रधान हैं नागादिपांच वायुका कर्म जो'चर्म एवं हड्डी रहकर करतेहै आगे कहतेहैं ॥३४॥३५॥ उद्वारे नाग आख्यातः कूर्म उन्मीलने स्मृतः। कृकरःक्षुतकृन्ज्ञेयो देवदत्तो विजृम्भणे ॥३६॥ जदार टकार निकालना नागवायुका कर्म है । नत्रोंके पलंक - BI भाषानुवाद । श०१ (२१) लगाना खोलना कूर्मवायुका तथा छिंका करना ककरवायका जूंना देवदत्तपायुका कर्म है ॥ ३६ ।। न जहाति मृतं चापि सर्वव्यापिधनंजयः । एते सर्वासु नाडीषु भ्रमन्ते जीवरूपिणः ॥ ३७॥ और धनंजयवायु सर्वशरीरमें व्याप्त रहताहै मृतशरीरमी रहताहै अर्थात् मरेमेनी चार घटीपर्यंत यह शरीरहीमें इसप्रकार ये दश वायु आपही जीवके आयाससे कल्पित होकर सुखदुःखका संबंध जीवको कराते हैं में सुखी हूं उत मैं दुखी हूं इत्यादि व्यवहारमय जीवकी उपावि लिंगशरीरमें होनेसे आपही जीवरुप होकर समस्त नाडियोमै फिरतारहताहै यद्यपि अवि- द्यावछिन्न चैतन्य जीवही है. तो इसका घूमना फिरना असंग- व है तथापि जैसे चंद्रमा तो कंपायमान नहीहै परंतु उसका प्र- तिबिंब जलमें जिससमय हो उससमय उस जलको हिलाया- नाय तो चंद्रबिंब हिलता दीखपडताहै ऐसेही व्यवहारसे दश बायुनका घूमना तथा इनहीकी उपाधि जीवचैतन्यमें आरोपित करतेहैं ॥ ३७॥ आक्षिप्तो भुजदण्डेन यथोच्छलति कन्दुकः । प्राणापानसमाक्षिप्तस्तथा जीवो न तिष्ठति ॥ ३८॥ जैसे कंदुकं (गेंद) हातसे भूमिपर ताइनकरके स्वतः उछ- बताई. तैसेही प्राणवायुके स्थान (हृदय ) में अपानवायु तथा अपानवायके स्थान (गुदा ) में प्राणवायुके प्राप्त होने में अपा- (२२) गोरक्षपद्धति- नवायु जीवको आकर्पण करके एकत्र स्थित नहींरहनेदेता - से गेंद खेलनेवालेके वशमें गेंद रहताहै ऐसेही अविद्या (माया)- के वशमें जीव रहताहै ॥ ३८॥ प्राणापानवशो जीवो बधश्चोर्दै च धावति । वामदक्षिणमार्गेण चञ्चलत्वान्न दृश्यते ॥ ३९॥ जीयकारणसे जीर्वात्मा प्राणअपानवायुके आधीन है उसी कारणसे इडा और पिंगला नाडीके द्वारा गिरके नीचे मूलाधार- पर्यंत ऊपर मुख नासिकाछिद्रपर्यंत फिरताही रहताहै इसके अ- तिचंचल होनेसे इतना कठिन है कि प्राणापानवायुके साधनविना वायु नहीं जीताजाता इसके जीते विना हृदयकमलमें ध्यान न- हाँहोता ॥ ३९॥ रज्जुबद्धो यथा श्येनो गतोऽप्याकृप्यते पुनः । गुणवद्धस्तथा जीवः प्राणापानेन कृप्यते ॥४०॥ जैसे वाजपक्षिके परमें डोरी बांधके हिलाते कि छोडदेने- पर उडजाता एवं खीचनेपर फिर हातमें आयजाताहै ऐसेही मायाक अंश सत्त्वरजतमोगुणके वासनासे बँधाहुवा जीव बुद्धि- की लीनहुयेमें उपाधिरहित शुद्धबल होगयाहो तौमी प्राणापा- नपायुकरके फिर सींचाजाताहै जामतअवस्थामें फिर प्रबुद्धहुये- की वृत्ति विषयमें पुनः जीवनावको प्राप्त कियाजाताहै ॥४०॥ अपानः कति प्राणं प्राणोपानश्च कर्पति । ऊोधः संस्थितायेती संयोजयति योगवित्॥ ४॥ ऊपरसे आज्ञाचनागतप्राणवायु नीचे मूलाधारस्थित अपान- नापानुवाद । श०१ (२३) वायुको तथा मूलाधारगत अपानवायु आज्ञाचक्रस्थपाणवायुको परस्पर अपने २ ओर आकर्पण करतेहैं योगाभ्यासी पुरुष मा- णायामसे इनहींको जोडकर योग (जोडना) कहतेहैं इसी यो- ग जोडनेको हठयोग कहतेहैं जो सूर्यचंद्रमा ऐक्य कहातेहैं हकारेण बहिर्याति सकारेण विशेत्पुनः । हंसहंसेत्यमुं मन्वं जीवो जपति सर्वदा ॥ १२॥ पद शतानि त्वहोरात्रे सहस्राण्येकविंशतिः । एतत्संख्यान्वितं मन्नं जीवो जपति सर्वदा॥४३॥ प्राणवायु सारूप्यको प्राप्त होरहा चिदानास जीव हकार- करके स्वाधिष्ठानचक्रस उत्पन्न होनाह और सकारकरके मूलाधारादि चक्रमें प्रवेश करताहै एवंमकार 'हंस' मंत्र (अजपागायत्री) का जप जीव नित्य करताही रहताहै अर्थात श्वास बाहर निकलने में कार जीतर प्रवेश होने में सकार उच्चारण होताहै सूर्योदयसे पुनः सूर्यास्तपर्यंत ६० घटीम इस मंत्रको जपसंख्या २१६०० होतीहै इतना जप जीव स्वतः करताहै ।। ४२ ॥ ४३ ॥ अजपा नाम गायत्री योगिनां मोक्षदायिनी। अस्याः संकल्पमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥४४॥ अनया सहशी विद्या अनया सहशो जपः। अनया सदृशं ज्ञानं न भूतं न भविष्यति ।। ४५ ॥ यह योमियोंको मोभ देनेवाली अनपा नाम गायत्री है इ- (२४) गोरक्षपद्धति- सके संकल्पमात्रसे योगी समस्तपापोंसे छुटजाताहै संकल्पकी विधि यह है कि सूर्योदयसे पहिलेही शयनसे उठकर शुद्धवस्त्र पहन हात, पैर, मुख प्रक्षालन कर शुद्धआसनमें बैठ आचमन करके संकल्पकल्पना इसप्रकार करना कि अयेह पूर्वारहो- रात्रचरितनासापुटनिःसृतोच्छासनिःश्वासात्मकपट्शताधिकैक- विंशतिसहस्रसंख्याकाजपागायत्रीजपं मूलाधारस्वाधिष्ठानम- णिपूगनाहतपिशुद्धाज्ञाचक्रब्रह्मरन्ध्रस्थितेत्यो गणपतिब्रह्मविष्णु- रुद्रजीवगुरुपरमात्मायः सिद्धिसरस्वतीलक्ष्मी गौरी प्राणशक्ति- ज्ञानशक्तिचिच्छक्तिसमेतन्यो यथासंख्यं षट्शतं, पट्सह- सं, पट्सहस्र, सहस्रमेकं, सहस्रमेकं, सहस्रमेकम् अजपागायत्री जपं प्रत्येक निवेदयामि इति निवेद्य । पुनरय प्रातःकाल- मात्य द्वितीयप्रातःकालपर्यन्तं नासापुटनिःसृतोच्यासनिःश्वासा- त्मकं पट्शताधिकैकाविंशतिसहस्रसंख्याकमजपागायत्रीजपमहो- रात्रेणाहं करिष्ये इति जायमानजपसंकल्पं रुत्वा स्वकृत्यमाचरेत् इस अजपाके समान जीवनश्लका अभेद कहनेवाला और कोई मंत्र नहींहै यह अल्पश्रममें उत्तम फल देनेवाला और जप नहीं. क्योंकि प्रातःकाल संकल्पमात्र करनाहै उपांत खाते पिते. च- लते उठते बैठते सोते सर्वदा सबअवस्थाओंमें उक्त जप आपसे होताही रहताहै और अद्वैतानुभव करानेवाला. उसके समान अन्य कोई ज्ञानशास्त्र पहिलेभी नहींथा और पीछे होनेवालानी नहींह ॥४४॥ ४५ ॥ १ .

भाषानुवाद । श०१ (२५) प्राणविद्या महाविद्या यस्ता वेत्ति स वेदवित्।।४६॥ कुंडलिनी महाशक्तिसे उत्पन्न होरही. तथा प्राणवायुको धारण करनेवाली यही अजपा गायत्री है. जीवात्माकी शक्ति प्राणविद्यास्वरूपी यही है इसीकारण महाविद्यानी इसको कहनेहैं इसे जो योगी पहिचानसके वही योगशास्त्राज्यासका तात्पर्य जानताहै ॥ ४६॥ ॥ अथ शक्तिचालनम् ॥ कन्दोरे कुण्डली शक्तिरधा कुण्डलाकृतिः। ब्रह्मद्वारमुखं नित्यं मुखेनाच्छाद्य तिष्ठति ॥१७॥ अव कुंडलिनीके भेद खोलनेनिमित्त एवं उसकी अधिकता प्रकट करनेकेलिये कुंडलिनीका और प्रकारशी स्थान कहतेहैं कि समस्त ७२००० नाडीनका उत्पत्तिस्थान पूर्वक्ति कंद है इसके ऊपर मणिपूरचक्र कणिकामें आठ वृतकरके वेष्टित होरही कुंडलिनीशक्ति ब्रह्मरंधद्वारके मुखको रोकके सर्वदा र- हतीहै ॥४७॥ येन द्वारेण गन्तव्यं ब्रह्मद्वारमनामयम् । मुसेनाच्छाद्य तद्वारं प्रसुप्ता परमेश्वरी ॥१८॥ प्रवुद्धा बुद्धियोगेन मनसा मरुता सह । सुचीव गुणमादाय वजत्यूच सुपुम्णया ।।१९॥ जिम मार्ग (सुपुग्णा) करके जन्ममरणके दुःख हरण क- नेवाला अखंड त्रमानंरपट मिलनाह इस मार्गको रोकके सोई.

(२६) गोरक्षपद्धति- हुई कुंडलिनी प्राणवायुके धौकने ( उत्तेजन करने ) से काला- मिके ज्योतिके संबंधसे प्रबुद्ध (जामत) होकर मन एवं प्राण- वायुके सहित होके सुपुम्णानामा मध्यनाडीसे ऊपरको जातीहै जसे सूची (सुई) अपनेपर पिरोये तागेसहित होनसे वस्त्रके अनेक सूत्रोंके मध्यमें प्राप्त होती है. तैसे आपही सृष्टि उत्पन्न करके पट्चक्र तथा उनके देवताप्रति सकलप्रपचको उल्लं- घन करके ऊपर सहस्रदलकमलके सन्मुख होकर जातीहै ॥४८॥१९॥ प्रसुप्तभुजगाकारा पमतन्तुनिभा शुभा। प्रबुद्धा बहियोगेन बजत्यूचं सुपुरणया ॥५०॥ सोते सर्पके समान कुंडलिनी अपानवायुसे धमित (धौं- कागया) जो मूलाधारमें रहनेवाला कालानिज्योतिके सबसे प्रबोध पायके अतिवेग (जोर) से चलताहुवा सर्पके समान कुटिलगति होकर, कमलनालके तंतु (सूत्र) समान सूक्ष्म ज्यो- तिर्मयस्वरूपा होकर सुपुम्णामार्गसे ऊपरको जातीहै ।।५० ॥ उद्घाटयेत्कपाटं तु यथा कुञ्चिकया हठात् । कुण्डलिन्या तथा योगी मोक्षद्वारंप्रभेदयेत् ॥५१॥ जैसे कुँची (चायो ) से ताला सुलकर कपाट (केवाडे) खुलनातेहैं तसेही कुडलिनीकरके मोक्षदार सुपुम्णाके मुखको योगी अन्याससे खोले जिससे कि कुंडलिनीके प्रबोधपिना, भाषानुवाद । २०१ (२७) गाढं वक्षसि सन्निधाय चिबुकं ध्यानं च तच्चेतसि ।। वारंवारमपानमूर्ध्वमनिलं प्रोचारयेत्पूरितम् । मुञ्चन्प्राणमुपैति वोधमतुलं शक्तिप्रभावादतः।।२।। दोनहूँ हात (संपुटित) अंजली बांधके दोऊ ( कपर) वा- हुमध्यभाग हृदयमें दृढ स्थापन करके पनासन करे चिचुक (ठोडी ) हृदयमें दृढतर लगायके अर्थात् जालंधरबंध करके ज्योतिःस्वरूपका ध्यान करे केवल कुंभकमाणायाम अधोदार रोकके करे प्राणायामसे कुंभितवायुको अपानवायुसे एकत्व करके यथाशक्ति कुंभक करे पुनः रेचकप्राणायाम ( जिसमें घायु अतिमंद रनिकस ) करे इसपकारसे कुंडलिनीका बोध होताहै तथा योगीको अपरिमित ज्ञान मिलताहे. कुंडलिनीके प्रबोध करनेवाली शक्तिचालनमुद्रा यही होतीहै परंतु प्राणाया- मक अभ्याससे प्राणापानवायुको दशवर्ती करके इस मुद्दाका बहुत कालपर्यंत अन्यास करना होताहै ।। ५२ ।। अङ्गानां मर्दनं कृत्वा श्रमसातवारिणा । कट्सम्ललवणत्यागी क्षीरभोजनमाचरेत् ॥ ५३॥ ब्रह्मचारी मिताहारी त्यागी योगपरायणः । अन्दादूय भवेत्सिहो नात्र कार्या विचारणा॥५४॥ शक्तिचालनमुद्राके अत्यासीके नियम कहतह कि प्राणा- रामादिकमसे जो अंगों स्देद (पसीना) आताह उसमे अंगमर्दन लो लवण और सट्टा ये दो रस न साथै केवल दुग्धान्न साया- । भोजननी एक प्रमाणसे को ब्रह्मचर्य रक्खे कामक्रोधमेर- (२८) गोरक्षपद्धति- हित रहै त्यागवान होवै योगाभ्यासका मात्र आयास रखे इ- सप्रकार नियममें रहकर योगान्याससे शक्तिचालनमुद्राके अ- यास करे एकवर्ष ऊपर जव इच्छा करे तती कुंडलिनीके आयुत्थानके सामर्थ्य होतीहै इसमें सिद्धि होतीहै या नहीं ऐसा सदेह न करना आयाससे अवश्यमेव सिद्धि होतीहै ।। ५३ ॥ ॥५४॥ सुस्निग्धो मधुराहारी चतुर्थाशविवर्जितः। भुञ्जते स्वरसं प्रीत्यै मिताहारी स उच्यते ॥१६॥ मिताहारके लक्षण कहतेहैं स्निग्ध (सचिक्कण ) मीठा भो- जन करे अम्ल (खट्टा) और लवणवर्जित करे दो भाग अन्न एक भाग जल खावै चौथा भाग उदरमें वायुसंचारकेलिये छोडदेव. देवताको निवेदन करके दुग्धान्न भोजन करे इसप्रकार विधि करनेहारा योगी मिताहारी कहाताहै ॥ ५५॥ कन्दोचे कुण्डली शक्तिः शुभमोक्षप्रदायिनी। बन्धनाय च मूढानां यस्ता वेत्ति स वेदवित् ॥५६॥ कंदके ऊपर मणिपूरचक्रके कर्णिका ८ फेरे वेष्टित होकर कुडलाकार कुडलिनी शक्ति है यह मूर्खजनाको वारवार ज- न्ममरणरूप यवन देतीहे ओर योगाायाम जाननेवालेको श तिचालनका आपास जन्ममरणरुप वधन छुटायके में देती है।

भाषानुवाद शि०१ १२९) अथ शक्तिचालनविधौ ग्रन्थान्तरे विशेषः॥ गङ्गायमुनयोमध्ये बालरण्डा तपस्विनी। बलात्कारेण गृहीयात्तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ १ ॥ शक्तिचालनमें ग्रंथातरमतसे कछ विशेप कहतेहैं कि, गंगा- यमुनाके बीच नपस्विनी बालरंडावलात्कारकरके कुंडलिनीको ग्रहण करे तो विष्णुके परमपद (ब्रह्मांड) में प्राप्त करती हैं। १।। इडा भगवती गङ्गा पिङ्गला यमुना नदी । इडापिङ्गलयोर्मध्ये बालरण्डा च कुण्डली ॥२॥ इडा भगवती चामश्वासा नाडी ऐश्वयादिसंपन्न गंगा, दक्षिणश्वासा पिंगलानाम्नी यमुना है इनके मध्यनाडी सुपुग्णा बालरंडा है ॥२॥ उर्व वितस्तिमानं तु विस्तारं चतुरङ्गुलम् । श्वेतं तु मृदुलं प्रोक्तं वेष्टितं वरलक्षणम् ।। ३ ।। मूलस्थानसे वितस्लिमात्र ऊपर नानि एवं मेढ़के मध्य में नवांगुल विस्तार, चार अंगुल आयाम, पक्षीके अंडाकार, थे- तरंग कोमल वस्रवेष्टित जैसा कंद है ॥३॥ सति वज्रासने पादौ कराभ्यां धारयेदृढम् । गुल्फदेशसमीपे च कन्दं तत्र प्रपीडयेत् ॥ ४॥ बजासनकरके हाथोंसे पैरोंके एडी पक्ट कंटस्थानमें स्ट लगार पोडन करें ॥४॥ वासने स्थितो योगी चालयित्वा च कुण्डलीम् ।

(३०) गोरक्षपद्धति-
कुर्यादनन्तरं भस्रां कुण्डलीमाशु बोधयेत् ॥५॥
योगी बजासनमें बैठ कुडलीको शक्तिचालनमुद्रासे च-
लायमान करे तब भस्रा नाम कुक कर कुंडलिनीशक्तिको
शोध प्रबोधित करे ।। ५॥
भानोराकुञ्चनं कुर्यात्कुण्डली चालयेत्ततः ।
मृत्युवक्रगतस्यापि तस्य मृत्युभयं कुतः॥६॥
नाभिस्थान (सूर्य ) को आकुंचन कर कडलीको चलाये
इसका आयास सिद्ध होजाय तो मृत्युके मुखमें पडगयाहो तौ-
भी उसकी मृत्यु न होवै ॥ ६॥
मुहूर्त्तव्यपर्यन्तं निर्भयं चालनादसौ।
ऊर्ध्वमाकृष्यते किञ्चित्सुषुम्णायां समुद्ता ।। ७॥
चार घडीपर्यंत निर्मय होकर शक्तिचालन करे तो कुड-
लिनो कछुक सुपुग्णामें ऊपरका ऊठतीहै ।। ७ ॥
तेन कुण्डलिनी तस्याः सुपुम्णाया मुखं ध्रुवम् ।
जहाति तस्मात्प्राणोयं सुपुम्णां ब्रजति स्वतः॥८॥
इससे कुडलिनी (जो सुषुम्णा रोक बैठीहै ) सुपाणाका
द्वारको छोडदेतीहै तब प्राणवायु आपही सुपुग्णामें प्रवेशफरता-
है॥८॥
तस्मात्सञ्चालयेत्रित्यं सुससुप्तामरुन्धतीम् ।
तस्याः सञ्चालनना योगी रोग-प्रमुच्यते ॥९॥
इससे नित्यप्रति सुपुग्णादारमें सोती कुंडलिनी चलाच-
छूटना ॥ ९ ॥

भापानुवाद । श०१ येन सञ्चालिता शक्तिः स योगी सिद्धिभाजनम् । किमत्र बहुनोक्तेन कालं जयति लीलया ॥१०॥ जिस योगीने शक्तिचालन किया वह अणिमादिसिद्दि- योका पात्र होताहै और विशेष माहात्य क्या कहाजाय वह काल (मृत्यु) को सहजही जीतलेताहै ॥ १० ॥ कुण्डली चालयित्वा तु भस्रां कुर्याद्विशेषतः । एवमभ्यस्यतो नित्यं यमिनो यमभीः कुतः॥११॥ जो यमी नित्य कुंडली चलायके भला कुंजकका आयास विशेषकरके करताहै तो उसको यमको भय नहींहोती ॥११॥ इयं तु मध्यमा नाडी दृढाभ्यासेन योगिनाम्। आसनप्राणसंयाममुद्राभिः सरला भवेत् ॥१२॥ योगियोंको दृढाल्याससे आसन प्राणायाम महामुद्रादि करके ( मध्यनाडी ) सपुग्णा सरल होजातीहै ।। १२॥ ॥ अथ महामुद्राः॥ महामुद्रां नभोमुद्रां उड़ीयानं जलंधरम् । मूलबन्धञ्च यो वेत्ति स योगी मुक्तिभाजनः॥१७॥ महामुद्रा १ खेचरीमुदा २ उड्डीयानवध ३ जालंधरवट मूलबंध ५ इनको करके शक्तिचालन करे तो योगी मुक्तिनाज- न होताहै शक्ति चली या नहीं इसके जाननेंका प्रमाण यह है कि से शरीरमें पिपीलिका (चीठी) चल में उसकी गतिसे ज्ञात ताहै कि कुछ जीव चलता है. ऐसेही सुषुम्णामें वायु जा च- . (३२) गोरक्षपद्धति- लने लगताह तो शक्ति चलायमान होगयी जानना शक्तिचा- लनमुद्राके पीछभी उक्त ५ मुद्रा करनी योग्य है ॥ ६ ॥ वक्षोन्यस्तहनुः प्रपीड्य सुचिरं योनि चवामाक्षिणा हस्ताभ्यामनुधारयेत् प्रसरितं पादं तथा दक्षिणम् । आपूयं श्वसनेन कुक्षियुगलं बड़ा शनै रेचये- देपाव्याधिविनाशिनी सुमहती मुद्रा नृणां कथ्यते५८ महामुद्राकी विधि कहतेहैं कि हृदयमें, चिबुक जोरसे धारणकरके वामपादके एडीसे योनिस्थानके अत्यंत दृढकरके अचेते दहिना पाद लंबा करके दोनहूं हाथोंसे पादमध्यभाग पकडके दृढ रोके. तब पेटमें पूरक विधिसे वायु भरे कुछ काल यथाशक्ति कुंभक करके मंद मंद वायुको रेचन करे. यह योगि- जनको समस्त रोगनाशक महामुद्रा कहीहै ।। ५८॥ चन्द्राङ्गेन समभ्यस्य सूर्याङ्गेनाभ्यसेत्पुनः । यावनुल्या भवेत्संख्या ततो मुद्रा विसर्जयेत्॥१९॥ इस महामुद्राके आयासमें प्रथम वामांगसे आयास करके पीछे दाहिने अंगसे करे तसेही प्राणायामभी करतारहे जब दोनहूं ओरके अत्याससे प्राणायामकी मात्रा बराबर होजाय तब मु. द्रा छोडनी तबतक उक्त आयास करतारहता ॥ ५९॥ नहि पथ्यमपथ्यं वा रसाः सर्वपि नीरसाः । अपि भुक्तं विपं घोरं पीयूपमिव जीर्यते ।। ६०॥ क्षयकुष्ठगुदापतंगुल्माजीणपुरोगमाः। i यान्ति महामुद्रांच योभ्यसेद ६६ - जापानुवाद श०१ (३३) कथितेयं महामुद्रा महासिद्धिकरी नृणाम् । गोपनीया प्रयत्नेन न देया यस्य कस्यचित् ॥६२॥ जव महामुद्राका आयास हट होजाय तो, पथ्यापथ्यविचार कुछ नहींरहता. मिष्ठ, लवण, तिचआदियों स्वाद कुछ नहीं- रहता. जो (घृत, सहद बराबर मिलायके रुत्रिम विष होताहै) संयोगविरुद्ध वस्तु, वा घोरविपनी खावै तो अमृतके समान प- चिजाताहै तथा उदावर्त, गुल्म, अजीर्ण, क्षय, कुष्ट, आदि रोग समस्त शांत होजातेहैं. इसके अयासीको महासिद्धि देनेहारी यह महामुद्रा कहीहै इसे बडे यनसे गुप्त रखना प्रकाश करनेसे सामर्थ्यहीन होताहै इसहेतु अनधिकारी, अयोग्य पुरुप, शठ, दांभिकआदि जैसे कैसेको न देना ।। ६० ॥६१ ॥ ६२ ॥ 'इसका विस्तार ग्रंथांतरसे पाठकोंके सुवोधार्थ लिखतेहैं.'- पादमूलेन वामेन योनि संपीड्य दक्षिणम् । प्रसारितं पद कृत्वा कराभ्यां धारयेदृढम् ॥ १॥ वामपादके एडीसे गुदा और शिश्नके मध्यमें योनिस्थानको रोकक दाहिना पैर लबा पृथ्वोंमें फैलाय जैसे एडी भूमिमें रहे और अंगुली ऊंची दैडके से नाई रहैं. तब हातोंके अगुष्ठ और तर्जनीसे दक्षिणपादांगुष्ट पकडके धारणकरे ॥ १ ॥ कण्ठे बन्धं समारोप्य धारयेद्वायुमूर्धतः । यथा दण्डाहतः सो दण्डाकारः प्रजायते ॥२॥ तदनतर ठमें जालभरबध करके वायूको ऊपर सुषुम्णामें (३४) गोरक्षपद्धति धारण करे इससे मूलबंधनी होजाताहै जहां योनिस्थानको पीडन और जिह्वाबंध करके मूलबंध होजाताहै ।। २।। ऋज्वीभूता तथा शक्तिः कुण्डली सहसा भवेत् । तदा सा मरणावस्था जायते द्विपुटाश्रया ॥३॥ जैसे सर्प दंडके प्रहारसे दंडाकार होजाताहै ऐसेही कुंडलिनी शक्तिली कुटिलताको छोडकर इस मुद्रासे सरल होजातीहै और कुंडलिनीके बोधसे सुपुम्णामें वायुका प्रवेश होताहे तब दोनहूँको प्राणके वियोगसे इडा पिंगला हैं आश्रय जिसके ऐसी मरणावस्था होतीहै ।। ३॥ ततः शनैः शनैरेव रेचयेन्नैव वेगतः। महामुद्रां च तेनैव वदन्ति विबुधोत्तमाः॥४॥ इयं खलु महामुद्रा महासिदैः प्रदर्शिता । महाक्केशादयो दोपाः क्षीयन्ते मरणादयः ॥५॥ तदनंतर शनैः शनैः रेचन करै वेगसे करनेमें बलहानि होतीह इससे महामद्राआदि नाथादि महासिद्धोंने दिखाईहै इसके आयाससे महालेश, अविद्या, राग, द्वेपादिक, शोकमोहादिदोप क्षीण होतेहैं तथा जरामरणभी नहींहोते इससे ज्ञानिजन इसे महामुद्रा कहतेहैं ॥ ४ ॥५॥ महामुद्रांच तेनैव वदन्ति विश्धोत्तमाः। चन्द्राङ्गेतु समभ्यस्य सूर्याङ्ग पुनरभ्यसेत् । यावृत्तुल्या भवेत्संख्या ततो मुद्रां विसर्जयेत् ॥६॥ कि (चंद्रांग) वामभागमें आयास

भाषानुवाद । २०१ (३५)
सय्यांग ( दक्षिणभाग ) में आयास करे और वामांगाच्यासके
पीछे जबलौं वामांगमें कुंताककी संख्या समान हो तबलौं अ-
भ्यास करै जब संख्या समान होतब महामुद्रा विसर्जन करे इस-
में यह क्रम है कि वामपादके एडीको योनिस्थानमें लगाय दा-
हिना पाद लंबा फैलाय-अंगुष्ठकों हातके अंगुष्ठ तर्जनीसे पकड-
के आयास करे यह वामांगायास है इससे पूरित जो वायु सो
वामांगमें स्थित रहताहै फिर दक्षिणपादको समेटताकी एडी यो-
निम लगाय वामपाद लंवा फैलाय अंगुष्टको हातके अंगुष्ट वर्जनी-
से पकडके अभ्यास करे इसे दक्षिणांगाभ्यास कहतेहैं इससे
पूरित वायु दक्षिणांगहीमें रहताहै ॥ ६ ॥
नहि पथ्यमपथ्यं वा रसाः सर्वेपि नीरसाः।
अपि भुक्तं विषं घोरं पीयूपमिव जीर्यते॥७॥
गुण कहतेहैं कि महामुद्राके अभ्यासको पथ्यापथ्यविचार नहीं-
है कटु, अम्लादि समस्त रसादिक जो खाय वहीं परजायै नीर-
स, बासी, पर्युपित सब पचे. तथा दुर्जर ( घोर विष) आदि-
भी अमृतके नाई पचनावै ॥ ७ ॥
क्षयकुष्ठगुदावर्तगुल्माजीर्णपुरोगमाः।
तस्य दोपाः क्षयं यान्ति महामुद्रां तु योभ्यसेत्॥८॥
जोपुरुष महामुद्राका अन्यास करे उसे क्षयरोग, कुष्ट, गुल्म-
रोग, अजीर्ण, ज्यर, प्रमेह, उदररोगादि कमी न होवें ॥८॥
कथितेयं महामुद्रा महासिद्धिकरी नृणाम् ।
गोपनीया प्रयत्नेन न देया यस्य कस्यचित् ॥९॥

(३६) गोरक्षपद्धति- और उस आपासीको अणिमादि महासिद्धि देनेहारी यह महामुद्रा कहीहै इसे गुप्त रखना अर्थात् अनधिकारीको न देना ॥९॥ ॥अथ खेचरीमुद्रा॥ कपालकुहरे जिह्वा प्रविष्टा विपरीतगा। ध्रुवोरन्तर्गता दृष्टिर्मुद्रा भवाति खेचरी॥६३॥ खेचरीमुद्राकी विधि कहतेहैं कि, जिह्वाको उलटे फिरायके कंठमूलमें जो छिद्र (लिलिग्या) याने क्षुद्रघंटिका है उसमें प्रवेश करना तदनंतर चूमध्यमें निश्चल दृष्टि स्थिर करना इसे खेचरीमुद्रा कहतेहैं ।। ६३॥ न रोगान्मरणं तस्य न निद्रा न क्षुधा तृपा। न मूर्छा तु भवेत्तस्य यो मुद्रां वेत्ति खेचरीम्॥६॥ जो योगी गुरूपदिष्ट मार्गकरके छेदन. दोहन, कर्पण, (ये- कर्म आगे कहेंग) प्रकारसे खेचरीमुद्राको बहुतकालपर्यंत अभ्यास करताहै उसको रोग, निद्रा, सुधा, तृपा, मूर्छा और मरणतुल्य कष्ट दूर होतेहैं ॥ ६४॥ पीच्यते न च शोकेन न च लिप्येत कर्मणा । वाध्यते न स केनापि यो मुद्रां वेत्ति खेचरीम्।।६।। जो योगी खेचरीमुद्रा जानके उन अत्यास करिके सिद्धि करताहै वह शोकसे पीडित नहींहोता. कर्मके फलमे बंधन नहीं मृत्यु आदियसिभी बाधा नहींपाता ॥६॥ .

। -- भापानुवाद। श०३ (३७) चित्तं चलति नो यस्माजिह्वा चरति खेचरी । तेनेयं खेचरी सिद्धा सर्वसिद्धैनमस्कृता ॥६६॥ जिसकारण तहां परब्रह्मविषये एकाग्र होकर मन बुद्धि चित्त शून्यवि फिरताहै तथा जिह्वानी कंठमूल छिद्राकाशमें रहके ब्रह्मरंध्रांतर्गत चंद्रकलामृतका पान करतीहै इस हेतुसे मनबुद्धिक विषयबंधन निवारण करनेहारी खेचरी मुद्रा समस्त सिद्धजनोंसे अत्यंत पूजित ( नमस्य) है ॥ ६६ ॥ विन्दुमूलं शरीराणां शिरास्तत्र प्रतिष्टिताः। भावयन्ति शरीराणामापादतलमस्तकम् ॥ ६७ ।। शरीरका मूल (कारण) बिंदु है इससे शरीरकी रक्षा है. पादसे शिरपर्यंत समस्त नाडीजाल बिंदुसे सेचन होरहीहैं इसी- हेतु उक्तनाही सजीव स्वकर्मसामर्थ्य रहती, अर्थात् समस्त नाही बिंदुके आधारमें है ॥ ६॥ खेचा मुद्रया येन विवरं लम्बिकोव॑तः । न तस्य क्षरते विन्दुः कामिन्यालिङ्गितस्य च ॥६८॥ जिस योगीने कंठमालके छिद्रलंबिकाके ऊपर आकाशवि खेचरीमुद्रासे रोकलिया. तो चंद्रामृत रुकनेसे उस योगीको कामिनी (स्त्री) आलिंगन करै तौसी उसका मन चलायमान नहींहोता तथा बिंदु नहींगिरताहै ।। ६८ ॥ यावद्विन्दुः स्थितो देहे तावन्मृत्योभयं कुतः। यावद्दा नभोमुद्रा तावद्विन्दुर्न गच्छति ॥ ६९ ॥ जबलों देहमें विंदु स्थिर है. तावत् मृत्युकी भय नहींहोती (३८) गोरक्षपद्धति- विंदुका स्थान व्योमचक है इससे कालकी गति नहींहै. जबली खेचरीमुद्रा दृढ है तवली बिंदु व्योमचक्रसे नहींगिरता. इसके स्वस्थानस्थ रहनेमें कालका वश नहींचलता ॥ ६९ ॥ चलितोपि यदा विन्दुः संप्राप्तश्च हुताशनम् । बजत्यूर्य हृते शक्त्या निरुद्धो योनिमुद्रया ॥७०॥ कदाचित् एकाय न होनेसे बिंदु उत्तरके नाभिस्थान सू. र्यमंडलमें पहुँचगया तो योनिमुद्राकरके कुडलिनीशक्तिको ऊपर उठायके उसके आघातसे उक्त विंदु पुनः ऊपर लौटके अपनेही स्थानमें प्राप्त होकर स्थिर रहताहै ॥ ७० ॥ स पुनर्द्विविधो बिन्दुः पाण्डुरो लोहितस्तथा । पाण्डुरः शुक्रमित्याहुलॊहिताख्यो महारजः ॥७१॥ उक्त विंदु दो प्रकारका होताहै एक तोपांडुरवर्ण जिसे शुरु कहतेहैं दूसरा (लोहित ) रक्तवर्ण इसे महारज कहते हैं।।७१॥ सिन्दूरद्रवसंकाशं नाभिस्थाने स्थितं रजः। शशिस्थाने स्थितोविन्दुस्तयोरैक्यं सुदुर्लभम् ७२ तेल मिलायके सिंदुर (हिंगुल) का दव (रस) के समान रज सूर्यस्थान नाशिमंडलमें रहताहै तथा बिंदु (वीर्य) चंद्र- माके स्थान कंटदेश पोडशारचक्रमें स्थिर रहताहै इन दोनहै- का ऐक्य (मेल ) अत्यंत दुर्लन है ।। ७२ ॥ विन्दुः शिवो रजः शक्तिश्चन्द्रो बिन्दू रजो रविः । अनयोः महमादेव प्राप्यते परमं पदम् ।।७३ पET- प. है, इनके एक्होनमें योगमिद्धि है।

भापानुवाद । श०१ परमपद मिलताहै चंद्रमा सूर्यका (प्राणवायु अपानवायुका जी- वात्मा परमात्माका ) ऐक्य करना यही हठयोगपदका अर्थ है वायुना शक्तिचारेण प्रेरितं तु यदा रजः। याति विन्दोः सहकत्वं भवेदिव्यं वपुस्ततः ॥७४॥ शक्तिचालनविधिसे वायुकरके जब रज बिंदुके साथ ऐ- क्यको प्राप्त होताहै तव शरीर दिव्य होजाताहै अर्थात् उसे अग्नि जलातनिहीं शस्त्रसे कटतानहीं ॥ ७४ ॥ शुक्र चन्द्रेण संयुक्तं रजः सूर्येण संयुतम् । तयोः समरसैकत्वं यो जानाति स योगवित् ।।७५॥ शुक्र बिंदुरूप हो चंद्रमासे मिला और रज रक्तरूप होकर सूर्यसे मिला इनका (समरसैकत्व) चंद्रमूर्य्यस्वरूप बिंदुरज- का समरसत्वनायको जो योगी जानताहै वह योगवित् कहा- ताहै चंद्रमा एवं सूर्यको योगको योग कहातेहैं ॥ ५५ ॥ शोधनं नाडिजालस्य चालनं चन्द्रसूर्ययोः । रसानां शोपणश्चैव महामुद्राभिधीयते ॥ ७६ ॥ नाडीजालके शोधनसे, इनमें रहनेवाले वात-पित्त-कफादि रोगोंका हरण होताहै. चंद्रसूर्यके चालनसे इनके एकत्र होने में साया अन्न, पिया जलका शोपण होताहै ऐसा महामुद्राका “न है. अर्थात् इस मुद्राकरिके नाडिजालका शोधन चंद्रसूर्य- पोलन रसोंकाशापणे होताहै ।। ७६ ।। - - (४०) गोरक्षपद्धति- ॥ ग्रन्थान्तरे खेचरीमुद्राविधिः॥ छेदनचालनदोहैः कलां क्रमेण वयेत्तावत् । यावद्भूमध्यं तु स्पृशति तदा खेचरीसिद्धिः॥१॥ जिह्वा खेचरीयोग्य करनेकी विधि ग्रंथांतरसे कहतेहैं कि छेदन-चालन-दोहनकर्मसे जिह्वा बढताहै, छेदन आगे कहेंगे, चालन यह है कि अंगुष्ठ और तर्जनीसे जिह्वाको हिलाते रहना, दोहन दोनहूं हाथोंके अंगुष्ट तर्जनीसे जैसे गौके थनको दुहै ऐसे खींचखींचके जिह्वाको लंबी करे जबतक बाहर निकल- कर चुकुटीको सर्शन करे तबतक ये विधि करतारहै ।। १ ॥ सुहीपत्रनिभं शस्त्रं सुतीक्ष्णं स्निग्धनिर्मलम् । समादाय ततस्तेन रोममात्रं समुच्छिनत् ॥२॥ छेदन कहतेहैं कि थूहरके पत्रके समान अति तीक्ष्ण, सचिक्कण निर्मल शनसे जिह्वाके नीचेकी नशको रोममात्र छेदनकरे ॥२॥ ततः सैन्धवपथ्याभ्यां चूर्णिताभ्यां प्रपर्पयेत् ! पुनः सप्तदिने प्राप्ते रोममात्रं समुच्छिनेत् ॥ ३॥ तापीछे सेंधा, नीमक, हेर्ड का चूर्ण छेदितस्थानपर मले. परंतु योगीकोलवणनिषेध है इसलिये लवणके स्थान खदिर (कथा)- से कार्य करना योग्य है एसे सायंप्रातः सात दिन करके फिर पूर्वोक्त विधिमे रोममात्र काटे पुनः उक्त औषधी लगातारहै॥३॥ एवं क्रमेण पण्मासं नित्यं युक्तः समाचरेत् । पण्मासादसनामूलशिलां वन्धः प्रणश्यति ॥४॥ । नित्य युक्तिसे करे तो निद्वामू एसे छः भाषानु बाद । श०१ (४३) नाडी जो जिह्वाको कपाल कुहरमें पौंछानेसे रोकतीहै वह सुख- पूर्वक कटजातीहै ॥ ४॥ कलां पराङ्मुखी कृत्वा त्रिपथे परियोजयेत् । सा भवेत् खेचरी मुद्रा व्योमचक्र तदुच्यते ॥५॥ जिद्दाको तिर्थी कर के वीनहूं नाडियोंका मार्ग जो कपाल- छेद इसमें योजित करें ये खेचरीमुद्रा है इसीको व्योमचक्रमी कहतेहैं ॥५॥ रसनामूर्ध्वगां कृत्वा क्षणार्द्धमपि तिष्ठति । विपैर्विमुच्यते योगी व्याधिमृत्युजरादिभिः ॥६॥ तालूके ऊपर छिमें जिह्वामवेश करके एकघडीमात्र खेचरी मुद्रा स्थिर रहे तो योगी ने सर्प विआदियोंका विप न लगे और बुढापा, रोग, मृत्युको जीते वलीपलित (जो बुढापे च- मटोला होकर सलवटें पाती) न होवें ॥६॥ अलजिह्वः स्थिरो भूत्वा सोमपानं करोति यः । मासान न संदेहो मृत्युंजयति योगवित् ॥७॥ तालूके ऊपर छिद्रके सन्मुख जिह्वा लगाय स्थिरकरके भू- मध्यगत चंद्रमासे निकसे अमृानका पान जो योगी करे वह १ पक्ष (१५) दिनमें मृत्युको निस्संदेह जीत लेताहै यह निश्चय नित्यं सोमकलापूर्ण शरीरे यस्य योगिनः । तक्षकेणापि दष्टस्य विपं तस्य न सर्पति ॥ ८॥ भऔर जिस योगोका शरीर नित्य उक्त चंद्रामृतकरकै पू- (४२) गोरक्षपद्धति- ण होजाय तो तक्षकनामभी उसे डसे तोमी विप न लगे. दुःख न होवे ।। ८॥ इन्धनानि यथा बहिस्तैलवति च दीपकः। तथा सोमकलापूर्ण देही देहं न मुञ्चति ॥९॥ जैसे अग्नि काठको एवं दीपक तेलसाहित पत्नीको नहींछो- डते तैसेही चंद्रामृतपरित देहको जीव कदापि नहींछोडता॥९॥ गोमांस भक्षयेन्नित्यं पिवेदमरवा रुणीम् । कुलीनं तमहं मन्ये इतरे कुलपातकाः ॥१०॥ आचार्य कहते हैं कि जो योगी नित्य गोमांस भक्षण एवं अमरवारुणी पान करे तो उसे हम उनमकुलमें उत्पन्न समझते हैं अन्यथा कुयोगी, कुलनाशक है सत्कु लमें उत्पन्न हुयेभी तो उ- नका जन्म व्यर्थ है ॥ १०॥ गोशब्देनोदिता जिह्वा तत्प्रवेशो हि तालुनि । गोमांसभक्षणं तनु महापातकनाशनम् ॥११॥ इस गोमांसशब्दका अर्थ कहते हैं कि गोशब्दकरके यहां जिज्ञासा वोधक है जिह्वाको कपालछिमें प्रवेश करने को गोमांस भक्षण कहतेहैं. यह महापातकोंका नाश करताहै।११ जिहाप्रवेशसंभूतवहिनोत्पादितः सलु। चन्द्रात्स्रवति यः सारः स स्यादमरवारुणीम् ॥१२॥ अमरवारुणीका अर्थ है कि ताटके ऊपर छिद्रमें जिहाद प्रवेश उप्मा (मा. भीतर वामनागस्थित चंद्रामृत

जिह्वाको कपालछिदम लगाय मुस विपरीतकरणीक तरह
ऊंगवर कुंडलिनीके ध्यानसहित प्राणायामसे चुकुटीमध्य
भाषानुवाद । २०३
(४३)
इवित होकर जिह्वायमें प्राप्त होताहै इसे अमरवारुणीपान
कहते हैं ।। १२॥
चुम्बन्ती यदि लम्बिकायमनिशं जिह्वासरस्यन्दिनी
सक्षारा कटुकाम्लदुग्धसदृशी मध्वाज्यतुल्या तथा।
व्याधीनां हरणं जरान्तकरणं शस्त्रागमोदीरणं
तस्य स्यादमरत्वमष्टगुणितं सिद्धाङ्गनाकर्षणम्॥१३
जब पूर्वोक्तकोसे जिह्वा बढायके उक्त विधिसे चंद्रामृत
पान करने लगतीहै तो मुखमें लवणसहित मिरिचादि, चिंचा-
फलादि, दुध, मधु, घृतके आदि स्वाद आपसे ज्ञात होतेहैं तब
योगीको रोग तथा वृद्धावस्थाका नाश होताहै शख (जोअपने-
को काटने आया) का निवारण होताहै आठों सिद्धि मिलवाह
देवगाव मिलताहै सिद्धांगनाओंकि आकर्षणके सामर्थ्य हो-
मूर्धः पोडशपत्रपद्मगलितं प्राणादवाप्तं हठा-
दूास्योरसनां नियम्य विवरे शक्तिं परां चिन्तयन्।
उत्कछोलकलाजलं च विमलं धारामयं यः पिचे
निधिः समृणालकोमलवपुयोगी चिरं जीवति
तीहै ।। १३ ॥
दिदलकमलके नीचे कंठस्थ पोडशटर मलमें हृदयोगसे प्राप्त
जो निर्मलधारामय तरंगसहित चंद्रामृतरम है इसे जो योगी पान
कर उसकोज्वरादिरोग न होते तथा कमलके गांवकासा कोमल
पर होकर बहुनयालपर्यंत जावे ॥ १४ ॥

(४४) गोरक्षपद्धति-
'यत्तालेयं प्रहितसुपिरं मेरुमूर्धान्तरस्थं
तस्मिन्तत्वं प्रवदति सुधीस्तन्मुखं निम्नगानाम्।
चन्द्रात्सारः स्रवति वपुपस्तेन मृत्युनराणां
तद्वनीयात्सुकरणमथो नान्यथा कार्यसिद्धिः॥१६॥
मेरुपर्वतसहश सबसे ऊंची सुपुम्णाके उपरीभागमें स्थित चं-
द्रामृतरूप जल जिसमें स्थितहै ऐसे छिद्रमें सत्त्वगुणात्मा बुद्धि-
करके आत्मतत्त्व है. और गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, संज्ञक
इडा, पिंगला, सुपुग्णा, गांधारी, आदि नाडियोंका उक्तविवरमें
मुख हैं इनके द्वारा चन्द्रमंडलादागत अमृत व्यर्थ चलेजानेंसे
शरीर जरामृत्युको प्राप्त होताहै इसलिये प्रथम कहआयेहैं कि
सुकरण नाम खेचरीमुद्रा करके चंद्रामृत व्यर्थ सवित नहींहो-
नेसे मृत्यु नहींहोती. इस मुद्राके विना देहकी सिद्धि, लावण्य,
बल, पजसमान दृढ शरीर, नहींहोते ॥ १५॥
सुपिरं ज्ञानजनकं पञ्चस्रोतःसमन्वितम् ।
तिष्टते खेचरीमुद्रा तस्मिन् शून्ये निरञ्जने ॥ १६॥
इडा १ पिंगला २ सुषुम्णा ३ गांधारी ४ हस्तिजिह्वा ५
इनका प्रवाह ऊपरको है सो इनके प्रवाहसंयुक्त आत्माको सा-
क्षात् प्रकट रहनेवाला विवर है सो अविद्या एवं अविद्याके
कार्य्य, शोक, मोहादि दूर होतेहैं जिसमें एसे विवरमें खेचरी-
मुद्रा स्थित होतीहै ॥ १६ ॥
एकं सृष्टिमयं वीजमेका मुद्रा च खेचरी।
एको देवो निरालम्व एकावस्था मनोन्मनी ॥१७॥

भाषानुराद । ०" (४५) नमत बीजोंमें मुख्य सृष्टिरुप एक प्रमाण यह है समस्तदे- वामा भगवान् मुख्य हतैसेही समस्त मुद्राओंमें सेचरी मुख्य है ॥ १७ ॥ उड्यानं कुरुते यस्मादविश्रान्तं महासगम् । उट्टीयानं तदेव स्यान्मृत्युमातगकेसरी ॥७७ ॥ जिसकारण उहियानबंधसे रुका प्राणयायु कहाँभी विभाम न करके उडके जैसा सुषुम्णामें गति करताहै उसीकारण तहां मृ- त्पुरुषो गजके ऊपर सिंह जैसा यहींबंध वहाताहै ॥ ७७ ॥ उदरात्पश्चिमे भागे अधो नाभेनिंगद्यते । उहियानो ह्ययं वन्धस्तत्र वन्धो निगद्यते ॥७८ ॥ उड्डीयानबंधका स्थान कहते हैं कि उदरसे पश्चिम और नानासे नीचे सबंधकास्थान योगी कहते हैं इसलिये यह बंध उसी स्थानमें करना योग्य है ।। ७८ ॥ ॥ग्रन्थान्तरे॥ उदरे पश्चिमं स्थानं नाभेरूच च कारयेत् । उड्डीयानो ह्यसौ वन्धो मृत्युमातङ्ग केसरी ॥१॥ नामीका कारला तथा नीचला भाग उदरमें लगजांय ऐसे पेटके पीछे खीचे इसे उड्डीयानबंध कहतेहैं मृत्युरूपी गजको निवृत्त करनेकेलिये सिंहसमान है ॥ १ ॥ उड्डीयानं तु सहज गुरुणा कथितं सदा । अभ्यसेत्सततं यस्तु वृद्धोपि तरुणायते ॥२॥ हितोपदेशका गुरुकरके सहज स्वभाव कहागया ऐसे (४६) गोरक्षपद्धदि- बंधको निरंतर यास करे तो वृद्धजी वरुण होजावै ॥२॥ नाभेरूलमधश्चापि स्थानं कुर्यात्प्रयत्नतः। पण्मासमभ्यसेन्मुत्युं जयत्येव न संशयः॥३॥ नातीउधि-भागोंको खींचकर पीठमे लगावै. ऐसे इस बं- धको छः महिनापर्यंत निरंतर आयास करे तो निस्सदेह मृ- त्युको जीत ॥ ३॥ सर्वेपामेव बन्धानामुत्तमो ह्युडियानकः। उड्डियाने दृढे बन्धे मुक्तिः स्वाभाविकी भवेत् ॥४॥ संपूर्ण बंधोंमें उड्डीयानबंध उनम है यह दृढ होजाय तो स्वभावसिद्ध मुक्ति होतीहै. इसके करने से पक्षियोकेमी गतिक- रके सुपुम्णाद्वारा प्राण मस्तिष्क में लेजानेंस समाधि माक्ष हो- नाहै यही स्वाभाविकी मुक्ति है।॥ ४ ॥ बध्नाति हि शिरोजालं नाधो याति नभोजलम् । ततो जालंधरो बन्धो कण्ठदुःखौघनाशनः ॥ ७९ ॥ जालंधरबंध कहते है कि यह बंध कठस्थान में होताह अनेक रोगोंको हरताहै शरीरस्थ नाडीजालका बंधन करताहै व्योम- चक्ररथ चंद्रकलामृतको कपालकुहरसे नीचे नहीं गिरनेदेता इ. सकारण यह जालंधरबंध वह है ॥ ७९ ॥ जालंधरे कृते बन्धे कण्टसंकोचलक्षण न पीयूपं पतत्यनो न च वायुः प्रकुप्यति ।। ८. ॥ बैठका संकोचन करके प्राणवायुवी गतिको रोकना जा.

भापानुवाद । श०१ (४७) लंबर बंध है इससे चंद्रकलामृत गिरके सूर्यरूप आनिमें नहीं - उता एवं वायु कदाचित् विरुद्ध नहीं होता ॥ ८०॥ ॥ग्रन्थान्तरे॥ कण्ठमाकुम्च्य हृदये स्थापयेचिबुकं दृढम् । वन्धोजालंधराख्योयंजरामृत्युविनाशकः॥१॥ ग्रंथांतरसे जालंधरबंध कहतेहैं कि वे नीचे नवाय हृदय- के चार अंगुल अंतर ढोडी लगाय दृढ स्थापन करे यह जा- लंधरबंध वृद्धावस्था तथा मृत्युनाशक है ॥१॥ कण्ठसंकोचनेनैव द्वे नाड्यो स्तम्भयेदृढम् । मध्यचक्रमिद ज्ञेयं पोडशाधारवन्धनम् ॥२॥ दृढके संकोचनमात्र करके इडा पिंगला दोनहूं नाडी स्तंजित होता. कंठस्थानमें जो विशुद्धनामा चक्र है वह अंगुष्ठादि ब्रह्म- रंघांत पोडश आधारोंवा मध्यम चक है इन १६ आधारोंका वर्णन पूर्व १३ श्लोकके दोकामें करआयेहैं ॥ २ ॥ मूलस्थानं समाकुञ्च्य उहीयानं तु कारयेत् । इडां च पिङ्गलां बद्धा चाहयेत्पश्चिमे पथि ॥३॥ नातिको पश्चिम तानरूप उड्डीपानबंध करे और कंठ न- माय जालंधरबंधसे इडा पिंगला नाडीनको स्तंजन करे तदनंतर पथिममार्ग सुपुम्गामें प्राणवायुको प्रामकरे ॥ ३ ॥ भनेनेव विधानेन प्रयाति पवनो लयम् । ततो न जायते मृत्युरारोगादिकं तथा ॥ ४॥ इस विधि से वायुको गति बंद होकर मागवायु स्थिर हो- 4 (४८) गोरक्षपद्धति- कर ब्रह्मरंध्रमें स्थित रहता है. इसे प्राणमय कहतेहै इससे मृत्यु, जरा, रोग, देहकी त्रिपली, श्वेतरोगता, मूली, आलस्यादिक, नहीं होतहैं ॥४॥ वन्धत्रयमिदं श्रेष्टं महासिद्धेश्च सेवितम् । सर्वेपां हठतन्त्राणां साधनं योगिनो विदुः ॥५॥ मूलबंध १ उडीधानबंध २ जालंधरबंध ३ ये श्रेष्ठ हैं म- स्येंद्रादि महासिद्ध वसिष्ठादिमुनि इन्हें सेवन करतेहै हठके उपा- योंके सिद्धिको प्रगट करते हैं इससे गोरक्षादि सिद्ध इन्हैं जानतेहैं ॥५॥ यत्किंचित्स्रवते चन्द्रादमृतं दिव्यरूपिणः । तत्सर्वं ग्रसते सूर्यस्तेन पिण्डो जरायुतः॥६॥ तालुके मूलमें स्थित दिव्यरूप चंद्रमासे कछुक अमृत सवित होताहै उसे नानिस्थित अनिरूप सूर्य ग्रास करलेता है तब देहको वृद्धावस्था होतीहै ।। ६॥ तत्रास्तिकरणं दिव्यं सूर्यस्य मुखवञ्चनम् । गुरूपदेशतो ज्ञेयं न तु शास्त्रार्थकोटिभिः ॥७॥ इसप्रकरणमें उत्त सूर्य के मुखवंचना अर्थात् जिससे उक्त अमृत सूर्य के मुखमें न पडे यह युक्ति कहीहै तथा विपरीतकरणी मुद्रासी ( जो आगे कहगे ) इसके उपयोगी है, ये सर्व गुर मखसे जानेजातेहैं विना गुरु कोटीसंरयाक शास्त्रके अर्थमनी न- जानेजाते ॥ ७॥ पाणिभागेन संपीड्य योनिमाकुञ्चयेदम् ।

भापानुवाद । श०१
अपानमूर्ध्वमाकृष्य मूलबन्धो विधीयते ।। ८१ ॥
अपानवायु ऊपर सींचके प्राणवायुसे योजित करना. पाद
को एडीसे गुदा, एवं लिंगके मध्य योनिरथानको दृढ अचेतके
गुदद्वारको दृढ संकुचित करना जिससे अपानवायु बाहर न नि-
कसे इसप्रकार मूलबंध होताहै ॥ ८३ ॥
अपानप्राणयोरेक्यात् क्षयो मूत्रपुरीपयोः ।
युवा भवति वृद्धोपि सततं मूलबन्धनात् ।। ८२ ॥
अपान और प्राणवायुका ऐक्य कर जो निरंतर मूलबंधका
अन्यास करताहै उसके मलमूत्र क्षय होतेहै. और बूटानी
जवान होजावाहे ।। ८२॥
'गोरक्षसहितामें दशमुद्राओंमेंसे महामुद्रा खेचरी २ उड्-
होयान ३ जालंघरबंध ४ मूलबंध ५ मुस्य कही, अन्य महा-
बंध १ महावेध २ विपरीतकरणीमुद्रा ३ वज्रोली ४ शक्ति-
चालन ५ ये पांच इमी शतक्में साधारणप्रकार पूर्वही कह
आपेहें तथापि विशेष प्रस्टताकेलिये मैं उन्हें ग्रंथांतरमतसेनी
लिखताहू'-
॥ तत्र प्रथमं महावन्धः॥
पाणिवामस्य पादस्य योनिस्थाने नियोजयेत् ।
वामोरूपार संस्थाप्य दक्षिणं चरणं तथा ॥१॥
वामपादको एडोसे योनिस्थानको रोधके दक्षिणपाद उसके
ऊपरं स्थापन करे अर्थात् मूलबंकरके ॥ १ ॥

(५०) गोरक्षपइतिः पूरयित्वा ततो वायुं हृदये चिबुकं दृढम् । निष्पीय वायुमाकुश्य मनोमध्ये नियोजयेत्॥२॥ तब जालंधरबंधकरके वायुको पूरकर मनको मध्यनाडी सुषुम्णामें प्रवृत्त करे ।। २॥ धारयित्वा यथाशक्ति रेचयेदनिलं शनैः । सव्याझे तु समभ्यस्य दक्षाढ़े पुनरभ्यसेत् ॥३॥ यथाशक्ति कुंक करंक मंद २ रेचन करे ऐसेही वामांगमें आयास करे दोनों अंगोंके आयासकी संख्या समान करे॥३॥ अयं तु सर्वनाडीनामू गतिनिरोधकः। अयं खलु महावन्धो महासिद्धिप्रदायकः॥४॥ यह समस्तनाडियोंकी ऊपरकी गतिरोधक महामिद्धिदायक महाबंध है ॥ ४॥ कालपाशमहाबन्धविमोचनविचक्षणः । त्रिवेणी संगमं धत्ते केदारं प्रापयेन्मनः ॥६॥ मृत्युपाशको काटनेवाला है. इडा, पिंगला, सुपुम्णा तीनोंके संगम (त्रिवेणी ) धारणकर मनकों (केदार ) भुकुटीशिवस्था- नमें प्राप्तकरे ।। ५॥ रूपलावण्यसंपन्ना यथा स्त्री पुरुपं विना । महामुद्रामहाबन्धी निप्पली वेधवर्जिती ॥६॥ जैसे कांति, गुण, शोभायुक्त स्त्री पुरुषविनां व्यर्थ है ऐसेही महावेधविना महामुद्रा और महाबंध निष्फल है इसलिये अब महावेध कहतेहैं ।। ६॥

भाषानुवाद । श०१ (५१) ॥ अथ महावेधः॥ महाबन्धस्थितो योगी कृत्वा पूरकमेकधीः। ' वायूनां गतिमावृत्य निवृतं कण्ठमुद्रया ॥१॥ एकामबुद्धि करके योगी महावेध इसप्रकार करे कि, ना- सापुटसे पूरक करके जालंधरबंधकर वायुको ऊर्ध्वगतिको रो- क कुंभक करे ॥ १॥ समहस्तयुगो भूमो स्फिचौ संताडयेच्छनैः। पुटद्धयमतिक्रम्य वायुः स्फुरति मध्यगः॥२॥ दोनहूं हाथोंके हथलीसमान पृथ्वीमें धरके पादकी एडी योनिस्थानमें दृढ लगाय हायोंके सहारे पृथ्वीसे कुछेक शरीर उठाव ( परतु जैसे मूलबंध मुद्रा न खुले ) फिर मंद मंद पृथ्वीमें अपने शरीगसन रिफचको नाइन करे इससे वायु इडा-पिंगला- को उल्लंघनकर सुपरणामें प्राप्त होताहै ( इस मुद्रामें स्वानुभवसे तथा हग्गिरूादिष्ट मार्गसे कहताहूं कि शरीर पृथ्वीसें उठायकर पृथ्वामें ताडन करनेमें उक्त मुद्रा दृढ नहीं रहसकती यदि बल- से रक्खानी तो मूलबंध विगडजाताहै इससे सुगम तो पद्मासन- से यह कार्य सुसपूर्वक होताहै औरसी सुनीता यह है कि हा- थोंके जोरसे शरीर उठानेमें मलबंध सुगमताहासे होजाताहै।।२ सोमसूर्याग्निसंवन्धो जायते चामृताय वै । मृतावस्था समुत्पन्ना ततो वायुं विरेचयेत् ॥३॥ इस विधि से सूर्यचंद्रमा अग्यात्मका इडा पिंगला सुपुम्णा का संयोग मोक्षके हेतु हैं ऐसे होने में (मराहुवा जैसा)

(५२).
गोरक्षपद्धति-
स्था होतीहै तब नासिकापुटमें मंद २ रेचन करे ॥३॥
महावेधोयमभ्यासान्महासिद्धिप्रदायकः।
वलीपलितवेपन्नः सेव्यते साधकोत्तमैः॥४॥
इस महावेधके न्यास करनेसे अणिमादि अष्टसिद्धि मि-
लतीहें (वली)बुढापेमें मुखपर सलवटें पडनी.(पलित) बाल
श्वेत होने. ( कंप ) बुढापेमें शरीर कांपना ये उक्त आयासीको
नहींहोते ॥ ४॥
एतत्रयं महागुह्यं जरामृत्युविनाशनम् ।
वह्निवृद्धिकरं चैव झुणिमादिगुणप्रदम् ॥५॥
ये महामुद्रा, महापंध, महावेध, गोप्य हैं बुढापे तथा मृत्यु-
को दूर करतेहैं जाठरागिको बढातेहैं अष्ट सिद्धि देवहि ॥५॥
अष्टधा क्रियते चैव यामे यामे दिने दिने ।
पुण्यं संभारसंघायि पापौषभिदुरं सदा ।
सम्यकशिक्षावतामेवं स्वल्पं प्रथमसाधनम् ॥ ६॥
आठों प्रहरमें ८ ही वार इनका अभ्यास करे ये ३ पु-
ण्यराशिको बढातेहैं पापसमूहको वज्रके समान सूकतेहैं शि-
क्षावान् पुरुपको इसप्रकार दिन २ प्रहर २ में थोडा २ करके
भायास करनारोग्य है ॥६॥
॥अथ विपरीतकरणमुद्रा॥
उर्ध्व नाभेरधस्तालोरूचं भानुरधः इशी ।
करणी विपरीताख्या गुरुवाक्येन लभ्यते ॥ १॥

भाषानुवाद । श०३ . (५३) अंब विपरीतकरणी मुद्रा कहते हैं कि, ऊपरको नाभि नीचे तालूकरके नाभिस्थ सूर्य ऊपरको चुकुटिस्थ चंद्रमा नोचेको होजाताहै इससे चंद्रामृत सूर्यरूप अनिमें नहीं पड़नेपाता यह विपरीतकरणीमुद्रा है यहां ग्रंथकर्त्ताने उदाहरण कुछेक लिख- कर लिखा गुरुलक्ष्यपर निर छोइदिया, इसलिये मैं (आपा- कार ) अपने अनुभव एवं हरिगुरूपदिष्टमार्गसे लिखताहूं कि, दोनहूं पैरोंसे पद्मासन बांधकर दोनहूं हाथ और शिर (चोटी) पृथ्वी लगाय,उक्त पद्मासनको ऊपर अंतरिक्ष खडाकरे अभ्यास हुएमें कभी तो उस पद्मासनको खोल पाँव आकाशमें लंबे करे कनी फेर वैसेहीमें पद्मासन कर हाथ और शिरके सहारे उलटा खडारहै तब यह मुद्रा होगी अन्याससे सुगम होजातीहै ।।१॥ नित्यमभ्यासयुक्तस्य जठराग्निविवहिनी। आहारो बहुलस्तस्य संपाद्यः साधकस्य च ॥२॥ जो इस मुद्राका नित्य ध्यास करताहै उसकी जठराग्नि बढती है. उस साधकको आहार बहुत ( यथेच्छ ) करनाचा- हिये ॥२॥ अल्पाहारो यदि भवेदनिर्दहति तत्क्षणात् । अंधःशिराश्चोर्ध्वपादः क्षणं स्यात्प्रथमे दिने ॥३॥ इस मुद्राका अन्यामी यदि भोजन अल्प करे तो जाठरामि प्रज्वलित होकर देहयो फुकतीहै. अब किया है कि पहिले दिन शिर पृथ्वी में रखकर पैर ऊपरको क्षणमात्र वरै ॥३॥ क्षणाच किंचिदधिकमभ्यसैच दिने दिने ।

. (५४) गोरक्षपद्धति- वलितं पलितं चैव पण्मासोव न दृश्यते । याममात्रं तु यो नित्यमभ्यसत्स तु कालजित् ॥४॥ फिर प्रतिदिन एक एक क्षण बढायके आयातसे साधे तो सिद्धि भयेमें चलीपलित छः महीने से दूर होजातहैं जो प्रतिदिन एक २ प्रहरपर्यंत इसका करताहै वह कालमृत्युको जीतताहै ४ । अथवज्रोली। स्वेच्छया वर्तमानोपि योगोक्तैनियमविना । वज्रोली यो विजानाति स योगी सिद्धिभाजनम्।।१॥ अब वज्रोलीमुद्रा कहते हैं कि जो योगोक्त नियम नहीं जानताहुवानी अपनी इच्छासे वज्रोलीको जाने वह अणिमा सिद्धि पाताहै ।। १ ॥ तत्र वस्तुद्वयं वक्ष्ये दुर्लभं यस्य करयचित्। क्षीरं चैकं द्वितीयं तु नारी च वशवर्तिनी ॥ २॥ इस मुद्रामें हरकिसीको दो वस्तु दुलभ हैं विशेषतः ये २ अवश्य चाहिये. वजोल्यर्थसंगमोत्तर दुग्पान, एवं वशवर्तिनी स्वी २ उपयोगी हैं ॥ २॥ मेहनेन शनैः सम्यगूर्वाकुञ्चनमभ्यसेत् । पुरुपोप्यथवा नारी वज्रोली सिद्धिमाप्नुयात् ॥३॥ संगमकरके मंद मंद क्षरितवोर्यको इंद्रियसंकोचनकरके ऊ- पर खेचनेके अत्यास सिद्ध हुये में वज्रोलीमुद्राकी सिद्धि प्राप्त होतीहै ।। ३॥

भाषानुवाद । श०१ (५५) यंत्रतः शस्तनालेन फूत्कारं पत्रकन्दरे। शनैः शनैः प्रकुति वायुसंचारकारणात् ॥ ४॥ इसकी पूर्वागक्रिया कहहैं कि चर्चादी वा कांचकी १४ अं- गुल सोखरी शलाका सच्छिद्र करे जो१२ अंगुल सरल २ अ- गुल तिरछी रहे उसे लिंगछिद्रमें प्रतिदिन२।२ अंगुल प्रवेश कर एक किनारेसे फूंककर वायु प्रवेश करते२ बारह दिनमें २४ अंगुल प्रवेश करे इससे इंद्रियमार्ग शुद्ध होताहै तब इस मार्गसे जलके आकर्षणका आयास करे अग्यास सिद्ध हुयेमें वीर्यका आकर्पण करे तो सिद्धि होतीहै. जिसको खेचरी एवं प्राणजय सिद्ध हों उसको वजोलोसिद्धि होताहै ॥ ४ ॥ नारीभगे पतद्विन्दुमभ्यासेनोर्चमाहरेत् । चलितं च निजं विन्दुमूर्ध्वमाकृप्य रक्षयेत् ॥५॥ बीसंयोगमें जब विंदु (वीर्य) शरीरसे चलायमान होतभी उसे उतान्याससे ऊपरको सींचलेवै अथवा जब भगमें गिरपडे तब बीके रजसहित बिंदुको आकर्पण कर ऊपरको चढायकर स्थापन करे ॥५॥ एवं संरक्षेयद्विन्दु मृत्यु जयति योगवित् । मरणं विन्दुपातेन जीवनं विन्दुधारणात् ॥ ६॥ याप्रकार जो बिंदुकी रक्षा करताहै सो योगी मृत्युको जी- तताहै बिंदुके पतनसे मृत्यु उसकी रक्षासे अमरत्व होतेहैं इस- टिये इस विघिसे बिंदुको स्थापन करे ॥ ६ ॥ सुगन्धो योगिनो देहे जायते विन्दुधारणात् ।

(५६)
- गोरक्षपद्धति-
यावद्विन्दुःस्थिरो देहे तावत्कालभयं कुतः ॥७॥
उक्त अभ्यासीके शरीरमें विदुधारणसे सुगंधि प्रकट होतीहै
और जबलौं देहमें बिंदु स्थित है तवलौं कालजय नहींहोती॥७॥
चित्तायत्तं नृणां शुक्र शुक्रायत्तं च जीवितम् ।
तस्माच्छुक्र मनश्चैव रक्षणीयं प्रयत्नतः॥८॥
वीर्य चित्तके आधीन है. चित्तके चलायमान होनसे वीर्य
चलायमान और स्थिरतासे स्थिर होताहै एवं शुक्रके आधीन
जीवित हैं. इसके स्थिरतासे जीवित स्थिर और चलायमान
होनेसे मरण होताहै, इसलिये शुक्र और मनकी रक्षा करनी
मुख्य है ।। ८॥
ऋतुमत्या रजोप्येवं वीजं विन्दुं च रक्षयेत् ।
मेढ़ेणाकर्पयेदूवं सम्यगभ्यासयोगवित् ॥९॥
ऐसेही रजोवती स्त्रीके रजको बिंदुसहित आकर्षणके ऊपर-
को सींचके स्थापन करे ऐसे वज्रोलीके अग्यास करनेवाला
योगवेत्ता होताहै ॥९॥
एक प्रकारके भेद वजोलीके सहजोली, अमरोलीभी हैं
अतः प्रथम सहजोली कहतेहैं-
सहजोलिश्चामरोलिर्वज्रोल्या भेद एकतः।
जले सुभस्म निक्षिप्य दग्धगोमयसंभवम् ।। १॥
जो वजोलीके फल वही सहजोली, अमरोलीये भी है
इसलिये येमी उसीके भेद हैं. गोवरके ( कंडे ) गोपठे जलायके
भस्म जलमें मिलावै ॥१॥

भाषानुवाद । श०१ (५७)
वंडोलीमैथुनादूर्व स्त्रीपुंसोः स्वाङ्गलेपनम् ।
आसीनयोः सुखेनैव मुक्तव्यापारयोः क्षणात् ॥२॥
बजोली अर्थ मैथुन करके क्षणमात्र सुखसे बैठके व्यवाय-
व्यापार छोडके उक्त भरम जलमें मिलाय स्त्रीपुरुष अपने २
सांग लेपन करें ।। २॥
सहजोलिरियं प्रोक्ता श्रद्धेया योगिभिः सदा ।
अयं शुभकरो योगो भोगयुक्तोपि मुक्तिदः ॥३॥
यह मत्सेदादि योगीश्वरोंने सहजोली कहीहै यह योग शु-
भकारक है, अन्यत्र साधनाओंमें जहां भोग तहां मोक्ष नहीं
जहां मोक्ष तहां भोग नहीं इस मुद्राके अन्यासमें भोगसहित
मोक्षनी है ॥ ३॥
अयं योगः पुण्यवतां धीराणां तत्त्वदर्शिनाम् ।
निर्मत्सराणां सिद्धयेत नतु मत्सरशालिनाम् ॥४॥
जो योगी पुण्यवान्, धैर्यवान् , तत्त्वदर्शी, और निर्मत्सरी हैं
उनको सिद्ध होताहै जो मत्सरी ( अन्पशुनदेपी) हैं उनको
सफल नहींहोता ॥४॥
"अब दूसरा भेद व अमरोली कहते हैं।-
पित्तोल्वणत्वात्प्रथमाम्बुधार
विहाय निःसारतयान्त्यधाराम् ।
निपेव्यते शीतलमध्यधारा
कापालिके सण्डमतेऽमरोली ॥१॥

(५८) गोरक्षपदति- शिवांबुके प्रथमधारा पित्तके उष्णतासे तथा अंत्यारा नि:- सारतासे त्यागकर निर्विकार मध्यधाराको ग्रहण कर सेवन कर- तेहैं यह योगाभिमत कापालिकी क्रिया है इसे अमरोली कह- तेहे यद्वा (कापालिक ) कनफटे जोगियोंका (जिसे खंडमत कहतेहैं ) यह कर्म विशेषतः इष्ट हैं ॥ १ ॥ अमरीयं पिवेन्नित्यं नस्यं कुर्वन् दिने दिने । वज्रोलीमभ्यसेत्सम्यगमरोलीति कथ्यते॥२॥ जो पुरुष अमरवारुणी (जो खेचरी प्रकरणमें कहींहैं.) का पान करतेहैं एवं नाशनी अमरवारुणीका लेतेहैं तथा प्रतिदिन वज्रोलीका आयास करें सोही कासालिकी अमरोली कहाँहा२। अभ्यासानिःसृता चान्द्री विभूत्या सह मिश्रयेत् । धारयेदुत्तमाङ्गेषु दिव्यदृष्टिः प्रजायते ॥३॥ अमरोलीके अग्याससे निःसृत चंद्रसुधाको पूर्वोक्त ममें मिलापके उत्तमअंग,-मस्तक, नेत्र, स्कंध, हृदय, सुजास्मेिं धारणकरे तो भूत, भविष्य, वर्तमान देखनेयोग्य दिव्यदृष्टि हो- जातीहै ॥ ३॥ ॥अथ स्त्रीणां वज्रोली॥ पुंसो विन्टुं समाकुन्च्य सम्यगभ्यासपाटवात् । यदि नारी रजो रक्षेद्वखोल्या सापि योगिनी ॥१॥ अब स्त्रियोंको वज़ोलीसाधन कहतेह कि, जो स्त्रीभापास- को चतुराईसे पुरुपके बिंदुको खींचके अपने रजकी वज्रोली- मुना करके रक्षा करे वहमी योगिनी कहाताहे ॥१॥ 11 " . भाषानुवाद । श.१ (५९) तस्याः किंचिद्रजो नाशं न गच्छति न संशयः । तस्याः शरीरे नाश्च विन्दुना मेन गच्छति ॥ २॥ उसके रजका नाश (पतन ) निस्संदेह अल्पनी नहींहोता तथा शरीरमें नादी उत्पन्न होताहै चंद्ररूप बिंदु सुर्यरुप रजके बाहर संयोगसे सृष्टि (ग) होतीहै जब अन्याससे भीतरही योग होय तो योगसिद्धि होतीहै परमपद मिलताहै इनके संयोगमें समस्त देवता स्थित रहतेहैं ॥२॥ स विन्दुस्तगुजश्चैव एकीभूय स्वदेहगौ । वोल्यभ्यासयोगेन सर्वसिद्धिं प्रयच्छतः॥३॥ रज, बिंदु बज्रोलीके आयाससे देहमें प्राप्त होनेपर सर्व सिद्धि देतेहैं ॥३॥ रक्षेदाकुञ्चनादूच मा रजः साहि योगिनी। अतीतानागतं वेत्ति खेचरी च भवेध्रुवम् ॥४॥ जो स्त्री भगको आकुंचन करते करते रजको ऊपर शरीरमें चढाय रक्षा करे वह योगिनी होतीहै भूत, भविष्य, वर्तमान जाने अंतरिक्षमें विच रहनेहारी वैमानिकगति मिलनीहै ॥४॥ देहसिद्धिं च लभते बोल्यभ्यासयोगतः। 'अयं पुण्यकरो योगो भोगे भुक्तेपि मुक्तिदः ॥५॥ वजोली न्यासयोगसे ( देहसिद्धि) रूप, लावण्य, वल, वजसंहननमा मिलनेहैं. यह योग पुण्य देनेवाला तथा विप- पलोग भोगनेमो मुक्ति देताहै ॥ ५॥ 'इनमें दशमशक्तिचाटनमुद्रा प्रथम अजया मायत्रीके उपरांत

(६०),
गोरक्षपद्धति-
कह आयेहैं. अब इन ३० का माताल्य कहतेहैं-
.इति मुद्रा दश प्रोक्ता आदिनाथेन शम्भुना
.
एकैका तासु यमिनां महासिद्धिप्रदायिनी ॥ १ ॥
ये दश (१०) मुद्रा आदिनाथ (शिव ) ने कहींह इनमें
एक एक मुद्रा योगीको अणिमादि देनेवारी हैं॥१॥
उपदेशं हि मुद्राणां यो दत्ते सांप्रदायिकम् ।
स एव श्रीगुरुस्वामी साक्षादीश्वर एव सः॥२॥
जो योगियोंको ( सांप्रदायिक ) गुरुपरंपराप्राप्त इन मुद्रा
ओंका उपदेश देवै वही सर्व गुरुनते श्रेष्ठ, स्वामी, साक्षात् ई-
श्वर हैं ॥२॥
तस्य वाक्यपरो भूत्वा मुद्राभ्यासे समाहितः ।
अणिमादिगुणैः साई लभते कालवञ्चनम् ।। ३॥
इनके उपदेशका गुरुके आसन, कनक, आहार, विहार,
चेष्टादि वाक्योंमें आदरपूर्वक ग्रहणकर तत्पर रहै तो अणिमादि
सिद्धियोंको जीतकर कालमृत्युकों जीते ॥ ३ ॥
॥अथ प्रणवाभ्यासः॥
पद्मासनं समारुह्य समकायशिरोधरः।
नासाग्रदृष्टिरकान्ते जपेदोडारमव्ययम् ।।८३।।
अब प्रणयके आयासकी निवि कहते हैं कि एकांत स्थलमें
बैठकर दृढ पद्मासन बांधके शरीर कंठ शिर सम (सरल) कर-
के नासाग्रष्टि निरंतर करके प्रणव जप करे ॥ ८३ ॥

भाषानुवाद । श०१ (६१) भूर्भुवःस्वरिमे लोकाः सोमसूर्याग्निदेवताः। यस्य मात्रासु तिष्ठन्ति तत्परं ज्योतिरोमिति॥८॥ जिस प्रणवके अकार उकार मकार तीन वर्णमें सुः १ भुवः २ स्वः ३ ये लोक चंद्रमा १ सूर्य २ अमि३ देवता रह- तेहैं वह प्रणव परमकारणरूप ज्योतिर्मय चैतन्य ॐ कारस्वरू- प है।। ८४ ॥ बयः कालास्त्रयो वेदास्त्रयो लोकास्त्रयः स्वराः। यो देवाः स्थिता यत्र तत्परं ज्योतिरोमिति।।८५॥ निस प्रणवमें भूत, वर्तमान, भविष्य ३ काल ऋक्, यजुः, साम तीनहूं वेद. स्वर्ग, मृत्यु, पातल ३ लोक उदाच, अनुदात्त, स्वरित ३ स्वर. ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर तीन देवता रहतेहैं. वह प्रणव ( ॐकार ) स्वरूप परब्रह्म ज्योतिस्वरूप है ॥ ८५ ॥ क्रिया इच्छा तथा ज्ञानं ब्राह्मी रोद्री च वैष्णवी । विधा शक्तिः स्थितायत्र तत्परं ज्योतिरोमिति॥८६॥ जिस प्रणवके अ, उ, म, तीन मात्रा अक्रिया, इच्छा, ज्ञान, शक्ति भेदोंकरके ब्रह्माणी, स्वाणी, वैष्णवी, ये शक्ति रहती हैं सो प्रणव ओंकारस्वरूप परब्रह्मज्योति है ॥८६ ॥ अकारश्च उकारश्च मकारो विन्दुसंज्ञकः। विधा मात्रा स्थिता यत्र तत्परं ज्योतिरोमिति॥८॥ गिलोणत्मा अकार उकार और विंदुस्वरूप मकार तीनहूँ मात्रा रहती हैं जिसमें ऐसा ब्रह्मजोतिस्वरूप प्रणव है ।। ८७ ॥ वचसा तजपेद्धीज वपुपा तत्समभ्यसेत् ।

(६२) गोरक्षपद्धति- मनसा तत्स्मरेन्नित्यं तत्परं ज्योतिरामिति ॥ ८ ॥ इस प्रणवको सकल जगत्कारण भूतभावना करके वच- नसे जप करना शरीरसे सिद्धासनादिसे सगुणब्रह्मकी भावना करके प्रणवार्थ समझ आयास करना तथा मनसे परब्रहारवरूप प्रकाश चैतन्य समझके सर्वदा स्मरण करना ।। ८८॥ शुचिर्वाप्यशुचिर्वापि योजयेत्प्रणवं सदा । न स लिप्यति पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ ८९ ।। जो योगी पाहात्यंतर शीचयुक्त वाघाशीचमात्र यदाजैसे तैसे होकर प्रणवको अर्थ समझ अन्याससे जप करताहै उसको शारीरकपाप स्पर्श नहींकरते. जसे कमलदल जलमें रहताहै परंतु जल उसके पत्रको पर्श नहीं करसक्ता ऐसेही उक्त वि- धिका प्रणवान्यासीती निर्लेप रहताहै ॥ ८९ ॥ ॥अथ प्राणायामप्रकारः॥ चले वाते चलो विन्दुनिश्चले निश्चलो भवेत् । योगीस्थाणुत्वमाप्नोति ततोवायु निरुन्धयेत् ॥९॥ प्राणवायुके निश्वासोच्छ्वास होतेरहतेमें विंदुनी चलायमान होताह जोपाणवायु स्थिर होगया तो विंदु स्थिर होजात है जब प्राणायामसे प्राण वायु स्थिर होगया तो योगी चिरकाल योगा- पामसे समर्थ होता है वीर्घजीवी तथा ईश (शिव)भावको प्राप्त होजाताहै. इसलिये योगीको वायुनिरोध करना मुस्प है ।। ९.॥ यावदायुः स्थितो देहे तावनीवं न मुञ्चति ।

१ भाषानुवादश मरणं तस्य निष्कान्तिस्ततो वायु निरोधयेत्॥११॥ जबलो शरीरमें वायु स्थिर रहता है तबलौंजीव शरीरको नहीं- छोडता जब प्राणवायु शरीरसे निकल जाताहै तो उसी अव- स्थाको मरण कहते हैं जीवन मरण प्राण वायुके आधीन है इस लिये प्राणवायुका रोधन अवश्य विधिसे करनाचाहिये ॥९१॥ यावद्वद्धो मरुद्देहे यावचित्तं निरामयम् । यावदृष्टिभ्रुवोर्मध्ये तावत्कालभयं कुतः ॥ ९२ ॥ जबतक प्राणवायु कुंभकसे देहमें स्थिर है तथा जबतक चित्त विषयवासना त्याग अंतःकरण ईश्वराकार निर्विकार है और जबतक मध्यमें दृष्टि निश्चल है तबतक कालकी भय नहीं होती।। ९२॥ अतः कालभयाद्रह्मा प्राणायामपरायणः। योगिनो मुनयश्चैव ततो वायु निरोधयेत् ॥१३॥ निसकारण जीवनमरण प्राणवायुके आधीन है इसी हेतु ब्रह्मा एवं सनकादिक सिद्ध, दत्तात्रेयादि मुनि, प्राणायाम सा- धन में तत्पर हैं अन्य योगियोंकोनी इस आयाससे कालको भ- य नहींहोती इस हेतु प्राणायाम साधन करना योग्य है।। ९३ ॥ पत्रिंशदडलो हंसः प्रयाणं कुरुते बहिः । वामे दक्षिणमार्गेण ततःप्राणोऽभिधीयते ॥९॥ प्राणवायु अपानवायुरूप हंस इडापिंगलाके मार्गसे (३६)छत्ती- स अंगुल बाहर निकलताहै इसहेतु 'बहिः प्रयाणं कुरुते प्राणः' उकवायुप्राण कहाताहै प्राणापानवायुरूप हंस है और नहीं ९४ "

(६४) गोरक्षपद्धति-
शुद्धिमेति यदा सर्वनाडीचक्र मलाकुलम् ।
तदेव जायते योगी प्राणसंग्रहणे क्षमः ॥ ९५॥
जय शरीरके मलसे च्याप्त नाडीजाल, नाडीशोधन प्राणाया-
मके मनावसे शोधके शुद्द निर्मल होता है तब योगाभ्यासोपयो.
गिप्राणवायुको थामनेकी सामर्थ्य योगीको होतीहै अन्यथा
नहीं ॥ ९५॥
॥अथ नाडीशोधनप्राणायामविधिः॥
पद्धपद्मासनो योगी प्राणं चन्द्रेण पूरयेत् ।
धारयित्वा यथाशक्ति भूयः सूर्यण रेचयेत् ॥१६॥
नाडीशोधन करनेवाले प्राणायामकी विधि कहते हैं कि एकांतमें
स्यूल और कोमल आसनमें बैठकर पद्मासन बांधे तव ( चंद्र-
नाडी) इडासे १२ संख्या प्रणव जप करते मंद मंद पूरक
तथा १६ संख्यासे दोनहूं ओर थामके कुंसकमें चंद्रमंडल-
का ध्यान करना और १० संख्यासे (सूर्यनाडी ) पिंग-
लासे मंद मंदरेचन करे यह चंद्रांग (वामांग) प्राणायाम है ९६
अमृतदधिसंकाशं गोक्षीरधवलोपमम् ।
ध्यात्वा चन्द्रमसो विम्बं प्राणायामी सुखी भवेत्९७
चंद्रांगप्राणायाममें दधि, दुग्ध समान अतिशुक्लवर्ण अमृत-
स्वरूप चंद्रमाका कंठ तथा नाशिमें ध्यान करनेसे आनंदकाअ-
नुभव होकर सुख मिलताहै ।। ९७ ॥
दक्षिणे श्वासमाकृप्य पूरयेदुदरं शनैः।
कुम्भयित्वा विधानेन पुनश्चन्द्रेण रेचयेत् ॥ २८॥

भाषानुवाद । श०१ (६५) (सूर्यनाडी) पिंगलामार्गसे प्राणवायु १२ संख्यासे प्र- णवजपसहित पूरक १६ संख्यासे कुंजकमें आदित्य मंडल- का ध्यान करना और १० संख्यासे प्रणवजप करके चंद्र- नाडी इडामार्गसे मंद २ रेचन करना यह दक्षिणांग (सूर्याग) प्राणायाम है।। ९८॥ प्रज्वलज्ज्वलनज्वालापुञ्जमादित्यमण्डलम् । ध्यात्वा नाभिस्थितं योगी प्राणायामी सुखी भवेत् ९९ सूयांग प्राणायाममें कुंभकविपये जाज्वल्यमान अग्निज्वा- लासमुदायसमान अमिमय सूर्यमंडलको अपने नाभिकमलमें ध्यानकरके जो योगी प्राणायाम करे तो आनंद पाताहै।९९॥ प्राणांश्चेदिडयापि चेत्परिमितं भूयोन्यया रेचयेत् पीत्वा पिङ्गलया समीरणमथो बड़ा त्यजेदामया। सूर्याचन्द्रमसोरनेन विधिना विम्बद्धयं ध्यायतां शुद्धा नाडिगणा भवन्ति यमिनां मासत्रयादूर्ध्वतः॥ ॥१०॥ उक्त ४ श्लाकका अर्थ सूक्ष्मसे पुनः कहते हैं कि यदि प्रा- णवायुको वामनासापुटसे १२ प्रणव जपसे पूरक १६ जपसे चंद्रमंडल ध्यानसहित कुंभक और १० जपसे रेचन सूर्यनाडीसे करना यह एक (3) प्राणायाम हुवा पुनः दक्षिण- नाडीसे १२ जपि पुरक १६ से मूर्यमंडल ध्यानसहित कै- मक और १० से रेचन करना दूसरा प्राणायाम हुवा. पु. नः वानसे पुरक दक्षिणसे रेचक करके तीसरा प्राणायाम, ..

(६६)
गोरक्षपदति-
इसीप्रकार चंद्रांग पूरकके कुंजकमें चंद्रबिंब प्राणवायुस्वरूपका
और सूांग पूरकके कुंमकमें सूर्य्यबिंब अपानवायुस्वरूपका
ध्यान करनेवाले योगोके समस्त नाडीजाल तीन (३) महीने
उपरांत शुद्ध (निर्मल ) होतेहैं यह नाडीशोधनका उत्तम प्रकार
कहाहै जो संयमसे रहके धौती १ नेति २ नौली ३ वस्ती ४
त्राटक ५ जना ६ पट्कर्ममें परिश्रम न करे तौजी इनही प्रा-
णायामोंके अायाससे उनका उक्तरुत्य संपादित होजाताह जैसे
कहानी है कि "प्राणायामेरेव सर्व प्रशुप्पन्ति मला इति । आचा-
र्याणां तु केपांचिदन्यत्कर्म न संमतम्" अर्थात् प्राणायामहीसे
नाडीमल शुद्ध होजाताह इसलिये याज्ञवल्क्यादियोंके अन्य
धौत्यादि पट्कर्म संमत नहींहै ॥ १०० ॥
॥ ग्रन्थान्तरे ॥
प्रातमध्यंदिनं सायमद्धरात्रे च कुम्भकान् ।
शनैरशीतिपर्यन्तं चतुर समभ्यसेत् ॥ १॥
अरुणोदय सूर्योदयपर्यंत ३ पटी प्रातःकाल दिनके पांच
विजाग कर मध्यमाग मध्याह्न, सूर्यास्तसे ३ घटी आगे पीछे
'साय संध्याकाल और भईरात्रिमं २ मुहुर्त निशीथ काल हो-
ताहै इन चारोंमें प्रत्येकी ८०८० प्राणायाम करना अद्धरा-
त्रिमं न करसके.तीनां कालंमं अवश्य आयास करना.चारों स-
मयके ३२० और ३ समयके २४० प्राणायाम होते हैं ॥ १॥
कनीयसि भवेत् स्वेदः कम्पो भवति मन्यमे ।
उत्तमे स्थानमामोति ततो वायुं निबन्धयेत ॥२॥

भाषानुवाद । श.०५ (६७) जिसमें प्रस्वेद आवै वह कनिष्ठ, जिसमें कंप हो वह मध्यम है, जिसमें वायु ब्रह्मरंध्रमें प्राप्त हो सो उत्तम क्हाताहै इससे योगी निरंतर वायुका आयास करे और कुछ कम ४२ विपल कुंभक रहै सो कनिष्ठ ८४ से मध्यम, १२५ में उत्तम प्राणायाम काल कहतेहैं जब प्राणायाम स्थिर होजा- य तब प्राण ब्रह्मरंध्रको प्राप्त होताहै नहां २५ विपला स्थि- ररहै तब प्रत्याहार २५ पलापर्यंत रहै तो धारणा तथा ६ घटी रहै तो ध्यान और बारह (१२) दिन रहै तो समा- धि होतीहै ॥२॥ जलेन श्रमजातेन गात्रमर्दनमाचरेत् । दृढता लघुता चैव तेन गात्रस्य जायते ॥३॥ प्राणायामश्रमसे जो पसीना आवे उसे सर्वांगमें खुब मले इससे गात्र लघु और दृट होतेहैं अर्थाद जडताका अभाव होताहै ।। ३॥ अभ्यासकाले प्रथमे शस्तं क्षीराज्यभोजनम् । ततोभ्यासे दृढीभूते न तादृनियमग्रहः॥४॥ अस्यासकालमें दूध, घृत भोजन करे जब केवल कुंभ- कायास दृढ होजाय तद उक्तनियमका कुछ आग्रह नहीं॥४॥ यदा तु नाडीशुद्धिः स्यात्तथा चिह्नानि वाह्यतः । कायस्य कृशता कान्तिस्तदा जायेत निश्चितम् ॥ जब नाडीशुद्धि होजातीहै तो वा बाहर चिह्न देहकी क- शता कातिवदनभादि निश्चय देखनमें आतेहैं बहुतकालस-।

(६८) गोरक्षपद्धति-
में कुंभक धारण करने से जाठरानिप्रदीप्ति, नादकी प्रकटता
और निरोगिता होतीहै ये सर्व नाडीशुद्धिके गुण हैं ॥ ५
यथेष्टं धारणं वायोरनलस्य प्रदीपनम् ।
नादाशिव्यक्तिरारोग्यं जायते नाडियोधने ॥१०१
इति गोरक्षशाने प्रथमशतकम्।।३।।
नाडिशोधन हुयेमें अपने समझेयोग्य मंत्र-जप कालपर्यंत
प्राणवायुके धारणसामर्थ्य होती है उदराग्नि प्रदीप्त स्पष्टतर ना-
दका श्रवण और नैरुज्यता होतीहै ।। १०१ ॥
इति महीधरकवायां गोरक्षयोगशास्त्रापाया ससंग्रहायां
योगाङ्गपूर्वाभ्यासविधिः ॥ ३ ॥

"
भाषानुवाद । श०२ (६९)
धनमें अत्यंत कष्टसेगी आयास हड नहींहोता इसलिये उनको
प्रथम पट्कर्म करके तर प्राणायामका अन्यास करना योग्य है
इसलिये षट्कर्मविधि कहतेहैं.
॥ तत्रादौ धौतिः॥
चतुरङ्गुलविस्तार हस्तपञ्चदशायतम् ॥
गुरूपदिष्टमार्गेण सिक्तं वस्त्रं शनैपॅसेत् ॥१॥.
चार अंगुल चौडी, पंद्रह अंगुल लंबी, वारीक वस्त्र (पग-
डी) की पट्टी थोडे गरमजउमें भिगाय मुखसे पहिले दिन ए-
क हाथ, दूसरे दिन दो हाथ, तीसरे दिन तीन एवं कमसे १५
दिनमें पूरी गुरुपदिष्टमार्गसे ( ग्रास ) निघलजावै ॥ १ ॥
पुनःप्रत्याहरेचैतदुदितं धौतिकर्म तत।
कासश्वासप्लीहकुष्टं कफरोगाश्च विंशतिः ।
धौतिकर्मप्रभावेण प्रयान्त्येव न संशयः॥ २॥
उक्त वस्त्र पिछला किनारा मुखमें दांतोंसे दाव ओठोंसे ल-
गाय नौलीकर्म करे इससे छातीमें लगा वन ( उदर ) अंतडिमें
पहुँच साफ कर्ताहै तब थोडा २ बाहर निकालडाले यह धौ-
तिकर्म है कास, श्वास, पीहा, कुष्ठादि विपरोग, वसि प्रकारके
कफरोग इस धोतिकर्मके प्रमापसे निरसंदेह नाश होजातेह।।२।।
॥अथ वस्तिः॥
नाभि दम्ने जले पायो न्यस्तनालोत्कठासनः ।
आधाराकुञ्चनं कुर्यात्क्षालनं वस्तिकम तत् ॥१॥

(७०) गोरक्षपद्धति-
भव वस्तिकर्म कहतेहैं कि नानिमात्र जलमें उत्कटासन
बैठकर छः अंगुल लबी और अंगुल प्रवेशयोग्य छिद्रवाली
बांसकी नली चार अंगुल गुदामें प्रवेशकर गुदा आकुंचन कर-
के पेटमें जल चटाय नौलीकर्म करके बाहर छोडदेवै यह ब-
स्तिकर्म है. धोती बस्ति विना भोजन किये करने न चाहिये
तथा इनके उपरांत शीघ्र भोजन करना योग्य है ।। १ ।।
गुल्मप्लीहोदरं चापि वातपित्तकफोद्भवाः ।
बस्तिकर्मप्रभावेण क्षीयन्ते सकलामयाः ॥ २॥
बस्तिकमसे गुल्म, पीह, जलोदर, वात, पित्त, कफसे
उत्पन्न सर्वरोग नाश होतेहै ॥ २॥
धात्विन्द्रियान्तःकरणप्रसाद
दद्याच कान्ति दहन प्रदीप्तिम् ।
अशेपदोपोपचयं निहन्या
दभ्यस्यमानं जलवस्तिकर्म ॥३॥
जलमें वस्तिकर्मके अग्याससे शरीरके सप्त धातु रस :
रुधिर २ मांस ३ मेद ४ अस्थि ५ मज्जा ६ शुक्र ७ तथा
पांच ज्ञानेंद्रिय पांच कमंद्रिय ओर अंतःकरणः, मन, बुद्धि,
• चिन, अहंकार, ताप, विक्षेप, शोकादि, मोह, गौरव, आवरण,
दीनता, राजसतामसका धर्म सभी निवृत्त होतेहैं. प्रसन्नता
कांति बढतीहै. जठरामि दीप्त होतीहै. वातादिसमस्त दोपोको
नीरोगिता होतीहै ॥ ३॥

भाषानुवाद । २०२ (७१) ॥अथ नेतिः॥ सूत्रं वित्तस्ति सुस्निग्धं नासानाले प्रवेशयेत् । मुखानिर्गमयेच्चैपा नेतिः सिद्धैर्निगद्यते ॥१॥ अब नेतिकर्म कहते हैं कि एक वालिस्त मुलायम, एवं थिरहित सूत्रका एक किनारा नासिकाके एक पुटमें प्रवेश कर दूरसे पुटकों बंदकर पूरक करे जब कुछ सूत्र ऊपर चढे तब मुखश्वास छोडकर सूत्र बाहर निकाले तब एक नारा मुख- के बाहर दूसरा नासिकाके बाहर दोनहूंको हाथोंसे पकड शनैः शनैः चलातारहै इसे नेतिकर्म सिद्धजन कहतेहैं ॥ १ ॥ कपोलशोधिनी चैव दिव्यहाष्टिप्रदायिनी। जबूर्ध्वजातरोगीघ नेतिराशु निहन्ति च ॥२॥ यह क्रिया कपोल तथा नासिकादियोंके मल दूर कर सू- क्ष्मपदार्थदशी दिव्यदृष्टि देतीहै और (जनू ) कंठमूल स्थानसे ऊपरके समस्त रोगसमूहको शीघ शांत करताहै ॥२॥ ॥अथ त्राटकम्॥ निरीक्षेनिश्चलदृशा सूक्ष्मलक्ष्यं समाहितः। अश्रुसंपातपर्यन्तमाचार्येवाटकं स्मृतम् ।।१।। अब त्राटक कहते हैं कि एकाग्र दृष्टिसे कुछ सूक्ष्म वस्तुको जबली नवॉमें पानी न आवै निरंतर देखतारहे. नेत्रोंमें जल आ- नेपर छोडदेव इसे मत्स्येंद्रादि त्राटक कहते हैं. में (नापाकार) समझताहूं कि सूक्ष्म वस्तुके स्थान में प्रथम नासाग्र .

(७२) गोरक्षपद्धति- होनेपर भूमध्य देखे तो औरभी अच्छे गुण शीघ्र होगे ॥३॥ मोचनं नेत्ररोगाणां तन्द्रादीनां कपाटकम् । यत्रतत्राटक गोप्यं यथा हाटकपेटकम् ॥२॥ यह घाटककर्म नेत्ररोगनाशक, बल बटानेवाला, आल- स्पनिद्रादियोंका (कपाट) केवाड है तंद्रा और तमागुणीचित तिके क्रोधादिकोंको दूर करताहे जैसे सुवर्णकी पिटारीसे यजसे रखते हैं ऐसेही इसकर्मकोभी गोप्य रक्खे ॥ २॥ ॥ अथ नौलिः॥ अमन्दावर्तवेगेन तुन्दं सव्यापसव्यतः नतांसो भ्रामयेदेपा नौलिः सिद्धेः प्रचक्ष्यते ॥१॥ अब नौटकर्म कहते हैं कि दोनहूं कधा नीचे नवाय उदरको दक्षिणवाममागकरके जलके (अमर) भोरके नाई घुमावै इस सिद्धलोग नौलि कहतेहै. अनुभवसिद्ध पहनी है कि दक्षि- णवामनागसे घुमायके अभ्यास हुयेमें नीचे ऊपरकोशी चरदी- के समान उदरानलको घुमाना चाहिये ।।१।। मन्दाग्निसंदीपनपाचनादिसंघापिकानन्दकरी सदेव । अशेपदोपामयशोपिणी च हठक्रियामौलिरयं हि नौलि २ जापानुवाद। श०२ (७३) ॥ अथकपालभातिः॥ भस्रावल्लोहकारस्य रेचपूरौ ससंभ्रमो। कपालभातिविख्याता कफदोपविशोपणौ ॥१॥ अब कपालभातिकर्म कहे कि लुहारकी धौंकनी (खाल) के नाई शीघ्र शीघ रेचन जो रेचकपूरक करे इसे कपालभाति कहतेहैं इससे बीस प्रकारके कफरोग दूर होतेहैं ॥ १ ॥ पट्कमनिर्गतस्थौल्यकफदोपमलादिकः । प्राणायामं ततः कुर्यादनायासेन सिद्ध्यति॥२॥ उक्त पट्कर्मोंकरके स्थूलत्ताव कफदोपमलपित्तादि दूर होमातेहैं तब प्राणायाम करे तो विनाश्रमही योगसिद्धि होतीहै ॥ २॥ उदरगतपदार्थमुद्रमन्ति पवनमपानमुदीर्य कण्ठनाले । क्रमपरिचयवश्यनाडिचका गजकरिणीति निगद्यते इटः॥३॥ अब गजकरणीमुद्राशी प्रसंगसे कहतेहैं कि, अपानवायुकों कठनालमें चटाय उदरगत भुक्तपीतअन्नजलादियोंको निकाले इस आयाससेभो नाडिचन अपने आधीन (वशीत ) होता- है इसे हठजयोगी गजकरणी कहते हैं ॥ ३ ॥ ॥ अथ उत्तराईग्रन्थः॥ पूर्वोक्न प्रकारोंसे नाडिशोधन हुयेमें यम-नियम-आसन साधक षट्चक्र पोडशाधारका कर्म जानकर नाडिजालना- (७४) गोरक्षपद्धति- डिगत वायु ज्ञात हुयेमें चंद्रतारानुकूल शुभदिन शुभ मुहूर्तमें लग्ननवांशादि शुभ साधके एकांतस्थलमै श्रीगुरु गोरक्ष, गणेशका पूजन मंगलपाठ स्वस्त्ययन कराय योगाभ्यासोपदे- शक श्रीगुरुको आरायनसे संतुष्ट कर उन्हीके आज्ञासे यो- गान्यासके आरंभ करना इसमें प्रथम पाणायामका विस्तार कहतेहैं।- प्राणो देहे स्थितो वायुरपानस्य निरोधनात् । एकश्वसनमात्रेणोडाटयेद्गगने गतिम् ॥ १॥ प्राणवायु जो देहमें स्थित है और मूलाधारस्थित अपानवा- युको ऊपर उठाय रोधकर एकही श्वासमें कुंडलीकरके रकाहु- भा सुपुम्णाद्वारको खोलके सुपुम्णानाडिके चिदाकाशमें ऊर्ध्व- गति कराताहै सो प्राणायाम सुगम होताहै ॥ ३ ॥ रेचकः पूरकश्चैव कुम्भकः प्रणवात्मकः । प्राणायामो भवेत्रेधा मात्राद्वादशसंयुतः॥२॥ रेचक, पूरक, कुंभकके भेदकरके प्राणायाम तीन प्रकार- का होताहै. बाहरके वायुको आयंतर प्रवेश करना पूरक, वा- युको भौतरही रोकना कुंभक, रुदवायुको बाहर निकालना रेचक होताहै प्रणवका स्मरण करनेवाला प्राणायाम है ब्राह्मण- को प्रणवका, क्षत्रिय वैश्यको एकाक्षर मंत्रजपका अधिकार है पूरकमें (अ) कारका स्मरणपूर्वक १२ प्रणव जपके चं- दनाडीसे पूरक (उ) कारके स्मरणपूर्वक चंद्रमंडलका ध्यान सनित : जमे # और (म) कारके ध्यानपृ. - भाषानुवाद । श०२ (७५) क १० प्रणवजासे रेचक करना. यह एक प्राणायाम हो- ताहै ॥२॥ मात्राद्वादशसंयुक्तौ दिवाकरनिशाकरौ। दोपजालमपघ्नन्तो ज्ञातव्या योगिभिः सदा ॥३॥ प्राणायामके अायास करते २ यदि संयम पूरा न पहुँचे तो नाडी मलिन होजातीहै इसलिये पुनः नाडीशोधन प्राणायाम क- हतेहैं कि चंद्रांग, सांग, प्राणायाम, प्राणापानवायुसंयुक्त १२ प्रणवमात्राकरके पूरक चंद्रमंडल-सूर्यमंडलध्यानयुक्त १६ मात्राकरके कुंभक और १० मात्रासे रेचक क- रके चंद्रसूर्य नाडी मलको नाश करते हैं ऐसा योगियोंने जान- ना ॥३॥ पूरके द्वादशी कुर्यात्कुम्भके पोडशी भवेत् । रेचके दश ॐ काराः प्राणायामः स उच्यते ॥४॥ प्रथमे द्वादशी मात्रा मध्यमे द्विगुणा मता। उत्तमे त्रिगुणा प्रोक्ता प्राणायामस्य निर्णयः ॥ ५॥ पूरकमें १२, कुंभकमें १६, रेचको १०, मात्रा प्र- णवकी यह प्राणायामप्रकार कनिष्ठ है. इससे द्विगुण अर्थात् पू. २४, कुं० ३२, रे० २०, यह मध्यम और पू० ३६, कुं० १.०, रे० ३०, यह उत्तम प्राणायाम है ॥४॥५॥ अधमे चोद्यते धर्मः कम्पो भवति मध्यमे । उत्तिष्ठत्युत्तमे योगी ततो वायुं निरोधयेत् ॥६ (७६) गोरक्षपद्धति- कनिष्ठप्राणायाममें (प्रस्वेद ) पसीना होती. मध्यममें कंप होताहै. उत्तममें योनिका आधार उठता है. इसलिये प्राणायामका आयास करना मुख्य है ॥६॥ पद्धपद्मासनो योगी नमस्कृत्य गुरुं शिवम् । भ्रमध्ये दृष्टिरेकाकी प्राणायाम समभ्यसेत् ॥७॥ ऊर्ध्वमाकृष्य चापानवायं प्राणे नियोजयेत् । ऊर्चमानीयते शत्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ८॥ प्राणायामकी विधि कहतेहैं कि एकांतस्थल में मोटे दलवाला कोमलकंबलादि आसनमें पद्मासन बांधके बैठकर श्रीगुरु एवं शिवकों प्रमाण करे अमृत सक्ति होरहा, ऐसे चंद्रबिंबका ध्यान भूमध्यकरके दोनहूं दृष्टि चूमध्यमें स्थापन करे तदनंतर बाह्मण प्रणवका क्षत्रिय वैश्य (ओम् ) इति एकाक्षरमंत्रका पूर्वोक्त मात्राके प्रकारसे पूरक, कुंभक, रेचक, प्राणायाम, चं- डांग, मांग, प्रकारकरके निरंतर करतारहै मूलाधार संको- चनपूर्वक अपानवायुको ऊपर खींचके प्राणवायुसे ऐक्य करे तव अपानवायुमिलित प्राणवायुको शक्तिचालनमुद्रासे उठाई- गई कुंडलिनीको सुपुग्णामार्गसे ऊपरको चढाव इतने विषि करनेसे योगी समस्तपापांसे निर्मुक्त होजाताहै ।। ७॥ ८॥ द्वाराणां नवकं निरुद्धय मरुतं पीत्वा दृढं धारितं । नीत्वाकाशमपानवह्रिसहितं शत्त्यासमुच्चालितम् ।। आत्मस्थानयुतस्त्वनेन विधिवदिन्यस्य मूर्ध्नि ध्रुवं । गावत्तिष्ठति तावदेव महतां संपेन संस्तूयते ॥९॥ - भाषानुवाद । श०२ (७७) केवल कुलकपाणायामका प्रकार कहते कि षण्मुखी- करक पूरकवायुसे उदर पूर्ण करके ऊपरके ७ नोचेके २ इन नव द्वारोंको रोकके मूलाधारगत कालानि अपानवायुसहित शक्तिचालनप्रकारसे प्रबुद्ध होरही कुंडलिनीको ऊपरको उठाय आज्ञाचक्रसे ऊपर उक्तवायुसे पूर्ण करके स्थिर करे सहस्रकम- लमें रहते परमात्माका ध्यानसे ज्योतिः प्रत्यक्ष करके यावतका- लसम योगी निश्चल होकर परमात्माका ध्यान करताहै,यही काल योगीका मोक्षसम है. आत्मध्यानतत्पर योगीश्वर सिद्ध इस योगीकी धन्यवादपूर्वक स्तुति करतेहैं यही परम फल योगका प्राणायामो भवत्येवं पातकेन्धनपावकः । भवोदधिमहासेतुःप्रोच्यते योगिभिः सदा ॥१०॥ इस प्रकारका नित्य निरंतर आयाससे प्राणायाम करना अनेक पातकरूपी काष्टको भस्म करनेवाला अग्नि होताहै. सं साररूपी समृद्रसे तारनेवाला महासेतु ( बडापूल ) योगिजनोंक- रके यही प्राणायाम कहाजाताहै ॥ ३ ॥ आसनेन रुजो हन्ति प्राणायामेन पातकम् । विकारं मानसं योगी प्रत्याहारेण मुञ्चति ॥१॥ पश्चिमतानआदि आसनोंसे शरीरके अशेष रोग नाश होते, प्राणायामसे समस्त पातक और प्रत्याहारते मानसिक अनेक विकार नष्ट होते हैं ।। ११ ॥ धारणाभिमतो धेय्य ध्यानाञ्चैतन्यमद्भुतम् ।

(७८) गोरक्षपद्धति समाधौ मोक्षमाप्नोति त्यक्त्वा कर्म शुभाशुभम्।।१२॥ धारणासे मनमें धैर्य बढनेउत्तर उत्तम ज्ञान मिलताहै ध्यानसे अद्भुत चैतन्य सर्वशाररिक ज्ञान मिलताहै समाधिसे अतिमान त्याग होकर जिसमें पुण्य-पाप लिप्त नहींहोते ऐसा कैवल्य मोक्ष मिलताहै ॥ १२ प्राणायामद्विपदकेन प्रत्याहारः प्रकीर्तितः। प्रत्याहारद्विपदकेन ज्ञायते धारणा शुभा ॥ १३ ॥ धारणा द्वादश मोक्ता ध्यानाध्यानविशारदैः। ध्यानद्वादशकेनैव समाधिरभिधीयते ॥१४॥ बारह प्राणायाम करके प्रत्याहारके फल देनेवाला प्रत्याहार (१२) प्रत्याहार (१४४ प्राणयाम) का धारणाका फल देनेवारी धारणा (१२) धारणा (१७२८ प्राणायाम)का प्राणायामरूप ध्यान (१२) ध्यान ( २०७३६ प्राणायाम) का प्राणायामरूप समाधि होतीहै ।। १३ ॥ १४ ॥ यत्समाधौ परंज्योतिरनन्तं विश्वतोमुसम् । तस्मिन् दृष्टे किया कर्मयातायातन्न विद्यते ॥१५॥ समाधिका सरूप कहतेहै. मूलाधारक चतुर्दल कमल कर्णिकामें सुपुम्णादारके मंमुस स्वयंचलिंगके शिग्में देदीप्य, मान पिंय है विंदुरवरूप कंडलिनीका है यह दीप्यमान विव समाधिम अंत न मिलनेगाला, समस्त जगत् व्याप्त करनेाला- “नम ज्योति कालामिस्वरूप प्रगट होता है इसके दर्शन, समा- " भाषानुवाद।श.२ (७९) धिद्वारा मिलनेसे जन्ममरण नहींहोवे कर्ममें लिप्त नहींहोता कैवल्यका अनुभव होजाताहै ॥ १५॥ संवद्धासनमेमप्रियुगलं कर्णाक्षिनासापुटा- वाराण्यङ्गुलिभिनियम्य पवनं वक्रेण संपूरितम् । ध्यात्वा वक्षसि वयपानसहित मूप्रिंस्थितं धारये- देवं याति विशेषतत्त्वसमतां योगीश्वरस्तन्मयः।।१६।। समाधिकी प्रक्रिया दिखातेहै प्रथम सिद्धासन बांधके दोनहूं हाथोंके अंगुष्ठोंसे दोनहूं कर्णछिद्र, तर्जनियोंसे नेत्र, मध्यमा- ओंसे नासिका, और अनामिका २ कनिष्ठिका २ से मुख रो- कके अधिमुखद्वारसे पूरित करके मूलाधारमें रहनेवाला अमि तथा अपानवायुसहित प्राणवायुको हृदयकमलमें धारण कर ऊपरको चढीय सहस्रदल कमलमें धारण करना इसप्रकार स- माधिके आयास करनेवाला योगी अपानवायुसंमिलित प्राण- वायुमय होकर सर्वदष्टा साक्षितत अंतरात्माके तुल्यताको प्राप्त होताहै ॥ १६ ॥ गगनं पवने प्राप्ते ध्वनिरुत्पद्यते महान् ।। घण्टादीनां प्रवाधानां तदा सिदिरदूरतः॥ १७॥ उक्त प्रकारसे प्राणवायु जब ( गगन ) सहस्रदल कमलमें प्राप्त होजाय तो धंदा नगारेआदि वायोंके ध्वनि प्रकट हो- नाहै इस चिह्नके मिलनेपर योगसिद्धि समीप है जानना ।।१७॥ प्राणायामेन युक्तेन सर्वरोगक्षयो भवेद । अयुक्ताभ्यासयोगेन सर्वरोगस्य संभवः ।। ३८ (८०) गोरक्षपद्धति- यथायोग्य निरंतराग्यस्त प्राणायामसे सबरोग क्षय होताहे ऐसेही अविधि विछिन्नाभ्यासादि प्राणायामसे अनेक रोग उत्पन्न होतेहैं ॥ १८॥ हिक्काकासस्तथा श्वासः शिरःकर्णाक्षिवेदनाः। भवन्ति विविधा रोगा पवनस्य व्यतिक्रमात् ॥१९॥ अयुक्त प्राणायामात्याससे वायु विरुद्ध होकर हिचकी, कास, श्वास, शिरःपीडा, कर्णशूल, नेत्रव्यथाआदि रोग उत्पन्न करताहै ॥ १९॥ यथा सिंहो गजो व्याघ्रो भवेदश्यः शनैः शनैः। अन्यथा इन्ति योक्तारं तथा वायुरसेवितः ॥२०॥ जैसे सिंह, व्याघ, गज इत्यादि दुष्ट जंतु मंदमंदकरके उन- के अनुकूल कर्मक्रमसे करके पालकके वशमें रहते हैं तथापि किसीसमय थोडानी उनसे विरोध होनेमें अपनेही पालकको मारडालतेहैं तैसेही पावनती युक्तअत्याससे वशवर्ती होताहै अयुक्तआयाससे रोगादियोंकरके अश्यासीको अनिष्ट हो- जाताहै ॥ २०॥ युक्तं युक्तं त्यजेदायुं युक्तं युक्तं च पूरयेत् । युक्तं युक्तं च वनीयादेवं सिद्धिरदूरतः ॥ २१ ॥ वायु शनैः शनैः रेचन करना जैसे नासाछिद्र के सामने - ईका फोहा रक्खाहुवा न उहे. एसेही शनः शनैः परकी कर- युक्न युक्त पूरक करना जिससे चित्तौबेग श्वासोत्कटतान " - , भाषानुवाद । श०२ (८१) होवै थोडासे क्रम सहनयोग्य घढावना उचित है इससे सिद्धि नजदीक मिलती है ।। २१॥ ॥ अथ ग्रन्थान्तरे प्राणायामभेदाः-॥ प्राणायामस्त्रिधा प्रोक्तो रेचपूरककुम्भकः । सहितः केवलश्चेति कुम्भको द्विविधो मतः॥१॥ ग्रंथांतरसें प्राणायामके भेद कहतेहैं कि (प्राण ) शरीरांत- र्गत वायुके रोधको प्राणायाम कहतेहैं इसके रेचक, पूरक, कुंक ३ भेद हैं भीतरसे वायु बाहर छोडना रेचक, बाहरसे वायु उदरमें पूर्णकरना पूरक, और पूरितवायुको घटवत् धा- रण करना कुंभक कहाताहै कुंतकी केवल एवंसहित दो भेद हैं वे केवल योगियोंके संमत है और सहितनी दोपकारका है एक रेचकपूर्वक दूसरा कुंजकपूर्वक पहिला रेचकमाणायामसे दूसरा पूरकप्राणायामसे भिन्न नहींहैं इनके पूरे भेद प्राणायाम प्रकरणसे जाननें ॥ १ ॥ यावत्केवलसिद्धिः स्यात्सहितं तावदभ्यसेत् । रेचकं पूरक मुक्त्वा सुखं यदायुधारणम् ॥२॥ जमलों केवल कुंजककी सिद्धि होतबलौं सहितकुंभक सू- प्यांग प्राणायाम करके सुपुम्णानके भेदनके पीछे उसके भीतर घटकासा शब्द हो तब केवल कुंभक सिद्ध होताहै तदनंतर १० १० वटायके ८० पयंत करे सामर्थ हो तो अधिक करे रेचक तथा पूरककोनी छोडके जो वायुधारण करना उसे केवल कुंभक कहतेहैं ।। २ ।

(८२), गोरक्षपद्धति-
प्राणायामोयमित्युक्तः स वै केवलकुम्भकः ।
कुम्भके केवले सिद्ध रेचपूरकवर्जिते ॥३॥
प्राणायाम जो कहा शुद्ध तो केवल कुंभकही है. अन्य
प्रकार नाडीशोधनार्थ हैं रेचकपूरकरहित केवल कुंजकके सिद्ध
होजानेमें ।। ३॥
न तस्य दुर्लभं किंचित्रिषु लोकेषु विद्यते ।
शक्तः केवलकुम्भेन यथेष्टं वायुधारणात् ॥ ४॥
योगीको तीनहूं लोकमें कुछभी दुर्लभ नहींहै जब केवल
कुंजकके सामर्थ्य होनेसे यथेच्छ (असंख्य) वायु धारण करे ॥४॥
राजयोगपदं चापि लभते नात्र संशयः।
कुम्भकात्कुण्डलीवोधः कुण्डलीवोधतो भवेत् ॥५॥
इस विधिसे निस्संदेह राजयोगपद प्राप्त होताहै कुंभकके
भायाससे आधारशक्ति (कुंडलिनी) बोध होता इससे निद्रा
भालस्यादि मिटतेहैं ॥५॥
अनर्गाला सुपुम्णा च हरसिद्धिश्च जायते ।
हठं विना राजयोगो राजयोगं विना हठः ।
न सिद्धयति ततो युग्ममानिप्पत्तेः समभ्यसेत्॥६॥
और सुपुग्णाके कफादिमल दूर होतेहैं तय हठसिद्धि (मोक्ष)
होताहै. हठयोगविना राजयोगसिद्धि राजयोगविना हठयोगसिदि
नहींहोती इसलिये दोनहूंका आयास करना ॥ ६ ॥

भाषानुवाद । श०२ (८३) कुंजकसे प्राण संरोधके अंत्यमें चित्तको आश्रयरहित करे इस प्रकारके आयासयोगकरके राजयोगपदको प्राप्त होताहै।णा वपुःकृशत्वं वदने प्रसन्नता। नादस्फुटत्वं नयने सुनिर्मले ॥ आरोग्यता विन्दुजयोग्निदीपनं । नाडीविशुद्धिर्हठयोगलक्षणम् ॥ ८॥ हठयोगसिद्धि जब होतीहै तो देहमें रुशता, मुखमें प्रसन्नता, नादकी प्रकटता, नेत्रोंकी निर्मलता, नीरोगिता, धातुका जय, उदग्में जठरामिकी दृद्धि, नाडियोंकीशुद्धि ये लक्षण होतेहै॥८॥ चरतां चक्षुरादीनां विषयेषु यथाक्रमम् । यत्प्रत्याहरणं तेषां प्रत्याहारः स उच्यते ।। २२॥ अब प्रत्याहार कहतेहैं रूप, रस, गंध, स्पर्श, शब्द ये पांच विषय हैं इनमें चक्षु, जिह्वा, प्राण, त्य, कर्ण, इन पांच ज्ञानेंद्रियोंके कर्म होतेहैं अर्थात् उक्त ज्ञानेन्द्रियों उक्त विषय- क्रमते हैं शासन-प्राणायाम सिद्ध करके जिस इंद्रियका जो विषय है उसे दूरसे समीप भावना कर क्रमशः शनैः शनैः त्याग करना अर्थात् इंद्रियसे उसके विपयका अनुभव- करके फेर इंद्रियोंको विषयसे अलग करना प्रत्याहार कहा- . नाह ।। २२॥ यथा तृतीयकालस्थो रविः प्रत्याहरेत्यभाम् । तृतीयाङ्गस्थितो योगी विकारं मानसं तथा ॥२३॥ निके प्रातः, मध्याह्न, सायं ये तीन भागसे तीन काल (८४) गोरक्षपद्धति- तेहै. जैसे (तीसरे ) सायंकालमें सूर्य अपनी (प्रभा) कांतिको क्रमशः हरण करताहै ऐसेही योगीनी तीसरे अंग ( आसन १ प्राणायाम २ प्रत्याहार ३) प्रत्याहारमें मानसविकार (विषय) में मनको अभिनिवेशको हरण करना अर्थात् विषयसंबंधसे चित्तको छुटाना ॥ २३ ॥ अङ्गमध्ये याङ्गानि कूर्मः संकोचयेऽदुवम् । योगी प्रत्याहरेद्देवमिन्द्रियाणि तथात्मनि ॥२४॥ जसे कूर्म (कछुवा ) अपने शिरपैरआदि अंगोंको संको- चन कर अपनही भीतर छिपायदेताहै. अंगतो उसी में रहतेहैं प- रंतु न हुयेके तुल्य होजानहैं ऐसेही योगीनेत्री इंद्रियोंको विप- योसे विमुख कर आत्मामें उनकी वृत्तियोंको थामलेना अर्थात् इंद्रियोंको उनके विपयोंमें आसक्त न होनेदेना विषयोंसे तृप्त जैसा मानकर इद्रियों को अपने भीतर अंतरात्मामें आसक्त करना ॥ २४ ॥ यं यं शृणोति कर्णाभ्यामप्रियं प्रियमेव वा। तं तमात्मेति विज्ञाय प्रत्याहरति योगवित् ॥२५॥ अगन्धमथवा गन्धं यं यं जिप्रति नासिका। तं तमात्मेति विज्ञाय प्रत्याहरति योगवित् ॥२६॥ अमेध्यमथवा मेध्यं यं यं पश्यति चक्षुपा। तं तमात्मेति विज्ञाय प्रत्याहरति योगवित ॥२७॥ अस्पृश्यमथ स्पृश्यं यं यं स्पृशति चर्मणा। तं तमात्मेति विज्ञाय प्रत्याहरति योगपित ॥२८ भाषानुवाद । श०२ (८५) लवण्यमलवण्यं वा यं यं रसति जिह्वया । तं तमात्मेति विज्ञाय प्रत्याहरति योगवित् ॥२९॥ कणसे मधुर वा कठोर जैसे शब्दोंको सुनताहै ऐसे मनमी कर्णद्वारा शब्दमें आसक्त होताहै. योगिजन उक्त शब्दोंकोजीय- हजो आत्माही है, समझ वह मतमें निश्चय कर मनको उक्त शब्द- विषसे प्रत्यायहण करे अर्थात् शब्दको विषय मानके जो मनमें ससंचम शब्द सुननेका लम होताहै उस भमसे मनको उसे मिथ्या (विनाशी) जानकर मनको उससे हटावै जैसे ( रज्जु ) रस्सीमें सर्पका एवं स्थाणु वृक्ष प्रस्तरादियोंमें मनुष्य भूतादि मांति होतीहै. नैसेही अखंडानंदस्वरूप आत्मचैतन्यमें संसार यद्वा देह है कहकर बुद्धि भांति करके कल्पना करती है वस्तुतः आ- त्मतत्त्वातिरिक्त कुछभी नहींहैं. इसकारण संपूर्णजगव आत्म- स्वरूप हैं. ऐसेही शब्दादि उक्त विपयोंकोंभी आत्माही है भा- वनापूर्वक निश्चय करके बाहर भीतर अद्वैवानंदस्वरूप आत्मा- से अन्य कोई नहींहै ऐसी धारणा स्थिर करके शब्दादि विष- योंको चलायमान हुयेमेंनी उन्हें आत्मा माने विषय न माने नासिकासे सुगंध वा दुर्गध जो सूंघताहै उसे आत्माही है निश्चय करके नासिकाकी वृत्ति जो गंधद्वारा मनको लुभाय नम डालतीहै उसे हटावै नेत्रंद्रियसे जोजो पवित्र वा अपवित्र पदार्थ देखताहै उन्हेंमी आत्माही है निश्चयकर रूपविषयसे मिथ्यासम छोडके नेद्रियवृत्तिको उक्त विषयसे इटावै त्वनिद्रियसे मृदु या कठोर तम वा शीतआदि जिस २ पदार्थको स्पर्श करताहै

(८६) गोरक्षपद्धति-
भी आत्माही है भावना निश्चयंकर त्वगिंद्रियवृत्ति जो स्पर्शसुखमें
मनको लुभातीहै उसको हटावे जिह्वासे सलोना, आनोना,मिष्ट,क-
टुक आदि जिन २रसोंको चखताहै उन्हें आत्माही समझकर जि-
व्हाकी वत्तिको हटावे इसप्रकार योगी प्रत्याहारके भायास क-
रके पंचेंद्रियवृत्तियोंको अपने २ विषयोंसे हटाय आत्मतत्त्वमें
स्थिर करना जब प्रत्याहार सिद्ध होजाताहै तो योगी कानोंसे
सुनें मधुरशब्दको तुल्य मानताहै कोहीनी इसके चित्तको
अपने ओर नहींलेजायसकते. ऐसेही नेत्रोंसे देवता वा पिशाच,
मनुष्य वा कुत्ता, ब्राह्मण वा चांडाल, गौना गदहा इत्यादि सभी-
को तुल्य देखताहै. नासिकासे कस्तूरिआदि सुगंधी वा पुरीपा-.
दि दुगंधियोंसे तुल्य सुख मानताहे त्वचासे अग्नि वा जल पोड-
शीत्रीकुच वा रुपाण (आरे) की धारा आदियोंके स्पर्शसे तु-
ल्य सुख मानताहै और जिह्वासे मीठा वा कडुवा, तप्त वा शीत,
तीक्ष्ण (मिर्च) वा, दुग्ध, मिट्टी, रेत,गोवर वा हलुवा,पूडीआदि-
योंको तुल्य स्वादिष्ट मानताहै।।२५॥२६॥२७॥२८॥२९॥
चन्द्रामृतमयीं धारां प्रत्याहरति भास्करः।
यत्प्रत्याहरणं तस्याः प्रत्याहारः स उच्यते ॥३०॥
प्रत्याहारके विधि कहनेउपरांत केवल हठयोगहीसेभी प्रत्या-
हारकी विधि कहतेहैं कि, पोडशदल कमलकर्णिकास्थित चंद्रयि-
बसे जो अमृतधारा गिरता है उसे नाभिकमलस्थित सूर्य ग्रासकर
लेताह. तो उक्त धाराको विपरीतकरिणीमुद्रा करके सूर्यसे हटाय
अपने मुखमं पारे. इसे प्रत्याहार कहतेहैं ॥ ३० ॥

जापानुवाद। श०२ (८७) एका स्रो भुज्यते दाभ्यामागता चन्द्रमण्डलात् । तृतीयो यः पुनस्ताभ्यां स भवेदजरामरः॥३१॥ एका स्त्री पदसे कंठस्थानगत चंद्रमासे निकसी अमृतधारा- का बोधन है (दात्यां ) पदसे सूर्यचंद्रमाका बोध है तृतीय पदसे आप ( योगी ) है उक्त अमृतधारा कंठ एवं नाभिगत चं- द्रसूर्यसे भोग करतीहै इसको तीसरा (आप) स्वयं विपरीत- करणीमुद्रा करके उक्त चंद्रसूर्यसे बचायकर भोग करे तो अजरामर होताहै ।। ३१॥ नाभिदेशे वसत्येको भास्करो दहनात्मकः । अमृतात्मास्थितो नित्यं तालुमूले च चन्द्रमा॥३२॥ अनिमय एक सूर्य नामिमें निवास करताहै अमृतात्मक चंद्रमा विशुद्धचक्र में रहताहै ॥ ३२॥ वर्पत्यधोमुखश्चन्द्रो असत्यूर्ध्वमुखो रविः। ज्ञातव्या करणी तत्र यया पीयूपमाप्यते ॥३३॥ विशुद्धचक्रमें रहकर अधोमुख चंद्रमा अमृतधारा वर्षाताहै उस धाराको नामिस्थित ऊर्ध्वमुख सूर्य पीलेताहै योगीकरके उक्त सूर्यको वंचनकर उक्त अमृतधाराको अपने मुतमें प्राप्त कियाजाताहै उसे विपरीतकरिणी जानना ।। ३३ ॥ ऊबै नाभिरपस्तालुरूच भानुरधः शशी। करणी विपरीताख्या गुरुवाक्येन लभ्यते ॥३॥ जो नाभिगत सूर्यको ऊपर (तालु) विशुद्धगत चंद्रमाको नोचें करे यह विपरीतकरणी गुरमुखहाँसे जानी जाती है, (८८) गोरक्षपदति- लिखनैसे नहीं किंतु सुबोध योगियों को इतना औरशी स्मरण करातेहैं कि यह मुद्रा प्राणायाम योग एवं खेचरीमुद्रासाधनके उपरांत इन्हीसे सुगम होजातीहै ॥ ३४ ॥ त्रिधा बद्धो वृपो यत्र रोखीति महास्वनः। अनाहतं च तच्चकं हृदये योगिनो विदुः ॥३५॥ तीन फेरा रस्तियासे बंधा वृपा जैसे पराधीन होकर शब्द करताहै ऐसेही अनाहतचक्रमें सत्त्व-रज तमोगुणस्वरूपमाया- वि प्रतिबिंबित होरहा जीव परा-पश्यंति-मध्यमावि प्रतिबि- वित होरहा जीव परा-पश्यंति-मध्यमाके क्रमसे हृदयमध्यमें ना दसहित होकर निरंतर शब्छ करताहै अनाहतचक्रको हदयमें योगिजन जानतेहैं ॥ ३५ ॥ अनाहतमतिक्रम्य चाक्रम्य मणिपूरकम् । प्राप्ते पाणे महापद्मं योगी स्वममृतायते ॥३६॥ खेचरीमुद्राकरके अमृतपानको सूचित करतेहैं कि प्राणापा- नवायुको एकत्व कर मणिपूर अनाहतचक्रोंको उल्लंघन करके महापन (ब्रह्मस्थान ) को प्राप्त करके योगी अमृतमय शरीर उक्तामृतपानसे होजाताहै ॥ ३६ ॥ ऊर्ध्व पोडशपत्रपद्मगलितं प्राणायाप्तं ठा- दुर्वास्यो रसनां निधाय विधिवच्छक्तिं परां चिन्तयेत् । तत्कल्लोलकलाजलं सुविमलं जिह्वाकुलं यः पिवे. निदोपः स मृणालकोमलवपुर्योगी चिरंजीवति ॥३७॥ उन प्रकारकरके ब्रह्मस्थानपर्यंत प्राणवायुको पूर्णकर भाषानुवाद । श०२ (८९) जो योगी शिरमें रहते सहस्रदल कमलमे विशद्धचक्र में गिरती बेला पाणवायुको ऊपर चढाय नासिका ऊर्ध्वविवरमें प्राप्त करे ऊर्च विवरमें जिह्वा प्रवेश कर अपना मुखभी अपरको करके सहस्रदलकमलमें प्राणवायुसहित प्रातहुई कुंडलिनीका ध्यान करता कुंडलिनीका सहस्रदलमें प्रवेश होतेही जो अमृ- ताकार तरंग निकलता है उसका लेशजूत अतिनिर्मल जिहाके मथनसे निकलेहुये अमृतको पान करे वह योगो अतिसुकुमार शरीर पायके समस्त रोगदुःखोंसे रहित होकर बहुतकालपर्यंत जीवित रहताहै ॥ ३७॥ काकचञ्चवदास्येन शीतलं सलिलं पिवेत् । प्राणापानविधानेन योगी भवति निर्जरः॥३८॥ अपानवायुको उठाय अपानवायुके साथ ऐक्य करनेवाले प्रकारसे काक (कौवे ) कासा चोंच मुखकर शीतल सलिल (वायायु ) को जो योगी पूरक (पूर्ण) करताहै वह वृद्धाव- स्थासे रहित होताहै अर्थात सर्वदा यवाही रहताहै ॥ ३८ । रसना तालुमूलेन यः प्राणमनिलं पिवेत् । अन्दान भवेत्तस्य सर्वरोगस्य संक्षयः ॥ ३९ ॥ 'जिह्वाके सहाय करके तालुमूलसे जो विवर (छिद्र) हैं इसक- रके जो योगी माणवायुको पूर्ण (परित ) करताहै उसके छः महिनेक आयासमे समस्त रोगोंका नाश होताहै !! ३९ ।। विशुद्धे पञ्चमे चके घ्यावासौ सकलामृतम् । उन्मार्गण हृतं याति पञ्चयित्वा मुखं खेः॥४० ' (९०) गोरक्षपद्धति- पांचवां विशुद्धचक्र ( जो कंठमें रहताहै ) में चंद्रकलांमृत- का ध्यानकरके क्रमसे ऊपरको हरण करताहुवा सूर्यके मुख- को वचनकर योगीके मुखमें उक्त चंद्रकलामृत पडताहै इसम- कार जिह्वाद्वारा उदरमें प्राप्त होकर योगीके जरा, रोगादियोंको हरलेताहै ॥ ४०॥ विशब्देन स्मृती हंसो नैर्मल्यं शुद्धिरुच्यते । अतः कण्ठे विशुद्धाख्यं चक्रं चक्रविदो विदुः॥४१॥ 'वि' शब्द हंसका और 'शुद्ध' शब्द निर्मलका बोधक है कंठमें अत्यंत निर्मल विशुद्धनामा चक्र है. यह सर्वोत्कृष्ट है चक्रोंके तत्त्व जाननेवाले योगी जानतेहै ॥ ४ ॥ अमृतं कन्दरे कृत्वा नासान्तसुपिरे कमात् । स्वयमुच्चालितं याति वर्जयित्वा मुखं खेः॥ ४२ ।। विशुद्धचक्रस्थ चंद्रकलामृतको अपानवायुसहित प्राणवा- युको ऊपर चलायके लंबिका ऊर्ध्ववियरमैं प्रवेश ( पूर्ण ) कर क्रमसे नासिकाके ऊपर विवरमें पहुँचानेसे नाभिमूर्यके मुख (जो अमृतको भस्म करताहै ) को वचन ( छलन ) करके उ- कामृत उदरमें अन्नके समान पहुँचताहै ।। १२ ।।

भाषानुवाद । श०२ नासा ऊर्ध्ववियर में पूरित करे तब सर्वद्वारों को रोकके (गगन) आज्ञाचक्रमें प्राणापानवायुसहित पूरण करके ऊर्ध्वमुख होकर भूमि उत्तान लेटकर पैरोंकोजी उत्तान करके जितेंद्रिय होकर उक्तामृतपान करना जो योगी निरंतर इस विधिको करताहै उसका क्षय (मृत्यु) नहींहोती ॥४३॥ ऊध्र्व जिह्वां स्थिरीकृत्य सोमपानं करोति यः। मासान न सन्देहो मृत्युं जयति योगवित् ॥४४॥ जिहाको ऊपर लंबि करके ऊपर स्थिर करके जो योगी अमृतपान करताहै उस आयासीको एकही पक्ष ( १५ दिन) में मृत्यु जीतने की सामर्थ होतीहै इसमें संदेह नहीं ॥ १४ ॥ बद्धं मूलबिलं येन तेन विनो विदारितः । अजरामरमाप्नोति यथा पञ्चमुखो हरः॥४५॥ जिस योगीने (मूलबंध) मूलद्वार रोका उसने जरामरणा- दि विघ्नका नाश करलिया, इस हेतु जरामरणयुक्त देहमें आ- मनावको छोडकर जरामरणरहित शुद्ध आत्मभावको प्राम होताहै जैसे पंचवा सदाशिव देहाहकार जरामरणादिरहित विराजमान हैं पैसेहो उक्त अयासीनी होताहै ॥४५॥ संपीड्य रसनाग्रेण राजदन्तविलं महत् । ध्यात्वामृतमयी देवों पण्मासन कविर्भवेत् ॥ ४६॥ जो जिद्वापसे गजदंतके बिल (रंध्र) को अचेतन (पीडन) कर अमृतमयी वागीश्वरी देवीके ध्यानका अायास करता है (१२) गोरक्षपद्धति अश्यास सिद्ध होनेपर छैः महीनेमें विचित्र कवितासामर्थ्य क- वि होजाताहै ॥ ४६॥ सर्वाधाराणि वनाति तदूर्य धारितं महत् । न मुञ्चत्यमृत कोपि स पन्थाः पञ्च धारणाः ॥१७॥ जिह्वायसे पीडनकर राजदंतके छिद्रको रोकनसे समरत नाडियोंके मुख रुक जातेहैं. ऊपरके रुकनेंसे अमृतधारा गिर- के अन्यत्र नहीं गिरसकती पंच धारणाके आयासी योगीको- श्री जैसे इसी में चंद्रमासे निरसरित अमृतका हरण भत्याहार कहाहै तैसेही अमृतको लंविकाके ऊर्ध्वविवरमें धारणा कर- ना यह धारणा होतीहै ।। ४७ ॥ चुम्वन्ती यदि लम्बिकायमनिशं जिह्वारसस्यन्दिनी। सक्षारं कटुकाम्लदुग्धसदृशं मध्याज्यतुल्यं तथा ॥ व्याधीनां हरणं जरान्तकरणं शास्त्रागमोदीरणं । तस्यस्यादमरत्वमटगुणितं सिद्धाङ्गनाकर्षणम् ४८ जिद्वासे लंपिकाके निरंतर चुंबनान्यास करनेवाले योगीको कभी लवण, कभी चरपरा, कती सट्टा, कभी दूधसा, कभी सह- इकासा, कनी पीकासा वाद जिह्वामें अनुभव होतहैं ये लक्षण जब आपास सिद्ध हुयमें होने लगते हैं तब योगीके व्याधि (रोग) नाश होतेहैं. वृद्धावस्थाका निवारण होता है शारके व्यास्यान करने के सामर्थ्य विनापटेनी होतीहै अमृतमपशरीर होकरभ- सिदि मिलतीहं स्मरणमा प, नागादिकन्याओं भावपण करनी भाषानुवाद । श०२ (९३) अमृतापूर्णदेहस्य योगिनो द्वित्रिवत्सरात् । जय प्रवर्तते रेतोप्याणिमादिगुणोदयः॥१९॥ उक्त प्रत्याहारका फल कहते हैं कि उक्त प्रकारसे अमृतसे परिपूर्ण जब देह योगीका होजाताहै तो २१३ वर्ष अभ्याससे वीर्य (रेत ) ऊपरको चढजाताहै कवरेता होकर कदाचित्- भो वीर्य स्खलित नहींहोता एवं अणिमादि सिद्धि उदय हो- तोहैं ।। ४९॥ इन्धनानि यथा वहिस्तैलवाति च दीपकः । तथा सोमकलापूर्णदेहं देही न मुञ्चति ॥५०॥ जैसे अमि शुष्ककाठ एवं दीपक तैलपतिको समग्र भस्म कियेविना नहीं छोडता तैसेही जीवात्मानी चंइकलामृतसे पू- हुये योगीके शरीरको कदापि नहींछोडना ।। ५०॥ नित्यं सोमकलापूर्णशरीरं यस्य योगिनः। तक्षकेणापि दष्टस्य विपं तस्य न सर्पति ॥५१॥ निस योगिका शरीर नित्य सोमक्लामृतसे पूर्ण रहताहै उसे तक्षरनागमो डसे ( काटे ) नोनी शरीरमें विष नहीं फैल- ता॥५३॥ इति प्रत्याहारप्रकरणम्. 'अब ९ श्लोकसे धारणाका विस्तार कहते हैं- आसनेन समायुक्त प्राणायामेन संयुतः। प्रत्याहारेण संपन्नो धारणां च समभ्यसेत् ।। ५२॥ 'भासनका साधन प्राणायामका साधन प्रत्याहारकामापा- . (९४) गोरक्षपदति- स स्थिर करके इंद्रियवृत्नियोंको रोकनके मामर्थ्य हुयेमें धारण- का अभ्यास करना ॥५२॥ हृदये पञ्च भूतानां धारणा.च पृथक् पृथक् । मनसो निश्चलत्वेन धारणा साभिधीयते ॥५३॥ - हृदयमें मन एवं प्राणवायुको निश्चल करके पृथ्वी, जल, ते- ज, वायु, आकाशसंज्ञक पंच भूतोंको पृथक् पृथक् संधार क. रना धारणा कहातीहै ॥५३॥ या पृथ्वी हरितालहेमरुचिरा पीता लकारान्विता संयुक्ता कमलासनेन हि चतुष्कोणा हदि स्थायिनी। प्राणांस्तत्र विलीय पञ्चपटिक चिन्तान्वितान्धारयः -देपा स्तम्भकरी सदा क्षितिजयं कुर्याद्धवो धारणा ५४ पहिले पृथ्वोधारणा कहतह कि जो पृथ्वी हरिताल यहा सुवर्णसमान रमणीयवर्ण अधिष्ठातृदेवता ब्रह्मासहित चतुष्कोणा- कार मध्यम ( लैं) चीजयुक्त है इस (लं) पृथ्वीतत्वको हृद- यमें ध्यान करके भावना करना उक्त मंडलमें आपभी लीन होना चित्तसहित प्राणको लीन करके पांच (५) घटीपर्यंत स्तंभन करनेवाली धारणा होतीहै इस धारणाके सर्वदायास करनेसे पृथ्वीतत्त्व अपने वशवनी होताहै ॥ ५४॥ अदेन्दुप्रतिमं च कुन्दधयलं कण्ठेम्वुतत्वं स्थितं यत्पीयूप-व-कारवीजसहितं युक्तं सदा विष्णुना । प्राणं तत्र विलीय पञ्च पटिका चित्तान्वितं धारये- देपा दुःसहकालबाटदद्दनीयादारुणोधारणा।।६।।

भाषानुवाद । श०२ (९५) वारुणी (जल ) धारणा कहतेहैं कि अर्दचंद्राकार कंद पुष्पसमान श्वेतवर्ण अमृतरूप (1) वीजमध्यसहित अधिष्ठात- देवता विष्णुसहित जलतत्त्वको विशुद्धचक्र में ध्यान करना उक्त जलतत्त्वमें आपनी लीन होकर चित्तसहित प्राणको लीन कराय पांच पटीपर्यंत धारणा करना यह जलस्तंभन करनेवाली वार- णीधारणा है इसके सर्वदा आयास करनेसे कालकूटविषकानी भस्म होजाताह विषका असर शरीरमें नहीं होता ॥५५॥ यत्तालस्थितमिन्द्रगोपसदृशं तत्त्वं त्रिकोणानलं तेजो रेफयुतं प्रवालरुचिरं रुदेण सत्सङ्गतम् । प्राणं तत्र विलीय पञ्चघटिक चित्तान्वितं धारये- देपा वह्निजयं सदा वितनुते वैश्वानरी धारणा॥५६॥ ' आग्नेयी धारणा कहतहें कि ( इंद्रगोप) वीरबहूटी कौडेके सहश रतवर्ण त्रिकोणाकार ( प्रवाल ) मुंगासमान रमणीय ते- जोरूप () बीजमध्य शोधित अधिष्ठातृदेवता रुद्रसहित आ- ग्नेयतत्त्वको तालुरथानमें भावनाकरके उक्त अमितत्त्वमें आप- भी लीन होकर चित्तसहित माणको सीन कराय पांच घरीप- यंत तन्मय होना वैवानरी धारणा होती है इसके सर्वदा सेवन करनेसे योगी अमिको जीतनेवाला होताहै अग्नि उसको दाह नहींकरता ॥ ५६॥ यद्भिन्नाञ्जनपुचसन्निभमिदं स्यूतं भ्रुवोरन्तरे तत्त्वं वायुमयं यकारसहितं तत्रेश्वरो देवता। 'प्राणं तत्र विलीय पञ्चपटिकं चित्तान्वितं धारये.

(९६) गोरक्षपद्धति- देपा खे गमनं करोति यमिना स्याद्वायवी धारणा५७ वायवी धारणा कहतेहैं कि वर्तुलाकार कज्जलके पुंजसमा- न अतिनीलवर्णा (य) बीजसहित अधिष्ठातृदेवता, ईश्वरस- हित वायुतत्त्वको मध्यमें ध्यानकर उक्त वायुतत्वमें आपभी लीन ही या चिचसहित प्राणकोलीन कर पांच घटीपर्यंत स्थिर रखना यह वायुतत्त्वकी धारणा है इस धारणाके नित्य अस्या- स करनेसे आकाशमें गति होता है ॥५७ ॥ आकाशं सुविशुद्धवारिसदृशं यारन्धस्थित तन्नादेन सदा शिवेन सहित तत्व हकारान्वितम् । प्राणं तत्र विलीय पञ्चषटिक चित्तान्वितं धारये- देपा मोक्षकपाटपाटनपटुः प्रोक्ता नभोधारणा ५८ ननोधारणा कहतेहैं कि वर्नुलाकार निर्मलजलसमान वर्ण (है) बीजसहित अधिष्ठातृदेवता सदाशिवसहित आकाशतत्त्व- को ब्रह्मरंध्रमें ध्यान करना इस तत्त्वमें आपभी लीन हो चित्त- सहित प्राणको लीन कर पांच घटीपर्यंत स्थिर रखना यह न- भोधारणा मोक्षरूपी द्वारके खोलने में चतुर है इसके नित्य अ- ग्यास करनेसे मोक्षद्वार खुल जाताहै ।। ५८॥ स्तम्भिनी द्राविणी व दानी भ्रामिणी तथा। शोपिणी च भवत्येपा भूता- पञ्च धारणाः ।।५९॥ पृथ्वीधारणाके अभ्यास दृढ हुयमें जलपवनादि स्तंभनसाम- र्य होती है वारुणीधारणाके भायास इट हुप में समस्तद्रव्यमा- अको (ब) जलसमान कानकी सामर्थ्य होताह एवं आमेयो- गशास्त्रोक्तमकारसे निर्मलांतरकरके आत्मतत्त्वका स्मरण कर- जापानुवाद । श०२ (९७) विना अग्निही वस्तुमात्रको जलानेकी सामर्थ्य होतीहै वायु- वारणासे वस्तुमात्र किंवा समस्त जगत्को घुमानेकी सामर्थ्य होताह मनोधारणासे सर्व शोपण सामर्थ्य होती है ये पंच धार- णाओंके साधारण किया हैं ॥ ५९॥ कर्मणा मनसा वाचा धारणाः पञ्च दुर्लभाः। विज्ञाय सततं योगी सर्वदुःखैः प्रमुच्यते ॥६० ॥ कर्म (अनुष्ठान ) से मनके चिंतनसे वचन शास्त्राज्ञाके प्रमा- ण माननेसे निरूपण कर पांचों धारणाओंको स्थिराज्यास कर- ताहै वह समस्त दुःखोंसे मुक्त होताहै ।। ६०॥ इति धारणाः- स्मित्येव सर्वचिन्तायां धातुरेकः प्रपद्यते । याचित्ते निर्मला चिन्ता तद्धि ध्यानं प्रचक्षते ॥६॥ 'स्मृ' यह धातु चिंतासामान्यवाचक है सो चित्तमें यो- ना ध्यान कहाताहै ।।६।। द्विविधं भवति ध्यानं सकलं निष्कलं तथा। सकलं चर्याभेदेन निष्कलं निर्गुणं भवेत् ॥ ६२ ॥ यह ध्यान सगुण, निर्गुण जेदसे दो प्रकार है जैसे न्यामवर्ण चतुर्बाहु वनमाला-मुकुट-वंडल-पीतांबरधारी विष्णुका ध्यान करना सगुणध्यान है ॥ ६॥ भन्तश्चेतो वद्दिश्चक्षुरधः स्थाप्य सुखासनः । कुण्डलिन्या समायुक्तं घ्यावा मुच्येत किल्विपात (९८) गोरक्षपद्धति- एकांत पवित्रस्थानमें बैठके पनासन वा स्वस्तिकासन बांध शरीर सरल बनाय आधारादिचक्रॉमें अंतःकरण ( मन ) ल- गाय नासाग्रदृष्टि देकर निश्चल एकाग्र होकर कुंडलिनी सहित ध्येयवस्तुका ध्यान करना इससे योगी समस्तपापोंसे निर्मुक्त होताह यह ध्यानमुद्रा है ॥ ६३ ॥ आधारं प्रथमं चक्रं स्वर्णाभं च चतुर्दलम् । कुण्डलिन्या समायुक्तं घ्यात्वामुच्येत किल्विपैः॥६॥ योगीजनोंके ध्यान करनेयोग्य वनस्थान है इनमें प्रथम मूलाधारचक्र सुवर्णवर्ण चतुर्दल कमल है इसके कनिका स्व- पंजूलिंगके शिरमें बिंबाकार साढतनि वृत्तवेष्टित होरही कुंड- लिनीसहित इस चक्रके ध्यान करनेसे समस्त पापोंसे निर्मुक्त होताहै ॥ ६४॥ स्वाधिष्ठाने च पदपत्रे सन्माणिक्यसमप्रमे। नासायष्टिरात्मानं ध्यात्वा योगी सुखी भवेत्॥६५॥ द्वितीय स्वाधिष्ठानचक रक्तवर्ण पदलकमलकर्णिकामें सगुण वा निर्गुण ज्योतिःस्वरूप आत्माको नासामष्टि करके ध्यान करनेसे योगी आनंदावस्थाको प्राप्त होता है ।। ६५॥ तरुणादित्यसंकाशे चक्रे च मणिपूरके । नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा संक्षोभयेजगत् ॥६६॥ तृतीय मणिपूरचा उदय होते मूर्यमंडलसमान रनवर्ण कमलकर्णिकामें सगुण वा निर्गुण ज्योतीरूप आत्माको नासा.

भाषानुवाद । श०२ प्रदृष्टिकरके ध्यान करनेसे योगी समस्त जगवक्षोभ करनेकी सामर्थ्य पाताहै ।। ६६॥ हृदाकाशे स्थितं शम्भु प्रचण्डरवितेजसम् । नासाग्रे दृष्टिमाधाय घ्यात्वा ब्रह्ममयो भवेत्॥६७॥ चतुर्थ दृदयरूपआकाश अनाहतचक्रकर्णिकामें रहते प्रचं- उतेजवान सूर्य्यसमान तेजस्वी बाणलिंग (शिव) का ध्यान नासाग्रदृष्टि देकर करनेसे योगी ब्रह्ममय होताहै ॥ ६७ ॥ विद्युत्प्रभे च हृत्पद्मे प्राणायामविभेदतः । नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा ब्रह्ममयो भवेत् ॥६८॥ ऐसेही विद्युत् ( विजुरी ) समान प्रभायुक्त हृदयकमल क- णिकामें उक्त प्रकारसे नासाग्रदृष्टि देकर सगुण था निर्गुण ज्योतिःस्वरूप आत्माके ध्यान करनेसे योगी ब्रह्ममय (जीव- म्मुक्त ) होताहै ।। ६८॥ सततं पण्टिकामध्ये विशुद्धे दीपकप्रभे। नासाग्रहटिरात्मानं ध्यात्वा ब्रह्ममयो भवेत् ॥६९॥ कंठस्थानमें दीपज्योतिसमान कांतिमान विशुद्धचक्रमें ना- सांप्रदृष्टिकरके सगुण निर्गुण वा ज्योनिःस्वरूप आत्माके ध्यान करनेसे योगी अमर (मरणरहित ) होताहै ॥ ६९ ॥ ध्रुवोरन्तर्गतं देवं सन्माणिक्यशिखोपमम् । नासायष्टिरात्मानं च्यात्वानन्दमयो भवेद ॥७॥ भूमध्ये आमाचक्रमें माणिकशिखा (चूनीकी सूक्ष्म चमक) गोरक्षपद्धति- समान रक्तवर्ण आत्माको नासायष्टि देकर ध्यान करनेसे यो- गी समस्त दुःखरहित आनंदमय होताहै ।। ७०।। ध्यायन्नीलनिभं नित्यं चमध्ये परमेश्वरम् । आत्मानं विजितप्राणोयोगी योगमवाप्नुयात्।।७॥ आज्ञाचक्रमें नीलवर्ण शिवपरमात्म्मका ध्यान प्राणायाम प्र- कारकरके करनेसे 'योगी जीवात्मा परमात्माके ऐक्यको पा- ताहै ॥ ७॥ निर्गुणं च शिवं शान्त गगने विश्वतोमुखम् । नासायष्टिरेकाकी ध्यात्वा ब्रह्ममयो भवेत् ॥७२॥ आज्ञाचक्रमें निर्गुणरूप, शात, विश्वव्यापक, शिवके नासा- मदृष्टि देकर ध्यान करनेसे जीवनावको देनेवाले गुणधर्मसे र- हित होताहै अर्थात् जीवभावकारमरणमात्रनी नहींरहता७२॥ आकाशे यत्र शब्दः स्यात्तदाज्ञाचक्रमुच्यते । तत्रात्मानं शिवं ध्यात्वा योगी मुक्तिमवाप्नुयात् ||७३।। जिस तत्त्वमें नाद प्रकट होताहै ऐसा आकाशतत्वस्थान म- नका स्थान है सोही भ्रूमध्यमें आज्ञाचक्र कहालाहै इसमें रहते सदाशिवरूप आत्माके ध्यान करनेसे योगी कैवल्य मुक्ति पाताहै ॥ ७३॥ निर्मलंगगनाकारं मरीचिजलसन्निभम् । आत्मानं सर्वगं ध्यात्वा योगी मुक्तिमवाप्नुयात् ७४ आज्ञाचक ऊपर शून्यस्थानमें करनेयोग्य ध्यान व हत हैं कि, स्वरुपको आच्छादित करनेवाला, मलिनसंपधम रहित, भाषानुवाद । श०२ (101) आकाशसमान, एकाकार, सर्वव्यापक, प्रकाशमान तेजःस्वरूपके प्यान करनेसे योगी मुक्ति को प्राप्त होताहै ।। ७४ ॥ गुदं मेद्रश्च नाभिश्च हत्पमं च तदूर्ध्वतः। घण्टिका लम्विकास्थानं भूमध्ये च नभोबिलम् ७५ ध्यानमुक्त नव (९) स्थानोंको पुनः स्मरण करतेहैं कि, गुदा (मूलाधार ) १ मे (स्वाधिष्ठान ) २ मामि (मणिपूर) ३ इसम (अनाहत) ४ तदूर्ध्व ( विशुद्ध ) ५ घटिकाका मूल ६ लंबिकाका स्थान ७ आज्ञाचक्र ८ इसके ऊपरका शून्पस्या- न ९ ये नव ध्यानयोग्य स्थान हैं ॥ ७५ ॥ कथितानि नवैतानि ध्यानस्थानानि योगिभिः । उपाधितत्त्वमुक्तानि कुर्वन्त्यष्टगुणोदयम् ॥७६॥ योगियोंने उक्त नव (९) स्थान ध्यानोपयोगी कहेहैं इन्हैं उ- पाधि अर्थात् पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश पांच तत्वोंक- रके सहित करनेसे अणिमादि अष्टसिद्धियोंका उदय होताहै ७६ एषु ब्रह्मात्मकं तेजः शिवज्योतिरनुत्तमम् । ध्यात्वा ज्ञात्वा विमुक्तः स्यादिति गोरक्षभाषितम्७७ उक नव (९, स्थानों में सर्वोत्कृष्ट शिव अनाहत आज्ञाच- कॉमें उक्त प्रकारसे साकार सगुणस्वरूपको अथवा निराकार निर्गुणबझको भावना करके उक्त स्थानोंमें ध्यान करने से यो- गो समारसे मुक्त होकर पुनर्जन्यमरणरूप संतापसे छुटताहै यह भीगोरक्षनाथ प्रतिज्ञा करके कहते हैं इसमें संशय न मानना ७७ नांभी संपन्य चित्तं पानगतिमधो रोघयत्संप्रयवा- . (३०.) गोरक्षपद्धति दाकुच्यापानमूलं हुतवहसदृशं तन्तुवत्सूक्ष्मरूपम् । तवा हत्सरोजे तदनु दलणके तालके ब्रह्मरन्ध्र भित्त्वा ते यान्ति शून्यं प्रविशति गगने यत्र देवो महेशः॥ चित्त (अनःकरण ) को मणिपूरचप्रमें स्थिर करके अ- पानद्वारको बड़े प्रयत्नसे सकोच विकाश र अपानवायु- को अधोगतिको रोकके ऊपरको उठाय मन एवं प्राणव युसे ऐक्य करे सूत्रके समान सूक्ष्म अभिसमान देदीप्यमान ज्योति:- स्वरूपको उक्त ऐक्यविपये चिंतन करनेसे उक्त ज्योति नाभि- चक्रको धनकर हृदयकमलमें पहुँचताहै पुनः भायास सिद्ध हो तो हृदयकमलको वेधकर ब्रह्मरन्धमें पहुँचताहै इसी विधिसे योगियोंक शरीरत्यागसमयमें वही ज्योतिःस्वरूप ब्रह्म- रन्धको भेदनकर परमशिव शून्याकार चिदाकाशमें प्रवेश कर परब्रह्ममें लीन होजाताहै ।। ७८ ॥ नाभौ शुभ्रारविन्दं तदुपरि विमलं मण्डलं चण्डरइमेः । संसारस्यैकरूपां त्रिभुवनजननी धर्मदात्री नराणाम् ॥ तस्मिन्मध्येत्रिमागें त्रितयतनुधरां छिन्नमस्तांप्रशस्तां । तांवन्दे ज्ञानरूपांमरणभयहरं योगिनीज्ञानमुद्राम् ७९ मणिपूरचक्रमें शुक्लपर्ण कमल चिंतनपूर्वक उसके मध्यमें नि- मल सूर्यमंडलका ध्यान करना इस मंडलके मध्यमें सत्त्व-रज- तम निगुणरूप उपाधिोदसे तीन प्रकारको प्रान होरहा सुपुग्णा- नाडीके द्वार संसारके कारणरूपा त्रैलोक्यक उत्पन्न करनेहारी जम्ममरणोपाधियस्त मनुष्योंको उपासनामार्गसे मोक्षरूप परमंध- जापानुवाद शि.२ (१०३) मैदेहारी त्रिगुणरूप होरही ज्ञानस्वरूपिणी (जिसकी स्तुति ब्रह्मादिदेवता सनकादि सिद्ध करतेहैं ) तथा योगमावसे गम्या, ज्ञानमात्र आधिसे होरही छिन्नमस्ता नाडीस्वरूप भासमान हो- रही कुंडीलनीको स्तुति (अभिवादन) करताहूं इसप्रकार योगी छिन्नमस्ता महाविद्यारूप कुंडलिनीकी वंदना करे ।। ७९ ॥ 'अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च। एकस्य ध्यानयोगस्य कलां नाईन्ति षोडशीम् ८० सहस्रों अश्वमेव सेकडों वाजपेययज्ञोंका फलभी केवल सा- त्विक एक ध्यानावस्थाका सोलहवा अंश ( भाग) के समान नहीं है अर्थात् यज्ञादि साधनाओमंत्री श्रेष्ठ ध्यानयोग है।८०॥ इति ध्यानप्रकरणम्. उपाधिश्च तथा तत्वं द्वयमेतदुदाहृतम् । उपाधिः प्रोच्यते वर्णस्तत्त्वमात्माभिधीयते॥८॥ अब १५ टोकमें समाधिविधि कहतेहैं आत्माके प्र- काश होनेवालेको उपाधि तथा आत्मचैतन्यको तत्त्व कहतेहैं उपाधि और तत्व ये दोनहूं मुख्य विचार्य्य हैं उपाधि प्रणवरू- प वर्ण ॐ है तत्त्व आत्मा कहाताहै ॥ ८१ ॥ - उपाघेरन्यथा ज्ञानतत्वसंस्थितिरन्यथा। समस्तोपाधिविध्वंसी सदाभ्यासेन जायते ॥ ८२॥ उपाधिसे यथार्थ वैपयिक अन्यही है अर्थाद विपरीत बो- वक है जैसे स्फटिक तो स्वच्छ खेतमात्र है परंतु लाल, पीलो, नीलो आदि रंग (उपाधि ) संबंधसे उसी रंगकासा स- मानं होताहै तैसेही शरीरमें निर्विकार शुद्ध आत्मा विषयवास- (१०४) गोरक्षपद्धति- नाओंके संसर्गसे "अहं सुखींग "अहंदुःखी" इत्यादि भासमान होताहै जब अपनी निर्मलबुद्धिसे उपाधि पृथक् माने तब आरम- स्वरूपका यथार्थज्ञान होताह जैसे रक्तारिंग में स्फटिव भी बै- सा होताहै परंतु बुद्धिसे जो न कि स्फटिक तो शुलही है परंतु रक्तादि रंगोपाधिविकारसे मिथ्या रंग देखाजाताहै सेही ई- दियधीस आतमी जीवात्मा यथार्थज्ञानसे अद्वैतानंदस्वरूप है सु- खदुःखका इसमें संबंध नहीं है ऐसा ज्ञानयोगाभ्याससे होताहै. तब योगी उपाधिजाल विनाश करने में समर्थ होताहै ।।८२॥ शब्दादीनां च तन्मानं यावत्कर्णादिषु स्थितम् । तावदेवं स्मृतं ध्यानं समाधिःस्यादतः परम् ।।८।। ध्यान एवं समाधिका अवस्थाभेद प्रकट कहते हैं कि ध्या- नावस्थामें स्थिर रहते योगीके कांदि इंदियोंविषे शब्दादि विषयोंका सूक्ष्मभागती जबलौं उपलक्ष्यमान होतेहैं. तभीलों ध्यानावस्था कहातीहै जब आत्मामें पंचेंदियवृत्ति लीन होजांय तब आत्मामें अर्थमात्रका भान रहनेवाली अवस्था समाधि कहातीहै ।। ८३॥ धारणा पञ्चनाडीभिर्ध्यानं च पटिनाडिभिः । दिनद्वादशकेन स्यात्समाधिः प्राणसंयमात् ॥८॥ ध्यान-धारणा-समाधिका प्रमाण कहतेहैं कि पाणयायुके व्यापार रोकनेमें पांच घटीपर्यंत धारणा कहाताह ऐसेही ६० घटीसे ध्यान और बारह (१२) अहोरात्रपर्यंत प्राणवायुके व्यापार निरंतर रोकनमे समाधि कहानी है ।। ८४ ॥

गोरक्षपति- न गन्धं न रसं रूपं न च स्पर्श न निःस्वनम् । नात्मानं न परस्वञ्च योगी मुक्त समाधिना ॥८८॥ योगीक समाधिमें रहनके अवस्था कहतेहैं कि जो योगी समाधिमें एकत्यको प्राप्त होजाताहै तो सर्व इंद्रियगण मनमें लोनताको प्राप्त होकर गंध, रस,रूप, स्पर्श, शब्द, इन पांच वि. पयोंको नहींजानता कोही वस्तुमात्र अपना वा पराया कुछ न- हीजानता जीवात्मा तथा परमात्माको अलग नहींमानता ए. कही समझताहै इसप्रकार ध्यानमें एकाम होमसे और किसी प्रकार भान नहींहोता ॥ ८८॥ अभेद्यः सर्वशास्त्राणामवध्यः सर्वदेहिनाम् । अग्राह्यो मन्त्रयन्त्राणां योगी युक्तः समाधिना ॥८९॥ जब योगी उक्त विधिसे समाधियुक्त होनाताहै तो समत्त शौसे अभेद्य (न कटनेयोग्य) होताहै (देही ) मनुष्य, सिंह, गज, व्याघआदियोसे ( अवध्य ) नहीं मारजाता(मत्र) (यंत्र) मारणमोहनादि प्रयोग (जादू) भी उसपर नहींचलता ॥८॥ बाध्यते न स कालेन लिप्यते न स कर्मणा । साध्यते न च केनापि योगी युक्तः समाधिना॥९॥ जब योगी समाधिमां स्थिर होजाताहै तो उसको जरा (बुढाया) एवं मरण (मृत्यु) पौडन नहीं करसकते अर्थाद अजरामर होजाताहै उसपर काला वश नहींचलता पापपुण्य हे हेतु जिसके ऐसे कर्मवधनाते लिन नहींहोता और कोई उसे " भाषानुवाद । श०२ (१०७) विषयवासनामें नहीं लगायसकता किसी साधनमें यह नहीं- आता ।। ९०॥ युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । पुक्तस्तनावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥११॥ मितोमरयुक्त व्यवहारमें रहकर जो योगी समस्तकोंमें युक्त रहताहै और निद्रा, जागरणनी युक्त रखताहै अर्थात् कोही काममी अयुक्त (अति) नहींकरता पूर्वोक्त क्रियाओंमें सावधान रहताहै उसको योग दुःखनाशक कहालाहै ॥ ९१..॥ निराद्यन्तं निरालम्ब निष्प्रपञ्चं निरामयम् । निराश्रयं निराकारं तत्त्वं जानाति योगवित् ॥९२॥ जब योगी उक्त विधिमे समाधिमे स्थिर होजाताहै तब प- रमतत्व जिसका (आयत ) जन्ममरण नहीं किसीके आलंबन (निमित्तमें ) नहीं मायाआदि किसीके आश्रयमें नहीं द्वैतक- ल्पनामें नहहि जन्ममरणादि दुःखमें नहीं ऐसे जीवात्मा पर- मालाके ऐक्य होरहे आत्मस्वरूपतत्त्वको जानताहै ॥ ९२ ॥ निर्मल निश्चलं नित्यं निष्कियं निर्गुणं महत् । व्योमविज्ञानमानन्दब्रह्म ब्रह्मविदो विदुः ।। ९३ ।। (निर्मल) कर्मके फल वासनारूप मलसे रहित (निश्चल) चेष्टारहित (नित्य ) परिणामरहित ( निष्क्रिय ) सर्वव्यापारशून्य (निर्गुण ) सत्त्वादिगुणरहित (महद ) जिसका परिमाण नहीं कियाजाता ऐसे (व्योमचिदाकाशस्वरूप (विज्ञान) बोधस्वरूप

Ath Gorakshpaddhati

Author
Sharma,mahidhar
Title
Ath Gorakshpaddhati
File name
Ath Gorakshpaddhati
Text
OCR done
Citation
1815
Published
2012/08
Publisher
Laxmi Venkateshwar Mudranagare
Language
Sanskrit
Pages
109
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
311647
Barcode
99999990320514.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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