Government College, Kota
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गा-सिद्धाना- कौमुदी 1023441 भैमीव्याख्या [ षष्ठ भाग ] [स्त्रीप्रत्ययप्रकरणमा G. भीमसेन शास्त्री एम्० ए०, पी-एच० टी०, माहिन्यरत्न प्रकाशन भमी. माप्य वरात्र PRAKI निबोधत -प्राप्ति-स्थान- भैमी प्रकाशन ५३७, लाजपतराय मार्केट, दिल्ली-~११०००६
भैमी प्रकाशन
५३७ लाजपतराय मार्केट,
दिल्ला-११०००६
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LAGHU-SIDDHANTA-KAUNIUDI-BHAIMI-VYANIYA
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Part VI, First Edition 1989
KOTA
पळ भाग, प्रथम मरकरण १६८६
Give
BHAIMI PRAKASHAN
537, Lajpat Rar Market Delhi-110006
© BHIM SEN SHASTRI (1920)
102341
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राया प्रेस, गाधीनगर, दिल्ली-३१ में मुद्रित ।
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व्याकरण-प्रशस्तिः
ब्राह्मणेन निष्कारणो धर्म पडङ्गो वेदोऽध्येयो ज्ञेयश्च ।
प्रधान च पट्स्वड्गेषु व्याकरणम् ।
प्रधाने च कृतो यत्न फलवान् भवति ।।
(पातञ्जलमहाभाष्य)
यद्यपि बहु नाऽधीपे तथापि पठ पुत्र | व्याकरणम् ।
स्वजन श्वजनो मा भूत् सकल शकल सकृत् शकृत् ॥
शब्दशास्त्रमनधीत्य य पुमान्
वक्तुमिच्छति बच सभान्तरे ।
रोधुमिच्छति वने मदोत्कट
हस्तिन
कमल-नाल-तन्तुना ॥
भमीव्यास्योपेताया
लघु-सिद्धान्त-कौमुद्याः
स्त्रीप्रत्ययप्रकरणस्य विषय-सूची
[५]-[-]]
(१) प्यावरणप्रशस्ति
(२) आत्म-निवेदनम्
(३) स्त्रीप्रत्मयप्रकरणम
(४) परिशिष्टे-
(१००-१५२)
[१] शुद्धाशुद्धबोधकशतकम्
{२श्रीप्रत्ययवरणगताप्टाध्यायीमूरतानिश
[३] म्नीप्रत्याप्रकरणान्नगंतवानिमादितारिका
[४] उदाहरणतालिका
[4] म्नीप्रत्ययारणापयागि अष्टाध्यायीमूत्रपाट
[६] विशेष द्रष्टव्य-स्थर-नालिश
[७] विशेष-स्मरणीय-पद्यमाला
[+] म्नीप्रत्ययविधायक मुख्यमूत्राणि
[६] मक्षिप्त पाणिनीय लिड्गानुशासन (मन्यास्यम्)
(१०१-११८)
(११८-११६)
(११६-१२०)
(१२०-१२६)
(१२६-१३१)
(१३१-१३२)
(१३२-१३३)
(१३३-१३०)
(१३४-१५२)
आत्मनिवेदनम् लघु-मिद्धान्त-कौमुदी की सुप्रसिद्ध भैमीच्याख्या का यह अन्तिम (पष्ठ)' भाग जाज जनता के सामने प्रस्तुत करत हुए अपार हर्ष हो रहा है । इस व्याख्या का प्रणयन मन् १६४१ मे प्रारम्न हुना था । आज ४८ वर्षों के बाद इम का अन्तिम खण्ड प्रकाश मे ला रहा है । जब इम व्याख्या का प्रारम्भ हुआ था तब लेखक की वय २०-२१ वर्षों की थी। आज लगभग सत्तर वर्षों की वय में यह व्याख्या ममाप्त हो रही है । इम अलराल मखन का स्वाध्याय तथा अध्ययन-अध्यापन मनत चलता रहा । देश- विभाजन तथा जन्न कई अनिवार्य आपिक वाधाओ के कारण इस व्याध्या के कुछ खण्डो का प्रकाशन वीच बीच म पर्याप्त विलम्ब ने होता रहा । लेखक के स्वाध्यान तथा अध्ययन-अध्यापन म जजित ज्ञानमामग्री इम व्याख्या के विभिन्न भागा म वग- वर मलिन हाती चली गई। जाज इस व्याख्या का जो स्वम्प है वह शायद पहते न हो पाता । इम काल में इस व्याया के पूर्वप्रकाशित प्रथम भाग को भी मशोधित तथा जनक टिप्पणो मे उप हित र नवीन द्वितीय मन्बग्ण निकाला गया जो मामत्री और जाकार म प्रथममम्करण मे पर्याप्त ममृद्ध है। इस म भी लेखक न जपने नवीन- नम अनुभवो का मार भर देश का पूरा पूरा प्रयास किया है। व्यास्था का प्रकृन भाग स्त्रीप्रत्यया म मम्बद्ध है। मस्कृतभाषा म शन्दो का लिङ्गनिर्णय जनीव दुष्कर काय है । इस न पुलिग, स्त्रीलिङ्ग और नपुमल का निय जय भाषाओ की तरह नहीं किया जाता । स्त्रीवाचक दारशब्द यहा पलिग है जबकि अन्य वनिना, योपित् आदि स्त्रीलिङ्ग हैं। जलवाचक अपशब्द स्त्रीलिङ्ग है जबकि बारि, नाय आदि नपुमक हैं । शरीरवाची कायशन्द पलिज है जवकि नुम् स्त्रीलिङ्ग नथा शरीर नपुमालिङ्ग है । देवतावाचक अमर निजर आदि शब्द पुलिङ्ग है जबकि देवताशब्द स्वयं पीलिद है । मित्रवाचन सुहृद्शब्द पुलिग है जबकि मिनशब्द म्बर नपुमर है । ननवाचक नाचन अक्षि जादि शब्द नपुमा हैं जबकि दृश् शब्द म्जीनिल है । अन मस्कृत म लिगा का ज्ञान मर्वथा शिष्टप्रयोगो की परपरा पर ही निभा करता है । इमो को दशान के लिये ही जप्टाध्यायी के कतिपय लिङ्गमम्बधीमूना नया पाणिनीयलिङ्गानुशासनीय भूगा मे यत्न किया गया है । मस्कृत म पुलिङ्ग या नपुनकलिङ्ग बनाने के लिय प्रातिपदिको के आगे कोई प्रत्यय जोडा नहीं जाता, वेवल स्त्रीलिङ्ग बनान के निय ही प्रत्यय जोडे जाने हैं (दे भी मब शब्दो में नहीं)। उत स्त्रीप्रत्ययप्रकरण ही प्रक्रियाग्रन्था में पृथक दर्शाना जाता है पुलिङ्गप्रत्ययप्रकरण या नपुनप्रययप्रकरण नहीं । स्त्रीप्रत्ययान अन्द प्राय पाञ्च श्रेणियों में विभक्त किये जा सकते हैं- १ इम व्याख्या के चार भाग (प्रथम द्वितीय तृनीय तथा चतुथ) पहले प्रकाशित हो चुके हैं । अब मप्राप्त पञ्चम भाग (नदिनप्रकरण) न छाप कर परीक्षार्थी विद्याथियो के तीव्र अनुरोध के कारण पप्ठ भाग (म्बीप्रत्ययप्रकरण) पहले प्रका- शिन किया जा रहा है। यह भा। इम व्याख्या का अन्तिम भाग है। पञ्चमभा। भी प्रेम में दिया जा रहा है नाशा है इमी वर्ष प्रकाशित हो जायेगा।
[६] - [१] जातिलक्षणस्त्रीप्रत्ययान्त शम्द- जब जाति एक होते हुए उम जाति के स्वीयक्ति को निर्दिष्ट करना अभीष्ट होता है तो वहा जानिमपत्रोप्रन्यय किये जाते हैं। इन में टोप् प्रत्यय प्रमुख है। दीन् आदि कुछ अपवाद प्रत्यय भी हैं । यथा--हयी, गवयो, मुक्यो, मनुपी, मानुपी, मनी, ब्राह्मणी, शाङ्गग्वी, बंदी, कटी, नटी, नारी आदि । 'जाति' से यहाँ पारिभापिर जाति का ग्रहण किया जाता है, लौक्ति जाति का नहीं । इम दिपर में यह काग्विा सुप्रसिद्ध है- मानिग्रहणा जातिलिङ्गाना च न सर्वभार । सरदारयातनिर्माह्या गोर च चरणं सह ॥ इस कारिका की व्याख्या इन प्रप के पृष्ठ (७०) पर की गई है वहीं देखें। [२] पुयोगलक्षपस्त्रोप्रत्ययान्त शब्द- निष्टप्रयोगानुसार जब पति (पुग्प) के कारण उम की म्यी का नाम वैमा हो पर जाना है नव वहा पुयाग मन्त्रीप्रचय दिये जान हैं । इन म दीप प्रत्यय प्रमुख है। चाप आदि कुछ अपवाद प्रत्यय भी विच जाते हैं। उदाहरण यया--गोपम्प स्त्री- जानी। गोपालाम्प स्नी-गापालिया। नवपालपम्प स्त्री-जवरातिका । वाणम्य न्यो-वरणानी । इन्द्रस्य म्नी-इद्राणी । भवम्य स्त्री - भवानी। मूपम्य स्त्री- दुर्वा मूगे । मातुनच स्त्री-मातुवानी । प्रमुग्म्य म्धी-वधू आदि । वही वही पिता या माई के कारण भी पुत्री या वन का नाम प्रमिद हा जाता है, वहा पर भी पुपा म स्त्रीप्रत्यय समयना चाहिए । यथा-वेवयम्य दहिता-वयो । देवकम्य इहिता-दवी। रेवतम्य दुहिता-रवती । स्यालस्य भगिनी-श्याली । यमम्य मशिनी-यमी जादि । [३] स्वागलक्षणस्त्रोप्रत्ययात गन्द- जब नमाम के अन्त में कोई म्वाङ्गवाची गर आ जाता है तब स्त्रोनिन बनान के लिय उम म परे स्वागभण स्त्रीप्रयय विवे जात है। इन म वैकल्पिर होप (पक्षे टाप्) प्रत्यय प्रमुम्र है । कम्पना पर केवन टाप प्रत्यय भी हुमा करता है। निदशनाय उदाहरण यथा-चद इब मुख यम्या मा चरमुखी चदमुवा । चदानना । अपमा। अपनी अपनता । ताम्रमुगी, ताम्रमुखा । अनिरगी अतिवेगा । कल्याणवाडा । नुहम्ना । बाद भी यहा पारिभापिर लिया जाता है लौवित्र नहीं। जनावि कहा है- अहव मूत्तिमम्वाङ्ग प्राणिस्यमविशरजम । अतत्य तत्र दृष्ट च तेन चेतत्तयायुतम् ॥ इन कारिया की व्याख्या इम नप के पृष्ठ (६२) पर की गई है वही दगें। [४] साधारणस्त्रीप्रत्ययान्त शब्द- जन उपर्युक्त नीनो काटिया में न आन वाले भन्दा ज्यान यतिवाचका, विशेपणा मवनामा वपावाचको गुणवाचकरा आदि मे घोषिङ्ग बनाना अभीष्ट हाता है तब वहा टाप टी आदि विविध प्रत्यय किये जाते हैं। पथा--गद्गा, नदी उवा, मा, एपा, भवती, मार्ग, हो, वी, गोरी, पट्टी, मट्टी, महिला, वामा दुवति धनीता आदि ।
[७] [५] विविधार्यस्त्रोप्रत्ययान्त शब्द- कुछ एक शब्दो मे विविध अर्थों के द्योतन के निव भी स्त्रीप्रत्यय किये जाते है। यथा-टुप्टो यवो यवानी । महद् ह्मि हिमानी । महद् नरप्यम् उरण्यानी । यवनाना लिपि यवनानी आदि । सस्कृतव्याकरण के पाठको को यह वान मन ने निकाल देनी चाहिये कि प्रत्येक स्त्रीलिङ्गीशब्द का पुलिडगरूप एव हर एक पुलिट्गशब्द का स्त्रीतिगरूप हुआ परता है । क्योकि अनक ऐन शब्द है जो केवल न्त्रीलिदा या पुलिङ्ग आदि में प्रयुक्त होते हैं । यथा-मम्पद्, विपद्, स्त्री, शिखा, रात्रि, नौका, खट्दा, मेघा, बलाका आदि शब्द केवल म्नीलिड्ग में ही प्रयुक्त हाले हैं, इन का पुलिडारूप नहीं होता। इनोतरह-पाक, भाग, पाठ, राग, महिमा, तनिमा आदि शद केवल पुलिट्ग में ही हुआ करने हैं, इन का नोलिट्ग रूप नहीं होता । स्त्रीप्रत्ययो पे लाने से ही शब्द स्त्रीलिङ्ग बनने हैं यह बात भी नहीं है । जनक पद विना स्त्रीप्रन्चयों के भी स्वन म्त्रीलिहा के द्योतक होते हैं । यथा-आप, गिर् पुर्, दिग्, वाच, दृश्, नम्पद्, विपद् आदि श द विना स्त्रीप्रत्ययो के भी स्त्रीत्व को प्रकट करते हैं। अन क्रिम में म्ली- प्रत्यय करना चाहिद और किम से नहीं-यह सारी व्यवस्था मिष्टप्रधागो पर आश्रित व्याकरण के नियमो के अनुमार ही समझनी चाहिौ । प्रस्तुत भाग मे स्त्रीप्रत्ययविधायन मूलोक्न मत्रो, वात्तिको वा गणसूत्रो की व्याख्या के अतिरिक्त घान्त्रोपयोगी अन्य भी अनेक सूत्र-वात्तिको की सार्थ सौदाहरण व्याख्या प्रस्तुन की गई है ताकि विद्यार्थियों के नामान्यज्ञान का स्तर ऊंचा रह। पूर्व भागो की तरह दम भाग में भी सूत्रो की वही व्याख्याशैली, स्थान स्थान पर उठने दाली शड्काओ का समाधान, प्रत्यक रूप की सिद्धि, उदाहरणो को झटी, पाठशोधन तथा विषय के स्पष्टीचरणार्थ दरजनो टिप्पण दिये गये हैं। उदाहरणो के अय तथा उन के साहित्यगत प्रयोगो को भी टूट ट्ट कर दान का पूरा प्रयाम किया गया है । अन्य के अन्त मे पचास से अधिक पृष्ठो में नौ परिशिष्ट दिये गये हैं। वैने तो ये मब परिजिष्ट छात्रो के लिये तथा शयायियों के लिये अपन्न उपयोगी और जानवधन है पर इन मे चार परिशिष्ट माधारण छात्रो के लिये भी लाभप्रद है। शुद्धाशुद्धबोधकशतरम् नाम वाले प्रथम परिशिष्ट में स्त्रीप्रत्ययों के विषय में विद्याथियो को सावधान एव चौकन्ना रखने के लिये शुद्धाशुद्धमिधिन प्राय स्वनिर्मित एक मो पद्यखण्ड दिये गये हैं जिन में स्त्रीप्रत्ययान्त बनेन पदो के शुद्धाशुद्धत्व का परीक्षण करना है। विद्यापियो के सौर्य के लिये इन पद्याशो नीच प्रत्येक पद का माधुत्व वा अनादुत्व सहेतुक एव मप्रमाण प्रतिपादित किया गया है। इन के भन्यास से विद्यार्थियों को निश्चय ही अशुशियो के पाउने में महती निपुणता प्राप्त हो सकी है । स्त्रीप्रत्ययप्रकरणगतोदाहरणतालिका नामक चतुर्थ परिशिष्ट में प्रकृनखण्ड में उदाहरणरूप में निर्दिष्ट प्राय छ मौ रूपो की बारादित्रम में सूची दी गई है। प्रयेक रूप से मागे कोष्ठक मे उम ने होने वाले स्त्रीप्रत्यय को निर्दिष्ट किया गया है। आगे उन उदाहण की पृष्ठमन्या भी दे दी गई जिम मे विद्यार्थी उन स्थल को निकाल कर तुरल हृदयङ्गम र म । स्त्री प्रयो के विधान में प्राय विद्यार्थी दीप टीप-टीन् प्रत्ययो के करने में भूल क दिया करते है। इन वे लिये स्त्रीप्रयपविधायक मस्यसूत्राणि के जन्नान अटम पटि में प्रदेश स्त्रीप्रय के नीचे तत्तद्विधायक नूत्रा को पृथक् पृय निर्दिष्ट कर दिया है। इन म विद्यार्थी [८] अपनी भूत का तुग्ल सुधार मरते है । सक्षिप्त पाणिनीय लिङ्गानुशासनम् के अन्तर्गत नवमपरिशिष्ट में पाणिनीयलिङ्गानुशामन के प्रमिद प्रमिद एक मो मूत्रा वी हिदी भापा म मोदाहरण व्याख्या प्रस्तुत की गई है जिन मे छान्य लिङ्गानुशासन- विपया अयुपयागी क्षेत्र का भी कुछ शान प्राप्त कर म। मम्भवत लघु मिदात- कौमुदी पर इस प्रकार का यह प्रथम पत्न है। प्रबुद्ध और उन्माही विद्यागियो के वार के लिये स्त्रीप्रत्ययप्रकरणोपयोगि अष्टाध्यायोमूत्रपाठ इन पन्चम परिशिष्ट व अनगन पाणिनीयाप्टाध्यायीध म्गप्रयया वा ममप्र प्रवण भी दे दिया है ताकि व इन कण्ठस्थ कर मदा के लिए लाभ उठा मरें। इन के अतिरिक्त विशेषद्रष्टव्य- स्थरतानिका मन पष्ट परिशिष्ट शोधार्थिया एवम् अध्यापकगण वे लिये तथा विशेष-स्मरणीय-पद्यमाला नामक मजम परिशिष्ट ममम्त होनहार छात्री के लिय परम उपयागी है । द्वितीय तथा तृतीय परिशिष्टा म ग्रन्थगत ममम्न मूत्रा वात्तिका न्या गणमून आदियो की अकारादित्रम मे सूची दी गई है। इस प्रकार इम खण्ड के परिशिष्ट अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हांगे। दम मुण्ट के प्रणयन में भी मब से जधिर योगदान ना मेर मत उपचीयमान बिगार पुस्तकालय का है जिम मे व्यावरण वे शतश दुलभ गैर मुभ अथ मगृहीन है। मच तो यह है कि यदि यह पुस्तकालय मर पाम न हाता ता निश्चय ही दम अन्य का प्रणयन ही न हो मरा हाता । इम खण्ड के प्रूफ्मगाधन म अथाह परिश्रम किया गया है। मेरे तृतीय पुन अश्विनी शास्त्री का भी इस म महत्त्वपूर्णा यागदान रहा है। परतु फिर भी दृष्टि दाप के कारण कही कही अशुद्धिया रह गई हैं (यथा-पृष्ट २० पर वयस्यचरमे के स्थान पर वयस्यप्रयमे एमा अशुद्ध वानिक प गया है)। नाशा है पाटा अपन उदारभाव स क्षमा बग्न की कृपा करेंगे। पह है मब कुछ-जो मुय में वन मका है। पाठर ही मेर प्रन्यो वी मदा म कसौटी रह ह और रहगे भी। इतना कहर दिन होता है-- मुरभारती वा तुच्छ ममुपासक भीमसेन शास्त्री शास्त्रिसदनम्, २/६४४२ मुर्जी गली गाधीनगर, दिल्ली-११००३१ पोषवदो, सम्बत् २०४५ (२०) ११ १९८९ (ई.)
श्रीमद्वरदराजाचार्यप्रणीता लघु-सिद्धान्त-कौमुदी * श्रीभीमसेनशास्त्रिनिर्मितया भैमीव्याख्ययोद्भासिता [षष्ठो भागः] जीवन सर्वजीवाना गति गतिमता सदा । प्राणभूतं पर पूज्यं प्रपद्ये परम पदम् ॥१॥ पाष्ठेऽस्मिल्लघुकौमुद्या भैमीव्याख्याविभूषिते । भागे स्त्रीप्रत्यया सर्वे विवियन्तेऽधुना मया ॥२॥ पूर्ववद् गौरवं यायात् कृतिम विदुषा हृदि । यतस्ते निकषीभूता ग्राह्याग्राह्यविवेचने ॥३॥ अथ स्त्रीप्रत्यय-प्रकरणम् अब स्त्रीप्रत्ययो का प्रकरण प्रारम्भ पिया जा रहा है। यह प्रकरण कृदन्त ममाम और तद्धितो को समझे विना ठीक तरह से बुद्धिगम्य नहीं हो सक्ना, अत उन सब प्रकरणो के अनन्तर इस प्रकरण को रख कर वरदराज ने अपनी सूक्ष्मेक्षिका का परिचय दिया है । भट्टोजिदीक्षित ने रामचन्द्राचार्यप्रणीत प्रक्रिया-कौमुदी को आधार बना कर अपनी सिद्धान्तकौमुदी में प्राय प्रकरणो का विन्यास किया है। सिद्धान्त- कौमुदी और प्रक्रियाकौमुदी दोनो मे स्त्रीप्रत्ययप्रकरण को समाम, तद्धिन और कृदन्त प्रकरणो से पूर्व रखा गया है। इस से विद्याथियो को विषय समझने में पदे पदे कठिनाई का कटु अनुभव होता है । क्योकि विना समासप्रकरण को समने स्त्रीप्रत्यय- २ ममीश्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या प्रकरण में अनुपसर्जनात् (४ ११४), द्विगो (१२५७), कोतात्करणपूर्वात् (१२६४), ऊस्तरपदादीपम्ये (१२७३) आदि मूत्रो को हृदयङ्गम कर सकना बहुत ही कठिन है। इसीप्रकार तद्धित और कृदन्त प्रकरणो के ज्ञान के विना टिड्ढाण० (१२५१), नस्तीक्क (वा० १.१), कृतिकारादक्तिन (गणमूत्र), सर्वतोऽक्तिन्नादि- त्येके (गणसूत्र) आदि स्थलो को समया नहीं जा सकता । यही अवस्था प्रत्यय- स्यात् कात्पूर्वस्यात इदाप्यतुप (१२६२) आदि मूत्रस्थ उदाहरणो और प्रत्युदाहरणो की ममझनी चाहिये । सिद्धान्तकौमुदी की इस त्रुटि को लघुसिद्धान्तकौमुदी मे न दोहरा वर वरदराजाचार्य ने स्तुत्य कार्य किया है। अब सब में प्रथम सम्पूर्ण स्त्रीप्रत्ययप्रकरण में व्याप्त होने वाले पाणिनीय अधिकारमूत्र का निर्देश करते हैं- [लघु०] अधिकारमूत्रम्-(१२४८) स्त्रियाम् ।४।१३॥ अधिकारोऽय 'समर्थानाम्' (४ १८२) इति यावत् ॥ अर्य-अष्टाध्यायी में यहा मे ले कर समर्याना प्रपमादा (४१ ८२) सूत्र में पूर्व तक 'स्त्रियाम्' का अधिकार रहेगा, अर्थात् यहा तर जिम जिम प्रत्यय का विधान रिया जायेगा वह स्त्रीत्व के द्योतन में ही होगा। व्याख्या स्त्रियाम् ।७।१। प्रातिपदिकात् ।।१। (उपाप्रातिपदिकात री प्रातिपदिकात्' अश का अधिकार सम्पूर्ण प्रकरण में चला आ रहा है)। प्रत्यय , परश्च-ये दोनो पीछे मे अधिकृत हैं ही। यह अधिकारमूत्र है। अधिकारसूत्रो की अवधि निश्चित हुआ करती है। इस सूत्र की अवधि अष्टाध्यायी में समर्यानां प्रयमाद्वा (४ १८२) सूत्र तर है। स्त्रियाम् यह भावप्रधान निर्देश है, इस का तात्पर्य है-'स्त्रीत्वे' (स्त्रीत्व मे)। अर्थ -यहा में ले कर समर्याना प्रयमाद्वा सूत्र तक जिन प्रत्ययो का विधान किया जाये वे प्रत्यय (प्रातिपदिकात्) प्रातिपदिन में परे (स्त्रियाम् = स्त्रीत्वे) स्त्रीत्व की विवशा में होते हैं । टाप, डाए, चाप, डीप, गोप, हीन्, कङ् और ति-ये आठ प्रत्यय इम अधिकार में बहे गये हैं। ये सब स्त्रीत्व में द्योतक हैं । सस्कृतवैयाकरणो के अनुमार लिङ्ग भी प्रातिपदिक के अर्थ मे ही सम्मि- लित होता है । स्त्रीप्रत्यय केवल उमे दोतित करते हैं, अन एव अनेक गन्दी में स्त्री- प्रत्ययो के बिना भी स्त्रीत्व का बोध स्वत ही हुआ करता है। यया-चाच, गिर, पुर्, दृश् आदियो मे स्त्रीत्वद्योतक प्रत्यय के विना भी स्त्रीत्व का बोध स्वत होता है । तात्पर्य यह है कि यह जरूरी नहीं वि स्त्रीप्रत्यय वे होने पर ही स्त्रीच या बोध हो, स्त्रीत्व का बोध प्रत्यय के विवा भी कई जगह हो सकता है । परन्तु टाप आदि प्रत्ययो के होने पर अवश्य स्त्रीत्व का बोध होता है-यह नियम है । टाप-अप-चापस्त्रयोऽप्यते सोप-सोपडीतप्रत्ययं सह । ऊड-तिभ्यां मिलितारचापि सरपष्टौ प्रत्यया स्त्रियाम् ।।
स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् ३ म्त्रीत्व क्या है ? सर्वप्रथम इसे समझना ज़रूरी है। लोक में स्त्रीत्व आदि का लपण इस प्रकार किया जाता है- स्तनक्शवती स्त्री स्याल्लोमश पुरुष स्मृत । उभयोरन्तर यच्च तदभावे नपुसकम् ॥ अर्थात् स्तनो और केशो के अतिशय से युक्त स्त्री होती है, लोमो के अतिशय मे युक्त पुरुष होता है । जब दोनो का अभाव अर्थात् अपूणता रहती है तो उस बीच की स्थिति को नपुसक कहते हैं । परन्तु लिङ्गो का यह लौकिक लक्षण खट्वा, माला, नट, घट, पट आदि जड पदार्थों पर घटित नहीं हो सकता अत व्याकरण मे इम का आश्रय नही किया जाता । वैयाकरणो का कहना है कि साख्यशास्त्रोक्न मत्त्व, रजम् और तमस् इन तीन गुणो का ही विपरिणाम प्रत्येक पदार्थ हुआ करता है। जब गुणत्रयात्मक क्मिी पदार्थ मे इन गुणो का प्रसव-आविर्भाव= उपचय या वृद्धि की अपेक्षित होती है तब पुलिङ्ग, जब सस्त्यान-अपचय या ह्रास कहना अपेक्षित होता है तब स्त्रीलिङ्ग तथा जब देवल स्थितिमात्र की अपेक्षित होती है तब नपुमकलिङ्ग का प्रयोग किया जाता है। परन्तु यह विवक्षा अस्मदादि प्रयोक्ताओ के आश्रित नहीं होती, इम के नियामक तो शिष्ट लोग ही होते हैं। उन को विवक्षा को ही व्याकरण, लिङ्गानुशासन या कोप आदियो मे निबद्ध किया गया है । यही हमें अनु- सर्तव्य है, स्वेच्छा से कुछ नहीं । यही कारण है कि कुछ शब्द दो लिङ्गो या तीनो लिङ्गो में भी प्रयुक्त हुआ करते हैं । सार यह है कि सस्कृतभाषा मे लिगा का निर्णय मर्वया शिष्ट प्रयोगो पर आश्रित व्याकरण आदि के नियमो मे ही हुआ करता मन- माने ढग या लौकिक ढग से नहीं। अब सब से प्रथम स्त्रीप्रत्ययो मे सुप्रसिद्ध टाप् प्रत्यय का विधान करते है- १ वैयाकरण प्योक्तोऽय श्लोक इथ व्याख्यायते- स्ननकेशवतीत्यत्र अतिशायने मतुम् । एव 'लोमश' इत्यत्रापि वोध्य । म्ननकेशादि भगशिश्नादेरप्युपलक्षणम् । केचित्-कैशो भग , शिश्न लोम इत्याहु । पर वेश- पद लोमपद च स्वार्थपरमेवेनि भाष्यमर्मविद । तदभावे म्ननवेशलोमादिव्यञ्जका- भावे मति यद् उभयो =स्त्रीपुसयोर् अन्तरम् - सदृश तन्नपुमकमित्यर्थ । २ इस धारणा के अनुमार लिङ्ग अर्थनिष्ठ ठहरता है न कि शब्दनिष्ठ । परन्तु वाच्यवाचक के अभेदोपचार के कारण व्यवहार म शब्दो को ही पुलिङ्ग, स्त्री- लिङ्ग या नपुसकलिङ्ग माना जाता है ! यहा एक बात और भी ध्यातव्य है कि ब्रह्मन्, आत्मन् आदि पदार्थ यद्यपि सत्त्व-रजम्-तमम् गुणो का विपरिणाम नही होते तथापि उन में भी सत्त्व आदि गुणो को आरोपित कर उपर्युक्नप्रकारेण लिङ्गव्यवम्या मान ली जाती है ।
मैमोव्याख्यपोपेताया तसिदानसीमुद्या [लघु०] विधिसूत्रम्--(१२४६) अजाद्यतष्टाप् ।४।१।४।। अजादीनाम् अकागन्तस्य च वाच्य यत् स्त्रीत्व तन द्योत्ये टाप स्यात् । अजा । एडका । अश्वा 1 चटका । मूपिका । वाला । वत्सा । होडा। मन्दा । विलाता । इत्यादिरजादिगण । मेधा । गङ्गा । सर्वा ।। अयं-अज आदि गणपठित प्रातिपदिको वे अथवा बदन्त प्रातिपदिको के वाच्य स्त्रीत्व का द्योतन वरना हो तो उन से परे टाप् प्रत्यय हो । व्याख्या-अजान ।६।१। राप् ।१।। प्रातिपदिकात् ।।१। (पाप्राति- पदिकात् इस अधिकृत से)। स्त्रियाम् ।७।१। (अधिकृत किया गया है) । प्रत्यय', पररच-ये दोनों भी अधिकृत हैं । समासः-अज (अजशन्दः) आदिउँपान्तै अादय, तद्गुणमविज्ञानबहुव्रीहिसमास । अजादयश्च अत् च अजायत्, तस्य- अजाधत' ममाहारद्वन्द्व' । 'अजायत' के कारण 'प्रातिपदिकात्' का भी पप्ठपन्नतया विपरिणाम हो जाता है-अजाद्यत प्रातिपदिकस्य । 'बजाद्यत" यह 'प्रातिपदिकस्य' का विशेषण है। अत 'बत्' अश से तदन्नविधि हो कर 'अदन्नम्य प्रातिपदिक्स्य' बन जाता है। 'जजायत प्रातिपदिकम्य' में पप्ठी वाच्यवाचकसम्बन्ध में हुई है। अप---(असाधन" प्रातिपदिक्स्य) अज आदि प्रातिपदिक का अथवा अदन्न प्रातिपदिक का वाध्य (स्त्रियाम्) जो स्त्रीत्व उस वे द्योतन करने की विवक्षा में इन में (पर) परे (साप्) टाप् (प्रत्यय) प्रत्यय हो जाता है। १ यहा समासप्रत्ययविधौ प्रतिषेध (दा०) इम दार्तिक में तदनविधि का निषेध नही होता क्यापि वहा उगिद्वर्णग्रहणवनम् (वा.) इस दूसरी वातिर से उगिद्- ग्रहण और वर्णग्रहण में तदन्तविधि का विधान वह दिया गया है । यह तदन्तविघि 'अजादि' अश मे भी यहा हो सकती है। सूबा धाऽमहत्पूर्वा जाति (गण०) इस गणमूत्र तथा अनुपसर्जनात् (४ ११४) इम अधिकार के कारण स्नीप्रययो में भी तदलविधि का अनुमान दिया जाता है। २ 'अजायत' को कौमुदीकार ने पप्ठयन्त पद माना है, पञ्चम्यन्त नहीं। यदि पञ्चम्चन्त मानते हैं तो-अजादि प्रातिपदिक तथा अदन्त प्रातिपदिय से परे म्त्रीत्व की विवमा मे टाप् प्रत्यय हो -इस प्रकार अयं तो बहुत मरल हो जाता है परन्तु तव पञ्चाजी (पाञ्च वारी का समूह) आदि प्रयोगों में भी टाप् प्राप्त होने लगता है जो अनिष्ट है । तथाहि-पञ्चानाम् मनाना समाहार पञ्चाजी । यहा 'पन्चन् याम् +अज आम्' इस अलौविक विग्रह मे तरितार्योत्तरपदसमा- हारे च (६३६) मूत्रद्वारा ममाहार क्यं मे द्विगुममाम हो पर मुंगुर, नकारलोप तथा सवपदोघं परने पर 'पञ्चात्र' यह द्विगुसशार प्रातिपदिर उत्सन्न हो जाता है । अब अकारातोतरपदो हिम स्त्रियामिष्ट (वा.) नै अनुमार स्त्रीत्व को विवमा होने पर अन्त में 'अ' मन्द होने के कारण पञ्चम्पन्न वाला बर्ष स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् ५ टाप् मे चटू (१२६) द्वारा टकार तथा हलन्त्यम् (१) द्वारा पकार इत्मज्ञक है अत तस्य लोप (३) से इन का लोप हो कर 'जा' ही शेष रह जाता है । टाप् मे पकार अनुवन्य अनुदातो सुप्पिती (३ १४) द्वारा अनुदात्त स्वर के लिये जोडा गया है । किञ्च औड आप (२१६), आडि चाप (२१८}, याडाप (२१९) आदि में जाए कहने से टाप् और चाप् के माथ टाप् का भी ग्रहण हो सके, इम के लिये भी जोडा गया है । टाप मे टकार अनुबन्ध न जोडते तो 'आप' कहने मे इयाप्रातिपदि- कात् (११९) आदि में केवल इसी का ग्रह्ण होता डाप् और चाप का नहीं (एका- नुबन्धग्रहणे न द्वयनुबन्धकस्य), जन मब का ग्रहण हो मरे इस के लिये टकार जोडा गया है। जादिगण के उदाहरण यथा-- अज (वकरा) शब्द अजादिगण का प्रथम शब्द है' । स्त्रीत्व के द्योतन करन म इस मे अजाधतष्टाप् १२४६) सूत्रद्वारा टाप प्रत्यय हो पर अनुबन्धों (ट्, ) का लोप करने से-अज+आ । अव अब सवर्ण दोर्घ (४२) सूत्र से सवर्णदीर्घ हो 'जजा' करने में टाप् प्राप्त होने लगता है जा अनिष्ट है। परन्तु पष्ठयन्त वाला अर्थ मान कर 'जजादियो का वाच्य जो स्त्रीत्व उस की विवक्षा में टाप् हो' ऐमा अथ हो जाने मे टाप नहीं हो सकता, क्योकि यहा स्त्रीत्वविशिष्ट समाहार जथ अज' का वाच्य नहीं, वह तो पूरे द्विगुसन्नक 'पञ्चाज' प्रातिपदिक का ही वाच्य है। अत टाप् न हो कर द्विगो (१२५७) से डीप् करने मे 'पञ्चाजी' यह इष्ट रूप सिद्ध हो जायेगा । इस तरह 'अजाद्यन' को पप्ठयन्न मानना उचित है पञ्च- म्यन्त नहीं । अन एव सिद्धान्तकौमुदीकार ने लिखा है--अजादिभि स्त्रीत्वस्य विशेषणान्नेह-पञ्चाजी। १ जादिगण म अज आदि प्रातिपदिका का साक्षात् पाठ नही किया गया किन्तु कृतटाप्प्रत्ययान्त बजा आदि शन्दो का परिगणनमात्र किया है। उन परिगणित टाबन्तो से तत्तत्प्रकृतिक प्रातिपदिको की प्रक्रियादगा मे म्बय पल्पना कर ली जाती है। अजादिगण यया-अबा। एटका। कोक्लिा । चटका। अश्वा । मूपिका । वाला । होडा (होटा का०) पाका । वत्मा । मन्दा । विलाता । पूर्वा- पहाणा (पूर्वापहरणा का०)। अपरापहाणा (अपरापहरणा का०) । सम्भस्त्राजिन- राणपिण्डम्य फलात्-मम्मला । भस्वफ्ला । अजिनफला । झणफ्ला । पिण्ड- फला। सदच्काण्डप्रान्तगतकेभ्य पुयात्-मत्सुप्पा । प्रायुमा । प्रत्यक्पुप्या। काण्ड पुमा । प्रान्तपुष्पा । शतपुमा । एक्पुष्पा । शूद्रा चाऽमहत्पूर्वा जाति । क्रुच्चा । उष्णिहा । देवदिशा । ज्येष्ठा । कनिष्ठा । मध्यमा पुयोगेपि । मूलान्नन । दष्ट्रा। आकृतिगणोज्यम् ॥ 1 ।
भमायाख्ययोपनाया लघुमिद्धान्तकौमुद्या ६ मन्द बन जाता है । मावन्त होने के कारण (११९) अब इम म म आदि प्रत्यया को उत्पत्ति होती है । प्रथमा के एक्वचन की विवक्षा में मु प्रत्यय ला वर उकार अनुवध का लोप तथा हडपान्म्यो दोर्घात् सुनिस्यपृश्न हल (१७६) मूत्रद्वारा अपृक्त मकार का भी लोप करने में 'मजा' प्रयोग मिद्ध हो जाता है । 'अजा' का अर्थ है-वरी। इमीप्रकार-- एडा+टाप्=एड+आ=एडका (भेड)। अब+टाप् = अश्व + आ =अश्वा (घोडी) । चटक+टाप् = चटर + आ = चटका (चिडिया)। मूपिक+टाप =मूपिक+आ=मूपिका (चूहो)।' बाल +टाप् =बाल+आबाला (बच्ची)। वन+टाप् =वत्म+आ= वन्मा (बच्ची या छिया)। होड+टाप् =होड +आ-हाटा (वाला)। मन्द+टाप् =मन्द+आ= मन्दा (वारिका)। विलात-1टार =दिलात + ना=विलाता (बाला या नवयोवना)। अदन्त प्रातिपदिको में यथा- मेध+टाप् =मेध+आ=मेधा (बुद्धि)। गङ्ग+टाप् गङ्ग+आगगा (नदीविशेष) । नव+टाप = मवं+जा=मर्वा (मव) । सट्व+टाप-मुट्व-आखट्वा (साट)। घनिक -टाप् = धनिक+आ= धनिका (घनी औरत)। १ जा लोग 'अज+आ इस स्थिति में भमना कर यस्येति च (२३६) मूत्रद्वारा भमज्ञा अकार का लोप कर स्पमिद्धि किया करते हैं—च भ्रान्न हैं। क्योति यस्येति च (२३६) की प्रवृत्ति ईवार या तद्धित परे होने पर ही हुआ करती है । टाप् प्रत्यय तदिनाधिकार म बहिर्भूत है। अन मवणदीपद्वारा ही म्प मिट करना चाहिये। • मुष्णानीति मूपिक । मुष स्तेये (या० परस्म०) धातु म मुझेपरच (उII २३) इस औषदिनमूत्रद्वारा विशन् (२) प्रयय कर धातु उतार को दोप करने से 'मूपिर' गन्द निप्पन्न होता है। इसी का पहा ग्रल दिया गया है । कुछ साग भ्वादिगणीय भूप स्तेये (म्वा० परम्म०) धातु से समा म क्युन शिस्ति- सनयोरपूर्वस्यापि (उमा० २ ३३) मूत्र म वन (व) पय पर व को अब आदेग परने में 'मूपर गन्द की निप्पत्ति मानते हैं-यूपनौति मूपर । उन रे मना- नुसार टाप करने के बाद प्रत्ययस्थात् पात्पूर्वस्यात इदाप्यसंप (१२६२) मूत्र मे अकार को झार करना विशेष कार्य होगा।
स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् ७ कृत्रिम +टाप् =कृत्रिम+आकृत्रिमा (बनावटी)। स्वभावज+टाप् =स्वभावज+आस्वभावजा। गत+टाप् = गत+आगता (गई हुई)। शड्डा-अजादिगणपठितशब्द प्राय अदन्त हैं। अदन्त होने से ही उन से टाप् स्वत सिद्ध है, पुन टाप के विधान के लिये उन का सूत्र मे पृथक् उल्लेख क्यो क्यिा गया है ? । समाधान-बाधक प्रत्ययो का बाध करने के लिये ही सून अजादियो का पृथक् उल्लेख किया गया है । यथा-अजा, अश्वा, चटका आदि में जातेरस्त्रीविषया- दयोपपात् (१२६६) से जातिलक्षण डीप् प्राप्त था। वत्मा, वाला आदि मे वयसि प्रयमे (१२५६) मे डीप होना था । परन्तु अब विशेष उल्लेख के कारण उन का बाध हो कर टाप् प्रत्यय ही होता है। पीछे अजन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरण म स्त्रीप्रत्ययविषयक दो सूत्र प्रसङ्गत पढे गये थे । प्रकरणशुद्धि के लिये उन का यहा पुनान कर लेना उचित है । तथाहि- [१] ऋन्नेम्यो डोप (२३२) । अर्थ -ऋदन्त और नकारान्त प्रातिपदिको से स्त्रीत्व की विवक्षा मे डीप् (ई) प्रत्यय हो जाता है । ऋदन्त प्रातिपदिको से यथा- कर्तृ + डीप् = कर्तृ + ई-क+ई (१५) = कर्की (करने वाली)। हर्तृ +डोप् --हतूं +ई-हर्त र+ई हर्जी (हरण करने वाली) । धातु +डीप् =धात+ई= धात्री (धारण करने वाली) । इत्यादि । नकारान्तो से यथा -दण्डिन् +डीप् दण्डिन् + ई=दण्डिनी (दण्ड वाली)। योगिन् +डीप् = योगिन्+ई=योगिनी (योग वाली)। रोगिन् +डोप = रोगिन् +ई-रोगिणी (रोग वाली)। राजन् +डीप् = राजन् + ईराउन्+ईरान +ई= राज्ञी (रानी)। यहा अल्लोपोऽन' (२४७) सूत्र से भसज्ञक अन् के अकार का लोप हो कर स्तो श्चुना श्चु (६२) से श्चुत्व के द्वारा नकार को नकार हो जाता है । जजोर्ज । अब इस सूत्र का अपवाद कहते है- [२] न षट्-स्वस्त्रादिभ्य (२३३)। अर्थ -स्त्रीत्व की विवक्षा मे पट्सचक प्रातिपदिको तथा स्वसृ आदि प्रातिपदिको से परे डीप और टाप् प्रत्यय नहीं होते । ष्णान्ता पट् (२९७) सूत्र मे पकारान्त और नकारान्त मण्यावाचको की पट्सज्ञा कहीं गई है । परन्तु पकारान्त षट्सज्ञर मे क्मिी स्त्रद्वारा कोई स्त्रीप्रत्यय प्राप्त नहीं होता अत उस का निषेध यहा अभीष्ट नही हैं केवल नकारान्त पट्मज्ञका में ही ऋन्नेम्यो डीप (२३२) द्वारा डोप् प्राप्त होता है अत उन से ही यहा निषेध होता है। उदाहरण यथा-पञ्च स्त्रिय , सप्त नाय , दश देव्य'। इसीप्रकार स्वस आदि १ इन 'पञ्च' आदि उदाहरणो में प्रकृतसूत्र से प्रथम वार तो डोप का तथा दूसरी बार टाप् प्रत्यय का निषेध हो जाता है । तथाहि पञ्चन् आदि से सुंदुत्पत्ति से भैमीव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या शब्दो मे ऋदन्तलक्षण डीप का प्रकृतमूत्र म निषेध हो जाता है-स्वसा, निस, चतया, ननादा, दुहिता, याता, माता । अब अप्रिममूत्रद्वारा डीप् प्रत्यय का विधान करते हैं- [लघु०] विधि-मूत्रम्- (१२५०) उगितश्च ।४।१॥६॥ उगिदन्तात् प्रातिपदिकात् स्त्रिया डोप् स्यात् । भवन्ती। पवन्ती। दीव्यन्ती॥ अर्थ-उगिदन्त अर्थात् जिस का उक् (उ, ऋ लु) वण इत् हो तदन्न प्राति पदिक मे स्त्रीत्व को विवता मे टीप् प्रत्यय हो। व्यात्या-उगित ।।१। च इत्यव्ययपदम् । टीप् ।१।। (ऋन्नेम्यो हो से) । प्रातिपदिकात्, स्त्रियाम्, प्रत्यय , परश्च-य मव पूर्वत अधिकृत हैं । ममाम'- उच (उ ऋ ल-इति वणत्रयम्प उप्रत्याहार ) इद् यस्य म उगित्, तस्मात् -- उगित , बहुमीहिलमास । 'उगित' यह प्रातिपदिकात्' का विशेषण है, विशेषण म तदन्न- विधि हा पर 'उगिदन्तात् प्रातिपदिकात्' बन जाना है। अथ -(गित = उगि- दन्नात्) उप्रत्याहारान्नगनवण जिस का इत् हो वह उगित् कहायगा वह उगित् जिस के अन्त में हो ऐमे (प्रातिपदिकात्) प्रातिपदिक से परे (स्त्रियाम्) म्त्रीत्व की पूर्व ही स्त्रीत्व की विवक्षा म नान्नलक्षण डीप के प्राप्त हाने पर णान्ता पद (२६७) में पमना के कारण प्रकृतसूत्रद्वारा उन का निषेध हो जाता है । अब जब जस् या शम् प्रत्यय ला वर पड्म्यो लुक् (१८८) में उन का लुर् कर देते है नब न लोप प्रातिपदिरातस्य (१८०) सूत्रद्वारा नकार का भी लाप हो कर पञ्च' आदि सिद्ध हो जाते हैं । परन्तु नकार का हुआ यह लाप न लोप सुंफ्वर. सज्ञातुग्दिधिषु कृति (२८२) के अनुसार सुबिधि आदिया म ही असिंद होता है अन्यत्र टाप आदि करने में नहीं। तो इस प्रकार सविधान के प्रसङ्ग मे नवारलोप के मिद्ध हाने स अजायतष्टाप् (१२८६) द्वारा अदन्तलक्षण टाप प्रत्यय प्राप्त हात लगता है। परन्तु इस का वारण भी पूर्ववत् प्रकृतमूत्र म पट्मशा के कारण ही हा जाता है। यहा यह ध्यातव्य है कि मजाविधि के प्रति नो नकार वा लोप असिद्ध है ही अत पट्मज्ञा करने में 'पञ्च' की नकारान्नता अक्षुण्ण रहती है, इस से पद्मज्ञा निर्वाध हो कर अदन्नलक्षण टाप वा भी मुतरा निषेध हो जाता है। स्वसा तिसश्चतसरच ननादा दुहिता तथा । याता मातेति सप्तते स्वनादय उदाहृता ॥ २ न च समासप्रत्ययविधी तदन्तप्रतिषेप (वा.) इति तदन्नविनिषेध गङ्गय , तत्र गिदणंग्रहणवर्नम् (वा०) इत्युक्तत्वात् ।
म्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् ६ विवक्षा में (डीप) ही (प्रन्यय ) प्रत्यय हा जाता है। उक् (उ, ऋ, लु) वण जिम के इन् हो ऐम शब्द दो प्रकार के हो मक्ते हैं--प्रातिपदिक या प्रत्यय । भवतुं (आप) यह अव्युत्पन्न मवनाम है, इस का अन्य उकार इन् है अन यह उगिन् प्रातिपदिक है। श, वसु आदि प्रत्यया के जन्य ऋकार वा उकार अनुनामिन होने मे इत् हैं अत ये उगिन् प्रत्यय हैं । उगित् चाहे प्रातिपदिक हो या प्रत्यय वह जिम के अन्न मे हो उम प्रातिपदिक में स्त्रीत्व की विवक्षा में दीप् प्रत्यय हो जाता है। डीप का इकार सशक्वतद्धिते (१३६) द्वारा तथा पकार हलन्त्यम् (१) द्वारा इत्मज्ञक हो कर लुप्त हो जाता है 'ई' मात्र शेष रहता है । पकार अनुबन्ध अनुदातौ सप्पिलो (३१४) द्वारा अनुदान म्वर के लिये तथा इकार अनुबध डीप, डीप डीन इन में सामान्यग्रहण के लिये जोडा गया है। उदाहरण यया- भवतु (आप) शब्द मदनाम है । इम का अन्य उकार पेदेशेऽजनुनासिक इन् (२८) मूत्र मे इत्मज्ञक हो कर लुप्त हो जाता है अन "भवत्' शब्द उगित् है । व्यप- दशिवद्भाव (२७८) में यह उगिदन्न भी है। इस मे स्त्रीत्व की विवक्षा म प्रकृत उगितरच (१२४६) मूत्रद्वारा डीप् प्रयय हो कर डकार-पकार अनुब गो का लाप करने में-भवन् । +ई =भवती शब्द निष्पन्न होता है। जब ड्यन्त होन में डया- प्रातिपदिकात् (११६) के अधिकार मे दम मे पर मुजादि प्रत्ययो की उत्पत्ति हानी है। प्रयमा के एकवचन की विवभा म मुं प्रत्यय ला कर हन्डयाम्यो दीर्घात मुतिस्ययुक्त हल (१७६) द्वारा अपृक्त सकार का लोप करन में भवती' (आप स्त्री) प्रयाग सिद्ध हो जाता है । आश्लेषि न श्लेषवेभवन्या श्लोकद्वयार्य मुधिया मया निम् (नपधः ३ ६६)। अत्रभवती या नत्रभवती 4 लिये इम व्याख्या के अव्ययप्रकरण में अ' शब्द पर टिप्पण देखें। इसी तरह-विदे शतुमु (८३३) द्वारा विद् धातु मे पर शतृ का वसु आदेग करने पर 'विद्वम्' प्रातिपदिक निष्पन्न होता है। यह उगिन् है, अत स्त्रीत्व को विवक्षा में इस मे उपितश्च (१२४६) द्वारा डीप हो कर-विद्वम् + ई । अब ईकार के परे रहने भमज्ञा हा कर वसो सम्प्रसारणम् (३५३) मे दम् के वकार को मम्प्रमारण उकार, सन्प्रसारणाच्च (२५८) में पूर्वरूप आदेशप्रत्यययो (१५०) में पत्त लया अन्न में विभक्तिकार करने में विदुषी' (जानती हुई) प्रयोग सिद्ध हो जाता है। १ १ डीप, डीए अन् अयवा टाप डाए चार-इन म्यौप्रत्यया के करन के बाद मुं प्रत्यय लाने पर उपर्युक्त प्रक्रिया अच्छी तरह हृदयङ्गम कर देनी चाहिये । इने बार-बार विन्तार में नहीं लिखेंगे । इस प्रक्रिया को आगे प्रार विभक्तिका मे निदिष्ट किया जायेगा।
१० भैमोव्याख्ययोपैताया लघुसिदान्तकौमुदा नकार को -- भू सत्तायाम् (भ्वा० परस्मै०) धातु मे वर्तमान काल मे लट्, उसे सॅट रात। शानवावप्रथमासमानाधिकरणे (८३१) मे शतं. आदेश, शप (अ) विवरण, धातु के अनार को मार्वधातुक्गुण में ओकार तथा एचोऽयवायाय (२२) मे ओकार को अव् आदेश करने पर 'भवत्' यह शत्रन्न प्रातिपदिक निष्पन्न होता है। इस के अन्त में 'शतृ" यह उगित् प्रत्यय क्यिा गया है अत'भवत्' यह उगिदन्त प्रातिपदिर ठहरा । अब स्त्रीत्व को विवक्षा में इस मे प्रकृन उगितश्च (१२५०) सूत्रद्वारा डीप् प्रत्यय हो कर अनुबन्धो का लोप करने में 'भवत् + ई' इस स्थिति में शयनोनित्यम् (३६६) में मुंम का आगम, उम् अनुबन्ध का लोप, नश्वापदान्तस्य मलि (७८) में अपदान्न अनुस्वार तथा अनुस्वारस्य यपि परसवर्ण (७६) मे अनुम्वार को परमवण नकार करने पर-मवती । अब उयल होने मे स्वाद्युत्पत्ति के प्रसङ्ग में प्रथमा के एक्वचन की विवक्षा मे मु प्रत्यय ला कर विभक्तिकाय करने स भवन्ती (होती हुई) प्रयोग सिद्ध हो जाता है इनीप्रकार उपचं पाके (भ्वा० उभय०) धातु से शत प्रत्यय कर स्त्रीत्व की विवक्षा मे डीप नुम् नथा नकार को अनुम्वार परमवर्ण कर विभक्तिकार्य करने मे 'पचन्नी' (पकाती हुई) प्रयोग सिद्ध हो जाता है । दिवं क्रीडा-विजिगोपा-व्यवहार-ति-स्तुति-मोद-मद-स्वप्न-कान्ति-गति' (दिवा० परम्म०) धातु में इमी तरह वर्तमानकाल मे लँट् उमे गतं. आदेश, दिवा. विभ्य श्यन् (६२६) ने श्यन विवरण तथा हलि च (६१२) मे धातु को उपधा इशार को दोध करने पर 'दीव्यत्' प्रातिपदिव निप्पल हाता है। स्त्रीत्व की विवक्षा में इस में उगितश्च (१२५०) मूत्र से डीप शयनोनित्यम् (३६६) मे नुम् का नागम तथा नकार को अनुम्वार जोर परमवर्ण कर विभक्ति लाने में दीव्यन्ती' (चमकनी हुई) प्रयोग सिद्ध हो जाता है। इमीप्रकार-नमन्ती पठन्ती पानी चोरयन्ती आदि की मिदि ममाननी चाहिये। ध्यान रह कि जहा मप और श्यन् नहीं हाता वहा नुम् का आगम भी नहीं हाता । यथा-मुणती, ददतो, कुवती, जानती अदती, मृण्वती आदि । तुदादिगणीय तथा आकारान अदादिगणीय धातुमा के शान्ता म डीप नै परे रहले आच्छोनद्यो म् (३६५) मे वैकल्पिक नुम् का आगम हो जाता है। यया-तुदन्नी-तुदनी, लिगली. लिखती, पृच्छन्नी पृच्छनी, यान्नी-याती पानी-पाती आदि दो दो स्प बनते है । इमी. प्रसार भविष्यत्वाल मे लुट्ने स्थान पर गर्न आदेश रन्नं पर भी दो दो म्प बनते है--भविष्पनी भविष्यतो आदि । इस विषय पर इस प्यास्या के प्रथम भाग में (३६६) मूत्र पर विस्तृत टिप्पण कर चुके है वही देखें । । १ पूर्वोक्न 'भवती और इम 'भवन्नी' में अर्थ एव प्रक्रिया के अन्तर का पन्छी तरह ममा लेना चाहिये ।
म्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् अब लोक मे कर्णक्टुत्वदोष के लिये प्रसिद्ध' अग्रिमसूत्र के द्वारा डोप का पुन- विधान करते हैं- [लघु०] विधि-मूत्रम्-(१२५१) टिड्-ढाणिज्-द्वयसज्-दध्नन्- मात्रच्-तयप्-ठक-ठन-क-क्वरप ।४।१।१५।। अनुपसर्जन यद् टिदादि, तदन्त यद् अदन्त प्रातिपदिक, तत स्त्रिया डीप स्यात् । कुरुचरी । नदट्-नदी। देव-देवी। सौपर्णेयी। ऐन्द्री। औत्सी । करुद्वयसी । ऊरुदघ्नी । करुमात्री । पञ्चतयी। आक्षिको। प्रास्थिकी । लावणिकी । यादृशी । इत्वरी॥ अर्थ-अनुपमजन (गौण अर्थात प्रधान) जो टित् या ढ आदि प्रत्यय, वे जिम के अन्त में हो ऐमें अदन्न प्रातिपदिक मे परे स्त्रीत्व की विवक्षा मे डीप प्रत्यय हो। व्याख्या-टित-ढ-अण्-अज्-द्वयमच्-दघ्नच्-मात्रच-तयप्-ठक-ठ-क-क्वरप' । ११३। डीप् ११३१। (ऋन्नेम्यो डोप में) । अनुपमजनात् ।।१। (यह पीछे से अधिकृत है)। अत ॥५॥१॥ (अजाधतष्टाप् मे) । स्त्रियाम् ।७।१। (यह अधिकृत है)। प्राति- पदिकात, प्रत्यय , परश्च-ये सब भी पूवन अधिकृत है । टिन से ले कर क्वर तक का ममाहारद्वन्द्व है । न उपमनम अनुपसजनम् तम्मात् = अनुपसजनात् ननन्पुरुष । ३ १ टिड्ढाणद्वयसच्चुटूड सिड सोस्तिप्तस्मिसिप्यस्यमिब्- वस्मस्ताहशिचष्टुनाष्टुरतइशश्छोटययोऽन्त्यादि टि। लोपोव्योलिद्धिरेचियचिभ दाधावदाप्छेच टे. रित्यब्दानखिलान्नन्ति कतिचिच्छब्दान् पठत क्टून ॥ (सुभाषितरत्न । शादू लविक्रीडितम्) । २ पाठोज्य पचिन्नोपलभ्यते । सहितरपदे नित्या नित्या धातूपसगंयो । नित्या समासे वाक्ये तु सा विवक्षामपेक्षते ॥ इस नियम के अनुमार ममाम मे मन्धि नित्य हुआ करती है । अन यहा सन्धि- रहित पदा का विच्छेद दर्शाया नहीं जा सकना । परन्तु विद्यार्थियों के मुखबोध के लिये यहा सन्धिरहित पदो का विश्लेष दिखाया गया है, परमार्थत नहीं। ४ अजाद्यतष्टाप (१२४६) से 'अत' पद का अनुवर्तन मम्पूर्ण स्त्रीप्रत्ययप्रकरण में व्याप्त रहता है। यदि इस प्रकरण म क्मिी प्रकार के विशेषविधान से अन्यथा नहीं कहा जाता तो इसी का हो अधिकार रहता है नब अदन्त प्रातिपदिक से ही प्रत्यय का विधान समझना चाहिये । - मंमीव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुग टित, ढ आदि प्रत्यय हैं। प्रत्ययग्रहणे तदन्ता प्राह्मा के अनुसार इन मे तदन्तविधि हो र टिदन्त, दाल, अन्न आदि बन जाता है। तब इम का 'प्रातिपदिकात्' के साथ अन्दय होता है। घर 'अन यह भी 'प्रातिपदिकात्' का विशेषण है, इसलिये इम मे भी तदतविधि हो कर 'नदन्तात् प्रातिपदिक्षात्' उपलब्ध हो जाता है । 'अनु. पसर्जनात्' को 'टिड्ढाणन०' मे अन्वित किया जाता है, 'प्रातिपदिकात्' मे नहीं । इस प्रकार सूत्र का यह अर्थ प्राप्त होता है-(अनुपमजनात् टिड्ढाण-दयसन्दघ्नन्मात्रम्- तयप्ठकठजपवरप) अनुपसजन अर्थात् प्रधान जो टित् ट अण्, अन्, द्वयमच, दनन्, मात्रच तयप् टक्, टन्, वन और क्वरप् प्रत्यय-वे जिस वे अन्न मे हा ऐसे (अन' == अदन्तात्) अदन्त (प्रातिपदिकात्) प्रातिपदिक मे परे (डोप प्रत्यय ) डोप् प्रत्यय हा जाता है (स्त्रियाम्) स्त्रीत्व की विवक्षा में। इन के क्रमश उदाहरण यथा- टित्-ट् इत् यम्य म टित, जिम का टकार इत् हो वह टित् वहाता है । टित दा प्रकार का होता है । (१) प्रत्यय का टित होना । (२) प्रातिपदिक या धातु का टित् होना। यहा दोनी प्रकार के टित् अभिप्रेत हैं। यथा-'कुरुचर' शब्द चरेष्ट (७६२) सूनद्वारा टप्रत्ययान्त सिद्ध हाता है । 'ट' प्रत्यय टित् है क्योकि इस के टकार की चुटू (१२६) द्वारा इत्मज्ञा हो जाती है । तो इस प्रकार यहा टित्नत्यान्न अदन्त प्रातिपदिक 'कुरचर' में स्त्रीत्व की विवक्षा में प्रकृत टिड्डाण० (१२५१) सूत्र मे होप् प्रत्यय हो कर अनुबन्धलोप करन मे बुग्चर-+-ई' हुआ। अब अजादि स्वादि प्रत्यय है' के परे रहते यचि भम् (१६५) द्वारा पूर्व की भसज्ञा हा जाती है। पुन यस्येति च (२३६) मूत्र म भसज्ञा अकार का लाप कर दचन्न होने से प्रपमरवचन म सुं प्रत्यय लान पर उम का हल्डयादिलोप हो 'कुरचरी' (कुरपु चरति स्त्री पुरुचरी, कुरदेश मे घूमने वाली स्त्री) प्रयाग सिद्ध हो जाता है । यहा यह विशेष ध्यातव्य है कि कुरचर में तत्पुरुषममाम के कारण उत्तरपद की प्रधानता है अत यहा 'चर' यह टित्प्रत्ययान शब्द अनुपसर्जन (प्रधान) है इसलिय इस स डीप् प्रत्यय हो गया है। यदि टिदन्न आदि उपमजन (गौण) हागे तो डोप न होगा। यया-बहब गुरुचरा यस्या मा बहुषुरुवरा नगरी । यहा अन्यपदप्रधान बहुबोलिमास म कुरचर' यह टिदन्त गौण (उपसजन) है बन 'बहुकुरचर' भन्द म प्रकृतमूत्रद्वारा डीप न हो कर अजाधतष्टाप् (१२४६) से अदन्नलक्षण टाप हो होता है। नदद, देवद, चोरट् आदि शब्द पचादिगण (७९६) में अच्यत्ययान्न पर्ने गर हैं । इन के टकार की हलन्त्यम् (१) द्वारा इत्ममा हो पर लाप करने में 'नद, देव, १ टित का छोह अन्य सब प्रन्यप हैं । टित्-प्रत्यय अप्रत्यय दाता प्रकार राहाता है । यदि टित् अपत्यय होगा तो भी 'प्रातिपदिशात्' का विशेषण होन में पारण इस से तदन्तविधि हो जायेगी।
स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् चोर आदि रह जाते हैं । टित्त्व के कारण इन प्रातिपदिको से स्त्रीत्व को विवक्षा में प्रकृतमूत्र से डोप् प्रत्यय हो कर भमज्ञक अकार का लोप कर विभक्नि लाने में नदी (दरिया), देवी (दिब्धगुणयुक्ता स्त्री), चोरी (चोर स्त्री) आदि प्रयोग सिद्ध हो जाते हैं। धातु के टित्त्व के उदाहरण स्तनधयी (म्ननपान करने वाली बच्ची) आदि व्याकरण के उच्च ग्रन्थो में देखें। ढ प्रत्यय का उदाहरण यथा -'सुपर्णी डस्' में अपत्य अथ मे स्त्रीम्यो ढक (१०२०) सूत्र में तद्धिन ढक् (ढ) प्रत्यय, तद्धिताल होने से प्रातिपदिक्त्व के कारण मुंपो धातु-प्रातिपदिकयो (७२१) से मुंप (डस्) का लुत् आयनेयोनीयिय पढखध्या प्रत्ययादीनाम् (१०१३) मे द को एय् आदेश, प्रत्यय के वित्त्व के कारण किति च (१००१) से आदिवृद्धि तथा भमज्ञक ईकार का यस्येति च (२३६) से लोप कर 'मौ- पर्णय' यह ढक्प्रत्ययान्न प्रातिपदिक निष्पन्न होता है । अब स्त्रीत्व की विवक्षा में इस से प्रकृत टिड्ढाणा ० (१२५१) सूत्रद्वारा डीप् प्रत्यय हो भसज्ञक अकार का लोप कर विभक्तिकार्य करने से 'मौपर्णेयी प्रयोग सिद्ध हो जाता है । सुपर्णा अपन्य स्त्री सोप- णेयी (सुपर्णी की कन्या, गरड की बहन) । इसीप्रकार विनताया अपन्य स्त्री वैनतेयो' । अण्प्रत्यय का उदाहरण यथा--- देवतावाचक प्रथमात 'इन्द्र' शब्द से सास्य देवता (१०४१) के अर्थ मे तद्धिन- मज्ञक अण् प्रत्यय हो कर-इन्द्र मुं+अण् । तद्धितान्त हो जाने से प्रातिपदिकन्व के कारण सुंपो धातु-प्रातिपदिक्यो (७२१) से मुंप् (सु) का लुक्, प्रत्यय के णित्त्व के १ यहा यह विशेषत ध्यातव्य है कि आगम के टित्त्व के कारण कोई प्रातिपदिक टित नहीं होता । अत एव 'पठिन' आदि को इट् आगम के कारण टित् न मानने से टित्त्वलक्षण डोप नहीं होता, अदन्तलक्षण टाप् ही होता है । यथा-पठिता अष्टा- ध्यायी, चलिता लक्ष्मी , प्रथिता माला, पूजिता विद्या भूषिता कन्या, पतिता पुष्पावलि इत्यादि । इस मे प्रमाण है साय-चिर-प्राणें-प्रमेऽव्ययम्यष्टय -टय लो तुटू च (१०८६) मूत्र मे तुंद आगम को टित करने पर भी ट्य, और टयल प्रत्ययो को पुन टित् करना । यदि आगमो का टित्त्व डीप का निमित्त होता तो प्रत्ययो को डी के लिये पुन क्यों टित करते उदाहरण यथा-मायन्ननी वेला, चिरन्तनी गाथा आदि। २ नन्वत्र निरनुन धकग्रहणे न सानुब धकस्य (५०) इति परिभाषया शिलाया ढ (५३ १०२), ढरछन्दसि (४४१०६) इन्यनयोरेव ग्रहणमुचित न तु सानुबध- कस्य ढक । मत्यम् । नयो नियामप्रवृत्तेरगत्या सानुबन्धकस्य दम्य ग्रहण क्रियत् 7 इति भाष्ये स्पष्टम् ।
अमोघ्याम्पयोपेनाया लघुमिदानवोमुद्या कारण तद्धितेप्वचामाद (१३८) द्वारा आदिवृद्धि तथा यस्येति च (२३६) मे भमजन अकार का लोप करने पर 'ऐन्द्र' यह अप्रत्ययान्न प्रातिपदिक निष्पन्न होता है। अब म्नीत्व को विवक्षा मे इम में टिड्दाणन० (१२५१) मूत्रद्वारा टोप् प्रत्यय, भमशन अकार का यस्येति च (२३६) से लोप तया विभक्तिकाय करने मे ऐन्द्री' प्रयोग मिर हो जाता है । इन्द्रो देवताऽस्य इति ऐन्द्री । इन्द्र जिम का देवना है ऐमी दिशा (पूर्वा), ऋचा कादि। अण् प्रत्यय तद्धित और कृत् दो प्रकार का हुआ करता है। यहा तदित वा उदाहरण दिया गया है। कृत्मन्ना अप् प्रत्यय के उदाहरण-कुम्भकारी, नगरवारी आदि समझने चाहिये । तदिन अण् वा जन्य उदाहरण-चन्द्रमस इयम्-चान्द्रममी' । अण्प्रत्यय की तरह शोलम् (११२८), छत्त्रादिभ्यो ण (४४६२) इन मे णप्रत्यय करने पर भी शापक वे आथय से इम में भी डी की प्रवृत्ति हो जाती है- तान्छोलिके पेऽपि (अण्कायं भवति)---सि० को० । उदाहरण यया-चुरा शोल- मस्या' इस अर्थ म चुराशन्द म छत्वादिम्यो ण (४४ ६२) सूत्रद्वारा पप्रत्यय करने पर 'चोर' शब्द निप्पन्न होता है । स्त्रीत्व की विवक्षा म इस में भी टीप् प्रत्यय हो कर 'चौरी' (चोरी करने के स्वभाव वाली औरत) प्रयोग सिद्ध हो जाता है । इमीप्रार- तप शीलमस्या इति तापमी आदि मे समझना चाहिय । परन्तु ज्ञापकसिद्ध न सर्वत्र (ज्ञापको से ज्ञाप्यमान कार्य सब जगह प्रवृत नहीं होता, अर्थात् कही-कही रस भी जाता हैं) इस परिभाषा का आश्रय ले कर 'छात्व' इस णप्रत्ययान प्रातिपदिक का स्त्रीलिङ्ग छात्रा' ही बनेगा, डीप हो र छात्री' नही, अदन्नलक्षण टाप ही होगा। गुगे >पाणाम् आवरण छन्त्रम्, तच्छीलमन्या इति छात्रा (वृ० शब्देन्दुशेखर में नागेश भट्ट)। अन्प्रत्यय का उदाहरण यथा- मप्नम्यन्त 'उत्स' भन्द मे तत्र भव (१०६२) वे अयं म उत्सादिम्योम (१००२) सूत्र स तद्धिन अन् प्रत्यय, तद्धितान्त के प्रातिपदिक्त्व के कारण मुंपू (डि) का लुक्, प्रत्यय के नित्व के कारण आदिवृद्धि (६३८) तथा अन्न म यस्येति च (२३६) म भमभक प्रकार का लोप करने में 'औत्म' यह अप्रत्ययान्न प्रातिपदिक निष्पन्न चत्र गता पपगुणान् न भाक्ने पाश्रिता चादमसोमभिस्याम् । उमामुख तु प्रतिपद्य सोता द्विसयां प्रीतिमवाप सक्ष्मी ॥ (कुमार० १४३) २ इमोप्रकार-प्रशाम्त्यस्मा इति प्रामा । यहा प्रज्ञा-यमााम्यो ग (५२१०१) मूत्रद्वारा मत्वर्षीय जयप दिया गया है। डीप नहीं होता, टाप हो जाता है।
स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् से प्रकृत होता है। स्त्रीत्व की विवक्षा मे इम मे प्रकृतसूत्र टिड्ढाण० (१२५१) द्वारा डीप् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, भमज्ञक अकार का लोप कर विभक्निकार्य करने मे 'औत्मी' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । उत्मे भवा--औत्सी, झरने में होने वाली मच्छली आदि । द्वयसच्, दघ्नच् और मात्र प्रत्ययो के उदाहरण यथा- प्रथमाद्विवचनान्त 'ऊरु औ' से 'ऊरू प्रमाणमम्या' (ऊरु है प्रमाण जिस के) दम अर्थ मे प्रमाणे द्वयसज्दघ्नश्मात्रच (११६८) सूनद्वारा तद्धितसज्ञक द्वयसच्, दघ्नच् और मात्र प्रत्यय हो कर सुँप् (ओ) का लुक् करने मे 'ऊरद्वयम, ऊरुदघ्न, ऊस्मात्र' ये तीन तद्धितान्त प्रातिपदिक निष्पन्न होते हैं। स्त्रीत्व की विवक्षा मे टिड्ढाणद्वयसज्दघ्नश्मात्रच्० (१२५१) सूत्रद्वारा डीप् प्रत्यय, अनुबन्धलोप तथा भसज्ञक अकार का यस्येति च (२३६) से लोप कर विभक्तिकाय करने में 'ऊरद्वयसी, ऊरुदघ्नी, ऊस्मात्री' ये प्रयोग सिद्ध हो जाते है । अर= =पट्टो के प्रमाण जितनी गहरी नदी आदि । इसीप्रकार--जानुद्वयसी जानुदघ्नी, जानुमात्री आदि प्रयोग बनते है । जानुदध्न्य आप मरितोऽस्या (इस नदी का जल घुटनो प्रमाण वाला है)। तयप् प्रत्यय का उदाहरण यथा-- प्रथमाबहुवचनान्त पञ्चन्शब्द से 'पञ्च अवयवा अस्या' (पाञ्च है अवयव इस के) इस अथ मे सख्याया अवयवे तयप् (११७२) सूत्र से तद्धितसज्ञक तयप् प्रत्यय हो सुप् (जम्) का लुक् तथा पदान्त नकार का न लोप प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) से लोप करने पर 'पञ्चतय' प्रातिपदिक निष्पन्न हो जाता है । अब स्त्रीत्व की विवक्षा मे इस से प्रकृत टिड्ढाणद्वयसज्दघ्नन्मात्रच्तयप्० (१२५१) सूत्रद्वारा डीप् प्रत्यय, अनु- बन्धलोप तथा भमज्ञक अकार का लोप कर विभक्तिकाय करने पर पञ्चतयो' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। कृत्तद्धितसमासंक्शेषसनाद्यन्तधातुरूपा पन्ततय्यो वृत्तय । दश अवयवा (मण्डलस्पा) अस्या इति दशतयी ऋक्सहिता। ठप्रत्यय का उदाहरण यथा- अक्षर्दीव्यतीति आक्षिकी स्त्री (पासा से जुआ खेलने वाली स्त्री) । तृतीयाबहु- वचनान्त अक्षशब्द से 'पासो मे खेलता या जीतता है इस अर्थ मे तेन दोव्यति खनति जयति जितम् (१११७) सूत्रद्वारा तद्धितसज्ञक ठक् (8) प्रत्यय, तद्धितान्त के प्राति- १ उत्स नाम के ऋषि की कन्या (उत्सस्यापत्य स्त्री) इस अर्थ की विवक्षा में उत्सा- दिम्पोऽन (१००२) से अप्रत्यय तो होगा-औत्स, परन्तु स्त्रीत्व की विवक्षा में वहा प्रकृतसूत्र से डीप न हो कर इस के बाधक जातेरस्त्रीविषयादयोपघात (१२६६) से जातिलक्षण डीप प्राप्त होगा। पुन उस का भी शाङ्गरवाद्यत्रो डोन् (१२७५) से बाध हो कर डीन् प्रवृत्त हो जायेगा । ध्यान रहे कि गोन च वरण सह के अनुसार यह जातिवाचक है। डोप, डीए, डीन् प्रत्ययो के कारण स्वर में ही अन्तर पडता है लौक्विरूपसिद्धि मे नहीं । ।
मंगोमागोतामा ननितान्योनदा पदिकन्द के कारण मुंब्लु. कार गे ठन्क (१०२७) ने इन आदेश, प्रकारे वित्व के कारण मिति च (१००१) मे नादिवृद्धि तथा जन में मनश्क अबार का पस्येति च (२३६) ने लोर करने पर आश्यि' प्रातिपदिक निम्पन्न होता है। पर म्त्रीत्व की विदक्षा में इस प्रत टिदाणदरमदानमारनपटर (१२५१). द्वारा ही प्रत्यय, अनुद प्रनार एव मनहर बार का इन्वेति च (२१६) में नोर कर विभक्तिकार्य करने में 'आक्षिी प्रयोग सिद्ध हो जाता है। ठप्रत्यय वा दाहरण यथा- प्रथेन श्रीता प्राम्पिको (अन्य नर दन्तु दे कर दरोदो हुई बानिन दस्तु) 1 तृतीयान्न प्रन्थशब्द मे तेन त्रीतन् (११४४) अर्थ में दिनभर व् (2) प्रत्यय, तद्धितान्न होने में प्रातिपदिकन्द के कारण मुंप (टा) का ना, प्रत्यर के पार को उन्मेष (१०२७) ने इ बादेश, प्रत्यय वे विन्द के कारण विति च (१००१) मे आदि अच् का दृद्धि (आकार) नया मदर बार वा पनि च (२३६) नोर करने पर प्रायिक' यह तद्धितान प्रातिपदिक निप्पन्न होता है। कब इन नेत्रीन्द की दिक्षा में प्रकृत टिडढाणदयनन्दनम्मालपटरटन (१२५१) द्वारा डीप प्रत्यय, अनुव धलोप नया मनना अनार का नोप कर विभक्तिकाचं वरने में मासिकी प्रयोग सिद्ध हो जाता है । ठा प्रपय का दूसरा मुमनिन दार- नवण पप्पनन्या इति लावपिको (लवण जिम का पाप है कपांत् नरम दचन वानो स्त्री) । प्रथमान नदण मन्द ने तदन्य पप्यन् (४४५१) २ अपने तदनाद- टन (४४५२) मूत्र में नद्धिनमश्क ठन (ट) प्रत्यय नदिनान्न होने ने प्रातिपदिन्य के वारण मुंप () का नुक् टवार को इन आदेश प्रन्यर के विन्द के कारण आदि वृद्धि नया पनि च (२३६) ने मनहर बार का लार करने पर 'नागिन' यह तडितान प्रातिपदिर निप्पन्न होता है। अब म्योन्य वो दिदक्षा में इस मन टिदाणसपनन्दनमात्रनपटकटन० (१२५१) मूत्रद्वारा होर प्रत्यक्ष अनुरोध तथा मनन्दन बार वा लोप वर विभक्तिका बग्ने र 'लादको प्रयोग किया जाता है। कन्यय का नाहरण था- १ जब टर बार उन दोनो योरा इन मूत्र में यह भीष्ट है तो मदर ट' हो कसा नहीं कर देत, इन ने टक और टम दोनो का म्हण हो गपंग इन मटा का उनर यह है कि परिट' ही रहते नो टर और टन माय मारन का भी पहप हो गता जो बनिए या। न्याहि-दहोम्यन्या इदि टमा। यहा अन इनिंग्नी (१९९१) में ठन् र किरा पा है। इन मंद में डोर न पर टार बरना होमीट है।
म्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् यादृश (जैसा) शब्द पीछे हलन्नपुलिङ्गप्रकरण मे त्यदादिषु दृशोऽनालोचने कन् च (३४७) सूत्रद्वारा प्रत्ययान्न सिद्ध क्यिा जा चुका है । कृदन्त होने में कृत्तद्धित- समासाश्च (११७) सूत्रद्वारा इस की प्रातिपदिक्सज्ञा हो जाती है । स्त्रीत्व की विवक्षा म टिड्ढाणद्वयसज्दघ्नमारच्तयप्ठकठकम० (१२५१) सूत्रद्वारा डीप् प्रत्यय, अनुबन्ध- लोप तथा यस्यति च (२३६) मे भमज्ञक अनार का भी लोप कर विभक्ति लाने से 'यादृशी' (जैमी) प्रयोग सिद्ध हो जाता है। यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी --(पञ्च० ५९८) । इसीप्रकार-तादृशी (वैमी), कीदृशी (कमी), मादृशी (मुझ जमी), त्वादृशी (तुय जैसो), सदृशो (वैसी) आदियो मे टीप् प्रत्यय समझना चाहिये । क्वरप्प्रत्यय का उदाहरण यथा- इण् गतौ (अदा० परस्म०) धातु से तच्छील आदि कर्ता अर्थ म इण्-नश-जि. सत्तिभ्य क्वरप् (३ २ १६३) मूत्रद्वारा कृत्सक क्वरप् (वर) प्रत्यय कर ह्रस्वस्य पिति कृति तुक् (७७७) से तु का आगम करने पर 'इत्वर' (गमनशील) यह कृदन्त प्रातिपदिक निप्पन्न होता है । अव इम मे स्त्रीत्व को विवक्षा में प्रकृत टिड्ढाणद्वय- सज्दघ्नन्मानच्तयप्ठकठकन्क्वरप (१२५१) सूत्रद्वारा श्रीप, अनुबन्धलोप एव भ- मज्ञक प्रकार का लोप कर विभक्तिकाय करने मे 'इन्दरी' (गमनशीला, पुश्चली कुलटा) प्रयोग सिद्ध हो जाता है । इमीप्रकार-नश्वरी (नाशशीला), जित्वरी (जयशीला) सृत्वरी (प्रसरणशीला), गत्वरी (गमनशीला) आदि प्रयोगों में डीप समझना चाहिये । साहित्यिक प्रयोग यथा- शरदम्बुधरच्छाया गत्वों यौवनश्रिय आपातरम्या विषया पर्यन्तपरितापिन। (किरात० ११ १२) विशेष वक्तव्य-यतमाना, पचमाना, एधमाना, वर्धमाना, वक्ष्यमाणा, वीक्ष्य- माणा, क्रियमाणा इत्यादियो में लेट या लूट के स्थान पर होने वाले शानच् प्रत्यय मे १ 'क्वरप्' इस सानुबन्ध क्थन के कारण वरच्प्रत्ययान्त प्रातिपदिक मे स्त्रीत्व में डोप नही होता, टाप् ही होता है । स्येशभासपिसक्सो वरच् (३ २ १७५) । स्था- वर , म्यावरा, ईश्वर ईश्वरा, भास्वर भाम्बरा, पेम्बर , पेम्बरा, विवस्वर , विक्स्वरा । तथा च भारवि वियस्तमङ्गलमहौषधिरीश्वराया (किरात० ५३३)। वही कही 'ईश्वरा' के स्थान पर 'ईश्वरी' का भी प्रयोग देखा जाता है । यथा देवीमाहात्म्य मे- प्रसोद विश्वेश्वरि पाहि विश्व त्वमोश्वरी देवो चराचरस्य । इन स्थानो मे ईश्वर- शब्द औणादिव वरट्प्रन्ययान्न है मन टित्त्वान्दीप समयना चाहिये । अथवा इन म्यानो मे पुयोग में पुयोगादास्यायाम् (१२६१) द्वारा टीप् ममया जा सकता है [अन्येभ्योऽपि दृश्यते (७६६) इति क्वनिपि वनो र च (४१७) इति डीवी- इत्यपरे । ल० १० (२) भेमोव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या वा०- म्यानिवद्भाव के कारण रित्त्व सक्रमित नहीं होता, अत डीप नही हो सकता। अजाप- तष्टाप (१२४६) सूत्रद्वारा अदन्तलक्षण टाप् ही होता है। इस में लिंड्स्थानी परम्मपदों में यासुंदु आगम को डित् करना शापर है। यदि लिड के आदेश तिप् आदियो में म्या- निवद्भाव के कारण डित्त्व आ जाये तो यामुटु को डित् अतिदेश करना व्यर्थ हो जाये । अत इस से यह ज्ञापित होता है कि लाराश्रित अनुद धकार्य आदेशो में नहीं हुआ करते । इस से लूट के स्थान पर होने वाले शानच् में उगित्त्वधर्म के न आने से उगि- तश्च (१२५०) द्वारा 'वक्ष्यमाणा' आदि मे डीप नहीं होता। इस विषय पर विशेष विचार व्याकरण के उच्च ग्रन्यो में देखें। अब इस सूत्र पर एक वात्तिक का अवतरण करते हैं- [लघु०] -(१०१) नञ्-स्नजीकक्-ख्युस्तरुण-तलुनानामुप- संख्यानम् ॥ स्त्रणी। पोस्नी । शाक्तीको । आयकरणी । तरणी। तलुनी ॥ अर्थ-प्रत्ययान्त, स्मन्प्रत्ययान्त, ईक्प्रत्ययान्त और स्युन्प्रत्ययान्त प्रातिपदिको स तथा ताण और तलुन प्रातिपदिको से स्त्रीत्व की विवक्षा में डीप प्रत्यय हो। व्याख्या~-यह वात्तिक टिड्ढाणा० (१२५१) मूत्र पर भाष्य में पढ़ा गया है अत इस से स्त्रीत्व को विवक्षा म डीप का विधान अभीष्ट है । इस वातिक में परि- गणित नन्, स्नन्, ईक्क और ट्युन् प्रत्यय हैं । तरण और तलुन प्रातिपदिक हैं । प्रत्ययमहणे तदन्ता प्राहा (प०) के अनुमार प्रत्यया से तदन्ना का ग्रहण समथना चाहिये । वात्तिक के प्रमश उदाहरण दिये जाते हैं- नप्रत्ययान्त का उदाहरण यथा- मप्तम्यन्त स्त्रीशब्द से प्राग्भवनीय भव आदि अर्यों में स्त्रीपुसाम्यां नमनमो भवनात् (१००३) सूत्रद्वारा तद्धित नन् (न) प्रत्यय हो कर तदिनान्तत्वेन प्रातिपदिव- सशा के कारण सुप् (सुप) वा लुक, प्रत्यय वे जित्त्व ये वारण तद्धितेप्वचामाद (६३८) से आदिवृद्धि एव उकार को णकार करने से 'स्त्रंण' यह नश्प्रत्ययान्त प्राति- पदिक निप्पन्न होता है। अब इस मे स्त्रीत्व की विवक्षा में प्रकृत नमस्नीरा (वा० १०१) वात्तिक से डीप् प्रत्यय, अनुव धलोप तथा भसशक अकार का यस्येति च (२३६) से लोप कर विभक्निकार्य करने से 'स्त्रंणी' प्रयोग मिद्ध हो जाता है । स्त्रीप भवा स्त्रणी । स्त्रियो मे होने वाली (क्या, चर्चा, प्रवृत्ति आदि)। स्नन्प्रत्ययान्त का उदाहरण यया- सप्तमीबहुवचनान्त पम् शब्द से प्राग्भवनीय भय आदि अपो म स्योपुसाम्या नस्ती भवनात् (१००३) मूत्रद्वारा तदितसशर म्नन (स्न) प्रत्यय हो पर सदिनाल. त्वेन प्रातिपदिक्मज्ञा के कारण मुंपू (मु) का ला, प्रत्यय के नित्य के कारण यादिवृद्धि ।
स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् तथा पदत्व के कारण पुस् के मकार का सयोगान्तलोप हो कर स्नन्प्रत्ययान्त 'पोस्न' शब्द निप्पन्न होता है । अब स्त्रीत्व को विवक्षा मे इस मे प्रकृत ननजीकर. (वा० १०१) वात्तिकद्वारा डीप् प्रत्यय, अनुबन्धलोप तथा भसज्ञक अकार का यस्येति च (२३६) से लोप कर विभक्तिकार्य करने से 'पोम्नी प्रयोग सिद्ध हो जाता है । पुसु भवा पौंस्नी । पुरुषो मे होने वाली (क्था, चर्चा, प्रवृत्ति आदि) । साहित्यगत प्रयोग यथा-- सगच्छ पौस्नि । स्त्रैण मा यवान तरुणी शुभे । राघव प्रोष्य पापीयान् जहीहि तमविञ्चनम् ॥ (भट्टि० ५६१) [सीता के प्रति रावण कह रहा है- हे सीते । हे पुरुषयोग्ये । तरुणी तुम, स्नियों के योग्य मुय तरुण के पास रहो । रामचद्र राज्य मे भ्रष्ट हो कर भाग्यहीन हो चुका है अत एव उम निर्घन को छोड दो । पुमे हिला पोस्नी नत्मम्बुद्वौ--'पौम्नि' ।] ईक्प्रत्ययान्त का उदाहरण यथा- शक्नि प्रहरणमस्या इति शाक्तीकी (शक्ति-वरछी है हथियार जिस का, ऐसी स्त्रो)। प्रहरण (शस्त्र) वाचक प्रथमान्त 'शक्ति' शब्द से तदस्य प्रहरणम् के अर्थ में शक्तियष्टयोरोकक (४४ ५६) सूत्रद्वारा तद्धितसशक ईकक् (ईन) प्रत्यय हो, सुब्नु, प्रत्यय के कित्त्व के कारण आदिवृद्धि एव यस्येति च (२३६) से भसशक इकार का लोप करने पर 'शाक्नीक' यह ईक्प्रत्ययान्न प्रातिपदिक निष्पन्न होता है। जब स्त्रीत्व की विवक्षा में इस से प्रकृत वात्तिक ननजीकक (वा० १०१) द्वारा डीप प्रत्यय, अनुबन्धलोप तथा भसनक अकार का यस्येति च (२३६) से लोप कर विभक्ति- वार्य करने से 'शाक्तीकी' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। इसीप्रकार-यप्टि प्रहरणमस्या इति 'याप्टोको' [लाठी हथियार धारण करने वाली स्तो] प्रयोग सिद्ध होता है । ख्युन्प्रत्ययान्त का उदाहरण यथा- अनाढ्यम् आढय कुवन्ति अनयेति आढयकरणी (विद्या)। जिम के द्वारा अनाढय (निर्धन) व्यक्ति को आदय (धनी) बनाया जाता है, ऐसी विद्या आदि। यहा च्यर्थ अर्थात् अभूतत्तद्भाव मे वर्तमान 'जाढ्य' म के उपपद रहते डुकृञ करणे (तना० उभय०) घातु मे करण कारक में आढय-सुभग-स्थूल-पलित-नग्नाग्ध-प्रियेषु व्यवच्ची कृत करणे ट्युन् (३ २ ५६) सूत्रद्वारा करणकारक मे कृत्मक स्युन् (यु) प्रत्यय, युवोरनाको (७८५) से 'यु' को 'अन' आदेश, धातु को आधधातुकगुण, उपपदममास, खित् के परे रहते अद्विषदजन्तस्य मुंम् (७९७) से मुंम् का आगम, मकार को अनुम्वार, अनुम्वार को वैकल्पिक परसवर्ण तथा अन्त में अप्वाइ० (१३८) मे नकार को णकार करने पर 'आढयड़करण' यह व्युत्प्रत्ययान्त कृदन्त शब्द निप्पन्न हो जाता है। अब इम मे स्त्रीत्व की विवक्षा मे प्रत नत्रस्नोककुयुस्तरुणतलुना- । १ आढयादिषु च्व्यर्थेषु अच्च्यन्तेषु कर्मसूपपदेषु कृन ट्युन् प्रत्यय स्मात् ।
२० भमीव्याख्ययोपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्या नाम् (वा० १०१) से डीप् प्रत्यय हो कर भसञक अकार का लोप विभक्ति- कार्य करने से 'आढयहरणी' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। इमीप्रकार-मुभगकरणी, स्थूलकरणी, पलितङ्करणी (जरा), नग्नदरणी, अघदरणी, प्रियङ्करणी' प्रयोगो की मिद्धि जाननी चाहिये। तरण और तलुन प्रातिपदिको के उदाहरण यथा- तरण और तलुन प्रातिपदिक युववाचर हैं। इन से स्त्रीत्व की विवक्षा में प्रकृतवात्तिक नस्नोकायुस्तरुपतलुनानामुपसरयानम् (वा० १०१) से डीप् प्रत्यय, अनुवन्धलोप एव भमज्ञक अकार का लोप कर विभक्ति लाने मे 'तरणी' 'तलुती' प्रयोग सिद्ध हो जाते हैं । दोनो का अर्थ है-युवति स्त्री। विशेष वक्तव्य-तरण और तलुन शब्द वयोवाचक हैं। इन में स्त्रीस्व की विवक्षा में पयस्यप्रथमे (वा०) वात्तिकद्वारा दीप प्रत्यय होना चाहिये था । परन्तु गौरादिगण में पाठ के कारण विद्-गौरादिम्याच (१२५५) सूत्रद्वारा डीप को बाध कर डीप का विधान किया गया है । इस पर प्रकृतवातिब से डीप का पुनविधान किया जाता है। गौरादिगण मे पाठ के सामर्थ्य से पक्ष मे डीप भी हो जायेगा । डोप करने पर भी रूप में कोई अन्तर नहीं पडेगा, पर स्वर मे अन्तर आ जायेगा । दीप करने पर आधुदात तथा डीप करने पर अन्तोदात्त स्वर हो जायेगा । न्यासकार तथा कपट आदियो का कथन है कि इस वात्तिक मे पडे तरुण और तलुन शब्द वयोवाचक नहीं अपितु सुरा आदि की प्रत्यग्रता (तीक्ष्णता, नवीनता, उत्कृष्टता) आदि के वाचर हैं अत प्रवृत वात्तिक स डीप हा पर 'तरणी तलुनी वा सुरा' बनेगा । वयोवाचको से तो गौरादित्वात् टीप ही होगा डीप नही । परन्तु प्रदी. पोद्योतकार नागेशभट्ट का कथन है कि तरण और तलुन शब्द मुख्यतया वयोवाचक ही हैं प्रत्यग्रता आदि तो इन का लाक्षणिक अर्थ है अत उपर्युक्तप्रवारेण डीप् और जीप् प्रत्ययो की पर्याय से ही प्रवृत्ति होगी । अव अग्रिमसूत्रद्वारा यनन्त से डीप का विधान करते हैं- १ सुभगकरणी (जो कल्माणयुक्त नही उसे कल्याणयुक्त बनाया जाता है जिम में द्वारा)। स्यूलकरणी (जो म्यूल नही उमे स्थूल बनाया जाता है जिग में द्वारा)। पलितकरणी (जो बूढा नही उमे धूढा बनाया जाता है जिम के द्वारा)। नग्नकरणी (जो नगा नही उसे नगा दिया जाता है जिस पे दारा) । अघ• दूरणी (जो अघा नहीं उसे अन्धा दिया जाता है जिम के द्वारा)। प्रियकरणी (जो प्रिय नही उसे प्रिय बनाया जाता है जिम के द्वारा)। अनम्यासे विष विद्या, अजोगें भोजन विषम् । विष सभा दरिसस्प, पठस्य तदणी विषम् ॥ (हितोप०) २ स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् २१ [लघु०] विधि-सूत्रम्- (१२५२) यजश्च ।४।१।१६।। यान्तात् स्त्रिया डीप् स्यात् । अकारलोपे कृते-- अर्थ-स्त्रीत्व की विवक्षा मे यन्प्रत्ययान्न प्रातिपदिक से परे डीप् प्रत्यय हो । अकारलोपे कृते-यस्येति च (२३६) सूत्रद्वारा अकार का लोप करने पर (अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है)। व्याख्या- यज ।५।१॥ च इत्यव्ययपदम् । डीप् ।१।१। (ऋन्नेम्यो डीप से)। प्रातिपदिकात्, स्त्रियाम्, प्रत्यय , परश्च-ये सब पूवन अधिकृत हैं । य यह प्रत्यय है, अन प्रत्ययप्रहणे तदन्ता ग्राह्या (प०) परिभाषाद्वाग तदन्तविधि हो कर 'यत्र- नात् प्रातिपदिकात्' उपलब्ध हो जाता है । अथ – (यन =यजन्तात्) यजन्त (प्राति- पदिकात्) प्रातिपदिक मे (पर) परे (च ) भी (डीप्) डीप् (प्रत्यय) प्रत्यय हो जाता है (स्त्रियाम्) स्त्रीत्व की विवभा मे। यदि पूर्वस्थ टिड्ढाणन० (१२५१) सूत्र मै टित, ढ, अण् आदियो के साथ यञ् को भी पढ देते तो इस सून के बनाने की आव- श्यक्ता न पडती । परन्तु मुनि ने ऐमा नहीं किया। इस का कारण यह है कि वे इस से अगले प्राचा फ तद्धित (१२५४) सूत्र मे केवल 'यन' का ही अनुवर्तन चाहते हैं टिड्ढाणञ्० आदि का नही अत उहोने पृथक् सूत्र बनाया है। सूत्र का उदाहरण यथा- गर्गस्य गोत्रापत्य स्त्री गार्गी (गर्ग की गोत्रसन्तति कन्या)। गोतापत्य अर्थ मे पष्ठयन्त गर्गशब्द से गर्गादिभ्यो यन् (१००८) सूत्रद्वारा तद्धितमज्ञक यन् (य) प्रत्यय करने पर तद्धितान्त हो जाने मे प्रातिपदिकन्द के कारण सुंपो धातु-प्रातिपदिकयो (७२१) से प्रातिपदिक के अवयव सुप् (डम्) का लुक्, प्रत्यय के नित्त्व के कारण तद्धितेष्वचामाद (६३८) से आदिवृद्धि एवम् अन्न मे यस्येति च (२३६) स भमज्ञर जकार का लोप करने पर 'गाय' यह तद्धितान्त प्रातिपदिक निष्पन्न हो जाता है । अब इस से स्त्रीत्व की विवभा में प्रकृत यजश्च (१२५२) सूत्रद्वारा दीप प्रत्यय, उम में अनुव धो का लोप तथा पूर्ववत् भसज्ञक अकार का लोप करने पर -'गार्ग्य +ई दस स्थिति में अग्निमसूत्र प्रवृत्त होता है- १ यहा 'च' का काई विशेष प्रयाजन प्रतीत नही होता, डीप् की अनुवृत्ति यहा ममाप्त नहीं हो रही । आगे वयसि प्रथमे (१२५६) आदि सूत्रो मे भी इस का अनुवर्तन हो रहा है। न्यामकार के अनुमार यहा च' का ग्रहण अनुक्तो के ममु- च्चयार्य है, अन नस्नोकर (वा० १०१) वात्तिक पाणिन्यनुमन सिद्ध हो जाता है। २ टिड्ढाणमूत्रे एव यज पाठेन डोपि मिद्धे प्राचा एक तद्धित (१२५४) इत्युत्तर- सूत्रे यन एवानुवृत्तियंया म्यादित्यतो योगविभाग इत्यवसेयम् ।
२२ भैमीव्यास्ययोपैताया लघुसिद्धान्तमुद्या [लघु०] विधि-सूत्रम्-(१२५३) हलस्तद्धितस्य ।६।४।१५०।। हल परस्य तद्धितयकारस्य उपधाभूतस्य लोप ईकारे परे । गार्गी ॥ अर्प-हल से परे तद्धित के उपधाभूत यवार का लोप हो जाता है ईकार पर हो तो। व्याख्या हल ।।१। तद्धितस्य ।६।१। उपधाया ।६।१३ य ।६(सूर्य- तिघ्याऽगस्त्य-मत्स्याना य उपधाया सूत्र मे) । लोप ॥११॥ ( लोपोनद्या मूत्र मे) । ईति ७।१। (यस्येति च से)। अयं--(हल) हल् मे परे (तस्तिस्य) तदित के अवयव (उपधायाः) उपधा (य ) यकार का (लोप) लोप हो जाता है (इति) ईकार परे हो तो। 'गायं +ई' यहा ईकार परे हैं अत हल्-गकार से परे तद्धित प्रत्यय यञ् उपधा यकार का प्रकृतसूत्र से लोप हा जाता है-गाग,--ई-गार्गी । विभक्तिकाय हल्ल्यादिलोप करने से 'गार्गी प्रयोग सिद्ध हो जाता है। इसीप्रकार-वत्सस्य गोत्रापत्य स्त्री वात्मी (वत्म की गात्रमन्तति कन्या)। वत्सशब्द भी गर्गादिगण में पढ़ा गया है। शका-~इस मूत्र म 'उपधाया' की अनुवृत्ति लान की आवश्यकता हो क्या है ? सीघा-हल से परे तद्धित के यकार का लोप हो ईकार पर होने पर--ऐमा सरल अर्थ क्यो नही कर देते ? गायं +ई = 'गार्गी' मिद्ध हो जायेगा । यदि कहो वि पस्येति च (२३६) द्वारा लुप्त हुआ अकार अच परस्मिन्पूवविधो (६६६) सूत्र में स्थानिव- द्भाव के कारण उपस्थित हा कर पूवविधि (यकारलोप) मे रकावट डालता है अन 'उपधाया' का ग्रहण किया गया है, तो यह भी ठीक नही, क्योंकिन पदान्त-द्विवंचन- वरे यलोप- स्वर-सवर्णानुस्वार-दोघं-जगन्धविधियु (११५७) मूत्र म यकार बालाप करने में स्थानिवद्भाव वा निषेध कहा गया है। इस तरह ईकार और यकार के मध्य किसी प्रकार का व्यवधान न पडने से मोधा लोप हो जायगा । समाधान-यस्येति च (२३६) वाला लोप नया प्रकृतसूत्रद्वारा विहित यह यकार का लोप-दोनो आभीय कार्य हैं । ममानाश्रय कोई आभीय कार्य करना हा नो पहले म किया गया आभीय कार्य असिदवदनाभात (५६२) अधिकार के कारण उम की दृष्टि में असिद्ध हो जाता है। तदनुमार यहा प्रकृत यकारलोप की क्सम्यना मे यस्येति च (२३६) द्वारा पूर्व किया गया कार का लोप अमिदहो जान मे यार और ईशार के मध्य में अवार आ जाने से उम तपारथिन मरलायं मे यारा - १ पदान्तविधि, द्विवंचनविधि, 'वर' के पर रहते विधि, यवारलापविधि, स्वरविधि, मवणविधि, अनुस्वारविधि, दोपविधि, जगविधि और घर्विधि-इन विधियों म परनिमित्तक अजादेश स्थानिवत् नही होता।
स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् २३ लोप नहीं हो सकता था अत 'उपधाया' का अनुवर्तन किया गया है। अब अकार का लोप असिद्ध हो कर ही 'य' प्रत्यय के यकार को उपधात्व प्रदान कर देना है इस से उपधा के लोप मे कोई बाधा उपस्थिन नहीं होती । विशेष वक्तव्य-प्रकृत यश्च (१२५२) सूत्र मे 'यन्' मे अपत्याधिकार में पठिन यप्रत्यय का ही ग्रहण अभीष्ट है अन्य यन् का नही-ऐसा वात्तिककार का आगय महाभाष्य में व्यक्त किया गया है। इस मे अपत्याधिकार मे वहित यन होने पर तदन प्रानिपदिक में स्त्रीत्व की दिवक्षा म डीप न होगा, अदन्नलक्षण टाप् ही किया जायेगा। यथा-द्वीपे भवा द्वैप्या (द्वीप म होने वाली)। यहा सप्तम्यन्न द्वीप- शब्द से तत्र नव (१०९२) के अर्थ मे द्वीपादनुसमुद्र यन् (४३ १०) मे यन् प्रत्यय कर मुंब्लु, आदिवृद्धि तथा भसज्ञक कार का लोप करने पर 'द्वंप्य' शब्द निष्पन्न होता है। अब इस से स्त्रीत्व की विवक्षा में प्रकृतसून मे डीप न हो कर अदन्तलक्षण टापू ही होता है । क्याकि यहा यन् प्रत्यय अपत्वाधिकार में पटा नही गया । इसीप्रकार- देवस्य अपत्य दव्या (देव की लडकी) यहा षष्ठयन देवशब्द से अपत्य अर्थ मे देवाद् पात्रो (वा० ६७) वात्तिक मे यन्प्रत्यय हा कर सुन्नु, आदिवृद्धि तया भमज्ञक अकार का लोप करने पर 'देव्य' शब्द निप्पन्न होता है । यहा यन्प्रत्यय अपत्यार्थक होता हुआ भी अपत्याधिकार में पढ़ा नहीं गया अपितु प्राग्दीव्यतीय अधिकार में दित्यदित्या- दित्यपत्युत्तरपदापण्य (SEE) स्त्र पर पड़ा गया है अन स्त्रीत्व की विवक्षा मे यहा पर भी डीप न हो कर टाप ही होता है। विस्तार के लिये सिद्धान्तकौमुदी की टीकाओ का अवलोकन करें। अब यन्प्रत्ययान्ता स स्त्रीत्व की विवक्षा में प्राच्य आचार्यों के मन का निर्देश करते हैं- [लघु०] विधि-सूत्रम्- (१२५४) प्राचा एफ तद्धित ।४।१।१७।। यजन्तात् (स्त्रिया) प्फो वा स्यात्, स च तद्धित ॥ अर्य-यन्प्रत्ययान्न प्रातिपदिक से स्त्रीत्व की विवक्षा मे विकल्प य प प्रत्यय हो और वह तद्धितमज्ञक भी हो । व्याख्या-प्राचाम् ।६।३। म इति लुप्नप्रथमरवचनान्न पदम् । तद्धित ।१।१॥ यज ।५१ (पत्रश्च सूत्र से) प्रातिपदिकात्, स्त्रियाम्, प्रत्ययः, पररच-य सब पूर्वन अधिकृत है । प्रत्यय होन के कारण 'यन' ये तदन्तविधि हो कर 'यजन्नात् प्रातिपदिकात्' उपलब्ध हो जाता है। अर्थ -(प्राचाम्) पूचदशकाती आचार्यों के मन १ परन्तु अन्य लोगा का क्यन है कि 'उपधाया' की अनुवृत्ति न होने की दशा में ईकार मे अव्यवहित पूर्व यकार तो कही मिल ही न सकेगा सर्वत्र अनार का व्यवधान अनिवार्यत रहेगा ही, बन सूनारम्भसामय्य मे ही तब पवार का लोप हो जायेगा, इस के लिये 'उपधाया' का अनुवर्तन करना व्यर्थ ही है।
२४ भैमीव्याख्ययोपताया लघुमिदान्तकौमुद्या मे (यत्र = यनन्तात्) यजन्त (प्रातिपदिकात्) प्रातिपदिक से परे (फ.एफ) फ (प्रत्यय) प्रत्यय हो जाता है और वह (तद्धित) तद्धितममक भी होता है (स्त्रियाम्) स्त्रीत्व की विवक्षा में। यह प्राच्य आचार्यों का मत है, अन्य आचार्यों का मत पीछे निर्दिष्ट कर चुके हैं। हमे सब आचार्य प्रमाण है अत विकल्प सिद्ध हो जाता है । एफ्प्रत्यय के आदि पकार को प प्रत्ययस्य (८३६) से इत्मज्ञा हो वर लोप हो जाता है, 'फ' मात्र शेष रहता है । 'फ' के आदि फकार को आपनेयोनीषिय' फ-द-ख-रा-पा प्रत्ययादीनाम् (१०१३) से आयन् आदेश हो जाता है । (फ को पित् करने का प्रयोजन विगौरादिम्यश्च (१२५५) द्वारा डीप् प्रत्यय का विधान करना है । तद्धिता (१६) के अधिकार से बहिर्भूत होने के कारण एफ तद्धित न था अत यहा इमे तद्धित अतिदिष्ट किया गया है । इम से एफप्रत्ययान्त शब्द तद्धितसमासारच (११७) मे प्रातिपदिकसन्जक हो जाता है। प्रातिपदिकत्वात् पुन डीप् की उत्पत्ति होती है । उदाहरण यथा- गर्गस्य गोयापत्य स्त्री गाायणी गार्गो वा (गर्ग को गोगमनति कन्या)। पष्ठयन्त गगंशब्द में गोत्रापत्य अर्थ में गर्गादिन्यो पद (१००८) से यन् प्रत्यय, मुंनुर आदिवृद्धि तथा भसज्ञा अकार का लाप कर पूर्ववत् 'गाग्य' यह यजन्न प्रातिपदिर निष्पन्न होता है। अब इस से स्त्रीत्व की विवक्षा में प्राच्य आचार्यों के मतानुमार प्रत प्राचा प्फ तद्धित (१२५४) सूत्र प्फ प्रत्यय प प्रत्ययस्य (८३६) में प्रत्यय * आदि पकार की इत्सज्ञा उस का लोप तथा आयनेयोनीपिय ० (१०१३) म 'पके बादि फ्कार वण का आयन् आदेश हो जाता है-माग्यं आयन् अगाग्य + आयन । अब पचि नम् (१६५) पूव को भसज्ञा हो पर यस्येति च (२३६) द्वारा भसाजर अनार का लोप करन पर गाग्य + आयन -गायिन' इस स्थिति म अग्रिममूत्र प्रवृत्त होता है-- [लघु०] विधि सूत्रम्-(१२५५) पिद्-गौरादिभ्यश्च ।४।११॥ पिझ्यो गौरादिभ्यश्च (स्त्रिया) डीप स्यात् । गायिणी । नतंकी। गौरी ॥ अय-जिस का पकार इत् हा एन प्रातिपदिशा म तथा गोर आदि गणपटिन प्रातिपदिको म परे स्त्रीत्व की विवक्षा म डोप प्रत्यय हा । प्यारया-पिद्-गौरादिभ्य ।।३॥र इत्यव्ययपदम् । डोप ।। (बसतो डोप मूत्र मे)। प्रातिपदिकात, स्त्रियाम्, प्रायय , पराच-ये सब अधित है । परन यस्य स पित्, बोसिमाम' | गौरः (गौरne) आदिपाने गौरादयः, उद्गुण- सविज्ञानबहुधोहिममाम । पितर गौरादयाच पिगौरादय तेम्प पिगौरादिन्य दतरतरदन्द । शानिपदिकात्' का मम्द ध पिगोरादिम्य' रे माप है मन वचन. विपरिणाम हो पर 'प्रातिपदिवस' बन जाता है। वर्ष-(पिझौराविप) पिन् तपा गौरादिगणपति (प्रातिपदिवस) प्रातिपदिमो में (पर) परे (डी) होप (पर) म्बोप्रत्ययप्राणम् प्रत्यय हो (स्त्रियाम्) स्त्रीत्व की विवभा म। डीए और डीए प्रत्यो के निशान में यही अन्नर होता है कि डीप्रत्ययान्न शब्द आद्यदात्त तया डोपान्त अनोदान होते हैं । डीए का डकार लशश्वतद्धिते (१३६) में नया पकार हनन्त्यन् (१) मूत्र इन्मज्ञक हो कर सुप्त हो जाता है 'ई' मात्र नवशिष्ट रहता है। उदाहरण प्या- 'गाायन' यह फयत्ययान्न होने में पिन् है । तद्धिवान्त होने में प्रातिपदिक भी है अत प्रकृन पिगौरादिम्यश्च (१२५५) स्त्र में स्त्रीच की विवक्षा में इस में दीप (ई) प्रत्यय हो भनत अकार का लोप, गन्द तया विभक्तिकार करने पर मायावती' प्रयोग सिद्ध हो जाना है। प्राच्य आचार्यों में भिन्न अन्य जाचाला मत में पूर्ववत् 'गार्गी' ही बनेगा। इस प्रकार 'गाायणी' और 'मार्गी' दो रूप निद्ध हो जाते हैं। पित् का अन्य उदाहरण यया- नृती गात्रविशेष (दिवा० परन्म०) धातु म शिल्पिनि प्युन (३ १ १४५) स्त्र- द्वारा शिल्पी का अर्थ मे बुन् (७) प्रस हो कर पकार और नकार अनुबन्धी का लोप करने म-'नृत्+वु हुआ। अद पुबोरनाको (३८५) में द' को अक' आदेश १ यहा पिन्व यद्यपि प्रत्यय का धम है तथापि प्रत्यय के लिए वह निष्पयोरन है अत इन समुदाय (प्रानिपदिक) मे अचरित कर लेते हैं। इस प्रकार समूचा प्रातिपदिक पिन कहलाने लाता है। गंगा कि कहा है--अवयवै कृत लिहा सन- दायस्य विशेषक भवति । [वपूष्प्रभृतीना धातूना पित्त्व तु पिभिदादिन्योड़ (३ ३ १०४) इत्यविधौ चरिताथमिति न तेन प्रातिपदिर पिद् भवतीति । अन 'त्रपा' (लना, शरम) इत्यादौ पित्त्वनिमिनको डीप् प्रत्ययो न भवति, अपितु जहन्नलक्षपाटावेब । २ जब एफ' प्रत्यय ने एक बार स्त्रीच द्योतन करा दिया ना पुन जीव की विवक्षा कहा रह गई जिम के लिये दूसरा प्रवन डोष किया जा रहा है। उतार्यानामप्रयोग इम न्यार के अनुसार यहा दूसरा स्त्रीन पर न होना चाहि- यह शङ्का यहा व्युत्पन्न विद्यापिका का प्राय हुया करती है। इस का ननाधान यह है कि प्पा यय के पिकरणसामय से ही यहा दुबारा स्त्रीचा क्यिा जा रहा है, अन्यया फ का पिकरण व्यर्थ हो जायमा, म का कोई समान हो । यहा न और डीप दोनो प्रन्यो का समुदाय एक ही म्बीद का द्योतन करा रहा है-ऐमा समझना चाहिन । जने द्वौ पुरुषों' म दोनों का समुन्धर एक ही द्विस्व का द्योतन कराता है वैसे यहा मी दो स्त्रीया का समुन्नर एक ही स्त्रोत्र का द्योतक है। 7 स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् २७ अब ग्रन्थकार गौरादिगणगत अनडुह, शब्द पर एक विशेष बात का उल्लेख करते हैं- [लघु०] (गणमूत्रम)-आमनडुह स्त्रिया वा ॥ अनड्वाही, अनडुही । आकृतिगणोऽयम् ।। अर्थ-स्त्रीलिङ्ग में झोप परे रहते अनडुह शब्द को विकल्प से आम का आगम हो जाता है । आकृतिगणोऽयम्-गौरादि आकृतिगण है । व्याख्या-गौरादिगण म 'अनडुही' और 'अनड्वाही' दोनो का उल्लेख है । अनडुह (बैल) शब्द हकारात है अदन्त नही, अत इम से स्त्रीत्व म न तो जातिलक्षण (१२६६) डीप प्राप्त होता था और न ही किमी प्रकार मे ङीप् । गौरादिगण मे पाठ के कारण इम मे डीप हो जाता है-अनडुह +डीप् = अनडुह, +ई = अनडुही (गाय) । गण मे 'अनड्वाही' के भी पाठ के कारण डीप परे रहते इसे आम का आगम भी विकल्प से विधान किया गया प्रतीत होता है । इम मे कौमुदीवार ने प्रकृत गणसूत्र को अहित कर लिया है । आम् के मकार को इत्सज्ञा हो जाती है 'आ' मान शेप रहता है। मिदचोऽन्त्यापर (२४०) के अनुसार आम् का नागम अनह शब्द के अन्त्य अच् उकार से परे होता है। आम के पक्ष म 'अनडु जाह.+ई' इस दशा म इको यणचि (१५) सूत्र में उकार को यण-वकार हो कर विभक्ति लाने से अनड्वाही' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । जिम पक्ष म आम् नही होता वहा केवल डीप ही रहता है-- अनडुहो। गौरादि आकृतिगण है । अथात् स्त्रीत्व की विवक्षा म जहा डोप का विधायक कोई सूत्र न मिले उमे गौरादिया के अन्तर्गत समझ लना चाहिये ।' १ गौरादिगण यथा- गौर । मत्स्य । मनुष्य । शृङ्ग । हय । गवय । मुक्य । ऋष्य । पुट । तूण । द्रुण । द्रोण । हरिण । पटर। उक्ण (उणक इति पाठान्तरम्)। आमलक । बुवल । बदर । बिम्ब । कर्कर । तर्कार । शर्कार । पुष्कर । शिखण्ड (शप्कण्ड इति पाठा- न्तरम्) । सुनन्द । सुषम । सुपव । सलन्द (सलद इति पाठान्तरम्) । अलिन्द । गडुल । पाण्डश । आनन्द । अश्वत्थ । मृपाट । आढक । शकुल । सूम । सुब (सूच इति पाठातरम्)। सूर्य (शूप इति पाठान्तरम्) । शूप । पूप । मूप। (यूष इति पाठान्तरम्)। यूथ । घातक (धातक इति पाठान्तरम्)। सकलूक । सल्लक । मालक । मालत । साल्वक । उभय । भृङ्ग। वेतस । अतस । पृस (बृस इति पाठान्तरम्) । मह । मठ । छेद । श्वन् । तक्षन् । अनडुहो । अनड्वाही । एषण करणे (गणसूत्रम्)। देह । काकादन । गवादन। तेजन । रजन । लवण । पान (यान इति पाठान्तरम्) । मेघ । गौतम । आय स्थूण भौरि (भौरिकि इति पाठान्तरम्)। ।
मोमास्पोका ननिदाना . 1 अब वोदिगेप के वाचको ने बरपयों का विधान है- [लघु०] विधि- (१२५६) वयनि प्रयने ।४॥२०॥ प्रयनवयोवाचिनोदन्तात् स्त्रिया डीप न्वान् । कुमारी ॥ अ-प्रपन वर (आ) ₹ दार मदन प्रातिपदिक ने परे होर अन्तर हो जाता है बीच गे दिवसा में। सास्वा-दानि १ प्रपने 15११॥ (लेमोगरा ने)। प्रत्यय, पररच, प्रातिपदिकात, त्रिपाम्, अन- नद पौने व है। यह प्रातिपदिकात 7 दिपा है इनिये न न नदन्तविधि हो कर उदनगन् प्रातिपदिकात् बन जाता है । 'दानि अपने वे मा दर्नमाना' का यातार किया जाना है। अप -(प्रयने) प्रथम (दानि) दर में (पनंगानन्) ददंगान (डत दन्नान्) अदन्न (प्रातिपदिकात्) प्रातिदिन ने (1) परे (डर) डोर (प्रत्यय) प्रवर हा जाता है (न्त्रियाम् ) बीच की दिक्षा में प्राणिनां काला दस्वादिगंणे दर-प्राणियों की कानन जनस्यापि वचन आदि को र (वयम्) कहते हैं । गुमार निगार आदि मन्द प्राणियों में कालत अदन्या में काम को कहते हैं न ३ प्रपनवोदाचर है। बीन्द को दिनमा में इन से मार डॉर प्रन्यर हो कर कुमार - ही बुनार-ई। अब पनि च (-2) - मानक बबार का लोर हो प्रयना के एरवचन में न आन्दर ला कर उन का हार ग्यो दोघांन मुतिम्पस हल (१७६) ने लोप बग्ने 'नारी' किगंगे' आदि निर हो गड है। वर नीन हते है-त्रांना पावन (उदानी) और पारि (दुढापा) । जनावि म्बी मदिपर को न व मनु न कहा है- पिता रक्षति कामा भनो रक्षनि पौरने । पुरच न्यादिरे मारे, न स्त्री म्दानयनहंनि ।। (मनु.१३) नौनिकि । मौनिन्न । औदनानि । आनिङ्गि। टि । अन् । अनधि । मालक्षिा बारट । टोटन्ट । नाट । लाट हातन (मानन इडि पाटानर) 1 पाइन । पावन । वानरण । शिवरण । अधिकार कहा- पी। प्रत्यवरोहिगी। नदन । गमगलान् महान् (प)। पर । मुन्दर । मष्टर । मन्दल । पट । पिन्ट । कुद (रं इति पासादरम्)। हं। मूदं । पाष्ट (पाद इति पाठानुग्न्)। राष्ट (हान्द)। कदर । कन्दर । ग्दर । दृहत् । नत् । सौधनं । रोहिणी नक्षत्रे (गजनन् । रेदनों नभने (पत्र) 1 दिक्न । निपल । पुप्पन । स्टान्छोपिददने (भद्रा)। मिङ्गल । देर । काव। रिपसादरच (गपत्रम्)-नगे। हटां। गोमादी । रमी । बगैरी । दिदी । कोष्टी । मातामही । पिगहो । गान् ।। बचपन।
स्त्रीप्रन्ययप्रकरणम् २६ कुछ लोग वय के चार भेद करते हैं—बाल्य कौमार, यौवन जोर वार्धक्य । इन सब को देखते हुए वात्तिककार ने इस मूत्र को दयस्यचरमे (वयमि+अचरमे) बनाने की सलाह दी है। उन का तात्पर्य यह है कि चरम गर्यान् अन्यवयोवाची शब्दो को छोड कर अन्य सभी (प्रथम, द्वितीय) वयोवाचको मेम्नीव की विवक्षा में डीप् प्रत्यय करना चाहिये। इम जय के कारण यौवनदयोबाची वयूट और चिरप्ट प्रातिपदिको से भी डीप प्रत्यय हो कर वयूटी चिरण्टी' (नौजवान औरत) प्रयोग सिद्ध हो जाते हैं। 'अचरमे' क्थन के कारण वृद्धा' 'म्यविरा' आदि अन्यवयो- वाचको मे डीप नही होता अजाद्यनष्टाप (१२४६) मे यदन्नलमा टाप ही होता है। यह डीप अदन्न प्रातिपदिका मे ही क्यिा जा सकता है अन्या में नहीं । अन "शिशु' से टीप नही हाता—शिशुरयम्, शिशुरियम् । बालगन्द का पाठ जनादिगण म आया है जत उम में डीप न हो कर टाप् प्रत्यय ही होता है-चाला (लड़की) । इमीप्रकार वत्मा' के विषय में समझना चाहिये । कन्या' शब्द कन्याया कनीन च (१०२१) इस ज्ञापन के कारण टाप् प्रत्ययद्वारा मिद्ध किया जाता है । प्रश्न-यदि प्रयमवयोवाची से टीप होना है तो 'वृद्धा चानो कुमारी वृद्धकुमारी' यहा दीप न हो सकेगा? क्याकि यहा प्रथमवर की ती दान किञ्चित् भी नहीं है कुमारी तो बृद्धा हो चुकी है। १ नूतनजलधररचये गोपवघूटीढुकूलचौराय । तस्मै कृष्णाय नम ससारमहोरहत्य दोजाय ॥ (कारिकादनी १) चिरण्टी तु स्ववासिनी-इत्यमर । स्ववासिन्या चिरण्टी स्याद द्वितीपश्यसि स्त्रियाम् इति स्न । ऊठा जनूडा वा पितृगृहस्थिना युवतिरिति शब्दकल्पद्रुम । चिरिण्टी इत्यपि क्वचिद् । २ वस्तुन वय दा प्रकार का ही है एक उपचयलमा अर्यात् वह दय जिम में शरीरगत धातुओ का उपचय (वधन) होता रहता है। यह दय यौवनान्त रहता है। दूमरा जपत्रय क्षण अर्यात वह वय जिम म शरीरगत धातुओ का ह्रास होता रहता है। आचार्य पाणिनि का यही मन्तव्य प्रतीत होता है। आचार्य ने इमी मन्तव्य को दृष्टि में रखते हुए वसि प्रयमे (१२५६) मूत्र का निर्माण किया है। उन के मत के अनुसार यौवन तक प्रथम वय ही है। न वधूटी, चिरप्टी जादि के लिये पृथर वातित बनाने की आवश्यक्ता ही नहीं रहती, प्रथमदयो- वाचक होने से मूत्रद्वारा ही टीम् सिद्ध हो जाता है । वात्तिा की जावावक्ता तो वय को तीन या चार प्रकार का मानने वालों के मन में ही पटती है । ३ जाने तपसो वीर्य सा वाला परवतीति मे विदितम् । न च निम्नादिव सलिल निवत्तेने मे ततो हृदयम् ।। (शाकुनल ३२) भैमीव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या उत्तर-~~यह प्रयोग साधम्यं के कारण लाक्षणिक है । वृद्धा होती हुई भी वह पुरुषमयोगराहित्य के कारण या मौग्ध्य आदि गुणो के कारण कुमारी (प्रथमवयस्का) के सदृश है। नोट-जिन के श्रवणमात्र से ही वय की प्रतीति होती है वे शब्द ही यहा वयोवाचक समझे जाते हैं। प्रकरणादि के बल से वय की प्रतीति कराने वाले शब्द वयोवाचक नहीं माने जाते । यथा-द्विवर्षा क्त्या, त्रिवर्षा कन्या । यहा 'कन्या' पद के सामीप्य के कारण ही 'वय' की प्रतीति होती है, स्वत नही । क्योकि द्विवर्षा, विवर्षा कोई शाला भी हो सकती है। इसी प्रकार-उत्तानशया बाला (मुह ऊपर कर सोने वाली बच्ची), लोहितपादिका बाला (स्वभावत लाल पैरो वाली वच्ची) जादि मे समझना चाहिये । अब अदन्त द्विगु से स्त्रीत्व की विवक्षा मे डीप का विधान करते हैं- [लघु०] विधि-सूत्रम्- (१२५७) हिगो ।४।१।२१॥ अदन्ताद् द्विगोर्डीप् स्यात् । त्रिलोकी । अजादित्वात्-त्रिफला, ध्यनीका ॥ अयं-अदन्त द्विगुसमास मे स्त्रीत्व की विवक्षा में डीप् प्रत्यय हो । अजादि- त्वात-अजादिगण मे पाठ के कारण टाप हो कर त्रिफला और न्यनीका शब्दो की सिद्धि होती है। व्याख्या-द्विगो ।५।१। डीप् ।१।१। (ऋन्नेम्यो डोप सूत्र से)। अत', प्राति- पदिकात, स्त्रियाम्, प्रत्यय , परश्च - ये सब अधिकृत हैं । 'अत' यह 'द्विगो' का विशेषण है। विशेषण स तदन्तविधि हो कर 'अदन्ताद द्विगो' बन जाता है । अर्थ - (मत = अदन्तात) अदन्त (द्विगो) द्विगु (प्रातिपदिकात्) प्रातिपदिक से परे (डीप्) डीप् प्रत्यय हो जाता है (स्नियाम्) स्त्रीत्व को विवक्षा मे । अकारान्तोत्तरपदो द्विप स्त्रियामिष्ट (वा०) अर्थात् जव समाहार अर्थ मे द्विगुममास किया जाये तथा उस का उत्तरपद अकारान्न शब्द हो तो वह द्विगु स्त्रीलिङ्ग में प्रयुक्त करना अभीष्ट होता है'। तो ऐसी अवस्था में प्रकृतमूत्रद्वारा द्विगुसमास से डीप् प्रत्यय किया जाता है। उदाहरण यथा- त्रयाणा लोकाना समाहार -त्रिलोकी (तीन लोको का समाहार) । यहा 'त्रि आम् + लोक आम्' इस अलौकिकविग्रह मे तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे च (६३६) सूत्र से समाहार अर्थ मे ममास हो कर सत्यापूर्वो द्विगु (६४१) से उस को द्विगुसज्ञा हो जाती है। अब समास मे सुंपो धातु-प्रातिपदिक्यो (७२१) मे सुंपो (दोनो आम् प्रत्ययो) का लुक् हो कर 'विनोक' प्रातिपदिक निष्पन्न हो जाता है । तब अकारान्तो. १ इस तात्तिक का विवेचन समासप्रकरण में इस व्याख्या के चतुर्थभागस्थ (९४३) सूत्र पर विस्तार से किया जा चुका है। वह यहा पुन मननीय है ।
स्नीप्रत्ययप्रकरणम् तरपदो द्विगु स्त्रियामिष्ट (वा०) इम इष्टि से स्त्रीत्व की विवक्षा में टाप् का बाध कर प्रकृत द्विगो (१२५७) सूनद्वारा डीप् प्रत्यय, अनुबन्ध-लोप तथा भमज्ञक अकार का यस्येति च (२३६) मे लोप कर विभक्ति लाने से 'त्रिलोकी' प्रयोग सिद्ध हो जाता है' । इसीप्रकार--- (१) त्रयाणा पादाना समाहार-विपादी। (२) अष्टानाम् अध्यायाना समाहार -अष्टाध्यायी। (३) पञ्चाना वटाना समाहार–पञ्चवटी । (४) चतुर्णा सूत्राणा समाहार -चतु सूत्री। (५) दशाना रथाना समाहार --दशरथी । (६) पञ्चाना पूलाना समाहार-पञ्चपूली (पाच बण्डलो का समूह) । त्रयाणा फलाना समाहार-त्रिफला (हरड, बहेडा और आवला इन तीन फलो का समाहार)। यद्यपि पर भी ममाहार अर्थ मे द्विगुसमास हुआ है और इस का उत्तरपद अकारान्त भी है तथापि इस का अजादिगण मे पाठ मान लेने के कारण प्रकृत द्विगो (१२५७) सूत्र मे डीप न हो कर अजाद्यतष्टाप् (१२४९) मे टाप हो जाता है । इसीतरह-त्रयाणाम् अनीकाना समाहार -~त्र्यनीका सेना (घोडे, हाथी और रथ इन तीन सैन्यदलो का ममाहार अर्थात् सेना) यहा पर भी टाप प्रत्यय समझना चाहिय' । शङ्का-त्रयाणा भुवनाना समाहार–त्रिभुवनम् (तीन भुवनो का ममाहार)। यहा समाहार अर्थ में द्विगुममास किया गया है। इस समास में 'भुवन' यह अकारान्त शब्द उत्तरपद म है। तो भला यहा द्विगो (१२५७) इम प्रकृतसूत्रद्वारा डीप क्यो नहीं होता? समाधान-अकारातोत्तरपदो द्विगु स्त्रियामिष्ट (वा.) इस वात्तिक का एक अपवाद है-पास्नाद्यन्तस्य न (वा०) अर्थात् पात्र आदि शब्द जिस के अन्त में हो ऐसे समाहारद्विगु का स्त्रीलिङ्ग में प्रयोग नहीं होता। पात्रादि को आकृतिगण माना जाता है । जहा जहा शिष्टप्रयोगो मे ममाहारद्विगु से डीप् प्रत्यय का प्रयोग नही देखा जाता वहा के अकारान्त उत्तरपद को वादियो म परिगणित मान लिया जाता "भुवन' शब्द को भी उन पात्रादियो के अनर्गत समझना चाहिये, अत स्त्रीत्व विवक्षिन न होने से यहा डीप नहीं होता । स नपुसकम् (६४३) सूत्रद्वारा नपुसक का ही प्रयोग होता है। । १ यदि त्रिलोको गणनापरा स्यात्तस्या समाप्तिर्यदि नायुष स्यात् । पारेपराधं गणित यदि स्याद् गणेयनि शेषगुणोऽपि स स्यात् ॥ (नैपघ० ३४०) २ जैसाकि वहा है- स्मृत्याजादिगणे युक्ता टाबुत्पत्तिद्विगोरपि । त्र्यनीति गणे कोयं स्यादाकृतिगणो हि स ।
३२ भभोव्याख्ययोपेताया लघुमिद्धान्तकौमुद्या इसीप्रकार- (१) चतुर्णा युगाना ममाहार -चतुर्यगम् । (२) त्रयाणाम् ऊपणाना समाहार.-त्र्यूषणम् (मोठ, काली मिर्च और पोपर)। (३) पचाना पात्राणा समाहार-पञ्चपात्त्रम् । (४) दशाना मूलाना समाहार-दशमूलम् । (५) पञ्चाना लवणाना ममाहार–पञ्चलवणम् । द्विगो (१२५७) मूत्र मे 'अन' को अनुवृत्ति आ रही है इसलिये अनदन्त द्विगु से डीप नहीं होना । यथा--त्रयाणा क्टूना समाहार-त्रिक्टु (कृष्णमरिच, पीपर और मोंठ का समाहार), पञ्चाना धेनूना ममाहार--पन्चधेनु, पञ्चाना कुमारीणा ममाहार.--पञ्चकुमारि । अब अग्रिमभूत्र मे डीप का पुन विधान करने है- [लघु०] विधि-मूत्रम- (१२५८) वर्णादनुदात्तातोपधात् तो न । ।४।१।३६।। वर्णवाचो योऽनुदात्तान्तस्तोपध , तदन्ताद् अनुपमजनात् प्राति- पदिकात् (स्त्रीत्वे) वा डीप तकारम्य नकारादेशश्च । एता, एनी। रोहिता, रोहिणी ।। अर्थ-वर्णवाची (रङ्गवाची) जो अनुदात्तान्त तकारोपध शब्द, तदन्त अनुप- सर्जन प्रातिपदिक से परे स्त्रीत्व को विवक्षा में डीप प्रयय तथा नकार को नकार आदेश-ये दोनो कार्य विकल्प मे हो । व्याख्या--वर्णात् १५॥१॥ अनुदात्तात् ।।११ तोपधात् ।।१॥ त ६॥न ।१।१॥ (नकारादवार उच्चारणार्थ) । डीप ।।१। (ऋन्नेन्यो डोप से)। वा इत्य- व्ययपदम् (मनोरौ वा सूत्र से) । अतः, अनुपसर्जनात्, प्रातिपदिकात्, स्त्रियाम्, प्रत्यय , परश्च-ये सब अधिकृत हैं । समास-त =तकार उपधा यस्य स तोपध , बहुव्रीहि- समाम । न उपमर्जनम् अनुपसर्जनम्, तस्माद् अनुपसर्जनात, नञ्तत्पुरष । 'अनुदात्तात्' तथा 'तोपधात्' ये दोनो 'वर्णात्' के विशेषण हैं । प्रथमविशेषण मे तदन्तदिघि हो कर 'अनुदात्तान्नात् तोपधाद् वर्णान्' बन जाता है। वर्णशब्द में यहा वर्णवावी (लाल, पोले आदि रङ्गो के वाची) शब्दो का ही ग्रह्म अभीष्ट है, 'वर्ण' इस शब्द का नहीं, अन्यथा 'तोपधान्' विशेषण व्यर्थ हो जायेगा । 'वर्षात्' यह 'अदन्तात् प्रातिपदिकात्' का विशेषता है अतः इस मे तदनविधि हो कर 'वर्णवाचिशब्दानाद् अदन्तात् प्रातिपदि- कान्' हो जाना है । 'अनुपमर्जनान्' का सम्बन्ध 'प्रातिपदिकात्' में है। इस प्रकार मूत्र का यह अर्थ निष्पन्न होता है--(अनुदात्तात् = अनुदात्तान्तात्) अनुदात्त जिस के अन्न मे है तथा (तोपधात्) तकार जिम की उपधा है ऐमा (वर्णात) रगदाची जो शब्द, स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् तदन्त' (अनुपसर्जनात्) अनुपसर्जन (अत =अदन्नात प्रातिपदिकात्) अदन्त प्राति- पदिक से परे (स्नियाम्) स्त्रीत्व को विवक्षा में (डीप् प्रत्यय ) डीप् प्रत्यय तथा (त =तकारस्य) वर्णवाचिशब्द के तकार के स्थान पर (न) न् आदेश-ये दोनो कार्य (वा) विकल्प से हो जाते है । सन्नियोगशिष्टाना सह वा प्रवृत्ति सह वा निवृत्ति (१०) इस परिभाषा के अनुसार जहा डीप् होगा वहा पर ही तकार को नकार आदेश होगा । जिस पक्ष मे ङोप न होगा वहा तकार को नकार आदेश भी न होगा। १ तदन्त अर्थात् पूर्वोक्त वर्णवाचक शब्द जिस के अन्त मे हो ऐमा अनुपसर्जन अदन्त प्रातिपदिक । लघुकौमुदीस्थ यह सूत्रार्थ भट्टोजिदीक्षिन को मिद्धान्तकौमुदी से लिया गया है । दीक्षितजी से पूर्व किमी वैयाकरण ने इम सूत्र का ऐमा अर्थ नही किया। स्वय दीक्षितजी ने भी अपनी पूर्वकृति शब्दकौस्तुभ में ऐमा अर्थ नहीं किया। सब वैयाकरण 'अनुपसर्जनात्' को 'वर्णात्' के साथ सम्बद्ध करते चले आ रहे थे। परन्तु दीक्षितजी ने उसे 'वर्णात' के साथ सम्बद्ध न कर तदल अर्थात् वर्णवाचि. शब्दान्त के साथ सम्बद्ध कर दिया है । भट्टोजिदीक्षित ने ऐसा क्यों किया? आइये, इस पर थोडा प्रकाश डालते हैं- पारस्करगृह्यसूत्र आदियो मे चूडाकरणप्रकरण के अन्तगत शल्यक (साही) के परो मे बनी हुई शललोनाम से प्रसिद्ध एक सूची का वर्णन आता है-त्रेण्या शलल्या विनीय केशान्-(पारस्कर० २ १) अर्थात् तीन जगह श्वेतरङ्गवाली शलली- नामक सूची से केशो को- यहा शलली के विशेषण 'न्येणी' शब्द का प्रयोग किया गया है । 'व्येणी' का विग्रह करते हुए गृह्यवृत्तिकार इसे बहुव्रीहि (त्रीणि एतानि यस्या ) मान कर प्रकृतसूत्र से डीप् +नत्व का विधान करते हैं और णत्व को आर्ष मानते हैं। परन्तु बहुव्रीहि मे सव पद उपसर्जन होते हैं अत यहा का ‘एत' शब्द भी उपसर्जन हुआ । अब यदि 'अनुपसर्जनात्' का सम्बन्ध 'वर्णात्' (वर्णवाचिन ) मे करते हैं तो 'एत' से डीप + नत्व नही हो सकता क्योकि वह उपसर्जन है । अत वृत्तिकार की व्याख्या के अनुरोध में उस की व्याख्या को सत्यापित करने के लिये दीक्षितजी ने 'अनुपसजनात' का सम्बन्ध वणवाची मे न कर वर्णवाचिशब्दात प्रातिपदिक से कर दिया है । इस मे वृत्तिकार के मत में कोई दोप नहीं आता, क्योकि वर्णवाची के उपसर्जन होने पर वर्णवाचिशब्दान्त समु- दाय तो अनुपसर्जन है ही। अत त्र्येत' शब्द मे स्त्रीत्व की विवक्षा मे डीप+ नत्व मिद्ध हो जाता है। परन्तु भाप्यमर्मज्ञ नागेशभट्ट का कहना है कि ऐसा मानना महाभाष्य के स्वारस्य में विरद्ध है । गृह्य माण 'वर्णात्' के साथ ही 'अनुपसर्जनात' को सम्बद्ध करना चाहिये । उन का यह भी कहना है कि गृह्यसूत्र के उपर्युक्त 'येणो' शब्द मे बहु- बीहिममास न मान कर 'त्रिषु एणी' इस प्रकार सुप्सुपासमाम मानना उचित है। विशेषजिज्ञासु शेखरद्वय का अवलोकन करें। ल०५० (३) ३४ भैमीव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या वर्ण (रङ्ग) के वाचक शब्द हमेशा दो तरह का अर्थ दिया करते हैं । एक तो वे गुणवाचक हो कर सुफेद, लाल, नीले, पोले आदि रगो को प्रकट करते हैं । दूसरे वे उस उस रङ्ग वाले पदार्थ के भी वाचक होते हैं । यथा---'श्वेत' शब्द जहा श्वेतगुण का वाचक है वहा श्वेतगुणयुक्त पदार्थ का भी वाचक है । गुणवाची होने पर इस का प्रयोग पुलिङ्ग मे तथा गुण वाले पदार्थ का वाचक होने पर इस का प्रयोग विशेष्या- नुसार तीनो लिङ्गो मे होता है । अत एव अमरकोप मे कहा है-गुणे शुक्लादय पसि, गुणिलिङ्गास्तु तद्वति । व्याकरणप्रक्रिया के अनुसार गुणवाचक श्वेत आदि शब्दो से तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुंप् (११८५) सूत्रद्वारा विहित मतुप् प्रत्यय का गुणवचनेभ्यो मतुंपो लुगिष्ट (वा० ६०) इस वात्तिक से लुक् हो जाता है। इस प्रकार गुणवाचक शब्द तत्तद्गुण वाले पदार्थों के भी वाचक हो जाते हैं । तव वे विशेष्यानुसार लिङ्ग को धारण करते हैं । यथा-श्वेत पट , श्वेता शाटिका, श्वेत वस्त्रम् आदि । सूत्र के उदाहरण यथा- 'एत' (चितकबरा, रबिरङ्गा, नाना रङ्गो वाला) शब्द' वर्णवाची है । इस का अन्त्य अकार वर्णाना त-ण-ति-नि-तान्तानाम् (फिट्सूत्र ३३) के अनुसार अनुदात है । इस की उपधा में तकार विद्यमान है । व्यपदेशिवद्भाव से इसे तदन्त भी माना जा सकता है। इस की किसी सूत्र के द्वारा उपसर्जनसञ्ज्ञा भी नहीं की गई है । अत इस अदन्त ‘एत' प्रातिपदिक से स्त्रीत्व की विवक्षा में प्रकृतसूत्र वर्णादनुदात्तातोपधातो न (१२५८) द्वारा डीप् प्रत्यय हो जाता है । ङीप्पक्ष मे तकार को नकार आदेश एव भसज्ञक अकार का लोप कर विभक्ति ताने से 'एनी' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। जिस . १ चित्र किर्मीर-कल्माष-शबलताश्च कर्बुरे-इत्यमर । एतशब्द श्वेतपर्याय इति कल्पसूत्रव्याख्यातारो घूत्तस्वामि-भवस्वामि-हरदत्तप्रभृतयो याशिका इति बाल- मनोरमा । २ अर्थ-जिस वर्णवाची शब्द के अन्त मे त, ण, ति, नि अथवा त् हो उस शब्द का आदि अच् उदात्त हो जाता है । जब किसी पद म एक स्वर उदात्त हो जाता है तब अनुदात्त पदमेकवर्जम् (६ १ १५२) सूत्र से उस पद के शेष सब स्वर अनुदात हो जाते हैं। 'त' गत वाला वर्णवाची यथा-एत , रोहित । 'ण' अन्त वाला वर्णवाची यथा-शोण । 'ति' अन्त वाला वर्णदाची यथा-शिति । 'नि' अन्त वाला वर्णवाची यथा- -पृश्नि । 'त्' अन्त वाला वर्णवाची यथा--पृषत् । इन सब का आदि स्वर उदात्त विधान किया गया है अन शेप सव स्वर अनुदात्त हैं। इस प्रकार ये शब्द अनुदात्तान्त समझने चाहिये । .
म्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् पक्ष मे डीप +नत्व नहीं होता वहा अजाद्यतष्टाप (१२४६) से टाप, अनुबन्धलोप, मवर्णदीर्घ तथा विभक्तिकार्य करने से 'एता' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। इसीप्रकार 'रोहित' (लाल रग वाला) प्रातिपदिक से 'रोहिणी' और 'रोहिता', 'श्येत' (सुफेद रङ्गवाला) प्रातिपदिक से 'श्येनी' और 'श्येता', 'हरित' प्रातिपदिक से 'हरिणी' और 'हरिता' दो दो रूपो की सिद्धि होती है। वर्णवाची शब्द के अन्त मे यदि अनुदात्त न होगा तो प्रकृतसूत्र की प्रवृत्ति न होगी । यथा 'श्वेत' शब्द का अन्त्य अकार घृतादीना च (फ्ट्सूित्र २१)' इस फिट्मूत्र मे उदात्त है अत डीप+मत्व नही होता। अदन्नलक्षण टाप हो कर 'श्वेता' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। वर्णवाचिशब्दान्त प्रातिपदिक अदन्त होना चाहिये तभी प्रकृतसूत्र से डीप+ नत्व की प्रवृत्ति होती है। 'शिति' शब्द धवल-रङ्ग का वाचक है, वर्णाना तणतिनिता- न्तानाम् (फिटसूत्र ३३) के अनुसार अनुदात्तान्त है और तोपध भी। पर अदन्त न हो कर इदन्त है बत प्रकृतसूत्र से डीप् +नत्व नहीं होता । अदन्त न होने से अदन्तलक्षण टापू भी नही होता । स्त्रीत्व में भी वैसे का वैसा रहता है । यथा-शितिर्ब्राह्मणी । अमरकोप मे-अवदात सितो गौर इस प्रकार अवदातशब्द श्वेतार्थक कहा गया है। परन्तु पुयोगादास्यायाम् (४ १४८) सूत्रम्थ महाभाष्य के अनुसार वह स्वच्छ या विशुद्ध अर्थ का ही वाचक है । साधर्म्य के कारण उमे सित या गौर कह दिया जाता है । अत लघावन्ते द्वयोश्च बह्वषो गुरु (फिट्सूत्र ४२) इस फिट्सूत्र से अनुदात्तान्त होते हुए भी वणवाची न होने से इस मे प्रकृतस्न की प्रवृत्ति नहीं होती। अदन्तलक्षण टाप ही होता है-अवदाता कीति । नोट–असित (काला) और पलित (श्वेत) शब्दो से स्त्रीत्व को विवक्षा मे प्रकृतसूत्रद्वारा डीप्+नत्व नही होता-असितपतितयोर्न (वा०) । अत अदन्तलक्षण टाप् हो जाता है-अमिता, पलिता। जिन की उपधा मे तकार नहीं होता ऐसे वर्णवाची अनुदात्तान्त शब्दा से स्त्रीत्व १ अर्थ-घृत आदि शब्दो का अन्त्य स्वर उदात्त होता है। २ अवदाताया डोप प्राप्नोति-अवदाता ब्राह्मणी, वर्णादनुदात्तात्तोपधात्तो न (४ १३६) इति । नप वर्णवाची । किन्तहि विशुद्धवाची । आतश्च विशुद्धवाची- त्रीणि यस्यावदातानि विद्या योनिश्च कर्म च । एतच्छिवे ' विजानीहि ब्राह्मणाश्यस्य लक्षणम् ॥ (महाभाष्य ४१४८) ३ अर्थ-जिसके अन्त मे एक लघु या दो लघु हो, ऐमे बहुत अचो वाले प्रानिपदिक का गुरु उदात्त हो जाता है। ४ अर्य-स्त्रीत्व की विवक्षा में अमित और पलित शब्दों में वर्णादनुदात्तात्तोपघातो न (१२५८) सूत्र द्वारा डीप् + नत्व की प्रवृत्ति नहीं होती।
भैमीव्यास्ययोपेताया लघुमिद्धान्तकौमुद्या की दिदक्षा मै अन्यतो डोम् (४१४०} मूत्रद्वारा दीप् प्रत्यय का विधान दिया जाता है। डीप और डीप करने मे पद के स्वर में ही अन्नर पड जाता है यह हम पीछे बना चुके हैं। कल्माषी, शबली, मारङ्गी । कृष्ण और कपिल शब्द अनुदानान्न नहीं अपितु उदात्तान्न हैं अतः इन से टाप हो होता -कृष्णा कपिला वा गौ। अब उदन्त गुणवाचकों ने स्त्रीत्व को विवक्षा मे डीए का विधान करते हैं- [लघु०] विधि-सूत्रम्- (१२५६) वोतो गुणवचनात् ।४।१।४४॥ उदन्ताद् गुणवाचिनो वा डीप स्यात् । मृट्टी, मृदु ।। अर्थ -हस्व उतारान्न गुणवाची प्रातिपदिक मे स्त्रीत्व की विवक्षा मे दिकल्प मे डोप् प्रत्यय हो। व्यारा-वा इत्यव्ययपदम् । उन १५॥१॥ गुणवचनात् ।।१।। डोप् ।१।१। (अन्यतो डोष सूत्र मे)। प्रातिपदिकात्, स्त्रियाम्, प्रत्यय , परश्च ये सब अधिकृत हैं। यहा मूत्रगत 'गुण' शब्द ने मदे गण (२५) वाला पारिभापिक गुण नहीं लेना चाोि वरन् उन का 'उन' विशेषण मगत न हो सकेगा। गुणम् उक्तवान् इति गुण- वचन", कर्तरि भूते ल्युट । जो शब्द गुण को कह कर न गुणयुक्त द्रव्य को कहता है उमे गुणवचन कहते हैं । तात्पर्य यह है कि गुणविशिष्ट द्रव्य के वाचक को गुणवचन वह्न हैं । मृदु (कोमल), लघु (छोटा), गुर (भारी), पटु (चतुर), साधु (ठीक', युक्न, भला), तनु (पतला) आदि शब्द गुणवचन हैं। उन' यह 'गुणवचनात् प्रातिपदिकात' पा विशेषण है, विशेषण मे तदन्तविधि हो कर 'उदन्ताद् गुणवचनात् प्रातिपदिनात्' १ अर्थ-तकारोपध से भिन्न अन्य वणवाची अनुदात्तान्न प्रातिपदिको से डोप प्रत्यय हो जाता है स्त्रीत्व की विवक्षा में । २ अत्र क्वचिद् डोप इति पाठान्तरमुपलभ्यते । नत्तु अत्रत्य वात्तिर भाप्यचा- थित्योक्न प्रतीयते । तथा चात्र भाष्यम्- गुणवचनाद् डोद आयुदात्तार्य (दा०)। गुणवचनाद् डोब् दक्तव्य । कि प्रयो- जनम् ? सायुदातार्य । आद्यदाता प्रयोजयन्ति । वस्वो । पट्दो । (महाभाष्य ४१४४) वसुपशब्दौ निल्दरेण आधुदात्तौ गुणवचनी । ताभ्या डोपि ईवारोऽनुदात्त' पित्त्वान् । आभ्या यदि डीप स्मात्तदा प्रत्ययम्दरेण टोप वार उदात्त इत्यनिष्ट प्रमज्यत । अन्नोदात्ताद् मृद्वादिशतिपदिकाद् होन्डोपोनास्ति विशेष । उदात्त पणो हत्पूर्वात् (६ १ १६८) इति डोप उदातत्वविधानात् । तस्मादत्र डीपी विधानमेव न्याम्यम् । तथा चोक्न शब्दकौस्तुभे दीक्षित- इद मूत्रमपनीय मनोरो दा (४ १३८) इत्यस्मादनन्तर 'गुणवचनादुत' इति पाठयम् । उत्तरसूत्र तुम्दन्थान एव वाशब्दमम्पिाट्यम्-बबादिम्यो वा इति । तेनाादाने गुणवचनेषु टोपिन्दर निध्याति (शब्दकोन्नुम ४१४४) । 7 स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् बन जाता है । अर्थ -(उन = उदन्तात) उदन्त (गुणवचनात्) गुणवाची (प्रातिपदि- कात) प्रातिपदिक से परे (वा) विकल्प से (डीए) डीप् प्रत्यय हो जाता है (स्त्रियाम्) स्त्रीत्व की विवक्षा म । उदाहरण यथा- 'मृदु' यह उदन्न प्रातिपदिक है जो मृदुत्वविशिष्ट द्रव्य का वाचक होने से गुण- वचन है । इम मे स्त्रीत्व की विवक्षा में प्रकृत वोतो गुणवचनात् (१२५६) सूनद्वारा डीप् प्रत्यय, डीए के अनुव धो का लोप तथा इको यणचि (१५) से उकार को यण् = वकार कर विभक्नि लाने म मृद्वी' प्रयाग मिद्ध हा जाता है। डीए के अभाव मे 'मृदु' ही रहगा । मृद्वीय लता, मृदुरिय लता-दानो तरह से प्रयोग हो सकता है। इसीतरह-तनु' मे तन्वी और तनु , पटु' से पट्वी और पटु, 'गुरु' से गुर्वी और गुरु , 'लघु' मे लध्वी और लघु , 'पृयु' मे पृथ्वी और पृथु , 'साधु' से साध्वी और साधु इत्यादिप्रकारेण प्रयोग जानने चाहिये । खरुसयोगोपचान (वा०)-खरु (मूख, कठार, क्रूर, श्वेत आदि) तथा सयो- गोपध गुणवचनो मे स्त्रीत्व की विवक्षा मे बोतो गुणवचनात् (१२५६) सूत्र की प्रवृत्ति नहीं होती-साह्मणी । सयोगोपध से—पाण्डुरिय लता। उदन्त प्रातिपदिक यदि गुणवाची न होगा तो उस से स्त्रीत्व की विवक्षा म प्रकृतसूत्रद्वारा डीप न होगा। यथा-आखुरियम (यह चुहिया है)। 'आखु' शब्द गुणवाचक नहीं अपितु द्रव्यवाचक है अत उस से स्त्रीत्व मे भी डीप् नही हुआ। विशेष वस्तव्य-इम सूत्र मे 'गुण' से क्या अभिप्रेत है ? इस के लिये महा- भाष्य (४ १ ४४) में एक प्राचीन श्लोक उद्धृत किया गया है- सत्त्वे निविशतेऽपति पृयजातिए दृश्यते । आधेयश्चाऽक्रियाजश्च सोऽसत्त्वप्रकृतिप्रेण ॥ इस श्लोक की खण्डश व्याख्या प्रस्तुत करते हैं- सत्त्वे निविशते-जो पदार्थ केवल सत्त्व (द्रव्य) मे ही निवेश करता या ठह- रता है उमे गुण कहते हैं । इतने क्थन से सत्ता जाति की व्यावृत्ति हो जाती है, सत्ता को गुण नहीं कहा जा सकता ! कारण कि सत्ता केवल द्रव्य मे ही नहीं रहती अपितु द्रव्य, गुण, कर्म तीनो मे रहती है। अच्छा तो द्रव्यत्वजाति केवल द्रव्य में ही रहती है, इस क्षप से वह भी गुण होने लगेगी। इस पर कहत हैं-अपति । अर्थात् गुण पदार्थ द्रव्य मे भी हो जाता है । यथा पक्न पर आम्र में नीलिमा हट कर पीतिमा आ जाती है । पर द्रव्यत्वजानि नो द्रव्य मे नीनो कालो म कभी नहीं हटती, इसलिये द्रव्यत्व- १ शिरोपमुद्री गिरिए प्रपेदे यदा यदा दुखरातानि सीता । तदा तदास्या सदनेष सौख्यलक्षाणि दध्यो गलदभु राम ॥ (साहित्यदर्पणे) २ जो द्रव्य में रहता है, द्रव्य मे हट भी जाता है, नानाविध जातियो मे रहता हुआ उत्पाद्य भी है और अनुत्पाद्य भी, ऐमे द्रव्यभिन्न पदार्थ को गुण कहते हैं ।
भमीव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या जाति को गुण नहीं कहा जा सकता । सत्त्वे निविशतेऽपति-इस लक्षण पर पुन एक शङ्का उत्पन्न होती है कि गोत्वजाति जो गोव्यक्तियो मे तो नित्य विद्यमान रहती है पर अश्व आदियो से व्यावृत्त रहती है तो इस लक्षण के अनुसार वह भी गुण होने लगेगी । इस दोष की निवृत्ति के लिये लक्षण मे जोडते हैं-पृथग्जातिषु दृश्यते । अर्थात् गुण पदार्थ द्रव्य को नाना जातियो में दिखाई देता है । जैसे मेघ मे दीखने वाली नीलिमा तृणादियों में भी देखी जाती है । गोत्वजाति तो द्रव्य की अन्य अश्वत्व आदि जातियो मे नही रहती । इस प्रकार श्लोक के पूर्वार्धोक्त सत्त्वे निविशते पति पृयग्जातिषु दृश्यते इस गुणलक्षण से किसी प्रकार की जाति गुण के अन्तर्गत नही आती । अच्छा । तो इस लक्षण के अनुसार वर्म भी गुण होने लगेगा । मै भी द्रव्यो में स्थित रहता है, उन से हट भी जाता है तथा नानाजातियो मे भी देखा जाता है। इस के परिहार के लिये कहते हैं-आधेयश्चाक्रियाजश्च । अर्थात् गुण-पदार्थ आधेय' (उत्साद्य) भी होता है और अक्रियाज' (अनुत्पाद्य) भी । जैसे घटादिगत रक्तिमादि गुण पाकक्रियाजन्य होने से उत्पाद्य है और आकाश में रहने वाला महत्त्व गुण नित्य होने से अनुत्पाद्य है। परन्तु कर्म तो हमेशा उत्पाद्य ही होता है अत वह गुण न होगा। अच्छा । सत्त्वे निविशतेऽपति पृथग्जातिषु दृश्यते । आधेयश्चाऽक्रियाजश्च इतना कहने पर द्रव्यपदार्थ मे अतिव्याप्ति होगी वह भी गुण कहलाने लगेगा। द्रव्य घटादि अवसवी अपने कपाल आदि द्रव्यरूप अवयवो अवस्थित होता है और असम- वायिकारण सयोग के नाश होते ही उन अवयवो से हट जाता है । घट पट आदि अनेक जातियो में रहता है और यह उत्पाद्य और अनुत्पाद्य दोनो प्रकार का हुआ करता है, घटपटादि अनित्यद्रव्य उत्पाद्य तथा आकाशादि नित्यद्रव्य अनुत्पाद्य हैं । इस के परिहार के लिये कहते हैं-सोऽसत्त्वप्रकृतिर्गुण । गुण असत्त्वप्रकृति अर्थात् द्रव्यस्प नहीं होता । इस प्रकार जातिभिन्न क्रियाभिन्न तथा द्रव्यभिन्न गुण होते हैं यह निर्दोष लक्षण प्राप्त होता है । परन्तु इस लक्षण को अनेक वैयाकरण सर्वथा ठीक नही मानते । उन का क्थन है कि भाष्य में यह एकदेशी की उक्ति है, भाष्यकार का स्वमन्तव्य नही । अत एव भाष्य मे इस कारिका की व्याख्या नही की गई । उन का कयन है कि आकडारादेका सञ्जा (१४१) के भाप्य मे जो गुण का लक्षण किया गया है वही युक्त है । वहा कहा गया है कि समास, कृदन्त, तद्धितान्त, अव्यय, सर्वनाम, जाति, मख्या तथा सज्ञाशब्दो को छोड कर अन्य अर्थवान् शब्द गुणवाचक होते हैं । शेखरकार नागेशभट्ट इसी लक्षण को हो निर्दुष्ट मानते हैं । अव अग्रिमसूत्रद्वारा पुन कोष का वैकल्पिक विधान करते है- १ आधातु योग्य माधेय , उत्पाद्य इत्यर्थः । २ क्रियया जायत इति त्रियाज, न क्रियाज-अत्रियाज । अनुत्पाद्य इत्यथ ।
स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् ३६ । [लघु०] विधि-मूत्रम्- (१२६०) बह्वादिभ्यश्च ।४।११४५।। एभ्यो वा डीप स्यात् । बह्वी । वहु ॥ अर्थ -बहु आदि गण मै पठिन प्रातिपदिको से स्नीत्व की विवक्षा में विकल्प से टीप् प्रत्यय हो। व्याख्या-वह्वादिभ्य ।।३। च इत्यव्ययपदम् । वा इत्यव्ययपदम् (वोतो गुणवचनात् सूत्र से) । डीप् ॥१॥१॥ (अन्यतो डोप मूत्र मे) । प्रातिपदिकात्, स्त्रियाम्, प्रत्यय , परश्च ये मव पीदे से अधिकृत हैं । 'प्रातिपदिकात्' का बहुवचनान्त मे विप- रिणाम हो कर 'प्रातिपदिकेभ्य' बन जाता है । ममास'-बहु (बहुशब्द ) आदिउँपान्ते बहादय तेभ्य = बह्वादिभ्य तदगुणमविज्ञानबहुव्रीमिमास । अर्थ -(बह्वादिभ्य ) बहु आदि (प्रातिपदिकेभ्य ) प्रातिपदिको में परे (वा) विकल्प में (डीए) दीप (प्रत्यय) प्रत्यय हो जाता है (स्त्रियाम्) स्त्रीत्व की विवक्षा में । उदाहरण यथा- बहु (बहुत विपुल) प्रातिपदिक मे स्त्रीत्व की विवक्षा मे बह्वादिभ्यश्च (१२६०) इस प्रकृतसूत्र से दीप प्रत्यय, दकार और पकार अनुवन्धों का लोप एवम् इको यणचि (१५) में उकार को वकार आदेश कर विभक्ति लाने से 'वह्वी' प्रयोग मिद्ध हो जाता है । दीप के अभाव में विभक्ति ला कर 'बहु" ही रहेगा । वह्वी सम्पत्, बहु' मम्पत् । एक्स्य वह्वो जाया भवन्ति, नरस्य बहब सपतय - (ऐत० ब्रा० ३ २३) । अजामेका लोहितशुक्लकृष्णा बह्वो प्रजा सृजमाना सरूपा -(ते० आ० १०१०१)। कुछ लोगो का विचार है कि बहुशब्द गुणवचन है अत' इस से वोतो गुणवच- नात् (१२५६) इस पूर्वसूनद्वारा ही वैकल्पिक टोप सिद्ध था, यहा उस का ग्रहण अगले स्त्र में अनुवृत्ति के लिये ही किया गया है । परन्तु अन्य वैयाकरणो का कहना है कि वहुशब्द बहुगणवतुडति सध्या (१८६) द्वारा सख्यासज्ञक है, सख्याशब्दो को पीछे महाभाष्य-प्रमाणानुसार गुणवचन माना नही गया, इसलिये यहा उस से विधान करना पड़ा है। अव वह्वादिगण के अन्तगत दो गणसूत्रो का उल्लेख करते हैं- [लघु०] (गणमूत्रम् )-कृदिकारादक्तिन । रानी। रात्रि ।। अर्थ---कृत्प्रत्ययसम्बधी इकार, जो किनन् का अवयव न हो, तदन्न प्राति- पदिक से स्त्रीत्व की विवक्षा मे विकल्प से डोष् प्रत्यय हो जाता है । व्याख्या वृदिकारात् ।।१॥ अक्तिन ।।१। प्रातिपदिकात्, स्त्रियाम्, प्रत्यय , पररच-ये सब पूर्वत अधिकृत हैं । यह वह्वादिभ्यश्च (१२६०) मूत्रस्य वह्वादिगण का एक गणसूत्र है अतवैकल्पिक डोप का विधान करता है । कृत इकार वृदिकार., तस्मात् =कृदिकारात, पप्ठीतत्पुरुष । न निन् अनिन्, तस्माद् अक्तिन', नतत्पुरष । ये दोनो समस्त पद 'प्रानिपदिकात्' के विशेषण हैं । अर्थ-(दिकारात्) कृत् प्रत्यय का ४० भैमीव्यास्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या - - जो इकार तदन्न (अक्तिन) सिन्भिन्नप्रत्ययान्त (प्रातिपदिकात्) प्रातिपदिक में (स्त्रियाम्) स्त्रीत्व की विवक्षा मे (वा) विकल्प मे (टीप) ङीप् प्रत्यय हो जाता है। उदाहरण यथा- रात्रि (रात) शब्द रा दाने (अदा० परस्मै०) धातु मे राशदिन्या विम् (उपादि० ४६७) इस औषादिक्सूत्रद्वारा निप् प्रत्यय करने मे सिद्ध होता है । इसके अन्त मे कृत्सज्ञक त्रिप् प्रत्यय का इकार मौजूद है, विञ्च इम के अन्त मे कितन् प्रत्यय भी नहीं है अत स्त्रीत्व की विवक्षा मे बह्वादिभ्यश्च (१२६०) इस गणस्थ के कृदि- कारादक्तिन इस गणसूत्र से वैकल्पिक डोष प्रत्यय हो जाता है। डीपक्ष में यस्येति च (२३६) सूत्रद्वारा भसज्ञक इकार का लोप कर विभक्तिकार्य करत मे रात्री' प्रयाग सिद्ध जाता है। होप के अभाव मे 'रात्रि' रहेगा। इमीप्रकार-- राजी, राजि. (पक्ति)। वापी, वापि (दावडी)। ओपधी, ओपधि (वन- स्पति)। दर्वी, दवि (क्डुछो)। धरणी, धरणि (पृथ्वी) । भूमी, भूमि । श्रेणी, श्रेणि (पक्ति)। श्रोणी, श्रोणि (कमर) । रजनी, रजनि (रात)। धमनी, घमनि (नाडी)। अवनी, अवनि (पृथ्वी) । खनी, खनि (मान)। तमी, नमि (अधैर्ग रात) । इत्यादिप्रयोग जानने चाहिये । 'अक्तिन' क्थन के कारण-कृति , स्तुति मनि', नीति , रीति इत्यादिया म इस डीप की प्रवृत्ति नहीं होती। अब दूसरे गणसूत्र को निर्दिष्ट करते है- [लघु०] (गणसूत्रम्)-सर्वतोऽक्तिन्नादित्येके ।। शकटी। शकटि ॥ अर्य-कई आचार्यों का मत है वि क्तिन्नर्यक्प्रत्ययान्तों में भिन्न किसी भी इदन्त प्रातिपदिक मे स्त्रीत्व की विवक्षा मे विकल्प से झोप प्रत्यय हो जाता है। व्याख्या-मवंत इत्यव्ययपदम् (पन्चम्यर्थे सार्वविभक्तिस्तमि)। अक्ति- न्नर्थात ।।१। 'इनि' इत्यव्ययपदम् । एके ।११३। यह गणमूत्र पूर्वोक्न गणसूत्र को लक्ष्य म रख कर बनाया गया है । ममास-क्तिनोर्थो यस्य स =स्तिन्नयं, व्यधिकरणबह- बीहि । न क्लिन्नर्थ =अक्निन्नर्थ , तस्मात् अक्तिन्नात्, नञ्तत्पुरुष । यह 'प्रानि- पदिकात्' का विशेषण है बत तदन्तविधि हो कर 'क्निन्नयंभिन्नप्रत्ययान्ताद् इदन्त- प्रातिपदिकात्' ऐसा उपलब्ध हो जाता है । अर्थ--(अस्तिन्नर्यान्) क्तिन्नयंकप्रत्ययान्ता मे भिन्न (मर्वत ) सव तरह के' (इन = इदन्तात्) इदन्न (प्रातिपदिकात्) प्रातिपदिक से (स्त्रियाम्) स्त्रीत्व को विवक्षा में (वा) विकल्प से (ओ) डीप् प्रत्यय हो जाता है (इनि) ऐसा (एक) कई आचार्य कहते हैं। यह गणसूत्र पूर्वगणमूत्र से दो बातों में अधिक व्यापक है- १ मर्वन = सब तरह का । अर्यात इकार चाहे कृत् का हो या अत् का।
- स्त्रीप्रन्ययप्रकरणम् [१] पूर्वगणसून म केवल कृत्सम्बन्धी इकारात प्रातिपदिको से ही दीप का वैकल्पिर विधान किया गया था। परन्तु इस मे कृत् या अकृत् किमी में भी सम्बद्ध इकारान्त प्रातिपदिक से डीप का वैकल्पिक विधान किया जा रहा है। यथा 'शकटि' (छोटा छकडा) शब्द अव्युत्पन्न प्रातिपदिक है। इस के अन्त में न तो क्तिन् प्रत्यय है और न ही सिन्नर्थक कोई अन्य प्रत्यय, अत स्त्रीत्व को विवक्षा म सर्व- तोऽक्तिन्नर्यादित्येके इस प्रकृतगणमूत्र से दीप् प्रत्यय विकल्प से हो जाता है । दीप्पक्ष में भसज्ञक इकार का यस्येति च (२३६) से लोप कर विभक्ति लाने से 'शक्टी' एव दीप के अभाव मे 'शकटि' ये दो प्रयोग सिद्ध हो जाते हैं। [२] पूर्वगणसूत्र में केवल किन प्रन्ययान्ता मे ही डीप का निषेध किया गया था परन्तु इम मे निन्नर्थक किसी भी प्रन्यय के करने पर इदन्त मे डीप का निषेध कहा गया है। पूर्वोक्त कृति , स्तुति , मनि आदि तो इस वे प्रत्युदाहरण हैं ही, किन्तु अजननि , अवरणि इत्यादि क्तिन्नथक्-अनिप्रत्ययान्तो (३ ३ ११२) मे भी डीए का निषेध सिद्ध हो जाता है । वह्वादिगण के कुछ अन्य उदाहरण यथा-- (१) पद्धति --पद्धती, पद्धति (पगडण्डी, माग)। (२) अहनि-अह्नी, अहति (दान, कष्ट, रोग)। (३) वहति—वहती, वहति (नदी)। (४) शक्नि--शक्ती, शक्ति (बरछी)। (५) अहि-जही, अहि (सर्पिणी)। (६) कपि-कपी, कपि (वानरी) । १ स्त्रिया क्तिन् (३ ३ ६४) के अधिकार म यह सूत्र पढा गया है- आक्रोशे नश्यनि- (३ ३ ११२) । अर्थ-आक्रोश गम्यमान हो तो नन के उपपद रहते स्त्रीत्व की विवक्षा मे धातु से भाव आदि म कृत्सज्ञक 'अनि' प्रत्यय हो जाता है । यथा-जनी प्रादुर्भाव (दिवा० आत्मने०) मे- अजननि , डुकर करणे (तना० उभय०) से-अकरणि । न लोपो नत्र (९४७) से नन के नकार का लोप हो जाता । अजननिस्ते शठ । भूयात् (रे दुष्ट | तेरा जन्म न रहे अर्थात् तू मर जाये) । अकरणिस्ते दुष्ट । भूयात् (ऐ दुष्ट । तेरी करनी का नाश हो)। २ पादाभ्या हन्यत इति पद्धति । हन्धातो वर्मणि क्लिनि धातो कारलोपे, समासे मुंब्लुपि हिम-काषि-हतिषु च (६ ३ ५३) इति पादम्य पदादेशे स्पसिद्धि । क्तिन्नन्त से गणसूत्रो द्वारा डीए का निषेध कहा गया है परन्तु गण मे पाठमामर्थ्य स यहा डोप हो जाता है, निषेध नहीं होता । ३ शक्ति शस्त्रे-इस गणसून से शस्त्र (वरठी) अर्थ में इम का वह्वादिगण में पाठ माना गया है अन्यत्र नही । अत' मामर्थ्यवाची शक्तिशब्द से झोप न होगा। यथा-शक्ति (सामर्थ्यम्) । .
४२ भमीव्याख्ययोपताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या (७) यष्टि-यष्टी, यष्टि (छडी) । (5) मुनि-मुनी, मुनि (वानप्रस्थ स्त्री)। (E) चण्ड-चण्डी, चण्डा (अत्यन्त कोपशीला) । (१०) पुराण-पुराणी, पुराणा (पुरानी)। (११) चन्द्रभाग-चन्द्रभागी, चन्द्रभागा (चिनाब नदी)। (१२) विकट-विकटी, विक्टा (विकराल, विशाल)। (१३) विशाल-विशाली, विशाला। (१४) कृपाण-कृपाणी, कृपाणा । (१५) क्ल्याण-कल्याणी, कल्याणा। विशेष जिज्ञासु वह्वादिगण का अवलोकन करें।' अब पुयोग में स्त्रीप्रत्ययो का विधान करते है- [लघु०] विधि-सूत्रम् ---(१२६१) पुंयोगादाख्यायाम् ।४।१।४८ ।। या पुमाख्या पुयोगात् स्त्रिया वर्तते ततो डीए । गोपस्य स्त्री गोपी ॥ . - अर्य --पुरुष के साथ सम्बन्ध के कारण जब पुवाचक शब्द स्त्रीलिङ्ग में प्रयुक्त हो तो उस अदन्त प्रातिपदिक से परे डीप प्रत्यय होता है । व्याख्या-पुयोगात ।।१३ आख्यायाम् ।७।१। (छन्दोवत् सूत्राणि भवन्ति- इति पञ्चम्यर्थे सप्तमी)। डीप् ।१।१। (अन्यतो डीप सूत्र मे)। स्त्रियाम्, अत , प्रातिपदिकात्, प्रत्यय , परश्च-ये सब पूर्वत अधिकृत हैं । समास -पुमो योग पुयोग , तस्मात्पुयोगात, षष्ठीतत्पुरुष । विभाषा गुणेऽस्त्रियाम् (२ ३ २५) इति हेतो पञ्चमी । आख्यायते बोध्यतेऽर्थोऽनयेति आख्या, आतश्चोपसर्गे (३३ १०६) इत्यड़ा- प्रत्यय । वाचक शब्द इत्यर्थ । कस्य वाचक इत्याकाङ्क्षायाम् 'पुयोगाद्' इत्युपस्थित- त्वात् पुस इति लभ्यते तेन पुसि प्रसिद्धात् शब्दादिति गम्यते । अर्थ-(पुयोगात्) पुरुष के सम्बध के कारण जब (स्त्रियाम्) स्त्रीलिङ्ग मे (पुस आख्याया) पुरष वाचक शब्द प्रयुक्त होता है तो उस (अत =अदन्तात्) अदन्त (प्रातिपदिकात्) प्रातिपदिक से परे १ बह्वादिगण यथा-बहु । पद्धति । अञ्चति । अङ्कति । अहति । शकटि । शक्ति शस्त्रे (गणसूत्रम्) । शारि। वारि । राति । राधि (शाधि)। अहि । कपि । यष्टि । मुनि। इत प्राण्यङ्गात् (गणसूत्रम्) । कृतिकारादक्तिन (गणसूत्रम्)। सर्वतोऽक्तिन्नादित्येके (गणसूत्रम्)। चण्ड । अराल । कृपण (कृपाण) । कमल । विक्ट । विशाल । विशङ्कट । भरुज । ध्वज । चद्रभागा नद्याम् (चन्द्रभागा नद्याम्-गणसूत्रम्) । कल्याण । उदार । पुराण । अहन् । गोड । नख । खुर । शिखा । बाल । शफ । गुद । आकृतिगणोऽयम् । तेन भग, गल, राग इत्यादि। इति बह्वादय । [यह गण शोधनापेक्ष है] । ।
स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् ४३ (डीप् प्रत्यय) डीप् प्रत्यय हो जाता है । अभिप्राय यह ह कि पुलिङ्ग के लिये प्रयुक्त होने वाला अदन्त प्रातिपदिक यदि पतिपत्नीभावमम्वन्ध के कारण स्त्री के लिये भी प्रयुक्त होने लगे तो उस से डीप् प्रत्यय हो जाता है । जैसे हिन्दी म चौधरी की स्त्री को चौधरायन, पण्डित की स्त्री को पण्डिातायन या पण्डिनानी आदि कहा जाता है वैसे सस्कृत में भी इस प्रकार के प्रयोग दीप् प्रत्यय लगा कर स्त्रीलिङ्ग में प्रयुक्त होते हैं। उदाहरण यथा- गोपस्य स्त्री (पत्नी)-गोपी (गोप अर्थात् ग्वाले की पत्नी') । गोपशब्द गौओ का पालन करने के कारण मुख्यतया पुलिङ्ग है। पतिपत्नीभावसम्बन्ध के कारण इस का प्रयोग स्त्रीलिङ्ग में भी होता है । तब इस से पुयोगादास्यायाम् (१२६१) इस प्रकृतसूत्रद्वारा डीप (ई) प्रत्यय होकर भमज्ञा अकार का लोप एव विभक्निकार्य करने से 'गोपी' (ग्वालिन) प्रयोग सिद्ध हो जाता है। इमीप्रकार—गणस्य पत्नी गणकी (ज्यातिविद् की पत्नी), महापात्रस्य पत्नी महापानी (प्रधानमन्त्री को पत्नी), गिरिशम्य पली गिरिशी (शिव की पत्नी, पार्वती)। इत्यादि। सूत्र में 'पयोगात्' इस लिये कहा है कि 'देवदत्ता' मे डीप न हा जाये । यहा किमी स्त्री का दवदत्ता' यह स्वत नाम है पुयोग के कारण नहो । 'आख्या' ग्रहण इमलिये किया है कि वह शब्द पुरुषवाचक होना चाह्येि अन्यया डोप न होगा। यथा- प्रसूता (प्रसूत हुई औरत)। यहा यद्यपि प्रसव पुयोग के कारण हुआ है तथापि वह पुमाख्या नहीं। किञ्च इस सूत्र में 'अन' का अनुवर्तन होने से बदन्त प्रातिपदिक से ही इस सूत्र की प्रवृत्ति होती है, इसलिये सहिष्णोर्भायों सहिष्णु । यहा उकारान्त 'सहिष्णु' शब्द मे दीप नही होता। विशेष वक्तव्य-पुयोग = पुरुषसम्बध से यहा केवल दाम्पत्यसम्बन्ध (पति- पत्नीभावसम्बन्ध) ही नहीं समझना चाहिये अपितु पितापुत्रीभाव आदि अन्य सम्बन्ध भी ग्रहण किये जा सकते हैं - ऐसा प्रौढमनोरमा मे भट्टोजिदीक्षित तथा तत्त्वबोधिनी मे ज्ञानेन्द्रसरस्वती का कथन हे । प्रक्रियासर्वस्वकार ने भी यहा स्पष्ट कहा है- क्वचिपुत्र्यामपि हर पृयोगे डीपमिच्छति । केक्यो वेश्यसुता देवको देवात्मजा ॥ अत एव भट्टिकाव्य मे- कौसल्ययाऽसावि सुखेन राम प्रायोतो भरतस्ततोऽभूत् । (भट्टि० ११४) १ गा पाति (रक्षति) इत्यर्ये आतोऽनुपसर्ग क (७६१) इति क्प्रत्यये, उपपदसमासे 'गोप' इति । तस्य स्त्रिया यदि गोपशब्दो लक्षणया वर्तते तदा डोप् । २ यदि स्त्री, पति के कारण 'गोप' न हो कर स्वय गौओ का पालन करने के कारण 'गोप' होगी तब ही न हो कर अदन्नलक्षण टा होगा-गोपा।
भैमीव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या 'कैकयीन' यह प्रयोग उपपन्न हो जाता है । तथाहि-कैकयदेश का राजा भी केकय कहलायेगा । 'वेकयस्य दुहिता' इस अर्थ मे पुयोग (पितापुत्रीभावसम्बन्ध) के कारण पुयोगादास्यायाम (१२६१) सूत्र से डीप् प्रत्यय होकर 'केकयो' प्रयोग निष्पन्न होता है। अन्यथा-कियस्यापत्य स्त्री' इस अर्थ मे जनपदशब्दात् क्षत्रियादर (१०२८) से अपत्यार्थ मे अन् प्रत्यय हो कर केकय-मित्रयु-प्रलयाना यादेरिय (७ ३ २) सूत्रद्वारा 'य' को 'इय' आदेश, गुण, आदिवृद्धि एव भसज्ञक अकार का लोप करने पर 'कैकेयी' रूप बनता' । इसीप्रकार-देवकस्य दुहिता देवकी, रेवतस्य सुता रेवती आदि मे पिनापुत्रीभावसम्ब धरूप पुयोग मे डीप समझना चाहिये । भगिनी म्रातृभाव- सम्बन्धरूप पुयोग में भी यह डोप देखा जाता है । यथा--श्यालस्य भगिनी श्याली, यमस्य भगिनी यमी। परन्तु महाभाष्य के ममवित् नागेशभट्ट इस से सहमत नही। उन का यह मन्तव्य है कि पुयोग से दाम्पत्यरूपसम्बन्ध का ही ग्रहण करना उचित है, क्योकि- यथवासावकुर्वतो किञ्चित्पाप भर्तृ कृतान् वधबन्धनादीन् क्लेशान् लभते एव- शब्दमपि लभते (महाभाष्य ४ १४८)--भाष्य के इस उद्धरण से दाम्पत्यरूपसम्बध की ही प्रतीति स्पष्ट होती है। बेकयी, देवकी, रेवती आदि प्रयोग गौरादिगण को आकृतिगण मान कर डीप् करने से सिद्ध करने चाहिये । यहा पर शेखरद्वय द्रष्टव्य हैं। अब अग्रिमवात्तिकद्वारा पुयोग मे पालकान्त शब्दो से स्त्रीत्व की विवक्षा म डोष का निषेध करते हैं- [लघु०]वा--(१०२) पालकान्तान्न ॥ गोपालिका । अश्वपालिका ।। अर्थ-पालक' शब्द जिस के अन्त मे हो ऐसे प्रातिपदिक से स्त्रीत्व की विवक्षा मे पुयोग मे डीप् प्रत्यय नहीं होता। ध्याख्या-पालकान्तात् ।।१।न इत्यव्ययपदम् । यह वार्तिक महाभाष्य मे पुयोगादास्यायाम् (१२६१) सूत्र पर पढ़ा गया है अत इस निषेध को तद्विपयक ही समझना चाहिये । पालकशब्दोऽन्त. (अन्तावयव ) यस्य स पालकान्त , तस्मात् =पाल कान्तात् । वहुव्रीहिसमास । पालक-अन्त वाले शब्द गोपालक', अश्वपालक, पशुपालक, प्रजापालक आदि होते है। १ न च अत्र अतश्च (४ ११७५) इति स्निया लुक् स्यादिति वाच्यम्, क्यिशब्दस्य भर्गादौ पाठेन न प्राच्य-भर्गादि-यौधेयादिभ्य (४११७६) इति लुको निषेधात् । २ अत्र पालयतीति पालक (बुलि वोरकादेश , णिलोपश्च), गवा (कर्मणि पष्ठी) पालक गोपालक इत्येव समासो नैद कार्य , तुजकाभ्या कर्तरि (२२१५) इति समासनिषेधप्रसङ्गात् । शेषषष्ठया समासश्चेत्तदपि न, तथा सति टाप सुंप स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् गोपालकस्य स्त्री (भार्या, पत्नी)-गोपालिका (गोपालक अर्थात् ग्वाले की पली) । 'गोपालक' शब्द म पुयोग मे स्वीत्व की विवक्षा मे पुयोगादात्यायाम् (१२६१) मूनद्वारा डोप प्रत्यय प्राप्त होता है, परन्तु अन्त मे पालक्शन्द होने के कारण प्रकृत- वात्तिक पालकान्तान्न (वा० १०२) मे उस का निषेध हो जाता है। अब अजा- द्यतप्टाप् (१२४६) से अदन्तलक्षण टाप, अनुवन्धो का लोप, वक्ष्यमाण प्रत्ययस्थात कात्पूर्वस्यात इदाप्यसुप (१२६२) स्त्र से ककार से पूर्व अकार को इवार आदेश, सवर्णदीघ एव विभक्तिकार्य करने पर 'गोपालिका प्रयोग सिद्ध हो जाता है । इमोपकार- अश्वपालकस्य भार्या-अश्वपालिका । पशुपालकस्य स्त्री-पशु- पालिका । द्वारपालकस्य स्त्रीद्वारपालिका । भूपालकस्य पली- भूपालिका । इत्यादि प्रयोग जानने चाहिये। गोपालकशब्द से टाप् प्रत्यय करने पर 'गोपालर+आ' इस स्थिति मे इत्व- विधायकसूत्र का निर्देश करते हैं--- [लघु०] विधि-सूत्रम्- (१२६२) प्रत्ययस्थात् कात् पूर्वस्यात इदाप्यमुंप ७।३।४४॥ प्रत्ययस्थात् कात् पूर्वस्याकारम्य इकार स्याद् आपि, स आप् सुंप परो न चेत् । सविका । कारिका । अत किम् ? नौका । प्रत्ययस्थात् किम् ? शक्नोतोति शका । असुप किम् ? बहुपरिव्राजका नगरी॥ अर्थ-प्रत्यय मे स्थित क्वार से पूव ह्रस्व अकार के स्थान पर ह्रस्व इकार आदेश हो यदि आप (टाप्, डाप्, चाप्) प्रत्यय परे हा नो परन्तु वह आप संप से परे नहीं होना चाोि । व्याख्या-इस सूत्र में सात पद हैं-प्रत्ययस्थात् ।।१॥ कात् ।।१। (क्का- रादकार उन्चारणार्थ) । पूर्वस्य ।६।१। अत १६।१। इत् ।११। आपि ।७।११ अमुंप परत्वेन प्रत्ययस्यात् कात्पूर्वस्यात इदाप्यतुंप (१२६२) इत्यनेन इत्त्वस्य दुर्लभ- त्वात् । अतोत्रंथम्प्रक्रियाऽवसेया- गा पालयतीति विग्रहे कर्मण्यण (७६०) इत्यण्प्रत्यये, गेरनिटि (५२६) इति लोपे, उपपदसमामे च कृते 'गोपाल' इति निष्पग्रते । तन -गोपाल एवं गोपा- लक , स्वार्थे क । गोपालस्य स्त्रीति पुयोगे डीपि प्राप्ने प्रकृतवात्तिकेन तन्निपेधे, टापि, अनुबन्धलोपे, प्रत्ययस्थात्कारपूर्वस्पात इदाप्यप (१२६२) इति लकारी- त्तरस्य अकारस्य इत्त्वे, मवणदीर्घ, विभक्तिकार्ये च कृते 'गोपालिका' इति रूप साधु। १ हिन्दी मे नगरपालिका (Municipality) शब्द आजक्ल प्रसिद्ध हो चला है । इस में पुयोग जैसी कोई विवक्षा नही। केवल स्त्रीत्व के योग्य म टाप् प्रत्यय करने मे उसे भी सस्कृतशब्द बनाया जा सकता है ।
भमोव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या 1५।१। समाम -प्रत्यये तिष्ठनीति प्रत्ययस्थ, तस्मात् प्रत्ययस्थात्, सुपि स्य (३२४) इति कप्रत्यये आतो लोपे (४८९) उपपदसमास । न सुंम् असुप्, तस्मात् असुंप', नञ्तत्पुरुष । प्रसज्यप्रतिषेधोऽयम् । अर्थ-(प्रत्ययस्थात्) प्रत्यय मे स्थित (कात्) क से (पूर्वस्य) पूर्व (अत ) ह्रस्व अकार के स्थान पर (इत्) ह्रस्व इकार आदेश हो जाता है (आपि) आप् प्रत्यय परे हो तो, परन्तु वह आप् प्रत्यय (असुप) सुप् से परे नहीं होना चाहिये । उदाहरण यथा- 'गोपालक+आ' यहा 'गोपालक' मे पूर्वोक्तप्रकारेण कन् प्रत्यय किया गया था अत' प्रत्यय के प्रकार से पूर्व लकारोत्तर अत् को प्रकृत प्रत्ययस्थात्कात्पूर्वस्यात इदा. प्यतुंप (१२६२) सूत्र से ह्रस्व इकार आदेश हो जायेगा, आप परे है ही । पुन सवण- दीर्घ कर विभक्ति लाने से 'गोपालिका प्रयोग सिद्ध हो जायेगा । इस सूत्र के अन्य उदाहरण यथा-- सर्विका (अज्ञात सब स्त्रीसमूह)। 'सर्व'प्रातिपदिक से स्त्रीत्व की विवक्षा में अदन्त होने से अजाद्यतप्टाप् (१२४६) से टाप (आ) प्रत्यय कर सवर्णदीर्घ करने मे 'सर्वां' शब्द निष्पन्न हो जाता है। यहा सवर्णदीर्घ एकादेश को अन्तादिवच्च (४१) सूत्रद्वारा पूर्वान्तवत् मान कर 'सर्वा' की सर्वादीनि सर्वनामानि (१५१) मे सर्वनाम- सञ्ज्ञा बनी रहती है । अव अज्ञात आदि अर्थो मे इस सर्वनाम को टि से पूर्व अध्यय- सर्वनाम्नामाच् प्राक्टे (१२३३) सूत्र से अच् प्रत्यय करने मे-सर्व अच आ= सर्व, अक् आ='सर्वका' इस स्थिति मे आप् (टाप) के परे रहते प्रकृत प्रत्ययस्थात् कात्पूर्वस्यात इदाप्यसुंप (१२६२) सूत्रद्वारा अच् प्रत्यय के ककार से पूर्व अकार को इकार आदेश कर विभक्तिकार्य करने से 'सर्विका प्रयोग सिद्ध हो जाता है । कारिका (क्रोति या स्त्री सा कारिका, करने वाली)। डुन करणे (तना० उभय०) धातु मे कर्तृकारक मे ण्वस्तृचौ (७८४) सूत्र से ण्वुल (बु) प्रत्यय, युवोरनाको (७८५) से 'वु' को 'अ' आदेश एवम् अचो णिति (१८२) से ऋवार को वृद्धि (आर) आदेश कर-'कारक' प्रातिपदिक निष्पन्न होता है । अब स्त्रीत्व की विवक्षा मे बदन्त होने के कारण इस से अजाद्यतष्टाप् (१२४६) से टाप् (आ) प्रत्यय हो जाता है । आप के परे रहते प्रत्यय के ककार से पूर्व अकार को प्रकृत प्रत्ययस्थाकात्पूर्वस्यात इदाप्यसूप (१२६२) सूत्र मे इकार जादेश हो कर विभक्तिकार्य करने मे 'कारिका' प्रयोग मिद्ध हो जाता है। इसीप्रकार-अध्यापिका, तारिका, हारिका, धारिका, परित्राजिका, शायिका, नायिका, गायिका आदियों में इत्त्व की निष्पत्ति समझनी चाहिये।' १ प्रत्ययस्य सार यहा दो प्रकार का गृहीत होता है। एक-प्रत्यय के अन्त में स्थित, तथा दूसरा प्रत्यय के उपान्त (अन्त से पूर्व) मे स्थित । अकंच (अव) मे क्कार प्रत्यय के अन्त में स्थित है। वु (अ), कन (क) आदि मे उपान्त मे स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् अव ग्रन्थकार प्रत्युदाहरणो के द्वारा इस सूत्र के अर्थ को हृदयङ्गम कराते हैं- अत किम् ? नौका । प्रत्ययस्थ क्कार से पूर्व अत् (ह्रस्व अकार) को ही इशारादेश होता है अन्य क्सिी वर्ण को नहीं। यथा-नौ (नाव) शब्द से स्वार्थ मे 'क' प्रत्यय हो कर स्त्रीत्व को विवक्षा मे अदन्तलक्षण टाप् (आ) करने पर 'नौका' शब्द निष्पन्न होता है। इस में प्रत्यय के क्कार से पूर्व अत् नही अपितु औकार है, इसलिये इसे इकार आदेश नही होता । इसीप्रकार-राका, कटुका, गोका आदि मे समझना चाहिये । प्रत्ययस्थात् किम् ? शक्नोतीति शमा । ककार भी यदि प्रत्यय मे स्थित होगा तभी उस से पूर्व जत् को इकार होगा, अन्यथा नही । यथा-शक् [शक्ल शक्ती, स्वा० परस्मै०] धातु मे वर्तृ. कारक में नन्दि-ग्रहि-पचादिभ्यो ल्युणियच (७८६) मूनद्वारा पचादित्वात् अच् (अ) प्रत्यय कर स्त्रीत्व की विवक्षा मे टाप, सवर्णदीर्घ एव विभक्निकार्य करने से 'शका' (शक्नोतीति शका, समय स्त्री) प्रयोग सिद्ध हो जाता है । यहा आप के परे रहते भी कार से पूर्व शकारोत्तर अत को इकार आदेश नहीं होता। कारण कि क्कार प्रत्यय मे स्थित नही, वह तो शक् धातु का अवयव है । असुप किम् ? बहुपरिव्राजका नगरी। आप् प्रत्यय यदि सुप मे परे होगा तो इस सूत्र की प्रवृत्ति न होगी। यथा- वहव परिव्राजका यम्या सा बहुपरिव्राजका नगरी (बहुत मन्यासियो वाली नगरी) । यहा अनेकमन्यपदायें (९६६) मे 'बहु' और 'परिव्राजक" पदो का बहुव्रीलिमास हुजा है। विद्यमान है। इन दो प्रकारों को समझाने के लिये ही मूल मे दो उदाहरण दिये गये हैं। पहला 'मविका' उदाहरण अन्न मे कार का तथा दूसरा 'कारिका' उदा- हरण उपान्त्य क्वार का है । इन के अतिरिक्त यदि प्रत्यय मे कही अन्यत्र क्वार मिलेगा तो उम का इस मूत्र मे ग्रहण न होने से उस से पूर्व अत् को इत्त्व न होगा। यथा-पुत्रकाम्य+टाप-पुत्रकाम्य+ना=पुत्रकाम्या । यहा काम्यच् प्रत्यय म स्थित कार न तो प्रत्यय के अन्त मे है और न ही उपाल मे, अत प्रकृतसून- द्वारा इत्त्व नहीं होता। इसीप्रकार-रथाना समूह -रथकट्या। यहा तस्य समूह (४२ ३६) के अर्थ मे रथशब्द से इनि-त्र-क्टयचश्च (४२५०) मूनद्वारा क्यच् (क्टय) प्रत्यय कर म्नीत्व की विवक्षा मे टाप् लाने पर 'रथक्टय+ आ' इस स्थिति मे क्टचप्रत्यय मे क्वार न तो अन्न मे स्थित है और न हौ उपान्त में, अत यहा प्रकृतसून मे इत्त्व नहीं होता । केवल सवर्णदीर्घ हो कर विभक्ति लाने से 'रथस्ट्या' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । इस मव की उपपत्ति के लिये आक्रग्रन्थो का जवलोकन करें। १ परिपूर्वाद् व्रजेवुल, वोरखादेश । अत उपधाया (४५५) इत्युपधावृद्धि।
४८ भेमोव्याख्ययोपेताया लघुमिद्धान्तकौमुद्या 'बहु जस् + परिव्राजक जम्' इम अलौतिकविग्रह में बहुव्रीहिसमाम, समाम की प्राति- पदिक्मज्ञा, संपो धातु-प्रातिपदिकयो (७२१) में समाम के अवयव दोनो सुंपो (जस प्रत्ययों) का लुक, स्त्रीत्व को विवक्षा में अदन-तक्षण (१२४६) टाप' मवर्णदीघ तथा विभक्तिकार्य करने से 'बहुपरिव्राजका, प्रयोग मिद्ध हो जाता है । यहा आप (टाम्) प्रत्यय परे तो है पर वह समास के अन्तावयव लुप्त हुए जस-मुंप से परे है क्योकि प्रत्ययलक्षणद्वारा लुप्त हुए जम को माना जा सकता है। [न तुमताङ्गस्य (१६१) मे यहा प्रत्ययलक्षण का निषेध नही हो सकता, क्योकि उस की प्रवृत्ति तो तब होती है जव लुवाले शब्द से लुप्त हुए प्रत्यय को मान कर अङ्ग के स्थान पर कोई कार्य करना हो, यहा तो सुप् से परे जो टाप उम को मान वर अङ्ग को इत्व का निषेध करता है।' इस इत्त्वविधायकसूत्र के कुछ अपवादस्थल भी हैं । उन में कुछ यथा- (वा.) क्षिपकादीना छ । अर्थ-क्षिपका आदि शब्दो मे प्रत्ययस्यात् (१२६२) सूत्र की प्रवृत्ति नही होती। यथा-क्षिपतीति क्षिप, इगपधज्ञाप्रोकिर , (७८७) इति क्प्रत्यय । वित्त्वाद् लघूपधगुणो न । तत स्वार्थे क्न्- क्षिपक । स्लियाम् टापि क्षिपका । इसीप्रकार-चटका । कन्यका । तारका (नक्षन)। ध्र वका । आदि । (वा.) त्यानश्च प्रतिषेध । अर्थ-त्यक्न्प्रत्ययान्तो मे प्रत्ययस्यात्। (१२६२) सूत्र की प्रवृत्ति नहीं होती । यथा - उपत्यका (पर्वत के समीपवर्ती भूमि) । अधित्यका (पर्वत के उपर वाली भूमि) । उपाधिभ्या त्यकन्नासन्नाढयो (५ २ ३४) इति त्यक्प्रत्यय । (वा०) मामकनरकयोरुपसल्यानम् । अथ -मामा और नरक शब्दो म स्त्रीत्व में आप के परे रहते कार मे पूर्व अत् को ह्रस्व इकार आदेश हो जाता है । १ प्रौढमनोरमा तथा तत्त्वबोधिनी आदि में 'अमुंप' का 'सुबन्तात् परो य' टाइप्रत्यय तस्मिन् इत्त्व न ऐसा व्याख्यान किया गया है। अत उन के अनुसार समाम म परले जम् का लुक् हो जाने पर भी प्रत्ययलक्षणद्वारा उसे पुन मान कर समाम का उत्तरपद सुवन्त हो जाता है तब इस सुवन्त मे परे टाप् के स्थित होने से इत्व की प्रवृत्ति नहीं होती । ध्यान रहे कि 'अमुंप' मे प्रसज्यप्रतिषेध माना जाता है पर्युदास नहीं । यदि पर्युदास-प्रतिषेध मानेंगे तो पर्यंदास के सदृग्ग्राही होने के कारण 'मुंबन्न से जो भिन्न, उम से परे टाप् हो तो इत्त्व हो जाता है' ऐमा अभिप्राय निकलेगा। तव 'बहुपरिव्राजका' में भी इत्त्व होने लगेगा, क्योकि यहा समुदाय से तो सुप् क्यिा नही गया इमलिये समुदाय सुंवत मे भिन है और इम से परे टाप् है हो, जत यहा पर भी प्रकृतसूत्र से इत्त्व प्राप्त होने लगेगा जो अनिष्ट है । इसलिये यहा प्रमज्यप्रतिषेध माना गया है-~सुप अर्थात् सुंवन्त से परे टाप नहीं होना चाहिये । यहा सुंबन्त परिव्राजक जम्' मे परे टाप् है अत दल नहीं होता।
स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् मामिका मम्पत् । नरिका। दोनों स्थानो पर क्कार प्रत्ययस्थ न था अत उस मे पूव अकार को इत्त्व प्राप्त न या, अन इम वात्तिक में विधान किया गया है । प्रासङ्गिक इत्त्वविधायक्सूत्र की व्याच्या कर पुन पुयोग में स्त्रीप्रत्ययो का विधान करते हैं- [लघु०] वा० ---(१०३) सूर्याद् देवताया चाब्वाच्य ।। सूर्यम्य स्त्री देवता-सूर्या । देवताया किम् ? अर्थ --'सूर्य' प्रातिपदिक से पुयोग मे देवता स्त्री (पत्नी) वाच्य होने पर 'चाप्' प्रत्यय कहना चाहिये । व्याख्या-सूयात् ।।१। देवनायाम ७१। चाप् ।१।१३ वाच्य ।१।१। यह वात्तिक महाभाप्य मे पुयोगादास्यायाम् (१२६१) सूत्र पर पटा गया है, अतः इने तद्वि- पयक ही समयना चाहिय । पुयोग में टीए के प्राप्त होने पर उम का अपवाद यह चाप्' प्रत्यय विधान किया जा रहा ह । 'चाप्' मे चुः (१२६) से चकार तथा हलन्त्यम् (१) से पकार इत्मज्ञक हा कर लुप्त हो जाते हैं, 'आ' मात्र शेष रहा है । टाप् और चाप् प्रत्ययो के करने मे स्वर में अन्नर पडता है । टाप् प्रत्यय करने पर अनुदात्तौ संस्पितो (३ १४) मे टाप् का आकार अनुदात्त रह्ना है परन्तु चाप् प्रत्यय करने में चित (६११५७) द्वारा अतोदात्त म्बर होता है, यही दोनो का अन्तर है । चाप म पकार त्याप्रातिपदिकात् (११९) मूत्र मे मामान्यग्रहण लिये जोडा गया है। 1023441 पौराणिक आख्यानो मे सूर्यदेव की दो पत्निया मानी जाती हैं एक देवता पन्नी और दूसरी मानुषी अर्थात् मनुष्यजानीया । इस वात्तिक की प्रवृत्ति सूर्य की देवता पत्नी के वाच्य होने पर ही होती है जन एव इस मे 'देवतायाम्' कहा गया है । उदाहरण यथा- सूर्यस्य स्त्री देवता---सूर्या। यहा 'सूय' प्रातिपदिक मे पुयोग म देवता- पन्नी की विवक्षा म पुयोगादास्यायाम् (१२६१) सूत्र मे डोप् प्रत्यय प्राप्त होता था, परन्तु प्रकृतवात्तिक सूर्याद देवताया चावाच्य (वा० १०३) से उस का बाघ हा १ ममेयम् इति विग्रहे युष्मदस्मदोरन्यतरस्या खञ्च (१०७९) इत्यणि तवक्ममावे- क्वचने (१०८१) इति ममादेशे आदिवृद्धो, टापि, प्रकृतवात्तिरेन इत्वे 'मामिका' इति सिध्यति । [अत्र टिड्डाण-० (१२५१) इति टीप् तु न, केवलमामाभागधेयर (४१ ३०) इन्यादिना मज्ञाछन्दमोरेव डोनियमात् । नरान् कायनि इनि नरिका । के शब्द (भ्वा० परस्मैश्य, आदेर शशित (४६३) इत्यात्त्वे आतोऽनुपसर्ग क (७६१) इति सत्यय, आतो लोप इदिच (४८६) इन्याकारलोपे उपपदममाम मुंपा लुकि टाचे विविधये च कुरा LIBR ३ म्पमिद्धि। College स० पर kan भैमीव्याख्ययोपेताया लघुमिद्धान्तकौमुद्या चाप प्रत्यय हो जाता है । चाप् चकार और पकार अनुबन्धो का लोप हो कर सवर्णदीर्घ तथा विभक्निकार्य करने पर 'सूर्या (सूर्य को देवता पत्नी) प्रयोग सिद्ध हो जाता है। मूर्यस्य स्त्री मानुषी-सूरी (सूर्य की मनुष्य स्त्री)। यहा मनुष्य स्त्री के वाच्य होने पर 'सूर्य' प्रातिपदिक से प्रकृतवात्तिक सूर्याद देवताया चावाच्य (वा० १०३) से चाप नही होता । पुपोगादाहरायाम् (१२६१) मे डीप प्रत्यय हो कर अनुबन्धलोप तथा यस्येति च (२३६) से भसज्ञक अकार का लोप हो जाता है--सूर्य +ई। जब अग्रिम वात्तिक प्रवृत्त होता है- [लघु०] वा--(१०४) सूर्यागस्त्ययोश्छे च ड्या च ॥ यलोप । सूरी (कुन्ती)। मानुपीयम् ।। अर्थ'छ या डी प्रत्यय परे होने पर जो अङ्ग, उम वे उपधा के यकार का लोप हो जाता है यदि वह यकार 'सूर्य' या 'अगस्त्य' शब्दो का अवयव हो तो।' व्याल्या-यह वात्तिक महाभाष्य में सूर्य-तिघ्यागस्त्य-मत्स्याना य उपधाया (६ ४ १४६) सूत्र पर पढा गया है । उक्त मूत्र का मरलार्थ यह है-ईकार वा तद्धित १ सूर्य और अगस्त्य शब्दो की उपधा के यकार का लोप हो जाता है छ या दी प्रत्ययो के परे होने पर -ऐसा सरल अथ न कर उपर्युक्त व्यायामपूर्ण अर्थ इस लिये किया गया है ताकि 'सौरी प्रभा' आदि म यकार का लोप हो सके अन्यथा सरलार्थ से यह सिद्ध न होता । तथाहि- मूर्यशब्द से तस्मैदम् (११०६) वे अर्थ मे अप् प्रत्यय, आदिवृद्धि तथा यस्येति च (२३६) से भसज्ञक अकार का लोप करने से 'मौर्य' प्रातिपदिक बनता है । अव इस से स्त्रीत्व की विवक्षा म टिड्ढाणञ्० (१२५१) सूत्रद्वारा डीप् प्रत्यय करने पर 'सौर्य + ई' इस स्थिति मे सरलार्थ में काम नहीं चल मक्ता, क्याकि डी (ई) के परे रहते 'सूर्य' शब्द तो रहा ही नहीं वहा तो अप्रत्ययान्त 'मौर्य' यह नया शब्द आ गया है अत उपधा के यकार का लाप नहीं हो सकता । परन्तु उपर्युक्त व्यायामपूर्ण अर्थ करने से कोई बाधा नहीं आती, आसानी में यकार का लोप सिद्ध हो जाता है । क्योकि 'डी' के परे रहते अङ्ग है-मौर्य, इम अङ्ग की उपधा वे यकार का लोप हो मक्ता है, कारण कि वह यवार सूर्यशब्द का मौलिक अवयव है कोई भिन्न वर्ण नहीं । अन यस्येति च (२३६) में भमनन अकार का लोप हो प्रकृतवात्तिर के उपर्युक्त अर्थ मे यकार का भी लोप कर विभक्ति लाने में 'सौरी प्रभा' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। [न च 'सौर्य +ई' इत्यत्र यस्येति च (२३६) इत्यनेन अगोकारलोपे एक्देशविकृतमनन्यवद् इतिन्यायेन स एव मूर्य- शब्द इति वाच्यम्, अल्लोपयलोपयोरुभयोरप्याभीयत्वेन यलोपे कर्तव्ये पूर्वप्रवृत्त- स्याल्लोपस्यासिद्धत्वेन मूर्यशब्दकल्पनाया अन्यायत्वादिनि ।
स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् परे हो तो अड्न की उपधा यकार का लोप हो जाता है यदि यह यकार सूर्य, तिघ्य, अगस्त्य या मत्स्य शब्दो का अवयव हो तो। इस सूत्रद्वारा तद्धितमात्र में प्राप्त उपधा के यकार का लोप प्रकृतवात्तिक तथा कुछ अन्य वात्तिको के द्वारा नियमित किया जाता है । प्रकृतवात्तिक म सूर्य और अगस्त्य शब्दो के उपधा यकार का लोप डी (ई) मे तथा तद्धितप्रत्ययो मे देवल छप्रत्यय के परे रहत ही नियमित किया गया है । अत 'छ' मे भिन्न अन्य तद्धितो में इस का लोप न होगा । उदाहरण यथा (टी मे)- 'सूर्य +ई' यहा दी परे है अत सूर्यागस्त्ययोरछे घ डया च (वा० १०३) इस प्रकृतवात्तिक में अङ्ग की उपधा यकार का लोप हो जाता है क्योंकि यह यकार सूर्य- शब्द का अवयव है-मूर+ई-सूरी। अब टयन्त मे प्रथमा के एकवचन की विवक्षा मे विभक्ति ला कर उस का हल्दयादितोप (१७६) करने मे 'सूरी' (मूर्य की मनुप्य स्नी अर्थात् कुन्ती') प्रयोग सिद्ध हो जाता है । इमीप्रकार-तस्येदम् (११०६) के अथ मे मूर्यशब्द मे अण् हो कर आदिवृद्धि एव भसज्ञक अकार का लोप करने पर 'सौर्य' शब्द निष्पन्न होता है । अब स्त्रीत्व की विवक्षा में अण्प्रत्ययान्त होने के कारण टिड्ढाण० (१२५१) सूत्र मे इस में परे डीप (ई) प्रत्यय हो कर भमर अकार का लोप एव प्रकृतवात्तिकद्वारा उपधा के यकार का भी लोप करने पर विभक्ति लाने मे मौरी प्रभा' (सूर्य की चमक) प्रयोग मिद्ध हो जाता है। 'छ' प्रत्यय म उदाहरण यथा- मौरीय (सूर्यमम्बन्धी प्रकाश आदि मे होने वाला) । मूर्यशब्द से पूर्ववत् तस्येदम् (११०६) के अर्थ मे जण प्रत्यय करने पर 'मौय' शब्द निष्पन्न होता है । अब इस मे तत्र भव (१०६२) के अर्थ मे वृद्धाच्छ (१०७७) मे छप्रत्यय, प्रत्यय के आदि छकार को आयनेयोनोयिय फ-ढ-ख-छ-घा प्रत्ययादीनाम् (१०१३) सूत्रद्वारा ईय् आदेश एव यस्येति च (२३६) मे भमज्ञक अकार का लाप कर 'सौय +ईय' हुआ। जब प्रकृत सूर्याऽगस्त्ययोरछे च ड याञ्च (वा० १०३) वात्तिक मे अङ्ग की उपधा यकार (जो सूर्यशब्द मे मम्बन्ध रखती है) का लोप कर विभकिन लाने में 'सौरीय' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। इमीप्रकार अगस्त्यशब्द में प्रक्रिया समझनी चाहिँ । अगस्त्यस्य पन्नी-- अगस्ती [पुयोग मे टीप्, यस्येति च (२३६) म भसनक अकार का लोप तथा प्रकृत- गतिक मे उपधा के यवार का लोप] । छ म पूर्ववत् 'आगस्नीय'। प्रकृतवात्तिकद्वारा नियमित किये जाने से अन्य तद्धित प्रत्ययो में इन के यकार का लोप नहीं होता । यथा-मूर्यो देवताऽम्येति मौर्यो मन्त्र [सास्य देवता (१०४१) में अण् आदिवृद्धि तथा यस्येति च (२३६) मे अकार का लोप] । अगस्न्यम्या- १ सूर्य की मानुपी पत्नी कुन्ती का आख्यान महाभारत आदि-पव अध्याय ११० में देखना चाहिये।
भमीव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या पत्यम्- आगस्त्य [ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुम्यश्च (१०१८) मे अण, आदिवृद्धि, यस्यति च (२३६)] । अब अग्रिममत्रद्वारा डीप का पुन विधान करते हैं- [लघु०] विधि-सूत्रम्-(१२६३) इन्द्र-वरुण-भव-शर्व-रुद्र-मृड- हिमाऽरण्य-यव-यवन-मातुलाऽऽचार्याणाम् आनुंक् ।४।११४६।। एपाम् आनुगागम स्यान्डीप् च । इन्द्रस्य स्त्री-इन्द्राणी । वरुणानी । भवानी। शर्वाणी । रुद्राणी । मृडानी ॥ अर्थ--इन्द्र, वरण, भव, शर्व, रुद्र, मृड, हिम, अरण्य, यव, यवन, मातुल और आचार्य-इन वारह प्रातिपदिको में स्त्रीत्व की विवक्षा मे डोष् प्रत्यय तथा इन प्रातिपदिको को आनुक् का आगम भी हो जाता है । व्याख्या-इन्द्र-वरण-मातुलाचार्याणाम् ।६।३। आनुक् ।।१। टीप् ।१।१। (अन्यतो डोष सूत्र से ।) । प्रत्यय , परश्च, प्रातिपदिकात्, स्त्रियाम्-'ये सब अधिकृत हैं । इन्द्रश्च वरणश्च भवश्च शर्वश्च रद्रश्च मृडश्च मि च अरण्य च यवश्च यवनश्च मातुलश्च आचार्यश्च इन्द्र-वरुण-भव-शर्व-रद्र-मृड-हिमाऽरण्य-यव-यवन मातुला- ऽचार्या , तेषाम् = इन्द्र-वरण-भव-शव-रद्र-मृड-हिमाऽरण्य-यव-यवन-मातुलाऽचार्याणाम्, इतरेतरद्वन्द्वसमास । प्रत्यय , परश्च- इन अधिकारों के अनुरोध से इस पद की आवृत्ति कर इमे पञ्चमीबहुचनान्त में परिणत कर लिया जाता है। एव 'प्रातिपदि- कात्' को बहुवचनान्त में परिणत कर 'प्रातिपदिकेभ्य' बना लिया जाता है । अर्थ - (स्त्रियाम्) स्त्रीत्व की विवक्षा मे (इन्द्र-आचार्येभ्य ) इन्द्र, वरुण, भव, शर्व, स्द्र, मृड, हिम, अरण्य, यव, यवन, मातुल और आचार्य इन बारह (प्रातिपदिकेभ्य ) प्रातिपदिको से परे (डीप्) डोप् प्रत्यय हो जाता है तथा इन प्रातिपदिको का अवयव (आनुक्) आनुक् आगम भी हो जाता है । यह सूत्र अष्टाध्यायी मे पुयोग के प्रकरण मे पढा गया है। परन्तु इन्द्र, वरण, भव, शर्व, रुद्र, मृड, मातुल और आचार्य- इन आठ शब्दो से ही पुयोग में स्त्रीत्व की विवक्षा मे इस सूत्र की प्रवृत्ति होती है, अन्यो (हिम, अरण्य, यव) मे असम्भव होने के कारण एव यवनशब्द से अप्रसिद्ध होने के कारण पुयोग में प्रवृत्ति रही होती । उन मे वक्ष्यमाण वात्तिकोक्त अर्यों मे ही इस सूत्र की प्रवृत्ति होती है । आनुक के अन्त मे उकार और कार इत् हो कर लुप्त हो जाते हैं, 'आन्' मात्र ही शेष रहता है। कित होने से यह आगम आद्यन्तौ टकितो (८५) परिभाषा के अनुसार इन्द्र आदि प्रातिपदिको का अन्तावयव बनता है । उदाहरण यथा- इन्द्रस्य स्त्री (भार्या, पत्नी)-इद्राणी (इद्र की पत्नी)। यहा 'इद्र' प्राति- पदिक से पुयोग में स्त्रीत्व की विवक्षा में इन्द्रवरुणभवशवं० (१२६३) इस प्रकृतसूत्र से दीप प्रत्यय तथा प्रातिपदिक के अन्त में आनु का आगम हो कर अनुव घलोप करने से 'इन्द्र आन्+ई हुआ। अब अब सवर्ण दोघं (४२) मे मवर्णदीर्घ तया स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् अटकुप्वाइनुम्व्यवायेऽपि (१३८) से नकार को पकार कर जन्त म विभक्तिकार्य करने मे 'इन्द्राणी' प्रयोग सिद्ध हो जाता है।' इसीप्रकार-वरणम्य स्त्री (मायां, पन्नी)-वरुणानी (वरण की पत्नी) । भवस्य स्त्री-भवानी । शर्वस्य स्त्री-शर्वाणी । स्ट्रस्य स्त्री-रद्वाणी । मृडस्य स्त्री- मृडानी । भव, शर्व, रुद्र और मृड-ये सब जिद के नाम हैं शिव की पत्नी पार्वती को भवानी, शर्वाणी, रुद्राणी और मृडानी कहते हैं । इन्द्र आदि शब्दो मे डीप तो पुयोग म पुयोगादास्यायाम् (१२६१) सूत्र में हो सिद्ध था, केवल आर्नु आगम के लिये ही स्त्र म इन का ग्रहण किया गया है २ जव अग्रिम वात्तिको के द्वारा अन्य शब्दा के अर्थों तथा विशिष्ट कार्यों का निर्देश करते [लघु०] वा० – (१०५) हिमाऽरण्ययोमहत्त्वे ॥ महद् हिम हिमानी। महद् अरण्यम् अरण्यानी॥ अर्थ-हिम और अरण्य इन दो प्रातिपदिको मे महत्त्व (बडा होना) अर्थ मे ही टीप और आनुक का विधान ममझना चाहिये । व्याख्या-वात्तिकार्य मरल है । उदाहरण यथा- महद् हिमम्-हिमानी (बडी वरफ) । महद् अरण्यम्-जरण्यानी (वडा जङ्गल)। इन अर्थों में इन का प्रयोग स्त्रीलिङ्ग में ही होता है। इन की सिद्धि 'इद्राणी' की समझनी चाहिये। [लघु०] वा. --(१०६) यवाद् दोषे ॥ दुष्टो यवो यदानी ॥ अर्थ-दोष द्योत्य होने पर यव' प्रातिपदिक से पर डीप् प्रत्यय और प्रकृति को जानुक का आगम हो जाता है । १ पुलोमजा शचीन्द्रागो-इत्यमर । २ आनुर आगम की बजाय यदि जनुन जागम कर दत तो अतो गुणे (२७४) सूत्र- द्वारा सवर्णदीर्घ का वाध कर पररूप हो जाना । इस प्रकार 'इन्द्राणी, वस्णानी भवानी' जादि के स्थान पर 'इन्द्रणी, वरुणनी, भवनो आदि अनिष्ट रूप बन जाते । जन आगम को दोघंघटित किया गया है। विशेषजिज्ञासु इस विषय पर विस्तृत विचार लेखक के शाधप्रबन्यास-पर्यातीचन म पृष्ठ (१५१, १५२, १५३, १५८, १५५, १५६) पर देखें । यह अन्य भमीप्रकाशन में प्रकाशित हो चुका है। ३ आचार्य युधिष्ठिर मीमामा का क्यन है कि महत्त्व में हिम का घनत्व अपे- क्षित है (देखें ट्रस्टद्वारा प्रकाशित उप्टाध्यायीभाष्य पर ४१४६ सूत्र पर टन की टिप्पण)। ४ निस्कन (E२६) मे 'अरण्यस्य पत्नी अरप्यानो ऐमा भी उपलब्ध होता है।
भैमीव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या मदृश है। व्याख्या-वात्तिवार्थ सरल है । दुष्टो यव --यवानी (दुष्ट यव नयात् अज- वायन) । 'यवानी वह द्रव्य है जो जात्या तो यव नहीं पर आकृत्या यव के दोप से यहा वैयाकरणो को यही अभिप्रेत है । जैसाकि कैय्यटनप्रदीप में लिखा है- जात्यन्तरमेवाभिधीयते । दोषस्तु यवत्वजातेरभावे तदाकारानुकृतिमात्रम् इत्याहु [प्रदीप ४१४६] । हरदत्त, मट्टोजिदीक्षित आदियो ने भी कैय्यट का अनुसरण क्यिा है। [लघु०] वा०-(१०७) यवनाल्लिप्याम् ॥ यवनाना लिपियवनानी। अर्थ –'यवन' प्रातिपदिक से डीप् प्रन्यय तथा प्रकृति का आनुंक का आगम लिपिविशेष के वाच्य होने पर ही होता है । व्याख्या यवनात् ।।१। निप्याम ।७।१। वानिकार्य मरल है। जक्षरो के विन्यास की विशिष्ट शैली को लिपि कहा जाता है। ब्राह्मी, शारदा, नागरी आदि लिपिविशेषो की सज्ञाए हैं । यवनो (यूनानियो) की भाषा जिस लिपि में लिखी जाती थी उसे प्राचीन काल में 'यवनानी' कहा जाता था। ब्राह्मी आदि भारतीय लिपिया जहा बाई ओर से दाई ओर को चला करती थी वहा यवनानी लिपि इस के विपरीत दाई ओर से वाईं ओर को अग्रसर होती थी। आजक्ल उर्दू, फारसी, जरवी आदिया की लिपिया यवनानोशली पर अग्रसर होती हैं । इम वार्तिकद्वारा लिपि के विषय म विधीयमान इस डीप और आनुं का तस्येदम् (११०६) द्वारा प्राप्त अण् प्रत्यय का अपवाद समझना चाहिये । अत एव 'यवनानामियम्--यावनी लिपि' ऐसा प्रयाग नही होता। हा । भाषा आदि के वाच्य होने पर अण का प्रयोग देखा जाता है । यथा- न वदे यावनी भाषा प्राण कण्ठगतैरपि । गजरापोडघमानोऽपि न गच्छेज्जतमन्दिरम् ॥ (भविष्यपुराणे) नोट-यवन प्रातिपदिक से पृयोग मे पुपोगादास्यायाम् (१२६१) मूत्रद्वारा देवल डीप् प्रत्यय ही होगा आनुंक नहीं। अत यवनस्य स्त्री 'यवनी' ही बनेगा 'यव. नानी नहीं। [लघु०] वा--(१०८) मातुलोपाध्याययोरानुग्वा ।। मातुलानी, मातुली । उपाध्यायानी, उपाध्यायी ॥ अर्य-मातुल (मामा) और उपाध्याय-इन दो प्रातिपदिको से पुयाग स्त्रीत्व की विवक्षा मे ही प्रत्यय तो नित्य होता है पर आनुक् का आगम विकल्प से । -मातुलोपाध्याययो ।६।२। आनु ।१।१॥ वा इत्यव्ययपदम् । वात्तिक का अर्थ पूर्ववत् सरल है । मातुलस्य स्त्री (भाया, पत्नी) मातुलानी (मामी)। जहा आनुक का आगम न होगा वहा केवल डीप् प्रत्यय हो र भमक्षर अकार का म ध्याल्या- म्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् लोप कर विभक्ति लाने से 'मातुली' प्रयोग बनेगा । इसीप्रकार-उपाध्यायस्य' स्त्री- उपाध्यायानी, उपाध्यायी (उपाध्याय की पत्नी) वा। यदि 'उपाध्यायस्य स्त्री' इस प्रकार पुयोग विवक्षित न होगा अर्थात् कोई स्त्री स्वयम् अध्यापिका होगी तो वहा डीए का विकल्प होगा आनु की प्रवृति न होगी- उपाध्यायी, उपाध्याया वा। यह बात महाभाष्य में इडश्च (२४४८) सूत्र पर कही गई है । अत एव सिद्धान्तकौमुदी मे भट्टाजिदीक्षित न लिखा है-या तु स्वयमेवाघ्या- पिका तत्र वा डोष् वाच्य (मि० को०)। इम स यह भी प्रमाणित होता है कि प्राचीनकाल मे स्त्रिया भी वेद का अध्यापन करती थी। बाद मे पुस्पो ने उन से यह अधिकार छीन लिया प्रतीत हाता है। [लघु०] वा० ---(१०६) आचार्यादणत्व च ॥ आचायस्य स्त्री-आचार्यानी॥ अथ -आचार्यप्रातिपदिक से परे आनुक (आन्) के नकार को गकार नहीं होता। व्याख्या-पाचाय" प्रातिपदिन से पुयोग म डीप और आनुक् तो सूत्र से ही सिद्ध है परतु इम के साथ आनुक् के नकार को णकार आदेश भी नही होता-इम के मग्रह के लिये वात्तिक मे 'च' का ग्रहण किया गया है । उदाहरण यथा- आचार्यस्य स्त्री (पत्नी) जाचार्यानी [आचाय की पत्नी] । यहा आचायशब्द से पुयोग म इद्रवरुणभवशवं० (१२६३) सूत्रद्वारा टीप् प्रत्यय हो कर प्रकृति को आनुक् का आगम हो जाता है--आचार्य आन् + ई-आचार्यानी। अब अकुप्या- ड्नुम्यवायेपि (१३८) सूत्र से नकार को णकार प्राप्त होता है, इस पर प्रकृतवात्तिक आचार्यादणत्व च (वा० १०६) से उम का निषेध हो जाता है। पुन विभक्तिकार्य करने से 'आचार्यानी' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । नोट-यहा यह विशेष ध्यातव्य है कि यदि कोई स्त्री स्वय व्याख्यात्री पण्डिता होगी तो पुयोग के अभाव म प्रकृतसूत्र से डीए और आनुक् न हो कर अजाद्यतष्टा (१२४६) से टाप् प्रत्यय ही होगा-आचार्या । [लघु०] वा.- --(११०) अर्यक्षस्त्रियाभ्या वा स्वार्थे । अर्याणी, अर्या । क्षत्रियाणी, क्षस्त्रिया ।। १ उपाध्याय का लक्षण यथा- एकदेश तु वेदस्य वेदानान्यपि वा पुन । योऽध्यापयति वृत्त्यर्यमुपाध्याय स उच्यते ॥ (मनु० २ १४१) २ आचाय का लक्षण यथा- उपनीय तु य शिष्य वेदमध्यापयेद् द्विज । सकल्प सरहस्य च तमाचार्य प्रचक्षते ॥ (मनु० २१४०) भैमीव्याख्ययोपेताया लघुसिदान्तकौमुद्या अर्य-'अर्य' (स्वामी या वंश्य)' एवं 'क्षत्रिय' प्रातिपदिको से स्वार्थ में (पुयोग मे नही बल्कि जाति आदि वाच्य होने पर) स्त्रीत्व की विवक्षा में डोप- प्रत्यय+आर्नुक-आगम विकल्प से होते हैं । व्याख्या-पक्ष मे अदन्तलक्षण टाप् (१२४६) हो जायेगा । उदाहरण यथा- अर्याणी, अर्या (स्वामिनी या वैश्य जाति की स्त्री)। क्षलियाणी, क्षलिया (क्षत्रिय- जाति की स्त्री) । पुयोग मे पुयोगादास्यायाम् (१२६१) से निर्वाध डोष् हो जायेगा। यथा-अर्यस्य भार्या-अh (स्वामी की पत्नी अथवा वैश्य की पत्नी) । क्षत्रियस्य भार्या-क्षत्रियी (क्षत्रिय की पत्नी)। [लघु०] विधि-सूत्रम्- (१२६४) क्रीतात् करणपूर्वात् ।४।१।५०।। त्रोतान्ताद् अदन्तात् करणादे' स्त्रिया डीप् स्यात् । वस्त्रक्रीती। क्वचिन्न-धनकीता ॥ अर्थ -'क्रीत' शब्द जिस के अन्त म तथा करणवाचन जिस का पूर्वावयव हा उस अदन्त प्रातिपदिक से स्त्रीत्व की विवक्षा मे डीप् प्रत्यय हो । १ अर्य स्वामि-वैश्ययो (३११०३)। २ यहा यह ध्यातव्य है कि पक्ष में जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् (१२६६) सूत्रद्वारा डीप नहीं होता, क्योकि उक्तसूत्र में 'अयोपधात' कहा गया है । अर्य और क्षत्रिय दोनो की उपधा में यकार है। ३ अमरकोष में इन का संग्रह सुन्दररीति से क्यिा गया है- अयाणी स्वयमयाँ स्यात् क्षस्त्रिया क्षत्रियायपि । उपाध्यायाऽप्युपाध्यायो स्यादाचार्यापि च स्वत ॥ आचार्यानी तु पुयोगे स्यादी क्षत्रियो तथा । उपाध्यायान्युपाध्यायो अर्थ-पुयोग के विना स्वार्थ मे 'अर्याणी-अर्या, क्षत्रियाणी-क्षत्रिया' रूप बनत है । इसीप्रकार पुयोग के बिना स्वत अध्यापन कार्य करने पर 'उपाध्यायो-उपा- घ्याया' तथा 'आचार्या' रूप बनते हैं । पुयोग मे--अर्यो, क्षत्रियी, उपाध्यायानी- उपाध्याया तथा आचार्यानी रूप बनते हैं। । क्रीतान्ताद् अदन्तात् करणादे -इन तीनो के पुलिङ्ग दिशेप्य 'प्रातिपदिक्शब्दात' का यहा अध्याहार करना चाहिये । केवल 'प्रातिपदिकात्' इस नपुसक विशेष्य का अध्यहार स्वीकार करेंगे तो 'करणादे' यह पुलिङ्ग प्रयोग अनुपपन्न होगा- ऐमा बालमनोरमाकार श्रीवासुदेवदीक्षित का क्यन है । परतु मारे विचार म 'करणादि' शब्द भाषितपुस्क है अत नपुसक के पन्चम्येक्वचन मे इस के 'कर- णादे और करणादिन' दोनो रूप बन सकते हैं । यहा 'प्रातिपदिकात्' इस नपुसक विशेष्य के साथ किसी भी रूप का प्रयोग हो सकता है कोई दोष नहीं आता । ॥
म्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् व्याख्या-त्रीतात् ।५।११ करणपूर्वात् ।।१। डीप् ।१।१। (अयतो डीए सूत्र से) । अतः, प्रातिपदिकात, स्त्रियाम, प्रयय , परश्च-ये सब पूवन अधिकृत हैं । करण (क्रणवाचक्म्) पूर्वम् (पूर्वपदम्) यम्य प्रातिपदिकम्य तत् करणपूर्वम् तस्मात् = करणपूर्वात्, बहुव्रीहिममाम । 'अत' और नीतान्' ये दानो 'प्रातिपदिकात्' के विशे- पण हैं । विशेषण मे तदनविधि हो कर 'त्रीतशब्दानाद् जदन्तात् प्रातिपदिकात्' उप- लब्ध हो जाता है। अर्थ-(ोतात् = क्रीनशब्दान्तात्) जीतशब्द जिसके अन्त में हो तथा (करणपूर्वात्) करणवाचक जिम के पूर्व मे हा ऐने (अन = अदन्तात्) अदन्त (प्रातिपदिकात्) प्रातिपदिक मे परे दीप प्रयय हो जाता है (स्त्रियाम्) म्त्रीत्व की विवभा मे । उदाहरण यथा- वस्त्र क्रीता वस्त्रक्रीती (वनाद्वाग उरीदी गई म्बी भूमि आदि कोई स्त्री- लिङ्ग वस्तु)। वस्त्र भिम् +गीत' दम रलौकिक विग्रह में 'क्रीत' शब्द में मुबुत्पत्ति पूर्व ही गतिकारकोपपदाना कृद्धि सह समासवचन प्रार संवत्पत्ते इस परिभाषा के वल से कर्तृकरणे कृता बहुलम (६२६) स्त्रद्वारा तत्पुरुषममाम हा कर सुंपो धातुप्रातिपदिक्यो (७२१) ने सुब्ला करन पर वस्त्रत्रीत' वना। इस शब्द के अन्न म त्रीतशब्द तथा इम के आदि म करणवाचर वम्नगद मौजूद है किञ्च यह ममम्त प्रातिपदिक दन्त भी है, इसलिय स्त्रीत्व की विवक्षा म इस मे प्रकृत क्रोतावरण. पूर्वात् (१२६४) सूनद्वाग टोप (ई) प्रत्यय हा भमज्ञक अकार का लोप कर विभक्ति- कार्य करने मे वस्त्रक्रीती प्रयोग मिद्ध हा नाता है। क्वचिन्न-घनकीता। प्रकृतमूत्रद्वारा विधीयमान दाप क्वचित् नहीं भी होता । यया-धनन क्रीना पनीता (धन मे खरीदी हुई स्त्री, भूमि नादि कोई म्नीलिङ्ग वस्तु) । कारण यह है कि फतृ करणे कृता बहुलम् (३२६) मूत्र म 'बहुलम्' रण के कारण गतिकार- कोपपदाना कृद्धि सह समासवचन प्रा वुत्पत्ते (प.) इस परिभाषा का क्वचित् जाश्रयण नहीं भी किया जाता । तव सह सुपा (९०६) अधिकार के कारण मुवन का मुबन के माय ही ममास होने के कारण कीन' को मुबन्त वनाने में पूर्व ही स्त्रीप्रत्यय करना पडना है । ऐमौ जवस्था म उम मे अजायतष्टाप् (१२४९) द्वारा टाप ही हा मक्ता है, टीप नहीं, क्योरिटीए की प्रवृत्ति नो तब होती ह जब उम के पूर्व करणार १ इम परिभाषा की सोदाहरण विस्तृत व्याख्या इस भैमीव्याख्या के चतुर्थभाग समास प्रकरण म पृष्ठ १५०-१५३ तक देखें । २ 'वम्पनीती' को और अधिक विस्तृत सिद्धि का जानन के निर ममामप्रकरण म पृष्ठ (१५२) पर लिखी 'अस्वीती' की मिरि का दने । ३ सा हि तस्य घनत्रोता प्रागेन्योऽपि गरीयसो-इबुद्धृत काशिकायाम् । मूलमस्य मृग्यम् ।
५८ भभोव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या जुडा हो । इस प्रकार 'धन टा+कीता मुं' इम अलौक्किविग्रह वाले ममास मे सुंपो (टा और मुं) का लुक् कर बननीता' यह नादन्त प्रातिपदिक निप्प न होता है। अब इम से स्त्रीत्व की विवक्षा होने पर भी प्रकृतसूत्र से डीप नही होता क्योकि इस मे अदन्त प्रातिपदिक में ही डीप का विधान किया गया है आदन्त से नहीं । इस तरह प्रथमा के एकवचन मे मुं का हल्डयादिलोप (१७९) हो कर 'धनत्रीना' प्रयोग मित हो जाता है। सूत्र म 'वरणपूर्वात्' कहने के कारण सुकीता, दुष्कीता, विक्रीता' आदि म डीप् न होगा । इसीप्रकार 'स्वक्रीता' मे कर्तृ कारक पूर्व मे जुड़ा होने के कारण भी डीप की प्रवृत्ति नहीं होती। 'बम् क्रीता' इत्यादि विग्रहवाक्यो म 'त्रीत' से डीप न हो कर टाप् ही हाता है । कारण कि यह करणादि एव नीतान्त प्रातिपदिक नहीं है । 7 अभ्यास [१] (१) क्या स्त्रीप्रत्यय लगा कर ही स्त्रीत्व प्रकट किया जा सकता है या जन्यथा भी? सोदाहरण स्पष्ट करें। (२) सस्कृतभाषा मे स्त्रीत्व का निर्णय किस आधार पर किया जाता है (३) निम्नस्य प्रश्नो का यथोचित उत्तर दीजिये-- [क] पाणिनीयव्याकरण के कुल स्त्रीप्रत्यय नामत निर्दिष्ट करें। [ख] 'श्वेता' मे वर्णादनुदात्तात्तोपधात्० की प्रवृत्ति क्यो नहीं होती? [ग] 'चटका' मे ककार से पूर्व अत् को इत्त्व क्यो नही होता ? [५] 'त्रिभुवनम्' मे द्विगो द्वारा डोप क्यो नही होता? [८] प्राचां फ तद्धित मे ष्फ को तद्धित क्यो कहा है ? (च] यवाद् दोषे मे दोप से क्या अभिप्रेत है ? {छ] वत्स, बाल और शिशु मे वयसि प्रथमे की प्रवृत्ति होगी या नहीं? (ज] वोतो गुणवचनात् से 'आखुशब्द मे डीए होगा या नहीं? (झ] युवावस्थावाची 'वधूटी' मे वयसि प्रथमे द्वारा डीप कैसे हो जाता है ? [भ] जाति के वाच्य होने पर 'क्षत्निय' और 'अय' का क्या रूप बनेगा? [८] प्रथमवयोवाची कन्याशब्द मे डीप न हो कर टाप कैसे? [6] 'आचार्यानी' में णत्व क्यो नही होता? (४) अधोलिखित प्रातिपदिको के स्नीलिङ्गरूप सिद्ध करें- १ राजन् । २ अनडुह । ३ विद्वस् । ४ शिव । ५ सुदर। ६ दण्टिन् । ७ पञ्चन् । ९ क । गच्छत् । १० जानत् । ११ नश्वर । १२ यतमान । १३ कुप्यत् । १४ कुर्वत् । १५ मातुल । १६ बहुकुरुचर । १७ देव।
भैमीव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या (१४) सर्वतोऽक्तिन्नादित्येके यह गणसूत्र किन किन बातो मे कृदिकाराक्सिन मूत्र की अपेक्षा अधिक व्यापक है? (१५) निम्नम्थ कारिका की सोदाहरण विस्तृत व्याख्या करे- सत्त्वे निविशतेऽपैति पृथग्जातिषु दृश्यते । आधेयश्चाक्रियाजश्च सोऽसत्त्वप्रकृतिर्गुण ॥ (१६) न पट्स्वस्त्रादिभ्य द्वारा डीप और टाप् दोनो का निषेध किया जाता है । टोन्निषेध को उदाहरणो मे घटा कर समझाए । (१७) अजाद्यतप्टाप में कौमुदीकार 'अजाद्यत' को षष्ठयन्त क्यो मानते है । (१८) प्रत्यय मै ककार विम स्थान पर हो तो इत्त्व की प्रवृत्ति होती है ? (१९) आगम के टित्त्व के कारण कोई प्रातिपदिक टित् नही होता-इस कथा की मोदाहरण पुष्टि करे । (२०) लकाराधित अनुबन्धकार्य लादेशो मे सक्रमित नहीं होते-इस कथन को सोदाहरण मप्रमाण व्याख्या करे । -- अब पुन टीप का विधान करते हैं- [लघु०] विधि-सूत्रम्---(१२६५) स्वागाच्चोपसर्जनादसयोगो- पधात् ।४।११५४॥ असयोगोपधम् उपसर्जन यत् स्वाङ्ग तदन्ताद् अदन्ताद् डोप वा स्यात् (स्त्रियाम्) । केशान् अतिक्रान्ता अतिकेशी, अतिकेशा। चन्द्रमुखी, चन्द्रमुखा । असयोगोपधात् किम् ? सुगुल्फा । उपसर्जनात् किम् ? शिखा ।। अर्थ -जिम को उपधा मे सयोग न हो ऐसा जा उपमर्जनसञ्जक म्वाङ्गवाची शब्द तदन्त अदन्त प्रातिपदिक से स्त्रीत्व की विवक्षा म विकल्प से डीप् प्रत्यय हो । व्याख्या--स्वाङ्गात् ।।१। च इत्यव्ययपदम् । उपसर्जनात् ।।१। असयोगा- पधात् ।।१। डीप ।१।। (अन्यतो डीप सूत्र मे) । वा इत्यव्ययपदम् । प्रातिपदिकात्, अत , स्त्रियाम्, प्रत्यय, परश्च-ये मब पूर्वत अधिकृत हैं । समास-सयोग उप- धाया यस्य स सयागोपध , न मर्यागोपध-असयोगोपध, बहुव्रीहिगर्भन तत्पुरप । 'अमयोगोपधात्' और 'उपसर्जनात्' ये दोनो 'स्वाङ्गात्' मे अन्वित होते है । 'स्वाङ्गात्' तथा 'अत' ये दोना 'प्रातिपदिकात्' के विशेषण हैं अन इन मे तदन्तविधि हो जाती है । अर्थ-(अमयोगोपधात्) जिस को उपधा में सयोग न हो ऐसा जो (उपमर्जनात्) उपसर्जनमञ्जक (दाङ्गात्) स्वाङ्गकाची शब्द, तदन्त (यत = यदन्तात्) अदन् (प्रातिपदिनात्) प्रातिपदिन से परे (वा) विकल्प से (डीए) दीप (प्रत्यय ) प्रत्यय हो जाता है (स्त्रियाम्) स्त्रीत्व की विवक्षा मे । उदाहरण यघा- केशान् अतिकान्ता-अनिदेशी, अतिवेशा वा (वेशो को जो लाय चुकी है अर्थात् के शो अधिक लम्बी माला आदि, अथवा लम्बे केशो वाली स्त्री आदि)। यहा 'केश शम् +अति' इस अलौकिकविग्रह मे अत्यादय क्रान्ताद्य द्वितीपया (वा० ५६) इस वात्तिक मे प्रादिममास, सुंपो धातु-प्रातिपदिक्यो (७२१) सूत्र से स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् मुंब्लु तथा प्रथमानिर्दिष्ट 'अति' को उपमजनमना (E०६) एवम् उपसर्जनम्पूर्वम (६१०) से उम का पूर्वनिपात कर 'अतिकेश' प्रातिपदिक निष्पन्न हुना। यहा प्रानि- पदिक के अत म स्वाङ्गवाची शब्द है—केश। इस की उपधा म बाई मयोग नहीं विञ्च विग्रह मे नियतविभक्तिर होने से एकविभक्ति चापूर्वनिपाते (६५१) सूत्र- द्वारा यह उपसर्जनमज्ञक भी है जन तदन्त 'अतिकेश' शब्द से विभक्ति लाने से पूर्व म्त्रीत्व की विवभा म प्रकृतमूत्र स्वाङ्गाच्चोपसर्जनादसयोगोपचात् (१२६५) द्वारा विकल्प से डीप (ई) प्रत्यय हो जाता है । डीप्पक्ष मे भमज्ञव अकार का यस्येति च (२३६) मे लोप कर विभक्ति लाने से अतिकेशी' तथा दोप के अभाव में अजाधतष्टाप् (१२४६) मे अदन्तलक्षण टाप हो मवर्णदीर्घ कर विभक्ति लान से 'अतिरेशा' प्रयोग मिद्ध हो जाता है । इस तरह अतिकेशी, जतिकेशा-ये दो प्रयोग सिद्ध हो जान हैं । इमीप्रसार-चन्द्र इव मुख यम्या सा चन्द्रमुखी, च द्रमुखा वा (चन्द्र के ममान सुन्दर मुखवाली स्त्री) । यहा 'चन्द्र मुं+मुख मु' इस अलौकिकविग्रह म अने- क्मन्यपदायें (९६६) मूत्रद्वारा बहुव्रीहिममाम म सुंपो का लुक् हो कर 'चन्द्रमुख' प्रानिपदिक निष्पन्न हुआ। इस प्रातिपदिक के अन्त मे म्वाङ्गवाची 'मुख' शब्द विद्य- मान है । इम की उपया म कोई मयाग नहीं । सर्वोपसर्जनो बहुद्रोहि (अर्थात् बहु- श्रीहिममाम में मब पद उपमर्जन होत हैं) इस वचन के अनुसार यह उपमजन भी है अत तदत 'चन्द्रमुख' से विभक्ति लान से पूर्व स्त्रीत्व की विवशा म प्रकृतसूत्र स्वा- शाच्चोपसर्जनादसयोगोपधात् (१२६५) द्वारा पाक्षिक डीप (ई) प्रयय हो भमज्ञव अकार का लोप कर विभक्ति लाने में चन्द्रमुखी' तथा पक्षान्त र म अदन्तलक्षण टाप (१२४६), मवर्णदीघ एव विभक्ति लाने से 'चन्द्रमुखा' प्रयाग सिद्ध हो जाता है । असयोगोपघात किम् ? सुगुल्फा । यदि स्वागावाची उपमर्जनसञ्जक शब्द की उपधा म सयाग हागा प्रातिपदिक मे प्रकृतम्बद्वारा दीप न होगा बल्कि अजाद्यतष्टाप् (१२४६) से केवल अदन्नलक्षण टाप ही होगा, कारण निम्न म 'असयोगोपधात्' कहा गया है । यथा-- शोभनो गुल्फो यस्या मा सुगुल्फा (सुन्दर गुल्फो गिट्टो वाली) । यहा 'सु-+ गुल्फ जौ' इस अलौविविग्रह में अनेकमन्यपदार्य (९६६) से बहुव्रीहिममास हुआ है। तो तदन्त १ अतिश' मे यद्यपि तत्पुरुपममाम है और तत्पुरुषममाम म परवल्लिङ्ग द्वन्द्व. तत्पुरुषयो (९६२) के अनुसार परवल्लिङ्गता हुआ करती है नथापि यहा प्राप्त परवल्लिङ्गता का द्विगु-प्राप्ताऽपन्नालम्पूर्व-गतिसमासेषु प्रतिषेधो वाच्य (वा. ६३) इस वात्तिक मे निषेध हो कर विशेष्यानुसार लिङ्ग होता है । विशेष्य यहा स्त्रीलिङ्ग विवक्षित है अत स्त्रीत्व मे वैकल्पिक डीप क्यिा गया है। २ सर्वोपसर्जनो बहुव्रीहि -इम वचन की व्याच्या ममामप्रकरण में (६६६) मूत्र पर कर चुके हैं वही देखें।
१२ भैमीयाध्ययोपेनाया लघुमिद्धान्तकौमुद्या ममाम में मुंब्लुक हो स्नीत्व की विवक्षा में जदन्नलक्षण टाप, मवर्णदीर्घ एव विभक्ति- कार्य करने पर 'सुगुल्फा' प्रयोग मिद्ध हो जाता है। यहा 'गुल्ल' इम म्बागवाची शब्द को उपधा मे 'ल्फ' यह सयोग वर्तमान है जन 'मुगुल्फ' प्रातिपदिर में प्रहतमूत्रद्वारा दीप नहीं हुआ। इसीतरह-मुपाा, सुवक्त्रा, सुहम्ना आदियों में दीषु का अभाव ममयना चाहिये ।' उपसर्जनात् किम् ? शिखा'। स्वाङ्गवाची शब्द यदि उपमर्जन न होगा ता भी तदन्त से प्रकृतमूत्रद्वारा पाक्षिक टीए न होगा । यथा-शिखा (चोटी) । यहा शोड स्वप्ने (अदा० आत्मने०) धातु से शीडो ह्रस्वश्च (उणा० ५ २४) इम उणादिस्त्रद्वारा 'ख' प्रत्यय तथा धातु को हम्ब हो कर 'शिख' प्रानिपदिक निप्पन्न होता है। इस की उपमजनमज्ञा नहीं है अत स्त्रीत्व की विवक्षा में प्रकृतमूत्र से पाक्षिक डीप न हो कर अदन्तलक्षण टाप, मवर्णदीर्घ एव विभक्तिकार्य करने पर "शिखा' पयोग सिद्ध हा जाता है। इम सूत्र म स्वाज' में 'अपना मङ्ग' नहीं समझना चाहिये । व्याकरण म यह पारिभाषिक शब्द माना गया है । इस को त्रिविध परिभाषा वैयाकरणो में अनुसार इस प्रकार कही जाती है- (१) अदब मूतिमत् स्वाङ्ग प्राणिस्थमविकारजम् । (२) अतत्स्थ तत्र दृष्ट च (३) तेन चेतत्तथायुतम ।। म्वाङ्ग का प्रथम लक्षण यथा- १ ध्यान रहे कि नासिकोदरौष्ठजधादन्तवर्णशृङ्गाच्च (०१५५) इम सूत्र के अनुसार आप्ठ, जद्घा, दन्त, वर्ण और शृङ्ग इन पाञ्च मयागोपधों के अन्त में जाने पर निपेंध की प्रवृत्ति नहीं होती, वैकलिन डीप हो जाता है। यया-- बिम्बोष्ठी-विम्बौष्ठा, दीर्घजधी-दीर्घजद्घा, ममदन्ती-ममदन्ना, चारकर्णी- चाकर्णा, तीक्ष्णशृद्गी-नीक्ष्णशृगा । उपर्युक्तमूत्र में 'च' ग्रहण के कारण अङ्ग, गान, कण्ठ और पुच्छ इन चार मयोगोपयो का भी ग्रहण किया जाता है- मृबङ्गी-मृद्रगा, तनुगात्री जनुगात्रा, स्निग्यकण्ठी-स्निग्धवष्ठा, ल्याणपुच्छी- कायाणपुच्छा। २ कुछ लोग यहा 'मुशिवा' प्रन्युदाहरण पटते हैं । उसका कथन है कि-शोभना शिखा मुशिखा । यहा कु-गति प्रादय (१४६) द्वारा प्रादितत्पुरुषममाम म प्रथमानिर्दिष्ट होने मे 'सु' नो उपमर्जन है पर 'शिखा' नहीं, अन इम में प्रकृतसूत्रद्वारा टोप् प्रत्यय न होगा। परन्तु उन का यह क्यन युक्त प्रतीत नहीं होना । कारण यह है कि तब 'शिवा' शब्द के उदन्त न होने में बत ही टोप प्राप्त न होगा।
म्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् अद्भव मूत्तिमत् स्वाङ्ग प्राणिस्यम् अविकारजम् ।' अर्थात् जो पदाथ द्रव (तरल) न हो, मूत्तिमान् (दृश्य) हो, विकार से उत्पन्न न हुआ हो एव प्राणिया में स्थित रहता हो-वह 'स्वाग' क्हाता है। जैसे प्राणिस्थ वेश, मुख, स्तन आदि 'म्वाङ्ग' हैं । अत तदनो से प्रकृनसूत्रद्वारा टोप् तथा पक्ष में टाप् हो जाता है- मुकेशी-मुकेशा, चन्द्रमुखी-चन्द्रमुखा, पीनम्ननी-पोनस्तना आदि । 'कफ' और 'म्वेद' (पमीना) म उपर्युक्न अन्य सब लक्षण पटिन होते हैं परन्तु वे द्रव (तरल) हैं अन वे स्वाङ्ग नही, इसलिये तदन्तो मे प्रकृत-मूत्रद्वारा टीप् नहीं होता । यथा-सुक्फा (बहुत कफ वाली), सुस्वेदा (बहुत पसीने वाली)। अजा- धतष्टाप् (१२४६) द्वारा नदन्तलक्षण टाप् ही होता है । 'ज्ञान' मूर्तिमत् (दृश्य, आकार वाला) नहीं होता अन शेप सव लक्षणो के घटित होने पर भी वह 'म्वाङ्ग' नहीं होता । जत तदन्त स प्रकृतसूत्रद्वारा दीप नहीं होना । यथा--सुज्ञाना (शोभन जान यम्या मा मुनाना, श्रेष्ठ नान वाली)। अजाद्यतष्टाप् (१२४६) से अदन्तलक्षण टाप ही होता है । मुमुखा शाला (सुन्दर मुख यस्या सा सुमुखा । सुन्दर द्वार वाला घर)। यहा का 'मुख' शब्द प्राणिम्य नही अन स्वाङ्ग नहीं । टसलिये नदन्न में यहा प्रकृत- स्त्रद्वारा डीप नहीं हुआ। अजाद्यतष्टाप् (१२४६) से जदल-लक्षण टाप् हो हुआ है। मुशोफा (बहुत सूजन वाली म्बी) । यहा 'शोफ' (शोय, मूजन) म अन्य तो सब लक्षण पाये जात हैं पर वह अविकारज नहीं, शारीरिक विकाररूप रोग से उत्पन्न होता है । अन वह स्वाङ्ग नहीं । इसलिये तदन से प्रकृनम्नद्वारा डीप नहीं होता । अदन्तलक्षण टाप ही होता है। वाह वा दुसग लक्षण यथा- अतत्स्य तत्र दृष्ट च (स्वागम्) ।' चाह अब प्राणिया में स्थित न हा परन्तु प्राणियो में देखा अवश्य गया हा वह भी स्वाग होता है । तात्पय यह है कि प्राणियो के अङ्ग यदि अब प्राणिया म विद्यमान न हाकर कही अन्यत्र पड़े हुए हो तो भा वे स्वाग क्लात हैं। यथा-- मुकेशी मुरेशा वा रथ्या (सुन्दर या वहुत केशो वाली गली)। यहा के 'क्श' अब प्राणिया म स्थित नहीं (गली में विद्यमान हैं) परन्तु वे हैं नी प्राणियो । अङ्ग ही, १ न विद्यते द्रवो इव व (तरलता) यस्मिन्तद उद्भवम् । मूत्ति = अवयरमयोगा- ऽस्याम्नीनि मूतिमत ! प्राणिप-जन्तुषु विद्यमान प्राणिस्थम । अविकारजम== गेगादि-विकाराऽजन्य च यत् तत् प्रथम स्वाङ्गमित्यर्थ । २ तच्छब्देन प्राणी पगमृश्यते । जनम्यम् = अप्राणिम्थम्, नत्र प्राणिनि दृष्ट यत् नदपि म्वाङ्गमित्यर्थ ।
६४ भैमीव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या अत इस द्वितीय लक्षण के अनुसार वे 'स्वाङ्ग' है । इमलिये तदन्न मे प्रकृतसूत्रद्वारा दीप की विकल्प मे प्रवृत्ति हो जाती है। स्वाग का तृतीय लक्षण यथा- तेन चेत् तत् तयायुतम् तात्पर्य यह है कि जैसे यह म्वाङ्ग प्राणियो मे स्थित होता है यदि उसी प्रकार अन्यत्र मूत्ति आदि में स्थित हो तो भी उसे 'म्वाङ्ग' समयना चाहिये । यथा- सुस्तनी सुस्तना वा प्रतिमा (सुन्दर स्तनो वाली मूर्ति) । यहा स्तन प्राणिया की तरह प्राणिसदृश प्रतिमा मे स्थित है अत ये भी स्वाङ्ग है । इसलिये तदन्त मे प्रकृतसूत्रद्वारा विकल्प से डीप हो जाता है। जाचार्य हेमचन्द्र ने अपने शब्दानुशासन म इन तीना लक्षणो को सुन्दर सरल शब्दो में इस प्रकार पद्यबद्ध किया है- अविकारोऽद्रव मूर्त प्राणिस्थ स्वाङ्गमुच्यते । च्युत च प्राणिनस्तत्तद् निभ च प्रतिमादिषु ॥ (बृहद्-हैमवृत्ति २ ४ ३८) अब कुछ स्वागवाची शब्दा मे डीए का निषेध करते है- [लघु०] निषेध-सूत्रम्-(१२६६) न कोडादि-बह्वच ।४।१।५६।। कोडादेवह्वचश्च स्वाङ्गान्न डी । कल्याणकोडा। आकृतिगणोऽयम् ।। अर्थ-मोडादिगणपठित स्वाङ्गवाचको से तथा बह्वच् (दो से अधिक अचो वाले) स्वाङ्गवाचक शब्दो मे परे स्त्रीत्व की विवक्षा में टीप् प्रत्यय नही होता। क्रोडादि आकृतिगण है। व्यारया-न इत्यव्ययपदम् । नोडादि-बह्वच ।।३। डीए ।१।१। (अयतो डीप स्त्र से) । स्वाङ्गात् ।।१। उपमजनात् ।।१। (स्वागाच्चोपसर्जनादसयोगोपधात् मून से)। स्त्रियाम्, प्रातिपदिकात्, प्रत्यय , परश्च~ये सब अधिकृत है । ममाम -- षोडा (क्रोडाशब्द ) आदिउँपा ते नोडादय , तद्गुणसविज्ञानबहुव्रीहि । बह्वोऽचो यस्य स बह्व, बहुव्रीहिसमास । गोडादयश्च बह्वच् च क्रोडादिब्रह्वच्, तस्मात् = क्रोडादिबह्वच । समाहारद्वन्द्र | समासान्तविधेरनित्यत्वाद् द्वन्द्वान्चुदषहान्तात् समाहारे (६६२) इति ट्च् न । 'स्वाङ्गात्' और 'उपसजनात्' ये दोनो 'कोडादिवह्वच' के साथ अन्वित होते हैं । 'कोडादिवह्वच' यह 'प्रातिपदिकात्' का विशेषण है त १ ते चेत्तत्तथायुतमिति तृतीय स्वागलक्षणमिति बोध्यम् । नत्र भाप्ये 'स्वाङ्गम- प्राणिनोऽपि' इति शेष पूरित । तेन =प्राणिस्थेन स्तनाद्यङ्गाकृतिकावयवविशेषण तत् = अप्राणिद्रव्य प्रतिमादि तथा प्रा प्राणिद्रव्यवद् युतम् = सम्बद्ध चे भवनि तदा तत् स्तनाद्यङ्गाकृतिकम् अप्राणिनोऽपि स्वाङ्गमिन्यर्थ । (वालमनोरमा) म्त्रीप्र ययप्रकरणम् विशेषण मे तदन्तविधि हो जाती है । अथ –(उपमजनात्) उपसर्जनमज्ञक (स्वाङ्गात्) म्बाङ्गवाची (क्रोडादिवह्वच ) जो कोडादिशन्द जयवा दो स अधिक अचो वाले शब्द, नदन्न (प्रातिपदिकात्) प्रातिपदिक से (स्त्रियाम्) स्त्रीत्व को विवक्षा मे (डीए) डीप प्रत्यय (न) नही होता । यह न स्वानाच्चोपसर्जनादसयोगोपधात् (१२६५) सूत्रद्वारा प्राप्त डीए का अपवाद है । इस से डीप का निषेध हो जाने पर अजाद्यतष्टाप् (१२४६) से अदन्तलक्षण टाप हो जाना है । कोडादि स्वाङ्गो का उदाहरण यथा- कल्याणी नोटा (वक्ष म्थलम्) यस्या मा=कल्याणमोडा अश्वा (शुभ छाती बाली घोडी) । 'कोटा' शब्द घोडे के वक्ष म्थल का वाचन है और नित्यस्त्रीलिङ्ग है। 'कल्याणी सुं+ नोडा म' इम अलौक्विविग्रह में अनेकमन्यपदायें (६६६) से बहुव्रीहिममास, सुपो का लुक् (७२१) तथा स्त्रिया पुवद् भाषितपुस्कादनूड समाना. धिकरणे स्त्रियामपूरणीप्रियादिषु (९६६) मे 'कल्याणी' का पुवद्भाव के कारण 'कल्याण' कर देने पर 'कल्याणत्रोदा' इस स्थिति में गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य (६५२) से उपमर्जनहम्ब हो जाना है-कल्याणकोट । अब मुंबुन्पत्ति मे पूर्व स्त्रीत्व की विवक्षा म म्दागवाची 'गोडा' शन्द अन्त में होने के कारण स्वागाच्चोपसर्जनादसयोगोपधात (१२६५) मे पाक्षिक डीप् प्राप्त होता है परन्तु प्रकृत न कोडादि-बह्वच (१२६६) सूत्र में उम का निषेध हो जाता है । तब अजाद्यतष्टाप् (१२४६) से अदन्नलक्षण टाप, अनुबन्धलोप, मवर्णदीर्घ नथा विभक्ति (मुं) ला कर उस का हृदयादिनोप (१७६) करने पर 'कल्याण-त्राटा' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । इसी प्रकार-कल्याणखुरा, कल्याणनखा, कल्याणगुदा, कल्याणघोणा, सुगला, सुभगा आदि प्रयागो की सिद्धि समझनी चाहिये । श्रोडादि आकृतिगण है। आकृत्या गण्यते-बुध्यते = परिचीयते इत्याकृति - १ कोटादिगण का पहला शब्द 'कोड' है या 'त्राडा' यह विवादग्रस्त है । महाभाष्य में यह मून व्याख्यात नहीं। काशिवागार ने इस पर कुछ प्रकाश नहीं डाला। न्यामकार जिनेद्रबुद्धि एव पदमञ्जरीकार हरदत्तमिश्र इमे 'काडा' मानते है । हरदत्त ने लिखा है-“अश्वानामुर काडा, म्त्रीलिङ्गोऽयम् । तर बहुव्रीही पूर्वपदम्य पुवद्भाव , उत्तरपदम्योपमजनह्रस्वत्वम् ।" माधवाचार्य धातुवृत्ति म तौदादिक कुड निमज्जने घातु पर म्पष्ट लिखते हैं-"कोड, घन् । कोटा अश्वानामुर । टावन्नोऽय स्वभावता विशेषविषय । कोडादिपु टावन्नमारस्य पाठाद् भुजान्नरवाचश्म्य तोडशब्दस्य बहुवीही स्वाङ्गलक्षणो टोविकल्प एव भवनि । कल्याणकोडो कल्याणलोटा मयुरोति ।” परन्तु गणरत्नमहोदधिकार जाचाय वर्षमान अपने ग्रथ में इसे पटते हैं और म्वोपज्ञ-व्याख्या म स्पष्ट लिखते हैं- "रत्नमतिस्तु कल्याण काडा यस्या इति विग्रह दर्शयन् पुलिङ्गता स्यापयनि' । इन सब को देखत हुए तत्त्वबोधिनीकार ज्ञानेन्द्रसरस्वती तथा त०५० (५) भैमीव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या गण । आकृति (कार्यदर्शन) से ही इस गण की पहचान होती है । तात्पर्य यह है कि लोक मे जहा स्वाङ्गवाचिशब्दान्त प्रातिपदिक से स्त्रीत्व की विवक्षा मे डीप को अप्रवृत्ति दिखाई दे और उस अप्रवृत्ति का विधान क्सिी सूत्र या वात्तिक से न हुआ हो तो वहा स्वाङ्गवाची शब्द को क्रोडादिगण के अन्तर्गत समज लेना चाहिये । पदमजरीकार हरदत्तमिश्र ने कोडादिगण मे ये शब्द गिनाये ई-वोडा बालखरोखा शफो गुद नगगलौ चेति । गणरत्नमहोदधिकार वर्धमान ने इस गण का परिगणन इस प्रकार किया है- छोड-बाल-गला भाल-भगोखा खुरसयुता । शफो भुजो गुद घोणाकरौ मोडादिनामनि ॥ अव बह्वच स्वागवाची का उदाहरण यथा- शोभने जघने यम्या मा सुजघना (सुन्दर जघना वाली स्त्री)। यहा 'सु+ जघन औ' इस अलौकिकविग्रह वाले बहुव्रीहिसमाम म मुंब्लुक् होकर 'सुजघन' बना । 'जघन' शब्द स्वाङ्गवाची है अत तदन्त 'सुजघन' में स्त्रीत्व की विवक्षा म स्वाइगा- चोपसर्जनादसयोगोपधात् (१२६५) से वैकल्पिक डीप् प्राप्त होता है । परन्तु 'जधन' शब्द दो से अधिक अचो वाला है अत प्रकृत न क्रोडादिबह्वच (१२६६) सून मे डीप का निषेध हो जाता है । अब अदन्तलक्षण टाप् कर सवर्णदीघ एव विभक्ति- कार्य करने पर 'सुजघना' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । इसीप्रकार-पृयुजघना, सुवदना, पद्मवदना, चन्द्रवदना, स्वधरा, महाललाटा, सुनयना, वामलोचना, पादापितेक्षणा आदि प्रयोगो की सिद्धि ममपनी चाह्यि । परन्तु नासिका और उदर इन दो स्वाङ्गवाचको म बहु-अच्-निमित्तक यह निषेध प्रवृत्त नही होता, वहा नासिकोदरोष्ठजधादन्तकर्णशङ्गाच्च (४ १ ५५) मूत्रद्वारा वरिपक डीप् प्रवृत्त हो जाता है --तुङ्गनासिकी-तुङ्गनासिका, कृशोदरी कृशोदरा ।' अब कुछ अन्य स्वागवाचकी से डीप के निषेध का विधान करत हैं- [लघु०] निषेध-सूत्रम् - (१२६७) नखमुखात् सज्ञायाम् ।४।१।५८।। न डीः ।। अर्थ-स्वाङ्गवाची जो 'नख' अथवा 'मुख' शब्द, तदन्त प्रातिपदिक से बालमनोरमाकार वासुदेवदीक्षित का कहना है कि यहा पर तीनो लिङ्गो में उदाहरण दिये जा सक्ते हैं । 'कोड' शब्द गोद और छाती वा वाचक प्रसिद्ध है। न ना क्रोड भुजान्तरम् इत्यमर । अमरकोष मे इम पुलिङ्ग नहीं माना गया परन्तु अन्य कोपनारो ने इसे पुलिङ्ग भी माना है। जत तीनो लिङ्गा म उदाहरण सम्भव हैं । १ इस विषय पर एक टिप्पण पीछे (६२) पृष्ठ पर लिख चुके हैं वह यहा पर भी पुन ध्यातव्य है।
स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम म्नीत्व की विवक्षा में डीप् प्रत्यय नहीं होता यदि सना अर्थात किसी का नाम गम्यमान हो तो। व्याख्या-नखमुखात् ।।११ सज्ञायाम् १७१११ न इत्यव्ययपदम् (न कोडादि- बह्वच मूत्र से) । टोप् ।१।१॥ (अन्यतो डीए मूत्र से) । म्वाङ्गात् ।।१। (स्वाङ्गाच्चोपसर्जनादसयोगोपचात् स्त्र मे)। प्रातिपदिकात्, स्त्रियाम्, प्रत्यय , परश्च-ये सब पूवन अधिकृत हैं। समास -नम्न च मुख च तयो समाहार नखमुखम, तम्मात् = नखमुखात्, ममाहारद्वन्द्व । 'म्वाङ्गात्' यह 'नखमुखात्' मे अन्वित होना है। 'नखमुखान' यह प्रातिपदिकान्' का विशेषण है। विशेषण स तदन्नविधि हो जाती है । अथ - (म्वाङ्गात्) स्वाङ्गवाची जो इनखमुखात्) नख और मुख शब्द, तदन्त (प्रातिपदिकात्) प्रातिपदिक से परे (टोप) दीप प्रत्यय (न) नही होता (स्त्रियाम्) स्त्रीत्व को विवक्षा में (मज्ञायाम्) मज्ञा गम्य हा ता। यह सूत्र स्वाङ्गाच्चोपसर्जनादसयोगोपधात (१२६५) द्वारा प्राप्त डीप् का निषेध करता है । डीए के न होने पर अजाद्यतष्टाप् (१२४६) मे अदन्नलक्षण टाप हो जाता है । उदाहरण यथा- श्पणखा । यह रावण की बहन राक्षमी की सज्ञा है' । मज्ञाए यद्यपि लौक्किविग्रहद्वारा प्रदर्शित नहीं की जा सकती तथापि अज्ञो को ममझाने के लिये अलीक्माग का आश्रय कर विमी तरह विग्रह प्रदर्शित किया जाता है। शूर्पाणीव नखानि यम्या मा नन्नाम्नी गक्षमी शूर्पणखा (छाज की तरह नाखूनो वाली तन्नाम्नी राक्षमी, रावण की वहन)। यहा 'शूप नम् + नख जम्' इम अलौकिक विग्रह मे अनेकम यपदार्थ (६६६) मूत्र से बहुव्रीहिममाम हो कर मुंपा का लुक् हो जाता है- शूर्पनख । अब स्त्री की विवक्षा मे स्वागाच्चोपसर्जनादसयोगोपधात् (१२६५) मूत्रद्वारा प्राप्त पाक्षिक टीए का प्रत नख मुवात्मज्ञायाम् (१२६७) से निषेध हा जाता है । पुन अजाद्यतष्टाप् (१२४६) मे जदन्नलमण टाप, आवन्धलोप, मवणदीर्घ एव वक्ष्यमाण 'पूर्वपदात्मज्ञायामग' (१२६८) से नकार को णकार कर विभक्ति लाने से 'शूर्पणखा' प्रयोग मिद्ध हो जाता है। यदि यह क्मिी का नाम न होगा तो यौगिरवृत्ति मे 'शूपाणीव खानि यम्या' इस विग्रह में स्वागाच्चोप० (१२६५) मूत्र से पाक्षिक डीप एव टाप हो कर-' -'अपनखी-शूर्पनखा' बनेगा। तव वक्ष्यमाण (१२६८) सूत्र में णत्व भी न होगा, क्योकि वह मझा मे हो णव का विधान करता है। । कुबेर ने अपने पिता विश्रवा (विधवम्) की सेवा के लिय नीन मुन्दरी गक्षमन्यानो को नियुक्त किया था। जिन के नाम थे-पुष्पोक्टा, गका नया मालिनो (देखें महाभारत वन. २७१, ३ ५)। इन के द्वाग पुष्पोत्स्टा मे रावण और कुम्भकर्ण का, गका म दर और शूर्पणखा का तथा मालिनी से विभीषण का जम हुआ (देखें महाभारत वन० २७५, ७-८) ।
भैमीव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या दूसरा उदाहरण यथा--- गौरमुखा (गोरे मुख वाली तन्नाम्नी कोई स्नी)। गौर मुग यस्या सा तन्नाम्नी काचित् स्त्री। यहा 'गौर सुं+मुख सुं' इस विग्रह में भी पूर्ववत् बहुव्रीहि- समास, सुंब्लुक् तथा स्वाङ्गाच्वोपसर्जनादसयोगोपधात् (१२६५) से प्राप्त पाक्षिक टीप् का प्रकृत नखमुखात्सजायाम् (१२६७) सूत्र से निषेध हो कर अदन्तलक्षण टाप कर विभक्ति लाने से 'गौरमुखा' प्रयाग सिद्ध हो जाता है। यहा भी यदि मज्ञा विवक्षित न होगी तो यौगिक्वृत्ति से पाक्षिक डीए हो कर 'गौरमुखी-गौग्मुखा' बनेगा। मज्ञा न होने पर प्रकृतसूत्र से निषेध नहीं होता। यथा-ताम्रमुखी कन्या (ताम्वे की तरह लाल मुख वाली कन्या)। यह किमी का नाम नही यौगिक शब्द है अन बहुव्रीहिसमास म सुंलुक् कर म्बीत्व की विवक्षा म स्वागाच्चोपसर्जनाद- सयोगोपधात् (१२६५) से डीप तथा पक्ष मे टाप करने से 'नाम्रमुख साम्रमुखा' म्प सिद्ध होते हैं । सज्ञा न होने से प्रकृतसूत्रद्वारा निषेध नहीं होता । 'शूर्प+नखा' के णत्वविधान समानपद न होने से रेफ मे परे अप्वाइ- नुम्व्यवायेपि (१३८) द्वारा नकार को णकार नहीं हो सकता। अत इस के लिये अग्रिमसूत्र दर्शाते हैं- [लघु०] विधि-सूत्रम्-(१२६८) पूर्वपदात् सज्ञायामग १८१४।३।। पूर्वपदस्थान्निमित्तात्परस्य नस्य ण स्यात् सज्ञाया न त गकारव्यव धाने । शूर्पणखा । गौरमुखा । सज्ञाया किम ? ताम्रमुखी कन्या ।। अयं -पूर्वपदस्य निमित्त (ऋ, र्, प्) में परे नकार को गवार हो जाता है सञ्ज्ञा मे, परन्तु गकार का व्यवधान होन पर इस सून से णत्व नही होता । व्याख्या -पूर्वपदात् ।५।१। मज्ञायाम् ।७।१। अग ।।१। रपाभ्याम् ।।२। न ।६।। ण ।११। (रषाम्या नोण समानपदे मूत्र से)। पूर्वपद वा अभिप्राय यहा 'पूर्वपदस्थ' से है । 'पूर्वपद' कहने से सम्बन्धिशब्द के कारण 'उत्तरपद' को अध्याहृत कर उस को 'न" से सम्बद्ध कर लिया जाता है । ममास - अविद्यमाना गकारो यस्मिन् तद् अग्, तस्माद् अग, बहुव्रीहिसमाम । 'बग' यह 'पूर्वपदात्' का विशेषण है । अयं--(अग) जिस मे गकार विद्यमान नही ऐमा गो (पूर्वपदात्) पूर्वपद, उम मे स्थित (रपाम्याम्) रेफ या पका निमित्त से परे (उत्तरपदस्थस्य) उत्तरपदस्थ (न) न् के स्थान पर (ण) ण् आदेश हो जाता है (मज्ञायाम्) सज्ञा मे । अप्वाइनुम्यवार्यपि (१३८) मूत्र मे अट्, क्वग, पत्रग आदियो वे व्यवधान में भी णत्व का विधान हो जाता है। इसीप्रकार ऋवर्णान्नस्य णत्व वाच्यम् (वा० २१) वात्तिकद्वारा रेफ और पकार के माय ऋवण को भी णत्वविधि मे निमित्त समझना चाहिये । समास मे अखण्डपद न होने के कारण पत्व प्राप्त न था अन इम मूत्र वे द्वारा विशेष परिस्थितियो मे णत्व का विधान किया गया है। 7 - म्त्रीप्रसारणम् 'गु नखा' यहा मनाम में 'गई पूर्वाद है, इसमें मार दिनान नहीं है नया इम में रेप निमिन भी माबूद है । न 'नन्दा कम उनपदय नार को प्रत पूर्वपदात् सञ्नानामा (१२६८) स्त्र में कार हा क 'पंगडा' प्रति हो जाता है। बीच में नट् और पां का व्यवधान पडना या जो अनुकत होने में बाधक नहीं था। 'गाडा' यह मना है--यह वस्त्र की व्याख्या में बताया जा चुका है। इसीप्रकार-द्रुष्णम , दान गरि मनावाचकों में पद हो जाता है।' पूर्वपद में गकार नहीं होना चाहिर गकार में व्यवधान में इस मंत्र की प्रवृनि नहीं होती। यथा - हवाम् नवतन मयनन् । यहा पटीतत्पुरुषामनार में ऋच के चकार बा चोक (३०६ में कुच-कता हो कर ना जगोले (६७) से जान्द के कारण कत्रा का मकार हो गया है। यह ग्रन्यविशेष की ना ह । परन्नु गका के व्यवधान म "न्द नहीं होता। प्ररन-यदि मना म पूर्वपदन्य निमित में प्रकृतसूत्रद्वारा उन्नम्पदम्य नकार का पका हो जाता है ना ग्युताय गमानाय पुनर्नवा, दर्मानु (राष्ट्र), चित्र- भानु (अग्नि), नग्दाहन (कुबेर) आदिवा म भी प्रतत्रद्वारा णन्च होना चाहिर क्यानिये मी मनाए हैं। उत्तर-इन का क्षुम्नादिम म पाठ मान लेन स क्षुम्नादिप च 10१७) नद्वारा णन्द का निषेध हो जाता है । जयवा-मनार नोरन व बबन्या में ही हैं णच करने में ना ६ मनाए ही नहीं रहेंगी, जन इन में पत्र नहीं होता। जैसाकि नागभट्ट ने कहा है-मान्दैन क्षेत्र सना गन्यत तदाम्ब नबन्ध प्रवृत्ति । इह तु कृते प्णत्वे सजाभङ्गापन पन्चन् । (लगन्देन्दुशेखर) । [लघु०] विपित्रम-(१२६६) जानेरस्त्रीविषयादयोपचात् । जानिवाचि यद् न च बिना नियतनसोध तर स्त्रिया हीप स्यात् । तटी । वृपलो। की। बह वृची। जाने किम् । मुम्डा । अन्त्री- विषयात रिम्' बलाका । पयोरबा नि । क्षत्रिया ।। अयं-जा जातिवात्रा प्रातिपदिक निमन्त्रीलिङ्गन हा तया टम को अधा में पका भी न हा ना सम स्पन्द का दिवमा में दी हो। दादा-जान जन्त्रीविषपात || समाचार ॥१॥ इंच ।।१। ( १ दृग्विदभ इव- भगादेव नातिया पर नन्नामा पुग्यो दृमन । वीद = रज्जुत्रिगे। इत्र नानिक पदम वानोगतो नादिर इन हदन । मात्र बहुदीही अन नानिमाया मनाया नसत्वान्यपान् (५ ४ ११८) इसमासान्दो नामिकायारच ननादेश।
७० भैमोव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या (अन्यतो डोष् सूत्र से)। स्त्रियाम्, प्रातिपदिकात्, अत , प्रत्यय , परश्च-ये सव पूर्वत अधिकृत है । समास - स्त्री विषयो (नियमेन वाच्या) यस्य तत स्त्रीविषयम्, नित्यस्त्रीलिङ्गमित्यर्थ । न स्त्रीविषयम् अस्त्रीविषयम्, तस्मात् = अस्नीविषयात्, बहुव्रीहिगर्भनञ्तत्पुरुष । नित्यस्त्रीलिङ्गभिन्नादिति भाव । य (यकार ) उपधा यस्य तत् =योपधम्, न योपधम् अयोपवम्, तस्मात् =अयोपधात्, वहुव्रीहिगभनस्त- त्पुरप । अत्र जात्या जातिवाचक प्रातिपदिक गृह्यते, अर्थ कार्याऽमम्भवात् । स्वरूपमपि न गृह्यते, अस्नीविषयाद् इति वैयर्थ्यापत्ते । अर्थ -(अस्त्रीविषयात्) जो नित्यम्त्रीलिङ्गी नही तथा (अयोपधात) जिस की उपधा मे यकार भी नहीं ऐमे (जाते - जातिवाचकात्) जातिवाचक (अत =अदन्तात्) अदन्त (प्रातिपदिकात्) प्रातिपदिय से (स्नियाम्) स्त्रीत्व की विवक्षा मे (डीए) डीप् प्रत्यय हो जाता है । यहा 'जाति' से पारिभाषिक जातिवाचको का ही ग्रहण भीष्ट है। 'जाति' की व्याकरणसम्मत परिभाषा इस प्रकार है-- आकृतिग्रहणा जाति , लिङ्गाना च न सर्वभाक् । सकृदाख्यातनिर्लाह्या, गोनञ्च चरणं सह ॥ इस श्लोक मे जाति के चार लक्षण दिये गये हैं। तद्यथा- [१] आकृतिग्रहणा जाति । गृह्यतेऽनेन इति ग्रहणम् = व्यञ्जनम्, करणे ल्युट् । जाकृति ग्रहणम् = व्यञ्जक यस्या सा जातिग्रहणा । जाकृति से पहचाने जाने वाली 'जाति' होनी है। तात्पय यह है कि आकृतिविशेष जिम का व्यञ्जक होता है उस 'जाति' कहत हैं । जैसे एक कुक्कुट (मुर्ग) या मूकर (मूअर) आदि को देख कर उम मे गृहीत अवयवसस्थान से अन्यन सवन कुक्कुट मूकर आदि व्यक्तियो का ज्ञान हो जाता है ता य कुक्कुट, सूकर आदि प्रातिपदिक व्यक्तिवाचक होत हुए भी जातिवाचक है। अत स्त्रीत्व की विवक्षा में इन से प्रकृत जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् (१२६६) मूत्रद्वारा डीप् प्रत्यय होकर भसज्ञक अनार का लोप कर विभक्निकार्य करने से 'कुक्कुटी' (मुर्गी) 'सूकरी' (मूअर की माद्दा) आदि सिद्ध हो जाते हैं । इसीप्रकार 'तट' शब्द भी जातिवाचक है। जल के समीप प्रदेश म एव तट का दख कर अन्यत्र सव तटो का ज्ञान हो जाता है । अत इस जातिवाचर प्रातिपदिक्ष से स्त्रीत्व की विवक्षा में प्रकृतसूत्र से डोप् प्रत्यय हो भसज्ञक अकार का लाप कर विभक्तिकार्य करने से 'तटी' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। [२] लिङ्गाना च न सर्वभाक् सकृदाल्यातनिर्णाझा (जाति)। १ या सर्वाणि लिङ्गानि न भजते । एक्स्या व्यक्ती सकृद् आख्यातन= उपदेशेन व्यक्त्यन्तरे उपदेश विनापि या सुग्रहा साऽपि जानिरिति जात्या लक्षणा- तरमित्यर्थ ।
स्त्रोप्र ययप्रकरणम् ७१ रिमी व्यक्ति में एक बार निम व क्थन मे अन्य अनेक व्यक्तियो मे उस का वोर हो जाये तो उमे भी जानि ममपना चाह्यि । परन्तु ऐमा शब्द निलिङ्गी या सर्वलिङ्गी नहीं होना चाहिये । यथा-क्सिो को जब वृषल (शुद्र) कह दिया जाये तो उसके पिना, पितामह, पुत्र, भ्राना नादि का भी वृषलत्व स्वप विदित हो जाना है। इस तरह यह 'वृपल प्रातिपदिव जातिवाचा हुआ। इस में स्त्रीव की विवक्षा मे प्रकृत जातेरस्त्रीविषयादयोपचात् (१२६६) मूत्र से टीप् प्रत्यय हो जकार का लोप कर विभक्ति लाने म 'वपली' (शूद्र जाति रो नी) प्रयोग मिद्ध हो जाता है। इस द्वितीय लक्षण में लिङ्गाना च न सर्वभार इमलिये कहा है कि शुक्ल आदि विलिङ्ग प्रातिपदिको' मे सकृदाख्यातनिर्ग्राह्या के अनुसार स्त्रीत्व की विवक्षा में डीप् प्रत्यय न हो जाये । यथा-शुक्ला (वलाका) । यहा शुक्नशन्द ने अदन्तलक्षण टाप ही होता है, जानिलक्षण टीए नहीं। इम द्वितीय लक्षण के अनुसार ब्राह्मण' शब्द भी जातिवाचक है, इस स भी प्रकृतमूत्रद्वारा डीप प्राप्त होता है, परन्तु शाङ्गग्य आदि गण में इस का पाठ होने के कारण शारवाद्यनो डीन् (१२७५) सूत्र मे दीए का वाध कर डीन्' प्रत्यय हो जाता है-ब्राह्मणी । 'गद्र' शब्द भी इसी तरह जातिवाचक है परन्तु अनादिगण में पाठ के कारण इस से प्रकृतसूत्रद्वारा सीए नहीं होता, अजाद्यतप्टाप् (१२४६) से गप् हो मवणंदोघ कर विभक्ति लाने मे 'द्रा' (शूद्रजाति की औरत) प्रयोग मिद्ध हो जाता है। क्षत्रियशब्द के विषय म नागे मूल मे ही वहग । 102341 १ शुक्ल जादि शब्दा का तीना लिङ्गा में प्रयाग देखा जाता है। यया-शुक्ला हस , शुक्ला बलाका शुक्ल वस्त्रम् । अत एव जमरकाप में कहा गया है- गणे शुक्लादय पुमि गुणिलिङ्गास्तु तद्वति । २ दीप और टीन् प्रत्यया के करने में म्वर का ही अन्नर पडता ह । डीपप्रन्ययान्न जलोदात्त तथा डीनप्रत्ययान्त जाादात्त होते हैं । ३ जनादिगण म यह गणस्न पटा गया है-शूदा चाऽमहत्पूर्वा जाति । जयात् यदि चंद्रशब्द जातिवाचा हो और उम स पूर्व 'महत्' शब्द भी न हो तो स्त्रीत्व की विवक्षा म उम मे टाप् प्रत्यय होता है-द्रा (द्रजाति की औरल)। 'महत्' पूर्व मे हा ना टाप् नहीं हाता, जानिलक्षपदीप ही होता है (अहीर जाति मी अग्न)। पुवाग में ता पुयोगादाख्यायाम् RAPEBR होगा ही-दम्य स्त्री शूद्री, महागूद्रम्य स्त्री महागू जना विनय कहा है- शूद्रो शूद्रस्य भार्या स्याच्या तजातिवाच । आभीरी तु महाशूद्री जातिपुयोगयो तमा । (acchor. Collet ७२ भैमीव्यास्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या [३-४] गोन च चरण सह (जाति) । गोत्र अर्थात् अपत्यप्रत्ययान्त प्रातिपदिक तथा चरणवाची (वेदशाखाध्यतृवाचक) प्रातिपदिक भी जाति-वाचर होते हैं। यथा--उपगोरपत्यम् औपगद (पगु की सन्तान) । यहा 'उपगु डस्' से अपत्य अर्थ में तरयाऽपत्यम् (१००४) मूत्र में अण् तद्धित प्रत्यय ला कर संन्नुक, आदिवृद्धि, ओर्गुण (१००५) मे भमनन उकार को ओकार गुण तथा एचोऽयवायाव (२२) मे ओकार को अव् आदेश करने पर 'औपगव' प्रातिपदिक निष्पन्न होता है। उपत्यप्रत्ययान्त होन से इस तृतीयलक्षणानुसार यह जातिवाचक है। अत स्त्रीत्व की विवक्षा म इस से परे प्रकृतमूनद्वारा डीप् प्रत्यय आ कर भसज्ञक अकार का लोप कर विभक्ति लाने मे 'ऑपगवी' (उपगु की लडकी) प्रयोग सिद्ध हो जाता है। यहा यह विशेष ध्यातव्य है कि अण्प्रत्ययान्त हाने में 'औपगव' से स्त्रीत्व में टिड्डाणन ० (१२५१) मूत्रद्वारा दीप प्राप्त था, उस का यह अपवाद है। चरणवाचियो का उदाहरण यथा--- कठेन प्रोक्नमधीते इति क्ठी (कठऋषिहाग प्रान वदशाखा का पटन वाली स्त्री)। सर्वप्रथम ऋपिवाचक 'कठ मे तेन प्रोक्तम् (११०८) के जथ म क्लापि- वैशम्पायनान्तेवासिम्यश्च (४ ३ १०४) सूत्र मे णिनि प्रत्यय हो कर कठचरकाल्तुक (४ ३ १०७)3 से उस का लुक् हो जाता है । 'कठ' अर्थात् कठऋषिप्रोक्न वेदशाखा । पुन इम 'कठ' से तदधोते (उसे पढ़ता है) के अर्थ मे तदघोते तद्वेद (१०५३) द्वारा अण प्रत्यय हो कर उस का भी प्रोक्ताल्लुक (४ २ ६३) से लुक् हो जाता है । अब 'कठ' शब्द का अर्थ हो गया-कपिप्रोक्न वेदशाखा का अध्ययन करन वाला। गोत्र च चरण सह के अनुसार 'कठ' यह जातिवाचा प्रातिपदिक है। अन म्नीत्व की विवक्षा में जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् (१२६६) दम प्रकृतमूनद्वारा इम मे डॉप प्रत्यय हो भसज्ञक अकार का लोप कर विभक्ति लाने से 'क्ठी' (कठऋषिप्रोक्त वेद- शाखा का अध्ययन करने वाली स्त्री) प्रयोग सिद्ध हो जाता है । १ चरण सह गोत्र जातिरित्यर्य । गोत्र चरण च जातित्व लभन इनि भाव । गोनशब्देनेह अपत्यमान विवक्षित न तु अपत्य पौत्रप्रभृति गोत्रम् (१००६) इति पारिभाषिकम् । गोत्रस्य आकृतिग्रहणत्वाऽभावात् सर्दलिङ्गलाच्च पूर्वलक्षणा भ्याम् असग्रहात् पृथगुपादानम् । २ क्लापिन् के शिष्यवाची तथा वैशम्पायन के शिष्यवाची तृतीयासमय प्रातिपदिवा से प्रोक्नाथ मै णिनि प्रत्यय होता है। 'कठ को वैशम्पायन का शिष्य माना जाता है। ३ कठ और चरक प्रातिपदिको से परे प्रोक्न प्रत्यय का लुर हो जाता है । ४ प्रोतप्रत्ययान्त द्वितीयासमर्थ प्रातिपदिक से अध्येतृ-वेदित अर्य में उत्पन्न प्रत्यय का लुक् हो गता है।
स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् चरणवाची का दूसरा उदाहरण यथा-- वहव ऋचो (अध्येतव्या ) यम्या मा बढची (बहुत ऋचाला अर्थात् ऋग्वेद का अध्ययन करने वाली म्नी)। बहु जम् । नच तम् इस बहुव्रीहिलमास म मुपो का लुक हो का ऋक्पूरब्यू पयामानक्षे (९६३) भूगम्य जनृचबवचौ अध्येतर्येव (वा०) इन इष्टि के अनुसार समामान्न 'उ प्रयय करन म बढच' यह जदल प्रातिपदिर निष्पन्न होता । चरणवाचन होन म यह जानिवाचक है। जा त्रीव की विवक्षा में जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् (१२६६) इम प्रकृतसूत्र म इस म टीप् प्रत्यय हो कर भसा अकार का लाप एव विभक्तिकार करन पर बढची प्रयोग सिद्ध हो जाता है। जाते किम् - मुण्डा। प्रकृत स्त्र द्वारा जातिवाचक म ही दीप का विधान क्यिा गया है अन्य म नहीं । यथा-मुण्डा (मिर मुण्डी औरत)। मुण्ट शन्द तातिवाचक नहीं क्याकि यहा जाति से जाति की अभिव्यक्ति नहीं होती । मिर के मुण्डान या न मुण्डान म जाति एक मी रहती है । जाति का द्विनीच लक्षण भी इस मे घटिन नहीं हाता क्योंकि यह मलिङ्गी है । अपत्यप्रत्ययान्त एव चरणवाची न हार म गोर च चरण सह के अनुसार भी यह जानिदाची नहीं। जन प्रकृतम्बट्टारा इस म नानिलक्षण दीप न हा कर अजाधतष्टाप् (१२४६) म सदन-लक्षण टाप हो मवणदीप कर विभक्निकार्य करन म 'मुण्डा' प्रयोग मिद्ध हा जाता है। स्त्रीविषयात क्मि 'बलाका। प्रकृतमूत्र म जम्त्रीविषयात कहा गया है। ज्यान जातिवाचक शब्द केवल म्त्रीलिङ्ग नहीं होना चाहिए । यथा-वलाका (वविशेष) । यह सब्द मदा स्त्रीलिङ्ग में ही प्रयुक्त होता है जन प्रकृतमून म टीप न हो कर अजाद्यतष्टाप् (१२४६) म अदन्नलक्षण टाप् ही होता है। इसीप्रकार--मभिका पिपीलिका यूका (जू), बटवा (माट) आदि में जानना चाहिये । १ इस प्रयाग की विस्तृत सिद्धि के लिय इम व्याघ्या 4 चतुयभागम्य (६६३) मून की व्याख्या का अवलोकन करे। २ कठी, वढची आदि प्रयागो से यही सिद्ध होता है कि प्राचीनकाल मस्निया का भी पुम्पो की तरह वैर वे अध्ययन अध्यापन का पूरा पूरा अधिकार प्राप्त था, बाद में यह अधिकार किमी तरह उन न छीन लिया गया । बत एव यमम्मृति (२) म कहा है- पुरा कल्पे तु नारीणा मौज्जीव घनमिप्यते । च वेदाना सावित्रीवचन तया ।। ३ बलाक विसष्ठिी-इत्यमर। अध्यापन ७४ भैमोव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धा तकौमुद्या अयोपधात् किम् ? क्षत्रिया। जातिवाचक् प्रातिपदिक को उपधा में यकार नहीं होना चाहिये अन्यथा प्रकृतसूत्र से डोष न होगा । यथा-क्षत्रिया (क्षत्रियजाति की औरत) । क्षत्रियशब्द उपर्युक्त द्वितीय जातिलक्षण के अनुसार जातिवाचक है परन्तु इस की उपधा में यकार है अत प्रकृतभूत्र मे डीप नहीं होता। अजाद्यतप्टाप् (१२४६) से टाप् हो कर रूप मिद्ध जाना है। इसीप्रकार-वैश्या (वैश्यजाति की स्त्री), इभ्या (हथिनी) आदि मे जानना चाहिये। यहा यह भी ध्यातव्य है कि 'अत' की अनुवृत्ति के कारण इस स्त्र की प्रवृत्ति जातिवाचक अदन्त प्रातिपदिका तक ही सीमित है। अत एव आखु , तित्तिरि , गौ इत्यादियो में जातिलक्षण डीप नहीं होता। अब कुछ यकारोपध प्रातिपदिको से भी जातिलक्षण टीप् का विधान करने में लिये अग्रिमवात्तिक प्रवृत्त होता है- [लघु०] वा०-(१११) योपधप्रतिषेधे हय-गवय-मुकय-मनुष्य- मत्स्यानामप्रतिषेध ॥ यी। गवयी। मुकयी। हलस्तद्धितस्य (१२५३) इति यलोप- मनुषी ॥ अर्थ-यकारोपध जातिवाचका से पूर्वसूत्रद्वारा जो दीप का निषेध किया गया है वह निषेध हय, गवय, मुक्य, मनुष्य और मत्स्य इन पाच शब्दा म प्रवृत्त नहीं होता।' व्यारया-प्रतिषेध का प्रतिषेध विमान हुना करता है । ता इस प्रकार हय आदि पाञ्च प्रातिपदिको से पूर्वसूत्रद्वारा जातिलक्षण डीप हो जाता है। उदाहरण यथा --ह्य (घोडा)-हयो (घोडी)। गवय (नीलगाय)-गवयी (नीलगाय को माद्दा)। मुकय (खच्चर)-मुकयो (खच्चरो)। ये सब जाति के प्रथमलक्षण (आकृतिग्रहणा जाति ) के अनुसार जातिवाचक है । इस प्रकृतवात्तिक को सहायता से जातेरस्नोविषया. दयोपधात् (१२६६) इस पूर्वसूनद्वारा डीए हो कर भमन्शक अकार का लोप कर विभक्तिकार्य करने मे उक्त रूप सिद्ध हो जाते है । मनोर्जातावञ्यतो धुंक् च (४ ११६१) सूत्रद्वारा मनुशब्द से तद्धित यत् प्रत्यय कर प्रकृति को फूंक का आगम करने से मनुष्य' शब्द निष्पन्न होता है। यह भी जातिवाचक है। इस का भी प्रकृतवात्तिक मे उल्लेख आया है । अत यापध होते हुए भी स्त्रीत्व की विवक्षा में इस से जातिलक्षण डीप हो कर भसज्ञक अकार का लोप । १ हय, गवय, मुक्य, मनुष्य और मत्स्य-इन शब्दो का परिगणन गौरादिगण म भी किया गया है। परन्तु प्रकृतवात्तिक के कारण इन का गणगत पाठ अप्रामाणिर प्रतीत होता है। यदि गणगत पाठ को प्रामाणिक माने तो इस वात्तिक की आवश्यक्ता नहीं रहती।
स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् करने से 'मनुष्य् +ई' हुआ । अब हलस्तद्धितस्य (१२५३) से उपधाभूत यकार का लाप कर विभक्ति लाने से 'मनुपी' (मनुष्यजाति की स्त्री) प्रयोग सिद्ध हो जाता है।' 'मत्स्य' शब्द भी जातिवाचक है। इस से भी प्रकृत योपधप्रतिषेधे हय-गक्य. मुकयमनुष्यमत्स्यानामप्रतिषेध (वा० १११) वात्तिक की सहायता से जातेरस्त्री- विषयादयोपधात् (१२६६) सूनद्वारा डीप् प्रत्यय हो कर भमज्ञक अकार का पस्येति च (२३६) से लोप करने पर 'मत्स्य+ई' हुआ। अब यहा उपधाभूत यकार तो है परन्तु वह तद्धित का अवयव नही अत हलस्तद्धितस्य (१२५३) के प्राप्त न होन पर अग्रिमवात्तिक से यकार के लोप का विधान करते है- [लघु०] वा०-(११२) मत्स्यस्य ड्याम् ।। यलोप 1 मत्सी। अर्थ-डी परे होने पर ही मत्स्यशब्द के उपधाभूत यकार का लाप हो । व्याख्या- यह वात्तिक सूर्य-तिष्याऽगस्त्य-मत्स्याना य उपधाया (६ ४ १४९) सूत्र पर पढा गया है। उक्त मूत्र का भरत अथ यह है--सूय, तिघ्य, जगस्त्य और मत्स्य शब्दो के उपधाभूत भमज्ञक यकार का लोप हो जाता है तद्धित या इंकार परे हो तो। इस के अनुमार डी (ई) या तद्धिन परे होन पर 'मत्स्य' के उपधाभून यकार का लोप प्राप्त था ही पुन सिद्धे सत्यारम्भो नियमार्थ इम न्याय के अनुसार इम वात्तिक का नियमार्थ समझना चाहिये । मत्स्य र उपधाभूत भमज्ञक यकार का लोप केवल डी (ई) परे होने पर ही होता है अन्यत्र नही–यह यहा नियम फलित होता है । इस नियम के कारण तद्धिन परे हान पर मत्म्य के उपधाभून भमज्ञक यकार का लाप न १ मनोर्जातावभ्यतो ओक् च (४१ १६१)। जथ –यदि समुदाय से जाति गम्यमान हो तो मनुशब्द से तद्धितसज्ञक अञ् तथा यत् प्रत्यय होते हैं किञ्च इन प्रत्ययो के सन्नियोग म मनुशब्द को षुक का आगम भी हो जाता है । अन् करन पर आदिवृद्धि हो कर मानुप', तथा यत् करने पर 'मनुष्य' प्रयोग सिद्ध होता है । मनुष्य का स्त्रीलिङ्ग ‘मनुपी' तथा मानुष का स्त्रीलिङ्ग 'मानुषी' बनेगा । मानुषी का प्रयोग यथा-- मानुषोभ्य कथ नु स्यादस्य स्पस्प सम्भव । न प्रभातरल ज्योतिरुदेति वसुधातलात् ॥ (शाकुन्तल १२८) स्त्रीणामशिक्षितपढ़त्वममानुषीणा सन्दृश्यते, किमुत या परिवोधवत्य । प्रागन्तरिक्षगमनात् स्वमपत्यजात. मन्यद्विज परभृता किल पोषयन्ति ॥ (शाकुन्तल ५२३) २ मद् धातु से औणादिक (उणा० ४२) स्थन् प्रत्यय करने में 'मत्म्य' शब्द सिद्ध होता है । इसे तद्धितान्न समझने की भूल नहीं करनी चाहिये ।
७६ भंमोव्याख्ययोपैताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या होगा । इम से--मत्स्यस्य इदम् मात्स्य मासम्-इत्यादियो मे तस्येदम् (११०६) से हुए जण तद्धित के परे रहते यकार का लोप नही होता। प्रकृत में 'मत्म्य+ई' इस स्थिति मे मत्स्यस्य डयाम् (वा० ११२) इस वात्तिक के नियमानुसार डी वे परे रहते मत्स्यशब्द के उपधाभूत यकार का लोप कर विभक्ति- कार्य करने मे 'मत्सी' (माद्दा मच्छली) प्रयोग सिद्ध हो जाता है । जब एक अन्य सूत्र के द्वारा जातिलक्षण डीप का विधान करते हैं- [लघु०] विधि-सूत्रम्-(१२७०) इतो मनुष्यजाते ।४।११६५।। टीप् । दाक्षी॥ अर्थ - मनुष्यजातिवाचक हम्व-इकारान्त प्रातिपदिक से परे डीप् प्रत्यय हो जाता है स्त्रीत्व की विवक्षा मे। व्याख्या-इत ।।१मनुष्यजाते ।५।१। डीप ।१।१३ (अन्यतो डीप सूत्र से)। प्रातिपदिकात्, स्त्रियाम, प्रत्यय , परश्च -ये सब पूर्वत अधिकृत हैं । 'इत' यह 'प्राति- पदिकात्' का विशेषण है । विशेषण से तदन्तविधि हा कर 'इदन्नात् प्रातिपदिकात्' बन जाता है। अर्थ -(मनुष्यजाते ) मनुष्यजातिवाचक (इत = इदन्तात्) ह्रस्व इकारान्त (प्रातिपदिकात्) प्रातिपदिक मे (स्त्रियाम्) स्त्रीत्व की विवक्षा मे (डीप् प्रत्यय ) डीप प्रत्यय हो जाता है । जातेरस्त्रीविषयादयोपघात् (१२६६) सूत्र मे 'अत' के अनुवर्तन के कारण उस की प्रवृत्ति अदन्त जातिवाचको तक ही सीमित है। यहा पुन मनुष्यजाति- वाचा इदन्त प्रातिपदिको से डीए का विधान किया जा रहा है। उदाहरण यथा- दक्षस्यापत्य स्त्री दाक्षी (दक्ष की मन्नति कन्या)। यहा 'दक्ष' प्रातिपदिक स तस्याऽपत्यम् (१००४) के अय मे अत इ (१०१४) सून से तद्धितसशक इन् (इ) प्रत्यय हो कर आदिवृद्धि एव यस्येति च (२३६) द्वारा भसभा अकार का लोप करन पर 'दाक्षि' यह ह्रस्व-इकारान्न प्रातिपदिक निप्पन होता है । अपत्यप्रत्ययान्न होने स गोत्र च चरण सह के लक्षणानुसार यह जातिवाचक है। मनुष्यजाति का वाचर होन के कारण स्त्रीत्वविवक्षा में प्रकृत इतो मनुष्यजाते (१२७०) मूत्रद्वारा इस मे डीप प्रत्यय हो भमन्ज्ञक इकार का यस्येति च (२३६) मे लोप कर विभक्तिरार्य करने म 'दाक्षी' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। इसीप्रकार-प्लक्षस्याप य स्त्री प्लाक्षी (प्लक्ष की लडकी) आदि प्रयागा की सिद्धि जाननी चाहिये। १ महाभाष्य आदि कई प्राचीन ग्रन्थो म अष्टाध्यायी के प्रणेता आचार्य पाणिनि को दाक्षीपुत्र कहा गया है । यथा- सर्वे सर्वपदादेशा दाक्षीपुत्रस्य पाणिने । (महाभाष्य ११२०) इस से स्पष्ट भासित होता है कि आचार्यवर को माता दक्षकुल की कन्या थी।
स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् अवन्ति और कुलिये शब्द जनपदवाची भी हैं और भत्त्रियदाची भी। अवन्तयो नाम जनपदा , अवन्नयो नाम भस्त्रिया । क्षत्रियवाची अवनि और कुन्ति इन इदन्त शब्दो से अप यार्थ मे वृद्धकोसलाजादायड् (४ १ १६६) सूत्र मे ज्यद् प्रत्यय हो स्त्रीत्व की विवक्षा में स्त्रियामन्तिन्तिकुरुभ्यश्च (४ १ १७४) से उस प्रत्यय का लुर हो जाता है । परन्तु प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् (१९०) मे जवनि और कुन्ति को अपत्यप्रत्ययान्त मान गोत्र च चरण सह के अनुमार उमे जातिवाचक (मनुष्यजाति- वाचक) स्वीकार कर स्त्रीन्च की विवक्षा में प्रकृत इतो मनुष्यजाने (१२७०) मून से डीप, भमज्ञक इकार का लोप तथा विभक्तिकाय करन म 'अवनी' (अवन्तरपत्र स्त्री, अवन्ती की लडकी), कुन्नी (कुन्तेरपत्य स्त्री, कुन्नि की लडकी) प्रयाग मिद्ध हो जाते हैं। पीछे से 'जाने' की अनुवृत्ति जाने पर भी इस सूत्र म जाते ' का पुन उल्लेख यह व्यक्त करता है कि आचार्य मनुष्यजातिवाचक से सवथा डीप चाहते हैं । इस में इदन्न मनुष्यजातिवाचक शब्द यदि यकागपध भी हा नो भी उम से टीए कर लिया जाता है। यथा- उदमेय यापत्न स्त्री जोदमेयो (उदमय की लडकी)। 'उदमय' से अपत्यार्थ म तस्यापन्यम् (१००४) मे इच् प्रत्यय, आदि अच् को वृद्धि एव भमज्ञक अकार का लोप कर 'जोदमेयि' प्रातिपदिक निष्पन्न होता है। अब स्त्रीन्त्र की विवक्षा मे यकारोपध होते हुए भी इम में प्रकृतसूत्रद्वारा डीप् प्रत्यय हो भमक्षा इकार का यस्येति च (२३६) मे लाप कर विभक्तिकाय करने में 'औदमेयी' प्रयाग मिट हा जाता है। उदन्त प्रातिपदिक यदि मनुप्प मे भिन्न अन्य जाति का वाचन होगा तो उम म प्रकृतसूनद्वारा डीप न होगा । यथा-तित्तिरि (नीतर की माद्दा) । यह इदन्न नाति- वाचक तो है परन्तु मनुप्यजानि का वाचा नहीं अन इम में दीप नहीं होता। अब ऊ प्रत्व का विधान करते हैं- [लघु०] विधि त्रम- (१२७१) ऊडुत ।४।१।६६॥ उदन्नाद् अयोपधाद् मनुष्यजातिवाचिन स्त्रियामृट् स्यात् । कुरु । अयोपधात् किम् ? अध्वर्गाह्मणी ॥ अर्थ:-जिस की उपधा म यकार न हो ऐम मनुष्यजानिवाची उदन्त प्राति- पदिक से स्त्रीत्व की विवभा मे ऊद प्रत्य हो। १ अर्थ -क्षत्तियाभिधायी जनपदवाची वृद्धमजको, इदन्ता, नया कोमल और अजाद प्रातिपदिको मे अपत्य जथ म नद्विनमज्ञा ज्या प्रत्यय हो। उदाहरण यथा-- (वृद्धसज्ञको म) जाम्बष्ठानामपन्यम् आम्बष्ठ्य मौवीराणाम् अपन्य मौवीय । (इदन्नो म) आवन्य , कौन्त । कोमल्य । आजाद्य । २ अय क्षत्रियाभिधायी जनपदवाची जो अवन्ति, कुन्नि तथा कुर शब्द उन स उत्पन्न जो तद्राज प्रत्यय उन का भी स्त्रीव को विवक्षा मे लुक् हो जाता - - - भैमीव्याययोपनाया लघुमिद्धान्न मुद्या व्याख्या-ऊड ।११। उन ॥२१॥ मनुष्यजाते १५१ (इतो मनुष्यजाते सूत्र मे) । अयोपधात् ।।१। (जालेरस्त्रीविषयादयोपधात स्त्र मे)। स्त्रियाम्, प्रातिपदिकात्, प्रत्यय , परश्च-ये मव पूर्वत अधिकृत हैं। "उत' यह 'प्रातिपदिकात्' का विशेषण है। विशेषण से तदन्नविधि हो कर 'उदन्तात् प्रातिपदिकात्' बन जाता है। अर्थ- (अयोपघात्) जिस की उपधा मे यकार नही ऐसे (मनुष्यजाते) मनुष्यजातिवाचक (जत - उदन्तात्) उदन्त (प्रातिपदिकात्) प्रातिपदिक से परे (ऊड प्रत्यय) उङ् प्रत्यय हो जाता है (स्त्रियाम्) स्त्रीत्व की विवक्षा मे । अड् प्रत्यय के डकार अनुवन्ध की इत्मज्ञा एव लोप करने पर 'ऊ' मात्र शेष रहता है । ऊ मे इकार अनुव ध नोड्धात्वो ११६६) इस स्वरविधायक्र म अब के ग्रहण के लिये है अन्यथा कोई सा भी मार गृहीत हो जाता । उ मे दीर्घ वार का ग्रहण श्वशुरम्य स्त्री- 'श्वधू' यहा दीर्घ के श्रवण के लिये किया गया है। उदाहरण यथा- कुरोरपत्य स्नी-कुरु (कुर की लटकी)। कुरु' शब्द से तस्याऽपत्यम् (१००४) के अर्थ में कुरु-नादिम्यो ण्य (१०२८) से तद्धितमन्जक ण्य प्रत्यय हो पर स्त्रियामति- कुन्ति-कुरम्यश्च (४१ १७४) मे उम का लुक् । जाता है। इस प्रकार प्रत्ययलक्षणद्वारा अपत्यप्रत्ययान्त होने से गोन च चरण सह के अनुसार यह जातिसम्ज्ञक ठहरता है । पुन इस से स्त्रीत्व की विवक्षा मे प्रकृत अडुत (१२७१) सूत्र में ऊ प्रत्यय हो कर सवर्णदीर्घ करन से कुम्' शब्द निष्पन्न हो जाता है। अब इस की प्रातिपदिक्मज्ञा करनी है जिम के कारण इस स सु जादि प्रत्ययो की उत्पत्ति हो सके । परन्तु कृदन्त तद्धितान्त या समास इन म से कोई सा भी न होने के कारण इस की कृत्तद्धित- समासाश्च (११७) मे प्रातिपदिक्सज्ञा क्मे हो क्योकि यह ऊडप्रत्ययान्न है, ऊप्रत्यय अष्टाध्यायी मे तद्धिता (६१६) अधिकार के आरम्भ हान म पहले पढा गया है ? इस समस्या के समाधान के लिये यहा एक परिभाषा का आथयण किया जाता है-प्राति- पदिकग्रहणे लिङ्गविशिष्टस्यापि ग्रहणम् (५०) अर्थात प्रातिपदिक के ग्रहण म लिङ्ग- विशिष्ट (लिङ्गयुक्न) प्रातिपदिक का भी ग्रहण हो जाता है । इस मे ऊडप्रत्ययान्त का भी ग्रहण हो कर 'कुरू' की प्रातिपदिक्मना सिद्ध हो जाती है। तव प्रथमा के एक वधन की विवक्षा म 'सु' प्रत्यय ला कर सकार का ससजुषो के (१०५) में रत्व नथा रेफ को अवसान म खरवसानयोविसर्जनीय (६३) मे विसर्ग आदेश करने पर कुस' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। ध्यान रह कि यहा डी अथवा आप न होने म हल्डयादिसूत्र (१७६) द्वारा सकार का लोप नहीं होता। अयोपधात् किम् ? अध्वर्यु ह्मणी । यदि उपधा म यकार होगा तो उडत (१२७१) सूत्र की प्रवृत्ति न होगी । यथा--अध्वर्य (ब्राह्मणी) । यजुर्वेद का अध्ययन करने वाली ब्राह्मणी। यहा चरण १ नध्वर्युशब्दोत्र अध्वर्युशाखाध्यायिनीपर अश्वयुशाखाध्यायिवशोद्वा वा, तेवश्य- त्वात् ताच्छन्दधम्।
म्बोप्रत्याप्रकरणम् वाची होने में अध्वयु जातिवाचक है। परन्तु अधा म यकार होन के कारण स्त्रीब को विवक्षा में इम में प्रकृतमूत्रद्वारा कई नहीं हाना स्त्रीनिगम भी पुलिन की नाह 'अध्वर्यु' रूप ही रहता है। अब अनिममूत्रद्वारा पडगुशब्द मे श्रीद में का विधान करने है- [लघु०] विधि-मूत्रम्-(१२७२) पङ्गोश्च ।४।११६८।। पड़गू॥ अर्य-पङ्गुमातिपदिक मन्त्रीद की दिवभा + ऊ प्रत्यन हा । व्याख्या-पडशो ।।११ च इन्सयादम । अङ्ग ।।१। (जुन सूत्र में) ! प्रातिपदिकात्, स्त्रियान, प्रत्यय, पररचय सब पूर्वन अधिकृत है । अय-(पमा प्रातिपदिकान्) पड़ा प्रातिपदिक से परे (अर प्रद ) : प्रत्यय हा (निनाम् । स्त्रीद की विवझाम। पद्गुशब्द गुणवाचन है तानिवाचक नहीं अन म्बीच की दिक्षा में इन म ऊत (१२७१) मन द्वाग ऊ प्राप्त नहीं हाता या इसलिय प्रकृतमून में उम का विधान किया गया है। उदाहरण यथा- पग प्रातिपदिक स सौन्त्र की विवक्षा म पगोरच (१२०० } इस प्रनम्न मे ऊदप्रयय टकार अनुब का लान नया अब मवय दी (४२) म मदान करन पर पड्ग' शब्द निष्पन्न हाता है। अब पूर्वोक्त निङ्गविगिटपरिभाषा में इन की प्रातिपदिकमज्ञा हो कर म आदिना को उपनि हाती है। प्रथना के ददन की विवक्षा में मु प्रत्यय जा कर मकार काम्ब नया गप का अवमान म बिसग जादा करने पर पम्' (लङ्गडी औरत) प्रया सिद्ध हो जाता है । पगर बाल पारित । दनिता। अब वगु गन्द के म्बीनिइ का निर्देग कान है-- [लघु० ] पा--(११३) श्वशुरस्योकारागारलोपश्च ।। श्व - श्वगुर (मुर। प्रातिपदिक ८ स्त्रीत्र की दिशा में पुनौर म ऊद प्रया हा जाता है लया दस के माय श्वशुर गन्न कार नया अन्य अभर का भी लोप हो जाता है। व्यात्या-श्वगुरन्च ।६।१॥ उकागकारलाप ११ च इचयमदम् । यह वानिक जयवर के प्रकरण म पहा गया है जन जड़ का विधायक ही सम्मना चाहिने । अयं—(श्वगुरान्) श्वशुर प्रातिपदिर में (बिग) म्बीन्द को विवभा में (अ) जद प्रत्यार हो जाता है नया इस के माय (श्वभुरब) श्वगुरगद के (उकारा:- कारदो ) उतार और कार का (लोर) लाप (च) भी हो जाता है । श्वसुर श्वश्रवा (१२७१) मूत्र के आधार पर यह दानिक हिन किया गया है So भीव्याख्ययोपेताया लघुमिद्धान्तकौमुद्या का ही लोप ममझा जायेगा नकि वकारोत्तर का । उद् प्रत्यय तद्धिनमज्ञक नहीं है बत उस के परे रहते यस्येति च (२३६) मे भमनन कार का लोप प्राप्त नहीं होता था जन दम वात्तिक म उम के लोप का विधान करना पड़ा है। पूॉफ्त ज्ञापन में इन वात्तिक की प्रवृत्ति पुयाग म ही होती है। उदाहरण यथा- श्वशुरस्य स्त्री (पत्नी)- श्वश्रू (मसुर की पत्नी अर्थात् सास) । यहा श्वशुर- शब्द में पुयोग मे स्त्रीत्व की विवक्षा म पुयोगादास्यायाम् (१२६१) मे डीप् प्रत्यय प्राप्त होता था उस का वाध वर प्रकृत श्वशुरस्योकाराकारलोपश्च (वा० ११३) वात्तिक से ऊङ् प्रत्यय हो कर 'श्वशुर' के उजार तथा अन्य अकार का लोप करने पर -श्वश्र्+ऊ= 'श्वधू' बना । जब पूर्ववत् लिङ्गविगिप्टपरिभाषा से प्रातिपदिक्समा हो कर सुंआदियो की उत्पत्ति होती है । प्रथमा के एक्वचन की विवक्षा मे 'मुं' प्रत्यय आ कर सकार को रत्व-विमर्ग करने मे 'श्वधू' प्रयो। मिद्ध हो जाता है।' पुन द प्रत्यय का विधान करते है- [लघु०] विधि-मूत्रम्-- (१२७३) ऊरुत्तरपदादौपम्ये ।४।१।६।। उपमानवाचिपूर्वपदम ऊत्त्तरपद यत् प्रातिपदिक तस्माद् ऊड म्यात् । करभोर ॥ अयं -जिम का पूर्वपद उपमानवाचक तथा उत्तरपद 'ऊर हा तो उस ममस्त प्रातिपदिन मे पर स्त्रीत्व को विवक्षा म उड् प्रत्यय हो । व्याख्या-उत्तरपदात ।११। औषम्य 1७1१। रुद् ।१।। (ऊडुत मूत्र से)। स्त्रियाम्, प्रातिपदिकात, प्रत्यय , परश्च-य मव पूर्वन अधिकृत है । जगत्तरपद यम्य तद् ऊम्नरपदम्, नम्मान - उस्नरपदात (प्रातिपदिकात)। बहुव्रीहिममाम । उत्तरपद * क्थन से पूर्वपद' का साक्षेप किया जाता है। 'औपम्ये' का अन्वय उमी आक्षिप्न प्वपद म होता है । समीयत नया इत्युपमा, उपमानमित्यथ , करणेऽद । उपमंव औपम्यम्, स्वार्थ प्पन् । टम प्रकार 'उपमानवाचिपूर्वपदम्' यह पद प्राप्त हा जाता है । इम 'प्रातिपदिकात्' के माथ मम्बद्ध कर विभक्तिविपरिणाम में 'उपमानवाचिपूर्वपदात' बना लेन हैं । अर्थ --- (औपम्ये = उपमानवाचिपूर्वपदात्) पमानवाचक जिम का पूर्वपद है तथा (ऊरूत्तरपदात्) 'कर' शब्द जिस का उत्तरपद है एमे ममग्न (प्रातिपदिकात्) प्रातिपदिक मे परे (स्नियाम) स्त्रीत्व को विवक्षा मे (द) उपत्यय हो जाता है । उदाहरण यथा-- करभाविव ऊर यम्या मा करभोर (वरभ वे ममान मामल पट्टो वाली स्त्री)। मणिव घ (हाथ वे पहुँचे) मे ले कर कनिष्ठिका अगुलि तक जो हाय को होलियो का १ श्वभूजनानुष्ठितचारवेषा प्रासादवातायनदृश्यबन्धं धोरयस्था रघुवीरपत्नीम् । साक्तनापोलिभि प्रणम् ॥ (रघु० १४१३) म्त्रीप्र ययप्रकरणम् - पार्श्ववर्ती मामल भाग होता है उमे करम कहते हैं। यहा ममाम म 'करम' शब्द 'करभ के समान' अर्थ में लाक्षणिक है। 'करभ औ+ऊ औ' इम अलौक्किविप्रह वारे जन्यपदप्रधान बहुव्रीमिमाम में अनेकमन्यपदायें (६६६) मूत्र से समास हो मुंब्लुक कर गण करने से 'करभो' यह समम्न प्रानिपदिक निष्पन्न होता है। इस मे पूर्वपद (करभ) उपमानवाचक नथा उत्तरपद 'र' हे अन प्रवृत्त ऊत्तरपदादौपम्ये (१२७३) म्न मे स्त्रीत्व को विवक्षा में जद प्रत्यय, मवणदीघ तथा लिङ्गविशिष्टपरिभाषा मे स्वादियों को उत्पत्ति हो प्रथमा के एक्वचन की विवक्षा में सकार को रेन्व-विमग करन से 'करभोरू' प्रयोग मिद्ध हो जाता है। इसीप्रकार--रम्भोर क्दलीम्नम्मोर गजनामोरू आदि प्रयोग ममझने चाहिाँ। रघुवश (६८३) म 'वरभोपमोल २ पद का प्रयोग अशुद्ध है इम के स्थान पर 'करभोपमोर' होना चाहिये । करभ उपमा ययोस्तो करभोपमो, करभोपमो ऊरू यस्या मा करभोपमोर । यहा बहुव्रीहिममास म 'करभ' उपमान तो है पर पूर्वपद नहीं (पूर्वपद तो 'करभोपम' है), अत प्रकृतसूत्र से द न होगा। इसीप्रकार-उपमान पूर्वपद न होने मे 'सुन्दरौ ऊ यम्या ना सुदरोस् पीवगै यम्या मा पीवरोर' वत्ती ऊस यम्या मा वृत्तोर' इत्यादियो म उ न हागा । यदि उत्तरपद म केवल ऊ' शब्द न हो कर ऊवन्त कुछ और होगा तो भी उ न होगा । यथा-स्वामिन अरू स्वाम्यूर, हस्तिन इव स्वाम्यूरू यस्या मा हस्ति- म्वाम्यूर । उत्तरपद मे ' न हो कर 'स्वाम्यूर' है अन ऊड् प्रत्यय नहीं होना । १ मणिबन्धाद् आकनिष्ठ करस्य करभो बहिर्- इत्यमर । 'परभ' शब्द हाथी या अंट के बच्चे के लिये भी प्रसिद्ध है । यदि यह अथ होगा तो 'उष्ट्रमुख' की तरह ममाम होगा । तथाहि-करभस्य 7 करभान । करभोर इव ऊस यम्या सा= करभोम् । इस दशा म सप्तम्युपमानपूर्वपदस्योतरपदलोपश्च (वा०) इस वात्तिर में बहवीहिममाम होगा। २ सा चूर्णगौर रघुन दनस्य धात्रीक्राम्या करभोपमोरू । आसज्जयामास ययाप्रदेश कण्ठे गुण मूतमिवानुरागम ॥ (रघु० ६८३) ३ कुमारसम्भव (८ ३६) मे कालिदाम ने 'पोवरोरु । पिवतीव बहिण' इमप्रकार 'पोरोम्' शब्द के सम्बोधन मे अम्बार्यनद्योह्रस्व (१६५) सूत्र प्रवृत्त कर जा पीदराम्' प्रयाग क्यिा है वह पाणिनीरव्याकरण की दृष्टि में ठीक नहीं है । यहा उपमानपूवपद न होने मे का विधान मम्भव नहीं। [अथवा-सज्ञापूर्वको विधिरनित्य इत्याधिष ह्रस्वस्य गुण (१६९) इत्वम्याध्यदने क्यञ्चित्ममा- धेयोऽयम्प्रयोग]। ५ इम सूत्र के अर्थ का वैयाकरणा म ऋमिर विकास हुआ है । दिशेपजिज्ञामु इस क लिये लेखक के सुप्रसिद्ध गोधप्रवन्ध्र न्यासपोलोचन (२३०) का जवलोकन करे। ल०५० (६) ८२ भंमीच्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या अब पूर्वपद उपमानवाची न होने पर भी ऊरूत्तरपद से अग्निमसूत्रद्वारा अट प्रत्यय का विधान करते हैं- [लघु०] विधि-सूत्रम्-- (१२७४) सहित-शफ-लक्षण-वामादेश्च ।४।१७०॥ अनौपम्यायं सूत्रम् । सहितोस् । शफोरू । वामोर ॥ अयं-महित (सश्लिष्ट, जुदा हुआ, मटा हुआ), शफ (खुर), लक्षण (लक्षणवान, सुलक्षण), वाम (अतिसुन्दर)-इन मे में कोई जिस का पूर्वपद तथा 'ऊर' शन्द जिम का उत्तरपद हो तो ऐसे समस्त प्रातिपदिक से स्त्रीत्व की विवक्षा में ऊद् प्रत्यय हो। उपमानवाची पूर्वपद न होने के कारण पूर्वमूत्रद्वारा ऊ प्राप्त न था जत प्रकृतसूत्र से विधान किया जा रहा है । ध्याख्या-सहित-शफ-लक्षण-वामाद ।५।११ च इत्यव्ययपदम् । अरूत्तरपदात् १५॥१॥ (ऊरुत्तरपदादौपम्य सूत्र मे) । अड् ।१।१। (अडत मूत्र में)। प्रातिपदिकात्, स्त्रियाम्, प्रत्यय , परश्च-ये मब पूर्वन अधिकृत हैं । ममाम ---महितश्च शपश्च लक्षणश्च वामश्च सहित-शफ-लक्षण-वामा , सहित-शफ-लक्षण-वामा आदय (याद्य- वयवा ) यस्य स =सहित-शफ-लक्षण-वामादि , तस्मात् = महितशफ्लक्षणवामादे , दद- गर्भबहुव्रीहिममास । अर्थ -(महित-शफ-तक्षण-वामादे ) महित, शफ, लक्षण वाम- आदि वाले तथा (अरूत्तरपदात्) ऊरु-उत्तरपद वाले (प्रातिपदिकात्) प्रातिपदिक स परे (स्नियाम्) स्त्रीत्व की विवक्षा म (ऊ. प्रत्यय ) ऊद प्रत्यय हो जाता है। प्रमश उदाहरण यथा- सहितौ अरू यस्या सा= =सहितोरू (सश्लिष्ट अर्थात् परस्पर सटे हुए पट्टो वाली स्त्री) । यहा 'सहित औ+ऊरु औ' इस अलोक्किविग्रह में अन्यपद के अथ में अनेकमन्यपदायें (९६६) से बहुव्रीहिममास हो सुब्लुक् कर गुण करने से 'महितोर' प्रातिपदिक निष्पन्न होता है। इस से स्त्रीत्व को विवक्षा म प्रकृन सहित-शफ-लक्षण- वामावेश्च (१२७४) सूत्रद्वारा कड् प्रत्यय हो सवर्णदीप कर पूर्ववत् प्रथमा के एरवचन मे सुं प्रत्यय के सकार को रत्व-विसर्ग करन पर 'सहितो' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । इसीप्रकार- शो (खुरी) ऊरू यस्या सा शफोरू (सुर हैं कर जिस के, अर्थात् खुरो की । १ खुरवाची शफशब्द अमरकोप मे शफ क्लोमे खुर पुमान् इम प्रकार नपुसकलिङ्ग माना गया है। परतु लोर मे यह पुलिग भी देखा जाता है । अत एव हेमचन्द्र में अपने कोष म शम खुरे गवाटीना मूले विपिनामपि इस प्रकार इस पुस्त्व मे प्रयुक्त किया है। प्राम्यपशुसवतरणेषु पो (१२७३) सूत्र की व्याख्या म पदमञ्जरी मे इसे पुलिङ्ग प्रयुक्त किया गया है। राय ने अपने वोप में भी इस की पुन्नपुसकता वही है।
स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् तरह मश्लिष्ट पट्टो वाली स्त्री)। यहा भी पूर्ववत् बहुव्रीहिसमाम मे मादृश्य के कारण ऊरनो मे खुरत्व का आरोप किया गया है, जन उपमानवाचिपूर्वपद न होने से पूर्वमूत्र- द्वारा ऊद् प्रत्यय प्राप्त न था । सूत्रगत 'लक्षण' शब्द अर्शआदिम्योऽच (१९९५) से प्राशस्त्य अर्थ में मत्वर्थीय अच् प्रत्यय करने से निप्पन हुआ है। प्रशस्त लक्षणम् अस्त्यस्येति लक्षण (शुभलक्षण वाला)। लक्षणी (शुभलक्षणवन्नौ) ऊर यस्या मा = लक्षणोरू (शुभलक्षणयुक्त पट्टो वाली स्त्री)। पूर्ववत् बहुव्रीहिसमास में ऊद् हो गया है । वामशब्द अतिसुन्दर अर्थ मे त्रिलिङ्गी है'। वामौ = अतिसुन्दरौ अरु यस्या मा =वामोरू (अतिसुन्दर पट्टो वाली स्त्री)२। पूर्ववत् बहुव्रीहिममाम मे मन्लुक हो कर ऊड हो गया है। जब डीन् प्रत्यय का अग्रिमसून मे विधान करते है- [लघु०] विधि-सूत्रम् -- (१२७५) शार्गरवाद्यजो डीन् ।४।११७३॥ शागरवादेरञो योऽकारस्तदन्नाच्च जानिवाचिनो डोन् स्यात् । शाड्गरवी । बैदी । ब्राह्मणी ॥ अर्थ-शागरव जादि गणपठिन प्रातिपदिक मे तथा अञ् प्रत्यय का जो अकार तदत जातिवाचक प्रातिपदिक में स्त्रीत्व की विवक्षा म डीन् प्रत्यय हो । व्यात्या-शागरवादि ।।३। (लुप्तपञ्चम्यन्त पृथक्पदम्) । अन्न १६।११ डीन् ।१।१५ जाते ।।१। (जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् सून से)। अत , प्रातिपदिकात्, स्त्रियाम्, प्रत्यय , परश्च-ये सब पूर्वत अधिकृत है । 'अन' इस पष्ठयन्त का अन्वय 'अत' के माथ होता है । किञ्च "प्रातिपदिकात' का विशेषण होने स 'अत' से नदलविधि हो जाती है । 'अत्रो योऽत्, तदन्नाद् जातिवाचिन प्रातिपदिकात्' ऐसा अथ निष्पन्न हो जाता है । अर्थ-(शाङ्गग्वादे ) शाङ्गरव आदि गण मे पडे प्रातिपदिक मे तथा (अत्र ) अन् प्रत्यय का जो (अत) अत् तदन्त (जाते प्रानिपदिकात्) जातिवाचक प्रातिपदिक मे (स्त्रियाम्) स्त्रीत्व की विवक्षा मे (डोन) दीन् प्रत्यय हो जाता है।' टीन् मे डकार और नकार इत्मज्ञा हो कर लुप्त हो जाते है, 'ई' मात्र शेप रहता है। दोन्प्रत्ययान्न शब्द नित्यादिनित्यम (६ १ १६१) मूत्रद्वारा आद्युदात्त होत - १ वाम सन्पे प्रतोपे च द्रविणे चातिसुन्दरे-इति विश्व । २ तदिद विषहिष्यते कय वद वामोर । चिताधिरोहणम्-(रघु० ८५७)। हे वामोर । सम्बुद्धौ अम्बार्यनद्योहस्व (१६५) इति ह्रस्व । ३ 'जाते' का सम्बध यथासम्भव 'शाइगरवादि' में भी कर लेना चाहिये । इस म शाइगरवादियो से विहित यह डीन जातिलक्षण हीप का ही अपवाद होगा, पुयोग मे होने वाले डीप का नही । अत एव 'शारिवस्य स्नो' इस प्रकार पुयोग को विवक्षा में पुयोगादास्यायाम् (१२६१) मे डीप ही होता है डीन नहीं ।
भैमोव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या अन् हैं जबकि दोषप्रत्ययान्त शब्द प्रययस्वर मे जन्तोदात्त, यही डोन् और टीप करने म अन्तर होता है। उदाहरण यथा- शृङ्गरोरपत्य स्त्री शाड्गरवी (शृङ्गर की लडकी) । शृङ्गर नामक कोई व्यक्ति है । तद्वाचक 'शृङ्गर' शब्द से तस्यापत्यम् (१००४) के अथ मै अण् प्रत्यय, आदिवृद्धि, ओर्गुण (१००५) मूत्र से उकार को ओकार गुण एवम् एचोऽयवायाव (२२) से ओकार को आदेश हो कर 'शाडगरव' प्रातिपदिक निप्पन्न होता है । गोत्रञ्च चरण सह के अनुसार अपत्यप्रत्ययान्त होने से यह जातिवाचक है, अत स्त्रीत्व को विवक्षा म जातेरस्त्रीविषयादयोपचात् (१२६६) सूत्रद्वारा प्राप्त दीप का वाघ कर प्रवृत शाड्नरवाद्यत्रो डीन् (१२७५) सूत्र मे इस मे परे डीन् प्रत्यय हो कर अनुव घलाप करने से 'शार्गरव+ई' हुआ । अब यस्येति च (२३६) से भसज्ञक अकार का लोप कर विभक्तिकार्य करने से 'शार्गरवी' प्रयाग सिद्ध हो जाता है । इसीप्रकार 'ब्राह्मण' शब्द शागरवादियो के अन्तगत पढा गया है। यह लिङ्गाना च न सर्वभाक् । सकृदाख्यातनिर्माह्या के अनुसार जातिवाचा है' । अत इस में भी पूर्ववत् प्राप्त जातिलपण डीप का वाध कर प्रकृतसूत्र मे डीन् प्रत्यय कर भसज्ञक अकार का लोप तथा विभक्तिकार्य करने से 'ब्राह्माणी' प्रयाग सिद्ध हो जाता है। याद रह कि 'ब्राह्मणी' म जातिलक्षण टीप करना अशुद्ध है। अज् का जो अकार तदन्त जातिवाचक का उदाहरण यथा- विदस्य गोत्रापत्य स्नी वैदी (विदनामक व्यक्ति की गोत्रापत्य लडकी)। यहा 'विद' से गोनापत्य अथ में अनुष्यान त बिदादिभ्योऽत्र (१०१६) सूत्र से अन् प्रत्यय, आदिवृद्धि एव भसज्ञक अकार वा लोप कर 'बंद' शब्द निप्पन्न होता है । यहा अञ् का जो अकार तदन्त प्रातिपदिक 'बंद' है ही। अपत्यप्रत्ययान्त होने मे गोत्र च चरण सह के अनुसार यह जातिवाचक भी है। जत स्त्रीत्व की विवक्षा मे जाते रस्त्रीविषयाद- योपधात् (१२६६) सूत्र में प्राप्त जातिलभण डीप का वाध कर प्रकृतमूत्र मे डीन प्रत्यय, अनुबन्धलोप तथा भमज्ञक कार का लोप कर विभक्तिकाय करन में 'बंदी' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। १ अथवा ब्रह्मणोऽपत्य ब्राह्मण (तस्यापत्यम् (१००४) इत्यण, अन् (१०२४) इति टिलोपो न] इस प्रकार उपत्यप्रत्ययान होने के कारण गोन च चरणं सह के अनु- मार जातिवाचक है। २ अनन्त जातिवाचर म डीन् हो-ऐमा मोधा मरल अर्थ न कर के 'अन का जो कार तदन्त जातिवाचर में टीन हो' इस प्रकार का अर्थ करना तथा मूत्र के मीधे 'शादर्गरवाद्यन' पद मे 'शाङ्गरवादि' को लुप्तपञ्चम्यन्त तया 'अन' को पप्ठ्यन्न मान कर उपर्यस्त झमेलो मे भरे अयं करने की यहा आवश्यक्ता ही स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् जब शारवादिगण के जन्तगत एक गणमूर का निर्देश करते हैं-- [लघु०] गणमूनम् -नृनरयोवृद्धिश्च ॥ नारी ॥ अर्थ -न और नर इन दो जातिवाचक प्रातिपदिका मे पर स्त्रीत्व की विवक्षा में डीन् प्रत्यय तथा इस के माथ नृ और नर शब्दा को वृद्धि भी हो जाती है। व्याख्या-यह गणसून शाड्ग रवादिया म पटा गया हे अत डीविषयक ही ममझना चाह्यि । नृ (मनुष्य) शब्द आकृतिग्रहणा जाति के अनुसार जातिवाचक है। परन्तु अदन्न न होन स इम म जातेरस्त्रीविषयादयोपधात (१२६८) द्वारा स्त्रीत्व में डोप प्राप्त नही, ऋन्नेभ्यो डीप् (२३२) म टोप ही प्राप्त है। इसी तरह 'नर' शब्द भी जानिवाचक है परन्तु उदन्न होने म यहा जातेरस्त्रोविषयादयोपधात् (१२६६) म डीप प्राप्त है । इन दानो का अपवाद यह टीन् प्रत्यय विधान किया जा रहा है किञ्च टीन के माथ इन प्रातिपदिको म वृद्धि का विधान भी हा रहा है । नृशब्द का उदाहरण यथा- 'न' शब्द मे स्त्रीत्व की विवक्षा म शागिरवादिगणानगत ननरयोवृद्धिश्च इस गणमूत्र से डीन् प्रत्यय तथा 'नृ' के इक्-ऋकार को वृद्धि (आर्) हो कर विभक्निकाय करन म 'नारी' (स्त्री) प्रयोग सिद्ध हो जाता है । क्या है ? यह शवा प्रबुद्ध जिज्ञासुमो के मन मे वार बार उठा करती है । इस का प्रयोजन ममझने के लिये 'शूरमेनी' उदाहरण को समझना होगा। शूरसेनस्यापत्य म्त्री शूरमेनी (शूरसेन की मन्तान लड़की)। यहा शूग्सन' से अपत्य अर्थ मे जनपद- शब्दात् क्षतिपादन (१०२८) सूत्र में अन् प्रत्यर हो कर अतश्च (४११७५) मून मे उम का लक हो जाता है-~-शूरसेन । जब स्नीत्व की विवक्षा म इम मे परे प्रत्यय करना है। यदि प्रकृतसूत्र का मोधा मरन शाझरवादिया तथा अन्- प्रत्ययान्त जातिवाचको से टीन् हो इस प्रकार का अर्थ करते हैं तो यहा भी प्रत्ययलक्षणद्वारा जन्त मान लेन स दीन् प्रत्यय की प्राप्ति होने लगती है जो अनिष्ट है। परन्तु उपयुक्त अथ करने मे 'जअ का जो अकार तदन्त जातिवाचक मे डीन् हो इस प्रकार अन् के कार के न रहन मे यहा दीन् नहीं होता । सकार को प्रत्ययलक्षण म भी नहीं माना जा मकना-वर्णाश्रये नास्ति प्रत्ययलक्षणम् । जब जातेरस्त्रीविषयादयोपधात (१२६९) सूत्र म टीप हो कर 'श्रमेनी' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। ध्यान रहे कि यदि टोन् क्यिा गया होता ता 'शूरमेनी' मे आद्युदात्त स्वर होता जो अब डीपन्न होने से अन्नोदात्तस्वर होता है । १ यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता । यत्रतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला त्रिया ॥ (मनु० ३ ५६) नाना नारी निष्फला लोक्यात्रा (गणल्न०) विना स्त्री के लोक्यात्रा निष्पल - ८६ भमाथ्याव्यांना लगिद्धान्दकोन्दा इसीप्रसार 'नर' प्रातिपदिर में स्त्रोत्र में विवा में ननरपोई दिरच दन उपसूत्र ने छीन् प्रपर हो रनर+ई । अदइनी नूत्र ने जोयारिभाषा 'नर' में अन्य अगर को दृद्धि (आ) प्राप्त होती है और हर यस्पैनि च (६) त्रद्वारा उन अगर मा लोन प्राप्त होता है । वागांदाङ्ग दनोर (सिवनी मां में अङ्गनन्दन्धी कार्य दलदान् हाता है) इन परिभाषा अनुवार उदनन्दी का अर्थात् मन अकार का नोर हो जाता है-न-ई। जद यहा लास्कियो । अनुरोध ने अथदा बान्नलम्प ने नर्' के नगरोत्तर जगार का ही वृद्धि का हाक विभक्तिकार्य करने में नारी (मनुष्यजानि की न्त्री) प्रभाग निद्ध हो जाता है । 'ना' प्रयोग 'न' मन्द ने ही निद हो जाना है पुनरपि नर पद - जानि- लक्षण डीप हो कर कही 'नरी न बन गये तिर नरमन न मी नार्ग बनाया या है। यहा गतिलभप दीन्ह पो न पुयोगदाग्यायान (१०) मना टीप होगा ही-नगन्य स्त्री नगे (पन्नी)। नृाद ने पुमान टीप नहीं होता कानि व अदन नहीं। जब नि' प्रत्यय का विधान जन- [लघु०] दिधि-मूत्रम्-(१२७६) यूनम्ति 1८1१२७७॥ युवन्मन्दान स्त्रिया नि प्रत्यय स्यात् । युवति । -युदनशब्द म स्त्रीत्व की विदक्षा म नि प्रत्यय हो । , कई वचा पा का कथन है वि स वात्तिक म ही लुप्त अवार नरब्द (नक नागेनर प्रकार का ही वृद्धि करन का स्पष्ट उल्लेत ह । दे ला वानिक न नृनरया' पद की व्याख्या इन प्रकार ग्ते हैं- नग्गन्द का पप्पैकवचन दनमा--नर (नन्द का)। नरब = नर पटीत पुरष अय हागा-नर का य । नृन्द का प्रथमवचन 'ना' बनता है। ना च नर. च- नृनरी नयो =ननरया द्वन्दनमान 1 नृगब्द वे न्यान पर नया नर्दन अकार व म्यान पर बृद्धि हा–दम प्रकार वात्तिक का अप हा आया। नृपः के म्यान पर होने वाली वृद्धि इको गुणवृद्धी (११३) परिभाषा के अनुसार नृशन्द व ऋकार को ही होगी। २ शारदादिया था- गाडाग्य । कापटव । गौलव । बाण । गौतम कामालद। दाहारनेर। जानिय। जानिराशाय । दाम्यायन । मौनापन । वामय गव्य । व्य । एहि । पहि । आश्मरथ्य । औदान । अरार। चम्डात । बनर। भोगवद्गोरिमतो मनायाम्-भोवती, गोरिमनी । ननरयोवंदिश्च नार्ग। इस गप का दिवचन कामिका, पदोस्तुभ आदि में देखें। अथ- स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् व्याख्या-यून ।।१। ति ११ स्त्रियान, तद्धिता, प्रत्यय , पररच-ये मन पूबत अधिकृत हैं । जर्य – (यून ) युवन् प्रातिपदिन में (बिमान) स्त्रोच की विवक्षा में (नि) ति (प्रत्यय) प्रत्या हाता है और वह (तद्धित) तद्धितसना होता है। उदाहरण यथा- युदन (जवान) प्रातिपदिक म म्नीत्व की विवज्ञा म प्रकृत यूनस्ति (१२७६) मन में नदिनमज्ञक ति प्रत्यय हो का युवन् +नि हुआ। अब स्वादिष्वमर्वनाम- स्थाने (१६४) म निप्रत्यर के पर रहते युवन् की पदमज्ञा हो न लोप प्रातिपदिकाम्नस्य (१८०) मे उम के अन्य नका का लाप हा नाता है-युवति । तद्धितान्न होने के कारण कृत्तद्धितममामाश्च (११७) द्वाग प्रातिपदिकमना हो कर अब 'युवति' में स्वादिया की उत्पत्ति हाती है । प्रथमा ३ वचन की विवभा में में प्रय ला कर मकार को मन्ब जोर रेफ का विमग आदेश कग्न म युवति' (जवान म्पी) प्रयोग मिद्ध हो जाता है। प्रकृतस्त्र अनुपमजनात् (४१ १४) के अधिकार म पहा गया है अन बहुब्रीहि- ममाम म जब युवाद उपमर्जन हाता है तब इस मूत्र की प्रवृत्ति नहीं होती-बहना युबानो यन्या मा बहुयुवा नगरी । १ डमा प्रातिपदिकात (११६) इन अधिकार के कारण सु आदिवा की उत्पनि डा और जाप् मे तो हा नाती है पर निम वान्न में नहीं इसलिय प्रकृन म 'ति प्रय की नद्धिनमना की गई है रिम से तद्धिनान्न की कृतद्धितसमानारच (१७) से प्रातिपदिकमज्ञा हो कर उन से स्वादिया की उत्पत्ति हा मरे । परन्तु यह प्रयोजन लिगविशिष्टपरिभाषा में भी सिद्ध हो सकता है जैसाकि ऊझरवानी म प्रातिपदिकमज्ञा हो कर स्वादिया की उत्पत्ति हुवा करती है। जन यहा नि' मी तद्धिननना करना निष्प्रचाजन मा प्रतीत होता है। नदिमज्ञा का उप अष्टाध्यायी में आग किया जाना उचित है । शायद इसी विचार से प्रेरित हा कर लघुमिद्धान्तकौमुदाकार बन्दराज न यहा दृनि (मूत्राय) म तिप्रत्यय की तदिनमहा का काई उल्लन्न नहीं किया। २ युवतिजनश्यामूरभाव परेपाम् । (नोनिगना ५4) पान्त्येव गृहिलोपद युवनयो वामा कुलम्याथय । (गानन ४१८) ३ 'ति' में मुक्त हान पर ऋलेन्यो होर (२३२) मे ङी प्राप्त हाता है। उस का अनो बहुदोहे (४१ १२) में निषेत्र हो जाता है । पुन डावुमान्याम पतरस्याम् (४१ १३) मुत्रद्वारा विकल्प मे डाम् प्रत्यय हो जाता है। डापास में हित्त्व में कारण टि का लाल हो जाता है। पक्षान्तर में राजशब्दवन प्रक्रिया हाती है। श्यमवचन में रूस दोनो पना का एक का बनना है-बहुयुवा (नारो)।
८८ भोव्याच्ययापनाया लघुसिद्धान्तकौमुद्या कही कही साहित्य मे 'युवनी ऐमा दोघघटित प्रयोग भी दृष्टिगोचर होता है।' वहा 'युवनि' शब्द से सर्वतोऽक्तिन्नांदित्यक (गणमूत्र) मे लोप प्रत्यय पर भमञ्जा इकार का यस्येति च (२३६) से लोप करने पर युवती शन्द की मिद्धि समयनी चाहिये । जथवा-यू मिश्रणाऽमिश्रणयो (अदा० प०) धातु के शान्त युवन्' म्प में उगितश्च (१२५०) द्वारा डीप कर विभक्ति लान में युवती' प्रयाग निष्पन्न हो जाता है । यौनि=मिधीकरोति आत्मान पत्यति युवनी। म्त्रीप्रत्ययप्रकरण के कुछ अन्य उपयागी मृत्र एव वात्तिक व्युत्पन्न विद्याथिया की ज्ञानवृद्धि के लिये यहा मक्षेप मे मादाहरण प्रस्तुत क्यि आ रह है-- (१) वनो र च ।४।१७॥ अर्थ -वन्प्रत्ययान्न प्रातिपदिर से परे म्नीन्त्र की विवक्षा म टोप् प्रयय नया इम के माथ वन के नकार को रफ आदग भी हा जाता है। डीप तो ऋन्लेम्यो डीप (२३२) न प्राप्त था वन् नकार बारफ आदश विधान करने के लिये ही यह मूत्र बनाया गया है। उदाहरण यया-- पारदृश्वन-पारदृश्वरी (जा पार का दख चुकी है पारगता। शास्त्रदृश्वन-शास्त्रदृश्वरी (शाम्ना को ज्ञाता स्त्री)। राजकृत्वन्–राजकृत्वरी (राजा को बनान वाली म्बी)।' महत्वन-सहकृत्वरी (माथ कर चुवी स्नी)।' प्रातरित्वन्-प्रातरित्वरी (प्रात काल जान वाली स्त्री)।' पीवन्-पीवरी (म्यूला स्त्री रक्षा करने वाली)। १ न सोऽस्ति पुरुषो लोके यो न कामयते श्रियम् । परस्य युवती रम्या सादर नेक्षतेन च ॥ (हिताप० २ १३१) २ पार दृष्टवतीति पारदृश्वरी। शास्त्र दृष्टवतीनि शास्त्रदृश्वरी। बुशे ववर्ति (८०८) मूत्रद्वारा इन म क्वनिप् प्रत्यय किया गया है। मम्पूण मिदि इसी मूत्र (८०८) पर लिख चुके है वहीं देखें । : राजान कृतवतीति गजकृत्वरी । राजनि युधि-वृत (८०६) मूत्रद्वारा कृ' धातु म क्वनिप् प्रत्यय हो कर तुक् का जागम (७७७) हो जाता है । ४ मह कृतवतीनि सहकृत्वरी । सहे च (८१०) सूत्र में क्वनि प्रयय हो जाता है । तुद का जागम पूर्ववत् समझना चाहिये । ५ प्रातर् एति (गच्छति) इति प्रातरित्वरी । प्रातरपूर्वक इण् गतो (अदा० परस्म०) धातु म अन्येम्योऽपि दृश्यन्ते (७६६) मूत्र में क्वनिप् प्रत्यय हो कर तुंर का आगम हो जाता है। ६ प्यड वृद्धी (भ्वा० आत्मन०) । ध्याप्यो सम्प्रसारण च (टणा. ४११६) इति क्वनिपि सम्प्रसारणम्, हल (८१६) इति दीर्घ ।
स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् ८६ धीवन-गीवरी (ध्यान करने वाली)।' मुत्वन्-सुत्वरी (निचोडने वाली)। इस मूत्र की प्रवृत्ति वन्नन्तान में भी हाती है। यथा [-~-धीवानम् अतिक्रान्ता-अनिधीवरी । अनिपीवर्ग । (२) वा०-वनो न हश इति वक्तव्यम् ॥ अर्थ -- यदि हशन्न धातु से वन्प्रन्यय विधान किया गया हो तो उम बन्नन्न प्रातिपदिक में स्त्रीत्व की विवक्षा में डीप् + रत्व नही होता । उदाहरण यथा- राजयुध्वन्-राजयुध्वा, राजयुध्वानों, राजयुध्वान ।' महयुध्वन्—मत्युध्वा, महयुध्वानो सयुध्वान ।' अबावन्-~-जवावा ब्राह्मणी (चुरान वाली ब्राह्मणी)। (३) पादोऽन्यतरस्याम् ।४।१८॥ अर्थ-पाद' शब्द जिम के अन्त म हा ऐम प्रातिपदिा म पर नीत्व' की विवक्षा मे विकल्प से दीप हो । अप्राप्ति मे टीप का विधान किया गया है । उदाहरण यथा- १ घ्य चितायाम् (भ्वा० परस्मै०) । पूर्ववत् क्वनिपि मम्प्रमारणे हल (८१६) इति दीर्घत्वम् । २ पुत्र अभिषये (म्त्रा० उभय०)। सुयजोड वनिप (३ २ १०३) इनि इवनिपि तुंगागम (७७७)। ३ राजान योधिवतीति राजयुध्वा । राजनि युधिकृत (८०६) मूत्र पर इस की सिद्धि । मह युद्धवतीति सहयुध्वा । सहे च (८१०) मून पर इस की सिद्धि देखे । । ओ अपनयने (म्वा० परस्मै०) धातु से अन्येभ्योऽपि वृश्यन्ते (७६६) सूत्रद्वारा वनिप् प्रत्यय कर विड्वनोरनुनासिकस्यात् (८०१) से णकार का आकार तथा एचोऽयवायाव (२२) से ओकार को अव आदेश करने पर 'अवावन्' शब्द निष्पन्न होता है । यहा प्रकृतवात्तिकद्वारा डी+रत्व का निषेध हा कर स्त्रीलिङ्ग से भी पुलिङ्गवत् 'अवावा' प्रयोग बनता है। परन्तु न्यासकार प्रकृतवात्तिक का क्वाचित मान वर यहा पर भी डीप+रत्व का विधान मानते हैं--अवावरी । साहित्य मे ऐमे प्रयोग देखे भी जाते हैं- अवावरों धीतिमिरस्य पोवरी ससारसिन्धो परमार्थदृश्वरीम् । सुधीवरी सत्पुरुषार्थसम्पदा नमामि भक्त्या परया सरस्वतीम् ।। (लोगा. गृ० मूत्र की टीवारम्भ) भमोव्याय्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या मु (शोभनौ) पादौ यस्या मा सुपदी सुपाद् वा (सुन्दर पैरो वाली)। द्वी पादौ यस्या मा द्विपदी द्विपाद वा (दौ पैरो वाली)। त्रय पादा यस्या मा त्रिपदी त्रिपाद् वा (तीन पैरो वाली)। चत्वार पादा यस्या मा चतुष्पदी चतुष्पाद वा (चार पैरो वाली)। बहुव्रीहिममाम मे सल्यासुपूर्वस्य (९७५) सून से पादशब्द के अन्त्य जकार का ममासान्त लोप हो जाता है। तब प्रकृतसून से वैकल्पिक डीप करने पर डीप्पक्ष में भसज्ञा हो कर पाद पत् (३३३) मूत्र में भसज्ञक 'पाद' को 'पद्' आदेश हो जाता है। डीप् के अभाव मे भमज्ञा न होने से पद् आदेश नहीं होता-मुपाद् । इन स्पो की मिद्धि ममासप्रकरण मे (९७५) सूर पर देखे । (४) मन ।४।१।११॥ अर्थ ----'मन्' जिम के अन्त मे हा उम प्रातिपदिक से पर स्त्रीत्व की विवक्षा में डीप् प्रत्यय नहीं होता। 'मन्' चाह साथक हो या निरथक दोनो का यहा ग्रहण हो जाता है।' उदाहरण यथा- दामन् (रस्मी)-दामा, दामानौ, दामान । पामन् (खुजली)-पामा, पामानो, पामान । सीमन् (सीमा-हद्द)-सीमा, सीमानी, सीमान । जतिमहिमन्-अतिमहिमा, अतिमहिमानी, अतिमहिमान । (५) अनो बहुवोहे ।४।१।१२॥ अर्थ – 'अन्' जिस के अन्त मे हो उम बहुव्रीहि स स्त्रीत्व की विवक्षा म डीप प्रत्यय नही होता । उदाहरण यथा- शोभन चम यस्या सा सुचर्मा मृगी । सुचर्माणौ, सुचर्माण । शाभनानि पर्वाणि यस्मा सा सुपर्वा यष्टि । सुपर्वाणो, सुपर्वाण । बहवो यज्वानो यस्या सा बहुयज्वा नगरी । बहुयज्वानो, बहुयज्वान । (६) डाबुभाभ्यामन्यतरस्याम् ।४।१।१३॥ अर्थ-पूर्वोक्त मन्नन्तो तथा उन्नन्तबहुव्रीहि म स्त्रीत्व को विवक्षा म एव पक्ष म डाप् प्रत्यय भी हो जाता है । डाप् (आ) करने पर टे (२४२) सूत्र से मसज्ञक टि का लाप हा जाता है। डाप के अभाव में पूर्वोक्त निषेधो के कारण नान्त रूप ही रहगे । उदाहरण यथा- (मन्नन्तो से) १ अनिनस्मन्महणान्यर्यवता चाऽनयंकेन च सदन्तविधि प्रयोजयन्ति (प.)। इस परिभाषा की व्याख्या (२८७) सूत्र पर देखें। २ महिमानम् अतिक्रान्ता-अतिमहिमा देवी । अत्यादय माताघ द्वितीयया (वा. ५६) इति समास । 'महिमन्'शब्द इमनिचप्रत्ययान्त पुलिङ्ग ।
स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् दामन्+डाप-दामन् दा= दाम् +जा= दामा, दाम, दामा । पामन् + डाप्पामन् + आ =पाम् + आ =पामा, पामे, पामा । सोमन्+डाप् -मीमन् +आमोम आ-सीमा, मीमे मोमा । अतिमहिमन् + टाप् = अतिमह्मिन + आ = जतिमहिम् + जा-अतिमहिमा, अतिमहिमे, जतिमहिमा । अन्नन्त बहुव्रीहि स भी- मुचमन-+दाप् = सुचमन्+ला=सुचम् +आमुचर्मा मुच, मुचर्मा । सुपवन् +डाप् = सुपर्वन् + ना=मुपद -आ = सुपवा, सुपर्वे सुपर्वा । बहुयज्वन् +टाप-बहुयज्वन् + आ = बहुयज्व+जावयज्दा, बहुयग्व, बहुयज्वा । (७) अन उपधालोपिनोऽन्यतरस्याम् ।४।१।२८॥ अर्थ-जिस की उपधा का लोप हाना हो ऐमे जन्नन्न बहुव्रीहि मे स्त्रीत्व की विवक्षा मे दीप् प्रत्यय विकल्प मे हाता है । पक्ष म डाप् तथा पनिपेव प्रवृत्त हागे । उदाहरण यथा- 'बहवो राजानो यस्या सा' इम बहुव्रीहिलमास में सुपा का लुक् हा वर 'बहु- राजन्' इम अवस्था में स्त्रीत्व के विवक्षित होने पर प्रकृतसूत्र म वैकल्पिक डीप हा जाता है। डीप्पक्ष मे-बहुराजन दीप् = बहुराजन् + ई । जब यचि मम् (१६५) स भसज्ञा हो कर अल्लोपोन (०४७) में जन् के अवार का लोप हा जाता है-बहुराज्न् +ई। स्तो रचुना श्च (६२) द्वारा श्चुत्व स नकार को नकार कर विभक्ति लाने में 'बहुराज्ञी' प्रयोग मिद्ध हो जाता है। बहुराज्ञो, बहुराज्यो, बहुराज्य । नदीवत् रूपमाला चलेगी। पक्ष म डावुभाभ्यामन्यतरस्याम (४१ १३) स डाप् प्रत्यय हा जाता है- वहुराजन् +डाप् = बहुराजन् + आ । दे (२०२) सूत्र स भसज्ञक टि का लोप हा कर -~बहुराज् + आ ='बहुराजा' यह आवन शब्द सिद्ध हो जाता है । वहुराजा, बहुराजे, बहुराजा । रमावत् रूपमाला चलेगी। डाप के अभावपक्ष मे अनो बहुव्रीहे (४११२) स झोप का निषेध रहगा । नब 'बहुराजन्' नवारान्न रहेगा, रूपमाला स्त्रीलिङ्ग में भी राजन्शन्द की तरह होगी -बहुराजा बहुराजानो, वहुराजान । (८) दाम-हायनान्ताच्च ।४।१।२७॥ अर्थ-मख्यावाचक जिम में आदि म हा तथा दामन या हायन शब्द जिस के जन्त म हो ऐसे समस्त प्रातिपदिक मे स्त्रीत्व को विवक्षा में डीप् प्रत्यय हो जाता है । उदाहरण यथा- द्वे दाम्नी यस्या सा द्विदाम्नी वडवा (दो रस्मिया वाली घोडी)। त्रीणि दामानि + ६२ भेमोव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या शब्द १ केवल पाप पापा यस्या सा त्रिदाम्नी बइवा (तीन रस्सिया वाली घोडी) । डीप् के पर रहते भसज्ञक अन् के अकार का अल्लोपोऽन (२४७) मे लोप हो जाता है। द्व हायने यस्या मा द्विहायनी बाला (दो वर्ष की लडकी)। बिहायणी। चतुर्हायणी। आयुवाचर 'हायन' शब्द ही का यहा ग्रहण भीप्ट है । निहायणी, चतुर्हायणी-इन म णत्व भी वयावाच्य होने पर ही इष्ट है । वयोवाच्य न होने पर दी और णत्व दोना नहीं होते । यथा-निहायना शाला चतुर्हायना शाला । टाप ही होता है। (8) केवल-माम-भागधेय-पापाऽपर-समाना_कृत-सुमङ्गल भैषजाच्च । ।४।१॥३०॥ अथवेदल, मामा, भागधेय, पाप, अपर, ममान, आर्यकृत, सुमगल और भेषज-इन नौ शब्दो म स्त्रीत्व की विवभा म नित्य डीप् प्रत्यय हा जाता है सजा या वेद में । अन्यत्र टाप् होगा। वेद या सजा में अमन लोक मे केवली केवला २ मामक मामवी मामिका ३ भागधेय भागधेयी भागधेया पापी उपरी समानी ७ जायकृत आयकृती जायकृता ६ सुमङ्गल मुमङ्गलोर मुमङ्गला ६ भेषज भपजी भेपजा (१०) वा०--पाणिगृहीती भार्यायाम ॥ अयं -यदि विधिवत् पाणिग्रहण किया गया हो ता उम स्नी का पाणिगृहीती (डीप्प्रत्ययान्त) कह्ना चाहिये अन्यथा पाणिगृहीता (टाप्प्रत्ययान्त)। १ कि तया श्यिते लक्ष्म्या या वधूरिव देवला । (पञ्च० २ १३०) २ सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृति यान्ति मामिकाम् । (गीता०६७) ३ स्त्रीरलष्टिरपरा प्रतिभाति मर मे । (शाकुन्नल २१०) ४ समानो मन्त्र समिति समानी समान मन सह चित्तमेषाम् । समान मन्त्रमभि मन्त्रपे व समानेन वो हविषा जुहोमि ।। (ऋग्वेद १० १६१३) ५ सुमङ्गलोरिय वधूरिमा समेत पायत । (ऋग्वेद १० ८५ ३३) ६ पाणिगू होतो यम्या (विधिवत्) सा पाणिगृहीती भार्या । यस्यास्तु कश्चित् पाणिर्ग ते सा पाणिगृहीता। ५ अपर अपरा ६ समान समाना स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम . (११) सत्यशिरवोति भाषायाम् । ४११॥६२॥ अयं -मखी और अशिश्वी ये दो हीपन्न प्रयोग स्त्रीरिग की विवक्षा में लौक्किमस्कृत म प्रयुक्त होते है। मखि (मित्र) शन्द मे स्त्रीत्व की विवक्षा म डीप् प्रत्यय कर भमनन दवार का लोप करने पर 'सखी' भन्द निप्पन होता है । सहेली को सही कहते है ।' आलि सखी वपस्या च--इत्यमर । अविद्यमान शिशुयंस्था मा अशिश्वी (अनप या मलतिरहिता म्नी)। यहा बहुव्रीहिममास में 'अशिशु मे टीप् प्रत्यय कर इको यणचि (१५) में उकार का वकार आदेश करने में 'अशिश्वी' निप्पन्न होता है । अशिश्वो शिशुना विना--दरमा । (१२) अतर्वत्पतिवतोर्नु क् ।४११॥३२॥ अर्य-अन्तर्वत् तथा पतिवत् प्रातिपदिरा को स्वीन्द की विवक्षा म नुन् का आगम हो जाता है। आद्यन्तो टक्तिी (८५) परिभाषा के अनुसार यह जागम अन्ना- वपद होता है । नब शन्दो के नान हा जाने में ऋन्नेम्यो डीप (२३२) म दीप हो जाता है। उदाहरण यथा--- अन्तर्वत् नुक+डीप अन्तवन्नी (मगर्भा स्त्री)। पतिवत् नक् +टीप्पतिवनी (जोपित पतिवाली स्त्री)। (१३) पत्युनों यज्ञसयोगे ।४।१॥३३॥ अर्य-स्त्रीत्व की विवक्षा म पनिगब्द के इकार को नकार आदेश हो जाता है १ गृहिणो सचिव मखी मिय प्रियशिष्या ललिते क्लाविधौ । करणाविमुखेन मृत्युना हरता त्वा वद दिन मे हतम ॥ (घु. ८६७) २ अन्तर+मतुप = जन्नत् । पहा अनर्गब्द अविकरण-शक्तिप्रधान अव्यय हे अत प्रधमान्न न होने से इस मे मतप की प्राप्ति न थी । उम का यहा निपातन समझना चाहिो । मतप के मकार को वत्व मादुपधायाश्च मनोर्दोऽयवादिम्य (१०६५) म हो जाता है। पनि + मनुप् पतिवत् । यहा मतुप तो प्राप्त है परन्तु वत्व नहीं उम का इस सून मे निपातन ममलना चाह्येि । ध्यान रहे कि अर्थविशेष में ही इन सूत्र की प्रवृत्ति हानी है। मगर्नी जय म 'जन्नवनी' का तथा जौदिनभर्तृका ये चर्य में पतिवन्नी' शब्द का प्रयाग हाता है । अन्नरस्त्यस्या गर्भ इत्यन्नवन्नी गभवती। आपन्नसत्त्वा स्याद् गदिश्यन्तर्वलो च गभिणी-इत्यमर । पतिरम्त्यस्या इनि पतिवत्लो जीवन्पनि । पतिवलो सनतका-इत्यमर ।
भंभोव्याख्ययोपेताया लघसिद्धान्तकौमुद्या यज्ञ के साथ मयोग गम्यमान हो तो। नकारादेश हो कर प्रातिपदिक नकारान्न हो जाता है तब ऋन्नेम्मो डीप (२३२) से डीप् प्रत्यय हो जाता है । पत्नी पति के साथ मिल कर यज्ञ की अधिकारिणी होती है और इस तरह यन के फ्ल की भी भोक्त्री होती है। उदाहरण यथा- यजमानस्य पत्नी। वसिष्ठस्य पत्नी अक्षमाला । याज्ञवल्क्यपत्नी मैत्रेयी । यज्ञसयोग गम्य न होने पर नहीं होता। यथा--ग्रामस्य पतिरिय ब्राह्मणो (यह ब्राह्मणी ग्राम की स्वामिनी है)। पत्नीव पन्नी-ऐमा औपचारिक प्रयोग भी होता है । यधा-वृपलम्य पत्नी । शद्रस्य पत्नी। (१४) विभाषा सपूर्वस्य ।४।१॥३४॥ अर्य-पूर्वपद से युक्त पतिशब्दान्न प्रातिपदिक को स्लीत्व की विवक्षा में विकल्प से नकारादेश होता है । जहा नकार आदेश होगा वहा ऋतन्यो डीप (२३२) में डीप होगा । नकार वे अभाव में वैसे का वैसा रूप रहेगा । उदाहरण यथा- गृहस्य पति -गृहपत्नी गृहपतिर्वा । मभाया पति-सभापत्नी सभापतिर्वा । बहुव्रीहिसमाम मे भी इस सून की प्रवृत्ति हो जाती है- वृद्ध पतिर्यस्या सा वृद्धपत्नी वृद्धपतिर्वा । जीवतीति जीव पचाद्यच् । जीव पनिरस्या इनि जीवपत्नी जीवपति। (१५) नित्य सपत्यादिषु ।।१॥३५॥ अर्थ --- मपल्ली आदि शब्दा की सिद्धि के लिये इकार के स्थान पर पूर्वोक्त नकार आदेश नित्य हो जाता है। पूर्वसूत्र मे विकल्प के प्राप्त होने पर इम मूत्र मे पित्य विधान कर रहे हैं। उदाहरण यथा- ममान पतिरस्या इति मपन्नों (ममान पनि वाली, सौत) । निपातन म ममान' को 'स' आदेश हो जाता है । इमीप्रकार-एक पनिरम्या इति एकपत्नी । वीरपत्नी । (१६) नासिकोदरोष्ठ-जधा-दत-कर्ण-शृङ्गाच्च ।४।१।५५॥ अर्य-नासिका, उदर, ओष्ठ, जड्या, दन्त, कर्ण और शह-ये जो स्वाग- १ पत्नीमूल गृह पुसा यदि छन्दोऽनुवतिनी। ग्रहाश्रमसम नास्ति यदि भार्या वशानुगा ॥ (आप्टेकोप से उद्धृत) २ कर प्रियसग्दोवृति सपत्नोजने-(शाकुन्नत ४१७)।
स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् वाचर उपसर्जन शब्द, तदन्त प्रातिपदिको से स्त्रीव की विवक्षा में विकल्प मे डीप हो जाना है। पक्ष मे अदन्तलपण टाप होता है। उदाहरण यथा-- तुड्गनासिकी, तुगनामिका । कृशोदरी, कृशोदरा। विम्बोष्ठी, बिम्बोष्ठा। मुजड्धी, सुजया । ममदन्ती, ममदन्ता । चारकर्णी, चारकर्णा। तीक्ष्णशृङ्गी, तीक्ष्णशृङ्गा। जोष्ठ, जड्या, दन्त, कण और शृङ्ग-ये पाञ्च शब्द स्वाङ्गवाचक होते हुए भी सयागोपध हैं, स्वाङ्गान्चोपसजनादसयोगोपघात् (१२६५) मूत्रद्वारा इन से वैकल्पिक दीप प्राप्त न था अत इन में विधान किया गया है । नामिका और उदर ये दो अनेकाच् स्वागवाची है इन म स्वाङ्गाच्चोप० (१२६५) द्वाग प्राप्त धैकल्पिक डीप का न कोडादिबह्वच (१२६६) द्वारा निषेध होना था अत इस सूत्र में इन का पुनर्विधान क्यिा गया है। प्रकृतसून में 'च' के ग्रहण के कारण कुछ अच मयोगापधो स भी वैकल्पिक डीए की प्रवृत्ति हो नाती है । यथा-~मृद्वनी-मृङ्गा, सुगात्री-मुगात्रा, रक्तकण्टी- रक्तकण्ठा, कल्याणपुच्छी-कल्याणपुच्छा । अन एव वानिककार ने कहा है-अङ्ग-गात्र- फण्टैन्य इति वतन्यम् (दा०) पुच्छाच्चेति वक्तव्यम् (वा०) । कुण्टोनी, घटोनी आदि शब्द बहुत दूध देन वालो गाय से लिय प्रमिद हैं। कुण्डमिव उच'पापीनम) यस्या मा कुण्डोनी (कुण्ड का तरह चड्डे -- हवाने वाली गाय)। 'कुण्ड मु -जाम् सु' इम अलोक्किविग्रह में अनेक्मन्यपदायें (६६६) सूत्र में बहुव्रीह्मिमाम हो मुब्लुक करने मे-कुण्डोधम् । जब ऊधसोऽनड् (५४ १३१) सूत्र १ तुने नासिरे यस्या मा तुलनामिनी तुगनामिका वा । यहा नामिका को बहुब्रीहि- ममास म उपमजनह्रस्व हुला है तथा 'तुङ्गा पद को पुवद्भाव । इसीप्रकार सुन्दयो जडघे यस्या सा मुजड्धी सुजया वा' में उपमजनह्रस्व समझना चाहिए। २ बिम्बमिव (बिम्बालमिव) जोठो यस्या मा बिम्बोष्ठी विम्बोप्ठा वा । ओत्वोप्ठयो समासे वा (वा०) इम वात्तिकद्वारा यहा वैकल्पिक परस्प हाता है। पभ में वृद्धि भी हो जाती है-बिम्बोष्ठी, बिम्बोष्ठा वा । ३ ऊघस्तु नीवमापीनम् इन्यमर । ४ अर्थ -अयम्शब्दान्न बहुमिमाम म ऊपम् के सकार को अर्ने आदेश हो जाता है स्त्रीत्व की विवक्षा में।
भैमीव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या में ऊधम् के अन्त्य अल् मवार को समामान्त अनंद आदेश हो जाता है-कुण्डोध अनड् =कुण्डोघ अन् = कृण्डोधन (अतो गुणे मे पररुप) । अब यहा अग्रिममूत्र प्रवृत्त होता (१७) बहुवोहेरूधसो डीए ।४।१।२।। अर्थ-ऊधम् (हवाना, चड्डा) शब्द जिस के अन्त मे हो ऐमे वहुव्रीहिसमाम मे स्त्रीत्व की विवक्षा में डीप प्रत्यय हो जाता है । 'कुण्डोधन' के अन्त में एकदेशविकृतमनन्यवत् के अनुमार ऊधस् शब्द विद्यमान है और यह बहुव्रीहिसमास भी है अत प्रकृतमूत्र से टीप् प्रत्यय हो कर अल्लोपोऽन (२४७) से भसञक अन् के अकार वा लोप कर विभक्ति लाने से 'कुण्डोघ्नी" प्रयोग सिद्ध हो जाता है । इसीप्रकार-घट इव ऊधो यस्या सा घटोनी गौ । -- अभ्यास [२] (१) निम्नलिखित गणसूत्रो तथा वात्तिको की मोदाहरण व्याम्या करे- १ शूद्रा चाऽमहत्पूर्वा जाति । २ श्वशुरम्योकारावारलोपश्च । ३ नृनरयोवृद्धिश्च । ४ योपधप्रतिषेधे ह्य-गवय० । ५ मत्म्यस्य डयाम् । ६ पाणिगृहीती भार्यायाम् । ७ वनो न श इति वक्तव्यम् । (२) निम्नस्थ सूत्रो की सोदाहरण व्याख्या करे- १ जातेरस्नीविषयाद् । २ स्वागाच्चोप० । ३ ऊरूत्तरपदादौपम्ये । ४ सहितशफ्लक्षणवामादेश्च । ५ न तोडादिवह्वच । ६ यूनम्ति । ७ ऊदुत । ८ इनो मनुष्यजाते । ६ शाङ्गरवाद्यनो डीन् । १० पन्युनों यज्ञमयोगे । ११ वनो र च। १२ जन उपधालोपिनोन्यतर- स्याम् । १३ सस्यशिश्वीति भाषायाम् । १४ अन्यतो डीप । १५ नित्य मपत्न्यादिपु । १६ दामहायनान्ताच्च । १७ मन । १८ अन्नवत्पति- वतोर्नु । १६ नामियोदरीष्ठ० । २० पूर्वपदात्मज्ञायामग । २१ नखमुखात्सनायाम् । २२ पादोज्यनरम्याम् । २३ बहुव्रीहरूधसो डीप् । २४ देवलमाम० । (३) निम्नलिखित युगलो मे अर्थ का अन्तर स्पष्ट करे- १ शूद्री-शूद्रा । २ सुमुखी-सुमुखा । ३ र्पणवा-शुपननी । १ भुव कोणेन कुण्डोघ्नी मेध्येनावमयादपि । प्रस्नवेनाभिवर्षन्तो धत्सालोकप्रतिना ॥ (रघु० १८४) २ अयकपेनोरपराघचण्डाद् गुरो कृशानुप्रतिमाद् विर्भपि । शक्योऽस्य मयभवता विनेतु गा कोटिश स्पर्शयता घटोप्नो ॥ (रघु० २४६) स्त्रीप्रपयप्रकरणम् ४ युवति-~-युवती । ५ पाणिग्रहीती-पाणिग्रहीता। ६ वती- दिला । ७ ममानी-मनाना । ८ निहायना-निहाणी नारी- नरी। १० त्रिपदी-त्रिपादी। (८) व्याख्या करें- [+] अमनौगोपयात् किम् ' मुगुल्त । [ख] उपनर्जनात् किम् ? शिखा। [ग] जाने किम? मुण्डा। [५] जयोपवान् पिम् ' अवांगी। [८] जयोपचात् पिम् ' क्षत्रिना। [च] मज्ञाया किम् ? ताम्री कन्य। [७] अस्त्रीविपनात् किन ? वनाका । (५) डीप डीप, टीन्-इन में अनुव धनेद के रण म्पमिद्धि पर का प्रभाव पड़ता है। (६) निम्नलिखित प्रातिपदिको के नौनिड़ न ममत्र सिद्ध करे- १ चतुष्पाद । २ कामला।३ परदृश्यन् । ८ नहर बन । ५ ६ मीमन । ७ दुप्टोगन् । ८ वानलाचन । ६ न।' ११ नट । १२ मङि। १३ पनिमन । १४ मामन । १५ अन् । १६ मघवन । १- मुवन । १८ आन्य । १६ मनापनि । ? - १ ममायमिनि मामक । युनदन्मदोर यतरन्या पञ्च (१०७६) द्वारा मन मे अण, तवरममावरवचने (१०८१) नकद को 'मम' मवादेश गदिदृद्धि तथा भगना कार का लापकर विभक्ति लाने में मामा होता है । जीव को विवना म 'मामा' में दाप कर मामस्नरक्योरपसख्यानम वानिक में कार में पूर अगर का इन्त्र द विभक्ति लाने में मामिका । ममेयम्-मामिका। २ म्बीन्च की विदक्षा में श्वन म घिदगौरादिन्यश्च (१२५) द्वारा दीप प्रय श्वयुवमघोनामतद्धिते (६०) में कार का उकार सम्प्रमारण नया पूनम्प (२५८) कर विभक्ति लाने मे 'जुनी' प्रयोगनिद्ध हो जाता है । ३ मघोन स्त्री-मघोनी। मघवन न्द म स्त्री व मे ऋलेन्यो डोर (२३२) मे डीप्, श्वयुबमघोनामतद्धिते (२१०) ने वकार को प्रसारण उका पूवरूप न्या आद् गुप (२७) से तुम कर दिभक्ति मान =--मघानी (टन्द की पनो)। मघवा दहतम् (२८८) बाग तृत्वरक्ष में उचितरच (१२५०) द्वारा दो करन में 'मपवनी भी दना। ल. प. (..
H ? भैमीव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या (७) अधोनिर्दिष्ट रूपा की ससून सिद्धि करे- १ पगू । २ कुरु । ३ दाक्षी। ४ वामोर । ५ ब्राह्मणो। ६ नारी। ७ मत्सी। ८ ह्यो। ६ श्वथू । १० करभोस् । ११ शाहरवी। १२ युवति । १३ वैदी। १४ अतिक्शी-अतिक्शा। १५ श्पणखा । १६ वढची। १७ कल्याणकोडा । १८ कुण्डोनी । १६ अदावा (जवावरी) । २० क्षत्रिया । २१ अशिश्वी । २२ अन्नवत्नी । २३ सपत्नी । २४ मुपदी । २५ बिम्बोष्ठी-विम्बोप्ठा । (८) निम्नस्थ दा कारिकाओ की सोदाहरण व्याख्या करे- (क) अद्रव मूत्तिम स्वाङ्ग प्राणिस्थमविकारजम् । अतरस्य तत्र दृष्ट च तेन चेत्तत्तयायुतम् ॥ (ख) आकृतिग्रहणा जाति लिङ्गाना च न सवभाक । सकृदारयातनिर्माह्या गोन च चरण सह ॥ (६) निम्नस्थ प्रश्नो का सहेतुक उत्तर दीजिये-- [क] 'सुम्वेदा' म स्वाङ्गलक्षण टोप क्यो नहीं होना ? [ख] किन किन योपधा में जातिलक्षण टीप् अनुमन है ? [ग] बंदी मे अजन्तत्वात् टिडढाणञ्० में टीप क्यो नहीं होता ? [घ] 'हस्तिस्वाम्यूर' में ऊद् की प्रवृत्ति क्या नहीं होती? [ड] मज्ञा होते हुए भी 'रघुनाथ' म पूर्वपदात्० स णत्व क्या नहीं ? [च] बहवो युवानो यस्या सा बहुयुबा । यूनस्ति द्वारा 'ति' प्रत्यय क्या नहीं हुआ? [छ] यूनस्ति मन को तद्धिता के अधिकार म क्यो पढा गया है ? [ज] पूर्वपदासज्ञायामग म 'अग' क्यो कहा गया है ? [] यज्ञमयोग के विना 'शूद्रस्य पत्नी' वैस उपपन्न होता है [व] ऊ तो मे स्वाद्युत्पत्ति कमे हो जाती है ? [2] पीवरोर, करभोपमोर-इन मे ऊट का प्रयोग शुद्ध है या अशुद्ध [8] जब 'नृ' से 'नारी' बन गया तो 'नर' से पुन क्यो बनाते हैं ? [ड] 'मुमुखा शाला' यहा स्वाङ्गलक्षण टोप क्यो नही होता? [6] 'आषु' मे ऊडुत द्वारा उड् क्यो नहीं होता? {ण] पिपीलिका, मक्षिका आदियो में जातिलक्षण डोप क्यो नही हुआ (१०) 'मुजघना' मे जातिलक्षण डोष नहीं होता परतु 'कृशोदरी' मे हो जाता है-इम वैषम्य का क्या कारण है ? (११) मामा शब्द अण्प्रत्ययान्त है। स्नीत्व मे टिड्ढाणन० (१२५१) द्वारा डीप हो कर 'मामी' क्यो नही बनता ? 'मामिका' क्यों बन जाता १ 'मामी' प्रयोग वेद में या मना म होता है। पग्नु लोक में केवलमामक. (४१३०) इस नियम के कारण टीप् न होकर टाप होता है। ? 2 ? 7 1 स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् ६३ [लघु०] इति स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् ।। यहा पर स्त्रीप्रत्यया का प्रकरण ममाप्त हाना है। [लघु०] शास्त्रान्तरे प्रविष्टाना बालाना चोपकारिका । कृता वरदराजेन लघु-सिद्धान्तकौमुदी । अन्वय --शानान्तरे प्रविष्टानाम् जप्रविष्टाना च वातानाम् उपकारिका (इस) लघुमिद्धान्तोमुदो वरदराजन कृता (वेदितव्या)। अर्थ –चाहे दूसरे शान्त्रो म प्रवेश हुआ हो या न हुआ हो वालको को व्याकरण का बोध करान मे उपकारक यह लघुमिद्वानकौमुदी वरदगज (आचाय) न बनाई है। व्याख्या-'शाम्बान्तरे प्रविष्टानाम्' का मरा छेद 'शास्त्रान्तरे+प्रविष्टा नाम्' भी यहा 'च' के वल म अभीष्ट है । 'वालानाम्' में अभिप्राय पहा दुर-पीने या जबोध दालका में नहीं, अपितु व्याकरण मे अनभिज्ञ छात्रो में है। ऐसे छात्र दो प्रशर वे हा सकते हैं । (१) अन्यगास्त्रों में प्रविष्ट प्रर्थात् अय गानो का ज्ञान रचन वाले तथा (२) यशास्ना मे अप्रविष्ट अर्थात् अन्य शान्त्रो का ज्ञान न रखने वान । दोनो प्रकार के व्याकरणानभिज्ञ छात्रा को लघु-मिद्धान-कौमुदी के माध्यम से व्याकरण- ज्ञानरूप लाभ पहुँचेगा-एमी वरदराजजी की मान्यता है। [लघु०] इति श्रीवरदराजकृता लघु-सिद्धान्त-कौमुदी समाप्ता॥ इनि भूतपूर्वाञ्खण्डभारताऽन्तर्गत-सि तटवत्ति-डेराइस्माईल- खानास्यनगरवास्तव्य-भाटियावशावतस-श्रीमद्रामचद्र- वर्मसूनुना एम ए साहित्यरत्लेत्याद्यनेकोपाधिभता वोन भीममेनशास्त्रिणा विरचिताया तसिद्धान्तकौमुद्या भमोव्याख्याया स्त्रोप्रत्ययप्रकरणात्मक षष्ठो भाग पूर्तिमगात् ।। १ अयन् शास्त्रम्-शास्त्रान्तरम् । मयूरवनकादिवान् ममाम शास्त्रान्तरे। । उम्मिन् - अथ परिशिष्टानि [१] शुद्धाऽशुद्धबोधक-शतकम् [२] स्त्रीप्रत्ययप्रकरणगताष्टाध्यायी सूत्र- तालिका [३] स्त्रीप्रत्ययप्रकरणान्तर्गतवातिकादि- तालिका [४] उदाहरण-तालिका [५] स्त्रीप्रत्ययप्रकरणोपयोगि अष्टाध्यायी- सूत्रपाठ [६] विशेष-द्रष्टव्य-स्थल-तालिका [७] विशेष-स्मरणीय-पद्यमाला [८] स्त्रीप्रत्ययविधायक मुख्यसूत्राणि [९] सक्षिप्त पाणिनीयं लिङ्गानुशासनम् [१] परिशिष्टे--शुद्धाशुद्धबोधकशतकम् [इस परिशिष्ट मे विद्याथियो को स्त्रीप्रत्ययो के विषय मे सावधान एव चौक ना रखने के लिये शुद्धाशुद्धमिश्रित प्राय स्वनिर्मिन एक सौ पद्यखण्डो का समायोजन किया गया है । इन में स्त्रीप्रत्ययविषयक विवेच्य पदो को सूक्ष्म टाइप मे दर्शाया गया है । प्रत्येक पद्यखण्ड के नीचे विवेच्य पदो का साधुत्व वा असाधुत्व सहेतुक सरल भाषा मे खोल कर समझाया गया है। विद्यार्थियो को इस परिशिष्ट के अभ्यास से अपन भी अशुद्धियो के पक्डने में महतो निपुणता प्राप्त होगी। (१) प्राणानामीश्वरी मे त्व जीवताच्छरद शतम् ।। विवेचन-ईश् धातु से स्थेश-भास-पिस क्सो वरच् (३ २ १७५) मूत्रद्वारा वरच प्रत्यय करने पर 'ईश्वर' शन्द निप्पन्न होता है। स्त्रीत्व मे अदन्तलक्षण टाप् करने मे 'ईश्वरा' होना चाहिये । यदि यहा औणादिक वरट् (उणा ० ५ ५७) प्रया मानें तो टिड्ढाणञ्० (१२५१) से टित्त्वलक्षण डीप् हो कर उपयुक्त प्रयोग भी शुद्ध वहा जा मक्ता है। (२) नवरा सम्पद प्राप्य को धयो भुवि मानव ॥ विवेचन-नश्धातु से इण-नश् जि-सत्तिभ्य क्वरप् (३ २ १६३) मूत्रद्वारा ताच्छोलिक क्वरप् प्रयय करन पर 'नश्वर' शब्द निष्पन्न होता है। स्त्रीत्व में टिड्ढाण० (१२५१) मूत्रद्वारा डीप् प्रत्यय करने म 'नश्वरी' प्रयोग बनेगा। अन यहा 'नश्वराम्' के स्थान पर 'नश्वरीम्' हाना चाहिये। (३) इय शैलिमहाक्लिष्टा शब्दजालसमविता ॥ विवेचन-शीले भवा शैली, शीलादागता वा शैली। शोलशब्द से जण प्रत्यन हो कर स्त्रीत्व की विवक्षा मे टिडढाणञ्० (१२५१) मूत्र में दीप् करन पर शैली प्रयोग होना चाहिये। (४) भक्तिरस्तु ममानी मे देवयोरुभयोरपि ।। विवेचन-केवल-मामक-भागधेय-पापाऽपर-समानाऽर्य-कृत सुमगन-भेषजाच्च (४१ ३०) इम सूत्र मे मज्ञा या वेद म ही दीप का विधान किया गया है, अन लोक मे अयन टाप् ही होता है । इस प्रकार यहा 'समाना' होना चाह्यि, 'ममानी' नहीं । (५) समदृष्टेभवत्येव सर्वा सुखमया दिशा ॥ विचन-मुखमयशन्द मयट्प्रत्ययान्न है उन टिड्ढाणन० (१२.१) म टिवल तण डोप हो कर 'सुखमयो' शब्द का प्रथमावहुवचन मुखमय्य' प्रयोग हाना .
१०३ भमोव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या पादि। दिश्शब्द में भागुरिमत के अनुमार' आप (आ) हो कर 'दिशा' शुद्ध प्रयोग (६) दशामेतादृशा प्राप्य नि स्वो याति यमालयम् ॥ विवेचन- 'एतादृश' शब्द त्यदादिषु दृशोऽनालोचने कञ्च (३४७) सूत्रद्वारा कप्रत्ययाल निष्प न हुना है । अत स्त्रीत्व मे टिडढाणन० (१२५१) द्वारा डीप हो कर 'एनादृशीम्' होना चाह्यि । (७) मूति भयङ्करी तस्य प्रत्यह समजायत । विवेचन-'भयङ्कर' शब्द मेर्धात्तभयेषु कृम (३ २ ४३) द्वारा बचप्रत्ययान्त निप्पन्न हुना है, अन डीप की अप्राप्ति मे अदन्तलक्षण टाप् हो कर 'भयङ्करा' प्रयोग होना चाहिये। (८) इय शूर्पनखी कन्याऽत्येति शूर्पणखामपि ॥ विवेचन शप इव नखा यस्या' इस यौगिक अथ मे स्वाङ्गाच्चोपसर्जनाद- सयोगोपधात (१२६५) सूत्रद्वारा विकल्प से डीप हो (पक्ष म टाप) कर 'श्पनखी' या 'भूर्पनखा' दो रूप मिस होत हैं। परन्तु जब यह मज्ञा हो तब नखमुखात्मज्ञायाम् (१२६७) मे डीए का निषेध हो कर अदन्नलक्षण टाप ही हाता है । किञ्च पूर्वपदा- सज्ञायामग (१२६८) से नकार को णकार भी मजा-अवस्था में हो जाता है-शूर्पणखा (गवण की बह्न का नाम)। (8) तावकीय मतिस्तात विपरीता तु मामकी ॥ विवेचन-तवाय तावक , ममाय मामन । एक्वचनान्त युष्मद् और अस्मद् १ जैमावि कहा है- वष्टि भागरिरल्लोपमवाप्योरपसर्गयो । आप चव हलन्ताना यथा वाचा निशा दिशा ॥ भागुरि आचाय कुदेक हलन्तस्नीलिङ्गी में भी आप् (आ) प्रत्यय की उत्पत्ति मानते है । यथा- वाच (वाणी) भागुरिमते-वाच्+आ (आप) = =वाचा। निश् (रात्रि) भागुरिमते-निश् +ला (आप)=निशा । दिश् (दिशा) भागुरिमते-दिश् + आ (आप) =दिशा । इमोप्रकार-क्षुध-क्षुधा, गिर्-गिग, तुप्-तुपा, रज-म्जा, मुद् --मुदा, प्रतिपद्-प्रतिपदा, वीरध-वीरधा, दृश्-दृशा, शुच्-शुचा, रुष-स्पा, विपद-विपदा, आपद्-आपदा, रच-म्चा, मृद्-मृदा, त्वच-त्वचा, ऋच -~ऋचा, विप्-विपा, इत्यादि । इम मन का विवेचन इस व्याख्या के प्रथमभागस्थ अध्ययप्रकरण के अत में किया जा चुका है वहीं देवे।
परिजिष्णनि १०३ . गन्दी मे शषिक जर्थों में जण प्रन्यय हो पर तवक्ममकावेक्वचने (१०८१) से उन का श्रमश तवा और ममा जादेश कर जादिवृद्धि आदि काय करने म 'तावक , प्रयोग मिद्ध होते हैं । स्त्रीत्व की विवक्षा मे जण्प्रत्ययान्त होने के कारण नाव में टीम हो 'तावी' स्प सिद्ध हो जाता है । मामा मन्द नो यद्यपि अणन्त है तथापि देवर- माम भागव० (४ १३०) टम स्त्रद्वारा मजा जोर वेद मे हा नीप विधान में निकम के कारण अन्यन टोप न हो कर उदन्नलक्षण टाप ही होता । नत्र मामकनरक्योरप- मख्यानम् इम वात्तिक में कार में पूर्व अन् का दकार आदेश हो 'मामिका प्रभाग सिद्ध होता है । जन यहा 'मामकी' के स्थान पर मामिका हाना चाहिये । 'ताकी प्रयोग शुद्ध है। (१०) शूद्रा-गद्री-महाशूद्री-शब्दतत्त्व निरुपय ॥ विवेचन-'शुद्र' शब्द जातिवाचाह अत इस न स्त्रीन्द की विद्या में जातेरस्त्रीविषयाद ० (१२६६) म दीप प्राप्त होता है। परन्तु अजादिषण म पठिन शूदा चा:महत्पूर्वा जाति इम गणम्त्र वे का ण उन का वात्र हो कर टाप हा नाना है-शुदा (ग्रदजाति की औरत) । गणन म यमहत्पूर्वा' कहा गया है जन महतगन्द पूर्व में होगा नो टाप् न हो कर जाति क्षण डीप ही हाा -महापद्रो (अही नानि की औरत) । परन्तु पुयोग मे नो पुयोगादाम्यायाम {१२६१) मीप होगा ही-वन्य भार्या शूद्री (शूद्र की पत्नी)। (११) तस्णा स्पवन्नी चेत्सादर वीक्ष्यतेऽग्विल । विवेचन--तरुणशब्द मे म्बीत्व की विदा म नस्नजीवस्यस्तरण (वा० १.१) वात्तिक मे डीए हो कर तरणी' प्रयोग सिद्ध होता है । 'म्पवत' पन्द मनुष्प्रन्ययान्त होने से उगिन् ह जव उगितश्च (१२५०) द्वारा दीप हा कर म्पती प्रयोग बनता है, नुम् का नागम विमो नरह प्राप्त नहीं । (१२) युवानो बह्यो यस्या जया वड्युवा पुरी। विवेचन-यूनस्ति (१२७६) मूत्र अनुपसजनात (४ ११४) के अधिकार में पड़ा गया है जन यहा बहुब्रीहिममाम म युवन शब्द के उपमर्जन होन के कारण स्त्रीत्र में 'नि' प्रत्यय नहीं हुआ। (१३) शाक्तीक्या तया देव्या रिपुस य पराजितम । विवेचन- शाक्तीवया' के न्यान पर 'जास्तीया' हाना चाहिये। अनि प्रहरणमन्या' इम अर्थ में शक्ति' द म शस्तियष्टमोरोकर (४ ४ ५६) मूत्रद्वारा ईकर प्रत्यय हो कर पानीक' गन्द निष्पन्न हाता है । इम न स्त्राव की विवभा म नजनभोकर (वा० १०१) वात्तिा न टोप् करन पर शास्तीची प्रभाग बनता है। (१०) पाण्डुपत्रसमाच्छन्ना पाण्डवी भूमिरजायत । विचन-'पाण्वी' अशुद्ध है पाण्डु हो। चाहिय । पाटुाद दाग- दाचा ह । स्त्रीत्व को विवक्षा म दोतो गुणवचनात (१२५६) म प्राप्त होप का भैमीव्याख्ययोपेनाया लघुसिद्धान्तकौमुद्या कर प्रयय- खत्मयोगोपधान्न (वा०) वात्तिक मे निषेध हो जाता है। अदत न होने से टाप् भी नहीं होता। (१५) भूपालिश्या तया दत्त भृत्याय विपुल धनम् ॥ विवेचन-'भूपालिक्या' के स्थान पर 'भूपालिक्या' होना चाहिये। भूपानक- गब्द मे स्त्रीत्व म पुयोगादाख्यायाम् (१२६१) मूनद्वारा प्राप्त डीए का पालकान्तान (दा० १०२) वातिद्वारा निषेध हो जाता है । तब जद नलक्षण टाप् भ्यान कात्पूर्वस्यात० (१२६२) मूत्र से इत्व करन पर भूपालिका' शब्द उपपन्न होता है । भूपालकम्य स्नी भूपालिका, तया = भूपालिकया। (१६) सम्मान्या विदुपा नारी धर्माधर्म विजानती ॥ विवेचन--यदि यहा नारी का वैदुष्य विवक्षित हो तो वसुप्रत्ययान्त विद्वम- शब्द मे स्नील मे उगितश्च (१२५०) द्वारा डोप् प्रत्यय कर सम्प्रसारण आदि करने मे 'विदुषी' बनना चाह्येि । परन्तु पुरुप के वैदुष्य के विवक्षित होने पर यथोक्त प्रयोग तृतीया ततया ठीक ही मानना चाहिये। (१७) हयया यात्यय दूतो बहुदूरतर वनम् ॥ विवेचन-'य' शब्द गौरादिगण मे पढा गया है अत षिद्गौरादिभ्यश्च (१२५५) मूत्र म दीप हो कर 'हयो' शब्द वन कर तृतीया के एक्वचन म 'य्या' बनेगा। अथवा-~योपधप्रतिषेधे य-गवय मुक्य-मनुष्याणामप्रतिषेध (वा० १११) इम वात्तिक की महायता से जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् (१२६६) मूत्र से जातिलक्षण टीप हो कर हयी' बनना चाहि । तृतीयकवचन म 'हय्या' बनेगा। (१८) तादृक्षी सम्पद प्राप्य मानव को न गधित ? विवेचन--यहा 'तादृक्षीम्' के स्थान पर 'तादृक्षाम्' होना चाहिये । तादृक्ष- शब्द दृशे यसश्च वक्तव्य (वा०) वात्तिकद्वारा क्सप्रत्ययात निष्पन्न होता है, इस कञ्प्रत्ययान्त ममज्ञना भूल है । अत यहा टिड्ढाणभ० (१२५१) द्वारा डोप न हा कर अदन्तलक्षण टाप ही होता है। (१६) कोक्लिीकूजित श्रुत्वा हृष्यति सर्वमानवा'। विवेचन- कोक्लि' शब्द अजादिगण मे पढा गया है जन जानिलक्षण डीप् का बाध हो कर अजाद्यतष्टाप् (१२४६) से टाप हो जायेगा-कोकिला जितम् । (२०) नयत्यशिशुरप्येषा काल शातंन चैतसा ।। विवेचन - अविद्यमान शिशुरस्या' इम बहुव्रीहिममास में 'अगिगुवन पर म्त्रीव की विवक्षा में सशिश्वोति भाषायाम (४ १६२) म टीपन्त 'शिवी' निपातन किया जाता है । अत यहा 'शिशु' वे गन पर नाशश्वा प्रयुका वग्ना चाहिये । शिश्वी = मतिहीना स्त्री । (२१) भार्या पाणिगृहीत्येव शस्यते सर्वग्धुभि । संव पाणिगृहीता चेल्लोके भवति निन्दिता ॥
'परिशिष्टानि १०५ विवेचन-पाणि होतो.म्या (यथाविधि) इति बहुव्रीहि । पाणिगृहीती भार्या याम् (वा०) इस वात्तिक स दीपन्न 'पाणिगृहीती' भन्द निपातिन किया जाना है। जिम का विधिवत् पाणिग्रहण नहीं हुआ होता वह 'पाणिगृहीता' कहाती है। (२२) पत्ते चन्द्राननी गर्भ राजवविवृद्धये ॥ विवेचन-'चद्राननी' के स्थान पर 'चद्रानना' होना चाहिये। स्वागाच्चो- पसर्जनादसयोगोपधात् (१२६५) मे प्राप्त म्बागलक्षण डीए का न कोडादिवह्वच (१२६६) में निषेध हो जाता है । तब अदन्नलक्षण टाप् हा कर च द्रानना' प्रयोग उपप न होता है। (२३) भावी ग्रहाद्वहिाधार्या ग्रन्यागाराद्विशेषत ॥ विवेचन-आखु (चूहा) शब्द उदन होता हुआ भी गुणवचन नहीं अत म्बीन्त्र को विवक्षा म बोतो गुणवचनात् (१२५६) द्वारा डीप प्राप्त नहीं होता । इसलिये यहा स्त्रीलिङ्ग में भी आनु ही रहेगा। (२४) सर्वाऽवश्यक्ता ज्ञाप्या त्यक्तलज्जन श्रीमता ।। विवेचन-अवश्यम्भाव जावश्यकम् । द्वन्द्वमनोजादिभ्यश्च (५१ १३२) मूत्रद्वारा मनोज्ञाद्यन्तगत हान के कारण 'अवश्यम्' अव्यय से भाव म वुन प्रत्यय, आदिवृद्धि वु को अफ आदेश तथा अव्ययाना भमात्र टिलोप (वा.) से टि वा नाप कर आवश्यक्म' प्रयोग उपपन्न हाता है । वु द्वारा भाव में उक्त होन पर दुबारा त्व-नल का प्रयोग अनुचित है । आवश्यकम् अस्त्यग्यनि आवश्यकम्, यहा मन्वय मे अशंशादिभ्योऽच् (११६५) द्वारा अच् प्रत्यय हुआ है । आवश्यकम् – अवश्य हाने वाला कार्य, वस्तु आदि । यही यहा विवथित है । जत यहा मवमावश्यक ज्ञाप्यम्' ऐमा लिखना उचित है। (२५) बिम्बोष्ठी चारकर्णा या समदन्ती कृशोदरी। मुजयो चापि चेल्लोके नून रूपवतो हि सा ॥ विवेचन–नासिकोदरौष्ठजधादन्तक्णशृङ्गाच्च (४ १५५) मूत्र म वैकल्पिक डीए का विधान हाता है, पर म अदतलक्षण टाप भी होगा। यथा-तुङ्गनामिकी- तुङ्गनामिका कृशोदरो-कृशादग, रिम्बाप्ठी विम्बोष्ठा मुजङधी-मुजवा, ममदनी- ममदन्ता चारकर्णी चारकर्णा, नीक्षणशृङ्गी-नीक्षणगा। सूत्रगत चकार म कुछ नय म्थानो पर भी–महङ्गी-महङ्गा मुगानी-मुगाना रक्तकण्ठो रक्तकण्ठा । अत उपवन । प्रयोग गुद्ध है। (२६) मुरागी शस्यते धेनुन्नीदपङ्गा तु निदिता ।। विवेचन--पूर्वोक्तमून म शृङ्ग शर का भी पाठ है जत डोष का वैकत्यिक विधान होता है, पक्ष मे टाप भी होगा । मुगृही मुगा नोक्षणगृड्गी-नीटणगृङ्गा । (२७) पिरा तुचनमी रूपे मदशी न गुणेदियम् ॥ विवेचन- मद्ग' शन्द त्यदादिषु दशोऽनालोचने कञ्च (३४७) मूत्रस्य समा- भैमीव्याग्योपेताया लघुमिद्धान्तकौमुदा मदृज, । पुर मग॥ . नाऽपयोश्चेति वाच्यम् (वा ) वानिवद्वाग वा ययान सिद्ध किया जाता है। दृग्दृशदतुप ( ३८८) द्वारा 'ममान' को 'म' आदेश हो जाता है-- ममान पश्यतीति कमात्तरि प्रयोग । समानत्वेन ज्ञानविपयो भवतीत्यथ । स्त्रीत्व मे टिड्डागन० (१२५१) डाग टीप हो कर 'मदृशो' रूप बनना है । परन्तु 'तुल्यतम' शब्द तमया यान है इस म विमी तरह डीप प्राप्त नहीं, टाप् हो कर 'तुल्यतमा' बनेगा। (२८) उन्मवे च विवाहादी नारी कार्या विवेचन--'पुर मर शब्द पुरो ग्रनोऽग्रेषु सत (३ २ १८) द्वारा प्रत्ययान मिड हाता है । मन स्त्रीत्व की विवक्षा में टित्त्व के कारण दीप हो कर पुर मगे बनना चाहिए। (२६) सन्ये । चिरायुपी भूया मुस च प्राप्नुया सदा ।। विवेवन-कन्य' शब्द से वयसि प्रयमे (१२५६) द्वारा स्त्रीत्व में डोप प्राप्त होता है परन्तु र याया क्नीन च (१०२१) इम नापक आधार पर टाप् हो जाता है । 'चिरायुष' शब्द जदन्त नहीं हल न है । इस में काई म्लीयत्यय प्राप्त नहीं हाता मा यहा 'चिगयु' होना चाहिए । (३०) मुन्दरय क्या सर्वर वार निपीयताम् ॥ विवेचन--'मुन्दर' शब्द गोगदिगण में पढ़ा गया है अन त्रीव की विवक्षा म विद्गौरादिभ्यश्च (१२५५) स दीप प्रत्यय हो कर 'मुन्दरी प्रभाग होना चाहिये। (३१) शैलया सर्वतोषिण्या पुनरचे नृणा वर ।। विवेवन-शोलादागता शोले भवा वा ली। शीलशब्द में मप्र यय हो कर म्त्रीत्व की विवक्षा म टिड्ढाणन० (१०५१) द्वारा दीप वग्न मे शेती' शब्द निप्पन होता है । मा यहा तृतीयववचन म 'गल्या' बनना चाहिये । (३२) इय शितमा मौका पार याना महोदये ॥ विवेचन-विशत' शब्द मे डट (११७५) प्रत्यय हो कर तमट (५ २ ५६) वा जागम करन मे निगत्तम' शब्द बनता है। जन टित्त्व के कारण म्नीत्व में दीप प्रत्यय हो र विगतमी' बनना चाहिये । (३३) नैजा शक्ति समालोच्य कार्यारम्भपरो भवेत् ।। विवेचन--निजशब्द से स्वार्थ मे जण प्रत्यय करन पर नज' शब्द निष्पन्न हाता है। जन जीव म टिडढाणन (१२५१) मूत्रद्वारा दीप प्रत्यय करन पर नजी बनना है। द्वितीया के एक्वचन मे यहा 'नजीम्' प्रयोग होना चाहिये । (३४) नूतनीय प्रथा मित्र । स्वमूत्र पोयते बुध ॥ विवेचन-नवस्य न आदेश, लग्तनर-वाश्च प्रत्यया वस्तय्या (वा.)7 वानिव म नून, नूतन और नवीन य नीन शन्द निष्पन हाल है। न्त्रीद में इन म सीप-दीप-टोन कोई प्रत्यय प्राप्त नही, अत उदन्तन टाप हो र कहा 'नूतनपम्' प्रयोग होना चाहिये ।
परिशिष्टानि १०७ (३५) सुखाय मम्पदा दवी विपदारं मताऽमुरी ।। विवेचन-सम्पद् और विपद दोनो हलल बालिग है। आप चंद हलन्ता- नाम् ० इम भागुरिमतानुसार इन मे आप् (आ) प्रत्यय हो कर 'मम्पदा, विपदा' शन्द वनने है । कुछ लोग ऐस प्रयोगो वो भाष्यानुक्त होने के कारण अपमाण मानते हैं। (३६) जापय विमला वाणी सर्वभूतहिते रता ॥ विवेचन--पीणामियम लापों । तम्येदम् (११०६) ३ अथ में ऋषिशद म औन्मर्गिक लण् प्रत्यय हो कर आदिवृद्धि एव मात्व में टिड्ढाणन० (१२५१) म दीप करने म 'आी' प्रयोग मिद्ध होता है । 'आपा अगुड़ है। (३७) कामुकी-कामुका-मध्ये को भेद प्रतिपाद्यताम् । विवेचन--जानपद-कुण्ड-गोण० (८१४२) सूत्र म मैथुनच्छावनी स्त्री की वाच्यता मे 'कामुकी' तथा अन्यत्र (क्वल अभिलाषा करन वानी) 'कामुका का प्रयाग होता है । कामुत्रीशब्द डीपन्न तथा कामुकाशब्द टाबन हाता है। (३८) नहि व घ्या विजानाति गुव: प्रसववेदनाम् ।। विवेचन -गुरुशब्द उदल गुणवाचक है जन स्त्रीत्व की विवक्षा म वोतो गुण- वचनान् (१२५६) मे वैकल्पिक दीप हा कर यण करने मे 'गुव:' बन कर द्वितीया के एकवचन मे 'गुर्वीम्' निष्पन होता है । पक्ष म 'गुरम्' भी होता है । (३६) पद्धनी स्वा परित्यज्य पयाशास्न समाधय ॥ विवेचन -- पद्धति' शब्द बह्वादिगण मे पटा गया है अन स्त्रीव की विवडा म बह्वादिभ्यश्च (१२६०) स वैकल्पिर डीए हो कर 'पद्धती-पद्धति ' दो स्प बनते है । (४०) क्षीरपीणा सुरापीभिमंत्री प्रायोऽस्ति दुलभी ।। विवेचन--क्षीरप' शब्द आतोऽनुपसर्ग क (७६१) द्वारा प्रत्ययान्न निप्पन हुआ है अन अदन्नलक्षण टापू हो कर स्त्रीव में 'क्षीरपाणाम' होना चाहि । 'मुराप शब्द गापोष्टक् (३२८) तथा सुरासोध्योरिति वक्तव्यम् (वा.) द्वारा टक्प्रत्ययान्त निष्पन्न हुआ हे अत टिन्व के कारण टिड्ढाणन् ० (१२५१) से दीप हो वर म्बीत्र में 'मुरापीभि' का प्रयोग युक्त है। 'दुर्लभ' शब्द ईषददु मुषु कृच्छाच्छायेषु खल (८७६) सूत्र म खलप्रत्ययान्न निष्पन्न हुना है अन टोप्-डीप-लीन् किमी का विषय न होने के कारण अदन्नलक्षण टाप् हो कर 'दुलभा' दाना चाहिये । (४१) अपोदानोतना नापा समाह्या भूतिमिच्छता ॥ विवेचन–'इदानीम्' अव्यय मे सायचिरप्रागप्रगेऽव्यपेभ्यष्टयु टयु लो तु च (१०८६) मूत्रद्वारा ट्यु ल प्रत्यय तथा तुटु का जागम करने पर ददानीन्तन' भन्द निष्पन्न होता है । स्त्रीच की विवक्षा में टित्त्व के कारण दिडदाणन० (१२५१) द्वाग टीप करन पर द्वितीया के बहुवचन में 'इदानीन्नती' हाना चाहि । (४२) फलाभिलापा परिहाय नित्य कुर्तीन क्माणि गहे स्थितोऽपि ।। विवेचन-'अभिलाष' शब्द पनन्त है। धनवन्त इस लिङ्गानुशामनीपमून के १०८ भमांव्याख्ययोपेताया लघुमिद्धान्तकौमुद्या 2 अनुमार पनल पुलिङ्ग हुआ करते हैं । मन यहा पलाभिलापम्' होना चाहिये । (४३) सद्यो बनहरी नारो सद्यो दलकर पय ।। विवचन-वल हतीनि वलहरा नारी । हरतेरनुद्यमनेच् (३२६) मूत्र में जच्च रयान बलहर अन्द मे स्त्रीत्व में जदन रक्षण टाप हो कर 'बलहा बनना चाहिन । (४४) त्रिसूत्रीय दृढा रज्ज' सर्वभारसहा मता ॥ विवचन--पीणि मूत्राणि यन्या मा निमूत्रा। बहुव्रीहिनमाम म टीप टीप - टीन की अप्राप्ति में अदनलक्षण टाप हो जायेगा। (४५) वेदान्तस्य समस्या चतु मूत्री प्रयत्नत ।। विवेचन--चतुर्णा मूत्राणा ममाहाश्चतु सूत्री। द्विगुममाम में अकारा तोत्तर. पदो द्विगु स्त्रियामिष्ट (वा.) इन वचन मेस्त्रीत्व की विवक्षा मे द्विगो (१२५७) हो जाता है। (४६) रद्धापी रदनार्येति प्रक्रिया व्याकृते क्यम् विवचन--स्द्रस्य भार्या न्द्राणी । इद्रवरणभवशव० (१२६३) मूत्र में 'रुद्र' को जानुस् का नागम नथा टोप् प्रत्यय करने मे 'ग्दापी' प्रयोग सिद्ध होता है । (४७) अगस्न्यस्त्री जगम्तीति व्याकृत्या प्रतिपाद्यताम् । विवेचन-अगस्त्यम्य भार्या जगम्नी। अगस्त्यशब्द म प्रयोगादात्यायाम् (१०६१) द्वारा स्त्रीत्व में डीप् प्रत्यय हो कर भमज्ञक अकार का लोप तथा सूर्या- हास्ययोछे च डमाञ्च (वा० १०४) इम वानिक स यकार का भी लाप परन पर 'जगन्नी प्रयाग सिद्ध हो जाता है। (४८) दर्वी रात्री नमी श्रोणी खनी भूमी तथा:वनी। व्यातेर्वचमा पेन डोपता वा स्मृता अमो । विवेचन-चह्वादिन्यश्च (१२६०) मूत्ररथ बहादिणान गत स्वतो दिन दियेरे इस गासूत्र म बंकल्पिर होप कर भमक्षा इकार का लाप करन मे उपयुक्त प्रगा निर हाते हैं । पन मेददि रात्रि , तमि, श्रोणित, मुनि , भूमि , अवनि-- बैंप भी बनेंगे। (४६) लोरे लावणिया योपिलिदनोया मना परम् ॥ विवेचन- लबण पप्पमत्या' इन अयं में लवणाट्टन (४ ८५०) मून ने टन, आदिवृद्धि नया कार को इन आदेर हो र 'लामिस' बना वस्तीत्व की विवभा में दिइटाणन० (१२५१) ने दीप प्रत्यय करने पर 'लावणिरी' प्रयाा बनना चाहिो । (५०) जप्टाध्यात्री जामातामरकोषो जापिता। भट्टिकाय गपेशश्च नयीय मुपदान्तु व ॥ विवेचन-जप्टाम् अध्यायाना ममाहार-अष्टाध्यायी। सारा तोतापदी गि त्रियामिष्ट (वा०) इन वानिक में स्त्रीत्व को विवक्षा म द्विगो (१२५७) मूत्र .
परिशिष्टानि मे डीप हो र 'अष्टाध्यायी प्रयोग निद्ध होता है। त्रयोऽवयवा जन्या मा दी (पति)। 'त्रि' शद में सख्याया अवयवे तयम् (१९७२) ले नयप् प्रवर हा कर द्वित्रिन्या तयस्यायज्दा (१९७३) द्वारा उमे जपत्र मादेश करने में 'त्र' गन्द निष्पन्न होना है । म्यानिवद्भाव द्वारा इसे भी नयाप्रमान मान नेने मन्त्रीव में टिइटागन (१२५१) मे दीप प्रत्यय हो कर 'त्रयी प्रयोग मिद्ध हो जाता है। (५१) निययाचनशोलेय वृत्ति पुनर्ग तृणात् ॥ विवेचन - 'लघुतर' शब्द त प्रत्ययान्न है जन स्त्रीत्र में इन में पर दीर- टोप-डीन् कोई प्राप्त नहीं होता । अदनलाग टाप करने मे 'गुता होना चाहिने। (५२) पगु कुनाऽपि वामोन्धं या सा चेन्पतिप्रिया । विवेचन-स्त्रीव म पङ्गुमन्द न पडोश्च (१०.०) मूत्रद्वारा अपना कर सवर्णादी करने में पड़ा बनना चाहिौ । इसीप्रकार मह्नि-शप-लक्षा-वामाइश्च (१२७४) द्वारा 'दामार' न म्नीच म न हो वामोन्ट वनगा । कुनगद गावचन होना हुवा भी उदन्न नही अन दम में वोतो गुपवचनात् (१२५६) द्वारा दीप नहीं हाता अदन्ननक्षण टाप ही होता है-कुमा। (५३) भनानिकवा तया शक्या होऽसौ पुरयाचम ॥ विवेचन- भवानिया' जगुद्ध है इम के स्थान पर भयानका' हाना चाहि । 'भी धातु म आनक शोभिव (उपा३८२) सुनद्वार औगादिक नानस्प्रत्यय करन पर भवानर द निष्पन्न होता है। त्रीव की विज्ञान इस में जदन्तमपटान हो प्रययम्यात् ० (१२६२) द्वारा प्राप्त दव का क्षिपदीना च (वा.) वानिक में निषेध हो जाना है। (५४) नीनारीद्वयोमध्ये दो व्याक्यिने वचम् दिवचन-नरन्द न्त्री नगे । 'न उन्द ने पुना म यहा दीप हुना है । जातिवाच्च हो ता नूनरयोवृद्धिश्च (गणन) द्वारा दीन् + वृद्धि करन से 'नारी बनेगा। (५५) दहिती पुत्रव पाल्या शिक्षणीया तयंव च ।। विवचन-हिनी दे म्यान प 'दुहिता' हाना चाहिो। दुन्दि स्ववा- दियो में पटित है जन ऋदन्तलक्षण दीप का न पटववादिन्य (२३३) से निपेर हा जाता है। (५६) मूषिकी परिहर्तया घान्यागाराद् विपश्चिना ॥ विदेचन-मूपिरब्द जादिाप में पटा पा है अन जानिनमन डी (१२६९) का वाघ कर अजाद्यतष्टान् (१२४६) ने टार करने पर 'पिता' बनना चाहेि। (५७) क्या म्बा त्यजेन्निर ब्रह्मचर्याने यिन ॥ विवचन-नानन्द ने स्त्रीसान्या नश्ननी भवनात् । १००६) मबद्वारा नन ?
मैमोव्याख्ययोपताया लघुमिद्धान्तकौमुद्या 7 प्रत्यय करने पर 'म्नण' शब्द निप्पन्न होता है । स्त्रीत्व की विवक्षा में नस्ननोक्क- स्वस्तरुणतलुनानामुपसल्यानम् (वा० १०१) वात्तिकद्वारा दीप प्रत्यय करने पर 'पी' प्रयोग बनता है । जन यहा 'म्त्रणाम्' के स्थान पर 'स्वैगोम्' होना चाहिये । (५८) रम्येय मुभुजी मूर्ती राजते गिरिसथिता ।। विवेचन-'भज' शब्द कोडादिगण मे पटा गया है जन स्वागलक्षण टीप (१२६५) का न कोडादिवतच (१२६६) से निपेध हो कर टाप वरन में 'मुभुना' वनना चाहिीं। (५६) एंद्राया नाय आदित्य उदेति प्रत्यह दिवि विवेचन-इन्द्रो देवनाऽस्या इति ऐन्द्री (पूर्वा दिव) । साऽस्य देवता (१०८१) के अर्थ म इन्द्रशद में तद्धित जण प्रत्यय करने मे 'ऐन्द्र' शब्द निप्पन्न होता है। म्त्रीत्व की विवक्षा म इम से टिडढाणज० (१२५१) भूत्रद्वारा टीप् प्रत्यय करने पर 'ऐद्री' बनता है । अन यहा 'ऐन्द्रया' प्रयोग होना चाहिये । (६०) भार्या चेद् भर्नु देवी स्यात् प्राप्त पत्या न कि भुवि विवेचन-'भर्ता देवो यस्या' इस प्रकार बहुव्रीहिममाम वी विवक्षा में पचा- दिया म टिन् पढे गये भी देवशन्द मे टिड्ढाणन्० (१२५१) द्वारा डीप नहीं हाता कारण कि टित् यहा उपमजन है । उस मूत्र में अनुपसर्जनात् (४११८) का अनुवत्तन होता है । इसलिये यहा अदललपण टाप कर 'भतृ देवा' प्रयोग होना चाहिो । (६१) आचचक्षे नृपो वाच नमस्कारपुर मरीम ।। विवेचन--'पुर मर' शब्द पुरोऽप्रतोऽग्रेषु सत (३ २ १८) मूनद्वारा टप्रत्ययान्न निप्पन्न हाता है । 'नमस्कार पुरमरो यस्या इस बहुव्रीलिमाम मे टप्रन्ययान्न पुर मर- शब्द वे उपसजन होन के कारण टित्त्वलक्षण टीप नहीं हो सकता, अदन्नलमण टा हो कर 'नमस्कारपुर मराम्' प्रयोग होगा । (६२) ससर्गो वामलोचन्यास्तपी हन्ति भनेरपि ।। विवेचन-वामे (मुन्दरे) लोचने यम्या मा वामलाचना । यहा बहुव्रीहिलमाम मे स्वागलक्षण वैकल्पिक टीप् प्राप्त होता था परतु न कोडादिवह्वव (१२६६) में उम का निषेध हा कर अदललक्षण टाप हो जाता है-वामलोचना । जन 'वामनाच- न्या' के म्यान पर 'वामलोचनाया' होना चाहिो । (६३) हेपानावश्मरी चिता भूपे शासति धामिरे । विवेचन-अवश्यम्भाव --आवश्यकम् । द्वन्द्वमनोनादिम्याव (५१ १३२) मूनद्वारा मनोज्ञाद्यन्नर्गत होने के कारण 'अवश्यम्' अव्यय मे भाव में वन् प्रत्यय, आदि. वृद्धि, वु को जब जादेग तथा अव्यपाना भमात्र टिलोप (वा.) से टि का लोप पर 'बावश्यकम्' प्रयोग उत्पन्न होता है। आवश्यकम् अस्त्यम्यनि आवश्यकम्, यहा मन्त्र मे अशंआदिभ्योऽच (११९५) द्वारा अच प्रयय किया गया है। इस में स्त्रीव की परिशिष्टानि विवक्षा में जदन्तसभण टाप हा का प्रत्ययम्यात् कात० (१२६०) द्वारा ककार म पूर्व अकार का इकार आदश करने पर आपश्यिका' बनना चाहिये। कुछ बचाकरण गोगदिगण का आकृतिगण मान कर यहा डीप प्रपर विधान कर पावती पका भी शुद्ध मानने है । (मनोज्ञादिसूने स्पष्टञ्चेद बृहन्यदुरोवर)। (६४) नायहीना विनइक्ष्यति सस्ते नुचग स्निय ॥ विवेचन-अनुच गतीनि अनुचगे। पचादिया म चन्ट् दन निदंग । कारण 'अनुचर' मम्मी व म टिवलमण दाप के कारण अनुचर्ग बनगा । मन यहा नन- चर' हाना चाहिय। (६५) तदमन्दरमभ्यरसुन्दरय निपीयताम् । श्रोत्रशुक्निपुट स्पष्टा माङ्गराजतर्राङ्गगो॥ ( गङ्गा १२४) विवेचन-मुन्दर' शन्द का गोगदिदा म पठ जाया है न घिद् गौरादिभ्यश्च (१२५५) मन म टीप हा कर मुदरी हाना चाहिो । (६६) वीराश्वेत पतयो यामा ता वीरपाया मता ॥ विवेचन–'वीग पनया यामाम्' इम बहुव्रीह्मिमान म नि य माल्यादिषु ( ४ १ ३३) मनद्वारा पति क इकार को नकार आदम तथा दीप प्र यस कपन पर वी. पनी बनना है । अन यहा वीरपन्य होना चाहिए । (६७) कि म्यान् स्याऽयबा मूरी मूर्यपल्या विविच्यताम् ।। विवेचन--सूयाद् देवताया चावाच्य (वा० १०३) इस वानिक म र का दवना भार्या वाच्य हान पर 'मूया' बनता है । म्र की मानुषी भागं अभियत हा ता पुयोगादास्यायाम् (१२६१) ने प् प्रत्यर हा कर 'मग वनगा । कुनी का मूत्र की मानुषी भाया म्बीकार किया जाता है । (६८) पिता रलाक्रो यम्य लक्ष्मीर्यस्य महोदरी । शइयो रोदिति भिक्षायों फ्त नाग्यानमारत ॥ विवचन-'महोदरी के स्थान पर 'महोदरा' हाना चाहिय। तथाहि-'मह (ममानम) उदर यन्या इम बहुव्रीहिलमाम मे वोपमजनस्य (६३८१) द्वारा 'सह' के स्थान पर विकल्प में 'म' आदेग हारर 'सादर' या सहोदर' बनता है। अब म्बीब की विवज्ञा म प्राप्त हुए म्वाङ्गतमा वैकल्पिक टीप का न कोडादिवतच (१२६६) मे निषेध हा जाता है। पुन नासिकोदरोष्ठजघादन्तकर्णनाच (४१५५) म उस की प्राप्ति होती है, इस का भी सहाविद्यमानपूर्वाञ्च (४१५३) में निषेत्र १ बोपसर्जनस्य (६ ३८१) । अर्थ-उपमनन अर्थात् बहुद्रोहि के अवयव 'सह' के स्थान पर विकल्प मे 'म' आदेश हो जाता है। मपुत्र, मात्र । २ सविद्यमानपूर्वाच्च (१५७) । अय --जिम पूर में मह, नत्र और विद्यमान शब्द हो नया अन में उपमजन स्वाङ्गवाची इन्द हा तो ऐन प्रातिपदिक से स्त्रीत्व में डीय प्रत्यय नहीं होता । यया-सरंगा अगा, विद्यमाननामिका। - ११२ भैमीच्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या हो जाता है । अब अजाद्यतप्टाप् (१२४६) मे अदननक्षण टाप् करने पर 'सोदरा' जोर 'सहोदरा' दो रूप सिद्ध हो जाते हैं । (६६) समरपापि सोदी शोलभिन्ना भवेदिह ॥ विवेचन–'सोदी' के स्थान पर 'सोदर्या' या 'समानोदर्या' होना चाहिये । तथाहि-यकारादि तद्धित प्रत्ययो को विवक्षामान मे 'समानञ्च तद् उदरम्' इम कर्मधारयसमास मे विभाषोदरे (६ ३ ८७) सूत्र से समानशब्द के स्थान पर वैकल्पिक 'स' आदेश हो कर 'सोदर' और 'समानोदर' ये दो रूप निष्पन होते हैं। अब 'समानादर' शब्द मे समानोदरे शयित ओ चोदात्त (४४ १०८) सूत्र से यत्प्रत्यय तथा मरे 'सोदर' शब्द से सोदराद् य (४४ १०६) सूत्र से यप्रत्यय हो कर 'समानोदर्य' तथा 'सोदय' ये दा प्रातिपदिक निष्पन्न होते हैं । इन दोना का अर्थ है- समान उदर में सोने वाला अर्धात सगा भाई । अब स्त्रीत्व की विवक्षा में इन दोनो टोप् जादियो की अप्राप्ति मे अदनलक्षण टाप होकर 'ममानोदर्या' और 'मोदी' ये दो प्रयोग सिद्ध हो जाते है । (७०) स्वयमध्यापिका या स्त्री सोपाध्याया स्मृता बुध ।। विवेचन–'उपाध्यायम्य स्त्री' इम पुयोग में मातुनोपाध्याययोरानुम् वा (वा० १०८) वार्तिक से टीप् तो नित्य पर आनुछ आगम का विकल्प हो कर 'उपाध्यायानी' तथा 'उपाध्यायो' य दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। परन्तु जब कोई स्त्री स्वयम् अध्यापन करती है नव वहा डीप का विकल्प भाष्य में विधान किया गया है-- उपाध्यायी, उपाध्याया। यहा आनुत् नही होता । (७१) गिरिशस्य भवेद् भार्या गिरिशा गिरिशीति या विवेचन-गिरिशस्य भार्या गिरिशी । पुयोग में पुयोगादास्यायाम् (१२६१) से टीप होगा । टाप् की प्राप्ति का दीप बाधक है । (७२) स च भवति दरिद्रो यस्य तृष्णा विशाला। मनसि च परितुष्टे कोऽयवान् को दरिद्र ॥ विवेचन-'विशाल' शब्द बह्वादिगण में पढ़ा गया है जत स्त्रीत्व की विवक्षा ? , १ विभाषोदरे (६३ ८७) अथ --यकारादिप्रत्यय की विवक्षा में उदरशब्द वे परे रहते ममानशब्द के स्थान पर विकल्प से 'म' जादेश हो जाता है। यथा- सोदय , ममानोदयं । २ समानोदरे शयित ओ चोदात्त (४४१०८)। जयं-सप्तम्यन्न समय समानो- दरशब्द से शयित (शयन किया हुआ) उर्य में यत् प्रत्यय होता है तथा ममानोदरशब्द का ओकार भी उदात्त हो जाता है। यथा-ममाने उदरे शयित ममानोदर्य । ३ सोदराद् य (४४१०६)। अथ -सप्तम्पल समर्थ मोदग्शब्द में शामिन (शयन किया हुआ) अर्थ म 'य' प्रयय होता है। यथा-सोदर शयित मोदय ।
परिशिष्टानि में बहारिन्यश्च (१२६०) सूनद्वाग डीप का विकल्प होगा पक्ष में अदनलक्षण टाप होगा-विशाली, विशाला । पग्न्तु साहित्य में डीपल प्रयोग अवेष्टव्य हैं । (७३) विक्टो स्थितिमासाद्य नरो भाग्यानि निन्दति ॥ विचन-विक्टाब्द भी वह्वादिगण मे पहा गया है अत पूववन् प्पिा विकल्प हो कर 'चिकटी, विक्टा' बनेंगे। इस के टीपन्न प्रयोग भी अन्वेष्टव्य हैं। (७४) भ्रात पश्य तडागेऽस्मिन् द्वे मीने कोडतो मिय ॥ विवेचन--मीनगन्द जातिवाचक होता हुआ भी साहित्य में स्त्रीलिङ्ग में दृष्टिगोचर नहीं होता । मन्म्यशब्द का स्त्रीलिङ्ग 'ममी' सही प्राय प्रयुक्त देखा जाता है। अन यहा 'द्वे मम्यो' कहना उचित होगा। (७५) सुकुमारा लता नाति पदनेरितपल्लवै ॥ विवेचन-म्वीप्रन्ययों म तदन्नविधि अनुमन है। जन कुमारगब्द की तरह सुकुमारशन्द में भी वयसि प्रथमे (१२५६) द्वारा दीप हारर सुकुमारी वनगा । सुकुमारशन्द में प्रादिममाम है अन कुमारशब्द की अनुपमर्जनता अक्षुण्ण है, दमन अनुपसजनात् (४ १ १४) इस अधिकार के साथ विरोध नहीं पटना। दयोबाचा कुमारशन्द कोमल अथ म पचगि होता है । (७६) भोगप्रवृत्ति खलु मानवाना म्वाभाविवेति प्रवदन्ति सत ॥ दिवेचन–स्वभावाद् आगता स्वाभाविकी। स्वाभाविक पद ठक्प्रययान्न है जन टिड्ढाण२० (१२५१) मूत्र मे टीप होगा टाप नहीं। (७७) गिर क्षोभाग श्रुत्वा वस्य नो दूयते मन ॥ विवेचन-क्षोभकर' शब्द कृनो हेतु-ताच्छील्याइनुलोम्येषु (७६) द्वारा टप ययात निप्पन्न हुआ है । जत म्नीत्व को विवक्षा में टिड्डागन० (१२५१) म टोप हो कर क्षोभवरी' बनेगा। द्वितीया के बहुवचन में 'क्षोभवरी प्रयोग होना चाहि । (७८) नानारूपधरी माया क्स्य नो मोहारिणी॥ विवेचन-धरतीनि घर , पचाद्यच् । स्त्रीत्व की विवधा म टीप, टीए टीन् कोई प्राप्त नहीं, जन जदनलक्षण टाप वर 'नानास्पयरा' होना चाहिो । (७६) प्राना-प्राज्ञीद्वयोमध्ये भेदास्यान निस्पय ॥ विवेचन-प्रना (बुद्धि) अस्त्वन्या इी प्राता। प्रज्ञागन्द से मन्वय म प्रजाश्रद्धार्चान्यो प (५२१०१) द्वाग प (अ) प्रन्यर करने पर आदिवद्धि - स्त्रीत्व में टाप् करने में 'प्राज्ञा' (बुद्धिमनी) प्रयोग सिद्ध होता है। प्रपूर्वक ज्ञा धातु से जातश्चोपमा (७८८) द्वारा प्रत्यय करने पर 'प्रन' बना। प्रज्ञ एव प्राT, म्याथ म अम् । इन 'प्रात' मे मी व को विवक्षा में टिड्ढाणा ० (१२५१) द्वारा दीप बग्ने ल०प० (८) भैमोव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या पर 'प्राजी' प्रयोग सिद्ध होता है । अत एव अमरकोष मे कहा है-प्रज्ञा तु प्राज्ञी, प्राज्ञा तु धीमती। (८०) तिर्बाधते नित्य दुष्टरक्त नर सदा ॥ विवेचन-'कण्डूति ' प्रयोग का माधुत्व चित्य है, यहा क्तिन् प्राप्त नही । कट्वादिभ्यो यर (७३०) से यक्प्रत्ययान्त 'कण्डूय' धातु मे अ प्रत्ययात (८६७) द्वारा 'अ' प्रत्यय हो कर यक् के अकार का अतो लोप (४७०) से लोप कर टाप् लान से 'कण्डूया' बनगा। मम्पदादियो म पाठ के कारण क्विप् प्रत्यय कर अकार एव यार का लोप करन मे 'कण्डू' भी बनता है।' (८१) पावनय सरिद गडगा निर्मलो तापहारिणी ।। विवेचन--पावनणब्द त्युडन्त है अत टित्त्व के कारण टिड्ढाणा० (१२५१) स डीप हा कर 'पावनी' रूप बनना चाहिये । 'निमली' लशुद्ध है, डीप-दीप-दीन् कोई प्राप्त नहीं, अदा तलक्षण टाप हो कर 'निमला' बनगा। 'तापहारिणी' ठीक है, यहा नातलक्षण डीप् हुना है। (८२) आत्मबुद्धि प्रमाणा चेद वृया शास्त्रानुशीलनम् ॥ विवेचन--प्रमाणणब्द नपुमक के एक्वचन मे मदा नियत है। अत वेदा प्रमाणम् की तरह यहा भी 'प्रमाणम्' कहना चाहिये । (८३) परिक्रमा विधातव्या गिरिराजस्य सवत ॥ विवेचन--परिश्मशब्द घनत है अन पुलिङ्ग मे नियत है। इसलिये यहा परिक्रमो विधातव्य' कहना चाहिये। (८४) चिरन्तना इमा रम्या मूतथो मृ मया अपि । विवेचन--यहा पर 'चिरन्तन्य' तथा 'मृ मय्य' प्रयोग करना चाहिये । चिरम्' अव्यय से प्य ल् प्रत्यय तथा तुट का आगम करने से 'चिरन्तन' शब्द उपपन्न होता है। नीत्व की विवक्षा म टिव के कारण इम से टोप् प्रत्यय हो कर चिरन्तनी' बनता है । 'मृमय शब्द मयत्प्रत्ययात है अत स्त्रीत्व मे यहा भी टित्त्वात् डीप होगा। १ परतु 'कति' का प्रयोग कई जगह देखा जाता है । यथा---- सुभग । त्वत्कथारम्भ कर्णे कण्डूतिलालसा । उज्जम्भवदनाम्भोजा भिनत्यड्गानि साङगना ।। (साहित्यदर्पण तृतीयपरिच्छेद) आचाय हेमचद्र ने अभिधानचिन्तामणि की स्वोपशव्याख्या में कण्डूयाशब्द व्याख्या करते हुए 'कण्डूतिरपि' लिखा है। २ 'मृद्+मय' में प्रत्यये भाषाया नित्यम् (वा० ११) वात्तिक से दवार को नित्य अनुनासिक हो कर 'मृन्मय' बनता है । ऋवर्णान्नस्य णत्व वाच्यम् (वा० २१) से प्राप्त गत्व वा पदाल मे पदान्तस्म (१३६) द्वारा निषेध हो जाता है। अत 'मृण्मय' लिखना अशुद्ध है।
परिशिष्टानि मे - (८५) पुरी निर्यादवी जाता देवदेवे दिव गते ॥ विवेचन-'यादव' श द यद्यपि अण्प्रत्ययात है तथापि टिड्ढाणन (१२५१) द्वारा यहा दीप नहीं होता, क्योंकि अनुपमर्जनात् का अधिकार जा रहा है। बहु- व्रीहिममान के कारण 'यादद' यहा उपमजन है अनुपमर्जन नहीं । अत टाप हो कर 'निर्यादवा' होना चाहिये। (८६) प्रिया कनिपया लोके महाभाष्यस्य सूरतय ॥ विवेचन-कतिशब्द मे अयच् प्रत्यय तथा पुक् का आगम करने पर 'कतिपय शब्द बनता है। स्त्रीत्व की विवक्षा म दीप-टीप-डीन् की प्राप्ति न हाने म टाम् हो जाता है । परन्तु शतपथब्राह्मण मे 'कतिपयोर्गा ददाति' रोमा प्रयोग देखा जाता है, तो इस प्रयोग के कारण अयट् प्रत्यय की कल्पना करनी भी उचित प्रतीत हाती है। (८७) मा ते महवरा भूयाद् दुशीलोत्तरदायिका ॥ विवेचन - यहा 'महचरा' के स्थान पर 'महबरी' होना चाह्यि । पचादियो मै अच्यत्ययात चरणब्द 'चग्ट्' इस तरह टित् पढा गया है जन हित्त्वान टी हो वर चरतीनि चरी बनेगा। पुन इम का 'मह' के माथ मुप्मुपासमाम हो कर 'महचरी' निष्पन हो जायगा । अथवा-मह चरतीनि महचरी, भिक्षासेनादायेषु च (३ २ १७) मूत्र में चकार के दल मे महशब्द के उपपद रहते भी 'चर' धातु टप्रत्यय कग्ने मे 'महचरी' बन जायेगा । दोनो अवस्थाओ मे टिन्वान्दीप होगा । इमी तरह 'अनुचरी' के विषय म भी समझना चाहिये । (८८) पापीय नापिती वृद्धा दुष्टा कर्णजपी सदा ॥ विवेचन-~-'पापी' अशुद्ध है, इम के स्थान पर 'पापा' होना चाह्यि । केवलमामकभागधेयपापापरसमानार्यकृतसुमगलभेषजाच्च (४ १३०) सूनद्वारा सना और वेद मे ही टीप का विधान कहा गया है। नापिनम्य स्त्री नापिती, यहा पुयोग में डीप ठीक ही है। 'कर्णेजप' शन्द स्तम्बकणयोरमिजपो (३ २ १३) मूत्रद्वारा अप्रत्ययान्न मिद्ध हुआ है अन यहा म्बीच मे टाप हो कर 'कर्णजपा' होना चाहिये। (८६) अहो विहायना वाला गीर्वाणीभाषणे रता ॥ विवेचन-विहायना' के स्थान पर 'त्रिहायणी' होना चाहिो । यहा दामहायनाताच्च ४ १२७) मूत्रद्वारा दय अथ मे हायनान्न शब्द स स्त्रीत्व म डीप तया त्रिचतुर्या हायनस्य णत्व वाच्यम् (वा.) वात्तिा से णत्व करने पर विहायणी' निप्पन होता है । इसीप्रकार 'चतुयिणी क्न्या' के विषय मे समझना चाहिौ। (२०) निहायणीपु शालासु मोदन्ते घनिका जना ॥ विवेचन-'निहायणीषु' के स्थान पर 'त्रिहायनामु' होना चाहिये, क्योकि पूर्वोक्न दामहायनान्नाच्च (४ १२७) द्वारा विधीयमान डीप् और वात्तिकोक्त णाव भमोव्याख्ययोपेताया लघुमिद्धान्तकौमुद्या सामान्य नपुमकम् दोनो वयोवाच्य होने पर ही हुआ करते हैं । यहा वय की कोई वात ही नही, 'शालासु को विशेपित किया जा रहा है अत डोप+णत्व न हो कर टाप् ही होगा । (६१) छात्रीणा छात्रवृन्दन सङ्गोऽनर्थकरो महान् ।। विवेचन-छादन छत्त्रम्, छत्र शीलमम्येति छान । छत्रशब्द से 'छत्लादि- न्यो ण (४४ ६२) द्वारा तद्धित 'ण' प्रत्यय करने पर 'छाल' शब्द निष्पन्न होता है । अब स्त्रीत्व को विवक्षा मे ताच्छोलिके णेऽपि अण्कायं भवति (ज्ञापक) इम के आश्रय से अग्निमित्त टिड्ढाणञ्० (१२५१) द्वारा डीप् प्राप्त होता है । परन्तु ज्ञापकसिद्ध न सर्वत्र के अनुमार यहा टीप् न हो कर टाप् ही होता है -छात्ना। इमीलिये तो मुनि ने छत्वादिभ्योऽण् सूत्र न बना कर छत्त्रादिभ्यो ण (४ ४ ६२) बनाया है । इम प्रकार छात्रीणाम् के स्थान पर छात्नाणाम् ऐमा स्त्रीलिङ्ग प्रयोग होना चाहिये। [दृश्यता छत्रादिभ्यो ण (४४ ६२) इत्यत्रत्य शब्देन्दुशेखर ।] (६२) आनिग्रहणा जातिलिङगाना च न सवभाक् ॥ विवेचन--गृह्यते ज्ञायतेऽनेनेति ग्रह्णम्, करणे मुश्, आकृति (अवयवसन्निवेश ) ग्रहणम् == ज्ञानमाधन यम्या मा आकृनिग्रहणा । यहा बहुव्रीहिममाम में 'ग्रहण' शद उपसजन है अत ल्युटन्त होते हुए भी टित्त्व के कारण डोप नहीं होता । अदललक्षण टाप् ही होता है । (६३) जीवपत्नी तु या नारी पनिवत्नीति भण्यते ॥ विवेचन-जीवतीनि जीव , पचाद्यच् । जीव पतियम्या मा जीवपत्नी जीवपतिर्वा । बहुव्रीह्मिमाम म स्त्रीत्व की विवक्षा मे विभाषा सपूर्वस्य (४ १ ३४) से पनिशब्द के इकार को विकल्प मे नकार जादेश हो जाता है । नकारादेश वाले पक्ष मे नान्तलक्षण डीप होकर 'जीवपत्नी' तथा अन्यत्र 'जीवपनि' बनता है । इमी अर्थ में अन्तर्वत्-पतिवतोर्नुक (४ १ ३२) मूत्र से पतिवत् वो रॉक का आगम हो कर ऋन्नेभ्यो डोप (२३२) से नान्तलक्षण दीप करने से 'पनिवनी' प्रयोग मिद्ध हो आता है।' (६४) गर्भ धत्ते तु या नारो सान्तवत्नी स्मृता बुध । विवेचन-~गभिणी स्त्री के वाच्य होने पर अन्तर्वत्पतिवतोर्नुक (४ १ ३२) मूत्रद्वारा जन्तर्वत' शब्द को नुक का नागम हो कर नान्तलपण डोप परने से 'मतर्वनी' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। जमानि जमरकोप मे कहा गया है- मापन्नसत्त्वा स्याद् गविण्यन्तर्वनी च गाभणी । (६५) द्रष्टारो वेदमत्राणाम् आसन् कतिपया स्त्रिय ।। विवेचन--'द्रष्ट्र' शब्द से स्त्रीत्व को विवक्षा मे ऋन्नेम्यो डो (२३२) १ मवय पतिमच्छन्दे स्त्रिया वत्व निपात्यने । नुगागमे ततो डोपि पतिवत्नोति सिध्यनि ।।
परिशिष्टानि १७ मूरद्वारा टीप् प्रत्यय हो कर 'द्रष्ट्री' शब्द बनता है। जन यहा प्रथमा के बहुवचन मे 'द्रष्ट्रय' प्रयोग करना चाह्येि । (६६) वृद्धहस्तगता यूनी मोदते न कदाचन ॥ विवेचन- यूनी' यह उपशब्द है । यूनस्ति (१२७६) द्वारा युवनशब्द में 'ति' प्रत्यय करने मे 'युवति' प्रयोग बनता है। (६७) नदीय जानुदघ्नापि वेगेन दुन्तरी मता ॥ विवेचन-- 'जानुदश्ना' यह अपशब्द है । टिड्ढाणज० (१२५१) मूत्रद्वारा टीप हो कर 'जानुदघ्नी' होना चाहिये। 'दुस्नर' शब्द खलप्रत्ययान्न है । स्त्रीत्व मे इस से दीप-टी-दीन् किमी की प्राप्ति नहीं । पद नलजण टाप् हो कर दस्नग बनेगा। (३८) विशदा विमला मेघा विद्याना पारदृश्वनी । दीयता मे सदा देव किञ्चिद यन्न कामये ॥ विवेचन--'पारदृश्वनी' के स्थान पर 'पाग्दश्वरी' हाना चाहि । पार दृष्टवतीनि पारदृश्वरी। 'पार' कम के उपपद रत दृश्धातु मे स्वनिप् प्रत्यय कग्न पर 'पारदृश्वन्' शब्द बनता है। स्त्रीत्व की विवक्षा मे बनो र च (४ १७) स्त्र में टीप् प्रत्यय तथा वन् के नकार को रेफ आदेश करन से हरदृश्वरी' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। (६६) सा हि तस्य धनत्रीता प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥ (काशिका) विवेचन-गतिकारकोपपदाना कृद्धि सह समासवचन प्राक्सुबुत्पत्ते (प०) इस परिभाषा के अनुसार सुबुन्पत्ति में पूर्व ही 'कोन' इम कृदन के माथ 'धन टा' का ममाम हो कर क्रोतात् करणपूर्वान् (१२६४) मे स्त्रीत्व की विवक्षा में टीप् हो कर 'धनक्रीती' बनना चाहिये जो यहा नहीं हुआ। परन्तु इस का ममाधान इस प्रकार करते हैं कि पूर्वोक्न परिभाषा अनित्य या प्रायिक है, कभी कभी इम की प्रवृति नही भी होती । अन यहा भी इम की अप्रवृत्ति मान लेने मे, पहले क्रीत सद में विभक्त्युत्पत्ति करन ममय टाप हो कर 'कीता' वन जायेगा । तब 'धन टा+श्रीना मु' का तृतीयान पुरुषममाम हा पर 'धनत्रीता' बन जायेगा। गरीयम् शब्द ईवमन्- प्रन्ययान्त है अत उगितश्च (१२५०) द्वारा टीप हो जाता है। (१००) परस्य युवती रम्या सादर नेक्षतेत्र क विवेचन- -युवन्शन्द मे स्त्रीत्व की विवभा में यूनस्ति (१९७६) मूत्रद्वारा नद्धिन ति' प्रयय हो र 'युवतिम्' प्रयाग होना चाहिये। कुछ लागा का बना है कि 'युवति' शब्द में सर्वतोऽस्तिन्नर्यादित्येके (गणमूत्र) द्वारा दीप प्रन्यय करन पर 7 ११८ भमोव्याख्ययोपेताया लघुमिद्धान्तकौमुद्दा ४ ७ 'युवनी' बनाया जा सकता है। अन्य लोग यु मिश्रणाऽमिश्रणयो (अदा० परम्म०) धातु मे शतृ प्रत्यय कर 'युवत' श द बना उगिनश्च (१२५०) द्वारा टीप् कर 'युदतो' की मिद्धि किया करते हैं । परन्तु इस प्रकार प्रयोग की मिद्धि हो जाने पर भी दय का बोध नहीं होता जिम की यहा विवक्षा है । [२] परिशिष्टे--स्त्रीप्रत्ययप्रकरणगताऽष्टाध्यायीसूत्रतालिका [इस परिशिष्ट में इस प्रकरण में प्रयुक्त अष्टाध्यायोमूत्रों को अकारादिरम से तालिका दी गई है। मूलोस्त सूत्र स्यूल टाइप मे तथा व्यास्योक्त भूक्ष्म टाइप में मुद्रित किये गये है। सूत्रो के आगे पृष्ठमख्या जाननी चाहिये। अजाद्यसप्टाप द्विगो बन उपधालोपिनो. ६१ न कोडादिवतच अनुपमर्जनात् ४,१२,८७ नवमुखात्मज्ञायाम् बनो बहुव्रीह न पटन्दवादिभ्य अन्तवत्पनिवौनक १३ नामिकोदरीष्टजड्यादन्न अयना डोप नित्य मपल्यादिषु ६४ इतो मनुष्यजाते ७६ पड्गोश्च इद्रवरणभवशर्व० ५२ पन्युनों यज्ञमयोगे उगितश्च पादोज्यतरस्याम् पुयोगादाख्यायाम ऊत्तरपदादीपम्ये पूर्वपदासज्ञापामग ऋन्नेभ्यो डीप प्रत्ययस्यात्कारपूर्वस्या. केवल-मामा-भागधेय. प्राचाफ तदित कीतात्करणपूर्वान ५६ बहुव्रीहेरूधमो डीप नातेरस्त्रीविषयादपोपधात् ६६ बह्वादिम्मश्च २६ टिड्ढाणद्वयसज. दादुभाभ्यामन्यतरभ्याम् मनोजानावयतो पुक्च दामहायनान्नाच्च २१ ७६ ८० ६८ ७ ८५ मन घनश्च १ इस प्रकार म्वीकार करने में एक दोप प्रसक्त होता है। नाहि-जव ति" द्वारा एक बार बीत्व कह दिया गया तो पुन डोप के द्वारा मे व्यवन करने की क्या जरन । वहा भी गया है-उतार्यानामप्रयोग । इम का परिहार इन नर किया जाता है कि स्त्रीप्रत्ययो में उक्नार्यानामप्रयोग वाना नियम लागू ही नहीं होगा, नभी नो कृदियारादस्तिन म 'यक्तिन' कहा गया है, जपया निन्द्वारा बीन्द के क्त हो जाने पर दूसरे स्त्रीप्रत्यय में लान का प्रश्न ही नहीं उठता, जम के लिये 'अस्निन' निषेध की जरूरत हो क्या यो' परािजप्टानि वनो र च बोतो गणवचनात् यूनस्ति ८६ पिद्गौरादिन्यश्च मध्यशिग्वानि भाषायाम् वर्यास प्रयमे २८ मलिशफ्लक्षणबामादेश्व वर्णादनुदात्तातोपधाता विभाषा मपूर्वन्य स्वानाच्चोपसजनाद स्त्रियाम् शाइगरवाद्यनो डौन् हस्तद्धितम्य [३] परिशिष्टे--स्त्रीप्रत्ययप्रकरणान्तर्गतवात्तिकादितालिका [इम परिशिष्ट में वातिको, परिभाषानो, गणसूत्रो, न्यायो, फिदमूनो एवं महत्त्वपूर्ण नाप्यवचन आदियो को अकारादिक्रम से सूची दी जा रही है । इन के आगे पृष्ठपल्या दी गई है। जारान्नोत्तरपदो द्विगु (दा०) निगुताप्नापन्नालमूब. (वा.) जङ्गगात्रभ्य इनि. (वा.) नलीवर (वा.) जादिभि त्रीत्वम्ब० (मि को) ५ निरनुब होन० (५०) अद्रव मूनिमम्बाङ्गम् (महा.) नृनरवादिश्च (TI) अत्रियाभ्या वा स्वायें (दा.) ५५ पाणिग्रहीती भागांनाम् (वा.) अवयवे कृत लिङ्ग ममुदायस्या पावाद्यन्नयन (वा.) (न्याय) पालकालान्न (वा.) अमितपलियान (वा.) पिप्पल्यादयन्त्र (प.) जाकृतिपणा जातिर (महा.) पुन्हाच्चति वनयम (वा.) आचार्यादणत्व च (दा०) ५५ प्रत्ययग्रहणे नदना ग्राह्या (५०) आमनदुह स्त्रिया वा (गप०) प्राणिना बालकनावन्या. (क्रागिरा उस्तार्थानामप्रयोग (न्यार) २५ प्रातिपदिक् ग्रहो लिग (प०) उगिद्वर्णग्रह्णदर्जम् (वा.) मन्यच चाम् (वा.) एकानुबन्धग्रहो ० (५०) ५ मातुलोपाध्यायोर- (वा.) कृदिकारादक्तिन' (गण) भामस्नग्योप० (दा०) भिपकादीना च (वा.) ८ दयवामावावती (महा.) खग्मयोगोपधान्न (वा०) पवनाल्लिप्याम् (बा ) गोत्र च चरण मह (महा.) वाद दोपे (वा.) चन्द्रभागान्नद्याम् (गप०) या नुम्बनकामानिन (मि) ५५ बापतरमेवाभिधीयते (पट) सोनप्रतिषेधे न (वा.) ज्ञापकनिद न मवत्र (प.) लपाबन्ने योञ्च (फ्टि.) ताछोलिरे प.पि. (मि को) १८ वनो न हा दनि. (वा.) त्यानश्व प्रतिपत्र (वा) वन्यवर (वा) १५ भैमीव्याख्ययोपेताया लघुमिदान्तकौमुद्या ४ वर्षाना तणनिनितान्नानाम् (फ्टि०) ३४ सन्नियोगशिष्टाना मह (प०) वर्णाधये नास्ति प्रत्यय ८५ समासप्रत्ययविधी० (वा.) वादाट्ग बलीय (प.) मदतोऽक्सिन्नाद् (गण) शक्ति शस्त्रे (गण) ४१ सूर्याऽगस्त्ययोग्० (वा.) शुद्रा चाऽमहत्पूर्वा० (गण०) मूर्याद् देवताया चाव्० (वा.) प्रवगुरस्योकारावार० (वा०) तत्त्व निविशते पति० (महा०) ३७ हिमारण्ययोमहत्त्वे (वा.) [४] परिशिष्टे---स्त्रीप्रत्ययप्रकरणगतोदाहरणतालिका [नमोव्यारया के इस पष्ठभाग के अन्तर्गत उदाहरणरूप से निर्दिष्ट प्राय छ सौ रूपो को जकारादिक्रम से यहा अनमणी दी जा रही है। इन स्पो के आगे कोष्ठको मे स्त्रीप्रत्यय दर्शाये गये है। (x) इस चिह्न से चिह्नित स्थानों पर किसी स्त्रोप्रत्यय के न होने को सरेतित किया गया है । कोष्ठको के आगे पृष्टसख्या दी गई है। मूलोक्त उदाहरण स्थूल टाइप मे तया व्यारयोक्त उदाहरण सूक्ष्म टाइप में अङ्कित समझने चाहिये। अन्तर्वत्नी (टीप) जति (x) घट्दरणी (डीप) २० अहती (डीप) अपरा (टाप्) ६० अकरणि (x) ४१ अपरी (टीप) जान्नी (डीए) अरण्यानी (डीप) अवननि (x) अजा (टाप्) अर्याणी (टीप) अतिक्शा (टाप्) अर्थी (डीए) अतिकेशी (डीप्) अवदाता (टाप) अवनि (x) निधीवरी (डीप) ८६ अवनी (डीप्) अतिपीवरी (डीप) अवन्ती (डीप) अनिमहिमा (x) अवावरी (डी) ८३ अतिमहिमा (डा) जवावा (x) अअभवती (टीप) है अशिश्वी (टीप) अधियका (टाप) अश्वपालिका (टा) अध्यापिका (टाप) अश्वा (टा) जवयु (x) जप्टाध्यायी (दी) अनडुही (टोप) २७ अमिता (टाप) जनवाहो (डीप) २७ अहि (2) अनुचरी (डीप) १७ नही (डी) अर्या (टाप्) ५७ ५ ५७ ६० ४० Yo ४८ ७८ परिशिष्टानि [आ] जाकृतिग्रहणा (टाप्) आसिकी (डी) एधमाना (टा) एनी (डी) ३४ [ए] आखु (x) ३७,७४ ऐन्द्री (दो) १३ ४० आचार्या (टाप्) आचार्यानी (डी) आढयकरणी (टीप्) जार्यकृता (टाप्) आर्यकृती (टीप) जापी (डीप्) आवश्यकी (डीए) आवश्यिका (टाप्) १६ १२ ६२ १०७ ११० जापधि (x) जोषधी (टीप) [औ] औत्सी (टीप) जोदमयी (डीए) ओपावी (डी) 33 ७२ कटी (टीप) कटका (टाप) कठो (डीए) ७२ इत्वरी (टीप) इदानीन्तनी (टीप) इन्द्राणी (टी) इभ्या (टाप) कण्ट्रया (टाप) २१४ २१५ ४८ ईश्वरा (टाप्) ईश्वरी (डीप्) उत्तानशया (टाप्) उपत्यका (टाप) उपाध्याया (टाप्) उपाध्यायानो (डीप) उपाध्यायी (टी) १०७ ५२ कतिपया (टाप) कतिपयी (टीप) क्दलीस्तम्भोरु (इ) १७१०१ कन्यका (टाप) १३,१०१ कन्या (टाप) कपिला (टाप) ३० कपि (x) कपी (टोप) ५५ करभोपमोरु (x) करभोर (ऊ) वर्णजपा (टा) की (ोप) कल्मापी (डीप) कल्याणकोडा (टाप्) १५ कल्याणपुरा (टाम्) कल्याणगुदा (टाए) कल्याणघोणा (टाप) ६ कल्याणपुच्छा (टा) ६४ कल्याणपुच्छी (डी) ८०,८१ ८० १२. ७ करदनी (डी) ऊरद्वपसो (टीप) करमात्री (टीप) एक्पनी (टीप) एडका (टार) एता (टाप) एतादृशी (टीप) ६२,९॥ ६२,९५ १०७ कामुका (टाप) १२२ भैमीव्याख्ययोपेताया लघुमिद्धान्तकौमुद्या ६ ८१ ४३ १७ ७७ ७४ २१ २४ कामुको (डीए) पारिका (टाप्) किशोरी (डीप) कीदृशी (डी) बुक्छुटौ (टीप) कुण्टोनी (टीप) कुन्ती (टी) कुमारी (डीप) कुम्भकारी (टीप) कुरुधरी (डीप) कुरू (ऊट) कृति (x) कृत्रिमा (टाप्) कृपाणा (टाप्) कृपाणी (डीए) कृशोदरा (टाप) कृशोदरी (टीप्) कृष्णा (टाप) वेक्यी (डीप्) केवला (टाप्) केवली (टीप्) कोकिला (टाप्) क्रियमाणा (टाप्) क्षत्निया (टा) क्षत्रियाणी (टी) क्षिपका (टाप्) क्षीरपा (टाप) क्षोभकरी (टीप्) १०७ ४६ गङ्गा (टाप्) २८ गजनामोरू (ऊद) गणी (डी) गता (टाप्) गत्वरी (डीप्) गरीयमी (डाप) गवपी (डीप्) गायिका (टाप्) गार्गी (टीप) १२ गाग्र्यायणी (डी) गिरिशी (दी) ४० गुर (४) ६ गुर्दी (डी) ४२ गृहपनि (x) ४२ गृहपन्नी (डीप्) गोवा (टाप्) गापा (टाप) ३६ गोपालिका (टा) गोपी (डीप) १२ गौ (7) ६२ गौरमुखा (टाप) १०४ गौरमुखी (डीप्) १७ गौरी (डी) प्रथिता (टाप्) [] घटोनी (डीप्) १०७ चटका (टाप्) चण्टा (टाप) चण्टी (टीप) ६.७३ चतुर्हायणी (टीप) चतुहायना (टा) चतु मूनी (सीप) चतुष्पदी (टीप) ४३ ४५ ४४ ६८ २६ ४८ ४२ [ख] खट्वा (टाप) १२ ६२ ४० खनि (४) खनी (डीप्) खर (x) ६० परिशिष्टानि चतुष्पाद (x) २०२६ २०३६ १०४ १४ 5 च द्रभागा (टाप्) चन्द्रभागी (डी) चन्द्रमुखा (टाप) चन्द्रमुखी (टीप) चद्रवदना (टाप्) च द्रानना (टाप) चनिता (टाप्) चादममी (टी) चारकां (टाप्) चारवर्णी (डीप) चिरण्टी (डीप) चिरन्तनी (डीप) चिरायु (x) चोरवन्ती (टीप) चोरी (डी) चौरी (टीप) ४६ १०२ ६५ १३ तमी (टीप) ४२ तरणी (टीप) ४२ नलुनी (टी) ६१ नादृक्षा (टाप) ६१ तादृशी (टो) तापनी (टी) तापहारिणी (डीप) १३ ताम्रमुखा (टाप) १४ ताम्रमुखी (डी) तारका (टाप्) तारिवा (टाप) नावकी (डीप्} निनिरि (x) ११४ तीक्ष्णशृङ्गा (टाप) नोक्ष्णगृङ्गी (डीप) तुङ्गनामिका (टाप्) १४ तुङ्गनामिकी (डीप) तुदती (टीप) तुदनी (टीप्) तुल्यतमा (टाप) अपा (टाप्) त्रिशत्तमी (टीप) त्रिदाम्नी (टीप) त्रिपदी (टोप) त्रिपादी (टीप) त्रिपाद् (x) त्रिफला (टाप्) विनोकी (टीप) विवर्षा (टाप्) ६ त्रिमूत्रा (टाप्) बिहायना (टाप) ६२ त्रिहायणी (टीप्) यनोका (टाप्) प्रेमो (टोप्) ४० वाजी (टीप) छान्धा (टाप्) २५ जानुदघ्नी (डीप्) नानुद्वयमी (डी) जानुमात्री (डी) निवरी (डीप्) जीवपनि (x) जीवपत्नी (डीप) ६० नटो (टोप्) तत्रभवती (डीप्) ३० १०८ दनु (x) ननुगात्रा (टा) ननुगानो (टीप) M तवी (डी) तमि (x) १२४ भैमीव्याख्ययोपेताया लघुमिदान्नौमुद्या नगरपालिका (टा) १६ नग्नझरणी (टीप) नटी (टीप) नदी (टीप) नमन्ती (टीप) २० २५ ७ नमस्कारपुर मरा (टा) ११० २१ १० दण्डिका (टाप्) दण्डिनी (टो) दव (४) दवी (टीप) दशरथी (टीप्) दाक्षी (टीप) दामा (x) दामा (डाप्) दोव्यतो (टोप्) टुप्त्रीता (टाप्) दुस्तरा (टा) दुलभा (टा ) दुहिता (x) देवकी (टीप) देवी (टीप) देव्या (टाप्) द्रष्ट्री (टीप) द्वारपालिका (टाप्) द्विदाम्नी (टीप्) द्विवर्षा (टाप्) द्विहायनी (टीप) द्वेप्या (टाप्) ११७ १०७ नरिका (टाप्) नरी (टीप) मतको (टीप) नश्वरी (टीप) नानास्पधरा (टाप) नापिती (डीप) नायिका (टाप्) नारी (टोन्) नारी (टीन) निमला (टाप्) निर्यादवा (टाप्) नीति (x) १०८ २३ 6५ नूनना (टा) १०६ नजी (टीप्) नौका (टाप) पडणू (ब्द) [५] ५७ १० १० ४० धनश्रोता (टाप्) धनिका (टाप्) प्रमनि (x) धमनी (टीप) धरणि (x) अरणी (टीप) धारिका (टाप्) धीवरी (टीप) अवका (टाप्) [न] नगरकारी (टीप) पच ती (टीप) पचमाना (टाप्) पञ्चतयो (टीप) पञ्चपूली (टीप) पन्चवटी (टीप) पञ्चाजी (टोप्) पटु (x) ८६ पट्वी (टीप) पठिता (टाप) ८९ पनन्नी (टो) पनिता (टाप) पतिवन्नी (टीप) ४० ८८ १३ १२१ परिपिष्टानि ६४ पृच्छनी (टीप) पृथु (x) पृथुजघना (टाप्) ६६ पृथ्वी (टीप) ७ सह पनी (टीप) पद्धति (४) पद्धती (टीप) पद्मवदना (टाप) परमायदृश्वरी (टीप) परिव्राजका (टाप) पलितकरणी (डीप्) पलिना (टाप्) पशुपालिका (टाप्) पाणिग्रहीता (टाप्) पाणिगृहीती (टीप) १४,११३ २० ४३ पेम्बग (टाप्) पौम्नी (टीप) प्राज्ञा (टाप्) प्राज्ञी (डीप) प्रातरित्वरी (डीप) प्रास्थिको (टीप) प्रियङ्करणी (टीप) प्लाभी (दी) [व] २० ६२ ६२ पाण्डु (x) १० १०८ वलहग (टाप) बनाका (टाप। १० ३२ १२ १२ ह ८८ पाती (टीप) पादापितक्षणा (टा) पान्ती (टी) पापा (टाप्) पापी (टीप) पामा (४) पामा (डाप्) पारदृश्वरी (टीप) पावनी (टीप) पितामही (टीप्) पिपीलिका (टाप्) पिप्पली (टीप) पीनस्तना (टाप्) पीनम्ननी (टीप) पीवरी (टीप) पोवरोर (x) पुत्रकाम्या (टाप्) पुर परी (टीप) पुरमा (टाप्) पुरणो (डी) पूपिता (टाए) पृच्छती (डी) बहुकुम्चग (टाप्) बहुपरिव्राजका (टाप्) वयज्वा (x) बहुयज्वा (डाप्) बहुयुवा (x) बहुसुवा (डा) बहुराना (x) बहुराजा (डाप्) ६३ वहुराज्ञी (टी) ६१ ६१ ६,२६ ६३ बह्वी (डोष्) दवची (डी) बाला (टाप्) बिम्बोप्ठा (टाप्) बिम्बोष्ठी (डीए) विम्वौष्ठा (टाप्) बिम्बोष्ठी (टीप) ददी (टीन) ब्राह्मणी (टीन) ४२ १२६ भैमीव्याख्ययोपेताया लसिद्धान्तकौमुद्या ७४ ४२ मुक्यो (डीप) १०२ मुण्डा (टा) १०६ मुनि (x) ११० मुनी (टीप) ६ मूषिका (टा) मृडानी (टीप) मृदु (x) मृन्मयी (टीप) मृदङ्गा (टाप) १२ मृदङ्गी (डोप्) मृबी (टीप) १० भयङ्करा (टाप्) भयानका (टाप्) भर्तृदेवा (टाप्) भवनी (टीप्) भवती (टीप) भवानी (टीप्) भविष्यनी (टीप) भविष्यन्नी (टीप्) भागोया (टाप) भागधेयी (डीप) भाम्बरा (टाप्) भूपालिका (टाप्) भूमि (x) भूमी (टीप) भूपिता (टाप) भेपजा (टाप्) भेपजी (टीप) ६२,६५ मेधा (टाप्) ६ ८० ४४ ४० ५४ म] ४२ २ ७४ मक्षिका (टाप) मति (x) भन्सी (टीप) मनुषी (टीप) मदा (टाप्) महापानी (टीप) महाललाटा (टाप) महाशूदी (टीप्) मातामही (टोप्) मातुलानी (डीप) मातुली (डीए) मादृशी (टीप) मानुषो (डीप) मामी (टोप्) मामिला (टाप्) यतमाना (टाप) यमी (डी) यवनानो (टीप) १३ यवनी (दीप) यवानी (डीप्) ६२ यष्टि (x) यष्टी (डीप) याती (टीप) यादृशी (टीप) यान्ती (डी) यावनी (टीप) ६ युवति (ति) ३ युवती (टीप) ६६ युवती (टीप) ७१,१०३ यका (टा) यागिनी (डो) [र] ५४ रक्तकण्ठा (टा) रक्तकण्टी (दोष) रजवी (डीप) १२ रजनि (x) रजनी (होम्) ७ Yo ४० १२७ परिनिष्टानि २२ ४० रथक्ट्या (टाप्) रम्भोरु (द) राका (टाप) राज वरी (टीप) 60 ८६ गजयुध्वा (x) 60 ४. वात्मी (दो) वापि (x) वापी (गो) वामलोचना (टाप) वामोर (अ) विटा टाप) विक्टी (टीप) विकन्या (टाप) विदपा (टीप) विपदा (जाप। विलाता (टा) विशाला (टाप) विशागो (टीप) वी माणा (टाप) वीरपत्नी (टीप) राजि (x) रानी (टीप) राती (टीप) रात्रि (x) रात्री (टी) रोनि (-) रवाणी (डी) रूपवती (टीप) रेवती (टीप) रोगिणी (टीप्) रोहिणी (टीप) रोहिता () १- है 10 १०३ ७ २६ [स ] वृत्तार (1) ३५ वृद्धबुमारी (टीप) वृपनी (टीप) वृषलो (टीप) लाणोक (उद) लघु (x) लघुतग (टाप्) वैननेयी (टीप) वैश्या (टाप) १०६ लघी (टीए) तावणिकरी (टीप) लिखली (टीप) लिखन्ती (टीप) लोहितपादिका (टाप) ४१ ८२ शकटि (X) शक्टो (टीप) १० शका (टाप) शक्ति (x) शक्ती (दो) शोर (ऊ) ६,२६ शबली (डीए) २३ शर्वाणो (टीप) शास्तीको (टीप) शायिका (टाप्) ५७ साङ्गरवी (डीन्) ४१ शास्तदृश्वरी (डोप) शिखा (टा) ५२ वक्षमाणा (टाप्) वत्सा (टाप) वधूटी (डोस्) वरुणानी (डोष्) वर्धमाना (टाप्) वस्त्रक्रीती (डी) वहति (४) बहती (डो) ४६ १२८ शुक्ला (टा) शुनी (डीप्) शूद्रा (टाप्) श्द्री (डीप) शूरमेनी (टीप) शूर्पणवा (टाप्) शूर्पनखा (टाप्) शूर्पनखी (डीप) शैली (टीप) श्याली (टीप) ध्येता (टाप्) ध्येनी (डीप्) श्रेणि (४) श्रेणी (टी) प्राणि (x) धोणी (डीप) ४० ४० ४० ४० श्वधू (ऊट) भंमीय्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या साध्वा (x) ८६ २६ महिष्णु (x) ८१,१०३ सहोदरा (टाप्) ७१ १०३ सहितोह (ऊट) ८२ साधु (x) ६७ साध्वी (डीप) माय तनी (डीप्) ६७ मारगी (डी) १०१ सीमा (x) १० सीमा (डाप्) सुक्फा (टाप्) ३५ सुकुमारी (डीप्) सुत्रीता (टाप) सुखमयो (टोप्) सुगला (टाप्) मुगावा (टाप्) सुगात्री (डी) मुगुल्फा (टाप्) सुचर्मा (x) ६० सुचर्मा (डाप) ६१ सुजघना (टा) सुजवा (टाप्) ६५ १४ सुजही (टीप) सुज्ञाना (टाप्) ६५ सुत्वरी (डीप) ६५ मुधीवरी (डीप) ८६ ६२ सुनयना (टाप्) ६२ सुन्दरी (डीप) २६ ११२ सुन्दरोर (x) १०७ मुपदी (दो) ६ मुपर्वा (x) ४६ मुपर्वा (डाप्) मुपाद् (x) ११५ मुपाया (टाप) ८० ६५ श्वेता (टाप्) मखी (टीप्) मदृणी (टीप्) मपनी (टीप) मभापति (x) सभापन्नी (टीप) ममदन्ता (टाप) समदन्ती (टीप) समाना (टाप्) समानी (डीप्) समानोदर्या (टाप) सम्पदा (आप) सर्वा (टा) सविका (टाप) महन्दरी (डी) महवरी (टीप) 8.
परिशिष्टानि १२ मौरी (टीप) 3 ७० 3 सुभगकरणी (डी) २० ५०,५१ मुभगा (टाप) ६५ म्नन यी (टी) मुभुजा (टाप) ११० स्तुति (x) मुमङ्गला (टाए) १२ स्त्रणी (टीप) १८ मुमङ्गली (डी) १२ स्थावरा (टा) १७ मुमुखा (टाप्) ६३ स्यूलङ्करणी (टीप) २० मुरापी (डीप्) १०७ स्निग्यक्ण्ठा (टा) ६२ सुवक्त्रा (टार) स्निग्धक्ण्ठी (टीप) ६२ मुवदना (टाप) स्वत्रीता (टा) मुशिखा (टाप्) ६२ स्वधरा (टाप्) सुशोफा (टार) म्वभावजा (टाप) मुस्वेदा (टा) स्वाभाविकी (टीप) मुहम्ना (टाप) ६२ सूकरी (टीप पी (टीप) सूरी (टीप) हरिणी (टीप) सूर्या (चाप) ४६ हरिता (टाप) मृदरी (टीप) १७ ही (टीप) १११ हारिका (टाप) सादया (टार) ११२ हिमानी (टो) सौपर्ण यो (टीप्) १३ होडा (टाप्) ६ [५] परिशिष्टे--स्त्रीप्रत्ययप्रकरणोपयोगि अष्टाध्यायीसूत्रपाठ [इस परिशिष्ट मे सम्पूर्ण स्त्रीप्रत्ययप्रकरण अष्टाध्यायीरमानुसार दिया जा रहा है। विद्यार्थी यदि इसे कण्ठस्थ कर लें तो इस प्रकरण मे ऐसा नपुण्य प्राप्त हो सकता है जो कौमुदीक्म मे दुर्लभ है । इन सूत्रो मे जो सूत्र लघुसिद्धान्तकौमुदी के मूल मे पढे गये है उन्हें स्यूल टाइप मे तथा अन्यो को बारीक टाइप में दिया गया है ।। अष्टाध्यायीसूत्रपाठे-- (1) ऋन्नेम्यो डीप। चतुर्योऽध्याय (६) उगितश्च । (७) वनो र च। (१) डचाप्रातिपदिकात् । (८) पादान्यनरम्याम् । (२) स्वौजसमौट्छष्टाम्याम्मिडे (8) ठावृधि । म्याम्भ्यस्ड मिम्याम्म्य- (१०) न पट्स्ववादिभ्य । स्ट सोसाइयोस्सुम् । (११) मन । (३) स्त्रियाम् । (१२) जनो बबीहे । (४) अजायतष्टाप् । (१३) टावुभाम्याम यनरम्यान् ल०५० (६) मोदरा (टाप्) प्रथम पाद भमोव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या (१४) अनुपसजनात । (१५) टिडढाणद्वयसज्दघ्न- माच्तियप्ठवठा. कञ्क्वरप । (१६) यनश्च । (१७) प्राचा प्फ तद्धित । (१८) मर्वत्र लोहितादिक्तन्तेभ्य । (१६) कौरव्यमाण्ड्याभ्या च । (२०) वयसि प्रथमे। (२१) द्विगो । (२२) अपरिमागविनाचित- कम्बत्येभ्यो न तद्धितलुकि । (२३) काण्डान्लान् (२८) पुग्पात् प्रमाणेऽन्यतरस्याम् । (२५) बहुव्रीहरी डीम्। (२६) सडस्याऽव्ययादींप् । (२७) दामहायनान्नाच्च । (२८) अन उपवालोपिनो:- यतरस्याम् । (२६) निर सज्ञाछ दसो । (३०) केवल-मामक भागधेय- पापापर-ममानायकृत- (४२) जानपद-कुण्ड-गोण-स्थल- भाज-नाग-काल-नील-कुश- कामुक-क्वराद् वृत्त्यमना- वपनाकृत्रिमाश्राणास्थौल्य- वर्णानाच्छादनायोविसार- मैयुनेच्छाकेशवेशेषु। (४३) शोणात् प्राचाम् । (४४) वोतो गुणवचनात् । (४५) बह्वादिभ्यश्च । (४६) नित्य छदमि। (४७) भुवश्च । (४८) पुयोगादारयायाम । (४६) इन्द्र-वरुण-भव-शव- रद्र-मृड हिमाऽरण्य-यव- यवन-मातुलाचार्याणा भानुक। (५०) श्रीतावरणपूर्वात् । (५१) क्तादल्पास्यायाम् । (५२) बहुव्रीहेश्चान्तादात्तात् । (५३) अस्वाङ्गपूर्वपदाद्वा । (५४) स्वाङ्गाच्चोपसर्जनाद. सयोगोपधात् । (५५) नामिकोदरौप्ठजदधा- दन्तरर्णशृटगाच्च । (५६) न कोडादिवह्वच । (५७) सनविद्यमानपूर्वाच्च (५८) नवमुखात्सनायाम । (५६) दीर्घजिह्वी च च्छ दसि । (६०) दिक्पूर्वपदाडी। (६१) दाद । (६२) सम्पशिश्वीति भापायाम् । (६३) जातेरस्त्रीविषयादयो- मगत भेषजाच्च (३१) रात्रेश्चाजसो। (३२) अलवत्पतिवतोर्नु । (३३) पत्युनों यज्ञसयोग। (३४) विभाषा सपूर्वस्य । (२५) पित्य सप यादिषु। (३६) पूतस्तोर च । (३७) वृपाकप्यग्निकुमित- कुमीदानामुदात । (३८) मनोरौ वा। (३६ वर्णादनुदात्तातोपघातो न । (४०) अन्यतो डीप। (४१) पिगौरादिभ्यश्च । पधात् । (६८) पार-कण-पणं पुष्प फ्ल-मूल वालोत्तरपदाच्च।
परिशिष्टानि (६५) इतो मनुष्यजाते । (७२) मनायाम् । (६६) ऊडुत । (७३) शाड्गरवाद्यनो डौन् । (६७) वाहनान सज्ञायाम् । (६८) पड्गोश्च । (७४) यहश्चाप। (६६) उत्त्तरपदादौपम्प (७५) आवट्याच्च । (७०) सहितशफलक्षणवामादश्च । (७६) तद्धिता । (७१) कद्रु-कमण्डन्बोग्छन्दमि । (७७) यूनस्ति । [६] परिशिष्टे--विशेपद्रष्टव्य-स्थल-तालिका [इस तालिका म इस व्याख्या के कतिपय द्रष्टव्यम्यलो का निर्देश दिया गया है । आगे पृष्ठमख्या दी गई है।] स्त्रीव का विवेचन (३) 'पुयोग' का विवेचन (13) अजादिगण-अनेक उदाहरण () 'गोपालिका' की व्याकरणप्ररिया (४) अजादियो में अदन शब्द प्रत्ययस्थ क्कार की स्थिति 'भूपिक' पर विशेष टिप्पण (६) प्रत्ययस्थान् वे कुछ जपवाद (८) 'पञ्च' मे टानिषेध कमे? (८) मूर्यागम्त्ययो ० का विवचन शनन्तो म नुम्-विवेचन अनुक् न कर जानुन् क्यो? टिड्टाणन पर सुभापित (११) यवानी' में यव का क्या दाप । आगम का टित्त्व टीप्प्रयोजन नहीं (१३) यवनानी-यावनी-यवनी म भेद (५५) 'ण' में भी अण्वत् कार्य लँडादेश शानच् मे डीप नहीं म्वयम् उपाध्याय होने परम्त्रीलिङ्ग (५५) (१७) उपाध्याय और चाय का लक्षण (५५) हलस्तद्धितम्य में 'उपधाया (२२) लम्नतिनस्य पर विशेष वनथ्य (२३) क्रीतावरण० मूत्र की वृत्ति निर्दष्ट (५५) गाग्यायणी म दा स्त्रीप्रत्यय (२५) त्रोतावरण मूत्र को क्वाचिक्ना (13) गौरादिगण-अनेक उदाहरण (२६) 'स्वाङ्ग' का विस्तृत विवेचन दयमि प्रयमे या वयम्यचरम (२६) 'सुशिखा' पाठ दापपूण (६२) (६) वयसि प्रथमे पर पाणिनीयमनव्य (३०) क्रोडादियो का मग्रलोक द्विगुममास म स्त्रीत्वविवेचन (३१) शूर्पणखा का मक्षिप्त इतिहास वर्णादनुदात्तात्तो० का अपूर्व अर्थ (३३) पूर्वपदान् से 'रघुनाथ' मे पच नहीं (६९) अवदाता में डीप क्या नहीं? (३५) 'जाति' का विवेचन (७०) वोतो गुणवचनात् पर भाप्यमन (३६) मनुषी और मानुषी- निप्पनि "गुण' का सादाहरण विवेचन (३७) पाणिनि की माता-दाक्षी बहुशब्द गुणवचन नहीं (३६) अन्नो मे म्वाद्युत्पत्ति (७८) कृदिनारादक्तिन के १४ उदाहरण (४०) कालिदान के कुछ दिन (८१) सर्वतोकिन्न० के १५ उदाहरण (४२) ननरयोवृद्धिश्च का अविवेचन (८६) , (७५) १३२ भैमीव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या कुछ पद्य 'युवती' मे डीप वा डी कैमे(८८) उदाहरणो को वर्णानुक्रमणी (१२०) मूलातिरिक्त कुछ जन्य सूत्र (८८) अप्टाध्यायी का स्त्रीप्रत्ययप्रकरण (१२८) शुद्धाशुद्धबोधकशतकम् (१०१) विशेष स्मरणीय (१३२) [७] परिशिष्टे-विशेष-स्मरणीय-पद्यमाला [भमोव्यात्या-पप्ठभागस्य दर्जनो पद्यों मे से व्याकरणसम्बन्धी कुछ विशेष स्मरणीय पद्य यहा सकलित किये गये है।] (१) टाप-डा चापस्त्रयोऽप्येने डोप-डी-डीन्प्रत्यय सह । ऊतिभ्या मिलिताश्चापि सन्त्यष्टौ प्रत्यया स्नियाम् ॥ (पृष्ठ २) (२) स्तनकेशवती स्त्री म्यान्लोमश पुरुप स्मृत । उभयोरन्तर यच्च तदभाव नपुसकम् ।। (पृष्ठ ३) (३) स्वमा तिम्रश्चतत्रश्च ननान्दा दुहिता तथा । याता मातेति सप्तने स्वयादय उदाहता ॥ (पृष्ठ ) (४) टिड्डाणन्द्वयमच्चुटसिटमास्तिप्तस्तिसिप्यस्थमिद्- वस्मस्नाशिचष्टुनाष्टुरत इशश्छोटयचोऽन्त्यादि टि । लोपोव्योवलिवृद्धिरेचिचिभ दाधाघ्वदाप्लेचट- रित्यब्दानखिलानयन्ति कतिचिच्छब्दान् पठन्त क्टून् ।। (पृष्ठ ११) (५) स्मृत्याऽजादिगणे युक्ता टावुत्पत्तिद्विगोरपि । त्र्यनीति गणे कीत्य स्यादाकृतिगणो हि स ।। (पृष्ठ ३१) (६) त्रीणि यस्यावदातानि विद्या योनिश्च म च । एतच्छिवे । विजानीहि ब्राह्मणाग्रयस्य लक्षणम् ॥ (पृष्ठ ३५) (७) सत्त्वे निविशतेपैति पृथग्जातिषु दृश्यते । आधेयश्चाक्रियाजश्च सोमत्त्वप्रकृतिर्गुण ॥ (पृष्ठ ३७) (८) क्वचित्पुयामपि हर पुयागे डीपमिच्छति । वेक्यी केकयसुता देवकी देवकात्मजा ।। (पृष्ठ ४३) (8) एक्देश तु वेदस्य वेदाङ्गान्यपि वा पुन । योध्यापयति वृत्त्यर्थमुपाध्याय स उच्यते ॥ (पृष्ठ ५५) (१०) उपनीय तु य शिष्य वेदमध्यापयेद् द्विज । सक्ल्प सरहस्य च तमाचार्य प्रचक्षते ।। (११) अयाणी स्वयमर्या स्यात् क्षस्त्रिया क्षत्रियापपि । उपाध्यायाऽप्युपाध्यायी म्यादाचार्यापि च स्वन ॥ आचार्यानी तु पुयागे स्यादों क्षत्रियो तथा । उपाध्याया-प्युपाध्यायी ॥ (पृष्ठ ५६) (पृष्ठ ५५) परिशिष्टानि (१२) सा हि तम्य धनमीता प्राणेभ्यो पि गरीयसी ॥ (पृष्ठ ५७) (१३) अद्रव मूत्तिमत् स्वाद्ग प्राणिम्थमविकारजम् । अतत्स्थ तन दृष्ट च तेन चेत्तत्तथायुतम ॥ (पृष्ट ६२) (१४) क्रोड-बाल-गला भाल-भगोखा खुग्मयुता । शफो भुजो गुद घाणावरौ कोडादिनामनि ॥ (पृष्ठ ६६) (१५) अविकारोद्भव मूर्त प्राणिम्य स्वाङ्गमुच्यते । च्युत च प्राणिनस्तत्तद् निभ च प्रतिमादिषु ।। (पृष्ठ ६४) (१६) जातिग्रह्णा जाति , लिङ्गाना च न मर्वभाक । मदास्यातनिर्ब्रह्मा, गोत्र च चरण सह ॥ (पृष्ठ ७०) (१७) गुणे शुक्तादय पुमि गुणिलिङ्गास्तु तद्वति ।। (पृष्ठ ७१) (१८) शूद्री शूद्रम्य भार्या म्याच्दा तजातिरेव च । आभीरी तु महाशूद्री जातिपुयोगया ममा ।। (पृष्ठ ७१) (१६) पुरा कल्प तु नारीणा मौजीवन्धनमिप्यत । अध्यापन च ददाना सावित्रीवचन तथा । (पृष्ठ ७३) (२०) सर्वे सर्वपदादेशा दाक्षीपुत्रस्य पाणिन ।। (पृष्ठ ७६) (२१) अवावरी धीतिमिग्म्य पीवरी ममारमिधो परमाथदृश्वरीम् । सुधीवरी मत्पुम्पाथसम्पदा नमामि भक्त्या परया मरस्वतीम् ।। (पृष्ठ ८६) [८] परिशिष्टे-स्त्रीप्रत्ययविधायकमुस्यसूत्राणि [स्त्रीप्रययो के विधायकमूत्रो मे विद्यार्थी प्राय डोप डोष डोन आदि मे अशुद्धि कर जाते हैं । अत यहा उन के मौकर्य के लिये तत प्रययो के विधायकसून पृथक् पृयर दर्शाए जा रहे है। [१] टाप्-विधायक- ४ टिहाण (१२५२) १ अजाद्यतप्टाप् (१२४६) ५ नम्नतीक. (वा.) [२] डाप विधाय- ६ वयसि प्रथमे (१२५६) १ डाबुभाभ्यामन्यनग्भ्याम् (४११३) ७ द्विगो (१२५७) [३] चार विधायर- दीदनुदात्तानाप० (१२५८) १ सूविनाया चाव्वाच्य (वा.) ६ वनो र च (४१८) [४] डीप-विधायक- १० पादोऽन्यतरम्याम् (४१८) १ ऋन्नेभ्यो डीप् (२४२) ११ जन उपमातोपिना० (४१२८) २ उगितश्च (१२५०) १२ दामहायनान्नाच्च (८ १२७) ३ यजश्च (१२५२) १३ केवलमामबभागोय० (४ १३०) भैमीव्याध्ययोपैतामा लघुमिद्धान्तकौमुद्या [५] डीप-विधायर- १६ अङ्गगारण्टेभ्यः (वा०) १ पिद्गौरादिभ्यश्च (१२५५), २० पुनश्चेति वक्तव्यम् (वा.) २ आमनदुह लिया वा (गण) २१ वहुधीहरूधसो डीप् (४१२५) ३ जन्यतो टोप् (४१४०) २२ पाणिगृहीती भार्यायाम् (वा०) ४ वोतो गुणवचनात् (१२५६) २३ मध्यशिश्वीति भाषायाम् ५ बह्वादिभ्यश्च (१२९०) ६ दिनारादस्तिन (गण) [६] डोन् विधायक- ७ सवतोऽक्तिनाद् (गण०) ८ पुयोगादाय्यायाम् (१२६१) १ शारिवाद्य जो डीन् (१२७५) ६ इन्द्र वरणभवशवं० (१२६३) २ ननरयोवृद्धिश्च (गण) १० मातुलोपाध्याययोरान ग्वा (वा०) / [७] अड्-विधायक- ११ जाचार्यादण व च (वा.) १ जदुत (१२७१) १२ अयक्षरिमाभ्या वा स्वायें (वा०) २ पड्गोश्च (१२७२) १३ गीतावरणपूर्वात् (१२६४) ३ श्वशुरस्याबाराकार नोपश्च (वा०), १४ स्वाङ्गाच्चापसजनाद० (१२६६) ४ ऊरुत्तरपदादौपम्ये (१२७३) १५ जातेरस्त्रीविषयाद० (१२६६) ५ महिलशपलक्षणवामादेश्च १६ यापधप्रतिषेधे ह्यगवय० (बा०) (१२७४) १७ इतो मनुष्यजाते (१२७०) [८] ति-विधायक- १८ नामिकोदरीष्ठ० (४१ ३०) १ यूनस्ति (१२७६) [६] परिशिष्टे-~-सक्षिप्त पाणिनीय लिङ्गानुशासनम् (सध्यारयम्) [मस्कृत में शब्दो के लिङ्गो का ज्ञान जय भाषाआ की अपेक्षा अधिक जटिल, ध्यानव्य एव चिन्तनीय है। यहा विशेप्य के लिङ्ग के अनुमार हो प्राय विशेषण वा लिङ्ग होता है । सर्वनामों से भी विशेप्यानुमार लिङ्गव्यवस्था मानी जाती है। अन लिङ्गशान इम मे अत्यावश्यक होता है । लिङ्गविषयक अशुद्धि में मारा वास ही गडबडा मरना है। प्राचीनकाल में जब मस्कृत लोकभाषा थी तव लापव्यवहार में ही लिङ्गो का ज्ञान हो जाता था, अतएव भाप्यार ने कहा है--लिङ्गमशिष्य लोकाश्रयत्वाल्लिङ्गस्य (महाभाप्य) । परन्तु अब जबकि सस्कृत लावभाषा नही रही, अन्यो नक ही सीमित तथा विद्वत्ममाज को ही व्यवहार्य वस्तु रह गई है तो लिङ्गगजान की आवश्यकता पूर्वापभया और भी अधिक यह गई है। अद्यत्वे मुधीजन भी निग के विषय में व्यामूट हो कर बहुधा स्खलन करते देखे जाते हैं। जा एवं तिहमान का अत्यावश्यर ममझते हुए मस्कृत कोपकार प्रत्येक शब्द के निज का दशान म मात्न देने जाते हैं। पानिनीय लिङ्गानुशासन में पूरी तरह तो नहीं पर हा कुछ मीमा नर निङ्गनान की आवश्यकता पूरी हो जाती है और इस मे विद्यार्थी लिगमान के प्रति परिशिष्टानि जागरक एव प्रबुद्ध हो जाते हैं । बस यही सोचकर यहा वानोपयागी मक्षिप्त पाणिनीय- लिङ्गानुशासन की व्याख्या प्रस्तुन कर रहे हैं । जाशा है छात्रवृद इम मे लाभाकि हो सकेगा। पुलिङ्ग आदि शब्दो मे पुम्म् आदि शब्द भावप्रधान निर्दिष्ट किये गय है। पुस्त्व लिङ्गम् रम्येति पुंलिङ्गोऽर्थ । स्वात्व निङ्गमयति स्त्रीलिङ्ग । नपमान लिद्गमस्मेति नपुसकलिङ्ग । वैयाकरण लिग को अथ-निष्ठ मानते है पर शन्द और अर्थ में अभेदोपचार के कारण शब्दो मे भी पुतिन नादि का व्यवहार किया जाता है। * अथ सक्षिप्त पाणिनीय लिङ्गानुशासनम् * [१] लिङगम् ॥ यह अधिकाग्म्न है। यहा में जागे शन्दो के निगी का अनुशासन विना जायेगा। [२] स्त्री ॥ सर्वप्रथम सीलिग का अधिकार चला रहे है । [3] ऋकाराता मातृ-दुहित-स्वमृ-यातृ-नना दर ॥ मातृ (माता), दुहित (पुत्री) स्वर (वहन), यात (देवर को पनी) ननान्द ननन्द)--ये पाच दन्त प्रकृतिया स्त्रीलिङ्ग होती हैं । इय माता इस दुह्निा, दय स्वसा, इस याता, इय ननान्दा । क्त आदि योगिक शब्दो मे या क्रोष्ट आदि स्टेशन्दो मे स्त्रीत्व की विवक्षा में सुन्नेन्यो डीप (२३२) से दीप् प्रत्यय हो कर की गोष्टी आदि रूप बन जाते हैं वे ऋदन्त नहीं रहते । तिम और बनम ऋदनपकृति नही अपितु त्रि और चतुर् शब्दो के स्थान पर हान वाले आदेश है । अन ऋदन्नप्रकृतिक उपर्युक्त पाञ्च शब्द ही स्त्रीलिङ्ग हैं। इन में न पटस्वस्रादिन्य (२३३) मे टोप का निषेध कहा गया है। [४] अन्यूप्रत्यया तो धातु ॥ धातु स अनिप्रत्यय अथवा प्रनय करने पर निप्पन्न होन वाले शन्द स्त्रीलिङ्ग होते हैं। उणादयो व्युत्पन्नानि प्रातिपदिकानि (उणायन्त भी व्युत्पन्न = यौगिक प्रातिपदिक होते है) इस मत का आश्रयण कर इम सूत्र का निर्माण किया गया है। अनिप्रत्ययान्न यथा - इयम् अवनि (पृथ्वी), मणि (मा), धरणि (वी), धमनि (नाडी, धीवनी) जादि । कृदिकारादक्तिन (गण) मे पक्ष म दीप हो कर अवनी, मरणी आदि भी बनेंगे। उपन्ययान्न यथा-इस चमू (सेना) तनू (शरीर), वधू, कण्डू (खारिग) खजू (माज), दर्दू (दाद) आदि । [५] अशनिभरण्यरणय पुसि दा ।। १ त्रिचतुरो स्त्रिया तिमृचतसृ (२२४) ।
भंमीव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या अनिप्रन्ययान्न अगनि (तडित्, बिजली), भरणि (नक्षन-विशेष), अरणि (काष्ठविशेष जिसके मथन में अग्नि उत्पन्न होती है)-ये शब्द पुलिङ्ग भी होते हैं । पूर्वमून मे इन को स्त्रीलिङ्गता प्राप्त होती है। अयम् इय वा अशनि । अय भरणि , इयम्भरणि । अयमरणि , इयमरणि । स्त्रीत्वपक्ष में वैकल्पिक डीप भी होगा—अशनी, भरणी, अरणी। [६] मिन्यत ।। मिप्रत्ययान्न तथा निप्रत्ययात शब्द स्त्रीलिङ्ग होते है। यथा -भूमि । ग्लानि । हानि । इत्यादि । [७] वह्निवृष्ण्यग्य पुसि ॥ यह पूर्वसूत्र का अपवाद है । वह्नि, वृष्णि और अग्नि शन्द निप्रत्ययाल हाते हुए भी पुलिग होते है । अय वह्नि । अय वृष्णि । अयम् अग्नि । [८] क्तिन्नन्त ॥ क्ति प्रत्ययान्त शब्द स्त्रीलिङ्ग होत ह । यथा—कृति , दृष्टि , भूति , प्रसूति आदि । अक्तिन' क्थन के कारण पक्ष में डीप न होगा। [8] ईकारान्तश्च ॥ 'ई' प्रत्ययान्त शब्द भी स्त्रीलिङ्ग हात हैं। यथा-इयम् अवी (रजस्वला स्त्री) तरी (नौका), स्तरी (धूम), तन्नी (वीणा), लक्ष्मी । ईप्रत्यय औणादिक है। [१०] ऊडाबन्तश्च ॥ ऊप्रत्ययान्त तथा आवन्त (टाप्-डाप-चाप-प्रत्ययात) शब्द भी स्त्रीलिङ्ग हाते हैं । ऊडल यथा-क्ष्य कुरू, पगू , श्वधू , करभोरु , सहितोर आदि । आवत यथा--इय विद्या, गङ्गा, जरा, त्वरा, सूर्या आदि ।' [११] ग्वन्तमेकाक्षरम ॥ एक अच वाले जो ईकारान्त और उकारात शब्द वे स्त्रीलिङ्ग हात है। यया--इय थी , भू, धी ह्री, भी , भ्रू । इत्यादि। एकाच्वयन से बहुव्रीहि म नही होता-पृथुधी , प्राप्तभू इत्यादि शब्द विशेष्यानुमार लिङ्ग धारण करते है। [१२] विशत्यादिरानवते ॥ विंशति म ले कर नवनवति तक के शब्द चाह मस्ययवाची हो या सम्न्यावाची मदा स्त्रीलिङ्ग हाते हैं । यथा-इय विंशति , इय त्रिंशत्, इय चत्वारिंशत्, दय . १ कई ग्रथा म इस मूत्र का पाठ इस प्रकार पाया जाता है...उड्डयाब तश्च । इम का अर्थ होगा-अप्रत्ययान्त, डी (डीप-दीप दी) प्रययान्न तथा आप (टाप-डाप-चाप) प्रययान्न श द स्त्रीतिग होते हैं । ऊ ययाता तथा जाए- प्रययाला के उदाहरण पर दे दिये गय है। टीप्रययान्तो के उदाहरण है- नदी, गौरी, ग्रामणी आदि ।
परिशिष्टानि - पञ्चाशत्, इय पष्टि , इय सप्तति , इयमशीति , इयनवति । विशनि आदि यदि सख्यापरक हो तो द्विवचन और बहुवचन मे भी प्रयुक्त हो सकते है परन्तु रहेगे तब भी स्त्रीलिङ्ग। यथा- छात्लाणा द्वे विगतो, बालाना तिम्रो विशनय । चतम्रो नवतयो स्प्यकाणाम् । [१३] तलन्त ॥ तन्प्रत्ययान शब्द स्त्रीलिङ्ग हाने है। यथा-शुक्लम्य भाव शुलना । गुनना । जडना । मृदुता । ब्राह्मणस्य कर्म भावो वा ब्राह्मणता । जनाना ममूहो जनना । ग्रामता । वयुता । दव एव देवता [स्वाथिका अपि प्रत्यया क्वचित् प्रकृतितो लिङ्गवचनायतिवर्तते इत्युक्न प्रकृतिभिन्नलिङ्गत्वम) । [१४] भूमि-विद्युत-सरिल्लता-निताभिधानानि ॥ भूमि, विद्युत्, सरित (नदी), लता जोर वनिना (म्नी) इन के पर्यायशब्द स्त्रीलिङ्ग में प्रयुक्त हात है। भूमि के पर्याय यया-इय भूमि , अचला, विश्वम्भरा, वसुधा आदि । विद्युत्पर्याय यथा-इय विगुत्, तदित, मौदामनी, चपना, चञ्चला आदि । सरित्पर्याय यथा-~इय सरित, तटिनी, निम्नगा, आपगा, स्रोतम्बनी आदि । लतापर्याय यथा--इय लता, व्रतनि , वल्ली, वल्लरो आदि । वनिता के पर्याय यथा-दय योपिन्, वनिता, अबला, वामा आदि । [१५] भास्-स्त्र क्-खग्-दिगुठिणगुपानह ॥ भाम (मकारान्त, प्रकाश), खुच् (चकारान्न, खुदा), बज् (जकारान्त, पुष्पमाला), दिश् (दिशा), उप्णिह (छन्दो-विशेष) उपानह (जूना)–य शब्द म्त्रीलिङ्ग होते हैं । इय भा । इय स्रक् । इय यत् । इय दिक् । इयम् उप्णिा । दमे उपानहीं। [१६] प्रावड्-विड-स्त-विट-विष ॥ प्रावृष (वरसान), विपुष (ब्द), रुप् (क्रोध) विप् (विष्ठा), विष् (कान्ति) - शब्द स्त्रीलिङ्ग हाते है । यथा-क्ष्य प्रावृट् । एना विग्रुप परिहरेत् । महया पानालायमप । एतया विषा दृषित जलम् । महल्या त्विषा भामतेऽम्य मुखम् । [१७] शनि-राजि-युदयशनि-बत्ति-भ्र कटि-त्रुटि-वलि पडक्तय ॥ शप्कुलि आदि नो शब्द मालिङ्ग होते है । यथा--इय शमुलि (कणमाग), नि (पति), कुटि (कुटिया) अशनि (विजली), दत्ति (बत्ती), भ्र कुटि (मा) बुदि (क्षण, लेश, कण आदि), वलि (झुरी), पति (वतार) प.. मे टीप हो कर साधुनी, राजो आदि भी बनन है। 1१८] अप-मुमनस्-सम्म-सिक्ता-वर्षाणा बहुत्व च ॥ अर (जल), मुमनम् (पुष्प), ममा (वय, सवत्सर), मिकता (रेत), वर्षा (बरमान)-ये शन्द स्तालिङ्ग है, इनका बहुवचन में प्रयोग होता है। यया-~दमा , भैमीव्यास्यमोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या आप । एता सुमनम । मा निषाद प्रतिष्ठा त्वमगम शाश्वती समा (रामायणे)। लभेत सिक्तामु लमपि यत्नत पोडयन् (भर्तृहर ) । वर्षामु वषन्ति मेघा । देवता- वाची मुमनम् शब्द पुतिन है। मिक्ता और समा शब्द कही कहीं अबबचान भी पवे जाते है । एका सिक्ता तैलदाने समर्था, खायंप्यसमर्या (महाभार)। (५२१२) । [इति स्त्रीलिङ्गाधिकार ] [१६] पुमान् ॥ यह अधिकारमून है । जब यहा मे आगे पुतिन शब्दो का अधिवार चला रहे हैं। [२०] घबन्त ॥ पप्रत्ययान्त तथा अप्रत्ययान्त शन्द पलिग होत हैं । घन्प्रत्ययात यथा- पान , त्याग राग , भाग , पाठ , नाग, दाह आदि। जपप्रत्ययात यथा--पर, गर, यव ,सव,म्तव पब आदि। [२१] घाजन्तश्च ॥ घप्रत्ययान्न तथा जन्प्रत्ययान्त शब्द पुतिन होत हैं। घप्रत्ययान्त यथा- विस्तर । जार । जालय । दतच्छद (ओप्ठ)। गायर । मञ्चर । वह (म्बन्ध)। व्रज (गाप्ट)। आपण (दुकान)। निगम (वेद)। अप्रत्यययात यथा-चय , जय , क्षय आदिर [२२] नटन्त ॥ नप्रत्ययान्न पुलिङ्ग होते है । यज-याच यत-विच्छ-प्रच्छ-रक्षो नड (८६०)- यन, यत्न, रण । [२३] याना तु स्त्रियाम् ।। याताशब्द नम्रत्ययान्त होता हुआ भी नीलिन हाता है। याना मोघा वरमधिगणे नाधमे लन्धकामा (मेघदत ६)। [२८] क्यन्तो पु॥ धुमज्ञवधातु मे "नि' प्रत्यय करने पर निप्प न शब्द पुषिङ्ग हात है। उपसर्ग घो मि (६२)-प्रधि , उपधि , जाधि , व्याधि, विधि , निधि , मधि आदि। विश्न , प्रश्न, . १ जाप मुमनसो वर्षा अप्सर सिरताममा । एते स्त्रिया बहुत्वे स्यरेक्त्वेऽप्यत्तरत्रयम् ॥ २ इम में कई अपवादम्थल भी हैं । यथा-महद भयम् । भयगन्द अप्प्रत्ययान्न हाता हुआ भी नपुमा होता है। वहा भी गया नयरिङ्ग-नग-पदानि नमः।
परिशिष्टानि [२५] देवाऽसुरात्म-स्वर्ग-गिरि-समुद्र-नखकेश-दन्त-स्तन-भुज-कण्ठ-सड्ग-गर-पजा. मिधानानि ॥ देव, असुर, आत्मन्, स्वर्ग, गिरि, ममुद्र, नम्ब, केश दन्न, स्तन, भज, काठ, द्वद्ग, शर और पङ्क-इन मव के पर्याय पुलिङ्ग होते है। देव के पर्याय-अमर , निर्जर , देव , सुर नादि । जमुर के पर्याय-असुर, राक्षम दानव , दनुज आदि । आत्मन् के पर्याय-भान्मा, क्षेत्रज्ञ , पुरुप जादि। स्वर्ग के पर्याय-स्वर्ग, नाव , मुरलोक जादि । गिरि के पर्याय-गिरि, पवत, नग जादि । ममुद्र के पर्याय-समुद्र , सागर , रत्नार, पारावार आदि । उख के पर्याय-पुनभव , कररह, नख जादि । केश के पर्याय-चिकुर, कुन्तल , वाल केश आदि । दन्त के पर्याय--रद, रदन , दन्त आदि । म्तन के पर्याय-स्तन , कुच , वोज आदि । भुज के पर्याय-भुज , बाटु आदि । कण्ठ के पर्याय-कण्ठ, गल जादि । खड्ग के पर्याय-खड्ग , अमि, निस्त्रिश आदि । शर के पर्याय-शर, वाण, आशुग आदि । पङ्क के पर्याय-~पा, कर्दम जादि । [२६] नान्त ॥ नकारान्त शब्द पुलिङ्ग हाते हे । यया-राजा, श्वा, नभा, वृषा, ऋभुक्षा वृत्रहा, तनिमा, गरिमा आदि । ब्रह्मन्, चमन आदि शब्द मन द्वयकोऽत्तरि (७१) दन लिङ्गानुशासनीय अग्रिमसूत्र से नपुमा होते हैं। सर्व खल्विद ब्रह्म । चम । । वर्म । आदि। [२०] ऋतु-पुरुष-कपोल गुल्फ-मेघाभिधानानि ।। ऋतु (यज्ञ), पुरप, पोल (गाल), गुल्फ (गिट्टा) और मेघ-इन पाञ्च के वाचक शब्द पुलिङ्ग होत हैं। ऋतुवाचर-ऋतु । यज्ञ । अध्वर ! मय । जादि । पुरुषवाचक-पुस्प । नर. । पुमान् । जादि । क्पोलवाचक-पोल' । गण्ट । जादि। १ देवता शब्द निन्यजीलिङ्ग है । २ स्वावाची 'त्रिविष्टप' शब्द नपुमा तथा 'या' और 'दिव' मन्द बौनिह है। द्योदियौ द्वे स्त्रिया क्लीने त्रिविष्टपम्-इत्यमर ।
भमोव्याध्ययोपेनाया लघुसिद्धान्तकौमुद्या । । गुल्पवाचक-गुम ।पादन्थि । आदि। मेघवाचक-मेघ । जलधर । दारिद | आदि। [२८] अभ्र नपसक्म ॥ यह पूर्वमूत्र का जपवाद है। मेघवाचक अभ्रशब्द नपुसक लिङ्ग होता है । अन मेघ । [२६] उकारान्त ॥ उमारान्त शब्द पुलिङ्ग होते हैं। यथा -विधु । इक्ष । शत्यू । प्रभु । आदि । यह उत्सर्गसूत्र है । इम के कई अपवादस्थल हैं । निदर्शनाथ एक अपवादम्यन यथा- [३०] धेनु रज्जु कुहु-सरयु तनु रेणु प्रियङ्गव स्त्रियाम् ॥ धेनु आदि उकारान्त शब्द स्त्रीलिङ्ग होते हैं। धेनुरियम् । रज्जुरियम् । कुट (अमावस, कोयलध्वनि)। इत्यादि । अन्य अपवाद आकरपन्था में देगे । [३१] रुत्वत ॥ रजन वाले तथा तु-अन्न वाले शब्द पुलिड्ग होते हैं । यथा--मेर । मतु । हेतु आदि। [३२] दार सेल्-जनु वस्तु-मस्तूनि नपुसके ॥ यह पूर्वसूत्र का अपवाद है । दार आदि शब्द नपुमकलिद्ग होत है। इद दार (लाडी), सेर (जलजक द विशेष), जनु (गले के नीचे की दो हदिया), वस्तु मस्तु (छाछ, लस्मी)। [३३] कोपध || जिनकी उपधा मे ककार हा ऐसे अदन्न शन्द लिङ्ग होते हैं। यथा- नबर (गुच्छा)। कोरक (क्ली)। कल्ल (सिल पर पिमा) आदि । इस मूब वे कई अपवादस्थल है। यथा-चिवुक (ठोडी), अशुा (महीन वस्त्र), प्रातिपदिन, ल्मुक (जलती हुई लकडी), कण्टक, मस्तक, पुस्तक, मोदर (लड्डू) नादि शन नपुमक में देखे जाते है। [३४] टोपध ॥ जिम की उपधा म टकार हो ऐसे अदन्न शब्द पलिद्ग हान है । यथा- घट । पट । आदि । इस के कुछ अपवादस्थल भी हैं । यथा-किरीट, लोप्ट, लगाट, मुकुट आदि नगुमर म देने जात हैं । इद क्रीिटम् इत्यादि । [३५] गोपध ॥ जिन की उपमा म णार हा ऐमे अदन्न शब्द पतिङ्ग होत है। यथा--- पाषाण । गुणः । गण । पण । नादि । ऋण, लवण, मुवण, तण, तारण, पण, चूत जादि कुछ शब्द नपुमक में प्रयुक्त हान है। - परिशिष्टानि १४१ [३६] थोपध ॥ जिन को उपधा में थकार हो ऐमे अदन्त शब्द पुलिग होते हैं । यथा- रथ । अयं आदि । काष्ठ, पृष्ठ, रिक्य (दाय भाग) सिक्थ (मोम) उक्थ (सामवेद वा अवयव) आदि कुछ शब्द नपुसक में प्रयुक्त होते हैं। [३७] नोपध ॥ नकारोपध अदन्त शद पुलिड्ग हाने हैं। यथा-इन (स्वामी या वैश्य), फेन (झाग) । कानन, वन, विपिन, तुहिन, जघन, सोपान, रत्न, श्मशान, चिह्न, अजिन (चमडा) आदि कुछ शब्द नपुमक में प्रयुक्त होते है । [३८] पोपध ॥ पकारोपध अदन्त पाब्द पुलिद्ग होते हैं । यथा-यूप । सर्प । दीप । मूप । कूप जादि । पाप, स्प, पुष्प आदि कुछ शब्द नपुमक में प्रयुक्त होने हैं । [३६] भोपध ॥ भकारोपध अदन्न शन्द पुलिग होते हैं । यथा-स्तम्भ । कुम्भ । शलभ । परभ (ऊँट, म्ड) नादि । जृम्भ-शब्द तीनो लिङ्गो मे प्रयुक्त देखा जाता है- जृम्भ , जम्भा, जृम्भम् (जम्भाई)। [४०] मोपध ॥ मकागेपध जदत शन्द पुलिटग होते हैं । यथा-मोम । भीम । स्तोम । होम । आदि । स्कम (सुवर्ण), कुटकुम (केमर), इध्म (लक्डी) आदि शब्द नपुमक होते हैं। [८१] योपच ॥ यकारोपध अदन शब्द पुलिग होते है । यथा--समय । ह्य । गबन भादि । हृदय, इद्रिय, विमलय (पल्लव, पना), उत्तरीय (जोहने की चादर) आदि नपुसक होते हैं। [४२] रोपध ॥ रकारोपध अदन्त शब्द पुलिङ्ग होते हैं । यथा-शूर । वीर । अकुर । क्षुर नादि । द्वार, तत्र, तीर, रन्ध्र, पत्त्र, पात्र, छिद्र, शस्त्र, शास्त्र, नेर, वक्र (मुख), क्षेत्र, मूत्र, केयूर, गह्वर (गुफा) आदि शन्द नपुसक होते है । [४३] पोपध ॥ पकारोपध अदन्त शब्द पुलिङ्ग होते हैं । यथा-वृक्ष । मेप । यक्ष आदि । पुरोष (विष्ठा), किल्विप (पाप, अपराध) जादि शब्द नपुमक में प्रयुक्त होते हैं । [४] सोपष ॥ मकारोध अदन्त शब्द पुलिङ्ग होते हैं । यथा- वत्म । वायस । महानस आदि । बुस (भूमा), मानन, मान, विम (मलनाल) आदि शब्द नपुसद में प्रयुक्न होते हैं।
१४२ मनोव्याख्ययोपनाया लघुमिद्धान्तकौमुद्या अक्षता, [४५] दाराक्षत-लाजामूना बहुत्व च ।। दार (पत्नी, स्त्री), अक्षत (माबुन चावल), लाज (लाजा), असु (प्राण)-- ये शब्द पुलिग हैं तथा बहुवचन में प्रयुक्त होन है। यथा-टमे दारा लाजा, नमः । नासावमून् मुञ्चति । [४६] रश्मि-दिवसाभिधानानि ।। रश्मि (किरण) तथा दिवस (दिन) के पर्याय पुलिङ्ग हात है । रश्मि के पयार यथा--रश्मि । मयूख । किरण । आदि। किरणवाची दीधिनिशन्द स्त्रीलिङ्ग हाता है। दिवस के पर्याय यथा-दिवम । वामर । घम । आदि । दिनाहनी नपुसके- दिनम । अह । [४७] ध्वज-गज मुज-युजा ।। ध्वज आदि शब्द पुलिङ्ग होते हैं। ध्वज । गज । मुन (मूज)। पुस्ज (समूह)। [४०] ह्रद-कन्द-बन्द-बुदबुद् शब्दा ॥ य पुलिङ्ग हैं। हृद (अगाधजल जलाशय)। कद । कुद (चमेनी का पौधा)' । बुबुद (बुलबुला) । शब्द । [४] सारय्यतिथि कुक्षि-वस्ति-पाण्यन्जलय ॥ मारथि आदि इकारान्त छ शब्द पुलिङ्ग होते हैं। मारथि । अतिथि । कुभि । वरिन (मूत्राशय) । पाणि । अन्जलि (जुडे हुए दाना हाथ) । [इति पुलिङ्गाधिकार ] [५०] नपुसकन् । यह अधिकारमून है । यहा स आग नपुमालिग का अधिकार है। [५१] भावे ल्युडन्त ॥ भाववाची ल्युट् प्रत्यय जिसके जन्न म हा वह मन्द नपुमा हाता है । यथा- गमनम्, हमनम् श्रवणम्, भक्षणम् आदि'। 'भावे' कहने में 'पवनाग्नि' इत्यादि में नमक नहीं होता, विशेष्यानुमार लिज हाता है। यहा 'पच्यते नैनति पचन' इम नाह करणाधिकरणयोश्च (३ ३ ११७) सूत्र में करण मे ल्युट् प्रत्यय हुआ है। इसी तरह 'प्रवृश्चन्तनेनेति प्रद्रश्चन , इमाना प्रवचन इश्मप्रवश्चन' इयादिया मे मम आना चाहिए । [५२] निष्ठा च ॥ 'मावे' का अनुवर्तन हो रहा है। भाव में जा निष्टा (स, तदन शब्द १ पुष्प अथ से नपुमा होता है-कुन्दम् (चमेली का पूल)। २ नपुस्तके भाव क्त (७०), स्पट् च (८७१)। ३ निष्टा से यहा वैवत 'कर' ही अभिधेत है, बावतं नहीं, क्योकि वह भाव म नहीं होता कता मे ही हुआ करता है।
परिशिष्टानि १४३ नमक होता है । नपुमरे भावेंकन (८३०) हमितम्, रदितम्, ज्वलितम्, गतम्, स्थितम्, नूनम् लादि। भावार्थक क्त के प्रयोग में कर्ता में शेप की विवथा मे षष्ठी शेधे (६०१) द्वारा पछी विभक्ति हाती है । यथा-विद्युतो विमितम् (बिजली का चमकना), छात्नम्य हमितम् (जान का हमना), शिशो शयितम् (बन्चे का मोना), मयूरम्य नृनम् (मोर का नाचना), कोक्लिम्य व्याहतम् (कोयल का कूरना), मनग- जस्य गतम (हाथी की वाल)। इन स्थाना पर द्याग म प्राप्त का म पष्ठी का न लोकाव्यनिष्ठाखलयतनाम् (02 ६६) मे निषेध हा कर जनिहिल बना म तृतीया- विभक्ति प्राप्त हानी थी पर तु क्तस्य च दर्तमाने (२३) मूगम्थ भाप्य व प्रामान में ऐसे म्याना पर देवल शेप की ही विवक्षा मानी जाती है क्तृत्व की नहीं (दवे The Students' Guide to Sanskrnt by VS Apte, Page 103)। [५३] त्व प्यनौ तद्धिती ॥ भाव में विहित नदिनमज्ञक ना त्व' और 'प्यन प्रत्यय, तदन्न गन्द नपुसक. लिड्ग होत है। यथा-शुक्लम्य भाव शुक्रत्व शौक्यम । जदम्प भावा अन्य जाट्यम् । मूढम्य भावा मूटब मौट सम् । इन म त्व और प्यन् क्यि गर है। चतु- रम्य भाव चातुर्यम् । निपुणग्य भावो नपुण्यम् । मधुरम्य भावा माऽयम् । उचितम्य भाव औचित्यम् । दन में प्यन हुना है । प्यन का पित् किया गया है अत लक्ष्वानुमार क्वचित् चित्त्वमामय्य म पिद्-गौरादिभ्यश्च (१२५५) द्वारा डीप हा कर भमक्षा अकार का नया तद्धित यार का लोप करन मे चातुरी, नपुणी, मागे, जोचिती आदि स्त्रीलिट्ग प्रयाग भी बनत है । प्यन हाने पर भी नपुमलिटग का प्रयोग देखा जाता है । यथा- सुखमेव सौख्यम् । मन्निधिरख मान्निध्यम् । समीपमेव मामीप्यम् जादि । [५४] यद् य-ढग्-यग्-अन-अण् वुन द्याश्च भावरमणि ॥ भाव अथवा कम मे होन वाल यत्, य, टक्या, जन अ, वुन् जार 8- प्रयय जिम जनम हो व शन्द नपुमनिट्ग होते है। उदाहरण यथा- यत्प्रन्यय-ननग्य भाव कम वा स्तेयम् (चोरी। यप्रत्यय-मस्युर्भाव कम वा मध्यम् (मित्रता)।' देकप्रत्यय-पेभाव कम वा कापयम् (चञ्चलता, अनुकरणशीलता)।" यप्रन्यय-मेनापतेर्भाव कर्म वा मैनापन्यम् (मेनापतिब)। बाय में १ चतुर्वर्गादोना स्वार्थ (प्यत्र ) उपमध्यानम् (वा०)। २ स्तेनाद्यन्नलोपश्च (५१३२५) । ३ सस्युर्य (५११२६)। ४ कपिज्ञा योई (११६२) । ५ पत्यन्तपुरोहितादिम्यो यक् (११६३) ।
भमायाख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या पुरोहितम्य भाव कर्म वा पौरोहित्यम् (पुरोहिताई)। जनप्रयय-अश्वस्य भाव कर्म वा जाश्वम् (घोडे का भाव)।' कुमारस्य भाव र्म वा कौमारम् (लवपन)। अण्प्रत्यय-यूनो भाव वर्म वा यौवनम् (जवानी)। वनप्रत्यय-रमणीयस्य भावो रामणीयकम् ।' छप्रत्यय-अच्छावारस्य भाव कम वा अच्छावातीयम् ।' [५५] अव्ययीभाव ॥ अव्ययीभावममाम नपुसकलिङ्ग होता है। नपुमक्त्व के वारण मे ह्रस्वो नपुसरे प्रातिपदिक्स्य (२४३) द्वारा ह्रम्व आदेश हो जाता है । यथा-मालायाम् इत्यधिमालम् । अविखट्वम् । अधिगोपम । नद्या मीपम् उपनदि (टचोभावे)। उपपोर्गमामि । अप्टाध्यायी मे अव्ययीभावश्च (६११) द्वारा प्रतिपादित विषय का यहा पुन म्मरण कराया गया है। इसीप्रकार आगे के कुछ मनो म ममयना चाहिये । [५६] दद्वक्त्वम ॥ ममाहारद्वन्द्व द्वारा निप्पन्न श द नपुमबालिग होता है । यथा-पाणी च पादो च एपा ममाहार पाणिपादम । मादटिक्वणविकम् । रविवाश्यारोम् । द्वन्दश्च प्राणि तूयसेनाङ्गानाम (६६१) मूत्रद्वारा यहा एकवद्भाव समझना चाह्यि । [५७) परदत ॥ तन्पुरपममाम परवल्लिड हाता है अर्थात तत्पुरष समाम म परपद का जा निग हाना है वही ममम्न पदमा हो जाता है। यह सूर जष्टाध्यायीस्य परवल्लिङ्ग द्वतत्पुरपयो (६६२) का स्मारव है। उदाहरण यथा-पिप्पत्या अधम् जय- पिप्पलो। इयमपिप्पली ग्राह्या । पूर्व कायम्य पूवकायोऽयम् । इम के कई अपवाद- स्थला का ममामप्रकरण म बणन जा चुका है वही देखें । [५८] रानाहाहा पुसि ।। यह परवानगता का अपवाद है। राज, अह्न, अह-ये शब्द जिम में अन में हा एमा तत्पुम्पसमाम पुलिग होता है। पूर्वगए । अपररात्र । पूर्वाह्न । मपराह्म । वह । श्यत् । यह मूत्र अष्टाध्यायी म भी पढ़ा गया है। वहा इस मूत्र म 'दर' की भी १ प्राणभग्नातिवयोवचनोद्गात्रादिन्योऽन (५१ १२९) । २ हायना तयवादिन्योण (५१ १३०)। श्वयुवमघोनामतद्धिने (२६०) मूत्र मे तदितपदाम होने में मम्नमारण नही हुआ । ३ पोपधाद गुस्पोतमा वन (५११३२) । ४ होत्रापार (५११३५) । नयावार ऋत्विग्विशेष ।
परिशिष्टानि अनुवृत्ति आती है अत रात्रान्न द्वन्द्व भी पुलिड्ग ममनना चाहिये-अहश्च गरिरच जहोरात्र । [५६] संख्यापूर्वा रात्रि ॥ मख्यावाचक जिम का पूर्वपद तथा रात्रिशद जिम का उत्तरपद हो ऐमा तन्यु- रुपममाम नपुमालिग होता है । यथा-द्वयो रायो समाहार-द्विरारम् । निमृगा रात्रीणा समाहार-त्रिरात्रम् । चतमणा रात्रीणा समाहार -- चतूरात्रम । सम्मा- वाचक पूर्वपद न हो तो परवल्लिङ्गना का वाध कर रानाहाहा पुसि (९५७) सूत्र मे पुस्त्व हो जायेगा-मर्वरात्र । मख्यातरात्र । पुण्यगर । इन सा उदाहरणो की सिद्धि इस व्याच्या के ममामप्रकरण में देखें। [६०] हिगु स्त्रिया च ॥ द्विगुममाम स्त्रीलिङ्ग मे और कही कही नपुसकलिङ्ग म भी होता है । स्त्रीलिङ्ग में या-नयाणा लोकाना ममाहार –त्रिलोकी। नपुमकलिग म यथा-त्रयाणा भुवनाना समाहार-तिभुवनम् । पन्धपात्रम् । [११] इसुसन्त ॥ इम् या उम् जिम के अन्त मे हो वह शब्द नपुसकलिदग हाता है । यथा-- हवि , मपि , धनु , वपु, चक्षु आदि । [६२] अचि स्त्रिया च ॥ परन्तु अचिम् (अग्निज्वाला) श द स्त्रीलिद्ग में भी प्रयुक्त होता है । इय- मचि । अचिरिदम् । {६३] छदि स्त्रियामेव ॥ छदिम् (पटल, छन) स्त्रीलिङ्ग में ही प्रयुक्त होता है । जीर्णा छदिवासु प्रश्च्योतति । अमरकोष मे पटल डदि ऐमा पाठ है । यहा पटलम् इम नपुसक के साह- चर्य मे छदिर को भी व्याख्याकारो ने नपुमक माना है परतु यह पाणिनिमूत्र के विद्ध समझना चाह्येि । [६४] मुख नयन-लोह-वन-मास रुधिर-पार्नुक-विवर-जल-हल-धनान्नानिधानानि ॥ मुख आदियो के वाचक शब्द नपुसकलिङ्ग होते हैं । १ अस्य व्यवस्था सूत्रवात्तिपाठयोरित्य प्रदर्शिता-स नपुसम्म (२४ १७)-स समाहारद्विगुर्नपुमकलिङ्ग स्यात् । परवल्लिङ्गतापवाद । पञ्चगवम् । अका- रान्तोत्तरपदो द्विगु स्त्रियामिष्ट (दा०)-पञ्चमूली । त्रिलोकी। आवन्तो वा (वा.)--आवन्नो द्विगु स्त्रिया क्लीवे च स्यात् । पञ्चखटवी, पञ्चदम् । अनो नलोपश्च, वा च द्विगु स्त्रियाम (वा.)-अन्न तम्य द्विगोन लोप , म्नी वा च, पक्षे तीवनपर्य । पचनक्षा, पचनक्षम् । पास्त्राद्य तस्य न (वा.)- स्त्रीत्व न, अपि तु म नपुमकम दति क्लीवत्वमेव, अदन्न वेन म्नीत्वे प्राप्ते नद- पवादार्थ वात्तिकम् । पञ्चपात्रम्, विभवनम् । ल.५० (१०) भैमीव्याख्ययोपेताया लघुसिद्धा तकौमुद्या । मुखबाचक-मुखम्, वदनम्, वक्त्रम्, आननम् आदि नयनवाचक-नत्रम्, नयनम्, जक्षि, लोचनम आदि । लोह्वाचक-लोहम्, जय , पालायमम् आदि । वनवाचक-वनम्, अरण्यम्, विपिनम् वान्तारम् आदि ।' मामवाचा-मामम, आमिषम्, पिशितम् आदि । रविरमाचक-धिरम्, रक्तम्, शोणितम, जसम आदि । कार्मक (धनुप) वाचक-धनु , कामकम्, शरामनम् आदि । विवर (छिद्र) वाचक-विवरम, छिद्रम्, दिलम् रन्द्रम आदि । जलवाचा-उलम, पय , मलिनम्, वारि, कोयम् आदि । हलवाचक -हतम्, लाद्गलम् आदि । धनवाचक-धनम् वित्तम्, द्रविणम वसु आदि ।' अन्नवाचक अन्नम्, अशनम, अन्ध जादि । इस मून के अनक अपवाद कोषग्रथा म पाये जाते है। [६५] सोरार्थोदना पुमि ॥ मीर (हल), अर्थ (धन) और आदन शब्द पलिड्ग म पाय जात है । यह पूव. मूत्र का अपवाद है । मीर | अर्था पादरजोपमा गिरिनदोवेगोपम यौयनम (हितोप० ११५५) । आदन । [६६] लोपध ॥ जदन्त लकारापध शद नपुमकलिदग होत है। यथा-पुलम् । कूलम् (किनारा)। स्थलम । आदि। इस के कई अपवादस्थल है । यथा-तूल, उपन (पथर) ताल, कुसूल (धान्यमग्रस्थान), कम्वन, वृपल आदि कई शद पुनिड्ग में प्रयुक्त हातह। [६७] शतादि सख्या ॥ सध्या या मय्यय अय म वत्तमान शत आदि मच्याए नपुमकलिड्ग म प्रयुक्त हाती हैं। यथा-शत जना । जनाना शतम् । सहय जना । जनाना मह्यम् । इत्यादि । [६८] शताव्युत प्रयुता पुसि च ॥ शन, अयुन (दम हजार), प्रयुत (दम लास)-ये सख्याए पुलिग में भी प्रयुक्त होती है । पूवसूत्रानुमार नपुमवत्व के प्राप्त होने पर पुलिट्ग वा भी विधान किया गया है। शतोऽयम्, इद शतम् । अयुतोऽयम्, इदम् अयुतम् । प्रयुनोऽयम्, इदम्प्रयुतम् । १ दृश् और दृष्टि शब्द स्त्रीलिङ्ग होते हैं । २ अटवी और अरण्यानी शब्द म्त्रीलिङग होते हैं। ३ धनवावी र शब्द पुलिड्ग और स्त्रीलिङ्ग दोनो में प्रयुक्त होता है ।
परिशिष्टानि [६६] तथा कोटि स्त्रियाम् ॥ लभा (लाख) और कोटि (गेट) गन्द स्त्रीलिटा में प्रयुक्त होते हैं। यह सूत्र शतादि सख्या भून का अपवाद है । इन का एक सुभापिन में प्रयोग यथा- श्यिती पञ्चसहस्रो क्यितो लशापि कोटिरपि स्थिती । औदार्योन्नतमनसा रत्नवती बनुमनो क्यितो ।। (नुनाषितरत्न० पप्ठ ७०) जमरकोपादियों में लाजव्द को नयनर नी माना गया है। [30] शक पुसि ॥ गहु (मौ खरब) गब्द पलिका प्रयुक्त होता है। यह भी शनादि मन्या मूत्र का जपवाद है । शरयन् । [१] मन्द्वयकोतरि ।। दो अचो वाला मन्प्रत्ययान्न मन्द जा कतृ वाची न हा वह नामकलिदान प्रयुक्त होता है । यथा-इद वर्म । २८ चर्म। इन इमतिय कहा है कि दा में जधिर अचो दाले गन्दो में इम की प्रवनि न हो। यथा-अपोनादगिना घोर्भाव -लधिमा महतो भाव-महिला । य नब पूर्वोक्त नान्न (निदा० २६) मूत्र में पुलिया है। प्रयोग यवा-एतावानन्य महिमा तो ज्यायाश्च पूरुष (वर १०६०३)। अन-' इसलिये कहा है कि-ददातीति दामा (मनिनाव। इत्यादियो में नपुमान्य न हो। [२] ब्रह्मन् पुसि च ।। ब्रह्मन्गन्द नपुनर के अतिरिक्त पुलिदा म नी दजा जाता है। रहा या न्यितविभाषा ममननी चाह्येि । चतुरानन (ब्रह्माजी) में अथ म यह पुनिता तका जन्यत्र परमान्मा आदि जयाँ म इने नप मन ममनना चाह्मि । ब्रह्मा विधाता चनः । मर्द सल्विद ब्रह्म [७३] असन्तो द्वयक ॥ दो जचो दाला अम्-अन माद नपरक हाना है। यथा-या । नप । पर। मन जादि । 'च' कथन के कारण 'पद्रमा' अदि म नहीं होता । वह पलिका है। 'वैधन्' गाद पूर्वोक्त देवासुर० (लिहा. २५) मूत्र म पुलिद्ग ममनना चाहि । कुछ लोग इस मूत्र में भी 'जक्नरि' पद का अनुपर्नन कर विदधानीति वा इस तरह परिहार करते है। [४] अप्परा स्त्रियाम ॥ अप्मरम् द म्त्रीलिङ्ग में प्रयुक्त हाता है। यह मद प्रयोग में प्रान बहुवचनान देखा जाता है। दमा अपरम । कही कही एकवचनान्त नी प्रयुक्त हाता है-भी नामाप्मरा । 1७५] बान्त ॥
१४८ भैमोव्याख्ययोपैताया लघुसिद्धान्तकौमुद्या 'त्र' शब्द जिम के अन्त मे हो वह नपुसकलिङग होता है । यथा-छत्त्रम्, पत्नम्, पातम्, दानम्, नेत्रम् जादि । [७६] यात्रा-माना-भस्त्रा दष्ट्रा वरना स्त्रियामेव ।। याना, माना, भस्ना (धोकनी), दष्ट्रा (दाढ), वरवा (चमडे की पेटी जो घोडे आदि की छानी के नीचे वान्धी जाती हैं)-ये पाञ्च शब्द स्नोलिड्ग मे ही प्रयुक्त होत है । पूर्वोक्त बात (७५) सूत्र का यह अपवाद है । इय याना । इय माना । भग्त्रेयम् । दष्ट्रेयम्' । वरनेयम । [७७] भूत्राऽमित्रच्छास्त्र-पुत्र-यन्त्र वृत्र-मेढोप्दा पुसि ।। भृत्र ( ), अमित्र (शत्रु), छाल, पुत्त्र, यर वृत्र (मेघ आदि), मैट्ट (मूत्रेन्द्रिय) और उप्ट (ऊँट)-ये शद पुलिड्ग होते है। यह भी बात (७५) मून का अपवाद है । अयम्भृत्र । न मित्रम-अमिन (शत्रु)। तत्पुम्प-ममास में परनिगता का प्रकृतमूत्र से वाध हो जाता है । तस्य मिनायमिनास्ते (माघ २१०१) । छात्रोऽयम् । यन्नोऽयम। को वन ? मेघ इति नरुक्ता । मेदोऽयम् । प्टा यम् । भृत और पुलिड्ग यन्त्र शब्द के प्रयोग अवेपणीय है। [७८] बल-कुसुम शुल्व-पत्तन-रणाभिधानानि ।। बल आदि के वाचक शब्द नपुसकलिड्ग म प्रयुक्त होत है । बलवाची यथा-वलम् मह (महम्) वीयम् जादि ।' पुष्पवाची यथा-पुप्पम्, कुसुमम्, प्रमूनम् आदि । ताम्रवाची यथा-ताम्रम्, शुल्वम्, म्लेच्छमुखम् जादि । नगरवाची यथा-पत्तनम् नगरम्, पुरम् आदि ।' रणवाची यथा-रणम, युद्धम्, जन्यम्, मृधम् आदि। [५६] फलजाति ॥ फ्रजातिवाचक शब्द नपुमक होते हैं । यथा-आभरकम् । आम्रम् । कुछेर १ दप्याशब्द दाम्नीशस० (८४४) मूत्रद्वारा प्रत्ययान्न सिद्ध होता है। परंतु पिन्वान् पिदपौरादिग्यश्च (१२५५) द्वारा दीप के प्राप्त होने पर अजादिगण म पाठ के कारण उम वा बाध हो कर टाप हा जाता है। उपर्युक्त भूत्र में दय' का पाठ भी टाप करने में ज्ञापर हो सकता है । २ दम के कई अपवादस्थल भी हैं । यथा-पराकम (५०), शस्ति (स्त्री०) । ३ नगरवाची पुर और नगरी शन्द स्त्रीलिङ्ग हाते है । नगरविशेषवाची ययाथुन- निटग को धारण करत हैं। यथा-कान्यकुब्ज , मथुरा, वाशी, पाटलिपुत्रम् - आदि। ४ युद्धवाची शब्द पुलिग होत है। यथा-मग्राम , आह्व आदि। कुछ स्त्रीलिङ्ग भी होत हैं । यथा-आजि , सयत्, युत् (युध्) आदि ।
परिशिष्टानि १४६ शन्द जन्य लिगो मे भी प्रयुक्त देवे जाते हैं । यथा -हरीतकी। जाम्बवम् । [८०] वृक्षजाति स्त्रियामेव ।। वृक्षजातिवाचक शब्द (क्वचित्) स्त्रीलिङ्ग मे ही प्रयुक्त हान हैं। यथा- हरीतकी (हरड का पड), आमलको (आमले का पेड)। [८१] वियजगत्-शत्-शकन्-पृषद् पदुदश्वित ।। वियन् (आकाश), जगत्, शकृत् (विष्ठा), शक्न् (१), पृषत् (विन्दु), यकृत (जिगर) और उदग्विन् (छा, मठा)--य सान गन्द नपुमा हात है । तारक्ति वियत् । इत्यादि। [८२] नवनीताऽवतानाऽनता मृत निमित्त वित्त-चित्त-व्रत-रजत-वृत्त-पलितानि ।। नवनीत (माखन) अवनान (चंदोला), अन्त (झूठ) अमृत, निमित्त, वित्त (धन), चित्त, बन, रजन (चान्दी) वृत्त (वृत्तान्न) और पलित (वृद्धत्वज य श्वेतता)। य शन्द नपुसकलिग म प्रयुक्त होत है । नीत यदि नवनीत नीत नीत च कि तेन । आतपतापितभूमौ माधव मा धाव मा धाव ॥ इत्यादि । इति नपुसकलिङ्गाधिकार ] [१३] स्त्रीपुसयो । यह अधिकारमूत्र है। अब यहा में आगे जा शब्द का वे मनोलिट्ग और पुतिद्ग अर्थात दोनो लिट्गा म प्रयुक्त हागे । [८४] गो मणि-यष्टि मुष्टि-पाटलि-वस्ति-शाल्मलि-त्रुटि-मसि-मरोवय ।। गा जादि दम शब्द म्बीनिटग और पलिग दोनो में प्रयुक्त हात है। गोशन्द वल अर्थ में पुलिड्ग तथा गाय अर्थ मे म्नालिट्ग है । अय गौ । गौग्यिम् । इय मणि । अब मणि । यप्टि (छडी) शन्द नीलिड्ग में तो उपलध है परन्तु इम के पुलिङ्ग में प्रयाग मृग्य हैं । अय मुष्टि , इय मुष्टि (मुट्ठी) । पाटलि (श्वेलरकन पुप्पविशेष) शन्द का कोपकारा न स्त्रीलिङ्ग ही माना है। पुलिटग में प्रयोग अन्वेषणाय है । इय बस्ति , जय वस्ति (मूत्राशय) । शाल्मलिरयम्, शाल्मति चन्द पुनिदग मे ही दखा जाना है । त्रुटि (लब, लेश कण आदि) शन्द स्त्रीलिट्ग म ही प्रयुक्त मिलता है । ममि (स्याही) श द दोनो लिगा मे उपलय हाता है । मरीचि (किरण) शब्द उभयलिद्ग है, बहुधा बहुवचनान्न देखा जाता है । (८५] मृत्यु-शीघु वधु-कण्ड-रेणव ।। मृत्यु (मौन), गोधु (मद्य), कामु (वर), कण्ड (मारिश) और रणु (धलि)-ये शब्द स्त्रीलिट्ग और पुनिट्ग दोनो मे प्रयुक्त होत हैं। इय मृत्यु जय मृ । इय शोधु । अय शोधु । य क , अय का धु । इय कण्डु, अय कण्ड । इय रेणु , अय रेणु । कर्क और कण्डु से स्त्रीत्वपक्ष मे अप्राणिजातेश्चाऽरवादी- नामिति वक्तव्यम् (वा०) वात्तिः स ऊद् प्रत्यय हा कर-ककन्यू, कण्डू भी वनगा।
भैमीव्याख्ययोपेताया लघुमिद्धान्तकौमुद्या . [८६[ गुणवचनमुकारान्त नपुसके च ॥ उवागन गुणवाची शब्द स्त्रीलिङ्ग, पुलिग तथा नपुसकलिङ्ग अर्थात् तीनों लिगा म प्रयुक्त होते है । यथा-पटुग्य घाल, पवीय कन्या, पटविद कुलम् । [८७] जपत्यायस्तद्धिते ॥ अपत्याथ मे विहिन जो तद्धितप्रत्यय तदन्न शब्द पुतिन जोर स्त्रीलिङ्ग दोनो मे प्रयुक्त होते हैं। यथा--उपगोरपत्यम् (पुमान) औपगव । उपगारपन्य (बी) पोपवी । गाग्य, गार्गी । इत्यादि। [इति स्त्रीपुसाधिकार] [८८] पुन्नपुसक्यो । यह अधिकारमूत्र है । यहा से आगे जो जब्द कहगे ने पुतिद्ग और नपुमर दानी जिदगा म प्रयुक्त हान हैं। [६] घृत-मूत मुस्त-क्ष्वेलितरावत-पुस्तक-बुस्त-लहिता ॥ पुन, मूत जादि शब्द पुलिदग और नपुनक दोना लिट् गो म प्रयुका होत है । घृतशद पर्चादिगण म भी पटा गया है। गोप में यह शब्द नपुमबलिदा म ही देखा जाना है । आयर्व घृतम् । पुलिद्ग म इम के प्रपाग वद म ही उपल ध हान हैं । जैसा कि अमरकोप मे कहा है-~~-अवर्वादो घतादोना पुस्लाद्य वदिक प्रवम । मूतशब्द पारद नथ मे पुनपुनर है । मावि जथ म पलिङ्ग है । मुम्त (नागरमाथा) शब्द पुरापुसव रे माथ माथ स्त्रीतिग म भी देखा नाता है । मुम्त मुस्लम, मुस्ता। ध्वनिन या वदित श-द मिहाजन एव मग्रामघोप अर्थो म पुन्नपुमा है। ऑगवनशब्द इन्द्र के हाथी के अयम पुलिटग प्रमिद्ध है। पुनव शब्द प्रायेण नपुमलिग है परतु क्वचित पुतिनग म भी प्रयुक्त हाता हैं। बुम्ल , गुम्नम् । फ्लादि के ऊपर के छिचर या युम्न करते है । नाहिशद धिर अथ म नपुमन तथा मदगतग्रह वे न म पुनिग है। [10] स्बन्धोपधाभ्यधाता । मध (मिरवटा चेप्टायुक्त देह), औषध आयुध (शस्त्र) और अन (मोन) ~य शन्द पुनमक हैं। क्वध, क्वन्धम् । औषधाद नपुमय में ही उपलब्ध हाता है-जोपधम् । आयुधम् । आयुपशब्द में पुस्टिग में प्रयोग मृग्य -आयुष तु प्रहण शस्नमस्त्रम् इत्यमर । जन अतम्-अयात्प्रियामत इत्यमर । १ अस्नि कस्मिश्चिन्नारे सागरदत्तो नाम गिर । तत्मनुना स्परशतेन वित्रीय- माण पुस्तको गृहीत । (पन्चतन्ये, द्वितीयतन्त्र) २ बधोऽस्तो चेप्टामुक्तमपमूर्धकलेवरम् इयमर । -- परिशिष्टानि [३१] दण्ड मण्डस्वर शब-मंचव-पारवाश-कुश-काशाऽकुश-कुलिशा ॥ दाट आदि ग्यारह शद पुन्नपमा होते है। दण्ड दण्टम । मष्ट, मनम् । खाद , खण्डम् । शव गबम् (कुणप शवस्त्रियाम्-इत्यमर)। मेवान्द घाटे के अर्थ में पुलिग तथा वा जप न पुनगुमर है। पारव पावन-बाहुमते मो को पावमस्त्री तयोरघ दपमर । आवारा जाकासम्-सम्माद्वा एनम्मादामन सागराश सम्भूत (३० उप० ० १) शब्दगुणक्माशम् (तक्मग्रह) । दुर दुगन् । काग काशम् । अवग, जगम्-अडशोस्त्री मणि स्त्रिगाम-दामा । कुना कुलिंगम् (इन्द्र का वत्र)। [३२] गृह-मेह-देह पट्ट-पटहाप्टापदाम्बुद-दाश्च ॥ गृह आदि आठ शब्द पुनप नन होन है। गहमन्द का परिटाम प्रकार जवेपणीच ह, नाक म नरमक-प्रयाग उपनय हात द्र-न गृह गहमि याहुपहिणी गृहमन्यते (पञ्चतन्ने)। मह (मन) शब्द के परिग म ही प्रयाा मिनत है। वह दहम् । ललाटपटट , नाटपट्टम् । पटह पुलिग उपत्य होता है । मष्टापद अष्टापदम् ।नुवा)। जम्मुर (मन) पद पलिग म ही दखा नाम है । कार क्दम (बैन का कुहान, पवनगट्ग) । दम का पाठ यमनी प्रचारमा करना है- इचाक्वश ककुद नृपाणाम् (१० ६ ०१)। [इति पुन्तपुमकाधिकार ] [२३] अविशिष्टलिङ्गम् ॥ जब पिलिटग गन्दा का अधिकार चना रहा है। वहा म आने जाना "द कहा वे तीनो लिगा में प्रयुक्त हान है। [६४] अव्यय-इति-युष्मदम्मद । अव्ययमल, इतिप्रत्यवानगद तथा युष्मद् और मम्मद् गद निनिद्गी होते हैं। अव्यय यया--उरचम्ना ना मन्दिर वा। रतिप्रयान्न यया-कति पुरुषा स्त्रियो मिज़ागि वा। युष्मद् यया--त्व पुमान् । त्व स्त्री । त्व मित्रम् । अम्मद् यया-अहम्पुमान् । जह त्री। जह मित्रम् । [३५] गान्ता सत्या । पकारात एव नकारान्त मध्यावाची शब्द निलिझी होते हैं। पवारान यथा-पद् पुस्पा । षट् त्रिर । पड् मित्राणि । नगारान्त यथा-पञ्च पुस्पा । पञ्च स्त्रिय । पन्च मित्रामि। ३ कई लोग इस सत्र में 'अन्बुद' के स्थान पर 'अईई' (दन कराड) रन का पाठ मानते हैं । अर्दद, अव॒दम् ।
भमोव्याख्ययोपेताया लघुमिद्धान्तकौमुद्या परिशिष्टानि [१६] शिष्टा सस्या परवत् ।। पकारान्न और नकारान्त मस्या मे भिन्न मध्यावाची शब्द विशेप्य के लिड्ग वो धारण करते हैं । यथा-एको वाल । एका कन्या । एक मिनम् । द्वौ बालो । द्वै कये। द्वे मित्र । त्रयो बाना । तिम्र कन्या । त्रीणि मित्राणि । चत्वारो बाला । चनत्र मन्या । चत्वारि मित्राणि । विशति आदि मख्या के विषय में पहले वह चुके हैं। [१७] गणवचन च ॥ गुणवाचक शब्द जब गुणिपरक होते हैं तो वे त्रिलिडग अर्थात् विशेष्यनिघ्न होते हैं । यथा-शुक्ल पट । शुक्ना शाटिका। शुक्ल वन्त्रम् । मृदु पुग्ध । मृदु (मृद्वी) माला । मृदु पुप्पम् । यदि गुणपरक हा तो पुनिड्ग में ही प्रयोग होता है। यथा-शुक्न । अमरकोष में कहा है-गणे शुरुनादय पुसि, गुणिलिड्गास्तु तद्वति । [३८] कृत्याश्च ॥ कृत्यप्रत्ययान्नशब्द विशेष्यनिघ्न अर्थान् विशेष्य के अनुसार लिड्ग को धारण करते हैं । यथा-पठिनव्यो ग्रन्य । पठितव्या स्तुति । पठितव्य पुस्तकम । FEE] करणाधिकरणयोल्युट ।। वरण तथा अधिररण में हुआ जो ल्युट् प्रत्यय, तदन शन्द विशेप्यानुसार लिङ्ग को धारण करत हैं। करणे ल्युट्-पलाशनातन कुठार । पलाशशातनी कुटारिका । पलाशशातन गुरमण्डलम् । अधिकरणे ल्युट्-मस्तुधानो घट । मक्तुधानी घटी । मक्तुधान पारत्रम् । [१००] सर्वादीनि सवनामानि ॥ मव आदि मर्वनाममज्ञा शब्द विशेप्य के अनुसार तीनो लिड्गी को धारण कर लेते हैं। यथा- अय पुमान् । इय स्त्री। इद मित्रम । म नर । मा नारी । तद् मित्रम् । इत्यादि। पाणिनोये महातन्त्रे लिङ्गशास्त्रानुशासने । भैमोव्यास्यासमायुक्त सूत्राणा शतक गतम् ।। भून वेद-व- पन्दे वक्रम शुभवत्मरे। विवारे नवम्यान्च पोपमामार्गमने दो ॥१॥ लघु-निशान-कौमुद्या भभीव्यायाममदिन । भाग पप्ठ ममायान पूत्तिमांशानुकम्पपा ॥२॥ शन भूया मुरभारतीममुपासनाम -.
३
PRUN
भैमी-साहित्य
[ देश-विदेश के मैकडो विद्वानो द्वारा प्रशमित मन्कृतव्यावरण के मूधन्य
विद्वान् श्री वैद्य भीममेन शास्त्रो एम० ए० पी-पच्० गैर द्वारा
लिखित उच्चकोटि के अनमोल मालीय व्या रपन्या की सूची ]
(१९८९.६०)
१ लघु-सिद्धान्त कौमुदी-मैमोव्याख्या (सधिपड्लिङ्गअप) प्रथमभा
२ लघु-सिद्धान्तकौमुदी-ममीव्याख्या (१०गण -- ११ प्रत्रिया) द्वितीयभाग
३ लघु-सिदान्त-कौमुदी-मैमोव्याटया (कृडल-कारक) तृतीयभाम
४ लघु-सिद्धान्त-कौमुदी-मैमोय्याख्या (समाम) चतुयभाग
५ लघु-सिद्धान्त-कौमुदी--ममीव्याख्या (तद्धित) पञ्चमभाग (प्रेम म)
६ लघु-सिद्धान्त-कौमुदी-मैमोव्याख्या (श्रीप्रत्यय) पप्ठभाग
७ वैयाकरण-भूषण-सार-मैमोव्याख्या (धात्वर्थप्रकरण, प्रेम म)
८ बालमनोरमा-धान्ति-दिग्दर्शन
६ प्रत्याहारसूबो का निर्माता कौन ?
१० अव्यय-प्रकरणम् (ममीव्याख्या)
११ न्यास-पर्यालोचन (काशिका की व्याख्या न्यास पर शासप्रवध)
मैमी-प्रकाशन
५३७, लाजपतराय मार्केट,
दिल्ली-११०००६
BHAIMI PRAKASHAN
537 LAJPAT RAI MARKET, DELHI-110006
लघु-सिद्धान्त-कौमुदी-भैमीव्याख्या [विध भीमसेन शास्त्री, एम० ए०, पो-एक्कमेत विश्लेषणात्मक भमोनामा विस्तृत हिन्दी व्याख्या सह्नि प्रथम भाग सन्धि-सालिङ्ग अध्ययप्रारण । यह मन्य लेखक के दीर्घकालिक यावरणाध्यापन का निचोड है । कौमुदी पर इन प्रकार को विस्तृन वैज्ञानिक विश्लेषणात्मर हिन्दी व्याख्या आज तक नहीं निकली। इम व्याख्या में प्रत्येक सूत्र का पदच्छेद, विभक्तिवचन, ममाम-दिग्रह, अनुवृत्ति अधि- कार, सूत्रगत तथा अनुवतित प्रत्येक पद का अयं परिभाषाजन्य विशेषता बर्षको निप्पत्ति, उदाहरण प्रत्युदाहरण तथा विस्तृत सिद्धि देते हुए छात्रों और अध्यापन मध्य आने वाली प्रत्येक गड़ा का पूर्ण विस्तृत समाधान प्रस्तुत किया गया है। इस हिन्दी व्याख्या की देश विदेश के डेढ सौ से अधिक विद्वानो न भूरि-भूरि प्रगसा को है । स्थान-स्थान पर परिगठित विषय के आलोडन के लिये बडे पल में पर्याप्त विस्तृत अभ्यास मङ्ग्रहीन क्रिये ये हैं। इस माल्या को रूपमालाओं में अनुवादोपयोगी लग- भग दो हजार भब्दो का जयहिन बृहत्मा प्रस्तुत करते हुए पादकियोपयुक्त प्रत्येक शब्द को चिह्नित किया गया है । जाज ना लघुकोमुदी को किमी भी व्याया में ऐनो विशेषता दृष्टिगोचर नहीं हाती । व्याख्या की मद मे बढी विशेषता नव्यपकरण है। प्रत्येक अध्यय के अप का विस्तृत विवेचन करके उम के लिये विशाल मस्कृतवाङ्मय में किमी न किमी मूक्ति वा प्रसिद्धवचन को मडगृहीन करन का प्रयास किया गया है । अकेला अव्ययप्रकरण ही लगभग मो पृष्टो में ममाप्त हुआ है । एक विद्वान ममा- लोचक ने अन्य की ममानाचना करन हुए यहा तक कहा पा दिदि लेखा ने अपने जोदन में अन्य कोई प्रायन न पर संदल अम्पर-प्रकरण हो लिसा होना तो पेवत यह प्रारण हो उसे अमर करने में सर्वमा समर्यया । मधिप्रकरण में लगभग एक हजार अभूतपूर्व नये उदाहरण दिद्यापियो के अपाम के लिए मालित रिपे गये है-या अरे हमरो परि मूत्र र ५० नये उदाहरण दिदै गय है। इस व्याख्या में अन्यगत किसी भी मन्द की म्पमाला को तहत नहीं लिखा गया प्रत्युत प्रत मन्द एव धातु की पूरी-पूरी माघ म्पमाला दी गई है। म्यान-स्थान पर ममपाने के लिये नाना प्रकार के काष्ठका और ची म यह प्रत्य ओत-प्रोत है। इस प्रकार का पन व्याकरण के किसी भी अन्य पर अद्ययावत नहीं किया गया। यह ध्याच्या हा लिये ही नहीं अपितु अध्यापकों नपा अनुसन्धान-प्रेमियों के लिए भी अतोद पलोगे है। अन्न म जनुमधानापयोगी कई परिशिष्ट दिए गये हैं। यह अन्य भारतमातार द्वारा सम्मानित हा चका है । बृहदावार (२३ ४ ३६)- १६ माइन के लगभग ६५० पृष्टी म इम व्याख्या का केवल पूर्वाधे माग ममाप्त हुआ है । मोधित एवं परिवनि द्वितीय मरण का मूल्य ववल एक मो रपया । मुन्दर दादा नटिर रिल नया परकी मिताई ने अन्य का वहन गावपत्र बना दिया है । पाण्डोचरीम्पिन नदिन्ददामायम का प्रम्म मामिक पत्र 'प्रतिनि' म व्यास्यारे विदय में लिया। - "जहा तक हमे ज्ञात है यह आधुनिक शैली से विश्लेषणपूर्वक विषय का मर्म समताने वाली अपने ढग को पहली व्याख्या है। व्याख्याकार ने भाष्यशैली मे आधु- नि व्याख्याशैलो का पुट देकर सर्वाङ्गसुदर व्याख्या प्रस्तुत की है। इस में मूल प्रय के एक-एक शब्द दा विचार को पूरा-पूरा खोल कर पाठकों के हृदय पर अक्ति कर देने का मुदर यत्न किया गया है। विद्वान् व्याख्याकार ने लघुसिद्धान्तकौमुदी को भैमीनामक सर्वाङ्गपूर्ण व्याख्या प्रकाशित कर के राष्ट्रभाषा को महान् सेवा की है। व्यावरण मे प्रवेश के इच्छुक छात्र, व्युत्पन्न विद्यार्थी, जिज्ञासु, व्याकरणप्रेमी, अध्यापक और अन्वेषक सभी के लिये यह प्रय एक रत्न-सा उपयोगी सिद्ध होगा ।" हिन्दी के प्रमुख मामिक पत्र 'सरस्वती' की मम्मनि- "लघुकौमुदी पर जब तक हिदी मे कोई विश्लेषणात्मर व्याम्या नहीं निकली है । प्रस्तुत व्याख्या को लेखनशैली, विनष्ट स्यलो का विस्तृत उद्घाटन नया सूत्रों को प्राञ्जल व्याख्या प्रत्येक मस्कृतपेमो पाठन पर अपना प्रभाव डाले बिना नहीं रह सकेगी। पुस्तक न केवल विद्याथियो दरन् सस्कृत का अध्ययन करने वाले मभी लोगों के लिये सग्रहणीय है।" उतरभारत का प्रमुख पत्र 'नवभारत टाइम्म' लिखता है- "लेखक महोदय ने कई वर्षों के कठोर परिश्रम के पश्चात् यह ग्रन्थ तपार किया है जो उपयोगी है। प्रथा स्वय विद्याव्यसनी हैं और विद्याप्रसार ही उन के जोबन को लगन है । हमे पूरी-पूरी जाशा है कि आबाल-वृद्ध मस्कृत-प्रेमी इस प्र यरत्न को अपनाकर परिश्रमो लेखक से इस प्रकार के अय भी अपूर्व प्रय प्राप्त करने का मौभाग्य प्राप्त करेंगे।" दिन्नी का प्रमुख दैनिक हिदुस्तान' लिखना है-- "वैसे तो कौमुदी को अनेक हिन्दी टोकाए निस्त चुको है, मार इस व्याख्या को अपनी विशेषताए है । इस मे व्याकरणशास्त्र के अध्ययन-अध्यापन के आधुनिक तरीकों का सहारा लिया गया है । सूत्रार्य और अभ्यास इसी के उदाहरण है। लघु कौमुदी मे आये प्रत्येक सूत्र को अर्यविधि को जानने के बाद विद्यार्यो को वृत्ति घोटने को आवश्यकता न रहेगी। वह सूत्रार्य समन कर स्वयमेव उसको वृत्ति तैयार करने योग्य हो सकेगा। लघुकौमुदी मे आये प्रत्येक शब्द के रूप देकर टोशकार ने शब्द- स्पावली का पृथक् रखना व्यर्य कर दिया है। इमो सिलसिले में करीब दो हजार शब्दो की अर्यसहित सूची देकर टोशकार ने इस विशेषता को चार चाद लगा दिये है। अव्ययप्रकरण इस पुस्तक को पाचवी वडी विशेषता है। यह हिदी टोका विद्यायियों के लिये उपयोगी है। एक बार अध्यापक से पढ़ने के बाद वे इस टीका के महारे बड़े आराम से पुनरावृत्ति कर सकते है। उन्हें टयूटर रखने को आवश्यकता न रहेगी । यह टोका उन के लिये ट्यूटर का काम करेगी। आशा है कि मस्कृतव्याकरण का अध्यापन करने वालो मस्याए इम प्राय का हृदय मे स्वागत करेंगी।"
४ राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पदवाक्यप्रमाणज्ञ, स्व० श्री प० ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु, आचार्य पाणिनिमहाविद्यालय काशी को सम्मति "मैंने लघुसिद्धान्तकौमुदी पर थीभीमसेनशास्त्रिकृत भभोव्याच्या सूक्ष्मरीत्या देखी है । पाश' कि शास्त्रीजी ने ऐसी व्याख्या अष्टाध्यायी पर लिखी होती। परन्तु इतना मैं नि सन्देह कह सकता हूँ कि इस प्रकार को विशद स्पष्ट और सर्वांगीण व्याख्या लघुकौमुदी पर पहली बार देखने को मिली है। इस व्याख्या मे अष्टाध्यायी पति का जो पदे-पदे मण्डन किया गया है उसे देख कर मुझे अपार हर्ष होता है।" अनुसन्धानविद्यानिष्णात ग. वासुदेवशरण अग्रवाल जी को सम्मति- "मैंने लघुसिद्धान्तकौमुदी पर श्रीभीमसेनशास्त्री जी को विशद भैमीय्याख्या का अवलोकन किया। यह व्याख्या मुझे बहुत पसन्द आई। ऐसा स्तुत्य परिश्रम हिन्दी भाषा के माध्यम द्वारा हो सर्वप्रथम प्रक्ट हुआ है। यह व्याख्या कठिन से कठिन विषय को भी अत्यन्त सरलशैली से हृदयगम कराने में सफल हो सकी है। प्रश्न-उत्तर, शका-समाधान, सनार्य का स्फोरण करते समय स्यान-स्थान पर परिभाषाओ का उप- योग, अविक्ल रपावलिया, सार्य शब्दसाह तथा परिश्रम से जुटाये गये अभ्यास आदि इस व्याख्या की अपनी विशेषता है। अव्ययप्रकरण का निखार प्रथम बार इस मे देखने को मिला है । व्याकरण के ग्रथो पर इस प्रकार की प्यारयाए नि सदेह प्रशस- नीय है । यदि शास्त्री जो इस प्रकार की व्याख्या सिद्धान्तकौमुदी पर भी लिसें तो छात्रों और अध्यापको का बहुत उपकार होगा। मैं हृदय से इस प्रथ के प्रचार एव प्रसार की कामना करता है।" लघु-सिद्धान्त-कौमुदी-भैमीव्याख्या (द्वितीय भाग- तिडन्तप्रकरण) लघु-सिद्धान्त कौमुदी के इस भाग म दम गण आर एकादश प्रक्रियाया की विशद व्यान्या प्रस्तुत की गई है। निरन्तप्रकरण व्याकरण की पृष्ठाम्धि (Backbone) समझा जाता है । क्योकि धातुआ मे ही विविध शब्दो की मृष्टि हुआ करनी है । अत इम भाग की व्याख्या में विशेष श्रम किया गया है । सगभग दो सौ ग्रयो के आलाइन में इस भाग की निष्पत्ति हुई है। प्रत्येव सूत्र पदच्छेद विभक्तिवचन गमामविग्रह अनुवृति अधिकार, प्रत्येक पद का जय, परिभाषाजय वैशिष्ट्य , अनिष्पत्ति, उदा हरण-प्रत्युदाहरण और मारमक्षेप के अतिरिक्त प्रत्येर धातु के दमो लगारो की प. माला मिद्धिहित दिखाई गई है। वैयाकरणनिशय में मैकडो वर्षों में चली आ रही अनेक भ्रानियों का सयुक्तिक निराकरण किया गया है। भाषा विज्ञान के क्षेत्र म विद्याथियों में प्रवेश के लिये यत्र-तत्र बनेर भाषावैज्ञानिए नोटम भी दिए हैं। चार मौ से अधिक सार्थ उपमर्गयो तथा उनके लिये विशान महतसाहित्य में चुने हुए एक सहय मे अधिन उदाहरणो का अपूर्व मग्रह प्रस्तुर प्रिया गया है। लगभग हर जार म्पो की ममूट मिद्धि और एक मो के दीर गाम्याथ और शवा-समाधान । ।
५ के ग्रहण इम म दिय गय है। अनुवादादि के सौक्य के लिये छात्रोपयोगी णिजन्त, सनन्त, यडन्त, भावमं आदि प्रक्रियाओ के अनेक शतक और सग्रह भी अर्थसहित दिये गये है। जैसे नानाविध लौक्कि उदाहरणो द्वारा प्रक्रियाओ को इम मे समयाया गया है वैसे अन्यत्र मिलना दुर्लभ है । इस से प्रक्रियाओ का रहस्य विद्याथियो को हस्तामलकवत् स्पष्ट प्रतीत होने लगता है। अन्त मे अनुमन्धानोपयोगी छ प्रकार के परिशिष्ट दिये गये हैं। अन्य का मुद्रण आधुनिक बढिया मैप्लोथो कागज पर अत्यन्त शुद्ध एव सुन्दर इग मे पाच प्रकार के टाइपो म किया गया है। सुन्दर, बढिया, जिल्द तथा पक्की मिलाई ने ग्रन्थ को और अधिक चमत्कृत कर दिया है। यह ग्रन्थ भी भारत मरकार मे सम्मानित हो चुका है। यह भाग (२३४३६)-१६ आकार के ७५० पृष्ठो म समाप्त हुआ है । मूल्य केवल एक सौ चालीस रूपये । (Rs 140/-) । इम भाग के विषय में श्री प. चारुदेव जो शास्त्री पाणिनीय लिखत है- इतनी विस्तृत व्याख्या आज तक कभी नहीं हुई। यह अद्वितीय ग्रन्थ है । यह व्याख्या न केवल बालकों अपितु अध्यापकों के लिये भी उपयोगी है । शब्दसिद्धि सर्वत्र स्फटिक्वत स्फुट और हस्तामलक्वत् प्रत्यक्ष, परिपूर्ण और असन्दिग्ध है कि इस के लिये अध्यापक की अपेक्षा नहीं रहती। कौमुदीस्य प्रत्येक धातु को अवि. क्लरपेण मूत्राद्य पयासपूर्वक सविस्तर सिद्धि दी गई है। व्याख्याश मे भी यह कृति अत्यत उपकारक है। स्थान-स्थान पर धात्वयप्रदशन के लिये साहित्य से उद्धरण दिये गये है । धातूपमर्गयोग को भी बहुत सुदर काव्यनाटकों से उद्धृत उदाहरणो से स्पष्ट किया गया है । यह इस कृति को अपूर्वता है । इम व्याख्या के प्रणयन मे शास्त्री जी ने अथाह प्रयत्न किया है । महाभाष्य, न्यास, पदमजरी आदि का वर्षों तक अवगाहन करके उन्होंने यह व्यारया लिखी है।" इम भाग के विषय म दिल्ली का नवभारतटाइम्स लिखता है- "सस्कृतव्याकरण के अध्ययन मे कौमुदी ग्रथो का अपना स्थान है । प्राय लघुकौमुदो से ही व्याकरण का आरम्भ किया जाता है । परन्तु इस अय का समझना आसान नहीं है। छात्रो के लिये यह प्राय वज्र के समान कठोर है। प्रस्तुत ग्रन्य में श्रीभीमसेनशास्त्री ने इम को हिन्दी व्याख्या को है । व्यारयाकार राजधानी के सुप्रसिद्ध वैयाकरण है । इस व्याकरण को देखकर हम दावे के साथ कह सकते हैं कि ऐसी व्यारया क्या, सिद्धान्तकौमुदी की भी नहीं प्रकाशित हुई । इस व्याकरण का प्रथमभाग आज से बीस वर्ष पूर्व प्रकाशित हुआ या तब इस का भारी स्वागत हुआ था । जनता को इस के उत्तरार्द्ध भाग को व्यारया की तभी से उत्स्ट लालसा रही है। लेखक ने अब इसे प्रकाशित कर जहा धात्रो का उपकार किया है, वहा शिक्षकों, प्राध्यापको को भो उपकृत किया है । इस मे लेखक का गहन अध्ययन, कठोर परिश्रम तथा विद्वत्ता स्थान-स्थान पर प्रक्ट होते है । परतु छात्रोपयोगी किसी भी विषय का विवेचन छोडा नहीं गया । यह इस को बडो भारी विशेषता है । इस भाग मे तिइन्तप्रकरण (दशगण तथा एकादश प्रक्रियाओं) का अत्यन्त विशद विवेचन प्रस्तुत किया गया है। यह प्रक लघु तो रण धातुसम्बन्धी होने से व्याकरण का प्राण है। इस मे प्रत्येक धातु के दस लकारो को ससूत्र प्रश्यिा साध र उन की सारी रूपमाता भी दी गई है । इससे विद्यार्थियो को धातुरूपावलियों को आवश्यक्ता नहीं रहती। छ सौ के करीब टिप्पणिया तथा साद चार सौ से अधिक उपसर्गयोग इस ग्रन्थ को अपनी अपूर्व विशेषता है । इन के लिये व्याख्याकार ने महान् श्रम कर विपुल सस्कृत साहित्य से जो डेढ हजार के करीब अत्यन्त सुन्दर सस्कृत को सूक्तियों का चयन किया है वह स्तुत्य है । संक्डों उपयोगी शङ्का समाधान तथा णिजन्त, सन्नन्त, यडन्त, भावकर्म आदि प्रक्रियाओ के अर्थमहित कई शतक विद्याथियो के लिये निश्चय ही उपयोगी सिद्ध होगे। इस प्रय को उत्कृष्टता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि अकेली भूधातु पर ही विद्वान् व्याख्याकार ने ६० पृष्ठो मे अपनी व्याख्या पूर्ण की है । सक्षेप मे इस व्यास्या को लघुकौमुदी का महाभाष्य कह सकते है । यह प्रय न केवल छात्रो, परीक्षार्थियो तथा उपाध्यायों, अध्यापको के लिए उपयोगी सिद्ध होगा बल्कि अनुसधान मे रुचि रखने वालो के लिए भी परमोपयोगी एव सहायक सिद्ध होगा। इसे पढने से जहा व्याकरण जैसे शुष्क विषय मे सरसता पैदा होती है वहा अनुस धान कार्य को भी बढ़ावा मिलता है । हिन्दी मे ऐसे प्रय स्वागत-योग्य है।" लघु-सिद्धान्त-कौमुदी-भमोव्याख्या (तृतीय भाग-कृदन्त एव कारप्रकरण) भंभोव्याम्या के इम तृतीय भाग में कृदन्न और कारक प्रकरणा का विस्तृत वैज्ञानिक विवेचन प्रस्तुत किया गया है । सुप्रसिद्ध कृत्प्रत्ययो के लिय कई विशाल शब्दमूचिया अथ नथा ममूटिप्पणो के साथ वड यत्न से गुम्पित की गई हैं, जिन म अढाई हजार म अधिक शब्दो का अपूर्व मग्रह है । प्राय प्रत्येक प्रत्यय पर सस्कृत- माहित्य मे म अनेर मुदर मुभाषितो या मूक्तियो का सक्लन किया गया है । कारप्रकरण लघुकोमुदी म केवल मालह ना तक ही मीमित है जो स्पष्टत बहुत अपर्याप्त है । भमोव्याच्या म इन मोलह मूत्रा की विस्तृत व्याख्या करत हुए अन्त मे अत्यन्त -पयागी लगभग पचाम अय मूत्रवातिको की भी मोदाहरण मरल व्याख्या प्रस्तुत की गई है । इस प्रकार कुल मिलाकर कारकप्रकरण ५६ पृष्ठा म ममाप्त हुआ है । आव प्रकार के उपयोगी परिशिष्टो मति यह भाग लगभग चार मौ पृष्ठा म ममाश्रित हुआ है । पूर्ववत् पक्की सिलाई स्त्रीनप्रिटिड आक्पक जिल्द । मूल्य वैवल जस्मी र० (Rs 80/-)। लघु-सिद्धान्त-कौमुदो-भैमीव्याख्या (चतुर्य भाग-समासप्रकरण) भंमीव्यास्या के अभिनव प्रकाशित इम चतुर्य भाग में लघु-सिद्धान्न-कौमुदी के समामप्रकरण का नयत विम्नार के माथ लगभग तीन मो पृष्ठो में विवेचन प्रस्तुन ७ किया गया है। ग्रन्थगत प्रत्येक प्रयोग के लौक्ति और अलौकिक दानो प्रकार के विग्रह निदिष्ट कर उम को मूत्रो द्वाग अविरल साधनप्रक्रिया दर्शाई गई है । मूलोकन उदाहरणो के अतिरिक्त संबडो अन्य नवीन उदाहरणा को विशाल मस्कृतमाहिन्य ने चयन कर इस व्याख्या मे गुम्पित किया गया है। इस प्रकार इस व्याख्या में बारह मौ म अधिक समामोदाहरण मगृहीत किये गये हैं। माहित्यिक उदाहरणो के स्थलनिर्देश मी यथासम्भव दे दिये गये हैं। प्रबुद्ध विद्यार्थिया के मन में स्थान स्थान पर उठने वाली दो सौ से अधिक शाओ का भी इस म यथास्थान समाधान किया गया है । स्थान स्थान पर उपयोगी पादटिप्पण (फुटनोट्स) दिय गये हैं। मूलगत मूत्रवानिक आदियो के अतिरिक्त छात्रोपयोगी कई अन्य मूत्रवानिर आदिया का भी इस में सोदाहरण व्याख्यान किया गया है । लघुकौमुदी के अगुद्ध या भ्रष्ट पाठो पर भी अनेक टिप्पण दिये गये हैं । व्याख्याकार की मूभनेक्षिका स्वाध्याय-निपु- णता तथा कठिन से कठिन विषय को भी नप-तुले शन्दो मे समझा देने की क्षमता इम व्याख्या में पदे पदे परिलक्षित होती है । ममामप्रकरण पर इतनी विस्तृत व्याख्या आज तक लिखी ही नहीं गई। इस मे विद्यार्थिवग और अध्यापकवृन्द दोनो जहा लाभान्वित होंगे वहा अनुसन्धानप्रेमियो को भी प्रचुर अनुसन्धानमामग्री प्राप्त होगी। विद्वान् लेखक न सततोत्थायी हो कर दो वर्षों के कठोर परिश्रम से सैक्डो प्रन्यो का मन्थन कर इस भाग को तैयार किया है। अन्त में विविध परिशिष्टो मे इम ग्रन्य को विभूषित किया गया है। व्याख्यागत वारह मौ उदाहरणो को ममासनाम- निर्देशसहित बनी वर्णानुक्रमपी इस ग्रन्य की प्रमुख विशेषता में एक समझी जायेगी। इस के सहारे सम्पूर्ण समासप्रकरण की आवृत्ति करने म विद्यार्थियो को महती सुविधा रहेगी। अन्य मे ययाम्यान अनेक अभ्यास दिये गये हैं। ममीनको का कहना है कि यदि इन अभ्यासो को सुचारु रूप मे हल कर लिया जाये तो विद्यार्थियो को सिद्धान- कौमुदी या काशिका में समासप्रकरण को समझने का म्दन सामथ्य प्राप्त हो सकता है। (२३४३६)-१६ माइज के लगभग तीन सौ पृष्ठो मे यह अन्य समाप्त हुपा है । साफ सुयगे शुद्ध पाई, पक्की सिलाई तथा सुन्दर स्त्रीन प्रिंटिड जिल्द से यह ग्रन्य और भी अधिक आकषक बन गया है । मूल्य एक सौ सय मात्र (Rs 100/-)। लघु-सिद्धान्तकौमुदी-भैमोव्याल्या (पञ्चम भाग-तद्वितकरण) इम भाग का मुद्रण शीघ्र ही चालू होने वाला है। मन् ८६ के मन तर इम के प्रकाशित होने की पूरी सम्भावना है। इस भाग मे लसिद्धान्तकौमुदी के तद्धितप्रकरण की अनीव सरल ढग से मविस्तर व्याख्या प्रन्नुत की गई है। प्रदेर सूत्र को व्याख्या के बाद हर एक उदाहरण का विग्रह, अयं तया दिशद मिति इम में दर्शाई गई है। मूलगत उदाहरणो के अतिरिक्त साहितगत विविध उदाहरणों में मी द यह ग्रन्थ विभूषित है। पठन-पाठन मे उठने वाली प्रत्येक शङ्का का इस मे समाधान किया गया है। मूलोक्त सूत्रो के अतिरिक्त भी छात्रोपयोगी अनेक सूत्रो की इस में व्याख्या दर्शाई गई है । यत्र-तत्र यल से अभ्यास निबद्ध किये गये हैं जिन की सहायता स मारा प्रकरण दोहराया जा सकता है । अल में अनेक परिशिष्टो के अतिरिक्त उदाहरणसूची वाला परिशिष्ट इस ग्रन्थ का विशेष आकषण है । मूल्य छपने पर । लघु-सिद्धान्त-कौमुदी-भमोव्याख्या (पष्ठ भाग--स्त्रीप्रत्ययप्रकरण) यह भाग अब प्रकाशित होकर पाठको के हाथों में आ चुका है। इसमे लपुको मुदी वे स्त्रीप्रत्ययप्रकरण की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की गई है। प्रत्येक सूत्र की विशद व्यारया के अन तर तद्गत प्रत्येक प्रयोग की विस्तृत मिद्धि तथा अनेकविध उदाहरण- प्रत्युदाहरणो एव शङ्कासमाधानो से यह भाग विभूपित है । मूलाक्न सूत्रो के अतिरिक्त छात्रोपयोगी अन्य भी अनेक सूत्र और वार्तिक इस मे सोदाहरण व्याख्यात किये गये है। जगह जगह माहित्यिक उदाहरण दूढ ढूढ कर सकलित किये गये है । 'स्वाङ्ग' और 'जाति' सरीखे पारिभाषिक शब्दो तथा अन्य कठिन स्थलो की मरलभाषा म विस्तार के साथ विवेचना की गई है। दूसरे शब्दो मे अन्य का कोई भी व्याख्येयाश रिना व्याख्या के अछूता छोडा नही गया । पठितविषय की आवृत्ति के लिये यत्र-तत्र जनक अभ्यास दिय गये है। नानाविध सूचीपरिशिष्टो विशेषत प्रत्ययनिर्देशसहित दी गई उदाहरणसूची म इम अथ का महत्व बहुत बढ़ गया है। अन्त में स्त्रीप्रत्यय- सम्बन्धी एक सौ से अधिक पद्यबद्ध अशुद्धियो का सहेतुक शोधन दर्शा कर लक्ष्यो के प्रति विद्यार्थिया की जागरूकता को प्रबुद्ध करन का विशेष प्रयत्न किया गया है। अनुसन्धानप्रेमी जना के लिये भी दजनो महत्त्वपूण टिप्पण जहा तहा दिये गये हैं। कई थानो पर पाणिनीतरख्याकरणा का आश्रय ले कर भी विषय को स्पष्ट करत का प्रयत्न किया गया है। वस्तुत इतनी विशद सर्वाङ्गीण व्याख्या स्त्रीप्रत्ययप्रकरण पर पहली बार प्रकाशित हुई है । (२३४३६)-१६ साइज के डेढ सौ से अधिक पृष्ठा म यह ग्राम समाप्त हुआ है । सुदर शुद्ध छपाई, घढिया स्त्रीनप्रिटिड जिल्द तथा परवी मिलाई म यह प्रथ और भी चमत्कृत हा उठा है। मूल्य साठ रपये मात्र (Rs 60/-)। वैयाकरण-भूषण-सार-भंमीमाष्योपेत (धारवर्षनिर्मपान) वयाकरण-भूषणसार वैयाकरणनिकाय में लन्धप्रतिष्ठ ग्रन्थ है । व्याकरण के दाशनिक सिद्धान्तो के ज्ञान के लिये इस का अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है । अत एव एम० ए०, आचार्य, शास्त्री आदि व्याकरण की उच्च परीक्षानों में इसे पाइपमन्य के रूप में स्वीकृत किया गया है। परन्तु इस ग्रन्य पर हिन्दी भाषा में कोई भी सरल व्याख्या आज तक नही निक्ली-हिन्दी तो क्या अन्य भी क्मिी प्रातीय वा विदशी भाषा में इस का अनुवाद तक उपलब्ध नही। विश्वविद्यालयो के छात्र तथा उच्च कक्षाओ में व्याकरण विषय को लेने वाले विद्यार्थी प्राय सब इस ग्रन्थ मे त्रस्त थे। परन्तु अब इस के विस्तृत जालोचनात्मक सरल हिन्दीभाष्य के प्रकाशित हो जान म उन का भय जाता रहा । छात्रो वा अध्यापको के लिये यह अन्य ममानरूपेण उपयोगी है । इस प्रन्य के गूढ आशयो को जगह-जगह वक्तव्यो वा फुटनोटो म भाष्यकार ने भली भाति व्यक्त किया है । भैमीभाष्यकार व्याकरणक्षेत्र मे लब्धप्रतिष्ठ विद्वान् है तथा वर्षों से व्याकरण के पठनपाठन का अनुभव रखते हैं। अत छात्रो वा अध्यापको के मध्य आने वाली प्रत्येक छोटी-से-छोटी समस्या को भी उन्होंने खोलकर रखने म कोई क्मर नही छोडी । जगह-जगह वैयाकरणा और मीमासको के सिद्धान्त का खोलकर तुलना- त्मकरीत्या प्रतिपादित किया गया है । इस भाष्य की महत्ता इसी में व्यक्त है कि अकेली दूमरी कारिका पर ही विद्वान् भाष्यकार न लगभग साठ पृष्ठा म जपना भाष्य समाप्त किया है। विषय को समझाने के लिये अनेक चाट दिये गये हैं। जैसे-वैया- करणो और नैयायिको का बोधविषयक चार्ट, धातु की साध्यावस्था और सिद्धावस्था का चार्ट, प्रसज्य और पर्युदास प्रतिषेध का चाट आदि । पूर्वपीठिका म भाष्यकार न व्याकरण के दशनशास्त्र का विस्तृत क्रमबद्ध इतिहास देकर माना मुवण म मुगन्ध का काम किया है । ग्रन्थ के अन्ल म अनुसन्धानप्रेमी छात्रो के लिये सात परिशिष्ट तथा आदि मे विस्तृत विषयानुक्रमणिका दी गई है जो अनुस धान-क्षेत्र म अत्यन्त काम की वस्तु हैं । वस्तुन व्याकरण में एक अभाव की पूर्ति भाष्यकार ने की है। इस भाष्य की प्रशमा में देश-विदश के विद्वानो के प्रशमा-पत्र घडाघट जा रहे हैं । भारत सरकार द्वारा यह प्रन्य सम्मानित हो चुका है । ग्रन्थ का मुद्रण बढिया मैप्लीया कागज पर अत्यन्त शुद्ध वा मुन्दर ढग मे छ प्रकार के टाइपो में किया गया है। सुन्दर बडिया सम्पूर्ण कपडे की जिल्द तथा पक्की सिलाई ने अन्य को और अधिक चमत्कृत कर दिया है। मूल्य साठ रुपये केवल (Rs 60/-) । (द्वितीय सस्करण प्रेम म) । 'नवभारत टाइम्स" इस ग्रन्य की आलोचना करता हुआ लिखता है- "अन्य के भावों और गूढ आशयों को व्यक्त करने वाले पदे पदे वक्तव्यो और पादटिप्पणों से लेखक का गम्भीर अध्ययन वा श्रम स्पष्ट झलकता है । पञ्चमी और त्रयोदशी कारिकाओं पर अकर्मक और सकर्मक थातुओ के लक्षण का आशय जैसा इस भाष्य में स्पष्ट किया गया है अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। इस तरह के अन्य भी रातरा स्थल उदाहरण स्प मे प्रस्तुत किये जा सकते हैं। शास्त्रीयो को शैली अध्य ताओं या पाठकों के मन में उत्पन्न होने वातो सम्भावित शकाओं को बटोरन्बटोर कर ध्वस्त करने को क्षमता रखती है। द्वितोपारिफा को व्याख्या का लगभग सतर पृष्ठों मे समाप्त होमा इस का ज्वलन्त प्रमाण है । हिन्दी मे इस प्रकार के यत्न स्तुत्य है।" बम्बई विश्वविद्यालय के सस्कृतविभाग के अध्यक्ष डाक्टर त्र्यम्बक गोविन्द माईगकर लिखते हैं- - - " Students of Grammar will always remaia lodebted to Bbım Sen Shastriji for his very valuable help available in his commentary I wish Bhim Sen Shastriji writes similar commentaries on other works in the field of Grammar and readers service both to the subject of his love and to the world of students and scholars Lonce again congratulate him अर्थात् श्रीभीममेन शास्त्री के इस बहुमूल्य व्याख्यान को पाकर व्याकरण के विद्यार्थी उन के सदा ऋणी रहेंगे। मैं चाहता हूँ कि शास्त्रीजी इस प्रकार की व्याख्यायें व्याकरण के अन्य ग्रन्थो पर भी प्रकाशित करते हुए विद्यापियो तथा अनुसन्धानप्रेमियो का उपकार करेंगे । मैं शास्त्रीजी को उन के इस कार्य के लिये पुन रधाई देता है। डा० सत्यव्रत जो शास्त्री व्याकरणाचार्य, प्रोफेसर एव सस्कृतविभागाध्यक्ष, दिल्ली विश्वविद्यालय लिखते है- "वैयाकरणभूषणसार अन्य के क्लिष्ट शब्दावली मे लिखा होने के कारण विद्यार्थियो को इसे समझने मे बहुत कठिनाई हो रही थी। इसी कठिनाई को दूर करने की सदिच्छा मे प्रेरित हो सुप्रसिद्ध वैयाकरण प० भीमसन शास्त्री ने हिन्दी में इस को सरल और सुबोध व्याख्या लिखी है। शास्त्री जी का व्याकरणशास्त्र का अध्ययन अति गहन है । विषय स्पष्टातिस्पष्ट हो, इस विषय में सतत उद्योगमोल रहते हे । इस का यह परिणाम है कि उन की व्याख्या मे गहराई भी है और विशदता भी । यह व्याख्या विद्वानो के लिए एव विद्याथियो के लिए एक समान उपयोगी है।" श्री पण्डित कुबेरदत्तजी शास्त्री प्याकरणाचार्य प्रिंसिपल श्रीराधाकृष्णसस्कृत- महाविद्यालय, खुर्जा लिखते हैं- "वैयाकरणभूषणसार पर विशद ममीभाष्य को पाकर मुझे बडी प्रसन्नता हुई। ऐमा परिश्रम हिन्दी में प्रथम बार हुआ है। यह भाष्य न केवल विद्यार्थियो वा परीक्षा- थियो के लिये अपितु अध्यापको के लिए भी अत्यन्त उपयोगी है । व्याख्यान की शैली नितान्त हृदयहारिणी तथा स्तुत्य है । व्याकरण के अन्य दार्शनिक प्रन्यो की भी इसी शैली में उन्हे व्याख्या करनी चाहिये । मैं शास्त्री जी को उन की सरल कृति पर बधाई देता है।" डा. रामचनजी द्विवेदी प्रोफेसर एव सस्कृतविभागाध्यक्ष, राजस्थान यूनि- दसिटी जयपुर अपने एक पत्र मे लिखते हैं- "I gratefully acknowledge receipt of a copy of the Vaiyakarapa Bbusana Sara Your knowledge of the grammar is profound aud subtle and the world of scholars expect many such good works from your peo" गुरुकुल अज्झर के आचार्य तपोमूर्ति भोभगवानदेवमी आर्य निखते हैं- "आप का परिश्रम स्तुत्य है। छात्रों के लिए इस प्रय का आर्यभाषानुवाद कर के आप ने महान् उपकार किया है । आप को अनेकश बधाइया । बालमनोरमा-भ्रान्ति-दिग्दर्शन [लेखक-वैद्य भीमसेन शास्त्री, एम० ए०, पो-एच० डी०, साहित्यरत्न श्री भट्टोजिदीक्षित की सिद्धानकौमुदी पर श्रीवासुदेवदीक्षित को बनाई हुई बालमनोरमा टीका सुप्रसिद्ध छात्रोपयोगी ग्रन्थ है। पिछली अघ शताब्दी में इस के कई मस्करण मद्रास, लाहौर, बनारम और दिल्ली आदि महानगरा म अनक दिग्गज विद्वानो के तत्वावधान में प्रकाशित हो चुके हैं। परन्तु शोक मे कहना पडता है कि इन स्वनामधन्य विद्वान् सम्पादको ने इस ग्रन्थ के साथ जरा भी न्याय नहीं किया इम पटने तक का भी कष्ट नहीं किया । यही कारण है कि इस में अनेक हास्यास्पद और घिनौनी अशुद्धिया दृष्टिगोचर होती हैं । इम म पठन-पाठन में बहुत विघ्न उप- स्थित होता है । इस शोधपूण लघुनिबन्ध में बालमनोरमाकार को कुछ मुप्रसिद्ध भ्रालियो की मयुक्तक ममोक्षा प्रस्तुत की गई है। आप इस श 'धपत्र को पढ़ कर मनोरञ्जन के साथ-साथ प्रक्रियामाग म जन्धानुकरण न करने तथा सदैव सजग रहन को भी प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं । इस मे स्थान-स्थान पर विद्वानों की प्रमादपूर्ण सम्पादनक्ला पर भी जनेक चुभती चुटकियां ली गई हैं। यह निबन्ध प्रकाशको, सम्पादको, अध्यापको एव विद्यार्थिया मब को जाखा वो खोलने वाला एक समान उपयोगी है । हिन्दी में इम प्रकार का प्रयत्न पहली बार किया गया है। अनेक टाइपो में मप्लीयो कागज पर छपे सुन्दर शोधपत्र का मूल्य-पाच रुपये केवल । प्रत्याहारसूत्रों का निर्माता कौन ? [लेखक-वैद्य भीमसेन शास्त्री, एम० ए०. पी-एच० डी०, साहित्यरत्न शोधपूर्ण इस निबन्ध मे 'अइउग्' आदि प्रत्याहारसूत्रो के निर्माता के विषय में खूब ऊहापोहपूर्वक विस्तृत विचार व्यक्त किये गये हैं। ये सूत्र पाणिनि की स्वोपज्ञ रचना हैं या विमी अन्य मनीपी की इस विषय पर महाभाष्य काशिकावृत्ति, भर्तृहरिकृत महाभाध्यदीपिका, कैयटकृत प्रदीप आदि प्रामाणिक ग्रन्थो के दरजनो प्रमाणो के आलोक मे पहली बार नवीनतम विचार प्रस्तुत किये गये हैं । इन वे शिव- सूत्र या माहेश्वरमूत्र कहलाने का भी ऋमिन इतिहास पूर्णतया दे दिया गया है। अन्य के परिशिष्ट भाग में कातन्त्र, चान्द्र, जनेन्द्र शाक्टायन, सरस्वतीमष्ठाभरण, हेम- चन्द्रशब्दानुशासन, मलयगिरिशब्दानुशासन, मारस्वत, मुग्धबोध, सक्षिप्तसार तथा हरिनामामृत-इन ग्यारह पाणिनीतरव्याकरणो के प्रत्याहारसूत्रो को उद्धृत कर उन का पाणिनीयप्रत्याहारसूनो के परिप्रेक्ष्य म मक्षिप्त तुलनात्मक विवेचन प्रस्तुत किया गया है । इस में प्रत्याहारसूत्रो के विषय मे गत अढाई हजार वर्षों के मध्य भारतीय व्याकरणविदो के विचारों में आये ऋमिक परिवतनो पर प्रकाश पडता है । इस के अन्त १२ । मे बहुचर्चित नन्दिकेश्वरकाशिका ग्रन्थ भी अविक्ल दे दिया गया है, जिस स पाठको को इस विषय का पूरा-पूरा विवरण मिल सके । पक्की सिलाई तथा आकर्षक जिल्द म यह ग्रन्थ चमत्कृत है । मूल्य–पच्चीस रपये केवल । अव्ययप्रकरणम् [लेखक-वैद्य भीमसेन शास्त्री, एम० ए०, पी-एच्. डो०, साहित्यरल] लघुसिद्धान्तकौमुदी का अध्ययप्रकरण सुविस्तृत भैमीव्याख्यासहित पृथक् छपवाया गया है । इस मे विशाल सस्कृतसाहित्यगत लगभग सदा पाच सौ अव्ययो का सोदाहरण साङ्गोपाङ्ग विवेचन प्रस्तुत किया गया है । प्रत्येक अव्यय पर वैदिक वा लौकिक मस्कृतमाहित्य से अनेक सुन्दर सुभाषितो वा मूक्तियो का सक्लन किया गया है। कठिन मूक्तियो के अर्थ भी साथ-माथ दे दिये गये हैं। प्रत्येक उद्धृत वचन का यथासम्भव उद्धरणस्थल भी निर्दिष्ट किया गया है । संक्डो टिप्पणिया तथा फुटनाटो से यह ग्रन्य ओत-प्रोत है। इस के निर्माण में संक्डो प्रन्यो से सहायता ली गई है। आज तक इतना शोधपूर्ण परिश्रम इस प्रकरण पर पहली बार देखने में आया है। साहित्यप्रेमी विद्यार्थियो तथा शोध मे लगे जिज्ञासुओ के लिये यह ग्रन्थ विशेष उपादेय है । ग्रन्थ के अन्त मे ग्रन्थगत मब अव्ययो को अकारादिक्रम मे अनुक्रमणी भी दे दी गई है। ताकि अव्ययो को दूढने में असुविधा न हो । इन ग्रन्थ म अव्ययो के अथशान के माथ-साथ सुभाषितो वा मूक्तियो का व्यवहारोपयोगी एक वृहत्सग्रह भी प्राप्त हो जाता है । सुन्दर पक्की सिलाई आकर्षक जिल्द । मूल्य-पच्चीम स्पय । न्यास-पर्यालोचन यह ग्रन्थ काशिका की प्राचीन सवप्रथम व्याख्या काशिकाविवरणपञ्चिका जपरनाम न्यास पर लिखा गया बृहत्काय शोधप्रबन्ध है जिसे दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा पी-एच०डी० की उपाधि के लिये स्वीकृत किया गया है। यह शोधप्रबंध वैद्य भीमसेन शास्त्री द्वारा कई वर्षों के निरन्तर अध्ययन स्वरूप बड़े परिश्रम से लिखा गया है इसमे कई प्रचलित धारणाओ का खुल कर विरोध किया गया है । जंस न्यामवार को जब तक बौद्ध समझा जाता है परन्तु इस मे उसे पूर्णतया वैदिकधर्मी सिद्ध किया गया है। यह शोधप्रबन्ध छ अध्यायो मे विभक्त है। प्रथम अध्याय म न्यास और न्यासकार का सामान्य परिचय देते हुए न्यासकार का काल, निवास स्थान, न्यास का वैशिष्टय, न्यास की प्रसन्नपदा प्रवाहपूर्णा शैली तथा न्यास और पदमञ्जरी का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है । द्वितीय अध्याय म 'न्यास के ऋणो उत्तरवर्ती वैयाकरण' नामक अत्यन्त शोधपूर्ण नवीन विषय प्रस्तुत किया गया है । इस म केवल पाणिनीय वैयाकरणो को ही नहीं लिया गया अपितु पाणिनीतर चाद्र, जैनेन्द्र, कातन्त्र, शाकटायन, भोजकृत सरस्वतीकण्ठाभरण, हैमशब्दानुशासन, मलय- गिरिशब्दानुशासन, सक्षिप्तमार, मुग्धबोध तथा सारस्वत इन दस प्रमुख व्याकरणो यो अनायाम भी सम्मिलित किया गया है । तृतीयाध्याय में 'उत्तरवर्ती वैयाकरणो द्वाग न्यास का वण्डन' नामक अपूर्व विषय प्रतिपादित है। इस म उत्तरवर्ती वयाकरणो द्वारा की गई न्यामकार की आलोचनाओ पर कारणनिर्देशपूर्वक युक्तायुक्तरीत्या खुल कर विचार उपस्थित किये गये है। चतुथ अध्याय में न्याम की सहायता से काशिका का पाठमशोधन' नामक महत्त्वपूर्ण विषय का वणन है । इसमे काशिका अन्य की अद्यत्वे मान्य सम्पादको (१) द्वारा हो रही दुदशा का विशद प्रतिपादन करते हुए उन के अनेक अशुद्ध पाठो का न्याम के आलोक मे महेतु क शुद्धीकरण पस्तुत क्यिा गया है। पञ्चम अध्याय मे न्यामकार की भ्रान्तियो तथा न्यास के एक-मो भ्रष्ट पाठी का विस्तृत लेखा-जोखा उपस्थित किया गया है । छठा अध्याय अनेक नवीन बानो मे उपबृ हित उपमहागत्मक है । न्यावरण का यह ग्रन्थ पाणिनीय वा पाणिनीतर व्याकरण के क्षेत्र में अपने ढग का सवप्रथम किया गया जनूठा ज्ञानवधन प्रयास है। यह प्रथ प्रत्येक पुस्तकालय के लिये समाध है तथा व्यापरणशास्त्र म शोधकाय करन वाले शोधच्छात्रो के लिये निता त उपयोगी है। सुन्दर मैप्लीथो कागज पक्की मिलाई म्क्रीनप्रिंटिड आकर्षक मजबूत जिल्द मे मुशोभित ग्रन्थ का मुन्य- केवल एक मौ पिया ---विशेष सूचना- मस्कृत के पचार एव प्रमार के लिये भैमीप्रकाशन द्राग एक विशेष योजना आरम्भ की गई है जिस के अन्तगत सम्कृत प्राध्यापको एव विद्या थिया को सुचापत्र में उल्लिखित ये पुस्तके बहुत अधिर रियायती मृत्य पर दी जाती हैं। दम मुवि श मे लाभ उठाने के लिये निम्न पत पर जवाबी पाड महित पत्र लिखें। प्राप्तिम्यान- प्रबधक भैमी प्रकाशन ५३७, लाजपतराय मार्केट, दिल्ली-११०००६ BHAIMI PRAKASHAN (1) LAGHU-SIDDHANT-KAUMUDI BHAIMI VYAKHYA-PART-1 (Revised and Enlarged Edition) Bbaimi Vyakhva of Dr Bhim Sen Shastri is unique and first of its kind published in Hindi, in its detailed and scientific exposition of the Laghu Siddhant Kaumudi The fact that part-1 (gafu) runs joto more than 600 pages, speaks for the painstaking nature, depth of learning and experience of the author He has left no store anturned to make the subject as simple and easy to grasp as possible for the students and to achieve this aim, he has combined the traditional method with the modern and scientific method of teaching and analysis The author has taken great pams to bring home to students the meaning of the Sutras without the help of Vritus At the end of each section have been appended exercises prepared with great care and caution to remove the doubts of students Declensions of all the words mentioned in the LSI have been given in the Bhamı Vyakbya This does away with the need to bave a separate Roopmala The author has also given a list of about 2000 words with meanings These include many rare and uncommon words This is a real help in translation The unique feature of the publi cation is the section on Avaya (stewa), which has becn acclaimed bv em nent scholars and erudite pandits as an original contribution to the subject The several indexes at the end are very useful The language of the work is very simple and lucid The difficult and kaotty points have been handled deftly On controver sial subjects, the views of all the well known authorities have been quoted The author is not a blind follower of tradition in matter of interpretation and meaning of Sutras Wherever he differs, be gives convincing arguments in support of his own view, which gives a stamp of his deep study, research and vast (caching experience Bhaim, Vyakhya, tp short is a self tutor and is of immense help to teachers and research scholars Price Rs 100/ only (2) LAGHU-SIDDHANT KAUMUDI BHAIMI-VYAKHYA-PART-I Part-Il of Bbamı Vyakhya on Laghu Siddhant Kaumudi deals with the far section, which is known as the backbone of Sanskrit grammar The work is an original commentary in the traditional style, which combines the modern scientific tecbnique of exposition and comparative analysis The work is unique in the 57747 portion The author has given detailed fat of about 1500 verbal forms besides conjugations of more than 300 verbs in all the ten tenses and moods The use and meaning of different 3441's in combination with verbs has been illustrated in about 1000 quotations taken from the famous Sanskrit works For the benefit of students, exercises have been given at the end of eaeh sub-section Th causal desiderative, intensive and denominative verbal forms have been ably explamed One hundred illustrations of each of these forms have been given with meaning The inclusion of well known controversies with the view point of each side and author's own, is a special feature of the work lo many places, the author has offered new solutions to difficult problems left unattended even bv Varadaraja himself At the end of the publication bave been appended six indetes of which special mention may be made of RO 5 This voluminous work running into 750 pages has been priced Rs 140/- only (3) LAGHU-SIDDHANT-KAUMUDI BHAIM-VYAKHYA-PARTI Like the first two parts, this part of Laghu Siddhanta kaurudi Bhaimi Vyakbra too deals in great details with an and FTTH sections only The section on Karkas has been elaborated by in pections of a sufficient qumber of new Sutras, not found in the ong:- ral L S K of Vardra? As in the first two parts exercises have been added at the end of each suo section Tous it contatos exce llent material for research scholars Price . Rs. 80/ only (4) LAGHU SIDDHANT KAUMUDI BHAHI-YZAKHYA-PART IV The recently published fourth part of the Bhamr-vyakhya of the LSK by Dr Phim Sen Shastri treats of the Samiss-section (FIFT) in great detail running to about 300 pages The author first furnishes both the popular (alf.) as well as the technical (fi) analysis (faus) of each example given in the text and then explains its complete formation with the help of relevant Sotras Besides the examples given in the text, hundreds of new examples of Samasas selected from the vast Sanskrit literature have been woven in this exposition The total number of llustrations thus collected exceeds 1200 Wherever possible, necessary references to the liter ary illustrations have also been given More than 200 objections or doubts likely to be raised by talented studeots at different places have been satisfactonly answered Useful footnotes have been added at places 'n addition to the Sutras, Vartukas etc , in the origina) text, some other Sutras, Varttikas etc., have also been elucidated with illustrations in the treatise Notes have been appended on the incorrect and false readings of the text of LSK The authors netrating observation, his scholastic dexterity and capability to elucidate even the most difficult topic in measured words are discernible at every step Such an elaborate and detailed commentary on Samasas has not as yet been attempted by anv one On the one hand it will bcocfit students and teachers and on the other the votaries of research will also find here ample investigative material The learned author has produced thispart after a continuous effort and hard labour of two years and a thorough scanning of hundreds of works and treatsses A number of appendices at the end adds to the value and importance of the pub lication The alphabetical index of 1200 illustrations of different Samasas indicating their names should be considered as one of the chief distinguishing features of this treatise With its help the whole of the section on Samasas can be revised witb great conve nience The work includes many exercises at appropiate places Critics oplad that if these exercises are properly solved, the students will be automaucally enabled to grasp the Samas section in facino atrator 7f997 This treatise runs into obout 300 pages of size (23X 36)-16 Elegant printing durable stitching and beautiful sereen printed binding is very attractive Price Rs 100/- only (5) LAGHU-SIDDHANT-KAUMUDI BHAI11I-VYAKHYA - PART 1 The prigting of this part of Bhaimi Vyakhya of LS Kwall be taken up soon It is most likely to be published by cod of 89 In this part the Taddhita section of LSK has been commented up on in depth in a very lucid style The clucidation of each Sutra is १७ followed by an analysis (feet) of each exacople, its meaning and complete formation (wafafa) with the help of relevant Satras. la addition to the illustrations gryen n the text, a number of cxamples taken from Sansint literature have also been included in the treatise Doubts or objections ansmog at the time of study or teaching have cach been fully clanfied Besides the Sutras in the text, many other Sutras likely to be of benefit to the students have also been explamed After each sub-secuon carefully prepared exercises have beco added, with the help of which the whole sub-section to be easily revised In addition to many appendices at the end, the one showing the list of illustrations is a special attraction of this publication Price to be announced (6) LAGHU SIDDHANT-KAUMUDI BHAIMI-VYAKHYA-PART-VI This part has been published & is available now for sale. This presents an extensive commentary on the Stor-Pratyaya (Fitriya) section of L S K It contains an exhaustive commentary on cach Sutra, followed by complete formation of each of the examples given thereunder, numerous illustrations and counter illustrations and clarifications to objections and doubts. Apart from the Sutras in the text, many other Sutres and Varttikas, useful for the students, have also been clucidated with illustrations. At many places literary illustrations have been collected after great explorative effort Techdical words like 'Farg' and 'Info' and other difficult pomts have been elaboratuly elucidated 10 simple language In fact, no portion of the text which peeded to be clarified, explained or elucidated has been left untouched without an appropriate commentary For revising the learnt material maov exercises have been appended at different places Many indexes particularly, the index of ullastrations showing aus bave e banced the value of this publication manifold Тоwards the end the author presents more than a hundred versts of his own containing errors relatieg to feminine affixes together with the rectification giving reasons for the same, with a view to arousvog students' alertdess for research lovers too dozens of impor. tant, notes bave been added at different places At many places attempt has been made to make the point clear by referring to non- Pantaian grammars as well In fact, such an exhaustive and compre hensive commentary on the US has been published for the first time The book contains more than 150 pages of size (23X 36)-16 Elegant printing, screen printed binding and durable stitching make the publication very attractive Price Rs 60/- only (7) VAIYAKARAN-BHUSHAN SARA Vaiyakaran Bhushan Sara of Kaundbhatt is an important trestise of Sanskrit grammar and occupies a special position for its exposition of the principles of pbilosophy of grammar This has been prescribed as a text book for MA, Acharya, Shastri, etc degrecs. The work is quite a difficult one and at places incomprehensible for even the briliant students. This is evident from the fact that all recently no translation of V B S. in English, Hindi or any other language of the country (except Sanskrit) was available The Bhaimi Bhashya of Dr Bhim Sen Shasth has filled this long felt need Dr Bhim Sen Shastri us an eminent Sanskrit scholar and grammar is dear to his heart He has been teachmg Sanskrit grammar for more than 4 decades and through his rescarches has carved out a place for bimself in the field This 13 borne out by the commentary on the argi-foruma of V BS This commentary has won him laurels from within and outside the country and has been given recognition by the Government of India too The explanations of the knotty points in simple and flowing language are remarkable His style of raising the doubt and putting forth its solution 13 commendable Particularly praiseworthy arc elucidations of Kankas 2, 5 and 13 At the end of the book, the author has given indexes which are very useful for teachers, students and research scholars Dr Satya Vrat Shastri, Professor and head of Sanskrit Department, Delhi University has contributed a scholarly introduction The book has been printed very dicely on mapltho paper and is clothbound This makes it very useful, particularly for libraries It is priced only Rs 60/- which is considered on the low side keep ing in view the prices of rescarch work of comparative ment (8) A STUDY OF NYASA Recently, the famous research work of Shastriji under the cap tion 'Nyasa Paryalochana' (11 Hmdı) has been published This is an original contribution towards the study of 'Kasbita-Vivarana- Panjika' also known as 'Nyasa', the earliest known commentary on 'Kashika' and it has been accepted for the award of Ph D degree by the University of Delhi Infact, it is the result of Shastriji s many years' continuous study and loving labour Several current sotons have been boldly contradicted For example, Nyasakara as still believed to be a Buddhist, but in this thesis several evidences have been put forward to show that he was a follower of Vedic religion The thesis is dided into six chapters The first chapter while giving general introduction to the Nyasa and its author, deal with the latter's time and place, the salient features of Nyasa, its elegant and fluent style and a comparative study of Nyasa and Hardatta's Padamanjari The second chapter deals with entirely a new research subject "Later Grammarans' indebtedness to Nyasa' This discusses not only Paninsan grammars but also mcludes the ten main non-Pantian grammars viz Chandra, Jainendra, Katantra, Shakatayana, Sarzs watikanthabharan, Hemchandra's Shabdanushasana, Malayagishabdanushasana, Sankshiptasara, Mugdhabodha & Sarsarata The third chapter entitled 'Refutation of Nyasa by Later Grammarians' discusses another topic not touched upon carbier by anyone Here the author examines the later grammanens' criticisms of Nyasakara by presenting in elaborate details the reasons for their soundness or otherwise The fourth chapter deals with an important issue 'Correction of Kasika-tests in the context of Nyasa'. The anthor has pomted out at length the grave mistakes committed by the modern emment scholans un editing Kasike and has offered rectificaton of several of its incorrect texts with justifications m the context of Nyze. The fifth chapter gives a detailed account of the misconcep tions of Nyasakars and one hundred Acorrect resemos LIBRARY po The sextb'chapter giveste conclusica adding several com facts la beldes Faninsan pd con-Pacmien bac mars this work is most reliable and uniquely raforcatre first attempt of fies onn kind diess to say,, Sis/publizzation is a must for every library and is excitingly useful for research scholars m ihe field of Sanskrit gramm. De is fricted on fine mapl.tho paper end is clothbound costing Rs. 100/- cals (PP 20 + 432) (9) BALMANORAMA-BARANTI-DIGDARSHAN This research paper in Hood by Dr Bhim Sen Shastri poigts out the glaring mistakes and contradictions abich are yesores to both students and teachers, in the various editions of Balmanorama edited by eminent scholars from different centres in the country The author through convincing arguments bas established that there learned scholars have not only not take any pains to edit the work carefully but have bladly followed each other, not noticing erta the self-evident errors. The paper is prad Rs. 5/- only (10) PRATYAHAR SUTRON KA NIRMATA KAUN (Who is the father of Pratyakar Aphorisms?) It is for the first time that the problem of the authorship of the Pratyabar Satras has been analysed in such depth The learced author has furorshed many coaviacmg arguments and produced numerous documentary evidence in support of his thesis The essas is 20 eye-opener to those who are easily led astrzy by bl.ad farth The paper is priced Rs 25/- oaly (11) AYYAYA-PRAKARANAVI The unique feature of Laghu Siddhanta Kumodi Bhanci vyakhya is the section on 30995, which has been acclaimed by emr nent scholars and erodite Pandits as an original contribatisd to the subject The author has given about 500 Avayas with their men ings and usages from the vast Sanskrit Literature At the end of this book an alphabetical list of ees has been added For the coaseostame of the readers, this chapter has been publshed separztely Price Rs. 25/- caly These books can be bad of BHAM PRAKASHAN 537 LAJPAT RAI MARKET, DELHI-110006 102341