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Kamunish

Basu Shanker · 2011/03

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कमूनिस

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कमूनिस
शंकर बसु
हिणी मनुवार
कचन कुमार
राध्यछण

द्वारा प्रकाशित
वर्णना, कलकत्ता
बगला पुस्तक 'कमूनिस' का अनुवाद
1980
राघव वद्योपाध्याय, कलकत्ता
कचन कुमार, नई दिल्ली
प्रथम हिन्दी सस्करण 1980
Tar
मूल्य
21 रुपये
84740 पैसे
प्रकाशक
राधाकृष्ण प्रकाशन
2, असारी रोड, दरियागज,
नई दिल्ली-110002
मुद्रक
भारती प्रिंटर्स
दिल्ली-110032

विप्लव, काजल, गोविन्द पार पति की स्मृति में

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हस का पख और पर्वत की फया फिर एक दुश्मन। पिनास गनी से मुगा पर भीमे नत्री-सी प ममत एक टोग हस से पमीन को छूती हुई। हाप को पार्थो नतिया कुछ करने के लिए पुमदुमा पी है। मामीपाड़ा से मनिकी विमम कामा टीका कपास पर लिप पिणु पनपते ही हथियार निभासकर सर के भीतर ही काम तमाम कर देगा। माना | जान मासत म पड़ी हुई है।परन पर उगे बासतोड़ फोड़े की-सी पोसी मनुभूति । धातु की तपसमाती हुई दोनों मामी से मौत को साफ-माफ सामने देखकर बह मेरफ की पहमारा छो रास्ते पर फूट पाने को तैयार रहता है। पोरा ममम पातु का बना है। सार गरी छोरी-मोटी धामों में पार करत हए, पानी-कीचा को मांपकर उसकी भार बहता पमा गया। गुम गए ममे पर्वोि और पापरिपा स फमे ममूहों के भीतर दामन की पत्नी हसी प्रायर होने नगी । रमन का मेहरा भर साफ हो रहा हैराब पीपे की तए माटा, पपरा गरीर राव के सर रोषों से की मेरे की पए मानिमम बरन कमरनीय पारीतर मुंपी की माठ । मह नगर सपमाटी गोप्त की तरह पूमती हुमाकर गोहरे पर गिरी पी। गोम छममी की तरह गोरा को पेरकर मम की नगर नापने मनी । एन रोड से इस नमरबस्ती दमाने में गोरा मब तक तीन बार पुएमन के सामन पदापा। पहला ममर दुश्मन एक बामपंपी था। गोरा ने उसके सीधे-सपाट चेहरे को गैस कम्पनी की खजली दीवार के पीछे सरकते देखा। उसके बाद दस-वीस कदम जेब मे मुट्ठी डाले आगे वढते ही, नारान के खडे वालों को देख ठिठक कर खडा हो गया। कान के अन्दर गला हुआ गर्म सीसा डाल दिया है नारान ने सुकु को उठा ले गया है। "कोन, वल्लू गिरोह" "हाँ" . . "वूडो वगैरह को खवर की है ?" "नहीं । मैंने नहीं देखा, जरा पता लगाना पडेगा, सुनी हुई बात है।" "तू पता लगाकर सुकु के घर चला जा और एक-डेढ घटे के भीतर फालतू ममाचार होने पर सब मिलकर, जाकर ।" "ठीक है।" उमके वाद ह्य ज रोड के मोह पर और एक । गोरा का नाम-पता रटा होने पर भी वह गोरा का चेहरा नहीं जानता था, नही पहचानता था। इमलिए गोरा खोचर' की बगल मे शान्त निरीह कदमो से निकल गया। गोचर इम समय भी पान चवा रहा है। और अब यह तीन नम्बर। तीन नम्बर के बीच की उंगली मे स्टील की एक अंगूठी। अंगूठी मे इसान के कटे हुए मिर की बनावट का नग। ज़रा फुरसत थी। दो कदम पीछे हटकर, खोका की नज़र से नजर मिलाकर वह दवे पांव आगे बढ सकता था। वैसे दूसरी ओर से हवा भी हो मकता था । गोरा को अव सव-कुछ जल्दी-जल्दी करना है । खुकु से भी भेंट करनी है। उसके बाद एक बार सुकु के वहां पता लगाना है । ए० वी० के लिए वक्त पर हाजिर होना है। हाथ का काम निवटा लेना ही बेहतर है। तवा गरम है तो रोटी मेंक लो। वस । खोका की मिचमिची आंखो की पलके झपकने से पहले ही गोरा की मगज़-मशीन ने झटपट हिसाव लगा लिया, एक बार सामने जाकर खडे होने से ही भडक जायेगा। इससे बेहतर दवा और नहीं है। । - गुप्तचर विभाग का यादमी।

कमूनित 9 पोरा हमने पगा। रा मुफकर दो-तीन हाय के प्राममे परयो होकर । मोर पुम्मन पस्त होन मगा 'मरे में होन" फिर गोरामी हमी । हसी के प्रमाके के साप उसके हाथ की रंगनी मुड़ी मोर मुट्ठी जुनी। फिर बेतरतीवरीमी ममियां मपने माप उसके सीने मौर बने के मामम हिमने मौं । पोदाम सा कर देने वाली पुरानी दुश्मनी एमन के नारे मम्मे बामों में से होते हुए उममे भीतर पुस गयी। "पाय मगाऊँ? 'म । रइने रो।" एकरम बसा सोचा बा साहो निकमा । वाम नम्मर बस्ती के नामे के पार, घिरे बांसों पी मचान पर भापार करते हुए गोरा समरे मामन खरे होकर बाकी हम पड़ा। दुश्मन ! यह भी भमा को मम हमा? सोका की मां उस समय विसपट्टे के परों की तरह पाफा रही है। और इम मांझे मे ही एक दिन भाबम रे पोरों के गोराम म पामी पूम पड़ती देती है। पोपाम की मुष बदरपरीवार ! समाचार भीगम्बर बा साठ मार बस्ती के बना मोका ने मोराम बमामा है। पालम का गोदाम ।राब की भट्ठी के साप मह मया म्पापार शुरू किया है ! परी दुपहरी में नाश मायब कर दना नेतामों के साप पटना-बैठना पड़ों के साथ पास्ता रखना-सोका के उम ममय पी-बारह थे। सात नम्बरबस्ती के पंधी को पररवस्ती एक रात पाकर बम्ब रमा पा । कामदा के मोती होम बस्ती के एक नमरकर दुकारा को पीटकर मत बना दिया था। पर फिर से कामूबा - पिरोह के माष गहरी दोस्ती न रही है। बार उनसरी माइन सप्ठ ममय कटि म पोटा निगरामन की पी। सब-कुछ नामयूम फर भी मारामदा म बॉक की पकर मिया पा। सब रस समय एक मगेनीवे पासकिन एकरण: मीपे होम से गया होगा? गोरा के दम की प्रारमियत तानाराम के दम मही है। एक पार्टी में रहकर भी नाराना का एक दम पा मोना , मोरा मन्टू को सेपर पार पावे ही स्तियों समाप अटपर निकम मा। सारे के सारे मा गय थे।म परे में मीराम साफ । उचित मूम्प Fr पायसदेचकर पोराने न बममा गोका कोहोर पर रण 4 1 10 कमूनिस पुलिस के आते ही बहाने बाजी के लिए गोरा आगे बढा था, "सीज करके तो आप लोगो को तार रहे हैं । अव यहाँ बसेडा खड़ा करने पर लाइन देखी है न, वस खिसक जाइये।" समाचार पाकर होमियोपैथिक दवाओ का वक्सा छोड गोरा का वाप दौडा आया था। रिटायर होने से चार-पांच साल पहले से ही उस आदमी ने वक्से को कसकर पकड लिया था। धुआंसे चश्मे के भीतर से फटी हुई आँखो से, छोटी-छोटी शीशियां टटोलते थे सिना थर्टि यह रहा उसके बाद कागज़ की पुडिया, नाखून के किनारे से बनाया हुआ मोड । सामने के दांतो से कट-कट की आवाज़ करते हुए वीच-बीच मे हिसाब-किताव करते थे वी० ए० पास करना वाप की ड्यूटी है, अब लाल झण्डा लेकर सडक पर घूमो मेरा क्या जाता है ? लाल झण्डे से पेट तो नहीं भरेगा। दोनो हाथो से अपने छोटे ससार को ओझल करते हुए ब्रजेन वावू का आधा चेहरा ढंक कर मरजूबाला के दोनो सफेद होंठ उस समय हिलडुल उठते थे, "लो फिर शुरू हो गया।" सरजूवाला के चपटे माथे पर लगे सिन्दूर की ओर देख वे फिर कट कट की आवाज करते हुए दोनो दांत बिठा लेते थे, "ठहरो तनवाह आधी होने दो-उस समय समझोगी।" गोरा के बाप की पेंशन का वक्त आ रहा था। वह आदमी गुस्से से लाल-पीला हो रहा था, "लम्पपोस्ट से बांधकर कोडे लगाने की जरूरत है। नेहरू ने कहा था न कि मुल्क आजाद होने पर ।" भीड के अन्दर से टुकाईदा गर्म हो उठे, "हू आजाद । देख नही रहे है मुल्क का हाल।" धुएं रंग के चश्मे का शीशा हट गया । मिचमिचाने लगी व्रजेन वाबू की आंखें, "इस आजादी के लिए सात-सात साल जेल मे काटे हैं, एक साल इनटर्न रहा हूँ। और देखता क्या हूँ, जिस आई० बी० अफमर ने टेररिस्टो पर जुल्म किया, वही अव डिप्टी कमिश्नर बन बैठा . . 1 - - सात दिन के अन्दर ही पार्टी ने नारान दा को चार्जशीट थमा दी थी। मुना, फट का इमेज इस घटना मे मक्खन की पुतली की तरह पिघल गया है। आखिर मे पुलिस के साथ वस्ती के लोगो ने जरा दिल्लगी शुरू की थी। उसके बाद पुलिस ने तडातड, दनादन लाठी वरसायो। नारानदा को मो० सी० - कमूनिस 11 पान वीरपना रहा पा। तमी सिगान के मग म जीप पेर सी। नारानदा उस समय दो-बार पूनियनों के प्रेमिट बायो सी. की रंगबाजी तब पापम माप थम गयी। मीर पुसिस मी हरकत देखकर सात नम्बरमौर तेइम नमार के पुराने हिम्दो में पुरानी महापत हरामी 'यो सफा बया बही राम बमा। मह तो बड़ी कामुम । भीर सोका बह वो सभी तक भी बारहाता है । मब माकना छोड़ दिया है। मेकिन किसे पता फिर पान में फोन कर दे। फिर तो मौकनकद पैसा भी पापायेगा। रुपमा मौर क्षार मिटान म मिए पान का रिस क्या सेगा? बग मुट्ठी पर मन्दर तामी-पीसी हिसा हुमाकर वोका को टा करके तेरस मम्मर की बस्ती मामेको मोराने एक नाम मे पार किया। असम में उसकी जेब में सिफ़ पाच मरमुख उँगमियां पी एक मुट्ठी। मानसट सोना पास था। टेबि सिर पर पुसमी का पाय और उस पर मीमी पगाई लगाये पमीन पर मार, मगा रही पी। सूचिपा की बीमारी समाकी के ना हाप समीन पर मटक गान हो गय है। हरी मिट्टी। पी की मांठ पर टेबि का पेट हर हा पा। करके सोम की तरह पर मानो इम्तारा बना रहा है। विजय मिस्मी की महकी का पेट देवतयते प्राधार स्मामी भावार मुमते सुनते गोरा इस मम्बर बम्ती की ऐनिमिमा मा भूप का मादिरी तरा मापकर बमा गया। पटा और बौड़ा रास्ता सीक-बार की तरह पतमा मीर पीसा होकर तेइस मम्बर वस्ती की प्रसारमा मुग्गियो से मास के टुका की तरह गुषा ।।दीरार पर पीठ सटाए, भार-तिरछे पांच फेंकते हुए कम्पे नाते से सरा मुका छिपा रास्ता पकाकर भाग पाते हुए मारा ममगामे में पोका की बात भूम बैठा । वह सोका जैस पुश्मन को गिनती में नही मेता । र मय पास सहन बानी चिन्ता बाक के पेट की तरह पाम की रोनों मां का फाइना-सब मुक निए । बन्द क्या पाई उसे भुगामी रिवाकर उठा में गया और उसकबार ठह पर कीमा बना गला? चोट पोट, पोट। मानो गोरापी परराम कुधम पीहा । ना 1 रिवातर ।

12 कमूनिस । । - सुकु को फंसाना उतना आसान नहीं है, उसके सिर के पीछे भी एक जोडी आँखें हैं । अफवाह है, बिलकुल अफवाह । नाले के किनारे का ही रास्ता चुना। रास्ता ही है। दोनो पांव जोडते ही नाले मे घुस जायेंगे। सावधानी से लम्बे-लम्वे कदम उस रास्ते पर पडने लगे । गन्दे कारखाने के सिर पर चढी हुई अछूत धूप उस समय भी कच्चे नाले के किनारे हिचकियां ले रही थी । विलकुल टेवि की तरह । सिर पर घाव नहीं हैं। घाव पर नीली दवा नही है। इतना ही फ़र्क है। गोरी-चिट्टी एक विल्ली लत्ते की तरह लुढक गयी । लात जमाने को तयार गोरा ने पवि.खीच लिया। बिल्ली के बदन पर धीरे से छुआ-भर दिया। वेरग उंगलियो के नाखून हलके रोगो मे धंस गये । अचानक लगा, वल्टू है ? नही, इसे क्या कहते हैं, रस्मी से सांप का भ्रम या सांप से रम्सी का भ्रम ? असल मे बिल्ली की आँखो की जोडी दीवार की दरार मे से जल रही थी । जुगनुओ की तरह दमकती हुई। छुरी के फाल की तरह धूप झिलमिला उठती है। वल्ट की याद धक से आते ही शायद छुरी की चमक दौड आयी मनसनाती हुई विल्ली की मांखों मे । वल्टू होता तो छुरी की आंखो से वोल फूटता, "क्या डर लग रहा है ? याद है पचु की लाश गिरायी थी वाबू ने ? यहाँ, ठीक इसी जगह।" वस, उसके बाद एक आवाज, उसके बाद दो टाँगें हवा में उछली। ना। वह सब-कुछ नही । सिर्फ एक गोरी-चिट्टी सफेद दिल्ली खिलाडी मिजाज से हट गयी। गोरा मन-ही-मन बडवटा उठा, "धुस्म दीवार से सटकर, कन्नी ग्वाती हुई पतग की तरह एक तरफ गोता लेकर आगे बढने लगा। बेलियाघाटा के धुएं से स्याह आममान से ठीक उसी समय उतर आयी भूखी साँझ, गोरी बिल्ली के पाँव के नाखूनो मे छिपी नरम चमडे की साल के भीतर से। और एक बार फिर चमक उठा बल्टू का गोरा चेहरा । नाली के पानी मे बल्टू की काली आंग्वें । एक जोडी भौहे । वर्ग---दुश्मन । बाबू होता तो यही कहता मोर कटक उठी झातिकारी हिंसा । पविन गभीर ढग से । अगर बल्टू का गोरा चेहरा बानक वह अपनी पहुंच मे पा जाये तो वाकई चमकती छुरी का फाल वल्टू मे धंसा कर खुशी से क्या हिचकियाँ आयेंगी, तुम लोगो के - पनिस 13 हाप-पांव के मोरनुस जायगे पार्टी के मारे मगाते हए ? या पन के दुगमन को परम कर यह मम्मे-समे रंग मरते हुए, बानबर की तह दोषार के घे में सबस खाकर निकल गायेमा चुपचाप । अपनी गाम बचात हए वाम पाम का पोरा सतरह साम के उस सरक सीन पर किसी भी तरह घटना मही टिका सकगा। पिसी किताब मोमकर बही माका ही वा पाएकी गुठी बाप की प्यासी से घुसकी मेकर कहता पा निवग्ध सिव नहीं पा रहा गोरा वा। मिख पोम। साथ ही उसके फ़से होठों पर एक तिरछी मुसकान गाम उठती थी। गोबरपट्टी क मदर से पाना पाया । मूक सिए एकमेनी । मन कुरबुरा हा है। इस माफ की एक नम्मर मराम की माम ईटों को घर में से होकर बह गोबरपट्टी के भीतर से पाता। ट्युमपान का टूटे चबूतरे पर टेडी कमर सिये कोई गोपा मिराहमा है। एक-दूसरे को काट बाने गम्दी मामियों मोर मारतों-माकी हो-हो हेमी की मलाफा मागानों में से मिकमत हुए बोरा म मुहके पर पर दोनों बाप उछाल दी है। मुपर के फर्श पर सोंधी येध मिय कन्ची मिट्टी सिममिना कर इस रही है । मुकु की भौगी की गोद में बम्पर के गले की तरह समुंग। रम्प * मुंह पर सर्दी की पपरी । उस पर बासी रोटी का सापा कामा पकत्ता । कामद रोटी मक्षिक बस पपी पी। उस सी हुई रोटी का चपत्ता बच्चे के मेहरे पर मुहकी भौगी क भोम पेहरे पर मरम का मापस मुमाकात नही हुई? भुरभुरावी चारदीवारी। माने के किनारे-किनारे मुफ के घर की रोबार बनी है। उससे माने रीवार मानमारी की मान तक सी गयी माधी-अधेरी सीमनार मिट्टी से ही भाप उठ ही पी। (पता- मुंषता । मुसि गास और बास्ट्र की भौहें पनी कामी गानों की पुनमी कर जाग उठीं । मुनगोगर, उपमे पनी दीवार क बाम पर मात पारी की दुम्सुम् भावार सुनते-मुनते सुधका दुबमा शरीर मानो बेमान हो गया। पम्मी। मोरम विमास देश के बीमार सीन पर बाकी कोई पर्वत नही टूटा । प्रबर सुनकर ए.बी. निवारन और बार की गाड भट्ठी की तरह जम उठेगी 'यह मौस एक परत के समान है। इसके पंप -- । - । 14 कमूनिस की तरह हलकी नहीं है । बीमारी भुगतकर या खून की के से हुई मौत नही, या आत्महत्या नही। शहीदो की इज्जत " उसके वाद दांतो को भीचकर की गयी कठिन प्रतिज्ञा-खून का बदला । वाकई सुकु को वे उठा ले गये या नहीं, पता नहीं। ले गये होंगे तो निश्चय ही खात्मा। जव से बाबू के दोस्त को सी० पी० एम० वालो ने पीछे से लोहे की छड मारी थी और उनके पचु की गरदन की मज्जा एक भोथरी कटारी से निकाल फेंकी थी, तभी से ही रास्ता बहुत फिमलन वाला वना है । और दुश्मन जितनी तादाद मे वढ रहे हैं, सून की गर्मी भी उतनी बढ रही है। चेहरा चमक उठा है। जुबान पर तेजी आ रही है। हथेली पर चूजे के नरम पेट की तरह जिन्दगी तिरमिरा रही है। एक छलांग के लिए। छलांग लगाकर गिरना चाहता है सडे-गले रास्ते पर । सुकु के भैया मदना की औरत ओढनी ओढकर तिरछी होकर बैठी है। बच्चे के मरने के बाद से ही वह जाने-जाने को कर रही थी। फिर एक आ रहा है। सुकु की अम्मा ढिवरी की काली-सी लो घुमा-घुमाकर बीडी जला रही है । बुठिया के दोनो गाल धंस गये हैं। महादेव झोला लेकर सोने के घधे मे निकला है। झोले के अन्दर चश्मे की डही, शीशा, तवे का टुकडा, तार वगैरह हैं। रोज़गार कुछ भी हो, लौटेगा एक पाइट देशी चढाकर। ज्यादा-से-ज्यादा हाथ मे आधा सेर आटे की एक थैली रहेगी। मदना के दो- चार पैसे देने पर भौजी दाल लायेगी। आटे की पिडी उसी दाल मे उवलकर पकेगी । इसे वे लोग कहते हैं पिटुली । महादेव सोनार रात के डेढ बजे तक गाना गायेगा, चिल्लायेगा, भैया-बापू को पुकारेगा। नही तो मार-पीट करेगा, दगा मचायेगा। एक बार गुस्से पर काबू न रहने पर सुकु ने बाबू को पीटा था। सुकु को लेकर शुरू-शुरू मे बूढी अम्मा और भौजी छाती पीटती थी। मरद के नाम पर तो वही है। उसे यह कैसा नशा । पार्टी का नशा । अव अल्लाह के नाम पर छोड दिया है। सुकु भी दिन-भर पार्टी के काम मे जुटा रहता है । रात-विरात आकर कलई वाली टूटी कटोरी लेकर नहीं बैठता, "दे भाभी, बहुत नीद लागा।" "और एक वार भी नहीं आया?" . - . "ना, वेटा " मूनिम 15 । बुड़िया को बसमा माती है पानी की तरह। कभी-कभार परेम बातचीत में बाके हिन्दी बोमती है। पर में एक भी पंमा नही है । मा की मी उस मोर मगर नही है। दिन रात पार्टी मोर पार्टी। इमसे क्या पेट भरेगा। यह सब यो मामिों को फबता है जिनकी बेब में पैम हों। धरपर में एक भी दाना नही है इस बात पर बहमान भी नही धरता। गोग की पब में पारमिनार के पूरे कममा कुछ भी मही है। इन पर विनयरा की साकी को पकोड़ी वरीवरेता । टमिकी हिपकी को नाबार ममी भी सम पा रहा है। फिर भी सवरंग पमियों की निकोरिम मे पीमी पड़ी पारा म कमीर की पेव को मवमवरम मगा।हाप म उठ पायी पसीर कामर की एक हुगवी फो से कासर का टुकड़ा। मस्सए मकामाम तारीख । गोप मीर नहीं ठहरा । कामी टप ममी हमाई पप्पम पहन तेजी से बम पर। पीप की मां का पर्दा-पत्ती-सा बहरा सुमा ही रह गया वारयुष । घटकाममा मान सोमबार ही म। मोरा के मिए मायाम दिन वारी बहन गरगरा पाती है। फिर कोई काम मेम-मुसाझाव निमकर रखना मना है। एसा करने पर एकसाप बहन मोम फेम नायेंगे। कागज पत्तर पार्टी पस्तार कई माप नही रहमा । अब सभी कुछ यार करक रखना पड़ता है। इसी लिए मन-ही-मन एहरा रहा था सोमरार रात के मोपर ए.बी.मायेगा। बठन को जगह का बयोबस्त मुकरेगा।सीम मन के मोड़ पर पार सोगों के मिमन की बात है। ए०ी. ठीक नोबर मायेगा। पदम बायमा या बम के मुत ही उसमें सटप स उतरेगा कौन जाम ? या पाइपनुमा गमी मे सुपचुप निकस मायेरा कुछ भी तय नहीं है । दुबमे-पतमे हापपी कर्मा पर मोम की संगीर से बंधी पड़ी के गयम में छोटी मुई के मौके सीने पर यम म पुमा भौरबड़ी मुई कहसकी पाम स बारह पर सवार होने पर ही ए.बी. मायेया।समी, भरी हुई मार मौर [पराम बामों पासा बहरा उमर बापमासमीन फारकर। उस समय मौवर्गमे परमी। मायबा मोर के मुहाने पर। यह मुरी जब-तब हममा हाता पता है। पूर बेमघाटा के वरह-तरह क गतीको म मुगर कर पार । - -- 16 कमूनिस । - रास्ते इस मोड पर आ मिले हैं। दूर से वही मोड दिन रहा है। खाली। अजीव तरह से खाली। पीछे विहारी मजूरो के फगुआ के मर्दाना नाच की तरह टेढी शील लेन । और बायी ओर कोडे की लम्बी टांग की तरह पतली गली। दायी-बायी नाक मे रबड की बदबू आ रही है । धूल-कालिख- धुएँ के दाग । दो-एक आदमियो की धुंधली-सी छायाएं सरकती जा रही । वीरू, सुकु अवश्य ही आ गये हैं। लम्पपोस्ट के नीचे मानो कोई फैलके बैठा हुआ है। सिगरेट की आग की चिनगारी जल रही है । अतहीन समुद्र मे तेरते जहाजी सकेत की तरह। एक-एक करके चारो ही इकट्ठे हुए हैं। आते समय इस गली उस गली से घूमते हुए आये हैं । माम सडक से चलना भूमिगत जीवन से खारिज है। नाला, गली, दीवार और रेल-पटरी आने-जाने, चलने-फिरने के रास्ते हैं । आकर भी चट से जाहिर नहीं किया । गोरा ने चापाकल से चुल्लू भरकर पानी पिया था। उसके बाद कमीज के किनारे से चेहरा पोछ- पांछ कर सारे इलाके पर अच्छी तरह से नजर डाली। दुश्मनो की तो कोई कमी नहीं है। झट से गरदन मोडकर ब्रिज के नीचे की लोहे की वीमो को देखा । छाया की तरह कुछ जैसे सरसराते हुए हटा । तुरत पांव के तलुए से सीने तक, नस-दर-नस खीचकर अपने को सख्त बना लिया। दो कदम पीछे हटकर मुकाबले के लिए तैयार हो गया। उसके बाद फालतू आवाज जान कर आश्वस्त हुआ। एक-एक करके वे चबूतरे पर आ बैठे। सीने का पिंजग खाली करके साम छोडी। पहले इधर-उधर की बातें हुई। बुडवुडाते हुए उदलने लगा। भापणवाजी का दिन खत्म । स्वर मे एक स्फूर्ति का भाव था। गाल पर एक उंगली रखकर बैठा। गड्ढा पडा । हंसते ही उसके गाल पर गड्ढे पडेंगे। शात पोखर के पानी मे पत्थर फेंकने पर जैसा होता है, ठीक उसी तरह गाल का गड्ढा धीरे-धीरे भरता जा रहा है। चेहरे पर एक विजयी भाव जाग उठा । सचमुच आदमी अगर भाषण और बहसवाजी से गुमराह न हो तो उसे कौन ठग सकता है ? ऐसी एक निश्चितता लेकर ही उसने यह बात कही। वहसा- बहसी, मापणवाजी ढेरों हो गयी हैं। मुंह से फेन निकलने लगा है । और फनिस 17 फायदा हमाई पटा। सब बपने अपने पीने का धंधा कर रहे हैं। घा करत-करते ही मान की पुतमी पड़ी रह गयी है। बिलकुल निरपल निस्सत्ता दौर बीमा नहीं हुमा।हरी-सी नमी म पास की तरह पाकर एक मौर म कहा 'यारमाना पसा मया है।" हाँबान का समाप्त है। "बात हम बहुत ही विषिष है। 'बाहनही मिसती।' "वठा तून सोचा है क्या ?" वापस कहीं कुछ म पवा और यह उसे उगस महीं समा । पनी कानी बालों की पुतमी बहुत कोहिय से मानो कुछ सोरती है। महका सरीक हम सोग रहा है कि उसे छू नहीं पा रहा है। "क्यों रे कानो 'न। 'क्या महीं ?" 'कुछ नहीं यों ही। साहाता सुस्त रास्ता। मुहस्ते का रास्ता। साल के मोड़ों में कभी-कभी इक्के-के मादमी गुररते हैं और दो-तीन वेप में सिगरम मैस कम्पनी मौर पर फैक्टरी मजूर साप मुग में रोटी के लिए पोरते है या बहुत ही बेदम होकर रेकी मोर मोटवे है। मौटत हुए मोर की कान से दो-पांच पैसे की बानि परीर मवाद कोई-कोई। हाप फरत हुए बुखार मनाता है । मोड़ के मोल पावरे के बदन से सटकर सभी को गाना पड़ता है। नोम पहले सुबह माम यहाँ बसे थे। पुमक की तरह पापमह मभो भी ग्ने सीपती है। फिर भी ये सोग पहले की तरह बब-तब नहीं बात। उतना समय नहीं है और फिर रे फ्रानतू गोपिम रहाने को तैयार नहीं है। मा बाम का समान है। बार माये वपैरनारा मही है इसी सिए । फिर भी गोरा मे बार-बार मना प्पिा पा भमरने की इच्छा हुई है? पवाब में सोना हंसापा,मही विविसी, "ए. बी. मौर काई ठीया नहीं पामत ।

18 कमूनिस "इसी लिए।" "वह कुछ नही होगा।" इम बाधे घटे में ही पान की दूकान के वटू ने तीन-तीन बार होशियार किया है-मुझे जाने क्यो ठीक नही लग रहा है। सरक जाओ सव। बटू को डराने के लिए वे गला खोलकर हंसे हैं । और बटू जुबान सी कर बैठा है । गुस्सा आने पर उसके मुंह से वात नहीं निकलती। और आज वटू ने फोकट मे सिगरेट भी नहीं मांगी। चौरस्ते के मुहाने पर लक्ष्मीकातपुर और कैनिंग लाइन की पैसेंजर ट्रेन की रोशनी छिटकी। उसके वाजू में लाइन । बीच मे इस चौरस्ते का तिरछा मोड। और साथ चिपकी हुई वस्ती। मोड पर बस का रास्ता और यो ही एक रास्ता आहे आ मिला है। मोड पर गैस-बत्ती नही है । ढिवरी वत्ती का ज़माना कव का वीत गया है । अव ट्यूबलाइट । ट्यूबलाइट के खम्बे के नीचे सीमेट का पलस्तर किया हुआ गोल चबूतरा। वहाँ खडे होकर पहले स्ट्रीटकार्नर मीटिंगें होती थी । भैदा मछलो की तरह प्रणवेश 'मुल्क मे सेपिटपिन बन रही है, लिहाजा उद्योग मे हम पीछे नहीं हैं' कहने के वाद नकियाते हुए चिल्लाता था 'बदे माताराम' और टिप्पणी चस्पा करने की कोशिश करता नाटा मास्टर, "तो फिर चूतड मे सेफ्टिपिन चुभोकर ही मुल्क आगे बढ जायेगा, क्यो" कोई कुछ नहीं बोलता था। कुछ कहने की किसे गरज है । चुनाव से पहले इस तरह का जरा काग्रेस-कम्युनिस्ट होता ही है। अब सब चूहे के बिल मे घुसे हैं यहाँ तक कि भेडी के किनारे तोडकर घोर वर्षा मे गरीव-गुरवा पर दुख- दर्द की गाज बनकर तोप की तरह जव वाढ मायी थी तो रिलीफ की एक बूंद भी उन्हें नहीं छू सकी थी। जो भी ज़रूरत पडी, गोरा के दल . . - - -- + + . वालो ने ही जुटाया। ट्यूबलाइट की हलकी रोशनी उनके चेहरे पर गोल होकर गिर रही है । लैम्पपोस्ट को चारो ओर से घेरकर वे लोग फैलकर बैठे हैं। रोशनी धुंधली-सी। कैसा माया का-सा भाव। माया का जाल। उनके शरीर का 1 1 रिली तलया, जिममें मछलियां पाली जाती हैं।

- । मूनिस 19 कुछ हिस्सा स्पष्ट निखता है। बाकी (घसा-सा । हमकी रोशनी में रिसापी नहीं पड़ता। सोना के सपनीम चेहरे पर सपन का नाम विधा है । गुनगुनाते हए कोई पंक्ति माता है। हमा गोरा क र बामों पर हममा कर रही है। पाम पर पटे । नम्बा रारा फीकी रोशनी में चमक हा है। पतमी पड़ी तो रग। दाप एक मपर में बिके फाम की तरह लग रहा है। गोरा टन मोहर बैठा है । पममी हवा की ग्यत पम रही है। मीर के बटन पूर पुसे है। पास मी तर रोएवार सोन से पसीना सोस रहे है हवा के माके । झुकमी की तरह सीमा ऊपर-नीच हो रहा है। एक पम्भिक-यस पुपरी। मानो मम स । दोनों माला से रोगनी का फमारा छोड़ती हुई। उसके पीले पूना-सुरली की दुकान की सैर पायीं । मोर दीवार पर गोमियो के महे । कादिम पहमे बौछारें बरसी थी। हटते-हटत पोरा रोबार पर पीट टिकाकर लगा हो गया था। मिझामा ठीक ही समामा पा। पूरी ने हाक मयामी पी।वामी भावार । उसी से बौंक उठा । मटे पाहता पा *पमूम। एक नियमन से ही साफ। नम्टे ममाम की मात्राम पतब याव मा जाती है। सीना भारी हो उठता है। अलि गमती है । गम में मानौ माम का गोमा स पाता है। मोराको उम समय होय नहीं रहता। उदास हो पाता है। छाटी गमी के पोर पर सुरसुरी पीटी की तरह मौत चलती है। 'मुन मे वर्ग-पृणा नहीं है। ईएसममा ? रेस मही रहा किम सरह पैन से बैठा । 'इसका माम चैन से बैठना है? 'मम्टे की बात सोप। । म । "हो नन्ट । उस वय महिं सिकोन की क्या बात है। 'मट का साहस म्यान से बाहर पया पा। देस! एक बात याद रपना मारम-पाश से हमारे होता है।

20 कमूनिस "तुम खुद जानते हो, कह क्या रहे हो।" "इसका मतलव ? नन्टे हठी था ?" "गोरादा " "क्या "तुम माथा ठडा रस नही पा रहे हो।" "नही, जल रहा हूँ। इतना होने पर भी ठडा रहे तो वह इसान का माथा नहीं रहेगा।" " "तो?" "मुर्दे की सोपडी हो जायेगी?" वायी तरफ कॉर्ड लाइन । टिकिम-टिकिस करके एक मालगाडी चली गयी। मओवर ब्रिज की वीमे कराह रही हैं । जाने कैसी मरोडने की आवाज़ है । और ब्रिज की फाँक से इस्पात के फाल की तरह पटरियां आधे-अंधेरे की केंचुल उतार हिंसा से चिलक उठी। मन्टू ने मुंह पर रोक लगायी। अचानक वह चुप मार गया । मन्टू का हाथ ठुड्डी की दाढी छूते हुए खेलने लगा। उसने सोचा-बात न वढाना ही बेहतर है। ताजा कच्चा घाव अभी भी कम नही हुआ, सूरखना तो दूर की वात। कभी सूखेगा या नही, किसे पता | कही एक आवाज़ हुई । दबी हुई । वीरू और मन्टू ने कान खडे किये । वीरू खम्बे पर वदन छोडकर रुख जानने की कोशिश करने लगा। सोना ने कोई घास नही डाली । यो ही वह कम परवाह करता है। असल मे वह सूंघकर समझ लेता है। वीरू की वडी आंखें गहरे ध्यान मे वन्द होने लगी है । जरा कुछ जानकर ही ढीला होकर बैठा, "कुछ नही।" - "वॉस" "हाँ" . सोना का मुंह चिडविडा उठा, "कही अन्त राखाल की गाय के झुड की तरह न हो।" "यानी । राखाल तो झूठमूठ लोगो को इकट्ठा करता था।" "इतनी उचपिच करने पर ऐसा ही होगा।" वीरू की पतली मूंछो की रेखा विरक्ति से एक ओर छिटक गयी। गरदन उछालकर वह उठ खडा हुआ। दोनो हाथो से पैट के पीछे लगी धूल । मासी । नहर धीरे धीरे धूम-मया से घटता जा हा है। सीन के पिमरे भर हना भी नहीं चीची पाती। बीर पप्पम बसीरते हुए मिपरेट परीदने के लिए मोहिमा की दुकान की मोर पमा। पुकान के सामने काई नमे हुए बबूतरे सीवरहप म के दाम मने पिसे पत्थर पर बमोक स्वम छाप दस पैसे का सिसा पट-से फेंका। ममोक स्तम के पहिये के मीचे कुपनी बाकर, कर्मिम राग्य मा रक्त मग्या सह-गमार इतने दिनों में मोरिया की पूफान के पत्पर की तरह सस्त मफरत स जम गये है। कोरिया की दूकान के कबूतरखामे की रीवार पर शरीर के सारे उभारों को रिवावी अभी-यमी महापी बोरत की तसवीर बामा एक कैमेगर मूल रहा है। सिपरेट निकातते हुए बन्टू मे कहा बीरवा !" "वया? 'बरा पुरक मामोन। 'क्या? "कम माया पा इसी टाइम । उसगार?" 'पूछताछ कर पापा। 'मन्ठा। 'पपादा देर तर मत रहो। होठों के बीच सिपरेट पुसेगकर पीस की मियाह ने भासपास चारों मोर व सिया । पानी की मुमटी पर जमती रस्सी मुभावे हए मम रही है। रस्सी की ओर एक मारगम बीर ने पसना शुरू किया। यहां से बमाने पर सिमरेट पटपट परम हो गावेगा। रास्ता बहुत ही वामी-बानी मग पाहै। रह रहकर दो-एक रिसगों की दंगटाप की मावार जम ही है फेबम। बीस पवन मारकर पम यापा। ट्यूबमाइट के मीरे सैम्प पोसके पमस्तर किये पोस-से पतरे के पास माकर ठेलता हुमा पानी के तीन जनों के बीच बैठ गया 'मन्टू रियासताईरे! सिगरेट को दो! गलियों के बीच होमन ममा । मग्दू ने मुफ्फरबरो रियासमाई निकामी 'मे। सोना ने एक बड़ी पम्हाई भी। दो मार्च अपने माप बन्द होन समी 20 कमूनिम "तुम खुद जानते हो, कह क्या रहे हो।" "इसका मतलब ? नन्टे हठी था ?" "गोरादा" "क्या?" "तुम माथा ठडा रख नही पा रहे हो।" "नही, जल रहा हूं। इतना होने पर भी ठडा रहे तो वह इसान का माथा नही रहेगा।" "तो" "मुर्दे की खोपडी हो जायेगी ?" वायी तरफ कॉर्ड लाइन । टिकिम-टिकिस करके एक मालगाडी चली गयी। ओवर ब्रिज की बीमे कराह रही है। जाने कैसी मरोडने की आवाज़ है। और ब्रिज की फांक से इस्पात के फाल की तरह पटरियां आधे-अधेरे की केंचुल उतार हिंसा से चिलक उठी। मन्टू ने मुंह पर रोक लगायी। अचानक वह चुप मार गया । मन्टू का हाथ ठुड्डी की दाढी छूते हुए खेलने लगा। उसने सोचा-वात न वढाना ही बेहतर है। ताजा कच्चा घाव अभी भी कम नही हुआ, सूखना तो दूर की वात। कभी सूखेगा या नही, किसे पता । कही एक आवाज़ हुई। दबी हुई। वीरू और मन्टू ने कान खडे किये । वीरू खम्बे पर वदन छोडकर रुख जानने की कोशिश करने लगा। सोना ने कोई घास नही डाली । यो ही वह कम परवाह करता है। असल मे वह सूंघकर समझ लेता है। वीरू की वडी आँखें गहरे ध्यान मे बन्द होने लगी हैं । जरा कुछ जानकर ही ढीला होकर बैठा, "कुछ नहीं।" "वॉस" "हाँ।" सोना का मुंह चिडविडा उठा, "कही अन्त राखाल की गाय के झुड की तरह न हो।" "यानी ! राखाल तो झूठमूठ लोगो को इकट्ठा करता था।" "इतनी उचपिच करने पर ऐसा ही होगा।" वीरू की पतली मूंछो की रेखा विरक्ति से एक ओर छिटक गयी। गरदन उछालकर वह उठ खडा हुआ। दोनो हाथो से पेट के पीछे लगी धूल माडी । बहर धीरे-धीरे घूम-मका से भेटता मा रहा है। सीन के पिमरे भर हवा भी नहीं खीची गाती। बीरू पप्पल पसीटते हुए सिमरेट परीवन के लिए बोडिया की पान की मोर पमा। दुकान के सामने काई ममे हुए जबूतरे की तरह करप चूने के दाग मये बिसे पत्पर पर महोऊ स्वम छाप दस पैसे का सिक्का चट-से फेंका। मनोक स्तंभ के पहिये के नीचे कुचली जाककर्मिय राग्य पा रक्त मग्या पर-पतकर इतने बिनों में योडिया की दूकान के पत्पर की तरह सम नफरत से जम गये है। मोडिया की पूमान के जूतरदाम की दीवार पर भरीर के सारे उभारों को दिलाती अभी वमी नहामी बौरत की सबीर मामा एक कमेगर भूम रहा है । सिगरेट निकालते हुए पद मे कहा वीसा । "या" 'परा सरसभाबो म1 'पया? "कल भाया पा इसी टाइम। उसके बाद? "पूवाछकर पहा था। "भन्छा।" 'रयादा देर तक मत रहो।" होठों के बीच सिगरेट पुसाकर बीस की निगाह मे भासपास चारों मोर रेस निमा। पानी की गुमटी पर गमती रस्सी लुभाठे हुए मृत पड़ी है। रस्सी की मोर एक नरगस बील पमना मुरू किया। यहां से बमाने पर सिगरेट चटपट क्षरम हो जायेगा। रास्ता बहुत ही मामी-पाप्ती लग पा है। रह रहकर दो-एक रिपों की टुंगोप की मावाव जग रही वत । बीरबदन माइकर पम रहा था। ट्यूबनाइट के मीप सैम्प पोस्ट के पमस्तर क्येि पोन से पतरे के पास माकर ठेसता हुमा वाकी के तीन बों के बीच बैठ गया 'मन्टू दियासमाई।" धिगरेट को दोनों गमियों के बीच मोसमे मना । मन्टू ने मुकभर मेब से दियासलाई निकासी 'भै। सोमा ने एक बड़ी पम्हाई मी। दो मा अपने-बाप बम 22 कमूनिस थी। उसने पलकें खीच रखी है। वीरू का गला अचानक तेज हो गया, "जानते हो न पचाननतल्ले के उस ओर झमेला हुआ है, हम लोगो के सुकु को वेधडक पीटा है।" सोना ने अकुश के साथ गरदन झुकाकर कहा,"हाँ ।" वीरू की बात का सिरा मन्टू ने पकडा, "इसी लिए केलो दा ने मुझे बुलाकर कहा, 'अरे भाई हम निरामिथ मध्यम वर्ग के हैं। यही मव सात-पांच बड- वडा रहा था।' अमल मे पचाननतल्ले का एक्शन अगर यहां हो, खाल बचाने का घधा।" वे लोग वारी-बारी से हाथ बढाकर सिगरेट पी रहे थे। मन्टू मे ली। वह सुट्टा मारने मे उस्ताद है । मन्टू ने राख झाडी। वीरू ने अपट्टा मारकर सिगरेट का टुकडा ले लिया, "सुकु को कुछ हुआ तो वल्लू की ने अत लाश ।" मोना "अपनी वकवक ज़रा बन्द कर ।" मन्टू "मुहल्ला अभी तक ठडा था, अव ।" गोरा "वर्ग-सघर्ष वल्टू मेरा छात्र था, शात निरीह लडका।" वीरू "अव देखो न जाकर । पांव मे हटिंग शू, जेव मे छह गोलियो वाला पिस्तौल ।" मन्टू "हैजा, चेचक और महामारी की तरह यह सघर्प फैलता जा रहा है।" गोरा "उन लोगो ने तो हमारे घर तक हमला किया था। किताव वगैरह खीचकर ले गये, पिताजी को धमकाया।" सोना "वमे कुछ भी कहो, नाले के पार की उनकी लाइन्नेरी में आग लगाना ठीक नहीं था।" वीरू "वैसे ठीक है।" गोरा "नहीं, यह कतई ठीक नहीं हुआ। इसे सैद्धातिक लडाई नही कहा जाता।" वीरू कुलबुला उठा "मशोधनवाद अभी भी मुख्य दुश्मन है। उनके साथ वहम वन्दूक की नली से होगी।" सोना "ठहर । देखो गोरादा, हम लोग तो उनके साथ लडना नही चाह रहे हैं। मगर सुकु को वे वाकई उठा ले गये हो तो?"

कमूनिस 23 बीस 'वो क्या, पोत पार्क की तर एक्शन सपोरवायेमा बम !" मन्टू मचानक सीमा होकर बैठ गया। मास मोर मुंह में पाप की पिनपारी । बायें हाप से माक की छोरमोर ठोड़ी पसीना पोछमिया 'माकई। पोसपार्क की पाव पार है | माप्त #रे को मा-मौसी की गम्दी मामियां निकल पमी नी । हिम्मत देप सब वारयुग में मा मये। अपने बाप कहा है सोना मे मां का दूध पीया है। कांग्रेसी मस्ताम खोग तीन हफ्ते तक मुहल्ले म पुस माहीं पाय। अंत में भमा वरह मांगी ठभी म। बीस के मुंह से फूलमड़ी फूट रही है। इस से एक विरपास सीमारी निकल गयी। कमोरा साप सोना की पहले बहुत प्यार-दोस्ती रही है। रिम्ता भार का तो नहीं।वही सोना पब हामपैट पहनकर रेल की पटरियों पर पाब रखते हुए स्कूल जाता पा तभी से मोवा के साप उसका माराना है। उसी से पर सुग शाम चाय यात सोना भार ममी बार पर पीठ टिका पांग फैमाकर बैठा हवा पासामना पत्तनी-सुबनी मीन सोना के साप चमकर एक दिन ए.परोके मोतिया की बीबी के पाम मापी। सोना मोतिया के साप पोसर के किनारे बातचीत कर रहा था। दोनों परम म होने वाली बातों का सिमसिमा गारी रखते हुए हगा की तरह मस्ती की पत्ती गती मे हो गयी। पोराको तभी मगा पा 'बाह बहत मन्छी है ।" उसने पीपे से नहीं पुकारा। उन दोनों की पुनमी छाया माखों से मोनम हो गयी। उसके बार एक दिन बिदिरपुर के पुमूस में माते हुए पहना मामा पार्न करने से कुछ पहमे सोमा ने कहा था 'जानते हो मीम पार पाना चाहती है।" इस से एक मारी निकस गयी। 'साना स्मगलिगकामास ।' "तिरपान से का माहै इसलिए! 'बिसन मही" *फिर? - - 24 कमूनिस "ड्राइवर को मैं पहचानता हूं। मैकनामारा के कलकत्ता आते समय मैं पकडा गया था न " "तो क्या ?" गये। "तभी इस ड्राइवर से बातचीत हुई थी। वे लोग नकली दवा का कारोवार करते हैं।" "इसी लिए इतना सीना तानकर निकल गया।" "जेव मे पूरा मत्रिमडल जो डाल रखा है।" सोना ने जीभ निकालकर होठ गीले किये। उसके बाद मुंह के दोनो तरफ़ से होठो को खीचने लगा । जाडा है। गर्मी के दिन पूरे असल मे सोना की यह आदत बन गयी है। जब-तब होठो पर जीभ फेरता है, मुंह विकृत करके । सोना की जीभ ने चक्कर लगाया, "पहले कहने से क्या हो रहा था ?" "क्यो" "बन रहा है?" "रोकता?" "फायदा?" "स्कूल मे वम मारने से अधिक ही होता।" मुट्ठी हिलाकर सोना ने बात कही । मन्टू का खयाल है, बुर्जुआ शिक्षा- विक्षा उठा देना ही ठीक है। मगर तर्क से मुक़ाबला नही कर सकता, इसी लिए चुप रहता है। सोना की वात उसके सीने पर छन से लगती है। साथ-ही-साथ चेहरे का भाव वदल गया। गोरा ने दवे स्वर मे डांट लगायी, "मोना " सही डांट नही, जरा अपनेपन का पुट लिये हुए थी। असल मे उन लोगो ने उसे मानर खा है। कामरेड गोरा, कहते-कहते चुप । दो हाथ जमा देने पर भी कोई आपत्ति नहीं है। सोना तो कहता है, "गोरादा गलती नहीं कर सकते । मन्टू इतनी ज्यादती पसद नही करता।" गुरुडम । डॉट खाकर वह चुप मार गया। गोरा का चेहरा साधु-सत की तरह हो उठा, "तू कमूनिम है न।" वाकी आगे कहना नही पडता । गोरा की आंख की पुतलियो में सोना वात को तैरते देखता है हमें धर्य रखना चाहिए।

मूनिस
और धैर्य मम मानो पनपन की मारमिपि के संयुक्तादार की
जिसे पाद कराने में मां का पना टूटता मा । सोमा रोकर मातम
मा। मन्टू ने गोरा की मोर तिरछी नजर से देगा। मांस मारे
बोराने सारे मामसे का मम्बारा समा सिमा। और साब-ही-सा
सीमा गमी।
पूरी को सुधारते-सुपारो भव मह हामत हो पपी। सुधारना
में पिकाने कीभारत बन जाती है। उसने बाप यह भारतसमका
ममी समान नही पाया। पाराप्रवाह पात करते-करते मनाममा
निकम पाता है। भाम नही पाता।
यूरो के पेट पर बम मारने पर भी एक मार नहीं निकमवा
रानवा के पहले पहा था परना जिम्मनी भर मनपारा पाता
मारामदा की मगर पहले से ही रही है। मुमूस से गुम करते
तिमी हातास के समय मान के प्रिमाफ़ साने वार में
विस्मया। मौर बबीते बारमी को मारामागीम में न
ना पाहता।महिम उस पर सिर्फ़ नगर ही पी इमम अधिक
ही। भाराना सहापों से काम करते हैं। मैस कम्ममी मग
पारसलान में सिपना पबना बाते।पर पर न्हा नही।
॥ो एक बार मान्ममा म पर के बारे म बाप।
मावा कुछ पता नहीं पा । मिमती भाभी सिसाई-माई और छोटा
मकरसमामतीबी। दिन भर मेगरा-मा मार भाव याम
टीबनाकर काम कोबारमामय तीन चाकी मारली
र ठीक उस समय का निमित मतिषि होवामा होमिनती
फरकहती पी हम धाम वान स दिन भर पट भराराता है।'
एकर पीर पर नाराा मतिर
1?"
परवान की तरह पारसम परों का पता पमना मिम
रमेहमाम मामा हुमा है। पाहमा मेहमान । नाकाम रही।
की बगम में काईममी परम बनाकर परलीभीमा
र पूछी, 'कोन हैर, मिनती।"

-- 26 कमूनिस '67 के बाद नारानदा ने उस कबूतरखाने में बैठकर कहा था, "यह मजदूर पार्टी नहीं है। दुनिया भर के धधेवाजो का अड्डा है।" थोडा-बहुत सभी लोगो को ऐसा लग रहा था । नारान दा की बात का खुलासा हो रहा था। दुख-दर्द और विपत्ति मे आगे बढकर छाया की तरह जिसने साथ दिया है, उमी की बात याद आयी थी नारानदा को। वह है चूहो। नारानदा शुरु शुरु में ढेरो इश्तहार बाँटने के लिए कहते थे। या सिगकल के गेट पर जाने के लिए कहकर चलती हुई बस का हैंडल पकड कर झूल जाते थे। रास्ते के बीचोबीच अचानक हाँक लगाते, "बूडो, फेलू की मां को एक बार अस्पताल ले जाना।" और '67 के बाद हिलते दांतो जैसे लाल मकान के कबूतरखाने मे रात-भर अगरबत्ती जलने लगी। वर्ग-परिचय पाकर लटते गये दो जवरदस्त इसान । मोमवत्ती गलकर फटी हुई दरी पर गिरने लगी। नयी लडाई शुरू हुई । और सान पर चढकर दिन-ब-दिन वूडो की धार सामने आने लगी । वह कोडा बन गया। फिर भी इतने वडे काड के बाद भी बूडो 'कम्युनिस्ट' शब्द उच्चारण नहीं कर पाया। जीभ के मिरे पर आटे की पूरी की तरह वह शब्द गोल-मटोल होकर जाने कैसे 'कमूनिस' बन गया और वूडो के मुंह से यह बात सुनते ही उन्हें ठीक सीने के वायी ओर हुत्पिड की धडकन का पता लगा। दोनो आँखें ठहर जाती हैं । उस समय वे गहराई से मानो कुछ सोचने लगते। फिर भी कोई थाह नहीं मिलती। पांव की सफेद चमटी पर वडी या छोटी कैटिया की तरह कांटा चुभ जाता है । जगली वेर की तरह खून की बूंद उभरती है। देखते- देखते व विदियाँ फूल की कली की तरह हो जाती हैं। उसके बाद पत्तियां खुलती। उसके बाद सुशबू । "वीरू " "बोल " "कितना बज रहा है, देसा है?" "ना।" मन्टू ने दोनो उँगलियाँ होठो से दवाकर, आखिरी कश खोंचकर, सिगरेट फेंक दिया। मुंह मे शायद तम्बाकू घुस गया था। थू-थू करके उसे निकाल दिया। पीछे की कॉर्ड लाइन पकडकर फिर एक डीजल गाडी मूनिस 27 कांसती हई पसी गयी । एक ममक रोगनी की मार से पार तरोताया पहरे फीके मासमानी रम की धूमिम रोमनी से उबर कर, साफ़-साफ़ उभर माये एक बार फिर । मद की बैठी हुई माफ वारी की तरह चमक उठी। कितने बजे भान की बात है? नौकेनगभग । मन्टू मीर बीम सबक करते जा रहे हैं। पिराविधिविग करके से बाते निकम रही है। सोना मिक्षिकार है।होंठ सीकर बैठा है। मपने पोतों परे बिछा दिये है।माई मोहर तिरछा होकर बैठा है । गोरा सिगरेट + लिए उवामसा हो रहा पा। किसी म उस पर ध्यान नहीं रिमा । मन्टू गोरा की मोर देख रहा पा। सोचा मापमी उतावमा है। पैठ नही पा रहा है। उतामसा होने के अमावा पारा ही क्या है? ए. बी मान की बात है ठीक नौ बजे। ममी कितना बज रहा है कोन जाने ! ए.पी. को तो होन भी नही रहता । बिना देखें पलता है । मिट्टी से भेटे पैगामे पर रास्ते की धून पाकर एक-सा बन जाता है जैसे कोई दुश्मन है ही नहीं । एक बार म पाने पर फिर कोई बगार नही रहेना । मग्गूत संमठन बनान का मपना संबोए मगर बस्ती म पारा खोये रहता है। पूर के पार की तरह हमेसा भासमान पर ही सटका रहेमा । मौर हाप स चारा करेगा । यह इस बमा यही तो मैं हूँ। विगयरा बाहारी नहीं कर रहे है। 'ठीक-ठीक नहीं पता। 'नौकरी चाकरी तोवरम हो गयी । 'तोरबोर तापमाउट का बड़ा ताला तोड़ना चाहिए । निमयदा की महकी को ऐया सहा पर सुना रही है । कितने दिन से पर नहीं पाते? छह-सात महीना हा रहा है। पेट की सरह धीवमातस्ले पी बस्ती मांगों क सामने उमर भायी। मौर नियम का चपटा पहरा। रंगकम में काम करते समय से पर केतसी पड़ी ही रहती पी। पोराका पुस्म सबसे अधिक पानी भी ।

28 कमूनिस गोरा का पता न पाने पर विजयदा के घर पर वे लोग उसे खोजने जाते थे। खाट पर नगे वदन, विजयदा की काली-कलूटी सूखियाग्रस्त लडकी को गोद में लेकर पुचकारते देखा जाता। आखिर मे विजयदा को थाने ले जाकर एक हाथ तोडकर ही छोडा गया। काम से हाथ धोना पडा। अव हॉकरी कर रहा है। वह हारने वाला नहीं है। गोरा अचानक बडबडा उठा, "कल जाऊंगा एक बार ।" सोना सुन्न मारे था। उसने अचानक बात को रोक लिया, "मैं साथ चलूंगा।" गोरा ने प्यार मे सोना की ओर देखा । सोना ने गरदन हिलायी। इसका मतलब-अकेले जाकर बखेडा खडा करो। जान तो तुम्हारी अकेले की नही है कि जो चाहोगे वही करोगे । गोरा उसके होठो को टेढी रेखा देख हंस पड़ा। अचानक दस बैटरियो की रोशनी उसके पांव के पास आ गिरी। गोरा के सीने के पास धक-से जैसे कुछ रुक गया। हाथ-पांव के तलुए सनसना उठे। तभी एम्वुलैम झट-से आगे निकल गयी। "वाढ का पानी घुस रहा है ।" मन्टू का हाथ ठुड्डी तलाश रहा था । "तपसे की आखिरी मीटिंग की वात तुझे याद है। डोगी से चलकर हम पहरेदार के शैल्टर पर पहुंचे थे। चारो ओर मिर्फ भेडी। भेडी का छिछला सीमानुमा पानी । वीच मे टापू जमीन का टुकड़ा। आसमान पर पूरा चांद। उस नाव पर बैठक, चीनी पार्टी की मीटिग की तरह । वह दिन कैसा व्यस्त दिन था | उस दिन ही वात शुरू कर चुका था। यूं फर्क रह ० वी० की बात दिल मे बैठ गयी थी, लोकल कमेटी के सदस्यो को कैसे भी वर्कर वैल्ट में अपनी पनाह बनानी पडेगी। चबूतरे पर बैठकर कुछ पेटी-दूर्जुआ लडको के साथ गरमागरम बातें झाउने से नही चलेगा। यहाँ अगर अपना गढ मजबूत न बना सके, तो फिर चाहे कितना हो छात्र-युवा वगैरह-वगैरह करते रहो, सब दो दिनो मे खत्म हो जायेगा । अभी-अभी लाइन पकड रहा था। और यह लाइन एक बार दिमाग में घुसने पर उसके बाद सभालने में कुछ भी नही लगता। मगर मौका नहीं मिला । जिस गति मे पुलिस झपट रही है गोरा की आँखो की पुतली मे एक अनजान पछी मृत्यु-याणा मे पख 1 हिली वलया, जिममे मछलियां पाली जाती है। की तरह पर भी ए० कमूनिम्र 29 फरफराने ममा । मासपास ममम-राम गोरा की माल भूम रही है। पसे के स्तर में भी अपनी बी नही रही 'कितना पग रहा है, मद! "पड़ी कहाँ है? अम्बार स? दस तो होगा ही। 'क्या कह रहा है? 'परेशान मत हो। बहभायेगा । मा। ए.बी. तो टाइम का पायम है। 'पापप सोपर पीछ मया है। भयोक बसु का माम में सोय मनाने का ये भूम यय है। यहाँ तक कि उसका नाम भी याद नहीं रहा। अब सक्षप में ए.वी. कहते है। हम खोपर मोय मी जान गये है। वही तो उस दिम जाममपट्टी से मिराम करफ एक बर्षको उठाकर मे नये पे मौर उसस पूछा पा–ए.बी.का मही पापानता । फिर एक मपा नाम बेमा पोगा। कपास के मम्मे फटे हुए पाग पर मोरा हार पर रहा पा। यह अपह मीच-बीच में घरसराती है । पपन में एक बार पुम पारणे यमप पौधे मुंह गिर पड़ा था। बीस से चोट मगकर मापा घट भया पा । ममातार छह माहीले भुगता का। बादाम्सकोई झापाम देनर टोटका पड़ा। कंपए का वत । पोषर का माम सुनते ही पोराको बुए का तम मारमा जाता है और यह बमह सरसरा उठती है। ऐपठे-पनी उरामा गाया गरग हो गया। कान समागमी म बहने मनी। तागतलमा मुहम का कमरठोर राम्ता गातार सामने उमर मामा जोरपना गया पा। भोर माटे भी मुंह गिगपा। वामी हाप वीग पोपर भी नाटक पाप मुछारना नही कर सकते। सरवहीं गै मुस्मा। तीन भारमियों का एक दम भावरविर कमीप गे धीरे-धीरे बा रहा है। जगह परम है। बहरा रिला मही पाता। गामा किम हो रहा है मार हिपिपार गाय गं मही है। किसी म पुलाम मही हिमापी। 1 दुप्पर विधारमा पनी ।

30 कमूनिस सब खिच-से गये । गोरी ने झट-से पीछे देखा । नहीं, ठीक है । मन्टू खुद-ब- खुद उठकर चारो ओर पगला चक्कर लगा रहा है। गोरा ने तब तक उनके हाथ मे स्टेंसिल का टीन देख लिया है। "वठा" "ठहरो न।" मन्टू मे हमेशा ही वेचनी ज्यादा रहती है। बहुत अधिक चौकस रहता है। कॉलेज के चुनाव के समय भी इसी तरह वेचैन रहता था । मन्टू ज़रा और निश्चित होना चाहता है। छिपकर तीनो के धुंधले दल को निशाना वनाकर आगे बढ चला। सोना के चेहरे पर विरक्ति की छाया, "धत्, डरपोक कही का।" और मन्टू पान-वीडी की दूकान से सटकर खडा है। कमीज़ के भीतर हाथ डालकर रिवाल्वर का बहाना बनाया। चट से गले की आवाज़ बदल ली, "कौन ?" "मैं।" "वूडो" " - मन्टू आड से निकल आया । बूडो का दल खडा हो गया था। ग्वालपाडे का वूडो। बूडो का ग्रुप । ब्रश और स्टेंसिल लेकर वालिंग करने निकला है। वे लोग इधर और नही बढे। वूडो ही उन्हें चक्करदार रास्ते से ले चला-फोर्थक्लास स्टाफ़ क्वार्टर के भीतर से होते हुए। यही नियम है । वरना नौसिखुओ का दल चारो को एक जगह बैठा हुआ देखकर कही कुछ और न समझ ले । कोई वैसा टैस्टिड भी नही है। यह सब अंग्रेजी अब वूड़ो ने भी सीख ली। स्प्रिंग फैक्टरी का वूडो । उसकी वीवी का कभी-कभी अचभा होता है, "यह तमाम अंग्रेज़ी-वंग्रेजी कैसे सीखी।" वूडो हँसता है, "हाँ, लिखने को कहते ही सारी विद्या निकल जायेगी । सव-कुछ सुन-सुनकर सीखा है। हां, मगर मतलव जानता हूँ। टेस्टिड का मतलब है, सीता की अग्निपरीक्षा ।" चूने की बाल्टी उतारकर चेचक के दाग़-भरे चेहरे वाले लडके ने जरा दम लिया। फिर चलना शुरू किया। सिगकल के निवारण के हाथ मे कुंची। छंटाई मजदूर निवारण की फटी खाकी पैट पर कतला मछली की

पनि ॥
वय पेर बन गया है। मोर पोहाय में सामान FTY
तपहिच रहा है।
माग रेस स्वार्टर मर से।"
'बात यस्दी निम्मा है!"
"नहीं भोर रात को मुबाक ने पोउन
सीडी मार पड़ी-सी एक पून की बाटो फरा"
'मन्ठा माना।
पोका उप पूमिक छापा की हए मेरे , मेना। न्द्र
रस्टविन दूसरी बोर का होकर उन्हें गिम्दीभरा re
देखा। काशी देर परमे पम्सिएप कमी पपी है। राम : r
बकरी के धमाकीवर वना हुमा-मा सम रहा है। मद मगर
पोस्ट के मीप बैठ पया। पा से रेरमारी निकासार हपर्न गए
गिन पा है। सोना फिर होंठ बाट हा है। पोरामपाप rrrrr
पर हार कर रहा है।
"प साठ पैम!"
सोना मे पाप मोरे वगैरपदा काफी है।
'तू तो मोसे ही खतरोटी निमसपा।"
'मापी देना।"
-फिर बोचर के कामर पण सेने पर काम की मा कानm
ऐगी।
दिन कामे भी सात रिलता म सगा।"
"म"
"बाबा साठ पैसे में पाने का मसमा निपटपापेमा।
इस पर बारावीठ नही हुई। कमायम होन पर मातराय
करता है। भात-रोटी मार सरही रिम्पेरीमान कम उमी परमा
पाती है। मोदी इन वीरों पर कोई मगरमी है। पिए पाप पीर
हो दिन काट मना है। मैगा मुबन कहता है "पोरा तो जरना पूनों रह
पाता है। सास समम भंगा मुगम से रसदी पेंट होती थी। जब रो

32 कनूनिस - के कच्चे नाले से सटा, तारकोल के टीन से घिरा छोटा-सा चबूतरा । बीच में बडी इमली के पेड का वडा-सा तना। और वैटरी का वक्सा। तारकोल के टीन से नटी रवर फैक्टरी और खुले टट्टर मे खुडो की चाय की दूकान। ओवरटाइम ने पहले ज़रा वक्त मिलता है। ठीक उसी समय गोरा हाजिर होता था। गंठी हुई गजी उस समय रवर की कालिख और मशीन के तेल से तर है । सुवल हाथ मोडकर ऊपर उठाता। लाल सलाम । गोरा का हाथ भी मुट्ठी बंधकर ऊपर उठता था। इसी को लेकर एक दिन तुलकलाम हो गया था। ब्रजेन वावू के जूते के तले की तरह सूखे पिचके चेहरे पर इस बात ने सिरिंज से सुर्ख जून दौडा दिया था और काले रवर की गेंद से पम्प करके प्रेशर नापने की सीसे को गोली रेस के घोड़े की तरह दौड रही थी, "नमस्कार कहने ने क्या आदर्श सड जाता है ।" पुराने पायो की टूटी खटिया ने गोरा के बाप की गठिया के दर्द से खोखली हड्डियो के चरमराने की- सी आवाज की थी। और गोरा हंसा था। निर्मल, सरल हमी। फिर भी भाले की फाल की तरह उद्धत, "यह मामूली बात नहीं है, समझे।" गोरा को कोई बात कहने की फुर्मत दिये बगैर ही सुवल पूछता था, "खाया है कुछ ?" उसे जुवान खोलने का मौका ही नही देता था। फिर तो हडहडाकर मेलगाडी चल पडती। रवर कारखाने के यूसुफ और नाटे अली को गोरा के बारे मे खूब पता है। इसी लिए जवरदस्ती टिफिन से रोटी निकालकर उमे एक-आध रोटी खिला देते हैं। ह्य ज रोड पर एक के बाद एक धडा फहरेगा। आज ही तो स्प्रिंग फैक्टरी की चिमनी के माथे पर बांध दिया है। फडफड करके उड़ रहा है। नीचे एक पोस्टर लगा दिया है। गोरा ने कोई दाधा नहीं डाली। कोई और वक्त होता तो इसे लेकर गजव का काड होता। आज मिज़ाज ठीक नहीं है। कमजोर ट्यूबलाइट अंधेरे के साथ मुक़ाबला नहीं कर पा रही है । धुंधला, अधमरा अंधेरा पाइप की तरह टूटे- फूटे और कच्चे नाले मे कराहते हुए उठकर आ रहा है। वीरू वेचन हो उठा, "भव बैठना ठीक नहीं है।" - "इसी वक्त राउड पर आते हैं।"

-- - कमिम 33 'हम सोयों पर गाने पर ए.बी. मुरिम्स में ईप गारमा । "मब नहीं पायेगा। "उसकी बात कभी भी इधर पर मही होती।" गोकने पुछकाते-कहते बात को धीच में हो निगल लिया। अपनी यावी हीरा ही है। ए.बी. परिषदो मेकर दो-एक बाते हुए। पोशी र पुप्पी । मन्दु मे भावार करते हुए पीठ सुगमापी । मुंह विजय (या। और पतग ही बी। मोर और मी मूना होता मा रहा है। भावरटााम पूरा करके दोपस की मिपा के प्रबार माय भी एक-एक कर मार गया पर पपरपनन को हर करने वाली टीम रहीवन की हा पोराकी मीर का कोना पापा मार करता हुमाग रहा है। सोना बाम छोरी म्मेि ठाम मे रहा पा। हमाकी डर ( मन्द पार का रसना जा रहा पा धीरे-धीरे । मैकमामारा बापयन पर पुलिस की माये सामी पी। पब कमी-कमी दोनों टसने फूम उम्।। बा के सामने मसि जमिन के पीछे का रास्ता उमर मापा । मारेका पिपिसार भविगभी भी होड़ते हुए सुतस की तप नमकी स्मृतियों में छापे-'म मक मानामारा-गो, गो गो गो के सासम में पवित्रगामटिमा का मास' सकर उस से परा हटकर बस पाबा। नमूस मामे-पीछे गाड़ा कामा रंग। भाउ बम बैन पर रोपी। मैनामाप हेलिकॉप्टर सहहर का पाकर मना रहा था। माता हार। मूग गिपरिपामय मे सटी हुई पतमी पनी के मुहाने परपरमते ही अपने को गौर नहीं समाम सा। तीन पेन घुमूस के साप बीं। इसोप्टर से मैकमामारा इस बाहर की गोप-पहवाम र पापा और नम्टे बहुत ही दिलास में परमाये पये 'माम' माम 5 सिए पीस रहा था। सामने पानी न उस ररुमा रही थी। विविधामय से सटी हुई मसी पर भावे ही किसी मे सासयुस की रात छोन मी । मोर एक ने माटी । हामी दुबतीयतली एसपी ने एक पुलिस मामे काटोप छीनकर आसमान में उछार दिया। बाद हो गयरध-यजीन पार परमा गुरिया मीर बम । मोर मारा -- 34 कमूनिम - हारी की । कलकत्ता शहर का सीना चीरकर मासमान की ओर दौडा। हैलिकॉप्टर उस वक्त भी चकरघिन्नी खा रहा था। मन्टू खडा हो गया था, एक मनि- दूकान के शेड के नीचे। सादा कपडे पहने दो-तीन पुलिस वालो नं आकर उसे खीचकर वैन मे ला विठाया। जेल से निकल आने के बाद से ही वीच-बीच मे दर्द चिलक उठता है। उसी दिन की ही तो बात है, जव खोचर के दौडाने से गोवरा तेजी से कद्रगाह की दीवार लांच गया था और उसके पांव में मोच आ गयी थी। जरा-मा चूकते ही काम तमाम हो जाता। सुकु दीवार के एकदम उस पार था, इसलिए । उसने झट से उमे खींचकर उठा लिया। अत मे न सभल पाने के कारण दोनो ही गदे नाले के भीतर औंधे गिर पडे थे। कीचड की सडी फिर भी नाक मे नही घुस सकी थी, पुलिस वाले की गालियो की वजह से । पागल सांड की तरह वह गालियां बक रहा था। मन्टू टखने की मालिश करते-करते हवा की नमी से खुश हो उठा। 'समझे।' गोरा को सम्बोधित करके उसने वात को स्वीच दिया। गोरा ने अनमने भाव और चिंतित आँखो से मन्टू की ओर देखा । मन्टू के गालो में गड्ढे पड गये थे। भरे हुए चेहरे पर गड्ढे । पहले शरीर भी भरा हुआ था। अब धूप-पानी-तूफान सहने और पेट के धंसने से पारीर खिंच गया था । मगर चेहरा अभी भी फूला-फूला-सा है । पाण्डु रोग मे ग्रस्त रोगी की "जेल में एक वडा जबरदस्त गाना सुना था। खूब याद हो गया था।" "सुना दे।" वीरू ने होठ टेढे किये। मन्टू ने गला खखार कर गाने की कोशिश की। दो-एक टूटे-फूटे शब्द । हिन्दी और बंगला मिली-जुली। कैदी बोले बीमार बीमार, डागहर बोले वीमार नहीं । कम्पाउण्डर को दिया चवन्नी भर्ती से इनकार नहीं घोडी चुप्पी। वीरू का मुहासेदार, विरक्त, निर्विकार चेहरा। मन्टू वैचन हो रहा है । गोरा खुले गले से मजाक करता है। - कमूनिस 35 'तू मा कविताएँ नही मिमता? पममी पास, नवी रेमा मौर पाने पपा-क्या । “पुस्स। मदूम रवास हाने का बहामा किया। मोर ठीक उस वक्त उमरे काम की म मुरमुरा उठी। मोरा बोर बीमय भी कविता को मेकर माफ कर रह पे। मन्टू बाधा हाप सरफ मपा । काम ही म पपाते हुए धीरे-धीरे एक सनसनाहर छोटी-सी माहर की तरह सार पदन में फमती जा रही है। मम्म पैसे उसे कोड़ा मगाकर सीधा कर रहे हैं। सीमेपन का भाव /ता ना रहा है। पाम की मीटिंय बहुत पहरी पी। सोना ने अफसोस के साप कहा। और बात सुनते ही योरा मीधा हो गया। बाबबामक साहो उठा। मारही मीटिंग में ए पी० के साप माममा रफा-दफा हो गावा। इस तरह मटके रहने स तो बसम मे रहा। मिट्टी में दौत गराकर कुछ-न-कुछ परमा पाहिए। गुरुरे दिनों में इतना अमेमा नही पा। ममा पारकर मारे ममावासारात राव मागकर इम्तहार ममाता पा। और दस-बीस मोप मिसकर बीच मैवान म इट्ट होते व । दो-तीन सामो मे सब कुछ गान पसा उसा गया है ! मब वीवार पर इम्तहार ममाते समय मानक पीठ में काम धंस सकता है और पोस्टर के सफेव कार पर तास पम्मे मग सकते है। रात महरान के साथ-साप सन्नाटा पूरे इमा पर छा गया था। मेहमतका भौर बारे भूने मागेका इमाका । टोकरी की तरह बस्ती । घुमा । हतारर चिनियाँ बासमान में कामिम पोत ही। साक के मम से घर घर की भावार निकाल रही है। बोहोरेर पहम एक सरमा कुत्ता मम पास पूंछ हिसा रहा था। किसी शरामीका मकिपाया पर कानों में बन रहा है-गिन् ए पी इन। रात भर सारे इलाके में मासमाते मराबियों मावारिस कुत्तों और तोपरों का राग वमता है। मोर मोरा का रस रात रात गायकर दीवारों पर भाग के टुकड़े की तरह एक-एक यग्य मटका देते हैं । सोना मे अपनी परम गुगमाई 36 कमूनिस "धतेरे की " "क्या हुआ ?" - "इम तरह वैठे रहना भला अच्छा लगता है ?" "क्या करेगा ?" "तुम्हे तो पता है कि घोडे के अड की तरह पोसाना मुझे अच्छा नही लगता । और वहस-मुवाहिसा मुझे आता ही नही । मार्क्स का इस नम्बर का वाल्यूम, लेनिन के । इससे वेहतर है बावा, मुझसे पहरा देने, पुलिस का घिराव तोडने, आग की चिनगारी विखेरने के लिए कहो। सोना का एक पाँव ठीक है।" सोना आग लगाकर रास्ता बनाना चाहता है। वह लडाई को समझता है । युद्ध | कोई खेल-कूद नहीं है । जरा-सा चूकते ही जान मरे तरह चपटी होकर पढी रह जायेगी। इसीलिए झमेले की बू पाते ही इकहरी चोटी का रिवन हवा मे उडाते हुए लम्बी गली से मीनू दौडी आती है, "सोनादा कहाँ है ?" पिछली बार उसके सवाल के जवाब मे उमकी ओर देखते ही गोरा की आँखो मे वारिश की बूंदो की तरह पानी पकडा गया था। वीरू ने पतले बालो को माथे से हटाकर हिहिस् आवाज करते कहा, "मेरा मन कह रहा है ।" हुए मेढक की "क्या?" "क्या कह रहा है " "वे तीनो ही झुक पडे।" वीरू तुतला रहा है-~"ए० बी० पकडा गया है।" "फालतू वक-चक मत कर, वीरू" गोरा का विगडा मूड टुकडे-टुकडे होकर बिखर गया। मन किसी तरह को लगाम नही मानता। कहीं कांटा चुभा रहता है। एक-एक करके भी कम नहीं पकड़े जा रहे हैं। फिर ए० वी० को चालढाल बहुत ढीली है, जैसे दुनिया मे उसका कोई दुश्मन ही नही । पाजामा-कुर्ता लटरपटर करते हुए चलता है तो कोई हुए चलता है तो कोई होश नहीं रहता। इसके साथ प्यार । उसके साथ गले लगना। जरा-सी भी मावधानी नहीं बरतता।

कमनिस 37 'कम हुई है। बी.सी. में। 'बासूपर में ? । तीनों का सिर एक-दूसरे से भिर गया है। वे एक-धूसरे के पास सरक मापे है । मोरा के मुंह से कोई वात मही निकल ही है। ऐसी हासत निम्बगी में पहले भी नहीं मापी। वैसे-वैसे दिन मुगर रहे। से-पैसे सब-कुछ हाप से बाहर हाता जा रहा है। कोष-कोपर पुलिस म कर रही है । सभासत हुए भी पान कोमसा बनी गा रही है । गोरा मांधी का पता नहीं है कि कहे 'पर-पर पिटाई कराते रहो मगर । सामने मूस या है अबसूरत-सा एक 'ममर'। ऐसे समय गोरा को मारानवा की गात या माधी है। हाल ही में मगरों के बीच पुसा पा। गावधीत पम रही है। दो-एक मेस्टर भी बनाये। यो पार मोपों के रहन सायक। ऐसे समम मह हुग्यत । देर बरदास्त नहीं हो रही है। सोगबाग इपियार बगैइ छोरबपने मपमे इलाकों में पाना चाहते हैं। मगे। मौका देखकर सरकार मे सोपर नमा दिम है। पही सोचत हुऐ गोरा चिस्ता पड़ा "साता परा सुस्वान का टाइम भी नहीं दे पा है। रेको बान की मीटिम । पोरा म भी साप-साथ सिर हिमाया हो माग ही साइन सेकर इस पार उस पार कुछ भी हो माता । हाप बांध कर मीर मूना बनकर मर 4ठा मही माता । रिशा तय म करने पर कौन से पहनुम म गायोमे ! घर बोचरों की पौसी के सामने टिकना मुरिफम। समुष अमर हो बस को गिराने का काम होता दो मह पीधे नही रहवा । ममर इससे कुछ होने वाला नहीं है। इस साइन गमती है। बार पराबा मिमता। 'मार ए.बी.पा यह सब माम मेगा? "देसागामेपा । भादमी यो सममार है।

। 38 कमुनिस ए० वी० की वात उठते ही सोना ने गरदन मोडकर फिर रास्ते की ओर देवा । वीरू की वात याद हो आयी। वीर की ओर सुलगते कोयले की-सी दहकती आँखो से कई क्षण स्थिर देराता रहा। वीरू बेचैन हुआ, "क्या ?" मोना ने आंखें फेर ली । गोरा भी कुछ देव नही पा रहा है। फिर सोना ने वीरू की जोर सीधे देवा । जलते हुए कोयले के टुकडो- टोनो आंखो से हवा टकरा कर चिनगारी विखेर रही है। वीरू चिल्ला पटा, "मामला क्या है?" सोना ने दांतो को खट की आवाज़ के साथ जोडा, "ए० बी० को अगर कुछ हुआ तो तुझे जिन्दा नहीं छोडूंगा। यह नारी अपशकुनी बातें निकाल दूंगा।" "सस्कार "कतई नहीं।" "फिर क्या" "क्या भला, ऐसा उसने क्यो कहा? घर पर एक बार पुलिस ने कुडी हिलायी थी कि वेहाला ननिहाल मे हवा । ऐसी वात कहते समय ।" मन्टू ने एक हाथ से सोना का चेहरा अपनी तरफ मोडा। हलकी-सी मुम्कान है मन्टू के होठो पर, काली आंखो की पुतलियों में, 'तेरा कुमकार अभी तक नहीं गया।" सोना ने और नही छेडा । नाराज होकर " - बैठा रहा। "क्या करोगे?" "हाँ, क्या करोगे? कब तक और बैठे रहोगे ?" गोरा ने इन बातो का जवाब दिये बगैर वीरू ने फिर मिगरेट मोगा। वीर ने अनमने भाव मे सिगरेट थमा दिया। हुस-हुस करके कश खीचने लगा। सोना उभे पर भार टाले एक स्पष्ट-सी आवाज को पकड़ने की कोशिश कर रहा है। ट्यूबलाइट को धूमिल रोशनी में अब कुछ भी चलता नजर नहीं आ रहा है। अधकार गाढा होता जा रहा है। रास्ता बिलकुल जाली है। कोई नहीं है। वीरू फुसफुसाया, "चलो, निकला जाये।" "ठहरो।" निवारण को लौटने देखा जा रहा है। फटी हाफपैट देखकर उसे कमूनिस 39 1 पहचाना गया। पुटने तक पैट नतर मायी है। धीरे धीरे कपम रसता हुमा बामे पा रहा है। पतमी-पतमी टा। बार मायर पट में गाना नहीं पड़ा है। मावड़ाते पाों को रेड गोरा सोष पापा। बीवी को ससुरात भेर दिया है। बमा बनेगी। असम में मांस के सामने मरेपी उसे रेलमा नहीं पाहता मिबारम ! उसकी छाती धंस गयी है। वीवा मेहरा।सिगकम की मोहरी पर खाने के बार बेहरा और तीसा हो गया है। सब दिम राठ काम मिमने पर रामस की तरह पिस पाता है। मयर हां यह सब पोस्टर मिखमा-नसना उसे रास नहीं पाता। मग निवारण का शरीर साफ रिजन मना है। हर का मस्सा तक। हालांकि उसके दोनों पार ही नगर को याँपत है।पकी पीसी-सी हरिराया । वेन पी हुई साठी की तह। पाव करोम एक नररमा रहे हैं। "हो मपा? 'महो। 'तो?' । "पूरी लोप ममी भी कर रो है मेरी तबियत ठीक नहीं है। क्या हमा? 'बाने कसा पाकर मा हा है। मात करते-करते निवारम ठ पया । निवारन का या पेहरा उसके पीमा बहन से मेल नही पाता । वैसे उसे हलके से किसी मे उपर मगा दिया हो । हाम की मर्से विद्रोह में उभरी हुई है। उनके सिरों के सर मासमान परीके सितारों की तामिममिस कर रहा है और ठी हमा बह रही है। गोरा म प्यार से पूछा 'यूनियन पाकापी है?" "भेनों का दम | क्या कहेंगे मला ? बावधीत परा मौका हा पपी। निवारन पहले की बात का सूप बीचता गया "कायी बाबु का कारसामा तो सामा मेरी मांगों के माप साहमा है। शु-गुरु के दिनों में हम कुम तीन मोप पे। माई का काम होता था। और मेष एक पी। कापी बालू उस समय पीनापारे में एक मौरत के साथ रहते पे । पर से कानी कौड़ी नहीं लगायी । मूमर की तरह पटे तर तीन बने । पौरमा सामे मे मुझे ही मात मार दी।

40 कमूनिस समझे गोरा दा, कारखाने मे आग लगा दूंगा। जरूर लगाऊंगा, साले किसी की भी नही सुनूंगा।" तभी गोरा को लगा कि वह एक ऐसे विशाल- काय मजदूर को देख रहा है, जो अपने सस्त मजबूत हाथो से मशीन तोडे डाल रहा है। उसके चेहरे की सिलवटो, हाथ की मछलियो मे गुस्से की आवाज़ गर-गर कर रही है । गोरा निवारन के स्वर का उतार-चढाव ध्यान से सुन रहा है । वात करते-करते आक्रोश की तेजी मे निवारन का गला गर्र-गरी करने लगा है। निवारन का रंग-ढग गोरा अच्छी तरह जानता है। काम गंवाने के वाद से वह और भी अधिक चिढा हुआ है । शुरू-शुरू में गोरा या मन्टू साथ वह थोडा-बहुत बहस-मुवाहिसा भी करता था। अब वह हर रोज़ गरम हो उठता है । उसकी वीवी ने पहली वार एक मरा हुआ वच्चा जना था । तभी से निवारन बहुत टूट गया है। दूसरे को दूध-बालि नही दे सका, वह भी गया। दो बार के दवाव से वीवी कुवडी हो गयी थी। कमर टूटने और शरीर सूखने के बाद भी किसी तरह जिन्दा है। फिर इस बार तो कोई वात ही नहीं है। निवारन ने वीवी को इस बार मरने के लिए भेजा है। तीन दिन में एक वक्त ज़रा-सा खाना देने की ताकत भी उसके वाप मे नही है। निवारन का अब आगे-पीछे कोई नहीं रहा। - "खाया है ?" "कव ?" . "दिन-भर मे एक बार भी खाया है?" "हाँ । आज दोपहर को वूडो ने खिलाया है।" "तू कमूनिस है ना " "सच कह रहा हूँ, खिलाया है।" "अच्छा।" निवारन को यही एक बीमारी है । भूख से सूखकर मर रहा होता है, फिर भी जुवान से किसी को कुछ नहीं कहता। गोरा ने हजार दफा उससे सिगकल के टिफ़िन को घटी के वक्त गेट पर जाने के लिए कहा है। मजदूरो का मन-मिजाज़ समझकर, छंटाई के खिलाफ जबरदस्त लडाई शुरू करने का मौका तलाशना चाहिए। ऐसी बातें निवारन नही छूता। जबडा भूमिस हिमाकर उसने बम्हा मी। प्याराचने पर बिया माता है ये सासे मुनाों को पात के है सब! जि को पिछमी बार पीट-पीट कर मार गमा पा । यह बात पोड़ी ही याद है। सब साले निगम रहेमा वा कर रहे मोर गरदन मोर सिमम्म में पुसकर खूनी पानी की वार मा निबाएन मे कांब-कासकर सांस छोड़ी। बसम में सौम नहीं छोड़ी एकमाबार कीबोर कर बात करने से पहले ही निवारन म यह मानार पी पी। पहले की बात का सेंमार गुहार कर हटाता है। उसके बार ही मापार निकमती है रसु । पपटी माफ ननम् बाबान से मूत माती भासा ५ भी मर पाई (निवारण के कपाम पर बूद रमर ही है। एक-यो करके। मांधी-तूफान की पोट साया हरा साठ हो उठा।) इतनी सुम्-तुकरके क्या होमा ? सभी माताएं छोड़कर मा पापा फिर यो भी रहे हिस्मत में । किस्मत में? उसी में। वह फिर तेरी से निकल गया। बोपरविर के मीचे से निमारत का नम्बा मरीर छापा की तरह बोलत हो या है। उस मोर देखते हुए फुसफुसा कर मन्दू ने कहा 'मब यह विमान मारने-मरम पर सवार हो उठा है।" मन्टू की बात बह गयी। को िमोम नहीं रहा है। सिर मारी भारी- सा है। ए.पी. के बारे में सोपकर ससन रास्ते के नुकीस मोड़ की बोर रेपा। मांगो म जसन । पो रातों से पस भी नहीं गा सका है। मन बोन कर नहीं रख पा रहा है। मन्द में पोरा से पूछा “पिछले हफ्ते बीरासातला गमये? पर्यो? पूछ रही थी। भएकबार मिलने में क्या बाता है तुम्हारा 11 मौसी को पानी भी मही से दी है।

?" "माँ जैनी ही है।" "तुम भी भला कैसे हो।" "इतना जो वक रहा है-तू घर गया था एक वार "वाह।" "श्यो?" "जाकर पकडा जाऊ, क्यो? "मोफ | और मुझे भेजकर पहरा बैठायेगा, यही न? उसके बाद सब मिलकर ।" नीद भगाने के लिए सोना उठकर चक्कर लगाने लगा। बीरू चुप है। गरदन कटी हुई मूर्ति की तरह लटकी है। यूं भी लडका कमजोर है। इतनी ज्यादती बरदाश्त नहीं हो रही। वीरू का सिर गोरा के कधे पर आ टिका है। गोरा अनमने भाव से वीरू के वालो मे उंगलियां चला रहा है, "मुझे कोई दिक्कत नही होती, तुम लोगो के साथ हूँ न । आजकल क्या होता है, जानते हो ? दिन-भर मे एक बार जरा वक्त बचाकर, तुम लोगो के साथ जमकर बैठ न पाने से, जाने कैसा सुन्न-सा हो जाता हूँ । पुलिस का मेला वढने के साथ-साथ लगाव भी बढ रहा है, देख रहा हूँ। सब जब एक साथ रहते हैं, तब कुछ याद नहीं रहता । उस समय लगता है, वाकई दुनिया को तोडना-गहना कोई बड़ी बात नही है। अकेला होते ही तरह-तरह की बातें मन मे आती हैं । कमजोरी महसूस होने लगती है।" अब वे चार हैं-~-मन्टू, वीरू, सोना और गोरा । भोर तारकोल की तरह अंधेरा । अंधेरे में चार मूर्तियो के हाथ, पांव और होठ हिल रहे हैं। फिर भी चारो जैसे खो से गये है। कितनी देर से बैठे हैं, खयाल ही नहीं रहा । चुम्बक की तरह यह मोड उन्हें खीचे हुए है । या एक मकडे के मुंह से निवली अंधकार की लार से बुने जाले मे चारो ही फंस गये हैं ? सोच रहे हैं। चाहने पर उठकर जा सकते हैं। उठू-उठू करके भी बैठे है । जव चाहूँ, उठू । सोच रहे हैं, यह तो हाथ हिला रहा हूँ, पांव हिला रहा हूँ। उठने में अब कितनी देर ? जवकि ये फेम गये हैं। शायद किसी के सीने के भीतर छमछम घुनरू बज रहा है, डर की मुद्रा लिये नाच की धुन पर। दाव लिया है डर ने गला । सब डरपोक समझेंगे, इसलिए सांस वद किये .

मूनिस 43 हुए है ऐसा भी नही है । बसम में मन के अम्बर बाबीत चल दी है। पुस्स मा गाय तो भी क्या ! सोमा का वानसट है न। पट सौर गाऊपा पस्पवास के मैदान में हाट पामकर दो बम हाम में मेकर को होन पर बस । इसके मनापा ए० वी० का ही तो रिस्क मधिक है। क्या हुमा, वह वा सो नहीं रहा है। पो कुछ बातचीत पस रही है वह मापम में ही है। इसका कोई तम्य कोई गम नही है। बाव-पर-यात निकाल रही है। भसप्त में चारों का के माये एक बड़ा-मा आ मगन कारण से है। बामे कौन-सी भातका? इस नम्मर यस्तीपी उस सके मित्मी की पप गोरा की माफ बाम कौन-सी एक मुंपन के मिए पास पर बैठी है। सामाठ के मममग पारों इकट्ठा हुए। दो पटे मीन मपे । ममी भी किसने मिमट-किस गरे पाप नक पदम के रोमों पर स । सुरमुराते हुए । पति पवनी देर में एक बार भी पार नहीं माया कि बमस में ये पाप मोम है। मौर उस पाप नमारबावमी का पता नहीं मिसे मेस्टर का इनाम करना या यह एप रोह में पी पी० एम. के पस्टू पिरोह के हाथों पा गया था। बाई वस्टू कापिरोह उस उठाकर म मया है या नहीं इसकी भी कोई गारंटी नहीं है।मे गये होंगे तो मब तक उस सह नामे की पीचरम मार पिया होगा। इस पयाम न एक बार भी मन में दरार पैदा नहीं की। लाइन पर गाड़ियां मुली हवा वार ट्यूबमाएर फी स्वप्निप मीमी रोडमी के नीचे से लोग मूर्तियों की नए पोहए। बवानर सोना धैर्य पाकर गर्म हो उठा। "मय उठा 1 ए.बी० 'इस्स । तानु में बीम टिमकर मन्ट म मावाब की। सोना पाप मावत के मुताबिक बेरम पसा गया। हमिदार मार बसने की माइत है। मान 42 कमूनिस "मां जैसी ही है।" "तुम भी भला कैसे हो" "इतना जो वक रहा है-तू घर गया था एक वार ?" “वाह।" . "क्यो?" "जाकर पकडा जाऊं, क्यो? "ओफ 1 और मुझे भेजकर पहरा बैठायेगा, यही न? उसके बाद सव मिलकर ।" नीद भगाने के लिए सोना उठकर चक्कर लगाने लगा। वीरू चुप है। गरदन कटी हुई मूर्ति की तरह लटकी है। यूं भी लडका कमजोर है। इतनी ज्यादती बरदाश्त नहीं हो रही। वीरु का सिर गोरा के कधे पर आ टिका । गोरा अनमने भाव से वीरू के वालो मे उँगलियां चला रहा है, "मुझे कोई दिक्कत नहीं होती, तुम लोगो के साथ हूँ न । आजकल क्या होता जानते हो? दिन-भर मे एक बार जरा वक्त वचाकर, तुम लोगो के साथ जमकर बैठ न पाने से, जाने कैसा सुन्न-सा हो जाता हूँ। पुलिस का झमेला बढने के साथ-साथ लगाव भी बढ रहा है, देख रहा हूँ। सव जब एक साथ रहते हैं, तब कुछ याद नही रहता । उस समय लगता है, वाकई दुनिया को तोडना-गलना कोई वडी वात नहीं है । अकेला होते ही तरह-तरह की बातें मन मे याती हैं । कमजोरी महसूस होने लगती है।" अब वे चार है-मन्टू, बीरू, सोना और गोरा। और तारकोल की तरह अंधेरा । अधे मे चार मूर्तियो के हाथ, पांव और होठ हिल रहे हैं। फिर भी चारो जैसे सो से गये हैं। कितनी देर से बैठे हैं, खयाल ही नही रहा । चुम्बक की तरह यह मोड उन्हें खीचे हुए है । या एक मकडे के मुंह से निकाली अंधकार को लार मे बुने जाले में चारो ही फंस गये है ? सोच रहे हैं । चाहने पर उठकर जा सकते हैं। उर्ले-उठू करके भी बैठे हैं। जब चाहूँ, उठू । सोच रहे हैं, यह तो हाथ हिला रहा हूँ, पांव हिला रहा हूँ। उठने मे जब कितनी देर ? जबकि वे फंस गये हैं। शायद किसी के सीने के भीतर छमछम धुंधरु बज रहा है, डर की मुद्रा लिये नाच की धुन पर। दाव लिया है हर ने गला । सब डरपोक समझेंगे, इमलिए सांम वद किये । - कमिस 43 हए। ऐसा भी नहीं है। मसत में मन अगर पापीत पम रही है। पुस्स मा गाये तो भी क्या ! सोना का वानसट हैन। पट से दौड़ गाउँमा अस्पताम के मैरान में हार खासकर वो बम हाप में मेकर सड़े होने पर बस । इसके अलावा ए वी० का ही वो रिस्क अधिक है। मा हमा पहया को नहीं रहा है? पो कुछ पाठपी बम रही है वह मापस में ही है। इसका कोई मम्म कोई उम्प मही है। वात-वर-बात निकम ही है। मसन में चारों का र भागे एक वा-मा प्रा' ममने के कारण ये है। गाने कौन-सी मानेका? तास ममार बस्ती की उम सफेर बिस्ती की तरह गोरा की माफ जाने कौन-पी एक मुंपने के लिए मात्र पर बैठी है। सार पाठ के लगभग पारों इक्ट्ठा हुए। वा पंटे मीत मय । ममी भी कितने मिनर-सकिर गुसरे पा रह नमके बहन के रोमों पर से । सुरमुराते हुए । बकितनी देर में एक बार भी याद नही माया किममम में से पांच मोप है । और उस पारमें मार मादमी का पता नहीं मिसे मेस्टरमा ईतराम करना पा यह पज रोर में सी० पी. एम. के मस्टू गिरोह के हापों पर पया था । पाकई यस्ट्र का पिरोह से उठाकर मे गया है या नहीं इसकी भी कोई गारटी नहीं है। मे गये होंगे तो भब तक उसे सह मामे की कीवा मे गार दिया होगा। इस पयाम ने एक बार भी मम में दरार पैदा नहीं की। माइन पर गाड़ियां पुती मा मोर टयूबसाइट की सप्लिम मीली रामनी के मीरे वे सोग मूर्तियों की तरह मरे हुए हैं। बचानक सोना धैर्य पोकर गर्म हो उठा। 'नहीं! "क्या? अब उठा पस्स ! पातु में बीभ टिपार मन्ट ने बाबारी। सोना का हाल बादत के मुताविक वेव में बमा गया। हथियार मेकर घमने की बात है। माग 44 कमूनिस . छोड आया, यह खयाल नही रहा । एक दर्द चिलक उठा। दोनो हाथ मलने लगा। और एक आवाज़ उठ रही है । अस्पष्ट दवा हुआ एक शब्द पहले रुक- रुककर, फिर सिलसिलेवार लगातार । भो-ओ-ओ-मो-ओ-ओ। सर- सराता हुआ । बर्र की आवाज की तरह शब्द । सुना है, वरं एक बार पीछे पडने पर सात हाथ पानी के नीचे जाकर भी डक मारती है । जहर उंडेलती है। आवाज धीरे-धीरे तेज हो रही है। झुण्ड-दर-झुण्ड वर्र मानो मोड निशाना बनाकर दौडते हुए आ रहे हैं । मन्टू उस समय भी कान लगाये है। अन्दाज़ा ले रहा है। गोरा और सोना ने आँख मिलायी। वीरू उठ खडा हो गया है। मगर हिल नही पा रहा है। सोना ने इसी बीच घुमाकर सिगरेट का कथा लिया। थोडा तम्बाखू निकालकर आखिरी खीचा। कश खीचकर टोटा फेंक दिया। फुटपाथ से टकराकर रोशनी हलकी-सी फुलझडियां खिली। वर्र की आवाज़ की तरह शब्द उस स मिट्टी कुतरकर खा रहा है । डक चुभोते हुए आगे बढ़ रहा है। उसके । ही वेक लगाने की आवाज़ । फिर धूल का भवर । "खोचर " "तुला !" ट्यूबलाइट का खभा अपनी जगह खडा है। गोल-सा सीमेट चबूतरा खाली पड़ा है। सूखा हुआ एक शालपत्ता भवर मे गिरा है। भर मे सारा इलाका खाली हो गया। सोना ने बायें हाथ से ढेला मारा ट्यूबलाइट को निशाना बनाकर । खवे हिलाकर ढेला गेडे की तरह वैन चपटी नाक पर लगा । आधे अंधेरे मे फिर एक पत्यर दौडा । मोना ने फैलाकर फेंका था। झनझनाहट की एक आवाज़ उठी। पतले शीशे टुकडे अंधेरे की कोख मे सवे के हर तरफ छिटकाकर विसर गये । अन्धन मे दौटते हुए तलुओ में एक छरछराहट की आवाज़ हुई। चबूतरा फाउ-फाडकर देख रहा है। चारो ओर जलेबी की तरह चदार गली वाए बैठी हैं निगलने के लिए। एक-एक करके वे सभी घेरे के अन्दर गये। अंधेरा जाग रहा है। धोती-कमीज़ पहने हुए छह-मात सडमुस्टड a कमूनिस 45 से उतरे। पैसपी पर पमा-4ठकी बदन । फिर भीबान पर भरोसा महो। कामी रिवारो को सांप के फल की तरह निकालकर माय बह रहे है-'भायो मत । भागो मत। मिरमीर रोगी की एमफसरों के चेहरे विकृति म तुमार एकस बन पये है। काम-कामे पर दांतों की तार मार निकम वापी है। फटे बांस-सा पसा पा रहा है "हेड्स मप ! पारों छिटक पर । पनवासी की दुकान का टट्टर मट-से गिर गया। हामी रास्ते का सीना पीर रहे है पुमित के यूट। लोपर पीप-पीछे सी. भार• पी वामे गुरु मेकर तीनों पसिया के मुंह रोकार तो हो गये। गिचित्र-सा सन्नाटा। उसके बाद ही भमरा की बाबार । हपिण की धाम्न। पौराहे का मोड़ रपत्र म बरमन की प्रतीमा मकातर। वाम्मांक करके खोपर मोम गती म पुम पानि म माइट युमा दी है। बमा हुमा धरा। न का बिन पा रहने के कारप गान कमी मापार हो रही है। सीने म दबी हुई बाबार। बसेबी की तरह पदार गमी मीतर म एक मापार पर मनाकर उठ ही 'होपर । कोर्ष मास स्टाफ पदार्टर्स के भीतर से हो अपना #र मार पात ममाये विकस भाषा। उनकी धूपसी छायाएं घमा उठी । छाया का निशाना बनाकर मोपर मोर साटफेरिवार ममाम उगमी। माओ का सिम परपरावे हुए कांप उठा। साप-ही-साप पूलो र हाफ मपाकर हाप का मान फेंकरिया । धमाके के साप हा मे मान सारी की पूरीर । भावे की तरह फैने दमिपार मौर रैमब पार्टर्स के भीतर म रोके मंदी-साधी मोम पटरी पर पर पये । मोपर तोप कदम-करम पीछ हटने ममे । पचास-साठ पर की पूरी पर दो स-सोपर पुमिम, सी. भार पी.बोर परी पर हाथों में पत्थर मिय गोरा का रन। मोरा मलाई पाना पाहता है। मगर पोचरों ने पास गम दी है। पारों भार सपरा है। बम रहवा तो पाभण भर में रास्ता निकास मेता। पारा मरर पाई 'सामे कोपमोचकर रास्ता पमा रहे है। साता मनमाने 1 बम बनानेपाममामा।

46 कमूनिस " मे हथियार की कमी भूल गया है। बूडो के दल के पास भी कुछ नहीं है। उधर मे आग उगलती हुई गोलियां इधर-उधर दौड रही हैं । लाइन के पीछे का हिस्सा घिराव मे नही आ सका। एक बार गली पकडने पर सीधे ह्य ज रोड पर निकला जा सकता है। वस ज़रा वक्त चाहिए। वरना पीठ छेदकर फोडी भी जा सकती है। सोना वायें हाथ से जादू खेल रहा है। सी० भार० पी० और खोबरो के दल अधाधुध गोलियां चला रहे हैं। सोना को निशाना लगाने का मौका नहीं दे रहे हैं। पांच मिनट उन्हे रोक सकने पर ही वे भाग सकते हैं। किसी भी तरह मौका नहीं मिल रहा है। पांच हाथ सामने गिरकर गोलियाँ इघर-उधर छिटक रही हैं और फटाश-फटाश की आवाज़ के साथ जमीन पर गिर रही हैं। गड्ढे बनाती हुई। दो कदम आगे बढ़ने के लिए बदूक लेकर झुक रहे हैं, अपने को ममाल नही पा रहे है । और लाइन के पत्थर तीरो की तरह दौड रहे है, सांय-सांय आवाज़ करते हुए। गोरा की छोटी-सी निहत्थी फ़ौज सभाल नही पा रही है । लगातार पसीना चू रहा है । हाथो से टपक रहा है। हवा भी गर्म हो उठी है। वसत की हवा । जाल की तरह मौत का फदा धीरे-धीरे उन पर घिरता आ रहा है। दांतो को भीचकर गोरा ने अपना होठ काट लिया, "दोनो ओर मरको।" दूसरी तरफ सोचर लोग भी लाइन पर चढ रहे है। लाइन से वे लोग मांप की तरह लिपटे हुए है। इस बीच पांच-छह लोग वूडो के साथ शिवतल्ले से खिसक गये हैं। सिर्फ सोना का वायां हाथ नल रहा है । गोरा लाइन के किनारे झाडियो के भीतर मन्टू को लेकर औंधा गिरा। खोचरो को नज़र नहीं आया । वे लोग चुपचाप पड़े हुए हैं। सोना को घेर लिया गया है । मन्टू चिल्लाने जा रहा था, गोरा ने मुंह पर हाथ रख दिया। वे लोग हांफ रहे थे। धुकपुकी चल रही थी। काला, तेल चुपडा, चेचक के दागो से भरा खोचर का मुंह थरथर कांप रहा है । फटे वांस जैसे गले से निकलती आवाज तक कांप रही है, "अभी तक जिन्दा है क्या सोना को दोनो हाथो से खोचरो ने जकड लिया है। वह कांप रहा है। सोना अगल-बगल ताक रहा था। उसका हाथ शायद नीचे वा गया था। ?"

कमूनिम 47
साप ही साप रिवाल्वर की ठगी नमी पाम की नस पर मा मपी । सोना
न हाप उपर उठाये।बह ताक में है। पत्र के गोमुमा दागों मरे
बहरे बामे पोपर के मुंह स गती पामियों का फन बिखर रहा है। इसके
बाद ही मोना या माना शुरू किया। गाते-नाते सोना नी बागों मे
मुकर म माने गया एक वार पेव सेमा पाहा । मारियों के भीतर स सोना
को योनी पनि गारा को बड़ी-बड़ी मगी। बड़ी-बड़ी यो मनि । पचानक
पाने से सोना की दो मा मौरपदी हो गयी।
"कोई चारा नहीं है।
'साना।
सोना का मानॊ भरा सिर पर तक बोझल म हो गया मोरा एकटक
रघर रेसता रहा । पापब मातोपाड़ी तक पहुंचने से पहम ही एक मटका
मारकर सोना ममी के रास्ते की तरफ मुरबाये । परदस्ती सोचने की
कोपित की, 'सीना को मे नही पा सकया किसी भी तरह नही।
मौर चौराहे के मोड़ पर मात ही राइफल का कुबा साना के सिर पर
बा गिरा। पाप ही वारकोस की पाक पर होंठ सट गये। हरीर रीमा
हो पा । सपा पर एक क्षनिक माल रेडा रिबन की तरह जुम
बयी।
'सामा हरिपार कहा है। पियार?
'पता नहीं।
'इपियार का नहीं पता?
मा।
-
'महो पण।
यूट की पोट से सोना होठ कुपम गये।
"स्टर?
मसर का फूला हुमा गरम गुस्से से भरपर नप रहा है । रस-बाप
जोपरों को मोर पंदूर के कदों ने सोना की वोनो जाँचों में पाया

48 कमूनिम । . अधकार फैला दिया । वह और सिर नहीं उठा पा रहा है। बडे-बडे वालो वाला सिर भारी हो गया है, शरीर मे कोई जान नहीं। होठ भी वेजान होते जा रहे है-न-न-न-न-ना । धीरे-धीरे खोचरो के चेहरे बहुत लम्वे- लम्बे हो आये, हांडियों की तरह । उसके बाद अपने आप आंखें बद होने लगी थी। और ठीक तभी मोना को गाल के नीचे ठडा-सा स्पर्श मिला। नली को गाल के नीचे को नरम गद्दीदार जगह टिकाकर उन्होने फायर किया। आँखो की पुतलियों मे दर्द की एक सूक्ष्म रेखा जगाकर सोना ने आखिरी बार होठ हिलाया, 'न-न-ना ।' फिर आंखें ही नही रही। सब-कुछ पत्थर हो गया है। खून के परनाले टेढे-मेडे होकर गरदन पर से बहने लगे, पशमीने की तरह मुलायम वालो के सिरे से । अफसर का झूला हुआ होठ किलविला उठा, "जल्दी, एकदम । वक्त वरवाद मत करो।" खून के बाद वे लोग आतकित हो उठे। जल्दी-जल्दी सब-कुछ झटपट पूरा किया जाने लगा। सोना के बेजान शरीर को उठाकर वैन के पेट मे डाल दिया । सी० आर० पी० का गिरोह झट से वैन में चढने लगा। दरवाजा खीचने की आवाज हुई । वैन ने धुएं का गुवार उगल दिया। इजन की आवाज़ रात के सन्नाटे को तोड, धरती पर वर का डक मारते हुए सामने की वस्ती को निशाना बनाकर दोडने लगी। मोड के लैम्पपोस्ट के नीचे अधकार गला दावे हुए है । वारूद की वू उस समय भी नाक के सिरे को जला रही है और वैन का धुआं दायरे बना रहा है। धुएं की गाढी मलाई फट गयी है, धुनी हुई रुई की तरह विखर रही है । अत मे धुआं धागे की लच्छी की तरह बिखर रहा है। तभी गोरा, मन्टू और बूडो खम्बे के नीचे आ खडे हुए। अंधेरे में उनके शरीर नज़र नहीं मा रहे । मन्टू के कन्धे पर साइडबैग। खम्बे के नीचे धीरे से उसने वैग रखा। और तभी उसके पांव के पास खून चिपचिपा उठा । अंधेरे मे लाल रंग नज़र नहीं आया । वे तीनो झुक गये हैं, खून के थक्के को घेरकर । फलस्वरूप वे उस गड्ढे को देख पाये। गोली का दाग पहचानने मे आजकल उन्हें जरा भी तकलीफ नही होती। तकलीफ़ होती है सीना लेकर, सीने का असहनीय दर्द देकर ।

मुख 9
तीन गोही पार मानों धरती पर पड़े हुए हैं। पुन मग
पान नीनी हिन्द की छोरी मोद पड़ी है। मीन ना
मासी सीने में बाकी रपम-युपम पर क्या मार न माग
ममा पटें बम कौतए खापर यम जानन TFTE:
मायबा।"
सामे समनी में धीरे से साहार गरि रे
परमहीं गाना कह रहा हूँ किमी भी तए महीं गाईमा
मोगुष मोरान घर में गत मी । मंत्रमुग्ध पोरोमो
बनत नदेना मेरा उन्हें धीरे-धीरे निपम रहा है।
मामा धरा पोड़ी देर बाद ही मौना होगा और
उपमुगमनाक सीन का यन मेहर धीरे-धीरे रसी।
"कम निपाहाहा बन्द।"
सोमा दाहिना हाप मुदगे के माप मारमा
परेकामी ठरए मुनमियों में नियमाम सपा सर
परम हा तमा मार मय रामी बईम में दो
माह में गिरी ITTEम सम्ली पनि
मुंह पापै पुरानी पार गुना Ary
बाक परनाग माना ने LIRIT
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50 कमूनिस जानते हैं । लोकनाथ गार्डन लेन के किराये के कबूतरखाने के ताले में एक पतली चाभी लगाकर गोरा हाथ घुमायेगा । उसके बाद रग, काग्रज, 'देशवती' पतली-पतली किता।--इन सबको ढकेलकर तीनो शरीर टूटी चौकी पर, सीनातोड आर्तनाद के बीच चूर होकर गिर पड़ेंगे। चाय के कुल्हड पर सिगरेट की राख गिरेगी । मन्टू शायद कागज़ पर कूची से 'कामरेड सोना' लिखकर कई वार काट-पीट करेगा। उसके बाद सट से उठ खडा होगा । तव सुबह होगी। साइडबैग को सूलने के लिए एक काबिल कधा मिलेगा और वंग के भीतर एक प्रतिज्ञा कठोर हो जायेगी, वूडो या सुकु की उंगलियो के स्पर्श की उत्कठा मे। 'कल' के भविष्य ने ही मन्टू को रोके रखा है। वूडो ने हाथ खीच लिया है, इजन के पिस्टन की तरह । ठीक ऐसे समय, जब उनके कानो मे एक ओर पर्वत के गिरने की आवाज़ उभरी है और उन्हें एक जबरदस्त शपथ का झडा खडा करने की जरूरत है। बहुत ही जरूरी है। फिर भी उस शपथ के खोल मे जो उत्तेजना घुस गयी है, उसमे गोरा का कोई हाथ नही है । कल उनके सामने पुराने हमलावरो को लाना चाहिए । यूं गोरा को पता है कि यह वडी वात नही । गोरा चाहता है, कल तमाम वेलियाहाट्टा शोक मे सीना पीटे। समझे उनके वीर योद्धा को, युद्ध के अर्थ को। पूछे, घेर लें और उनकी पूछताछ की बच्यिो से सारे शरीर विध जायें। गोवरपट्टी के पास आकर गोरा ने जेब से चाभी निकाली। "तुम लोग चलो, में ज़रा वाद मे आऊंगा ।” मन्टू और वूडो की आंखो मे विचित्र उद्वेग, "क्यो?" "सोना के घर जाऊँगा।" वे दोनो किसी कुशल मूर्तिकार की छेनी से घडी मूर्तियो की तरह क्षण-भर के लिए स्तब्ध खडे रह गये । .

अज्ञातमास परिनामे की बदबू मौर हसीकम की चिमनी का घुमा हरियों का पूरा, गुम बेनियाहाट्टा के घरे को मारा कर रहे थे। एक प्राणी की ताया मृत्यु के लोक में वो बेतियाहाहा को रात। सत्तर का देनियाहाट्टा मारकी सीने में मिय मौत की पुतनी में मावून गडापे पड़ा है। बिग पार करम के बार फुसफुसाहर दो चार गात हुई दी। उसके बाप रेपट से पामबहो पमे। बीतमावस्मा के माम पमस्तर बामे मोग बीबगल से पोरा में फिर यस का रास्ता पकड़ा है। अब मकेसा है। विराकुम मरेमा । और ममे रहने से ही बो राक्षसी सूनापन मोराको निगलने मपता है उसका बड़ा पेट अब रस भरा हुआ है। बतन मोर पर्द सीने की हरियों के गिरको ठमकर कसे एक ताकत को बामरे हा है। सीने के भीतर मगीब-सी एक ताकत पैदा हो रही है मोर दोनों हापोंस मेंपरा चीरकर मोरा पमा गाहा है। बम गाई मार रहा है बामने का कापैिमाना नहीं है। यह रहकर एक मावार बाग रही है- हुन्-इन-हम् । और सास बाम : भमरे की तरह पम रही है से वह कापी बाम नियम रहा हो मंमार । होंठ नही हिमते । वीम नहीं हिमती। एकविरादिल माक का नाम मन में नाचता है। मोरा बड़गड़ा हा पा सोमा सो ना । मोना नही है। नहीं है। यह बात पोरा स बेहतर और किस पता है ? कट पहले तक विस महक में इंसान की ममाई के मिए अपना मरीर 52 कमूनिस खैरात किया, जो लाइन से पत्थर उठाकर हाथ मे लिये आसमान फाडकर हंसा था, उसे पीट-पीटकर, कुचल-कुचलकर खत्म किया गया है। गदे पोखर की उपलो से पाथी दीवार और तारकोल के टीन से घिरी वस्ती की बगल से सटकर चलते हुए गोरा वात हजम नही कर पा रहा है । इसान की आंतो मे हाजमे की इतनी ताकत नहीं है। राव की तरह लसदार, देवकूफ, वेहोश नीद इसानी लोथडो पर थपेडे लगाकर उन्हे वेसुध किये हुए है । और अंधेरे की केंचुल तोडकर, गूंगे रास्ते के सीने पर बुडबुडाता हुआ गोरा चला जा रहा है, शोक-सवाद लेकर । वूडो पहले ही कह बैठा था, "काट डालने पर भी नहीं जा सकूँगा। अपना यह जिन्दा चेहरा अव जिन्दगी-भर सोना की मां को नही दिखाऊंगा।" गोरा ने भी जवरदस्ती नहीं की। वाकई सोना की मां को वह कैसे समझायेगा? और गोरा? शोक-सतप्त, गरीबी से मारे जिन्दा इसान से वही भला क्या कहेगा? हाँ, अगर सारा देश फट पडता, लाखो लोग लडते हुए मर जाते, धक्का सभालकर फिर हथियार हाथ में लेकर दौड पडते तो कोई बात नहीं होती। फिर तो वदले की धधकती हुई आग दौडती होती. -आग। वाजू की दीवार जैसे आंत निकाल लेगी। ऐसी ही दीवारो का सिलसिला । और दोनो आंख जल-जलकर खाक हो गयी । दीवार का सीना फाडकर अक्षर उभर आये। आंखे धीरे-धीरे झुलसकर राख होती हैं। लाल और काले रंग के मोटे अक्षर दिन-ब-दिन आग बनते जा रहे हैं। 'आंसुओ को ताकत मे. व-द लो।' जोर आगे बढने की जरूरत नही । सव- कुछ याद आ गया । अच्छा, यह सब कुछ क्या उन्होने जनता के लिए लिखा या? या कि जनता के सीने के टूटे पजर को जोडना होगा ? पता था, नन्टे के बाद और एक । उसके बाद . 1 गोरा के सीने में बात गडकर बैठ नही सकी। ऐसी ही एक बात गोरा ने रामायण में पड़ी है। वही बात, जब सुनीव के साथ राम का साक्षात्कार हुआ था-सीता रावण द्वारा अपहृता-वैदेही को फेंकी हुई निशानियां इधर-उधर विसरी हुई है.--श्री- राम वैदेही के चिह्न देस शोकाकुल । श्रीराम को उत्साहित करने के लिए सुग्रीव ने कहा था 'शोक को शक्ति मे ।' सिर्फ उद्दीप्त करने को लिए।

कमिस 53 परना बाक्या बोकमक्ति में सांतरित होकर काफूर हो जाता है? सायद रामायण या रीवार की बात में यह मही समनाया गया। फिर फिर भी पोराको खोर की बात ही माय मापी। मिषे हुए संत एक वमोद मोक। यह मोर मार मय यह कहा जायपा? मन्टे परपावर पमा मया चपकेगावसोना । पोराके सोने म मौत की स्मिरणमनमबमानोविदगी भर लिपटी रहेगी। मन्टे मार सोना मे पपररास्वी पोरा के शरीर पर अधिकार कर लिया है मौर में उसे सामने की मोर ठेम हे पतो मोरावामागबमा1 भब रात के मंतिम पहर का सीना चीरकर मोरा सोना की मां के पास पा रहा है। पाकर या कहेगा मौर काने के बाद मोना की मां पर पमा भटेपी, यह सब-कुछ पहसाब नही पा रहा है। उसे सिर्फ पता है इस जमे शरीर को किसी तरमीमार सोना की मां के सामन मे गाना पड़ा। उसके बाद पर परम। उसके बाद से गोरा पुराहो परम हो पायेगा । सोना की मां पुस्म में गोरा सिर से बाम नोच गनना चाहे वो भी ससे कोई एतराज नही होमा। असल में गोरा विमोमान से कुछ एमा ही पाह पहा था। एक या मारीरिक प्रताडन---ठीक वैसा ही पैसा पिछले साम मेहकर पट्टी के नारे को पहुंक्त के काम पर हुआ था। पहर उतर माया पा सारे बदन पर । होठो की गोग मकरी होकर नीती पर मपी पी। मां अपनपा ही पी। भने गमो वामा श्रोमा गानाकर मंतर परते हुए बमरिष्टी से मरने को को? मगा रहा पा गगाये रखने के लिए, पपकी भमान के मिए। गहर की अपकी। माके की वह फूल उठी थी। फिर भी दोनों माबों मे मपकिया था रही पी। भापर्मबनक । सपकी। सौना का पर। बनगी टूटी पटी पीमी टीन मा छापन घमा से मरी दीवार मापन में काई। सब मिनाकर एक नीयस्त बसमोर योग बालों वामे और पीपी। बोरबह सामा के घर की दीवार में उप पीपन के नन्ह पौधे की मोर मी सिचापना गा रहा था। मन्टू पूणे भीम-सम ममग-बसन दिशा में हिटक ममे हैं। सारे सिमाहाहा 54 कमूनिस समाचार फैलता जा रहा है। भोर होने से पहले ही सब तरफ समाचार फैल जायेगा "पुलिस के साथ मघर्प मे सोना नामक युवक मारा गया युवक के पास रेडवुक-और रिवाल्वर । और आपत्तिजनक पत्रं..।" अमल में यह तव पहले ने ही कम्पोज किया हुआ रहता है । निर्फ युवक का नाम बदलता है। और सारे वगाल की माएं अपने नभाने, वेकार, विदादिल लडको पा नाम खोजती है छापे के अक्षरो में, लखबार मे, अखबार की खबरो में। गोरा को पता है कि भोर के यसवार की इस निर्भीक, निरपेल, निरीह पक्ति पर आंखें फिराकर वेलियाहाट्टा के चायखानो मे सब गुस्से मे गरजेंगे--सालो ने कत्ल किया है, कत्ल ! और हाज़ रोड से वा की रफ्तार से खवर दौडती हुई रवर फैक्टरी के नाटे अली के चपटे मुंह पर लथपथ होकर बेलाग गुस्से को जन्म देगी--सूमर के बच्चे हरामी लोगो ने सोना को मार डाला ।तपसे की वाढ में लोकनाथ गार्डन लेन ने लाँदे जसो जिस बुढिया को को पर लादकर सोना ने नाम रान्ते पर तिरपाल के नीचे ला विठाया था और जाहा भगाने के लिए आधा कुल्हड चाय उसके मुंह के आगे लगा दी थी, वह अवश्य ही बहुत कातर होगी। पेट मे न पाला तो क्या वेटा नहीं होता? वुढिया को पुत्र-शोक जगेगा । उफन पडेगा । मा० साल की फजीहत के बाद एक सवाद मुंह फाडकर छिपकली की पूंछ जैने कठ के काग को उखाड लायेगा-कौन सोना वही जिमने गले तक पानी मे उड़े होकर भवका उद्धार किया था-वडी-वडी बांखो वाला वही काला छरहरा लडका । बहा हा-हा । बुढिया दतहीन मसूडो और पिचके हुए गाली में से सारी जिंदगी के दुखो को समेट लम्बी सांस छोड़ेगी एक वार । और फिर उसका सिर सीन के ऊपर झुक आवेगा। अचानक गोरा के भीतर अभी-अभी पैदा ताफ़त ने ऍन्न-सी पैदा की, जैसे कान के पास बडबडाकर कोई कह रहा है, 'डटकर मुकाबला करना पडेगा । हटकर । तू पमूनिस है न । डरपोक कहीं का।' यह बात कौन कहता था--तू पनिन है न? जोहो, वूडो कहता था। अकसर कहता था। और सोना जरा-नी चूक होने पर कहता था-डरपोक । और इन तमाम वातो के टुकड़े मिलकर एक बडो वात वन जाते हैं। एक- कमनिस 55 एक बार में पतरनाक वाहत होती है। मावमी भूल नहीं सकता। कभी महीं । जैसे कि पोरा नहीं भूल पा रहा है। बातों के भी हार-पाच निकलते है। बच्छा-खासा विदा मादमी बन पाता है। एकसान । हार-मांस का ईसान। भोर होने से पहमे ही घटना परेया। बैठकर सारी बातचीत पत्म करनी पड़ेगी। तपसे केसरिया सूझके पर पर मीटिंग । मपने-अपने खतरे की दीवार मारकर सब हागिर हमि। मोरा पर फिर एकवहार दिखने का उत्तरदायित्व मा पामा पैसा मम्टे के माम मै एमा था। पासतमा का मन्टे । क्या पा हैषि महा याद मा गया हहीों का भारमबचिदान स्पर्ष नहीं जाता। मम्टे और सोता दोनों एक बसे थे उनमें भारपर्यनमा समानता थी। सोना कोहगारोंपतरों में भी पोराने एसमुन होते नही देखा। बतरा नठाने में उस्ताद । गोबर-पट्टी के पिरावको तोड़कर भागते समय पोरा ने सोना का पति-स्पिर भाष देखा है। चार मामकर बबधर-उपर तेजी से भागने में व्यस्त पे सोना सीमे-सारे बारमीकी तरह धीरे-धीरे समवेदए बोचर की मांगों के सामने से निकसा पा। पामे पया कहा पा गोरा ने 1 ठीक पार नहीं मापा। मसम में उसे मम कापापा बहुत बहादुरी दिसायी पवाब में साफा ईसा पा समय मम पिताकर-पत्त । मभी भी मानो इस रहा है- तमही पो हंसा वा बभी कुछ घंटे पहले। सीने में एक दर्द भरा। बीच-बीच में सीने में दर्द उमरता है । साप-ही-साप मीनू की बात भी याद हो भायो। पवनी पीठ पर एक बोटी मुभाती हुई वैसे गमी के सुनमान में से ही बायेगी, मोरादा प्रोनादा कहाँ है? और बादिर कहाँ पम्प पर माबों की पुतलियों से छमकेगा, पोरादा। तपसे की बांस-गुमटी के पाप्त ए.बी.सियामह से बाती हुई चमती पाही से पतरेगा। मतियों से ही सारे इसाकेको माप देया। मट से। उसकी बातों पर उस समय हाई पावर का परमा नहीं होगा। रास्ते में उसे नहीं पहनता । सुपर परमराती पारपाई पर बरते समय पम्मा मगाएमा। ए.मी.की बात पार बाते ही कही से सोना की बड़ी-बड़ी मां सामने पौरमापी । कम ए.बी.समर समय से बात - 56 कमुनिस । ए० वी० पर गुस्सा आने लगा। वैसे इस गुस्से की व्यर्थता वह नही समझता हो, ऐमी वात नहीं है । सब-कुछ समझ कर भी एक दर्द सालता है, अपने हाथो की उंगलियां काटने को जी चाहता है। मालीपाडे के नीम के पेड की सूखी टहनियों को छूते समय गोरा ने भैंस के पेट की तरह फैले मेघ को देखा। फिर आंधी आयी, देखते-ही- देखते । दुनिया भर की धूल उडाकर, पांचू कुम्हार की जग-लगी टीन को धडधडाते हुए । आसमान काला करके 1 तूफान उठा । तूफान उठा गोरा के दुबले-पतले सीने मे, वदले के भाव से हड्डियां कपाते हुए । 'बदला' शब्द जैसे गोरा के दिमाग के भीतर खोलने लगा। वेलियाहाट्टा के गाढे अंधेरे को फुलायी हुई साइरन की-सी एक आवाज सारे इलाके मे गर-गरी कर रही है । आँखो की पुतलियों पर धूल के थपेडो के तीखे हमले को हाथो से काटते हुए गोरा को ए० वी० की बात याद आने लगी। और वह तेजी से चलने लगा। गरम भाप के भभके-से चल रहे हैं अब । ए० वी० के हाई पावर के चश्मे के भीतर से निकल कर आती हुई दोनो आँखें जाग रही हैं । गोरा को पता है कि कल सुवह ए० बी० क्या कहेगा? उसकी नाक के कोने पर पसीना उभर आयेगा। बहुत देर तक बोल नहीं सकेगा। उसके बाद भिचे दांतो से वदले की ख्वाहिश उसकी दोनो आंखो को और जरा बाहर धकेलेगी, वायें गाल के धूप से जले हिस्से में एक विचित्र-सी थिरकन होगी, 'कामरेड, हत्या का बदला चाहिए एक्शन ।' और भी बहुत-सी व्याख्या करेगा। रह-रहकर उँगलियो को चटकाने के अदाज़ मे हिलायेगा । एक्शन की वात अचानक याद आते ही गोरा की आंखो के सामने रथ का पहिया उठाये, पसीने से तर, कर्ण का असीम माहसी चेहरा तैरने लगा। और रक्षा-कवच । जैसे यह कर्ण का रक्षा कवच है। एक्शन | सोना होता तो क्या कहता? वह अवश्य ही पगला जाता। उसके मुंह से वोल नहीं निकलता। फिर ठडा होता धीरे-धीरे सारे इलाके के इसान इकट्ठा होने पर । और ए० बी० हलके-हलके मुस्कराता, 'तुम लोगो को चुनावी पार्टी में जाना चाहिए था।" गोरा और आगे नही सोच पाता। गोरा को अव कुछ भी महसूम नही हो रहा है। नीम के पेड के माथे पर अरके भारी पकी मोर टेख - कमूनिस 57 पोरामार कुछ भी नहीं सोच पा रहा है। बाही रात इंटती हुई साफ हो रही है। साफ हो रही है धीरे धीरे। पंजर ठेलकर बह वेग फिर से पाम रहा है। उफन-तफल कर। यह देय गोरा को सींचते हुए बनाने ममा। पुवमीकम का भोपू बनने से पहमे ही यह दो समाचार पहुंचा देना पड़ेगा। उसके बाद से उसक बार पाका से छुट्टी मिलेगी। मोरा के होठों की रएर के बीच मनखिमी हसी की एक छोटी-सी महर नठी। पोरा पायम की तरह पायड़ाया "पसाप्त।' नारापनपा के भास-पास पने पर पोरा को भरोसा रहता है। सममता है, बानता है वह मावमी । सस पिपास मारमी को देखते ही पाने कैसी हिम्मत गती है। मास्था उपरती है । उस एक पादमी म ही तो पहा रक्तपीर की माहियों को सम्म दिया है। मोरा कहो या मन्द या सोना-विसका भी नाम क्यों न को भी उसे बापमी के हापो तालीम पाये हुए है। प्रारम्भ से ही इस क्षेत्र में होने की बजह से पोरा और पूरी साप-साप रहे हैं। साये की तय। मारमी का साया। पेका साया। भौर विचमा छ मन में भाता है। तीन पायों को मेकर मिनती मामी पेट पर रस्सी बांध कर परमार ही हिस्म की मड़ाई कर रही है। बिहार के मोतीहारी पाने पर हुईम कीपर सुनने के लिए मिनती भाभी के कान में पान मनाता है उत्कंग में उम्मीद में। हाँ बरनी कुटी में मुना है इस बार बार मायी है।' मिनती भाभी की पसों पर स्मिग्य छाया।परा मंभीर हो कर मोरा में मुंह मोसा, 'हो बार आ रही है भयंकर मार ।" एक बार नारानरा के हवे मोरा को बहुत द्वारगुष हमा पा । उस दिन मां से भगड़ा करके गोरा उपर बमा माया था। पिताजी उसी दिन रिटायर हुए थे। ए.बी.पत के महो-माते में बिन्दनी के नामीध सास मस्तीसे हरफ़ों में पाककर रे हाप मन रहे थे। सबसे छोटे नाके की परत की बापी बोर की नसें मर गयी है। ग्मटटी.पी.। चार बनों के मुंह में दाना समने का रास्ता विमाम पर हो गया । उस समय विश्वविधालय का ठपा मोरा के पूतों पर वागा-तापामगा पा ठीक वैसे ही पसे पूमरपट्टी मिबह किसे सूमा 58 कमूनिस की जांघ पर गुणा का निशान लगाया जाता है । झगडा अचानक किस बात पर शुरू हुमा था, गोरा को याद नही । खटपट चल ही रही थी, "और कोई तो पार्टीवाजी नहीं करता, पार्टीवाजी करने पर नौकरी नही मिलती।" ऐसी बातो की धुन ने उस दिन अचानक सुर बदला, "तव पार्टी ही करो, मेरी गरदन पर बैठकर खाते हुए शर्म नही आती? यह कौन-सा आदर्श है ? शोपण की बातें बढ कर वकते हो, क्या यह शोपण नही है ?" उसने वात को आगे नही बढाया था। चुपचाप चला आया था। उसके दिमाग को केवल एक वात ताकत दे रही थी सिर्फ, नारानदा की बात, "एक पेट भला कोई समस्या है ? पगला कही का" आगे से घर पर खाना नहीं खायेगा। रात को नारानदा के घर पर ही खा लिया करेगा। घर से निकलते समय मिनती भाभी ने किश्तो मे कहा था, "मझली की दवादारू किये बगैर चल नही पा रहा है । लगातार छह दिन से वुखार चल रहा है । घटने का नाम नहीं। वदन से आग छूट रही है, बकझक रही है, दवा न मिलने पर ।" दिन-भर गोरा नारानदा के साथ रहा। लौटते समय मोतीझील वस्ती के पीछे युनाइटिड मिल के हसन भैया के साथ मुलाकात । व्यास ब्रिज की सीढियो पर ही बैठ गये । हसन भया ने खैनी मल और फूंककर नारानदा की हथेली पर रखी। होठो को खोल लेनी मसूडे के नीचे ठेलकर नारानदा नेशका "असल में मालिकलो- - "शोर दान me मारवही भादमी या इसन के साथ होता है तो विमम ममम । गोरा को बीच-बीच में अमन होती पी। कैसी विचित्र मसन ? 'तुम मुप्त पर विश्वास नहीं करते !" 'मिसने कहा?" फिर सुनो मेरी मां कहती पी--मरती हमारी उराती है राज उस मारी की बनती है साथ हम सोर्पोपीबहीरमा है।" हसन भैया के उमरगामी दंव-पक्ति में सोमे का बिम्दी की वय म माने क्या चमक चठा । सीन के पिंजरे में हसी की मार पातकर छह साम तक मवावार प्रेम करने के बाद बदमाक दिन विस महकीको पर मामा पा वीर बराम के कमरे मामी भाभी के कहने पर उसके माथे पर सिनूर ममा दिया था मारामबा को चपी के मुख पेट की बात या नहीं रहती बीमार महकी की बाव याव नही गठी। और यह सम याद न रख पाने का वर्ष कितना पहरा है, इथे गारा मच्छी तरह मानता है । सस्त मादमी । मह मौर एक तहकी। मपोपित पुर। नाराना के मुंह से ही सुना है 'साउप मेषाटा उस समय पार्टी की सबसे कमरोर बगह पी। पार्टीका उस समय बेटपारा नहीं हुमा पा सिंगल पार्टी दी। ज्योति बापू तो हात में रिस्टरी पास करके मोटे हैं। भोमावा उसबमाने का वादमी है । कहा गाये तो हमे मपम हायों बनाया मा नमोने । पर-बार नहीं है कहां से रहते हुए माये पे किसी को पता नहीं। मुंह से खून -एक कर रखा पटरी में फूट पाड़े पे भूनों रहकर बदन पर पुल्म महकर सीना छानी हो पया। अंत में पेविक हो ममी। स्टोरी हिसाकर मान कपडा विछाकर गाना माकर भी निमाया नहीं जा सका। यह पीचिों का रेत है समासे गोग। इस तरह के कितन है? कितने ?" भार की नमाई मनन है। नवराबा । मन्टे मौर सोना । पाँचों के सामने पिछा दिया मया उन्हें । समी परमान मेकर माम में है। कौन बड़ा है मोरा समझ नहीं पाता । मैम्पपोस्ट के मीचे बरे की फेम तागा मर्म पून को देखन के बाप समोरा संभम मही पा पा है। । .

bU मानस , सनी वक्त ही पेटी चार्ज करके कुन्क्षेत्र बनाना चाह रहा था। जायद युद्ध नहीं होता, और होने पर एक कच्चे धाव का दर्द ही उगला गया होता। लेकिन उगलकर मीना तो हलका होता। यहीं से ही रेल लाइन की बगल से मटा हुला जहरीला साड उत्तकी बांव की पुतली मे उभर आया । वह क्यों मन्टू के पंज खीचकर छिप रहा था? जाने की बात तो गोरा की ही है । उसी ने तो उन्हे रास्ता बताया घा। गोरा ने सोना कम-से-कम पांच साल छोटा था। और गोरादा पर कितनी लान्याधी उसकी गोरा ने भी तो उसे माय पकड-पकडकर कम नहीं चलाया। सारे नमाज की खाल उधेडकर सब कुछ पहबनवाया था, "यह देख, देख फैने मुंह से खून चूकते हुए आदमी जीता है क्यो क्यो ?" और मोना नान के उन वडे-से लडके की आंख में और भी जानने की राक्षनी भूव जगती है। तपना है वह । लड़के ने पागलो पी तरह हाघ लगाया। पोन्टर लिखना सीखा। शुरू-शुरू मे हाथ की लकीरें अच्छी नहीं खिचती थी । उलझ-उलझ जाती थी। धीरे-धीरे एक घसीटमें लिखना नोखा । मन्टू ने ही धैर्य के साय उसे सिखाया था। हाथ पकड- पकडकर। मामूली दात के लिए सोना ने पोस्टर बहुत ही कम लिखे हैं। अक्षर-दर-अक्षर सजाकर वह इमान के मन मे झटका देना चाहता था। वातो को जड देना चाहता था । पोस्टर नही, जैसे कविता। पोस्टर लिखने को बैठते ही वह कविता कर डालता था । ऐसी वहन-सी बातें लिव डालता था, जो कविता बन जाती थी । पहबानने ना कोई रास्ता नहीं रहता था। और पोस्टर से जिन लडने ने शुभ कपाल की रगो में एक छेद बनवाकर उसने विधाम किया । अनन्त विधाम! पुतलीकल बायें हाथ छोड, कच्चे नाले को लांघकर तेइन नम्बर की वस्ती। यहां बस यही एक उनझन है । वन्ती की कोई इज्जत-आवरूनही है। टीन के छाजनों और चार दीवारो से दन न्वृतन्मानों की पी बन्नी । फलस्वरूप गिनती से बाहर चली गयी वन्ती। तत्र नम्बर लगाये । -- तुरन्त अभियान किया था, देनी धन। -- । यम है। पंछी की चोंच की उप मुंह मुसा पाते ही मम हा सौ करके गोल नठी। मामीपाड़ा की पूरी स्मित पर मार काट ऐ मेष इस मोर बभी भी यो होकर टूटे नही है यह सच है। मगर पुतमीम के इर्दगिर्द एक मजीव रमपोटू बाताबरण बिर रहा है। पाप-दर-पार धीरे पीर । और मैस की तरह मेष को मय सीप उग रहा है । मरसा नहीं। विमान एक मैस । सीम या करके मासमान, सीने को निशाना बनाकर रहा है । फागसन + लिए बासमान का सीना । इसने दिनों में भासमान का भी मामा समय मा गया है। और स्तिना कितना समय | बमा हुमा सीना पुस की भाप के समते-चमते मासमान मा परम होने के करीब है। पुतसीकम की सफेत्री हमा में गाते हुए हमा मपट्ट मार रही है। पुसीकमपी भासमान छूती बिमनी साप की तय मम वाता धुनो उमस रही है मौर सारा माझा कर मोतियाविष पिर रहा है। सोमा के पर करनाल को धक्का देते हए गोरा पसीन से तर-ब-तर हो या पा। मोर गयी राव के ठोपन स मी मरमी छंट नही ही है। भीतर की बाम । माप की गरमी । रात के सम्नाटे को पूर पूर करती हुई रवाने पर धक्के की मापस नाम उठी। पोरा और देर नहीं कर पा रहा है। बदन में कोई दम नही है। सुन्न । मौर परबाग बोमने में उतनी ही देर हो रही है। भीतर से कोई बापार नहीं । मैपपोस्ट के नवदीक से मोमी से तेइस नम्बर की बम्ठी के इसी मकान का सीना फारकर मी पपी है। दरवारे का प्रका महे की वह पा रहा है। मंत में सांसी रेप कफ की बरसराहट भरे ममे की मावार मामी। "मा रही हूँ ।" पट से एक मावार हुई। परवारा पूरी तरह नुम गया। सोना की मौका पतीसी की तरह पपटा मह पस्न मी दरार स मनिद्रा की जमन मरी औरों सहित दीख पड़ी। पानी की तरह निराकार पहरा । उत्कंठा का माममात्र नहीं है। मोर थी रात में गाराको रेस परा भी भर मही हुए। वायर फी क्या बात है? इस सबको । मादी हो सपी 04 फामूलित है । आधी रात को खिडकी और दरवाजा खटखटाता है, "माँ ओ माँ" और चुपचाप उठकर दरवाजा खोल देना पडता है। शायद आंचल धरती पर ही लोटता रहता है। उठा लेने तक की फुरसत नहीं होती। रात-विरात नही है उनकी। इन लडको के लिए रात और दिन मे कोई फर्क नही है। जब-तव धमाके की तरह हाजिर होते हैं। जैसे धरती चीरकर प्रकट होते । जरा कुछ मुंह मे डालते हैं, झटपट नहा लेते हैं। किताब तलाशते हैं, "मेरी उस पतली-सी किताव क्या हुआ ?" कभी-कभी आते ही कातर हो जाते हैं, "मोसी, जो कुछ भी हो थोडा-सा दीजिये । उफ ! दिन-भर पेट मे दाना नहीं पडा।" और कभी-कभी मुंह मे कुछ भी नहीं डालता । एक पल भी खडा नही होता। कोई वात कहकर धूमकेतु की तरह गायब हो जाता है । गाय व । मोर दरवाजे पर बूटो को चोटें पडती रहती है। सगीनो की नोके मकान को चारो ओर से घेर लेती हैं। हंडिया-पतीला तोडते हुए गाली-गलौज चलता रहता है । और सोना की सत्तर साल की विधवा वुआ गले की बत्तीस शिराएँ जोक की तरह फुलाती है "खजहा कुत्तो का गिरोह माया है। यम को क्या आंन्द नहीं है . इन लोगो को मीत क्यो नही आती ?" आस-पास, अगल-बग़ल, दसो दिशा में होशियारी फैलती। होशियार। झपट्टा मारा है। होशियार। नज़र तेज । लडके खिसक जाते । बहाना बनाकर चुपचाप पडे रहते । खतरा जिस तरह घात लगाकर माता है, जाते समय इतना छुपा नही रहता । जाते समय उडिया ठाकुर के चूतडो पर नाल-लगे बूट वाली लात पडती, "सूअर का बच्चा | खबर नही दे सकता--कव सव आते-जाते हैं-साला दूकान तोड दूंगा ।" उसके बाद डर से और नहीं ठहरते थे । जान का डर किसे नहीं ? पुलिस है तो क्या जान नहीं है ? खोचर है तो क्या उमे डर नहीं है ? जल्दी-जल्दी हमला खत्म करके धुना उगलते हुए लौट जाते थे । जाते समय पापा को चावल चेचने वालो को ज़बरदस्ती उठा लेते थे। और जिस ओर दीवार पर लिखावट कम है, उसी पामर बाजार के चौडे रास्ते से लौटते थे। वरना आसमान से पुष्पवृष्टि की तरह अचानक दस-दस वाज़ ने एक दिन है कमनिस 63 सेर के चार गिर सकते हैं। फिर वो वापस मावमर्भ में मोट बाना पड़ता। सतरा टम जाने पर धीर-धीरे मछी तरह इधर-उधर देखकर निकस मात पे । इस तरह की सवेश का सामना करने और न पाफ बनाकर निकम मानेको मेकर हपता मर मरेगर किस्सा पमता वा। उस समय कैसा रोमापकमा सब-कुछ ! हार्यों के रोम बड़े हो जाते थे। एक सनसमाइट ने नगदी पी । बेरोक दौड़। पाप कटने से तेभी से खून निकल पा है। एक बार बोरे गाने पर मग्दू का पार कटार सफेद मांस निमम माया मा।बान हाप में मेकर दौर रहे पे सब। पीछे सौ सामोचियां छूट रही है । बामपाड़े में हो के घर में सब घट से घुस गये। पुगेकी मोस्ने बैंगनी साड़ी का पस्मा पारकर मरती से बांध दिया। पुमो की भोर की साड़ी बहुत प्यारी और साबुत पी । पोड़ी देर बाप बन गिरना बहुमा । पूटो के भर यामाया मय पर बैठकर ममके मोबाची सईबीर सपना ! स्वप्न । होंठों से धुएं के छम्मे बनात हए मन्दू रोहा रहा था कान्ति सफल होने के बाद मैरान मे एक पि-सा-म समारोह होमा। सारा मुस्त उगारकर सोम मायेपे । ईसानों कादेमम । जयम। पौर चून की दूगरों-सा सुर्व मंग पर्व से पधी से पत्पत करके उड़पा । उफ बह रिन । और सोना या उठता पा । जब तब या पाना उसके होठों पर मधुमाथी की तरह माराने ममता पा 'मुमत होपी प्रिय मातृभूमि" धीरे धीरे उस रस से सिंचने भूरे इंसानों की हदिग्या म से पसन निपोरने मान से यह अपने को रोक मही पा रहा है। अब तो ये एक एक मुहस्से के पसे में काटी के तार ममे में मपेट-मपेटकर फरासमवेत है। पंसपोस्ट के मीचे बगान न की गर्म बाइ।बमी मोर है। गुस्सा और ममम । सोना की मृत्यु का समाचार मिये मोरा मुन्न-सा रहा है। दरवार एक पाने की दरार में से सोना की मां का रक्तहीन कापब-सा पहरा मक रहा है। मोरा की गुजान से कोई बात नहीं निकामठी । मौर बस एक तूफानी रात का मठ होना ही नही पाहवा । साना की युबा को वह 64 कमूनिस गठिया हो गया है । रस भर रहा है। हिल-डुल नहीं सकता । फिर भी इसान का हृपिंड धुकधुकाता है । इसान जिन्दा रहता है। जिन्दा रहने की असह्य टक-टक ध्वनि अभी भी गोरा के कान मे वज रही है। सोना को मां गोरा की ओर देख विचित्र ढग से हंसी । हँसी के साथ-साथ रत्ती-भर विस्मय, "क्या बात है रे? इस समय आया है ? वह हरामजादा कहाँ है ?" - सोना की मां का चेहरा अव साफ दीख रहा है । सारे चेहरे पर जरा मास नहीं है । गाल धंसने से गड्ढे उभर आये हैं। पुतलीकल की तारकोल की छोटे-मोटे अंधेरे गड्ढो से पटी सडक के गड्ढो की तरह । जवकि एक ज़माने मे यह चेहरा भरा-पूरा था। और अव आँख के नीचे पिसे चदन की तरह के दाग । उम्र के दाग़ । अभाव के चिह्न । सोना की मां गोरा के गूंगे चेहरे की ओर देखते हुए वेचैन हो उठी थी। मन के इनारे-किनारे तरह-तरह के शक फन निकाल लेते हैं। फुफकार उठते हैं। दरवाजे के पल्ले को झट से पूरी तरह खोलते हुए सोना की मां ने कहा, "कल एक वार आया था, कहा जरा मुंह मे कुछ डाल ले-~~~इतने दिनो के वाद आया है। जरा कुछ मुंह मे न डालने पर मन वश मे नहीं रहता। मेरी वात नुनता रहा । इतनी बढी थाली लगा दी थी, लडके के लिए। कहा और सारी आशाएँ तो मेरी पूरी कर दी हैं तूने, अव इन्हे निगल कर मेरा उद्धार कर (रुककर सांस ली) । घर की हालत तो तुझे सब पता है। क्या छिपाऊँ, घर मे दाना तक नहीं था । शिबू की दूकान से उधार मे थोडा चावल और आलू लायी । सोचा, जरा उबाल दूं। इधर-उधर फिरता रहता है। खाता है या नहीं खाता, कौन देखता है ? और दिनो- दिन चेहरा कैसा बनता जा रहा है | वालो मे एक बूंद तेल तक नही पडती। खैर मुंह मे भात का कौर तो डाल ले । तभी कही से एक लड़का आकर कान में जाने क्या फुसफुसाया कि बस । भात की थाली जैसी की तैसी पड़ी रह गयी। दीवार लांघकर पलक झपते ही हवा हो गया। उसी ममय से ही सीने पर चावल-सा कुट रहा है। रात को कौर तक गले से नीचे नहीं उतरा । जरा उसे समज्ञाना-बुझाना । मेरी बात तो सुनता ही नहीं। ऐम जिवन दिन रे।र री रेट पार मोगा। बिसी में पोराकी बीमरम्म पेसर दी है। में से बातों का मुर छूटन के मिरrtमर रहा है। के मदर बार्ने देवी से उबम रही है। मर मटा की ना मनन बरामपाकर कोटा हुईगारही।मान की मनरप मामा म कमास्नि मौका दिस दुको-को कर दिया पाहमा है पोरा' इस तरह मा देश रहा है? ए मोरा माना काप पारामा पर्गे नहीं है। योरा ।" पौर सीने क भीवर मचानक पाहोन बानी उस मारपर्यजनक साइत ने मोरा क पंचर कोषले हुए उमम बसे उपतमा दिया 'सोना । तूफान का मामास व हुए मारे पूर्वावास को कासा करके भैस की यो मेष सीप हिता रहा पा इतनी देर में वह सोना के परके सरे मम ररबारे के पत्ते पर बहीनोवा कप में टपकन मगा। पटोम भोप करता हुबा पस्ता गुमने-बद हान लगा रमा पाते हुए। मेहोश-स पोराकोठहित येमामौर सोना की मां का पता घरीर से हमा के एकममा समागिर मापन में गिर पड़ा। फिर सीना-तोड़ मार्तनार। फिर कराने नमी। सोनाको पर्भ में धारण कर जीवन रस की द-से एपकर, पग्म रेकर मार सोना की मां होठों में रखी मंत्रमा मटेडी होकर घनुप बन गयी पी वोर उसकी परवन की नसें असहनीय पर्व से कमाम की टोरी की तरह हिप मपी पी मोर उसक महके कोनों से झाग निकम रहा पा। फिर वही पर सौ युना होफर नोट रहा है। "एक कोर माव भी नही जाया रे " उसके बार इस नम्बर की पूरी बस्ती का पीमा पारकर स्माईका रेखा ना । भान कौन लोग कमेगा निचोड़कर पनीमूत स्नेह से सोगा का माम सकर पुकारने ममे। फिर बारिश उतरी। गुरु में हसकी इमकी। धमके बाद बड़ी-बड़ी बूरों के पास में सारे दक्षिण पेमपाटा के गिर पर नगरा धुएं को रोकते हुए । वारिश उतरी सारा वेलेघाटा को ढेंकते हुए, छुरी की नोक की तरह। कच्ची नोंद मे उठकर तेइस नम्बर की पूरी वस्ती एक लूले आतंक को लेकर घडघडाते हुए सोना के घर के आंगन मे कतारवद खडी हो गयी। शोक, दुख और गुस्से मे उनके बदन रह-रहकर कांप रहे थे। किसी की ठुड्डी दीर्घश्वास के साथ सीने पर झुक आयी। हड्डियां-उभरे सीने । गोरा को वोध नही है। राक्षसी खालीपन लेकर दोनो आँखें आदमियों की दगल- भीड मे जाने क्या ढूंढती हैं। बारिश के बीच पुतलीकल का सुबह की पारी का भोंपू वजा। कान का परदा फाडने वाला भोपू। भोपू की आवाज से अचानक गोरा को होश आया। आज वैलियाहाट्टा वद । सिर हलका हो रहा था धीरे-धीरे। इतने इसानो के शोक, दुख, गुस्से को जलन से गर्मी खाकर गोरा विचलित हो उठा। अव खभा नोचने का वक्त नही है। अभी कितना काम है। बहुत सारा काम। कुछ बोले विना वह छिटककर निकल गया। सोना की मां के विलाप में अव शब्द नहीं हैं। शब्द गल-गलकर वस अस्पष्ट-सी कराह के रूप में निकल रहे हैं। तारकोल की सड़क पर उतरने से पहले सोना ने बुआ को चबूतरे पर बैठे देखा था। बुढिया ने एक बूंद आंसू तक नहीं गिराया। गले की बत्तीस नसें फुलाकर उसे होशियार नही किया। अब किसे होशियार करेगी? चबूतरे पर निर्जीव पडी है । जाने के लिए उन्मुख गोरा की ओर देख बडबडायो, “कहाँ छोड आया रे उसे, तू कहाँ छोड नाया रे ?" बुआ के गले मे पहले जैसा तीखापन नहीं है। ज़रा ठहराव है। अब विचित्र ढंग से स्थिरता है। गोरा ने दुआ की अस्पष्ट अंधेरी आंखो मे से आग की चिंगारी निकलती देखी । दपदपाती हुई। देखते-देखते उसने चलना शुरू किया। और बोलने के वह आसपास भी नहीं गया। उसे वोनना अच्छा नहीं लग रहा है। क्या बोले,क्या बात करे । बात को धोकर पीयेगा क्या वह ? अभी वात का मतलब है काम। जिंदा रहने का मतलव कमूनिस 67 ही है काम । मोर काम का मतसब है उबम-पुषस । उपम-पुषस । बेतिया हाहा। । पुवतीकम पीपे छोड़कर एक रोर की बोरी तारकोम की सरका बायौं भोर मेहतरपट्टी। मायामा मीन। दोनों तरफ गेमपाड़ा सूमरपट्टी मोर मगर बस्ती उतार-पर-कतार पनी नयी है । तपसे के ये पर सन्नाटा है। उधर पराकम पा। बंगाम पुलिस का इमाका । पहले भागतना हाट भेडी और मेड़ों बार यसों से भरा इमाका पार करके पीपा से मथपष रामबी किस गरे पर परिपे सम। चाटीमा । छावन और तानपत्तों की मोपड़ी। सोना तो पहनी रफा माकर ही तुती से पागल हो उठा पा। उसने रामग्री के साप पोस्ती कर मी पी। उसके बाप-परपावा वापर कमी संबाम परगना में ऐ। उसके बाद माटे के विधाप से छिटककर घर बम माये। बहुत पहले की बात है यह। उस समय पुन भी महीं बना पा रेप भी नहीं मर के। उस समय यई बेसहारा पाभरी रोपहरी में यहाँ चीता बोमता था। हाथों की वाय, हमुर्मों के पोर से संबन काट-काटार मौर बना-बमाकर और गेहेरन सापो का सफाया करके पमीन तैयार की पी। रामगी को मम्मा कहती, हिस्मत का मिमा पमीन पर जमा नही हुमा। सरकारी कागर का सिम्मा दोन मिटापेमा? बपटा मुंह बैठी माक मौरमोटे होंठों की मघामक मारमा जाती है। तभी मोरा कोबी की धार की तरह वेष बांस की पत्तियों मार पारिमों की याद मामे सपी। टिप-टिप बारिश। बम पेट कांटों में बादम फैसा हमापा। मौर बारिप टप टपककर मिर पी पी। रामनी के गरे की नरम मिट्टी बोदकर मारा मूबर गरे में अपना बबन पाये बैठी पी। माके का हरीर नोरा के कंधे पर। पुकारते ही रामगी हारिरहमा । परा धमकाया 'वेस्टर नहीं मिम रहा पावो इसे पामे मान मया बा गावा?" माके का सारा मुंह मुसस पमा था। सपने की कोई उम्मीद नहीं पी। जिस पर पुमिस का इममा। उस बार माका किसी तरह पत्र गया था। मुटने की कमी हट जाने की मग से पापपरा पसीटकर बमता बा। माकेको पेस्टरने में ही रामरी फैस गया। मपर उसने एक भी बात नहीं मिमी। मत में उसे पेस में गस:- 68 कमूनिस । दिया गया। गोरा से जो भी बनता है, उसके डेरे पर हर महीने दस-पद्रह रुपये पहुंचा देता है। एक और इसान है, जिसे नाटा अली 'पक्के रग का आदमी' कहते है। सन् अडतालीस में गरजा था वह। और अव इस सत्तर मे। बीच में बहुत-से झाड-अखाड पैदा हुए। कालिकापुर के परे, बहुत भीतर जाकर गोरा ने डामूकदिहा के चाचा को देखा है। काकद्वीप की अहिल्या की पापाणदेह में जव प्राण जगे थे, उस समय चाचा की वायी आंख पित्त की तरह गल गयी थी। और फिर यह तो गाधी का देश है। गोरा को याद आया कि जब वह नादान था तो कितना व्याकुल होकर, कितनी बार वह 'देश' शब्द का मतलव खोजता फिरा था। 'भारत के उत्तर मे ऊंचा हिमालय पर्वत है।' भूगोल के मास्टर साहब की नसवार से अंटी चपटी नाक अचानक याद हो आयी । मन्टू तो स्कूल-कॉलेज की शिक्षा के ठाठ ज़रा भी बरदाश्त नहीं कर पाया। गोरा को अभी भी कितनी ही बातें याद आती हैं। सोना की वात, रामजी किसक की वात । रामजी और सोना दोनो ही उस देश मे पैदा हुए हैं, जिसके उत्तर मे ऊँचा हिमालय है। हालांकि रामजी अभी दमदम सेंट्रल जेल की साढे तीन हाथ की कोठरी मे दिन गुजार रहे हैं और सोना ने दक्षिण वेलेघाटा के कच्चे नाले के घिराव मे खून बहाया है, जहां वह पैदा हुआ था। इससे आगे वेलेघाटा लोकल कमेटी के साथ-साथ तपसे बानतला होकर मगराहाट तक गांवो का सिलसिला चला गया है, जिसका पुलिस को अच्छी तरह पता हैं। इसीलिए अब सिर्फ वगाल पुलिस नही रही। अव यहाँ भी कलकत्ते की पुलिस आती है। नरम मिट्टी के सीने पर कांटेदार बूट जमकर बैठ जाता है। महुआपाडा के कोचड से सने ढलुआं रास्ते के मोउ पर ही बूढे पीपल की जटाएं उतर आयी हैं। पीपल के नीचे मां शीतला का थान। शीतला- थान की वगल मे कोचह-मरे रास्ते से होते हुए गोरा सुकु की झोपडी मे घुसा। पीछे भेडी-दर-भेडी । फन्टे के ज़माने में कितने दगे हुए थे? अमीर गरीवो मे, गरीव गरीबो मे। गोरा ने एक पलक दिगन्त को छू रहे पानी की ओर देखा। भोर की रोशनी पानी के नीने पर छिटक रही है। और वस रास्ते के किनारे चीनापट्टी से दो-तीन चमडे के चीनी व्यापारी पीली कमूनिस 69 मामा सिये भी मे सूरर को मते देख रहे हैं। ये मोग रोग मार सूरज का उपते रेवत है । स्वास्थ्य के मिए वापर। पोरा ने उपर रेसा ही महीं। भेडी के पानी में सातिमा बियरता हुमा मूरब उम रहा है। धीरे धीरे। गड़ही बार भेडी बोर बीच में महका सीना पीरमर मारिपस के पेह का मुसायम वना साफ़ पीस रहा है। मेरी किनारे से ना मुनी पीन पर मुहमों का पर। पर नहीं कबूतरखाना। बरसात में तीप की पए रखा है। टों पर तत टिकाया पपा है। मामन में पांच एक ही छा-सात बोड़ी हमापिप्पों पर मर पड़ी। बाबा बाम के पमाने की मन्टू की साइकिस एक मोर पड़ी है। कोई बाबार नही है। नापरवाही माहाँ तक कि बाहर कोई स्थाा भी नात नहीं। पुपचाप मेरा पाने पर बचने का कोई रास्ता मही है। पता भी नहीं लगेगा। मसम में परवाह ही दिया। गोरा के पाप की वाहर से मन्टू ने सेंडसी की वराहपुरे दोनों पुटनों के बीच से सिर उठाया। एक मगर समकर फिर सिर पुटों में गम पी.बीसी सुमपाय रखने के लिए तेजी से सुट्टा बीच हा पा। छोटे तापोग पर सब गुरसी बने बैठे हैं। दूर पता मग रहा है कि कोड़ी देर पहम कुछ बातें हुई है। पिछली रात की पटना की रिपोर्ट मष्ट्र या बीस म परूरी है। वही सिमसिमा नभी भी जारी है। चाया पुछ कहते-नहसे मांगों के मागे फिर से पूरा दिन बीवित हो उठने की जगह से किसी की पमान से कोई बात नहीं निकल रही है। ए. बी. पायर सब कुछ बारीकी से सुनकर समय पर न पहुंचने की पग से मन-ही-मन बस रहा है । मोरा पार नाकर बैठ गया। मौर बैठते ही देखा कि मार्ये कोने की टूटी बमह पाती है। सोलापहीवापा दीवार पर पीठ सगाकर । परा बदन कोसा करके । मीटिंग वर्गय में गहरपारा सिरनहीं पाता पा। दोनों गानों को मुंदकर बाम पीवार पर छोड़ देता मा। सबकी पमान बन्द है । बीड़ी का ममता सिरा पम माम बिनुकी वर उभरा हुमा है। ए.बी.नासिरे पर नाम बामा पमक ही है जिसकी बहस नाक मनीय स्थी मोर धारपार लग रही है। पामे के पत्तने डीनों के भीतर से उसकी बड़ी-सी मां बाहर को उमरी .

68 कमूनिस दिया गया। गोरा से जो भी बनता है, उसके डेरे पर हर महीने दस-पद्रह रुपये पहुंचा देता है। एक और इसान है, जिसे नाटा अली 'पक्के रंग का आदमी' कहते है। सन् अडतालीस मे गरजा था वह। और अब इस सत्तर मे। वीच मे बहुत-से पाड-झखाड पैदा हुए। कालिकापुर के परे, बहुत भीतर जाकर गोरा ने डामूकदिहा के चाचा को देखा है। काकद्वीप की अहिल्या की पापाणदेह में जव प्राण जगे थे, उस समय चाचा की वायी आंख पित्त की तरह गल गयी थी। और फिर यह तो गाधी का देश है। गोरा को याद आया कि जब वह नादान था तो कितना व्याकुल होकर, कितनी बार वह 'देश' शब्द का मतलव खोजता फिरा था। भारत के उत्तर मे ऊंचा हिमालय पर्वत है।' भूगोल के मास्टर साहब की नसवार से अँटी चपटी नाक अचानक याद हो आयी । मन्टू तो स्कूल-कॉलेज की शिक्षा के ठाठ जरा भी बरदाश्त नहीं कर पाया। गोरा को अभी भी कितनी ही वातें याद आती हैं। सोना की बात, रामजी किसक की वात । रामजी और सोना दोनो ही उस देश में पैदा हुए हैं, जिसके उत्तर मे ऊँचा हिमालय है। हालाकि रामजी अभी दमदम सेंट्रल जेल की साढे तीन हाथ की कोठरी में दिन गुजार रहे हैं और सोना ने दक्षिण वेलेघाटा के कच्चे नाले के घिराव मे खून बहाया है, जहां वह पैदा हुआ था। इसने मागे वेलेघाटा लोकल कमेटी के साथ-साथ तपसे वानतला होकर मगराहाट तक गांवो का सिलसिला चला गया है, जिसका पुलिस को अच्छी तरह पता हैं। इसीलिए अब सिर्फ बगाल पुलिस नही रही । अव यहाँ भी कलकत्ते की पुलिस आती है । नरम मिट्टी के सीने पर कोटेदार बूट जमकर बैठ जाता है। महुआपाडा के कीचड से सने ढलुओं रास्ते के मोड पर ही बूढे पीपल की जटाएं उतर आयी हैं। पीपल के नीचे मां शीतला का थान। शीतला- थान की वग़ल से कीचह-भरे रास्ते से होते हुए गोरा सुकु की झोपडी मे घुसा। पीछे भेडी-दर-भेडी। फन्टे के ज़माने में कितने दगे हुए थे? अमीर गरीबो मे, गरीब गरीबो में। गोरा ने एक पलक दिगन्त को छू रहे पानी की ओर देखा। भोर की रोशनी पानी के सीने पर छिटक रही है। और वस रास्ते के किनारे चीनापट्टी से दो-तीन चमडे के चीनी व्यापारी पीली - कमूमिम 69 वामा मियेकर मे सूरजको उगवे देख रहे हैं। मोन रोर माकर मुरबको रपते देखते हैं । स्वास्प्प के लिए भापर। गोरा में उपर देखा ही मही । मेड़ी के पानी में मामिमा विसरता हुमा मूरज उप रहा है। धीरे धीरे। गडही और भेडी वीर बीच में मेरा सीमा पीरकर मारियत के पहा मुमायम ठना साफ दीम रहा है। भेी के किमारे घेतमा सुमा पीन पर सुकूमों का पर। पर नहीं कबूतरबाना। बरसात में शीप की पहरता है। ज़े पर पत टिकाया गया है। मांगन में पग रखते ही छा-मात गोडी इमाई पप्पाहों पर मारपी। बाबा मान्म के समाने की मन्दू की साइपिस एक मोर पड़ी है। कोई भावार मही है। मापरवाही पहा तक निगाहर कोई सवाा भी तैनात नहीं । चुपचाप मेरा पाम पर अपने का कोई रास्ता नहीं है। पता भी नही ममेगा। भसम में परवाह ही महीं है। मोरा के पागनी माहट से माष्टू मे सैसी की तरह पुरे दोनों पुटमों के बीच से सिर समया। एक मर कर फिर सिर कुटनों म गम दिया। ए.बी.बीड़ी सुनपाये रखने के मिए ठेवी से सुट्टा बीच रहा मा। छोटे वमपोल पर सब गुरली बने बैठे हैं। सब पता मप रहा है कि पोड़ी देर पहले कुछ माहई है। पिछमी राठ की पटमा की रिपोर्ट मन्टू याबीसम पर दी है। वही सिमसिता मभी भी बारी है। मायब कुछ कहते-कहते भावों के माये फिर से पूरा विम जीवित हो उठने की वजह से किसीकी समान से कोई बाठ मही निकल रही है। ए. बी. मापदसम इछ बारीकी से मुनकर समय पर न पहुँचन की परह से मन-ही-मन गम रहा है। मोरा पनि फैजाकर बैठ पया। बीर ठठे ही देखा कि बायकोने की टूटीपमहकाती है। सोना ही ठाबा वीबार पर पीठ मसार । परा बदन कोरीमा करपे । मीटिंग बौर में यह स्यावा सिरनहीं पाता पा।सानों मांगों को मुंबकर बरन रीवार पर छोड़ देता था। सरको परान बन्द है। पीड़ी का बनता सिरा चमकते नाम लिम्की प्रय भरा हुमा है। ए.बी. माफ के सिरे पर तान मामा चमक रही है जिसकी मगह से माफममीय म्बो बार बारपार कम रही है। पामे * पतले कीड़ों के भीतर स उसकी बड़ी-बड़ी मावे बाहर को सभरी हुई है 70 कमूनिस जैसे फट से एक आवाज़ होगी और आँख की पुतली खून विखेर देगी, "इस हडताल-वडताल से कुछ भी नही होगा।" छोटे-से कबूतरखाने का वरामदा। वरामदे का छाजन । धुआं वेचन हो रहा था। धुएं का ढेर। ए० वी० ने झुककर फर्श पर घिसकर बोडी वुझा दी। वहां काला-सा एक दाग पड़ गया। ऊलजलूल । सारे बदन की जलन लेकर मन्टू ने फटी आवाज़ मे (मन्टू के गले मे दर्दोले गीत बहुत अच्छी तरह उभरते हैं। उसका सोज़ से पुर गला अचानक इस तरह कैसे फट गया?) पूछा, "क्या क्या क्या करना चाहते हो?" मवाल टांगकर मन्टू सीधे ए० वी० की ओर देख रहा है। थोडी देर के लिए चुप्पी । ए० वी० ने फिर एक वीडी जलायी। मीटिंग में बैठने पर ए० वी० लगातार वीडी पीता है। आज उसकी मात्रा और भी बढ गयी है। पार्टी के ऊपरी नेतृत्व के माथ ए० वी० का सीधा सम्पर्क है। पूरे साउथ वेलियाहाट्टा का उत्तरदायित्व, लोकल कमेटी के मत्री की जिम्मेवारी ए० वी० पर है। फलस्वरूप ए० वी० की जुबानी ही पार्टी का निर्देश भायेगा। और एक डांवाडोल हालत मे वे सभी वेचैनी के साथ एक निर्णायक वात सुनने के लिए बैठे हैं जो बात उनको नुकसान से बचाने मे मदद करेगी, सोना के कत्ल का बदला लेने के लिए हिम्मत जुटायेगी, और दक्षिण वेलेघाटा के नगे-भूखे लोगो के दिलो मे घुसने का दुर्गम रास्ता वतलायेगी। वीरू ने दोनो हाथो को मुंह पर फेरा । जाने कसी एक आवाज हुई। रात-भर जागने से आँखो की जोडी जल रही है शायद । तिरछी आँखो से निवारन गोरा को देख रहा था। शीशाकल का निवारन वही पट्टीदार फटी हुई हाफपंट पहने हुए है । अभी थोडे ही दिनो मे वह इस कोर मे आया है । मोना के रहते ही। सोना ने ही कहा था, "निवारनदा को कोर मे लेना चाहिए। एक तो मजदूर हैं, दूसरा वक्त दे रहे हैं।" ए० बी० ने वीडी के जल्दी-जल्दी कश खीचकर उमे निवारन की ओर वढाया । दियासलाई की तीली तन्नपोश पर लकीर खीचते हुए कहने लगा, मोना ही पहला नहीं है। उससे पहले हमने नन्टे को खोया है। शासक वर्ग अपने गुडो का गिरोह लेकर हर जगह हम लोगो पर टूट "कामरेड ।

कमूनिस 71 हा है क्योकि पानते है कि यह एक क्रांतिकारी पार्टी -।" धीरे धीरे यमे में मावेशयागमे ममा।माने का मनममे भाव पामा रवार मिया है। भारी पनर होने मगीपीं। ममर पक्षकों की बोड़ी हमकी-मी दरार रसकर स्थिर हो करी। ए.बी. की गुम्भीर बाबाव भेड़ी के पास पानी को उछाम ही है। चार-पांच पोड़ी कान बधीर प्रतीक्षा में सरे है। मोर बहुत दूर से एक मरा हुदा ममा कपि-काप नठ हा है-एपयन बारमा बना । पब तक मोरापान नहीं होती थी। ए.पी.कीबात पर शरीर का दीमापन टूट गया। कमान वमकर ममे हुए तीर को जैसे किसी न छोड़ दिया । मुहर्मो के रेरेक माने का समम ऐसी ही मालंका में पटा है। बात सुनवे ही गोरा का स्थिर मार टूटकर दुको-को हो गया। उधर ए बी. उस समय भी बोसे पा रहा है इतने दिनों की बरसरवावी मान हो तोड़कर पार्टी ने मारम-सिधान की महान मान को ऊपर उठाया है-कामरेर सोना हमें रास्ता रिसा यये है। नहीं। "यानी 'सेच्छा से मृत्यु 'मरल से इवनागर?" 'वो मरने की होग हो रही है क्या?" मंतिकारी साहस मौर बसिरान । 'हा ठीक है। मपरमा सबकुछ गिरा एने के लिए वो है यहाँ ताकि मरना भी।" ए.मी.की पांचों उँगलिया उसके पराले बाहों में न होकर सेम ही पी। होठों के छोर पर बगहा की सीबीडी सुमगाने तक महसूस ।पोड़ी देर बार ही बातों की पुनियों में तारों के सपनों का नया बमा-पमान पार्टी की नाइम है। महीं मानने पर पार्टी छोड़नी पोमी। तौर प्रतिपिपार से भपर रात मिच पाते। तो महम रास्ता मापना पड़ेगा। दूसरा रास्ता। मारेर तक सलाह-मशविरा तथा बास-मुबाहिसा बनता पार ।

72 कमानस गरमागर्मी भी हुई। फिर दिमागो का पारा नीचे उतरा । एकदम नीचे। दुख की गहराई मे । निवारन और सुकु के हाथ शुरू से ही बदले के लिए कुलबुला रहे थे। गत मे वीरू भी उनके साथ हो गया। सिर्फ मन्टू और वूडो वैलियाहाट्टा वद की जिद पर अड़े रहे। अत में तय हुआ कि हडताल की जो पुकार की गयी हैं, वह वरकरार रहेगी। एक्शन की भी कोशिश चलेगी । सुकु चट से उठ खडा हुआ एक झटके मे। बाहर नजर दौडाकर जायेगा। उसके बाद सब अपने-अपने रास्तो पर खिसक जायेंगे। पहले ए० वी० जायेगा। पागल कुत्ते की तरह वे उसे खोज रहे हैं। पाने पर नोच खायेंगे। उसके बाद गोरा। उसके बाद धीरे-धीरे बाकी सभी जायेंगे। पहला झडा लगा मोड के लम्पपोस्ट के ऊपर। वूडो काले कपडे का टुकडा मुंह मे लेकर सर्र से ऊपर चढ गया। थमे हुए आसमान के नीचे लम्पपोस्ट के माथे पर काला झडा फहरा। नीचे गोरा, मन्टू, नली और विजयदा खडे हैं। बूडो के नीचे उतरते ही उन लोगो ने फिर चलना शुरू किया । वस रास्ते के दोनो ओर की दुकानें वद कराते हुए आगे वढे ! कहीं- कही थोडा बहुत बहस-मुवाहिसा भी हुआ। तभी वूडो सामने आ खडा होता। वूडो की हिम्मत की वात इस इलाके के काने टेंगरा तक को पता है । झट से दुकान का टट्टर गिर गया। झमेला खडा हुआ पुतलीकल के गेट पर । तब तक दिन चढ आया था। सूअरपट्टी से दो पहियो वाला छकडा मूअर का मास लादकर घटांग-घटांग आवाज़ करता हुमा न्यू मार्केट की ओर चला गया। पारी चालू हो रही है। सारे इलाके ने काले वुर्के से अपना चेहरा ढांप लिया। गोरा पुतलीकल के गेट का एक पल्ला पकड कर चमगादड की तरह उस पर झूलने लगा। गेट मीटिंग । बहुत दिनो से वे लोग इस रास्ते से नही आये हैं। शुरू-शुरू मे जुलूस, स्क्वाड, स्ट्रीट कार्नर मीटिंग जैसी बातें लगी ही रहती थी। तव पोस्टर और वालिंग के अलावा कुछ देखने को ही नही मिलता था। गोरा ने आवाज़ लगायी । नारों से वातावरण गर्म हो उठा। जोश भाने लगा। इसके बाद उसने मुंह खोला। सीना-तोड दर्द से भरा बोल निफ्ला, "दुश्मन को याद नहीं है कि यह वेलियाहाट्टा है निमाई सरकार का वेलियाहाट्टा ।" ।

कमूनिस 73 मनामक माम' गिरा। योग के मापे पर मोहे के छह की चोट। पुतसीकस के सिक्योरिटी फोर्स का हवाई फायर ।सो की तरफ भिवतस्से के कनिसी मस्ताम मोम नाठियां सेकर दौड़ रहे है- 'मारो सासे सानगी केसों को | मोर पुनिन । मघामक समाई का मैरान । बकरों की भीड़ के बीच से वे मोम किनारा काटवे हुए मेहवरपट्टी के भीतर पुस पये। मान की मापार से काम के परये फट रहे हैं। हाप-पाव कट-पट ऐ है। मोर जोक का गहरा फासा धिम्ह सारे इमाके को रफर मासमान के नीचे उस समय भी स्पिर है। मासे से घटी हुरिरीकार फोरकर सब मुमरपट्टी के पाप सपे विरो पार्क में बैठकर परा मुस्तामे मगे । मौर इतने में ही सुना कि पोड़ी देर पामे सिमकान के पास एक पुमिस बामा बत्म हुमा है। सूमरपट्टी के पार्क में पाकर उम नोर्गो मे हाथ-पांव छोड़ दिये। मकान-ए-पकान । बदन पर मर कोमा महीं है। बतरे की वेर संघ माक में आकर लग रही है। मौर माया हो सकता है । बोरा मन्टू की मोर देखकर रखी हुई इसी हंसा । पानी पतरे के हाप-पार निकल रहे हैं। मब देसा भाये कि क्या कुछ होता है ! 'मुक मोर्चा का काम है। ममी ने गुस्से स कहा 'ठीक किया है। बमी भीतर मीतर हम नहीं कर पा रहा था। पुततीकल के भागे मान गिरने पर एक कि उसकी ऐड़ी में मा तपा पा। एक बोटी मास उहाहर ने नया है । गोरा की मोबना दी कि शाम को पांच-सात पनों का मकर एक समार निकामेमा। तूफान की तरह। अभी ये मोम दिशा तय नहीं कर पा रहे है । विनमरा बहुत पादा एक्सपोरा नहीं है। हामवास पता लगाने के लिए उन मोर्यों में समाह-मानगिरा कर दिय पाके पर रोके मोड़ पर पहुंचते ही भणगीनी मोरया की तरा रो गारी पुलिस ने पाक में रेर किया । पतरा मेकर ही मिनकी गृहस्पी पसती है कोएमा से समाचार पाकर ये लोग समये। पड़ा और बप।

74 कमूनिस पोखरा । और सडा हुना नाला । और रेलवे ओवरब्रिज पार करके हवा मे गायब हो गये। बादल ने और पानी नही गिराया। पानी-भरी आंखो की तरह बादल । बादल के नीचे वेलियाहाट्टा। वेलियाहाट्टा का दमघोंटूपन । सांस लेने मे दिक्कत । हवा का नामोनिशान नहीं। काले कपडो के टुकडे जीभ की तरह झूल रहे हैं। जबकि कुछ भी हिल-डुल नहीं रहा है। स्थिर, निस्पन्द । जैसे सब-कुछ पत्थर हो गया है। पुतलीकल की चिमनी से घना गाढा धुआं उठ रहा है, वायलर मे नाग बनाये रखने के लिए। और यहां- वहां लोगो की भीड । फुसफुसाकर बातचीत, "देखो क्या होता है, गोरा, लोग छोड़ने वाले नहीं हैं। अभी तो वस शुरुआत है।" यानी अब आसमान चीर कर गाज गिरेगी और खामोश वेलियाहाट्टा अचानक निष्ठुर ढंग से फट पडेगा । काली पट्टियो से लिपटे वेलियाहाट्टा के प्राण जागेंगे। वेचन प्राण। विजयदा के चले जाने के बाद वे तीनो उठ खड़े हुए थे। रेड से पहले ही हवा हो गये थे। नेशनल रवर के पीछे का रास्ता पकडकर नीधे पचानन- तल्ला। सुस्ताने का मौका भी नहीं मिला। पचाननतल्ला से नाला पार । नाला पार को इस जगह का पता खोचरो को नहीं है। पत्थरो से अटे कबड-खावह रास्ते के एक तरफ पडे लकडी के कुन्दे पर ही वे वैठ गये। जल्दी से योजना बनानी है। तीन जनो का एक साथ घूमना-फिरना वेवकूफ़ी है । सव साथ-साथ पकडे जायेंगे । सवका अलग-अलग दिशा मे छिटक जाना ही बेहतर है। बाद में मौका देखकर मुलाकात की जायेगी। लकडी के कुन्दे के पीछे नाला। गदा नाला। कलकत्ते को कीचड- गन्दगी को लिये गदा नाला । और गदे नाले के दाहिनी तरफ़ किलखाना, हड्डीकल । गायें जिवह होती हैं। और लाइन की बग़ल में उनकी मांत हवा मे फुलाकर, धूप मे खीचकर विछा रखी हैं। वदवू निकल रही है। यूं ही गोरा का दम घुट रहा था। फिर यह वदवू । दौडने की वजह से सीने में अभी भी थोडा-थोडा दर्द उभर रहा है। ज्यादा दौडने पर सीने के पाम एक दर्द उभर पाता है । असल मे शरीर ही कमजोर होता जा रहा है। तीनो ही पनीने से तर। होठ मूख कर लकडी बन गये। जल्दी में कोई ।

कमूनिस 15
गाव नहीं निकली । मोरा पस्त हो गया पा नहीं मप सा सेपाटा
को सोना की बात का पता भी नहीं मप सका ।" रोका हाप मुरता
पाई इस मस्तीप्त देने पर मरना पापा।
"सिर्ड मरना और मारना-तुम नोर्यों के मुंह में क्या मौर कोई
गात मही
'यो सब है वही कह रहा हूँ।
"कौन-सा सच है?"
"मरना।"
"मर फिर।
पता नपाकर विजयदा सही-समामत भा रहे हैं। बिरया के रमी
हुई मकड़ी से मरीर की मोर बेख गोराके मन में बारे सो तापक
बनी। मूसिया रोग पस्त पोदी की मामी की बात मारहा।
सोनारपुर की सीधी-सारी मरी छिरि भाभी की बात भी हो
भायी। विजय के म हने पर सब-कुछ वह गाया। कौन-म गदर में
पापेंगे ? फिर पमी तो मिनती भाभी नहीं है। पोरा मर पा
पिपरा को मेकर डीचतान करमा ठीक नहीं है। कहीं से गा
का कुन ममा है। मोरा को महसूस हो रहा है। साफ मर र
कुछ करने को नहीं है। वैसे मोरा कहीं बहुत ही मभन है। रिर
पसीन से दूर हो ये हैं 'पोरा तेरी मां को उन म परे है।"
मामा रहे हो?"
है। ठीकही गापा है। मगर मानी म'मों मFr
महस्से में पुष नहीं सका। बावामीम नमरी रम,
सुसने नहीं लिया । वमी सुना तेरे घर में पुम पानमन
पा सपा । सोषरों से भर पया।"
सहजीबो-स कुम्दे पर विपदा म बन कारror
में हरियों की सही मा-सी बान मपी पाने
फैम रही है। वे ममे से बताकर पिया
पर

76 कमूनिस मा घेरा हो । हाथ-पांव नहीं फैला पा रहे हैं। मन्टू वारीकी से पूछताछ कर रहा था, जैसे रास्ता खोज रहा हो। रास्ता कहाँ है ? हूबहू नन्टे जैसा हाल । तालतल्ले का नन्टे । मिर पर कोमत लगी थी। और लडका खोचर के दौडाने से एक ब्लाइड लेन में घुस गया था । उस समय सिर्फ घुसने की बात याद रही थी। फिर निकलना पडेगा, यह बात भूल गया था। तब तक एकमुंहा गली का मुंह उन्होने घेर लिया। "अली" "हाँ।" "तू डेरे में चला जा। स्थिति खराव देखने पर वी० सी० मे चले आना।" "नहीं।" "अव वहस का समय नही है।" "नहीं, नहीं।' "वात मत वढा।" "नहीं। यह नही होगा।" "जा।" "नहीं।" "अली" मिजाज विगहा जा रहा है। पारा चढ रहा है। पारा और कपर । विजयदा के मुंह से समाचार सुनने के बाद मे ही रुलाई का एक वेग सीने के भीतर घुमड रहा था। इसीलिए तो गला फाड कर रोया नहीं जा सकता । जलन बढने लगी। अचानक स्वर धीमा हो गया, "तू तो समझ- दार है अली, क्यो नही समझ रहा है ? सभी अगर एक-साथ इलाका छोड दें तो सगठन की क्या हालत होगी ? तुझे ज्यादा नहीं पहचानते । रह जा।" अली की चपटी नाक होठ पर झूल आयी है। बंगला अच्छी तरह नही वोल पाने पर भी, ममझता खूब है। और समझता है, इसीलिए चुप मार गया । मन्टू किसी बात को आधी पेट मे, आधी मुंह मे लिये वेचैन होने लगा। अली को मिचमिची आंखो की जोडी छोटी हो आयी। उसकी कमूनिस 77 ? मों में मासानी से पानी महीं भाता। छाती फटने पर भी नहीं। धीरे-धीरे यह पमा मपा।तिनी मनिच्छा से बह मोटा यह तीनों भारमियों के इस छोटे दस को ही पता है। सिर्फ तीम बने। तीन ईसान। मोरा हो और माद । रियपदा पोरा की मोर मुका मुहस्म में मत पुसमा । मुसते ही मारा गायेमा। सारा इसाझा छान गसा है।बी. सी. में पमा या मीन ग्राम को भायेगी। उसी की पुरानी सब सुनना। 'मीर तुम 'यो रिन एक दास्तक पर बिता कर देगा । उसके बाद । जब इंसान के नाम पर वे तीन बन है। तीन जनों का छोटा-सा दम । विजयदा भी पोड़ी देर पहम पम गये हैं। मम मुहस्से से खबरे माने मे पाने का काम निवपदा को ही करना पड़ेगा। यानी रिपर। उन मोर्पो म बिजमराको घमा होते हुए गायब हात देता। पारा म सामी मगर रास्ते पर बिछाए रखी। मानक वह मट से ठपड़ा हुमा। माटू न ही ठकावा किया कि चसो बब मेठमे से कोई फायदा नहीं है। मकोका कुम्बा पीछे छोड़ दि मामे को बराम से सिरेलिये पमने मये। मन्टू का एक हाप मोरा की पीठ छूकर सीमा हो पाया है। उन्होंने तय किया कि माइन पर पगे। मुझे सीम उठा "एक बार म नसीहत महीं मिमी। पोरा मोर मटू ने पात टाम दी। बात यह पमी। साइन पर से ही शार्ट-क्ट है। उन्हें बहुत गस्ती हो ऐसी बात नहीं। बदन को टीम देकर ही पम रहे हैं। फिर भी इस पार्ट-कट रास्त का कैसा निचाव है ! गोरा * मुंह से मनमाने में एक बात निकल गयो क्या हमे न पाकर मेरी मा को ही वोमी मार से हो?" "हट भमा ऐसा होता है क्या? मन्टू होकीबात परपर काटन मगा क्यों ? क्यों नही होवा? उनस इंसानियत की उम्मीर रखते हो? मममनसाहत की? वारयुग है। मारा में मुंह नही सोसा। ब तीनों वर माती-यस्ती चम ऐ है। मन्टू की बात ने मसम म उ उम्सा दिया है। मोर पोप सोच रहामा-

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पान
कोमनी परम में यह मया पामार कान समाVAIL पानाम
के पगमे दिलीपग पर हरमत न मान RT AHI HIRI
करता है बार भी। शि बार YEHit मामानामा
निमाम तक नदीपा । गुण नी मन ATTRI1111
परहवाम कामगार तिमिलातामा । परनामा "
भी तो
बार भीतर माती ममीद नाम 41111.1
पता पाया पापीठा-मानपना नातायात tatit ,
मिपाटा मिमिया निना HAIR Nter
गिपाम भार भी बाम लिनी I TEAM THE TIMES
गर-नगर हरियों में पपमा पीपी MHASARArt
भाग ममापी, नी ही भाग मानी। 117 1141M
नाही मामी मग PHAmit tri
निामा माग गहननी भावनामा
पिने मीर पर निगान गमन सीई) 4 titarike
म मरम दोनपाका मन, "Hinit krt..।
हर उगम नमक माना" MORE IT ..?"
मामा
पारमा भाममाRERNमान मानी ग
पापा मुगी श्रीमान

। । 80 कमुनिस शाम है । ये तीनो लम्वे डग भरते हुए चल रहे थे । बालू के चर की ओर। अव बालू का कही अता-पता नही है। फिर भी बालू का चर, वालूचर । वालूचर का मतलब है चौडा सीना । पूरी दीवार पर स्टैसिल की छाप । वालूचर का मतलव एक दगल-भर जवान लडके । भविष्य का सपना, पार्टी का आधार । खोचरो को कपडपी । वेलेघाट की जान । वेलियाहाट्टा की मान। यही अत है। वालचर ही वेलेघाटा का मत है। गरीव वेलेघाटा की आखिरी सीमा । उन लोगो ने उसकी सीमा में पहुंचकर चैन की सांस ली। इसके बाद नाला और भेडी। भेडी और नाला । और ज़रा भीतर जाने पर, मछली की वू पार करके, कीडा खाये पके धान का गीत । वे लोग काले पानी के सीने पर छाया बिखेरते हुए चल रहे थे। घने काले पानी की गहराई मे काई और सेंवार । मुरारी के इकहरे शरीर पर चारो ओर काई और सेंवार लिपट गयी थी। वालूचर का मुरारी। गहरी रात को उन लोगो ने मुरारी को झील के पानी मे ठेलकर लगातार गोलियो से दागा था। गोलियां आर-पार निकाल दी थी। झील के पानी ने निष्ठुर ढग से खून के दाग छिपा लिये थे साजिश की स्याही मे । सिर्फ झील के किनारे बसे मज दूर-मजदूरनियो और रेलवे गैंगमैनो की झोपडियो पर 'इनक़लाब' की गूंज धक्के मार रही थी। भोर गयी रात ‘इनकलाव' शब्द की गूंज से उनकी वेबस नींद टूट गयी। उन लोगो को पता चला कि एक आदमी ने यह बात अपने कातिल के सीने पर फेंक मारी है । और उसके बाद ही गोली की आवाज़ । और उसके भी वाद लेक के किनारे पर बने सोपडो के मीधे-सादे लोगो ने बात का मतलव खोजा था। 'इन- कलाव' का मतलब ? जो बात कहकर मुरारी ने राइफल की गोली हजम की थी, वही बात 1 उसका मतलब? गौर ए० बी० ने कहा था, 'एक्शन से, सघर्प से जनता सीखती है।' शरीर पर गोली दगने से पहले मुरारी जूझा था। उसके बाद झील का ठडा पानी । और इनकलाव । हनीफ ने ए० बी० से पूछा था- 'इनकलाव का मतलब ?' इससे ही सब-कुछ प्रमाणित हो गया । एक्शन का मतलब ही है प्रचार । सगठन । मन्टू वात नहीं मान सका। वह फुफकार . । -

कमूनिस 1
उठा पा 'कामरेश मुरारोहम मोगों की मानों की पुतमी पे।पोपोषित
रहत वा पार्टी को मोर पयादा मजबूत बना सकत पे।
"हाँ मिषय ही।"
"हो क्या गिरा पहने के लिए होड़ मचा-पों?
“मरे क्यों ? कामरेर मुरारी उनकी बातों से बचकर मान सस्त पे।
बनता के भीतर पैठार मगाई की पमीन तैयार कर सकते थे ।
"सहीर कामरेतों की मातोपना नही सुनना पाहता।"
तब कहने के लिए कोई बात नही बनी। किसी काम के बहाने मन्टू
रठ गया था। मौर बन वाट पाइपगन को बीसी पैट की जेब में रासे ए.
बी. मी उठ खड़ा हमा । ए० बी० के सिर पर उस समय हमार सये
का इनाम पा । और इसीलिए छोटी पाइपगन हमेशा उसकी गांप म्ती
रहती थी । वन में नोहे का ठंग स्पर्य । ममी का डिस मनाकर
मार की तरह बना दिया मया है। ए.पी.का है 'वन बाट । बसस
में है पाइपगा।
सीम की बग्न में सेक हाप की दूरी पर पुरानी स्प्रिंग फेरी
और सीमनगर भीमा मैदान । बारीक रेत का वापरासार बार
को मेरकर मानो सती की येह के टुकड़ों की तर मुरारी बिखरा हुमा
है। मकसाब की बिरकती हई पादान सारे इसाके कोपरकर हिपी
है, मबाने कब फर प.? आर से कुछ भी पता सगाने का उपाय
मही वापर गोमही है।राहिनी ओर सारे कसत्ता सहारा
साफ रिमा मैना । मैमे का पहारा पेट पूमकर सोत बना एमाता
मामे पी पाने पैराहमा बमा-कफन मोड हुए मोर बगा।
बामपर बीच में ममे बस की एक मही पोरस हारा
माविरी दुरग मुस्ता रहा है। रेम-झाइन के पतरों के टूगों और मी
बने तारों से ठोकर जाते-जाते बनोपपी.सी. में मारे । मारे गम्म
पर चोर-चोर मे सौप्स मेन के कारण अब पूरी तपम है। मम्मी
रोनों पति कनर की तरह पूर्व है।
"किसी का बता-पता नहीं है।"
"मामी की एकान पर पहें।"

82 कमूनिस "भाभी के लूले पति को कई दिन पहले उठा ले गये थे न ।" "फिर क्या हुआ " "दूकान पर नजर जरूर होगी।" "चलो तो।" गोरा हथेलियो से सारा चेहरा ढांपकर बडबडाया, "जरा गला तर करना भी जरूरी है, कठ एकदम सूख गया है।" सिर नीचा करके वे लोग भीतर घुसे। भाभी की दूकान का टट्टर पूरी तरह नहीं उठाया जाता। पहले दूकान मे कोई-न-कोई हर समय जमा रहता था, दूकान गर्म रखता था। शुरू के दिनो मे शायद सवेदना मिली चाय की प्याली के मारे आते थे । मरे, जोरू को कितनी तकलीफ है। आदमी रेल से दोनो पांव कटाकर बैठा है। अब पांव नहीं है । वेजान मास के पिंड बैगन की तरह झूलते हैं। ढलती दोपहर आज बिलकुल खाली है। एकदम सन्नाटा है। विचित्र एकात है । गोरा को देख भाभी की चिकनी नाक की कोर पर एक मलिन भाव सरका । पतले होठो मे हंसी खिली। "नही है ?" । "बहुत मुश्किल " "आज किसी का भी अता-पता नही है।" "बिल्डिंग मे हैं ?" "ठीक पता नहीं है। मगर लग रहा है, नही हैं।" तभी टूटे हैंडलो और काले दागो वाले सस्ते प्यालो को उलट-पलट- कर घोना शुरू हो गया । कलाइयो मे चढी शख की चूडियो को छन-छन वजने लगी। चाय की वात मुंह से नही कहनी पडती। भाभी को पता है, इन लडको को प्यास लगी है। प्यास लगने पर ही आते हैं इस 'भाभी काफे' मे । उनमे से किसी ने मजाक में यह बात कही थी। बस, तव से यह बात चल पडी। ममी तूफान की तरह आते है । दो क्षण बैठते हैं। गरम-गरम चाय मे गला माफ करते हैं । फिर चट से गायब हो जाते हैं, कबूतर की । तरह।

कमूनिस 83 पसके बारे में नहीं साबना पाता। सोचना हाता है म माफों का मेकर। इसकी गिन-दोम हमी का मेकर। एफान में जमकर बैठकर, गुरू- गुम में तूफान नठाय पातों की फुसहियासी+सी बातें चीन म्स संगोपनगाव ति सामाग्यवाद के तनुए पाटने बामा कुत्ता- ऐसीरों बाते भाभी- काकी मामी की समातम महीमामी। देना नाम की मरत बहादसा सापती उफ | सारी दुनिया को घागमा है। फिर भी बेमा सममवीपी।'भाभीकाकी मामी। उसकेसममने मायक बातचीत भी होती बीमा समप्तती है कि ब मोग मर स मोरे तक बवतना पाहत है। मंत्री-पी का बममा बहना मही। विमान या स पलटना । एकरम उसट दमा चाहते है। मप्न-कपा मुमते-सुनते माने कब भाभी के सीम में भी एक तूफाम-सा उठा है । मये-मय माकों की चमकती हुई माों में मोर पसीन में हर पहरों पर मास्था है मटूर इस भास्था। होमी ही । हाँ हा पी ही । सात दशक में ही ।पमा होमा, पुमान से कान की बावश्यकता नहीं। ईमान पास नही परते । कीर पर उमसियों से कैस उठाया जाता है पेट में रोटी से गनी माती है और नहीं रोटी गान सीपत में गमकर पुटामी पड़ती है यह बात कामपर ही बानता है। जानता है किया पाहिए, क्या नहीं चाहिए। पट पर भात पूग पर कपड़ा । मौर और मुक्ति । मु क ति। भोपु रेगरनी की हामत मच्छी नहीं है। बमपा हिमान की सट-सट मावार हुई। मोरा की मोर एक कप गाव ह भाभी बोली। मुटन पर दरी तिरछी रानी है। मांग की भारी भारी पम मुंदी है। भमर मस्पताल में तमाम च्यिा गाता |" 'पामस हुईहा। मारा का हरा परम मया।पिमित्र परिवर्तन । मपामा परेका भार वपन बाता है। प से सिर में माग पस उसी।तिनीपार से कोई फुसफुसापा प्रत्त साम की। मामात पर ऐसा हो पा है। गर-बमसे पन बाठी मार संबार नीमकोई कमी नही है। एक 84 कमूनिम एक सवाद गोली की तरह । राइफ़ल की गोली शरीर में चम-धंस जाती है। "दादा को तो छोड दिया है ना?" "हां।" वह रात जैसे कालरात्रि थी। ए० वी०, नेपु और पांच-छह जने मिलकर रात-भर वालिंग-पोटरिंग करके भोर के लगभग उमलूले आदमी का नाम लेकर पुकारने लगे "रविदा । ओ रविदा । क्यो उठोगे नही क्या?" आदमी को उस दिन बुखार-सा था। देर से ही उठता है। भोर गयी रात ही कालरात्रि है। रात-भर जागने की थकान से अब अगर लुढक जाये तो बचाव नही है । ऐसे वक्त ही दुश्मन आते हैं। और इसीलिए नीद दुश्मन है। दुश्मन को भगाने के लिए गले को एक बूँट गरम पानी चाहिए। स्टेंसिल का पतला टीन, रग का डिब्बा और वश भाभी की दुकान मे ही रहते हैं। चाय गले में डालने के लिए पहुंचे। मुखबिरो की तो कोई कमी नहीं, देखते-देखते घेर लिये गये । किस्मत मे पीछे के दलदली जगल को वे लोग अपने वश में नहीं ला सके थे 1 उम ओर से ही वे लोग साफ हो गये । और सरकारी वेतनभोगी अफसर लूले आदमी की बगल मे स्टेंसिल खोसकर उसे घसीटते हुए वींच ले चला । इतने भमेले के बाद भी लडको के लिए वेला के मन मे दर्द है। उन्हें देखकर रुलाई आती है। भोर गयी रात को दुम्वप्न देख धडधडाकर उठ बैठती है। खतरे की बू पाते ही खवर पहुंचाने के लिए वेचन हो उठती है। उसके मारे वदन में न जाने क्या कुछ होता रहता है। आधी रात तक नीद नहीं आती। दूकान पर कड़ी नजर है। चाय लेकर बैठने पर अनजान मादमी मे इधह-उधर की पूछताछ करते हैं । नेपु के ग्रुप ने एक को अचानक घेर लिया था। वेला की आंखो के सामने । मुरारी उस समय तक शहीद नहीं हुआ था, वरना कुछ हो जाता। दूकान के चारो ओर कडी निगाह है। किसी भी क्षण हमला बोलकर तवाही मचा सकते हैं । इसानी ज़िन्दगी को फाड सकते हैं । और ए० बी० ग्रुप के तो किसी एक को भी पाने पर नोच डालेंगे। फिर भी वे लोग आते हैं। खूब आते हैं। दिन-भर मे एक-न-एक वार आयेंगे ही। न आने के अलावा कोई और चारा नही है । घर छोडे हुए, पुलिस के कमूनिस 85 भए हुए नोय । मूखी निम्मपी मे भरपूर स्नेह की एकर पाने कमिए कितनी गहरी प्यास ! गुरो बभी तक सबान पर तामा मारकर बैठा पाहम बात मामूम करन के फिराक में था। दिनों दिन पुगो से हिकारी विस्मी की तय बनता जा रहा है सूंपकर ही उसे बवर का पता चल पाता है। चाय की उमछट तक गले में मकर मह मट से उठसा हा 'भेपु के रेस्टर में पहें।" पूरी मे मार्क की बात की है। सबको पसन्द नापी । मन्द पैसा चुकता कर पररन मीची किये मिकम भाया । मौर मनमाने में ही न जाने किस सिंबाप से उसकी माने भाभी की मारों से मिस ममी। मागे में माम। पानी गिम्दा रहने पर फिर मुसाकात होगी। मसविदा ! मोम बेसा भाभी की नम मासों से धीरे-धीरे एक-एक करकर पाने तये । बुधमे होते हुए बिमकुम मोझम हो गय । बाम के पेड़ की हमकी विपना छापा उमक सरीरों पर पी। कपम पेह के र-मेहनने पर इनकसान की। गंभ । घरीर के रोम साहो जाते। रोम रोम में बिरसिया सड़ती है। मुरारी को पेड़ के तन के साम बीमा यया था और एप इंसान क पमे से नामान की पुकार साइन की तरह पनी दी। बासूपर से पिरे परवानों से परों भौर कामे परेबासमान भौर सीस संपामी परनामाव की पुकार। और दो कदम मामे बहाते ही मेपु का सेन्टर। कच्ची मिट्टी की मोपड़ी।पा हफ्ते स फ्यादा समय से महका यहाँ पग हुआ है अस्पताम मेबाने का कोई रास्ता नहीं है। बसने के पार में पहर फैम पपा है। सरका निश्चित म्प से मर पापा । सबकी बोचों के सामने कुछ भी नहीं मिपापा मकवा एक फासतू समेमे में फंसकर यह हास हमा है। मए उस रिन माम टेस्टपरम सिए मीस पिनारे गमा पा। बचानक पान से माम पेब में ही फट गया। मसनी मान पा। ५-५ करते बासूपर में एक रिषिष-सी मान-सर मंघ विजेता हुमा माम फटा बा। मास फापा मेपु की जीप मांस को उमारते हुए। मारकम इस तरह की मानाएं हर समय पर पी मार मार । ་སམཱན 86 कमूनिस - सी जग डिंगी, कोई हिसाब-किताव नहीं। पुलिस, सी० मार० पी०, सी० पी० एम०---किसके साप जग नहीं? छिड़ने-भर की देर है। इसी कारण बात चली थी, एक भूमिगत नसिंग होम या अस्पताल जैसा कुछ कायम करने की। ए० बी० ने ही यह बात कही थी। हालांकि यह बात वास्तविक रूप कव लेगी, भगवान ही जाने । मन्टू ने उस दिन चिढकर कहा पा, "कव से सुन रहा हूँ, कायम होगा, होगा। लेकिन क्या सबके का मे जाने के बाद कायम होगा?" वात मुंह से निकलते ही ए० वी० की गरदन की नसें बुरी तरह फूल उठी थी। वायी जाँख के ऊपर कटी हुई भौहे सटके से नीचे उतर आयी थी। उनके बाद और कोई बात नहीं हुई। उसके बाद मौन गाभीर्य । विराग। होठो की दरार मे टेढी हँसी का टुकड़ा। दिन-ब-दिन गव-कुछ कसा बदलता जा रहा है । हू-हू तूफान के वेग से दिन गहराते जाडे की तरह खुश्की फैला रहे है। ए० वी० का असली नाम नव याद नहीं रहता। जब अशोक नहीं, ए०वी० । अशोक नाम हटके ला- खाकर बदला है। ऊपर के दर्जे के नेताओ के साथ उठ-बैठकर, नीचे के दर्जे का दादा बनकर अव विचित्र हाफ नेता है ए० बी० । जला हुआ जगार । टेढो हंसी । बहुत रिस्क । उस पर कोई बात नही चलती। जाने कसा फौजी मिज़ाज है । नेतृत्व का मोह ? या नशा? या तर्जनी उठाकर अतिम शब्द कहने या मैन्डेट देने का बेअक्व मिजाज न रहने पर नेतृत्व नही चलता? कच्ची मिट्टी की नमक-नायी दीवार के साथ-साथ आगे बटते हुए सिर पर प्रश्नो को आरो-सी चलती है। नारानदा मे यह सव-कुछ नहीं था। नारानदा विहार के किसी गांव में पार्टी के नेता हैं। अब मोतीहारी थाने मे हैं। कितना विचिन नाम है । मोतीहारी थाने के नाम के अलावा गोरा को इस बारे मे और कुछ नहीं पता । गोरा को पता नहीं कि जाडे की गत को ठड भगाने के लिए देहाती लोग कितना फून जलाते हैं ? गोरा को पता नहीं कि साग के चारो ओर रूखे, जली लकडी-ते इमानो के साय शिकारी की तरह बैठकर नारानदा उन्हें कौन-सा रास्ता बताते हैं? उसे नहीं पता कि हफ्ते में इस आदमी को एक वक्त का खाना भी मिलता है कमूनिस 87 या महीं। मोरा माहर इवमा गानवा है मारानरा मेवा है। जैसे नेता ! दोस्त से पिता से नेता। सीने के गिर्द एक मेकर उस मादमी हे सामने फफर रोया जा सकता है। साफ रिम से मुमकर बात की गा समती है। मारानपा कहते 'कम्युनिस्ट बममा इमा मासान नहीं है । मेरी मां काठी पी मरठीमारी उरवी है राब पर नारी की गमती है सास। हम लोगों का भी यही हाल है। शिम्पमी-मर को ईमान पारी से मगपूर को मड़ाई में साप दे सके ही कम्युनिस है। याबाद गोरा को मरसर पाव माती है। पतरे परेशानी के समय । सुचनुस में । और इस बात के मम में मावे ही सीने में तागत पर पाती है। मारानवा बहुत ही करीब के मारमी है। मौर इसीलिए नारामा नेता है। कोई पुएँ मम्मों में गिरा पहा विस्मय मही है। वीबार बोड़ी दूर पाकर विसकुन पत्म हो गयी है। ऊँच-मोष गरे पार करके नेपु का मेस्टर । भीतर मोरी बिछाकरमाका पड़ा रहता को साना चिमाती माता । ए.पी.की बहन । निपिनको में चावा हर रोर उसका साना मे मापी है । मेपुकाता है, राराकीतए पपता है। वीर माता की चिमुक कामे विन में गोम्म एक पुष एक सोक धीरे-धीरे स्पष्ट हो उठता है "तुम से होगी?' नेपु सवा है मारहौर निमलता है। माता के हों पर पीमी आप। गाव रिनों धार पर में स्नी मिर्च-मसासार सम्मी नेपू को पार से सा हापाठिा नाम की कसे रदन बासी हरकी की बारामी बौदों की पुमिया स्थिर है। पीन रेप का वेनिहा मरहम नेपु के पूरेहाप पर पुता है। शाहिने हाप में हीयाम श्यावा है। तीन उपलियां रैसे की आप मूल रही है। टिफिन कटोरे में ही नेपु ने पुस्ता किया। पोही किनारीवार तर माही माचम से माफी में मेपु का होछ रिया। पोरा तब तक बोरी पर ही पसर ममा बा। मरीरमौर महांगेया मा पासाम काही मरीर।।कहाँ कसरत कर सकता है? पोप सीने पर र भूभामा है। मां की बात मार मावे ही पैसे धक सेकसी है। कुछ मामता रहता है। और हरीर बसता है।

88 कमुनिस "ल न लग रहा है।" शान्ता तिर झुकाकर नेपु के हाथ पर मलहम लगा रही थी। उसके वालो की लटो से तेल की खुशबू उस कबूतरखाने मे फैलती जा रही है। नेपु के चिल्ला पडते ही शाता को तरस आ गया। उनने एक झटके से निर ऊपर उठाया। भीतर एक खिंचाव। लडकी की ठडी आंखो मे गहरी ममता । नेपु का समूचा दर्द सीने मे संजोकर लडकी की आंखो मे गहरी वेदना । मन के आदमी से आसन्न विच्छेद की बात सोचकर वेदना । नेषु की मृत्यु-यत्रणा देख शाता की जांखो मे धूसर जाल। गोरा को पता है कि वे लोग एक दिन के लिए भी गृहस्थी नहीं बता सके। रेडवुक मे ते खुद ए० वी० ने एक अश पढकर सुनाया था। नारी- सवधी अध्याय से। नारी का पुरुष द्वारा शोषण-एक और अतिरिक्त शोपण-पीडन है। इस नामाजिक पीडन को ध्वस्त करके ही, जिंदगी की एक बहुत बडी जरूरत को ध्यान में रखकर उनकी शादी हुई थी। सग्राम को वात याद रखकर । शाता उस दिन जैसे उफनी पड रही थी। एक खुशी का फव्वारा। और पार्टी-कामरेडो ने लगातार चाय पीकर बातो का फवारा छोडा था। जाने किसने कहा था, "शाता को मांग में सिन्दूर लगाना चाहिए, वरना वह जनता से फट जायेगी। वस, शादी खत्म ।" उनके बाद उस दिन ही नेपु पार्टी के एक काम से मालदा चला गया था। शाता को पता नहीं चला। कुछ भी पता नहीं चला। घर लौटते वक्त कान के पास से सरक्ती लतर के फूलो के गुच्छे ने उनका गाल कर उसे जन- मना बना दिया था। उदान वाऊल गीत-सा। नेपु के सिर के पास एक चौकी है। शाता रास के मेले से कुछ दिन पहले लायी थी। दवा और चन्द किताबें हैं। अकेले रहते ही वह किनाव लेकर पड़ जाता है। हालांकि आजकल यह सब पा० खत्म होते जा रहे हैं। किताव पढे हुए दिग्गज कम्युनिस्ट बहुत देखे हैं। सिद्धात की चखचल का जमाना लब नहीं है। अब तो है काम । ऐक्शन । ए० वी० कहता है- प्रयोग। नेपु की हालत निहायत खराब है इसी कारण । हालांकि पहले भी उस तरफ उसका झुकाव था। घर के कोने में पोस्टर । लाठी के सिर पर लिपटा हुआ सडा । और मिट्टी के कुल्हह में खून की तरह रग 1 दीवार पर

रंप के स्ट्रोकातुरेमोकार । कार का बात।
नेपुका मेहरा भी कायर की दर सनदार नामा
"सूना होकर पहा इससे तो मरना सहरहै।
'फामतू बावे छोड़ो वासा सो। राजाराम
हादान हवानों की मट बस्दी से पीघे काम।
महर एक बार ने की मांसों में माप पर है -
गुरु किया था। हारों गली-कों में से हेगे
पसरबाती है। उसके पास माने से इस
पर
निश्चित स से फस गायेपा। मोर एकरा -
हावा सोच भी नहीं सकती। मोटापा
भीगे पछिका पोसाकार पार पीता
का पिम्ह। चिम्हित । और उस मोर मर
माषा वर्म हो उठा मोघ्र में सा-:-
कायम हुनाई।
भएकी बातों में एक पीमार
मुरू की उपजातियों की गोरगर --
रखी है। फूल-पने से पहरे पर
उमर पी है। पुकापामा
गम हा सारे चहरे परा
'विलिय में गाने पर
मिल सकता है।"
मेप की सटिका
पातपारगोमर मरम्म
किसीबीपन राम-----
पोस्टरकार
बापार एकति -
पायो
बनेच्या

-- 90 क्मूनिम की चालू भाषा मे विल्डिग । शार्टकट अपनाया है। इतनी लम्बी बात का वक्त कहाँ है ? इस दौरान वेजुवान दीवारो के सीने मे बोल खिलाये जा मकते हैं, तेजी ने ऊपर सरक कर स्प्रिग कम्पनी की चिमनी के माथे पर सहा वाधा जा सकता है, तान कर। मजदूरो का झडा। दो पजो में दो भारी 'माल' लेकर वैन रोकी जा सकती है । दलाल को हलाल किया जा मकता है। झुटपुटा काफी पहले गुज़र गया है। सारे बदन हर वालिंग की स्याही पोते वेनियाहाट्टा में अब गाढी शाम । चलते-चलते गोरा ने एक सिगरेट जलायी। सीने के पिंजर मे धुआं भरकर वस-स्टॉप की ओर जल्दी-जल्दी बढा । मन्टू और बूटो बिल्डिंग के खाली कमरे मे जमकर बैठे हैं। वदन ढीला करके शरीर को ज़ग सुस्ता लेने दे रहे हैं। घर अब उनके कब्जे मे है। रतजगा मोटिंग और गैरकानूनी कागज-पत्तर रखने की जगह । थोडी देर बाद ही ए० वी० लौटेगा। तरह-तरह की बातें गोरा की खोपड़ी में झीगुर को तरह बोल रही है । फैसला । गोरा आज एक फैसला करेगा ही। इम पार या उग पार, जो भी हो । आज रात को ही। बात को पकडे रहने के लिए ही उमने धुआं खीचा । और सीने के अन्दर लगातार धुआं भरने से हाथ की उंगलियां आपसे-आप ढीली हो जाती हैं। कमर में ताकत नहीं रहती। जमे कही एक जबरदस्त कमी आ गयी है। कही जैसे एक सुनसान मूखा मंदान है । कही जैसे गरीवी की विशाल अंतही है। गोरा को महसूस हो रहा था कि मुक, निवारन-सभी कैसे गर्म हो रहे हैं। काफी तप रहे हैं। परेशान । अब और सभालने का वक्त नही है। इसके अलावा कहूंगा भी क्या~म्कूल में पेटो' मारना ठीक है या नहीं या व्यक्ति हत्या सपासवाद । कुछ भी कहो, विद्यासागर आदमी बुरा नहीं था । इससे क्या होता है । प्रचड वाढ मे तिनका। इससे कुछ नही होता। कुछ नहीं होता । कुछ नहीं। सोना, सोना का नाम ही काफी है। कामरेड सोना। मेरा कामरेड । शायद रुलाई की एक थिरकती हुई लहर को दांत भीचकर रोकेंगे। इसके अलावा बहुत-सी गलतियां हैं, मगर इसके बाद ? - 1 एक विम्म का देमी वम ।

बमूमिस 91 ममी भीबो गोरा की गरदन के पास सोना की पर्म सांस गोरावा ! तुम पमूनिस होन। मोर ऐसी ही कोई गात याद माते हो योरा का सारा अपन मसहनीय असन से बेचैन हो पाता है। पर्यो' क्यों रखने यह सब नहीं पाना? रामनीतिक परिभाषा की मेंस उतार कर बह को सप का माविष्कार मही कर सत्रा? बस-युमटी के नवपीर आव ही घर में मां की याद मा ययी। मौका पारा से हवा में रन नमा। मोर गोरा को सोपड़ी में पन ने मगा। मुमटी के पास बरे होकर उसने दर तक पर बिठा दाना माल स्पिर है। विविध स्थिरता ! गोरा मीन के लिए पग रहा। रने माकी कोन-सा समाचार माती है ! प्रतीक्षा पद मानो पत्पर-सरीसा पारी सीन के कार पाकर बैठ जाता है । सीने के भीतर हगा नही मीची गायी। मपानर राम बीमार रोपी की तरह भारी मारी साहो उठाता है। बसपा पास से एक चोटी के यनावा कई कुछ मही दिसता। माठ पE: गौराकी दोनों बौनी मे उसे निपस मिया: पब मनोन: बत दहा है। ठहरी हरिन मार्योकी पनियों में गिरि विरह उभर रही है । गिरिरम पारों मोर रीगर |र. बदन पर टेप-मेहमसरों में नियाहाट्टा की रानीनिकम ITI पीपे मामा । मामा या पा? और मान से बाउ निकाला एनाका पेर कर कप। कपभीतर मिगु की। देमियाहाहा का मेमा भूखा मगर । मगर भागा के ममर्को की मामा पहने मही मोर मसा-काराग हरामी माघार । पप । कफ्यू मौर मोमीन पर बारिप की तरह पेटो। रात दिरात गंदे माने के मीन में मगाएर अभी धाम है। राव को माना निगर सिपाहाटा के सीन में पुस्मा पार पसागुपरस विपिन में हुए नियम में पाडी। बस से उतरकर एक मटर म मनमfrari लाल किनारीदार साडी ऐडी पार लोट रही है। मीन जल्दी-जल्दी चल रही है। दवी नाक के नीचे अमा उत्तेजना और थकान का पसीना। उस बोर निगाह जाते ही झट से जमे कुछ याद आ जाता है। प्यार की बात, मीनू का प्यार । गोरा ने देखा कि लड की बुरी तरह पमीने से तर हो रही है। सारे वदन से पसीना नही, जैसे आंसुओ की वाढ वह रही है। जरा आगे बढते ही गोरा ने मीनू को पकड लिया और अनजाने मे ही उसका हाथ मजबूती से थाम लिया-इस तरह जैसे कभी नही छोडेगा। जैसे वह एक मजबूत सहारा हो । जैसे कोई डर न हो । जैसे दांतो से खतरा चीरते-फाडते हुए वे आगे बढ़ जायेंगे। हाथ के दवाव से, मजबूत दवाव से गोरा ने बहुत कुछ कहना चाहा, 'अभी मरा नही हूँ। जिंदा हूँ, मीनू । और जिंदा रहने का मतलव तुझसे बेहतर कौन समझता है, कुछ भी वेकार नहीं जायेगा । कुछ भी नहीं। तू रो नहीं सकेगी मीनू, किसी भी तरह नही। और मीनू नही रोयो । जरा भी नहीं। दांतो से होठ दवाकर भयकर आवेग का दमन नही किया, 'हल्दी पीसते और खाना पकाते हुए ज़िन्दगी खत्म नही कर सकूँगी। मुझे काम चाहिए । काम दीजिये, गोरा दा । चौबीसो घटे।' "मीन " "कहिये ।" "तुम स्वस्थ नही हो समी।" "अच्छी तरह नहायी-धोयी हूँ, खाना खाया है, धीरे-धीरे इतना लम्बा रास्ता तय करके आयी हूँ, और आप कह रहे हैं ।" "फिर भी चन्द दिन और निकल जाने दो।" "नहीं। यह नही हो सकता।" "सुन, पागलपन मत कर।" "देख रही हूँ, आप ज़बरदस्ती पागल बनायेंगे। सोनादा ने आपमे कुछ नहीं कहा? घर छोड़ने की बात आज नयी नही है।" गोरा ने देखा कि मीनू की दवी नाक के नीचे जाने कैसा एक दाग है। एक रेखा । कटकर बैठी रेखा। अस्पष्ट, मगर दृढ़ । निहायत ही सूक्ष्म रेखा। मीपण सूक्ष्म अनुभूति ।

कno1 भनुभूति की पेत्रमा। मप-राउम स्टेट बसोकसों के परपर पीप पानी माता से पिरेपम रहे हैं। मीग से पुरपी मोर क्षमाको नाम रही है। माधी-तूफान की सरास मावार सिये मापस उग रहा है। पिता रहा है मर की तरह। मीन नाम की ममी की ही कोसी ३ कठोरता । मापसो सिरे पर काम का पट्टा। मोर एक III खबातों के भीतर पागमों की तरह मोरा की ममिया ॥ बार समाव कर रही है । मौर कोई बात नही है।दा-बकरम की मोर पर बसे मीनू का हाप उस समय भी गोरामी गस्ती में पा। भमानक मीनू का यमे को पीरता हुमा एप पतमा पर उHILI समय बाप पर उसे ? - । बेममाटाके पर भय निमम बारामाग। पन्नातही मासमान में सारे । तारों का भूग। गुमूग गही अंगभाना। माता माम की ताकी हाप का कमाम । और भागमाग गीत माह में उनका दम ममे मगा। मोराको सपा framपाकी मग पर बामी । मीन का पंगर तीर प्तिमीमा वि भाना पाहती है कि उनकी कोई भापा कोई मागही। कुछ भी नयान नहीं रहा किसाहीन कर तिमिमीजीवीही कर पुगिन पर बायें हाप दीवार पर नि ना 4t मिपावट पर मनमने भाव म एमागमीय निधिमा Nym मौर -मरे कमरे की बीमार गारमा माना। पर पीट टिकारी रमान मामाकी गार -11 को र महीं किया है। मोदीका EUM Mallm पूछ भीगारदीयापागामकाजमाRARITRATHI मीन की बीमतीकामा पानी न IA उरी। रानों पर भाभारा MEANIWWhat काला है। मुहाग पर trarms or famirmami 94 कमूनिस दिया, एक कोने मे काफ़ी लीफलेट पडे हैं। धूल की गन्ध । वे लोग लगातार बीडी पो रहे हैं। धुएं का एक घना परदा पडा है। ए० वी० की वेतरतीव दाढी और कौए के घोमले की तरह से विखरे वाल कि सिर जाने कैसा धुंधला- धुंधला लग रहा है। मीनू का ,चेहरा तक भी धुंधला। अचानक मीनू के मुंह खोलते ही हवा के झोको ने धुएँ को उडा-उडा कर बात को घना कर "सिर्फ एक शेल्टर तय कर दीजिये।" मन्टू की छोटी आंखें बात सुनते ही दपदपाने लगी हैं। ए० वी० बिलकुल आँखें बन्द किये हुए था। आदत के मुताविक बोडी फर्श पर घिसते हुए बहुत ही डी आवाज़ में जाने क्या कहा, "यहाँ क्यो नही रहा जायेगा? यही, हम लोगो की तरह जाने कैसी एक रहस्यमय हमी जागी, जबकि ए० वी० के मोटे होठ रत्ती-भर भी नहीं हिले । सफ़ेद झलक दिखी, एक भी दांत नज़र नहीं आया। फिर दाढी और मूंछो के भीतर हँसी की पतली रेखा टेढी-मेढी होकर गायव हो गयी। ए० बी० के होठो पर निकोटीन की पीली छाप । पाजामे के पायचे मे से निकले लम्बे से पांव का तलुआ हिल रहा है, जिसकी नसें उभरी हुई हैं। मीनू स्फुट स्वर मे वडवडा कर वोली, "मगर मैं तो एक लडकी हूँ।" "कामरेड निर्मला?" " ין "क्या पता ए० वी० की तनी हुई नाक का सिरा विचित्र ढंग से उभरा हुआ है। निर्मला का नाम उच्चारण करने के साथ-साथ जबडा सख्त हो उठा। रहस्य की टेढी हमी अव होठो पर नहीं है। कठोरता अव भी है। विचित्र सत्ली। आध्र प्रदेश की निर्मला। निर्मला लडकी। निर्मला को लेकर उन्होंने गीत रचा है। वीरता की गाथा। फिर भी एक 'मगर' कांटे की तरह मीनू के सीने मे चुभ रहा है। सोना की जवानी मीनू ने सव-कुछ सुन रखा है। एक्दम शुरू-शुरू की वात याद आ जाती है। और विल्डिंग के तिमज़िले पर बने कमरे में बैठी मीनू अचानक जैसे कही गायव हो जाती है। आग को चिनगारियां छूटी थी उस दिन । एक बूंद शीतल छांव के लिए वे भटक-भटक कर थक गये थे। "जानती हो, वे तुम्हे रगड सकते हैं।" - निस 95 पाप-ही-साप मीन का छोटा हाथ उसके होंठों पर से कुछ कहना रोकने के लिए प्याकुल हो उठा चुप रहो चुप । "र रही हो।" "नही पर किस बात का! "मानती हो वियतनाम में बमरीकी सेना ने कितभी सपियों की इश्वत मी है मगर वे लोग क्या भसती हो गयी है? पराधीन देश की मापियां मागादी के लिए सरने पर ही मती होती है । मुम्क बयर मम्पटों केमे में ये दो जैसे सती मी?" "तुम चुप हो गायो।" "क्यों ?" मुसे पता है सब पता है।" उसके पार की धूप सिर पर लेकर कितनी दूर तक वन पे पार नहीं है। उम दोनों की छायाएँ तारकोम की सड़क पर मम्मी हो रही पी-और लम्बी। बांचों की पुतलियों में सबाम झुमाकर ए. पी. मीन की मोर देश रहा है। मत मुसाम मबहेलना मौर ममता की गाड़ी के भीतर स फिर परा-परा नभर ही है। धीरे-धीरे करके ए. बी.के पहरे पर बाने जैसी तोड़फोर की हठी प्रतिमा पौर डिम विश्वास बाम रहा है। धुएँ का परग पीरफर ए.बी.का चेहरा दिखायी पर रहा है। मोर एक निगाह उस मोर देख कर तरा-तरह की बातें पोरा के मन में ठा-माफ कर रही है। मीन की छोटी-सी नाफ पेहरे का असहाय कोमम भाव देते हुए पोरा ने सोचा यावभी बहुत ही कम्पी है। क्या कामरा मिर्ममा की तुबना इससे की पा सकती है? कामरा निर्ममा मे पिरिएन मौरतों को समठित म्यिा पा। मौर मीनू ? हाँ माना पचारि प्णमूर्ति की तह सोना को भी उन्होंने कल किया है। मगर इसी स पपा मीनू निर्ममा बन सकती है? वमी तक माकी नोट वापी पीरान गिम्दगी मही पी। मूस नहीं देखी। सिळ किवादी पार। मोर मुनी-सुनायी बात। और दर्द की वास्ता बारे की पत। एकरम संतों की बनाती हुई। बाहर पसी आवाज़ । और तिमजिले के अड्डे के कान खडे हो जाते हैं। अचानक सारे कमरे मे लीफलेट उडाती हुई हवा का एक झोका खेल गया। मन्टू के गभीर घने, गूंगे भाव को चीरते हुए। "कामरेड मीनू के लिए शेल्टर का इतज़ाम करना ही ठीक है। ऐसे-वैसे रहना उनके लिए सभव नहीं है।" " ए० वी० के चैन की सांस लेने से पहले वूडो ने मीनू से पूछा, "गोरा दा की माँ-मासी मां को छोड दिया है ?" "नहीं । गोरादा को विना पाए नहीं छोड़ेंगे, कहा है।" "कही एक जबरदस्त गलती हो रही है-ज़ वरदस्त।" ए० वी० और नही सभाल सका, पेट की अंतडियो को उद्वेलित करती हुई बात निकलती है, "कहाँ ?" "हम लोगो की बातो मे, काम मे ।" "या कि पेटी-बुर्जुवा डर, भ्रम, दुविधा, द्वद्ध ?" कमरे मे वे लोग महज पांच हैं। सांसो से हवा गर्म है। चैन की कोई गुजाइश नहीं है । वूडो ने ए० बी० की बात खत्म होने के बाद सूखा थूक गटका। मन्टू की आंखें फर्श से चिपकी हैं। ए० वी० ने गले को जहां तक सभव हुआ, नर्म बनाया, "किताबो मे रटे सिद्धातो की चखचख का ज़माना अब नही है । यह सशस्त्र सग्राम का युग है ।" अपनी बात खडी करने के लिए ए० वी० कहां-कहां से उद्धरण दे रहा था। इस दौरान गोरा भी हिम्मती हो उठा है। कितनी बातें, कितने सवाल मीने के अन्दर डेरा डाले हुए हैं। अब हुडहुड करके निकल आना चाहते है। जल्दवाजी मे वात गले मे फंस जाती है, सीना गर्म हो उठता है। "मुल्क के नब्बे प्रतिशत लोगो को एक कतार में न ला सकने पर काति नहीं की जा सकती।" "मी० पी० एम० का तर्क ।" "नहीं । मैं मिर्फ स गठन की बात नही कर रहा हूँ। मैं उस नारे की बात कर रहा हूँ, जिसे उठाने पर कारखाने का मजदूर, खेत का किसान- सभी म्वर मिलायेंगे?" "निवारन मजदूर नहीं है ?" - । कमिस 97 हो मगर है। मगर उंटाई मगर । हवामाग्रस्त । में कोई मौर बात नही कहना चाहता। दूसरा कोई इस तरह पार्टी की निदा परेपो ।" 'पठा है या हाता? मगर में एक फसमा पाहवा हूँ।* मीन के छोटे-से माप पर छोटे-छोटे बाम । -मोवास। मौष का सारा कामा रंग अब मीर नहीं दीख रहा है। उसकी पटी गांवोंक मरहमा से बास हिल रहे हैं। मार्मों बीच में से माली पड़ीपी बाद मिमे व रही है। बान कैसा एक विस्मय एक र मीम को नियम या है। धीरे धीरे करक। यह यह तमाम बातें नहीं समाती। फिर भी ए.पी.की धारदार बातो की धार उसे बीप रही है। मठीसी पतली बलिया के उतार पान म जैसे कोई रहस्य है। गहरा रहस्य । इसका पंत कहाँ है मीनू को पता नही है। उसे फेमस पता है बचाने में राहत पान पर और छ यार नही रहेपा । उस पता है, सोना कहत्पारे अभी तक सीमित है। मोर गितम दिन ये जीवित रहेगे उतने दिन । उठने दिन सबने की हरियों को कठोर बनाकर जैसे कुछ करने की मुन बनी रहेगी। ए बी.की तरह। माधी-सूफान की व्यापार की न्य। माग की लपटों की तरह। पोड़ी देर पहसे ही पास-मुबाहिसे का एक वीर गीत पुका है। उसकी समीकमी तक नही कटी है। भैसे यम माप इस छोटे कमरे में पार मगा रही है। गौरा अचानकवीला उंग धैर्य मेकर बापडापा सारे बस कसानों को धीरे धीरे बगाना पड़गा।" और ए०बी० की मम्मी परवम पाठ सुमत ही अनुप की पहनकर टेढ़ी होने लगी वैसे ममी अनदार तीर घटया। सौ-माँ की मावार के साथ। मोर पारा मुस परबता रहेगा। कुछ समय बारसपान की धार पटने लगी। मोट होंठ। टडी-मेडी हसी की एक पतसी रेसा वाड़ी के मम्पर पो गयी। ए.मी. में गोरा की बात का जवाब नही रिया। कपल हसी घिमी रही। होठों की दरार म । एकपाश्चर्यजनक सर्वाका भाव मौर कठिन मास्था मकर । मन्टू की सुर्स बिनमारियों की तरह पमती दो बा स्थिर मही रह पही बन्छा कामरेर ए. बी. क्या आपको नसवा है कि हम मान ।

- ?" 98 कमूनिन प्राति नहीं चाहते. ? कितने खतरो के बीच हम लोग एक साथ रहे है, घिगव तोडकर हमने रास्ते बनाये हैं, जुलूसो मे नारे लगाये हैं।" 71 ए० वी० की धूसर बांखो मे जान नहीं है, "है क्या "आपको बातचीत का तरीका बदलना चाहिए। हम लोग क्या आपके दुश्मन हैं ? पार्टी के दुश्मन "हम लोगो के कामरेड लोग जान विछाकर रास्ता बना रहे है, मशस्त्र क्राति की आग की लपटो के वीच से हम लोग चल रहे है। वात- चीत तथा कामकाज में 'जो पार्टी की खिलाफत करेंगे, क्या वही दुश्मन हैं, प्रतिक्रातिकारी ?" तभी गोरा के वालों में हवा का एक झोका फैम गया, "हम लोग प्रतिक्रातिकारी (जसे उसमे लेने की ताकत भी नहीं है)। तू अपनी हद से बाहर जा रहा है-अरे, सी० पी० एम० को भी तू प्रतिप्रातिकारी नहीं कह सकता।" "तुझने राजनीति सोखनी पडेगी।" बूडो अब तक कुछ नहीं बोला था। जैसे सुन्न होकर बैठा हो। दियासलाई की जली हुई एक तीली से फर्श पर कुछ उसने कहा, "यह मालोचना का तरीका नहीं है।" मोनू ने भी सीने मे सांस भर कर कहा, "हां गोरादा, अगर तुम लोग इस तरह पागलो की-सी बातें करोगे तो फिर ।" मीनू अपनी बात खत्म नहीं कर मकी, जैसे किसी तीखी वेदना ने संडसी ने लडकी का गला दवा दिया था। मीनू की आंखो से टपकता हुआ पानी। पानी की बूंदें। और अचानक माथा गरम होने से गोरा न जाने कैसा उदास-उदास हो गया है। कुहरा-कुहरा। उनके चेहरो की रेखाएं अब. दिखायी नहीं दे रही। मीनू की अम्वाभाविक रूप से पतली रुलाई के अनगिनत फूल गले में खिलने लगे । "तुम लोग इसानो को राह दिखाओगे गूगे इमानो की ज़बानो पर वोल खिलानोगे-एक साथ लडाई का सपना, इसान की तरह जीने का सपना । धुन मे पागल होकर यह लोग जहरीले झाड-खाट उखाटेंगे। जल्लादो के देश को तहस-नहस कर देंगे। झडा गाडकर यहेंगे, यह मुल्क हमारा है, यहां खूनियो के लिए एक इच भी जगह लिखते हुए 4 - मूनिस 99 नही है । वौर तुमी मोग अमर मापरा में एक्सरे की छीछामेहर मीन का चेहरा माल हो उठा-प्तिना गर्म वाड़ने की से मोर कितना उत्तेजना से पिम पता ! मगर मात करते समय उसके सीमे पर से पामत फूटा पा रहा था। फिर भी पाते उसे पहनी ही पड़ेगी। बिना कहे पाण मही है । और सीना सामी करके सबकुछ नबमकर मडकी की सासी गान गान किस उम्मीद से गोरा के पेहरे पर टिकी हुई पी। एक पिपित्र तमाम में परकर पोरान हो या पा ममर यह छीछामेवर नही। ममममही पा रही है मीन् । नही इसकी परत नहीं है। 'तुम महर भावनाओं के मायेन पर बम्मे वा रही हो।" 'भोर तुम मोय? 'पया हम मोम क्या?" 'तुम सोग पहीर काम का या गामने रखकर सोचम बैठहो कि किस भोर पाना है ! तुम मोग इंसान हो ?" मोराप हो या पुछ म बात मा। बोममे से ममा क्या होगा। मीनू तर यह सोच यी है कि बोरा भयात है। इसीमिए तिमपट्टे की वरह मर हिला रहा है। बार-बार कसेगा सुममने लगता है। मोकगार ममता है पापम की तरह सब-कुछ तहस-नहस कर से मोर पतारे- रेस देव में रामहीं हूँ । ए साम दो-तीन एकचन कर गमे। मोमबत्ती की मरियत रोशनी घुम की तीवी गंध वीरशमकी हमा में नीफोटो घड़ने की कसमस में मोरा सही चाता पा रहा है। मपने को बहुत ही मकमा मामूम कर रहा है। ए बी का सम्बोवरा पेहरा मीन की पतती हुई अंगार-सीमा मौर मन्ट के माथे पर पटे का दाग--सवको पीछे छोड़ पान कहा मामे बड़ा बा रहा है | होगी मे। मोरा का मारा मुक गया है और एक मसाप गरमा में हॉट परपरा रह ! “मान् मीन् मीन दूपतत समग ही है बहन । ए पी० का मुंह बस तुमा हीपा बान कौन-सी पवरमा बाट कहने मा रहा था कि ठी उसी समय मिगारन मोर सुकेधापक 1 .

ने दरवाजा खुला। साथ ही हवा का झोका कमरे में घूल का जपकड लाया। वाहर आंधी और तूफान की खतरनाक होड जारी थी। लगातार सो-मो के शोर ने घिरा ए० बी० का गभीर स्वर, "कल दोपहर तभी रहो। उस समय ही कामरेड गोरा को जो कहना हो, कहेगे। तभी एक पक्का निर्णय लिया जायेगा। यदि तव हम लोगो को अलग होना पड़ा तो वही होगा।" सुकु के पाजामे पर खून के छोटे। चेहरा साधु-सन्तो की तरह । जाने नमा विचित्र स्थिर चेहरा बांख की जमीन विलकुल नफेद । और तृप्ति। भरपूर तृप्ति । निवारन पहले ते अधिक तना-तना-सा लग रहा है । नुकु ने पाजामा उतारते-उतारते बचानक गाना शुरू किया । आप-ही-आप- 'पैदा होये तें मरे भी पडी यह तो जाने सभी भाई ।' सुकु ने पाजामा छोड तहमत गठियाया। और निवारन इस बीच मुनाये जा रहा है वदले की उत्तेजक कहानी। पेट मे छुरी घुसेडने से पहले कास्टेबल की जीने की तीन लालसा कैसी कुडमुड गयी थी। निवारन, सुकु और ए० वी० की वातो से, व्याख्या करती उँगलियो ने, मीनू ठीक होती जा रही थी। रह-रहकर उसके चेहरे पर एक चमक खिल रही थी। नाक फूल रही थी। लडकी के सीने मे उथल-पुथल हो रही है । बात कहते ही सुकु के गोलमटोल चेहरे पर प्रशात हत्ती उभरी। उसके चेहरे पर एक गहरी शाति चो, जैसे इसके बाद मरने पर भी कोई शिकवा- शिकायत नहीं होगी। मीनू के गले मे दुलार, "पेट मे कुछ गया है?" "नहीं।" "पहले कुछ खा आगो।" मोनू अब जननी की तरह है। फिर वे लापरवाही से हंसने लगे। तब तो जनम-भर का खाना हो जायेगा। वेलेघाटा की मिट्टी सूंघ-मूंघकर तलाश रहे हैं । गोरा की जीभ जैसे गिर गयी है। जवान पर एक भी शब्द नहीं है। इन लड़को को छोडकर वह कहाँ जायेगा? किय जहन्नुम में मन्टू लगा- तार उँगलियां चटवा रहा है। बोर निवारन बूडो को कोच रहा है क्यो, इस तरह जोक्तिने दिन चलेगा? वात दगा दे गयी। बोपडी के भीतर कच्ची आग । होठो पर एक - कमूनिम 101 बात मायी। मिर पकाकर मोरा संभमा सोना का बवमा इम तरह नहीं मिया जा सकता। और सोमा मोबासे के लिए नहीं लगा बह मड़ा पा सम्पी बारावी के लिए। तुम मोग मसस में बरपास नहीं कर पा रहे हो इसमिए। क्यों हरम क्यों कर? हम मोम भूम है ! सुको एकदम प्रति पेहरे पर अचानक एरी की धार फा-मा तीया पन उभरा अब तक तुमसे कुछ नहीं कहा अब मौर बरदास्त नहीं पगा। समोर जंग के भीतर हम माम बस ए है। उममें तुम पुन मगाना पाहठे हो। मीन गाने क्या कहार सबको ठग करना चाह रही पी ! समझौता। उनके योमों में मभी विचित्र धार है । माम-पान मिट्टी म मिनाकर स्नेह ममता वैसे तमाम मोहर फेंककर बदमे में नाव हिसाब दुकाने बाम- प सभी निष्ठुर तपस्वी है। मसाईट पर टिकी मोमबत्ती का टररा। बममता गमाहा। मोमबत्ती मम-पमकर सी स्पे-सी मन पपी है। रह रहकर पनीता सुमपम की सरसराहट-सी हो रही है। फट फर फट् । मोर मोम पानी सरीवा गम रहा है । पोड़ी पर पहले की या मरमी मर मही है। मग उतनी मांग भी नहीं है। ए.पी में पेब से एक नक्सा निकासकर फर्य पर बिछा दिया। मेदिनीपुर गिने के बानदार नमय में एक बमह पर माम की अस्पप्ट रामनी टिटककर पदप कर उठी से माय समी है। निमारन ही मामबत्ती पहा पा। निवारण की हुपियार की तरह बड़ी माक ममी भी जम पी है। नमले पर रो-तीन चेहरे मुरु पये है। ए.पी. की पाती पतमी महिमा मकवे की पत्नी रेखा कर मामे वापी । और पादी पाभी की चाह ममता मोम गिरफर नकोसीन पर मोतियो मे गोन साग उभार पहा है। यह है मागपुर स्टपन बस एट और मेदिनीपुर टाउन इधर पगम है बिहार के भीतर स होता हुमा एकदम पीकाकुलम तक पता गया। सिहावा । सिंहावा मुकुने पूरे पेहरे पर ति फट पानी। मिहाग निवार 102 फमूनिस को टोली उंगलियां बंधकर मजबूत हाथ की मुट्ठी वन जायेंगी। लिहाजा ए० वी० की भूरी दाढी के पतले उदास जंगल मे रहस्य की हंसी। नाधार रूप मे एक सुर्ख इलाके की चाह । इच्छा । उतावलापन। जाने किस बात को जल्दबाजी है कि उन्हें जला-जलाकर सीक-कबाव बना रहा है। ए० बी० की बातो के बीच ही मोमबत्ती के पलीते में फिर आवाज़ । फर-फर करके एक पेट फटा तिलचट्टा उडने की कोशिश करके नक्शे पर छिटक पडा। और आवाज़ हुई। मछली के पेट फटने की तरह एक वेढंगी आवाज़ । ए० वी० की दोनो आंखें जाने कैसी धूसर दिख रही हैं । चेहरा दिन-ब-दिन कागज़-सा होता जा रहा है। मोमबत्ती की मद्धिम रोशनी मे ए० वी० का चेहरा रक्त-शून्य लग रहा है। जैसे शरीर को निचोडकर सारा खून निकाल लिया गया है। साली फोक बचा है। भीगे हुए कपडे के गोले की तरह दोनो आंखो मे दुर्दान्त व्याकुलता। "क्राति का काम द्रुततर ।" और आगे बात खत्म नहीं कर पाया। अंधेरा मुंह खोलकर सारे इलाके को निगलकर बैठा है। नाले के किनारे मरी गाय के फूले पेट की तरह बेलियाहाट्टा का आसमान । वेलियाहाट्टा के आकाश मे आज एक भी तारा नहीं है। गोरा रेलिंग पर हाय रसकर खडा हुआ था। उनकी बातो के अश उडकर कानो मे आ रहे हैं, जबकि, अघकार का सागर ढकेलकर उसकी थकी हुई आंखें दो तराको की तरह जाने किस चीज़ की तलाश कर रही हैं। काफ़ी साफ-साफ समझ मे ला रहा है कि अब वाकई अलग होना पडेगा। रातो साथ-साथ जागकर, पुलिन की गोलियो के सामने कधे से कधा मिलाकर, वालिग की स्याही मारे बदन में लिपटाकर, लगातार सिगरेट पीकर, इनकलाव का नारा लगाकर इतने दिनो मे जिस सम्पर्क की जडो ने सवो को बांधा था, कल दोपहर को वे सब उखाड देनी पड़ेंगी। सुकु, निवारन, ए० वी०-इन सबको छोडकर गोरा कैसे बचेगा? कैसे मुंह हिलायेगा? पांव चलायेगा? दिमाग चलायेगा? एक ज़माने से वह अकेला जीना भूल गया है । और इस गलत गली मे से चलते हुए वे लोग भी भला कहाँ पहुंचेंगे? नोचते सोचते गोरा जैसे कही खो गया। अचानक सोना का चेहरा गांवों के सामने छोटे वल्व की तरह, बतरे के सफेत की तरह जलने-बुसने कमूनिस 103 मगा। मगर यह किस तरह मागे गोगा? उफ सोना तमगरपिता! बमर पर समाप्त पाता ! मापे की वोर्नो मर्से फल रही थी। पूत-फमकर मोठ-सी बन पाती है। यत्रमा मार दीधी होती है। एक वीवी पंपा। किसे पता है कि इन दिनों क्यों मावे की दोनों मोर गर्टि-सी फूमन भगधी Iसिर की नसों में एक दुईममीम निभाय । झटकों में विराग ये कोई एमी से समूचे मापे को पकाकर खींचने मरता है-यह क्या सोना है? साप विस तरह महा पाते हैं। श्री मामी से मात समाकर ठे हते है उसके बाद घट से सोपड़ी पर मुंह मारकर निपस जाते हैं। परा सी भी बाबारा नहीं होती। बस पात्मा । भमकर रात मे मूर्त सिकारी की वह परिमाकर मचानक मेमियाहाट्टा की गरदन पर मी पटस निपम लिया है उसे । सरम सीधा बेमियाहाटा। विलिंग के एकांत साप्ती कमरे में एकसान बर्षन है। मस्थिर होकर पबी.पामादमी कर रहा है मीन को रखने मायड एक गेस्टर के बारे में सोचते सोचते । ए.पी.के बेतरतीय माम मौरमहाराही में भरण्य मेघ । गान कैसा एक अपसीपन है ! माम फैंस गये है पहरे पार्टी में यूरोपन की हमकी छाप । म साप पारा की गस-परी गमवाधीनी मम्पर्ष में एक वाहन पैदा कर दी है। से मुस्वानोमी से मब फायदा नहीं है। सेर चिया साम । इसान की धममा भारतवर्ष की परम एनीति कुर्सीबार मोर भापों की बजाय में निस्वार्थ सम मारी है। समोर निवारन बात-बात पर उसी समय की बात पहते हैं। काशीन तयाना पिरमा भगवान-पही है इस देव का इतिहास । बारावी का इतिहास । विस बाबारीके मिए बमोन पोतों को पीपार ममातार मा रहे। सनी मावारी । मुख की पमे की नसे उसी के बादान में कांपठी है परस-गरम पर विरेशी गमन सम्पया मूर ने गावा! मा के मासूमपने बना से साधी-नया समाना माना है छीनकर भागरी मानी है-हाली... सानी है। बदन फिर गर्म हो उठता है। उधर पिपिचारों मोर भएमंत्री वह मेरा गुपचाप मात गाये बम है। कोईमानी बागार 104 कमूनिस - घर-घर, घटांग-घटांग की आवाजें भी नहीं हैं। कोई आवाज नहीं है। विचित्र मन्नाटा । खा-खां करता हुआ वीराना । एक विचित्र अत । हू-हू करती हुई हवा । सीने में खिंचाव, “मीनू, तू पागलपन मत कर वहन, इस तरह नही होता पहले तू समझ तू जान ।" मीनू की दोनो आँखें कही दूर अटकी हुई है। बहुत-से हाथो की पहुंच मे परे, कही बहुत दूर। सारे चेहरे पर उत्सर्ग की छाप। लडकी के चेहरे पर आश्चर्यजनक प्रसन्नता। सुकु और निवारन पेट मे जलन के कारण खतरा उठाकर बाहर चले गये हैं । बूडो और मन्टू के शरीर नीद की बेहोशी से लुढक गये हैं। और गोरा निहायत ही स्नेह के साथ मीनू को एक बात समझाने के फेर मे ठोकर खा रहा है, कठोर पत्थर पर सिर पटक रहा है। मीनू की ओर झुककर समझा रहा है। और अचानक गोरा ने देखा, मीनू के दबे होठो पर शोक और दुख को परे ठेलती हुई एक मुसकराहट । गभीर रहस्य की हँसी, "अव यह नहीं होने का गोरादा, मेरे सामने अब एक ही रास्ता है।" ए.बी० का हाथ क्षणजीवी पछी के पख की तरह फैला और वह खुश हो उठा, "ठीक है, चल ।" यानी एक शेल्टर तय कर लिया है। मीनू तो चलने के लिए नपार खडी थी। सिर्फ एक बार गोरा की ओर देखा उसने । माफ स्वच्छ हमी, “चलूं।" और एक कटु आवाज करते हुए दरवाजा खुल . . गया। नन्दू और कूडो दोनो नीद से कातर है। बूडो तो इस मामले मे एकदम मचा हुआ है। जहां-तहां पसरने की गुजाइश पाते ही पसर जाता है। और कोई बात नहीं हुई। रोशनी के नाम पर एक ईट पर जली हुई मोमबत्ती बहुत पहले हो बत्म हो चुकी है। फिर भी वचाव नहीं है। मोम को हली बनाकर उसी में पलीता किसी तरह खोस दिया गया है। गोरा ने फूंक नारकर मोमबत्ती वुझा दी। रोशनी वरदाश्त नहीं हो रही है। साथ लोफलेट के वडन पर चूहो की उछल-कूद शुरू हुई। खस-खस की नावाज उठ रही है। इसके अलावा सन्नाटा। कोई नावाज नही एक आदमी के सांस लेने की आवाज़। रात को थाह नहीं है । वज रहा है। लडखडाते शरावी ने प्रेम-गीत गाया। " पमूनिम 105 मीत गा उठा सड़क पर बमता कोईरानी। निवारन और सुधीरे-धीरे सीटी बनाते हुए मार रहे है। सीटी जवावे हुए कोई माना गा रहे है । सकी हवाई हमीर का कोना और की तर उर रहा है। पेट को सफर बामा है। मिमांबगान बस्ती के सस्ते सीपकबार और रोटी से ! हिंग पकाकर पाना पा रहा है। गुनगुनाकर । जबकि पोरी देर पहले पाम में फेमने बामे थे। पनामे जाम में । हसते-हसते रस सेते हुए निवारन ने कहा 'पराने हो मये पे सासा ..से बोगों से नियस हा पा।" कहकर पाईसा। कितना मरामा हा है उसे इस बात में मार निवारण की ईसी की भागार ए.बी. की मांगों मे बिचाव पाकर पी, "बाहर पर्यो निकल ?" अचानक से रिम का मिचाप ए.बी.के गमे में एवरमायापा। तीचे स्वर में बाबरा रहा है “कम ही तुम मोम इस इमारकी छोर पामोरे। यहाँ से परे हो कुछ दिर्मों तक। उसके बाद मेदिनीपुर के कस्ट में चल मागोगे।" पुल का छोटा-सा मोम सिर मन्त्रों की तरह हिम पहावा नन् मा तिमी बनी नहीं पर का काम ।' 'तुमे सोपना नहीं मा।" "नगा। 'फासतू पकरा पायेगा। 'इसमा मासान नही है।" "न-नना तुझे बाना पड़ेगा। ए.पी. की दोनों मांस बाहर निकमने को हो रही थी। और सुपु का चेहरा ठहरा हबा और शांत 'कम्युनिस्टों की धसभी परीमाया है ?" ए.बी. अपने हापों से बड़े स्त्रको पापान महीं पा रहा है। बीम गर्ने की तप बाहर मौक ममी-पाया उलयाह । कारागार पोमिकी बौछार। ए. बी० की बीम सुम्न-सी सूने की तप मन ही है।

106 वमूनिन
और
मुकु
जीभ की नोक पर शब्दो को नचा रहा था, "कत्लगाह।
कारागार । गोलियो की वोछार।"
मुक अब पहचानने में नहीं जाता । उनके शरीर मे अव शहीद-गध है।
होठो ने हलके ने गाना शुरू किया, "पैदा होये तें मरे भी पड़ी रे ।"

- 'अनगिनत क्यो के फूल उगाकर छन्द गूंथने की स्वाहिश भारो मादिरी दिन। सड़ी गरमी मसाहनीय हो रही है । उस बमोदू गरमी को पीर कर मुई की तरह वीसी हवा का झोंका हकरके और माया । मीन के ठी पानी के सीने से काई मार सँगार की पम्ध मकर । ए.बी. के हापों के रोम काट की वराम हो पम सरसरात हुए। मीनू को पास + एक खेन्टर में रात भर के लिए रख माया था। किसी तप से रात गुगरने के बायकोई राम किया जायेगा । बस रस भाया है। दो घंटे बीततेन सीतते ही पाता हापिरहई। मीनू के रोस्टर के बगल माते मकान में ही छापा पड़ा है। तेह-बीरमान के एक माकेको ठाकर से गये हैं। सी. बी. ( मोम मम नये देशाती' महीं कहव) मौर कामराव मिमे है। समाचार देते समय नास्ता केहरे पर ए बी० म विरक्ति की रेवारेसी दी "तुम मोप कैसे हो दादा होई मातचीत मही पट से महकी को रसार पमे माये। चाम्ता गसे में जाने कैसा वीवापन है ! बगाव म देकर ए.बी. ने नसके पहरे कीमोर देखने-समममे की कोविध को। सड़क पर उतरकर शान्ता सिर मुका कर पममे भयी। पम पनवे फुसफुसाकर कहा अगर ऐरेस्ट हो जाती-फिर काम के #पा पुरी तरह प्रवरा मये है। बाती उत्तहार, माबो की पतमी-पतमी किताब भी बैठकर बना है। मौर मुमे युमाया सो पार रेवती कि दोनों पति पुएँ से खराबी की 1 मापसमाधि-निनवाशाम्पमापी पार्टीका मुगा ।

106 कमूानम - तरह लाल हो गयी है और डर ने हाथ-पांव सिकुड गये हैं --जगोक से पहकर इसे जल्दी हटाओ यहाँ से ।" चलते-चलते ए० वी० ने तेजी से कुछ सोचा। फिर एक और शेल्टर मे लडकी के लिए रात गुजारने का इतजाम करके लौटा। लौटते समय ही चिट्ठी मिली । छोटा-सा एक कागज । चार तहो मे तहाया हुआ। सारे पसीने का जाने कैना एक पीला-सा निशान । भोला ने चिट्ठी दी थी। मोड पर चाय की दूकान अभी पूरी तरह से खाली है । भाटे की तरह चूल्हे की आग उतार पर है। लाल-सी एक म्लान आमा सुलग रही है । कोयले जल-जलकर सफ़ेद हो गये है। राख । ए० वी० ने दुकान में बैठकर ही चिट्ठी पढ डाली प्रिय कामरेट, एक जरूरी काम से कलकत्ते आना पडा । आकर सब सुना । तुम लोगो मे बातें करने के लिए दिल मचल रहा है। इसके अलावा और भी कुछ गभीर बातें करनी है, कल दोपहर को आऊंगा। रहना। कातिकारी अभिनदन के साथ- नारान दा चिट्ठी पटकर, उसका गोला बनाकर आग के पेट मे फेंक दिया। गोल कागज जलने लगा। और ए० वी० ठहरी निगाह से उसे देखता रहा। भूमिगत जिन्दगी को ट्रेनिंग, दस्तावेज पाम में रखने से काम नहीं चलेगा। कव फम जायें, कोई ठिकाना नहीं । पहले कागज काला पडा और फिर भवक से जल उठा। बस खत्म । मीनू को शेल्टर में पहुँचाकर लौटते समय रास्ते में जाने कैनी एक गध मिली थी। कटार की तरह तनी ए० वी० की नाक को अचानक गध मिली। पुलिस की बू । दांत पीसने, पहियो के घिमटने की-सी कोई आवाज़ सुनी थी शायद । चारो ओर जीभ उखाड फेकने वाला लूला मातक। पुलिस-बैन की म्याहो जसो गहरी रात । मरे हुए कछुए के खोल की तरह तारकोल का रास्ता नितात खाली हैं। एकदम सा-सा कर रहा है। कपy की गध । कपर्दू मे ही रास्ते मे वच-बचकर, जिप-छिपकर ए. वी० के साथ वह एक दूसरे शेल्टर में बनी गयी। एक बार भी घुटने नहीं - मूनिस 109 कांपे । सारै रास्त में पबान से एक भी सच नही निकमा । पनीसी यात्रों की गोडी तेसिहा स्याहीही छाप मिये विमकुम सूसी है। ए.सी.कह रहा था साबमामी से रात मुगरना। मोमू म पम तक नहीं मूगी। इस साकी का सब-कृष्छ विचित्र है। एकही पोटी की यह मीन भब पिठनी तनी हुई है । कठोर । बसे छिमी न भीतर से नीव रखा है। उसके पास ममा मोनों से मामू मिरामे का वक्त है । यह मसन बालक पानी से मांत होन मामी नही। ए.बी. का मन भी पान क्या टपकन मगा मोम की दों की तरह। बिस्टिग पमरे में माकर एकदम गंमा बन गया । मन्टू और पुगे महोश होकर सो रहे हैं। निमारम मटे मेटे करवटें बदम पाहै। मुके होठों पर फूमझती बसा गाना मन नहीं है। ही मौधा लेटाहमा है। और ए. पी. विएकीक पास पुषपाप 4ठा है। पोमा बलि रोशन करका एक परसा-सा पामा भी निगाह से जपकर महीं निम्मने वा । सिर पर मोमियों का बोखिम मिय वितिय का कमरा चुप है । बीच-बीच में सामी सांसों का मम्बा सिमसिमा । बौर विषट्टे के पपो की फर-फर पनि । स्ट्रीट मार की हसकी पतसी रोमनी की मीर पिर रही है ए.बी के सम्बोवरे चेहरे पर उभरी पर । वरतीय वाही के भीतर से रोमनी का माम । परा दूर से पारा ए.बी.को देख रहा था। ए.बी.के भीतर मन तक रेव पाम के लिए उसकी बात पुरी तरह से जम रहीमोल की पुतमियां कड़ी हो मामी । कैसा मसग-अलम-सा नपता है। एकदम असम ईमान । निजी के पास ए० बी पी पटना मोड कर बैठी शया बालों से भरा माषा मोरा ने उसे इस तरह तटस्थ भाव से पहले कभी नहीं देवा । सपका बह रोवावा भाव कहाँ है? महर तरतीब नामों की वाडी डीबीच में मौत का-सा विचार ।मापरणाही मे भरा हठ । फिर भी उस मसान मीची रोपनी में ए.बी. पहरा शोर मय रहा है। ऐमा गत किम जानता ही न हो किमी कमी होती है। ए.सी. का पर कर मारा अमन बहाने मगता है। श्विनी बाते मन में भनी रही है या समाप्त नहीं पा रहा है इसीसिएरलापरता। और-- H 110 फमूनिस ए० वी० की छाया में उसरे क० की दोनो हड्डियां जाने कैनी मुट्ठी हुई दिख रही हैं। "सिगरेट पीएगा?" अखाड वालों का सिर जरा हिल उठा, "दे।" "एक ही जला रहा हूँ। वाहर रोशनी दी सलक टिक जाने पर कोई वचाव नहीं है । कहां कोई घात लगाकर का हो, पिसे पता है । साय की पंछ की तरह । एक वार पवि-भर लगने की जरूरत है।" दो-चार कम खींचकर गौरा ने सिगरेट आगे बटायी, "ले।" सीने में सांस अटक जाने से निवारन नीद मे गोगो कर उठा । सुपू जगा ही था। उसने उसे कघा पक्डकर हिलाया, "एई क्या हुआ!" गले में लार लिये निवारन ने जाने क्या कहते हुए होठ खोले, ".. सुकु .साला मार डाल .ना" और मागे नहीं बोल सका। जीभ भारी-भारी-सी हो उठी। सिर हाप पर टिका कर फिर मो गया। गोरा को बदकिम्मती कि उसकी आँखो मे नीद नहीं है । मुकु की भी। यो ही पड़ा हुआ है। नीद नहीं बा रही है। आजकल इट से नीद नहीं जाती। निवारन की गले की आवाज ने ए० वी० कैसा घबरा गया है । निवारन मानो घर मे पस्त होता जा रहा था। किस बात का टर? निवारण को तो पोई डर-वर नहीं है। गोरा के बारे में आजकल कुछ पता नहीं चलता। अचानक वह धडधडाकर क्यो जवा? निवारन पया कोई सपना देख रहा था? कोई खतरनाक मपना? या मन के भीतर लटाई के महाकाव्य के तमाम अशेष अध्यायो का पार पाने मे ही टूवा जा रहा था जगी हालत में नशय के जिस कोडे को लगातार दवाये रखता है, नीद में उनी ने मना किया है। ए० वी० की नांखो मे क्या एक मवाल पूल आया है? खिडकी की ड पकडकर दोनो बखिरान्ते पर फेक दो हैं। बटनी भी आवाज सीने की हड्डी चूर-चूर करके ए० वी० को नीधा कर देती है। एकदम तान देती है। दूडो की नीद मे खलल पड रहा है। बड़े-बड़े मच्छरो के डक, वैन के पहियों की आवाज , लपकती नाग-नी जिन्दगी के जलने से भी नींद नहीं जाती। नाक के छोर को लाल झलक देते हुए ए० वी० ने सिगरेट का लाजिरी कम खीचा, "शान्ता आज कैसी चुप मार गयी थी।" । + म पनिम । पमवार की तरह अंधेरा मूम पा है।ए. पी.की मम्मी माम मे मागीलो गया है। मायद मोष रहा है कि कोई बाठ उसका जमावबौर समाव के लिए उसन पाबाट पोरे ही कही पी। शायद मचानक महम का बहा या मा गया या नपु की हानी । शान्ता के दम तमाते गए पेहरे पर मेपु का भविष्य । बीच-बीच में एमा होता है मपामा कोई बात याद मा जाती।इस स्नेहिम ममतामय बादमी क बदन पर पीठ पर हमासे पासे रबर हाय फेर मान की एक बाहयती है। इस सर्वनामा चाह की पग से ही उन्होंने रो एक मादमियों का मप से ठा मिपा है। सिर्फ पुसिस-सेना ही नही है उमक एजेंट मागासकी वरह बिखरे हुए हैं। परला कोई सोच सकता पा कि पिटन रबर का साद मुखबिरामसत में विममा कांग्रसी है। पोरा सोच रहा पाकि सापर चमे बहन की बात अचानक यार या पयी है, इसीलिए ए. बी. की बड़ी-बड़ी मांगों की मार देखकर उसने एकाएक पूछा "नपुरे मिए। कान्वा इसनी चुप्पा है कि मेपु के लिए होने पर मुझ पता नहीं "फिर "डी मास्पा रस मही पा रही है मुरारी के मारे जाने के मार से ही निस्सिम की मौतों को लेकर उस दिम एक गुमस निकामने की होसिव की पी उसने । मैंने मना किया । प्राप, बहस भी हुई उमरित ही पता लगा । गुमूस झालांकि पुमूस नहीं निफमा । वोर ।" भोर की ठगी हया से कमरा बफ-सा बना हुभा है। मेघकार फीस पा रहा है। दर-पूपमा हमा मधेरा ममता वा हा। निबारम रात भर कराहार या मुर्दे की तप सो रहा है। कोई भावार नहीं। निबारन की बसी हुईसकली-सा पहरा अब विचित्र कोममता सिये है। सोते हुए बादमी का चेहरा कैसा बों का-सा हो जाता है। सरम मसहाय । मामा मुछ महीं मानता। मानो बड़ा है, कमजोर है। निमारन के जान पड़े की काट देत मोरा के मन में ऐसी बहुत बाते मारी । बसस में गोरा को ममता हाकि सब-कुछ बमर बहन मान या छ 112 कमूनिस खोजता रहा है। वह जैसे उनके बीच रहकर भी अलग है। बलग । छान- बीन कर देखने की जाने की एक आदत बन गयी है। जैसे मीनू को देख लगा था 'वह शायद सोना के लिए ही अपना जीवन समर्पण कर बैठी है। प्यार को समर्पित ।' काति के लिए समर्पित प्राणों की भी कमी नहीं है। मगर मीनू ठीक वह नहीं है, मीनू ठीक नोना नहीं है। फलस्वरूप उसने जलते हुए बहुत कुछ चटपट निगल लिया है । अभी वह कच्ची आग हजम कर सकती है। इस शर्मीली, एक चोटी मुलाती लड़की को गोरा आज से नहीं जानता । वही मीनू, वही काली आंखो की पुतलियो । आज बहुत हिम्मत ने बनजान लोगो के घर रात बिता रही है। यही मीनू उस दिन सुकान्त के जन्म-दिन पर 'बोधन' कविता का पाठ करने के लिए किसी भी तरह राजी नहीं हुई थी, जबकि वह कितना सुन्दर कविता-पाठ करती थी। अच्छा, क्या अव भी उसके गले मे आवेग उभरता है। आज शायद अनजान लोगो के घर मे परम आत्मीय को तरह लेटे हुए भी मीनू को नीद नहीं आ रही है। यह यप्रणा क्या प्राति के लिए है ? अपने एकात मे एक सीना-तोड आर्तनाद । मगर वह आदमी जिसके लिए उसके सीने में तूप की माग जल रही है, वह तो काति में शरीक है। उसके प्रति लगाव रखना भी क्राति के लिए लगाव है। फिर भी कही एक पेचीदा भवर है। सव-कुछ जैसे कही उलझता जा रहा है। खिडकी के पास मिसककर ए० वी० फर्श पर फूंक मारकर लेट गया । एक हाय भाडा माये पर है। और एक सुकु की पीठ पर । उंगलियो की पोरो से स्नेह की वाढ उतरी, "मिनती भाभी आयी थी। विजयदा भी।" सुकु चट मे उठ बैठा, "कव" ए० वी० की शात आवाज, "शाम के वक्त, मुझमे भेंट नहीं हुई। भोला की दुकान मे एक चिट्ठी रख गया था। नारानदा की चिट्ठी।" मिनती भाभी आयी थी। इसका मतलब है रा ज रोड की खबर । नाटे अली की बात । पुलिम के जुल्म की रिपोर्ट । और फिसे खीच ले गये, ऐसी बहुत मी वात । इन्ही खबरो के लिए वे लोग सांस रोके बैठे हैं। सुकु की विधवा मा। अचानक उनकी मां की बात मन में की गयी। चट । कमूनिस 113 से बात कपाम बीपपामायो । म सम्म एक रात के लिए भी मरका मा समसग नही सोया । बीस साम का बदाम मरका सुष 'भारानदा माये है। पोरा मौर स्थिर नहीं रह सका 'कस ही शायद। रात फोफामी छामा के ठसे साम-साप पकर मी मोरा भाग किसी भी वह ए.बी.को पहबाम मही पा रहा है। वह बार बामे वासी गात पर एकदम महीं है। पाने कैसा पस्त-सा हो पा है 1 कैसा सीम सा गया है ! काळी दुखी-वी-सा मग रहा है। पिभित्र रूप से टा। माता के बारे में बताते समय ही ऐसा मगा पा। शायद ए.बी०के मन के बदर भी एक बार गरगहा है। पूछताछ की छुरी से एक के बाद एक एमपन करता पम रहा है। भीतर ही भीतर चूम रिस रहा। माराना के माने की परत समय ही ए.बी.की मांव में संगम मा रेत का एक कप मुसा था। अपने माप कैसे पुप मार गया है ! मारामदा को मेकर विकास का मस्त नही है। माम तक ऐसी-सी कोई रिपोर्ट मही मिली है यह तय है । मगर बारमी दूसरी धातु का ही बना हुमा है । सब-कुछ को एकदम पोड़कर उमाना चाहता है । मीवर कहा दीवार के साप यह पयारा देर और टिककर मही बैठ पाया । कमर पक गयी है । रातपत्म होने पर मब सुस्ती भा रही है। पलकों को मब मुंबन से नहीं रोक पा रहा है। जम्हाई मकर नहीं पहर मया। उपर मेरा पिबाम पाहै। भोर की मोस मिलिंग के पीछे भीग मकान में बालों के पानी की बों की तरह उभर मागी है।मोस टपटपा गी है। मांप की तरह। पानी की तरह। मेरे मामे की बदबू और बेमियाहाट्ठा की ममर पुतलीकन के भोंपू की जान बचायो पुकार स सुबह होती है। गाने कौन मोम पीनी मिट्टी छानकर सपि में गमकर पुतली बमावे || सपनों की पुतनी । मौर भोंपू की पुकार से जान बचाने की पुकार से सुबह होती है। इसलिए भोंपू की पुकार को मभी नाम चामों की पुकार कहता पा ! पुतमीकम में किसी .

114 कमूनिन जमाने में पुतली वनती थी, किसे पता? अब तो अमरीका, इगलैंड मे डिनर मेटों के चालान जाते हैं। वेलेघाटा के बूढे मजदूर की हड्डियो मे वत्ती लगाकर उनकी मेज़ो पर तश्तरियां रख देते हैं। खाने की तश्तरी । और नाती-पोतो को पाम विकाकर खुराफाती मजदूर किस्सा सुनाता है। पुराना किस्सा। सनी जाने से काले पडे ममूडो और चूना खाये सामने के दाँतो की जडो की तरह तन मे जो किस्सा काई-सा जमा पड़ा है 'पहले थोडी ही यह नव होता था चीनी मिट्टी की पुतलियां वनती थीं। चीन से मिट्टी बाती थी मैदे से भी नरम, महीन।' माथे पर तेज धूप लेकर, दो नम्बर पुतलीकल से सटे रास्ते से जाते हुए गोरा को यह बातें अचानक याद आ जाती हैं। पुतलीकल का भी जैसे एक दिल है । कैसे नाडी पकड कर खीचती है कल | वेलेघाटा के सारे किल्ले कल की सूंड जैसी चिमनी के अन्दर जमा है । घुमड-घुमडकर पीला धुआं छोडती हुई पुतलोकल जैसे दिन-रात उस कहानी का जाल बुनती जाती है, जिस कहानी की परत-दर-परत के तले इसान जीवन्त हो उठते हैं- मारी जिन्दगी-भर शोषण, जिन्दा रहने के लिए छोटी-मोटी सुवाहिशो और इकट्ठे लडाई का गीत मेंजोकर । वह ज़िन्दगी अपनी फटी हुई कवरी में फूल टांककर गोरा को तुला भेजती है। गर्माहट लेने के लिए, हाथों की जकडन तोडने के लिए। चाय के गिलास मे चुस्की लेते ही गोरा ने अखवार खीच लिया। वूडो भी उस पर टूट पडा। सुबह-सुबह इस अखवार में मिलेगी हत्यालो की सूची और उस सूची पर निगाह डालते ही मोठे काले हरफ़ो वाली पक्नि सुलगती लाल सीको की तरह गोरा की आँखो मे बिंध गयी 'पुलिन के साघमघर्ष मे उर्फ वावू मारा गया।' अचानक कागज गायव हो जाता है। दवे जबड़े वाला सी० भार० पी० का नाटा सिपाही और उसकी वदूक की नली हरफ़ो का सीना फाडकर उभर आती है । 'सघर्प' शब्द के अन्दर कितना भयानक 'घर्पण' है, जैसे नाग की चिनगारियां छिटकती हों। माजकल अखबार बोलते ही एक तरफ मत कान्टेबल की जोरू और उनके गरीब घर की एक तसवीर छपी होती है। पुलिस के पहरे मे शोक- कमूनिम 115 गमूस । संघर्ष के बारे में सो मूठे पिस्स। युवा की मृतदेह के दुको। सोमा कहता पा पाखा देनेसिए मकसी स्माई जुरुकी है। एक सौ बीस म्पये 'उनबाह पाम बामे सिपाही के लिए हितमा पई मसत में हम मोगो को करम करेगा-सी की सफाई पेहमी पा रहे है मानते हो मोरारा उस दिन मा कह पी पी पुमिस की बोर की तमगीर देती है सोना! एकदम मम्मी है रे महा! क्या कहूँ मता सामान निगमते बाप है म उगमते । बासरी बात बता पा 'दुश्मन का त सामने नहीं रखना चाहिए। बाबू की मोटी मछ बात करते समय सरसराती पी। पायुका कसा भरीर मरा हुमा हरा। पेब में छोटा-सा एक चमकता हमारतामयी हरियार एता पा हरदम । मौर निशाना ऐसा कि मुंह में ममी सिगरेट उड़ा दे। बमाकनार में पू. पी. (बाबू कभी भी मेर पाठेर मनही मोसता पा) म रहने के दौरान दौड़ते सांप की योपड़ी में घेद करवा पामरा भी गया। मरकर ही गया है। बायका मोमा भामा बहरा महामारक भीतर से उभर माया। प्रसीसी कनियमान पर बमी बैठकों के दौरान विबरती हुई इसी। मौर मैरान की मीटिंप में पागामे के पापचे मोगर मन के पिरोह को खोहमा। यह सब बापू की बातें -। गर से पम्। मारकाट उस समय सापेचक की वफ फैम ही पी। मब तो बाहिरी हामत में है। किसम की इस लेकर मनक पार्टियां मनेक पाते कह रही है। नारामा एक बार पसरवस्ती पीचकर साये ये बापू को सुर कम्पनी के मैदान में। घोबिया का मैदान । पारे पानी की गम्भ उठ रही पी रह रहार। मोर रूपा पटान का महनती हम। मेमोग मारेंगे मोर हम भा.मों की तरह रेसमे? र्पवान मारानदा की मौहों पर विचार पहा 'यह सिर्फ दंगा है हिम्मू-मुसनमान बॉस भी पुषित पगा। बाद उत्तेमित 'बाह ! बन्छी कही । मेरे कामरायो । मारानदा म तट से बात काटी 'उनके दिमाठ दगे दिमाफ प्रचार म उतरना पड़ेगा ।" बाडू मे पवमूम की भूम माही 'यह सब-कुछ मुझे मही माता, तम मावा, तम मोगकरो जाबो ..।" wha 116 कमूनिन बाबू बना गया था। एकदम शुरू-शुरू की बात है। पार्टी बनने-बनने को थी उन नमय । इन इलाके में वह नहीं आया। उसके जोडीदार महदेव को मी० पी० एम० वालो ने कत्ल किया था । इनीलिए जाति के साथ सी० पी० एम० को काटने की बात भी पक्की तरह बैठ गयी थी। इसके बलावा दिमाग भी विगड गया था। एक्शन, इतालवी हरियार और वेनीद जिन्दगी के भयानक स्पर्स में जाने कैसा बन गया था। पत्थर की तरह। और नुरारी की मीना छेदने वाली गोली को लावाज सुनकर दोनो हाथो ने मुंह दांपकर जोर-जोर से रोया था । कौन समझेगा इस पत्थर को पुतलीकल से सटकर निकलते समय गोरा जैमे वही पुगर अपने सीने के अन्दर महसूस करता है । कोहली से वूडो को ठेला, "देवा" "क्या?" "कारखाना वैने का वैसा ही चल रहा है बासी रोटी बांधकर नव ड्यूटी पर जा रहे हैं।" वूडो ने एक सटके मे उनकी तरफ देखा। उसके बाद गरदन टेटी करके पूछा, "इनका मतलव सव-कुछ छोड-छाड के चले आयें, यही कहना चाहते हो?" "नही, यह नहीं कह रहा हूँ। इतना ढोल पीटने से भी काम नहीं बना। क्रानि की कोई जल्दबाजी नहीं है-देखो, वे जोरू के चूतडो पर कपडा नौर बाल-बच्चो को लेकर ही मगन हैं।" "वे लोग कहेंगे, मशोधनवाद के गड्डे मे डूबे हुए हैं "असल में क्या ।" अचानक गोरा जैसे वही डूब जाता है। बालूचर के लम्बे वकपूल पेड की पनली छाया धनी होकर उमरे चेहरे पर गिर रही है। नफेद दांतो की कतार लकी, 'तुझे हरिया भाई की बात याद है ? बरे वहीं ऐलेनवरी का चोखा मजदूर "(वूडो ने महमति से सिर हिलाया) हरिया ने एक मजेदार किस्सा सुनाया था। एक गांव में एक अघा और एक लगडा रहते थे। दोनो में बहुत दोस्ती थी। भोजन न मिलने के कारण दोनो ही सूज रहे थे । अन्त में पेट के पीछे गांव छोडा । लगडे को अधा कधे पर ले चला। एक चल रहा है, दूग्रा रान्ना बतला रहा है । अन्त मे एक गांव मे पहुंचे। ऽमजान की कमूनिस 117 तरह पीराम । मंपाम रास्ते में चूने का एक पतीमा एकतमी रस्सी मौर एम नानाराव देसा। मंघ से कहा ते मे काम मायेपा । मतप्त में हुमा क्पा कि उस गांव में एक मकान खासी पा बहा एक राधम एवा पा। दो पार परों में मोम रह रहे ये मरने के लिए रामम रोर उमें मारकर सुंर से सीध मता मा। उसके बाद दूसरे माप में चूम चूसन गावा पासोमों ने मंप-ममको मना किया मगर उन मोगों को शिव । रासस की हवेमी में ही माटिक । राठ को मौकर राक्षस दरवार पर घरका देने मया मौन हरे? उन मोर्चा ने मार दिया वोक्स । रासस महा तुम्हारा नाम देखें। उन लोगों ने मम्मी रस्सी फेरी। फिर उसने पूर्ण फेंकने को कहा। सम्हामि पूने का पतीमा राक्षस के मुंह पर म दिया। उसमे चार राक्षस न कहा मापूम विधामो। तब उसकी वाव पर मासून राम गका दिया । बस राक्षस र गया । यह देख दूसरे मोर्चा के मीने में मी ताकत भायी बस सब मिमकर हरिया कहता पा पोषकसमा मसस में कुछ नही होता सब मुठ होता है। मगर उम मुठ मे राक्षस को ग्रा दिया पार के मारे रासस के हाथ-पांव पेट के अन्दर धंस गय पे। यही है सामाग्यबाद । एकदम मोवना। मगर इसे ऐसा किसने बनाया बता । मह कहानी बहता मौर मूतती मूंछ के बीच से मरमुरापर हसता पा। शिवम्ता-दुर्भावनापी रासकट पाने के बाद अब दोनों के पहरों पर पराम समा रहा है।कस रात तमोराका भारी मन पस्पर-सरीमा बना हुमापा गान बगह पसने ममा! हायर मारानरामाने के बाद सही। गोरा को ममेमानुम की तरह निश्चितता के हमरे माप न पर लिया है। यह पार से ईटाको मतियाते हुए पापे मर रहा है। किसे पता शिवम्ब काम बामे गात ही उम सोना की बात पाप मा गारगी! स्प्रिय फैटरी में बगो हपीड़ों की दुमदुम बागार मुनते हुए 4 मामी की पुमान में से । पहा तर करने के मिए। भाभी की देसी नाक और होठों की परार के बीच पत्तती हसी। "मन्छा विस्ट दीगिये। मोबाप साकरस मरा उदार कर है।"

18 कमानस "और नहीं तो क्या?" पुतलीकल का 'जान बचानों की पुकार लगाने वाला भोपू एक बार फिर बज उठा । और एक बार फिर एक दगली मजदूर माथे पर पट्टी की तरह गमछा बांधकर लोहे के छोटे गेट को निशाना बनाकर दौडने लगा। अन्दर जाने के लिए गरदन झुकाकर घुसना पड़ता है। माथा नीचा करके । सुना है कि यह गुलामी का प्रतीक है। पुतलीकल के मुदामा की वजह मे तीनेक मजदूरो को लेकर एक बार लाइन के किनारे गोरा बैठा था। ढलुआ बमीन । पीछे मालगाडी की लाइन । घिस-घिस, घटांग-घटांग की आवाज । मीटिंग में ए० वी० भी था। कुछ बातो के बाद उस छोटे-से गेट की बात भी उठी। ए० बी० ने कहा था कि इसी मे इजत की लडाई शुरु की जा सकती है। सुदामा की हंसी फट पडी, "पेट का भात और चूतड पर का कपडा जहन्नुम मे गया ।" और साथ ही हारान मिस्त्री का किस्सा चालू हो गया "तो समझो, एक बोस और सात साल से इस पुतलीकल मे हूँ। एक बार तो कल ही ठप्प हो गयी थी। विलायत के साहव तक फेल हो गये। उस समय यही हागन मिस्त्री काम आया। मगर हाल वही था, गरदन झुकाकर कारखाने मे घुसना । ज्योही कारखाने के पेट मे घुसे, त्योही दुनिया-गर मे कही भी तुम्हारा कोई नहीं रहा। न दादा, न बावा, न बहन । मशीन से कैसा प्यार । कारखाने के साथ कैसी दिल्लगी। यह है चावा, मालिक के साथ जूझने की जगह । कुरुक्षेत्र। हारान मिस्त्री की बात खत्म नहीं होती। लगातार चलती रहती है । अन्त मे सुदामा ही ज्व गया, "चलो, चाय पीकर आयें।" चाय की तलछट तक गले मे उतारकर, पुतलीकल के कान का परदा फाडने वाले भोपू की आवाज़ दिमाग मे लेकर वे वस-गुमटी की ओर बढे । इलाके से कोई-न-कोई आयेगा। विजयदा आ सकते हैं। मुहल्ले से कैसा लगाव है । वहाँ के समाचार के लिए दिल वेचैन रहता है। बस-स्टॉप से सटा हुआ गदगी का ढेर। सारे कलकत्ते की गदगी। कादापाडे की वस-गुमटी। सोना की मां की लम्बी-सी ठुड्डी गोरा को दिसायी पड़ी। वूडो वेचन हो उठा। उसने भाग जाना चाहा, "मैं चल रहा हूँ।"

कमूनिस 119 मोरा ने बहुत ही सतसर में कहा 'मही ।" स्रोता की मां के हाप में एक पोरसी पी। कई रिनों सहरा फूमकर रोग बन गया है। शायद यह कई दिन उन्हेंनि रोकर ही गुगरे । पकाम के पैर की पत्ती छाया कांप उठी, "गोरा!" भोर मचे बासूपर के बीच मैदान में मोरा म सोना की मां को पकड़ लिया “मौसी । दुकान में पेटमा बेवककी है। इसे ही पता चल जायेगा। इसक अप्सामा एक बार पाम नुसने पर का क्या उफा पर कोई ठिकाना नही है। उस समय बातों के प्रवाह में ये भाव की पसन का भी उनको होड नही रहेगा ।बापी मोर भरपापियों के रेबगम से उन्होंन बमना गुरु किया। "तुम नोम वो मामे-मापे फिर रहे हो उधर शिवम को बाब भोर में ठाम मये हैं। मब उस युर-सी बा बौर सूभियाग्रस्त नाकी को मेकर मह किस बहनुम में जापेगी? 'बिजपरा परम मय है? "हो । मुहम्मे के बोदू बापू के पास छिरिको मेकर मपी पी। बोटू बाग रपये-पैसे नहीं तो पमानत कराने कहा है।" 'हाँ । नही मगे मतलब मोबी में मायेगा मही करेंगे क्या? रेसिये।" हो बर ये कहाँ मा फूस में माग धमाकर तुम मोम तो बब वो देखना ही पड़गा मोर सुन भूमकर भी मुहस्ते में पांच मत रमना कीविका नही सकेगा। फिर तो उसी सोना की तप ।" उसके भार स्मर भीप मया। पोरा मौर से पांचों में पमन की ताकत नहीं है। वापर से भोग काफी परपसे माये है। वरुन पैर का बहराइरा रेप ममी मी से मासों में कायम की तरह नगाहमा है। पूप में मावी नहीं है बाने सा बारन-सा भिर बाया है। रस पसर रखे प्रसते हुए मैदान में बालों से घिरे बासमान तने सोमा का माम सुनम के गाव किसी के पाव भी भामे नही पड़ सके। भयानक पैसे बमीम में पड़ पये ।

120 कमूनिस "यहाँ बैठ।" सोना की मां ने पोटली खोलकर सुकु की पंट और कमीज निकालं फेर टिफ़िन-कैरियर। बूडो घुटने पर ठुड्डी रखकर बैठा था। गोरा दोनो पांव फैला दिये और सोना की मां, जननी की तरह प्यारे वेटे को भर के खिलाने लगी। "यह तेरी मिनती भाभी ने भेजा है सुना है, बूडो उसके हाथ चटनी बहुत पसन्द करता है।" खाते-खाते वायें हाथ से गोरा ने रूखे व पीछे ठेले, "खुकु के साथ मेंट हुई, मौसी" "हाँ, होगी क्यो नही ?" "तबीयत कैसी है?" "अच्छी है।" "मां को छोड़ा है ?" "ना, कल कचहरी मे देखें क्या होता है । हाँ रे गोरा, उस पुलिस को क्यों मारा तुम लोगो ने ? सुकु बता रहा था, मुहल्ले के सब लोग - कह रहे थे " "पता नहीं।" सोना की मां दो बजे के लगभग चली गयी। बिल्डिंग के तिमरि कमरे मे धूल की गध सीने में लेकर मन्टू वेचैन होने लगा। समाचार सु मे वाद से ही मन्टू बहुत व्याकुल था। सोना की मां से मिलने के लिए खतरनाक खिंचाव भीतर-ही-भीतर खिचता जा रहा है। वैसे इस दोपह मे विलकुल सन्नाटा है। पुलिस की जीप के ब्रेक की आवाज़ । और खां- करती हुई धूप । इसके अलावा रात-भर आंसी की पलकें मूंद नही पाया बात करते-करते गोरा सो गया। निवारन, सुकु और मन्टू की इक्की-दुक बातें कानों में नही पड़ रही हैं। अभी नीद । मुर्दे की तरह नीद । पुलिस-बैन की हैडलाइट को तेज नशीली रोशनी और लावारिस की तरह काटते पहियो की आवाज़ के साथ मुकाबला करते हुए र कटती है। रात कटती है आँखो की पुतलियां जलाकर । उसके बाद हत का ममाचार और भारी थकान लेकर सुबह । उसी सुबह के लुढकते-लुढद फिर रात आ गयी । तिमजिले के कमरे को इसका होश नहीं था। का .

। - कमूनिस 121 किनारेबार साड़ी के माधम में मेरा मिये चाम्ता गायी “मेपु पकड़ा गया है। यो सरकारी.बी.मेर मा रहा था उसका पीछा करते हुए ही वेस्टर रेप किया गया।" हो या पार बातें। बुमिन्दा बाते। उनसे ही सब-कुछ बीवन्त हो उठा। नाम्ठा की रिपोर्ट ही इस तरह की है। कोई माग-मपेट नहीं है । एकदम बहरी पार्यों से भरी हुई। कसे बरम की तरह ही माता की बात । मगर नेपू के पको शान की घटना की रिपोर्ट भी शान्ता उसी वह कर सकती यह किसे पता बा ! किसे पता पा कि उसकी रखी हुई दरी पर नन्हा सा गोस तिन बसस में पत्थर है ! शान्ता के होठों की जोड़ी सूबे पत्तों की तरह हमके से परपरामी। पता पा यही होगा। पुरोगी से पहमादमी कर पा नामोके परि के बाप से फट से एक तिसपट्टे का पेट फटा और मसवार मेघरा न गया। दियासमाई खोजकर माम्ता ने ही मोमबत्ती बसायो । फस्स से एक बाबा हर मौर चाम्ता की भूरी मासों की पुरुमिमों में हमके फमीते पी तप रोशनी पमका कर विमाससाई भपक से अस उठी। भूरा रंग से बम ममकर पत्म होता जा रहा है। मोमबत्ती की बीम तीधी रोगनी को परकर मोम फमे बैठे हैं। गोरा के बालों से निखर कर उसकी गरएन को लिया है। उन बालों में यह ममियाँ बता रहा पा थाम्ता। "क्या है?" 'कुछ किया मही गा सकता !" पाबपना ! उससे क्या होगा? बादमी बाम से भी काई नाम मही होवा महाई भी एक करम मागे नहीं बढ़ेगी । मापा-स-रपा पोड़ी बमम मिट सकती है। इसके ममाया सोधकर भी क्या होगा ? सुना है पार्टी में कहा कि किसी कामरेर के पार जाने पर मराहमा मान मना परमा ।" तुमम सुना मुरारी के समय एक मूस ।" 'युनूस निकालने के लिए कह रोहो?

122 कमुनिस । वे लोग दबी जवान मे बातें कर रहे थे । फुसफुसाकर । सभातकर। वरना सुकु या निवारन वात का छोर पकड़ सकते है। बगल मे बूडो दीवार से टेक लगाकर सोया हुआ है। वूडो तक नहीं सुन पा रहा है उनकी बाते। असल मे शान्ता को बारे मे कही गयी ए० बी० की बात ने ही गोरा को उसकी ओर ढकेला है। और एक दिशाहीन भयानक क्षण में उसी की तरह रास्ता सोजता गोरा उसकी दोस्ती पाने को तरस रहा है। इस दोस्ती की बुनियाद शान्ता भीतर-ही-भीतर बहुत पहले से बना रही है, यह बात गोरा ने सपने में भी नही सोची थी। यालूचर के शरणार्थी मुहल्ले मे वयस्क औरतो को लेकर शान्ता एक स्कूल चला रही है । मीनू से उसने फल रात बात की है । मीनू को भी वापस लाया जायेगा। शान्ता ने सिर्फ इतना समता है कि किसी भी तरह आम गरीव, मेहनतकश इसान का साथ छोडने से काम नही चलेगा। और यही नआस्था लेकर वह लडे जा रही है। इसका पता नेपु को भी था। हर वक्त किताव पलटता था। इसीलिए तुफान थहाने से ऐसा लग रहा था कि. । हा ज रोउ की टप्परदार बस्ती मे टूटी-फूटी गृहस्थी और बाल-बच्चो की भूप-बीमारी भूलकर जो इसान सहाई के मैदान, मीटिंग-जुलूसो मे, हमेशा मौजूद रहता था, उसका नाम है नारानदा। शीशे की फैक्टरी के कच्चे नाले के किनारे, नाले के ऊपर alस के मचान पर । अली, सुबला, विजय के हाथो को परुट-पकडकर पूछते थे। बातचीत का दौर खुल कर गलता था। मुंह का धन सूचकर भात के साग गो तरह गिरता था। दलाल के खिलाफ, करपनी के खिलाफ आदमी के जयडे की हड्डियां तनी रहती थी। अभी भी वैसे ही, बस ये वेशदव हड्डियां छिटक फर और बाहर आ गयी है। हाज रोड की पनकी जमीन पर, पीपल की मीठी हांव में पोपजी की चदि को बचाकर एक दिशा योजने, एकजुट लडाई लउने के तौर तरीको को लेकर घटो वातो को माला गंधो जाती थी "स्टारटेक्स के मजदूरो की छंटाई होने पर ग्लास फैटरी के मज दूर अगर सोते रहते तो एका पया आसमान से उतरता?" S - , - .

पमूनिस 123 यही नारानदा । वही रिमोस हसी । ५ उर पहचानने का कोई मौर तरीका नही सिर्फ हसी की उस महर के ममामा से हो पहम यह बताभो।" पहरा विसास बदल गया है। नाक माम तक मटक माने वाले गास मय नहीं है । मापा मगर साफ कर रिया गया है। मूंछ भी बिहारी अंग से मीचे पिरीहा है। गाम के दोनों मोर के मांस के मुख पाने से एकदम सपाट पहरा। गिहार कीमती मिट्टी का-सा ताई रंन । मार यह माखों की थोड़ी ही पहमे बंसी है। वही घार नही मिनगारी। गोरा के हर पर बममाम इसी विती नारामा | निस इसी को देखकर समय और संकट का भिराम शोरने की हिम्मत पैदा होती नागनदा कपाट गामों घनुप - तरहनी विसी हुई। . मोमबसी धीमी बन रही है। बीच-बीच में परपरा उठती है फिर मी बम रही है। बाने कब सभी उन्हें पेरकर गोमा बनाकर बा ठहै। पुराने हिस्से-कहामी फम उठते हैं। संप्रामी बेसेपाटा और उसके प्रर साहसी प्राणों की कहानियां बोरकर महा का काप्प मन बैठे है। "अमी का समाचार क्या है रे? उसकी बहम की बीमारी ठीक हुई पानी की बहन को टी.बी.एई पी। मनी की छटनी की गयी थी। अभागिन मरकी गे माम हुमा गुगर मपी। ममी को पिर मौकरी मिमी । मला-पुरा मिलाकर समाचार मही है। तुम्के विस्मय का घटाटोप छैटा सत्तर मादिरी दिनों की एम हाती हुई दुविधा संचय और प्रानों की सरिया सीन में मेकर भी मचानक तुम हो नठे। बातों-बातों ममिवाहाट्टा से नारामदा कर मोतीहारी प?ष मये पता नही । बिहार के फुमिया गांव की फीचर मिट्टी गाड़ा ममाने के लिए पुनाह माना फूस बसाना। बीगने का मुरीमा गीत । सप का कारोबार । झोपण की मारो। बारीपत। रन पहरीसे पांवों को उबारने के लिए सहाई-बंग । पंग की तैयारी यह मंग तुमस कहता है क्यों । । दिन रात मुम सहवा है?

- -- । जुलुम के नामोनिशान मिटाओ, होश मे आओ, बेदार हो जानो, ओ मेहनतकश जनता उठ अडतालीस में पार्टी ने यह गीत रचा था। घूम-घूमकर उसके गाने, गाने के उनके जोश ने, फुलिया गांव के छोटे कद के मरियल शरीर के कनाई आजि ने मन मोह लिया था। बाल-बच्चे, वह बेटी छोड लडाई की आग में कूद पटा था वह आदमी । फुलिया खाल रहा था। उसके बाद चार साल तक जेलवाने की चक्की पीसी। अव अघ-बटाई पर खेती करता है। इस वार जाडे मे ईख लगायी थी। खेसारी को खेती। मिट्टी का मीना चीरकर मीठे पानी की खेती । ईख नहीं, मीठा पानी। छोटे कद के उम ठडे आदमी के सीने मे आग ठोस आदमी चुन-चुनकर पार्टी बनाना उम आदमी के घर में ही नारानदा ने शेल्टर लिया था। लौटते समय कनाई आजि के बेटे की लड़की के लिए लाल फॉक खरीदकर ले जानी पडेगी। उसके जिन के माथ उसके नटखटपन के किस्मे भी चले । वह छोटी-सी लडकी नारानदा मे बहुत घुली-मिली है। कनाई आजि कहता है, "इम वार लडाई वाल-बच्चे, बहू-बेटी-मवको लेकर होगी।" अचानक मीनू की वात उठी, "मीनू कहाँ है रे ?" शान्ला ने जाने कैसे गभीर ढंग से जवाब दिया, "उसे दूर के शेल्टर में रखा गया है।" मीनू का मांवला चेहरा आंखो मे तैरते ही मोना की दात आ जाती है। उस रात जैसे वातो का अन नहीं । जनगिनत वातें। उनकी रखी, जली जिन्दगी मे कनाई आजि की हरी जमीन की तरह सोना जैसे मिट्टी के दुकडे का रस है । सोना की तरह के बहुत लोग नही । मोना की बात उठने ही बिल्डिंग का चौकोर कमरा मौन हो गया। ए० वी० का मिर घुटने पर सुक माया । इधर उनके सीने में एक दर्द चिलक उठा । वडी-वडी आंत्रो की पलकें असहनीय दर्द मे मुंदने लगती है। नारानदा की दोनो आँखें नमक के दानो की तरह जल रही है "मोना ने जब मेरे साथ जाना चाहा था उस समय क्यो नही जाने दिया।" फिर मीनू की बात उठी। छरहरी, जिद्दी मीनू । गोरा को लगता है, मीनू शायद वाकई निर्मला नहीं है, मगर मिखाने- कमनिस 125 पदाने में धारदार इपियार बन सकती है। गोरा की बोर देखते एए मारामरागडाये मरकी कोरा माम पर रखना।" मौर गौराकी मांत बदी हा वठी 'मह ममा समाप्त कर रबम माया मापी है ! रमा ही वरह सारे बदन म राम मसार यह एक मीपण या में पुरी है।" करते गोप का सीना से बहने समा नही रोग मका सोना रे ! पाड़ी रातभपकार उमसती महरी रात घरे के सीने पर पाग समार मिशिग खड़ी है। धूम वीर विहारों की बा सिये हुए। मोमबत्ती की पीकी रोशनी म मागमा मापसे पहरे की साबई रम सिये रोशन है। ए रहकर हमाका HIT भीतर मा मावा है। हवा में आगे की तरह मोमबत्ती कीमी रह रहकर काप यी है। ए.पी. की यही नाकपी छाया फर्भ पर हिमस्त रहती है पदहमा पाइजा है में शिरि भाभी के पारे में नही सापवा । विवपरा की भाबीसे मराई सगाव मही है हैन? पोड़ी देर पहने नारानदा ने ही बात उठापी पी। बावों में से करियर बिया की बात निकल मामी। मेपु क बममे का भी शिकामा। जिम्मरारीकी बात भी ठी। "जितने कामरेर पकर पप है महीद हुए हैं उनके परिवारों की देशभास करनी पड़गी। यह हमारा मैतिक उत्तरदायित्वाबो मोग पर गर उनके लिए कानूनी बमोबस्त करना । समी फर्म पर ए.मी.की नाइको पापी-नती छापा हटी "गुणा कानून विप्ताफ ही हमारा वाम । उनही दमा पाने के लिए हमारे कामरेरों ने सराई नहीं की है। मापनदाने भरुचाकर भाग से चाव काटी यापनबागी अधिकार सनकी बपौती नहीं है। हमारे बमोमों में कई सौ साम तक मड़ाई मगर यह मधिकार हासिल किया है।" ए.बी.के होठ अपने-आप टेरे हो पय देशी मुधकाम मिमे तिर्फे भानून की बात नही है मगरको कानून की पोहही में बरसाये रखना ही कानूनमा गम है।" मुनकर पोरा अपने को संभात मही सा, "तुम्हारी साई में इंसान 126 कमूनिस - का कोई अस्तित्व नहीं है विजयदा, छिरि भाभी-किसी को भी तुम कुछ नहीं समझते, समझ नही सकते ।" गोरा ने एक हाथ से अपना चेहरा पोछा। ए० वी० की तनी हुई नाक और तनकर कटे के निशान को छूने लगी। नारे के फट पटने जैसा दुरन्त उल्लाम । कटे का दाग टीयर गैस के गोले की यादगार है। आज की बात नहीं है। खाद्य-आदोलन । कलकत्ता शहर की तारकोल की सरत सडको पर वह भूखे पेट ही टूट पड़ा था। लाठी नही, गोली नहीं। खा-पहनकर जीना चाहता हूँ। जुलूस के आगे चलता वडा-सा लाल झडा, माथे पर बंधी पट्टी की तरह हवा में उड़ रहा था। ए० वी० के मिर के ऊपर । और पेट के लिए दाने के बदले सीसे की गोलियां और टीयर गैस के गोले मिले थे। उस समय का टीयर गैस के एक गोले का खोल अभी तक उमके पास रखा था। सोना ने सकेड बनाया था। जबर 'माल' । वह 'माल' एक नाटे गोरखा सिपाही ने फेंका था। पुलिस पा मिलिटरी ? एक गोला बाकर ए० वी० की नाक के नीचे लगा था । उस जगह फांक हो गयी थी। कधे पर कपडे का झोला झुलाती हुई लम्बी लडकी अशोक को वेलिंगटन स्क्वायर खीच ले गयी थी। शायद रुमाल भिगोकर बांध दिया था। काला दाग लडकी की स्मृति जगाता है । टीयर गैस के उस गोले और गोरखा सिपाही और खाद्य- आदोलन की स्मृति मे दाग़ अभी भी जल उठता है । जाने कैसी एक आवाज-सी हुई-सत्, संत । अचानक सभी मुंह वद हो गये । नारानदा ने सभालने के लिए कोई बात कही। तभी फिर ज्वार उठा । और उसके प्रवाह मे नारानदा की आधी खुली वात डूब गयी। एक भयकर ज्वार, रुलाई का-सा, "शान्ता मेरी माँ के पेट की जायी वहन नहीं है, नेपु को वे लोग मेरा सीना ज़रा भी नही जलेगा न ।" यह जैसे अशोक नही, अशका नहीं, ए० बी० नहीं। हलकी दाढी वाले इस आदमी को गोरा ने जैसे पहले कभी नहीं देखा । शुरू-शुरू मे ऐसी बात । 1 देमी वम ।

मूनिम 127 पसन पर पार्टी की रिमा को मेहर बात होने पर ए. बी. के पते में जाने कैसा पाए मम माता पा! माम यह सब-कुछ मही है। छोटी-सी वारी के पीछे भाव से कोई विषिष रहस्य छुपा है। एक नियोग्य प्पा मोर पीड़ा का रहस्य मारामराका मन चयनित हो रहा "नाराम मद मा मनका बयका मुना !" पात सीने में सुमगने मगी। इस तरह पुममी कि यह पपन को और महीं रोक सका। पट से उठकर रेडा होकर या हो गया देखना हमारे कामरेर सोग बेत बोरकर रात के माप निकस मामे देवना । माघे हर बात पर मसी उठाने शसा ए बी.मोहै। साठप नियाहाटा सोफम कमेटी का मास मेता एन. सी. एस. ए. बी० नहीं है ! वैसे एक ममिमामी मिमुहै। बाहिरी वार देवता हम कहते समय ए.पी.का पता भीग गया। पीछे के रणारे पर चमकी माबार दा करते हुए ए. बी. पायाहो मया । ए.बी.के जाते ही निवारन सा पटाने सपा । गाने किस बात कोनी है ! बोहरा सिबाय । मापनदा को तुरंत बाप नही पा रहा है। पकि सांपने की रम्त माकामा है। उसी माकाना में बह चुनमुनाने ममा। सारा भरीरपैनी से पिबिहाने ममा नारानवा में रात होते ही निकम पर पा । गांव के हालचाम बताइप । परा सुनकर ही गई । पुकको से बस्तीमही है, यहाँ की बातें हो।" मारामदा की मौतों की घोड़ी ममी बेहरे पर टिक पपी प्रया बात है? नपु की बात दिम की मुप्त काटरी में किसकर खाना भी भागार काँप उठी 'पहास पुप्त कर सके ?" "पामे पहन में कटिहारक ए मिस मगर कभर रहा। मका माम सुबमाम पा । सुत का कोई ठिकाना नही। पर मार कामादमी है भी नहीं । पहम सी० पी. एम. में यहा। रसम पामे सी० पी० मा । पानी माम पार्टी का मारमी मने मौसममा बाठा है. सिमाम सा..

। - -- । 128 कमूनिस तेल-पिलाई पक्की लाठी की तरह शरीर। टीन की खोली मे डेरा । वग़ल मे मकई का खेत । उस आदमी को सभी मानते थे। उमका ही एक साला मोतीहारी में रहता था। मिलटोले मे कई दिन बिताकर, सीधे वहाँ चला गया । कनाई आजि । दिन-भर खेसारी काटने लगा । वह भी अनाडी हाथो मे हेसुआ चलाने लगा। उसी से अगली उंगली उड गयी । कनाई आजि की जोरू ने सीख दी, 'हसुआ ऊपर की ओर नहीं खीचना चाहिए ।" छह प्राणियो के सांस लेने की आवाज़ लगातार उठ रही है। मोमबत्ती की हलकी रोशनी में मोतीहारी थाने के फुलिया गांव के रहस्यो की गांठ खुल रही है एक-एक करके । तावे के-से रग के, धूप से जले इसान, आँखो मे मूखापन लेकर कमरे मे जैसे चल-फिर रहे है। सुख-दुख का गीत गा रहे हैं। भारी अंधेरी रात हू-हू करती लुढकती जा रही है । रात के गाढी होने के साथ-माध विक्षुब्ध उस कहानी का स्वाद अब जाने कैसा खारा- खारा-मा हो उठा है । कहानी की तहो मे से से कांटे उभर रहे हैं। माथा चरचरा उठा है, मवालो के तीखे भाले। पार्टी कामरेड गांवगज के कारखाने में काफी तकलीफें सह रहे हैं, काफी दिक्कतें झेल रहे हैं हमारे इलाके में ही एक कामरेड ने अनगिनत दिन सिर्फ हँडिया पीकर आदिवासियो के बीच गुज़ारे हैं। मगर ज़मीन पर पांव जमाये हुए हैं दिनो-दिन भूसे रह रहे हैं, मीलो पैदल चल रहे हैं गोलियो के सामने सीना तान रहे है मगर मजदूर-किसान के सामने क्या प्रोग्राम रख पा रहे हैं एक वही खात्मे का (यहाँ निवारन फुफकार उठा, जैसे अब तक वह मौका तलाश रहा था)।" "तो फिर खात्मे की राजनीति में आपकी आस्था नहीं है ?" "नही, सासवाद मे किसी कम्युनिस्ट की आस्था नहीं होती।" निवारन विरक्ति के झाग उठाने लगा। अचानक उसके धैर्य की दीवार - 1 पार्टी के 'बग दुश्मन के मफ़ाये' की मुहिम, जिसे वे वर्ग-मघर्प का उच्चतर स्प तथा छापामार युद्ध की शुरआत मानत हैं।

कमनिस 129 ग्रह गयी । वाताबराबरपान क्या कहने नमी ! उसकी मुंह की हमाघे मोमबत्ती गुसीयुमो-सी हो मायी। बौर निवारन न नपरी नसों माने मपने हाम मो माया "फिर तो कोई पात ही मही हो सकती !" नारामा ने मजबूत हापों से पतबार पीपरना इसके बाद बात हीम होती। फिर यही बात बार की तरह बनी। नारदनिकों की बात। म उस माधे सम्पासी-दन की बात माम्ता और सुक नमुन होकर सुनने मपाइ प्राणी पाने का एक धक्के से स्स के बनि तुफान में चमने हिरन समे। मारामदा को वायों के बीच में पाम्ता म इधर-उपर के समान पूपे। कभी वीचकर मोहे कपास पर पड़ायी 'यह अभी तक मान नही पायी हूँ। मारमी ने इसका एक स्तिाव का माम मिया बोसपर देखना । उस समय तो बात परम हई। फिर मुझने पया यानी भाप काना चाह यह है कि हम मोग बो कर रहे हैं, वह तमाम गमत है? नारामा के चेहरे पर साफ-सुबरी मुसकान 'नही कामरा!" योग मारें बड़ी-बड़ी करके उस बादमी की भोर देवया है। कान करके उसकी बात पचा रहा है। कुछ बातें तो मोरा ने भी समझी की। मपर सममा किसे पाया ? शायद उसक समझने में कुछ पोमापन बा। ६षक ममावा मपनी समझ सरे तक पहुँचाना एक बारीक कसा है। वह बातों की करकच मही है और बात उसप्ताकर उसका सिरा मोरेमा भी नहीं है। यह तो पैसे परत-पर-परत बोलना है बब तक तान मिन। निमारन उसी तरह तुनक उठा 'तो फिर मब सभी स्तिाव लोगे। बात कहने के साथ-ही-साथ मिबारम ने गठीमी उगमी पासमाम मी तरफ सछासी । हवा चीरकर शम हरहरा उठे । पोड़ी देर के लिए पुप्पी । मुझ पर रेखाएं बीच रहा है। यानी सोप रहा है। भीर रंग से बाम क्या सोच रहा है । और निवारन का तुमकुपन मागनरा सात

कमूनिम
130
भाव से सहलाने लगे, "क्रान्ति एक वर्ग का उत्थान है ।"
गले मे उतार-चढाव नही है । एक सुर मे कहते जा रहे है । इसान
की जान और जिन्दगी लेकर जो वात शुरू हुई थी, अव कूट-छानकर
उसका अर्क निकाला जा रहा है। अब वह वात एक सिद्धात बन गयी है,
क्राति का सिद्धात।
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कत्लगाह, जेलखाना गोलियों को वोछार
मं मामे के पाम एगकम । रमपम का कमेगा चीरती हुई माके उपर
से उठी गहरी सासी चिमनी। गोखिम उठाकर पाने कर भूते पेट ममी म
चिमनी 5 मा पर सुबसूम के रग का मास मेग मरत हापों म सकर
पाँच दिया था। मगरकीरत इम्मत की कड़ाई!
पो धूप मौर आममाम-झार पारिको की बगह से ममी के मेहनती
पून से सुर्व मरमा रग मब मुर्च मही है। यहत ही मसा पा मया है।
बारम । उया या रंग। फिर भी तेरहमा से बेमेबाटा के मत माग
में चोर पाने पर पटा मग मुरारी के इपिए की धान निये फरफरा
कर उठा रहता है। उस समय हिपकियों की तरह एक भाराव रखती
है। मौर विशिम के तिमधिमे के कमरे की मुदनी मोमबत्ती की रामनी में
उस भाषा समोरही गंभ पाती है। माने जैसी वामोशी छा पाती है।
पापागनीवरह । अहिल्या की वय।
मैघरी रात कटती है पकात पत्ते होकर । रात बसूने को
परावी हा सपाटा की मार मुरी की धरती मांगों से पदम
के
मादिम अघरे का सीना चीरती पाती है।
पूर नहीं मान का मानार-'मामाह समाह मुहम्मा ६
मूल ।
मनी का म्मान माते ही पुतसीकम + मगर के माथे की तय
चिमनी के भाव पर मायाद पाया और गोरा कीबोगरों में बीपी
वगाम की बस्ती में ममी की तोपरी का साहिन उठा। अभी की मार
मामी से गाम पटी नाक । माक की गुख्ती। परकम मौर'
पर

132 यमूनिस ने संडसी की तरह भूवी-नगी बस्ती का गला दवा लिया है। सेंडमी तिकोन में फंमा वीवीवगान के मेहनतकश का कलेजा धुक-धुक करता है- व्याह-शादी, निकाह और कव्वाली के बोल लेकर । और वस्ती की ना जमी गली के बीच उभरी नसो वाले हायो के रोएं सुलसाकर, धारदा सलाख मे मास के टुकडे फंसाकर, चूल्हे को आग में पकाते हैं उन्हें वीवं वगान के लोग । जिन्दगी-मौत की छोटी-बडी लहरें उठाते हुए जिन्दा रह है वेवकूफ़ इसान । गौरैया जैसे दुबले सीने के पिंजरे में हवा भरकर कर्भ कभी कोई बूढा कारीगर गाली देता है, यू यू करते अब तक अली उठ बैठा है। तडाक से। लोटा लेकर मालगाडी रेल लाइन के किनारे गुसल करने गया । दो-दो वच्चो वाली जिस नाजिम बीवी को पिछले महीने वह निकाह करको लाया है, वह अव चेहरा लटक- चूल्हे मे आग सुलगा रही है । इसके बाद भूसी-मिले माइलो-गेहूँ-जो के मिले जुले आटे मे एक लोटा पानी उँडेल देगी। उसके बाद हिलते हुए उसे गूंद बैठेगी। उसके बाद लोइयां ! उसके बाद रोटी। वही रोटियां गमछे छोर मे बांधकर अली काम पर जायेगा । नाजिमा मुहम्मद की पान गमुटी तक साथ-साथ आकर अचानक पत्यर हो जायेगी । उन सम मुडकर गली के नुक्कड की ओर देख अली नाजिमा के स्खे-दुखी ताक चेहरे, दोनो बच्चों के चेहरे पर जुकाम के पतले सफेद दाग और फ्टी सफे औखो को देखेगा। दोनो बच्चो की आँखें साल फाडकर निकली रह हैं। उधर देखते हुए अचानक अली की गुठली नाक के नीचे जूही की कल की तरह हंसी खिल उठती है । परम आस्था की हमी। अली उस मम बिलकुल नाज़िमा के बच्चो का बाप लगता है। साउथ वेलेघाटा का समाचार पांच कानो से होता हुआ कूरियर होशियार कानो के इर्द-गिर्द चक्कर काट कर गतव्य तक आता है। औ समाचार विल्डिग का सीना चीर कर हू-हू करके भेडी' की ओर दौड जात है-ठीक उसी तरह जैसे खिदिरपुर-कॉलेज स्ट्रीट मियालदाह के मोड प पुलिस के साथ मुकाबले के वक्त टीयर गैस का गोला पांव के पास गिरत ' कमूनिस 133 पा और पाम पाम पासे रास्तं परमा नामे के पिनारे पटी गोरी के कासे परम भातापा। सती हुई मैस का मौसा । इसान को रमाने पाती गैस । तमाम घेमियाहाट्टा का सारा होक-दुख भाप ममने की पार की तरह बिलिंग तक पहुँमता है। तिमश्मेि के कमरे में बार पहुंची 'पनी गिरफ्तार । विजयदा की सीधी-सादी बीनी-गामी बीपी हिर मामी ही तबर र मयी। उनकी गोर म मुखिया से बीमार नाकी का पिपा गरीर । छिरि भाभी की बायों में मब सतरे का काम लगा है। कारम-मगी बा । सोनापुर की मम्मी के पास रेयमे मासे गाव हाथ धान मोम में पकती माग रेबार मौर मयूत तेजी से सीढ़ियां उतर कर वतरेकी वाईसा नासा छाप मारकर पार कर मयी छिरि भाभी। गौर पिप-सी साकीम परम विश्वास के धाप माँ के कंधे की टेडी हारी में मुंह मार दिया। अभी के बारे मे नबर मुन भभक ठा पा मोरा का घोट पापा सीना। एक मनमोस सम्पदा बोकर धम्म के दुम मे सीने को मोर-मारकर पाताल योगा पाहवामान-पाठाम । सोमा की मां भी तय मिचिमनाक उपमापा। 'मृत्यु माने या बीमारी से मरम पर मन को फिर भी सममाया जा सकता पा-पहयो गिम्दा । ममी का बाँधमा बेहरा बोर समनदारीपी बात यार हो पायी 1 साप ही गोरा का सोना भी मार हा मामा। रात हुए सोनों पायों से पर मौरने पर मम + रोटी की तरह फस उठने पर मांगों के सामने हताहा का घुपमा मासमान मटका कर से कोई मोरा के कान में सोना मी बात पाता है। पात्रारम का तटम्प विज हारमोनियम की तीन ममार रीना रबार एक हाप पक्ष की तरह बोमकर देगा होकर दौ माता है प्रो र मोना, म म नाहगार युमित व सिवात तर घामा दोरकर ममी के रामा को तए माममान में मुसवे एक है। - मात्रामा पाव बोबम्ब सभी प्रतिमा में से पानी पाठी कामर पर पौषमान से मार हारमोनियम एम ए पाकर 134 कमूनिस साहम का वायलर सीने मे लेकर ए० वी० नाम का जो इसान हाई पावर का चश्मा पहनकर तूफान उडाये जा रहा है, उसकी बात याद आती है। नारानदा का मामला अलग है, उनकी वात दूसरी है। पर्वत की तरह स्थायी रूप से जमे है वेलियाहाट्टा के सीने पर । अटल, फिर मिनती भाभी की तरह शान्त चेहरा, जैसे इसान का हृदय । आदमी है ही ऐसा । आमरण ऐसा ही रहेगा। जव गोरा ने सुना कि कॉलेज के छोकरे बीरू ने पहली बार पकडे जाते ही सब-कुछ उगल दिया है, पूरी एल० सी० (लोकल कमेटी) का नाम ही खोल दिया है तो क्या उम समय भीतर-ही-भीतर अविश्वास के कॅटीले पेड ने सिर नहीं उठाया था? कामरेडो के शरीर की गर्मी के भीतर बैठकर भी बर्फ मे दबी मछली की तरह आंखो की वर्फ नही गली? और वुडवक नातक से दोनो हाथ लूले हो गये थे, "क्या इसका अन्त मौत मे है ? क्या ए० वी० के मन में भी यही प्रतिक्रिया चल रही है ? मिर्फ़ सुर अलग है, वैष्णव मार्का-मरण रे तुह मम श्याम समान ।' मवसे छिपाकर मन के अन्दर बात उभर रही थी । सुद से भी। जब कि गोरा को मन की गहराई से पता था-~~-इसका नाम डर नहीं है। डर-~- भय अलग चीज़ है । व्यक्ति का घुटना कांपता है। वेजान-वेजान-सा लगता है । या तो अपने को बचाने के लिए चूहे का बिल खोजता है, नही तो सून-खराबा कर बैठता है। गोरा मे इस सब का अशमान भी नहीं है । गोरा का मामला और भी जटिल है। (अब वह खुद ही अपने मन की चीर-फाड करने लगा है) और भी गहरा। एक्शन । सग्राम । सशस्त्र सग्राम । फुलझडी की तरह। आतिशवाजी की तरह । सग्राम फूट पडा था। गांव-गिरांव मे और अजीव शहर कलकत्ता में। एक्शन का फव्वारा छूटा था पिचकारी की तरह। हालांकि भाटे के मरे हुए चांद ने ज्वार का मुंह घुमा दिया है अव । अव हवा में उकसाने वाली गैस की कमी है । अव चुने हुए कामरेडो की लाशें सख्त जमीन पर विछायी जा रही हैं। जेल की दीवार, प्रकृति विज्ञान मे पढे कलसीगाछ की तरह गध सुंघाकर एक-एक जवान लटके को पेट के अन्दर खीच रही है। लोगो की जवान पर कोई और बात नहीं है। लड़को की भोप्म-प्रतिज्ञा देखकर जो मध्यमवर्गीय वाप कभी थरथर कांप उठा था, अतीत की ।

कमूनिस 135 स्मृति टटोमकर जिसके कानों के दुरमे परदे पर यात्रा का रंका गया पा ममर मर ? अब उसी के सामने उसी के हाइ-मांस से बने ये सब जीवित प्राणी गोमियों की माम में सीने की सफर हरियां निकामे पील के बापा ! सो मैं मरा नही हैरेसो-देखो में पिस पप गिम्दा है। मुनाफे के लिए मिस मुक में पाइयों में मिमावट की जाती है मिस रेत के सीम में छिहत्तर का काम पुन की तरह बभी भी चपा हमा है निहायत ही ईमानदारी से सारी रिम्दगी बिताकर विस देश के प्रति पवित्र प्यार को दिन में छुपाकर भी भो बारमी वक्षम है वह ऐसे समय म क्या कर सकता है ? जिसके लिए मारमहत्या मसंभव है कि समाई का समुद्र मुमसाने पाती धूप में मूल चुका है उस पिता के रमे का विचार सबसे भिमेमा? प्रेम पुरारी' गामे एपयन के दौरान जमने से पैदा हुई मम ममी भी गोरा की माफ में ममची है। पर्वग की तरह कन्ने साता हुमा बीह पार्फ सिनेमा-हॉप के काउंटर पर टूट पड़ा पा चीन-विरोधी मूठा प्रभार नमा गनो फार गसो |" काउंटर से टिकटों की गरी मेकर पाकर हवा में उहा दी पी बार की तरह । उन पापों के टुम्हनों मे ग-उगकर दीवार पर टैपी हर्ष मायिका की मनपी मेह का मरबा-निवारण किया पा। सात पाठ मोगों के सवार में नफरत और बोस धधक रहा था। जबकि हॉल से रोहाप परा पीघे हटकर बोचरों के साथ नहाई शुरू हो गयी पी मौर गोरा महर एक पेटी मेकर कमर चुमाकर बड़ा हो गया था। उस समय पता महीपा यह भीपा हुमा 'माम' है। उससे पिनगारिया गिरते हुए किर नही सगी बोर का सीना फारकर बमी हुई नफरत का कोई भयंकर पर्थम नहीं होगा। उसकी हपेनी मरम हो उठी भाकने बानी वाप धुएं के पास बोर विस्फोट की बात सोचकर-4से मुट्ठी में ही एक मानामुखी फट पोमा । सपने को पचाते हुए दोनियारी के साप सोपर सोप धीरे-धीरे मागे बनते है भार पीछे हटते हैं। अचानक रात मीधार पोराम 'माप्त कपिया। दंपनी पमान दस हाप पीछे हट गये बकि 'मान धीरे-धीरे मारवर्यग्नक कोममता परवी पूता हुमा मुसका। पोरा के दोनों हाथ वासी । ममियो दुन बमी ।। मसंभव साहस क साप 136 कमूनिस फेंका गया सुतली वाला 'माल' सामने पहा है। फिर भी गोरा सिर्फ़ इस. लिए भाग सका था, क्योकि खोचर लोग घबरा गये थे। उसके बाद खाली पजे की ओर देखकर कितनी बार भीगे हुए 'माल' की बात याद नायी है, वाद के दिनो मे जलने से बने घाव कितनी बार सीली हुए सुतली के 'माल' की वेजान स्मृति लिये ताजा हो उठे हैं । रात ने धीरे-धीरे चलना शुरू किया है। मोमबत्ती के काले धागे की तरह असह्य रात भी जलकर खाक हो रही थी । तिमजिले के कमरे को इन मबका खयाल नहीं है। वहां अंधेरी रात मे जगली इसान की कहानी चक्कर खाती हुई आगे बढ रही है । इसान कव पांव पर खड़ा होकर, पीठ तानकर, सिर को झटके देकर उठ सहा हुआ, कव उसकी जवान से बोल फूटा—यही उसके लतीत का इतिहास है। पत्थर के भोथरे हथियार हाथ में लेकर भयकर जानवरो के साथ लडाई। इसान का संग्राम, सग्राम का इतिहास । मत्तर के वेलियाहाट्टा की इस विल्डिंग के कमरे मे पगली हवा चक्कर खाते हुए भूखे पत्ते, घास-फूस उडाकर लाने लगी। नारानदा के जबड़े की चिनुक-हड्डी अभी भी शात है। सुस्ता रहा है, "सग्राम चल रहा है दास समाज से स्पार्टकस ।" सूखे की माग से जला मोतीहारी थाने का कनाई आजि, खेसारी सिंझने की भाप और भडतालीस की लडाई छेडने के गीत से जिस नारानदा ने बात का चीज बोया था, वही अब सारी मानवजाति के वर्ग-दुश्मन के खिलाफ लड़ाई के हज़ारो सालों के इतिहास की जीवन्त बातो को मोचते और सुनाते हुए गुस्-गभीर है । मजदूर का विजय-गीत, वीरता की गाथा। हवा के झोंके से अचानक मोमबत्ती बुझ गयी और पानी-सी सुबह, घुआ-धुआं-सी सुवह फिमल पडी तिमजिले के कमरे में। मरी-मरी-ती रोशनी का एक टुकडा लीफलेट के बोल्ड टाइपो पर आ गिरा है 'शहीदो का आत्म-बलिदान व्यर्थ नहीं जाता।' 'व्ययं' शब्द फिजूल मे पानी-स्याही- धूल से मलिन हो गया है। सारे कमरे को धेरै धूल की गघ । हवा के झोके रह-रहकर उसे उकता रहे हैं। किसी ने लम्बी सांस ली। वूडो की जोरदार बास्था चरमरा उठी, "अलबत्ता कमूनिस होने के लिए सब-कुछ चीर-फाड- कर जानना पडेगा। यह सब-कुछ मय-तत्र झाडफूंक नहीं है ।"

पमूनिम 131 निवारण वैयार ही पा उपका पवना हापमा 'फिर नो हार में बत्तीमम गायेगी। नपु दुख-मोर के पापान ग दबकर पान्ता के पास होठों पर स्पष्ट हसी नहीं नहीं मही ऐसा क्यों ? बसमी बात मानकर उतरना पड़ेगा किसकी मड़ाई कौन साप देगा किम माप माई है-एमी बहुत-सी बात है। बाकी सब पमते बमवे सीखना पड़पा।" नेपु को बीच से गये। उसके यार एक भी पत ऐसी मही स्त्री या शान्ता की बातों में पानी के बिलम हो। विपिन कोमम विड़ ने भी सा होगा। शादी के रिलही होठों के कोनों में इसी बिखरे माता पिते में कुंभारी बोटी सी मेड पर सेट-मगारों की हडिया के मात में से हिस्सा मेने को रोहा पा। बेम का भात न खाने पर मेपु की मस्ती नहीं होगी। इतनी सोच इवन विचारों के बहिस्या-पापाप से सात हाप मीये मिट्टी में मासम्न भूकंप की संभावना मिमे शाम्ता के मन को किसी गुप्त पर में एक बिन्दु पानी बमा रहता है। जबकि सरकी का चेहरा पाह पसम्परा तरह सहनतीम निर्विकार । यो पुग्न मोड़कर तनकर बैठी है। कमरखकर उतरने की प्राप्त मौर उसकी मांग की धागे की तप क्षीण रेसा में पोरदार बास्त्रा। रिरिप के मापे पर मनुष-रोरी की तरह बने एरिया के तारों में होम्-धि की तरह कासा ग ममी भी मिपटा हुआ है। मौर हीरे सीन से निकारी गगुमे की सराहना ठार बा रही है। हवा जैसे उनके सारे सरीरों पर पांच-पांच ममियों की पाप ममा रही पी। गमिपों की पौ । सारी रात मौन मेस सोनपार, गहरेवई मार भगाने माना स्वारबीम के कटिदार सिरेपर मेकर बनाम सपन की बत्सना उकेरकर पर भोर होने पनी है। रात भर बनने का सरगमता या है। यही पैसे छाती फाइन मासी प्यास मेकर पान पुष्पुकर रही है। गिरमीस दोनों हाप ऊपर उठाकर मामाची नारे मना रही है। इमान रा बाप मारिष्कार की महानी कम्युनिस्ट पार) 'दुनिया के मारो एक हो' भारे में मा रिफी है। मिसरट का का वीच उसे नाचूनों की पोरों से सु 138 कमूनिस "कलकत्ते मे रहने पर गलती सुधारने का समय नहीं मिलेगा, ऐसा लग रहा है। निश्चय ही वीध डालेंगे ।" किम तरह चीर-फाडकर मभी कुछ को परखा गया है। सभी कुछ समझने के लिए चीर-फाट के अलावा और चारा भी क्या है । विल्डिग की धुंधली सुबह की रोशनी मे सुकु समझदारी लिये अब तक चुपचाप बैठा है । कुछ कहना चाहता है तो खच्च से जैसे कुछ विध जाता है। वात नहीं निकलती। इसीलिए सुकु ने घूमा-फिराकर कहा। उसने जितना समझा है, उसी को लेकर वह मोतीहारी जाना चाहता है । या वहाँ जहाँ हेसुए से धान काटने की खम-खस आवाज़ जगती है । झुड बांधकर मजदूर लोग काम पर जाते हैं। मुकु दौडकर उनके दल मे मिल जाना चाहता है। वू से जान लिया है कि खातमे का वारट लेकर बेलियाहाट्टा को छानते हुए पुलिस सुकु की खोज चलायेगी। कलकत्ते मे रहने पर, आज या कल, किमी दिन वीध डालेंगे। और एक बार पकडे जाने या गोलियो से बीध दिये जाने पर सच्ची दिशा मे इसानो को खड़ा करने की फुरमत जिंदगी मे नही पा सकेगा । एक गलती की कीमत एक जिंदगी से चुकानी पडेगी-~जो जिंदगी बहुत पहले ही से आधी समझकर आधे आवेग मे मजदूरो के हित मे समर्पित है। सुपु की बात पर जैसे स्नेह, प्यार, विश्वास के स्वर्ग-धरती-पाताल उफन पडे, "जायेगा मेरे माथ" नारानदा के आश्वासन पर लडके का स्वर वच्चे जैसा हो उठा, "अगर पहले से ज़रा-सा भी जानता।" फिर फर्श पर लकीर खीचना। जवकि इससे भी थाह नहीं मिलती। सुकु की मुट्ठी खुली और उंगलियां धूल-भरे फर्श की दरार में फैल गयी। शान्ता की आंखो मे जाने कहां से एक बूंद चमक उठी, वालू के कण की तरह, निर्मल पानी की तरह । कही जैसे दर्द की खान है। वर्गगत नफरत की धधकती आग । आग की ज्वाला। और जननी के सजल स्नेह से भीगी, ताड के पत्तो से बने पते की हवा घर के अन्दर तितली की तरह फरफराने लगी। टूटे पसे की डडी से जाने कैसी कैच-कैच की आवाज और पखा मुनिर मुक परन पर समते ही शान्ता ने फर्य पर रमेन रउपसर पा। सत्ताइस-सामा मेट पर हाप पर मिलारन बना है। दुश्मन का फार रामने के लिए उसके दांत ही काफी है। रामरमरे असे सिमीत इतिहास निवारन के लिए कालतू है। मरने सरीर पर याकोमा से मिस पिगुका जाम रिया पा उमी की बाउ बसे पस्नर- करती दौड़ रही है। सुरके गरे की मोर ग मरत के सभी महीं पा पाई। पब वो सिफ रात गुजारन की बात है। परमा निरन एक यम के लिए भी यही मही टिकता । असम मे राव के पान होने बसतही र ममिक हाता है। रात अतिम पहर म लबहमतोंक दन की तरह बायोसकर योचर मोप बार की तरह अपपाप हमता परते पनि म मार देमपाग में बसपाटा का नमक-मगी दीवारों पर भभी भी स्टेममिस की छाप म मावा की नमवीर चमक ही है यहाँ मायापार है की प्रतिवाद होपा। पेग' का पहरा राग सीने पर मार बी.आई. पी. रार मग पहाई। मपाग को बग-सा फूते हुए। पिम म गाय बागर म म गण म पल बाते हैं। मीमी मांगों मारामाराहापस फाममे पर ही मुरारी मापन यानी गई। पर सम्म हम्म पेड़ की डान र मर मिटा नही है। मेरा बारममाकर बैठा है। परमाच्याटमा म र सरकी मस्ती पर मानत है। प्रायद उम सपा टास्टिस मिकrsra माग Trrrrrr मायाम marterer FryFarमाती 140 कमूनिस कमर कमकर फिर मग्राम के अकुर फूटेंगे तपते सूर्य की उम्मीद मे। कांसे की एक थाली मात की तरह सूर्य (क्राति के प्रतीक के तौर पर मूर्य का उगना घिसी-पिटी उदित है, फिर भी वे लोग इसे सोचे बिना नहीं रह मकते) धीरे-धीरे आगे बढ़ेगा, वटवारा करके स्वाने के लिए। और यह विराट देश मिर उठा सारे अग-प्रत्यगो के माथ उठेगा। यही तो स्वप्न है। यही तो गोरा और सुकु, निवारन, नारानदा और शान्ता की जिंदगी है। विल्डिंग के तिमज़िले का कमरा, बेलियाहाट्टा के माथे पर हवा मे निशान की तरह, अनियमित आवेग से थरथर कांप रहा था। "हम लोगो को एक स्टडी-नर्कल खोलना चाहिए ।" शान्ता की इस बात को पूरा करने के लिए और भी कितना कुछ जरूरी है। लडकी पागल की तरह वोले जा रही थी । तिल-तिल करके तिलोत्तमा' बनाने के लिए छह कारीगर अपनी जली जिन्दगी के शोक-दुख- आनद और आग के पंचमेल अनुभव मे, अपने हाड-मास की मिट्टी को पीमकर, छानकर, घोलकर एक दुर्लभ मूर्ति बनाने में डूबे हैं । रह-रहकर वे मार्क्स, लेनिन, स्तालिन की बातें कर रहे थे। और इस विशाल देश की वात । एक सही रास्ता पहचानने-खोजने मे, तिमजिले के कमरे मे एक सूक्ष्म बिन्दु पर सारी अनुभूति केंद्रित कर, इद्रियो के अर्घ्य से सीचने में मगन है। आंखें सुइयो की तरह चुभ रही हैं। विपण्ण धूल, फटे कागज और मुर्दा रोशनी मे वे जैसे कोई खोयी कील या आलपिन मरम्मत के लिए खोज रहे है। लीफलेट के ढेर पर हवा लोट-पोट मचा रही है। मारे कमरे मे दो- चार लीफलेट और फ्टे कागज़ो के टुकडे उडते फिर रहे हैं। शान्ता के बालो मे तिनके । तूफान की-पी गध । जवकि उन्हे होश तक नहीं । उनके सीने के बायी ओर हृपिंडों में स्वच्छद उतार-चढाव, रक्त की सफाई- धुलाई । और शाति एक आश्चर्यजनक शाति । झर रही थी सुकु की वानो से । फाति जैसे एक शिशु का जन्म है । उसके बाद विराम । वातें टूटती, गलती जा रही थी। कान के पास . - । - अद्वितीय सौन्दर्य की प्रतीक, एप मिथिव नारी।

कमूनिस 141 रिकामा शान्ता का स्पिर हाप । मारामरा की बहाती मूहों की परार में बागकामात गिम्दी । गोरा की सपमा सन बानी बड़ी-बड़ी बा । ममी माफ की कोर पर पकान का पसीना मोती सा पसीना । निमारन सीन में कच्ची माग । और पिशु की तरह पात मन्दुका चिकना चेहरा । पूरा की बिनती हुई इसी विधि नगी सवानी बयाका मे नाच ही हो। रात-भर के कम्नि मन्वेपग में उन्होंने पुची फा मामिफार किया था जाति की टेडी-मड़ी कटिन यात्रा करते हुए । मोर मा सफर मात की तरह सुबह के समय खुती। हाति । माति स मम पत्ते पर बजेसी मिम मिना रही है तिमरिमे धूसर कमरे म । मां की छाती से निकमन वामी सफ़ेद पूप की धार-सी भार भी नहीं हुई है। हत्पारे सूनो रशियों के दमाम और मावड़ाते मम्पट बराबी के भमन फिरन सापड छिपुट मेधेग यमी मी चममार की तरह मूम रहा है गौर टया-ट्या कर रहा है । पुलिप सोबर सी० भार० पी० पानो की संगीन और भारी भरकम सिपाहो-यूट ठोक ऐसे धन ही वैघरे परदे म मे पन्नी काटते हुए, घुटना ठमते हुए बमप्त है । वडी-बड़ी जॉपों को घसीटते हुए । सामन पो बा-बड़े से सून रह है। यमेमाटा की पम्दगी म सही मम्मी मौर मरी माय के पेट म मा पुमेरकरपू सुंप रहे है पोर्नो कुत्त । मौर सारे सियाहाट्टा की गान पार्टी की री की हाणे की तरह जमी हुई भूत की मसीम ताकत की तरह विसिंग मुंह बाये हुए । समय सिबास में एक वगमी पुमिस बासा मोपर सपा हाप सम्बी बीम निकालकर गर्म हवा छोरम मपा। कोम उम्मनी की बिस्कुट की माही टम्पो ठमा मौर एम्मुझेस करेगकास के बीच मे राइफस की नमी निकास पर गाने पिसने नाप्टपा किसोर क गमे पर यूट बमा दिया सान। पिनाते ही मोती गार दूंगा । यस्दी वास कहाँ है सब पत्ती मस्वी । रिमोर म स सत्तर में तप में पांच रसा है। तेइ सास की उम्र में ही पपरीती रातों में जागते रहना मोर पहरा दना सीव यया है। ए. बी. हे साप महफा छाया की तरह रहता है। छापा या काया? ए० पी०के समाा परीर की छापा म हा मास मार्य में घिस घिन ने वसेरा . 142 कमूनिस बनाया है, क्या यह वही किशोर है ? इम कच्ची उम्र में ही लडके ने, बडी- बढी आंखो मे नीद की मरत नमें तोड, जाने कव धनुप को डोरी वांधी थी । कहता है, पिंजर की हड्डियां खोलकर दुश्मन का कलेजा छेद देगा। फिर भी लगातार तीन रात जागने के बाद शायद जरा झपकी आ गयी घी, मीने की सोखल मे फैमे नीले नपने ने शायद पतगे की तरह पखो की आवाज की थी । और नन्हे लडके को झपकी आयी थी । झपकी आयी थी धूल की गन्ध उडाकर तिमजिले के छोटे-से कबूतरखाने मे । जली हुई मोमबत्ती के काले पलीते के पिघले मोम पर लीफलेट के 'शहीद' शब्द के ऊपर । पुराने निषिद्ध इश्तहार की व मे । 'सखिया' और सडी-गली मासल हिंसा' के निष्ठुर शब्द लेकर कही जैसे आग फुफकार उठी । सांप के फन की तरह । पतली चिरी जीम मे। जहरीला डक । किसी निष्ठुर रमणी का बदमूरत काला तिल, तिल पर वाल सरसराने लगा । 'खा, सा, वेअकल ख। । फैस-स-स-स " दोनो हाथो से वेलियाहाट्टा का नरम शरीर जकड लिया । खून की गर्मी ने शहीद-गन्ध फैला दी । गरम सीसे की गोली से वे लोग वेलेघाटा में कत्लगाह का जला हुमा चेहरा उकेरना चाह रहे थे । एक इमान की आस-नाक जलाकर-झुलसाकर, वेलेघाटा के सीने पर उसका चमडा तानकर फैला देना चाहते थे । नगीत की नोक पर उसका सिर काटकर उसके नीचे लिख देना चाह रहे थे 'जो सूअर के बच्चे, हरामी की औलाद क्राति करने चलेंगे, उन्हे इस तरह ।' गभीर बेलेघाटा में रहने वाले सरल-सीधे इसानो की घर-गृहस्थी मे प्यार और नफरत एक ही डठल मे लगे जडवा फूल है "भागिये । भागिये। कामरेडो भागिये ।" 'कामरेड' शब्द के धीमे उच्चारण में तेरह साल के लडके ने सारी ज़िन्दगी का प्यार, प्यार की गहरी निष्ठा उँडेलकर अपनी मातृभूमि भारत के नीने से, अपने ही रक्त के लाल कणो से भीगी एक मुट्ठी हरी घास उखाड ली। वह घास लडके की ढीली मुट्ठी मे, विजयदा की काली-कलूटो सूखिया-ग्रस्त लडकी की मगलकामना मे वेलेघाटा के जले सीने पर फैल गयी । और बेलेघाटा शहीद की इज़त लेकर स्थिर हो गया। वेलियाहाट्टा, पुतलीकल का वेलियाहाट्टा-वही जो स्वावो .

कमूनिस 143 गया, की पुतली बनाता है । ईमान के सपनों से रपी गयी पुरती बनियाहाट्टा की फसपाह की पत्ती माम उकरी नहीं पा सको योनि मेंकों के मा की तए बसी चपटी बस्ती में एक कामा पम्मा नगा साका बार-बार 'मा-या करके पिता परा। भूसे पेट पर मात्र मारकर मरत ईसाम अभी भी मामा मावे दिलगी करते हैं। बप्रदर बसियाहाट्ठा का अंबा मिर । विमोर नाम के मरके केन मे भीगा मा बसेपाटा पापाण की तरह लग रहा । पाम पर की किमी एक लिएकी मेमसादेन की पिसो जमी किस्मत बामी मोम साका नाम देकर पास से पुकारा 'मुन्नारे ! और रिवापर की नमी हिसहिसा उठी। तीन पर पाकर गाँध मिरने से पहले मारे पमे का साइरन फट "मम्मत मानो मुस-युग मीयें । सत्तर की मरी धाम नमार बिहिब में इस्माकोर अवसार बदरम पीम पानों में संपर्प की पुलिसी रिपोर्ट । गौर विमधिमे के अदा में बन के कामे वाम । मौर मन्त में सुबह हुई । बाई । म मोम की मरा एक दबासूको वह पास पर घमा पठी । भेट्टी की मम हवा में मुबह की मग्ध। रिसार की माग की बम्रम में मुह पो मोर निमारम को एक स्वार मैं ममाया मया पाामान्ता कोपान में निवारम पकड़ा गया पामब शाम्ता मरणार्थी कॉमोनी के निरापद सेस्टर में पहुँच गयी होगी। मनाउरे की चरान का कामा रंग मोरा मारानरा मार मार को पेट के भीतर मेकर न हो रहा मार बार हमाम इंसानी मामा- मामाओं को भएमी जसको पुतमियों में सिर सुकर्मो की हार म पापमान शिवा फेफर सामाविक गति स फूल पित्राएं । मापी मही कहता पा "मम की बुमेट के सामने पहाफर मरा फफमा मगर एकरार मी हिलामो में कमुनिम नही है।या समममा मेरा मिान नही है। हार-मोस में पार्टी को विदा रसमे की मिपि भास्मा समेटे पार्यों की रहयोबाटा की धरती पर मह बपी । फिर भी बेसबाटा की जमान पर कोई शिरपा मही। मिट्टी की गहरी परतों में यह सारीपानी प्राचीन 144 कमूनिस शिला की तरह न्यिर । वारूद की गन्ध नाक के सिरे पर नचाते हुए जैसे किसी ने हूँ-हू करती एक खाली हवा उगल दी और भात के लिए तरसते शरीर के कोपो मे ज्वार लाकर भी वेलियाहाट्टा गभीर है। भयानक रूप से गभीर। जबकि वेलियाहाट्टा का धू-धू करता मैदान, वालूचर का उदात उदार सीना, नडा वस्ती के जले हुए चमडे के नीचे अनगिनत सके?', जालकाटी, कटोरी वाले माल और प्लास्टर पेटो' ए० बी० ने डम्प किये थे। बैटरी के काले बक्मे के भीतर चार ताजे माल अपने हाथ से बनाकर, तपसे के डेढ़ हाथ वाले कबूतरखाने में पटी खटिया के नीचे छिपाते हुए वगल की खोली की मोमी को बुलाकर नुकु ने कहा था, "कमरा साफ करने जाओ तो रघर खीचतान मत करना।" लडके जव-तब आते थे। एक पतली किताब खोलकर एक-दूसरे के हाथो से लेते हुए पढते थे। सुना है, इमान का दुख मिटाने का सीधा साफ रास्ता किताबो मे लिखा है। मौसी के कपाल पर लगी सिन्दूर की विन्दी पसीने की वजह से पसीज जाती थी । पसीना छूटता था लडको की बातो से । उनके हावभावो ने, “पेट का लडका न होने से क्या हुआ, पर तुम लोगो का पार नही पाती। जरा बता तो सही, क्यो?" सीने के भीतर वारूद का कारखाना। और जन्म की नाल काटने वाले दुख-दर्द की वात लेकर भी पुतलीकल का वेलियाहाट्टा मुकु, निवारन, वूडो और किशोर की लाश की तरह स्थिर। हवा नहीं है । कही भी एक पत्ता नहीं हिल रहा है । वैन के इजन की दवी आवाज़ उठ रही है लगातार । और कूरियर की जवानी समाचार पाकर ए० वी० शायद पागल की तरह विल्डिग की ओर दौडता आ रहा है जले हुए शरीर को पटकते हुए। शायद दांतो की दरार में आखिरी पेटो फाड देगा। किस जमाने में जगल-झाड-अखाड साफ करके इसान ने यहां सिर उठाया था, कोन जाने वलियाहाट्टा के कठिन रहस्य का किस पता है ? कारखाने के मजद्र-मजदूरनियो का वेलेघाटा । मस्ते का वेलेघाटा । पुराने गीतो का वैलेघाटा "जिमका न हो पूंजी पाटा-वह रहे बेलेघाटा ।" 1,2,3,4 देमी वम-चिन्म-किस्म के। .

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146 कमूनिन . । पाने मे लाया गया। पुराने कागजो के वडल, चन्द मोटी-मोटी कापियाँ, डडे, मगीनें, राइफलें, फोन, वेंचें-~-सभी कुछ गाली-गुपतार की चोट से उलट-पुलट गया। कम्बल डालकर थोडी देर तक पीटा गया। उसके बाद फचूआ। पांव के तलवे पूडी की तरह, गोद की तरह रात-भर में फ्ल गये । रात कटी लॉकअप की पेशाव की गध और मच्छरो के डक और वेजान वुवार-मरी नीद के बीच। उसके बाद जिरह । इटेरोगेशन । गिद्ध की चोच की तरह अफसर की नाक । लिपा-पुता चेहरा । चेहरे के एक-कोने मे धुंधली अनास्या और सदेह के घिनौने दाग। चांदी के पुराने रुपये की तरह चमकती हुई लालची आ। और खरवराती हुई जीभ से गालियों की बौछार । चीटियो की तरह सभी अगो पर से रेंगती हुई मौत आ रही थी। गोरा की रीड की हड्डी, फूले हुए पांव के तलुए, उपाडे गये नाखूनो की उंगलियो से मरमराती हुई दिमाग की ओर बढ रही थी। सियालदाह के पतले-दुवले, बीमार कुली के माथे पर ढाई मन की बालू की बोरी की तरह भारी माथा वेलेघाटा थाने के लॉकनप मे गेंद की तरह, रबर की गेंद की तरह, मौत लेकर उछलने लगा। और क्या । एक किस्मा खत्म होने लगा, दुरमुट मे पिटी हुई एक आस्था, पच्चीस-छब्बीस साल की एक जिन्दगी । लॉकअप की गजी दीवार, छिपकली की जीभ जैसे रोशनदान, जूए और गाय के चमडे के बूट की आवाज, गोरा के इर्द-गिर्द हाथ उठाये नगे नाच रहे थे। स्मृति के धागे, गाठे, जालकाटी लांघते हुए गोरा जमे वेलमुडा मैदान की ओर बढ़ रहा है, जहाँ पेड के नाम पर एक टांग मे सडा बकफूल का पेड जम्हाई ले रहा था गहरे मालस से । होमियोपैथी का बक्सा जिस बीमारी को जिन्दगी-भर दूर नहीं कर सका था, उसी बीमारी के माथ टक्कर लेकर गोरा जैसे दस-बीस लडको ने सोचा था 'इसका मतलव है जिन्दगी । मुल्क का चेहरा बदलना पडेगा।' सफ़ेद होठो पर विटामिन की कमी से बने घाव को फैलाकर मां कहती थी. "देख, तेरी बुआ का लडका एम० ए० पास करके कॉलेज में पढ़ा रहा है । हम लोगो मे भी तो जरा उम्मीद जगती है।" गोरा उस वक्त उस नारी की मोर सीधी रेखा मे देखता था "मैं भी वैसा कुछ वनू, उसके बाद गरीव-दुखियो को थोडा-बहुत देखू, यही न?" और ।

कमूनिस 147 तेरस नम्बर की वारणस्तरीबार के सहारे बनकर नहा समाचार पर फुटनों पर टूट पड़ा दो गोरा को धर्म में धारण करने बासी मां के सफेद भाष मारे गम-भर में फैम पये मोर पूर्वी मनाप्त के पितापी स्वर में फरे। "किस्मत में यह भी रहो !" नहीबाननी,नही सममेनी पेट के सदमेपो बहजोखिम उठाया था? बीच में एक भागार से हवा बीचने की। माध्यप । मोरा चांद मुहस्मे के मोहरम के एक किरामी की तरह भोगे-मामे पहरेका एकसान उसके सामने पाबीच में टेकुन की चमकती पानिश । उस चमकते रंग के कपर सुनी हुई एकापी भोर मादमी का उमटकर रखा हमापामा। परमे की कासीसमोर बाविशी कांच परमे ने गोरा के दुपार से पपवे सफर हो और माथे के कटे दाग की बार रेसा पा। "पहले मू रखवे पेन? "मीनिये पारमीमार पीते हैं मोगवासी से पास किया कमिय यूमिपन के मता से अचानक मूनियन क्यों छोड़ दी नहीं छोड़ी? मठा बन्छा बापका थीमगेश या कमिय में ही किस बात से पहले प्रेरित हुए पानी हाँ मुक की हामत तो वादयनीय है एकसपनाम । परीफ मारमी सी बातें करनी फीते से मपी मुसकान पैन के मिमसे हिस्से में सोने के पानी की बस-खस भागार परमे के नमुमा कामे रम के मदर से निकम आया एक गोड़ी यूट एकदम मचानक। कोर में कौन-कौन? "मैं कोर मेमर महीं है। "ए.बी.कास्टर कहाँ है? 'सड़क पर मैराम पर। तेरी मां को छोड़ दिया है मारा ?- की वो ।" कमर से ऊपर पूरा कपड़ा उठाकर, मंगकोप सहित पौनाम गोरा मह साममे मार पक्रसर (एम.बी.) अपनी गांभ पर पप्पा मारने नमा भपी साप्तापी मृत पी ! पोड़े की तरह वादमी का हापौर मांगों मामे करणे मांस की 148 कमूनिन तरह झूलते हुए अडकोप, सारी दुनिया को अलग कर कुत्सित जुल्म की तरह, बदसूरत मेढक के पेट की तरह हिलने लगे। उसके बाद सब तेजी मे जमे हडबडाहट में घटित हुआ। फ़ोटो खीचना, हाथो की छाप, नाप-जोख, जन्म के निशान की खोज, सो० आर० एम० । तीन-चार थानो मे खीचतान-लाल बाजार, लार्ड सिन्हा रोह । और एम० बी० की चमकीली तोद । फरेवी सौम्य चेहरा । और शराफत । उसके बाद जे० सी० । जेल ! कारागार । जेलखाना। पिजरा। पिजरे का पछी । किसने कहा था "कम्युनिस्ट का असली इम्तहान है कत्लगाह, जेलसाना और गोलियो की बौछार-"मन्टू या सुकु ने वूडो या सोना ने ? या कि मवो ने " ठीक याद नहीं आता । कठ के भीतर काग पर किमने वात नचायी थी मोर नारानदा कहते थे "ज़िन्दगी-भर मजदूरो के झडे के नीचे रहना पडेगा, तब न " केस-टेवुल के डडे के आगे पहली गिनती देते हुए, उकडू वैठे गोरा से नारानदा की भेंट हो गयी। नारानदा का गोरा से पहले ही प्रेमीडेंसी जेल मे चालान कर दिया गया था। जेल के सातखाते में। अडतालीस के कामरेड लोग भी वहीं रहे थे । और संतालीस से पहले ए० बी० के एनाकिस्ट पिता ने एक गोरे साहब को सातखाते की सीढी पर थैले से पीटा था। सातखाते की मीढियो मे वदित्व की यातना मे अधकार बना रहता है । और दुमज़िले के लम्बे हॉल मे दौड आती है आज़ाद हवा । हवा मे पुराने जमाने की गध ! रात गहरी होने पर वह गध सीने मे लिये दो-एक अधेड उम्र के कामरेड हिजली के शहीदो को वन्दना करते है 'हम लोग तो भूले नहीं शहीद ना ही यह बात कभी है भूलना तुम्हारे कलेजे के खून से रगा है जो अंधेरा जेलखाना ।' दो फटे कम्बल, कम्बलो मे अनगिनत छेद और थाली-कटोरी बगल में लिये गोरा सातखाते मे हाजिर हुआ था। सातखाते के दाहिनी ओर वडा चौका । हजार आदमियो के पेट का जुगाड इसी बडे चौके से किया जाता है। सजायाफ्ता कैदी जोर फालतू मे पसीने से तर बदन । सात सब्ज़ियो के इठलो-छिलको से बना शोरवा, शोरवे की विचित्र वू । पीछे दीवार । एक शेल्टर मे तीन रातें विता कर, मोनुमेंट तक जुलूस मे चलते हुए कमूनिस 149 । भारासयाकर, या कभी एक कारखाने के भीतर माल मेकर की गयी मुप्त बैठक में मारमा क बार दोस्ती हुई थी। कामरेर । पुरामा कामरेर। पोरा को उसके बारे में कोई खबर नहीं पी । यहाँ इस म के अम्बर सबके साप भेंट हो रही है। ममी भी जो बीस-तीस मोम छिटक यये है या बोसोप मारे पये है उहें निकाम विया बाये तो बाकी सभी बेस में माये है।पीच के साप केस-रविम पर मुसाकात हईपी । मनपा पाच । रेषा करागों से भरा पहरा 1 टीसी नाक । सस्त पंगा। देख-सुनकर मुंहष्ट मन्टू पापड़ाया 'कम्युनिस्ट पार्टी माफ बस रिया।" हर रविवार को बड़ा कस्बम । मतसय सातमाते के दोनों होतके कामरेर सोब एक कमरे में कठे होये । पहमे सास्कृतिक कायम । म का गीत इनसानी माना। कांति का माद्वान । नसके बाद कविता-पाठ। जामोबना । समालोचमा ।इसके असामा हफ्ता भर इसी कायक्रम पो छोटे पैमाने पर किया जाता है। उसका माम है 'छोटा कमन । यहाँ एक कम्बत भी पता है। और पार-पाच कामरे । सबेरे नोनम बराबार से सब तेम ममने के लिए बैठते हैं। मानो फोगी किमे में हों। मात फोराकर मुमामात से सौटते समय सभी बाप-मां माईबहन-रिम्तेदार की परत अमर साईको मारपर्यजनक बरं मे माते है। और सामाग समता है। नगई की गर्मी में बरसस्त पर्मी। माराना पोरा र की सास बसने ममती है ऐसा ताप । मोर मीरा-पस मार उपती है। सब सोचना शुरू किया है। मौर इतने सारेपरमापरम समाचारों मीर पर की गोली से मरे किसी प्रिम कामरेर का पहरा नि भीवर टूट का समाचार सुनकर बेस कमेटी के साम पुरामा पेहरा कठोर हो रठा उगः गम्- मुरागार " मौर बह सनी नरसा पी. नरेनर नापान विष्ट नसे माता- महीये, स्स में पैरा मो नहीं एए । रच: एकनिष्ठ मस्त कर मुस्स- रान:

. 150 कनिम पक्तियो की पक्तियां निगली थी उन लडके ने। और नीहारदा के साथ वातचीत में उनने जाना या 'सशोधनवाद एक घिनौना कीडा है।' लिहाजा दांतो के बीच मे तिनके के तरह शब्द को काटने पर जाने कैसी एक सीधी लडाई की उपलब्धि होती विष्टु को । जवपि भगीरथ की गगा इम मुल्क की धरती पर छिपी वाढ फैलाती है, अन्त मलिला नदी की तरह जेल के चढे हुए तेवरो के वीच उथल-पुथल । ५ मीने में मुक्ति के जयगान के बीच कही जैसे तपस्या और बाराधना का शान शीतल मोता बहता है । नारानदा ने कब ज़बान खोली थी। वाहर की ताल में ताल मिलाते हुए। बाहर की पार्टी। वहाँ भी सग्राम । धरती पर मौत के माय जमकर जूझना, दुश्मन का मुकावला और मही रास्ते की तलाश की लडाई। जेल के भीतर भी वही लडाई। जेल तोडने के लिए लडाई को पुकार। और जनता का मुक्ति आदोलन खडा करने की मोच में एक पक्ति मे बैठकर गिनती देते हैं। जेल-पार्टी टूट रही है। और दांत पर दांत जम रहा है। भाले की तरह दीवार लांघकर सवाल फ्न उठा रहे हैं। मिनती भाभी मुलाकात करने के लिए आयी थी "शाता ने हम सबको लेकर ममिति बनायी है, सिलाई-कढाई करके चला रही हूँ देखो, बीडी के दो वडल से अधिक नही ला पायी।" गोरा के माथ इटरव्यू करने आयी मोना की मां "अपने वाप को तो तू जानता है । वोला, औरत थाना-पुलिन क्या जायेगी माँ तो रोकर ही परेशान मत होना। विजय छूट गया है । वकील लगाकर विजय तुम लोगो का केस लडेगा उनके लिए एक क्लब भी बनाया है क्या नाम हैं भला ।" "मोनू का क्या समाचार है ? बकु कैसी है ? छिरि भाभी?" "बन्छी हैं, नव अच्छी है मिर्फ़ सिर्फ मीनू का कोई पता नहीं है।" मुलाकात के अन्त में गोरा की आंग्वें जलने लगी, एक असहनीय जलन । यूं मन को समझाने के अलावा कोई चारा नहीं है। मगर भीतर-ही भीतर और भी दो-चार जने फुफकार रहे थे। भूख-हडताल लेकर सव- कुछ फट पड़ा। मातखाते के राजनीतिक वदियों की मर्यादा की मांग पर भूख- पुकार । लगातार हडताल । पेट पर रस्सी बांधने वाली हडताल की कमनिस 151 मनाई। इस पर सातमाते में उपम पुषन मची हुई है। पेन-कमेटी टूटने टूटन को हुई। भीतरमाकर गान सी टूट-फूट गुरू हुई है। एक पम मौर भी सम हो गया है। दीवार से पीठ सटाकर पो होकर कह रहे। बम के मदर भीबासमे का मभिवान बनगा भूम-हावास मियमों की सहाई।। नपे बाबा मांधी की पडू मारानदाकी देहाती मूछों की परार में ईमानदार हंसी 'बमह सममकर नाई। यह पेम है। भूख हावाम यहाँ बरबस्त हपियार है। मह मेन है।बहन। पमा बामो धनार समझकर बम पटो कार पाना समानकर, बी मास तोम हर बस्त कहते रहते हैं। चोरी-ठाई पीरी करके महीने में दो-एक रफा बात है साम में कम-से-कम चार छह पार तोपर । म उनके लिए कारखाना है मौर कम्युनिस्टों के सिए' -विवविधामय । यूनिवर्सिटी। ठेह नम्बर गास का पांच बात सुनकर महुधा पा। बहुत गुन। पाप की सिमाई-पहाई बगावे की पुसा तक है । कान तक हंसी मीचकर पह बात पाजूने बतापी पी। उसके बार मचानक मंभीर हो गया पा 'मो पीच पर बटकर तब दो दाने गुटाती वी सिंबाई-पाई कहाँ से होगी मोरारा ? परमे के लिए मां काती पी। ममर होम संभालते ही में काम में गुट गया। माटर के पीछ। मापगोल मैं सब जानता है। मगर हो तुम एक पवि पड़न के लिए कहो तो बस । पहसी गिनती स पहले मारामरा उठे। कप का टुगाड़ा मकरसुराकी में मिसापरा-सा दन उस पर रासा। पसीता। पमीता बसाना बासान काम नहीं है। मारानरा माहिर है। नीकी तरह दोनों माम फूमाकर बीड़ी सुसपाने में नवाचार फ़क मारने की तरफूक मारनी पड़ती है। उसके गार कपड़ा पुमाने ममता है। उस धुएँ के भीतर दोनों मा मान यि मारामवा मारत रहते बोरा सिमा एस"तम पोरा मे मान पाय का वराम रिमे मे गम दिया है। इस तरह व मोम रोग भाग मला है। मौर सोचते है इंसान को भार बताये रखने के लिए स्विनी पसरत करनी पाती है। पाके पास एक बार समाती में दिया ।" - सलाई निकली थी। वस । सीधे केस-टेबुल। कोई और होता तो लेंग जमादार मेल में डाल देता। इमीलिए लत्ते मे आग। बीडी की फूंक । लगातार। तभी न ल चाय । उम चाय की चुस्की लगाकर नारानदा का दिल खुल जाता थ साफ हो जाता "विश्वविद्यालय का मतलब क्या है ? दुश्मन के जुल्म पस्त नहीं हो रहे है, और जिस यन मे तमाम जनता को दबाकर रखते उसका नट-बोल्ट-स्क्रू सभी की पहचान कर रहा हूँ इम्तहान दे रहा हूँ वेइन्तहा वरदाश्त का और मन की ताकत का। इसके अलावा यही वक्त है, सारी किताबें पढ डालो, समझो और जान लो सभी कुछ और काले पांचू को वडा-सा 'अ' लिखकर और उस पर अभ्यास क के लिए देकर गोरा ने भाटपाडे के खभे के ऊपर दूरबीन की तरह दो आंवें लगा दी। लोगबाग आवाजें करते हुए चलते-फिरते हैं। गाडी हॉर्न बजता है। अचानक मीनू का चेहरा कटी गरदन की तरह ल गया एक पतली चोटी लेकर । मीनू का कोई समाचार नहीं है। चीनी चौके मे सटे, नमाज़ पढ़ने के चबूतरे पर नारानदा किसी साथ घनिष्ठ होकर बातचीत कर रहे हैं। अचानक गोरा को ईसामसीह उन पक्के बारह शिष्यो की याद आयी, जिनमे से एक ने उन्हे पकड दिया था। और बिल्डिंग का घिराव हुआ था नारानदा का समाच पाकर । अभी तक उस आदमी का नाम छिपा है । मगर । उन बारहो से एक 7 जिन्दगी में इस तरह की कितनी गांठ पड गयी हैं । और इनको ले मजे मे हो-हो हेपते हुए सारे कैदी फाइल में जमा है। कभी-कभी अवसन्न आती है जेलखाने के शेड पर नीम के पेड की टेढी छाया की तरह। दो होंठ सी जाती है जिन्दगी-भर के लिए। उस समय पुकारने पर भी गो के मुंह से कोई आवाज नहीं निकलती। उस समय गोरा बहकता हुआ ज कहाँ चला जाता है। सिर्फ पडे रहते हैं दो घुटने, एक दुवला कधा, वेजा सा लम्बा हाथ । कानूनी सजा के मुताविक ! दीवार और सगीन के ग जाल के भीतर।

Kamunish

Author
Basu Shanker
Title
Kamunish
File name
Kamunish
Text
OCR done
Citation
1833
Published
2011/03
Publisher
Xxxxxxxxxxxxxx
Language
Sanskrit
Pages
159
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Chemistry
DLI number
552199
Barcode
4990010032915.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
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Kamunish