Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Shri Vedant Vinod (pratham Ank)
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॥ ॐ श्री गुरुपरमात्मने नमः ॥ ॥श्री वेदांत विनोद॥ प्रथम अंक ॥१॥ अथ श्रीविचारचंद्रोदयकी पोड- शकलाके अनुसार वेदांत पदावलिः प्रारभ्यते॥ ॥ उपोदातवर्णन ॥ १ ॥ ।। मनहर छंद ॥ पुरुपइच्छा विपय पुरुपार्थ जोई सोई। दुखनाश मुखमाप्तिरूप मोक्ष मानहु । हेत, ताको ब्रह्मज्ञान सो परोक्ष अपरोक्ष । नामें अपरोक्ष दृढ भदृढ दो गानहु ।। ॥१॥ कोईवी रागके ध्रुवपदगाया भार है। है २ वेदातपदावलि [वेदांत मोक्षको साक्षात् हेतु बदअपरोक्ष ज्ञान । हेतु ता विचार जीवब्रह्मजग जानहु ॥ तीन वस्तुरूप जडचेतन दो जड मिथ्या । माया ब्रह्मचित “सो मैं" पीतांवर स्यानह ॥१॥ ॥ प्रपंचारोपापवाद ॥ २॥ अपंचारोपापवाद करि निमपंच वस्तु- ब्रह्म जानिके अवस्तु मायादिक भानिये ॥ ब्रह्म माया संबंध रु जीवईश भेद तिन । पट ये अनादि तामें ब्रह्मानंत मानिये ॥ पस्तुमै अवस्तु कर कथन आरोप वाधि । ॥ २ ॥ अन्वयः- ता ( दृढअपरोक्षजानका) हेतु विचार है॥ ॥ ३ ॥ ऐसे निश्चय करो। ॥ ४॥ अन्वयः- अवस्तु वाधि वस्तुकथन अपवाद गानिये॥
विनोद १] चेदातपदाचालि ये। अवस्तु वस्तु कथन अपवाद गानिये ॥ गुरुके प्रसाद यह युक्ति जानि पीतांवर । तेज तमकारज आरज निज जानिये ॥२॥ ॥ देह तीनका मैं द्रष्टा हूं ॥ ३ ॥ द्रष्टा तीन देहको मैं स्थूल सूक्ष्म कारण तीन देह दृश्य अरु अनातमा मानियो । पंचीकृत पंचभूतके पचीसतत्वनको। स्थूल देह एह भोग आयतन मानियो ।। अपचीकृत भूतफे सप्तदशतवनको । सूक्ष्मदेह सोइ भोग साधन प्रमानियो । अज्ञान कारणदेह घटवत दृश्य एह । पीतांवर द्रष्टा आप जानि दृश्य भानियो ।॥३॥ ॥५॥ अन्यय -हे भारज (रिषेकी) समका रज तम । निज (खरूप) जानिये ४ वेदातपदावलि [दात -- ।। मैं पंचकोशातीत हूं ॥४॥ पंच कोमातीत मैं हूं अन्न प्राण मनोमय । विज्ञान आनंदमय पंचकोश नीतमा ।' स्थूलदेह अन्नमय कोश लिंगदेह प्राण । मम र विज्ञान तीन कोश कहें मातमा ॥ कारण आनंदमय-कोश ये कारज जड । विकारी विनाशी व्यभिचारीही अनातमा ।। अज चित अविकारी नित्य व्यभिचारहीन । पीतांवर अनुभव करता में आतमा ॥ ४ ॥ ॥६॥ मात्मा नहीं । अर्थ यह जो भमामा है । ॥ ७ ॥ महात्मा लिंगदेह[] माण मन अरु विज्ञान तीनकोशरूप कहै हैं।। ॥८॥पंचकोश ॥
विनोद १] वेदातपदावलि ६ । तीनअवस्थाका मैं साक्षी हूं ॥५॥ अवस्था तीनको साक्षी आतमा अन्वययाको। व्यभिचारी अवस्थाको व्यतिरेक पाईयो । त्रिपुटी चतुरदश करि व्यवहार जहा। स्पष्ट सो जायत जूठ ताकू दृश्य ध्याईयो । देखे सुने पस्तुनके सरकारसे सृष्टि जहां । अस्पष्ट मतीति स्वप्न मृपा लोक गाईयो । सकल करण लय होय जेहा सुप्ति सो.। ॥ ९ ॥मा (आत्मा) को अन्वय (पुष्पमालाम सूत्रकी पाई तीनअवस्थामै अनुस्यूतपना) है । यह अर्थ है। ॥१०॥ पुष्पनकी न्याई वीमअवस्थाका परस्पर श्री अधिष्ठानते भेद ॥ ॥११॥ अन्नय:--जही सकल करण लय होय। मो मु िहै" sur चेदातपदावलि [वेदात पीतांवर तुरीयही प्रत्यक प्रत्याईयो ॥ ५ ॥ ॥प्रपंच मिथ्या वर्णन ॥ ६॥ ॥ लैंलित छंद ॥ सकल दृश्य सोऽन्यास छोडना। जग अधारमै चित्त जोडना ॥ त्रय देशाहि जो जाग्रदादि हैं। सव प्रपच सो भिन्न नाहि हैं ॥ ६ ॥ रजतआदि हैं सी पिमैं यथा । जय दशा सु हैं ब्रह्ममें तथा ॥ रजत आदिवत् दृश्य ये भूपा। ॥ १२ ॥ अतरात्मा ॥ ॥ १३ ॥ निश्चय कीयो॥ ॥ १४ ॥ श्रीमद्भागवत के दशमस्कधके एकतीसवै अध्यायगत गोपिका गीतको न्याई है। ॥ १५॥ तीनअवस्था ।
विनोद वेदात पदारलि शुगतिकादिवत् ब्रह्म अमृषा ॥ ७ ॥ व्यभिचौ मियो रजत आदि ज्यों । इन हिकी मिथो व्यावृत्ती जु त्यों ॥ , शुगति सूत्रवत् अनुग एक जो। अवृतीयुतो यहा आप सो॥ ८ ॥ शुगर्गातकामही तीन अंस ज्यू । अजड ब्रह्ममैं तीन अंस त्यूं ॥ ॥ १६॥ सत्य है। ॥ १७॥ परस्पर ।। ॥ १८॥ इहां आदि शब्दकरि मोरल (अब. रख) भी कागजका ग्रहण है। ॥ १९॥भेद (अन्योन्यामान)॥ ॥ २०॥ पुष्पमालामै सूत्र की न्याई ।। ॥ २१ ॥ अनुस्यूतताकरि बुक्त। ॥ २२॥ सामान्य । विशेष । कल्पित विशेष येतीनश हैं। -- ८ वेदांत पदावलि (वेदांत उभय अंसद्धं सत्य जानिले । तिय त्यागदे मोक्ष तो मिले ॥ ९ ॥ मिद भ्रमादि जो पंघा भवं । विविधतापता तप्त सो देवं ॥ पशु पंचधा युक्तियों करी। करि विचार तूं छेद ना डरी ॥ १० ॥ ॥ २३ ॥सामान्य श्री विशेष । दन दो अंशनहूं। ॥ २४ ॥ कल्पित अंशकू।। ॥ २५ ॥ भेदभ्रांति आदिलेके । इहां आदि अब्दकरि कामोत्तापनकी भ्रांति । संगनाति । वि. कारनाति । ब्रह्मते भिन्न जगतके सत्यताको भ्रानि । इन च्यारीनातिनका ग्रहण है। ।। २६ । पोचमकारका संसार है। ॥ २७ ॥ वन है॥ ॥ २८ ॥ अन्वयः--पंचधा (पाचप्रकारकी) यु- क्तियो ( दृष्टातरूप) परशु कुठार) करी॥
विनोद वेदातपदावलि e नहि ज जाहिमें तीन कालमैं । तहहि भान व्है मध्यकालमें। शुगति रौप्यवत् ध्यास सो भ्रम । अधज्ञान दो मांतिका क्रमं ॥ ११ ॥ विविध वेम है ज्ञान अर्थको। अरथभ्राति वा पहिया वको । सकल ध्यास जे जगतम से। ॥ २९ ॥ धबयः-सो भ्रम (अभ्यास) अरथ (अध्यास) श्री ज्ञान (जानाध्यास) [या कम (क्रमसे ) दो भांतिका है। ॥ ३०॥ अन्वयः-शान (जानाध्यास यो) अर्थ (अर्थाध्यात)को वेम (अभ्यास) [मस्येक ] विविध है ।। ॥ ३१ ॥ वा भरथ भ्रांति (अर्थाभ्यास ) पहिधा पदमकारको) बको (कहो)॥ ॥ ३२ ॥ दिखाये १० वेदांतपदावलि [ वेदात सबसु याहिके वीचमै धसे ।। १२ ॥ निन चिदात्मा ब्रह्म जानिके । सकल वेमको भूल भानिके ॥ परम मोदक आप बूजि ले । इहहि मुक्ति पीतांवरो मिले ॥ १३ ॥ ॥ आत्माके विशेपण ॥ ७॥ ॥ इंद्रविजय छंद ॥ आत्म विशेषण हैं जु दुर्भाति । विधेय निषेध्य कहाँ निरधारे ॥ वे सब जानि भले गुरु शास्त्र सु। ॥ ३३ ॥ प्रवेशकू पाये हैं। ॥ ३० ॥ अज्ञान ।। ॥ ३५ ॥ परमानदरूप ब्रह्मक आत्मा जानीले ॥ ॥३६ ।। ठुमरी भी लावनीमें गाया नावे है। ॥३७॥ वे विशेषण ।।
विनोद १] वेदातपदायलि सो अपनो निजरूप निहारे । सच्चिदनद रु ब्रह्म स्वयंपर-1 काश कुटस्थ साक्षि विचारे । द्रष्ट्ट अरु उपद्रष्ट रु एकहि । आदि विधेय विशेषण धारे ॥ १४ ॥ अतविहीन अखंड असंगह। अद्वय जन्मविना अविकारे । चारि अकारविना अरु व्यक्त । न माननको विषयो जु निकारे ।। कर्म करीहि बढे न घटे इस । हेतुहि अव्यय वेद पुकारे ॥ ॥ ३८॥ अनत ॥ ॥१९॥ अजमा॥ ॥१०॥ निराकार ।। ॥४१॥ अममेय ॥
वेदातपदावलि [वेदांत अक्षर नाराविना कहिये इस । आदि निपेध्य पीतांवर सारे ॥ १५ ॥ ॥सचितुआनंदका विशेपवर्णन ॥८॥ सच्चिदनंद सरूप हि मैं यह । सहरुके मुख पहिचान्यो॥ जाग्रत स्वम सुषुप्ति नु आदिक । तीनहुँ कालहि में परमान्यो । जाग्रत आदि लयावधि तीनहुं । कालहि हो इसते सत मान्यो । तीनहुँ कालविषै सब जानहुँ । याहित मैं चिदरूपहि जान्यो ॥ १६ ॥ मैं प्रिय हुँ धन पुत्र रु पुद्गल । आदिकते त्यकाल अंगान्यो । ॥ ४२ ॥ स्थूल शरीर ॥ ॥ ४३ ।। तृप्त ॥
विनोद १] वेदांतपदावलि आतम अर्थ सबै प्रिय आतम । आपहि है प्रिय दुःख नसान्यो । या हित में सक्ते प्रियतम्मरु हो परमानंद दुःखहि भान्यो। देह देशादि अतीत सु आतम । पूरण ब्रह्म पीतांवर गान्यो ॥ १७ ॥ ।। अवाज्यसिद्धांत वर्णन ॥ ९ ॥ ब्रह्म अहै मन वानि अगोचर । शास्त्र र संत कहूँ अरु ध्यावे । वेद वदें लछनादिक रीति रु । त्ति विआप्ति जनो मन लावें ॥ हैं जु सदादि विधेय विशेपण । वे असदादिक भिन्न कहावें ॥ 1188 !! अवस्था आदिकतें।
१४ वेदांतपदावलि [वेदांत सत्य अपेक्षिक आदि विरोधि जु । अंस तनी परमार्थ लखावें ॥१८॥ हैं जु अनंत अखंड असंग रु । अद्वय आदि निषेध्य रहावें ॥ वे परपंच निषेध करी अव- शेपित वस्तु गिरा विन गावें ॥ यूं परमातम आतम देव ही। वेद रु शास्त्र सबे सुरावे ॥ पंडित त्यागि अभास पीतांबर । ॥ ४५ ॥ अपेक्षिक सत्य । वृत्तिवान औ विष- यानंद आदिक विरोधि जो अंश है । ताकू त्यागिके ।। ॥ १६॥ वास्तवरूप जो निरपेक्षसत्य । चेतन. रूपज्ञान औ स्वरूपानंद आदिक | ताईं लक्षणासै बोधन करे हैं। ॥ १७ ॥ पडित पीताबर कहै है कि:- आभास विनोद १] वेदांतपदावलि त्ति अहं अपरोक्षहि पावै ॥ १९ ॥ सामान्यविशेष चैतन्य वर्णन १ चेतन है जु समान विशेष म्। दो विध सत्य सुजान समाने ॥ प्राति सरूप विशेष जु कल्पित । संसृति आश्रय सो तिहि माने । ज्यो रविको मतिबिंब जलादिक । सो रविरूप विशेष पिछाने । त्यों मतिम प्रतिषिर्व परातम । सो कलपीन विशेष हि जाने ।। २० ॥ आवत जावत लोक प्रलोक हिं। (फलव्याति) त्यागिके अहंवृत्ति ' ('वृत्ति व्या- प्तिकार) अपरोक्ष जाने । यह अर्थ है ।। 1821 परमात्माका प्रतिबिंब!"
वेदातपदावलि [दात भोगत भोग जु कर्म निपाने ॥ सो सब चित्त अभास करै अरु । शुद्ध समान मही नहिं आने । अस्ति रु भाति प्रिय सब पूरन । ब्रह्म समान सुचेतन माने । नाम रु रूप तजी सत चेतन । मोद पीतांवर आप पिठाने ।। २१ ॥ ॥ तत्त्वंपदार्थक्य निरूपण ॥११॥ वाच्य रु लक्ष्य लखी तत त्वंपद । लक्ष्य दुहूकर एक दृदा भिन्न जु देशहि काल मु वस्तु रु । ॥ ४९ ॥ जो कर्मरचित भोग है। [ताकू] भो गता है। ॥५०॥ चेतनका प्रतिबिंब ॥
१७ विनोद १] वेदांतपदावलि धर्म समेत उपाधि उडावै ॥ जन्म थिती लय कारक मयिक । जाननहार सवी जग भावे ॥ ईश्वर वाच्य सुहै ततपादहि । ब्रह्म सुलक्ष्य उपाधि अभावै ॥ २२ ॥ संसति मानत आपहिमें पर- तंत्र अविद्यक अल्प जनावै। त्वंपद वाच्य मु जीव विवेचित । लक्ष्य मुसाक्षि उपाधि ढहावै ॥ वाच्य दुअर्थ हि भेद बि है पुनि । लक्ष्य विभेद न रंचक गावै ।। ब्रह्म अह इस भांति जु जानत । सोई पीतांवर ब्रह्महि पावै ॥ २३ ॥ ॥५१॥ माया उपाधिवान् । ।। ५२ ॥ अविद्या उपाधिवान ।।
वेदातपदावलि [दात आज्ञानीके कर्मनिवृत्तिका प्रकार॥३२॥ ॥ तोटकछंद ॥ जिन आतमरूप मेयो जु मले। तिस त्रैविध कर्म मिटें सकले ।। में आरति आश्रित सचित ले । निज बोध सु पावक सर्व जले ॥ २४ ॥ जड चेतन गांठ विभेद वले । दृढराग दवेष कपाय गले ॥ जलमै जिम लिप्त न कर्जदले। परसे न अगामि जु कर्म मले ॥ २५ ॥ ।। ५३ ॥ हुमरीमें गाया जाते है । ॥५४॥ देख्यो । 1॥५५॥ अनारकी आवरणशक्तिके आश्रित स चितकर्मोकू लेके ॥ ॥ ५३॥ कमलका पत्र । -- विनोद १] वेदातपदावलि इस जन्म अरंभक कर्म फले। सुख दुःखहि भोगत होत मले।। इस भाति जु होवत जन्म विले । विखरूप पीतांवर स्व विमले ॥२६॥ ॥ समज्ञानभूमिका वर्णन ॥ १३ ॥ निज वोधकि भूमि मु सप्त अहै। इस माति वसिष्ठ मुनीश काहै ।। शुभ साधन सपति आदि लहै। भवणादि विचार द्वितीय वहै ॥ २७॥ निदिध्यासन तीसर भूमि गहै। अपरोक्ष निजातम नौथि चहै ॥ हमता ममता विन पचम है। छटवी सब वस्तु अकार दहै ॥ २८ ॥ ।। ५७ ॥ देखिके। ।।५८ ॥ योगवासिष्ठ प्रथविष ।।
२० वेदांतपदावलि वेदांत सतमी तुरिया जुवरिष्ठित है। सब वृत्ति विलीन चिदात्म रहै । इवे गाढ सुषुप्ति न जागत है। परमानंद मत्त पीतांवर है ॥ २९ ॥, ॥जीवन्मुक्ति विदेहमुक्ति वर्णन ॥१४॥ जब जानत है निज रूपहिएं। तव जीवन्मुक्ति समीपहि कुं॥ भ्रमबंध निवृत्ति सदेह हिदूं। सुख संपति होवत गेहहि• ॥ ३० ॥ विदवान तजे इस देहहि। ॥ ५९ ।। गाटसुपुप्ति इव (वत)॥ ॥ ६॥ तब शरीरसहित पुरुषकं भ्रमरूप बं. धकी निवृत्तिस्वरूप जीवन्मुक्ति समीपहीकू (तत्काल होते है) यह अर्थ है ॥
विनोद १] चेटांतपदावलि २१ तब पावन मुक्ति विदेहहिकं ॥ तम लेश भजे सद नाशहिकू। तन देत प्रपंच अमासहिषं ॥ ३१ ।। सरिती इव सागर देशहिदूं। चिनमान मिलाय विशेपहिा। चिद होय भजे अवशेपहि। नहि जन्म पीतांवर शेपहिफू ॥ ३२ ॥ || वेदांतप्रमेय (पदार्थ) वर्णन ॥ १५॥ । ललित छंद ॥ (गोपिकागीतवत् ) जन तु जानिले ज्ञेय अर्थकुँ । ॥६१॥ सागरदेशहिक सरिता दव (नदीकी न्याई)| ॥६२॥ स्थूलसूक्ष्म प्रपंचसहित चिदाभासरूप निक्षेपकुँ। ॥६३ ॥ वेदातके प्रमेयरूप पदार्यन।।
२२ वेदांतपदाचाल [वेदांत सकल छेद मं दे अनर्थकुं ॥ मुगति कौन है हेतु ताहिको। जनक बीचको कौन वाहिको ॥ ३३ ॥ विपय वोधको कौन जानिले । मतक ईशको तत्व मानिले ।। अहेम अर्थकू खूब खोजिले । तत पदार्थक शुद्ध सोनिले ॥ ३४ ॥ परम आतमा एक मानि ले। तहँ सदादि ऐश्वर्य आनि ले ॥ सत चिदात्म सो सर्वदा अहै। ॥६४ ॥ वाहिको (मोक्षके हेतु ज्ञानको) बीचको जनक (अवांतरसाधन) कौन है । ।। ६५ ।। अहं (ख) पदके अर्थकू ।। ॥६६॥ ब्रह्म । ।। ६७ ॥ सच्चिदानद स्वरूप सो (ब्राआत्माकी एकता) सर्वदा (तीनोकालमैं ) है॥
विनोद १] वेदात पदावलि इस पीतांबरो ज्ञानवं गहै ॥ ३५ ॥ । पोडशकला वर्णन ॥ १६ ॥ निपकलं निज वेदही वदे। पट दर्श कला ब्रह्म में न दे॥ निरवयेव जो निष्कलंक सो। इकरसं सदा अंगता न सो ॥ ३६॥ हिरण्यगर्भ औ अद्धया नभो । पयन तेज के भूमि इंद्रिभो ॥ मन अनाज औ शक्ति सरपो। करमलोक नामामजपो । ३७ ॥ पट दर्श कला एहि नानिले। जड उपाधिको धर्म मानिले । ।।६९ ॥ मनका जप ॥
२१
वेदांतपदावलि
[वेदांत
अनुगतायो पुप्पसूत्रवत् ।
निज चिदात्म पीतांवरो हि सत् ॥ ३८ ॥
॥दोहा॥
पांचकलाहि कवित्त । पांच सवैया मांहि ।।
ललित छंदमें तीन हैं तोटक, त्रय आहि ॥ १ ॥
पांचकवित दशसचैया । चौदा ललित पिछान ॥
नवतोटक एकत्र करि । अठतिस छंद प्रमान ॥२॥
विचारचंद्रोदयकला । पोडस सार निचोड ॥
पीतांवरनै गानियो । वर पोडश पद जोड ॥३॥
जो जन यह पोडशपदी। समुज गाय मन लायं।
सो निजबोध सुपायके । पुनर्जन्म नहि आय॥४॥
॥संस्कृत दोहा॥
श्री विचारचंद्रोदयं शुद्धां धियं समाप्य ॥
विचार्येति परानंदं तत्त्वज्ञानमवाप्य ॥५॥
बिनोद श्रीपीतांवरजीके पद ब्रह्मनिष्ठपंडित श्रीपीतांवरजीकृत ।। हिंदुस्थानी भापाके पद ॥ राग समयानुसार ॥१॥ रामरूप हैं मेरे सहरु । रामरूप हैं मेरे रे ॥ रमत चतुर्दश लोक लीलाकृत। दमते दोप बहुतेरे रे ॥ टेक ॥ निजअनुभव जिन मोहि वताया। श्रुति स्मृति शब्दहि टेरेरे ॥ कर्णरंभ मग चले अंत तव । काम कोष लिये घेरे रे ॥ १॥ सद चित् आंनद रूप स्वयं निज । पूरन ब्रा देरे रे॥
२६
श्रीपीतारती के पद
[दान
संही ? अम रहो रपाररि ।
गही लयो तिहि मेरे रे ॥ २ ॥
संशय भ्रमहि मिटे मनके सत्र।
भये मुशात सुरोरे रे॥
गुरुनाथू पद पर पीतांपर।
लये गये भए फेरे रे ॥ ३ ॥
राग आशा ॥२॥
मो कैसे कहिये शानी।
जाकी रत्ति विवेक विहानी ॥ टेक ॥
हरि गुरु भक्ति शमादिक साधन ।
धारिन बुद्धि विषय रस सानी ।
जन्म अनत मोगिन अगानी ॥ १ ॥
मोक्षरूप साधन नहिं जानी।
ज्ञानरूप साधन न पिछानी ।
क्षेयवस्तु मनमें नहीं आनी ॥ २ ॥
विनोद ] श्रीपीतावरजीके पद देह अवस्था कोश जगतते । चेतनको नहिं भिन्न लखानी। निज तत्व असग न गानी ॥ ३ ॥ तवं पदको पाच्य लक्ष्य लखि । लक्ष्य दुहुनको एक न मानी । अज्ञान जगत नहिं मानी ॥१॥ पीतांवर कहे संशय भ्रम तजि । वृत्ति न ब्रह्मरूप ठहरानी। जहा नहिं पहुचे मन वानी ॥ ५ ॥ राग आशा॥३॥ सो सन्जन कहिये ज्ञानी। जाकी खुलि अनुभवकी सानी । सो सज्जन कहिये ज्ञानी ।। टेक॥ साधन चारिकी धारि निसानी। विधिवत शरण गझो गुरु ज्ञानी ।
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श्रीपीतांबरजोके पद
ब्रह्मातमको शोधन ध्यानी ॥ १ ॥
महावाक्य अर्थ जिय आनी ।
श्रवन मनन निदिध्यास करानी ।
मान मेय संशय भ्रम हानी ।। २ ।।
जीव रु ईश भाव विसरानी।
बंध मोक्षकी बुद्धि बिलानी ।
अहंब्रह्म अस निश्चय ठानी ॥३॥
द्वैतवुद्धि जाकी जो नसानी ।
ज्यो,तरंग परपोटा पानी ।
सहज समाधि स्थिती ठहरानी ॥४॥
सगुरु बापू पदरज परसी।
पीतांबर जु मयो ब्रह्मज्ञानी ।
गुरु शास्त्र जगत ब्रह्म जानी ॥५॥
शरीफ सालेमहंमद की कंपनी. वेदांतपुस्तकालय-कराची. बहुतकरित सस्तन तथा भाषा उपे हुये सर्व वेदात- विषयक प्रप हमारे वहासे मिल सकते है ।। कोई बीमप लेनेवी इच्छावालेकू प्रथकी कीमत तया डाक महसूल ज- नाया जावेगा । उत्ताके लिये सलकार्ड भेजना।। नीच लिखे प्रथना डाक महसूल नहीं पड़ेगा मान वेत्युपेएलका डाकमोशन पडेगा ॥ श्री विचारसागर ५५४ टिप्पणसहित औ वृत्ति- रखावलि तथा बड़ी अकारादि अनुक्रमणिकास- हित तृतीयावृत्ति 31 उक्ततृतीयावृत्ती उत्तमकागदपो श्रीसुंदरविलास । ज्ञानसमुद्र आदिर तृतीयावृत्ति । ,, उक्ततृतीयावृत्ती उत्तमकागदशी. श्रीसटीका अधावक्रगीता मूलकी माषासहित. १ उक्तग्रंथ उत्तम पूठे औ कागदका.... श्रीविचारचंद्रोदय । तृतीयावृत्ति श्रीपचदशी! मूल औटोकाको भाषा दो विमागमे १५ थोडेही प्रथ रहे है । ( बहुत करिके फेरछपनेकी नहीं) श्रीपचदशीका प्रथम प्रकरण.... ... ... ४॥ " ... 3 ... 000 श्रीवेदांतविनोद ॥ द्वितीय अंक ॥२॥ श्रीवेदांतपदार्थसंज्ञा॥ ब्रह्मनिष्ठपंडितश्रीपीतांवरजीकी So, Why आज्ञाअनुसार शरीफ सालेमहंमदनै छपाई प्रकट किया। श्रीमुंबईम निर्णयसागरप्रेसमै छपा. ॥ संवन् १९४२-सन् १८८६ ॥ (मरस्कान सर्वहक साधीन रखे है) । प्रस्तावना॥ मंगल ॥दोहा॥ श्रीगुरुके पद वंदिके यह वेदांतविनोद । प्रकट करों जिस करि संघ सज्जन पावहुमोद १ श्रीवेदातविनोदमैं लघुमथ प्रकट किये जाते है | तिन मथोके नाम इस प्रथके प्रत्येक अक्के अंतम रष्ट पडगे। परमदयालु ब्रह्मनिष्पडित श्रीपीतावरजी महाराजकी सहायतासे वेदातविनोदके अक प्ररट पिये जाते है। वेदातपदार्थसना नामक मानीन मथ है । तिसपर "'- दार्थमजूषा" नामक व्यारख्या महात्मा फुलचन्द्र ज्ञानीने करीहै सो "पदार्थमनूषा" ब्रह्मनिष्ठ पडित श्रीपीतावरजीने शोधन करि प्रकट किया है। यह लघुमथ श्रीविचारच द्रोदयमै षोडशकलारूपसे वो प्रकट किया है। 'अजिव्हत्वादि ६.१४०" आदिक अकारादि अनु- क्रमस रखे हैं। तहा ६ का अक पष्टपदार्थनका सूचक है। औ १४० का अक । पदार्थसस्याककै अनुक्रमाक जो श्रीप. दार्थमजूषाम रसे हैं । तिनका सूचक है । जिन पुरुषनके पास पदार्थमजूषा है तिनोके वास्ते यह सुखकर अनुक्रम- णिका है | औ मुमुचनकू पदार्थस्मृति में सहायक है। शरीफ मालेमहंमद.
ॐ पदार्थमंजूषागत मंगलाचरणं ब्रह्मनिष्ठपंडितश्रीपीतांवरजीकृतम्. ॥ नाराचरत्तम् ॥ कल कलंक कज्जलं तमः प्रलापि सज्जलं गतातिचंचलाचलं सुशांतिशीलमुज्ज्वलम् ।। सदा सुखादिकंदलं पितापपापशामकं । नमामि ब्रह्मधामकं सबापुरामनामकम् ॥ १॥ समानदानदायकं भवाववाक्यसायकं । सुशुद्ध धीविधायकं मुनीद्र मौलिनायकम् ॥ स्वसंगगीतगायकं व्यक पिलोकरामकं । नमामि ब्रह्मधामकं सबापुरामनामकम् ॥ २॥ शमक्षमादिलक्षणं मतिक्षणं स्वशिक्षणं ।
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मुमुक्षुरक्षणे क्षमं क्षमे वै विलक्षणम् ॥
सुलक्ष्य लक्ष्य संशयं हरं गुरुं हि मामक।
नमामि ब्रह्मधामकं सवापुरामनामकम् ॥ ३ ॥
कलेशलेशवेशशून्यदेशके प्रवेशकं ।
गताविशेपशेपकं ह्यशेपवेपदेशकम् ।।
परेशकं भवेशकं समस्तभूपभामकं ।
नमामि ब्रह्मधामकं सबापुरामनामकम् ॥ ४ ॥
सकालकरलिजालभालभेदिभानभल्लकं ।
मभिन्न खिन्ननुन्नभाविजन्ममत्त मछकम् ।। ।
सभेदखेदछेदवेदवाक्ययूथयामकं ।
नमामि ब्रह्मधामकं सबापुरामनामकम् ॥ ५ ॥
भवाष्टकष्टपाशदासभावभासनाशकं ।
सुशुद्धसत्वबुद्धतत्वब्रह्मतवमासकम् ॥
स्वलोकशोकशोषक विनोपदोषवामकं ।
नमामि ब्रह्मवामकं सवापुरामनामकम् ॥ ६॥
सबंधुजन्मसिधुपारकारिकर्णधारकं । सलोभशोभकोपगोपरूपमारमारकम् ॥ स्वबालकालवारकं समाप्तसर्वकामकं । नमामि ब्रह्मधामकं सबापुरामनामकम् ।। ७ ।। स्वलक्ष्यदक्षचक्षुपं स्वरूपसौख्यसंजु । कृतार्थचेतनायुपं गतार्थगामितस्थुपम् ॥ विभोग्यजातदुर्विपं मुपं गुणालिंदामकं । नमामि ब्रह्मधामकं सबापुरामनामकम् ॥ ८ ॥ भवाटवीविहारकारि जीवपांथपारदं । सयुक्तिमुक्तिहारसारदं सुबुद्धिशारदम् ॥ सपीतपादकांवरो ब्रवीतितं स्वरामकं । नमामि ब्रह्मधामकं सवापुरामनामकम् ॥ ९॥ श्रीमन्मंगलमूर्तिपूर्तिसुयशा- स्वानंदवान्युल्लसत् । सौभाग्यकसरित्पति प्रतिहत-
मोद्भूततापत्रयम् ॥
संसारसृतिलममममनसा-
मुद्धारकं कागतं।
प्रत्यक्तत्वसुचित्स्वरूपसुगुरुं ।
राम भजेऽह मुदा ॥१॥
॥ ॐ गुरुपरमात्मने नमः॥ ॥ श्रीवेदांतविनोद ॥ द्वितीय अंक ॥२॥ ॥ अथ श्री वेदांतपदार्थसंज्ञा ॥ अजिव्हत्वादि६/१४० तलातल अजिन्हत्व रसातल नपुंसकल महातल पंगुत्व पाताल अंधत्व अध्यात्मताप २०१७ बधिरत्व आधि (मानसताप) मुग्धत्व च्याधि (शारीरताप) अतलादि ७/१४९ अध्यात्मादि ३२६९ अतल इंद्रिय (अध्यात्म) वितल देवता (अधिदैव) सुतल विषय (अधिभूत) २ ॥ वेदांतपदार्थसंज्ञा ॥ वेदांत अनादिपदार्य ६।१४५ नीव. ईश शुद्धचेतन अध्यास २।२३ अर्याध्यास ज्ञानाध्यास अनात्माके धर्म १२।१६९ नित्य विनाशी अशुद्ध नाना क्षेत्र आश्रित- विकारी परप्रकाश हेतुमान व्याप्य संगी भावृत अविद्या चेतनअविद्यासंबंध तिनका संबंध अनुवंध ४ । ८५ अधिकारी विषप प्रयोजन संबंध अन्तःकरण ४१८६ मन । चित्त बुद्धि। अहंकार अन्तःकरणदोपस७१ मल । आवरण ३ विनोद २] ॥ वेदांत पदार्यसंज्ञा ।। विक्षेप । वैराग्यकी अभाव ५।१२६ उपरामकी मागभाव अवस्था ३।२९ प्रध्वंसाभाव जाग्रत । सुषुप्ति अन्योऽन्याभाव स्वप्न अत्यंताभाव अवस्था ७॥१४६ सामयिकाभाव अज्ञान अरिवर्ग ६।१२८ आवरण काम । मोह विक्षेप परोक्षज्ञान लोभ । मत्सर अपरोक्षज्ञान अर्थवाद ३१६८ शोकनाश अनुवाद तृप्ति गुणवाद अवस्था ६।१३३ भूतार्थवाद शिशु । किशोर अवधि ३१५३ कीमार । यौवन बोधकी क्रोध । मद पौगंड । जरा
॥ वेदांतपदार्थसंज्ञा ॥
[वेदांत
७
असंभावना २१८ आत्मा ३१६५
प्रमाणगत
ज्ञानात्मा । शांतात्मा
प्रमेयगत
महानात्मा
अहंकार २।१४ आत्माकेधर्म१२११६९
शुद्ध (सामान्य) निस । अविक्रय
अशुद्ध (विशेष)
अव्यय 1 स्वप्रकाश
अज्ञान २२
शुद्ध । हेतु
समष्टि । व्यष्टि एक व्यापक
अज्ञानकी शक्ति १२ क्षेत्रज्ञ । असंगी
आवरणहेतु
आश्रय । अनावृत
विक्षेपहेतु आत्माके भेद ३१७२
अज्ञानके भेद ५।१२३/ मिथ्यात्मा । मुख्यात्मा
मायाअविद्यारूप गौणात्मा
ज्ञानक्रियाशक्तिरूप आनंद ३१६०
विक्षेपआवरणरूप ब्रह्मानंद
समष्टिव्यष्टिरूप, विषयानंद
कारणरूप
वासनानंद
विनोद २] ॥ वेदात पदार्थसंज्ञा ।। ५
आन्ध्यादि ३१५५ ईश्वरके ज्ञान ६।१४४
आन्ध्य 1 माद्य । पटुव उत्पत्ति । आगति
आादि भक्त ४।९७
प्रलय । विद्या
आत । अर्थार्थी गति । अविद्या
লিনা। নানা उत्पत्यादिक्रिया ४॥
आश्रम ४१८३
ब्रह्मचर्य
उत्पत्ति । विकार
गृहस्थ
प्राप्ति सस्कार
घानप्रस्थ
उद्देशादि ३१७५ .
सन्यास
उद्देश । परीक्षा
ईश्वरके भग ६।१४३ लक्षण
समनऐश्वर्य
उपवायु ५।१०८
समग्रधर्म
नाग । देवदत्त
समग्रयश
कूर्म । धनजय
समनश्री
ककर
समग्रज्ञान
उपासना ०२२
समनवैराग्य
सगुण । निर्गुण
६ ॥ वेदांतपदार्थसंज्ञा ॥ [ वेदीत समि६।१३१ प्रारब्ध जन्म । तृषा कर्म५।१०९ मरण । हर्ष निय । प्रायश्चित क्षुधां । शोक नैमित्तिक । निषिद्ध एषणा ३१ ५५ काम्प पुत्रैषणा कर्म ६। १३७ वित्तषणा म्नान । अर्चन लोकेषणा जप । आतिथ्य करण ३।३० होम । वैश्वदेव मन । वाणी । काय कर्मइंद्रिय ५। १०५ कर्तव्यादि २१७३ वाक् । उपस्थ कर्तव्य । प्राप्तव्य ज्ञातव्य पाद कर्म ३।३१। कर्मादि ३।७४ पुण्य । पाप । मिश्र कर्म । अकर्म कर्म १६१ विकर्म सचित । आगामी कारणवाद ३।४० पाणि । गुद विनोद २] । वेदांतपदार्थसंज्ञा ॥ आरंभ । विवर्त परिणाम काल ३।४२ भूत भविष्यत् वर्तमान कोश ५। १०२ अन्नमय प्राणमय मनोमय विज्ञानमय आनंदमय, कौशिक ६।१३० अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश ख्याति ५।११९ असत् आत्म अन्यथा अख्याति अनिर्वचनीय गन्ध २०१६ सुगंध । दुगंध : त्वक् । मेद गुण ३।४१ मास । मज्जा रुधिर । अस्थि क्लेश ५। १२० 'सत्व रज । तम. चैतन्य ७।१४७ ईश्वर । प्रमाण
॥ वेदांतपदार्थसंज्ञा ॥
[ वेदांत
।
श्रोत्र । मन
। चित्त
जीव । प्रमेय तप
शुद्ध । प्रमा विसंवादाभाव
प्रमाता
दुःखनिवृत्ति
जाग्रत ३१६२ सुखप्राप्ति
जाग्रत जाग्रत तत्व ९/१६५
जाग्रत स्वप्न
जाग्रत सुषुप्ति
त्वक् । बुद्धि
जाति २१२४ चक्षु
पर । व्याप्य जिव्हा । अहंकार
अपर । व्यापक घ्राण
जीव ३१२७ तादात्म्य ३१५६
पारमार्थिक (प्राज्ञ) भ्रमज ।
व्यावहारिक (विश्व) सहज ।
प्रातिभासिक (तैजस) कर्मज ।
जीवन्मुक्तिके प्रयोजन ताप ३१३९
५।१२१
अध्यात्म । अधिभूत
ज्ञानरक्षा ।
अधिदैव
।
.
।
e
विनोद २] ॥ वेदांत पदार्थसंज्ञा ॥
रज्जविष सर्प
त्रिपुटी १४ । १७३
मज्जा
देखो वि.चं. पृष्ठ ९५
रुधिर । अस्थि
दृष्टांत ५।११८ मांस ।रेत
शक्तिविषै रजत
मेद
नाडिका औ देवता
स्थाणुविधै पुरुष १०।१६६
गगनविषै नीलता इडा (चंद्र) हरि
मरीचिकाविषे जल पिंगला (सूर्य) ब्रह्मा
द्रव्यादिपदार्थ७।१५५ सुषुम्णा (मध्यमा) रुद्र
द्रव्य । समवाय गाधारी (दक्षिणनेत्र)
गुण । अभाव
कर्म । विशेष
हस्तिजिव्हा (वामनेत्र)
सामान्य ।
वरुण
धर्मादि ४।१०० पूषा(दक्षिणकर्ण)ईश्वर
धर्म । काम यशस्विनी (वामकर्ण)
अर्थ । मोक्ष
ब्रह्मा
कुहु (गुदा) पृथ्वी
घातु७॥ १५२
॥ वेदांतपदार्यसंज्ञा ॥
[दांत
अलंयुसा (मेद्) सूर्य निःश्रेयस २१६
शंखिनी (नाभि) चद्र अनर्थनिवृत्ति
नादादि ३१६७ परमानंदमाप्ति
नाद । विंदु । कला परमहंससंन्यास २११२
निग्रह २॥ १३ विविदिपा । विद्वत्
कम । हठ
पापकर्म ३१२३
नियम ५। ११.३ उत्कृष्ट । सामान्य
शीच
मध्यम
संतोष
पाश८1१६०
दया । निदा
स्वाध्याय
ईश्वरप्रणिधान भय ।शील
निवृत्ति (तादात्म्पकी) लउजा। धन
पुण्यकर्म ३।३२
उत्कृष्ट । सामान्य
सहज
मध्यम
कर्मज
पुरी ८।१५६
तप
शंका । कुल
भ्रमज
विनोद २J ॥ वेदातपदार्थसंज्ञा ।। पृथ्वी । आकाश जल । मन अमि। बुद्धि वायु । अहंकार प्रतिबंध ३१३६ भूत । भावी ज्ञानेंद्रियपचक कमेद्रियपंचक अतःकरणचतुष्टय माणादिपंचक भूतपंचक' काम विविधकर्म वासना पुरुषार्थ ४१८० धर्म । काम अर्थ | मोक्ष पूजापात्र ४१९९ भ्रह्मनिष्ठ मुमुक्षु हरिदास स्वधर्मनिष्ठ प्रकृति ८११५७ वर्तमान प्रतिबंधनिचिहेतु ४७९ शमादि श्रवण मनन निदिध्यासन प्रपंच ३।४५ स्थूल । सूक्ष्म | कारण प्रपंच २१ बाधा पावर ॥ वेदांपदार्थसंज्ञा ॥ [ वेदांत प्रमाण ४८८ स्थितप्रज्ञा प्रत्यक्ष उपमान अस्थितप्रज्ञा अनुमान । शब्द माणादि ५११०७ प्रमाण ६।१३८ प्राण । उदान प्रत्यक्ष अपान । समान अनुमान व्यान उपमान प्राणायाम ३५४ शब्द। रेचक । कुंभक अर्थापत्ति पूरक अनुपलब्धि प्रारब्ध ३१३५ मलय ५। २१५ इच्छा। परेच्छा नित्यप्रलय अनिच्छा नैमित्तिकालय ब्रह्म ३१२६ दिनप्रलय विराट । ईश्वर महाप्रलय हिरण्यगभ आत्यंतिकालय ब्रह्मचर्यके अंग१५९ प्रज्ञा २०१० स्त्रीका दर्शन I ।
१ विनोद २] ॥ वेदांतपदार्थसंज्ञा ।। . . इनसे विपरीत। स्पर्शन दम । यज्ञ कलि श्रुत। दान कीर्तन अमात्सर्य । धैर्य गुह्यभाषण भागवतधर्म १११७२ संकल्प सकामकर्मके फलका निश्चय विपरीत दर्शन। क्रियाजन्यसुख धनगृहपुत्रादिकपि ब्रह्मविदादि ४।९२ दुःखवुद्धि भी च- ब्रह्मवित् । लबुद्धि । ब्रह्मविद्वर। परलोकवियु नश्वर- ब्रह्मविदूरीयान् बुद्धि। ब्रह्मविद्वारिष्ठ । शब्दब्रह्म औ परब. ब्राह्मणकेव्रत १२॥ T हाविषै कुशल गु- रुमति ममन । . ज्ञान । लज्जा- सस । तितिक्षा . गुरुविष ईश्वरबुद्धि औ निष्कपट सेवा । परमेश्वरविर्ष सर्व कर्म शम । अनसूया १४ CC ॥ वेदांतपदार्थसंज्ञा ॥ वेदांत मौन। . समर्पण। दर्शन भी भगव- भक्तिराम्पसहित स्व. ड्रपआत्माविषै सर्व रूपानुभव। भूतनका दर्शन। साधुसंग। जन्मकर्म वर्णाश्रमा- शीच तप। तितिक्षा। दि करि देहविप निरभिमान ी स्वाध्याय । आर्जव । स्वपरवृद्धिकाभ- ब्रह्मचर्य । अहिंसा भाव । औ द्वंद्वसमत्व । भूतग्राम ४१९१ सर्वत्र आत्मारूपईश्व जरायुज । उद्भिज्ज रका दर्शन। अंडज । स्वेदज कैवल्य । ग्रहनबांधना। भूमिका ७।१५० अनिकेतता । एकांत शुभेच्छा (विविक्त) चोरवस्त्र | सुविचारणा तनुमानसा सर्वभूतनविषै आत्मा सत्वापत्ति के भगवद्भावका असंसक्ति संतोष।
विनोद २] ॥ वेदांतपदार्यसंज्ञा ॥
कुल । वर्ण
भूर् । जन
पदार्थाभाविनी भ्रम ६।१४१
तुरोयगा
भूरादिलोक ७/१४८/ गोत्र । आश्रम
जाति | नाम
भुवर । तप
भ्रमविवर्त दृष्टांत ५।
स्वर । सस
११७
महर्
चित्रप्रतिबिंब
भेद ५। १२५ लोहितस्फटिक
जीवईशका भेद
घटाकाश
जीवजीवका भेद
रज्जुसर्प
जीवनडका भेद
ईशजडका भेद
कनककुंडल
जडजडका भेदं मद८॥१६१
भ्रम ५।११६
भेद । विकार
शील । विद्या
कर्तृत । सयव
धन । तप
संग
रूप ।राज्य
कुल । यौवन
." । पौरुष श्रुत 1 ॥ वेदांतपदार्यसंज्ञा ।। - [वेदांत महत्ता हेतुधर्म अव्यक्त १२ । १७० अव्याकृत धनादयता तेज अजा अभिजन । प्रभाव अज्ञान । बल . तम तप तुच्छा । बुद्धि अनिर्वचनीया ओज । योग मिश्रकर्म ३।३४ महायज्ञ ५। १२२ उत्कृष्ट । सामान्य देव । मनुष्य मध्यम मूर्ति ३१४३ पितर ब्रह्मा । विष्णु। शिव मायाकेनाम १५।१७४/मृतिमद ८।१६० माया सया पृथ्वी । आकाश जल ।चद्र तेज 1 सूर्य शक्ति । योनी पवन । आत्ममद ऋषि । भूत अविद्या | मूला प्रकृति । तूला १७ विनोद २.] ॥ वेदांत पदार्थसंज्ञा ।। करुणा । उपेक्षा "मैञ्यादि ४।९० अस्तेय मैत्री । मुदिता यक्ति ४ । ९५ अध्यात्मविद्या मोक्षद्वारपाल ४।१०१ साधुसंग शम 1 विचार वासनायाग सतोप ! सत्संग प्राणायाम मौनादि ७ । १५१. योगभूमिका ५।११४ मौन क्षेप । एकाग्र योगासन विक्षेप । निरोध योग मूद तितिक्षा योगभूमिका ४ ॥ ९४ एकातशीलता याणीलय निस्टहता मनोलय समता बुद्धिलय अहकारलय अहिंसा । ब्रह्मचर्य रस ६।१४२ सस । अपरिग्रह मधुर । कटुक यम ५। ११२ ॥ वेदांतपदार्यसंज्ञा ॥ [ वेदांत . - । रति आम्ल । कषाय लवण | तिक्त अर्थवाद रूप ७।१५४ उपपत्ति शुक्ल । हरित लोक ३१४६ कृष्ण । कपिश स्वर्ग । मृत्यु । पाताल पीत । चित्र वचनादि ५। १०६ वचन लक्षण २०२० आदान। मलयाग स्वरूपलक्षण। गमन तटस्थलक्षण वर्ण ४।८२ लक्षणदोष ३१७६ ब्राह्मण | वैश्य अव्याप्ति 1 असभव अतिव्याप्ति वर्तमान प्रतिबंध४७८ लिंग ६।१३२. विषयासक्ति उपक्रम उपसहार बुद्धिमाद्य अभ्यास कुतर्क अपूर्वता विपर्ययदुराग्रह क्षत्रिय । शूद्र
विनोद २] ॥ वेदांतपदार्थसंज्ञा ॥
१
पाक्य २११९
अपक्षय
अवांतरवाक्य विनाश
महावाक्य विधिवाक्य ३१६९
बाद २१८ अपूर्वनिधि
प्रतिबिंबवाद नियमविधि
अवच्छेदवाद परिसंख्याविधि
वादादि ३१७७ विपरीतभावना २९
पाद। जल्प। वितंडा प्रमाणगत
वासना ३१४८ प्रमेयगत
लोकवासना विवेकादि ४।८४
शास्त्रवासना
विवेक
देवासमा
वैराग्य
विकार ६१२९ पटूसंपत्ति
जन्म
मुमुक्षुता
अस्तिता वेद ४१८७
ऋग् । साम
विपरिणाम
यजुषु । अथर्वण
२० ॥ वेदातपदार्यसज्ञा ॥ [वेदांत वेदअंग ६।१३६ जाति । क्रिया शिक्षा 1 निरुक्त गुण सबंध कल्प शब्दशक्तिग्रहणहेतु व्याकरण | ज्योतिष ८1१६३ वेदके काड १७० व्याकरण कर्म । ज्ञान उपमान उपासना कोश व्यसन ७। १५३ आप्तवाक्य तन ।धन वृद्धव्यवहार मन राज्य वाक्पशेष क्रोध सेवकव्यसन विवरण सिद्धपदकी सन्निधि शब्द०।१५ शब्दसंगति ०।०५ वर्णरूप शक्तिवृत्ति ध्वनिरूप लक्षणावृत्ति शब्दप्रतिनिमित्त शब्दादि ५११०४ ४१८१ शव्दारस विषय।
विनोद २] ॥ वेदांतपदार्थसंज्ञा ! २१ स्पर्श गंध शृंगारादि रस. १०१ अद्भुत । शाति शमादि६। १३९ शृंगार । भयानक शम । तितिक्षा वरि । बीभत्स दम । श्रद्धा करुणा रौद्र उपरति । समाधान शारीर ३१२८ हास्य प्रेमभक्ति श्रवणादि ३ । ४९ स्यूला कारण श्रवण सूक्ष्म मनन । शास्त्र ६।१३४ निदिध्यासन सांख्य श्रवणादिफल ३.१५० योग प्रमाणसंशयनाश न्याय प्रमेयसंशपनाश पेशेषिक विपर्यपनाश पूर्णमीमांसा उत्तरमीमांसा प्रमाणगत, -- संाय २१७ ॥ वेदांतपदार्यसंज्ञा ॥ [मेदांत -- प्रयेगत आंतरनिर्विकल्प संन्यास ४।९३ समाधिके अंग १५८ कुटीचक यम बहूदक नियम हंस आसन परमहंस प्राणायाम संपत्ति २।२१ प्रत्याहार दैवी । आसुरी धारणा समाधि २०१२ ध्यान सविकल्प सविकल्पसमाधि निर्विकल्प समाधिविघ्न ४१८९ समाधि ६ १२७ लय । कपाय बाह्यदृश्यानुविद्ध विक्षेप । रसास्वाद आंतरदृश्यानुविद्ध संबंध ३ । ३७ बाह्यशब्दानुविद्ध संयोग । तादात्म्य आंतरशब्दानुविद्ध समवाय बाह्यनिर्विकल्प संसार ९।१६४ । विनोद २] ॥ वेदांतपदार्थसंज्ञा ॥ ३ ज्ञाता । भोग ज्ञान की नेय ।करण भोका । क्रिया भोग्य सुपुप्ति ३१६४ मुषुप्तिजायत सुषुप्तिस्वम सुपप्तिसुपुष्टि मुघुस्यादि ३१५९ सुषुप्ति । समाधि मूळ सूत्र ६।१३५ जैमिनीय आश्वलायन यापस्तंव बोधायन कासायन वैखानसीय सूक्ष्मभूत ५।११० शब्द । रस स्पर्श गंध रूप सूक्ष्मशरीर २।३ समष्टि । व्यष्टि स्थूलभूत ५।१११ आकाशाजल वायु । पृथ्वी तेज स्थूल शरीर २१४ समष्टि । व्पष्टि स्पर्श ४.९६ शीत | कोमल उज्ण | कठिन शरीफ सालेमहंमदकी कंपनी.. वेदांतपुस्तकालय-~-कराची. . बहुतकारिके संस्मत तथा भाषाके उपे हुये सर्व वेदांत- विषयक मंथ हमारे यहां से मिल सकते है । कोई वी मध लेनको इच्छावाले ग्रंथकी कीमत तथा डाक महसूल न. नाया जावेगा। उत्तर के लिये उपलकार्ड भेजना। -नीच लिखे ग्रंथनका डाक महसूल नहीं पडेगा मात्र वेल्युपेएवलका डाककमीशन पडेगा ।। श्री विचारसागर.५५४ टिप्पणसहित औ वृत्ति- रखापाल तथा बडी अकारादि अनुक्रमणिकास- हित तृतीयावृत्ति उक्ततृतीपात्ती उत्तमकागदकी श्रीसुंदरविलास ! ज्ञानसमुद्र आदिक तृतीयावृत्ति २। उक्ततृतीयावृत्ती उत्तमकागदकी.. श्रीमटीका अष्टावक्रगीता मूलकी भाषासहित. १ उक्तग्रंथ उत्तम पूठे औ कागदका. श्रीविचारचंद्रोदय । तृतीयावृत्ति श्रीपंचदशी।मूल भो टीकाको भाषा। दो विभागमैं १५ (योडेही मंध रहे है । बहुत फारिक फेर छपनेकी नहीं) श्रीपंचदशीका प्रथम प्रकरण,... ... ४ ... 3 " ... ..." ...
...
...
...
.
२
श्रीपंचदशीका प्रथम और पंचम प्रकरण. १
श्रीपंचदशी मूलमात्र....
श्रीईशायटोपनिषद् । मूल ओ श्रीशंकरभाष्य
अनुसार हिंदुस्थानी में.
श्रीवालबोध टीकासहित..
011
उक्तग्रंथ चिनित कपडेके पूठेसहित.
श्रीपदार्थमंजुषा (वेदांतपदार्थ कोश)
'श्रीवेदस्तुति । अन्यययुक्त । तथा गुर्जर भाषा
श्रीवेदांतविनोद.
इस नामसे अनेक लघुमंथ प्रकट किये जाते हैं । ति-
नमें वेदांतपदावलि तथा वेदांतपदार्थसंज्ञा उपे है ॥
प्रत्येक अंककी कीमत ०) रखो है । औ कोइवी ७
अंकका मान ०||| पडेगा.
१ वेदांपदावलि (श्रीविचारचं. ५ अखाभक्तके पद.
द्रोदयका सार)
६ प्रस्ताविक शोक अर्थ
२ वेदांतपदार्थसंज्ञा.
सहित.
3 सूफीओंके गजल.
वेदांतस्तोत्र संग्रह भर्थ
४ देवामत्तके पद.
सहित.
इनसे आदिलेके अनेक लघुमंथ ऊपर लिखे कमसे
नहीं परंतु समयसजोग अनुसार प्रकट किये जायेंगे।
॥ श्रीवेदांतविनोद ॥ तृतीयअंक ॥ ३ ॥ ॥ श्रीवेदांतस्तोत्रसंग्रह ॥३॥ ब्रह्मनिष्ठपंडित श्रीपितांवरजीकृत भाषादीपिका सहित सर्वमुमुक्षुके हितार्थ शरीफ सालेमहंमदने छपाई प्रकट किया । श्रीमुंबई में निर्णयसागरप्रेसमै छपा ] ॥ सवत् १९४४-सन् १८८८। (प्रकटकर्ताने सर्वहक स्वाधीन रखे हैं) ॥ प्रस्तावना ॥ मंगल ॥ दोहा॥ श्रीगुरुके पद वंदिके यह वेदांतविनोद ॥ प्रकट करों जिस करिसवें सज्जन पावहुमोद? पहुत मुमुक्षुजन श्रीमच्छंकराचार्यकृत औ अन्यमहा. स्माकृत संस्कृतस्तोत्रनकू पाठ किंवा कंठ करते हैं। परंतु निष्ठाकी आरूढतामै उपयोगी तिन स्तोत्रनके अध निधय फरनेम पराधीनताकु अनुभव करते हैं। तातें परमकार- णिक ब्रह्मनिष्ठपंडित श्रीपीतांवरजीने दयाकरिके स्तो- धनकी भाषा करी है। औ संस्कृत, अल्पअभ्यासवान… पी प्रत्येकशब्दके अर्थका बोध होवै । तात मूलमें भी भाषा, अन्वयअनुसार अंकोंकू रखे हैं। श्रीवेदांतविनोदके इस तृतीयअंकमै जितनै स्तोत्र छपे हैं सो नीचे लिखे हैं:- श्रीप्रातःस्मरणस्तोत्रम् ॥१॥ श्रीचर्पटपंजरिकास्तोत्रम् ॥ २॥ श्रीमुक्तिपंचकम् ॥ ३॥ श्रीविज्ञाननौका ॥४॥ भी अन्य स्तोत्र की चतुर्थादिअंकोंविपै छापे हैं । शरीफ सालेमहंमद. .
तावद्गति शास्त्राणि जंबुका विपिने यथा । न गर्नति महाशक्तिर्यावद्वेदांतकेसरी ॥ १ ॥ अर्थ:-जैसे वनविप श्याल नामक पशुवि. शेप तहालगि गर्जते हैं। जहांलगि सिंह नहीं गर्ज- ता है ॥ तैसे अन्य सांख्यन्यायादिक-शास्त्र तहां- लगि गर्जते हैं । जहांलगि महाशक्तिमान् वेदांतशास्त्ररूप सिंह नहीं गर्जता है ॥
॥ ॐ गुरुपरमात्मने नमः॥ ॥ श्रीवेदांतविनोद ।। . तृतीयअंक ॥३॥ ॥ श्रीवेदांतस्तोत्रसंग्रहमारंभः॥१॥ अथ श्रीप्रातःस्मरणस्तोत्रम् ॥१॥ ॥ वसंततिलका छंदः ।। मांतः स्मरामि हृदि संस्फुरदात्मतत्त्वं सचित्सुखं परमहंसगति तुरीयम् ।। यत्स्वप्नजागरसुपुप्तमवैति नित्यं तहह्म निष्कलंमंहं न च भूतसंघः॥१॥ अर्थः-१प्रातःकालमैं २हृदयकमलविपै अ- तःकरण औ तोकी तिनका साक्षी होनेकरि अहंवृत्तिविषै स्वयंप्रकाशरूपकरि स्कुरायमान (मासमान) । ३सच्चिदानंदमय परमहंसोंकी ग- प्रातःस्मरणस्तोत्रम् ॥१॥ २ तिरूप तुरीयस्वरूप जो ४आत्मतच्य है । ताईं ५मैं स्मरण करूं हूं। कैसे किः-६ जो स्वप्न जापत् अरु सुपुप्तिकं जानता है । औ नित्य (उत्पत्ति अरु नाशसे रहित ) है । औ निष्कल (निर- वयव ) है । औ (ब्रह्म (सर्वसैं अधिकव्यापक परमात्मा ) है । ९सो १०मैं हूं । ११ अरु पंचभू- तनका समुदाय में १२नहीं हूं ॥ १ ॥ प्रांतर्भजामि मैनसो वचसामगम्यं वाचो विभांति निखिला यैदनुग्रहेण ।। पन्नेतिनेतिवचननिगमा अबोचु- स्त देवदेवमजमच्युतमाहुरग्र्यम् ॥ २ ॥ अर्थः-१प्रातःकालमैं २मन अरु वाणीओंके अविषय । औ ३सर्व ४वाणीआं ५निसके अ- नुग्रहसे भान होते हैं। औ जाईं "नेतिनति" [मपंचके निपेधक वचनोंकरिके वेद कहते है ।
३ प्रातःस्मरणस्तोत्रम् ॥१॥ वेदांत औ ना• ब्रह्मवेत्ते देवनका देव अजन्मा अ. च्युत अरु ९मुख्य १०कहते हैं । ११तार १२मैं भनता हूं ॥२॥ प्रांतनमामि तमसः परमर्कवर्ण पूर्ण सनातनपदं पुरुषोत्तमाख्यम् ।। यस्मिनिर्द जगदंशेपमशेषमृतौं रंज्यां भुजंगम इव प्रतिभासितं वै ॥शा अर्थः-१मातःकालम २अज्ञानते १र स्वम- काश पूर्ण सनातनपद पुरुषोत्तम नामक । औ ३सर्व मतिरूप जिसविष यह संपूर्ण जगत् ७रज्जुविपै सर्पकी न्याई भासमान है। [ताईं] मैं अभेदनिश्चयरूप नमस्कार करूं हूं ॥ ३ ॥ ॥ अनुष्टुप छंदः॥ श्लोफेत्रयमिदं पुण्यं लोकत्रयविभूपणम् ।। मौतःकाले पठेद्यस्तु से गच्छेपरमं पदम्४
४
विनोद ३] प्रातःस्मरणस्तोत्रम् ॥ १॥
अर्थ:-१इन पुण्यरूप औ त्रिलोकीके विभूष-
गरूप तीनश्लोकनहूँ जो प्रातःकालविर्ष
पठन करै ५सो परमपदकू पावै ॥ ४ ॥
॥ इति भापाटीकासहितं श्रीमच्छंकराचार्य-
विरचितं प्रातःस्मरणस्तोत्रं समाप्तम् ॥२॥
१ वेदांत ॐ अथ श्रीचर्पटपंजरिकास्तोत्रम् ॥२॥ ।। छंदः॥ भज गोविदं भज गोविंद भंज 'गोविंदं मूढमते॥ मासे सन्निहिते मरणे. नहि नहि रक्षति इंकृश्करणे॥भज०॥१॥ अर्थ:-काहू समयमै जगद्गुरु श्रीमदशंकराचा. यस्वामीजी चाह्मणोंके गृह विपे भिक्षाटन करनेर पधारे थे। वहां किसी शत्रबासनाके पेश- पाला कोइएक वृद्धयाह्मण व्याकरणका प्रारंभ करिके "ह करणे" शब्दका घोप करता या । निसहं देखिके अत्यंतकरणाविष्ट हुये पी. मांकर पहने भये:- १मरणरे समीपमै ३माप्त भये। जात "हु-
विनोद ३] चर्पटपंजरिकास्तोत्रम् ॥२॥
हर करणे" नहीं रक्षा करै है । नहीं रक्षा कर
'है यति हे मूढमते !, गोविंद मन । ९गो-
विंदळू १० भज । ११गोविदकू १२भन ॥ १ ॥
वालस्तावत्क्रीडासक्त-
स्तरुणस्तावत्तरूणीरक्तः॥
दस्तावञ्चितामग्नः
परे ब्रह्माणि कोऽपि न लग्नः भज०॥२॥
अर्थ:-बालक है तहांलगि खेलमें आसक्त है ।
युवा है नहालगि स्त्रीविष मीतिमान होवे है । औ
वृद्ध है तहांलगि चिंतामै मग्न रहै है । परंतु
परब्रह्मविपै कोई वी ला होता नहीं । नति
विचक्षण हुया तूं अब गोविंदकू भन ॥ १ ॥
अंग गलितं पलितं मुंह
देशनविहीनं जातं तुंडम् ॥
इंदो याति हित्वा दंड
संदपि ने नसाशीपिंदम् ।। भज०॥३॥
चर्पटपंजरिकास्तोत्रम् ॥ २॥ वेदांत
अर्थः-१अंग गलितं भया । २शिर ३श्वेतके.
शयुक्त भया। मुख पदंतरहित भया । द्ध
हुया ७दंडपकरिके ९चलता है । १०तौबी
११आशाके पिंडकू १२छोडता नहीं । तति
तूं अब ताके दाहअर्थ गोविंदकू मन ॥ ३॥
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं
पुनरपि जननीजठरे शयनम् ।।।
इह संसारे खल्लु दुस्तारे
कृपयापारे पाहि मुरारे। भज०॥४॥
अर्थ:-१इस २दुस्तर ३अपार संसारविपै
५फेर बी जन्म । फेर बी मरण । फेर बी माताके
उदरविषै शयन होपै है । तात "हे मुरारे ।
तूं कृपा करी रिक्षण कर" एसे प्रार्थना करिके
नूं गोविंदकू मज ॥ ४॥
विनोद ३] चर्पटपंजरिकास्तोत्रम् ॥ २॥ दिनमपि रजनी सायं पात: शिशिरवसन्तौ पुनरायातः ॥ कालः क्रीडति गच्छत्योयु- स्तदपि न मुंचयाशावायुः ॥ भज० ॥५॥ अर्थः-१दिनरात्रि सायंप्रात शिशिर अरु वसंत बी फेर आवता है। काल खेलता है । २आयु ३जाता है । ४तौ वी ५आशारूप वायु ६छोडता नहीं । तात तूं दृढयत्नकरिके बी गोविंदकुं भन ॥ ५ ॥ जटिलो मुंडी लुचितकेशः कापायांवरयहुघृतवेपः॥ पश्यन्नपि न च पश्यति लोक उदरनिमित्तं वहुकृतशोकः ।। भन०॥६॥ अर्थ:-१जटाधारी ।मुड़ितालुचित केशोगा- लाअरु कापायांचरकारि बहुतवेपनके धारनेवाला।
चर्पटपंजरिकास्तोत्रम् ॥२॥ वेदांत औरउदरनिमित्त बहुशोकका करनेवाला श्लोक। पाप आदिककू ४देखता हुया बी नहीं देखता है । तात तूं अदृष्टके भरोसे अदंभी हुया गो- विदा भन ॥ ६॥ वयसि गते कैः कामविकारः गुप्के नीरे कः कासारः॥ सीणे वितेका परिवारो ज्ञाते तवे कः संसारः ॥ भज० ॥७॥ अर्थ:-जैसे १वयके गये २कामविकार ३को. न है ! जलके ५सूके हुये इताल कौन है ? धनके क्षीण भये १०परिवार ११कौन है ! तैसे १२तचके १३जाने हुये १४संसार १५कौन है ? तात तूं तत्वज्ञानअर्थ गोविंदकू भन ॥ ७ ॥ अग्रे वह्निः पृष्ठे भान् रात्री चिकसमर्पितजानुः॥
१०
विनोद ३] चर्पटपंजरिकास्तोत्रम् ॥२॥
करतलभिक्षा तरुतलवास-
स्तदपि नै मुंचत्यांशापाशः ॥ भन०11८॥
अर्थः-१आगे अग्नि है । पीछे सूर्य है । रात्रि-
मैं हनुवटीविषे धरे जाउवाला है । करतलमें
मिला है । तस्तलमें वास है । तौबी २आशारूप
पास ३छोडना नहीं । तात तूं गोविंदकू भन ॥८॥
यावद्विचोपार्जनसक्त-
स्तावनिजपरिवारो रक्तः॥
पवाज रस्ते देहे
वाती कोऽपिन पृच्छति गेहे ॥ भज०॥९॥
अर्थ:-नहांलगि धनसंपादनमें समर्थ होवे
तहांलगि स्वकुटुंब प्रीतिमान होवे है। पीछे २दे-
हके जीर्ण भये ४गृहविषै ५कोई बी ६वात.
७पूछता नहीं । तात तूं कुटुंबासक्ति छोडिके गो-
विदकू भन ॥ ९॥
चर्पटपंजरिकास्तोत्रम् ॥२॥ वेदांत स्थ्याकर्पटविरचितकंथः पुण्यापुण्यविवर्जितपंथाः॥ नै त्वं नाई नार्य लोक- स्तदपि किमर्थं क्रियते शोकः॥ भज०१० अर्थः-१मार्गके जीर्णवस्त्रके खंडौकरि रची है कंथा जिसनें । औ पुण्यपापकरि रहित है मार्ग जिसका। "औ रतूं ३नहीं । ४, ५नहीं। यह लोक नहीं है।" (ऐसे जान्या है जिसने) तौ बी किसअर्थ ९शोक १०करिये है ! तात शोकरहित हुया तूं गोविंदकू भन ॥ १० ॥ नारीस्तनभरजघननिवेश दृष्ट्वा मायामोहावेशम् ॥ पैतन्मांसवसादिविकारं मनसि विचारय वारंवारम् ॥ भज० ११ अर्थः-१माया ओ मोहके आवेशवाले २ना- विनोद चर्पटपंजरिकास्तोत्रम् ॥ २॥ १२ रीके स्तनोंके भार अरु जघनरूप स्थानळू देखि- के .३ इसकू मांस.अरु नाडीआदिकका विकार मनविपै ४वारंवार विचार कर । अरु गोविंद गेयं गीतानामसदसं ध्येयं श्रीपतिरूपमजस्रम् ॥ नेय सज्जननिकटे चिचं देयं दीनजनाय च विचम्॥ भज० ॥१२॥ अर्थः-१गीता अरु नामोंका सहस्त्र २गावनै योग्य है। ३श्रीपतिका रूप निरंतर ४ध्यावन योग्य है । ६सन्ननोंके समीपमै चित्त देनैकू योग्य है । ७औ दीनजनके वास्ते ९वित्त १०देने योग्य है । ऐसे करते हुये तूं गोविंदकू भन ॥१२॥ भगवद्गीता किंचिदधीता गंगाजललवकणिका पीता ।।
चर्पटपंजरिकास्तोत्रम् ॥ २॥ वेदांत येनाकॉरि रारेरर्चा तस्य यमः किं कुरुते चर्चाम् ॥ भज०॥१३ अर्थः-१जिसने २भगवद्गीता कछुक पढी है औ गंगाजलकी लवकनिका पान करी है औ ३मुरारिकी पूजा ४करी है । ताकी ६चर्चाकू ७यमराजा क्या करता है। किंतु नहीं करता है। या ऐसा हुया तूं गोविंदकुं मन ॥ १३ ॥ को कस्त्वं कुत आयातः का में जननी को में तातः ॥ ति 'परिभाषय सर्वमसारं स त्यक्त्वा स्वमविचारम् ॥ भज० १४ अर्य:-मैरकीन हूं! तूं कौन है ! १- होते याया है। मेरी जननी कौन है ! मेरा तातएकीन है ! १.ऐसें ११स्वमतुल्प विचार- 30 विनोद ३] चर्पटपंजरिकास्तोत्रम् ॥२॥ वाला हुया १२सर्व असार १३भावना कर। औ १४सर्वकू त्यागिके गोविंद• मज ॥ १४ ॥ कोते' कांता कस्ते पुत्रः संसारोडेयमतीव विचित्रः।। कस्य त्वं के कुत आयात- स्तत्वं चितय मनसि भ्रातः॥ भन०१५ अर्थ:--तेरी कांना कौन है ? तेरा पुत्र ४कौन है ? ५यह ६संसार ७अतिशयही विचित्र है || तूं ९कौनका है। १०कौन है ? कहां- ने आया है ? ११हे भाई !. १२तच्या १३मन- विपे १४चितन कर । अरु गोविंदा भन ॥१५॥ रतटिनीतरुमूलनिवासः शप्या भूतलमंजिनं वासः ॥ सर्वपरिग्रहमोगत्यागः कस्य मुखं न करोति विरागः॥ .ro
चर्पटपंजरिकास्तोत्रम् ॥२॥ वेदांत
भज गोविंदं भज गोविंद
भैज 'गोविंदं मूढमते ।। १६ ॥
अर्थः--१गंगाके तीरके तरुके मूल निवास
है । २भूतलरूप ३शय्या है । ४मृगचर्मरूप वस्त्र
है । अरु सर्व परिग्रह औ भोगका त्याग है जि-
सविषै । ऐसा जो ५विराग । सो ६किस• सुख
नहीं करै है ? किंतु सर्वकू करै है । यात तूं विरक्त
हुया । ७हे मूढमते ! <गोविंद• ९भन । १०गो-
विदक् ११भन । १२गोविंद• १३भन ॥१६॥
॥ इति भापाटीकासहितं श्रीमच्छंकरा-
चार्यविरचितं चरपटपंजरिकास्तोत्रं
समाप्तम् ॥२॥
-विनोद ३] अथ श्रीमुक्तिपंचकम् ॥३॥ ॥ शिखरिणी छंदः॥ विहायैनः कृत्वा ऋतुविधुरकर्मादि विहितं धिर्य संशोव्याऽऽस्वा- चिंदचिदरलोकादिनिकरम् ।। समाराध्याऽऽचार्य नतिविमत्तिशुश्रूपणमुखैः पत्रः सन् पृच्छेद विविदिपितमात्मीयमखिलम् ॥१॥ अर्थ:-१ विहित (शुभ) अरु २फलके संक- ल्पसे रहित कर्म अरु उपासनाएं ३करोके । ४पाप ( मलविक्षेप)हू ५त्यागीके । धुदिडूं शोधनकरिके चिद् जडके विवेकादिक सा- धनीका समूह <माप्तकरिके | फेर नमस्कार मुक्तिपंचकम् ॥ ३ ॥ विदांत प्रश्न अरु सेवाआदिक उपायोंकरि १०आचार्य (गुरु) • ११सम्यक् आराधन (प्रसन्न) करिके १२शरणागत हुया १३आपके १४जाननेकू वांछित १५सकल अर्थकू [अधिकारी] १६पूछे ॥ १ ॥ विचार्यात्मानं स्वं श्रुतिगदितसञ्चित्सुखमयं पैरं ब्रह्मास्मीति श्रवणमननध्यानकरणः ॥ अहं ब्रह्मास्मीति हेदर्मवगति गम्य परमां विाध्येदं यं सकलमलमज्ञानसहितम् ॥२॥ अर्थ:-१गुरुके पास श्रुतिप्रतिपादित सञ्चि- दानंदस्वरूप २अपने ३आत्माक ४"में परब्रह्म दू" ऐसे ५विचारिके । फेर श्रवण मनन अरु १२ विनोद ३] मुक्तिपंचकम् ॥ ३ ॥ निदिध्यासनरूप साधनोकरि “मैं ब्रह्म हूं" ऐसी सर्वोत्तम विद्यार्चे ९दृढ जैसे होवे तैसे १०पायके । ११अज्ञान सहित १२इस १३स- कल १५दृश्यङ्घ १५अत्यंत १६वाधकरिके [स्थित होवे ] ॥२॥ विदित्वत्य निखिलनिगमांतर्निगदितं । निहत्वाऽनर्थ वै संकलमपि जीवातुसहितम् ॥ परानंदो भूत्वा भवति भुवि भन्यो भपतिभो विधेयं कर्तव्य विविविधमपि हेयं हृदि गतम् ३ अर्थ:-१ऐसें सकलवेदांतोंकरि प्रतिपादित ३तत्वकू मानिके । कारणसहित ६सकल मुक्तिपंचकम् ॥ ३॥ वेदांत वी ७ अनर्थकू <अपरोक्षबाध करिके । ९परमा- नंदरूप होयके १० भूमिवियु श्रेष्ठचंद्रमा जैसी कांतिवाला (शांत) ११होवे है ॥ ऐसें हुये १२विधान करने योग्य १३हृदयगत २४विविध प्रकारका वी १५कर्त्तव्य १६त्यागने योग्य होवै है ॥ ३ ॥ मुंदो जीवन्मुक्ते- यदि हेदि मनीपा स्वविदुप- स्तैदाऽऽत्ति वृत्ते- रंनिशेपैभिकुर्वन् पंडुत्तियम् । विनाश्यैव स्थौल्य मलिनतरसत्वस्य मनसः अँसत्याविर्भावात परममुससिंधी हि मुरमेत् ॥४॥ अर्थ:-फेर जोर स्वस्वरूपके पेत्ता (ज्ञानी) विनोद ३] मुक्तिपंचकम् ॥ ३ ॥ २० कुजो ३हदयविपै ४जीवन्मुक्तिके विलक्षण- आनंदकी ६इच्छा होवै ७तो। निरंतर अरु ९दीर्घकाल १०ब्रह्माकारवृत्तिको ११आवृत्तिकू १२करता हुया १३अत्यंत मलिन (रजतमसे निरस्कृत ) है सत्वगुण जितका । ऐसे मनके १४स्थूलभाव ( रजतमकरि सत्वगुणके तिरस्का- र) • [ब्रह्माभ्यासके वलसे रजतमके तिर- स्कारद्वारा ] १५विनाश करिके (ऐसे मनोनाश- कुं करिके) ही। १६शुद्धसत्वगुणके आविर्भा- वर्ते निरतिशयमुखके समुद्रविष निरंतरही र. मण कर ॥४॥ सुभूमिं प्राप्येमा परमसुखदा पंचममुखां मुंख भुक्त्वा बालं हतरनिजारख्यमपि ॥
१
२१ मुक्तिपंचकम् ॥ ३ ॥ विदांत
विलाप्येदं विवं
जगदगमयं हेतुसहितं
चिदानंदे शुद्ध
भजति , विदेहामृतमयम् ॥५॥
अर्थः-१इस ( उक्त कारकी) जीवन्मुक्ति-
के विलक्षणानंदकी देनेहारी पंचमआदिक २श्रे-
भूमिका (चित्तकी अवस्थाविशेष)कू पायके-
३ब्रह्मके सुखकू ५औ दृिढतर (प्रयत्नसे अ-
मेट) स्वप्रारब्धा बी ७भोगिके । दहेतु ( अ-
ज्ञानकी विक्षेपहेतुशक्ति) करि सहित ९इस (दृश्य-
मान)१०चराचररूप ११ विश्वकू १२शुद्ध १२चि-
दानंद ब्रह्मविपै १४विलय (नाश) करिके १५यह
ज्ञानी १६विदेहमोसळू १७वी १८पावता है ॥५॥
॥ इति श्रीमत् वापुपूज्यपादशिप्य पीतांव-
राहविदुपा विरचितं सटीकं मुक्ति-.
पंचकं समाप्तम् ॥ ३॥
विनोद ३] २२ अथ श्रीविज्ञाननौका ॥४॥ ॥ भुजंगप्रयात छंदः॥ तपोयज्ञदानादिभिः शुद्धबुद्धि- विरक्तो नृपादौ पदे तुच्छचुद्ध्या ।। परित्यज्य सर्व यंदामोति तत्त्वं परं ब्रह्म नित्यं तेदेवाहमस्मि ॥ १॥ अर्थः-१तप यज्ञ अरु दानादिककरि शुद्धबु- हिवाला औ २राज्यआदिकपदविपै तुच्छबुद्धि- करिके ३विरक्त भया पुरुष । सर्वकू ५परित्या- गकरिके ६निस तत्वकू पावता है । ९सोई १.नित्य ११परब्रह्म १२मैं हूं ॥१॥ दयालु गुरुं ब्रैह्मनिष्ठ प्रशांत समाराध्य भत्तया विचार्य स्वरूपम् ।।
३ २३ विज्ञाननौका ॥ ४॥ विदांत येदामोति तचं निदिध्यास्य विद्वान् परं ब्रह्म नित्यं तदेवाहमस्मि ॥ २॥ अर्थः-१दयाल २ब्रह्मनिष्ठ अरु परमशांत ३गुरुकू भक्तिसे ५सम्यक् आराधनकरिके । ६ स्वरूपईं ७विचारिके (श्रवणमननकरिके )। फेर निदिध्यासनकरिके विद्वान् हुया । जिस १०तच्चकुँ ११पावता है । १२सोई १३नित्य १४परब्रह्म १५मैं हूं ॥२॥ यदानंदरूपं प्रकाशसरूपं निरस्तमपंचं परिच्छेदशून्यम् ।। अहं ब्रह्महत्यैकगम्यं तुरीयं परं ब्रह्म नित्यं तदेवोहमस्मि ॥ ३ ॥ अर्थ:-जो आनंदरूप प्रकाशस्वरूप निष्प- पंच तीनपरिच्छेदते रहित । "मैं ब्रह्म हूं"। इस
विनोद ३] विज्ञाननौका ॥ ४ ॥
२४
एकवृत्तिकरि गम्य अरु तुरीयरूप है। रसोई
३नित्य परब्रह्म में हूं ॥ ३ ॥
यदज्ञानतो भाति विश्व समस्तं
विनष्ट, सद्यो येदात्ममयोधे ॥
मनोवागतीतं विशुद्ध विमुक्त
परं ब्रह्म नित्यं तेदेवाहमस्मि ॥ ४॥
अर्थ:-१समस्त २विश्व ३जाके अज्ञानते
भासता है । ४औ जाके स्वरूपके प्रबोध हुये
६ सद्यः ७विनाशकं प्राप्त होवै है । ऐसा नो-
८मनवाणीका अविषय विशुद्ध औ विमुक्त है।
९सई १०नित्य ११परब्रह्म १२मैं हू ॥ ४ ॥
निषेधे कृते नेतिनतीति वाक्यः
समाधिस्थितानां यदामाति पूर्णम् ॥
अवस्थात्रयातीतमद्वैतमेकं
परं ब्रह्म नित्यं तदेवाहमस्मि ॥५॥
विज्ञाननौका ॥ ४ ॥ [वेदांत
अर्थ:-"नेतिनति (कारण नहीं औ कार्य
नहीं)" ऐसे वाक्यनकरि २निषेधके कियेहये ।
३समाधिविप स्थित पुरुपनकू ४पूर्ण तीनअव-
स्थात रहित अद्वैत औ एकरूप ५जो भासता है।
६सोई नित्य परब्रह्म मैं हूं ॥ ५ ॥
यंदानंदलेशैः समानंदि विश्वं
यदाभाति सत्वे तर्दाभाति सर्वम् ।।
यदालोचने हेर्यमन्यत्समस्तं
'पैरं ब्रह्म नित्यं तदेवाहमस्मि ।।६।।
अर्थ:-१जाके आनंदके लेशों(प्रतिवियों)-
करि २विश्व ३सम्यक् आनंदवाव होतं है ।
औ ४जिसके आमाति (प्रमा)के सद्भावके हुये
सो ५सर्व ६मासता है । औ जाके आलोचनके
हुये अन्य समस्त ९त्याज्य होते है। १०सोई
११नित्य १२परब्रह्म १३मैं हूं ॥ ६ ॥
२६ विनोद ३] विज्ञाननौका ॥४॥ अनंतं विभुं सर्वयोनि निरीहं शिवं संगहीनं येदोंकारगम्यम् ।। निराकारमत्युज्ज्वलं मृत्युहीनं परं ब्रह्म नित्यं तदेवाहमस्मि ।। ७ ।। अर्थः-१जो अनंता विभु (व्यापक)। सर्व- योनि (सर्वका कारण)। निरीह ( निष्क्रिय )। शिव (कल्याणरूप) असंग। ऑकारकरि गम्य। निराकार । अतिउज्ज्वल औ मृत्युरहित है। सोई ५नित्य परब्रह्म ७मैं हूं ॥ ७ ॥ यदानंदसिंधी निमनःपुमाया- दविद्याविलासः समस्तमपंचः ।। तेदानं स्फुरत्यद्भुतं यनिमित्तं परं ब्रह्म नित्यं तदेवाहमस्मि ।।८।। अर्थ:-१जब २पुरुप आनंदसमुद्रवि नि- मन होवे है । तब अविद्याका कार्य सम-
२७
विज्ञाननौका ॥४॥
स्तमपंच ७स्फुरता नहीं। किंतु अद्भुतरूप
आनंदका निमित्त स्फुरता है। सोई ९नित्य
१० परब्रह्म ११मै हूं ॥<॥
स्र्चेरूपानुसंधानरूपां स्तुति यः
पठेदादराद्भक्तिभावो मैनुष्यः॥
शृंणोती, वा नित्यमुद्युक्तचित्तो
भैवेद्विप्णुरत्रैव वेदप्रमाणात् ॥ ९ ॥
अर्थः-१जो २मनुप्य ३भक्तिभाववाला हुया
स्वरूपके अनुसंधानरूप इस स्तुतिकू ५आद-
र ६पठन करै । ७वा दईहां नित्य उद्योगवान्
चित्तवाला हुया १०सुनताहै । सो ११इहांही जी
वत अवस्थाविपै वेदरूप प्रमाणते १२विष्णुरूप
१३होवैगा ॥९॥
॥ इति श्रीमापाटीकासहिता श्रीमच्छंकरा-
चार्यविरचिता विज्ञाननीका समाता ॥४॥
॥ श्रीवेदांतपुस्तकालय॥ शरीफ सालेमहंमदकी कंपनी.-कराची. दाउद शरीफ-श्रीभावनगर. बहुतकरिके संस्कृत तथा भापाके छपे हुये सर्व वेदांत- विषयक ग्रंथ हमारे वदासे मिल सकते हैं। कोई भी ग्रंथ लेनेकी इच्छावाले प्रथकी कीमत तथा डाक महसूल जनाया जायेगा । उत्तरके लिये हवलका भेजना ।। नीचे लिखे प्रथनका डाक महसूल नही पडेगा मान वेल्युपएपलका साफकमीशन पडेगा। श्री विचारसागर ५५४ टिप्पणसहित औ वृत्ति- रलावलि तथा बडी अकारादि भनुप्रामणिकास. हित तृतीयाति ३३ , उक्ततृतीयावती उत्तमकागजकी श्रीसुंदरविलास । ज्ञानसमुद्र भादिक तृतीया रत्ति २१, " उक्ततृतीयावृत्ति उत्तमफागजको ३ श्रीसटीकाअष्टावक्रगीता मूलको भाषासहित. १ उक्तग्रंथ उनम पूठे भी कागजका.... १॥ श्रीविचारचद्रोदय । तृतीयावृत्ति श्रीपंचदशी।मूल ओ टोकाफी भाषा : दो विभागमैं (घोडेही प्रय रहे हैं) ... ... ... ... ४ ...
... ... . १ .. ... ... ... ... १ श्रीपंचदशीका प्रथम प्रकरण.... श्रीपंचदशीका प्रथम औ पंचम प्रकरण, श्रीपंचदशी मूलमात्र... श्रीईशायटोपनिषद् । मूल औ श्रीशंकरभाष्य अनुसार हिंदुस्थानी. श्रीवालबोध टीकासहित. ollo ., उक्तग्रंथ चित्रित कपडेके पूठेसहित. श्रीपदार्थमंजूपा (वेदांतपदार्थकोश ॥ आगेरु०४थे) ३ श्रीवेदस्तुति । अन्वययुक्त । तथा गुर्जरभाषा ॥ श्रीवेदांतविनोद ॥ इस नामसे अनेक लघुप्रथ प्रकट किये जाते हैं।तिनमै *ऐसे चिहवाले प्रप छपे हैं। प्रत्येक अंकको कीमत-11 रखी है। औ कोइली ६ अंकका मात्र रु० ॥ पडेगा. *१ वेदांतपदावलि (श्रीविचारचं. ५ अखामक्तके पद. द्रोदयका सार) ६ मस्ताविकत्येक अर्थ- *२ वेदांतपदार्थसंज्ञा. सहित. ३ सूफीओंके गजल. * वेदांतस्तोत्रसंग्रह अर्थ- ४ देवाजीमक्तके पद. सहित. इनसे आदिले के अनेक लघुग्रंथ उपरि लिसे क्रमसे नहीं परतु समयसंमोग अनुसार प्रकट किये जायेंगे ।
॥ श्रीवेदांतविनोद ॥ चतुर्थअंक ॥ ४ ॥ ॥श्रीवेदांतस्तोत्रसंग्रह ॥२॥ ब्रह्मनिष्ठपंडित श्रीपितांवरजीकृत भाषादीपिकासहित सर्वमुमुक्षुके हितार्थ शरीफ सालेमहंमदने छपाई प्रकट किया। श्रीमुंबईमैं निर्णयसागरप्रेसमैं छपा ॥ ।। सवत् १९४४-सन् १८८८ । (प्रकटकर्ताने सर्वध स्वाधीन रखे है) ॥ प्रस्तावना ॥ मंगल ॥ दोहा ॥ श्रीगुरुके पद वंदिके यह वेदांतविनोद ।। भकट करों इस करि सवे सज्जन पावहुमोद १ बहुत मुमशुजन श्रीमच्छकराचार्यकृत औ अन्यमहा- स्माकृत सस्कृतस्तोत्रनकू पाठ किंवा कठ करते हैं। परतु निष्ठाकी आरूढतामें उपयोगी तिन स्तोननके अर्थ निश्चय करनेमें पराधीनताकू अनुभव करते हैं। ताते परमारु- णिक ब्रह्मनिष्ठपडित श्रीपोतावरजीने दयाकरिके स्तो. मनकी मापा फरी है । औ सस्कृतमें अल्पअभ्यासवानकू थी प्रत्येक शब्दफै अर्थका बोध होवे । तात मूलमै औ भाषामें अन्वयअनुसार अओंकू रखे श्रीवेदांत विनोदके इस चतुर्थअरमें जितने स्तोत्र छपे है। सो नीचे लिखे हैं श्रीआत्मपटकस्तोनम् ॥५॥ श्रीआत्मचिंतनम् ॥ ६॥ श्रीनिर्वाणदशकम् ॥ ७ ॥, श्रीआत्मपंचकम् ॥ ८॥ औ अन्य स्तोत्र पी पचमादिअगाविस छापे हैं। शरीफ सालेमहंमद. ॥
॥ ॐ गुरुपरमात्मने नमः॥ ॥ श्री वेदांतविनोद ।। चतुर्थअंक ।। ४ ॥ ॥ श्रीवेदांतस्तोत्रसंग्रहमारंभः ॥ २॥ ॥ अथ श्रीआत्मपदकस्तोत्रम् ॥५॥ | भुजंगप्रयातं छेद ॥ मनायुयहंकारचिचानि नाई में चै श्रोत्रजिव्हे न चे प्राणनेत्रे ॥ न च व्योमभूमी में तेगो ने वायु- चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥२॥ अर्थ:-१मैं २मन बुद्धि अहंकार अरु चित्त नहीं हूं। ३औ श्रोग औ जिव्हा नहीं हूँ। १अरु घाण अरु नेश ६ नहीं हूं। यो आकाश अरु भूमि २ आत्मपटकस्तोत्रम् ॥ ५॥ वेदांत नहीं हूं। अरु एतेज १० नहीं हूं। अरु ११वायु १२नहीं हूं। किंतु १३चिदानंदरूप शिव मैं हूं । शिव में हूं ॥१॥ अहं माणवर्गों न पंचानिला मे" न तोयं न में धातवो नै कोशाः॥ ने योपाणिपादौ में चौपस्थपायू चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥२॥ अर्थ:-१मैं २जल अरु ३प्राणवर्ग नहीं हूं। ४ मेरे ५पांच वायु नहीं हैं । ७मेरे धातु नहीं हैं। औ ९कोश १०नहीं हैं। औ ११वा पाणि अरु पाद १२नहीं हैं । १३औ उपस्थ अरु पायु १४नहीं हैं । किंतु १५चिदानंदरूप शिव मैं हूं। शिव में हूँ ॥२॥ न में' परागी ने में लोभमोही मंदो नैय में नव मात्सर्यभानम् ।।
- विनोद ४] आमपटकास्तोत्रम् ||१|| ने धीन चार्ज न कोमोन मोक्ष- श्चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥३॥ अर्थ:-१मेरे द्वेप अरु राग रनहीं हैं । अरु ३मेरे• लोभ अरु मोह ४नहीं हैं मेरेकू ६ मद नहीं है। श्री ७मत्सरभावका भान नहीं है। ९धर्म १ ० नहीं है। ११औ अर्थ १२नहीं है ।.१३ काम १४ नहीं है । ११मोक्ष १६नहीं है। किंतु १७चिदानंदरूप शिव मैं हूं । शिव मैं हूं ॥ ३ ॥ ने पुण्यं न पापं न सौख्यं नै दुःखं ने मंत्री ने "तीर्थ न वेदाने यज्ञाः ।। अहं भोजन नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥४॥ अर्थः-१पुन्य रनहीं है । ३पाप नहीं है। ५ सुख नहीं है। दुःख नहीं है । मंत्र १०नहीं है। ११तीर्थ १२ नहीं है । १३पेद १ नहीं हैं। १५ आत्मपटकस्तोत्रम् ॥ ५॥ वेदांत यज्ञ १६नहीं हैं। औ १७ मैं भोजन (मोग) नहीं हूं । भोज्य अरु १८भोक्ता १९नहीं हूं। किंतु २०चिदानंदरूप शिव मैं हूं । शिव मैं हूं ॥४॥ ने में मृत्युशंका नें में जातिभेद:-- पिता नैव में नैर्व माता ने जन्म ॥ ने बंधुने "मि गुरु व शिय- चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥५॥ अर्थ:-१मेरे मृत्युकी शंका नहीं है। श्री ३मेरेकू जातिका भेद नहीं है । औ ५मेरेकू ६ पिता नहीं है । ७माता नहीं है । ९जन्म १० नहीं है । ११बंधु १२नहीं है। १३मित्र १४नहीं है । गुरु अरु १६शिप्य १७नहीं किंतु १८ चिदानंदरूप शिव में हूं। शिव में हूँ ॥ ५ ॥ अंहं निर्विकल्पो निराकाररूपो विभुाप्य सर्वत्र सर्वेद्रियाणि ॥
-विनोद ४] आत्मपटकस्तोत्रम् ॥ ५ ॥
सदा में समत्वं न मुंक्तिर्न बंध-
चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥६॥
अर्थः-१में निर्विकल्प निराकाररूप विमुई।
औ सर्वठिकाने सर्वइंद्रियन के प्रति ३च्यापिके
वर्तमान हूं। मेरेकू सदा ६समता है । ७मुक्ति
(नहीं है । ९वंध १०नहीं है। किंतु ११चिदानं.
दरूप शिर मैं हूं । शिव में हूं ॥६॥
॥ इति भापाटीकासहितं श्रीमच्छंकराचार्य-
विरचितं आत्मपदकस्तोत्रं समासम् ॥ ५॥
६ [वेदांत ॥अथ श्रीआत्मचिंतनम् ॥६॥ ॥ अहं ब्रह्मास्मीसनुभवं वदति शिप्यः ॥ ॥ अनुष्टुप् छंदः ॥ अहमेव परं ब्रह्म वासुदेवाख्यमव्ययम् । . इति सानिश्चयान्मुक्तो बद्ध एवान्यथा भवेत : अर्थ:-" में ब्रह्म हूं" इस अनुभवकू शिष्य कहता है:-१" वासुदेव नामवाला अव्यय (घटने वधनेसे रहित ) २परब्रह्म ३मैहीं हूं"। ४इस पनिश्चयते मुक्त होवैगा अन्यथा स्बद्धहीं होगा ॥ १ ॥ अहमेव परं ब्रह्म ने चाहं ब्रह्मणः पृथक् । इत्येवं समुपासीत ब्राह्मणो ब्रह्मणि स्थितः २ अर्थः-१“मैंही परब्रह्म हूं २औ में ब्रह्मति पृथक् ३नहीं हूं." । ४इसमकारसें ५ब्राह्मण (ब्रह्म होनेकी इच्छावाला मुमुक्ष) जो है सो विनोद ४] आत्मचितनम् ॥ ६॥ ब्रहाविप स्थित हुया इसम्यक उपासना करै ॥२॥ अहमेव परं ब्रह्म निश्चितं चित्त चियताम् । चिद्रूपत्वादसंगत्वादवाध्यत्वात्मयवतः ॥३॥ अर्थः-१हे चित्त ! २चिद्रूप होनेते औ असंग होनेते औ ३प्रयत्नकरि ४अबाध्य होनेते ५" मैहीं परब्रह्म निश्चित हूं" ऐसे तुज करि चिंतन करनेवं योग्य है ॥ ३ ॥ सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं चैतन्यं च निरंतरम् । तद्रह्माहमिति ज्ञात्वा कैथं वर्णाश्रमी भवेत् ४ अर्थः-१सर्वउपाधिनते रहित चैतन्य औ निरंतर ( भेदरहित ) तिस ब्रह्मकू "मैं हूं" ऐसे जानिके २वर्णाश्रमी कैसे होवे। किसीम कारसे बी होवे नही ॥ ४ ॥ अहं ब्रह्मास्मि यो वेदै स सर्वे भवति विदम् । नाभूसा ईशते देवास्तस्यात्मैपां भवेद्धि सः५ ३ आत्मचिंतनम् ॥ ६॥ [वेदांत अर्थ:-१जो २" मैं ब्रह्म. हूं" एसे जानता है । सो तो यह ५सर्व । ( सर्वात्मा) होवै है। ताकी ७अभूतिके अर्थ देव ९ नहीं १०समर्थ होवै हैं । जाते ११सो (ज्ञानी) १२इन (देवन)का १३आत्मा २४होवै है॥५॥ अन्योसावहमन्योस्मीत्युपास्ते योऽन्यदेवताम् नर्स वेदे नरो ब्रह्म सं देवानां यथा पशुः ६ अर्थ:-१" यह २अन्य है । मैं अन्य हूं" ऐसे जो अन्य ( आपत भिन्न ) देवताळू ५उपासता है । ६सो. नर ब्रह्मकुं नहीं ९जानता है । १०सो ११जैसे (मनुप्यनका) पशु होवै सै १२देवनका (पशु) है ॥ ६ ॥ अहं देवो ने चान्योऽस्मिनौवाहं न शोकभाक् सच्चिदानंदरूपोऽहं निर्विकल्पस्वभाववान् ७ अर्थ:-१में देव हूँ। २अन्य ३नहीं हूं।
विनोद ४] आत्मचिंतनम् ॥६॥
नाही में हूं । ५शोकका भननेवाला
नहीं है। किंतु सच्चिदानंदरूप निर्विकल्प-
स्वभाववाला ९मैं हूं ॥ ७॥
आत्मानं सततं ब्रह्म संभाव्य विहरंति ये।
न तेषां दुकृतं किंचिहुंकृतोत्थाने चापंद:८
अर्थ:-१जे पुरुप २आत्मा निरंतर ब्रह्म-
रूप निश्चय करके विचरते हैं । ३तिनकू कि-
चित् ५दुष्कृत (पाप) ६नहीं होवे है। औ
दुष्कृतते उत्पन्न ९आपत्तियां १० नहीं होते हैं ८
आत्मानं सततं ब्रह्म संभाव्य विहरेमुखम् ॥
संसारे गतसारे यस्तैस्स दुःखं न जायते ।।९।।
अर्थ:-१जो पुरुष आत्मा निरंतर
ब्रह्मरूप निश्चयकरिके सुख जैसें होने से
विचरे। ताई असार संसारविपे दु:-
ख नहीं होवे है ॥९॥
आत्मचिंतनम् ॥६॥ वेदांत क्षणं ब्रह्माहमस्मीति यः कुर्यादात्मचिनम् । से महापातकं हन्यात्तमः सूर्योदयो यथा।। १० अर्थः-१जो क्षणमान "मैं ब्रह्म हूं ऐसें ३आत्माके चिंतनकू ४ करै । ५सो ६ सूर्यका उदय जैसे अंधकारकू (हनन करै है) तैसै ८महापातका हनन करै है ॥ १० ॥ अंज्ञानाद्रह्मणो जाताकाशं बुद्बुदोपमम् । आकाशाद्वायुरुत्पन्नो वायोस्तेजस्ततः पयः । अंभसः पृथिवीजाता ततोत्रीहियवादिकम?? अर्थः-१ब्रह्मके २अज्ञानते २बुबुदकी उप- मावाला आकाश ५ उपज्या । आकाशतें वायु उपज्या। वायुते तेज । तिसत जल । जलसे पृथ्वी उपजी। तिसत व्रीहियवादि (अन्न) उपज्या॥११॥ पृथिव्यप्मु पयो वन्ही पन्हिाया नभस्सा । नभोऽप्यन्याकृते तच शुद्ध शुद्धोऽस्Hदं हरिः विनोद ४] आत्मचिंतनम् ॥ ६ ॥ अर्थ:-१४थ्वी जलविपै । जल आमे. विपै । अग्नि वायुवि । २यह (वायु) ३ आकाशविषै। आकाश वी अभ्याकृत ( अ- ज्ञान )विपै । औ सो ( अज्ञान) शुद्धवि क- ल्पित है । “सो शुद्ध पहरि ६मैं ७हूं " ॥१२॥ अंहं विष्णुरहं विष्णुरहं विष्णुरहं हरिः । कभोकादिकं सर्वं तद विद्योत्यमेव च १३ अर्थः-१मैं विष्णु हूँ। में विष्णु हूँ । विष्णु हूं । मैं हरि हूं २औ ३क मोक्ता- दिक सर्व तिसकी अविद्यास उपजाही है ३१३.] अच्युतोऽहमनंतोऽहं गोविंदोऽहमहं हरिः। ऑनंदोहमशेपोहमजोहममृतोसम्यहम् ॥१४॥ अर्थः-१अच्युत मैं हूं। अनंत मैं हूँ । गोविंद मैं हूँ । २हरि ३मैं हूं । ४ आनंदरूप में हूं। बशेष मैं हूं । अजन्मा में हूँ। अमृतरूप में हूं ॥१४॥ मैं १२ आत्मचिंतनम् ॥६॥ [वेदांत निसोहं निर्विकल्पोहं निराकारोहमव्ययः । सचिदानंदसंदोहः पररूपोऽस्म्यहं सदा १५ अर्थ:--नित्य में हूं। निर्विकल्प मैं हूं। निराकार मैं हूं । अव्यय सत् चित् अरु आनंद- का समूह परब्रह्मरूप २सदा ३मैं हूं ॥ १५ ॥ ग्रीवहिं न संसौरी मुक्तोऽहमिति भावयेत् । अंशक्नुवन्भावयितुं चौक्यमेतत्सदाभ्यसेत् १६ अर्थ:-१" मैं २ब्रह्मही हूं । ३संसारी नहीं । ५, ६ मुक्त हूं'। ऐसे, भावना करै । भावना करने• ९अशक्त हुया १०इस . ११वाक्यका १२सदा अभ्यास करै ।। १६ ।। ध्यानयोगेनकमासाद्महसां व्यपोहति । पण्मासाभ्यासयोगेन सर्व पापं व्यपोहति १७ अर्थः-१एक मासते २ध्यानयोग कर . विनोद ४] आत्मचितनम् ॥६॥ ३ब्रह्महत्यार्चे दूरी करै । पदमासके अभ्या- सयोगकरि सर्वपापळू दूरी कर है ॥ १७ ॥ संवत्सरकृताभ्यासासिद्धयष्टकमवाप्नुयात् । यावज्जीवं सदाभ्यासाज्जीवन्मुक्तो न संशयः अर्थ:-संवत्सरपर्यंत किये अभ्यासते सिद्धिनके अष्टककू पायता है। औ जीवत्पर्यंत सदा अभ्यासते जीवन्मुक्त होवे है । याम संशय नहीं है ॥१८॥ नाहं देहो ने च प्राणो ने द्रियाणि तथैव च । में मनाने'धुद्धिथै नै चिचेमहंकृतिः१५ अर्थः-१मैं देह नहीं हूं । ३औ प्राण नहीं हूँ मैं ६इंद्रियां नहीं हूं। री में १०मन ११नहीं हूं। १२औ १३बुद्धि १४नहीं है । औ १५चित्त अरु अहंकार १६नहीं है ११ नाहं पृथ्वी ने सलिलं नच यहिस्तथानिला। ने चाकाशो ने शेन्दचने च स्पर्शस्तयारसः।।
१
OC
आत्मचिंतनम् ॥ ६॥
[वेदांत
अर्थः-१में पृथ्वी २नहीं हूं । ३जल ४नहीं
हूं। ५औ अग्नि नहीं हूं। तैसें वायु औ
आकाश ९नहीं हूं। १०ी ११शब्द १२नहीं
हूँ। १३औ स्पर्श तैसे रस नहीं हूं ॥ २० ॥
नोह' गंधो न पंचन माहिं ने संहतिः ।
संदा साक्षिस्वरूपत्वाच्छिंच एवास्मि केवलम्।।
अर्थः-१में गंध २नही हूं । ३औ ४रूप
५नहीं हूँ। मैं माया नहीं हूं। ९संमृति
१०नहीं हूं । ११सदा साक्षी स्वरूप होनेने १२
केवल १३शिवहीं हूं ॥ २१ ॥
अकर्ताहमभोक्ताहमसंगः परमेश्वरः।
सदा मत्सन्निधानेन चष्टिते सर्वमिंद्रियम् ॥२२
अर्थ:-१, २अकर्त्ता हूं। ३अभोक्ता हूं। मैं
सदा ५असंग परमेश्वर हूं । मेरे संन्निधानते
७सर्वइद्रिय चेष्टा करैहै ॥ २२ ॥
विनोट ४} आत्मचितनम् ॥ ६॥ - आदिमध्यांतमुक्तोऽई ने बद्धोई कदाचन । संभावनिर्मलः शुद्धः स एवाई न संशयः२३ अर्थ:- (मैं आदि मध्य अरु अंतने र- हित हूं। मैं कदाचित् वद्ध नहीं हूं। जो स्य. भाव निर्मल अरु शुद्ध है । सोई में हूं। याम संशय नहीं है ।॥ २३ ॥ सर्वज्ञोहमनतोऽहं सर्वगः मर्यशक्तिमान । आनंदः सत्यवोधाहमिति ब्रह्मानुचिंतनम्२४ अर्थ:- "सर्वश में हूं। अनंत में हूँ । सर्व- गत सर्वशक्तिमान् आनंदरूप सत्यवोधप में हूं" । यह ब्रह्मका अनुचिंतन है ॥ २४ ॥ अयं प्रपंचो मिथ्येय मत्यं प्रेमाहमंद्वयम् । अत्र प्रमाणं वेदांता गुरवोऽनुभवस्तथा २५ अर्थ:- १"यह प्रपंच मिथ्याही है । सत्य १ अद्वग ३ब्रह्म मैं हूँ" | श्याम वेदांत (उप- १ आत्मचिंतनम् ॥ ६॥ वेदांत निपद् ) ६अरु ७गुरु नैसै अपना अनुभव प्रमा- ण है ॥ २५॥ मय्येव सकलं जातं मयि सर्व प्रतिष्ठितम् । मयि सर्व लयं याति तद्ब्रह्माईयमस्म्यहम् २६ अर्थ:- मेरेविही सकल उपज्या है । मेरे- विषै सर्व स्थित है । मेरेविपै सर्व लयकू पावता है । सो २अद्वय ३ब्रह्म मैं ५हूं ॥ २६ ॥ ब्रह्मैवाहं न संसारी न चाहं ब्रह्मणः पृथक् । नाहं देहो ने मे देहः कैवलोऽह सनातनः अर्थः- १, रब्रह्मही हूं। ३संसारी (जीव) नहीं हूं । ५औ में ब्रह्मते पथक् ६नहीं हूं। में देह नहीं हूं। मेरा देह १०नहीं है । ११ केवल १२सनातन १३मैं हूं ॥ २७ ॥ ॥ इति भापाटीकासहित श्रीमदात्मचिं- तनं ममाप्तम् ॥ ६॥ .
विनोद ४]
११
२२
॥अध निर्वाणदशकं (सिद्धांत-
विंदुः) प्रारम्भः ॥७॥
॥ भुजंगप्रयातं छंदः॥
में भूमिर्न तोयं न तेजो न वायु-
न ख २नेंद्रियं वो ने 'तेषां समूहः ॥
अनकांतिकलात्सुपुत्यैकसिद्ध-
स्तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥१
अर्थ:- १भूमि २नहीं है । ३जल ४नहीं
है। एतेन नहीं है । ७वायु नहीं है । ९आ-
काश १०नहीं है । ११इंद्रिय १२नहीं है । १३
वा १४तिनका समूह १५नहीं है । इनकू १६
व्यभिचारी होने । १७ताते १८सुपुतिविपै
सिद्ध १९एक अपशिष्ट २०केवल २१ शिव
२२मैं हूं ॥ १ ॥
निर्माणदशकम् ॥ ७॥ वेदात ने वर्णा ने वर्णाश्रमाचारधर्मा न में धारणाध्यानयोगादयोपि ॥ अनात्माश्रयाममाध्यासहानात् तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥२॥ अर्थः-१मेरेकू वर्ण ३नहीं है। श्री स्वर्ण औ आश्रमके आचार अरु धर्म नहीं है । औ ६धारणा औ ध्यान योग आदि वी नहीं है । <अनात्मारूप आश्रयवाले बहंममअध्यासकी निरत्तिते ॥ तातै एक अवशिष्ट ९केवल १० शिष ११मैं हू ॥ २ ॥ ने माता पिता वा न देवा न लोका 'न वेदो 'नं यज्ञा . 'तीर्थ 'अवंति ।। मुपुप्ती निरस्तातिशून्यात्मकत्वात् तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ||६॥ अर्थ:-१माता रवा ३पिता नहीं है । ५ पिनोद ४] निर्वाणदशकम् ॥ ७ ॥ देव नहीं है। लोक नहीं है । वेद १० नहीं है। ११यज्ञ १२नहीं है । १३तीर्थ १४नहीं है। १५कहते हैं कि सुपतिविपै निरस्त अतिश- न्यरूप होनेते । तात एक अपशिष्ट १६केवल १७शिवरूप १८मैं हूं ॥ ३ ॥ ने सांख्यं ने शै नै तपांचरात्रम् ने जनं न 'मीमांसकादेर्मतं वा ।। विशिष्टानुभूत्या विशुद्धात्मकसात । तदेकोवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥ ४ ॥ अर्थ:-१सो २सांख्य ३नहीं है । शैव ५ नहीं है। पांचराग नहीं है। जैन ९नहीं है। १०वा ११ मीमांसक आदिकका मत १२ नहीं है। १३श्रेष्ठ अनुभव करि विशुद्धस्वरूप हो- नेते ॥ तातें एक अवशिष्ट १४केवल १५शिवरूप, १६मै हूं ॥४॥ १३ २० निर्वाणदशकम् ॥७॥ [वेदांत ने चोर्ध्व न चाधो न चतिर्न बाह्यम् । मैं मध्यं ने तिर्य ने पूर्वोपरादिक् ॥ वियध्यापकत्वादखंडेकरूप- स्तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहं ॥ ५ . अर्थः-१उर्ध्व २नहीं है । ३औ अध नहीं हैं । ५औ भीतर नहीं है । ७वाद्य नहीं है। ९मध्य १०नहीं है। ११टेदा १२नहीं है । १३पूर्व अरु पश्चिम दिशा १४नहीं है। १५आकाशकी न्याई व्यापक होने” । अखंड एकरूप है । ताते एक अवशिष्ट १६ केवल १७शिवरूप १८मैं हूं ॥५॥ ने शुकं न कृष्ण ने रक्तं न पीत' में कुंजं न पीनं न इस्वं ने दीर्घम्' अपं तथा ज्योतिराकारकत्वात तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥६ अर्थः-१शुश्च २नहीं हूं। ३कृष्ण नहीं है ।
२१ १ विनोद ४] निर्वाणदशकम् ॥ ७ ॥ ५रक्त नहीं हूं। पीत नहीं हूं। एकुञ्ज (कूबडा) १०नहीं हूं। ११पीन १२नहीं हूं । १३हस्व १४नहीं हूं। १५दीर्घ १६नहीं हूं १७तथा १८अरूप हूं। १९ज्योति (प्रकाश) रूप आकारवाला होनेः । तात एक अवशिष्ट २० केवलं २१शिवरूप २२मैं हूँ ॥ ६ ॥ ने शास्ता न शास्त्रं न शिंप्यो न शिक्षा । में च त्वं ने चौहं ने चायं प्रपंचः॥ स्वरूपावयोधो विकल्पासहिष्णु- । स्तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥७॥ अर्थः- १शास्ता नहीं है । ३शास्त्र नहीं है । ५शिष्य नहीं है। शिक्षा नहीं है । ९ औ तूं १० नहीं है। ११औ में १२नहीं हू । १३औ यह प्रपंच १४नहीं है । जाते १५स्वरूप- भूत अववोध विकल्पक़ नहीं सहारनेहारा ।
२२ निर्वाणदशकम् ॥ ७ ॥ (वेदांत हूं। ताते एक अवशिष्ट १६केवल १७ शिवरूप १८मैं हूं ॥ ७ ॥ में जीयन में स्वप्न को वा मुपुति- न विश्वो ने वा तैजसः मौज्ञको वा ॥ अविद्यात्मकत्वाप्रयाणां तुरीय- । स्तदेकोवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥८॥ अर्थ:-- १मेरेकू २जागृत ३नहीं है । ४स्वा वा सुपुप्ति नहीं है । ६ विश्व नहीं हूं। वा सैनस ९वा १०मान ११नहीं हूं। १२तीनोकू १३अविद्यास्वरूप होनेते । १४तात १५ तुरी- गरूप १६एक अवशिष्ट १७केवल १८शिवरूप १९मैं हूं ॥ ८॥ अपि च्यापकचादितचायोगाव स्वतः सिद्धभावादनन्याश्रयत्वान् ।
विनोद ४] निर्वाणदशकाम् ॥ ७ ॥ जैगनुच्छमेतत्समस्तं वेदन्यत् तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम् ॥९॥ अर्थ:- १व्यापक होनेते । औ प्रसिद्ध तत्य शब्दकारि उचारणते । औ स्वतःसिद्ध सत्ता (होनेवाला) होनेते । औ अन्य आश्रयकरि र. हित होनेते रवी । ३तिसत अन्य यह समस्त जगत् तुच्छ है । ६तात एक अपशिष्ट केवल शिवरूप ९मैं हूं ॥९॥ ने के तदन्यद्वितीयं कुतः स्यात् ने यो केवलत्वं ने चाकवलत्वम् ॥ ने शून्य मे पागून्यमद्वपकत्वात कथं सर्ववेदांतसिद्ध ग्रवीमि ॥ १० ॥ अर्थ:- जय एक रनहीं है । ३तव तिसत अन्ग द्वितीय कहात होयेगा । ४वा केवलभाष ।
२४
निर्वाणदशकम् ॥ ७॥ [वेदात
५नहीं है ।६औ अकेवलभाव नहीं है। शू
न्य नहीं है। १०औ अशुन्य ११नहीं है । १२
अद्वतरूप होनेते । तब ताकू १३सर्ववेदातों
करि १४कैसें १५कहों ॥१०॥
॥ इति भापाटीकासहितं श्रीमच्छंक-
राचार्यविरचितं निर्वाणदशकं (सिद्धांत-
विदुः) समाप्तम् ॥७॥
विनोद ४] ॥ अथ आत्मपंचकप्रारम्भः॥८॥ --- ॥शालिनी छंदः ।। नाह देहो नंद्रियाण्यंतैरंगम् नाहकार प्राणवर्गों ने बुद्धिः॥ दौरापयक्षेत्रवित्तादिदः साक्षी निसः प्रसगात्मा शिवोऽहम् ।।२।। अर्थः-१में देह २नहीं हूं। ३इंद्रियां नहीं, हूँ। ५अंतरग (मन ) भी अहंकार अरमाण- वर्ग नहीं हूं। श्री बुद्धि नहीं हूं। किंतु स्त्री पुष क्षेत्र धन आदिकत दूर । साक्षी नित्य मत्य- गामा शिवरूप में हूं ॥ १॥ ज्यानाड़ाति रेज्जुर्यथाहिः स्वारमाज्ञानादात्मनो जीवभावः ।।
२६ आत्मपंचकम् ॥८॥ वेदांत 'आप्तोतया हि भ्रांतिनाशे स रज्जु- र्जीवो नहिं दे शिकोत्तया शिवोहम् ॥२॥ अर्थः-१ से २रज्जुके अज्ञानते ३रज्जु ४ सर्परूप भासती है । तैसे स्वात्माके अज्ञानते आत्माकू जीवभाष है । जैसे आप्तवचनकरिही भ्रांतिके नाश हुये सो (सर्प ) रज्जु होवै है । तैसे ७गुरुके वचनकर मैं ९जीव नहीं । किंतु १० म ११शिव हूं ॥ २ ॥ • आभातीदं विश्वमात्मन्यसत्यं सत्यज्ञानानंदरूपे विमोहात् ।। निद्रामोहात स्वप्नवत्तन्ने सत्यं शृंदः पूर्णो नित्य एकः शिवोहम् ॥३॥ अर्थ:- १असत्य यह विश्व ! ३सत्य ज्ञान आनंदरूप ४आत्माविप ५विमोह (भ्रांति ते ६भासता है । निद्रारूप मोहत स्वमकी न्याई सो २७ १३ १२ विनोद ४] आत्मपंचकम् ॥ ८ ॥ सत्य नहीं है ।। १०शुद्ध पूर्ण नित्य एक शिष- रूप में। हूं ॥ ३ ॥ नाह जातो ने प्रेटद्धो न नष्टो देहस्योक्ताः प्राकृताः सर्वधर्माः॥ कठत्वादिश्चिन्मयस्याऽस्ति नोहं- कारस्यैव धात्मनो मे शिवोऽहम् ॥ ४ ॥ अर्थ:-१में जन्मकुं पाया २नहीं हूं । ३वृद्ध भया नहीं हूं। ५नष्ट भया ६नहीं हूं । ७मारत सर्वधर्म देहके कहे हैं । ९कीभाव आदि चिन्मय १०आत्मरूप मेरे• ११नहीं १२है । किंतु १३अहंकारही हैं। मैं १५शिवरूप - मैत्तो नान्यत्किचित्रांस्ति ईश्य सर्व वाद्य वस्तुमायोपकप्तम् ।।
२८
आत्मपंचकम् ॥ ८॥
वेदांत
आदांतर्भासमानस्य तुल्यं
मेय्यद्वैते भौति तस्माच्छेिवोऽहम ॥५॥
अर्थः-१ईहां २कुछ बी ३दृश्य ४मुजते ५
अन्य नहीं है । आदर्शके भीतर भासमा-
नके तुल्य ९सर्व बाह्य वस्तु १०अद्वैतरूप ११
मुजविपै १२माया करि कल्पित १३भासता है।
तति १४, १५शिव हूं ॥ ५ ॥
॥ इति भापाटीकासहितमात्मपंचक
समाप्तम् ॥८॥
... ... १ ... ०/- श्रीईशाद्यष्टोपनिषद् । मूल औ धीशकरभाष्य अनुसार हिंदुस्थानोभे. श्रीबालबोध टीकासहित. 011 उक्तग्रंथ चित्रित कपटेके पूंठेसहित. श्रीपदार्थमंजूपा (वेदांतपदार्थकोश ।। आगेरु०४थे) ३ श्रीवैदस्तुति । अन्वययुक्त। तथा गुर्जरभाषा ॥ श्रीवेदांतविनोद ॥ इस नामसैं अनेक लघुप्रथ प्रकट किये जाते हैं। तिनमें र ऐसे चिद वाले प्रथ पे है । प्रत्येक अकमी कीमत )-॥ रपी है । औ कोइबी ६ अंकका मात्र रु. ०॥ पंगा।। *१.वेदातपदावलि (श्रीविचारच.५ अखाभक्तके पद- दोदयका सार) ६ प्रास्ताविश्लोक अर्थ. *२ वेदांतपदार्थसंज्ञा. सहित. ३मूफी ओंके गजल. * ज्वेदातस्तोत्रसंग्रह . ४ देवाजी भक्तके पद. सहित. इनसे आदिले अनेक लघुग्रंथ उपरि लिमे प्रमर्स नही परतु समयसजोग अनुमार प्रकट रिये जायेंगे । 1 ॥ श्रीवेदांतविनोद ॥ पंचमअंक ॥ ५॥ ॥ श्रीवेदांतस्तोत्रसंग्रह ॥३॥ ब्रह्मनिष्ठपंडित श्रीपितांवरजीकृत भाषादीपिका सहित सर्वमुमुक्षुके हितार्थ शरीफ सालेमहंमदने छपाई प्रकट किया। श्रीमुंबई में निर्णयसागरप्रेसमें छपा { । सवत् १९४४-सन् १८८८॥ प्रकटकतांने सहिद स्वाधीन रखे हैं) ४ .. ... १ 01- श्रीईशाद्यष्टोपनिषद् । मूल भी श्रीशंकरभाष्य अनुसार हिंदुस्थानी. श्रीवालवोध टीकासहित. ,, उक्तग्रंथ चित्रित कपडे के पूठेसहित. श्रीपदार्थमंजूपा (वेदांतपदार्थकोश ॥ आगेरु०४थे) ३ श्रीवेदस्तुति । अन्वययुक्त। तथा गुर्जरभाषा ॥ श्रीवेदांतविनोद ॥ इस नामसे अनेक लघुग्रथ प्रकट किये जाते हैं। तिनमें ऐसे चिहवाले प्रथ छपे हैं। प्रत्येक अंककी कीमत )-1 रसी है । ओ कोइवी ६ अंकमा मात्र रु. ०॥ पडेगा ।। ५१.वेदातपदावलि (श्रीविचारचं.५ अखाभक्तके पद- द्रोदयका सार) ६ प्रास्ताविक अर्थ- *२ वेदातपदार्थसंज्ञा. सहित. ३सूफीओंके गजल. ज्वेदांतस्तोत्रसंग्रह अर्थ- ४ देवाजी भत्ताके पद. सहित. इनसे आदिलेके भनेक लघुग्रंथ उपरि लिखे प्रमर्स नही परंतु समयमंजोग अनुसार प्रकट किये जायेंगे। 14 ।
गुरुपरमात्मने नमः॥ ॥श्रीवेदांतविनोद॥ पंचमअंक ॥५॥ ॥ श्रीवेदांतस्तोत्रसंग्रहमारंभः ॥३॥ ॥ अथ श्रीहस्तामलकस्तोत्रम् ॥ ९॥ ॥श्रीशंकरउवाच ॥ ॥ उपद्रवमा छंदः॥ कस्त्वं शिशो कॅस्य कुतोऽसि गता। किं नाम ते त्वं कुत आगतोऽसि। एतन्मयोक्तं दे चोमकलं मत्तीतये प्रीतिविवर्धनोऽसि ॥१॥ अर्थ:-श्रीशंकर उवाच:-१हे बालक ! २५ ३कौन है । किसका है। कहांते जानेवाला ६है। तेरा क्या नाम है । ९तूं कहांत आया .
। ॥ प्रस्तावना ॥ मंगल ॥दोहा॥ श्रीगुरुके पद वंदिके यह वेदांतविनोद ॥ प्रकट करों इस करि सर्वे सज्जन पावहु मोद१ बहुत मुमुक्षुजन श्रीमच्छंकराचार्यकृत औ अन्यमहा- स्माकृत संस्कृतस्तोवनकू पाठ किंवा कंठ करते हैं। परंतु निष्टाकी आरटताम उपयोगी तिन स्तोत्रनके अर्थ निश्चय करनेमें पराधीनता अनुभव करते हैं। ताने परमकार- णिक ब्रह्मनिष्ठपंडित श्रीपीतावरजीन दयाकरिके स्तो. घनकी मापा करी है। औं सस्कृतमे अल्पअभ्यासवानक पी प्रत्येकशब्दके अर्थका योध होवे । तात मूलमें औ भाषामें अन्वयअनुसार अंकोंक रखे हैं । श्रीवेदोतविनोदके इस पंचमसमें जितने स्तोन छपे हैं। सो नीचे लिखे है:- श्रीहस्तामलकस्तोत्रम् ॥९॥ श्रीकाशीपंचकस्तोत्रम् ॥१०॥ श्रीस्वानुभवादर्शस्तोत्रम् ॥ ११ ॥ औ अन्य स्तोत्र या पाठअंकविध छाये हैं। शरीफ सालेमहंमद.
३ विनोद ५] हस्तामलकस्तोनम् ॥ ९॥ निमिर्च मेनचक्षुरादि महत्तौ। निरस्ताखिलोपाधिराकाशकल्पः ॥ रेविलॊकचेष्टानिमित्तं यथा यः । से निसोपलब्धिस्वरूपोहंमात्मा ॥३॥ अर्थ:-जैसे लोकनकी चेष्टाका निमित्त ३सूर्य है । तैसे जो मन अरु चक्षु आदिक- की प्रतिविष निमित्त है। श्री निरस्त सर्व उपाधिवाला अरु आकाशके तुल्य है। सो नित्य ज्ञानस्वरूप ९आत्मा १०मैं हूं ॥३॥ यै मन्युष्णवनियोधस्वरूपं । निश्चक्षुरादीन्यवोधात्मकानि ।। प्रवर्तत ऑथित्य निष्कंपमेकं । से निसोपलब्धिस्वरूपोहमात्मा ॥ ४ ॥ अर्थ:-अमिक उष्णकी न्याई नित्य बोध- स्वरूप रनिश्चल एकरूप ३जिप्तकों माय
हस्तामलकस्तोत्रम् ॥ ९॥ वेदांत
हैं। १०हे बाल! तूं ११इस मेरेकरि उक्तअर्थकू
१२औ (अनुक्कर्षथ बी) १३मेरी मीतिके
वास्ते १४कथन कर । १५तूं प्रीतिवर्धक है ॥१॥
॥ हस्तामलकउवाच ।।
॥ भुजंगप्रयातं छंदः॥
नाह मनुप्यो ने चै देवयक्षौ ।
न ग्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्राः ।।
न ब्रह्मचारी ने ही वनस्थो।
भिक्षुर्न चौह" निजवोधरूपः ॥ २ ॥
अर्थ:-हस्तामलक उवाच:-में मनुष्य २न-
ही हूं। ३औ देव अरु यक्ष ४नहीं हूं। औ
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य अरु शूद्र नहीं हूं। ७व्र-
ह्मचारी नहीं हूँ। ९गृहस्थ औ वानप्रस्थ १० नहीं
हूं। ११औ १२ भिक्षु (सन्यासी) नहीं हूं। किंतु
१३निनबोधरूप १४मैं हूं ॥२॥
विनोद ५] हस्तामलगास्तोत्रम् ॥ ९॥ निमिचं मनश्रक्षुरादि प्रचत्तौ। निरस्ताखिलोपाधिराकाशकल्पः ॥ रेविलकिचेष्टानिमित्तं यथा यः। स निसोपलब्धिस्वरूपोहमात्मा ॥३॥ अर्थः-१जैसे २लोकनकी चेष्टाका निमित्त ३सूर्य है । तैसे नो मन अर चक्षु आदिक- की प्रतिविष निमित्त है । औ निरस्त सर्व उपाविधाला अरु आकाशके तुल्य है। सो नित्य ज्ञानस्वरूप ९आत्मा १०मैं हूं ॥३॥ ये मैन्युप्णपन्निसपोधस्वरूपं । मनश्चक्षुरादीन्यवोधात्मकानि ॥ प्रवर्तत ऑश्रित्य निष्कंपमेकं । स नियोपलब्धिस्वरूपोहमात्मा ॥४॥ अर्थ:-अनिके उष्णकी न्याई नित्य बोध- स्वरूप निथल एकरूप ३जिसको ४माश्रय
हस्तामलकस्तोत्रम् ॥ ९॥ वेदांत
करिके ५अवोध (जड) स्वरूप ६मन अरु चक्षु
आदिक प्रवर्त्त होते हैं। सो नित्य ज्ञान-
स्वरूप ९आत्मा १०मै हूं ॥ ४ ॥
मैनश्चक्षुरादवियुक्तः स्वयं यो।
मेनश्चक्षुरादेमनश्चक्षुरादि।
मनश्चक्षुरादेरगम्यस्वरूपः।
स नित्योपलब्धिस्वरूपोर्हमोत्मा ॥५॥
अर्थ:-१जो २आप ३मन अरु चक्षु आदिकत
न्यारा है। औ४मन अरु चक्षुआदिकका मन अरु च-
शुरूपादिक है । औ मन अरु चक्षुआदिकर्ते अगम्य
स्वरूपवाला है।सो नित्य ज्ञानरूप आत्मा मैं हूं
मुसाभासको दर्पणे दृश्यमानो।
मुंसत्वात्पृथक्त्वेन नवास्ति वैस्तु ।
चिदाभासको धी' जीवोपि तद्वत् ।
से नित्योपलब्धिस्वरूपोहमात्मा ॥ ६ ॥
६ il विनोद ५] हस्तामलकास्तोत्रम् ॥ ९ ॥ . अर्थ:-जैसे दर्पणविषै दृश्यमान जी २मु- खका आभास । सो ३मुखरूप होनेत एथपने- करि ४वस्तु पनहीं है। इसे बुद्धिविषै चिदा- भासरूप ९जीव बी है। १०सो नित्य ज्ञानस्व- रूप ११आत्मा १२मैं हूं॥ यथा दर्पणाभाव आभासहानौ । मुखं विद्यते कल्पनाहीनमेकम् ।। तथा धीवियोगे निरीभासको यः। से निसोपलब्धिस्वरूपोहेमात्मा ॥७॥ अर्थ:-जैसे दर्पणके अभावके भये मुखके आभासकी हानिके हुये २कल्पनाहीन एक ३मुख विद्यमान होवै है । तेसै वद्धि उपाधिके. दि- योग भये ५जो ६आभासरहित होवे है। सो नित्यज्ञानस्वरूप (आत्मा ९मैं हूं ॥ ७ ॥ य एको विभाति स्वतः शुद्धचेताः। प्रकाशस्वरूपोऽपि नौनेव धीषु ॥
." ६ हस्तामलकास्तोत्रम् ॥ ९॥ वेदांत शरांवोदकस्थो यथाभानुरकर से नित्योपलब्धिस्वरूपोहेमात्मा ॥८॥ अर्थः-१जो एक २स्वतः शुद्धचेतन प्रकाश- स्वरूप हुयावी ३बुद्धिनविपै नानाकी न्याई। भा. सता है । जैसे ७एक भानु ९शरावके जल- विप स्थित हुया नानाकी न्याई भासता है । तैसे १०सो नित्य ज्ञानस्वरूप ११आत्मा १२मैं हूं ॥८॥ यथा सूर्य एकोप्यनेकश्चलासु । स्थिरास्वप्खनन्वग्विभाव्यस्वरूपः ॥ चलामु प्रभिन्नासु धीवेक एवं । से नित्योपलब्धिस्वरूपोहेमात्मा ॥९॥ अर्थः-१जैसे २एक बी ३सूर्य । चंचल अरु स्थिररूप नानाजल विप अनुगतप्रकाशकारि भासमान स्वरूपवाला हुया ५अनेकरूप हो- ये है। ऐसे ७एक हुया। (चंचल भिन्न भि- न बुद्धिन विषै जो अनेकरूप होते है। सो विनोद ५] हस्तामलकस्तोत्रम् ॥ ९ ॥ नित्य ज्ञानस्वरूप १० आत्मा ११मैं हूं ॥९॥ यथानेकचक्षुः प्रकाशो रविन । मेण प्रकाशीकरोति प्रकाश्यम् । अनेका धियो यस्तयकमवोधः । से नियोपलब्धिस्वरूपोहेमात्मा ॥१०॥ अर्थः-१जैसे अनेकचानका प्रकाशक सूर्य है । सो २प्रकाशने योग्य वस्तुएं ३कम नहीं प्रकाश करै है । तैसै जो <एक पयोध ९अनेकबुद्धिनकू प्रकाश करै है । १०सो नि. त्यज्ञानस्वरूप ११आत्मा १२मैं हूं ॥ १० ॥ विवस्वत्मभातं यथा रुपमक्षम् । प्रगृह्णाति नाभातमेवं विवस्वान् । यदाभातमाभासयत्यक्षमेकः। से नित्योपलब्धिस्वरूपोहमात्मा ॥११॥ अर्थ:-जैसे सूर्यकरि प्रकाशित ३रूपस् चक्षु ग्रहण करहै । ४अप्रकाशित• पनहीं। + ८ हस्तामलकस्तोत्रम् ॥९॥ वेदांत ६ऐसे ७एक सूर्य जो है सो जिसकरि प्रकाशित ९चक्षुकू १०प्रकाशना है । ११सो नित्य ज्ञान- स्वरूप १२थात्मा १३मैं हूं ॥११॥ समस्तेषु वस्तुप्वनुस्यूतमेकं । समस्तानि वस्तूनि यन स्पृशति ।। चियद्वत्सदा शुद्धमच्छस्वरूपं । स निसोपलब्धिस्वरूपोहमात्मा ॥ १२॥ अर्थः-समस्तवस्तुनविपै अनुस्यूत एक है। औ समस्तवस्तु जिसकू स्पर्श करते नहीं। औ थाकाशकी न्याई शुद्ध स्वच्छ स्वरूपवाला है । सो नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा में हूं ॥ १२ ॥ चनच्छन्नदृष्टिनच्छन्नमर्क । यथा भन्यते निप्पमं चौतिमूढः ।। तथा बंद्धवभाति यो मूहदृष्टः से नित्योपलब्धिस्वरूपोहेमात्मा ॥१३॥ अर्थ:-जरी रमादट करि आच्छादिनदृष्टि- . . .
विनोद ५] हस्तामलमस्तोत्रम् ॥ ९॥ वाला ३अतिमूढ (बालक) ४ मेघरि आच्छादित सूर्यवं निस्तेज ६मानता है । ७तैसे जो मूढह- ष्टिवाले पुरुषहू ९बन्दकी न्याई भासता है । १०सो नित्य ज्ञानस्वरूप ११आत्मा १२मै हूं १३ उपाधी यथा भेदता सन्मणीनां । तथा भेदता बुद्धिभेदेषु तेऽपिं ॥ येथा चंद्रिकाणां जले चंचलत्वम् । तथा "चंचलत्वं तवापीह विष्णो ॥१४॥ अर्थ:-(आचार्यवाक्य) १जैसे श्रेष्ठ २मणीनकी ३उपाधिके होते ४भेदता होवैहै । ५तैसे तेरी वी बुद्धिके भेदोषिपै भेदता होवै है । ९जैसे चंद्र- माकी कां तिनकी जलविपै चंचलता है। तैसे १०हे विष्णो (पूर्ण)! ११तेरी बी [इहां बुद्धिविपै] १२चंचलता है१४ ॥ इति श्रीमापाटीकासहितं श्रीहस्तामलका- चार्यकृतं स्तोत्रं समाप्तम् ॥९॥ ।
१०
वेदांत
॥अथ श्रीकाशीपंचकस्तोत्रम्॥२०॥
॥ उपेंद्रवना छंदः॥
मनोनिवृत्तिः परमोपशांतिः।
सा तीर्थवर्या मणिकर्णिका च ।।
ज्ञानप्रवाहा विमलादिगंगा।
सा काशिकाहं निजवोधरूपा ॥१॥
अर्थ:-जहां १मनकी निरत्तिरूप जो परम-
उपशांति । सो तीर्थन विप श्रेष्ठ मणिकर्णिका है।
औ ज्ञानरूप प्रवाहवाली विमलआदि गंगा है ।
सो २निनवोधरूप ३काशी में हूं ॥ १ ॥
यस्यामिदं कल्पितमिंद्रजालं ।
चराचरं भाति मनोविलासम् ।।
सचिमुग्यैका परमात्मरूपा ।
सा काशिकाहं नियोधरूपा ॥२॥
विनोद ५] काशीपचकस्तोत्रम् ॥१०
अर्थः-१जिप्सविप यह कल्पित इद्रजालरूप
रमनका विलास ३चराचर भासता है । औ जो
सञ्चिदानद एक परमात्मारूप है । सो पनिज
बोधरूप काशी में हू ॥२॥
कोशेष पंचस्वैधिराजमाना।
बुदिर्भवानी प्रतिदेहगेहम् ।।
साक्षी शिवः सर्वगतोऽतरात्मा ।
सा कोशिकाहं निजयोधरूपा ॥३॥
अर्थ:-जो १पच २कोशोविपै ३विराजमान
है । औ जहा ४देहदेहरूप गृहके प्रति बुद्धि-
रूप भवानी है । औ सर्वगत बतरात्मा
साक्षीरूप शिप है । सो ९निजबोधरूप
१०वाशी मैं हू ॥३॥
काशीपचकस्तोनम् ॥१०॥ वेदात ॥ अनुष्टप् छंद.॥ कोश्यां हि कॉशते कोशी ।। कांशी सर्वभकाशिका सां काशी विदिता येन तेन प्रांता हि कोशिका ॥४॥ अर्थः-१पसिद्ध २काशीविपै ३चेतनरूप का- शी ४मकाश करै है । औ जो चेतनरूप ५काशी सर्वकी प्रकाशक है । ६ जिसनै ७सो काशी जानी है। जिसने ९काशी १०प्राप्त करी है ॥ ४ ॥ ।। स्त्रग्धरा छंदः॥ काशीक्षेत्रं शरीर निभुवनजठरे व्यापिनी ज्ञानगंगा । भक्तिः श्रद्धा गयेयं निजगुरुचरण- ध्यानयोगः प्रयागः ॥
१ २ विनोद ५] काशीपंचकस्तोत्रम् ॥१०॥ विश्वेशोय.तुरीयः संकलजनमनः सातिभूतोऽतरात्मा। १ देहे सर्व मैदीये यदि वैसति पुन- 'स्तीर्थमन्पत्किमस्ति ॥ ५॥ अर्थ:-१शरीररूप २काशीक्षेत्र है । औ ३त्रिभुवनके जठरविप व्यापनेवाली ज्ञानरूप गंगा है। औ ४ यह भक्ति अह श्रद्धारूप गया है। श्री मिन गुरुके चरणोंका ध्यानयोग प्रयाग है । औ ७सर्वजनोंके मनका साक्षीभूत अंतर आत्मा यह तुरीयरूप ९विश्वेश्वर है। १०जय १२मेरे १२देहविप सर्व १३वसता है। तब फेर १४अन्य १५तीर्थ १६क्या है ॥ ५ ॥ ॥ इति भापाटीकासहितं श्रीकाशी- पंचकस्तोत्रं समाप्तम् ।। १० ॥
वेदांत ॥अथ श्रीस्वानुभवादर्शस्तोत्रम् ११ प्रथम सर्वअधिकारीन• साधारण ससाधन सफलज्ञानके उपदेशपूर्वक स्वरूपानुसंधान करते हुये स्वानुभवहूं दिखाव है:- ॥ शार्दूलविक्रीडितं छंदः ॥ कर्मोपास्तिविशुद्धशांतहृदयो नाऽप्ता विवेकादिकं । गैत्वा बृह्मविदं मशांतममलं वेदार्थविज्ञ गुरुम् ।। संशोध्य श्रवणं विधाय चें मुईमत्वा निदिध्यासवान्। ज्ञात्वा "यं परमेति 'मुक्तिवर्ष 'सोऽहं परात्मा स्वयम् ॥ १॥ अर्थः-१कर्म अरु उपासना करिके.विशुद्ध अरु शांत (एकाग्र) भया है हृदय जिसका । ऐसा विनोद ५] स्वानुभवादर्शस्तोत्रम् ॥११॥ जो मनुष्य । सो २विवेक यादिक [ सावन हूँ ३पायके । ब्रह्मवेत्ता शांत निर्मल ( अनंदित आचारवाले ) वेदअर्थके माननेवाले गुरुके प्रति विधिपूर्वक शरण जायके। ताके पास] तत्त्वकू शोधन करिके।७औ अंगअंगी भेदते द्विविध] (श्रवणहूं करिके औ वारंवार मनन- करिके निदिध्यासनवान् हुया पुरुष १०जादू ११जानिके १२मुक्तिस्वरूप १३परब्रह्मकुं पा- पता है। १४सो १५परमात्मा आप १६मैं हूं ॥१॥ अब उत्तमअधिकारीके अर्थ तत्वशोधन के प्रकारपूर्वक बोधके मार्ग कहै हैं:- 'नेतीत्यादिजगनिषेधनपरै- दांतवाक्यः परै- युक्त्या चे प्रतिषिद्धय इतमखिलं चाव्याकृतं व्याकृतम् ।।
१६
१३
.
२३ २५ २४
स्वानुभवादर्शस्तोत्रम् ॥११॥ वेदांत
ध्यात्वाकाशसुपुष्पसन्निभमिदं
शेपचे तत्त्वं निज।
ज्ञात्वा 'यं पेरेमेति मुक्तिवपुपं
सोऽहं परात्मा स्वयम् ॥२॥
अर्थः- १ "नेति नेति" इत्यादिक जगत्के
निषेध करनेके परायण २श्रेष्ठ ३उपनिषदनके
वाक्यनकरि ४औ ५युक्तिकरि । अव्याहत
( कारण )रूप ७औ व्याकत (कार्य रूप
९संपूर्ण १०द्वैत• ११निषेधकरिके (प्रथम प-
रोक्षवाय करिके)।१२औ [ तिसविपै एकाग्रताके
अर्थ ] १३इस (प्रपंच दूं १४आकाशके पु-
प्पतुल्य (तुच्छरूप) १५चिंतन करिके।१६शे.
परूप १७जिस १८निन १९तवर्षं २०जानिके
२१मुक्तिस्वरूप २२परब्रह्मळू पायता है । २३सो
२४परमात्मा आप २५मैं हूं ॥ २ ॥
विनोद ५] सानुभवादर्शस्तोत्रम् ॥११॥ अब मध्यमअधिकारीके अर्थ तवशोधनके प्रकारपूर्वक बोधके मार्ग कहै है - देहांतर्गतपंचकोशजगतः कृत्वा पृथग वुद्धिमान् । संगत्या सुविभागहान विधया तत्वंपदायों परौ ॥ स्मृत्वाऽसीतिपेदन चैक्यमनयोः संबंधसिद्ध हुँदा। ज्ञात्वा य" परमेति मुक्तिवपुपं 'सोऽहं परात्मा स्वयम् ॥ ३॥ अर्थ:- बुद्धिमान् पुरुष । २सुशुप्रकारसे विरोधिभागका त्याग है प्रकार जिसका । ऐसी ३संगति (शब्दकी लक्षणारतिकरि समष्टिव्यष्टि रूप तीन देहनके अतर्गत पचकोश (अन्नमय प्राणमय मनोमय विज्ञानमय आनदमय )रूप ज- ११ स्वानुभवादर्शस्तोत्रम् ॥११|| - [वेदांत गत्ते ५पर (लक्ष्य )रूप " तत्वमसि" महावाक्यगत ·६"तत्" अरु "त्वं" इन दो पदोंके अर्थनकू ७पृथक् ( भिन्न ) करिके ।९ औ १०" असि" (हो) इस पदकरि ११इन ( उक्त दो पदार्थन)के एकताके बोधक तीन- संबंध (दोपदनके सामानाधिकरण्य दो वाच्या- धनके विशेषण विशेष्यता । दोलक्ष्यनके लक्ष्य- लक्षकभाव )करि सिद्ध १२एकताकू [बोधके सहकारी कारण शुद्ध] १३अंतःकरणकरि १४ स्मरणकरिके। १५जिसकू १६जानिके १७मुक्ति- स्वरूप १८परब्रह्मकू पावता है । १९सो २०परमात्मा आप २१मैं हूं ॥ ३ ॥ अब मेद (कुतर्कपितबुद्धिवाले ) अधिका- रीके अर्थ तयशोधनके प्रकारपूर्वक बोधक माग• कहै है:- विनोद ५] स्वानुभवादास्तोत्रम् ॥११॥ चार्वाकादिपरीक्षकैरभिमता- नात्मत्वयुद्ध्या जटान् । कोशान् पंच विविच्य तुच्छमतिना संवाध्य युतया सुधीः॥ 'शेपं पुच्छतया मतं सहमिति प्रत्यक्स्वरूपं दृढं। ज्ञात्वा "यं परमेति 'मुक्तिवपुपं 'सोऽहं पैरात्मा स्वयम् ॥ ४ ॥ अर्थ:- १तीवबुद्धिवाला पुरुप । २चावीक (देहात्मवादी) आदिक परीक्षक (युक्तिकुशल)- नकरि ३अहंभावकी बुद्धिकरि ४अभिमत ५ज- ड ६पंच अन्नमयादि कोशन• ८ युक्तिसे ९ विवेचनकरिके ( आत्माते भिन्न जानिके)।"ये तुच्छ ( असत् ) हैं" ऐसी बुद्धिकरि सम्यक् बा- धकरिके (परमार्थसत्ताकरि इनके त्रिकालअ- २. . स्वानुभवादर्शस्तोत्रम् ||११॥ विदांत भावका निश्चय करिके) । आनंदमयकोशरूप पक्षीके ब्रह्मरूप १० पुच्छ होनेकरि तैत्तिरीय- श्रुतिविपै माने हुये ११प्रत्यक् स्वरूप (प्रत्य- गात्मा0 अभिन्न) १२शेपरूप १३जिसकूँ १४, मैं हूं । ऐसें १५दृढ (संशय औ विपर्ययसै रहित) जानिके १६मुक्तिस्वरूप १७परब्रह्मकू पावताहै। १८सो १९परमात्मा आप २०मै हूं ॥ ४ ॥ अब जीवन्मुक्तिके विलक्षणानंदअर्थ वैराग्य बोध अरु उपशमके एकत्रस्थितिके प्रकार कहें है- स्वांत चासनया मलीमसमयो पीनं गुणाभ्यां भृशं । वैराग्येण "विवेकजन्मवपुपा देग्ध्वा हि पूर्व च ताम् ।। भयकृसानु जस्तमस्युपरमाद संपाय शुद्धं मृतं ।
विनोद १] स्वानुभवादर्शस्तोत्रम् ॥११॥ २१
ज्ञोला "यं परमेति मुक्तिवपुपं
सोऽहै परात्मा स्वयम् ॥ ५॥
अर्थ:- वासनाकरि मलिन औ रजोगुण
अरु तमोगुणकरि अत्यंत ३पीन (स्थूल) भये
मनझं विवेक जन्मयुक्त स्वरूपवाले वैरा-
ग्यकरि प्रथमता (वासना)९दग्ध (क्ष-
य)करिके १० औ ११जिसकू १२जानिके १३
अनंतर १४उपशम (ब्रह्माभ्यासजनित चित्त-
निरोधरूप समाधिमय राजयोग )ते १५रजो-
गुण अरु तमोगुणकू १६तिरस्कार करिक १७
शुद्ध (निर्वासनिक) यह मृत ( आविर्भूत स-
वगुणवाला होनेकरि नष्टस्थूलभाववाला)
१८संपादनकरिक जीवत्दशाविपै} १९मु.
तिस्वरूप २०परब्रह्मकुं पावताह २१सो २२
परमात्मा आप २३मैं हूँ ॥ ५॥
53 स्वानुभवादर्शस्तोत्रम् ॥११॥ (वेदात अब सप्तज्ञानभूमिकाके कथनपूर्वक उक्त स्थितिकी अवधि औ फलकू दिखावै हैं:- जायकत्रितयं तथैकमपरं -स्वमं सुपुप्तिद्वयं। संपाद्यैव तुरीयगां मुविमले पूर्णे त्या युते ॥ सांद्रानंदपयोनिधी सुरमते ध्यात्वाऽथ जीवनपि। ज्ञात्वा यं परमेति मुक्तिवपुर्प सोऽहं पैरात्मा स्वयम् ॥६॥ अर्थ:- १तीनजागृत (शुभेच्छा । मुविचा- रणा । तनुमानसारूप तीनभूमिका)हूं २संपाद- नकरिकहीं । तैसे ४जिसकू जानिके एक अपर (मसिद्धस्वमते विलक्षण) स्वम (चतुर्थ भूमिकाएं [संपादनकरिकही तैसे ] ७ध्यान २० पिनौद १] खानुभवादर्शस्तोत्रम् ॥११॥ २३ (समाधि )करिके ८ दोसुषुप्ति (पंचम, पष्ठ भू- मिका ) [तैसे ] ९तुरीयगा (राप्तमभूमिका )दूं [संपादन करिकेही) १०जीवता हुया बी पुरुष ११ सुविमल (विशुद्ध) १२औ १३पूर्ण औ स्वरूपा कार १४सत्तिकरि सहित सघनआनंदके समुद्रविपै सुष्टुप्रकारसैं रमता है । १५अनंतर (देहपातके भये) १६ विदेहमुक्तिस्वरूप १७परबाकू पावता है। १८सो १९परमात्मा आप २०में हूं ॥ ६ ॥ अब उक्तस्थितिके साधनभूत अष्टांगसहित निर्विकल्पसमाधिरूप राजयोग• सूचन करते हुये स्वस्वरूपका अनुसंधान करै हैं:- कृत्वा पंचविधान यमांश्च नियमान् सिद्धादिकं चासनं। प्राणानां नियमं तैथेंद्रियगणं संयम्य शब्दादितः॥
स्वानुभवादर्शस्तोत्रम् ॥११॥ वेदांत ध्यान धारणया समोधियुगलं संपाद्य धीरात्मवान् । ज्ञात्वा 'यं परमेति मुक्तिवपुपं 'सोऽहं परात्मा स्वयम् ॥७॥ अर्थ:- १पांचप्रकारके यर्मोकू औ नियमों • २औ ३सिद्धआदिक ४आसनकू औ ५मा- गोंके निरोध• किरिके तैसें इंद्रियनके गणरू शब्द आदिकते ९रोधिके । तैसें १०धारणाकरि ११ध्यान तैसें सविकल्प अरु निर्विकल्प भेदतें] १२दोसमाधि• संपादन करिके । धीरचित्तवाला हुया पुरुष १३जिसकू १४जानिके (साक्षात् क- रिके) उभय १५मुक्तिस्वरूप १६परब्रह्मकुं पाव- ताहै । १७सो १८परमात्मा आप १९मैं हूं ॥७॥ अब उक्त अष्टांगसहित योगविपै असमर्थ- ज्ञानीकू उक्तफलकी प्राप्तिअर्थ विचाररूम सुगम- उपायकू काहै हैं:- .
विनोद ५] स्वानुभवादर्शस्तोत्रम् ॥११॥ मिथ्यात्वं मनसा स्मरंजिगतो देहादिभानं त्यजन्। वोपाधिकृतां भिदां विघटयन् कुर्वन् मनो निर्मलम् ॥ प्रेमास्मीति विभावयन्त्रनुदिनं स्वानंदमास्वादयन् । ज्ञात्वा यं परमेति 'मुक्तिवषुपं 'सोऽहं परात्मा स्वयम् ॥ ८॥ अर्थः- १जिस (प्रत्यक् अभिन्न परमात्मा ) यूं २जानिके [स्थूलसूक्ष्मकारणभेदर्ने] ३त्रि- विधमपंचके निश्चित मिथ्यापनैकू मनसे स्म- रण, करता हुया । ५ देहादिकके भानकू त्यागता दुया । देहरूप उपाधिके किये.. भेदकू नाश करता हुया । मनकू निर्मल (अचंचल) क. रता हुया निरंतर ९"मैं ब्रह्म हूं" ऐसे भावना करता हुया । १०स्वरूपानंद• आस्वादन करता हुया । उभय ११मुक्तिस्वरूप १२परब्रह्मकुंपा- . स्वानुभवादर्शस्तोत्रम् ॥११॥ वेदांत वताहै । १३सो १४परमात्मा आप१५मैं हूं ॥८॥ अब उक्तविचारआदिक साधनोंविष अ- समर्थ मंदबुद्धिवाले पुरुपनके अर्थ ज्ञानके नाना- साधन ज्ञान अरु मोक्षफू कहते हुये स्वस्वरूपका अनुसंधान कर हैं:- ईशस्य स्मरणं द्विधा होर्नुदिनं तन्नामसंकीर्तनं । वा गंगास्नपनं सुकृत्य पैठनं गीतास्मृतेः प्रत्यहम् ॥ सत्संसद्गमनं स्वकर्म यजन दानं सुदत्वा शुचिर् । ज्ञात्वा "यं परमेति 'मुक्तिवपुपं *सोऽह पैरात्मा स्वयम् ॥ ९॥ अर्थ:- १निरंतर ईश्वरके सगुण निर्गुण भेद ३द्विविध ४स्मरण (चिंतनरूम उपासन). कू । ५वा. ६निरंतर ता (ईश्वर के नामके सम्यक् (वित्तकी एकाग्रतापूर्वक) कीर्तनकू ।
विनोद ५] स्वानुभवादर्शस्तोत्रम् ॥११॥ २७ वा गंगास्नानकुंवा प्रतिदिन ९गीतास्मृतिके १०पाठक । वा प्रतिदिन ११संतोंकी समाविषै गमनकू । वा १२स्वकर्म (अपने वर्णाश्रमके धर्म) कू। वा प्रतिदिन १३यजन (भगवत्पूजन ). १४सुष्टुप्रकारर्स करिके । वा ११दान [ सुप्त प्रकारसे श्रद्धापूर्वक सत्पात्रके अर्थ ] देके पवित्र हुया पुरुष १६जिसकू १७जानिके १८मुक्ति- स्वरूप १९परब्रह्म पावता है। २०सो २१पर- पात्मा आप २२मैं हूँ ॥९॥ अब "स्वानुभवादर्श" शब्दके अर्थसहित ताके प्रयोजनकू कहै हैं:- 'येनास्मिन्यिमले मुबाक्यनिकरा- दर्श विवेकान्विते । सेवालेहसुदीप्तदेशिकत्रची- दीपप्रभोद्भासिते॥ मुंद्धस्वांतहशा हि पश्यति जनः स्वात्मानमेवाद्वयं । प
सानुभवादर्शस्तोत्रम् ॥११॥
१तेन स्वानुभवाय वाय देयया-
दर्शोऽयमादर्शितः ॥ १० ॥
अर्थः- १जिस कारणकरि २विमल (नि.
पि) भी ३विवेककरि युक्त औ सेवारूप
तैलकरि प्रदीप्त जो गुरुके वचनरूप दीपककी
प्रभा । तिसकरि प्रकाशित ४इस ५श्रेष्ठवाक्योंके
समूहरूप दर्पणविपै अधिकारी जन ७शुद्ध
अंतःकरणरूप चक्षुकरिही ८ अद्वय (ब्रह्मसै अ-
भिन्न ) ९स्वात्माही १०देखताहै { अपरोक्ष
प्लानता है ।।११तिस कारणकरि १२शुभ १३
स्वानुभवके अर्थ १४यह १५आदर्श है । सो मुमु-
सुनके ऊपर १६दयाकरि १७दिखाया ॥ १० ॥
इति श्रीमद्वापुसरस्वतीपूज्यपादशिप्य
पीतांवरान्हविदुपा विरचितः स्वानुभवादर्शः
समासः ॥११॥
...
...
...
...
शरीफ सालेमहंमद ( काठियावाड) वेरापल.
दाउद शरीफ~-श्रीभावनगर.
नीच लिपे ग्रंथ हमारे वहासे मिलेंगे औ डाक
महसूल नहीं पड़ेगा मात्र वेल्धुपैएपलका हाफफमी-
शन पढ़ेगा । यह सर्वप्रए सारे हिंदुस्थान में जहां जहां
पुस्तक थेचनेवाले है । उनीस को मिल सकते हैं।
श्री विचारसागर ५५४ टिप्पणसहित भी वृति-
रत्नावलि तथा बडी अकारादि अनुप्रामणिका-
सहित तीरात
उक्ततृतीयावृति उत्तम कामनकी.
श्रीसुंदरविलास ज्ञानसमुद्र आदिक तृतीयाय २॥
उक्तततीयावृत्ति उत्तमझागजयी... ... ३
श्रीसटीकाअष्टावभागीता मूलको भाषासहित. १
,, उक्तग्रंथ उत्तम पूठे औ कागजा,... ...
श्रीविचारचंद्रोदय । तृतीयात्ति
श्रीपंचदशी । मूल ओ टीकाको मापा। दो विभाग
(घोटेही ग्रंथ रहे है।
श्रीपंचदशीका प्रथम प्ररण....
श्रीपंचदशीका भयम भी परम प्रकरण. १
श्रीपंचदशी भूलमान,... ... ... ...
"
की
...
..
४ ... ... १ " श्रीईशायष्टोपनिषद् । मूल औ श्रीशकरभाष्य अनुसार हिंदुस्थानोमै. श्रीवालबोध टीकासहित. उक्तग्रंथ चित्रित कपके पूठेसहित. श्रीपदार्थमंजूंपा (वेदातपदार्थकोश ॥ आगे०४ थे) ३ श्रीवेदस्तुति । अन्वययुक्त। तथा गुर्जरभाषा ॥ श्रीवेदांतविनोद ॥ इस नामसे अनेक लघुग्रंथ प्रकट किये जाते है । तिनमे ऐसे चिहवाले अथ छपे है । प्रत्येक अककी कीमत .)-।। रसी है । भी कोइषी ६ अका मात्र रु. ०॥ पडेगा ।। *१ वेदातपदावलि (श्रीविचारच.५ अखाभक्तके पद- द्रोदयका सार) ६ प्रास्ताविकश्लोक अर्थ- *२ वेदातपदार्थमज्ञा. सहित. ३सूफीओंके गजल. * ज्वेदातस्तोत्रसग्रह अर्थ- ४ देवाजी भक्तके पद. सहित. अक ३-४-५-६ इनसे आदिले के अनेक लघुप्रथ उपरि लिखे कमसे नही परतु समयसजोग अनुसार प्रकट किये जायेंगे।
॥ श्रीवेदांतविनोद ॥ ONDO पष्ठअंक ॥ ६॥ ॥श्रीवेदांतस्तोत्रसंग्रह ॥४॥ ब्रमनिष्टपंडित श्रीपीतांवरजीकृत भाषादीपिकासहित सर्वमुमुक्षुके हितार्थ शरीफ सालेमहंमदने छपाई प्रकट किया। श्रीमुंबई में निर्णयसागरप्रेसमें छपा । ॥ सरत् १९४५-सन् १८८९।। (प्रस्टातीने सर्वहा स्वाधीन रखे हैं) - ॥ प्रस्तावना ॥ मगल || दोहा॥ श्रीगुरुके पद वैदिके यह वेदांतविनोद ॥ प्रकट करों इस करि सर्वे सज्जन पावहुमोद १ बहुत मुमुक्षुजन श्रीमच्छकराचार्यकृत औ अन्यमहा- त्माकृत सस्कृतस्तोत्रनकृ पाठ किंवा कठ करते हैं। परतु निष्ठासी आरूदतामें उपयोगी तिन स्तोत्रनके अर्थ निश्चय करनेमै पराधीनताकू अनुभव करते हैं। तातै परमकारु- णिक ब्रह्मनिष्ठपडित श्रीपीतोपरजी महाराज, दयाकरिके स्तोत्रनकी भाषा करी है । औ सस्कृतमै अल्पअभ्यास- वान्कू यो प्रत्येक शब्दके अर्थका बोध होवै। तांते मूल में ओ भाषामै अन्वयअनुमार अौक रखे हैं । श्रोवेदातविनोदके इस पटअरमें जितने स्तोत्र छपे है सो नोचे लिखे है - श्रीदक्षिणामूर्तिस्तोत्रम् ॥ १२ ॥ श्रीपरापूजा ॥१३॥ श्रीमनीपापचक्स्तोनम् ॥१४॥ चतनसाहेवके गजेल ॥२॥ शरीफ सालेमहंमद. - ॥ ॐ गुरुपरमात्मने नमः॥ ॥श्रीवेदांतविनोद ॥ पष्ठअंक ॥६॥ ॥ श्रीवेदांतस्तोत्रसंग्रहमारंभः ॥ ४ ॥ ॥ अथ श्रीदक्षिणामूर्तिस्तोत्रम् १२ ॥ शार्दूलविक्रीडितं छंदः ॥ विश्व दर्पणदृश्यमाननगरी- तुल्यं निजांतर्गतं । पश्यन्नात्मनि मायया पहिरियो- द्भूतं ययौ निद्रया ॥ यः साक्षात्कुरुते प्रबोधसमये स्वात्मानमेवाद्वयम् । तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम 'ईदै श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ १॥ अर्थः-१दर्पणविपै दृश्यमान नगरीके तुल्य
दक्षिणामूर्तिस्तोत्रम् ॥१२॥ वेदांत
निजातरगत रविश्वकं जैसे निद्राकरि (देखिये
है।) तैसें ४मायाकरि बाहिर १उद्भूतकी ६न्या-
ई आत्मावि देखताहुया । ९जो १०प्र.
बोधके समयमें ११अद्वयरूप १२ स्वात्माकू-
ही १३साक्षात् (अपरोक्ष) करता है । १४तिस
श्रीगुरुकी मूर्तिरूप १५श्रीदक्षिणामूर्तिके ताई
१६यह १७नमस्कार होहु ॥ १ ॥
वीजस्यांतरिवांकुरो जैगदिदै
प्राङ् निर्विकल्पं पुन-
सयाकल्पितदेशकालकलना-
वैचित्र्यचित्रीकृतम् ॥
मायावीव विजृभयत्यपि मैहा-
योगीव यः स्वेच्छया।
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं
श्रीदक्षिणामूर्तये ॥२॥
my
विनोद ६] दक्षिणामूर्तिस्तोत्रम् ॥१२॥
अर्थ:-१वीन के भीतर २अंकुरकी ३न्याई
यह ५ जगत् ६पूर्व निर्विकल्प था। फिर मा.
याकरि कल्पितदेशकालकी कल्पनाके विचि-
बताकरि चित्रकी न्याई किया है ।। ७जो ८मा-
यावीकी न्याई औ ९महायोगीकी न्याई १०
स्वइच्छाकरि ११विजृभण (विलास) करता-
बी है। १२तिस श्रीगुरुमूर्तिरूप १३श्रीदक्षिणा-
मूर्तिके ताई १४यह १५नमस्कार होहु ॥ २॥
यस्यैव स्फुरणं सदात्मकमसत
कल्पार्थगं भासते।
साक्षात्तवमसीति वेटवनमा
यो बोधयाश्रितान् ॥
यंत्साक्षात्करणावेन पुनरा-
वृत्तिर्भवाभानिया।
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं
श्रीदक्षिणामूर्तये ॥३॥
४
दक्षिणामूर्तिस्तोत्रम् ॥१२॥ वेदांत
अर्थः-१जाहिका स्फुरण सत्वरूप हुया
असत्के तुल्य अर्थो विष अनुस्यूत भासता है ।
भौ २जो ३"तत्वमसि" इस वेदके वचनकरि
४आश्रितन (शरणागतन)कू साक्षात् बोधन
करै है । औ ७जिसके साक्षात्कारते (संसार-
सागर विपै ९पुनरारत्ति (पुनर्जन्म) १०होवै न-
हीं। ११तिस श्रीगुरुमूर्तिरूप १२श्रीदक्षिणा-
मूर्तिके ताई १३यह १४नमस्कार होहु ॥ ३ ॥
नांनाछिद्रघटोदरस्थितमहा-
दीपप्रभाभाखरं।
ज्ञानं यस्य तु चक्षुरादिकरण-
द्वारा वहिः स्पंदते ॥
जानामीति तमेव भांतर्मनुभा-
त्येतत्समस्तं जगत् ।
संस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं
श्रीदक्षिणामूर्तये ॥४॥
६
।
विनोद ६] दक्षिणामूर्तिस्तोत्रम् ॥१२॥
अर्थः-१नानाछिद्रयाले घटके उदरविषै
स्थित बडेदीपके प्रभाकी न्याई । प्रकाशवाला
२जाका ३ज्ञान तो चक्षुआदिकरणद्वारा पा-
हिर स्फुरता है । "मैं जानता हूं" ऐसें तिसीही-
के भासमान होते ५यह समस्तजगत् पीछे
भासता है । तिस श्रीगुरुमूर्तिरूप श्रीदक्षिणा-
मूर्तिके ताई ९यह १०नमस्कार होहु ॥ ४ ॥
देहं प्राणमपी द्रियाण्यपि चला
बुद्धिं च शून्यं विदुः ।
खीवालांधजडोपमास्वमिति
भ्रांता भृशं वादिनः॥
मायाशक्तिविलासकल्पितमहा-
व्यामोहसंहारिणे ।
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इद
श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ५॥
'दक्षिणामूर्तिस्तोत्रम् ॥१२॥
[वेदांत
अर्थः-१त्री वाल अंध अ.जडकी उपमावा-
ले २ अतिशयवादी ३भ्रांत पुरुप ४ तौ ५देह-
कू औ प्राणळू बी औ इंद्रियन वी औ चंचल-
बुद्धिकूँ भी शून्यकू ६"मैं हु ऐसे जानते
है। तिस ९मायाशक्तिके विलास (कार्य) रूप
कल्पित महाव्यामोहके संहार करनेहारे १०
श्रीगुरुमूर्तिरूप ११ श्रीदक्षिणामूर्तिके ताई १२यह
नमस्कार होहु ॥ ५॥
राहग्रस्तदिवाकरेंदुसदृशो
मायासमाच्छादनात् ।
सन्मात्रः करणोपसंहरणतो
योऽभूत्सुपुप्तः पुमान् ।।
प्रोगस्वासमिति प्रबोधसमये
यः प्रसभिज्ञायते ।
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं
श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ६॥
७
ते
विनोद ६] दक्षिणामूतिस्तोत्रम् ॥१२॥
अर्थ:-१माया करि सम्यक् ढापनेते । २रा-
हुकार ग्रस्त सूर्य औ चद्रके तुल्य ३सदमान-
रूप जो पुरुप । ६करणोंके उपसहार (विलय)
७सुपुप्त होवैहै । औ ९जो १० बोध (जान-
त) के समयविपै ११"में पूर्व सोयाथा" ऐसे
१२मत्यभिज्ञामत्यक्षका विषय करिये है। निस
श्रीगुरुमूर्तिरूप १३श्रीदक्षिणामूर्तिके ताई १४यह
१५नमस्कार होहु ॥ ६ ॥
वाल्यादिप्यपि जाग्रदादिषु तथा
सर्वास्ववस्थास्वपि
न्याचास्वनुवर्तमानमहमि-
त्यंतःस्फुरतं सदा ॥
स्वात्मानं मकटी करोति भजता
यो" भंद्रया मुद्रया।
तेस्मै श्रीगुरुमूर्तये नमद
श्रीक्षिणामूर्तये ॥७॥
८ दक्षिणामूर्तिस्तोत्रम् ॥१२॥ वेदांत अर्थः-१वाल्यआदिकन विपै वी । रतैसे ३ नागृत्आदिक न्यारत (परस्परभिन्न) सर्व अवस्थाके विष बी ६अनुवर्तमान । औ "मैं हूं" ऐसे भीतर ७सदा (स्फुरनेवाले ९स्वात्माकू १.जो ११भजन करनेवालेके मध्य १२भद्रा- मुद्राकरि १३प्रकट करै है । १४तिस श्रीगुरु- मुर्तिरूप १५श्रीदक्षिणामूर्तिके ताई १६यह १७नमस्कार होहु ॥ ७ ॥ विश्व पश्यति कार्यकारणतया स्वस्वामिसंवैधतः। शिप्याचार्यतया तथैव पिच पु- त्राद्यात्मना भेदतः॥ स्वप्ने जाग्रति वा य एप पुरुपो मायापरिभ्रामितम् ।
९ विनोद ६] दक्षिणामूर्तिस्तोत्रम् ॥१२॥ तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम ईद श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ८॥ अर्थः-१जो यह पुरुष मायाकरि चारिऔर- ते भ्रमकू प्राप्त हुया । २स्वमविषै ३वा ४जाग्र- तविषे ५कार्यकारणभावकरि । औ स्वस्वामी- संबंधते औ शिष्यआचार्यभावकरि । तैसेही पितापुत्रआदि स्वरूपकरि भेदते ६विश्वकू दे- खता है । ७तिस श्रीगुरुमूर्तिरूप (श्रीदक्षिणा- मूर्तिके ताई ९यह १० नमस्कार होहु ॥८॥ भूरंभास्यनलोऽनिलोऽबरमह- थो हिमांशुः पुमा- नित्पाभाति चराचरात्मकमिदं यस्यैव मूर्त्यष्टकम् ॥ नान्यत् किंचन विद्यते विमृशता यस्मापरस्माद्विभी- १० दक्षिणामातस्तोत्रम् ॥१२॥ [वेदांत स्तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥९॥ अर्थः-१ पृथ्वी जल तेज वायु आकाश सूर्य चंद्र औ पुरुप । ऐसें २चराचरस्वरूप यह जि. सोहीकी मूर्तिका अष्टक ३भासता है । औ ४विचार करनेवाले पुरुपन• जिस ५विभुरूप ६परमात्माते ७अन्य कछु बी नहीं विद्यमान है। १०तिस श्रीगुरुमूर्तिरूप ११श्रीदक्षिणा- मूर्तिके ताई १२यह १३नमस्कार होहु ॥ ९ ॥ सर्वात्मत्वमिति स्फुटीकृतमिदं यस्मादमुप्मिस्तये । तेनास्य श्रवणात्तथार्थमनना- ध्यानाच संकीर्तनात् ॥ सर्वात्मत्वमहाविभूतिसहितं स्यादीश्वरत्वं स्वतः।
१
विनोद १] दक्षिणामूर्तिस्तोत्रम् ॥१२॥
सिध्येत्तत्पुनरष्टधा परिणतं
चैवर्यमव्याहतम् ॥ १०॥
अर्थ:-१जति इस स्तोत्रविथै २ऐसे ३यह ।
सर्वात्मभाव ५स्पष्ट किया है । ६तिस हेतुकार
याके श्रवणते तथा अर्थके मननते औ ध्यान
औ संकीर्तनत । सर्वआत्मभावरूप महावि-
भूतिकरि सहित ७ईश्वरमाव स्वतःसिद्ध हो
है। सो फेर अष्टप्रकारसे परिणाम पाया
हुया ८अव्याहत ( अभंग) ९ऐश्वर्य १०होदै
॥ इति श्रीभापाटीकासहितं श्रीमच्छंकराचा.
यविरचितं दक्षिणामूर्तिस्तोत्रं समाप्तम् ॥१२॥
निदांत
॥ अथ श्रीपरापूजा प्रारंभः ॥१३॥
॥ अनुष्टुप् छंदः ॥
पूर्णस्यावाहनं कुत्र सर्वाधारस्य चासनम् ।
स्वच्छस्य पायर्मयं च शुद्धस्याचमनं कुतः॥२॥
अर्थ-१पूर्णका आवाहन कहां होगा ।२औ
३सर्वाधारका ४आसन कहां होवैगा । औ स्व-
च्छका पाद. ५अरु ६अर्घ्य औ शुद्धकू आ-
चमन कहांत होवैगा ॥ १ ॥
निर्मलस्य कुतः स्नान वस्त्रं विश्वोदरस्य च ।
निरीलंवस्योपवीतं पुप्पं निर्वासनस्य च ।।२।।
अर्थः- १ निर्मलकुं स्नान ३कहांत होगा।
४ औ विश्वोदरा ६वत्र अझ ७निरालंब…
उपवीत (जनोई) अरु ९निर्वासनकू १० पुष्प
कहांत होगा ॥ २॥
विनोद ६]
परापूजा ॥१३॥
निर्लपस्य कुतो गंधो रम्यस्याभरणं कुतः ।
निसत्तस्य नवेद्यं तांबूलं च कुतो विभौः॥३॥
अर्थ:-१निर्लेपर्चे गंध ३कहांत होवेगा।
औ रम्य ( रमणीय ) आमरण कहाँ हो.
वैगा । औ नित्यतृप्त ५विभुक नैवेद्य अरु
तांबूल ९ कहांत होगा ॥ ३॥
प्रदक्षिणा ानंतस्स ह्यद्वयस्य कुतो नतिः ।
वेदवाक्यरवेद्यस्य कुतः स्तोत्रं विधीयते ॥४॥
अर्थ:-मसिद्धधनंतकी प्रदक्षिणा औ
३मसिद्धअद्वितीय श्नति ५कैसे होवेगी। श्री
६वेदवाक्योंकरि अवेद्यका स्तोत्र कहां एवि.
धान करियह ॥ ४ ॥
स्वयं प्रकाशमानस्य कुतो नीराजनं विभोः ।
अंतर्बहिश्च पूर्णस्य फैयद्वासनं भवेत् ॥ ५॥
परापूजा ॥ १३ ॥
वेदात
अर्थ:-१स्वयंप्रकाशमान २विभुका ३नीराजन
(आरातिक) ४कहांत होवैगा । औ ५ भीतर
अरु बाहिर पूर्णका ६उद्वासन ( विसर्जन )कैसे
यहोवै ॥ ५॥
एवमेव परापूजा सर्वावस्थासु सर्वदा ।
एकबुद्धया तु देवेशे विधेया ब्रह्मवित्तमः॥६॥
अर्थ:-१इसप्रकारसँही परापूजा सर्वअव-
स्थाओंविषै सर्वदा एकबुद्धिसै तौ देवेशविपै
रब्रह्म वित्तमोकरि ३कर्तव्य है ।। ६ ॥
॥ इति श्रीभापाटीकासहिता परापूजा
समाप्ता ॥ १३॥
विनोद ६] अथ श्रीमनीपापंचकस्तोत्रम् ॥ १४ ॥ ॥ अनुष्टुप् छंदः॥ संसाचार्यस्य गमने कदाचिन्मुक्तिदायकम् । काशीक्षेत्रप्रति संह गौर्या मार्गे तु शंकरम् ॥ २॥ अंसवेषधरं दृष्ट्वा गच्छगच्छेति चाब्रवीत् । शंकरः सोऽपि चांडोलस्- "तं पुनः माह शंकरम् ॥२॥ अर्थ:-१कदाचित् मुक्तिदायक काशीक्षे. के प्रति २ श्रीशंकराचार्य गमन ३करते थे। तहां मार्गविषै तो ५गौरी ६सहित ७चांडाल- वेषधारी शंकरकू देखिके । १० श्रीशंकरा- चार्य स्वामी ११"गच्छ गच्छ (रस्ता छोड)" ऐसे कहते भये ।। १२सो १३चांडाल १४वी१५निस१६ श्रीशंकराचार्यकुं१७फेर कहता भया:-११-२॥ ६२ १४ ON मनीपापचकस्तोत्रम् ॥१४॥ वेदात ॥ आर्यावृत्त ॥ अन्नमयादन्नमय- मथवा चैतन्यमेव चतन्यात । द्विजवर दूरीकर्तुं वांछसि कि हि गच्छ गच्छति ॥३॥ अर्थ:-१हे द्विजवर (कर्मजड) ! २क्या ३"गच्छ गच्छ" ऐसे [ कहनेकरि । ४अन्नमयते अन्नमयकू अथवा चैतन्यते ६चैतन्याही परि करने• इच्छताहै ? सो कथन कर ॥ ३ ॥ ॥ शार्दूलविक्रीडितं छंदः ॥ कि गंगांबुनि विचितऽवरमणौ चांडालवाटीपयः। पूरे यांतरमस्ति कांचनवदी मृत्कुंभयांविरे ॥ प्रसग्वस्तुनि निस्तरंगसहजा- नंदावयोधांधी।
१६ विनोद ६] मनीषापंचकास्तोत्रम् ॥१४॥ विप्रोऽयं वचोऽयमिसपि महान् कोऽयं विभेदभ्रमः॥४॥ अर्थः-१क्या गंगाजल विपै २वा ३चांडाल- नके गलीके जलके पूरमै ४ प्रतिबिंधित सूर्यविपै ५वा ६सुवर्णके घट औ मृत्तिकाके घटमैं आ- काशविपै भेद है ! (कितु नहीं है)। ९निस्तरंग सहजआनंद अरु ज्ञानके समुद्ररूप १० प्रत्यगात्म. वस्तु विपै ११ "यह १२विप्र है १३यह १४चा- डाल है। १५ऐसा बी १६कौन यह १७वडा १-भेदभ्रम [तुनळू भया ] है ! ॥ ४ ॥ जाग्रत्स्वनमुषुप्तिषु स्फुटतरा यो संविदुज्जृभते । या ब्रह्मादिपिपीलिकांततनुपु प्रोता जगत्साक्षिणी॥ सेवाहं न च दृश्यवस्त्विंति दृढ- प्रज्ञापि यस्यास्ति "चेच मनीषापंचकस्तोत्रम् ||१४॥ वेदात चांडोलोऽस्तु सेतु द्विजोऽस्तु गुरुरि- खेषा मनीषा मेमे ॥५॥ अर्थ:-तहां श्रीशंकराचार्य स्वामी कह है:-जो संवित् (चिति) २जागृत्स्वम अरु सुपप्तिविप अत्यंतस्पष्ट ३ विलसती है। औ ४ जगत्की साक्षी- रूप जो (संवित् ) ब्रह्मास आदिलेकै चीटि- पर्यंत शरीरनविपै ओतप्रोत है । ६"सोई मैं हूं ७औ दृश्यवस्तु नहीं है"। ९ऐसी हदबुद्धि बी १० नब ११जाळू है । १२सो तो १३चांडाल हो वा १४ द्विज हो । परंतु सर्वका गुरु है। ऐसी यह १५मेरी १६बुद्धि (निश्चयरूपरत्ति) है ॥५॥ प्रेझैवाहमिदं जगच सकलं चिन्मात्रविस्तारितम् । सर्व "चैतदविद्यया त्रिगुणया शेपं मैया कल्पितम् ॥ इत्थं यस्य दृढा मतिः मुखतरे निसे 'परे निर्मले।
विनोद १] मनीपापंचकस्तोत्रम् ॥१४॥ १९ चांडालोऽस्तु स तु द्विजोऽस्तु गुरुरि- सेपा मनीपा मम ॥६॥ अर्थः-१मैं २ौ सकल चिन्मात्ररूप विस्ता- रित ३यह जगत् ४ब्रह्मही है । ५औ सर्व सं- पूर्ण यह ९त्रिगुणरूप १०अविद्यासे ११मुज- करि कल्पित है । ऐसी जाकी दृढमति अत्यं- तसुखरूप नित्य १२निर्मल १३परब्रह्मविष है। १ सौ लो १५चांडाल हो वा १६दिन हो । परंतु गुरु है । ऐसी यह १७मेरी १८वृद्धि है ।।६।। शैवनश्वरमेव विश्वमखिलं र्निचित्य वाचा गुरो- निसं ग्रॉ निरंतरं विशता नियाजशांतात्मना । भूत भौवि दुकतं मदहना संविन्मये पावके ।
२० मनीपापंचकस्तोत्रम् ॥१४॥ [वेदांत भारब्धाय समर्पित संवपुरि- त्येपा मैनीपा मैम ॥७॥ अर्थः-१संपूर्ण २विश्वकू निरंतर नश्वरही है। ऐसें ४गुरुके वचनते ६निश्चय करिके ७नित्य निरंतर ब्रह्मकू १०निष्कपट शांत- चित्तकरि ११विचारवाले । १२भूत १३औ १४ भाषी १५पाप १६संवित् (ज्ञान )मय अ- निविपै १७दहन करनेवाले जिसने १८अपना शरीर १९प्रारब्धके अर्थ समर्पण किया है । सो गुरु है २०ऐसी यह २१मेरी २२बुद्धि है ।। ७ ।। या तिर्यहनरदेवताभिरहमि- त्यन्तः स्फुटा गृह्यते । यद्भासा हृदयाक्षदेहविपया भांति स्वतोऽचेतनाः॥ तो भास्यः पिहितार्कमंडलनिभा स्फूतिं सदा भावयन् ।
१ विनोद ६] मनीपापंचकस्तोत्रम् ॥१४॥ २१ योगी नितमानसो हि गुरुरि- त्येपा मनीपा मम ॥८॥ अर्थः-१जो ( स्फूर्ति ) तिर्यक् नर औ देवता वोंकरि "मैं हूं" ऐसे अंतःकरणविपै स्पष्ट ग्रहण करिये है। औ जिसके प्रकाशकरि २स्वतः अचे. तनरूप ३अंतःकरण इंद्रिय देह औ विषय भा. सते है । तिस भास्य (मकाश्य बादलन) करि ढापेसूर्यमंडलके तुल्य स्फुर्ति सदा भावना करताहुया योगी (ज्ञानी) ५जाते ६आनंदित- मनवाला होवे है । ताते ७गुरु है । ऐसी यह मेरी बुद्धि है ॥ ८ ॥ यत्सौख्यांयुधिलेशलेशत इमे शकादयो निता। यश्चित्ते नितरां प्रशांतकलने लया युनिनिवृतः॥
मनापापंचकस्तोत्रम् ॥१४॥ वेदांत यस्मिनित्यमुखांधी गलितधी- ग्रीव ने बृह्मविद्यः। कश्चित्स सुरेंद्रवंदितपदो नूनं मनीपा ममें ॥ ९ ॥ अर्थ:-१जिस आनंदसमुद्र के लेशने ये ई- द्रादिक आनंदित हैं । औ २मुनि जो है सो ३निरंतर प्रशांतकल्पनावाले ४चित्तविपै ५जि- सकू पायके आनंदित होवैहै । औ (नित्य- सुखके समुद्ररूप ९जिसविपै १०गलितबुद्धि- वाला पुरुष ब्रह्मही है ११ब्रह्मवित् १२नहीं । ऐसा जो १३ कोईबी है सो सुरेंद्रकरि वंदित- पदवाला निश्चयकरि गुरु है । ऐसी १४मेरी १५बुद्धि है ॥ ९॥ ॥ इति भापाटीकासहितं मनीपापंचक- स्तोत्रम् समाप्तम् ॥ १४ ॥.
विनोद६]
दीवाने वतनस
॥ गजल ॥१॥
("गइ एक ब एक जो हवा पलटू" की राह )
खुदाइ कहता है जिस्कु आलम्
सो ये मि है एक खियाल मेरा।
बदलना सूरत् हजॉर ढवसे
हरेक दम्में है हाल मेरा ॥ १॥
अर्थ:-जिसकू लोक ईश्वर कहते हैं सो मात्र
मेरी कल्पनाही है औ हजारप्रकारसे जो माणि-
योकी आस्तीका पलटना है । सो तिनोके प्र.
त्येक श्वासमें मेरी स्थिति बोधन करे है ॥१॥
कहीं सजन्जल कहीं हुँ सूरत
कहाँ हुँ दीद और कहाँ हुँ हैरत् ।
नर हुई है नसीय जिन्कु
वो देखते हैं जमाल मेरा ॥२॥
२४ वेदांत ॥ गजेल ॥१॥ अर्थः-कहुं आभास तो कहुं बिवरूप हूं । कहुं दर्शन तो कई दृश्यरूप हूं। परंतु जिनोदूं गुरुकृपासे ज्ञानचक्षु प्राप्त भई है सो मेरे स्वरूपकू देखते हैं ॥ २ ॥ कहाँ हुँ सूरज कहीं हुँ जरा कहीं हुँ दरिया कहीं हुँ कतरा। वफौरे कसरत्से अपने मुजकु हुवा है मिल्ना महाल मेरा ॥ ३ ॥ अर्थः यद्यपि कहुं सूर्य तो कहुं अणुरूप हूं। कहुं समुद्र तो कहुं विदुरूप हूं । तथापि प्रपंच. दृष्टि से मेरेकू मेरा मिलना दुर्लभ भया है ।। ३ ॥ तलस्म इसरारे गन्जे मखफि कहूँ न सीनेकुँ अपने क्यु कर । अयाँ हुवा हाले हर्दो आलम् हवा जो जॉहिर कमाल मेरा ॥४॥ अर्थः-गुप्तरत्नखाणिका यह एक चमत्कार
विनोद६
गजेल ॥ १॥
है । सो में अपने अंतःकरणहूँ किस वासते न
कहुं ? जबसे मेरा ऐश्वर्य प्रकट भया है तबसे
दोनूलोक (इसलोक और परलोक )का मर्म
स्पष्ट हो गया है ।। ४ ॥
हिजाचे खुर्शद जातेमॉनि
हुवा जहूरे नमूदे सूरत् ।
मिटा जो दुनियासे नाम आदम्
हुवा है मुजकु विसाल मेरा ॥ ५॥
अर्थ:-नामरूपके प्रकट होनेसे लक्ष्यस्वरूप
सूर्यकू आवरण भया । परंतु जबसे जगतमेसे
आदम नामका नाश भया तबसे मेरेकू मेरी
प्राप्ती भई है ॥ ५॥
हमेशा आँसुंकु वंध रखना
जमाल मोनिका देखना है।
जो गोशेकर हैं वो है समात्
जो वेवानि है कॉल मेरा ॥६॥
॥ गजैल ॥ १॥ [वेदात अलस्तो कालूवला अर्थ:-निरंतर बहिरमुखदृष्टीरूप नेत्रनकू दां- पना लक्ष्यस्वरूपका देखना है । जो एकांतमें बैठे हैं सो श्रवण करते हैं । तैसे में जिहारहित- काही यह कथन है ॥ ६॥ "कि रम्जै न पूछ मुजसे वतन् तु हगिर्जे । आप मशगूल आप शागिल् जवाव खुद है सवाल मेरा ॥ ७ ॥ अर्थ:-वतन साहेब कहते हैं:-"मैं तुमारा श्वर हूं वां नहीं ? अवश्य हो" इस विनोदकुं हे मुमुक्षु ! तूं मुजसे कदाचित् वारंवार मति पूछ । सुन कहता हूं:- मैही बंध भया हूं औ मेही बंधका कर्ता हूँ औ उक्तमन मेरा है तथा उत्तर बी मेराही है ॥ ७ ॥ ऐसा प्रसग है कि "सटिक आदिकालमैं परमेश्वरने सर्वजीवनकू पूछा जो मैं तुमारा ईश्वर दूधा नहीं? तय कितनेक जीवोंने उत्तर दिया जो 'अवश्य हो"।
विनोद ६ ॥ गजल ॥२॥ ("सफरका होता है ऐसा भी" इत्यादिक राह) न बन्दा न खुदा था मुजे मालूम न था । दोनु इल्लत्से जुदा यामुळे मालूम न था ||२|| अर्थ:-में जीव नहीं था औं ईश्वर बी नहीं था परंतु दोउपाधिसे न्यारा था । इतना मे- र ज्ञात नहीं था ॥ १ ॥ शिल्ले हैरत् हुइ आईनये दिल्से पैदा मानिये शान सफाथा मुजे मालूमन था॥२॥ अर्थ:-अंतःकरणरूप दर्पणसे एक आर्य- रूप मूर्ति प्रकट हुई । तिसका अर्थरूप किंव निर्मल था। परंतु मेरे• ज्ञात नहीं था ॥२॥ देखता था मैं जिसे होके नदीदा हर्स। मेरी ऑखाम छुपा था मुर्जे मालूम् न था॥२॥ अर्थ:-जिसकूँ मै चारहित होईको सदि- शामि देखता था ! वो मेरी चइनमें गुप्त था। यह रत्तांत मेरेकू ज्ञात नहीं था ।। ३ ।। आपही आप हो याँ तालियो मतलूब है कोन्। मैं जी आशक् हुँकहा था मुजे मालूम न था ॥४ गजल || २ ॥ अर्थ:-अपना आप होनेते इहां मुमुक्षु औ मोक्ष क्या है ? अज्ञानदशामें ऐसे कहता था कि “मैं आ. शक् हूं" परंतु उक्तअनुभव मेरेकू ज्ञात नहीं था। दिल्के आईनेकुँ मैं रूवरू रख कर देखा । आपका रूये सफाथा मुजें मालूम् न था ॥५॥ अर्थ:-अंतःकरणरूप दर्पणकू मैंने सन्मुख राखिके देखा तो यद्यपि मेरा मुख निर्मल था तथापि सो मेरेकू ज्ञात नहीं था ।। ५ ।। वजे मालूम हुई तुजसे न मिल्नेकि सनम् । मैं हि खुद पर्दे हुवा था मुर्जे मालूम् न था।॥६॥ अर्थ:-हे प्रिय ! तेरेसे योग करनेकी युक्ति मेरेकू ज्ञात न हुई । काहे जो मैंही आप आव- रण भया था। यह मेरेकू ज्ञात नहीं था॥ ६ ॥ बाँदे मुद्दत् जो हुवा वस्ल खुला राजे वतन् । वासिले हक्में सदा था मुजे मालूम् न था॥७॥ अर्थः-दीर्घकालके पीछे जय ब्रह्मात्माकी प्राप्ति भई तब मर्म खुल गया जो मैं वतन सत्यस्वरूपमै सर्वदा एकरस पूर्वसही था। परंतु यह मेरे ज्ञात नहीं था
.
शरीफ सालमहंमद ( काठियावाड ) वेरावल.
दाउद शरीफ-श्रीभावनगर.
नीचे लिखे प्रय हमारे वहासे मिलेंगे औ डाक
महसूल नही पडेगा मात्र वेल्युएबलका डाकनमी.
शन पडेगा ।। यह सर्वप्रथ सारे हिंदुस्थानमें जहा जहा
पुस्तक पेचनेवाले है उनसे बी मिल सकते है।
श्रीविचारसागर ५५४ टिप्पणसहित औ पति-
रत्नावली तथा बडी अकारादि अनुक्रमणिका-
सहित तृतीयात्ति
उक्ततृतीयावृत्ति उत्तमकागजकी .
श्रीसुंदरविलास ज्ञानसमुद्र आदिक तृतीया० २१
" उक्ततृतीयावृत्ति उत्तमशागजी...
श्रीसटीकाअष्टावक्रगीता मूलकी मापासहित १
उक्मग्रंथ उत्तम पढे औ कागजका....
श्रीविचारचंद्रोदय । तृतीयात्ति
श्रीपंचदशी । मूल औ टोमाकी भाग दो विभाग,
(थोडेही प्रय रहे हैं)
१५
श्रीपंचदशीका प्रथम प्रार....
14
श्रीपंचदशीका प्रथम भी पचम प्रारण.
श्रीपंचदशी मुलगान....
"
...
...
...
... ... 011 ... ... १ ... श्रीईशाद्यष्टोपनिषद् । मूल औ श्रीशकरभाष्य अनुसार हिंदुस्थानी श्रीवालबोध टीकासहित. ,, उक्तग्रंथ चित्रित कपडेके पूठेसहित श्रीपदार्थमंजूषा (वेदातपदार्थकोश ।। आगेह०४ थे) ३ श्रीवेदस्तुति । अन्वययुक्ता। तथा गुर्जरभाषा ॥ श्रीवेदांतविनोद ॥ इस नामसँ अनेक लघुप्रथ प्रकट किये जाते है। तिनम ऐमै चिहवाले प्रथ छपे हैं। प्रत्येक अककी कीमत .)। रखी है । औ कोइबी ६ अरुका मात्र रु ॥ पडेगा ॥ ५१ वैदातपदावलि (श्रीवि ५७ वेदातस्तोत्रसग्रह अर्थ- चारचद्रोदयका सार) सहित. अर३-४.५६ *२वेदातपदार्थसज्ञा. ८ श्रीदीवाने वतन. ३ सूपीओंके गजल. ९ श्रीशकराचार्यकृत अ- ४ देवाजी भक्त पद. परोक्षानुभूति आदिक. ५ अखाभक्तके पद. १० श्रीयोगवासिष्ठमैसे ह. ६ प्रस्ताविश्लोक अर्थसहित. टात दाति मूल सहित. इनसे आदिलेके अनेक लघुप्रय उपरि लिखे नमसे नही परतु समयमंजोग अनुमार प्रकट किये जावेंगे ।।
॥ श्रीवेदांतविनोद.॥ सप्तम अंक ॥ ७ ॥ ॥श्रीमहावाक्यविवेक॥ तत्त्वप्रकाशिकाव्याख्या सहित ब्रह्मनिष्ठपंडित श्रीपीतांवरजीकृत सर्वमुमुक्षुके हितार्थ शरीफ सालेमहंमदने छपाई प्रकट किया। श्रीमुंबईमें निर्णयसागरप्रेसमें छपा ॥ । सवत् १९४६-सन् १८८९ ॥ (प्रकटकर्ताने सर्वहक स्वाधीन रखे हैं) ॥ प्रस्तावना॥ मंगल !! दोहा ॥ श्रीगुरुके पद बंदिके यह वेदांतविनोद | प्रकट करों इस करि सवें सज्जन पावहुमोद इन लघुग्रंथनर्से वेदांतनिष्ठ महापुरुषोंकू विनोद होवे औ मुमुक्षुनकू आत्मज्ञानका अभ्यास होईके परमपदकी प्राप्ति होवै । ऐसे दो हेतुकू चित्तविपे राखिके प्रकट किये जाते है॥ श्रीपंचदशी जैसा वेदांतविषे उत्कृष्ट मननसहायक प्र. क्रियाकी दृढता उपयोगी अन्यग्रंथ नहीं है ॥ पूर्व सन् १८७६ में (१४ वर्षसे पूर्व ) यह ग्रंध दो विभागमें ब्रह्म निष्ठपंडित श्रीपोतांवरजी महाराजकृत तत्वप्रकाशिकाव्या- ख्यासहित मैंने छपवाया था ॥ इसमें श्रीमहावाक्यविवेक नामक पंचम लघुप्रकरण है । सो इस अंकमें प्रकट किया है। अंतमै श्रीपंचदशीके प्रस्ताविक श्लोक अर्थसहित इसीभंककी रूढीपर पूर्णपंचदशी छपायनेका मैंने संक- रूप किया है । सो हरिइच्छाकरि कालपाइके सिद्ध हविगा। शरीफ सालेमहंमद. ।
॥ॐ गुरुपरमात्मने नमः॥ ॥ श्रीवेदांतविनोद ॥ सप्तम अंक ॥७॥ श्री पंचदशीगत श्रीमहावाक्यविवेकनाम पंचमप्रकरणमारंभः ॥५॥ ॥ भाषाकर्ताकृत मंगलाचरण ॥ श्रीमत्सर्वगुरून् नत्वा पंचदश्या तृभापया । महावाक्यविवेकस्य कुर्वे तत्त्वप्रकाशिकाम्॥२॥ अर्थ:-श्रीयुक्तसर्वगुरुनकुं नमनकरिके नर- भाषासें पंचदशीके महावाक्यविवेक नाम पंचम- , च्यारिमहावास्यनसा है विवेक (विभाग) जिस विष सो॥
२ पंचदशी-महावाक्यविवेक ॥५॥ वेदांत मकरणकी तत्वप्रकाशिका (नाम व्याख्या) में करं हूं ॥ १॥ ॥संस्कृतटीकाकारकृत मंगलाचरण।। नत्वा श्रीभारतीतीर्थविद्यारण्यमुनीश्वरौ । महावाक्यविवेकस्य कुर्वे व्याख्यां समासतः १ अर्थः-श्रीमत् भारतीतीर्थ औ विद्यारण्य इन दोमुनीश्वरनई नमनकरिके महावाक्यविवेककी व्याख्या में संक्षेप करूं हूं ॥ १ ॥ ॥१॥ ऋग्वेदकी ऐतरेयउपनि- पद्गत इस महा- वाक्यका अर्थ ॥२८७-२८८॥ ॥१॥ प्रज्ञान पद्का अर्थ ॥२८७॥ ॥२८७॥ मुमुक्षुनकू मोक्षका साधन जो ब्रह्मआत्माकी एकताका ज्ञान है । तिसकी सिद्धि- अर्थ प्रसिद्ध (च्यारिवेदनमें प्रगट) जो च्यारि. "प्रज्ञानं ब्रह्म "
विनोद ७] पंचदशी-महावाक्यविवेक ॥५॥ ३
महावाक्य हैं तिनके अर्थकू क्रम निरूपन
करते हुये परमपालआचार्य (श्रीविद्यार-
ण्यस्वामी) आदिविष प्रथम ऋग्वेदकी ऐतरे.
यारण्यकगत "प्रज्ञानं ब्रह्म" (प्रज्ञान ब्रह्म है)
इस महापाक्यविपै "मज्ञान" शब्द (पद) के अ.
र्थक कहै हैं:-
येनेक्षते शृणोतीदं जिघति व्याकरोति च ।
स्वादस्वादू विजानाति तत् प्रज्ञानमुदीरितम् १
"येन इदम् ईक्षते शृणोति जिप्रति
व्याकरोति च स्वादस्वादू विजानाति तत्
मज्ञानम् उदीरितम् "] जिस (चैतन्य)
करि पुरुप इस (रूपादिक)कू देखता है औ
शन्दकू सुनता है औ गंधकू सूंघता है औ
शब्दकू बोलता है औ सादूअस्तादू (रस)
जानता है सो (वृत्तिउपलक्षित चैतन्य)
प्रज्ञान" कया है।॥ १॥
२ पंचदशी-महावाक्यविवेक ॥ ५॥ वेदांत प्रकरणकी तत्वप्रकाशिका (नाम व्याख्या ) मैं करुं हूं ॥१॥ संस्कृतटीकाकारकृत मंगलाचरण।। नत्वा श्रीभारतीतीर्थविद्यारण्यमुनीश्वरौ । महावाक्यविवेकस्य कुर्वे व्याख्यां समासतः अर्थः-श्रीमत् भारतीतीर्थ औ विद्यारण्य इन दोमुनीश्वरनईं नमनकरिके महावाक्यविवेककी व्याख्या में संक्षेपः करुं हूं ॥१॥ ॥३॥ ऋग्वेदकी ऐतरेयउपनि- पद्गत प्रज्ञानं ब्रह्म” इस महा- वाक्यका अर्थ ॥२८७-२८८॥ पदका अर्थ ॥२८॥ ॥२८७॥ मुमुक्षुनर्ले मोसका साधन जो ब्रह्मआत्माकी एकताका ज्ञान है । तिसकी सिद्धि- अर्थ प्रसिद्ध (च्यारिवेदनमैं प्रगट) जो च्यारि- ॥१॥ मज्ञान"
विनोद ७] पंचदशी-महावाक्यविवेक ॥ ५॥ ३
महावाक्य है तिनके अर्थ• क्रमते निरूपन
करते हुये परमपालुआचार्य्य (श्रीविद्यार-
ण्यस्वामी ) आदिवि प्रथम ऋग्वेदकी ऐतरे-
यारण्यकगत “प्रज्ञानं ब्रह्म" (प्रज्ञान बहा है)
इस महावाक्यपि "प्रज्ञान" शब्द (पद) के अ.
र्थकू कहै हैं:-
येनेक्षते शृणोतीदं जिघ्रति व्याकरोति च ।
स्थाद्वस्वादू विजानाति त मज्ञानमुदीरितम् १
{"येन इदम् ईक्षते शृणोति निप्रति
व्याकरोति च स्वाहस्वादु विजानाति तत्
मज्ञानम् उदीरितम् "] जिस (चैतन्य)
करि पुरुष इस (रूपादिक) देखता है औ
शन्द• सुनता है भी गंध सूंघता है औ
शब्दकू वोलता है औ साअखादू (रस हूं
जानता है सो (त्तिउपलक्षित चैतन्य)
मज्ञान" कहा है ॥ १॥
४ पंचदशी-माहावाक्यविवेक ॥ ५॥ (वेदांत, टीका:-जिस 'चक्षुद्वारा निर्गत (निकसी) अंतःकरणकी वृत्तिउपहित ( साक्षी )चैतन्यकरि इस देखनैयोग्य रूपआदिककू पुरुष (संवात- रूप पुरुष ) देखता है । तैसे श्रोत्रद्वारा निर्गत अंतःकरणवृत्तिरूप उपाधिवाले जिस (चैतन्य)- करि पुरुष शब्दके समूहकू सुनता है। तेसैंही घाण (नासिका )द्वारा निर्गत अंतःकरणवृत्ति- रूप उपाधिवाले जिस (चैतन्य )करि पुरुष गंधके समूहळू सूंघता है । औ जिस वाइंद्रिय अवच्छिन्न (उपहित )चैतन्यकरि पुरुष श- ब्दके समूहळू बोलता है । औ रसनइंद्रियद्वारा निर्गत अंतःकरणवृत्तिरूप उपाधिवाले जिस (चै- तन्य)करि स्वादुअस्वादु दोभांतिके रसकू पुरुष जानता है । इहां (मूल श्लोकविषै) जो च" शब्द है । सो अनुक्त (नहीं कहे अन्य- इंद्रियन )के समुदाय (ग्रहण )अर्थ है ॥ तैसे .विनोद ७] पंचदशी-महावाक्यविवेक ॥ ५॥ ६ हुये कही भी नहीं कही सफल इंद्रिय भी अंत:- करणकी वृत्तिनकरि उपलक्षित जो (कूटस्थ) चैतन्य है। सोइ इहां (“प्रज्ञानं ब्रह्म" इस महावाक्यविपै) " प्रज्ञान " ऐसे कहिये है । यह अर्थ है ।। इस कहनेकरि । जिसकरि "प्रसिद्धि दे- खता है" इस आदिवाला औ " सर्वहीं यह प्र- ज्ञानके नामधेय (नाम) हैं" इस अंतवाला जो अवांतर (आत्माके स्वरूपके बोधक) वाक्यका समूह है तिसका अर्थ संक्षेपकरिके दिखाया ॥१॥ ॥२॥ "ब्रम" पदका अर्थ औ (एक- तारूप) वाक्यार्थ ॥ २८८ ॥ ॥२८८॥ ऐसें " प्रज्ञान " शब्दके अर्थदूं कहिके "ब्रह्म" शब्दके अर्थकू कहै हैं:- चतुर्मुखेंद्रदेवेषु मनुष्याश्वगवादिपु । चैतन्यमेकं ब्रह्मातः प्रज्ञानं ब्रह्म मय्यपि॥२॥ 00000038 gaooooooo
६ पंचदशी-महावाक्यविवेक ॥५॥ वेदांत
["चतुर्मुखेंद्रदेवेषु मनुष्याचगवादिषु एक
चैतन्यं ब्रह्म"] चतुर्मुख (ब्रह्मा) इंद्रदे-
बनविपै औ मनुष्य अश्व गौआदिकनविप
जो एकचैतन्य है सोब्रह्म है।
टीकाः-उत्तम जो देवादिक हैं औ मध्यम जो
मनुप्य हैं औ अधम जो अश्वगीआदिक हैं तिन
सर्वदेहधारिनविप औ आकाशादिकभूतनविर्षे
जगत्के जन्मआदिक (स्थितिलय)का हेतुरूप
जो एकचैतन्य है सो ब्रह्म है । यह अर्थ है ।।
इस कहनकर "यह (ज्ञानरूर आत्मा)
ब्रह्मा है । यह इंद्र है" इस आदिवाला । औ
प्रज्ञा (ज्ञानरूप चैतन्य) प्रतिष्ठा (सर्वका
अधिष्ठान ) है" इस अंतवाला । जो अवांतर
(ब्रह्मके स्वरूपका बोधक) वाक्यका समूह है
तिसका अर्थ संक्षेपकरिके दिखाया ।
ऐसें, "प्रशान" औ "ब्रह्म" इन पदनके अर्थक
"
विनोद ७] पंचदशी-गहावाक्यविवेक ॥५॥ ७ कहिके नामय (पदसमृदायरूप)के अर्थक् कहै ।-- [“ अतः मयि अपि प्रज्ञानम् ब्रह्म"] याते मेरेविप वी (शित) प्रज्ञान ब्रह्म है ॥२॥ टीका:-- जाते सर्व देव मनुष्य पशु आका- शादिकविप स्थित प्रज्ञान ब्रह्म है । यातै मेरे- विष वी स्थित प्रज्ञान ब्रह्म है ।। काहेते । प्रज्ञान- पनैके अविशेष (समानपन). ।। यह अर्थ है ॥२॥ ।।२।। यजुर्वेदकी वृहदारण्यकउ- पनिपद्गत “अहं ब्रह्मास्मि” इस महावाक्यका अर्थ ॥२८९-२९०॥ ॥२॥ "अहं" पदका अर्थ ॥२८९ ॥ ॥२८९॥ ऐसें कावेदकी शाखाविप स्थित वाक्यके अर्थवं निरूपण करिके अब यजुर्वेदकी शाखाऊके मध्यम जो वृहदारण्यकउपनिषद् है &000ccococoas cocococoscmococcococke ८ पंचदशी-महावाक्यविवेक ॥५॥ [वेदांत तिसविप गत " अहं ब्रह्मास्मि (मैं ब्रह्म हूं)" इस महावाक्य (जीवब्रह्मकी एकताके बोधक वाक्य )के अर्थके प्रकट करनेवास्ते " अहं" शब्दके अर्थ. कहै हैं:- परिपूर्णः परात्माऽस्मिन्देहे विद्याऽधिकारिणि युद्धेःसाक्षितया स्थित्वा स्फुरनहमितीर्यते ३ [" परिपूर्णः परात्मा विद्याधिकारिणि अस्मिन् देहे बुद्धः साक्षितया स्थिखा स्फु- रन् अहम् इति ईर्यते"] परिपूर्ण परमा- स्मा। विद्या (ज्ञान)के अधिकारी इस दे. हविपै बुद्धिका साक्षी होनेकरि स्थित होयके जो स्फुरता है । सो “अहं" (मैं) इस पदकरि कहिये है ॥ ३॥ टीका:-- परिपूर्ण कहिये स्वमाव ( स्वरूप) तै देशकालवस्तुकरि अपरिच्छिन्न जो परमात्मा । सो इस (मायाकरि कल्पितजगत् विपै विनोद ७J पंचदशी-महावाक्यविवेक ॥ ५ ॥ ९ विद्याके अधिकारी (शमादिकसाधनयुक्त हो नैकरि ब्रह्मविद्या सपादनके योग्य ) इस (श्रव- णादिकके अनुष्टानवाले) मनुष्यादिशरीरविषै बुद्धि (बुद्धिकरि उपलक्षित सूक्ष्मशरीर )के सा क्षी (अविकारीपनैसै अवभासक होनेकरि स्थित होयके स्फुरता (प्रकाशमान) है । सो लक्षणासे "अहं" पदकरि कहिये है । यह अर्थ है ॥३॥ ॥२॥ "ब्रम" पदका अर्थ औ "अ- स्मि" पदके अर्थकरि (एकतारूप) वाक्यार्थ ॥२९॥ ॥२९॥ "ब्रह्म" शब्दके अर्थ कहै हैं:- स्वतः पूर्णः परात्माऽत्र ब्रह्मशब्देन वर्णितः। अस्मीत्यैक्यपरामर्शस्तेन ब्रह्म भवाम्यहम् ४॥ "सतः पूर्णः परात्मा अब ब्रह्मशब्देन वर्णितः"] स्वतः पूर्ण परमात्मा जो है । सो Saccccoococcoococcoscosex S:000000002 १० पंचदशी-महावाक्यविवेक ॥५॥ वेदांत इहां “ब्रह्म" शब्दकरि वर्णन किया है ।। टीकाः- स्वतः परिपूर्ण । कहिये स्वभावते देशकालादिकरि अनवच्छिन्न (अपरिच्छिन्न) जो पूर्व ( २८९वें श्लोकविपै) उक्त परमात्मा है । सो इहां (“ अहं बह्मास्मि" इस महावाक्य- विप) “ब्रह्म" शब्दकरि वर्णन किया (ल. क्षणासे कया ) है ॥ यह अर्थ है ॥ इस वाक्यगत अस्मि" इस पदकरि दोन "अहं" अरु "ब्रह्म 1 इन ) पदनके सा. २ मित्रअर्थयुक्त (अपर्याय) पदनकी समान विभक्तिके पलसें एकही अर्थविष जो प्रवृत्ति । सो सामानाधिकरण्य कहिये है। इहां (इस वाक्यविषे) अहं" औ "ब्रह्म" ये दोपद् फ्रम आत्मा भी ब्रह्मरूप अर्थक बोधक हैं। याते भिधअर्थयुक्त (अपर्याय) है। परंतु समान (प्रथमा) विभक्तिके पल से तिन दोपदनको अखडएकरसतारूप ए- कहीं अर्थविषै प्रवृत्ति (लक्षणासै धर्तना) है । सो सामा- माधियारण्य है । तिसहीसे झारमाकी एकता सिद्ध है। ( विनोद ७] पंचदशी-महावाक्यविवेक ॥५॥ ११ मानाधिकरण्यर्स लभ्य (प्राप्य) जो जीव ब्रह्मकी एकता है । सो स्मरण करिये है । ऐसें कहै है:- ["अस्मि इति ऐक्यपरामर्श:"]"अस्मि" यह पद एकताका परामर्शक (स्मरण करा- चनहारा) है। फालित (वाक्यार्थ) दूं कहै हैं:- [" तेन अहम् ब्रह्म भवामि"] तिस (हेतु) करि "मैं ब्रह्मही हूं ॥४॥ ॥३॥ सामवेदकी छांदोग्यउपनिपक्ष्- गत "तत्वमसि" इस महावाक्य- का अर्थ ॥ २९१-२९२॥ ॥१॥ "तत्" पदका अर्थ ॥२९॥ ॥२९॥ अव सामवेदकी छांदोग्य उपनि- तिसका अस्मि" पद रमरण करावनहारा है। अन्य अर्थका वोध " अस्मि" पद नहीं है । 2-0000020030030000000cccoconcon recoccoccals १२ पंचदशी-महावाक्यविवेक॥ ५॥ वेदांत पद्गत "तत्त्वमसि" (सो तूं है) इस महावा- क्यके अर्थके प्रकाश करनेवास्ते "त" (सो)प. दके लक्ष्य (लक्षणावृत्तिके विपय) अर्थत कहै है:- एकमेवाद्वितीयं सन् नामरूपविवर्जितम् । सृष्टेः पुराऽधुनाऽप्यस्य तादृक्त्वं तदितीर्यते ५ ["सृष्टेः पुरा एकम् एव अद्वितीयम् नाम- रूपविवर्जितम् सत् । अस्य अधुना अपिता- क्त्वम् तत् इति ईर्यते"] सृष्टित पूर्व एकहीं अद्वितीय नामरूपरहित जो सत् था । इस (सत् का अव (सृष्टिके पीछे) वी तैसैपना। तत्" (सो) ऐसे कहिये है ॥५॥ टीका:- "हे सोम्य यह (जगत् ) आगे एकहीं अद्वितीयरूप सहीं था 1 इस श्रुति- ३"तत्वमसि " यह सामवेदकी छांदोग्यउपनिषदके पष्टप्रपाठक (अध्याय) गत महावाक्य है । सो नववार उपदेश किया है।
विनोद ७] पंचदशी-महावाक्यविवेक ॥ ५॥ १३ पाक्यकारि सृष्टितं पूर्व स्वगतादिभेदशूना भी ना. मरूपरहित जो सत्वस्तु प्रतिपादन किया है। इस (सद्वस्तु )का अब (सृष्टित उत्तरकालवि) पी विचारष्टिर्स जो तैसैपना (स्वगतादिभेद- रहित नामरूपवर्जित सत्पना) है । सो "तत्" इस पदकरि कहिये (लक्षणासै जानिये) है। यह अर्थ है ॥५॥ ॥२॥ "त्वं" पदका अर्थ औ "असि" पदके अर्थकरि (एकातारूप) वाक्यार्थ ॥ २९२॥ ॥२९२॥ त्व" पदके लक्ष्यभर्थक कहै हैं:- ओतुर्देहेंद्रियातीतं वस्त्वत्र वंपदेरितम् । पंकता ग्राह्यतेऽसीति तदैक्यमनुभूयताम्॥६॥ "श्रोतुः देहेंद्रियातीतं वस्तु अत्र खपदे- रितम् "] श्रोताके देहइंद्रियतै अतीत जो Sooooo cocood cosccebcOE १४ पंचदशी-महावाक्यविवेक ॥५॥ वेदांत वस्तु (सतरूप आत्मा) है । सो इहां "त्व" पदकरि कहिये है। टीका:- श्रवणादिकके अनुष्ठानसे महावा- क्यके अर्थकी प्रतिपत्ति (निश्चय ) करनैहारा जो श्रोता है । तिसके देहइद्रियते अतीत कहिये देह औ इंद्रियतै उपलक्षित स्थूलसूक्ष्म- आदि (कारण )रूप तीनशरीर हैं । तिनका साक्षी होनेकरि तिनते विलक्षण सद्वस्तु है । सो महावाक्यगत इस पदकरि लक्षित (लक्षणासै जान्या) है । यह अर्थ है ।। इस वाक्यमें स्थित " असि"(है) इस प- दकरि " तत्" औ "त्व" इन पदनके सामा- नाधिकरण्यसै लब्ध (प्राप्त) जो दोपदनके अर्थ (ब्रह्म औ आत्मा)को एकता (सिद्ध) है । सो शिष्यके ताई मतीति कराइये है। ऐसें कहै हैं:- [""असि' इति एकता ग्राह्यते"] "त्वं विनोद ७] पंचदशी महावाक्यविवेक ॥ ५॥ १५ असि (है)" इस पदकरि एकता ग्रहण कराइये है ॥ इस निरूपणकरि सिद्ध भया जो अर्थ (चाक्यार्थ) ताकू कहै हैं:- [" तदैक्यं अनुभूयताम"] यात तिनकी एकता अनुभव करना ॥ ६ ॥ टीका:- यात तिन "त" औं "स्व" पदके अर्थ (ब्रह्म आत्मा)को प्रमाणसिद्ध ए- कता मुमुक्षुजनोंकरि अनुभव (साक्षात् ) करनी चाहिये । यह अर्थ है ॥६॥ ॥४॥ अथर्वणवेदकी मांडूक्यउपनि- पद्गत "अयमात्मा ब्रह्म" इस महावाक्यका अर्थ ।।२९३-२९॥ ॥१॥"अयं" औ "आत्मा" पदका 3.cccccoacod cconococ00000000000000000000098 अर्थ ॥२९३।। ३
H
१६ पंचदशी-महावाक्यविवेक ॥५॥ वेदांत
॥२९३॥ अब क्रमतें प्राप्त अथर्वणवेदकी
मांडूक्यउपनिषद्गत " अयमात्मा ब्रह्म" (यह
आत्मा ब्रह्म है)। इस महावाक्यके अर्थकू
व्याख्या करनैकू इच्छते हुये आचार्य । आदि-
विपै "अयं" (यह) औ "आत्मा" (आप) इन दो-
पदनकरि विवक्षितअर्थकू क्रमकरि दिखावै हैं:-
स्वप्रकाशापरोक्षत्वमयमित्युक्तितो मतम् ।
अहंकाराऽऽदिदेहांतात् प्रसगात्मेति गीयते ७
["'अयम्' इति उक्तितः स्वप्रकाशा-
परोक्षवं मतम्"] "अयं" इस उक्ति (पद)
४ यह अथर्वणवेदकी मांडूक्यउपनिषद्गत महावाक्य
है । जाते " सर्व यह (उक्त ॐकारमात्र जगत् ) ब्रह्म
है" यात "अयं आत्मा ब्रह्म (यह आत्मा ब्रह्म है) सो
यह आत्मा च्यारीपादवाला है" [२]॥इहां जाननेको
मुगमताभर्थ धान्यके परिमाणमें उपयोगी फर्षापणप्रस्थादि.
काकी न्याई पादकल्पना है 1 गौकी न्याई नहीं ॥ इति ।।
विनोद ७) पंचदशी-महावाक्यविवेक ॥५॥ १७ करि आत्माका स्वप्रकाशपनैकार युक्त अप- रोक्षपना मान्याहै ।। टीकाः-"अयं" इस उक्ति (शब्द)कारि साक्षीका स्वप्रकाशताकरि (युक्त ) अपरोक्षपना अभिमत (मान्या ) है ॥ अदृष्ट (धर्मअधर्म आदिकनकी न्याई नित्यपरोक्षपना औ घटादि- कनकी न्याई दृश्यपना (परमकाशतायुक्त अपरो- सपना ) इन दोनूं (अनात्मधर्मन ) आत्मा निवारण करन• मूलविपै " स्वप्रकाश "अपरोक्षपना" ये दोविशेषण हैं । ऐसें जानना। देहादिकविपै बी आत्मशब्दके प्रयोग (यो- जना)के देखनै । इस महावाक्यविपै "आत्म" • शब्दकरि क्या कहनैकू इच्छित है ? इस आकांक्षा (पूछने की इच्छा के हुये कहै हैं:- [" अहंकारादि देहांतात् भसक्आत्मा इति गीयते"] अहंकारसे आदिलेके दे. " श्री १८ पंचदशी-महावाक्यविवेक ॥९॥ वेदांत हपर्यंत जो (संघात) है । तिसते जो प्रसक् (आंतर) है। सो आत्मा " ऐसे क. हिये है ॥ ७॥ टीकाः-अहंकार है आदि जिस (प्राण मन इंद्रिय देहरूप संघात )के।सो (संघात) अहंका- रादि है ।। तैसे देह है अंत जिस (कथन किये सं- घात)के । सो (संघात) देहांत (देहपर्यंत) कहिये है। तिस (अहंकारसे आदिलेके देहपर्यंत संघात) ते जो प्रत्यक् है । कहिये तिस (संघात )का अ- धिष्ठान होनेकरि औ साक्षी होनैकर आंतर जो (चेतन ) है । सो इस महावाक्यविषै "आत्मा" ऐसे गाइये (कहिये) है । यह अर्थ है ॥ ७ ॥ ॥२॥ "ब्रह्म" पदका अर्थ औ एकता- रूप वाक्यार्थ ॥२९॥ ॥२९४॥ ब्राह्मण आदिकवि वी "ब्रह्म" R000000000000000ccor concococer .
" शब्दके विनोद ७] पंचदशी-महावाक्यविवेक ॥ ९॥ १९ शब्दके प्रयोग (योजना)के देखनै । तिन (ब्रह्मणादिकन त व्यावर्तन (भेद जनावन) वास्ते इस महावाक्यविपै " ब्रह्म विवक्षितअर्थकू कहे है:- दृश्यमानस्य सर्वस्य जगतस्तत्वमार्यते । ब्रह्मशब्देन तद् ब्रह्म स्वप्रकाशात्मरूपकम् । ["दृश्यमानस्य सर्वस्य जगतः तत्वम् 'यश-शब्देन ईयते दृश्यमानसर्वजग- का जो तत्व (वास्तवस्वरूप) है । सो ब्रह्म" शब्दकरि कहिये है ।। टीका:- दृश्य होनेकरि मिथ्यारूप जो सर्व (आकाशादिकनगत् ) है । विसका तत्त्व । क- हिये अधिधान हो करि औ तिस (उत्तजगत् )के वाधका अवधि (सीमा) होनैकरि पारमार्थिक (वास्तविक) सचिदानदलक्षणयुक्त जो स्वरुप “ २० पंचदशी-महावाक्यविवेक ॥ १॥ [वेदांत है । सो इस महावाक्यविपै "ब्रह्म" शब्दकरि कहिये है । यह अर्थ है ॥ वाक्य (पदसमुदाय )के अर्थवँ कहै हैं:- [" तद् ब्रह्म स्वप्रकाशात्मरूपकम् "] सो ब्रह्म स्वप्रकाश आत्मस्वरूप है ॥८॥ टीका:- जो उक्तलक्षणवाला ब्रह्म है । सोही स्वप्रकाशआत्म ( अपना)स्वरूप है । यह ब्रह्म- आत्माकी एकतारूप वाक्यका अर्थ है ।। (इस- रीतिर्स कया जो च्यारिमहावाक्यनका अर्थ ब्रह्म (आत्माकी एकता) ता• जिस जिस प्रक्रिया- विपै रुचि होवै तिस तिस प्रक्रियाकी रीतिसे विवेकवैराग्यआदिक च्यारीसाधनसंयुक्त हुये मुमु- शुजनोंने वेदांतशास्त्र औ ब्रह्मनिष्ठगुरुके मुखद्वारा वाच्यअर्थ औ लक्ष्यअर्थके विचारकरि पदार्थ- शोधनपूर्वक यथार्थ जानिके श्रवणमननादिद्वारा 'संशयविपर्ययकू निवारण करि बढअपरोक्षनिष्ठासे . . 1
विनोद ७) पंचदशीके प्रस्ताविक श्लोक २१
अज्ञान ओ नाके कार्यरूप अनर्थकी निरति औ
परमानंदकी प्राप्तिरूप जीवन्मुक्ति औ विदेहयु-
क्तिका अनुभव करना योग्य है ।। इति ॥ ८॥
इति श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य
वापुसरस्वतीपूज्यपादशिप्य पीतां-
पराव्हविदुपा विरचिता पंचद-
श्या महावाक्यविवेकस्य तत्त्व-
मकाशिकाख्या व्याख्या
समाप्ता ॥५॥
॥श्रीपंचदशीके प्रस्ताविक श्लोक ॥
मायाविध विहायैयमुंपाधी परजीवयोः ।
अखंड सच्चिदानंदं परं ब्रह्मैव लक्ष्यते॥४॥
अर्थ.-१ऐसे २पर औ जीवकी ३उपाधि
माया औ अविद्याळू छोडिके १अखंड सच्चि-
दानंद परबहाही लखिये है (प्र. वि. ॥१८॥
२२
पंचदशीके प्रस्ताविक श्लोक वेदांत
चोधं वा परिहारो वा क्रियतां द्वैतभापया।
अद्वैतभापया चोयं नास्ति नापि तदुत्तरम् १९
अर्थ.-१चोद्य (प्रश्न) वा परिहार (उत्तर)
रतकी भाषाकरि करिये है औ अद्वैतकी
भाषा करि चोद्य नहीं है औ ५तिस (प्रश्न)
का उत्तर ६वी नहीं है (पं. वि. ॥१०४॥)
वाढं निद्रादयः सर्वेऽनुभूयंते नै चेतरः।
तेथाऽप्येतेऽनुभूयंते येन ते को निवारयेत् १२
अर्थः-१ निद्रा (आनंदमय )आदिक सर्व
(कोश) अनुभूत ( अनुभवके विषय) होवै हैं
२औ तिन भिन्न आत्मा अनुभूत ३नहीं होने
है" । यह (तेरा कथन ) सत्य है । तथापि
६जिस ( अनुभव) करि ७यह (पंचकोश)
अनुभव करिये हैं (तिस (अनुभव )कू कौन
(पुरुष) निवारण (निषेध) करैगा ? कोइवी
करी शके नहीं (पं. वि. ॥ १८६ ॥)
३
विनोद ७) पंचदशीके प्रस्ताविक श्लोक
जलपापाणमृत्काष्ठवास्याकुहालकादयः ।
इधरा सर्व ऐवते पूजिताः फलदायिनः २०८
अर्थः-१जल । पाषाण । मृचिका ! काट ।
वास्या (काएके छीलनका साधन ) । कुद्दालक
आदिक हैं। यह ३सर्वहीं ईश्वर हैं औ
पूजन किये हुये ६फलदायक है (चि.
दी॥ १०२॥)
न निरोधो न चोत्पत्तिर्न वदोन च साधकः ।
न मुमुक्षुर्न चै मुक्त इत्येपा परमार्यता ॥२२५||
अर्थ:-न निरोध है । न उत्पत्ति है। न
पद्ध है । न साधक है । न मुमुक्षु है । औ न
मुक्त है । ऐसें यह परमार्थता (वास्तवता) है
(चि.दी. ।। ५२९॥)
अप्रवेश्य चिदात्मानं पृथक् पश्यनकतिम् ।
ईच्छंस्तु कोटिवस्तूनि नेवायोग्रंथिभेदतः२६२
अर्थ:-अहंकाररिपे चिदात्माकं अप्रवेश
२४ पंचदशीके प्रस्ताविक श्लोक विदांत करिक । अहंकारकू चिदात्माने मिन्न देख- ताहुआ ५कोटिनस्तुन इच्छै तौबी - थिके भेदते (साक्षी आत्माका वा बोधमोक्षका) स्वाध नहीं है (चि. दी. ।। ५५६ ॥) आरब्धकर्मनानात्वाद बुद्धानामन्यथाऽन्यथा वर्तनं तेन शास्त्रार्थे भ्रमितव्यं न पंडितैः।।२८७ अर्थ:-१मारब्धकर्मके नाना होनैकरि । बुद्ध (ज्ञानिन )का अन्यथा अन्यथा (और और प्रकारसैं ) वर्तना है । तिस (विलक्षणवर्तन) करि २पंडितजनोर्ने ३ शास्त्रके अर्थविषे ४भ्र- मणा (भ्रांत होना) योग्य नहीं है (चि. दी. ॥ ५८१॥) आत्मानं चेर्दै विजानीयादयमस्मीति पूरुषः । किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥ अर्थ:-१पुरुप (जीव) २आत्माकू ३"यह मैं हूं" इसमकार जब जानै तब ५किस (भो-
विनोद ७] पंचदशीके प्रस्ताविक श्लोक
ग्यविषय )इच्छता हुया किस (भोक्ता के
काम ( भोग )अर्थ शरीरके पीछे ज्वर (संताप)कू
पावै ? (तृ. दी. ॥ ५८५॥)
देहाऽऽत्मज्ञानवत् ज्ञान देहाऽऽत्मज्ञानयाधक।
आत्मन्येव भवेद् येस्स से नेउबपिमुच्यते २०
अर्थः-१देहरूप आत्माके ज्ञानकी न्याई २
आत्माविषही देहात्मज्ञानका माधक ४ज्ञान
५जिसकू ६ होवे । ७ सो नही इच्छता हुया
बी मुक्त होवै है ( तृ. दी ॥ ६०४ ॥)
जनकादेः कथं राज्यमिति चेद् दृढवोधतः ।
तथा तेवाऽपि चेत् तेक पठ यद्वा कृषि कुरु१३०
अर्थ:-१"जनकादिक राज्य कैसे भया?"
ऐसे जो कहै । तो दृढबोधते (जनकादिककू
राज्य भया) । २तेरे बी नो ३तैसें (दृढयोध)
होवै तौ ४तर्क पठन कर यद्वा कृषि (खेती हूं
कर (तृ. दी. ॥ ७१४)
२६ पंचदशीके प्रस्ताविक श्लोक वेदांत अवश्य भावि भावानां प्रतीकारो भवेद् यदि । तदा दुःखैन लिप्येरन् नैलरामयुधिष्ठिरा: १५ अर्थ:-१अवश्य होनहारे जो भाव (दुःखा- दिक) हैं । तिनका प्रतीकार (निरत्तिका उ- पाय) २जब ३हो । ४तब ५नल राम औ युधिष्ठिर ६दुःखनकरि ७लिप्त होते नहीं (सो बी दुःखग्रस्त भये । यात सो अनिवार्य है) (तृ. दी. ॥ ७४० ॥) जाग्रत्स्वमसुपुल्यादिमपंचं यत् प्रकाशते । तद्ब्रह्माहमिति ज्ञाला सर्ववंधैः प्रमुच्यते२१.३ अर्थः-१“जो ब्रह्म । २जाग्रत्-स्वम-सु- पुप्ति-आदिकमपंच ३प्रकाशता है । सो ब्रह्म मैं हूँ" ऐसे जानिके सर्वबंधनते मुक्त होवै है (तु. दी॥ ७९७ ॥) दुःखिनोऽज्ञाः संसरंतु काम पुत्राद्यपेक्षया । परमानंदपूर्णोऽहं संसरामि किंमिच्छया।।२५५ विनोद ७] पंचदशीके प्रस्ताविक श्लोक अर्थ:- -१दुःखी जो अज्ञानी हैं। सो जैसे इच्छा होवे तैसे पुत्रादिकनकी अपेक्षासें २इस- लोकसंबंधी व्यवहारकू करहू औ ४परमानंद- करि पूर्ण जो मैं हूं सो ५किसकी इच्छा करि ६व्यवहार• करों ? (तृ. दी. ॥ ८३९॥) नित्यानुभवरूपस्य को में वाऽनुभवः पृथक् । कृतं कृत्यं मापणीयं मासमित्येव निश्चयः १६६ अर्थ:-नित्य ( उत्पत्तिनाशरहित) अनु- भवरूप २मेरेकू ३कौन ४अनुव भिन्न है ? (कोई वी नहीं)॥ जो ५करनेयोग्य या सो ६किया औ ७ प्राप्त होनेयोग्य था सो पाया। यहहीं मेरा निश्चय है (तृ. दी. ॥ ८५० ॥) अनुभूतेरभावेपि ब्रह्मास्मीत्येव चिंबताम् । अप्यसत्याप्यते ध्यानान्नित्याप्तं ब्रह्म किं पुन: अर्थ:-अनुभूतिके अभाव हुये बी “ मैं ब्रह्म हूं" ऐसही चिंतन करना । २असत् (अ- पेदांत पंचदशीके प्रस्ताविका श्लोक विद्यमानं पस्तु) ३वी ४ध्यानतें माप्त होवै है। तब फेर नित्यप्राप्त जो ब्रह्म सो ध्यान प्राप्त होवै यामैं क्या (कहना) है (ध्या.दी.॥१११३॥) भियते हृदयग्रंथिश्छिद्यते सर्वसंशयाः। क्षीयतेचा कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥७ अर्थः-१तिस २परावर (परमात्मा)के ३दृष्ट (देखे) हुये ४इस (पुरुष)का ५हृदयग्रंथि ६ भेदनकू पावता है औ ७सर्वसंशय छेदन होवे हैं ९औ १० कर्म ११ क्षीण (नाश) होवै है (न. यो. ॥ ११४९॥) असाध्याकस्यचिद्योगाकस्पचिज्ज्ञाननिश्चयः इत्थं विचार्य मार्गों द्वौ जंगाद परमेश्वरः॥८३ अर्थः-१किसी ( अधिकारी योग २अ- साध्य (दुष्कर ) है औ ३किसी ज्ञानका नि- श्रय असाध्य है । ऐसे विचार करिके परमे- श्वर (श्रीकृष्ण) । ५दोनें (योग औ विवेकरूप) ६मार्गत ७कहते भये (व. आ. ॥१३५९॥)
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शरीफ सालेमहंमद-वेरावल (काठियावाड).
दाउद शरीफ-श्रीभाषनगर,
नीचे लिखे ग्रंथ हमारे वहां से मिलेंगे औ डाक
महसूल नहीं पडेगा मात्र वेल्युपएपलका डाकमी-
शन पडेगा। यह सर्वप्रथ सारे हिंदुस्थानमै जहां जहां
पुस्तक पेचनेवाले हैं उनासे बी मिल सकते है ।।
श्रीविचारसागर ५५४ टिप्पणसहित भी पृति-
रत्नावली तथा घडी अकारादि अनुभामणिका.
सहित तृतीयात्ति
,, उक्ततृतीयावृत्ति उत्तमशागजकी,
श्रीसुंदविलास।ज्ञानसमुद आदिक तृतीया० २१
, उक्ततृतीयावृत्ति उत्तमशागजकी
श्रीसटीकाअष्टावक्रगीता मूलकी मापासहित. १
,, उक्तग्रंथ उत्तम पूठे औ कागजमा....
श्रीविचारचंद्रोदय । वृतीयागृत्ति
श्रीपंचदशी । मूल ओ टीकाकी भाषा। दो विभागमै
(घोडेही ग्रंथ रहे हैं)
श्रीपंचदशीका प्रथम प्रकरण....
श्रीपंचदशीका प्रथम श्री पंचम प्रकरण.
श्रीपंचदशी मूलमान.... ... ... ...
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011
१५
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