Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Anth Nardha

Hari,viyoghi · 2011/01

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अन्तनाद
(गाय)
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प्रपाल
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प्रकाशक
गान्धी-हिन्दी-पुस्तक भहार,
प्रयाग
[साहित्य भवन लिमिटेड, प्रयाग]
मुद्रक
के० पी० दर, इलाहाबाद ला जर्नल

श्रीगुम-पाद-पोष

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दो शब्द
प्रस्तुत पुस्तक में सप मिला कर चालीस ठोटे-बडे नियन्ध आये है,
जिन्हें मैं, विषय विभाग के अनुसार, निम्नलिखित चार खण्डों में
विभक्त कर दिया है-
१–सत्य, शिवं, सुन्दरं,
२-उद्बोध,
३-अग्नि-उद्गार,
४--उद्धार।
इस पुस्तक का अधिकाश हिन्दी की लब्ध प्रतिष्ठ पत्रिका 'सरस्वती'
में प्रकाशित हो चुका है, कुछ निबन्ध 'प्रमा' में और कुछ 'सम्मेलन
पत्रिका' में भी छपे हैं। सात आठ नये जोड दिये गये हैं । जिन
पत्रिकाओं ने भन्तनाद' को भपमा बहुमूल्य स्थान प्रदान किया है,
उनका मैं, इस कृपा के लिये, सदा कृतज्ञ रहूँगा ।
यह कहने का तो मैं अधिकारी हूँ नहीं कि मेरा यह 'मन्तादि'
किसी सहृदय के मरस हृदय पर अपना यत्किचित् कोमल, सुखद और
सजीव आघात कर सकेगा, पर इतना कहने
घटता अवश्य कराँगा
कि मेरी जर्जरित हत्तत्री के हटे और उतरे हुए तारों के स्वर में यदा कदा
जो यह नाद ध्वनित हुआ करता है उससे मुझे निस्सन्देह प्राहाद प्राप्त
होता है । अतएव इसे 'स्वान्त सुखाय' प्रयास हो समझिये । इस प्रयास
द्वारा मेमो पाठकों को भी कुछ लाभ पहुंचा, तो मैं अपने को अधिक
कृताधे मानूंगा।
प्रयाग,
विनीत
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी,
वियोगी हरि
संवत् १९८३

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प्रार्थना
अतुल शक्तिधर ! मुझे भी वह शक्ति दे, जिससे जन्मजात
अधिकारों की रक्षा करता हुआ इन तुच्छ प्राणों की भेंट तेरे
चरणोंपर चढ़ा सकूँ।
भावगम्य । वह भावुकता भर दे, जिससे यह स्वार्थपूर्ण,
सफीर्ण, नीरस और मायिक हृदय नि स्वार्थ, विस्तीर्ण, सरस
और आध्यात्मिक हो जाय ।
अखिल बोधेश्वर ! वह योध दे, जिससे सत्-असत् का
निर्णय कर नरकोपम ससार को स्वर्ग में परिणत कर सकूँ ।
सर्व समर्थ ! वह सामर्थ्य दे, जिसे पाकर पद दलित तथा
पीड़ित जनता की अहोरात्र निष्काम सेवा करता रहूँ।
परमेश ! वह ईशत्व दे, जिसके द्वारा प्रेय और श्रेय में
साम्य स्थापित कर सदुधर्म का साक्षात् कर सकें।
ज्योतिष्मन् ! इन निष्प्रभ नेत्रों में वह ज्योति जगा दे,
जिस में तेरे दिव्यालोक का प्रतिविम्य पड़ता हो।
जगदाधार ! वह आधार दे, जिससे यह निराधार जीवन
तेरी अकुतोभय शरण पाकर 'ब्राह्मी स्थिति' की पात्रता प्राप्त
कर सके।

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प्रार्थना । अतुल शक्तिधर ! मुझे भी वह शक्ति दे, जिससे जन्मजात अधिकारों की रक्षा करता हुआ इन तुच्छ प्राणों की भेट तेरे चरणोंपर चढ़ा सकूँ। भावगम्य | वह भावुकता भर दे, जिससे यह स्वार्थपूर्ण सकीर्ण, नीरस और मायिक हृदय निःस्वार्थ, विस्तीर्ण, सर और आध्यात्मिक हो जाय । अपिल बोधेश्वर । वह बोध दे, जिससे सत् असत् । निर्णय कर नरकोपम ससार को स्वर्ग में परिणत कर सकें। सर्व समर्थ ! वह सामर्थ्य दे, जिसे पाकर पद-दलित त पीडित जनता की अहोरात्र निष्काम सेवा करता रहूँ। परमेश ! वह ईशत्व दे, जिसके द्वारा प्रेय और श्रेय साम्य स्थापित कर सद्धर्म का साक्षात् कर सकें। ज्योतिष्मन् ! इन निष्प्रभ नेत्रों में वह ज्योति जगा जिस में तेरे दिव्यालोक का प्रतिविम्व पड़ता हो। जगदाधार ! वह आधार दे, जिससे यह निराधार जी तेरी अकुतोमय शरण पाकर 'माझी स्थिति' की पात्रता कर सके।

मन्दिर-द्वार . भला, यह भी कोई आराधना की वेला है ! उपासक कभी चले गये । पुजारी भी द्वार वन्द करके जा रहा है । पर तू कुलों की डलिया लिये अब आयी है ! जान पड़ता है, यहाँ तू पहली ही बार आयी है। यहाँ की नयङ्करता तुझे प्रकट नहीं। इस घड़ी यहाँ कौन पैर रखने का दुस्साहस करेगा ? कैसा भीषण स्थान है! चारों ओर पहाड़-ही- पहाड़ देख पढ़ते हैं। उनके निस्पन्द् काले शिखर, न जाने क्यों, सजल नेत्र तारों की ओर टक लगाये खड़े हैं। दूर तक न कोई जीव है, न जन्तु । रात सॉय-साँय बोल रही है । सामने यह जल-प्रपात शिला-खण्डों के वक्षस्थल पर झर-झर शब्द कर रहा है। पता नहीं, मन्दिर के आगे कितना गहरा पानी है ! कहते हैं, यह स्थान प्राणान्तक है । इस अर्द्धचन्द्राकार प्रपात की अनन्त जल-राशि से जो नदी बनी है वह बड़ी ही भीषण है। उसके आवत्तों में कई नौकाएँ चकर खा कर इव चुकी हैं । फिर तू ने इस सन्नाटे के समय कैसे नदी को पार किया ? किस माझो ने तुझे पार उतारा १ऐं! तू तैर कर आयी है ! धन्य यह साहस शरीर शीत के मारे थरथर काँप रहा है। पेर टिठुर गये हैं। प्रभात की धूम्र-सदृश झीनी-झीनी बूंदों ने आँखों को सुन्न कर दिया है। केश खुलकर हाथों में उलझ गये हैं। यह

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देखा करता है। जान पड़ता है, उस दिव्य देवी का प्रयास निम्फल नहीं जाता । उस अर्चा में अवश्य हो कोई-न-कोई रहस्य अन्तर्हित है। जब वह अन्तर्धान होने लगती है, तव संमस्त आकाश-मण्डल रक्तामा से परिपूरित हो जाता है। वरती पर विखरे हुए फूल उड़ उड फर उसके विलम्वित मुक्त केशों में गुंथजाते हैं । मालाएँ उस के हृदय पर लहराने लगती हैं । उस समय उन फूलों का सुगन्ध कुछ और ही हो जाता है । वह दृश्य अपूर्व होता है। उसके बड़े-बड़े नेत्रों से अभ्र-विन्दु टपकने लगते हैं। मुख मुकुलित हो जाता है । और सुकुमार उँगलियाँ ऊपर को उठ कर उलझने- सी लगती है । इसी तरह वह अनन्त आकाश की ओर देखती हुई उस दिगन्त व्यापिनी रक्ताभा में विलीन हुआ करती है। मैंने उसकी आराधना का रहस्य अनेक उपासकों से पूछा, पर आज तक किसी ने मेरी जिज्ञासा का यथेष्ट समाधान नहीं किया। आत्मा तो यह कहती है, कि उस देवी के अभिमुख मन्दिर का जगदाराध्य देव द्वार खोल कर आया करता है और उपासिका का, अपने हाथों से, शृद्धार करके फिर मन्दिर में चला जाता है । उस वन देवी को उसने, अपनी पवित्र प्रेम- भावना की प्रतिमूर्ति बना कर, अपने अन्तस्तल में स्थान है रखा है। इसो को 'परा पूजा' कहते हैं।

प्रतीक्षा कय की खड़ी हुँ, प्रियतम । पुकारते-पुकारते थक गयी, जीभ में छाले पड़ गये, पर तुम न आये ! इस विजन वन में अकेली में ही है। चारों ओर अंधेरा-ही- अँधेरा छा रहा है । तरगिणी का कलफल रव भी मन्द पड़ता जाता है । जान पड़ता है, हवा भी अपनी अठखेलियाँ बन्द कर सोने जा रही है। सामने के काले भयावने गिरि-शिखरों की ओर तो आंख खोल कर देखा भी नहीं जाता। बड़ी सनसनाहट है। पेड़ो पर बसेरा लेनेवाली चिडियों के परों को फड़फड़ाहट ही, रुक रुक कर, इस घोर सन्नाट को चीरती है। इसी से थोड़ा-बहुत धीरज चॅधा है । नाथ ! अचल से ढका हुआ यह निस्नेह दीपक कबतक टिमटिमायगा? पैर काँप रहे हैं । हृदय धक-धक कर रहा है । पलके भी भारी होती जाती है। शरीर पसीज उठा है । गला रुंध आया है । बडी घबराहट मालूम होती है। क्या करूं, क्या न करूं? न खडा ही रहा जाता है, न लौटते ही बनता है । लौहूँ भी, तो कहाँ, किस ओर ? अब न मेरा कहीं घर है, न द्वार। न सखी है, न सहेली। न सजन है, न परिजन । न कुल है, न कानि । फिर किधर जाऊँ, कहाँ रहे? पूर पच्छिम का भी तो शान नही । नाथ ! तुम्हारे मन में आखिर है क्या ? यह देखो, दीपक भी वुझा चाहता है। क्या यह शिला, जिस पर मैं खडी तुम्हारी बाट जोह रही है, मोम को तो नहीं है ? यदि नहीं, तो पिघलती क्यों जाती है ? तारे क्यों रो रहे हैं ? कौन कहता है, कि पत्तियों पर ओस की बूंदें झिलमिला रही हैं । यह तो इन्हीं तड़पते तारों के आँसू है। कालो साड़ी पहने यह अँधेरी रात मुझ निराशा में डूबी अभागिनी का दुख वटाने आयी है। देखू, बेचारी कयतक साथ देती है ! स्नेहमयी प्रकृति का हृदय सचमुच ही बड़ा कोमल है। यह इतनी दया न दिखाती तो मैं किसके आगे अपना रोना रोती? पर उन्हें तनिक भी दया न आयी, कठोरहृदय ! यह प्रतीक्षा है, या परीक्षा प्रतीक्षा ही है, परीक्षा किस बात की होगी ? तुम अनन्त, तुम्हारी प्रतीक्षा भी अनन्त ठीक है न ? कुछ तो कहो । किससे बात कर रही हूँ ? क्या तुम सुनते हो ? यदि हाँ, तो अपनी मोहिनी झलक क्यों नहीं दिखाते, मोहन! लो, दीपक गया ! आशा भी गयो । अव भी दौड आओ, प्रियतम ! टेर करने से प्राण-पखेरू भी उड़ जायेंगे, प्राणेश!

समझ कर दौड़ी थी कि कालिन्दी-तट पर यह मर्ममरी रागिनी कालिन्दी-कूल खड़े-खडे आधी रात बीत गयी। चारों ओर अंगी. अंधेरा छा रहा है । ऊपर काली धन घटा है, नीच कालिदी का श्याम प्रवाह ! कहीं कुछ सूझता तक नहीं। तारे भी नदी झिलमिलाते । वडा विकट सन्नाटा है । रात सायं साय योल रही है। कैसा भायें भाय लगता है । रह-रह कर यमुना की विक्षिम लहरे हृदय को और भी हिला देती हैं । बड़ा भयायना दृश्य है ! अकेली खड़ो-खड़ी क्या करूँ ? सखी-सहेलियाँ छोड़ कर क्यों यहाँ अकेली ही चली आयी? न जाने, मुझे यहाँ कौन खींच लाया? खड़ी-पड़ी किसकी थाट जोह रही है? किस उलझन में पड़ी हैं। कुछ समझ में नहीं आता । केसे धीरज धरूँ ! पैर थर-थर काँपते हैं । आँखें तिल मिला रही हैं। घड़ा व्यर्थ ही भर कर सिर पर लाद लिया। अब गिरा ही चाहता है । केसे सँभालू? दिया भी क्या चुझ जायगा' इस तेज आँधी में, अञ्चल की ओट में, कबतक ठहरेगा! कौन जानता है, कब बुझ जाय ! और तेल भी तो चुक गया है । क्या घश ' किसे मालूम था, कि। मुझ अभागिनी के साथ ऐसी प्रवंचना की जायगी। मैं तो यही सुनने को मिलेगी, जिसने मेरे फापना भवन में 'सत्य शिव सुन्दरं' की स्वर-लहरी प्रतिध्वनित की थी। पर सव धोखा ही निकला! वेदान्तियों ने कदाचित् इसी अमितृष्णा को 'मृग-जल कहा है। एक यार और वह उन्माद-आमोदिता रागिनी सुनी थी। उस दिन भी वह मुझ मुग्धा मृगी के अन्तस्तल में वाण-सी विध गयी थी। पर, तव इस तरह घर-बार छोड़ कर भागी नहीं थी। वहीं जी मसोस कर रह गयी थी। आज की भॉति उस दिन दौड़ी नही । आज की दशा तो कुछ विचित्र ही हुई। घरवालों के रोकते रोकते भी घडा ले इधर चल पड़ी। भला, यह भी कोई पानी भरने का समय है! सखी-सहेलियों की ओर देखा तक नहीं। करील की कॅटीली डालों में वस्त्र उलझ जाने तक का तो ध्यान नहीं रहा । फूल-माला तो, न जाने कहाँ, टूट-टाट कर गिर गयी । आँखे अपनी होती तो कुछ देखती । सुध तो तन तक की न थी, वस्त्राभूपण कौन सँभालता? आखिर, यह रागिनी हुई क्या? अलापनेवाला कहाँ गया' कहाँ जाऊँ, किससे पूछू ? सोचा था, कि उस रागिना की धवल धारा से अतःकरण पखारूँगी, गायक को देख कर यह निस्तेज दृष्टि सौन्दर्य-सुधा से अनुप्राणित करूंगी। पर यह कुछ न हुआ। सुना क्या-उत्कण्ठित हृदय की धीमी प्रकम्पन- ध्वनि ! देखा क्या-अदृष्ट का धुंधला मानचित्र !जान पड़ता है, यह विश्वव्यापी अन्धकार मेरी ही निराशा का काला प्रति विम्न है । तो क्या वह मोहिनी रागिनी भी मेरे ही विक्षिा- , .

? - छिड़काव ही करती है, उसे उल्टने पल्टने का वह भीसाहस नहीं करती। फिर तू क्यों अपने सतृष्ण लोलुप नेत्रों से देखने के लिये, अधीर हो, उस पिटारी को खोले देता है ? क्या तू उस लावण्य कलिका का निर्दयता और नीरसता के साथ उपभोग कर उसे अक्षुण्ण नहीं रखना चाहता सावधान । यों ही न छेड़ देना ! वह एक अछूती वीणा है। उस पर वाग्देवी ने एक एक तार अपने निगूढ अन्तर्नाद के द्वारा प्रतिष्ठित कर चढ़ाया है । अन्तःकरण में प्रतिध्वनित स्वर- लहरी उसके तरल तारों का, एक झीनी झनकार के साथ, स्निग्ध आलिङ्गन ही करती है, उन पर कठोर आघात पहुँचाने का वह भी साहस नहीं करती। फिर तू क्यों उस अन्तस्तल- नादिनी वीणा को अपनी टेढ़ी-मेढ़ी मोटी-मोटी उँगलियों से छेड़े देता है ? क्या तू उसके नाद का निर्दयता और नीरसता के साथ उपभोग कर उसे अक्षुण्ण नहीं रखना चाहता? सावधान ! योंही न पैर रख देना! वह एक अछूता आसन है। उसे प्रकृति देवी ने अरुणोदय के हलके रंग में रंग कर, ओस की बूदों के साथ करलोल करते हुए सुकुमार पल्लवों पर, बिछाया है। अधीर भावना उस परधीरे से बैठ कर साधना ही करती है, कामना-कलुषित पैरों से उसे प्रताड़ित करने का सावधान! ? . सावधान ! योहो न हाथ डाल देना। वह एक अछूता कटोरा है । उसे वसत के सरस सुमृदु समीर ने उल्लसित कुसुम कलियों से रस ले-ले कर भरा है। रसिक मधुकर उस पर मंडराता ही है, ओठ लगाने का वह भी साहस नहीं करता। फिर तू क्यों उसमें अपना कोयले से रंगा काला-कलूटा हाथ डाले देता है क्या तू उस रस का निर्दयता और नीरसता के साथ उपभोग कर उसे अक्षुण्ण नहीं रखना चाहता सावधान ! योही न बिखेर देना ! वह एक अछूती डलिया है। उसमें भगवती उपाने,अपने सौभाग्य-शृङ्गार के लिये, नन्दन वन से एक-एक सौरभित सुमन चुन-चुन कर रखा है । पुलकित पवन उस सुमन-चय का धीरे से चुम्बन ही करता है, उलझी हुई उँगलियों से छूने का वह भी साहस नहीं करता । फिर तू क्यों उन्हें अपने कलुपित कठोर हाथों से बिखेरे देता है ? क्या तू निर्दयता और नीरसता के साथ उन फूलों का उपभोग कर उन्हें अक्षुण्ण नहीं रखना चाहता सावधान ! योही न खोल देना ! वह एक अछूती पिटारी है । उसमें प्रकृतिसुन्दरी ने अविकसित लावण्य-कलिका को, चाँदनी को धवल धारा से पखार-पखार, सपुटित कर रखा है अनुराग-रंजिता किशोरावस्था उस पर धीरे से उन्माद-रस क १ १ छिड़काप ही करती है, उसे उल्टने पल्टने का वह भी साहसनहीं करती। फिर तू क्यों अपने सतृष्ण लोलुप नेत्रों से देसने के लिये, अधीर हो, उस पिटारी को खोले देता है ? क्या तू उस लावण्य-कलिका का निर्दयता और नीरसता के साथ उपभोग कर उसे अक्षुण्ण नहीं रखना चाहता सावधान ! यों ही न छेड़ देना ! वह एक अछूती वीणा है । उस पर वाग्देवी ने एक एक तार अपने निगूढ़ अन्तर्नाद के द्वारा प्रतिष्ठित कर चढाया है । अन्त करण में प्रतिध्वनित स्वर- लहरी उसके तरल तारों का, एक झीनी झनकार के साथ, स्निग्ध आलिङ्गन ही करती है, उन पर कठोर आघात पहुँचाने का वह भी साहस नहीं करती। फिर तू क्यों उस अन्तस्तल- नादिनी वीणा को अपनी टेढ़ी-मेढ़ी मोटी-मोटी उँगलियों से छेड़े देता है ? क्या तू उसके नाद का निर्दयता और नीरसता के साथ उपभोग कर उसे अक्षुण्ण नहीं रखना चाहता सावधान ! योही न पैर रख देना ' वह एक अछूता आसन है। उसे प्रकृति देवी ने अरुणोदय के हलके रंग में रंग कर, ओस की बूदों के साथ कल्लोल करते हुए सुकुमार पल्लवों पर, विछाया है। अधीर भावना उस पर धीरे से बैठ कर साधना ही करती है, कामना-कलुपित पैरों से उसे प्रताड़ित करने का वह भी साहस नहीं करती। फिर तू क्यों उस सत्यालोक से आलोकित शुभ्र आसन को कुचलने के लिये उस पर अपने पाप- पंकिल अपवित्र पैर रखे देता है ? क्या तू उसकी स्वच्छता का ?

? निर्दयता और नीरसता के साथ उपभोग कर उसे अक्षुण्ण नहीं रखना चाहता सावधान ! यों ही न जाने देना! वह एक अछूता पाहुना है। उसे हमने अपने अझैन्मीलित पलकों पर प्यार कर-कर सुलाया है। हमारा उद्भ्रान्त भाव अपने प्रेमाश्रु-जल से उसके परिश्रान्त पाद-पल्लवों का पखारना ही अपना सौभाग्य समझता है, उसकी ओर उपेक्षा की दृष्टि से देखने का वह भी साहस नहीं करता । फिर त क्यों उस प्यारे पाहुने को, बिना ही उसका कुछ आतिथ्य किये, जाने देता है ? क्या तू उसके स्वागत के सौभाग्य का निर्दयता और नीरसता के साथ उपभोग कर उसे अक्षुण्ण नहीं रखना चाहता ?

अतिथि कब से द्वार खोलो, अन्तर्यामिन् ! यह बेचारा, हाय तुम्हारा द्वार खटखटा रहा है ! यह कोई पथिक है, और काले कोसों से दौड़ा आ रहा है। चलते चलते पैर सूज गये हैं, तलुवों में छाले भी पड गये हैं । न जाने, यहाँ तक कैसे पहुंचा देखते नहीं, विलकुल शिथिल पड़ गया है ? बोलने तक की शक्ति नहीं। ओंठों पर पपड़ी पड़ गयी है। प्यास के मारे जीभ तालू से लग गयी है। अरे, कितना कृश है। ककाल-मात्र शेप है। किसी प्रणय-आशा ने ही इसे अवतक सप्राण रखा है। नाथ! द्वार खोलो और इसकी सँभाल करो। क्या कहा, कि किस काम से आया है ? केवल तुम्हारी शलक लेने-और कोई काम नहीं। बड़ा भोला है । कहता है, मैं अपने पैरों थोड़े ही आया । न जाने, कौन यहाँ तक खींच लाया! सुना है, कि एक रात इसने तुम्हारी प्यारी सूरत सपने में देखी थी। जागते ही बावला हो गया। एक फटा पुराना कयल लपेटे तुम्हारी टोह में चल पड़ा । तुम लापता तो रहते हो हो । इससे बेचारा, न जाने कहाँ कहाँ, खाक छानता मारा मारा फिरा। इतने दिनों बाद आज कहीं इस भूले-भटके योगी को तुम्हारा पता चला है। सो, द्वार .

बोल कर बाहर पधारो, प्राणाधार! निठुर न बनो, भक वत्सल! टुक आओ तो। वैठना मत, एक ही झलक दिखा कर चले जाना। सफुचते हो क्या? या डरते हो? तुम्हे यह चाँध कर फैद थोड़े ही कर लेगा। सर्वशक्तिमान् हो कर एक निर्चल का भी सामना नहीं कर सकते। तुम्हारी पहेली तुम्ही जानो। हम तो इतना ही कहते हैं कि द्वार खोल दो, पीछे जो तुम्हारे मन में हो, करना। इसे देख कर तुम्हें अवश्य ही तरस आ जायगा। इस निराश्रय का आज कहीं भी ठौर-ठिकाना नहीं । जो कुछ है, सो तुम्हारा द्वार । यही धूनी रमा कर डटेगा । यहाँ से टस से मस होने का नहीं। बड़ा हठीला है। इसे कह सकते हैं लगन पर मर-मिटनेवाला । बड़ी-बड़ी अधमुंदी आँखों से स्नेह-रस छलका पड़ता है, पर तोभी बेचारी प्यास से छटपटा रही हैं । समुद्र में भी मछलियाँ प्यासी हैं ! रह-रह कर यह किसी मर्म पीड़ा का अनुभव कर रहा है। पूछने पर जवाब यह मिलता है कि मेरा दर्द, दर्द नहीं-एक मीठी-सी चुभीली फसक है । यही कसक उसे यहाँ तक खींच लायी है। इसी से वह उसे प्राणाधिक प्यारी है । मुबारक हो ऐसा दर्द। ऐसा अतिथि कदाचित् ही इस द्वार पर कभी आया हो । प्यारे, द्वार खोल कर इस मस्त पागल को इसी घड़ी दर्शन दो। ऐसे पाहुने नित्य तो आते नहीं। तुम्हें इसकी पहुई भी, एक तरह से, बहुत महगो न पड़ेगी। सिर्फ एक बार इसकी ओर मुसकरा भर देना । बस, मस्त हो झूमने लगेगा। सतृष्ण नेत्रों की तीव पिपासा तो उसी क्षण शान्त हो जायगी। मुरझाया हुआ मुख एकदम खिल उठेगा । ओठों पर मुसकरा- हट को एक पतली रेखा खिंच जायगी । तुम्हारी एक बार की हा चितवन से इस परिश्रान्त पथिक का काया कल्प हो जायगा । देखते-देखते रस समुद्र उमड़ उठेगा। प्रेम पर्व का पया अच्छा सुयोग है । ऐसे आकस्मिक आतिथ्य से चूकना ठीक नहीं। लो, द्वार खुला। इसके बाद क्या हुआ, कहने का अधिकार नहीं। [-१५ आवरण हमी से कहते हो, कि अपना परदा हटालो । परदा तो दो के बीच में हुआ करता है, एक के नहीं। सारा दोप हमारे ही माथे न मदो, न्यायाधीश | हमारे परदा खींचने से क्या होगा? तुम्हारी सूरत देखने को थोडे ही मिल जायगी! लोग कहते हैं, कि परदे की ओट में एक अद्भुत दृश्य दिखायी देता है, पर हमें तो यह सब धोखा जान पड़ा। समझ में ही नहीं आता, कि अद्भुत दृश्य किसे कहते हैं । हाँ, यदि तुम्हारी झलक देखने को मिल जाय, तो हम उसे कुछ अद्भुत या अलौकिक यात कहें । पर, तुम न जाने कहाँ, किस परदे की ओट में बैठे हो । हमने परदा अलग कर दिया, लोक-लाज को भी पानी की तरह वहा दिया, खुदी भी तुम्हारे गहरे इश्क में खो दी, पर चितचोर ! तुम लापता ही रहे । हम तो समझते थे कि तुम हमारे सुख-दुख के साथी रहोगे, हृदय के हार बनोगे, कलेजे की कसक टटोलोगे, जिगर के जलते फफोले ठंडे करोगे, पर यह सब न करके तुमने हमारे आगे धर्म की ध्वजा गाड़ दी, ज्ञान का पोथा खोल दिया और निराशा का काला पहाड़ सामने खड़ा कर दिया ! अन, हमारे परदा हटाने से क्या हुआ दर्शन कडी धूप में मजदूर के पसीने की टपकती हुई बूंदों में देख । दीन-दुखियों की आँसूभरी ऑख में देख । धूल में मिले हुए हीरे की कनी में देख । पतित, पददलित और तिरस्कृत कुटीर पुष्प के अक्षत पराग में देख। कमल-कोश में फैद भौरे की प्रेम परता में देख । कवि की भावनास्थली पर इठलाती हुई लहरों में देख । गगन पटल पर अंकित चित्रों की कला में देख । निर्जन वन के आराधक विहा समूह में देख । वासंती वायु की प्रकंपित और अस्पष्ट स्वर-लहरी में देख । कलकल-निनादिनी तरंगिणी की एकान्त साधना में देख । पत्तों पर धीरे-धीरे ढलकते हुए ओस चिन्दुओ में देख । भावुकता के कोमल और सरल हृदयस्पन्दन में देख । टिमटिमाते हुप, दीपक की सकरुण दृष्टि में देख । अरे, विज्ञानियों के आविष्कार में, दार्शनिकों के तत्त्व विचार में, व्यापारियों के वही-साते में, अधिकारियों की सत्ता में तू उसे न देख सकेगा। उसकी झलक ससार से कहीं बाहर न दिखायी देगी। पर, उसे देखनेवाले का ससार कुछ निराला ही होगा। उस का दीदार तेरी तीन कौड़ी की दुनियाँ का काया पलट कर २ देगा। साथ ही तेरी दुरगी नजर भी बदल जायगी। उस नज़ारे के आगे तुझे 'मुक्ति' भी फीकी और घदरड जॅचगी। यात है भी कुछ ऐसी ही- "जय लो तुमसों नहि भेंट भई, तय लौ 'वरियो' का कहावतु है " - वीणा यह झीनी झनकार किधर से आ रही है? हवा का रुख क्या इधर ही को है ? आज कार्यालय में जितना काम किया, शायद ही कभी उतना किया हो। सारे बंध ढीले पड़ गये हैं। शिर अब भी घूम रहा है। पर धन्य, मेरे स्वामी ! तूने हदय भी क्या हो अनूठी चीज बनायी है ! आहा । यह झनकार तो और भी समीप सुनायी देने लगी! इसके तारों पर जिसकी सुकुमार सुकोमल उँगलियाँ नाच रही है, वह धन्य है ! इस मधुर झन- कार से तो यही अवगत होता है कि मस्तिष्क और हृदय में धीरे-धारे, किन्तु गम्भीरता से द्वन्द्व सग्राम हो रहा है। और जीत हृदय की हो रही है। इस अव्यक्त वीणा के प्रत्येक स्वर से सुधाविन्दु टपक रहा है । मुझे तो इतने ही में सुख है कि दूर से इसका मधुर नाद सुना करू । कैसा होगा वह वीणा पर हाथ रखनेवाला, कैसी होगो उसकी गति माधुरी, कैसी होगी उसकी सरल मन्द मुस्तफान ! जो हो, इस झनकार की तरल तरगावली पर मेरे मन मराल को तैरना हो सौभाग्य चिन्ह जान पड़ता है। किन्तु सावधान ! स्वार्थी सावधान !! तेरे कटोर और भारी परों का आघात घे हलकी-हलको तरंगें कैसे सह सकेंगी दूर से ही सुन उस गली इठलाती हुई झनकार को।

बाँसुरी क्या कभी फिर बजेगी वह चाँसुरी ? सुनी तो एक ही बार थी, पर उसकी प्रतिध्वनि आज भी इस अंधेरे शून्य हृदयागार में गूंज रही है । समझ में नहीं आता, उस फूक में क्या जाद भरा था। शिशिर के दिन थे। लजवन्ती प्रतीची को एक झीनो लाल साड़ी पहना कर भगवान् भुवन-भास्कर क्षितिज पार कर चुके थे। सुहागिनी प्रात्री के ललाम ललाट पर कुमुदिनी-कान्त सौभाग्य-सिन्दूर लगा रहे थे । गो-धूलि-आच्छादित आकाश मकरंद-मण्डितपुप्पोद्यान-सा प्रतीत होता था। चिड़ियाँचहचहाती हुई वृक्षों के अङ्क में बसेरा लेने जा रही थीं। ठण्ड के मारे निराश्रय जीव-जन्तु आश्रय हूँढ रहे थे। देखते-देखते चारों ओर सन्नाटा छा गया। उन दिनों मेरी कुटिया, उत्तराखण्ड में, एक बीहड़ पहाड़ी के सामने थी। आस-पास टीले-ही-टीले थे। नीचे एक चुलबुला नाला कूद-फांद कर रहा था, जिसकी विलोल लहर प्राय कुटिया के चबूतरे के साथ अठखेलियाँ किया करती थीं। उस रमणीय सन्ध्या को चबूतरे पर निरुद्देश-सा बैठा हुआ में सामने के ऊँचे शिखरों की ओर टक लगाये देख रहा था स्वच्छ चाँदनी से निखरे हुए हिमान्छादित श्वेत शिखर ऐरावत के दाँतो से होड लगा रहे थे। बैठा-बैठा मैं, न जाने, किस उधेड़- बुन में लग गया! मेरी विचार शक्ति प्रतिक्षण क्षीण होती जाती थी। ऐसा प्रतीत होता था, मानो मैं किसी गहरे अन्धकृप में इयता जा रहा है। एकाएक किसी स्वर्गीय स्वर ने मेरी ध्यान मुद्रा भङ्ग कर दी। स्वर बाँसुरीका सा था। पीछे निश्चय भी हो गया कि कहीं से बाँसुरी की ही ध्वनि आ रही है । वह उल्लसित स्वर- लहरी उस प्रशान्त नभोमण्डल में विद्युत् की भाँति दौड़ने लगी । हृदय लहरा उठा । शिखर मुस्कराने लगे। चन्द्रमा पुल. कित हो गया। परिमल वाही पवन प्रणय-सङ्केत करने लगा। दिग्वधुएँ घूघट हटा झाँकने लगी। नाला भी निस्तब्ध हो गया। पत्तियाँ थिरकने लगीं। मुग्धा प्रकृति के सलाज मुख पर एक अनुपममाधुरी कलिका मुकुलित हो उठी। यह सब उसी मोहिनी ध्वनि का प्रभाव था। तो फिर उसे मैं नव सृष्टि विधायिनी क्यों न कहूँ? हाँ, अवश्य ही उस बाँसुरी की तान में नवीन सृष्टि विधान का अद्भुत उपादान था। ऐसा न होता तो उस स्वर-लहरी का आलिङ्गन कर प्रस्तर-खण्ड क्यों पसीज उठते? कठोरहदया विभावरी के तारक-नेत्रों में प्रेमाभु क्यों छलक आते ? धनधी का धूमिल अञ्चल अनुराग रञ्जित क्यों हो जाता? मेरा पाप परितप्त मलिन हदय दूध की धार से पसार फर कौन शीतल और निर्मल फरता १ वंशी-ध्वनि बरावर उसी ओर से आ रही थी। कभी कमी नो कानों के अत्यन्त ही समीप जान पड़ती थी। उस समय मेरा मन हाथ में नहीं था। रह-रह कर उछल-सा रहा था। बंशी बजानेवाला कौन है, कैसा है, कहाँ है, कैसे मिलेगा-आदि प्रश्नों में उलझ कर बेचारा अधीर हो उठा। उस रंगीले जादूगर की तरफ़ बेचारा खिंचा-सा जा रहा था। चाहा कि कुटिया छोड कर वशीवाले को इधर-उधर टोह लगाऊँ, पर उठन सका। शरीर जकड़-सा गया। क्या वश ! अधीर आँखें कानो को कोसती हुई, विना पानी की मछलियों की तरह, छटपटाने लगी। वंशीवाले ! तुम चाहे जो हो, पर हो पूरे निर्दय ! आँखों से ओट ही रहना था, तो बाँसुरी क्यों की? किसने कहा था कि वाँसुरी बजाकर मुझे कुछ-का-कुछ कर दो ! मेरा पहले का जीवन क्या धुरा था? कम-से-कम यह पागलपन तो सवार न था। दिल में न कोई दर्द था, न कसक थी, न आँखों में यह जहरीला नशा। न ऊधौ का देना था, न माधौ का लेना। खैर, जो हुआ सो हुआ, अब अपना दरस कर दोगे, प्यारे वह मोहिनी मुरली कच फूकोगे, मोहनी वह ध्यान कब से तुम्हारा ध्यान करती हूँ, हृदय नाथ क्या यह विक्षिप्त जीवन तुम्हारी मानसिक मूर्ति का ही ध्यान करने को बनाया गया है, जीवितेश्वर ! तुम इस उपालंभ को शायद् गर्व कहो ! गर्व ही सही। गर्व क्या बुरा है ? और फिर, तुम्हारे ध्यान का! नाथ, एक ही बार तो तुम्हें वहाँ देखा था। कहाँ ? उसी दिव्यद्वीप में, जहाँ की एक अस्पष्ट याल. -स्मृति आज भी मेरे अधीर और प्रापित हृदय को ऊपर उछाल देती है। कैसा दिव्यद्वीप था! अहा ! यह रात भूलने की नहीं। ज्योत्स्ना न विस्तीर्ण सागर-तट को पसार फर, दूध के फेन सा, धवल बना दिया था। चंचल और गरीली लहरें उस अनंत वालुका-राशि के साथ अठखेलियाँ करती मेरी अधखुली आँखों में मुसकरा-सी जाती थीं । मेरी कुज उस समय देखते ही बनती थी। उसके झरोखों में हो झाँकती हुई चद् किरणें मुझे जाल बिनना सिखा रही थीं। मेरा सरल हृदय उनकी उलझी उँगलियाँ पकड़ कर नाव-सा रहा था। उस रात वहाँ अकेली में ही थी। ससी सहे. लियाँ, मुझे छोड़ कर न जाने, कहाँ, चपत हो गयी थीं। मुझे दुलार करनेवाली मेरी चिरसहचरी द्वोपदेवी भी कहीं चली गयी थी। देवी ने उस दिन मेरा अच्छा शृगार किया था। जय । [-२३ । मेरा शृद्धार किया गया, मैं सो रहा थी। जागने पर मैंने अपनी चेश-भूपा देखी। हाथों में वकुल-कलियों के कलित कंकण और हृदय पर मुकुलित मालती की माला थी। लंबे और उलझे हुए वालों में रंग विरंगे फूलों के छोटे-छोटे गुच्छे गूंथ दिये थे। आँखों में, न जाने कहाँ की, मादकता लाकर भर दी थी। यह भी भला कोई काजल है ! क्या कहती थी, क्या कहने लगा। हाँ, एक सफेद चौको पर बैठी कुछ गुना-गुना रही थी। उस गीत की टेक शायद, भूली नहीं हूँ तो, यह थी- "प्रियतम, कैसो तेरो देश कैसी तेरी झलक झिलमिली, कैसो तेरो वेश ?" यह गीत मैंने द्वीप देवी से सीखा था। अस्तु । उस अभूत पूर्व रात्रि ने मुझे उन्मत्त सा कर दिया। मन हाथ से जाता रहा । मैं उसे पकड़ती थी, पर वह हाथ छुड़ा कर लहरों से लपटता और किरणों से उलझता फिरता था। जाने दो, उसका स्वभाव हो चुल् घुला है । मैं चद्रमा की आर देखने लगी। देखते देखते क्या हुआ, कह नहीं सकती। क्या देखा, याद नहीं। अहा ! देखते देखते एक अप्रतिम आलोकमयी श्वेत रेखा ने अनत आकाश और मेरे निकुज-द्वार को मिला कर एक कर दिया। क्या ही सुन्दर मार्ग में वह शुभ्र रेखा परिणत हो गयी ! सब की सब रजत-निर्मित थी । और उस पर दूध और पल-पराग का छिड़काय । मैं वरावर चंद्रयिम्ब की ही ओर देख रही थी। थोड़ी देर में उस दिव्य मार्ग पर से अत्यंत वेग से उतरती हुई

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हैं। मैं भी उनके इस उपाधि दान पर मन-ही-मन प्रसन्न भरने को अपनी कांपती हुई भुजाएँ आगे बढ़ायी, तुम अन्तर्धान जानता है कि मैं किसकी टोह में हूँ? लोग मुझे 'पगली' कहते उन्हें और भी प्रमत्त कर दिया। क्या उन्हें ऐसी 'पेया' । कभी पीने को मिलेगी? मेरी ओर देख-देख कर मुस्कराते क्यों थे, नाथ' फ्या अस्तव्यस्त झार पर दृष्टि गयी थी? मैं भला शृङ्गार जानू ! क्या मेरी अशिष्टता पर ध्यान गया था? सो भी मैं नहा जानती। मैं तो इतना ही जानती हूँ कि तुम आये और मैं , देखने लगी। जब तुमने मेरे नेत्रों पर अपनी फूल-माला स्पर्श कराया, मैं स्नेहाधीर हो उठी। ज्योंही मैंने तुम्हें अंकम हो गये | यह कौनसी लीला थी, लीलामय ? उस दिन से तुम्हारा पता ही नहीं । द्वीप भी, न जाने कहा छूट गया। तब से कहाँ-कहाँ मारी-मारी फिरती है! कोन . होती हूँ। हृदय कहता है, कि ध्यान सफल होगा, तुम मिलोगे । क्य सचमुच ही तुम मिलोगे, हृदयेश्वर?

मुसकराहट २ क्या कभी वह मुसकराहट भूलेगी? ज्योंही वह मुसकराया, मस्त प्रकृति पुर क्ति हो उठी। निस्त-ध आकाश उद्वेलित गया। धीर समीर में प्रकम्प होने लगा। कुसुम की कोमल लियों पर रोमाञ्च हो आया। लताएँ थिरकने लगीं। पाटल । पखडियों पसीज उठी। कमल कोश से रस छलकने लगा। अस्फुट ध्वनि से गूंजने लगे। पक्षी इधर से उधर उड़ ड कर चहकने लगे। अधिक क्या, माधुर्य मुकुलित हो उठा, कास विकसित हो गया और लावण्य बार बार उस मुसकरा- ट के कोमल स्पर्श को चूमने लगा। कितने नेत्रों ने उस सुधा से अपनी प्यास बुझायी ? तने हदय पटलों पर वह इन्द्रधनुषकी सी सस्मित रेखा बचित हो गयी ! कितनों के मन-मृग उस रिमति-पाश में उलझ र फंस गये ! ओह ! क्या से क्या हो गया ! उस मुसकराहट में दि बाँधने की शक्ति थी, तो साथ ही मुक्त करने की भी युक्ति । उसकी ओर देख-देख कर विप और अमृत ने कई बार मालिङ्गन किया था। वहाँ मृत्यु और जीवन का भी प्रत्यक्ष समन्वय देखने को मिला था। चतुर चितेरे रग और कूची ले लेकर उसकी तसवीर सींचने नाये, पर वेचारे खड़े देखते ही रह गये। उनकी आँसों ने उस [--२ देखने लगी। जव तुमने मेरे नेत्रों पर अपनी फूल-माला स्पर्श कराया, मैं स्नेहाधीर हो उठी। ज्योंही मैंने तुम्हें अंक उस दिन से तुम्हारा पता ही नहीं। द्वीप भी, न जाने कहाँ जानता है कि मैं किसकी टोह में हूँ? लोग मुझे 'पगली' कहते है । मैं भी उनके इस उपाधि दान पर मन ही-मन प्रसन्न न्हें और भी प्रमत्त कर दिया। क्या उन्हें ऐसी 'पेया': कभी पीने को मिलेगी? मेरी ओर देख-देख कर मुस्कराते क्यों थे, नाथ' क्या अस्तव्यस्त शृङ्गार पर दृष्टि गयी थी? मैं भला ऋङ्गार जानू ! क्या मेरी अशिष्टता पर ध्यान गया था? सो भी मैं जानती। मैं तो इतना ही जानती है कि तुम आये और मैं भरने को अपनी कॉपती हुई भुजाएँ आगे बढ़ायी, तुम हो गये । यह कौनसी लीला थी, लीलामय ? छूट गया। तब से कहाँ-कहाँ मारी-मारी फिरती हूँ! कोन होती हुँ। हृदय कहता है, कि ध्यान सफल होगा, तुम मिलोगे । सचमुच ही तुम मिलोगे, हृदयेश्वर ?

मुसकराहट क्या कभी वह मुसकराहट भूलेगी' ज्योंही वह मुसकराया, मस्त प्रकृति पुलक्ति हो उठी। निस्तब्ध आकाश उद्वेलित गया। धीर समीर में प्रकम्प होने लगा। कुसुम की कोमल लियों पर रोमाञ्च हो आया। लताएँ थिरकने लगी । पाटल ने पंखड़ियों पसीज उठी। कमल कोश से रस छलकने लगा। रे अस्फुट ध्वनि से गूंजने लगे। पक्षी इधर से उधर उड़ डि कर चहकने लगे। अधिक क्या, माधुर्य मुकुलित हो उठा, वकाल विकसित हो गया और लावण्य बार बार उस मुसकरा- हट के कोमल स्पर्श को चूमने लगा। कितने नेत्रों ने उस सुधा से अपनी प्यास बुझायी? कितने हृदय पटलों पर वह इन्द्रधनुपकी-सी सस्मित रेखा खचित हो गयी! कितनों के मन-मृग उस रिमति-पाश में उलझ कर फंस गये ! ओह ! क्या से क्या हो गया ! उस मुसकराहट में यदि बाँधने की शक्ति थी, तो साथ ही मुक्त करने की भी युक्ति थी। उसकी ओर देख-देख कर विप और अमृत ने कई बार प्रेमालिङ्गन किया था। वहाँ मृत्यु और जीवन का भी प्रत्यक्ष समन्वय देखने को मिला था। चतुर चितेरे रन और कृची ले-लेकर उसकी तसवीर खींचने आये, पर येचारे सड़े देखते ही रह गये। उनकी आँखों ने उस । है।

जाने क्यों, निखरी हुई शरच्चन्द्रिका का स्मरण हो आता है, हिम-मण्डित धवल शिखरों पर खेलने को मन दौड़ जाता। ओर कुछ एमा जान पड़ता है, जैसे मेरी अधखुलो माल पलकों को कच्चे दूध से पखार रही हों। समझ पड़ता है, शान्ति, सरलता और विमलता उस मुसकान से ही प्रस्फुटित हुई है। विकास और प्रकाश उसी मुकि-नन्दिनी के सरस अधर तरल तरङ्गमाला में ऐसी उछल-कूद मचायी कि गरोगे । भी न करते यना । उलटे आप ही उधर खिंच गये ! यही शब्द-वाटिका के मालियों की भी हुई। उनकी उस ओर ऐसे सिंच गयी, जैसे लोहे को चुम्पक लपक . है। कुछ शब्द हृदय से बाहर निकलना चाहते थे, पर और मुख पर कड़ा पहरा बैठा था! लेखनी की की गयी था । कहें तो क्या, और लिखें तो क्या ? जव कभी मैं उस मधुर मुसकान का ध्यान करता है तब पल्लव हैं। उस मुसकान की झलक एक ही बार क्यों मिली १ वह अमृतमयी विद्युत्प्रभा एक ही बार चमक-दमक कर क्यों अनन्त अदृष्ट में लीन हो गयी ? आँखों में, वाट देखते-देखते, झाईप गयी। कलेजा आह के धुएँ से धुंधला हो गया। पर 4 चिदानन्द-विलासिनी मुसकराहट आज तक सामने न आयी न जाने, किस कोप-भवन में मान ठाने चैठी है ! उसकी झलक कौन नहीं लेना चाहता ? कितने तरसते ने समें, वृषादित्य की प्रचण्डता के कारण, जल की एक क्षोण खा दूसरे पार दिखायी देती थी। दूर तक बालू ही बाल नजर आ रही थी। वृक्ष झुलम-से गये थे। सूखी पत्तियाँ झड़-झड़ कर हाँ-तहाँ बिछ गयी थीं। कपास के पेड़ बड़े सुहावने जान पड़ते ।। बीच में एक खपरैल भवन था और उसके आस पास कई कोटी छोटी कुटियाँ। सादे रहन-सहन के कुछ परिश्रमी व्यक्ति पौर फोड़ा-निरत बालक-बालिकाओं को उस स्तत्रता-सदन के आँगन में देख कर मैं पुलकित और प्रफुल्लित हो गया। माश्रम में बड़ी स्वच्छता और पवित्रता थी। उस तीर्थ भूमि पर र रसते हो एक प्रकार की दिव्य शान्ति का अनुभव होने लगा। दर्शन मिला । वह जगद्वन्द्य महापुरुष एक कुशासन पर आसीन था। आस-पास कुछ साधक बैठे थे। उस समय वह सदाशय अपने सम्मुख प्रतिष्ठित देवता की अर्चा में निरत था। पूजा समाप्त होने को थी। उसके आराध्य देव का नाम 'सुदर्शन' है। मैंने उस स्थितप्रज्ञ महात्मा को सायाङ्ग प्रणाम किया, और थोडा-सा मानसिक स्तवन भी । मानसिक इसलिये, कि मुख से कुछ भी बड़बड़ाने में सकोच और भय लगता था। यह मेरी ओर मुस्कराया। कुशल-क्षेम पूछा- ? हाँ, मानसिक स्तवन का भाव, जहाँ तक स्मरण है, कुछ- कुछ ऐसा था- "नरश्रेष्टीतू वह आदर्श उपस्थित करने को धरातल पर अवतीर्ण हुआ है, जिसे हृदयस्थ कर आज नहीं तो कल अवश्य ही त्रिताप-संतप्त जन-समाज विश्व-वीणा के स्वर में सजीव सुख-शान्ति का राग अलापने में समर्थ होगा। "सत्यनिष्ठ! तेरा जन्म और मरण दोनों ही सत्य-साधना के अर्थ हैं । सत्य को तू साकारता प्रदान कर चुका है । तेरा और सत्य का सौहाद्द देख कर कौन कृतकृत्य न होगा ? धन्य तेरा सत्याग्रह धन्य तरी सत्य-निष्ठा। "तपोधन! तेरी तपस्या उनके निमित्त है, जो तिरस्कृत, पतित और पद दलित हैं, जो निर्धन, निराश्रय और निर्वल है, जो दीन, हीन और पराधीन हैं। तू चाता है, वे काटते हैं! "शक्तिशालिन् ! तू ने आज जगद्व्यापी हिंसा को भी हिंसा कर डालने का सकल्प किया है। तभी तो तू ने अपने अप्रमेय पराक्रम से बडे-बड़े बलवानों को भी थर्रा दिया है तेरी प्रदत्त शक्ति का परिणाम निस्सदेह 'जीवनोत्सर्ग है। और जीवनोत्सर्ग ही तो मुक्ति का जनक है। "धर्ममूर्त्त । तुझे किस धर्म का प्रतिनिधि कहें तेरी आत्म में राम की मर्यादा, कृष्ण को कर्मण्यता, बुद्ध की अहिंसा, शंक- की भीमता, चैतन्य की भावना, ईसा की दीनबन्धुता औ मुहम्मद की कट्टरता आदि अनेक धर्म-धारणाएँ विद्यमान है तू सत्य के माध्यम द्वारा इन सभी धर्मों में समन्वय स्थापित कर रहा है। धन्य तेरा सत्प्रयास। "भागवत -भूपण ! कौन कहता है कि तू कोरा राजनीतिक पथ-प्रदर्शक है। तूतो एकशुद्ध भागवत है । तेरी प्रमानन्यता में गोपिकाओं को, कीर्तन में गौराष्ट्र देव को, और भक्ति-विहवलता में मीरा की प्रतिमूर्ति सामने आ खडी होती है। भक्ति की मूर्च्छित लता को आज तू अपने आँसुओं से सींच-सींच कर अनुप्राणित कर रहा है। "महात्मन् ! वास्तव में इस युग का तू एक ईश्वरीय रहस्य है । तुझे नमस्कार है । शत-सहस्रश नमस्कार है !!" उस पुण्यश्लोक की मुट्ठी भर हड्डियो के दर्शन-लाभ से निश्चय ही मेरी मृतप्राय आत्मा में एक नवीन और पवित्र जीवन का सचार हुआ। तीर्थ यात्रा सफल हुई। उस महानु- माव की अनिर्वचनीय अवस्था देख कर मुख से हठात् यह भगवदुक्ति निकल पड़ी- 'एपा प्राझीस्थिति पार्थ । नैना प्राप्य विमुह्यति ।

रमया लना "टूट गया, तो टूट जाने दो। रोते क्यों हो, लला! मैं तुम्हें और खिलौना ला दूंगा। "नही, हम तो अपना वही खिलौना लेंगे।" रमैया, यह कहता हुआ, धूल में लेट गया। रमैया का मच मैं खूब जानता हूँ। उसे मना लेना सहज नहीं। मैं भी- कौन तेरे मुंह लगे-कह कर एक पेड़ की ओट में खडा हो गया। वह अब भी 'मेरा खिलौना, मेरा खिलौना' रटता हुआ फूट-फूट कर रो रहा था। थोड़ी देर में उसका प्यारा मृग-शावक कहीं से उछलता-कूदता उसके पास आ पहुँचा । रमैया किलक कर उससे लपट गया। मृग-शावक ने भी अपनी अव्यक्त भाषा में उस चपल बालक से कुछ बात की, जिसे वह तुरन्त समझ गया । लो, वह खिलौना भूल गया। दोनों खेलते-कूदते एक लता-मंडप की ओर चले गये। मैं भी पीछे-पीछे हो लिया । सध्या का समय था । और महीना था चैत का । पहाड़ी पर से भेटें तेज़ी से उतर रही थीं। उनके गले में धी घटियो का स्वर बड़ा सुहावना जान पड़ता था। अधीर वत्सला गाएँ रॅभाती हुई गो-शाला की ओर दौड़ती आती थीं । गडरिया भी पीछे पीछे बाँसुरी वजाता, झूमता हुआ, चला आ रहा था। उस के साथ दो-तीन कुत्ते भी थे। गो-धूलि से आकाश पांडुवर्ण हो ।

गया था। चिड़ियाँ चहचहाती हुई पेड़ों पर बसेरा लेने जा रही थीं। मेरे उद्यान में पक्षियों का कलरव सूय भर रहा था । यही सुन्दर दृश्य दिखाने के लिये, जान पड़ता है, वह मृग- शावक मेरे रमैया को उस लता मडप की ओर खींच ले गया। न मेरा लाल खिलौने के लिये मचलता, न मुझे वह सध्या- फालीन मनोरम दृश्य देखने को मिलता। उस समय रमैया बड़ा ही प्रसन्न था । मृग-शावक भी उस के साथ किलक किलक कर खेल रहा था। मेरे लाल के मुख पर एक अपूर्व भाभा थी। रोते-रोते उसकी बड़ी-बड़ी आँखें लाल हो गयी थीं। सान्ध्य गगन की रक्ताभा ने भी उस लाली में एक अनुपम योग दिया था। कपोलों पर हॅसते समय, जो गडढा पड़ जाता था, उसमें एक निराली ही सरलता झलकती थी। लाल लाल ओठो की पतली रेखा पर क्या हो भोलापन थिरक रहा था। उस बाल-लावण्य को धूलि- धूसरित अलकों ने और भी बढ़ा दिया था। उन उलझी अलको को सध्या की उडी हवा अपनी सुकुमार और सुमृदु उँगलियों से सुलझा-सी रही थी। उस बि का ठीक ठीक चित्राङ्कण मेरी लौह लेखनी-द्वारा असभव है, उस रूप का सचा चित्रकार तो यह चपल मृग-शावक ही है । मैं तो दूर से, पेड़ की ओट में चोर-सा छिपा, मन-ही-मन यह पक्तियाँ गुन गुना रहा था- "अरविंद सो भानन, स्प-मरन्द, अनादित लोचना [-३० पिये।

लिया और उसका मुख चूम कर कहा कि-'लला, तुम मेरे मन में न बस्यो अस वाहक जो, 'तुलसी' जग में फल कौन जिये?" बाल गोविंद के रूप-मकरंद का पान करते-करते आँखों से आँसुओं की धारा वह चली। शरीर पर रोमांच हो आया। ऐसा समझ पड़ा, मानो मैं कमल के फूलों को गोद में समेटे उस प्रशान्त वातावरण में उड़-सा रहा हूँ। जान पड़ा कि मेरा रोम रोम किसी ने चंद्र-सुधा से परिप्लुत-सा कर दिया है । समस्त प्रकृति मुझे अपने लाल की लाली से रंगी देख पड़ने लगी। 'लाली मेरे लाल की जित देखू तित लाल !' अधीर हो मैंने अपने रमैया को दौड़ कर छाती से लगा अहा! खिलौना हो।' खिलौने का नाम सुनते हो वह फिर मचल गया। धन्य यह बाल लीला!

मेरे लाल! १ "मोहन, उठो, उठो देखो, तुम्हारी बुधिया 'हम्मा हम्माँ' करती अपनी माँ का दूध पीने को कैसी उतावली हो रही है !" "कहाँ है अमाली बुधिया आज अमी उछ घास चलायेंगे।" "लला! पहले उठो तो।" मोहन युधिया की आवाज सुन कर चट उठ बैठा । और जाकर अधीर घुधिया के गले से लपट गया। बुधिया भी बड़े चाव से उसकी विखरी हुई अलके चाटने लगी। कई बरस बीत गये, पर वह दिन मेरे लिए आज भी वैसा ही है । अहा ! वह प्रभात कभी भूलने का है ? उस दिन आकाश हँस-सा रहा था । पक्षी भी किसी निराले राग में मस्त थे । जिधर देखो उधर माधुर्य भरा दिखायी देता था। कमलदलायत नेत्र म दे मोहन सो रहा था। उपा-समोर उसके लच्छेदार काले वालों पर कल्लोल कर रहाथा । उस सय्य मेरेलाल की मुखच्छबि म में, न जाने क्या, मोहिनी थी। मुख-कमल मुकुलित हो रहा था। ओठों की अरुण रेखा में सरलता झलकती थी। लाल-लाल गुलाव- सी हथेलियों से वात्सल्यरस छलफ-सारहाथा । अलकों पर हाथ फेरने से फूल विखेरने का सा आनन्द आता था। यालगोविन्द की यह दिव्य शोभा में अनिमेष दृष्टि से देसने लगा। उस [-३९

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दर्पण क्यों हमेशा दर्पण लिये बैठे रहते हो? क्या तुम्हें काई और काम नहीं रहता भाई, तुम्हारी यह नित्य की दर्पण-लीला देख कर मुझे बारबार यह भजन याद आ जाता है- "मुखडा क्या देखै दरपन में। तेरे दया धरम नहि तन में।" दर्पण, शायद, तुम इसलिए देखते होगे कि वह तुम्हें 'सुन्दर' होने का प्रमाण-पत्र प्रदान किया करता है । तुम अपने को सुन्दर मानते भी होगे। सौन्दर्य का तुम्हें अभिमान भी होगा । पर क्या तुमने कभी वास्तविक सौन्दर्य पर भी विचार किया है ? न किया होगा। क्यिा होता, तो आज तुम्हारे निर्यल हाथ में यह काँच का टुकडा न होता। तुम्हें अपना सौन्दर्य ही देराना है तो उसे प्रकृति के दर्पण में क्यों नहीं देखते चले जाओ प्रकृति के शीश महल में। वहीं तुम अपने लावण्य और माधुर्य का यथेष्ट चित्राङ्कण कर सकोगे। यहाँ तुम चन्द्र-किरणों में अपनी नित्य-भूतन दिव्य कान्ति का आमास पाओगे । अरुणोदय की प्रभा में तुम अपने कलित कपोलों की स्वच्छ रालिमा देखोगे । कमल फी अर्द्धविकसित कलियों में तुम्हें अपनी बड़ी-बड़ी सुन्दर और रसोरी आँखें - देखने को मिलेंगी। नवीन लाल लाल कोपलों में तुम्हें अपने AN-H अपने सरकल्पना में तुम्हें अपनी बड़ी-बड़ी सुन्दर और रसीली आँख देखने को मिलेगी। सरसता और रसिकता में तुम्हें अपने अरुण अरुण और सरस ओंठ दिखाई देंगे। ललित लताओं के जालों में तुम अपनी घुघराली अलक सुलझाने लगोगे। उस दर्पण में तुम अपने को नित्यकिशोर और नित्यसुन्दर पाओगे । यह नकली दर्पण ता उसी क्षण तुम्हारे हाथ से छूट कर गिर पड़ेगा। तुम्हें अपना सौन्दर्य ही देखना है तो उसे हृदय के स्वच्छ दर्पण में क्यों नहीं देखते ? चले जाओ हृदय के भावना भवन में। वहीं तुम अपने लावण्य और माधुर्य का यथेष्ट वित्राण कर सकोगे। यहाँ तुम अलोकमयो निर्मल भावनाओं में अपनी दिव्य कान्ति का आभास पाओगे। प्रचड ओज में तुम कलित कपोलों को सच्छ लालिमा देखोगे। सरलता और और सरस ओंठ दिखायी देंगे। सहयता की निकुज में बैठ कर तुम अपनी घुघरालो अलफें सुलझाने लगोगे । उस दर्पण में तुम अपने को नित्यकिशोर और नित्यसुन्दर पाओगे । यह नफ़ल दर्पण तो उसी क्षण तुम्हारे हाथ से छूट कर गिर पड़ेगा। तुम्हें अपना सौन्दर्य हो देखना है तो उसे आत्मा के निर्मल दर्पण में क्यों नहीं देखते ? चले जाओ आत्मा के नीरव अन्तस्तक में । वहीं तुम अपने लावण्य और माधुर्य का यथेष्ट चित्राङ्क कर सकोगे। वहाँ तुम नित्यज्योति के प्रकाश में अपनी दिद कान्ति पाओगे। आनन्दोदय में तुम अपने कलित कपोलों के लालिमा देखोगे । आत्म-सन्तुष्टि और सौम्यता में तुम्हें अपना दाचित् उसी चक्र के रहस्य का समझ लेना 'गहना गति" हा गया है। इस अविरत प्रगति का लक्ष्य एक ही । जहाँ तक स्मरण उसका नाम 'विधाम' है। वह सजीव है, निर्जीव नहीं । समें एक स्फूर्ति है, एक विकास है । एक आदेश है, एक र्तव्य है । एक योगक्षेम है, एक निश्रेयस है। यही विश्राम उस क का आधार है, या उसकी गति का आदि, मध्य और अव- , बान है। त्रिलोक का प्रयास इसी विधाम-लाभ के लिए जान पड़ता । कहीं प्रत्यक्षरीति से, तो कहीं अप्रत्यक्ष रीति से। त्रिकाल की गुत्थियाँ यहीं सुलझती हैं। कैसे? इसी का बताना तो टेढ़ी वीर है। विश्राम के नाम पर झूठी विज्ञापन-वाजी इतनी अधिक होती है कि उसके चक्कर में आकर प्रायः समस्त सृष्टि अफfण्यता के गर्त में पड़ी सड़ा करती है । आशा से हाथ धो बैठना तो इस भ्रान्त विश्राम के उम्मेदवार के लिए पहली सीढ़ी है। भीरुता इस मृगतृष्णा की सहचारिणी है। विलासिता सहोदरी है। और इसका फ्रोडा-स्थल है स्मशान वैराग्य का विनोदाञ्चल! सया विश्राम सचमुच ही बड़ा दुर्लभ है । निर्भीक कर्मयोगी दाउस निधि के सच्चे अधिकारी है। उसकी साधना फुछ ये- परवाह मस्तों से ही बन पड़ी है। चीर स्थार्थत्यागियों ने ही यह महामत्र साधा है। उन स्वायत्तसिद्धों ने अपने अजर-अमर सिद्धान्तों को 'ब्राह्मो अवस्था' के दिव्य पटल पर अङ्कित किया है । शान्ति-कुटीर तो सदा ही उन नित्य विकसित सिद्धान्त पुष्पों से आच्छादित रहती है। विश्राम का कैसा चित्र है, ठीक-ठीक नहीं उतारा जा सकता। फूची अपनी रग-रेलिया उस सूरत को देखते ही बन्द कर देती हैं । रह-विरग रग भी बदरड हो मुंह छिपा लेते हैं । चित्रकार की आँखें तो पहले ही मुंद जाती हैं। यह है विश्राम की चित्रणा! हम अशान्त भ्रान्त पथिकों के लिए विश्रान्त सुख का रसास्वादन करना मन-मोदकों का खाना है। विधाम ! तेरी महिमा तो वही जान सकेगा, जो तेरे देश का निवासी होगा।

परिश्रान्त पथिक SE "अरे भैया! घड़ी भर विश्राम तो कर ले। इस पेड़ की डाल पर अपनी पोटली टाँग दे, और येठ कर दो पूँट ठण्डा पानी पो ले । कहाँ से आ रहा है, भैया? पसीने से लथपथ हो रहा है। साँस पेट में नहीं समाती । पैर सूज गये हैं। कलेजा भूख के मारे मुंह में आ रहा है । अभी और कहाँ तक जाना है, भाई" "क्या पूछते हो! कुछ पता नहीं, कहाँ तक जाना है।" "ऐं! यह कैसी यात ! कुछ पता नहीं!" "हाँ! भाई, कुछ पता नहीं। चलते चलते, न जाने, कितने दिन हो गये, पर अभी तक मुझे यह मालूम नहीं कि मैं किधर जा रहा है। अनेक नगर, गाँव, खेड़े, नदी, नाले, पहाड, टोले, जङ्गल पार करके जव मैं आगे नज़र फेंकता हूँ तव अनन्त क्षितिज रेखा ज्यों की त्यों ही दिखायी देती है ! कभी कभी तो मैं जहाँ से चलता हूँ वहीं फिर घूम घाम कर आ पहुँचता है। कोई मुझे मेरा पता भी तो ठीक-ठीक नहीं बतलाता । सङ्गी-साथी भी अव तक कोई मन का नहीं मिला। गठरी के योझ के मारे गर्दन झुक गयी है, सिर फटा जाता है । टेकने की लाठी भी गिर-गिर जाती है। बड़ी आफत है । क्या करूँ-क्या न करूं "इस पोटली में क्या-क्या है?" “सुन कर हँसोगे । सिवा करड-पत्थर के रखा ही क्या है ? "तो फेंक क्यों नहीं देते?" "कैसे फक दूं ? लालच बुरी बला है। लोग कहते हैं कि एक दिन यह कड़-पत्थर होरे-मोती हो जायेंगे। राम जाने, उनकी इस भविष्यवाणी में कहाँ तक तथ्य है!" "तो क्या तुम इन्हीं हीरे-मोतियों की टाह में वावले बने घूम रहे हो ? अजीब आदमी हो ! इन कङ्कड़-पत्थरों को फेंक फाँक कर उस सच्चे हीरे की खोज क्यों नहीं करते, जिसे पाकर तुम्हारो सारी यात्रा सफल हो जायगी ?" 'तेरा हीरा हेराइगा कचरे में'-यह विरागभरी स्वरावली कहीं से प्रताड़ित हो हम लोगों के कानों में गूंजने लगी। पथिक ने उस गान को सुन कर पूछा- "क्यों भाई ! तुम मुझसे इसी हीरे के खोजने के लिए कहते थे? यह हीरा कहाँ मिलेगा?" "तुम्हारी इसी फटी-पुरानी गुदड़ी में कहीं छिपा होगा। उसके लिए तुम्हें पूरब पच्छिम न भटकना पड़ेगा। अहा ! उस हौरे की दमक हज़ारों सूर्य और चन्द्र के प्रकाश से कहीं बढ़कर है। उसका जौहर हर एक नहीं जानता। लाख क्या, फरोड़ में फहीं उसका एक जौहरी मिलेगा।" - "इसो फटी पुरानी गुदड़ो में। फिर दिखायी क्यों नहीं देता" "धूल-भरा है न १७ "फिर कैसे दिखायी देगा" "दृष्टि निर्मल करो। दिव्य दृष्टि से उसका दर्शन होगा। दिव्य दृष्टि का अञ्जन तुम्हें इस वृक्ष के नीचे ही मिल जायगा। धीरज धरो, पथिक ! बहुत भटक चुके, अब चलने फिरने की जरूरत नहीं। तुम चाहोगे तो वह हीरा इसी क्षण मिल जायगा।" पथिक की आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगी ओर उसकी सफेद दाढ़ी पर से मोती-जैसी बूंदें टपक पडी। - सवार . देख, घोड़े की बाग मोड़, नहीं तो आगे धड़ाम ! इस घोड़े पर चढ़ने का तुझे क्या धमण्ड है ? जानता नहीं, यह अश्व कितने कुशल आरोहियों को गिरा चुका ? माना कि इसकी गति कल्पनातीत है; इसकी पहुँच तीनों लोक में है, इसकी दौड़ चौदहों भुवन तक है, पर अश्वारोही! तूने इस पर चढ़कर क्या देखा? वही तीन कौड़ी की दुनियाँ, दस इञ्ची का क्षेत्रफल ! तिस पर जरा सी चूक हुई कि रसातल गया! यह अडीला भी बड़ा है । कहीं अड़ गया तो होश ठिकाने कर देगा। देख, बाग मोडले, इस मार्ग पर हो आगे न बढ़ । इसके दोनों ओर खाई खन्दक हैं। तू तो उस तग गली से जा। रास्ता टेढ़ा मेढा अवश्य है, कड्डूडीला भी है। काँटे भी बिछे मिलेंगे। पर डरना मत, साहस न छोड़ना, चले ही जाना, बहादुर सवार ! जव तेरा यह मस्त सैलानी घोडा हाँफने लगे, पसीने से तर हो जाय, अपनी सारी कूद-फाँद भूल जाय, तब उतर पड़ना । यस, वहीं सफर पूरा हुआ समझना। तू अपना लक्ष्य-स्थान पा लेगा। उसी स्थान पर तुझे 'स्थैर्य प्राप्त होगा सुना है, उस स्थैर्य को स्थितप्रज्ञों ने 'ब्राह्मी स्थिति' का नाम दिया है। ५२- भठियारिन क्या कहा, कि यहाँ किराया नहीं देना पडता? ठीक, पर क्या तू मुझे यह भी समझा सकेगी कि इस सराय में किसी तरह की चोरी तो नहीं होती? में किराया देने को तो तैयार हूँ, पर दगाबाज चोरों के जाल में फंसने को राजी नहीं । यहाँ काफी उजेला भी तो नहीं। कौन जाने, कहाँ चोर-डाकू छिपे हो । इस दुरंगी सराय में मुझे जहाँ देखो तहाँ मक्कारी-ही- मकारी देख पड़ती है। घाह, यहाँ तो गाने-बजाने का, नाच रंग का, हँसी दिल्लगी का और खेल-कूद का भी सामान इकट्ठा कर रखा है। और वह भी सब विना दाम ! अवश्य इसमें कुछ न कुछ भेद है । क्या तू मुझे इसका भी कारण बतला सकेगी, कि यहाँ से जो मुसाफिर जा रहे हैं वे चुपचाप नीचे को देखते हुए, बोझ के मारे दये से, क्यों दिखायी पड़ते हैं। स्मरण तो कुछ ऐसा आ रहा है कि यहाँ, शायद, मैं भी दस- चीस बार ठहर चुका है। यह काली-काली दीवारें, यह पुरानी छते और यह दीमक-खाये फटे बिस्तरे ही यतला रहे हैं कि मैं यहाँ कई यार आया गया है। जो हो, अव फी पार यहाँ ठहरने का नहीं। आज मैं फाड़ होकर भी किसी धन-कुयेर से कम नहीं। नंग-धुइंग हूँ, पर किसी इन्द्र से कम नहीं। मेरे पास चार येटियाँ हैं, थोड़ा सा चना-चबैना है, एकाध पैसा गाँठ में भी है, तो क्या यह सव, भठियारिन, तेरे भुलावे में आकर लुटवा लूंगा? मुझे जाने दे। मैं तेरे आदर-सत्कार को, तेरी मेहमानदारी को, दूर से ही हाथ जोडता हूँ। दया कर मेरा पिण्ड छोड़ दे। मैं किसी पेड़ के ही नीचे पड़ रहूंगा, किसी न किसी तरह एक रात काट लूँगा, पर इस सराय की भूल-भुलैयों में आने का नहीं। --- वीरभोग्या वसुन्धरा तेरी रक्षा करते हुए हृदय यल्लमा मृत्यु प्रणयिनी का सप्रेम भगवति वसुन्धरे ! तुझे क्या यह भोगेंगे! जिनको अपना फूल-सा जीवन ही भार प्रतीत होता है, जिनकी फौलादी नसें ढीली पड़ गया है, जिनके चेहरे पर झुर्रियों पड़ी दिखायी देती हैं, जिनकी ऑखे तिलमिला गयी हैं, जिनका हृदय परासे को आवाज़ से ही धड़कने लगता है, जिनकी किसी समय की रण कङ्कण मण्डित कलाई आज केवल घडी बाँधने के ही योग्य रह गयी है, जिनकी उँगलियाँ कलम पकड़ने में भी फाँपा करती हैं, क्या वे तेरे हिम शिखर-मण्डित मुकुट-विभूपिन शुभ्र शीर्प, विन्ध्य भूपणालङ्कृत वज्राङ्ग एवं सागर-विलोड़ित नीलचरण- फमलों के भोग-सुख के अधिकारी हो सकते हैं ? तुझे तो यही रण-चाँकुरे सुपूत भोग सकेंगे, जिन्होंने तुमुलयुद्ध में वीर माता का दूध पिया है, जिनका लालन पालन । मुण्डमाल धारिणी धाय ने किया है, जो मारू बाजे के साथ लोरियाँ गा-गाकर रणागण के पालने पर सुलाये गये हैं, शत्रुओं की अंतड़ियों की पाड़ियाँ यांधाँध कर जिन्होंने केलि-कल्लोल किया है, जिनके कर-पल्लव सदा ही रक-रजित रहे हैं, तोप को गड़गड़ाहट और तलवार की झनझनाहट में जिन्हें मृदा और चीणा के ताल-स्वर का अनुभव हुआ है और जिन्होंने . - आलिङ्गन करना सीखा है। माँ धसुधे! इन कायरों को देख लिया न? आज इन मूक पाषाण-मूर्तियों से तू जैसी कुछ भाराक्रान्त हो रही है, कदा चित् ही वैसी कभी हुई हो। ये वही हैं, जिन्होंने तुझ कपिला को, दान की बछिया की तरह, स्वयं ही विदेशियों और विधर्मियों के हाथ में सौंप दिया। ये वही हैं, जिन्होंने अपने जन्मजात अधिकार-कुसुमों को कुचल कर अपनी छाती पर पर- तन्त्रता की सन्तप्त शिला हंसते-हँसते रख ली। ये वही है, जिन्होंने तेरे उन्नत मस्तक पर से स्वाधीनता का ताज़ उतार तुझे गुलामी की बेड़ियाँ पहना कर कैद करवा दिया ! ये वही हैं, जो फत्र में बैठे हुए भी बेशर्मी से अपने को जानदार कहने का दम भर रहे हैं ! आश्चर्य ! तू इन कायरों को अय भी अपने पुनीत अङ्क में बिठाये है ! इन परतन्त्र कठ-पुतलियों को तोड़ कर फेंक दे । प्रलयकारी। इन कुपूतों से क्यों भाराकान्त हो रही है ? इन नपुंसकों का सर्वनाश करते क्या तुझे दया आती है ? इन मुर्दो को अङ्क में धारण कर क्या तू 'पुत्रवती' बनना चाहती है ? चीर-भोग्ये ! इन कायर कामियों को तुरन्त ही रसातल भेज, इसी क्षण नरक में फेंक । इन्हें नरक भी, शायद ही, स्थान दे, क्या तू इसी चिन्ता में है ?

, ण्यवती धाराङ्गना नृत्य कर रही है। उसके कुटिल कटाक्ष तो कुछ होश ही नहीं । येचारे मखमली गई पर लुटके पड़े । एक युवती ताल खिला रही है। तलार पैरों के नीचे चित्राङ्कण कसा चित्राङ्कण किया है, चित्रकार ! तेरी यह सारी चित्र- . लोक के लिए असामयिक, अनुपयुक्त और महित- सिद्ध होगी। जान पड़ता है, तेरे रहो में चटक ही है, यित्व नहीं, तेरी लेखनी में लचक ही है, घल नहीं । इसी ण तू अपने प्रयासों में असफल हुआ है । यह फैसा चित्र खींचा है, भाई ! यह तो किसी रग-महल चन जान पडता है। सजावट तो.सूर दिखायी है । गगन- जो गुम्बजों और कनक-कँगूरों की छटा सचमुच हो निराली चित्ताकर्पिणी है । छज्जे क्या ही मनोमोहक है । इन झरोखों न्या ये मदविह्वला चन्द्रमुखियाँ झाँक रही हैं ? अच्छा ' यह र का दृश्य है । स्वर्ण सिंहासन पर एक सुन्दर और सुकुमार विराजमान हैं। ये कैसे राजा हैं। क्षात्र तेज तो इनमें मान भी नहीं । अस्तु । पीछे छत्र तना हुआ है ! आस पास -कार सरदार और मन्त्री हाथ जोड़े खड़े हैं। मामने एक ललित हाय भावों पर दरवारी झूम-से रहे हैं । राजा सादर एक हाथ में शराय का प्याला है और दूसरे में फलों की सकेगा? यदि बा, तो इसका पुरस्कार भी तुझे शीर्षस्थानीय दवी पढ़ी है ! चित्र-कौशल तो तेरा, वास्तव में, प्रशंसनीय है, पर है यह सर घृणित और विपाक । इस चित्राण का तुझे क्या पुरस्कार दिया जाय ? पारितोषिक पाने के पहले अपनी कलुपित लेखनी तोड़ कर फेंक दे, गन्दे रह उट्टेल दे, निजीय उँगलियाँ काट डाल । तुझे कुछ सींचना ही है तो ऐसा चित्र- खींच । एक उजड़ा हुआ ग्राम बना । उसमें खंडहर और टूटी फूटी झोपड़ियाँ हो । खेत और याग झुलसे ओर उजडे पड़े हो। एक मोर भीषण अग्नि धाय-धाय करती हुई जीभ लपलपा रही हो । जहाँ-तहाँ अत्याचार-पीडित पद-दलित अस्थिकट्वाल पड़े हो । भूख के मारे नन्हे-नन्हे बरे माताओं की गोद में कलप रहे हो । लूट खसोट और मार-पीट हो रही हो । सर्वत्र सर्वनाश का साम्राज्य हो। चित्रकार । क्या ऐसा चित्र तू खींच दिया जायगा। यह कैसाचित्र खींचा है, भाई ! यह तोकिसीमानिनी नायिका का चित्र जान पड़ता है। कोप-भवन खूब बनाया है ! स्फटिक शिला पर एक मैली-सी सेज बिछी है । मानिनी उसी पर करवट लिये पड़ी है। सारा शरीर धूलि-धूसरित है। केश खुले हुए हैं। अङ्ग पर एक भी भूषण नहीं, सब-क-सब इधर-उधर पड़े हैं। एक सहेली आप को पचा झलती है और दूसरी हाथ पकड़े मना रही है। पतिदेव पर पलोट रहे हैं। पर श्रीमती मानिनी देवी उस वेचारे की ओर देखती तक नही। गरीव रमेण पर बन . १ . हट पड़ा है। अब मान गढ ढहे तो कैसे ? चित्र-कौशल तो तेरा, वास्तव में, प्रशंसनीय है, पर है यह सब घृणित और विपाक । इस चित्राङ्गण का तुझे क्या पुरस्कार दिया जाय पारितोपिक पाने के पहले अपनी कलुषित लेखनी तोड़ कर फेंक दे, गन्दे रङ्ग उड़ेल दे , निर्जीव उंगलियाँ काट डाल । तुझे कुछ खींचना ही है तो ऐसा चित्र खींच । सबसे पहले एक शुभ्र मन्दिर बना । देख, उसके चारों ओर अग्निदेव प्रखर ज्वालाएँ उगल रहे हो। मन्दिर में एक प्रलयकारिणी महाशक्ति प्रतिष्ठित हो । उसके ज्वलन्त नेत्रों से पति- शेखा निकल रही हो । अट्टहास की मुद्रा हो । दाँतों में बजली-सी कौंधती हो । हृदय पर लाल फूलों का हार पड़ा हो । साडी भी लाल ही हो । सारा शरीर रुधिर से लथपथ हो । केश पैरों तक लहरा रहे हों। एक हाथ अनाथ भक्तों के मस्तक पर हो और दूसरे हाथ में हो क्त-रञ्जित कराल कृपाण । मन्दिर में अखण्ड तेज और प्रचण्ड पराक्रम का साम्राज्य हो । चित्रकार ! क्या ऐसा चित्र तू खींच सकेगा? यदि हाँ, तो इसका पुरस्कार भी तुझे शीर्षस्थानीय दिया जायगा। यह कैसा चित्र खींचा है, भाई ! यह तो किसी सुरम्य उद्यान का चित्र जान पडता है। रचना तो.सूर दिसायी है ! लहलही लताओं के मण्डप और गहगहे गहर के प्रीम मवन सचमुच ही अनुपम है । क्यारियों की छटा कुछ निराली ही है !

भी हो रहा है । इस चित्र को देख कर रसिक-मण्डली गमलों की सजावट देखने-योग्य है । माधवी निकुन्ज क्या ही मनोमुग्धकारी है ! कहीं डालों पर रख-विर पक्षी चैठे हैं, तो कहीं पंख फैलाये मोर नाच रहे हैं । इधर कुछ मनचले रसिक जन हिडोलों पर झूल रहे हैं। उधर उस पद्म सरोवर में कुछ निर्लज्ज नवयुवक, मद-विभोर ललनाओं के साथ, केलि कल्लोल कर रहे हैं ? अच्छा! यह जल-विहार का दृश्य है ।एक दूसरे पर जल छिड़क रहा है। कोई कमल की नली से पानी गुड़गुड़ा रहा है, तो कोई अर्द्धमुकुलित कलियों को ताड-तोड़कर उछाल रहा है। माधवी-निकुञ्ज में गान वाय अवश्य कह उठेगी कि चित्रकार ने कलम तोड दी है । तेग चित्र-कौशल है भी प्रशसनीय, पर यह सब घृणित और विपाक्त । इस चित्राण का तुझे क्या पुरस्कार दिया जाय ' पारितोषिक पाने के पहले अपनी कलुषित लेखनी तो कर फेंक दे, गन्दे र उड़ेल दे, निर्जीव उँगलियाँ काट डाल तुझे कुछ खींचना ही है तो ऐसा चित्र खींच । एक सघन वन खण्ड बना। वह प्रान्त पहाड़ी हो । वहाँ एक निर्मल नदी वहती हो। तीर के वृक्ष झुककर उसके सुनील जल से आचमन के रहे हो । नदी के तट पर एक ओर हष्ट-पुष्ट गायें पानी पीती है और दूसरी ओर छोटे-छोटे मृग-शावक नव दुर्वा हूँग रहे हो समय प्रभात का हो । प्राची को लालिमा से रंग देना । इध उधर पक्षी उड़ रहे हों। कहीं ऋषियों और ब्रह्मचारियों - सुगेय गाथा इसी अनादि तरहिणी को तरङ्ग-तन्त्री से प्रतिध्वनित हुई थी। वेद-वाणी को इसी तीर पर ईश्वरीय आदेश प्राप्त हुआ था। इन उपासकों की केसी सरल और उपासना है ! प्रथम प्रभात का दर्शन इन्हीं महात्माओं ने किया था। जीवन-सङग्राम में इन आत्म-वीरों ने अभूतपूर्व विक्रम से विजय-वेजयन्ती उड़ायी थी । विश्व प्रेम का अमोब मन्त्र इन्हीं विश्व-वन्द्य महापुरुषों के पाद-प्रच्छालन से मिलेगा, अन्यथा नहीं। अतएव उठकर एक बार प्रणतभाव से इनके चरणों पर श्रद्धाञ्जलि चढ़ा। ये प्रसन्न होकर तुझे 'ब्राह्मी स्थिति' का साक्षात्कार करा देंगे। । त् कैसा महाभारतीय सैनिक है। पड़े-पडे केसे काम चलेगा? उठ, आँख खोल देख, युद्धारम्भ होने ही वाला है । यह विप्लव- बेला है । क्रान्ति को फाली-काली घटाएँ घिरने लगी हैं । कैसा विकराल वातावरण है ! दनुज-दल मर्दिनी रणचण्डी समर- भूमि पर ताण्डव नृत्य करने जा रही है। क्या तुझे उसके लोक प्रकम्पन नूपुरों का छम छम शब्द सुनायी नहीं देता? उद्धान्त दिशाएँ थर थर कांप रही हैं। ब्रहाण्ड विक्षिप्त हो उठा है। समस्त जीव जन्तु त्रस्त हो रहे हैं। प्रशान्त नभो मण्डल के बज्रोपम वक्ष स्थल पर विलव की रेखाएं खचित हो गयी हैं। थोड़ी ही देर में तेरे आस पास नगी तलवार बिजली की तरह चमकने लगेंगी । सुना है, उन तरवारों पर पद-दलित दुर्यलों के गर्म आँसुओं का विपाक पानी चढ़ाया तो देख। ब्रह्म-चेला की ऐसी स्वर्गीय आराधना और किसमे बनेगी? समीर की तरल तरङ्गों में ये परिमल-कण कैसा आँख खोल तू कैसा भारतीय उपासक है ! पड़े-पड़े कैसे काम चलेगा। उठ, आँख खोल । देख, प्रभात होने ही वाला है । यह ब्रह्म वेला है। आत्मानुभूति की जन्म भूमि यही वेला है। प्राचा के अईविकसित सरल हास की ओर तो दृष्टिपात कर । क्या ही अनुपम आभा है ! प्रकृति के शुभ्र दर्पण में अनुराग रञ्जिता उपा की उद्भावना कैसी प्रतिविम्बित हो रही है । धन्य है वह चतुर चित्रकार, जिसने अनन्त आकाश के प्रशान्त पट्ट पर यह दिव्य आलोक रेखा अद्धित कर दी है। विहग-कुल का सरस स्वर-समूह तो निराला ही है। इसी नाद-नदी के तीर्थ सलिल में निमजन कर कवि की अन्तनि अपने को कृतार्थ मानती है । तनिक इस ध्यानावस्थित समीर की आराधना कल्लोल कर रहे हैं ! कदाचित् इसी कल्लोल-कला में अदम्य उत्साह ओर अनन्त जीवन का निगूढतम रहस्य अन्तर्हित हो । अहा ! क्या ही मनोहर दृश्य है ! आर्य-सस्कृति की पुनीत पताका क्या कभी फहराती देखा है ? यदि नहीं, तो अब देख यह किसी पुण्यसलिला तटिनी का तट है। स्वर्गानुमोदित फर्मभूमि का अभिषेक इसी जल से हुआ था। शब्दब्रह्म ६२-] ! की विजली की तरह चमकने लगेगी। सुना है, उन तलपारों सुगेय गाथा इसी अनादि तरङ्गिणी की तरङ्ग-तन्त्री से प्रतिध्वनित हुई थी। वेद-वाणी को इसी तीर पर ईश्वरीय आदेश प्राप्त हुआ था। इन उपासको की केसी सरल और उपासना है ! प्रथम प्रभात का दर्शन इन्हीं महात्माओं ने किया था। जीवन सङग्राम में इन आत्म-वीरों ने अभूतपूर्व विक्रम से विजय-वैजयन्ती उड़ायी थी । विश्व-प्रेम का अमोघ मन्त्र इन्हीं विश्व-वन्य महापुरुषों के पाद-प्रच्छालन से मिलेगा, अन्यथा नहीं। अतएव उठकर एक बार प्रणतभाव से इनके चरणों पर श्रद्धाञ्जलि चढ़ा । ये प्रसन्न होकर तुझे 'ग्राही स्थिति' का साक्षात्कार करा देंगे। तू कैसा महाभारतीय सैनिक है ! पढ़े-पडे केसे काम चलेगा? उठ, आँख खोल ।देख, युद्धारम्भ होने ही वाला है । यह विप्लव- वेला है। क्रान्ति को काली-काली घटाएँ घिरने लगी हैं । फैसा विकराल वातावरण है ! दनुज-दल महिनी रणचण्डी समर- भूमि पर ताण्डव नृत्य करने जा रही है। क्या तुझे उसके लोक प्रकम्पन नूपुरों का छम-छम शब्द सुनायी नहीं देता ? उद्घान्त दिशाएँ थर-थर कांप रही हैं। ब्राह्माण्ड विक्षिप्त हो उठा है। समस्त जीव जन्तु अस्त हो रहे हैं। प्रशान्त नमो. मण्डल के पन्नोपम वक्ष स्थल पर विप्लव फी रेखाएं संचित हो गयी हैं। थोड़ी ही देर में तेरे आस पास नगी तलवार पर पद-दलित दुर्यलों के गर्म आँसुओं का विपाक पानी चढ़ाया से चोलता नहीं। सङ्कत से ही बात हो रही हैं। लो, रण-बाध इस घोर विप्लव में कौन किसकी सुनता है ? यह देख, अमिमुख लगी। उधर तलवारे भी कृतान्त की जीभो की तरह लपलपा हुङ्कार दिशाओं को चीरे डालता है। इन्हीं सर्वस्व-त्यागियों ने प्राणों का मूल्य जाना है। और तू? धिकार है तुझे, जो अब गया है ! ओह ! कितनी भीषण तो गम्भीर गर्जना कर घय कते हुए गोले उगलेंगी ! उनका ब्रह्माण्ड-भेदी शब्द असहाय दोनों के आर्तनाद का रूपान्तर होगा। तेरे देखते ही देखते यहाँ ज्वलन्त ज्वालामुखी फट पड़ेंगे। कहते हैं, उन अग्नि-गर्भ पर्वतों का निर्माण प्राणावशेष पीड़ित अस्थि-कङ्गालों की धुआँ धार आहों से हुआ है ! कुसुम-कलिका से वनोत्पत्ति होगी।' लो, शख फेंक दिया गया! रण-घोषणा कर दी गयी ! लाल झगडे फहरा उठे । शिविर में हलचल मच गयी। कवच और शिर खाण खडखडाने लगे। अखागार की और कितने ही लोग दौड़े जा रहे हैं। कितनी मशालें चल रही है। कोई किसी भी बजने लगा । अरे ! यह अग्निकाण्ड कैसा' पूछना व्यर्थ है। तो दुर्भध दुर्गों को धराशायी करने की तैयारियां करने रहो हैं । धीर सैनिक कैसे झूमते हुए आगे बढ़ रहे हैं । उनका भी बिछौने पर करवट बदल रहा है !

आक्रान्त वसुन्धरा वसुन्धरे ! तू न मानेगी ? तेरी लाल-लाल विकराल आँखें केसे टक लगाये देख रही हैं ? क्या तू आज अपने छोटे-छोटे चों पर रुष्ट है? सभव है, तू उनकी निर्जीव बाल क्रीड़ा देखते देसते अब यी हो । आज तू उनकी, कच्चे दूध के समान, भोली-भाली चतवन पसन्द नहीं करती, कदाचित तुझे उनकी रुधिर-वर्पिणी यङ्कर दृष्टि देसनी है। तभी तो आज तू उनके हाथ में खिलौने नहीं दे रही है । इतनी भीपणता क्यों जिन चालकों को तूने कड़ों बरसों से माधुर्य के हिंडोले पर झुलाया, सुकुमारता के लने में सुलाया, वे आज सेरे साथ कैसे फ्रान्त कोड़ा कर केंगे ? उनका रक्त वीर आयों का है, उनका पालन पोषण प्रकृति- ची ने किया था, उनकी अझैन्मीलित आँख रणागण में बन्द ई थीं, पर आज वे अपने आपको भूलकर कृत्रिम सभ्यता- मणी के गुलाम हो रहे हैं, उनके ओजस्वी नेत्रों से कामोद्दीपक घ छलक रहा है, जटाजूट के स्थान पर तैल-रजित उल्लेदार वाल चमक रहे हैं ! जिनकी छाती पर लोहे के कवच धे रहते थे, आज वहाँ फूलों के हार भी भार-से मालूम होते । जिनकी कलाइयाँ फौलाद की बनी हुई थीं, जिन पर रण- - रहा है? क्या आज तू बार-बार अपने वीर सुपूत परशुराम का सर्वनाश की लीला देख रहे हैं! तेरो छाती पर आतताइयों जिसके स्तनों से इन्होंने सहस्रों वर्प दुध पिया, जिसके पिला सकेंगे? पर, तू तो सदा वीर पुरुषों का ही पवित्र रक्त पास करती है। इन कायरों का कलुपित रक्त, इन कामियों का पर नहीं, तू यही चून पियेगी, इनकी मलिनता को अपनी कंकण याँधा जाता था, आज वे नाजुक दिखायी पड़ती हैं और रण कंकण के स्थान पर रिस्ट-वाच नज़र आ रही है ! जिनका सुकुमार हाथ छड़ी के ही उठाने पर बल खा रहा है, भला, वे तेरे साथ क्या खेलेंगे? समझ पड़ता है, अब तू शान्त होने को नहीं । माँ, अपने वक्षस्थल पर क्या इन कायरों का दुर्वह भार तुझे असहा नहीं हो स्मरण न कर रही होगी? यह क्लोब कुफ्त, माँ । अपनी पौरूपहीन आँखों से का तांडव-नृत्य देखते हुए भी इनकी आँखों से खून टपकता । यह मृतप्राय अपने श्वास-प्रश्वास को जोवन' का नाम दे रहे हैं ! धिक्कार ! अक में बैठ कर पुरुष और प्रकृति के गूढतम रहस्य प्रत्यक्ष किथे, जिसके वात्सल्य-सकेत द्वारा इन्हें निर्वाण-सुख प्राप्त हुआ। जिसको शक्ति से इन्होंने बड़े-बडे वोरों को थर्रा दिया, आज यह उस मातृ-भूमि को क्या अपना एक चुल्लू भर उष्ण रक्त भी न गंदा यून, भला तू क्यों पीने चली ? नहीं ६६--] काल के अट्टहास से कम नहीं। क्या इस वारुणो विमोर शब्दावली को तू फ्रान्त नहीं कर सकता ? क्या इन भ्रष्ट रग- शालाओं, ससखानों, फौचारों, और गुलदस्तों को तेरे गीत दिव्य शक्ति-मन्दिरों, बलिवेदियों, चौर-वाणियों ओर वजों में परिणत नहीं कर सकते ? यदि नहीं, तो तोड डाल इस कलङ्किनी वीणा के तार, मत छेड यह वे-सुरी तान । यह असङ्गति नहीं, तो क्या है ? एक ओर खण्डहरों में पड़े नङ्ग धुग आर्त अस्थि-कङ्काल 'भूख भूख' चिल्ला रहे हैं, दूसरी ओर सुसज्जित महलों में मखमली गद्दों पर प्याले पर प्याले ढल रह हैं और उन्मादिनी रागिनी छेडी जा रही है ! एक ओर रोमाञ्चकारी सर्वनाश की भयावनी काली छाया हमारे अदृष्ट पर पड़ रही है, दूसरी ओर वागभ्रष्ट शब्द-चित्रकार अश्लील चित्र खींच-खींच छबीली कामिनी की लचीली लङ्क और रंगोली रसीली आँख पर मर रहा है ! इधर महाशक्ति भरवी सुनने को उत्कठित खड़ी है, उधर पाटल की पंखुड़ियों पर थिरकते हुए सुकुमार समीर द्वारा प्रकम्पित वसत राग विलासियों के निर्जीव हृदय में नारकीय कामोद्दीपन कर गायक, स्वर-साम्य क्या भूल गया है ? यदि नहीं, तो फिर विश्व-चेणु के स्वर में स्वर फ्यों नहीं मिलाता? उस अलाप में मस्त क्यों नहीं हो जाता, जिससे आत्मा में अनन्त जीवन- दायिनी दिव्य शकिका सञ्चार होता है ? यह गगनभेदी शश [-६९ -- काल-परिस्थिति से विलकुल ही बेख़बर है । जिस कुञ्ज-कुटीर में भीषण हकार नहीं सुनायी देता यदि वह क्रान्तिकारिणी एव शक्ति-सञ्चारिणी रागिनी तेरे हृदय पर ताण्डवनृत्य कर अनर्थकारिणी जान पड़ती है। तू ही बता, यह समय क्या जैसी मुसकराहट चूसने लगते हैं । अरुण अधर-पल्लवों पर थिरकना और काले सटकारे केशों में बंध जाना तो गरीबों का कि अब उनके आगे रणभेरी के गम्भीर नाद की चर्चा करना बे-सुरी तान क्या वे-सुरी तान छेड़ी है, गायक ! जान पड़ता है, तू देश बैठा हुआ तू, वीणा की सरस स्वरावली में, विहाग राग अलाप रहा है, क्या उसके पार्श्व में तुझे प्रलयद्वारिणी भीमा भैरवी का जाती, तो आज तेरे प्रकम्पित कण्ठ से उन्मत्त आलाप को यह मन्द धारा प्रवाहित न हुई होती! तेरे गीतों की शब्दावली भी असामयिक, असंगत और नायक-नायिकाओं के हाव-भाव-भरे गीतों के गाने का है ? इन गीतों के शब्द कहीं गुलावी गालों पर फिसल रहे हैं, तो कहीं अमी-हलाहल-मद-भरी कटोरियों में उछल-कूद मचा रहे हैं ! कभी भौंह को कमान पर उतरते चढ़ते हैं, तो कभी मिश्री रोज़ का काम है। कङ्कण-कितिणि की झीनी झनकार सुनते सुनते तो बेचारे इतने सुकुमार और नाजुकमिज़ाज हो गये हैं विलासियों के निर्जीव हृदय में नारकीय कामोद्दीपन कर समस्त पयों नहीं हो जाता, जिससे आत्मा में अनन्त जीवन काल के अट्टहास से कम नहीं। क्या इस वारुणो विभोर शब्दावली को तू क्रान्त नहीं कर सकता? क्या इन भ्रष्ट रंग- शालाओं, खसखानों, फौथारों, और गुलदस्तों को तेरे गीत दिव्य शक्ति-मन्दिरों, वलिवेदियों, चोर-वाणियों और बज्रों में परिणत नहीं कर सकते ? यदि नहीं, तो तोड डाल इस कलदिनी वीणा के तार, मत छेड यह बे-सुरी तान । यह असङ्गति नहीं, तो क्या है ? एक ओर खण्डहरों में पड़े नङ्ग धुङ्ग आर्त अस्थि-कवाल 'भूख-भूख' चिल्ला रहे हैं, दूसरी ओर सुसज्जित महलों में मखमली गद्दों पर प्याले पर प्याले ढल रह हैं और उन्मादिनी रागिनी छेडी जा रही है ! एक ओर रोमाञ्चकारी सर्वनाश की भयावनी काली छाया हमारे अदृष्ट पर पड़ रही है, दूसरी ओर वाग्भ्रष्ट शब्द-चित्रकार अश्लील चित्र खींच-खींच छपीली कामिनी की लचीली लङ्क और रॅगोली रसीली आँख पर मर रहा है ! इधर महाशक्ति भैरवी सुनने को उत्कंठित खड़ी है, पर थिरकते हुए सुषुमार समीर द्वारा प्रकम्पित बसत राग रहा है। गायक, स्वर साम्य क्या भूल गया है ? यदि नहीं, तो फेर विश्व-वेणु के स्तर में स्वरमयों नहीं मिलाता उस अलाप उधर पाटल की पंखुड़ियों दायिनी दिव्य शक्ति का संचार होता है ? यह गगनभेदी राध [~६९ कि अब उनके आगे रणभेरी के गम्भीर नाद की चर्चा करता - काल-परिस्थिति से विलकुल ही बेखबर है। जिस कुञ्ज कुटीर में शक्ति-सञ्चारिणी रागिनी तेरे हृदय पर ताण्डवनृत्य कर तेरे गीतों की शब्दावली भी असामयिक, असंगत और जैसी मुसकराहट चूसने लगते हैं । अरुण अधर-पल्लवों पर वे-सुरी तान क्या ये सुरी तान छेड़ी है, गायक ! जान पड़ता है, तू देश बैठा हुआ तू, वीणा की सरस स्वरावली में, विहाग राग अलाप रहा है, क्या उसके पात्र में तुने प्रलयकारिणी भीमा भैरवी का भीषण हङ्कार नहीं सुनायी देता ? यदि वह क्रान्तिकारिणी एव जाती, तो आज तेरे प्रकास्पित कण्ठ से उन्मत्त आलाप को यह मन्द धारा प्रवाहित न हुई होती! अनर्थकारिणी जान पड़ती है। तू ही बता, यह समय क्या नायक-नायिकाओं के हाव-भाव-भरे गीतों के गाने का है ? इन गीतों के शब्द कहीं गुलाबी गालों पर फिसल रहे हैं, तो कहीं अमी-हलाहल-मद-भरी कटोरियों में उछल-कूद मचा रहे हैं ! कमी भौंह की कमान पर उतरते-चढ़ते हैं, तो कभी मिश्री थिरकना और काले सटकारे केशों में बंध जाना तो गरीबों का रोज़ का काम है । कङ्कण-किद्धिणि की झीनी झनकार सुनते सुनते तो बेचारे इतने सुफुमार और नाजुकमिज़ाज हो गये हैं ६८- क्लेव्यं मास्म गमः -- । अरे, पहचाना नहीं। धोखासा गया! मैं समझ बैठा था कि तू भी एक स्वत्वप्रिय मनुष्य है, तू भी एक समाज का अङ्ग है। आरति से तो त निस्सन्देह मनुष्य सा ही प्रतीत होता है, किन्तु तेरो आत्मा उन उदात्त उपादानों से विल्कुल ही पृथक देख पड़ी, जिनका समाहार 'मनुष्य' कहा गया है। फिर तेरा व्यक्तित्व समाज के किस काम का ? तेरी सजीवता मानव-जाति क किस अर्थ की? भारी भूल हुई । व्यर्थ हो मैंने इस घट में तुझे जगा दिया ! तेरी फूलों को मुलायम सुगन्धित सेज व्यर्थ ही विरोर दी ! तेरे गुलाव के गजरे यों ही परों से कुचल डाले । तरे काँपते हुए कमजोर हाथ में इसलिये इस शक्ति की प्रतिष्ठा की थी कि तू मदिरा का प्याला फेंक कर गरम-गरम लाल शरबत से अपने फीके ओठ रेंगे। पर कुछ न हुआ। तेरा नाजुक हाथ फिर उसी प्याले पर पहुंच गया! अपनी समालिंगित प्रयसी के फटाक्ष वाणों से विधता हुआ तू फिर उसी फूल माला को उछालने लगा। थोड़ी देर में जब तेरी मतवाली रंगीली आँस उस महाशक्ति पर गयी, तू मारे भय के थर थर काँपने एगा। रमणी के अचल में मुंह छिपा लिया, और लगा पल-पल पर चौंकने ! मुने हँसी आ गयी। साथ ही दो बूँद आँसू भी क्यों नही कता, जिसके गम्मीर नाद ने किसी समय प्रेय ओर श्रेय, एवं जीवन और मरण के समन्वय का विश्वव्यापी सन्देश संसार को सुनाया था? क्या उस गम्भीर नाद का ध्यान करते डर लगता है। अवश्य लगता होगा। आज वह कंठ कहाँ, यह फान कहाँ, यह हृदय कहाँ ? सर्वनाश हो इस उन्मादिनी रसिकता का, इस निर्जीव विलासिता का, इस पिशाचिनी क्लायता का । गायक, तेरा गीत, तेरा शब्द-चित्र और तेरा स्वर-समूह प्रतिक्षण मृत्यु का माहान कर रहा है। सुत्न, इस स्वरावली की प्रतिध्वनि कैसी डरावनी है ! अपना भला चाहे, तो अव भी इस ये-सुरी तान का छेड़ना बन्द कर दे।

प्राण. । इतनी सा दुर्दशा होने पर भी उस त्रिलोक-वन्दनीया वी का रूप बडा ही दिव्य और शान्त था । तुझे देखते ही वह तप्राय साध्वी और भी फूट-फूट कर रोने लगी। उसके पास तरजित अस्त्र और वाण विद्ध कवच पड़ा था । उधर देखते तूने आँख बंद करली । इतना ही नहीं 'प्राणप्यारी, बारी' चिल्लाता हुआ तू अपनो उसी रगशाला की ओर तेजी म भागा । उस नारकीय जोड़ास्थली में तू फिर उसी तरह तवाला हो नाचने-कूदने लगा ! तेरी इस नपुंसकता पर वार र धिक्कारते हुए मैंने गभीर गर्जना के साथ कहा कि, अरे नर्जीव ! क्या तुझे कहीं डूब मरने को एक चुल्लू पानी भी हीं मिलता? तेरी पुरुषार्थ हीनता एक नहीं अनेक स्थलों पर देख चुका । कभी तो तू विश्व प्रेम का ढकोसला रचता है, और कभी या चा धर्म की ओट लेता है । कभी तु लेसनी के बल से न्ति फा मान चित्र खींचना चाहता है और कभी मौखिक दाडम्मर से ईश्वर भक्ति एव आत्मानुभूति की क्लिष्ट कल्पना रने लगता है ! पर तेरी कथनी और करनी में सदा आकाश ताल का अंतर रहता है । क्लीय है न! सच बात तो यह है तू अपनी विलासिता और निर्जीवता अक्षुण्ण रखने के ये ही यह सारा पाखण्ड-प्रपंच प्रणीत किया करता है। सुन ! कैसा भीषण हुकार है ! देख, पैसा प्रलयकारी दृश्य उठ, हर मत । खडा हो जा। सुन ! तेरे सामने फोन यह [-०३ कार तेरे विलास-विभोर अन्तस्तल को निष्णाण सा करती जाती थी। और तेरी आत्मा उस रंग-शाला की मायामयी यवनिका से टकरा कर खड-खड हो रही थी। गंभीर शख-नाद में सरगी और तवले का स्वर-ताल विलुप्त-सा हो गया। नर्तकियॉ मूर्छित तेजस्विनी वृद्धा छाती पीटती हुई बिलख-बिलख कर रो रही थी। उसके हाथ-पैर जंजीरों से जकड़े हुए थे। छाती से रक गिर पड़े । धिमारते हुए तुझ से कहा, अरे क्लीय ! क्या पृथिवी पर और भी एकाध घडी जीना चाहता है ? सचमुच ही मुझ से बड़ी ग़लती हुई । व्यर्थ ही मैंने तुझ रङ्गशाला से खींच कर इस बीहड़ मैदान में खड़ा कर दिया था। जिस समय क्रान्ति का दिगन्तव्यापी शंख नाद तेरो रण शाला में प्रतिध्वनित हुआ, उस समय तू मख़मली गद्दे पर बैठा मदविहिला नर्तकियों की नृत्य-कला देख-देख कर स्वर्गा धिक सुख लूट रहा था। उनकी किंकिणी और नूपुर की झन हो भूमि पर गिर पड़ी। मारे भय के तेरी भी आँखें बन्द हो गयीं । उद्दाम विलास को समय सामग्री लतिया कर मैंने तुझे वाहर खींच लिया। अब तू एक मैदान में खड़ा कर दिया गया। यह वह मैदान था, वह उजड़ा हुआ बाग था, जहाँ दूर तक खडहर ही-खडहर दिखायी देते थे। उन में जहाँ तहाँ भूखे-प्यासे अनाथ छटपटा रहे थे । एक ओर एक यह रहा था। वस्त्र रुधिर से लथपथ थे। खुले हुए केश धूल से सने थे। नेत्रों से प्रलयकारी चिनगारियाँ निकल रही ७२-] हैउठ, दर मत । खदा हो जा! सुना तेरे सामने फोन यद कि तू अपनी विलासिता और निर्जीयता अक्षुण्ण रसने के हों। इतनी सब दुर्दशा होने पर भी उस त्रिलोक-चन्दनीया देवी का रूप बडा ही दिव्य और शान्त था। तुझे देखते ही वह मृतप्राय साधी और भो फूट-फूट कर रोने लगी। उसके पास रक्तरंजित अस्त्र और वाण-विद्ध कवच पड़ा था। उधर देखते हो तुने आँख बंद करली । इतना ही नहीं 'प्राणप्यारी, प्राण- प्यारी' चिल्लाता हुआ तू अपनी उसी रंगशाला की ओर तेजी से भागा । उस नारकीय फ्रोडास्यली में तू फिर उसी तरह मतवाला हो नाचने-कूदने लगा ! तेरी इस नपुसकता पर वार वार धिकारते हुए मैंने गभीर गर्जना के साथ कहा कि, अरे निर्जीव ! क्या तुझे कहीं डूब मरने को एक चुल्लू पानी भी तेरी पुरुषार्थ हीनता एक नहीं अनेक स्थलों पर देख चुका है। कभी तो तू विश्व प्रेम का ढकोसला रचता है, और कभी देया घा धर्म की ओट लेता है। कभी तृ लेसनी के बल से शान्ति का मान चिन खींचना चाहता है और कमी मौखिक शब्दाडम्बर से ईश्वर भक्ति पव आत्मानुभूति की शिष्ट फल्पना करने लगता है ! पर तेरी कमी और करनी में सदा आकाश- पाताल का अंतर रहता है। लीव है नहीं मिलता नासच बात तो यह है लिये ही यह सारा पाखण्ड-प्रपंच प्रणीत किया करता है। सुन ! कैसा भीषण हुंकार है देस, यैसा प्रलयकारी एस निर्धूम अग्नि-खण्ड के समान प्रज्वलित शब्द अंकित कर रहा है ! अहा ! कैसे प्राण सचारी चित्र हैं। लव्य छध्यं मा स्म गम व्य मा स्मगम स्वाधीनता का यज्ञ "यह 'स्वाहा स्वधा' का शब्द कहाँ से आ रहा है ? सर- स्वती का तट तो यह है नहीं। यह तपोभूमि भी तो नहीं है। यह ऋषियों और अग्निहोत्रियों का पुण्याश्रम भी नहीं है, फिर यह पवित्र प्रतिध्वनि किधर से आ रही है ? ऐसा शब्द तो यज्ञ- शाला से ही उठा करता है।" "किन्तु इस युग में यज्ञ का आयोजन कैसे हो सकता है ? जिस देश में 'भूखे भक्ति न होइ गोपाला' लोकोक्ति व्याप्त हो रही है, जहाँ पर धान्य और गोरस स्वम के धुधले चित्रों में योग दे रहे हैं, जहाँ पतित निवासियों का धार्मिक जीवन तिरस्कृत हो अन्तहित होता चला जा रहा है, और जहाँ फो टिमटिमाती हुई आत्मिक ज्योति भी घुझना ही चाहती है, यहाँ यह कल्पना करना कि यह शब्द यज्ञशाला से प्रतिध्वनित होरहा है, भ्रम नहीं तोफ्या है?" "फिर है "वही- -यश मडप का शब्द।" "यिस यज्ञ का?" "एक निराले या का।" "नाम?' "स्वाधीनता का यश।" 1 फ्या - निर्धूम अग्नि-खण्ड के समान प्रज्वलित शब्द अंकित कर रहा, है। अहा ! कैसे प्राण संचारी चित्र हैं! व्य मा स्म गम ! व्य मा स्म गम " मदान्ध 0920 मदान्ध ! जरा आँख तो सोल । देख, यह क्या हो रहा है ? यह सुसज्जित प्रासाद जल कर भस्म होना ही चाहता आग लग गयी-अव घुझने की नहीं । आश्चर्य, तू अब भी मली गहियों पर करवट बदल रहा है ! मुलायम तकियों छाती से लगाये मस्त पड़ा है ! तुझे अपने सर्वनाश का क भी ख्याल नहीं? तूने आज तक किया क्या ? यही न, कि सच्चे रत्नों का - खूटी पर टॉग कच्चे काँच के टुकड़े अपने आभूषणों में पाये, आर्य-सभ्यता को ताक पर रख विदेशी चाल-ढाल अपनाया, गरीब किसानों के झोपड़े फूक कर अपने ल में ऐयाशी के सारे सामान इकट्ठा किये, ककाल शेष की प्यासी प्रजा का रक्त चूस-चूस कर नत्तकियों के हाव- वों का शिकार बना, प्याले पर प्याले ढाले और सियारों तरह दुम दवा कर अपने नाम के साथ 'सिंह' शब्द को भी नाया ? क्या तू ने कभी कलपते हुए किसानों और पिसते हुए जदूरों के करुण कन्दन को सुन कर गान-घाद्य की ओर से अपने न हटाये हैं ? क्या तृ ने कुरगाक्षी कुटिल कटाक्षों हो सकते हैं जो स्वार्थ के शत्रु, इन्द्रियों के शासक, स्वतंत्रता अपनी माँ की गोद सूनी करके आप से आप उस कनान्त कुंड में कूद पड़ते हैं । सहस्रों युवक अपनी प्राणवल्लभी का प्रेम-पाश तोड़कर उस ज्वाल-माला को हृदय पर धारण "यज्ञ-देवता के प्रीत्यर्थम् । सुना है कि इन आहुत धीरों के धीनता को पापड़ की तरह चबाकर अन्याय को मसल देंगे, अत्याचार को पद-दलित कर स्वाधीनता की धांसुरी बजायेंगे।" उसकी चेदी बड़ी ही भीषण है। उसके मात्विज्ञ वही के उपासक और जातीयता के प्रकाशक हो । उस हवन कुंड में असंख्य वीर-मुण्डों की आहुति दी जाती है। सैकड़ों लाल "यह सब किसलिये" करते हैं। रक्त के एक एक बूंद से सहस्र-सहस्र घोर-पुङ्गव उत्पन्न होंगे। वे कृत्रिम सभ्यता को दबोच कर पैर के तले कुचल देंगे, पर "तथास्तु।"

कोकिल की कुहक ध्वनि ही। सारा राजसी ठाट बाट उसने मिट्टी में मिला दिया है। वीणा और मृदङ्ग इधर से उधर लुढकते फिरते हैं। चौसर के पांसे और मदिरा के प्याले न जाने क्या हुए ' इत्र की शीशियाँ इधर-उधर टूटी फूटी पड़ी है। चित्र विचित्र कमरों में कुत्ते भोंकते हैं। और छतों पर चमगादड़ों का एकछत्र राज्य स्थापित हो गया है । सगमरमर की चौकियों और मखमली गद्दों का तो कुछ पता भी नहीं। वाढ है या दानवी ! हत्यारी ने देवालय और धर्म-ग्रन्थ तक नहीं छोडे । कराल दादों के नीचे जो आया, चया गयी। सावधान हो जाओ। उठो। विस्तर छोड़ो। औरों को भी उठा दो। सबसे पहले प्रसुप्त विलास-विभोर कामियों को जगाओ । निर्दयतापूर्वक उनके हाथ से शृङ्गार-मञ्जूपा छीन कर फेंक को। उनकी बकुल मालाएँ और कुसुम-कवण कुचल डालो। घोणाएँ तोड़ ताड़ कर लतिया दो। जैसे बने तैसे शीघ्र ही उन कामान्धों को चन्द्रमुखियों के बाहु-पाश से छुड़ा कर अलग कर दो। दोड़ो, सचेत कर दो उन पुरानी लकीर पीटनेवाले कूप मण्डक धर्मदम्मियों को। उनके आडम्बर मण्डित ग्रन्थों को फेंक दो। हिचकते क्या हो ? ऐसा करने में कोई पाप तो है नहीं। सड़े-गले सोखले धर्माडम्बर को दूर कर देना ही अच्छा उन कध्यानी धर्म-जन्तुओं को तुरन्तही उनके पतित लो। है "देखते नहीं, दुनिया में उथल-पुथल करती हुई भीषण बाढ़ "याद ! किस नदी की बाढ़ इन दिनों बाढ़ कहाँ से आयी, “आँख खोलो। पड़े-पड़े वरने से काम न चलेगा। वह । "हाँ वह कराल काल की भयङ्कर चाढ़ है । उसका वेग मन से भी अधिक प्रवल है। सुना है, वह संसार का काया कल्प करती आ रही है। उसने अमरपुर-जैसे नगरों के गगन भीषण बाढ़ "सावधान ! सावधान !!" "क्या है, भाई" इधर बढ़ती आ रही है ?" भाई?" किसी नदी या तालाब की बाढ नहीं है । इन दिनो--उन दिनों की बात छोड़ो।" "फिर, आखिर यह है क्या बला? कुछ कहोगे भी " ? चुम्बी सुरम्य प्रामादों का खण्डहर बनाकर छोड़ा है । जिन रङ्गशालाओं में मत्त गजगामिनी बालाओं का कङ्कण किङ्कणि झणत्कार विलासियों को उन्मत्त बना देता था, रोमाञ्चकारी ऋगाल रोदन ही निशीथ में सुनायी देता है । नन्दन चनों का तो उसने नाम निशान तक नहीं छोड़ा ! आज, न वहाँ रङ्ग विरङ्गी फ्यारियाँ ही हैं, और न रसाल की डाल पर यहाँ अब तो किल की कुहक ध्वनि ही। सारा राजसी ठाट बाट उसने मट्टी में मिला दिया है। वीणा और मृदङ्ग इधर से उधर इकने फिरते हैं। चौसर के पांसे और मदिरा के प्याले न गने क्या हुए ' इत्र की शीशियाँ इधर-उधर टूटी-फूटी पड़ी । चित्र विचित्र कमरों में कुत्ते भोंकते हैं। और छतों पर प्रमगादडों का एकछत्र राज्य स्थापित हो गया है। सगमरमर की चौकियों और मख़मली गद्दों का तो कुछ पता भी नहीं। गढ है या दानवी ! हत्यारी ने देवालय और धर्म-ग्रन्थ तक नहीं छोडे । कराल दादों के नीचे जो आया, चया गयी। सावधान हो जाओ। उठो। विस्तर छोड़ो। औरों को भी उठा दो। सबसे पहले प्रसुप्त विलास-विभोर कामियों को जगाओ । निर्दयतापूर्वक उनके हाथ से शृङ्गार-मञ्जूपा छीन कर फेंक दो। उनकी बकुल मालाएँ और कुसुम-कङ्कण कुचल डालो। वोणाएँ तोड़ ताद कर लतिया दो। जैसे बने तैसे शीघ्र ही उन कामान्धों को चन्द्रमुखियों के बाहु-पाश से छुड़ा कर अलग कर दो। दोढी, सचेत कर दो उन पुरानी लकीर पीटनेवाले कूप माहक धर्मदम्भियों को। उनके आडम्बर मण्डित ग्रन्थों को फेंक दो। हिचकते क्या हो? ऐसा करने में कोई पाप तो है नहीं । सडेगले सोखले धर्माडम्यर को दूर कर देना ही अच्छा है। उन भ्यानी धर्म जन्तुओं को तुरन्तही उनके पतित आराधना मन्दिरों मे हटा ली।

फ़कीर की बाँसुरी जो काम लाखों सिपाही और उन्हे कमाण्ड देनेवाले बडे- बड़े शूरवीर सेनापति पूरा नहीं कर सकते, उसे एक सन्चा शहीद, एक मस्त फ़कीर, सहज ही अपनी वॉसुरी बजाकर आन की में वान पूरा कर डालता है। उसकी बॉसुरी कहाँ बजती है ? उसकी सुरीली ध्वनि, कहाँ से कहाँ तक जाती है ? सुनते हैं, उसकी बाँसुरी आधीरात के अधेरे में उसके उत्क्रान्त अन्तस्तल से की जाती है और देश पर वलि हो जानेवाले नवयुवको की नाड़ियों में प्रतिध्वनित हो लोकत्रय में गूंज उठती है। उसके स्वर सत्ता को थरथरा देते हैं, जुल्म का अन्त कर शान्ति में लीन हो जाते हैं। बैंड के बड़े-बड़े ढोल, तलवारों और सगीनों की खड़खडाहट या तोप के गोलों की तड़तड़ाहट आप से आप इस बॉसुरी के आगे ख़ामोश हो जाती है। संसार में कइयों ने उस सुरीली बाँसुरी को सुना, जिसे सुनकर अन्धे अधिकारी बहरे और गूंगे हो गये थे। चाँसुरी के फेंकनेवाले लटकाये गये, जीते ही जलाये गये, किन्तु उनकी चापम इड़ियों से, उनकी तीर्थ- तुल्य कत्रों से वही आज़ादी के स्वर वरावर निकलते रहे, मर मिटनेवालों की धमनियों में दौडते रहे, न्याय का सदेश सुनाते रहे।

- उन दिनों यहाँ भी कुछ ऐसा ही दृश्य दिखायी दिया । यहाँ भी सुपुप्तावस्था के सन्नाटे में, कुछ ही दिन हुए, एक फकीर ने याँसुरी फूकी थी। उसे सुनकर जो जहाँ बैठा था, उठ कर उस मस्त शहीद के पास दौड़ा गया, तन-बदन की किसी को सुध-बुध न रही । बाप ने लड़के को, लड़के ने बाप को छोड़ दिया, किसी ने राजसी ठाट-बाट ठुकरा दिया, तो किसी ने अपने आलीशान महल में ही आग लगा दी। उसकी बाँसुरी सुनने के लिये, भला, किस के दिल में वेकली न होती ? फकीर एक पेड़ के नीचे नग-धुड़ग खड़ा था । वहीं, आस पास, ये लोग जाकर खडे हो गये । घाँसुरी बरावर बज रही थी। उसकी मीठी तान ने लोगों को क्या से क्या कर दिया, कह नहीं सकते । वाँसुरी के स्वरों में एक ही राग था, एक ही तान थी, और वह थी "स्वतन्त्रता की पुकार।" खासी समा आँध गयी। बड़ा असर हुआ। सभी अपनी- अपनी गँसुरी मोहन के साथ फूंकने लगे। सव बाँसुरियों में साम्य था, सब की उँगलियाँ एक साथ ही उठती और एक साथ ही गिरती थीं। सत्र में से स्वतन्त्रता की पुकार ही निक- लती थी। यह स्थान नहीं था, इतना सच्चा था, है और रहेगा, जितना कि दिन के बाद रात और रात के बाद दिन । स्वतन्त्रता की पुकार अनन्त आकाश में गूंज उठी। उसने क्या किया, कहने की आवश्यकता नहीं। पर इतना कह देना अनावश्यक भी न होगा कि उसने हम लोगों की आत्म शुद्धि करके हमें सदा के लिये उस पथ का पथिक बना दिया, जहाँ होकर हमें अपने लक्ष्यस्थल पर पहुंचना है, अपने उजड़े हुए बाग में फिर आजादी के साथ चहकना है।

कैसे आ गये? कैसे आ गये हमारे खेलने के आँगन में ? हमारी यह विनोद स्थली, एक दिन, आनन्द को जन्म भूमि मानी जाती थी।प्रेय और श्रेय का यहाँ प्रतिदिन मिलन होता था। हम यहाँ.पूर हॅसते बोलते, मिलते जुलते और खेलते-कूदते थे। हमारे प्रत्येक खेल में सत्कल्पना, सरलता, सुन्दरता और भय भावना झलकती थी । राग और द्वेप का तो हमने कभी नाम भी न सुना था। इस अभागे ऑगन को हमने, चन्द्र-ज्योत्स्ना की धरल धारा से धोकर, स्फटिक-सा शुभ्र बना दिया था। यहाँ हम कभी नवविकसित कुसुम कलियों की मालाएँ गूंथ गूंथ कर पहन्ते थे, कभी ओस की तरल बूंदों को कमल-ततुओं में पिरो पिरो कर अपनी उलझी हुई अलकों पर लटका लेते थे, कभी मित चन्द्र-विम की गेंद बनाकर उछालते थे, कभी प्रभात स्मीर के हलके हिंडोले पर झूला करते थे और कभी अन्तर्वीण के मधुर स्वर में मुक्त गीत गाते थे। उस समय हमारी वत्र भुजाओं में अखड पराम्म भरा था । विकसित मुस कमल पर अक्षा पराग झलकता था । सरस हदय मे सदभावों का स्रोत उमड़ताया और बडे-बड़े नेगों में अग्नि शिरा-सी प्रज्वलित रहती थी। हम ऐसे खिलाड़ी थे कि हमने इस अनन्त विश्व को ही एक ग्वेलवाड़-मा समझ रखा था। पर कौन जानता था कि याह आकस्मिक प्रवेश हमारे इस आँगन को अपवित्र और फ्लुपिन कर देगा ? तुम हमारा खेल देखने आये थे। अच्छा खेल देखा। आज न यहाँ वह प्राकृतिक छटा है, न वह फरलोल की स्वाभाविक स्वच्छंदता । आज हम व्यर्थ का काम करने के लिए इस सर्व नाशिनी कृत्रिम कर्मण्यता के हल में, कोल्ह के बैल की तरह, जोत दिये गये हैं। आज हमारे शारीरिक, मानसिक और आत्मिक-तीनों ही--विकासों पर कुठाराघात हुआ है । जिस सुविस्तीर्ण विश्व को हम खेलवाइमात्र समझते थे, आज यह कारागार-सा भयावह देख पड़ता है ! इतने पर तुम यह घोपणा करते फिरते हो कि हम तुम्हें स्वावलम्वर और स्वतन्त्रता का पाठ पढ़ाने आये हैं ! कैसे आ गये हमारे इस उद्यान में ? एक दिन यह उद्यान नन्दनवन से होड़ लगाता था। यहाँ की रत्नगर्भा स्वर्णभूमि का उपभोग करने के लिए अमरावती के निवासी भी लालायित रहते थे। सुना है, इस शस्यश्यामला वसुन्धरा पर दूध की नदियाँ बहती थीं। इस सुरस्य उद्यान में बारह माल वसत रहता था। रग-बिरंगे फूलों की क्यारियाँ आदिनी प्रकृति के अभिनय कौशल का एक उज्ज्वल आदर्श उपस्थित करती थीं। हरित और लहलहे फलित वृक्षों की सघन शीतल छाया ने कितने परिधान्त पथिकों का पसीना पोंछ पोंछ कर उन्हें विश्रान्ति सुसन दिया होगा'शीतल समीर के सुमी सरस स्पर्श ने कितनों का आतिथ्य न स्वीकारा होगा? इद उद्यान में कहीं स्वच्छन्द मृग शावक चौकडी भरते थे, तो वहीं छाया ८४-] में बैठकर गोवत्स तृण हुँगा करते थे। उन्मत्त विहग-कुल, अलग हो, वृक्षों के सस्नेह अंक पर कूजन और करलोल किया करता था। हम लोग भी आनन्दोन्मत्त हा, इस स्वर्गाराम में विचरते हुप, स्वतत्रता की रागिनी अलापा करते थे। पर यह कौन जानता था कि तुम्हारा यह इस हरे-भरे उद्यान को नष्ट-भ्रष्ट कर देगा? तुम इसमें सैर करने आये थे। अच्छे सेलानी निकले ! जिन रनों का हमको भी पता न था, वे भी सोद-सोद कर निकाल लिये गये ! सारा नन्दनवन अजड़ हो गया । वृक्षों में एक भी फल न बचा । दुग्ध परिपिक्त भूमि पर मदिरा का छिड़काव कर दिया गया। जिस स्वार्थ परता और निर्दयता से इस स्वर्गीय उद्यान का चौपट हुआ है, उसे या तो हम जानते हैं या घट-घट सो परमात्मा । इतने पर यह बकते फिरते हो कि हम माली बनकर तुम्हारे ऊजड वाग की रखवाली करने आये हैं। कैसे आ गये हमारे राजमहलों में ? ये महल एक दिन महेन्द्र भवन पर हंसते थे। हम लोगों ने इन खंडहरों में जैसी राजसी भोगी, कोई क्या भागेगा? उस काल ससार के समस्त साम्राज्य हमारे उच्छिष्ट माने जाते थे। इन महलों की प्राचीन चित्र-कला आज भी हमारे उन्नत गोरव की सूचना दे रही है । किसी दिन इन हटे फुटे फंगूरों से स्वर्गीय सुख आलिंगन फरने आये थे । लक्ष्मी और सरस्वती की विहारस्थली इसी बोलाभूमि पर थी। रणचण्डी के कराल खग ने यही अट्टदास किया था। सूर्य की उज्ज्वल किरणों ने न्याय विधान को अभिषिक्त कर सब से पहले यहीं प्रतिष्ठित किया था। पर यह कौन जानता था कि यह पाशविक प्रवेश इन राज-महलों की ऐसी दुर्दशा कर डालेगा? तुम हमारे अतिथि होकर आये थे । अन्छे अतिथि निकले ! हमको निकाल कर स्य ही गृहपति वन बैठे ! आज न वह रत्न-सिहासन ही दिखायी देता है, न वे मणि-मालाएँ ही। मणियों के स्थान पर काँच की किरचें, और सोने-चांदी के बदल टोन के खिलौने, निस्सन्देह, सजा दिये गये हैं। जहाँ-तहाँ मदिरा के प्याले और मास की रकाबियाँ भी रख दी हैं। इन महलों का तो रूप ही बदल गया। और फिर, हमारा क्या हुआ, हम ही जानते हैं ! कहने को तो हम आज भी इन महलों में रहते हैं, पर किस प्रकार ? फैदियों की तरह, और किस प्रकार ? कोप लुट चुका है, शक्ति छिन्न-भिन्न हो गयी है, हृदय विलास प्रिय बना दिया गया है और आत्मा पर डाल दी गयी है एक काली चादर | इतने पर यह दावा करते हो कि हम तुम्हे शिष्ट और योग्य बनाने आये हैं। कैसे आ गये हमारे आराधना-मन्दिर में ? यह मन्दिर एक दिन 'सत्य शिवं सुन्दर' का अधिष्ठान था। ज्ञानोदय सबसे पहले यहीं हुआ था। आराधों ने अन्तर्नाद द्वारा इस मन्दिर की प्राण-प्रतिष्ठा की थी। उन्होंने ज्ञान, भक्ति और कर्म में यहीं समन्वय स्थापित किया था। स्वच्छ परिमल-बाही पवन ने .

यही से मुक्ति मन्त्र' ले जाकर विश्व के कान में फंका था। हम इस मन्दिर के आराधक होने में अपने को परम कृतार्थ समझते थे । पर यह कौन जानता था, कि तुम्हारा अपवित्र पदार्पण इस दिव्य मन्दिर को पैशाचिक काडौं का अडा बना देगा ? तुम यहाँ साधक होकर आये थे। अच्छी साधना की ! क्सिने कहा था कि तुम इस मन्दिर की सफेद दीवारों पर विषय वासना की कालिमा पोत दो, धर्म-ग्रन्थों को हमारे हाथ से छीन कर रास्ते पर फेंक दो, या हमारी फूलों की डलिया देवता के आगे से हटाकर अपने पैरों से कुचल डालो? तुम्हारे पदार्पण ने मन्दिर को मदिरालय, श्रद्धा को अन्धता, साधना को कवि कल्पना, और धर्म को आडम्बर बना डाला। इमारी प्राणाधिक आस्तिकता भी आज चौपट कर दी गयी। आज न हम लोक के रहे, न परलोक के ! इतने पर यह कहने का दुस्साहस करते हो कि हम तुम्हें निर्मल, उदार और धार्मिक चनाने आये हैं। [-९१ स्वर्ग में असन्तोष । क्या यही स्वर्ग है ? तव तो छोड़ा ऐसा स्वर्ग देवदूत ! मुझे अपने उसो मर्त्यलोक में भेज दे । कर्म-लोक का निवासी काम-लोक की कामना नहीं करता। अरे ! मेरो वह निर्जन कुटिया क्या घुरो है ? मुझे अपनी उसी मडैया में सन्तोप है । मैं समझ रहा था कि स्वर्ग में कर्म की अनवरत धारा बहती होगी, वहाँ के वासो पारस्परिक प्रेम-सूत्र में बंधे होंगे और वहाँ सन्चरित्रता, सद्व्यवहार एवं सहानुभूति का अटल साम्राज्य होगा । सो वे सब बातें यहाँ कहाँ है? यहाँ का रख-ठ तो कुछ निराला ही है। यहाँ सब के सब विलास विभोर, कामो न्मत्त और मदान्ध देख पड़ते हैं ! क्या इन अकर्मण्यों को कोई काम नहीं ? अगराग लगाना, माला गूंथना या चित्राङ्कण करना हो क्या इन मुफ्त पोरों का इतिकर्तव्य है ? सहकारिता और सहानुभूति तो ये जानते ही नहीं । इनके समान ईर्ष्यालु, लोलुप और स्वार्थी हमारे मर्त्यलोक में नहीं । आस्तिकता का तो इन स्वयप्रभुओं ने नाम भी न सुना होगा। ये लोग हैं तो दानव, पर कहे जाते हैं देव किमाश्चर्यमत: परम् ? देवदूत ! तेरा देव-दुर्लभ स्वर्ग मुझे लुभा न सकेगा । इन सुरम्य राज प्रासादों को नो में कभी का ठुकरा चुका है। यह उन्मादकारो नन्दनवन मेरे किस काम का? इन पारिजात-युप्पो ?

का पराग-पान करने के लिए मेरे सरस सुकुमार अधर पल्लव नहीं। यहाँ के परिमलवाही पवन की विलोल लहरों को मै किन उँगलियों से स्पर्श करूंगा? इन गजगामिनी प्रमदाओ को और तो मैं देखूगा भी नहीं। इनके कटाक्ष-वाण मेरे नीरस और कठोर हृदय पर टकरा कर खण्ड-खण्ड हो गयेंगे । स्वर्गीय सुधा का भी मैं इच्छुक नहीं। चिन्तामणि तो मेरे लिए कानी कौड़ो का भी मूल्य नहीं रखती। मुझे इस स्वर्ग-विहार से नरक-यातना कहीं अधिक अभिवाञ्छनीय है । मैं यहाँ पलमात्र भी नहीं ठहर सकता । यहाँ तुम लोगों के दिन कैसे कटते होंगे। मैं अपनी जन्म-भूमि का स्मरण कर अधीर हो रहा है। वह ऊजड गॉव, वे ऊसर खेत, वह टूटी फूटी झोपड़ी, यह निर्जल नदी, वह निर्जन वन और वे टेढी मेढी वन वीथियाँ आज भी मुझे स्वर्ग से ऊँचा उठा रही हैं। वे सीधे-सादे असभ्य ग्रामीण यहाँ कहाँ मिलेंगे ? यहाँ न वह हल है, न वह खुरपी । न जेठ की लू है, न सावन की मूसलवार चर्पा । न रोना है, न गाना । न रूखी रोटी है, न सूखे चने । वहाँ हम लोग हिल-मिल कर रहते हैं। दूसरे के सुख में सुख और दुख में दुख मानते हैं । अहवार तो हम गरीव जानते ही नहीं। हम लोग ईश्वर से बहुत डरते हैं । यहाँ की वेश-भूषा लेकर मैं क्या करूँगा ? तन पर एक फटा-पुराना चिथड़ा ही हमारा शृङ्गार है और रत्न-जटित [-९५

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अनाड़ी सुधारक फ्या 'सुधार सुधार' चिल्लाता है, सुधारक ? कुछ अपना भी सुधार किया है ? ससार का सुधार करने के पहले कभी इस पर भी विचार किया है कि सुधारक का सुधार कैसे होगा? न तो तुझे देश-काल-परिस्थिति का ही पर्याप्त ज्ञान है और न विवेक एवं शक्ति का ही साक्षात्कार तूने किया है । फिर सुधार करने को क्यों कटिवद् हो रहा है? तू तो केवल दो-चार चाहरी अधूरी बातों के आधार पर ही सुधार की हलचल मचा रहा है । तू अपने छोट-से बन्द कमरे के भीतर बैठा हुआ, खिड़की से ही, समस्त ब्रह्माण्ड की छानबीन किया करता है। कभी कभी तो तृ विधि विधान की भी नुक्ता चीनी कर बैठता है। कपोल-कल्पनाओ की कच्ची नींव पर नवीन विश्व के निर्माण का आयोजन करना तो तेरा सहज व्यापार है। किसी भी घटना पर तू अपने क्षुद्र व्यक्तित्व की छाप लगा देता है । यह नहीं समझता कि इससे सुधार होगा या विगाइ । यदि तू अपने सुधार के उत्तरदायित्व से परिचित होता तो ईश्वरीय वाटिकाओं के उजाड़ देने की कभी दुश्वेष्टा न करता, विष-लताओं से पारिजात पुष्प चुनने को खड़ा न हो जाता, अमृत-भरी कटोरियाँ करील की जड़ों में न उड़ेल देता, सौरभित सुमनों की मंजुल मालाएँ हाथी के पैरों के तले न कुचल देता, प्रकृति सुन्दरी के कोमल कलेवर को लोहे के काले कण्टकित आभूषणों से कलङ्कित न करता, सहज सामाजिक बन्धनों को ढीला करके स्वर्ग-भूमि पर रक्तपात न कराता, आराधना-मन्दिरों में धर्म मृतियों पर मदिरा की धारा से अभिषेक न होने देता और न शुक्लवसना सरस्वती को काली-कलूटी साडी पहना कर नर्तकी की तरह गली-गली नचाता ही फिरता। सुधारक ! सुधार का बीड़ा उठाते हुए क्या तूने कभी जनता के सरल वायुमण्डल में अपनी हृदय तन्त्री की झीनी झनकार सुनी है ? क्या तूने उत्तरदायित्व की दुधारा तलवार पर कभी फूंक-फूक कर पैर रक्खा है ? क्या तूने कभी अपने वर्तमान आन्दोलन के गर्भ में सदसत्-परिणाम की स्पष्ट रेखाएँ भविष्य- पटल पर खचिन देखी हैं ? यदि नहीं, ती तुझसे कोन कहने गया था, कि त आकाश के प्रशान्त अन्तःकरण में क्रान्ति का प्रलयङ्करी लहरें उठा दे । सुधार करने के पहले तुझे क्रान्ति और शान्ति के हृदय की धड़कन भी तो देख लेनी चाहिए थी । यदि तुझे कर्तव्याकर्तव्य का शान होता त लोक-सत्ता को, नीरोग बनाने के बदले, सन्निपात-जैसी असाध्य व्याधि से निष्प्राण फरने की अनधिकार चेष्टा न कर बैठता । तेरे दुष्कृत्यों के भयङ्कर परिणाम नरक की काली दीवारों पर रक्त से अङ्कित किये गये हैं। दुर्दैव तेरी करतूतों पर खिलखिला कर हँस रहा है । इधर समस्त जन-समाज भी किंकर्तव्यविमू- ढता के अन्धकूप में पड़ा हुआ चिलख-विल्ख कर रो रहा है। इन सब अनर्थों का तू क्या उत्तर रखता है, सुधारक ?

अछूत " १" अछूत ! अछूत !!" "हैं ! अछूत यह है या तुम “यही काला कलूटा जो सामने खड़ा है। हम लागों को कौन अछूत कह सकता है ?" " इसे-इस पद-दलित गरीव को-अछूत मान लेने का आदेश तुम्हें किस न्यायाधीश के इजलास से प्राप्त हुआ है ? इस अछूत आईन की प्रसविनी किस व्यवस्थापक की लेखनी है ? किस निर्णायक ने तुम्हें यह निर्णय दे रखा है ?" "आदेश ! व्यवस्था ! निर्णय !! तुम्ह यह सब पूछने का क्या अधिकार है ?" "संभव है, तुमने कभी स्वार्थ-स्वप्न में किसी न्यायाधीश, व्यवस्थापक अथवा निर्णायक की प्रतिच्छाया देखी हो । पर, सावधान ! वह न्यायाधीश नहीं, शैतान का कोई पंचक वकील होगा, ध्यस्थापक नहीं, शान्ति-रिच्छेद करनेवाला कोई आततायी होगा, निर्णायक नहीं, अध पतन का पाँसा फेंकनेवाला काई चतुर जुआरी होगा। सावधान ! यह न्याया- लय नहीं, माया मन्दिर होगा, व्यवस्था भवन नहीं, वचना. गृह होगा, निर्णय निकेतन नहीं, गोलमाल का अहा होगा। "निरे निरक्षर हो, सुधारक। धर्मशास्त्र के एक भी सूत्र पर मनन किया होता, तो आज ऐसी ऊटपटाग यात न पकते फिरते।" 'सुनो, सुनो । सच यात तो यह है कि क्रिया के साथ ही प्रतिक्रिया की प्राण-प्रतिष्ठा हो जाया करती है । पर, तुम लोग इस महा महासूत्र से नितान्त अनभिज्ञ हो। इस व्याव- हारिक सिद्धान्त पर तुमने यदि ज़रा भी दिमाग खर्च किया होता, तो आज विश्व के 'स्वातन्य-सदन' से तुम्हारा और तुम्हारे समाज का बहिष्कार ही क्यों किया जाता । तुम्ही बताओ, आज मानव-समाज में तुम छूत हो या अछूत न्यायावतार ! समाज के चित्र-पट्ट पर केवल इसे ही क्यों काली रेखाओं से अकित किया है ?" 'क्योंकि यह जन्म से ही घृणास्पद, पतित और अस्पृश्य है। इसके सस्कार पूर्वजन्म से ही नीच हैं। हमारी थरावरी कैसे कर सकता है ? इस के स्पर्श से हमारे पैरों की धूल तक अछूत हो जाती है । । ससार में यदि कहीं स्वच्छता, उज्ज्वलता और उच्चता है, तो वह हमारे द्विज-समाज में ही है, अन्यत्र नहीं" "ढोंग, निरा ढोंग। इसी दंभाचार का क्या स्वच्छता, उज्ज्वलता और उच्चता कहते हैं ? अन्तरात्मा के दर्पण में, तनिक, अपना रूप तो देखा, महाराज ! कितनी मलिनता है ! छिद्रान्वेषण का काजल आँजते-आँजते तुम्हारे ओजस्वी नेत्र निष्प्रभ हो चुके हैं, पर तुम्हें उनके विकृत सौन्दर्य पर, १००-] . शायद अब भी, अशेप गर्व है । पहले तुम्हारा मुख-कमल कैसा 'प्रफुल्लित रहता था! सहृदयता का यह पराग ही कुछ और था । आज तुम्हारी वह कान्ति कहाँ गयी? तुम्हारा काचन- वर्ण शरीर अकारण द्वेष से झुलस-सा गया है। यह झुर्रियाँ दूसरों पर व्यर्थ घृणा करते-करते ही पढ़ गयी हैं। विचार- सकीर्णता ने ही तुम्हारे शुभ्र और उन्नत अगों को निर्बल और अर्जरित कर दिया है। भले ही तुम नस से शिख तक दंभ का इत्र पोते रहो, पर चिर दुर्गन्ध की यह विपाक लहर, एक- न-एक दिन, तुम्हारे जीवन के अन्तस्तल में व्याप्त हो कर ही रहेगी। इस मूक अछून का अमोघ अभिशाप निश्चय ही तुम्हें उच्चता के विमान से च्युत करके रसातल में फेंक देगा।" "इस नीच पतित का अभिशाप! तब तो यह विश्वामित्र और दुर्वासा को भी मात कर देगा!" "संदेह ही क्या! अस्तु । कुछ भी हो, तुम लकीर पीटते ही जाना । भूल कर भा मिथ्याचारों मे मुख न मोड़ना, क्योंकि इन्हीं ढोंगों की बदौलत तो तुम छूत, ऊँच और लन्ध प्रतिष्ठ वन पाये हो । मूर्ख तो यही अभागा है। इसीसे तो इसका अमल अङ्ग अस्पृश्यता के आभूषणों से अल्हत किया गया है। मढ ने व्यर्थ हो कपट के साथ वैर विसाह लिया । सदाचरण को अकारण ही अपना सुष्टद बनाया। कैसा पागल है ! पुरस्कार की उपेक्षा करके दया ओर अपनी पुराना सेवा को यों ही युगानुयुगों से अपनाये बैठा है ! तुम्हारी तरह यह शाब्दिक आस्तिक भी तो नहीं। हिसाब-किताय में बिल्कुल ही कोरा है। यही कारण है, किधर्म-विधानों का जवानी जमा खर्च नहीं रस सकता। और अव भी, मनुष्योचित हार्दिक भावों का अपव्यय किया करता है। देवाधिदेव ! तुम्हारे श्रीपाद-पम- समीपेषु रहते हुए भी इस कुदजहन ने सनातन समाज-व्यापी स्वार्थवाद का यथेष्ट अध्ययन नहीं किया! तभी तो आज तिरस्कृत और पद-दलित-होकर मारा-मारा फिर रहा है।" "कहते जाओ । सुन रहा है।" "क्या लाभ ! तुम्हारे आगे यह सारा कथनोपकथन अरण्य• रोदन से कुछ अधिक मूल्य नहीं रखता। हाँ, इस दुर्मति ने व्यर्थ ही पसीना बहा-यहा कर, जीवन भर, सूखी-रूखी रोटियों से अपना पापी पेट भरा । मुफ्त का माल हड़प जाने की परा विद्या सीख जाता, तो आज इसकी भी तोंद तुम्हारी ही जैसी सचिकण, पीन और दिव्य दिखायी देती । धर्म धुरन्धरता की कलित कला में पारगत होता, तो आज यह भी, तुम्हारी ही भाँति, सब कुछ करता हुआ भी 'पद्मपत्रमिवाम्भसा' निर्लेप रहता । बेचारा निर्वल है, निराश्रय है। तुम्हारे ब्रह्मास्त्र का सामना कैसे कर सकता है ? धर्मशास्त्र तुम्हारा, व्यवस्था तुम्हारी, आचार्यता तुम्हारी और वेदोक्त ईश्वर भी तुम्हारा । जहाँ देखो तहाँ तुम्हारा ही बोलवाला है । इस एकाधिकार से, निस्सन्देह, तुम फूले न समाते हागे । और चाहे जो करो, पर १०२-] - । दया करके समदर्शी ईश्वर के नाम पर तो धाँधलो न मचाओ, कृपा-निधान ! वह तुम्हारी बपौती नहीं है । ईश्वरीय विधान और न्याय के तुम्ही एक मात्र ठेकेदार नहीं हो । न्यायावतार! आँखें क्यों बंद कर ली? क्या सोच रहे हो? "धोखा! धोखा !" "कैसा धोखा" "अन्तस्तल के स्फटिक-मंदिर में देख रहा हूँ। धोखा । इन घृणित और पद-दलित अछूतों को परमात्मा कैसे स्नेह से भेंट रहा है । वास्तव में, वह पतित पावन है-दुर्घल बन्धु हैं। इतने दिनों बाद कहीं आज मेरी आँखें खुली !" "अब तो न कभी इसे अछूत कहोगे?' "कभी नहीं, स्वप्न में भी नहीं।" .

आलोचक क्या आलोचना करेगा, आलोचक ? आलोचना करने का कुछ अधिकार भी रखता है। न्यायाधीश की हैसियत से तो तेरी आलोचना कुछ अधिक मूल्य रखती नही । ऐसी आलोचना सिर्फ एक फैसला होगी, जो वाहा उपकरणों से तैयार किया जाता है। उसके आधार में न तो विशुद्ध सत्य ही रहता है, और न निष्फपट सौजन्य और सौहार्द ही । ऐसे यान्त्रिक फैसले को महत्व ही क्या दिया जा सकता है ? आलोचक, अपना मत स्थिर करने के पहले ज़रा देश-काल- परिस्थिति पर भी तो विचार कर लिया कर । कहाँ, किस समय, किस कारण से और केसे अमुक वस्तु का निर्माण हुआ है, इसका तुझे तनिक भी ध्यान नहीं रहता। क्या किया जाय, दृष्टि कोण ही निर्मल नहीं। जबतक पक्षपात, दुराग्रह कीर्ति-वान्छा का काला और मोटा परदा उस पर पड़ा है, तब तक तेरा मत सत्य और श्रेय से कोसों दूर रहेगा। तबतक तू नीर-क्षीर-विवेकी राजहल न हो सकेगा। छिद्रान्वेषण करते समय क्या गुण-प्रदर्शन की ओर भी तेरा ध्यान जाता है ? केसे जाय । हृदय तो अहवार, द्वेष और मान का निवास स्थान बन रहा है। जोश में आकर जब तू मुँह से आग के गोले उगलने या कलम से सर्पिणी-जैसी १०४-] तेरा और जहरीली लकीरें खींचने लगता है तर वहाँ वेचारे विवेक, साम्य और सद्भाव ठहर ही कैसे सकते हैं ? उस समय तो । तू ही-तू रहता है, या तेरी बुद्धि का डेढ़ अंगुल का फीता, जिससे तू तीनों लोकों और तीनों कालों के नाप डालने का दुस्साहस कर बैठता है। क्षणमात्र में तेरी लोक-सहारिणी आलोचनाग्नि प्रज्ज्वलित हो समस्त साहित्य को भस्मसात् कर देती है। वाल्मीकि और व्यास भी तेरा रुद्ररूप देख थर थर काँपने लगते हैं ! कभी-कभी तो गरीव ईश्वर भी अपने अस्तित्त्व की खोज में व्याकुल हो जाता है ! सामाजिक, नैतिक और धार्मिक पद्धतियों तो, तेरी समझ में, कभी की विदा ले भाग जाती हैं । तेरी दृष्टि में संसार का उत्थान और पतन तेरे शन्दों के सकेत पर ही हुआ करता है। यह सव हुआ, पर दुर्निग्रहा मरुति पर तेरे तर्क-ताण्डव का तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ता। युगान्तरकारी कराल काल का फुचक तेग अकाट्य युक्तियों को छिन्न-भिन्न कर विस्मृत्ति गर्त में फेंक देता है । तेरी आलोचना में असगति और अत्युक्ति की अतिमात्रा रहती है । अनुमान और कपोल-कल्पना की टेढी सीधी रेखाएँ खींच-खींचकर तू नित्य नूतन सृष्टि का मानचित्र यनाया फरना है । प्रकृति और काल के भाल-पट्ट पर तो बात को यात में हरताल पोत देता है ! कभी तू अपने अचूक धाग्माणों से समाज के सहज बन्धनों को छिन्न भिन्न करने की चेष्टा करना - है और कभी सनातन धार्मिक तत्वों पर भीषण आक्रमण पर बैठता है । ज्ञात होता है कि तेरे नवीन और अद्भुत आविष्कार ही त्रिलोक के उत्थान एवं पतन के मुख्य द्वार हैं । अपना यश लोलुप व्यक्तित्व सुरक्षित रखने के लिये स्याह को सफेट और सफेद को स्याह सावित कर देना तो तेरे बायें हाथ का खेल है ! अपनी ना-समझी को औरों के मत्थे मढ़ देना भी तेरा एक बाल-विनोद है। अतएव पाहि माम् ! पाहि माम्, दुराग्रह-वाहन आलोचक देव!! दूसरों की आलोचना करने के पहले स्वयं अपनी भी तो आलोचना कर लिया कर। दिल की सफाई कर के दुनिया का कूड़ा-करकट साफ कर। खुदी को खोकर वेखुदी में मस्त हो। आँख पर से एकतरफ़ी चश्मा हटा कर यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर । आलोचक ! जब तेरा प्रत्येक शब्द विवेक के गहरे रन में हवा निकलेगा, तभी तु सच्ची आलोचना करने का अधिकारी हो सकेगा।

अनाथालय । कभी अनाथालय में भी सैर करने गया है, सेलानी? न गया होगा । वहाँ दिल बहलाने को रखा ही क्या है ? रसिकों की रसीली आँसे उस नीरस स्थान से कोसो दूर भागती हैं। अनाथालय का रोमाचकारी दृश्य सचमुच ही रँगीले रसीले नेत्रों का आतिथ्य नहीं कर सकता । उस उजडे हुए कोने में मनमोजी सैलानी के मन की एक भी चीज नहीं । जहाँ तहाँ इटी फूटी झोपड़ियाँ मिलेगी, जिनमें डरावने अस्थि ककाल पड़े हैं । भूख के मारे उनके पेट पीठ से जा लगे हैं। आँखें बैठ गयी हैं । ओंठ सूख गये हैं । गले से आवाज तक नहीं निकलतो । चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ गयी हैं। किसी के तनपर एकाध फटा- पुराना चिथड़ा पड़ा है, तो कोई बिल्कुल नग-धुडंग ही गरमी. जाड़े से मर रहा है । दुधमुहें बालकों को दो घूट भी दूध नसीव नहीं ! सैकड़ों अछूते लाल असमय ही काल के गाल में जा रहे हैं। लासों अनाथ कॅगले विना रोटी के तड़प तडप कर प्राण-विसर्जन कर रहे हैं। चारों ओर चीत्कार ही चीत्कार सुनायी देता है। उन प्राणावशेष अस्थिककालों के स्वर्ण प्रासाद लुट गये हैं। उनके मुंह का कौर छिन चुका है। उनके गुलाय-जैसे मुसड़ों की लाली फोकी हो गयी है । अय, उन की जर्ज रित हड़ियों पर कड़ी नजर रखी जाती है । उन येचारे दोन- .

? दुखियों के निर्वल हाथ-पैर खूब कस कर बँधे हैं । हिलना डुलना तो दूर रहा, अभागे चीं भी नहीं कर सकते, क्योंकि उनके मुंह पर ताले लगा दिये गये हैं ! यह सब किस लिए ? इसलिए कि वे अपनी पूर्व-कथा का स्मरण तक न कर सके, अपना दुखड़ा किसी सहदय के आगे न रो सके, अपने को 'जीवित मनुष्य' कहना भी भूल जायं । यह है अनाथालय की एक झलक । क्या तू वहाँ घूमने जायगा ? पूछना व्यर्थ है। तेरा मन-मराल उस क्षार-समुद्र में कैसे रम सकता है ! उसके रमने के सरोवर तो और ही हैं। तेरी लावण्यप्रिय आँख तो उन सुसजित प्रासादों पर जाती है, जहाँ सगमरमर के सफेद फर्श पर तेरे नाजुक पैर फिसला करते हैं, जहाँ उससानों की महक से तेरा दिल और दिमाग तर और मस्त हो जाता है, जहाँ कोकिल-कठियों की मधुर स्वरावली तेरे प्रमपित हृदय पर थिरका करती है, जहाँ चन्द्र मुखियों के नयन-चाणों से तेरा उन्मत्त मन-मृग विध जाता है, या जहाँ तू शराब के चटकीले रङ्ग से अपना नापाक दामन रेंगा करता है । तेरा चञ्चल चित्त-चञ्चरीक तो उन्हीं उद्यानों पर मॅडराया करना है, जहाँ उन्मादिनी मल्लिका वल्लरी के पल्लब- करों का तुझे कोमल स्पर्श मिलता है, जहाँ रङ्ग-विरङ्ग फूलों की क्यारियाँ तुझ मुग्धकारी समीर के हिंडोले पर झुलाया करती है, जहाँ सुगन्धित फौवारों के ठण्टे छींट तेरी अधमुंदी मतवाली आँखों में एक निराली ही मस्ती भर देते हैं । ऐसा १०८-] ।

देव-दुर्लभ स्वर्ग भला किससे छोडा जायगा ? अनाथालय देसने जाय तेरी यला! न देख । तेरा न देखना ही अच्छा है। तेरे जैसे मदान्धों के देखने से होगा ही क्या ? उन अनाथों का देसनेवाला तो एक अनाथकन्धु परमात्मा है । वही उनकी आह का ठीक ठीक मूल्य आँक सकता है। उसके करुणरस पूरित नेत्रों में उनका आई चित्र अकित है । एक न एक दिन वह अवश्य ही उस अनाथालय की सुध लेगा ? उन अनाथों को अपने अशरण- शरण अक में स्थान देकर कृतार्थ करेगा।

दुराग्रह ? जाने दो, जाने दो। क्यों रोकते हो? तुम्हारे सहवास को मला वह पसन्द करेगा? क्या कहा, कि उस एक आसमुद्रान्त साम्राज्य का युवराज बनायेंगे ? न, वह एक रक्ष-कुमार ही अच्छा है। दुर्भाग्य उसका, जो आज तुम्हारी मदान्ध मण्डली में आ फंसा। वेचारा कैसा स्वच्छ और सरल है ! चेहरे पर क्या ही भोलापन है ! नेत्र चञ्चल, किन्तु विकारहीन हैं। उसकी सहज दृष्टि की कमल-पत्र पर थिरकती हुए ओस-विन्दु से उपमा दें या दूध के प्याले में तैरती हुई मछली की विलोल गति से मादकता मिश्रित सरलता तो मानों आँखो से छलकी ही पड़ती है। ओंठों पर अब भी बाल-स्मिति की एक अरुण रेखा उदित हो रही है । उसका स्वाभाविक सौन्दर्य अनाघ्रित कलियों का समरण दिला रहा है। उसे सुचिस्तीर्ण गगन में स्वच्छन्द्र विचरनेवाला स्वर्ण-पक्षी कहें तो क्या आप कवि-कल्पना समझेंगे? ऐसे निर्वाध निरपराध बच्चे को अपने माया जाल में फंसा कर तुम कौनसा उद्देश सिद्ध कर लोगे? तुम्हीं सोचो, वह अवोध बालक तुम्हारा घृणास्पद सह- वास क्यों पसन्द करेगा। तुम्हारा विलास-विनोद देख कर येचारा घबरा-मा गया है। तुम्हारे निर्जीव जीवन में हमें तो ११०-] एकमात्र मृत्यु सहोदरी विलासिता का ही साम्राज्य देख पड़ता है। तुम्हारे सारे रहन-सहन पर उद्दाम वासनाओं ने विकार की छाप लगा दी है । लोक-लज्जा को तिलाञ्जलि दिये तो तुम्हें एक युग बीत गया। कर्तव्य का तो शायद नाम भी भूल गये होगे । तुम्हारा लक्ष्य तो आज काम काञ्चन पर है। तुम्हारे निष्प्रभ नेत्रों में विकारिता, निस्पन्द हृदय में विला- सिता और निपाण शरीर में अकर्मण्यता ने अट्टा जमा रखा है। सहस्रों निर्योध जनों को लक्ष्य-भ्रष्ट करके भी क्या तुम्हारी प्रलय-पिपासा शान्त नहीं हुई ? तुम्हारी नरक-यात्रा का साथ देने के लिये क्या यह मण्डली काफी नहीं ? बस करो। अव मत रोको। नहीं रहना चाहता है, तो क्यों दवाव डालते हो? उसे कनक-काराग्रह में कैद करके तुम्हें फौन-सा स्वर्गीय सुख प्राप्त हो जायगा? कुछ भी करो, स्वतन्त्र कुटीर-वासी एक सरल बालक तुम्हारे माया-मन्दिर में धन्दी हो कर नहीं रहना चाहता । ठहर जाओ। दुराग्रह मत करो। मुंह से नहीं लगाना चाहता, तो क्यों दवाव डालते हो? उसे प्याले में भरा हुआ लाल-लाल जहर पिला कर तुम्हें कौन सा स्वर्गीय सुख प्राप्त भी करी, वह अपने पवित्र ओंठों की स्वाभा- विक लालिमा इस फेनिल पेया से रंग कर विस्त ओर फलुपित नहीं करना चाहता। बहुत हुआ। हठ मत करो। नहीं पहनना चाहता, तो हो जायगा P क्यों दवाव डालते हो? उसके गले में मणि-युक्त सुनहरा सॉप डालकर तुम्हें कौन-सा स्वर्गीय सुख प्राप्त हो जायगा कुछ भी करो, वह अपने पुष्प-माल-भूपित कण्ठ को तुम्हारे इस रत-जटित स्वर्ण-हार से अलंकृत नहीं करना चाहता । कितना ही प्रलोभन दो, वह तुम्हारे नारकीय समाज का सदस्य होना स्वीकार नहीं करेगा । तुम्हारी समस्त मोहिनी कला को वह अन्त तक उपेक्षा की ही दृष्टि से देखेगा। तुम्हारे समाज का विपाक्त वातावरण उस निर्दोप पवित्रात्मा को मृत्यु-यन्त्रणा दे रहा है। इस क्षण वह पक्षहीन पक्षी नहीं, तो क्या है ? उसकी छटपटाहट देख कर, तम्हें क्या तनिक भी दया नहीं आती? कोई चिन्ता नहीं। ईश्वर-कृपा से वह विहग तो तुम्हारे निर्दय हाथों से छूट कर उड़ ही जायगा, पर, स्मरण रखना, उसके मूक अभिशाप से तुम्हारा त्राण नहीं। सावधान !! ११२-] कृतघ्न-कथा आश्चर्य ! तू सारा उपकार भुला बैठा ! जरा, उन दिनों का स्मरण तो कर। अगाध, अपार और उन्मत्त सागर के अक पर कैसी बीती थी! उस गत लहरों के साथ विनोद करती हुई तेरी नौका इठलाती जा रही थी। पूर्ण चद्रमा की ओर देख-देख तू कभी तो राग अलापता था और कभी वशी बजाता था । मल्लाह भी मद्यपान कर मत्त हो रहे थे। बड़ा आनन्द था, बड़ा उल्लास था । एकाएक तूफान आ गया। काली घटाएँ भी घिर आयीं। सागर के सहस्रों हाथ आकाश की ओर उठने लगे। उतुङ तरङ्गों का ताण्डव प्रलयकारी-सा प्रतीत होने लगा। नौका उस उथल पुथल में डगमगाने लगी। मल्लाहों ने धीरज छोड़ दिया। थोडी देर में बेचारों के हाथ से डॉड भी छूट गये । हाहाकार मच गया। प्राणों पर आ पड़ी। लो, पाल भी उलट गया। नौका डूबी ! आततायो तूफान में, पर, उस रात रोते-चिल्लाते हाथ-पैर फटफटाते हुए तुम सब कहाँ से कहाँ पहुँचे, ईश्वर ही जानता है | तुझे सागर सकट से किसने बचा कर इस देव दुर्लभ प्रासाद में प्रतिष्ठित किया था, कुछ स्मरण है ? तेरा परित्राण करनेवाला तेरे सम्मुख कर से खडा हैं ? पर, तू ने उसकी ओर आँख उठाकर देखा तक नहीं ! तेरे समान ससार में क्या और भी कोई कृतघ्न होगा? ज़रा, उन दिनों का स्मरण तो कर । तू उस नगर में कभी [-१३ के भीषण अङ्क बड़े राजसी ठाट से रहता था। दिनरात तेरा मोग-विलास में ही वीतता था। गाना-बजाना और हँसना-खेलना ही तेरा एक- मात्र कर्त्तव्य था । शान्ति और क्रान्ति को तृ एक-सा समझता था। मदविह्वला इन्दुमुखियों के दृग्वाणों से छिन्न-भिन्न होना तेरे लिए स्वर्गाधिक सुख था। मदिरा में मुक्ति थी और चौसर में चारों फल ! खूब मौज थी, खूब उन्माद था ! पर यह जीवनचर्या बहुत दिन न चल सकी। सितारा डूबने लगा! देश में भीपण दुर्भिक्ष पड़ा। लोग 'भूख-भूख' चिल्लाने लगे। हाहाकार मच गया । मनुष्य, मनुष्य को खाने लगा। तेरी भी समस्त सम्पत्ति 'उदार्पणमस्तु' हो गयी। वीणा और मृदंगों का परीदनेवाला कोई न मिला। मदिरा के प्यालों और चौसर के पॉलों को भला कौन पूछता! हंसगामिनी मृग के मद-विभोर हाव-भाव पेट की ज्वाला में झुलस कर, न जाने, क्या हुए ! इतने में अग्निदेव ने तेरे भव्य भवनो पर अपनी आरक्त पताका फहरा दी। बचा-खुचा सामान भी सव स्वाहा हो गया। सच है, छिद्रेवना वहुलीभवन्ति ! अस्तु, घर के लोग तुझे अकेला ही छोड़ इधर-उधर तीन-तेरह हो गये। तीन दिन तक तेरे मुंह में अन्न का एक दाना भी न गया। चौथे दिन कहीं सन्ध्या को किसी ने रोटी का एक टुकड़ा तेरे मुँह में डाला था। स्मरण है न? उसके बाद स्या हुआ, परमात्मा ही जानता है। तुझे दुर्भिक्ष-यातना से यचा कर इस देय-दुर्लभ प्रासाद में किसने प्रतिष्ठित किया १४- नयनियों - था, कुछ स्मरण है ? तेरा परिवाता तेरे सामने कव से खड़ा है ! तूने उसे पहचाना तक नहीं ! उल्टे उसकी मोर से अपनी आँप हटा ली! तेरे समान संसार में क्या और भी कोई. कृतघ्न होगा? जरा, उन दिनों का स्मरण तो कर । बात बड़ी पुरानी है। तो भी स्मरण करने से पह चित्र ज्यों का त्यों आँसों में उत्तर आयगा । तेरे माता पिता बचपन म ही तुझे छोड स्वर्ग सिधार गये थे। तेरा लालन पालन एक निर्जन आश्रम में हुआ था। वहाँ एक देवालय भी था। याद है न ? मृग-शावको के साथ तू खेलता और कन्दमूल एवं फल खाता था । आश्रम का तपोधन अधिपति तुझे .सूब प्यार करता था। अधिक फ्या, वह तुझे पलको पर सुलाता था । तू भी उसे अपना 'सर्वस्व' जानता था। दोनों में खूब पारस्परिक प्रेम था । उन दिनों वह आश्रम तेरे लिए स्वर्ग से भी अधिक आनन्दप्रद था। वृद्ध महात्मा ने तुझे, अपने बुढ़ापे का सहारा या अंधे की लकडी समझ, आश्रम की समस्त सम्पत्ति सोंप दी। गूढ से गूढ विद्याएँ भी ब्रह्मर्पि ने तुझे अनायास ही अवगत करा दी। तेरी उच्चता और सत्पात्रता पर उसे लेशमात्र भी सदेह न था। पर, भविष्य कौन जानता है? तू 'पयोमुस विप-कुम्भ' निकला ! वृद्ध ऋपि को तू ने एक दिन रस्सियों से बाँध दिया, और आश्रम का सर्वस्व-हरण कर वहाँ से चंपत हो गया। उस देव निर्मात्य सम्पत्ति का तू ने जिस प्रकार दुरुप- [-१५ योग किया, परमात्मा ही जानता है। तुझे पाप-पंक से निकाल कर किसने देवदुर्लभ पद पर आसीन किया था, कुछ स्मरण है? तेरा वही वृद्ध अभिभावक, देख, कव से तेरे सामने खड़ा है ! तू सब कुछ जानता हुआ भी अनजान-सा बना बैठा है। उसका परिचय चाहता है ! दुःशील! तेरे समान संसार में क्या और भी कोई कृतघ्र होगा।

शुद्धि-पत्र पृष्ठ पक्ति ४ अशुद्ध वन देवा कुमुम वन देवी १० २४ ६ कुसुम लगी ओर लगा २४ १५ आर १२ गडढा १९ ५० ८ गड्ढा ही टोह मदविह्वला न्यायाधीशा ७ मदविह्विला न्यायधीशों ८२ २१ १४ सुना था ८९ यह कुप्रवेश इस क्रान्ति की ९८ सुना यह इस क्रान्ति का पुराना राटियों १२ पुरानी रोटियाँ ૧૦૨ १२

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Anth Nardha

Author
Hari,viyoghi
Title
Anth Nardha
File name
Anth Nardha
Text
OCR done
Citation
1903
Published
2011/01
Publisher
Sahitya Bhawan Ltd. Prayag
Language
Sanskrit
Pages
119
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546561
Barcode
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Digital publisher
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