Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
The Matsya Puranam Gurumandal Series. Xiii
Front matter
1
Printed by
Gopal Printing Works
198/1, Cornwallis St.,
Calcutta - 6.
" गोरोशङ्कराभ्यां नम ॥ " अत्रकिञ्चित् "पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिता "इतिहासपुराणाभ्यां चेदं समुपवृहयेत", "इतिहासपुराणानि पञ्चमोवेद उच्यते”, इत्यादिप्रमाणैः पुराणानाम् प्रामाण्यमवसीयत ज्य। उपरितनरुद्धरणे चेदसात्म्ये सिद्ध भगवन्निःश्वासरूपा- पौरुषेयवेदयत् पुराणानामपि तस्वमङ्गीकार्यमालोचकैः । तानि चाप्रादर्शति सुप्रसिद्धम् । वस्तुतो भारतीयसंस्कृते, वर्णाश्रमधर्मस्य, निखिलस्य, समाजस्य, अधिकलस्य च राष्ट्रस्य मर्यादा संरक्षणं यथा चेदैः प्रियते तदनुस्मृतिभिस्तथैव च पुराणेरपीति न संशयग्रस्तम् । वेदानां दुरुहत्या तदीयतत्त्वसाक्षात्कारी याक काठिन्यमावहति प्रायः सरलातिसरलभाषानिवद्धात्मनां पुराणानां न साहगिति । परं फालप्रभावादयत्ये पुराणप्रतिपाद्यार्थज्ञानकथा तु दूरन्तिष्ठतु, पुराणानां नामान्यपि यथावत् सर्न जायन्ते, मन बानि सन्ति फारणानि, प्रथमतोऽर्थाभावे- ऽन्यीभावन्यायेन न कोऽपि पुगणानि प्रकाशयितुमीहने, प्रकाशितान्यपि पदाचित् मर्यतया न सर्वसुलभानि, सुलमान्यपि न शुद्धस्वरूपाणि इति पण्डितजनवेदनीयत्य- पर दुर्लभे सर्यजनवेद्यता नभ कुसुमायने। परं फरणापरतन्त्र मृतधर्मरक्षण- प्रतिश्रुतिः सर्वव्यापी भगवान् पुण्ययशान पदाचित् कस्यचिहदयदरी- मध्युष्य पीजरक्षणमुठया सर्व रिरक्षिपुः शुभायाऽऽवश्यककर्मणे प्रेरयति इति सम्प्रदायः। वश्यकुलतिलकस्य मयूर (मोर) पदमाजो येदशास्त्राध्ययनपठिष्ठस्य समुदार- चेतसो पदान्यपारम्य परमास्तिपस्य भगवतो रक्ष्मीनारायणम्यानन्यरूपामाजनम्य गोग्रामणकुलफमतस्य विद्वत्सम्मानतोपिण, स्वनामधन्यम्य भारतविश्व॑तस्यो- द्योगपतेः श्री मनसुखरायमोरमहोदयस्य चेतसि भारतीयसंस्कृतिमूलभूतानां ग्रन्थानाम् प्रचिकाशयिया समुदपद्यत। -महाभागेनानेन तत्तद्ग्रन्थप्रकाशनं स्थव्ययेन विधाय निश्शुल्कवितरणं च समुद्दिश्य लुप्तप्रायाणां स्मृतीनामपूर्व- संस्करणेन यादृश उद्धारो विहितस्स न शब्दैवर्णयितुं शक्यते स्थिरीकृतया गुरुमण्डलग्रन्थमालया तदनु निरुक्तप्रकाशनं विधाय पुराणानि प्रकाशयितुमु- पक्रान्तम्। ब्रह्मपुराणं भागद्वयेनाविकलम् प्रकाशितम्। अधुनेदं मत्स्यपुराणं सर्वाङ्गशोभनम् प्रकाश्य भवताम्पुरत उपस्थाप्यते। घणदेशीयादर्श संस्कृतसाहित्य- प्रकाशकै श्रीजीवानन्दविद्यासागरमहाशय मुद्रापितसंस्करणमेवाऽऽदर्शतयोररीकृतम् । एतादृशवृहत्कार्यसम्पादनाय श्रेष्ठिप्रघरैः विद्वन्मण्डलमेकं महता सादरव्ययेन संस्थापितं यत्र व्याकरणाचार्य एम० ए० पदभाजः पं० श्रीब्रह्मदत्तत्रिवेदिशास्त्रिणः दाधीचोपाय पं० श्रीरामनाथ शास्त्रिणः, मिश्राहब ५० श्रीकजोड़ीलाल शर्म- महारायप्रभृतयो बहु परिश्रश्य साधुशोधनादी प्रायतन्त। अल्पीयसि काले त्वरया महतोऽस्य मत्स्यपुराणस्येदशं सुदशं शुद्धं च सस्करणम् विद्वद्वराणामेपां महान्तं श्रमं विज्ञापयति। नवत्यधिकद्विशताध्यायात्मकस्यास्य सूचोरूपेण संक्षिप्तप्रत्येकाध्यायकथा- संवलनेन तत्तध्यायारम्भे तदीयविशेषतासूचकेन वर्णनप्रस्तावनया, अन्ते शुद्धाशुद्धविवेकप्रदर्शनेन सौष्ठवं जिज्ञासुजनाध्ययनसौकयं च यदुपस्थापितन्तद् घस्तुत आदर्शायते। ईदृशचिकणपत्रेषु सुन्दरातिसुन्दराक्षरमुद्रापणमप्यतीय मनोहारि। वैश्यकुलभूपणस्य महनीयवरितस्य विद्याविद्वत्प्रमोदजुप. श्रीमोर महोदयस्य चिरायुषः सुपुत्राः श्रीराधाकृष्ण, श्रीनन्दलाल, श्रीसज्जनकुमाराः सर्वेऽपि पित्रा. देशानुवर्तिनः परमसहृदया ईदृशेऽपूर्वकार्ये सर्वथा सहयोगमाचरन्तोऽनुकार्या एव । किम्बहुना 'कारणगुणाः कार्यगुणानारभन्ते' इति न्यायेन सस्कृतचिद्याप्रेम पयोधे घेष्टिमहाशयस्य मर्यादारक्षणक्षमा. सत्सुता उचिता एव । 1 ( ग ) सर्वपिता भगवान् एतादृशान् सत्तनयान शास्त्ररक्षणधिपणान् उत्तरोत्तर- म्युदयपथे प्रीणयेदिति सर्वस्यापि संस्कृतसमाजस्य धर्मप्रधानस्य शुमामिलापः । दिव्यसंस्करणानामेपामिदमपि वैशिष्टयं विशेषत आलोच्यं यत् श्रेष्ठि- हाशयाः समयाभावेऽपि कार्ययाहुल्यव्यस्ततायामपि सर्वतोभावेन स्वयं साकल्येन पनिरीक्ष्य मुद्रापयितुमप्रेसरयन्ति । तदिदममीयां संस्कृतमानप्रीढिमानम् पुराणस्वाध्यायरसिकत्वं च विस्पष्टयति । मुद्राराक्षसदोपादक्षरदोपाद् विनिरीक्षणदोपाद् घा सम्भवन्त्यो मानव- सुलभास्थ्टयो न गण्याः । गच्छतः स्पलनं कापि भवत्येव प्रमादतः, हसन्ति दुर्जनास्तत्र समादधति सजनाः' इति न्यायेन नीरक्षीरविवेकिभिस्तत्त्वज्ञः क्षन्तव्या एव। सद्य एव गुरुमण्डलप्रन्यमालानुगत मोखाच्यशोधसस्थानतः ब्रह्मवैवर्त. , पालिङ्गाग्निपुराणानि प्रकाश्यन्ते। प्राचीनसंस्कृतिधर्मसंस्कृतविद्यारक्षणकयतं लोकोपकारलक्ष्यं आदर्श- त्यागर्म मोरणान्यशोधसंस्थानमेतत्संस्थाएफसञ्चालकष्ठिजातम् अदसीयपरि- कमण्डलं च इंदूक्प्रशस्तफार्यकरणपुण्यनिवयेन चिरं शिवमीयामुरिति फामयते । । हरिशयनी न्यायाचार्य पण्डित राजनारायण शास्त्री थध्यक्षः राजसम्यशादर्श शास्त्रार्य महाविद्यालयः, फाशी २०१२ वि० ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ दो शब्द "जा पर कृपा राम की होई तापर रुपा करहि सय कोई।" आनन्दकन्द भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र की असीम अनुकम्पा से चिद्वजन की सेवामें पुराण साहित्य का शिरोमणि पुराण शरीर का प्रत्यक्ष विग्रह यह मत्स्य पुराण गुरुमण्डलग्रन्थमाला के तेरहवें पुष्प रूप से प्रस्तुत करते हुए अत्यन्त प्रसन्नता हो रही है। यह पुराण सम्पूर्ण वेदों, वेदाङ्गों और समस्त शास्त्रों के उद्धारक मत्स्यावतार द्वारा कथन किये जाने के कारण मत्स्य नाम से प्रसिद्ध हुमा है। "पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम् । उत्तम सर्वलोकानां सर्वज्ञानोपपादकम् ॥ ४५ ॥ त्रिवर्गसाधनं पुण्यं शतकोटिप्रविस्तरम् । नि शेपेषु च लोकेषु चाजिरूपेणकेशवः ॥ ४६ ॥ ब्रह्मणस्तु समादेशाद्वेदानाहृतवानसौ। शङ्गानि चतुरो वेदान् पुराणन्यायविस्तरम् ॥ ४७ ।। असुरेणाखिलं शास्त्रमपहृत्यात्मसात्कृतम् । मत्स्यरूपेणाजहार फल्पादावुदकार्णवे ॥४८॥ अशेषमेतदघददुदकान्तर्गतोविभु :- (पद्म पु० स० ख० १०१ श्लो० ४५-४८) पुराणों के सम्बन्ध में ब्रह्मपुराण के पुराण परिचय में विशेष अन्वेपण के साथ पूज्य पिताजी ने विशेष रूप से प्रतिपादन किया .. - . ऐतरेय ब्राह्मण के उपक्रम प्रसङ्ग में सायण ने पुराण का लक्षण लिखा है "जगत प्रागस्थामुपकम्य सर्गप्रतिपादक वाक्यजातम्पुराणम्" जगत् की भारम्भावस्था से लेकर सृष्टिप्रक्रिया का विवरण उपस्थित । करने वाले शास्त्र का नाम पुराण है। इस लक्षण के अनुसार 'पुराण पञ्चलक्षणम्' का जो क्रम है उसमें मत्स्यपुराण में वर्णित विषयों का समावेश होने से उसकी महापुराण संज्ञा हो जाती है सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च । वंशानुचरितञ्चेति पुराण पञ्चलक्षणम् ॥ सर्ग-सृष्टि का वर्णन , प्रतिसर्ग=पुन सृष्टि और ल्य वंश-देवता और पितरों की शायली मन्वन्तर-सय मनुओं का आधिपत्यकाल , वशानुवरित-सूर्य और चन्द्रवंशी राजाओं का निरूपण इस महापुराण में बराबर उपलब्ध होते है। मेरी तुच्छ बुद्धिके अनुसार ऋग्वेद आदि अनादि हैं और ऋग्वेद के रय मण्डल का गृत्समद, ३य मण्डल को विश्वामिन, चतुर्थ का घामदेव, पञ्चम का अत्रि, पष्ठ का भारद्वाज, सप्तम फा घशिष्ठ, अष्टम का फपच, नयम का अगिरा और प्रथम तथा दशम के नाना ऋषि सङ्कलन फर्ता प्रसारक और द्रष्टा हैं। वैसे ही इन महापुराणों का अनादित्य है। प्रथम ग्रह्माजी ने वेदों के साथ समाधिगम्य ग्मृति द्वारा पुराण विद्या फो प्राप्त किया था। इनके फाल निर्धारण के लिये पाश्चात्य और पौर्वात्य विद्वत्समुदाय ने जो प्रयत्न किये है वे अभी तक अपूर्ण हैं । प्रोफेसर पिसन ने “And the testimony that establishes their (Purana's ) existence three centuries before Christianity, carries it back to a much more remote antiquityto an antiquity that is probably not surpassed by any of the prevailing fictitious institutions or beliefs of the ancie. world. To such an antiquity the "Mosaic creation" is b as yesterday." अर्थात् साधारणतः ईसा के तीन सौ वर्ष पूर्व पुराण रचे गये परन्तु कुरे अन्तरंग एवं बहिरंग प्रमाणों से यह भी शक्य है कि इनको रचना स्थिर करने में घही दिन निश्चित हो सकता है जिस फी कल्पना मात्र विश्व की किसी भो जाति के इतिहास में नहीं हो सकती। इसको प्राचीनता के सामने अन्य पश्चिमी देशों की रचनायें कल की सी मालूम देती है । मेरी समझ में पुराणों के सम्बन्ध में अभी गवेषणा का आधार भारत सरकार की चीन में तिब्यत की सीमा निर्धारण के लिये पद्मपुराण की प्रतियां भेजने में ही है। आशा है भारत की स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद कुछ ठोस कदम इस महती निधि के प्रसार के लिये उठाये जायेंगे जिप्तले अपने प्राचीन गौरव को स्मरण कर भारतीय कर्तव्य कर्म में ऊंचा स्तर बना कर अपना पूर्व स्थान बना सके। अब आत्म निवेदन के रूप में कुछ लिखना अपना कर्तव्य समझता हूँ । मेरी पुराण पठन की अभिरुचि उतनी नहीं है जितनी कि पितुःश्री के शास्त्रमय जीवन के आदर्श की है। न ही मैं समय निकाल कर इस अपूर्व अमूल्य भारतीय साहित्य फा थोडासा भी रसास्वादन करने का समय निकाल सका हूँ यह मेरी ही अपनी कमी है। आरम्भ से ही पितृवरणों को जब एक दशक पहले शास्त्रों के विषय में चर्चा का अबसर आया तो कलकत्ता में हो उनकी सन्निधि में व्यवसाय एवं उद्योग की शिक्षा में लगा रहा। उनके गृहस्थ धर्म से जो आशातीत सफलता सद्गृहस्थों को मिली है उससे मैं भी अपने को गौरवान्वित समझता हूँ। इन दिनों उनकी सन्निधि से दूर इस महानगरी में अपने उद्योग धन्धों से अवकाश का भी अवसर नहीं फिर मेरे जैसे अन्धकार में रहनेवाले असंस्कारी व्यक्ति के लियो लिपना कालक्षेप करू इसके सिवा अन्य मार्ग नहीं। हाँ जब कभी घर्ष में एक सधवार, उनके शुभदर्शनों का बम्बई या कलकत्ता में लाभ मिलता है और वे अपनी सारी शास्त्रज्ञता का परिचय देते है तो मुझे आश्चर्य होता है कि व्यवसायी और उद्योगपति होते हुए उन्हें किस प्रकार शास्त्रों को अध्ययन करने का सुसमय मिल जाता है मैं तो भगवत् कृपा ही इस में एकमात्र कारण मानता हूँ। इन वर्षों में उन्होंने मुझे राम नाम पुस्तक में विशेष मनोयोग से इष्टदेव के नाम लिखते रहने का आदेश दिया है इसे में यथाशक्ति करने की चेष्टा करता है। पूज्य पिताजी के पुगण प्रकाशन के सङ्कल्प को इतनी शीघ्र मूर्तरूप धारण करते देख बहुत ही आत्मसन्तोष होता है। अपने सम्मान्य पाठकों को यह अपूर्व उपहार भेंट करते हुए मुद्रण सम्बन्धी त्रुटियों और शीघ्रता में संशोधन कार्य की चूटी हुई अशुद्धियों के लिये क्षमा याचना करते हुए उन्हें अन्त में दिये गये शुद्धाशुद्धि पत्र से सुधारने को सादर प्रार्थना है । सदा की तरह इस बार भी आरम्भ से ही श्री ब्रह्मदत्त त्रिवेदी श्री फजोडी- लाल मिश्र एवं रामनाथ दाधीच ने प्रुफ सशोधन तथा शुद्धिपत्रक एवं विषय सूची तैयार करने में विशेष योग दिया। इसकी विषय सूवा में इस बार हिन्दी में अध्यायों फा संक्षेप में विवरण तैयार करवाया गया है जिससे संस्कृत के न जानने पर भी पुराणों की विशेषता से परिचय करने और प्रेम करनेवाले हिन्दी भाषाभाषी महानुभावों को इन ग्रन्यों का लाभ होगा ऐसी आशा है। ऋषियों ने विश्वहित के लिये जिस साहित्य को रचना की उनके शन्दों को उसी विशाल भावना से ही सदा गढने और समझने का हमारा लक्ष्य एवं प्रयत्न होना चाहिये यह सादर निवेदन है। यन्त में इस महान यज्ञ के द्वारा सम्पूर्ण देशों में पुराण सौरम फैल फर दिव्य भावों से जनमानस को सुरभित करने का हमें सफल अवसर मिलता रहे और यह निर्विघ्न सम्पन्न हो यही एकमेव परम पिता से प्रार्थना करत'* . पाठक महानुभावों के अनुपम सहयोग से पुराणों का प्रकाशन विश्व भर में अहिंसक क्रान्ति का मन्त्र फूंककर एक नयी आशा तथा नया जीवन सञ्चार कर सके तो हम अपना प्रयत्न सफल समझेंगे। अपनी अपूर्णताओं के लिये पुन प्रार्थना करते हुए उपसंहार में उन सभी सम्मान्य महानुभावों का कृतज्ञतापूर्वक स्मरण करता हूँ जिन्होंने अब तक हमारे प्रकाशित साहित्य का स्वाध्याय कर हमारे परिश्रम को सफल बनाया एवं आगे भी बनाते रहेंगे। शुभम् भूयात् विनयावनत- मार्गशीर्षशुक्ला ११ गीता जयन्ती, २०११ ४६, कुसुम कुञ्ज, रिजरोड, बम्बई। नन्दलाल मोर
॥ श्रीगणेशाय नम
मत्स्य पुराण की
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अध्याय
विषय
पृष्ठाङ्क
निर्मग्नः श्रुतिजालमार्गणदशादत्तक्षणैवींक्षणै-
रन्तस्तन्वदिवारविन्दगहनान्यौदन्नतीनामपाम् ।
निष्प्रत्यूहतरङ्गारिङ्गणमिथः प्रत्यूहपाथश्छटा-
दोलारोहसदोलहं भगवतो मात्स्यं वपुः पातु नः ।।
१ मत्स्यावतारवर्णनम्
भगवान् के मङ्गलाचरणोपरान्त सकल प्राणिहितार्थ मत्स्यावतार का
वर्णन।
२ मत्स्यमनुसंवादवर्णनम् ।
भगवान् मत्स्य और मनुका प्रलय विषयक सवाद। प्रलय में सृष्टि के
उपसहार का वर्णन । अन्तमें प्रभु द्वारा बेद रूपी नायको मत्स्य के रङ्ग से
सुरक्षित रूप में बाधकर प्रलयकारी दृश्य उपस्थित होनेका वर्णन । उत्पत्ति,
स्थिति, प्रलय चश, मन्वन्तर, भुधन, वश्यानुवरित, भुवनविस्तार, दान धर्म
विधि, श्राद्धकल्प और वर्णाश्रम विभाग के सम्बन्ध में मनुका प्रश्न एवं
भगवान् मत्स्य द्वारा प्रत्युत्तर ।
३ सृष्टिप्रकरणम् ।
약
ब्रह्मा द्वारा मानसी सृष्टि में मरीचि आदि महर्षियों का जन्म। प्रति
३
[ २ ] की परिभाषा और पञ्चीस तरयों से पुरुष की उत्पति। मानली बाद मैथुनी सृष्टि का आरम्म ब्रह्माजी से सावित्री की मानसी उत्पत्ति से ही मनुका जन्म । मनु स्वायम्भुव घ विराट् नाम से विख्यात हुआ ४ सरस्वत्याश्चरित्रम् । ब्रह्माजी तथा सरस्वती का चरित्र और फामदेव को ब्रह्मा का शा स्थायम्भुव मनु का घंश वर्णन तथा दक्ष की उत्पत्ति। ५ दक्षाय मैथुनतः सृष्टिः। ब्रह्माजी की आज्ञा से दक्षने पाचजनी नामक स्त्री में हर्यश्चों उत्पन्न किया। वे नारदजी के उपदेश से ब्रह्म में तल्लीन हो गये। तदन दक्षने सबलाश्व नामक पुत्रों को पैदा किया उन्होंने भी नारदजी पचन से अपने भाईयों के मार्गका अनुसरण किया। फिर दक्षने कन्याओं को पैदा किया जिनके अंश से सम्पूर्ण सृष्टि की रचना हुई। ६ कश्यपान्वयवर्णनम् । कश्यपजी के वंश का वर्णन जिनमें अदिति से देव, दिति से दनु से दानव एवं अन्य स्त्रियों से पशु, पक्षी, वृक्ष, सर्प, यक्ष, राक्षस, गने और अप्सरादिकों को उत्पत्ति हुई। दिति से उनवास ४६ मरगणों उत्पत्ति हुई। ७ मलूगणोत्पत्ति कथनेमदनद्वादशीव्रतकथनम् । मरुद्गणों की उत्पत्ति के विषय में ऋषियों का सूतजी से प्रय सूतजी ने उत्तर में कहा कि देवदानवों के युद्ध में दानवों के मरने पर दु दिति ने कश्यपजी से पुत्र की याचना की। कश्यपजी ने दिति को पुत्र के लिये मदन द्वादशी के व्रत का विस्तार से वर्णन किया तथा गर्भवती फो क्या २ करना चाहिए इस विषय में सारगर्मित उपदेश फिये, जैसे .
२७
३०
३
११ आदित्यारूपानवर्णनम् ।
आदि सृष्टि में सूर्य वंश के राजाओं का वर्णन; इला का उपाख्यान ।
१२ मूर्यवंशवर्णनम् ।
सूर्यवंशी राजाओं का वर्णन
१३ देच्या अष्टोत्तरशतनामकथनम् ।
भगवती के १०८ स्थानों में सिद्ध पीठों वा वर्णन ।
१४ पितृवंशानुकीर्तनम् ।
पितृवंशानुकीर्तन के रूप मे अग्निप्वात्तादिपितरों का वर्णन ।
१५ पितृवंशानुकीर्तनम् ।
३४
वहिपद लोको में पितरों का स्थान और उनका वर्णन पितरों को न
देने योग्य वस्तुओं का परिगणन।
१६ श्राद्धप्रकरणम् ।
३७
आत्मा अविनाशी है आत्मा के साथ भावना वरावर रहती है। तत्त्वों
से निर्मित यह मानव शरीर अन्त में तत्पी में ही समा जाता है। अत: वह
तत्त्वरूप से हमारे कल्याण की कामना करते है।
उनका हमारा अनादि
सम्बन्ध इतना घनिष्ट बना रहता है कि तत्त्व रूपमे भी उनकी भावना
निरन्तर हमे फुला फला देखने की रहती है। हम जो समय २ पर पित्रेश्वरों
की पूजा श्राद्धादिके रूपमें करते है यह तत्त्वोंकी पूजा है शास्त्रकार पिता
घम (वायु) रूपः पितामह ख्द (जल) रूप और प्रपितामह आदित्य (सूर्य) रूप
है अथांत् (घायु) जल, और सूर्य, रूप होकर तत्त्व रूप पित्रेश्वर हमारी
सर्वदा रक्षा करते रहते है। घसून्यदन्ति पितरुद्राश्चैव पितामहान् ।
प्रपितामहांस्तथाऽऽदित्यानित्येव वैदिकी श्रुतिः ॥ ३॥ मत्स्य पु० १६ अ
सदैव पितृदा स स्थानमातृमातृपिनामाकः ।
मृताहे पार्वणं कुर्वन्नधोऽधो याति मानघः ।
सम्पृक्तप्याकुलीभाषः प्रेतेषु तु यतो भवेत् ।
प्रतिसम्वत्सरं तस्मादेको दिए समाचरेत् ।
१६ श्राद्धप्रकरणम् ।
४५
पितर पसु है, पितामह रुद्र है और प्रपितामह आदित्य है । इन्य फव्य
जो इन्हें अर्पित किये जाय घे नाम गोत्र के साथ श्राद्ध मन्त्रों का विधि
सहित उच्चारण करते हुए हों। वह श्रद्धा से अर्पित अन्न उन उन पितरों को
नाना योनियों मे तृप्तिकारक होता है :-
देवो यदि पिताजात: शुभकर्मानुयोगतः ।
तस्यान्नममृतं भूत्वा दिव्यत्वेऽप्यनुगच्छति ।
दैत्यत्वे भोगरूपेण पशुत्वे च तृणं भवेत् ।
श्राद्धानं पागुरूपेण सर्पत्वेऽप्युपतिष्ठति ।
पानं भवति यक्षत्वे गृनत्वेऽपि तथाऽऽमिषम् ।
मनुष्यत्वेऽन्नपानानि नानाभोगरसम्भवेत् ॥
पितर तृप्त होकर सम्पूर्ण पृथ्वी के भोग, दानशक्ति, वैभव, रूप, आरोग्य, विद्या,
स्वर्ग और मोक्ष, आदि की कृपा करते है। पितरों की कृपा से कौशिक के पुत्रों को
पांच जन्म मे परम पद लाभ हुआ था।
२० श्राद्धमाहात्म्ये कौशिक सूनुकथानकम् ।
सात कोशिक पुत्रों के कर्म के क्षय होने का सुन्दर वर्णन। उन
फौशिक पुत्रों की पित्रेश्घरों के प्रताप से नीचयोनि प्राप्त होने पर भी
जातिस्मगदि (पूर्व जन्मों की स्मृति ) विशेषताओं के साथ पांच जन्म में
भगवत् प्राप्ति
२१ श्राद्धमाहात्म्ये पोपिलिकावहासवर्णनम् । ४७ श्राद्ध प्रकरण की परम्परा में ब्रह्मदत्त राजा का आख्यान सम्पूर्ण प्राणियों की भाषा को समझने की उसे पितृ प्रसाद से प्राप्त हुई। २२ श्राद्धयोग्यतीर्थानां वर्णनम् । पवित्र पितृतीर्थ गया भादि एव प्राचीन सप्तपुरी, द्वादश ज्योतिलिङ्ग, पवित्र गङ्गादि नदिया और उनके सङ्गम पर किये हुए श्राद्ध का अनन्त फल इन तीर्थों की संक्षेप में प्रशस्ति । २३ मोमवंशाख्यानम् । पितरेश्वरों का अधिपति चन्द्रमा (सोम ) है यह लोक में प्रसिद्ध है। उसके वशजों का वर्णन । ब्रह्माजी ने अत्रि को सृष्टि के निर्माण के लिये आशा दी उन्होंने आनन्दमय, क्लेश विनाशक ब्रह्म, विष्णु और रुद्र के आन्त- रिक तेजका प्रकाश किया। उनके अपम अश से सोम की उत्पत्ति हुई। इसके प्रकाश से संसार प्रकाशित हुआ। २४ युधोत्पत्तिवर्णनम् । बुध की उत्पत्तिका वर्णन। गुरुपती तारा के उदर से बुध की उत्पत्ति। बुध के बाद पूरु फा चक्रवर्ती बनना। तथा फ्रम से यशवर्णन; सोम वंश में यति, ययाति, सयाति, उद्भव, पाचि, शर्याति और मेघजाति जैसे चंशवर्धक राजाओं का वर्णन। ययाति के वृद्ध होने पर अपने पुनों से युघायस्था देनेका अनुरोध । चारपुत्रों के अस्थीफार फरने पर सबसे छोटे पूरने पित भक्तिफी भारतीय परम्परा को अधुण्ण रपते हुए अपनी युपा. पस्या देफर पिताफी माशा का पालन किया। इस पर प्रसन्न होकर राजाने पुत्रको राज्यामिपिक्त फिया और उसे घरदान दिया कि तुम्हारे नाम से ही यह यंश पोरष कहलायेगा।
[८] २५ ययातिचरितवर्णनम् । प्राचीनकाल में जब फभी सुरों और असुरों का युद्ध होता था तब जो राक्षस देवताओंसे मारे जाते थे उन्हें शुक्राचार्यजी अपनी सञ्जीवनी विद्या के बल से जिला देते थे। बृहस्पतिजी को यह विद्या न आने से देवता लोग घाटे में रहते थे। इससे दुःखी होकर वृहस्पति के जेष्ठपुत्र कचको शुक्राचार्य से विद्या सीखनेको देवताओं ने कहा । इसके लिये शुक्रकी लड़की देवयानी को उपयुक्त माध्यम बनाने से कच का शुक्र के घर जाना । यहां पर बृहस्पति पुत्र कचको गोचारण करते हुए राक्षसों द्वारा मारडालना। बिना कच के देवयानी ने इह लीला समाप्त करने की धमकी दी। फिर शुक्राचार्य द्वारा सञ्जीवनी विद्या के प्रसाद से कच का जीवित हो जाना । वादको घनमें कचका चूर्ण बनाकर सुरा में राक्षसों द्वारा ब्राह्मणों को पीने के लिये दिया जाना। इस दुर्वृत्तता का ज्ञान होने पर बृहस्पति के पुत्र कचको फिर जिला कर भविष्य में सुरापान करनेवाले ब्राह्मणादि द्विजमात्र को श्राप । “यो ब्राह्मणोऽद्य प्रभृतोद्द कश्चिन्मोहात सुरां पास्यति मन्दबुद्धिः । अपेतधर्मा ब्रह्महा चैव स स्यादस्मिन्लोके गर्हितः स्यात्परं च ॥ ६३ ॥ और शुक्र द्वारा फच को ब्रह्मसञ्जीवनी विद्या का उपदेश । २६ कचदेवयानीसम्बादकथनम् । फच की देवयानी के द्वारा प्रशंसा और उसके प्रति पाणिग्रहण के लिये प्रस्ताघ । फच फा अनुरोध के प्रति सकारण उपेक्षा का माय ! गुरु पुत्री को विवाहका दूसरा प्रबन्ध फरले को फहने पर देवयानी द्वारा उसका अधिका- धिक प्रस्ताव समर्थन कर विवाह के लिए आनद फरना । इसी परदेवयानीका फचको विद्यासिद्धि सफल न होने का शाप । फच फा शाप लौटाने के लिये अनुरोध। ऋषि-पुत्र फमी मी तुम्हारा पाणिग्रहण नहीं फरेगा, [ 8 ] ऐसा देवयानी को शाप । यदि उसकी विद्या सफल न भी होगी तो भी यह जिसे पढ़ा देगा उसफी विद्या सफल होगी। फच का देवलोक में लौटना और देवताओं की फच के प्रति शुभ कामना । २७ देवयानीकथानकम् । ६७ देवयानी घशर्मिष्ठा का चित्ररथ घन में क्रीडा करने के लिये जाना पहां घायु द्वारा उन दोनों के घस्त्रों का परस्पर मिलन । देवयानी और शर्मिष्ठा का परस्पर पादविवाद फिर शर्मिष्ठा ने देवयानी फो कुए में डाल दिया। इसके याद राजा ययाति का धन गमन और देवयानी को कुए में से निफालना व राजा ययाति का स्थपुर में गमन । शुक्र और देवयानी का परस्पर में चार्तालाप। २८ शुक्रकृतदेवयानीसान्तनम् । फुपित हुई देवयानी को शुक्राचार्य फा शान्ति से समझाना। २६ शुक्रस्प क्रोधोत्पत्तिकथनम् । फोधित शुक्राचार्य की सुपपर्चा के प्रति उति। वृषपर्वा ने अपने गुरु फो शान्त फरयाया एवं उनके कथनानुसार शर्मिष्ठा का दास्यत्व स्वीकार । ३० गपातिचरित्रम् । ७३ यहुन समय बीतने के याद देवयानी-शर्मिष्ठा एवं सहन सत्रियों को साथ ले प्रोडा के लिये पन में गई। उसी पन में शिकार खेलने के लिये राजा ययाति का मागमन |उसने शर्मिष्ठा और देवयानी दोनोंसे पूछा कि तुम फोन हो। देवयानी ने अपना परिचय शुक्राचार्य की पुत्री के रूप में और शर्मिष्ठा फो पृषपर्वा दानपेन्द्र की पुत्री रूप में अपनी दासी यताकर दिया। ययाति के पूछने पर फि मनुरराज फी फन्या तुम्हारी दासी कैसे हुई। इस पर देपपानीने विधि विधानफोहोरसके लिये उत्तरदायी पठाया और ययानिमें पाणिग्रहण (विवाह) का प्रस्ताव किया। तदुपरान्त राजी ययाति ने देवयानी से कहा तुम ब्राह्मण कन्या हो मैं क्षत्रिय हूं अत प्रतिलोम विवाह ठीक नहीं कारण ब्राह्मण तो सर्प एवं अग्नि से भी दुर्धर्ष है। देवयानी के कारण पूछनेपर ययाति ने बतलाया कि सर्प एक को डसता है एवं एक शस्त्र एक को ही मारता है लेकिन क्रोधित विप्र राष्ट्रो को नष्ट कर देता है अतः मैं पिता द्वारा देने पर भी तुम्हें ग्रहण करने में असमर्थ हैं। देवयानी ने कहा कि विना मांगे देने पर ग्रहण करने में कोई भी डर नहीं है। पिता के पास देवयानी का अपनी दासी को भेजना और दैत्य गुरु शुकाचार्य द्वारा प्रस्ताघ का देवयानी के अनुरोध से पूर्ण समर्थन करना परन्तु ययाति का वर्णसङ्कर सन्तान से अधर्म का भय बता कर अनुरोध को टालदेना। इस पर शुक्र ने अधर्म से छुटकारा देकर इस शुभविवाह के लिये रत्न काञ्चन का संयोग यता कर अपनी शुभ कामना प्रगट की और आशीर्वाद दिया। ३१ ययातिचरित्रम् । देवयानी सहित ययाति के घर लौटने पर यथासमय ऋतुकाल उप- स्थित होने पर गर्भस्थिति हो जाना और शर्मिष्ठा भी जो देवयानी के साथ दासी रूप में थी, पूर्ण योपना हो गई उसे इस बात की चिन्ता होने लगी कि पूर्णोधना होने पर भी मैं अविधाहित उसने यह निश्चय किया कि अपनी युवावस्था का पुत्र रूप का फल राजा द्वारा हो मिले। इसलिये एकान्त में राजासे मिलकर काम बनाना ठीक है। उसने राजा से मिल कर कहा कि अपनी सहेली का पति होने के नाते मैं भी आपको ही पति रूप में घरण करने की प्रार्थना करती है। राजाद्वारा शर्मिष्ठा की प्रार्थनाका स्वीकार किया जाना तथा प्रथम गर्म में ही सूर्य के समान तेजस्वी कुमार की उत्पत्ति। ३२ ययातिचरित्रम् । शर्मिष्ठा के पुत्र होने की यात जानने पर देवयानी का उसपर कुपित ७६ ७८ [se होना तथा ययाति को क्रोध से इस'सधका कारण पूछना। ययाति का स्पष्ट उत्तर एवं शुक्राचार्य के सामने अपने आवरण का (शमिष्ठा के विवाह) यह कहते हुये औचित्य स्वीकार करना । ऋतुं यो याच्यमानाया न ददाति पुमान् वृत । भ्रूणहेत्युच्यते ब्रह्मन् ? स चेह ब्रह्मवादिभिः ।। ऋतुकामा स्त्रियं यस्तु गम्यां रहसि याचित.। न याति यो हि धर्मेण ब्रह्महेत्युच्यते बुधैः ॥ अधर्ममयसंचिन्न शर्मिष्ठामुपजग्मिवान् । शुक्राचार्य ने विरोध करते हुए कहा कि हे ययाते मिथ्याचरण धर्म में इस प्रकार एफ को धोखेमें रखने से वीर्य होता है। शुक्राचार्य के द्वारा शाप दिये जाने पर अपनी पूर्वावस्था को छोड कर ययातिका बुढा बन जाना, फिर घात अनुनय विनय करने पर शुक्राचार्यने कहा कि यदि दूसरे से अवस्था का सड्समण कर लो तो फिर अवस्था मिल सकती है। जो उसे अपना यौवन दे यह पुण्य और कीर्ति पाला हो उसके लिये शुक्राचार्य से आशा मिल गई ३३ ययात्युपाख्यानम् । ८१ अड्डा होफर लय ययाति अपने नगर में आया तो अपने ज्येष्ठ पुत्र यदु फो अपनी युवावस्था को देने की और ऋषिपर्य शुक्राचार्य के शाप फी यात पही। इस पर यदु ने बिलकुल मना कर दिया और दूसरेर येटों से अवस्था मांगने का सुझाव दिया। ययाति ने फिर तुर्वसु के पास जाफर पही माग की। तुर्वसु ने भी काम भोग को नए फरनेवाली और यल,रूप फा अन्त करनेपाली बुद्धि और अपने मान को मिट्टी में मिला देनेपालील युदापे की अपम्या फो नहीं चाहा । इस पर.यदु को दुष्प्रजा और तुर्यसू को सन्तानच्छेद का शाप देकर ययाति शर्मिष्ठा में उत्पन्न ज्येष्ठ पुत्र द्वारा को बोला कि यह अपनी .
. [ १२ ] अवस्था हजार वर्ष तक के लिये उसे देकर फिर लेले । द्रुह्य ने कहा न .. न रथ, न घोड़ों की सवारी और न स्त्रियों को वृद्धभोग सकता है, संसार के प्रति राग रहता है फिर उसे जलप्रधान देश में सदा रह कर फरने का शाप देकर यह अनु के पास गया उसने भी वृद्धावस्था की। कर नकारात्मक उत्तर दे दिया। फिर पूरु के पास जाने पर पूरु ने उसकी आज्ञानुसार अपनी युवावस्था उसे दे दी और राजा की वृद्धावस्था को स्वयं ले लिया। ३४ ययात्युपाख्यानम् । उस राजर्षि ने अपने पुत्र में बुढ़ापे का सङ्क्रमण किया और स्वयं युवा बन धर्माविरुद्ध राज्यके शासनको चलाया। उन्होंने यज्ञसे देवताओंको, तृप्त किया श्राद्ध से पितामहादिकों को सन्तुष्ट किया, इष्ट अनुग्रह से दीनों को इष्ट कामनाओं से द्विजों को, अतिथियों को अन्नपान से, वैश्यों को प्रतिपालन से, शूद्रों को दयालुता से और चोरों को शमन कर सम्पूर्ण प्रजा का पालन किया। हजार वर्ष तक इस पुकार भोगों को भोग कर इनकी असारता को अपने पुत्र पूरु से कहा जैसे घी की अग्नि में आहुति डालने से यह पूर्णतया यढ़ता है उसी प्रकार भोगों के भोगने से उनकी तृप्ति न होकर वे बढ़ते जाते है । शम की बराबरी संसार के ऐश्वर्य, धनधान्य, पशु, स्त्री और पुत्रादि नहीं कर सकते है है अपने यौवन को तुम सम्भालो और अपने राज्य को भी। पूरु को यौवन मिलने पर और उसके बड़े भाई यदु की उपस्थिति में उसे अभिषेक किये जाने पर ब्राह्मणादि समाज के प्रमुख महानुभाव आपत्ति फर राजा को समझाने के लिये गये। ययाति ने कहा कि आज्ञाकारी पुत्र ही पिता का अनुग्रह भाजन होता है जो पिता के विपरीत होता है यह . पुत्र नहीं। "प्रतिफलः पितुर्यश्च न स पुत्रः सतां मतः” [ १३ ] राजा ययाति उस पर अत्यन्त प्रसन्न हुआ और अपने पुत्र के प्रति इच्छानुसार घर मागने की इच्छा प्रगट की। सारा प्रजा ने आकर पूरु के त्याग की बडी प्रशसा की और राज्य के लिए पूर का अभिषेक कर स्वयं राजा धनको तप करने चला गया। ३५ ययात्युपाख्यानम्। ८४ इस प्रकार ययाति ने घानप्रस्थ होकर स्वर्गवास की तैयारी की और स्वर्गजाकर इन्द्र ने उसे फिर नीचे आने को बाध्य किया। कहते है कि यह बीच में ही स्थित रह गया। शतानीक द्वारा राजा को इन्द्र ने पृथ्वी पर क्यों डाला इसका कारण पूछने पर शौनक ने तपस्या की कमी ही एकमात्र कारण यतलाया । पृथ्यो पर आकर फिर उसने १००० वर्ष तक ससार से विरक्त होकर शिलोंच्छ वृत्ति से तपस्या की और अग्घुमक्ष, पायुभक्ष बनकर अत में स्वर्ग पद को पाया। ३६ ययातिशक्रमंवादवर्णनम् । ८५ एक बार इन्द्र ने स्वर्ग में स्थित ययाति को पूछा कि तुमने पूर फो राज्य देकर कसा पहा ? ययाति बोला किसी के साथ क्रोधपूर्ण व्यवहार न फरना-फड़ा पवन न कहना, सजनों की सदा रक्षा और उनका सम्मान फरना । फिसी फो कडा पचन पहने से उसरे मर्म मेदे जाते है । ससार में मैत्री, दान, और मधुर पाणी स ही सब कुछ शस्य है। ३७ ययातिशकसंपादवर्णनम् । इन्द्र ने पदा कि हे ययाते सय कामनाओं को छोडकर यन में निवास फरते हुए तुम्हारी तपस्या किस यगयर है? ययाति ने पहा "पिसी फे. भी नहीं।" इस पर इन्द्र ने पूछा क्षीण पुण्य पाले लोफ में तुम्हारा यधिपार है।" ययाति ने छा परफे देवराज भी यातों का समर्थन किया। तय माफाश . T से गिरते हुए ययाति को अष्टक ने देखा। और अष्टक ने उसको हाल पूछा। "प्रभुरग्निः प्रतपने भूमिरावपने प्रभुः । प्रभुःसूर्यप्रकाशाच्च सतांचाभ्यागतः प्रभुः ॥ ३८ ययात्यष्टकसंचादवर्णनम् । ८८ ययाति ने अपना परिचय नहुप के पुत्र के रूप में और पूरु के पिता रूप में दिया और कहा कि अल्प पुण्य होने से मुझे च्युत कर दियागया है उसने अष्टक का अभिवादन किया और कहा कि "विद्या, तपस्या और से जो वृद्ध है यही वृद्ध माना जाय । इसी प्रकार ययाति और अष्टक तथा हुआ। फिर ययाति ने कहा, "मनुष्य को सुख दुःख के इस संसारमें किसी प्रकार का भय अथवा संताप या मानसिक दुःख नहीं चाहिए । क्योंकि पूर्व कर्मों से ऊर्ध्वगति और अधोगति मिलती है । अष्टक ने फिर ययाति को पूर्व जन्मों का वृत्तान्त पूछा, उसने पूर्व जन्मों में पृथ्वी का सार्वभौम राज्य, अमरावती का घास और फिर क्षीण पुण्य होने पर इस स्थान पर आना बतलाया। ३६ ययात्यप्टकसंवादवर्णनम् । ६०॥ ययाति और अष्टक का जीच की नानागतियों पर मननीय सम्बाद अपने पूर्व सत्कर्म के प्रताप से ऊर्ध्वगति और बुरे फर्मो से नाना नीर योनियों की प्राप्ति मनुष्य को होती है। पृथ्वी पर जो नारकीय यातनायें है उनका परिताप उस जीव को भिन्नर योनियों के आवागमन में फंसने से होता रहता है। ययाति ने नोच कर्म को छोड़ने से सदा उन्नति होने की बात कही है। अष्टक ने फिर नाना जलचर, थलचर, नभचर योनियों के प्रश्न पूछा। ययाति ने पीर्य और रज की पूर्व स्थितियों को पता कर नानायोनियों के प्राणियों का गर्भ में आना यतलाया। वनस्पति औषधि, और सम्बन्ध में जल, पायु. पृथिवी और अन्तरिक्ष में तत्त्वरूप से जीवयोनि, चतुष्पद, द्विपद पक्षी रूप में मिलती हैं । फिर अटक ने पूछा कि गर्भ में शरीर स्वेच्छा से धारा जाता है कि प्रकृति गत व्यापार का यह एक अङ्ग होता है । इस पर ययातिने यतलाया कि पुष्पित योनि में घीर्य रज से मिलकर डिम्ब फोशों में चला जाता है जहां पर स्त्री परमाणु और पुं परमाणु के योग से गर्भ यढता जाता है और नवम मासमें बाहर आता है एवं नाना योनियों में आपेक्षिक समय का अन्तर होता है। बाहर आकर पाप पुण्य के अनुसार जीवन विताकर पुण्यवान ऊँची योनियो में और फिर पापकर्मा नीच योनियों में जाते है। फिर ययाति ने मनुष्यों के पुण्य के सात द्वार यताये मान से सदा दूर रह फर मनुष्य उत्तम फर्म बनाकर यह लोक और परलोक बनाते हैं। ४० ययात्यप्टकर्मवादवर्णनम् । ६३ मानव जीवन की ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, पानप्रस्थ एवं सन्यास की अवस्थाओं फो ययाति से अनुरोधपूर्वक पूछने पर उसने बताया कि विद्या पल लेकर अपने गुरु फी आशा फा पालन उनसे प्रथम उठकर सारा कार्य फर गुरु के सोने पर सोना, सरल स्वमाय, दमनशील, प्रमाद से दूर फाम में लगा हुमा ब्रह्मचारी प्रशस्त है। गृहस्य-अपने धर्मागत अर्जन से यज्ञ श्रेष्ट फर्म फरता है अतिथि सेयापरायण हो दूसरे के धन पर फमी हाथ साफ न फर यही परम्परा से चली आती गृहस्थ की परिपाटी है। पानप्रस्य-अपने पीर्यार्जन से जीवन का प्र.म चलाने पाला, घरेलू झंझटों से दूर दूसरों को शानदान फरने पाला, और दूसरों के लिये फी उपताप (दुप) फा फारण न पनने पाला ऐसा पानप्रस्थ सर्व सिद्धियों फा सम्द है। यह पन में रद्द फर अपनी इन्द्रियों को नियत आधार पिदार में लगा फरमा का चिन्तन करता है।
सन्यासी:-विना घर के रहने वाला किसी भी सांसारिक इच्छा से हजारों कोस दूर, प्रति दिन पर्यटक, सब झंझटों से छूटा हुआ और जिस रात्रि में संसारी प्राणी भोगादि में लगे रहते हैं उसमें वह योगी यतात्मा होकर योग साधना द्वारा ब्रह्म में एकीभाव पाने में तैयार रहता है। ऐसे अरण्यवासी सन्यासी जीवन से उस व्यक्ति के समस्त कुल इक्कीस पीढी तक तारा जाता है। ४१ ययात्यष्टक संवादवर्णनम् । ययाति ने दूसरे के पुण्य से स्वर्गारोहण अम्वीकार कर दिया। प्रतर्दन और ययाति का लम्बाद किसी प्रकार की आसक्ति न करनेवाले दो प्रकार के मुनियों में कौनसा देवताओं के सात्म्य को पा लेता है इस पर ययाति ने निःसङ्ग और ब्रह्मपरायण एकान्त पासी योगीराज को ऊँचा स्थान दिया और उसकी प्रशंसा की। ४२ ययात्यष्टकसंवादवर्णनम् । ६७ अष्टक और ययाति के बीच हुए सम्बाद में इसी बात पर विशेष जोर दिया गया है कि जीवन के सार्वमौन धर्म जैसे दान, शौच, सत्य, अहिंसा, लजा, श्री, तितिक्षा, समता और सरलजीवन का जितना अधिक हो सके सेवन करना चाहिए इन्हें बढ़ाने से मनुष्यका इहलोक और परलोक दोनों . सुधरता है। फिर ययातिको उनके दोहियों ने तार (उद्धार) दिया और वे परम पदके भागी यने। ४३ यदुवंशवर्णनम् । ऋषियों द्वारा सुनती को यदुवंश का सविस्तर वर्णन करने के लिए पूछना । यदुफे पांच धर्मात्मा, तेजस्वी पुत्रोंका वर्णन ) ये सय यदुत योग - और आज्ञाकारी थे। कार्तवीर्य ने दत्तात्रेय भगवान् की आराधना कर चार पर मांगे। प्रथम घरमें सहस्रभुजा, द्वितीय में अधर्म में रतमनुष्यका सजनों से निराकरण, तृतीय में युद्ध से पृथ्वी कोजीतकर धर्मपूर्वक पालन एवं चतुर्थ में संग्राम में बलवान से पध। आपषमुनिका अर्जुनको शाप । फार्तवीर्य का प्रात काल नाम लेने पालेका धन कभी नष्ट नहीं होता और नष्ट होता है तो फिर मिल जाता है। ४४ यदुवंशवर्णने क्रोष्टुवंशवर्णनम् । ऋषियोंका सूतजी से प्रश्न कि महात्मा फार्तवीर्यने जो कि प्रजाकी रक्षा करने वाला था आपचके धनको क्यों जलाया। भगवान सूर्य कार्तवीर्य के सामने ब्राह्मणरूप में आये और भोजन मांगा। कार्तवीर्य ने उन्हें माहार दिया। सूर्यका प्रत्यक्ष तेज असह्य होने कारण राजाको घाण दिये गये। उसने उनको छोडा और सूर्य की तृप्ति की! आपयका जलमें प्रवेश । दश हजार घर्ष के बाद जलमें से निकलने पर उसने आश्रमको जला हुआ देसा और राजर्पिको श्राप दिया। फोटु राजा के वंश का वर्णन। इसी फुल में भगवान् विष्णु हुए। विदर्भ वंशका वर्णन । विदर्भचंश के अनन्तर अन्धक वंशका वर्णन। अन्धकांशमें सभी राजा महान तेजस्वी दानवीर धार्मिक यज्ञ फरनेवाले पचित्र विद्वान् एव फोर्तिशाली हुये । अन्धकाशवर्णनका फल। स्यमन्तकमणिसंक्षिप्तचरित्रम् । १०७ पृष्णि के दो स्त्रियां थी गान्धारी और माद्री। माद्री के युधाजित्, देवमीदुफ, अगमित्र और शिपि हुए तथा गान्धारीके मुमित्र हुमा । यनमित्र पापुत्र निम्न एवं निम्न के दो पुत्र प्रसेन और शतिमेना प्रमेन के पास सय रतों में Jष्ठ स्यमन्तक मणि थी। उसके लिये भगपान् स्वयं भी लेने को लालायित थे परन्तु प्रसेन ने उनको नहीं दी। एपयार प्रसेन मणि को - (१८) धारण कर धन मे शिकार के लिये गया वहां पर एक गुफा देखी जिसमें से आवाज आ रही थी पहीं उसे एक भालू मिला। - उसने प्रसेन को मारकर स्यमन्तक मणि लेली। उस भालू के निवासस्थान में इस प्रकार प्रसेनकी अज्ञात दुःखान्त मृत्यु से भगवान् कृष्णपर घर वालोंको शंका हुई। भगवान् ने इस कलंक के टीके को मिटाने के लिये प्रसेन को मारनेवाले की पूरी खोज की और स्वयं शिकार के लिये उसी गुफा के पास पहुचे। ऋक्षराज ने क्रोधो कृष्ण को देखकर अपने वैष्णवोचित कार्यों से उन्हें प्रसन्न कर दिया। भगवान के घर मांगने को कहने पर उसने केवल चक्र से अपनी मृत्यु मांगी तया मणि समेत अग्नी पुत्री को ग्रहण करने का पर मांगा। भगवान् ने उसको इच्छा पूर्ण कर मणि सहित जाम्यवान् की कन्या के साथ घर लौटफर स्यमन्तक मणि सत्राजित फो देकर अपने कलंक फो उतार दिया। इस स्यमन्तक मणि के आख्यान फो जो पढ़ेगा उसे मिथ्या चोरी फा फलंक नहीं लगेगा। ४६ कृष्णोत्पत्तिवर्णनम् । १०६ वृष्णि वंश का वर्णन । इस वंश में महावाहु पसुदेय हुये । पसुदेवजी के कस फी यहिन देवकी के गर्भ से कृष्ण आदि पुत्र हुए। ४७ कृष्णसन्तानवर्णनम् । १११ भगवान् धर्म को हानि और अधर्म को यढ़ते देख साधु पुरुषों के रक्ष- पार्थ और दुष्पों के दमन करने के लिये अर्थात् भूमि का भार उतारने के लिये अपतार लेते है। इसपर भगवान् ने पसुदेव फो तपस्या पर प्रसन्न होकर साक्षात् चतुमुंज प दिपाया । फिर पसुदेव की प्रार्थना पर अपना याल रूप यनाफर नन्दी के घरमें ले जाने को तथा इसीसे यादोंफा फल्यान होगा ऐसा पहा । मुनियों के इस प्रश्न पर फिपासुदेव पौर देवको फोन , । जिनके विष्णु मगवान् ने जन्म लिया और नन्दजी तया यशोदा फौन थे जहां श्रीकृष्ण बड़े हुये। वसुदेव कश्यप थे और देवकी अदिति स्वरूपा थी। ब्रह्मा के अंशसे कश्यप और पृथ्वी के अंश से अदिति हुई । भगवान् ने इनकी तपस्या पर प्रसन्न होकर धर्म नष्ट होने तथा पाप बढने पर घसुदेव के घर जन्म लिया और साधु पुरुषों का त्राण किया। भगवान् के दस अवतारों का वर्णन । संसार में होने वाले देवासुर संग्राम का क्रमशः वर्णन । देव और आसुर सर्ग में सदा से चले आते संघर्ष का भगवान् द्वारा अवतार धारण कर न्याय से धर्म की स्थापना मादि फा वर्णन। भार्गव की तपस्या से शंकरजी के संतुष्ट होने पर परदान देना। आसुर सम्पत्ति के लिये शुका. चार्य द्वारा यह घर मांगना कि देवताओं को हराने के लिये उन्हें शक्ति मिले और जो फला वृहस्पति में नहीं है वे उन्हें प्राप्त हो। फटिन तपस्या के लिये भगवान् का फथन । शुक की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् शंकर का परदान देना और अंतर्धान हो जाना। शुक्राचार्य द्वारा स्तुति एवं जयंती शुक्रफा मिलन ! वृहस्पति का शुक्राचार्य के छद्म येप में अमरों को ठगना। प्रहाद फा शुकावार्य से भगवान् के द्वारा दिये गये पर फा पर्णन और असुरों के कृत्यों का पर्णन । ४८ ययातिपुत्राणामन्वयवर्णनम् । १२४ तुर्यसु आदि को सन्तान और उसके यसका वर्णन मनुवंशका पणन । अंगसी उत्पत्तिका वर्णन ! मुनियों के द्वारा पलि के घश का वर्णन फानेको पूछने पर सूतजीने बताया कि पहले उशिज नाम फा: विद्वान् ऋषि यॉर उनकी धर्म पती ममता नामक थी उसरे दीर्घतमा ऋषि फा उत्पन्न दोना उसके पाद मग फे यंश का वर्णन और फर्ण फी उत्पत्ति फा पर्णम । १६ पूवंशवर्णनम् । १३० पूग्यश, दुप्यन्तका माश्यान तथा मरत पा जन्म । यदम्पति से मर- द्वाज की उत्पत्ति । वृदनक्षत्र पंश फा पर्णम । उपायुध की उत्पत्तिका वर्णन ।
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( २० )
५० कुरुवंशवर्णनम् ।
१३५
कुरु वंश का अनुकीर्तन। अजमीढ राजा के वंश का वर्णन ! जरासंध
का जन्म और अपध्यात तथा देवापि का वर्णन । शन्तनु का वंश पर्णन।
परिक्षित् को वैशम्पायन का श्राप तथा अधि, सोम, कृष्ण और भावी
आदि वंशों का वर्णन।
५१ अग्निवंशवर्णनम् ।
मुनियों द्वारा अग्नि वंश के सम्बन्ध में पूछने पर सूतजी ने कहा-
स्वायम्भुव मन्वन्तर में ब्रह्माके मानसपुत्र अग्नि से स्वाहा नामक स्त्री में
पावक, पचमान और शुचिनाम की सन्तान हुई । दक्षिणाग्नि निर्मथ्य अग्नि,
और गार्हपत्य अग्नि का निरूपण । भगवान् विष्णु की उत्पत्ति ।
५२ कर्मयोगवर्णनम् ।
१४२
योग माहात्म्य और उसके पूर्व के आचार्यों का वर्णन । सूतजी ने कर्म
योग को हजार ज्ञान योग से घिशिष्ट बतलाया क्योंकि ज्ञान योग तो
फर्म योग से ही उत्पन्न होता है उसके लिये आठ आत्मा के गुणों की
प्रधानता बतलाई है, जैसे-
दया सर्वेषु भूनेपु क्षान्ती रक्षाऽऽतुरस्य च ।
अनस्या तथा लोके शोवमन्तहिडिजाः ।
अनायासेषु फार्येषु माङ्गल्याचारसेवनम् ॥
न च द्रव्येषु फार्पण्यमार्तेपूपाजितषु च ।
तथाऽस्पृहा परद्रव्ये परस्त्रीपु च सर्वदा।।
अपापात्मगुणाः प्रोताः पुराणस्य तु कोविदः ।
अयमेय मियायोगो शानयोगस्य साधकः ।।
सय प्राणियों में दया, क्षमा, आतुर फी रक्षा, दूसरों में दोप नहीं
. ( २१ । निकालना, बाह्याभ्यन्तर की शुद्धि, अनायास कार्यों में माङ्गल्यावार सेवन, द्रव्योंमें कृपणता न करना और परस्त्री एवं परद्रव्यों में इच्छा न करना यही कियायोग ज्ञानयोग का साधक है। पंच महायज्ञ ब्रह्मादित्रिदेव सूर्य, अष्टवसु, एकादश गणाधिप आदि विभूतिया अग्नि में यज्ञ के द्वारा और सदा अनुष्ठान करने वाले द्विजाति के द्वारा पूजे जाते है। जिनके लिये दान, चत, उपवास, जप, होम साधन होते है। ससार में कर्मयोगी वेद, शास्त्र, स्मृति से प्रेम करने घाले अर्थात् इनके आदेशों पर चलनेवाले व्यक्तिको विकर्म से डर रहता है और ससार में यह सब सिद्धि प्राप्त कर लेता है। ५३ पुराणसंख्या वर्णनम् । पुराणों का अनुक्रम फथन । कल्प के आरम्भ में एक ही पुराण था। यह शतकोटि विस्तारवाला हुआ अर्थात् पुराणों से प्रेरणा लेकर अनेकानेक महर्षियों ने नाना शास्त्र, स्मृति, तन्त्र, उपपुरापा, ज्योतिष, मीमाला, न्याय दर्शन, आयुवद और इतिहास आदि एवं साहित्य स्रष्टाओं ने अगणित विषयों के ग्रन्थों की रचना की। अत नाना शापा भेद से शतकोटि पाले पुराण है । चार लाख श्लोकों का अठारह पुराणों में पर्णन। पुराणों का लक्षण । नाना मासों में पुराण की पुस्तक देने का विविधप्रकार से फल कथन । पुराण श्रवण फा फल। (पुराण चतुर्दिक प्राण है। प्रथम परम पिता परमात्मा के नि श्वास भूत प्राण वेदों के प्राण, सारे प्राणियों का उद्धार इनके चलाये मार्ग से होता है इसलिये सारे प्राणियों के प्राण है और सारे ज्ञान का मथन रुप सार होने से उसके भी प्राण ये पुराण हैं।) इनकी महिमा अगाध है। यह पितरों के प्रिय हैं, देवताओं के लिये अमृत स्वरूप है । शाश्वत सत्योंका इनमें प्रतिपादन है इसलिये यह मनुष्यों को सदा दुष्फों से यवाते हैं।
। ५४ नक्षत्रपुरुषनामव्रतकथनम् ॥g . दान धर्म में नक्षत्र पुरुष श्रीमन्नारायण व्रत का भगवान् के पादादि से केशान्त तक नामोंका वर्णन। व्रत का विधान और व्रत का फल । ५५ आदित्यशयनव्रतकथनम् १५० नारदजी द्वारा सरलतासे फरने योग्य, अभ्यास न करने पालेके उपयुक्त, रोगी होनेके कारण व्रतादि न कर सकने वाले व्यक्ति के लिये व्रतका विधान पूछनेपर भगवान् ईश्वर का आदिस्य शयन व्रत करने का उपदेश जय सप्तमी रविघार में हस्त नक्षत्र का योग हो तो आदित्य शयन नामकवत होता है उस दिन यदि संक्रान्ति में हो तो और भी बहुत उत्तम फल मिलता है इस व्रत के करने वाले को कभी भी आधि व्याधि, शोक, दुःख एवं हानि नहीं होती। ५६ कृष्णाष्टमीवतकथनम् कृष्णामी (कृष्णपक्ष की अएमी ) चत का फथन किस २ मास में, किन २ नामों से शम्भु फा पूजन होना चाहिये उसका विधान बताया है। ५७ रोहिणीचन्द्रशयनवतकथनम् नारदजी के यह पूछने पर कि दीर्घ आयुफो देने पाले, आरोग्य, फारफ पुल फो बहाने घाले फोन से व्रत का मनुष्य अनुप्टान फरें। इस पर शंकरजी ने उन्हें रोहिणीवन्द्ररायनयत यताया! यह शुद्ध पक्षकी पूर्णिमा सोमबार के दिन अथवा ब्राह्म नक्षत्र पूर्णिमा के दिन पड़े तर करना चाहिये। भगवान् चन्द्र के नाम से मधुसूदन की पूजा फरे। नारद और भगवान का संपाद और मत करने का फल । ५८ तडागारामलादीनां प्रतिष्ठाविधिवर्णनम् १५६ तालाय की प्रतिष्ठा की विधि। फूप फा प्रमाण, यगीचा, फया और १५४ . १ - , (.२५) -पुष्करिणी (छोटी तलया) की विधि, वर्षा, हेमन्त आदि ऋतुओं में जल रहने का फल घर्णन। ६ पादपोद्यापन विधिवर्णनम् । १५६ किसी देश की उन्नति में जन, धन की शक्ति के साथ यन की शक्ति का महत्व कम नहीं। हमारे शास्त्रों में घनों के द्वारा पर्या, सुकाल और पनस्पति के निर्माण का बहुत ही सुन्दर रूप निरुपण है। वृक्षों के उद्यापन में इसी महत्व को लेकर पूजा विधान बत्लाया है। वृक्षोत्सविधि सारे भारतवर्ष में मनाई जाती थी। वृक्षों को लगाने धाले के लिये अनन्त ब्रह्म लोकों की प्राप्ति का फल यतलाया गया है। ६. सौभाग्यशयननतम् । यह सौभाग्य शयन व्रत सम्पूर्ण सौभाग्यों को देने वाला है। भगवती सती फी आराधना इसका प्रधान लक्ष्य है। सौभाग्य अष्टक घर्णन और सौभाग्यमयी देवी की आराधना का प्रकार । ६१ सप्तलोकाधिपत्यप्राप्तित्रतकथनम् । अगस्त्यजी की उत्पत्ति और पूजाविधि फथन । उसी प्रकरण में नारद महेश्वर सम्पाद । अग्नि और मारत को इन्द्र के शाप देने में अगस्त्यजो फा जन्म । अगस्त्यजी के दक्षिणाचल में उदय होने पर विष्णु पूजन करने पालेको इच्छित फल मिलना है। भगवान्को होम द्वारा प्रीणन करने से और अब देनेसे पद्दलेमय से इस लोफमें रूप और दूसरे से भुपौंक तथा इस प्रकार सात अार्य देनेसे सातो लोफ मिलते हैं। ६२ गौरीवतीयावतकथनम् सोमाय एवं आरोग्यको फल देने वाले भगवती उमाके यतको भगपती के नामों से पादादि शान्त सफ पूजन फरें मार प्रतिपक्ष पूजन. परे मागे ( २४ ) व्रत का प्रकार और व्रत फलका विशेष वर्णन है। ६३ रसकल्याणिनी तृतीयावतकथनम् । माघ मासकी शुक्ल पक्षको तृतीया को प्रातः काल गज्य पय भोर तिल से स्नान करे। देवीजी को मधु और ईखके रस से स्नान करावे । पहले दहिने अगोंको पूजकर फिर थायें अटों को पूजे। इसके साथ ही द्विज दम्पती को निमन्त्रण कर विधि विधान से पूजा कर उन्हें सौभाग्यमाङ्गल्ययुक्त उपकरण सामग्री से सन्तुष्ट करे। इसके करनेवालेको अग्निधोम का फल मिलता है। ६४ शुक्लतृतीयानतकथनम्। १७१ आनन्दकरी नामकी तीया के व्रत का वर्णन । यह जय आपाढ़ प्रह्मर्श, मृगर्भ, या हस्त या मूल की शुद्ध पक्ष की तृतीया हो तय किया जाता है। भगवान् शंकर सहित महादेवी को पूजन करनी चाहिए। पादादि फेशान्त महों का ग्यास घिधि सहित पूजन करे इसके करनेवाली सध्या अथवा विधया दोनों को ही भगपती जगदम्या का प्रसाद मिलता है और गौरीपद की प्राप्ति होती है। ६५ अक्षयतृतीयावतकश्नम्, सरस्वतीव्रतकथनश्च । १७३ सम्पूर्ण कामों की देनेवाली अक्षय तृतीया का प्रत भी महत्त्यपूर्ण है यह मत पैशाप रामाक्ष की तृतीया को किया जाता है। इसको करनेवाले फी सन्तान अक्षय होती है । भगवान् जनार्दन की पूजन का विशेष फल है। इसी साय साम्यत मत का विधान प्रतिपक्ष की पवमी को यताया गया है। भापी मानयासिनी फी पूजा का विधान है इस दिन मान रहना मापश्यप दरद मास सफ लगातार विधिविधान से मीन रयार भोजन परने के बाद उपापन फिया जाता है।
. ( २५ ) १६ चन्द्रादित्योपरागे स्नानविधिकथनम् । १७४ चन्द्र और सूर्यग्रहण के अवसरों पर स्नान करने की विधि । ग्रहण से पहले ही चार ब्राह्मणों को बुलाकर उन्हें घरणकर सभी दुरित अरिष्टों के निवारण करने के लिये भगवान् और गणपति आदि की पूजन कर फिर दान करे। इसमें सुवर्ण,छायापात्र,वस्त्र और गोदानका विशेष माहात्म्य है। ७ सप्तमीस्नपनत्रतकथनम् ।। १७६ यह व्रत दरिद्रता, और मृतवत्सा स्त्री के दोषों को दूर करने के लिये किया जाता है। भगवान् ने इस व्रत का पूर्व का इतिहास देवर्षि नारदजी को बतलाया और इसकी प्रामाणिकता यतलाई। जिस माता के सन्तान नहीं जीती हो उसके गर्भ में सातवे मास की सन्तान होने पर इसका विधान है। ग्रह तारा बल देखकर और जन्म नक्षत्र को छोड कर व्रत आरम्भ करे । इस प्रकार करने से दीर्घायुचाली सन्तान की प्राप्ति होती है। ६८ भीमद्वादशीव्रतकथनम्। १७८ भीमद्वादशी व्रतका विधान । माघ शुक्ला दशमी को शरीर में धृन लेपन फर तिलों से स्नान करें, पश्चात् नमो नारायणाय इत्यादि नामों से भगवान् विष्णु को पूजा करे। एकादशी के दिन भगवान् केशय का पूजन कर द्वादशी को क्षीर का भोजन करे। तदनन्तर इतिहास पुराण का श्रवण कर आचार्य को गोदान और स्वर्णनादि देकर व्रतका विसर्जन करे। इस व्रत को सर्व प्रथम भीमसेन ने किया था इसलिये इसका नाम भीमद्वादशी हुआ । ६६ पुण्यस्त्रीणां सदाचारव्रतकथनम् । १८२ ब्रह्माजी का शिवजी से उत्तम स्त्रियों का सदावार पूछना, अनंगदान प्रत। दाल्भ्य की संनिधि में कुमारों के प्रति स्त्रियों का पैश्या धर्म का काम पूजा का विधान। ५ - प्रश्न करना।
(. २६ ।
७०/ अशून्यशयनत्रतकथनम्। .......
श्रावण कृष्णा द्वितीया को अशून्यशयन द्वितीया का व्रत और उसकी
प्रकार।
।
१६०
७१ अङ्गारकवतकथनम्।
पिप्पलाद और युधिष्ठरका संवाद । अङ्गारक व्रत की विशेषता।
सम्बन्ध में घिरोचन और भार्गव का संघाद । व्रत का प्रकार एवं विधान ।
७२ शुक्रगुरुपशान्तिकथनम् ।
गुरु एवं शुक्र की पूजा विधि ।
७३ कल्याणसप्तमीव्रतकथनम् ।
१६१
कल्याणसममी व्रत-प्रति मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी और रविवार
होने से फल्याणिनी एवं विजया कहलाती है। इस दिन भगवान सूर्य का
न्यास एवं पूजन विधि यतलाई गई है। इस व्रतको करनेवाला सम्पूर्ण
पापों से छूटकर सूर्य लोक का प्राप्त होता है।
७४ विशोकसप्तमीव्रतकथनम् ।
१६२
विशोक सप्तमी का व्रत प्रातः काल उठकर माघ कृष्णा पष्ठी को
आरम्म फर शुभ पक्ष तक ब्रह्मवारी रहकर उपवास फरें और केवल खीचडी
फा भोजन करता रहे। शुक्षा पक्ष की पष्ठी तफ यह क्रम जारी रखे और
सप्तमी को सोने का फमल यना फर अन्न, वस्त्र सहित ग्राह्मण को दे तथा
माघ शुक्ल सप्तमी तक दोनों पक्षों में इसको फरता रहे ।
७५ फलसप्तमीवतकथनम् ।
१६३.
यह मार्गशीर्ष शुहा सप्तमी से आरम्म होता है। प्रतिमास में सप्तमी में
दिन सूर्य भगवान् फाफा एफ नाम
पूजन करें। ऐसा करनेवाले
h (33) कमी रोग नहीं होता और यह व्यक्ति अपने पूर्वज और बंशजों की पक्कीप्स पीदियों को तार देता है। शर्करासप्तमीव्रतकथनम् । १६४ शर्करा सप्तमी का व्रत । यह व्रत वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी से होता है। भगवान सूर्य की पूजा प्रातः काल के नित्य कर्मों से निवृत्त होकर फरे, एक जलपात्र, साथ में चीनी का पात्र सफेद वस्त्रों से सजाकर पीर सफेद माला लगाकर उसमें सोना रख कर मन्त्र से पूजा करे। रात्रि में पञ्चगव्य पीकर पृथ्वी पर सोधे। इस समय पुराण श्रवण या सौर सूक्त का पाठ करे प्रातः अध्मी को नित्य कर्म फर ये सम्पूर्ण वस्तु विद्वान अधिकारी ब्राह्मणको देदे। सुन्दर भोजन से प्राह्मणको तृप्त कर तथा स्वयं बिना तेल और लवण के साये। एक के बाद उद्यापन इसका अनंत फल होता है। कमलमप्तमीत्रतकथनम् । १६५ फमल सप्तमी का व्रत चैत्र मास में करने का विधान बताया है। मन्दारससमीयतकथनम्। १६६ मन्दार सप्तमी का प्रत मार्गशुला पंची फो थोडा सा पाये। पठी को सारे दिन उपपास फरे। रात्रि में मन्दार का प्राशन फर फिर सप्तमीको भगवान्फा पूजन फर पिडान प्राह्मणों को पह सय देदे । इसको परनेवाला स्पर्ग का अधिकारी वैभवशाली और सम्पूर्ण पापों से छुट जाता है। शुममतमीयतस्थनम् । १६७ शुम सममी फा पत रोग, शोफ, दुप से छुट फारा करता है। आश्विन के महीने में सफा भारम्भ फिया जाता है। सोनेफी गाय मार सोने का यल पनापर योग्य पिद्वान् को देनेण पिधान ।
( २८ ),
८. विशोकद्वादशीव्रतकथनम् ।
प्रियजनों का वियोग शोक न हो और ऐश्वर्य की प्राप्ति हो इस
लिये मनु ने व्रत विधान पूछा। भगवान् मत्स्य ने आश्विन मास की द्वादर्श
का व्रत बतलाया। दशमी के दिन कम खावे । एकादशी को निराहार रहे
द्वादशी को नित्यकृत्य कर भगवान की पूजा करे और गृहस्थ के उपयोग
सारी सामग्री बनाकर योग्य ब्राह्मण को दे ऐसा प्रति मास करे ।
८१ गुडधेनुदान विधिवर्णनम् ।
२००
विशोक द्वादशी के व्रत में गुडधेनु का दान। धेनुदान की विधि
सब व्रतों में विशोक द्वादशी उत्तम है इसको गुड़ धेनु बनाकर और उसका
दान करने से सालोपाङ्ग विधि हो जाती है।
८२ धान्यशैलदानविधिवर्णनम् ।
२०२१
दस प्रकार के पर्वतों के दान का वर्णन उनका समय। नारद शङ्कम
फा संवाद और धान्य शैल फी विशेषता । अन्न फी बड़ाई ।
८३ लवणाचलदानवर्णनम् ।
लवणाचल पर्वत के दान का फल। सोलह द्रोण का लवणावर
यनाना चाहिये । उसमें सम्पूर्ण देवतामों का आवाहन कर उसका दान
फर देना चाहिये।
८४ गुड़पर्वतदानवर्णनम् ।
गुड़ के पर्वत का विधान और उसके दान की विधि । सम्पूर्ण रसों में
इंफा रस उत्तम है। उसकी पूर्ण मावना करते हुये गुड़ पर्वत का विधि
पिधान से पूजन फर दान फरे ।
८५ सुवर्णाचल दानवर्णनम् ।
मुपर्णाचल का दान । यह यथाशक्ति समी श्रेणी के मनप्यों द्वाण
२०६
( २६ ) किया जाता है और अनन्त फल देने वाला है तथा पापों का नाश करनेवाला है। तिलपर्वतदानवर्णनम् । २०७ तिल के पर्वत को दान विधि । विष्णु भगवान् के देह से तिल की उत्पत्ति "यस्मान् मधुवधे विष्र्णोदेहश्वेदसमुद्घा । तिला कुशाश्च माषाश्च तस्माच्छंनो भवत्विह। कासपर्वतदानवर्णनम् । २०७ कपास के पर्वत के दान का विधान । और उसका फल । घृताचलदानवर्णनम् । २०८ घृताचल का विधान । अमृत और तेज के संयोग से घृत की उत्पत्ति और उसके दान का फल। रताचलदानवर्णनम् । २०६ रत्नाचलदान के महत्त्व का वर्णन इसके करने से ब्रह्महत्यादिमहापाप नष्ट होते है। रौप्याचलदानवर्णनम् । २०६ रोप्याचल के दान का वर्णन तथा उसको बनाने का विधान उसको भी ब्रह्मा विष्णु एव सूर्य युक्त बनाये तथा उसका नितम्वप्रदेश सोने का धनाये। शर्कराशैलदानवर्णनम् । २१० शर्करा शैलके दान का विधान तथा लीलावती वेश्या का आख्यान । इसको करने से गनन्त फल की प्राप्ति । ग्रहशान्तिवर्णनम् । २१२ नवग्रहों की शान्ति का वर्णन अयुत रक्ष एवं कोटि तीन तरह के नानाग्रहों 1 - २२ (३०) यज्ञों का विधान । नवग्रहों का आवाहन कर शान्ति करे । लिए नाना तरह की पूजन सामग्री का वर्णन। इसके करने से ब्रह्महत्या महान् पापों से छुटकारा होता है। १३ नवग्रहस्वरूपवर्णनम् । नवग्रहों के स्वरूपों का वर्णन । शिवचतुर्दशीव्रतकथनम् ।। २. शिवचतुर्दशी के व्रत का विधान तथा नन्दीश्वर एवं नारदजी संघाद में शिव पूजन का वर्णन तथा व्रत कथा श्रवण का फल । Edy फलत्यागमाहात्म्यकथनम् । सम्पूर्ण फलों के त्याग का माहात्म्य। फल त्यागने का व्रतग्रहण का तथा उसकी कमविधि। ९६ आदित्यवारव्रतकथनम् । रविवार के व्रत का विधान भगवान सूर्य का व्रत करने से सम्म स्वास्थ्य की प्राप्ति तथा "अग्निमीले” इत्यादि वैदिकमन्त्रों से पूजन ती व्रतान्त में सुवर्णली फपिला गो का दान करे। १७ मंक्रान्त्युद्यापनफलवर्णनम् । २२ संक्रान्ति का प्रत एवं उद्यापन का विधान तथा श्रषण पठन २० मादात्म्या २४ २८ विभृतिद्वादशीवत्तकथनम् । नन्दीश्यर और नारदजी फा संवाद तथा नारदजी को विभूतिद्वार मत करने का विधान यनाया है । फार्तिक, चैत्र, पेशाप, मार्गशीर्ष, फा एवं भागद मदीने में शुद्धपक्ष फी देशमी को लघुशाहार फर एका
को निराहार तथा द्वादशी को भोजन तथा भगवत् पूजन का विधान इसके
फरने से व्याधि एवं दरिद्रता का नाश होता है।
विभूतिद्वादशीवतमाहात्म्यवर्णनम् ।
२३०
विभूतिद्वादशी के व्रत का माहात्म्य ।
पष्टिव्रतकथनम् ।
२३२
साठ प्रकार के व्रतों का विधान एवं उद्यापन का विधान । जो पुरुष
इस पष्टि व्रत के विधान को सुनता है यह सौ मन्वन्तर पर्यन्त गन्धर्वाधि-
पति होता है।
स्नानमहत्ववर्णनम् ।
२३७
"नर्मल्यं भायशुद्धिश्च विना स्नानं न विद्यते ।
तस्मान्मनो विशुद्ध्यर्थ स्नानमादी विधीयते ॥"
स्नान के महत्त्व का विधान जिसमें त्रिकाल स्नान एवं सन्ध्या करे
तथा देवर्षि एवं पितरों का तर्पण तथा सूर्य को प्रणाम करे तथा तीन
परिक्रमा करे।
. प्रयागमाहात्म्यवर्णनम् ।
२३६
प्रयागमाहात्म्य का वर्णन। मार्कडेय का हस्तिनापुर में जाना।
युधिष्ठिर और मार्कण्डेय का प्रयाग के विषय में संवाद ।
प्रयागमाहात्म्पवर्णनम् ।
२४१
प्रयाग में पञ्च कुण्डों का वर्णन तथा अन्य तीर्थों के माहात्म्य का
वर्णन । यहां पर दानपुण्य करने का फल ।
प्रयागमाहात्म्यम् ।
२४३
मार्कण्डेयजी ने राजा युधिष्ठिर से कहा कि प्रयाग फा स्मरण करना
भी महान् पुण्यप्रद है और हे राजन् गङ्गा और यमुना के मध्य में जो पुरस
--
२४
१४
गोदान सुवर्ण, पर्व मणि मुक्तादि का दान करता है उसको अक्षय पुण्य
प्राप्ति होती है।
१०५ प्रयागमाहात्म्पम् ।
तीर्थराज प्रयाग में अनेक तीर्थों का वर्णन तथा कर्मानुसार फलों
प्राप्ति।
१०६ पयागमाहात्म्यम् ।
प्रयाग माहात्म्य के प्रसङ्ग में अनेक कर्मों का कथन तथा धहीं
मानस तीर्थ के माहात्म्य का कथन । यमुना के उत्तर तट एवं प्रयाग
दक्षि तट पर ऋण प्रमोचन तीर्थ का भाख्यान ।
१०७ प्रयागमाहात्म्यम्
.२४॥
प्रयाग में स्नान एव दान करनेसे अक्षय फलकी प्राप्ति तथा युधिष्ठिरने
मार्कण्डेयजी से कहा कि है मुने आपके दर्शन से भाज मेरा जन्म सफल
हुआ है मेरा आज फुल पवित्र हुआ है तथा मैं सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो
गया है। फिर युधिष्ठिर ने पूछा कि यमुना नदी में स्नान दानादि करने
से क्या फल होता है तदनन्तर राजा को मार्कण्डेयजी का समाधान |
१०८ प्रयागमाहात्म्यम् ।
२५१
प्रयाग के प्रसंग में सोमतीर्थ का वर्णन तथा प्रयाग का तीर्थराजत्वा
कथन, जैसे-
यथा सर्वेषु लोकेषु प्रयागं पूजयेद् बुधः । पूज्यते तीर्थराजस्तु सत्यमेव युधिष्ठिर!
ग्रह्माऽपिस्मरतेनित्यं प्रयाग तीर्थमुत्तमम् । तीर्थराजमनुप्राप्य नवान्यात्किञ्चिदर्हति
१०६ प्रयागमाहात्म्यम्।
२५
प्रयाग में सम्पूर्ण तीर्थों का निवास तथा उनकी प्रशंसा
वर्णन है।
[[ 8 ]. . प्रयागमाहात्म्यम्। २५४ प्रयाग में ब्रह्मा विष्णु महेश तीनों देव निवास करते हैं, और प्रयाग- मण्डल की रक्षा करते है। यहां पर यज्ञ करने से सब पाप नष्ट होते हैं तथा नरक को प्राप्ति नहीं होती है। १११ प्रयागमाहात्म्यम् । २५५ प्रयागमाहात्म्य के श्रवण पठनका फल। भगवान् घासुदेव द्वारा प्रयाग • की प्रशंसा तथा राजा युधिष्ठिर और मार्कण्डेयजी का प्रस्थान । .११२ द्वीपसमुद्रपर्वतानांवर्णनम् । २५७ ऋषियों ने सूतजी से पूछा कि हे महाराज ! द्वीप एवं र ४ और पर्वत कितने हैं तथा वर्ष कितने है और उनमें नदियां कितनी है। लोकालोक का प्रमाण, भूमि प्रमाण, चन्द्र, सूर्य गति और ज्योतिश्चक वर्णन हमारे लिए विस्तार से कहिए। उत्तर में सूतजी ने जम्बू द्वीपादिकों का नाम सप्रमाण वर्णन किया। ११३ भारतवर्पवर्णनम् । -२६१ भारतवान्तगतानां नानानदीदेशानांवर्णनम् । जम्यूकिम्पुरुपहरिवाणांवर्णनम् भारतवर्ष की व्युत्पत्ति जैसे- "मरणात्प्रजनाचैच मनुर्भरत उच्यते।' निरुक्तपचनश्चय घपं तदारतं स्मृतम्" भारतवर्ष के नवं भेदों का वर्णन जैसे-इन्द्रद्वीप, केशर, ताम्रपर्ण, गभस्तिमान, नागद्वीप, सौम्य, गन्धर्व, पारुण और घां भारतवर्ष इस तरह नवभेद है । यह भारतवर्ष दक्षिणोत्तर हजार योजन में है। पहां पर होने- घाले नाना नदी एवं. देशोंका वर्णन तथा जम्बूद्वीप किम्पुरर हरिवर्पा- दिकों का वर्णन।
२६ २६५ २६६ [ ३४ ] ११४ पुरूरवसःपूर्वजन्मवृत्तान्तवर्णनम् राजा पूरघा के पूर्वजन्म के वृत्तान्त वर्णन में कहा है कि पूरया पू जन्म में मद्र देश का राजा था उसने राज्य की कामना से एकादशी का उपवास कर जनार्दन का पूजन किया था इस व्रत के पुण्य से मद्रदेश उसका अकपटक राज्य हो गया। ११५ हैमवतीनदीमहात्म्यवर्णनम् राजा मद्रेश्वर रूप की कामना से हिमालय प्रदेश में गया जह पर हैमवती नदी है जो ऋषिदेवगन्धवों से सेपित है यहां पर जाने से मनुष्यों के पाप दूर होते है एवं पुण्य की प्राप्ति होती है। ११६ हिमवद्वर्णनम् हैमवती नदी पर जाने से मदेश्वर की थकावट दूर हो गई तत्पर हिमालय को देखने के लिए चला। यहां पर तप करनेवाले अल्पतपस्या सिद्धि को प्राप्त होते है। जिसके दर्शन मात्र से सम्पूर्ण पाप नष्ट होत ११७ हिमवत्प्रदेशवर्णनम् २५ पर्वतेन्द्र हिमालय से ऐरावती नाम की श्रेष्ठ नदी निकली है जहां शाल, ताल, तमाल एवं खजूरादि के असंख्य वृक्ष लगे हुए है तथा नान तरह की औषधियां उसी प्रदेश में उत्पन्न होती है। हंस, फारण्डप आदि बहुत से पक्षी तथा व्याघ्र सिंहादि जानवर पहीं रहते हैं। वहां का दृश्य महान् रमणीय है। उसी स्थानपर अत्रि ऋषि का परमरमणीय आश्रम ११८ हिमवत्प्रदेशवर्णनम् हिमालय प्रदेश के दो महारङ्ग है उन दोनों के बीच एफ भङ्ग अत्यन ऊंचा है यहां का जल अत्यन्त शीतल है यहां मदेश्वर ने तप कर प्रारम्भ किया। :
+
। ३५ ]
१६ मद्र वरस्य क्रीडाविहारवर्णनम्
२७७
मद्रेश्वर के क्रीडा विहार का वर्णन ।
१२० कैलासवर्णनम्, गङ्गायाःसप्तस्रोतानां वर्णनम्
२७६
नानानदीपर्वतानांवर्णनम्
कैलासका वर्णन। वहीं भगवान् शंकरका निवासस्थान है। यह कैलास
हिमालय के पृष्ठ की तरफ है जहां पर यक्षाधिपति कुवेर गुह्यकों के साथ
रहते है। कैलास के उत्तर में सौगन्धिक पर्वत है । मन्दाकिनी नाम पुण्य नदी
घहीं बहती है। उसी के सात स्रोत हैं तथा और भी नाना नदी पर्वतों का
वर्णन बताया है।
२१ शाकद्वीपवर्णनम्, शाकद्वीपस्थनदीपर्वतानांवर्णनम्
२८४
। कुशद्वीपवर्णनम्, शाल्मलिद्वीपवर्णनम
सूतजी शौनकादि को फहते हैं कि शाकद्वीप का वर्णन मैं आपलोगों
को कहता है। शाकद्वीप जम्बूद्वीप के विस्तार से दुगुना है तथा लवण
समुद्र से व्याप्त है शाकद्वीप में होने वाले नदी पर्वतों का वर्णन ।
कुशद्वीप एवं शाल्मली द्वीप का विस्तृत वर्णन । यहाँ ही क्रौञ्चद्वीप का
वर्णन किया है। यह कुशद्वीप के विस्तार से दुगुना है उस द्वीप में
उत्तम मनुष्य रहते है। उस द्वीप में देवन नाम पर्वत है देवन पर्वत से
आगे गोविन्द नाम पर्वत है उससे भागे क्रौञ्च नामक पहाड़ है यहां का
दृश्य अत्यन्त रमणीय है।
-
१२ गोमेदकपुफरद्वीपयोर्पर्णनम्, पुष्करद्वीपवर्णनम्
२६०
सप्तद्वीपसमुद्रवर्णनम्
गोमेदक नामका द्वीप सुरोद समुद्रसे वेष्टित है शाल्मलि के पिस्तारसे
.." प है *]] दुगुनाहै। उस द्वीप में दो पर्वत है प्रथमा सुमन नाम पर्वत द्वितीय सर्वोपनि से युक्त कुमुद नाम पर्वत है। मीठे जलयाले समुद्रसे वेष्टित पुष्कर द्वीप है। यह गोमेदक द्वीपसे दुगुना है। इस द्वीप में रहनेवाले मनुष्यों की आयु तीस हजार वर्ष की तथा आरोग्यता एवं सुस की बाहुल्यता और मानसी सिद्धि में स्थित है । इन तीनों द्वीपों में सुस, आयु और रूप की समानता है तथा ईर्षा, निन्दा, भय, लोभ, पापण्ड और द्वेष फा नाममात्र भी नहीं है और वहां पर आनन्द फी पराकाष्ठा है। चन्द्रोदय होने से समुद्र बढ़ता तथा अस्त होनेपर क्षोण होता है। जैसे-"क्षयवृद्धी समुद्रस्य शशि- वृद्धिक्षये तथा।" शाफ द्वीप में शाफ पर्वत, कुशद्वीप में कुशस्तम्य, शाल्मल द्वीप मे शाल्मलि वृक्ष, क्रौञ्चद्वीप में क्रौञ्च गिरि गोमेदक में गोमेद पर्वत और पुष्कर द्वीप में न्यग्रोध वृक्ष है। इसी पुष्कर में ब्रह्मा साध्य देवोंके साथ निवास करते है। जम्बूद्वीप से नानाविध रत्नों का निकास है। सब द्वीप समुद्रों से वेष्टित है। पृथ्वी से दश गुना जल है जो चारो तरफ से पृथ्वी का पालन करता है। जल से दशगुना अग्नि (तेज) है जो सम्पूर्ण जल को धारण करता है। अग्नि से दशगुना घायु है जो सम्पूर्ण तेज को धारण फरता है। घायु से दशगुना आकाश है जो सम्पूर्ण प्राणियो फो' धारण । इस तरह पृथ्वी आदि तत्त्व परस्पर में एक दूसरे से अधिक शक्ति शाली है एवं परस्पर ओत प्रोत है। १२३ पृथिवीपरिमाणवर्णनम्, आकाशपरिमाणवर्णनम् २६४ सूर्यगतिवर्णनम्, ग्रहाणांगतिवर्णनम् । सप्तद्वीपचती पृथिवी के परिमाण का वर्णन तथा आकाश के परिमाण का वर्णन ! सूर्यमण्डल का विस्तार नौ हजार योजन है, तथा विस्तारसे तीन । गुना ऊंचा मण्डल है । सूर्यमण्डल के विस्तारसे दुगुना, चन्द्रमण्डल है जैसे करता .
-- . [91 "मास्करबुद्विगुणः शशी" । पचास कोटि योजन में पृथ्वी का विस्तार है तथा पृथ्वी के समान ही आकाशा का विस्तार है। मेरुपर्वत के पूर्व की तरफ इन्द्रपुरी, दक्षिण में यमपुरी, पश्चिम में सुपा नाम की रमणीय परुणपुरी और उत्तर में विभावरी नामकी चन्द्रपुरी है। मानस के उत्तर पृष्ठ में चारों तरफ लोकपाल धर्म की व्यवस्था के लिये तथा संसार की रक्षा के लिये विराजमान है । कुल (कुम्हार) चक्र की तरह सूर्य की गति है। दक्षिणायन में शीघ्रगति से भ्रमण करता है तथा उत्तरायण में मन्दगति से भ्रमण करता है। लोकालोक पर्वत के मध्य मे लोकपालो की स्थिति है । सूर्य एव ग्रहोंकी गति का विवरण। १२४ ज्यौतिश्चक्रवर्णनम् ३०० ऋषियों ने सून जी से पूछा कि सूर्य चन्द्र एव ग्रह नक्षत्रा के संचार का वर्णन करिये तदनन्तर सूत जी का विस्तृत उत्तर। चौदह नक्षत्रों में शिशुमार चक्र स्थित है उन्ही के बीच ध्रुवस्थित है वही ध्रुव चन्द्र आदित्यादि ग्रहोंको भ्रमण करवाता हुआ रघय भ्रमण करता है। वर्षा, गर्मी, जाडा, रात्रि, दिन और शुभाशुभ फल ये सब ध्रुव से ही होते है। सूर्य की किरणें घायु के सयोग से समुद्र से जल को सींचती है और सब प्राणियों के हितार्थ छ मास तक घर्षा घरसाती है । मेघ शब्द की व्युत्पत्ति "मिहसेचने" धातु से है। - १२५ सूर्यस्थवर्णनम् ३०३ सूर्यरथ का विस्तार से वर्णन । यह रथ ऋषि, गन्धर्व अप्सरा, सर्प राक्षसों के साथ आदित्य को पहन करता है। दिन रात एक चम्चाले स्थ से सूर्य भगवान् भ्रमण करते है। चन्द्ररथ का वर्णन । शट्के समान कान्तियाले दश घोडे चन्द्र रथ को पहन फ़रते है। शुरु, पक्ष में फला यहती हैं तथा कृष्ण पक्ष में घटती हैं।
३०७.
घर्णन।
--
[ ३८ -
.२६ ग्रहाणांगतिवर्णनम्
नक्षत्र एवं ग्रहों की गति का वर्णन । शिशुमार वक्र का वर्णन।
ध्रुध का वर्णन
१२७ ग्रहाणांगतिवर्णनम
सूर्य, चन्द्र, भीम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु एवं केतु की गति का
१२८ मयासुराख्यानवर्णनम्
३१४
महामायापी मयदानव के चरित्र का वर्णन। मयदानव ने अन्य
दानवों के साथ तप करना प्रारम्भ किया तदनन्तर मय की तपस्या से प्रसन
हुए ब्रह्मा ने मय को त्रिपुर दुर्ग बनाने का घरदान दिया।
१२६ मयस्य त्रिपुरनिर्माणम्
मय के त्रिपुर निर्माण का वर्णन । जिसमे सुन्दर तालाब तथा बगीचे
इत्यादि का भी निर्माण किया तथा अन्य दैत्यों के निवास के लिए अलग २
स्थान बनवाये।
१३० मयाख्यानवर्णनम्
।
मनुष्य ही सत्व, रज और तमोगुण की प्रधानता से देव, यक्ष गन्धर्व,
और दानवों की तरह आचरण करता है। मनुष्यों में तमोगुण की अभि-
वृद्धि होनेसे आसुरी भाषों की जागृति होना ही दैत्यत्व का लक्षण है।
त्रिपुर निर्माण के अनन्तर उद्दण्ड दानवों ने असत्य, अधर्म एवं हिंसा को
अपना लिया। जैसे-
द्विषन्ति ब्राह्मणान् पुण्यान्न चार्चन्ति हि देवताः ।
गुरु चैव न मन्यन्ते.ह्यन्योन्यश्चापि चुक्रुधुः ॥
फलहेषु च सज्जन्ते स्वधर्मप हसन्ति च ।
-
[ ३६ ] परस्पंज निन्दन्ति अहमित्येव वादिनः। चिट्यस्तदेवायतनामश्च संभग्नदेवहिजपूजकन्तु । जगदुपभूवामरराजजुष्टरमिद्भुतं सत्यमिवालिबन्दः ॥ ब्राह्मणों से द्वेष फरने लगे तथा देवपूजा से विमुख हो गये और गुरुओं को अपमानित करने लगे परस्पर में निन्दा करने लगे। ऊंचे स्वर से गुरुओं को पुकारने लगे अचानक एवं असमयमें ही अश्रुपात, रात्रिमें दही सत्तू एवं कैथ आदिफा भक्षण तथा फलहमें प्रवृत्त हो गये। उच्छिएमुख शयन तथा मूत्र करके हाथ पैर न धोना इत्यादि बहुतसे अशुद्ध आचरण करने लगे । देवताओंके मन्दिरोंका विध्वंस तथा देव पूजकों को मारने लगे। १३१ दानवानामुपद्रयं दृष्ट्वा देवैः ब्रह्मसमीपे गमनम् ३२१ इतने महान् दानवों के उपयों को देखकर देवता ब्रह्माजी के पास गये और फहा कि हे मान जैसे मेघों के माने से हंस तथा सिंह के माने से मृग माग जाते हैं उसी तरह हमलोग भी दानवों से पराभूत हो रहे है यदि इनसे आप रक्षा नहीं करेंगे तो- यदि न प्रायसेलोकं दानवैद्रुितं द्रुतम् । घर्षणानेन निर्दवं निर्मनुप्याननं जगत् ॥ पृथ्यी मनुष्यों से रहित हो जायेगी। पुनः ब्रह्माजी के बादेश से देयतामों ने शदूर फो स्तुति की।. १३२ देवेम्यो महादेवस्यपरदानम, देवयुद्धाय रथनिर्माणम् ૨૨૨ देवानां शङ्करम्प्रति समम्पर्धनम् प्रवादि देवतामों की स्तुति से प्रसन्न दो फर फर ने परदान दिया मोर शंकर के मादेशानुसार देयताओं ने त्या निर्माण किया। शिप मार [ 8 ] ब्रह्मा का संवाद । ऋषियों के द्वारा भगवान्। शटर की स्तुति 11m १३३ त्रिपुरे नारदांगमनम्, नारदेन मयस्य वार्तालापः of ૨૨૬ त्रिपुर दुर्ग में नारद जी का आगमन । नारद जी का मय के साथ घार्तालाप । मय द्वारा दानवों को युद्ध का आदेश । १३४ इलावृतवर्षवर्णनम्, इलावृते सज्जीभूतदेवसैन्येवर्णनम् ३२८ देवदानवयुद्धवर्णनम् इलावृत घर्ष का वर्णन तथा इलावृत में देव सेना का वर्णन । देव- दानवों का युद्ध । १३५ मयस्य महेश्वररूपस्य कालस्य प्रशंसावर्णनम् ३३३ देवप्रतिहतानां दैत्यानां वाप्यां पुनरुज्जीवनम् देव दानवों के युद्ध में मय का माया द्वारा गणेशादिकों को मोहित फरना तथा स्वामी कार्तिक के प्रति प्रहार । विद्युन्माली की मृत्यु । मय- द्वारा मृत दानवों को जीवित करने वाली पापी का निर्माण । “धापी (बावड़ी) मृत दानवों को जीवित करेगी” ऐसा देवों द्वारा महादेवको संकेत। १३६ वापीपालेन मयसमीपे वापीपानकथनम् जनार्दनस्य मयपुरगमनम् देवताओं द्वारा त्रिपुर दुर्ग मे आक्रमण । भगवान् का वृपरूप से वापी पान | पापीपाल का मय को संदेश कि वृषरूप धारी किसी मनुष्य ने याबड़ी फा जल पी लिया तदनन्तर मय को कष्ट की प्राप्ति । त्रिपुर को मारने के लिए इन्द्र का आगमन । १३७ त्रिपुरे देवदानवयुद्धम् , तारकवधवर्णनम् ३४० त्रिपुर में देव दानवों का युद्ध । तारकासुर फायध । -- - ।
[ 8 ] ११३८ मयस्य युद्धार्थ दानयोन्प्रति प्रोत्साहनम् चन्द्रोदयवर्णनम् ३४४ मय द्वारा युद्ध के लिए दानवों को प्रोत्साहन | चन्द्रोदय एवं रात्रि का वर्णन । १३६ देवदानवयुद्धवर्णनम्, विद्युन्मालिनन्दीयुद्धवर्णनम् ३४७ मयपुरस्त्रीणां विलापवर्णनम् देव दानवों के युद्ध का विवरण । विद्युन्माली और नन्दीश्वर का युद्ध एवं नन्दी द्वारा उसकी मृत्यु । महादेव द्वारा मय का संहार तथा मयपुर में रहने वाले स्त्री, पालकों का शोककरण । त्रिपुरासुर आख्यान के श्रवण पठन का माहात्म्य । अमावास्यामहत्ववर्णनम् , पितृमहत्ववर्णनञ्च ३५२ राजा पुरूरयाका स्वर्गमें चन्द्रकेसाथ समागम तथा चन्द्रमासे अमृती प्राप्ति । सिनीवाली और कुह का लक्षण। नक्षत्रमण्डल में चन्द्रमा और सूर्य फा जब समागम होता है तर यह तिथि पिनरों के लिये श्रेष्ठ मानी गई है। सूर्य की किरणों के साथ पितर लोग नीचे माते है और अपने वंशजों के द्वारा स्वधा शब्दरूपी अमृतसे तृप्त होते है। सोमपा और ऊष्मपा दो तरह के पितर होते है। ऋतु ही मग्नि है ऋतु ही सम्वत्सर है, ऋतु से दी अन्य ऋतुरें हुई एवं उन्दी से आतय हुये। पितरों के लिये अर्धमासको अमायाम्या ही उपयुक्त समय माना गया है जिसमें पितर विशेष रूप से तृप्त होते है। मोमपा, सोमपर्धन, मार्तप, और अन्द इनकी देवता भावना फरने है इसीमे यह समय पितरों के लिये महत्त्व का है। ब्रह्मचर्य, तपम्या, या, सन्तान, धाद, विद्या और मन्नदान से पितर तृप्त होते हैं। मास धाद्ध फा सोम लाफिक पितर ही उपभोग फर सपने हैं और योनियों में नर फर्म में यातना स्थानों में पढ़े हुये भूत प्यास से व्याकुल पितरों को श्राद्ध में नाम,
.
[ ४२ ]
गोत्र एवं मन्त्रों के उच्चारण से तदाकार योनियों को उपयुक्त आहार बनकर
मिलता है। यथा-
यदाहारा भवन्त्येते तासु तास्विह योनिषु ।
तस्मिंस्तस्मिस्तदाहारे श्राद्धं दत्तन्तु प्रीणयेत् ।
काले न्यायागतम्पाने विधिना प्रतिपादितम् ॥
प्राप्नुवन्त्यन्नमादत्तं यत्र यत्रावतिष्ठति ॥
यथा गोषु प्रनष्टासु पत्लो विन्दति मातरम् ।
तथा श्राद्धेषु दृष्टान्तो मन्त्र प्रापयते तु तम् ॥
एतत्पितृमहत्त्वं हि पुराणे निश्चयं गतम् ।
ऐसा कह कर शास्त्रों में पितरों के महत्व का वर्णन किया है।
१४१ चतुर्युगमानवर्णनम्
३५८
निमेष आदि से लेकर युगपर्यन्त काल का वर्णन । युगोंकी घर्प संख्या।
श्रीत स्मार्त धर्म तथा आचार आदि का वर्णन । जीवन की सत्ययुग आदि
से लेकर कलियुग तक विकृति और उनका कालानुरूप वर्णन ।
१४२ त्रेतायुगे यज्ञविधिप्रवृत्तिः
त्रेतायुग में यज्ञ की प्रमुखता। ऋषियों और देवताओं के सम्बाद मे
देवताओं का पसु के द्वारा पक्षपात करना और उसे ऋषियो का शाप ।
सनातन धर्म का मूल यज्ञ, ब्रह्मचर्य, अद्रोह, अलोभ, दम, भूतदया, शम,
तपस्या, शौच, अनुकोश, क्षमा और धृति है।
१४३ द्वापरयुगविवरणवर्णनम् , कलियुगविवरणवर्णनम
द्वापर में पुरुषों की वृत्ति का वर्णन । बुद्धि की कमी, लोभ, वर्णों का
प्रध्यस और फों का विपर्यय अर्थात् सात्विक भाषों के कम होने से रज
और तम का उदय होना। सत्ययुग, त्रेता द्वापर एवं कलियुग में
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- - [ ४३ ] उतरोत्तर धर्म का हास । द्वापर के अन्त में कलियुग की प्रवृत्ति । हिंसा, चौरी, माया, झूठ और पापण्ड आदि में जनता का स्वतः प्रवेश । कलि में दिन प्रति दिन होनेवाले संघर्ष एवं अशान्ति का धन । १४४ विस्तारान्मन्वन्तरस्थितिवर्णनम् ३७१ चतुर्दश मन्वन्तरों की कल्प कल्प में जो स्थिति है उसका वर्णन । क्षेत्र और क्षेत्र का कथन तथा शिष्टावार का वर्णन- श्रुतिस्मृतिभ्यां घिहितो धर्मो पर्णाश्रमात्मके। शिष्टाचारप्रवृद्धश्च धर्मोऽयं साधुसम्मतः ॥ ऋपियों के नामों का वर्णन ! ऋषि शब्द का विशदार्थ वर्णन- शपिहिसागतीधातुर्विद्यासत्यं तप श्रुतम् । एपसग्निचयो यस्माद् ब्रह्मणस्तुततस्त्वृषिः निवृत्तिसमकालाच धुझ्याव्यक्त ऋषिस्त्वयम् । ऋपतेपरमं यस्मात्परमपिस्ततः स्मृतः १४५ तारकाख्यानवर्णनम, वनाङ्गदानवाख्यानम् ३७७ सूत शौनक संवाद में सक्षेप से तारक धध का कथन पुनः विस्तार से घर्णन करने में पनाङ्ग दानव का आख्यान । दिति और इन्द्र का परस्पर पार्तालाप । बज्राङ्ग की तपस्या का वर्णन तथा ब्रह्माजी का चबाङ्ग को परदान और ब्रह्माजी से घनाड़ की प्रार्थना कि मेरी आसुरीभावोंमें प्रवृत्ति न हो इत्यादि। आसुरो मास्तु मे भाव सन्तु लोका ममाक्षया । तपस्येच रतिर्मेऽस्तु शरीरस्यास्तु घर्तनम् ।। तत्पश्चात् चना आहार के निमित्त घर आया तो अपनी स्त्री को रोती हुई देखकर पूछा कि हे भीरु ! तुम्हारा किसने अपकार किया है और क्या तुम्हारी कामना है जिसे मैं पूर्ति करूं !!~ १९६ तारकानुरोपाख्यानम् ३८२ पराङ्गी और बनाङ्ग के संवाद में परागी ने कहा कि मैं देवराज इन्द्र A - से पीडित की गई हूं अतः मैं बहुत दुःखी है मुझे इस दुःखरूपी समुद्र से उद्धार करने के लिये पुत्र दीजिए तत्पश्चात् धदाङ्गने पुत्रार्थ तप किया इस पर प्रसन्न हो ब्रह्माजी ने उसे घरदान दिया कि तुम्हारे तारक नाम का पुत्र होगा। तारकासुर के उत्पन्न होते ही पृथ्वी आकाश समुद्र सब खलायमान हो गये। १४७ तारकासुरोपाख्यानम् ३८३ तारकासुर का दानवों को उपदेश तथा तारककी तपस्या । तदनन्तर उसको ब्रह्माजी का परदान । (तारकासुर का अपने मन्त्रियों के प्रति पुरुषार्थ निमित्त धवन। लध्या जन्म न यः कश्चिद् घटयेत्पौरुषनरः । जन्मतस्य वृथाभूतमजन्मा तु विशिष्यते माता पितृभ्यां न करोति कामान् बन्धूनशोकान् न करोतियो धा। कीर्ति हि वा नाजयते हिमामा पुमान् स जातोऽपि मृतो मतं मे ॥ जो मनुष्य संसार में जन्म लेकर पुरुपार्थ नही करता उसका जन्म वृथा ही है। पुरुषार्थ करनेवालेको ही लक्ष्मी प्राप्त होती है जैसे महाभारत में कहा है कि “उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी." । देव दानवों का युद्धार्थ उद्योग । ब्रह्मा एवं तारकासुर का सवाद इन्द्र के लिए गुरु वृहस्पति का साम दामादि उपाय कथन । दण्ड विधान वर्णन । देव सेना का सुसजित होना- १४८ तारकोपाग्व्यानेदेवदानवयुवर्णनम् ३८६ तारकासुर के आख्यान में देव दानवों के युद्ध का वर्णन । जिसमें शाक्ति, त्रिशूल, मुद्गर एवं चक्र तथा अन्यान्य अस्त्र शस्त्रों से भीषण संग्राम किया यहां तक कि नदियां ग्वून फी यहने लगी। २४६ तारकोपाख्याने देवासुरयुद्धवर्णनम् ३६० देघ दानय युद्ध में प्रसन दानच फा यमराज के साथ भयङ्कर युद्ध । जम्मका धनेश के साथ संग्राम । जम्भ की मृत्य के पश्चात कुजम्भ ।
ने धनेशके साथ युद्धारम्भ किया । युद्ध में यक्षराज कुवेर ने फुजम्म के हृदय में मुदगर प्रहार किया। मुद्गर प्रहार से भी दानव विचलित नहीं हुआ फिर परुण ने उसकी भुजाओं को पाशों से याध कर गदा से मारा उससे उसके रसून गिरने लगा। पुन दैत्यों को दुखो देखकर कालनेमि ने किया प्रथम कालनेमि का सूर्य के साथ युद्ध तथा सम्पूर्ण देवसेना पर कालनेमि ने शस्त्र वृष्टि को जिससे देवसेना त्रासित होगई फिर विष्णु से कालनेमि की पराजय। १५० तारकासुरोपाख्याने देवासुरयुद्धे ग्रसनवधवर्णनम् ४०३ सारथिका युद्ध में पतित कालनेमि को रथ में बैठाकर दूर ले जाना । इसके बाद बलवान् निमि दैत्य ने हरि के साथ युद्ध किया । कोधित टानयो ने भगवान के ऊपर इस तरह एक हो साथ प्रहार किया। परिघेण निमित्यो मथनो मुद्गरण तु । शुम्भ शूलेन तीक्ष्णेन प्रासेन ग्रसनस्तथा ।। चक्रपामहिप क्रुद्धो जम्म शत्तयामहारणे । जम्नुर्नारायणसर्वे शेपास्तीक्ष्णैश्चमार्गणे और वे अस्त्र भगवान के अङ्गमें इस तरह प्रवेश कर गये जैसे श्रेष्ट शिष्य को गुर से उपदेश किये गये शास्त्र । तत्पश्चात् अन्य दानवी को परास्त कर चक्र से प्रसन दानव के दो खण्ड कर दिये । १५१ तारकासुरोपाख्याने देवासुरयुद्धवर्णनम् देव दानवों के भीषण युद्ध का वर्णन । असुरो द्वारा नाना प्रकार के भयानक शस्त्री से भगवान् जनार्दन पर प्रहार एघ सम्पूर्ण अस्त्रों के छोडने के पाद दैत्यों ने मृत घोडे तधा हाथियों से हा युद्ध किया कुछ २ थकने के कारण विष्णु ने गण्ड से युद्ध त्यागनेको पहा पुन भगवान्ने पाच पाणों से तारकासुर के मर्मस्थानों पर थाघात किया। और यदले में दैत्य ने भी अति तीक्ष्ण अस्त्रों से प्रहार कर विष्णु को घायल पिया और अन्त में घोर समाम पुआ।
T म १५२ तारकासुरोपाख्याने देवासुरयुद्धवर्णनम् .४०७ दैत्यों के बढ़ते हुए प्रभाव को देखकर इन्द्र भगवान विष्णु के पास गया और इस तरह से उत्साहवर्धक शब्दों में कहा कि इन दुष्ट दानवों से क्यों खेल करते हैं। अपने शत्रु को उपेक्षा बुद्धि से देखना बुरा है पहिले भी आपने हिरण्याक्ष हिण्यकशिपु आदि मदोद्धत राक्षसों का संहार किया है। आपने सदा ही इनके बढ़े हुए उपद्रवोंसे जनताको बचाया है। इसपर भगवान् ने देवताओं को सेना सज्जित करने के लिये कहा और बल के साररूप ग्यारह रूद्रों को बनाया। इन ग्यारह रूद्रों ने दैत्यों की सेना मे विध्वंस मचा दिया इस प्रकार देवताओं की सेना को सजी हुई देख कर यह विकट वेषधारी दैत्य देवताओं को दायें यायें भागेपीछे मर्दित और चूर्णित करता हुआ आगे बढ़ा और रुद्रों के सामने आकर युद्ध के लिये ललकारने लगा। रुद्रों ने मन्त्रणाकर उस मायावी राक्षस को मारने का उपायसोचा और चारों तरफ से उस दैत्य पर आक्रमण किया इस प्रकार बड़ी देर तक युद्ध होने पर रुद्रों ने उसे मार डाला और उसकी सारी सेना भयभीत होकर भाग गई। परन्तु फिर निमि ने पैर रोप कर लड़ाई की और देवताओं की सेना में हाहाकार मवादिया । निमि पर इन्द्र ने घन का प्रहार किया और निमि ने इन्द्र के हाथी पर इतनी तेजी से आक्रमण किया कि वह युद्ध से डर के मारे भागखड़ा हुआ बाद में सभी प्रधान सुरों से युद्ध करते हुए तारक को विजय लाभ हुआ। १५३ तारकपीडितैर्देवैःब्रह्मस्तुतिकरणम् ४२० ब्रह्मकृतदेक्सान्त्वनम् ब्रह्मकृतरात्रिप्रार्थनम् नारदस्प हिमालयगृहगमनम् . ४२३ ४२५ ४२७ --- के उपस्थित होने पर ब्रह्माजीने उससे कहा कि हे रात्रि देवताओं के सम्मुख (४७) हिमालयस्य कन्याविपये दुःखप्रकटनम् "-, ४२६ नारदकृत हिमालयसान्त्वनम् ४३१ मदनस्य शिवान्तिकं गमनम् ४२३ रतिकृतशङ्करस्तुतिः ४३५ उमातपश्चर्यावर्णनम् ४३७ उमासप्तपि कथोपकथनम् ४२६ सप्तर्षीणां मेनया सह परामर्शः ४४३ पार्वतीपाणिग्रहणार्थ हरस्य हिमालयगृहे गमनम् ४४५ हरगौरीसहवासवर्णनम् ४४६ पार्वती गणेशनाम्नः पुत्रप्राप्तिः ४५१ पार्वत्याःगणेशम्प्रति उपदेशः ४५३ तारकासुर से दुःखित देवताओं द्वारा ब्रह्माजी की स्तुति । देवताओं की प्रार्थना से प्रसन्नहुए ब्रह्माजी ने कहा कि यह दैत्य देव दानव किसी से भी नष्ट नहीं होगा इसने मेरे से यही घरदान मांगा है कि मेरी मृत्यु सात दिन के चालक से हो । वह बालक भगवान शंकर से होगा जो अभी स्त्री -रहित है। हिमालय की लड़की पार्वती होगी जिसका परदहस्त सदा ही सीधा रहता है उसके सकाश से जो सन्तान होगी उससे वारफासुर का पध होगा तुम लोग उस काल की प्रतीक्षा फरो ब्रह्माजी के ऐसा कहने पर देवता लोग चले गये । तत्पश्चात् ब्रह्माजी ने रात्रि को स्मरण किया। रात्रि । एक महान् कार्य उपस्थित हुआ है उस कार्य के लिए तुम्हें जो करना है पर मुनो। दूसरे जन्म में जय दक्ष पुत्री सती हिमालय के घर पार्यती (४८) अवतरित होगी तब यह भगवान् शङ्कर की तपस्या कर उन्हें.पतिरूप में प्राप्त करेगी उस काल में तुम्हें सहवास के समय स्वयं सुन्दर रूप से उनका मनो- रञ्जन करना चाहिये । इस बीचमें जब भगवान् शङ्कर उठकर चले जायेंगे तब मा भगवती पार्वतीजी रुष्ट होकर फिर तपस्या करने चली जायेंगी और उनसे उत्पन्न सन्तान दैत्यों को नष्ट करेगी तथा तुम्हें भी दानवों का नाश करना होगा जिससे संसार में उमा के अंश रूप में तुम भी पूजनीय बनोगी। ऐसा कहते हुये ब्रह्माजी ने रात्रि की स्तुति की। पार्वती का हिमालय के घर जन्म । उसके जन्म लेने पर सम्पूर्ण संसार सुखी हो गया यहाँ तक कि नरक मे रहने वाले भी स्वर्ग के समान सुखी एवं क्रूर मनुष्य भी शान्त हो गये। उधर इन्द्र ने देवपिनारद को अपने कार्य को शीघ्र करनेके लिये स्मरण किया। देवराज इन्द्रको स्मरण करते जान नारदजी प्रसन्न हुए और इन्द्र भवन में आये । उनको आया हुआ देख इन्द्र ने अपने स्थान से उठकर नारदजी की पाद्य अर्य आचमन से पूजा की तथा नारदजी ने कुशल क्षेम पूछा । तब इन्द्र ने कहा कि आप हिमालय की पुत्री पार्वती का भगवान शंकर से योग हो ऐसा उद्योग कीजिये । इन्द्र के ऐसा कहने पर नारदजी का हिमालय के घर जाना तथा हिमालय का कन्या विषयक दु ख प्रगट करना । नारद जी द्वारा हिमालय को सान्त्वना देना। नारदजी का हिमालय के घर से पुनः इन्द्र भयन जाना और इन्द्र को भगवान् शङ्कर के पास कामदेव को भेजने के लिये कहना । इन्द्र का कामदेवको स्मरण कर भगवान् शङ्कर के पास भेजना। भगवान् शङ्कर के नेत्र से उत्पन्न अग्नि से कामदेव का भस्म होना । कामदेव की पत्नी रति का भगवान् शंकर की स्तुति करना। भगवान् शङ्कर का प्रसन्न होफर रति को घरदान देना कि तुम्हारा पति अब अनङ्ग नाम से विरयात होगा । भगवती पार्वती का कठोर तप देख फर सम्पूर्ण प्राणी विचलित हो गये। 'इन्द्र का सप्तपियों का स्मरण करना । सप्त- .
. [४] पियों का इन्द्र भवन में आगमन तथा इन्द्र द्वारा उनकी पूर्जा। इन्द्र ने सप्तर्षियों को अपना प्रयोजन कहा कि हिमालय की पुत्री हिमालय में घोर तपस्या करती है आप लोग उसके मनइच्छित कार्य को करने के योग्य हो। तदनन्तर समर्षि पार्वती के पास गये तया उससे पूछा कि हे पुत्रि तुम्हारी का इच्छा है । पार्वती का भगवान् शङ्कर को पति रूप में परण फरने की अपनी इच्छा प्रगट करना। सप्तर्षियों ने पार्वती से कहा कि शङ्कर तो नग्न रहने घाला, भयङ्कर, कपाल रखने घाला, भिक्षुक, विरूप, पागल एवं धन में रहने वाला है। तुम ऐसे भय देने वाले निन्दनीय, खून से सने हुए, कपालों को पहनने पाले, फूकार मारने घाले, उन सपो को धारण करनेवाले, भयानक भूत प्रेतों को रखने वाले एवं श्मशान में रहने वाले से विवाह की इच्छा रखती हो । जगत् को धारण करने घाले, लक्ष्मीकान्त भगवान हरि, देवराज इन्द्र, सम्पूर्ण देहधारियों का प्राणरूपयायु, सम्पूर्ण अर्थ को देने घाले वैश्रवण को छोड शङ्कर को क्यों भजती हो। मुनियों के ऐसा कहने पर पार्वती कुपित हो क्रोध से लाल नेत्र कर कड़कडाती हुई योली कि-आपलोग सम्पूर्ण प्रजापति के समान हो एवं सर्वज्ञ हो फिर भी निरन्तर संसार के प्रभु, अज, ईशान, अव्यक्त, अनन्त महिमापाले उस आशुतोष भगवान् शङ्कर फो निश्चयफर आप नहीं जानते हैं। जिस भगवान् शङ्कर को ब्रह्मा, विष्णु, इन्दादि देवता, महर्षि आदि भी पूजते हैं। जिसके प्रभाव को ब्रह्मादि देवता भी नहीं जानते हैं यह अनन्त पराममीष मनन्त प्रभाच घाला है ऐसा कहने हुये पार्वती ने कहा- नाह भद्रा किलेच्छामि ऋते शर्थात् पिनाकिनः । स्थितश्च नारतम्येन प्रापिना परमन्त्विदम् ।। খামিম মুছুনা মধু। यस्मान फिश्चिदपरं सर्व यस्मात् प्रवर्तते ॥
. (५०) यस्यश्वर्यमनाद्यन्तं तमहं शरणं गता। एप मे व्यवसायश्च दीर्घोऽतिविपरोतकः॥ अर्थात्-भगवान् शङ्कर को छोड़ कहीं भी कल्याण नहीं देखती हूँ तब सप्तर्पियों ने मा पार्वती से कहा कि हम उस महामहिमशाली देव ऐश्वर्य को नहीं जानते हैं। आपकी निश्चित दृढ़ता को जानने के लिये ही हम यहां आये हैं। तुम्हारी मनोकामना शीघ्र ही पूर्ण होगी यह कह कर वे भगवान् शङ्कर को देखने हिमालय पर गये और शङ्कराश्रम के द्वारपाल धीरक से बोले कि हम शङ्कर से मिलने आये हैं। तव धीरक ने कहा कि शङ्करजी मन्दाकिनीके तटपर स्नान करने गये हैं । तत्पश्चात् क्षणभर के बाद शङ्कर का आगमन और शङ्कर की आज्ञासे ऋषियों का शङ्करजी से मिलना! प्रसन्न हुए मुनियों द्वारा शङ्कर की स्तुति । तदनन्तर शङ्करजी ने कहा कि मैं हिमालय कन्या के सत्कार्य को जानता है । इस कार्य के लिये सभी देवगण - उत्सुक है। करने शङ्कर से वार्ता करके मुनियों ने हिमालय और उसकी स्त्री मेना से विवाह विषय में बातचीत की पुनः पार्वती के विवाह के लिये शहर की गणों सहित हिमालय के घर में गमन । यहां पर वैवाहिक कार्य की रचना। विवाह के समय सुगन्धित पपन चलने लगी गन्धर्व गायन लगे तथा अप्सराए' नृत्य करने लगी। विवाह के पश्चात् हिमालय से विदाई लेकर शिव पार्वती ने घायुवेग धाले नन्दीश्वर पर बैठ कर मन्दावल प्रस्थान किया। शिवपार्वती गृहस्थ धर्म पालन करना। बहुत दिन बीतने के बाद पुत्रेच्छावाली पार्यती सखियों के साथ खिलोने लगी । एक दिन पार्वती सुगन्धित तेल से मर्दन कर उसी चूर्ण (शरीर फा मैल) से हाथी के मुनघाला मनुष्य बना उसके साथ फ्रीडा करने लगी। फिर उसको गवाजल में गिरा दिया उससे उसका सुन्दर रूप बन गया को खेलने बनाकर [ ५१ ] और उसका नाम गाथेय हुआ। ब्रह्माजी ने उसे विनायकां का अधिपति पना दिया। फिर पार्वती अशोक के अड्कुर को पुत्र बना खेलने लगी इस पर देवमुनियों ने कहा कि हे देवि "प्रायः सुतफलो लोकः पुत्रपौत्रेश्च लभ्यते । अपुत्राश्च प्रजाः प्रायो दृश्यन्ते देवहेतवः ।” इन वृक्षों के पुत्रों से क्या फल होगा इसके अर्थ मर्यादा बनाइए तब देवी पार्वती ने कहा कि जो जल रहित देश में कूमा करवाता है यह जल की बूंद २ पानी से एक घर्ष तक स्वर्ग में रहता है और कहा कि- दशकृपसमा पापी दश पापीलमो हृदः । दशहदसम पुत्रो दशपुत्रसमो द्रुमः । एषैच मम मर्यादा नियता लोकभाविनी भगवान् शङ्कर ने भी गणेश के नामों की बहुत प्रशंसा की। पार्वती का गणेश के प्रति उपदेश । ब्रह्माजी को आज्ञा से रात्रि का पार्वती के अंग में प्रवेश और पार्वती को कृष्णत्व रूप की प्राप्ति । १५४ शिवपार्वतीसंवादवर्णनम् शिवपार्वती के संवाद में पार्वती के प्रति शङ्करजी का व्यङ्ग पचन । शिवयवनों को नहीं सहन करती हुई पार्वती का सुन्दर रूप प्राप्ति के लिये तपस्या को प्रस्थान इसी बीच पुत्र वीरक ने कहा कि मैं भी आपके साथ चलूंगा तत्पश्चात् पार्वती ने घोरक से कहा कि तुम यहीं द्वार रक्षक वन कर रहो जिससे यहां कोई अन्य स्त्री प्रवेश नहीं कर सके। १५५ पार्वतीतपश्चर्यापर्णनम् पार्वती को तपश्चर्या का वर्णन। बन्धक दैत्य की मृत्यु के पश्चात् आडि दैत्य की तपस्या । ब्रह्मा ने आडि दैत्य को घरदान देकर कहा कि जब तुम इस रूप से दूमरे रूप का परिवर्तन फरोगे तर मृत्यु होगी अन्यथा नहीं तदनन्तर सर्पकप से आडि दैत्य का शङ्कर के पास जाना तथा शहर द्वारा देत्य फी मृत्यु। .
४५६ ( ५२ ) १५६ पार्वतीम्प्रतिब्रह्मवरदानम् पार्वती का घीरक के प्रति क्रोध । "निर्जगाम मुखात् क्रोधः सिंहरूपी महायल"। अर्थात् भगवती के मुप से सिंहरूपी क्रोध निकला (भगवती का सिंहवाहिनी होना माता की उस दुर्दान्त दुर्दमनीय क्रोधावस्था का ही परिचायक है। आज तक भी स्त्री के ऊपर पुरुषों ने कहीं भी आक्रमण नहीं किया है जो भी देश इसके विपरीत गया है। उसकी कहीं भी बलिहार नहीं हुई।) यही उदाहरण पद्मपुराण में भी आया है। ब्रह्माजी का पार्वती को घरदान । घरदान प्राप्ति के अनन्तर पार्वती का हिमालय के पास गमन । १५७ वीरकपार्वतीसंवादः हिमालय पर धीरफ द्वारा पार्वती को शङ्कर के पास जाने से रोकना। तदनन्तर पार्वती का घोरक पर क्रोध एवं शाप। (यहां पर यह कहदेना आवश्यकीय है कि माता पार्वती का क्रोध संसार में प्रलयकारी हुआ, इस विषय में सद्गृहस्थों को चाहिये कि अपनी गृहिणी, मा और बहिन आदि को कभी भी क्रोधित न होने दे क्योंकि उनके क्रोधित होने से लक्ष्मी एवं कीर्ति नष्ट हो जाती है एवं वही क्रोध है संसार के उत्थान का अवरोधक । इसलिये उनको सदैव प्रसन्नचित्त रक्खें)। पश्चात् रोकने के रहस्य खुलने पर पार्वती को पश्चात्ताप होना तथा क्रोधकी निन्दा करना। यथा- अकार्य क्रियते मूढ़े प्रायः क्रोधसमीरितः । क्रोधेन नश्यते कीतिः क्रोधो हन्ति स्थिरां श्रियम् ॥ अपरिच्छन्नतत्यार्था पुत्रं शापितवत्यहम् ।
[ ५३ ] विपरीतार्थवुद्धीनां सुलभो विपदोदयः ॥ पार्वती के ऐसा कहने पर धीरकने पार्वती की स्तुति की। १५८ कुमारोत्पत्तिवर्णनम् , देवकृतकुमारस्तुतिश्च । शक्रंदूततारकासुरयोः कथोपकथनम्। पीरक की स्तुति से प्रसन्न हो पति के पास गई तत्पश्चात् पार्वती के दक्षिण कुक्षि से चैत्र शुक्ल पूर्णिमाको कुत्सित दैत्यों को मारनेवाले कुमार नामक पुत्र को उत्पत्ति हुई। कुमार की लोक में स्कन्द, विशाख, पण्मुख और कार्तिकेय नाम से ख्याति हुई। पार्वती पुत्र कुमार की देवताओं द्वारा स्तुति । देवताओं की तारकासुर को पध करने के लिये कुमार से प्रार्थना। तदनन्तर इन्द्र का संसार के कण्टक रूप तारकासुर के पास दूत का भेजना। दूत पवं तारकासुर का संवाद। सिद्ध चारणों द्वारा असुरों के हृदय को दारण करनेवाली कुमार की जय गाथा। १५६ तारकोपाख्यानम्, कुमारतारकयुद्धवर्णनम् ४६६ देववन्दियों द्वारा कुमार की जयगाया सुनकर ब्रह्माजी के पाक्यों का स्मरण कि तुम्हारी मृत्यु कुमार द्वारा होगी। इस यातको स्मरण फर सारफासुर अपने अनुगामियों के साथ शोफग्रस्त वित्त से अपने भवन से निकला! फारनेमि आदि दैत्य शोध से युक्त हो कुमार से युद्ध करने के लिये दो। तारकासुरने कुमार को सामने देख फर कहा कि तुम यालफ हो अभी तो तुम्हारी अपस्या गेंद गल्ने फी है क्या तुम संग्राम में भयानक देस्यों से युद्ध करने आये हो। ऐसा सुनफर कुमारने पहा तुम मुझे यालफ मत समझो में थारूप काल सर्प ।। तदुपरान्त कुमार और सारफामुर का युद्ध । स्कन्द पी तारपासुर पर पिजय।
. ( ५४ ) १६० नरसिंहमाहात्म्यवर्णनम् , हिरण्यकशिपुवैभववर्णनम् पहिले सत्ययुग में दैत्यों में हिरण्यकशिपु नामक आदिपुरुप हुआ। उसने ग्यारह हजार वर्ष तक जल में रहकर कठिन तपस्या की। जिससे प्रसन्न हो ब्रह्माजी ने दैत्यराज को घर के लिये फहा। उसने ब्रह्माजी से बड़ा अद्भुत घरदान मांगा कि मैं किसी भी मनुष्य, देवता, राक्षस, पिशाच आदि से न मारा जाऊं, न किसी के शाप से, न किसी अस्त्र शस्त्र से, न दिन में न रात में न जल में न स्थल में न अन्तरिक्ष में मेरी मृत्यु हो । ब्रह्माजी ने कहा तथास्तु । परन्तु देवताओं को इससे बड़ो चिन्ता हुई और वे भगवान् विष्णु की शरण में ऐसे उद्दण्ड भयंकर उत्पात मचाने वाले राक्षस के वध के लिये गये और स्तुति की। प्रसन्न हुये भगवान् ने उनकी मार्त प्रार्थना को मानकर नरसिंह रूप में अपने पक्षस्थल पर नखों से उस दैत्य को मारने की बात कही। हिरण्यकशिपु बड़ापराक्रमी एवं तेजस्वी था भगवान उसके भवन में नरसिंह रूप में अवतीर्ण हुए। १६१ नरसिंहमाहात्म्यवर्णनम् ४७४ हिरण्यकशिपुनरसिंहयुद्धवर्णनम् ৪৩৪ नरसिंह भगवान् को अवतरित हुए देखकर भक्तपघर प्रह्लाद ने हिरण्य- फशिपु से कहा कि ऐसा अद्भुत रूप न कभी देखा है न सुना है यह अलौ- किक दिव्य शरीर निश्चित रूप से दैत्यों का अन्त करने के लिये प्रगट हुआ है। इस भगवान् नरसिंहके शरीर में सम्पूर्ण समुद्र, नदियां, हिमालय आदि पर्वत, नक्षत्रों सहित चन्द्रमा, पसुओं सहित, आदित्य कुवेर, धरण, यम, इन्द्रा मस्त, देव, गन्धर्व, ऋषि, नाग, यक्ष, पिशाव, राक्षस, ब्रह्मा, ललाटस्थ शङ्कर, स्थावर जंगम, आप और मैं तथा सम्पूर्ण चराचर जगत स्थित है। प्रहादके धवनों को सुनकर आदिदैत्य हिरणाकशिपुने सम्पूर्ण दानवगों - को आज्ञा दी कि इस धनगोचर को पकड़ फर बांध दो । तत्पश्चात् भगवान नरसिंह ने कालरूप हो सम्पूर्ण दानवगणों फी सभा को भंग कर दिया। हिरण्यकशिपु से भीषण युद्ध का वर्णन । १६२ अन्यदानवैः सह नरसिंहयुद्धम् , नरसिंहमाहात्म्यवर्णनम् ४७६ अग्नि के तुल्य पराक्रमी भगवान् नरसिंह से त्रासित हुए दिति के पुत्र भय से विचलित हो गये। तदनन्तर अन्य दैत्यापने क्रोधित हो प्रचण्ड वेग से अस्त्र शस्त्रों की वृष्टि की परन्तु भगवान नरसिंह के शरीर में उन शस्त्रा. स्त्रों से कोई भी पीडा नहीं हुई। पुनः क्रोधित हो उन दानवों ने सर्प की तरह फूकार मारते हुए पापों की वृष्टि की । उन सबको भी भगवान ने नष्ट कर दिया पश्चात् हिरण्यकशिपु ने बिजली के सदृश कान्तिवाली प्रज्वलित घोर शक्ति का प्रहार किया जिसे उन्होंने हुकार से ही नष्ट कर दिया। फिर गर्जना करते हुए भगवान ने उस दानवेश्वर की सेनाको तृणको तरह उत्पाटित कर दिया। इस प्रकार अपनी सेना को क्षत विक्षत देखकर दैत्योंने पत्थरों की वर्षा और प्रचण्ड वेगपाली जलधारा फी वर्षा की परन्तु उस देवको ये स्पर्श भी न फर सी। तदनन्तर दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने अग्निवर्ण, प्रचण्डघायु तथा दानधी माया के यल से भगवान् को पराजित करने के लिये अथक परिश्रम किया, परन्तु उस सम्पूर्ण दानची मायाको प्रभुने इस प्रकार नाश किया जैसे सूर्य-उदित होते ही अन्धकार फो नष्ट कर देता है। फिर भगवान् ने कुपित हो दानवेश्वर को पक्ड़ नसों से विदीर्ण कर युद्ध में मार दिया जिससे सम्पूर्ण जगत प्रफुल्लित हो गया तथा देवताओं ने भगवान् नासिद की स्तुति की। १६३ मनुमत्स्यसंवादवर्णनम् मनु द्वारा भगवान मत्स्य से पल फि जप सृष्टि प्रलयकालीन जल में " ४८४ विलीन हो गई फिर भगवान् जनार्दन के नाभिकमल से सृष्टि केसे उत्पन्न हुई ? प्रलयकालोन जल में सोते हुए पद्मनाम भगवान् के प्रभाष से तीर्थाग्रणी पुष्कर राज में ऋषिगणों सहित देवता कैसे प्रगट हुए? उस जल में भगवान् कितने समय तक सोते हैं एवं कितने काल से उठते हैं और कब निखिल जगत् की रचना करते हैं ? यह सम्पूर्ण मेरे लिये वर्णन करो। मनु के प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान् मत्स्य ने कहा कि सत्य, अमृत, अक्षर, तीनों फाल, चर, अचर सम्पूर्ण उसी भगवान् पुरुषोत्तम में स्थित हैं उससे अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। १६४ चातुर्युगगतिवर्णनम् पहिला सत्ययुग चार हजार दिव्य वर्षों का है। सत्ययुग में धर्म के चार पैर तथा अधर्म बिना पैर अर्थात् उस काल में धर्म का पूर्ण उत्कर्ष था अधर्म का नाम भी नहीं था। सभी मनुष्य अपने २ पर्णाश्रम एवं धर्म में लीन थे। दूसरा त्रेतायुग तीन हजार वर्षों का दुगुनी सन्ध्या से युक्त है। त्रेता में धर्म में कुछ धिकार होने से पूर्ण धर्म एवं आश्रमों में दुर्बलता आ गई। तीसरा द्वापर दो हजार वर्षों का दुगुनी संध्या से युक्त है। इस युग में सम्पूर्ण प्राणी अर्थ लोलुप एवं रजोगुणी प्रकृति के हो गये; चतुर्थ कलियुग एक हजार दो सौ वर्ष का दुगुनी संध्या से युक्त है। जिस कलियुग में धर्म का पूर्ण हास होकर प्राणियों की अधर्म में प्रवृत्ति हो गई। इसमें मनुष्यों की विषयभोग में लिप्सा फी वृद्धि होकर उनके सात्विक भावों का हास हो गया। १६५ प्रलयकालवर्णनम पुराण पुरुषोत्तम भगवान् नारायण ने सत्त्वमूर्ति सूर्यरूप होकर अपनी प्रचण्ड किरणों से समुद्रों को शोषित कर सम्पूर्ण नदी कूप एवं पर्पतों के ।
[ ५७ ] झरनों के जल को भी सुखा दिया। उनने अपनी प्रलयकालीन उग्र किरणों से पृथ्वो को भेद न करता हुआ पाताल के जल को भी खींच लिया तथा धायु ने भी सम्पूर्ण जगत के प्राणों को अपने में समाविष्ट कर लिया। इसी प्रकार सब तत्व अपने २ गुणों को खींच उस हृषीकेश भगवान् में लीन हो गये तदनन्तर घायु के झोकों से द्रुमशाखाओं में घर्षण होने से अग्नि पैदा हुई जिस सम्घर्तक अग्नि से सम्पूर्ण संसार, पर्वत, वृक्ष आदि सहित भस्मीभूत हो गया पश्चात् मूसलाधार वृष्टि से संसार जलप्लापित हो गया एवं यमित पराक्रमो भगवान् पुरुषोत्तम भी अपने सत्वरूप में स्थित हो उस एकार्णव जल में योग को धारण कर सो गये। १६६ यज्ञावतारवर्णनम्, भगन्मार्कण्डेयसंवादवर्णनम् ४८७ यज्ञावतार का वर्णन | भगवान् मत्स्य द्वारा प्रथम चक्त्रादि से ब्रह्मा, उद्गातृ और सामगादि को उत्पत्ति का कथन । भगवान के मुख में प्रविष्ट हुआ मार्कण्डेय उस भगवान् के कुक्षि में तीर्थ प्रसङ्ग से सम्पूर्ण पृथ्वी, वीर्थ, आभ्रम, देवमन्दिर और नगरादिकों को देखकर आश्चर्यचकित हुआ। पुन. मुख से बाहर निकला परन्तु देवमाया से कुछ भी नहीं जान सका। जिघर देखता है, सिवा जल के कुछ भी भान नहीं होता। ऐसा देखकर उसको भयंकर भय पैदा हो गया एवं चिन्ता करने लगा कि वस्तुत: यह मुझे मोह हो रहा है या स्वप्न है ऐसा विचार करता हुआ फिर भगवान के मुख में प्रविष्ट हुआ। पहां फिर समुद्र में मग्न मेघ के सदृश सूर्य की तरह तेज से देदीप्यमान देव को देखकर आप फोन हैं ? इस बात को जानने के लिये समीप में आया। फिर कुक्षि में प्रवेश किया फिर यही दृश्य देसा पुनः बाहर आफर देखता है कि एक बालक घटके पत्ते पर सोया है उसके समीप जाकर पूछता है आप कौन हैं उत्तर में भगवान ने कहा है पत्स ! तेरा पिता। तुम्हारे पिता अङ्गिराने पुत्र फो कामना से मेरी आराधना की थी। उसका [ ५८ ] तपस्या से प्रसन्न होकर पुत्र होनेका घरदान दिया था। तब माण्डेयने कहा कि मैं आपकी माया देखना चाहता हूं तब भगवान ने मार्कण्डेय को विभूति योग का उपदेश किया और कहा कि संसार में जितने भी जलवर, स्थलन, नभचर प्राणी है उन सब में मेरो ही स्वरूप जान । तदनन्तर मार्कण्डेय का भगवान् की कुक्षि में प्रवेश। १६७ भगवन्नाभितःकमलोत्पत्तिवर्णनम् ४६१ प्रलयानन्तर फिर संसार को रचने की इच्छा से समुद्र को क्षुभित कर शब्दादि स्थूलभूतों को उत्पन्न किया और स्वयं उसी जल में क्रीडा करता हुमा अपनी नाभि से कमल को उत्पन्न किया इसका वर्णन । १६८ ब्रह्मण उत्पत्तिवर्णनम् ४६२ भगवान् ने पद्म को पैदाकर उसके मध्य में सम्पूर्ण लोकों की रचना करने वाले ब्रह्मा को उत्पन्न किया। उसी पद्म को पुराण जानने वाले पृथ्वी रूप कहते है । जो पढ़ा है उसे रसादेवी तथा जो पद्मसार गुरु है वे पर्वत है इस प्रकार नदी, पर्वत और तालाब आदिकी उत्पत्ति बताई है। १६६ मधुकैटभाख्यानवर्णनम् ४६३ पुष्करराज में ब्रह्मा के तप में स्थित होने पर मधुकैटभ नामक दैत्यों ने यहां आकर विघ्न किया तथा कहा कि तुम कौन हो? यहां आवो और हम से फरो तत्पश्चात् ब्रह्माजी ने उनसे कहा कि जिस प्रभु से संसार उत्पन्न होता है वही तुम्हें नए करेगा पीछे भगवान् नारायण ने आत्ममाया से उन दोनों देत्यों को खींच लिया। तब वे पद्मनाम भगवान के सामने । प्रणाम कर स्थित हो गये तथा कहा कि हे भगवन् आप संसार के कारण हैं हमारी रक्षा कीजिये आपका दर्शन विफल नहीं होता है अतः परदान [ ५६ ] दीजिये। भगवान ने कहा तुम क्या चाहते हो तब उन्होंने यह घर मांगा कि हम आपके सिवा किसी से न मरे। १७० ब्रह्मणस्तपश्चर्यावर्णनम् ४६५ नानाविधसृष्टिवर्णनम् ४६७ ब्रह्म को जानने घाले ब्रह्मा ने पुष्कर में अद्र्धवाह होफर घोर तपस्या की। यहीं पर भगवान् नारायण दूसरा रूप धारण कर योगाचार्य रूप में तथा मतिमान् साख्याचा फपिल उपस्थित हुए। ब्रह्माजी से मानस पुत्रों की उत्पत्ति तथा दक्षादिकों की उत्पत्ति का वर्णन । पुष्कर फा प्रादुर्भाव एव उसके माहात्म्य तथा श्रवण पठन का फल कथन । १७१ विष्णोः प्रादुर्भावपर्णनम् ४९६ वृत्रासुर घधके अनन्तर तारकासुरफा देवताओंसे युद्ध । युद्ध में परा- जित देवताओं का अपने स्थानों को छोडकर भगवान् विष्णुको शरण में जाना । शरणमें माये हुए भयमीत देवताओंको देखकर भगवान् ने दानवों- फो विनाश करने के लिये मन में सफरूप फिया पुन आकाश में स्थित देवताओं से भगवान् ने कहा कि भय मत करो तुम्हारा फल्याण होगा। मेरे द्वारा सम्पूर्ण दानव पराजित हो गये है आपलोग त्रिलोफी को पुन ग्रहण फरो भगवान्फी इस प्रतिशाफो सुनफर देवता हर्पयुक्त हो गये तथा प्रह नक्षत्र समुद्रादि भी पूर्वपत् मर्यादामें स्थित हो गये। १७२ दैत्यसैन्यविस्तारवर्णनम् क्ष्यों के विनाश के लिये विष्णु भगवान् फी प्रतिक्षा सुनकर मय, पिरोचन, हयग्रीप, पाराद, पर, स्पष्टा, पिप्रवित्ति, परिपुत्र अरिटासुर, लम्य मौर स्पर्भानु आदि दैत्य अपने अपने पाइनों में स्थित मल शस्त्रों से सुस. मित दोपर युर में विजय प्राप्त करने के लिये पिपुल उद्योग करने लगे। वाला [ ६० ] १७३ सुरसैन्यविस्तारवर्णनम् ५०४ दैत्य सेनाओं का विस्तार सुनकर देवताओं ने भी अपनी सेना को सुसजित किया। द्वादश आदित्य, अष्टवसु, एकादशरुद्र, और लोकपाला- दि देवताओं का अपनी अपनी सेनाओं से युक्त हो अपने अपने वाहनों पर आरूढ़ होकर गुरु वृहस्पति से फल्याण का माशीर्वाद ग्रहण कर युद्ध के लिये प्रस्थान करना ! गुरुशुक्राचार्य ने भी असुरों को आशीर्वाद दिया। १७४ देवासुरसंग्रामवर्णनम् और्वनिर्मितमाया वर्णनम् परस्पर विजय की इच्छापाले देव दानवों का तुमुल युद्ध । अनेक शस्त्रास्त्रों से युक्त देवता और दानवों का धर्म अधर्म एवं अभिमान और चिनय से युक्त अत्यन्त अद्भुत युद्ध । जिससे समस्त संसार भय से उद्विग्न हो गया वहीं पर मय दानव द्वारा छोड़ी हुई माया से देव सेना को जलती हुई देखकर देवराज इन्द्र से घरुण ने कहा कि हे इन्द्र यह और्व नामक अग्नि है। उर्व की जंघा से इसकी उत्पत्ति है इसने पहिले ब्रह्मचर्यपूर्वक फठिन तपस्या की है ब्रह्मचर्य से ही ग्राह्मणको ब्राह्मणत्व की प्राप्ति है तथा तप, योग धेर्य और यश ब्रह्मचर्य के धिना फलीभूत नहीं होते हैं जैसे- ब्रह्मवये स्थितं धैर्य ब्रह्मचर्य स्थितं तपः । ये स्थिता ग्रहाचर्येषु ब्राह्मणा दिवि संस्थिताः । नास्ति योग चिना सिद्धिर्नया सिद्धि विना यश.। नास्ति लोके यशो मूलं ब्रह्मचर्यात्परन्तपः ॥ इस लिये शीतरश्मि चन्द्रमा को मेरे साथ दीजिये जिससे इस माया को नष्ट करदूंगा।
[ ६१ ] ७५ देवासुरसंग्रामवर्णनम् सोम एवं घरण द्वारा मय माया फाशमन । पुन मय ने दैत्य सेनाको सोम घरुण द्वारा दुखित देखकर पार्वतीय मायाफीरवना फी अर्थात् देवताओं पर पत्थरों की एवं वृक्षोंकी वृष्टि करना प्रारम्भ किया। तदनन्तर उस मायाको शान्त करने के लिए भगवान् विष्णु द्वारा अग्नि और घायु को दैत्य सेनाको नष्ट करने के लिए प्रेरित करना जिससे त्रासित हुए दैत्य रपाङ्गण से विमुख हो गये तथा सर्वत्र शान्ति हो गई । तदनन्तर विख्यात दानव कालनेमि ने अपने युद्ध से दानवों को हर्षित फर देवताओं को त्रासित किया। १७६ कालनेमिवृत्तान्तवर्णनम् फालनेमि बढ़े हुए इन्द्रादि देवताओं को अपने पराक्रम से हीन तेज फर ब्रह्मा जी के स्थान में स्थित हो गया। पुन. देवदानचों का भयङ्कर युद्ध तत्पश्चात् कोधित कालनेमि ने इन्द्र, परुपा धीर सोम आदि देवताओं को परास्त कर सय सम्पत्ति छीन ली। उस फालनेमि फो देवता तथा दैत्यगण पितामह ब्रह्माजी की तरह प्रसन्न करने लगे। १७७ कालनेमिना सह विष्णुयुद्धम् कालनेमि को फर्मों की विपरीतना से घेद, धर्म, क्षमा, सत्य और नारायणाधित लक्ष्मी नहीं मिली । यह स्वयं इन पावों के अभाव से क्रोधित हा भगवान् विष्णु के स्थान को सोजता हुआ नारायण के पास पहुचा। यहा पर भावान् को शंप, चमा, गदा धारण किये हुए दानयों के विनाश के लिए गदा घुमाने हुए गरुड पर चढने हुर देखा । भगवान् को स्यस्य वित्त रण में स्थित देगा युद्ध के लिये सलमारने हुर भला युग पहा । उसासमर फालनेमि फो प्रजापति की मर्यादा फी नष्ट करनेवाला पदपर युद्ध के लिए आयाइन पिया तपा [ ६२ अपने अपने स्थानों में देवताओं को पुनः स्थापित फर दूंगा ऐसा कहते हुए भगवान् पर अट्टहास फर क्रोध से अपने सौ हाथों को उठाकर भगवान् विष्णु की छाती पर प्रहार किया तथा गरुड़ के सिर पर भी गदा छोड़ी जिससे गरुड़ को दुःखित देखकर भगवान् ने अपने चक्र से फालनेमि के सौ सिर तथा सो हाथोंको नष्ट कर दिया पुनः गरुड़ने उसको भूमिपर गिरवा दिया। तदनन्तर ब्रह्माजी द्वारा विष्णु की स्तुति । भगवान् द्वारा देवताओं को अपने अपने अधिकारों का देना एवं ब्रह्माजी सहित अपने लोकमें गमन । १७८ भवमाहात्म्यवर्णनम् ५२१ शङ्करकृत नृसिंहस्तुतिवर्णनम् । ५२५ ऋषियों का भवमाहात्म्य के लिये सूतजी से प्रश्न। सूतजीने भवमाहाल्य सूत्रक अन्धकासुरका वृत्तान्त वर्णन किया। अन्धकासुरने एकबार भगवान् शङ्करको पार्वतीजी के साथ बैठे हुए देखकर मा भगवती को हरण करने की इच्छा फी। जिससे भगवान् शङ्कर के साथ उसका घोर युद्ध हुन । युद्ध में उसने राक्षसी माया रची जिससे कुपित हो भगवान् शङ्कर ने मातृगणों को उत्पन्न किया। मातृकाओं ने अन्य अन्धकों के रक्त को पान किया और अन्धकों में जो मूल पुरुष था उसको भगवान् शङ्कर ने अपने गणों का स्वामी बना दिया ! उन मातृकाओंने फ़िर शङ्कर से देव, असुर और मनुष्यों को खाने के लिए आज्ञा मांगो । शङ्करजी ने कहा मातृकायें प्रजा के रक्षा के लिए ही होती है तत्पश्चात् मातृकाओं ने उस पचन का उल्लङ्घन फर सृष्टिके भक्षण के लिए उद्यम किया। उनके इस जघन्य कार्य को रोकने लिए भगवान् शङ्कर से प्रार्थित नृसिंह भगवान् का प्रादुर्भाव और भगवान् नृसिंह द्वारा निर्मित पाणीश्चर्यादि मातृकाओं द्वारा रद मातृकाओं का . पराभघ एवं नृसिंह की स्तुति । ।
(६३) १७६ वाराणस्या माहात्म्यम् ५२६ ऋपियों का सूतजी से प्रश्न ? कि पिङ्गल गणत्य को कैसे प्राप्त हुआ इसपर सूतजी ने बताया कि पिङ्गल पर बनारस की पूर्ण कृपा होनेसे उसको अब स्थान मिला कहते हैं। पूर्णभद्र के सुपुत्र हरिकेश को भगवान् शङ्करजी में निश्चल भक्ति थी यह उठते बैठते शङ्करजी में ही तन्मय रहता था। एकयार पिता ने पुत्र को इस भक्तिपूर्ण स्थिति के लिए. फडी जवान कही। यह घर यार छोड़कर धाराणसी में आकर तप करने लगा। पहा सारा शरीर घल्माक से पूर्ण हो गया केयल हड्डी हड्डी हो रह गई। तर भगवती पार्वतीजी ने शङ्काजी से उस स्थान को देखने को इच्छा प्रगट की जहा सुन्दर उद्यानादि हैं। श्री भगवान् ने फिर वनारस क्षेत्र की अमित महिमा का वर्णन किया जहाँ सम्पूर्ण प्राणीमात्र को मोक्ष मिलता है। देवा- धिदेव शङ्करजीने इस सिद्धस्थान पर तपस्या करनेवाले गुहा क्षेत्रकी विशेष. तायें क्तलाई । नैमिपारण्य, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, पुष्कर और प्रयाग से कहीं विशेष माहात्म्य बनारस क्षेत्र का है। इस स्थान पर मनुष्य मुझे भजता हुआ परमगति को प्राप्त करता है, उन्होंने नाना महान् सिद्ध योगियों को गिनाकर उन्हें जो सिद्धिया मिली उसका परिगणन कर इसकी महत्त्वपूर्ण विशेषता बतलाई। चारापासी तु भुवनत्रयसारभूता, रण्या सदा मम पुरी गिरिराजपुत्रि!! अनागता विविधदुष्कृतकारिणोऽपि, पापक्षयाद्विरजस प्रतिमान्ति मा । इसके बाद शङ्करजी ने पार्वतीजी को जहा यक्षपुत्र हरिकेश तपस्या कर रहा था पहा ले जाकर उस हड्डी के कडाल का दिखाया ! दयामयी पार्वतीजी ने शङ्करजी से ऐसे मक की रक्षा करने और पर देनेकी प्रार्थना की। भगवान् ने उसे उद्बोधन किया तो उसने उनके चरणों में मति मांगी और शङ्कर का अविमुक्त पद मांगा। इस पर शङ्करजी ने उसे गणाध्यक्ष होकर आगे जन्म में अपना जन्म सफल फरने का घरदान दिया एवं कैलाशधाम पधार गये। १८० वाराणसीस्थक्षेत्रमाहात्म्यम् ५३३ वाराणसी क्षेत्र का माहात्म्य जो नन्दिकेश्वरजी ने बताया उसोको भगवती पार्वतीजी ने शङ्करजी से पूछा तय शङ्करजी ने इस सिद्ध क्षेत्र में सम्पूर्ण सत्कर्म किया हुआ अनन्त फल को देनेवाला है ऐसा कहा। जैसे- अविमुक्ते परासिद्धिरविमुक्ते परागतिः । जप्तं दत्तं हुतं चेष्टं तपस्ततं कृतं च यन् । ध्यानमध्ययनं दानं सर्व भवति चाक्षयम् ।' १८१ वाराणसीमाहात्म्यम् घाराणसी क्षेत्र अविमुक्त है यह सम्पूर्ण गुह्य स्थानों में श्रेष्ठ है। यहां सिद्धि हाथ के नीचे ही धरी रहती है जो कोई इस पवित्र क्षेत्र में एकमास पर्यन्त ब्रह्मवर्य व्रत पालन करता हुआ रहता है उसे इष्ट सिद्धि प्राप्त होती है। १८२ वाराणसी माहात्म्यम् ५३६ वाराणस्यां दानमाहात्म्यम् ५४१ सम्पूर्ण सिद्धिस्थानों में श्रेष्ठ यह पाराणसी क्षेत्र है। इसके लिये पार्वती ने शङ्कर से उसके निवासियों की विशेषता के लिए प्रश्न किया। शङ्करजी ने कहा कि यहां भगवती गङ्गा उत्तरघाहिनी विराजमान है। यहां विश्वनाथ के दर्शन होनेसे यह स्थान मुझे प्रियतम है। यहां प्रलय के समय सभी स्थावर जङ्गम प्राणी मेरे में समा जाते है । उस रूप में मैं सबकी पूजा ग्रहण करता हूं इसलिये यह स्थान श्रेष्ठ है। इस पवित्र तीर्थ धाराणसी में जो हजारों जन्मों में अन्य स्थानों में दुर्लभ है यह यहा एक ही जन्म में मिल जाता है। साङ्ख्य और योग की प्रक्रिया का निरूपण और पाराणसीक्षेत्र का विस्तार। इस तीर्थ में धनसूकी पाप भी मिट जाता है। १८३ वाराणसी क्षेत्र माहात्म्यम् , ५४३ इस पवित्र स्थान में तपस्या और साधना करने वालों का पुनर्जन्म नहीं होता। जो लोग इस अविमुक्त क्षेत्र का सेवन नहीं करने के सम्पूर्ण सिद्धियों से पश्चित ही रह जाते हैं। यहा सक्षेप में सम्पूर्ण भुवन और सम्पूर्ण ससार भर की सिद्धिया निघास करती है । भगवान् शङ्करजी के द्वारा रक्षित यह भूमि शुभकर्मानुपान के लिये सदा ही सेवन करने योग्य है । यहा पर तप साधन करने से बहुन उरष्ट गति मिलती है। १८४ वाराणमीमाहात्म्यम् , वाराणस्यां व्यामतपश्चर्यावर्णन ५४६ इस पवित्र क्षेत्र में योग और मोक्ष दोनों प्राप्त होत हैं। व्यासजी ने इस क्षेत्र को श्राप दिया कि तीन पीहा तक विद्या धन एव मित्रता न रहेगी, जब पार्वतीजीने इसका कारण पूछा तो भगवान् शङ्करने बताया कि एकवार यारहयातक व्यासनाने तपस्या की थी तर एकाएक उहें भूख लगी किसीने भी इहे प्राधानास भी नहीं दिया ऐसा रहने हुए उ हैं ६ मास बीत गये। तय उन्हें उपर्युक्त श्राप देनेको विवश होना पड़ा। इसको निवारण करने के लिये पारती और साक्षात् शङ्करजी मानुप रूप धारण कर थाये और व्यास- जी से मिक्षा रेनेको माग्रह किया। मिक्षा से तृप्त हुए व्यासजी ने फिर कहा कि है भगवन् आप मुझे चतुर्दशा और अष्टमी को इस स्थान में प्रवेश करने का आहादें। इस फाशा क्षेत्र का माहातापपर्णनातीत है। शङ्करजा ने यनारस में तीधों के पाच सार गिनाये पि. - था पही में बतला रहा है। उन्हीं के प्रश्नोत्तरके रूपमें यह माहात्म्य यतला दशाश्वमेध, लोलार्क, फेशव बिन्दुमाधव और मणिकर्णिफा। यह अधिन क्षेत्र पाराणसी फा सक्षेप में मादाम्य सबको मंगलदायी हो। १८५ नर्मदामाहात्म्यपारम्भः प्रपियोंका सूतजीसे नर्मदामाहात्म्य फो सुनाने के लिये आप्रइ करण सूतजी ने कहा कि इसी प्रश्न को पाण्डवों को पहले मार्कण्डेयजीने समभा ५ गया है । नर्मदा सम्पूर्ण नदियोंमें श्रेष्ठ है । यह सम्पूर्ण स्थाघर वरप्राणियों तारनेवाली है जैसे कनखल में गङ्गाजी और कुरक्षेत्र में सरम्घतो पुण्य न चैसे ग्राम, धन्य और सव स्थानों में नर्मदा है। सरस्वती के जल में तीन स्नान करने से, सप्ताह से यमुना जलमें तथा गाजल से त फाल शुद्धि है परन्तु नर्मदा के जल के दर्शन मात्रसे शुद्धि हो जाती है । कलिङ्ग देशके पश्चाईमें भमर कण्टक पर्वतसे यह पवित्र नदी बह यहां बड़ बड़े ऋषि पोधन सभी ने तपस्या कर परम सिद्धियां पाई यहां नियम से रहकर स्नान करने से सम्पूर्ण पितर कल्पान्त तक तृप्त है। यहा तर्पण का बड़ा भारी माहात्म्य है। यह क्षेत्र दो योजन वि, पाला है ६० करोड और ६० हजार तीर्थों का माहात्म्य यहा स्नान कर मिलता है। यहां जप, तप, व्रत और दान का अखण्ड फल है। यहा। पाप भी छूट जाते है। कहते हैं कि नर्मदा और समुद्र के सङ्गमपर करने का दशगुणा पुण्य होता है। संक्षेप में वर्णन। १८६ नर्मदामाहात्म्ये वालेश्वरतोर्थमाहात्म्यवर्णनम् , वाणपुरे नारदगमनम् नर्मदा माहात्म्य को लेकर ज्यालेश्वर तीर्थ के महा इस प्रकार अमरकण्टकमाहात्म ma कुबेर मेसो दिव्य वर्षों तक तप किया था। इस पर भगवान् भूतनाथने प्रसन्न होकर घर मागने को कहा। कुवेर ने सब यक्षों का अधिपति होने का घर मागा। भगवान् शङ्करन उस तथास्तु कहकर सारी कामना पूर्ण की। इस सङ्गम पर स्नान करने वाले को अनन्त पुण्य प्राप्त होते है और यह नर्मदामाहात्म्ये नानाविधतार्थमाहात्म्पपर्णनम् मन्त्रेश्वर, गर्जन, मेघनाद आदि तीयों के माहात्म्य का वर्णन इनके तीर्थगज महत्फल को देता है तथा सर पापों फो नाश करनेवाला है। द्वारा जब ऋषिगण सताये गये तो वे सर भगवान शिव के पास आये और सारी परिस्थिति पतलाई इसे सुनकर शिवजी ने नारदजी को त्रिपुर में स्थित सभी असुरों की वुद्धि बदलने के लिये भेजा। याणको पत्नी अनीपमी के साथ नारद का सम्बाद । नारदजी के प्रभाव से वाण की पतिव्रता स्त्रियों का मन डांवाडोल हो गया और त्रिपुर में छिद्र हो गया। ७ त्रिपुरविनाशार्थ रुद्रस्य वाणपुरेगमनम् त्रिपुरे नारीणां विलापनम् , चाणकृतशंकरस्तुतिः नर्मदा के किनारे माहेश्वर स्थान में स्थित शङ्कर का त्रिपुर भेदन में सम्भ्रम हो जाना । शङ्करजी के क्रोधसे दग्ध सभी लोगोंका हाहाकार करना, जय बाणने त्रिपुर को इस प्रकार जलते देखा तो वह अपने सारे परिपार स्त्री पुत्रादिक को छोडकर शिर में लिङ्ग को धारण कर शिवजी की स्तुति करने लग गया। भगवान् शङ्कर इससे अतीव प्रसन्न हुए और उन्होंने वाण को देवताओं से कभी नहीं माराजायगा आदि घर दिये। वाणासुर के द्वारा शङ्करजी की स्तुति। नर्मदामाहात्म्य कावेरीसंगममाहात्म्यरर्णनम कावेरी और नर्मदा सङ्गम के माहात्म्य का वर्णन । इस सङ्गम पर पहले ५६४ तीर्थ की उत्पत्ति और उसके महत्त्व, गुण तथा प्रभाव का सुन्दर वर्णन शुक्लतीर्थ में भगवान् शिव स्वयं कैलास से निकल कर आये है | यह प्रसिद्ध को स्नान कर सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फल पाता है। इस दिन जागरण का (६८) साथ ब्रह्मावर्त आम्रातकेश्वर, कपिलातीर्थ, फरजतीर्थ, कुण्डलेश्वर, विमले. श्वर, जहां प्रसिद्ध देवशिला है। फिर पुष्करणी आदिका सुन्दर निरूपण निःसन्देह इतने तीर्थों में स्नान करने से फाय, मन और पाणी की शुद्धि होती है। १६० नर्मदामाहात्म्ये नानाविधतीर्थमाहात्प्यवर्णनम् शूलभेद का माहात्म्य जिसमें स्नान कर भगवान् शिवको पूजने से हजार गोदानका फल होता है। यहां तीन रात रहकर शिवपूजन करने से आवागमन से छूट जाता है। भीमेश्वर, नारदेश्वर, नन्दिकेश, घरेश और स्वतन्त्रेश्वर आदि तीर्थों का वर्णन । कोटीश्वर तीर्थ में स्नान करने से सदेह स्वर्ग की प्राप्ति होती है। यहां भोजन, घस्त्र आदिका दान, तप, जप, श्राद्ध, तर्पण का अनन्त गुणा फल होता है। जो मनुष्य नन्दितार्थ में स्नान करने है भाघान् व्यासदेव उन पर प्रसन्न होते हैं। यहां पर प्रदक्षिणा करनेवालों को अक्षर लोकों की प्राप्ति होती है। स्कन्दतीर्थ, लिङ्गसार, घटेश्वर, फोटितीर्थ, अङ्गारेश और फटेश्वर के दिव्य तीर्थों का वर्णन और उनका प्रभाव । १९१ नर्मदामाहात्म्ये नानाविधतीर्थमाहात्म्पकथनम् ५७२ शुक्लतीर्थमाहात्म्यवर्णनम शुक्ल सिद्धार्थ है । शुक्लनी में वैशाख और चैत्र मास को कृष्णपक्ष की चतुर्दशी - -- वडा फल १६२ नर्मदामाहात्म्ये नानाविधतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् ५७४ भृगुकृतकरुणाभ्युदयनामस्तोत्रम् नर्मदा माहात्म्य को लेकर नरकादि तीर्थ यात्रा का वर्णन । भृगुक्षेत्रकी उत्पत्ति और उसके माहात्म्य का वर्णन । धौतपाप और एरण्डी तीर्थ आदि का वर्णन । भगवान् का भृगुजी द्वारा फरुणाभ्युदय स्तोत्र निरूपण। इस क्षेत्र में दान, जप, तप सब अक्षय होता है। इसमें स्नान करने मान से कोई भी तपस्या कमी भी क्षरण नहीं होती जो कोई भृगुतीर्थ का माहात्म्य सुनाता है वह सब पापों से छूट कर रुद्रलोक को जाता है। आगे दापेश्वर एरण्डी तीर्थ और देवतीर्थों का वर्णन है। १६३ नर्मदामाहात्म्ये नानाविधतीर्थमाहात्म्यानम् ২৩১ नर्मदामाहात्म्य के प्रसङ्ग में अकुशादि तीर्थों का वर्णन ! ऋषिकन्या तीर्थ की उत्पत्ति और स्वर्ण विन्दु आदि तीर्थों का माहात्म्य वर्णन निर्मदा माहात्म्य के साथ इससे राम उठानेवाले मनुष्य मान को नाना प्रकार की फल प्राप्ति का निरूपण। १६४ भृगुवंशज-कोणानामगोत्रवंशपरसर्णनम् ५८२ पियों के प्रवरों को चलाते हुए ब्रह्मादिकों की पुनरुत्पत्ति और भृगुवंशज ऋपिमहर्षियों का वर्णन। इन गोत्रकार ऋषिमहपियों के नाम कोर्सन करनेवाले व्यक्ति के समय पाप नष्ट हो जाते हैं। १६५ आङ्गिरसरशज कोणानामगोवंशप्रवरवर्णनम आङ्गिरस वशन ऋपियों का नाम गोत्र वश तथा प्रवरों का वर्णन । १६६ अत्रिवंशज ऋषीणानामगोत्रवंशप्रवरवर्णनम् । ५८८ अत्रि चशज ऋषियों के नाम, गोत्र, वश और प्रवर का वर्णन ।
१६७ कुशिकवंशजऋषीणां नामगोत्रवंशप्रवरवर्णनम् - ५८६ कुशिक वंशज ऋषियों के गोत्र प्रधादिकों का निरूपण । १६८ कश्यपवंशजऋषीणां नामगोत्रवंशप्रवरवर्णनम् । ५६० कश्यप के वंशवाले ऋपियों के नाम, गोत्र, वंश और प्रवरका वर्णन ! १६६ वशिष्ठवंशजसपीणां नामगोत्रवंशप्रवरवर्णनम् वशिष्ठजी के वंशवाले ऋषियों के नाम, गोत्र, वंश और प्रवर का वर्णन। २०० ऋषीणामाख्याने निमेराम्ब्यानवर्णनम् । ५६३ निमि के पूर्व पुरोहित धशिष्ठजी थे। उनसे निमि ने यज्ञ कराने की प्रार्थना की। पशिष्ठ ने कुछ समय विश्राम कर यज्ञ करने को कहा इस पर निमि ने विशेष जोर दिया और कहा कि धर्म कार्यों को अधिक टालना ठीक नहीं। मृत्यु किसी को भी प्रतीक्षा नहीं करती। कल के लिये कोई भी सत्कार्य नहीं छोड़ना चाहिये । आप प्राण घायु की चञ्चलता घरायर जानते है। “यदन जीव्यते ब्राह्मन् क्षणमात्रन्तदभुतम् । शरीरं शाश्वतम्मन्ये विद्याभ्यासे धनार्जने ॥ अशाश्वतं धर्मकार्ये ऋणपानस्मि सङ्कटे। सोऽहं सम्भृतसम्भारो भन्मूलमुपागतः यदि आप मुझे यह नहीं करायेगें तो मैं दूसरे से यज्ञ कराऊंगा। तय ऋविशिष्ठ ने निमि को शाप दिया कि जामो तुम घिदेह यनोगे क्मा परिश्रम से थके हुए मेरा बिल्कुल भी ध्यान नहीं रखते ? इस पर निमि ने भी पशिष्ट फो धर्म कृत्य के न फराने पर विदेह होने का शाप दिया और ये दोनों देव दीन दोफर ब्रह्माजी के पास गये। निमि को प्रामा ने कहा फिमाज से तुम्हें सारे प्राणियों के नेत्रों की पलकों पर स्थान देता है ।
तभी से पलक मारने का नाम निमेप हुआ और वशिष्ठजी से कहा कि तुम मित्रापरुण के पुत्र चनोगे। बद्दों पर भी तुम्हारा नाम पशिष्ठ ही होगा। दो जन्म बीतने पर भी तुम्हें अपना पूर्व जन्म का स्मरण रहेगा। एकयार मित्र और घरुण घसन्त ऋतु में तपस्या कर रहे थे, वहा पर उर्वशी पुष्प तोडने के लिये आई। उस्ले देखकर दोनों ही उर्वशी पर मोहित हो गये और उनके पोर्यका स्खलन मृगासन पर हो हो गया। ऋषियों के श्राप के भय से उन्होंने उस वीर्य को जलपात्र में रख छोडा और उसीसे पशिष्ठ और अगस्त्य दोनों महानुभाषों की उत्पत्ति हुई। पशिष्ठजी का विवाह नारदको बहिन अन्धता के साथ हुआ। उसमें शक्ति उत्पन्न हुए शक्ति से पराशर और उनसे द्वैपायन इस प्रकार पराशर वश के आगे के वशजों का वर्णन । अध्याय श्रवण पठन का फल। २०१ पोणा नामगोत्रवंशप्रवरवर्णनम् । ५६५ प्रवरानुकीर्तन में अगस्त्य, पुलह, ऋतु और पुलस्त्य के चों का कीना २०२ मनुमत्स्यसबादे धर्मवशवर्णनम् । ५६६ मनुमत्स्य के सम्वाद के प्रकरण में धर्मबंश घर्णन और धर्म प्रघरों का अनुकीर्तन। २०३ मनुमत्स्यसवादे पितृगाथावर्णनम । मनु मत्स्य सम्बाद में पितृगाथा का निरूपण। पितरों की यह इच्छा होती है कि हमारे कुल में ऐसा सत्पात्र वशज हो कि जो हमें जल से पूर्ण नदियों में जलालिदे, यथा समय नित्य श्राद्ध फरे, प्रयोदशी को, घर्षाकाल में औग्माघमास में पायस मधु और सर्पि थी) के साथ वृतिकारक अन्न से ब्राह्मणों को भोजन करावे या यथाशक्ति जैसा यन पडे उसी द्रव्य से करें।
( ७२ ) इसके साथ साथ गया श्राद्ध, धेनु दान, वृष फाउन्सर्ग (छोड़ना) सुवर्ण, पृथ्वी का दान करनेवाला, कूआ, बाघड़ी, तालाबों का बनाने पोला और भगवान का भक्त हो और ऐसा कुल में पैदा हो कि जो विद्वान् लोगोंको धर्मशास्त्रों के पुण्य ग्रन्थों की भेट करे। यह पितृगाथा पापों को नाश करने एवं पुण्य को बढ़ानेवाली और लोगों में उन्नति कारक है। २०४ धनुदानविधिवर्णनम् ५६८ धेनु दान की विधि का वर्णन । जो व्यक्ति सोनेक शङ्ग घालो, चांदो के खुवाली, पॅछ भी मछली की भांति सजी हुई और कांस्य दोहन पात्र के साथ बड़ेवालो गाय को योग्य विद्वान् शानी ब्राह्मण को देता है यह सम्पूर्णलोकों से ऊचे ब्रह्मलोक को जाता है। २०५ कृष्णमृगनर्मदानविधिवर्णनम। वैशाख पूर्णिमा एवं सूर्य और चन्द्रमा के ग्रहण पर, माघी, आषाढी या फातिकी पूर्णिमा और उत्तरायण की द्वादशी के अवसर पर योग्य माहिताग्नि द्विज फो फाले भृग फी चर्म (मृगछाल) देने का अनन्त फल है । इसके Rখ ২ বুধ বা ঋণ নানা মন হরি না। মূল दक्षिगादि दान देने से उसका फरफई गुणा बढ़ जाता है। धृपोत्सर्गविधिवर्णनम् । वृोत्सर्ग के प्रकरण में वृष (सॉट) का लक्षण सबसे पहले उस वृन को माता गाय की परीक्षा फरे पह अरोगिणा, सघ पछड़े जीपिन, स्निग्ध पर्णकी, स्निग्धपुर प सीङ्ग पाली, देखने में सौम्य पमनोहर हो, विस्तीर्ण जपनपाली, नेत्र सौम्य रे, गाय के स्यान उन्नत हो मागे मा स्थान, पीठ, शिरोभाग फुसे ( फोप) और प्रोणी! कान, नेत्र, ललाट, पुच्छ, HHIन और सक्यि (दपाने ) ये समायत दो साप ही चारों स्तन भी २०६ 1 ऐसी गौक बछड़े को सांड के लिये देखे उसका स्कन्ध और फकुद (थुआ) ऊंचा उडा हुआ, उसको गलकाबल और पूंछ सीधी कटिप्रदेश चौड़ा वैदूर्गमणि के समान स्वच्छ नेत्र मूंगा के मध्य भाग के समान शृङ्गों का अगला भाग, लम्बी और मोटी पूंछ नौ या अठारह दांत मल्लिका पुष्प के समान आंखोवाला आगे वर्ण से ताम्र कपिल चिकने वालोंवाला, पीठ पर जग भुरभुरा रंगशाला निकचरा सुन्दर होता है। फिर नन्दीमुख आदि कई प्रकार के चेलों के लक्षण और उनका विस्तार से वर्णन। वृपो- त्सर्ग और कन्यादान का फल विशेषरूप से समान है। २०७ पतिव्रतामाहात्म्ये सावित्र्युपाख्यानम् । ६०३ मनुजीने भगवान् मत्स्य से प्रश्न किया कि पतिव्रताओं में श्रेष्ठ कौन है और किसके नामकीर्तन से सब पापोंका नाश हो जाता है तब मत्स्यने उत्तर सावित्री यह स्त्री रन है जिसने कुलको उद्वार कर अपने पतिदेव को मृत्यु के पास से छुड़ाया। यह मद्रदेश के शाकल राजा अश्वपति के बड़ी तपस्या के अनन्ता सावित्री के घर से रानी मालती के गर्भ से सावित्री का जन्म हुआ जब वह विवाह योग्य हुई तो राजाने उसका विवाह धुमत्सेन पुत्र सत्यवान् से कर दिया। जय नारदजी ने आकर सत्यवान् के क्षीणायु होने की बात कहो तो राजा ने विचार किया पान्तु भाची अमिट समझ कर उसने यह सम्बन्ध स्थिर रक्खा। राजा धमत्सेन धनमें रहने थे। जब सत्यवान् के दिन निकट आने लगे तो सती सावित्री फिर आने साम, ससुर और पतिदेव को खूब सेवा करने लगी। आने पति के गतायु हाने के दिन यह स्वयं उसके साथ जंगल में लकड़ो लाने गई । २०८ सावित्र्युपाख्यानम् । सत्यवान् ने धन में पसन्त फी शोमा निहार फर' सुन्दर पर्णन किया ! दिया।
१०६ ( इस यियाधान जङ्गले में सुरक्षित स्थान पर सावित्री को छोड़कर दूसरी तरफ.बनमें लकड़ी इकट्ठी फरने के लिये चला गया, परन्तु सावित्री अपने पति के साथ २ रही। सावित्र्युपाख्यानम् । जब यह लकड़ी को फाड़ रहा था तो एकाएक शिरमें दर्द होने लगा और सत्यवान् ने सावित्री को गोद में अपना सिर रख दिया मानो वह सो गया हो। उसी समय धर्मराजको काल और मृत्यु के साथ आकर उसके शरीर से अंगुष्ठ मात्र देह को पाश से बांध कर ले जाते हुए देखा। उसके बाद सावित्री ने हाथ जोड़कर दुःखित हृदय से यमराज को अपना हार्द प्रकट किया। यम ने सावित्री को पतिव्रताधर्म का उपदेश किया और यह आशा प्रगट की कि वह अपने सास ससुर की सेवायन्दना करे। फिर सावित्री ने "पतिहि दैवतं स्त्रोणा पतिरेव परायणम् । अनुगम्य स्त्रिया साव्या पति. प्राणघनेसरः ।। मिनन्ददाति हि पिता मितं भ्राता मितं सुतः अमितस्य च दातारं भर्तारं फान पूजयेत् ॥” (१७-१८) इसलिये जा मेरा प्राणधनरति जाता है यहां ही मुझे जाना चाहिये। विधया का जीवन शून्य है। यम ने इस पति भक्ति पर प्रसन्न होकर घर मांगने को कहा सावित्री ने कहा कि मेरे अन्धे सास और श्वसुर को आय और राज्य पापिस मिल जाय। २१० माचित्युपाख्यानम् । ६०८ सापित्री ने फिर यम से कहा कि सजन महामागों के साथ में आनन्द मिलता है "यियाग्निसशस्त्रेभ्यो न तथा जायते जगदरि सलेम्पो जायते यया। सन्तः प्राणानपि त्यत्वा परायं कुर्वते यथा । आप देयों से अधिक हे मतः माप से मुझे फोई फष्ट नहीं इस पर प्रसन्न मयम्। अफारणं M होकर यम ने दूसरा पर सत्यवान के जीवन को छोड़कर मांगने को कहा। सावित्री ने कहा, मेरे सौ सहोदर भाईहों यह पर दाजिये। यमने सारे और्देहिक काम फर सद्गत पति की मुक्ति की यात कही। २११ सावित्र्युपाख्यानम् । सावित्री को चार यार जानेके लिये कहने पर भी यह नही गई और धर्म चवनों से यम को सन्तुष्ट किया। "धर्मश्चार्थश्च कामश्च त्रिवर्गो जन्मनः फलम् । धर्महीनस्य कामार्थी बन्ध्यासुतसमौ प्रभो ॥३॥ धर्म ही सम्पूर्ण पृथ्वी का प्रतिष्ठापक है एक धर्म ही नित्य है। मनुष्य को धर्म के जो द्वार हैं उनका सेवन करना आवश्यक है- "तस्य द्वाराणि यजनन्तपो दानन्दमः क्षमा । ब्रह्मचर्य तथा सत्यन्तीर्थानुस्मरणं शुभम् ।। स्वाध्यायसेवासाधूनां सहवासः सुरार्चनम् । गुरुणा चैव शुभूपा ब्राह्मणानी च पूजनम् ॥ इन्द्रियाणा जयश्चैव ब्रह्मचर्यममत्सरम् ॥ २० ॥ मनुष्य को बालपनसे हो धर्म का आचरण करना चाहिये । युवावस्था की अपेक्षा बाल और वृद्धत्व की अपेक्षा युरा मृत्यु को गोदमें अधिक पेलते हैं, फिर बुढापेकी तो बात ही क्या। इन घचोंसे प्रसन्न होकर धर्मराज ने सत्यवान् के प्राणों को न मंगकर और कोई भो घर मागने को सावित्री से कहा। साविमो ने अपने औरस सौ पुत्रों का परदान मागा क्योंकि संसार में बिना पुत्रवाले को कहीं कोई गति नहीं होती। यमराजने इसके लिये तथास्तु कह कर घर स्वीकार किया। २१२ सावित्र्युपाख्यानम् । ६१२ सावित्री ने धर्मराज की यम, आदि नामों से प्रशंसा परफ स्तुति की । . .
और कहा कि इस राजपुत्र के बिना मेरे सास श्वसुर दोनों दुःखित हैं। आप मेरी रक्षा करें, आप मर्यादा पालक हैं इसको आप जीवित कीजिये। तब यमराज प्रसन्न होकर सावित्री को यथेप्सित घरदान देकर अन्तर्धान कर गये। इस सावित्री के उपाख्यान को पढ़नेवाला भो दीर्घायु का लाभ करता है। २१३ सावित्र्युपाख्यानम् । ६१३ अब सावित्री जहां पर सत्यवान्का मृत देह रखा गया था वहां पहुंच गई जब धर्मराज ने उसके जीव को छोड दिया तो धीरे धोरे उसने अपनी आंखें खोली और सावित्रीसे उस दिनकी गहरी नीदके अनुभवकी बात कही और शीघ्र आश्रम चलने का प्रस्ताव रखा। दोनों भाश्रममें आये जहाँ आंखों- घाले धुमत्सेन और उनकी स्त्री वैठे २ सत्यवान् और सावित्री की उत्कण्ठा से बाट देख रहे थे आकर दोनोंने राजा और रानोका सन्तोप किया । दूसरे दिन सारी प्रजा राजा द्युमसेन को फिर राज्य कार्य करनेके लिये लिवाने आई। अब सापिनी के सी भाई हो गये इस प्रकार पतिव्रता साध्वी सावित्री ने अपने पितृकुल और पतिकुल दोनों को तार दिया। इसलिये इन साधी माताओं और बहनों को घर घर में देवताओं के सदश पूजा होनी चाहिये। "तस्मात्साळ्यः स्त्रियः पूजयाः सततं देववन्नरः। तासां राजन् प्रसादेन धार्यते वे जगत्त्रयम् ॥ २१ ॥ तासां तु पाक्यं भरतीह मिथ्या न जातु लोकेषु चराचरेषु । तस्मात्सदा ता: परिपूजनीयाः फामान्सममानमिकामयानेः ॥ २२ ॥ २१४ अभिपिक्तभ्य रामः कृत्यवर्णनम राजकृत्यवर्णनम् भगवान् मत्म्य धारा मनुजी से अभिपित हुए राजा के पर्तव्यों का (७७) 1 वर्णन । अकेले राजा से शासन जैसे कठेन उत्तरदायित्व के भारका चलाना कठिन है। अत उसे अपने विश्वासपात्र कुलीन, साहसो, सत्वगुणचाले तेजस्मो धर्मज्ञ, कष्ट सहनेवाले, सहिष्ण, प्रियगोलनेवाले लोगोंको नियुक्त करना चाहिये और उन्हें अच्छे अच्छे पदों पर नियुक्त फर राज्यका कार्य चला। राजा को सहाय सम्पत्ति का वर्णन । "बहुभिर्मन्त्रयेत्काम राजामन्त्र पृथक् पृथक् । मन्त्रिणामपिनोर्यान्मूलमन्त्रप्रकाशनम् राजा के धर्म बहुत विस्तार से बताये गये हैं। २१५ राजकृत्यवर्णनम् ६२० अनुनावियों (अधिकारी वर्ग) को राजा के अनुसार प्रिय हितकर सत्य घचन बोलना आवश्यक है । उन्हें कभोभाराजा के अप्रियकारक अहित. कारक किसा दूषित जनसे सम्पर्क स धन नहीं करना चाहिये । गजाके अनु जी घयों को शठता, दुपता, नाचपन, नास्तिकता और चञ्चलता भी नहीं करनी चाहिये। यिना बुलाये राजा से बोले नहीं यदि बोले तो थोडा, हितकारक और सभा प्रकार से परिणाम सुख को देनेवाला पचन फहे । राजा को सम्पूर्ण उपयोगी औषध, वृक्ष, रस, पनिज, चिप, अन्त का पूरा संग्रह करना चाहिये। २१६ राजकृत्यपर्णनम् , राजधर्मवर्णनम् ६२२ राजा अपने अमापवर्ग, कोष रक्षापति और दुर्गादि के साथ सारे राज्य के पीच में राजधाना यनायर रहे। यह स्थान हिंसक जन्तुओं से दीन दो दुर्ग निर्माणमें के प्रकार के जो दुर्ग हैं उनमें उपयुक्त दुर्ग बनाये इन सबमें वैसे गिरिदुर्ग है। दुर्ग पे नारों ओर परफोटा, पाई, और सैफाहों तोपों को गाकर मुदृढ गोपुर, श्याजों और म्यापन्य पा से पूर्ण सज्जिन पनाना चाहिये । फिर हारा घोटे भादिपी शागी या भावास म्यान प्रकार भार माना पृशां याटिकाओका निर्माण प्रसार पताया गया है।
२१७ मनुमत्स्यसंवादे राजधर्मवर्णनम् ६२७ राजधर्म में दुर्ग में की जाने योग्य राजरक्षा के रहस्यों का सुन्दर वर्णन रक्षोन्न, विपन्न, अङ्गद आदि औषधों का वर्णन । इस प्रकार उपयुक्त द्रव्यों को संग्रह कर अपने पुर की बराबर रक्षाकर राजा सुन्दर सुन्दर भवनों के निर्माण द्वारा नगर को शोभाशाली बनाये। २१८ मनुमत्स्यसंवादे राजधर्मवर्णनम् राज रक्षाके उपयुक्त साधनो का संक्षेप से वर्णन । विषद के लक्षण जव अन्न मे विप दे दिया जाता है तो पकाये व्यञ्जन शुष्क द्रवपेय मे वुवुदे उठ जाते है नमकीन वस्तुओं मे झाग हो जाते है इसलिये सदा राजा मणि मन्त्र औपधियों के साथ अपनी रक्षा का उपाय करने को जागरूक रहे । प्रजारूपी वृक्ष का सेवन कर बढ़ाने से राष्ट्र पुष्पित और पल्लवित होता है। इसलिये इनके मूलमें स्थित राजा की सयको रक्षा करना चाहिये । २१६ राजधर्मवर्णनम् ६३२ मत्स्य भगवान ने फिर राजकुमार के सम्बन्ध में राजा के अवश्य ध्यान में रखने योग्य बातें कहो क्योकि भविष्य में उसीकी योग्यता से ही राज्यकार्य बरावर सञ्चालित हो सकते हैं। राजपुत्र के लिये सब विद्याओं में निपुण एक आचार्य रखना चाहिये और उसे अपनी बाल्यावस्थासे ही धर्म, काम और अर्थशास्त्र, धनुर्वेद रथ और हाथी पर चढ़ने की शिक्षा व्यायाम का अभ्यास तथा शिल्प शिक्षा का पूर्ण प्रबन्ध करना चाहिये ! कुमार को विनयावनत बनाने की चेष्टा करनी चाहिये । जब सब विद्याओं में निपुण हो जाय तो कुमार को व्यावहारिक शिक्षा के लिये राज्य के कार्यों में थोड़े थोड़े अधिकार देवे। छोटे छोटे दायित्वों के याद बड़े बड़े अधिकार भो सौंपता जाय । राजा को सुरापान, ( 9 ) जुआ, और शिकार नहीं खेलनी चाहिये। दिन में सोना भी वर्जनीय है। अर्थों का दुरुपयोग और अर्थों में दुपण दोनों हो राजा घर्जित करे। राजा को काम, क्रोध, मदमान, लोभ और हर्ष को प्रयत्न पूर्वक घर्जित करना चाहिये। उसे सदा सारे ही शत्रु, मित्र और उदासीन का यथायथ समझ कर जागरूक होकर व्यवहार करना चाहिये। राजा के सात अङ्ग हैं । “स्या- म्यमात्यो जनपदो दुर्गदण्डम्तथेवच। कोशो मित्रश्च धर्मज्ञ ! सप्ताङ्गं राज्य. मुच्यते" । राजा को सदा आकार, सङ्केत, गति और भाषण तथा आँप, मुँह के विकार से बाहर मुखाकृति से मनुष्य के अन्तर्हित भाव जानने चाहिए। राजा इसका सदा ध्यान रक्खे। २२० दैवे पुरुषकारे च किंज्याय्य इति मनुप्रश्ने मत्स्योत्तरम् ६३५ मनुजी ने देव और पुरुषकार में कौन श्रेष्ठ है ? इसका प्रश्न किया। मत्स्यने दोनों में पोरुपयको श्रेष्ठ यताया। उन्होंने कहा कि जैसे खेती में हल जोतने से और वर्षा से ही सुन्दर अन्न उत्पन्न होता है वैसे ही देव और पुरुषकार से मनुष्य जीवन बनता है परन्तु प्रधानता है पुरुषकार की ही। इसलिये सदा ही धर्मपूर्वक पुरुषार्थ फरे। आलसी मनुष्य तथा भाग्य पर विश्वास ग्पनेघाले को धन प्राप्त नहीं होता है। लक्ष्मी आलसो एवं भाग्य पर विश्वास करनेवाले को त्याग फर उत्थानशाली पुरुषों को प्राप्त होती है। अतः मनुष्य को सदा ही उद्योग करना चाहिये । २२१ राजधर्मवर्णने सामप्रयोगवर्णनम् राजधर्म में सामफयन । दो प्रकार का साम कहा गया है तथ्य और अतथ्य । इनफा समय पर प्रयोग करना हितकर है। २२२ राजधर्मवर्णने मेदप्रयोगवर्णनम् ६३७ जो जिस दोष से भेदन फर लिया जाय उसको मेद सालपर फोड़ना '६३८ ६३८ है देवता तक भी चशमें हो जाने है । दान सर उपायों में शत्रुको भेदन करने (८० ८०) चाहिये । राजधर्म का यह अविभाज्य अंग है क्योंकि शत्रुओं को इससे अपने पशमें करने में बड़ी सहायता मिलती है। २२३ राजधर्मवर्णने दानप्रयागवर्णनम् सम्पूर्ण उपायों में दान प्रयोग श्रेष्ठ बताया गया है। दानसे संसार में लिये उपयोगी सिद्ध हुआ है अत: दान प्रयोग विहित है। २२४ राजधर्मवर्णने दण्डोपायवर्णनम् राजधर्म में दण्ड की प्रशसा वर्णन और दण्ड देने योग्य को दण्ड देने से और निरपराध को रक्षा करने से राज्य शासन भलो प्रकार चलता इससे उलटा करनेवाला राजा नरक का भागो होता है। यदि दण्ड न भय है कि सारे ही घर्ग के लोग मर्यादा का रवन कर जाय इसलिये दण्ड की प्रतिष्ठा सार्वभौम रूप से करे । २२५ राजधमवर्णने राज्ञोदेवमाम्यत्ववर्णनम् ६४० सम्पूर्ण प्राणियों की रक्षा के लिये देव भागों को लेकर दण्ड को प्रसिद्ध करने के लिये ब्रह्मा जीने राजा को बनाया है। राजा को देखने से सब को आनन्द आता है इसलिये इसे चन्द्रमा की सज्ञा दी गई है। राजा, यम, घरण, इन्द्र, वायु और सूर्य के समान फठिन असिधार व्रतका पालन कर राष्ट्र को कर प्रणालो से रक्षा और राज्य व्यवस्थाको सुद्रगढ बनाये। इस प्रकार राजा देवताओं के समान है। सारे राज्य में चारों को नियुक्त करने से राजा मारत व्रत का आचरण का शान्ति स्थापना का विशाल प्रयत करता है। २२६ राजधर्मवर्णने दण्डविधानवर्णनम् राजधर्म फो रेफर सारे राज्य में नाना प्रकार के दण्ड विधान, अमित हो तो ६४० विधान [ ८२ ] योग और दोषों के निराकरण के लिये विस्तार पूर्वक सीमा निरूपण और दण्ड विधान का वर्णन। दण्ड प्रणयन की इस अध्याय में व्यवहार तोडने वाले, नियम से विपरीत चलनेवाले, आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक आचरणों को बिगाडनेवाले, अगम्या में गमन करनेवाले, अपने से इतरवर्ण की स्त्रीके पास जानेवाले पुरुषों को कठिन से कठिन दण्ड व्यवस्था का भगवान् मत्स्य ने आदिए किया है। २२७ मनुमत्स्यसंवादे विविधमहोत्पातेषु शान्तिविधानम् ६५२ मनु महाराज का भगवान् मत्स्य से दिव्य, अन्तरिक्ष एव भीम विविध उत्पातों को शान्तिविषयक प्रश्न ? उत्कट पाप के उदयके कारण ससार में अधिक से अधिक उपद्रव, नरसंहार, प्रकृति के प्रकोप, भूकम्प, बाढ एवं महामारी आदिके साथ होता है । राजा के देवाश होने से शान्तिको स्थापित करने का दायित्व उसीपर होता है। इसलिये दिव्य, अन्तरिक्ष एवं भीम उत्पातो की शान्ति अत्यावश्यक है। भीम शान्ति ही विशेष रूपसे करनी चाहिये । अपना कल्याण चाहनेवाले व्यक्ति को अन्तरिक्ष की अभया और दिव्य की सौम्य शान्ति भी करनी चाहिये। यज्ञ काम के लिये सौम्य शान्ति प्रशस्त है । भूकम्प, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, टिड्डी दलके आममण के भय होनेपर, लूट और हिंसा आदि में वैष्णपी शान्ति कही गई है। पशु एवं मनुष्यों के दारुण मारण अवस्था के उपस्थित होनेपर रोद्री शान्ति तथा झाननाश, वेदना और नास्तिक बहुल होनेपर ब्राह्मी शान्ति कही गई है। इसी प्रकार धारणी, आग्नेयी आदि सोरह शान्ति भिन्न भिन्न घातक निमित्त उपस्थित होनेपर पतलाई गई है। पाणप्रहारा न भवन्ति यहन्द्रामन्नणा सन्नहनतानाम् । देषोपयाता न मपन्ति तद्वधर्मात्मना शान्तिपरायणानाम् ॥ जैसे पयरधारी लोगोंका घाण हार के भाघात से याल भी याफा
[ ८२ ]
नही होता उसी प्रकार दिव्य, अन्तरिक्ष और भीम उपद्रवोंका प्रभाव
धर्मात्मा और शान्तिपरायण मनुष्यों पर नहीं होता।
२२८ शान्तिविधानवर्णनम्
आकस्मिक उत्पात और :उल्कापातादिके शमन आदिका उपाय ।
दिःय, अन्तरिक्ष और भीम उपसर्गों का लक्षण वर्णन । इनके नाना ऋतुओं में
नाना प्रकार से हुए उत्पातों और शमनों का वर्णन ।
२२६ शान्तिविधानवर्णनम्
६५५
अद्भुत शान्ति एवं नाना प्रकार के उपद्रवों का वर्णन। इनके लिये
दान, यज्ञ, जप, तप करना इस प्रकार शान्ति करने से देशमें आनन्द और
शान्ति का अखण्ड साम्राज्य स्थापित होता है।
२३. शान्तिविधानवर्णनम
६५६
जहां पर स्वतः ही अग्नि विना इन्धन के जलती हो यहां राजा लोगों
द्वारा राष्ट्रको उत्पीड़न होता है। इस प्रकार के अत्यधिक उपद्रवों की
तत्काल शान्ति करवानी चाहिये । हवन एवं सुवर्ण दानसे अग्नि विकृतिका
जो प्रभाव है वह शमन हो जाता है।
२३१ शान्तिविधानवर्णनम्
६५७
जव वृक्षों से रस टपके या हंसने तथा रोनेकी आवाज आये और
विना कारण ही डालियां गिर गिरकर पड़ें तो वृक्षोत्पात होता है। उससे
राष्ट्रों में अशान्ति होती है। इसकी शान्ति गोदान, एवं सुवर्ण दान आदि से
होती है।
२३२ शान्तिविधानवर्णनम्
६५८
अतिवृष्टि, अनावृष्टि, दुभिक्षाद, भय, सर्दी औरगर्मीकी विपरीतता
होनेकी शान्ति यही है कि यज्ञ एवं दान विशेष रूप..से करवाये जाय ।
"
[ ८३ ] २३३ शान्तिविधानवर्णनम् ६५६ अद्भुतशान्तिमें जलाशय आदि की विकृति होने पर घारुण मन्त्रों का जप और जल में हवन, भोजन, गोदान, घडे जलभर कर दान में देवे जिससे जलीय पाप की शान्ति हो जाय। २३४ शान्तिविधानवर्णनम् उचित क्रियाओं की जहां विच्छिति हो तथा कहीं भी मङ्गलमय शद सुनाई न दें जहा पूज्य जनों का अपमान हो शान्ति, मङ्गल और होम कार्यों में लोगों का नास्तिक्य भाव हो यहा राजाओं का नाश निश्चित है तो पूर्ववत् शान्ति इप्ट है। २३५ शान्तिविधानपर्णनम् ६६० जो कुछ अयुक्त है यह युक्त हो जाता है जो अचल है वे चल, एवं चल है ये अचल हो जाते हैं आकाशमें तूर्यनाद हो रहा वायु की पूजा मन्त्र विधान के साथ हो और प्रभूत अन्न दक्षिणा समेत देनेसे इसकी शान्ति होती है। २३६ शान्तिविधानवर्णनम् ६६१ जर ग्राम के जीवजन्तु धन में चले जाय घन के माम में चले आवें, जल के जन्तु स्थल में और स्थल के प्राणी जल में आवे तो मृगपक्षी वरावर प्राणियों के विकार से अशान्ति होती है इसकी शान्ति के लिये सोने की गाय और पस्न का दान करना चाहिये। २३७ शान्तिविधानवर्णनम् जहा सय दिशाओं में धूमा दो , अधिकतर चन्द्र सूर्य ग्रहण हो, उचिन- रियायें जहा विपरीत ही होयें ; महरमय शद कहीं भी न सुनाई दे पूज्य ८४ ] अतों का अपमान हो और देव पितर हवन कार्यों में नास्तिकता के भाव हों यहां राजाओं का नाश हो और गोदान सुवर्ण दान आदि करे। २३८ ग्रहयज्ञादीनां विधानवर्णनम मनुजीने ग्रहयज्ञ लक्षहोम, फोटिहोम का विधान पूछा जिसके उत्तर में देवताओं को नदी सलमों पर इन महायज्ञों को करने का विधान मत्स्य ने बताया । लक्षहोम के साथ प्रयशका आयोजन समभूमिपर योग्य विद्वान तपस्वी महर्पिकल्प ब्राह्मणो के आदेश से कुण्ड खोदकर किया जाय एक हाथ गहरा हो लक्षहोम में द्विगुण और कोटिहोम में चतुर्गुण होना चाहिये। ऋत्विकलोग कन्द मूल फलाहारी दही क्षीराशी हों उनकी संख्या आठ हो यह यज्ञ कई दिन एवं मासादि तक चलता है.उसके नाना विधान ! २३६ यात्राकालविधानवर्णनम् राजा की विजय यात्रा के काल का वर्णन। सारे देश समय को ध्यान में लेकर राजा यात्रा के लिये जावे। २४० अङ्गस्फुरणविचारवर्णनम् मनुजीने अङ्ग स्फुरण निमित्तक शुभ अशुभ सगुनों के विषय में पूछा--- मत्स्य ने उत्तर दिया सिर के अग्रभाग में स्फुरण होनेपर पृथ्वी लाभ, आंखें फडकने पर मृत्यु की प्राप्ति, किन्ही स्थानों के फड़कने पर धनागम कान, नाक, कण्ठ, पाहु, हाथ, पीठ, पक्षस्थल के स्फुरण से क्रमश. वश, प्रीति- सौख्य, भोग लाभ, मित्रलाम, धनागम, पराजय, जय आदि नाना प्रकार के फल बतलाये गये है। यदि अनिष्टकारी..फलयाले अड्न स्फुरण हो तो ब्राह्मणों को सुवर्ण से तृप्त करना चाहिए। २४१ मनुमत्स्यसंबादे स्वप्नदर्शनवर्णनम्, ६६८ स्वप्नदर्शनविचारवर्गनम् नाभि को छोडकर शरीर में त सके उगने से, शिर के ।
[ ८५ ] कास्यके फूटने, मुण्डन, नग्नता, पुराने कपडे पहनने, तैल मालिश, कीचड में लिपटना, ऊवे स्थान से गिरना, झले पर चढना, घोडों का मारना, लाल फल व वृक्ष का दीखना, वराह, रीछ,गधा प ऊंट इनपर चढना, पके मांस का खाना, तैल और खिचडी फा भोजन, हंसना, नावना, विधाह और गीततन्त्री घाद्य से रहित गाने बजाने का सुनना, झरनों में स्नान, गोवर से स्नान या कीचड भरे जल से स्नान, माता के जठर में प्रवेश या चिता पर चढ़ना दिव्य अन्तरिक्ष और भीम उत्पातों का दर्शन, देवता, द्विज और गुरुजन का क्रोध, कुमारी के साथ आलिङ्गन, पुरुषों का मैथुन, शरीर की हानि, विरेचन और घमन होना, दक्षिण दिशा में जाना, रोग से पीडा, फल की हानि, पुप्पी हानि, घर का गिरना, घर की सफाई होना, दूसरे से पराजय, पिशाव, राक्षस, यानर, रीछ और मनुष्यों से क्रीडा गेरा वस्त्र का धारण और स्त्री प्रीडा और स्नेह, मद्यपान और स्नान तथा रक्त माला का धारण करना इन सरको दुस्थानके रूप समझना चाहिए । इन्हें कहकर प्रकट करदेना चाहिये तिल से फल्क स्नान, होम, ब्राह्मण पूजन, दान, जप, भगवान का भजन और गजेन्द्र मोक्ष का जप ये सब दु स्वप्न को नाश करते हैं । रात्रि के पहले पहर में स्वप्न फा फल एक वर्ष तक होता है दूसरे में ६ महीने में तीसरे पहर में तीसरे महीने तफ चतुर्य मे चौथे मास तक अरुणोदय के समयका स्थम दश दिन में ही फल देता है यदि पहले स्थान देय लिया है फिर दूसरा स्थान देप लिया जाय तो दूसरे को फल मिलता है इसलिये यदिया स्वप्न देपने के याद नहीं सोना चाहिए । पर्वत, महल, हाथी, घोडा और येल पर बढना शुम है, यदुतसे हाय दीपना, यहुत से शिर दीपनेपा फल अच्छा है। पूर्व सफेद धम्त्र, श्वेत माला धारण चन्द्र सूर्य और तारा पा प्रहण, परिमार्जन ये सय शुभ लक्षण है। पियाद, जूमा, युद्ध में विजय दूध, भाई भोजन, रनफा देपना, या रक्त से मानमय य रक्त पा पीना या दूध + [ ८६ ] का पीना, आंतो से शरीर का बन्धन, पृथ्वी में निर्मल आकाश को देखना मुख से भैंस, गाय या सिहिनी या हस्तिनी को दूहना तथा देव विप्र और गुरु जन से प्रसाद लेना, जल से अभिषेक या गाय के सीग के पानी या चन्द्रमा से छुटे जल से अभिषेक निश्चय ही राज योग देता है। राज्याभिषेक, शिर का छेदन, मरण, अग्नि में जलना, घोड़ों का आरोहण, रोदन, साध्वी सुन्दर स्त्री का मिलना, या आलिङ्गन, हथकडी वेड़ी पहनना, या विष्ठा का लेपन ये सबधन्य है जीवित राजा और मित्रों का दर्शन देवता और स्वच्छ जल का देखना ये सब शुभ है; इनसेचिना परिश्रम ही शुभफलों की प्राप्ति अवश्य होती है। यदि बीमार इनको देखलेता है तो रोगसे मुक्त हो जाता है। २४२ यात्रासमये मङ्गलामङ्गलसूचकशकुनवर्णनम् यात्रा के समय राजालोगों को औषधियां, काला धान, कपास, घास, सूखा गोमय, इन्धन, अङ्गार, गुड़तेल शुभ है मैल मालिश कियेहुए; मलिन मुण्डित, नग्न, और विखरेवालोंका रोगी, गेरुआ पत्रधारी, उन्मत्त, नपुंसक गरीव, आदि दीखने से अशुभ होता है। इष्ट माङ्गल्य घस्तुए ये है। श्वेताः सुमनसः श्रेष्ठाः पूर्णकुम्भास्तथैव च । जलजाः पक्षिणश्चैव मांसं मत्स्याश्च पार्थिव !॥ गावस्तुरङ्गमाः नागा बद्धएकः पशुस्तथा । त्रिदशाः सुहृदो विप्राः ज्वलितश्चहुताशनः मनोत्सुफत्वं मनसः प्रहर्षः शुभस्य लाभो विजयप्रवादः । मङ्गल्यलब्धिः श्रवणञ्च राजन् ! शेयानि नित्यं विजयावहानि । २४३ वामनावतारचरित्रवर्णनम् ६७२ अदितिकृतभगवत्स्तुतिः ६७३ विष्णु माहात्म्य का वर्णन । धामन प्रादुर्भावकथन । जब राक्षसी ने इन्द्रादि देवता वृन्द को हरा दिया तो माता अदिति ने भगवान् को फिर - " [ ८७ ] अवतार धारण करने के लिये परम कठिन तपस्या की। जब भगवान पर देने को आये तो अदिति ने भगवान् विष्णु की स्तुति की प्रसन्न होकर भगवान ने यथेच्छ घरमांगने के लिये कहा। तर अदितिने यह घर मांगा कि मेरा पुत्र इन्द्र त्रैलोक्य का अधिपति बने । प्रसन्न होकर भगवान् ने घर दिया कि मैं तेरे गर्भ मे भगवान् कश्यप के अंश से उत्पन्न हाकर दैत्यों के तेज की हानि कर सय यथा काम पूर्ण करंगा फिर कश्यपजी के अश से अदिति में गर्भस्थिति करने को कह कर भगवान् का अन्तर्धान हो जाना। २४४ भगातोवामनरूपणप्रादुर्भाववर्णनम्, बलिप्रहादसम्बादवर्णनम् ६७५ प्रह्लादकृतभगवत्स्तुतिः, ब्रह्मकृतवामनस्तुतिः । ६७६ भगवान् के तेजसे असुरादि समी निस्तेज हो गये यह देयकर अपने पितामह भक्तराज प्रसाद को यलिने विस्मित होकर इसका कारण पूछा। तम प्रहाद ने कहा पत्म! जिन अखिल ब्रह्माण्ड नायक घासुदेव के स्वरूप फो ब्रह्मादि भी जानने में असमर्थ हैं और जिनसे यह सय विवर्त रूप में भापित है वे अपनी फला से भगवान् कश्यप के अश से अदिति में अवतीर्ण हुए हैं यह अब पृथ्वी के भार-स्वरूप दैत्यों को मारफर इन्द्रादि देवताओं को सुखी करेंगे। तय घलिने पूछा हे तात ! यह हरि नामफ कौन है जब मेरे ये चिप्रवित्ति आदि पासुदेव से भी अधिक बलशाली सैकड़ों है तो उसकी तो गिनती ही गया है उनके आधे से आधे भी बल फी बराबरी कृष्ण नहीं फर सकते। इस पर प्रहाद ने यलि को धिकार फर शाप दिया कि तुम के पूज्य कृष्ण की निन्दा करते हो तो शीघ्र ही तुम अपनी विभूति और ऐश्वर्य से हीन हो जानोगे। फिर प्रहाद के सामने अपनी भूल स्वीकार फर यलि ने यहुन अनुनय पिनय फी सो ग्रहाद ने कहा मान से दी तुम भगवान् की भति, फरोपी तु दारी रक्षा करेंगे। अपने गुरुजन घह [ ८८] भगवान् घामन का अवतार उनके व्रतबन्धादि का वर्णन । ब्रह्माजी ने उनकी स्तुति की और भगवान् ने कहा कि मैं इसकी प्रतिज्ञा कर चुका है त्रैलोक्य का राज्य इन्द्र को दूंगा यह सत्य होगा। तय भगवान को वृहस्पतिने कृष्ण मृगवर्म, पशिष्ठने कमण्डलु, मरीचिने व्रतीके धारण करने योग्य दण्ड और पुलह ने अक्षसूत्र तथा पुलस्त्य ने श्वेतवस्त्र दिया । सम्पूर्ण घेद और देवमय होकर बलि के यज्ञ में गये । २४५ बलिशुक्रमन्त्रणम् ६८१ चामनायपदत्रयभूमिदानम् ६८३ चलिविष्णुसम्बादकथनम् ६८५ जय चामन भगवान् बलिराजा के यज्ञ में आने लगे तो सारी पृथ्वी कांपने लगी । बलिने उशना (शुक्राचार्य) जी को दण्डवत्प्रणाम कर इस सब उपद्रव का कारण पूछा और यह भी पूछा कि असुरों के दिये भाग को यह अग्नि क्यों नहीं ग्रहण करती है। तव शुक्राचार्य ने कुछ समय तक ध्यान कर इस प्रकार कहा “कश्यप महर्षि के घर में जगत् की योनि भगवान् विष्णु वामन रूप में प्रगट हुए है वही तुम्हारे यज्ञ में आ रहे है उन्ही के चलने से पृथ्वी पर हडकम्प मचा हुआ है इस प्राणियों के अधिष्ठाता भग- घान् की गति को पृथ्वी सम्हाल नहीं सकती। उसीके सन्निधान से यह अग्नि असुर भागो को भी नहीं खाती। यह सब सुनकर चलिने हर्ष से शुक्राचार्य से कहा है हे भगवन् ! जय भगवान् स्वयं यहां पधार ही रहे है। तो मेरा कर्तव्य हो जाता है उनकी आवभगत के लिये मैं क्या करू? सो आप मुझे बताइये। शुक्राचार्यने कहा हे राजन् ! दानवपते यह सत्त्व रूपस्थित भगवान् सृष्टि के पालन करने को और तुम्हे दाने को इस ओर चले आ रहे है तब तुम किसी प्रकार की छोटी सी भी प्रतिज्ञा मे मत चंधना "नालं दातुमहं देव ! दैत्य ! पाच्यं त्वया घनः।" मैं आपको कोई भी वस्तु देने में असमर्थ हैं है बलिराज! यह फहना। इस पर यलिने कहा हे गुरो! विविध व्रतोपचासों द्वारा अवतार ।
[ ८६ ] धारण करनेवाले भगवान् साक्षात् आकर देवो देवो कहकर मांगेंगे तो मैं ना किस तरह कर सकूँगा। मेरी उनमें दृढ़ भक्ति है यह मुझे कभी नहीं मारेंगे। आपको दान के समय किसी रूप में विघ्न नहीं करना चाहिए। ऐसी बातचीत होते होते बलि के द्वार पर माया पामन वेषधारी भगवान् चामन जा पहुंचे। उसे देख राक्षस यज्ञ की भूमि में चले गये। सभी उपस्थित सभासद क्रोध में उबल पड़े और मुनि लोग जप करने लगे बलि ने अपना जन्म धन्य और सफल माना तय कोई भी न बोला। चलि को इस प्रकार का या देखकर वामन रूपधारी भगवान् ने सबका सन्तोष किया। यज्ञ द्वारस्थित घामन भगवान् का अर्थ, पाद्य, आचमानादि से सत्कार कर यलि ने कहा- "सर्वस्वं सकलामुवी भवतो घा यदीप्सितम् । तमुददामि गुप्य त्वं येनार्डो घामनः प्रियः ॥" है धामन चाहे सर्वस्य, भले ही सारी पृथ्वी या और भी जो आपको पच्छित हो आप जिसके लिये आये है मांगिये, मैं दूंगा" तो धामनने कहा- ममाग्निशरणार्थाय देहि राजन् ! पदवयम् । मेरी अग्नि क्रिया को करने के लिये मुझे तीन पाद (पैण्ड) की भूमि दीजिये। तय यलि ने तीन पैर पृथ्वी दे दी। हाथ में जल लेने न लेते भगवान पामन अपने सर्व देवमय दीर्घकाय शरीर में प्रगट हुप और तीन पेण्ड का त्रैलोक्य देकर इन्द्र को उसका अधिपति यना दिया तथा राजा यलि को अनेक घरदान देकर उमे मुनल में म्यापन कर दिया। इस प्रकार शौनक अजन सम्वाद रूपमें यह पामनावतार फी भायलीला का वर्णन किया गया। २४६ वराहावतारपियजनप्रश्नः ६८६ घराहारतारम्पप्यापकमरर्णनम् ६८७ भगयान्ने पराद मपमें समुद्रमेंदूशी तु पृथ्वीको जिस प्रकार निकाला ६८८ ६८६ [१०] उसके विषय मे अर्जुन का प्रश्न और शौनक जी का उत्तर। क्रम से प्रलय कालीन दृश्य का वर्णन करते हुए जगत्की उत्पत्तिका विस्तारसे वर्णन । इसका एकमात्र कारण भगवान् नारायण है इससे ही सृष्टि की उत्पत्ति स्थिति और लय होते है। २४७ वराहावतारचरित्रवर्णनम् पृथ्वीकृतवाराहस्तुतिः जय प्रलयके अनन्तर हजार वर्पतक पृथ्वी जलमें रहने के बाद उसमें से निकाली गई तो अण्डाकार रूप मे थी यह प्रजापति की मूर्तिके सदृश थी तय इसके उर्ध्वमुख और नीचे के मुख का भेदन किया गया जिससे लोक सर्जन हो उस अण्डाकार भाग के आठ विभाग किये इसीसे आकाश तलातलादि रसातल और पृथ्वी के आकार का वर्णन किया है । जय पृथ्वी बड़े बड़े पर्वतों के योझ से नीचे ही नीचे जाने लगी तो भगवान्ने इसके उद्धारार्थ घराह रूप धारण किया। पृथ्वी द्वारा भगवान् की स्तुति । विष्णु, नारायण, गोविन्द सङ्कर्षण, हृषीकेश, अनिरुद्ध आदि नामो की निर्वचन । इस स्तुति के फल का वर्णन । भगवान् ने घराहरूप से पृथ्वी का उद्धार कर संसार का उद्धार किया। २४८ क्षीरोदमथनप्रकरणवर्णनम् ६६३ देवदानवकृतभगवत्स्तुतिः देवताओं के अमर होने की बात के प्रस्ताव को लेकर अमृत की कथा। शुक्राचार्य को शकरजी द्वारा सञ्जीवनी विद्या का दान । मन्दरावल की प्रार्थना क्षीरोदमयन देवता और दानवों द्वारा भगवान् विष्णु की स्तुति । २४६ क्षीरोदमयनवर्णनन क्षीरसमुद्रके मथन करने से कालकुटकी उत्पत्ति, चन्द्रमा, लक्ष्मी, मद्यादधी उच्चश्रया कौस्तुभमणि, पारिजात की उत्पत्ति का वर्णन | फिर अग्नि की उत्पत्ति । हुण्डुम आदि सों की उत्पत्तिका निरूपण । विष्णु और कालकूट ६६५ ६६८ - ७०२ [११] विषका सम्वाद । नेवता और दानवों द्वारा भगवान् शिप जी की तुति। देवदानव और शिवजी का सम्वाद का वर्णन । पिप पान फर भगपान, मोफर कैलास पर चलेगये और देवदानवों ने अपना समुद्र मधन फा फम फिर भी चालू ही रक्खा २५० क्षीरोदमधनवर्णनम् तदनन्तर धन्वन्तरि की उत्पत्ति और अमृत का प्रादुर्भाघ । नाना रस का भिन्न भिन्न देवतागणों द्वारा ग्रहण । अव अमृत फो लेफर दोनों पक्षों में विवाद चला भगवान् ने माया मोहनी रूप बनाकर दैत्यों से अमृत ले लिया और सबको पङ्क्ति बनाकर यांटने का उपक्रम किया गट ने देवता का रूप बनाकर अमृत लेकर ज्योंही पीना चाहा तो चन्द्र सूर्य द्वारा इस छायेषकी शिकायत की गई और भगवान् ने सुदर्शन चक्र से उसका मिफाटयाला परन्तु अमृत उसके कण्ठ तक पहुच चुका था। फिर देय धानों का युद्ध । अमृत को विष्णु भगवान की रक्षा में दिया जाना ॥
[ २ ] घास्तु का विधान बताया। गृह काल के निर्णय में मास; फल, नक्षत्र और धारादिका फल । गृह निर्माण प्रकार वर्णन । २५३ भवननिर्माणवर्णनम् ७०६ नन्द्यावादि नाना भवनों का लक्षण भिन्न भिन्न भवनों के गुण दोष लक्षणो का फलसमेत वर्णन । द्वार के सम्बन्ध में निर्णय ज्ञाति विशेष से घर के प्रमापा का वर्णन । २५४ स्तम्भमाननिर्णय वर्णनम् ७११ घासगेह का प्रवेश द्वारका दिशाओं के अनुसार फल कथन वेध का परिवर्तन और पाँच महास्तम्भो का निरूपण भवन के पूर्व भाग में घट उदुम्बर दक्षिणा, पीपल एवं उत्तरमे प्लक्ष आदि नाना प्रकारके वृक्षोका फलवर्णन । २५५ भवननिर्माणवर्णनम् शल्यादि निरूपण एवं दिशाओ का निर्णय । सूत्रादि च्छेद दोष धर्णन देवता गृहादि करण प्रकार वर्णन २५६ दाहिरणवर्णनम् ७१५ दार्याहरण कथन । वास्तु विद्या समाप्ति। शुभ अशुभ दारुयष्टि- काट का वर्णन | आय कथन । २५७ क्रियायोगविधिवर्णनम् क्रिया योग विधि में देवताओं की पूजा मुख्य है प्रथम भगवान विष्णु के स्वरूप व प्रतिमा के प्रमाण का वर्णन जो कि घर में पूजा के लिये रक्सी जाय लक्ष्मी देवी एवं पुरुष देवताओं के नाना आकृतियों का प्रमाण निरूपण। २५८ देवाकारप्रमाणवर्णनम् ७२० देवताओं की प्रतिमा का लक्षण और प्रतिमा के आकार का वर्णन । ।
भेद। [ ] २५६ देवाकारप्रमाणवर्णनम् ७२२ अर्धनारीश्वरादि के श्री विग्रह का प्रमाण कथन । २६० नानादेवप्रतिमावर्णनम् ७२६ प्रभाकर (सूर्य) आदि की प्रतिमा का लक्षण एवं प्रकार वर्णन । २६१ पीठिकालक्षणकथनम् ७२६ पीठिका का लक्षण और उनका वेद प्रतिपादित फल फथन । २६२ लिङ्गलक्षणकथनम् भवन के प्रमाण से ही लिङ्ग का मान बताया है प्रकार के लिङ्गो के २६३ देवप्रतिष्ठाविधिवर्णनम् ७३२ फुण्डादि प्रमाण कथन । प्रतिमास्थापना के दिन फा पणन और प्रतिमा के स्थापन का प्रकार। २६४ देवप्रतिष्ठा विधिवर्णनम् હરૂ૪ मूर्तियां एवं आचार्य में लक्षण वर्णन। अधिवासन के फल का निरूपण । २६५ देवप्रतिष्ठाविधिवर्णनम् ७३७ देवताओं का अधिवास विधिविधान से करने के लिये प्रतिष्ठा विधान का निरूपण इस में अन्न पत्र आदि का दान, पुण्याह महोत्सव, महास्नान पिशेष रूप से इष्ट है। २६६ देवप्रतिष्ठाविधिवर्णनम् ७४१ देवता स्नान की विधिका निरूपण । २६७ प्रामादरिधिनिर्णयपर्णनम् ७४३ प्रति वर्ष के अनुसार पास्तु दोषों के उपरामन की विधि का निरूपण ७४६ ७५३ ७५५ A [ १४ ] २६८ प्रासादविधिनिर्णयवर्णनम् ७४६ प्रासाद निर्देश के साथ साथ प्रासाद के नाम स्वरूप का कथन । २६६ मण्डपलक्षणवर्णनम् मण्डप लक्षणादि कथन सत्ताईस प्रकार के मण्डप के नामों का कथन और उनका लक्षण। २७० कलौ भाविनृपान्वयवर्णनम् ७५१ कलि मे इक्ष्वाकुवंश के राजाओं और मगध देशीय राजाओं का वर्णन २७१ कलौ भाविनृपान्वयवर्णनम् पुलकादि वेश्य राजाओं का निरूपण और वेश्य नामो का निरूपण । २७२ कलौ भाविनपान्ययवर्णनम् आन्ध्र, यवन और म्लेच्छ राजाओ का राज्यवर्णन साथही युगक्षय निरूपण तथा कलियुग की उत्पत्ति का निरूपण | २७३ पोडशमहादानानां वर्णनम ७६० १६ महादानों का वर्णन और तुला पुरुष के दान का प्रकार निरूपण । २७४ हिरण्यगर्भाख्यमहादानविधिवर्णनम् हिरण्यगर्भ दान की विधि का निरूपण । २७५ ब्रह्माण्डमहादानविधिवर्णनम ७६७ ब्रह्माण्ड महादान विधि का वर्णन इसके श्रवण और पठन के फल का वर्णन। २६६ कल्पपादपदानविधिवर्गनम् ७६८. तुलापुरुष के दान के समान ही सुन्दर दिन को देखकर कल्पद्रुम को सोने का बनाकर दान की विधि और इसके सुनने तथा पढ़ने का फल । .
७७० [ १५ ] २७७ गोसहस्रप्रदानाख्यमहादानविधिवर्णनम् सहन गोदान की विधि का वर्णन तथा इसके श्रवण का फल । २७८ कामधेनुमहादानविधिवर्णनम् ७७१ कामधेनु महादान की विधि का निरूपण । दानके अधिकारी ब्राह्मणों का तिरूपण। २७६ हिरण्याश्वमहादानविधिवर्णनम् ৩৩২ हिरण्य माव के महादान की विधि का वर्णन इसके सुनने और पढ़ने फा फल। .२८० अश्वरथाख्यमहादान विधिवर्णनम् ७७४ अश्वरथ के दान का वर्णन और इसके पठन तथा श्रवण का वर्णन । २८१ हेमहस्तिमहादान विधिवर्णनग ৬৬৪ हिरण्य के दस्ति और उसके रथ के दान का विधान पर्णन । • २८२ पश्चलागलकमहादान विधिवर्णनम् ७७६ पृथ्वी का बैल हलादि के साथ दान विधि फा वर्णन उसके सुनने पवं पढ़ने का फल निरूपण । २८३ हेमधराख्यमहादानविधिवर्णनम मुपर्ण धरा दान फा विधाम और उसके श्रवण पवं पठन का फल । २८४ पिनचक्राग्यमहादानविधिवर्णनम् ७७६ पिश्चचमा के दान की विधि और चम. फरण का प्रकार निरपण २८५ महाकल्पलताग्यमहादानविधिवर्णनम ७८? दमफल्पलना के मदादान की विधि का वर्णन और उसके प्रपण मशा पटन या निरूपण ७७८
७८२
.
[ ६ ]
२८६ सप्तसागरमहादानविधिवर्णनम्
प्रादेशमात्र या चितस्ति मात्र ७ कुण्ड बनाकर उन में एक से सात
तक लवण, जल, घी, गुड़, दही, शर्करा और तीर्थवारि आदि भरे और
उन में विपुल स्वर्ण आदि लेकर दान करे ।
२८७ रत्नधेनुमहादानविधिवर्णनम्
७८३
रत्न धेनु के दान की विधि का वर्णन तथा दान के महत्त्व का वर्णन
२८८ महाभूतघटमहादानविधिवर्णम्
महाभूतघट महादान की विधि का वर्णन उसके श्रवण एवं पठन
७८४,
का फल।
७८७
२८६ कल्पानां कीर्तनम
७८५
कल्पों के नाम और उनकी सख्या का वर्णन । ब्राह्म पाद्म पुराणके श्रवणं
का फल घ माहात्म्य वर्णन । भगवान् मत्स्य के अन्तर्धान होने का वर्णन ।
२६० मत्स्यपुराणान्तर्गतसम्पूर्णविषयवर्णनम्
मत्स्य पुराण में आये हुए सम्पूर्ण विषयों का संक्षेप में दिग्दर्शन और
इस महापुराण के पठन की फलश्रुति ।
मुद्रापितं मात्स्यमिदं पुराण,
मोरेण रायान्तमन सुखेन ।
सड्क्षेपतस्सूचिरियं निवद्धा,
कृतानुरागैः परिशोधनीया।
विद्वजनचरणानुरागिण:-
लक्ष्मणगढ़वास्तव्य ब्रह्मदत्तत्रिवेदि नवलदुर्गाभिजन कजोड़ीलाल मिश्र
रामनाथ दाधीचाः ।
श्री गणेशाय नम । श्रीमन्महर्षि वेदव्यास प्रणीतम् मत्स्यपुराणम् । प्रथमोऽध्यायः। श्रीपुराणपुरुषाय नमः। तबादौमङ्गलाचरणम् । मत्स्यावतारवर्णनम् । प्रचण्डताण्डवाटोपे प्रक्षितायेन दिग्गजाः । भवन्तुवितभङ्गाय भवस्य चरणणाम्बुजाः ।। पातालादुत्पतिप्णो मकरयसतयो यस्य पुच्छाभिधाता दृश्य ब्रह्माण्डसण्टव्यतिकरविहितव्यत्यनेनापतन्ति ।। विष्णोर्मत्स्यावतारे सकलयमुमतीमण्डलं व्यंशुमानं, तस्यास्योदीरितानां ध्वनिरपहरताश्रियम्व. श्रुतीनाम् ॥ २॥ नारायणं नमस्टन्य नख्येव नरोनमम् । देवों सरस्वती व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ २॥ अजोऽपियः प्रियायोगानारायण इतिस्मृतः । त्रिगुणायत्रिवेदाय नमस्तस्मैस्वयम्भुवे॥ सतमेकान्तमासीनं नैमिषारण्यवासिन. । मुनयो दोसपान्तेपप्रच्युदोघमंहिताम् ॥1॥ प्रत्तासु पुराणीपु धामु ललितामु च । फयामुशीनगाद्याम्नु अभिनन्य मुरमुंहः॥ फयितानि पुराणानियान्यम्मा त्वयानधा तान्येयामृनर गनि श्रोतुमिच्छामहेपुन । काससर्गभगवान लोपनायचराचरम् । पम्मा भगवान्विष्णुमनायमान्यमाधिन ]
२
[प्र
* मत्स्यपुराणम् *
भैरवत्वं भवस्यापि पुरारित्वञ्च गद्यते । कस्य हेतोः कपालित्वं जगाम वृषभध्वज
सर्वमेतत्समाचक्ष्व सूत ! विस्तरशः क्रमात् । त्वद्वाक्येनामृतस्येव न तृप्तिरिहजाय
सूत उघाव।
पुण्यं पवित्रमायुष्यमिदानी श्रुणुत द्विजाः । मात्स्य पुराणमखिलं यजागाद गदः)
पुरा राजा मनुर्नाम चीर्णवान् विपुलन्तपः । पुत्रराज्यं समारोप्यक्षमावान रविनन्,
मलयस्पैकदेशेतु सर्वात्मगुणसंयुतः । समदुःखसुखीवीरः प्राप्तवान् योगमुत्तमम् ।
यभूव वरदश्चास्य वर्षायुतशते गते । घरम्वृणीष्व प्रोवाच प्रीतः स कमलासनः ।
एवमुक्कोऽप्रवीद्राजा प्रणम्य स पितामहम् । एकमेवाहमिच्छामि त्वत्तो परमनु-
भूतग्रामस्य सर्वस्य स्थावरस्य चरस्य च । भवेयं रक्षणायालं प्रलये समुपस्थितं..
एवमस्त्विति विश्वात्मा तत्रैवान्तरधीयत । पुष्पवृष्टिः सुमहती खात्पपात सुरादि
कदाचिदाश्रमे तस्य कुर्वतः पितृतर्पणम् । पपात पाण्योरुपरि शफरी जलसंयुता
दृष्ट्वा तच्छफरीरूपं स दयालुमहीपतिः । रक्षणायाकरोद्यत्नं स तस्मिन् करकोदरे।
अहोरात्रेण येकेन पोडशाङ्गलविस्तृतः । सोऽभवन्मत्स्यरूपेण पाहि पाहीति चाया
स तमादाय मणिके प्राक्षिपजलचारिणम् । तत्रापि चैकरात्रेण हस्तत्रयमवर्धत ;
पुनः प्राहार्तनादेन सहस्रकिरणात्मजम् । समत्स्य पाहि पाहीति त्वामहं शरण,
ततः स कृपेतं मत्स्य प्राहिणोद्रविनन्दनः । यदा न माति तत्रापिकूपे मत्स्यः सरोद |
क्षितोऽमी पृथुतामागात्पुनर्यो जनसम्मिताम् । तत्राप्याह पुनर्दीनः पाहिपाहि नृपोत्त
ततः स मनुना शितोगडायामप्यवर्धत । यदा तदा समुद्रेतं प्राक्षिपन्मेदिनीपतिः ॥२,
यदा समुद्रमसिलं व्याप्यासी समुपस्थितः । तदा प्राह मनुर्भातः कोऽपित्यमसुरतरः
अथवा चासुदेवात्वमन्य ईदृप्रयं भवेत् । योजनायुतविंशत्याकस्य तुल्यं भवेद्वपुः २६
शातस्त्वंमत्स्यरूपेण मांग्वेदयसिकेराव! । हुपीकेश!जगन्नाथ! जगद्धाम. नमोऽस्तुते
पचमुकासभगवान्मतम्यम्पीजनार्दनः। साधुसाश्चितिचोवाचसम्यग् ज्ञातस्त्वयाऽनघ।
अविरेणव कालेन मेदिनी मेदिनीपते । भविष्यति जले मता सशैलवनकानना ॥ ३०॥
नारियं सर्वदेवानां निकायेन विनिर्मिता । महाजीवनिकायस्य रक्षणार्थ महीपते ! ॥३॥
। - व्याय.] * मत्स्य मनुसंवादवर्णनम् * दाण्डजोद्विजीयेवैयेचजीघाजरायुजा । अस्यानिघायसर्गस्ताननाथान् पाहिसुनत । पान्तवाताभिहता यदाभवतिनीपगृहेऽस्मिन्मम राजेन्द्र तिदमा सयमिष्यसि ॥ लयान्ते सर्वस्य स्थावरस्य वरस्यव । प्रजापतिस्त्व भविता जगत पृथिवीपते!॥ कृतयुगस्यादी सर्वज्ञो धृतिमान्नृप । मन्वन्तराधिपश्चापि देवपूज्यो भविष्यसि ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे मत्स्यावतारवर्णनं नाम प्रथमोऽध्याय । द्वितीयोऽध्यायः। मत्स्य-मनुसंवादवर्णनम् । सूत उवाच। उक्तो मनुस्तेन पप्रच्छ मधुसदनम् । भगवन् । फियनिर्भिविष्यत्यन्तरक्षय ॥१॥ प्रचा पनि च कथ नाग रक्षिष्ये मधुसूदन । त्वया सह पुनर्योग कथ या भवितामम ॥ मत्स्य उवाच। र प्रभृत्यनाधिर्मविष्यति महीतले । यावर्षशत साग्रन्दुर्मिक्षमशुभावहम् ॥ ३ ॥ मोऽल्पसत्वक्षयदा रमय सत दारगा । सरसर्भविष्यन्ति प्रततानारयर्णिन rel निलोऽपि वितिलमिप्यति युगक्षये। विपाग्निश्चापि पातालात्सङ्कर्षणमुगच्युतः । भवस्यापि सलाटोत्यतृतीयनयनानर ॥॥ निजगनिर्दहन क्षोभसमेष्यति मदामुने । प.पदग्धा महीसर्या यदास्यागुम्मसन्निमा । आकाशमणा ततम्भविष्यति परन्तप ।। तत सदेवनक्षत्र जगद्याम्यति मक्षयम् ॥७॥ सम्मतों भीमनादध होगवण्डोग्लाइक । विद्युत्पताक शोणम्तुसमतेरययारिदा ॥ अग्निप्रस्वेदसम्भृता हाययिष्यन्तिमेदिनीम् । समुद्री क्षोभमागत्य चकन्येनम्यवस्थिता ।। एतेदेकार्णयसम्ररिष्यन्ति जगत्प्रयम् । वेदनावमिमा गृप सत्ययोजानि सर्वश: 01 * मत्स्यपुराणम् * [द्वितीयो. आरोप्य रजुयोगेन मतप्रदत्तेन सुव्रत । संयम्य नाचं मच्छृङ्गे मत्प्रभावाभिरक्षितः ।। एकः स्थास्यसि देवेषु दग्धेष्वपि परन्तप!। सोमसूर्यावहं ब्रह्मा चतुलॊकसमन्वितः ॥ नर्मदा वनदीपुण्यामार्कण्डेयोमहान्ऋषिः । भवोवेदाःपुराणाश्चविद्याभिःसर्वतोवृतम् ।। त्वया सार्द्धमिदं विश्वं स्थास्यत्यन्तरसंक्षये । एवमेकार्णवे जाते चाक्षुपान्तरसंक्षये ॥ वेदान् प्रवर्तयिष्यामि त्वत्सर्गादो महीपते । एवमुत्तवा स भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ मनुरप्यास्थितोयोगं घासुदेवप्रसादजम् । अभ्यसन यावदाभूतसंप्लवं पूर्वसूचितम्॥१६ काले यथोक्ते संजाते घासुदेवमुखोद्गते । शृङ्गी प्रादुर्वभूवाथमत्स्यरूपी जनार्दनः ।। भुजहोरजुरुपेणमनोःपार्श्वमुपागमत् । भृतानसर्यानसमाकृष्ययोगेनारोप्यधर्मवित् ।। भुजङ्गरज्या मत्स्यस्य शृङ्गे नावमयोजयत् । उपर्युपस्थितस्तस्याःप्रणिपत्यजनार्दनम् । आभूतसंप्टवे तस्मिन्नतीते योगशायिना । पृटेन मनुना प्रोक्तं पुराणं मत्स्यरूपिणा ! तदिदानी प्रवक्ष्यामि शृणुध्यमृषिसत्तमाः ॥ २० ॥ यद्भवद्भिः पुरा पृष्टः सृष्टयादिकमहन्द्विजाः । तदेवैकार्णवे तस्मिन् मनुःपप्रच्छ केशवम् ॥ मनुरुवाच । उत्पत्ति प्रलयश्चैव वंशान्मन्वन्तराणि च । बंश्यानुचरितश्चैव भुवनस्यच विस्तरम् ॥२२ दानधर्मविधिश्चैव श्राद्धकल्पञ्च शाश्वतम् । वर्णाश्रमविभागञ्च तथेष्टापूर्तसंज्ञितम् ॥ देवतानां प्रतिष्ठादि यच्चान्यद्विद्यते भुपि । तत्सचं विस्तरेण त्वं धामन्याच्यातुमर्हसि ॥ मत्स्य उवाच। महाप्रलयकालान्त उदासीत्तमोमयम् । प्रसुप्तमिव चातय॑मप्रभातमलक्षणम् ॥२५॥ अविशेयमविशातं जगत् स्याम्नुवरिष्णु च । ततःस्वयम्भूग्व्यक्त.प्रभय.पुण्यकर्मणाम् ॥ व्यसयतदपिलं प्रादुरासीत्तमोनुदः । योऽतीन्द्रियः परोव्यक्तादणुायान सनातनः । नारायण इति स्यातः स एकः सयमुयी ॥२७॥ या शरीरादभिध्याय सिरानुर्विविधं जगत् । अपए ससर्जादी तामु पीजमवाजत्॥ तदेवाण्ड सममप मरुप्यमयं महत् । संघन्सरसहस्रेण स्या॑युतसमप्रभम् ॥ २६ ॥ प्रविश्यातमातेजाःस्वयमेवात्मसम्मपः । प्रभाचादपिळ्याप्त्याविष्णुत्वमगमत्पुनः।
ऽध्यायः] * सृष्टिप्रकरणम् * तदन्तर्भगवानेष सूर्यः समभवत् पुरा । आदित्यश्वादिभूतत्वात् ब्रह्माब्रह्मपठन्नभूत् ॥३१ दिवं भूमि समकरोत्तदण्डशकलद्धयम् । सवाकरोद्दिश सर्यामध्येव्योमच शाश्वतम् ॥ जरायुमरमुफ्याश्च शैलास्तस्याभयंस्तदा । यदुल्वन्तदभून्मेघस्तडित्सवातमण्डलम् ॥ नद्योऽण्डनाम्नः सम्भूताः पितरोमनवस्नथा । समयेऽमीसमुद्राश्चतेऽपित्रान्तर्जलोद्भवाः । लयणेक्षुमुरायाश्च नानारतसमन्विताः ॥ ३४॥ स सिग्वृश्चरभूचिः प्रजापतिररिन्दम । तत्तेजसश्च तत्रैप मार्तण्डः समजायत ॥ ३५ ॥ मृतेऽण्डे जायते यस्मान्मार्तण्टस्तेन संस्मृतः । रजोगुणमयं यत्तद्रूपं तम्य महात्मनः । चतुर्मुसः स भगवानभूलोकपितामहः ॥ ३६॥ येन सृष्टं जगत्सर्व सदेवासुरमानुपम् । तमवेहि रजोरूपं महत्सत्वमुदाहृतम् ॥ ३७॥ इति श्रीमन्स्यपुराणे मत्स्यमनुसंवादवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्याय. । तृतीयोऽध्यायः । सृष्टिप्रकरणम् । मनुस्याच। चतुर्मुपन्चमगमत्कस्मालोकपितामह । कयं तु लोकानरराजन् ब्रह्मा ब्रह्मविदाम्बरः ॥? मत्स्न्य उधावा तपश्चधार प्रथमममराणां पितामहः । आविर्भूताम्तमो येदाः साङ्गोपाङ्गपदामाः ॥२॥ पुराणं मर्यशाग्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम् । नित्यं शन्दमयंपुण्यं शतकोटिप्रयिन्ताम्॥ अनन्तरच पवप्रेभ्योवेदाम्तम्यचिनि स्मृता ।मीमांसान्यायरियाचप्रमाणाटकसंयुताः॥ घेदाभ्याममग्नन्याय प्रजाफामान्य मानना । मनस.पूग्णारि जानायतनमानसा.॥ मर्गविग्भरतपूर्वनलोऽनिभगवान् अपि । नदिगचामवत्पश्चात् पुनम्त्यम्तदनन्तरम्॥
६ [तृतीयो * मत्स्यपुराणम् * ततः पुलहनामा वै ततः ऋतुरजायत । प्रचेताश्च ततः पुत्रो वशिष्ठश्चामवत् पुनः ॥ ७ ॥ पुत्रो भृगुरभूतद्वन्नारदोऽप्यविपदभूत् । दशेमानमानसान्ग्रहामुनीन पुत्रानजीजनत् ॥ शारीरानथ वक्ष्यामि मातृहीनान् प्रजापतेः । अङ्गुष्टादक्षिणाद्दक्षः प्रजापतिरजायत REL धर्मस्तनान्तादभवत् हृदयात्कुसुमायुधः । भ्रूमध्यादभवत्कोधोलोभश्चाधरसम्भवः। वुद्ध मोहः समभवदहङ्कारादभून्मदः । प्रमोदश्चाभवत्कण्ठानमृत्युलौंचनतो नृप ॥ ११ ॥ भरतः करमध्यातु ब्रह्मसूनुरभूततः । एते नव! सूता राजन् ! कन्या च दशमी पुनः । अङ्गजा इति विख्याता दशमी ब्रह्मणः सुता ॥ १२ ॥ मनुवाच। युद्धेर्मोहः समभवदिति यत्परिकीर्तितम् । अहङ्कारः स्मृत,कोधोबुद्धिर्नामकिमुच्यते॥ मत्स्य उवाच सत्वं रजस्तमश्वैव गुणधयमुदाहृतम् । साम्पावस्थितिरतेपां प्रकृतिः परिकीर्तिता । फेचित् प्रधानमित्याहुरव्यक्तमपरे जगुः । एतदेव प्रजासृष्टिं करोति विकरोति च ॥१५ गुणेभ्यः क्षोभमाणेभ्यायो देवा विजशिरे । एकामूर्तिस्त्रयोभागाब्रह्मविष्णुमहेश्वराः । स विकारात् प्रधानात्तु महत्तत्त्वं प्रजायते । महानितियतःच्यातिर्लोकानांजायतेसदा ।। महङ्कारश्च महतो जायते मानवर्धनः । इन्द्रियाणि ततः पञ्च वक्ष्ये बुद्धिवशानि तु ॥ प्रादुर्भवन्ति चान्यानि तथा कर्मचशानि तु ॥ १८ ॥ श्रोत्वस्वचपीजिहानासिकाचयथाक्रमम् । पायूपस्थंहस्तपादचाक्चेतीन्द्रियसंग्रहः ।। शब्दः स्पर्शश्च रूपञ्च रसोगन्धश्च पञ्चमः । उत्सर्गानन्दनादानगत्यालापाश्चतक्रियाः ।। मन एकादश तेषांकम्मबुद्धिगुणान्वितम् । इन्द्रियावयवाःसूक्ष्मास्तस्यमूर्तिमनीषिणः । ध्रयन्ति यस्मात्तन्मात्राः शरीरं तेन सम्मृतम् । शरीरयोगानीयोऽपिशरीरीगद्यतेबुधः ॥ मनः सृष्टि पिस्ते चोद्यमानं सिम्रक्षया । भाकाशशब्दतत्मावादभूच्छन्दगुणात्मकम् ॥ आकारापिटने युः शन्दम्पर्शगुणोऽभवत् । पायोश्च म्पर्शतन्मात्रात्तेजश्चाधिरभूततः ।। दिगुणं तद्विकारंण तच्छन्दम्पर्शम्पयन् । तेजोविकारादभवद्वारि राजंचतुर्गुणम् ॥२५॥ रसतन्माणसम्भूतं प्रायोरसगुणात्मयम् । भूमिस्तु गन्धतन्मात्रादभूत्पञ्चगुणान्विता ।।
चतुर्थोऽध्यायः । सरस्वत्याश्चरित्रम् । मनुरुवाव। अहो कप्तरञ्चतदङ्गजागमनं विभो! । कथं न दोपमगमत्कर्मणानेन पद्मभूः ॥ १ ॥ परस्परञ्च सम्बन्धः सगोत्राणामभूत्कथम्। वैवाहिकस्तत्सुतानाञ्छिन्धिमेसंशयंविभो मत्स्य उवाच। दिव्येयमादिसृष्टिस्तु रजोगुणसमुदचा । अतीन्द्रियेन्द्रिया तद्वदतीन्द्रियशरीरिका ॥३॥ दिव्यतेजोमयी भूप! दिव्यज्ञानसमुद्भवा । नमत्यैरमितः शत्त्या वक्तुं वै मांसचक्षुभिः। यथा भुजङ्गाः सर्पाणामाकाशं विश्वपक्षिणाम् । विदन्ति मार्ग दिव्यानां दिव्या एव न मानवाः ॥५॥ कार्याकार्येन देवानां शुभाशुभफलप्रदे । यस्मात्तस्मान राजेन्द्र ! तद्विवारोनृणांशुभः अन्यच्च सर्ववेदानमधिष्ठाता चतुर्मुखः । गायत्री ग्रहणस्तद्वदङ्गभूता निगद्यते ॥ ७ ॥ अमूर्त मूर्तिमद्वापि मिथुन तत्प्रचक्षते । चिरिश्चियंत्र भगवांस्तत्र देवी सरस्वती ॥ भारती यत्र यत्रैव तत्र तत्र प्रजापतिः ॥ ८॥ यथातपो न रहितश्छायया दृश्यते क्वचित् । गायत्री ब्रह्मणः पाश्वं तथैव न विमुञ्चति चेदराशिःस्मृतोब्रह्मासावित्रीतधिष्टिता । तस्मान्नकश्चिद्दोपास्यात् सावित्रीगमनेविभो तथापि लजावनतः प्रजापतिरभूत् पुरा । खसुतोपगमात् ब्रह्मा शशाप कुसुमायुधम् ।। यस्मान्ममापि भवता मनःसंक्षोभितं शरैः । तस्मात्व हमविरादुद्रो भस्मीकरिष्यति ॥ ततः प्रसादयामास कामदेवश्चतुर्मुखम् । न मामकारणे शप्तुं त्वमिहार्हसि मानद ! ॥१३॥ अहमेवंविधः रसृष्टम्त्ययैव चतुरानन । इन्द्रियक्षोभजनकः सर्वेषामेव देहिनाम् ॥१४॥ स्त्रीपुंसोरविचारेण मया सर्वत्र सर्वदा । शोभ्यमनः प्रयत्नेन त्वयैवोक्तं पुरा विभो ॥ नस्मादनपराधेन त्वयाशप्तस्तथा विभो । कुरु प्रसाद भगवान ! म्वशरीराप्त्ये पुनः ।।
* मत्स्यपुराणम् * [चतुर्थो उत्तानपादोऽजनयत् सूताया प्रजापति । ध्रुवो वर्षसहस्राणि त्रीणि कृत्वातप पुरा । दिव्यमाप तत स्थानमचल ब्रह्मणोवरात् । तमेव पुरत कृत्वा ध्रुव सप्तर्पय स्थिता । धन्या नाम मनो कन्या ध्रुवाच्छिष्टमजीजनत् । अग्निकन्या तु सुच्छाया शिष्टात्मा सुपुवे सुतान् ॥ ३८ ॥ कृप रिषु जय वृत्त वृक च वृकतेजसम् । चक्षुप ब्रह्मदोहिया पीरिण्यां स रिपुञ्जय ॥ घोरणस्यात्मजायान्तु वधुर्मनुमजीजनत् । मनुचराजकन्याया नड्वलाया सवाशुप ॥ जनयामास तनयान्दश शूरानकरमपान् । ऊर पूरु शतयुग्नस्तपस्ची सत्यवाहवि ॥ अग्निष्टुदतिरामश्च सुद्युम्नश्चापराजित । अभिमन्युस्तु दशमो नट्वायामजायत । ऊरोजनयत् पुत्रान् पड़ाग्नेयी तु सुप्रभान् । अग्नि सुमनस ख्याति ऋतुमगिरसङ्गयम् । पितृकन्या सुनीथातु वेनमवादजीजनत् । वेनमन्यायिन विप्रा ममन्थुस्तत्कराभूत् ॥ पृथु म महातेजा स पुत्रौ द्वावजीजनत् ॥ ५४॥ अन्तर्वानस्तु मारीच शिपण्टिन्यामजीजनत् । हविर्धानात पडाग्नेयी धिषणाऽजनयत सुतान् । प्राचीनवहिप साङ्ग यम शुन यल शुभम् ॥ ४ ॥ प्राचीनयहिभगवान महानासीत्प्रनापति । हषिर्धाना प्रजास्तेन यह सम्प्रतिता । सवर्णायान्तु सामुयान्शाधत्त मुतानप्रभु । सर्वप्रचेतसोनाम धनुर्वेदस्य पारगा । तत्तपोरक्षिना वृक्षा यभुलौं समन्तत । देवादेशाच्च तानग्निरदहद्रविनन्दन । ॥ ३८॥ सोमयन्याऽभवत्पनी मारिवानाम विधृता । तेभ्यस्तु दक्षमेक सापुन मनधमजीजनत् । दक्षादनन्तर वृक्षानीपधानि च सर्नश ! अजीजनत्सोमपन्या नन्दी चन्द्रवती तथा ॥ सोमाशम्यवतम्यापिदक्षग्याशीतिगोटय । तासातुविस्तर घश्ये रोके य सुप्रतिष्ठित । द्विपश्याभवन् पेचित् फेचिट यहुपदा नरा । परीमुपा शङ्या वर्णनावरणास्तथा ।। अश्याक्षमुग्या येचिन् पेचित् सिंघाननाम्तथा । श्यापरमुग्ग पेचिन पेचिदुप्रमुपान्तथा ॥३॥ जनयामासधर्मात्माच्छान साननेक्स । सन्ष्ट्रामनसादक्ष म्बिय पयादीजनन ।
ऽध्यायः] * दक्षादूर्ध्व मैथुनतः सृष्टिः * ददी स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश । सप्तविंशतिः सोमाय ददौ नक्षत्रसंशिताः । देवासुरमनुप्यादि ताभ्यः सर्वमभूज्जगत् ॥ ५५॥ इति मत्स्यपुराणे चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः पञ्चमोऽध्यायः। दक्षादूर्ध्व मैथुनतः सृष्टिः। ऋपय ऊचुः। देवानां दानवानाञ्च गन्धर्वारगरक्षसाम् । उत्पत्तिविस्तरेणैव सत! ब्रूहि यथातथम् ॥ सूत उवाच। सङ्कल्पाद्दर्शनात् स्पर्शात् पूर्वेषां सृष्टिरुच्यते। दक्षात्याचेतसादूध्वं सृष्टिमथुनसम्भवा । प्रजासजेति व्यादिष्टः पूर्व दक्षः स्वयम्भुवा । यथा ससर्ज चैवादी तथैव रणुत द्विजाः ॥३॥ यदा तु एजतस्तस्य देवर्षिगणपन्नगान् । न वृद्धिमगमल्लोकस्तदा मैथुनयोगतः । दक्ष' पुरसहस्राणि पाञ्चजन्यामजीजनत् ॥४॥ तांस्तु दृष्ट्वा महाभागः सिसवर्विविधाःप्रजाः। नारदप्राहहर्यश्वान्टक्षपुनान्समागतान भुवः प्रमाणं सर्वन झात्योर्चमध घ च । ततः सृष्टि विशेषेण फुरुध्यमृपिसत्तमाः ॥ ते तु तद्वचनं श्रुत्वा प्रयाताः सर्वतोदिशम् । अद्यापि न निवर्तन्ते समुद्रादिय सिन्धयः यथ्येषु प्रणप्टेषु पुनर्दक्षः प्रजापतिः। पीरिण्यामेव पुत्राणां सहनमसृजत्प्रभुः ॥ ८ ॥ शवला नाम ने विप्राः समेताः सृष्टितियः । नारदोऽनुगतानमाह पुनस्तानपूर्ववत्सतान् भुवः प्रमाणं सर्वत्र प्रात्या भ्रातृनयो पुनः॥ ६॥ मागत्य बाध सपिच फरिष्यथ विशेषतः। तेऽपि तेनैव मार्गेण अग्मुतिन यथा पुरा सतः प्रभृति न भ्रातुः पनीयानमार्गमिच्छति । अन्विान्दु यमाप्नोति तेन तत्पग्यिर्जयेत् ततस्तेषु यिनप्टेपु षष्टिं पन्याः प्रजापतिः । वैरिण्यां जनयामास दक्षः प्राचेतसम्तया * मत्स्यपुराणम् [पञ्चमोऽध्याय प्रादात्स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश । सप्तविशतिसोमायवतस्रोऽरिष्टनेमये(मिने)। द्वे चैव भृगुपुत्राय द्वे कशाश्वाय धीमते । द्वे चैवाङ्गिरसे तद्वत्तासान्नामानि विस्तरात् शृणुष्व देवमातृणा प्रजाविस्तरमादित । मरत्यती वसूर्यामी लम्बा भानुररुन्धती ॥ सङ्कल्पाच मुहर्ता च सा या विश्वा च भामिनी । धर्मपल्य समारयातास्तासा पुन्नियोधत ।। १६ ।। विश्वेदेवास्तु विश्वाया साध्या सा यानजीजनत् । मरत्वत्या मरत्वन्तो वसोस्तु वसवस्तथा ॥ १७ ॥ भानोस्तु भानवस्तद्वन् मुहर्ताया मुहर्तका । लम्पायाधोपनामानोनागवीथीतुयामिजा पृथिवीतरसम्भूतमरन्धत्यामजायत । सङ्क पायास्तु सङ्कल्पो बसुमृपिन्नियोधत ।१६) ज्योतिष्मन्तरतुयेदेवाध्यापका सर्वतोदिशम् । वसयस्तेसमारयातास्तेपासर्गन्निबोधत आपो ध्रुवय सोमश्च धरश्चैवानिलोऽनर । प्रत्यूपश्च प्रभासश्च वसपोऽष्टीप्रकीर्तिता आपस्य पुनराश्चत्वार शान्तो चैदण्डएपच । शाम्योऽयमणियनश्चयशरक्षाधिकारिणा ध्रुवस्य कालपुवस्तु चर्चा सोमादजायत । द्रविणो हव्यवाहश्च धरपुत्रायुभी स्मृती । क्याणिन्या तत प्राणोरमण शिशिरोऽपि च । मनोहराधरात्पुत्रानयापाथ हरे सुता शिवा मनोजन पुरमपितातगति तथा अवापाचागलात पुनायग्निप्रायगुणोपुन ।२५॥ अग्निपुत्र कुमारतु शरस्तम्थे व्यजायत । तम्य शाग्यो विशायश्च नैगमेयश्च पृष्ठजा ॥ अपत्य यत्तिकाना नुपातियस्ततम्मृत । प्रत्यूपसससि (पे )पुत्रोविभुर्नाम्नाथदेवर विश्वकर्मा प्रभासस्य पुत्र शिपी प्रजापति ॥२७॥ प्रासादभवनोद्यानप्रतिमाभूषणादिषु । तडागायमस्पेयु स्मृन सोमस्यधंकि ॥२८॥ अपपादहिर्बुध्न्य विपाशोध पत । हरश्च यस्पश्च न्यायस्थ सुरेश्वर IIREN सावित्रश्च जयनय पिशाप चापगनिन । पने न्द्रा समाग्याता एकादश गणेश्वरा एतेषा मानमानानु त्रिशल्याधारिणाम् । योग्यचतुगीनिम्त-पुत्राचाक्षया मता ॥ दिशु समुयेगमा प्रगति गर्णयग । पुनपानासनाचते मग्मा गभसम्भवा ॥ गिरगपुगणे अशा या गाम प-मोर याय । । - - पष्ठोऽध्यायः । कश्यपान्ययवर्णनम् । सूत उवाच। कश्यपस्य प्रवक्ष्यामि पत्नीभ्यः पुत्रपौत्रकान् । अदितिदितिर्दनुश्चैव अरिष्टासुरसातथा मुरभिनिता तद्वत्ताम्रा क्रोधवशा इरा । कटूविश्वा मुनिस्तद्वत्तासां पुत्राग्नियोधत ॥ तुपिता नाम ये देवाश्चाक्षुपस्यान्तरे मनोः । वैवस्वतेऽन्तरे चैते आदित्याद्वादशस्मृताः इन्दोधाता भगस्त्वष्टा मित्रोऽथवरुणोयमः । विवस्वान्स विनापूपाअंशुमानविष्णुरेवच एते सहस्त्रकिरणा आदित्या द्वादश स्मृताः । मारीचात् कश्यपादाप पुत्रानदितिरुत्तमान् ॥५॥ भृशाश्वल्य ऋपे. पुत्रा देवप्रहरणा.स्मृताः । एते देवगणा विप्राः प्रतिमन्वन्तरेषु च । उत्पद्यन्ते प्रलीयन्ते कल्पे ल्पे तथैव च । दितिः पुत्रद्वयं लेभे कश्यपादिति नः श्रुतम् ।। हिरण्यकशिपुश्चैव हिरण्याक्षं तथैव च । हिरण्यकशिपोस्तजातं पुत्रचतुष्टयम् ॥ ८ ॥ प्रहादश्यानुहादश्च संहादोह्लाद एव च । प्रह्लादपुत्र आयुष्मान् शिविष्कल एव च ।। विरोचनश्चतुर्थश्च स वलिं पुत्रमाप्तवान् । चलेः पुत्रशतं त्वासीहाणज्येनं ततोद्विजाः । धृतराष्ट्रस्तथा सूर्यश्चन्द्रश्चन्द्रांशुतापनः । निकुम्भनाभो गुर्वक्षः कुक्षिभीमो विभीषणः । एवमाद्यास्तु यवो वाणज्येष्ठा गुणाधिकाः । वणिः सहस्रबाहुश्च सर्वास्त्रगणसंयुतः ।। तपसा तोपितो यस्य पुरे वसति शूलभृत् । महाकालत्वमगमत्साम्यं यश्च पिनाकिनः हिरण्याक्षस्य पुत्रोऽभूदलूक शकुनिस्तथा । भूतसन्तापनश्चच महानाभस्तथैव च ॥४॥ एतेभ्यः पुत्रपौत्राणां कोटयः सप्तसप्ततिः ।महावला महाकाया नानारूपा महौजसः हनुः पुरशतं टेभे कश्यपायलदर्पितम् । विप्रचित्तिः प्रधानोऽभूषां मध्येमहायला द्विमूह शनिश्चय तथा शशिरोधरः । अयोमुखः शम्वरश्च कपिशो नामतस्तथा ॥ मारीचिमधयांचव इरा गर्भशिरास्तथा । विद्रावणश्च केतुश्च केतुर्वीर्यः शतहदः ॥१८॥ ॥ 1 - [ षष्ठो १४ १ मत्स्यपुराणम् * इन्द्रजित् सप्तजिञ्चैव वज्रनाभस्तथैव च । एकचक्रो महावाहुर्यनाक्षस्तारकस्तथा ॥१६॥ असिलोमा पुलोमा च विन्दुर्वाणो महासुरः । स्वर्मानुपपर्चा वएचमाद्या दनो सुताः स्वर्भानोस्तु प्रभा कन्या शची चैव पुलोमजा । उपदानवी मयस्यासीत्तथा मन्दोदरी कुहः ॥ २१ ॥ शर्मिष्टा सुन्दरी चैव चन्द्रा च वृषपर्वणः । पुलोमा कालका चैव वैश्वानरसुते हि ते ॥ चह्नपत्ये महासत्वे मारीवस्य परिग्रहे । तयोः पष्टिसहस्राणि दानवानामभूत्पुरा ॥२३॥ पौलोमान् कालकेयांश्च मारीचोऽजनयत्पुरा । अवध्या येऽमराणां च हिरण्यपुरवासिनः चतुर्मुसालब्धवरास्ते हता विजयेन तु । विप्रचित्ति सहिकेयान् सिंहिकायामजीजनत् हिरण्यकशिपोर्यवैमागिनेयास्त्रयोदश । व्यंसः करपश्च राजेन्द्र ! नलो पातापिरेव च ॥ इल्वलो नमुनिश्चैव श्वसृपश्चाजनस्तथा । नरक कालनामश्च सरमाणस्तथैव च ।२७) कालवीर्यश्च विरयातो दनुवंशयिवर्धनाः । संहादयस्य तु दैत्यस्यनियातकवचास्मृताः अवध्याः सर्वदेवानां गन्धर्वोरंगरक्षसाम् । ये हता भर्गमाश्रित्य त्वर्जुनेन रणाजिरे ।२६६ पटकन्या जनयामास ताम्रा मारीचवीजतः । शुकीश्येनीचभासीचमुग्रीवीगृध्रिकाशुचिः शुको शुकानुलूझांश्च जनयामास धर्मतः । श्येनी श्येनांस्तथा भासी कुररानप्यजीजनत् गृधी राधान् कपोतांश्च पारावतविहङ्गमान् । हंससारसकोनांश्च पवान् शुविरजीजनत् अजाश्वमेपोष्ट्रपरान मुग्रीवी बाप्यजीजनन् । एपताम्रान्वयः प्रोक्तो विनतायांनियोधत गमः पततांनायो अरुणश्च पतन्त्रिणाम् । सौदामिनी तथा कन्या ये नभसि विश्रुता सम्पातिश्च जटायुश्च अरुणस्य सुतायुभो । सम्पातिपुत्री यवैध शीघ्रगधापि विश्रुतः । जटायुषः पर्णिकार, शतगामी च विश्रुती । सारसी रज्जुबालश्चभेगण्डयापि तत्स्सुताः तेपामनन्तमभयत् पक्षिणां पुत्रपारकम् ।सुरसायाः सहनन्तु सर्पाणामभवत्पुरा ॥३७॥ सह शिरसाद सहननापि मुनत ! प्रधानाम्तषु विग्याताः पविशतिररिन्दम शेपवामुकिकोटश रावतमाला । धनयमहानीलपाध्यतातक्षका: ॥३६॥ पलापमहापरतरायलाहकाः । शलपाल महाराष्ट्र पुष्पदंप्र-शुभाननाः ॥५॥ int च यदुलो चामन पाणिनस्तथा । कपिलोदुमंगयापि पतनिरितिस्मृताः । है ऽध्यायः] * मदनद्वादशीव्रतकथनम् * एषामनन्तमभवत् सर्वेषां पुत्रपौत्रकम् । प्रायशो यत् पुरादग्धं जनमेजयमन्दिरे ॥४२॥ रक्षोगणं क्रोधवशा स्वनामानमजीजनत् । दष्ट्रिणां नियुतं तेषां भीमसेनादगात्क्षयम्। दाणाञ्च गणं तद्वद्गोमहिप्यो चराङ्गनाः । सुरभिर्जनयामास कश्यपात् संयतनता ॥ मुनिर्मुनीनाञ्च गणंगणमप्सरसां तथा । तथा किन्नरगन्धनिरिष्टाऽजनयद्यहुन् ॥ ४५ तृणवृक्षलतागुल्ममिरा सर्वमजीजनत् ! विश्वा तु यक्षरक्षांसि जनयामास कोटिशः ॥ तत एकोनपञ्चाशनमस्तः कश्यपादितिः । जनयामास धर्मज्ञान् सर्वानमरवल्लभान् ॥४७ इति श्रीमत्स्यपुराणे कश्यपान्चयो नाम पष्ठोऽध्यायः । सप्तमोऽध्यायः मरुद्गणोत्पत्तिकथने मदनद्वादशीव्रतकथनम् । ऋषय ऊचुः। दितःपुत्रा कर्यजाता मरतो देववल्लभाः । देवैर्जग्मुश्च सायनः कस्माते सरयमुत्तमम् ॥ सूत उवाच। पुरा देवामुरे युद्धे हतेषु हरिणासुरः। पुत्रपौनेषु शोकार्ता गत्या भूलोफमुत्तमम् ॥२॥ म्यमन्तपञ्चके क्षेत्रे सरस्वत्यास्तटे शुभे । भर्तुराराधनपरा तप उग्रं चचार ह ॥ ३ ॥ तदादितिदत्यमाता ऋषिम्पेण सुनत! । फलाहारा तपस्तेपे सऊंचान्द्रायणादिकम् ॥ यावर्षशतं सा जाता शोफसमाकुला । ततः सा तपसा तता पसिष्टादीनपृच्छन ॥५॥ फययन्तु भवन्तो में पुप्रशोकविनाशनम् । व्रतं सौभाग्यफलदमिह लोये. परय च ॥६॥ असिष्टममुग्गा मदनद्वादशीयनम् । यस्या. प्रभावादभवन् सुतशोकविवर्जिता ॥ षय ऊचुः। अनुमिन्छामदे सूत ! मदनदादशी प्रतम् । मुनानेकोनपचाराद्येन लेभेदितिः पुनः॥८
३ मत्स्यपुराणम् ।
[सामो
सूत उवाच।
यवसिष्ठादिभि पूर्वन्दिते कथितमुत्तमम् । विस्तरेण तदेवेद मत्सकाशान्नियोधत ।।
चैत्रमासि सितेपक्षे द्वादश्या नियतवत । स्थापयेदवण कुम्भ सिततण्डुलपूरितम् ॥१०॥
नानाफलयुत तद्वदिशुदण्डसमन्वितम् । सितवस्त्रयुगच्छन्न सितचन्दनचचितम् ॥११॥
नानाभक्ष्यसमोपेत सहिरण्यन्तु शक्तित । तानपात्र गुडोपेत तस्योपरि निवेशयेत् ।।
तस्मादुपरि कामन्तु कदलीदलसस्थितम् । कुादायद्वयोपेत रति तस्य च वामत ॥
गन्ध धूप ततो दद्याद्गीत वाद्यश्च कारयेत् । तदभावे कथाकुर्यात् कामकेशवयोर्नर ।
कामनाम्नो हरेर; स्नापयेद्गन्धवारिणा । शुरूपुष्पाक्षततिलैरर्चयेन्मधुसूदनम् ॥१५॥
कामाय पादौ सपूज्य जड्ढे सौभाग्यदाय च । ऊरूस्मरायेतिपुनर्मन्मथायेति वै कटिम्।
स्वच्छोदरायेत्युदरमनङ्गायेत्त्युरो हरे । मुख पद्ममुसायेति चाहपञ्चशराय च ॥ १७ ॥
नम सर्वात्मने मौलिमर्चयेदिति केशवम् । तत प्रभाते त कुम्भ ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥
ब्राह्मणान् भोजयेद्वतया स्वयञ्चलवणादृते । भुक्त्वा तु दक्षिणादद्यादिम मन्त्रमुदीरयेत् ।
प्रीयतामन भगवान् कामरूपी जनार्दन । हृदये सर्वभूताना यआनन्दोऽभिधीयते ॥२०॥
अनेन विधिनासर्व मासिमासि व्रत चरेत् । उपवासी त्रयोदश्यामर्वयेद्विष्णुमव्ययम् ।
फल्मेकञ्च समाश्य द्वादश्याभूतले स्वपेत् । ततस्त्रयोदशे मासि घृतधेनुसमन्विताम् ।
शय्या दद्यादनाय सर्वोपस्करसयुताम् । काञ्चनकामदेवश्च शुका गाच पयस्विनीम्,
पासोभिजिटाम्पत्यपूज्यशक्त्याविभूषणे । शय्यागन्धादिकदद्यातप्रीयतामित्युदीरयेत् ।
होम शुरतिले कार्य कामनामानिकीर्तयेत् । गव्येनहविषातद्वत् पायसेनचधर्मवित् ।।
विप्रेभ्योभोजनदद्याद्वित्तशाठ्यविवर्जयेत् । इभुदण्डानथोदद्यात् पुप्पामालाश्च शक्तित।
य पुर्याद्विधिनानेन मदनद्वादशीमिमाम् । स सर्वपापनिर्मुक्त प्राप्नोति हरिसाम्यताम् ।।
इह रेवरान् पुत्रान् सौभाग्यफरमश्नुते । य स्मर सम्मृतीविष्णुरानन्दात्मामहेश्वर
मुपार्थी यामम्र्पण स्मरेदङ्ग जमीश्वरम् । एतच्छ्र त्या चकारासी दिति सर्वशेषत,
पश्यपो व्रतमाहात्म्याटगत्य परया मुदा । चकार वर्षशा भूयो म्पयौवनशालिनीम्।
परैरान्छन्दयामास सातु यो ततोयग्म् । पुत्र शमयधार्थाय समर्थममितौजसम् ॥३॥
। ऽध्यायः] * मदनद्वादशीव्रतकथनम् * घरयामि महात्मानं सर्वामरनिषूदनम् । उपाच कश्यपो चाममिन्द्रहन्तारमूर्जितम् ॥ प्रदास्याम्यहमेवेहकि त्वेतक्रियतां शुभे! । आपस्तम्यः करोत्विष्टिपुत्रीयामद्यसुयते । विधास्यानि ततोगमिन्द्रशत्रुनिपूदनम् । आपस्तम्बस्ततचनपुष्टिन्द्रधिणाधिकाम् । इन्द्रशत्रुर्भवस्वेति जुहाव च सविस्तरम् । देवा मुमुदिरे दैत्या विमुगाम्युश्चदानवाः ।। दित्यांगर्भमथावत्तकश्यपः प्रातां पुनः । त्वयायतो विधातव्यो घस्मिन्गर्भवरानने । सम्वत्सरशतं त्येकमम्मिन्नेव तपोवने। सन्ध्यायां नैव भोकव्यंगर्मिण्यावरणिनि! ॥ न स्थाव्यं न गन्तव्यं वृक्षप्लेषु सर्वदा । नोपम्करपूपविशेन मुसलोल्पलादिषु ॥३८॥ जले च नावगाहेत शन्यागारञ्च यर्जयेत् । वल्मीकायां न तिप्टननवोद्विग्नमना भवेत् ।। विलिरोन्न नपे मिन्नाहारेण न भस्मना । न शयालुः सदा तिछेद व्यायामश्च विवर्जयेत् ॥ ४० ॥ न तुपांगारमस्मास्थिकपादिपु समाविरोन्। वर्जयेत्कल लोकप्रभंगं तथैव च। न मुक्तकेशा तिष्ठत नागचिःम्यात् कदाचन । न शीतोत्तरशिरा नचापशिगःकचित् । जपत्रहीनानोद्विग्नानबावरणासती। नामंगल्यांवदेवाचं नत्र हाम्याधिका भवेत् । उत्तु गुम्शुधूपांनित्यं मांगल्यतत्परा । सवाषर्धाभिः कोणेन पारिणाम्नानमाचरेत् । तरक्षा मुभूपा च धाम्नुपूजनन पग । तिष्टेन् प्रसन्नवदना भर्नुः प्रियहिने रना 1241 नशीला तृतीयायां पापं ननमाचरेत् । इति वृत्तामन्नारी विशेषेणतु गभिती । स्तुतम्या भवेत् पुनः शीलाई दिसंयुनः। अन्यथा गर्भपतनमवालोनिन मंशयः । स्मात्त्यमनयावृत्त्यागर्भेऽम्मिन्यदामाचर । म्यस्त्यानुनेगमिष्यामिनयेन्युनम्नयापुनः श्यतां सर्वभूनानां तपान्तरधीयन । ततः सा फज्यपानन विधिनाममनिष्ठन ॥६॥ अथ भीतत्तयेन्द्रोऽपि दिनः पानमुपागमत् । पिदायदेवसदनं तन्मुथूपुग्वम्पिनः ॥५० सिदान्तप्रेमुग्भवम् पापशामनः। पिनीतोऽमयदन्यतः प्रशान्तयदनो यहिः ।। मार स्विकार्यमान्मन गुममाचरन् । सतीयांशतान्नेमान्यूनतुतिवमरिलमिः । एतापमात्मानं प्रीत्या पिम्मिनमानमा । मस्त्यापादयोगानंप्रमुभा मुनमधता निद्रामरसमाशान्ता दिपापरसिराः पचिन् । सानदन्तरं लायामपिटनुरानीतिः।
[अष्टमो
* मत्स्यपुराणम् *
चत्रेण सप्तधा चक्रे तं गर्भ त्रिदशाधिपः । ततः सप्तव ते जाताः कुमाराः सूर्यवर्वसः॥
रुदन्तः सप्तवेताला निषिद्धा गिरिदारिणा । भूयोऽपिरुदतश्चैतानेकैकं सतधा हरिः ॥५६॥
विच्छेद वृत्रहन्ता वै पुनस्तदुरे स्थितः । एवमेकोनपञ्चाशद् भूत्वा ते रुरुदुर्भृशम् ॥
इन्द्रो निवारयामास मा रोदीष्ट पुनः पुनः।
ततःसचिन्तयामासकिमेतदितिवृत्रहा । धर्मस्पकस्यमाहात्म्यात् पुनःसञ्जीवितास्त्वमी
विदित्वा ध्यानयोगेन मदन द्वादशी फलम् ॥ ५६ ॥
नूनमेतत् परिणतमधुना कृष्णपूजनात् । क्त्रेणापि हताः सन्तो न विनाशमवाप्नुयुः ।।
एकोऽप्यनेकतामाप यस्माद्दरगोप्यलम् । अवध्या नूनमते वै तस्माद्देवा भवन्त्यिति ।
यस्मान्मारुदतेत्युक्तारदन्तो गर्भसंस्थिताः । मरतो नाम ते नाना भवन्तुमखभागिनः ।।
ततः प्रसाद्य देवेशः क्षमम्वेति दितिं पुनः। अर्थशास्त्रं समास्थाय मयैतदुष्कृतंकृतम् ॥
कृत्या मरुद्रणं देवः समानममराधिपः । दिति विमानमारोप्य ससुतामनयदिवम् ॥६४
यभागभुजो जाता मस्तस्ते ततो द्विजाः । न जग्मुरैक्पमसुरैरतस्ते सुरवल्लभाः ॥६५॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे मरुतोत्पत्तौ मदन द्वादशी व्रतं नाम सप्तमोऽध्यायः ।।
-
अप्टमोऽध्यायः
आधिपत्याभिषेचनम्।
मृपय ऊचुः।
आदिसर्गश्च यः सूत ! कथितो विस्तरेण तु। प्रतिसर्गइयेयेपामधिपास्तान पदस्व नः ॥
सूत उवाच।
यदाभिपितः सकलाधिराज्ये पृथुर्धरित्र्यामधिपो यभूव ।
तदीपधीनामधिपं चकार यमयतानां तपसा चन्द्रम् ॥२॥
गान ताग दिज-वृक्ष-गुल्मलतापितानस्य च स्तमगर्भः।
अपामधी धरणं धनानां राम प्रभु वैधयण तन् ॥३॥
ऽध्यायः] * आधिपत्याभिषेचनम् * विष्णु रवीणामधिपं बसूनामग्निञ्च लोकाधिपतिधकार । प्रजापतीनामधिपं च दक्षञ्चकार शक्रं मरुतामधीशम् ॥४॥ दैत्याधिपानामथ दानवानां ग्रहादमीशश्च यमं पितॄणाम् । पिशाचरक्ष.-पशु भूत यक्ष-बेतालगजन्त्यथ शूलपाणिम् ॥५॥ प्रालेय शैलञ्च पति गिरीणामीशं समुदं ससरिनदानाम् । गन्धर्वविद्याधरफिनराणामीशं पुनश्चितरथं चकार ॥६॥ नागाधिपं वासुकिमुप्रयीयं सर्वाधिपं तक्षकमादिदेश । दिशाशनानामधिपञ्चकार गजेन्द्रमैरावतनामयम् ॥७॥ सुपर्णमीशम्पततामधाश्वगजानमुद्यै श्रवसञ्चकार । सिंह मृगाणां वृषभं गवाञ्च वृक्षं पुन. सर्ववनस्पतीनाम् ॥८॥ पितामह पूर्वमधाभ्यपिञ्चच्नतान् पुनः सर्वदिशाधिनाथान् । पूर्वण दिपालमथाभ्यपिञ्चन्नामा सुधर्माणमरातिमेनुम् ॥३॥ ततोऽधिपं दक्षिणतश्चकार सर्वेश्वरं शङ्खपटाभिधानम् । समेतुमन्तच दिगीशमीशधकार पश्चाद्भुवनाण्डगर्भ. ॥१०॥ हिरण्यरोमाणमुदग्दिगीशं प्रजापतिर्देवसुतश्चकार । अद्यापि कुर्वन्ति दिशामधीशाः शनून दहन्तस्तु भुवोभिरक्षाम् ॥१९॥ चतुभिरेमि पृथुनामवेयो नृपोऽमिपिनः प्रथमं पृथिव्याम् । गनेऽन्तरे चाभुपनामधेये वैवम्बतारये च पुन प्रवृत्ते ॥१२॥ प्रजापति सोऽस्य चराचरम्य यभ्य सन्धियांशचिह्नः ॥३॥ इति मत्स्यपुगणे आधिपत्यामिपेचनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥
नवमोऽध्यायः मन्वन्तरानुवर्णनम् । सूत उवाच । एवं श्रुत्वा मनुः प्राह पुनरेव जनार्दनम् । पूर्वपाश्चरितं ब्रूहि मनूनां मधुसूदन ॥१॥ मत्स्य उवाचा - मन्वन्तराणि सर्वाणि मनूनां चरितञ्च यत् । प्रमाणश्चैवकालस्यतच्छृणुष्यसमाहितः ॥ एकचित्तः प्रशान्तारमा ऋणुमार्तण्डनन्दन । यामानामपुरादेवाासन स्वायम्भुवान्तरे।। सप्तवमृपयः पूर्वे ये मरीच्यादयः स्मृताः । आग्नीध्रश्चाग्निवाहुश्च सहः सवन एव च ॥ ज्योतिप्मान्द्युतिमान्हव्योमेधामेधातिधिनुः । स्वायम्भुवस्यास्यमनोर्दशैतेवंशवर्द्धनाः प्रतिसर्गमिमे कृत्या जग्मुर्यत्परमम्पदम् । एतत्स्वायम्भुवंप्रोक्तं स्वारोविषमतः परम् ॥ स्वारोचिषस्य तनयाश्चत्वारो देववर्चसः । नमो नमस्यप्रसूतिभानवः कीर्तिवर्द्धनाः ।। दतोनिश्च्यवनस्तम्यः प्राणाः कश्यप एप च । और्वी वृहस्पतिश्चैवसततऋषयःस्मृताः ।। देवाश्च तुपितानामस्मृताःस्वारोचिपेऽन्तरे । हवीन्द्रःसुरुतोभूतिरापोज्योतिरयस्मयः ॥ घसिष्टस्य मुताः सप्त ये प्रजापतयः स्मृताः। द्वितीयमेतत्कथितं मन्यन्तामतः परम् ॥ योत्तमीयं प्रवक्ष्यामि तथामन्वन्तरं शुभम् । मनुर्नामोत्तमिर्यत्र दशपुत्रानजीजनत् ॥११ ईपऊर्जश्च तर्जश्च शुचिः शुक्रस्तथैव च। मधुश्च माधयश्चय नभस्योऽथ नभास्तथा ।। सहः कनीयानेतेपामुदार: कीर्तिवर्द्धनः । भावनास्तत्र देवा:म्युरुजाः सप्तर्षयास्मृताः ॥ फौकुरण्टिश्च दालभ्यश्च शङ्खः प्रवहणःशियः । सितश्वसस्मितश्चेयसतैतेयोगवर्दनाः ॥ मन्वन्तरं चतुर्थ तु तामसं नाम विश्रुतम् । कपिः पृथुस्तधैवाप्निरकापिकपिरेव च ॥१५ तथैव जल्पधीमानो मुनयः सप्तनामतः । साध्या देवगणा यत्र फधितास्तामसेऽन्तरे ।। अकल्मपम्तथा धनी तपोमूलस्तपोधनः । तपो रति तपस्यश्च तपोद्युतिपरन्तपी॥१७ मग मागी तपो योगी धर्माचाररताः सदा । तामसम्य मुनाः सर्वेदशवंशषियर्द्धनाः ॥
नयमोऽध्यायः]] * मन्वन्तरानुवर्णनम् । २१ पञ्चमस्य मनोस्तद्रवतस्यान्तरं शृणु । ऐन्द्रयाहुः सुवाहुश्च पर्जन्यः सोमपो मुनिः ।। हिरण्यरोमा सप्ताभ्यः सनते ऋषयः स्मृताः । देवाश्चाभूतरजसस्तथाप्रतयःशुमाः॥२० अमणस्तत्वदर्शीचतिमानव्यवान् कविः । युक्तोनिरन्सुफःसत्वोनिर्मोहोऽयप्रकाशकाः धर्मवीर्यवलोपेता दर्शते रैवतात्मजाः । भृगुः सुधामा विरजाः सहिष्णुर्नाद एव च ॥ विवस्वानतिनामा च पप्ने सप्तर्पयोऽपरे । चानुपस्यान्तरे देवालेसा नाम परिश्रुताः॥२३ भयोऽथ भायाधवारिमून्यादिवौकसः । चाचपस्यान्तरप्रोक्तादेवानांपञ्चयोनयः ।। मरुप्रभृतयस्तढच्चाक्षुपम्य सुता दश । प्रोक्ताः स्वायम्भुचे वंशे ये मयापूर्वमेव तु ॥२५॥ अन्तरं चाक्षुपं चैतन्मया ते परिकीर्तितम् । सप्तमं तत्प्रयभ्यामि यद्वैचम्चतमुच्यते ॥ अनिश्चैव वसिष्टश्च कश्यपोगौतमम्तथा । भरद्वाजस्तथायोगीविश्वामित्रःप्रतापवान् ।। जमदग्निश्च सप्तैते साम्प्रतं ये महर्षयः । कृत्या धर्मव्यवस्थानं प्रयान्ति परमम्पदम्॥ साध्याविश्वेनस्ट्राश्चमस्तोवसवोऽश्विनी । आदित्याश्चसुरास्तद्वतसनदेवगणाःस्मृताः इक्ष्वाकुप्रमुग्पाश्चास्य दशपुत्राः स्मृता भुवि । मन्वन्तरेषु सर्वेषु सत सतमहर्षयः॥३०॥ त्या धर्मव्यवस्थानं प्रयन्तिपरमम्पटम् । सावर्ण्यस्यप्रवक्ष्यामिमनो वितथान्तरम्॥ अश्वत्थामा शरद्वांश्चकौशिकोगालवस्तथा । शतानन्दःकाश्यपश्चगमश्चम्पयाम्मृताः॥ धृनिर्वरीयान् यवसः सुवर्णो वृष्टिरेव च । चरिष्णुराज्य: सुमतिनुः शुमश्च वीर्यवान् भविष्यादशसावर्णमनो:पुत्राःप्रकीर्तिताः।रोत्यादयस्तथान्येऽपिमनयः सम्प्रकीर्तिताः रचेः प्रजापतेः पुगी रोच्यो नाम भविष्यति । मनुभूतिमुतस्नीत्योनामभविष्यति ॥ ततस्तु मेरसावर्णिब्रह्मसू नुर्मनुः स्मृतः । मृतश्च मृतधामाचविष्यासेनोमनुस्तथा ।। अतीतानागताञ्चैते मनवः परिकीर्तिताः । पड़नं युगसाहनमेभिर्व्यातं नराधिप ॥३७॥ स्वेस्थेऽन्तरे सरमिदमुत्पाद्य सचराचरम् । फल्पक्षये विनिवृत्ते मुच्यन्तेरह्मणा सह ।। एनेयुगसम्रान्तेविनश्यन्तिपुन:पुनः । ग्रहाचाविष्णुसायुज्यंयातायाम्यन्ति चैद्विजाः ।। इति धीमन्म्यपुराणे मन्यन्तरानुर्निनं नाम नवमोऽध्यायः ।।
दशमोऽध्यायः पृथ्वीदोहनम् ऋपय ऊचुः। बहुभिर्धरणी भुक्ता भूपालैः श्रूयतेपुरा। पार्थिवाःपृथिवीयोगात्पृथिवीकस्य योगतः ।। किमर्थश्चरतासंज्ञाभूमेःकिंपारिभापिणी । गौरितीयञ्चविख्यातासूत ! कस्माद्ब्रवीहिनः।। सूत उवाच। चंशे स्वायम्भुवस्यासीदङ्गो नाम प्रजापतिः । मृत्योस्तुदुहितातेनपरिणीतासुदुर्मुखा ॥३ सुनीथा नाम तस्यास्तु चेनो नामसुतः पुरा । अधर्मनिरतश्चासीबलवान्वसुधाधिपः लोकेऽप्यधर्मटजातः परभार्यापहारकः । धर्माचारस्य सिद्धयर्थजगतोऽथमहर्षिभिः॥ अनुनीतोऽपि न ददावनुशां स यदा ततः । शापेन मारयित्वैनमराजकभयार्दिताः ॥६॥ ममन्यु ाह्मणास्तस्यवलाद्देहमकल्मपाः । तत्कायान्मथ्यमानात्तुनिपेतुर्लेच्छजातयः ॥ शरीरे मातुरंशेन कृष्णाचनसमप्रभाः। पितुरंशस्य चांशेन धार्मिको धर्मचारिणः ।। उत्पनो दक्षिणाद्धम्तात्स धनुः सशरोगदी। दिव्यतेजोमयवपुः सरत्नकयचाङ्गदः॥ पृथोरैया भवद्यत्नात् ततः पृथुरजायत । स विप्रैरभिषिक्तोऽपितपः कृत्वा सुदारुणम् ॥ विष्णोर्वरेण सर्वम्य प्रभुत्वमगमत्पुनः । निःस्वाध्यायचपट्कारंनिर्धर्मवीक्ष्य भूतलम् ।। दग्धुमेपोद्यतः फोपाच्छरेणामितविक्रमः । ततो गोरूपमाम्थाय भूः पलायितुमुद्यता । पृष्टतोऽनुगतस्तम्याः पृथुदीतशरासनः । ततःस्थित्वैकदेशे तु किं करोमीतिवावधीत् ।। पृथुरत्यघदवाक्यमीप्सितं देहि मुयते । सर्वम्य जगतः शीघ्र स्थावगम्य चरस्य च ॥ तथेच सा प्रचीदभूमिर्तुदोह स नराधिपः । सो पानी पृशुर्वत्सं सत्या सायम्भुपं मनुम् ॥१५॥ तदनमभपच्वं प्रजाजीवन्तियेनचे । ततस्तु अपिभिधायन्सः सोमन्तदाभवत् । दोधागृहम्पनिरभूत्पानं घेदस्नपारसः देव पासुधा दुग्धा दोधामिनस्तदा भयत् ॥ न्द्रोपनसः समभयन क्षीरमूखम्फर यलम् । देवानां फाशनं पात्रं पिनणां राजतंतधा।
एकादशोऽध्यायः] * आदित्याएयानम् * अन्तकचामायद्दोग्धायमोघत्सास्वधारसः। अलाबुपानागानांतक्षकोयत्सकोऽभवत् ।। विषं क्षीरं ततो दोग्धा धृतराष्ट्रोऽभवत्पुनः। असुरैरपि दुग्धेयमायसे शकपीडिनीम् । पात्रे मायामभूद्वत्सः प्राहादिस्तु विरोचनः। दोग्धाद्विमूर्धा तत्रासीन्मायायेनप्रवत्तिता। यक्षश्च वसुधा दुग्धा पुरान्तनिमीप्सुभिः । कृत्वा वैश्रवणं वत्समामपात्रे महीपते ।। प्रेतरक्षोगणैर्दुग्धा धारा रुधिरमुत्वणम् । रौप्यनामोऽभवद् दोग्धासुमाली वत्सएचय। गन्धर्वैश्चपुरादुग्धा वसुधा साप्सरोगणः । यत्संचनरथरत्या गन्धान पद्मदलेतथा । दोग्धा वररचि मनाट्यवेदस्य पारगः । गिरिभिर्वसुधा दुग्धा रनानि विविधानिय । औषधानिच दिव्यानि दोग्धा मेरमहाचल. । वत्सोऽभृद्धिमयास्तत्र पार्नशैलमयंपुनः । वृक्षैश्चरसुधादुग्धा क्षीरं छिन्नप्ररोहणम् । पालाशपात्रंदोग्धातु शाल पुष्पलतातुल । पक्षोऽभवत्ततो यत्स सर्ववृक्षोधनाधिपः । एवमन्यैश्च वसुधा तदा दुग्धायथेप्सितम्॥ आयुर्धनानि सोरयञ्चश्थी राज्यंप्रशासति । न दरिदस्तदा कश्चिन्नरोगीन च पापरत्। नोपसर्गभयंफिश्चित् पृथौराजनिशासति । निन्यंप्रमुदितालोका दु.पशोकविवर्जिताः ॥ धनुष्कोट्याच शैलेन्द्रामुन्सार्यसमहाबलः । भुवस्तलंसमंचक्र लोकानांहितकाम्यया ।। न पुरयामदुर्गाणि नचायुधधरा नराः । क्षयातिशयदु.यञ्च नार्थशास्त्रस्य चादरः ॥ धर्मकरासनालोकाः पृथों राज्यं प्रशासति । कथितानिचपानाणि यतक्षीरञ्चमयातच । येषां यन रुचिस्तत्तद्देयं तेभ्यो विज्ञानता। यज्ञश्राद्धेषु सर्वेषु मया तुभ्यं निवेदितम् ।। दुहितृत्वङ्गता यस्मात् पृथौधर्मयतो मही। तदानुरागयोगाय पृथिवी विश्रुता बुधै. ॥ इति मतस्यपुराणे चैन्याभिवर्णनो नाम दशमोऽध्यायः । एकादशोऽध्यायः आदित्याख्यानम् । पय ऊचु.. आदित्यवंशमगिलं पद स्त्र! यथारमम् । सोमवंशच तत्पर यथावद्वसुमईसि ।। सूत उवाच। विवस्वान् फण्यपात् पूर्वमदित्यामभवत्सुतः । तस्यपदीयं तद्वत्संगा रामी प्रभातथा
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* मत्स्यपुराणम् *
[एकादशो
रैवतस्य सुता राज्ञी रेवतं सुपुवे सुतम् । प्रभा प्रभातं सुपुवे त्वाष्ट्रीसंज्ञा तथा मनुम्॥
यमश्च यमुना चैव यमलो तु बभूवतुः । ततस्तेजोमयं रूपमसहन्ती विवस्वतः ॥ ४ ॥
नारीमुत्पादयामास स्वशरीरादनिन्दिताम् । त्वाष्ट्रीखरूपेणनाम्ना छायेतिभामिनीतदा।।
किङ्करोमीति पुरतः स्थितां तामभ्यभाषत । छाये! त्वं भज भर्तारमस्मदीयं वरानने ! ।।
अपत्यानि मदीयानि मातृस्नेहेन पालय । तथेत्युक्ता तु सा देवमगमत् कापि सुव्रता ॥
कामयामास देवोऽपि संज्ञेयमितिचादरात् । जनयामास तस्यांतु पुत्रञ्च मनुरूपिणम् ॥
सवर्णत्वाञ्च सावणिर्मनोवैवस्वतस्य च । ततः शनिञ्च तपती विष्टिं चैव क्रमेण तु ॥
छायायां जनयामास संज्ञेयमितिभास्करः। छाया स्वपुत्रेऽभ्यधिक स्नेहं चक्रेमनी तथा।
पूर्वो मनुस्तु चक्षाम न यमः क्रोधमूच्छितः । सन्तर्जयामासतदा पादमुद्यम्य दक्षिणम् ।
शशाप च यमं छाया सक्षतः कृमिसंयुतः । पादोऽयमेको भविता पूयशोणितपित्रवः ।
निवेदयामास पितुर्धर्मः शापादमर्पितः । निष्कारणमहं शप्तोमात्रा देव ! सकोपया ॥
बालभावान् मया किञ्चिदुद्यतश्चरणः सकृत् । मनुना वार्यमाणापि मम शापमदाद्विभो।
प्रायोन माता सास्माकं शापेनाहं यतो हतः। देवोऽप्याहयमं भूयः किङ्करोमिमहामते।
मोात्कस्यनदुःखंस्यादथपाकर्मसन्ततः । अनिवार्याभवस्यापिकाकथान्येपुजन्तुषु ।
पाकवाकुर्मया दत्तो यः कृमीन् भक्षयिष्यति । क्लेदञ्च रुधिरश्चैव यत्सायमपनेष्यति ॥
एवमुक्तस्तपस्तेपे यमस्तीवं महायशाः । गोकर्णतीर्थे वैराग्यात् फलपत्रानिलाशनः ॥
आराधयन् महादेवं यावद्वर्षायुतायुतम् । वरं प्रादान् महादेवः सन्तुष्टः शूलभृत्तदा ॥
पत्रेसलोकपालत्वं पितृलोकेनृपालयम् । धर्माधर्मात्मकस्यापि जगतस्तुपरीक्षणम् ।
एवं स लोकपालत्वमगमच्छूलपाणिनः । पितृगाञ्चाधिपत्यञ्च धर्माधर्मस्य चानघ ।
विवस्वानथ तज्ज्ञात्वा संशायाः कर्मणितम् । त्यषुः समीपमगमदाचचक्षे चरोपवान् ।
समुबान ततस्त्यपासाल्त्यपूर्व द्विजोत्तमाः । लयासहन्नी भगवन! महस्तीवंतमोजुदम् ।
पडयाम्पमास्थाय मत्सकाशमिहागता । निवारिता मया सातु त्यया चैव दिवाकर!
यस्मादविज्ञाततया मत्सकाशमिहागता! तस्मान्मदीयं भवनं प्रवेष्टुं न त्वमर्हसि ॥२५
एयमुक्ता जगामाय मरदेशमनिन्दिता। यड्या म्पमास्थाय भूतले सम्प्रतिष्ठिता ॥२६॥
ॐ २५ त ऽध्याय ] आदित्याख्यानम् * तस्मात्प्रसाद कुरु मे यद्यनुग्रहमागहम् । अपनेप्यामि ते तेजो यन्ने कृत्वा दिवाकर ।। रूपतवकरिष्यामि लोकानन्दकर प्रभो । तथेत्युक्त स रविणाभ्रमी कृत्वा दिवाकरम्। पृथक चकारतत्तेजधान विष्णोरकरपयत् । त्रिशरचापिन्द्रग्यवत्रमिन्द्रस्यचाधिकम् । दैत्यदानवसहर्तु सहनकिरणात्मकम् । रूपञ्चाप्रतिमञ्चके त्वण पदयामृते महत् ॥ न शशाकाथ तद्रष्टुं पादरूपरवे पुन । अर्चास्वपितत पादौनकश्चितकारयेत कचित् ॥ य करोति स पापिष्टा गतिमाप्नोति निन्दिताम् । कुष्ठरोगमवाप्नोति लोकेऽस्मिन् टु खसयुत ॥ ३ ॥ तस्माच नर्मकामाथीं चिनेप्वायतनेषु च । न चित्कारयेत्पादो देवदेवस्य धीमत । स भगवान् । गत्वा भूलोकममराधिप । कामयामाल कामात? मुखएव दिवाकर । अश्वरूपेण महता तेजसा च समामृत । मज्ञा च मनसा क्षोभमगमद्यविहला ॥ ३॥ नासापुटाभ्यामुत्सृपरोऽयमितिशङ्कया । ततसस्ततोजातायश्विनावितिनिश्चितम् ।। दनीसुतत्यानसवाती नासत्यानासिकानत । शात्वाचिरायत देवसन्तोषमगम परम् । विमानेनागमत् स्वर्ग पन्या सह मुदान्विता ॥ २७॥ सावर्णोऽपि मनुमरावद्यायास्ते तपोधन | शनिम्तपोरादाप ग्रहसाम्य तत पुन ॥ यमुना तपती चैवपुनर्नधौ भवतु । विधिोगत्मिका तहत बालत्वेन व्यवस्थिता ।। मनीवयस्यतस्यासन दशपुत्रा महारय । इम्तु प्रामस्तेपा पुत्रेण्या समनायत ॥ इश्या कुशनामश्च बरिणो कृष्ण पपच । नरिष्यत म्यश्च शांतिश्च महाय? ॥ पृपधश्चाथ नाभाग सर्ने ते दिव्यमानुपा ॥४॥ अभिपिच्य मनु पुप्रमिल ज्येष्ठ स धार्मिक । जगाम तपोभूय स महेन्द्रयनारयम् । अथ दिगनयसिभ्यर्थमित प्रायान् महीमिमाम् । भ्रमन् दीपानि सर्वाणि दमामृत मप्रर्पयन् ॥ ८ ॥ जगामोपरन शम्भोण्यारण प्रतापवान । यपद्रुमरतामीण नाम्ना शग्यण मान । रमते यदेवेश शम्भु सोमाईशेगर । उमया समयम्तय पुग शरवणे न ॥ .. ॥ पुग्नामसत्त्व यन् मिचिदागमिप्यति ते यने 1 श्री यमेप्यनि तसा दशयोननमण्डी ॥
IT २६ * मत्स्यपुराणम् * [एकादशोऽध्यायः अज्ञातसमयो राजा इलः शरवणे पुरा । स्त्रीत्वमाप विशन्नेव घडवात्त्वं हयस्तदा ।। पुरुषत्वं हृतं सर्व स्त्रीरूपे विस्मितो नृप । इलेति साभवनारी पीनोन्नतघनस्तनी॥४८॥ उन्नतश्रोणिजघना पद्मपत्रायतेक्षणा । पूर्णेन्दुवदना तन्वी विलासोल्लासितेक्षणा। मूलोन्नतायतभुजा नीलकुञ्चितमूर्धजा । तनुलोमा सुदशना मृदुगम्भीरभापिणी ॥५०॥ श्यामगौरेण वर्णेन हंसवारणगामिनी । कार्मुकभू युगोपेता तनुताम्रनखाङ्करा ॥५१॥ भ्रमन्ती च चने तस्मिन् चिन्तयामास भामिनी। को मे पिताऽथवा भ्राता का मे माता भवेदिह ॥ ५२ ॥ कस्य भर्तुरहं दत्ता कियद्वतस्यामि भूतले । इति चिन्तयती दृष्टा सोमपुत्रेण साङ्गना इलारूपसमाक्षितमनसा वरवर्णिनीम् । वुधस्तदाप्तये यत्नमकरोत् कामपीडितः ॥५४॥ विशिष्टाकारवान् दण्डी सकमण्डलुपुस्तकः । वेणुदण्डकृतानेकपवित्रकगणित्रकः ॥५५॥ द्विजरूपः शिखी ब्रह्मनिगदन् कर्णकुण्डलः । वटुभिश्वान्वितोयुक्त समित्पुष्पकुशोदकः किलान्विपन्वने तस्मिन्नाजुहाव स तामिलाम् । पहिर्यनस्यान्तरितः किल पादपमण्डले ससम्भ्रममकस्मात्ता सोपालम्भमिवावदत् । त्यत्त्वाग्निहोत्रशुश्रूपां वगता मन्दिरान्मम इयं विहारवेला ते ह्यतिक्रामति साम्प्रतम् । एहोहि पृथुसुश्रोणि ! सम्भ्रान्ताकेन हेतुना इयं सायन्तनीवेला विहारस्येह वर्तते । कृत्वोपलेपनं पुप्पैरलंकुरु गृहं मम ॥६॥ सावत्रीद्विस्मृताहं सर्वमेतत्तपोधन !! आत्मानं त्याञ्च भर्तारं कुलञ्च बदमेऽनघ । बुधः प्रोवाच तान्तन्वीमिला त्वं वरवणिनि !! अहञ्च कामुको नामबहुविद्योबुधःस्मृतः तेजस्विनः कुलेजातः पितामे ब्राह्मणाधिपः । इति सा तस्यवचनात्प्रविष्टायुधमन्दिरम् रतस्तम्भसमायुक्तं दिव्यमायाविनिर्मितम् । इला कृतार्थमात्मानं मेने तद्भवनस्थिता ॥ महोवृत्तमहोरुपमहोधनमहोकुलम् । मम चास्य च मे भर्तुरहोलावण्यमुत्तमम् ॥६५॥ रमेच सा तेन सममतिकालमिला ततः । सर्वभोगमये गेहे यथेन्द्रभवने तथा ॥६६॥ इति मत्स्यपुराणे इलोपारयाने एकादशोऽध्यायः ।
- A द्वादशोऽध्यायः सूर्यवंशवर्णनम् । सन उवाच। अथाविपन्ती राजानं भ्रातरस्तस्यमानवाः । इश्याकुसमुपाजग्मुस्तदाशरवणान्तिकम् ।। ततस्तेददृशुः सर्वे घडवामप्रत. म्यिताम् । रत्नपाणकिरणदीतकायामनुत्तमाम् ॥२|| पर्याणप्रत्यभिमानान् सर्वे विस्मयमागताः । अयं चन्द्रप्रमो नाम बाजीतस्य महात्मनः अगमदडया पमुनमं येन हेतुना । ततस्तु मैत्रावाणि पप्रच्छुग्ते पुरोधसम् ॥ ४ ॥ किमित्येतदभूचिबदयोगविदाम्बर !! पशिएश्चारचीन सनं दृष्ट्वा तद्धघानचक्षुषा । समयः शम्भुदयितारत शरवणे पुरा । यः पुमान् प्रविशेदन स नारीत्यमवाप्स्यति ॥ अयमण्योऽपि नारीन्चमगादासा सहवतु । पुन' पुरयतामेति यथासी धनदोपमः ॥ तथैव यतः फतथ्यचाराध्येय पिनाकिनम् । ततम्ने मानवा जग्मुर्यत्र देवो महेन्याः ॥ तुष्टुपुर्विविध स्तोत्र: पार्यतीपरमेश्वरी । तावूचनुग्लादयोऽयं समयः किन्तु साम्पतम् इश्याफोरयमेधेनयन्फलं म्यात्तदाययोः । दत्त्या किम्पुरगीरः स भविष्यत्यमशयम् तन्युक्ताम्तनम्नेम्नुजग्मुर्चचम्यतान्मजाः । श्याकोचाग्यमेधेनचेत किम्पुगयोऽभवत् मासमेकम्पुमान्धीरः बीच भासमभूत पुन । युधम्य भवने तिष्ठनिलो गर्मधरोऽभवत् अजीजनन् पुरमेश्मनेरगुणमंयुतम् । बुधशोत्पारन पुत्र न्यायमगमत्तत ॥ १३ ॥ लय नाम्ना तमिलामृतमभनदा । सोमार्यवेशयोगदापिलोऽभन्मनुनन्दन ॥१॥ पं पुरुग्याः पुंसोरभयाशपाईन । स्यापुरफयंशम्य तर्पयोक्तम्तगधना: n!.. पिम्पुमान्ये च मुगुन इति जोगनं । पुन पुषप्रयमभून मुलग्याराजिनम् ॥ उत्पाला गयम्नसरितान्या पीर्यापान । एकागोत्पलानाम गाम्यनुगपामता हरिनाम्याय दिपपूपा पिधुना पुरमिः मा । प्रतिष्टाने मिरित्रयाय सपुग्यमं गुतम् जागापून भातुं पण दिपपलाशनम् मापदामादो देश गरिप्यन्ताय पुरोभूननो नाम महापरः । नामागम्याग्नु पृष्टम्यय गुरयम् २८ * मत्स्यपुराणम् * [द्वादशो धृतकेतुश्चित्रनाथो रणधृष्टश्च वीर्यवान् । आन” नाम शर्यातेः सुकन्याचैव दारिका आनर्तस्याभवत्पुत्रो रोचमानः प्रतापवान् । आन? नाम देशोऽभूनगरीव कुशस्थली रोचमानस्य पुत्रोऽभूदेवोरैवत एव च । ककुमीवापरान्नामज्येष्ठः पुत्रशतस्य च ॥२३॥ रेवती तस्य सा कन्या भार्या रामस्यविश्रुता । करूपस्य तु कारूपावहवः प्रथिताभुवि पृषधोगोवधाच्छ्द्रो गुरुशापादजायत । इक्ष्वाकुवंशं वक्ष्यामि णुध्वमृपिसत्तमाः ॥ इक्ष्वाको पुत्रतामाप विकुक्षि म देवराट् । ज्येष्ठः पुत्रशतस्यासीदश पञ्चव तत्सुताः मेरोरुत्तरतस्तेतु जाताः पार्थिवसत्तमाः । चतुर्दशोत्तरञ्चान्यच्छ तमस्य तथाभवत् ॥ मेरोदक्षिणतो ये वै राजानः सम्प्रकीर्तिताः । ज्येष्ठः ककुत्स्थो नाम्नाऽभूत्तत्सुतस्तु सुयोधनः ।। २८ ॥ तस्य पुत्रः पृथु म विश्वगश्च पृथोः सुतः । इन्दुस्तस्यवपुत्रोऽभूयुवनाश्वस्ततोऽभवत् श्रावस्तश्चमहातेजावत्सकस्तत्सुतोऽभवत् । निर्मिता येन श्रावस्तीगौडदेशे द्विजोत्तमाः श्रावस्ताद् वृहदश्वोऽभूत् कुवलाश्वस्ततोऽभवत् । धुन्धुमारत्वमगमद् धुन्धुं नाम्ना हतः पुरा ॥ ३१॥ तस्य पुत्रान्त्रयो जाता ढ़ाश्वो दण्ड एव च । कपिलाश्वश्च विख्यातो धौन्धुमारिः प्रतापवान् ॥ ३२ ॥ . दृढ़ाश्वस्य प्रमोदश्चहर्यश्वस्तम्यचात्मजः। हर्यश्वस्यनिकुम्भोऽभूसंहताश्वस्ततोऽभवत् भरताश्चोरणाश्यश्च संहताश्वसुतावुभौ । युवनाश्वोरणाश्वस्य मान्धाताचततोऽभवत् मान्धातुः पुरुकुत्सोऽद्धर्मसेनश्च पार्थिवः । मुचुकुन्दश्च विख्यातः शत्रुजियः प्रतापवान् पुग्नुत्सग्य पुत्रोऽभूबसूदोनर्मदापतिः । सम्भूतिस्तस्यपुत्रोऽभूत्त्रिधन्याचततोऽभवत् विधन्यनःसुनोजातम्घय्यारण इति स्मृतः । तस्मात्सत्यवतीनामतस्मात्सत्यरथःम्मृतः तम्य पुनो हरिश्चन्द्रो हरिश्चन्द्राचगेहितः । गेहिताच घृको जातो वृफाढाहुरजायत । सगरम्तम्य पुरोऽभूद्वाजा परमधार्मिकः । दे. भार्ये सगरस्यापि प्रभाभानुमती तथा । नाभ्यामाराधितः पूर्वमावोऽग्निः पुत्रकाम्यया । और्यम्तुष्टम्तयोमादायथेष्टं घरमुत्तमम् एगा पटिसम्माणि मुनमेकं तथापग। गृहानु वंशकर्तारं प्रभाऽगृहाद यहम्नदा ॥४॥ -- २६ । ऽध्यायः] * सूर्यवंशानुकीर्तनम् । एकं भानुमती पुत्रमगृह्णादसमञ्जसम् । ततः पटिसहस्राणि सुपुवे यादवीप्रभा ॥४२॥ खनन्तः पृथिवीं दग्धा विष्णुना येऽश्वमार्गणे असमन्जसस्तु तनयोयोंऽशुमान्नामविश्रुतः तस्यपुत्री दिलीपस्तु दिलीपात्तु भगीरथः । येन भागीरथी गङ्गा तपः कृत्वावतारिता ॥ भगीरथस्य तनयोनाभाग इतिविश्रुतः । नाभागस्यावरीपोऽभूत्सिन्धुद्वीपस्ततोऽभवत् तस्यायुतायुः पुत्रोऽभूतुपर्णस्ततोऽभवत् । तस्य कामापपादस्तु सर्वकर्मा ततः स्मृतः तस्यानरण्यः पुत्रोऽभून्निघ्नस्तस्य सुतोऽभवत् । निनपुत्रावुभौजाती अनमित्ररघुनुपी अनमित्रो वनमगादविता सकृते नृपः । रघोरभू दिलीपस्तु दिलीपादजकस्तथा ॥४८t दीर्घवाटरजाजातश्चाजपालस्ततो नृपः । तस्माद्दशरथो जातस्तस्य पुनचतुष्टयम् ।। नारायणात्मकाः सर्वे रामस्तेप्चनजोऽभवत् । रावणान्तकरस्तद्वद्घूणां वंशवर्धनः ॥ पाल्मीकिस्तस्य चरितं चक्र भार्गवसत्तमः । तस्य पुत्री कुशलवाविन्याकुमुलवर्धनौ । अतिथिस्तु कुशाजशे निपधस्तस्य चात्मजः । नलस्तु नैपधस्तस्मान्नभास्तस्मादजायत ॥ ७२ ॥ नभसः पुण्डरीकोऽभूत् क्षेमधन्वा ततः स्मृत । तस्य पुनोऽभवहीरो देवानीक. प्रतापवान् ॥ ५३॥ अहीनगुस्तस्य सुतः सहनश्चिन्तत. परः । ततचन्द्रावलोफस्तु तारापीठस्ततोऽभवत् । तस्यात्मजश्चन्द्रगिरि नुश्चन्द्रस्ततोऽभवत् । श्रुतायुरभयत्तस्मादारते यो निपातित. ॥ नलौतायेचविण्यातौ वंशे कश्यपसम्भवे । वीरसेनसुतस्तद्वन्नैपधश्च नराधिपः ॥५६॥ एते वैवस्वते वंशे राजानो भूरिदक्षिणा. 1 इक्ष्वाकुवंशप्रभवा प्राधान्येन प्रतिताः। इति धीमत्स्यपुराणे सूर्यवंशानुकीर्तनो नाम द्वादशोऽध्यायः ।
त्रयोदशोऽध्यायः
देव्या अष्टोत्तरशतनामकथनम् ।
मनुरवाव।
भगवन् । श्रोतुमिच्छामि पितृणावशमुत्तमम् ।रवेश्वश्राद्धदेवत्व सोमस्य व विशेषत ।
मत्स्य उवाच।
हन्तते कथयिष्यामि पितॄणा वशमुत्तमम् । स्वर्गेपितृगणा सप्तत्रयस्तेपाममूर्त्तय ॥
मूर्तिमन्तोऽथ चत्वार सर्वपाममितौजस । अमूर्त्तय पितृगणा वैराजस्य प्रजापते ।।
यजन्ति यान देवगणा वैराजा इति विश्रुता ।
दिवि ते योगविभ्रण प्राप्य लोकान् सनातनान् ॥ ४ ॥
'पुनर्गह्मविदान्ते तुजायन्ते ब्रह्मवादिन ।सप्राप्यता स्मृति भूयो योग साङ्ख्यमनुत्तमम्।
सिद्धिप्रयान्ति योगेन पुनरावृत्तिदुर्लभाम् । योगिनामेचदेयानि तस्माच्छ्राद्धानिदातृभिः
एतेपा मानसीकन्यापत्नी हिमवतोमता। मैनाकस्तस्यदायाद क्रौञ्चस्तस्याग्रजोऽभवत् ।
मोञ्चद्वीप स्मृतो येन चतुर्थों घृतसवृत । मेनाचसुपुतिन कन्यायोगवतीरतत ८॥
उमैकपर्णापर्णा च तीव्रतपरायणा । रतस्यैका सितस्यैका जैगीपव्यस्यचापरा ||
दत्ता हिमवता वाला सर्वा लोके तपोऽधिका ।
ऋषय ऊचु ।
यस्माद्दाक्षायणी पूर्व ददाहात्मानमात्मना ॥ १० ॥
हिमवदुहितातद्वन् कथ जाता महीतरे । सहरन्ती किमुत्तासौ सुता वा ब्रह्मस नुना ॥
दक्षेण रोकजननी मत। विस्तरतो घद ।
सूत उवाच।
दक्षम्य यो वितने प्रभृतयग्दक्षिणे ॥१२॥
समानेषु देवेषु प्रोवाच पिता सती । विमयं तात ' भर्तामे योऽम्मिन्नाभिमन्त्रित ।
अयोग्य इति तामाह दक्षो योपु शरभृत । उपसहारछद्रम्नेनामगठभागयम् ॥ ४॥
त्रयोदशोऽध्यायः] * देव्या अटोचरशतनामकथनम् * चुकोपाथ सती देहं त्यक्षामीति त्वदुद्वम् । दशानान्त्वञ्च भविता पितॄणामेकपुत्रकः। क्षत्रियत्वेऽश्वमेधे व रुदात्त्वं नाशमेष्यसि । इत्युक्त्वायोगमास्थायस्वदेहोद्भवतेजसा । निर्दहन्ती तदात्मानं सदेवासुरकिन्नरैः । कि किमेतदिति प्रोक्ता गन्धर्वगणगुहाकः । उपगम्यानवीद्दक्षः प्रणिपत्याथ दुःखितः । त्वमस्य जगतो माताजगत्सौभाग्य देवता॥ दुहितृत्वङ्गता देवि ममानुग्रहकाम्यया । न त्वया रहितं किञ्चित् ब्रह्माण्डेसचराचरम् ॥ प्रसाद कुरु धर्मजे न मान्त्यक्तुमिहार्हसि । प्राह देवी यदारन्धं तत्कार्य मे न संशयः किं त्वपश्यं त्वया मत्ये हतयझेन लिना । प्रसादेलोकसृपार्य तग कार्य ममान्तिके ।। प्रजापतिस्त्वं भविना टशानामहजोप्यलम् । मदंशेनादनापष्टि भविष्यन्त्यङ्गजास्तच ।। मत्सन्निधौ तपः कुर्वन् प्राप्स्यसेयोगमुत्तमम् । एवमुक्तोऽत्रवीक्षाकेषुकेषुमयाऽनो ॥ तीर्थेषु च त्वं द्रष्टव्या स्तोतव्या कैश्च नामभिः । देव्युवाच । सर्वदा सर्वभूतेषु द्राच्या सर्वतो भुवि ॥ २४ ॥ सर्वलोकेषु यत्किञ्चिद्रहितं न मया विना । तथापियेपुग्धानेपुद्रष्टव्यासिद्धिमाप्मुभिः ॥ स्मर्तव्याभूतिकामेर्वातानिवक्ष्यामितन्यत. 1 वाराणम्यांविशालाक्षीनैमिषेलिङ्गधारिणी। प्रयागे ललिता देवी कामाक्षी गन्धमादने । मानसे कुमुदा नाम विश्वकायातथाम्बर ।। गोमन्ते गोमती नाम मन्दरे कामचारिणी । मदोत्कटा चैनरथे जयन्ती हस्तिनापुरे ॥ कान्यकुब्जे तथा गौरी रम्भा मलयपर्वते । एकाम्भकेकीर्तिमतीविश्वाविश्वेश्वरेविदुः ॥ पुष्करे पुरहतेति वेदार मार्गदायिनी । नन्दा हिमवत' पृष्टे गोकर्णे भद्रकर्णिका ॥३०॥ स्थानेश्वर भवानी तु विल्वके विल्वपत्रिका । श्रीशैले माधवी नाम मदामटेश्वरैतथा ६ जया वराहशैले तु कामला कमलालये । स्ट्रकोप्याच नद्राणी काली कालक्षरेगिरी ।। महालिंगे तु कपिला मर्कोटे मुकुटेश्वरी । शालिग्रामे महादेवी शिवलिंगे जलप्रिया । मापापुर्शङ्कुमारी तु सन्ताने ललिता तथा । उत्पलाक्षी सहनाक्षेकमलाक्षेमहोत्पला ॥ गंगाया मंगला नाम विमला पुरषोत्तमे । विपाशायाममोघाक्षी पाटला पुण्डपढने ॥ नारायणी मुपा तु विकटे भद्रमुन्दरी । विपुले विपुला नाम कल्याणी मलयाचले।
* मत्स्यपुराणम् * [त्रयोदशो कोटीकोटितीर्थ तु सुगन्धा माधये वने । कुब्जाग्न त्रिसन्ध्यानुगंगाद्वारेरतिमिया ॥ शिवकुण्डे सुनन्दा तु नन्दिनी देविकातटे । रुक्मिणी द्वारयत्यान्तु राधा वृन्दावने वने देवकी मथुरायान्तु पाताले परमेश्वरी । चित्रकूटे तथा सीताविन्ध्येचिल्लयनिवासिनी॥ सह्याद्रावकवीरा तु हर्मचन्द्रेति चन्द्रिका । रमणा रामतीर्थतु यमुनायां मृगावती ॥४७ करवीर महालक्ष्मीरुमादेवी विनायके । अरोगा वैद्यनाथे तु महाकाले महेश्वरी ॥४६॥ अभयेत्युष्णतीर्थेषु चामृता विन्ध्यकन्दरे । माण्डव्ये माण्डवी नामस्याहामाहेश्वरपुरे। छागलण्डे प्रचण्डातु चण्डिका मकरन्दके । सोमेश्वरे वरारोहा प्रभासे पुष्करावती ॥ देवमाता सरस्यत्यां पारा पारातटे मता । महालये महाभागा पयोष्ण्यां पिङ्गलेश्वरी। सिहिका कृतशौचेतु कार्तिकेये यशस्करी । उत्पलावर्त्तके लोला सुभद्रा शोणसङ्गमे ।। माता सिद्धपुरं लक्ष्मीरङ्गना भरताथमे । जालन्धरे विश्वमुखी तारा किष्किन्धपर्वते । देवदारुवने पुष्टिर्मेधा काश्मीरमण्डले । भोमा देवी हिमाद्रीतु पुष्टिविश्वेश्वरे तथा । कपालमोवने शुद्धिर्माता कायावरोरणे । शङ्खोदारे धरा नाम धृतिः पिण्डारके तथा ॥ कालातु चन्द्रभागाया मच्छोदे शिवकारिणी । येणायाममता नाम वदर्यामुर्वशी तथा। औषधी चोत्तरकुरी कुशद्वीपे कुशोदका । मन्मथा हेमकटे तु मुकुटे सत्यवादिनी ।५७ अश्वत्थे वन्दनीया तु निधिर्वश्रवणालये । गायत्री वेद्वन्दने पार्वती शिवसनियो । देवलोके तथेन्द्राणी ब्रह्मास्येषु सरस्वती । सूर्यविम्ये प्रभा नाम मातृणां वैष्णवीमता अरन्धती सतीनान्तु रामासु च तिलोत्तमा । चित्तेब्रह्मकला नाम शक्तिःसर्वशरीरिणाम्। एतदुद्देशतः प्रोफ नामाष्टशतमुत्तमम् । अष्टोत्तरच तीर्थानां शतमेतदुदाहृतम् ॥ ५४ ॥ यः स्मरेणुयाद्वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते । एषु तीर्येषुयः कृत्वा मानपश्यति मां नरः। सर्वपापविनिर्मुकः कसं शिवपुरे वसेत् । यस्तु मत्परमं कालं करोत्येतेषु मानवः ॥ स भित्या ब्रह्मसदनं पदमभ्येति शाङ्करम् । नाम्नामएशतं यस्तु श्रावयेच्छिवसानिधी तृतीयायामथाप्टम्यां बहुपुत्रो भवेन्नरः । गोदाने श्राद्धदाने वा महन्यहनि वा बुधः ।। देयानुनविधी विद्वान् पठन् ब्रह्माधिगच्छति । एवं बदन्ती सा तत्र ददाहात्मानमात्मना स्वायम्भुयोऽपिफालेनदक्षः प्राचेतसोऽभवत् । पार्वतीसाभवधी शिवदेहाईधारिणी।
ऽध्यायः] पितृवंशानुकीर्तनम् * ३३ मेनागर्भसमुत्पन्ना भक्तिमुक्तिफलप्रदा ! अरुन्धती जपन्त्येतत् प्राप योगमनुत्तमम् ।६१ पुरूरवाश्च राजपिर्लोके व्यजयतामगात् । ययातिः पुत्रलाभञ्च धनलाभञ्च भार्गवः ६२|| तथान्येदेवदैत्याश्च ब्राह्मणाःक्षत्रियास्तथा । वैश्या-शूद्राश्चयहवः सिद्धिमीयुर्यथेप्सिताम् यत्रैतल्लिसितं तिष्ठेत् पूज्यते देवसन्निधौ । न नत्र शोको दौर्गत्यं कदाचिदपि जायते। इति श्रीमत्स्यपुराणे पितृवंशान्वये गौरीनामाष्टोत्तरशत-कथनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः। h चतुर्दशोऽध्यायः पितृवंशानुकीर्तनम् । सूत उवाच। लोका.सोमपथा नाम यसमारीचनन्दनाः । वर्तन्ते देवपितरो देवायान् भावयन्त्यलम् । अग्निप्वात्ताइतिरयातायज्वानो यनसंस्थिताः । अच्छोदानामतेपान्तुमानसीकन्यकानदी अन्छोदन्नाम च सरः पितृभिनिमितंपुरा । अच्छोदा तु तपश्चनेदिव्यं वर्ष सहस्रकम् । आजग्मुः पितरस्तुष्टाः किलादातुञ्च तां परम् । दिव्यम्पधरा.सर्वेदिव्यमाल्यानुलेपनाः । सर्वे युवानोयलिनः कुसुमायुधसन्तिमाः । तन्मध्येऽमावसुंनाम पितरंचीक्ष्यसांऽगना। पमेवरार्थिनी संग कुसुमायुधपीडिता । योगाभ्रष्टा तु सा तेन व्यभिचारेणभामिनी । धरान्तु नास्पृशत् पूर्वपपाताय भुवस्तले । तिथावमावसूर्यस्यामिच्छांच न तां प्रति। धैर्यण तम्य सा लोकरमावास्येतिविधृता । पितृणांचल्लभातस्यात्तस्रामक्षयकारकम् । अच्छोदाऽयोमुरीदीना लज्जितातपस क्षयात् ।सा पितृनप्रार्थयामासपुरंगात्मप्रसिद्धये विलप्यमाना पितृभिरिदमुक्ता तपस्विनी । भविष्यमर्थमालोपर देवकार्यञ्च ते तदा ॥ इदमुचुमहाभागाः प्रसादशुभयागिरा। दिवि दिव्यशरीरेण यत्किशि क्रियते युधः । • तेनेच तत्कर्मफलं भुज्यते घरपणिनि । सयं फलन्ति पर्माणि देवत्वे प्रेत्य मानुषे । तम्मात्त्वपुत्रि!तपस प्राप्स्यसेप्रेन्यतन्फलम् । अष्टाविशेभवित्रीत्वं द्वापरेमान्ययोनिजा प्यतिम्मापितृणां त्वंककुलमयाम्यसि। तस्मादायसो.फन्यात्यमवायभविष्यसि .
पराशरस्य * मत्स्यपुराणम् * [पञ्चदशो कन्या भूत्वा च लोकान् स्वान् पुनराप्स्यसि दुर्लभान् । वीर्येण पुत्रमेकमवाप्स्यसि ॥१५॥ द्वीपे तु बदरीप्राये चादरायणमच्युतम् । स वेदमेकं बहुधा विभजिष्यति ते सुतः ॥ पोरवस्यात्मजीद्वौ तु समुद्रांशस्य शन्तनोः। विचित्रवीर्य्यस्तनयस्तथा वित्राङ्गदोनृपः। इमाबुत्पाद्य तनयो क्षेत्रमावस्य धीमतः । प्रौष्ठपद्यष्टकारूपा पितृलोके भविष्यसि ॥१८ नाम्ना सत्यवती लोके पितृलोके तथाटका । आयुरारोग्यदा नित्यं सर्वकामफलप्रदा ।। भविष्यसिपरे कालेनदीत्वञ्चगमिष्यसि । पुण्यतोयासरिच्छ्रष्ठालोके ह्यच्छोदनामिका। इत्युक्त्वा सगणस्तेषां तत्रैवान्तरधीयत । साप्यवाप च तत्सर्व फलं तदुदितं पुरा॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे पितृवंशानुकीर्त्तनो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ पञ्चदशोऽध्यायः पितृवंशानुकीर्तनम् । सूत उवाच। विभ्राजानाम चान्येतु दिविसन्ति सुवर्चसः । लोकावर्हिपदोयत्र पितरः सन्तिसुव्रताः। यत्र बहिणयुक्तानि विमानानि सहस्रशः । सङ्कल्प्य वहिपो यत्र तिष्ठन्ति फलदायिनः । यत्राभ्युदयशालासु मोदन्ते श्राद्धदायिनः । यांध देवासुरगणा गन्धर्वाप्सरसांगणाः ॥ यक्षरक्षोगणाश्चैव यजन्ति दिवि देवताः । पुलस्त्यपुत्राः शतशस्तपोयोगसमन्विताः । महात्मानो महाभागा भक्तानामभयप्रदाः । एतेषां पीवरी कन्या मानसी दिविविश्रुता योगिनी योगमाता च तपश्चक्रे सुदारुणम् । प्रसन्नो भगवांस्तस्यावरंचवेतु सा हरेः। योगवन्तं सुरूपंच भर्तारं विजितेन्द्रियम् । देहि देव! प्रसन्नस्त्वंपति मे उवाच देवो भविता व्यासपुत्रो यदा शुकः । भविता तत्य भार्यात्वं योगाचार्य्यस्य सुवते ॥ ८॥ घदताम्वरम् ।
ऽध्यायः] * पितृवंशानुकीर्तनम् । भविष्यति च ते कन्या कृत्वी नाम व योगिनी! पाञ्चालाधिपतेर्दया मानुष्यस्य त्वया तदा ॥ ६॥ जननीब्रह्मदत्तस्ययोगसिद्धा च गो.स्मृता । कृष्णोगोरसप्रभुःशम्भुभविष्यन्तिवतेसुताः । महात्मानोमहाभागागमिष्यन्ति परम्पदम् । तानुत्पाद्यपुनर्योगात्सपरा मोक्षमप्यसि । सुमूर्तिमन्तः पितरो वशिष्ठस्य सुतास्मृताः। नाना तुमानसाः सर्वे सर्वेते धर्ममूर्तयः । ज्योति सिपुलोकेपुये वसन्ति दिवः परम् । विराजमाना.कीडन्तियत्रतेश्राद्धदायिनः। सर्वकामसमृद्धेपुषिमानेष्वपिपादनाः । किं पुनः श्राद्धदा विप्राभक्तिमन्तक्रियान्विताः। गोर्नाम कन्या येपान्तु मानसी दिवि राजते । शुकस्य दयिता पत्नी साध्यानां कीर्तिद्धिनी ॥ १५ ॥ मगचिगर्मानानातुलोफामानण्टमण्डले। पितरोयत्रतिष्ठन्तिहविष्यन्तोऽगिर.सुताः ॥ -तीर्थश्राद्धप्रदायान्ति ये च क्षत्रियसत्तमाः । राजान्तु पितरस्तेवै स्वर्गमोक्षफलप्रदाः । एतेपांमानसीकन्या यशोदा लोकविश्रुता । पत्नी हांशुमतः श्रेष्ठा स्नुषा पंचजनस्य च ॥ जनन्यथ दिलीपस्य भगीरथपितामही । लोका.कामदुधानाम कामभोगफलप्रदाः॥१६ सुस्वधा नाम पितरोयत्रतिष्ठन्तिमुनता. । आज्यपा नाम लोरेषु कर्दमध्य प्रजापतेः। पुलहानजदायादा वैश्यास्तान भावयन्ति च। यत्र श्राद्धरताः सर्वे पश्यन्तियुगपद्गताः । मातृभ्रातृपितृावर सविसम्बन्धिवान्धवान् । अपिजन्मायुत शाननुभृतान्सहनशः ।। एनेवां मानसी कन्या विरजानाम विध्रुता । या पत्नीनहुपस्यासीद्ययातेर्जननी तथा । एकाएकाऽभवन् पश्चाटु ब्रह्मलोके गता सती। त्रय पतेगणा प्रोक्ताश्चतुर्थन्तुबदाम्यतः। लोकारतु मानसा नाम ब्रह्माण्डोपरि संस्थिताः। येपान्तु मानसी कन्या नर्मदा नाम विश्रुता ॥ २०॥ सोमपानामपितरोयनतिष्ठन्तिशाश्वता.। हत्यारश्यादिकसरं मानसेसाम्प्रतस्थिताः। "नर्मदानाम वान्नु फन्यातीयपहासरिन् । भूतानि या पावयति दक्षिणापथगामिनी ॥ नेभ्यःसर्वे तु मनपा प्रजा सर्गेपुनिर्मिताः। शात्याश्राद्धानि पुगन्तिधर्मामानेऽपिसदा। तेभ्य एव पुन प्रानुं प्रसादायोगसन्ततिम् । पितृपामादिसर्गेनु श्राद्धमेयविनिर्मिनम् ।
२६.
* मत्स्यपुराणम् *
[पोड़शो
सर्वेषां राजतं पात्रमथवा रजतान्वितम् । दत्तस्वधापुरोधाय पितॄन् प्रीणाति सर्वदा ।
अग्नीपोमयमानान्तुकार्यमाप्यायनंवुधैः । अग्न्यभावेऽपिविप्रस्य पाणायपिजलेऽथवा ।
अजाकणेऽश्वकणे चा गोडे चा सलिलान्तिके।
पितॄणामम्बरं स्थानं दक्षिणादिक प्रशत्यते ॥ ३२ ॥
प्राचीनावीतमुदकं तिलाःसव्याङ्गमेव च । दर्भामांसं च पाठीनं गोक्षीरं मधुरा रसाः ।।
खड्गलोहामिषमधुकुशश्यामाकशालयः । यवनीवारमुद्गक्षु शुकपुष्पवृतानि च ॥३४॥
घल्लभानि प्रसस्तानि पितृणामिहसर्वदा । द्वेष्याणिसम्प्रपक्ष्यामिश्राद्धेषानियानितु ।
मसूरशणनिप्पावराजमाषकुसुम्भिकाः । पद्मविल्वाधत्तूरपारिभद्राहरूपकाः ॥३६॥
न देयाः पितृकार्येषु पयश्चाजाधिकं तथा। कोद्रवोदारवणकाः कपित्थं मधुकातसी॥
एतान्यपि न देयानि पितृभ्यः प्रियमिच्छता।
पितॄन् प्रीणाति यो भक्त्या ते पुनः प्रीणयन्ति तम् ॥ ३८ ॥
यच्छन्ति पितरः पुएिं स्वर्गारोग्यं प्रजाफलम् ।
देवकार्यादपि पुनः पितृकार्य विशिष्यते ॥ ३६ ॥
देवनानाञ्चपितर:पूर्वमाप्यायनंस्मृतम्।शीघ्रप्रसादास्त्वक्रोधानिःशस्त्राःस्थिरसौहृदाः।
शान्तात्मानः शोचपराः सततं प्रियवादिनः । भक्तानुरक्ताः सुखदाः पितरःपूर्वदेवताः ।
हविष्मतामाधिपत्ये श्राद्धदेवः स्मृतो रविः। एतद्वः सर्वमाख्यातं पितृवंशानुकीर्तनम् ॥
पुण्यं पवित्रमायुष्यं कीर्तनीयं सदा नृभिः ॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे पितृवंशानुकीर्तनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः समाप्तः ।
पोडशोऽध्यायः
श्राद्धप्रकरणम् ।
सूत उवाच।
श्रुत्वैतत्सर्वमखिलं मनुः पप्रच्छ केशवम् ।
श्राद्धकालच विविधं श्राद्धभेदं तथैव च ॥ १॥
ऽध्यायः]
* श्राद्धप्रकरणम् *
३७
श्राद्धपुभोजनीयायेयेच धाद्विजातयः । कस्मिन्वासरभागेयापितृभ्य श्राद्धमाचरेत् ।
कस्मिन्दत्तं कथंयाति श्राद्धन्तु मधुसूदन । विधिनायनकर्त्तव्यं कथं प्रीणातितत्पितॄन् ।
मत्स्य उवाच।
कुर्यादहरहः श्राद्धमन्नायेनोदकेन वा । पयोमूलफलैपि पितृभ्य, प्रीतिमावहन ॥४॥
नित्यन्नैमित्तिकंकाम्यनिविधंधाडमुच्यते । नित्यंतावत्प्रवक्ष्यामिअर्धावाहनवर्जितम् ।
अदैवं तद्विजानीयात् पार्वणं पर्वसु स्मृतम् । पार्वणं त्रिविधंप्रोक्तं शृणुतावन्महीपते !!
पार्वणे ये नियोज्यास्तु ताञ्छृणुष्व नराधिप।
पञ्चाग्नि स्नातकश्चैवत्रिसुपर्ण पडङ्गवित् । श्रोत्रिय श्रोत्रियसुतोविधिवाक्यविशारदः
सर्वज्ञोबेदविन्मन्त्री ज्ञातवश कुलान्वित । पुराणवेत्ता धर्मज्ञ स्वाध्यायजपतत्परः ।
शिवभक पितृपर सूर्यभक्तोऽथ वैष्णवः ॥ ६ ॥
ब्रह्मण्यो योगविच्छान्तो विजितात्मा च शीलवान् ।
भोजयेच्चापि दौहित्रं यत्नत स्वसुहृद्गुरून् ॥ १० ॥
विद्यति मातुल बन्धुमृत्विगाचार्यसोमपान् । यश्चव्याकुरुतेवाक्पयश्चमीमासतेऽचरम् ।
सामस्वरविधिशश्च पतितपावनपावन । सामगोब्रह्मवारी च वेदयुक्तोऽथब्रह्मवित् ॥
यत्रते भुञ्जते श्राद्ध तदेव परमार्थवित् । एते भोज्या प्रयत्नेन चर्जनीयान्निबोध मे ॥
पतितोऽभिशस्त क्लीवश्चपिशुनव्यङ्गरोगिण | कुनखीश्यावदन्तश्चकुण्डगोलाश्वपालकाः
परिवित्तिनियुक्तात्मा प्रमत्तोन्मत्तदारणा । वैडाली चकवृत्तिश्च दम्भोदेवलकादयः ।।
मृतवान्नास्तिकास्तद्वन्लेच्छदेशनिवासिन । त्रिशङ्कुर्वर्वरद्रावधीतद्रविडकोकणान् ॥
वर्जगेल्लिगिन सर्वान् श्राद्धकाले विशेषत । पूर्वारपरेधुर्वा विनीतात्मा निमन्त्रयेत् ॥
निमन्त्रितान् हि पितर उपतिष्ठन्ति तान् द्विजान् वायुभूतानुगच्छन्ति तयासीनानुपासने
दक्षिणं जानुमालभ्यत्वमयातुनिमन्त्रित । एव निमन्न्यनियमंधावयेपितृवान्धवान् ॥
अमोधरे शोकपर सततं ब्रह्मचारिमि । भवितव्य भवद्विश्व मयान शाकारिणा ॥
पितृयज्ञ विनिर्त्य तर्पणारयन्तु योऽग्निमान् ।
पिण्डान्बाहार्यकं कुर्याच्छ्राद्धमिन्दुक्षये मुदा ॥२१॥
* मत्स्यपुराणम् * [पोड़शो गोमयेनोपलिते तु दक्षिणप्रवणेस्थले । श्राद्धं समाचरेद्वत्या गोष्ठे या जलसन्निधौ । अग्निमालिर्वपेत्पित्यं चश्वसाममुष्टिभिः । पितृभ्योनिर्यपामीतिसवंदक्षिणतोन्यसेत् । अमिधार्य ततः कुर्यान्निर्यापत्रयमनतः । तेपि तस्यायताःकार्याश्चतुरङ्गुलविस्तृताः । दीनयन्तु कुब्योंत खादिरं रजतान्वितम् । रनिमात्र परिलणं हस्ताकाराप्रमुत्तमम् उदपात्रञ्च कास्यश्च मेक्षणञ्चसमित्कुशान् । तिला पात्राणिसवालोगन्धधूपानुलेपनम् । आहरेदपसव्यन्तु सर्व दक्षिणतः शनः। एवमासाद्य तत्सर्व भवनस्याग्रतो भुवि॥२७॥ गोमयेनोपलिप्तायांगोमूत्रेणतुमण्डलम् । अक्षताभिःसपुष्पाभिस्तदन्यापसव्यवत् । विप्राणां झालयेत्पादावभिनन्द्य पुनः पुनः । आसनेषूपक्लप्तेषु दर्मवत्सु विधानवत् ॥ उपस्पृष्ठोदकान्विप्रानुपवेश्यानुमन्त्रयेत् । द्वौ देवे पितृसत्ये त्रीनेकैकमुभयत्र च ॥३०॥ भोजयेदीश्वरोऽपीह न कुर्याद्विस्तरं बुधः । देवपूर्व नियोज्यायविमानादिनायुधः ।। अग्नी कुर्यादनुज्ञातो विप्रैविप्रो यथाविधि । स्वगृह्योक्तविधानेत कांस्येकत्वावर ततः ॥ अग्नीपोमयमाभ्यान्तु कुर्यादाप्यायन वुधः । दक्षिनाग्नीप्रतीतेवा य एकामिद्विजोत्तमः ॥ यज्ञोपवीती निर्वयं ततः पर्युक्षणादिकम् । प्राचीनावीतिना कार्यमतः सर्वं विजानता ॥ पट्चतस्माद्धविःशेषापिण्डान्कृत्वाततोदकम् । दद्यादुदकपात्रैस्तु सतिलं सव्यपाणिना जान्वाच्य सव्यं यत्नेन दर्भयुक्तो चिमत्सरः । विधाय लेखा यत्नेन निर्वापेष्ववनेजनम् ।। दक्षिणाभिमुखः कुर्यातकरे दयौ निधायवै । निधाय पिण्डमेकैकं सर्वदर्भेष्वनुक्रमात् ।। निमयेदय दर्भेषु नामगोत्रानुकीर्तनः । तेषु दर्भेषु तं हस्तं निमृज्याल्लेपमागिनाम् ॥३८ तथैव च ततः कुर्यात् पुनः प्रत्यवनेजनम् । पडप्येतान्नमस्कृत्य गन्धधूपाहणादिभिः ।। एधमाघाह्य तत्सर्व बेदमन्त्रैर्यथोदितः । एकाग्नेरेकएच स्यानिपोदविका तथा ४० सतः कृत्यान्तरेदद्यात्पनीभ्योऽन्नकुशेषुसः । तद्वपिण्डादिकेकुर्यादावाहन विसर्जनम् ।। ततो गृहीत्या पिण्डेभ्योमात्राः सर्वाः क्रमेणतु । तानेवविप्रान्प्रथमंमाशयेद्यनतोनरः ।। यस्मादनात् धृता मात्राभक्षयन्तिद्विजातयः। अन्याहार्यकमित्युक्तंतस्मात्तचन्द्रसंक्षये। पूर्व दत्त्वातु तदस्तेसपवित्रंतिलोदयम् । तपिण्डाग्रंप्रयच्छेतस्पर्धेषामस्त्वितिब्रुवन् । घर्णयन् भोजयेदनं मिष्टं पूतश्च सर्वदा । पर्जयेत् क्रोधपरतां स्मरनारायणं हरिम् ॥३५ सप्तदशो * मत्स्यपुराणम् * मामघारोहिणीषु द्रव्यबामणसङ्गमे । गजच्छायाव्यतीपाते विष्टि वैधृतिवासरे ॥श चैशातस्य तृतीयायां नवमी कार्तिकस्य च । पञ्चदशी च माघस्य नमस्येवत्रयोदशी। युगादयः स्मृता होता दत्तस्याक्षप्यकारिकाः । तथा मन्वन्तरादीचदेयंधादविजानता ॥ अध्ययुक् शुलनवमी द्वादशीकार्तिके तथा । तृतीया चैत्र मासस्य तथा भाद्रपदस्य च ॥ फाल्गुनस्यामावास्यापीपस्यैकादशीतथा । आषाढस्याऽपिदशमीमाधमासस्यसप्तमी। श्रावणस्याष्टमी कृष्णातथापाढीचपूर्णिमा । कार्तिकीफाल्गुनीचैत्रीज्येष्ठपञ्चदशीसिता ॥ मन्वन्तरादयश्चैता दत्तस्याक्षयकारिकाः ॥८५ यस्यां मन्वन्तरस्यादौ रथमास्तेदिवाकरः । माघमासस्यसप्तम्यांसातुस्याद्रथसप्तमी ॥ पानीयमप्यत्र तिलविमिधं दद्यात्पितृभ्यः प्रयतो मनुष्यः । श्राद्धं कृतं तेन समाः सहस्रं रहस्यमेतपितरो वदन्ति ॥१०॥ वैशाख्यामुपरागेषु तथोत्सवमहालये । तीर्थायतनगोप्टेषु द्वीपोद्यानगृहेषु च ॥ ११ ॥ विविक्तेपूपलिप्तेपु श्राद्धं देयं विजानता। विधान पूर्व परेचाहिविनीतात्मानिमन्त्रयेत् ।। शीलवृत्तगुणोपेतान् चयोरूपसमन्वितान् । द्वौ दैवे त्रीस्तथा पैञ्ये एकैकमुमयत्रया । भोजयेत्सुसमृद्धोपिनप्रसञतविस्तरे । विश्वानदेवान्यधैःपुष्पैरभ्यासनपूर्वकम् ॥ पूरयेत्पात्रयुग्मन्तु स्थाप्य दर्भपवित्रकम् । शन्नोदेवीत्यपःकुर्याद्ययोऽसीतियवानपि ।। गन्धपुष्पैश्च संपूज्य वैश्वदेवं प्रतिन्यसेत् । विश्वेदेवासइत्याभ्यामावाह्यविकिरद्यवान् ॥ गन्धपुष्पैरलपत्ययादिव्येत्यपउत्सृजेत् । अभ्यर्च्यताभ्यामुत्सृष्टंपितुकायंसमारभेत् दर्भासनन्तुतत्यादौत्रीणिपात्राणिपूरयेत् । सपवित्राणिकृत्वादोशन्नोदेवीत्यपःक्षिपेत् ॥ तिलोऽसीति तिलान कुागन्धपुष्पादिकं पुनः । पात्रंबनस्पतिमयंतथापर्णमयं पुनः ।। जलजं वाथ कुर्वीत तथा सागरसम्भवम् । सौवर्ण राजतं चापि पितॄणां पात्रमुच्यते ।। रजतस्य कथा धापि दर्शनं दानमेव था। राजतै जनरेपामथवा रजतान्वितैः ॥२॥ वार्यपि श्रद्धया दत्तमक्षयायोपकल्पते । तथार्यपिण्डभोज्यादी पितृणां राजतं मतम् ।। शिवनेत्रोद्भवं यस्मात्तस्मात्तपितृवल्लभम् । अमङ्गलं तद्यतेन देवकार्येषु वर्जयेत् ॥२३॥ एर्व पात्राणि संकप्य यथालाभविमत्सरः । यादिव्येतिपितुर्नामगोत्रैदर्भकरोन्यसेत् ।।
ऽध्याय] * साधारणाभ्युदयकीर्तनम् * ४१ पितृनायाहयिष्यामि कुवित्युक्तस्तु तै पुनः । उशन्तस्त्वा तथायन्तु ऋग्भ्यामावाहयेत् पितॄन् ॥२५॥ यादिव्येत्यर्यमुत्सृज्य दद्याद् गन्धादिकांस्ततः । हस्तात्तदुदकं पूर्व दत्त्वा संश्रयमादितः ॥२६॥ पितृपाचे निधायाथन्युरजमुत्तरतोन्यसेत् । पितृभ्यःस्थानमसीतिनिधाय परिपेचयेत् ।। तत्रापि पूर्ववत् कुर्यादग्निकार्य विमत्सरः । उभाभ्यामपि हस्ताभ्यामाहत्य परिवेपयेत् ॥२८॥ प्रशान्तचित्तः सततं दर्भपाणिरशेषतः । गुणाढ्यः सूपशाकैस्तु नानाभक्ष्यविशेषतः ॥ अवन्तु सदधिक्षीरं गोधुतं शर्करान्वितम् । मासम्प्रीणातिसर्यानपितृनित्याहकेशवः ॥ द्वौ मासो मत्स्यमांसेन त्रीन्मासानहारिणेनतु । औरभ्रमेणाथचतुरःशाकुनेनाथपञ्चवै ॥ पण्मासंच्छागमांसेन तृप्यन्ति पितरस्तथा । सप्त पार्षतमांसेन तथाटावेणजेनतु ॥३२॥ दश मासांस्तु तृप्यन्ति वराहमहिपामिः । शशकर्मजमांसेन मासानेकादशेव तु ॥३॥ संवत्सरन्तु गव्येन पयसा पायसेन च । रोरवेण च तृप्यन्ति मासान् पञ्चदशैव तु ॥ व्याघ्रयाः सिंहस्य मांसेन तृप्तिादशवार्षिकी । कालशाफेनचानन्तापगमांसेनचैयहि । यत्किञ्चिन्मधुसंमिनं गोक्षीरं घृतपायसम् । दत्तमक्षयमित्याहुः पितरःपूर्वदेवताः ॥३६, स्वाध्यायं श्रावयेत् पित्र्यं पुराणान्यपिलानि च । ब्रह्मविष्ण्यर्करद्राणां स्तपानि विविधानि च ॥ ३७॥ इन्द्राग्निसोमसूतानि पावनानि स्वशक्तितः । वृदयन्तरंतवज्येष्टसामसरोहिणम् ॥३८॥ तथैव शान्तिकाध्यायं मधु ब्राह्मणमेव च। मण्डलं नाह्मणंतत्प्रीतिकारिनुयनपुनः ।। विमाणामात्मनश्चैव तत्सवं समुदीरयेत् । मुख्यत्म ततस्तेषु भोजनोपान्तिके नृप ॥४०॥ सायनिकमन्नायं सीयाराव्य पारिणा। समुन्मजेद भुनायतामप्रनो विकिरदभुवि अग्निदाधास्तु ये जाया येऽप्यदाधापुले मम । ममा दत्तेन तृप्यन्नु भयान्तु परमाङ्गनिम् ४२ [सप्तदशो * मत्स्यपुराणम् * येषां न माता न पिता न कधुन गोत्रशुद्धि तवान्नमस्ति । तप्तयेऽनं भुवि दत्तमेतत् प्रयातु लोकेषु सुखाय तद्वत् ॥ ४३ ॥ असंस्कृतप्रमीतानान्त्यकानां कुलयोपिताम् । उच्छिष्टभागधेयःस्याहर्मेविकिरयोश्चयः। तृप्ता नात्योदकं दद्यात् साद्विपकरे तथा। उपलिप्ते महीपृष्ठे गोशशनमूत्रधारिणा ॥ निधाय दर्मान विविधदक्षिणामान्प्रयत्नतः । सर्वचर्णेन चान्नेन पिण्डांस्तु पितुयशवत् । गवनेजनपूर्वन्तु नामगोत्रेण मानवः । गन्धधूपादिकं दद्यात् फत्या प्रत्ययनेजनम् ॥४७॥ जान्याच्यसव्यं सत्येनगणिनाथ प्रदक्षिणम् । पित्र्यमानीय तत्कार्य विधिवदर्भपाणिना दीपप्रज्वालनंतद्वत् कुर्यात्पुप्पार्चनं बुधः । अथावान्तेषु नाचम्यवारिदद्यात्सवात्सरुत् अथ पुष्पाक्षतान् पश्चादक्षय्योदकमेव च । सतिलं नामगोत्रणवद्याच्छन्न्यावदक्षिणाम् गोभूहिरण्यवासांसि भव्यानि शयनानि च । दद्यायदिएं विप्राणामात्मनः पितुरेव च ॥ चित्तशाटन रहितः पितृभ्यः प्रीतिमावहन् । ततः स्वधावाचनकं विश्वेदेवेषु योदकम् , दत्त्वाशी. प्रतिगृह्णीयाद्विश्वेभ्यः प्राङ्मुखो बुधः । अघोराः पितरः सन्तु सन्त्चित्युक्तः पुनर्द्विजैः ॥ १३ ॥ गोत्रं तथावईन्ताजस्तयेत्युक्तश्च ते पुन । दातारोनोऽभिवर्धन्तामिति चैवमुदीरयेत् ॥ एताः सत्याशिषः सन्तु सन्त्वित्युक्तच तैः पुनः । स्वस्तिवाचनकं कुर्यात् पिण्डानुद्धृत्य भक्तितः ॥ ५५ ॥ उच्छेपणन्तु ततिष्ठेद्यापतिमा विसर्जिताः । ततो प्रवलिं कुर्यादिति धर्मव्यवस्थितिः उन्लेषणं भूमिगतमजिहास्यास्तिकस्य च । दासवर्गस्य तत्पिश्यं भागधेयं प्रचक्षते ॥ पितृभिनिर्मितं पूर्वमेतदाप्यायनं सदा । अपुत्राणां सपुनाणां स्त्रीणामपि नाधिप ! | ततस्तानप्रतः स्थित्वा परियोदपानकम् । पाजेवाज इतिजपन् पुशाग्रेण विसर्जयेत् ॥ बहिः प्रदक्षिणान्यांत पदान्यष्टायनुजन् । मधुपर्गेण सहितः पुत्रभासमन्वितः ।। निवृत्य प्राणपत्याथ पर्पयाग्नि समन्धयत् । वैश्वदेवं प्रर्षीत नैत्यर्फ धलिमेव च ॥ ततस्तु वैश्वदेवान्ते सभृत्यमुनगान्धयः । भुनीतातिथिसंयुगा सर्व पितृनिषेचितम् ।। एतयानुपनीतोऽपि पुर्यात सधेनु पर्पसु । धाक्षं साधारण नाम सर्वकामफलप्रदम् ।। - ऽध्यायः । * एकोद्दिष्टश्राद्धप्रकरणम् * भार्याविरहितोऽप्येतत् प्रवासयोऽपि मक्तिमान् । शूद्रोऽप्यमन्त्रवत् कुर्यादनेन विधिना बुधः ॥ ६४ ।। तृतीयमाभ्युदयिकं वृद्धिश्राद्धं तदुच्यते । उत्सवानन्दसम्भारे यज्ञोद्वाहादिमङ्गले ॥६५॥ मातर प्रथम पूज्याः पितरस्तदनन्तरम् । ततो मातामहा राजन् विश्वेदेवास्तथैव च ॥ प्रदक्षिणोपचारेण दध्यक्षतफलोदकः । प्राङ्मुखो निर्वपेपिण्डान दूर्वयाच कुशैर्युतान् सम्पन्नमित्यभ्युदये दद्यादर्थं द्वयोईयोः । युग्मा द्विजातयः पूज्या वस्त्रकार्तस्वरादिभिः तिलार्थस्तु यवैः कार्योनान्दिशदानुपूर्वक । माङ्गल्यानि च सर्वाणिवाचयेद्विजपुङ्गवः एवं शूद्रोऽपि सामान्यवृद्धिश्राद्धेऽपि सर्वदा । नमस्कारेण मन्त्रेण कुर्यादामानत सदा बान शूद- स्यादित्याह भगवान्प्रभु । दानेन सर्वकामातिरस्य समायते यत ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे साधारणाभ्युदयकीर्तनो नाम सप्तदशोऽध्यायः । अष्टादशोऽध्यायः एकोद्दिष्टश्राद्धप्रकरणम् । सूत उवाच। एकोद्दिष्टमतोवक्ष्ये यदुक्तं चक्रपाणिना । मृने पुर्यथाकार्यमाशौचञ्च पितर्यपि ॥ १ ॥ दशाहं शावमाशीचं ब्राह्मणेषु विधीयते । क्षत्रियेषु दश द्वेच पक्षं वैश्येषु चैयहि ॥ ॥ शूद्रेषु मासमाशोचं सपिण्डेषु विधीयते । नैशम्वाऽरतचूडस्य विरारम्परतः स्मृतम् ॥ जननेऽप्येवमेव स्यात् सर्ववर्णषु सर्वदा । तथास्थिसञ्चयादूर्ध्वमङ्गस्पों विधीयते ॥ प्रेताय पिण्डदानन्तु द्वादशाह समाचरेत् । पाथेयं तस्य तन् प्रोक्तं यतः प्रीतिकरं महत् तस्मात् प्रेतपुरं प्रेतो द्वादशाहं न नीयते । गृहं पुत्रं कलाश्च द्वादशाहं प्रपश्यति ॥ ६ ॥ तस्मान्निधेयमाकाशे दशरानं पयस्तथा । सर्वदाहोपशान्त्यर्थमध्यभ्रमविनाशनम् ॥ तत एकादशाहे तु द्विजानेकादशैव तु । क्षनादिः मृतकान्ते तु भोजयेदयुतो द्विजान् ।।
୨୫ [अष्टादशोऽध्यायः * मत्स्यपुराणम् द्वितीयेऽहि पुनस्तदेकोद्दिष्टं समावरेत् । आवाहनाग्नीकरणं देवहीनं विधानतः ॥६॥ एक पवित्रमेको एकः पिण्डो विधीयते । उपतिष्ठतामित्येतदेयं पञ्चात्तिलोदकम् ॥ स्थादितं विकिरेन्यूयाद्विसर्गे चामिरम्यताम् । शेयं पूर्ववदत्रापि कार्य वेदविदा पितुः । अनेन विधिना सर्वमनुमासं समाचरेत् । सूतकान्ताद्वितीयेऽहि शय्यां दद्याद्विलक्षणाम् काश्चनं पुरुष तद्वत् फलयनसमन्विताम् । संपूज्य द्विजदाम्पत्यं नानामरणभूषणैः ॥ वृपोत्सर्ग प्रकुर्वीत देया च कपिला शुभा । उदकुम्भश्च दातव्यो भक्ष्यभोज्यसमन्वितः यावदन्दं नरश्रेष्ठ ! सतिलोदकपूर्वकम् । ततः संवत्सर पूर्ण सपिण्डीकरणं भवेत्।१५। सपिण्डीकरणादूर्ध्व प्रेतः पार्वणभाग भवेत् । वृद्धिपूर्वेषु योग्यश्च गृहस्थश्च भवेत्ततः ॥ सपिण्डीकरणे श्राद्धे देवपूर्व नियोजयेत् । पितॄनेवासयेत्तत्र पृथक् प्रेतं विनिर्दिशेत् ॥ गन्धोदकतिलयुक्तं कुर्यात्पात्रचतुष्टयम् । अर्धार्थ पितृपात्रेषु प्रेतपात्रं प्रसेवयेत् ॥१८॥ तद्वत्संकल्प्य चतुरः पिण्डान् पिण्डप्रदस्तदा । ये समाना इति द्वाभ्यामन्त्यन्तु विभजेत्रिधा ॥ १६॥ चतुर्थस्य पुनः कार्य न कदाचिदतोभवेत् । ततः पितृत्वमापन्नः सर्वतस्तुष्टिमागतः ॥ अग्निप्यातादिमध्यत्व प्राप्तोत्यमृतमुत्तमम् । सपिण्डीकरणादूर्ध्व तस्मै तस्मान्नदीयते पितृष्येव तु दातव्यं तन् पिण्डोयेषु संस्थितः। ततः प्रभृति संक्रान्तावुपरागादि पर्वतु त्रिपिण्डमाचरेच्क्राइमेकोद्दिष्टं मृताहनि । एकोद्दिष्ट परित्यज्य मृताहे यः समाचरेत् सदैव पितृहा स स्थानमातुभ्रातृविनाशकः । मृताहे पार्वणं कुर्वन्नधोऽधोयाति मानवः संपृक्तप्वाकुलीभावः प्रेतेपु तु यतीभवेत् । प्रतिसंवत्सरं तस्मादेकोद्दिष्ट समावरेत् ॥ यावदब्दन्तु योदद्यादुदकुम्भं चिमत्सरः । प्रेतायानसमायुक्तं सोऽध्वमेधफलं लभेत् ॥ आमनाद्धं यदा कुर्याद्विधिशः श्राद्धदस्तदा । तेनाप्नौकरणंकुपिण्डास्तेनैवनिपेत्॥ त्रिभिः सपिण्डिकरणे अशेषत्रितये पिता । यदा प्राप्स्यतिकालेनतदामुच्येतवन्धनात् ॥ मुक्तोऽपिलेपभागित्वंप्राप्नोतिकुशमार्जनात् । लेपमाजश्चतुर्थायाःपित्राद्याःपिण्डभागिनः। पिण्डदः सप्तमस्तेषां सापिण्ड्यं सासपोश्यम् ॥२६॥ इति धीमत्स्यपुराणे सपिण्डीकरणकल्पो नामाष्टादशोऽध्यायः ।
-- एकोनविंशोऽध्यायः श्राद्धप्रकरणम् । ऋपय ऊचुः। कथं कव्यानि देयानिळ्यानिचजनैरिह । गच्छन्तिपितृलोकस्थानप्रापक कोऽत्र गद्यते॥ यदि मत्यो द्विजो भुदते हयते यदिधानले । शुभाशुभात्मक प्रेतैर्दत्तन्तभुज्यतेकथम्॥ सूत उवाच। घसून्यदन्तिवपितृन्द्रांश्चैवपितामहान् ।प्रपितामहांस्तथादित्यानित्येयंवैदिकीनुति.॥ नामगोत्रपितृणान्तुप्रापकहव्यकव्ययोः । श्राद्धस्यमन्त्रा:श्रद्धाच उपयोज्यातिभक्तितः ।। अग्निप्वात्तादयस्तेपामाधिपत्येव्यवस्थिता । नामगोत्रकालदेशाभवान्तरगतानपि ॥५॥ प्राणिनः प्रीणयन्त्येते तद्राहारत्वमागतान् । देवो यदि पिताजात शुभकर्मानुयोगत ॥ तस्यान्नममृतं भूत्वा दिव्यत्वेऽप्यनुगच्छति । दैत्यत्त्वे भोगरूपेण पशुत्त्वेचतृणंभवेत् ॥ श्राद्धानं घायुरूपेण सर्पत्त्वे प्युपतिप्रति । पानं भवति यक्षत्वे गृध्रत्वेऽपि तथामिपम् । दनुजत्वे तथा माया प्रेतत्त्वे रुधिरोदकम् । मनुष्यत्त्वेऽन्नपानानि नानाभोगरसंभवेत् । रतिशक्तिःस्त्रिय कान्ता भोज्यंभोजनशक्तिता। दानशक्ति सविभवा रूपमारोग्यमेवच । श्रद्धा पुप्पमिदंप्रोक्तं फल ब्रह्मसमागमः । आयु पुत्रान्धनविद्या स्वर्ग मोक्षं सुखानिव ॥ राज्यंचैवप्रयच्छन्ति प्रीता पितृगणा नृणाम् । श्रूयतेचपुरामोक्ष प्राप्ता कौशिकसनयः ।। पञ्चभिर्जन्मसम्बन्धैर्गता विष्णोः परं पदम् ॥ १२ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे श्राद्धकल्पे फलानुगमनो नाम एकोनविंशोऽध्याय ॥१६॥ विंशोऽध्यायः श्राद्धमाहात्म्ये कौशिकस्नुकथानकम् । ऋपय ऊचु । कथंको शिकदायादा. प्राप्तास्तेयोगमुत्तमम् । पञ्चभिर्जन्मसम्बन्धे कथं कर्मक्षयोऽभवतः
* मत्स्यपुराणम् ॥
[विशो
सूत उवाच।
कोशिकोनामधर्मात्मा कुरक्षेत्रेमहान ऋपि । नामत फर्मतस्तस्य सूतानसप्तनियोधत ।
स्वसृप कोधनोहिस्त्र पिशुन कविरेव च । चारदुष्ट पितृवर्तीच गर्गशिप्यास्तदाभवन् ।
फ्तियुपरते तेषामभूददुर्मिक्षमुल्वणम् । अनावृष्टिश्च महती सर्वलोकभयङ्करी ४॥
गर्नादेशाद्वनेदोगधी रक्षन्तस्तेतपोधना ( सादाम कपिलामेता वय क्षुत्पीडिताभृशम् ।
इति चिन्तयता पाप लघु प्राह तदानुज । यद्यवश्यमिय यध्या श्राद्धरूपेण योज्यताम् ।
श्राद्धेनियोज्यमानेय पापात् वास्यतिनीध्रुवम् । एचकुर्वित्यनुशात पितृयती तदानुजै ॥
चक्रेसमाहित श्राद्धमुपयुज्यचतापुन । द्वौ देवे भ्रातरी कृत्वा वियेत्रीनप्यनुक्रमात् ॥
तथैकमतिथिं कृत्वा श्राद्धद स्वयमेव तु । चकार मन्त्रवाच स्मरन् पितृपरायण ॥
विना गया यत्सकोऽपि गुरवे विनिवेदित व्याण निहताधेनुर्वत्सोऽयप्रतिगृह्यताम्
एवसामक्षितानु सप्तभिस्तैस्तपोधनै । वैदिक बरमाश्रित्य तरे कर्मणि निर्भया ॥
तत कालावस्थास्ते व्याधा दासपुरेऽभवन् । जातिस्मरत्वप्रासास्ते पितृभावेन भाषिता
यत् कृत क्रूरकर्मापि श्रादरूपेण तैस्तदा । तेन ते भवने जातान्याधानाङ्करकर्मिणाम् ।
पितृणाञ्चैव माहात्याजाता जातिस्मरास्तु ते । ते तु पैराग्ययोगेन आस्पायानशनपुन
जातिस्मरा सप्तमाता मृगा कालवरे गिरी । नोलकण्ठस्य पुरत पितृभावानुमाविता ॥
तत्रापिज्ञानवैराग्यात् प्राणानुत्सृज्यधर्मात । लोकरवेक्ष्यमाणास्तेतीर्थान्तेऽनशनेनतु ।
मानसेचक्रवाकास्ते साता सप्तयोगिन । नामत कर्मत सर्वान् शृणुप्रद्विजसत्तमा ॥
सुमना कुमुद शुद्धश्छिद्रदी सुनेत्रक । सुनेत्रश्चाशुमाश्चय सप्तैते योगपारगा ॥१८
योगभ्रणास्त्रय स्तेपा चप्रमुश्चात्पचेतना । दृष्ट्वा विभ्राजमान तमुद्याने स्त्रीभिरन्वितम।
क्रीडन्त विविधैर्भावैर्महायरपरामम् । पाञ्चालान्चयसम्भूत प्रभूतवल्वाहनम् ॥ २० ॥
राज्यकामोभवश्चैक स्तेपाम येजलौकसाम् । पितृपतींचयो विप्र श्राद्धमतपितृवस्सल ।
अपरी मन्त्रिणौ दृष्ट्वा प्रभूतपल्याहनो । मन्त्रित्वेच क्रतुश्चेच्छामस्मिन्मत्य द्विजोत्तमा ।
तन्मध्ये ये तु निष्कामास्ते वधुद्विजोत्तमा ।।
विभ्राजमानरत्येकोऽभूत् बहादत्त इति स्मृत ॥ २३ ॥
ऽध्याय ] * श्राद्धमाहात्म्ये पिपीलिकावहासवर्णनम् * मन्त्रिपुनौतथावोभौकण्डरीकसुवालको । ब्रह्मदत्तोऽभिषिक्त सन् पुरोहितविपश्चिता । पाञ्चालराजोविक्रान्त सर्वशास्त्रविशारद । योगवित् सर्वजन्तूनास्तवेत्ताऽभवत्तदा ॥ तस्यराज्ञोऽभवाद्वा- देवलस्यात्मजाशुभा। सन्नतिर्नामविरयाता कपिलायाभवतपुरा। पितृकार्ये नियुक्तत्वादभवद्ग्रह्मवादिनी । तया चकार सहित सराज्य राजनन्दन ॥ कदाविदुद्यानगस्तया सह स पार्थिव । ददर्श कीटमिथुनमनङ्गकलहाकुलम् ॥ २८ ॥ पिपीलकामनुनयन् परित कीटकामुक । पञ्चवाणाभितप्ताङ्ग स गद्गदमुवाच ह ॥२६॥ न त्वयासशीलोके कामिनीविद्यतेकचित् । म यक्षामातिजधना वृहद्वक्षोऽभिगामिनी। सुवर्णवर्णा सुश्रोणी मञ्जूक्ता चारहासिनी । सुलक्षनेत्ररसना गुडशर्करवत्सला॥३१॥ भोक्ष्यसेमयिभुक्तत्व नासि स्मातेतथामयि । प्रोपितेसतिदीनात्व क्रुद्धेऽपि भयचञ्चला किमर्थवदकल्याणि । सरोपवदनास्थिता । सा तमाह सकोपातु किमालपसि मा शठ ॥ त्वयामोदकचूर्णन्तु मा विहाय विनेप्यता । प्रदत्त समतिक्रान्ते दिनेऽन्यस्या समन्मथ ।। पिपीलिक उवाच । त्यत्सादृशानमया दत्तमन्यस्यै घरणिनि ।। तदेकमपराध मे क्षन्तुमर्हसि भामिनि ॥ नैतदेव करिष्यामि पुन कापीह सुव्रते। । स्पृशामि पादी सत्येन प्रसीद प्रणतस्यमे ॥ सूत उवाच। इति तद्वचन श्रुत्वा सा प्रसन्नाऽभवत्तत ।मात्मानमर्पयामास मोहनाय पिपीलिका । ब्रह्मदत्तोऽप्यशेषन्त ज्ञात्या विस्मयमागमत् । सर्वसत्वस्तज्ञत्वात् प्रसादाचक्रपाणिन । इति श्रीमत्स्यपुराणे श्राद्धकल्पे श्राद्धमाहात्म्ये पिपीलिकायहासो नाम विंशतितमोऽध्याय । 1 . एकविंशतितमोऽध्यायः श्राद्धमाहात्म्ये पिपीलिकामहामनर्णनम् । ऋषय ऊचु । कथ सत्वरतज्ञोऽभूदु ब्रह्मदत्तो धरातले । तयाभवत् कस्य पुरे वयाकचतुण्यम् ॥१ RAJ * मत्स्यपुराणम् * [एकविंशतितमो . सूत उवाच। तस्मिन्नेवपुरे जातास्ते व चकाहयास्तदा । वृद्धद्विजस्य दायादा चिप्रा जातिस्मरा:पुरा। धृतिमस्तित्त्वदर्शीच विद्याचण्डस्तपोत्सुकः । नामतःकर्मतश्चैते सुदरिद्रस्यते सुताः ।। तपसेबुद्धिरभवत्तदा तेषां द्विजन्मनाम् । यास्यामःपरमां सिद्धिमित्यूचुस्ते द्विजोत्तमाः। ततस्तद्वचनं श्रुत्वा सुदरिदो महातपाः । उवाच दीनया वाचा किमेतदिति पुत्रकाः । अधर्म एप इति व पिता तानभ्यवारयत् । वृद्धं पितरमुत्सृज्य दरिदं वनवासिनः ।। कोनुधर्मोऽनभवितामत्यागाद्गतिरेव था। ऊचुस्ते कल्पिता वृत्तिस्तवतात ! पदस्पतत् वित्तमेतत् पुरो राज्ञः स ते दास्यति पुष्कलम् । धनं ग्रामसहस्राणि प्रभाते पठतस्तव । ये विप्रमुख्याः कुरुजाङ्गलेपु दासास्तथा दासपुरै मृगाश्च । कालञ्जरे सप्त च चकवाका ये मानसे ते वयमन सिद्धाः ॥ ६॥ इत्युक्त्वा पितरं जग्मुस्ते धनं तपसे पुनः । वृद्धोऽपि राजभवनं जगामात्मार्थसिद्धये अनधो नाम बभ्राजः पाञ्चालाधिपति-पुरा । पुत्रार्थी देवदेवेशं हरि नारायणं प्रभुम् ॥ आराधयामास विभुं तीव्रततपरायणः । ततः कालेन महता तुष्टस्तस्य जनार्दनः ॥१२॥ चरं वृणीव भद्रं ते हृदयेनेप्सितं नृप!। एवमुक्तस्तु देवेन च स वरमुत्तमम् ॥ १३ ॥ पुत्रं मे देहि देवेश! महावलपराक्रमम् । पारगं सर्वशास्त्राणां धार्मिक योगिनां परम् ॥ सर्वसत्वरुतशं मे देहि योगिनमात्मजम् । एवमस्त्विति विश्वात्मा तमाह परमेश्वरः ॥ पश्यतां सर्वदेवानां तत्रैवान्तरधीयत । ततः स तस्य पुत्रोऽभूत् ब्रह्मदत्तः प्रतापवान् ॥ सर्वसत्यानुकम्पी च सर्वसत्वयलाधिकः । सर्वसत्वतज्ञश्च सर्वसत्वेश्वरेश्वरः ॥१७॥ अहसत्तेन योगात्मा स पिपीलिकरागतः । यत्र तत् कीटमिथुन रममाणमवस्थितम् ।। अतः सा सनतिर्दृष्ट्वा तं हसन्तं सुविस्मिता। किमप्याशय मनसा तमपृच्छन्नरेश्वरम सन्ततिरुवाच। प्रकस्मदतिहासस्ते किमर्थमभवन्नृप। हास्यहेतुं न जानामि यद्काले कृतं त्वया ॥२० . सूत उपाय। प्रवद्राजपुत्रोऽपि स पिपीलिकमापितम् । रागवाग्भिः समुत्पन्नमेतद्धास्यं धरानने!
४६ . ध्यायः] * पितमाहात्म्यम् * नचान्यत्कारणं किश्चिद्धास्यहेतौशुचिस्मिते । नसामन्यत्तदा देवीप्राहालीकमिदंघचा। अहमेवाद्यहसिता न जीविष्ये त्वयाऽधुना । कथं पिपीलिकालापं मोवेत्ति विनासुरान् तस्मात्त्वयाहमेवेहहसिताकिमतः परम् । ततो निरुत्तरो राजा जिज्ञासुस्ततपुरोहरेः ॥ भास्थाय नियमन्तस्थी सतगनमकल्मपः । स्वप्नेप्राह हृषीकेशः प्रभाते पर्यटन पुरम् ।। वृद्धद्विजोयस्तदक्पात् सर्वशास्यस्यशेषतः । इत्युक्त्यान्तर्दधेविष्णु प्रभातेऽथनृपःपुरात् निर्गच्छन्मन्त्रिसहितः सभार्यो वृद्धमप्रतः । गदन्तं विप्रमायान्तं तं वृद्धं सन्ददर्श ह ।। ब्राहाण उवाच । ये विप्रमुरयाः कुरजाङ्गलेपु दासास्तथा दासपुरे मृगाश्च । कालसर सप्त च चक्रवाका ये मानसे ते चयमन्त्र सिद्धाः ॥२८॥ सत उवाच । . इत्याकर्ण्य पवस्ताभ्यां स पपात शुचा ततः । जातिस्मरत्वमगमत्तौच मन्त्रिवरावुभौ । कामशास्त्रप्रणेता च घाभ्रव्यस्तु सुचालकः । पाञ्चाल इतिलोकेपु विश्रुतः सर्वशास्त्रचित् फण्डरीकोऽपिधर्मात्मा वेदशास्त्रप्रवर्तकः । भूत्वाजातिस्मरोशोकात पतितावनतस्तदा। हा घयं योगविभ्रष्टाः कामतः कर्मवन्धना । एवं पिलप्य बहुशस्त्रयस्ते योगपारगाः ॥ । विस्मयाच्छ्राद्धमाहात्म्यमभिनद्य पुनः पुनः । ततस्तस्मै धनं दत्त्वा प्रभूतग्रामसंयुतम् ॥ विसृज्य ब्राह्मणन्तञ्च वृद्धं धन मुदान्वितम् । आत्मीयं नृपतिः पुत्रं नृपलक्षणसंयुतम् । विप्वक सेनाभिधानन्तु राजा राज्येऽभ्यपेचयत् । मानसे मिलिताः सर्व ततस्ते योगिनो घराः॥ ३५॥ ब्रह्मदत्तादयस्तस्मिन् पितृसत्ताविमत्सराः । सन्नतिश्चाभवद्भ्रष्टामयैतत् किलकारितम्। राज्यत्यागफलंसवं यदेतदभिलप्यते । तथेति प्राह राजा तु पुनस्तामभिनन्दयन् ॥३७ ॥ त्वत् प्रसादादिदंसर्व मयैतत् प्राप्यतेफलम् । ततस्ते योगमास्थाय सर्वएवयनीकसः ॥ ब्रह्मरन्ध्रेण परमम्पदमापुस्तपोधनाः । एचमायुधन विद्यां स्वर्ग मोक्षं सुखानि च ॥३६ प्रयच्छन्तिमुतार राज्यंतृप्रां प्रीता पितामह यूहहपितमाहालल्यं ब्रह्मदतम्यचद्रिजा.! द्विजेभ्यः श्रावयेद्यो चा शृणोत्यथ पठेत वा । कल्पकोटिशतं सायं ब्रह्मलोके महीयते । इति श्रीमत्स्यपुराणे श्राद्धकरपे पितृमाहात्म्यं नाम एकविंशतितमोऽध्यायः । - द्वाविंशतितमोऽध्यायः श्राद्धयोग्यतीर्थानांवर्णनम्। ऋपय ऊचुः। कस्मिन्कालेचतच्छ्राद्धमनन्तफलदंभवेत् । कस्मिद् चासरभागेतुश्राद्धकृच्छ्राद्धमाचरेत् । तीर्थेषु केषु च कृतं श्राद्धं बहुफलं भवेत् । सूत उवाच । पराह तु संप्राप्ते अभिजिद्रोहिणोदये ॥२॥ यत्किञ्चिद्दीयते तत्र तदक्षयमुदाहृतम् । तीर्थानि कानि शस्तानि पितृणां पल्लभानिच ॥ नामतस्तानि वक्ष्यामि संक्षेपेण द्विजोत्तमाः!। पितृतीर्थ गया नाम सर्वतीर्थवरं शुभम्। यत्रास्ते देवदेवेशः स्वयमेव पितामहः । तत्रपा पितृभिर्गीता गाथा भागमभीप्सुमिः ।। एएव्या वहयः पुत्रा ययेकोऽपि गयांवजेत् । यजेत घाश्वमेधेन नीलं घावृपमुत्सृजेत् । तथावाराणसी पुण्या पितॄणां पल्लभासदा । यत्राविमुक्तसान्निध्यंभुक्तिमुक्तिफलप्रदम् । पितॄणां वल्लभं तद्वत् पुण्यश्च विमलेश्वरम् । पितृतीर्थ प्रयागन्तु सर्वकामकलप्रदम् ॥ घटेश्वरम्तु भगवान् माधवेन समन्वितः । योगनिद्राशयस्तद्वत् सदावसति केशवः । दशाध्यमेधिकं पुण्यं गड्याद्वारं तथैव च । नन्दाथ ललिता तद्वत्तीय मायापुरी शुमा । नथा मित्रपदं नाम ततः केदारमुत्तमम् । गङ्गासागरमित्याहुः सर्वतीर्थमयं शुभम् ॥ नीयं ब्रह्मसरस्तद्वच्छतद्रुसलिले हदे । तीर्थन्तु नैमिषं नाम सर्वतीर्थफलप्रदम् ॥ १२ ॥ गगोद्रेदस्तु गोमत्यां यत्रोद्भूतः सनातनः । तथा यावराहस्तु देवदेवश्च शूलभृत् ॥१३ यत्र तत्काशनं द्वारमष्टादशभुजोहरः । नेमिस्तु हरिचक्रम्य शीर्णा यमाभवत्पुरा ॥१४॥ नदेतनैमिगरण्यं मर्वतीर्थनियिनम् । देवदेवम्य तत्रापि धाराहस्य तु दर्शनम् ॥ १५ ॥ प्रयाति स पूनान्मा नारायणपदं प्रजेत् । एतशीचं महापुण्यं सर्वपापनिषूदनम् ॥ नाम्ने नारसिद्धस्तु म्ययमेव जनार्दनः । तीर्य मिशुमती नाम पितृणां पल्लमं सदा
द्वाविंशतितमोऽध्यायः] * श्राद्धयोग्यतीर्थानां वर्णनम् *
सङ्गमे यत्र तिष्ठन्ति गङ्गायाः पितरः सदा । कुरुक्षेत्रं महापुण्यं सर्वतीर्थसमन्वितम् ॥
तथा च सरयू:पुण्या सर्वदेवनमस्कृता । इरावती नदी तद्वत् पितृतीर्थाधिवासिनी ।।
यमुना देविका काली चन्द्रभागा द्रुपद्वती । नदी वेणुमती पुण्या परा वेत्रवती तथा।
पितॄणां धल्लभा ह्येताः श्राद्धकोटिगुणा मताः । जम्बूमार्ग महापुण्यं यत्रमागोंहिलक्ष्यते
अद्यापि पितृती) तत्सर्वकामफलप्रदम् । नीलकुण्डमितिख्यातं पितृतीथं द्विजोत्तमाः!
तथा रदसरः पुण्यं सरोमानसमेव च । मन्दाकिनी तथाच्छोदा विपाशाथ सरस्वती ।
पूर्वमित्रपदन्तवैद्यनाथं महाफलम् । क्षिप्रा नदी महाकालस्तथाफालअरं शुभम् ॥२४॥
बंशोखेदं हरोद्भेदं गणोद्धेदं महाफलम् । भद्रेश्वरं विष्णुपदं नर्मदाद्वारमेव च ॥ २५ ॥
गयापिण्डप्रदानेन समान्याहुमहर्षयः । एतानि पितृतीर्थानि सर्वपापहराणि च ॥२६॥
स्मरणादपि लोकानां किमु श्राद्धकतांनृणाम् । ओङ्कारपितृतीर्थञ्चकावेरीकपिलोदकम्
सम्भेदश्चण्डयेगायास्तथैवामरकण्टकम् । कुरुक्षेत्राच्छतगुणं तस्मिन् स्नानादिकं भवेत्
शुक्रतीर्थञ्च विरयातं तीर्थ सोमेश्वरं परम् । सर्वव्याधिहरं पुण्यं शतकोटिफलाधिकम्
श्राद्धे दाने तथा होमे स्वाध्याये जलसन्निधौ । कायावरोहण नाम तथा चर्मण्यतीनदी
गोमती वरुणा तद्वत्तीर्थमोशनसम्परम् । भैरवं भृगुतुङ्गञ्च गौरीतीर्थमनुत्तमम् ॥ ३१ ॥
। तीर्थ वैनायकं नाम भद्रेश्वरमत. परम् । तथा पापहरं नाम पुण्याथ तपती नदी ॥३२॥
मूलतापीपयोप्णी व पयोष्णीसङ्गमस्तथा । महाबोधिः पाटला च नागतीर्थमवन्तिका
तथावेणा नदी पुण्या महाशालं तथैव च । महारुद्रं महालिङ्गं दशार्णा च नदी शुभा ॥
शतरुद्रा शताहाच तथा विश्वपदं परम् । अङ्गारवाहिका तन्नदी तो शोणधर्धरी ॥
कालिका च नदी पुण्या वितस्ता च नदी तथा।
एतानि पितृतीर्थानि शस्यन्ते स्नानदानयोः ॥ ३६ ॥
श्राद्धमेतेषु यद्दत्तन्तदनन्तफलं स्मृतम् । द्रोणी पाटनदी धारासरित् क्षीरनदी तथा ॥
गोकर्ण गजकर्णश्च तथा च पुरुषोत्तमः। द्वारका कृष्णतीर्थश्च तथादसरस्वती ॥३८॥
"दी मणिमनी नाम तथा च गिरिकर्णिका ।धूतपापं तथा तीर्थ समुद्रो दक्षिणस्तथा ।
'पु पितृतीर्थपु श्राद्धमानन्त्यमशुने । तीर्थ मेधकरं नाम स्वयमेव जनार्दनः ॥ ४० ॥
* मत्स्यपुराणम् * [द्वाविंशतितमी यत्र शाइधरो विष्णुर्मेखलायामवस्थितः । तथा मन्दोदरी तीर्थं तीर्थं चम्पा नदी शुभा तथा सामलनाथश्च महाशालनदी तथा । चक्रवाकं चर्मकोट तथा जन्मेश्वरं महत् ॥ अर्जुनं त्रिपुरं चैव सिद्धेश्वरमतःपरम् । श्रीशैलं शाङ्करं तीर्थ नारसिहमतःपरम् ॥४३॥ महेन्द्रश्च तथा पुण्यमथ श्रीरङ्गसंज्ञितम् । एतेप्यपि सदा श्राद्धमनन्तफलदं स्मृतम् । दर्शनादपि चैतानि सद्यः पापहराणि वै । तुङ्गभद्रा नदी पुण्या तथा भीमरथी सरित् ॥ भीमेश्वरं कृष्णवेणा कावेरी कुड्मलानदी । नदी गोदावरी नाम त्रिसन्ध्यातीर्थमुत्तमम तीर्थ त्रयम्बकं नाम सर्वतीर्थनमस्कृतम् । यत्रास्ते भगवानीशः स्वयमेव त्रिलोचनः । श्राद्धमेतेपु सर्वेषु कोटिकोटिगुणं भवेत् । स्मरणादपि पापानि नश्यन्ति शतधा द्विज' श्रीपर्णी ताम्रपर्णी च जयातीर्थमनुत्तमम् । तथा मत्स्यनदी पुण्या शिवधारं तथैव च भद्रतीर्थञ्च विख्यातं पम्पातीर्थञ्च शाश्वतम् । पुण्यं रामेश्वरं तद्वदेलापुरमलं पुरम् ॥ अङ्गभूतञ्च विख्यातमानन्दकमलं बुधम् । आम्रातकेश्वरं तहदेकाम्भकमतः परम् ॥५१॥ गोवर्धनं हरिश्चन्द्रं रूपचन्द्रं पृथूदकम् । सहस्राक्षं हिरण्याक्षं तथा च कदली नदी ॥५२॥ रामाधिवासस्तत्रापि तथा सौमित्रिसङ्गमः । इन्द्रकीलं महानादन्तथा च प्रियमेलकम् एतान्यपि सदा श्राद्धे प्रशस्तान्यधिकानि तु । एतेषु सर्वदेवानां सान्निध्यं दृश्यते यत' दानमेतेषु सर्वेषु दत्तं कोटिशताधिकम् । वाहुदा च नदी पुण्या तथा सिद्धचनं शुभम् तीथं पाशुपतं नाम नदी पार्वतिका शुभा । श्राद्धमेतेषु सर्वेषु दत्तं कोटिशतोत्तरम् ॥ तथैव पितृतीर्थन्तु यन गोदावरी नदी । गुतालिङ्गसहस्रेण सर्वान्तरजलावहा ॥ ७ ॥ जामदग्न्यस्य तत्तीय क्रमादायातमुत्तमम् । प्रतीकस्य भयादिन्नं यन गोदावरी नदी । तत्तीय हव्यकव्यानामप्सरोयुगसंशितम् । श्राद्धाग्निकार्यदानेपु तथा कोटिशताधिकम् तथा सहस्रलिङ्गच राघवेश्वरमुत्तमम् । सेन्द्रफेना नदी पुण्या यनेन्द्रः पतितः पुरा ॥ निहन्य नमुचिं शसस्तपसा स्वर्गमाप्तवान् । तत्र दत्तं नरः श्राद्धमनन्तफलदं भवेत् ॥ तीर्यन्तु पुष्करं नाम शालग्रामं तथैव च । सोमपानञ्च विण्यातं यत्र वैश्वानरालयम् ॥ तीर्थ सारम्यतं नाम म्वामिनीयं तथैव च । मलन्दरानदीपुण्या फौशिकीचन्द्रिका तथा पेदभावाय चैरा च पयोणी प्रासगापरा ! कावेरी चीत्तगपुण्यातयाजालन्धरोगिरिः ॥ ऽध्यायः] *श्राद्धयोग्यतीर्थानावर्णनम् - एतेषु धाइतीर्थषु श्राद्धमानन्त्यमभुते । लोहदण्ड तथा तीर्थ चित्रकूटस्तथैव च ॥६५|| विन्ध्ययोगश्य गगनायास्तथा नदीतटं शुभम् । कुब्जाम्रन्तु तथा तीथं उर्वशी पुलिनंतथा संसारमोचन तीर्थ तयैव ऋणमोवनम् । एतेषु पितृतीर्थपु श्राद्धमानन्त्यमभुते ॥६७ ॥ अट्टहासं तथा तीर्थ गौतमेश्वरमेव च । तथा यशिष्टं तीर्थन्तु हारितं तु ततः परम् ।। ब्रह्मावत कुशावर्त हयतीर्थ तथैव च । पिण्डारकञ्च विख्यातं शवोद्धार तथैव च ॥६६॥ घण्टेश्वर विल्वकच नीलपर्वतमेव च । तथा च धरणीतीर्थ रामतीर्थ तथैव च ॥ ७० ॥ अश्वतीर्थञ्च विख्यातमनन्तं श्राद्धदानयोः । तीर्थ वेदशिरो नाम तथेचीघवती नदी। तीर्थ वसुमदं नाम च्छागलाण्ड तथैव च । एतेपु थाददातारः प्रयान्ति परमं पदम् तथा च घदरीतीर्थ गणतीर्थ तथैव च । जयन्तं विजयश्चैव शुक्रतीर्थ तथैव च ॥ ७३ ॥ श्रीपतेश्च तथा तीर्थ तीर्थ रेवतकं तथा । तथैव शारदातीर्थ भद्रकालेश्वरं तथा ॥४॥ वैकुण्ठतीर्थञ्च परं भीमेश्वरमथापि पा । एतेषु श्राद्धदातारः प्रयान्ति परमां गतिम् ॥ तीर्थ मातृगृहं नाम करवीरपुरं तथा । कुशेशरञ्च विख्यातं गौरीशिखरमेव च ॥७६ ॥ नकुलेशस्य तीर्थञ्च कर्दमालं तथैव च । दिण्डिपुण्यकरं तद्वत् पुण्डरीकपुरं तथा ॥७॥ सप्त गोदावरी तीर्थ सर्वतीर्थेश्वरम् । तत्र श्राद्धं प्रदातव्यमनन्तफलमीप्तुभिः ॥ ७८ ॥ एपतृदेशतः प्रोक्तस्तीर्थानां संग्रहोमया । घागीशोऽपिनशक्तोतिविस्तरान् किमुमानुपः । सत्यं तीर्य दया तीर्थ तीर्थमिन्द्रियनिग्रहः । वर्णाश्रमाणां गेहेऽपि तीर्थन्तु समुदाहृतम्। पतत्तीर्थपु यच्छ्राद्धं तत्कोटिगुणमिप्यते । यस्मात्तस्मात् प्रयत्नेन तीर्थ श्राद्धं समाचरेत् रातः कालोमुहूर्तास्त्रीन् सङ्गवस्तावदेव तु । मध्याह्नस्त्रिमुहूर्तस्यादपराहस्ततः परम् ॥ सायाह्नस्त्रिमुहूर्तः स्याच्छ्राद्धं तत्रनकारयेत् । राक्षसी नामसा वेला गहिता सर्वकर्मसु । अहो मुहतों विख्याता दश पञ्च चसर्वदा । तत्राटमो मुहायः सकाल: कुतपः स्मृतः। मध्याह्न सर्वदा यस्मान्मन्दीभवति भास्करः । तस्मादनन्तफलदस्तदारम्भो भविष्यति। मध्याहखडा पात्रञ्च तथा नेपालकाबला रूप्यंदर्भास्तिला गावोदौहित्रश्चाएमास्मृतः । पापं कुत्सितमित्याहुस्तस्य सन्तापकारिण । अष्टावतेयतस्तस्मात् कुतपाइति विश्रुता॥ ऊय मुहूर्तात् कुतपाद्यन् मुहूर्तचतुष्टयम् । मुहर्तपञ्चकश्चैतन्वधाभवन मिष्यते ॥८॥ , . * मत्स्यपुराणम् * [त्रयोविंशतितमो विष्णोदेहसमुद्भूताः कुशाः कृष्णास्तिलास्तथा। श्राद्धस्य रक्षणायालमेतत् प्राहुर्दिवौकसः ॥ ८६ ॥ तिलोदकालिर्दय जलस्थस्तार्थवासिभिः । सदर्भहस्तेनैकेन श्राद्धमेवं विशिष्यते । श्राद्धसाधनकाले तु पाणिनैकेन दीयते । तर्पणन्तू भयेनैव विधिरेप सदा स्मृतः ॥ ६॥ सूत उवाच। पुण्यं पवित्रमायुप्यं सर्वपापविनाशनम् । पुरा मत्स्येन कथितन्तीर्थश्राद्धानुकीर्तनम् ॥ शृणोति यः पठेद्वापि श्रीमान् सआयते नरः ॥ १२ ॥ श्राद्धकालेच वक्तव्यं तथा तीर्थनिवासिभिः । सर्वपापोपशान्त्यर्थमलक्ष्मीनाशनं परम् ।। इदं पवित्रं यशसो निधानमिदं महापापहरञ्च पुंसाम् । ब्रह्मास्टैरपि पूजितञ्च श्राद्धस्य माहात्म्यमुशन्ति तज्ज्ञाः ॥ १४ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे श्राद्धकल्पे द्वाविंशतितमोऽध्यायः॥ त्रयोविंशतितमोऽध्यायः सोमवंशाख्यानम् । ' ऋषय ऊचुः। सोमः पितॄणामधिपः कथं शास्तविशारदः । तदंश्याये च राजानो वभूयुः कीर्तिवर्धनाः । सूत उवाच वादियो ब्रह्मणा पूर्वमश्रिः सर्गविधी पुरा । अनुत्तमं नाम तपः सृष्टयथं तप्तवान् प्रभुः ।। यदानन्दकर नहा जगत् केशविनाशनम् । ब्रह्मविष्ण्वकरद्राणामभ्यन्तरमतीन्द्रियम् ॥३ शान्तिमयान्तमनसस्तदन्तनयनेस्थितम् । माहात्म्यात्तपसा विप्राःपरमानन्दकारकम् ॥ यम्मादुमापतिः साईमुभयातमधिष्ठितः । तं दृष्ट्वावाटमांशेन तस्मात् सोमोऽवच्छिशुः अधःमुस्रायनेत्राभ्यांधामतयाम्बुसम्भवम् । दीपयविश्वमसिलंग्योत्मयासचराचरम् ॥
ऽध्यायः]
* सोमाख्यानम् *
५५
तद्दिशो जगृहुर्धाम स्त्रीरूपेणसुतेच्छया । गर्भोभूत्वोदरे तासामास्थितोऽब्दशतत्रयम् ॥
आशास्तं मुमुचुगर्भमशक्का धारणे ततः । समादायाथ तं गर्भमेकीकृत्य चतुर्मुखः ॥८॥
युवानमकरोद् ब्रह्मा सर्चायुधधरं नरम् । स्यन्दनेऽथ सहस्राध्ये वेदशक्तिमये प्रभुः ॥२॥
आरोप्य लोकमनयदात्मीयं सपितामहः । तत्रब्रह्मर्षिभिः प्रोक्तमस्मत्स्वामीभवत्वयम्॥
पितृभिर्देवगन्धर्वैरोपधीभिस्तथैवच। तुष्टुयुः सोमदेवत्यैर्ब्रह्माणं मन्त्रसंग्रहः ॥ ११ ॥
स्तूयमानस्यतस्याभू दधिकोधामसम्भवः । तेजो वितानादभवद् भुविदिव्यौषधीगणः ।
तद्दीप्तिरधिका तस्मादात्री भवति सर्वदा । तेनीपधीशः सोमोऽभूद्विजेशश्चापि गद्यते
वेद्धामरसञ्चापि यदिदं चन्द्रमण्डलम् । क्षीयते पीते चैव शुक्ले कृष्णे व सर्वदा ॥१४
विंशतिन्च तथा सप्तदक्षःप्राचेतसो ददौ । रूपलावण्यसंयुक्तास्तस्मै कन्याः सुवर्चसः ।
ततः पाद्मसहस्त्राणां सहस्राणि दर्शवतु । तपश्चचार शीतांशु विष्णुध्यानकतत्परः ॥
ततस्तुष्टस्तु भगवांस्तस्मै नारायणो हरिः। वरं वृणीष्व प्रोवाच परमात्मा जनार्दनः ।
ततो परेवरान् सोमः शक्रलोकं जयाम्यहम् । प्रत्यक्षमेव भोक्तारोभवन्तु मममन्दिरे ।
राजसूये सुरगणा ब्रह्माद्याः सन्तु मे द्विजाः ।
रक्षः पालः शिवोऽस्माकमास्तां शूलधरो हरः ॥ १६ ॥
तयेत्युक्तः स आजहे राजसूयन्तु विष्णुना । होतानि गुरध्वर्युरुगानाभूचतुर्मुरः॥२०॥
ब्रह्मत्त्वमगमत्तस्य उपद्रष्टा हरिःस्वयम् । सदस्याः सनकाद्यास्तुराजस्यविधीस्मृताः।
चमसाध्वर्यवस्तत्र विश्वेदेवादशैव तु । लोक्यं दक्षिणा तेन ऋत्विगभ्यःप्रतिपादितम् ॥
तत: समाप्तेऽवभृथे तटूपालोकनेच्छवः । कामघाणाभि तमाङ्गयो नवदेव्यः सिपेचिरे ।।
लक्ष्मीनारायणं त्यच्या सिनीवालीवकर्दमम् । द्युतिर्विभावसुं तद्वत्तुष्टिर्धातारमव्ययम् ।
प्रभाप्रभाकरं त्यस्याहविष्मन्तं कुहास्ययम् । कीतिर्जयन्तंभार वसुमारीचकश्यपम् ॥
धृतिस्त्यश्यापतिनन्दिसोममेवामजस्तदा । स्वकीयाइवसोमोऽपिकामयामासातास्तदा
एवं रतापचारस्य तासाम्भ गणम्तदा । न शशाङ्कापचाराय शापः शस्त्रादिभि.पुनः ।।
तथाप्यराजत विधुर्दशधाभावयदिशः । सोम.पाप्याथ दुष्प्राप्यम वर्गपिसंस्कृतम् ।।
सप्तलोकनाथत्वमवाप तपसा तदा ॥२८॥
* मत्स्यपुराणम् *
[ त्रयोविंशतितमो.
कदाचिदुद्यानगतामपश्यदनेकपुप्पाभरणश्च शोभितम् ।
वृहन्नितम्बस्तनभारखेदात् पुष्पस्य भङ्गेऽप्यतिदुर्वलाङ्गीम् ॥ २६ ॥
भार्याञ्च तां देवगुरोरनड्डाणाभिरामायतचारनेत्राम् ।
तारां स ताराधिपतिः स्मरातः केशेषु जग्राह विविक्तभूमौ ॥ ३० ॥
सापि स्मरार्ता सह तेन रेमे तद्रूपकान्त्या हतमानसेन ।
चिरं विहृत्याथ जगाम तारां विधु! हीत्वा स्वगृहं ततोऽपि ॥ ३१ ॥
न तृप्तिरासीच्च गृहेऽपि तस्य तारानुरक्तस्य सुखागमेषु ।
वृहस्पतिस्तद्विरहाग्निदग्धस्तद्ध्याननिष्ठै कमना बभूव ॥ ३२॥
शशाक शापन्न च दातुमस्मै न मन्त्रशस्नाग्निविपरशेपैः ।
तस्यापकर्तुं विविधैरुपायै वाभिवारैरपि घागधीशः ॥ ३३ ॥
स याचयामास ततस्तु दैन्यात् सोमं स्वभार्यार्थमनङ्ग तप्तः ।
स याच्यमानोऽपि ददौ न तारां वृहस्पतेस्तत्सुरापाशबद्धः ॥ ३४ ॥
महेश्वरेणाथ चतुर्मुखेन साध्यैर्मरुद्भिः सह लोकपालैः।
ददी यदा तान्न कथञ्चिदिन्दुस्तदा शिवः क्रोधपरो बभूव ॥ ३५ ॥
यो वामदेवः प्रथितः पृथिव्यामनेकदाचितपादपद्मः ।
ततः सशिप्यो गिरिशः पिनाकी वृहस्पतिस्नेहवशानुबद्धः ॥ ३६॥
धनु! हीत्याजगवं पुरारिजगाम भूतेश्वरसिद्ध ष्टः ।
युद्धाय सोमेन विशेषदीप्तनृतीयनेत्रानलभीमवक्त्राः ॥ ३७॥
सहेच जग्मुश्च गणेशकाद्या विंशचतुः पष्टिगणास्त्रयुक्ताः ।
यक्षेश्वरः कोटिशतैरनेकयुतोऽन्वगात्स्यन्दनसंस्थितानाम् ॥ ३८ ॥
घेतालयक्षोरगकिन्नराणां पद्मन चैकेन तथार्बुदैन ।
लक्षस्त्रिभिर्दादशभीरथानां सोमोऽप्यगात्तत्र विवृद्धमन्युः ।। ३६ ॥
नक्षनदैत्यामुरसैन्ययुक्तः शनैश्चरागारफवृद्धतेजाः ।
जग्मुर्भयंसत तथैव लोकाश्चचालभूद्रोपपसमुद्रगर्भा ॥ ४० ॥
ऽध्यायः] * बुधोत्पत्तिवर्णनम् * स सोममेवाभ्यगमत्पिनाकी गृहीत दीप्तास्त्र विशालवह्नि । अथाभवदीपणभीमसेनसैन्यद्वयस्यापि महाहवोऽसौ ॥४१॥ अशेपसत्वक्षयकृत्प्रवृद्धस्तीक्ष्णायुधास्त्रज्वलनैकरूपः । शस्त्ररथान्योन्यमशेषसैन्यं द्वयोर्जगाम क्षयमुग्रतीक्ष्णैः ॥ ४२ ॥ पतन्ति शस्त्राणि तथोञ्चलानि स्वर्भूमि पातालमथादहन्ति । रुद्रः कोपाद् ब्रह्मशीप मुमोच सोमोऽपि सोमास्त्रममोघवीर्यम् ॥ १३ ॥ तयोनिपातेनसमुद्र भूभ्योरथान्तरिक्षस्य च भीतिरासीत् । तदस्त्रयुग्मं जगतां क्षयाय प्रवृद्धमालोक्म पितामहोऽपि ॥ १४ ॥ अन्तः प्रविश्याथ कथं कथञ्चिभिवारयामास सुरैः सहैव । अकारणं किं क्षयरजनानां सोम! त्वयापीत्थमकारिकार्यम् ॥ ४५ ॥ यस्मात्परस्त्रीहरणाय सोम ! त्वया कृतं युद्धमतीच भीमम् । पापग्रहस्त्वं भविता जनेषु शान्तोऽप्यलं नूनमथासितान्ते ॥ ४६ ॥ भार्यामिमामर्पय वापतेस्त्वं न चावमानोऽस्ति परस्वहारे । सूत उवाच । तथेति चोयाच हिमांशुमाली युद्धादपानामदतः प्रशान्तः ॥ ४७ ॥ वृहस्पति.स्वामपगृह्य तारां हष्टो जगाम स्वगृहं स स्टः । इति श्रीमन्स्यपुराणे सोमवंशाल्याने सोमापचारो नाम त्रयोविंशतितमोऽध्यायः । चतुर्विशतितमोऽध्यायः बुधोत्पत्तिवर्णनम् । सूत उवाच। ततः संवत्सरस्यान्ते द्वादशादित्यसन्निभः । दिव्यपीताम्बरधरो दिव्याभरणभूषितः ।। तारोदराद्विनिप्पान्तः कुमारश्चन्द्रसनिमः ।
* मत्स्यपुराणम् * [चतुर्विशतितमो सर्वार्थशास्त्रविद्धीमान् हस्तिशास्त्रप्रवर्तक ॥२॥ नामयद्राजपुत्रीय विश्रुत गजवैद्यकम् । राज्ञ सोमस्य पुत्रत्वाद्राजपुत्रोवुध स्मृत ॥ जातमात्र स तेजासि सर्वाण्येवाजयद्वली । ब्रह्माद्यास्तत्र चाजग्मुर्देवादेवर्षिभि सह ॥ वृहस्पतिगृहे सर्व जातकर्मोत्सरे तदा । अपृच्छस्तेसुरास्तारा केन जात कुमारक । तत सा लजिता तेषा न किञ्चिश्वदत्तदा । पुन पुनस्तदापृष्टा लजयन्ती वराङ्गना ॥६ सोमस्येति बिरादाह ततोऽगृह्णादिधु मुतम् । बुधइत्यकरोन्नानाप्रादाद्राज्यञ्चभूतले ॥ अभिपेक तत कृत्वा युवानमकरोद्विभु । अहसाम्य प्रदायाथ ब्रह्मा ब्रह्मर्पिसयुत ॥८॥ पश्यता सर्वदेवाना तत्रैवान्तरधीयत । इलोदरे च धर्मिष्ट वुध पुत्रमजीजनत् ॥ ६ ॥ अश्वमेधशत साग्रमकरोद्य स्वतेजसा। पुरूरवा इति ख्यात सर्वलोकनमस्कृत ॥१०॥ हिमवच्छिसरे रम्ये समाराध्य जनार्दनम् । लोकश्वर्यमगादाजा सप्तद्वीपपतिस्तदा ॥११ केशिप्रभृतयोदैत्या कोटिशो येन दारिता । उर्वशी यस्य पत्नीत्वमगमदूपमोहिता ॥ सप्तद्वीपा वसुमती सशेल्वनकानना । धर्मेण पारिता तेन सर्वलोकहितैषिणा ॥ १३ ॥ चामरग्राहिणीकीर्ति सदाचैवालवाहिका । विष्णो प्रसादाद्देवेन्द्रोददावर्धासनन्तदा ॥ धर्मार्थकामान्धर्मेणसममेवाभ्यपाल्यत्। धर्मार्थकामा सन्द्रष्टुमाजग्मु कौतुकात्पुग। जिशासवस्तयरित क्थ पश्यति न समम् । भक्त्या वततस्तेपामध्यपाद्यादिक नृप ।। आसनग्यमानीय दिव्य कनकभूपितम् । निवेश्याथाक्रोत् पूजामीपद्धर्मेऽधिकापुन ॥ जग्मतुस्तेन कामार्थति कोप नृप प्रति । अर्थ शापमदात्तस्मैलोभात्त्वनाशमेष्यसि ॥ कामोऽप्याह तवोन्मादो भवितागन्धमादने । कुमारयनमाश्रित्यवियोगादुर्वशीभवात् ॥ धोऽप्याइचिरायुस्त्वधार्मिकश्चमविष्यसि । सन्ततिस्तवराजेन्द्रयावचन्द्रावतारकम् ॥ शतशो वृद्धिमायातु न नाशम्भुपियास्यति । इत्युतवान्तर्दधु सराजाराज्य तदन्यभूत्।। अद्दन्यहनि देवेन्द्र द्रा याति सराजराद् । पदाचिदारा स्थदक्षिणाम्बरवारिणम् ॥२२ सार्द्धमर्येण सोऽपश्यनीयमानामयाम्बरे । फेशिना दानवेन्द्रेण चित्रलेगामथोर्यशीम् ॥ तं विनिर्जित्य समरे विविधायुध्रपाणिना ! युधपुरेणयायव्यमन्त्रमुल्यायशोऽथिना ॥ तथा शमोऽपि समरे यो चैव विनिर्जित । मित्रत्वमगमद्देवैर्ददाचिन्द्राय चोर्वशीम्॥ ।
ऽध्यायः * रजेश्चरित्रम् * ५६ ततःप्रभृति मित्रत्वमगमत्पाकशासनः ।.सर्वलोकातिशायित्वं यलमों यशः श्रियम् ॥ प्रादाद्वनीतु सन्तुष्टो गेयतां भरतेन च । सा पुरूरवसः प्रीत्या गायन्ती चरितं महत् २७ लक्ष्मी स्वयं वरं नाम भरतेन प्रवर्तितम् । मेनकामुर्वशी रम्भा नृत्यतेति तदा दिशत् ।। ननर्त सलयं तत्र लक्ष्मीरूपेण चोर्वशी । सा पुरुरवसं दृष्ट्वा नृत्यन्ती कामपीडिता ॥२६ विस्मृताभिनयं सर्वं यत्पुरा भरतोदितम् । शशाप भरतः क्रोधाद्वियोगादस्य भूतले ॥ पञ्चपञ्चाशदव्दानि लता सूक्ष्मा भविष्यसि । पुरूरवाः पिशाचत्वं तत्रैवानुभविष्यसि ॥ ततस्तमुर्वशी गत्वा भर्तारमकरोचिरम् । शापान्ते भरतस्याथ उर्वशी बुधसनुत. ॥३२॥ अजीजनत् सुतानष्टौ नामतस्तानियोधत । आयु ढायुरश्वायुधनायु तिमान्वसुः ॥३३ शुचिविद्यः शतायुश्च सर्वे दिव्यवौजसः । आयुषो नहुप पुत्रो वृद्धशर्मा तथैव च ॥ रजिदम्भो विपाप्मा च वीराः पञ्च महारथाः । रजेः पुत्रशतंज राजेयमिति विश्रुतम् ॥ रजिराराधमास नारायणमकल्मपम् । तपसा तोपितो विष्णुर्यरान् प्रादान्महीपतेः ॥३६ देवासुरमनुष्याणामभूत् स विजयी तदा । अथ देवासुरं युद्धमभूद्वर्पशतत्रयम् ॥३७॥ प्रहादशक्रयोभीमं न कश्चद्विजयी तयोः । ततो देवासुरैः पृष्टः प्राह देवश्चतुर्मुख. ॥३८॥ अनयोविजयीक स्यात्रजिर्यवेतिसोऽत्रवीत् । जयायप्रार्थितोराजासहायस्त्वभवस्वनः॥ दैत्यैः प्राह यदि स्वामी योभवामिततस्त्वलम् । नासुरैःप्रतिपन्नतत्प्रतिपन्नंसुरैस्तथा ।। स्वामी भव त्वमस्माकं सग्रामेनाशयद्धिपः । ततोविनाशिता सर्वेयेऽवध्यावज्रपाणिना ॥ पुत्रत्वमगमत् तुष्टस्तस्येन्द्रः कर्मणा विभुः । दत्वेन्द्राय तदा गज्य जगाम तपसेरजित रजिपुत्रस्तदाच्छिन्नं बलादिन्द्रस्य वैभवम् । यज्ञभागञ्च राज्यञ्चतपोवलगुणान्वितै ॥ राज्याभ्रष्टस्तदाशकोरजिपुर्निपीडित । प्राहवाचस्पतिदीन.पीडितोऽस्मिरजे.सुतैः ॥ न यज्ञभागो राज्यं मे निर्जितश्च वृहस्पते । राज्यलाभायमेयतंविधत्स्वधिपणाधिप ॥ ततो वृहस्पति शक्रमकरोद्वलदर्पितम् । ग्रहशान्तिविधानेन पौष्टिक्नच कर्मणा ॥४६॥ गत्वाऽथ मोहयामास रजिपुत्रान् वृहस्पति । जिनधर्मसमास्थाय चेदयाहां सवेदवित् ॥ वेदत्रयी परिभ्रष्टांश्चकार धिषणाधिपः । वेदवाह्यान् परिज्ञाय हेतुवादसमन्वितान् ||४८ जधान शको पत्रेणसर्वानधर्मवहिएतान् । नहुपस्यप्रवक्ष्यामिपुनान्सप्लेयधार्मिकान् ।। - मत्स्यपुराणम् * [चतुर्विंशतितमो यतिर्ययातिः संयातिरुद्धवः पाचिरेव च । सर्यातिमघजातिय सतते वंशवर्धनाः ॥५०॥ यतिः कुमारभावेऽपियोगीवैपानसोऽभवत् । ययातिश्चाफरोद्राज्यंधर्मकशरणःसदा ॥ शर्मिष्ठा तस्य भार्याभूद्दुहितावृषपर्वणः । भार्गवस्यात्मजा तहदेवयानी च सुव्रता ॥५२॥ ययातः पञ्च दायादास्तान् प्रवक्ष्यामि नामतः । देवयानी यहूं पुत्रं तुर्वसुच्चाप्यजीजनत् ॥ ५३॥ तथाद्रुह्य मन पूरुं शर्मिष्टाजनयत्सुतान् । यदुः पूरब्धाभवतां तेषां वंशविवर्धनी ॥५४॥ ययाति हुपश्चासीत् राजा सत्यपराक्रमः । पालयामास स महीमीजेचविधिवन्मसैः ॥ अतिभत्त्या पितृनय॑ देवांश्च प्रयतः सदा । अथाजयत्प्रजाः सर्वा ययातिरपराजितः ॥ स शाश्वतीः समा राजाप्रजाधर्मेणपालयत् । जरामार्छन्महाघोरंना पोरूपनाशिनीम् ॥ जरामिभूतः पुत्रान् स राजा वचनमत्रवीत् । यदुं पूरु तुर्वसुञ्च द्रुह्यं चानुञ्च पार्थिवः ।। यौवनेन चलान्कामान् युवायुवतिभिःसह । विहर्तुमहमिच्छामिसाहाय्यं कुरतात्मजाः॥ तं पुत्रो देवयानेयः पूर्वजो यदुरप्रवीत् । साहाय्यं भवतः कार्यमस्माभियौवनेनकिम् ॥ ययातिरब्रवीत् पुत्रान् जरा मे प्रतिगृह्यताम् । यौवनेनाथ भवतांचरेयं विषयानहम् ॥६१ यजतो दीर्घसत्रैर्मे शापाच्चोशनसो मुनेः । कामार्थः परिहीनो मेऽतृप्तोऽहंतेन पुत्रकाः ॥ स्वकीयेन शरीरेण जरामेनां प्रशास्तु वः । अहं तन्वाभिनवया युवा कामानवाप्नुयाम् ॥ नतेऽस्य प्रत्यगृह्णन्त यदुप्रभृतयो जराम् । चतुरस्तान् स राजर्पिरशपच्चेतिनः श्रुतम् ।। तमप्रवीत्ततः पूरुः कनीयान् सत्यविक्रमः । जरांमादेहिनवयातचामेयौवनात्सुखी ॥६५ अहं जरावन्तवादाय राज्ये स्थास्यामि चाज्ञया । एवमुक्तः स राजर्षिस्तपोवीर्यसमाधयात् ॥६६॥ संस्थापयामास जरां तदा पुत्रे महात्मनि । पौरवेणाथ वयता राजा यौवनमास्थितः॥ ययातेश्चाथ वयसा राज्यं पूरुरकारयत् । ततो वर्षसहस्रान्ते ययातिरपराजितः ॥६८॥ अतृप्त इव कामानां पूरं पुत्रमुवाच ह । त्वया दायादवानस्मि त्वं मे वंशकरः सुतः ॥ पौरखो वंश इत्येप रयाति लोके गमिष्यति । ततः स नृपशार्दूलः पूरुराज्येऽभिषिच्य च कालेन महता पश्चात्काल धर्ममुयियान् । पूरुवंश प्रवश्यामि शगुन मृषिसत्तमाः ॥
ऽध्याय ]
* ययातिचरित्रम्
यन ते भारता जाता भरतान्चय पर्खना ।
इति श्रीमत्स्यपुराणे सोमवशे ययातिचरिते चतुर्विशतितमोभ्याय ।
पञ्चविंशतितमोऽध्यायः
ययातिचरित्रम् ।
ऋपय ज्यु ।
किमथ पौरवो वश श्रेष्ठत्व प्राप भूतले । ज्येप्टस्यापि यदोवश किमर्थ हीयतेश्रिया ॥
अन्यद्ययातिचरित स्त। विस्तरतो बद । यस्मात्तत्पुण्यमायुप्यमभिनन्द्य सुरैरपि ॥२
सृत उवाच।
एतदेव पुग पृष्ट शतानीकेन शौनक । पुण्य पवित्रमायुष्य ययाति चरित महत् ॥॥
शतानीक उवाच।
ययाति पूर्वजोऽस्माक दशमो य प्रजापते । कथ स शुक्तनया लेभे परमदुर्लभाम् ॥
एतदिच्छाम्यह श्रोतु विस्तरेण तपोधन । आनुपूर्व्याञ्च मे शस पूरोवंशधरान्नुपान् ॥"
शौनक उवाच ।
ययातिरासीद्राजर्पिर्देघराज समद्युति । त शुक्रवृषपर्वाणी चत्राथे वै यथा पुरा ॥६॥
तत्तेऽह सम्प्रवक्ष्मामि पृच्छतो राजसत्तम । देवयान्याश्च सयोग ययाते दुपस्य च ॥७
सुराणामसुराणाञ्च समजायत वै मिथ । ऐश्वर्य प्रतिसङ्घर्ष स्नैलोक्ये सचराचरे ॥८॥
जिगीषया ततो देवा धनुरागिरस मुनिम्। पौरोहित्ये च यशार्थे कान्य तृशनस परे ।
ब्राह्मणी तावुभौ नित्यमन्योन्य स्पर्धिनी भृशम् ।
तत्र देवा निजध्नुयान दानपान् युधिसङ्गतान् ॥१०॥
तान् पुनर्जीचयामास काव्यो विद्यायलाश्रयात् ।
ततस्ते पुनरुत्थाय योधयाचबिरे सुरान् ॥११॥
* मत्स्यपुराणम् * [पञ्चविंशतितमो असुरास्तु निजघ्नुर्यान् सुरान् समरमूर्द्धनि । नतानसंजीवयामासवृहस्पतिरुदारधीः ॥ नहिवेदसतांविद्यांयांकाव्योवेदवीर्यवान् । संजीवनीन्ततो देवा विषादमगमन् परम् ॥ अथ देवा भयोद्विग्नाः काव्यादुशनसस्तदा । ऊचुः कवमुपागम्य ज्येष्ठंपुत्रंबृहस्पतेः॥ भजमानान् भजस्वास्मान् कुरु साहाय्यमुत्तमम् । यासी विद्या निवसति ब्रह्मणे मिततेजसि ॥१५॥ शुक्रेतामाहरक्षिप्रभागभाग्नोभविष्यसि । वृषपर्वणःसमीपेऽसौशयोद्रष्टुंत्ययाडिन रक्षते दानवांस्तत्र न स रक्षत्यदानवान् । तमाराधयितुं शक्तो नान्यःकश्चिद्भुते देवयानी च दयिता सुता तस्य महात्मनः । तामाराधयितुं शक्तो नान्यःकश्चय शीलदाक्षिण्यमाधुर्यैराचारेणदमेनच । देवयान्यान्तुतुष्टायांविद्यान्तांप्राप्स्यसिध्रुवम् ॥ तदाहि प्रेषितो देवैः समीपे वृषपर्वणः । तथेत्युक्त्या तु स प्रायाबृहस्पतिसुतःकचः ॥ स गत्वा त्वरितो राजन् ! देवैः संपूजितः कचः । असुरेन्द्रपुरैशुक्रप्रणम्येदमुवावह॥२१ ऋपेरगिरसः पौत्रं पुत्रंसाक्षावृहस्पतेः । नाम्नाकचेतिविख्यातंशिष्यंगृह्णातुमाभवान् ॥ ब्रह्मचर्य वरिष्यामि त्वय्यहं परमं गुरो । अनुमन्यस्य मां ब्रह्मन् ! सहस्रपरिवत्सरान् ॥ शुक्र उवाच। कव! सुस्वागतन्तेऽस्तुप्रतिगृह्णामितेववः । अर्चयिष्येऽहमय॑त्वामचितोऽस्तुवृहस्पतिः शौनक उवाच । कवस्तु तं तथेत्युक्त्या प्रतिजग्राह तद्वतम् । आदिष्टङ्कविपुत्रेणशुक्रणोशनसास्वयम् ॥ व्रतञ्च व्रतकालञ्च यथोक्तं प्रत्यगृह्णत । आराधयन्नुपाध्यायं देवयानीच भारत ॥२६॥ संशीलयन् देवयानी कन्यां संप्राप्तयौवनाम् । पुष्पैःफलैःप्रेषणेश्वतोपयायासमार्गवीम् । देवयान्यपि तं चित्रं नियमवतचारिणम् । अनुयायन्ती ललना रह: पर्यचरत्तदा ॥२८॥ पञ्चवर्ष शतान्येवं कचस्य चरतोभृशम् । तत्तत्तीचं व्रतं बुध्या दानवास्तं ततः कचम् ॥ गारक्षन्तं चनेदृष्ट्वा रहस्येनममर्पिताः । जन्नुहस्पते पानिजरक्षार्थमेव च ॥ ३० ॥ हत्याशालावृकेभ्यश्चप्रायच्छंस्तिलशःकृतम्। ततोगायोनिवृत्तास्ताअगोपाःस्वनिवेशनम्॥ ता दृष्ट्वा रहितागास्तु कचेनाभ्यागता बनात् । उवाचवचनं कालेदेवयान्यथ भार्गवम् ॥ ।
ध्यायः]
* कचोपाख्यानम् *
हुतञ्चैवाग्निहोत्रन्तेसूर्यश्चास्तगत.प्रभो । अगोपाश्चागतागायःकवस्तात ! न दृश्यते ।
व्यक्त हतो धृतो वापि कचस्तात! भविष्यति ।
तं विना नैव जीवामि वचः सत्यं ब्रवीम्यहम् ॥३४॥
शुक्र उवाच ।
-
पथह्येहीति शब्देन मृतं सञ्जीवयाम्यहम् । ततः सञ्जीवनी विद्यां प्रयुक्त्वा कचमाह्वयत ॥
"प्राद्रवदूरात् कचः शुक्रननामसः । ततोऽहमितिवाचख्यौराक्षसधिषणात्मजः॥
जयान्युक्तः पुष्पाहारे यदृच्छया । वनं ययौ कचो विप्रः पठन्व्रह्मशाश्वतम् ॥
पीणि चिन्वन्तं दद्गुशुर्दानवाश्चतम् । ततो द्वितीये तं हत्वापुन कृत्वाचचूर्णचत् ॥
प्रायच्छन् ब्राह्मणायैव सुरायामसुरास्तदा ॥३६॥
देवयान्यथ भूयोऽपि पितरं वाक्रमब्रवीत् । पुप्पाहारप्रेषणकृत्कचस्तात ! न दृश्यते ॥
व्यक्तं हतो मृतोवापिकचस्तात ! भविष्यति । तंविनानैवजीवामिवःसत्यं ब्रवीमिते ॥
शुक्र उवाच ।
वृहस्पतेः सुतः पुत्रि! कच प्रेतगतिं गतः ।
विद्यया जीवितोऽप्येवं हन्यते करवाणि किम् ॥४२॥
मैनं शुचो मा रद देवयानि ! न त्वादृशी मर्त्यमनु प्रशोचेत् ।
यस्यास्तव ब्रह्म च ब्राह्मणाश्च सेन्द्रा देवा वसवोऽश्विनी च ॥४॥
सुरद्विपश्चैव जगच सर्वमुपस्थितं मत्तपस' प्रभावात् ।
अशक्योऽयं जीवयितुं द्विजाति सञ्जीवितो यो वध्यते चैध भूयः ॥ ४४ ॥
देवायान्युवाच ।
यस्याशिरा वृद्धतमः पितामहो वृहस्पतिश्चापि पिता तपोनिधिः ।
ऋषेः सुपुषन्तमथापि पौत्रं कथं नशोचेयमहन्नरन्याम् ॥ ४५ ॥
स ब्रह्मचारी च तपोधनश्च सदोत्थितः कर्मसु चैव दक्षः।
कवस्य मार्ग प्रतिपत्स्ये न भोक्ष्न्ये प्रियो हि मे तात! कचोझिरूपः॥४६॥
ऽध्यायः] * कवोपारयानम् * शौनक उवाच । गुरोः सकाशात् समवाप्य विद्यां भित्वा कुक्षिनिर्विचक्राम विनः । प्रालेयादः शुकमुद्विय शृङ्खराध्यागमेपौर्णमास्यामियेन्दुः ॥५॥ दृष्ट्वा च तं पतितं वेदराशिमुत्थापयामास ततः कचोऽपि । विद्यां सिद्धान्तामवाप्याभिवाद्यः ततः कचस्तं गुरुमित्युवाच ॥५८॥ निधि निधीनां घरदं वराणां येनाद्रियन्ते गुरुमर्चनीयम् । प्रालेयादिप्रोज्वलभालसंस्थं पापान लोकांस्ते व्रजन्त्यप्रतिष्ठाः ॥५६॥ शौनक उवाच । सुरापानावञ्चनात्प्रापयित्वा संज्ञानाशञ्चेतसश्चापि घोरम् । दृष्ट्वा कवञ्चापि तथाभिरूपं पीतं तथा सुरया मोहितेन ॥६॥ स मन्युरुत्थाय महानुभावस्तदोशना विप्र हितंचिकीर्षुः । काव्यः स्वयं पास्पमिदं जगाद सुरापानं प्रत्यसो जातशङ्कः॥६१॥ शुक्र उचाव। यो ब्राह्माणोऽद्य प्रभृतीह कश्चिन्मोहात् सुरा पास्यति मन्दबुद्धिः। अपेतधर्मा ब्रह्महा चैव स स्यादस्मिन् लोके गर्हित. स्यात्परं च ॥६॥ मया चेमा विप्र धर्मोक्त सीमा मर्यादां वै स्थापितां सर्वलोके। सन्तो विप्राः शुश्रुषांसो गुरूणां देवा दैत्याश्चोपण्वन्तु सर्वे ॥६॥ शौनक उवाव। इतीदमुक्त्वा स महाप्रभावस्तपोनिधीनां निधिरप्रमेयः । तान्दानवांश्चैव निगूढवुद्धीनिदं समाहूय वचोऽभ्युवाच ॥ ६४ ॥ शुक्र उवाच । आचक्षाणो दानवा वालिशास्थ शिप्यः कचोपत्स्यति मत्समीपे । सञ्जीवनीं प्राप्यविद्यां ममायं तुल्यप्रभावो ब्राह्मणो ब्रह्मभूत ॥६५॥ शौनक उवाच । गुरोरुप्यसकाशे च दशवर्षशतानि सः । अनुज्ञातः कवोगन्तुमियेप त्रिदशालयम् ॥६६॥ इति श्री मत्स्यपुराणे कचोपाप्याने पञ्चविंशोऽध्यायः ।
पड्विंशोऽध्यायः कचदेवयानीसंवादकथनम् । शौनक उवाच। समापितव्रतं तन्तु विसृष्टं गुरुणा तदा । प्रस्थितं त्रिदशावासं देवयानीदमत्रवीत् ॥१॥ देवयान्युवाच । ऋपेरङ्गिरसः पौत्र! वृत्तेनाभिजनेन च । भ्राजले विद्यया चैव तपसा च दमेन च ॥२॥ ऋपिर्यथाशिरामान्यः पितुर्मम महायशाः । तथामान्यश्च पूज्यश्च मम भूयो बृहस्पतिः एवं ज्ञात्वा विजानीहि यज्रवीमि तपोधन !! व्रतस्थे नियमोपेते यथावतम्यहं त्वयि स समापितविद्यो मां भक्तान्न त्यक्तुमर्हसि । गृहाणपाणि विधिवन मममन्त्रपुरस्कृतम् । कच उवाच। पूज्योमान्यश्च भगवान् यथा मम पिता तव । तथात्वमनवद्याङ्गि! पूजनीयतमा मता ॥ आत्मप्राणैः प्रियतमा भार्गवस्य महात्मनः । त्वं भद्रे! धर्मतः पूज्या गुरुपुत्री सदामम यथा मम गुरुनित्यं मान्या शुक्रः पिता तव । देवयानि ! तथैवत्वं नैवं मां वक्तुमर्हसि । देवयान्युवाच । गुरपुत्रस्य पुत्रो मे न तु त्वमसि मे पितुः । तस्मान्मान्यश्च पूज्यश्चममापित्वं द्विजोत्तम असुरैहन्यमानेतु कचे त्वयि पुनः पुनः । तदा प्रभृति या प्रीतिस्तां त्वमेव स्मरस्य मे ॥ सौहार्येचानुरागे च येत्थ मे भक्तिमुत्तमाम् । न मामर्हसिधर्मश! त्यक्कुंभकामनागसम् फच उपाचा अनियोज्ये नियोगे मां नियुनक्षि शुभयते । प्रसीद सुभु! महन्त्वं गुरोर्गुस्तरा शुभे ॥ यत्रोपितं विशालाक्षि! त्वया चन्द्रनिभानने!। तबाहमुपितो भद्रे ! फुक्षी काव्यस्य भामिनि ! ॥१२॥ भगिनी धर्मतो मे त्वं मै घोचः शुभानने !! मुपेनाध्युपितोभद्र न मन्युर्विद्यते म..
। ऽध्यायः] * देवयानी कथानकम् * मापृच्छे त्वांगमिप्यामिशिवमस्त्वथमेपथि । अविरोधेनधर्मस्यस्मर्तव्योऽस्मिकथान्तरे अप्रमत्तोद्यता नित्यमाराधय गुरुं मम । देवयान्युवाच । दैत्यहतस्त्वं यदर्तृवुध्या त्वं रक्षितोमया ॥ १६ ॥ 'यदि मां धर्मकामा प्रत्याख्यास्यसि धर्मतः । ततःकवनतेविद्यासिद्धिरेपागमिष्यति कच उवाच। गुरपुनीति कृत्याहं प्रत्यास्यास्ये न दोपतः । गुरुणा चाम्यनुज्ञातः काममेवं शपस्वमाम् आपं धर्मवाणोऽहंदेवयानि यथात्वया । शप्तुंनाहोऽस्मि कल्याणि कामतोऽद्यचधर्मतः तस्माद्भवत्या यः कामो न तथासंभविष्यति । ऋषिपुत्रोनतेकश्चित्जातुपाणिग्रहीष्यति फलिप्यति नमे विद्या त्वद्वचश्चेतितत्तथा । अध्यापयिष्यामिव यं तस्यविद्याफलिप्यति शौनक उवाच! एवमुक्त्या नृप श्रेष्ठ! देवयानी कचस्तदा । त्रिदशेशालयं शीघ्रं जगाम द्विजसत्तमः ॥ | 'तमागतमभिप्रेक्ष्य देयाः सेन्द्रपुरोगमा । वृहस्पति समाज्येदं कचमाहुर्मुदान्विताः ॥ देवा ऊचुः। चं कचास्मद्धिकिर्म कृतवान्महदद्भुतम् । न ते यशः प्रणशिता भागभागच भविष्यसि। इति श्री मत्स्यपुराणे कचदेवयानी सवादो नाम पड्दिशोऽध्यायः । सप्तविंशोऽध्यायः देवयानी कथानकम् । शौनक उवाच । धे कचे प्राप्त हएरूपा दिवौकस. । कचादयेत्य तां विद्या कृतार्था भरतर्षभ ॥१॥ गुरव समागम्य शतकतुमथायन् । कालः स्त्वविक्रमस्याद्य जहिं शनून् पुरन्दर ! वर्मुक्तस्तु सह ते स्त्रिदशेर्मयांस्तदा । तथेत्युक्त्योपचकाम सोऽपश्यद्विपिन स्त्रियः * मत्स्यपुराणम् * [सप्तविंशो क्रीडन्तीनान्तु कन्यानां घने चैत्ररथोपमे । घायुर्भूतः सवस्त्राणि सर्वाण्येवव्यमिश्रयत् ततोजलात्समुत्तीर्यता:कन्याःसहितास्तदा । वस्त्राणिजगृहुस्तानियां संस्थान्यनेकशः तत्र चासो देवयान्याः शर्मिष्ठा जगृहे तदा । व्यतिक्रममजानन्ती दुहितावृषपर्वणः ॥ ततस्तयोमिथस्तत्र विरोधः समजायत । देवयान्याश्च राजेन्द्र ! शर्मिष्ठायाश्च तत्कृते॥ देवयान्युवाच। कस्माद्गृह्णासि मे वस्त्रं शिष्याभूत्वा समासुरि !! समुदाचारहीनायानतेश्रेयोभविष्यति शर्मिष्ठोवाव। आसीनञ्च शयानञ्चपिता ते पितरंमम । स्तौति पृच्छतिचाभीक्ष्णंनीचस्थः सुविनीतवत् यावतस्त्वञ्च दुहिता स्तुवतः प्रतिगृह्णतः । सुताहं स्तूयमानस्य ददतो न तु गृह्णतः ॥ अनायुधासायुधाया:कित्वंकुप्यसिभिक्षुकि !लिप्स्यसेप्रतियोद्धारंनचत्वांगणयाम्यहम् शौनक उवाच । सा विस्मयंदेवयानीं गतां सत्ताञ्चवाससि । शर्मिष्ठा प्राक्षिपत्कृपे ततः स्वपुरमाविशत् हतेयमिति विज्ञाय शर्मिष्ठा पापनिश्चया । अनवेक्ष्य ययौ तस्मात् क्रोधवेगपरायणा ॥ अथ तं देशमभ्यगाद्ययातिनहुपात्मजः। श्रान्तयुग्मः श्रान्तरूपो मृगलिप्तुः पिपासितः नाहुपिः प्रेक्ष्यमाणोहि सनिपानेन गतोदके । ददर्श कन्यां तां तत्र दीप्तामग्निशिखामिय तामपृच्छत् स दृष्ट्वैध कन्याममरणिनीम् । सान्त्वयित्वा नृपश्रेष्ठः साम्ना परमवल्गुना कात्यंचारुमुखीश्यामातुमृष्टमणिकुण्डला। दीर्वध्यायसिचात्यर्थकस्माच्छ्यसिपिचातुरा कथञ्च पतिता ह्यस्मिन् कूपे धीरुत्तृणावृते । दुहिता चैव कस्य त्वं चदसवं सुमध्यमे ! देवयान्युवाच । योऽसौदेवैर्हतान् दैत्यानुत्यापयतिविद्यया । तस्यशुक्रस्यकन्याहन्त्वं मां नूनं न बुध्यसे एप मे दक्षिणो राजन् ! पाणिस्ताननपाङ्गुलिः । समुदर गृहीत्वा मां फुलीनस्त्वं हि मे मतः ॥२०॥ जानामित्याञ्चसंशान्तंवीर्यचन्तंयशस्विनम् । तस्मान्मांपतितं कृपादस्मादुद्धतुमर्हसि । - ऽध्यायः] * देवयानीकथानकम् * शोनक उवाच । तामथ ब्राह्मणी स्त्री व विज्ञाय नहुपात्मजः । गृहीत्वादक्षिणेपाणावुनहारततोवलात् । उधृत्य चैनान्तरसा तस्मात् कृपान्नराधिपः । आमन्त्रयित्वा सुश्रोणी ययाति स्वपुरं ययौ ॥ २३ ॥ देवयान्युवाच त्वरितं धूर्णिके गच्छ सर्वमावक्ष्व मे पितुः । नेदानीं तु प्रवेक्ष्यामि नगरं वृषपर्वणः । शौनक उवाच । सातु वै त्वरितं गत्या घूर्णिका सुरमन्दिरम् । दृष्ट्वा काव्यमुवाचेदंकम्पमानाविचेतना आचरयो च महाभागा देवयानी पने हता । शर्मिष्टयामहाप्राज्ञ ! दुहित्रा वृषपर्वणः ।। श्रुत्वा दुहितरं काव्यस्तदा शर्मिष्टयाहताम् । त्वरयानिर्ययोदु.सात्मार्गमाण सुतावने । दृष्ट्वा दुहितरं काल्यो देवयानी तपोवने । बाहुभ्यांसंपरिप्वज्यदुःखितो पापमप्रवीत्। आत्मदोपैनियच्छन्तिःसर्वे दुःखसुग्वेजना । मन्येदुश्चरितंतस्मिन् तस्येयं निष्कृति कृता देवयान्युवाच । निकृतिर्वास्तु वा मास्तु शृणुष्वावहितो मम । शर्मिष्ठयायदुक्तास्मि दुहित्रा वृषपर्वणः सत्य किलेतत् सा प्राह दैत्यानामस्मि गायना। एवं हि मे कथयति शर्मिष्ठा पापपर्पणी ॥ ३१॥ घवनं तीक्ष्ण परवं क्रोधरक्तक्षणा भृशम् । स्तुवतीदुहितासि त्वं याचत. प्रतिगृह्णतः ॥ सुताहं स्तूयमानस्य ददतोऽप्रति गृह्णत. । इति मामाह शर्मिष्टा दुहिता वृषपर्वणः ॥ क्रोधसंरक्तनयना दर्पपूर्णानना तत ॥ ३३ ॥ यद्यहं स्तुवतस्तात दुहिता प्रतिगृह्णत 1 प्रसादयिष्ये शर्मिष्ठामित्युक्ता हि सपीमया ॥ ' शुक्र उवाच। स्तुवतो दुहिता नस्त्वंभटे। न प्रतिगृह्णतः । अतस्त्वंस्तूयमानस्यदुहितादेवयान्यसि वृषपर्वध तद्वेद शको राजा च नाहुप । अचिन्त्य ब्रह्म निर्द्वन्द्वमैश्चरं हि वलं मम ॥३६॥ इति श्री मत्स्यपुराणे देवयानीकथानकं नाम सप्तविंशोध्यायः ।
। अष्टाविंशोऽध्यायः शुक्रकृतदेवयानीसान्त्वनम् । शुक्र उवाच। यः परेषां नरोनित्यमतिवादांस्तितिक्षते । देवयानि ! विजानीहि तेन सर्वमिदञ्जितम् यः समुत्पतितं क्रोधं निगृह्णातिहयं यथा । संयते त्यज्यते सद्भिर्नयो रश्मिपु लम्वते ॥ यः समुत्पतितं क्रोधमक्रोधेन नियच्छति । देवयानि विजानीहि तेन सर्वमिदञ्जितम् यः समुत्पतितं कोपं क्षमयैव निरस्यति । यथोरगस्त्वचंजीर्णा स वै पुरुष उच्यते ॥ यस्तु भावयते धर्म योनिमात्रन्तितिक्षति । यश्च तप्तो न तपति भृशं सोऽर्थस्य भाजनम् यो यजेदअश्वमेधेन मासि माति शतं समाः । यस्तु कुप्येन सर्वस्य तयोरक्रोधनोपरः ये कुमाराः कुमार्यश्च वैरं कुर्युरचेतसः । नैतत् प्राज्ञस्तु कुर्वीत विदुस्तेन कलावलम् ॥ देवयान्युवाच । वेदाहन्तात ! बालापिकार्याणान्तुगतागतम् । क्रोधे चैवातिवादे या कार्यस्यापिवलावले शिष्यस्याशिष्यवृत्तं हि न क्षन्तव्यं बुभूपुणा । असत्संकीर्णवृत्तेपु चासो मम नरोचते पुंसो ये नाभिनन्दन्ति वृत्तेनाभिजनेन च । न तेषु निवसेत् प्राज्ञ श्रेयोऽर्थीपापबुद्धिपु॥ ये नैनमभिजानन्तुवृत्तेनाभिजनेन च । तेषु साधुषु घस्तव्यं स घासः श्रेष्ठ उच्यते ॥ तन्मे मध्नाति हृदयमग्निकल्पमिवारणिम् । वाग्दुरुक्तं महाघोरं दुहितुर्वपपर्वणः ॥१२॥ नह्यतो दुष्करं मन्ये तात लोकेष्वपि त्रिपु । यः सपत्नश्रियं दीप्तां हीनधीः पर्युपासते इति श्री मत्स्यपुराणे शुक्ररूत देवयानीसान्त्वनं नामाटाविंशोऽध्यायः । एकोनत्रिंशोऽध्यायः शुक्रस्य क्रोधोत्पत्तिकधनम् शौनक उवाच । सतःफान्यो भृगुश्रेष्टःसमन्युरुपगम्य ह । घृषपर्वाणमासीनमित्युवाचाविचारयन् ॥१॥ नाधर्मधरितोराजन् ! सद्यःफलतिगारिय। शनैरापय॑मानस्तु मूलान्यपि निरन्तति ।।
ऽध्यायः ] * शुकवृषपर्वणोः संवादकथनम् # यदि नात्मनिपुत्रेषु न चेत्पश्यति नप्तृषु ! पापमावरितं कर्म त्रिवर्गमतिवर्तते ॥३॥ फलत्येवं ध्रुवं पापं गुरुभुक्तमिवोदरे । यदाघातयसे विप्रं कचमांगिरसन्तदा ॥ ४॥ अपापशीलं धर्मशं शुश्रूष मद्गृहे रतम् । घधादनहतस्तस्य वधाच दुहितुर्मम ॥ ५ ॥ वृषपर्वनियोधत्वंत्यक्ष्यामित्वांसवान्धवम् ।स्थातुंत्वद्विपयेराजन् ! नशनोमित्ययासह अद्येवमभिजानामि दैत्यं मिथ्यापलापिनम् । यतस्त्वमात्मनोदी दुहितांकिमुपेक्षसे वृषपर्वोवाच । नाव न मृपावादं त्वयिजानामिभार्गव ! त्वयिसत्यञ्चधर्मश्च तत्प्रसीदतुमाभवान् । मद्यास्मानपहायत्वमितोवास्यसि भार्गव ! । समुदंसंम्प्रवेश्यामिनान्यदस्तिपरायणम् ।। शुक उवाच समुदं प्रविशध्वं धा दिशो चा बजतासुराः । दुहितु प्रियं सोढुं शक्तोऽहंदयिताहिमे ॥ प्रसाद्यता देवयानी जीवितं यत्र मे स्थितम् । योगक्षेमकरस्तेऽहमिन्द्रस्येवबृहस्पति.॥ वृषपर्योवाव यत्किञ्चिदसुरेन्द्राणां विद्यतेवसुभार्गव ! । भुवि हस्तिरथाश्य या तस्यत्वममवेश्वर.।। शुक उवाच यत्किञ्चिदस्तिद्रविणंदैत्येन्द्राणांमहासुर! तस्येश्वरीस्मियोतद्देवयानि! प्रसाद्यताम्। शौनक उवाच । ततस्तु त्वरितः शुक्रस्तेन राज्ञा समं ययौ । उवाच चैनां सुभगे ! प्रतिपन्नं वचस्तय ॥ देवयान्युवाच । यदित्यमीश्वरस्तात! राज्ञोचित्तस्य भार्गव । नाभिजानामितत्तेऽहं राजाघदतुमांस्वयम् वृषपर्वोवाच । यं काममभिजानासि देवयानिशुचिस्मिते । तत्तेऽहंसंप्रदास्यामियद्यपिस्यात्सुदुर्लभम् देवयान्युवाव। दासीकन्यासहस्रण शर्मिष्ठामभिकामये । अनुयास्यत्ति मां तत्र यन दास्यति मे पिता * मत्स्यपुराणम् * [एकोननिशी वृपपर्योधाव। उत्तिष्ट धात्रि गच्छ त्वं शर्मिष्ठांशीघमानय । यं च कामयतेकामं देवयानी करोतुतम् शौनक उवाच । ततोधात्री तत्र गत्वा शर्मिष्ठामिदमब्रवीत् । उत्तिष्ठ भद्दे ! शर्मिष्ठे ! ज्ञातीनांसुखमावह त्यजति ब्राह्मणःशिष्यान देवयान्याप्रचोदितः । ये साकामयतेकामसकार्योऽत्रत्वयानचे दासीत्वमभिजातासि देवयान्याः सुशोभने ! ॥२०॥ शामिष्ठोवाच । यं च कामयते कामं करचाण्यहमद्य तम् । मागान्मन्युवशं शुक्रो देवयानी च मयते ॥ शौनक उधाव। ततः कन्यासहस्रेण वृता शिविकया तदा । पितुर्निदेशात्त्वरिता निश्चक्राम पुरोत्तमात् शर्मियोवाच । अहं कन्यासहस्रण दासी ते परिचारिका । ध्रुवं त्यां तन यास्यामियनदास्यतिते पिता देवयान्युवाच। स्तुपतो दुहिता चाहं याचतः प्रतिगृहतः । स्तूयमानस्य दुहिता पायं दासी भविष्यसि शर्मिष्ठोवाच । येन ग्रेनचिदार्तानां शातीनां सुसमायहेत् । अनुयास्याम्यहं तत्र यत्र दास्पति ते पिता शौनक उपाय। प्रतिश्रुते दासमाये दुदिना वृपपर्वणः । देवपानी नृपश्रेष्ठ ! पितरं पापपमप्रवीत् ॥२६॥ प्रविशमि पुरं तात तुष्टास्मि द्विजसत्तम । अमोयं तव विज्ञानमस्ति विद्यापलच ते । एयमुक्को हिमश्रेष्ठो दुहिता मुभाया प्रधिवेशपुर हष्टः पूजितः सर्वदानवैः ॥२८॥ इति धी मस्यपुराणे शर्मिष्ठाया दासम्पत्यस्वीकरणं नाममैकोनवियशोऽध्यायः ।
.. त्रिंशोऽध्यायः ययातिचरित्रम् । शौनक उवाच । अथ दीर्येण कालेन देवयानी नृपोत्तम । वनं तदेव निर्याता क्रीडार्थ वरणिनी ॥२॥ तेन दासी सहस्त्रेण साधं शमिष्टया तदा । तमेव देशं संप्राप्ता यथा काम चवारसा॥ ताभिः सखीभिः सहिताः सर्वाभिर्मुदिता भृशम् । क्रीड़न्त्योऽभिरताः सर्वाः पिबन्त्यो मधु माधवम् ॥३॥ खादन्त्यो विविधान भक्ष्यान् फलानि विविधानि च । पुनश्च नाहुपो राजा मृगलिप्सुर्यदृच्छया ॥४॥ तमेव देशं संप्राप्तो जललिप्मुः प्रतर्पितः । ददर्श देवयानीच शर्मिष्ठान्ताश्च योपितः ॥५ पियन्त्यो ललनास्ताश्च दिव्याभरणभूषिताः । उपविष्टाञ्चदशेदेवयानीशुचिस्मिताम् ।। रूपेणाप्रतिमा तासां स्त्रीणांमध्येवराननाम् । शर्मिष्ठयासेव्यमानांपादसम्वाहनादिभिः॥ ययातिरवाव। द्वाभ्यां कन्यासहस्राभ्यांद्वेकन्येपरिवारिते । गोत्रेचनामनीवैवद्वयो.पृच्छाम्यतोह्यहम् ।। देवयान्युघाव। आख्यास्याम्यहमादत्स्यवचनंमेनराधिपः । शुक्रोनामामुरगुरुःसुतांजानीहितस्यमाम् ॥ इयं च मे सखी दासी यत्राहं तत्र गामिनी । दुहितादानवेन्द्रस्यशर्मिष्ठावृषपर्वणः ॥१० ययातिवाद। कथं तु ते ससी दासी कन्येयं वरवणिनी । असुरेन्द्रसुना मु! परं कौतहलं हि मे ॥ देवयान्युवाच । सम्मेव नरव्याघ्र! विधानमनुवर्तते। विधिना विहितं ज्ञात्वा माविचिन्मन कृथा। राजबद्पनेपी ते ब्राह्मी वाचं विपि च । किं नामा त्वं कुतश्चासिकस्यपुनश्चशंसमे ।।
។ ७४ * मत्स्यपुराणम् * [त्रिंशो। ययातिरुवाच। ब्रह्मचर्येण वेदो मे कृतस्नः श्रुतिपथं गतः । राजाहं राजपुत्रश्च ययातिरितिविश्रुतः॥१४ देवयान्युधाच। केन चार्थेन नृपते ! होनं देशं समागतः । जिघृक्षुर्धारि यत्किञ्चिदथवा मृगलिप्सया ॥ ययातिरुवाच । मृगलिप्सुरहं भद्रे ! पानीयार्थमिहागतः । बहुधाप्यनुयुक्तोऽस्मि त्वमनुज्ञातुमर्हसि ।। देवयान्युवाच । कन्यासहस्राभ्यांदास्याशर्मिष्टयासह । त्वधीनास्मिभद्रतेसखे! भर्ताचमेभव ॥ ययातिरुवाच। विध्योशनसिभद्रतेनत्वदोंऽस्मिभामिनि । अविवाद्याःस्मराजानोदेवयानि ! पितुस्तक देवयान्युवाच । संसृष्टं ब्रह्मणा क्षत्रं क्षत्रं ब्रह्मणि संश्रितम् । ऋपिश्च ऋपिपुत्रश्च नाहुपाद्यभजस्वमाम् ।। ययातिरुवाच। एकदेहोद्भवा वर्णाश्चत्वारोऽपिपरानने । पृथधर्माःपृथक् शोचास्तेपांवैब्राह्मणोवरः॥ देवयान्युवाच । पाणिग्रहो ना पायं नपुंभिः सेवितः पुरा । त्वमेनमग्रहीदने वृणोमि त्वामहं ततः ।२१ फायतुमेमनस्चिन्या:पाणिमन्यःपुमान्स्पृशेत् । गृहीतमृपिपुत्रेणस्वयंचाप्यपिणा त्वया ॥ ययातिण्याच। शुद्धादाशीविषात्सज्ज्विलनात्सर्वतोमुपात् । दुराधर्षतरो विप्रः पुरुषेण विज्ञानता ॥ २३ ॥ देवयान्युवाच । फथमाशीविशात्सपज्ज्वलनात्सर्वतोमुपात् । दुराधर्षतरोविन इत्यात्य पुरुषर्षम ॥२४ ययातित्याच। ५. शस्त्रेणेफश्च यध्यते । इन्तिविप्रःसरामाणि पुराण्यपिदिकोपितः ऽध्यायः] * ययातिवरित्रम् * दुराधर्षतरो विप्रस्तस्मात् भीरु ! मतोमम । अतो दत्ताञ्चपित्रात्वां भद्रनिविवहाम्यहम् देवयान्युवाच । दत्तां यहस्व पित्रामांत्वंहिराजन्! वृतोमया । अयाचतो भयं नास्ति दत्ताञ्चप्रतिगृह्णतः शौनक उवाच। त्वरितदेवयान्याथ प्रेषिता पितुरात्मनः । सर्वं निवेदयामास धात्री तस्मै यथातथम् ॥ श्रुत्वैषच स राजानं दर्शयामास भार्गवः । दृष्ट्वैवमागतं विनं ययाति: पृथिवीपतिः ॥ घवन्दे ब्राह्मणं काव्यं प्राञ्जलिः प्रणत.स्थितः। तचाप्यभ्यवदत्काल्यासानापरमवल्गुना देवयान्युवाच। राजायं नाहुपस्तात दुर्गमे पाणिमग्रहीत् । नमस्ते देहि मामस्मे लोयनान्यं पतिं वृणे ॥ शुक्र उवाच । वृतोऽनया पतिवीर ! सुतया त्वं ममेष्टया। गृहाणे मां मया दत्तां महिपी नहुपात्मज ! ॥ ३२ ॥ ययातिरुवाच। अधोमां स्पृशेदेवं पापमस्याश्चभार्गव!।पर्णसंकरतोब्रह्मन् ! इतित्वां प्रवृणोम्यहम्॥ शुक्र उवाच । अधर्मात् त्वां विमुञ्चामि वरं वरय चेप्सितम् । अस्मिन् विचाहे त्वं श्लाघ्यो रहो पापनुदामि ते ॥ ३३ ॥ वहस्य भायों धर्मेण देवयानी शुविस्मिताम् । अनया सह संप्रीतिमतुलां समवाप्नुहि ॥ इयं चापि कुमारी ते शर्मिष्ठ चार्षपर्वणी । संपूज्य सन्ततं राजन् ! नचैनांशयनेयः ॥ शौनक उवाच। एवमुक्तो ययातिस्तु शुक्ररुत्वा प्रदक्षिणम् । जगामस्वपुरं दृष्टःसोऽनुज्ञातो महात्मना !! इति श्री मत्स्यपुराणे ययाति चरिते त्रिंशोऽध्यायः ।
एकत्रिंशोऽध्यायः
ययाति चरित्रम् ।
शौनक उवाच।
ययातिः स्वपुरं प्राप्य महेन्द्रपुरसन्निभम् । प्रविश्यान्तःतुरं तत्र देवयानी न्यवेशयत् ॥
देवयान्याश्चानुमते सुतां तां वृषपर्वणः । अशोकवनिकाभ्यासे गृहं कृत्वान्यवेशयत् ॥
वृतां दासीसहस्रेण शर्मिष्टामासुरायणीम् । वासोभिरन्नपानश्च संभिज्य सुसंवृताम् ।।
देवयान्यातु सहितः स नृपो नहुपात्मजः । विजहार बहूनब्दान् देववन्मुदितो भृशम् ॥
ऋतुकाले तु संप्राप्ते देवयानी वराङ्गना। लेभे गर्भ प्रथमतः कुमारश्च व्यजायत ॥५॥
गते वर्षसहस्रे तु शर्मिष्ठा वापर्वणी । ददर्श यौवनं प्राप्ता ऋतुं सा कमलेक्षणा ॥ ६ ॥
चिन्तयामासधर्मज्ञा ऋतुप्राप्तीचभामिनी । ऋतुकालश्च संप्रातोनकश्चिन्मे पतिवृतः॥
किं प्राप्तंकिञ्च कर्तव्यंकथं कृत्वामुखंभवेत् । देवयानी प्रसूतासी वृथाऽहं प्राप्तयौवना।।
यथा तथावृतो भत्तथैवाहं वृणोमि तम् । राज्ञा पुत्रफलं देयमितिमे निश्चिता मतिः ॥
अपीदानी स धर्मात्मा रहो मे दर्शनं व्रजेत् ॥ ६॥
शौनक उवाच।
अथनिष्कम्यराजाऽसौतस्मिन्कालेयदृच्छया ।
अशोकवनिकाभ्यासेशर्मिष्ठांप्राप्यधिष्टितः ॥ ८॥
तमेकरहसि दृष्ट्वाशर्मिष्टा चारहासिनी । प्रत्युद्गम्याञ्जलि कृत्या राजानं पाक्यमब्रवीत्॥
शर्मिष्ठोवाच ।
सोमश्चन्द्रश्च घायुश्च यमच वरुणश्च घा । तववा नाहुपगृहे कः स्त्रियं द्रष्टुमर्हति ॥१२॥
पाभिजनशीलहि त्वं राजन् क्त्यमांसदर। सात्वांगाने प्रसाहोऽहरन्तुमेहिनराधिय!!
ययातिरुवाच ।
मित्वांशीलसम्पनांदैत्यकन्यामनिन्दिताम् । रूपन्नुतेनपश्यामिसूच्यनमपिनिन्दितम् ॥
- 1. शुको देवयानी यदायहम् । नेयमाहयितव्या ते शयने पार्षपर्वणी ॥ १५॥
ऽध्यायः] * ययाति चरित्रम् * 'शर्मिष्ठोवाच । न नर्मयुक्तं वचनं हिनस्ति न स्त्रीपु राजन्नविवाहकाले। प्राणात्यये सर्वधनापहारे पञ्चानृतान्याहुरपातकानि ॥ १६ ॥ पृष्टास्तु साक्ष्ये प्रवदन्ति चान्यथा भवन्ति मिथ्यावचना नरेन्द्र ते। एकार्थतायान्तु समाहितायां मिथ्यावदन्तं ह्यनृतं हिनस्ति ॥ १७ ॥ ययातित्वाच । राजाप्रमाणंभूतानांस विनश्येन् मृपावदन् । अर्थकृच्छ्रमपिप्राप्य न मिथ्या कर्तुसुत्सहे। शर्मिष्टोवाच । समावेतीमतौराजन् ! पतिःसख्याश्चयःपतिः । समविवाह इत्याहुःसख्यामेऽसिपतिर्यतः। ययातिरुवाच । दातव्यं याचमानस्य हीतिमेव्रतमाहितम् । त्वञ्च यावसिकाममां ब्रूहिकिङ्करवाणितत् । शर्मिष्ठोवाच । अधर्मात्त्राहि मां राजन्! धर्मञ्चप्रतिपादय । त्वत्तोऽपत्यवती लोकेचरेयं धर्ममुत्तमम्। त्रयएवाधनाराजन् ! भार्या दासस्तथासुतः । यत्तेसमधिगच्छन्ति यस्यतेतस्यतद्धनम्। देवयान्याभुजिप्यास्मिवश्याचतवमार्गधी। सचाहंचत्वयाराजन् ! भरणीयांभजस्वमाम् । शौनक उवाव । एवमुक्तस्तया राजा ताड्यमित्यभिजज्ञवान् । पूजयामास शर्मिष्ठां धर्मच प्रतिपादयत् ॥ ससमागम्यशर्मिष्ठां यथाकाममवाप्यच । अन्योन्यंचाभिसंपूज्य जग्मतुस्तीयथागतम् ॥ तस्मिन् समागमे सुभ्रुः शर्मिष्टा धार्पपर्वणी । लेभे गर्भ प्रथमतः तस्मान्नृपतिसत्तमात्। प्रजज्ञे चततः फाले राज्ञी राजीवलोचना | कुमार देवगर्भाभमादित्यसमतेजसम् ॥२७ इति श्री मत्स्यपुराणे ययाति चरिते एकत्रिंशोऽध्यायः ।
द्वात्रिंशोऽध्यायः ययातिचरित्रम् । शौनक उवाच। श्रुत्वाकुमारजातं सा देवयानीशुचिस्मिता । चिन्तयाविष्टदुःखार्ता शर्मिष्ठां प्रत्यभाषत । ततोऽभिगम्य शर्मिष्ठां देवयान्यत्रयोदिदम् । किमर्थवृजिनं सुभ्र! कृतन्ते कामलुब्धया। शर्मिष्ठोवाव। पिरभ्यागतः कश्चिद्धर्मात्मा वेदपारगः । समया तु परः कामं याचितो धर्मसंहतम्। नामन्यायतः काममाचरामि शुचिस्मते! । तस्माद्वषेर्ममापत्यमिति सत्यं ब्रवीमि ते ॥ देवयान्युवाच । यद्येतदेवं शर्मिष्ठेन मन्युविद्यते मम । अपत्यं यदिते लब्धं ज्येष्ठाच्छ्र प्ठाय वै द्विजात्।। शोभनं भीरु ! सत्यं चेत्कथं स ज्ञायते द्विजः । गोत्रनामाभिजनतः श्रोतुमिच्छामि तं द्विजम् ॥ ५॥ शर्मिष्ठोवाच। ओजसा तेजसाचैव दीप्यमानंरवियथा । तं दृष्ट्वा मम संप्रष्टुं शक्तिर्नासीच्छुचिस्मृते! । शौनक उवाच । अन्योन्यमेवमुक्त्वाधसंग्रहस्य यते मिथः । जगाम भार्गवीवेश्म तथ्यमित्यभिजानती॥ ययातिर्देवयान्यासु पुत्रावजनयन नृपः । यदुञ्चतुर्वसुञ्चैव शक्रविष्णू इवापरी ॥ तस्मादेवतु राजः शर्मिष्ठावापपर्वणी । द्रुह्यंचानुञ्च पूरञ्च त्रीन् कुमारानजीजनत् ॥ ततःकालेचकस्मिंश्चित् देवयानीशुचिस्मिता । ययातिसहिताराजन् ! जगाम हरितंवनम्। ददर्शच तदा तत्र कुमारान्देवरूपिणः । क्रीडमानान् सुविश्रब्धान् विस्मिता चेदमप्रवीत्। कस्यैते दारका राजन्! देवपुत्रोपमाःशुभाः । वर्चसा रूपतश्चैव दृश्यन्ते सद्शास्तच ।। एवं पृष्ट्वा तु राजानं कुमारान् पर्यपृच्छत । कि नामधेयगोत्रे वा पुत्रका ब्राह्मणापिता ॥ मे यथातथ्यं श्रोतुकामास्म्यतो ह्यहम् । ते दर्शयन् प्रदेशिन्या तमेव नृपसत्तमम् शर्मिष्ठां मातरञ्चेव तस्या ऊचुः कुमारकार। ॥
ऽध्यायः] * ययातिवरित्रम् * शौनक उवाच। इत्युक्ताः सहितास्तेन राजानमुपचक्रमुः॥ १६ ॥ नाभ्यनन्दसतानराजादेवयान्यास्तदान्तिके । रुदन्तस्तेऽथ शर्मिष्ठामभ्ययुर्यालकास्तदा।। दृष्ट्वा तेपान्तु बालानां प्रणयं पार्थिवं प्रति । बुध्याव तत्यतो देवी शर्मिष्ठामिदमब्रवीत् । देवयान्युवाच । मदधीना सती कस्मादकापी विप्रियं मम । तमेवासुरधमत्वमास्थिता न विभेपि किम् शर्मिष्ठोवाच । यदुक्तमृपिरित्येव तत् सत्यञ्चारुहासिनि !। न्यायतोधर्मतश्चैव चरन्तीन विभेमिते॥ यदात्वया वृता राजो वृत एव तदामया ( सखिभर्ता हि धर्मेण भर्ता भवति शोभने ! पूज्यासि मम मान्या च श्रेष्ठा ज्येष्ठा च ब्राह्मणी । त्वत्तो हि मे पूज्यतरो राजर्षिः किन्न वेत्सि तत् ॥ २२ ॥ शानक उवाच । श्रुत्वातस्यास्ततो वाक्यंदेवयान्यव्रवीदिदम् । राजन्नाद्येह वत्स्यामि विप्रियंमत्वयाकृतम् सहसोत्पतितां श्यामां दृष्ट्वा तां साधुलोचनाम् । तूर्ण सकाशं काव्यस्य प्रस्थितां व्यथितस्तदा ॥ २४ ॥ अनुववाज सम्भ्रान्तः पृष्ठतः सान्त्वयन नृपः । न्यवर्तत नसाचैव क्रोधसंरक्तलोचना। अपि ग्रुवन्ती किञ्चिञ्च राजानं साश्रुलोचना । अविरादेव संप्राप्तः काव्यस्योशनसोऽन्तिकम् ॥ २६ ॥ गतु दृष्ट्वैव पितरमभिवाद्यानतः स्थिता । अनन्तरं ययातिस्तु पूजयामास भार्गवम् ॥ देवयान्युवाच। मिण जितोधर्मः प्रवृत्तमधरोत्तरम् । शर्मिष्ठायातिवृत्तास्ति दुहिता वृपपर्वणः ।२८१ योऽस्याजनिताः पुत्रा राज्ञानेन ययातिना । दुर्भगाया मम द्वौतुपुनौतात! ब्रवीमि ते मंश इति विख्यात एप राजा भृगुहह ! अतिक्रान्तश्च मर्यादां काव्यतत्कथयामि ते ।
८० * मत्स्यपुराणम् * [द्वात्रिंशो शुक्र उवाच धर्मशास्त्वं महायज ! योऽधर्ममस्थाः प्रियम् । तस्माजरात्वामविरादूयिष्यतिदुर्जया ययातिरुवाच । ऋतुं यो याच्यमानाया न ददातिपुमान्वृतः । भ्रूणहेतुच्यतेब्रह्मन् ! स चेह ब्रह्मवादिभिः ऋतुकामां स्त्रियं यस्तु गम्यां रहसि याचितः । नपाति योहिधर्मेण ब्रह्महत्युच्यते युधैः इत्येतानि समीक्ष्याहवारणानि भृगृहह !! अधर्मभयसंविग्नः शर्मिष्ठामुपजग्मिवान् ॥३४॥ शुक्र उवाच न त्वहं प्रत्यवेक्ष्यस्ते मदधीनोऽसि पार्थिव!। मिथ्याचरणधर्मेपु चौर्यं भवति नाप शौनक उवाच क्रोधेनोशनसा शप्तो ययाति नाहुपस्तथा । पूर्व चयः परित्यज्यजरांसद्योन्यपद्यत् ।३६।। - ययातिरुवाच अतृप्तो यौवनस्याहं देवयान्यां भुगद्धह ! । प्रसादं कुरु मेब्रह्मन् ! जरेयंमाविशेतमाम् ॥ शुक्र उवाच नाहं मृपावदाम्येतन्जरांप्राप्तोऽमि भूमिप ! जरान्त्वेतांत्वमन्यस्मिन्संक्रामययदीच्छसि।। ययातिरुवाच राज्यभाक् स भवेद् ब्रह्मन् ! पुण्यभाक् कीर्तिभाक् तथा । यो दद्यानमेव वयः शुक्रतदयाननुमन्यताम् ॥ ३६॥ शुक्र उवाच संक्रामयिष्यसि जरा यथेष्टुनहपात्मजः । मामनुध्याय तत्वेन नव पाप मवाप्स्यसि चयो दास्यति ते पुनो यासराजामविष्यति । आयुष्मान् कीर्तिमांश्च पवह्नपत्यस्तथैवव हति श्री मत्स्यपुराणे ययातिचरिते द्वात्रिंशोऽध्यायः ।
त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ययात्युपाख्यानम् । शौनक उचाच जरा प्राप्य ययातिस्तु स्वपुर प्राप्य चैव हि । पुत्र ज्येष्ठ वरिष्ठ च यदुमित्यब्रवीद्वव । ययातिरुवाच जरावलीचमातात । पलितानिव पर्यगु । काव्यस्योशनसो शापानचतृप्तोस्मियोचने त्व यदो प्रतिपद्यस्व पाप्मानजरया सह । यौवनेन त्वदीयेन चरेय विषयानहम् ॥३॥ पूर्ण घर्पसहस्त्रे तु त्वदीय योवन त्वहम् । दत्त्वासप्रतिपत्स्यामि पाप्मानञ्जरयासह ॥ यदुरुवाच सितश्मश्रुधगे दीनो जरसा शिथलीस्त । वलीसन्ततगात्रध दुर्दर्शीदुर्वल यश ॥५॥ अशक्त कार्यकरणे परिभूत स यौचने । सहोपजीविभिश्चैव तजरा नाभिकामये ॥६ सन्ति ते वहव पुत्रा मत्त प्रियतरा नृप] । जरा गृहीतुधर्मज्ञ ! पुत्रमन्य वृणीप्व चै ॥ ययातिरचाव यस्त्व मे हृदयाजातीचय स्वनप्रयच्छसि । पापान्मातुलसम्बन्धाद्दुष्प्रजातेभविष्यति। तुर्वसो | प्रतिपद्यस्थ पाप्मानजरया सह । यौवनेन चरेय वै विषयास्तव पुनक । पूर्ण घर्ष सहस्र तु पुनर्दास्यामि यौवनम् । तथैव प्रतिपत्स्यामि पाप्मानवरया सह ॥ तुर्वसुरुवाच न कामये जरा तात ! कामभोगप्रणाशिनीम् । वररूपान्तकरणाधुद्धिमानविनाशिनीम् । ययातिरचाच यस्त्व मे हृदयाज्जातोवय स्वनप्रयच्छसि । तस्मात्प्रजासमुच्छेदतुर्यसोतक्यास्यति । सकर्णिश्चोरधर्मपु प्रतिलोमचरेषु च । पिशिताशिपुलोवेषु नून राजा भविष्यसि ॥१३॥ गुरुदारप्रसक्तेषु तिर्यग्योनिरतेषु च । पशुर्मिपुम्रेच्छेषु पापेषु प्रभविष्यसि ॥१४॥ .
। * मत्स्यपुराणम् *. [त्रयस्त्रिशोऽध्यायः शौनक उवाच एवं स तुर्वसुं शत्त्वा ययातिःसुतमात्मनः । शर्मिष्ठायाःसुतं ज्येष्ठं द्रुह्य वचनमब्रवीत् ॥ ययातिरुवाच द्रा ! त्वं प्रतिपद्यस्व वर्णरूपविनाशिनीम् । जरां वर्षसहस्रं मे यौवनस्वं प्रयच्छताम् ।। पूर्णे वर्षसहस्रेतु ते प्रदास्यामि योवनम् । स्वञ्चादास्यामि भूयोऽहंपाप्मानजरयासह ॥ द्रुह्य उवाच न राज्यं न रथं नाश्वजीर्णोभुक्तेनचस्त्रियम् । न रागश्चास्य भवतितज्जरान्तेनकामये । ययातिरुवाच यस्त्वं मेहृदयाज्जातोवयःस्वंनप्रयच्छसि । तद्ब्रह्म ! वैप्रियःकामोनतेसंपत्स्यतेकचित् नौरूपप्लवसञ्चारोयत्र नित्यंभविष्यति । अराज्यभोजशब्दन्त्वंतत्रप्राप्स्यसिसान्वयः॥ ययातिरुवाच अनो! त्वं प्रतिपद्यस्व पाप्मानञ्जरया सह । एक वर्षसहस्रन्तु बरेयं यौवनेन ते ॥२१॥ अनुरुवाच जीर्णः शिशुरिवादत्ते कालेऽन्नमशुचिर्यथा । न जुहोतिचकालेऽग्निं तां जरांनाभिकामये ययातिवाच यस्त्वं मेहृदयाज्जातोचयःस्वंनप्रयच्छसि। जरादोपस्त्वयोक्तोयस्तस्मात्त्वंप्रतिपद्यसे। प्रजाश्चयोवनप्राप्ताविनश्यन्तिानो! तव । अग्निप्रस्कन्दनगतस्त्वञ्चाप्येवं भविष्यसि । ययातिरुवाच पूरो! त्वं प्रतिपद्यस्वपाप्मानञ्जरयासह । त्वं मे प्रियतरः पुत्रस्त्वंवरीयान्भविष्यसि ॥ जरावलीचमांतात ! पलितानिच पर्यगुः । काव्यस्योशनसःशापानचतृप्तोस्मियौवने ॥ किञ्चित् कालं चरैयंवैविषयान्वयसा तव । पूर्ण वर्षसहस्र तु प्रतिदास्यामि यौवनम् ॥ स्वञ्चैव प्रतिपत्स्येऽहंपाप्पानझरया सह । एवमुक्तःप्रत्युवाच पूरुः पितरमासा ॥२८॥ यथार्थत्वंमहाराज!तत्करिष्यामितेवचः ।प्रतिपत्स्यामितेराजन् ! पाप्मानंजरयासह। गृहाण यौवनं मत्तश्वर कामान् यथेप्सितान् । जरयाऽहं प्रतिच्छन्नो योरूपधरस्तव ॥ यौवनं भवते दत्त्वा चरिष्यामि यथेच्छया ॥३०॥ इति श्री मत्स्यमहापुराणे ययात्युपाख्याने त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ।
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ययात्युपाख्यानम् । शौनक उवाच एवमुक्तः स राषिःकाव्यस्मृत्वामहावतम् । संक्रामयामासजरां तदा पुत्रेमहात्मनि ।। पोरवेणाथ वयसा ययातिनहुपात्मजः । प्रीतियुक्तोनरश्रेष्ठश्चचार विषयाप्रियान् ॥२॥ यथा कामं यथोत्साहयथाकालंयथासुग्वम् । धर्माविरुद्धानराजेन्द्रीयथार्हतिसएयहि ॥ देवानतर्पयज्ञः श्राद्धैरपि पितामहान् । दीनाननुप्रदरि कामैश्च द्विजसत्तमान ॥४॥ अतिधीननपानश्च विशश्च प्रतिपालनैः । आनृशंस्येन शूद्रांश्च दस्यून्निग्रहणेन च ॥५॥ धर्मेण च प्रजाः सर्वा यथावदनुरञ्जयन् । ययातिः पालयामाससाक्षादिन्द्रइवापरः ॥६॥ स राजा सिंहविक्रान्तो युवा विषयगोचरः । अविरोधेन धर्मस्य चचार सुसमुत्तमम् । स सम्प्राप्य शुभान्कामान्तमापिन्नश्च पार्थिवः । कालंघर्षसहस्रान्तंसस्मारमनुजाधिपः परिचिन्त्य स कालज्ञ. कलाः काष्ठाश्च वीर्यवान् । पूर्ण मत्वाततःकालंपूरं पुत्रमुपाचह न जातुकामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्मेच भूय एवाभिवर्द्धते ।। यत्पृथिव्यां वीडिययं हिरण्यं पशवःस्त्रियः । नालमेकस्य तत्सर्यमितिमन्चाशमं प्रजेत् यथासुसं यथोत्साहं यथाकाममरिन्दम !! सेविता विषयाः पुत्र ! यौवनेन मया तव ॥ पूरो! प्रीतोऽस्मि भद्रं ने गृहाणेदं स्वयौवनम् । राज्यञ्चैवगृहाणेदंत्वहिमे प्रियात्मतः शौनक उवाच । प्रतिपेदे जरांराजा ययाति हुपस्तदा । योचनं प्रति पेदे स पूमः म्ब पुनगन्मनः ॥१४॥ अभिषेक्तुकामञ्च नृपं पूरी पुत्रं फनीयसम् । ब्राह्मणप्रमुया घर्णा इदं वचनमनुवन् ॥ फयं शुक्रस्य दो दिन देवयान्याः मुनं प्रभो !! ज्येष्ठं यदुमतिरम्य राज्यंपूरोःप्रदाम्यसि ज्येष्ठो यदुम्नपातम्नुर्व नुस्तदनन्तरम् । शर्मिष्टायाः मुनी दुशम्नयानुः पूरेव च ॥ कथं ज्येष्ठमतिकम्य फनीयान् राज्यमर्हति । एतन्मम्योधयामस्त्वां स्वधर्ममनुपालय * मत्स्यपुराणम् * [पञ्चत्रिशो ययातित्याचा ब्राह्मणप्रमुसा वर्णाः सर्वेशृण्वन्तु मे वयः । ज्येष्टंप्रति यतोराज्यं न देयं मे कथञ्चन ।। मम ज्येष्ठेन यदुना नियोगो नानुपालितः । प्रतिकूलः पितुर्यश्च न स पुत्रः सतां मतः । मातापित्रोर्वचनाद्धितः पथ्यश्च यः सुतः । स पुत्रः पुत्रवधश्च वर्तते पितृमातृषु ॥२॥ यदुनाहमयज्ञातस्तथा तुर्वसुनापि वा। द्रुह्येण चानुना चैव मय्ययज्ञा कता भृशम् ॥ पूरुणा मे कृतं वाक्यं मानितञ्च विशेषतः । कनीयान्मम दायादो जरा येन धृता मम ।। मम कामः स च कृतःपूराणा पुत्ररूपिणा । शुक्रेण च धरो दत्तः काव्येनोशनसास्वयम् पुत्रो यस्त्वानुवर्तेत सराजापृथिवीपतिः । भवन्तः प्रतिजानन्तु पूरु राज्येऽभिपिच्यताम् प्रशतय ऊचुः। यः पुत्रोगुणसम्पनो मातापित्रोहितःसदा । सर्व सोऽर्हति कल्याणं कनीयानपिसप्रभुः अहं पूरो रिदं राज्यं यः प्रियः प्रियकृत्तव । वरदानेन शुक्रस्य न शक्यं वक्तुमुत्तरम् । शौनक उवाच । पौरजानपदैस्तुष्टैरित्युक्तो नादुपस्तदा । अभिपिच्य ततः पूरु राज्ये स्वसुतमात्मजम् ॥ दत्त्वा च पूरवे राज्यं वनवासाय दीक्षितः । पुरात् स निर्ययोराजा ब्राह्मणैस्तापससह यदोस्तु यादवा जाता तुर्वसोर्यचनाः सुताः । द्रुह्यस्यतुसुताभोजा अनोस्तुच्छजातयः पूरोस्तु पौरवो वंशो यत्र जातोऽसि पार्थिव !! इदं वर्षसहस्रात्तु राज्यं कुरु कुलागतम् इति श्रीमत्स्यपुराणे ययात्युपाख्यानं नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः । पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ययात्युपाख्यानम् । शौनक उवाच। एवंसनाहुपोराजाययातिःपुत्रमीप्सितम् । राज्येऽभिपिच्य मुदितोवानप्रस्थोऽभवन्मुनिः उपित्यायनवासं स ब्राह्मणैः सह संश्रितः । फलमूलाशनोदान्तो यथा स्वर्गमितो गतः ऽध्यायः] * ययातिशकसम्बादवर्णनम् * स गतः स्वर्गवासन्तु न्यबसन् मुदितःसुखी । कालस्य नातिमहतः पुनः शक्रेण पातितः विवशः प्रच्युतः स्वर्गादप्राप्तो मेदिनीतलम् । स्थितश्चासीदन्तरीक्षे स तटेति श्रुतं मया तन एव पुनश्चापि गतः स्वर्गमिति श्रुतिः । राजावसुमता सार्द्धमष्टकेन व वीर्यवान् । प्रतर्दनेन शिविना समेत्य किल संसदि ॥ ५ ॥ शतानीक उवाच । कर्मणा केन स दिवं पुनः प्राप्तो महीपतिः । कथमिन्द्रेण भगवन् ! पातितो मेदिनीतले सर्वमेतदशेपेण श्रोतुमिच्छामि तन्यत । कथ्यमानं त्वया विप्र ! देवर्षिगणसनिधी । देवराजसमोह्यासीद्ययातिः पृथिवीपतिः । वर्द्धनः कुरुवंशस्य विभावसुसमद्युतिः ॥८॥ तस्य विस्तीर्णयशसः सन्यकीर्तेर्महात्मनः । श्रोतुमिच्छामिदेवेश : दिविचेहचसर्वशः॥ शौनक उवाच। हन्त ते कथयिष्यामि ययातेरुत्तमांकथाम् । दिविचेहचपुण्यार्था सर्वपापप्रणाशिनीम्।। ययाति हुपो राजा पूर्व पुत्रं कनीयसम् । राज्येऽभिषिच्य मुदितः प्रवत्राजवनं तदा ॥ अन्तेषु स विनिक्षिप्य पुनान्यदुपुरोगमान् । फलमूलाशनोराजावनेऽसौन्यवसचिरम् ॥ स जितात्मा जितकोधस्तर्पयन्पितृदेवताः । अग्नीश्वविधिवजुह्ववानप्रस्थविधानत. ॥ अतिथीन् पूजयन्नित्यंवन्येनहविपाविभुः । शिलोच्छवृत्तिमाथाय शेपानमनभोजनः ॥ पूर्ण सहन्त्रं वर्षाणामेवंवृत्तिरभून्नपः । अम्बुभक्षः सचाव्दास्त्रीनासानियतवाट्सनाः॥१५ ततस्तु वायुभक्षोऽभूत्सम्बन्सरमतन्द्रितः । पञ्चाग्निमध्ये च तपम्नेपे सम्यन्सरं पुनः ।। एकपादम्थिनश्चासीनपण्मासाननिलाशन । पुण्यतिम्तन: म्यगंजगमावृत्यरोदसी ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे ययातेः म्वर्गगमनं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः । पत्रिंशोऽध्यायः ययातिशक्रमम्बादवर्णनम् । शॉनक उपात्रा म्बर्गतस्नु स राजेन्द्रोन्ययसद्देवसानि । पूजिननिदर्श माध्यमरुदिमुभिस्तथा ॥ देवलोकान् प्रागलोकं सञ्चग्न् पुण्यद्धशी । अवसपृथिवीपालोटर्यकालमितिध्रुतिः ॥
१ मत्स्यपुराणम् [पत्रिंशोऽध्यायः स कदाचिन्नृपश्रेष्ठः ययातिः शक्रमागतः । कथान्ते तत्र शक्रेण पृष्टः स पृथिवीपतिः ॥३॥ शक उवाच यदा स पूरुस्तव पुत्रेषु राजन् ! जरां गृहीत्वा प्रचचार लोके । तदा राज्यं सम्प्रदायैव त्वमस्मै त्वया किमुक्तः कथयेह सत्यम् ॥ ४॥ ययातिरुवाच प्रकृत्यनुमते पूरु राज्ये कृत्वेदमब्रुवम् । गङ्गायमुनयोर्मध्येकृत्स्नोऽयं विषयस्तव । मध्येपृथिव्यास्त्वंराजाभ्रातरोन्तेऽधिपास्तव अक्रोधनः क्रोधनेभ्यो विशिष्टस्तथातितिक्षुरतितिक्षोविशिष्टः । अमानुपेभ्यो मानुपश्च प्रधानो विद्वांस्तथैवाविदुपः प्रधानः ॥६॥ आक्रोश्यमानो नाक्रोशेन्मन्युमेव तितिक्षति । आक्रोप्टारंनिर्दहतिसुकृतंचास्यविन्दति ।। नारुन्तुदस्यान्न नृशंसवादी न हीनतः परमभ्याददीत । ययाऽस्य वाचा पर उद्विजेत न तां वदे द्रुशती पापलौल्याम् ॥८॥ अरुन्तुदं परुपं तीव्रवाचं वाकण्टकैर्वितुदन्तं मनुष्यान् । विन्द्यादलक्ष्मीकतमं जनानां मुखे निवद्धन्नितिं वहन्तम् ॥६॥ सद्भिः पुरस्तादभिपूजित.स्यात् सद्भिस्तथा पृष्ठतोरक्षितः स्यात् । सदा सतामतिवादांस्तितिक्षेत् सतां वृत्तं पालयन साधुवृत्तः ॥१०॥ वाक्सायका बदनान्निप्पतन्ति यैराहतः शोचति घाव्यहानि । परस्य नो मर्मसु ते पतन्ति तान् पण्डितो नावसृजेत् परेषु ॥११॥ नास्तीदृशं सम्वननं त्रिषु लोकेषु किञ्चन । यथा मैत्री च लोकेषुदानश्चमधुराच वाक् ॥ तस्मात् सान्त्वं सदावाच्यंपल्पनैवकुत्रचित् । पूज्यान्संपूजयेद्दद्यान्नभिशापं कदाचन ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे ययातिशकसम्बादवर्णनं नाम पट्त्रिंशोऽध्यायः ।
सप्तत्रिंशोऽध्यायः
ययातिशक्रसम्बादवर्णनम् ।
इन्द्र उवाच।
सर्वाणि कार्याणि समाप्य राजन् ! गृहान् परित्यज्य वनं गतोऽसि ।
तत्त्वां पृच्छामि नहुपस्य पुत्र! केनापि तुल्यस्तपसा ययाते ॥१॥
ययातिरुवाच ।
नाहं-देवमनुष्येषु न गन्धर्यमहर्पिपु । आत्मनस्तपसा तुल्यं कश्चित् पश्यामिवासव ॥
इन्द्र उवाच।
यदावमस्थाः सदृशः श्रेयसश्च पापीयसश्चाविदितप्रभावः ।
तस्मालोकाऽह्यन्तवन्तस्तवेमे क्षीणे पुण्ये पतितोऽस्यद्य राजन् ॥३॥
ययातिरुवाच।
सुरर्पिगन्धर्वनराधमानात् क्षयं गता मे यदि शकलोकाः ।
इच्छाम्यहं सुरलोकाविहीनः सतां मध्ये पतितुं देवराज ॥४॥
इन्द्र उवाच ।
सतां सकाशे पतितोऽसि राजन् ! श्च्युत प्रतिष्ठां यत्र लयासि भूयः ॥
एवं विदित्वा तु पुनर्ययाति न तेऽचमान्या. सदृशः श्रेयसे च ॥१०॥
शौनक उवाच ।
ततः पपातामरराजजुष्टात् पुण्यालोकात्पतमानं ययातिम् ।
संप्रेत्य राजर्षिचरोटकस्तमुवाच सद्धर्मविधानगोप्ता ॥६॥
अष्टक उवाच।
कस्त्वं युवा पासचतुल्यरूपः स्वतेजसा दीप्यमानो यथाग्निः ।
पतस्थुदीर्णो म्युधप्रकाश. खे खेचराणां प्रबरो यथाऽर्कः ॥७॥
* मत्स्यपुराणम् *
[अष्टत्रिशो
दृष्ट्वा च त्वां सूर्यपथात् पतन्तं वैश्वानरायु तिमप्रमेयम् ।
किन्तुस्विदे तत् पततीव सर्वे वितर्कयन्तः परिमोहिताः स्मः ॥८॥
दृष्ट्वा च त्वाधिष्ठितं देवमार्गे शमार्कविष्णुप्रतिमप्रभावम् ।
प्रत्युद्गतास्त्वां वयमद्यसर्वे तस्मात्पाते तव जिज्ञासमानाः ॥६॥
न चापित्यां धृष्णवः प्रधुमने न च त्वमस्मान् पृच्छसि के घयं स्म ।
तत्त्वां पृच्छामि स्पृहणीय रूपं कस्य त्वं घा किनिमित्तं त्वमागाः ॥ १०॥
भयन्तु तेऽन्येतु विपादमोही त्यजाशु देवेन्द्रसमानरूप!॥
त्वां वर्तमानं हि सतां सकाशे नालं प्रसोढुं बलहापि शक्तः ॥ ११ ॥
सन्तः प्रतिष्ठा हि सुखच्युतानां सतां सदैवामरराजकल्प!॥
ते सङ्गताः स्थावरजङ्गमेशाः प्रतिष्ठितस्त्वं सदृशेषु सत्सु ॥ १२ ॥
प्रभुरग्निः प्रतपने भूमिरावपने प्रभुः। प्रभुः सूर्य प्रकाशाच्च सतां चाम्यागतः प्रभुः ॥
इति श्री मत्स्यपुराणे ययातिशकसम्बादवर्णनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ।
अष्टत्रिंशोऽध्यायः
ययात्यष्टकसम्बादवर्णनम् ।
ययातिरुवाच।
अहं ययातिनहुपस्य पुत्रः पूरोः पिता सर्वभूतावमानात् ।
प्रभ्रंशितोऽहं सुरसिद्धलोकात् परिच्युतः प्रपताम्यल्पपुण्यः ॥ १॥
अहं हि पूर्वो घयसा भवद्भयस्तेनाभिवादं भवतां प्रयुञ्जे ।
यो विद्ययातपसा जन्मना वा वृद्धः स वै सम्भवति द्विजानाम् ॥ २॥
अष्टक उचाच
अवादीस्त्वं वयसास्मि वृद्ध इति ये राजन्नधिकः कथञ्चित् ।
यो वै विद्वांस्तपसा च वृद्धः स एव पूज्यो भवति द्विजानाम् ॥ ३॥
ऽध्यायः]
* ययात्यष्टकसम्बादवर्णनम् ।
ययातिरवाच।
प्रतिकुल कर्मणा पापमाहुस्तद्वर्तिना प्रवण पापलोकम् ।
सन्तो सतो नानुवर्तन्त ते वै यदात्मनपा प्रतिकलवादी ॥४॥
अभूद्धन मे विपुल महदै विचेष्टमानोऽधिगन्ता तदस्मि।
एव प्रधार्यात्महिते निविष्टो यो वर्तते सविजानाति धीर ॥ ५ ॥
नानाभावा बहवो जीवलोके देवाधीना नएचेष्टाधिकारा ।
तत्तत् प्राप्य न विहन्येत धीरो दिष्ट वलीय इति मत्वात्मयुध्या ॥ ६॥
मुख हि जन्तुर्यदिवापि दुखदेवाधीन विन्दन्ति नात्मशक्तया ।
तस्मादिष्ट वल्वन्मन्यमानो न सञ्चरेनापि हप्येत्कदाचित् ॥ ७ ॥
भयेन मुह्याम्यटकाह कदाचित् सन्तापी मे मानसो नास्ति कश्चित् ।
धाता यथा मां विदधाति लोके ध्रुव तथाह भवितेति मत्वा ॥ ८॥
सस्वेदजा ाण्डजा हृद्विदश्च सरीसृपा रूमयोऽप्यप्सुमत्स्या ।
तथाश्मानस्तृणकाष्ठश्च सरं दिएक्षये स्था प्रकृति भजन्ते ॥ ६॥
अनित्यता सुपदु सस्य बुभ्या कस्मात्सन्तापमष्टकाह भजेयम् ।
किं कुर्य्या ये किच रत्वा न तप्ये तम्मात्सन्ताप वर्जयाम्यप्रमत्त ॥२०॥
शौनक उवाच।
एर वाण नृपति ययातिमथाएक पुनरेवान्यपृच्छन ।
मातामह सर्पगुणोपपन्न यत्र स्थित स्वर्गलोके यथावत् ॥ २१ ।।
अष्टक उवाच।
ये ये लोका पार्थिवेन्द्रप्रधानास्त्वया भुतायञ्च काल यथा च ।
तन्मे राजन् ब्रूहि सर्व यथावत् क्षेत्रमवद्धापसेव हि धर्मम् ॥ ॥
ययातिरमाचा
राजाहमासन्त्विह सार्वभौमस्ततो लोकान महतयाजय वै।
तनाव संवर्गसहनमात्र ततो लोकान् परमानभ्युपेत ॥१॥
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* मत्स्यपुराणम् *
[ऊनचत्वारिंशो
ततः पुरी पुरुहूतस्य रम्यां सहस्रद्वारां शतयोजनान्ताम् ।
अध्यायसं घर्पसहस्रमानं ततो लोकान् परमानभ्युपेतः ॥ १४ ॥
ततो दिव्यमजरं प्राप्यलोकं प्रजापतेलोकपतेर्दुरापम् ।
तत्रावसं वर्षसहस्रमानं ततो लोकान् परमानभ्युपेतः ॥ १५ ॥
देवस्य देवस्य निवेशने च विजित्य लोकान् न्यवसं यथेष्टम् ।
संपूज्यमानस्त्रिदशैः समस्तैस्तुल्यप्रभावद्युतिरीश्वराणाम् ॥ १६ ॥
तथा वसन्नन्दनकामरूपी संवत्सराणामयुतं शतानाम् ।
सहाप्सरोभिर्विचरन् पुण्यगन्धान पश्यन्नगान पुप्पितांश्चारुरूपान् ॥१७॥
तत्र स्थितं मां देवसुखेपु सक्तं कालेऽतीते महति ततोऽतिमात्रम् ।
दूतो देवानामववीदुग्ररूपो ध्वंसेत्युच्चैस्त्रिः ल्पुतेन स्वरेण ॥ १८ ॥
एतावन्मे विदितं राजसिंह ततो भ्रष्टोऽहं नन्दनात् क्षीणपुण्यः ।
पाचोऽश्रीपञ्चान्तरिक्ष सुराणामनुकोशाच्छोचतां मां नरेन्द्र ॥१६॥
अकस्माद्वेक्षीणपुण्यो ययातिः पतत्यसौ पुण्यकन् पुण्यकीर्तिः ।
तानत्रुवं पतमानस्तदाहं सतां मध्ये निपतेयं कथन्नु ॥२०॥
तैराख्यातां भवतां यज्ञभूमि समीक्ष्य चैनामहमागतोऽस्मि ।
हविर्गन्धैर्दशितां यज्ञभूमि धूमापाङ्ग परिगृह्य प्रतीताम् ॥ २१ ।।
इति श्री मत्स्यपुराणे ययात्यष्टकसम्बादवर्णनं नाम त्रिशोऽध्यायः।
ऊनचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
ययात्यष्टकसम्मादवर्णनम् ।
अटक उचाचा
यदा यसन्नन्दने कामरूपे संवत्सराणामयुतं शतानाम् ।
किं कारणं कार्तयुगप्रधान हित्वा तद्वै घसुधामन्यपद्यः ॥१॥
M
ऽध्यायः]
* ययात्यष्टकसम्बादवर्णनम् ।
ययातिरुवाचा
ज्ञाति मुहन स्वजनो यो यथेह क्षीणे वित्ते त्यज्यते मानवैहिः।
तथा स्वर्ग क्षीणपुण्यं मनुष्यन्त्यजन्ति सद्यः खेचरा देवसंघाः ।
अक उवाच।
कथं तस्मिन् क्षीणपुण्या भवन्ति संमुह्यते मेऽत्रमनोऽतिमात्रम् ।
कि विशिष्टाः कस्य धामोपयान्ति तद्वै ब्रूहि क्षेत्रवित्त्वं मतो मे ॥ ३॥
ययातित्वाव।
इमं भीमं नरकन्ते पतन्ति लालप्यमाना नरदेव ! सर्वे ।
ते कङ्कगोमायुपलाशनार्थं क्षिती विवृद्धिं वहुधा प्रयान्ति ||४||
तस्मादेवं वर्जनीयं नरेन्द्र दुष्टं लोके गर्हणीयञ्च कर्म ।
आण्यातं ते पार्थिव सर्वमेतत् भूयश्चेदानी घद किन्ते पदामि ॥५॥
अष्टक उवाच।
यदा तु तांस्ते वितुदन्ते चयांसि तथा गृध्राः शितिकण्ठाः पतगा।
कथं भवन्ति कथमाभवन्ति त्यत्ती भीमं नरकमहं शृणोमि ॥६॥
ययातिल्याच।
ऊध्वं देहाकर्मणो जृम्भमाणात व्यक्तं पृथिव्यामनुसञ्चरन्ति ।
इमं भोमं नरकन्ते पतन्ति नावेक्षन्ते वर्षपूगाननेकान् ॥ ७ ॥
पष्टिं सहस्राणि पतन्तिव्योनि तथाशीतिञ्चैव तु वत्सराणाम् ।
तान्दै तुदन्ते प्रपतन्त. प्रयातान भीमा भीमा गक्षसास्तीणदंप्राः ॥८
अटक उवाच।
यदेतांस्तै संपततम्मुदन्ति भीमा भीमा राक्षसास्तीक्ष्णदंप्राः।
कथं भवन्ति कथमाभवन्ति कथं भूगर्भभृता भवन्ति ॥ ६ ॥
ययातित्वाचा
असप्रेत पुष्परसानुयुक्त अन्येति सय पुरुषेण सृष्टम् ।
तः तस्यारज आपद्यते च स गर्भमृत समुपनि तन ॥ १० ॥
१२
* मत्स्यपुराणम् *
[ऊनचत्वारिशो
घनस्पतीनोषधीधाविशन्ति भपो वायु पृथिवीश्चान्तरिक्षम् ।
चतुष्पदं द्विपदञ्चापि सर्व एवं भूता गर्भभूता भवन्ति ॥ ११ ॥
अष्टक उचाचा
अन्यहपुर्विदधातीह गर्भे उताहोस्वित् स्वेन कामेन याति ।
आपद्यमानो नरयोनिमेतामाचक्ष्व मे संशयात् पृच्छतस्त्वम् ॥ १२ ॥
शरीरदेहादिसमुच्छयञ्च चक्षुःश्रोने लभते केन संज्ञाम् ।
एतत् सर्व तात आचश्व पृष्टः क्षेत्रनं त्वां मन्यमाना हि सर्वे ॥२३॥
ययातिरुवाच।
चायुः समुत्कर्षति गर्मयोनिमृतौ रेतःपुप्परसानुयुक्तम् ।
स तत्र तन्मात्रताधिकारः क्रमेण संवर्धयतीह गर्भम् ॥ १४ ॥
स जायमानोऽथ गृहीतगात्रः संज्ञामधिष्ठाय ततो मनुष्यः ।
स थोत्राभ्यां वेदयतीह शब्दं स वै रूपं पश्यति चक्षुपा च ॥१५॥
घ्राणेन गन्धं जिह्वायाथो रसञ्च त्वचा स्पर्शमनसा घेदभावम् ।
इत्यष्टके होपचितं हि विद्धि महात्मनः प्राणभृतः शरीरे ॥१६॥
अटक उचाच।
-
यः संस्थित्तः पुरुषो दहाते वा निखन्यते चापि निशष्यते या ।
अभावभूतः स विनाशमेत्य केनात्मानं चेतयते पुरस्तात् ॥१७॥
ययातिरुवाच ।
हित्वा सोऽसन् सुप्मयन्निष्ठितत्वात् पुरोधाय सुकृतं दुष्कृतश्च ।
अन्यां योनि पुण्यपापानुसारां हित्वा देहं भजते राजसिंह ॥१८॥
पुष्पां योनि पुष्पहतो विशन्ति पायोनि पापरतो ब्रजन्ति ।
कीटाः पतलाश्च भवन्ति पापान मे विवक्षास्ति महानुभाव ॥३॥
चतुष्पदा द्विपदा. पक्षिणश्च तथा भूता गर्भभूता भवन्ति ।
आल्यातमेतन्निसिलं हि सर्व भूयस्तु किं पृच्छसि राजसिंह ॥२०॥
ऽध्यायः]
* ययात्यष्टकसम्बादवर्णनम् *
अष्टक उवाच।
-
किंस्वित् कृत्वा लभते तात संज्ञां मर्त्यः श्रेष्ठां तपसा विद्यया था।
तन्मे पृष्टः शंस सर्वयथायच्छुभान लोकान येन गच्छेत् क्रमेण ॥२१॥
ययातिरुवाच।
तपश्च दानञ्च शमी दमश्च हीरार्जवं सर्वभूतानुकम्पा ।
स्वर्गस्य लोकस्य वदन्ति सन्तो हाराणि सप्तव महान्ति पुसांम् ।।२२।
सर्वाणि चैतानि यथोदितानि तपःप्रधानान्यभिमर्शकेन ।
नश्यन्ति मानेन तमोऽभिभूताः पुंसः सदैवेति वदन्ति सन्तः ॥२३
अधीयानः पण्डितं मन्यमानो यो विद्यया हन्ति यशः परस्य ।
तस्यान्तवन्तः पुरुषस्य लोकानचास्य तद्ब्रह्मफलं ददाति ॥२४
चत्वारि कर्माणि भयङ्कराणि भयं प्रयच्छन्त्ययथाकृतानि ।
मानानिहोत्रमुनमानमोनं मानेनाधीतमुतमानयज्ञः ॥ २५ ॥
नमान्यमानो मुदमाददीत न सन्तापं प्राप्नुयाचापमानात् ।
सन्तः सतः पूजयन्तीह लोके नासानव साधुबुद्धिं लभन्ते ॥ २६ ॥
इति दद्यादिति यजेदित्यधीयीत मे श्रुतम् । इत्येतान्यभयान्याहुस्तान्यवानिनित्यशः
येनाश्रय घेदयन्ते पुराणं मनीविणो मानसे मानयुक्तम् ।
तन्निश्रेयस्तेन संयोगमेत्य परां शान्ति प्राप्नुयुः प्रेत्य चेह ॥ २८ ॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे ययात्यष्टकसम्पादवर्णनं नामैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ।
चत्वारिंशोऽध्यायः
ययात्यष्टकम यादवर्णनम् ।
डटक उचाचा
वरन् गृहम्यः कथमेति देवान् कथं भिक्षः कथमाचार्यकर्मा।
वानप्रसः सत्पथे सन्निविष्टो यहन्यस्मिन् संप्रति वेदयन्ति ॥१॥
* मत्स्यपुराणम् * [चत्वारिंशो ययातिरवाच। आहृताध्यायी गुरुकर्मसु चोद्यतः पूर्वोत्थायी चरमञ्चाथशायी । मृदुर्दान्तो धृतिमानप्रमत्तः स्वाध्यायशील सिद्धयति ब्रह्मवारी ॥ २॥ धर्मागतं प्राप्य धनं यजेत दयात्सवातिथीन् भोजयेञ्च । अनाददानश्च परैरदत्तं सैपा गृहस्थोपनिषत्राणी ॥३॥ स्ववीर्य्यजीवी वृजिनानिवृत्तो दाता परेभ्यो न परोपतापी । तादृड्मुनिः सिद्धिमुपैति मुख्या वसन्नरण्ये नियताहारचेष्टः ॥ ४॥ अशिल्पजीवी विगृहश्च नित्यं जितेन्द्रियः सर्वतो विप्रमुक्तः । अनोकशायी लघु लिप्समानश्वरन् देशानेकाम्बरः स भिक्षुः ॥ ५ ॥ राज्या यया वाभिरताश्च लोका भवन्ति कामाभिजिताः सुखेन च । तामेव रात्रि प्रयतेत विद्वानरण्यसंस्थो भवितुं यतात्मा ॥६॥ दशैव पूर्वान् दश चापरांस्तु ज्ञातीस्तथात्मानमर्थकविंशम् । अरण्यवासी सुकृतं दधाति मुश्चात्वरण्ये स्वशरीरधातून ॥ ७॥ अएक उवाच। । कतिस्विद्देवमुनयो मौनानि कतिचाप्युत । भवन्तीति तदाचक्ष्य श्रोतुमिच्छामहे घयम् ययातिरुवाच। अरण्ये वसतो यस्य ग्रामो भवति पृष्टतः । ग्रामे वा वसतोऽरण्यं स मुनि स्थाजनाधिप अष्टक उवावा कवितसतोऽरण्ये ग्रामो भवति पृष्टत (नामे वा घसतोऽरण्यं कथं भवति पृष्टतः ययातिरुवाच । नमाम्यमुपयुञ्जीत य आरण्यो मुनिर्भवेत् । तथास्य चसतोऽरण्ये ग्रामो भवति पृष्ठतः अनग्निरनिकेतचाप्यगोत्रचरणो मुनिः । कौपीनाच्छादनं यावत्तावदिच्छेच श्रीवरम् ॥ यावत्प्राणाधिसन्धानं तावदिच्छेच्चमोजनम् । तदास्यवसतोग्रामेऽरण्यं भवति पृष्ठतः ॥ यास्तुकामान्परित्यज्यत्यतकर्माजितेन्द्रियः । आतिष्ठेतमुनिमानसलोकेसिद्धिमाप्नुयात्
ऽध्यायः]
* ययात्यष्टकसम्बादवर्णनम् *
धौतदन्तं कृत्तनखं सदास्नातमलतम् । असितं सितकर्मस्थं कस्तन्नाचितुमर्हति ।१५।
तपसाकर्शितःक्षामाक्षीणमांसास्थिशोणितः । यदाभवतिनिर्द्वन्द्वो मुनिमोनं समास्थितः
अथलोकमिमक्षित्वा लोकञ्चापि जयेत्परम् । आस्येन तु यदाहारं गोवन्मृगयते मुनिः
अथास्य लोकः सर्वो यः सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १७ ॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे ययात्यष्टकसम्बादवर्णनं नाम चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ।
एकचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
ययात्यष्टकसम्भादवर्णनम् ।
अष्टक उवाच।
कतरस्त्वेतयो.पूर्वदेवानामेतिसात्म्यताम् । उभयोर्धावतो राजन् ! साचन्द्रमसोरिष
ययातिरवाच ।
अनिकेतगृहस्थेषु कामवृत्तेपु संयत । ग्राम एवं वरन् भिक्षुस्तयोः पूर्वतरङ्गत ॥ २॥
अप्राप्यं दीर्घमायुश्च यः प्राप्तो विकृति चरेत् । तप्येत यदितत्कृत्वा चरेत्सोग्र तपस्ततः
य? नृशसन्तदपथ्यमाहुर्य सेवते धर्ममनर्थवुद्धिः ।
असावनीशः स तथैव राजन् तदार्जवं ससमाधिस्तदार्यम् ॥ ४ ॥
अष्टक उवाच ।
केनाद्य त्वन्तु प्रहितोऽसि राजन् युवा स्रग्वी दर्शनीयः सुवर्चा. ।
कुत आगतः कतमस्यां दिशि त्वमुताहोस्वित् पार्थिवस्थानमस्ति ॥५॥
ययातिरुवाच ।
इमं भौम नरकं क्षीणपुण्य प्रवेष्टुमुवी गगनाद्विप्रकीर्णः ।
उत्तवाऽहं का प्रपति याम्यनन्तरन्त्यरन्त्यमी ब्रह्मणो लोकपाये ॥ ६ ॥
सतां सकाशे तु वृतः प्रपातस्ते सङ्गता गुणयन्तस्तु सर्वे ।
शकाच्च लन्धी हि घरो मप प्रतिप्यता भूमितलं नरेन्द्र ! ॥७॥
* मत्स्यपुराणम् *
[एकचत्वारिंशत्तमो
अष्टक उवाच।
पृच्छामि त्वा प्रपतन्त प्रपात यदि लोका पार्थिव सन्ति मेऽत्र ।
यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि थिता क्षेत्रज्ञ त्वा तस्य धर्मस्य मन्ये ॥८॥
ययातिरवाच ।
यावत्पृथिव्या विहित गवाश्व सहारण्य पशुभि पक्षिभिश्च ।
तापल्लोका दिवि ते सस्थिता वै तथा विजानीहि नरेन्द्रसिंह ॥ ॥
अष्टक उवाच।
तास्ते ददामि मा प्रपत प्रपात ये मे लोका दिवि राजेन्द्र सन्ति ।
यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि धितास्तानाक्रम क्षिप्रममित्रहासि ॥१०॥
ययातिरवाच ।
नास्मद्विधो ब्राह्मणो ब्रह्मविच्च प्रतिग्रह घर्तते राजमुरय ।।
यथा प्रदेय सतत द्विजेभ्यस्तथा ददे पूर्वमह नरेन्द्रम् ॥ ११॥
नात्राह्मण कृपणो जातु जीवेद्यद्यपि स्यात् ब्राह्मणी वीरपत्नी।
सोऽह यदेवाकृतपूर्वश्चरेय विवित्समान किमु तत्र साधु ॥ १२ ॥
प्रतर्दन उवाच ।
पृच्छामि त्वा स्पृहणीयरूप प्रतर्दनोऽह यदि मे सन्ति लोका ।
यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रुता क्षेत्रज्ञ त्वा तस्य धर्मस्य मन्ये ॥ १३ ॥
ययातिरवाच ।
सन्ति लोका बहवस्ते नरेन्द्र ! अप्येक सप्तशतान्यहानि ।
मधुच्युतो घृतवन्तो विशोकास्तेनान्तवन्त प्रतिपालयन्ति ॥ १४ ॥
प्रतर्दन उवाच ।
तास्ते ददामि पतमानस्य राजन् । ये मे लोकास्तव ते वे
भवन्तु
यद्यन्तरिक्षे यदि घा दिवि नितास्तानाक्रम क्षिप्रमपेतमोह ॥ १५॥
१७ ऽध्यायः] * ययात्यटकसंवादकथनम् * ययातिरुवाच। न तुल्यतेजाः सुकृतं हि कामये योगक्षेमं पार्थिवात् पार्थिव सन् । वादेशादापदं प्राप्य विद्वान् चरन्नृशंसं हि न जातु राजा ॥ १६ ॥ धम्यं मागं चिन्तयानो यशस्य कुर्यात्तपो धर्ममवेक्षमाण । न मद्विधो धर्मवुद्धिहि राजा होवं कुर्यात् कृपण मा यथात्थ ॥१७॥ कुर्य्यामपूर्व न कृतं यदन्यैर्विवित्समान किमु तत्र साधु । चुवाणमेवं नृपति ययाति नृपोत्तमो वसुमानचीत्तम् ॥ १८ इति श्रीमत्स्यपुराणे ययात्यष्टकसवादे एकचत्वारिंशोऽध्याय । . द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ययात्यष्टकमम्बादकथनम् । घसुमानुवाच । पृच्छाम्यहं वसुमानौपदश्चिर्यद्यस्ति लोको दिवि महा नरेन्द्र ।। यद्यन्तरिक्षे प्रथितो महात्मन् क्षेत्रमं त्या तस्य धर्मस्य भन्ये ॥१॥ ययातिरघाव। यदन्तरिक्षं पृथिवी दिशश्च यत्तेजसा तपते भानुमाश्च । लोकास्तावन्तो दिवि संस्थिता वै ते त्वां भवन्त प्रतिपालयन्ति ॥२॥ घसुमानुवाच। तास्ते ददामि पतमाप्रपात ये मे लोकास्तच ते वे भवन्तु । क्रीणीप्वना स्तृणकेनापि राजन् प्रतिग्रहस्ते यदि सम्यक् प्रदुष्ट ॥३॥ ययातिरवाच । न मिथ्याहं विक्रियं वै स्मरामि मयाकृतं शिशुभावेऽपि राजन् । कुर्य्याञ्चैवास्तपूर्वमन्यैर्विवित्समानो पसुमन्न साधु ॥ ४ ॥ वसुमानुवाच। तास्त्वं लोकान् प्रतिपद्यस्व राजन् ! मया दत्तान् यदि नेष्ट मयस्ते ।
C * मत्स्यपुराणम् * [द्विवचारिशो नाहन्तान् वै प्रतिगन्ता नरेद्र सर्वे लोकास्तावका वै भवन्तु ॥५॥ शिविरुवाच। पृच्छामि त्वां शिविरौशीनरोऽहं ममापि लोका यदि सन्ति तात! यद्यन्तरिक्ष यदि वा दिवि धिताः क्षेत्रमं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ॥६॥ ययातिरुवाच। न त्वं वाचा हृदयेनापि राजन् ! परीप्समानो मावमंस्था नरेन्द्र । तेनानन्ता दिवि लोकाःस्थिता वै विद्युदूपाः स्वनवन्तो महान्तः ॥ ७ ॥ शिविरुवाच। तांस्त्वं लोकान् प्रतिपद्यस्व राजन् मया दत्तान् यदि नेष्टः क्रयस्ते । न चाहन्तान् प्रतिपद्य दत्त्वा यत्र त्वं तात गन्तासि लोके ॥८॥ ययातिरुवाच। यथा त्वमिन्द्रप्रतिमप्रभावस्ते चाप्यनन्ता नरदेवलोकाः। तथाद्य लोके न रमेऽन्यदत्ते तस्माच्छिवेनाभिनन्दामि पाचम् ॥ ६ ॥ अष्टक उवाच। न चेदेकैकशो राजन् ! लोकानःप्रतिनन्दसि । सर्वेप्रदायतानलोकान्गन्तारोनरकं घयम् ययातिरुवाच । यदर्हास्तद्वदध्वं वः सन्तः सत्यादिदर्शिनः । अहन्तु नाभिगृह्णामि यत्कृतं न मया पुरा ॥ अलिप्समानस्य तु मे यदुक्तं न तत्तथास्तीह नरेन्द्रसिंह !। अस्य प्रदानस्य यदेव युक्तं तस्यैव चानन्तफलं भविष्यम् ॥ १२ ॥ । अटक उवाच। करयते प्रतिदृश्यन्ते रथाः पञ्च हिरण्मयाः । उच्चैःसन्तःप्रकाशन्ते ज्वलन्तोऽग्निशिखाइय ययातिरुवाच भवतां मम चैवैते रथा भान्ति हिरण्मयाः । आरोतेषु गन्तव्यं भवद्भिश्च मया सह ।। अप्टक उवाच। - रथं राजन् विक्रमस्व विहायसा। वयमप्यनुयास्यामोयदाकालो भविष्यति ६६ ऽध्यायः * ययात्यष्टकसंपादकथनम् * ययातिरुवाच। सर्वैरिदानो गन्तव्यं संह स्वर्गों जितो यतः । एष यो विरजाः पन्था दृश्यते देवसद्मगः शौनक उवाच। तेऽभिरा रथं सर्व प्रयाता नृपते नृपाः । आक्रमन्तो दिवं भान्ति धर्मेणावृत्य रोदसी अष्टक उवाच। अहं मन्ये पूर्वमेकोऽभिगन्ता सखा चेन्द्रः सर्वथा मे महात्मा । कस्मादेवं शिविरोशीनरोऽयमेकोऽत्ययात् सर्ववेगेन वाहान् ॥ १८ ॥ ययातिरवाच। अददादेवयानायःयावद्वित्तमनिन्दितः । उशीनरस्य पुत्रोऽयंतस्मात् श्रेष्ठो हिवः शिविः दानं शोचं सत्यमयो हिंसा हीः श्रीस्तितीक्षा समतानृशंस्यम् । राज्यन्त्येतान्यथ सर्वाणि राशि शिवी स्थितान्यप्रतिमे सुवुद्धया। एवं वृत्तं ही निपेयो विमति तम्माच्छिविरभिगन्ता रथेन ॥ २० ॥ शौनक उवाच। अथाष्टकः पुनरेवान्वपृच्छन् मातामहं कौतुकादिन्द्रकल्पम् । पृच्छामि त्वां नृपते ब्रूहि सत्यं कुतश्च कञ्चासि कथं त्वमागाः । कृतं त्वया यद्धि न तस्य कर्ता लोके त्वदन्यो ब्राह्मणः क्षत्रियो चा ॥२३॥ ययातिरयाच। ययातिरस्मि नापस्य पुत्रो पूरीः पिता सार्वभौमत्यिहासम् । गुह्यं मन्त्रं मा केभ्यो प्रवीमि मातामहो भवतां सुप्रकाश' ॥ २२ ॥ सर्वामिमां पृथियो निजिगायस्तृद्धां महीमददं ब्राह्मणेभ्यः । मेध्यानश्वान्नेकशस्तान सुम्पान् तदा देवा. पुण्यभाजी भवन्ति ॥२३॥ अदामहं पृथिवीं ब्राह्मणेभ्यः पूर्णामिमामपिलान्नैः प्रशस्ताम् । गोभिः सुवर्णश्च धनश्च मुप्पैरश्वा. सनागा शतशस्त्वयुदानि ॥२४॥ सत्येन मे द्योश्च वसुन्धरा च तथैवानियलते मानुषेषु ।
१०० ** मत्स्यपुराणम् * [त्रिचत्वारिंशो नमे वृथा व्याहृतमेव पाक्यं सत्यं हि सन्तः प्रतिपूजयन्ति ॥२५॥ साध्वष्टक प्रववीमीह सत्यं प्रतर्दनं घसुमन्तं शिविञ्च। सर्वे देवा मुनयश्च लोकाः सत्येन पूज्या इति मे मनोगतम् ॥२६॥ यो नः सर्गजितं सर्व यथा वृत्तं निवेदयेत् । अनसूयुद्धिजाग्रेभ्यःसभजेन्न सलोकताम् ।। शौनक उवाच। एवं राजन् स महात्मा ययातिः खदौहित्रत्तारितो मित्रवर्यः । त्यक्त्वा मही परमोदारकर्मा स्वर्ग गतः कर्मभिर्व्याप्य पृथ्वीम् ॥२८॥ एवं सर्वं विस्तरतो यथावदात्यातं ते चरितन्नाहुपस्य । वंशो यस्य प्रथितः कौरवे यो यस्मिन् जातस्त्वं मनुजेन्द्रकल्पः ॥२६॥ इति श्री मत्स्यपुराणे ययात्यटकसंवादेय यातिचरितसमाप्तिवर्णनं नाम द्विचत्वारिंशोऽध्यायः। - त्रिचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः यदुवंशवर्णनम् । सूत उवाच। इत्येतच्छौनकाद्राजा शतानीकोनिशम्य तु । विस्मितः परयाप्रीत्यापूर्णचन्द्र इवावी ॥ पूजयामास नृपतिविधिवञ्चाथ शौनकम् । रत्नैर्गोभिःसुवर्णैश्चपासोभिर्विविधस्तथा ॥ प्रतिगृहा तत: सर्व यद्राक्षा प्रहितं धनम् । दत्त्वा च ब्राह्मणेभ्यश्च शौनकोऽन्तरधीयत ।। ऋपय ऊचुः । ययातिवंशमिच्छामः श्रोतुं विस्तरतो घद । यदुप्रभृतिभिः पुत्रैर्यदा लोके प्रतिष्ठितः ॥ सूत उवाच । यदोवंशं प्रवक्ष्यामि ज्येष्टस्योत्तमतेजसः। विस्तरेणानुपूर्ध्या च गदतो में नियोधत ५ यदोः पुत्रा बभूवुर्हि पञ्च देवसुतोपमाः । महारथा महेप्वासानामतस्तानियोधत ॥६॥ सहस्रजिरथोज्येष्ठकोष्टुनीलोऽन्तिकोलघुः । सहस्रजेस्तुदायादोशतजिर्नामपार्थिवः ।। - MI ॥ ऽध्यायः] * कार्तवीर्यास्यानम् * शतजेरपि दायादास्त्रयः परमकोर्तयः । हैहयश्च हयश्चैव तथा वेणुहयश्च यः ॥८॥ हैहयस्य तु दायादो धर्मनेत्रः प्रतिश्रुतः । धर्मनेत्रस्यकुन्तिस्तुसंहतस्तस्य चात्मजः ॥ संहतस्य तु दायादो महिष्मान्नामपार्थिव. । आसीन्महिष्मत.पुत्रोरद्रभेण्याप्रतापवान् । वाराणस्यामभूद्राजा कथितं पूर्वमेव तु । रदश्रेणस्य पुत्रोऽभूदुर्दमो नाम पार्थिवः दुईमस्यसुतोधीमान्कनकोनामवीर्यवान् । कनकस्यतुदायदाश्चत्वारोलोकविश्रुताः ॥ कृतवीर्यः कृतानिश्च कृतवर्मा तथैव च । कृतोजाश्च चतुर्थोऽभूतरुतवीर्य्यानुसोर्जुनः॥ जात' करसहस्रेण समहीपेश्वरो नृपः । वर्षायुतं तपस्तेपे दुश्चरं पृथिवीपतिः ॥१४॥ दत्तमाराधयामास कार्तवीर्योऽत्रिसम्भवम् । तस्मै दत्तापरास्तेनचत्वारः पुरषोत्तम ॥ पूर्व वाहुसहस्रन्तु स वने राजसत्तमः । अधर्म चरमाणस्य सद्विश्चापिनिधारणम् ॥१६ युद्धेन पृथिवी जित्वा धर्मणवानुपालनम् । संग्रामे वर्तमानस्य वधश्चवाधिकागवेत् ।। तेनेयं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपर्वता । समोदधिपरिक्षिप्ता क्षात्रेण विधिना जिता ॥ जशे बाहुसहस्रं वै इच्छतस्तस्य धीमतः । रथो अजश्च संजज्ञे इत्येवमनुशुश्रुमः ॥१६ दशयशसहस्राणि राज्ञा द्वीपेषु वै तदा । निर्गला निवृत्तानि श्रूयन्ते तस्यधीमत. ॥२० सर्वे यज्ञा महाराशस्तस्यासनभूरिदक्षिणा । सर्वेकाञ्चनयूपास्तेसर्वाः काञ्चनयेदिका. ॥ सर्वे देवैः समं प्राप्तैर्विमानस्थैरलड्मृताः । गन्धर्वैरप्सरोभिश्च नित्यमेवोपशोभिता ॥ तस्य यज्ञे जगी गाथां गन्धर्वोनारदस्तया । कार्तवीर्यस्यराजमहिमानंनिरीक्ष्य सः॥ न नूनं कार्तवीर्यस्य गति यास्यन्तिक्षनिया । यनिस्तपोभिश्चविक्रमेणश्रुतेन च । स हि सप्तसु द्वीपेसु खड्गी चक्रीशरासनी । रथीद्वीपान्यनुचरनयोगीपश्यतितस्करान् । पञ्चाशीतिसहस्राणि वर्षाणां स नराधिपः । स सर्वरत्नसम्पूर्णश्चक्रवत्तीं बभूव ह ॥ स एव पशुपालोऽभूत् क्षेत्रपाल. स एव हि । स एव वृष्ट्या पर्जन्यो योगित्वादर्जुनोऽभवत् ॥२७॥ योऽसौ याहु सहस्त्रेण ज्याघातकठिनत्वचा । भाति रश्मिसहस्रेण शारदेनधभास्करः॥ एप नागं मनुष्येषु माहिप्मत्यां महाद्युति. । कर्कोटकसुतंजित्वापुयां तत्रन्ययेशयत् ॥ एप वेगं समुद्रस्य प्रावृट्काले भजेत वै । फ्रीडन्नेव मुखोदिन्नः प्रतिस्रोतोमहीपतिः॥ 1 * मत्स्यपुराणम् * [त्रिचत्वारिंशो ललता कीड़ता तेन प्रतिस्रग्दाममालिनी । ऊर्मि भ्रुकुटिसन्त्रासाञ्चकिताभ्येतिनर्मदा ॥ एको वाहुसहस्रेण घगाहे स महार्णवः । करोत्युह्यतवेगान्तु नर्मदाप्राबृडुह्यताम् ॥३२ तस्य बाहुसहस्रेण क्षोभ्यमाने महोदधौ । भवन्त्यतीव निश्चेष्टा पातालस्था महासुराः चूर्णीकृतमहावीचिलीनमीनमहातिमिम् । मास्ताविद्धफेनौघमावर्ताक्षिप्तदुःसहम् ॥३४॥ करोत्यालोडयन्नेव दो सहस्रेण सागरम् । मन्दारक्षोभचकिता ह्यमृतोत्पादशङ्किताः। तदा निश्चलमू‘नो भवन्ति च महोरगाः । सायाह्न कदलीखण्डानिर्वातस्तिमिताइव ॥ एवं वध्वा धनुर्व्यायामुत्सितंपञ्चभिःशरैः । लङ्कायांमोहयित्वातुसवलंरावणंवलात् ॥ निर्जित्यवध्वाचानीयमाहिष्मत्याम्बवन्धन । ततोगत्वापुलस्त्यस्तुअर्जुनंसंप्रसादयत् ॥ मुमोच रक्षः पौलस्त्यं पुलस्त्येनेहसान्त्वितम् । तस्यवाहुसहस्रेण बभूव ज्यातलखनः।। युगान्ताभ्रसहस्रस्य आस्फोटस्वशनेरिव । अहोवत विधेवीयभार्गवोऽयं यदाच्छिनत् ॥ त सहनं वाहनां हेमतालवनं यथा । यत्रापवस्तु संकुद्धो हार्जुनं शप्तवान् प्रभुः ॥४१ यस्माइनं प्रदग्धं वै विश्रुतं मम हैहय । तस्मात्ते दुष्करं कर्म कृतमन्योहरिप्यति ॥४२ छित्या बाहुसहस्रन्ते प्रथमन्तरसा बली । तपस्वी ब्राह्मणश्च त्वांसवधिप्यतिभार्गवः ॥ सूत उवाच। तस्य रामम्तदा त्वासीन् मृत्युः शापेन धीमता । चरश्चैवन्तु राजः स्वयमेव वृतः पुग ॥ ४४ ॥ तस्य पुत्रशतं त्यासीत् पञ्च तत्र महारथाः । फ्तारत्रा यलिनः राग धर्मात्मानो महायलाः ॥४५॥ शूरसेनश्च शृपश्च धृष्टः गोष्टस्तथैव च । जयध्यजश्च चैकर्ता अपन्तिश्च विशाम्पते ॥ जयध्यजम्य पुत्रस्नु तालजवा महायलः । तस्य पुत्रशतान्येव तालजला इति श्रुताः ॥ नेपांपञ्चकुलाण्याता हिंदयानांमहात्मनाम्। पीतिहोत्राश्चशार्यातामोजाश्चावन्तयम्तथा कुपितफेगचविप्रान्नाम्नालजदाम्नवच । पीतिहोयसुतश्चापिसागौनामीप्येयान् दुर्जेयम्तम्य पुप्रानु यभृयामित्रपार्शनः ॥ ४६॥ सदायेन महागन ! प्रजा धर्मेण पालयन् । फार्तपीयर्यार्जुनी नामगजा पाहुसम्यान ।
J ऽध्यायः] *कोप्टुवंशविस्तारवर्णनम् - येन सागरपर्यन्ता धनुषा निर्जिता मही । यस्तस्य कीर्तयेन्नाम कल्यमुत्थाय मानयः ।। न तस्य वित्तनाशः स्यान्नटश्च लभते पुनः । कार्तवीर्यस्य यो जन्म कथयेदिह धीमतः यथावत् स्पिष्टपूतात्मा स्वर्गलोके महीयते ॥५२॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे यदुवंशवर्णने कार्तवीर्यारयाने त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः । चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः यदुवंशवर्णने क्रोष्टुवंशवर्णनम् । अषय ऊचुः। किमर्थं तद्वनं दग्धमापवस्य महात्मनः । कार्तवीर्येण विक्रम्य सत! प्रबूहि तत्वतः ॥१ रक्षिता स तु राजर्षिः प्रजानामिति नः श्रुतम् । सकथंरक्षिताभूत्वा अवहत्तत्तपोवनम् ।। सूत उवाचा आदित्यो द्विजरूपेण कार्तवीर्यमुपस्थितः । तृप्तिमेकां प्रयच्छस्वभादित्योऽहनरेश्वर ॥३ राजोवाच भगवन् ! केन तृप्तिस्ते भवत्येव दिवाकर । कीदृशं भोजनंदनिश्रुत्वातु विदधाम्यहम् ॥ मादित्य उवाच । स्थावरन्देहि मे सर्वमाहारन्ददतां वर । तेन तृप्तो भयेयं वै सा मे तृप्तिर्हि पार्थिव ॥५ कार्तवीर्य उवाच । न शस्याः स्थावराः सर्वे तेजसाववलेनव । निर्दग्धंतपतांश्रेष्ठ ! तेन त्वांप्रणमाम्यहम् ।। आदित्य उवाच। तुष्टस्तेऽहं शरान् दमि अक्षयान् सर्वतोमुखान् । ये प्रक्षिप्ता ज्वलिप्यन्ति मम तेजःसमन्विताः ॥ ७॥ आविष्टाममतेजोमि शोपयिष्यन्तिस्थावरान्। शुष्कानभस्मीकरिष्यन्तितेनतृप्तिनराधिप स्त उवाच। तत: शरांस्तदादित्यस्त्वर्जुनाय प्रयच्छत । ततो ददाह संप्राप्तानम्थायरान्स मेवय ॥ ।
* मत्स्यपुराणम् [चतुश्चत्वारिंशो ग्रामांस्तथाश्रमांश्चैव घोपाणि नगराणि च । तथा वनानि रम्याणि धनान्युपवनानि च ॥ १० ॥ एवं प्राचींसमदहत् ततःसर्वाश्चपक्षिणः | निवृक्षा निस्तृणाभूमिहताघोरेण तेजसा । एतस्मिन्नेव काले तु आपपो जलमास्थितः । दश वर्षसहस्राणि तत्रास्तेसमहानृषिः । पूर्ण व्रते महातेजा उदतिष्ट्रस्तपोधनः । सोऽपश्यदाश्रमं दग्धमर्जुनेन महामुनिः ॥१३॥ क्रोधाच्छशाप राजर्षि कीर्तितं घो यथा मया । क्रोटोःणुतराजवंशमुत्तमपौरुषम् ॥ यस्यान्ववाये सम्भूतो विष्णुर्वृष्णिकुलोद्वहः । क्रोप्टोरेवाभवत् पुत्रो वृजिनीवान महारथः ॥ १५ ॥ वृजनीवतश्च पुत्रोऽभूत् स्याहोनाममहाबलः । स्वाहपुत्रोऽभवद्राजन्!रुपङ्गदतांवरः ।। स तुप्रसूतिमिच्छन् चैरुषङ्गःसौम्यमात्मजम् । चित्रश्चित्ररथश्चास्य पुत्रःकर्मभिरन्वितः ॥ अध चैत्ररथिवींरोजज्ञे विपुलदक्षिणः । शशविन्दुरिति ख्यातश्चक्रवर्ती बभूव ह ॥१८॥ अत्रानुवंशश्लोकोऽयं गीतस्तस्मिन्पुराऽभवत् । शशविन्दोस्तु पुत्राणां शतानामभवच्छतम् ॥ १६ ॥ धीमतां चाभिरूपाणां भूरिदविणतेजसाम् । तेषां शतप्रधानानां पृथुसाहर महायलाः ।। पृथुश्रवाः पृथुयशाः पृथुधर्मा पृथुञ्जयः । पृथुकीतिः पृथुमना राजानः शशविन्दयः ।२॥ शंसन्ति व पुराणाः पृथुश्रवसमुत्तमम् । अन्तरस्य सुयज्ञस्य सुयज्ञस्तनयोऽभवत् ।। उशना तु सुयशस्य यो रक्षन्पृथिवीमिमाम् । आजहाराश्वमेधानांशतमुत्तमधार्मिकः ।। तितिक्षुरभवत् पुत्र औशनः शत्रुतापनः । मरुत्तस्तस्य तनयो राजपीणामनुत्तमः ॥२४॥ आसीनमरुत्ततनयो धीरः कम्बलयहिषः । पुत्रस्तु रयमकयचो विद्वान्कम्पलयहिपः ।। निहत्य समकवापरान कवचधारिणः । धन्विनोविविधर्वाणैरवाप्यपृथिवीमिमाम् ॥ अश्वमेधे ददी राजा ग्राह्मणेभ्यस्तु दक्षिणाम् । यशेतु स्वमफवच.फदाचित्परवीन्हा ।। जमिरे पचपुत्रास्तु महापार्या धनुर्भृतः । स्वमेषु पृथुरसमश्य ज्यामयः परिधो हरिः ॥ परिघं च दरि चप विदेदेऽम्यापपत्पिता । ग्यमेपुरमवद्वाजा पृथुरसंमस्तदाश्रयः ॥२६॥ तेभ्यः प्रयाजिनी राज्याच्यामघम्नुतदाश्रमे । प्रशान्तधाश्रमम्पश्चपासणेनापयोधितः ।
ऽध्यायः ] * कोष्टुवंशविस्तारवर्णनम् * जगाम धनुरादाय देशमन्यं ध्यजी रथी । नर्मदा नृपएकाकी केवलं वृत्तिकामतः ।३॥ ऋक्षयन्तं गिरिं गत्वा भुक्तमन्यरूपाविशत् । ज्यामध मयस्याभवदार्या चैत्रापरिणतासती ॥ अपुत्रो न्यवसद्राजा भार्यामन्यानचिन्दत । तस्यासीद्विजयो युद्धेतत्रकन्यामवाप्यसः ॥ भार्यामुचाच सन्त्रासात् स्नुषेयं ते शुचिस्मिते । एवमुक्तानचीदेनंकस्यचेयंस्तुपेति च ॥ राजोवाच यस्तेजनिष्यते पुत्रस्तस्य भार्या भविष्यति । तस्मात्सातपसोणकन्यायाःसम्प्रसयत ।। पुत्रं विदर्भ सुभगा चैत्रा परिणता सती । राजपुत्र्यांचविद्वान्सस्नुपायांकथकैशिको ।। लोमपादं तृतीयन्तु पुत्रं परमधार्मिकम् ।। ३६ ॥ तस्यां विदर्भोऽजनयच्छूरान्रणविशारदान्। लोमपादान्मनु.पुत्रीज्ञातिस्तस्यतुचात्मजः कैशिकस्य विदिः पुत्रो तस्माच्चैद्या नृपाःस्मृताः । क्रथो विदर्भपुत्रस्तु कुन्तिस्तस्यात्मजोऽभवत् ॥ ३८ ॥ कुन्तेऽष्टः सुतो जज्ञे रणधृष्टः प्रतापवान् । धृष्टस्यपुत्रोधर्मात्मानिर्वृतिःपरवीरहा ।। तदेको निवृतेः पुत्रो नाम्ना सतुविदूरथः । दशार्हस्तस्यवैपुत्रोन्योमस्तस्यववस्मृतः ।। दाशार्हाच्चैव व्योमात्तु पुत्रो जीमूत उच्यते ॥ ४० ॥ जीमूतपुत्री विमलस्तस्यभीमरथासुतः । सुतो भीमरथस्यासीत् स्मृतोनवरथाकिल ॥ तस्य चासीग़ढ़रथः शकुनिस्तस्यचात्मजः । तस्मात्करम्भः कारम्भिर्देवरातोबभूवह ॥ देवक्षत्रोऽभवदाजा देवरातिर्महायशाः । देवगर्भसमो जज्ञे देवनक्षत्रनन्दनः ॥४३॥ मधुर्नाम महातेजा मधोः पुरवसस्तथा । आसीत् पुरवसः पुत्रः पुरुद्वान पुरषोत्तम । जन्तुर्जनेऽथ वैदा भद्रसेन्यांपुरद्वतः । ऐश्वाकीचाभवदार्याजन्तोस्तस्यामजायत । सात्वतः सत्वसंयुक्त सात्वतांकीर्तिवर्द्धनः । इमां विसृष्टिविज्ञायज्यामधस्यमहात्मनः ॥ प्रजावानेति सायुज्यं राज्ञः सोमस्य धीमतः ॥ ४६॥ । सात्वतान्सत्वसम्पन्नानकोशल्यासुपुवेसुतान् । भजि भजमानन्तुदिव्यंदेवावृधंनृपः॥ अन्धकञ्च महाभोजं वृष्णि च यदुनन्दनम् ! तेषांतु सर्गाश्चत्यारोविस्तरेणैवतच्छृणु ।। भजमानस्यएअय्यांबाह्यकायाञ्च वाह्यकाः । सूक्षयस्य सुतेहेतुबाह्यकास्तुतदाभवन् ।
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* मत्स्यपुराणम् *
[चतुश्चत्वारिंशो
तस्यभार्येभगिन्यौ द्वे सुषुवाते बहन सुतान् । निर्मिश्चकृमिलश्चैववृष्णिपरपुरञ्जयम् ॥
ते याह्यकायां सृञ्जय्यां भजमानादविजंज्ञिरे ॥ ५० ॥
जज्ञे देवावृधो राजा बन्धूनां मित्रवर्द्धनः । अपुत्रस्त्वभवद्राजा वचार परमन्तपः ॥
पुत्रः सर्वगुणोपेती मम भूयादिति स्पृहन् ॥५१॥
संयोज्य मन्त्रमेवाथ पर्णाशाजलमस्पृशत् । तदोपस्पर्शनात्तस्य चकार प्रियमापगा।
कल्याणत्वान्नरपतेस्तस्मैसानिम्नगोत्तमा। चिन्तयाथपरीतात्माजगामाथविनिश्चयम् ॥
नाधिगच्छाम्यहं नारी यस्यामेवंविधः सुतः । जायेत नस्माद्दद्याहं भवाम्यथसहस्रशः ॥
अथ भूत्वा कुमारी सा विभ्रतो परमं वपुः । ज्ञापयामास राजानं तामियेप महाप्रतः ॥
अथ सा नवमे मासि सुपुवे सरितां परा। सर्वगुणोपेतं यच॑ देवावृधान्नृपात् ॥
अनुवंशे पुराणज्ञा गायन्तीतिपरिध्रुतम् । गुणान् देवावृधस्यापिकीर्तयन्तो महात्मनः ॥
यथैवं श्णुमो दूरादपश्यामस्तथान्तिकात् । बभ्रुः श्रेष्ठोमनुष्याणां देवर्दघावृधःसमः॥
पटिश्च पूर्वपुरुषाः सहस्राणि च सप्ततिः । एतेऽमृतत्वं संप्राप्ता पभोर्देवावृधान्नृप!॥
यज्वा दान पतिवीरो ब्रह्मण्यश्च व्रतः । रूपवान्सुमहातेजाः श्रुतवीर्य्यधरस्तथा ।६०)
अथ कङ्कस्य दुहिता सुपुवे चतुरः सुतान् । कुकुरं भजमानश्च शशि कम्बलवहिपम् ॥
फुकुरम्यसुतोवृष्णिवृष्णेस्तुतनयोधृतिः । कपोतरोमातस्यायतैत्तिरिस्तस्यचात्मजः ।।
तस्यासीत्तनुजापुत्रो ससाविद्वान्तलःफिल । स्यायतेतस्यनाम्नायनन्दनोदरदुन्दुभिः ।।
तम्मिन्नयितते यो अभिजातः पुनर्वसुः । अश्यमेधं च पुषार्थमाजहार नरोत्तमः ॥६॥
तम्यमध्येतिपत्रस्यसभामध्यात्समुत्थितः । अतस्तुविद्वान्कर्मझोयचादातापुनर्वसुः ॥
तम्यासीन पुत्रमिथुनं यभूयाविजितं किल । आणुकचागुकी चैव प्यातमतिमतांवर!"
माधोदाहग्न्त्यश्लोकान्प्रतितमाहुकम्। सोपासनानुफाणांसध्यज्ञानांवरूथिनाम् ।
ग्यानां मेयधोरणां सहस्राणि दशैव तु । नासत्यवादी नातेजा नायचा नासाहदः॥
नाशुचिनाप्यविद्वान् हिपोमोजेप्यभ्यजायत । आहुफम्यभृति प्राप्ताइत्येतदेतदुच्यते ।।
भारफधायपतीपुम्पसारंचानुफी ददौ । भागुफाम्फाश्यदुहिता दो पुत्रीसमग्यत ।
देपणाप्रसेनधि देवगर्मसमायुभो । देवफस्य मुना पीग जगिरे प्रिदशोपमाः ॥१॥
ऽध्यायः * स्यमन्तकमणिसंक्षिप्तचरित्रम् * देववानुपदेवश्च सुदेवो देवरक्षितः । तेषां स्वसारः सप्तासन् वसुदेवाय ता ददौ १७२१ देवकी श्रुतदेवी च यशोदा च यशोधरा | श्रीदेवी सत्यदेवी चसुतापी चेतिसप्तमी ॥ नवोनसेनस्य सुताः कंशस्तेपातु पूर्वजः । न्यग्रोधश्च सुनामा च कङ्कःशङ्कुश्च भूयसः ।। सुतन्तराष्ट्रपालधयुद्धमुष्टिः सुमुष्टिदः । तेषां स्वसारः पञ्चासन कंसाकसवती तथा । सुतलन्तराष्ट्रपाली च कडा चेतिवराङ्गनाः । उनसेनःसहापत्यो व्यारयातःकुकुरोद्भवः॥ भजमानस्य पुत्रोऽथ रथिमुख्यो विदूरथ. । राजाधिदेवः शूरश्च विदूरथसुतोऽभवत् ।। राजाधिदेवस्य सुतो जज्ञाते देवसंमिती । नियमवतप्रधानी शोणाश्वः श्वेतवाहनः ॥ शोणाश्वस्यसुताः पञ्चशूरारणविशारदा. । शमीच वेदशर्मा च निकुन्त शमशत्रुजित् शमिपुत्रः प्रतिक्षत्रःप्रतिक्षत्रस्य वात्मजः । प्रतिक्षेत्रः सुतोमोजोहृदीकस्तस्य चात्मजः हृदीकस्याभवन पुत्रा दश भीमपराक्रमाः । कृतवर्मानजस्तेषां शतधन्या च मध्यमः ॥ देवाहश्चैव नाभश्च भीषणश्च महाबलः । अजातो वनजातश्च कनीयकफरम्भको १८२॥ देवाहस्य सुतोविद्वान्जशेकम्बलवहिपः । असमक्षाः सुतस्तस्य तमोजास्तस्यचात्मजः अजातपुत्रा विक्रान्तास्त्रय. परमकीर्तयः । सुदंप्रश्च सुनाभश्च कृष्ण इत्यन्धकामताः ।। अधिकानामिमं वंशं यः कीर्तयतिनित्यशः । आत्मनो विपुलं वंश प्रजावानाप्नुते नरः इति श्रीमत्स्यपुराणे सोमवंशे चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥४४॥ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः स्यमन्तकमणिसंक्षिप्तचरित्रम् । सत उवाच । गान्धारी चैव माद्री च वृष्णिभार्येवभूवतु । गान्धारी जनयामास सुमित्रमित्रनन्दनम् माद्री युधाजितं पुत्रं ततो वै देवीदुषम् । अनमित्रं शिविचैव पञ्चमं कृतलक्षणम् ॥ अनमित्रसुतो निनो निनस्यापितुद्वौ सुतौ । प्रसेनश्चमहावीर्यः शक्तिसेनश्च तावुभौ । स्यमन्तक प्रसेनस्य मणिरत्नमनुत्तमम् । पृथिव्यां सर्वरत्नानांराजा सोऽभवन्मणिः।
[पशवत्वारिंशो
* मत्स्यपुराणम् *
हृदिस्त्यातुबहुशो मणिन्तमभियाचितम् । गोविन्दोऽपिनतं लेभेशक्तोऽपिनजहारसः ॥
कदाचिन्मृगयां यातः प्रसेनस्तेन भूपितः । यथाशब्दं स शुश्राव विले सत्वेन पूरिते ॥
ततः प्रविश्य स विलं प्रसेनो ऋक्षमक्षत । ऋक्षः प्रसेनञ्च तथा ऋक्षं चैवप्रसेनजित् ॥
हत्वा ऋक्ष प्रसेनन्तु ततस्तं मणिमाददात् । अदृष्टस्तु हतस्तेन अन्तर्विलगतस्तदा १८
प्रसेनन्तु हतं ज्ञात्यागोविन्दःपरिशङ्कितः । गोविन्देन हतोव्यक्तप्रसेनोमणिकारणात् ॥
प्रसेनस्तु गतोऽरण्यं मणिरत्नेन भूषितः । तं दृष्ट्वा स हतस्तेन गोविन्दः प्रत्युवाच ह ॥
हन्मि चैनं दुराचारं शत्रुभूतं हि वृष्णिषु ॥ १० ॥
अथ दीर्घण कालेनमृगयांनिर्गतःपुनः । यदृच्छयाच गोविन्दोबिलस्याभ्यासमागमत् ॥
तं दृष्ट्वा तुमहाशब्दसचक्रेमक्षराट्यली । शब्दं श्रुत्वातु गोविन्दःखङ्गपाणि:प्रविश्यसः ।।
अपश्यज्जाम्बवन्तं तं अक्षराजं महावलम् ॥१२।।
ततस्तूर्ण हृषीकेशस्तमृक्षपतिमासा । जाम्बवन्तं स जग्राह क्रोध संरक्त लोचनः ॥ .
तुष्पाचनं तदा ऋक्षः कर्मभिर्वैष्णवैः प्रभुम् । ततस्तुष्टस्तु भगवान् वरेणैनमरोचयत् ॥
जाम्बवानुवाच
इच्छे चक्र प्रहारेणत्वत्तोऽहं मरणंप्रभो ! । कन्याचेयममशुभा भर्तारत्वामवाप्नुयात् ॥
योऽयं मणिः प्रसेनन्तु हत्या प्रातो मया प्रयो ॥१५॥
ततः सजाम्बवन्तं तं हत्वाचक्रणवै प्रभुः । कृतकर्मा महाबाहुः सकन्यं मणिमाहरत् ॥
ददौ सत्राजितायैनं सर्वसात्वदसंसदि । तेन मिथ्यापवादेन सन्तप्ता ये जनार्दने ॥१७॥
ततस्ते यादवाः सर्वे वासुदेवमधात्रुवन् । अरमाकन्तु मतियासीत्प्रसेनस्तुत्वयाहतः ॥
कैकेयस्य सुता भार्यादशसत्राजितः शुभाः। तासूत्पन्नाःसुतास्तस्य सर्वलोके विश्रुताः
ख्यातिमन्तो महावीर्या भट्टकारस्तु पूर्वजः ।। १६ ॥
सय बताती नाल्मात् भङ्गकारान्नु पूर्वजात । ग्लुएचे सुकुमारीस्तु लिमकाललोया
सत्यभामा घरास्त्रीणां व्रतिनीचढ़वता । तथा पद्मावतीचैवताश्च कृष्णायसोऽददात् ।।
अनमित्रात् शनिर्जशे कनिष्टाद् वृष्णिनन्दनात् ।
सत्यवांस्तम्य पुत्रस्तु सात्यकिस्तस्य चात्मनः ॥२२॥
ऽध्यायः] : * कृष्णोत्पत्तिवर्णनम् । सत्यवान्युयुधानम्तुशिनेमाप्रतापवान् । मसङ्गोयुयुधानस्याग्निस्तस्पात्मजोऽमयत्।। द्युम्नेयुगन्धरःपुत्रइतिशैन्याः प्रकीर्तिताः । अनमित्रान्वयोहोपन्याख्यातोवृष्णिवंशजः।। अनमित्रस्य संजो पृथ्यां वीरोयुधाजितः । अन्यौतु तनयो धीरौ वृषभः क्षत्रएव च!! वृषभः काशिराजस्य मुतां भार्यामविन्दत । जयन्तस्तु जयन्त्यान्तुपुत्रःसमभवच्छुमा सदा यनोऽति परिश्च श्रुतवानतिथिप्रियः । अरःसुपुवे तम्मात्सदायशोऽतिदक्षिणः ।। रता कन्याचशेन्यस्य अरस्तामवाप्तवान् । पुत्रानुत्पादयामास एकादशमहाबलान् । उपलम्भः सदालम्भो वृकलो धीर्यएवच । सिर्ग ततो महापक्षः शत्रुनोवारिमेजयः। धर्मभृद्धर्मवर्माणी धृष्टमानम्तथैव च । सर्वे च प्रतिहोतारो रतायांजजिरे व ते ३० अगनुग्रमेनायां सुनी हो कुलगईनी । देववानुपदेवश्च जमाने देवसग्निी ॥ ३६॥ अश्विन्यां च ततःपुत्राः पृथुविपृथुरेव च । अश्वत्थामा मुवाहश्च मुपायकगवेपों। वृष्टिनेमिः सुधर्मा च तथा शर्यतिरेवच । अभूमिभूमिश्च श्रमिष्टः श्रवणस्तथा ॥३॥ इमानिध्याभिशस्तियोयेदाणादपोहिताम्। नसमिथ्याभिशापनअभिशाप्योऽयमेनचित् इति श्रीमत्स्यपुराणे सोमयंशवर्णने स्यमन्तकारयानं नाम पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः । " भादिदेवस्तथा विष्णुरेभिस्तु सहदेवतः। किमर्थ सङ्घशोभूताःस्मृताःसम्भूतयः कति ॥ [सप्तचत्वारिंशो तेषामुत्सादनार्थाय उत्पन्नो यादवे कुले । कुलानां शतमेकञ्च यादधानां महात्मनाम् सर्वमेतत् कुलं यावद्वर्तते वैष्णवे कुले। विष्णुस्तेषां प्रणेता च प्रभुत्वे च व्यवस्थितः। सप्तर्षयः कुबेरश्च यक्षो माणिवरस्तथा । शालकिर्नारदश्चैव सिद्धोधन्वन्तरिस्तथा ।। * मत्स्यपुराणम् * रुक्मिणीसत्यभामावसत्यानानजितीतथा । सुभामाचतथाशैव्यागान्धारीलक्ष्मणा तथा मित्रचिन्दा चकालिन्दीदेवीजाम्बवतीतथा । सुशीलाचतथामाद्रीकौशल्याविजयातथा । एवमादीनि देवीनां सहस्राणि च पोड़श ॥१४॥ रुक्मिणी जनयामास पुत्र रणविशारदम् । चारुदेष्णं रणे शूरं प्रद्युम्नञ्च महावलम् ।।१५ सुचारं भद्रचारं च सुदेष्णं भद्रमेव च । परशुचारु गुप्तञ्च चारु भद्रं सुचारुकम् । चारुहासं कनिष्ठञ्च कन्यां चास्मती तथा ॥१६॥ जज्ञिरे सत्यभामायां भानुभ्रमरतेक्षणः । रोहितोदीप्तिमांश्चैव ताम्रश्चको जलन्धमः ॥ चतस्रोजशिरेतेपास्चसारस्तुयवीयसीः । जाम्बवत्याःसुतोजज्ञेसाम्यःसमिति शोभनः॥ मित्रवामित्रविन्दश्चमित्रविन्दावसङ्गना । मित्रवाहुःसुनीथश्चनानजित्या:प्रजाहिसा ॥ एवमादीनि पुत्राणां सहस्त्राणि निवोधत । अशीतिश्च सहस्राणिवासुदेव सुतास्तथा ।। लक्षमेकं तथा प्रोक्तं पुत्राणाञ्च द्विजोत्तमाः ॥२०॥ उपासनस्य तु सुतौ वज्रः संक्षिप्त एव च । भूरीन्द्रसेनो भूरिश्च गवेषण सुतावुभौ ॥ प्रद्युम्नस्य तु दायादो वैदा धुद्धिसत्तमः । अनिरुद्धो रणे रुद्धः जज्ञेऽस्यमृगकेतनः ॥ काश्या सुपार्श्वतनयासाम्बाल्लेभेतरस्विनः । सत्यप्रकृतयोदेवा पञ्चवीराःप्रकीर्तिताः ॥ तिनः कोट्यः प्रवीराणां यादवानां महात्मनाम् । पष्टिः शतसहस्राणि वीर्यवन्तो महाबलाः । देवांशाः सर्व एवेह उत्पन्नास्ते महौजसः ॥२४॥ देवासुरे हता ये च असुरा ये महावला: । इहोत्पन्ना मनुष्येषु वाधन्ते सर्वमान्वान् ॥ निदेशस्थायिनस्तस्य कथ्यन्ते सर्चयादवाः ॥२७॥ ऋपय ऊचुः।
ऽध्यायः] * पृथिव्यां भगवदवतारकारणकथनम् * भविष्याः कतिवैवान्ये प्रादुर्भावा महात्मनः । ब्रह्मक्षत्रेषु शान्तेषु किमर्थमिह जायते॥ यदर्थमिह सम्भूतो विष्णु प्ण्यन्धकोत्तमः । पुनः पुनर्मनुप्येषु तन्नःप्रयूहि पृच्छताम् ।। सूत उवाच । त्यज्य दिव्यान्तनुं विष्णुर्मानुपेयिह जायते । युगेत्वथ परावृत्ते काले प्रशिथिलेप्रभुः ॥ देवासुरविमर्देषु जायते हरिरीश्वरः । हिरण्यकशिपो दैत्ये त्रैलोक्यं प्राकप्रशासति ॥ वलिनाधिष्ठिते चैव पुरा लोकत्रये कमात् । सस्यमासीत्परमकं देवानामसुरैः सह ।३४ युगाल्यासुरसंपूर्णासीदत्याकुलंजगत् । निदेशस्थायिनश्चापितयोर्देवासुराः समम् ।। मृधो बलिविमर्दाय संप्रवृद्धः सुदारुणः । देवानामसुराणां च घोरः क्षयकरोमहान् ।। फतुं धर्मव्यवस्थानं जायते मानुपेप्विह । भृगोः शापनिमित्तन्तु देवासुरकृते तदा ॥ मुनय ऊचुः। कथं देवासुरकृते व्यापार प्राप्तवान् स्वतः । देवासुरंयथावृत्तन्तानःप्रदूहि पृच्छताम् ॥ सूत उवाच तेषां दाय निमित्तं ते संग्रामास्तुसुदारुणाः । वराहावादशहीचशण्डामर्कान्तरे स्मृताः॥ नामतस्तु समालेन शृणुतेषां विवक्षतः । प्रथमो नारसिंहस्तुद्वितीयश्चापि घामनः ॥४० तृतीयस्तु घराहश्च चतुर्थोऽमृतमन्थनः । संग्रामः पञ्चमश्चैच सञ्जातस्तारकामयः ॥४१॥ पष्ठोह्याडीवकास्यस्तु सप्तमस्त्रपुरस्तथा । अन्धकाख्योऽष्टमस्तेपानवमोवृत्रघातकः ॥ धात्रश्च दशमश्चैव ततोहालाहल स्मृतः । प्रथितो द्वादशस्तेषां घोरकोलाहलस्तथा । हिरण्यकशिपुदैत्यो नारसिंहेन पातितः । चामनेन धलिबद्धस्त्रैलोक्याक्रमणे पुरा ॥४४॥ हिरण्याक्षो हतोद्वन्द्वे प्रतिघाते तुदैवतैः । दंष्ट्रयातु वराहेण समुदस्तु द्विधाकृतः ॥४५|| प्रह्लादो निर्जितो युद्धे इन्द्रेणामृतमन्थने । विरोचनस्तु प्राहादिनित्यमिन्द्रवधोद्यतः ।। इन्द्रेणैव तु विक्रम्य निहतस्तारकामये । अशक्नुवन् स देवानां सर्व सोढुं सदैवतम् ॥ निहताः दानवाः सर्वत्रलोक्येन्यस्यकेणतु । असुराश्च पिशाचाश्च दानवाश्चान्धकाहते। हता देवमनुप्ये स्वे पितृभिश्चैव सर्वशः । संपृक्तो दानवैर्वृतो धोरो हालाहले हत्तः ॥
* मत्स्यपुराणम् ** [पट्चत्वारिंशी अथ सख्येन वृद्धेऽसौ कुन्तिभोजेसुतांददौ । एवंकुन्तीसमास्यातावसुदेवस्चसा पृथा। पसुदेवेन सा दत्ता पाण्डोर्भार्याह्यनिन्दिता । पाण्डोरर्थेनसाजशे देवपुत्रान्महारथान् ॥ धर्माधुधिष्ठिरो जशे बायोर्जशे वृकोदरः । इन्द्राधनञ्जयश्चैव शकतुल्य पराक्रमः ! माद्रवत्यान्तु जनितावश्विभ्यामिति शुश्रुमः । नकुलः सहदेवश्च रूपशीलगुणान्वितौ ॥ रोहिणी पौरवी सा तु ख्यातमानकदुन्दुभेः। लेभेज्येष्टंसुतरामसारणञ्चसुतं प्रियम् ॥ दुर्दमं दमनं सुव्र पिण्डारक महाहनू । चित्राक्ष्यो वे कुमायाँ तु रोहिण्यांजशिरेतदा देवमा जज्ञिरे शोरेः सुपेणः कीर्तिमानपि । उदासी भद्रसेनश्च ऋपिवासस्तथैव च । पष्टो भद्र विदेहश्च कंसः सर्वानघातयत् ॥१३॥ प्रथमाया अमावास्या वार्षिकी तु भविष्यति । तस्यां जज्ञे महाबाहु.पूर्वकृष्णःप्रजापतिः अनुजात्य भवत् कृष्णात् सुभद्राभद्रभापिणी । देवक्यान्तु महातेजाजज्ञेशूरोमहायशाः सहदेवस्तु तानायां जज्ञे शोरिकुलोद्वहः । उपासङ्गधरं लेभे तनयं देवरक्षिता । एका कन्याञ्च सुभगाइंसस्तामभ्यघातयत् ॥१६॥ विजयं रोचमानश्च बर्द्धमानन्तु देवलम् । एते सर्वे महात्मानो पदेव्याः प्रजज्ञिरे ।१७॥ अवगाहो महात्मा च वृकदेव्यामजायत । वृकदेव्यां स्वयं जज्ञे नन्दको नामनामतः ॥ सप्तमं देवकी पुत्रं मदनं सुपुवे नृप । गवेपणं महाभागं संग्रामेष्व पराजितम् ॥१६॥ श्रद्धा देव्या विहारे तु वने हि विचरनपुरा । वैश्यायामदधात् शोरिःपुत्रंकोशिकमग्रजम् सुतनूरथराजी व शौरेरास्तां परिग्रहो । पुण्द्रश्च कपिलश्चैव वसुदेवात्मजो चली। जरानाम निपादोऽभूत् प्रथमः स धनुर्धरः । सौभद्रश्च भवश्चैव महासत्वौ बभूवतुः ॥ देवभागसुतश्चापि नाम्नाऽसाबुद्धवः स्मृतः । पण्डितं प्रथम प्राहुर्देवश्रवः समुद्भवम् ।। ऐक्ष्वाक्यलभतापत्य अनाधृष्टेर्यशस्विनी । निधूतसत्वं शत्रुघ्नं श्राद्धस्तस्मादजायत करूपायानपत्याय कृष्णस्तुष्टः सुतन्ददौ । सुचन्द्रन्तु महाभागं वीर्यवन्तं महावलम् जाम्यवत्याः मुतावेतौ हौ च सत्कृतलक्षणौ। चारुदेष्णश्च साम्यश्ववीर्यवन्ती महावर तन्तिपालश्च तन्तिय नन्दनस्य सुतावुभौ । शमीकपुत्राश्चत्वारो विक्रान्ता:सुमहा ॥ विराजश्च धनुश्चैव श्याम्यश्च सृञ्जयस्तथा ॥२७॥ - ।
ऽध्यायः] * कृष्णसन्तानवर्णनम् * अनपत्योऽभवच्छयामःशमीकस्तुवनययौ । जुगुप्समानोभोजत्वं राजपित्वमवाप्तवान् कृष्णास्य जन्माभ्युदयं य कीर्तयतिनित्यशः । शृणोति मानवोनित्यंसर्वपापैः प्रमुच्यते इति श्रीमत्स्यपुगणे सोमवंशे कृष्णोत्पत्तिवर्णनं नाम पट्चत्वारिंशोऽध्याय । सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः कृष्णसन्तानवर्णनम् । सूत उवाच। अथ देवो महादेव पूर्व कृष्ण प्रजापति । विहाराथं स देवेशो मानुपेप्विह जायते ॥ • देवयां वसुदेवस्य तपसा पुष्करेक्षण' । चतुटुस्तदा जातोदिव्यरूपोज्वलनश्रिया ॥ श्रीवत्सलक्षणं देवं दृष्ट्वा दिव्यैश्च लक्षण । उवाच वसुदेवस्तं रूपं संहर चै प्रभो ॥३॥ भीतोऽहं देव ! कंसस्य ततस्त्वेतद्ब्रवीमि ते । ममपुत्राहतास्तेनज्येष्टास्तेभीमविस्मा' यसुदेवयवः श्रुत्वा रूपं सहरतेऽच्युत । अनुज्ञाप्य ततः शोरि नन्दगोपगृहेऽनयत् ॥५ दत्वैनं नन्दगोपस्य रक्ष्यतामिति चानचीत् । अतस्तु सर्वकरयाणयादवानाभविष्यति। मुनय ऊचुः। क एप घमुदेवस्तु देवकी व यशस्विनी । नन्दगोपश्च कस्त्वेप यशोदा च महाव्रता ॥ यो विष्णुं जनयामास यञ्च तातेत्यभाषत । या गर्भ जनयामास याचैनं त्वभ्यवर्द्धयत्॥ सूत उवाच । पुरुष कश्यपस्त्वासीददितिस्तु प्रिया स्मृता। ब्रह्मण कश्यपस्त्वाश पृथिव्यास्त्यदितिस्तथा ॥६॥ कामान् महाबाहुर्देचक्या समपूरयत् । ते तया काशितानित्यमजातस्यमहात्मन जीर्णो महीं देव प्रविष्टो मानुषीतनुम् । मोहयन्सर्पभूतानियोगात्मा योगमायया धर्म तथा जज्ञे विष्णुणिले प्रभु । कर्नु धर्मस्य सस्थानंभमुराणांप्रणाशनम् * मत्स्यपुराणम् * , [सप्तचत्वारिंशो रुक्मिणीसत्यभामाचसत्यानाप्नजितीतथा। सुभामाचतथाशैन्यागान्धारीलक्ष्मणा तथा मित्रविन्दा चकालिन्दीदेवीजाम्बवतीतथा । सुशीलावतयामाद्रीकौशल्याविजयातथा एवमादीनि देवीनां सहस्राणि च पोड़श ॥१४॥ रुक्मिणी जनयामास पुत्रं रणविशारदम् । चारुदेणं रणे शूरं प्रद्युम्नञ्च महायलम् ॥१५ सुवारं भद्रवार व सुदेष्णं भद्रमेव च । परशुचारु गुप्तच वारु भद्रं सुचारुकम् । चारुहासं कनिष्ठश्च कन्यां चास्मती तथा ॥१६॥ जज्ञिरे सत्यभामायां भानुर्धमरतेक्षणः। रोहितोदीप्तिमांश्चैव ताम्नश्चको जलन्धमः ॥ चतस्रोजशिरतेपास्चसारस्तुयवीयसीः । जाम्ववत्याःसुतोजज्ञेसान्यासमिति शोभनः। मित्रवामित्रविन्दश्चमित्रविन्दावसङ्घना। मित्रवाहुःसुनीथश्चनागजित्याःप्रजाहिसा ॥ एवमादीनि पुत्राणां सहस्राणि नियोधत । अशीतिश्च सहस्राणिवासुदेव सुतास्तथा ॥ लक्षमेकं तथा प्रोक्तं पुत्राणाञ्च द्विजोत्तमाः ॥२०॥ उपासङ्गस्य तु सुतो वज्रः संक्षिप्त एव च । भूरीन्द्रसेनो भूरिश्च गवेपण सुतावुभौ ॥ प्रद्युम्नस्य तु दायादो वैदा बुद्धिसत्तमः । अनिरुद्धो रणे रद्धः जज्ञेऽस्यमृगकेतनः ॥ काश्या सुपार्श्वतनयासाम्वाल्लेभेतरस्विनः । सत्यप्रकृतयोदेवा पञ्चवीराःप्रकीर्तिताः ॥ तिनः कोट्यः प्रचीराणां यादचानां महात्मनाम् । पष्टिः शतसहस्राणि वीर्यवन्तो महाबलाः । देवांशाः सर्व एवेह उत्पन्नास्ते महौजसः ॥२४॥ देवासुरे हता ये च असुरा ये महाबलाः । इहोत्पन्ना मनुष्येषु बाधन्ते सर्वमानवान् ॥ तेषामुत्सादनार्थाय उत्पन्नो यादवे कुले । कुलानां शतमेकञ्च यादयानां महात्मनाम् सर्वमेतत् कुलं यावद्वर्तते वैष्णवे कुले। विष्णुस्तेषां प्रणेता व प्रभुत्वे च व्यवस्थितः । निदेशस्थायिनस्तस्य कथ्यन्ते सर्वयादवाः ॥२७॥ अपय ऊचुः। सप्तर्षयः कुवेरश्च यक्षो माणिवरस्तथा । शालकिर्नारदश्वैव सिद्धोधन्वन्तरिस्तथा । आदिदेवस्तथा विष्णुरेभिस्तु सहदैवतैः। किमर्थ सङ्घशोभूताःस्मृताःसम्भूतयः कति ।।
ऽध्यायः] * पृथिव्यां भगवदवतारकारणकथनम् * भविष्याः कतिचैवान्ये प्रादुर्भावा महात्मनः । ब्रह्मक्षत्रेषु शान्तेषु किमर्थमिह जायते ॥ यदर्थमिह सम्भूतो विष्णुर्वृष्ण्यन्धकोत्तमः । पुनः पुनर्मनुप्येषु तन्नःप्रयूहि पृच्छताम् ।। सूत उवाच। त्यज्य दिव्यान्तनुं विष्णुर्मानुषेविह जायते । युगेत्वथ परावृत्ते काले प्रशिथिलेप्रभुः ॥ देवासुरविमर्देषु जायते हरिरीश्वरः । हिरण्यकशिपो दैत्ये त्रैलोक्यं प्राक्प्रशासति ॥ वलिनाधिष्टिते चैव पुरालोकत्रये क्रमात् । सत्यमासीत्परमकं देवानामसुरैः सह ॥३४ युगाख्यासुरसंपूर्णह्यासीदत्याकुलंजगत् । निदेशस्थायिनश्चापितयोर्देवासुराः समम् ॥ मृधो बलिविमर्दाय संप्रवृद्धः सुदारुणः । देवानामसुराणां च घोरः क्षयकरोमहान् ॥ क धर्मव्यवस्थानं जायते मानुपेप्विह । भृगोः शापनिमित्तन्तु देवासुरकृते तदा ।। मुनय ऊचुः। कथं देवासुरकृते व्यापार प्राप्तवान् स्वतः । देवासुरंयथावृत्तन्तन्न प्रयूहि पृच्छताम् ।। सत उवाच। तेषां दायनिमित्तं ते संग्रामास्तुसुदारुणाः । वराहावादशीवशण्डामर्कान्तरे स्मृताः। नामतस्तु समासेन शृणुतैषां विवक्षतः । प्रथमो नारसिंहस्तुद्वितीयश्चापि वामनः ॥४० तृतीयस्तु घराहश्च चतुर्थोऽमृतमन्थन । संग्रामः पञ्चमश्चैव सजातस्तारकामयः ॥ ४१॥ षष्ठोह्याडीवकाख्यस्तु सप्तमस्त्रपुरस्तथा । अन्धकाण्योऽष्टमस्तेपानवमोवृत्रघातकः ॥ धात्रश्च दशमश्चय ततोहालाहल स्मृतः । प्रथितो द्वादशस्तेषां घोर:कोलाहलस्तथा ।। हिरण्यकशिपुर्दैत्यो नारसिंहेन पातितः । वामनेन वलिर्वद्धस्त्रैलोक्याक्रमणे पुरा ॥४४॥ हिरण्याक्षो हतोद्वन्द्वे प्रतिघाते तुदेवतैः । दंष्ट्रयातु वराहेण समुद्रस्तु द्विधारतः ॥४५॥ प्रहादो निर्जितो युद्धे इन्द्रेणामृतमन्थने । विरोचनस्तु प्राहादिनिन्यमिन्द्रवधोद्यतः ॥ इन्द्रेणैव तु विक्रम्य निहतस्तारकामये । अशक्नुवन् स देवानां सर्व सोढुं सदैवतम् ॥ निहताः दानवाः सर्वत्रलोक्येभ्यम्बकेणतु । असुराश्च पिशाचाश्च दानवाश्चान्धकाइते ॥ हता देवमनुष्ये स्वे पितृभिश्चैव सर्वशः । संपृक्तो दानयंत्रो घोरो हालाहले हतः ॥
[सप्तचत्वारिंशो - ॥ * मत्स्यपुराणम् * तदा विष्णुसहायेन महेन्द्रेण निवर्तितः । हतोध्वजे महेन्द्रेण मायाच्छन्नस्तु योगचित् ॥ ध्वजलक्षणमाविश्य विप्रवित्तिः सहानुजः ॥ ५० ॥ दैत्यांश्च दानवांश्चैवसंयतान्किलसंयुतान् । जयन् कोलाहलेसर्वान्देवैःपरवृतोवृषा || यज्ञस्यावभृथे दृश्यो शण्डामको तु देवतैः ॥५१॥ एते देवासुरे वृत्ताः संग्रामा द्वादशैव तु । देवासुरक्षयकराः प्रजानान्तु हिताय वै॥५२ हिरण्यकशिपू राजा वर्षाणामधूदं वभौ । द्विसप्तति तथाऽन्यानि नियुतान्यधिकानिय अशीतिञ्च सहस्राणि त्रैलोक्यैश्वर्यताङ्गतः ।। ५३ ।। पर्यायेण तु राजाऽभूवलियर्पायुतं पुनः । पष्टिवर्पसहस्राणि नियुतानिच विंशतिः ।५४ वले राज्याधिकारस्तु यावत्कालं बभूवह । तावत्कालन्तु प्रहादो निवृत्तोह्यसुरैःसह ॥ इन्द्रास्त्रयस्ते विज्ञेया असुराणां महौजसः । दैत्यसंस्थमिदं सर्वमासीद्दशयुगं पुनः त्रैलोक्यमिदमव्यग्रं महेन्द्रेणानुपाल्यते । असपत्नमिदंसर्वमासीद्दशयुगं पुनः ।। ५७ ॥ प्रहादस्य हते तस्मिन् त्रैलोक्येकालपर्ययात् । पर्यायेणतुसंप्राप्तेत्रैलोक्यंपाकशासने" ततोऽसुरान् परित्यज्य शुक्रो देवा न गच्छत ॥ ५८ ॥ यज्ञे देवानधगतान्दितिजाकाव्यमायन् । कित्वंनो मिपतां राज्यंत्यक्त्वायज्ञपुनर्गतः ॥ स्थातुंनशक्नुमोह्यत्रप्रविशामोरसातलम् । एवमुक्कोऽब्रवीदैत्यान्विपण्णासान्त्वयगिरा माभैष्ट धारयिष्यामितेजसास्वेनवोऽसुराः । मन्त्राश्चैवोपधींश्चैवरसांवसुचयत्परम् ॥ कृत्स्नानि मयि तिष्ठन्ति पादस्तेषां सुरेषु वै । तत्सर्वचःप्रदास्यामि युष्मदर्थेधृतामया ॥ ततो देवास्तु तान् दृष्ट्वा वृतान्काव्येनधीमता । संमन्त्रयन्तिदेवावै संविज्ञास्तुजिघृक्षया काव्योह्येपइदंसर्वव्यावर्तयति नो वलात् । साधुगच्छामहेतूर्ण यावन्नाध्यापयिष्यति ॥ प्रसह्य हत्वा शिष्टांस्तु पातालं प्रापयामहे । ततो देवास्तु संरब्धा दानवानुपरमृत्यह ॥ ततस्ते वध्यमानस्तु काव्यमेवाभिदुद्रुवुः । ततः काव्यस्तुतान्दृष्ट्वा तूर्णं देवैरभिद्रुतान् ॥ रक्षा काव्येनसंहृत्यदेवास्तेऽप्यसुरार्दिताः । काव्यं दृष्ट्वास्थितंदेवानिःशङ्कमसुरााहुः ॥ ततः काव्योऽनुचिन्त्यायत्राह्मणोवचनंहितम् । तानुवाचततःकाव्यापूर्ववृत्तमनुस्मरन् ।। त्रैलोक्यं यो हृतं सर्वं पामनेन त्रिभिः क्रमैः । वलिर्वद्धो हतोजम्भो निहतश्चविरोचनः
ऽध्यायः]
* शुक्रकृततपश्चर्याकथनम् *
महासुरा द्वादशसु संग्रामेषु सुरैर्हताः । तेस्तैरुपायभूयिष्ठं निहता वः प्रधानतः ॥७०॥
किञ्चिच्छिष्टास्तु यूयं चै युद्धं मास्त्विति मे मतम् ।
नीतयो वोऽभिधास्यामि तिष्ठत्वं कालपर्ययात् ।।७।।
यास्याम्यहमहादेवमन्त्रार्थविजयावहम् । अप्रतीपस्तितोमन्त्रान्देवात्प्राप्यमहेश्वरात् ॥
युध्यामहे पुनर्देवांस्ततः प्राप्स्यथ वै जयम् ॥७३॥
ततस्ते कृतसंवादा देवानूचुस्तदासुराः । न्यस्तशस्त्रा वयंसर्वे नि सन्नाहा रथैर्विना ।।
ययं तपश्चरिष्यामः संवृता वल्कलैने । प्रह्लादस्य वचः श्रुत्वासत्याभिव्याहृतन्तुतत् ।।
ततो देवान्यवर्तन्त विञ्चरामुदिताश्च ते । न्यस्तशस्त्रेषु दैत्येषुविनिवृत्तास्नदासुराः ॥
ततस्तानप्रवीत् काव्यः कश्चित्कालमुपास्यथ ।
निरुत्सित्तास्तपोयुक्ताः कालं कार्यार्थसाधकम् ।।१६।।
पितुर्मर्माश्रमस्था चै मां प्रतीक्षथ दानवाः । तत्संदिश्यामुगन्काव्योमहादेवंप्रपद्यत ॥
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शुक्र उवाच
मन्त्रानिच्छाम्यहं देव ! येन सन्ति वृहस्पती । पराभवाय देवानामतुराणांजयाय वा
एवमुक्तोऽब्रवीद देवोवतं त्वञ्चर भार्गव ! 1 पूर्ण घर्पसहनं तु कणधृममया शिराः ॥
यदि पास्यसि भद्र से ततो मन्त्रानवाप्स्यसि ||७||
तथेतिसमनुज्ञाप्य शुक्रस्तु भृगुनन्दनः । पादौ संस्पृश्य देवस्य वादमित्यत्रीद्वचः ॥
चतं चराम्यहं देव ! त्वयाऽऽदियोऽद्य चै प्रभो ! ॥८॥
नतोऽनुसृष्टो देवेन कुण्डधारोऽस्य धूमकन् । तदातस्मिन्गतेशुक्र ह्यगणांहितायये ।।
मन्त्रार्थ तत्र वसति ब्रह्मवयं महेश्वर ।।८।।
तयुयानीतिपूर्वतुराज्येन्यस्तेतदासुरैः। अस्मिच्छिद्रेतटामाद्देवास्तान्समुपाद्रयन् ॥
दंशिताः सायुधाः सर्वे बृहस्पतिपुरःसरा. १८३||
। दृाऽसुरगणादेवानप्रगृहीतायुधान पुनः उन्पेनुःसहमातेवैसरनाम्मानयचोऽब्रुवन ।
न्यस्ने शस्त्रभये दत्ते आचार्य व्रतमास्थिते ।
दत्त्वा भवन्तो हाभयं संप्राप्ता नो जिघांसया ॥ ८५ ॥
[सप्तवत्वारिंशा * मत्स्यपुराणम् अनाचार्यावयदेवा स्त्यक्तशस्त्रस्त्ववस्थिता । चीरकृष्णाजिनधरानिष्कियानिष्परिग्रहा रणे विजेतु देवाश्च न शक्ष्याम कथञ्चन । अयुद्धेन प्रपत्स्याम शरणं काव्यमातरम् । यापयाम कृच्छ्रमिद यावदभ्येति नो गुरु । निवृत्तेच तथाशुक्रे योत्स्यामोदशितायुधा एवमुक्त्वा सुराऽन्योन्य शरण काव्यमातरम् । प्रापद्यन्त ततो भीतास्तेभ्योऽदादभयन्तु सा ॥ ८६ ॥ न भेत्तव्य न भेत्तव्य भयन्त्यजत । दानवा । मत्सन्निधौ चर्तता को न भीर्भवितुमर्हति तयाचाभ्युपपन्नास्तान् दृष्ट्वा देवास्ततोऽसुरान् । अभिजग्मु प्रसौतान विचार्यबलाबलम् । ततस्तान वाध्यमानास्तुदेवैर्द्व ट्वासुरास्तदा । देवी क्रुद्धाऽब्रवीद्देवाननिन्द्रान्व करोम्यहम्। सभृत्य सर्वसम्भारानिन्द्र साभ्यचरत्तदा । तस्तम्भ देवी चलवद्योगयुक्ता तपोधना ।। ततस्त स्तम्भित दृष्ट्वा इन्द्र देवाश्च मूकवत् । प्राद्रवन्त ततोभीता इन्द्र दृष्ट्वा वशीकृतम् । गतेषु सुरसड्वेषु शक विष्णुरभाषत । मा त्व प्रविश भद्ते नयिष्येत्वा सुरोत्तम 10 एवमुक्तस्ततो विष्णु प्रविवेश पुरन्दर । विष्णुना रक्षितदृष्ट्वा देवी क्रुद्धा वचोऽब्रवीत्। एपा त्वा विष्णुना सार्धन्दहामि मघवन् । बलात् । मिपता सर्वभूताना दृश्यता मे तपोवलम् ॥ १७ ॥ दयाऽभिभूतौ तो देवाविन्द्रविष्णू बभूवतु । कथ मुच्येऽचसहितौ विष्णुरिन्द्रमभाषत। इन्द्रोऽब्रवीजहि ह्येना यावन्नी न दहेत् प्रभो ।। विशेषेणाभिभूतोऽस्मि त्वत्तोऽहजहि मा चिरम् ॥ ६६ ॥ तत समीक्ष्य विष्णुस्ता स्त्रीवधे कच्छमास्थित । अभिन्याय ततश्चक्रमापदुद्धरणेतुतत् । ततस्तु त्वरया युक्त शीघ्रकारी भयान्वित । ज्ञात्वा विष्णुस्ततस्तस्या क्रूरन्देव्याश्चिकीर्पितम् ।। क्रुद्ध स्वमस्नमादाय शिरश्चिच्छेद वै भिया ॥ १०१ ॥ त दृष्ट्वा स्त्रीवधघोर चुक्रोध भृगुरीश्वर । ततोऽभिशप्तो भृगुणा विष्णुर्भार्यावधेतदा। यस्माते जानतो धर्ममय या स्त्री निपूदिता । तस्मात्व सप्तरत्वेह मानुपेपूपपत्स्यसि। ततस्तेनाभिशापेन नऐ धर्मे पुन पुन । रोक्स्यच हितार्थाय जायते मानुपेप्चिह ॥१०४ - ऽध्यायः] है. इन्द्रेणस्यकन्यायाजयन्त्या शुक्रसमीपेसेवार्थप्रेषणम् * अनुव्याहृत्य विष्णुस तदादाय शिरस्त्वरन् । समानीयततः कायमसौ गृह्येदमब्रवीत्। एपात्वं विष्णुनादेवि हतासीवयाम्यहम् । ततस्तायोज्यशिरसाअभिजीवेतिसोऽब्रवीत् यदि कृत्स्नोमया धमोज्ञायते चरितोऽपिवा । तेन सत्येन जीवस्चयदि सत्यं वदाम्यहम् सतस्तांप्रोक्ष्यशीताभिरद्विज वेतिसोऽब्रवीत्। ततोऽभिव्याहृतेतम्यदेवीसञ्जीवितातदा ॥ ततस्तां सर्वभूतानिदृष्ट्वा सुप्नोत्थितामिव । साधु साविति चकुस्तेवचसा सर्वतोदिशम् एवं प्रत्याहृता तेन देवीसा भृगुणातदा । मिषतां देवतानां हि तदद्भुतमिवाभवत् ॥११० असंभ्रान्तेन भृगुणा पत्नी सञ्जीविता पुनः । दृष्ट्वा चेन्द्रो मालमतशर्म काव्यभयात् पुनः। प्रजागरे ततश्चेन्द्रो जयन्तीमिदमत्रवीत् ॥ १११ ।। सञ्चिन्त्यमतिमान्याक्यंस्तांकन्यांपाकशासनः। एपकाव्योह्यमित्रायत्रतञ्चरतिदारणम् ।। तेनाहं व्याकुल पुत्रि कृतो मतिमताभृशम् ॥ ११ ॥ । गच्छ संसाधयस्वैनं धमापनयन. शुभैः । तेस्तैर्मनोऽनुकृलश्च [पचारैरतन्द्रिता ॥११३ काव्यमाराधयस्वैनं यथा तुप्येत स द्विजः । गच्छ त्वं तस्य दत्तासि प्रयत्नंकुस्मते एवमुक्तता जयन्ती सावचः संगृह्य वै पितुः । अगच्छयत्र घोरं स तप आरभ्यतिष्ठति नंदृष्ट्वा तु पिबन्तंसा कणधृममवाड्मुखम् । यक्षेण पात्यमानञ्चकुण्डधारेण पातितम् ॥ दृष्ट्वाच तं पात्यमानं देवी काव्यमवस्थितम् । स्वम्पयानशाम्यन्नं दुर्वल भूतिमास्थिदम् । पित्रा यथोक्तं वाक्यं सा काव्ये कृतवती तदा ॥ १७ ॥ गाभिश्चैवानुकूलाभि स्तुवतीवल्गुभाषिणी । गात्रसंवाहने.कालेसेवमानात्वचःसुखैः ।। प्रतवानुकलाभिरवास बहुलाः समा. ॥ ११८ ॥ पूर्ण धूमवते तस्मिन् घोरे वर्षसहस्रके । वरेण च्छन्दयामास काव्य प्रीतो भवस्तदा ॥ महादेव उवाच । एतदुक्तं त्वयकेन वीणं नान्येन केनचिम् । तस्माद्वै तपसा बुद्धया श्रुतेनच बलेन च ॥ तेजसावसुरान्सर्यास्त्वमेकोऽभिभविष्यसि यचाभिलषितंग्रह्मन् ! विद्यतेभृगुनन्दन!। प्रपत्स्यसेतुतत्सर्वनानुवाच्यंतुकस्यचित् । सर्वाभिभावी तेनत्वं भविष्यसिद्विजोत्तम! एतान्दत्त्वा वरांस्तस्मै भार्गवाय भवः पुनः । मजेशत्वं धनेशत्वमवध्यत्वञ्च वै ददौ ।
[सप्तचत्वारिंशो ११८ * मत्स्यपुराणम् * एतान् लब्ध्वा धरान् काव्यःसम्प्रहएतनूरुहः । हर्षात् प्रादुर्भवन्तन्तु दिव्यस्तोत्रंमहेश्वरम् तथा तिर्यस्थितश्चैव तुष्टुवे नीललोहितम् ॥ १२४ ॥ शुक्र उवाच। नमोऽस्तुशितिकण्ठाय कनिष्ठायसुवर्चसे । लेलिहानाय काव्याय वत्सरायान्धसःपते कपर्दिने करालाय हर्यक्ष्णे वरदाय च । संस्तुताय सुतीर्थाय देवदेवाय रंहसे ॥१२६॥ उष्णीपिणे सुवक्त्राय बहुरूपाय वेधसे । पसुरेताय रुद्राय तपसे चित्रवाससे ॥१२७।। ह्रस्वाय मुक्तकेशाय सेनान्य रोहिताय च । कवये राजवृक्षाय तक्षकक्रीडनाय च ॥ सहस्रशिरसे चैव सहस्राक्षाय मीढुषे । घराय भव्यरूपाय श्वेताय पुरुषाय च ॥१२६॥ • गरिशाय नमोऽर्काय बलिने आज्यपाय च । सुतृप्ताय सुवस्त्राय धन्विने भार्गवाय व निपङ्गिणे च ताराय स्वक्षाय क्षपणाय च । ताम्रायचैव भीमाय उग्राय च शिवाय च महादेवाय शर्वाय विश्वरूपशिवाय च । हिरण्याय वरिष्टाय ज्येष्ठाय मध्यमाय च पास्तोपते पिनाकाय मुक्तये केवलाय च । मृगव्याधाय दक्षाय स्थाणचे भाषणाय च बहुनेत्राय धुर्य्याय त्रिनेत्रायेश्वराय च । कपालिने च वीराय मृत्यवे व्यस्वकाय च ॥ पभ्रवे व पिशङ्गाय पिङ्गलायारुणाय च । पिनाकिने चेषुमते चित्राय रोहिताय च ॥ दुन्दुभ्यायैकपादाय अजाय बुद्धिदाय च । आरपयापा गृहस्थाय यतये ब्रह्मवारिणे ॥ सावयाय चैव योगाय व्यापिने दीक्षिताय च । अनाहताय शाय भव्येशाय यमायच रोधसे चेकितानाय ब्रह्मिष्ठाय महर्षये । चतुष्पदाय मेध्याय रक्षिणे शीघ्रगाय च ॥ शिखण्डिने करालाय दंनिणे विश्ववेधसे । भास्वराय प्रतीताय सुदीप्ताय सुमेधसे । क्रूरायाचिकृतायैच भीषणाय शिवाय च । सौम्याय चैव मुस्याय धार्मिकाय शुभायच अवध्यायामृतायैच नित्याय शाश्वताय च । व्यापृताय विशिष्टाय भरताय च साक्षिणे क्षेम्याय सहमानाय सत्याय चामृताय च ! कत्रे परशवे चैव शूलिने दिव्यचक्षुपे ॥ सोमपायाज्यपायैव धूमपायोप्मपाय च । शुचये परिधानाय सद्योजाताय मृत्यवे ।। पिशिताशाय साय मेघाय विद्युताय च । व्यावृत्ताय वरिष्ठाय भरितायतरक्षये ॥ उसाय तीर्थायावक्राय रोमशाय च । तिग्मायुधाय व्याख्याय मुसिद्धाय पुलस्तये ऽध्याय ] * शुक्रकृतशिवस्तुतिवर्णनम् * रोवमानाय चण्डाय स्फीताय ऋषभायच । तिने युञ्जमानाय शुचये चोर्ध्वरेतसे ॥ असुनाय स्थानाय मृत्युम्ने यज्ञियाय च । कृशानवे प्रचेताय वह्नये निर्मलाय व १४७ रक्षोनाय पशुमायाविनाय श्वसिताय च । विभ्रान्ताय महान्ताय अत्यन्त दुर्गमाय च। कृष्णाय च जयन्ताय लोकानामीश्वराय च । अनाधिताय वेश्याय समत्वाधिष्ठितायव हिरण्यवाहवे चैव व्याप्ताय च महाय च । सुकर्मणे प्रसह्याय चेशानाय सुचक्षुषे । क्षिप्रेषये सदश्वाय शिवाय मोक्षदाय च । कपिलाय पिशङ्काय महादेवाय धीमते॥ महाकायाय दीप्ताय रोदनाय सहाय च । दधन्विने कवचिने रथिने च वरूथिने ॥ भृगुनाथाय शुक्राय गह्वरिष्ठाय वेधसे । अमोघाय प्रशान्ताय सुमेधाय वृषाय च ॥ नमोऽस्तु तुभ्य भगवन् । विश्वाय कृत्तिवाससे । पशना पतये तुभ्य भूतनापतये नम प्रणवे ऋग्यजु साम्नेस्वाहायचस्वधाय च । वषट्कारात्मने चैव तुभ्य मन्त्रात्मनेनम 'त्वष्ट्र धात्रे तथा कर्ने चशु श्रोत्रमयाय च । भूतभव्यभवेशाय तुभ्य कर्मात्मने नम ॥ धसबै चैव साध्याय रुद्रादित्यसुराय च ! विपाय मारतायैच तुभ्य देवात्मने नम ।। अग्नीपोमविधिज्ञाय पशुमन्त्रीपधाय च । स्वयम्भुवे ह्यजायच अपूर्वप्रथमाय च ॥ प्रजाना पतये चैव तुभ्य ब्रह्मात्मने नम ॥१५८॥ आत्मेशायात्मवश्याय सर्वशातिशयाय च । सर्वभूताङ्गभूतायतुभ्य भृतात्मने नम १५६ निर्गुणाय गुणशाय ज्यास्तायामृताय च । निस्पारयाय मित्राय तुभ्यसारयात्मने नम पृथि ये चान्तरिक्षाय दिव्याय च महाय च । जनस्तपाय सत्यायतुभ्य लोकात्मनेनम अव्यक्ताय च महते भूतादेरिन्द्रियाय च । आत्मनाय विशेषाय तुभ्य सर्वात्मने नम । नित्याय चात्मलिङ्गाय सूक्ष्मायवेतराय च । बुद्ध्याय विभवे चैव तुभ्य मोक्षात्मने नम नमस्ते त्रिषु लोकेषु नमस्ते परतस्त्रिषु । सन्त्यातेपु महायेषु चतुर्पु च नमोऽस्तु ते । नम स्तोत्रे मयाह्यस्मिन् यदिनव्याहृत भयेत् । मद्भक्त इति ब्रह्मण्य । तत्सरंक्षन्तुमर्हसि सूत उवाच। एधमाभाप्य देवेशमीश्वर नीललोहितम् । प्रबोऽभिपणतस्तस्मै प्रालिग्यितोऽभवत् काव्यस्य गान सस्पृश्य हस्तेन प्रीतिमान् भव । निकाम दर्शन दत्त्वातत्रैवान्तरधीयत.
[सप्तवत्वारिंशो
।
१२०
* मत्स्यपुराणम् *
ततः सोऽन्तहितेतस्मिन्देवेशेऽनुचरी तदा । तिष्ठन्ति पार्श्वतो दृष्ट्वाजयन्तीमिदमत्रवीत्
कस्य त्वं सुभगे! कावादुःखितेमयि दुःखिता । महता तपसा युक्ता किमर्थमांनिपेवसे
अनया संस्तुतो भक्त्या प्रश्रयेण दमेन च । स्नेहेन वसुश्रोणि!प्रीतोऽस्मिवरवणिनी!
किमिच्छसि परारोहे! कस्ते कामः समृद्धयताम् ।
तत्ते सम्पादयाम्यद्य यद्यपि स्यात् सुदुष्करः ॥१७१॥
एवमुक्ताऽब्रवीदेनं तपसा ज्ञातुमर्हसि । चिकीर्पितं हि ब्रह्मन् ! त्वं हि वेत्थ यथातथम् ॥
एवमुक्तोऽब्रवीदेनां दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा । मया सहत्वं सुश्रोणि! दशवर्षाणिमामिनि ।
देवि! चन्दावरश्यामे! वहे ! वामलोचने! । एवंगोषिकामत्वमत्तोवैवल्गुभापिणि ।
एवं भवतु गच्छामो गृहानोमत्तकाशिनि!। ततः स्वगृहमागत्य जयन्त्या पाणिमुद्वहन्
तया सहावसद्देव्या दशवर्षाणि भार्गवः । अदृश्यः सर्वभूतानां मायया संवृतः प्रभुः ।
कृतार्थमागतं दृष्ट्वा काव्यं सर्वे दितेः सुताः । अभिजग्मुहं तस्य मुदितास्ते दिद्वक्षवः ।
यदा गतान पश्यन्ति मायया संवृतगुरुम् ।लक्षणंतस्य तद्बुद्ध्वा प्रतिजग्मुर्यथागतम् ।
वृहस्पतिस्तु संरुद्धं काव्यं ज्ञात्वावरणतु । तुष्टयथं दशवर्षाणि जयन्त्या हितकाम्यया।
बुद्ध्वातदन्तरंसोऽपिदैत्यानामिन्द्रनोदितः । काव्यस्यरूपामास्थाय असुरान्समुपायत्
ततस्तानागतान् दृष्ट्वा वृहस्पतिरुवाचह । स्वागतं मम याज्यानां प्राप्तोऽहंचो हितायच ।।
अहंवोऽध्यापयिष्यामि विद्याः प्राप्तास्तुयामया । ततस्ते हृष्टमनसो विद्यार्थमुपपेदिरे॥
पूर्णे काव्यस्तदा तस्मिन् समये दशवार्षिके। समयान्ते देवयानी तदोत्पनाइतिश्रुतिः
बुद्धि चक्रेततः सोऽथ याज्यानां प्रत्यवेक्षणे ॥ १८३ ॥
देवि! गच्छाम्यहं द्रष्टुं मम याज्यान शुचिस्मिते!।
विभ्रान्तवीक्षिते! साचि ! त्रिवर्णायतलोवने ॥१८॥
एवमुक्तानवीदेनं भजभक्तान् महाव्रत !। एष धर्मः सतां ब्रह्मन्! न धर्म लोपयामिने ।
ततो गत्वा सुरान् दृष्ट्वा देवाचार्येण धीमता।
चञ्चितान् काव्यरूपेण ततः काव्योऽब्रवीत्तु तान् ॥ १८६ ॥
ऽध्यायः] * बृहस्पतिनाशुकरूपेणदैत्यमोहनम् * काव्यं मां वो विजानीध्वन्तोपितो गिरिशो विभुः । घञ्चिता यत यूयं वै सर्वे शृणुत दानवाः!॥ १८७ ॥ श्रुत्वा तथा ब्रुवाणन्तं संभ्रान्तास्ते तदाऽभवन । प्रेक्षन्तस्तावुभौ तत्र स्थितासीनी सुचिस्मिताः ॥ १८८ ॥ सम्प्रमृदास्ततः सर्वे न प्राबद्धन्त किञ्चन । अप्रवीत्सम्प्रमुढेषु काव्यस्तानसुरांस्तदा ।। आचार्योयोत्यहंकाव्योदेवाचार्योऽयमनिराः अनुगच्छत्तमदित्यास्त्यजतनंवृहस्पतिम् ।। इत्युक्ता ह्यसुरास्तेन तावुभौ समवेक्ष्यच । यदासुराविशेषन्तु न जानन्त्युभयोस्तयोः । बृहस्पतिस्वाचनानसंभ्रान्तस्तपोधनः । काव्योवोऽहं गुरुदैत्या! मटूपोऽयंवृहस्पति ॥ संमोहयति रूपेण मामकेनेष वोऽसुराः ।।श्रुत्वा तस्य ततस्ते समेत्यतुततोऽब्रुवन् । अयंनो दशवर्षाणि शततं शास्ति व प्रभुः । एष वै गुरुरस्माकमन्तरे स्फुरयन द्विजः ॥ ततस्ते दाना सर्व प्रणिपत्याभिनन्य च । वचनअगृहस्तस्य चिराभ्यासेन मोहिताः ॥ ऊचुस्लमसुराःसर्वेक्रोधसंरकलोचना । अयंगुरहितोऽस्माकं गच्छत्वं नासिनोगुण ॥ भार्गवोवाशिरावापि भगवानेपनोगुर । स्थितावयंनिदेशेऽस्य साधुत्वंगच्छमाचिरम्। एवमुक्त्या सुराः सर्वे प्रापद्यन्तहस्पतिम् । यदा न प्रतिपद्यन्त काव्येनोक्त मह दिनम् चुकोपभार्गवस्तेयामवलेपेन तेन तु । योधिताहि मया यस्मान्न मां भजथ दानवाः ।। तस्मात्पनष्टपंज्ञा पराभवमवाप्स्यथ । इतिव्याहृत्यतानकाव्योजगामाथ यथागनम् । शप्तांस्तानसुरान् ज्ञात्वा कान्येनस वृहस्पति । कृतार्थः स तदाहपः स्वरुपं प्रत्यपद्यत । बुध्या सुरान् हतान् ज्ञात्वा धोऽन्तरधीयत। ततः प्रणरेतस्मिस्तु विभ्रान्ता दानया भवन् ॥ २०॥ अहो विवञ्चिताः स्मेति परस्परमयानुवन् । पृटतोऽभिमुखाश्चैव ताडिताङ्गिरसेन तु ॥ धचिताः सोपधानेन म्स्ये वस्तुनिमायया। ततस्वपरितुणास्ते तमेव त्वरिताययुः ।। महादमप्रतः कन्या काव्यशनुपदं पुनः ॥२०॥ तत कायंसमासाद्य उपतस्थुरयाइमुसा.। समागतान् पुनदृष्ट्वाकाव्यो याज्यानुवाबह । मया सम्योधिताः सयस्मान्मानाभिनन्दथ । तनहतेनावमानेन गना यूयं पराभवम् ।।
१२२ * मत्स्यपुराणम् * [सप्तचत्वारिंशो एवं बुधाणं शुक्रन्तु पाप्पसन्दिग्धयागिरा । प्रह्लादत्तातदोवाच मा नचन्त्यजमार्गव! स्वाश्रयान् भजमानांश्च भक्तांस्त्वम्भज भार्गव!। त्वय्यद्रष्टे वयं तेन देवावार्येण मोहितान् । भक्तानहसि वै ज्ञातुं तपोदीभ्रुण चक्षुषा । २०८ ॥ यदिनस्त्वं न कुरुते प्रसादभृगुनन्दन! । अपध्याता स्त्वयाह्यद्य प्रविशामो रसातलम् । ज्ञात्वाकाव्यो यथातत्त्वं कारुण्यादनुकम्पया । एवंप्रत्यनुनीतोवै तताकोपंनियम्यसः ॥ उवाचतान भेतव्यं न गन्तव्यं रसातलम् ॥२१०॥ अवश्यंभाविनोह्याः प्राप्तव्यामयिजामति । न शक्पमन्यथाकतु दिष्टंहि बलवत्तरम् ॥ संज्ञाप्रणटाया घोऽद्य तामेतांप्रतिपत्स्यथ । देवाञ्जित्वासकृच्चापिपातालंप्रतिपत्स्यथ ।। प्राप्तेपर्यायकालेच हीति ब्रह्माभ्यभाषत । मत्प्रसादाश्च त्रैलोक्यं भुक्तं युप्माभिरूजितम् युगाख्यादश संपूर्णा देवानाक्रम्यमूर्द्धनि । एतावन्तश्च कालं वै ब्रह्मा राज्यमभाषत ।। राज्यसावर्णिके तुभ्यंपुनः किलभविष्यति। लोकानामीश्वरो भाव्यस्तवपौत्रःपुनर्वलिः एवं किल मिथः प्रोक्तः पौत्रस्ते विष्णुना स्वयम् । चाचा हृतेषु लोकेषु तास्तास्तस्याभवन् किल ॥ २१६ ॥ यस्मात्प्रवृत्तयश्चास्य सकाशादभिसन्धिताः । तस्माद्वृत्तेनप्रीतेनतुभ्यंदत्तस्वयम्भुवा। देवराज्येवलिर्भाव्य इतिमामाश्वरोऽब्रवीत् । तस्माददृश्योभूतानां कालापेक्षासतिष्ठति । प्रीतेन चापरो दत्तोवरस्तुभ्यं स्वयम्भुवा । तस्मानिरुत्सुकस्त्वं पर्यायं सहितोऽसुरैः नहिशक्यंमयातुभ्यं पुरस्ताद्विप्रभाषितुम् । ब्रह्मणा प्रतिपिद्धोऽहं भविष्यक्षानताविभो!!! इमौच शिष्योती मह्यं समावेतो वृहस्पतेः । देवतःसहसंसृष्टान् सर्वान्वोधारयिष्यतः । इत्युक्ता हासुराः सर्वे काव्येनाक्लिष्टकर्मणा । दृष्टास्तेन ययुः सार्द्ध प्रह्लादेन महात्मना । अवश्यंभाव्यमर्थन्तु श्रुत्या शुक्रेण भाषितम् । सदाशंसमानास्तु जयंशुकोणभापितम् ॥ दंशिताः सायुधाः सर्वे ततो देवान् समाहयन् ॥२२३॥ देवास्तदासुरान् दृष्ट्वासंग्रामे समुपस्थितान् । सर्वेसंभृतसम्भारा देवास्तान्समयोधयन् भारतदा तस्मिन् पर्तमाने शतं समाः। अजयन्नसुरा देवांस्ततो देवा हामन्त्रयन् ।
ऽध्यायः] * शुक्रस्यदैत्यान्प्रतिशापः * यझेनोपायामस्तो ततोजेप्यामहे सुरान् । तदोपामन्त्रयन्देवाः शण्डामर्को तुतात्रुभी। यज्ञेचाहयता प्रोक्तो त्यजेतामसुराद्विनी । वयंयुयां भजिप्यामःसहजित्यानु दानवान् एपंकृताभिसन्धीती शण्डामकौं सुरास्तथा । ततोदेवाजयं प्रापुर्दानवाश्च पराजिताः ॥ शण्डामर्कपरित्यक्ता दानवायलास्तथा । एवंदैत्याःपुरा काव्यशापेनाभिहतास्तदा ॥ काव्यशापाभिभूतास्ते निराधाराश्च सर्वशः । निरस्यमानादेवैश्च विविशुस्तेरसातलम्॥ एवं निरुद्यमा देवैः कृताः कृष्ण दानवाः । तत. प्रभृति शापेन भृगोनैमित्तिकेन तु ॥ जो पुनः पुनर्विष्णुईमैं प्रशिथिले प्रभुः । कुर्वन् धर्मव्यवस्थानमसुराणां प्रणाशनम् ॥ प्रहादस्य निदेशेतुन स्थास्यन्त्यसुराश्चये । मनुष्ययध्यास्ते सर्वग्रह्मेतिव्याहरन् प्रभुः ॥ धर्मान्नारायणस्यांशः सम्भूतश्चाक्षुषेऽन्तरे । यज्ञं ये वर्तयामासुर्देवा चैवस्यतेऽन्तरे ।। प्रादुर्भाव ततस्तस्य ब्रह्माह्यासीत्पुरोहितः । युगारयायां चतुर्यान्तु आपन्नेषु सुरेपुर्व।। • सम्भूतस्तु समुद्रान्ते हिरण्यकशिपोधे । द्वितीयेनरसिंहाय्ये रद्रोह्यासीत पुरोहितः । यलिसंस्थेषु लोकेषु त्रेतायां सप्तमं प्रति । तृतीये चामनस्यार्थे धर्मेण तु पुरोधसा ।। एतास्तिस्रः स्मृतास्तस्य दिव्याः सम्भूतयो द्विजाः । मानुपाः सप्त योन्यस्तु शापजास्ता नियोधत ॥ २३८ ।। त्रेतायुगे तु प्रथमे दत्तात्रेयो यभूव ह । नाटे धर्मे चतुर्थीशे मार्कण्डेयपुरःसरः ॥२३६॥ पञ्चमः पञ्चदश्याञ्चतायां सम्बभूवह । मान्धाता चक्रवर्तीतु तदोत्तङ्कपुरःसरे ॥२४०॥ एकोनविंश्यांत्रेतायां सर्वक्षत्रान्तद्विभुः । जामदग्न्यस्तथा पष्टो विश्वामित्रपुरःसरः ॥ चतुर्विशे युगे रामो घसिप्टेन पुरोधसा । सम्मो रावणम्यार्थे जशे दशरथात्मजः ॥ अष्टमे द्वापर विष्णुरष्टाविंशे पराशरात् । वेदव्यास म्तथा यो ज्ञातृकर्ण्यपुरस०।२४३ फत्तुं धर्मव्ययस्थानमसुराणां प्रणाशनम् । बुद्धो नवमकोया तपसापुष्करेक्षणः ॥ देवसुन्दररूपेण द्वैपायनपुरःसरः ।। २५४ ॥ नम्मिन्नेवाशीणे मन्याशिष्टेभविष्यति । कल्कीनु मिरशम पाराशर्यपुरःसरः दशमो भाव्यसम्भूती यामयापपुरस्सरः ॥ २५ ॥ सपांच भृतांस्तिमितान् पापण्डांश्चैव सर्वशः । प्रगृहीतायुधर्विपति शतसमशः ॥
[अष्टचत्वारिंशो १२४ * मत्स्यपुराणम् * निःशेषान् शूद्रराशस्तु तदा स तु करिष्यति । ब्रह्मद्विपः सपत्नांस्तु संहृत्यैव च तद्वपुः अष्टाविंशस्थितःकत्किश्चरितार्थःससैनिकः । शूद्रानसंशोधयित्यातुसमुद्रान्तशवैस्वयम् प्रवृत्तचक्रोवलवान् संहारन्तुकरिष्यति। उत्सादयित्वावृपलान्प्रायशस्तानधार्मिकान ततस्तदा स वै कल्किश्चरितार्थः ससैनिकः । ग्रजास्तं साधयित्वा तु समृद्धास्तेन चै स्वयम् ॥ २५० ॥ अकस्मात्कोपितान्योन्य भविष्यन्तीह मोहिताः । क्षपयित्वा तु तेन्योऽन्यं भाविनार्थेन चोदिताः ॥ २५१ ॥ ततः काले व्यतीते तु स देवोऽन्तरधीयत । नृपेवथ प्रनयेषु प्रजानां संग्रहात्तदा । रक्षणे निविवृत्ते तु हत्वा चान्योन्यमाहवे । परस्परं निहत्वा तु निराकन्दाः सुदुः इःखिताः पुराणि हित्वाग्रामांश्चतुल्यत्वेनिष्परिग्रहाः । प्रनष्टाश्रमधर्माश्च नष्टवर्णाश्रमास्तथा ॥ अट्टाला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः । प्रमदाः केशशूलाश्च भविष्यन्ति युगक्षये ॥ हस्वदेहायुपश्चैव भविष्यन्ति धनौकसः । सरित्पर्वतवासिन्यो मूलपत्रफलाशनाः ॥ चीरचर्माजिनधराः सङ्करं धोरमाश्रिताः । उत्पातदुःखाःस्वल्पार्थाःयहुवाधाश्चताःप्रजाः एवं कष्टमनुप्राहा. काले सन्ध्यंशके तदा । ततः क्षयं गमिष्यन्ति सार्द्ध कलियुगेन तु ॥ क्षीणे कलियुगे तम्मिस्ततः कृतमवर्तत । इत्येतत्कीर्तितं सम्यक् देवासुरविचेष्टितम् ॥ यदुवंशप्रसङ्गेन समासाद्वैष्णवं यशः । तुर्वसोस्तु प्रवक्ष्यामि पूरोटुंह्योस्तथानोः ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे भगवदवतारकारणकथनं नाम समचत्वारिंशोऽध्यायः । अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ययानिपुत्राणामन्ययवर्णनम् । मत उवाच।
ऽध्यायः]
* ययातिपुत्राणामन्ययवर्णनम् *
१२५
दुप्यन्तस्य तु दायादोघरूथोनामपार्थिवः । वस्थातु तथावीरः सन्धानस्तस्यवात्मजः
पाण्ड्यश्चकेरलश्चैवचोलकर्णस्तथैवच । तेषां जनपदास्फीताः पाण्ड्याश्चोला सकेरलाः
द्रुह्यस्य तनयो शूरी सेतुः केतुस्तथैव च । सेतु पुत्रःशरद्धास्नु गन्धारस्तस्यवात्मजः।
ख्यायते यस्य नाम्नासो गन्धारविषयो महान् । आरट्रदेशजास्तस्य तुरगावाजिनांवराः
गन्धारपुत्रोधर्मस्तु घृतस्तस्यात्मजोऽभवत् । घृताञ्चविदुपोजने प्रचेतास्तस्यचात्मजः
प्रचेतसः पुत्रशनं राजानः स एव ते । म्लेच्छराष्ट्राधिपाः सर्वे उदीचीन्दिशमाश्रिताः।
अनोश्चैव सुता वीरास्त्रयः परमधार्मिकाः। सभानरश्चाक्षुषश्च परमेषु तथैव च ॥१०॥
समानरस्यपुत्रस्तु विद्वान्कोलाहलो नृपः । कोलाहलस्य धर्मात्मा सञ्जयोनामविश्रुतः
सक्षयस्याभवत् पुत्रो पीरो नाम पुरञ्जयः । जनमेजयो महाराज ! पुरअयमुतोऽभवत्
जनमेजयस्य राजमहाशालोऽभवत् सुतः । पासीदिन्द्रसमो गजा प्रतिष्ठितयशाभवत्
महामनाः मुतस्तम्य महाशालस्य धार्मिकः । सप्तद्वीपेश्वरी जशे चक्रवत्ती महामनाः ॥
महामनास्नु द्वौ पुत्री जनयामास विश्रुता । रशीनच धर्मशं तितिक्षं चैव तावुभौ ।।
उशीनरस्य पुत्रम्तु पञ्चराजर्षिसम्भवाः । भृशा कृशानया दर्शा या च देवी दृपद्धती ॥
उशीनरम्य पुत्रास्तु तामुजाताः फुलोढहाः । तपसा ते तुमहता जातानस्यधार्मिकाः
भृशायान्तु नृगः पुत्रो नपायानव एपच । शायास्तु शो जो दर्शायाः सुप्रताऽभवत
दृपद्वत्याः मुतश्चापि शिविरीशीनगे नृपः ॥ १८ ॥
शिवन्नु शिवयः पुत्राश्चन्यारो लोकविश्रुताः । पृथुदर्भः मुयोग्य किया भद्रकम्तधा।
तेषां जनपदाः स्फीताः फेकयाभद्रकाम्नया । साँचीराचयपोगच नृगम्योकयाम्तथा
मुग्रतम्य नथाम्यष्टा राम्य वृपला पुरी। नवम्य नवगमन्नु तितिक्षोम्नु प्रजांणु॥
तिनिभुरभवद्वाजा पूर्वम्यां दिशि विनः । वृष्टयः मुतम्नम्य तम्य सेनोऽभयत्मनः.
सेनम्य मुनपा जशे मुनपस्तनयोयलिः । जानी मानुग्योन्यान्नु क्षीणे यंशे प्रजेच्छया ।
महायोगी तु स परितो यन्धमहात्मना । पुपानु पादयामास क्षेत्रज्ञानपक्षपाधियान.
भई म जनयामास पर मान तप पुण्ठं फलिटुं च तथा यालेय क्षेत्रमुच्यने ।
यालया प्रामपाचप तम्य यंगरगः नमो ॥२५॥
१२६ - * मत्स्यपुराणम् * [अष्टचत्वारिंशो बलेश्च ब्रह्मणा दत्तो वरः प्रीतेन धीमतः । महायोगित्वमायुश्च कल्पस्य परिमाणकम् । संग्रामे चाप्यजेयत्वं धर्मे चैवोत्तमा मतिः । त्रैकाल्यदर्शनं चैव प्राधान्यं प्रसवे तथा। जयश्चाप्रतिमं युद्ध धर्म तत्त्वार्थदर्शनम् । चतुरो नियतान् वर्णान् सबै स्थापयिताप्रभुः वेषाश्च पञ्च दायादावङ्गाङ्गाःसुकास्तथा । पुण्ड्राः कलिङ्गाश्च तथा अङ्गस्यतुनियोधत मुनय ऊचुः। कथं बलेः सुताजाताःपञ्चतस्य महात्मनः । किं नाम्नी महिपी तस्यजनिताकतमोपिः कथं चोत्पादितास्तेन तन्नःप्रहिपृच्छताम् । माहात्म्यञ्चप्रभावश्च निखिलेन घदस्वतन् सूत उवाच । अथोशिज इति ख्यात आसीद्विद्वानृषिः पुरा । पत्नी वै ममता नाम वभूवास्यमहात्मनः उशिजस्य यवीयान् वै भ्रातृपत्नीमकामयत् । बृहस्पतिर्महातेजा ममतामेत्य कामतः ॥ उचाच मम तातन्तु देवरं वरवर्णिनी । अर्वन्यस्मि ते भ्रातुज्येष्टस्य तु विरम्यताम् अयं तु मेमहाभाग ! गर्भःकुप्येत्वृहस्पते ! । औशिजो भ्रातृजन्यस्तेसोपाङ्गंवेदमुगिरन् अमोघरेतास्त्वञ्चापिनमा भजितुमर्हसि । अस्मिन्नेव गतेकाले यथा वा मन्यसेप्रभो! एवमुक्तस्तथा सम्यक्वृहत्तेजावृहस्पतिः । कामात्मास महात्मापिनमनःसोऽभ्यवारयत् सम्बभूवैव धर्मात्मा तया सार्द्धमकामया। उत्सृजन्तं तु तदेतो घाचं गर्भोऽभ्यभाषत भो तात! वाचामधिप! यो स्तीह संस्थितिः । अमोघरेतास्त्वञ्चापि पूर्व चाहमिहागतः ॥ ३६॥ सोऽशपत्तं ततः क्रुद्ध एवमुक्तो वृहस्पतिः । पुत्रं ज्येष्टस्य वै भ्रातुर्गर्भस्थंभगवान पिः। यस्मात्त्वमीदशे काले गर्भस्थोऽपिनिषेधसि । मामेव मुक्तवांस्तस्मात्तमोदीर्घप्रवेक्ष्यसि ततो दीर्घतमा नाम शापादपिरजायत । अतोऽशजोवृहत्कीर्तिहस्पतिरियोजसा ॥ ऊर्ध्वरेतास्ततोऽसौ वै वसतेभ्रातुराश्रमे । स धर्मान् सौरभेयांस्तु वृषभाच्छ तांस्ततः तस्य भ्राता पितृव्योयश्चकार भरणन्तथा । तस्मिन्निवसतस्तस्य यदृच्छैचागतोवृपा यशार्थमाहृतान्दर्भाश्चपाद सुरभीकृतः । जग्राह तं दीर्घतमाः शृङ्गयोस्तु चतुष्पदम् ॥ तेनासौ निगृहीतश्च न चचाल पदात्पदम् । ततोऽत्रवीपस्तं वै मुञ्च मां बलिनांवर !
ऽध्यायः * गोधर्मवर्णनम् * १२७ नमयासादितस्तात ! बलवांस्त्वत्समःकचित् । ममचान्यः समोवापिनहिमेवलसंख्यया मुञ्च तातेति च पुनः प्रीतस्तेऽहं घरं वृणु leon एवमुक्तोऽब्रवीदेनं जीवन्मे त्वंकयास्यसि । एप त्वां न चिमोक्ष्यामि परस्वादचतुष्पदम् वृषभ उवाच। नास्माकं विद्यते तात! पातकं स्तेयमेव च । भक्ष्याभल्यं तथा चैवपेयापेयं तथैव च ।। द्विपदां बहवो ह्यते धर्म एप गवां स्मृतः । कार्याकार्य न वा गम्यागमनञ्च तथैव च ।। सूत उवाच । गांधम॑न्तुर्वश्रुत्वासम्भ्रान्तस्तुविसृज्यतम् । शत्यानपानदानात्तु गोपर्तिसम्प्रसादयन प्रसादिते गते तस्मिन् गोधर्मभक्तितस्तु सः । मनसैव समादध्यौ तनिष्टस्तत्परोहिसः ततो यवीयसः पत्नी गौतमस्याभ्यपद्यत । कृतावलेपान्तां मत्वा सोऽनड्वानिच न क्षमे गोधर्मन्नुपरं मत्वा स्नुपान्तामभ्यपद्यत । निर्भत्स्य चैनं रुदवा च बाहुभ्यां सम्प्रगृह्यच भाव्यमर्थन्तुतंज्ञात्वामाहात्म्यात्तमुघाचसा । विपर्ययन्तुत्वंलब्ध्याअनड्यानिववर्त्तसे ॥ गम्यागम्यं न जानीपे गोधर्मात् प्रार्थयन् सुताम् । दुर्वृत्तं त्वान्त्यजाम्यद्य गच्छ त्वं स्वेन कर्मणा ॥५६॥ काप्टे समुद्गप्रक्षिप्यगदाम्मसिसमुत्सृजत् । यस्मात्त्वमन्योवृद्धश्चभर्त्तव्योदुरधिष्ठितः ॥ तमुह्यमानं वेगेन स्रोतसोऽभ्यासमागतः । जग्राह तं स धर्मात्मा यलिरोचनिस्तदा । अन्त'पुरे जुगोप्यनं भक्ष्यभोज्यश्च तर्पयन् । पीतश्चैत्रं वरेणैयच्छन्दयामासवै बलिम् ॥ तस्माय स घरं यये पुत्रार्थे दानवर्षभः । सन्तानार्थं महाभाग ! भार्यायांमममानद । पुत्रान् धर्मार्थतत्त्वज्ञानुत्पादयितुमर्हसि ॥ ६ ॥ एयमुक्तोऽथ देवपिस्तथास्त्वित्युक्तवान् प्रभुः। स तस्य राजा स्वां भाा सुदेष्णां नाम प्राहिणोत् । अन्धं वृद्धञ्च तं ज्ञात्वा न सा देवी जगाम ह ॥ ६१॥ शूद्रान्धात्रेयिकां तस्मैअन्धायप्राहिणोत्तदा । तस्यांकाक्षीयदादीश्चशूटयोनापिर्वशी॥
१२८ * मत्स्यपुराणम् * [अष्टचत्वारिंशो जनयामास धर्मात्मा शूद्रानित्येवमादिकम् । उवाच तं वली राजा दृष्ट्वा काक्षीवदादिकान् ॥ ६३ ॥ राजोवाच। प्रवीणानृषिधर्मस्य चेश्वरान् ब्रह्मवादिनः । विद्वान् प्रत्यक्षधर्माणां बुद्धिमान् वृत्तिमान् शुचीन् ॥ ६४ ॥ ममैवचेति होवाव तं दीर्घतमसं वलिः । नेत्युवाच मुनिस्तं वैममैवमितिचाब्रवीत् ॥६५ उत्पन्नाः शूद्रयोनौ तु भवच्छन्दे सुरोत्तम । अन्धवृद्धञ्चमांशात्यासुदेष्णामहिपीतव ॥ प्राहिणोदवमानान् मे शूद्रान्धात्रेयिकां नृप ॥ ६६ ॥ ततःप्रसादयामासयलिस्तमृपिसत्तमम् । यलिासुदेष्णान्तांभार्या भसयामासदानवः ॥ पुनश्चैनामलकृत्य ऋषये प्रत्यपादयत् । तां स दीर्घतमा देवी तथा कृतवती तदा ॥६८ दध्नालवणमिश्रेण स्वसक्तं मधुकेन तु । लिहमाम जुगुप्सन्ती आपादतलमस्तकम् । ततस्त्वं प्राप्स्यसे देवि ! पुत्रान् वै मनसेप्सितान् ॥ ६ ॥ तस्य सा तढचो देवी सर्व कृतवती तदा । तस्य सा पानमासाद्य देवीपरिहरत्तदा॥७० तामुवाच ततः सोऽथ यत्ते परिहृतं शुभे । विना पानं कुमारन्तु जनयिप्यसि पूर्वजम् ।। मुदेष्णोवाच । नाहसि त्वं महाभाग ! पुत्रं मे दातुमीदृशम् । तोपितश्च यथाशत्तयाप्रसादंफुरमेप्रभो॥ दीर्घतमोपाव। तपापचाराद्देव्येप नान्यथा भपिता शुमे । नैच दाम्यति पुत्रस्तेपात्रोयेदास्यतेफलम् ॥ तम्यापानं विना चैव योग्यभावो भविष्यति । तस्माद्दीर्घतमाङ्गेपु कुक्षी म्पृष्ट्वेदमावीत. प्राशितं यद्यदनेषु न सोपस्थं शुचिस्मिते । तेन तिष्ठन्तिनेगर्भपौर्णमास्यामिवोदुगट् ॥ भपिप्यन्ति युमाराम्नपञ्चदेयमुनोपमाः। तेजस्विनःसुवृत्ताधयम्पानोधार्मिफाश्यते ॥ सूत उवाच। नदंशम्नु मुदेणाया ज्येष्टः पुत्रो व्यजायत । अगम्तथाकलिङ्गधपुण्नामुमातर्थपन ॥ पद्गगजम्नु पञ्चने पटेः पुनाथ क्षेत्रजाः । इत्येते दीर्घतमसा यर्दताः सुतास्तथा । ह प्रजाः ऽध्यायः] * ययात्यन्वयवर्णनम् । १२६ प्रतिष्टामागतानां हि ब्राह्मण्यं कारयंस्ततः । ततो मानुषयोन्यां स जनयामास ततस्तं दीर्घतमसं सुरभिर्वासमत्रवीत् । विचार्य यस्माद्गोधर्म प्रमाणन्ते कृतं विभो ।। भक्त्यानानन्ययाऽस्मासुतेनप्रीतास्मितेऽनघ । तस्मात्तुभ्यन्तमोदीर्घमात्रायापनुदामि बैं पार्हस्पत्यस्तथैवैष पाप्मा वै तिष्ठति त्वयि । जरां मृत्युं तमश्चैव आवायापनुदामिते॥ सद्यः स घ्रातमात्रस्तुअसितोमुनिसत्तम!! आयुष्मांश्च वपुप्मांश्चवक्षुप्मांश्च ततोऽभवत् गोभ्याहते तमसिवंगौतमस्तुततोऽभवत् । काक्षीवांस्तुततोगत्वासहपित्रागिरिग्रजम् ॥ दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा पितुः सोह्युपविष्टश्चिरन्तपः । ततःकालेन महता तपसा भावितस्तु सः ॥ विधूय मातृजं कायं ब्राह्मण्यं प्राप्तवान् विभुः । ततोऽत्रवीत्पिता तंवैपुनवानस्यहंत्यया सत्पुत्रेण तु धर्मज्ञ ! कृतार्थोऽहं यशस्विना । मुक्वात्मानं ततोऽसी वै प्राप्तवान् ब्रह्मणः क्षयम् ॥८॥ ब्राह्मण्यं प्राप्य काक्षीवान् सहस्रमस्जत् सुतान् । कौमाण्डा गौतमाश्चैव स्मृता. काक्षीचत' मुताः ॥८॥ इत्येप दीर्घतमसोबलेवैरोचनस्य च । समागमो यः कथिन सन्ततिश्चोभयोस्तथा ॥ यलिस्तानभिनन्द्याहपञ्चपुनानकल्मपान् । कृतार्थ सोऽपिधर्मात्मायोगमायावृतम्बयम्॥ अदृश्यः सर्वभूतानां कालापेक्ष. स वै प्रभुः । तमाङ्गस्यतुदायादोराजासीद्दधिवाहनः ॥ दधिवाहनपुत्रस्तु राजा दिविरथ, स्मृत । आसीहिविरथापत्यं विद्वान् धर्मरथोनृपः॥ स हि धर्मरथः श्रीमांस्तेन विष्णुपदे गिरी । सोम शुक्रेण वै राजासहपीतो महात्मना अथ धर्मस्थस्याभूत् पुत्रश्चित्ररथ फिल । तस्य सत्यरथ. पुत्रस्तस्माद्दशरथः किल ॥ लोमपाद इति स्यातस्तस्य शान्ता सुताभवत् । अथ दाशरथिवीरश्चतुरङ्गोमहायशाः ॥ ऋष्यशृङ्गप्रसादेन जरे स्वकुलवर्धनः । चतुरङ्गस्य पुरस्तु पृथुलाक्ष इति स्मृतः ॥६६॥ पृथुलाक्षमुतश्चापि चम्पनामा बभूव ह । चम्पस्य तु पुरी चम्पापूर्व या मालिनोऽभवत् पूर्णभद्रप्रसादेन हयड्रोऽस्य सुतोऽभवन् । जज्ञे विभाण्डकाचास्यवारण शत्रुवारणः ।। अवतारयामास महीं मन्त्रैर्वाहनमुत्तमम् । हर्यङ्गस्य तु दायाटो जातो भएरथः क्लि ॥ अथ भद्ररथस्यासीत् वृहत्कर्मा जनेश्यरः । वृहद्भानु सुतस्तस्यतस्माजमहात्मयान् ।।
* मत्स्यपुराणम् * [ ऊनपञ्चाशत्तम बृहदानुस्तु राजेन्द्रो जनयामास वै सुतम् । नानाजयद्रथं नाम तस्मात्वृहद्रथो नृपः ॥ आसीवृहद्रथाच्चैवविश्वजिजनमेजयः । दायादस्तस्यवानोवैतस्मात्कर्णोऽभवनृपः कर्णस्य वृषसेनस्तु पृथुसेनस्तथात्मजः । एतेऽङ्गस्यात्मजाःसर्वराजानःकीर्तिता मया ॥ विस्तरेणानुपूर्व्याच पूरोस्तु शृणुत द्विजाः ॥१०॥ ऋपय ऊचुः। कथं सतात्मजः कर्णः कथमङ्गस्थ चात्मजः । एतदिच्छामहेश्रोतुमत्यन्तकुशलोह्यसि ।। सूत उवाच वृहदानुसुतो जने राजा नाशा बृहन्मना. । तस्य पत्नीद्वयं हासीन्छव्यस्य तनये हाभे । यशोदेवी च सत्या च तयोवंशश्च मेणु ॥१०॥ जयद्रथन्तु राजानं यशोदेची हाजीजनत् । सा वृहन्मनसः सत्या विजयनाम विश्रुतम् । विजस्य वृहत्पुत्रस्तस्य पुत्रो वृहद्रथः । वृहद्रथस्य पुत्रस्तु सत्यकर्मामहामनाः ॥१०७ सत्यकर्मणोऽधिरथः सूतथाऽधिरथास्मृतः । यः कर्ण प्रतिजग्राह तेन फर्णस्तु सूतजः तच्चेदं सर्वमाग्यातं कर्ण प्रति यथोदितम् ॥१०८।। इति श्रीमत्स्यपुराणे ययातिवंशवर्णनं नामाटचत्वारिंमत्तमोऽध्यायः ।। ऊनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः पूरुवंशपर्णनम् । पूरोः पुनो महातेजा राना स जनमेजय, । प्राचीतन.मुतस्तस्ययःप्राचीमकरोशिम् प्राचीततम्य तनयोमनम्युश तयाभवत् । राजा पीतायुधो नाम मनस्योरभयन् मुत. " दायादम्तम्यचाप्यासीधुन्धुर्नाममहीपति.धुन्धोर्यविध.पुत्र सम्पातिम्तस्पचात्मनः सम्पातेम्नु गई यचां भवाम्यानम्यात्मनः । भद्राश्यम्यधृतायानुदशाप्सासि सुनयः याचेगुध युथ फक्षेयुध सनेयुकः । गुयुध विनेषुध म्यलेयुश्चेष सत्तमः ॥ धर्मयुः समनेयुध पुष्ययुश्चेति ते दश भावोदना नाम भार्या पैतमका या॥
1- ध्यायः] * पूरवंशववर्णनम् - तस्यां स जनयामास अन्तिनारं महीपतिम् । अन्तिनारो मनस्चिन्यां पुत्रान् जो परान् शुभान् ॥७॥ अमूर्तग्यसंवीरं त्रिवनयधामिकम् । गौरी कन्या तृतीया च मान्धातुर्जननी शुमा । दलिनानुयमस्यासोकन्यायाजनयत्सुतान् । ब्रह्मबादपराकान्तांशटुम्भदायिलिनाहाभून् उपदानवी मुतान् लेभे चतुरस्त्विलिनात्मजात् । कृप्यन्तमथ दुष्प्यन्तं प्रवीरमनयं तथा ॥१०॥ चक्रवती ततो जज्ञे दुप्यन्तान् समितिजाः । शकुन्तलायां भरतो यस्य नान्नाचभारताः टोप्यन्ति प्रति राजानं घायूचे चाशरीरिणी । माताभरनापितु-पुत्रोयेनजात.सएक्सः ॥ भर स्वपुनं दुप्यन्त ! मायमस्याः शकुन्तलाम् । रेनोधां नयते पुन.परेनं यमलादनात् ।। त्वं चास्य धाता गर्मस्य सत्यमाह शकुन्तन्दा ॥१३॥ भरतस्य विनटेषु तनयेषु पुग किल । पुत्राणामातृकात् कोपात् मुमहान् संक्षयः कृतः तनो मरुद्भिानीय पुनः स तु वृहस्पतेः । संकामितो भरद्वाजो मरनिर्भरतस्य तु ॥१५ ऋपय ऊचुः॥ भरतस्य भरद्वाजः पुत्रार्थ मारुनः कथम् । संक्रामितो महातेजास्तभो ब्रूहि यथात यम् सूत उवाच। पन्यामापनसत्वायांमुशिनः सः स्थितोभुधि । मातुर्भायां सदृष्ट्वातु वृहस्पतिवाचह पतिष्ट स्वलन्य मैथुनायच मां शुभे! । एवमुक्ताऽब्रवीदेनं स्वयमेव वृहस्पतिम् ॥ का परिणतचायं ब्रह्म व्याहस्ते गिरा। अमोधरेतास्त्यश्चापि धर्मश्चैवं विगहितम् १६ लोमुक्तोऽत्रचोदेनां स्वयमेव वृहस्पतिः । नोपदेष्टव्यो विनयस्त्वया में घग्चणिनि ! ॥ प्रमाणः प्रसानां मैथुनायोपचक्रमे । ततो घृहस्पति गमों थर्षमाणमुवावह ॥२१॥ पृन्निविष्टो हाहं पूर्व मिहनाम बृहस्पते ! । अमोधरेनाश्च भवान नावकाश इह द्वयोः । प्रामुक्तः स गर्मेण कुपितः प्रत्युवाच ह । यस्मात्चमीदृशे काले सर्वभूनेप्सिते सति ॥ अभिषेधसिःतस्मात्त्यं तमोदोघं प्रवेक्ष्यसि ॥२३॥ अथ भद्र सन्निवयं तस्यानन्दावृहस्पतेः। ततस्त्वपतभूमौ नित्तं शिशुकोऽभवत् * मत्स्यपुराणम् * [ ऊनपञ्चाशत्तमो सद्यो जातं कुमारं तु दृष्ट्वा तं ममताऽब्रवीत् । गमिप्यामि गृहं स्वं वै भरस्वैनं वृहस्पते एचमुक्त्वागतासातुगतायांसोऽपितंत्यजत् । मातापितृभ्यां त्यक्तन्तुदृष्ट्वातंमारुतःशिशुम् जगृहुस्तं भरद्धाजं मरुतः कृपया स्थिताः ॥२६॥ तस्मिन् काले तु भरतो वहुभिः ऋतुभिर्विभुः । पुत्रनैमित्तिकैर्यहरयजत्पुत्रलिप्सया ॥ यदा स यजमानस्तु पुत्रं नासादयत् प्रभुः । ततः क्रतुं मरुत्सोमं पुत्रार्थे समुपाहरत् ।। तेन ते मरुतस्तस्य मरुत्सोमेन तुष्टुवुः । उपनिन्युभरद्वाजं पुत्रार्थं भरताय वै ॥२६॥ दायादोऽङ्गिरसः सूनोरोरसस्तु वृहस्पतेः । संक्रामितो भरद्वाजो मरुद्भिर्मस्तं प्रति ।३० भरतस्तु भरद्वाजं पुत्रं प्राप्य विभुम्रवीत् । आदावात्महिताय त्वं कृतार्थोऽहंत्ययाविभो पूर्व तु वितथो तस्मिन् कृते वै पुत्रजन्मनि । ततस्तु पितथो नाम भरद्वाजो भूपोऽभवत् तस्मादपि भरद्धाजाद् ब्राह्मणाः क्षत्रिया भुवि । द्वयामुष्यायणकोलीनाः स्मृतास्ते द्विविधेन च ॥३३॥ ततो जाते हि वितथे भरतश्च दियं ययौ । भरद्वाजो दिवं यातो ह्यभिषिच्यसुतं ऋषिः दायादो वितथस्यासीद्वमन्युर्महायशाः 1 महाभूतोपमाः पुत्राश्चत्यारो भुधमन्ययः ॥ बृहत्क्षेत्रो महावीर्यः नरो गर्गश्च वीर्यवान् । नरस्य संकृतिः पुत्रस्तस्य पुत्रो महायशाः ॥ ३६॥ गुरुधोरन्तिदेवश्च सत्कृत्यान्तावुभौ स्मृतौ । गर्गस्य चैव दायादः शिविचिद्वानजायत स्मृताः शैव्यास्ततो गर्गाः क्षत्रोपेला द्विजातयः । माहार्यतनयश्चैव धीमानासीदुरक्षवः तस्य भार्या विशाला तु सुषुवे पुत्रकत्रयम् । घ्यूपण पुष्करिं चैव कवि चैव महायशाः उरक्षयाः स्मृता होते स ब्राह्मणताहनाः । काव्यानान्तु घरा होते त्रयः प्रोक्तामहर्षयः गर्गाः संस्तयः काव्याःक्षत्रोपेताद्विजातयः । संभृताहिरसो दक्षाःवृहत्क्षत्रस्यचक्षितिः वृहक्षत्रम्य दायादो हस्निनामा बभूव ह । तेनेदं निर्मितं पूर्व पुरन्तु गजसाहयम् ।। हस्तिनश्चैव दायादास्त्रयः परमकीर्तयः । अजमीढी हिमीढश्व पुस्मीदम्तथैव च ४३ यजमीढस्य पन्यस्नु तिनः फुल्युलोढहाः । नीदिनीधृमिनीचव केशिनी चैव विश्रुताः स तामु जनयामास पुत्रान् वै देववर्वप्तः । तपसोऽन्तमहातेजा जाता वृद्धम्यधार्मिपाः ऽध्यायः] * पूरुवंशवर्णनम् * भारद्धाजप्रसादेन विस्तरं तेपु मे शृणु । अजमीढस्य केशिन्यां कण्वः समभवत्किल ॥ मेधातिथिः सुतस्तस्य तस्मात्काण्वायना द्विजाः । अजमीहस्यभूमिन्यांजज्ञवृहदनुपः वृहदनोवृहन्तोऽथ वृहन्तस्य वृहन्मना । बृहन्मनः सुतश्चापि वृहद्धनुरिति श्रुतः ।।८।। बृहद्धनो हदिपुः पुत्रस्तस्य जयद्रथः । अश्वजित्तनयस्तस्य सेनजित्तस्य चात्मजः ॥ अथ सेनजितः पुत्राश्चत्वारो लोकविश्रुताः । रुचिराश्वश्चकाव्यश्च राजा द्वरथस्तथा । चासश्चावर्तको राजा यस्पैते परिवत्सकाः। रुचिराश्वस्य दायादःपृथुसेनो महायशाः पृथुसेनस्य पौरस्तु पोरानीपोऽथ जशिवान् । नीपस्यैकशतन्यासीत् पुत्राणाममितौजसाम् ॥ ५२ ॥ नीपा इति समास्याता राजानः सर्वएयते । तेपांवंशकर श्रीमान् नीपानां कीर्तिवर्द्धनः काव्याच समरो नाम मदेष्टसमरोऽभवत् । समरस्य पारसम्पारी सदश्व इति ते त्रयः पुत्राः सर्वगुणोपेता जाता चै विश्रुता भुवि । पारपुत्रः पृथुर्जात.पृथोस्तु सुकृतोऽभवत् जज्ञे सर्वगुणोपेतो विभ्राजस्तस्यचात्मजः । विभ्राजस्यतुदायावस्त्वगुहोनामवीर्यवान् बभूव शुकजामाता कृत्वीमा महायशाः । अणुहस्य तु दायादो ब्रहारत्तो महीपतिः ।। युगदत्तः सुतस्तस्य विष्वक्सेनो महायशाः । विभ्राजः पुनराजातो सुकृतेनेह कर्मणा विष्वक्सेनस्य पुत्रस्तु उदक्सेनो बभूव ह । भल्लाटस्तस्य पुत्रस्तु तस्यासीजनमेजयः उग्रायुधेन तस्याथै सर्वे नीपाः प्रणाशिताः ॥ ५६ ॥ ऋपय ऊचुः। उन्नायुधः कस्य सुतः कस्य वशे स कथ्यते । किमर्थतेनने नीपाः सर्येचच प्रणाशिताः सूत उवाच। उग्रायुधः सूर्यवंश्यस्तपस्तेपे वराश्रमे । स्थाणुभूतोऽष्टसाहस्रन्तं भेजे जनमेजयः ॥६१ तस्य राज्यं प्रतिध्रुत्य नीपानाजनिवान्प्रभुः । उवाचसान्त्वविविधं जन्नुस्तेवाभावपि हन्यमाना गतानूचे यस्मादेतोर्न मे पवः । शरणागतरक्षार्थ तस्मादेवं शामियः ॥ यदि मेऽस्ति तपस्तनं सर्वान्नयतु यो यमः । ततस्तान् कृप्यमाणांस्तु यमेन पुरतः स तु कृपया परयायिष्टो जनमेजयमचिवान् । गतानेतानिमान वीरांस्न्यं मे रक्षितुमर्हसि ।।
१३४ * मत्स्यपुराणम् * [ ऊनपञ्चाशत्तमो जनमेजय उवाच। अरे पापा! दुराचारा! भवितारोऽस्यकिङ्कराः । तथेत्युक्तस्ततोराजायमेनयुयुधेचिरम् व्याधिभिर्नारकैघोरैर्यमेन सह तान् वलात् । विजित्य मुनयेप्रादात्तदद्भुतमिवाऽभवत् ।। यमस्तुष्टस्ततस्तस्मै मुक्तिज्ञानं ददौ परम् । सर्वे यथोचितंकृत्वा जग्मुस्तेकृष्णमव्ययम् येपान्तु चरितं गृह्य हन्यन्ते नापमृत्युभिः । इह लोके परे चैव सुखमक्षय्यमश्नुते ॥६॥ अजमीढस्य धूमिन्यां विद्वाञ्जज्ञेयवीनरः । धृतिमांस्तस्य पुत्रस्तु तस्य सत्यधृतिस्मृतः अथ सत्यधृतेः पुत्रो दृढ़नेमिः प्रतापवान् ॥ ७० ॥ दृढ़नेमिनुतश्चापि सुधर्मा नाम पार्थिवः। आसीत् सुधर्मतनयः सार्वभौमः प्रतापवान् साव मेति विख्यातः पृथिव्यामेकराडूवभो । तस्यान्ववाये महति महापौरचनन्दनः ॥ महापोरवपुत्रस्तु राजा रुक्मरथः स्मृतः । अथरुक्मरथस्यासीत् सुपावोनामपार्थिवः सुपार्श्वतनयश्चापि सुमति म धार्मिकः । सुमतेरपि धर्मात्मा राजा सन्नतिमानपि ।। तस्यासीत् सन्नतिमतः कृतो नाम मुतो महान् । हिरण्यनामिनः शिप्यः कौशल्यस्य महात्मनः ॥ ७५ ॥ चतुर्विंशतिधा येनप्रोक्ता वै सामसंहिताः । स्मृतास्तेप्राच्यसामानाकार्तानामेहसामगाः फार्तिरुग्रायुधः सो चै महापौरववर्द्धनः । बभूव येन विक्रम्य पृथुकस्य पिता हतः ॥७७ नीलो नाम महाराजः पञ्चालाधिपतिर्वशी । उग्रायुधस्य दायादः क्षेमो नाम महायशाः क्षेमात् सुनीथः संजने सुनीथस्य नृपञ्जयः। नृपजयाय विस्थ इत्येते पोरवाः स्मृताः इति श्रीमत्स्यपुराणे पूरुवंशपर्णनं नाम ऊनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः । ।
।
पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
कुरुवंशवर्णनम् ।
सूत उवाच।
अजमीढस्य नीलिन्यां नीलः समभवन्नृपः । नीलस्य तपसोग्गेण सुशान्तिरुपपद्यत ॥१॥
पुरुजानुः सुशान्तेस्तु पृथुस्तु पुरुजानुनः । भद्राश्व पृथुदायादो भद्राश्वतनयान्णु ॥
सुद्गलच जयश्चैत्र राजा वृहदिषु स्तथा । यीनरश्च विशान्तः कपिलश्चय पञ्चमः ।।
पञ्चानाश्चैव पञ्चलानेतान् जनपदान् विदुः । पञ्चालं रक्षिणो ोतेदेशानामितिनः श्रुतम् ।
मुद्गलस्यापिमौद्गल्याः क्षत्रोपेता द्विजातयः । एने ह्यगिरस: पलं सथिताः काण्यमुद्गलाः
मुद्गलम्यसुतोजज्ञे अहिष्टासुमहायशाः । इन्द्रसेनःमुतस्तस्य विन्ध्याध्वस्तस्यचात्मजः।।
विन्ध्याश्वामिथुनं जज्ञ मेनकायामितिश्रुतिः । दिवोदासश्च राजपिरहल्याचयशस्विनी।
शरदतस्तु दायामहल्या सम्प्रस्यत । शतानन्दमृपिश्रेष्ठं तस्यापि सुमहातपाः ॥ ८॥
सुतः सत्यधृति म धनुर्वेदस्य पारगः । आसीत् सत्यधृतेः शुक्रममोघं धार्मिकस्य तु
स्कन्नं रेत: सत्यधृतेर्दृष्ट्वा चाप्सरमंजले । मिथुनं तत्र सम्भूतं तमिन् सरसिसम्भृतम् ॥
ततः सरसि तस्मिंस्तु क्रममाणं महीपतिः । दृष्ट्वा जग्राह रूपया शन्तनुमंगयां गतः ॥
एने शरदन.पुत्रा आख्याता गौतमाययः । अत ऊर्य प्रवक्ष्यामि दिवोदासस्ययप्रजाः।
दिवोदासस्य दायादो धर्मिष्ठो मित्रयुनुप। मैत्रायणावरः सोऽयमैत्रेयस्तुततःस्मृतः।
एनेवंश्यायतेः पक्षाः क्षत्रोपेतास्तु भार्गवाः । राजा चैद्यवरो नाममैत्रेयस्य सुतःस्तृतः॥
अथचद्यवरात् विद्वान् सुदासस्तस्यचात्मजः । अजमीढ-पुनांत क्षीणेवंशेनुसोमकः ॥
सोमकस्य मुतोजन्तुहते तस्मिन् शतं यी । पुत्राणामजमीढस्य सोमकस्य महात्मनः
महिनीवजमीढस्य धूमिनी पुत्रवर्धिनी । पुत्रामाये तपस्तेपे शतं वर्षाणि दुश्वरम् ॥१७
हुत्याग्नि विधिवत् सम्यक् पवित्रीतभोजना।
यग्निहोनग्रमेणध सा सुप्याप महानता ॥ १८ ॥
[पञ्चाशत्तमो * मत्स्यपुराणम् * तस्यां वै धूमवर्णायामजमीढः समीयिवान् । ऋक्षं सा जनयामासधूमवणं शताग्रजम् ऋक्षात् संवरणोजज्ञकुरुः संवरणात्ततः । यः प्रयागमतिक्रम्य कुरुक्षेत्रमकल्पयत् ॥२० कृष्यतस्तु महाराजो घर्षाणि सुवहन्यथ । कृष्यमाणस्ततः शकोभयात्तस्मै वरन्ददौ । पुण्यश्चरमणीयश्चकुरुक्षेत्रन्तु तत्स्तृतम् । तस्यान्ववायःसुमहान् यस्यनाम्नातुकौरवाः॥ कुरोस्तु दयिताः पुत्राः सुधन्वा जन रेवव । परीक्षिचमहातेजा प्रजनश्चारिमर्दनः ॥२३ सुधन्वनस्तुदायादःपुत्री मतिमतांवरः । च्यवनस्तस्य पुत्रस्तु राजा धर्मार्थतत्त्ववित् ॥ च्यवनस्य कृमिः पुत्र ऋक्षाजशे महातपाः। कृमेः पुत्रो महावीर्यः ख्यात इन्द्रसमो विभुः ॥ २५ ॥ चैद्योपरिचरी वीरो वसुर्नामान्तरिक्षमः । चेद्यो परिचराज गिरिका सप्त वै सुतान्॥ महारथो मगधराट् विश्रुतो यो वृहद्रथः । प्रत्यश्रयाः कुशश्चैव चतुर्थो हरिवाहनः ॥२७ पञ्चमश्च यजुश्चैव मत्स्यः कालीच सप्तमी । वृहद्रथस्य दायादः कुशाग्रो नामविश्रुतः ॥ कुशाग्रस्यात्मजश्चैव वृपभो नामवीर्यवान् । वृषभस्यतु दायादः पुण्यवान्नाम पार्थिवः पुण्यःपुण्यवतश्चैव राजासत्यधृतिस्ततः । दायादस्तस्य धनुपस्तस्मात् सर्वश्वजशिवान सर्वस्य सम्भवः पुत्रस्तस्माद्राजा वृहद्रथः । द्वै तस्य शकले जातेजरया सन्धितश्चसना जरया सन्धितो यस्माजरासन्धस्ततः । जेता सर्वस्य क्षत्रस्य जरासन्धो महाबलः ॥ जरासन्धस्य पुनस्तु सहदेवःप्रतापवान् । सहदेवात्मजःश्रीमान् सोमवित्स महातपाः॥ श्रुतवास्तु सोमादेर्मागधापरिकीर्तिताः । जह स्त्वजनयत् पुत्रं सुरथं नामभूमिपम् ।। सुरथस्यतु दायादो पीरो राजा चिदूरयः । विदूरथसुतश्चापि सार्वभौम इप्ति स्मृतः ॥ सार्वभौमात् जयत् सेनो रचिरस्तस्य चात्मजः । रविगत्तु ततो भौमस्त्वरितायुस्ततोऽभवत् ॥ ३६॥ अमोधनस्त्यायुसुनस्तस्माद्देयातिथिः स्मृतः । देवातियेस्तु दायादो दक्ष एप बभूव ह॥ भीमसेनस्तनोदक्षादिलीपस्तस्यचात्मनः । दिलीपम्यप्रतीरस्तुतस्यपुत्रास्त्रयःस्मृताः ॥ देपापिः शन्तनुश्चैव याहीकश्चयते प्रयः । याहीकम्य तु दायादाः सप्त पाठीश्वरानृप! देवापिम्नु धपध्यातः प्रजाभिरभवन् मुनिः ॥ ३६ ॥ ।
." ऽध्यायः] * कुरुवंशवर्णनम् * मुनय ऊचुः। प्रजाभिस्तु किमर्थं वै अपध्यातो जनेश्वरः । को दोपो राजपुत्रस्य प्रजामिःसमुदाहृतः सूत उवाच । फिलासीद्राजपुत्रस्तुकुष्टितं नाभ्यपूजयन् । भविष्यंकीर्तयिष्यामिशन्तनोस्तुनिबोधत ॥ शन्तनुस्त्वभवद्राजा विद्वान् सो ये महाभिषक् । इदं चोदाहरन्त्यत्र श्लोकं प्रति महाभिषक् ॥४२॥ यं यं कराभ्यां स्पृशति जीणं रोगिणमेवच । पुनर्युवा च भवति तस्मात्तं शन्तनुं विदुः तत्तस्य शन्तनुत्वं हि प्रजामिरिह कीर्त्यते । ततो वृणुत भार्यार्थ शन्तनुर्जाह्नवी नपः ॥ तस्यां देवव्रतं नाम कुमारं जनयद् विभुः। काली विचित्रवीर्य्यन्तु दासेयोऽजनयत् सुनम् ॥ ४ ॥ शन्तनोर्दयितंपुत्रं शान्तात्मानमकल्मपम् । कृष्णद्वैपायनो नाम क्षेत्रे वैचित्रवीर्यके । धृतराष्ट्रच पाण्डुञ्च विदुरं चाप्यजीजनत् । धृतराष्ट्रस्तुगान्धाऱ्या पुत्रानजनयत् शतम्॥ तेषां दुर्योधनः श्रेष्ठः सर्वक्षवस्य चै प्रभुः । माद्री कुन्ती तथा चैव पाण्डोर्भार्य वभूवतुः देवदत्ताः सुताः पञ्च पाण्डोरर्थेऽभिजशिरे । धर्माद्युधिष्ठिरो जज्ञे मारताच वृकोदरः।। इन्द्राद्धनञ्जयश्चैव इन्द्रतुल्यपराक्रमः । नकुलं सहदेवञ्च माव्यशिवाभ्यामजीजनत् ।।५० पञ्चैते पाण्डवेभ्यस्तु द्रौपद्या जज्ञिरेसुताः । द्रौपद्यजनयच्छ्रेष्ठप्रतिविन्ध्यंयुधिष्ठिरात्॥ श्रुतसेनं भीमसेनाच्छ तकीर्ति धनञ्जयात् । चतुर्थ श्रुतकर्माणं सहदेवादजायत ॥२॥ नकुलाच शतानीकं द्रोपदेयाः प्रकीर्तिताः । तेभ्योऽपरे पाण्डवेयाःपडेवान्येमहारथाः। हैडम्यो भीमसेनात्त पुत्रो जने घटोत्कचः । काशीबलरात्भीमाजसेवेसर्वगंसुतम्।। सुहोत्रं तनयं मादी सहदेवादस्यत । करेणुमत्यां चद्यायां निरमिनस्तुनाकुलिः ॥१०॥ सुभद्राया रथी पार्यादभिमन्युरजायत । योधेयं देवकीचैव पुत्रं यज्ञे युधिष्टिरात् ॥५६ अभिमन्योः परिक्षित्तु पुत्रः परपुरञ्जयः । जनमेजयः परिक्षितः पुत्रः परमधार्मिकः । ब्रह्माणं कल्पयामास सबै वाजसनेयकम् । स वैशम्पायनेनैव शतः किल महर्षिणा न स्थास्यतीहदुर्घटे ! तपैतद्वचनं भुवि । याचन् स्थास्यसि त्वं लोफेतावदेवप्रपत्म्यति [पञ्चाशत्तमो * मत्स्यपुराणम् * क्षत्रस्य विजयं ज्ञात्वा ततः प्रभृति सर्वशः । अभिगम्य स्थिताश्चैव नृपञ्च जनमेजयम्। ततः प्रभृति शापेन क्षत्रियस्य तु याजिनः । उत्सन्ना याजिनो यज्ञे ततः प्रभृति सर्वश! क्षत्रस्ययाजिन केचित् शापात्तस्यमहात्मनः । पौर्णमासेनहविषा इष्ट्वातस्मिन्प्रजापतिम् । स वैशम्पायनेनैव प्रविशन् पारितस्ततः ॥ ३२॥ परिक्षितः सुतः सो वै पौरखो जनमेजयः। द्विरश्वमेधमाहृत्य महावाजसनेयकः॥६३॥ प्रवर्तयित्वा तं सर्वमृपि वाजसनेयकम् । विवादे ब्राह्मणैः सार्धमभिशप्तो वनं ययौ ।। जनमेजयाच्छतानीकस्तस्माजशे स वीर्यवान् । जनमेजयः शतानीकं पुत्रं राज्येऽभिषिक्तवान् ॥ ६५ ॥ अथाश्वमेधेनतत शतानीकस्यवीर्यवान् । जोऽधिसोमकृष्णाख्यःसाम्प्रतंयो महायशाः॥ तस्मिन् प्रासति राष्ट्रतु गुप्माभिरिदमाहृतम् । दुरापं दीर्घसतं वै त्रीणि वर्षाणि पुष्कर धर्षद्वयं कुरुक्षेत्रे द्रुपद्वत्यां हिजोत्तमाः ॥ ६७ ।। मुनय ऊचुः। भविष्यं श्रोतुमिच्छामः प्रजानां लोमहर्षणे । पुरा किल यदेतद्वै व्यतीतं कीर्तितं त्वया येपुवै स्थास्यतेक्षत्रं उत्पत्स्यन्ते नृपाश्चये । तेपामायुः प्रमाणचनामतश्चैच तान्नृपान् ।। कृतयुगप्रमाणञ्च नेताद्वापरयोस्तथा । कलियुगप्रमाणञ्च गुगदोपं युगक्षयम् ॥ ७० ॥ मुखदुःसप्रमाणञ्च प्रजादोषं युगस्य तु । एतत्सर्व प्रसंरयाय पृच्छतां ब्रूहि नः प्रभो ॥ सूत उवाच। गथामे कीर्तितं पूर्व व्यासेनारिएकार्मणा । भाव्यं कलियुगश्चैव तथा मन्वन्तराणि च भनागतानिसाणि ध्रुवतोमे नियोधत । अत ऊध्वं प्रपश्यामि भधिप्या ये नृपास्तथा डेश्याकान्वये चंय परिये चान्वयेतथा । येपु संस्थास्यते तश्च ऐडेश्याफुकुलंशुभम् ॥ तान् सर्यान् फीर्तयिष्यामि भविष्य फथितान्नृपान् ॥ ७४ ॥ तेभ्योऽपरेऽपियेत्यन्योयुत्पत्म्यन्तेनृपाःपुनः । क्षमापारशवादास्तथान्येये मीश्वराः अन्धाशकाःपुलिन्दाधचूलिफायनास्तथा । फेवामीमायरायेचान्येम्लेच्छसम्भवाः। पव्यतः प्रवक्ष्यामि नामतधैव तान्नुपान् ।। ७६ ॥ ।
ऽध्यायः ] * अग्निवंशवर्णनम् * अधिसोमकृष्णश्चैतेषां प्रथमवर्ततेनृप । तस्यान्वयायेवक्ष्यामि भविष्येकथितान्नुपान्। अधिसोमकृष्णपुनस्तु विचक्षुर्भवितानृपः । गङ्गया तु हृते तस्मिन नगरे नागसाहये ।। त्यत्वा वियभुनगरंफौशाम्ब्यान्तुनिवत्स्यति । भविष्यातीसुतास्तस्यमहावलपराममाः भूरिज्येष्ठ सुतस्तस्यतस्यचित्ररथ.स्मृतः । शुचियश्चित्ररथात् वृष्णिमांश्चशुचियात् । वृष्णिमतःसुपेणश्चभविष्यतिशुचिर्नुपः । तस्मात् सुपेणात्भवितासुनीथोनामपार्थिवः । नृपात् सुनीथाभविता नृचक्षुःसुमहायशाः। नृचक्षुपस्तु दायादो भविता चै सुपीवलः सुसीबलसुतश्चापि भावी राजा परिष्णवः । परिप्णवसुतश्चापि भविता सुतपा नृप । मेधावी तस्य दायादोभविष्यति न संशयः । मेधाविनः सुतश्चापि भविष्यति पुरजयः उवामाव्यः सुतस्तस्य तिग्मात्मा तस्य चात्मजः । तिग्मात वृहद्रथी भाव्यो वसुदामा बृहद्रथात् ॥ ८ ॥ वसुदाम्न. शतानीको भविप्योदयनस्ततः । भविष्यते च दयनात् चीरो राजा वहीनर.॥ घहीनरात्मजश्चैव दण्डपाणिर्भविष्यति । दण्डपाणे निरामित्रो निरामित्रात्तु क्षेमका अत्रानुवंशश्लोकोऽयं गीतो चिप्रैः पुरातनैः । ब्रह्मक्षत्रस्ययो योनिशो देवर्षिसतत ] क्षेमकं प्राप्य राजानं संस्थास्यति कलौ युगे ॥ ८८ ॥ इप्येप पौरखो वंशो यथावदिह कीर्तित । धीमतः पाण्डुपुत्रस्य अर्जुनस्थ महात्मन. ) इति श्रीमत्स्यपुराणे पुरवंशवर्णन नाम पञ्चाशत्तमोऽध्यायः । + एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः अग्निवंशवर्णनम् । अपय ऊचुः। ये पूज्या स्युर्द्विजातीनामग्नय सत! सर्वदा । तानिदानी समाचक्ष्व तद्वंशं चानुपूर्वश. ॥
* मत्स्यपुराणम् * [एकपञ्चाशत्तमो सूत उवाच। योऽसायग्निरभीमानी स्मृतः स्वायम्भुवेऽन्तरे । ब्रह्मणो मानसः पुत्रस्तस्मात् स्वाहा व्यजीजनत् ॥ २॥ पावकं पचमानञ्चशुचिरग्निश्च यः स्मृताः । निर्मथ्यःपवमानोऽग्निवैद्युतः पाचकात्मजः ॥ शुचिरग्निःस्मृतःसौरः स्थावराश्चैवतेस्मृताः । पवमानात्मजो ह्यग्निहव्यवाहःसउच्यते पावकिः सहरक्षस्तु हव्यवाहमुखः शुविः । देवानां हव्यवाहोऽग्निः प्रथमो ब्रह्मणःसुतः सहरक्षः सुराणान्तु त्रयाणान्ते त्रयोऽग्नयः । एतेषां पुत्रपौत्राश्च चत्वारिंशत्तथैव च ॥ प्रवक्ष्ये नामतस्तान्वैप्रतिभागेन तान् पृथक् । पावनोलौकिको ह्यग्निःप्रथमोब्रह्मणश्चयः॥ ब्रह्मोदनाग्निस्तत् पुत्रोभरतो नाम विश्रुतः । वैश्वानरो हव्यवाहो वहन हव्यंममारसः॥ समृतोऽथर्वणः पुत्रो मथितः पुष्करोदधिः । योऽथर्वा लौकिको ह्यनिर्दक्षिणाग्निः स उच्यते ॥ ६ भृगोप्रजायताथ_ह्यगिराथर्वणःस्मृतः । तस्य लौकिकोह्यग्निदक्षिणाग्निःस वैस्मृतः अथय:पवमानस्तु निर्मथ्योऽग्निःस उच्यते । सव वैगार्हपत्योऽग्निः प्रथमोब्रह्मणस्मृतः ततःसभ्यावसथ्यौच संशत्यास्ती सुतावुभौ । ततः पोडशनद्यस्तु धकमे हव्यवाहनः । यः खल्वाहवनीलोऽग्निरभिमानी द्विजैः स्मृतः ॥ १२ ॥ कावेरी कृष्णवेणीञ्च नर्मदां यमुनां तथा । गोदावरी वितस्ताञ्च चन्द्रभागामिरावतीम्। विपाशा कौशिकीञ्चैव शतटू सरयूतथा । सीतां मनस्विनीञ्चैव ह्रदिनी पावनां तथा । तालुषोडशधात्मानं प्रविभव्य पृथक्पृथक् । तदानु विहरंस्तासु धिष्ण्येच्छासबभूवह स्वाभिधानस्थिता धिष्ण्यास्तासूत्पन्नाश्च धिप्णवः । धिष्पयेषु जज्ञिरे यस्मात् ततस्ते धिष्णवः स्मृताः ॥१६॥ इत्येते वै नदीपुत्रा धिष्ण्येषु प्रतिपेदिरे । तेषां विहरणीया ये उपस्थेयाश्च ताञ्णु विभुः प्रवाहणोनीऽनस्तत्रस्था धिष्णवोऽपरे ॥ १७ ॥ विहरन्ति यथास्थानं पुण्याहे समुपक्रमे । अनिर्देश्यानिवार्याणामग्नीनां गृणुत क्रमम् । पासवोऽग्निशानुर्योद्वितीयोत्तरयेदिकः । सम्राडग्निःसुतोयटायुपतिष्ठन्तिता द्विजाः।
ऽध्यायः] * अग्निवंशवर्णनम् * १४१ पर्जन्यःपाचमानस्तुद्वितीयासोऽनुदृश्यते । पावकोप्णःसमुह्यस्तुवोत्तरेसोऽग्निरुच्यते॥ हव्यसूदोह्यसंमृज्यः शामित्रः सविभाव्यते । शतधामासुधाज्योती रौद्रेश्वर्यःसदच्यते । ग्रह्मज्योतिर्वसुधामा ब्रह्मस्थानीय उच्यते । अजैकपादुपस्थेयः स वै शालामुस्टीयतः ।। अनिर्देश्योद्यहिबुध्नो घहिरन्ते तु दक्षिणी । पुत्राोते तु सर्वस्य उपस्थेयाद्विजैः स्मृताः ततोविहरणीयांस्तुवक्ष्याम्यष्टौतुतान् सुतान् । होत्रियस्यसुतो ह्यग्निर्वहिपो हव्यवाहनः प्रशस्योऽग्निःप्रचेतास्तुद्वितीयःसंसहायकः । सुतोद्यानेविश्ववेदाब्राह्मणाच्छंसिरुच्यते। अपांयोनिःस्मृतःस्वाम्भःसेतुर्नाम विभाव्यते । धिष्ण्याहरणाहोतेसोमैनेज्यन्तद्विजः ततो यः पावको नाम्ना यः सद्धियोग उच्यते । अग्निःसोऽवभृथेनेयोवरुणेन सहेज्यते हृदयस्य सुतो ह्यग्नेर्जठरेऽसौ नृणां पचन् । मन्युमान् जाठरश्चाग्निविद्धाग्निः सततं स्मृतः ॥२८॥ परस्परोत्थितो ह्यनिर्भूतानीह विभुर्दहन् । अग्नेर्मन्युतमः पुत्रो घोरः सम्वर्तकः स्मृतः पिधन्नग्निः स घसति समुद्रे घडवामुखे । समुद्रयासिनः पुत्रः सह रक्षो विभाव्यते॥३० सहरक्षस्तुकामानगृहसबसतेनृणाम् । कव्यादग्निः सुतस्तस्य पुरुपान्योऽत्तिमृतान् इत्येतेपायकस्याग्नेहिजे. पुत्राः प्रकीर्तिताः । ततः सुतास्तु सौवीर्य्याद्गन्धरसुरैह ताः मथितोयस्त्वरण्यान्तुसोऽशिरापसमिन्धनम् । आयुर्नाम्नातुभगवान पशौयस्तुप्रणीयते आयुषो महिमान्पुत्री दहनस्तु ततः सुतः । पाकयज्ञेप्यभीमानीहुनं हव्यं भुनक्ति यः॥ सर्यस्माद्देवलोकाच हव्यं कठ्यं भुनक्ति यः । पुत्रोऽस्य सहितो हाग्निरद्भुतःसमहायशाः प्रायश्चित्तेप्यभीमानी हुतंकन्यंभुनक्ति य. । अद्भुतस्य सुतो धीरो देवांशस्तुमहारमृतः विविधानिस्ततरतस्यतस्यपुत्रोमहाकविः । विविधाग्निमुतादादग्नयोऽटीसुताःस्मृताः काम्याखिटिप्वभीमानी रक्षोहायतित्ययः । मुरभिर्वमुमान्नादोहर्यश्व सोऽभवत्पुरा प्रवर्यः क्षेमवांश्चैव इत्यष्टौ च प्रकीर्तिताः । शुच्यानेस्तु प्रजाहोपा अग्नयश्च चतुर्दश ॥ इत्येते हामयः प्रोक्ताः प्रणीता ये हि वाध्वरं । समतीते तु सर्गे ये यामैः सहनुरोत्तमः स्वायम्भुपेऽन्तरे पूर्वमग्नयस्तेऽभिमानिनः । पते विहरणीयेषु चेतनाचेतनैयिह ॥४॥ स्थानाभिमानिनोऽग्नीध्राः प्रागासन्हव्यवाहनाः ।
२४२ * मत्स्यपुराणम् * [द्विपञ्चाशत्तमो काम्यनैमित्तिवाद्यास्ते ये ते कर्मस्वस्थिता ॥४॥ पूर्व मन्यन्तरेऽतीते शुक्रर्यामैश्च ते सह । एने देवगणे साद्धं प्रथमस्यान्तरे मनो ॥४३ इत्येता योनयो ह्यता स्थानारयाजातवेदसाम् ।स्वारोचिपादिपुशेया सवर्णान्तेपुसप्तपु तैरेवन्तु प्रसरयात साम्प्रतानागतेष्विह । मन्वन्तरेषु सर्वेषु लक्षण जातवेदसाम् ॥४५ मन्वन्तरेषु सर्वेषु नानारूपप्रयोजनै । वर्तन्ते वर्तमानश्च यामैर्देवै सहाग्नय ॥४६॥ अनागते सुरै साद्धं चत्स्यन्तो नागतास्त्वथ । इत्येष प्रचयोऽग्नीनामयामोतोयथाक्रमम् विस्तरेणानुपूर्व्या च किमन्यच्छ्रोतुमिच्छथ ॥४७॥ इति श्रीमत्स्यपुराणेऽग्निशवर्णननामैकपञ्चाशत्तमोऽध्याय । द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः कर्मयोगवर्णनम् । ऋषय ऊचु । इदानी प्राह यद्विष्णु पृष्ठ परममुत्तमम् । तमिदानी समाचक्ष्व धर्माधर्मस्य विस्तरम् । सूत उवाच । एवमेकार्णवे तस्मिन् मत्स्यरूपी जनार्दन । विस्तारमादिसर्गस्य प्रतिसर्गस्य चाखिलम् कथयामास विश्वात्मा मनवे सूर्यसूनवे । कर्मयोगञ्च साड्डयञ्च यथावद्विस्तरान्चितम् ऋपय ऊचु । श्रोतुमिच्छामहे सतकर्मयोगस्य लक्षणम् । यस्मादविदित लोके नकिञ्चित्तवसुव्रत सूत उवाच । कर्मयोगश्च वक्ष्यामि यथाविष्णुविभाषितम् । ज्ञानयोगसहस्राद्धि कर्मयोग प्रशस्यते कर्मयोगोट्य ज्ञान तस्मात्तत्परम्पदम् । कम्म ज्ञानोद्भव ब्रह्म नव ज्ञानमकर्मण ॥६॥ तस्मात्कर्मणियुक्तात्मातत्त्वमाप्नोतिशाश्वतम् । वेदोऽखिलोधनमूलमाचारश्चैवतद्धितम् अष्टावा मगुणास्तस्मिन् प्रधानत्वेन सस्थिता । दया सर्वेषु भूतेषु क्षान्तीरक्षातुरस्यव १ ॥ * कर्मयोगवर्णनम् * अनसूया तथा लोके शौचमन्तवहिडिजाः । अनायासेषु कार्येषु माङ्गल्याबारसेवनम् ॥ न च द्रव्येषु कार्पण्यमार्तेपूपार्जितेपु च । तथा स्पृहा परद्रव्ये परस्त्रीषु च सर्वदा ।१०। अष्टावात्मगुणाः प्रोक्ताःपुराणस्यनुकोविदः । अयमेव क्रियायोगो ज्ञानयोगस्यसाधकः कर्मयोगं बिना ज्ञानं कस्यचिन्नेह दृश्यते । श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममुपतिप्ठेत्प्रयत्नतः ॥ स्वतानां पितृणाञ्च मनुष्याणाञ्च सर्वदा । कुर्यादहरहर्यीभूतर्षिगणतर्पणम् ॥ १३ ॥ बाध्यायैरर्चयेचपीन होमविद्वान् यथाविधि । पितॄन् श्राद्धैरन्नदानभूतानिवलिकर्मभिः चैते विहिता यज्ञाः पञ्चसूनापनुत्तये । फण्डनी पेपणी चुल्ली जलकुम्भी प्रमार्जनी पश्चसूना गृहस्थस्य तेन स्वर्गे न गच्छति । तत्पापनाशनायामी पञ्चयज्ञाः प्रकातिता। द्वाविंशति तथाटी च ये संस्काराः प्रकीर्तिताः । तद्युक्तोऽपि न मोक्षाय यस्त्यात्मगुणवर्जितः ॥ १७ ॥ तस्मादात्मगुणोपेतः श्रुतिकर्म समाचरेत् । गोब्राह्मणानां वित्तेन सर्वदा भद्रमाचरेत्॥ गोभूहिरण्यवासोभिर्गन्धमाल्योदकेन च । पूजयेद् ब्रह्मविष्ण्वर्करदयस्पात्मकं शिवम् प्रतोपवासविधिवत् श्रद्धया च पिमत्सरः । योऽसावतीन्द्रियः शान्तः सश्मोऽव्यक्तः सनातनः ॥ पासुदेवो जगन्मूर्तिस्तस्य सम्भूतयो ह्यमी ॥ २० ॥ ब्रह्मा विष्णु भगवान् मार्तण्डो वृषवाहनः । भष्टौ च यसवम्तहदेकादशगणाधिपाः लोकपालाधिपालेश्च पितरो मातरम्तधा ॥ २१॥ इमा विभूतयः प्रोक्ताश्चरावरसमन्विताः 1 ग्रह्माद्याधतुरो मूलमन्यताधिपतिः स्मृतः ।। ब्रह्मणा चाय सूर्येण विष्णुनाथ शिवेन या । भभेटात्पूजिनेन म्यात्पूजितं सचराचरम् ब्रह्मादीनां परन्याम त्रयाणामपि संस्थिति.। वेदमूर्तायतः पूषा पूजनीयः प्रयत्नानः २४ तम्मादग्निद्विजमुपान् रत्या संपूजयेदिमान् । दानतोपवासश्च जपदोमादिना ना इति क्रियायोगपरायणम्य घेदानशास्त्रम्मृतिरन्सलन्य। विकर्मभातम्य सदा न फिशित् प्राप्तव्यमानीद परं च लोके ॥२६॥ इति धीमत्म्यपुगणे फर्मयोगवर्णनं नाम दिपचाशत्तमोऽध्यायः । -- ।
त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
पुराणसंख्यावर्णनम् ।
मुनय ऊचुः।
पुराणसङ्ख्यामाचक्ष्व सूत ! विस्तरशः क्रमात् । दानधर्ममशेपन्तु यथावदनुपूर्वशः ॥
सूत उवाच ।
इदमेव पुराणेपु पुराणपुरुषस्तदा । यदुक्तवान् स विश्वात्मा मनवे तन्नियोधत ॥२॥
मत्स्य उवाच।
पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम् । अनन्तरञ्चवक्त्रेभ्यो वेदास्तस्यविनिर्गताः
पुराणमेकमेवासीत् तदा कल्पान्तरेऽनघ । त्रिवर्गसाधनं पुण्यं शतकोटिप्रतिस्तरम् ॥४
निर्दग्धेषु च लोकेषु वाजिरूपेण वै मया । अङ्गानि चतुरो वेदाः पुराणं न्यायविस्तरम्
मीमांसां धर्मशास्त्रञ्च परिगृह्य मया कृतम् । मत्स्यरूपेण च पुनः कल्पादावुदकार्णवे
अशेपमेतत् कथितमुदकान्तर्गतेन च । श्रुत्या जगाद स मुनीन् प्रति देवान् चतुर्मुखः ॥
प्रवृत्तिः सर्वशास्त्राणां पुराणस्याभवत्ततः । कालेनाग्रहणं दृष्ट्वा पुराणस्य ततो नृप!
ध्यासरूपमहं कृत्वा संहरामि युगे युगे । चतुर्लक्षप्रमाणेन द्वापरे द्वापर सदा ॥ ६ ॥
तथाऽष्टादशधा कृत्वा भूलोकेऽस्मिन् प्रकाश्यते ।
अद्यापि देवलोकेऽस्मिन् शतकोटिप्रविस्तरम् ॥ १० ॥
तदर्थोऽत्र चतुर्लक्षं सक्षेपेण विशेषितम् । पुराणानि दशाशे च साम्प्रतं तदिहोच्यते ।
नामतातानि वक्ष्यामि श्णुध्वं मुनिसत्तमाः!। ब्रह्मणाभिहितं पूर्व यावन्मानं मरीचये ।
ब्राह्मन्निदशसाहस्रं पुराणं परिकीर्त्यते। लिखित्वा तच योदयाजलधेनुसमन्वितम् ॥
वैशाखपूर्णिमायाञ्च ब्रह्मलो महीयते ॥१३॥
एतदेव यथा पद्ममभूद्धरण्मयं जगत् । तद्वृत्तान्ताश्रयं तद्वत् पाद्ममित्युच्यते बुधैः ॥
पा तत् पञ्च पञ्चाशत् सहस्राणीह कथ्यते ॥१४॥
. ज्याय.] * पुराणसण्यावर्णनम् * नपुगणश्च थो पचात् सुवर्णकलशान्वितम् । ज्येप्टेमासि तिलयुक्तमश्वमेघफल लभेत् पाराहकल्पमत्तान्तमधिर-य पराशर । यत्प्राह धर्मानसिलान् तयुक्त वैष्णव विदु ॥ तदापाढे च यो दद्यात् धुतमेनुसमन्वितम् । पौर्णमास्याविपूतात्मा स पदयातिवारुणम् प्रयोविंशतिसाहस्र त प्रमाण विदुषुधा ॥१७॥ श्वेतकल्पप्रसङ्गेन धर्मान् वायुरिहारवीत् । यत्र तवायवीयस्यात् रुद्रमाहात्म्यसयुतम्। चतुर्यिशत्सहस्राणि पुराण तदिहोच्यते ॥१८॥ श्रावण्या धावणे मासि गुडधेनुसमन्वितम् । यो दद्यात् वृषसयुक्त ब्राह्मणायकुतुम्पिने शिवलोके स पूतात्मा करपमेक वसेजर ॥१६॥ यत्राधिरन्त्य गायनी पर्यते धर्मविस्तर । नासुरयधोपेत तद्भागवतमुन्यते ॥२०॥ सारस्वतस्य करपस्य मध्ये ये म्युनरोत्तमा । तवृत्तान्तोद्भव रोके तद्भागवतमुन्यते ।। लिखित्वा तय योदद्याद्धमसिंहसमन्वितम् । पौर्णमास्याप्रोष्ठपद्या स यातिपरमागतिम् अष्टादशसहस्राणि पुराण तत् प्रवक्षते ॥ २२॥ यवाह नारदो धर्मान् वृहत्करपाश्रयाणिच । पञ्चविंशत्सहस्राणि नारदीय तदुच्यते ॥ तदिद पञ्चदश्यान्तु दद्याद्धेनुसमन्वितम् । परमा सिद्धिमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभाम् ।। यनाधिरुत्य शकुनीन् धर्माधर्मविचारणा । व्यारयातामुनिप्रश्ने मुनिभिर्धर्मवारिभि ।। मार्कण्डेयेन कथित तत्सर्व विस्तरेण तु । पुराण नवलाहन मार्कण्डेयमिहोन्यते॥२६॥ प्रतिरित्यत्रयोदद्यात् सौवर्णकरिसयुतम् । कालिम्पापुण्डरीकस्ययज्ञस्यफलभाग्भवेत् यत्तदीशानक कल्प वृत्तान्तमधित्य च । पशिष्टायाग्निना प्रोक्तमाग्नेय तत्प्रचक्षते ॥ लिसित्वा तच यो दद्यादेमपद्मसमन्वितम् । मार्गशीया विधानेन तिलधेनुसमन्वितम तच पोडशसाहस्र सर्वपतुफलप्रदम् ॥ २६ ॥ यन्नाधिस्य माहात्म्यमादित्यस्यचतुर्मुस । अघोरकल्पवृत्तान्तप्रसङ्गेन अगस्थितिम् मनवे कथयामास भूतनामस्य र न् ॥ ३० ॥ चतुर्दशमहस्राणि तथा पञ्चशतानिच । भतिक चरितप्राय भविष्यन्तदिहोच्यते ॥३१॥ तत्पोपेमासियोदयात् पौर्णमास्यां विमत्सर गुडकुम्भसमायुक्तमग्निोमफलभवेत्॥
* मत्स्यपुराणम् * [त्रिपञ्चाशत्तमो रथन्तरस्यकल्पस्य वृत्तान्तमधिसत्य च । सायणि नारदाय कृष्णमाहात्म्यमुत्तमम् ॥ यत्र ब्रह्मवराहस्य चोदन्तं वर्णितं मुहुः । तदपादशसाहस्रं ब्रह्मवैवर्त्तमुच्यते ॥ ३४ ॥ पुराणं ब्रह्मवैवर्त यो दद्यान्माघमासि च । पौर्णमास्यां शुभदिने ब्रह्मलोके महीयते।।३५ यत्राग्निलिङ्गमध्यस्थः प्राह देवो महेश्वरः । धर्मार्थकाममोक्षार्थमाग्नेयमधिकृत्य च ॥ कल्पान्ते लैङ्गमित्युक्तं पुराणंब्रह्मणा स्वयम् । तदेकाशसाहस्रं फल्गुन्यायः प्रयच्छति ॥ तिलधेनुसमायुक्तं स याति शिवसाम्यताम् ॥ ३७ ॥ महावराहस्य पुनर्माहात्म्यमधिकृत्य च । विष्णुनाभिहितं क्षोण्यै तद्वाराहमिहोच्यते ॥ मानवस्य प्रसङ्लेन कल्पस्यमुनिसत्तमाः । चतुर्विशत्सहस्राणि तत् पुराण मिहोन्यते ॥ काञ्चनं गरुडं कृत्वा तिलधेनुसमन्वितम् । पोर्णमास्यां मधौदद्यात् ब्राह्मणायकुटुम्बिने । वराहस्य प्रसादेन पदमाप्नोति वैष्णवम् ॥ ४० ॥ यत्र माहेश्वरान्धर्मानधिकृत्य च पण्मुखः । कल्पे तत् पुरुषं वृत्तचरितैरुपवृहितम् । स्कन्दं नाम पुराणञ्च होकाशीति निगद्यते । सहस्राणि शतं चैकमिति मत्येषु गद्यते ॥ ४२ ॥ परिलिख्य च यो दद्याद्धेमशूलसमन्वितम् । शैवं पदमवाप्नोति मीने चोपागते र ।। त्रिविक्रमस्य माहात्म्यमधिकृत्य चतुर्मुखः । त्रिचर्गमभ्यधात्तञ्च चामनं परिकीर्तितम् । पुरा दशसाहस्त्रं कृमकल्पानुगं शिवम् । यः शरद्विषुवे दद्याद् वैष्णवं यात्यसौपद यत्र धर्मार्थकामानां मोक्षस्य च रसातले । माहात्म्यं कथयामाल कर्मरूपी जनार्दनः इन्द्रद्युम्नप्रसङ्गेन ऋषिभ्यः शक्रसन्निधौ । अष्टादशसहस्राणि लक्ष्मीकल्पानुषट्रिकम् ।। यो दद्यादयने कृम हेमकर्मसमन्वितम् । गोसहस्रप्रदानस्य फलं सम्प्राप्नुयान्नरः ॥४८ श्रुतीनां यत्र कल्पादौ प्रवृत्यर्थ जनार्दनः । मत्स्यरूपेण मनवे नरसिंहोपवर्णनम् ॥४६॥ अधिरत्याऽब्रवीत्सप्तकल्पवृत्तंमुनीश्वराः । तन्मात्स्यमितिजानीध्वं सहस्राणिवतुर्दश विषुवे हेममत्स्येन धेन्या चैव समन्वितम् । योदद्यात्पृथिवी तेन दत्ताभवतिचाखिला यदाचगारड़ेकल्पेविश्वाण्डात् गरुड़ोद्भवम् । अधिकृत्याऽब्रवीत्कृष्णोगारइंतदिहोच्यते तदष्टादशकञ्चैव सहस्राणीह पठ्यते । सौवर्ण हंससंयुक्तं यो ददाति पुमानिह ॥
-
ऽध्यायः]
* पुराणसंख्यावर्णनम् *
१४७
स सिद्धिं लभते मुख्यां शिवलोके च संस्थितिम् ॥ ५३ ॥
ब्रह्मा ब्रह्माण्डमाहात्म्यमधिसत्यापीत् पुनः । तच्चद्वादशसाहस्रं ब्रह्माण्डंद्विशताधिकम्
भविष्याणाञ्च कल्पानां श्रूयते यत्र विस्तरः । तदुब्रह्माण्डपुराणञ्च ब्रह्मणा समुदाहृतम्
यो दद्यात्तव्यतीपाते पीतोर्णायुगसंयुतम् । राजस्यसहस्त्रस्य फलमाप्नोति मानव. ॥
हेमयेन्वा युतं तच ब्रह्मलोकफलप्रदम् ॥ ६ ॥
चतुर्लक्षमिदं प्रोक्त ध्यासेनाद्गुनकर्मणा । मत्पितुर्मम पित्रा च मया तुभ्यं निवेदितम्॥
इह लोकहितार्थाय संक्षितं परमर्पिणा । इमद्यापि देवेषु शतकोटिप्रविस्तरम् ॥१८॥
उपभेदान् प्रवक्ष्यामि लोके ये सम्प्रतिष्ठिताः । पाद्म पुराणे तत्रोक्तं नरसिंहोपवर्णनम्
तचाष्टादशसाहस्रं नारसिंहमिहोच्यते ||६||
नन्दाया यत्र माहात्म्यं कार्तिकेयेन वर्ण्यते । नन्दीपुराणं तल्लोकराज्यातमिति कीयते
- यत्र शाम्यं पुरस्कृत्यभविष्येऽपिकथानकम् । प्रोच्यतेतन्पुनलोंके शाम्यमेतन्मुनित्रताः!
पुरातनस्य कल्पस्य पुराणानि विदुर्बुधा । धन्यं यशस्यमायुष्यं पुगणानामनुक्रमम् ॥
एवमादित्यसक्षा च तत्रैच परिगद्यते ॥६२॥
अष्टादशभ्यस्तु पृथक् पुराणंयत्प्रदिश्यते । विजानीध्यंद्विजश्रेष्टा !स्तदेतेभ्योविनिर्गतम्
पञ्चाङ्गानि पुराणेषु आख्यानकमिति स्मृतम् ।
सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणिच । वंशानुचरितञ्चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥६॥
ब्रह्मविष्ण्वदाणां माहात्म्यं भुवनस्यच । ससंहारप्रदानाञ्च पुराणे पञ्चवर्णके ॥६५॥
धर्मश्चार्थश्च कामश्च मोक्षश्चैवात्र कीय॑ते । सर्वेष्वपि पुराणेषु तद्विरुद्धञ्चयत्फलम् ।।
साधिकेषु पुराणेषु माहात्म्यमधिकं हरेः । राजसेपुच माहात्म्यमधिक ब्रह्मणोविदुः ।।
तहदग्नेश्च माहात्म्यं तामसेषु शिवस्यच । संकीर्णेषु सरस्वत्याः पितॄणाञ्च निगद्यते ॥
अष्टादश पुराणानि कन्या सत्यवतीसुत.। भारताप्यानमखिलचके तदुपहितम् ।
लक्षणेकेन यत् प्रोक्तं वेदार्थपरिवृहितम् ॥६६॥
चाल्मीकिना तु यत् प्रोक्तं रामोपारम्यानमुत्तमम् ।
ब्रह्मणाऽभिहितं यच्च शतकोटिप्रविस्तरम् ॥७॥
१४८ * मत्स्यपुराणम् । [चतु पञ्चाशत्तमो आहृत्य नारदायव तेन वाल्मीकये पुन । वाल्मीकिनाच लोकेषु धर्मकामार्थसाधनम् । एर सपादा पञ्चैते ल्क्षा म] प्रकीर्तिता ॥ ७१ ॥ पुरातनस्य कल्पस्य पुराणानि विदुधा । धन्य यशस्यमायुष्य पुराणानामनुक्रमम् । य पठेच्छृणुयाद्वापि स याति परमाङ्गतिम् ॥ ७ ॥ इद पवित्र यशसो निधान इद पितृणामतिबल्लभश्च । इदञ्च देवेप्वमृतायितञ्च नित्य त्विद पापहरञ्च पुसाम् ॥ ७३॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे पुराणसख्यावर्णन नाम त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय । चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्याय. नक्षत्रपुरुपं नाम व्रतकथनम् । सत उवाच। अत पर प्रवक्ष्यामि दानधर्मानशेषत । व्रतोपवाससयुक्तान् यथा मत्स्योदितानिह ॥१॥ महादेवस्य सवादे नारदस्य व धीमत । यथा वृत प्रवक्ष्यामि धर्मकामार्थसाधकम्॥ कैलासशिसरासीनमपृच्छनारद पुरा। त्रिनयनमनङ्गारिमनगाङ्गहर हरम् ॥३॥ नारद उवाच। भगवन् देव देवेशब्रह्मविष्ण्विन्द्रनायक।। श्रीमदारोग्यरूपायुर्भाग्यसौभाग्यसम्पदा सयुक्तस्तव विष्णोर्वा पुमान् भक्त कथ भवेत् ॥ ४ ॥ नारीघाविधवासर्पगुणसौभाग्यसयुता । क्रमान्मुक्तिप्रदन्देव ' किञ्चिद्धतमिहोच्यताम ईश्वर उवाच । सम्यक् पृष्टत्वयाब्रह्मन् । सर्वलोकहितावहम् । श्रुतमप्यत्र यच्छान्त्यै तव्रतशृणुनारद । नक्षत्रपुरष नाम व्रत नारायणात्मकम् । पादादि कुर्याहिधिवत् विष्णुनामानुकीर्तनम् ॥ प्रतिमा वासुदेवस्यमूलादिषु चार्चयेत् । चैत्रमास समासाद्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् ॥
ऽध्यायः]
* नक्षत्रपुरपं नाम व्रतम् *
मूले नमो विश्वधराय पादौ गुल्कावनन्ताय च रोहिणीषु ।
जङ्ग्रेऽभिपूज्ये वरदाय चैव द्वे जानुनी वाश्चिकुमार ऋश्ले॥६॥
पूर्वोत्तराषाढयुगे तयोरू नमः शिवायेत्यभिपूजनीयो ।
पूर्वोत्तराफल्गुनि युग्मके च मेढूनमः पञ्चशराय पूज्यम् ॥ १० ॥
कटि नमः शाधराय विष्णोः संपूजयेन्नारद ! कृत्तिकासु ।
यथाऽर्चयेत् भाद्रपदाहये व पार्श्वे नमः केशिनिपूदनाय ॥ ११ ॥
कुक्षिद्वयं नारद । रेवतीपु दामोदरायेत्यभिपूजनीयम् ।
ऋक्षेऽनुराधासु च माधवाय नमस्तथोरस्थलमेव पूज्यम् ॥ १२ ॥
पृष्ट धनिष्ठासु च पूजनीयमधीयविश्वंसकराय तच्च ।
धीशङ्खचक्रासिगदाधराय नमो विशापाठ भुजाच पूज्या ॥ १३ ॥
हस्ते तु हस्ता मधुसूदनाय नमोऽभिपूज्या इति कैटभारेः ।
पुनर्पसावङ्गुलिपूर्वभागाः साम्नामधीशाय नमोऽभिपूज्या ॥ १४ ॥
भुजङ्गनक्षत्रदिने नसानि संपूजयेन्मत्म्यशरीरभाज. ।
कृर्मग्य पादौ शरणं व्रजामि ज्येष्टासु कपठे हरिरर्चनीयः ॥ १० ॥
श्रीने वराहाय नमोऽभिपूज्या जनार्दनस्य श्रवणेन सम्यक् ।
पुष्पे मुसं दानवसूदनाय नमो नृसिंहाय च पूजनीयम् ॥ १६ ॥
नमोनमः कारणावामनाय म्यातीषु दन्ताग्रमथार्चनीयम् ।
आस्यं हरेर्भार्गवनन्दनाय सम्पूजनीय द्विजवारणे तु ॥ १७ ॥
नमोऽस्तु रामाय मधासु नासा सपूजनीया रघुनन्दनस्य ।
मृगोत्तमाते नयनेऽमिपूज्ये नमोऽस्तुते गमपिर्णिताक्ष! ॥ १८ ॥
युद्धाय शान्ताय नमो ललाटं विधासु संपूज्यतमं मुगरेः ।
शिरोऽभिपूज्यं भरणीपु विष्णोर्नमोऽस्तु विश्वेश्वर ! फल्किापिणे॥१६॥
आदान फेशाः पुरुषोत्तमस्य संपूजनीया हरये नमम्ने ।
उपोषिते नक्षदिनेषु भत्या संपूजनीया दिजपुगयाः म्युः ॥२०॥
१५०
** मत्स्यपुराणम् * [पचपचाशत्तमी
पूर्ण व्रते सर्वगुणान्विताय वागरूपशीलाय च सामगाय ।
हैमी विशालायतबाहुण्डां मुक्ताफलेन्दूपलवजयुक्ताम् ॥ २१ ॥
जलस्य पूर्ण कलशे निविष्टामची हरचनगवा सहैव ।
शख्या तथोपस्करभाजनादियुक्तां प्रदद्याद् द्विजपुङ्गवाय ॥ २२ ॥
यद्यस्ति यत्किञ्चिदिहात्ति देयं दद्याद् द्विजायात्महिताय सर्वम् ।
मनोरथं नः सफलीकुरुप्य हिरण्यगर्भाच्युत! रुद्ररूपिन् ! ॥ २३ ॥
सलक्ष्मीकंसभार्याय काञ्चनंपुरुषोत्तमम् । शय्यांच दद्यान्मन्त्रेण ग्रन्थिभेदविवर्जितम् ॥
यथा न विष्णुभक्तानां वृजिनं जायतेक्वचित् । तथा सुरूपतारोग्यंकेशवे भक्तिमुत्तमाम्॥
यथा न लक्ष्म्याशयनं तवशून्यंजनार्दन! शय्या ममाप्यशून्यास्तुकृष्ण! जन्मनिजन्मनि।।
एवं निवेद्य तत्सर्व वस्त्रमाल्यानुलेपनम् । नक्षत्रपुरुषाय विप्रायाथ विसर्जयेत् ॥२७॥
भुञ्जीतातैललवणं सर्वःप्वप्युपोषितः । भोजनञ्च यथाशक्त्या वित्तशाट्यं विवर्जयेत् ॥
इतिनक्षत्रपुरुषं उपास्यविधिवत् स्वयम् । सर्वान् कामानवाप्नोति विष्णुलोकेमहीयते ।।
ब्रह्महत्यादिकंकिञ्चिदिह चामुत्रवाकृतम् । आत्मना वाथ पितृभिस्तत्सर्व क्षयमाप्नुयात्
इति पठति शृणोति यश्च भक्त्या पुरुपवरो व्रतमड़नाऽथ कुर्यात् ।
कलिकलुपविदारणं मुरारेः सकलविभूतिफलप्रदञ्च पुंसाम् ॥३१॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे नक्षत्रपुरुषं नाम व्रतकथने चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।
.
पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
आदित्यशयनव्रतकथनम् ।
नारद उवाच।
उपचासेष्वशकस्य तदेव फलमिच्छतः । अनभ्यासेन रोगाद्वा किमिष्टं व्रतमुत्तमम् ॥१॥
ऽध्यायः] * आदित्यशयनवतम् * ईश्वर उपाय। उपवासेऽप्यशक्तानां नक्तं भोजनमिप्यते । यस्मिन् व्रते तदप्यत्र श्रूयतामक्षयं महत् २॥ आदित्यशयनं नाम यथावच्छङ्करार्चनम् । येषु नक्षत्रयोगेषु पुराणनाः प्रवक्षते ॥३॥ यदा हस्तेन सप्तम्यामादित्यस्य दिनं भवेत् । सूर्य्यस्य चाथ संक्रान्तिस्तिथिः सा सार्वकामिकी ॥ ४ ॥ उमामहेश्वरस्या_मर्चयेत् सूर्यनामभिः । सूर्याची शिवलिङ्गे च प्रकुर्वन् पूजयेद्यतः ॥ उमापतेरवेर्वापि न भेदोदृश्यते क्वचिन् । यस्मात्तस्मान्मुनिश्रेष्ट! गृहे शम्भु समर्चयेत् ॥ हस्ते च सूर्याय नमोऽस्तु पादाचर्काय चित्रानु च गुरफदेशम् । स्वातीषु जड्डे पुरुषोत्तमाय धात्रे विशापासु च जानुदेशम् ॥ ७॥ तथानुराधासु नमोऽभिपूज्यमूरद्वयञ्चय सहयभानोः । ज्येष्ठास्यनङ्गाय नमोऽस्तु गुह्यमिन्द्राय सोमाय फरीच मुले ॥ ८ ॥ पूर्वोत्तरापाढयुगे च नाभिन्त्यष्ट्रे नमः समतुरङ्गमाय । तीक्ष्णांशये च श्रवणे च कुक्षी पृष्टं धनिष्ठामु विकर्तनाय ॥ ६ ॥ चक्षुस्थलं ध्यान्तविनाशनाय जलाधिपः परिपूजनीयम् । पूवोत्तराभाद्रपदाद्वये च घाह नमश्चण्डफराय पूज्यों ॥ १०॥ साम्नामधीशाय फरदयञ्च संपूजनीयं द्विज ! रेवतीपु । नमानि पूज्यानि तथाम्धिनीपु नमोऽस्तु सप्ताश्यधुन्धराय ॥ ११ ॥ फठोरधाम्ने भरणीपु फण्ठं दिवाकरायेत्यमिपूजनीया । प्रीधानिक्षे धरमम्युजेशे संपूजयेन्नारद! रोहिणीषु ॥१२॥ मृगोत्तमाड़े दशना मुगरेः संपूजनीया हरये नमस्ते । नम सवित्रे रसना गरे च नासाभिपूम्या च पुनर्गसौच ॥ १३ ॥ ललाटमम्मोगदपलभाय पुष्पेलफायेदशरीग्धारिणे । शाऽय मालि पियुधप्रियाय मघामु फाणांपिनिगो गणेशे ॥१५॥ पूर्वानु गोग्राणपन्दनाय नेत्राणि माणग्यतमानि शम्मी।
* मत्स्यपुराणम् * [पञ्चपञ्चाशत्तमो अथोत्तराफल्गुनि भे भ्रवौ च विश्वेश्वरायेति च पूजनीये ॥१५॥ नमोऽस्तु पाशाङ्कुशशूलपद्मकपालसर्पन्दुधमुर्धराय । गजासुरानगपुरान्धकादिविनाशमूलाय नमः शिवाय ॥ १६ ॥ इत्यादि चास्त्राणि च पूज्य नित्यं विश्वेश्वरायेति शिरामिपूज्य । भोक्तव्यमत्रैवमतैलशाकममांसमक्षारमभुक्तशेषम् ॥ १७ ॥ इत्येवं द्विज! नक्तानि कृत्वा दद्यात्पुनर्चशी । शालेयतण्डुलप्रस्थमौदुम्बरमये घृतम् ॥१८॥ संस्थाप्य पात्रे विप्राय स हिरण्यं निवेदयेत् । सप्तमे वस्त्रयुग्मञ्च पारणे त्वधिकंभवेत् चतुर्दशे तु संप्राप्ते पारणे नारदाब्दिके । ब्राह्मणान् भोजयेत्या गुड़क्षीरघृतादिभिः ॥ कृत्वा तु काञ्चनं पद्ममष्टपत्रं सकर्णिकम् । शुद्धमष्टाङ्गुलं तच्च पद्मरागदलान्वितम् ॥२१ शय्यांविलक्षणांकृत्वा विरुद्धग्रन्थिवर्जिताम् । सोपधानकविश्रामस्वास्तरव्यजनानिच।। भाजनोपानहच्छत्रवामरासनदर्पणः । भूषणैरपिसंयुक्तां फलवस्त्रानुलेपनैः ॥ २३ ॥ तस्यां विधाय तत् पद्ममलङ्कृत्य गुणान्वितम् । कपिलां वस्त्रसंयुक्तां सुशीलाञ्च पयस्विनीम् ॥ २४ ॥ रौप्यखुरी हैमङ्गी सवत्सां फांस्यदोहनाम् । दद्यान्मन्त्रेण पूर्वाह्न नचैनामभिलयेत् यथैवादित्यशयनमशून्यं तव सर्वदा । कान्त्या धृत्या श्रिया रत्या तथा मे सन्तुसिद्धयः यथा न देवाः श्रेयांसं त्वदन्यमनघं विदुः। तथा मामुद्धराशेषदुःखसंसारसागरात् ॥ ततः प्रदक्षिणीकृत्य प्रणिपत्य विसर्जयेत् । शय्यागवादि तत्सर्व द्विजस्य भवनं नयेत्॥ नैतद्विशीलाय न दाम्भिकाय कुतर्कदुष्टाय विनिन्दकाय । प्रकाशनीय बतमिन्दुमौलेयंश्चापि निन्दामधिकां विधत्ते ॥२६॥ भक्ताय द्वान्ताय व गुह्यमेतदाख्येयमानन्दकरं शिवस्य । इदं महापातकभिन्नराणामप्यक्षरं वेदविदो वदन्ति ॥३०॥ नयन्धुपुत्रेण वलैवियुक्तः पत्नीमिरानन्दकः सुराणाम् । नाभ्येति रोगं न च शोकदुःखं या चाऽथ नारी कुरुतेऽतिभत्या ॥३१॥ इदं पसिष्टेन पुराऽर्जुनेन कृतं कुवेरेण पुरन्दरेण । .
उध्यायः] * कृष्णाष्टमीवतकथनम् * यत्कीर्तनेनाप्यपिलानि नाशमायान्ति पापानि न संशयोऽस्ति ॥३२॥ इति पठति शृणोति घा य इत्थं रविशयनं पुरुहुतवल्लभः स्यात् । अपि नरकगतान् पितृनशेपानपि दिवमानयतीह यः करोति ॥३३॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे थादित्यशयनव्रतकथनं नाम पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः । पट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः कृष्णाष्टमीव्रतकथनम् । श्रीभगवानुवाच । कृष्णाष्टमीमयो यक्ष्ये सर्वपापप्रणाशिनीम् । शान्तिनिधभवति जयः पुंसांविशेषतः शहरं मार्गशिरसि शम्भु पायेऽभिपूजयेत् । माथे महेश्वरं देवं महादेवच फाल्गुने ॥२॥ म्या' चे शियं तदशाये वर्चयेन्नरः । ज्येष्ठे पशुपति चार्चेदापगढ़े उनमर्चयेत् ॥३॥ पूजयेत् श्रावणे सर्व नमस्येश्यम्बकं तथा । हरमाश्वयुजे मासि तयेशानच कार्तिके प्राणायमीपुसानु शनःसम्पूजयेदुद्धिवान् । गोभूदिरण्यवासोमिः शिवमनानुपापिनः गोममधूनगोक्षीरतिलान् ययकुशोदकम् । गोलोदशिरीगर्कविल्वपत्रदधीनि च । पञ्चगव्यञ्च सम्माय शङ्करं पूजयेनिशि ॥६॥ अध्ययं च य योदुम्परं क्षमेव च । पलाशं जम्युवृक्षच विदुषश्च मदर्षयः ॥ ७ ॥ मार्गशोदिमामाभ्यां दाभ्यां द्वाभ्यामिनिझमान् । पफकदन्तपयनं पृप्येतेषु भक्षयन् देवाय दद्यादप च कृष्णानां कृष्णयाससम् । दद्यान्समाते दध्यग्नं विनानध्यतयामरम् द्विजानामुदकुम्मांध पचरासमन्धिनान् । गाय.या सुपर्णापासांसिविविधानिय भशनाम्नु पुनदंबादामेकामपि शनितः ॥३०॥ ग यिसम्पाट कुपीत कुर्वान्दोगमापात् । मनाएमीमुपोप्य साफगगनत्रयम् पुमान मापूजितो देयः शियलोके महागने , इति धीमाभ्ययुगणेशमाटमीवरायनं नाम कट्पशायनमायायः।
.
सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
रोहिणीचन्द्रशयनव्रतकथनम् ।
नारद उवाच।
दीर्घायुरारोग्यकुलाभिवृद्धियुक्त पुमान् भूपकुलायुत स्यात् ।
मुहुर्मुहुर्जन्मनि येन सम्यक् व्रत समाचक्ष्व तदिन्दुमौले । ॥१॥
श्रीभगवानुवाच ।
त्वया पृष्टमिद सम्यक् उक्तञ्चाक्षायकारकम् । रहस्य तव वक्ष्यामि यत्पुराणविदोविदु
रोहिणीचन्द्रशयन नामवतमिहोत्तमम् । तस्मिन्नारायणस्यया॑मर्चयेदिन्दुनामभि ॥३॥
यदा सोमदिने शुक्ला भवेत् पञ्चदशी क्वचित् । अथवा ब्रह्मनक्षत्र पोर्णमास्या प्रजायते
तदा स्नान नर कुर्यात् पञ्चगव्येन सर्पपै । आप्यायस्येति तु जपेत् विद्वानष्टशत पुन
शूद्रोऽपि परया भत्त्यापापण्डालापर्जित ! सोमाय घरदायाथ विष्णवे च नमोनम
कृतजप्य स्वभवनादागत्य मधुसूदनम् । पूजयेत् फरपुष्पैश्च सोमनामानि कीर्तयन् ।।
सोमाय शान्ताय नमोऽस्तु पादावनन्तधाम्नेति च जानुजये ।
ऊद्धयञ्चापि जलोदराय सपूजयेन्मेदमनन्तवाहवे ॥८॥
नमो नम कामसुखप्रदाय कटि शशाङ्कस्य सदार्चनीया ।
तथोदरञ्चाप्यमृतोदराय नाभि शशाङ्काय नमोऽभिपूज्या ॥६॥
नमोऽस्तु चन्द्राय मुराञ्च पूज्य दन्ता द्विजानामधिपाय पूज्या ।
हास्य नमश्चन्द्रमसेऽभिपूज्यमोष्ठी कुमुदन्तवनप्रियाय ॥१०॥
नासा च नाथाय वनौषधीना आनन्दभृताय पुनर्भुधौ च ।
नेत्रद्वय पशिनिभन्तधेन्दोरिन्दीवरश्यामकराय शोरे ॥११॥
नम समस्ताघरपन्दिताय कर्णद्वय दैत्यनिपूदनाय ।
ललाटमिन्दोरदद्धिप्रियाय केशा सुपुग्नाधिपते प्रपूज्या ॥१२॥
सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः] * रोहिणीवन्द्रशयनव्रतकथनम् * शिरः शशाङ्काय नमो मुरारेविश्वेश्वरायेति नमः किरीटिने । पद्मप्रिये रोहिणि नाम लक्ष्मी: सौभाग्यसौरयामृतवारकाये ॥१३|| देवीं च संपूज्य सुगन्धपुष्पैनवेद्यपुग्पादिभिरिन्दुपत्नीम् । सुप्त्वाऽय भूमी पुनरुत्थितेन स्नात्वा च विप्राय हविष्ययुक्तः ॥२४॥ देयः प्रभाते सहिरण्यवारिकुम्भो नमः पापविनाशनाय । संप्राश्य गोमूत्रममांसमसमक्षारमष्टावथ विशतिञ्च ॥ ग्रासान् पयः सर्पियुतानुपोग्य भुक्त्वेतिहासं शृणुयान मुहर्तम् ॥१५॥ कदम्पनीलोत्पलकेतकानि जातीसगेज शतपत्रिका च । अम्लानकुन्जान्यथ सिन्दुवार पुष्पं पुनारद ! मलिकायाः ।। शुभ्रञ्च विष्णोः करवीरपुष्पं श्रीचम्पकं चन्द्रमस प्रदेयम् ॥१६॥ धावणादिषु मासेषु क्रमादेतानि सर्वदा । यस्मिन्मासे प्रतादिः स्यात्तत्पुष्पैरर्चयेद्धरिम् । एवं संवत्सरं याचदुपास्य विधियन्नर. । प्रतान्ते शयनं दद्यात् दर्पणोपस्करान्घितम् ॥ रोहिणीचन्द्रमिथुनं कारयित्वाऽथ काञ्चनम् । चन्द्रः पडङ्गुल कार्यों रोहिणी चतुरझुला मुक्ताफलाष्टकयुतं सितनेत्रपटावृतम् । श्रीकुम्भोपरि पुन, कास्यपात्राक्षतान्वितम् ॥ दद्यान्मन्त्रेण पूर्वाह शालीक्षुफलसयुतम् ॥ २० ॥ श्वेतामथ सुपर्णास्यां पुरैरोप्ये. समन्विताम् । समस्त्रभाजनाधेनुंतथाशयशोभनम् भूषणजिदाम्पत्यमलत्य गुणान्वितम् । चन्द्रोऽहं द्विजरूपेण सभाये इतिफल्पयेत यथा नरोहिणीरप्णशय्यासन्त्यन्यगच्छति । सोमम्पस्यनेतन्ममाभेदोऽस्तुभूतिभिः यथा त्वमेव सर्वेषां परमानन्दमुक्तिदः । भुक्तिमुक्तिम्तया भक्तिस्त्वयि चन्द्रास्तु मेसदा संसारभीतम्य मुक्तिकामम्य चानघ पारोग्यायुषामेतद्विधायकमनुत्तमम् ।२०॥ इदमेव पितॄणां च सर्वदा घलभं मुने !' त्रैलोमाधिपतिर्भूत्या सप्तफापशनप्रयम् ॥ चन्द्रलोकमवाप्नोति विद्युद्ध भूत्या तु मुच्यते ॥ २६॥ नारी या रोहिणीवन्दशयनं या समाचरेत् । साऽपितत्फलमानोति पुनरावृत्तिदुर्लभम् इति पठति शृणोति पा य इत्यं मधुमथनार्चनमिन्दुफीर्तनेन नित्यम् । ।
* मत्स्यपुराणम् * [अष्टपञ्चाशत्तमो मतिमपि च ददाति सोऽपि शोरभवनगतः परिपूज्यतेऽमरोः ॥ २८ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे रोहिणीचन्द्रशयनवतकथनं नाम सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः । अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः तड़ागारामकूपादीनां प्रतिष्ठाविधिवर्णनम् । सूत उवाच । जलाशयगतं विष्णुमुवाव रविनन्दनः । तदागारामकृपानां वापीषु नलिनीषु च ॥ १॥ विधि पृच्छामि देवेश ! देवतायतनेषु च । के तत्र चत्विजोनाथ! बेदी वा कीदृशीभयेत दक्षिणावलयः कालः स्थानमाचार्यएयच । द्रव्याणिकानि शस्तानिसर्वमावक्ष्यतत्त्वत, मत्स्य उवाच । शृणुराजन्महावाहो' तडागादिषुयो विधि । पुराणेवितिहासोऽयं पठ्यतेवेद्यादिभि प्राप्य पक्षं शुभं शुक्लमतीते चोत्तरायणे । पुण्येऽहि विप्रकथिते कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् ॥ प्रागुदप्रवणे देशे तडागस्य समीपतः । चतुर्हस्तां शुभां वेदि चतुरस्रां चतुर्मुखाम् ।। तथा पोडशहस्त स्थानमण्डपश्च चतुर्मुख. । वेद्याश्च परितोगर्ता रनिमात्रास्ति मेखला. नव सप्ताथ वा पञ्च नातिरिक्ता नृपात्मज !! वितस्तिमात्रा योनिः स्यात् षट्सप्ताङ्गुलिविस्तृता ॥ ८ ॥ गश्चितन्त्र शस्तास्युस्त्रिपर्वोच्छ्रितमेखला.। सर्वतस्तुसवर्णा स्युःपताकाध्वजसंयुताः अश्वत्थोदुम्बरप्लक्षवटशाखाहतानि तु । मण्डपस्य प्रतिदिशं द्वाराण्येतानि कारयेत् ॥ शुभास्तत्राट होतारोद्वारपालास्तयाट वै । अष्टौ तु जापका कार्या'ब्राह्मणावेदपारगाः सर्वलक्षणसम्पूर्णो मन्त्रविद्विजितेन्द्रियः । कुलशीलसमायुक्तः पुरोधास्याद्विजोत्तमः प्रतिगर्तेषु कलशा यज्ञोपकरणानि च । व्यञ्जनश्चामरे शुभ्रे ताम्रपात्रे सुविस्तृते ॥ १३॥ ततस्त्वनेकवर्णाः स्युश्वरवः प्रतिदैवतम् । आवार्यः प्रक्षिपे मावनुमन्न्य विचक्षणः ऽध्यायः] * तडागप्रतिष्ठाविधिवर्णनम् । ध्यरतिमात्रोयूप.स्यातक्षीरवृक्षविनिर्मितः । यजमानप्रमाणोवासंस्थाप्योभूतिमिच्छता हेमाटङ्कारिणः कार्याः पञ्चविंशति ऋत्विजः । कुण्डलानिचईमानि केयूरफटकानिय तथाङ्गुलयः पवित्राणिचासांसिविविधानिच । पूजयेत्तु समंसर्वानाचार्या द्विगुणंपुनः दद्याच्छयनसंयुक्तमात्मनश्चापि यत् प्रियम् । सौवर्णकर्ममकरी राजती मत्स्यदुन्दुभी ताम्रो कुलीरमण्डकावायसः शिशुमारकः । एवमासाद्य तत्सर्वमादावेव विशाम्पते ! ।। शुलमाल्याम्बरधरः शुक्लगन्धानुलेपनः । सर्वोपध्युदकैस्तत्र नापितो चेदपारगः ॥१६॥ यजमानः सपत्नीकः पुत्रपौत्रसमन्वितः । पश्चिमं द्वारमासाद्य प्रविशेद्यागमण्डपम् ।। ततो मङ्गलशब्देन भेरीणां निस्वनेन च । अञ्जसा मण्डलं कुर्य्यात् पञ्चवर्णेन तत्त्ववित् पोडशारन्ततश्चकं पद्मगर्भ चतुर्मुखम् । चतुरस्नञ्च परितो वृत्तं मध्ये सुशोभनम् ॥२२॥ वेद्याश्योपरि तत् सन्या ग्रहान् लोकपतींस्ततः । सन्यसेन्मन्त्रतः सर्वान् प्रतिदिक्षु विचक्षणः ॥ २३ ॥ कर्मादि स्थापयेन्मध्ये वारुण्यां मन्त्रमाश्रितः । ब्रह्माणञ्चशिविष्णुं तत्रयस्थापयेयुधः विनायकञ्च विन्यस्य कमलामम्बिका तथा । शान्त्यर्थसर्वलोकानां भूतग्राम न्यसेत्तत. पुष्पभक्ष्यफलयुक्तमेवंन्याऽधिवासनम्। कुम्भान्सजलगर्भास्तान्वासोभिःपरिवेशयेत् पुष्पगन्धरलड्कृत्य द्वारपालान् समन्ततः । पटध्यमिति तान् ब्रूयादाचार्यस्न्यभिपूजयेत् यह ची पूर्वतः स्थाप्या दक्षिणेन यजुर्विी 1 सामगो पश्चिमे तद्वदुत्तरेण त्वथर्वणी ।। उदमुखी दक्षिणतो यजमान उपाधिशेत् । यजध्यमितितान्यूयाद हाँत्रिकान्पुनरेव तु उत्राणान् मन्त्रजापेन तिष्ठचमिति जापकान् । एवमादिश्य तान् सर्वान् पर्युक्ष्याग्निं स मन्त्रविन ॥ ३० ॥ जुयाद्वारणमन्नराज्यं च समिधस्तथा । मृत्यिभिधाय होतव्यं यामणरेव सर्गतः प्रदेभ्यो विधिपद्न्यातधेन्द्रायेश्वराव च। मगदुभ्योटोकपालेभ्योविधिय विश्वकर्मणे रात्रिसूनच रौद्रश्च पायमानं सुमङ्गलम् । जपेयुः पार सून पूर्वतो यह बाः पृथयः ॥ शाम रोदश्च सौम्यंच कृमाण्डं जातरेदसम् । सीपमून जन्मिन्नं दक्षिणेन यजुर्विदः राज्य पार सून. सावणे रुद्रमहिनाम् । शैशवं पक्ष निधनं गायत्रं ज्येष्टसाम च।
* मत्स्यपुराणम् * [अष्टपञ्चाशत्तमो वामदेव्यं वृहत्साम रौरवं सरथन्तरम् । गवां व्रतं च काण्वञ्च रक्षोनं वयसस्तथा ॥ गायेयुः सामगा राजन् ! पश्चिमं द्वारमाश्रिताः ॥ ३६ ।। अथर्वणश्चोत्तरतः शान्तिकं पौष्टिकं तथा । जपेयुर्मनसा देवमाश्रित्य घरुणं प्रभुम् ॥ पूर्वद्याभितो रानावेवं कृत्वाधिवासनम् । गजाश्वरथ्यावल्मीकात् सङ्गमाद्धदगोकुलाल मृदमादाय कुम्भेषु प्रक्षिपञ्चत्वरात्तथा ॥ ३८ ॥ रोचनाञ्च ससिद्धार्था गन्धं गुग्गुलमेव च । नपनं तस्य कर्तव्यं पञ्चमङ्गसमन्वितम् ॥ प्रत्येकन्तु महामन्त्रैरेवं कृत्वा विधानतः । एवं क्षपातिबाह्याथ विधियुक्तेन कर्मणा ॥ ततः प्रभाते विमले सातेऽथ शतं गवाम् । ब्राह्मणेभ्यः प्रदातव्यमष्टपष्टिश्च चा पुनः ॥ पञ्चाशद्वाथ पत्रिंशत् पञ्चविंशतिरप्यथ ॥४१॥ ततः साम्यत्सरप्रोक्ते शुभे लाने सुशोभने । वेदशब्दश्च गान्धर्वैर्चाद्यैश्च विविधैः पुनः ॥ कनकालमृतां कृत्वा जले गामवतारयेत् । सामगाय च सा देया ब्राह्मणायविशाम्पते पात्रीमादाय सौवर्णी पञ्चरत्नसमन्विताम् । ततो निक्षिप्य मकरमत्स्यादींश्चैव सर्वशः धृतां चतुर्विधैविप्रर्वेदवेदाङ्गपारगः ॥ ४५ ॥ महानदीजलोपेतां दध्यक्षतसमन्विताम् । उत्तराभिमुखीं धेनुं जलमध्ये तु कारयेत् ४५ आथर्वणेन संस्नातां पुनर्मामेत्यथेति च ।आपोहिष्ठेति मन्त्रेण क्षिप्त्वाऽऽगत्य च मण्डलम् पूजयित्वा सरस्तत्र वलिं दद्यात् समन्ततः । पुनदिनानि होतव्यं चत्वारि मुनिसतमाः! चतुर्थी फर्म कर्तव्यं देया तत्रापि शक्तितः । दक्षिणा राजशार्दूल ! घरुणक्ष्मापनं ततः ।। सत्या तु यापात्राणि यमोपफरणानि च । ऋत्विाभ्यस्तु समंदत्त्वामण्डपं विमजेत्पुनः हेमपात्रीच शय्याञ्च स्थापकाय निवेदयेत् ॥ ४६॥ ततः सहनं विमाणामयवाटशतं तथा । भोजनीयं यथाशक्ति पञ्चाशद्वाथ विंशतिः ॥ एयमेषु पुराणेषु तडागविधिकच्यते ॥ ५० ॥ कृपयापीपु सासु तथा पुष्करिणीषु च । एष एव विधिपः प्रतिष्ठासु तथैव च ॥ मन्यतस्तु विशेष: स्यात् प्रसादोद्यानभूमिपु । अयन्त्वशक्तावन विधिएः म्ययम्भुपा मल्पेयेफासिवलत्या वित्तशाट्याने नृणाम् ॥५२॥ .
. ऽध्यायः] * पादपोद्यापन विधिवर्णनम् * प्रावृट्काले स्थिते तोये ह्यग्निष्टोमफलं स्मृतम् । शरत्काले स्थितं यत् स्यात् तदुक्तफलदायकम् । चाजपेयातिरात्राभ्यां हेमन्त शिशिर स्थितम् ।। ५३ ॥ अश्वमेधसमं प्राह वसन्तसमयेस्थितम् । ग्रीष्मेऽपि तत् स्थितन्तोयं राजसूयाद्विशिष्यते एतानमहाराज ! विशेषधर्मान् करोति योऽप्यागमशुद्धबुद्धिः । स याति रद्वालयमाशु पूतः करपाननेकान् दिवि मोदते च ॥ ५५ ॥ • अनेकलोकान् स महत्तमादीन भुक्त्वा परार्द्धद्वयमङ्गनाभिः । सहय विष्णोः परमम्पदं यत् प्राप्नोति तयागफलेन भूयः ॥ ५६ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे तड़ागारामकृपादीनां प्रतिष्ठाविधिवर्णनं नामाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः . ऊनपष्टिततमोऽध्यायः पादपोद्यापन विधिवर्णनम् । ऋपय ऊचुः। पादपानां विधि सूत ! ययावद्विस्तरावद । विधिना केन कर्तव्यं पादपोद्यापनं बुधैः ।। ये व लोकाः स्मृतास्तेपान्तानिदानी पदस्व नः ॥ १॥ सूत उवाच। पादपानां विधि वक्ष्ये तथैवोद्यानभूमिपु । तडागविधिवत् समासाद्य जगदीश्वर! ऋत्विमण्डपसम्भारश्चाचार्यश्चैव तद्विधः । पूजयेत् ब्राह्मणांस्तद्धमयम्ञानुलेपन ॥३॥ सर्वोषध्युदकै सिक्तानपिष्टातकविभूषितान् । वृक्षान्माल्यैरलऋत्य चासोभिरभिवेटयेत् सूच्या सांघर्णया कार्य सर्वेषां कर्णवेधनम् । अञ्जनञ्चापि दातव्यं तदमिशलाकया । फलानि सप्त चाटीवाकालधौतानिकारयेत् । प्रत्येकंसर्ववृक्षाणां वेद्यान्तान्यधिवासयेत् धूपोऽत्रगुग्गुल श्रेष्ठ ताम्रपानरधिप्टिनान्।सन्धिान्यस्थितानसत्वायम्यगन्धानुलेपनेः १६० है मत्स्यपुराणम् है [पष्टितमा कुम्भान् सर्वेषु वृक्षेषु स्थापयित्वानरेश्वर !। सहिरण्यानशेषांस्तान्मृत्वावलिनिवेदनम् यथास्वं लोकपालानामिन्द्रादीनांविशेषतः । वनस्पतेश्च विद्वद्भिहोमः कार्योंद्विजातिभिः ततः शुक्लाम्बरधरां सीवर्णरतभूपणाम् । सकांस्पदोहां सौवर्णशृङ्गाभ्यामतिशालिनीम् पयस्विनी वृक्षमध्यादुत्यजेत् गामुदङ्मुखीम् ॥ १० ॥ ततोऽभिषेकमन्त्रेण वाद्यमङ्गलगीतकैः । ग्यजुःसाममन्त्रैश्च वारुणैरभितस्तथा ॥ तैरेव कुम्भः सपनं कुर्यात् ब्राह्मणपुङ्गवः ॥ ११ ॥ स्नातः शुक्लाम्बरस्तद्रयजमानोऽभिपूजयेत् । गोभिर्विभवतःसर्वानऋत्विजस्तान्समाहितः हेमसूत्रः सकटकरडलीयपवित्रकः । घासोभिः शयनीयश्च तथोपस्करपादुकैः ।। क्षीरेण भोजनं दद्याद्यावद्दिनचतुष्ट्रयम् ॥ १३ ॥ होमश्च सर्पपैः कार्योयवैः कृष्ण तिलैस्तथा । पलाशसमिधः शस्ताश्चतुर्थेऽह्नितथोत्सवः दक्षिणा व पुनस्तद्वद्देया तत्रापि शक्तितः ॥ १४ ॥ यद्यदिष्टतमं किञ्चत् तत्तद् दद्यादमत्सरी । आचार्य द्विगुणं दद्यात्मणिपत्य विसर्जयेत् । अनेन विधिना यस्तु कुर्यात् वृक्षोत्सवं वुधः । सर्वान्कामानवाप्नोतिफलञ्चानन्त्यमश्नुते यश्चैकमपि राजेन्द्र !वृक्षसंस्थापयेन्नरः । सोऽपिस्वर्गवसेद्राजन् ! यावदिन्द्रायुतत्रयम्. भूतान् भव्यांश्च मनुजांस्तारयेद्रुमसंमितान् । परमां सिद्धिमाप्नोतिपुनरावृत्तिदुर्लभाम् य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद्वापि मानवः । सोऽपि संपूजितो देवैर्ब्रह्मलोके महीयते ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे पादपोद्यापनविधिवर्णनं नामोनपटितमोऽध्यायः । पष्टितमोऽध्यायः सौभाग्यशयनव्रतकथनम् । मत्स्य उवाच। तथैवान्यत् प्रवक्ष्यामि सर्वकामफलप्रदम् । सौभाग्यशयनं नाम यत्पुराणपिदोविदुः ॥ पुरा दग्धेषु लोकेषु भूर्भुवःस्वमहादिषु । सौभाग्यं सर्वभूतानामकस्थमभवत्तदा ।
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ऽध्यायः]
* सौभाग्यशयनव्रतकथनम् *
वैकुण्ठं स्वर्गमासाद्य विष्णोर्यक्षस्थलस्थितम् ॥२॥
तत. कालेन महता पुनः सर्गविधौ नृप !! अहङ्कारावृते लोके प्रधानपुरपायिते ॥३॥
स्पर्धायाच प्रवृत्तायां कमलासनहष्णयोः । लिङ्गाकारासमुद्भूता पहचालातिभीषणा
तयामिततस्य हरेर्यक्षसस्तहिनिःसृतम् ॥ ४ ॥
पक्षस्थलंसमाश्रित्यविष्णोःसौभाग्यमास्थितम् । रसरूपन्ततोयावत्प्राप्नोतिवसुधातलम्
उत्क्षिप्तमन्तरिक्षे तद्ब्रह्मपुत्रेण धीमता ।
दक्षेण पीतमानन्तद्रूपलावण्यकारकम् ॥ ६ ॥
वलं तेजो महज्जातं दक्षस्य परमेटिनः । शेषं यदपतभूमाघष्टधा समजायत ॥ ७ ॥
ततोजनानांसाताःसप्तसौभाग्यदायका । इक्षपोरसराजाश्चनिपावाजानिधान्यकम्।
विकारयश्च गोक्षीरं फुसुम्भं कुड्डुमं तथा । लयणं चाष्टमन्तद्वन सौभाग्याएकमुच्यते ॥
पीतं यत् ब्रह्मपुत्रेण योगज्ञानविदा पुनः । दुहिता साऽभवत्तस्य या सतीत्यभिधीयते ।
लोकानतीत्य लालित्यात् ललिता तेन चोच्यते ।
त्रैलोक्यसुन्दरीमेनामुपयेमे पिनाकधृक् ॥ ११ ॥
यादेवीसामाग्यमयी भुक्तिमुनिफलप्रदा। तामाराध्य पुमानभनयानारीवाक्निविन्दति
मनुरचाच।
फयमाराधनं तस्या जगद्धाच्या जनार्दन । तद्विधान जगन्नाथ तत सर्वच पदम्य में।
मत्म्य उपात्र।
पसन्तमासमासाद्य तृतीयायां जनप्रिय!। शुक्लपक्षम्य पूर्या तिट सानं समाचरेत् ।।
तस्मिनहनि सादेवी फिल विश्वात्मना सती ! पाणिग्रहणकर्मन्प्रेरयसहस्पणिनी ॥१५॥
तया सहव देवेश तृतीयायामथार्चयेन । फलनानाविध पदोपनवेद्यमंयुन' ॥ १६ ॥
प्रतिमा पचगव्येन तथा गन्धोदन नु । मापरित्वाऽचंयेत् गौरीमिन्दुशेगरमंयुताम्।।
नमोऽस्तुपाटलायतुपादोदेव्या:शिवम्यतु । शिवायेतिचनपी जयापैगुल्फोहयोः ।।
त्रिगुणाति दाय भवान्ये जोयुगम् । शियां म्देश्यरायै च पिजपापति जानुनी ।
सदीय हरिपेशाप तयार पादे नमः ॥ १६ ॥
[पष्टितमो * मत्स्यपुराणम् ईशायैच कटिं देव्याः शङ्करायेति शङ्करम् | कुक्षिद्वयञ्च कोटव्य शूलिने शूलपाणये ॥२० मङ्गलायै नमस्तुभ्यमुन्दरं चाभि पूजयेत् । सर्वात्मने नमो रुद्रमीशान्यैच कुचद्वयम् ॥ शिवं वेदात्मने तद्रुद्राण्यै कण्ठमर्चयेत् । त्रिपुरनाय विश्वेशमनन्तायै करद्वयम् ॥२२॥ त्रिलोचनाय च हरं बाहुकालानलप्रिये । सौभाग्यभवनायेति भूपणानि सदार्चयेत् । स्वाहा स्वधायै च मुखमीश्वरायेति शूलिनम् ॥ २३ ॥ अशोकमधुवासिन्यै पूज्यावोष्ठी च भूतिदौ । स्थाणघेतु हरं तद्वद्धास्यं चन्द्रमुखप्रिये । नमोऽर्द्धनारीशहरमसिताङ्गीति नासिकाम् । नम उपाय लोकेशं ललितेति पुनर्भुवौ ॥ शर्वाय पुरहन्तारं घासव्यतु तथालकान् । नमः श्रीकण्ठनाथाय शिवकेशांस्ततोऽर्चयेत् भीमोग्रसमरूपिण्यै शिरः सर्वात्मने नमः ॥ २६ ॥ शिवमभ्यर्च्यविधिवत्सौभाग्याष्टकमग्रतः । स्थापयेद् धृतनिष्पावकुसुम्भक्षीरजीरकान् । रसराजञ्च लवणं कस्तुम्बरमथाष्टकम् । दत्तं सौभाग्यमित्यस्मात् सौभाग्याष्टकमित्यतः ॥ २८ ॥ एवं निवेद्य तत्सर्वमग्रतः शिवयोः पुनः । रात्रौ शृङ्गोदकं प्राश्य तद्वद् भूमावरिन्दम् ! पुनः प्रभाते तु तथा कृतम्मानजपः शुचिः । संपूज्य द्विजदाम्पत्यं वस्त्रमाल्यविभूषणः । सौभाग्याष्टकसंयुक्तं सुवर्णचरणद्वयम् । प्रीयतामत्र ललिता ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥ एवंसम्पत्सरंयावत्तृतीयायांसदामनो!। कर्त्तव्यं विधिवद्भक्यासर्वसौभाग्यमीप्सुभिः । प्राशने दानमन्त्रेच विशेषोऽयन्नियोधमे । शृङ्गोदकञ्चैत्रमासे वैशासे गोमयं पुनः॥३३ ज्येप्टेमन्दारकुसुमं बिल्वपत्रं शुचौस्मृतम् । श्रावणेदधि सम्प्राश्यं नमस्येवकुशोदकम् ॥ क्षीरमाश्वयुजेमासि कार्तिके पृषदाज्यकम् । मार्गमासेतु गोमूत्रपोपे संप्राशयेघृतम् ॥ माधे कृष्णतिलंतद्वत् पञ्चाव्यक्ष फाल्गुने । ललिताविजया भद्राभवानी कुमुदाशिवा ॥ पासुदेवी तथा गौरी मङ्गला कमलासती । उमाच दानकालेतु प्रीयतामिति कीर्तयेत् ॥ मलिकाशोककमलं फदम्योत्पलमालतीः । फुजकं करवीरच घाणमलामकुङ्कुमम् ॥३८॥ सिन्दुवाच सर्वेषु मासेषु प्रमशः स्मृतम् । जपाकुमुम्भकुसुमं मालती शनपत्रिका । यथालाभं प्रशस्नानि फरवीरच सयंदा । पयं सम्पत्सरं यावदुपोप्य विधियन्नरः ॥४०॥ --
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isध्याय:]
* सप्तलोकाधिपत्यप्राप्तिव्रतकथनम् *
स्त्रीमक्ता वा कुमारी या शिवमभ्यर्च्य भक्तितः ।
प्रतान्ते शयनं दद्यान् सर्वोपस्करसंयुतम् ॥ ४१
उमा महेश्वरं हेमं वृषभञ्च गवा सह । स्थापयित्वाऽथ शयने ब्राह्मणाय निवेदयेत् ४२॥
अन्यान्यपि यथाशक्त्या मिथुनान्यम्वरादिभिः । धान्यालङ्कारगोदानरभ्यर्चेद्धनसञ्चयः ॥
वित्तशाव्येन रहितः पूजयेत् गतविस्मयः ॥ ४ ॥
एवं करोतियः सम्यक सौभाग्यशयनवतम् । सर्वान् कामानवाप्नोति पदमत्यन्तमभुते
फलस्यैकस्य त्यागेन व्रतमेतत्समाचरेत् ॥ १४ ॥
अ इच्छन् कीर्तिमानोति प्रतिमासंनराधिपः । सौभाग्यारोग्यरूपायुर्वस्त्रालङ्कारभूपः।
न वियुक्तो भवेद्राजन् ! नवार्युदशतत्रयम् ॥ ४५ ।।
यस्तु द्वादश वर्षाणि सौभाग्यशयनवतम् । करोति सप्त चाटीया श्रीकण्ठमवनेऽमरैः।
पूज्यमानो वसेत् सम्यक् यावत्कल्पायुनत्रयम् ॥ ४६ ॥
नारीवा कुरते वापि कुमारीवा नरेश्वर ! । सापि तन्फलमानोति देव्यनुग्रहलालिता ।।
शृणुयादपियश्चैव प्रदद्यादथवा मतिम् । सोऽपिविद्याधरो भूत्वास्वर्गलोके चिरंवसेत् ।।
इदमिह मदनेन पूर्वमिष्टं शतधनुषा कृतवीर्यसूमुना च ।
कृतमय वरुणेन नन्दिना था किमु जननाथ ततो यदुद्भवः स्यात् ॥४६॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे सौभाग्यशयनत्रतकथनं नाम पप्रितमोऽध्यायः
एकपष्टितमोऽध्यायः
सप्तलोकाधिपत्यप्राप्तित्रतकथनम् ।
मारद उवाच।
मूलोकोऽयभुवलोकः सर्लोकोऽयमहर्जनः । तपः सत्यश्च सप्तैतेदेवलोकाःप्रकीर्तिताः ॥
'पर्यायेणतु सर्वेपामाधिपत्यं कथं भवेत् । इद्द लोके शुमं रूपमायुः सौभाग्यमेव च ।
लक्ष्मीश्च विपुला नाथ! फर्थ म्यान् पुरमदन ! ॥२॥
ऽध्यायः] * अगस्त्यवशिष्टजन्मकथनम् * तपसा तस्य भीतेन विनार्थ प्रेषितावुभौ । शोण माधवानहावप्सरोगणसंयुतौ ॥२२॥ तदा तद्गीतवाद्येन नाङ्गरागादिना हरिः। न काममाधवाभ्याच विषयान् प्रतिवुक्षुभे । तदा काममधुस्त्रीणां विषादमगमगुगणः । संक्षोभाय ततस्तेषां म्बोल्देशानराग्रजः ॥ नारीमुत्पादयामास त्रैलोपजनमोहिनीम् ॥ २४ ॥ संक्षुब्धास्तु तया देवास्तौ तु देववरायुभी । अप्सरोमिः समक्षं हि देवनामब्रवीद्धरिः। अप्सराइति सामान्यादेवानामप्रवीद्धरिः । उर्चशीतिय नाम्नेयं लोकेर यातिगमिष्यति। ततः कामयमानेन मित्रेणाय सोर्चशी । उक्ता मां रमयस्येति चाढ़मित्यवचीत्तु सा ॥ गच्छन्ती चाम्बरं तद्वत् स्तोकमिन्दीवरेक्षणा । घरुणेन धृता पश्चात् वरुणं नाभ्यनन्दत मित्रेणाहं वृतापूर्वमद्य भार्या न ते विभी !! उघाचवरणश्चित्तं मयि सन्न्यस्य गम्यताम् गतायां वाढमित्युच्चा मित्रः शापमदात्तदा । तम्य मानुपलोके त्वं गच्छ सोमसुतात्मजम् ॥ ३० ॥ भलस्वेति यतोवेश्या धर्म एप त्वया कृतः । जलकुम्भे ततो घीय मित्रेण वरुणेन च ॥ प्रक्षितमय सक्षाती द्वायेव मुनिसत्तमौ ॥३॥ निमिर्नाम स्त्रीभिः पुरा द्यूतमदीन्यतः। तान्तरेऽभ्याजगाम घमिठो ब्रह्मसम्मयः ॥ ३२॥ तस्य पूजामकुर्वन्तं शशाप समुनि पम् । विदेहस्त्वं भवस्येति ततस्तेनाप्यसौमुनिः। अन्योन्यशापाथ तयोगिते इव चेतसी । जग्मतुः शापमानाय ब्रह्माणं जगतः पतिम् ।। अथ ब्रह्मण आदेशालोचनेप्वयसग्निमिः । निमेपाः स्युश्च लोकानां तद्विधामाय नारद! पसिष्टोऽप्यभवत्तस्मिन् जलकुम्मेच पूर्ववत् । ततः श्वेतचतुःसाक्षमूत्रकमण्डलुः । अगम्त्य इति शान्तात्मा बभूव ऋषिसत्तमः ॥ ३॥ मलयायैकदेशे नु चैवानसविधाननः । समायः संवृतो विनम्तपञ्चमुश्वरम् 1250 ततः फालेन महना तारकादनिपादितम् । जगदीश्य सफापेन पीतवान्यामालपम् । ततोऽम्य परदाः स यमयुः शङ्कादयः । ग्रामा विष्णुध भगवान् यग्दानाय जग्मतुः । परं गृणीप्य भन्ने यदीएच ये मुने ! mat सह * मत्स्यपुराणम् * [एकपटितमो अगस्त्य उवाच। यावद् ब्रह्मसहस्राणां पञ्चविंशतिकोटयः । वैमानिको भविष्यामिदक्षिणाचलवमनि ॥ मद्विमानोदये कुर्याद्यः कश्चित् पूजनं मम । स सप्तलोकाधिपतिः पर्यायेण भविष्यति॥ ईश्वर उवाच। एवमस्त्वितेप्युक्त्वा जग्मुर्देवायथागतम् । तस्मादधः प्रदातव्योह्यगस्त्यस्य सदाबुधैः॥ नारद उवाच। कथमप्रदानन्तु कर्त्तव्यं तस्य वै विमो । विधानं यदगस्त्यस्य पूजने तद्धदस्व मे ॥ ईश्वर उवाच । प्रत्यूपसमये विद्वान् कुर्यादस्योदये निशि । स्नानं शुलतिलस्तद्वत् शुक्ल माल्याम्बरी गृही प्थापयेदवणं कुम्भं माल्यवस्त्रविभूषितम् । पञ्चरत्नसमायुक्तं घृतपात्रसमन्वितम् ॥४५॥ अङ्गुष्टमात्रं पुरुषं तथैव सौवर्णमेवायतबाहुदण्डम् । चतुर्मुरां कुम्भमुग्वे निधाय धान्यानि सप्ताम्वरसंयुतानि ॥४६॥ सकांस्यपात्राक्षतशुक्तियुक्तं मन्त्रेण दद्यात् द्विजपुङ्गवाय । उतक्षिप्य लम्बोदरदीर्घबाहुमनन्यचेता यमदिड्मुसः सन् ॥४७॥ श्वेताश्च दद्याद्यदि शक्तिरस्ति रोप्यः पुरैर्हममुखी सवत्साम् धेनुं नरः क्षीरवतीं प्रणम्य सवत्सघण्टाभरणां द्विजाय ॥४८॥ आसरात्रोदयमेतदस्य दातव्यमेतन् सकलं नरेण । यावत्समाः सप्तदशाथ पाम्युग्थोयमप्यत्र पदन्ति केचित् ||४|| फाशपुष्पप्रतीकाश ! अग्निमारतसम्भव । मियापरुणयोःपुत्र ! कुम्भयोने! नमोऽस्तुते प्रत्यग्दन्तु फटयांगमेवं पुर्वप्न सीदति ॥२०॥ होमं त्या ततः पश्चाहर्जयेन्मानयः फलम् । अनेन विधिनायस्तुपुमानग्यं निवेदयेत् ।। इमं लोक स चाप्नोति रूपारोग्यसमन्वितः । द्वितीयेन भुपलॉय म्याटोपाततःपरम् ॥ सीपलीफानाप्नोनिसमायानगःप्रयच्छति । यापदायुधयःपुर्यानपरयागाधिगच्छति ॥ इह पटति शृणोति या य एतयुगलमुनिप्रमयायमंप्रदानम् ।
ऽध्यायः] * गौरीतृतीयाव्रतकथनम् * १६७ मतिमपि च ददाति सोऽपि विष्णोर्भवनगतः परिपूज्यतेऽमरोघे. ॥५॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे सप्तलोकाधिपत्यमातिव्रतकथनं नामैकषष्टितमोऽध्यायः । द्विपष्टितमोऽध्यायः गौरीतृतीयाव्रतकथनम् । मनुरुवाच। सौभाग्यारोग्यफलदममुत्राक्षय्यकारकम् । भुक्तिमुक्तिप्रदं देव ! तन्मे ब्रूहि जनार्दन ॥१ मत्स्य उवाच। यदुमायाः पुरा देव ! उवाच पुरसूदनः । कैलासशिखरासीनो देव्या पृटस्तदा किल । कथासु संप्रवृत्तासु धासु ललितासु च । तदिदानी प्रवक्ष्यामि भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ईश्वर उवाच । शृणुप्पावहिता देवि! तथैवानन्तपुण्यात् । नराणामथ नारीणामाराधनमनुत्तमम्॥१॥ नभस्ये घाथ वैशापे पुण्यमार्गशिरस्य च । शुक्लपक्षे तृतीयायां सुनातो गौरसप्पै ॥ गोरोचनं सगोमूत्रमुष्ण गोशरतं तथा । दधिचन्दनसंमिश्रं ललाटे तिलकं न्यसेत् । सौभाग्यारोग्यदं यस्मात् सदाच ललिता प्रियम् ॥६॥ प्रतिपक्ष तृतीयासु पुमानापीतवाससी धारयेदर्थ रक्तानि नारी चेदय संयता |७|| विधवा धातुरक्तानि कुमारी शुक्लबाससी । देवी तु पञ्चगव्येन तत क्षीरेण केवलम् । स्नापयेन्मधुना तद्वत् पुष्पगन्धोदकेन च ॥८॥ पूजयेन्दुहपुष्पैश्च फलनानाविधरपि । धान्यकाज्ञाजिलपणैर्गुडक्षीरघृतान्यितः ॥६॥ शुलाक्षततिलेरान्ततो देवी सदार्चयेत् । पादाद्यभ्यर्चनं कुर्यात् प्रतिपक्षं घरानने ॥ घरदायै नमः पादौ तथा गुल्फो नमाश्रिये । अशोकायनमोजड्वेपार्वत्यैज्ञानुनी तथा । ऊरू मङ्गलकारिण्यै घामदेव्यै तथा कटिम् । पद्मोदराये जठरमुर कामधियै नमः ॥१२ फरी सौभाग्यदायिन्ये वादग्मुखं श्रियै । मुपं दर्पणवासिन्यै स्मग्दाय स्मितं नमः ॥
[द्विषष्टितमो पञ्चगव्यञ्च विल्यञ्च प्राशयेत् ब्रमशस्तदा । एताद्रपदाधन्तु प्राशनं समुदाहृतम् ॥२६ पुंसः पीताम्बरे दद्यात् स्त्रिय कौसुम्भवाससी ॥२७॥ * मत्स्यपुराणम् गौर्य नमस्तथा नासामुत्पलायचलोचने । तुष्य ललाटमलकान्कात्यायन्यशिरस्तथा ॥ नमो गौर्य नमो धिष्ण्यै नमः कान्त्यै नमः श्रिये । रम्भाय ललितायै च घासुदेव्यै नमो नमः ॥१५॥ एवं संपूज्य विधिचन्नतः पममालिखेत् । पत्रैदशभिर्युक्त कुइमेनसणिकम् ॥१६॥ पूर्वेण विन्यसेदोरीमपर्णाञ्च ततः परम् । भवानी दक्षिणे तदुद्राणीञ्च ततःपरम् ॥१७॥ चिन्यसेत् पश्चिमे सीम्यां सदा मदनवासिनीम् । पायव्ये पाटलामुग्रामन्तरेण ततोऽप्युमाम् ॥१८॥ मध्ये यथा स्वन्मासाङ्गामङ्गलां कुमुदां सतीम् । रुद्रञ्च मध्ये संस्थाप्य ललिता कर्णिकोपरि । फुसुमैरक्षतर्वामिनमस्कारेण विन्यसेत् । गीतमङ्गलनि?पान् कारयित्वा सुवासिनीः । पूजयेद्रतयासोभीरक्तमाल्यानुलेपनः । सिन्दूरं स्नानवर्णञ्च तासां शिरसि पातयेत् ॥२०॥ सिन्दूरकुङ्कुमस्तानमतीवेष्टतमं यतः। तथोपदेष्टारमपि पूजयेद्यत्नतो गुरुम् । न पूज्यते गुरुयंत्र सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ॥२१॥ नभस्ये पूजयेद् गौरीमुत्पलरसितैः सदा । बन्धुजीवैराश्वयुजे कार्तिकेशतपनकः ॥२२॥ तीपुष्पैर्मार्गशीर्ष पौषे पीतैः कुरण्टकैः । कुन्दकुङ्कुमपुष्पैस्तु देवी माघे तु पूजयेत् ।। सिन्दुरवारेण जात्या था फाल्गुनेऽप्यर्चयेदुमाम् ॥२३॥ चैत्रे तु मलिकाशोकवैशाखे गन्धपाटलैः । ज्यैप्ठे कमलमन्दारैरापाढे च नवाम्बुजैः ॥ कदम्बैरथ मालत्या श्रावणे पूजयेत्सदा ॥ २४ ॥ गोमूत्र गोमयं क्षीरं दधिसर्पिः कुशोदकम् । विल्यपत्रार्क पुष्पञ्च यवान गोङ्गवारि च ॥२५॥ प्रतिपक्षश्च मिथुनं तृतीयायां वरानने । पूजयित्वाऽर्चयेत्या घस्लमाल्यानुलेपनैः । निष्पायाजाजिलवणमिक्षुदण्डगुडान्वितम् । तस्यदद्यात्फलंपुष्पंसुवर्णोत्पलसंयुतम् ॥
ध्यायः । रसफल्याणिनीतृतीयाव्रतकथनम् * यथा न देवि! देवेशस्त्वां परित्यज्यगच्छति । तथामामुद्धराशेपदुःखसंसारसागरात् ।। कुमुदा विमलानन्ता भवानी व सुधाशिवा । ललिताकमलागौरीसतीरम्भाधपार्वती॥ नभल्यादिषु मामेषु प्रीयतामित्युदीरयेत् । घतान्ते शयनं दद्यात् सुवर्णकमलान्वितम्॥ मिथुनानि चतुर्विशद्दश द्वौ च समर्चयेत् । अतो पड्वाप्यय पुनश्चानुमासं समर्चयेन् । पूर्व दत्त्वा तु गुरवे शेपानप्यर्चयेत् बुधः । उक्तानन्ततृतीयेपा सदानन्तफलप्रदा ॥३३ सर्वपापहरां देवि! सौभाग्यारोग्यवर्धिनीम् । नचनांवित्तशाध्य नेकदाचिदपिलवयेत् नरो घा यदि चा नारी वित्तशाट्यात् पतत्ययः ॥३४॥ गर्भिणी सूतिकानक्तं कुमारी बाथ रोगिणी । यद्यशुद्धा तदान्येन कारयेत् प्रयता स्वयम् इमामनन्तफलदा यस्तृतीयां समाचरेत् । कल्पकोटिशत साग्रं शिवलोके महीयते ।। वित्तहीनोऽपि कुरुते वर्षत्रयमुपोषणैः । पुष्पमन्त्रविधानेन सोऽपितत्फलमाप्नुयात् ॥ नारी चा कुरुते यातु कुमारी विधयाथ चा । सापि तत्फलमाप्नोतिगोर्य्यनुग्रहलालिता इति पठति शृणोति घा य इत्थं गिरितनया प्रतमिन्द्रवाससंस्थः । मतिमपि च ददाति सोऽपि देवरमरयघृजनकिन्नरैश्च पूज्यः ॥३६॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे गोगेतृतीयावतकथनं नाम द्विपटितमोऽध्यायः । त्रिपष्टितमोऽध्यायः रसकल्याणिनीतृतीयात्रतकथनम् । अथान्यामपिवश्वामितृतीयांपापनाशिनीम् । रसकल्याणिनीमेतांपुराकल्पविदो विदुः॥ माघमासे तु संप्राप्ते तृतीयां शुक्लपक्षतः । प्रातर्गव्येन पयसा तिलैः स्नानं समाचरेत् ॥ स्नापयेनमधुना देवीं तथैवेक्षुरसेन च । दक्षिणाङ्गानि संपूज्य ततो घामानि पूजयेत् ॥ ललितायै नमोदेव्या:पादोगुल्फीततोऽर्चयेत् । अङ्घाक्षातथाशान्त्यतथैवोचिये नमः॥ मदालसाय तु कटिममलाय तथोदरम् । स्तनी मदनयासिन्य कुमुदाय च कन्धराम् ॥ भनं भुजा माधव्य कमलायै मुखस्मिते । मूललाटे व दाण्यै शङ्कराये तथालकान । .
[त्रिषष्टितमो मत्स्यपुराणम् * मुकुट विश्ववासिन्यै शिर कान्त्य तथार्चयेत् । मदनाय ललाटन्तु मोहनाय पुनर्भुवौ । नेत्रे चन्द्रार्द्धधारिण्यै तुष्टयं च घदन पुन । उत्कण्ठिन्यनम कण्टममृतायैनम स्तनौ । रम्भाय धामकुक्षिश्च विशोकायै नम कटिम् । हृदयमन्मथाधिप्पयपाटलायतथोदरम् ।। कर्टि सुरतवासिन्यै तथोरञ्चम्पकप्रिये । जानुजडे नमोगौर्य गायन्यै धुटिके नम ॥१० धराधरायै पादौ तु विश्वकार्यं नम शिर । नमोभवान्यकामिन्यकामदेव्यजगत प्रिये ॥ एव सपूज्य विधिवत् द्विजदाम्पत्यमर्चयेत् । भोजयित्वान्नपानेन मधुरेण विमत्सर । जरपूरित तथा कुम्भ शुक्लाम्यग्गुगद्वयम् । दत्त्या सुवर्णकमल गन्धमाल्यै समर्चयेत् ॥ प्रीयतामत्र कुमुदागृह्णीयालवणव्रतम् । अनेन विधिना देवी मासि मासि सदार्चयेत् ॥ लवण वर्जयेन्माचे फाल्गुने च गुड पुन । तेल गजि तथा चैत्रे वय व मधुमाधवे ॥ पानक ज्येष्ठमासे तु आपाढे चाथ जीरकम् । श्रावणे वर्जयेत् क्षीर दधिभाद्रपदेतथा ॥ घृतमाश्चयजे तद्वत् ऊर्जे चय॑श्च माक्षिकम् । धान्यक मार्गशीर्षनुपौपेचाचशर्करा ॥ व्रतान्ते करक पूर्णमेतेपा मासि मासि च । दद्यादद्विकाललाया पूर्णपात्रेणसयुतम् ॥ लडडुकान् श्वेतवर्णाश्च सयावमथ पूरिका । घारिकानप्यपूपाश्च पिप्रापूपाश्चमण्डकान, क्षीर शाकञ्च दध्यन्नमियों शोकवतिका । मायादि क्रमशो दद्यादेतानिकरकोपरि॥ कुमुदा माधवी गोरी रम्भा भद्रा जया शिवा । उमारति सतीतद्वन्मङ्गलारतिलालसा ॥ क्रमान्माधादि सर्वत्र प्रीयतामिति कीर्तयेत् । सर्वत्र पञ्चगव्येन प्राशन समुदाहृतम् ॥ उपवासी भवेन्नित्यमशक्ते नक्तमिप्यते ॥२२॥ पुनर्माये तु सप्राप्त शर्करा करकोपरि । कृत्वा तु काञ्चनी गौरी पञ्चरत्नसमन्विताम् ॥ हैमीमङ्गुष्टमात्राञ्च साक्षसूत्रकमण्डलुम् । चतुर्भुजामिन्दुयुता सितनेत्रपटावृताम् ॥२४॥ तद्गोमिथुन शुक्ल सुवर्णास्य सिताम्वरम् । सवखभाजन दद्यादवानी प्रीयतामिति ।। अनेन विधिनायस्तु रसकल्याणिनीवतम् । कुर्यात्स सर्वपापेभ्य स्तरक्षणादेवमुच्यते ॥ नवार्बुदसहस्त्रन्तु न दुखी जायते नर । सुवर्णकमल गौरी मासि मासि ददार । अग्निोमसहस्रस्य यत् फल तयाप्नुयात् ॥२७॥ नारी चा कुत्ते या तु कुमारी चा घरानने ।
ऽध्यायः] * शुक्तृतीयामतकथनम् . विधवा या तथा नारी सापि तत् फलमाप्नुयात् । सौभाग्यरोग्यसंपन्ना गौरी लोक महीयते ॥२८॥ इति पठति शृणोति यः प्रसङ्गान् । कलिफलपविमुक्तः पार्वती लोकमेति । मतिमपि च नराणां यो ददाति प्रियार्थम् । विबुधपतिविमाने नायकःस्यादमोघः ॥२६ इति श्रीमत्स्यपुराणे रसकल्याणिनीतृतीयावतकथनं नाम त्रिषष्टितमोऽध्यायः । चतुःपप्टितमोऽध्यायः शुक्लतीयावतकथनम् । ईश्वर उवाच। तथैवान्यां प्रवन्यामि तृतीयां पापनाशिनीम् । नाना च लोके विख्यातां आनन्दकरीमिमाम ॥१॥ यदा शुक्लतृतीयायामापादक्षं भवेत् कचित् । ब्राक्षं वा भृगवाहस्तीमूलमथापि वा । दर्भगन्धोदकः स्नानं तदा सम्यक् समाचरेत् ॥२॥ शुक्लमाल्याम्बरधरः शुक्लगन्धानुलेपनः । भवानीमर्चयेद्भक्या शुतपुष्पैः सुगन्धिभिः । महादेवेन सहितामुपविष्टां महासने ॥३॥ पासुदेव्यै नमः पादौ शङ्कराय नमो हरम् । जड्वे शोकविनाशिन्यै आनन्दायनमःप्रभो॥ रम्भाय पूजयेदूरू शिवाय च पिनाकिनः । अदित्यै च कटिं देव्याःशूलिनःशूलपाणये॥ माधव्यै च तथा नाभिमय शम्भोर्भवाय च । स्तनावानन्दकारिण्यैशङ्करस्येन्दुधारिणे ॥ उकण्दिन्यै नमः कण्ठं नीलकण्ठाय चै हरम । करावुत्पलधारिण्यै स्वाय च जगत्पते । वाह च परिरम्भिण्य त्रिशूलाय हराय च ॥ ७॥ देव्या मुपं विलासिन्यवृषेशायपुनर्षिभोः । स्मितंसम्मेलीलायविश्वयक्त्रायवैविभोः ने मदनवासिन्यै विश्वधाम्ने त्रिशूलिनः । प्रवी नित्यप्रियायतुताण्डवेशायशालिनः॥ ..
। * मत्स्यपुराणम् * [चतुःपठितमो देच्या ललाटमिन्द्राण्यै हव्यवाहाय धैविभोः । स्वाहायमुकुटदेव्याविभोर्गङ्गाधरायबै । विश्वकायौ विश्वमुखौ विश्वपादकरौ शिवौ । प्रसन्नवदनौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ ॥ एवं संपूज्य विधिवदप्रतः शिवयोः पुनः । पद्मोत्पलानि रजसा नानावर्णेन कारयेत्॥ शङ्खचक्रे सकटके स्वस्तिकाशचामरान् । यावन्त: पांसवस्तत्र रजसः पतिता भुवि । तावद्वर्षसहस्राणि शिवलोके महीयते ॥१३॥ चत्वारि घृतपात्राणि सहिरण्यानि शक्तित. । दत्त्वाद्विजायकरकमुदकान्नसमन्वितम् ॥ प्रतिपक्षं चतुर्मासं यावदेतन्निवेदयत् ॥१४॥ ततस्तु चतुरो मासानपूर्ववत्करकोपरि । चत्वारिसक्तुपात्राणितिलपात्राण्यतः परम् ।। गन्धोदकं पुष्पवारि चन्दनं कुङ्कुमोदकम् । अपक्वं दधिदुग्धश्चगोश्टङ्गोदकमेवच ॥१६॥ पिष्टोदकं तथा पारि कुठचूर्णान्वितं पुनः । उशीरसलिलं तद्वद्यवचूर्णोदकं पुनः ॥१७॥ तिलोदकञ्च संप्राश्य स्वपेन्मार्गशिरादिषु । मासेषु पक्षद्वितयं प्राशनं समुदाहृतम् ॥१८ सर्वत्र शुक्लपुष्पाणि प्रशस्तानि सदार्चने । दानकाले च सर्वत्र मन्त्रमेतमुदीरयेत् ॥१६॥ गौरी मे प्रियतां निन्यमघनाशाय मङ्गाला । सौभाग्यायास्तुललिताभवानीसर्वसिद्धये ॥ संवत्सरान्ते लवणं गुडकुम्भश्च सर्जिकाम् । चन्दनं नेत्रपट्टश्चसहिरण्याम्बुजेन तु ॥२१ उमामहेश्वरं हैमं तद्वदिक्षुफलैर्युतम् । सतूलावरणां शय्यां सविधामा निवेदयेत् । सपत्नीकाय चिप्राय गौरी में प्रीयतामिति ॥२२॥ आनन्दकरी नाम्ना तृतीयपा सनातनी । यामुपोप्यनरोयाति शम्भोर्यत्परमम्पदम् ॥ इहलोके सदानन्दमानोति धनसम्पदः । आयुरारोग्यसन्तप्तोनकश्चिच्छोकमाप्नुयात् ॥ नारी घा कुरुते या तु कुमारी विधवाचया। सापितत्फलमाप्नोतिदेव्यनुग्रहलालिता ॥ प्रतिपक्षमुयोध्येवं मन्त्रार्चन विधानवित् । रुद्राणी लोकमभ्येति पुनरावृत्तिदुर्लभम् ।। य इदं शृणुयानित्यं श्रावयद्वापि मानवः । शकलोके सगन्धःपूज्यतेऽपि युगत्रयम् ॥ आनन्ददां सकलदुःसहरां तृतीयां या स्त्री करोत्यविधवाऽविधवाथ वापि । सा स्वे गृहे सुखशतान्यनुभूय भूयो गौरीपदं सदयिता दयिता प्रयाति २८ इति श्रीमत्स्यपुराणे शुतृतीयाव्रतकथनंनाम चतुःषष्टितमोऽध्यायः ।
पञ्चषष्टितमोऽध्यायः अक्षयतृतीयात्रतकथन सरस्वतीव्रतकथनश्च । ईश्वर उवाच । अथान्यामपि वक्ष्यामि तृतीया सर्वकामदाम् । यस्या दत्त हुत जप्तसभवति चाक्षयम् वैशाखशुपक्षे तु तृतीया ये रपोपिता । अक्षय फलमानोति सर्पस्य सुस्तस्य च ।। सा तथा कृत्तिकोपेता विशेषेण सुपूजिता । तत्र दत्त हुत जप्त सर्वमक्षयमुच्यते ॥३॥ अक्षयासन्ततिस्तस्यास्तस्यासुम्तमक्षयम् । अक्षतै तुनरा माताविष्णोर्दत्वातथाक्षतान विप्रेषु दत्त्वा तानेव तथा सक्तून सुसंस्कृतान् । यथानभुक महाभाग फल्मक्षयमभुते एकामप्युक्तवत् पृत्त्वा तृतीया विधिवनर । एतालामपि सर्वासातृतीयाना फ्लभवेत् तृतीयाया समभ्यर्च्य सोपवासो जनार्दनम् । राजस्यफल प्राप्यगतिमायाञ्च विन्दति मनुस्वाच । मधुरा भारती केन व्रतेन मधुसूदन । तथैव जनसौभाग्य मतिं विद्यासुकौशलम् ॥ ८ ॥ अभेदश्चापि दम्पत्यो स्तथा वन्धुजनेन च । आयुश्च विपुल प्रसा तन्मे कथय माधव । मत्स्य उवाच सम्यक पृष्ट त्वया राजन् । रणुसारस्वतन्त्रतम् । यस्य सीर्तनादेव तुप्यतीह सरस्वती यो यद्भक्त पुमान् कुर्यात्एतव्रतमनुत्तमम् । तद्वार तद्वासरादौसम्पूज्यविप्रानेतान्समाचरेत् अथवादित्यवारेण ग्रहतारावलेन च । पायस भोजयेद्विमान् कृत्या नाह्मणवाचनम् ॥१२ शुक्रवस्त्राणि दत्त्वा च सहिरण्यानि शक्ति | गायत्री पूजयेद्नया शुरुमाल्यानुलेपन यथा न देवि । भगवान् ब्रह्मलोके पितामह । (वा परित्यज्य सन्तिष्टेत्तथा भव पठा घेदा शास्त्राणिसर्वाणिगीतनृत्यादिपञ्चयत् । न विहीनत्वयादेवि तथामेसन्तुसिद्धय लक्ष्मीर्मेधा धरापुष्टिगौरीतुष्टाप्रभामति । एताभि पाहि अभि स्तनूभिर्मा सरस्वती पर सम्पूज्यगायत्री चाणाक्षयनिरिणीम् । शुद्धपुष्पाक्षर्मतयासकमण्डलुपुस्तकाम् मानवतेन भुञ्जीत साय प्रातस्तु धर्मयित् ॥ १७ ॥ पञ्चम्या प्रतिपक्षश्च पूजयेद्ब्रह्मवासिनीम् । तथैव तण्डुलप्रस्थ घृनपानेण सयुतम् ॥
१७४ * मत्स्यपुराणम् * [पट्पष्टितमो क्षीरं दद्याद्धिरण्यञ्च गायत्री प्रीयतामिति ॥ १६ ॥ सन्ध्यायाश्च तथा नौनमेतत्कुर्वन्समाचरेत् । नान्तराभोजनंकुर्याद्यावन्मासास्त्रयोदश समाप्ते तु व्रते कुर्यानोजनं शुक्लतण्डुलैः । पूर्व सवस्त्रयुग्मञ्च दद्याद्विप्राय भोजनम् ॥ देव्या वितानं घण्टाञ्च सितनेत्रे पयस्विनीम् । चन्दनं वस्त्रयुग्मञ्च दद्याच्च शिखरं पुनः तथोपदेष्टारमपि भक्त्या संपूजयेत् गुरुम् । वित्तशाख्येन रहितो घस्त्रमाल्यानुलेपनैः ॥ अनेन विधिना यस्तु कुर्यात्सारस्वतं व्रतम् । विद्यावानर्थसंयुक्तो रक्तकण्ठश्च जायते ॥ सरस्वत्याः प्रसादेन ब्रह्मलोके महीयते । नारी वा कुरुते या तु सापि तत्फलगामिनी ब्रह्मलोके वसेद्राजन् ! यावत्कल्पायुतत्रयम् ॥ २५ ॥ सारस्वतं व्रतं यस्तु शृगुयादपि यः पठेन् । विद्याधरपुरे सोऽपि घसेत्कल्पायुतत्रयम् इति श्रीमत्स्यपुराणेऽक्षयतृतीयावतंसारस्वतव्रतकथनं नाम पञ्चपष्टितमोऽध्यायः । पट्पष्टितमोऽध्यायः चन्द्रादित्योपरागे स्नानविधिकथनम् । मनुरुवाच । चन्द्रादित्योपरागेतु यत्नानमभिधीयते । तदहंश्रोतुमिच्छामि द्रव्यमन्त्रविधानवित् ॥ मत्स्य उवाच। यस्य राशिसमासाद्य भवेद्ग्रहणसंशवः। तस्य स्मानं प्रवक्ष्यामि मन्त्रीपविधानतः ॥ चन्द्रोपरागंसम्प्राप्य इत्याब्राह्मणवाचनम् । संपूज्यचतुरो विप्रान् शुरुमाल्यानुलेपनैः।। पूर्वमेवोपरागस्य समासाद्योपधादिकम् । सापयेचतुरः पुम्मानवणान् सागरानिति ।। गजाश्वरध्यायल्मीकसङ्गमाद्धदगोकुलात् । राजद्वारप्रदेशाश मृदमानीय चाक्षिपेत् ॥५ पश्चगव्यच कुम्भेषु शुद्धमुक्ताफलानि च । गचना पद्मशमीच पञ्चरतसमन्वितम् ॥६॥ 'फटिफ चन्दनं श्वेनं तीर्थचारि ससर्पपम् । राजदन्तं समुदं तययोशारगुग्गुलम् ॥
ऽध्यायः] * चन्द्रादित्योपरागे स्नानविधिकथनम् * एतत्सर्व विनिक्षिप्य कुम्भेप्यावाहयेत सुरान् ॥७॥ सर्वे समुद्राः सरितस्तीर्थानि जलदा नदाः । आयान्तु यजमानस्य दुरितक्षयकारकाः ।। योऽसौ धनधरो देव आदित्यानां प्रभुर्मतः । सहस्त्रनयनश्चेन्द्रो ग्रहपीडां ध्यपोतु ।। मुपं यः सर्वदेवानां सप्ताविरमितद्युतिः । चन्द्रोपरागसम्भूतां अग्निः पीडां व्यपोहतु ॥ यः फर्मसाक्षी भूतानां धर्मो महिषवाहनः । यमश्चन्द्रोपरागोत्यां ममपीडां व्यपोहतु ॥ नागपाशधरी देवः साक्षान्मकरवाहनः । स जलाधिपतिश्चन्द्रग्रह पीडां व्यपोहतु ॥१२॥ प्राणम्पेण यो लोकान् पाति कृष्ण मृगप्रियः । घायुश्चन्द्रोपरागोत्यां पीडामन व्यपोहतु ॥ १३ ॥ योऽसौ निधिपतिर्देवः सङ्गमूलगदाधरः । चन्द्रोपरागकलुपं धनदो मे व्यपोहतु १४॥ योऽसो विन्दुधरो देय. पिनाकी पाहनः ! चन्द्रोपरागज पीडां विनाशयतुशङ्करः। त्रैलोक्येयानिभूतानि स्थावराणिचराणिच । ब्रह्मविष्ण्वर्कयुक्तानि तानि पापंदहन्तुवै ॥ एमामव्यतः कुम्भैरभिषिक्तोगुणान्वितैः । ऋग्यजुः साममन्त्रश्च शुक्लमाल्यानुलेपनैः। पूजयेद्वस्त्रगोदानाह्मणानिष्टदेवताः ॥ १७ ॥ पतानेव ततोमन्त्रान् विलिखेत्करकान्वितान् । चस्वपट्टेऽथ घा पद्म पञ्चरत्नसमन्वितान् ॥ १८ ॥ यजमानस्य शिरसि निदध्युस्तेद्विजोत्तमाः । ततोऽतियाहये।लामुपरागानुगामिनीम् ॥ प्राड्मुखः पूजयित्वा तु नमस्यनिष्टदेवताम् । चन्द्रग्रहे विनिवृत्ते कृतगोदानमङ्गलः । कृतस्नानायतं पट्ट ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥ २० ॥ अनेन विधिना यस्तु ग्रहनानं समाचरेत् । न तस्य ग्रहपीडा स्यान्नच वधुजनक्षयः ।। परमां सिद्धिमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभाम् । सूर्यग्रहे सूर्यनाम सदा मन्त्रेषु कीर्तयेत् ॥२२ अधिकाः पद्मरागाः स्युः कपिलाञ्च सुशोभनाम् । प्रयच्छेञ्च निशाम्पत्ये चन्द्रसूर्योपरागयोः ॥ २३ ॥ यइदं शृणुयानित्यं श्रावयेद्वाऽपि मानवः । सर्वपापविनिर्मुक्तो शकलोके महीयते ॥२५॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे चन्द्रादित्योपरागेस्नानविधिकथननाम पट्पटितमोऽध्यायः ।
.. ॥ सप्तपष्टितमोऽध्यायः सप्तमीनपनव्रतकथनम् । नारद उवाच। किमुद्वेगागुते कृत्यमलक्ष्मीः केन हन्यते । मृतवत्साभिषेकादि कार्येषु च किमिष्यते ॥ श्रीभगवानुवाच । पुरा कृतानि पापानि फलन्त्यस्मिस्तपोधन । रोगदौर्गत्यरूपेण तथैवेष्टवधेन च ॥२॥ तद्विघाताय वक्ष्यामि सदा कल्याणकारकम् । सप्तमीस्नपननाम जनपीडाविनाशनम् । थालानां मरणं यत्र क्षीरपानां प्रदृश्य तम् । तद्वत्वृद्धतराणाञ्च यौवने वापिवर्तताम् ॥ शान्तये तत्र पक्ष्यामि मृतवत्साभिषेचनम् । एतदेयाद्भुतोद्वेगचित्तभ्रम चिनाशनम् ॥५॥ भविष्यतिच चाराहो यत्र कल्पस्तपोधन ! । वैवस्वतश्च तत्रापि यदा तु मनुरुत्तमः भविष्यति च तत्रैव पञ्चविंशतिमं यदा। कृतं नामयुगं तत्र हैहयान्वयवर्द्धनः ॥ भविता नृपतिवीरः कृतवीर्यः प्रतापवान् ॥ ७ ॥ ससप्तद्विपमखिलं पालयिष्यति भूतलम् । याचवर्षसहस्राणि सप्तसप्तति नारद!॥ ८॥ जातमात्रञ्च तस्यापि यावत् पुत्रशतं तथा । च्यवनस्यतु शापेन विनाशमुपयास्यति । सहस्रया च यदा भविता तस्यवै मुतः । पुरङ्गनयनः श्रीमान् सम्भृतो नृपलक्षणेः ।१० कृतवीर्य्यस्तदाराध्य सहस्रांशु दिवाकरम् । उपचासर्वतैर्दिव्यैर्वेदसूक्तश्च नारद !। पुत्रस्य जीवनायालमतन्नानमवाप्स्यति ॥१॥ उत्तीर्येण चै पृष्ट इदं वक्ष्यति भास्करः । अशेषदुष्टशमनं सदा कल्मपनाशनम् ॥१२॥ सूर्य उवाच। अलं शेन महता पुत्रस्तर नराधिप!। भविष्यति चिरशीयो किन्तु फल्मपनाशनम् ।। समी तपनं पक्ष्ये सर्वलोकदिताय थे । जातस्य मृतवत्सायाः सप्तमे मासि नारद !!! अथवा शुसप्तभ्यामेतत् सर्व प्रशस्यते ॥ १४ ॥ प्रातारायलं लध्या एत्या ब्राह्मणवाचनम् ।
- मापः] • सामीपन पासना पसंपेगी for Tr: गगनाम्पादित गोमवानुनिमायो भूमापकाविषगदा । सदरममाटीपधागासांरगुतम् ॥ निपत गप्पग्दाग मन्त्रालय विधान in पापम् गदपापं गागि मामी: । जुमानुटांग पटाप गारद ! ॥१७॥ द्वमा समिपमा पापनाशी गप्पनिल होमः पानंम्पोट पुनः । प्रामाभिनयान पारस पुनः ल्या नाना पान महलं येन धीमना । पिन पदपिदुग पिचिपापापिनापिन्या तु गनुः पुम्मायो शालनान् TIMI पुनमध्ये पिपिनम् । परमपं कुम्म सानाभिमन्वितम् ॥२॥ गौरेण गोपनीयन पूर्ण राममन्यितम् । मन्मियानधनान् गमगत्यसमन्विताम् पभयान:पुर्णपामाभिः परियष्यन् । मजायरध्यापामीफापरमानुभदगीलान् । मंशुशां गृदमानाप मध्ययविनिक्षिपन् मनुष्यपि च युगपु ग्यागर्नेषु मध्यगम् । गल्या प्राणम्ना माँगन्मयानुग्येत् गाभिः समर्मग्यामिाग्यशाहीं गिरत्र च । पूजिगाभियंगाशमया माल्यपावधिभरण: सविप्रामिश फर्तव्यं मृनयमामिपंचनम् ॥२०॥ दीर्घायुग्म्नु बालोऽयं जीपापुत्राच मामिनी । भादिन्याचन्द्रमा सार प्रदनक्षमण्डल मशया लोकपाला ये प्रविष्णुमहेश्वगः । एते चान्येच देयोधाः सदापान्तुषुमारकाम् मित्रोशनि दुतभु ये च यालामहाः कचिन । पीडा कुर्वन्नु यादम्यमामातुर्जनफम्यय ततः शुशायरधरा युमारपतिसंयुता । समयं पूजयेदभनपा स्रीणामय गुरं पुनः ॥२६॥ फानीच तनः कुर्यान तानपायोपरि रियताम् । प्रतिमांधमंगजम्यगुरवे पिनियेदयेत् पत्रकाशनरपोर्मश्यः सगुनपायमैः । पूजयेद्गाह्मणांस्तद्वित्तशादयविजित: ॥३॥ भुनया च गुरुणा चेयमुधार्या मन्त्रमन्ततिः । दीर्घायुरम्नु यालोऽयं यावर्षशनंसुरी यत् किञ्चिदस्यदुरितंतन शिबश्यानले । ग्रालाग्दोयसुः म्यान्दीविष्णुःनामोहुताशनः रक्षन्तु सर्वे दुणेभ्यो घरदाः सन्नु सर्वदा । एयमादीनि पाक्यानि यदन्तं पूजयेद्गुरम् शक्तितः फपिलां दधात् प्रणम्य च विसर्जयेत् । यरच पुषसदिता प्रणम्य रविशदर्ग। १२-
* मत्स्यपुराणम् *
[अष्टषष्टितमो
छुतशेयं तदाश्नीयादादित्याय नमोऽस्त्विति । इदमेवामृतोद्वेगदुःस्वप्नेषु प्रशस्यते ॥२६॥
कर्तुर्जन्मदिनक्षेञ्च त्यक्त्या संपूजयेत् सदा । शान्त्यर्थ शुक्लसप्तम्यामेतत्कुर्वन्न सीदति ॥
सदानेन विधानेन दीर्घायुरभवन्नरः । सम्वत्सराणां प्रयुतं शशास पृथिवीमिमाम् ॥
पुण्यं पवित्रमायुष्यं सप्तमीस्नपनं रविः । कथयित्वा द्विजश्रेष्ठ! तत्रैवान्तरधीयत ॥३६
एतत् सर्व समाख्यातं सप्तमीस्नानमुत्तमम् । सर्वदुष्टोपशमनं घालानां परमं हितम् ।।
आरोग्यं भास्करादिच्छेद्धनमिच्छेद्भुताशनात् ।
ईश्वराज्ज्ञानमिच्छेच्च मोक्षमिच्छेजनार्दनात् ॥४१॥
एतन्महापातकनाशन स्यात्परं हितं वालविवर्द्धनञ्च ।
शृणोति यश्चैनमनन्यचेतास्तस्यापि सिद्धि मुनयो घदन्ति ॥ ४२ ॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे सप्तमीस्नपनव्रतकथनं नाम सप्तपष्टितमोऽध्यायः ।
अष्टपष्टितमोऽध्यायः
भीमद्वादशीव्रतकथनम् ।
मत्स्य उवाच।
पुरा रथन्तरे कल्पे परिपृष्टो महात्मनः । मन्दरस्थो महादेवः पिनाकी ब्रह्मणा स्वयम् ॥
ब्रह्मोवाच ।
कथमारोग्यमैश्वर्यमनन्तममरेश्वर! । स्वल्पेन तपसा देव ! भवेन्मोक्षोऽथवा नृणाम्।।
किमज्ञातं महादेव : त्वत्प्रसादादधोक्षज ! स्वल्पकेनाथ तपसा महत्फलमिहोच्यताम्
मत्स्य उवाच।
एवं पृष्टः स विश्वात्मा ब्रह्मणो लोकभावनः । उमापतिरुवाचेदं मनसः प्रीतिकारकम्
ईश्वर उवाच ।
अस्माद्रथन्तरात्कल्पात् त्रयोविंशात्पुनर्यदा । धाराहो भविता फल्पस्तस्यमन्वन्तरे शुभे
वैवस्वतारये साते सप्तमे सतलोकरन् । द्वापराख्यं युगंतवदष्टाविंशतिमझगुः ॥६॥
ऽध्यायः] * भीमद्वादशीव्रतकथनम् * तस्यान्ते स महादेवो वासुदेवो जनार्दनः । भारावतरणार्थाय विधा विष्णुभविष्यति। द्वैपायन ऋपिस्तद्धहौहिणेयोऽथ केशवः । कंसादिदर्पमथनः केशवः क्वेशनाशनः ॥ ८॥ पुरी द्वारवती नाम साम्प्रतं याकुशस्थली । दिव्यानुभावसंयुक्तामधियासाय शाङ्गिणः त्वष्टा ममाज्ञया तद्वत् करिष्यति जगत्पतेः ॥६॥ तस्यां कदाविदासीन. सभायाममितयुतिः । भार्याभिवृष्णिभिश्चैव भूभृद्धिभूरिदक्षिणः कुरुभिर्देवगन्धर्वैरभितः फैटभार्दनः । प्रवृत्तासु पुराणानु धर्मसम्बर्धिनीषु च ॥११॥ कथान्ते भीमसेनेन परिपृष्टः प्रतापवान् । त्वया पृष्टस्य धर्मस्य रहस्यल्यास्य भेदात् भविता स तदाब्रह्मन् ' कर्ताचैववृकोदरः । प्रवर्तकोऽस्य धर्मस्य पाण्डपुत्रीमहाबलः यस्य तीक्ष्णो वृकोनामजउरे हव्यवाहनः । मया दत्त' स धर्मात्मा तेनचासौवृकोदरः मतिमान्दानशीलश्च नागायुतबलोमहान् । भविष्यत्यरजा श्रीमान् कन्दर्प इव रूपवान् । धार्मिकस्याप्यशक्तस्य तीवाग्नित्यादुपोषणे । इदं व्रतमशेषाणां व्रतानामधिकं यतः ।। कथयिष्यति विश्वात्मा वासुदेवो जगद्गुर । अशेषयज्ञफलदमशेषावविनाशनम् ।१७ अशेवदुष्टशमनमशेषसुरपूजितम् । पवित्राणां पविनञ्च मङ्गलानाञ्च मङ्गलम् ॥ भविष्यञ्च भविष्याणा पुराणाना पुरातनम् ॥ १८ ॥ वासुदेव उवाच । यद्यष्टमी चतुर्दश्योर्द्वादशीप्वध भारत । अन्येप्पपि दिनक्षेषु न शक्तस्त्यमुपोपितुम् ॥ सत पुषयान्तिथिमिमा सर्वपापप्रणाशिनीम् । उपोष्यविधिनानेन गच्छविष्णो परम्पदम् माघमासस्य दशमी यदा शुक्ला भवेत्तदा । घृतेनाभ्यञ्जनं कृत्वा तिलः स्नानं समावरत् तथैव विष्णमभ्यर्य नमोनारायणेति च । कृष्णाय पाटी संपूज्य शिरः सर्वात्मनेनमः वैकुण्ठायेति वैकुण्ठमुर श्रीवत्सधारिणे । शनिने चक्रिणे तद्वद् गदिने वरदाय वै ।। सर्वे नारायणस्यैव संपूज्याः वाहव क्रमात् ॥२३॥ . दामोदरायेत्युदरं मे पञ्च शराय वै । ऊरू सौभाग्यनाथाय जानुनी भूतधारिणे ॥२४ नमो नीलायवैजड्पादी विश्वराजे नमः । नमो देव्यै नमः शान्त्यै नमोलक्षयनम श्रियै नमः पुश्यै नमस्तुट्यै धृष्ट्यै हण्यै नमोनमः । नमो विहङ्गनाथाय घायुवेगाय पक्षिणे॥
* मत्स्यपुराणम् * [अष्टपष्टितमो विषप्रमाथिने नित्यं गरुड़ञ्चामिपूजयेत् ॥२६॥ एवं संपूज्य गोविन्दं उमापतिविनायकी । गन्धैर्माल्यस्तथा धूपैर्भक्ष्य नाविधरपि ॥ गव्येन पयसा सिद्धसरामथ धाग्यतः । सर्पिपा सह भुक्त्वा च गत्वाशतपदं बुधः। नैयग्रोधं दन्तकाप्टमथवा खादिरं बुधः । गृहीत्वा धावयेद्दन्तानाचान्तः प्रागुदड्मुखः ॥ ग्रूयात् सायन्तनी कृत्वा सन्ध्यामस्तमिते खो । नमोनारायणायेति त्वामहं शरणतः एकादश्यांनिराहारःसमभ्यर्च्यचकेशवम् । रात्रिञ्चशकलास्थित्वास्नानञ्चपयसातथा ॥ सर्पिया चापि दहनं हुत्या ब्राह्मणपुङ्गवैः । सहैव पुण्डरीकाक्ष! द्वादश्यां क्षीरभोजनम् करिष्यामि यतात्माऽहं निर्विघ्न नास्तु तच्च मे ॥३२॥ एवमुक्त्वा स्वपेद्भूमावितिहासकथां पुनः । श्रुत्वा प्रभाते साते नदीगत्वा विशाम्पते. स्नानं कृत्वा मृदा तद्वत् पाखण्डानभिवर्जयेत् ॥३३॥ उपास्य सन्ध्यांविधिवत् कृत्वा चपितृतर्पणम् । प्रणम्य च हृषीकेशंसतलोकैकमीश्वरम् गृहस्य पुरतो भत्तया मण्डपं कारयेद् बुधः। दशहस्तमथाटो वा करान कुर्याद्विशाम्पते! चतुर्हस्तां शुभां कुर्याद्वेदीमरिनिषूदन ! 1 चतुर्हस्तप्रमाणञ्च विन्यसेत्तत्र तोरणम् ॥ प्रणम्य कलशं तत्र माघ(प)मात्रेण संयुतम् । छिद्रेण जलसम्पूर्णमथ कृष्णाजिनस्थितः तस्य धारां च शिरसा धारयेत् सकलानिशम् ॥३॥ तथैव विष्णोः शिरसि क्षीरधारां प्रपातयेत् । अरनिमानं कुण्डञ्चकुर्यात्तत्र त्रिमेसलम् योनिवक्त्रञ्च तत् कृत्वा ब्राह्मणैःपयसर्पिपी। तिलांश्चविष्णुदेवत्यैर्मन्त्रैरेकाग्निवत्तदा । हुत्वा च वैष्णवंसम्यक्चरंगोक्षीरसंयुतम् । निष्पावार्द्धप्रमाणांवैधारामाज्यस्यपातयेत् जलकुम्भान् महावीर्य स्थापयित्वा त्रयोदशभिर्नानाविधैर्युक्तान् सितवस्त्रैरलतान युक्तानोदुम्वरैः पात्रः पञ्चरत्नसमन्वितान् । चतुर्भिर्वहोमस्तत्र कार्य उदड्मुखैः ।। रुद्रजापश्चतुर्भिश्च यजुर्वेदपरायणः । वैष्णवानि तु सामानि चतुरः सामवेदिनः । अरिएवर्गसहितान्यभितः परिपाठयेत् ॥१४॥ एवं द्वादश तान् विप्रान् वस्त्रमाल्यानुलेपन. । पूजयेदगुलीयश्च कटकैमसूत्रकः ॥४५॥ पासोभिः शयनीयैश्च पित्तशाट्यविवर्जितः । एवं क्षपातिवाह्या च गीतमङ्गलनिस्वनः ।।
ऽध्यायः] * भीमद्वादशीव्रतकथनम् * उपाध्यायस्य च पुनर्टिगुणं सर्वमेव तु । ततः प्रभाते विमले समुत्थायत्रयोदश ॥४॥ गावोदद्यात्कुरश्रेष्ठ! सौवर्णमुग्यमंयुनाः । पयस्विन्य शीलवत्यःकांस्यदोहसमन्विताः ।। गंप्यमुराःमवस्त्रानचन्दनेनाभियेचिताः । तास्नुनपांततोभनयामन्यभोग्यान्नतर्पितान् कन्या चे ग्राह्मणान् सर्वानन्ननानाविधस्तथा। भुनया चाक्षाग्लपणमात्मना च विसर्जयेत् ॥ ५० ॥ अनुगम्य पदान्नष्टी पुत्रभार्यासमन्धितः । प्रीयतामत्र देवेशः केशवः शनाशनः ॥२१॥ शिवम्य हृदये विष्णुर्विष्णोश्च हदये शिवः । यथान्तरनपश्यामितधामेम्वस्तिवायुषः ॥ एवमुधार्य तान् कुम्भान् गाश्चैवशयनानिच । वासांसिवसर्वेषांगृहाणिप्रापयेद्बुधः ॥ अभावव शय्यानामेकामपिसुसंसरताम् । शय्यांदयाइद्विजातश्चमापस्करमयुताम् ॥ इतिहासपुगणानि घाचयित्वानियाहयेत् । नदिनं नगशाईल ! य इच्छेद्विपुलां श्रियम् ॥ तम्मात्त्वं सत्पमालम्व्यभीमसेन ! विमन्सरः । युग्नतमिदंसम्यरम्नेदात्तव मयेरितम् ॥ त्यया एतमिदं धीर ! त्वन्नामाण्यं भविष्यति । साभीमहादशाहोपामपापहग शुभा या तु फल्याणिनी नाम पुग कापेषु पठ्यते ॥५॥ त्वमादिकर्ता भव सीकरऽस्मिन् करपे महाग्यग्नधान । यम्याः म्मग्न फीर्तनमप्यशेवं विनष्पापनिदशाधिपः म्यान् एत्या च यामप्सरसामीशा येण्यारना धन्यमवान्नरेषु । आमीरकन्यानिपुनहलेन संयोवंशी सम्प्रति नाफपृष्टे ॥५॥ जातायया यध्यपुन्टोद्वपापि पुलोमपन्या पुरहतपती । नापि सम्पाः परिचाम्पियं मम प्रिया सम्पनि सायफामा । ग्मान पुन मण्डलमेव दत्तेजोमयं येदगरिमाप । अम्याच त्यानतिया विषम्यान सहस्त्रधारेण सहनमः ॥ इदमेय एतं मन्द्रमुग्यमुमियमुगनिमग्नपा । परमम्य न गारमियतुं यदि निहायुनकोटग मुगम्युः । पलिफ्नुविधारिणमनन्तामिति पापियति यादयन्दमनु १२ * मत्स्यपुराणम् * [ऊनसप्ततितमी अपि नरकगतान् पितॄनशेपानलमुद्धर्तुमिहैव यः करोति । य इदमघधिदारणं शृणोति भत्त्या परिपटतीह परोपकारहेतोः । तिथिमिहसकलार्थभाड् नरेन्द्रस्तव चतुरानन ! साम्यतामुपैति ॥६॥ कल्याणिनी नाम पूरा बभूव या द्वादशी माघदिनेषु पूज्या । सा पाण्डुपुत्रेण पृता भविष्यत्यनन्तपुण्यानघ! भीमपूर्वा ॥६॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे भीमद्वादशीव्रतकथनं नाम अष्टपटितमोऽध्यायः । ऊनसप्ततितमोऽध्यायः पुण्यस्त्रीणां सदाचारप्रतकथनम् । ब्रह्मोवाच । वर्णाश्रमाणां प्रभवः पुराणेषुमयाश्रुतः । सदाचारस्यभगवन् ! धर्माशास्त्रविनिश्चयः ।। पुण्यस्त्रीणां सदाचारं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥१॥ ईश्वर उवाच । तस्मिन्नेव युगे ब्रह्मन् ! सहस्राणितुपोडश | वासुदेवस्यनारीणांभविष्यन्त्यम्बुजोद्भव ताभिर्वसन्तसमये कोकिलालिकुलाकुले। पुष्पिते पयनोत्फुल्लकल्हारसरसस्तटे ॥३॥ निर्भरापानगोष्टीषु प्रसकाभिरलतः । कुरङ्गनयनः श्रीमान् मालतीकृतशेखरः ॥४॥ गच्छन् समीपमार्गेण साम्यः परपुरञ्जयः । साक्षात्कन्दर्परूपेण सर्वाभरणभूपितः ॥५॥ अनङ्गशरतप्ताभिः साभिलापमयेक्षितः । प्रवृद्धोमन्मथस्तासां भविष्यति यदात्मनि ॥६ नवेश्य जात्रा मनो. ध्यानाश । शापं चयनितालमोहरियल्लिदस्यायः मत्परोक्षं यतः कामलौल्यादीद्वग्विधं कृतम् ॥७॥ ततः प्रसादितो देव इदं पक्ष्यतिशाईभृत् । ताभिःशापाभितप्ताभिर्भगवान्भूतभावनः। उत्तारभूतन्दासत्वंसमुद्राब्राह्मणःप्रियः । उपदेक्ष्यत्यनन्तात्माभाविकल्याणकारकम् ॥
१० ऽध्यायः] • पुण्यस्त्रीणांसदाचावतकथनम् * भयतीनामृपिदाल्भ्यो यानं कथयिष्यति । तदेवोत्तारणायालं दासत्वेऽपि भविष्यति । इत्युत्तया ताः परिप्वज्य गतो द्वारपतीश्वरः ॥३०॥ तनः कालेन महता मारावतरणे शते । निवृते मासले तद्धन् केशने दिवमागते ॥१३॥ शून्ये गदुपले सर्चधारैरपि जिनेऽर्जुने । हतासु राणपनी दासभोग्या गाम्युधी । तिष्टन्तीषु च दीर्गत्यसन्ततामु चनुमंग!। भागमिप्यति योगामा दाम्यो नाम महातपाः ॥३॥ ताम्नमाण संपूज्य प्रणिपन्य पुनः पुनः लालप्पमाना यहुशीयायायांकुलक्षणाः || म्मान्त्यो पिपुलान् भोगान् दिव्यमाल्यानुलेपनम् । मतारअगतामीशमनन्तमपगजिनम् ॥१५॥ विश्यभावान्ता पुरींनानाम्यागृहाणिच । दारफायामिन.मानदेयम्मान पुमाग्फान् । मनमेयं फरिप्पन्नि मुनरगिमुगं गिना ॥१६॥ निय ऊचुः। पायुभिमंगपन समिरिभुका पर्पयामा म्यधमांन्ययाम्मापम्मिन्यास मादिनासिपुगणान् ! फेयरन धामना (पग्मादमियोगमाप्ययम्यापमाना: गयानामपि यो धरमग्ननो प्रतिमान | पापियायसम्मास दामोपिलायन nain [ऊनसप्ततितमो । * मत्स्यपुराणम् * चोरैरपहृता सर्व वेश्यात्व समवाप्स्यथ ॥२४॥ एव नारदशापेन केशवस्य च धीमत । वेश्यात्वमागता सर्वा भवन्त्य काममोहिता इदानीमपि यद्वक्ष्ये तच्छृणुध्न घराङ्गना ॥२५ ॥ दारभ्य उवाच। पुरा देवासुरे युद्धे हतेषु शतश सुरै । दानासुरदैत्येषु राक्षसेपु ततस्तत ॥२६॥ तेपायातसहस्राणिशतान्यपिच योपिताम् । परिणीतानियानिस्युर्वलाहुक्कानियानि ॥ तानि सर्वाणि देवेश प्रोवाच पदताम्बर ॥२७॥ इन्द्र उवाच। वेश्याधर्मेण धर्तध्वमधुना नृपमन्दिरे । भक्तिमत्योधरारोहास्तथा देवकलेपु च ॥२८॥ राजान स्थामिनस्तुल्यासुतावापिचतत्समा । भविष्यतिचसौभाग्यसर्वासामपिशक्तित य कश्चिच्छुल्कमादाय गृहमेष्यतिव सदा ! निधनेनोपवावि सतदान्यत्रदाम्भिकात् ॥ देवताना पितॄणाच पुण्याहे समुपस्थिते । गोभूहिरण्यधान्यानि प्रदेयानिस्वशक्तित । ब्राह्मणाना वरारोहा कार्याणि वचनानि च ॥ ३१ ॥ यच्चाप्यन्यद् व्रत सम्यगुपदेक्ष्याम्यह तत । अविचारेण सर्वाभिरनुष्ठेय च तत् पुन ॥ ससारोत्तारणायालमेतद्वेदविदोविदु । यदा सूर्यदिने हस्त पुष्योधाथ पुनर्वसु ॥३३॥ भवेत्सर्वोपधीस्नान सम्यड्नारी समाचरेत् । तदा पञ्चशरस्यापि सन्निधातृत्वमेष्यति अर्चयेत् पुण्डरीकाक्षमनस्यानुकीर्तन ॥ ३४ ॥ कामाय पादौ सपूज्य जड्दै वै मोहकारिणे । मेद्र कन्दर्पनिधये कटिं प्रीतिमते नम ॥ नामि सौख्यसमुद्राय रामाय च तथोदरम् । हृदय हृदयेशाय स्तनावाह्लादकारिणे ।। उत्कण्ठायेति वैकण्डमास्यमानन्दकारिणे । घामादपुष्पचापाय पुष्पवाणायदक्षिणम् ।। मानसायेति चै मौलि विलोलायेति मूर्द्धजम् । सर्वात्मनेच सर्वाङ्ग देवदेवस्य पूजयेत् । नम शिवाय शान्ताय पाशाङ्कुशधराय च । गदिने पीतवस्त्राय शङ्खचक्रधराय व ॥३॥ नमो नारायणायेति कामदेवात्मने नम । सर्वशान्त्यै नम प्रीत्यै नमोरत्यै नम श्रियै । नम पुष्ट्यै नमस्तुष्ट्यै नम सर्वार्थसम्पदे । एव सम्पूज्य देवेशमनङ्गात्मकमीश्वरम् ॥ ---
ऽध्यायः]
* पुण्यस्त्रीणां सदाचारब्रतकथनम् *
गधैर्माल्यैस्तथा धूपैनवेद्येन च कामिनी ॥ ४१
तत आहृय धर्मज्ञं ब्राह्मणं वेदपारगम् । अव्यमावयवं पूज्य गन्धपुष्पार्चनादिभिः ।।२
शालेयतण्डुलपस्थं घृतपात्रेण संयुतम् । तस्मै विप्राय सा दद्यान्माधवः पीयतामिति ॥
यथेष्टाहारयुक्तं वै तमेव द्विजसत्तमम् । रत्यथं कामदेवोऽयमिति चित्तेऽवधार्य तम् ॥
यद्यदिन्छति विप्रेन्दस्तत्तत् कुर्याद्विलासिनी । सर्वभावेनचात्मानमर्पयेत् स्मितभाषिणी
एवमादित्यवारेण सर्वमेतत्समाचरेत् । तण्डुलप्रस्थदानञ्च यावन्मालास्त्रयोदशा ॥४६॥
ततस्त्रयोदशे मासि संप्राप्ते तस्य भामिनी। विधस्योपस्करैर्युक्तां शय्यांदयाद्विलक्षणाम्
सोपधानकविश्रामा सास्तरावरणां शुभाम् । प्रदीपोपानहच्छत्रपादुकासनसंयुताम् ।।
सपनीकमलकृत्य हेमसत्राङ्गलीयकैः । सूक्ष्मयस्त्रैः सफटफैधूपमाल्यानुलेपनः ॥१६॥
कामदेवं सपत्नीकं गुडकुम्भोपरि स्थितम् । ताम्रपानासनगतं हेमनेत्रपटावृतम् ॥५०॥
स कांस्यभाजनोपेतमिशुदण्डसमन्वितम् । दद्यादेतेन मन्त्रेण तथैकां गां पयस्विनीम्
यथान्तरं न पश्यामि फामकेशययोः सदा । तथैव सर्वकामाप्तिरस्तु विष्णो! सटामम
यथा न कमला देहात् प्रयाति तच केशव ! । तथा ममापि देवेश! शरीर स्वेकुरुप्रभो!
तथा च काञ्चनं देवं प्रतिगृह्णन् द्विजोत्तमः । क इदं कस्मादादिति वैदिक मन्त्रमीरयेत्
ततः प्रदक्षिणीत्य विसयं द्विजपुङ्गवम् । शय्यासनादिकं सवं ब्राह्मणस्य गृहं नयेत्
ततः प्रभृत्ति यो विप्रोरत्यथं गृहमागतः । स मान्यः सूर्यवारे च स मन्तव्यो भवेत्तदा ।
एवं त्रयोदशं यावन्मासमेवं द्विजोत्तमान् । सर्पयेत यथाकामं प्रोपितेऽन्य समाचरेत् ॥
तदनुशया रूपयान्यो यावदभ्यागतोभवेत् । आत्मनोऽपियथाविप्नं गर्मभूतिकरम्वियम्
देवं घा मानुषं धा स्यादनुरागण घा ततः ! साचानिएपञ्चाशयथाशक्या समाचरेत् ॥
एतद्धि कथितं सम्यक् भवतीनां विशेषतः । अधर्मोऽयं ततो न स्याडेश्यानामिहसर्वदा
पुरहतेन यत्प्रोक्तं दानवीपु पुरा मया । तदिदं साम्प्रतं सर्व भवतीप्यपि युज्यते॥६.
सर्वपापप्रशमनमनन्तफलदायकम् । फल्याणीनां प्रकाशितं तत् कुरुवं घराननाः ! ॥६२
फरोति या शेषमपण्डमेतत् फल्याणिनीमाधवलोकसंम्या ।
सा पूजिता देवगणरशेषेरानन्दत्स्थानमुपैति विष्णोः ॥६॥
१८६ * मत्स्यपुराणम् * [सप्ततितमो श्रीभगवानुवाच । तपोधनः सोऽप्यभिधाय चैवं तदा च तासां व्रतमङ्गनानाम् । स्वस्थानमेष्यन्ति समस्तमित्थं व्रतं करिष्यन्ति च देवयोने ! ॥६॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे पुण्यस्त्रीणांसदाचाखतकथनं नामोनसप्ततितमोऽध्यायः । सप्ततितमोऽध्यायः अशून्यशयनत्रतकथनम् । ब्रह्मोवाच । भगवन् पुरुषस्येह स्त्रियाश्च विरहादिकम् । शोकव्याधिभयं दुःखं न भवेद्येन तद्वद् ॥ श्रीभगवानुघाव। श्रावणस्य द्वितीयायां कृष्णायां मधुसूदनः । क्षीरार्णवे सपत्नीकः सदा घसति केशवः। तस्यां संपूज्य गोविन्दंसर्वान् कामान् समश्नुते।गोभूहिरण्यदानादि सप्तकल्पशतानुगम् अशृन्यशयनं नाम द्वितीया सम्प्रकीर्तिता । तस्यां सम्पूजयेद्विष्णुमेभिर्मन्त्रविधानतः ॥ श्रीवत्सधारिन् ! श्रीकान्त! श्रीधामन् ! श्रीपतेऽव्यय!। गार्हस्थ्यं मा प्रणाशं मे यातु धर्मार्थकामदम् ॥५॥ अन्नयो मा प्रणश्यन्तु देवताः पुरुषोत्तम ! पितरो मा प्रणश्यन्तु मास्तु दाम्पत्यभेदनम् लक्ष्म्यावियुज्यतेदेव ! नकदाचिद्यथा भवान् ।तथाकलत्रसम्बन्धोदेव!मामेवियुज्यताम् लक्ष्म्या न शून्यो परद! शय्यां त्वं शयनं गतः । शय्याममाप्यशून्यास्तु तथैवमधुसदन! गीतवादिबनिघोपं देवदेवस्य कीर्तयेत् । घण्टाभवेदशक्तस्य सर्वचाद्यमयी यतः ॥ ६ ॥ एवं सम्पूज्य गोविन्दमश्नीयात्तैलयजितम् । नक्तमक्षारलवणं यावत्तत्स्याच्चतुष्टयम् ।। ततः प्रभाते सजाते लक्ष्मीपतिसमन्विताम् । दीपानभाजनैर्युक्तां शय्यांदद्याद्विलक्षणाम् पादुकोपानहच्छत्रचामरासनसंयुताम् । अभीष्टोपस्करैयुक्तां शुक्लपुप्पाम्वरावृताम् ॥१२ ऽध्यायः] * अडारकवतकथनम् । सोपधानकविश्रामा फलैर्नानाविधैर्युताम् । तथाभरणधान्यैश्च यथाशच्या समन्विताम् अव्यङ्गाङ्गाय विप्राय वैष्णवाय कुटुम्बिने । दातव्या वेदविदुपे भावेनापतिताय च ॥ तनोपविश्यदाम्पत्यमलङ्कृत्यविधानतः । परल्यास्तुभाजनं दद्याद्रक्ष्यभोज्यसमन्वितम् ब्राह्मणस्यापि सौवणींमुपस्करसमन्विताम् । प्रतिमां देवदेवस्य सोदकुम्भांनिवेदयेत् । एवं यस्तु पुमान् कुर्यादशून्यशयनं हरेः । वित्तशाठ्येन रहितोनारायणपरायणः ॥१७ नारीवाविधवानह्मन् ! यायचन्द्रार्कतारकम् । न विरूपीन शोकातौंदम्पतीभवत क्वचित् न पुत्रपशुरत्नानि क्षयं यान्ति पितामह ! । सप्तकल्पसहस्राणि सप्तकल्पशतानि च ॥ कुर्वन्नशून्यशयनं विष्णुलोके महीयते ॥ १६ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणेऽशून्यशयनवतं नाम सप्ततितमोऽध्याय.। एकसप्ततितमोऽध्यायः अङ्गारकप्रतकथनम्। ईश्वर उवाच । शृणु चान्यद्धविष्यं यदपसम्पद्विधायकम् । भविष्यति युगे तस्मिन् द्वापरान्तपितामह । पिप्पलादस्य संवादो युधिष्ठिरपुर सरैः ॥२॥ घसन्तं नैमिषारण्ये पिप्पलादं महामुनिम् । अधिगम्य तदा चैन प्रश्नमेकं करिप्यति । युधिष्ठिरो धर्मपुनो धर्मयुक्तस्तपोधनम् ॥२॥ युधिष्ठिर उवाच । फचमारोग्यमैश्वयंमतिधर्मगतिस्तथा । अन्यङ्गता शिरे भक्तिणयोवाभनेत्ययम् ।। ईश्वर उवाच । , तस्योत्तरमिदं ब्रह्मन् ! पिप्पलादम्यधीमत । शृणुष्य यस्यतिधर्मपुत्राय धार्मिक || पिप्पलाद उपाय साधुपृष्टं त्यया मद्र! इदानी कथयामि ते । अङ्गारमतमित्येतत् स पक्ष्यतिमदीपनैः * मत्स्यपुराणम् * [ एकसप्ततितमो अत्राप्युदाहरन्तीममितिहास पुरातनम् । विरोचनस्य सम्वाद भार्गवस्य च धीमत ॥ प्रह्लादस्य सुत दृष्ट्वा द्विरएपरिवत्सरम् । रूपेणाप्रतिम कान्त्या सोऽहसभृगुनन्दन ॥७ साधु साधु महाबाहो । विरोचन ! शिव तव । तत्तथा हसित तस्य पप्रच्छसुरसूदन ॥ ब्रह्मन् । किमर्थमेतत्तेहास्यमाकस्मिकतम् । साधुसाश्चितिमामेवमुक्तवास्त्ववदस्वमे ॥ तमेव वादिन शुक्र उवाच चदताम्बर । विस्मयाव्रतमाहात्म्यादास्यमेतत् कृतमया ॥ पुरा दक्षविनाशाय कुपितस्य तु शूलिन । अथ तद्वीमवक्त्रस्य स्वेदबिन्दुर्ललाटज ॥ भित्वा स सप्तपातालानदहत्सप्त सागरान् । अनेक्वक्त्रनयनोचलज्ज्चर नभीषण १२ धीरभद्र इति ख्यात करपादायुतैर्युत । कृत्वासी यज्ञमथन पुनर्भूतलसम्भव । निजगन्निर्दहन भूय शिवेन विनिवारित ॥१३॥ कृत त्वया वीरभद्र । दक्षयज्ञविनाशनम् । इदानीमलमेतेन लोकदाहेन कर्मणा । शान्तिप्रदाता सपा ग्रहाणा प्रथमोभव । प्रेक्षिप्यन्तेजना पूजाकरिष्यन्तिवरान्मम ।। अङ्गारक इति ख्याति गमिष्यसि धरात्मज । देवलोके द्वितीयञ्च तव रूप भविष्यति ॥ ये च त्वा पूजयिष्यन्ति चतुर्थ्या त्यद्दिनेनरा । रूपमारोग्यमैश्वर्यतेप्वनन्तभविष्यति ॥ एवमुक्तस्तदा शान्तिमगमत्कामरूपधृक् । सबातस्तन्क्षणाद्राजन् ' ग्रहत्वमगमत्पुन ॥ स कदाचित्भयास्तस्यपूजा_दिकमुत्तमम् । दृष्टवान् प्रियमाणश्चशद्रेणचव्यवस्थित ॥ नेन व रूपवान् जात सुग्शत्रुकुलोढह । विविधा च रचिर्जाता यस्मात्तव विदरगा। विरोचन इति प्राहुर्यस्मात् त्या देवदानवा । शूदेण प्रियमाणस्यवतम्यतव दर्शनात् ॥ इंदशी म्पसम्पत्ति दृष्ट्वाचिम्मितवानहम् । साधुसाध्वितितेनोक्तमही माहात्म्यमुत्तमम् ।। पश्यतोऽपि भयेटूपमैश्वयं किमु पुरंत ॥२०॥ यम्माच मत्तया धरणीमुनम्य विनिन्धमानेन गपादिदानम् । आलोरितन्तन मुरारिगर्भ सम्भतिरेषा तव दैत्य ' जाता ॥२॥ वर उपाय। भए नमन धुन्या मार्गपम्य महात्मन ! प्रहादनन्दनापीर पुन पाद विम्मित ॥ + ऽध्यायः] # मनारकरतकथनम् । १८६ विरोचन उपाय। भगवंस्तवतं सम्यक श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः । दीयमानन्तु यहानमयादृष्टं भवान्तरे ॥ माहात्म्यञ्च विधि तम्य यथावद्वतमर्हसि । इति तद्वचनं श्रुत्वापुन प्रोवाचविस्तरात् ।। शुक्र उवाच । चतुर्थ्यङ्गारकदिने यदा भवति दानव । मृदा स्नानं तदा कुर्यात्पारागविभूषितः ॥२७ अग्निादियोमन्त्रजपन्नास्लेउटमुग्यः ।शूट्रम्नृणीम्मरम्भौममास्तभोगविवर्जितः॥ तयास्तमित आदित्ये गोमयेनानुलेपयेत् । प्रागणं पुष्पमालाभिरक्षतामिः समन्ततः ।। अभ्याभिलिगेन् पा फुङ्गमेनाप्टपरकम् । फुङ्गमम्याप्यभाये तु रक्तचन्दनमिप्यते॥३० चत्वारः करका:कार्याभक्ष्यमीज्यसमन्विता तिलैरक्तशालीय पद्मरागैध संयुताः ।। चतुःकोणेपु तान् शन्या फलानि विधिनानि च । गन्धमाल्यादिकं सर्व तथैव विनिवेदयेत् ॥३॥ मुवर्णही कपिलामथार्य गप्यः गुः काम्यदोहां सवत्साम् । धुरन्धरं रक्तमतीच सौम्यं धान्यानि सप्ताम्यरमंयुनानि ॥३३॥ अष्टमात्रं पुरुष तथैव सौवर्णमन्यायतराहुटण्टम् । चतुर्भुजं हेममये निविष्टं पाने गुडम्योपरि सर्पियुनम् ॥३॥ समम्नयाय जिनेन्द्रियाय पाशाय शोलान्ययमयुताय । दानन्यमेतत् मफल, दिजाय पुटुम्पिने नेप नु दाम्मिकाय । समादेदिप्रयगय भनया रतावलिः पूर्वमुद्रीर्य मन्त्रम् ||३|| भूमिपुत्र मदामाग! म्येटोदयः पिनाकिन ।म्पायीत्यांप्रपन्नोऽहंगृहाणायनमाग्नुने मन्त्रणानेन दचापं नायन्दनयाग्णिा। ततोऽयेहिमवरंगतमाल्यारयगदिमिः । दयानेगेयमन्त्रेणीमहोमिथुनान्वितम् । शध्यानामिनोदयानमएम्फरमंयुताम् ।। गदिएनम लोफे यथाम्य दयितं गृ । तत्तद्गुणयने देयन्तदेवाशयमिन्ना En प्रदक्षिणं सत्र न्या विमर्श द्विजपुश्यम् । ननमशारणमनीयाद्गुनायुतम् ॥ भवया यम्नु पुन दुर्गादेपमहापारम । गनुगे याया तम्य पपुण्यनामित [द्विसप्ततितमो * मत्स्यपुराणम् * रूपसौभाग्यसम्पन्नः पुनर्जन्मनिजन्मनि । विष्णौचाऽथशिवभक्तःसप्तद्वीपाधिपोभवेत।। सप्तकल्पसहस्राणि लोके महीयते । तस्मात्त्वमपि दैत्येन्द्र ! व्रतमेतत् समावर ॥४३ पिप्पलाद उवाच । इत्येवमुनवा भृगुनन्दनोऽपि जगाम दैत्यश्च चकार सर्वम् । त्वं चापि राजत् ! कुरु सर्वमेतद्यतोऽक्षयं वेदविदो वदन्ति ॥ ४४ ॥ ईश्वर उवाच । तथेति संपूज्य स पिप्पलादं पापञ्चकाराद्भुतवीर्यकर्मा । शृणोति यश्चैनमनन्यचेतास्तस्यापि सिद्धिं भगवान् विधत्ते ॥ ४५ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे अङ्गारकचतुथींवतकथनं नामैकसप्ततितमोऽध्यायः । द्विसप्ततिमोऽध्यायः शुक्रगुरुप्रशान्तिकथनम् । पिप्पलाद उचाव । अथातः 2णु भूपाल ! प्रति शुक्र प्रशान्तये । यबारम्भेऽवसाने च तथा शुक्रोदये त्विहा राजतेवाथ सौवर्णे कांस्यपात्रेऽथ चा पुनः । शुक्लपुष्पाम्वरयुते सिततण्डुलपूरिते ॥ विधाय राजतं शुक्र शुचि मुक्ताफलान्वितम् । मन्त्रेणानेन तत्सर्व सामगाय निवेदयेत्॥ नमस्ते सर्यलोकेश! नमस्ते भृगुनन्दन ! । कवे सर्वार्थसिद्धयर्थं गृहाणाय नमोऽस्तुते । एवमस्योदयेकुर्वन् यात्रादिपुच भारत !! सर्वान् कामानवाप्नोति विष्णुलोकेमहीयते ॥ यावच्युकस्य नहता पूजा सामाल्यकः शुभैः। घटक पूरिफाभिध गोधूमैश्चणकरपि । तापदन्नं नवानीयात् त्रिभिः कामार्थसिद्धये ॥६॥ तहद्वायस्पतेः पूजा प्रवक्ष्यामि युधिष्ठिर!। सुवर्णपात्रे सौवर्णममरेशपुरोहितम् । पीतपुप्पाग्वरयुतं कृत्वा नात्याथ सर्पपैः पलाशाश्वत्थयोगेन पञ्चगव्यजलेन च ॥ell ISI ऽध्यायः] * कल्याणसप्तमीव्रतकथनम् * पीताङ्गरागवसनो घृतहोमन्तु कारयेत् । प्रणम्य च गवा साद्धं ब्रह्मणाय निवेदयेत् ॥ नमस्तेऽङ्गिरसानाथ! वाक्पते!च वृहस्पते! क्रूरग्रहः पीडितानाममृताय नमो नमः ।। संक्रान्तावस्यकौन्तेय यात्रास्वभ्युदयेपुच । कुर्वन्वृहस्पतेःपूजांसर्वान्कामान्समभुते ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे गुरुशुक्रप्रशान्तिकथनं नाम द्विसप्ततितमोऽध्यायः । त्रिसप्ततितमोऽध्यायः कल्याणसप्तमीव्रतकथनम् । ब्रह्मोवाच । भगवन्! भव ! संसारसागरोत्तारफारक'। किञ्चिद्वतंसमाचक्ष्वस्वर्गारोग्यसुखप्रदम् ।। ईश्वर उवाच । सोरं धर्म प्रवक्ष्यामि नान्ना कल्याणसप्तमीम् । विशोकसप्तमी तद्वत् फलाढयां पापनाशिनीम् ॥ २ ॥ शर्करासप्तमी पुण्यां तथा कमलसप्तमीम् । मन्दारसप्तमी तद्वच्छुभदां शुभसप्तमीम् ॥३॥ सर्वानन्तफलाः प्रोकाः सर्या देवपिपूजिताः । विधानमासां पक्ष्यामि यथावदनुपूर्वश, यदा तु शुद्धसप्तम्यामादित्यस्य दिनं भवेत् । सातु फल्याणिनी नामविजयावनिगद्यते। प्रातर्गव्येन पयसा मानमस्यां समाचरेत् । तत शुलाधरः पद्ममक्षताभिः प्रकल्पयेत् ॥ प्राङ्मुसोऽष्टदलं मध्ये तद्वद् वृत्ताञ्च कर्णिकाम् । पुष्पाक्षताभिर्देवेशं विन्यसेत् सर्वतः क्रमात् ॥ ७ ॥ पूर्वण तपनायेति मार्तण्डायेति चानले । याम्ये दिवाकरायेति विधान पति नेते । पश्चिमे परणायेति भास्फरायेति चानिले । सौम्य चैकर्तनायेति रवये चाटम दले हा श्रादायन्लेव मध्येच नमोऽस्तु परमात्मने । मन्त्रैरेमिः समभ्ययं नमम्फारान्तदीपितः शुवस्त्र. फलैर्भक्ष्यधूपमात्यानुलेपनैः । स्थण्डिले पूजयेद्धच्या गुइन लयन च ॥११ --- २६२ * मत्स्यपुराणम् * [चतुःसप्ततितमो ततो व्याहृतिमन्त्रेण विसर्जेद्विजपुङ्गवान् । शक्तितः पूजयेद्वत्या गुडक्षीरघृतादिभिः । तिलपात्रं हिरण्यं च ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥ १२ एवं नियमझत्सुप्त्वा प्रातरुत्थाय मानवः । कृतस्मानजपो विप्रैः सहैव घृतपायसम् ॥ भुन्या च वेदविदुपि विडालवतजिते । घृतपानं सकनकं सोदकुम्भ निवेदयेत् ॥१४|| प्रीयतामत्र भगवान परमात्मा दिवाकरः । अनेन विधिना सर्व मासिमासि व्रतंचरेत् । ततस्त्रयोदशे मासि गावै दद्यात्त्रयोदश । वस्त्रालङ्कारसंयुक्ताःसुवर्णास्याः पयस्विनीः एकामपिप्रदद्याद्वा वित्तहीनो विमत्सरः । न वित्तशाठ्यं कुर्वीतयतो मोहात् पतत्यधः । अनेन विधिनायस्तु कुर्यात् कल्याणसप्तमीम् । सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्यलोके महीयते॥ आयुरारोग्यमैश्वर्यमनन्तमिह जायते ॥ १८ ॥ सर्वपापहरा नित्यं सर्वदैवतपूजिता । सर्वदुष्टोपशमनी सदा कल्याणसप्तमी ॥ १६ ॥ इमामनन्तफलदां यस्तु कल्याणसप्तमीम् । शृणोति पठते चेह सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥२०॥ इति श्री. स्यपुराणे कल्याणसप्तमीव्रतकथनं नाम त्रिसप्ततितमोऽध्यायः । चतुःसप्ततितमोऽध्यायः विशोकसप्तमीव्रतकथनम् | - ईश्वर उवाच। विशोकसप्तमी तद्वद्वक्ष्यामि मुनिपुङ्गव ! यामुप्योप्य नरः शोकं न कदाचिदिहाभुते ॥ माघे कृष्णतिलैः स्नात्वा षष्ठयां वै शुक्लपक्षतः । एताहारः कसरया दन्तधावनपूर्वकम् । उपवासवतं कृत्वा ब्रह्मचारी भवेनिशि ॥२॥ ततः प्रभात उत्थाय कृतस्नानजपः शुचिः । कृत्वातु काञ्चनं पद्ममा ति। करवीरेण रक्तन रक्तवस्त्रयुगेन च । यथा विशोकं भुवनं त्यः दित्य ! सर्वदा ॥ तथा विशोकता मेऽस्तु त्वद्भक्तिः प्रतिजन्म च ॥२॥ येत् ३
ऽध्यायः]
* फलसप्तमीव्रतकथनम् *
एवं संपूज्यपप्ठ्यान्तुभक्त्यासंपूजयेद्विजान् । सुप्त्यासंप्राश्यगोमूत्रमुत्थायकृतनत्यका
संपूज्य विप्रानन्नेन गुडपात्रसमन्वितम् । तद्वस्त्रयुग्मं पद्मञ्च ब्राह्मणाय निवेदयेत् । ६ ।
अतेललवर्ण भुक्त्वा सप्तम्यां मौनसंयुतः । ततः पुराणश्रवणं कर्तव्यं भूतिमिच्छता ॥
अनेन विधिना सर्वमुभयोरपि पक्षयोः । कृत्वा यावत् पुनर्माघशुक्लपक्षस्य सप्तमी १८॥
वतान्ते कलशन्दद्यात् सुवर्णकमलान्वितम् ।
शय्यां सोपस्करन्दद्यात् कपिलाञ्च पयस्विनीम् ॥६॥
अनेन विधिनायस्तु वित्तशावविवर्जितः । विशोकसप्तमी कुर्यात्सयातिपरमाङ्गतिम् ।।
यापजन्मसहस्राणां सानं कोटिशतं भवेत् । तावन्नशोकमभ्येति रोगदोर्गत्यवर्जित. ॥
यंयं प्रार्थयते कामं तन्तमाप्नोति पुष्कलम् । निष्कामाकुरतेयस्तु स परं ब्रह्मगच्छति ।।
यः पठेच्छृणुयाद्वापि विशोकाख्याञ्च सप्तमीम् ।
सोऽपीन्द्रलोकमाप्नोति न दुःपी जायते क्वचित् ॥१३॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे विशोकसप्तमीग्रतकथनं नाम चतुःसप्ततिता ध्यायः
।
पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः
फलसप्तमीव्रतकथनम् ।
ईश्वर उवाच।
अन्यामपिपपश्यामिनामातुफलसनमीम् । यानुपोप्य नरःपापाद्विमुक्तः स्वर्गभाग्भवेत्॥
मार्गशीर्ष शुभेमासिसतम्यां नियतरतः । तामुपोप्याथकमलं कारयित्वा तु काञ्चनम् ॥
शर्फरार 'नं दद्याद्गाह्मणाय कुटुम्बिने । रवि कांचनसं कृत्वापलस्यकस्य धर्मवित्।। ।
। गत द्विकाललायां भानु, प्रीयतामिति ॥२॥
भक्या विमान् संपूज्य चाटम्यां क्षीरभोजनम् ।
दत्त्वा पुर्यात् फलयुतं यावत् स्यात् ऋष्णसप्तमी ॥२॥
* मत्स्यपुराणम् *
[पट्सप्ततितमो
तामप्युपोप्य विधिवदनेनैव क्रमेण तु । तद्धमफलं दत्त्या सुवर्णकमलान्वितम् ॥५
शर्करापात्रसंयुक्तवस्त्रमाल्यसमन्वितम् । सम्वत्सज्ञ्च तेनैव विधिनोभयसप्तमीम् ॥६॥
उपोप्य दत्त्वा क्रमशः सूर्यमन्त्रमुदीरयेत् । भानुरौरविब्रह्मा सूर्यःशको हरिः शिवः ॥
श्रीमान् विभावसुस्त्वष्टा वरुणः प्रीयतामिति ॥७॥
प्रतिमासञ्च सतम्यामेकैकं नाम कीर्तयेत् । प्रतिपक्षं फलत्यागमेतत् कुर्वन् समाचरेत् ॥
प्रतान्ते विप्रमिथुनं पूजयेद्वस्त्रभूपणैः। शर्कराकलशं दद्याद्धमपद्मदलान्वितम् ॥६॥
यथा न विफला कामास्त्वद्भक्तानां सदा रवे । तथाऽनन्तफलावाप्तिरस्तु मे सप्तजन्मसु
इमामनन्तफलदां यः कुर्यात् फलसप्तमीम् । सर्वपापविशुद्धात्मासूर्यलोके महीयते ॥
सुरापानादिकंकिश्चियत्रामुत्र वा कृतम् । तत्सर्वनाशमायातियःकुर्यात्फलसप्तमीम् ।
कुर्वाणः सप्तमीञ्चेमां सततं रोगवर्जितः । भूतान् भव्यांश्च पुरुषांस्तारयेदेकविंशतिम् ।
यः शृणोति पठेद्वापि सोऽपि कल्याणभाग्भवेत् ॥१३॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे फलसप्तमीव्रतकथनं नाम पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ।
पट्सप्ततितमोऽध्यायः
शर्करासप्तमीत्रतकथनम् ।
ईश्वर उवाच ।
शर्करासप्तमी वक्ष्ये तद्वत्कल्मपनाशिनीम् । आयुरारोग्यमैश्वयं ययाऽनन्तं प्रजायते ॥१
माधवस्य सिते पक्षेसप्तम्यां नियतव्रतः । प्रातः स्नात्वातिलैःशुलःशुलमाल्यानुलेपनः ॥
स्थण्डिलेपझमालिख्यकुङ्कुमेनसकर्णिकम् । तस्मिन्नमः सवित्र तु गन्धधूपो निवेदयेत् ।।
स्थापयेदुकुम्भश शर्करापात्रसंयुतम् । शुक्लवस्त्रैरलङ्कृत्य शुकमाल्यानुलेपनैः ।।
सुवर्णेन समायुक्तं मन्त्रेणानेन पूजयेत् ॥४॥
ऽध्यायः] * कमलसप्तमीयतकथनम् * विश्ववेदमयोयस्माद्वेदचादीति पत्र्यसे । सर्वस्यामृतमेवत्वमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥५॥ पञ्चगव्यं तत. पीत्वा स्वपेत्तत् पार्श्वतः क्षिती । सौरसूक्तं स्मरनास्ते पुराणनवणेन च अहोरात्रे गते पश्चादष्टम्यां कृतनत्यकः । तत्सर्व विदुये तद्वबाह्मणाय निवेदयेत् ॥७॥ भोजयेच्छक्तितो विप्रान् शर्करातपायसै । भुञ्जीतातललवणं स्वयमप्यथ वाग्यतः ॥ अनेन विधिना सर्वमासि मासि समाचरेत् । संवत्सरान्ते शयनं शर्कराकलशान्वितम् सर्वोपस्करसंयुक्तं तथैकाडांपयस्विनीम् । गृहंचशक्तिमान्दद्यात्समस्तोपरकरान्वितम् सहस्रणाथ निकाणां कृया दद्याच्छतेन वा । दशभिर्वार्थ निप्फेण तदनापि शक्तितः सुवर्णाश्य, प्रदातव्य पूर्ववनमन्तवादनम् । न वित्तशाटय कुर्वीत कुर्वन्दोष समश्नुने ! अमृतं पियतो घस्त्रात्मर्यस्यामृतपिन्दवः । निपेतुर्य तदुत्थामी शालिमुद्रेक्षवः स्मृताः शर्करा तु परा तस्मादिक्षुसारोऽमृतात्मवान् । इष्टा रखेरत. पुण्या शर्करा हव्यकव्ययोः शरासप्तमी घेणं घाजिमेधकलपदा । सर्पदुष्टप्रशमनी पुत्रपौत्रपर्दिनी ॥ १५ ॥ यः कुर्यात् परया भन्या स वै सद्गतिमाप्नुयात् । करपमेकं घसेत् स्वर्ग ततो याति परम्पदम् ॥१६॥ इदमनघं यःमृणोति स्मद्धा परिपठतीह मुरेश्वरस्य लोके । मतिमपि च ददाति सोऽपि देवेग्मरवधूजनमालयाऽभिपूज्य. ॥१७॥ इति श्रीमत्स्यपुरापो शर्फगसप्तमीनतकथनं नाम पट्सप्ततितमोऽध्यायः । 1 सप्तसप्ततितमोऽध्यायः कमलमप्तमीवतकथनम् । ईश्वर उवाच। अतः परं प्रवक्ष्यामि तद्वत् कमलसममीम् । यम्या सहीनादेव नुमतीद दिवाकरः ।। पसन्तामलसप्तम्यां मातः सन् गौरसप्पैः । तिनपाने च सोपणे विधाय पमलं शुभम् पम्प्रयुग्मावृतं एन्वा गन्धपुर: समर्चयेन् । नम यमलहम्नाय नमम्ने विश्वधारिणे ॥
[अपसप्ततितमो
* मत्स्यपुराणम् *
दिवाकर | नमस्तुभ्य प्रभाकर ! नमोऽस्तुते । ततो द्विकालवेलायामुदकुम्भसमन्विताम्
विनाय दद्यात् सपूज्य वस्त्रमाल्यविभूषण । शक्त्या चकपिलादद्यादलङ्कृत्यविधानत
अहोरात्रे गने पश्चादष्टम्या भोजयेद्विजान् । यथाशक्त्याऽथभुजीत मासतैलविवर्जितम्
अनेन विधिना शुक्सप्तम्या मासि मासि च । सर्व समावरेद्भक्त्या वित्तशाट्यविवर्जित
बतान्ते शयन दद्यात् सुवर्ण कमलान्वितम् ।
गाञ्च दद्यात् स्वशत्तयां तु सुवर्णाढया पयस्विनीम् ॥८॥
भाजनासनदीपादीन दयादिष्टानुपस्करान् । जनेन विधिना यस्तु कुर्यात् कमलसप्तमीम्
लक्ष्मीमनन्तामभ्येति सूर्योके महीयते ॥६॥
कल्पेकल्पेततोलोका-सप्त गत्यापृथक पृथक् । अप्सरोभि परिवृतस्ततोयातिपराङ्गतिम्
य पश्यतीद शृणुयाञ्च मर्त्य पठेच्च भत्तयाऽथ मति ददाति ।
सोऽप्यन लक्ष्मीमवलामवाप्य गन्धर्वविद्याधरलोकभाक् स्यात् ॥११॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे कमलसप्तमीनतकथन नाम सप्तसप्ततितमोऽध्याय ।
अष्टसप्ततितमोऽध्यायः
मन्दारसप्तमीत्रतकथनम्।
ईश्वर उवाच।
अथात सम्प्रवक्ष्यामि सर्वपापप्रणाशिनीम् । सर्वकामप्रदा रम्यानाम्नामन्दारसप्तमीम्
माघस्यामलपक्षे तु पञ्चम्या लघुभुड्नर । दन्तकाष्ट तत कृत्वा षष्ठीमुपवसेद् बुध ॥
विप्रान् सपूजयित्वातुमन्दारप्राशयेन्निशि । तत प्रभात उत्थाय कृत्वा मानपुनद्विजान
भोजयेच्छक्तित कृत्या मन्दारकुसुमाष्टकम् । सौवर्ण पुस्प तद्वत्पद्महस्त सुशोभनम् ॥
पा कृष्णतिरै हत्या ताम्रपाषु पत्रकम् । हैममन्दारकुसुमैांस्करायेति पूर्वत ॥५॥
नमस्कारेण तद्वच्च सायेत्यानलेदले । दक्षिणे तद्वदर्याय तथार्यम्णेति नैते ॥६॥
ऽध्यायः] * शुभसप्तमीव्रतकथनम् १६७ पश्चिमे वेदधाम्ने च वायव्ये चण्डभानवे ! पूणेत्युत्तरतः पूज्यमानन्दायेत्यतः परम् ॥ कर्णिकायाञ्च पुरयंस्थाप्यसर्वात्मनेति च । शुकवस्नैःसमावेष्ट्रयभक्ष्याल्यफलादिमिः एवमभ्यय॑ तत्सर्व दद्याद्वेदविदे पुनः । भुनीतातललवर्ष वाग्यत. प्राड्मुखो गृही ॥६ अनेन विधिना सर्व सप्तम्यांमासिमासि च | कुर्यात्सम्वत्सरं यावद्वित्तशाट्यविवर्जितः एनदेव व्रतान्ते तु निधाय कलशोपरि । गोभिर्विभवत सार्द्ध दातव्यं भूतिमिच्छता ॥ नमो मन्दारनाथाय मन्दारभवनाय च । त्वं रखे, तारयस्वास्मान्ससारभयसागरात् ।। अनेन विधिना यस्तु कुर्य्यान्मन्दारसप्तमीम् । विपाप्मा ससुसीमर्त्यः करपञ्चदिविमोदते इमामधीघपटलभीपण चान्तदीपिकाम् । गच्छन् प्रगृह्य संसारे सर्वार्थाश्च लभेन्नरः ॥ मन्दारसप्तमीमेतामीप्सितार्थफलप्रदाम् । यः पठेच्छृणुयाद्वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते ।१५।। इति श्रीमत्स्यपुराणे मन्दारसप्तमीव्रतकथनं नामाष्टसप्ततितमोऽध्यायः । ऊनाशातितमोऽध्यायः शुभमप्तमीव्रतकथनम् । श्रीभगवानुवाच । अथान्यामपि वक्ष्यामि शोभनां शुभसप्तमीम् । यामुपाप्य नरोरोगशोकदु.ख प्रमुच्यते पुण्ये चाश्ययुजेमासिकतम्नानजप शुचिः । वात्रयित्वा ततो विप्रानारमेच्छुभसममीम् कपिलां पूजयेद्भक्त्या गन्धमाल्यानुलेपनै । नमामि सूर्यसम्भूतामशेषभुवनालयाम् ॥ त्वामहं शुभकल्याणशरीरां सर्वसिद्धये ॥ ३ ॥ अथ कृत्या तिलप्रस्थं ताम्रपाण संयुतम् । काञ्चनं वृषभ तद्वद्गन्धमात्यगुडान्वित. ॥ फलनानाविधैर्भक्ष्यतपायससंगुतः । दद्याद्विकालवेलायामर्यमा प्रोग्रतामिति ॥५॥ पञ्चगव्यश्च समाश्य म्वद्भूमी विमत्सर. । ततः प्रभाते सानेभक्यासंपूजयेद्विजान् अनेन विधिना दद्यान्मासि मासि यदा नर. चाससी वृषभ हैम तद्वद्गां काशनोद्भवाम् [अशीतितमो * मत्स्यपुराणम् * सम्वत्सरान्ते शयनमिक्षुदण्डगुड़ान्वितम् । सोपधानकविश्रामं भाजनासनसंयुतम् ॥८ तान्नपात्रे तिलप्रस्थं सौवर्णं वृषभ तथा । दद्याद्वेदविदे सर्व विश्वात्मा प्रीयतामिति ॥ अनेन विधिना विद्वान् कुर्याद्यःशुभसप्तमीम् । तस्य श्रीविपुला कीतिर्भवजन्मनिजन्मनि अप्सरोगणगन्धर्वैः पूज्यमानः सुरालये । वसेद् गणाधिपो भूत्वा यावदाभूतसंप्लवम् । कल्पादाववतीर्णस्तु सप्तद्वीपाधिपो भवेत् ॥ ११ ॥ ब्रह्महत्यासहस्त्रस्य भ्रूणहत्याशतस्य च । नाशायालमियं पुण्या पठ्यते शुभसप्तमी।१२॥ इमां पठेद्यः शृणुयान्मुहूर्त पश्येत्प्रसङ्गादपि दीयमानम् । सोऽप्यत्र सर्वाघविमुक्तदेहः प्राप्नोति विद्याधरनायकत्वम् ॥१३॥ यावत्समाः सप्त नरः करोति यः सप्तमी सप्तविधानयुक्ताम् । स सप्तलोकाधिपतिः क्रमेण भूत्वा पदं याति परं मुरारः ॥१४॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे शुभसप्तमीव्रतकथनं नामोनाशीतितमोऽध्यायः । अशीतितमोऽध्यायः विशोकद्वादशीव्रतकथनम् । मनुरुवाच। किमभीष्टवियोगशोकसवादलमुर्तुमुपोषणं यतं वा । विभवोदयकारिभूतलेऽस्मिन् भवतिरपि सूदनञ्च पुंसः ॥३॥ मत्स्य उवाच। परिपृष्टमिदं जगत् प्रियन्ते विबुधानामपि दुर्लभं महत्त्वात् । तव भक्तिमतास्तथापि पध्ये व्रतमिन्द्रासुरमानवेषु गुह्यम् ॥२॥ पुण्यमाश्चयुजे मासि विशोपडादशीवतम् । दशम्यां लघुभुग्विद्वानारनियमेन तु ॥ उदमुगः प्राइमुग्यो पा दन्तधायनपूर्यफम् । एकादश्यांनिराहारः समभ्यय॑तुपूर्वकम् ।
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ऽध्यायः
* विशोकद्वादशीव्रतकथनम् *
श्रियं घाऽभ्यर्च्य विधिवदोक्ष्यामि त्वपरऽहनि ॥४॥
एवं नियमहत्सुप्ता प्रातरत्थाय मानवः । स्नानं सर्वोपधैः कुर्यात्पञ्चगव्यजलेन तु ॥
शुब्लमाल्याम्बरधरः पूजयेच्क्रीशमुत्पलैः ॥५॥
विशोकाय नमः पादो जङ्घच घरदाय वै । श्रीशाय जानुनी तद्वदूरू च जलशायिने ॥
कन्दाय नमो गुह्यं माधवाय नम. कटिम् । दामोदरायेत्युदरम्पार्श्वे व विपुलाय वै।।
नाभिञ्च पद्मनाभाय हृदयं मन्मथाय वै । श्रीधराय विभोर्यक्षः करी मधुजिते नमः ।।८
चक्रिणे घामबाहुञ्च दक्षिण दिने नमः । चैकुण्ठाय नम' कण्टमास्यं यज्ञमुखाय वै ॥६॥
नासामशोकनिधये घासुदेवाय चाक्षिणी । ललाट वामनायेति हरयेति पुनर्बुची ॥१०॥
अलकान माधवायेति किरीटं विश्वरूपिणे । नमः सर्वात्मने तच्छिर इत्यभिपूजयेत् ॥
एवं संपूज्य गोविन्दं फलमाल्यानुलेपन. । ततस्तु मण्डलं कृत्वा स्थण्डिलंकारयेन्मृदा
चतुग्नं समन्ताच्च रनिमात्रमुदायम् । श्लक्ष्णं हृद्यं च परितो विप्रत्यसमावृतम् ।।
अगुलेनोच्छ्ता विप्रास्तद्विस्तारस्तु यमुलः ।
स्थण्डिलस्योपरिणाञ्च भित्तिरष्टाडुला भयेत् ॥१४॥
नदीवालुकयाशूलक्ष्म्या प्रतिकृतिन्यसेत् । स्थण्डिलेशूर्पमारोप्यलक्ष्मीमित्यर्चयेयुधः
नमो देव्यै नम' शान्त्यै नमोलक्ष्यै नमानिये । नम पुष्यनमस्तुल्यवृष्ट्यदृश्यनमोनमः।
विशोकादु.सनाशायविशोकाबरदास्तु मे । विशोकाचास्तुसम्पत्त्यै विशोकासर्वसिद्धये
ततः शुलाम्बरः शूर्प येष्टा संपूजयेत्फले । वस्त्रैर्नानाविधैस्तद्वत् सुवर्णकमलेन च ।
रजनीषु च सर्वासु पिवेद्दभोंदकं बुध । ततस्तु गीतनृत्यादि कारयेत् सकलान्निशाम्
यामनये व्यतीते तु सुप्त्वाप्युत्थाय मानव । अभिगम्यचविप्राणांमिथुनानितदार्चयेत्
शक्तिस्त्रीणिचैकंचावस्त्रमाल्यानुलेपनैः । शयनस्थानि पूज्यानि नमोऽस्तुजलशायिने
ततस्तु गीतवाद्येन रात्रिजागरणे कृते । प्रभाते च तत. स्नानं हत्या दाम्पत्यमर्चयेत् ॥
भोजनञ्च यथाशक्त्यापित्तशाम्यविर्जित । भुत्तथा श्रुत्वापुराणानि तहिनञ्चातियाहयेत्
अनेन विधिना सर्व मासि मासि समाचरेत् । नतान्त शयनं दद्याद्गुडधेनुसमन्वितम्
सोपधानकविश्रामं सास्तरावरणं शुभम् ॥२४॥
* मत्स्यपुराणम् * [एकाशीतितमो यथा न लक्ष्मीदेवेश! त्वां परित्यज्य गच्छति । तथा सुरूपतारोग्यमशोकवास्तुमेसदा यथा देवेन रहिता न लक्ष्मीर्जायते क्वचित् । तथाविशोकितामेऽस्तु भक्तिरग्र्याचकेशवे मन्त्रेणानेन शयनं गुड़धेनुसमन्वितम् । शूर्पञ्च लक्ष्या सहितं दातव्यं भूतिमिच्छता ॥ उत्पलं करवीरञ्च चाणमम्लानकुङ्कुमम् । केतकी सिन्दुवारञ्च मल्लिका गन्धपाटका ॥ कदम्ब कुञ्जकं जातिः शस्तान्येतानि सर्वदा ॥२८॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे विशोकद्वादशीव्रकथनं नामाशीतितमोध्यायः । एकाशीतितमोऽध्यायः गुड़धेनुदानविधिवर्णनम् । मनुरुवाच । गुड़धेनुविधानं मे समाचक्ष्य जगत्पते !। किं रूपं केन मन्त्रेण दातव्यं तदिहोच्यताम् मत्स्य उवाच। गुड़धेनुविधानस्य यटूपमिह यत्फलम् । तदिदानी प्रवक्ष्यामि सर्वपापविनाशनम् ॥२॥ कृष्णाजिनं चतुर्हस्तं प्रागनं विन्यसेदभुवि । गोमयेनानुलिप्तायां दर्भानास्तीर्य सर्वत । लम्बेणकाजिनं तद्वत्सश्च परिकल्पयेत् । प्राङ्मुर्गी पाल्पयेडेनुमुदक्पादां सवत्सकाम् ॥४॥ उत्तमागुड़धेनुःस्यान्सदाभारचतुष्टयम् । यत्सं भारेणकुवातद्वाभ्यांचे मध्यमास्मृता ॥ अर्द्धभारणवत्सम्यान् मानिष्ठाभाग्केण तु | चतुर्थ शेनवत्सः स्याद्गृहवित्तानुसारतः ।। धेनुघन्सापनाम्यानसितमूक्ष्माम्बरावृतौ । शुक्तिकर्णापिनुपादोशुचिमुक्ताफन्देक्षणा । सितसूत्रशिराली तो सितकम्बलकम्बली । ताम्रगण्डकपृष्टी तो सितचामारीमफो। पिदुमन्युगोपेनी नयनीतम्ननामुमोक्षामपुच्छों काश्यदोहापिन्द्रनीलगातारको । उपर्णयहाभरणी राजनेः सुग्मंयुनो । नानाफलसमायुनी प्रापगन्धफरण्टफो ।।
- ऽध्यायः * गुड़धेनुदान विधिवर्णनम्र २०१ इत्येवं रचयित्वा तो दीपधूपैरथाऽर्चयेत् ॥१०॥ या लक्ष्मी सर्वभूतानां याव देवेष्यवस्थिता । धेनुरूपेण सा देवी मम शान्ति प्रयच्छतु देहस्था याच रुद्राणी शङ्करस्य सदा प्रिया । धेनुरूपेण सा देवी मम पापं व्यपोहतु ।। विष्णोक्षसि या लक्ष्मीः स्वाहा या व विभावसोः। चन्द्रार्कशकशक्तिर्या धेनुरूपास्तु सा श्रिये ॥१३॥ चतुर्मुखस्यया लक्ष्मीर्यालक्ष्मीर्धनदस्यच । लक्ष्मीर्या लोकपालानां सा धेनुर्वरदाऽस्तुमे खधाया पितृमुख्यानां स्वाहा यज्ञभुजाचया । सर्वपापहरा धेनुस्तस्माच्छान्तिप्रयच्छमे एवमामन्त्र्यतां धेनुं ब्राह्मणाय निवेदयेत्। विधानमेतद्धेनूनां सर्वासामपि पट्यते ॥१६ यास्ता.पापविनाशिन्यः पठ्यन्तेदशधेनवः । तासांम्वरूपं वक्ष्यामिनामानिधनराधिप। प्रथमा गुडधेनुः स्यात् घृतधेनुस्तथापरा । तिलधेनुस्तृतीयातु चतुर्थी जलसंशिता॥१८ क्षीरधेनुश्च विख्याता मधुधेनुस्तथापरा । सप्तमी शर्कराधेनुर्दधिधेनुस्तथाष्टमी । रसधेनुश्च नवमी दशमी स्यात् स्वरूपतः ॥१६॥ कुम्भाः स्युचधेनूनामितरासान्तु राशयः । सुवर्णधेनुमप्यत्र केचिदिच्छन्ति मानवाः॥ नवनीतेन रनैश्च तथान्ये तु महर्षयः ॥ २१ ॥ एतदेव विधानं स्यात्तएयोपस्कराः स्मृताः । मन्त्राचाहनसंयुक्ता सदा पर्वणि पर्वणि यथाश्रद्धं प्रदातव्या मुक्तिमुक्तिफलप्रदाः ॥ २२ ॥ गुडधेनुप्रसष्टेन सर्वास्तावन्मयोदिताः । अशेषयशफलदाः सर्वाः पापहराः शुभाः ॥२३ बतानामुत्तमं यस्मादिशोकद्वादशीवतम् । तदङ्गत्वेन चैयान गुटधेनुः प्रशस्यते ॥२४॥ अयने विपुये पुण्ये व्यतीपातेऽथवा पुनः । गुटधेन्वादयो देयास्तूपरागादिपर्वसु ॥२५॥ विशोकद्वादशीचपा पुण्या पापहराशुभा । यामुपोप्यनरो याति तद्विष्णोः परमम्पदम् इहलोकेच सौभाग्यमायुरारोग्यमेव च । वैष्णवं पुरमाप्नोति मरणे च स्मरन् हरिम् ॥ नवादसहस्राणि दश चाष्टीच धर्मवित् । न शोकदुःपदार्गत्यं तस्य सज्ञायते नृप!॥ नारी चा पुरतेयातु विशोकद्वादशीटतम् । नृत्यगीतपरा नित्यं सापि तत्पलमाप्नुयात् तस्मादने हरेनिन्यमनन्तं गीतवादनम् । कर्त्तव्य भूतिकामेन भचया तु परया नृप !॥ - २०२ * मत्स्यपुराणम् * [दव्यशीतितमो इति पठति य इत्यं यः शृणोतीह सम्यक् मधुमुरनरकारेरर्चनं यश्च पश्येत् । मतिमपि च जनानां यो ददातीन्द्रलोके वसति विवुधौधैः पूज्यते कल्पमेकम् ॥ ३० इति श्रीमत्स्यपुराणे गुड़धेनुदानविधिवर्णनं नामकाशीतितमोऽध्यायः। दव्यशीतितमोऽध्यायः धान्यशैलदानविधिवर्णनम् । नारद उवाच। भगवन् ! श्रोतुमिच्छामि दानमाहात्म्यमुत्तमम् । यदक्षयं परे लोके देवर्षिगणपूजितम्॥ उमापतिरुवाच । मेरोः प्रदानं घश्यामि दशधा मुनिपुङ्गव । यत्प्रदानान्नरो लोकानाप्नोति सुरपूजितान् ॥ पुराणेषु च वेदेषु यज्ञेप्वायतनेषु च । न तत्फलमधीतेपु कृते चिह यदभुते ॥३॥ तस्माद्विधानवक्ष्यामिपर्वतानामगुफमात् । प्रथमोधान्यशैलास्याइद्वितीयोलयपावलः ॥ गुड़ाचलस्तृतीयस्तु चतुर्थों हेमपर्वतः । पञ्चमस्तिलशैलः स्यात् पाठः कार्पासपर्वतः ।। सप्तमी पुनशेलच रत्नशैलस्तथाटमः । राजतो नयमस्तदद्दशमः शर्कराचलः ॥६॥ पक्ष्ये विधानमेतेषां यथावदनुपूर्वशः । अयने विपुवे पुण्ये व्यतीपाते दिनक्षये ॥ ७ ॥ शुरूपक्षे तृतीयायामुपरागे शशिक्षये । विवाहोत्सवयशेषु द्वादश्यामथवा पुनः ॥ ८॥ शुशायांपञ्चदश्यां या पुण्यवाविधानतः । धान्यशैलादयोदेया यथाशास्त्रंविधानतः ॥ तीर्थेप्यायतनेपापि गोष्टे याभयनाङ्गणे । मण्डपं कारयेत्या चनुरम्नमुदङ्मुग्यम् । प्रागुदय प्रवणन्तत् प्राइमुपच विधानतः ॥१०॥ गोमयेनानुलिमायांभूमावास्तीयवैकुशान् । तन्मध्येपर्यतंकुर्यात् विष्कम्भपर्वतान्वितम् । धान्यद्रोणसहस्रेण भवेदिगिरिदोत्तमः । मध्यमः पञ्चशविकः फनिष्टः म्यातिप्रभिःशतः
ऽध्यायः]
* धान्यशैलदानविधिवर्णनम् *
मेरमहानीहिमयस्नु मध्ये सुवर्णवृक्षत्रयसंयुतःस्यात् ।
पूर्वेण मुक्ताफलयजयुक्तोयाम्येन गोदकपुष्परागः ॥ १३ ॥
पश्चाच्च गात्मतनीलरत्नैः सौम्येन वैदूर्यसरोजरागः ।
श्रीखण्डखण्डैरभितः प्रयालेलतान्वितः शुक्किशिलातलास्यात् ॥ १४ ॥
ब्रह्माऽथ विष्णुर्भगवान् पुरारिर्दियाकरोऽन्यत्र हिरण्मयः स्यात् ।
मुर्धन्यवस्थानममत्सरेण कार्य त्यनेकैश्च पुनहिजोधैः ॥ १५ ॥
चत्वारि शृङ्गाणि च राजतानि नितम्बभागेष्वपि राजतः स्यात् ।
तथेचप्रावृतकन्दरस्तु धृतोदकप्रस्रवणश्च दिक्षु ॥ १६ ॥
शुक्लाम्बराण्यम्धुधरायली स्यात् पूर्वेण पीतानि च दक्षिणेन ।
घासांसि पश्चादयकर्बुगणि रक्तानि वैधोत्तरतो घनाली ॥ १७ ॥
रोप्यान् महेन्द्रप्रमुखांस्तथायी संस्थाप्य लोकाधिपत्तीन क्रमेण ।
नानाफलाली च समन्ततः स्यान्मनोरमं माल्यविलेपनञ्च ।
चितानकञ्चोपरि पञ्चवर्णमसानपुष्पाभरणं सितश्च ॥ १८ ॥
इत्थं निवेश्यामरशैलमग्य मेरोस्तु विष्कामगिरीन् क्रमेण
तुरीयभागेन चतुर्दिशञ्च संस्थापयेत् पुप्पविलेपनाढ्यान् ॥ १६ ॥
पूर्वेण मन्दरमनेकफलावलीभिर्युक्तं ययैः कनकभद्कदम्बचिह्नः।
कामेन काञ्चनमयेन विराजमानमाकारयेत् कुसुमवस्त्रविलेपनाढयम् ।
क्षीरारुणोदसरसाथ वनेन चैवं रौप्येण शक्तियटितेन विराजमानम् ॥२०॥
याम्येन गन्धमदनश्च निवेशनीयो गोधूमसञ्चयमयः कलधौतयुक्तः ।
हैमेन यज्ञपतिना घृतमानसेन वस्त्रैश्च राजतवनेन च संयुतः स्यात् ॥२१॥
पश्चात्तिलाचलमनेकसुगन्धिपुप्प-सौवर्णपिप्पलहिरण्मयहंसयुक्तम् ।
आकारयेन्द्रजतपुप्पयनेन तद्वद्वस्त्रान्वितं दधिसितोइसरस्तथाने ॥ २२ ॥
संस्थाप्य तं विपुलशैलमयोत्तरेण शैलं सुपार्श्वमपि मापमयं सुपस्त्रम् ।
पुप्पैश्च हेमपटपादपशेपरातमाकारयेन् कनकधेनुविराजमानम् ॥ २३ ॥
२०४ - * मत्स्यपुराणम् * [इन्यशीतितमो माक्षीकमद्रसरसाथ वनेन तद्रौप्येण भास्वरवता च युत निधाय । होमश्चतुभिरथ वेदपुराणविद्विदन्तैिरनिन्धचरितारतिभिर्द्विजेन्द्र ॥२४॥ पूर्वण हस्तमितमन विधाय कुण्ड कार्यस्तिलैर्यवघृतेन समिताशश्च । रात्रौ च जागरमनुद्धतगीततुरावाहनञ्च कथयामि शिलोशयानाम् ॥२५|| त्व सर्वदेवगणधामनिये । विरुद्धमस्मद्गृहेप्यमरपर्वत ! नाशयाशु । क्षेम विधतम्य कुर शान्तिमनुत्तमान सपूजित परमभक्तिमता मया हि ।२६ त्वमेव भगवानीशो ब्रह्मा विशुर्दिवाकर । मृर्तामूर्तात्पर घीजमत पाहि सनातन ।। यस्मारचलोकापालानाविश्वमूर्तेश्चमन्दिरम् ।रदादित्यवसनाश्चतस्माच्छान्तिप्रयच्छमे। यस्माटशून्यममरनारीभिश्च शिन च । तस्मानमामुद्धराशेषदु रामसारसागरात् ।२॥ एवमभ्यर्च न मेग मन्दरश्चामिपूजयेत् । यस्माचेवग्येन त्व भदान व चर्पत ॥३०॥ शोभसे मन्दर ' शिप्रमतम्तुष्टिकरी भव । यम्माचूडामणिर्जम्बूद्रीपे त्व गन्धमादन । गपचनशोभाचानत फीति दास्तु मे। यम्माच येनुमान भ्राजेग धनेन च ॥३॥ दिग्पमपाय थशिरास्तम्मान् पुष्टिवास्तुमे । उत्तर कुरभिर्यस्मात्सावित्रेणचनेनच ।। सुपात्र राजसे निन्यमत धीरक्षयाग्नु मे ॥३०॥ एपमामन्य नान् सर्वान् प्रमाने पिमरे पुन । मायाऽथ गुग्ये दद्यान्म यम पतीनमम् ॥३॥ विपासतानत्यान्विाभ्य प्रमशोमु गाध दद्यायपिंगधया नश नागद 2.0 गय मानधाण या पक्ष्यादानि मा | पयापि गुग्ये देया पापियन पम्पिनी पर्यतानामशेणार ण्य विधि म्मन मण्य पूजने मन्त्रानण्योगम्यग मrns प्राजा गंगागना प्रमादीना परशाम्पमन्य मर्यपुतीम शेंगा गया उपपानी नपेशियमा गामिप्यनं ॥८॥ विधान मपंग प्रमग 2शु गाग्द । दाननिय मन्त्रा पगपुगगनाम् । Hi aai anम माजा प्रतिष्टिता । मन्नादपनि मा िजगात ऽध्यायः] * लवणाचलदानवर्णनम् - अन्नमेव ततो लक्ष्मीरनमेव जनार्दनः । धान्यपर्वतरूपेण पाहि तस्मानगोत्तम ॥४१॥ अनेन विधिना यस्तु दद्याधान्यमयं गिरिम् । मन्वन्तरशतं सामं देवलोकेमहीयते ॥४२ अप्सरोगणगन्धराकीर्णन विराजता । विमानेन दिवः पृष्टमायानिस्म निपेवितः । धर्मक्षये राजराज्यमानोतीह न संशयः ॥४३॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे धान्यशैलदानविधिवर्णनं नाम द्वयशीतितमोऽध्यायः । व्यशीतितमोऽध्यायः लपणाचलदानवर्णनम् । ईश्वर उवाच। अथातः सम्प्रवक्ष्यामिलपणाचलमुत्तमम् । यत्प्रदानानरोलोकानामोतिशिवसंयुतान् ॥ उत्तमः पोदशद्रोणैः कर्त्तव्यो लवणाचलः । मध्यमः स्यात्तदर्द्धनचतुर्भिरधमः स्मृतः ॥ वित्तहीनोयथाशक्याद्रोणार्श्वन्तुकारयेत्। चतुर्था शेनविष्कम्भपर्वतानकारयेत्पृथक्क विधानं पूर्ववत्कुर्याद् ब्रह्मादीनाञ्च सर्वदा । तद्वद्धममयान् सर्वान् लोकपालान्निवेशयेत् ॥ सरांसि कामदेवादीस्तद्वदत्रापि कारयेत् । कुर्य्याजागरणञ्चापि दानमन्त्रानियोधत ॥ सौभाग्यसरसम्भूतो यतोऽयं लवणोरसः । तदानकर्तृकत्वेन त्वं मां पाहि नगोत्तम॥ यस्मादन्नरसाः सर्वेनोत्कटालवणंविना । प्रियश्चशिवयोनित्यंतस्माच्छान्तिप्रयच्छ में॥ विष्णुदेहसमुद्भूनं यस्मादारोग्यवर्द्धनम् । तस्मात्पर्वतम् पेण पाहि संसारसागरात् ।।८ अनेन विधिना यस्तु दद्यालवणपर्वतम् । उमालोके यसत्कल्पं ततो यातिपरांगतिम् ।। इति श्रीमत्स्यपुराणे लघणाचलदानवर्णनं नाम ध्यशीतितमोऽध्यायः। .
चतुरशीतितमोऽध्यायः गुडपर्वतदानवर्णनम् । ईश्वर उवाच । अतःपरं प्रवक्ष्यामि गुड़पर्वतमुत्तमम् । यत्प्रदानान्नरः स्वर्गमाप्नोति सुरपूजितम् ॥१॥ उत्तमो दशभिर्भारमध्यमः पञ्चभिर्मतः । त्रिभिर्भारःकनिष्ठःस्यात्तदर्द्धनाल्पवित्तवान् ॥ तद्वदामन्त्रणं पूजा हेमवृक्षसुरार्चनम् । विष्कम्भपर्वतांस्तहत्सरांसि धनदेवताः ॥३॥ होमजागरणं तल्लोकपालाधिवासनम् । धान्यपर्वतयत् कुर्यादिमं मन्त्रमुदीरयेत् ॥४॥ यथा देवेषु विश्वात्मा प्रवरोऽयं जनार्दनः । सामवेदस्तुवेदानांमहादेवस्तु योगिनाम् ॥ प्रणवः सर्वमन्त्राणां नारीणां पार्वती यथा । तथा रसानां प्रवरः सदैवेक्षुरसोमतः ॥६॥ मम तस्मात्परालक्ष्मीगुडपर्वत : देहिये । यस्मात्सौभाग्यदायिन्याभ्रातात्वंगुडवत ।। निवासञ्चापि पार्वत्यास्तस्माच्छान्ति प्रयच्छ मे ॥७॥ अनेन विधिना यस्तु दद्याद्गुटमयं गिरिम् । पूज्यमानः सगन्धारीलोके महीयते ॥ ततः कल्पशतान्ते तु सप्तद्वीपाधिपोभवेत् । आयुरारोग्यसम्पन्नः शत्रुभिश्चापराजितः ।। इति श्रीमत्स्यपुराणे गुड़पर्वतदानवर्णनं नाम चतुरशीतिमोऽध्यायः । पंचाशीतितमोऽध्यायः सुवर्णाचलदानवर्णनम् । अथ पापहरं पक्ष्ये सुवर्णाचलमुत्तमम् । यम्य प्रदानादयनं वैरियं याति मानवः ॥२॥ उत्तमः पलसाइनो मध्यमः पञ्चभिः शनैः । तदनाधमत्तदायित्तोऽपि शनितः । दद्यादेकपटादृध्यं यथाशत्तया विमत्सरः ॥२॥ धान्यपर्वतयन्सयं विदध्यान्मुनिपुद्यः । विप्पाम्मशैलास्तद्वपमन्यिाभ्याप्रतिपादयेत् ।। प्रामपाजाय प्रायगर्भाय ते नमः । यस्मादनन्तरालदम्तम्मात्पादि शिलोपय
ऽध्यायः]
तिलपर्वतदानवर्णनम् *
यस्मादग्नेरपत्यं त्वं यस्मात् पुण्यं जगत्पते । हेमपर्वतरूपेण तस्मात्पाहि नगोत्तम !!५
अनेन विधिना यस्तु दद्यात् कनकपर्वतम् । स याति परमं ब्रह्मलोकमानन्दकारकम् ।
तत्र कल्पशतं तिष्ठेत् ततो याति पराङ्गतिम् ॥६॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे सुवर्णाचलदानकथनं नाम पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ।
पडशीतितमोऽध्यायः
तिलपर्वतदानवर्णनम् ।
अत परं प्रवक्ष्यामि तिलशैल विधानत । यत् प्रदानान्नरोयातिविष्णुलोकंसनातनम् ॥
उत्तमोदशभिर्दोर्मध्यम.पञ्चभिःस्मृतः । विभिःकनिष्ठोविप्रेन्द्र ! तिलशैल प्रकीर्तित. ॥
पूर्ववचापरान्सर्वान् विष्कम्भानभितीगिरीन् । दानमन्त्रानप्रवक्ष्यामियथावन्मुनिपुनच
यस्मान्मधुवधेविष्णोदेहस्वेदसमुद्धा. । तिलाकुशाश्चमापाश्चतस्माच्छनोभवत्विह ॥
हव्ये कन्ये च यस्माच्च तिला एचाभिरक्षणम् ।
भवादुद्धर शैलेन्द्र ! तिलाचल ! नमोस्तुते ॥५॥
इत्यामन्त्र्य च यो दद्यात् तिलाचलमनुत्तमम् ।
स वैष्णवं पदं याति पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥६॥
दीर्घायुष्यं समाप्नोति पुत्रपौत्रैश्च मोदते । पितृभिर्देषगन्धर्वः पूज्यमानो दिवं व्रजेत् ॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे तिलपर्वतदानविधिवर्णनं नाम पडशीतितमोऽध्यायः ।
सप्ताशीतितमोऽध्यायः
कार्यासपर्वतदानवर्णनम् ।
कार्यासपर्वतस्तद्वविंशदारैरिहोत्तमः । दशभिर्मध्यमः प्रोक्तः पञ्चभिस्त्वधमः स्मृत. ।
भारणाल्पधनो दद्यापित्तशाट्यविवर्जितः ॥१॥
धान्यपर्वतवत् सर्वमासाद्य मुनिपुङ्गय । प्रभातायान्तु शर्वयों दद्यादिदमुदीरयेत् ॥२॥
२०८ * मत्स्यपुराणम् * [ अष्टाशीतितमो त्वमेवावरणं यस्माल्लोकानामिह सर्वदा । कार्पासाद्रे! नमस्तुभ्यमघौधध्वंसनो भव ॥ इति कार्पासशैलेन्द्र यो दद्याच्छर्वसन्निधौ । रुद्रलोके वसेत्कल्पं ततो राजा भवेदिह॥ इति श्री मत्स्यपुराणे कार्पासपर्वतदानवर्णनं नाम सप्ताशीतिमोऽध्यायः अष्टाशीतितमोऽध्यायः घृताचलदानवर्णनम् । अतः परं प्रवक्ष्यामि घृताचलमनुत्तमम् । तेजोऽमृतमयं दिव्यं महापातकनाशनम् ॥१॥ विंशत्या घृतकुम्भानामुत्तमःस्यादुघृताचलः । दशभिर्मध्यमः प्रोक्तःपञ्चभिस्त्वधमःस्मृतः अल्पवित्तोऽपियः कुर्याद् द्वाभ्यामिह विधानतः । विष्कम्भपर्वतास्तद्वच्चतुर्भागेन कल्पयेत् ॥३॥ शालितण्डुलपात्राणि कुम्भोपरि निवेशयेत् । फारयेत्संहतानुच्चान्यथाशोभं विधानतः ॥४॥ वेष्टयेच्छुलपासोभिरिक्षुदण्डफलादिकः । धान्यपर्वतवच्छेपं विधानमिह पठ्यते ॥५॥ अधिवासनपूर्वञ्च तद्वद्धोमसुरार्चनम् । प्रभातायां तु शर्व- गुरवे तन्निवेदयेत् । विष्कम्भपर्वतांस्तत्विगभ्यः शान्तमानसः ॥६॥ संयोगाप्रतमुत्पन्नयस्मादमृततेजसोः । तस्माद्घृतार्चिश्विात्माप्रीयतामत्र शङ्करः ॥ यरमात्तेजोमयं ब्राह्म पृते तद्विध्यवस्थितम् । घृतपर्वतरूपेणतस्मात्त्वं पाहिनोऽनिशम् ।। अनेन विधिना दद्याधनाचलमनुत्तमम् । महापातफयुक्तोऽपि लोकमामोति शाङ्करम् ॥ ससारसयुक्तेन फिङ्किणीजालमालिना । विमानेनाप्सरोभिश्च सिद्धविद्याधरवृतः । विहरेत् पितृभिः साचं यायदाभूतसंप्रयम् ॥१०॥ इति धीमत्स्यपुराणे पृताचलदानवर्णनं नामाष्टाशीतितमोऽध्यायः ।
उननवतितमाऽध्यायः रत्नाचलदानवर्णनम् । अतः परं प्रवक्ष्यामि रताचलमनुत्तमम् । मुक्ताफलसहनेण पर्वतः स्यादनुत्तमः ॥५॥ मध्यमः पञ्चशतकस्त्रिशतेनाधमः स्मृतः । चतुर्थांशेन विष्कम्भपर्वता.स्युः समन्ततः ।। पूर्वण पत्रगोमेद क्षिणेनेन्द्रनीलकः । पद्मरागयुतः कार्यो विद्वद्विर्गन्धमादनः ॥३॥ वैदूर्यविद्रुमैः पश्चात्संमिश्री विमलाचलः । पद्मरागः ससौवर्णरत्तरेण च विन्यसेत् ॥ धान्यपर्वतवत्सर्वमत्रापि परिकल्पयेत् । तददावाहनं कुर्य्यावृक्षानदेवांश्चकाञ्चनान् ॥ पूजयेत्पुष्पगन्धायैः प्रभाते च चिमत्सरः । पूर्वबद्गुरुमृत्यिग्भ्यइमान मन्त्रानुदीरयेत्।। यदा देवगणाः सर्वे सर्वरनेप्यवस्थिताः । त्यञ्च रत्नमयो नित्यं नमस्तेऽस्तुसदावल ॥ यस्माद्रत्नमदानेन तुष्टिं प्रकुरते हरिः । सदा रनप्रदानेन तस्मालः पाहि पर्वत ॥८॥ अनेन विधिना यस्तु दद्याद्रत्नमयं गिरिम् । स यातिविष्णुसालोक्यममरेश्वरपूजित. ॥ यावत्कल्पशतं साग्रं घसेच्चेह नराधिप । रूपारोग्यगुणोपेत सप्तद्वीपाधिपीभवेत् ॥१० ब्रह्महत्यादिकं किञ्चिद्यदत्रामुत्र वा वृतम् । तत्सर्व नाशमायाति गिरिजहतो यथा ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे रत्नाचलदानवर्णनं नामोनवतितमोऽध्यायः । नवतितमोऽध्यायः रौप्याचलदानवर्णनम् । अत परं प्रवक्ष्यामि रौप्याचलमनुत्तमम् । यत्प्रदानान्नरो यातिसोमलोकमनुत्तमम् ॥ दशभि. पलसाहस्ररत्तमो रजताचल । पञ्चभिर्मध्यमः प्रोक्तस्तदनाधमः स्मृत ॥२॥ अशक्तो विशतेरुद्र कारयेन्छक्तितस्तदा । विश्वकम्भपर्वतांस्तद्वत्तुरीयांशेन कल्पयेत् ।। पूर्ववद्राजतान् कुर्वन् मन्दरादीन् विधानत । कलधौतमयांस्तहलोकेशानर्चयेद् वुधः ।
[एकनवतितमो २१० * मत्स्यपुराणम् * ब्रह्मविष्पवर्कवान् कार्यों नितम्वोऽत्र हिरण्मयः । राजतं स्याद्यदन्येषां सर्वं तदिह काञ्चनम् ॥५॥ शेपन्तु पूर्ववत् कुर्याद्धोमजागरणादिकम् । दद्यात्ततः प्रभाते तु गुरवे रौप्यपर्वतम् ॥६ विष्कम्भशैलानृत्विग्भ्यः पूज्य घस्रविभूषणः । इममन्त्रं पठन्दद्यादर्भपाणिर्चिमत्सरः ।। पितृणांवलभोयस्माद्धरीन्द्राणां शिवस्यय । पाहिराजत! तस्मात्वंशोकसंसारसागरात् इत्थं निवेद्य यो दद्याद्रजताचलमुत्तमम् । गवामयुतदानस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥६ सोमलोकेसगन्धःकिन्नराप्सरसाङ्गणः । पूज्यमानोवसेदविद्वान्यावदाभूतसंप्लवम् ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे रोप्याचलदानवर्णनं नाम नवतितमोऽध्यायः । एकनवतितमोऽध्यायः शर्कराशैलदानवर्णनम् । अधातः संप्रवक्ष्यामि शर्कराशैलमुत्तमम् । यस्य प्रदानाद्विष्ण्वकरदास्तुप्यन्तिसर्वदा॥ अष्टाभिः शर्कराभाररुत्तमःस्यान्महाचलः । चतुभिर्मध्यमःप्रोक्तोभाराभ्याधमःस्मृतः ॥ भारण पार्द्धमारेणकुर्याद्य.स्वल्पवित्तवान् । विष्कम्भपर्वतान्कुर्यात्तुरीयांशेनमानवः ।। धान्यपर्वतवत् सर्वमासाद्यामरसंयुतम् । मेरोरुपरि तय स्थाप्य हेमतरुत्रयम् ॥ ४॥ मन्दारः पारिजातश्च तृतीयः कल्पपादपः । एतद् वृसत्रयं मूनिसर्वेप्पपिनियोजयेत् ॥ हरिचन्दनसन्तानी पूर्वपश्चिमभागयोः । निवेश्यो सर्वशैलेपु विशेषान्छर्करावले ॥६॥ मन्दरे पामदेवस्तु प्रत्यग्यकत्रः सदा भवेत् । गन्धमादनार तु धनदास्यादुद मुगः। प्रामुग्गे घेदमूर्तिपतु इंसः म्यादिपुलाचले। हैमी मुपार्श्वसुरभिर्दक्षिणाभिमुपोमवेत् धान्यपर्वतयन् सर्वमायाहन विधानकम् । एत्या तु गुरवे दद्यान्मध्यमं पर्वतोत्तमम् ।। ऋत्विाम्यश्चतुरः शैलानिमान्मन्त्रानुदीरयन् ॥३॥ सॉमायामृनसारोऽयं पर्वतः शर्मगयुतः । तम्मादानन्दफारीत्वंभवशैलेन्द्र ! सर्वदा । भमृतं पिधनां ये नु निपेतु यि शीफराः । देयानांतन्ममुन्यात्यंपादिनः शरारल!!
याय) *शर्कराशैलदानवर्णनम् - २११ मनोभवधनुर्म यादुद्भूता शर्करायत । तन्मयोऽसि महाशैल 1 पाहिमसारसागरात् ॥ यो दद्याछराशेरमनेन विधिना नर । सर्वपापैर्विनिर्मुक्त स याति परमम्पदम् ॥१३ चन्द्रतारार्कसङ्काशमधिरह्यानुजीविभि । सद्वेष यानमातिष्ठत्तर विष्णुप्रचोदित ॥१४ तत कपशतान्ते तु सप्तद्वीपाधिपोभवेत् । आयुरारोग्यसम्पनोयावजन्मादयम् ।। भोजन शक्तित कुर्यात् सर्वशैनेयम सर । सर्मनाक्षारत्वमश्नीयात्तदनुनया । पर्वतोपस्कगन् सर्वान् प्रापये ब्राह्मणाल्यम् । ईश्वर उवाच। आसीत् पुरा वृहत्कधर्ममूर्तिजनाधिप 1 सुहृच्छकम्यनिहतायेनदैत्या सहनश ।। सोमसूर्यादयो यस्य तेजसा विगतप्रभा । भवन्ति शतशो येन शत्रयश्चापराजिता । यथेच्छारूपनारी च मनुष्योऽप्यपराजित ॥२८॥ तस्य भानुमती नाम भार्या त्रैलोसमुन्दरी । लक्ष्मीपहिव्यरूपेण निर्जितामरसुन्दरी ॥ राजस्तस्यानमहिया प्राणेभ्योऽपि गरीयसी । दशनारीसहस्राणा मध्येधीरिव राजते ॥ नृपको टिसहस्रेण न कदाचिन् समुच्यते । कदाचिदाम्यानगत पप्रच्छ स पुरोधसम् । विस्मयेनावृतो राजा वसिष्टमृषिसत्तमम् ॥२१॥ भगवन् । केन धर्मेण मम लामीरनुत्तमा । कस्माचविपुलन्तेजोमच्छरीरसदोत्तमम् ।। घसिष्ट उवाच। 'पुरा लीलावती नाम वेश्या शिवपरायणा । तया दत्तश्चतुर्दश्याङ्गुरवे लवणाच हेमवृक्षादिभि साई यथावद्विधिपूर्वकम् ॥२२॥ शूट सुवर्णकारश्च नान्नाशीण्डोऽभवत्तदा । भृत्योलीलावतीगेहेतेनहेम्ना विनिर्मिता ॥ तरय सुरमुग्याश्च श्रद्धायुक्तेन पार्थिव । अतिम्पेण सपना घटयित्वाविनाभृतिम् । धर्मकार्यमिति सान्या न गृह्णाति कथञ्चन ॥२८॥ , उच्चारिताश्च त पल्पासीवमरपादपा । लीलावतीगिरे पापरिचर्याञ्च पार्थिव ।। कृत्या ताभ्यामशाठय ने गुरुशुश्रूपणादिकम् । सा च लीलावतीवेश्याकालेनमहतापिच कालघम्ममनुप्राप्ता कार्मयोगेन नारद । सर्वपा पविनिमत्ता जगाम शिवमन्दिरम् ॥२८
[द्विनवतितमो
२१२
* मत्स्यपुराणम् *
योऽसौ सुवर्णकारस्तु दरिद्रोऽप्यतिसत्त्ववान् ।
न मौल्यमादाद्वेश्यातः स भवानिह साम्प्रतम् ॥२६॥
सप्तद्वीपपतिर्जातः सूर्यायुतसमप्रभः । यया सुवर्णकारस्य तरवो हेमनिर्मिताः ।
सम्यगुज्यालिताः पन्या सेयम्भानुमती तव ॥३०॥
उज्वालनादुज्वलरूपमस्याः सातमस्मिन् भुवनाधिपत्यम् ।
यस्मात् कृतं तत्परिकर्म रात्रावनुद्धताभ्यां लवणाचलस्य ।
तस्माञ्च लोकेप्चपराजितत्वमारोग्यसौभाग्ययुता व लक्ष्मीः ॥३१॥
तस्मात्त्वमप्यत्र विधानपूर्व धान्याचलादीन् दशधा कुरुष्व ।
तथेति सत्कृत्य स धर्ममूर्तिर्वचो वसिष्टस्य ददौ च सर्वान् ।
धान्याचलादीन् शतशो मुरारेर्लोकं जगामामरपूज्यमानः ॥३२॥
पश्येदपीमानधनोऽति भक्या स्पृशेन्मनुप्यैरपि दीयमानान् ।
शृणोति भत्तयाऽथ मतिं ददाति विकल्मषः सोऽपि दिवं प्रयाति ॥ ३३ ॥
दुःस्वप्नं प्रशममुपैति पठ्यमानः शैलेन्द्रर्भवभयभेदनैर्मनुष्यः ।
यः कुर्यात् किमु मुनिपुङ्गवेह सम्यक् (शान्तात्मा सकलगिरीन्द्रसम्प्रदानम्
इति श्रीमत्स्यपुराणे शर्कराशैलदानवर्णनं नामैकनवतितमोऽध्यायः ।
द्विनवतितमोऽध्यायः
ग्रहशान्तिपर्णनम् ।
सूत उवाच।
चैशम्पायनमासीनमपृच्छन्डोनरः पुरा । सर्वकामासयनित्यंकयंशान्तिपोष्टियम् ।
वैशम्पायन उवाच ।
श्रीफामः शान्तिकामो या ग्रहया समारभेत् ।ध्यायुः पुष्टिकामोपा तयामिवरन् पुनः
येन ग्रामन् ! विधानेन तन्मे निगदतः शृणु ॥२॥
ऽध्यायः]
* ग्रहशान्तिवर्णनम् *
२२३
सर्वशास्त्राण्यनुक्रम्यसंक्षिप्यग्रन्थविस्तरम् । ग्रहशान्तिप्रवक्ष्यामिपुगणधुतिनोदिताम् ॥
पुण्येऽहि विप्रकथिते कृत्या ब्राह्मणवावनम् । ग्रहान्ग्रहादिदेवांश्चम्याप्यहोमं समारभेत्
ग्रहयज्ञस्त्रिया प्रोक्तः पुराणध्रुतिकोविदः । प्रथमोऽयुतहोमस्यालक्षहोमस्ततःपरम् ।।
तृतीत कोटिहोमस्तु सर्वकामफलप्रदः । अथुतेनाहुतीनाञ्च नवग्रहमखः स्मृतः ॥६॥
तत्य तावद्विधि चक्ष्यपुराणश्रुतिभाषितम् । गर्तस्योत्तरपूर्वेण वितस्तिद्वयविस्तृताम् ॥
वाद्ययावृतांवेदि वितस्त्युच्छ्रयसम्मिताम् । संस्थापनायदेवानाञ्चतुग्नामुमुखाम् ।।
अग्निप्रणयनं कृत्वा तम्यामावाहयेत्सुगन् । देवतानांततःस्थाप्याविंशतिद्वादशाधिका ॥
सर्म्यः सोमस्तथा भीमोयुधजीवसितार्कजाः ।
राहुः केतुरिति प्रोक्ता ग्रहा लोकहितावहाः ॥३०॥
मध्येतु भास्करं विन्यालोहिनं दक्षिणेन तु । उत्तरेण गुरुं विन्द्यायुधं पूर्वोत्तरेण तु॥
पूर्वेण भार्गवं विन्द्यात सोमं दक्षिणपूर्वके । पश्चिमेन शनि चिन्यादाहु पश्चिमटक्षिणे ।
पश्चिमोत्तरतः केतुं स्थापयेच्छुक्तण्डुलैः ॥१०॥
भास्करस्येश्वरंविन्यादुमाञ्चशशिनस्तथा । स्कन्दमङ्गारकस्यापिवुधस्यचतथाहरिम् ।।
ब्रह्मापाञ्च गुरोचिन्द्याच्छुकस्यापि शचीपतिम् । शनैश्चरस्यतुयम राहो.कालं तथैवच ॥
केती चित्रगुप्तञ्च सर्वेषामधिदेवताः । अग्निरापः क्षितिर्विष्णुरिन्द्र ऐन्द्रीच देवताः ॥
प्रजापतिश्चसश्च ब्रह्मा प्रत्यधिदेवताः । विनायकं तथा दुर्गा वायुराकाशमेव च ।
आवाहयेव्याहृतिभिस्तथैवाश्चिकुमारको ॥३६॥
संस्मरेढक्तकादित्यमगारकसमन्वितम् । सोमशुक्रौतथाश्येतो बुधजीवाचपिट्रली ॥
मन्दराह तथा कृष्णी धूनं फेनुगणं विदुः ॥ १७ ॥
अहवर्णानि देयानि घासांसि कुस्तुमानित्र । धूपामोदोऽत्र सुरभिम्परिणाद्विनानिकम् ।
शोभनं स्थापयेत्यानः फलपुप्पसमन्वितम् ॥ १८ ॥
* गुड़ौदनं रखेर्दद्यात् सोमाय नपायसम् । अङ्गारकाय संयावं युधाय क्षारपष्टिके ॥३॥
ध्योदनच जीवाय शुक्रायच गुड़ौदनम् । शनैश्चराय कसरामजामांसच राहवे ॥
चित्रीदनञ्च केतुभ्यः सर्वभक्ष्यस्थार्चयेत् ॥ २० ॥
[ द्विनवतितमो * मत्स्यपुराणम् * प्रागुत्तरेण तस्माच द-यक्षतविभूपितम् । चूतपलवसच्छन्न फलवस्त्रयुगान्वितम् ॥२१ पञ्चरत्नसमायुक्त पञ्चभङ्गसमन्वितम् । स्थापयेवण कुम्भवरण तर विन्यसेत् ॥२२॥ गङ्गाद्या सरित सर्चा समुद्राश्वसरासिच । गजाश्वरथ्यावल्मीकसङ्गमाददगोकुलात् ॥ मृदमानीयविप्रेन्द्र ! सर्वोपधिजलान्वितम् । स्नानाथविन्यसेत्तत्र यजमानस्यधर्मवित् । सर्वे समुद्रा सरित सरासिच नदास्तथा । आयान्तु यजमानस्यदुरितक्षयकारका ।। एवमावाहयेदेतानमरान मुनिसत्तम । होम समारभेत् सपिर्ययव्रीहितिलादिना ॥२६॥ अर्क पालाशखदिरावपामार्गोऽथपिप्पल । औदुम्बर शमीदूर्वाकुशाश्चसमिध क्रमात् ॥ एकैकस्याप्रकशतमणविशतिमेव वा।होतव्यामधुसर्पिभ्या दभ्ना चैव समन्विता ॥२८ प्रादेशमानाअशिफा अशापाअपलाशिनी । समिध कल्पयेत्प्राज्ञ सर्वकर्मसुसर्वदा ॥ देवानामपि सर्वेपामुपाशु परमार्थवित् । स्वेनस्वेनैव मन्त्रण होतच्या समिध पृथक ।। होत य च घृताभ्यक्त चर भक्षादिक पुन । मन्त्रैर्दशाहुतीहुत्वा होम व्याहृतिभिस्तता उदडमुखा प्राङ्मुखावाकुयु ह्मणपुङ्गवा । मन्त्रवन्तश्च कर्त्तव्याश्चरय प्रतिदैवतम् ॥ हुत्वा च ताश्चरून् सम्यक ततो हाम समाचरेत आरणेति च सूर्य्याय होम कार्यों द्विजन्मना ॥ ३३ ॥ आप्यायस्येतिसोमायमन्त्रेणनुहुयात पुन । अग्निमूर्धादियो मन्त्रइतिभौमायकीर्तयेत् भाने । विद्यम्बदुपस इति सोमसुताय चै ।वृहस्पते परिदीया रथेनेति गुरोर्मत ॥३५ शुमन्ने अन्यदितिच शुबस्यापि निगद्यते । शनैश्चरायेति पुन शन्नो देवीति होमयेत् ॥ क्यानश्चिन आभुव इति रदाहृत ॥ ३६॥ पेतु कृप्यन्नपि चूयात केतृनामपि शान्तये ।आयो राजेति रदस्य पल्हिोम समाचरेत् ।। जापोहिष्ठेत्युमायास्तु स्योनेति स्वामिनस्तथा ॥ ३७ ॥ लिपटि लिगुरिति समीति समानुष : इन्द्रनिदेयतायेति स्काय जुहमारत तथा यमायनाय गोरिति होम प्रकीर्तित । फालस्यब्रह्मयज्ञानमिति मन्त्रविदो विदु! विधगुमम्य चाशातमिति मन्त्रविदो विदु । अग्नि दन वृणीमह इति घटाहत ।। उत्तम परणमियपा मन्त्र प्रीर्तित । भूमे पृधिव्यन्नरिक्षमिति येदेषु पठ्यते ।। ।
॥
ऽध्यायः]
* ग्रहशान्तिवर्णनम् *
सहस्रशीपा पुरुष इति विष्णोरदाहृतः ।
इन्द्रायेन्दोमरस्वत इति शक्रस्य शस्यते ॥४३॥ ।
उत्तापर्णे सुभगे इति देव्याः समाचरेत् । प्रजापतेः पुनहोमः प्रजापतिरिति स्मृतः ॥४४
नमोऽस्तु सभ्य इति सर्माणां मन्त्र उच्यते । एष ब्रह्माय ऋत्विज्यदतिब्रह्मण्युदाहृतः
विनायफस्य चानूनमिति मन्त्रो बुधैः स्मृतः । जातवेदसे सुनवामितिदुर्गामन्धउच्यते
आदिप्रनस्य रेतस आकाशस्य उदाहृतः । प्राणाशिशुर्महीनाञ्च वायोमन्त्रः प्रकीर्तितः।
एपो उपा अपूादित्यश्विनोर्मन्त्र उच्यते । पूर्णाहुतिस्तु मृानं दिवइत्यभिपातयेत्।
अयाभिषेकमन्त्रेण वाद्यमङ्गलगीतकः। पूर्णकुम्भेन तेनैव होमान्ने प्रागुदङ्मुग्यम् ॥१६॥
अव्यगाययवैर्ब्रह्मन् ! हेमस्रग्दामभूषितैः । यजमानस्य कर्त्तव्यं चतुर्भिः स्मपनं द्विजैः
सुरास्त्यामभिषिञ्चन्तु ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः । वासुदेवो जगन्नाथस्तथा सर्पणो विभुः
प्रद्युम्नचानिल्द्धश्च भवन्तु विजयाय ते ॥१॥
आखण्डलोऽग्निर्भगवान् यमो चैनैतिस्तथा। वरुणः पचनश्चैय धनाध्यक्षस्तधाशिवः
ब्रह्मणा सहितः शेषो दिकपालास्त्वामवन्तु ते॥ ५२ ।।
फोत्तिलक्ष्मी तिमधापुष्टि धदाक्रियामतिः। युद्धिलजायपु'शान्तिस्तुष्टिकान्तिश्चमातरः
एतास्त्वाममिपिञ्चन्तु धर्मपल्ल्यः समागताः ॥५३॥
आदित्यचन्द्रमाभीमोबुधोजीवःसितोऽर्कजः । ग्रहास्त्वामभिषिञ्चन्तुराहु फेनुश्चर्षिताः
देवदानवगन्धर्वाः यक्षराक्षसपनगाः । पयो मुनयो गावो देवमातर एव च ॥ ५५॥
देवपन्न्यो द्रुमानागादैत्याचाप्सरसालणाः । अस्त्राणिसर्वशम्प्राणिराजानीयाहमानित
औषधानि च रत्नानिकालस्यावयपाश्च ये। सरितः सागगः शैलाम्तीर्थानिजलदानदाः
एते त्वामभिषिञ्चन्तु सर्वकामार्थसिद्धये ॥५॥
ततः शुलाम्बरधरः शुक्गन्यानुलेपनः । सर्वोपधैः सर्वगन्धः स्नापितो द्विजपुङ्गवः॥
यजमानः सपत्नीकः ऋत्विजः सुसमाहितान् । दक्षिणाभिः प्रयत्नेन पूजयेद्गतविस्मयः ।
सूर्य्याय कपिलां धेनुं शङ्खदद्यात्तयेन्दये । रक्तं धुरन्धरं दद्यानीमाय च ककुमिनम् ॥६०
बुधाय जातरूपन्तु गुरवे पीतवाससी । श्वेताभ्यन्दैत्यगुग्ये कृष्णालामसनवे ॥६॥
[द्विनवतितमो * मत्स्यपुराणम् * आयसंराहवे दद्यात्केतुभ्यश्छागमुत्तमम् । सुवर्णेन समा कार्या यजमानेन दक्षिणा । सर्वेषामथवा गायो दातव्या हेमभूषिताः । सुवर्णमथवादद्याद्गुरुर्वा येन तुष्यति । समन्त्रेणैव दातव्याः सर्वाः सर्वत्र दक्षिणाः ॥ ६३॥ पुण्यस्त्वंशङ्खपुण्यानांमङ्गलानाञ्च मङ्गलम् । विष्णुना विधृतश्चासि ततःशान्तिप्रयच्छमे धर्मस्त्वं वृषरूपेण जगदानन्दकारक ! । अष्टमूत्रधिष्ठानमतः शान्ति प्रयच्छ मे ॥६५) हिरण्यगर्भगर्भस्त्वं हेमवीजं विभावसोः । अनन्तपुण्यफलदमतः शान्ति प्रयच्छ मे।६६ पीतवस्त्रयुगं यस्माद्वासुदेवरय वल्लभम् । प्रदानात्तस्य मे विष्णो! ह्यतःशान्तिप्रयच्छ मे विष्णुस्त्वमश्वरूपेण यस्मादमृतसम्भवः । चन्द्रार्कवाहनो नित्यमत शान्तिप्रयच्छ मे ॥ यस्मात्त्वं पृथिवी सर्या धेनुः केशवसन्निभा । सर्वपापहरा नित्यमतःशान्तिप्रयच्छ मे। यस्मादायसकर्माणितवाधीनानि सर्वदा । लाङ्गलाद्यायुधादीनि तस्माच्छान्तिप्रयच्छमे यस्मात्त्वं सर्वयज्ञानामङ्गत्वेन व्यवस्थितः । यानं विभावसोनित्यमतः शान्तिप्रयच्छमे गवामङ्गपु तिष्ठन्ति भुवनानि चतुर्दश । यस्मात्तस्माच्छ्रिय मे स्यादिहलोके परत्र च ॥ यस्मादशान्यं शयनं केशवस्य च सर्वदा । शय्याममाप्यशून्यास्तु दत्ता जन्मनिजन्मनि। यथा रत्नेषु सर्वेषु सर्वे देवाः प्रतिष्ठिताः । तथा रतानि यच्छन्तु रत्तदानेन मे सुराः ।। यथा भूमिप्रदानस्य कलानार्हन्ति पोडशीम् । दानान्यन्यानि मे शान्ति मिदानाद्भवत्यिह ॥ ७५ ॥ एवं संपूजयेद्वतया पित्तशाट्येन पर्जितः । रक्तकाचनवम्बोधपमाल्यानुलेपनः ।।७।। अनेन विधिना यस्तु ग्रहपूजां समाचरेत् । सर्वान्कामानवाप्नोति प्रेत्य स्यर्गे महीयते यस्तु पीडाकरी नित्यमल्पवित्तम्य या ग्रहः । तस यनेन संपूज्य शेषानप्यचयेद् युधः प्रादा गायोनरेन्द्राश्च ब्राह्मणाश्च विशेषतः । पूजिताः पूजयन्त्येते निर्दन्त्यिपमानिताः ॥ यथा घाणप्रहागणां फयचम्भवति धारणम् । सदद्देवोपनातानां शान्तिर्भवति वारणम् तस्माग्नदक्षिणादीनं फर्तव्यं भूतिमिच्छता। संपूर्णया दक्षिणया यस्मादेकोऽपिनुष्यति सदेयायुतदोमोऽयं नयप्रदम ग्यितः । पिपादोत्सवयोपु प्रतिष्ठादिपु फर्मसु ॥२॥ निर्पितार्थ .मुनिश्रेष्ठ ! तथोडेगागुतेषु च । फशितोऽयुतदोमोऽयं लक्षहोममतः शृणु ॥
ध्यायः] * ग्रहशान्तिवर्णनम् * सर्वकामाप्तये यस्मालक्षहोमं विदुर्बुधाः । पितृणां वल्लभं साक्षागुचिमुक्तिफलप्रदम् ।। ग्रहताराबलं लब्ध्या कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् । गृहस्योत्तरपूर्वेण मण्डपं कारयेद् बुधः ॥ रुद्रायतनभूमी वा चतुरनमुदङ्मुखम् । दशहस्तमथापी चा हस्तान्कुर्याद्विधानतः ।।६। प्रागुदक् हयनाम्भूमि कारयेद्यत्नमो बुधः । प्रागुत्तरं समासाद्य प्रदेशं मण्डपस्य तु ८७ शोभनं कारयेत्कुण्डं यथावलक्षणान्वितम् । चतुरस्त्रं समन्तात्तुयोनिवस्त्रं समेखलम् ॥ चतुरङ्गलपिस्तारा मेग्यला तहदुच्छ्रिता । प्रागुदक्लपना कार्या सर्वतः समवस्थिता ॥ शान्त्यर्थं सर्वलोकानां नवग्रहमसः स्मृतः । मानहीनाधिकं कुण्डमनेकमयटम्भवेत् ॥ यस्मात्तस्मात् सुसम्पूर्ण शान्तिकुण्डं विधीयते ॥ ६ ॥ अस्माद्दशगुणः प्रोको लक्षहोमः स्वयम्भुवा । आहुतीभिः प्रयत्नेन दक्षिणाभिस्तथैव च द्विहस्तविस्तृतं तद्वचतुर्हस्तायतं पुनः ! लक्षहोमे भवेत्कुण्डंयोनिचक्चन्त्रिमेपलम् ।।२ तत्यचोत्तरपूर्वेण वितस्तित्रयसंस्थितम् । प्रागुदक् प्रवणन्तञ्च चतुरस्त्रं समन्ततः ॥६३ विष्कम्भाडोंछितं प्रोक्तं म्याण्डिलं विश्वकर्मणा। संन्यापनाय देवानां यत्रयसमावृतम् ॥ १४ ॥ यहलोपच्छितो विप्रः प्रथमः सउदाहृतः । अङ्गलोयमंयुक्त वाद्वयमयोपरि ॥६५ ध्यङ्गलम्यचविस्तारःसर्वेषांकथ्यतेवुधः । दशागलोच्छ्रिताभित्तिःस्थण्डिलेस्यानथोपरि तस्मिन्नाबाहयेद्देवान् पूर्वचन पुप्पतण्डुलः ॥ १६ ॥ आदिल्याभिमुपगःसर्वाःसाधिप्रत्यधिदेवता. म्यापनीयामुनिश्रेष्ठ! नोत्तरीणपरामुयाः गम्न्मानधिकस्तत्र संपूयः धियमिच्छता । सामध्यनिशरीरत्वं वाहनं परमेटिनः ॥ विषपापहगे नित्यमतः शान्ति प्रयच्छ मे ॥ १८ ॥ पूर्ववत्कुम्भमामय तहदोमं समाचरेत् । सहस्राणां शतं हुत्या समित्मण्याधिकं पुनः । घुनकुममयमो_गं पातयेटनलोपरि । औदुम्बरों तथा ऋग्ची फोटरयजिताम् । याहुमा धुचं त्या तनम्तम्मयोपरि पुनधारान्तया सम्यगग्नेरपरि पातयेत् ॥ १० ॥ श्रावयेत् सूनमाग्नेयं वैष्णवं गेद्रमेन्दयम् । महावैश्वानरं साम ज्येष्ठसाम र पाचयेत्।
ऽध्यायः] * ग्रहशान्तिवर्णनम् * २१६ वितस्तिमात्रा योनिःस्थात्परसप्तांगुलविस्तृता । फर्मपृष्टोन्नता मध्ये पार्श्वयोश्चांगुलोच्छिता ॥ १२३ ॥ गजोष्टसदृशी तद्वदायताच्छिद्रसंयुया । एतत् सर्वेषु कुण्डेपु योनिलक्षणमुच्यते ।। मेखलोपरि सर्वत्र अश्वत्थदलसन्निभम् ॥ १२४ ।। घेदी च कोटिहोमे स्याद्वितस्तीनां चतुष्टयम् । चतुरबा समन्ताच त्रिभिर्वप्रैस्तुसंयुता चप्रप्रमाणं पूर्वोक्तं वेदीनाञ्च तथोच्छ्रयः ॥ १५ ॥ तथा षोडशहस्त' स्यान्मण्डपश्च चतुर्मुखः । पूर्वद्वारे व संस्थाप्य यह चंवेदपारगम् ।। यजुर्विदं तथा याम्ये पश्चिमे सामवेदिनम् । अथर्ववेदिनं तद्वदुत्तरेस्थापयेद् बुधः ।। अप्ठौ तु होमकाः कार्या वेदवेदाङ्गवेदिनः । एवं द्वादश विद्याः स्युर्यस्त्रमाल्यानुलेपनैः पूर्ववत् पूजयेद्वत्या वस्त्राभरणभूपणैः ॥ १२८ ।। गत्रिसक्तं च रौद्रश्च पायमानं सुमङ्गलम् । पूर्वतो यह च. शान्ति पठन्नास्तेादमुखः शान्तं शाश्च सौम्यञ्च कोप्माण्डं शान्तिमेव च । पाठयद्दक्षिणद्वारियजुर्वेदिनमुत्तमम् सुपर्णमथ बैराजमान्नेयं रसंहिताम् । ज्येष्ठसाम तथा शान्ति छन्दोगः पधिमे जपेत् शान्ति सक्तञ्च सीरच तथाशाकुनरं शुभम् । पीटिका महागज्यमुत्तरेणाप्यथर्व वित् पञ्चभिः सप्तभिर्यापिहोमःकार्योऽत्रपूर्वयत् । म्नाने दाने चमन्त्रास्युस्तएयमुनिसत्तम घसोधाराविधानच लक्षहोमे विशिष्यते । अनेन विधिना यस्तु कोटिहोम समाचरेत् सर्वान् कामानवाप्नोति ततो विष्णुपदं ब्रजेत् ॥ १३४ ॥ य. पठेतृणुयादापि ग्रहयात्रयं नरः । मपापविशुद्धात्मा पदमिन्दम्य गन्छति ॥ अश्वमेधसत्राणि दशचाच धाम वित् । सन्या यत्फलमाप्नोति कोटिहोमात्तदभुने ब्रहात्यासहस्राणि भ्रूणल्यायुदानि च । कोटिहोमेन नश्यन्ति यथावच्छियभाषितम् पश्यकाभिचारादितथेयोचाटनादिकम् । नरप्रहमपं त्या ततः काम्यं समाचरेत् ॥ अन्यथा फलदं पुंसां न याम्यं जायते कचित् । तामादयुतहोमस्य विधानं पूर्वमाचरेत् वृत्तं घोचाटने कुण्ड तथा च यशफम्र्मणि । निमेपरफास्त्रमातिविग्नरेण तु ॥ पलाशसमिधः शस्ता मधुगोरोचनान्विताः । चन्दनागुगणा तदन् कुड़मेनाभिषिचिनाः - २२० [द्विनवतितमो * मत्स्यपुराणम् * होमयेन्मधुसर्पिभ्यां विल्वानि कमलानि च । सहस्राणि दशैयोक्तं सर्वदेव स्वयम्भुवा ।। ४२॥ वश्यकर्मणि विल्यानां पद्मानां चैत्र धर्मवित् । सुमित्रियानाप औषधय इतिहोमयेत्। न चात्र स्थापनंकार्य नवकुम्भाभिषेचनम् । स्नान सर्वोषधैः कृत्वाशुक्लपुष्पाम्बरोगृही। कण्ठसूत्रःसकनकैः विप्रान् समभिपूजयेत् । सूक्ष्मवस्त्राणि देयानि शुक्लागावासकाञ्चनाः। अवशानि वशीकुर्यात् सर्वशत्रुयलान्यपि ! अमित्राण्यपिमित्राणिहोमोऽयं पापनाशनः ॥ विद्वेषणेऽभिचारे व त्रिकोण कुण्डमिष्यते । द्विमेखलं कोणमुखं हस्तमात्रञ्च सर्वशः। होमकुर्युस्ततोविमा रक्तमाल्यानुलेपनाः । निचीतलोहितोष्णीषा लोहिताम्बरधारिणः॥ नववायसरकाढ्यपात्रत्रयसमन्विताः । समिधो घामहस्तेन श्येनास्थिवलसंयुताः। होतव्या मुक्तकेशैस्तु ध्यायद्भिरशिवं रिपी ॥१४॥ दुर्भित्रियास्तस्मैसन्तु तथा हुम्फडितीतिव। श्येनाभिचारमन्त्रेणधुरं समभिमन्यच । प्रतिरूपं रिपोः कृत्वा भुरेण परिकर्तयेत् । रिपुरुषस्य शकलान्यर्धवानी विनिक्षिपेत् ॥ प्रहया विधानान्ते सदेवाभिचरन् पुनः । विशेषणं तथा कुर्वन्नेतदेव समाचरेत् ॥३५॥ इहैव फलदं पुंसामेतनामुत्र शोभनम् । तस्माच्छान्तिकमेवात्र कर्त्तव्यं भूतिमिच्छता ॥ ग्रहयात्रयं कुर्याद्यस्त्यकाम्येनमानवः । सविष्णोः पदमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥ य इदं शृणुयानित्यं श्रावयेद्वापि मानवः । न तस्य ग्रहपीडा स्यानच बन्धुजनक्षयः ।। ग्रहयात्रयं गेहे लिपितं तत्र तिष्ठति। न पीटा तत्र बालानां न रोगो न च यन्धनम् ।। अशेषयाफलदं निःशेषायविनाशनम् । कोटिहोमं विदुः प्राशा भुक्तिमुक्तिफन्टप्रदम् । अश्वमेधफलं प्राहुर्लक्षहामं सुरोत्तमाः। द्वादशाहमयस्तद्वनवग्नहमसः स्मृतः ॥१५॥ इति फशितमिदानीमुत्सवानन्दहेतोः सकलयालुपहारी देवयज्ञाभिषेकः । परिपउति य इत्यं यः शृणोति प्रसङ्गादभिभवति स शनायुरारोग्ययुक्तः १५९ इति धीमत्स्यपुराणे ग्रहशान्तिवर्णनं नाम दिनयतितमोऽध्यायः ।
त्रिनवतितमोऽध्यायः नवग्रहस्वरूपवर्णनम् । शिव उवाच। पद्मासनः पाकरः पद्मगर्भसमद्युति । सप्ताश्यः सतज्जुश्च द्विभुजः स्यात् सदा रविः।। श्वेत श्वेताम्बरधरः श्वेताश्यः श्वेतवाहनः । गदापाणिढिबाहुश्च कर्तव्यो घरदःशशी॥ रक्तमात्याम्वरंधरः शक्तिशलगदाधरः । चतुर्भुज. श्वेतरोमा घरदः स्यादरामुत ॥३॥ पीतमाल्याम्बरधरः कर्णिकारसमद्युतिः । पनवमंगदापाणिः सिंहम्यो वरदो बुधः ।। देवदैत्यगुरू तहत्पीतभ्येतो चतुर्भुजी । दण्डिनी बग्दी यायौं साक्षम्म्रकमण्डल ॥1॥ इन्द्रनीलघुति शली घरटो गृध्रवाहनः । चाणवाणासनधरः कर्तव्योऽर्फ सुत म्तथा नीलसिंहासनम्यश्च राहुरत्र प्रशस्यते । धूम्रा.द्विवाहवः सर्वे गदिनो विरताननाः । गृध्रासनगता नित्यं पेतवः म्युर्वपदाः ॥ ७॥ सर्वे किरीटिनः कार्या प्रदलोफद्दितायदा । धनेनोनिता सधैं शतमप्रीत सदा। इति श्रीमत्स्यपुराणे नवप्रहम्यम्पवर्णनं नाम विनवतितमोऽध्यायः । चतुर्नवतितमोऽध्यायः शिवचतुर्दशीव्रतस्थनम् । नारद ऊयाचा भायन् भूतमध्येश तथान्यदपि यच्छ तम् । भुनिमुक्तिपदापालं तत्पुनयनासि ।। ज्यमुक्तोऽमपीच्यम्भुरयं पामयपारगः । मत्समम्नपसा प्रायन ! पुगणश्रुतिविम्तमा धमोऽयं गृपमपेण गन्दीनाम गणाधिप । धर्मान माद्देश्यगन पदान्यतःप्रभृतिनारद! मन्मय उपाना शृणुष्यावदितीप्रामन् : पश्येमाद-परंपत्यम् । विपुलोरोपिणानं नागशिपरतुर्दशी।
२२२ - * मत्स्यपुराणम् * चतुर्नवतितमी मार्गशीर्ष त्रयोदश्यां सितायामेकभोजनः । प्रार्थयेद्देवदेवेश ! त्वामहं शरणं गत ॥५॥ चतुर्दश्यां निराहार' सम्यगभ्यर्च्य शङ्करम् । सुवर्णवृषभं दत्त्वा भोक्ष्यामि च परेऽहनि । एवं नियमकृत् स्तुत्वा प्रातरुत्थाय मानवः । कृतस्नानजप पश्चादुमया सह शङ्करम् । पूजयेत्कमलः शुभैर्गन्धमाल्यानुलेपन ॥ ७ ॥ पादौ नम शिवायेति शिर सर्वात्मने नन । निनेत्रायेति नेत्राणि ललाट हरये नम ॥ मुपमिन्दुमुसायेति कीकण्ठायेतिकन्धराम् । सद्योजाताय कर्णोतु बामदेवायवैभुजौ ॥ अघोरहृदयायेति हृदयञ्चाभिपूजयेत् । स्तनौ तत्पुरपायति तथेशानाय चोदरम् ॥ १० ॥ पार्वं चानन्तधर्माय ज्ञानभूतायवै कटिम् । ऊरू चानन्तवैराग्यसिंहायेत्यभिपूजयेत् ॥ अनन्तैश्वर्य्यनाथाय जानुनीचार्चयेवुध. । प्रधानायनमोजड्वे गुल्फोव्योमात्मनेनम ॥ व्योमकेशात्मरूपायकेशान् पृष्ठञ्चपूजयेत् । नम पुष्टयनमस्तुष्टय पार्वतीञ्चापिपूजयेत् ॥ ततस्तु धृषभ हेममुदकुम्भसमन्वितम् । शुलमाल्याम्बरधरं पञ्चरतसमन्वितम् । भक्ष्यैर्नानाविधैर्युक्तं ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥ १४ ॥ ततोविप्रान समाय तर्पयेद्भक्तित शुभान् । पृषदान्यञ्च सप्राश्य स्वपेद्भूमामुदङ्मुख । पञ्चदश्यातत पूज्य विप्रान् भुञ्जीतवाग्यत । तद्वत् कृष्णचतुर्दश्यामेतत् सर्वसमाचरेत् ॥ चतुर्दशीपु सर्वासु बुर्य्यात् पूर्वयदर्चनम् । येतुमासे विशेषा स्युस्ताग्निरोधममादिह । मार्गशीर्षादिमासेपु प्रमादेतदुदीरयेत । शङ्कराय नमस्तेऽस्तु नमस्ते करवीरक ! ॥ १८ ॥ ध्यम्रकाय नमस्तेऽस्तु महेश्वरमत परम् । नमस्तेऽस्तु महादेव स्थाणवेच लत परम् नम पशुपने नाय ! नमस्ते शम्भो पुन । नमस्ते परमानन्द ! नम सोमार्दधारिणे ॥ नमो भीमाय इत्येव त्वामह शरण गत । गोमन गोमपं क्षीरं दधिपि युशोदकम् ॥ पञ्चगव्य ततोवित्र पंचागुरुयचा । तिला कृष्णाश्च निश्चित्माशनप्रमश स्मृतम् प्रतिमाम चतुर्दश्योरेयकं प्राशन स्मृतम् ॥ २० ॥ मन्दाग्मालनीभिध तथा धत्तूरफोरपि । सिन्दुबारग्शोयश्च मल्लिकाभिश्च पाटलः ।। अर्गपुणे पदम्मेध शतपण्या तथोत्पलैः । एफैन चतुर्दश्योरर्चयेन्पार्यतीपतिम् ।२४ ऽध्यायः * शिवचतुर्दशीघ्रतकथनम् * 'पुनश्च कार्तिक मासे प्राप्ते सन्तर्पयेद्विजान् । अन्नैर्नानाविधर्मक्ष्यैर्वस्त्रमाल्यविभूषणः॥ मृत्वा नीलवृपोत्सर्ग श्रुत्युक्तविधिना नरः । उमामहेश्वरं हैमं वृषभञ्च गवा सह ॥२६॥ मुक्ताफलाष्टकयुतं सितनेत्रपटवृताम् । सर्वोपस्करसंयुक्तां शन्यां दद्यात् सकुम्भकाम् ताम्रपात्रोपरि पुनः शालितण्डुलसंयुतम् । स्थाप्य विप्राय शान्ताय वेदवतपराय च ॥ ज्येष्टसमविदे देयं न वकवतिने कचित् । गुणशे श्रोत्रिये दद्यादाचार्य तत्त्ववेदिनि ॥२६ अव्यङ्गाङ्गाय सौम्याय सदाकल्याणकारिणे । सपत्नीकाय संपूज्य चत्रमाल्यविभूषणः गुरौ सति गुरोर्देयं तदभावे द्विजातये । न वित्तशाट्य कुर्वीत कुर्वन् दोपात्पतन्यधः । अनेन विधिना यस्तु कुर्याच्छियचतुर्दशीम् । सोऽश्वमेधसहनस्य फलंप्राप्नोतिमानयः ब्रह्महन्यादिकं फिश्चिद्यदत्रामुत्र वा स्तम् । पितृभिातभिर्वापि तत्सर्वनाशमाप्नुयात् दीर्घायुरारोग्यकुलान्नमृद्धि रत्राक्षयामुन्न चतुर्भुजन्यम् । गणाधिपत्यं दिवि कल्पकोटिशतान्युपित्या पदमेति शम्भोः ॥ ३४ ॥ न वृहस्पतिरप्यनन्तमस्या. फलमिन्द्रो न पितामहोऽपि वक्तुम् । न च सिद्धगणोऽप्यलं न चाहं यदि जिह्वायुतकोटयोऽपि पकने ॥३॥ भवत्यमरयल्लभः पति यः स्मरेद्वासदा शृणोत्यपि विमत्सरः सफलपापनिर्मोचनम् । इमां शिव चतुर्दशी ममरकामिनी कोटयः । स्तुवन्ति तमनिन्दितं किमुसमाचरेद्यः सदा ॥ ३६ ।। या पाथ नारी फुक्नेति भक्या भर्तारमापृच्च्य सुतान् गुरुन् था। सापि प्रसादात्परमेश्वरस्य परम्पदं याति पिनाकपाणेः ॥ ३७॥ इति श्रीमन्स्यपुराणे नन्दिनारदसंवादे शिवचतुर्दशीनतनाम चतुर्नवतितमोऽध्यायः ।
पञ्चनवतितमोऽध्यायः फलत्यागमाहात्म्यकथनम् । नन्दिकेश्वर उवाच । फलत्यागस्य माहात्म्यं यद्भवेच्छृणु नारद !! यदक्षयं परं लोके सर्वकामफलप्रदम् ।। मार्गशीर्ष शुभे मालि तृतीयायां मुने! वतम् । द्वादश्यामथवाटम्यां चतुर्दश्यामथापि वा आरभेच्छुक्लपक्षस्य कृत्वा ब्राह्मणघाचनम् ॥ २ ॥ अन्येप्वपि हि मासेपु पुण्यपु मुनिसत्तम!। सदक्षिणम्पायसेन भोजयच्छक्तितोद्विजान् अप्रादशानां धान्यानामवद्यं फलमूलक. । वर्जयेदव्दमेकन्तु ऋते औषधकारणम् ॥ सत्पं काञ्चनं रुद्रं धर्मराजञ्च कारयेत ॥ ४ ॥ कृष्माण्डं मातुलिङ्गञ्च धार्ताकम्पनसंतथा । आम्राम्रातकपित्थानि कलिङ्गमथघालुकम् श्रीफलाश्वत्थवदरञ्जम्वीर कदलीफलम् । काश्मरन्दाडिमं शक्त्या कालधौतानिपोडश. मूलकामलक जम्वृतिन्तिडीकरमर्दकम् । ककोलेलाकतुण्डीरफरीर कुटजं शमी ॥ ७॥ मोदुम्बर नालिकेर द्राक्षाथ वृहतीद्वयम् । रोप्यानि कारयच्छत्या फलानीमानिपोडश तानं तालफलं फुर्सादगस्तिफलमेव च । पिण्डारकाश्मय॑फलं तथा सूरणकन्दकम् ॥ रतालुकायन्दकञ्च कनकाहच विभिटम् । चित्रवल्लीफलं तद्वत्कृटशाल्मलिजम्फलम् ॥ आम्र निप्पावमधुकरटमुगपटोलकम् । ताम्राणि पोडशैतानि कारयेच्छक्तितोनरः ॥१.१ उदयुम्भवयंपुर्याद्धान्योपरि सवस्त्रकम् । ततश्च कारयेन्छय्या यथोपरि सुवाससी ॥ भक्ष्यपात्रत्रयोपेतं यमरुद्रवान्वितम् । धेन्या सहय शान्ताय विप्रायाथ पुटुम्बिने । सपनीकाय संपूज्य पुण्येऽति विनिवेदयेत् ॥ १३ ॥ यथा फलेषु सर्वेषु पसन्त्यमरकोटयः । तथा सर्यफलत्यागयतादति शिऽस्तु मे।१४ यथा शिवश धर्मश्च सदानन्तफलप्रदी। तयुक्तफन्टदानेन तो स्यातां मे घपदी ॥१५॥ यथा फलान्यनन्तानि शियमनषु सर्पदा । तशानन्तफलावातिरन्तु जन्मनि जन्मनि ॥ पया भेदंगपश्यामि शिवपिण्वपमजान । तथा ममाम्तु विश्वात्माशदर शरसदा ऽध्यायः * मादित्यवारयतफथनम् * २२५ इति दत्त्वा व तत्सर्वमलत्य च भूपणे. । शक्तिश्चेच्छयनं दद्यात्सर्वोपस्करसंयुतम् ॥ अशकस्तु फलान्येव यथोक्तानि विधानतः । तथोदकुम्भसंयुको शिवधर्मों व काञ्चनी विप्राय दत्त्वा भुञ्जीत वाग्यतस्तैलवर्जितम् । खन्यान्यपि यथा शच्या भोजयेच्छक्तितो द्विजान् ॥२०॥ एतद्भागवतानान्तु सौरवैष्णवयोगिनाम् । शुभं सर्वफलत्यागवतं वेदविदो विदु ॥२१ नारीभिश्च यथाशक्तया कर्त्तव्यं द्विजपुङ्गव !! एतस्मान्नापरं किञ्चिदिहलोके परत्र च ॥ चतमस्ति मुनिश्रेष्ठ ! यदनन्तफलप्रदम् ॥ २२ ॥ सौवर्णरौप्यतानेपु यापन्त' परमाणप. । भवन्तिचूर्ण्यमानेपु फलेषु मुनिसत्तम! ॥ तावयुगसहस्राणि रुद्रलोके महीयते ॥ २३ ॥ एतत्समस्त फलुपापहरं जनानामाजीवनाय मनुजेषु च सर्वदा स्यात् । जन्मान्तरेप्वपि न पुत्रवियोगदुःखमाप्नोति धाम च पुरन्दरलोकजुटम।२४ यो घागृणोति पुरपोऽस्पधन पठेद्वा देवालयेषु भुवनेषु च धार्मिकाणाम्। पापैवियुक्तवपुरत्र पुरं पुरारेरानन्दरुत्पदमुपैति मुनीन्द्र । सोऽपि ॥ २७ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे फलत्यागमाहात्म्यकथनं नाम पञ्चनवतितमोऽध्याय । पष्णवतितमोऽध्यायः आदित्यवारव्रतकथनम् । नारद उवाच। यदारोग्यकर पुंसां यदनन्तफलप्रदम् । यच्छान्तये च माना घट नन्दीश तद्वतम्॥१ नन्दिरेश्वर उवाच। यत्तद्विश्वात्मनो धाम परं ब्रह्मसनातनम् । सर्याग्निचन्द्ररूपेण तनिधाजगति स्थितम् तदाराध्य पमान् विप्र प्राप्नोतिकुशलं सदा । तस्मादादित्यचारेण सदा नक्काशनोमवेत् है
[पण्णवतितमो
વરદ
* मत्स्यपुराणम् *
यदा हस्तेन संयुक्तमादित्यस्य च घासरम् । तदा शनिदिने कुर्य्यादेकभुक्तं विमत्सरः।
नक्तमादित्यवारेण भोजयित्वा द्विजोत्तमान् । पत्रादशसंयुक्तं रक्तचन्दनपङ्कजम् ॥५॥
विलिख्य विन्यसेत्सूर्य नमस्कारेण पूर्वतः । दिवाकरं तथाग्नेय विवस्वन्तमतः परम्
भगन्तु नैते देवं वरुणं पश्चिमे दले । महेन्द्रमनिले तद्वदादित्यञ्च तथोत्तरे ॥ ७ ॥
शान्तमीशानभागे तु नमस्कारेणविन्यसेत् । कणिका पूर्वपत्रेतु सूर्य्यस्यतुरगानन्यसेत्
दक्षिणेऽर्यमनामानं मार्तण्डं पश्चिमे दले । उत्तरे तु रवि देवं कर्णिकायाञ्च भास्करम्
रक्तपुप्पोदकेनायं सतिलारुणचन्दनम् । तस्मिन् पद्म ततो दद्यादिम मन्त्रमुदीरयेत् ।
कालात्मा सर्वभूतात्माचेदात्मा विश्वतोमुखः । यस्मादग्नीन्द्ररूपस्त्वमतःपाहिदिवाकर!
अग्निमीले नमस्तुभ्यमिषेत्वोर्जेचभास्कर !! अग्न आयाहि घरद ! नमस्तेज्योतिषाम्पते!
अयं दत्त्वा विसृज्याथनिशितैलविवर्जितम् । भुञ्जीतवत्सरान्ते तु काञ्चनंकमलोत्तमम्
पुरुषञ्च यथाशक्त्या कारयेद्विभुजं तथा ॥ १३ ॥
सुवर्णशृङ्गी कपिलां महाऱ्या रौप्यैः खुरैः कांस्यदोहां सवत्साम् ।
पूणे गुडस्योपरि ताम्रपाने निधाय पद्म पुरुपञ्च दद्यात् ॥ १४ ॥
संपूज्य रक्ताम्यरमाल्यधूजिञ्च रक्तरथ हेमन्टहै।
संकल्पयित्वा पुरुषं सपा दद्यादनेकवतदानकाय ॥
अव्यङ्गरूपाय जितेन्द्रियाय कुटुम्बिने देयमनुद्धताय ॥ १५ ॥
नमो नमः पापविनाशनाय विश्वात्मने सप्ततुरङ्गमाय ।
सामर्यजुर्धामनिधे ! विधात्र भवाब्धिपोताय जगत्सवित्रे ॥ १६ ॥
इत्यनेन विधिना समाचरेदब्दमेकमिह यस्तु मानपः ।
सोऽधिरोहति विनएफल्मपः सूर्यधामधुतचामरावलिः ॥ १७ ॥
धर्मसंक्षयमवाप्य भूपतिः शोफदुःपभयरोगपर्जितः।
द्वीपसप्तकपतिः पुनः पुनर्दममूर्तिरमितीजसा युतः ॥ १८ ॥
या च भगुरुदेवतत्परा बेदमूर्तिदिननक्तमाचरेत् ।
सापि लोकममरेशवन्दिता याति नारद! रखेर्नसंशयः ॥१६॥
ऽध्यायः] * संक्रान्त्युद्यापनफलवर्णनम् । २२७ यः पठेदपि शृणोति मानवः पठ्यमानमथधानुमोदते । सोऽपि शकभुवनस्थितोऽमरै. पूज्यते घसति चाक्षयं दिवि ॥२०॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे आदित्यवाखतवर्णनं नाम पण्णवतितमोऽध्यायः । सप्तनवतितमोऽध्यायः संक्रान्त्युद्यापनफलवर्णनम् । नन्दिकेश्वर उवाच । अथान्यदपि वक्ष्यामि सक्रान्त्युद्यापने फलम् । यदक्षयं परे लोके सर्वकामफलप्रदम् ॥ अयने विपुवे वापि सक्रान्तिरतमाचरेत् । पूर्वयुरेकभक्तेन दन्तधावनपूर्वकम् ॥ सक्रान्तिवासरे प्रातस्तिले स्नानं विधीयते ॥२॥ रविसक्रमणे भूमी चन्दनेनाटपरकम् । पद्म सकर्णिकं कुर्यात् तस्मिन्नावाहयेदविम् ॥ कणिकाया न्यसेत्सूर्यमादित्यपूर्वतस्तत । नम उष्णाचिपे याम्येनमोमृड्मण्डलायव नम सवित्रे नैऋत्ये वारुणे तपनं पुन । घायव्ये तु भग न्यस्य पुन पुनरथार्चयेत् ॥५ मार्तण्डमुत्तरे विष्णुमीशाने विन्यसेत्सदा । गन्धमात्यफलर्भक्ष्य, स्थण्डिलेपूजयेत्ततः द्विजाय सोदकुम्भञ्च घृतपात्रं हिरण्मयम् । कमलञ्च यथाशस्या कारयित्वा निवेदयेत चन्दनोदकपुष्पैश्च देवायाध्यं न्यसेद् भुवि । विश्याय विश्वरूपाय विश्वधाम्नेस्वयम्भुवे नमोऽनन्त । नमो धात्रे ऋक्सरमयजुपाम्पते ! ॥८॥ अनेन विधिना सर्वमासिमासिसमाचरेत् । चत्मरान्तेऽथवा कुर्यात् सर्वद्वादशधानरः सम्वत्सरान्ते धृतपायसेन सन्तर्प्य वहि द्विजपुङ्गवाच । कुम्भान् पुनदिशधेनुयुक्तान् सरतहैरण्मयपद्मयुक्तान् ॥१०॥ पयखिनी शीलवतीश्च दद्या मै. शृङ्रोप्यखुरैश्च युक्ता. । गावोऽष्ट पा सप्त सकास्यदोहा माल्याम्बरायाचतुरोऽप्यशक्त । JAL [भएनवतितमो २२८ * मत्स्यपुराणम् * दोर्गत्ययुक्तः कपिलामथैकां निवेदयेद्वाह्मणपुगवाय ॥ ११ ॥ हैमीञ्च दद्यात्पृथिवी सशेषामाकार्यरूप्यामथ वा च ताम्रीम् । पैटीमशक्त प्रतिमां विधाय सौवर्णसूर्येण समम्प्रदद्यात् ।। न वित्तशाठ्यपुस्पोऽत्र कुर्यात् कुर्वन्नधोयाति न संशयोऽत्र ॥१२॥ यावन्महेन्द्रप्रमुसैनगेन्द्रः पृथ्वी च सप्ताब्धियुतेह तिष्ठेत् । तावत्सगन्धर्वगणैरशेपै. संपूज्यते नारद ! नाकपृष्ठे ॥१३॥ ततस्तु कर्मक्षयमाप्य सप्तद्वीपाधिपः स्यात् कुलशीलयुक्तः । सृष्टर्मुखेऽव्यङ्गयपुः सभार्यः प्रभूतपुत्रान्वयवन्दितानिः ॥ १४॥ इति पठति शृणोतिवाथभत्तयाविधिर्माखलं रविसंक्रमस्य पुण्यम् । मतिमपि च ददाति सोऽपि देवरमरपतेर्भवने प्रपूज्यते च ॥१०॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे संक्रान्त्युद्यापनफल-वर्णनं नाम सप्तनवतितमोऽध्याय'। अप्टनवतितमोऽध्यायः विभूतिद्वादशीव्रतकथनम् । नदिकेश्वर उवाच। शृणु नारद ! वक्ष्यामि विष्णोर्वतमनुत्तमम् । विभूतिद्वादशीनाम सर्वदेवनमस्कृतम् ॥ कार्तिकेचैत्रवैशाखे मार्गशीर्षे च फाल्गुने । आषाढे घा दशम्यान्तु.शुक्लायांलघुभुड्नरः । कृत्यासायन्तनीसन्ध्यां गृह्णीयान्नियमधुध एकादश्यां निराहार समभ्यर्च जनार्दनम् । द्वादश्याद्विजसंयुक्तः करिष्येभोजनं विभो! तदविनन मे यातु सफलं स्याच केशव !! नमोनारायणायेति घाच्यञ्च स्वपता निशि ततः प्रभात उत्थायसावित्र्यप्टशतक्षपेत् । पूजयेत् पुण्डरीकाक्षं शुल्लमात्यानुलेपन ॥५॥ विभूतयेनम पादायशोफायच जानुनी । नम शिवायेत्यूरच विश्वमूर्ते! नमः कटिम् ॥६ ऽध्यायः] • विभूतिद्वादशीव्रतवर्णनम् * २२६ कन्दर्पायनमोमे, फलं नारायणायच । दामोदरायेत्युदरं घासुदेवाय च स्तनी ॥ ७॥ माधयायेत्युरोविष्णोः कण्ठमुन्कण्ठिनेनमः । श्रीधरायमुनकेशान् केशवायेतिनारद !। पृष्ठं शाईधरायेति श्रवणो वरदाय वै । स्वनाम्ना शड्वकासिगदाजलअपाणये । शिरः सर्वात्मने ब्रह्मन् ! नमइत्यभिपूजयेत् । मत्स्यमुत्पलसंयुक्त हैमं कृत्वा तु शक्तित । उदकुम्भसमायुक्तमग्रतः स्थापयेद् बुधः गुडपानं तिलयुक्तसितवस्त्राभिवेष्टितम् । रात्री जागरणं कुर्यादितिहासकथादिना ।। प्रभातायान्तु शर्वर्या ब्राह्मणाय कुटुम्बिने । सकाञ्चनोत्पलंदेवं सोदकुम्भं निवेदयेत् ॥ यथा न मुच्यसे देव ! सदासर्व विभूतिभिः । तथामामुद्धराशेषदुःससंसारकर्दमात् ।२३। दशावताररूपाणि प्रतिमासं प्रमान्मुने ! 1 दत्तात्रेयंतथा व्यासमुन्पलेन समन्वितम् ॥ दद्यादेवं समा यावत्पापण्डानभिवर्जयेत् ॥ १४ ॥ समाप्यचं यथाशक्त्या द्वादश द्वादशी पुनः । सम्वत्सरान्ते लवणपर्वतेन समन्विताम् । शय्यां दद्यान्मुनिश्रेष्ठ ! गुरखे धेनुसंयुताम् ॥१५॥ ग्रामञ्च शक्तिमान्दद्यात क्षेत्रंया भवनान्वितम् । गुरंसंपूज्य विधियद्वस्त्रालङ्कारभूपण: अन्यानपि यथाशत्तया भोजयित्या द्विजोत्तमान् । तर्पयेवस्त्रगोदाने रत्नाघधनसञ्चयः। अल्पवित्तो यथाशक्त्या स्तोकं म्तोकं समाचरेत् ॥१७॥ यश्चाप्यतीवनिःस्थ स्यानक्तिमानमाधयंप्रति। पुप्पार्चनविधानेन स कुर्याद्वत्सद्वयम् ।। अनेन विधिना यस्तुविभूतिद्वादशवतम् । कुर्यात् पापविनिर्मुक्त पितॄणा तारयेच्छतम् । जन्मनां शतसाहस्रन शोकफलभाग्भवेत । न च व्याधिर्भवेत्तस्य न दारिद्रं न यन्धनम् वैप्पावोवाथ शैवोवा भजन्मनि जन्मनि ॥२०॥ याययुगसहस्त्राणां शतमष्टोत्तरं भवेत । तावतस्वर्गे बसेग्रह्मन् ! भूपतिश्च पुनर्भवेत् इति मत्स्यपुराणे विभूतिद्वादशीवतोद्यापनवर्णनं नामाप्टनपतितमोऽध्यायः । 1 10 नवनवतितमोऽध्यायः विभूतिद्वादशीव्रतमाहात्म्यवर्णनम् नन्दिकेश्वर उवाच । पुरा रथन्तरे कल्पे राजासीत् पुष्पवाहन | नाना लोकेपुविख्यातस्तेजसा सूर्यसन्निभ तपसा तस्य तुष्टेन चतुर्वक्त्रेण नारद !! कमलं काञ्चनं दत्तं यथा कामगर्म मुने ॥२॥ लोकः समस्तैर्नगरवासिभि. सहितो नृप । द्वीपानि सुरलोकञ्च यथेष्टं व्यचरत्तदा ॥३ कल्पादौ सप्तमं द्वीपं तस्य पुष्करवासिन । लोकेच पूजितं यस्मात् पुष्करद्वीपमुच्यते देवेन ब्रह्मणा दत्तं यानमस्य यतोऽम्भुजम् । पुष्पवाहनमित्याहुस्तस्मात्तं देवदानवा. नागम्यमस्यास्ति जगत्त्रयेऽपि ब्रह्माम्बुजस्थस्य तपोऽनुभावात् । पत्नी च तस्याप्रतिमा मुनीन्द्र ! नारीसहस्ररभितोऽभिनन्द्या । नाना च लावण्यवती वभूव सा पार्वतीवेष्टतमा भवस्य ॥ ६ ॥ तस्यात्मजा नामयुतम्वभूध धर्मात्मनामग्यधनुर्धराणाम् । तदात्मन सर्वमवेक्ष्य राजा मुहुर्मुहुर्विम्मयमासमाद । सोऽभ्यागतं वीक्ष्य मुनिप्रवीर प्राचेतसं वाम्ममिदं धभापे ॥ ७॥ राजोवाच । कस्माठिभूतिरमलामरमर्त्यपूज्या जाता च सा विजितामरसुन्दरीणाम् । भार्या ममाल्पतपसा परितोपितेन दत्तं ममाम्युजगृहञ्च मुनीन्द्र ! धात्रा ८t यस्मिन् प्रविष्टमपि कोटिशतं नृपाणाम् सामात्यकुञ्जररथौघजनावृतानाम् । नो लक्ष्यते क गतमम्बरमध्य इन्दुस्तारागणैरिव गत परितः स्फुरद्भिः ॥६॥ तस्मात् किमन्यजननीजठरोद्भवेन धर्मादिकं कृतमशेषफलाप्तिहेतु। भगवन् मयाऽथ तनयैरथवाऽनयापि भद्रं यदेतदखिलं कथय प्रचेत ॥१०॥ मुनिरभ्यधादथ भवान्तरितं समीक्ष्य पृथ्वीपते प्रसभमद्भुतहेतुवृत्तम् ।
ऽध्यायः] * विभूतिद्वादशीव्रतमाहात्म्यवर्णनम् * २३१ जन्माभवत्तच तु लुब्धकुलेति घोरे जातस्त्वमप्यनुदिनं किल पापकारी ११॥ चपुरप्यभूत्तच पुनः परुषागसन्धिदुर्गन्धिसत्यभुजगावरणं समन्तात् । न चते सुहन्नसुतवन्धुजनो न तातस्त्वाक स्वसा न जननी च तदाभिशस्ता अभिसङ्गतापरमभीष्टतमा विमुखी महीश! तव योपिदियम् ॥ १० ॥ अभूदनावृष्टिरतीच रौद्रा कदाचिदाहारनिमित्तमस्मिन् । क्षुत्पीडितेनाथ तदा न किञ्चिदासादितं धान्यफलामिपञ्च ॥ १३ ॥ अथाभिदृष्टं महदम्बुजाढ्य सरोवरं पङ्कपरीतरोधः। पद्मान्यथादाय ततो वहूनि गत पुरं वैदिशनामधेयम् ॥१४॥ तन्मौल्यलाभाय पुरं समस्तं भ्रान्तं त्वया शेषमहस्तादासीत् । नैता न कश्चित् कमलेषु जातः श्रान्तो भृशं क्षुत्परिपीडितश्च ॥१५॥ उपविष्टस्त्वमेकस्मिन् सभार्यों भवनाङ्गणे । अथ मङ्गलशब्दश्च त्वया रात्री महान्छ,त. सभार्यस्तत्रगतवान् यत्रासौमङ्गलध्वनि. । तत्र मण्डपमध्यस्था विष्णोरर्चावलोकिता। वेश्यानंगवती नाम विभूतिद्वादशीव्रतम् । समाप्ती माघमासस्य लवणाचलमुत्तमम् ।। निवेदयन्ति गुरवे शय्या चोपस्करान्विताम् ! अलत्यहषीकेश सोवमरपादपम् ॥ तान्तु दृष्ट्वा ततस्ताभ्यामिदं च परिकीर्तितम् । किमेभि कमलैः कार्यवरं विष्णुरलङ्कृतः इति भक्तिस्तदा जाता दम्पत्योस्तुनराधिप । तत्प्रसंगात् समभ्यय॑केशवलपणाचलम् शय्या च पुष्पप्रकरैः पूजिता भूश्च सर्वतः ।। २१ ॥ अथानंगवती तुटा तयोर्धनशतत्रयम् । दातुंत्यामाददे साथ कलधौतशतत्रयम् ॥२२॥ न गृहीतं ततस्ताभ्यां बहुसत्वावलम्बनात् । अनंगवत्या च पुनस्तयोरनं चतुर्विधम् । ानीय व्याहत चात्र भुज्यतामिति भूपते ! ॥ २३ ॥ ताभ्यान्तु तदपित्यकं भोक्ष्यावो वै.वरानने। प्रसंगादुपवासेन तपाद्य सुखमावयोः ।। जन्म प्रभृति पापिष्ठी कुकर्माणो दृढव्रते । तत्प्रसंगात्तयोर्मध्ये धर्मलेशस्तु तेऽनध !! इति जागरण ताभ्यां तत्प्रसंगानुष्ठितम् । प्रभाते च तया दत्ता शय्या सलवणाचला। ग्रामाश्च गुरये भक्या विप्रेषु द्वादशैव तु । यस्त्रालङ्कारसंयुक्ता गावश्च करकान्विताः।।
[शततमो
૨૨૨
* मत्स्यपुराणम् **
भोजनञ्च सुदृन्मित्रदीनान्धकृपणःसमम् । तच लुब्धकदाम्पत्यं पूजयित्वा विसर्जितम्
स भवान् लुब्धकोजातः सपत्नीकोनृपेश्वरः । पुष्करप्रकरात्तस्मात्केशवस्यच पूजनात्
विनष्टाशेषपापस्य तव पुष्करमन्दिरम् । तस्य सत्वस्य माहात्म्यादल्पेन तपसा नृप !!
यथाकामगमं जातं लोकनाथश्चतुर्मुखः । सन्तुष्टस्तव राजेन्द्र ! ब्रह्मरूपी जनार्दनः ॥३६॥
साप्यनङ्गवती वेश्या कामदेवस्य साम्प्रतम् । पत्नीसपत्नीसाता रत्याःप्रीतिरितिध्रुता।
लोकेवानन्दजननी सफलामरपूजिता ॥ ३२ ॥
तस्मादुत्सृज्यराजेन्द्र ! पुष्करतन्महीतले । गङ्गात समाश्रित्य विभूतिद्वादशीव्रतम् ॥
कुरु राजेन्द्र ! निर्वाणमवश्यं समवाप्स्यसि ॥ ३३ ॥
नन्दिकेश्वर उवाच ।
इत्युक्त्वा स मुनिर्ब्रह्मन् ! तत्रैवान्तरधीयत । राजा यथोक्तञ्च पुनरकरोत् पुष्पवाहनः ।
इदमाचरतो ब्रह्मन्नखण्डवतमाचरेत् । यथाकथञ्चित्कमलैादशद्वादशीर्मुने ! ॥३५॥
कर्तव्याःशक्तितो देवाविप्रेभ्योदक्षिणाऽनधन वित्तशाठ्यं कुर्वीत भक्क्यातुष्यतिकेशव
इति कलुषविदारणं जनानामपि पठति शृणोति चाथ भक्या ।
मतिमपि च ददाति देवलोके वसति स कोटिशतानि घत्सराणाम् ॥३७॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे विभूतिद्वादशीव्रतवर्णनं नाम नवनवतितमोऽध्यायः ।
शततमोऽध्यायः
पष्टि-वतरणनम् ।
नन्दिकेश्वर उवाच ।
अथातासाप्रवक्ष्यामि व्रतपछिमनुन्नमाम् । रुदेणाभिहितां दिव्यां महापातकनाशिनीम्।।
नक्तमन्दं चरित्वा तु गया साई कुटुम्बिने । हैमं चक्रं त्रिशूलच दद्याइद्विप्राय घाससी।'
शिवरूपस्ततोऽस्माभिः शिवलोकेस मोदते । एतद्देवव्रतं नाम महापातकनाशनम् ॥३॥
ऽध्यायः] पष्टि-व्रतवर्णनम् । ઉપર यस्त्वेकमक्तेन समां शिवं हैमवृपान्वितम् । धेनं तिलमयी दद्यात् सपदं यातिशाङ्करम् एतद्रुवतं नाम पापशोकविनाशनम् ॥४॥ यस्तु नीलोत्पलं हेमं शर्करापात्रसंयुतम् । एकान्तरितनताशी समान्ते वृपसंयुतम् ।। स वैष्णवं पदं याति लीलावतमिदंस्मृतम् ॥५॥ भापाढादिचतुर्मासमभ्यङ्गं वर्जयेन्नरः । भोजनोपस्करं दद्यात् स याति भवन हरेः ।। जने प्रीतिकरं नृणां प्रीतिव्रतमिहोच्यते ॥ ६ ॥ घर्जयित्वा मधी यस्तु दधिक्षीरनैक्षवम् । दद्याद्वस्त्राणि सूक्ष्माणि रसपात्रैश्चसंयुतम् ॥ सम्पूज्य विप्रमिथुनं गौरी मे प्रीयतामिति । एतद्गौरीव्रतं नाम भवानी लोकदायकम्।। पुष्पादौ यत्रयोदश्यांकृत्वा नक्तं मधौपुनः । अशोकंकाञ्चनं दत्वाइश्चयुक्तं दशाङ्गुलम्॥ विप्राय वस्त्रसंयुक्तं प्रद्युम्नःप्रीयतामिति । कल्पविष्णुपदेस्थित्वाविशोक स्यात् पुनर्नरः॥ एतत् कामवतं नाम सदा शोकविनाशनम् ॥ १० ॥ आपाढ़ादिवतं यस्तु धर्जयेन्नखकर्ननम् । वार्ताकंच चतुर्मासं मधुसर्पिर्धटान्वितम् ॥ कार्तियां तत्पुनर्हमें ब्राह्मणाय निवेदयेत् । स रुद्रलोकमानोति शिवव्रतमिदं स्मृतम् ॥ वर्जयेद्यस्तु पुष्पाणिहेमन्तशिशिरावृतृ । पुष्पवयंच फाल्गुन्यां कृत्वा शक्या च काञ्चनम् दद्याद्विकालवेलायां प्रीयेतां शिवकेशयो । दत्त्वा परम्पदं याति सौम्यव्रतमिदंस्मृतम् ॥ फाल्गुनादितृतीयायां लवणंयस्तुवर्जयेत् । समाहे शयनदद्यात् गृहचोपस्कारान्यितम् ।। संपूज्य विप्रमिथुनं भवानी प्रीयतामिति । गौरीलोके घसेत्कल्पं सौभाग्यवतमुच्यते ॥ सन्ध्या मौनं ततः कृत्वा समान्ते घृतकुम्भकम् । घायुग्मं तिलान् घण्टा ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥ १७ ॥ सारस्वतं पदं याति पुनरावृत्तिदुर्लभम् । एतत्सारस्वतं नाम रूपविद्याप्रदायकम् ॥१८] लक्ष्मीमभ्यर्च्य पञ्चम्यामुपवासी भवेन्नरः । समान्ते हेमकमलं दद्यादुधेनुसमन्वितम् ॥ सवैष्णवंपदं यातिलक्ष्मीवान् जन्मजन्मनि । एतत्सम्पद्वतं नाम सदापापविनाशनम्।। कृत्वोपलेपन शम्भोरगतः केरावस्यच । यावदछदं पुनर्दद्याधेनुञ्जलयटान्यिताम् ॥२६॥ जन्मायुतं स राजा स्यात्ततः शिवपुरं व्रजेत् । एतदायुव॑तं नाम सर्वकामप्रदायकम् ॥
[शततमो २३४ * मत्स्यपुराणम् * अश्वत्थं भास्करं गङ्गां प्रणम्यकत्र घाग्यतः । एकभक्त नर कुर्यादब्दमेकं चिमत्सर । व्रतान्ते विप्रमिथुनं पूज्यंधेनुनयान्वितम् । वृक्षहिरण्मयं दद्यात् सोऽश्वमेधफलं लभेत्। एतत् कीतिव्रतं नाम भूतिकीर्तिफलप्रदम् ॥ २४ ॥ घृतेन स्नपनं कुर्याच्छम्भो| केशवस्य च । अक्षताभिः सपुष्पाभि कृत्या गोमयमण्डलम् तिलधेनुसमोपेत समाप्ते हेमपङ्कजम् । शुद्धमष्टाङ्गुलं दद्याच्छिवलोके महीयते ॥ सामगाय ततश्चैतत् सामवतमिहोच्यते ॥ २६ ॥ नवम्यामेकभक्तन्तु कृत्याकन्याश्चशक्तित । भोजयित्वा समां दद्याद्वैमकयुकवाससी हैम सिंहञ्च विप्राय दत्त्या शियपदं व्रजेत् । जन्मायुदंसुरूप स्याच्छत्रुभिश्चापराजित । एतद्वीरवत नाम नारीणा व सुखप्रदम् ॥ २८ ॥ यावत् समाभवेद्यस्तु पञ्चदश्यापयोग्रत । समान्ते श्राद्धष्टद्दद्यात् पञ्च गास्तु पयस्विनी घासासि च पिशङ्गानि जलकुम्भयुतानिय । सयातिवैष्णचं लोकं पितृणान्तारयेच्तम् कल्पान्ते राजराज स्यात् पितृव्रतमिदं स्मृतम् ॥ ३० ॥ चैत्रादिचतुरो मासाञ्जलं दद्यादयावितम् । व्रतान्ते मणिक दद्यादन्नवस्त्रसमन्वितम्॥ तिलपात्र हिरण्यञ्च ब्रह्मलोके महीयते । कल्पान्ते भूपतिनमानन्दव्रतमुच्यते ॥ ३२ पञ्चामृतेन स्वपन कृत्वा सवत्सर विभो । घत्सरान्ते पुनर्दद्याद्धेनुं पञ्चामृतेन हि ॥ विप्राय दद्याच्छङ्घश्चत पदं याति शाङ्करम् । राजाभवति कल्पान्तेधृतिव्रतमिदं स्मृतम्, पर्जयित्वा पुनर्मासमब्दान्ते गोपदो भवेत् । तद्धेममृग दद्यात् सोऽश्वमेधफललभेत्॥ अहिंसाव्रतमित्युक्तं कल्पान्ते भूपतिर्भवेत् ॥ ३५ ॥ माघमास्युपसिस्थानकृत्वादाम्पत्यमर्चयेत् । भोजयित्वायथाशत्तया माल्यवस्त्रविभूषणः सूर्यलोके वसेत् कल्पं सूर्यग्रतमिदं स्मृतम् ॥३६॥ आषाढादिचतुर्मासप्रात स्नायी भवेन्नर । विप्रेषुभोजन दद्यात् कार्तिक्यागोप्रदोभवेत् ।। स वैष्णवं पद याति विष्णुवतमिद शुभम् ॥ ३७ ॥ अयनादयनं यावद्वर्जयेत् पुष्पपिपी । तदन्ते पुष्पदामानि धृतधेन्वा सहैव तु ॥३८॥ दत्त्वा शिवपदं गच्छेदविप्राय घृतपायसम् । एतच्छीलवत नाम शीलारोग्यफलप्रदमः ।। F ऽध्यायः] * पटि-व्रतवर्णनम् * २३५ सन्ध्यादीपप्रदोयस्तु समांतलं विवर्जयेत् । समान्तेदीपिका दद्यात् चनालेचकाञ्चने ॥ घवयुग्मच विप्राय तेजस्वी स भवेदिह । रद्रलोकमवाप्नोति दीप्तियतमिदं स्मृतम् ४१ कार्तिकादितृतीयायां प्राश्य गोमृत्रयाचकम् । नक्तञ्चरेदब्दमेकमन्दान्ते गोप्रदो भवेत् गौरीलोके घसेत्कल्पं ततो राजा भवेदिह । एतद्रुद्रप्रतं नाम सदा कल्याणकारकम् ॥ धर्जयेचैत्रमासे च यश्च गन्धानुलेपनम् । शुकिं गन्धभृतां दत्त्वा विप्राय सितवाससी॥ पारुणं पदमाप्नोति दृढव्रतमिदं स्मृतम् ॥४॥ वैशाखे पुष्पलवण पर्जयित्वाऽथगोप्रदः । भूत्वा विष्णुपदे कल्पं स्थित्वा राजाभवेदिह एतत्कान्तिनतं नाम कान्तिकीतिफलप्रदम् ॥४५॥ ब्रह्माण्ड काञ्चनरुत्या तिलराशिसमन्वितम् । व्यह तिलपदो भूत्वावहिसतर्यसद्विजम् सपूज्यविपदाम्पत्यमाल्यवस्त्रविभूषणे । शक्तितस्त्रिपलाध्यविश्वात्माप्रीयतामिति पुण्येऽहि दद्यात् सपरं ब्रह्मयात्यपुनर्भवम् । एतद्ब्रह्मयत नाम निर्वाणपददायकम् ४८॥ यश्चोभयमुखीं दद्यात् प्रभूतकनकान्विताम् । दिन पयोक्तस्तिष्ठेत् स याति परमम्पदम् एतद्धनुक्त नाम पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥४॥ यह पयोवते स्थित्वा काञ्चन करपपादपमा पलादूचं यथाशक्त्यातण्डुलस्तृपसयुतम् दत्त्वा ब्रह्मपदं याति करयव्रतमिदं स्मृतम् ॥५०॥ मासोपचासी यो दद्याद्धेनु विप्राय शोभनाम् । सवैष्णव पदं याति भीमवतमिदस्मृतम् दद्यादिशत्पलादूदुध्वं महीं कृत्वा तु काञ्चनीम् । दिन पयोमतस्तिद्रुद्रलोके महीयते ।। धराव्रतमिदं प्रोक्तं सप्तकरपशतानुगम् ॥५२॥ माघे मासेऽथवा चैत्रे गुडधेनुप्रदो भवेत् । गुडव्रतस्तृतीयाया गौरीलोके महीयते ॥ महाव्रतमिदं नाम परमानन्दकारकम् ॥७३॥ पक्षोपवासी यो दद्याद विप्राय कपिलाद्वयम् । ब्रह्मलोकमवाप्नोति देवासुरसुपूजितम् करपान्ते राजराज. स्यात्प्रभावतमिद स्मृतम् ॥५४॥ वत्सरन्त्वकभक्ताशी समयजलकुम्मदः । शिवलोके वसेस्कल्प प्राप्तिव्रतमिदं स्मृतम् नक्काशी चाष्टमीपु स्याद्वत्सरान्ते व धेनुद । पौरन्दर पुर थाति सुगतिप्रतमुच्यते ।५६ ।
[शततमो ॥ २३६ * मत्स्यपुराणम् * विप्रायेन्धनदो यस्तु घर्षादिवतुरो ऋतून् । घृतधेनुप्रदोऽन्ते च स परं ब्रह्म गच्छति ॥ वैश्वानरव्रतं नाम सर्वपापविनाशनम् ॥५॥ एकादश्याञ्च नताशी यञ्चकं विनिवेदयेत् । समान्ते वैष्णवं हेमंसविष्णोःपदमाप्नुयात् एतत्कृष्णवतं नाम कल्पान्ते राज्यभाग्भवेत् ॥५८॥ पायसाशी समान्ते तु दद्याद्विप्रायगोयुगम् । लक्ष्मीलोकमवाप्नोति होतद्देवीव्रतस्मृतम् सतम्यानक्तमुपदयात्समान्ते गाम्पपस्विनीम् । सूर्यलोकमवाप्नोतिभानुव्रतमिदंस्मृतम् चतुर्थ्या नक्तभुग्दद्यादब्दान्ते हेमवारणम् । व्रतं वैनायकं नाम शिवलोकफलप्रदम् ।६१ महाफलानि यस्त्यत्त्या चतुर्मासं द्विजातये । हैमानि कात्तिके दद्याद्गोयुगेनसमन्वितम् एतत्फलवत नाम विष्णुलोकफलप्रदम् ॥६२॥ यश्चोपवासी सप्तम्यां समान्ते हैमपड्डजम् । गावश्च शक्तितो दद्याद्धमान्नघटसंयुता. एतत्सौखतं नाम स्वर्गलोकफलप्रदम् ॥६॥ द्वादश द्वादशीर्यस्तु समाप्योपोषणेन च । गोवस्त्रकाञ्चनैर्विप्रान् पूजयेच्छक्तितोनरः ॥ परमम्पदमवाप्नोति विष्णुव्रतमिदं स्मृतम् ॥६॥ कातिमाञ्च वृपोत्सर्ग कृत्वा नक्त समाचरेत् । शैवम्पदमवाप्नोति चात्रतमिदंस्मृतम् कृच्छ्रान्ते गोप्रद कुर्याद्रोजनशक्तितः पदम् । चिप्राणां शाङ्करं यातिप्राजापत्यमिदंव्रतम् चतुर्दश्यान्तु नक्काशी समान्ते गोधनप्रदः । शैवम्पदमवाप्नोति त्रयम्बकमिदं व्रतम्।६७ सतरागोपितो दद्याघृतकुम्भं द्विजातये । घृतव्रतमिदम्पाहुब्रह्मलोकफलप्रदम् ॥ ६८॥ थाकाशशायी वर्षासु धेनुमन्ते पयस्विनीम् । शकलोके घसेन्नित्यमिन्द्रप्रतमिदं स्मृतम् अनग्निपकमश्नाति तृतीयायान्तु यो नरः । गान्दत्त्वा शिवमभ्येति पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥ इह चानन्दरुन् पुंसा श्रेयोव्रतमिदं स्मृतम् ॥७॥ हेमं पलढयादुध्वं रथमश्वयुगान्वितम् । ददन् कृतोपवासः स्यादिवि कापशतं घसेत् कल्पान्ते गजराजः म्यादश्यनतमिदं म्मृतम् ॥३१॥ तवद्धेमरथं दद्यात्यरिभ्यां संयुतं नरः । सत्यलोके घसेत्कल्पं सहस्रमथ भूपतिः ॥७२॥ उपयामं परित्यज्य समान्ते गोप्रदो गवेत् । यक्षाधिपत्यमाप्नोति पारणं प्रतमुच्यते इति श्रीमत्स्यपुराणे पष्टिवतादिधर्णनं नाम गन्मात्यायः। करपान्तै राजराज' स्यात् सोमनतमिदं स्मृतम् ॥८॥ प्रतिपद्यकभक्ताशी समान्ते कपिलाप्रदः । वैश्वानरपदं याति गिरतमिदं स्मृतम् ।।८२ श्रोतुन्तवेच्छा तदुदीरयामि प्रियेषु किं या पथनीयमान ! ऽध्यायः] * स्नानमहत्त्ववर्णनम् * निशि कृत्वा जले घासं प्रमाते गोप्रदो भवेत् । घारुणं लोकमाप्नोति घरुणातमुच्यते चान्द्रायणञ्च यः कुर्याद्धेमचन्द्रं निवेदयेत् । चन्द्रवतमिदं प्रोक्तं चन्द्रलोकफलप्रदम् ।। ज्येष्ठ पञ्चतपाः सायं हेमधेनुप्रदो दियम् । यात्यष्टमी चतुर्दश्यो रुद्रयतमिदं स्मृतम् ।। समृद्वितानकं कुर्यात्तृतीयायां शिवालये । समान्ते धेनुदो याति भवानी अनमुच्यने ।। माघे निश्यावासाः स्यात् सप्तम्यां गोपदो भवेत् । दिचि कल्पमुपित्वेह राजा स्यात् पवनं प्रतम् ॥ ७८ ॥ त्रिरात्रोपोपितोदयात्फाल्गुन्यांभवनंशुभम् । आदित्यलोकमाप्नोतिधामननमिदंग्मृतम् त्रिसन्ध्यं पूज्य दाम्पत्यमुपवासी विभूषणैः । अन्नं गाय. समाप्नोति मोनामिन्द्रप्रतादित दत्त्वा सितद्वितीयायामिन्दोलवणभाजनम् । समान्ते गोपटोयातियिायशियमन्दिरम् दशम्यामेकमक्ताशी समान्ते दशधेनुद. । दिशश्च काञ्चनैर्देवान् ब्रह्माण्डाधिपतिर्मयत एतद्विश्वनत नाम महापातकनाशनम् ॥३ य. पठेच्छृणुयाद्वापि व्रतपष्टिमनुत्तमाम् । मन्वन्तरशतं सोऽपि गन्धयाधिपतिर्मन । पष्टिव्रतं नारद ! पुण्यमेतत्तवोदितं विश्वजनीनमन्यत ।
[ एकाधिकशततमो त्रिपथगामिनी २३८ * मत्स्यपुराणम् * नमो नारायणायेति मूलमन्त्र उदाहृतः॥२॥ दर्भपाणिस्तु विधिना आचान्तः प्रयतः शुचिः । चतुर्हस्तसमायुक्तं चतुरस्रं समन्ततः । प्रकल्प्यावाहयेद्गगामेभिर्मन्त्रर्विचक्षणः ॥ ३ ॥ विष्णोःपादप्रसूतासिवैष्णवीविष्णुदेवता । त्राहिनस्त्वेनसस्तस्मादाजन्ममरणान्तिकात् तिन.कोट्योऽईकोटीचतीर्थानांवायुरनचीत् । दिविभूम्यन्तरिक्षेचतानितसन्तुजाहचि॥ नन्दिनीत्येव ते नाम देवेपुनलिनीति च । दक्षा पृथ्वी वविहगा विश्वकायाऽमृताशिवा विद्याधरी सुप्रशान्ता तथा विश्वप्रसादिनी। क्षेमा च जाह्नवीचैव शान्ताशान्तिप्रदायिनी एतानि पुण्यनामानि स्नानकाले प्रकीर्तयेत् । भवेत्सन्निहिता तत्र गङ्गा सप्तवाराभिजप्तेन करसपुटयोजित । मनि कुर्य्याजलं भूयस्त्रिचतुः पञ्चसप्तकम् ॥ स्नानं कुर्य्यान्मृदा तद्वदामन्य तु विधानत ॥६॥ अश्यक्रान्ते रथकान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे । मृत्तिके ! हर मे पापं यन्मयादुष्कृतंकृतम् उधृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना । नमस्ते सर्वलोकानां प्रभवारणि सुव्रते ! ॥ एवं स्नात्वा ततः पश्चादाचम्य व विधानतः । उत्थाय वाससी शुक्लेशुद्धे तु परिधायचे ततस्तु तर्पणं कुर्यात्त्रैलोक्याप्यायनाय वै ॥१२॥ देवायक्षास्तथानागागन्धर्वाप्सरसः सुराः । क्रूराः सर्पाःसुपर्णाश्चतरवोजम्बुका.ख वाय्वाधारा जलाधारास्तथैवाकाशगामिन !निराधाराश्य ये जीवा येतु धर्मरतास्तथा तेपामाप्यायनायैतद्दीयते सलिलं मया । तोपवीती देवेभ्यो निवीती च भवेत्ततः ॥ मनुष्यास्तर्पयेत्या ब्रह्मपुत्रानृपीस्तथा । सनकश्च सनन्दश्च तृतीयश्च सनातनः ॥१६॥ कपिलश्चासुरिश्चैव धोदुः पञ्चशिखस्तथा । सर्वे ते तृप्तिमायान्तु मद्दत्तेनाम्बुनासदा ॥ मरीचिमध्यङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं कतुम् । प्रचेतसं घशिष्ठश्च भृगुन्नारदमेव च । देवनहाइपीन् सर्वा स्तर्पयेदक्षतोदकैः ॥१८॥ अपसव्यं ततः कृत्वा सव्यं जान्वाच्य भृतले । अग्निप्यात्तास्तथा सौम्या हविष्मन्तस्तथोप्मपा. ॥१६॥ मुकालिनो यहिपदस्तथान्ये पाज्यपाः पुनः । सन्त पितरो भन्यासतिलोदकचन्दने. .खगाः - ऽध्यायः] * प्रयागमाहात्म्यवर्णनम् * २३६ यमाय धर्मराजाय मृत्यवे चान्तकाय च । वैवस्वताय कालाय सर्वभूतक्षयाय च ॥२१॥ औदुम्बराय दध्नाय नीलाय परमेष्टिने । वृकोदराय चित्राय चित्रगुप्ताय वै नमः । दर्भपाणिस्तु विधिना पितॄन् सन्तर्पयेत् बुधः ॥२२॥ पित्रादीन्नामगोत्रेण तथा मातामहानपि । सन्तर्प्य विधिना भत्तया इमं मन्त्रमुदीरयेत् ।।२३।। ये वान्धवा वान्धयेया येऽन्यजन्मनि वान्धवाः । ते तृप्तिमखिला यान्तु यश्चास्मत्तोऽभिवाञ्छति ॥२४॥ ततश्याचम्य विधिवदालिखेत्पद्ममग्रत । अक्षताभिः सपुष्पाभि. सजलारुणवन्दनम् । अयं दद्यात्प्रयत्नेन सूर्यनामानि कीर्तयेत् ॥२५॥ नमस्ते विष्णुरूपाय नमो विष्णुमुग्लाय वै । सहस्ररश्मये नित्यं नमस्ते सर्वतेजले २६। नमस्तेशिय ! सर्वेश ! नमस्तेसर्ववत्सल। जगत्स्वामिन्नमस्तेऽस्तु दिव्यचन्दनभूषित ।। पद्मासन ! नमस्तेऽस्तु कुण्डलाङ्गदभूपित । नमस्ते सर्वलोकेश ! जगत्सर्व वियोधसे।। सुरत दुष्कृतं चैव सर्व पश्यसि सर्वग । सत्यदेव ! नमस्तेऽस्तु प्रसीद मम भास्करण दिवाकर! नमस्तेऽस्तुप्रभाकर ! नमोऽस्तुते । एवंसूर्यनमस्कृत्यत्रि इत्वाथप्रदक्षिणम् द्विजगां काञ्चनं स्पृष्ट्वा ततो विष्णुगृहं ब्रजेत् ॥३०॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे स्नानादितर्पणसूर्याय॑निरूपणं नाम एकाधिकशततमोऽध्यायः । दुव्यधिकशततमोऽध्यायः प्रयागमाहात्म्यवर्णनम् । नन्दिकेश्वर उवाच अत परं प्रवक्ष्यामि प्रयागस्योपवर्णनम् । मार्कण्डेयेन कथितं यत् पुरा पाण्डुसूनवे॥१॥ भारते तु यदा वृत्ते प्राप्तराज्ये पृथासुते । एतस्मिन्नन्तरे राजा कुन्तिपुत्रोयुधिष्टिरमा २४० [द्वयधिकशततमो * मत्स्यपुराणम् * भातृशोक्न सन्तप्तश्चिन्तयन् स पुन पुन । आसीत्सुयोधनोराजा एकादशचभूपति ॥ अस्मान् सन्ताप्य बहुश सर्वे ते निधन गता । वासुदेव समाश्रित्य पञ्चशेपास्तु पाण्डवा ॥४॥ हत्वा भीष्म च द्रोणञ्च कर्णं चैव महावलम् । दुर्योधन च राजान पुनभ्रातृसमन्वितम् राजानो निहता सर्वे येवान्येशूरमानिन । किन्नोराज्येनगोविन्द । किम्भोगै वितेनवा धिक्कष्टमितिसञ्चिन्त्यराजावैतव्यमागत । निर्विचेष्टोनिरुत्साह किञ्चित्तिष्ठत्यधोमुख लब्धसशो यदा राजा चिन्तयन् स पुन पुन । कतरो विनियोगो घानियम तीर्थमेव च येताह शीघ्रमामुञ्चे महापातककिल्विषात् । यत्र स्थित्वा नरो याति विष्णुलोकमनुत्तमम् ॥६॥ कथ पृच्छामि वै कृष्णण येनेदकारितोऽस्म्यहम् । धृतराष्ट्र कथ पृच्छे यस्य पुत्रशत हतम् ॥१०॥ एव वैलव्यमापनो धर्मराजो युधिष्ठिर । रदन्तिपाण्डवा सर्वेभ्रातृशोकपरिप्लुता ॥ ये च तत्रमहात्मान समेता पाण्डचा स्मृता । धुन्तीचद्रौपदीचैव ये व तत्र समागता भूमौ निपतिता सर्वे रदन्तस्तु समन्तत ॥१२॥ धाराणस्या मार्कण्डेयस्तैन ज्ञातो युधिष्ठिर ! यथावैलव्यमापनोरमानस्तुदु खित ॥ अचिरेणैव कालेन मार्कण्डेयो महातपा । सप्राप्तो हास्तिनपुर राजद्वारे हातिष्ठत॥१४ द्वारपालोऽपि त दृष्ट्वा राज्ञ कथितवान् द्रुतम् । त्वा द्रएकामो मार्कण्डो हारि तिष्ठत्यसो मुनि । त्वरितो धर्मपुत्रस्तु द्वारमागादत परम् ॥१५॥ युधिष्ठिर उवाच । स्वागत ते महाभाग | स्वागत ते महामुने । अद्य मे सफल जन्म अद्य मे तारित कुलम् अद्य मे पितरस्तुष्टास्त्वयि द्रष्टे महामुने । अद्याद पूतदेहोऽस्मि यत्त्वया सहदर्शनम्॥१७ नन्दिकेश्वर उवाच। सिंहासनेसमास्याप्यपादशीवार्चनादिभि । युधिष्ठिरोमहात्मा घे पूजयामास तमुनिम् २४१ ऽध्यायः] * प्रयागमाहात्म्यवर्णनम् ॐ तत सतुष्टोमार्कण्डःपूजितचाहतनृपम् । आख्याहित्वरितराजन् ! किमर्थादितं त्वया । केनचा विक्लवीभूतः का बाधा ते किमप्रियम् ॥१॥ युधिष्ठिर उवाच । अस्माकं चैवयद्वत्तं राज्यस्याथै महामुने । एतत् सर्व विदित्वा तु चिन्तावशमुपागतः ॥ मार्कण्डेय उवाच । ऋणुराजन् ! महाबाहो ! क्षत्रधर्मव्यवस्थितम् । नैव दृष्टरणे पापंयुद्धमानस्य धीमतः ॥ किम्पुना राजधर्मेण क्षत्रियस्य विशेषतः । तदेवं हृदयं कृत्वा तस्मात्पापन चिन्तयेत् ॥ ततो युधिष्ठिरो राजा प्रणम्य शिरसामुनिम् । पप्रच्छविनयोपेत सर्वपातकनाशनम् ॥ युधिष्ठिर उवाच । पृच्छामित्वांमहाप्राज्ञ! नित्यंत्रैलोक्यदर्शिनम् । कथयत्वंसमासेनयेनमुच्येतकिल्विपात् मार्कण्डेय उचाच । 2णुराजन् ! महावाहो सर्वपातकनाशम् । प्रयागगमन श्रेष्ठं नराणांपुण्यकर्मणाम् ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे प्रयागमाहात्म्यवर्णनं नाम द्वयधिकशततमोऽध्यायः । त्र्यधिकशततमोऽध्यायः प्रयागमाहात्म्यवर्णनम् । युधिष्ठिर उवाच । भगवन् ! श्रोतुमिच्छामिपुराफरपेयथास्थितम् । ब्रह्मणादेवमुरयेनयथावत्कथितमुने ॥ कथं प्रयागे गमनं नराणां तत्र कीदृशम् । मृतानाकागतिस्तत्रस्नातानांतनकिम्फलम् ॥ ये घसन्ति प्रयागे तु ब्रूहि तेपा च किम्फलम् ॥२॥ मार्कण्डेय उवाच। कथयिष्यामितेवत्स! यच्वंतत्रयत्फलम् । पुराहिसर्यविप्राणांकय्यमानमयाभुतम् २४२ * मत्स्यपुराणम् * [त्र्यधिकशततमो आप्रयागप्रतिष्ठानादापुराद्वासुकेहदात् । कम्वलाश्वतरौ नागौ नागश्च बहुमूलकः ॥३॥ एतत्प्रजापतेः क्षेत्रं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥en तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्ते पुनर्भवा । ततो ब्रह्मादयो देवा रक्षां कुर्वन्ति सङ्गताः ॥५॥ अन्ये च बहवस्तीर्था सर्वपापहरा. शुभाः। न शक्या.कथितुंराजन् ! बहुवर्षशतैरपि । संक्षेपेण प्रवक्ष्यामि प्रयागस्य तु कीर्तनम् ॥६॥ पष्टिधनु सहस्राणि यानि रक्षन्ति जाह्नवीम् । यमुना रक्षति सदा सवितासातवाहनः । प्रयागं तु विशेपेण सदा रक्षति वासव. । मण्डलं रक्षति हरिवतैः सह संगतः ॥८॥ त घटं रक्षतिसदा शूलपाणिमहेश्वरः । स्थानं रक्षन्ति वै देवाः सर्वपापहरं शुभम् ॥६॥ अधर्मेणावृतो लोकेनैव गच्छति तत्पदम् । स्वल्पमल्पतरं पापं यदा ते स्यान्नराधिप । प्रयागं स्मरमाणस्य सर्वमायाति संक्षयम् ॥१०॥ दर्शनात्तस्य तीर्थस्य नाम सङ्कीर्तनादपि । मृत्तिका लम्भनाद्वापि नः पापात्प्रमुच्यते ॥ पञ्चकुण्डानि राजेन्द्र ! तेपा मध्ये तु जाह्नवी। प्रयागस्यप्रवेशेतुपापनश्यतितत्क्षणात् ॥ योजनाना सहस्रपु गगाया स्मरणान्नरः । अपि दुष्कृतकर्मा तु लभते परमांगतिम् ॥ कीर्तनान्मुच्यते पापाद् दृष्ट्वाभद्राणिपश्यति । अवगाहवपीत्वातुपुनात्यासप्तमङ्कुलम् ।। सत्यवादी जितकोधी अहिंसायाव्यवस्थित । धर्मानुसारीतत्वज्ञोगोब्राह्मणहितेरत ॥ गंगायमुनयोर्मध्येसातोमुच्येतकिल्यिपात् । मनसाचिन्तयन्कामानयानोतिपुष्कलान् ततो गत्या प्रयागं तु सर्वदेवाभिरक्षितम्। ब्रह्मचारी घसेन्मासं पितॄन्देवांश्चतर्पयेत् ।। ईप्सितान् लभते फामान् यर यनाभिजायते ॥१७॥ तपनस्य सुता देवी त्रिषु लोकेषु विश्रुता । समागता महाभागा यमुना तत्रनिम्रगा। तर सन्निहितो नित्यं साक्षाद्देवो महेश्वरः ॥१८॥ दुष्प्राप्यं मानुपै. पुण्य प्रयागन्तु युधिष्ठिर । देवदानवगन्धर्षा ऋपय सिद्धवारणा. ॥ तदुपस्पृश्य राजेन्द्र ! स्वर्गलोफमुपासते ॥ १६ ॥ इति श्रीमन्स्यपुराणे प्रयागमाहात्म्ये त्र्यधिकशततमोऽध्यायः।
चतुरधिकशततमोऽध्यायः प्रयागमाहात्म्यम् । मार्कण्डेय उवाच । शृणु राजन् ! प्रयागस्यमाहात्म्यंपुनरेव तु । यच्छु त्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यतेनात्रसंशयः आर्तानां हि दरिद्राणां निश्चितव्यवसायिनाम् । स्थानमुक्तं प्रयागन्तुनाख्येयन्तुकदाचन व्याधितो यदिवादीनो वृद्धोवापि भवेन्नरः । गङ्गायमुनयोर्मध्ये यस्तुप्राणान्परित्यजेत् दीप्तकाञ्चनवर्णाभैविमानैः सूर्य्यसन्निभैः । गन्धर्वाप्सरसां मध्ये स्वर्गे कीड़ति मानवः ईप्सितान् लभते कामान् धदन्ति ऋपिपुङ्गवाः ॥ ४॥ सर्वरत्नमयैर्दिव्यैर्नानाध्वजसमाकुलैः । घराङ्गनासमाकोणेर्मोदते शुभलक्षणैः ॥ ५ ॥ गीतवाद्यविनिर्घोपः प्रसुप्तः प्रतिबुध्यते । यावन्न स्मरते जन्म तावत् स्वर्गे महीयते ॥६ ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा दिवश्च्युत । हिरण्यरत्नसंपूर्ण समृद्धे जायते कुले। तदेव स्मरते तीर्थ स्मरणात्तत्र गच्छति ॥ ७॥ देशस्थोयदिवाऽरण्येविदेशस्थोऽथवागृहे । प्रयागंस्मरमाणोऽपियस्तुप्राणान्परित्यजेत् ब्रह्मलोकमवाप्नोति वदन्ति ऋपिपुङ्गवाः ॥ ८ ॥ सर्वकामफला वृक्षा मही यत्र हिरण्मयी। ऋषयो मुनयः सिद्धास्तत्र लोकेस गच्छति स्त्रीसहस्रावृते रम्ये मन्दाकिन्यास्तटे शुभे । मोदते ऋपिमि साद्धं सुकृतेनेह कर्मणा सिद्धचारणगन्धर्वैः पूज्यते दिवि देवत. । ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो जम्बूद्रीपपतिर्भवेत् ॥ ततः शुभानि कर्माणि चिन्तयानः पुनपुन । गुणवान् वित्तसम्पन्नो भवतीह नसंशयः कर्मणा मनसा चाचा धर्मसत्यप्रतिष्ठितः । गलायमुनयोर्मध्ये यस्तु गां सम्प्रयच्छति सुवर्णमणिमुकाश्च यदिवान्यत् परिग्रहम् । स्वकार्य पितृकार्य पा देवताभ्यर्चनेऽपि पा सफलं तस्य तत्तीयं यथावत् पुण्यमाप्नुयात् ॥ १४॥ एवं तीर्थे न गृह्णीयात् पुण्येवायतनेषु च । निमित्तेषु च सर्वेषु हाप्रमत्तो भवेद्विज ॥
२४४ * मत्स्यपुराणम् * [पञ्चाधिकशततमो कपिलांपाटलावर्णा यस्तुधेनुप्रयच्छति । स्थर्णनीं रौप्यखुरांकांस्यदोहापयस्विनरम् प्रयागे श्रोत्रियं सन्तं ग्राहयित्वा यथाविधि । शुक्लाम्बरधरं शान्तं धर्मशं घेदपारगम् ।। सा गौस्तस्मै प्रदातव्या गङ्गायमुनसङ्गमे । पासांसि च महार्हाणि रत्नानिविविधानिच याबद्रोमाणि तस्यागो. सन्तिगापु सत्तम! । ताचर्पसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते यत्राऽसी लभते जन्म सा गोस्तस्याभिजायते । नच पश्यति तं घोरंनरकं तेन कर्मणा उत्तरान् स कुरून् प्राप्य मोदते कालमक्षयम् ॥ २० ॥ गवां शतसहस्त्रेभ्योदद्यादेकापयस्विनीम् । पुत्रान् दारांस्तथाभृत्यान्गारेकाप्रतितारयेत् तस्मात् सर्वेषु दानेपु गोदानन्तु विशिष्यते । दुर्गमे विषमे घोरे महापातकसम्भवे ॥ गौरव रक्षा कुरते तस्माद्देया द्विजोत्तमे ॥ २२ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे प्रयागमाहात्म्यवर्णनं नाम चतुरधिकशततमोऽध्यायः । . पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः प्रयागमाहात्म्यम् । युधिष्ठिर उवाच। यथा यथा प्रयागस्य माहात्म्यं कथ्यते त्वया । तथा तथा प्रमुन्येऽहं सर्वपापैर्नसंशयः भगवन् ! केनविधिना गन्तव्यंधर्मनिश्चयै । प्रयागे योविधि. प्रोक्तस्तन्मे–हिमहामुने! मार्कण्डेय उवाच । कथयिष्यामि ते राजन् । तीर्थयानाविधिनमम् । आणविधिनानेन यथादृष्टयथाश्रुतम् प्रयागतीर्थयात्राथीं य प्रयाति नर चित् । वलीवर्दसमान्ढ शृणु तस्यापि यत्फलम् नरके घसते घोरे गया क्रोश हिदारणे । सलिलं न च गृह्णन्ति पितरस्तस्य देहिन ॥५॥ यम्तु पुत्रास्तथा यारान् मापयेत्पाययेत्तया । ययात्मना तथ सर्व दान विप्रेषु दापयेत् पेश्वर्यलोभमोहाढा गच्छेद्यानेन यो नरः । निष्फलं तस्य तत्स तस्माद्यान विवर्जयेत् ऽध्यायः] * प्रयागमाहात्म्यपर्णनम् * २४५ गङ्गायमुनयोर्मध्ये यस्तु कन्यां प्रयच्छति । आणेच विवाहेन यथाविभवसम्भवम् ॥८ नस पश्यति तं घोरं नरकं तेन कर्मणा । उत्तरान्सकुरून् गत्वा मोदते कालमक्षयम् पुत्रान्दारांश्च लभते धार्मिकान् रूपसंयुतान् ॥ ६ ॥ तत्र दानं प्रकर्त्तव्यं यथा विभवसम्भवम् । तेन तीर्थफलञ्चैव वर्धते नात्र संशयः ॥ स्वर्ग तिष्ठति राजेन्द्र ! यावदाभूतसंप्लवम् ॥ १० ॥ घटमूलं समासाद्य यस्तु प्राणान् विमुञ्चति । सर्वलोकानतिमम्य रङ्गलोकं स गच्छति तत्र ते द्वादशादित्यास्तपन्ति रुद्रसंश्रिताः । निर्दहन्ति जगत्सवं वटमूलं न दह्यते॥१२॥ नष्टचन्द्रार्कभुवनं यदा चैकार्णवं जगत् । स्थीयते तत्र चै विष्णुर्यजमानः पुनः पुनः ॥ देवदानवगन्धर्वा ऋषयः सिद्धचारणाः । सदा सेवन्ति तत्तीथं गङ्गायमुनसङ्गमम् ।१४ ततो गच्छेत राजेन्द्र ! प्रयागं संस्तुयंश्च यत् । यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयःसिद्धचारणाः , लोकपालाश्च साध्याश्च पितरो लोकसमताः । सनत्कुमारप्रमुखास्तथैव परमर्पयः ॥ अङ्गिर प्रमुखाश्चैव तथा ब्रह्मर्पयः परे । तथा नागाः सुपर्णाश्च सिद्धाश्चाधरास्तथा । सागरा. सरितः शैला नागा विद्याधराश्च ये। हरिश्च भगवानास्ते प्रजापतिपुर सरः । गङ्गायमुनमोर्मध्ये पृथिव्या जघनं स्मृतम् । प्रयागं राजशार्दूल! त्रिषु लोकेषु भारत ! श्रवणात्तस्य तीर्थस्य नामसंकीर्तनादपि । मृत्तिकालम्भनाद्वापि नरः पापात् प्रमुच्यते तत्राभिषेकं यः कुर्यात् सङ्गमे शंसितव्रतः । तुल्यं फलमवाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः ॥ न देववचनात्तात! न लोकवचनात्तथा। मतिरुत्नमणीया ते प्रयागगमनम्प्रति ॥२२॥ दशतीर्थसहस्राणि पष्टिकोट्यस्तथापराः । तेषां सान्निध्यमत्रैव ततस्तु कुरुनन्दन !॥२३ या गतियोंगयुक्तस्य सत्यस्थस्य मनीषिणः । सा गतिस्त्यजतः प्राणान् गङ्गायमुनसङ्गमे ॥ २४ ॥ नतेजीवन्तिलोकेऽस्मिन्तत्रतत्र युधिष्ठिर । ये प्रयागंन सम्प्राप्तास्त्रिपुलोकेषु वञ्चिताः ॥ + एवं दृष्ट्वा तु तत्तीर्थं प्रयागं परमम्पदम् । मुच्यते सर्वपापेभ्यो शशाङ्क इव राहुणा ॥ कम्बलाश्वतरो नागी विपुले यमुनातटे । तत्र स्नात्वाचपीत्वाच सर्वपापै प्रमुच्यते ॥ तत्र गत्वाच संस्थानं महादेवस्य धीमतः । नरस्तारयते सर्चान् दशपूर्वान् दशापरान ॥
* मत्स्यपुराणम् * [पञ्चाधिकशततमो कृत्वाभिषेकन्तु नर.सोऽश्वमेधफलं लभेत् । स्वर्गलोकमवाप्नोति यावदाभूतसंध्वम् ।। पूर्वपार्श्वे तु गङ्गायात्रिषु लोकेषु भारत । कूपञ्चैव तु सामुद्रं प्रतिष्ठानञ्च विश्रुतम् ॥ ब्रह्मवारी जितक्रोधस्त्रिरात्रंयदितिष्ठति । सर्वपापविशुद्धात्मा सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥ उत्तरैण प्रतिष्ठानात् भागीरथ्यास्तु पूर्वतः । हंसप्रपतनं नाम तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ।। अश्वमेधफलं तस्मिन् स्नानमात्रेण भारत । यावञ्चन्द्रश्च सूर्यश्च तावत्स्वर्गे महीयते ॥ उर्वशीरमणे पुण्ये चिपुले हंसपाण्डुरे । परित्यजतियःप्राणान्णुतस्यापियत् फलम् ॥ पष्टिवर्षसहस्राणि पष्टिवर्षशतानि च । सेव्यते पितृभिः साई स्वर्गलोके नराधिप!॥ उर्वशीन्तु सदा पश्येत् स्वर्गलोके नरोत्तम !। पूज्यतेसततं पुत्र! ऋषिगन्धर्व किन्नरैः ॥ तत.स्वर्गात् परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा दिवश्च्युतः । उर्वशीसदशीनान्तुकन्यानालभतेशतम्॥ मध्ये नारीसहस्राणां वहनाञ्च पतिर्भवेत् । दशनामसहस्राणां भोका भवति भूमिपः ॥ फाञ्चीनू पुरशब्देन सुप्तोऽसौ प्रतिबुद्ध्यते । भुत्वातुचिपुलान्भोगान् तत्तीर्थ भजतेपुनः शुक्लाम्बरधरो नित्यं नियतः संयतेन्द्रियः । एकं कालन्तु भुञ्जानोमासंभूमिपतिर्भवेत् ॥ सुवर्णालतानान्तु नारीणां लभते शतम् । पृथिव्यामासमुद्रायां महाभूमिपतिर्भवेत् ॥ धनधान्यसमायुक्तोदाताभवति नित्यशः । भुत्तचातुविपुलान्भोगान् तत्तीर्थलमतेपुनः॥ अथ सन्ध्यायटेरम्ये ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः । उपवासीशुचिः सन्ध्यांब्रह्मलोकमवाप्नुयात् फोटितीर्थ समासाद्य यस्तुप्राणान् परित्यजेत् । फोटिवर्षसहस्राणांस्वर्गलोके महीयते तत स्वर्गात्परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा दिवश्च्युतः । सुवर्णमणिमुक्तान्यकुले जायेत रूपवान ततो भोगवती गत्वा पासुकेरुत्तरेण तु । दशाश्वमेधिकं नाम तीथं तत्रापरं भवेत् ॥ प्रतामिपेकस्तु नरः सोऽश्यमेधफलं लभेत्। धनाढयोरूपवान्दक्षीदाताभवतिधार्मिकः चतुर्वेदेषु यत् पुण्यं यत् पुण्यं सत्यपादिषु । अहिंसायान्तुयोधर्मोगमनादेवतत् फलम्।। पुरक्षेनसमा गङ्गा यत्र यत्रावगाह्यते । कुरक्षेत्राद्दशगुणा यत्र विन्ध्येन सङ्गता ॥४६॥ यत्र गड्डा महाभागा यतीर्था तपोधना । सिद्धक्षेत्रहि तोयनात्र कार्याविचारणा ॥ क्षिती तारयते मानागांस्तारयतेऽप्यधः । दिवितारयतेदेवांस्तेन प्रिपथगा स्मृता । यापदम्धीनि गलायां तिष्ठन्ति हि शरीरिणः । तायर्पसहवाणिभ्यर्गलोके महीयते । १
२४७
ऽध्यायः
* प्रयागमाहात्म्यवर्णनम् *
तीर्थानान्तुपरं तीथं नदीनां तु महानदी । मोक्षदा सर्वभूतानांमहापातकिनामपि ॥५३॥
सर्वत्र सुलभा गङ्गा निपु स्थानेषु दुर्लभा ।
गङ्गाद्वारे प्रयाणे व गङ्गासागरसङ्गमे ।।
तत्र स्नात्या दिवं यान्ति ये मृतास्ते पुनर्मवाः ॥५४॥
सर्वेषामेव भूताना पापोपहतचेतसाम् । गतिमन्विष्यमाणाना नास्ति गङ्गासमागति ॥
पवित्राणा पवित्रञ्च मङ्गलानाञ्च मङ्गलम् । महेश्वरशिरोभ्रष्टा सर्वपापहरा शुभा ॥१६॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे प्रयागमाहात्म्ये पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ।
पड़धिकशततमोऽध्यायः
प्रयागमाहात्म्यम् ।
मार्कण्डेय उवाच ।
श्णु राजन् । प्रयागस्यमहात्म्यं पुनरेच तु । यच्छ त्यासर्वपापेभ्यो मुच्यतेनात्रसंशयः
मानसं नाम तत्तीर्थ गङ्गाया उत्तरे तटे । त्रिरात्रोपोपितो भूत्या सर्वकामानवाप्नुयात्
गोभूहिरण्यदानेन यत् फल प्राप्नुयानर । स तत् फलमवाप्नोति तत्तीर्थं स्मरते पुन ॥
अकामो पा सकामो वा गङ्गाया योऽभिपद्यते । मृतस्तु लभते स्वर्ग नरकञ्च न पश्यति
अप्सरोगणसीत सुतोऽसौ प्रतिबुभ्यते ।
हससारसयुक्तेन विमानेन स गच्छति ॥
बहुवर्षसहस्राणि स्वर्ग राजेन्द्र भुञ्जति ॥ ५॥
तत स्वर्गात् परिभ्रष्ट क्षीणकर्मा दियश्च्युत ! सुवर्णमणिमुक्ताट्य जायते विपुलेकुले
पटितीर्थसहस्राणि पटिकोट्यस्तथापगा 1 माघमासे गमिष्यन्ति गङ्गायमुनसङ्गमम् ।।
गया शतसहस्रस्य सम्यग् दत्तस्य यत् फलम् ।
प्रयागे माघमासे तु यह स्नानात्तु तत् फलम् ॥८॥
२४८ * मत्स्यपुराणम् [ सप्ताधिकशततमो गङ्गायमुनयोर्मध्येकर्षाग्निं यस्तु साधयेत् । अहीनाडो हरोगश्च पथेन्द्रियसमन्धितः । यावन्ति रोमकूपाणि तस्य गात्रेषु देहिनः । तावद्वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते ॥ ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो जम्बूद्वीपपतिर्भवेत् । सभुक्तवाविपुलान् भोगांस्तत्तीर्थस्मरतेपुनः जलप्रवेशं यः कुर्यात् सङ्गमे लोकविश्रुते । राहुनस्ते तथा सोमे विमुक्तः सर्वकिल्विषैः सोमलोकमवाप्नोति सोमेन सह मोदते । पष्टिवर्पसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते ॥१३॥ स्वर्गे च शकलोकेऽस्मिन् ऋषिगन्धर्वसेविते । परिभ्रष्टस्तु राजेन्द्र ! समृद्धे जायते कुले ॥१४॥ अधःशिरस्तु यो ज्वालामूर्ध्वपादः पिवेन्नरः । शतवर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते परिभ्रएस्तु राजेन्द्र ! सोऽग्निहोत्रीभवेन्नरः । भुत्वातुविपुलान्भोगान् तत्तीर्थभजतेपुनः यः स्वदेहन्तुकर्तित्वाशकुनिभ्य.प्रयच्छति । विहगैल्पभुक्तस्य शृणु तस्यापियत् फलम् शतं वर्षसहस्राणां सोमलोके महीयते । तस्मादपि परिभ्रष्टो राजा भवति धार्मिकः ॥ गुणवान् रूपसम्पन्नो विद्वांश्च प्रियवाचकः। भुक्त्वा तु विपुलान् भोगांस्तत्तीर्थं भजते पुनः ॥ १६ ॥ यामुने चोत्तरेकले प्रयागस्य तु दक्षिणे । ऋणप्रमोचनं नाम तत्तीथं परमं स्मृतम् ।। एकरात्रोपितः स्नात्वा ऋण. सर्वैः प्रमुच्यते । स्वर्गलोकमवाप्नोति अनृणश्च सदाभवेत् इति श्रीमत्स्यपुराणे प्रयागमाहात्म्ये ऋणप्रमोचनतीर्थवर्णनं नाम पदधिकशततमोऽध्यायः । सप्ताधिकशततमोऽध्यायः प्रयागमाहात्म्यम् । युधिष्ठिर उवाच। एतच्छ्र त्या प्रयागस्य यत्त्वया परिकीर्तितम् । विशुद्धं मेऽद्य हृदयंप्रयागस्यतु कीर्तनात् अनाशकफलं ब्रू हि भगवंस्तत्र कीदृशम् । यञ्च लोकमवाप्नोतिविशुद्धः सर्वकिल्बिर्षः २४६ ऽध्यायः] * प्रयागमाहात्म्यम् * मार्कण्डेय उवाच । शृणु राजन् ! प्रयागेतुअनाशकफलंविभो। प्राप्नोतिपुरुषोधीमानश्रद्धधानो जितेन्द्रियः अहीनाङ्गोऽप्यरोगश्च पञ्चेन्द्रियसमन्वितः । अश्वमेधफलंतस्य गच्छतस्तु पदे पदे ॥ कुलानि तारयेद्राजन् ! दशपूर्वान् दशापरान् । मुच्यते सर्वपापेभ्यो गच्छेत्तुपरमपदम् ॥ युधिष्ठिर उवाच । महाभाग्यहि धर्मस्य यत्त्वं वदसि मे प्रभो! अल्पेनैव प्रयत्न न बहन्धर्मानवाप्नुते ॥ अश्वमेधैस्तुबहुभिः प्राप्यते सुव्रतैरिह । इममे संशयं छिन्धिपरं कौतृहलं हि मे ॥७॥ मार्कण्डेय उवाच ] शृणुराजन् ! महावीर ! यदुक्तं ब्रह्मयोनिना ! ऋषीणां सन्निधौ पूर्वकथ्यमानमयाश्रुतम् पञ्चयोजनविस्तीर्ण प्रयागस्य तु मण्डलम् । प्रविष्टमावतभूमावश्यमेधः पदे पदे ॥६॥ व्यतीतान् पुरुषान् सप्त भविष्यांश्च चतुर्दश । नरस्तारयते सर्वान् यस्तु प्राणान् परित्यजेत् ॥ १० ॥ एवं ज्ञात्वा तु राजेन्द्र ! सदा सेवापरो भवेत् । अथ्रद्दधाना: पुरुषाः पापोऽपहतचेतसः न प्राप्नुवन्ति तत्स्थानं प्रयागं देवरक्षितम् ॥ ११ ॥ युधिष्ठिर उवाच । स्नेहाद्वा द्रव्यलोभावा ये तु कामवशङ्गताः । कथं तीर्थफलं तेषां कथं पुण्यफलं भवेत् विक्रयः सर्वमाण्डाना कार्याकार्यमजानतः । प्रयागेकागतिस्तस्यतन्मे ब्रूहि पितामह ! मार्कण्डेय उवाच। 2णुराजन् ! महागुह्य सर्वपापप्रणाशनम् । मासमेकन्तु यः मायात् प्रयागे नियतेन्द्रियः ॥ मुच्यते सर्वपापेभ्यः स गच्छेत् परमं पदम् ॥ १४॥ - विश्रम्मघातकानान्तु प्रयागे शृणु यत् फलम् । त्रिकालमेवनायीत आहारंभेक्ष्यमाचरेत् त्रिभिर्मासैः समुच्येत प्रयागे तु न संशयः ॥१५॥ अज्ञानेन तु यस्येह तीर्थयात्रादिकं भवेत् । सर्वक्रामसमृद्धे तु स्वर्गलोके महीयते ।
* मत्स्यपुराणम् *
[सप्ताधिकशततमो
स्थानञ्च लभते नित्यं धनधान्यसमाकुलम् ॥ १६ ॥
एवं ज्ञानेन संपूर्णः सदा भवति भोगवान् । तारिताः पितरस्तेन नरकात् प्रपितामहाः
धर्मानुसारितत्वज्ञ! पृच्छतस्ते पुनःपुनः । त्वप्रियार्थसमाख्यातं गुह्यमेतत् सनातनम्
युधिष्ठिर उवाच।
भद्यमे सफलं जन्म अद्यमे तारितं कुलम् । प्रीतोऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि दर्शनादेवतेमुने !
त्वद्दर्शनात्तु धर्मात्मन् ! मुक्तोहऽञ्चाद्य किल्विपात् ।
इदानी वेद्मि चात्मानं भगवन् ! गतकल्मपम् ॥ २० ॥
मार्कण्डेय उवाव।
दिष्ट्या ते सफलं जन्म दिष्ट्या ते तारितं कुलम् ।
कीर्तनाद्वर्धते पुण्यं श्रुतात्पापप्रणाशनम् ॥ २१ ॥
युधिष्टिर उचाव ।
यमुनायान्तु किं पुण्यं किं फलन्तु महामुने !। एतन्मेसर्वमारयाहियथादृष्टयथाश्रुतम् ॥
मार्कण्डेय उवाच ।
सपनस्य सुतादेवी त्रिपुलोकेषु विश्रुता । समाख्याता महाभागा यमुना तन निम्नगा।।
येनेच निःसृता गङ्गा तेनैव यमुनागता । योजनानां सहस्त्रेषु कीर्तनात् पापनाशिनी ॥
तत्र मात्वा च पीत्वा च यमुनायां युधिष्ठिर!।
कीर्तनालभते पुण्यं दृष्ट्वा भद्राणि पश्यति ॥ २५ ॥
अवगाहाचपीत्वाच पुनात्यासप्तमंकुलम्। प्राणांस्त्यजतियस्तत्र स यातिपरमाङ्गतिम् ॥
अग्नितीर्थमितिण्यातं यमुनादक्षिणे तटे । पश्चिमे धर्मराजस्य तीर्थन्तु नरकं स्मृतम् ॥
तर स्मात्या दिवंयान्ति ये मृतास्ते पुनर्भया. । एवं तीर्थसहस्राणि यमुनादक्षिणे तटे ॥
उत्तरेण प्रवक्ष्यामि आदित्यस्य महात्मनः । तीयं निरञ्जनं नाम यत्र देवाः सवासाः।।
उपासतेस्म सन्ध्यां ये निकालं हि युधिष्ठिर! देवा.सेवन्तितत्तीर्थयेचान्ये विबुधाजनाः
श्रद्दधानपरो भूत्या कुरु तीर्थाभिपेचनम् । अन्ये च यहयस्तीर्थाःसर्वपापहराः स्मृता.॥
तेषु स्नात्या दिवं यान्ति ये मृतास्ते पुनर्भवाः ॥ ३१ ॥
ऽध्याय ] *प्रयागमाहात्म्यम् * २५१ गङ्गा च यमुना चैध उभे तुल्यफले स्मृते। केवल ज्येष्ठभायेन गङ्गा सर्वत्र पूज्यते ॥ एव कुरुप्प कौन्तेय । सर्वतीर्थाभिपेचनम् । यावजीवरत पाप तत्क्षणादेव नश्यति ॥ यरित्यम कल्प(ल्य)उत्थायपटतेचशृणोतिय । मुच्यतेसर्वपापेभ्य स्वर्गलोक सगच्छति इति श्रीमत्स्यपुराणे प्रयागमाहात्म्ये सताधिकशततमोऽध्याय । अष्टोत्तरशततमोऽध्यायः प्रयागमाहात्म्यम् । मार्कण्डेय उवाच । ' श्रुत मे ब्रह्मणा प्रोक्त पुराणेब्रह्मसम्भवे । तीर्थानान्तु सहस्राणि शतानि नियुतानि च ॥ सर्वे पुण्या पवित्राश्च गतिश्च परमा स्मृता ॥ १॥ सोमतीथं महापुण्य महापातकनाशनम् । स्नानमात्रेण राजेन्द्र ' पुरुपास्तारयेच्छतान् । तस्मात् सर्वप्रयत्नेन तत्र स्नान समाचरेत् ॥२॥ युधिष्ठिर उवाच । पृथिव्या नैमिष पुण्यमन्तरीक्षेच पुष्करम् । नयाणामपि लोकाना कुरक्षेत्र विशिष्यते सर्वाणि तानि सन्त्यज्य कथमेक प्रशससि । अप्रमाणन्तु तत्रोक्तमश्रद्धेयमनुत्तमम् गतिञ्च परमा दिव्या भोगाश्चैव यथेप्सितान् । किमर्थमल्पेयोगेन वह धम प्रशससि ॥ एतन्मे सशय ब्रूहि यथादृण् यथाश्रुतम् ॥ ५॥ मार्कण्डेय उवाच। अध्रद्धेय न पचव्य प्रत्यक्षमपियद् भवेत् । नरस्यानद्दयानस्य पापोपहतचेतस ॥ ६ ॥ अश्रद्दधानोमशुचिर्दुर्मतिस्त्यक्तमङ्गल । एते पातकिन सर्वे तेनेद भापित त्वया ॥७॥ शृणु प्रयागमाहात्म्य यथादृष्ट यथाश्रुतम् । प्रत्यक्ष परोक्षश्च यथान्यस्त भविष्यति॥ योवान्यदद्रुष्टञ्च यथादृष्ट यथानुतम् । शास्त्र प्रमाण कृत्वा च युज्यते योगमात्मन ।
२५२ * मत्स्यपुराणम् * [अष्टोत्तरशततमो क्लिश्यते चापरस्तत्र नैव योगमवाप्नुयात् । जन्मान्तरसहस्रेभ्यो योगो लभ्येत मानवैः।। यथा योगसहस्त्रेण योगो लभ्येत मानवैः । यस्तुसर्वाणि रत्नानि ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति तेन दानेन दत्तेन योगं नाभ्येति मानवः । प्रयागे तु मृतस्येदं सर्वं भवति नान्यथा॥१२ प्रधानहेतुं वक्ष्यामि श्रद्दधत्स्व च भारत ! यथा सर्वेषु भूतेषु ब्रह्म सर्वत्र दृश्यते ॥ ब्रह्माणे धास्ति यत् किञ्चिदब्राह्ममितियोच्यते । एवं सर्वेषु भूतेषु ब्रह्म सर्वत्र पूज्यते॥ यथा सर्वेषु लोकेपु प्रयागं पूजयेद्बुधः । पूज्यते तीर्थराजस्तु सत्यमेव युधिष्ठिर ! ॥ ब्रह्मापि स्मरते नित्यं प्रयागं तीर्थमुत्तमम् । तीर्थराजमनुप्राप्य न चान्यत् किञ्चिदर्हति कोहि देवत्वमासाद्य मनुष्यत्वं चिकीर्षति । अनेनैवोपमानेन त्वं ज्ञास्यसि युधिष्ठिर यथा पुण्यतमं चास्ति तथैव कधितं मया ॥ १७ ॥ युधिष्ठिर उवाच । श्रुतं चेदंत्वयाप्रोक्तं चिस्मितोऽहंपुनः पुनः। कथं योगेन तत्प्राप्तिः स्वर्गवासस्तुकर्मणा दाता चै लभते भोगान् गां च यत्कर्मणः फलम् । तानि फर्माणि पृच्छामि पुनस्तैः प्राप्यते मही ॥ १६ ॥ मार्कण्डेय उवाच । शृणु राजन्महायाहो! यथोक्तकरणं महीम् । गामनि ब्राह्मणंशानं काञ्चनं सलिलंत्रियः मातरं पितरश्चय ये निन्दन्ति नराधमाः । न तेषामूदुर्ध्वगमनमिदमाह प्रजापतिः ॥२१॥ एवं योगस्य सम्प्राप्तिस्थानं परमदुर्लभम् । गच्छन्ति नरकं घोरं ये नराः पापकर्मिणः हस्त्यश्यगामनयाहं मणिमुक्तादिकाञ्चनम् । परोक्षं हरते यस्तु यध दानं प्रयच्छति ।। न ते गच्छन्ति चै स्वर्ग दातारो यत्र भोगिनः । अनेकफर्मणा युक्ताः पन्यन्ते नरकेपुनः एवं योगचधर्मश्च दाताचयुधिष्ठिर !! यथा सत्यमसत्यंया अस्ति नास्तीतियत्फलम् निरुतन्तु प्रवक्ष्यामि यथाह स्वयमंशुमान् ॥ २५ ॥ इति श्रीमन्स्यपुगणे प्रयागमाहात्म्येऽष्टोत्तमानतमोध्यायः ।
नवोत्तरशततमोऽध्यायः प्रयागमाहात्म्यम् । मार्कण्डेय उवाच। शृणु राजन् ! प्रयागस्य महात्म्यं पुनरेव तु । नैमिषं पुष्करचैव गोतीर्थ सिन्धुसागरम् गया च चैत्रकं चैव गङ्गासागरमेव च । एते चान्ये च बहवोये च पुण्याः शिलोच्चयाः देशातीर्थसहस्राणि त्रिंशत्कोट्यस्तथापरा. । प्रयागेसंस्थिता नित्यमेवमाहुर्मनीषिणः ।। त्रीणि चाप्यग्निकुण्डानि येषांमध्ये तुजाह्नवी । प्रयागादभिनिष्क्रान्ता सर्वतीर्थनमस्टता तपनस्य सुता देवी त्रिपु लोकेषु विश्रुता । यमुना गङ्गया सार्द्ध सङ्गता लोकभाविनी । गङ्गम्यमुनयोमध्ये पृथिव्याजधनं स्मृतम् । प्रयागराजशार्दूल! कलां नाईन्तियोडशीम् तिनः फोट्योऽर्द्धकोटिश्च तीर्थानां घायुरब्रवीत् । दिवि भुत्यन्तरिक्षे व तत्सर्वं जाह्नवी स्मृता ॥ ७ ॥ प्रयागं समधिष्ठानं कम्बलाश्वतरायुभी । भोगवत्यथ या चैपा चेदिरेपा प्रजापतेः 1८॥ तत्र वेदाश्च यज्ञाश्च मूर्तिमन्तो युधिष्टिर'। प्रजापतिमुपासन्ते अपयञ्च तपोधनाः ॥E यजन्ते क्रतुभिर्दयास्तथा चक्रधरा नृपाः । तत पुण्यतम नास्ति त्रिषु लोकेषु भारत ।। प्रभावात् सर्वतीर्थेभ्य' प्रभवत्यधिकं विभो!। दशतीर्थसहस्राणि तिस्त्र. फोट्यस्तथा पराः ॥ ११ ॥ यत्र गङ्गा महाभागा स देशस्तत्तपोधनम् । सिद्धक्षेत्रञ्च विशेयं गङ्गातीरसमन्वितम् ॥ इदं सत्यं विजानीयात् साधूनामात्मनश्च वै । मुहृदश्च जपेत् कर्णे शिष्यस्यानुगतस्यच इदं धन्यमिदं स्वार्थमिदं सत्यमिदं सुखम् । इदं पुण्यमिदं धयं पावनं धर्ममुत्तमम् ॥ महीणामिदं गुहां सर्वपापप्रणाशनम् । अधीत्यच द्विजोऽप्येतन्निर्मलः स्वर्गमाप्नुयात् य इदं शृणुयानित्यं तीर्थ पुण्यं सदा शुवि । जातिस्मरत्वं लभते नाकपृष्ठेच मोदते ॥ प्राप्यन्ते तानि तीयांनि सद्भिः शिष्टानुदर्शिभिः ।
* मत्स्यपुराणम् * [ दशोत्तरशततमो स्नाहि तीर्थेषु कौरव्य ! न च धक्रमतिर्भवेत् ॥ १७ ॥ त्वयाच सम्यक् पृष्टेन कथितं वै मया विभो!। पितरस्तारिता:सर्वे तथैवच पितामहाः प्रयागस्य तु सर्वे ते कलां नाईन्ति पोडशीम् ॥१८॥ एवं ज्ञानञ्च योगञ्च तीर्थं चैव युधिष्ठिर !! बहुक्लेशेन युज्यन्ते तेन यान्ति पराङ्गतिम् । त्रिकालं जायते ज्ञानं स्वर्गलोकं गमिष्यति ॥ १६ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे प्रयागमाहात्म्ये नवोत्तरशततमोऽध्यायः । दशोत्तरशततमोऽध्यायः प्रयागमाहात्म्यम् । युधिष्ठिर उवाच । कथं सर्वमिदं प्रोक्तं प्रयागस्य महामुने!। एतन्नः सर्वमाख्याहि यथा हि मम तारयेत् मार्कण्डेय उवाच। शृणुराजन् । प्रयागेतु प्रोक्तं सर्वमिदं जपेत् । ब्रह्मा विष्णुस्तथेशानो देवता प्रभुरव्ययः ब्रह्मा सृजतिभूतानि स्थावरं जङ्गमञ्च यत् । तान्येतानि परंलोके विष्णु, सम्वर्द्धतेप्रजा. कल्पान्ते तत्समग्र हि रुद्र संहरते जगत् । तदा प्रयागतीर्थश्च न कदाचिद्विनश्यति ॥४ ईश्वरः सर्वभूतानां यः पश्यति स पश्यति ! यत्नेनानेन तिष्ठन्तिते यान्ति परमाङ्गतिम् ॥ युधिष्ठिर उवाच। आरयाहि मे यथातथ्यं यथैपातिष्ठति श्रुतिः । फेनवा कारणेनैव तिष्ठन्ते लोकसत्तमाः मार्कण्डेय उवाच। प्रयागे निघसन्ते ते ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः। कारणं तत्प्रवक्ष्यामि शृणु तत्वं युधिष्ठिर! पञ्चयोजनविस्तीर्ण प्रयागस्य तु मण्डलम् । तिष्ठन्ति रक्षणायात्र पापकर्मनिवारणात् उत्तरेण प्रतिष्ठानाच्छमना ब्रह्म तिष्ठति । वेणीमाधवरूपी तु भगवांस्तन तिष्ठति ।।
ऽध्यायः] * प्रयागमाहात्म्यम् * २५५ माहेश्वरो वटो भूत्वा तिष्ठते परमेश्वरः । ततो देवाः सगन्धर्चाः सिद्धाश्च परमर्पयः । रक्षन्ति मण्डलं नित्यं पापकर्मनिवारणात् ॥ १० ॥ यस्मिन् जुन स्वकं पापं नरकच न पश्यति । एवं ब्रह्माच विष्णुश्च प्रयागे समहेश्वरः सप्तद्वीपाः समुद्राश्च पर्वताश्च महीतले । रक्षमाणाश्च तिष्ठन्ति यावदाभूतसंप्लवम् ॥१२ येचान्ये यहवः सर्वे तिष्ठन्ति युधिष्ठिर! पृथिवी तत्समाश्रित्यनिर्मिता दैवतैत्रिभिः प्रजापतेरिन्द्र(द)क्षेत्रं प्रयागमिति विश्रुतम् । एतत् पुण्यं पवित्रं वै प्रयागञ्च युधिष्ठिर! स्वराज्यं कुरु राजेन्द्र ! भ्रातृभिः सहितोऽनय ! ॥ १४ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे प्रयागमाहात्म्ये दशोत्तरशततमोऽध्यायः । एकादशोत्तरशततमोऽध्यायः प्रयागमाहात्म्यम् । नन्दिकेश्वर उवाच। भ्रातृभिः सहितः सर्वे द्रौपद्या सह भार्यया । ब्राह्मणेभ्यो नमस्कृत्य गुरुन् देवानतर्ययत् धासुदेवोऽपितचक्षणेनाभ्यागतस्तदा । पाण्डवैः सहितः सर्वे(वः)पूज्यमानस्तुमाधयः कृष्णेन सहितः सः पुनरेव महात्मभिः । मभिषिक्त स्वराज्येच धर्मपुत्री युधिष्ठिरः एतस्मिन्नन्तरेचैव मार्कण्डेयोमहामुनिः। ततः स्वस्तीति चोच्यातु क्षणादाश्रममागमत् युधिष्ठिरोऽपि धर्मात्मा भ्रातृभिः सहितोऽवसत् । महादानं ततो दत्त्वा धर्मपुत्रो महामनाः ॥ ५॥ यस्त्विदं फल्प(ल्योउत्थाय माहात्म्यंपडतेनरः । प्रयागंस्मरते नित्यं स याति परमंपदामू मुच्यते सर्वपापेभ्यो दलोकं स गच्छति ॥ ६॥ घासुदेव उवाच। मम पाक्यश्च फव्यं महाराज! अधीम्यहम् । नित्यं जपस्य जुहस्य प्रयागे विगतचर * मत्स्यपुराणम् * [एकादशोत्तरशततमो प्रयागं स्मर वै नित्यं सहास्माभियुधिष्ठिर! स्वयं प्राप्स्यसि राजेन्द्र! स्वर्गलोकं न संशयः ॥ ८॥ प्रयागमनुगच्छेद्वा घसते वापि यो नरः । सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोकं स गच्छति ॥ प्रतिग्रहादुपावृत्तः सन्तुष्टो नियतः शुचिः । अहङ्कारनिवृत्तश्च स तीर्थफलमश्नुते ॥१०॥ अकोपनश्च सत्यश्च सत्यवादी दृढ़वतः । आत्मोपमश्च भूतेषु स तीर्थफलमभुते ॥११॥ ऋपिभिः क्रतवः प्रोक्ता देवश्चापि यथाक्रमम् न हि शक्त्या दरिद्रेण यज्ञाः प्राप्तुं महीयते ॥ १२॥ यहपकरणा यज्ञा नानासम्भारविस्तराः । प्राप्यन्ते पार्थिवैरेतैः समृद्ध; नरैः कचित् ।। यो दरिदैरपि विधिः शक्यः प्राप्तुं नरेश्वर ! तुल्यो यशफलैः पुण्यस्तन्निवोधयुधिष्ठिर ऋपीणां परमं गुह्यमिदं भरतसत्तम । तीर्थानुगमनं पुण्यं यशेम्योऽपि विशिष्यते ॥१५ दशतीर्थसहस्राणि तिस्रः कोट्यस्तथापगाः । माघमासे गमिष्यन्ति गङ्गायां भरतर्षभ। स्वस्थो भव महाराज! मुंश्व राज्यमकण्टकम् । पुनर्दक्ष्यसि राजेन्द्र ! यजमानो विशेषतः ॥ १७ ॥ नन्दिकेश्वर उवाच । । इत्युक्त्वा स महाभागो मार्कण्डेयो महातपाः । युधिष्ठिरस्य नृपतेस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ततस्तत्र समाप्लाव्य गात्राणि सगणो नृपः । यथोक्तनाथ विधिनापरां निर्वृतिमागमत् 'तथा त्यमपि देव ! प्रयागाभिमुखोभव । अभिषेकन्तु कृत्वाद्य कृतकृत्यो भविष्यसि सूत उवाच। एयमुत्त्वाऽथ नन्दीशस्तत्रैवान्तरधीयत । नारदोऽपि जगामाशु प्रयागाभिमुपस्तदा ॥ तत्र स्नात्वा च जप्त्वाच विधिदृष्टेन फर्मणा । दानन्दत्त्वा द्विजाग्यभ्यो गतः स्यभवनं तदा ॥ २२ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे प्रयागमाहात्म्यसमाप्तिपर्णनं नामफादशोत्तयाततमोऽध्यायः ।
: . द्वादशोत्तरशततमोऽध्यायः द्वीपसमुद्रपर्वतानां वर्णनम् । ऋपय ऊचुः। कति द्वीपाः समुद्रावापर्वतावा कतिप्रभो ! कियन्तिचैव घर्षाणितेषु नद्यश्चकाःस्मृताः महाभूमिप्रमाणञ्च लोकालोकस्तथैव च । पर्याप्ति परिमाणञ्च गतिश्चन्द्रार्कयोस्तथा।। एतद् ब्रवीहिनःसर्व विस्तरेण यथार्थयित् । त्वदुक्तमेतत् सकलं श्रोतुमिच्छामहे घयम् सूत उवाच। द्वीपभेदसहस्राणि सप्तवान्तर्गतानिच । न शययन्ते क्रमेणेह वक्तुंच सकलं जगत् ॥४॥ सप्तैच तु प्रवक्ष्यामि चन्द्रादित्यग्रहैः सह । तेषां मनुष्यतर्केण प्रमाणानि प्रचक्षते ॥५॥ अचिन्त्याः पलु ये भावास्तांस्तु तर्केण साधयेत् । प्रतिभ्यः परं यच्च तदचिन्त्यस्य लक्षणम् ॥६॥ सप्तधर्षाणि पक्ष्यामि जम्बूद्वीपं यथाविधम् । चिस्तरं मण्डलं यच्च योजनैस्तंनियोधत योजनानां सहस्राणि शतं द्वीपस्य विस्तः । नानाजनपदाकीणं पुरश्च विवधैः शुभैः ।। सिद्धचारणसंकीणं पर्वतरपशोभितम् । सर्वधातुपिनद्धस्तैः शिलाजालसमुद्गतः ॥६॥ पर्वतप्रसपामिश्च नदीमिस्तु समन्ततः । प्रागायता महापाः पटिमे घर्षपर्वताः ॥१०. अवगाध स्वभयतः समुद्री पूर्वपश्चिमी । हिमप्रायश्च हिमवान् हेमकूटश्च हेमवान् ॥११॥ चातुर्वर्ण्यस्नु सौपर्णमिरुधोल्पमयःस्मृतः । चतुर्विंशत्सहस्राणि विस्तीर्णधचतुर्दिशम् वृत्तारतिप्रमाणश्च चतुरनः समाहितः । नानापर्णः समः पार्श्वः प्रजापतिगुणान्वितः नाभिवन्धनसम्भूतो ब्रह्मणो व्यक्तजन्मनः । पर्वतः श्वेतवर्णस्तु ब्राह्मण्यं तस्य तेन थे। पीतच दक्षिणेनासो तेन पैश्यत्यमिप्यते । भृङ्गिपत्रनिमश्चय पश्चिमेन समन्धितः ॥ तेनास्य वृदता सिद्धा मेरोनामार्थफर्मतः ॥ १५ ॥ पार्श्वमुत्तरतस्तस्य रकपणं स्वमायतः । तेनास्य क्षत्रमावः स्यादितियाः प्रकीर्तिताः १२५६ * मत्स्यपुराणम् * [एकादशोत्तरशततमो प्रयागं स्मर वे नित्यं सहास्माभिर्युधिष्ठिर ! स्वयं प्राप्स्यसि राजेन्द्र! स्वर्गलोकं न संशयः ॥८॥ प्रयागमनुगच्छेद्वा वसते चापि यो नरः । सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोकं स गच्छति ॥ प्रतिग्रहादुपावृत्तः सन्तुष्टो नियतः शुचिः । अहङ्कारनिवृत्तश्च स तीर्थफलमश्नुते ॥१०॥ अकोपनश्च सत्यश्च सत्यवादी व्रतः । आत्मोपमश्च भूतेषु स तीर्थफलमभुते ॥११॥ ऋषिभिः क्रतवः प्रोक्ता देवैश्चापि यथाक्रमम् न हि शक्त्या दरिद्रण यज्ञाः प्राप्तुं महीयते ॥ १२ ॥ यहपकरणा यज्ञा नानासम्भारविस्तराः । प्राप्यन्ते पार्थिवैरतैः समृद्ध; नरैः क्वचित् ॥ यो दरिदैरपि विधिः शक्यः प्राप्तुं नरेश्वर !! तुल्यो यज्ञफलैः पुण्यत्तन्निवोधयुधिष्ठिर ऋषीणां परमं गुह्यमिदं भरतसत्तम !! तीर्थानुगमनं पुण्यं यज्ञेम्योऽपि विशिष्यते ॥१५ दशतीर्थसहस्राणि तिस्रः कोट्यत्तथापगाः । माघमासे गमिष्यन्ति गङ्गायां भरतर्षभ। स्वस्थो भव महाराज ! भुंक्ष्य राज्यमकण्टकम् । पुनर्द्वक्ष्यसि राजेन्द्र ! यजमानो विशेषतः ॥ १७ ॥ नन्दिकेश्वर उपाय। , इत्युत्त्वा स महाभागो मार्कण्डेयो महातपाः । युधिष्ठिरस्य नृपतेस्तत्रैवान्तरधीयत । ततस्तत्र समाप्लाव्य गात्राणि सगणो नृपः । यथोक्तनाथ विधिनापरां निवृतिमागमत् 'तथा त्वमपि देव ! प्रयागाभिमुखोभव । अभिषेकन्तु कृत्वाद्य कृतकृत्यो भविष्यसि सूत उवाच। एघमुत्त्वाऽथ नन्दीशस्तत्रैवान्तरधीयत । नारदोऽपि जगामाशु प्रयागाभिमुरास्तदा ॥ तत्र स्नात्वा च जप्त्वाच विधिदृष्टेन कर्मणा । दानन्दत्त्वा द्विजाग्यभ्यो गतः स्वभवनं तदा ॥ २२ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे प्रयागमाहात्म्यसमाप्तिवर्णनं नामकादशोत्तरशततमोऽध्यायः । .
द्वादशोत्तरशततमोऽध्यायः द्वीपसमुद्रपर्वतानां वर्णनम् । ऋपय ऊचुः। कति द्वीपाः समुद्रावापर्वताया कतिप्रभो !! कियन्तिचैव धर्माणितेषु नद्यश्चकाःस्मृताः महाभूमिप्रमाणञ्च लोकालोकस्तथैव च । पर्याप्ति परिमाणच गतिश्चन्द्रार्कयोस्तथा।। एतद् व्रचीहिनःसर्व विस्तरेण यथार्थवित् । त्वदुक्तमेतत् सकलं श्रोतुमिच्छामहे घयम् सूत उवाच। द्वीपमेदसहस्राणि सप्तचान्तर्गतानिच ! न शक्यन्ते क्रमेणेह वक्तुंच सकलं जगत् ॥ell सप्तव तु प्रवक्ष्यामि चन्द्रादित्यग्रहः सह । तेषां मनुष्यतर्कण प्रमाणानि प्रचक्षते ॥५॥ अचिन्त्याः सलु ये भावास्तांस्तु तर्केण साधयेत् । प्रतिभ्यः परं यच्च तदचिन्त्यस्य लक्षणम् ॥६॥ सप्तवर्षाणि पक्ष्यामि जम्बूद्वीपं यथाविधम् । विस्तरं मण्डलं यच्च योजनस्तंनियोधत योजनानां सहस्राणि शतं द्वीपस्य विस्तरः । नानाजनपदाीणं पुरैश्च विवधैः शुभैः ॥ . सिद्धचारणसंकीणं पर्वतरुपशोभितम् । सर्वधातुपिनस्तैः शिलाजालसमुद्गतः ॥६॥ पर्वतप्रसयाभिश्च नदीभिस्तु समन्ततः । प्रागायता महापााः पडिमे पर्षपर्वताः ॥१०. अवगाहा ह्यमयतः समुद्री पूर्वपश्चिमी । हिमप्रायश्च हिमवान् हेमकूटश्च हेमघान् ॥२१॥ चातुर्वर्ण्यस्तु सौयामेरुयोल्यमय स्मृतः । चतुर्विशन्सहम्नाणि विस्तीर्णश्चचतुर्दिशम् वृत्तारतिप्रमाणध चतुरस्रः समाहितः । नानावर्णः समः पाश्चः प्रजापतिगुणान्वितः माभियन्धनसम्भूतो ब्रह्मणो व्यक्तजन्मनः । पर्यतः श्वेतवर्णस्तु ब्राह्मण्यं तम्य तेन थे। पीतच दक्षिणेनासौ तेन पैश्यत्यमिप्यते । भृङ्गिपरनिमश्चैव पश्चिमेन समन्धितः ।। तेनास्य दता सिद्धा मेरोनामार्थकर्मतः ॥ १५ ॥ पारमुत्तरतस्तस्य रकवणं स्वभावतः । तेनास्य क्षग्रभावः स्यादितिवर्णाः प्रकीर्तिताः
२५८
* मत्स्यपुराणम् * [द्वादशोत्तरशतमो
नलश्च वैदूर्यमयः श्वेतः पीतो हिरण्मयः । मयूरवर्हवर्णश्च शातकोम्भः स शृङ्गवान् ॥
एते पर्वतराजानः सिद्धचारणसेविताः। तेपामन्तरविष्कम्भो नवसाहस्रमुच्यते ॥१८॥
मध्ये विलावृतं नाम महामेरोः समन्ततः ।
चतुर्विशत्सहस्राणि विस्तीर्णो योजनैः समः॥ १६ ॥
मध्ये तस्य महामेरुर्विधूम इव पावक. । वेद्यद्धं दक्षिणं मेरोरुत्तराद्धं तथोत्तरम् ॥ २०॥
घर्षाणि यानि सप्तात्र तेषां वै वर्षपर्वताः । द्वे हे सहस्र विस्तीर्णा योजनर्दक्षिणोत्तरम्
जम्बूद्वीपस्य विस्तारस्तेपामायाम उच्यते । नीलश्च निषधश्चैव तेपां हीनाश्च ये परे ॥
श्वेतश्च हेमकृटश्च हिमवान् ङ्गवांश्च यः । जम्यूद्वीपप्रमाणेन ऋषभः परिकीर्त्यते ॥२३
तस्माद्द्वादशभागेन हेमकूटोऽपि हीयते । हिमवान् विंशभागेन तस्मादेव प्रहीयते ॥
अष्टाशीतिसहस्राणि हेमकूटो महागिरिः ॥ २४ ॥
अशीतिहिमवांछैल आयतः पूर्वपश्चिमे । द्वीपस्य मण्डलीभावाद्धासवृद्धी प्रकीर्तिते॥
घर्षाणां पर्वतानाञ्च यथाभेदं तथोत्तरम् । तेषां मध्ये जनपदास्तानि वर्षाणि सप्त वै ॥
प्रपातविपमेस्तैस्तु पर्वतैरावृतानि तु । सप्त तानि नदीभेदैरगम्यानि परस्परम् ॥ २७ ॥
घसन्ति तेषु सत्वानि नानाजातीनि सर्वशः । इमं हैमवतं वर्ष भारतं नाम विश्रुतम् ॥
हेमकूटं परं तस्मान्नाम्ना किं पुरुषं स्मृतम् । हेमकटाच निषधं हरिवषं तदुच्यते ॥२६
हरिवत्परञ्चापि मेरोस्तु तदिलावृतम् । इलावृतात्परं नीलं रम्यकं नाम विश्रुतम् ॥
रम्यकादपरं श्वेतं विश्रुतं तद्धिरण्यकम् । हिरण्यकात्परञ्चैव शृङ्गशाकं कुरं स्मृतम् ।।
धनुः संस्थे तु विज्ञेयो देवर्षे ! दक्षिणोत्तर । दीर्घाणि तस्यचत्वारि मध्यमंतदिलावृतम्
पूर्वतो निषधस्येदं वेद्यद्धं दक्षिणं स्मृतम् । परन्त्विलावृतं पश्चाद्वयर्द्धन्तु तदुत्तरम् ॥३३
तयोर्मध्ये तु विज्ञेयो मेर्यत्र त्विलावृतम् । दक्षिणेन तु नीलस्य निपधस्योत्तरेण तु ।
उद्गायतो महाशैलो माल्यवान् नाम पर्वत ।
द्वात्रिंशता सहस्रेण प्रतीच्यां सागरानुगः ॥ ३५ ॥
माल्यवान् वै सहस्रक आनील निपधायतः । द्वात्रिंशत्त्वेवमप्युक्त पर्वतो गन्धमादन
परिमण्डलयोर्मध्ये मेरुः कनकपर्वतः । चातुर्वर्ण्यसमोवणश्चतुरस्रः समुच्छ्रितः ॥३७॥
ऽध्यायः] * शैलराजमेरोवर्णनम् २५६ नानाथर्णः सपार्चेषु पूर्वान्ते श्वेत उच्यते । पीतन्तु दक्षिणं तस्य भृङ्गिपत्रनिभम्परम् । उत्तरं तस्य रक्तं वै इति वर्णसमन्वितः ।। ३८ ॥ मेरुस्तु शुशुभे दिव्यो राजवत्स तु वेष्टितः । आदित्यतरुणाभासो विधूम इव पावकः योजनानां सहस्राणि चतुराशीति उच्छ्रितः । प्रविष्टः पोड़शाधस्तादष्टाविंशतिविस्तृतः विस्तरादद्विगुणश्चास्य परीणाह समन्ततः । स पर्वतो महादिन्यो दिव्योपधिसमन्वितः भुवनरावृतः सर्वैर्जातरूपपरिष्कृतः । तत्र देवगणाश्चैव गन्धर्वासुरराक्षसाः ।। शैलराजे प्रमोदन्ते सर्वतोऽप्सरसाङ्गणः ॥ ४२ ॥ स तु मेरुः परिवृतो भुवनैर्भूतभावनः । यस्येमे चतुरो देशा नानापार्येषु संस्थिताः ।। भद्राश्व भारतञ्चैव केतुमालञ्च पश्चिमे । उत्तराश्चैव कुरवः कृतपुण्यप्रतिश्रयाः ॥४॥ विष्कम्भपर्वतास्तद्वन्मन्दरो गन्धमादनः । विपुलश्च सुपार्यश्च सर्वरत्नविभूपितः ॥४५ अरुणोदं मानसञ्च सिनोदं भवसंज्ञितम् । तेषामुपरि चत्वारि सरासिय वनानि च ॥ तथा भद्रकदम्बस्तु पर्वते गन्धमादने । जम्यूवृक्षम्तयाश्वत्यो विपुलेऽथ पटः परम् गन्धमादनपार्श्वे तु पश्चिमेऽमरगण्डिकः । द्वात्रिंशति सहस्राणि योजनः सर्वतः समः तर ते शुभकर्माणः केनुमाला परिनुताः। तत्र कालानलाः सर्वे महासत्या महाबलाः खियश्चोत्पदयभाः सुन्दर्यः प्रियदर्शनाः । तत्र दिव्यो-महावृक्षः पनसः पत्रमासुरः।। तस्य पीचा फलरसं संजीवन्ति समायुतम् । तस्यमाल्यवतःपायें पूर्व पूर्वानुगण्डिका द्वात्रिंशव सहस्राणि तत्रापि शतमुच्यते ॥ ५१ ।। भद्रश्च तत्र विशेयो नित्यं मुदितमानसः । भद्रमालयनं तन कालाघ्रश्च महाद्रुमः ॥१२॥ तत्र ते पुरुषाः श्वेता महासत्या महाबलाः । स्त्रियः पुमुदवर्णामाः मुन्दर्यः प्रियदर्शनाः चन्द्रमभाश्चन्द्रवर्णाः पूर्णचन्द्रनिभाननाः । चन्द्रशीतलगायाश्च स्त्रियाहात्पलान्धिकाः दशवर्षसहस्राणि आयुस्तेषामनामयम् । कालानस्य रस पीत्या ते सर्वे स्थिरयौवनाः सूत उवाच। इत्युक्तवान् ऋषीन् ग्रामा घर्षाणिय निसर्गतः। पूर्व ममानुग्रहाभूयः किं पर्णयामि यः पतकृत्वा पचस्नेतु ऋग्यःसंशितव्रताः । जानसौन्लाः सर्वे प्रत्यूयुस्ते मुदान्विताः .
२६० * मत्स्यपुराणम् * [द्वादशोत्तरशततमो अपय ऊचु । पूर्वापरौ समारयाती यो देशो तो त्वया मुने। । उत्तराणाञ्च घर्षाणापर्वतानाञ्चसर्वश आख्याहिनोयथातथ्ययेचपर्वतवासिन । एवमुक्तस्तु ऋपिभिस्तेभ्यस्त्वाख्यातवान्पुन सूत उवाच । शृणुध्व यानि घर्षाणि पूर्वोक्तानि च वै मया । दक्षिणेन तु नीलस्य निषधस्योत्तरेणतु वर्ष रमणक नाम जायन्ते यत्र वै प्रजा । रतिप्रधाना विमला जायन्ते यत्र मानवा ॥ शुक्लाभिजनसम्पन्ना सर्वे ते प्रियदर्शना ॥ ६१ ॥ तत्रापि च महावृक्षोन्यग्रोधो रोहिणो महान् । तस्यापि ते फलरसपिवन्तो वर्तयन्तिहि दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च । जीवन्ति ते महाभागा सदा हृष्टा नरोत्तमा । उत्तरेण तु श्वेतम्य पार्चे गृङ्गस्य दक्षिणे । वर्ष हिरण्वत नाम यत्र हेरण्वती नदी॥ महावला महासत्वा नित्य मुदितमानसा । शुक्लाभिजनसम्पन्ना सर्वे च प्रियदर्शना । एकादशसहस्राणि वर्षाणा ते नरोत्तमा । आयु प्रमाण जीवन्ति शतानि दशपञ्च च तस्मिन् वर्षे महावृक्षोलकुच पत्रसश्रय । तस्य पीत्वा फलरस तत्र जीवन्ति मानवा शृङ्गसाह्रस्य शृङ्गाणि नीणि तानि महान्ति वै। एक मणियुततत्रएकन्तु कनकान्वितम् सर्वग्नमय चैक भुवनैरुपशोभितम् ॥ ६८ ॥ उत्तरे चाम्य शृङ्गस्य समुद्रान्ते च दक्षिणे । कुरघस्तनतद्वर्ष पुण्य सिद्धनिपेवितम् ॥ तत्र वृक्षा मधुफला दिव्यामृतमयाफ्गा । धस्त्राणि ते प्रसूयन्ते फलश्चाभरणानि च । सर्वकामप्रदातार केचिद् वृक्षा मनोरमा । अपरे क्षीरिणो नाम वृक्षास्तत्र मनोरमा ॥ ये रक्षन्ति सदा क्षीर पटपञ्चामृतोपमम् ॥ ७१ ॥ सर्वा मणिमयी भूमि सूक्ष्मा काञ्चनयालुका । सर्वत्र सुखसस्पर्शा नि शन्दा पवना शुभा ॥ ७२ ॥ देवलोकच्युतास्तत्र जायन्ते मानवा शुभा । शुहाभिजनसम्पन्ना सर्वेते स्थिरयौवना मिथुनानि प्रजायन्ते स्त्रियश्चाप्सरसोपमा । तेषान्तेक्षीरिणाक्षीर पिवन्तिामृतोपमम् एकाहाजायते युग्म समञ्चैव विवर्द्धते । सम रूप च शीलञ्च समञ्चैव नियन्तिवै ॥ . ८ है ऽध्यायः] * भारतवर्पवर्णनम् * एकैकमनुरक्ताश्च चक्रवाकमिव ध्रुवम् । अनामया ह्यशोकाञ्च नित्यं मुदितमानसाः ॥ दशवर्पसहस्राणि दशवर्षशतानि च । जीवन्ति व महासत्या न वान्या स्त्री प्रवर्तते॥ सूत उवाच। एवमेव निसर्गो वै वर्षाणां भारते युगे । दृष्टः परमधर्मज्ञाः किम्भूयः कथयामि वः ॥ आस्यातास्त्येवम्पयः सूतपुत्रेण धीमता। उत्तरश्रवणे भूयः पप्रच्छ : सूतनन्दनम् ।। इति श्री मत्स्यमहापुराणे होपसमुद्रपर्वतानां वर्णनं नाम द्वादशोत्तरशततमोऽध्यायः ।। त्रयोदशोत्तरशततमोऽध्यायः भारतवर्पवर्णनम् । अपय ऊचुः। यदिदं भारनंय यस्मिन् स्वायम्भुवादयः । चतुर्दशैव मनवः प्रजासर्ग ससर्जिरे ॥१॥ एतद्देदितुमिच्छामः सकाशातव सुव्रत ! उत्तरश्रयणं भूयः प्रयूहि वदतां घर ! ॥२॥ एतच्छ त्या ऋषीणां तु मानवील्लीमहर्पणिः । पौराणिकस्तदासून ! ऋरीणां भावितात्मनाम् ॥३॥ युद्ध्या विचार्य बहुधा विमृश्य च पुनःपुनः । तेभ्यस्तु कथयामास उत्तरध्रवणं तदा सूत उवाच । अथाहं वर्णयिष्यामि घऽस्मिन् भारते प्रजा भरणात्मजनाचंच मनुर्मरत उच्यते । निएकवचनश्चय प तद्धारतं स्मृतम् । यतः स्यगंध मोक्षश्च मध्यमश्चापि दि स्मृतः । न समन्यत्र मस्र्यानां भूमौकर्मविधिः स्मृतः । भारतस्यास्य वर्षस्य नवमेदान्नियोधत' इन्द्रद्वीपः केसरच ताघ्ररणों गमस्तिमान् । नागद्वीपम्तथा सौम्योगन्धर्वस्त्वयवारणः अयं तु नवमस्ते द्वीपः सागरमपृतः । योजनानां सहस्रन्तु द्वीपोऽयं दक्षिणोनमः ॥ आयतस्तु कुमारीको गङ्गायाप्रबहायधिः तिर्यगूढयन्तुविस्तीर्ण.सहस्राणि दर्शवतु।।
૨૨ * मत्स्यपुराणम् * [त्रयोदशोत्तरशततमो द्वीपोह्युपनिविष्टोऽयं म्लेच्छरन्तेषु सर्वशः । यवनाश्च फिराताश्च तस्यान्ते पूर्वपश्चिमे।। ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या मध्ये शूद्राश्च भागशः । इज्यायुतचणिज्यादि घर्तयन्तो व्यवस्थिताः ॥ १२ ॥ तेषां सव्यवहारोऽयं घर्तनन्तु परस्परम् । धर्मार्थकामसंयुक्तो वर्णानान्तु स्वकर्मस्तु ॥ सङ्कल्पपञ्चमानान्तु आश्रमाणां यथाविधि । इह स्वर्गापर्गार्थ प्रवृत्तिरिह मानुपे ॥१४ यस्त्वयं मानवो द्वीपस्तिर्यग्यामः प्रकीर्तितः । य एनं जयते कृत्स्नं स सम्राडिति कीर्तितः ॥ १५॥ अयं लोकस्तु वै सम्राडन्तरिक्षजितां स्मृतः । स्वराडसी स्मृतो लोकः पुनर्वक्ष्यामि विस्तरात् ॥ १६ ॥ सप्त चास्मिन् महावर्षे विश्रुताः कुलपर्वताः । महेन्द्रो मलय. सह्य शक्तिमान् ऋक्षवानपि ॥१७॥ विन्ध्यश्च पारियात्रश्च इत्येते कुलपर्वताः । तेषां सहस्रशश्चान्ये पर्वतास्तु समीपतः ॥ सभिज्ञातस्ततश्चान्ये विपुलाश्चित्र सानवः । अन्येतेभ्यः परिज्ञाता हस्वा ह्रस्वोपजीविनः तैर्विमिश्रा जानपदा आर्या म्लेच्छाश्च सर्वतः । पिबन्ति बहुला नद्यो गङ्गासिन्धुः सरस्वती ॥२०॥ शतश्चन्द्रभागा च यमुना सरयू तथा । ऐरावती वितस्ता च विशाला देविका कुहः गोमती धौतपापा च वाहुदा च दृषढती । कौशिकी तु तृतीयाचनिश्चलागण्डकी तथा इक्षुलौंहितमित्येता हिमवत्पार्श्वनि.मृता ॥२२॥ वेदस्मृतिर्वेत्रवती वृत्रघ्नी सिन्धुरेव च । पर्णाशा नर्मदा चैव कावेरी महती तथा ॥२३ पारा व धन्वतीरूपा विदुपाचेणुमत्यपि। शिप्राह्यवन्तीकुन्ती च पारियात्राश्रिताःस्मृताः मन्दाकिनीदशार्णा च चित्रफ्टा तथैव च । तमसापिप्पलीश्येनी तथा चित्रोत्पलापिच विमला चञ्चलावैव तथा च धूतवाहिनी । शुक्तिमन्ती शुनी लजामुकुटाहदिकापि च ॥ अमृप्यवन्तप्रसूतास्तानथामलजलाः शुभाः ॥ २६ ॥ तापीपयोप्पी निर्विन्ध्याक्षिप्रा च ऋषमा नदी । वेणावैतरणी चैव विश्वमालाकुमुद्रती
ऽध्यायः] * भारतवर्षान्तर्गत नानानदीदेशानांवर्णनम् -
तोया चैव महागौरीदुर्गमातुशिला तथा ! विन्ध्यपादप्रस्तास्ताः सर्घा शीतजलाःशुभाः
गोदावरी भीमरथी कृष्णवेणी च वचला ! तुङ्गमदा सुप्रयोगा बाहाकावेरी चैव तु
दक्षिणापथनधस्ताः सापादाहिनिःसृताः ॥ २६ ॥
कृतमाला ताम्रपर्णी पुप्पजा हुत्पलावती । मलयानसूता नद्यः सर्वाः शीतजला: शुभाः।
त्रिभागा ऋषिकुल्या च इक्षुदा त्रिदिवाचला । ताम्रपर्णी तथा मूली शरवाविमला तथा
महेन्द्रतनयाः सर्वाः प्रख्याताः शुभगामिनीः ।। ३ ॥
काशिकासुकुमारी च मन्दगामन्दवाहिनी । कृपाच पाशिनीचैव शुकिमन्तात्मजास्तुताः
सर्वाः पुण्यजलाः पुण्याः सर्वगाश्च समुद्रगाः ।
विश्वस्य मातरः सर्वाः सर्वपापहराः शुभाः ॥ ३३ ॥
तासां नापनद्यश्च शतशोऽथ सहस्रशः।
तास्विमे कुरुपाञ्चालाः शाल्वाश्चैव सजागला. ॥ ३४ ॥
शरसेना भद्रकारा याह्याः सहपश्चराः।
मत्स्याः किराता: कुल्याश्च कुन्तलाः काशिकोशलाः ॥ ३५ ॥
यावन्ताश्च कलिङ्गाश्च मूकाश्चैवान्धकैः सह । मध्यदेशाजनपदा प्रायशः परिकीर्तिताः
साम्यानन्तरे चैते तत्र गोदावरी नदी । पृथिव्यामपि कृत्स्नायां स प्रदेशो मनोरमः ॥
यत्र गोवर्धनो नाम मन्दरो गन्धमादनः । रामप्रियार्थ स्वर्गीयावृक्षादिन्याम्तापधी:
भरद्वाजेन मुनिना प्रियार्थमयतारिताः । ततः पुष्पवरो देशस्नेन जाने मनोरमः ॥३६॥
चारहीका पाटयानाश्च पामीराः फालतीयकाः ।
पुरन्धाश्चय शृदाध पल्लयाश्चात्तपण्डिकाः ॥१०॥
गान्धारा यवनाश्चैव सिन्धुसापीरमद्रकाः । शका यापुलिन्दाथपारदाहारमूर्तिकाः
रामटाःफण्टफाराध फैकेया दशनामकाः । क्षत्रियोपनिवेश्याच वेश्यावृाटकुलानिय
अन्नयोऽध भरद्वाजाः प्रस्थलाः सदमेरफाः ।
लम्पफास्तलगानाध सैनिकाः सह जाङ्गलः।
पने देशा उदीच्यास्तु प्राच्यान्देशानियोधतः ॥४॥
२६४ * मत्स्यपुराणम् * [त्रयोदशोत्तरशततमो अङ्गा बड़ा मद्गुरका अन्तर्गिरियहिगिरी । सुरोत्तरा प्रविजया मार्गवागेयमालवा ॥ प्राग्ज्योतिपाश्च पुण्ड्राश्च विदेहास्ताम्रलिप्तका । शाल्चमागधगोन प्राच्या जनपदा स्मृता ॥४५॥ तेपा परे जनपदा दक्षिणापथवासिन । पाण्ड्याश्च केरलाश्चैव चोला कुल्यास्तथैव च ॥ ४६॥ सेतुका सूतिकाश्चैव कुपथावाजिवासिका । नवरराणामाहिपिका कलिङ्गाश्चैवसर्वश 'कारूपाचसहैपीका आटव्या शवरास्तथा । पुलिन्दाविन्ध्यपुषिका वैदर्भा दण्डकै सह कुलीयाश्च सिरालाश्च रूपसास्तापस सह । तथातैत्तिरिकाश्चैव सर्वे कारस्करास्तथा। घासिकाश्चैव ये चान्ये ये चैवान्तरनर्मदा । भारुकच्छा समाहेया सह सारस्वतैस्तथा फाच्छीकाश्चैवसौरामा आनर्ताअर्बुदै सह । इत्येतेअपरान्तास्तुशृणु ये विन्ध्यवासिन मालयाश्वकरूपाश्चमेकलाश्चोत्कले सह। औण्डामापादशार्णाश्चभोजा किष्किन्धकै सह स्तोशला कोसलाश्चैव त्रैपुरा वैदिशास्तथा । तुमुरास्तुम्बराश्चैव पद्गमा नैपधै सर अरूपा शोण्डिकेराश्च धीतिहोत्रा अचन्तय । एने जनपदा ख्याताविन्ध्यपृष्ठनिवासिन अतो देशान् प्रवक्ष्यामि पर्वताधयिणश्च ये । निराहारा सर्वगाश्चकुपथा अपथास्तथा।। घुथप्रावरणाश्चैव ऊर्णादर्वा समुद्गका । निगर्ता मण्डलाध किराताश्यामर सह ॥ चत्वारिभारते व युगानि मुनयोऽनुवन् । यून प्रेता द्वापञ्च फलियोति चतुर्युगम् ॥ तेपा निसर्ग पक्ष्यामि उपरिष्टाय रत्नश ॥ ५७ ॥ मत्स्य उवाच। एतच्छ त्यातु अपय उत्तर पुनरेव ते । शुश्रूपवस्तमूचुस्ते प्रकाम रोमहर्षणिम् ॥५८॥ वय ऊचु । यद्यमिपुरपवर्ष हरिव तथैव च । आचदय नो यथातर कोर्तित भारत त्वया ॥ जम्यूरगण्डस्य विस्तार तथान्येगविदाम्बर । दीपाना पासिनातेगवृक्षाणा प्रापीदिन पृण्म्येय तदा विप्रययाप्रमा विशेषत । उपाच ऋषिभिर्ट पुराणामिमत यथा ६१ । . ऽध्यायः] • जम्बूकिम्पुरुषहरिषर्षाणांवर्णनम् * सूत उपाय। शुश्रूपयस्तु यद्विप्राः शुश्रूपध्वमतन्द्रिताः । जम्बूवर्पःकिंपुरुषः सुमहानन्दनोपमः ॥६शा दशवर्पसहस्राणि स्थितिः किम्पुरुष स्मृता । जायन्ते मानवास्तत्र सुतप्तकनकप्रभाः ।। वर्षे किंपुरुषे पुण्ये प्रक्षो मधुयहः स्मृतः । तस्य किंपुरुषाः सर्वे पिवन्तो रसमुत्तमम् ॥ अनामया एशोकाश्च नित्यं मुदितमानसाः । सुवर्णवर्णाश्चनराः स्त्रियश्चाप्सरसास्मृताः ततः परं किम्पुरुषात् हरिवर्ष प्रचक्षते । महारजतसङ्काशा जायन्ते यत्र मानवाः ॥६॥ देवलोकच्युताः सर्वे बहुरूपाश्च सर्वशः। हरिवर्षे नराः सर्वे पिवन्तीक्षुरसं शुभम् ६७ न जरा वाघते तत्र तेन जीयन्ति ते विरम् । एकादशसहस्राणि तेपामायुः प्रकीर्तितम् मध्यमं तन्मया प्रोक्तं नाम्ना घर्पमिलावृतम् । न तत्र सूर्यस्तपति नव जीवन्ति मानवा ॥ चन्द्रसूयौं सनक्षत्रावप्रकाशाविलावृते । पद्मप्रभाः पद्मवर्णाः पद्मपत्रनिभेक्षणाः १७०॥ पद्मगन्धाश्च जायन्ते तत्र सर्वे च मानवाः । जम्बूफलरसाहाराःअनिष्पन्दाः सुगन्धिनः देवलोकच्युताः सर्वे महारजनवासस. । त्रयोदशसहस्राणि चर्पाणान्ते नरोत्तमाः॥७२॥ आयुःप्रमाणं जीवन्ति ये तु चर्पइलावृते । मेरोस्तु दक्षिणे पायें निपधल्योत्तरेण चा॥ सुदर्शनो नाम महान जायूवृक्षः सनातन. । नित्यपुष्पफलोपेतः सिद्धचारणसेवितः ॥ तस्य नाम्ना समाल्यातो जम्बूद्वीपो धनस्पत्तेः । योजनानांसहस्रञ्च शतधाचमहान्पुन: उत्सेधो वृक्षराजस्य दियमावृत्य तिष्ठति । तस्य जम्फलरसो नदी भूत्वा प्रसर्पति ।। मेरुं प्रदक्षिणं कृत्या जम्बूमूलगता पुनः । तं पियन्ति सदा हमा जम्बूरस मिलावृते||७७ जम्बूफलरसं पीत्वा न जरा वाधतेऽपि तान् । न क्षुधा न क्लमो चापि न दुःपञ्च तथाविधम् ॥ ७८ ॥ तत्र जावूनदं नाम कनकं देवभूषणम् । इन्द्रगोपकलङ्काशं जायते भासुग्ध यत् is६ ॥ सर्वेषां धर्पवृक्षाणां शुभः फलरसस्तु सः । स्कनन्नु काञ्चनं शुभ्रं जायते देवभूषणम् ॥ तेषां मूत्रं पुरीपं घा दिक्ष्यष्टासु च सर्वशः । ईश्वरानुग्रहाभूमिमृतांश्च असतेतु तान्॥ रक्षः पिशाचा यक्षाच सर्वे हेमयतास्तु ते। हेमटेतु विज्ञेया गन्धवाःसाप्सरोगणा: सर्वनागा नियन्ते शेषयासुकितक्षकाः । महामेरी अर्यास्त्रशत् कीडन्ते यज्ञियाःशुभाः * मत्स्यपुराणम् * [चतुर्दशोत्तरशततमो नीलवैदूर्ययुक्तेऽस्मिन् सिद्धाब्रह्मर्पयोऽवसन् । दैत्यानां दानवानाञ्च श्वेतः पर्वत उच्यते शृङ्गवान् पर्वतश्रेष्ठः पितृणां प्रतिसञ्चरः । इत्येतानि मयोक्तानि नव वर्षाणि भारते ॥ भूतैरपि निविष्टानि गतिमन्ति ध्रुवाणि च । तेषां बुद्धिर्वहुविधा दृश्यते देवमानुषैः ।। अशक्या परिसंख्यातुं श्रद्धेया च विभूपता ॥ ८६ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे नानाधणाम्वर्णनं नाम त्रयोदशोत्तरशततमोऽध्याय' । चतुर्दशोत्तरशततमोऽध्यायः पुरूरवसः पूर्वजन्मवृत्तान्तवर्णनम् । मनुरुवाव। चरित बुधपुत्रस्य जनार्दन ! मया श्रुतम् । श्रुतः श्राद्धविधिः पुण्यः सर्वपापप्रणाशन. ॥ धेन्चाः प्रसूतमानायाः फलं दानस्य मे श्रुतम् । कृष्णाजिनप्रदानञ्च वृपोत्सर्गस्तथैव च श्रुत्वा रूपं नरेन्द्रस्य बुधपुत्रस्य केशव | 1 कौतूहलं समुत्पन्नं तन्ममाचक्ष्य पृच्छतः ॥ केन कर्मविपाकेन स तु राजा पुरूरवाः । अयाप तादृशं रूपं सौभाग्यमपि चोत्तमम् ॥ देवास्त्रिभुवनश्रेष्ठान् गन्धर्वाश्च मनोरमान् । उर्वशीसङ्गता त्यत्तया सर्वभावेन तं नृपम् । गत्स्य उवाच। शृणु कर्मविपाकेन येन राजा पुरूरवाः । अयाप तादृशं रूपं सौभाग्यमपि चोत्तमम् ।। अतीते जन्मनि पुरा योऽयं राजा पुरूरवा. 1 पुरुरवा इति ख्यातो मद्रदेशाधिपोहि सः चाक्षुपस्यान्वये राजा चाक्षुषस्यान्तरे मनो । स वै नृपगुणैर्युक्त. वेचलं रूपवर्जित. ॥ ऋपय ऊचुः। पुरुरवा मद्रपतिः फर्मणा केन पार्थियः। बभूव कर्मणा येन रूपांश्चैव सतज ! ॥६॥ ! सूत उवाच। द्विजनामे द्विजश्रेष्टो नाम्नाचासीत् पुरुरवाः । नद्याः फुले महाराजः पूर्वजन्मनिपार्थिवः ऽध्यायः] * हैमवतीनदीमाहात्म्यवर्णनम् ** २६७ स तु मद्रपती राजायस्तुनाना पुरूरघा । तस्मिन् जन्मन्यसौ चिनो द्वादश्यान्तुसदानप्र! उपोष्य पूजयामास राज्यकामो जनार्दनम् । चकार सोपचासश्च स्नानमभ्यगपूर्वकम् । उपवासफलात्याप्तं राज्यं मद्रेशकण्टकम् । उपोपितम्तथाभ्यगादूपहीनो व्यजायत ॥ उपोषित रेस्तस्मात् स्नानमभ्यगापूर्वकम् । पर्जनीयं प्रयत्नेन स्पन्न तत्परं नृप!॥१४॥ एतद्वः कथितं सर्व यवृत्तं पूर्वजन्मनि । मद्रेश्वरस्यचरितं शृणु तस्य महीपतेः ॥ १५॥ तस्य राजगुणैः सर्वैः समुपेतस्य भूपते. । जनानुरागो नेचासीटूपहीनस्य तस्य वै ।। रूपकामः स मद्रशस्तपसे कृतनिश्चयः । राज्य मन्त्रिगतं कृत्वा जगाम हिमपर्वतम् ॥ व्यवसायद्वितीयस्तु पद्भ्यामेव महायशा' । द्रष्टुं स तीर्थसदनं विषयान्ते म्बके नदीम् ॥ ऐरावतीति विख्यातान्ददर्शातिमनोरमाम् ॥ १८ ॥ तुहिनगिरिमहीधवेगान्तुहिनगमस्तिलमानशीतलोदाम् । तुहिनसक्दशहमवर्णपुक्षान्तुहिनयशाः सरितन्ददर्श राजा ॥ १६ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे पुररवस.पूर्वजन्मवृत्तान्तवर्णनं नाम चतुर्दशोत्तरशततमोऽध्यायः । पञ्चदशोत्तरशततमोऽध्यायः हैमवतीनदीमाहात्म्यवर्णनम् । सूत उवाच। स ददर्शनदी पुण्यांदिव्याहेमवती शुभाम् । गन्धर्यंश्च समाकीर्णा नित्यंशक्रेणसेविताम् मुरेभमदसंसिक्ता समन्तात्तु विराजिताम् । मध्येन शकचापामा तस्मिन्नहनि सर्वदा ।। तपस्विशरपोपेतां महाराह्मणसेविताम् । ददर्श तपनीयामां महाराजः पुरुरवाः ॥ ३॥ सितहंसापलिच्छन्नाङ्काशचामरराजिताम् । साभिषिक्तामिव सता पश्यन्त्रीति परययों पुण्यां मुशीतला हयांमनस प्रतिवद्धिनीम् । क्षयवृद्धियुतां रम्या सोममूचिमिघापनम् सुशीतशीघ्रपानीयां द्विजसद्यनिषेविताम् । सुता हिमवतः श्रेष्टां चञ्चद्वीचिपिराजिताम् अमृतस्यादुसलिलान्तापसरपशोभिताम् । स्वर्गारोहणनि श्रेणी सर्वकामपनाशिनीम् ॥
૨૬૮ * मत्स्यपुराणम् * [पञ्चदशोत्तरशततमो अम्यां समुद्रमहिषी महर्षिगणसेचिताम् । सर्वलोकस्य चौत्सुम्यकारिणी सुमनोहराम हितांसर्वस्यलोकस्यनाकमागंप्रदायिकाम् । गोकुलाकुलतीरान्तां रम्यां शैवालवर्जिताम् हंससारससंघुटां जलजैरुपशोभिताम् । आवर्तनाभिगम्भीरां द्वीपोरुजघनस्थलीम् ॥१० नीलनीरजनेनामां उत्फुल्लकमलाननाम् । हिमाभफेनवसनाञ्चमवाकाधरां शुभाम् ॥ वलाकापङ्क्तिदशनाञ्चलन्मत्स्यावलिभ्रुवम् ॥ ११ ॥ खजलोद्भूतमातरम्यकुम्भपयोधराम् । हंसनूपुरसंघुष्टां मृणालवलयावलीम् ॥ १२ ॥ तस्यां रूपमहोन्मत्तागन्धर्वानुगता. सदा । मध्याह्नसमये राजन्! क्रीड़न्त्यप्सरसागणाः तामप्सरोविनिर्मुक्तं वहन्ती कुङ्कुमं शुभम् । स्वतीरटुमसम्भूतनानावर्णसुगन्धिनीम् ॥ तरङ्गबातलंक्रान्त्रसूर्यमण्डलदुशम् । सुरेभजनिताघातविकलहयभूपिताम् ॥ १५ ॥ शक्रेभगण्डसलिलैर्देवस्त्रीकुलवन्दनः । संयुत सलिलं तस्याः पट्पदैरुपसेव्यते ॥ १६ ॥ तस्यास्तीरभवा वृक्षाः सुगन्धकुसुमाश्चिताः । तथापष्टसम्भ्रान्तभ्रमरस्तनिताकुलाः ॥ यस्यास्तीरे रति यान्तिसदाकामयशा मृगा. । तपोधनाश्च भूपयस्तथा देवाःसहाप्सराः लभन्ते यत्र पूताना देवेभ्यः प्रतिमानिताः । स्त्रियश्च नाकबहुलाः पद्मन्दुप्रतिमाननाः या विभति सदा तोयं देवसधेरपीड़ितम् । पुलिन्द पसङ्घश्च व्याघ्रन्दरपीडितम् ॥ सतामरसपानीयां सतारगगनामलाम् । सतां पश्यन् ययो राजा सतामीप्सितकामदाम् यस्याम्तीररहैः काशैः पूर्णश्चन्द्रांशुसन्निभै । राजते विविधाकारैः रम्यं तीरं महाद्रुमैः या सदा विविधैविप्रेर्दवैधापि निषेत्र्यते ॥ २२ ॥ याच सदा सकलौघविनाशं भत्ताजनस्य फरोत्यचिरेण । यानुगता सरितां हि कदम्पैर्यानुगता सततं हि मुनीन्द्रः ॥ २३ ॥ या हि मुतानिय पाति मनुष्यान् या च युता सततं रिमसंघः । या च युता सततं मुरवृन्दर्या च जनः स्वहिताय श्रिता चै ॥ २४ ॥ युक्ता च केसरिगणैः करिहन्दजुष्टा सन्तानयुक्तसलिलापि सुवर्णयुक्ता । सूटयां शुतापपरिसृद्धिचिवृद्धशीता शीतांशुतुल्ययशसा दहरो नृपेण ॥ २५ ॥ इति श्रीमन्म्यपुगणे मद्देश्याम्यमियतोदर्शनं नाम पश्चादशोत्तरशनतमोऽध्यायः।
पोडशोत्तरशततमोऽध्यायः हिमववर्णनम् । सूत उवाच । आलोकयन्नदी पुण्यान्तत्समीपहृतश्रमः । स गच्छन्नेव ददृशे हिमवन्तं महागिरिम् ।। खमुल्लिदिर्घहुभिर्वृतं शृङ्गैस्तु पाण्डुरैः । पक्षिणामपि सञ्चारैविना सिद्धगति शुभम् ॥२ नदीप्रवाहसातमहाशब्दैः समन्ततः । असंश्रुतान्यशब्दन्तं शीततोयं मनोरमम् ॥ ३ ॥ देवदारुवनैनीलः कृताधोयसनं शुभम् । मेघोत्तरीयकं शैलं ददृशे स नराधिपः॥ ४ ॥ श्वेतमेघरुतोष्णीपं चन्द्रार्कमुकुटं क्वचित् । हिमानुलिप्तसङ्गिं कचिद्धातुविमिश्रितम् ॥ चन्दनेनानुलिप्ताङ्ग दत्तपञ्चाङ्गुलं यथा । शीतप्रदं निदाघेऽपि शिलाविकटसङ्कटम् ॥ सालक्तकरप्सरसां मुदितं चरणः क्वचित् ॥ ६ ॥ कचित्संपृष्टसूर्य्या शुं क्वचिच तमसावृतम् । दरीमुखैः क्वचिदीमै. पिबन्तं सलिलं महत् कचिद्विद्याधरगणेः क्रीडद्विरुपशोभितम् । उपगीतं तथा मुख्यैः किन्नराणागण क्वचित् आपानभूमो गलितर्गन्धर्वाप्सरसां कचित् । पुष्पैः सन्तानकादीनां दिव्यस्तमुपशोभितम् ॥ ६ ॥ सुनोत्थिताभिः शय्याभिः कुसुमानां तथा क्वचित् । मृदिताभिः समाकीर्ण गन्धर्षाणां मनोरमम् ॥ १० ॥ निद्धपयनर्देशैनीलशाद्वलमण्डितैः । तचिञ्च कुसुमयुक्तमत्यन्तरुचिरं शुभम् ॥ ११॥ तपस्विशरणं गेलं कामिनामतिदुर्लभम् । मृगैर्यथानुचरितन्दन्तिमिन्नमहाद्रुमम् ॥१२॥ यत्र सिंहनिनादेन त्रस्तानां भैरवं रवम् । दृश्यते न च संभ्रान्तं गजानामाकुलं फुलम् ।। तटाश्च तापसर्यन कुञ्जदेशेरलताः। रत्नैर्यस्यसमुत्पन्नस्त्रैलोक्यसमलकृतम् ॥१४ अहीनशरणं नित्यमहीनजनसेवितम् । अहीनः पश्यति गिरि महीनं रतसम्पदा ॥१५॥ अल्पेन तपसा यत्र सिद्धि प्राप्स्यन्ति तापसाः । यस्य दर्शनमात्रेण सर्वफल्मपनाशनम् २७० * मत्स्यपुराणम् * [सप्तदशोत्तरशततमो महाप्रपातसम्पातप्रपातादिगताम्बुभिः। घायुनीतैः सदा तृप्तिस्तदेशं कचित् क्वचित् ।। समालब्धजलैः शृङ्गः क्वविद्यापि समुच्छ्रितैः । नित्यर्कतापविषमेरगम्यैर्मनसा युतम् ॥ देवदारुमहावृक्षवजशाखानिरन्तरैः । वंशस्तम्ववनाकारैः प्रदेशैरुपशोभितम् ॥ १६॥ हिमच्छत्रमहारङ्ग प्रपातशतनिझरम् । शब्दलभ्याम्वुविपमं हिमसंरुद्धकन्दरम् ॥२०॥ दृष्ट्वैव तं चारुनितम्यभूमि महानुभाव. स तु मद्रनाथः । वभ्राम तौच मुदा समेतस्थानं तदा किञ्चिदथाससाद ॥ २१ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे मद्रराजस्यहिमवद्गमनं नाम पोडशोत्तरशततमोऽध्यायः । सप्तदशोत्तरशततमोऽध्यायः हिमवत्प्रदेशवर्णनम् । सूत उघावा तस्पैच पर्वतेन्द्रस्य प्रदेशं सुमनोरमम् । अगम्यं मानुपैरन्यैर्दैवयोगादुपागतः ॥ १॥ ऐरावती सरिठा यस्माद्देशाविनिर्गता । मेघश्यामञ्च तं देशन्द्रुमखण्डैरनेकशः ॥२॥ शालैस्तालस्तमालश्चकर्णिकारैःसशामलैः । न्यग्रोधेश्वतधाश्वत्यैः शिरीपशिशपाद्रुमैः महानिम्वैस्तथा निम्पैनिर्गुण्डीभिर्हरिद्रुमैः । देवदारमहावृक्षस्तथा कालेयकद्रुमैः ॥४॥ पद्मश्चन्दनविल्यैः कपित्यैः रक्तचन्दन. । घाताम्रारिष्टकाक्षोटैरव्दकैश्च तथार्जुनैः ॥५॥ हस्तिकर्णः सुमनसः कोविदाः सुपुष्पितः। प्राचीनामलकैश्चापि धनकैः समराटकैः । सर्जून रिफलश्च प्रियाल्वाम्रातफेछुदैः । तन्तुमालैर्धवैभव्यैः काश्मीरीपणिभिस्तथा ॥७ जातीफलः पूगफलः फटफललावलीफलैः। मन्दारैः फोविदारश्च किंशुकैः फुसुमांशुः ॥ ८॥ ययासः शमिपर्णासर्वतसैरम्बुवेतसः । रक्तातिरनारङ्गीडिशभिः सप्रियङ्गुभिः ॥ ६ ॥ रक्ताशोस्तथाशोकराकल्ले रविचारकः । मुचकुन्दैस्तथा कुन्दैराटम्पपरूपकः ॥१० ॥ फिरातेः फिकिरातेश्च फेतमः श्वेततकः । सीमाअनेरजनन्ध सुकलिङ्गनिफोटकः ।।
ऽध्यायः] * हिमवत्प्रदेशवर्णनम् * २७२ सुवर्णचास्यसन?मश्रेष्ठत्तथासनः । मन्मथस्य शराकारैः सहकारर्मनोरमैः ॥ १२ ॥ पीतयूथिकया चैव श्वेतयूथिकया तथा । जात्या चम्पकजात्या व तुम्वरैश्चाप्यतुम्वरैः । मोचैर्लोस्तु लकुचैस्तिलपुष्पकुशेशयैः । तथा सुपुप्पावरण. चन्यकैः कामिवल्लभः ।। पुष्पारेध चकुलः पारिभद्रहरिदकः । धाराकदम्बः कुटजः कम्यगिरिकूटजः ॥१५॥ आदित्यमुत्तकैः कुम्मैः कुडमैः कामवल्लभः । कर फलैदरैनीपैदीपरिच मद्दोज्ज्वलः ॥ रक्त. पालीवनैः श्वेतैर्दाडिमैश्चम्पकद्रुमैः । बन्धूफैश्च सुबन्धूकः कुञ्जकानान्तु जातिभिः कुसुमैः पाटलाभिश्च मल्लिकाकरवीरकः । कुरवर्हिमवरर्जमुभिर्नृपजम्बुभिः ॥ १८ ॥ थीजपूरैः सकपूरैर्गरभिश्चागुरदुमैः । विग्वैश्च प्रतिविम्बैश्च सन्तानकवितानकैः ॥१६॥ तथा गुग्गुलवृक्षश्च हिन्तालघवलेक्षुभिः । तृणशून्यैः करवीरैरशोकचक्रमर्दनः ॥ २० ॥ पीलुभिर्घातकोमिश्च चिरियिय समाकुलः । तिन्तिडीकस्तथालोधेविड क्षीरिकाटुमैः अश्मन्तकैस्तया कालर्जम्बीरै श्वेतकट्ठमैः । भल्लातकैरिन्द्रियवैल्गुजः सिद्धिसाधकैः करमर्दैः फासमदरविष्टकवरिष्टकः । रद्राक्षसम्भूतैः सप्ताहः पुत्रजीवकः ॥२३॥ कड्कोलेलंघनैश्च त्वाद्रुमै. पारिजातकः । प्रतानैः पिप्पलीनाञ्च नागवल्यचभागशः ।। मरीचस्य तथा गुल्मैनवमलिकया तथा । मृद्रीकामण्डपैर्मुरयैरतिमुक्तकमण्डपैः ॥२५॥ वपुसैनतिकानाञ्च प्रताने. सफलैः शुभैः । कृप्माण्डानां प्रतानश्च अलावूनां तथाकचित् चिभिटस्य प्रतानश्च पटोलीकारवल्लिकैः। कर्कोटकीवितानश्च वार्ताकर्वृहितीफलैः ॥२७ कण्टकर्मूलकैलशाकैस्तु विविधैस्तथा । कहारैश्च पिदायां चरस्टैः स्वादुकण्टकैः ॥ सभण्डीरविदूसारराजजम्बुकवालुकैः । सुवर्चलाभिः सर्वाभिः सर्पपाभिस्तथैव च ॥ काकोलीक्षीरकाकोलीच्छत्रया चातिच्छत्रया। कासमदींसहासद्धिः शकन्दलसकाण्डकै ॥३०॥ तथा क्षीरकशाकेत कालशान चाप्यथ । शिम्विधान्यस्तथाधान्य सर्वनिरवशेषितः ।। औषधीभिर्विवित्रामिदीप्यमानाभिरेव च । आयुप्याभिर्यशस्याभिल्याभिश्च नराधिप जरामृत्युभयनीभिः क्षुदयनीभिरेव च । सौभाग्यजननीमिश्च कृतस्माभिश्चाप्यनेकशः तत्र येणुलताभिश्च तथा कीचकवेणुभिः । काशः शशाङकाशश्च शरगुल्मस्तथैव च ॥
२७२ * मत्स्यपुराणम् * [ सप्तदशोत्तरशततमो कुशगुल्मैस्तथा रम्पैर्गुल्मैश्चक्षोर्मनोरमैः । कार्यासजातियण दुर्लभेन शुभेन च ॥३५॥ तथा च कदलीखण्डैमनोहारिभिरुत्तमैः । तथा मरकतारयः प्रदेशः शाद्वलान्वितैः॥ इरापुष्पसमायुक्तः कुङ्कुमस्य च भागशः । तगरातिविषामांसीग्रन्थकैस्तु सुरागदैः ॥ सुवर्णपुप्पैश्च तथा भूमिपुष्पैस्तथापरैः । जम्बीरभूस्तृणकैः सरसः सशुकैस्तथा ॥३८॥ शृङ्गवेराजमोदाभिः कुवेरकप्रियालकः । जलजैश्च तथा पूर्ण नावणः सुगन्धिभिः॥ उदयादित्यसङ्काशः सूर्यचन्द्रनिभस्तथा । तपनीयसवर्णश्च अतसीपुष्पसन्निभैः ॥४०॥ शुकपननिभैश्वान्यैः स्थलपत्रैश्च भागशः । पञ्चवर्णैः समाकीर्णैर्वहुवर्णस्तथैव च ॥४॥ दाटुर्दृष्ट्या हितमुदैः कुमुदैश्चन्द्रसन्निभैः । तथा घह्निशिखाकारैर्गजवक्त्रोत्पलैः शुभैः ।। नीलोत्पलः सकर्पूरैर्गुआतककसेरमः । शृङ्गाटकमृणालश्च करटै राजतोत्पलैः ॥४३॥ जलनेः स्थलजर्मूलः फलैः पुप्पैविशेषतः । विविधैश्चैव नोचारैमुनिभोज्यनराधिप । न तद् धान्यं न तच्छस्यं न तच्छाकं न तत् फलम् । न तन्मूलं न तन् कन्दं न तन् पुष्पं नराधिप ॥४॥ नागलोकोद्भवं दिव्यं नरलोकभपञ्च यत् । अनूपोत्थं धनोत्यञ्च तत्र यन्नास्ति पार्थिव सदा पुष्पफलं सर्वमजर्यमृतुयोगतः । मद्रेश्वरः स दहशे तपसा ह्यतियोगतः ॥७॥ दहशे च तथा तत्र नानाम्पान् पतत्विणः। मयूरान् शतपत्रांचकलविदांध कोकिलान् तदा कादम्यकान् हंसान कोयष्टीन् पसरीटकान् । फुररान् फालकृटाध पवाङ्गान् लुब्धकांस्तथा ॥४॥ गोश्त्वेडफान तथा युम्भान् धार्तराष्ट्रान शुकान् यकान् । धानुफांधवाफांध फटुफान टिहिमान भटान् ॥२०॥ पुत्रप्रियान् लोहपृष्टान्गोचर्मगिरिपर्नफान् । पारापतांधकामलान्सारिफाजीपजीयफान लापवर्तकयार्ताफान् रक्तयन्म प्रभद्रकान् । ताप्रचूसान स्वर्णचूदान् पुगटान् फाप्युटान् ॥५२॥ फपिशलान् फलपिहान् तथा कुड़मगष्ट्रफान् । - ऽध्यायः * हिमवत्प्रदेशवर्णनम् * २७३ भृङ्गराजान सीरपादान भुलिङ्गान् डिण्डिमान नवान् ॥५३॥ मञ्जलीतकदात्यूहान्भारद्वाजांस्तथाचपान् । एतांश्चान्यांश्चसुवहन्पक्षिसवानमनोहरान श्वापदान् विविधाकारान् मृगांश्चैव महामृगान् । व्याघ्रान् केसरिणः सिंहान द्वीपिनः शरभान वृकान् ॥ ५५ ॥ ऋक्षास्तरखंच बहून् गोलागूलान् सवानरान् । शशलोमान् सकादम्यान मार्जारान् घायुवेगिनः ॥५६॥ तथा मत्तांश्च मातङ्गान् महिपान् गवयान वृपान् । चमरान् समरांश्चैव तथा गौरखरानपि ॥५॥ उरभ्रांश्च तथा मेपान् सारङ्गानथ कृकुरान् । नीलांश्चैव महानोलान् करालान् मृगमातृकान् ॥८॥ सदंना रामसरभानकोश्चाकारकशम्वरान् । करालान्तमालांश्चकालपुच्छांश्चतोरणान दंप्रान् खड्गान् घराहांश्चतुरङ्गान् खरगर्दभान् । एतानद्विष्टान् मद्रेशोविरुद्धांश्च परस्परम् अघिद्धान् घने दृष्ट्वा विस्मयं परमं ययौ । तच्चाश्रमपदं पुण्यं वभूयात्रेः पुरा नृप । तत्प्रसादात् प्रभायुक्तं स्थावरैर्जडमैस्तथा । हिंसन्ति हि नचान्योन्यहिंसकास्तुपरस्परम् क्रव्यादाः प्राणिनस्तत्र सर्वेक्षीरफलाशनाः । निर्मितास्तत्र चात्यर्थमत्रिणा सुमहात्मना शैलान् नितम्वदेशेषु न्यबसच्च स्वयं नृपः । पयः रक्षन्ति ते दिव्यममृतस्यादुकण्टकम् क्वचिद्राजन् ! महिप्यश्चक्वचिदाजाश्वसर्वश' । शिला क्षीरेणसंपूर्णानाचान्यत्रयांबहिः सम्पश्यन् परमां प्रीतिमवाप वसुधाधिपः । सपंसि तदिव्यानिनद्यश्चविमलोदकाः प्रणालिकानि चोष्णानि शीतलानि च भागशः । फन्दराणि च शैलस्य सुसेन्यानि पदे पदे ॥६॥ हिमपातो न तत्रास्ति समन्तात् पञ्च योजनम् । उपत्यका सुशैलस्य शिसरस्य न विद्यते ॥६॥ तत्रास्ति राजन् ! शिरारं पर्वतेन्द्रस्य पाण्डुरम् । हिमपातङ्गनायर कुर्वन्तिसहिताःसदा तत्रास्ति चापरं गृहं यत्र तोयधनायनाः । नित्यमेवामिवर्षन्ति शिलाभि.शियरं परम् २७४ * मत्स्यपुराणम् * [अष्टादशोत्तरशततमो तदाश्रमं मनोहारि यत्र कामधरा धरा। सुरमुख्योपयोगित्वात् शाखिनां सफलाः फलाः ॥७१॥ सदोपगीतभ्रमरं सुरस्त्रीसेवितं परम् । सर्वपापक्षयकरं शैलस्येव प्रहारकम् ॥७२॥ वानरैः क्रीडमानैश्च देशाद्देशान्तराधिप । हिमपुजाः कृतास्तत्र चन्द्रविम्बसमप्रभाः ॥ तदाश्रमं समन्ताच्च हिमसंरुद्धकन्दरैः। शैलवाटः परिवृतमगम्यमनुजैः सदा ॥४॥ पूर्वाराधितभावोऽसौ महाराज पुरूरवाः । तदाश्रमपदं प्राप्तो देवदेवप्रसादतः ॥७॥ तदाश्रमं श्रमशमनं मनोहरं मनोहरैः कुसुमशतैरलङ्कृतम् । कृतं स्वयं रुचिरमथात्रिणा शुभं शुभावहं हि ददृशे स मद्रराट् ॥७६॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे मदेश्वरस्यात्रैराश्रमगमनं नाम सप्तदशोत्तरशततमोऽध्यायः । । अष्टादशोत्तरशततमोऽध्यायः हिमवत्प्रदेशवर्णनम् । सूत उवाच। तत्र यो तो महारङ्गी महावौँ महाहिमो । तृतीयन्तु तयोर्मध्ये शृङ्गमत्यन्तमुच्छ्रितम् नित्यातप्तशिलाजाल सदाभ्रपरिवर्जितम् । तस्याधस्तावृक्षगणो दिशा भागेचपश्चिमे जातीलतापरिक्षिप्त विवरं चारुदर्शनम् । दृष्ट्वैप कौतुकाविष्टस्तं विवेश महीपति ॥३॥ तमसा चातिनिविडं नल्बमान सुसङ्कटम् । नल्वमात्रमतिक्रम्य स्वप्रमाभरणोज्ज्वलम् तमुचितमथात्यन्तं गम्भीरं परिवर्तुलम् । न तत्र सूर्यस्तपति न विराजति चन्द्रमा. तथापि दिवसाकारं प्रकाश तदहनिशम् । क्रोशाधिकपरीमाणं सरसाच विराजितम् ॥ समन्तात्सरसस्तस्य शैललग्ना तु वेदिका । सोवणे राजतै क्षविद्रुमेरुपशोभितम् ॥ ! नानामाणिक्ययुसुमे सुप्रभाभरणोग्यलैः । तस्मिन् सरसि पानिपनरागच्छदानितु पनवेसरजालानि सुगन्धीनि तथा युतम् । पत्रैमरकतैनील-दूर्य्यस्य महीपते ।। ६ ॥
. - ऽध्यायः] * हिमवत्प्रदेशवर्णनम् * कणिकाश्व तथा तेषां जातरूपस्य पार्थिव । तस्मिन् सरसि या भूमिर्न सा पत्रसमाकुला ॥१०॥ नानारत्नरुपचिता जलजानां समाश्रया । कपर्दिकानां शुक्तीनां शसानाञ्च महीपते !!१२ मकराणाञ्च मत्स्यानां चण्डानां कच्छपैः सह । तत्र मरकतखण्डा जाणाञ्च सहस्रशः ॥१२॥ पारागेन्द्रनीलानि महानीलानि पार्थिव । पुष्परागाणि सर्वाणि तथा फर्कोटकानि च ॥१३॥ तुत्थकस्य तु सण्डानि तथाशेपस्यभागशः । राजावर्तस्यमुरयस्यरुचिराक्षस्यचाप्यथ सूर्येन्दुकान्तयश्चैव नीलो धर्णान्तिमश्च ज्योतीरसस्य रम्यस्य स्यमन्तस्य च भागशः ॥१५॥ सुरोरगवलक्षाणां स्फटिकस्य तथैव च । गोमेदपित्तकानाञ्च धूलीमरफतस्य च । चैदूर्यसौगन्धिकयस्तथा राजमणेर्नृप । पत्रस्यैव च मुख्यस्य तथा ब्रह्ममणेरपि । मुक्ताफलानि मुकानान्ताराविग्रहधारिणाम् ॥१८॥ सुपोष्णश्चैव तत्तोयं स्नानाच्छीतविनाशनम् । वैदूर्यस्य शिलामध्ये सरसस्तस्य शोभना प्रमाणेन तथा सा चद्वे च राजन् ! धनुःशते । चतुरस्रा तथा रम्या तपसा निर्मिताऽत्रिणा ॥२०॥ यिलद्वारसमो देशो यत्र तत्र हिरण्मयः । प्रदेशः स तु राजेन्द्र ! द्वीपे तस्मिन् मनोहरे ॥२॥ तथा पुष्करिणी रम्या तस्मिन् राजन् ! शिलातले । सुशीतामलपानीया जलजश्व विराजिता ॥२२॥ आकाशप्रतिमा राजन् ! चतुरना मनोहरा । तस्यास्तदुदकं स्वादुलघुशीतसुगन्धिकम् न क्षिणोति यथा कण्ठं कुक्षिन्नापूरत्यापि । तृप्ति पिघत्ते परमां शरीरे च महत् मुसम् मध्ये तु तस्याः प्रासादं निर्मितं तपसात्रिणा । रसमसेतुप्रवेशान्तं सरजमयं शुभम् ।। शशादरमः सदाशं प्रासादं राजितं हितम् । ग्यदूर्यसोपानं विद्रुमामलसारफम् ॥
૨૭૬ * मत्स्यपुराणम् * [अष्टादशोत्तरशततमो इन्द्रनीलमहास्तम्भ मरकतासक्तवेदिकम् । वज्रांशुजालैः स्फुरितं रम्यं दृष्टिमनोरमम् ॥ प्रासादे तत्र भगवान् देवदेवो जनार्दनः । भोगिभोगावलीसुप्तः सर्वालङ्कारभूषितः ।२८ जान्याचकुञ्चितस्त्वेकोदेवदेवस्यचक्रिणः । फणीन्द्रसन्निविष्टोऽद्धिद्वितीयश्चतथानध लक्ष्म्युत्सङ्गगतोऽड्मिस्तु शेषभोगप्रशायिनः । फणीन्द्रभोगसन्यस्तवाहुः केयूरभूषणः अङ्गुलीपृष्ठविन्यस्तदेवशीर्षधरम्भुजम् । एकं वै देवदेवस्य द्वितीयन्तु प्रसारितम् ॥३१ समाकुञ्चितजानुस्थमणिवन्धेन शोभितम् । किञ्चिदाकुञ्चितं चैव नाभिदेशकरस्थितम् ॥३२॥ तृतीयन्तु भुजं तस्य चतुर्थन्तु तथा शृणु । आत्तसन्तानकुसुमं प्राणदेशानुसर्पिणम् ॥ लक्ष्म्या संवाह्यमानाशिः पद्मपत्रनिभैः करैः । सन्तानमालामुकुटं हारकेयूरभूषितम् ।। भूपितञ्च तथा देवमङ्गदैरङ्गुलीयकैः । फणीन्द्रफणविन्यस्तवारुरत्नशिरोज्ज्वलम् ॥३५॥ अज्ञातवस्तुचरितं प्रतिष्ठितमथात्रिणा । सिद्धानुपूज्यं सततं सन्तानकुसुमाचितम् ॥ दिग्यगन्धानुलिप्ताङ्ग दिव्यधूपेन धूपितम् । सुरसः सुफलह धैः सिद्धरपहत.सदा ।। शोभितोत्तमपार्श्वन्तं देवमुत्पलशीर्षकम् । ततः सम्मुखमुवीक्ष्य पधन्दे स नराधिपः जानुभ्यां शिरसा चैव गत्या भूमि यथाविधि । नानां सहस्रेण तदा तुष्टाय मधुसूदनम् ॥३॥ प्रदक्षिणमथो चक्रे स तृत्थाय पुनः पुनः । रम्यमायतनं दृष्ट्वा तत्रोवासाश्रमे पुनः ।।४० जलायहिहां काश्चिदाश्रित्य सुमनोहराम् । तपश्चकार तत्रैव पूजयन्मधुसूदनम् ॥ नानाविधस्तथा पुष्पैः फलमूलैः सगोरसः । नित्यं त्रिपवणस्नायी घहिपूजापरायणः । देवयापीजलेः कुर्यन् सततं प्राणधारणम् । सर्वाहारपरित्यागं कृत्या तु मनुजेश्वरः ॥ अनास्तृतगुहाशायी कालं नयति पार्थिवः । त्यक्ताहारनित्यश्च ध फेवलं तोयतो नृपः ॥ न तस्य ग्लानिमायाति शरीरञ्च तदभुतम् । एवं स राजा तपसि प्रसक्तः संपूजयन् देवघरं सदेव । तमाश्रमे फालमुवास फश्चित् स्वाँपमे दुःपमधिन्दमान. ॥४५॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे मटेग्यरतपश्चर्यापर्णनं नामाष्टादशोत्तरशततमोऽध्यायः ।
६ ऊनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः मद्रसरस्य क्रीडाविहारवर्णनम् । सूत उवाच। स त्याधमपदे रम्ये त्यक्ताहारपरिच्छदः । क्रीडाविहारं गन्धर्वः पश्यत्यप्सरसां सह ॥ कृत्वा पुप्पोञ्चयं भूरि प्रथयित्वा तथा स्रजः । अयं निवेद्य देवाय गन्धर्वेभ्यस्तदा ददी पुप्पोच्चयप्रसक्तानां क्रीडन्तीनां यथा सुखम् । चेष्टा नानाविधाकाराः पश्यन्नपि न पश्यति ॥ ३ ॥ फाचित् पुष्पोच्चयेसकालताजालेनवेष्टिता । सषीजनेनसन्त्यक्ताकान्तेनाभिसमुझिता काचित्कमलगन्यामा निश्वासपवनाहृतः । मधुरैराकुलमुखी कान्तेन परिमोचिता। मकरन्दसमानान्तनयना काचिदङ्गना । कान्तनिश्वासवातेन नीरजस्कठतेक्षणा ॥६॥ काचिदुच्चीय पुष्पाणि ददी कान्तस्य भामिनी । कान्तसंग्रथिते पुष्पै रराज कृतशेखरा ॥ ७॥ उच्चीयस्ययमुद्ग्रथ्य कान्तेन कृतशेखरा । कृतकृत्यमिवात्मानं मेने मन्मथवर्धिनी ॥८॥ अस्त्यस्मिनाहने कुशे विशिष्टकुसुमा लता । काचिदेवं रहो नीता रमणेन रिंसुना। कान्तसन्नामितलता कुसुमानि विचिन्वती । सर्वाभ्य.काचिदात्मानमेनेसर्वगुणाधिकम् काश्चित् पश्यन्तिभूपालंनलिनोपु पृथक्पृथक् । क्रीडमानास्तुगन्धरममाणामनोरमाः काचिदाताडयत्कान्तमुदकेन शुचिस्मिता । ताज्यमानाथ कान्तेन प्रीति काचिदुपाययो॥ १२ ॥ फान्तञ्च ताडयामास जातखेदा घराष्ट्रना । अदृश्यत घरारोहा श्वासनृत्यत्पयोधरा ॥ फान्तामताडनोवृष्टकेशपाशनिवन्धना । केशाकुलमुखी भाति मधुपैरिव पद्मिनी ॥१५॥ स्वचक्षु सदृशैः पुप्पैः संच्छन्ने नलिनीवने । छन्ना काचिच्चिरात् प्राप्ता फान्तेनान्धिप्य यत्नतः ॥१५॥ - २७८ . * मत्स्यपुराणम् [ ऊनविंशत्यधिकशततमो स्माता शीतापदेशेन काचित् प्राहाङ्गना भृशम् । रमणालिङ्गनं चक्रे मनोऽभिलपितञ्चिरम् ॥ १६ ॥ जलायसनं सूक्ष्ममङ्गलीन शुचिस्मिता । धारयन्ती जनं चक्रे काचित्तत्र समन्मथम् ।। कण्ठमाल्यगुण.काचित् कान्तेनाकृप्यताम्भसि । त्रुट्यत्स्त्रग्दामपतितंरमणप्राहसचिरम् काविना सखीदत्तजानुदेशे नखक्षता। संभ्रान्ता कान्तशरण मग्ना काविद्गता चिरम् ॥ १६ ॥ काचित् पृष्टतादित्या केशनिस्तोयकारिणी । शिलातलगता भर्ना दृष्टा कामार्तचक्षुपा कृत्तमाल्य पिलुलितं संक्रान्तकुचकुङ्कुमम् । रतिक्रीडितकान्तेय रराज तत् सरोदकम् सुस्नातदेवगन्धर्वदेवरामीगणेन च । पूज्यमानञ्च ददृशे देवदेवं जनार्दनम् ॥ २२ ॥ कविच्च ददृशेराजा लतागृहगता स्त्रियः। मण्डयन्ती स्वगात्राणि फान्तसंन्यस्तमानसाः काचिदादर्शनकरा व्यग्रा दूतीमुखोद्गतम् । शृण्वन्ती कान्तवचनमधिका तु तथावभी। काचित् सत्वरिता दूत्या भूषणाना विपर्ययम् । कुर्वाणा नैव युबुधे मन्मथाविटचेतना वायुनुन्नातिसुरभिकुसुमोत्करमण्डिते । काञ्चित् पिबन्ती ददृशे मेरेयं नीलशाद्वले ॥२६ पाययामास रमण स्वय काचिद्वराङ्गना । काचित् पपो चरारोहा कान्तपाणिसमर्पितम् काचित् स्वनेत्रचपलनीलोत्पलयुतम्पय । पीत्वा पप्रच्छ रमण व गती तो ममोत्पलौ त्वयैव पीती तो नूनमित्युक्ता रमणेन सा। तथा विदित्वा मुग्धत्वाद् बभूव वीडिता भृशम् ॥ २ ॥ काचित् कान्तार्पित सुभू कान्तपीतावशेषितम् । सविशेपरसं पान पपी मन्मथवर्धनम् ॥ ३० ॥ अपानगोष्ठीषु तथा तासा स नरपुङ्गव । शुश्राव विविधतीतं तन्त्रीस्वरविमिश्रितम् ॥ प्रदोपसमये ताश्च देवदेवं जनार्दनम् । राजन् । सदोपनृत्यन्ति नानावाद्यपुर सरा ॥ याममात्रे गते रात्री विनिर्गत्य गृहामुखात् । आवसन् संयुता' कान्त. परधिरविताङ्गहाम् ॥ ३३ ॥ नानागन्धान्वितलतांनानागन्धसुगन्धिनीम् । नानाविचित्रशयनांकुसुमोत्करमण्डिताम्
२७६
ऽध्यायः]
* कैलासवर्णनम् ।
एचमप्सरसां पश्यन् क्रीडितानि स पर्वते । तपस्तेपे महाराजन् ! केशवापितमानस:
तमूचुर्नु पतिङ्गत्वा गन्धर्चाप्सरसाङ्गणाः । राजन् ! स्वर्गापमन्देशमिमं प्राप्तोऽस्यरिन्दम!
घयहि प्रदास्यामो मनसः कांक्षितान्धरान् । तानादाय गृहङ्गच्छ तिष्ठेह यदि वा पुनः ॥
राजोचाव।
अमोघदर्शनाः सर्वे भवन्तस्त्वमितौजसः । घरं वितरतायेव प्रसादं मधुसूदनात् ॥३८॥
एघमस्त्वित्यथोक्तस्तैःस तु राजा पुरुरघाः। तत्रोवास सुखीमासं पूजयानो जनार्दनम्
प्रिय एव सदैवासीद्गन्धर्षाप्सरसां नृपः। तुतोष स जनो राज्ञस्तस्या लील्येन कर्मणा
मामस्य मध्ये स नृपः प्रविष्टस्तदाश्रमं रत्नसहस्रचित्रम् ।
तोयाशनस्तत्र उवास मासं यावत् सितान्तो नृप ! फाल्गुनस्य ॥ ११ ॥
फाल्गुनामलपक्षान्ते राजा स्वप्न पुरूरवाः । तस्यैव देवदेवस्य श्रुतवान् गदितं शुभम् ॥
राज्यामस्यां व्यतीतायामत्रिणा त्वं समेष्यसि ।
तेन राजन्! समागम्य कृतरुत्यो भविष्यसि ॥४३॥
स्थतमेवं स राजर्षिर्दृष्ट्वा देवेन्द्रविक्रमः । प्रत्यूषकाले विधिवत् स्नात. स प्रयतेन्द्रियः
कृतकृत्यो यथाकामं पूजयित्वा जनार्दनम् । ददर्शात्रि मुनिराजा प्रत्यक्षं तपसा निधिम्
स्थामन्तु देवदेवस्य न्यवेदयत धार्मिकः । तत श्रुधाव घचनं देवतानां समीरितम् ॥४६॥
एवमेतन् महीपाल! नात्र कार्या विचारणा । एवं प्रसादं संप्राप्य देवदेवाजनार्दनात् ।
कृतदेवार्चनो राजा तथा हुतहुताशन । सर्वान् कामानवाप्तोऽसौ घरदानेन केशवात् ॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे मद्रेश्वरचरित्रवर्णनं नामोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।
,
विशत्यधिकशततमोऽध्यायः
कैलासवर्णनम् ।
सूत उवाच।
तस्याश्रमस्योत्तरतस्त्रिपुरारिनिषेवितः । नानारत्नमयः शृङ्गैः कल्पद्रुमसमन्वितैः ॥ १॥
- २८० १ मत्स्यपुराणम् * [विंशत्यधिकशततमो मध्ये हिमवतः पृष्ठे कैलासोनाम पर्वतः । तस्मिन्निवसति श्रीमान कुबेर सह गुह्यकैः अप्सरोऽनुगतो राजा मोदते हलकाधिपः । कैलासपादसम्भूतं रम्यं शोतजलं शुभम् । मन्दारपुष्परजसा पूरितं देवसन्निभम् । तस्मात् प्रवहते दिव्या नदी मन्दाकिनी शुभा। दिव्यञ्च नन्दनं तत्र तस्यास्तीरे महद्वनम् । प्रागुत्तरेण फैलासादिव्यं सौगन्धिकंगिरिम् सर्वधातुमयं दिव्यं सुवेलं पर्वतं प्रति । चन्द्रप्रभो नाम गिरिः स शुभ्रो रत्नसन्निभः ॥६ तत्समीपे सरो दिव्यमच्छोदं नाम विश्रुतम् । तस्मात् प्रभवते दिव्या नदी ह्यच्छोदिका शुभा ॥७॥ तस्यास्तोरे घनं दिव्यं महाचैत्ररथं शुभम् । तस्मिन् गिरी निघसति मणिभद्रः सहानुगः यक्षसेनापतिः क्रूरो गुह्यकः परिवारितः । पुण्या मन्दकिनी नाम नदी ह्यच्छोदिका शुभा ॥६॥ महीमण्डलमध्ये तु प्रविष्टे तु महोदधिम् । कैलासदक्षिणे प्राच्यां शिवं सर्वोपर्धि गिरिम् ॥ १० ॥ मनःशिलामयं दिव्यं सुवेलपर्वतं प्रति । लोहितो हेमङ्गस्तु गिरिः सूर्यप्रभो महान् ॥ तस्यपादे महद्दिव्यं लोहितं सुमहत्सर । तस्मात् प्रभवते पुण्यो लोहित्यश्च नदोमहान् दिव्यारण्यं विशोकञ्चतस्य तीरे महद्वनम् । तस्मिन् गिरी निवसति यक्षोमणिधरोवशी सौम्यैः सुधार्मिकश्चैव गुह्यकै. परिवारितः । फैलासात् पश्चिमोदीच्या कमानीपधी गिरिः ॥१४॥ फयुमति च रुद्रस्य उत्पत्तिच ककुद्मिनः । तदजनन्यैः फकुदं शैलन्त्रिककुदंप्रति ॥१५॥ सर्वधातुमयस्तनमुमहान् वैद्युतो गिरिः । तस्य पादे महद्दिव्यं मानसं सिद्धसेवितम् तस्मात् प्रभयते पुण्या सरयूलोकपावनी । तस्यास्तीरे धन दिव्यं वैम्राजं नामविश्रुतम् पुरेरानुचरस्तस्मिन् प्रहेतितनयो घशी । प्रामधाता निवसति राक्षसोऽनन्तचित्रमः ॥ १८॥ फैलासात् पश्चिमामाशां दिव्य सौंपधिगिरि । अरुण.परंतश्रेष्ठो स्यमधातुषिभूपित भपस्य दयित श्रीमान्पायतोहेमसग्निम । शातफोम्ममयदिव्य शिलाजाले समावित
-
॥
ऽध्यायः] * गड्डायाः सप्तस्रोतानां वर्णनम् *
२८१
शतसंस्पैस्तापनीयः शृङ्गदिवामियोलिखन् । शृङ्गवान् सुमहादिव्यो दुर्गःशैलोमहावितः
तस्मिन् शिरी निवसति गिरिशो धूम्रलोचनः ।
तस्य पादात् प्रभवति शैलोदं नाम तत्सरः ॥ २२॥
तस्मात् प्रभवतेपुण्या नदीशैलोदकाशुभा । सा चक्षुसी तयोर्मध्ये प्रविष्टापश्चिमोदधिम्
अस्त्युत्तरेण कैलासाच्छियः सर्वोषधोगिरिः । गौरन्तु पर्वतश्रेष्ठं हरितालमयं प्रति ।
हिरण्यशृङ्गः सुमहान् दिव्योपधिमयो गिरिः । तस्यपादे महद्दिव्यं सरकाञ्चनयालुकम्
रम्यं विन्दुसरो नाम यत्र राजा भगीरथ. । गङ्गार्थे स तु राजपिस्वास बहुलाः समाः॥
दिवं यास्यन्तु मे पूर्व गंगातोयाप्लुतास्थिकाः ।
तत्र त्रिपथगा देवी प्रथमं तु प्रतिष्ठिता ॥ २७ ॥
सोमपादात् प्रसूता सा सप्तधा प्रविभज्यते । यूपामणिमयास्तत्र विमानाश्च हिरण्मया.
तत्रेष्वा क्रतुभिः सिद्ध. शक्र. सुरगणैःसह । दिव्यच्छायापथस्तत्रनक्षत्राणान्तुमण्डलम्
दृश्यते भासुरा रात्री देवी त्रिपथगा तु सा । अन्तरिक्षं दिवं चैव भावयित्वाभुवंगता
भवोत्तमांगे पतिता संस्द्धा योगमायया । तस्या ये विन्दयाकेचित्क्रुद्धाया.पतिताभुधि
कृतन्तु तैर्वहुसरस्ततो विन्दुसरः स्मृतम् । ततस्तस्या निरुद्धाया भवेन सहसा स्पा ॥
ज्ञात्वा तस्या हाभिप्रायं क्रूरं देव्याश्चिकीर्पितम् ।
भित्वा विशामि पातालं श्रोतसा गृह्य शङ्करम् ॥३३ ॥
अथावलेपतं ज्ञात्या तम्याः क्रुद्धन्तु शङ्कर । तिरोभावयितुंचुद्धिरासीदङ्गेपुतां नदीम् ॥
एतस्मिन्नेव काले तु दृष्ट्वा गजानमग्रत । धमनीसन्ततंक्षीपं क्षुधान्याकुलितेन्द्रियम् ॥
अनेन तोपितश्चाहं नद्यर्थे पूर्वमेव तु । युवास्य घरदानन्तु ततः कोपं न यच्छत ॥३६॥
ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा यदुक्तं धारयन्नदीम् । ततो विसर्जयामास संद्धा स्वेन तेजसा
नदी भगीरथस्याथै तपसोग्रेण तोपित । ततो विसर्जयामास सप्तस्रोतांसि गड्या ॥
त्रीणि प्राचीमभिमुखं प्रतीचीन्त्रीण्यथैव तु । स्रोतांसि त्रिपथायास्तु प्रत्यपद्यन्तसप्तया
नलिनी हादिनी चैव पावनी चैव प्राच्यगा।
सीता चक्षुश्च सिन्धुश्च तिनस्ता वै प्रतीच्यगाः ॥४०॥
૨૮૨ * मत्स्यपुराणम् * [विशत्यधिकशततमो, सप्तमी त्वनुगा तासां दक्षिणेन भगीरथम् । तस्मात् भागीरथी सा वै प्रविष्टा दक्षिणोदधिम् ॥४१॥ सप्तचैताः प्लावयन्ति घर्षन्तु हिमसायम् । प्रसूताः सप्त नद्यस्तु शुभा विन्दुसरोद्भवाः तान्देशान् प्लाचयन्ति स्म म्लेच्छप्रायांश्च सर्वशः । सशैलान् कुकुरान् रौध्रान् वर्वरान् यवनान् खसान् ॥ ४३॥ पुलिकांश्च कुलत्यांश्च अङ्गलोक्यान्वरांश्च यान् । कृत्वा द्विधा हिमवन्तं प्रविष्टा दक्षिणोदधिम् ॥ ४४ ॥ अथ चीरमरूंश्चैव कालिकांश्चैवशूलिकान् । तुपारान् वीरानगान्यगृह्णात्पारदानशकान् एतान् जनपदांश्चक्ष प्लापयित्वोदधिमृता । दरदोर्जगुण्डाश्चैव गान्धारानीरसानकुहुन् शिवपौरानिन्द्रमरून घसतीन समतेजसम् । सैन्धवानुर्वसान घर्चान् कुपश्रान् भीमरोमकान् ॥ ४७ ।। शुनामुखांश्चोर्दमरून सिन्धुरतान्निषेयते । गन्धर्वान् किन्नरान्यक्षान् रक्षोविद्याधरोरगान् ॥ ४८ ॥ कलापग्रामकांश्चैव तथा किंपुरपान्नरान् । किराताश्च पुलिन्दांश्व कुरून वै भारतानपि ॥ ४६॥ पाञ्चालान् कौशिकान् मत्स्यान् मागधाडांस्तथैव च । ब्रह्मोत्तराश्च घड्याश्च ताम्रलिप्तांस्तथैव च ॥५॥ एतान् जनपदानार्यान् गङ्गा भावयते शुभा । ततः प्रतिहता विन्ध्येप्रविष्टादक्षिणोदधिम् ततस्तु हादिनी पुण्या प्राचीनाभिमुसा ययो। हावयन्त्युपकांश्चैव निपादानपि सर्वशः धीपरानृपिकांश्चैव तथा नीलमुखानपि । केकरानेकफणीश्च किरातानपि चैध हि ॥ फालिन्दगतिकांश्चैव कुशिकानस्वर्गभीमकान् । सामण्डले समुद्रस्यतीरभूत्यातुसर्वशः ततस्तु नलिनीवापि प्राचीमेव दिशें ययो । फुपथान हाघयन्ती सा इन्द्रद्युग्नसरांस्यपि तथा सरपथान देशान् वेत्रशङ्कपथानपि । मध्येनोजानकमान् कुथप्रावरणान् ययो । इन्द्रद्वीपसमीपे तु प्रविष्टा लवणोदधिम् । ततस्तु पायनी प्रायात् प्राचीमाशाअवेन तु॥
ऽध्यायः] * नानानदीपर्वतानांवर्णनम् * २८ तोमरान्माययन्तीचहंसमार्गानसमूहकान् । पूर्वान्देशांश्चसेवन्तीमित्वासाबहुधागिरिम् कर्णप्रावरणान् प्राप्य गता साश्वमुखानपि ॥ ५८॥ सिक्या पर्वतमेरु सा गत्वा विद्याधरानपि । शैमिमण्डलकोष्ठन्तु सा प्रविष्टा महत्सरः।। तासां नधुपनद्योऽन्याः शतशोऽथ सहस्रशः । उपगच्छन्तिता नद्यो यतोवर्पति पासवः तीरे बंशीकसारायाः सुरभि म तद्वनम् । हिरण्यरङ्गो घसतिविद्वान् कोवरको घशी यज्ञादपेतः सुमहान मितीजाः सुविक्रमः । तत्रागस्त्यैः परिवृता विद्वद्भिर्ब्रह्मराक्षसः ।। कुबेरानुवरा ह्येते चत्वारस्त-समाश्रिताः । एवमेव तु विज्ञेया सिद्धिः पर्वतयासिनाम् परस्परेण द्विगुणा धर्मतः कामतोऽर्थतः । हेमकृदस्य पृष्ठे तु सर्पाणां तन्सरःस्मृतम्, सरस्वती प्रभवति तस्माज ज्योतिष्मती तु या। भयमाढ़े झुमयतः समुहरे पूर्वपश्चिमी ६५ ॥ सरो विष्णुपदं नाम निषधे पर्वतोत्तमे । यस्मादने प्रभवति गन्धर्वानुकुले च ते ॥६६ मेरोः पार्थात् प्रभवति ह्रदश्चन्द्रप्रभो महान् । जम्यूश्चैव नदी पुण्या यस्यां जाम्यूनदं स्मृतम् ॥ ६७ ॥ पयोदस्तु हृदो नीलः स शुमः पुण्डरीकवान् । पुण्डरीकात् पयोदाय तस्माद् वै सम्प्रसूपताम् ॥६८ ॥ सरसस्तुसरस्त्वेतत् स्मृतमुत्तरमानसम् । मृग्याच मृगकान्ताच तस्माद्धेसम्प्रसूयताम् ह्रदाः कुरुपु विरयाताः पद्ममीनकुलाकुलाः । नाना वे वैजयानाम द्वादशोदधिसनिभाः तेभ्यः शान्त मध्वीच ट्रेनद्यो सम्भस्यताम् । फिपुरुषाद्यानि यान्यष्टौतेपुदेवोनवर्षति उद्भिदान्युदकान्यत्र प्रवहन्ति सरिद्धराः । यलाहकच ऋषमो चको मैनाक एव च ॥ विनिविष्टा प्रतिदिशं निमनालवणाधुधिम् । चन्द्रकान्तस्तथा द्रोणःसुमहांश्चशिलोच्चयः उद्गायता उदीच्यान्तु अघगाढा महोदधिम् । चको धिरकश्चय तथा नारदपर्वतः॥७४ प्रतीचीमायतास्ते वै प्रतिष्टास्ते महोदधिम् । जीमूतो द्रावणश्चैव मैनाफश्चन्द्रपर्वतः ।। मायतास्ते महाशैलाः समुद्रं दक्षिणम्प्रति । चक्रमैनाकयोमध्ये दिवि संदक्षिणापये ॥ तत्रसंवर्तको नामसोऽग्निपियति तजलम् । अग्निः समुदयासस्तु ऑर्थोऽसौपड़पामुखः - २८४ * मत्स्यपुराणम् * [एकविंशत्यधिकशततमो इत्येते पर्वताविष्टाश्चत्वारो लवणोदधिम् । छियमानेषु पक्षेषु पुरा इन्द्रस्य भयात् तेषान्तु दृश्यते चन्द्र शुक्ल कृष्णे समाप्लुतिः । ते भारतस्य घर्षस्य भेदायेन प्रकीर्तिताः इहोदितस्य दृश्यन्ते अन्ये त्वन्यत्र चोदिताः । उत्तरोत्तरमेतेषां वर्षमुद्रिच्यते गुणः ॥ आरोग्यायुः प्रमाणाभ्यां धर्मतःकामतोऽर्थक. । समन्वितानि भूतानितेपु वर्षेषुभागशः वसन्ति नानाजातीनि तेषु सर्वेषु तानि वै । इत्येतद्धारयद्विश्वं पृथ्वी जगदिदं स्थिता ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे नानानदीपर्वतानां वर्णनं नाम विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः । - एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः शाकद्वीपवर्णनम् । सूत उवाच। शाकद्वीपस्य वक्ष्यामि यथावदिहनिश्चयम् । कथ्यमानंनियोधध्वंशाकंद्वीपंद्विजोत्तमाः! जम्बूद्वीपस्य विस्ताराद्विगुणस्तस्य विस्तरः । विस्तारात् त्रिगुणाश्चापि परीणाहः समन्ततः ॥२॥ तेनावृतः समुद्रोऽयं द्वितीयो लवणोदकः । तत्र पुण्या जनपदा चिराच नियते जन' ॥ कुत एव च दुर्भिक्ष क्षमातेजोयुतेष्विह । तत्रापि पर्वताः शुभ्राः सप्तव मणिभूपिताः ॥ शाकद्वीपादिपु त्वेषु सप्त सप्त नगास्त्रिधु । ऋज्वायताः प्रतिदिशं निविष्टा. पर्वतोत्तमा रत्नाकाराद्रिनामानः सानुमन्तो महाचिताः । समोदिताः प्रतिदिशं द्वीपविस्तारमानत'॥ उभयत्रावगाढी व लवणक्षीरसागरी। शाकद्वीपे तु वक्ष्यामि सप्तदिव्यान् महाचलान् देवर्षिगन्धर्वयुतः प्रथमो मेरुरुच्यते । प्रागायत: स सौवर्ष उदयो नाम पर्वतः ॥ ८॥ तत्र मेघास्तु वृष्टयर्थं प्रभवन्त्यपयान्ति च । तस्यापरेण सुमहान् जलधारो महागिरिः स वै चन्द्रः समाख्यातः सौंपधिसमन्वितः । तस्मानित्यमुपादत्ते घासवः परमालम् नारदो नाम चैवोक्तो दुर्गशैलो महाचितः । तत्रावली समुत्पन्नौ पूर्व नारदपर्वती ॥११ + ऽध्यायः] * शाकद्वीपस्थनदीपर्वतानांवर्णनम् * २८५ तस्यापरेण सुमहान् श्यामो नाम महागिरिः। यत्र श्यामत्वमापन्नाः प्रजाः पूर्वमिमाः किल ॥ १२ ॥ स एव दुन्दुभिर्नाम श्यामपर्वतसन्निभः । शब्दमृत्युःपुरातस्मिन् दुन्दुभिस्ताड़ितासुरैः रत्नमालान्तरमयः शाल्मलश्चान्तरालकृत् । तस्यापरेण रजतो महानस्तोगिरिः स्मृतः ॥ सबै सोमक इत्युक्तो देवैर्यत्रामृतं पुरा । संभृतञ्च हृतञ्चैव मातुरर्थे गरत्मता ॥१५॥ तस्यापरे चाम्बिकेयः सुमनाश्चैव स स्मृतः । हिरण्याक्षो चराहेण तस्मिन्शेलेनिपूदितः आम्बिकेयात् परो रम्य. सर्वोपधिनिषेवितः । विभ्राजस्तु समारयात स्फाटिकस्तु महान् गिरिः ॥ १७॥ यस्माद्विभ्राजते पहिर्विभ्राजस्तेन स स्मृतः । सैवेह केशवेत्युक्तो यतो घायुः प्रवातिच तेषां वर्षाणि वक्ष्यामि पर्वताना द्विजोत्तमाः! 1 शृणुध्वं नामतस्तानि यथावदनुपूर्वशः द्विनामान्येव वर्षाणि यथैव गिरयस्तथा । उदयस्योदयं वर्ष जलधारेति विश्रुतम् ॥२० नाम्नागतभयं नाम वर्ष तत् प्रथमं स्मृतम् । द्वितीयं जलधारस्य सुकुमारमिति स्मृतम् तदेव शेशि नाम पर्ष तत् परिकीर्तितम् । नारदस्य च कौमारन्तदेव च सुखोदयम् ॥ श्यामपर्वतवर्ष तदनीचकमिति स्मृतम् । आनन्दकमितिप्रोक्तं तदेव मुनिभिः शुभम् ॥ सोमकस्य शुभं घर्ष विशेयं कुसुमोत्करम् । तदेवासितमित्युक्तं वर्ष सोमकसंज्ञितम् ॥ आविकेयस्य मैनाकं क्षेमकञ्चैव तत् स्मृतम् । तदेव ध्रुवमित्युक्तं घर्ष विभ्राजसज्ञितम् ॥ २५ ॥ द्वीपस्य परिणाहश्च ह्रस्वदीर्घत्यमेव च । जम्बूद्वीपेन संख्यातं तस्य मध्ये घनस्पतिम् । शाको नाम महावृक्षः प्रजास्तस्य महानुगाः। एतेषु देवगन्धर्वाः लिद्धाश्च सह चारण: विहरन्ति रमन्ते च दृश्यमानाश्च ते. सह । तत्र पुण्या जनपदाश्चातुर्वर्ण्यसमन्विताः ॥ तेषु नद्यश्च सप्तव प्रतिवर्ष समुद्रगाः 1 द्विनाम्ना चैव ताः सर्चा गङ्गा सप्तविधा स्मृता प्रथमा सुकुमारीति गङ्गा शिधजला शुभा। मुनितप्ता व नानपा नदी सम्परिकीर्तिता ॥३०॥ सुकुमारी तप सिद्धा द्वितीया नामतः सती । नन्दाच पावनी चैव तृतीया परिकीर्तिता - * मत्स्यपुराणम् # [एकविंशत्यधिकशततमो शिविका च चतुर्थी स्यात् द्विविधा च पुनः स्मृता । इक्षुश्च पञ्चमी ज्ञेया तथैव च पुनः कुहः ॥ ३२ ॥ वेणुका चामृता चैव पष्ठी सम्परिकीर्तिता । सुकृताच गभस्ती च सप्तमी परिकीर्तिता एता सप्त महाभागाः प्रतिवर्ष शिवोदकाः। भावयन्ति जनं सर्व शाकद्वीपनिवासिनम् अभिगच्छन्ति ताश्चान्या नदनद्यः सरांसि च । वहदकपरित्रावा यतो वर्षति घासवः ॥ तासान्तु नामधेयानि परिमाणं तथैव च । न शक्यं परिसंरयातुं पुण्यास्ता.सरिदुत्तमाः ताः पिबन्ति सदा हृष्टा नदीर्जनपदास्तु ते । एते शान्तभया: प्रोक्ताः प्रमोदा ये च वै शिवाः ॥ ३७ ॥ आनन्दाश्च सुखाश्चैव क्षेमकाच नवैः सह । वर्णाश्रमाचारयुता देशास्ते सप्त विश्रुताः। आरोग्या वलिनश्चैव सर्वे मरणवर्जिताः । अवसर्पिणी न तेप्यस्ति तथैवोत्सर्पिणी पुनः न तत्रास्ति युगायस्था चतुर्युगकृता कचित् । त्रेतायुगसमः कालस्तथा तत्र प्रवर्तते ॥ शाकद्वीपादिषु ज्ञेयं पञ्चस्वेतेषु सर्वशः । देशस्य तु विचारेण कालः स्वाभाविकास्मृतः न तेषु सङ्करः कश्चित् वर्णाश्रमकृतः क्वचित् । धर्मस्य चाव्यभीचारादेकान्तसुखिनः प्रजाः ॥ ४२ ॥ न तेषु माया लोभो वा ईर्ष्यासूया भयं कुतः । विपर्ययो न तेष्वस्ति तद्वै स्वाभाविकं स्मृतम् ॥ ४३ ॥ कालो नैव च तेष्वस्ति न दण्डो न च दाण्डिकः । स्वधर्मेण च धर्मशास्ते रक्षन्ति परस्परम् ॥ ४४ ॥ परिमण्डलस्तु सुमहान् दीपो वै कुशसंज्ञकः । नदीजलैः परिवृतः पर्वतश्चाभ्रसन्निभैः। सर्वधातुविचित्रश्च मणिविद्रुमभूपितैः । अन्यैश्च विविधाकार रम्यैर्जनपदैस्तथा ॥४६॥ वृक्ष पुष्पफलोपेतैः सर्वतो धनधान्यवान् । नित्यं पुष्पफलोपेतः सर्वरत्नसमावृतः ॥ आवृतः पशुभिः सर्वैामारण्यश्च सर्वशः । आनुपूर्षात् समासेन कुशद्वीपं नियोधत ॥ अथ तृतीयं वक्ष्यामि कुशद्वीपञ्च कृत्स्नशः । कुशद्वीपेन क्षीरोद. सर्वतः परिवारितः ॥ शाकद्वीपस्य विस्तारो द्विगुणेन समन्वित । तत्रापि पर्वताः सप्त विज्ञेया रत्नयोनयः ।
ऽध्यायः] * कुशद्वीपवर्णनम् * रताकारस्तथा नास्तेपां नामानि मे शृणु । द्विनामानश्च ते सर्व शाकद्वीपे यथा तथा॥ प्रथमः सूर्यसङ्काशः कुमुदो नाम पर्वतः । विद्रुमोचय इत्युक्तः स एव च महीधरः ।। सर्वधातुमयः शृङ्खः शिलाजालसमन्वितैः । द्वितीय पर्वतस्तत्र उन्नतो नाम विश्रुतः ॥ हेमपर्वत इत्युक्तः स एव च महीधरः । हरितालमयः शृङ्गे द्वीपमावृत्य सर्वशः ॥५४॥ यलाहकस्तृतीयस्तु जात्यानमयो गिरि । द्युतिमानामतः प्रोक्तः स एव च महीधरः॥ चतुर्थः पर्यतो द्रोणो यत्रॉपध्यो महागिरी । विशल्यकरणी चैच मृतसञ्जीवनी तथा ॥ पुष्पवान्नाम संवोक्तः पर्वतः सुमहाचितः । कङ्कस्तु पञ्चमस्तेषां पर्वतो नाम सारवान्।। कुशेशय इति प्रोक्तः पुनः स पृथिवीधरः । दिव्यपुष्पफलोपेतो दिव्यचील्समन्वितः ।। “यष्ठस्तु पर्वतस्तत्र महियो मेघसनि । स एव तु पुनः प्रोको हरिरित्यमिविश्रुतः ॥ तस्मिन् सोऽग्निनियसति महिपो नाम योऽप्सुजः ! सप्तमः पर्वतस्तत्र ककुमान् स हि भापते ॥६॥ मन्दरः सैव विज्ञेयः सर्वधातुमयः शुमः । मन्द इत्येप यो धातुरपामर्थे प्रकाशकः ॥६१ अपां विदारणाचैव मन्दरःस निगद्यते । तत्र रक्षान्यनेकानि स्वयं रक्षति घासवः ॥६२ प्रजापतिमुपादाय प्रजाभ्यो विदधत् स्वयम् । तेषामन्तरविष्कम्भो द्विगुणःसमुदाहृतः इत्येते पर्वताः सप्त कुशद्वीपे प्रभाषिताः। तेषां धर्षाणि वक्ष्यामि सप्तैव तु विभागशः॥ कुमुदस्य स्मृतः श्येत उन्नतश्चैव स स्मृतः । उन्नतस्य तु विज्ञेयं वर्ष लोहितसंज्ञकम् ॥ वेणुमण्डलकञ्चव तथैव परिकीर्तितम् ।यलाहकस्य जीमूतः स्यरथाकारमित्यपि ॥६॥ द्रोणस्य हरिक नाम लवणश्च पुनः स्मृतम् । कङ्कस्यापि फकुन्लाम धृतिमञ्चैव तत् स्मृतम् ॥ ६७ ॥ 'महिषं महिपस्यापि पुनश्चापि प्रभाकरम्। ककुद्मिनस्तु यद्वर्ष कपिलं नाम विश्रुतम् ॥ 'एतान्यपि विशिष्टानि सप्त सप्त पृथक् पृथक् । वर्षाणि पर्वताश्चैव नदीस्तेषु नियोधता तत्रापि नद्यः सप्तव प्रतिवर्ष हि ताः स्मृताः । द्विनामपत्यस्ताः सर्वाः सर्वाः पुण्यजलाः स्मृताः ॥७०॥ धूतपापा नदी नाम योनिश्चैव पुनः स्मृता ।
२८८ * मत्स्यपुराणम् * [एकविंशत्यधिकशततमो सीता द्वितीया विज्ञया सा चैव हि निशा स्मृता ॥ ७१ ॥ पवित्रा तृतीया ज्ञेया वितृष्णापि च या पुनः । चतुर्थी हादिनीयुक्ता चन्द्रमा इति च स्मृता ॥ ७२ ॥ विद्युच्च पञ्चमी प्रोक्ता शुक्लाचैव विभाव्यते। पुण्ड्रा पष्ठी तु विज्ञेया पुनश्चैव विभावती महती सप्तमी प्रोक्ता पुनश्चैपा धृतिः स्मृता । अन्यास्ताभ्योऽपि साताः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ७४ ॥ अभिगच्छन्ति ता नद्यो यतो वर्षतिघासवः । इत्येष सन्निवेशो वःकुशद्वीपस्य वणितः शाकद्वीपेन विस्तारः प्रोक्तस्तस्य सनातनः । कुशद्वीपः समुद्रेण घृतमण्डोदकेनच ॥७६ सर्वत सुमहान् द्वीपश्चन्द्रवत् परिवेटित'। विस्तारान्मण्डलाच्चघ क्षीरोदाद्विगुणोमतः ततः परं प्रवक्ष्यामि क्रौञ्चद्वीपं यथा तथा। कुशद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणस्तस्य विस्तर. ॥ ७८ ॥ घृतोदक समुद्रो वै क्रौञ्चद्वीपेन संवृतः । चक्रनेमिप्रमाणेन वृतो वृत्तेन सर्वशः ॥७॥ तस्मिन् द्वीपे नरा. श्रेष्ठा देवनो गिरिरुच्यते । देवनात्परतश्चापि गोविन्दो नाम पर्वतः गोविन्दात् परतश्चापि क्रौञ्चस्तु प्रथमोगिरिः। क्रौञ्चात्परे पावनकः पाचनादन्धकारकः अन्धकारात्परे चापि देवावृन्नाम पर्वत । देवावृतः परेणापि पुण्डरीको महान् गिरिः एते रत्नमया सप्त क्रौञ्चद्वीपस्य पर्वताः । परस्परस्य द्विगुणो विष्कम्भो घर्षपर्वत । घर्षाणि तस्य पक्ष्यामि नामतस्तु नियोधत । क्रौञ्चस्य कुशलो देशो वामनस्य मनोऽनुगः ॥ ८४ ॥ मनोऽनुगात्परे चोष्णस्तृतीयोऽपि स उच्यते । उष्णात्परे पाचनक पावनादन्धकारका अन्धकारकदेशात्तु मुनिदेशस्तथापरः । मुनिदेशात् परे चापि प्रोच्यते दुन्दुभिस्वनः । सिद्धवारणसङ्कीर्णो गौपाय. शुचिर्जनः । श्रुतास्तत्रय नद्यस्तु प्रतिवर्षङ्गताः शुभाः नारी कुमुद्रती चैव सन्ध्या रात्रिर्मनोजवा। ख्याती च पुण्डरीका च गङ्गा सप्तविधाः स्मृताः ॥८८॥ तासांसहस्रशश्चात्या नद्य. पावसमीपगाः । अभिगच्छन्ति ता नद्यो बहुलाश्च वहदकाः ॥
ऽध्यायः * शाल्मलद्वीपवर्णनम् । २८६ तेषां निसगौ देशानामानुपूर्वेण सर्वशः । न शक्मो विस्तराद्वक्तुमपि वर्षशतैरपि ॥६॥ सर्गायश्च प्रजानान्तु संहारो यश्च तेपु वै । अत ऊध्य प्रवक्ष्यामि शाल्मलस्यनियोधत शाल्मलो द्विगुणो द्वीपः क्रौञ्चद्वीपस्य विस्तरात् । परिवार्य समुद्न्तु दधिमण्डोदकं स्थितम् ॥ १२ ॥ तत्र पुण्या जनपदाचिराध नियते जनः । कुत एव तु दुर्भिक्षं क्षमातेजोयुता हि ते ॥ प्रथमःसूर्य्यसङ्काशःसुमना नाम पर्वतः । पीतस्तु मध्यमश्वासीत्ततः कुम्भमयो गिरिः ।। नाना सर्वसुखो नाम दिव्योपधिसमन्धितः । तृतीयश्चैव सौवर्णोभृगपत्रनिभो गिरिः सुमहान् रोहितो नाम दिव्यो गिरिघरो हि सः । सुमनाः कुशलो देशः सुसोदकः सुसोदयः ॥ ६ ॥ रोहितो यस्तृतीयस्तु रोहिणो नाम विश्रुतः । तत्र रत्नान्यनेकानि स्वयं रक्षति पासवः प्रजापतिमुपादाय प्रसन्नो विदधत् स्वयम् । न तत्र मेघा घर्षन्ति शीतोष्णश्च न तद्विधम् घर्णाश्रमाणां पार्ता घा त्रिषु द्वीपेषु विद्यते । न ग्रहो न च चन्द्रोऽस्ति ईर्ष्याऽसूया भयं तथा MEET उद्विदान्युकान्यत्र गिरिप्रस्रवणानि च । भोजनं पसं तत्र तेषां स्वयमुपस्थितम् ॥ अधमोत्तमं न तेप्यस्ति न लोभो न परिग्रहः । भारोग्ययलयन्तश्च एकान्तमुसिनो नराः त्रिशर्षसहस्राणि मानसी सिद्धिमास्थिताः । सुरामायुश्च रूपश्च धर्मश्वर्यन्तथैव च ॥ १० ॥ शाल्मलान्तेपु विक्षयं द्वीपेषु निपु सर्वतः । घ्याव्यातः शाल्मलान्तानां द्वीपानान्तु विधिः शुभः ।। १०३ ॥ परिमण्डलस्तु दीपस्य चक्रपत् परिवेष्टितः । सुरोदेन समुद्रण द्विगुणेन समन्धितः ॥ १०४॥ इति श्री मत्स्यमहापुराणे मोश्चशाल्मलदीप वर्णननामेकाविशत्यधिकशततमोऽध्यायः । ८ द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः गोमेदकपुष्फरद्वीपयोवर्णनम् । सून उपाचा गोमेदकं प्रपक्ष्यामि पष्ठं होणं तपोधनाः! । मुरोदफसमुदस्तु गोमेदेन समागृतः ॥१६ शाल्मायर पनु विस्ताराद्विगुणम्नम्यपिस्ताः। तम्मिन्द्वीपे नपिनेयापरतोटोसमाधितों प्रथमः मुमना नाम जान्यानमयो गिरिः । द्वितीयः पुमुदो नाम सर्वोपधिसमन्वितः। शातफोरममयः श्रीमान् वि यः सुमहावितः । समुद्रक्षरसोदेन गृतो गोमेदश्च सः॥ पप्ठेन तु समुद्रेण मुरोदाइ हिगुणेन च । धातको पुमुदश्चय हायपुरी सुपिम्तृतौ । सामने प्रथमं घर धातकोमण्डमुन्यते ।धातकिनः स्मृतं त प्रथमं प्रथमस्य तु ॥ गोमेदं यत् स्मृनं घर्ष नाम्ना सर्यसुपन्तु तन् । फुमुदस्य द्वितीयम्य द्वितीयं कुमुदं ततः ॥ ७॥ एती ठौ पर्वती वृत्ती शेपी सर्यसमुचिकृतौ । पूर्वेण तस्य द्वीपस्य सुमनाः पर्वतः स्थितः ॥ ८॥ प्रापश्चिमायतैः पादरासमुद्रादिति म्पितः । पश्चार्द्ध कुमुदस्तस्य परमेव स्थितस्तु वै । एतैः पर्वतपादस्तु स देशो चै द्विधारतः । दक्षिणा? तु द्वीपस्य धातकोपण्डमुच्यते । कुमुदन्तृत्तरे तस्य द्वितीयं घर्षमुत्तमम् । एतौ जनपदो द्वौ तु गोमेदस्य तु विस्तृतौ । अतःपरं प्रवक्ष्यामि सतमं द्वोपमुत्तमम् । समुदेवरसं चैव गोमेदाद्विगुणं हि सः आवृत्य तिष्ठति द्वीपः पुष्करः पुष्करवृतः । पुष्करेण वृतः श्रीमांचिरसानुर्महागिरिः ॥१३॥ कृटैश्चित्रमणिमयः शिलाजालसमुद्भवः । द्वोपत्त्यैव तु पूर्वार्द्ध वित्रसानुः स्थितो महान् ॥ १४ ॥ परिमण्डलसहस्राणि विस्तीर्ण. पञ्चविंशतिः । उद्ध्वंसवै चतुर्विशद्योजनानां महाबलः ऽध्यायः] * पुष्करद्वीपवर्णनम् * २६१ द्वीपार्द्धस्य परिक्षिप्तःपश्चिमे मानसो गिरिः । स्थितो बेलासमीपेतु पूर्णचन्द्र इवोदितः योजनानां सहस्राणि साद्धं पञ्चाशदुच्छ्रितः । तस्य पुत्रो महावीतः पश्चिमार्द्धस्य रक्षिता ॥ १७ ॥ पूर्वार्दू पर्वतस्यापि द्विधा देशस्तु स स्मृतः । स्वादूदफेनोदधिनापुष्करः परिवारितः ॥ विस्तारान्मण्डलाच गोमेदाद्विगुणेन नु । त्रिंशद्वर्षसहस्राणि तेपु जीवन्ति मानपाः विपर्ययो न तेप्यस्ति पतन् स्वाभाविकं स्मृतम् । थारोग्यं सुसबाहुल्यं मानसी सिद्धिमास्थिताः ॥२०॥ सुसमायुश्च रूपञ्च निपु द्वीपेषु सर्वशः । अधमोत्तमा न तेप्यास्तांतुल्यास्तेवीर्य्यरूपतः न तन पध्ययधी नेासूया भयं तथा 1 न लोभो न च दम्भी पा न च द्वेषः परिग्रहः सत्यानृतेन तेप्यास्तां धर्माधर्मी तथैव च । वर्णाश्रमाणांपाचपाशुपाल्यं घणिकपिः श्रीविद्या दण्डनीति शुश्रूषा दण्डएपच । न तत्र पर्ष नद्योवा शीतोष्णञ्च न विद्यते। उद्विदान्युदकानि स्युगिरिप्रस्रवणानि च । तुल्योत्तरकुरूणान्तु कालस्तत्र तु सर्वदा ॥ २५ ॥ सतः सुग्पकालोऽसी जगहेशविवर्जितः । सर्गस्तु धातकीपण्डे महाचीते तथैव च ॥ २६ ॥ एवं द्वीपाः समुद्रस्तु सप्तसप्तभिरावृताः । द्वीपस्यानन्तरो यस्तु समुद्रस्तत् समस्तु वे। एवं द्वीपसमुद्राणां वृद्धिोया परस्परम् । अपाचच समुद्रेफात् समुद्र प्रति संगित ॥ ऋपढसन्त्यो पर्षे पु प्रजा यत्र चतुर्विधाः । ऋपिरित्येव रमणे घर्पन्त्येतेन तेषु ॥२६॥ उदयतीन्दी पूर्व तु समुद्रः पूर्यते सदा । प्रक्षीयमाणे यहुले क्षीयतेऽस्तमिते चचे ॥३०॥ मापूर्यमाणो दधिरात्मनेयापि पूर्यते । ततो ये क्षीयमाणे तु स्वात्मन्येव हपां क्षयः ॥ ३१॥ उदपान पयसां योगान पुष्णन्यापो यथा स्वपम् । तगा स तु समुदोऽपि पड़ने शशिनोदये ॥३२॥ भन्यूनानतिरिकामा पन्त्यापोरमन्ति च । उदयेऽम्तमये पेन्दो पक्षयोःशुष्ट रयो-शुष्ट २६२ * मत्स्यपुराणम् * [द्वाविंशत्यधिकशततमो क्षयवृद्धी समुद्रस्य शशिवृद्धिक्षये तथा । दशोत्तराणि पञ्चाहुरङ्गुलानां शतानि च ।। अपांवृद्धिःक्षयोदृष्टःसमुद्राणान्तु पर्वसु । द्विरापत्वात् स्मृतोद्वीपोदधनाचोदधिःस्मृतः अपशीर्णात्तु गिरयो पर्वयन्धाच्च पर्वताः । शाकद्वीपे तु वैशाकः पर्वतस्तेन वोच्यते ॥ कुशद्वीपे कुशस्तम्यो मध्ये जनपदस्य तु । क्रौञ्चद्वीपे गिरिः क्रौञ्चस्तस्य नाम्ना निगद्यते ॥ ३७ ॥ शाल्मलिः शाल्मलद्वीपे पूज्यते स महामः । गोमेदके तु गोमेदः पर्वतस्तेन चोच्यते॥ न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे पद्मवत्तेन सः स्मृतः । पूज्यतेस महादेवैर्ब्रह्मांशो व्यक्तसम्भवः ॥ तस्मिन् स वसति ब्रह्मा साध्यैः साद्धं प्रजापतिः । तत्र देवा उपासन्ते त्रयस्त्रिंशन्महर्षिभिः ॥ ४०॥ स तत्र पूज्यते देवो देवैर्महर्पिसत्तमैः । जम्बूद्वीपात्प्रवर्तन्ते रतानि विविधानि च ॥४१॥ द्वीपेषु तेषु सर्वेषु प्रजानां क्रमशस्तु वे । आर्जवात् ब्रह्मचर्येण सत्येन च दमेन च॥४२॥ आरोग्यायुःप्रमाणाभ्यां द्विगुणं द्विगुणं ततः। द्वीपेषु तेषु सर्वेषु यथोक्तं वर्षकेषु च ॥ गोपायन्ते प्रजास्तत्र सर्वैः सहजपण्डितैः । भोजनञ्चाप्रयत्नेन सदा स्वयमुपस्थितम् ॥ पसं तन्महावीर्य तत्र ते भुञ्जते जनाः । परेण पुष्करस्याथ आवृत्यावस्थितो महान् ॥ स्वादूदकसमुद्रस्तु स समन्तावेष्टयत् । स्वादूदकस्य परित: शैलस्तु परिमण्डलः ॥ प्रकाशश्चाप्रकाशश्च लोकालोकः स उच्यते । आलोकस्तत्र चार्वाक् च निरालोकस्ततः परम् ॥ ४७ ॥ लोकधिस्तारमात्रन्तु पृथिव्याईन्तु पाह्यतः । प्रतिच्छन्नं समन्तात्तु उदकेनावृतं महत् ॥ ४८ ॥ भूमेर्दशगुणाश्चापः समन्तात् पालयन्ति गाम्। अभ्यो दशगुणश्चाग्नि सर्वतो धारयत्यपः ॥ ४६॥ भानेर्दशगुणोवायुर्धारयज्योतिरास्थित । तिर्यक्रमंडलोघायु तान्यावेष्ट्यधारयन् दशाधिक तथाकाशं पायोर्भूतान्यधारयत् । भूतादिधारयन् व्योम तस्माद्दशगुणस्तु वै 5 ।
ऽध्यायः] * सप्तद्वीपसमुद्रवर्णनम् . २६३ भूतादितो दशगुणं महद्भूतान्यधारयत् । महत्तत्व धनन्तेन भव्यक्तेन तु धार्यते ५२॥ आधाराधेयभावेन विकारास्ते विकारिणाम् ॥५३॥ पृथ्यादयो विकारास्ते परिच्छिन्नाः परस्परम् । परस्पराधिकाश्चैवप्रविष्टाश्चपरस्परम् एवं परस्परोत्पन्नाधार्यन्तेचपरस्परम् । यस्मात्प्रविष्टास्तेऽन्योन्यंतस्मात्तेस्थिरतांगताः आसंस्ते ह्यविशेषाश्च विशेषा अन्यवेशनात् ॥ ५५ ॥ पृथ्व्यादयस्तु पाठ्यन्ताः परिच्छिन्नास्तु तत्र ते । भूतेभ्यः परतस्तेभ्यो हालोक सर्वतः स्मृतः ॥५६॥ तथा ह्यालोक आकाशे परिच्छिन्नानि सर्वशः। पात्रे महति पत्राणि यथा ह्यन्तगतानि च ॥७॥ भवन्त्यन्योन्यहीनानि परस्परसमाश्रयात् । तथा द्यालोक आकाशे भेदास्त्वन्तर्गता गताः ॥५८॥ कृतान्येतानि तत्त्वानि अन्योन्यस्याधिकानि तु । यावदेतानि तत्त्वानि तावदुत्पत्तिरुच्यते ॥७॥ जन्तूनामिह संस्कारो भूतेप्वन्तर्गनेषु वै । प्रत्यारयायेह भूतानि कार्योत्पत्तिर्न विद्यते तस्मात्परिमिताभेदा स्मृता.कार्यात्मकास्तुवै । तेकारणात्मकाश्चैवस्युर्भेदामहदादयः इत्येवं सन्निनेशोऽयं पृळ्याकान्तस्तु भागशः । सप्तद्वीपसमुद्राणां याथातथ्येन मया विस्तारान् मण्डलाच्चैव प्रसंख्यानेन चैव हि । विश्वरूपं प्रधानस्य परिमाणेकदेशिनः एतावत्सन्निवेशस्तु मया सम्यक् प्रकाशित ॥६॥ एतापदेव श्रोतयं सन्निवेशस्य पाधिय । अत ऊदचंप्रवक्ष्यामिसाचन्द्रमसो तिम् इति श्रीमत्स्यपुराणे सप्तद्वीप समुद्र वर्णनं नाम द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।
त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः पृथिवीपरिमाणवर्णनम् । सूत उवाच मत उद्ध्वं प्रवक्ष्यामि सूर्याचन्द्रमसोर्गतिम् । सूर्याचन्द्रमसावेतो भ्राजन्तीयावदेवतु सप्तद्वीपसमुद्राणां द्वीपानां भाति विस्तरः । विस्तरार्द्ध पृथिव्यास्तु भवेदन्यत्र बाह्यतः पर्यासपरिमाणञ्च चन्द्रादित्यो प्रकाशतः । पर्यासपारिमाण्यात्तु बुधैस्तुल्यं दिधः स्मृतम् ॥३॥ त्री लोकान् प्रतिसामान्यात् सूर्यो यात्यविलम्वतः । अविरात्तु प्रकाशेन भवनात्तु रविः स्मृतः ॥४॥ भूयो भूय. प्रवक्ष्यामि प्रमाणं चन्द्रसूर्ययोः। महितत्वान्महच्छन्दोह्यस्मिन्नर्थनिगद्यते अस्य भारतवर्षस्य विष्कम्भात्तुल्यविस्तृतम् । मण्डलंभास्करस्याथयोजनस्तन्नियोधत नवयोजनसाहस्रो विस्तारो मण्डलस्य तु । विस्तारत्रिगुणश्चापिपरिणाहोऽत्र मण्डले विष्कम्मान मण्डलाच्चैच भास्कराद् द्विगुणः शशी। अतः पृथिव्या वक्ष्यामि प्रमाणं योजनः पुनः ॥८॥ सप्तद्वीपसमुद्राया विस्तारो मण्डलस्य तु । इत्येतदिह संख्यातं पुराणे परिमाणतः ॥ तश्यामि प्रसंख्याय साम्प्रतश्चाभिमानिभिः । अभिमानिनो घतीता ये तुल्यास्ते साम्प्रतस्त्विह ॥१०॥ देवदेवरतीतास्तु रूपैर्नामभिरेव च । तस्माद्वै साम्प्रतैर्देवैर्वक्ष्यामिधसुधातलम् ॥११॥ दिन्यस्य सन्निवेशोचे साम्प्रतैरेधकृत्स्मशः । शताईकोटिविस्तारापृथिवीकृत्स्नश स्मृता तस्याश्चार्द्धप्रमाणञ्च मेरोश्चैवोत्तरोत्तरम् । मेरोर्मध्ये प्रतिदिशं कोटिरेकातुसा स्मृता तथा शतसहस्राणामेकोननवति पुनः । पञ्चाशच्च सहस्राणि पृथिव्यर्द्धस्य विस्तरः पृथिव्या विस्तरं कृत्स्नं योजनेस्तन्नियोधत ।
ऽध्यायः] * आकाशपरिमाणवर्णनम् * तिनः कोट्यस्तु घिस्तारात् संख्यातास्तु चतुर्दिशम् ॥१५॥ तथा शतसहस्राणामेकोनाशीतिरुच्यते । सप्तद्वीपसमुद्रायाः पृथिव्याः स तु विस्तरः विस्तारं त्रिगुणञ्चैवपृथिव्यन्तरमण्डलम् । गणितंयोजनानान्तु कोट्यस्त्वेकादशस्मृता तथा शतसहस्राणां सप्तत्रिंशाधिकास्तु ताः । इत्येतद्वैप्रसंख्यातं पृथिव्यातरमण्डलम् तारकासन्निवेशस्य दिवि याचत्तु मण्डलम् । पर्याप्तसन्निवेशस्य भूमेस्तावत्तु मण्डलम् ॥१८॥ पर्यासपरिमाणच भूमेस्तुल्यं दिवः स्मृतम् । मेरो.प्राच्यादिशायान्तुमानसोचमूद नि पस्त्वेकसारामाहेन्द्री पुण्या हेमपरिष्कृता । दक्षिणेन पुनमैरोर्मानसस्य तु पृष्टतः ॥२० वैवस्वतो निवसति यमः संयमने पुरे । प्रतीच्यान्तु पुनरोर्मानसस्य तु मूर्द्धनि । सुपा नाम पुरी रम्या घरुणस्यापि धीमतः । दिश्युत्तरायां मेरोस्तु मानसस्यैव मूर्द्धनि तुल्या महेन्द्रपुर्यापि सोमस्यापि विभावरी । मानसोत्तरपृष्ठे तु लोकपालाश्चतुर्दिशम् स्थिता धर्मव्यवस्था लोकसंरक्षणाय च । लोकपालोपरिष्टात्तु सर्वतोदक्षिणायने ॥ फाष्ठागतस्य सूर्यस्य गतिस्तत्र नियोधत । दक्षिणोपरमे सूर्यः क्षिप्तेपुरिघ सर्पति ज्योतिषाचनमादाय सततं परिगच्छति । मध्यगश्यामरायत्यां यदा भवति भास्कर. ॥ वैवस्वते संयमने उद्यन् सूर्य प्रदृश्यते । सुपायाम रावस्तु विभावर्यास्तमेति च ॥ वैवस्वते संयमने मध्याहे तु रविर्यदा । सुपायामय पारण्यामुत्तिष्ठन् स तु दृश्यते ॥२८॥ विभाषर्यामर्द्धरानं माहेन्द्रयामस्तमेव च । सुपायामय पारण्यां मध्याह तु रविर्यदा॥ विभाषा सोमपुा उत्तिष्ठति विभावसु । महेन्द्रस्यामरायत्यामुद्गच्छति दियाफरः ॥३णा भद्धरावंसंयमने पारुण्यामम्तमेति व।स शीटमेव पर्यति मानुगलातचक्रवत् ॥३१॥ भ्रमन् ये भ्रममाणानि क्षाणि चरने रमिः। एवं चतुएं पापु दक्षिणां तेषु सर्पति ॥३२॥ पा
२६६
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* मत्स्यपुराणम् * [प्रयोविंशत्यधिकशततमो
पूर्वाद चापराहे च द्वौ द्वो देवालयो तु स ॥३३॥
पतत्येकन्तु मध्याह्न भाभिरेव च रश्मिमि ।
उदितो बर्द्धमानाभिर्मध्याह तपते रवि ॥३४॥
अत पर हसन्तीभिगोभिरस्त स गच्छति ।
उदयास्तमयाभ्या च स्मृते पूर्वापरे तु वै ॥३५॥
यादक पुरस्तात्तपति यादृय पृष्ठे तु पार्श्वयो. । यत्रोदयस्तु दृश्येत तेषांसउदय स्मृत
प्रणाश गच्छते यत्र तेपामस्त स उच्यते । सर्वंपामुत्तरे मेरुलोकालोकस्य दक्षिणे॥
विदूरभावादकस्य भूमेरेया गतस्य च । श्रयन्ते रश्मयो यस्मात्तेन रात्री न दृश्यते ॥
ऊदुवं शतसहस्राशु स्थितस्तत्र प्रदृश्यते । एर पुष्करमध्ये तु यदा भवति भास्कर'
त्रिंशदागच मेदिन्या मुहूर्तेन स गच्छति । योजनाना सहस्रस्य इमासख्या निबोधत
पूर्ण शतसहस्राणा एकत्रिंशच्च सास्मृता । पञ्चाशवसहस्राणितधान्यान्यधिकानिच
मौहर्तिकी गतिहीपा सूर्य्यस्य तु विधीयते । एतेन क्रमयोगेन यदा काठान्तु दक्षिणाम्
परिगच्छति सूर्योऽसी मास काष्ठामुदक दिनात् ।
मध्येन पुष्करस्याथ भ्रमते दक्षिणायने ॥४॥
मानसोत्तरमेरोस्तु अन्तर त्रिगुण स्मृतम् । सर्वतो दक्षिणायान्तुकाष्ठायातन्नियोधत
नवकोट्य प्रसख्याता योजने परिमण्डलम् । तथा शतसहस्राणि चत्वारिंशञ्च पञ्चव
अहोरात्रात् पतस्य गतिरेषा विधीयते । दक्षिणादिडनिवृत्तोऽसौधिपुवस्योपदारपि
क्षीरोदम्य समुद्रस्योत्तरतोऽपि दिश चरन् । मण्डल विपुवच्चापियोजनस्तनिवोधत
तिन कोट्यस्तु सम्पूर्णा वियुवस्यापि मण्डलम् ।
तथा शतसहस्राणि विंशत्येकाधिकानि तु ॥४८॥
श्रावणे चोत्तरा काष्ठा चित्रभानुर्यदा भवेत् । गोमेदस्य परद्वीपे उत्तराञ्च दिश चरन
उत्तराया प्रमाणन्तु काप्ठाया मण्डलस्य तु।
दक्षिणोत्तरमध्यानि तानि विन्यायथाक्रमम् ॥५०॥
जरद्गव मध्ये तथैरावतमुत्तरम् । वैश्वानर दक्षिणतो निर्दिष्टमिह तत्त्वत ॥५१॥
२६७ ऽध्यायः] * सूर्यगतिवर्णनम् * नागवीव्युत्तरा पीथी ह्यजवीथिस्तु दक्षिणा । उभे आपादमूलन्तु अजवीथ्यादयस्त्रयः अभिजित् पूर्वतः स्वातिन्नागपीथ्युत्तरालयः । अश्विनीरुत्तिकायाम्यानागवीथ्यस्त्रयः स्मृताः ॥५३॥ रोहिण्यार्दा मृगशिरो नागोथिरिति स्मृता । पुष्याश्लेषा पुनर्वस्वोर्वीथी चैरायती स्मृता ॥५४॥ बिस्रस्तु वीथयो ह्येता उत्तरामार्ग उच्यते । पूर्वउत्तरफल्गुन्यो मघा चैवार्षभी भवेत् पूर्वोत्तरप्रोष्ठपदी गोचीधी रेवती स्मृता । श्रवणञ्च धनिष्ठा च धारुणञ्च जरद्गवम् ॥ एतास्तु घीथयस्तिस्रो मध्यमोमार्गउच्यते । हस्तवित्रातथास्वातीह्यजवीथिरितिस्मृता जेष्ठा विशासा मैत्रञ्च मृगवीथी तथोच्यते । मूलं पूर्वोत्तरापाढ़े पीथोवैश्वानरी भवेत् स्मृतास्तिस्रस्तु घोत्यस्ता मार्गे वै दक्षिणेपुनः । काष्ठयोरन्तरञ्चैतद्वक्ष्येयोजनःपुनः ।। एतच्छतसहस्राणामेकशित्तुबै स्मृतम् । शतानि त्रीणि चान्यानि त्रयस्त्रिंशत्तथैव च फाप्ठयोरन्तरं ह्येतद्योजनानां प्रकीर्तितम् । काष्ठयोर्लेपयोश्चैव अयने दक्षिणोत्तरे ।। ते पक्ष्यामि प्रसंख्याय योजनेस्तु नियोधत । एकैकमन्तरं तद्वद्युक्तान्येतानि सप्तभिः सहस्रेणातिरिक्ता च ततोऽन्या पञ्चविंशतिः । लेपयोः काष्ठयोश्चैव वाह्याभ्यन्तरयोश्चरन् ॥६३॥ अभ्यन्तरं स पति मण्इलान्युत्तरायणे । बाह्यतो दक्षिणेनेर सततं सूर्यमण्डलम् । चरन्नसाबुदीच्याच घशीत्या मण्डलान् शतम् । अभ्यन्तरं स पर्येति क्रमते मण्डलानि तु ॥६५॥ प्रमाण मण्डलस्यापि योजनानानियोधत । योजनानां सहस्राणि दश चाटी तथा स्मृतम् ॥६६॥ अधिकान्यष्टपञ्चाशयोजनानि तु वै पुनः । विष्कम्मो मण्डलस्यैव तिर्यक् स तु विधीयते ॥ ६७ ॥ अहस्तु चरतेनाभः सूश्यों वै मण्डलंक्रमात् । कुलालवरुपर्यन्तो यथा चन्द्रो रविस्त दक्षिणे चक्रवत् सूर्यस्तथाशीघ्रं निवर्तते । तस्मात्प्रष्ट भूमि तु फालेनाल्नग - २६८ * मत्स्यपुराणम् * [त्रयोविंशत्यधिकशततमो सूर्यो द्वादशभिः शीघ्र मुहत्तैर्दक्षिणायने । त्रयोदशार्द्धमृक्षाणां मध्ये चरति मण्डलम् मुहूर्तस्तानि ऋक्षाणि नक्तमष्टादशश्चरन् । कुलालवक्रमध्यस्थो यथा मन्दं प्रसर्पति॥ उदग्याने तथा सूर्यः सर्पते मन्दविक्रम । तस्माद्दीघेण कालेन भूमि सोऽत्पां प्रसर्पति सूर्योऽष्टादशभिरहो मुहतरदगायने ॥ ७२ ॥ त्रयोदशानां मध्ये तु ऋक्षाणा चरते रवि । मुहूर्तेस्तानि ऋक्षाणि रात्री द्वादशभिश्चरन् ॥ ७३ ॥ ततो मन्दतरं ताभ्यां चक्रन्तु भ्रमते पुन । मृत्पिण्ड इव मध्यस्थोभ्रमतेऽसोध्रुवस्तथा मुहूर्तस्त्रिंशता तावदहोरात्रं ध्रुवो भ्रमन् । उभयोः काष्टयोर्मध्ये भ्रमते मण्डलानि तु ॥ उत्तरक्रमणेऽर्कस्य दिवा मन्दगति स्मृता । तस्यैव तु पुनर्नक्त शीघ्रा सूर्यस्य वैगति दक्षिणप्रक्रमे पापि दिघा शीघ्र विधीयते । गति सूर्यस्य वै नक्तं मन्दा चापि विधीयते एवं गतिविशेषेण विभजन राज्यहानि तु । अजवीथ्या दक्षिणाया लोकालोकस्य चोत्तरम् ।। ७८ ॥ लोकसन्तानतोोप वैश्वानरपथावहि । व्युष्टिर्यावत् प्रभा सौरी पुष्करात् संप्रवर्त्तते पार्श्वभ्यो वाह्यतस्तावल्लोकालोकश्च पर्वत । योजनाना सहस्राणि दशोचं चोच्छितो गिरिः ॥ ८ ॥ प्रकाशश्चाप्रकाशश्च पर्वत परिमण्डल । नक्षत्रचन्द्रसूर्याश्च ग्रहास्तारागणै. सह ॥८१ अभ्यन्तरे प्रकाशन्ते लोकालोकस्य वै गिरे । एतापानेचलोकरतु निरालोकस्तत परम् लोक आलोकने धातुनिरालोकस्त्वलोकता। लोकालोको तु संधत्ते तस्मात् सूर्यः परिभ्रमन् ॥ ८३ ॥ तस्मात्सन्ध्येतितामा स्याव्युटैर्यथान्तरम् । उपारात्रि स्मृताविप्रैच्युष्टिश्चापिभह स्मृतम् । त्रिंशत्कलो मुहूर्तस्तु अहस्ते दशपञ्च च । हासो वृद्धिरह गदिवसाना यथा तु वै ॥ सन्ध्या मुहूर्तमात्रायां हासवृद्धी तु ते स्मृते । लेखाप्रभृत्यधादित्ये त्रिमुहूर्तागते तु वै स्मृतस्तत कालीभागाश्चाहुश्च पञ्चच । तस्मात् प्रातर्गतात्कालान्मुहूर्ता सङ्गवस्त्रय. मध्याहस्त्रिमुहूर्तस्तुतस्मात्कालादनन्तरम् । तस्मान्मध्यन्दिनाकालाअपरामरतिस्मृतः .
ऽध्यायः] * ग्रहाणां गतिवर्णनम् * २६६ प्रय पर मुहूर्तास्तु फाल एषस्मृतो बुधैः । अपराहव्यतीताय कालः सायं स उच्यते । दशपञ्च मुहर्ताहो मुहर्तास्त्रय एष च । दशपञ्च मुहतं च सहस्तु विपुषे स्मृतम् ॥ १०॥ पर्धत्यतो हसत्येव अयने दक्षिणोत्तरे । अहस्तु ग्रसते गनि रात्रिस्तु असते अहः ॥ शरदसन्तयोर्मध्यं विधुवन्तुविधीयते । आलोकान्त स्मृतोलोको लोकाचालोकउच्यते लोकपाला: स्थितास्तत्र लोकालोकस्य मध्यतः। चत्वारस्ते महात्मानस्तिष्ठन्त्याभूतसंप्लवम् ॥ १३॥ सुधामा चैच बैराजः कर्दमश्च प्रजापतिः । हिरण्यरोमापर्जन्यः केतुमान् राजसश्च सः निर्द्वन्टा निरभीमाना निस्तन्द्रा निप्परिग्रहाः । लोकपाला: स्थितास्त्येते लोकालोके चतुर्दिशम् ॥ १५ ॥ उत्तरं यदगस्त्यस्य श्रङ्गं देवपिसेवितम् । पितृयानः स्मृत' पन्था वैश्वानरपथावहिः।। तनासते प्रजाकामा ऋश्योयेऽसिहोत्रिणः । लोकस्य सन्तानकराः पितृयानेपथिस्थिताः भूतारम्भस्तं कर्म आशिषश्चविशाम्पते ! । प्रारम्भन्ते लोककामास्तेषापन्या सदक्षिणः चलितन्ते पुनर्धर्म स्थापयन्ति युगे युगे । सन्तप्ततपसा चैव मर्यादाभि श्रुतेन च ॥६॥ जायमानास्तु पूर्व वै पश्चिमाना गृहेषु ते । पश्चिमाश्चैव पूर्वेषां जायन्ते निधनेप्विह ॥ एचमावर्तमानास्ते वर्तन्त्याभूतसंप्लयम् । अष्टाशीतिसहस्राणि ऋषीणां गृहमधिनाम् सवितुर्दक्षिणं मार्गमाश्रित्याभूतसंप्लवम् । क्रियावतां प्रसंरयैपा से श्मशानानि भेजिरे लोकसंव्यवहारार्थ भूतारम्भहतेन च । इच्छाद्वेषरताञ्चैव मैथुनोपगमाञ्च वै ॥ १०३ ॥ तथा कामकृतेनेह सेवनाद्विपयस्य च । इत्येते कारण सिद्धाः श्मशानानीह भेजिरे। प्रजैपिणः सप्तऋषयो द्वापरेविह जशिरे । सन्ततिन्ते जुगुप्सन्ते तस्मान्मृत्युर्जितस्तु ते. अष्टाशीतिसहस्त्राणि तेपामप्यूवरेतसाम् । उदर पन्थानपर्यन्तमाश्रित्याभूतसंप्लवम् ते सम्प्रयोगाल्लोकस्य मिथुनस्य च धर्जनात् । ईर्ष्याद्वेषनिवृत्त्या चभूतारम्भविवर्जनात् .. इत्येते कारण. शुद्धस्तेऽमृतत्वं हि भेजिरे । आभूतसंप्लवस्थानाममृतत्वं विभाज्यते त्रैलोक्यस्थितिकालो हि न पुनर्मारगामिनाम् । भ्रूणहत्याश्वमेधादि पापपुण्यनिर्भ. परम् ॥ १० ॥ .
३००
* मत्स्यपुराणम् * [चतुर्विशत्यधिकशततमो
आभूतसप्लवान्ते तु क्षीयन्ते चोर्ध्वरेतस । अर्कोत्तरमृपिन्यस्तु ध्रुवो यत्रानुसस्थित
एतद्विष्णुपद दिव्यतृतीयव्योम्नि भास्वरम् । यत्रगत्वा नशोचन्तितद्विष्णो परमम्पदम्
धर्मे ध्रुषस्य तिष्ठन्ति ये तु लोमस्य काङ्क्षिण ॥ १११ ॥
इतिश्रीमत्स्यपुराणे सूर्यचन्द्रादिग्रहाणागतिवर्णन नाम त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्याय
चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
ज्यौतिपचक्रवर्णनम् ।
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ऋषय ऊचु ।
एव श्रुत्वा कथा दिव्यामबुवन लोमहर्पणिम् । सूर्याश्चन्द्रमसोचार ग्रहाणाश्चैव सर्वश
भ्रमन्ति कथमेतानि ज्योतीपि रविमण्डले । अव्यूहेनैव सर्वाणि तथा घासङ्करेण घा।
कश्च भ्रामयते तानि भ्रमन्ति यदि वा स्वयम् । एतद्वेदितुमिच्छामस्ततो निगदसत्तम
सूत उवाच ।
भूतसमोहन होतब्रुवतो मे निबोध तम् । प्रत्यक्षमपि दृश्य तत् समोहयति वै प्रजा ।
योऽसौ चतुर्दशर्केषु शिशुमारो व्यवस्थित । उत्तानपादपुत्रोऽसौ मेढीभूतो ध्रुवोदिवि
सैष भ्रम भ्रामयते चन्द्रादित्यो प्रहे सह । भ्रमन्तमनुसर्पन्ति नक्षत्राणि च चक्रवत्
ध्रुषस्य मनसा यो वै भ्रमते ज्योतिपाङ्गण । चातानीकमयर्वन्ध वैयद्ध प्रसर्पति ।
तेषा भेदश्च योगश्च तथा कालस्य निश्चय । अस्तोदयास्तथोत्पाता अयनेदक्षिणोत्तरे
विघुवग्रहवर्णश्च सर्वमेतद् ध्रुवेरितम् । जीमूता नाम ते मेघा यदेभ्यो जीवसम्भव ॥
द्वितीय भावहन् घायुमेघास्ते त्वमिसभिता । इतोयोजनमात्राच्च अध्यद्धविकृतामपि
वृष्टिसर्गस्तथा तेपा धाराधार प्रकीर्तिता । पुष्करावर्तका नाम ये मेघा पक्षसम्भवा
शक्रेण पक्षाश्छिना वै पर्वताना महोजसा।
कामगाना समृद्धाना भूताना नाशमिच्छताम् ॥ १२ ॥
ऽध्यायः] * ज्यौतिपचक्रवर्णनम् * पुष्करा नाम ते पक्षा बृहन्तस्तोयधारिण' । पुष्करावर्तका नाम कारपोनेह शब्दिताः]] नानारूपधराश्चैव महाघोरस्वराश्च ते । कल्पान्तवृष्टिकर्तारः कल्पान्ताग्नेनियामकाः ।। घाय्याधारा वहन्ते वै सामृताः कल्पसाधकाः । यान्यस्याण्डस्य भिन्नस्य प्राकृतान्यमवंस्तदा ॥ १५ ॥ यस्मिन् ब्रह्मा समुत्पन्नश्चतुर्वक्त्रः स्वयं प्रभुः । तान्येवाण्डकपालानि सर्वे मेधाः प्रकीर्तिताः ॥१६॥ तेषामप्यायन धूमः सर्वपामविशेषतः । तेषा श्रेष्ठश्च पर्जन्यश्चत्वारश्चैव दिग्गजाः ॥१७ गजानां पर्वतानाच मेघानां भोगिभि सह । कुलमेकं द्विधाभूतं योनिरेका जलं स्मृतम् पर्जन्यो दिग्गजाश्चैव हेमन्ते शीतसम्भवम् । तुपारवर्ष घर्षन्ति वृद्धा 'ह्यन्नविवृद्धये ॥ पष्ठ परिपहो नाम पायुस्तेषां परायणः । योऽसौ विभर्ति भगवन् ! गङ्गामाकाशगोचराम् ॥ २० ॥ दिव्यामृतजला पुण्यां त्रिपयामिति विश्रुताम् । तस्या विस्पन्दितन्तोयं दिग्गजाः पृथुभिः करैः ॥२१॥ शीफरान सम्प्रमुञ्चन्ति नीहार इति स स्मृतः । दक्षिणेन गिरियोऽसौ हेमाट इति स्मृतः ॥ २२ ॥ उदहिमयत शैलस्योत्तरे चैव दक्षिणे । पुण्इं नाम समात्यातं सम्यग्वृष्टिधिवृद्धये ।। तस्मिन् प्रवर्तते वर्ष तत्तुपारसमुद्धम् । ततो हिमवतो पायुहिमं तत्र समुद्भवम् ॥२४॥ आनयत्यात्मवेगेन सिञ्चयानो महागिरिम् । हिमयन्तमतिकम्य वृष्टिशेपं ततः परम् ॥ इभास्येचततः पश्चादिदम्भूतपिवृश्चये । घर्षद्वयं समारयातं सम्यग् वृष्टिविवृद्धये ॥२६ मेघाश्याप्यायनं चैव सर्वमेतत् प्रकीर्तितम् । सूर्य एव तु पृष्टीनां स्रष्टा समुपदिश्यते ॥ पर धर्म हिमं गरि सन्ध्ये चैव दिनं तथा । शुभाशुभफलानीह ध्रुषात् सर्व प्रवर्तते ॥ ध्रुयेणाधिष्टिताचापः सूख्यों चै गृह्य तिष्ठति । सर्वभूतशरीरए त्यापी धानुचिताचयाः दहामानेपु तेप्येह जङ्गमस्यायरेषु च । धृमभूतास्तु ता धापो निष्फामन्तीह सर्वशः ।। तेन चास्त्राणि जायन्ते सानमभ्रमयं स्मृतम् ।
* मत्स्यपुराणम् * [चतुर्विंशत्यधिकशततमो
तेजोमिः सर्वलोफेभ्य आदते रश्मिमिर्जलम् ॥ ३ ॥
समुद्राद्वायुसंयोगात् पहन्त्यापो गभस्तयः । ततस्त्वृतुवशात्कालेपरिवर्तन दिवाकरः
नियच्छत्यापो मधेभ्यः शुक्ला-शुकैस्तुरश्मिभिः । अनस्याःप्रपतन्त्यापोवायुनासमुदीरिताः
सतो घर्पति पण्मासान् सर्वभूतविवृद्धये । घायुभिस्तनितंचव विद्युतस्त्वतिजाःस्मृताः
मेहनाञ्च मिहेर्धातोर्मेघत्वं व्यञ्जयन्ति च । न भ्रश्यन्ते ततोह्यापस्तस्मादभ्रस्यवैस्थितिः
स्रष्टाऽसौ वृष्टिसर्गस्य ध्रुवेणाधिष्ठितो रविः ॥ ३५ ॥
ध्रुवेणाधिष्ठितो घायुर्वृष्टि संहरते पुनः । ग्रहान्निवृत्या सूर्य्यात्तु चरते ऋक्षमण्डलम् ॥
चारस्यान्ते विशत्यर्क ध्रुवेण समधिठितम् । अतः सूर्यरथस्यापि सन्निवेशं प्रचक्षते ।
'स्थितेन त्वेकचक्रेण पञ्चारेण त्रिनाभिना । हिरण्मयेनाणुना वै अपचक्र कनेमिना ॥
चक्रेण भास्वता सूर्यः स्यन्दनेन प्रसर्पिणा ॥ ३८ ॥
शतयोजनसाहस्रो विस्तारायाम उच्यते । द्विगुणा च रथोपस्थादीपादण्डः प्रमाणतः
स तस्य ब्रह्मणा सृष्टो रथोह्यर्थवशेन तु । असङ्गः काञ्चनो दिव्यो युक्तः पर्वतगैर्हयैः ।।
च्छन्दोभिर्वा जिरूपैस्तैर्यथाचक्रं समास्थितैः । वारुणस्य रथस्येह लक्षणैः सदृशश्च सः
तेनासौचरतिव्योम्निभास्वाननुदिनन्दिपि । अथाङ्गानितु सूर्यस्यप्रत्यङ्गानिरथस्यव ॥
सम्वत्सरस्यावयवैः कल्पितानि यथाक्रमम् ॥ ४२ ॥
अर्नाभिस्तु सूर्यस्य एकवक्रस्य वै स्मृतः ।
अरात् सम्वत्सरास्तस्य नेम्यः पड् ऋतषः स्मृताः ॥४॥
रात्रिर्वरूथोधर्मश्चध्वजऊचव्यवस्थितः । अक्षकोट्योर्युगान्यस्यअर्तवाहाःकलाःस्मृताः
तस्य काप्टा स्मृता घोणा दन्तपङ्क्तिः क्षणास्तु वै ।
निमेपश्चानुकर्पोऽस्य ईषा चास्य कला स्मृता ॥ ४५ ॥
युगाक्षकोटी ते तस्यअर्थकामावुभौस्मृतौ । सप्ता(मा)श्वरूपाश्छन्दांसिवहन्तेवायुरंहसा
गायत्री चैव त्रिष्टुप् च जगत्यनुष्टुप् तथैव च । पङ्क्तिश्च वृहतीचैव उष्णिगेवतुसप्तमः
चक्रमक्षे नियद्धन्तु ध्रुवे चाक्षः समर्पितः । सहचको भ्रमत्यक्षः सहाक्षोभ्रमति ध्रुवम् ॥
अक्षः सहैव चक्रेण भ्रमतेऽसौ ध्रुवेरितः एषमर्थवशात्तस्य सन्निवेशो रथस्य तु ॥४६॥
अध्याय ] * सूर्य्यरथवर्णनम् * तथा सयोगमागेन सिद्धो वै भास्करो रथ । तेनाऽसौ तरणिर्मध्ये नमस सर्पतेदिवम् युगाक्षकोटी ते तस्य दक्षिणे स्यन्दनस्य तु ! भ्रमतो भ्रमतो रश्मी तीवकयुगयोस्तुवै मण्डलानि भ्रमे तेऽस्य खेवरस्य रथस्य तु । कुलालवान्नमवनमण्डल सर्वतोदिशम् युगाक्षकोटि ते तस्य बातोमीस्यन्दनस्य तु । सबमे ते ध्रुवमहो मण्डले पर्वतोदिशम् भ्रमतस्तस्यरश्मी ते मण्डले तूत्तरायणे। पद्धते दक्षिणेवन भ्रमतो मण्डलानि तु ॥ युगाक्षकोदोसम्बद्धी द्वे रश्मीस्यन्दनस्य ते । ध्रुवेण प्रगृहीती तो रश्मी धारयतारविम् आकृप्यते यदा ते तु ध्रुषेण समधिष्टिते । तदा सोऽभ्यन्तरे सूय्यों भ्रमते मण्डलानि तु अशीतिमण्डलशत काष्ठयोरुभयोश्चरन् । भूपेण मुच्यमाने न पुनारश्मियुगेन च ॥ ७७ स्तथैव बाह्यत सर्यो भ्रमते मण्डलानि तु । उद्वेष्टयन्वैधेगेन मण्डलानि तु गच्छति ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे ज्योतिषचाचर्णन नाम चतुर्विशत्यधिकशततोऽध्याय । पञ्चाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः सूर्यरथवर्णनम् । स्त उवाच । स रथोऽधिष्ठितो देवैर्मासि मालियथाक्रमम् । ततो वहत्यथादित्य बहुमि पिभि सह गन्धरप्सरोभिश्च सर्पग्रामणि राक्षसै । एते वसन्ति वै सूर्य मासौदी द्वो क्रमेण च धातार्यमा पुलस्त्यश्च पुलहश्च प्रजापती । उरगी वासुकिश्चैव सङ्कीर्णश्चैव ताजुभो । तुम्परारदश्चैव गन्धवौं गायताम्बरौ । कृतस्यलाप्सराश्य या च सा पुसिकस्थली ग्रामण्यो रथकृतस्य रथीजाश्चैव तानुमी। रक्षोहेति प्रहेतिश्च यातुधानादुर्भास्मृती मधुमाधषयोहोप गणो घसति भास्करे । सन् ग्रीष्मे तु द्वो मासी मित्रश्च धरुणश्च पिरनिर्वसिष्ठश्च नागो तक्षकरम्मको । मेनका सहधन्या व हाहा हश्व गायको । स्थातरश्च ग्रामण्यो रथर चैप तानुभो । पौरुषेयो वधश्चैव यातुधानी नु ती स्मृती ॥
३०४ - * मत्स्यपुराणम् * [पञ्चविंशत्यधिकशततमो एते वसन्ति वै सूर्येमासयोःशुचिशुक्रयोः । ततः सूर्ये पुनश्चान्या निवसन्तिस्मदेवताः इन्द्रश्चैव विवस्वांश्च अभिरा भृगुरेव च । एलापत्रस्तथा सर्पः शङ्खपालश्च पन्नगः ॥१० विश्वावसुसुसेनौ च प्रातश्चैव रथश्च हि । प्रग्लोचेत्यप्सराश्चैवनिम्लोचन्तीचतेउभे । यातुधानस्तथा हेतियाघ्रश्चैव तु तावुभौ । नभस्य नभसोरेतैर्वसन्तश्च दिघाफरे ॥१२॥ मासौ द्वौ देवताः सूर्ये घसन्ति च शरद्रतो । पर्यन्यश्चैव पूपा च भरद्वाजः सगौतमः चित्रसेनश्च गन्धर्वस्तथा चा सुरुचिश्च यः। विश्वाची च घृताची च उभेते पुण्यलक्षणे नागश्चरायतश्चैव विश्रुतश्च धनञ्जयः । सेनजिच्च सुपेणश्च सेनानी ग्रामणीस्तथा ॥१५ चारोवातश्च द्वावेती यातुधानावुभौ स्मृती। वसन्त्ये ते च वै सूर्ये मासयोश्च त्विषोर्जयोः ॥१६॥ हेमन्तिको च द्वौ मासी निवसन्ति दिघाकरे । अंशोभगश्च द्वावेतो कश्यपश्चक्रतुश्चत भुजगश्च महापत्यसर्पः कर्कोटकस्तथा । चित्रसेनश्च गन्धर्वः पूर्णायुश्चैध गायनौ । अप्सराः पूर्वचित्तिश्च गन्धर्वाह्यवंशी व या। तक्षा धारिष्टनेमिश्च सेनानीग्रामणीश्च ती विद्युत् सूर्यश्च ताबुनौ यातुधानी तु तो स्मृतौ । सहे चैव सहस्ये च वसन्त्ये ते दिवाकरे ॥ २०॥ ततस्तु शिशिरे चापि मासयोर्निवसन्ति ते । त्वष्टा विष्णुर्जमदग्निविश्वामित्रस्तथैव च ॥ काद्रवेयौ यथा नागौ कम्वलाश्वतरावुभौ । गन्धर्वी धृतराष्ट्रश्च सूर्यवर्चाश्च तावुभौ ॥ तिलोत्तमाप्सराश्चैव देवी रम्भा मनोरमा । ग्रामणीतजिच्चैव सत्यजिच्च महाबलः ।। ब्रह्मोपेतश्च वै रक्षो यज्ञोपेतस्तथैव च । इत्येते निघसन्तिस्म द्वौ द्वौ मासी दिवाकरे । स्थानाभिमानिनो यते गणा द्वादशसप्तकाः । सूर्यमापादयत्येते तेजसा तेज उत्तमम् ॥ २५॥ ग्रथितैस्तु वचोभिश्च स्तुवन्ति ऋपयो रविम् । गन्धर्याप्सरसश्चैव गीतनृत्यैरुपासते ॥ विद्याग्रामणिनो यक्षाःकुर्वन्त्याभीषु संग्रहम् । सर्पाःसर्पन्तिवैसूर्योयातुधानानुयान्तिव बालखिल्या नयन्त्यस्तं परिवार्योदयादविम् । एतेपामेव देवानां यथावीय्यं यथा तपः यथायोगं यथाधर्म यथातत्त्वं यथावलम् । तथा तपत्यसौ सूर्यास्तेपामिद्धस्तुतेजसा ऽध्यायः * सूर्यस्थवर्णनम् * भूतानामशुभं सर्व व्यपोइति स्वतेजसा । मानवानां शुभतेहियते दुरितन्तु वै ॥३०॥ दुरितं शुभचाराणां व्यपोहन्ति कचित् कचित् । एते सहवसूर्येण भ्रमन्ति सानुगा दिपि तपन्तश्च जपन्तश्च हादयन्तश्च वै प्रजाः । गोपायन्तिस्म भूतानि ईहन्ते झनुकम्पया ॥ स्थानामिमानिनां ह्येतत् स्थानमन्वन्तरेपु वै । अतीतानागतानाच धर्तन्ते साम्प्रतश्च ये एवं घसन्ति वै सूर्ये सप्तकास्ते चतुर्दश । चतुर्दशेषु घर्तन्ते गणा मन्वन्तरेषु वै ॥३४॥ ग्रीष्मे हिमे च घर्षासु च मुञ्चमानो धर्म हिमञ्च वर्षञ्च निशां दिनञ्च । गच्छत्यसावनुदिनं परिवृत्य रश्मीन् देवान् पितृ श्च मनुजांश्च सुतर्पयन्वै ।। शुक्त च कृष्णे तदहः क्रमेण कालक्षये चैव सुराः पियन्ति । मासेन तच्चामृतमस्य मृ सुवृष्टये रश्मिपु रक्षितं तु ॥३६॥ सर्वेऽमृतं तत् पितरः पियन्ति देवाश्च सौम्याश्व तथैव काव्याः । सूर्येण गोभिर्ह विद्धिताभिरद्धिः पुनश्चय समुच्छ्रिताभिः ॥३७ ॥ वृष्टयाभिवृष्टाभिरथोपधीभिर्मा अथान्नेन क्षुधं जयन्ति । तृप्तिश्चाप्यमृतेनार्द्धमासं सुराणां मासे स्वाहाभिः स्वधया पितृणाम् ॥ अनेन जीवन्त्यनिशं मनुष्याः सूर्यः थितन्तद्धि विभर्ति गोभिः ॥३८॥ इत्येष एकचक्रेण सूर्य्यस्तूर्णं प्रसर्पति । तत्र तैरक्रमैरश्वैः सर्पतेऽसौ दिनक्षये ॥ ३६ ॥ हरिहरिदिहियते तुरङ्गमैः पियत्यथापो हरिभिः सहस्रधा । पुनः प्रमुञ्चत्यथ ताश्च यो हरिः समुह्यमानो हरिमिस्तुरङ्गमैः ॥ ४० ॥ अहोरात्रं रथेनासावेकचक्रेण वै भ्रमन् । सप्तद्वीपसमुद्रांस्तु सप्तभिः सप्तभिर्दुतम् ॥ ४१ ॥ च्छन्दोरूपैश्च तैरश्वर्यतश्चकं ततः स्थितिः । कामरूपैः सकृयुक्तः कामगैस्तैमनोजवैः ॥ ४२ ॥ हरितैरव्ययः पिङ्गेरीश्वरावादिभिः । वाह्यतोऽनन्तरचैव मण्डलं दिवसः प्रमात् ॥ फल्पादी सम्प्रयुक्ताश्च वहन्त्याभूतसंप्ठयम् । आवृतो यालखिल्यैश्च भ्रमते राज्यहानितु प्रथितैः स्वपचोमिश्च स्तूयमानो महर्षिभिः । सेव्यते गीतनृत्यैश्च गन्धर्वाप्सरसाङ्गणैः * मत्स्यपुराणम् * [पञ्चविंशत्यधिकशततमो पतङ्गैः पतगैरश्वमा॑म्यमाणो दिवस्पति 1 घीथ्याश्रयाणि चरति नक्षत्राणि तथा शशी हासवृद्धी तथैवास्य रश्मयः सूर्यचत् स्मृताः । त्रिचक्रोभयतोऽश्वश्च चिशेयः शशिनो रथः॥ १७ ॥ अपाङ्गर्भसमुत्पन्नो रथः साश्व. ससारथि । सहारेस्तै त्रिभिश्चकयुक्त' शुक्तहयोत्तमै. दशभिस्तुरगैर्दिव्यैरसङ्गैस्तन्मनोजवैः। सयुक्त रथे तस्मिन् यहन्तस्त्वायुगक्षयम् ॥ संग्रहीता रथे तस्मिन् श्वेतश्चक्षु श्रवाश्चवै । अश्यास्तमेकवर्णास्ते पहन्ते शटवर्चस' अजश्च निपथश्चैव वृपो पाजी नरो हयः । अशुमान् सप्तधातुश्च हंसो व्योम मृगस्तथा ॥ ५१ ॥ इत्येते नामभिश्चैव दश चन्द्रमलो ह्या । एवं चन्द्रमसं देवं घहन्ति स्मायुगक्षयम्॥ देवैः परिवृत सोम पितृभि सह गच्छति। सोमस्य शुक्लपक्षादी भाष्कर परत. स्थिते आपूर्यते परो भाग सोमस्य तु अह क्रमात् । तत. पीतक्षयं सोमं युगपद्व्यापयन् रवि. पीत पञ्चदशाहञ्च रश्मिनैकेन भास्करः । आपूरयन् ददी तेन भागं भागमह क्रमात् ॥ सुषुम्नाप्यायमानस्य शुक्के धर्द्धन्ति वै कला। तस्माद्धसन्ति वै कृष्णे शुक्ल ह्याप्याययन्ति च ॥ ५६ ॥ इयेव सूर्य्यचीर्येण चन्द्रस्याप्यायते तनु । पूर्णमास्या प्रदृश्येत शुक्ल, सम्पूर्णमण्डलः ॥ एवमाप्यायते सोम शुक्लपक्षेप्वह क्रमात् । ततो द्वितीयाप्रभृति बहुलस्य चतुर्दशी ॥ अपा सारमयस्येन्दो रसमात्रात्मकस्य च । पिवन्त्यम्बुमयं देवा मधुसौम्यं तथामृतम् संभृतन्त्वर्द्धमासेन अमृत सूर्यतेजसा । मक्षार्थमागतं सोमं पौर्णमास्यामुपासते ॥६० एकरात्र सुरा सार्द्ध पितृभि पिभिश्च वै। सोमस्य कृष्णपक्षादौ भास्कराभिमुखस्य वै ॥ ६१ ॥ प्रक्षीयते परे ह्यात्मा पीयमानकलाक्रमात् । त्रयश्च त्रिशता साई मशिन्छनानि तु त्रयस्त्रिंशत् सहस्राणि देवा. सोम पिबन्ति वै । इत्येव पीयमानस्य कृष्णे पर्दन्ति ता कला ॥ ६३ ॥ क्षीयन्ते च तत शुक्ला कृष्णाधाप्याययन्ति च ।
ऽध्यायः] * ग्रहाणांगतिवर्णनम् * एवं दिनक्रमात् पीते देवश्चापि निशाकरे ॥ ६४ ॥ पीत्वार्द्धमासं गच्छन्ति अमावास्यां सुराश्च ते । पितरश्चोपतिष्ठन्ति अमावास्यां निशाकरम् ॥६५॥ ततः पञ्चदशे भागे किञ्चिच्छे निशाकरे । ततोऽपराह्न पितरो यदन्यदिवसे पुनः ॥ पिवन्ति द्विकलं कालं शिष्टास्तास्तु कलास्तु याः। विनिस्सृष्टं त्वमावास्यां गभस्तिभ्यस्तदामृतम् ।।६७ ।। अर्द्धमाससमाप्ती तु पीत्वा गच्छन्ति तेऽमृतम् । सौम्या बहिपदश्चैव अग्निप्यात्ताश्च ये स्मृताः ॥ ६८ ॥ काव्याश्चैव तु ये प्रोक्ताः पितरः सर्य एव ते । सम्वत्सराश्च ये काव्या पश्चाद्वा वै द्विजाः स्मृताः ॥ ६६ ॥ सौन्याः सुतपसो शेया सौम्मा बर्हिग्दस्तथा । अग्निप्वात्तात्रयश्चैव पितृसर्गस्थिता द्विजाः ॥ ७० ॥ पितृभिः पीयमानायां पञ्चदश्यान्तु वै फलाम् । यावच्च क्षीयने तस्माद् भागः पञ्चदशस्तु सः ॥ ७१ ॥ अमावास्यां तथा तस्य अन्तरा पूर्यतेपर. । वृद्धिक्षयो वै पक्षादी पोडश्यांशशिनःस्मृती एवं सूर्यनिमित्ते ते क्षयवृद्धी निशाकरे ॥ ७२ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे सूर्याचन्द्रमसोर्गतिवर्णनं नाम पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः । पडूविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ग्रहाणांगतिवर्णनम् । सूत उवाच। ताराग्रहाणांवक्ष्यामि स्धर्भानोस्तु रथं पुन. । अथ तेजोमयः शुनः सोमपुत्रस्य वैरयः युक्तोहयैः पिशङ्गस्य दशभिर्यातरंहस. । श्वेतः पिशङ्ग. सारङ्गोनीलःश्यामो विलोहितः - * मत्स्यपुराणम् * [पडूपिंशत्यधिकशततमो श्वेतच हरितश्चैव पृपतो वृष्णिरेव च । दशभिस्तु महाभागैरुत्तीर्घातसम्मवैः ॥३॥ ततो भीमरथश्चापि अष्टाङ्गः काञ्चनः स्मृतः । अष्टभिर्लोहितैरश्वैः सध्वजैरग्निसम्भवैः सर्पतेऽसी कुमारो वै ऋजुचक्रानुवक्रगः । अतश्चाभिरसो विद्वान् देवाचार्यो वृहस्पतिः गोराश्वेन तु रौप्येण स्यन्दनेन विसर्पति । युक्तनाष्टाभिरश्वैश्च ध्वजैरग्निसमुद्भवः ॥६॥ अब्दं वसति यो राशौ स्वदिशन्तेन गच्छति। ततः शनैश्चरोऽप्यश्वैः सबलैर्वातरंहसः॥ कार्णायसं समारुह्य स्यन्दनं यात्यसो शनिः । स्वर्भानोस्तु तथाष्टाश्वाः कृष्णा वै घातरंहसः ॥ ८॥ रथन्तमोमयं तस्य वहन्तिस्म सुदंशिताः । आदित्यनिलयो राहुः सोमं गच्छति पर्वसु आदित्यमेति सोमाञ्च तमसां तेषु पर्वसु । ततः केतुमतस्त्वश्वा अष्टौ ते घातरंहसः ।। पलालधूमवर्णाभाः क्षामदेहाः सुदारुणा. । एते पाहा ग्रहाणां वै मया प्रोक्ता रथैः सह सर्वे ध्रुवे निबद्धास्तेनिवद्धा घातरश्मिभिः । एते वै भ्राम्यमाणास्ते यथायोगं वहन्तिवै घायव्याभिरदृश्याभिः प्रवद्धा घातरश्मिभि । पग्भ्रिमन्ति तद्वद्ध्याश्चन्द्रसूर्यग्रहा दिकि यावत्तमनुपर्यति ध्रुवं वै ज्योतिपाङ्गणः । यथा नादके नौस्तु उदकेन सहोह्यते ॥१४॥ तथा देवगृहाणि स्युरह्यन्ते वातरंहसा । तस्माद्यानि प्रगृह्यन्ते व्योनि देवगृहा इति ॥ यावन्त्यश्चैव ताराः स्युस्तावन्तोऽस्य मरीचयः । सर्घा ध्रुवनियद्धास्ता भ्रमन्त्यो भ्रामयन्ति च ॥ १६ ॥ तैलपीई यथा चक्रं भ्रामते भ्रामयन्ति वै। तथा भ्रमन्ति ज्योतीपि वातावद्धानि सर्वशः अलातचक्रघद्यान्ति चातचक्रेरितानि तु । यस्मात् प्रचहते तानि प्रवहस्तेन स स्मृतः । एवं ध्रुवे नियुक्तोऽसौ भ्रमते ज्योतिपाङ्गण । एप तारामयः प्रोक्तः शिशुमारे ध्रुषा दिवि ॥ १६ ॥ यदहा कुरते पापन्तं दृष्ट्वा निशि मुञ्चतः । शिशुमारशरीस्था यावन्त्यस्तारकास्तु ताः ।। वर्षाणि दृष्ट्वा जीवेत तावदेवाधिकानि तु । शिशुमाराकृति ज्ञात्या प्रधिमागेत सर्वशः । उत्तानपादस्तस्याथ विज्ञेयः सोत्तरा हनुः। यशोधरस्तु विज्ञेयो धर्मो मूर्धानमाश्रितः॥ हदि नारायण साध्या अश्विनीपूर्वपादयोः । वरणश्चार्यमा वैघ पश्चिमे तस्यसथिनी .
ऽध्यायः] * ज्योतिपचवर्णनम् - ३०६ शिसम्वत्सरोज्ञेयो मित्रश्चापानमाश्रितः। पुच्छेऽग्निश्च महेन्द्रश्च मरीनिःफश्यपोभुवः एष तारामयः स्तम्भो नास्तमेति नवोदयम् । नक्षत्रचन्द्रसूर्याश्च ग्रहास्तारागणैः सह ।। तन्मुखाभिमुणाः सर्वे चक्रभूता दियि स्थिताः । ध्रुयेणाधिष्ठिताश्चैव भूवमेव प्रदक्षिणम् परियान्ति सुरश्रेष्ठं मेढीभूतं ध्रुयं दिवि । आग्नीधकाश्यपानान्तु तेषां स परमो ध्रुधः एकएव भ्रमत्येष मेरोरन्तरमूर्द्धनि । ज्योतिषाञ्चक्रमादाय आकर्षस्तमधोमुखः ॥२८ ।। मेहमालोकयन्नेव प्रति याति प्रदक्षिणम् । इति श्रीमत्स्यपुराणे ताराग्रहाणांगतिवर्णनं नाम पइविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः । ॥ सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ग्रहाणांगतिवर्णनम् । ऋपय ऊचुः। यदेतदवता प्रोक्तं श्रुतं सर्वमशेषतः । कथं देवगृहाणि स्युः पुनज्योतीपि धर्णय ॥१॥ सूत उवाच। एतत्सर्वप्रवक्ष्यामि सूर्य्याचन्द्रमसोर्गतिम् । यथा देवगृहाणिस्युः सूर्याचन्द्रमसोस्तथा अग्न व्यु शो रजन्यां वै ब्रह्मणा व्यक्तयोनिना । अव्यास्तमिदं त्वासीत्नेशेन तमसावृतम् चतुर्भूतावशिरोऽस्मिन् ब्रह्मणा समधिष्ठिते । स्वयम्भूभगवांस्तत्र लोकतत्त्वार्थसाधकः खद्योतरूपी विचरन्नाविर्भायं व्यचिन्तयत् । ज्ञात्वाग्नि कल्पकालादावपः पृथ्वीञ्च संश्रिताः ॥५॥ स सम्भृत्य प्रकाशार्थन्त्रिधातुल्योऽभवत् पुनः पाचको यस्तु लोकेऽस्मिन् पार्थिवः सोऽग्निरुच्यते ॥६॥ यत्रासी तपर सूर्य शुविरग्निश्च स स्मृतः । वैद्युतो जठरः सोम्यो वैद्युतश्चाप्यनिन्धनः तेजोमिश्चाप्यतेकश्चित्कश्चिदेवाप्यनिन्धनः।काष्ठेन्धनस्तुनिर्मथ्यासोऽदिशाम्यतिपायका - * मत्स्यपुराणम् * [सप्तर्षिशत्यधिकशततमो अचिष्मान् पचनोऽग्निस्तु निष्प्रभः सौम्यलक्षण । यश्चासी मण्डले शुझे निरूप्मा न प्रकाशते ॥ ६ ॥ प्रभा सौरी तु पादेन अस्तं याति दिवाकरे। अग्निमाविशते रात्री तस्मादग्नि' प्रकाशते उदिते तु पुन' सूर्य ऊष्माग्नेस्तु समाविशत् । पादेन तेजसश्चाग्नेस्तस्मात् सन्तपते दिवा ॥११॥ प्राकाश्यञ्च तथोष्णञ्च सौर्याग्नेये तु तेजसी । परस्परानुप्रवेशादाप्यायेते दिवानिशम् उत्तरे चैव भूम्यर्द्ध तथा ह्यस्मिस्तु दक्षिणे । उत्तिष्ठति पुन. सूर्य रात्रिमाविशते ह्यप ॥१३॥ तस्मात्ताम्रा भवन्त्यापो दिवारात्रिप्रवेशनात् । अस्तगते पुनः सूर्ये अहो वै प्रविशत्यप ॥१४॥ तस्मान्नक्तं पुनः शुक्ला ह्यापो दृश्यन्ति भासुरा । एतेन क्रमयोगेन भूम्यर्द्ध दक्षिणोत्तरे ॥१५॥ उदयास्तमये ह्यत्र अहोरात्रं विशत्यप । यश्चासी तपते सूर्य. सोऽप. पिवति रश्मिभिः ॥१६॥ सहस्त्रापादस्त्वेपोऽग्नी रक्तकुम्भनिभस्तु स । भादत्ते स तु नाडीनां सहस्रोणसमन्ततः आपो नदीसमुद्रेभ्यो हदकूपेभ्य एच च । तस्य रश्मिसहस्रेण शोतवोणनि स्रयः। तासाञ्चतु शत नाड्यो वर्षन्ते चित्रमूर्तयः । चन्दनाश्चैव मेध्याश्च केतनाश्चेतनास्तथा अमृता जीवना. सर्वा रश्मयोवृष्टिसर्जनाः । हिमोद्याश्चतान्योन्यरश्मयस्त्रिंशत स्मृताः चन्द्रताराग्रहै सर्वः पीता भानोर्गभस्तयः ॥२६॥ एता मध्यास्तथान्याश्च हादिन्यो हिमसर्जना.। शुद्धाश्च ककुभश्चैध गावो विश्वस्तश्च याः ॥२२॥ शुद्धास्ता नामत. सर्वास्त्रिंशत्या धर्मसर्जनाः । सम्विधति हि ताः सर्वाः मनुष्यान्देवताः पितॄन् ॥२३॥ मनुष्यानीपधीभिश्च स्वघया च पितनपि । अमृतेन सुरान् सर्वान् साततम्परि तर्पयन ऽध्यायः] * ग्रहाणां गतिवर्णनम् * घसन्ते चैव ग्रीष्मे व शनैः सन्तपते त्रिभिः । घर्षासु च शरद्ययं चतुर्मि. संग्रवति ॥ हेमन्ते शिशिरे चैव हिमोत्सर्गनिभिः पुन. । ओपधीपु बलन्धत्ते सुधाञ्च स्वधया पुनः ॥२६॥ सूर्योऽमरत्वममृते त्रयस्त्रिषु नियच्छति । एवं रश्मिसहस्रन्तु सौरं लोकार्द्धसाधनम् भिद्यतेऋतुमासाद्य सहस्रं बहुधा पुनः । इत्येवं मण्डलं शुलं भास्वरं लोकसंज्ञितम् ॥ नक्षत्रग्रहसोमानां प्रतिष्ठायोनिरेव च । चन्द्रऋक्षग्रहाः सर्वे विज्ञयाः सूर्यसम्भवा । सुपुग्ना सूर्यरश्मिर्या क्षीणं शशिनमेधते । हरिकेशः पुरस्तात्तु योवै नक्षत्रयोनिकृत् ।। दक्षिणे विश्वकर्मा तु रश्मिराप्याययद् बुधम् । विश्वावसुश्च यः पश्चाच्छुक्रयोनिश्च स स्मृतः ॥ ३१ ॥ सम्वर्द्धनस्तु यो रश्मिः सयोनिलोंहितस्य च । पष्ठस्तु ह्यश्वभूरश्मिोनिः स हि बृहस्पतेः ॥ ३२ ॥ शनैश्चरंपुनश्चापि रश्मिराप्यायते सुराट् । न क्षीयते यतस्तानि तस्मान्नक्षत्रतास्मृता॥ क्षेत्राण्येतानि वे सूर्यमापतन्ति गभस्तिभिः । क्षेत्राणि तेपामादत्ते सूर्योनक्षनता ततः ॥ अस्माल्लोकादमुं लोकं तीर्णानां सुकृतात्मनाम् । तारणात्तारका होताः शुक्लत्वाच्चैव शुलिकाः ॥ ३५ ॥ दिव्यानां पार्थिवानाञ्च वंशानाञ्चच सर्वशः । तपसस्तेजसो योगादादित्य इति गद्यते ॥ ३६॥ नवति स्यन्दनाथै धानुरेप निगद्यते । स्रवणात्तेजसश्चय तेनासी सविता स्मृत ॥३॥ यहर्थश्चन्द इत्येष प्रधानो धातुरुच्यते । शुक्लत्वे ह्यमृतत्वे च शीतत्वे हादनेऽपि च ॥ सूर्याचन्द्रमसोदिव्ये मण्डले भास्वरे खगे। जलतेजोमये शुक्ल वृत्तकुम्भनिभे शुभे ।। घसन्ति कर्मदेवास्तु स्थानान्येतानि सर्वश । मन्वन्तरेषु सर्वेषु ऋपिसूर्यग्रहादयः ॥४० तानि देवगृहाणि स्युः स्थानाख्यानि भवन्ति हि । सौर सूर्योऽविशत् स्थानं सौम्यं सोमस्तथैव च ॥४॥ - * मत्स्यपुराणम् * [सप्तविंशत्यधिकशततमो शोकं शुक्राऽविशत् स्थानं पोडशारं प्रभास्वरम् । बृहस्पतिवृहत्वञ्च लोहितञ्चापि लोहितः ॥४२॥ शनैश्चरोऽविशत् स्थानमेवं शानैश्चरं तथा । बुधोऽपि वै युधस्थानं भानुस्वर्भानुरेवच नक्षत्राणि च सर्वाणि नाक्षत्राण्यविशन्ति च । ज्योतीपि सुकृतामेते ज्ञेया देवगृहास्तुवै स्थानान्येतानि तिष्ठन्ति यावदाभूतसंप्लवम् । मन्वन्तरेषु सर्वेषु देवस्थानानि तानि वै अभिमानेन तिष्ठन्ति तानि देवाः पुनः पुनः । अतीतास्तुसहातीतैर्भाव्याभाव्यासुरैः सह घर्तन्ते वर्तमानैश्च सुरैः सार्द्धन्तु स्थानिनः । सूर्योदयो विवस्वांश्च अष्टमस्त्वदितःसुतः द्युतिमान् धर्मयुक्तश्च सोमो देवो वसुः स्मृतः । शुक्रो दैत्यस्तु विज्ञेयो भार्गपो सुरयाजकः ॥४८॥ बृहस्पति हत्तेजा देवाचार्योऽङ्गिरःसुतः । वुधोमनोहरश्चैव शशिपुत्रस्तु स स्मृतः ॥ शनैश्चरो विरूपश्च संज्ञापुत्रो विवस्वतः । अग्निर्विकेश्यां जज्ञे तु युवाऽसौ लोहिताधिपः ॥५०॥ नक्षत्रनाम्न्यः क्षेत्रेषु दाक्षायण्यः सुताः स्मृताः। स्वर्भानुः सिंहिकापुत्रो भूतसंसाधनोसुरः ॥५१॥ चन्द्रार्कग्रहनक्षत्रेप्वभिमानी प्रकीर्तितः । स्थानान्येतानि चोकानि स्थानिन्यश्चैव देवताः ॥५२॥ शुक्मग्निसमं दिव्यं सहस्रांशोविवस्यतः । सहस्रांशुत्विपः स्थानमन्मयन्तेजसं तथा ॥ आशास्थानं मनोज्ञस्य रविरश्मिगृहे स्थितम् । शुक्रः पोडशरश्मिस्तु यस्तु देवो हापोमयः ॥५४॥ लोहितो नवरश्मिस्तु स्थानमापन्तु तस्य च । वृहद्वादशरश्मीकं हरिदाभन्तु वेधसः॥ अष्टरश्मिशनेस्तत्तु कृष्णं वृद्धमयस्मयम् । स्वर्भानोस्त्यायसं स्थानं भूतसन्तापनालयम् सुरतामाश्रयास्तारा रश्मयस्तु हिरण्मयाः । तारणात्तारकायेताःशुलत्याच्चैव तारकाः । नवयोजनसाहस्रोविष्कम्भःसचिनुःम्मृतः । मण्डलंद्विगुणंचास्यविस्तारोभास्करम्य तु रिगुण सूर्य विस्ताराद्विस्तारशशिनःस्मृतः।त्रिगुणमण्डलंचास्य पुल्यान्डशिनःम्नम् ऽध्यायः] * ग्रहाणांगतिवर्णनम् . सर्वोपरिनिष्टानि मण्डलानि तु तारकाः।योजनार्द्धप्रमाणानि ताभ्योऽन्यानिगणानि तु तपोभूत्वातुस्वर्भानुस्तद्धस्तात्मसर्पति।उधृत्यपार्थिवींच्छार्यानिर्मितांमण्डलाकृतिम् ब्रह्मणा निर्मित स्थान तृतीयन्तुतमोमयम् । आदित्यात्सतुनिष्कम्यसोमंगच्छतिपर्वतु आदित्यमेति सोमाच्चपुन सोरेपुपर्वसु । स्वभासातुदतेयस्मात्स्यर्भानुरितिसस्मृतः ॥ चन्द्रत.पोडशोभागोभार्गवस्यविधीयते । विष्कम्भानमण्डलाच्चैवयोजनानान्तुसस्मृतः भार्गवात्पादहीनश्च विशेयोवैवृहस्पति. । वृहस्पतेः पादहीनो केतुवक्रायुभी स्मृती ॥ विस्तारमण्डलाभ्यान्तु पादहीनस्तयोर्बुध. । तारानक्षत्ररूपाणि घपुष्मन्तीह यानि वै ॥ चुधेन समरूपाणि विस्तारानमण्डलात्तु चै । तारानक्षत्ररूपाणि हीनानि तु परस्परम् ॥ शनानि पञ्चचत्वारि त्रीणि द्वे चैकमेव च । सर्वोपरिनिसृष्टानि मण्डलानि त तारकाः योजनार्द्धप्रमाणानि तेभ्यो ह्रस्वं न विद्यते । उपरिष्टात्तु ये तेषां गृहा ये क्रूरसात्विकाः सौरश्वाङ्गिरसोवक्रोविज्ञयामन्दचारिणः । तेभ्योऽधस्तात्तुचत्वार:पुनश्चान्ये महाग्रहा. सोमः सूर्यो धुधश्चैध भार्गवश्चेति शीधगाः । यावन्ति चैव ऋक्षाणि कोट्यस्तावन्ति तारकाः ॥७॥ सवपान्तु ग्रहाणां वै सूर्योऽधस्तात्मसर्पति। विस्तीर्ण मण्डलं कृत्वा तस्योद्ध्वं चरते शशी ॥७२॥ नक्षत्रमण्डलचापि सोमाध्यप्रसर्पति । नक्षत्रेभ्योवुधश्चोद्ध्यंवुधाचोर्ध्वन्तुभार्गवः चक्रस्तु भार्गवावंचक्राव॑वृहस्पतिः । तस्माच्छनैश्चरश्वोचदेवाचार्योपरिस्थितः शनैश्चरात्तथा चोचं ज्ञेयं सप्तर्षिमण्डलम् । सप्तर्षिभ्यो ध्रुवश्चोध्यं समस्तं त्रिदिवं ध्रुवे ॥७॥ द्विगुणेषु सहस्रेषु योजनानां शतेषु च । गृहान्तरमथैकैकमूदुयं नक्षत्रमण्डलात् ॥७६॥ ताराग्रहान्तराणिस्युरपर्युपर्य्यधिष्ठितम् । ग्रहाश्चन्द्रस्य्यौं व दिचि दिध्येन तेजसा । नक्षत्रेषु च युज्यन्ते गच्छन्तो नियतकमात् । चन्द्रार्कग्रहनक्षत्रानीचोचगृहमाश्रिता ॥ समागमे च भेदे च पश्यन्ति युगपत्प्रजाः । परस्परं स्थिता हो युज्यन्तेच परस्परम् ।। असङ्करेण विशेयस्तेषां योगस्तु चै बुधैः । इत्येवं सन्निवेशो पृधिव्या ज्योतियाचय.
* मत्स्यपुराणम् * [अष्टाविंशत्यधिकशततमो द्वीपानामुदधीनाञ्च पर्वतानां तथैव च । पर्षाणाञ्च नदीनाञ्च ये च तेषु घसन्ति वै॥८१ इत्येपोऽर्कवशेनैवसन्निवेशस्तुज्योतिषाम् । आवर्त सान्तरोमध्येसंक्षिप्तश्चध्रुवात्तु सः सर्वतस्तेषु विस्तीर्णो वृत्ताकार इवोच्छ्रित.। लोकसम्व्यवहारार्थमीश्वरेण विनिर्मितः कल्पादौ वुद्धिपूर्वन्तु स्थापितोऽसौ स्वयम्भुवा । इत्येप सन्निवेशो वै सर्वस्य ज्योतिरात्मकः ॥ ८४ ॥ वैश्वरूपं प्रधानस्यपरिणाहोऽ ऽस्यय स्मृत । तेषां शक्यं न संख्यातुंयाथातथ्येन केनचित् गतागत मनुष्येण ज्योतिषां मां स चक्षुपा ॥ ८५॥ इति श्रीमत्स्यमहापुराणे ज्यौतिपचक्रवर्णनं नाम सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः । अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः मयासुराख्यानवर्णनम् । ऋपय ऊचु.। कथं जगाम भगवन् पुरारित्वं महेश्वर. । ददाह व कथं देवस्तन्नो विस्तरतो पद ॥ पृच्छामस्त्यां पयं सर्वे बहुमानात् पुनः पुन त्रिपुरगतद्यथादुर्ग मयमायाधिनिर्मितम् । देवेनैकेषुणा दग्धं तथा नो घद मानद ! ॥२॥ सूत उवाच। शृणुध्य विपुरं देयो यथा दारितवान् भय ।मयोनाम महामायो मायानाजनकोऽसुरः निर्जित स तु संग्रामे तताप परमन्तप. । तपस्यन्तन्तु तं विप्रा दैत्यायन्यावनुग्रहात् ।। तस्यैप कृत्यमुद्दिश्य तेपनुः परमन्तपः । विद्युन्माली च बलवान तारफारयश्चवीर्यपान् मयतेज समाफ्रान्ती तेपतुर्मयपार्श्वगौ । लोफा ५य यथामूस्त्रियस्रय इयाग्नयः ।। लोकत्रयं तापयन्तस्तै तेपुर्दानयास्तप । हेमन्ते जलशय्यामु प्रीप्मे पञ्चतपे तथा ॥७ पांसु च तथाकाशे क्षपयन्तम्तनूः प्रियाः ।
ऽध्यायः] * मयासुराख्यानवर्णनम् * सेचानाः फलमूलानि पुष्पाणि च जलानि च ॥८॥ अन्यदाचरिताहाराः पनाचितवल्कलाः । मनाः शैवालपङ्केषु विमला विमलेषु च । निर्मा'साश्च ततो जाता: शाधमनिसन्तताः । तेषां तप.प्रभावेन प्रभावविधुतं यथा ।। निष्प्रभन्तु जगत् सर्व मन्दमेवाभिभाषितम् । दह्यमानेषु लोकेषु तैत्रिभिदनियाग्निभिः तेपामग्ने जगद् बन्धुः प्रादुर्भूतः पितामहः। ततः साहसकर्तारःपाहुस्तेसहसागतम् ॥ स्वकम्पितामहं दैत्यास्तंवैतपुरेव च । अथ तान् दानवान् ब्रह्मा तपसा तपनप्रभान् ॥ उवाच हर्षपूर्णाक्षी हर्षपूर्णमुखस्तदा । घरदोऽहं हि धो धत्सास्तपस्तोपित आगतः ।। व्रीयतामीप्सितं यच्चसामिलापं तदुच्यताम् । इत्येचमुच्यमानन्तु प्रतिपन्नं पितामहम् ॥ १५ ॥ विश्वकर्मा मयः प्राह प्रहरफुललोचनः । देवदैत्याः पुरा देवः संग्रामे तारकामये॥ निर्जितास्ताडिताश्च हताश्चाप्यायुधैरपि । देवेवैरानुवन्धाच्च धावन्तो भयवेपिता ॥ शरणघ जानीम शर्म चा शरणार्थिन । सोऽहं तपः प्रभावेण तव भत्त्या तथैव च।। इच्छामि कर्तुं तदुर्ग यद्देवैरपि दुस्तरम् । तस्मिश्च त्रिपुरे दुर्गे मत्कृते कृतिनां घरः ।। भूम्यानां जलजानाञ्च शापानां मुनितेजसाम् । देवप्रहरणानाञ्च देवानाञ्च प्रजापते ! ॥ २० ॥ अलवनीयं भवतु त्रिपुरं यदि ते प्रियम् । विश्वकर्मा इतीयोक्तः स तदा विश्वकर्मणा उचाच प्रहसन पाक्यं मयं दैत्यगणाधिपम् । सर्वामरत्वं नैवास्ति असवृत्तस्य दानध॥ तस्माद्दुर्गविधानं हि तृणादपि विधीयताम् । पितामहयच श्रुत्वा तदैवं दानयो मयः प्राञ्जलि पुनरप्याह ब्रह्माणं पद्मसम्भवम् । शम्भुरेकेषुणा दुर्ग सरन मुक्तेन निर्दहेत् ॥ समंस संयुगे यादवध्यं शेषतो भवेत् । एघमस्त्विति चाप्युत्तधामयं देव पितामहः स्वप्ने लब्धो यथार्थो वै तत्रधादर्शन ययौ । गते पितामहे दैत्या गता मयरविप्रभाः॥ घरदानाद्विरेजुस्ते तपसा च महाबलाः । समयस्तु महावुद्धिानयो वृषसत्तम ॥ २७ ॥ दुर्ग व्यवसित कर्तुमिति चाचिन्तयत्तदा । कथं नाम भवेद्दर्ग तन्मया त्रिपुरं कृतम् ।। वत्स्यं हि तत् पुरं दिव्यं मत्तो नान्यन संशयः।
* मत्स्यपुराणम् * [ऊनत्रिंशदधिकशततमो यथा चैकेपुणा तेन तत् पुरं न हि हन्यते ॥ २६ ॥ देवैस्तथा विधातव्यं मया मतिविचारणम् । विस्तारो योजनशतमेकैकस्य पुरस्य तु ॥३०॥ कार्यस्तेषाञ्च विष्कम्भश्चैकैकशतयोजनम् । पुष्पयोगेन निर्माण पुराणञ्च भविष्यति ॥ पुष्पयोगेन च दिवि समेष्यन्ति परस्परम् । पुष्पयोगेन युक्तानि यस्तान्यासादयिष्यति पुराण्येकप्रहारेण शतानि निहनिष्यति । आयसन्तु क्षितितले राजतन्तु नभस्तले ॥ राजतस्योपरिष्ठात्तु सौवर्ण भविता पुरम् । एवं त्रिभिः पुरैर्युक्तं त्रिपुरं तद्भविष्यति ॥ शतयोजनविष्कम्भैरन्तरैस्तद्दुरासदम् ॥ ३४ ॥ अट्टालकैर्यन्त्रशतनिभिश्च सचक्रशूलोपलकम्पनैश्च । द्वारैर्महामन्दरमेरुकल्पैः प्राकारटङ्गः सुविराजमानम् ॥ ३५ ॥ सतारकाख्येन मयेन गुप्तं स्वस्थञ्च गुप्तं तडिन्मालिनापि । को नाम हन्तुं त्रिपुरं समर्थो मुक्या त्रिनेत्रं भगवन्तमेकम् ॥३६ ॥ इति श्री मत्स्यमहापुराणे त्रिपुराख्यानवर्णनं नामाष्टविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः । ऊनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः मयस्यत्रिपुरनिर्माणम् । सूत उवाच। इति चिन्त्य मयो दैत्यो दिव्योपायप्रभावजम् । चकार त्रिपुरं दुर्गमनःसवारचारितम् प्रकारोऽनेन मार्गेण इद्द यामुत्र गोपुरम् । इह चाहालफद्वारमिह चाहालगोपुरम् ॥२॥ राजमार्ग तथापि विपुलो भयतामिति । रथ्योपरथ्याः सत्रिका इहचत्यर एवच ॥३॥ इदमन्त पुरस्थानं रवायतनमय च । सबटानि तड़ागानि पत्र घाप्यः सरांसि च ॥४॥ आरामाच समाधान उद्यानान्यत्र घा तथा । उपनिर्गमो दानवानां भवत्या मनोहरः।।
ऽध्यायः] * मयस्यत्रिपुरनिर्माणवर्णनम् * इत्येवं मानसं तत्राकल्पयत् पुरफल्पवित् । मयेन तत्पुरं सृष्टंत्रिपुरं त्विति नः श्रुतम् ॥ कार्णायसमयं यत्तुमयेन विहितं पुरम् । तारकास्योऽधिपस्तनस्तस्थानाधिपोऽवसत् यत्तु पूर्णेन्दुसङ्काश राजतं निर्मिनं पुरम् । विद्युन्माली प्रभुस्ता विद्युन्मालीवियाग्दः सुवर्णाविरतं यत्र मयेन विहितं पुरम् । स्वयमेव मयस्तत्र गतस्तदधिपः प्रभुः ॥ ६!! तारकस्य पुरं तत्र शतयोजनमन्तरम् । विद्युन्मालिपुरचापि शतयोजनकेऽन्तरम् ॥१०॥ मेरुपर्वतसङ्काशं मयस्यापि पुरं महत् । पुष्पसंयोगमात्रेण कालेन समयः पुरा ॥ ११ ॥ कृतवास्त्रिपुर दैत्यस्त्रिनेन. पुष्पकं यथा । येन येन मयो याति प्रकुर्वाण पुरं पुरात् ।। प्रशस्तास्तत्र तत्रैव वारुण्यामालयाः स्वयम् । रुक्मम्प्यायसानाञ्च शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १३ ॥ रत्नाचितानि शोभन्ते पुराण्यमरविद्विपाम् । प्रासादशतजुष्टानि कूटागारोत्कटानि च ॥ सर्वेषां कामगानि स्युः सर्वलोकातिगानि च । सोद्यानवापीकृपानि सपद्मसरपन्ति च अशोकवनभूतानि कोकिलारतवन्ति च । चित्रशालाविशालानि चतु शालोत्तमानि च सप्ताएदशामानि सत्कृतानि मयेन च । बहुध्वजपताकानि स्नग्दामालकृतानि च ॥ किङ्किणीजालशदानि गन्धवन्ति महान्ति च । सुसंयुक्तोपलिप्तानि पुप्पनैवेद्यवन्ति च यमधूमान्धकाराणि संपूर्णकलशानि च । गगनावरणामानि हंसपङ्क्तिनिभानि च ॥ पड्कीकृतानि राजन्ते गृहाणि त्रिपुरे पुरे । मुक्ताकलापैर्लम्बनिहंसन्तीव शशिश्रियम् ॥ मलिकाजातिपुप्पाद्यैर्गन्धधूपाधियासितैः । पञ्चेन्द्रियसुखैनित्यं समैः सत्पुरुपैरिव ।। हेमराजतलोहाद्यमणिरनासनाडिताः । प्राकारास्त्रिपुरे तस्मिन् गिरिनाकारसन्निभाः ॥ एकैकस्मिन् पुरे तस्मिन् गोपुराणां शतं शतम् । सपताका ध्वजवती श्यन्ते गिरिश्टङ्गयत् ॥ २३ ॥ नूपुरारावरम्याणि त्रिपुरे तत् पुराण्यपि । स्वर्गातिरिक्तश्रीकाणि तन्न कन्यापुराणि च ॥ २४ ॥ मारामैश्च विहारैश्च तडागवटवत्वरैः । सरोभिश्च सरिद्भिश्च घनश्चोपपनैरपि ।। २५ ॥ दिव्यमोगोपभोगानि नानारत्नयुतानि च । पुष्पोत्करैश्च सुभगानि पुरस्योपनिर्गमा:
* मत्स्यपुराणम् * [त्रिंशदधिकशततमो परिखाशतगम्भीराः कृता मायानिवारणैः । निशम्य तदुर्दुर्गविधानमुत्तमं कृतं मयेनाद्भुतवीर्यकर्मणा । दिते सुता दैवतराजवैरिणः सहस्रश. प्रापुरनन्तविक्रमाः ॥ २७ ॥ तदासुरैर्दर्पितवैरिमर्दनैर्जनार्दनैः शैलकरीन्द्रसन्निभैः । बभूव पूर्ण त्रिपुर तथा पुरा यथाम्बरं भूरिजलैजलप्रदैः ॥ २८ ॥ इति श्रीमत्स्यमहापुराणे मयस्यत्रिपुरनिर्माणवर्णनं नामोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः मयाख्यानवर्णनम् । सूत उवाच। निर्मिते त्रिपुरे दुर्गे मयेनासुरशिल्पिना । तद्दुगं दुर्गता प्राप बद्धवरैः सुरासुरैः ॥ १॥ सकलत्राः सुपुत्राश्च शस्त्रयन्तोऽथ कोपमाः 1 मयादिष्टानि विविशु हाणि हृपिताश्च ते सिंहा धनमिवानेके मकरा इव सागरम् । रोपैश्चैवातिपारुष्यै. शरीरमिव संहतैः ॥३॥ तद्वद्यलिभिरध्यस्तं तत् पुरं देवतारिभिः। त्रिपुरं सकुलं जात दैत्यकोटिशताकुलम् ।। सुतलादपि निप्पत्य पातालाद्दानवालयात् । उपतस्थु पयोदाभा ये च गिर्युपजीविनः ॥५॥ योऽयं प्रार्थयते काम संप्राप्तस्तिपुरात् त्रयात् । तस्य तस्य मयस्तत्र मायया विदधाति स. ॥ ६ ॥ सचन्द्रेषु च दोपेषु साम्युजेपु सर सु च । आरामेषु स चूतेषु तपोधन धनेषु च ॥ ७॥ स्वाश्चन्दनदिग्धाङ्गा मातङ्गाः समदा इव ! मृष्टाभरणयस्त्राश्च मृटस्रगनुलेपनाः ॥८॥ प्रियाभिः प्रियकामाभिहावभावप्रसूतिभि । नारीभिः सततं रेमुर्मुदिताश्चैव दानवाः॥६ मयेन निर्मिते स्थाने मोदमानामहासुरा. । अर्थे धर्म च कामे च निदधुस्ते मति स्वयम् + ऽध्यायः] * मयाल्यानवर्णनम् * तेषां त्रिपुरयुक्तानां त्रिपुरे त्रिदशारिणाम् । ब्रजतिस्म सुखं कालः स्वर्गस्थानां यथा तथा ॥ ११ ॥ -शुश्रूपन्तो पितॄन् पुत्रा पल्यश्चापि पतींस्तथा । विमुक्तकलहाश्चापि प्रीतयः प्रचुराभवन् आधर्मस्त्रिपुरस्थानां वाधते घीर्यवानपि । अर्चयन्तो दितः पुत्रास्त्रिपुरायतने हरम् ॥ पुण्याहशब्दानुच्चेरराशीर्वादांश्च चेदयान् । स्थनूपुररपोन्मिधान् वेणुवीणारयानपि ॥ हासच घरनारीणां चित्तव्याकुलकारकः । त्रिपुरे दानवेन्द्राणां रमतां श्रूयते सदा॥१५॥ तेपामर्चयतांदेवान् ब्राह्मणांश्चनमस्यताम् । धर्मार्थकामतन्त्राणां महान् कालोऽभ्यवर्तत अथालक्ष्मीरसूया च तृड्बुभुक्षे तथैव च । कलिश्च कलहश्चैव त्रिपुरं विविशुः सह ॥ सन्ध्याकालं प्रविष्टास्ते त्रिपुरच भयावहाः । समध्यासुः समं घोराः शरीराणि यथामयाः ॥ १८ ॥ सर्व एते विशन्तस्तु मयेन त्रिपुरान्तरम् । स्वप्ने भयवहा दृष्टा आविशन्तस्तु दानवान् उदिते च सहस्रांशी शुभभासाकरे यो । मयः सभामाविवेश भास्कराभ्यामिवाम्बुदः मेरुकूटनिभे रम्ये आसने स्वर्णमण्डिते। आसीनाः काञ्चनगिरः शृङ्गे तोयमुचो यथा पार्श्वयोस्तारकाख्यश्च विद्युन्मालीव दानवः । उपविष्टोमयस्यान्तेहस्तिन कलभाविव -ततः सुरारयः सर्वे शेषकोपारणाजिरे । उपविष्टा दृढ़ बद्धा दानवा देवशत्रवः ॥ २३ ॥ तेष्यासीनेषु सर्वेपु सुखासनगतेपु व । मयो मायाविजनक इत्युवाच स दानवान् २४ खेचरा: खेचरारावा भो भो दाक्षायणीसुताः !। निशामयध्वं स्वप्नोऽयं मया दृष्टो भयावहः ॥२५॥ चतस्रः प्रमदास्तत्र त्रयोमा भयावहाः। कोपानला दीप्तमुपाः प्रविष्टास्त्रिपुरादिनः । प्रविश्य रुपितास्ते च पुराण्यतुलविक्रमाः । प्रविष्टास्तच्छरीराणि भूत्या बहुशरीरिणः॥ नगरं त्रिपुरञ्चेदं तमसा समवस्थितम् । सगृहं सह युष्माभिः सागराम्भसिमजितम् । उलूकं रुचिरा नारी नाम्ना रूढा खरं तथा । पुरुषः सिन्दुतिलकश्चतुरद्धिस्त्रिलोचनः॥ येन सा प्रमदा नुन्ना अहञ्चैव विवोधितः । ईदृशी प्रमदा द्ष्टा मया चाति भयावहा एप ईशिकः स्वप्नो दृष्टो वै दितिनन्दनाः।
३२० * मत्स्यपुराणम् [त्रिंशदधिकशततमो दृष्टः कथं हि फष्टाय असुराणां भविष्यति ॥३१॥ यदि वोऽहं क्षमो राजा यदिदं वेत्य चेद्धितम् । नियोधध्वं सुमनसो नचासूयितुमर्हथ कामं चेयाञ्च कोपञ्च असूयां संविहाय च । सत्येदमे च धर्मे च मुनिवादे च तिष्ठत । शान्तयश्च प्रयुज्यन्तां पूज्यताञ्च महेश्वरः। यदि नामास्य स्वामस्य ह्येवञ्चोपरमोभवेत् कुप्येत नो ध्रुवं रुदो देवदेवस्त्रिलोचनः । भविष्याणि च दृश्यन्ते यतोनस्त्रिपुरे सुराः कलह घर्जयन्तश्च अर्जयन्तस्तथार्जवम् । स्वप्नोदयं प्रतीक्षध्वं कालोदयमथापि च ॥३६ श्रुत्वा दाक्षायणीपुत्राइत्येवंमयभाषितम् । कोधेावस्थया युक्ता दृश्यन्तेचविनाशगाः विनाशमुपपश्यन्ती हालक्ष्मयाध्यापितासुराः । तत्रैव दृष्ट्वातन्योऽन्यंसंक्रोधापूरितक्षणा- अथ देवपरिश्वस्ता दानवास्त्रिपुरालयाः। हित्वा सत्यञ्च धर्मच अकाव्ण्यपि चक्रमुः॥ ३६॥ द्विपन्तिग्राह्मणान पुण्यानवार्चन्ति हि देवताः । गुरुं चैवनमन्यन्तेहान्योन्यञ्चापिचुक्रुधुः कलहेयु च सजन्ते स्वधर्मेषु हसन्ति च । परस्परञ्च निन्दन्ति अहमित्येव वादिनः । उच्चैर्गुरुन् प्रभाषन्तनाभिभाषतिपूजिताः। अकस्मात्साश्रुनयना जायन्ते च समुत्सुकाः दधिसक्तून् पयश्चैव कपित्थानिच रात्रिषु । भक्ष्यन्ति च शेरन्त उच्छिष्टाःसंवृतास्तथा मूत्रं कृत्वोपस्पृशन्तिवाकृत्वापादधावनम् । संविशन्तिवशय्यासु शौचाचारविवर्जिताः सङ्कुचन्ति भयाच्चैव मार्जाराणां यथाखुकः । भाऱ्यां गत्वा न शुध्यन्ति रहोवृत्तिषु निस्त्रपाः ॥ ४५ ॥ पुरा सुशीला भूत्वा च दुःशीलत्यमुपागताः । देवांस्तपोधनांश्चैववाधन्ते त्रिपुरालयाः मयेन पार्यमाणापि ते विनाशमुपस्थिताः। विप्रियाण्येवाविप्राणां कुर्वाणा:कलहैषिणः वैभ्राजं नन्दनं चैव तथा चैत्ररथं धनम् । अशोकं च वराशोकं सर्व कमथापिच॥४८॥ स्वर्गच देवतावासं पूर्वदेववशानुगाः । विध्वंसयन्ति संक्रुद्धास्तपोधनवनानि च ॥४६ विध्वस्तदेवायतनाश्रमं च संभग्नदेवद्विजपूजकं तु । जगद्मभूवामरराजदुष्टैरभिद्रुतं सस्यमिवालिवृन्दैः । ५०॥ इति श्री मत्स्यमहापुराणे मयाख्यानवर्णनं नाम त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।
M एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः दानवानामुपद्रवं दृष्ट्या देवैः ब्रह्मसमीपे गमनम् । सूत उवाच। अशीलेषु प्रदुऐषु दानवेषु दुरात्मनु । लोकेपूत्साद्यमानेषु तपोधनवनेषु च ॥१॥ सिंहनादे व्योमगानान्तेपु भीतेपु जन्तुषु । त्रैलोक्ये भयसंमूढे तमोन्धत्यमुपागते ॥२ आदित्या घसवासाध्या पितरो मरुताङ्गणा. । भीता. शरणमाजग्मुब्रह्माणं प्रपितामहम् ते तं स्वर्णोत्पलासीनं ब्रह्माणं समुपागता. । नेमुरुधुश्च सहिताः पञ्चास्यं चतुराननम् घरगुप्तास्तवैवेह दानवात्रिपुरालयाः। वाधन्तेऽस्मान्यथाप्रेष्याननुशाधि ततोऽनघ!॥ मेघागमे यथा हंसा मृगाः सिंहभयादिय । दानवानां भयानद्वयभ्रामः प्रपितामहः ।। पुत्राणां नामधेयानि फलनाणां तथैव च । दानवैर्धाम्यमाणानां विस्मृतानि ततोऽनघ देववेश्मप्रभङ्गाध आश्रमभ्रशनानि च । दानवैर्लोभमोहान्धैः क्रियन्ते च भ्रमन्ति च ॥ यदि न बायसे लोकं दानवैविद्रुतं द्रुतम् । धर्षणानेन निर्देवं निर्मनुष्याश्रम जगत् ॥६॥ इत्येवं त्रिदशैरुतः पायोनि पितामहः । प्रत्याह त्रिदशान् सेन्द्रानिन्दुतुल्यानन. प्रभुः मयस्य यो घरो दत्तो मया मतिमताम्बरा.!! तस्यान्त एप संप्राप्तो यः पुरोक्तो मया सुरा. ॥ ११ ॥ तञ्च तेषामधिष्ठानं त्रिपुरं त्रिदशर्षमा.। एतेषु पातमोक्षेण हन्तन्यं नेपु वृष्टिमि ॥१२ भवताञ्च न पश्यामि कमप्यत्र सुरर्षभाः । यस्तु चैकप्रहारेण पुरं हन्यात् सदानवम् त्रिपुरं नाल्पधीर्येण शक्यं हन्तुं शरेण तु । एकं मुक्या महादेवं महेशानं प्रजापतिम् ॥ ते यूयं यदि अन्ये च क्रतुविध्वंसक हरम् । याचामः सहितादेवं त्रिपुरं स हनिष्यति । कृतः पुराणा विष्कम्भो योजनानां शतं शतम् । यथा चैकप्रहारेण हन्यते वैभवेन तु पुष्पयोगेन युकानि तानि चैकक्षणेन तु ॥ १६ ॥ ततो देवश्च संप्रोक्तो यास्याम इति दुःखितः। पितामहश्च ते साद्धं भवसंसदमागतः ॥
॥
३२२
* मत्स्यपुराणम् * [द्वात्रिंशदधिकशततमो
तं भवं भूतभव्येशं गिरिशं शूलपाणिनम् । पश्यन्ति चोमया सार्द्धनन्दिना च महात्मना
अग्निवर्णमजन्देवमग्निकुण्डनिभेक्षणम् । अग्न्यादित्यसहस्राममग्निवर्णविभूषितम् ।।
चन्द्रावयवलक्ष्माण चन्द्रसौग्यवराननम् । आगम्य तमजन्देवमथ तं नीललोहितम् ॥
स्तुवन्तो घरद शम्भु गोपति पार्वतीपतिम् ॥ २१ ॥
देवा ऊचुः।
नमो भगवतेशाय रुद्राय घरदाय च । पशूनाम्पतये नित्यमुग्राय च कपर्दिने ॥ २२ ॥
महादेवाय भीमाय न्यम्वकाय च शान्तये । ईशानाय भयनाय नमस्त्वन्धकघातिने ॥
नीलग्रीवाय भीमाय वेधसे वेधसास्तुते । कुमारशत्रुनिघ्नाय कुमारजनकोय च ॥२४
विलोहिताय धूम्राय घराय क्रथनाय च । नित्यं नीलशिखण्डाय शलिने दिव्यशायिने॥
उरगाय त्रिनेत्राय हिरण्यवसुरेतसे । अचिन्त्यायाम्विकाभत्र सर्वदेवस्तुताय च ॥२६॥
वृपध्वजाय मुण्डाय जटिने ब्रह्मचारिणे । तप्यमानाय सलिले ब्रह्मण्यायाजिताय च ।।
विश्वात्मने विश्वसृजे विश्वमावृत्य तिष्ठते । नमोऽस्तु दिव्यरूपाय प्रभवे दिव्यशम्भये
अभिगम्याय काम्याय स्तुत्यायााय सर्वदा।
भक्तानुकम्पिने नित्य दिशते यन्मनोगतम् ॥ २६ ॥
इति श्रीमत्स्यमहापुराणे देवैः शङ्करस्तुतिकरण नामैकनिशदधिकशततमोऽध्यायः ।
द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
देवेभ्यो महादेवस्य वरदानम् ।
सूत उवाच।
ब्रह्माद्यस्तृयमानम्तु देदघो महेश्वरः । प्रजापतिमुघाचेदं देवानां क भयं महत् ॥१॥
भो ! देवा ! स्वागतं घोऽस्तु चूत यद्वो मनोगतम् ।
तावदेव प्रयच्छामि नास्त्यदेयं मया हिप ॥२॥
३२३ ऽध्यायः] *देवयुद्धार्थ रथनिर्माणम् * युष्माकं नितरां शं वै कर्ताऽहं विवुधर्षभाः !1 चरामि महदत्युग्रं यच्चापि परमं तपः॥ विद्विष्टा घो मम द्विष्टाः कष्टाः कटपराक्रमाः। तेपामभाव सम्पाद्यो युस्माकं भवएवच एवमुक्तास्तु देवेन प्रेम्णा सब्रह्मकाः सुराः । दमाहुर्महाभाग भागार्हाः सर्व एव ते॥ भगवंस्तैस्तपस्ततं रौद्रं रौद्रपरालमैः । असुरैर्वध्यमानाः स्म वयं त्यां शरणं गताः ।। मयो नाम दिते. पुत्रत्रिनेत्रफलहप्रियः । त्रिपुरं येन तद्दुर्ग कृतं पाण्डुरगोपुरम् ॥ ७ ॥ तदाश्रित्य पुरं दुर्ग दानवा वरनिर्भयाः { बाधन्तेऽस्मान् महादेव प्रेप्यमस्वामिनं यथा॥ उद्यानानि च भग्नानि नन्दनादीनि यानि च। घराश्चाप्सरसःसर्वा रम्भाद्या दनुजैई ताः इन्द्रस्य याद्याश्च गजाः कुमुदाअनवामनाः । ऐरावताद्यापहृता देवतानां महेश्वर !॥१०॥ ये चेन्द्ररथमुख्याश्च हस्योऽपढतासुरैः । जाताश्च दानवानान्ते रथयोग्यास्तुरङ्गमाः ॥ ये रथा ये गजाश्चैव याः स्त्रियो वसु यञ्च न । तन्नो व्यपहृतं दैत्यैः संशयो जीविते पुनः ॥ १२॥ त्रिनेत्र एव मुक्तस्तु देवैः शक्रपुरोगमैः । उवाच देवान् देवेशो वरदो वृपवाहनः ॥१३॥ व्यपगच्छतु घो देवा महद्दानवजम्भयम् । तदहं त्रिपुरन्धश्ये क्रियतां यद्वीमि तत् ।। यदीच्छथ मया दग्धं तत्पुरं सह दानवम् । रथमोपयिकं मह्यं सजयध्वं किलास्यते ।। दिग्याससा तथोक्तास्तेसपितामहकाः सुराः । तथेत्युक्त्वा महादेवञ्चकुस्ते रथमुत्तमम्।। धरां कृयरको तु दो रुद्रपार्श्वचरावुभौ । अधिष्ठानं शिरो मेरो रक्षो मन्दर एव च ॥ चकुश्चन्द्रश्च सूर्यञ्च चक्रे काञ्चनराजते । कृष्णपक्षं शुक्लपक्षं पक्षद्वयमपीश्वराः ॥१८॥ स्थनेमिद्वयं चनुर्देघा ब्रह्मपुरःसराः । आदिद्रयं पक्षयन्त्रं यन्त्रमेताश्च देवताः॥ कम्बलाश्वरतराभ्याच नागाभ्यां समवेष्टितम् । भार्गपश्चाङ्गिराश्चैव युधोऽङ्गारक एव च ॥ २० ॥ शनैश्चरस्तथा चाव सर्वे ते देवसत्तमाः । घरुथं गगनं चक्रुश्चाररूपं रथस्य ते ॥ २६ ॥ कृतं द्विजितनयनं निवेणु शातकोम्भिकम् । मणिमुकेन्द्रनीलैश्च वृतं हपमुसैः सुरैः॥२२ गङ्गा सिन्धुःशतद्रश्य चन्द्रभागा सरस्वती । धितस्ता च पिपाशावयमुना गण्डकी तथा सरस्वती देविका च तथा च श(सरयूरपि । एता: सरिद्वराः सर्या येणुसंशाता रथे .॥
- . ३२४ * मत्स्यपुराणम् * [द्वात्रिंशदधिकशततमो धृतराष्ट्राश्च ये नागास्ते व वेश्यात्मकाः कृताः। वासुके कुलजाये च ये व रैवतवंशजाः ते सा दर्पसम्पूर्णाश्चापतूणेष्वनूनगाः । अवतस्थुः शरा भूत्वा नानाजातिशुभाननाः ॥ सुरसा सरमा कनिता शुविरेवच । तृपा बुभुक्षा सर्वोया मृत्युः सर्वशमस्तथा ॥ ब्रह्मवध्या च गोषध्या यालवध्याः प्रजाभयाः। गदा भूत्वा शक्तयश्च तदा देवरथेऽभ्ययुः ।। २८ ॥ युगं कृतयुगञ्चात्र चातुर्होत्रप्रयोजकाः। चतुर्वर्णाः सलीलाश्च बभूवुः स्वर्णकुण्डलाः ।। २६ ।। तयुगं युगसङ्काशं रथशी प्रतिष्ठितम् । धृतराष्ट्रण नागेन बद्ध बलवता महत् ॥३०॥ ऋग्वेदः सामवेदश्च यजुर्वेदस्तथापरः । चेदाश्चत्वार एवैते चत्वारस्तुरगा भवन् । अन्नदानपुरोगाणि यानि दानानि कानिचित् । तान्यासन्याजिनां तेषां भूपणानि सहस्रशः ।। ३२ ॥ पद्मद्वयं तक्षकश्च कर्कोटकधनञ्जयो । नागा बभूवुरेचते हयानां यालबन्धनाः ॥ ३३ ॥ भोडारप्रभवास्ता था मन्त्रयशक्रतुक्रियाः । उपद्रयाः प्रतीकाराः पशुवन्धेष्टयस्तथा ॥३४ यशोपचाहान्येतानि तस्मिन् लोकरथे शुभे । मणिमुक्ताप्रपालस्तु भूपितानि सहस्रशः।। प्रतोदोङ्कार एवासीत्तदनञ्च घषतम् । सिनीवाली कुहूराका तथा चानुमती शुभा ॥ योक्त्राण्यासंस्तुरगाणामपसर्पविग्रहाः॥ ३७॥ कृष्णान्यथ च पीतानि श्वेतमाविष्टकानि च । अवदाताः पताकास्तु बभूवुः पचरिताः ॥ ३८॥ ऋतुभिश्च कृतः पड्भिर्धनुः सम्वत्सरोऽभवत् । अजराज्याभयद्यापि साम्बिका धनुगे दृढ़ा॥ ३९ ॥ फालो हिभगवान्तुद्रस्तञ्चसम्बतसरं विदुः । तम्मादुमाकालरात्रिर्धनुषोज्या जराभवत् सगमं त्रिपुरं येन दग्धवान् स प्रिलोचनः । स इपुर्विष्णुसोमाग्निनिदेयतमयोऽभवत् ॥ । थाननं पग्निरमपच्छल्यं सोमम्तमोनुदः । नेजसः समयायोऽथ चेकोस्तेजो रथाङ्गत् तस्मिाध पीर्यवृद्धयर्थ पासुफिर्नागपाधियः ।
ऽध्यायः • देवानां शङ्करप्रति समभ्यर्यनम् । तेजः सम्पसनाय घे मुमोचातिपिणेविषम् ॥४३॥ त्या देवा रथापि दिव्यं दिव्यप्रभावतः । लोकाधिपतिमभ्येत्य इदं पचनमयुपन् । संस्थतोऽयं योऽम्मामिस्तप दानपशनिन् । इदमापत्परित्राणं देवान् सेन्द्रपुरोगमान तं मेशिनराकारं त्रैलोररथमुत्तमम् । प्रशम्यदेवान् साध्यिति रयं पश्यति शङ्करः ।। मुगुईया रयं साधु साचित्युक्या मुटुमदुः । उपाच सेन्दानमरानमराधिपनिः म्ययम् यादृशोऽयंग्यायलमो युप्माभिर्ममसत्तमाः। ईदृशो रथसम्पत्या यन्ता शीघ्र विधीयताम् न्युक्या देवदेवेन देवाविद्रा इयेषुभिः । अयापुर्महनी चिन्ता फयं कार्यमिति ग्रुपन् । महादेवस्य देयोऽन्यः फो नाम सहशो भवेत् । मुत्या चक्रायुधं देवं सोपास्य इपुमाश्रितः ॥ ५० ॥ धुरि युक्ता इवोक्षाणो बदन्त इव पर्वतैः । नि.श्वसन्तः मुराः सः कथमेतदिति ग्रुपन् देयोऽदृश्यत देवांस्तु लोफनाथस्य धूर्गतान् । अहं सारथिरित्युक्त्या जमाहाश्यांस्ततोऽमजः ॥ ५२ ॥ तती देवैः सगन्धर्वः सिदनादो महान् कृतः । प्रतोददस्तं संप्रेक्ष्य ब्रह्माणं सुनतां गतम् भगवानपि विश्वेशो रथस्ये वे पितामहे । सदृशः सून इत्युक्त्या चारारोह रथं हर.॥ आरोहति रथं देये घश्या हरमरातुराः। जानुभिः पतिता भूमौ रजोनासाथ ग्रासितः । देयो दृष्ट्वाथ वेदास्तानमारग्रहयान् मयात् । उजहार पितृनाान् सुपुत्र इय दु.पितान् ततः सिंहरयो भूयो बभूय रथभैरवः । जयशदश्च देवानां संवभूयार्णधोपमः ॥ ५७ ॥ तदोवारमयं गृह्य प्रतोदं घरदः प्रभुः । स्वयम्भूः प्रययौ घाहाननुमन्न्य यथाजपम् ॥ ग्रसमाना इवाकाशं मुष्णन्त इयमेदिनीम् । मुरोभ्यासरजु यासानुच्छ्वसन्त इवोरगाः स्वयम्भुवा चोद्यमानाश्चोदितेन कपर्दिना । व्रजन्ति तेऽश्या जपनाःक्षयकाल इयानिलाः ध्वनोच्छ्रयविनिर्माणे ध्वजयष्टिमनुत्तमाम् । भागम्य नन्दीवृषभं तस्यो तस्मिशियेच्छया ॥६॥ भार्गवाङ्गिरसो देवी दण्डहस्ती रविप्रभो । रथचो तु रक्षेते रद्रस्य प्रियकाक्षिणा शेषश्च भगवान्नागः अनन्तोऽन्तकरोऽरिणाम् । शरहस्तो रथम्पाति शयनं ब्रह्मणस्तदा ।
* मत्स्यपुराणम् * [त्रयस्त्रिंशदधिकशततमो
यमस्तूर्णसमास्थाय महिपञ्चातिदारुणम् । द्रविणाधिपािल सुराणामधिपो द्विपम्
अरक्षत मयूर निकूजन्त किन्नर यथा । गुह आस्थाय घरदो युगोपमरथ पितु ॥६५॥
नन्दीश्वरश्चभगवान् शूलमादाय दीप्तिमान् । पृष्ठतश्चापि पार्वाभ्या लोकस्यक्षयकृद्यथा
प्रमथाश्चाग्निवर्णाभा साग्निज्वाला इवाचला । अनुजग्मू रथ शावं नका इच महार्णवम्
भृगुर्भरद्वाजवसिष्ठगीतमा ऋतु पुलस्त्य पुलहस्तपोधना ।
मरीचिरनिर्भगवानथाङ्गिरा पराशरागस्त्यमुखा महर्षय ॥ ६८ ॥
हरमजितमज प्रतुशनुर्वचनविविचित्रभूषण ।
रथस्त्रिपुरे सकाञ्चनाचलो ब्रजति सपक्ष इवाद्विरम्वरे ॥६॥
फरिगिरिरविमेघसन्निभा सजलपयोदनिनादनादिन ।
प्रमथगणा परिवार्य देवगुप्त रथममरापि ययु स्म दर्पयुक्ता ॥ ७० ॥
मकरतिमितिमिलिलावृत प्रलय इचातिसमुद्धतोऽर्णच ।
व्रजति रथवरोऽति भास्वरो ह्यशनिनिपातपयोदनि स्वन ॥७॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे शङ्करम्प्रतिदेवानामनुरोधघर्णन नाम द्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
त्रयस्त्रिशदधिकशततमोऽध्याय.
त्रिपुरे नारदागमनम् ।
सत उचाचा
.
पूज्यमाने रथे तस्मिन् लोकदैवे रथे स्थिते । प्रमथेपु नदत्सुन प्रवदतसु साध्विति।।
ईश्वरस्थरघोपेण नर्दमाने महावृपे । जयत्सु विप्रेषु तथा गर्जत्सु तुरगेपु च ॥ २ ॥
रणानणात् समुत्पत्य देवपिनारद प्रभु । फान्त्या चन्द्रोपमस्तुणं त्रिपुर पुरमागत ॥
औत्पातिकन्तु दैत्याना त्रिपुरे घर्त्तते ध्रुवम् । नारश्चात्र भगवान् प्रादुर्भूतस्तपोधन
गत जरदाभास समेता सर्वदानपा । उत्तस्थुनारद दृष्ट्वा अभिवादनवादिन ॥ ५॥
ऽध्यायः]
* नारदेन मयस्य वार्तालापः *
३२७
हमर्येण च पायेन मधुपर्केण चेश्वराः। नारदं पूजयामासुब्रह्माणमिव पासवः ॥ ६॥
तेषां स पूजां पूजाईः प्रतिगृहा तपोधनः । नारदः सुखमासीनः काञ्चने परमासने १७॥
मयस्तु सुखमासीने नारदे नारदोट्ये । यथाहं दानवैः सार्द्धमासीनो दानवाधिपः॥८॥
आसीनं नारदं प्रेक्ष्य मयस्त्वथ महासुरः । अप्रचीद्वचनं तुष्टो हपरोमाननेक्षणः ॥ ६ ॥
औत्पातिकं पुरेऽस्माकं यथा नान्यत्र कुनचित् ।
घर्त्तते धर्तमानज्ञ घद त्वं हि च नारद ! ॥ १० ॥
दृश्यन्ते भयदाः स्वप्ना भज्यन्ते च ध्वजाः परम् ।
विना व वायुना केतुः पतते व तथा भुधि ॥ ११ ॥
अट्टालकाश्च नृत्यन्ते सपताफा: सगोपुराः । हिंस हिंसेति श्रूयन्ते गिरश्च भयदाः पुरे ।
नाहं विभेमि देवानां सेन्द्राणामपि नारद ! । मुक्त्वैकवरदं स्थाणुं भक्ताभयकर हरम्
भगवन्नास्त्यविदितमुत्पातेपु तवानघ ! । अनागतमतीतञ्च भवान् जानाति तत्त्वतः॥
तदेतनोभयस्थानमुत्पाताभिनिवेदितम् । कथयस्व मुनिश्रेष्ठ ! प्रपन्नस्य तु नारद!॥
इत्युक्त्वा नारदस्तेन मयेनामयचर्जितः ।
नारद उवाच।
शृणु दानव! तत्त्वेन भवन्त्योत्पातिका यथा ॥ १६ ॥
धर्मति धारणे धातुर्माहात्म्थे चैव पठ्यते । धारणाय महत्त्वेन धर्म एव निरुच्यते ॥२७
स इष्टप्रापको धर्म आचार्यरुपदिश्यते । इतरश्चानिष्टफल आचार्येनोपदिश्यते ॥१८॥
उत्पथानमार्गमागच्छेन्मार्गाच्चैव विमार्गताम् । विनाशस्तस्य निर्देश्यइतिवेदविदोविटुः
सस्वधर्म रथारूढः सहैमिर्मत्तदानवैः। अपकारिपु देवानां कुरुषेत्वं सहायताम् ॥२०॥
तदेतान्येवमादीनि उत्पातावेदितानि च । चैनाशिकानि दृश्यन्ने दानवानां तथैव च ।।
एप रुद्रः समास्थाय महालोकमयं रथम् । आयाति त्रिपुरं हन्तुं मय! त्यामसुरानपि
सत्त्वं महोजसं नित्यं प्रपद्यस्व महेश्वरम् । यास्यसे सह पुत्रेण दानवैः सह मानद !।
इत्येव मावेद्यभयं दानघोपस्थितं महत् । दानवानां पुनर्देयो देवेशपदमागतः ॥२४॥
नारदे तु मुनी याते मयो दानवनायकः । शूरसंमतमित्येवं दानपानाह दानवः ॥ २५॥
३२८ * मत्स्यपुराणम् * [चतुखिशदधिकशततमो शूराः स्थ जात पुत्राःस्थ कृतकृत्याः स्थ दानवाः । युध्यध्वं दैवतैः सार्धं कर्तव्यं चापिनो भयम् ॥ २६ ॥ जित्वा वयं भविष्यामः सर्वेऽमरसभासदः । देवांश्च सेन्द्रकान् हत्वा लोकान् भोक्ष्या महेसुराः ॥ २७ ॥ अट्टालकेषु च तथा तिष्ठध्वं शस्त्रपाणयः । दंशिता युद्धसजाश्च तिष्ठध्वं प्रोद्यतायुधाः पुराणि त्रीणि चैतानि यथास्थानेषु दानवाः । तिष्ठध्वं लड्वनीयानि भविष्यन्ति पुराणि च ॥ २६ ॥ न भोगतास्तथा शूरा देवता विदिता हि षः। ताःप्रयत्नेन घार्याश्च विदार्याश्चैव सायकः इति दनुतनयान्मयस्तथोक्वा सुरगणवारणघारणे पांसि । युवतिजनविषण्णा मानसं तत् त्रिपुरपुरं सहसा विवेश राजा ॥३१॥ अथ रजतविशुद्धभावभावो भवमभिपूज्य दिगम्बर लुगीमिः। शरणमुपजगाम देवदेवं मदनार्यन्धकयशदेहघातम् ॥ ३२ ॥ मयमभयपदैषिणं प्रपन्नं न किल बुयोध तृतीयदीप्तनेत्रः। तदभिमतमदात्ततः शशाङ्की स व किल निर्भय एव दानयोऽभूत् ॥ ३३ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे मयस्य दानवोद्बोधनं नाम त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः । चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः इलाकृतवर्षवर्णनम् । सूत उवाच। ततो रणे देवबलं नारदोऽभ्यगमत् पुनः। आगत्य चैव त्रिपुरात्समायामास्थितःस्वयम् इलावृतमितिरन्यातं तवर्ष विस्तृतायतम् । यत्र यशोवलेवृत्तोयलियंत्र च संयतः ॥२॥ देवानां जन्मभूमिर्या त्रिपु लोकेषु विश्रुता। विवाहाः तयश्चैव जातफर्मादिकाःमियाः ऽध्यायः] . इलावृते सजीभूतदेवसैन्यवर्णनम् * देवानां यत्र वृत्तानि कन्यादानानि यानि च। रेमे नित्यं भवो यत्र सहायः पार्षदैर्गणः लोकपालाः सदा यत्र तस्थुमहगिरी यथा । मधुपिङ्गलनेत्रस्तु चन्द्रावयवभूषणः ॥ देवानामधिपं प्राह गणपांश्च महेश्वरः ॥ ५ ॥ चासतदरीणां ते त्रिपुरं परिदृश्यते । विमानश्च पताकामियजश्च समलकृतम् ॥६॥ इदं वृत्रमिदं ख्यातं वहिवभृशतापनम् । एते जना गिरिप्रख्याः सकुण्डलकिरीटिनः ॥ प्राकारगोपुराट्टेषु कक्षान्ते दानघाः स्थिताः । इमे च तोयदाभासा दनुजा विकृताननाः निर्गच्छन्ति पुरोदैत्याः सायुधाविजयैषिणः । स त्वं शरशतैः साईससहायोघरायुधः सहनिर्माम त्यैापादय महासुरान् ॥ १० ॥ अहं च रथवर्येण निश्चलाचलपस्थितः। पुरः पुरस्य रन्ध्रार्थी स्थास्यामि विजयाय घः यदा तु पुष्पयोगेन एकत्वं स्थास्यते परम् । तदेतन्निर्दहस्यामि शरेणकेन चासव! ॥ इत्युक्तो वे भगवता रुनेणेह सुरेश्वरः । ययो तत्रिपुरं जेतुं तेन सैन्येन संवृतः ॥१३॥ प्रकान्तरथमीमेस्तैः स देवैः पार्षदाङ्गणः । कृतसिंहरवोपेतैरुगच्छतिरिवाम्बुदैः ॥ १४ ॥ तेन नादेन त्रिपुरादानवा युद्धलालसाः। उत्पत्य दुद्रुयुश्चेलुः सायुधाः खे गणेश्वरान् ॥१५॥ अन्ये पयोधरारावाः पयोधरसमा यभुः । ससिंहनादं घादित्रं पादयामामुरद्धताः ॥१६ देवानां सिंहनादश्च सर्यतूर्यरयो महान् । प्रस्तोऽभदैत्यनादैश्च चन्द्रस्तोयधरैरिव ॥१७ चन्द्रोदयात् समुद्भूतः पौर्णमास इयार्णयः। त्रिपुरं प्रभवत्तद्ववीमम्पो महासुरैः ॥१८॥ प्राकारेषु पुरे तर गोपुरेप्वपि चापरे । अट्टालकान समारा केविचलितयादिनः ॥१६॥ स्वर्णमालाघराः शूराः प्रभासितकराम्बराः। केचिन्नदन्ति दनुजास्तोयमुक्का इवाम्बुदाः इतश्चेतश्च धावन्तः केविदुतवाससः किमेतदिति पाच्छु रन्योन्यंगृहमाश्रिताः ॥२१॥ कितनैव जानामि जानमन्तहितं हि मे। मास्यसेनान्तरेणेति फालो विस्तारतो महान् ॥ २२ ॥ सोऽप्यसौपृथ्वीसारं सिंहश्चरथमास्थितः । तिष्ठने त्रिपुरं पीड्य देई च्याधिरघोच्छितः यएपोऽस्तिस एपोऽस्तुफाचिन्तासम्नमे सति। एहिमायधमादायक मेपच्छामविष्यति ३३० * मत्स्यपुराणम् * [चतुस्त्रिशदधिकशततमी इति तेऽन्योन्यमाविद्धाउत्तरोत्तरभाषिणः । आसाद्य पृच्छन्तितदा दानवास्त्रिपुरालयाः तारकाक्षपुरे दैत्यास्तारकाक्षपुरसराः । निर्गताः कुपितास्तूर्णं विलादिवमहोरगाः ॥' निर्धावन्तस्तु ते दैत्याः प्रमथाधिपयूथपैः । निरूद्धा गजराजानो यथा केसरियूथपैः ॥ दर्पितानांततश्चैपां दर्पितानामिवाग्निनाम् । रूपाणि जज्वलुस्तेपामग्नीनामिव धम्यताम् ततो वृहन्ति चापानिभीमनादानिसर्वशः। निकृप्य जम्नुरन्योन्यमिपुभिः प्राणभोजनः मार्जारमृगभीमास्यान् पार्पदान्विकृताननान् । दृष्ट्वा दृष्ट्वा हसन्नुच्चैर्दानवा रूपसम्पदा ।। वाहुभिः परिघाकारैः कृप्यतां धनुपां शराः । भटधर्मेपु विविशुस्तड़ागानीव पक्षिणः ॥ मृताः स्थ क नु यास्येथ हनिष्यामो निवर्त्तताम् । इत्येवं परुपाण्युक्त्वा दानवाः पार्षदर्पभान् ॥ ३२ ॥ विभिदुः सायकैस्तीक्ष्णैः सूर्य्यपादा इवाम्बुदान् । प्रमथा अपि सिंहाक्षाः सिंहविक्रान्तविक्रमाः ॥ खण्डशैलशिलावृक्षविभिदुर्दैत्यदानवान् ॥ ३३ ॥ अम्बुदैराकुलमिव हंसाकुलमियाम्बरम् । दानवाकुलमत्यर्थं तत्पुरं सकलं वभौ ॥३४॥ विकृष्टचापा दैत्येन्द्राः सृजन्ति शरदुर्दिनम् । इन्द्रचापाङ्कितोरस्का जलदा इव दुर्दिनम् इपुभिस्ताड्यमानास्ते भूयोभूयो गणेश्वराः । चक्रुस्ते देहनिर्यासं स्वर्णधातुमिवाचलाः तथा वृक्षशिला पत्रशूलपटिपरश्वधैः । चूर्ण्यन्तेऽभिहता दैत्याः काचाष्टङ्कहता इव ॥ चन्द्रोदयात् समुद्भूतः पौर्णमास इचार्णवः । त्रिपुरं प्रभवत्तद्वनीमरुपमहासुरैः ॥३८॥ तारकाक्षो जयत्येप इति दैत्या व्यघोषयन् । जयतीन्द्रश्च दश्च इत्येव च गणेश्वराः ॥ धारितादारितावाणेर्योधास्तस्मिन्बलोभये । निःस्वनन्तोऽम्बुसमयेजलगाइयाम्बुदाः करैश्छिन्नः शिरोभिश्च ध्यजेश्छत्रेश्च पाण्डुरैः । युद्धभूमिर्मयवती मांसशोणितपूरिता व्योग्नि चोत्प्लुत्य सहसा तालमात्रं घरायुधः । दृदाहताःपतन्पूर्व दानवाप्रमशास्तथा सिद्धाश्याप्सरसश्चैव चारणाश्च नभोगताः । दृढ़प्रहारहपिताः साधु साध्यित्ति चुक्रुशुः अनाहताध पियति देवदुन्दुभयस्तथा । नदन्तो मेघशब्देन सरमा इव रोपिताः ॥४॥ न तस्मिरित्रपुरे दैत्यानद्यः सिन्धुपतायिय । विशन्ति फुद्धपदना घल्मीकमिवपन्नगाः ।।
ऽध्यायः]
* देवदानवयुद्धवर्णनम् .
तारकाक्षपुरे तस्मिन् सुराः शूराः समन्ततः । सशस्त्रा निपतन्तिस्म सपक्षाइव भूधराः
योधयन्ति त्रिभागेन त्रिपुरे तु गणेश्वराः । विद्युन्माली मयश्चैव भनौ च द्रुमवद्रणे ॥
विद्युन्माली स दैत्येन्द्रो गिरन्द्रसदृशयुति । आदाय परिघं घोरं ताडयामास नन्दिनम्
स नन्दी दानवेन्द्रेण परिघेण दृढाहतः । भ्रमते मधुना व्यक्त पुरा नारायणो यथा ।४६
नन्दीश्वर गते तत्र गणपारयातविक्रमा । दुद्रुवुर्जातसंरम्भा विद्युनमालिनमासुरम् ॥
घण्टाकर्णः शङ्कको महाकालश्च पार्पदाः ॥ ५१ ॥
ततश्च सायकै.सर्वान् गणपान्गणपारतीन् । भूयो भूयः स विव्याध गणेश्वरमहत्तमान
भित्या भित्वा रुरावोथैर्नभस्यम्बुधरो यथा । तस्यारम्भित शब्देन नन्दी दिनकरप्रभः॥
संज्ञां लभ्य तत सोऽपि विद्युन्मालिनमाद्रवत् ॥ ५३ ॥
रुद्रदत्तं तदा दीतं दीप्तानलसमप्रभम् । घनं घनिमाङ्गस्य दानवस्य ससर्ज ह ॥ ५४॥
तनन्दिभुजनिर्मुक्तं मुक्ताफलविभूषितम् । पपात पक्षसि तदा वनं दैत्यस्य भीषणम् ॥
स चनं निहतो दैत्यो पसंहननोपमः । पपात पनाभिहत. शरणादिग्विाहतः ॥५६॥
दैत्येश्यरं विनिहतं नन्दिना पुलनन्दिना । चुक्रुशुनिया. प्रेक्ष्य दुद्रुवुश्व गणाधिपाः ॥
दु.खामपितरोपास्ते विद्युन्मालिनिपातिते । द्रुमशैलमहावृष्टिं पयोदा ससृजुर्यथा ॥१८॥
ते पीड्यमाना गुरुभिगिरिभिश्च गणेश्चराः । कर्त्तव्यं न विदुः किश्चिद्वन्धमाधार्मिकाश्य
ततोऽसुरघरः श्रीमांस्तारकाक्ष प्रतापवान् । स तरूणां गिरीणां वै तुल्यरूपधरो यमी
भिन्नोत्तमाङ्गा गणपा भिन्नपादाङ्कितानना.। विरेजुर्भुजगा मन्त्रैर्यमाणा यथा तथा
मयेन मायाचीर्येण यध्यमाना गपोश्वरा. निमन्ति पहुशब्दाला' पञ्जरे शकुना इच ।।
तथा सुरपरः श्रीमांस्तारकाक्षः प्रतापवान् । दाह च बलं सर्व शुष्येन्धनमिचानलः ।
तारकाक्षेण धार्यन्ते शरवर्षस्तदा गणाः । मयेन मायानिहतास्तारकाख्येण चेपुमिः ।।
गणेशा विधुरा जाता जीर्णमूला यथा द्रुमाः ॥ ६ ॥
भूयः सम्पतते चाग्निम्रहान् प्राहान् भुजमान् ।
गिरीन्द्रांश्च हरीन व्यानान वृक्षान् समरपर्णफान् ॥ ६६ ॥
शरभानष्टपादांध आपः पयनमेव च । मयो मायायलेनैप पातयत्येव शत्रुषु ॥ ६७ ॥
३३२
* मत्स्यपुराणम् *
[चतुस्त्रिशदधिकशततमो
ते तारकाक्षेण मयेन मायया संमुह्यमाना विवशा गणेश्वराः ।
न शक्नुवंस्ते मनसापि चेष्टितुं यथेन्द्रियार्था मुनिनाभिसंयताः ॥ ६८ ॥
महाजलाग्न्यादि सकुअरोरगैर्हरीन्द्रव्याघ्रक्षतरक्षुराक्षसः।
विवाध्यमानास्तमसा विमोहिताः समुद्रमध्येष्विव गाधकाङ्क्षिणः ॥६६॥
संमद्यमानेषु गणेश्वरेषु सन्नर्दमानेषु सुरेतरेषु ।
ततः सुराणां प्रवराभिरक्षितुं रिपोर्वलं सम्विविशुः सहायुधाः ॥७॥
यमोगदास्रो घरुणश्च भास्करस्तथा कुमारोऽमरकोटिसंयुतः ।
स्वयं च शकः सितनागवाहनः कुलीशपाणिः सुरलोकपुङ्गवः ॥७॥
स चोडुनाथः ससुतो दिवाकरः ससान्तकस्यक्षपतिर्महाद्युतिः ।
एते रिपूणां प्रवलाभिरक्षितं तदा वलं सम्विविशुर्मदोद्धताः ॥७२॥
यथा धनं दर्पितकुञ्जराधिपा यथा नभः साम्बुधरं दिवाकरः ।
यथा च सिंहैविजनेषु गोकुलं तथा यलं तत्त्रिदशैरभिद्रुतम् ॥७३॥
कृतप्रहारातुरदीनदानवं ततस्त्वभज्यन्त वलं हि पार्षदाः।
स्वज्योतिषां ज्योतिरिवोप्मवान् हरिर्यथा तमो घोरतरं नराणाम् ॥७॥
विशान्तयामास यथा सदैव निशाकरः मञ्चितशार्वरन्तमः ।
ततोऽपष्टे च तमः प्रभावे अस्त्रप्रभावे च विवर्द्धमाने ७५॥
दिग्लोकपालगणनायकैश्च कृतो महान् सिंहरयो मुहर्तम् ।
संख्ये विभन्ना विकरा विपादाश्छिन्नोत्तमाङ्गाः शरपूरितानाः ॥७६॥
देवेतरा देववरैविभिन्नाः सीदन्ति पषु यथा गजेन्द्राः ।
धन्त्रेण भीमेन च धनपाणिः शक्या च शक्या च मयूरकेतुः ॥७॥
दण्डेन चोग्रेण च धर्मराजः पाशेन चोगेण च धारिगोप्ता ।
शूलेन कालेन च यक्षराजो धीर्येण तेजस्वितया सुकेशः ॥७८॥
गणेश्वरास्ते सुरसन्निकाशाः पूर्णाहतीसिकशिखिप्रकाशाः ।
उत्सादयन्ते दनुपुत्रवृन्दान्यथैव इन्द्राशनयः पतन्त्यः ॥७॥
ऽध्यायः] * मयस्य महेश्वररूपस्य कालस्यप्रशंसनम् * मयस्तु देवान् परिरक्षितारमुमात्मजं देववरं कुमारम् । शरेण भित्वा स हि तारकासुतं स तारकाप्यसुरमावभाषे ॥८॥ कृत्वा प्रहारं प्रविशामि वीरं पुरं हि दैत्येन्द्र बलेन युक्तः । विश्राममूर्जस्करमप्यवाप्य पुनः करिष्यामि रणं प्रपन्नैः ॥८॥ चयं हि शास्त्रक्षनवीक्षिताड़ा विशीर्णशस्त्रध्यजयर्मयाहा. । जयपिणस्ते जयकाशिनश्च गणेश्वरा लोकवराधिपाश्च ॥४२॥ मयस्य श्रुत्वा दिवि तारकाख्यो चोभिकाड्झन् क्षतजोपमाक्षः । विवेश तूर्णं विपुरन्दितः सुतै सुतैरदित्या युधि वृद्धहः ॥८॥ ततः सशट्टानकमेरिभीम ससिंहनादं हरसैन्यमावभी। मयानुगन्धोरगभीरगह्वरं यथा हिमाद्रेर्गजसिंहनादितम् ॥८॥ इति धीमत्स्यपुराणे देवदानवयुद्धवर्णनं नाम चतुस्त्रिशत्यधिकशततमोऽध्यायः। १ पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः मयम्य महेशररूपस्य कालस्य प्रशंसापर्णनम् । सत उपाय। मयः प्रहारं कृत्वा तु मायापी दानवर्षम । विवेश तृणं त्रिपुरमभ्रं नीलमिवाम्वरम् ॥१! सदीर्घमुनि श्वस्य दानवान्वीक्ष्य मध्यगान्। दध्यो लोकक्षये प्राप्तकालंकालइयापर: इन्द्रोऽपि विभ्यते यस्य स्थितो युद्धप्सुअतः । स चापि निधन प्रामो विद्युन्माली महायशाः ॥३॥ दुर्ग 2 त्रिपुरस्यास्य न सम विद्यते पुग्म् । तस्याप्येपो नय प्राप्ती नदुर्गफारणं धचित् फालस्यैध पशे सर्व दुर्ग दुर्गतरञ्च यत् । काले युद्ध क्यं कालाप्राणं मोऽयमविष्यति लोपेषु त्रिपु यत् फिशियलं वे सर्वजन्तुषु।
1 ३३४ * मत्स्यपुराणम् * [पञ्चत्रिशत्यधिकशततमो कालस्य तद्वशं सर्वमिति पैतामहो विधिः ॥ ६ ॥ अस्मिन् क प्रभवोद्योगोासन्धायें मितात्मनि । लङ्घनेकः समर्थः स्यादृते देवं महेश्वरम् विभेमि नेन्द्राद्धि यमाद्वरुणान्न च वित्तपात् । स्वामी चैपान्तु देवानां दुर्जयःस महेश्वरः ऐश्वर्यस्य फलं यत्तत् प्रभुत्वस्य च यत् फलम् । तदद्य दर्शयिष्यामि यावद्वीराः समन्ततः वापीममृततोयेन पूर्णा स्वक्ष्ये वरीषधी. । जीविष्यन्ति तदादैत्या.सजीवनवरौषधीः ॥ इति सञ्चित्य बलवान् मयो मायाविनावरः। मायया ससृजे वापी रम्भामिव पितामहः द्वियोजनायतां दीर्घा पूर्णयोजनविस्तृताम् । आरोहसंक्रमवती चित्ररूपां तथैव च ॥ इन्दोः किरणकल्पेन मृष्टेनामृतगन्धिना । पूर्णा परमतोयेन गुणपूर्णामिवाङ्गनाम् ।। उत्पलैः कुमुदैः पद्मता कादम्बकैस्तथा । चन्द्रभास्करवर्णाभै मेरावरणवृताम् ॥ खर्गमधुररावैश्च चारुचामीकरप्रभः । कामैपिभिरिवाकीर्णा जीवानामरणीमिव ॥१५ तां वापी सृज्य स मयो गङ्गामिव महेश्वरः । तस्याम्प्रक्षापयामास विद्युन्मालिनमादितः ॥ १६ ॥ स वाप्यां मन्जितो दैत्यो देवशत्रुर्महायलः । उत्तस्थाविन्धनैरिद्धः सद्यो हुत इवानलः ॥ मयस्य चाञ्जलिं कृत्वा तारकाख्योऽभिवादितः । विद्युन्मालीति वचनं मयमुत्थाय चाब्रवीत् ॥ १८॥ क नन्दी सह देण वृतः प्रथकजम्बुकः । युद्ध्यामो नन्दिनं पीड्यदयादेहेषु का हिनः अन्चास्यैव च रद्रस्य भवामः प्रभविष्णवः । तैर्वा विनिहतायुद्धे भविष्यामो यमाशनाः विद्युन्मालेनिशम्यैतन्मयोवचनमूर्जितम् । तं परिष्वज्य सार्द्राक्ष इदमाह महासुरः ।। विद्यु नमालिन मे राज्यमभिप्रेतन्न जीवितम् । त्वया चिता महावाहो ! किमन्येन महासुर! ॥ २२ ॥ महामृतमयी पापी छपा मायाभिरीश्वर !! सृश दानवदैत्यानां हतानां जीवर्धिनी ॥ दिष्ट्या त्वां दैत्य! पश्यामि यमलोकादिहागतम् । दुर्गतायनयग्रस्तं भोक्ष्यामोऽद्य महानिधिम् ॥ २४ ॥ दृष्ट्वा दृष्ट्वा च तां पापों मायया मयनिर्मिताम् । हशाननाक्षा दैत्येन्द्राइदं पचनः "यन ।
॥ ऽध्यायः] * देवप्रतिहतानां दैत्यानां पाप्यां पुनरुज्जीवनम् * दानवा ! युध्यतेदानी प्रमथैः सहनिर्भयाः। मयेन निर्मिताचापी हतान् सञ्जीवयिष्यति ततः क्षुब्धाम्युनिधिमा भेरीसानुभयङ्करी। घाबमाना ननादोच्चै रौरवी सा पुनः पुनः श्रुत्वा भेरीरवं घोरं मेघारम्भित सन्निभम् । न्यपतन्नसुरास्तृणं त्रिपुराा दलालसाः।। लोहायतसौवर्णः कटकर्मणिराजित । आमुक्तः कुण्डलेहारैर्मुकुटरपि चोत्कटः ।। धूमायिता हाविरमा ज्वलन्त इव पावकाः । आयुधानि समादाय काशिनो दृढ विक्रमाः ॥ ३० ॥ नृत्यमाना इव नटा गजन्त इव तोयदा । करोच्छ्राया इय गजा सिंहा इव च निर्भयाः हुदा इच च गम्भीराः सूर्या इव प्रतापिताः । द्रुमा इच च दैत्येन्द्रा प्रासयन्ते वलंमहत् प्रमथा अपिसोत्साहागरुडोत्पानपातिन. । युयुत्सवोऽभिधायन्ति दानवान् दानवारयः नन्दीश्वरेण प्रमथा स्तारकारयेण दानवा. । चकः संहत्य संग्रामोद्यमाना क्लेन च ॥ ३४ ॥ तेऽसिमिश्चन्द्रसदारीः शूल धानलपिंगलः । घाणश्च दृढ़निर्मुक्तरभिजन्नुः परस्परम् ॥ शराणां सृज्यमानानामसीनाञ्च निपात्यताम् । रूपाण्यान्महोल्काना पातन्तीनामिवाम्यरात् ॥ १६ ॥ शक्तिमिमिन्नहृदया निर्दया इव पातिताः । निरयेष्विव निर्ममाः कूजन्ते प्रमथासुराः ॥ हेमकुण्डलयुक्तानि किरीटोत्कदवन्तिव । शिरांस्युर्व्या पतन्तिम गिरिटानियात्यये परश्वधैः पटिशश्च पलेश्व परिच स्तथा । छिन्नाः करिबराकारा निपेस्तुस्ते धरातले ।। गर्जन्ति सहसा हृष्टाः प्रमथा भीमगर्जना. । साधयन्त्यपरे सिद्धा युगान्धर्यमदभुतम् बलवान्भासि प्रमथदर्पितो भासि दानय !। इति चोधारयन्याचं धारणा रणधूर्गताः ॥ ४२ ॥ 'परियैराहता फेचिदानः शङ्करानुगाः ! घमन्ते रुधिरं घयप्रैः स्वर्णधानुमिवाचला. ॥ प्रमयरपि नाराचैरसुराः मुरशप्रयः । द्रुमैश्च गिरिराङ्गध गाढ़मेवाहये हताः ॥ ४ ॥ सूदितानय तान् दैत्यानन्ये दानवपुलवाः । उक्षिप्य विक्षिपुर्याप्यां मयदानवनोदिताः ते चापि भास्यरदहे. स्वर्गलोक इवामराः । उत्तम् पीमासाद्य सपा भरणाम्यराः * मत्स्यपुराणम् [पञ्चत्रिंशत्यधिकशततमो अथैके दानवाः प्राप्य वापीप्रक्षेपणादसून् । आस्फोट्य सिंहनादश्च कृत्वा धावंस्तथा सुराः ॥ ४६ ॥ दानवाः प्रमथानेतान् प्रसर्पत किमासथ । हतानपि हि पो चापी पुनरुज्जीवयिष्यति ॥ एव श्रुत्वा शङ्कुकर्णो वचोऽग्रग्रहसन्निमः । द्रुतमेवेत्य देवेशमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ४८ ॥ सूदिता सूदिता देव! प्रमथैरसुरा ह्यमी। उत्तिष्ठन्ति पुनर्भीमा सस्याइव जलोक्षिता.॥ अस्मिन् किल पुरे पापी पूर्णामृतरसाम्भसा । निहतानिहता यत्र क्षिप्ता जीवन्ति दानवाः ॥५०॥ इति विज्ञापयद्देवं शङ्कुकर्णो महेश्वरम् । अभवन् दानवधलउत्पाता वै सुदारुणा. ॥५१॥ तारकाख्य. सुभीमाक्षो दारितास्यो हरियथा । अभ्यधावत् सुसंक्रुद्धो महादेवरथं प्रति त्रिपुरे तु महान्छोरो भेरीशङ्खरवो यभो । दानवा निःसृता दृष्ट्वा देवदेवग्थे सुरम् ॥ भूकम्पश्चाभवत्तत्र शताङ्गो भूगतोऽभवत् । दृष्ट्वा क्षोभमगाद्रुद्रः स्वयम्भूश्च पितामहः ॥ ताभ्यां देववरिष्ठाभ्यामन्धित स रथोत्तमः । अनायतनमासाद्य सीदते गुणवानिव ॥५५॥ धातुक्षये देह इव ग्रीष्मे चाल्पमिवोदकम् । शैथिल्यं याति स रथ नेहो विप्रकृतो यथा ॥५६॥ रथादुत्पत्यात्मभूर्व सीदन्तं तु रथोत्तमम् । उजहार महाप्राणो रथं त्रैलोक्यरूपिणम् तदा शराद्विनिष्पत्य पीतवासा जनार्दन । वृपरूपं महत् कृत्या रथं जग्राह दुर्धरम् ॥ सविपाणाभ्यां त्रैलोक्यं रथमेव महारथः । प्रगृह्योद्वहते सनं फुलं कुलयही यथा ॥५६ तारफारयोऽपि दैत्येन्द्रो गिरीन्द्र इच पक्षवान् । अभ्पद्रवत्तदा देवं ब्रह्माणं हतवांश्च स ६०॥ स तारकाख्याभिहत प्रतोदं न्यस्य कृवरे । विजज्वाल मुहुर्ब्रह्मा श्वासं घक्त्रात् समुगिरन ॥६१॥ तर दैत्यमहानादो दानवैरपि भैरवः । तारकारयस्य पूजार्थ कृतो जलधरोपमः ॥६२॥ रथवरणफरोऽय महामृधे वृषमयपुर्वपमेन्द्रपूजित ।
ऽध्यायः] *धापीपालेन मयसमीपे घापीपानकथनम् * दितितनयवलं विमर्च सर्व त्रिपुरपुरं प्रधिवेश केशवः ॥६॥ सजलजलदराजितां समस्तां कुमुदघरोत्पलफुलपङ्कजाब्याम् । सुगुरुपिचत्पयोऽमृतन्तद्रविरिख सञ्चितशावल्तमोऽग्धम् ॥६॥ पापी पीत्या सुरेन्द्राणां पीतवासाजनार्दनः । नर्दमानोमहाबाहुः प्रधिवेश श(सोरन्ततः ततोऽसुरा भीमगणेश्वरैर्हताः प्रहारसम्बद्धितशोणितापगाः ! पराङ्मुखाभीममुखैः कृतारणे यथा नयाभ्युद्यततत्परैर्नरः ॥६६॥ स तारकारयस्तडिमालिरेव च मयेन सादं प्रमथैरभिद्रुता। पुरं परावृत्यनुतेशरादिता यथा शरीरं पचनोदये गता ॥६॥ गणेश्वराभ्युद्यतदर्पकाशिनो महेन्द्रनन्दीश्वरपण्मुखायुधि । विनेदुरुच्चैहमुश्च दुर्मदाजयेमचन्द्रादि दिगीश्वरः सह ॥६८॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे घापीपानकथनं नाम पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः । पत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः वापीपालेन मयसमीपे वापीपानकथनम् । सत उवाच। प्रमः समरेमिनास्त्रपुरास्तेसुरारयः । पुरं प्रविधिशुभीताः प्रमथर्भग्नगोपुरम् ॥१॥ शीर्णदंष्ट्रा यथा नागा भनाङ्गा यथा वृपाः । यथा विपक्षाः शकुना नयः क्षीणोदका यथा ॥२॥ मृतप्रायास्तपा दैत्या देवतेहिताननाः । यभूयुस्ते विमनसः फयं फार्यमिति ग्रुपन् । अथ तान् म्लानमनसस्तदा तामरसाननः । उवाच दैत्यो दैत्यानां परमाधिपतिर्मयः। एत्या युद्धानि घोगणि प्रमथैः सहसामरैः। तोपयित्या तया युद्धे प्रमथानमरैः सद । यूयं यत् प्रथमं दैत्याः पश्चाश यलपीडिताः।
३३८
* मत्स्यपुराणम् * [पत्रिंशदधिकशततमो
प्रविष्टा नगरन्त्रासात् प्रमथैभृशमर्दिताः ॥६॥
अप्रियं क्रियते व्यक्तं देवर्नास्त्यत्र संशयः। यत्र नाम महाभागाः प्रविशन्ति गिरैर्वनम्
अहो हि कालस्य बलमहो कालो हि दुर्जयः ।
यत्रेदशस्य दुर्गस्य उपरोधोऽयमागतः ॥८॥
मये विवदमाने तु नईमान इवाम्बुदे । बभूवुनिष्प्रभा दैत्या ग्रहा इन्दूदये यथा ॥६॥
पापीपालास्ततोऽभ्येत्य नभःकाल इवाम्बुदाः।
मयमाहुर्यमप्रख्यं साञ्जलिप्रग्रहाः स्थिताः ॥१०॥
या सामृतरसा गूढा घापी वै निर्मिता त्वया ।
समाकुलोत्पलघना समीनाकुलपङ्कजा ॥११॥
पीता सा वृषरूपेण केनचिदैत्यनायक । वापी सा साम्प्रतं दृष्ट्रामृतसंज्ञा इघागना ॥१२
पापीपालवचःश्रुत्वा मयोऽसौदानवप्रभुः । कष्टमित्यसकृत्प्रोच्य दितिजानिदमब्रवीत्
मया मायावलता पापी पीता त्वियं यदि।
विनष्टाः स्म न सन्देहस्त्रिपुरं दानवागतम् ॥१४॥
निहतानिहतान् दैत्यानाजीवयति देवतैः । पीता था यदि घा पापी पीतावैपीतवाससा
कोऽन्योमन्मायया गुप्तांवापीममृततोयिनीम् । पास्यतेविष्णुमजितंचर्जयित्या गदाधरम्
सुगुह्यमपि दैत्यानां नास्त्यस्याविदितम्भुवि । यत्रमद्वरकौशल्यं विज्ञानं न वृतं बुधैः ।
समोऽयं रुचिरो देशो निर्दुमो निर्दुमाचलः ।
लभेमन्दूरतः कृत्वा बाधन्तेऽस्मान् गणामराः ॥२८॥
ते यूयं यदि मन्यध्वं सागरोपरिधिष्ठिताः । प्रमथानां महावेगं सहामः श्वसनोपमम्
एतेपाच समारम्भास्तस्मिन् सागरसंप्लवे । निसाहा भविष्यन्ति एतदथपथावृताः
युध्यतां निम्नतां शनभोतानाञ्चद्रविष्यताम् । सागरोऽग्यरसदाशःशरणग्नो भविष्यति
इत्युक्त्या स मयो दैत्यो दैत्यानामधिपस्तदा । त्रिपुरेण ययोतूर्णसागरंसिन्धुयान्धयम्
सागरे जलगम्भीर उत्पपात पुरं परम् । अयतस्युः पुराण्येच गोपुरामरणानि च ॥२३
अपमान्ते तु त्रिपुरे त्रिपुरारिस्त्रिलोचनः । पितामहमुपाचेदं वेदपादविशारदम् ॥२४॥
ऽध्यायः] * जनार्दनस्य मयपुरगमनम् * ३३६ पितामह ! दृढं भीता भगवन् ! दानवा हि नः । विपुलं सागरन्ते तु दानवाः समुपाश्रिताः ॥२५॥ यतएव हि ते यातास्त्रिपुरेण तु दानवाः । ततएव रथं तूर्णं प्रापयस्य पितामह ॥२६॥ सिंहनादं ततः कृत्वा देवा देवरथञ्च तम् । परिवार्य ययुद्ध शाः सायुधाः पश्चिमोदधिम् वतोऽमरामरगुरुं परिवार्य भवं हरम् । नर्दयन्तो ययुस्तूणं सागरं दानवालयम् ॥२८॥ अथ चारुपत्ताकमूपितं पटहाडम्बरशाङ्कनादितम् । त्रिपुरमभिसमीक्ष्य देवता विविधयला ननदुर्यथा घनाः ॥ २६ ॥ असुरवरपुरऽपि दारणोजलधरारवमृदङ्गगह्वरः । दनुतमयनिनादमिश्रितः प्रतिनिधिसंक्षुभितार्णवोपमः ॥३०॥ अथ भुवनपतिर्गति सुराणामरिमृगयां प्रददात् सुलब्धबुद्धिः । त्रिदशगणापति[चा च शकम् त्रिपुरगतं सहसा निरीक्ष्य शनुम् ॥३१॥ त्रिदशगणपते ! निशामयैतत् त्रिपुरनिकेतनमुत्तमं सुरेन्द्र । यमवरणकुवेरपण्मुपेस्तत् सह गणपैरपि हन मितावदेव ॥३२॥ विहितपरवलाभिघातभूतम् ब्रज जलधेस्तु यतः पुराणि तस्थुः । स रथवरगतोभवः समर्थो [दधिमगात् त्रिपुरं पुनर्निहन्तुम् ॥३३|| इति परिगणयन्तोदितः सुता हावतस्थुलवणार्णवोपरिष्टात् । अमिभवत् त्रिपुरं स दानवेन्द्र शरवर्षमसलैश्च घनमिटः ॥३४॥ अहमपि रथवर्यमास्थित सुरघरघ> ! भवेय पृष्ठतः । असुरघरयधार्थमुद्यतानाम् प्रतिविद्धामि सुसयतेऽनघ ॥३५॥ इति भयवचनप्रचोदितो दशशतनयनवपु समुद्यतः । त्रिपुरपुरजिघांसया हरि प्रविकसिताम्बुजलोचनो ययौ ॥३६॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे हरे मयपुरगमनं नाम पनिशदधिकशततमोऽध्यायः ।
स सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः त्रिपुरे देवदानवयुद्धम् । सूत उवाच। मघवा तु निहन्तुं तानसुरानमरेश्वर. । लोकपाला ययुः सर्वे गणपालाश्च सर्वशः ॥१॥ ईश्चरामोदिताः सर्व उत्पेतुश्चाम्बरे तदा । सगतास्तु घिरेजुस्ते पक्षवन्त इवाचलाः ॥ प्रययुस्तत्पुरं हन्तुं शरीरमिव व्याधयः । शङ्खाडम्बरनि?पैः पणवान् पटहानपि । नादयन्त पुरो देवा दृष्टास्त्रिपुरवासिभिः ॥३॥ हरः प्राप्त इतीचोक्त्वा यलिनस्ते महासुरा । आजग्मुः परमं क्षोभमत्ययेष्विवसागरा सुरतूर्य्यरवं श्रुत्वा दानवा भीमदर्शना. । निनेदुर्घादयन्तश्च नानावाद्यान्यनेकश ॥५॥ भूयोदीरितवीर्यास्ते परस्परकृतागसः। पूर्वदेवाश्च देवाश्च सूदयन्तः परस्परम् ॥६॥ माक्रोशेऽपि समप्रख्ये तेषा देहनिकृन्तनम् । प्रवृत्त युद्धमतुल प्रहारकृतनिस्वनम् ॥७॥ श्वसन्त इव नागेन्द्रा भ्रमन्त इच पक्षिणः । गिरीन्द्रा इच कम्पन्तो गर्जन्तइघतोयदाः॥ जृम्भन्त इघ शार्दूलाः प्रधान्त इव घायव । प्रवृद्धोर्मितरङ्गालाः क्षुभ्यन्त इच सागरा ॥ प्रमथाश्च महाशूरा दानवाश्च महायला । युयुधुनिश्चला भूत्वा पत्रा इच महाचलः ॥ फार्मुकाणा निरष्टाना वभृयुर्दारुणा रवाः। कालानुगाना मेघानां यथा वियति घायुना आहुश्च युद्धे मा भैपी व यास्यसिमृतोह्यसि । महराशुस्थितोऽस्म्यत्रएहिदर्शयपौरपम् गृहाण च्छिन्धि भिन्धीति सादमारयदारय। इत्यन्योऽन्यमनूच्चार्य प्रययुर्यमसादनम् खड्यापवर्जिताः केचित्केचिच्छिन्नाः परश्वधैः । फेचिन मुद्गरचूर्णाश्चकेचिद्याहुभिराहताः पहिशैः सूदिताः केचित्केचिच्छूलविदारिताः । दानवा शरपुप्पामाः सवनाइचपर्वताः । निपतन्त्यर्णयजले भीमनतिमिङ्गिले ॥१५॥ व्यसुभिः सुनिबद्धाङ्गः पतमान. सुरेतरः । सम्बभूवार्णवे शब्दः सजलाम्बुनिस्वनः ।। तेन शन्देन मकरा नास्तिमितिमिङ्गिलाः । मत्तालोहित गन्धेन क्षोभयन्तो महार्णवम् ऽध्यायः] * त्रिपुरे देवदानवयुद्धम् * ३४१ परस्परेण फलहं कुर्वाणा भीममूर्तयः। भ्रमन्ते भक्षयन्तश्च दानवानाच लोहितम् ॥ सस्थान सायुधान् साश्वान् सवस्त्राभरणावृतान् । जनसुस्तिमयो दैत्यान् द्रावयन्तो जलेचरान् ॥ १६ ॥ मृधं यथा सुराणाञ्च प्रमथानां प्रवर्तते । अम्बरेऽम्मसि व तथा युद्धं च जलेचराः ।। यथा भ्रमन्ति प्रमथाः सदैत्यास्तथा भ्रमन्ते तिमयः सनका. । यथैव छिन्दन्ति परस्परन्तु तथैव कन्दन्ति विभिन्नदेहाः ॥२॥ वणाननैरङ्गरसं स्रपतिः सुरासुरैर्नक्रतिमिनिलेश्च । कृतो मुहर्तेन समुद्रदेश. सरक्ततोयः समुदीर्णतोयः ॥२२॥ पूर्व महाम्भोधरपर्यताभं द्वारं महान्तं त्रिपुरस्य शक्रः । निपीय तस्थी महता वलेन युक्तोऽमराणां महता बलेन ॥२३॥ तथोत्तर सस्तनुजो हरस्य बालार्कजाम्बूनदतुल्यवर्णः । स्कन्दः पुरद्वारमथाररोह वृद्धोऽस्तरङ्ग प्रपतन्निवार्कः ॥२४॥ यमश्च वित्ताधिपतिश्च देवो दण्डान्वितः पाशवरायुधश्च । देवारिणस्तम्य पुरस्य द्वार ताभ्या तु तत्पश्चिमतो निरुद्धम् ॥२५॥ दक्षारिरुद्धस्तपनायुताभः स भास्थता देवरयेन देवः । तदक्षिणद्वारमः पुरस्य रुद्धाचतस्थो भगवास्त्रितरः ॥२६॥ तुङ्गानि वेश्यानि सगोपुराणि स्वर्णानि कैलासशशिप्रभाणि ! प्रहादरूपाः प्रमथावस्ता ज्योतीपि मेया इव चाश्मवर्गः ॥२॥ उत्पाट्य चोत्पाट्य गृहाणि तेषाम् सशैलमालासमयेदिकानि । प्रक्षिप्य प्रक्षिप्य समुद्रमध्ये फालाम्बदामा प्रमथा विनेदुः ॥२८॥ रकानि चारोषनर्युतानि साशोकपण्डानि सकोकिलानि । गृहाणि हे नाथ ! पितः! मुतेति भ्रातेति फान्तेति प्रियेति चापि । उत्पाटयमानेषु गृहेषु नार्य अनार्यशदान्विविधान् प्रचः ॥२६॥ फलमपुत्रक्षयप्राणनाशे तस्मिन् पुरे युद्धमति प्रवृत्त । ।
३४२ * मत्स्यपुराणम् * [सप्तत्रिंशदधिकशततमो महासुराः सागरतुल्यवेगा गणेश्वराः कोपवृताः प्रतीयुः ॥ ३० ॥ परश्वधैस्तत्र शिलोपलैश्च त्रिशूलवत्रोत्तमकम्पनैश्च । शरीरसद्मक्षपणं सुघोरं युद्धं प्रवृत्तं दृढ़वैरबद्धम् ॥ ३१ अन्योन्यमुद्दिश्य विमर्दता च प्रधावतां चैव विनिम्नताञ्च । शब्दो बभूवामरदानवानां युगान्तकालेष्विव सागरान्तः ॥ ३२ ॥ मार्गाः पुरे लोहितकर्दमाला. स्वर्णेकास्फाटिकभिन्नचित्राः । कृता मुहर्तेन सुखेन गन्तुं छिन्नोत्तमाङ्गानिकराः करालाः ॥ ३३ ॥ कोपावृताक्षः स तु तारकाख्या संख्ये सवृक्षः सगिरिनिलीनः । तस्मिन् क्षणे द्वारपरं रिरक्षो रुद्धं भवेनाद्भुतविक्रमेण ॥ ३४ ॥ स तत्र प्राकारगतांश्च भूतांश्छातन्महानद्भुतवीर्यसत्यः । चचार चाप्तेन्द्रियगर्वदृप्तः पुरादिनिष्क्रम्य ररास घोरम् ॥ ३५ ॥ ततः स दैत्योत्तम पर्वताभो यथाअसा नाग इवाभिमत्तः । निवारितो रुद्ररथं जिघृक्षुर्यथार्णवः सर्पति चातिवेलः ॥ ३६ ॥ शेप.सुधन्वा गिरिशश्च देवश्चतुर्मुसो यः सत्रिलोचनश्च । ते तारकाख्याभिगता गताजी क्षोभं यथा वायुवशात् समुद्राः ॥ ३७ ॥ शेपो गिरीशः सपितामहेशश्चोत्क्षुभ्यमाणः स रथेऽम्वरस्थः । त्रिभेद सन्धीपु बलाभिपन्न कृजन्निनादांश्च करोतिधोरान् ॥ ३८ ॥ एफन्तु ऋग्वेदतुरङ्गमस्य पृष्ठे पदं न्यस्य वृपस्य चकम् । तस्थो भवः सोद्यतयाणचापः पुरस्य तत्सङ्गमभीक्षमाणः ॥ ३६॥ तदा भवपदन्यासाद्धयस्य वृषभस्य च । पेतुस्स्तनाश्च दन्ताश्च पीडिताभ्यां त्रिशूलिना ततःप्रभृतिचाश्यानां स्तनादन्ता गपान्तथा। गढ़ाः समभयंस्तेन चादृश्यत्यमुपागताः सारफारयस्तु भीमाग्थ्यो रौद्ररकान्तरेक्षणः । स्ट्रान्तिके सुसंख्दो नन्दिना कुलनन्दिना । परश्यधेन तीक्ष्णेन स नादी दानवेश्वरम् । तक्षयामास घे तक्षा चन्दनं गन्धदो यथा। परश्वधहतः धारः शैलादिः शरमो यथा । दुद्राप राङ्गं निष्कृप्य तारफाण्यो गणेश्वरम ऽध्यायः] * तारकपधवर्णनम् * ३४३ यज्ञोपवीतमादाय बिच्छेद च निनाद च । ततःसिंहरयो घोरः शङ्खशब्दश्च भैरवः ।। गणेश्वरः कृतस्तत्र तारकाख्ये निषूदिते ॥ ४५ ॥ प्रमया रसितं श्रुत्वा धादित्रस्वनमेव च । पार्श्वस्यः सुमहापाश्वं विद्युन्मालि मयोऽब्रवीत् ॥ ४६॥ बहुचदनवतां किमेव शब्दो नदतां श्रूयते भिन्नसागराभः । पद वचनन्तडिमालिन् किडिमे तद्गणपाला युयुधुर्ययुगजेन्द्राः ॥ ४७ ॥ इति मययचनाशादितस्तन्तडिमाली रविरियांशुमाली । रणशिरसि समागतः सुराणां निजगादेदमरिन्दमोऽतिहर्षात् ॥ ४८ ॥ यमवरुणमहेन्द्ररुद्रवीर्यस्तवयशसो निधिधीरतारकाख्यः । सफलसमशीर्षपर्वतेन्द्रो युद्ध्या यस्तपति हि तारको गणेन्द्रः ॥४॥ मृदितमुपनिशम्य तारकास्यम् रविदीसानलभोषणायताक्षम् । हपितसकलनेत्रलोमसत्वाः प्रमथास्तोयमुची यथा नदन्ति ॥ ५० ॥ इति सुहृदो घचनं निशम्य तत्वं तडिमालेः स मयस्तु वर्णमाली। रणशिरस्यसिताअनावलाभो जगदे पाक्यमिदं नयेन्दुमालिम् ॥५१॥ विद्युन्मालिन नः कालः साधितुं छपहेलया । करोमि विक्रमेणेतत् पुरं व्यसनवर्जितम् विद्युन्माली तत.फुद्धोमपश्चत्रिपुरेश्वरः । गणान् जन्नुस्तु द्रापिष्टाः सहितास्तैर्महासुरैः येन येन ततो पिधुनमाली याति मयश्च सः । तेन तेन पुरं धान्यं प्रमयोपहृततम् ।। अथ यमवरुणमृदङ्गयोपैः पणपडिण्डिमन्यास्थनप्रयोः । सफरतलपुटेध सिंहनादेर्मघमभिपूज्य सुरावतस्थः ॥ ५५ ॥ संपूज्यमानो दितिजर्मदात्मभिः सहस्त्रारमिप्रतिमौजसपिभुः । अमिष्टुतः सत्यरतैस्तपोधनैर्यधास्तरङ्गामिगतो दियाफरः ॥ ५ ॥ इति श्री मत्स्यपुराणे तारफयधवर्णनं नाम सप्तत्रिशदधिकशततमोऽध्यायः।
अष्टत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः मयस्य-युद्धार्थ दानवान्प्रति प्रोत्साहनम् । सूत उवाच। तारकाख्ये हते युद्धे उत्सार्यप्रमथान मयः। उवाव दानवान् भूयोभूयः सतु भयावृतान् भोः सुरेन्द्राधुना सर्वे नियोधध्वं प्रभाषितम् । यत् कर्त्तव्यं मया चैव युष्माभिश्च महावलैः ॥२॥ पुष्यं समेष्यते काले चन्द्राचन्द्रश्चनिभाननाः । यदकं त्रिपुरं सर्व क्षणमेकं भविष्यति कुरुध्वं निर्भया! काले कोकिलाशसितेन च। सकाल पुष्ययोगस्य पुरस्यच मयाकृतः काले तस्मिन् पुरे यस्तु सम्भावयति संहतिम् ।सएनं कारयेचूर्ण बलिनेकेषुणा सुरः॥ योधां प्राणोवलं यच्च याच वोवैरिता सुराः । तत् कृत्वा हृदयेचैव पालयध्वमिदंपुरम् महेश्वररथं ह्येकं सर्वप्राणेन भीपणम् । विमुखीकुर्वतात्यथं यथा नोत्सजते शरम् ॥ तत एवं कृतेऽस्माभिस्त्रिपुरस्यापिरक्षणे । प्रतीक्षिष्यन्ति विवशाःपुष्ययोगं दिवौकसः निशम्य तन्मयस्यैवं दानवास्त्रिपुरालयाः । मुहुः सिंहरवं कृत्वा मयमूवुर्यमोपमाः ॥EI प्रयत्नेन घयं सर्व कुर्मस्तव प्रभाषितम् । तथाकुर्मो यथा रुद्रो न मोक्ष्यति पुरेशरम् ।। अद्य यास्यामः संग्रामे तद्वद्रस्य जिघांसवः । कथयन्ति दितेः पुत्रा हृष्टा भिन्नतनूरहाः फल्पस्थास्यन्ति वा खस्थं त्रिपुरंशाश्वतंध्रुघम् । अदानवंचा भपिता नारायणपदत्रयम् घयंनभमहास्यामो यस्मिन्प्रोक्ष्यतिनो भवान् । अदैवतमदैत्यंचालोकं द्रक्ष्यन्तिमानयाः इति संमन्य हटास्ते पुरान्तर्विवुधारयः । प्रदोषे मुदिता भूत्वा घेर्मन्मथचारताम् ॥ मुहुर्मुक्तोदयो भ्रान्त उदयाप्रमहामणिः । तमांस्युत्सार्यभगवांश्चंद्रो जृम्भति सोऽम्वरम् कुमुदालत हंसी यथा सरसि विस्तृते । सिंहो यथा चोपविष्टोवैदूर्यशिखरेमहान् ॥ विष्णोर्यथा च विस्तीर्ण हारश्चोरसि संस्थितः । तथापगाढे नमसि चन्द्रो निनयनोद्यः ।
ऽध्यायः] * चन्द्रोदयवर्णनम् * भ्राजते भ्राजयन लोकान् सृजत् ज्योत्स्नारसं बलात् ॥ १७॥ शीतांशाचुदिते चन्द्र ज्यत्नापूर्णे पुरे सुरा.। प्रदोपे ललितं चक्रुहमात्मनमेव च ॥ रथ्यासु राजमार्गपु प्रासादेषु गृहेषु च । दीपाश्चम्पकपुष्पाभा नाल्पस्नेहप्रदीपिताः । तदा मठ ते दीपाः स्नेहपूर्णाः प्रदीपिताः । गृहाणि घसुमन्त्येषां सर्वरत्नमयानि च । ज्वलतो दीपयन्दीपान चन्द्रोदयमिव ग्रहाः ॥ चन्द्रांशुभिर्मासमानमन्तदीपः सुदीपितम् । उपद्रवैः कुलमिय पीयते त्रिपुरे तमः ॥२९॥ तस्मिन् पुरे चै तरुणप्रदोषे चन्द्राट्टहासे तरुणाप्रदोपे । रत्यर्थिनो वै दनुजा गृहेषु सहाङ्गनाभिः सुचिरं पिरेमुः ॥ २२ ॥ विनोदिता ये तु वृपध्वजस्य पञ्चेपघस्ते मकरध्वजेन । तत्रासुरेवासुरपुङ्गवेषु स्वाङ्गाइनाः स्वेदयुता बभूवुः ॥ २३॥ कलप्रलापेषु च दानवीनां वीणाप्रलापेषु च मूञ्छितांस्तु । मत्तालापेषु च कोकिलानां स चापवाणो मदनो ममन्थ ।।२४ ।। तमांसि नैशानि द्रुतं निहत्य ज्योत्मावितानेन जगद्वितत्य । से रोहिणी ताञ्च प्रियां समेत्य चन्द्रः प्रभाभिः कुरुतेऽधिराज्यम् ॥ २५ ॥ स्थित्वैव कान्तस्य तु पादमूले काचिद्वरस्त्रीस्थकपोलमूले । धत्ते विशोकं रुदती करोति तेनाननं स्वं समलङ्करोति ॥ २६ ॥ दृष्ट्वाननं मण्डलदर्पणस्य महाप्रभा मे मुसजेति जप्त्या । स्मृत्वा घरडीरमणेरितानि तेनैव भावेन रतीमवाप ॥ २७ ॥ रोमाञ्चितैर्गात्रघरैयुवभ्योरतानुरागाइमणेन चान्याः । स्वयं दुतं यान्ति मदामिभूताः क्षपा यथा चार्कदिनापसाने ॥२८॥ पेपीयते चातिरसानुषिद्धा विमागितान् या च प्रियं प्रसन्ना । काचित्मियस्यातिचिरात्प्रसन्ना आसीत्प्रलापेषु च सम्प्रसन्ना ॥ २६ ॥ गोशीपयुक्नईरिचन्दनच पट्टाहिताक्षीरधरा मुरीणाम् ।
३४६
* मत्स्यपुराणम् * [अष्टत्रिंशदधिकशततमो
मनोज्ञरूपा रुचिरा यभूवुः पूर्णामृतस्येव सुपर्णकुम्भाः ॥ ३० ॥
क्षताधरोष्ठा द्रुतदोपरक्ता ललन्ति दैत्या दयितासु रक्ताः ।
तन्त्रीप्रलापा त्रिपुरेप रक्ताः स्त्रीणा प्रलापेषु पुनर्विरक्ताः ॥ ३१ ॥
क्वचित् प्रवृत्तं मधुराभिगानं कामस्य पाणः सुकृतं निधानम् ।
आपानभूमीपु सुसप्रमेयं गेयं प्रवृत्तन्त्वय साधयन्ति ॥ ३२ ॥
गेयं प्रवृत्तं त्वथ शोधयन्ति केचित् प्रियां तत्र व साधयन्ति ।
केचित्प्रियां सम्प्रति बोधयन्ति सम्वुध्य सम्बुध्य व रामयन्ति ॥ ३३ ॥
चूतप्रसूनप्रभव सुगन्धः सूर्य गते वै त्रिपुरे बभूव ।
समर्मरी नूपुरमेखलानां शब्दश्च सम्वाधति कोकिलानाम् ॥ ३४ ॥
प्रियावगूढा दयितोपगूढा काचित्प्ररूढारुहापि नारी।
सुचारुचाप्पाडरपल्लयाना नवाम्बुसिक्ता इव भूमिरासीत् ॥ ३५ ॥
शशाडूपादरुपशोभितेषु प्रासादपर्येषु धराङ्गनानाम् ।
पानेन खिन्नादयितातिवेलङ्कपोलमाघ्रासि व किं ममेदम् ॥३६॥
आरोह मे श्रोणिमिमां विशालां पीनोन्नताङ्काञ्चनमेखलाढ्याम् ॥ ३७ ॥
रथ्यासु चन्द्रोदयभासितासु सुरेन्द्रमार्गेषु च विस्तृतेषु ।
दैत्याङ्गना यूथगता विभान्ति तारा यथा चन्द्रमसो दिवान्ते ॥ ३८ ॥
घण्टाट्टहासेषु च चामरेषु प्रेड्वासु चान्यामदलोलभावात् ।
सन्दोलयन्ते कलसम्प्रहासा. प्रोवाच काञ्चीगुणसूक्ष्मनादा ॥ ३६॥
अम्लानमालान्वितसुन्दरीणाम् पर्याय एषोऽस्ति व हर्पितानाम् ।
श्रूयन्ति पाच. कलधौतकल्पा धापीपु चान्ये कलहंसशब्दा.॥४०॥
काञ्चीकलापश्च सहागराग प्रेवासुतदासकृताश्च भावा ।
छिन्दन्ति तासामसुराङ्गनानाम् प्रियालयान्मन्मथमार्गणानाम् ॥४१॥
चित्राम्बरधोद्धृतकेशपाश सन्दोल्यमान, शुशुभेऽसुरीणाम् ।
सुचारवेषाभरणरुपेतस्तारागणज्योतिरिवास चन्द्रः ॥ ४२ ॥
ऽध्यायः] * देवदानवयुद्धवर्णनम् * ३४० सन्दोलनादुच्छसितैश्विन्तसूत्रः कालीघ्रटमणिभिविप्रकोण: दोलाभूमिस्तैर्विवित्रा विभाति चन्द्रस्य पाश्चर्योपगतैर्विवित्रा ॥ ४३ ॥ सबन्दिके सोपपने प्रदोपे रुतेषु वृन्देषु च कोकिलानाम् । शरज्ययं प्राप्य पुरेऽसुराणां प्रक्षीणवाणो मदनश्चचार ॥ ४४ ॥ इति तत्र पुरेऽमरद्विपाणां सपदि हि पश्चिमकौमुदी तदासीन् । रणशिरसि पराभविष्यतां च भवतुरगैः कृतसङ्ख्या अरीणाम् ॥ १५ ॥ चन्द्रोऽथकुन्दकुसुमाकरहारवर्णो ज्योत्स्नावितानरहितोऽनसमानवर्णः । विच्छायतां हि समुपेत्य न भाति तद्वद्भाग्यक्षये धनपतिश्च नरो विवर्णः ॥ चन्द्रमभामरुणसारथिनाभिभूय सन्तप्तकाञ्चनरथागसमान धिम्यः । स्थित्योदयानमुकुटे यहुरेघ सर्यो भात्यग्यरे तिमिरतोयवहान्तरिष्यन् ।। इति श्रीमत्स्यपुराणे प्रदोपवर्णनं नामापत्रिशदधिकशततमोऽध्यायः । एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः देवदानवयुद्धवर्णनम् । सूत उवाच। उदिते तु सहन्नांशी मेरी भासाकरे रयो । नदद्देष कुलं कृत्स्नं युगान्त इव सागराः ॥ सहस्रनयनो देवस्ततः शरः पुरन्दरः । सवित्तदः सवरुण त्रिपुरं प्रययौ हरः ॥२॥ ते नानाविधरुपाय प्रमथातिप्रमाथिनः । ययुः सिंहरवैधोरेदिवनिनदरपि॥३॥ ततोपादितयादिश्चातपत्रमहादमः। यभूव तद्वलं दिव्यं धनं प्रचलितं यथा ॥ ४॥ तदा पतन्तं संप्रेक्ष्य रौद्रं स्ट्रयलं महत् । सक्षोभो दानवेन्द्राणां समुद्रप्रतिमो यमौ ॥५॥ तेचासीन पहिशानच्छतीः बालदण्डपरश्यधान् ।
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૪૮
* मत्स्यपुराणम् * [ एकोनचत्वारिशदधिकशततमो
शरासनानि वज्राणि गुरूणि मुसलानि च ॥ ६ ॥
प्रगृह्य कोपरक्ताक्षाः सपक्षा इच पर्वताः । निजम्नुः पर्वतघ्नाय घना इव तपात्यये ॥७॥
स विद्युन्मालिनस्ते वै समयादिति नन्दनाः । मोदमानाः समासेदु देवदेवैः सुरारयः ।।
मर्तव्यकृतयुद्धीनां जये चानिश्चितात्मनाम् । अवलानाञ्चमू ह्यासीदवलावयवा इव ॥६॥
विगर्जन्त इनाम्भोदा अम्भोदसदृशत्विपः । प्रयुद्धा युद्धकुशलाः परस्परकृतागसः ॥
धूमायन्तो ज्वलद्भिश्च आयुधैश्चन्द्रवर्चसैः ।
कोपाद्वा युद्धलुब्धाश्च कुट्टयन्ते परस्परम् ॥ ११ ॥
चाहताः पतन्त्यन्ये घाणैरन्ये विदारिताः ।
अन्ये विदारिताश्चक्रः पतन्ति युदधेर्जले ॥१२॥
छिन्नस्त्रग्दामहाराश्च प्रमृशाम्बरभूपणाः । तिमिनकगणे चैव पतन्ति प्रमथाः सुराः ॥
गदानां मुसलानाञ्च तोमराणां परश्वधाम् । पत्रशूलर्भिपातानां पट्टिशानाञ्च सर्वतः ॥
गिरिडोपलानाञ्च प्रेरितानां प्रमन्युभिः । सजवानां दानवानां सधूमानां रवित्विपाम्
आयुधानो महानोघः सागरोघे पतत्यपि ॥ १५ ॥
प्रवृद्धवेगैस्तैस्तत्र सुरासुरकरेरितैः । आयुधैस्त्रस्तनक्षत्रः क्रियते सक्षयो महान् ॥१६
क्षुद्राणाङ्गजयोर्युद्धे यथा भवति सक्षयः । देवासुरगणैस्तद्वत्तिमिनकक्षयोऽभवत् ॥१७
विद्युन्माली च वेगेन विद्युन्माली इवाम्बुदः । विद्युन्माल घनोन्नादो नन्दीश्वरमभिद्रुतः
स तन्तमोऽरिवदनं प्रनदन घदताम्बरः। उवाच युधि शैलादिन्दानयोऽम्बुधिनिस्वन. ॥
युद्धाकाङ्क्षी तु बलवान् विद्युन्माल्यहमागतः ।
यदि त्विदानी मे जीवन्मुच्यसे नन्दिकेश्वर !।
न विद्युन्मालि हननं घोमियुधि दानयः ॥२० ।।
तमेवं धादिनं दैत्यं नन्दीशस्तपताम्बरैः ।
उवाच प्रहरंस्तत्र घायलङ्कारवद्वचः ॥ २१ ॥
दानवाः! धर्मकामानां नेपोऽपसर इत्यतः ।
शको हन्तुं फिमात्मानं जातिदोपाद्विवृहसि ॥ २२ ॥
ऽध्यायः] * विद्युन्मालिनन्दीयुद्धयर्णनम् . ३४६ यदि तायन्मया पूर्व हतोऽसि पशुवद्यथा । इदानी घा कथं नाम न हिस्ये क्रतुदूपणम् ॥ सागरं तरते दोभा पातयेद्यो दिवाकरम् । सोऽपि मां शक्नुयान्नैव चक्षुभ्यां समचीक्षितुम् ॥ २४ ॥ इत्येवं वादिनं तत्र नन्दिनं तनिभोवले । विभेदैकेपुणा दैत्यः करणार्क इवाम्बुदम् ।। पक्षसः सशरस्तस्य पपी रुधिरमुत्तमम् । सर्यस्त्वात्मप्रभावेण नद्यर्णवजलं यथा ॥ स तेन सुप्रहारेण प्रथमञ्चाति रोपितः । हस्नेन वृक्षमुत्पाट्य चिक्षेप गजराडिच ॥२७॥ घायुनुन्नः स च तरुः शीर्णपुप्पो महारवः । विद्युन्मालिशरैछिन्नः पपात पतगेशवत् वृक्षमालोक्य तं छिन्नं दानवेन परेपुभिः । रोपमाहारयत्तीवं नन्दीश्वर सुविग्रहः ॥२६ सोद्यम्य फरमारावे रविशककरप्रभम् । दुद्राय हन्तुं स क्रूरं महिषं गजराडिय ॥ ३०॥ तमापतन्तं वेगेन वेगवान् प्रसभं वलात् । विद्युन्माली शरशतः पूरयामास नन्दिनम् ॥ शरफण्टकितालो वै शैलादिः सोऽभवत् पुनः । अरेर्गुह्यरथं तस्य महतः प्रययी जयात् विलम्बिताभ्योविशिरो भ्रमितश्च रणे रथः । पपात मुनिशापेन सादित्योऽर्करथो यथा अन्तपानिर्गतश्चैव मायया स दितः सुतः । आजघान तदा शक्याशेलादि समपस्थितम् तामेव तु विनिष्काम्ययानिशोणितभूपिताम् । विद्युन्मालि समुद्दिश्यचिक्षेपप्रमथाग्रणीः तया मिन्नतनुत्राणो विभिन्न हृदयस्त्वपि । विद्युन्माल्यपतभूमौ घजाइतइवाचलः विद्युन्मालिनिनिहतेसिद्धचारणकिन्नराः। साधुसाध्वीतिचोक्त्या ते पूजयन्तउमापतिम् मन्दिना सादिते दैत्ये विद्युन्मालौ हते मयः । ददाह प्रमथानीकं घनमग्निरियोद्धतः ॥ शलनिदारितोरस्का गदाचूर्णितमम्तकाः । इषुभिर्गादविद्धाश्च पतन्ति प्रमाणये ॥ अथ पजधरो यमोऽयंदः स च नन्दी स च षण्मुपो गुहः । मयममुरपीरसम्प्रवृत्तं विविधुः शस्त्रवरईतारयः ॥४०॥ नागन्तु नागाधिपतेः शताक्षं मयो विदायेंषु परेण तूर्णम् । मयञ्च वित्ताधिपतिश्च पिदुध्या ररास मत्ताम्युदयत्तदानीम् ॥४॥ तन: शाः प्रमथगणेश्च दानया हाताभ्योत्तमयेगविग्रमाः। भृशानुपिद्धास्त्रिपुरं प्रयेशिता यथा शिपधामधरेण संयुगे ॥४२॥ ।
३५० * मत्स्यपुराणम् * [एकोनचत्वारिंशदधिकशततमो ततस्तु शङ्खानकभेरिमर्दलाः ससिंहनादादनुपुत्रभङ्गदाः । कपर्दिसैन्ये प्रवभुः समन्ततो निपात्यमाना युधि पज्रसन्निभाः ॥२३॥ अथ दैत्यपुराभावे पुष्ययोगो बभूव ह । वभूव चापि संयुक्तं तद्योगेन पुरत्रयम् ॥४४॥ ततो वाणं त्रिधा देवस्त्रिदैवतमयं हरः । मुमोर त्रिपुरे तूर्णं त्रिनेत्रस्निपदाधिपः ॥४५॥ तेन मुक्तेन वाणेन वाणपुष्पसमप्रभम् । आकाशं स्वर्णसङ्काशं कृतं सूर्येण रञ्जितम् ॥ मुक्ता त्रिदैवतमयं त्रिपुरे त्रिदशः शरम् । धिग्धिड्मामिति चक्रन्दकप्टंकप्टमिति त्रुवन् ॥ चैधुर्य दैवतं दृष्ट्वा शैलादिर्गजवद्गत 1 किमिदन्त्विति पप्रच्छ शूलपाणि महेश्वरम् ॥४८॥ ततः शशाङ्कतिलकः कपर्दी परमार्तवत् । उवाच नन्दिनं भक्तः स मयोऽध विनंक्ष्यति अथ नन्दीश्वरस्तूर्णं मनोमारुतमद्वली । शरे त्रिपुरमायाति त्रिपुरं प्रविवेश सः ॥५०॥ स मयम्प्रेक्ष्य गणपः प्राहकाञ्चनसन्निभः । विनाशस्त्रिपुरस्यास्य प्राप्तो मय! सुदारणः अनेनेच गृहेण त्वमपक्राम ब्रवीम्यहम् । श्रुत्वा तन्नन्दिवचनं गुढ्भको महेश्वरे ॥ तेनैव गृहमुल्येन त्रिपुरादपसर्पितः ॥ ५२ ॥ सोऽपीपुः पत्रपुटवद्दग्ध्या तन्नगरत्रयम् । त्रिधा इच हुताशश्च सोमो नारायणस्तथा । शरतेज-परीतानि पुराणि द्विजपुङ्गवाः!। दुप्पुत्रदोपाइह्यन्ते कुलान्यूध्वं यथा तथा ॥ मेरुकैलासकल्पानि मन्दराग्रनिभानि च । सकपाटगवाक्षाणि पलिभिः शोभितानि च सप्रासादानि रम्याणिकृटागारोत्कटानि च । सजलानिसमाख्यानिसायलोकनकानिव यद्धध्वजपताकानि स्वर्णरीप्यमयानि च। गृहाणि तमिस्त्रिपुरे दानवानामुपद्रवे ॥ दह्यन्ते दहनामानि दहनेन सहस्रशः ॥ ५७ ॥ प्रासादानेषु रम्येषु धनेपूपपनेषु च । पातायनगताश्चान्याश्चाकाशस्य तलेषु च ॥५॥ रमणेरपगूढाश्च रमन्त्यो रमणः सह । दह्यन्ते दानवेन्द्राणामग्निना ह्यपि ताःस्त्रियः॥ फाचित् प्रियं परित्यज्य अशक्ता गन्तुमन्यतः । पुरः प्रियस्यपञ्चत्वङ्गताग्नि पदनेक्षयम् उपाच शतपत्राक्षी सानाक्षीव स्तालिः । हव्यवाहन ! भार्याहं परस्य परतापन ! धर्मसाक्षी त्रिलोकस्य न मां स्प्रामिहार्हसि ॥ ६१॥ शायितञ्च मया देव ! शिवया च शिवप्रभ!। परेण प्रेहि मुक्त्येदं गृहश्च दयितं हि मे ऽध्यायः] * मयपुरस्त्रीणां विलापवर्णनम् * एका पुत्रमुपादाय वालकं दानवाङ्गना । हुताशनसमीपस्था इत्युवाच हुताशनम् ॥६३ चालोऽयं दुःखलब्धश्च मया पावक ! पुत्रक । नार्हस्येनमुपादातुं दयितं पण्मुखप्रिय! काश्चित् प्रियापरित्यज्य पीडितादानवागनाः । निपतन्त्यर्णवजले शिअमानविभूषणाः तात पुत्रेति मातेति मातुलेति च विद्दलम् । चकम्पुस्त्रिपुरेनार्यः पावकज्वालवे पिताः यथा दहति शैलानिःसाम्बुजं जलजाकरम्। तथा स्त्रीवस्त्रपद्मानि चादहत्रिपुरेऽनल: तुपारराशिः कमलाकराणां यथा दहत्यम्वुजकानि शीते । तथैव सोऽग्निस्त्रिपुराइनानां ददाह थक्वेक्षणपजानि ॥६॥ शराग्निपातात् समभिद्रुतानां तत्राइनानामतिकोमलानाम् । यभूव काञ्चीगुणनूपुराणामाक्रन्दितानाञ्च रपोऽतिमिश्नः ॥६६॥ दग्धादचन्द्राणि स चेदिकानि विशीर्णहाणि सतोरणानि । दग्धानि दग्धानि गृहाणि तत्र पतन्ति रक्षार्थमिवार्णचौधे ॥७॥ गृहः पतद्भिवलनावलीढेरासीत्समुद्र ललिलं प्रतप्तम् । कुपुत्रदोषः प्रह्तानुषिद्धं यथा कुलं याति धनान्वितस्य ॥११॥ गृहप्रतापः क्वथितं समन्तात्तदार्णवे तोयमुदीर्णवेगम् । चित्रासयामास तिमीन सनक्रां स्तिमिङ्गिलास्तत्वथितांस्तथान्यान् ॥७२॥ सपोपुरो मन्दरपादकल्पः प्राकारधर्यत्रिपुरे च सोऽथ । तैरेव साद्धं भवनैः पपात शब्दं महान्तं जनयन् समुद्रे ॥ ७३ ॥ सहस्रश्टङ्गर्भयनर्यदासीत् सहस्रन्टङ्गः स इचावलेश । नामावशेषं त्रिपुरं प्रजझे हुताशनाहारबलिप्रयुक्तम् ॥ ४ ॥ प्रदहामानेन पुरेण तेन जगत्सपातालदिवं प्रतप्तम् । दुःपं महत्प्राप्य जलायमग्नं यस्मिन् महान् सीधधरो मयस्य ॥ ७५ ॥ शोपचः श्रुत्या इन्द्रो पत्रधरस्तदा । शशाप तद्गृहञ्चापि मयस्यादितिनन्दन' ।। असेव्यमप्रतिष्ठश्च भयेन च समावृतम् । भविष्यति मयगृहं नित्यमेव यथाऽनल.॥ यस्य यस्य तु देशस्य भविष्यति पराभवः । द्रक्ष्यन्ति त्रिपुरं सण्डं तत्रेदं नाशगा जना ।
३५२
* मत्स्यपुराणम् * [चत्वारिंशदधिकशततमो
तदेतदद्यापि गृहं मयस्यामयवर्जितम् ॥ ७८ ॥
ऋपय ऊचुः।
भगवन् ! स मयो येन गृहेण प्रपलायितः । तस्य नो गतिमाख्याहि मयस्य चमसोद्भव।
सूत उवाच ।
दृश्यते दृश्यते यत्र ध्रुवस्तत्र मयास्पदम् । देवद्विड् तु मयश्चातः स तदाखिन्नमानसः ।
ततश्च्युतोऽन्यलोकेऽस्मित्राणार्थ वै चकार सः॥ ८०॥
तत्रापि देवताः सन्ति आप्तोर्यामाः सुरोत्तमाः। तत्राशक्तं ततो गन्तुं तश्चैकं पुरमुत्तमम्
शिवः सृष्ट्वा गृहं प्रादान मयञ्चैव गृहार्थिनम् । विरराम सहस्राक्षः पूजयामास चेश्वरम्
पूज्यमानञ्च भूतेशं सर्वे तुष्टुचुरीश्वरम् ॥ ८२ ॥
संपूज्यमानं त्रिदशैः समीक्ष्य गणैर्गणेशाधिपतिन्तु मुख्यम् ।
हर्षाद्ववल्गुर्जहसुश्च देवा जग्मुर्ननर्दुस्तु विपाक्तहस्ताः ॥ ८३ ॥
पितामहं वन्द्य ततो महेशं प्रगृह्य चापं प्रविसृज्य.भूतान् ।
रथाच्च सम्पत्य हरेषु दग्धं क्षिप्तं पुरं तन्मकरालये च ॥ ४॥
य इमं रुद्र विजयं पठते विजयावहम् । विजयन्तस्य कृत्येषु ददाति वृषभध्वजः ।।८५॥
पितृणां घापि श्राद्धेषु य इमं श्रापयिष्यति । अनन्तं तस्य पुण्यस्यात् सर्वयज्ञफलप्रदम्
इदं स्वस्त्ययनं पुण्यमिदं पुंसवन महत् । इदं श्रुत्वा पठित्वा च यान्ति रुद्रसलोकताम्
इति श्री मत्स्यपुराणे शङ्करविजयवर्णनं नामोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।
चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
अमावास्यामहत्चवर्णनम् ।
पय ऊचुः।
कथं गच्छत्यमावास्यां मासिमासि दिवं नृप । ऐलः पुरूरवा.स्त! तर्पयेत कथं पितन
एतमिच्छामहे श्रोतुं प्रभावन्तस्य धीमतः ॥१॥
ऽध्यायः] * अमावास्यामहत्त्ववर्णनम् * सूत उवाच। तस्य चाहं प्रवक्ष्यामि प्रभाव विस्तरेण तु ! ऐलस्य दिवि संयोगं सोमेन सह धीमता सोमाचैधामृतप्राप्तिः पितृणां तर्पणं तथा । सौम्या बहिपदः काव्या अग्निप्वात्तास्तथैव च ॥३॥ यदाचन्द्रश्च सूर्यश्च नक्षत्राणां समागती । अमावास्यां निवसत एकस्मिन्नथ मण्डले तदा स गच्छति द्रष्टुं दिवाकरनिशाफरौ । अमावास्याममावास्यां मातामहपितामही अभिवाद्य तुती तत्र कालापेक्षः स तिष्ठति । प्रचस्कन्द तत सोममर्चयित्वा परिश्रमात् ऐलः पुरुरवा विद्वान् मासि श्राद्धचिकीर्षया । तत स दिवि सोमवै ह्युपतस्थेपितृनपि द्विलवड्डहुमात्रञ्च तावुभौ तु निधाय सः । सिनीवाली प्रमाणाल्पकुहुमात्रवतोदये ॥ कुहमात्रं पित्रुद्देशं ज्ञात्वा कुहमुपासते । तमुपास्य ततः सोमं कलापेक्षी प्रतीक्षते ॥६॥ स्वधा मृतन्तु सोमाद्वैवसंस्तेपाञ्च तृप्तये । दशभिः पञ्चभिश्चैव स्वधाऽमृतपरिस्रवैः ।। कृष्णपक्षभुजां प्रीतिर्दुह्यते परमांशुभिः॥ १० ॥ सद्योमिक्षरता तेन सौम्येन मधुनाच सः । निवापेप्वथ दत्तेपु पित्र्येण विधिना तु थे। स्वधा मृतेन सौम्येन तर्पयामास वै पितॄन् । सौम्या हिपदः फाव्या अग्निप्यात्तास्तथैव च ॥ १२ ॥ ऋतुरग्नि-स्मृतो विनैऋतुं सम्वत्सरंविदुः। जज्ञिरे ऋतवस्तस्मातुभ्यो ह्यार्त्तवाभवन पितरोतयोर्द्धमासा विज्ञेया ऋतुसूनवः । पितामहास्तु तवो ह्यमावास्याब्दसूनधः ॥ प्रपितामहाः स्मृता देवा. पञ्चाब्दं ब्रह्मणः सुताः ।। १४ ।। सौम्यायहिपदःकाल्या अग्निप्वात्ताइतित्रिधा । गृहस्थायेतु यज्यानोहविज्ञार्त्तवाश्चये स्मृता पहिपदस्ते वै पुराणे निश्चयं गताः ॥१५॥ गृहमेधिनश्च यज्यानो अग्निप्यात्तातयाः स्मृताः। अएका पतयः फाव्याः पञ्चाब्दांस्तु नियोधत ॥ १६ ॥ तेपुसम्बत्सरोह्यग्नि सूर्य्यस्तु परिवत्सरः । सोमस्त्विपत्सरश्चैववायुश्चवानुवत्सर दस्तुपत्सरस्तेषां पञ्चादाये युगाल्मकाः। कालेनाधिष्ठितस्तेषु चन्द्रमासक्ते सुधाम् * मत्स्यपुराणम् * [चत्वारिंशदधिकशतततमो एते स्मृता देवकृत्याः सोमपाश्चोष्मपा ये। तांस्तेन तर्पयामास यावदासीत्पुरूरवाः यस्मात्प्रसूयतेसोमो मासिमासिविशेषतः। ततः स्वधामृतंतदै पितॄणां सोमपायिनाम् एतत्तदमृतं सोममवाप मधु चैव हि ॥ २० ॥ तत पीतवं सोमं सूर्योऽसावेकरश्मिना । आप्यायते सुपुम्णेन सोमन्तु सोमपायिनम् नि शेषावैकला:पूर्वायुगपद्व्यापयनपुरा । सुषुम्णाप्यायमानस्य भागंभागमह.क्रमात् कलाः क्षीयन्ति कृष्णास्ताः शुक्ला ह्याप्याययन्ति च । एव सा सूर्यवीर्येण चन्द्रस्याप्यायिता तनुः ॥ २३ ॥ पौर्णमास्यां सदृश्येत शुक्ल सम्पूर्णमण्डल' । एवमाप्यायितः सोमः शुक्लपक्षेप्यह.क्रमात् देव पीतसुधं सोमं पुरापश्चात्पिवेचिः ॥ २४ ॥ पीतं पञ्चदशाहन्तु रश्मिनैकेनभास्करः। आप्याय यत् सुपुम्णेन भागं भागमहः क्रमात् सुषुम्णान्यायमानस्य शुक्लावर्द्धन्तिवैकला. । तस्माद्धसन्तिवैकृष्णा शुक्काप्याययन्तिव एवमाप्यायते सोमः क्षीयते च पुनः पुन । समृद्धिरेवं सोमस्य पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः ॥२७॥ इत्येप पितृमान् सोम स्मृतस्तद्वत् सुधात्मक. । कान्त पञ्चदशे साईसुधामृतपरिस्रवः अत.पर प्रवक्ष्यामि पर्वाणा सन्धयश्च याः । यथाप्रथ्नन्ति पर्वाणिभावृत्तादिक्षवेणुवत् तथाब्दमासा. पक्षाश्च शुक्ला कृ ष्णास्तु व स्मृताः। पौर्णमास्यास्तु यो भेदो ग्रन्थयः सन्धयस्तथा ॥३०॥ अर्द्धमासस्य पर्वाणि द्वितीयाप्रभृतीनि च । अग्न्याधान क्रिया यस्मानीयन्ते पर्वसन्धिषु तस्मात्तु पर्वणोह्यादौ प्रतिपद्यादिसन्धिषु । सायाह्न अनुमत्याश्च द्वौलवी फालउच्यते लवी द्वावेव राकाया कालो शेयोऽपराजिकः ॥३२॥ प्रकृति कृष्णपक्षस्य कालेऽतीतेऽपराहिके। साया प्रतिपद्येप स कालः पौर्णमासिकः व्यतीपाते स्थिते सूर्य लेखावं युगान्तरम् । युगान्तरोदिते वचन्द्रे लेखोपरिस्थिते पूर्णमासव्यतीपाती यदा पश्येत्परस्परम् । तो तु वैप्रतिपद्यायचस्मिन्काले घ्ययस्थिती तत्कालं सूर्यमुद्दिश्य दृष्ट्वा संरयातुमर्हसि । सचैवसक्रियाकाल.पष्ठ फालोऽभिधीयते - ऽध्यायः] * अमावास्यामहत्त्ववर्णनम् * पूर्णन्दुः पूर्णपक्षे तु रात्रिसन्धिषु पूर्णिमा । तस्मादाप्यायते नकंपौर्णमास्यां निशाकरः यदान्योन्यवतीं पाते पूणिमां प्रेक्षते दिया । चन्द्रादित्योऽपराले तु पूर्णत्वात् पूणिमा स्मृता ॥३८॥ यस्मात्तामनुमन्यन्ते पितरो दैवतैः सह । तस्मादनुमति म पूर्णत्वात् पूर्णिमा स्मृता ॥३६॥ अत्यर्थ राजते यस्मात् पौर्णमास्या निशाकर । रक्षनाच्चैव चन्द्रस्य राकेति कवयो विदु ॥४०॥ अमावसेतामुक्षे तु यदा चन्द्रदिवाकरौ । एका पञ्चदशी रात्रिरमावस्या तत स्मृता ।। उद्दिश्य ताममावास्या यदा दर्श समागती। अन्योऽन्यं चन्द्रसूर्यो तु दर्शनादर्श उच्यते ॥४२|| द्वौ द्वौ.लवावमावास्या स काल पर्वसन्धिषु । यक्षर कुहमात्रश्च पर्वकालस्तु स स्मृत ॥४३॥ दृष्टचन्द्रा त्वमावास्याम याह्नप्रभृतीह वै । दिवा तद्- राधान्तु सूर्य प्राप्ते तुचन्द्रमाः सूर्येण सहसोद्गच्छेत्तत प्रातस्तनात्तु वे ॥४५॥ समागम्य लपी ही तु मध्याह्नानिपतव्रवि । प्रतिपच्छुल्लपक्षस्य चन्द्रमा सूर्यमण्डलात् निर्मषमानयोर्मभ्येतयोर्मण्डलयोस्तु थे। स तदान्याहुते कालोदर्शस्पच पपक्रियाः एतद्वतुमुख ज्ञेयममावास्यान्तु पार्वणम् ॥४७॥ दिवा पर्व त्वमावास्या क्षोणेन्दो धवले तु वै । तस्माद्दिवा त्वमायाम्या गृह्यने यो दिवाकरः ॥४८॥ कुहेति कोकिलेनोकं यस्मात् कालात् समाप्यते । तत्कालसंज्ञिता ोपा अमावास्या कुट्ट स्मृता॥४६॥ सिनीवालीप्रमाणन्तु क्षीणशेषणे निशाकर। अमावास्या विशत्यक सिनीवाली तदा स्मृता ॥५०॥ अनुमतिश्च राका च सिनीवाली कुहस्तथा।। רז * मत्स्यपुराणम् * [चत्वाशिदधिकशततमो एतासां द्विलयः कालः कुहूमात्रा कुहूः स्मृता ॥५१॥ इत्येष पर्वसन्धीनां कालोहिलवःस्मृतः । पर्वाणान्तुल्यकालस्तु तुल्याहुतिवपट्टियाः चद्रसूर्यव्यतीपाते समे वै पूर्णिमे उभे । प्रतिपत्प्रतिपन्नस्तु पर्वकालो द्विमात्रकः ॥ कालः कुहसिनीवाल्योः समुद्धो द्विलयः स्मृतः । अर्कनिर्मण्डले सोमे पर्वकालः फलाः स्मृताः ॥५४॥ यस्मादपूर्यते सोमः पञ्चदश्यान्तु पूणिमा । दशभिः पञ्चभिश्चैव कलाभिर्दियसक्रमात तस्मात् पञ्चदशे सोमे कला वै नास्ति पोडशी। तस्मात् सोमस्य विप्रोक्तः पञ्चदश्यां मया क्षयः ॥५६॥ इत्येते पितरोदेवाः सोमपाः सोमवर्द्धनाः । आर्तवा ऋतवोऽथाब्दा देवास्तान् भाधयन्ति हि ॥५७॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि पितॄन् श्राद्ध जस्तु ये । तेषां गतिञ्चसत्तत्त्वंप्राप्तिश्राद्धस्यचैव हि न मृतानाङ्गतिः शक्या ज्ञातुं पा पुनरागतिः । तपसा हि प्रसिद्धेन किं पुनर्मा सचक्षुषा अत्र देवान् पितृ श्वैते पितरो लौकिकाः स्मृताः । तेषान्ते धर्मसामर्थ्यात् स्मृताः सायुज्यगा द्विजैः ॥६०॥ यदि वाश्रमधर्मेण प्रज्ञानेषु व्यवस्थितान् । अन्येवान प्रसीदन्ति श्राद्धयुक्तेषु कर्मसु ॥ ब्रह्मवर्येण तपसा यज्ञेन प्रजया भुवि । श्राद्धन विद्यया चैव चान्नदानेन सप्तधा ॥ ६२ ॥ फर्मस्वेतेषु ये सक्तावर्त्तन्त्या देहपातनात् । देवैस्ते पितृभिः साईम्ष्मपैःसोमपैस्तथा स्वर्गता दिवि मोदन्ते पितृमन्त उपासते ।। ॥ ६३॥ प्रजायतां प्रसिद्धषा उक्ताश्राद्धकृताञ्च वै । तेषां निवापेदत्तं हि तत् कुलीनैस्तु वान्धवैः मासश्राद्धं हि भुआनास्तेऽप्येते सोमलौकिकाः। एते मनुष्याः पितरो मासश्राद्धभुजस्तु चै ।। ६५ ॥ तेभ्योऽपरे तु येत्यन्ये सङ्कीर्णा कर्मयोनिषु । भ्रष्टाश्चाश्रमधर्म स्वधास्वाहाविवर्जिताः भिन्ने देहे दुरापन्नाः प्रेतभूता यमक्षये । स्वकर्माण्यनुशोचन्तो यातनास्थानमागताः ।।
ऽध्यायः] * पितृमहत्ववर्णनम् * दीर्घाश्चैवातिशुष्काश्च श्मश्रुलाश्च विवाससः । शुतपिपासाभिभूतास्ते विद्रवन्ति वितस्ततः ॥ ६८ ॥ सरिस्सरस्तागानि पुष्करिण्यश्वसर्वशः। पराशान्यमिकाङ्क्षन्तःकाल्यमानाइतस्ततः स्थानेषु पात्यमाना ये यातनास्थेषु तेषु वै । शाल्मल्यां चैतरिण्याञ्चकुम्भीपाकेद्धवालुके असिपनयनेचैवयात्यमानाःस्वकर्मभिः । तत्रस्थानान्तु तेषां वै दुःखितानामशायिनाम् तेषां लोकान्तरस्थानां वान्धवैर्नामगोत्रतः । भूमापसव्यं दर्भपु दत्ताः पिण्डास्त्रयस्तु वै प्राप्तांस्तु तर्पयन्त्येव प्रेतस्थानेष्वधिष्टितान् । अप्राप्ता यातनास्थानंप्रभ्रष्टा ये च पञ्चधा पश्चाये स्थावरान्ते वै भूतानीके स्वकर्मभिः । नानारूपासु जातीनां तिर्यग्योनिपुमूर्तिपु यदाहारा भवन्त्येते तासु तास्थिह योनिपु! तस्मिंस्तस्मिस्तदाहारेश्राद्धं दत्तन्तु प्रीणयेत् काले न्यायागतम्पाने विधिना प्रतिपादितम् । प्राप्नुवन्त्यन्नमादत्तं यत्र यत्रावतिष्ठति यथा गोपु प्रनष्टासु वत्सो विन्दति मातरम् । तथा श्राद्धपु दृष्टान्तो मन्त्रः प्रापयते तु तम् ।। ७६ ॥ एवं ह्यविकलं श्राद्धं श्रद्धादत्तं मनुरवीत्। सनत्कुमारः प्रोवाच पश्यन् दिव्येन चक्षुपा गतागतज्ञःप्रेतानां प्राप्ति श्राद्धस्य चैव हि । कृष्णपक्षस्त्वहस्तेषा शुरु स्वप्नाय शर्वरी इत्येते पितरो देवा देवाश्च पितरश्च वै । अन्योन्यपितरो ोते देवाश्च पितरो दिवि ॥ एते तु पितरो देवा मनुष्याः पितरश्च ये। पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः ॥ ८० इत्येप विषयः प्रोक्तः पितॄणां सोमपायिनाम् । एतत् पितृमहत्त्वं हि पुराणेनिश्चयंगतम् इत्येष सोमसूर्याभ्यामेलस्य च समागमः । अवाप्ति श्रद्धयाचैवं पितृणाञ्चैवतर्पपाम् पर्वणाञ्चैव य. फालो यातनास्थानमेव च । समासात् कीर्तितस्तुभ्यं समएप सनातनः घेरूप्यं येन तत्सर्व कथितन्त्वेकदेशिकम् । अशक्यं परिसंख्यातुं श्रद्धेयं भृतिमिच्छता स्वायम्भुवस्य देवस्य एप सर्गो मयेरितः । विस्तरेणानुपूर्व्याच भूयः किं कथयामि घः इति श्रीमत्स्यमहापुराणे पितृमहत्त्ववर्णनं नाम चत्वारिंशदधिकशतमोऽध्यायः ।
एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः चतुर्युगमानवर्णनम् । ऋपय ऊचु । चतुर्युगानि यानि स्यु पूर्व स्वायम्भवेऽन्तरे । एपा निसर्ग सख्याञ्च श्रोतुमिच्छाम विस्तरात् ॥ १॥ सूत उवाच। एतच्चतुर्युग त्वेव तद्वक्ष्यामि निबोधत । तत्प्रमाण प्रसख्याय विस्तराच्चैव कृतनश लौकिकेन प्रमाणेन निष्पाद्याव्दन्तु मानुषम् । तेनापीह प्रसरयायवक्ष्यामि तु चतुर्यगम् काष्टा निमेषा दश पञ्च चैव त्रिशच्च काष्ठाङ्गणयेत् कलान्तु । त्रिंशत्कलाश्चैव भवेन् मुहर्तस्तैत्रिशता रात्र्यहनी समेते ॥ ४ ॥ अहोरात्रे विभजते सूर्यो मानुषलौकिके । रात्रि स्वप्नाय भूतानाञ्चेष्टायै कर्मणामह ॥ पित्र्ये राज्यहनी मास प्रविभागस्तयो पुन । कृष्णपक्षस्त्वहस्तेपा शुक्ल स्वप्नाय शर्वरी त्रिंशद्ये मानुपा मासा पैत्रो मास स उच्यते। शतानि त्रीणि मासाना पण्या चाभ्यधिकानि तु । पैत्र सवत्सरो होप मानुषेण विभाव्यते ॥ ७॥ मानुपेणैव मानेन घर्षाणा यच्छत भवेत् । पितॄणा तानि घर्षाणि सरयातानि तु त्रीणि वै । दश च घधिका मासा पितृसख्येह कीर्तिता ॥८॥ लौकिकेन प्रमाणेन अब्दो यो मानुप स्मृत । एतद्दिव्यमहोपत्रमित्येपा वैदिकी श्रति दिव्ये रात्र्यहनी वर्ष प्रविभागस्तयो पुन । अहस्तु यदुदक् चैव रात्रिर्या दक्षिणायनम् एते रात्र्यहनी दिव्ये प्रसख्याते तयो पुन ॥१०॥ त्रिशद्यानि तु घर्षाणि दिव्यो मासस्तु स स्मृत ।
4 ऽध्यायः] * चतुर्युगमानवर्णनम् . मानुपाणां शतं यय दिच्यामासास्त्रयस्तु वै। तथैव सह संख्यातो दिव्य एप विधिः स्मृतः ॥११॥ श्रोणि घर्षशतान्येवं पष्टिवर्षस्तथैव च । दिव्यः सम्वत्सरोह्यप मानुषेण प्रकीर्तितः ॥ त्रीणि घर्षसहस्राणि मानुपेण प्रमाणतः । त्रिंशदन्यानि घर्षाणि स्मृतः सप्तपिवत्सरः ॥ नव यानि सहस्राणि घर्षाणां मानुपाणि च। धर्याणि नवतिश्चैव ध्रुवसम्वत्सरस्मृतः पत्रिंशत्तु सहस्राणि वर्षाणां मानुपाणि च । पष्टिश्चैव सहस्राणि संख्यातानि तु संख्यया। दिव्यं वर्षसहस्रन्तु प्राहुः संख्याचिदो जनाः ॥ १५ ॥ इत्येतदृषिमिगीतं दिव्यया संख्यया द्विजाः। दिव्येनैव प्रमाणेन युगसंख्या प्रकल्पिता ।। चत्वारि भारत वर्षे युगानि ऋषयोऽनुवन् । कृतोता द्वापरच फलिश्चैवं चतुर्युगम् ॥ पूर्व कृतयुगं नाम ततस्त्रेताभिधीयते । द्वापरञ्च कलिश्चैव युगानि परिकल्पयेत् ॥ चत्वार्याहुः सहस्राणि पर्पाणां तन् कृतं युगम् । तस्य तावच्छती सन्ध्या सन्ध्यांशश्च तथाविधः ॥ १६ ॥ इतरेषु ससन्ध्येषु ससन्ध्यांशेषु च त्रिषु । एकपादे निवर्तन्ते सहस्रणि शतानि च ॥ घेता त्रीणि सहस्राणि युगसंख्याविदो विदुः । तस्यापि त्रिशती सन्ध्या सन्ध्यांशः सन्ध्यया समः ॥२१॥ द्वे सहने द्वापरन्तु सन्ध्यांशी तु चतुःशतम् । सहरमेकं घर्षाणां फलिरेष प्रकीर्तितः । द्वे शते च तथान्ये च सन्ध्या सन्ध्यांशयोः स्मृते ॥२२॥ एपा द्वादशसाहस्री युगसंख्या तु संशिका ! मृतत्रेता द्वापरच फलिश्चेति चतुप्रयम् ॥ तत्र सम्बत्सराः सृष्टा मानुपास्तानियोधत 1 नियुतानिदश द्वे च पञ्च चैयार संप्यया अयाविशत्सहस्राणि हन्तं युगमयोच्यते ॥ २४ ॥ प्रयुतन्तु तथा पूर्ण वे चान्ये नियुते पुनः । पण्णपतिसहस्राणिसंग्या सानिव संख्यया । त्रेतायुगस्य संख्येपा मानुपेण तु संशिता । मष्टी शतसहस्राणि पर्याणां मानुपाणि तु ॥ चतुःषष्टिसहस्राणि घाणां द्वापर युगम् ॥ २६ ॥ - । * मत्स्यपुराणम् * [एकचत्वारिंशदधिकशततमो चत्वारि नियुतानि स्युर्वर्षाणि तु फलियुगम् । द्वात्रिशच्च तथान्यानि सहस्राणि तु संख्यया । एतत्कलियुगं प्रोक्तं मानुषेण प्रमाणत ॥ २७ ॥ एपा चतुर्युगावस्था मानुषेण प्रकीर्तिता। चतुर्युगस्य संख्याता सन्ध्या सन्ध्यांशकैः सह एपा चतुर्यगाख्या तु साधिका त्वेकसप्ततिः । कृतप्रेतादियुक्ता सा मनोरन्तरमुच्यते॥ मन्वन्तरस्यसंख्यातु मानुपेण नियोधत । एकत्रिंशत्तथाकोट्य संख्याता संख्ययाद्विजैः तथा शतसहस्राणिदशवान्यानि भागशः । सहस्राणि तु द्वात्रिंशच्छतान्यष्टाधिकानि व अशोतिश्चैव वर्षाणि मासाश्चैवाधिकास्तुपट्। मन्वन्तरस्यसंख्यैपामानुषेण प्रकीर्तिता दिव्येन च प्रमाणेन प्रवक्ष्याम्यन्तरं मनो. 1 सहस्त्राणा शतान्याहु सच वै परिसंख्यया चत्वारिंशत् सहस्राणि मनोरन्तरमुच्यते । मन्वन्तरस्य कालस्तु युगः सह प्रकीर्तितः एपा चतुर्युगारया तु साधिका ह्येकसप्ततिः । क्रमेण परिवृत्ता सा मनोरन्तरमुच्यते ॥ एतच्चतुर्दशगुणं कल्पमाहुस्तु तद्विदः । ततस्तु प्रलय. कृतन. स तु सप्रलयो महान् ॥ फल्पप्रमाणो द्विगुणो यथा भवति संख्यया। चतुर्युगाख्या व्याख्याता कृतंत्रेतायुगञ्चव त्रेतारसृष्टिं प्रवक्ष्यामि द्वापरं कलिमेव च । युगपत्समवेती द्वौ द्विधा वक्तुं न शक्यते ॥ क्रमागतं मयाप्येतत्तुभ्यं नोक्तं युगद्वयम् । ऋपिवंशप्रसङ्गेन व्याकुलत्वात्तथा क्रमात् ॥ नोक्तं त्रेतायुगे शेष तद्वक्ष्यामि निबोधत । अथ त्रेतायुगस्यादी मनु सप्तर्षयश्च ये। श्रौतस्मात त्रुवन्धमं ब्रह्मणा तु प्रचोदिताः ॥ ४० ॥ दाराग्निहोत्रसम्बन्धं ऋग्यजु सामसंहिता. 1 इत्यादिबहुलं श्रीतं धर्म सप्तर्पयोऽत्रुधन ॥ परम्परागत धर्म स्मार्तत्वाचारलक्षणम् । वर्णाश्रमावारयुक्त मनु स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥ सत्येन ब्रह्मचर्येण श्रुतेन तपसा तथा । तेषां सुतप्ततपसा मार्गेणानुक्रमेण ह ॥ ४३ ॥ सप्तर्षीणा मनोश्चैव आदी त्रेतायुगे तत ! अबुद्धिपूर्वकं तेन सकृत् पूर्वकमेव च ४४॥ अमिवृत्तास्तु ते मन्या दर्शनस्तारकादिमि । आदिकल्पेतुदेवानां प्रादुर्भूतास्तुतेस्चयम् प्रमाणेप्यथ सिद्धानामन्येपाच प्रवर्तते । मन्नयोगो व्यतीतेषु फल्पेप्पथ सहस्रशः ।
ऽध्यायः] * वेतायुगाचारवर्णनम् । ते मन्ना ये पुनस्तेषां प्रतिमायामुपस्थिताः ॥ ४६ ॥ वो यजूंपिसामानिमन्त्राचाथर्वणास्तु ये । सप्तर्षिभिश्चयेप्रोकाःस्मार्त्तन्तु मनुखवीत् त्रेतादी संहता वेदाः केवलं धर्मसेतवः । संरोधादायुपश्चैव व्यस्यन्ते द्वापरे च ते ॥ पयस्तपसा वेदानहोरात्रमधीयत ॥ ४८ ॥ अनादिनिधना दिव्याः पूर्व प्रोकाः स्वयम्भुवा । स्वधर्मसंवृताः साना यथा धर्म युगे युगे। विक्रियन्ते स्वधर्मान्तु वेढयादायथायुगम् ॥ ४६ ॥ आरम्भयना. क्षत्रहविर्यमा विशः स्मृताः । परिचारयज्ञाः शूद्राश्च जपयज्ञाश्च ब्राह्मणाः ततः समुदिता वर्णास्त्रेतायां धर्मशालिनः । क्रियावन्त.प्रजावन्त. समृद्धिसुपिनश्च ये ब्राह्मणेश्च विधीयन्ते क्षत्रियाः क्षत्रियैर्विशः । वैश्यान् शूद्रानुवर्तन्ते शूद्रान् परमनुग्रहान् शुभाः प्रकृनयस्तेषां धर्मा वर्गाश्रमायाः । सङ्कल्पितेन मनसा यावा या हस्तकर्मणा त्रेतायुगे ह्यविकले फारम्भः प्रसिध्यति ॥ ५३॥ आयूम यलं मेघा आरोग्यं धर्मशीलता । सर्वसाधारणं घेतदासीत्तायुगे तु वै॥ घर्णाश्रमव्यवस्थानमेषां ब्रह्मा तथाकरोत् । संहिताश्च तथा मन्ना भारोग्यधर्मशीलता संहिताश्च तथा मन्त्रा ऋषिभित्रह्मणः सुतः । यशः प्रवर्तितश्चैव तदा ह्येव तु देवतैः । याम. शुकर्जयश्चैव सर्वसाधनसंभृते. । विश्वसइभिस्तथा सार्द्ध देवेन्द्रेण महौजसा । स्वायम्भुवेन्तरे देवैस्ते यज्ञाः प्रायप्रवर्तिताः ॥ ५७ ॥ सत्यं जपस्तपोदानं पूर्व धर्मोऽयमुच्यते । यदा धर्मस्य हसते शारसा धर्मस्य पद्धने । जायन्ते च तदाशरामायुप्मन्तो महायला. । न्यस्तदण्डा महायोगायज्यानोरयादिनः पम्पत्रायताक्षाय पृयुवकया सुसंहताः । सिंहोरस्का महासत्या मत्तमातङ्गगामिनः महाधनुर्द्धराश्चय त्रेताया चक्रवर्तिनः । सर्वलक्षणपूर्गास्ते न्यग्रोधपरिमण्डला. ॥६॥ न्यग्रोधी तुस्मृतीयाहव्यामोन्यग्रोधउच्यने । व्यामेन नूयोयस्यअतउर्जन्तुदेदिनः समुफ्यो परीणादो न्यग्रोधपरिमण्डलः ॥६॥ परयो मणिमा निधिाप्योगजस्ता प्रोकानि सामानि पूर्व स्वायम्भुपेऽन्तरे ३६२ * मत्स्यपुराणम् * [द्विचत्वारिंशदधिकशततमो विष्णोरशेन जायन्ते पृथिव्या चक्रवर्तिन । मन्वन्तरेषु सर्वेषुह्यतीतानागतेषु वै॥६॥ भूतभव्यानि यानीह वर्तमानानि यानि च । त्रेतायुगानि तेष्वत्र जायन्ते चक्रवर्तिन ॥ भद्राणामानि तेषाञ्च विभाव्यन्ते महीक्षिताम् ।अत्यगुतानि चत्वारि बलधर्मसुख धनम् अन्योन्यस्याविरोधेन प्राप्यन्ते नृपते समम् । अर्थोधर्मश्च कामश्च यशोविजयएव च ऐश्वर्येणाणिमाद्येन प्रभुशक्तिवलान्विता । श्रुतेन तपसा चैव ऋषीस्तेऽभिभवन्ति हि यलेनाभिभवन्त्येते तेन दानवमानवान् । लक्षणश्चैव जायन्ते शरीरस्थैरमानुपै ॥६६॥ केशास्थिता ललाटेन जिह्वा च परिमार्जनी। श्यामप्रभाश्चतुर्दष्ट्रा श्रवसाश्चोर्ध्वरेतस ॥ ७० ॥ आजानुबाहवश्चैव तालहस्ती कृती। परिणाह णाभ्या सिंहस्कन्धाश्च मेधिन पादयोश्चक्रमत्स्यौ तु शङ्खपझे च हस्तयो । पञ्चाशीति सहस्राणि जीवन्तिह्यजरामया असमा गतयस्तेषा चतनश्चक्रवर्तिनाम् । अन्तरिक्षे समुद्रेषु पाताले पर्वतेषु च ॥७॥ इज्यादानन्तप सत्यन्त्रताधर्मास्तु वै स्मृता । तदा प्रवर्तते धर्मों वर्णाश्रमविभागश ॥ मर्यादास्थापनार्थञ्च दण्डनीति प्रवर्तते । हृष्टपुष्टा जना सर्वे आरोगा पूर्णमानसा ॥ एको वेदश्चतुष्पादस्त्रेतायान्तु विधि स्मृत । त्रीणि घर्पसहस्राणि जीवन्तेतत्रता प्रजा पुत्रपौत्रसमाकीर्णा म्रियन्ते च क्रमेण ता । एते त्रेतायुगे भावस्त्रेतासख्या निवोधत त्रेतायुगस्वभावेन सन्ध्यापादेन घर्तते । सभ्यापाद स्वभावाच्च योऽश पादेनतिष्ठति इति श्रीमत्स्यपुराणे त्रेतायुगनिधरणवर्णन नामैकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय । द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः त्रेतायुगे यज्ञविधिप्रवृत्तिः। श्य ऊचु। फथ त्रेतायुगमुसे यज्ञस्यासीत् प्रवर्तनम् । पूर्व स्वायम्भुवे स्वर्ग यथावत् प्राचीहि नः अन्तहिताया सन्ध्याया साद्धं कृतयुगेन हि । फालायाया प्रवृत्ताया प्रात्रेतायुगेतथा ऽध्यायः] * ग्रेतायुगेयज्ञप्रवृत्तिः औपधीषु च जातासु प्रवृत्ते वृष्टिसर्जने । प्रतिष्ठितायां वार्तायां ग्रामेषु च परेषु च ॥३ वर्णाश्रमप्रतिष्ठान्नं हत्या मन्त्रैश्च तैः पुनः ! संहितास्तु सुसंहृत्य कथं यज्ञः प्रचत्तितः एतच्छुत्वाप्रवीत् सूतः श्रूयतां तत्प्रबोदितम् ॥ ४॥ सूत उवाच । मन्त्रान्वै योजयित्वा तु इहामुत्र च कर्मसु । तथा विश्वभुगिन्द्रस्तु यज्ञं प्रापर्तयत्प्रभुः दैवतैः सह संहृत्य सर्वसाधनसंवृतः । तस्याश्वमेधे वितते समाजग्मुर्महर्षयः ॥ ४ ॥ यज्ञकर्मण्यवर्तन्त कर्मण्यग्रेतत्विजः । 'यमाने देवहोत्रे अग्नौ बहुविधं हपिः ॥७॥ सम्प्रतीतेषु देवेषु सामगेपु व मुस्वरम् । परिक्रान्तेपु लघुपु अध्वर्युपुस्पेषु च ॥ ८ ॥ आलब्धेषु च मध्ये तु तथा पशुगुणेषु वै । आहतेषु च देवेषु यज्ञभुक्षु ततस्तदा ॥ ६ ॥ य इन्द्रियात्मका देचा यज्ञभागभुजस्तु ते । तान्यजन्ति तदा देवाः कल्पादिपु भवन्ति ये अध्वर्युप्रेपकाले तु न्युत्थिता ऋश्यस्तथा ! महर्षयश्च तान् दृष्ट्वा दीनान् पशुगणांस्तदा विश्वभुजन्तेत्वपृच्छन् कथं यज्ञविधिस्तथ ॥११॥ अधर्मो बलवानेप हिंसा धर्मेप्सया तय ! नवः पशुविधिस्त्विष्टस्तव यज्ञे सुरोत्तम ॥ अधर्मा धर्मयाताय प्रारब्धः पशुभिस्त्वया । नायंधी ह्यधर्मोऽयं न हिंसाधर्मउच्यते आगमेन भवान् धर्म प्रकरोतु यदीच्छति ॥ १३ ॥ विधिदृष्टेन यज्ञेन धर्मेणाव्यसनेन तु । यज्ञयोजः सुरश्रेष्ठ! त्रिवर्गपरिमोपितः ॥१५॥ एषयज्ञो महानिन्द्रः स्वयम्भुविहित पुरा । एवं विश्वभुगिन्द्रस्तु ऋपिभिस्तत्वदर्शिभिः उक्तो न प्रति जग्राह मानमोहसमन्वितः ॥१५॥ तेषां विधादः सुमहान् जसे इन्द्रमहर्षिणाम् । जङ्गमः स्थावरैः केनयष्टव्यमिति चोच्यते ते नु सिन्ना विवादेन शक्त्या युक्ता महर्षयः । सन्धाय सममिन्द्रेण पप्रच्छुपचरंघसम् मृपय ऊचुः। मदाप्राश ! त्वया दृष्टः फर्य याविधिप! भोत्तानपादे प्रद्दि संशयं नस्तुद प्रभो! सूत उवाच। श्रुत्वा पाक्यं पसुस्तेषामविचार्ययलायलम् । वेदशास्त्रमनुस्मृत्य यस्तत्त्वमुवाच हा - * मत्स्यपुराणम् * [द्विचत्वारिंशदधिकशततमो यथोपनीतैर्यष्टव्यमिति होवाच पार्थिवः । यसव्यं पशुभिर्मेध्यैरथ मूलफलैरपि ॥ २० ॥ हिंसास्वभावो यज्ञस्य इति मे दर्शनागमः । तथैते भविता मन्त्रा हिंसालिङ्गामहर्षिभिः दीर्धेण तपसा युक्तस्तारकादिनिदर्शिभिः। तत्प्रमाणं मया चोक्तं तस्माच्छमितुमर्हथ । यदि प्रमाणं स्वान्येच मन्त्रवाक्यानि वो द्विजाः!। तथा प्रवर्त्ततां यज्ञो ह्यन्यथा मा नृतं वचः ॥ २३ ।। एवं कृतोत्तरास्ते तु युद्ध्यात्मानं ततोधिया । अवश्यम्भाविनं दृष्ट्वा तमधोह्यशपस्तदा इत्युक्तमात्रो नृपतिः प्रविवेश रसातलम् । ऊर्ध्वचारी नृपो भूत्वा रसातलचरोऽभवत् घसुधातलचारी तु तेन चाक्येन सोऽभवत् । धर्माणां संशयच्छेत्ताराजा वसुधरोगतः तस्मानवाच्यो ोकेन बहुज्ञेनापि संशयः । बहुधारस्य धर्मस्य सूक्ष्मा दुरनुगागति. ॥ तस्मान्न निश्चयाद्वक्तुं धर्मः शक्तो हिके नचित् । देवानृपीनुपादाय स्वायम्भुवमृतेमनुम् तस्मान्न हिंसा यशेस्याद्यदुक्तमृपिभि.पुरा । ऋपिकोटिसहस्राणि स्वस्तपोभिर्दिवङ्गताः तस्मान्न हिंसायज्ञञ्च प्रशंसन्ति महर्षयः । उञ्छो मूलं फलं शाकमुदपात्रे तपोधनाः एतद्दत्वा विभवतः स्वर्गलोके प्रतिष्टिताः । अद्रोहश्चाप्यलोभश्च दमोभूतदया शमः ॥३१ ब्रह्मचयं तपः शौचमनुक्रोशं क्षमा धृतिः । सनातनस्य धर्मस्य मूलमेव दुरासदम् ॥३२ द्रव्यमन्त्रात्मको यज्ञस्तपश्च समतात्मकम् । यज्ञैश्च देवानाप्नोति चैराजं तपसा पुनः॥ ब्रह्मण. कर्मसंन्यासाद् वैराग्यात्प्ररनेर्लयम् । ज्ञानात् प्रामोति कैवल्यं पञ्चैता गतयः स्मृताः ॥ ३४॥ एवं विवादः सुमहान् यास्यासीत् प्रवर्तते । ऋषीणां देवतानाञ्च पूर्व स्वायम्भुवेऽन्तरे ततस्ते ऋषयो दृष्ट्वा हृतं धर्म बलेन ते । पसोसिमनादृत्य जग्मुस्ते चै यथागतम् ॥ गतेषु पिसद्धेषु देवायामवाप्नुयुः । श्रूयन्ते हि तपःसिद्धा ग्रामक्षत्रादयो नृपाः ॥३७ प्रिययतोत्तानपादो ध्रुयो मेधातिथिर्वसुः । सुधामा चिरजाश्चय शड्सपाद्राजसस्तथा ।। प्राचीनयहिः पर्नन्यो हविर्धानादयो नृपाः । एते चान्ये च यहयस्ते तपोभिर्दिवङ्गताः राजर्पयो महात्मानोयेषांकीतिः प्रतिष्टिताः । तस्माद्विशिष्यते यशात्तप.सर्वस्तुकारणः प्रामणा तपसा सृष्टं जगद्विभ्वमिदं पुरा । तस्मानाप्नोति तात्तपो मूलमिदं स्मृतम ।
ऽध्यायः ] * द्वापरयुगविवरणवर्णनम् यज्ञप्रवर्तनं ह्येवमासीत् खायम्भुवेऽन्तरे । तदा प्रभृति यज्ञोऽयं युगः सार्द्ध प्रवर्तितः॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे मन्वन्तरानुकल्पे देवर्षि संवादे प्रेतायुगेयज्ञप्रवृत्तिवर्णनं नाम द्विचत्वारिंशदुत्तरशततमोऽध्यायः । ॥ त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः द्वापरयुग विवरणवर्णनम् । सूत उवाच। अत उद्ध्वं प्रवक्ष्यामि द्वापरस्य विधि पुनः । तर त्रेतायुगे क्षीणे द्वापरं प्रतिपद्यते ।। द्वापरादी प्रजानान्तु सिद्धिस्त्रेतायुगे तु या । परिवृत्ते युगे तस्मिंस्ततः सावप्रणश्यति तत. प्रवर्तिते तासा प्रजानां द्वापर पुनः । लोभोधृतिर्वणिग्युद्धं तत्त्वानामविनिश्चयः प्रध्वंसश्चैव वर्णाना कर्मणान्तु विपर्ययः । यात्रा यधापरोदण्डोमानोदपोऽक्षमावलम् तथा रजस्तोमोभूयः प्रवृत्ते द्वापरे पुनः । आद्यकृतेनाधर्मोऽस्ति स त्रेतायां प्रवर्तितः द्वापर व्याकुलो भूत्वा प्रणश्यति कली पुनः । वर्णानां द्वापरधर्माःसङ्कीर्यन्ते तथाश्रमाः द्वधमुत्पद्यते चेय युगे तस्मिनश्रुतिस्मृती । द्विधाधुतिःस्मृतिश्चैवनिश्चयो नाधिगम्यते अनिश्चयायगमनाद्धर्मतत्त्व न विद्यते । धर्मतत्त्वे ह्यविज्ञाते मतिभेदस्तु जायते ॥८॥ परस्परं विमिन्नास्ते दृष्टीना विभ्रमेण तु । अतो दृष्टिविभिन्नस्तः कृतमत्याकुलन्त्विदम् ॥६॥ एको वेदश्चतुप्पादः संहृत्य तु पुनः पुनः । संक्षेपादायुपश्चैव व्यस्यते द्वापरेयिह ॥ वेदश्चकश्चतुर्धा तु व्यस्यते द्वापरादिषु । ऋषिपुत्रः पुनर्वेदा भिद्यन्तं दृष्टिविनमः ॥ ते तु ब्राह्मणविन्यासः स्वरक्रमविपर्ययः । संहृता ऋग्यजु:साम्नां सहितास्तैमहर्षिभिः ॥१२॥ सामान्यावरताच्चैव दृष्टिभिन्नः कवित् कचित् ।
* मत्स्यपुराणम् * [त्रिचत्वारिंशदधिकशततमो ब्राह्मणं कल्पसूत्राणि भाष्यविद्यास्तथैव च ॥१३॥ अन्ये तु प्रस्थितास्तान्वै केचित्तान् प्रत्यवस्थिताः । द्वापरेषु प्रवर्तन्ते भिन्नार्थस्तैः स्वदर्शन. ॥१४॥ एकमाध्वर्यवं पूर्वमासीद्वैधन्तु तत् पुन । सामान्यविपरीतार्थः कृतंशस्त्राकुलन्त्विदम् आध्वर्यवञ्च प्रस्थानहुधा व्याकुलीतम् । तथैवाथर्वणां साम्नां विकल्पै.स्वस्यसंक्षयः व्याकुलो द्वापरेप्वर्थ. क्रियते भिन्नदर्शनः । द्वापर सन्निवृत्ते ते वेदा नश्यन्ति वै कली तेषां विपर्ययोत्पन्ना भवन्ति द्वापरे पुन. । अदृष्टिमरणं चैव तथैव व्याध्युपदया. ॥१८ घानन कर्मभिर्दु.सैनिदो जायते ततः । निर्वेदाजायते तेषां दुःखमोक्षविवारणा ॥ विचारणायां वैराग्यं वैराग्याहोपदर्शनम् । दोपाणा दर्शनाच्चैव ज्ञानोत्पत्तिस्तुजायते तेपा मेधाविनां पूर्व मत्र्ये स्वायम्भुवेऽन्तरे । उत्पत्स्यन्तीहशास्त्राणांद्वापरे परिपन्थिनः आयुर्वेदविकरपाश्च अङ्गानांज्योतिपस्यच । अर्थशास्त्रयिकल्पाश्च हेतुशास्त्रविकरपनम् प्रक्रियाकल्पसूत्राणांभाष्यविद्याविकत्थनम्।स्मृतिशास्त्रप्रभेदाचप्रस्थानानिपृथक्पृथक् द्वापरेप्चभिवर्तन्ते मतिभेदास्तथा नृणाम् । मनसा कर्मणा घाचा कृच्छ्राद्वार्ता प्रसिध्यति ॥२४॥ द्वापर सर्वभूतानां काल क्लेशपरः स्मृत । लोभो धृतिर्मणिग्युद्धन्तत्त्वानामविनिश्चयः वेदशास्त्रप्रणयनं वर्णानां सङ्करस्तथा । वर्णाश्रमपरिश्चंसः कामद्धेपो तथैव च ॥२६॥ पूर्ण वर्षसहस्र द्वे परमायुस्तदा नृणाम् । निशेपे द्वापरे तस्मिस्तस्य सन्ध्या तु पादतः गुणहीनास्तु तिष्ठन्ति धर्मस्य द्वापरस्य तु । तथैव सन्ध्या पादेनभशस्तस्यांप्रतिष्ठितः द्वापरम्य तु पर्येपा पुष्यस्य च नियोधत । द्वापरस्यांशशेपे तु प्रतिपत्तिः फलेरथ ॥२६ क्षिास्तेयानृतं माया दम्मश्चैव तपस्विनाम् । एने स्वभावा. पुष्यम्य साधयन्ति च ता. प्रजाः ॥३०॥ एप धर्म स्मृत लोधर्मधपरिहीयते । मनसाकर्मणावाचावार्ताःसिध्यन्ति यानया फलिः प्रमारको रोग सततं चापि शुद्वयम् । अनावृष्टिमयप देशानाञ्च विपर्ययः॥ न प्रमाणे स्पिति हम्निपुष्येघोरेयुगेकली । गर्मस्याम्रियतेकश्चिद् यौवनस्थस्तथापरः
ऽध्यायः]
* कलियुगविवरणवर्णनम् *
स्थाचर्य मध्यकौमारे नियन्ते च फली प्रजाः ।
अल्पतेजोघलाः पापा महाकोपा ह्यधार्मिकाः ॥३४॥
अनतव्रतलुब्धाश्च पुप्ये चैव प्रजा. स्थिताः । दुरिऐ१रधीतैश्च दुराचारैर्दुरागमे. ॥३५
विप्राणा कर्मदोस्तै. प्रजानां जायते भयम् ।
हिंसा मानस्तर्ध्याच क्रोधोऽसूयाऽक्षमाऽधृतिः ॥३६॥
पुप्ये भवन्तिजन्तुनालोमोमोहश्चसर्वश । सइक्षोभोजायतेऽत्यर्थकलिमासानयुगम्
नाधीयन्ते तथा वेदान्यजन्ते वै द्विजातयः । उत्सीदन्तियथाववैश्यै सार्द्धन्तुक्षत्रियाः
शूद्राणां मन्त्रयोनिस्तु सम्बन्धो ब्राह्मणै. सह । भवतीहकलौतस्मिन्शयनासनभोजनः
राजान शूदभूयिष्ठा पापण्डानांप्रवृत्तय । कापायिणश्वनिष्कच्छास्तथाकापालिनश्चह
ये चान्ये देवयतिनस्तथा ये धर्मदूपका' । दिव्यवृत्ताश्च ये केविवृत्त्यर्थं श्रुतिलिङ्गनः
एवम्विधाश्च ये केचिद्भवन्तीह कलौ युगे । अधीयते तदा वेदान् शूद्राधर्मार्थकोविदाः
यजन्ति ह्यश्वमेधैस्तु राजानः शूद्रयोनयः । स्त्रीयालगोवधं कृत्वा हत्वा चैव परस्परम्
उपहृत्य तथान्योन्यं साधयन्ति तदा प्रजाः । दु खप्रचुरताल्पायुर्देशोत्साद.सरोगता ॥
अधर्माभिनिवृत्तत्वं फलोवृत्त कलौस्मृतम् । भ्रूणहत्या प्रजानाञ्च तथा ह्येवं प्रवर्त्तते ॥
तस्मादायुर्यलं रूपं प्रहीयन्ते कलीयुगे । दुःस्वेनाभिप्लुतानां च परमायु शतं नृणाम् ॥
भूत्वा च न भवन्तीह वेदा कलियुगेऽसिला । उत्सीदन्ते तथा यज्ञाः केवलं धर्महेतवः
एपाफलियुगावस्थासन्ध्यांशीतु नियोधत । युगेयुगे तु हीयन्तेत्रीस्त्रीन् पादांथसिद्धयः
युगस्वभावा.सन्ध्यासुअवतिष्ठन्ति पादत । सन्ध्यास्वभावा.स्वांशेपुपादेनवायतस्थिरे
एवं सन्ध्यांशकेकाले सम्प्राप्त युगान्तिके। तेपामर्मिणां शास्ता भृगुणाञ्च कुले स्थितः
गोत्रण ये चन्द्रमसे नाम्नापमतिरच्यते । कलिसन्ध्यांशभागेषु मनो.स्वायम्भुवेऽन्तरे
समास्त्रिशत्तुसम्पूर्णाःपर्यटन्वैपसुन्धराम् । अस्त्रकर्मा स वै सेनाहस्त्यश्वरथसङ्घलाम्
प्रगृहीतायुधैविप्रैः शतशोऽथ सहस्रश । स तदातै परिवृतोम्लेच्छान् सान्निजमिवान्
स हत्या सर्वशश्चय राजानः शृदयोनयः ॥ ५४ ॥
पापण्डान् स तदा सर्वानि.शेगनकरोत् प्रभु ॥ ५५ ॥
* मत्स्यपुराणम् * [ त्रिचत्वादिधिकशततमो अधार्मिकाश्चयेकेचित्तानसर्घान् हन्तिसर्वशः । श्रौदीच्यान्मध्यदेशांश्चपार्यतीयांस्तथैवच प्राच्यान् प्रतीच्यांश्च तथा विन्ध्यपृष्ठापरान्तिकान् । तथैव दाक्षिणात्यांश्च द्रविडान् सिंहलैः सह ॥ ५७ ॥ गन्धारान् पारदांश्चैव पहचान यवनान् शकान् । तुषारान् पर्वशान् श्वेतान् पुलिन्दान् वर्वरान् श्यसान्॥ ५८ ॥ लम्पकानान्धकांश्चापि चोरजातींस्तथैव च । प्रवृत्तचक्रो बलवान्शूद्राणामन्तकृद् बभी विद्राव्य सर्वभूतानि चचार वसुधामिमाम् । मानवस्य तु वंशे तु नृदेवस्येहजशिवान् ॥ पूर्वजन्मनि विष्णुश्च प्रमतिर्नाम वीर्यवान् । स्वतः स वै चन्द्रमसः पूर्व कलियुगे प्रभु द्वात्रिंशेऽभ्युदितेवर्षे प्रकान्तो विंशतिसमा.। निजम्नेसर्वभूतानिमानुपाण्येवसर्वशः ॥ कृत्वाचीजावशिष्टान्तांपृथ्वीफ्रेणकर्मणा । परस्परनिमित्तेन कालेनाकस्मिकेन च ॥६३॥ सस्थिता सह सायासे सेना प्रमतिना सह । गङ्गायमुनयोर्मध्येसिद्धिप्राप्ता समाधिना ततस्तेषु प्रनष्टेषु सन्ध्याशे क्रूरकर्मषु । उत्साद्यपार्थिवान् सर्वान् तेप्वतीतेषु वे तदा ततः सन्ध्यांशके काले संप्राप्ते च युगान्तके । स्थिताः स्वत्पावशिष्टासु प्रजास्विह कचित् क्वचित् ॥ ६६ ॥ स्वाप्रदानास्तथातेवै लोभाविष्टास्तुवृन्दश. । उपहिंसन्ति चान्योन्यंप्रलुम्पन्तिपरस्परम् अराजके युगाशे तु सड्झये समुपस्थिते । प्रजास्ता वै तदा सर्वाः परस्परभयादिता. ॥ व्याकुलास्ताः परावृत्तास्त्यज्य देवगृहाणि तु । स्थान स्थान प्राणानवेक्षन्तो निष्कारुण्यात् सुदुःखिता. ॥६६॥ नष्टे श्रौतस्मृते धर्मे कामक्रोधवशानुगाः । निर्मर्यादा निरानन्दा नि.स्नेहानिरपनपाः ॥ नष्टे धर्म प्रतिहता हस्वकाः पञ्चविंशकाः । हित्वा दारांश्च पुत्रांश्च विपादन्याकुलप्रजाः अनावृष्टिहतास्तेवै पार्तामुत्सृज्यदुःसिताः । चीरकृष्णाजिनधरा निकुद्धानिष्परिग्रहाः पर्णाधमपरिभ्रष्टा. सकरट्वोरमास्थिताः । एवं फटमनुप्राप्ता घल्पशेषाः प्रजास्ततः ॥ जन्तवश्च क्षुधाविष्टा दुःपानिर्येदमागमन् । संश्रयन्तिच देशांस्तांश्चयत् परिवर्तनाः॥ ततः प्रजास्तु ताः सर्या मांसाहारा भवन्ति हि
--२
ऽध्यायः]
# कलियुगविवरणवर्णनम् *
मृगान् पराहान् वृपभान्ये चान्ये घनचारिणः ॥ १५॥
भक्ष्यांश्चैवाप्यभक्ष्यांश्च सर्वांस्तान् भक्षयन्ति ताः।
समुद्रं संनिता यास्तु नदीश्चैव प्रजास्तु ताः ॥ ७६ ॥
तेऽपि मत्स्यान हरन्तीह आहारार्थ च सर्वशः । अभक्ष्याहारदोपेण एकवर्णगता प्रजाः
यथा कृतयुगे पूर्वमेकवर्णमभूत्किल । तथा कलियुगस्यान्ते शूद्रीभूताः प्रजास्तथा ॥
एवं वर्षशतं पूर्ण दिव्यं तेषां न्यवर्त्तत । पत्रिंशच सहस्राणि मानुपाणि तु तानि वै ।।
अथ दीर्पण कालेन पक्षिणः पशवस्तथा । मत्स्याश्चैव हताः सर्वैः क्षुधाविष्टश्चसर्वशः
नि शेषेप्वय सर्वेषु मत्स्यपक्षिपशुप्वय । सन्ध्यांशे प्रतिपन्नेतु निःशेपास्तु तदा कृताः ॥
ततः प्रजास्तु सम्भूय कन्दमूलमथोऽखनन् । फलमूलाशनाः सर्वे अनिकेतास्तथैव च ॥
घल्कलान्यथ घासांसि अधःशय्याश्च सर्वशः। परिग्रहो न तेष्वस्ति धनशुद्धिमवाप्नुयुः
एवंक्षयंगमिष्यन्ति ह्यल्पशिष्टा-प्रजास्तदा । तासामल्पावशिष्टानामाहाराद् वृद्धिरिप्यते
एवं वर्षशतं दिव्यं सन्ध्यांशस्तस्य घर्त्तते । ततो घर्पसहस्रान्ते अल्पशिष्टाः स्त्रियःसुताः
मिथुनानितुताः सर्वा हान्योन्यंसंप्रजज्ञिरे । ततस्तास्तु नियन्तेचे पूर्वोत्पन्ना-प्रजास्तुयाः
जातमानेप्वपत्येषु ततः कृतमवर्तत । यथा स्वर्गे शरीराणि नरके चैव देहिनाम् ॥७॥
उपभोगसमर्थानि एवं कृतयुगादिपु । एवं कृतस्य सन्तानः कलेश्चैव क्षयस्तथा ॥८॥
विचारणात्तु निर्वेदः साम्यावस्थात्मना तथा।
ततश्चैवात्मसम्बोधः सम्बोधाद्धर्मशीलता ।। ८६ ॥
फलिशिप्पु तेष्वेवं जायन्ते पूर्ववत् प्रजाः।मायिनोऽर्थस्य च वलात्ततः कृतमवर्तत ॥
अतीतानागतानि स्युर्यानि मन्वन्तरेप्विह !! एतेयुगस्यमावास्तु मयोकास्तु समासतः
विस्तरेणानुपूर्व्याच नमस्कृत्य स्वयम्भुपे । प्रवृत्तेतु ततस्तस्मिन् पुनः कृतयुगे तु वै ।
उत्पन्नाः फलिशिप्रेषु प्रजाः फार्तयुगास्तथा । तिष्ठन्ति चेह ये सिद्धा अदृष्टा विहरन्तिच
सह सप्तर्षिभिर्य तु तत्र ये च व्यवस्थिताः । ब्रह्मक्षाविशः पृदा पीजार्ये य इह स्मृताः
तेषां सप्तर्षयो धर्म कथयन्तीह तेषु च । घर्णाश्रमानारयुतं श्रीतस्मातविधानतः ।।
एवं तेषु नियावत्मु प्रवर्तन्तीह वै एन्ते ॥ १६ ॥
* मत्स्यपुराणम् * । त्रिचत्वारिंशदधिकशततमो अधार्मिकाधयेकेचित्तान्सर्वान् हन्तिसर्वशः । औदीच्यामध्यदेशांश्चपार्वतीयांस्तथैवच प्राच्यान् प्रतीच्यांश्च तथा विन्ध्यपृष्ठापरान्तिकान् । तथैव दाक्षिणात्यांश्च द्रविडान सिंहलैः सह ॥ ५७ ॥ गन्धारान् पारदाश्वैव पहवान् यवनान् शकान् । तुपारान् वर्यशान् श्वेतान् पुलिन्दान् वर्वरान् श्वसान्॥ ५८ ॥ लम्पकानान्धकांश्चापि चोरजातीस्तथैव च । प्रवृत्तवक्रो बलवान्भूदाणामन्तकृद् यभी विद्राव्य सर्वभूतानि चचार घसुधामिमाम् । मानवस्य तु वंशे तु नृदेवस्येहजशिवान् ॥ पूर्वजन्मनि विष्णुश्च प्रमतिर्नाम वीर्यवान् । स्वतः स वै चन्द्रमसः पूर्वं कलियुगे प्रभुः द्वात्रिंशेऽभ्युदितेवर्षे प्रकान्तो विंशतिसमाः । निजध्नेसर्वभूतानिमानुपाण्येवसर्वशः ।। कृत्वावीजावशिष्टान्तांपृथ्वीरेणकर्मणा । परस्परनिमित्तेन कालेनाकस्मिकेन च ॥६३॥ संस्थिता सह सायासे सेना प्रमतिना सह । गङ्गायमुनयोर्मध्येसिद्धिप्राप्ताःसमाधिना ततस्तेषु प्रनप्टेषु सन्ध्यांशे क्रूरकर्मषु । उत्साध पार्थिवान् सर्वान् तेप्वतीतेषु वै तदा ततः सन्ध्यांशके काले संप्राप्ते च युगान्तके । स्थिताः स्वल्पावशिष्टासु प्रजास्विह क्वचित् क्वचित् ॥ ६६ ॥ स्वाप्रदानास्तथातेवै लोभाविष्टास्तुवृन्दशः । उपहिंसन्ति चान्योन्यंप्रलुम्पन्तिपरस्परम् अराजके युगांशे तु सक्षये समुपस्थिते । प्रजास्ता वै तदा सर्वाः परस्परभयार्दिताः ॥ व्याकुलास्ताः परावृत्तास्त्यज्य देवगृहाणि तु । स्थान् स्थान प्राणानवेक्षन्तो निप्कारुण्यात् सुदुःसिताः ॥ ६॥ नटे श्रीतस्मृते धर्मे कामक्रोधवशानुगाः । निर्मर्यादा निरानन्दा निःस्नेहानिरपत्रपाः॥ नटे धर्म प्रतिहता हस्वकाः पञ्चविंशकाः । हित्वा दारांश्च पुत्रांश्च विषादव्याकुलप्रजाः अनावृष्टिहतास्तेवै पार्तामुत्सृज्यदुःसिताः । चीरकृष्णाजिनधरा निष्कुद्धानिप्परिग्रहाः घर्णाश्रमपरिभ्रष्टाः सङ्करवोरमास्थिताः । एवं कष्टमनुप्राप्ता ह्यल्पशेषाः प्रजास्ततः ॥ जन्तवश्च क्षुधाविष्टा दुःपानिर्वेदमागमन् । संश्रयन्तिच देशांस्तांश्चक्रयत् परिवर्तनाः॥ ततः प्रजास्तु ताः सर्या मांसाहारा भवन्ति हि
ऽध्यायः]
* कलियुगविवरणवर्णनम् *
मृगान् घराहान् वृपमान्ये चान्ये धनवारिणः ॥ ५॥
भक्ष्यांश्चैवाप्यमक्ष्यांश्च सर्वांस्तान् भक्षयन्ति ताः।
समुद्रं संश्रिता यास्तु नदींश्चैव प्रजास्नु ताः ॥ ७६ ॥
तेऽपि मत्स्यान हरन्तीह आहारार्थं च सर्वशः । अभक्ष्याहारदोषेण एकवर्णगता प्रजाः
यथा कृतयुगे पूर्वमेकवर्णमभूत्किल । तथा कलियुगस्यान्ते शूद्रीभूताः प्रजास्तथा ।
एवं घर्षशतं पूर्ण दिव्यं तेषां न्यवर्त्तत । पत्रिंशच सहस्राणि मानुपाणि तु तानि च ॥
अथ दीघेण कालेन पक्षिणः पशवस्तथा । मत्स्याश्चैव हताः सर्वैः क्षुधाविष्टैश्वसर्वशः
नि शेषेप्यथ सर्वेषु मत्स्यपक्षिपशुप्पथ । सन्ध्यांशे प्रतिपन्नेतु निःशेषास्तु तदा वृताः॥
ततः प्रजास्तु सम्भूय फन्दमूलमयोऽसनन् । फलमूलाशनाः सर्वे अनिकेतास्तथैव च ॥
घल्कलान्यथ घासांसि अधःशय्याश्च सर्वशः। परिग्रहो न तेष्वस्ति धनशुद्धिमवाप्नुयुः
एवंक्षयंगमिष्यन्ति हाल्पशिष्टा प्रजास्तदा । तासामल्पावशिष्टानामाहारान वृद्धिरिप्यते
एवं घर्षशतं दिव्यं सन्ध्यांशस्तस्य घर्तते । ततो वर्षसहस्रान्ते अल्पशिष्टाः स्त्रियःसुताः
मिथुनानितुताः सर्वा ह्यन्योन्यसंप्रजशिरे । ततस्तास्तु नियन्तेयै पूर्वोत्पन्ना-प्रजास्तुयाः
जातमात्रेप्यपत्येपु ततः कृतमपर्तत । यथा स्वर्ग शरीराणि नरके चैव देहिनाम् ॥७॥
उपभोगसमर्थानि एवं कृतयुगादिषु । एवं रतस्य सन्तानः कलेश्चैव क्षयस्तथा ॥८॥
विचारणात्तु निर्वेदः साम्यावस्थात्मना तथा।
ततश्चैवात्मसम्योध' सम्योधाद्धर्मशीलता ॥ ८ ॥
फलिशिष्टेपु तेप्येवं जायन्ते पूर्ववत प्रजाः। मायिनोऽर्थस्य च बलात्ततः स्तमवर्तत ॥
अतीतानागतानि स्युर्यानि मन्वन्तरेप्विह !! एनेयुगस्यमावास्तु मयोक्तास्तु समासतः
विस्तरेणानुपूpथ नमस्कृत्य स्वयम्मुवे । प्रवृत्तेदु ततस्तस्मिन् पुनः मृतयुगे तु घे ॥
उत्पन्नाः फलिशिरेषु प्रजाः फायुगास्तथा । तिष्ठन्ति चेद ये सिद्धा मा विहरन्तिच
सह सप्तरिमियं तु तत्र ये च व्यवस्थिताः । प्रदक्षत्रविशः वृदा धीजायें य इद्द स्मृताः
तेगं समर्पयो धर्म फययन्तीह तेषु च । घर्णाश्रमाचारयुतं श्रौतस्मातविधानतः ।।
एवं तेपु क्रियापदमु प्रवन्तीह ये एते ॥ १६ ॥
३७० * मत्स्यपुराणम् * [त्रिचत्वारिंशदधिकशततमो श्रौतस्मार्गस्थितानान्तु धर्म सप्तर्पिदर्शिते। ते तु धर्मध्यवस्था) तिष्ठन्तीह उते युगे मन्वन्तराधिकारेषु तिष्ठन्ति ऋपयस्तु ते । यथा दावप्रदग्धेषु तृणेष्वेवापनक्षितौ ६८ बनाना प्रथमं दृष्ट्वा तेषा मूलेषु सम्भवः । एवं युगायुगानां वै सन्तानस्तु परस्परम् ॥ प्रवर्तते ह्यविच्छेदाद्यावन्मन्वन्तरक्षयः । सुखमायुर्वलं रूपं धर्मार्थों काम एव च ॥१०० युगेष्वेतानि हीयन्ते त्रय. पादाः क्रमेण तु । इत्येप. प्रतिसन्धिः कीर्तितस्तु मया द्विजाः!॥ १०१ ॥ चतुर्युगाणा सर्वेषामेतदेव प्रसाधनम् । एषा चतुर्युगाणान्तु गणिता ोकसप्ततिः ॥ १०२ ॥ क्रमेण परिवृत्तास्ता मनोरन्तरमुच्यते। युगाख्यासु तु सर्वासु भवतीह यदा च यत् ॥ तदेव च तदन्यासु पुनस्तद्वै यथाक्रमम् । सर्गे सर्गे यथा भेदा ह्युत्पद्यन्ते तथैव च १० १०४ चतुर्दशतु तावन्तो शेया मन्वन्तरेप्चिह । आसुरी यातुधानी च पैशाची यक्षराक्षसी ॥ युगे युगे तदा काले प्रजा जायन्ति ता.शृणु । यथाकल्पं युगै. साद्धं भवन्ते तुल्यलक्षणा । इत्येतलक्षणं प्रोक्तं युगाना वै यथाक्रमम् ॥ १०६ ॥ मन्वन्तराणां परिवर्तनानि चिरप्रवृत्तातियुगस्वभावात् । क्षण न सतिष्ठति जीवलोक. क्षयोदयाभ्यां परिवर्त्तमानः ॥ १०७॥ एते युगस्यभाचा पः परिफ्रान्ता यथाक्रमम् । मन्वन्तराणि यान्यस्मिन् फल्पे पक्ष्यामि तानि व ॥ १०८ ॥ इति श्री मत्स्पमहापुराणे मन्वन्तरानुफीर्त्तनो नाम त्रिचत्वारिशदधिकशततमोऽध्यायः ।
चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः विस्तारान्मन्यन्तरस्थितिवर्णनम् । सूत उवाच। मन्यन्तराणि यानि स्युः कल्पे करपे चतुर्दश । व्यतीतानागतानि स्युर्यानि मन्यन्तरेप्विह ॥ १ ॥ विस्तरेणानुपूर्व्याच स्थिति पक्ष्ये युगे युगे। तस्मिन् युगे च सम्भूतियांसा यावश्च जीवितम् ॥ २ ॥ युगमात्रन्तु जीवन्ति न्यून तम्माद्वयेन च । चतुर्दशनु तापन्तो झया मन्वन्तरेधिद्द मनुष्याणां पट्टानाच पक्षिणा स्थायरैः सह । तेषामायुरुपान्तं युगधर्मेषु सर्वशः ॥४॥ । तवायुः परिफ्रान्त युगधर्मेषु सर्वश. ! अम्धितिश फलां दृष्ट्वा भूतानां मानुषे तथा ॥ परमायुः शतन्त्वतन्मानुपाणां फली स्मृतम् । देवासुरमनुप्याय यक्षगन्धर्वराक्षसाः ॥ परिणाहोचाये तुल्या जायन्त। एते युगे। पपणपत्पङ्गलोरसेधो भष्टाना देवयोनिनाम् ॥ ७॥ नपाद्गुलप्रमाणेन निप्पनेन तथाष्टकम् । एनन् स्वाभाविकं तेपा प्रमाणमधिपुर्यताम् ॥ मनुष्या यतमानास्तु युगसन्ध्यांशकेप्विइ । देवासुप्रमाणन्तु सप्तसामाङ्गलं प्रमात् ॥६॥ चतुराशीतिगर्धय फन्निजरलः स्मृतम् । पापाढतन्नमस्तको नपतालो भवेत्तु या १० मंहत्याजानुयाय देवतेमिपूज्यने । गया दलिनाञ्चैप मलियापरात्मनाम् ॥१॥ प्रमेणतेन पिमेये हासदी युगे युगे। पट्समस्यद्गलोरमेयः पशुगपदी भयेत् ॥१२॥ मगलानामटशनमुसंधो इम्तिनां स्मृतः । मङ्गलानां सदनन्तु द्विवन्यायिादलम् । शतामगुलानान्तु एन्सेप. शागिनाम्पः । मानुगम्य शरीरम्य सनिपेराग्नु याहरा। महाजन्तु देपाना हरयनेऽन्वपदर्शनात् । युपातिशयमयुको देपानां पाप उसे ।
३७२ * मत्स्यपुराणम् * [चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमों तथा नातिशयश्चैव मानुषःकाय उच्यते । इत्येव हि परिक्रान्ताभाषा ये दिव्यमानुपा. पशूनां पक्षिणाञ्चैव स्थावराणां च सर्वशः। गावोऽजाश्चाश्च विज्ञेया हस्तिनः पक्षिणो मृगाः ॥ १७ ॥ उपयुक्ताः क्रियास्वेते यशियास्त्विह सर्वशः । यथाक्रमोपभोगाश्च देवानां पशुमूर्तयः । तेपा रूपानुरूपैश्च प्रमाणैः स्थिरजङ्गमाः । मनोजैस्तत्र तैभांगैः सुखिनो झुपपेदिरे ॥१६ अथ सन्त. प्रवक्ष्यामि साधूनथ ततश्च वै । ब्राह्मणाः श्रुतिशब्दाश्च देवानां पशुमूर्तयः ॥ सपूज्य ब्रह्मणा हान्तस्तेन सन्तः प्रचक्षते । सामान्येषु च धर्मेषु तथा वैशेषिकेषु च ॥ ब्रह्मक्षत्रविशो युक्ताः श्रौतस्मातेन कर्मणा । वर्णाश्रमेषु युक्तस्य सुखोदकस्य स्वर्गता श्रीतस्मात्ततॊ हि यो धर्मो ज्ञानधर्मः स उच्यते । दिव्याना साधनात् साधुर्ब्रह्मचारीगुरोहितः ॥ २३ ॥ कारणात् साधनाच्चैव गृहस्थ.साधुरुच्यते । तपसश्च तथाऽरण्येसाधुखानसः स्मृतः- यतमानो यतिः साधुः स्मृतोयोगस्य साधनात् । धर्मो धर्मगतिः प्रोक्त' शब्दो ह्येप क्रियात्मकः ॥ २५॥ कुशलाकुशलो चैव धर्माधर्मों अधीत् प्रभुः । अथ देवाश्च पितर. ऋपयश्चैध मानुपाः ।। अयं धर्मो ह्यय नेति त्रुघते मौनमूर्तिना । धर्मेति धारणे धातुर्महत्ये.चैघ उच्यते ॥२७ आधारणे महत्त्वे चा धर्म सतु निरच्यते । तत्रेष्टप्रापको धार्म आचार्यरुपदिश्यते ॥ अधर्मश्चानिएफल आचायनोपदिश्यते । वृद्धाश्च लोलुपाश्चपआत्मघातोपदाम्मिका. सम्यग्विनीतामृदधस्तानाचार्यान् प्रचक्षते । धर्मविहितीधर्म श्रीतस्मात्तौद्विजातिभिः दाराग्निहोत्रसम्बन्धमिज्या श्रौतस्य लक्षणम् । स्मात्ततॊपाश्र्माचारी यमैश्चनियमैर्युतः पूर्वेभ्यो वेदयित्त्वेहधीतंसप्तर्षयोऽत्रुधन् । ऋजो यजूपि सामानि ब्राह्मणोऽङ्गानिश्रुति मन्वन्तरस्यातीतस्य स्मृत्या सन्मनुखवीत् । तस्मात् स्मातः स्मृतो धम्मो पर्णाधमविभागशः ॥३३॥ एवं द्विविधो धर्मः शिष्टाचारः सउच्यते । शिर्धातोश्च निटाताच्छिएशम्प्रचक्षते मन्यन्तरेषु ये शिष्टा इह तिष्ठन्ति धार्मिकाः । मनुः सप्तर्षयश्चैप लोपसन्तानकारिणः।
ऽध्यायः] * विस्तारान्मन्वन्तरस्थितिवर्णनम् * तिष्ठन्तीहव धर्मार्थ तान्छिष्टानसम्प्रचक्षते। ते. शिष्टैश्चलितो धर्मःस्थाप्यते चैयुगेयुगे त्रयीवार्ता दण्डनीतिः प्रजा वर्णाश्रमेप्सया। शिष्टेराचर्यते यस्मात् पुनश्चचमनुक्षये पूर्वः पूर्वमतत्वाच शिष्टाचारास शाश्वत । दानं सत्यं तपोलोको विद्यज्या पूजनन्दमः अप्टो तानि चरित्राणि शिष्टाचारस्य लक्षणम् । शिष्टायस्माञ्चरन्त्येनं मनुः सप्तर्षयश्च मन्वन्तरेषु सर्वेषु शिष्टाचारस्तत'स्मृतः। विशेयः श्रवणाच्झौतः स्मरणात्स्मार्त उच्यते इज्यावेदात्मकः श्रीतः स्मार्तों वर्णाश्रमात्मकः। प्रत्यङ्गानि प्रवक्ष्यामि धर्मस्येह तु लक्षणम् ॥ ४१ ॥ दृष्टानुभूतमर्थञ्च यः पृष्टो न विगूहते । यथा भूतप्रवादस्तु इत्येतद्धर्मलक्षणम् ॥ ४२ ॥ ब्रह्मचयं तपो मीनं निराहारत्वमेव च । इत्येतत्तपसो रूपं सुघोरन्तु दुरासदम् ॥४॥ पशूनां द्रव्यहविषामृक्सामयजुषां तथा । ऋत्विजां दक्षिणायाश्च संयोगो यज्ञ उच्यते आत्मवत्सर्वभूतेषु यो हिताय शुभाय च । पर्त्तते सततं हृष्टः क्रिया श्रेष्ठा दया स्मृता 'आकुष्टोऽमिहतो यस्तु नाक्रोशेत्प्रहरेदपि । अदुष्टोचाइमन कार्यस्तितिक्षु साक्षमास्मृता स्वामिना रक्ष्यमाणानामुत्सृष्टानाञ्च सम्भ्रमे । परस्थानामनादानमलोभ इति संशितः ॥ मैथुनस्यासमाचारो जल्पनाचिन्तनात्तथा। निवृत्तिर्ब्रह्मचर्यञ्च तदेतत्क्रमलक्षणम् ॥४८॥ आत्मार्थे चा परार्थे वा इन्द्रियाणीह यस्य वै। विषये न प्रवर्त्तन्ते दमस्यैतत्तु लक्षणम् । पञ्चात्मके यो विषये कारणे चाष्टलक्षणे । न क्रुद्धयेत प्रतिहत' स जितात्मा भविष्यति यद्यदिष्टतमं द्रव्यं न्यायेनैवागतश्च यत् । तत्तद्गुणवते देयमित्येतदानलक्षणम् ॥ ५१ ॥ श्रुतिस्मृतिभ्यां विहितो धर्मो वर्णाश्रमात्मकः । शिष्टाचारप्रवृद्धश्च धर्मोऽयं साधुसम्मत ॥५२॥ अप्रद्वेष्यो धनिऐषु इष्टं ये नाभिनन्दति । प्रीतितापविषादानां विनिवृत्तिविरसता ॥ कर्मणां न्यासः कृतानामकृतैः सह । कुशलाकुशलाभ्यांतु प्रहाणंन्यासउच्यते भव्यक्तादिविशेषान्तविकारेऽस्मिन्निवर्त्तते । चेतनाचेतनं ज्ञात्वा जाने ज्ञानी स उच्यते प्रत्यङ्गानि तु धर्मस्य चेत्येतलक्षणं स्मृतम् । ऋषिभिर्धर्मतत्वज्ञः पूर्व स्वायम्भुवेऽन्तरे अत्र यो पर्णयिष्यामि विधि मन्यन्तरस्य तु । तथैव चातुर्होत्रस्य चातुर्वर्ण्यस्य चैव हि सन्न्यासः ३७४ * मत्स्यपुराणम् * [चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमो प्रति मन्वन्तरञ्चैव श्रुतिरन्याविधीयते । ऋचो यजूंषि सामानि यथावत् प्रतिदैवतम् ।। विधिस्तोत्रं तथा होत्रं पूर्ववत् सम्प्रवर्तते । द्रव्यस्तोत्रं गुणस्तोत्रं कर्मस्तोत्रं तथैवच तथैवाभिजनस्तोत्रं स्तोत्रमेवं चतुर्विधम् । मन्वन्तरेषु सर्वेषु यथा वेदाद्भवन्ति हि ॥ प्रवर्तयन्ति तेषां वै ब्रह्मस्तोत्रं पुनः पुनः। एवं मन्त्रगुणानान्तु समुत्पत्तिश्चतुर्विधा । अथर्वऋग्यजु'साम्नां वेदेप्विह पृथक् पृथक् । ऋषीणां तप्यतां तेषां तपः परमदुश्चरम् मन्त्राःप्रादुर्भवन्त्यादीपूर्वमन्वन्तरस्य ह । असन्तोपाट्याद्दु खान्मोहाच्छोकाचपञ्चधा ऋषीणां तारका येन लक्षणेन यदृच्छया । ऋषीणां यादृशत्वं हि तद्वक्ष्यामीह लक्षणम् ॥ ६४॥ अतीतानागतानाच पञ्चधा ह्यापकं स्मृतम् । तथा अपीणां वक्ष्यामि आपस्येह समुद्भवम् ॥६५॥ गुणसाम्येन वर्त्तन्ते सर्वसम्प्रलये तदा । अविभागेन वेदानामनिर्देश्यतमोमये ॥६६॥ अबुद्धिपूर्वकं तद्वै चेतनार्थ प्रवर्तते । तेनापं बुद्धिपूर्वन्तु चेतनेनाप्यधिष्ठितम् ॥ ६७ ॥ प्रवर्तते यथा ते तु यथा मत्स्योदकायुभी। चेतनाधिकृतं सर्व प्रापर्तत गुणात्मकम् कार्यकारणभावेन तथा तस्य प्रवर्तते ॥ ६८॥ विषयो विषयित्वञ्च तदा ह्यर्थपदात्मको । कालेन प्रापणीयेन भेदाश्च फारणात्मका सांसिद्धिकास्तढावृत्ताः क्रमेण महदादयः । महतोऽसावहङ्कारस्तस्माद्भूतेन्द्रियाणिव भूतभेदाश्च भूनेभ्यो जज्ञिरे तु परस्परम् । संसिद्धिकारणं कायं सद्य एय निवर्त्तते ॥ यथोल्मुकात्तु विटपा एकफालादयन्ति हि । तथा प्रवृत्ताः क्षेत्रशाः फालेनेफेनकारणात् यथान्धफार पद्योत. सहसा सम्प्रदश्यते । तथा निवृत्तो व्यक्त पद्योत इव सज्वलन् स महात्मा शरीरस्थम्तयेह प्रवर्त्तते । मदतस्तमसः पार येलक्षण्याद्विभाज्यते ॥७॥ तय संम्पितो विद्वान् तपसान्त इति श्रुतम् । युधिषिपद्धतस्तस्य प्रादुर्भूता चतुर्विधा मानं पैगम्यमैश्वयं धर्मश्चेति चतुष्टयम् । सांसिद्धिफान्यर्थतानि अप्रतीतानि तस्य महात्मनः शरीरम्य चैतन्यात् सिद्धिरुच्यते । पुरि शेते यतः पूर्व क्षेत्रज्ञान तथापि व पुरे शयनात् पुरुषः क्षेत्रहानात् क्षेत्रश उच्यते । ॥
ऽध्यायः] # विस्तारान्मन्वन्तरस्थितिवर्णनम् *
यस्माद्धर्मात् प्रसूते हि तस्मादै धार्मिकस्तु सः ॥ ८ ॥
सांसिद्धिके शरीरे च बुद्ध्याव्यक्तस्तु चेतनः । एवं विवृत्तः क्षेत्र क्षेत्रानभिसन्धितः
निवृत्तिसमकाले तु पुगणन्तचेतनम् । क्षेत्रशेन परिज्ञातं भोग्योऽयं विपयो मम ॥८०
अपिहिसागती धातुर्विद्या सत्यं तपः श्रुतम् ।
एष सन्निचयो यस्माद् ब्रह्मणस्तु ततस्त्वृषिः ।। ८१ ॥
निवृत्तिसमकालाच्च बुद्धयाव्यक्तऋपिस्त्वयम् । पतेपरमं यस्मात्परमर्पिस्ततः स्मृतः
गत्यर्थादृपतेर्धातोर्नामनिवृत्तिकारणम् । यस्मादेष स्वयम्भूतस्तस्माच्च ऋपिता मता।
सेश्वराः स्वयमुद्भूता ब्रह्मणो मानसाः सुताः। निवर्तमानस्तैर्युद्धया महान्परिगतः परः
यस्मादशपरत्वेन सह तस्मानमहर्षयः । ईश्वराणां सुतास्तेषां मानसाचीरसाश्च ।।
ऋषिस्तस्मात्परत्वेन भूतादिपयस्ततः । ऋषिपुत्रा ऋषीकास्तु मैथुनाद् गर्भसम्भवाः
परत्वेन ऋपन्ते चै भूतादीनृपिकास्ततः । ऋषिकाणां सुता ये तु विशेया ऋषिपुत्रकाः
श्रुत्वा ऋषं परत्वेन श्रुतास्तस्माच्छ तर्षयः। अव्यक्तात्मा महात्मावाहङ्कारात्मातथैव च
भूतात्मा चेन्द्रियात्मा च तेषां तज्ज्ञानमुच्यते ।
इत्येवमृपिजातिस्तु पञ्चधा नाम विश्रुता ॥ ८६ ॥
भृगुर्मरीचिरत्रिश्च अङ्गिराः पुलहः क्रतुः । मनुर्दक्षो घसिष्ठश्च पुलस्त्यश्चापि ते दश ।
ब्रह्मणो मानसा होते उत्पन्नाः स्वयमीश्वराः । परत्वेनर्पयो यस्मान्मतास्तस्मारमहर्षयः
ईश्वराणां सुतास्त्वेपामृपयस्तान्नियोधत ! काव्यो वृहस्पतिश्चैव कश्यपश्च्यवनस्तथा
उतथ्यो वामदेवश्वमगस्त्यः कोशिकस्तथा। कर्दमो बालखिल्याश्चविश्रवाशक्तिवर्द्धनः
इत्येते ऋषयः प्रोकास्तपसाऋपिताङ्गताः । तेषां पुत्रानृपीकांस्तु गर्मोत्पन्नानियोधत
परसरो नग्नश्चय भरद्वाजश्च धीर्यवान् । अपिदीर्घतमाघ वृहद्वक्षाः शरदतः ॥२५॥
धाजिश्रयाः सुचिन्तश्च शावश्च सपराशरः। शृङ्गी च शटपाच्चैव राजा वैधयणम्तथा
इत्येते ऋषिकाः सर्वे सत्येन ऋपिताङ्गताः। ईश्वरा ऋषयश्चैव ऋषीका ये च विभुताः॥
एवं मन्त्रातः सर्वे कृत्यशश्च नियोधत ।
भृगुः फाश्यपः प्राचेता दधीचो ह्यात्मपानपि ॥१८॥
* मत्स्यपुराणम् * [चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमो ऊर्वोऽथ जमदग्निश्च वेदःसारस्वतस्तथा । आर्टिषेणश्च्यवनश्च पीतहव्यः स वेधसः॥ वैण्यः पृथुदिवोदासो ब्रह्मवान् गृत्सशोनको। एकोनविंशतिहोते भृगवो मन्त्रकृत्तमाः ॥ १०० ।। अभिराश्चैव त्रितश्च भरद्वाजोऽथ लक्ष्मणः । कृतवाचस्तथा गर्गः स्मृतिसंकृतिरवच गुरुचीतश्च मान्धाता अम्बरीषस्तथैव च । युवनाश्वः पुरुकुत्सः स्वश्रवस्तुसदस्यवान्। अजमीढो स्वहार्यच ह्युत्कलः फविरेव व । पृषदश्वो विरूपश्च काव्यश्चैवाथ मुद्गलः ॥ उतथ्यश्च शरद्धांश्च तथा पाजिश्रवा अपि । अपस्योपः सुवित्तिश्च घामदेवस्तथैव च ॥ ऋपिजो वृहच्छुल्कश्च ऋषिर्दीर्घतमा अपि । कक्षीवांश्च त्रयस्त्रिंशत् स्मृता ह्यगिरसा घरा. ॥ १०५ ॥ एते मन्त्रकृतः सर्वे काश्यपांस्तु नियोधत। कश्यपः सहवत्सारो नैध्रुवो नित्य एघ च ॥ १०६ ॥ असितो देवलश्चैव पड़ते ब्रह्मवादिनः । अत्रिरर्द्धखनश्चच शावास्योऽथ गविष्ठिरः ॥ कर्णकश्च ऋषि. सिद्धस्तथा पूर्वातिथिश्च यः॥ १०८॥ इत्येते त्वत्रयः प्रोक्ता मन्त्रकृत् पण्महर्पय. । घसिष्ठश्चैव शक्तिश्च तृतीयश्च पराशर. ॥ ततस्तु इन्द्रप्रतिमः पञ्चमस्तु भरद्धसुः । पष्ठस्तु मित्रावरुणः सप्तमः कुण्डिनस्तथा ॥ इत्येते सप्त विज्ञ या घासिष्ठा ब्रह्मवादिनः । विश्वामित्रश्च गाधेयो देवरातस्तथा वल.॥ तथा विद्वन्मधुच्छन्दा ऋषिश्चान्योऽघमर्षणः । अष्टको लोहितश्चैव भृतकीलश्चमाम्बुधि देवश्रवा देवरत पुराणश्च धनञ्जयः । शिशिरश्च महातेजा. शालकायन एव च ॥११३॥ त्रयोदशैते विज्ञेया बहिष्ठाः कोशिका घराः। अगस्त्योऽथ दृढद्युम्नो इन्द्रबाहुस्तथैव च ॥ ११४ ।। ब्रह्मिष्ठागस्तयो ह्येते त्रयः परमकीर्तयः । मनुवैवस्वतश्चैव ऐलो रांजा पुरूरवाः ॥ ११५॥ क्षत्रियाणां घरी घेतो विशेयो मन्त्रवादिनी । भलन्दकश्च वासाश्वः सङ्कीलश्चैव ते त्रयः ॥ ११६ ॥ ।
ऽध्यायः] * तारकाख्यानवर्णनम् * एते मन्त्रकृतो ज्ञेया वैश्यानां प्रवराः सदा । इति द्विनपतिः प्रोक्ता मन्त्रा यच पहिष्कृताः ॥ ११७॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या ऋषिपुत्रानियोधत । ऋपीकाणां सुता ते ऋषिपुवाः श्रुतर्षयः ॥ २१८ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे मन्वन्तरकल्पवर्णनो नाम चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः । -- पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः वारकाख्यानवर्णनम् । पय ऊचुः। कथं मत्स्येन कथितस्तारकस्य अधोमहान् । कस्मिन् कालेविनिर्वृत्ताकयेयं सतनन्दन! त्वन्मुसक्षीरसिन्धत्या कथेयममृनात्मिका ! कर्णाभ्यां पिवतां तृतिरस्माकं न प्रजायने इदं मुने! समारयाहि महायुद्ध ! मनोगतम् । सूत उवाच। पृएस्तु मनुना देवो मत्स्यरूपी जनार्दनः ॥३॥ कथं शरवने जातो देवः पड्यदनो विमो!। एतत्तु पवनं श्रुत्वा पार्थिवम्यामितीजसः उचाच भगवान् प्रीतो ब्रह्मसूनुर्महामतिम् । मत्स्य उवाच। पनाङ्गो नाम देस्योऽभूनस्य पुत्रस्नु तारकः ॥ ५ ॥ सुरानुदासयामास पुरेभ्यः स महाबलः । ततस्ते ब्राह्मणेऽभ्यासं जग्मुर्मयनिपीडिता.॥ भीताध निदशान् दृष्ट्वा प्रामा नेपामुवाच ह । सन्यन्यध्वं भयं देवा ! शटरस्यात्मजः शिशुः ॥ ७॥ नुदिनाचलदाधिवस्त हनिष्यति दानयम् । तन कालेतु फस्मिंश्चिदृष्टा ये शैलजां शियः * मत्स्यपुराणम् * [पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमो खरेतो घह्निवदने व्यसृजत्कारणान्तरे । तत्प्राप्तं वह्निवदने रेतोदेवानतर्पयत् ॥ ६ ॥ विदार्य जठराण्येषामजीणं निर्गतं मुने । । पतितं तत्सरिद्वरे ततस्तु शरकानने ॥१०॥ तस्मात्तु स समुद्भूतो गुहो दिनकरप्रभः । स सप्तदिवसो बालो निजध्नेतारकासुरम् एवं श्रुत्वा ततो वाक्यं तमूचु पिसत्तमा । ऋपय ऊचुः। अत्याश्चर्यवती रम्या कथेयं पापनाशिनी ॥ १२॥ विस्तरेण हि नो ब्रूहि यथातथ्येन शृण्वताम् । बनाङ्गोनाम दैत्येन्द्र कस्य वंशोद्धयः पुरा ॥ १३ ॥ तस्याभूत्तारक पुत्रः सुरप्रमथनो वली । निर्मित को बधे चाभूत्तस्य दैत्येश्वरस्य तु ॥ १६ ॥ गुहजन्म तु कात्मन्येन अस्माकं ब्रूहि मानद !। सूत उवाच। मानसो ब्रह्मण' पुत्रो दक्षो नाम प्रजापतिः ॥ १५॥ पष्टिंसोऽजनयत्कन्या वैरिण्यामेव नः श्रुतम् । ददी स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश सप्तविंशति सोमाय चतस्रोऽरिएनेमये । द्वै वै वाहुकपुत्राय द्वे चान्येऽङ्गिरसे तथा ॥ द्वे कृशाश्वाय विदुषे प्रजापतिसुत प्रभु । अदितिदितिर्दनुविश्वा ह्यरिष्टा सुरसा तथा। सुरभिविनता चैध ताम्रा क्रोधवशा इरा । कर्दू मुनिश्च लोकस्य मातरो गोपु मातर तासा सकाशाल्लोकानां जगमस्थायरात्मनाम् । जन्म नानाप्रकाराणा ताभ्योऽन्ये देहिन. स्मृताः ॥ २०॥ देवेन्द्रोपेन्द्रपूजाद्या सर्वेते दितिजा मता । दितः सकाशालोकास्तु हिरण्यकशिपादयः दानवाश्च दनोः पुत्रा गावश्च सुरभीसुताः । पक्षिणो विनतापुत्रागरुडप्रमुखाः सुताः । नागा. कटूसुता ज्ञेया. शेपाश्चान्येऽपि जन्तवः । त्रैलोक्यनाथं शकन्तु सामरगणप्रभुम् ।। २३ ॥ हिरण्यकशिपुश्चक्रे नीत्या राज्यं महायलः । ततः केनापि कालेन हिरण्यकशिपादयः ॥ - ऽध्यायः] • यमागदानवाग्यानम् . निद्दता विष्णुना सट्टये शेगधेन्द्रेण दानवाः । ततो निहतपुत्राभूदितिर्यग्मयायत ॥ २५ ॥ भत्तारं कश्यपं देवं पुप्रमन्यं महायलम् । समरे शाम हन्तारं स तस्या अददात् प्रभुः ।। नियमे पर्त हे देवि ! सहनं शुचिमानसा । वर्षापालपयसे पुयमित्युक्तासातशाफरोत् पतंन्त्या नियम तस्याः सहन्नाक्षः समाहितः । उपासामानरत्तम्याः सा चैनमन्वमन्यत ।। २८ ॥ दशसम्पत्सरोषस्य सहस्रम्य तदादितिः । उपाच शमसुप्रीता घग्दा तपसि स्थिता दितिश्याच। पुनोत्तीर्णव्रता प्रायः पिद्धि मां पाकशासन !। भविष्यति च ते भ्राता तेन सार्द्धमिमां श्रियम् ॥ ३० ॥ भुश्य घत्स ! ययाकामं त्रैलोक्यं हतकण्टकम् । इत्युनचा निद्रयापिटा चरणाकान्तमूर्द्धजा ॥ ३१ ॥ स्वयं सुष्वापानियतामायिनोऽर्थस्यगौरयात् । तत्तु रन्धं समासाद्य जठरं पाफशासनः चकार सप्तधा गभं कुलियोन तु देवराट् । एक कन्तु पुनः खण्डं चकार मघया ततः ॥ सप्तधासप्तधाकोपात् प्रबुध्यतततोऽदिति. । विद्युध्योवाच मा शक! यातयेथा.प्रजामम त त्या निर्गतःशमा स्थित्याप्राञ्जलिरग्रतः । उचाचवाक्यं सन्त्रस्तोमातुर्य घदनेरितम् शम उवाच। दिवास्वप्नपरा मातः ! पादाकान्तशिरोरहा। सप्त सप्तभिरेवातस्तव गर्भः कृतो मया । एकोनपञ्चाशत्कृता भागा धज्रेण ने सुताः । दास्यामितेषां स्थानानि दिवि दैवतपूजिते इत्युक्ता सा तदा देवी संघमस्त्वित्यभाषत । पुनश्च देवी भर्तारमुपाचासितलोचना । पुत्रं प्रजापते ! देहिशकलेतारमूर्जितम् ! यो नास्त्रशास्त्रैर्वध्यत्वंगन्छेत्रिदिववासिनाम् इत्युक्तः स तथोपाचतां पत्नीमतिदुःसिताम् । दशवर्षसहस्राणि तपः कृत्वा तु लप्स्यसे पत्रसारमयैरङ्गेरच्छेद्यैरायसः । चत्राङ्गो नाम पुत्रस्ते भविता पुत्रवत्सले ! ॥४१॥ सा तु लब्धघरा देवी जगाम तपसे धनम् । दशवर्पसहस्राणि सा तपो थोरमाचरत् ।।
॥ -- * मत्स्यपुराणम् * [पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमो तपसोऽन्ते भगवती जनयामास दुर्जयम् । पुत्रमप्रतिकर्माणमजेयं वज्रदुश्छिदम् ॥४३॥ सजातस्तत्र एवाभूत् सर्वशस्त्रास्त्रपारगः । उवाच मातरं भत्त्या मात ! किङ्करवाण्यहम् तमुवाच ततो दृष्टा दितिर्दैत्याधिपञ्च सा। बहवो मे हता पुत्रा सहस्राक्षेण पुत्रक! तेषा त्व प्रतिकतु वै गच्छ शक्रवधाय च । बाढमित्येव तामुक्त्वा जगाम त्रिदिवं वली बद्ध्वा तत सहस्राक्ष पाशेनामोघवर्चसा । मातुरन्तिकमागच्छव्याघ्र क्षुद्रमृगं यथा एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा कश्यपश्च महातपा । आगतो तत्र यत्रास्तां मातापुत्रावभीतको॥ दृष्ट्वा तु तमुवाचेदं ब्रह्मा कश्यपश्च एव च । मुश्चैनं पुत्र । देवेन्द्र किमनेन प्रयोजनम् ॥ अपमानो वध प्रोक्त पुत्रसम्भावितस्य च । अस्मद्वाक्येन यो मुक्तो विद्धि त मृतमेवच परस्य गौरवान् मुक्त शत्रूणा मारमावहेत् । जीवन्नेव मृतो पत्स ! दिवसेदिवसे स तु महतां वशयामाते वैर नैवास्ति वैरिणि । एतच्छ्र त्वा तु पनाङ्ग प्रणतो वाक्यमत्रवीत् न मे कृत्यमनेनास्ति मातुराज्ञा कृता मया । त्व सुरासुरनाथो वै मम च प्रपितामह ॥ करिष्ये त्वचो देव ! एप मुक्त शतक्रतु । तपसे मे रतिर्देव ! निर्विघ्नं चैव मे भवेत् त्वत्प्रसादेन भगवन्नित्युक्त्वा विरराम स । तस्मिंस्तूष्णीं स्थिते दैत्ये प्रोवावेद पितामहः ॥ ५५ ॥ ब्रह्मोवाचा तपस्त्वरमापन्नो अस्मच्छासनसस्थित । अनयाचित्तशुद्धया ते पर्याप्तं जन्मन फलम् इत्युक्त्या पहाज कन्या ससर्जायतलोचनाम् । तामस्मै प्रददी देव. पत्ल्यथं पद्मसम्भव घरा)तिच नामास्या न्यायात पितामह ।पनाङ्गोऽपि तयासार्द्ध जगामतपसेवनम् ऊर्ध्ववाहु स दैत्येन्द्रोऽचरव्दसहस्रकम् । कालं कमलपनाक्ष शुद्धबुद्धिर्महातपा ॥ तापचावामुरा फालं तावत् पञ्चाग्निमध्यग । निराहारो घोरतपास्तपोराशिरजायत तत सोऽन्तर्जले चके फालं घर्षसहस्रकम् । जलान्तरं प्रविष्टस्य तस्य पत्नी महाव्रता॥ तत्यय तीरे सरसस्तपस्यन्ती मौनमास्थिता। निराहारा तपो घोरं प्रविवेश महाद्युति तस्या तपसि पतन्त्यामिन्द्रश्चक्रे विमोषिकाम् । भूत्वातु मर्कटस्तत्र तदाश्रमपदंमहान् चविलोलं निशेष तुम्बीघटफरण्डफम् । ततस्तु मेपरूपेण फम्प तस्याफरोन्महान् ॥
ऽध्यायः] * तारकासुरोपारयानम् ४ ततो भुजङ्गरूपेण यध्वा च चरणद्वयम् । अपरष्टा ततो दूरं नमस्तस्या मर्हामिमाम् ॥ तपोबलाढ्या सा तस्य न घध्यत्वं जगाम ह । ततो गोमायुरूपेण तल्या दूपयदाश्रमम् ततस्तु मेघरूपेण तस्यालेदयदाश्रमम् । मीपिकाभिरनेकाभिस्तां क्लिश्यन् पाकशासनः विरराम यदा नैवं घनाङ्गमहिपी तदा । शैलस्य दुष्टतां मत्वा शापन्दातुं व्यवस्थिता ॥ स शापाभिमुखां दृष्ट्वा शैलः पुरपविग्रहः । उवाच तां घरारोहां घराङ्गी भीरचेतनः ॥ नाहं घराङ्गने ! दुष्टः सेव्योऽहं सर्वदेहिनाम् । विभ्रमन्तु करोत्येष रुषितः पाकशासनः एतस्मिन्नन्तरे जातःकालवर्षसहस्निकः । तस्मिन् गतेतु भगवान् काले कमलसम्भवः तुष्टः प्रोवाच वनाझं तमागम्य जलाश्रयम् ॥ ७ ॥ ब्रह्मोवाच । ददामि सर्वकामांस्ते उत्तिष्ठ दितिनन्दन ! । एवमुक्तस्तदोत्थाय दैत्येन्द्रस्तपसांनिधिः उवाच प्राञ्जलिक्यं सर्वलोकपितामहम् ॥ १२ ॥ M वनाङ्ग उवाच । आसुरो मास्तु मे भावः सन्तु लोका ममाक्षया. । तपस्येव रतिर्मेऽस्तु शरीरस्यास्तु घर्तनम् ॥ ७३ ॥ एवमस्त्विति तन्देवो जगाम स्वकमालयम् । पनाङ्गोऽपि समाप्ते तु तपसिस्थिरसंयमः आहारमिच्छन् मायाँ स्वान्न ददर्शाश्रमे स्वके। क्षुधाविष्टः स शैलस्य गहनम्प्रविवेशह आदातुं फलमूलानि स च तस्मिन् व्यलोकयत् । रदन्ती ता प्रियान्दीना तनुप्रच्छादिताननाम् ॥ ७६ ॥ ता विलोक्य स दैत्येन्द्रः प्रोवाच परिसान्त्वयन् । पन्नाङ्ग उवाच । केन तेऽपरत भीरु ! यमलो यियासुना ॥ ७ ॥ कम्वा कामं प्रयच्छामि शीघ्रं मे ब्रूहि मानिनि ! ॥ ७८ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे तारकासुरोपाख्याने पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।
षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः तारकासुरोपाख्यानवर्णनम् । घराड्युवाच। त्रासितास्म्यपघिद्धास्मि ताडिता पीडितास्मिच । रोद्रेण देवराजेन नष्टनाथेव भूरिश.॥ दु.खपारमपश्यन्ती प्राणांस्त्यक्तुं व्यवस्थिता । पुत्रमे तारकं देहि दुःखशोकमहार्णवात् एवमुक्त स दैत्येन्द्रः कोपव्याकुललोचनः । शक्तोऽपि देवराजस्य प्रतिकर्तु महासुरः।। तप कर्तु पुनर्दैत्यो व्यवस्यत महावल । ज्ञात्वा तु तस्य संकल्पं ब्रह्मा क्रूरतरं पुन ॥ आजगाम तदा तत्र यत्राली दितिनन्दन । उवाच तस्मै भगवान् प्रभुमधुरया गिरा ॥५ ब्रह्मोवाच । किमर्थं पुत्रभूयस्त्वं नियम क्रूरमिच्छसि । आहाराभिमुखो दैत्यस्तन्नो ब्रूहि महाव्रत ॥ याचब्दसहस्रेण निराहारस्य यत् फलम् । क्षणेनैकेन तलुब्धा त्यवाहारमुपस्थितम् ॥ त्यागो ह्यप्रातकामाना कामेभ्यो न तथा गुरु । यथाप्राप्तंपरित्यज्य कामं कमललोचन श्रुत्वैतवाह्मणो पाक्यं दैत्यः प्राञ्जलिखवीत् । चिन्तयंस्तपसायुक्तो हृदि ब्रह्ममुखरितम् वज्राङ्ग उवाच। उत्थितेन मया दृष्टा समाधानात्त्वदाशया। महिषी भीपिता दीना रुदन्ती शाखिनस्तले सा मयोक्ता तु तन्वङ्गी दूयमानेन चेतसा । किमेवं वर्त्तसे भीरु ! पद त्वं किञ्चिकीर्षसि इत्युक्ता सा मया देव ! प्रोवाच स्खलिताक्षरम् । वाक्यं वाचस्पते ! भीता तन्वङ्गा हेतुसंहितम् ॥ १२ ॥ घराजयुवाच। त्रासितास्यपविद्धास्मि कर्पिता पीडितास्मि च । रोद्रेण देवराजेन नष्टनायेव भूरिशः दुपस्यान्तमपश्यन्ती प्राणास्त्यतुं व्यवस्थिता। पुनं मे तारकं देहि धस्माद्दुःसमहार्णवात् ॥ १४ ॥ .
ऽध्यायः] * तारकासुरोपाख्यानम् * एवमुक्तस्तु संभुब्धस्तस्याः पुत्रार्थमुद्यतः । तपोधोरं करिष्यामिजयाय त्रिदिवौकसाम् एतच्छ्र त्वा वचो देवः पद्मागर्मोद्भवस्तदा। उचाव दैत्यराजानं प्रसन्नश्चतुराननः॥१६॥ ब्रह्मोवाच । अलन्ते तपसा पत्स! मा क्लेशे दुस्तरे विश । पुत्रस्ततारको नाम भविष्यति महाबलः देवसीमन्तिनीकान्त धम्मिलस्यविमोक्षण । इत्युक्तोदैत्यनाथस्तु प्रणिपत्य पितामहम् आगत्यानन्दयामास महिपी हर्षिताननः । ती दम्पती कृतार्थों तु जग्मतुः स्याश्रमं मुदा बनाइनाहितं गर्भ घराङ्गा वरवणिनी। पूर्ण घर्षसहस्रञ्च दधारोदर एव हि ॥ २० ॥ ततो वर्षसहस्रान्ते वराङ्गी सुपुवे सुतम् । जायमाने नु दैत्येन्द्र तस्मिन् लोकमयङ्करे चचाल सकला पृथ्वी समुद्राश्च चकम्पिरे । चेलुमहीधराः सर्वे पधुर्वाताश्च भीषणाः ॥२२॥ जेपुर्जप्यं मुमिवरा नेदुालमृगा अपि । चन्द्रसूर्या जहुः कान्ति सनीहारादिशोऽभवन् जाते महासुरे तस्मिन् सर्व चापि महासुराः । आजग्मुह पितास्तत्र तथाचासुरयोपित. जग्मुर्हर्पसमाविष्टा ननृतुश्चासुराङ्गनाः । ततो महोत्सयो जातो दानवानां द्विजोत्तमाः विषण्णमनसो देवाः समहेन्द्रास्तदाभवन् । धरानी खसुतं दृष्ट्वा हर्षेणापूरिता तदा ॥२६ बहुमेने न देत्येन्द्रविजयन्तु तदेव सा । जातमात्रस्तुदैत्येन्द्रस्तारकश्चण्डविक्रमः॥२७॥ अभिषिक्तोऽसुरैः सर्वैः कुजम्भमहिपादिभिः । सर्वासुरमहाराज्ये पृथिवीतुलनक्षमै । सतु प्राप्य महाराज्यं तारको मुनिसत्तमाः । उवाच दानवश्रेष्ठान युक्तियुक्तमिदं वचः ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे तारकासुरोपाख्याने पट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः । सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः तारकासुरोपाख्यानम् । तारक उवाच। शृणुध्वमसुराः! सर्वे पाक्यं मममहावलाः । श्रेयसेक्रियतांबुद्धिःसव.इत्यस्य सम्बिधी ३८४ * मत्स्यपुराणम् * [ सप्तचत्वारिंशदधिकशततमो वंशक्षयकरा देवाः सर्वेषामेव दानवाः । अस्माकं जातिभ्रमों वै विरुदं पैरमक्षयम् ॥२ घयमद्य गमिष्यामः सुराणां निग्रहाय तु । स्वयाहुयलमाश्रित्य सर्च एवमसंशयः ॥३॥ किन्तु ना तपसा युक्तो मन्येऽहं सुरसङ्गमम् । अहमादी करिष्यामि तपो घोरन्दितेः सुताः ॥४॥ ततः सुरान् विजेप्यामो भोक्ष्यामोऽथ जगत्त्रयम् । स्थिरोपायो हि पुरुषः स्थिरीरपि जायते ॥५॥ रक्षितुं नैव शक्नोति चपलश्चपलाः श्रियः । तच्छ्र त्या दानवाःसर्वेवाक्यंतस्यासुरस्यतु साधु साध्वित्ययोचंस्ते तत्र दैत्याः सविस्मयाः । सोऽगच्छत्पारियात्रस्य गिरेः फन्दरमुत्तमम् ॥७॥ सर्वर्तुकुसुमाकीणं नानोपधिविदीपितम् । नानाधातुरसस्रावचित्रं नानागुहागृहम् ॥८॥ गहनैः सर्वतो गूढं चित्रकल्पद्रुमाश्रयम् । अनेकाकारवहुलं पृथक् पक्षिकुलाकुलम् ॥६ नानाप्रस्रवणोपेतं नानाविधजलाशयम् । प्राप्य तत् कन्दरं दैत्यश्चवार विपुलं तपः॥ निराहारः पञ्चतपा पत्रमुग्वारिभोजनः । शतं शतं समानान्तु तपांस्येतानि सोऽकरोत् ॥११॥ ततः स्वदेहादुत्कृत्य कर्ष कप दिने दिने । मांसस्याग्नौ जुहावासौःततो निर्मा सताङ्गत ॥१२॥ तस्मिन्निर्मा सतां याते तपोराशित्वमागते । जज्यलुः सर्वभूतानि तेजसा तस्य सर्वतः उद्विग्नाश्च सुराः सर्वे तपसा तस्य भीपिताः । एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा परमं तोपमागतः ॥ तारकस्य घरं दातुं जगाम त्रिदशालयात् । प्राप्य तं शैलराजानं स गिरे.कन्दरस्थितम् उवाच तारकं देवो गिरा मधुरया युतः । ब्रह्मोवाच। पुत्रालं तपसा तेऽस्तु नास्त्यसाध्यं तवाऽधुना ॥१६॥ घरं वृणीष्व रुचिरं यत्ते मनसि घर्तते । इत्युक्तस्तारको दैत्यः प्रणम्यात्मभुवं विभुम् उपाच प्राअलिर्भूत्वा प्रणतः पृथुविक्रमः ।
ऽध्यायः] • तारपासुरोपाध्यानम् . तारक उपारा देप! भूतमनापाम! पेन्सि जनुपिचेष्टितम् ॥१८॥ एनातिरनाफाही जिगीषुः प्रायशो जनः । पपा जातिधर्मण एमयेराः सदामरः ने नि:शेषिता दैत्याः पूरैः सन्याय धर्मिनाम् । तपाम समुदत्ता भयेयमिति मे मतिः ॥२०॥ अयध्यं सर्वभूतानामाप्राणाय महाजमाम् । म्यामदं परमो मम हदि स्थितः पनन्मे देहि देवेश! नान्यो मे रोचते पाः । तमुपाय ना दत्यं पिरिशिः मुग्नायफः न युज्यन्ने यिना मृत्यं देदिनी दैत्यसत्तम ! यतम्तनोऽपि पाय मृत्युं यम्मान शरमे ततः सन्त्यि दैत्येन्द्रः शिशीय समयासगम् । धमे मदामुरी मृत्युमपलेपनमोदितः प्रारमा यास्म परं इत्या यत्किशितमनमेप्सितम् । जगाम निदियं देषों देत्योऽपि म्यफमालयम् ॥२५॥ इत्तीर्ण तपसस्तं तु दैत्यं दैत्येभ्यरास्तथा। परियाः सदनासं दियि देवगणा यथा । तस्मिन् महति राज्यस्य साम्ये दैत्यनन्दने । मृतयो मूर्तिमन्तध म्यफालगुणहिताः अभयन् फिरास्तम्य लोफपादाय सर्वशः। फान्तियुतिति मेंधाः श्रीरयेक्ष्य च दानयम् ॥२८॥ परिवगुणा फीर्णा निश्छिद्राः सर्व पर दिफालागुरुपिलिप्ताहं महामुफुटभूषणम् ॥ रविराङ्गन्दनदाङ्गं महासिंहासने स्थितम् । पीजयन्त्यप्सरः श्रेष्ठाःभृशं मुञ्चन्ति नेप ताः चन्द्राकों दीपमार्गेषु घ्यजनेषु च मारतः । एतान्तोऽग्रेसरस्तस्य यभूयुमुनिसत्तमाः ॥ एवं प्रयाति फाले.तु वितते तारकासुरः । यमाये सचिवान् देत्यः प्रभूतपरदर्पितः ॥ -- तारक उघाच। राज्येन फारणं कि मे त्वनाफम्य प्रिविष्टिपम् । अनिर्याप्प सुरैयर फा शान्तिह दयेमम । भुअतेऽद्यापि यशांशानमरा नाक एप हि । विष्णुः श्रियं न जद्दति तिष्ठते च गतभ्रमः स्पस्थामिःस्वर्गनारीमिःपीड्यन्तेऽमरपलमाः । सोत्पलामदिरामोदादिविक्रोडायनेषुच सध्या जन्म नयाफश्चिघटयेत्पौरपनरः ।जन्म तस्य वृथा भूतमजन्मना तु विशिष्यते * मत्स्यपुराणम् * [सप्तत्वाशिदधिकशततमो माता पितृभ्यां न करोति फामान् यन्धूनशोकान् न करोति यो पा। फीति हि पार्जियते हिमाभां पुमान् स जातोऽपि मृतो मतं मे ॥ ३७॥ तस्माज जयायामरपुङ्गयानां त्रैलोक्पलक्ष्मीहरणाय शीघ्रम् । संयोज्यतां मे रथमष्टचक्रं वलच मे दुर्जयदत्यचक्रम् । ध्वजञ्च मे काञ्चनपट्टनद्धं च्छत्रञ्च मे मौक्तिकजालबद्धम् ॥३८॥ तारकस्य घचः श्रुत्वा प्रसनो नाम दानवः । सेनानीदैत्यराजस्य तथा चक्रे चलान्वितः पाहत्य भेरी गम्भीरां दैत्यानाहय सत्वरः । तुरगाणां सहस्रेण चक्राष्टकविभूषितम् ॥ शुक्लाम्बरपरिष्कारं चतुर्योजनविस्तृतम् । नानाक्रीडागृहयुतं गीतवाद्यमनोहरम् ॥४१॥ विमानमिव देवस्य सुरभर्तुः शतक्रतोः । दशकोटीश्वरा दैत्या दैत्यास्ते चण्डविक्रमाः तेपामग्रेसरो जम्भः कुजम्भोऽनन्तरस्ततः । महिपः कुञ्जरो मेघः कालनेमिनिमिस्तथा। मथनो जम्भकः शुम्भो दैत्येन्द्रा दश नायकाः । अन्येऽपिशतशस्तस्यपृथिवीदलनक्षमाः दैत्येन्द्रा गिरिवर्माणः सन्ति चण्डपराक्रमाः । नानायुधप्रहरणा नानाशस्त्रास्त्रपारगाः तारकस्याभवत् केतूरोद्रः कनकभूषणः । केतुना मकरेणापि सेनानीसनोऽरिहा ॥४६ पैशाचं यस्य पदनं जम्भस्यासीदयोमयम् । खरं विधूतलागुलं कुजम्भस्याभवद् ध्यजे महिपत्य तु गोमायुक्रेतोहमतदाभवत् । ध्वाक्षंध्यजेतुशुम्भस्यकृष्णायोमयमुच्छ्रितम् अनेकाकारविन्यासाश्चान्येषान्तु ध्वजास्तथा । शतेन शीघ्रवेगानां व्याघ्राणां हेममालिनाम् ॥ ४६॥ असनस्य रथो युक्तो किङ्किणीजालमालिनाम् । शतेनापि च सिंहानां रथो जम्भस्य दुर्जयः ॥५॥ कुजम्भस्य रथो युक्त. पिशाचवदनैः खरैः । रथस्तु महिपस्योष्ट्रर्गजस्य तु नुरङ्गमः॥ मेघस्य द्वीपिभि मे. कुञ्जरैः कालनेमिनः । पर्वताभै. समारूढो निमिर्मत्तर्महागजः॥ चतुर्दन्तर्गन्धवद्धि. शिक्षितैर्मेध्रभैरवैः । शतहस्तायते कृष्णे तुरङ्गैर्हेमभूषणैः ॥ ५३ ॥ सितचामरजालेन शोभिते दक्षिणां दिशम् । सितवन्दनवार्यङ्गो नानापुष्पस्रजोज्ज्वलः मथनो नाम दैत्येन्द्र पाशहस्तोव्यराजत । जम्भक किङ्किणीजालमालमुष्ट समास्थितः - ऽध्यायः] * तारकासुरोपारयानम् * ૨૮૭ कालशुक्लमहामेपमारूढः शुम्भदानवः । अन्येऽपि दानवा चीरा नानावाहनगामिनः ॥५६ प्रचपडचित्रकर्माणः कुण्डलोणीपभूषणाः । नानाविधोत्तरासगा नानामाल्यविभूषणाः नानासुगन्धिगन्धाढ्या नानावन्दिजनस्तुताः । नानापाद्यपरिष्यन्दाश्चातरमहारथाः ॥२८॥ नानाशीर्यकथासक्तास्तस्मिन् सैन्ये महासुराः । तयलं दैत्यसिंहस्य भीमरूपं व्यजायत ॥५६॥ प्रमत्तवण्डमातङ्गतुरङ्ग रथसड्डुलम् । प्रतस्थेऽमरयुद्धाय बहुपत्तिपताकिनम् एतस्मिन्नन्तरे वायुदेवदूतोऽम्बरालये। दृष्ट्वा स दानववलं जगामेन्द्रस्य शंसितुम् ॥ ६१ ॥ स गत्वा तु समां दिव्या महेन्द्रस्य महात्मनः । शर्शसमध्ये देवानांतत्कार्यसमुपस्थितम् तच्छ त्वा देवराजस्तु निमीलितविलोचनः । बृहस्पतिमुवाचेदं वाक्यं फाले महाभुजः इन्द्र उवाच। संप्राप्नोति विमर्दोऽयं देवानांदानवैः सह । कार्य किमिति तद्वहि नीत्युपायसमन्वितम् एतच्छ्र त्वा तु वचनं महेन्द्रस्य गिरां पतिः । इत्युचाच महाभागो बृहस्पतिरुदारधीः सामपूर्वा स्मृता नीतिश्चतुरङ्गाम्पताकिनीम् । जिगीपतां सुरश्रेष्ठ ! स्थितिरेपासनातनी सामभेदस्तथा दानं दण्डश्चाङ्गचतुष्टयम् । नीती क्रमाद्देशकालरिपुयोग्यक्रमादिदम् ।। सामदैत्येपु नैवास्ति यतस्ते लब्धसंध्याः । जातिधर्मेण चाभेद्या दानप्राप्तश्रियेचकिम् एकोऽभ्युपायो दण्डोऽत्र भवता यदि रोचते । दुर्जनेषु कृतंसाम महद्यातिवबन्ध्यताम् भयादिति व्यवस्यन्तिरासाममहात्मनाम् । ऋजुतामार्यबुद्धित्वंदयानीतिव्यतिक्रमम् मन्यन्ते दुर्जना नित्यं साम चापि भयोदयात् । तस्माद् दुर्जनमाकान्तुं श्रेयान् पोस्पसंश्रयः ॥ ७१ ।। आक्रान्ते तु क्रिया युक्ता सतामेतन्महानतम् । दुर्जन. सुजनत्वाय कल्पते न कदाचन । सुजनोऽपिस्वभावस्यत्यागंचान्छेत् कदाचन । एवमेधुद्धयते बुद्धिर्भवन्तोऽत्रव्ययस्यताम् एवमुक्त. सहस्राक्ष एवमेवेत्युवाच तम् । कर्त्तव्यता स सञ्चिन्त्य प्रोवावामरसंसदि।
* मत्स्यपुराणम् * [सप्तत्वारिंशदधिकशततमो इन्द्र उवाच । सावधानेन मे चाचं शृणुध्वं नाकवासिनः!। भवन्तो यज्ञभोक्तारस्तुष्टात्मानोऽतिसात्विकाः ॥ ७५ ॥ स्वे महिन्नि स्थिता नित्यं जगतः परिपालकाः । भवतश्चानिमित्तेन वाधन्तेदानवेश्वराः तेषां सामादि नैवास्ति दण्डएपविधीयताम् । क्रियतां समरोद्योगःसैन्यंसंयुज्यतांमम आद्रियन्तां चशस्त्राणिपूज्यन्तामस्त्रदेवताः। घाहनानि च यानानि योजयन्तुसहामराः यम सेनापति कृत्वा शीघ्रमेवं दिवौकसः । इत्युक्ताः समनह्यन्त देवानां ये प्रधानतः ।। घाजिनामयुतेनाजौहे मघण्टापरिष्कृतम् । नानाश्चर्यगुणोपेतं संप्राप्तं सर्वदेवतः ॥८॥ रथं मातलिना क्लप्तं देवराजस्य दुर्जयम् । यमो महिपमास्थाय सेनाने समवर्तत ॥८॥ चण्डकिङ्करवृन्देन सर्वत परिवारितः । कल्पकालोद्धतज्यालापूरिताम्बरलोचन ॥८२॥ हुताशनश्छागरूढ. शक्तिहस्तो व्यवस्थितः । पवनोऽङ्कुशपाणिस्तु विस्तारितमहाजवः ।। भुजगेन्द्रसमारूढो जलेशो भगवान् स्वयम् । नरयुक्तरथे देवो राक्षसेशो वियचर ॥ तीक्ष्णखङ्गयुतो भीमः समरे समवस्थितः । महासिहरवो देवो धनाध्यक्षो गदायुधः ॥ ८५ ॥ चन्द्रादित्यावश्विनी व चतुरङ्गबलान्विती । राजभिः सहितास्तस्थुर्गन्धर्वा हेमभूषणा हेमपीठोत्तरासङ्गाश्चित्रचर्मरथायुधाः । नाकपृष्ठशिखण्डास्तु वैदूर्यमकरध्वजा ॥८॥ जपारक्तोत्तरासला राक्षसा रक्तमूर्द्धजा. । गृध्रध्वजा महावीर्या निर्मलायोविभूषणाः ॥ मुसलासिगदहस्ता रथे चोष्णीपदंशिताः । महामेघरपा नागा भीमोरकाशनिहतय ॥ यक्षा कृष्णाम्बरभृतो भीमयाणधनुर्द्धरा । ताम्रोलूकध्वजा रौद्रा हेमरत्नविभूषणाः ॥ द्वीपिचर्मोत्तरासङ्गं निशाचरवलं वभो । गार्धपत्रध्वजप्रायमस्थिभूपणभूषितम् ॥ ११ ॥ मुसलायुधदुष्प्रेक्ष्यं नानाप्राणिमहारघम् । किनरा. श्वेतवसना सितपत्रिपताकिनः॥ मत्तेभवाहनप्रायास्तीद णतोमरहेतयः । मुक्ताजालपरिष्कारो हंसो रजत्तनिर्मितः ॥३॥ केतुर्जलाधिनाथस्य भीमधूमध्वजानिल' । पद्मरागमहारत्नपिटपं धनदस्य तु ॥ ४ ॥ ध्यजं समुच्छ्रितं भाति गन्तुकाममियाम्वरम् ।
ऽध्यायः]
* देवदानवयुद्धधर्णनम् #
३८६
घृण काठलोहेन यमस्यासीन्महाध्यजः ॥ ५ ॥
राक्षसेशस्य केतोवै प्रेतस्य मुखमावभो । हेमसिंहध्वनी देवी चन्द्राविमिताती ॥
कुम्भेन रत्नचित्रेण केतुरश्विनयोरभूत् । हेममातङ्गरवितं चित्ररत्नपरिष्कृतम् ॥ १७ ॥
ध्वजं शतक्रतोरासीत् सितचामरमण्डितम् । सनागयक्षगन्धर्वमहोरगनिशावरा ॥८॥
सेना सा देवराजस्य दुर्जया भुवनत्रये । कोटयस्तास्त्रयस्त्रिंशवे देवनिकायिनाम् ।।
हिमाचलाभे सितकर्णचामरे सुवर्णपद्मामलसुन्दरनजि ।
कृताभिरागोज्ज्वलकुङ्कमाङ्करे कपोललीलालिकदम्वसङ्कले ॥ १०॥
स्थितस्तदरायतनामकुञ्जरे महावलश्चित्रविभूषणाम्बरः ।
विशालवस्त्रांशुचितानभूपितः प्रकीर्णकेयूरभुजाग्रमण्डलः ॥
सहस्रक् धन्दिसहस्रसंस्तुतत्रिविष्टपेऽशोभत पाकशासनः ॥१०॥
तुरङ्गमातड्यूयलीघसड्डुला सितातपत्रध्वजराजिशालिनी ।
चमूश्च सा दुर्जयपत्रिसन्तता विभाति नानायुधयोधदुस्तरा ॥१०२॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे तारकोपाख्याने सप्तवत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।
अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
तारकोपाख्याने देवदानवयुद्धवर्णनम् ।
सूत उवाच ।
सुरासुराणां सम्मर्दस्तस्मिन्नत्यन्तदारुणे । तुमुलोऽतिमहानासीत् सेनयोरभयोरपि ।
गर्जता देवदैत्यानां शङ्खमेरीरवेण च । तुर्याणाञ्चैव निर्घोषैर्मातगानाञ्च हिते. ॥२॥
हेपता हयवृन्दानां रथनेमिस्वनेन च । ज्याघोपेण व शूराणान्तुमुलोऽतिमहानभूत् ॥३
समासाद्योभये सेने परस्परजयैषिणाम् । रोषेणातिपरीतानान्त्यक्तजीवितचेतसाम् ॥४
समासाद्य तु तेऽन्योन्यं प्रक्रमेण विलोमतः । रथेनासकपादातो रथेन चतुरङ्गम' ॥५॥
* मत्स्यपुराणम् * [ऊनपञ्चाशदधिकशततमो
हस्ती पादातिसंयुक्तो रथिना च क्वचिद्रीं । मातलेनापरो हस्ती तुरमुभिर्गजः ॥ई
पदातिरेको बहुभिर्गनैर्मत्तैश्च युज्यते । ततः प्रासाशनिगदाभिन्दिपालपरश्वधैः ॥७॥
शक्तिभिः पट्टिशैः शूलैर्मुद्गरैः कडपैन्डैः । चक्रश्च शङ्कभिश्चैव तोमरैरङ्कुशैः स्थितैः ॥८॥
कर्णिकालीकनाराबवत्सदन्तार्द्धचन्द्रकै । भलश्च शतपत्रैश्च शुकतुण्डैश्च निर्मलः ॥६॥
वृष्टिरत्यगुताकारा गगने समदृश्यत । संप्रच्छाद्य दिश' सर्वास्तमोमयमिवाकरोत् ॥
न प्राज्ञायत ते ऽन्योऽन्यं तस्मिंस्तमसि सङ्कुले। अलक्ष्यंविसृजन्तस्तेहे तिसवातमुद्धतम्
पतितं सेनयोर्मध्ये निरीक्षन्ते परस्परम् । ततोध्वजै जैश्छत्रैः शिरोभिश्च सकुण्डलैः ।
गजैस्तुरङ्गैः पादातैः पतद्भिः पतितैरपि । आकाशसरसोभ्रष्टैः पङ्कजैरिव भूस्तृता ॥१३॥
भग्नदन्ता भिन्नकुम्भाश्छिन्नदीर्घमहाकरा. । गजाः शैलनिभाः पेतुर्धरण्यां रुधिरस्रपाः
भग्नेषा दण्डवक्राक्षा रथाश्च शकलीकृता । पेतुः शकलतां यातास्तुरङ्गाश्च सहस्रशः॥
ततोऽसृक् हददुस्तारा पृथिवी समजायत । नद्यश्च रुधिरावर्ता हर्पदाः पिशिताशिनाम्
वेतालाक्रीडमभवत्तत् सङ्कलरणाजिरम् ॥ १७ ॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे तारकासुरोपाख्याने देवासुरयुद्धेऽष्टचत्वारिंशदधिक-
शततमोऽध्यायः।
अनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
तारकोपाख्याने देवासुरयुद्धवर्णनम् ।
सूत उवाच।
अथ ग्रसनमालोक्य यम क्रोधविमूच्छितः । वर्प शरवर्षेण विशेषेणाग्निवर्चसाम् ॥
स विद्धो बहुभिर्वाणैर्घसनोऽतिपराक्रमः। कुतप्रतिकृताकाङ्क्षी धनुरानम्य भैरवम् ।।
शते. पञ्चभिरत्युप्रैः शराणां यममर्दयन् ।
स विचिन्त्य यमो वाणान् ग्रसनस्यातिपौरपम् ॥ ३॥
ऽध्यायः] * तारकासुरोपाख्याने देवासुरयुद्धवर्णनम् * ३६१ घाणवृष्टिभिख्यामियमोनसनमर्दयन् । कृतान्तशरवृणिन्तां धियति प्रतिसर्पिणीम् ॥४॥ विच्छेद शरवर्षेण प्रसनो दानवेश्वरः । विफलां तां समालोक्य यमस्तां शरसन्ततिम् स चिचिन्त्य शरवातं ग्रसनस्य रथं प्रति । विक्षेप मुद्गरं घोरन्तरसा तस्य चान्तकः ।। सतं मुद्गरमायान्तमुत्प्लुत्य गगनस्थितम् । जग्राह वामहस्तेन याम्यं दानवनन्दनः ।। तमेव मुद्गरं गृह्य यमस्य महिषं स्पा । पातयामास वेगेन स पपात महीतले ॥ ८ ॥ उत्प्लुत्याथ यमस्तस्मान् महिपानिष्पतिप्यतः । प्रासेन ताडयामास ग्रसनं वदने दृढम् ।। ६॥ सतु प्रासप्रहारेण मूच्छितोन्यपत धि । ग्रसनं पतितं दृष्ट्वा जम्मो भीमपराक्रमः ॥ यमस्य भिन्दिपालेन प्रहारमकरोधृदि । यमस्तेन प्रहारेण सुस्त्राव रुधिरं मुखात् ॥ कृतान्तमदितं दृष्ट्वा गदापाणिर्धनाधिपः । वृतो यक्षायुतशतैर्जम्भं प्रत्युद्ययो रपा ॥१॥ जम्मो रपा तमायान्तं दानवानीकसंवृतः। उवाचप्राशोवारन्तु यथा स्निग्धेनभापितम् नसनो लब्धसंज्ञोऽथ यमस्य प्राहिणोद्गदाम् । मणिहमपरिष्कारां गुपींमरिविमर्दिनीम् ॥ १४ ॥ तामप्रता सप्रेक्ष्य गदा महिपवाहन. ! गदायाः प्रतिधातार्थ जगदलनभैरवम् ॥१५ दण्डं मुमोच कोपेन ज्वालामालासमाकुलम् । सगदा वियतिप्राप्य ररासाम्बुधरो यथा समभवत्ताभ्यां शैलाभ्यामिघ दुःसहम् । ताभ्यां निष्येपनिर्हादजडीकृतदिगन्तरम् ॥ जगद्व्याकुलतां गतं प्रलयागमशङ्कया। क्षणात् प्रशान्तनिहादं ज्वलदुल्कासमावितम् नियेषेण तयोर्भीममभूगगनगोवरम् । निहत्याथ गदा दण्डस्ततोनसनमूर्द्धनि ॥१॥ हत्या श्रियमिवानों दुर्वृत्तस्यापतदृढः । स तु तेन प्रहारेण दृष्ट्वा सतिमिरादिश ॥ २० ॥ पपात भूमौ नि संज्ञो भूमिरेणुविभूषितः । ततो हाहारयो घोरः सेनयोरभयोरभूत् २१ ततो मुहूर्त्तमात्रेण प्रसन' प्राप्य चेतनाम् । अपश्यत् सान्तनुं ध्वस्तां विलोलाभरणाम्बराम् ॥२२॥ स चापि चिन्तयामास ते प्रतिकृतिक्रियाम् ।मद्विधे घस्तुनिपुंषि प्रभो परिमयोदयात् * मत्स्यपुराणम् * [ऊनपञ्चाशदधिकशततमो मय्याश्रितानि सैन्यानि जिते मयि विनाशिता । असम्भावित एवास्तु मनः स्वच्छन्दचेष्टितः ॥ २४॥ न तु व्यर्थशतोपुष्टसम्भावितधनो नरः । एवं सञ्चिन्त्य वेगेन समुत्तस्थौ महाबलः ।। मुद्गरं कालदण्डाभं गृहीत्वा गिरिसन्निभः । ग्रसनो घोरसङ्कल्प' सन्दष्टौष्ठपुटच्छदः ।। रथेन त्वारतो गच्छन्नाससादान्तकं रणे । समासाद्य यमं युद्धे ग्रसनोभ्राम्य मुद्गरम् ॥ वेगेन महता रौद्रश्चिक्षेप यममूर्द्धनि । विलोक्य मुद्गरं दोप्तं यमः सम्भ्रान्तलोचनः ॥२८ पञ्चयामास दुर्द्धर्षं मुद्गरं स महाबलः । तस्मिन्नपसृते दूरं चण्डानां भीमकर्मणाम् ॥ याम्यानां किङ्कराणान्तु सहस्रं निष्पिपेप ह । ततस्तां निहतां दृष्ट्वा घोरां किङ्करघाहिनीम् ॥ ३०॥ अगमत् परमं क्षोभ नानाप्रहरणोद्यतः । असनस्तु समालोक्य तां किङ्करमयीञ्चमूम् ।। मेने यमसहस्राणि सृयानि यममायया । निग्राह्य ग्रसनः सेनां विसृजन्नत्रवृष्टयः ॥३॥ फल्पान्तघोरसङ्काशो बभूव क्रोधमूच्छितः । कांश्चिदविभेद शूलानि कांश्चिद्वाणैरजिह्मगैः ॥ ३३ ॥ कांश्चित्पिपेप गदया कांश्च मुद्गरवृष्टिभिः । केचित्प्रासप्रहारैश्च दारुणैस्ताडितास्तदा। अपरे बहुशस्तस्य ललम्बु,हुमण्डले । शिलाभिरपरे जम्नुटुमैरन्यैर्महोच्छ्रयः ॥३५॥ तस्यापर तु गात्रेषु दशनैरपि दंशयन् । अपरे मुष्टिभिः पृष्ठं किङ्कराः प्रहरन्ति च ॥३६॥ अभिद्रुतस्तथा घोरैर्ग्रसनः क्रोधमूच्छितः । उत्सृज्य गात्रं भूपृष्ठे निष्पिपेप सहस्रशः ॥ कांश्चिदुत्थाय मुष्टीभिर्जम्ने किङ्करसंश्रयान् । स तु किङ्करयुद्धेन ग्रसनः श्रममाप्तवान् तमालोक्य यमः श्रान्तं निहताश्च स्वयाहिनीम् । आजगाम समुद्यम्य दण्डं महिपवाहनः ॥ ३६॥ आसनस्तु समायान्तमाजम्ने गदयोरसि । अचिन्तयित्वा तत्कर्म ग्रसनस्यान्तकोऽरिहा जम्ने रथस्य मूर्धन्यात् व्याघ्रान् दण्डेन कोपनः । स रथो दण्डमथितार किप्यते ॥ ४१ ॥ संशयः पुरुषस्येव चित्तं दैत्यस्य तद्रयम् । समुत्सृज्य रथं दैत्यः पदातिधरणींगतः ॥
३६४ * मत्स्यपुराणम् * [ ऊनपञ्चाशदधिकशततमो विच्छेद लघुसन्धानो धनेशस्यातिपौरुषात् । ततो धनेशः संक्रुद्धो दानवेन्द्रस्य कर्मणा व्यधमत्तस्य सैन्यानि नानासायकवृष्टिभिः । तदृष्ट्वा दुष्कृतं कम्मं धनाध्यक्षस्यदानवः गृहीत्वा मुद्गरं भीममायसं हेमभूषितम् । धनदानुवरान्यक्षान् निष्पिपेप सहस्रशः॥६४। ते वध्यमाना दैत्येन मुञ्चन्तो भैरवान् रवान् । रथं धनपते. सर्वे परिवार्य व्यवस्थिताः दृष्ट्वा तानर्दितान् देवः शूलं जग्राह दारुणम् । तेन दैत्यसहस्राणि सूदयामास सत्वरः ।। क्षीयमाणेषु दैत्येपु दानवः क्रोधमूछित । जग्राह परशु दैत्यो मईनं दैत्यविद्विषाम् ॥ स तेन सितधारेण धनभर्तुर्महारथम् । चिच्छेद तिलशो दैत्यो ह्याखुः स्निग्धमिवाम्बरम् ॥ ६८ ॥ पदातिरथ वित्तेशो गदामादाय भैरवीम् । महाहव विमर्देषु गुप्तशत्रुविनाशिनीम् ॥६॥ अधृप्यां सर्वभूतानां बहुचर्पगणार्चिताम् । नानाचन्दनदिग्धाङ्गां दिव्यपुष्पविवासिताम् निर्मलायोमयीं गुर्वीममोघां हेमभूषणाम् । चिक्षेप मूर्ध्नि संक्रुद्धो जम्भस्यतुधनाधिपः आयान्ती तां समालोक्य तडित्सवातमण्डिताम् । दैत्यो गदाभिघातार्थ शस्त्रवृष्टिं मुमोच ह ॥ ७२ ॥ चक्राणिकोणपः प्रासान्भुशुण्डी पटिशानपि । हेमकेयूरनद्धाभ्यां बाहुभ्यां चण्डविक्रमः व्यर्थीकृत्यतुतान् सर्वानायुधान् दैत्यवक्षसि । प्रस्फुरन्तीपपातोनो महोल्केवाद्रिकन्दरे गदयाभिहतो गाढं पपात रथवरे । स्रोतोभिश्चास्य रुधिरं सुनाव गतचेतसः ॥७॥ जम्भन्तु निहतं मत्वा कुजम्भो भैरवस्वनः। धनाधिपस्य संक्रुद्धो पाक्येनातीय फोपितः चक्रघाणमयं जालं दिक्षु यक्षाधिपस्य तु । चिच्छेद घाणजालं तदर्धचन्द्र. शितैस्ततः मुमोच शरवृष्टिन्तु तस्य यक्षाधिपो बली । सनं दैत्यः शखातं चिच्छेद निशितःशरैः व्यर्थीस्तान्तु तां दृष्ट्वा शरवृष्टिं धनाधिप । शक्ति जग्राह दुईपी हेमघण्टाट्टहासिनीम्॥ बाहुना रत्नकेयूरकान्तिसन्तानहासिना । स तां निरूप्य वेगेन फुजम्माय मुमोच ह ॥ सफुजम्भस्य हृदयं दारयामास दारुणा । वित्तेश स्वल्पसत्वस्य पुरुषस्यातिभाविता अथास्य हृदयं भित्या जगाम धरणीतलम् । ततो मुहर्तादस्वस्थो दानवो दारुणातिः जग्राह पहिशं दैत्यः प्रांश शितशिलीमुसम् । सतेन पहिशेनाजी धनदस्य स्नानान्तरम्॥
ऽध्यायः] * देवदानवयुद्धवर्णनम् * वाक्येन तीक्ष्णरूपेण मर्मान्तरविसर्पिणा । निर्विभेदाभिजातस्य हृदयं दुर्जनो यथा ।। तेन पट्टिशघातेन धनेश परिमूच्छितः । निपपात रथोपस्थे जर्जरो धूर्वहो यथा ॥५॥ तथागतन्तु तं दृष्ट्वा धनेशं नरवाहनम् । खड्गास्त्रो निर्स तिर्दवो निशाचारबलानुगः ॥८ अभिदुद्राच वेगेन कुजम्भ भीमविक्रमम् । अथ दृष्ट्वा तु दुर्द्धर्षं कुजम्भो राक्षसेश्वरम् ॥ चोदयामास सैन्यानि राक्षसेन्द्रवधं प्रति । स दृष्ट्वा चोदितां सेना भल्लनानास्त्रभीपणाम् रथादाप्लुत्य वेगेन भूषणद्युतिभास्वरः । खड्गेन कमलानीय विकोशेनाम्बरत्यिपाleE चिच्छेदरिपुवक्त्राणिविचित्राणि समन्ततः । तिर्यक् पृष्ठमधश्चोद्ध्वं दीर्घबाहुमहासिना सन्दष्टौष्टपुटाटोप भूकुटीविकटानन' । प्रचण्डकोपरक्ताक्षो न्ययन्तदानपान रणे ॥१॥ ततो निशेपित्तप्रायां विलोक्य स्वामनीकिनीम् । मुक्त्वा कुजम्भो धनदं गक्षसेन्द्रमभिद्रवत् ॥ १२ ॥ लघसज्ञोऽय जम्भस्तु धनाध्यक्षपदानुगान् । जीवनाहान् सजग्राह यध्यापारी सहस्रशः मूर्तिमन्ति तु रत्नानि विविधानि च दानवाः। वाहनानिव दिव्यानि विमानानिसहनशः धनेशो लन्धसंज्ञोऽथ तामवस्थां विलोक्य तु । निश्वसन दीर्घमुष्णञ्च रोपात् ताम्रविलोचनः ॥ १५ ॥ ध्यात्वास्त्रं गारुडन्दिव्यंवाणं सन्धाय कार्मुके । मुमोचदानवानीके तं धाणं शनुदारपाम् प्रथमङ्कामकात्तस्य 'निधेरुधूंमराजयः । अनन्तरं स्फुलिङ्गानां कोटयो दीप्तवर्चसाम् ॥ ततो ज्यालाकुलं व्योम चकारास्त्रं समन्ततः । तत'क्रमेण दुर्वारं नानारूपं तदाभवत् ।। अमर्तश्चाभवल्लोको ह्यन्धकारसमावृत । ततोऽन्तरिक्षे शंसन्ति तेजस्तेतु परिष्कृतम् ॥ फुजम्भस्तत्समालोच्य दानवोऽतिपराक्रम | अभिदुद्राय वेगेन पदातिर्घनदं नदम् ॥ भाभिमुपमायान्त दैत्यं दृष्ट्वा धनाधिप । बभूप संभ्रमाविष्टः पलायनपरायण ॥१०॥ ततः पलायतस्तस्य मुकुट रनमण्डितम् । पपात भूतले दीतं रविविम्वमिवाम्बरात् ॥ शूराणामभिजातानां भर्तर्यपस्ने रणान् । भर्तुः संग्नामशिरसि युक्तन्तभूपणानत ॥ इति व्यवस्य दुर्धर्षा नानाशस्त्रास्त्रपाणयः। युयुत्सवः स्थिता यक्षामुकुट परिचार्य तम् अभिमानधना धीरा धनदस्य पदानुगा । तानमांश्च मंप्रेक्ष्य दानपाश्चण्डपौरपाः ।।
३६६ * मत्स्यपुराणम् * [ऊनपञ्चाशदधिकशततमी भृ (भु) शुण्डी भैरपाकारां गृहीत्वा शैलगोरवाम् । रक्षिणो मुकुटस्याथ निष्पिपेष निशाचरान् ॥ १०६ ॥ तान् प्रमथ्याथ दनुजो मुकुटन्तन् स्यके रथे । समारोप्यामररिपुर्जिन्या धनदमाहवे ॥ धनानि रत्नानि च मूतिमन्ति तथा निधानानि शरीरिणश्च । आदाय सर्वाणि जगाम दैत्यो जम्भः स्वसैन्यन्दनुजेन्द्रसिंहः । धनाधिपो चै विनिकीर्णमूर्धजो जगाम दीनः सुरभर्तुरन्तिकम् ॥१०॥ .कुजम्भेनाथ संसक्तो रजनीयरनन्दनः । मायाममोधामाश्रित्य तामसी राक्षसेश्वरः॥ मोयामास दैत्येन्द्रं जगत् कृत्वा तमोमयम् । ततो विफलनेत्राणि दानवानां चलानितु नशेकुश्चलितुन्तत्र पदादपि पदन्तदा । ततो नानास्त्रवण दानवानां महावमूम् ॥११२१ जघान धननोहारतिमिरातुरवाहनाम् । वध्यमानेषु दैत्येषु कुजम्भे मूढचेतसि ॥ ११२ ॥ महिपो दानवेन्द्रस्तु कल्पान्ताम्भोदसन्निभः । अस्त्रञ्चकार सावित्रमुल्कासङ्घातमण्डितम् ॥ ११३ ॥ विजृम्भत्यथ सावित्रे परमास्त्रे प्रतापिनि । प्रणाशमामत्तीव्र तमो धोरमनन्तरम् ॥११४ ततोऽस्त्र विस्फुलिङ्गाङ्क तमः कृतन व्यनाशयत् । प्रफुलारुणपद्माभं शरदीवामलं सरः ततस्तमसि सभ्रान्ता दैत्येन्द्राः प्राप्तचक्षुय । चक्रुः रेण मनसा देवानीकैः सहाद्भुतम् ॥ शस्त्रैरमन्निर्मुक्तंर्भुजङ्गास्त्रं विनोदितम् । अथादाय धनु|रमिपूंश्चाशीविषोपमान् ।। कुजम्भोऽधावत क्षिप्रं रसोराजवलम्प्रति । राक्षसेन्द्रस्तमायान्तं विलोक्य स पदानुगः विव्याध निशितैर्वाणैः क्रूराशीविषभीपणे. । तदादानश्च सन्धानं न मोक्षश्चापि लक्ष्यते विच्छेदास्य शरवातान् स्वशरैरतिलाघवात् । ध्वज परमतीक्ष्णेन चित्रकर्मामरद्विपः ॥ सारथिञ्चास्य भल्लेन रथनीडादपातयात् । कुजम्भः कर्मतद् दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रस्य संयुगे रोपरकेक्षणयुतो रथादाप्लत्य दानवः । खड्गं जमाह वेगेन शरदम्बरनिर्मलम् ॥ १२२ ॥ शकेन विभूषितम् । अभ्यद्रवद्रणे दैत्यो रक्षोऽधिपतिमोजसा ॥ तंरक्षोऽधिपतिः प्राप्तं मुद्गरणाहनधृदि । स तु तेन प्रहारेण क्षीणः संभ्रान्तमानसः ॥ तस्थावचेष्टो दनुजो यथा धीरो धराधरः । समुहूर्त समाश्वस्तो दानवेन्द्रोऽतिदुर्जयः॥
ऽध्यायः] * देवदानवयुद्धवर्णनम् * ३६७ रथमारुह्य जग्राह रक्षो घामकरण तु । केशेषु निर्मति दैत्यो जानुनाक्रम्यधिष्टितम् ।। ततः खङ्गेन व शिरश्छेत्तुमैच्छदमर्पणः । तस्मिन् तदन्तरे देवो घरुणोऽपापतिद्रुतम् ।। पाशेन दानयेन्द्रस्य वयन्ध च भुजद्वयम् । ततो पद्धभुजं दैत्यं विफलीस्तपौरूपम् ॥ ताडयामास गया दयामुत्सृज्य पाशधृक् । स तु तेन प्रहारेण स्रोतोमिःक्षतजं घमन् धार रूपं मेयस्य विद्युन्मालालतावृतम् । तदयस्थागतं दृष्ट्वा कुजम्भं महिषासुरः ॥१३० व्यावृत्तवदने गाधे प्रस्तुमच्छत् सुरायुभी । निति वरुणश्चैव तीक्ष्णदंगोत्कटाननः ताबभिप्रायमालक्ष्य तस्य दैत्यस्य दूषितम् । त्यक्त्वारथपथं भीती महिषल्यातिरंहसा भृशं द्रुती जवादिग्भ्यामुभाभ्यां भयविहली । जगाम नितिः क्षिप्रं शरणं पाकशासनम् ॥१३३।। मुद्धस्तु महिपो दैत्यो घरुणं समभिद्रुतः । तमन्तकमुखासक्तमालोक्य हिमवद्युतिः ।। यो सोमास्त्रनिसृष्टं हिमसवातकण्टकम् । पायव्यं चास्त्रमतुलं चन्द्रश्चनो द्वितीयकम् ॥१३५॥ पायुना तेन चन्द्रेण संशुष्केण हिमेन च । व्यथिता दानवाः सर्वे शीतोच्छिन्ना विपौरुषाः ॥१३६॥ न शेकुचालितुं पद्भ्यां नास्याण्यादातुमेव च । महाहिमनिपातेन शस्त्रैश्चन्द्रप्रचोदितः।। गामाण्यमुरसैन्यानामदारान्त समन्ततः । महियो निप्रयतस्तु शीतेनाफरिपताननः ।। पक्षोपालम्भ्य पाणिभ्यामुपविष्टोधोमुखः । सर्वे तेनिष्प्रतीकारादत्याश्चन्द्रमसाजिताः रणेच्छां दूरतस्यत्वा तस्थुस्तेजीवितार्थिन । तत्राप्रवीत्कालनेमिदैत्यानकोपेन दीपितः भो भोः शृङ्गारिणः शृगः ! सर्वे ! शस्त्रास्त्रपारगाः । एकैकोऽपि जगत्सर्व शक्तस्तुलयितुं भुजैः ॥१४१॥ एकोफोऽपि क्षमो प्रस्तुं जगत्सवं चराचरम् । एफेफस्यापि पर्याप्तानसर्यऽपिदिपीकसः फलां पूरयितुं यतात् पोडशीमनिविषमाः । प्रियाताच तिष्ठध्वं समरेऽमरनिर्जिताः न युक्तमेतराणांविशेगादत्यजन्मनाम् । राजावान्तरितोऽम्माफ्तारफो लोकमारफः पिरताना रणादम्मान् ग्रुद्धः प्राणान् हरिप्यति । शीलेन नएनयोनपाक्पाटपाम्तया
।
३६८
* मत्स्यपुराणम् * [ऊनपञ्चाशदधिकशततमो
मूकास्तदाभवन् दैत्या रणद्दशनपतयः ।
तान् दृष्ट्वा नष्टचेतस्कान् दैत्यान् शीतेन सादितान् ॥१४६॥
मत्वा कालक्षम कार्य कालेनेमिर्महासुरः । आश्रित्य दानवी मायां वितत्य स्वं महावपुः
पूरयामास गगनं दिशो विदिश एव च । निर्ममे दानवेन्द्रेशः शरीरे भास्करायुतम् ॥
दिशश्च मायया चण्डै.पूरयामास पावकः। ततोज्वालाकुलं सर्व त्रैलोक्यमभवत्क्षणात्
तेन ज्वालासमूहेन हिमांशुरगमच्छमम् । ततः क्रमेण विभ्रष्टशीतदुर्दिनमावभौ ॥१५०॥
तवलं दानवेन्द्राणां मायया कालनेमिनः । तदृष्ट्वा दानवानीकं लब्धसंज्ञं दिवाकरः ॥
उवाचारुणमुभ्रान्तकोपालोककलोचनः ।
दिवाकर उवाच ।
नयारुणरथं शीघ्र कालनेमिरथोयतः ॥१५२॥
विमर्दस्तत्र विषमो भपिता शूरसक्षयः । एपोऽजितः शशाङ्कोऽत्र तवलं बलमाश्रितम् .
इत्युक्तश्चोदयामास रथं गरुडपूर्वजः । प्रयत्नविधृतैरश्व. सितवामरमालिभिः ॥१५४॥
जगद्दीपोऽथ भगवान् जग्राह विततं धनुः ।
शरौ च द्वौ महाभागो दिव्याचाशीविषद्युती ॥१५५॥
सञ्चारास्त्रेण सन्धाय चाणमेकं ससर्ज स.। द्वितीयमिन्द्रजालेन योजितं प्रमुमोच ह
सञ्चारास्त्रेण रूपाणां क्षणाञ्चके विपर्ययम् । देवानां दानवं रूपं दानवानाच दैविकम्
मत्वा सुरान् स्वकानेव जम्ने घोरास्त्रलाघवात् ।
कालनेमीरुषाविष्टः कृतान्त इव संक्षये ॥१५८॥
कांश्चित् खड्नेन तीक्ष्णेन काश्चिन्नाराचवृष्टिभिः ।
कांश्चिद् गदाभि|राभिः कांश्चिद् घोरैः परश्वधः ॥१५॥
शिरांसि केषांच्चिदपातयच भुजान् स्थान् सारथीश्चोग्नवेगः ।
काश्चित् पिपेपाथ रथस्य वेगात् काश्चित् क्रुधा चोद्धतमुष्टिपातैः ॥१६०॥
रणे विनिहतान् दृष्ट्वा नेमिः स्वान् दानवाधिप. ।
रूपं स्वनं प्रपद्यन्त सुराः सुरधर्पिता. ॥१६॥
•ऽध्यायः * देवासुरयुद्धवर्णनम् * कालनेमी रुषाविष्टस्तेषां रूपं न बुद्धवान् । नेमिदैत्यस्तु तान् दृष्ट्वा कालनेमिमुपाव ह अहं नेमिः सुरो नैव कालनेमे ! विंदस्व माम् । भवता मोहितेनाजी निहता भूरिविक्रमाः ॥१६॥ दैत्यानां दशलक्षाणि दुर्जयानां सुरैरिह । सर्वास्त्रवारणं मुञ्च ब्राहामस्त्रं त्वरान्वितः ]] स तेन चोधितो दैत्यः सम्भ्रमाकुलचेतनः । योजयामास वाणं हि ब्रह्मास्त्रविहितेन तु मुमोच चापि देत्येन्द्रः सस्वयंसुरकण्टकः । ततोऽस्त्रतेजसाव्यातंत्रैलोक्यंसचराचरम् देवानां चामघत् सैन्यं सर्वमेव भयान्वितम् । सञ्चरास्त्रञ्च संशान्तं स्वयमायोधने यमी तस्मिन् प्रतिहते ह्यस्ने भ्रष्टतेजा दिवाकरः। महेन्द्रजालमाश्रित्यचरेस्यां कोटिशस्तनुम् विस्फूर्जत्करसम्पातसमाकान्तजगत्त्रयम् । तताय दानवानीकं गतमजीघशोणितम् ॥ ततश्चावर्षदनलं समन्त(न्ता)दतिसंहतम् । चक्षूपि दानवेन्द्राणां चकारान्धानि च प्रभुः गजानामगलन्मेदः पेतुश्चाप्यरया भुवि । तुरगा निश्वसन्तश्च धर्मात रथिनोऽपि च ॥ इतश्चेतश्च सदिलं प्रार्थयन्तस्तुपातुराः । प्रच्छायविटपांश्चैव गिरीणां गहराणि च ॥ दायाग्निः प्रज्वलंश्चच घोराचिर्दग्धपादपः । तोयार्थिनःपुरो दृष्ट्वा तोयं कल्लोलमालितम् 'पुरस्थितमपि प्राप्तुं न शुकेरवमर्दिताः । अप्राप्य सलिलं भूमौ व्यात्तास्यागतचेतसः ।। तत्र तत्र व्यदृश्यन्त मृता दैत्येश्वरा भुवि । रथे गजाश्च पतितास्तुरगाश्च समापिताः ॥ स्थिता घमन्तो धावन्तो गलद्रक्तवसासृजः 1 दानवानां सहस्राणि व्यदृश्यन्त मृतानितु सञ्जये दानवेन्द्राणां तस्मिन्महति पर्तिते । प्रकोपोधूतताम्राक्षः कालनेमीरुपानुरः ।। अभवत्कल्पमेघामः स्फुरदभूरिशतहदः । गम्भीरास्फोटनिहादजगद्धृदयघट्टकः ॥१.७८॥ प्रच्छाद्य गगनामोगं रविमायां व्यनाशयत् । शीतं ववर्ष सलिलं दानवेन्द्रवलं प्रति ॥१७॥ दैत्यास्तां वृश्मिासाद्य समाश्वस्तास्ततः क्रमात् । वीजाड्डरा इवामानाः प्राप्य वृष्टि धरातले ॥१८०॥ ततः स मेयरूपी तु कालनेमिर्महासुरः । शस्त्रवृष्टिं घचयां देवानीपु दुर्जयः ॥१.८१ तयां वृष्टया याध्यमाना देत्येन्द्राणां महौजलाम् ।
४००
* मत्स्यपुराणम् * [ऊनपञ्चाशदधिकशततमो
गति काञ्चन पश्यन्तो गाव शीतादिता इव ॥१८॥
परस्पर व्यलीयन्त पृष्ठेषु व्यस्त्रपाणय । स्वेषु वाधे व्यलीयन्त गजेषु तुरगेपु च ॥
रथेषु त्वमरास्त्रस्तास्तत्र तत्र निलिलियरे । अपरे कुश्चितैर्गानै स्वहस्तपिहितानना
इतश्चेतश्च सम्भ्रान्ता वभ्रमुर्वं दिशोदश । एव विधेतु सग्रामे तु मुले देवसक्षये ॥१८५
दृश्यन्ते पतिता भूमौ शस्त्रभिन्नाङ्गसन्धय । विभुजाभिन्न मूर्धानस्तथाच्छिन्नोरुजानव
विपर्यस्तरथा
सगा निप्पिष्टध्वजपक्तय । निभिन्नाङ्गैस्तुरङ्गैस्तु गजैश्चावल्सन्निभै
श्रुतरक्तहदैभूमिर्विकृताऽविकृता बभौ । एचमाजी चली दैत्य कालनेमिर्महासुर ॥१८८॥
जम्ने मुहूर्तमात्रेण गन्धर्वाणा दशायुतम् । यक्षाणा पञ्चलक्षाणि रक्षसामयुतानि पट ॥
त्रीणि लक्षाणि जम्ने स किन्नराणा तरस्चिनाम् ।
जम्ने पिशाचमुख्याना सप्तलक्षाणि निर्भय ॥१०॥
इतरेषामसरयाता सुरजातिनिकायिनाम् ।
जम्ने स कोटी सक्रुद्धश्चित्रास्त्रैरस्त्रकोविद ॥१६१ ॥
एवं परिभवे भीमे तदा त्वमरसड्झये । सकुद्धावश्विनी चित्रास्त्रकवचोचली॥१२॥
जनतु समरे दैत्य कृतान्तानलसन्निभम् । तमासाद्य रणे घोरमेकैक पष्टिभि शरै
जम्ने मर्मसु तीक्ष्णाप्रैरसुरम्भीमदर्शनम् । ताभ्या याणप्रहारै स कितिदायस्तवेतन ॥
जग्राह चक्रमप्यारन्तैलधौत रणान्तकम् । तेन चक्रेण सोऽश्विभ्याञ्चिच्छेद रथकूवरम्
जग्राहाथ धनुर्दैत्य शराश्चाशीविषोपमान् । घवर्ष भिपजोमूनिसच्छाद्याकाशगोचरम्
तावप्यस्नैश्चिच्छिन्तु शितैस्तैर्दैत्यसायकान् । तयकर्मतयोर्दृष्टाविस्मित कोपमाविशत्
महता स तु कोपेन सर्वायोमयसादनम् । जग्राह मुद्गरम्भीम कालदण्डविभीषणम् ॥
स ततो भ्राम्य वेगेन विक्षेपाश्विस्थ प्रति । तन्तु मुद्गरमायान्तमालोक्याम्बरगोचरी।
त्यक्त्वा रथी तु ती वेगादाप्लुतो तरसाश्विनी ।
तो रथो स तु निप्पिप्य मुद्गरोऽचलसन्निभ ॥ २० ॥
दारयामास धरणी हेमजालपरिष्कृत । तस्य कर्माश्विनी दृष्ट्वा भिपजी चित्रयोधिनी
पत्रास्त्रन्तु प्रकुर्याते दानवेन्द्रनिवारणम् । ततो पत्रमय वर्षम्प्रावर्तदतिदारुणम् ॥२०॥
. ऽध्यायः] * देवदानवयुद्धवर्णनम् * ४०१ घोरखनप्रहारैस्तु दैत्येन्द्रः स परिष्कृतः । रथो ध्वजो धनुश्चक्रं कवचं चापि काञ्चनम् क्षणेन तिलशो जातंसर्वसैन्यस्य पश्यतः। तदृष्ट्वा दुष्करं कर्मसोऽश्विभ्यांभीमविक्रमः नारायणास्त्रं बलवान् मुमोच रणमूर्द्धनि । चन्नास्त्रं शमयामास दानवेन्द्रोऽस्त्रतेजसा तस्मिन् प्रशान्ते घज्रास्त्रे कालनेमिरनन्तरम् । जीवग्राहं ग्राहयितुमश्विनौ तु प्रचक्रमे ॥ २०६ ॥ तावश्विनौ रणाद्वीती सहस्राक्षरथं प्रति । प्रयाती वेपमानौ तु यदा शस्त्रविवर्जितौ ॥ तयोरनुगतो दैत्यः कालनेमिर्महाबलः । प्राप्येन्द्रस्य रथं क्रूरो दैत्यानीकपदानुगः ।। तं दृष्ट्वा सर्वभूतानि वित्रेसुविह्वलानि तु । दृष्ट्वा दैत्यस्य तत्क्रौयं सर्वभूतानि मेनिरे ॥ • पराजयं महेन्द्रस्य सर्वलोकक्षयावहम् । चेलुःशिखरिणो मुख्याः पेतुरुल्का नभस्तलात् जगर्जुर्जलदा दिक्षु भूताश्च महार्णवाः । तां भूतविकृति दृष्ट्वा भगवान् गरुडध्वजः । ध्ययुध्यता हि पर्ययोगनिद्रां विहाय तु । लक्ष्मीकरयुगाजस्त्रलालिताद्मिसरोरह.॥ शरदम्बरनीलाजकान्तदेवच्छवित्रिभुः । कौस्तुभोद्भासितोरस्को कान्तकेयूरभास्करः । विमृश्य सुरसंक्षोभं चैनतेयं समाह्वयत् । आहूतेऽवस्थिते तस्मिन्नागावस्थितवमणि ॥ दिव्यनानास्त्रतीक्ष्णार्चिरारह्यागात् सुरान् स्वयम् । तत्रापश्यत देवेन्द्रमभिद्रुतमभिप्लुतैः ॥ २१५ ॥ दानवेन्द्रनचाम्भोदसच्छायः पौरपोत्कटः । प्रयात्वा पुरुषोरैरभाग्यर्धनशालिभिः ।। परित्राणायाशुकृतं सुक्षेत्रे कर्म निर्मलम् । अथापश्यन्त दैतेयावियति ज्योतिमण्डलम् स्फुरन्तमुद्याद्रिस्थं सूर्यमुष्णत्चिपा इच । प्रभावं ज्ञातुमिच्छन्तो दानघास्तस्यतेजसः गरतमन्तमपश्यन्त फल्पान्तानलसन्निभम् । तमास्थितञ्च मेघीघद्युतिमक्षयमच्युतम् ।। तमालोक्मासुरेन्द्रास्तु हर्षसम्पूर्णमानसाः । अयंवैदेव! सर्वस्वक्षितेऽस्मिन्निर्जिता.सुराः मयं स दैत्यचकाणां कृतान्तः केशवोऽरिहा। एनमाश्रित्य लोकेषु यज्ञभागभुजोऽमराः ॥ २२१ ॥ इत्युक्त्वा दानवाः सर्वे परिवार्य समन्ततः । निजम्नुर्विविधैरस्वैस्ते तमायान्तमाये । फालेनेमिप्रभृतयो दशदत्या महारथा.। पष्टया विव्याध वाणानां कालनेमिर्जनार्दनम् २६- ।
४०२ * मत्स्यपुराणम् * [ऊनपञ्चाशदधिकशततमो निमिः शतेन वाणानां मथनोऽशीतिभि शरैः। जम्भकश्चैव सप्तत्या शुम्भो दशमिरेवव शेपा दैत्येश्वराः सर्ने विष्णुमेकैकशः शरैः । दशभिश्चैव यत्तास्ते जन्नुः सगरुडं रणे। तेपाममृप्य तन् कर्म विष्णुर्दानवसूदनः । एक्कं दानवं जम्ने पभिः पहिरजिह्मगैः आफर्णकृष्टैर्भूयश्च कालनेमिस्त्रिभि शरैः । विष्णुं विव्याध हृदये क्रोधाद्रतविलोचनः तस्याशोभन्त ते बाणाहृदये तप्तकाञ्चनाः। मयूखानीव दीप्तानि कौस्तुभस्यस्फुटत्विपः तैर्वाणैः किञ्चिदायस्तो हरिर्जनाह मुद्गरम् । सततं भ्राम्य वेगेन दानवाय व्यस यत् दानवेन्द्रस्तमप्राप्तं वियत्येव शितैः शरैः। विच्छेद तिलश क्रुद्धो दर्शयन् पाणिलाघवम् ततो विष्णुः प्रकुपितः प्रासअग्राह भैरयम् । तेन दैत्यस्य हृदय ताडयामास गाढ़तः ॥ क्षणेन लन्धसंज्ञस्तु कालनेमिर्महासुरः । शक्तिक्षग्राह तीक्ष्णाग्रां हेमघण्टाट्टहासिनीम् तया घामभुजं विष्णोविभेद दितिनन्दनः । भिन्नः शत्या भुजस्तस्य त्रुतशोणित आयभी ॥ २३३ ॥ पद्मरागमयेनेव केयूरेण विभूषितः । ततो विष्णुः प्रकुपितो जप्राह विपुलन्धनुः ॥२३४। सप्तदशवनारावांस्तीक्ष्णान् मर्मविभेदिनः । दैत्यस्य हृदयं पड्भिविव्याधचत्रिभिःशरैः चतुर्भिः सारथिञ्चास्यध्वजञ्चैकेनपत्रिणा । द्वाभ्यांज्याधनुपीचापि भुजंसव्यञ्चपत्रिणा स विद्धो हृदये गाढं दैत्यो हरिशिलोमुखैः । स्रुतरक्तारुणप्रांशुः पीडाकुलितमानसः ॥ वकम्पे मारतेनेव नोदित. किंशुकद्रुमः । तमाकम्पितमालक्ष्य गदां जग्राह केशवः ।। ताञ्च वेगेन विक्षेप कालनेमिरथं प्रति । सा पपात शिरस्युग्रा विपुला कालनेमिनः ॥ सञ्चूर्णितोत्तमाङ्गस्तु निपिष्टमुकुटोऽसुरः । तरक्तोघरन्ध्रस्तु स्रुतधातुरिवाचलः ॥ प्रापतत्स्वे रथेभग्ने विसंज्ञः शिष्टजीवितः। पतितस्य रथोपस्थे दानवस्याच्युतोऽरिहा स्मितपूर्वमुवाचेदं पाक्यं चक्रायुध.प्रभुः। गच्छासुर! विमुक्कोऽसि साम्प्रतंजीवनिर्भयः ततः स्वल्पेन कालेन अहमेव तवान्तकः । एतच्छ त्वा घचस्तस्य सारथिः कालनेमिनः अपवाहा रथं दूरमनयत् कालनेमिनः ॥ २४३ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे देवासुरसंग्रामे कालनेमिपराजयो नामैकोनपञ्चाशद- धिकशततमोऽध्यायः।
पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः तारकासुरोपाख्याने देवासुरयुद्ध ग्रसनवधवर्णनम् । सूत उवाच। तं दृष्ट्वा दानवाः क्रुद्धाश्चेरु' स्वैस्वैर्यलैर्वृताः । सरघा इव माक्षीकहरणे सर्वतो दिशम् कृष्णचामरजालाढ्ये सुधाविरचितारे । चित्रपञ्चपताके तु प्रभिन्नकरटामुखे ॥ २॥ पर्वतामे गजे भीमे मदनाविणि दुर्द्धर । आरह्माजी निमिदैत्यो हरि प्रत्युद्ययौ वली ॥ तस्यासन् दानया रौद्रा गजस्य पदरक्षिणः । सप्तविंशतिलाहनाः किरीदकववोज्वला: अश्वारूढश्च मथनो जम्भकश्चोष्ट्रवाहन । शुम्भोऽपि विपुलं मेपं समारयावजद्रणम् ।। अपरे दानवेन्द्रास्तु यत्तानानास्त्रपाणयः । आजघ्नु समरे बुद्धा विष्णुमक्लिष्टकारिणम् परिघेण निमिदैत्यो मथनो मुद्गरेण तु । शुम्भः शूलेन तीक्ष्णेन प्रासेन ग्रसनस्तथा ।। चक्रेण महिपः क्रुद्धो जम्भ. शत्या महारणे । जनारायणं सर्वे शेपास्तीक्ष्णश्च मार्गणः ॥ ८॥ तान्यस्त्राणि प्रयुक्तानि शरीरं विविशुहरैः । गुरूक्तानुपदिष्यान्वै सच्छिप्यस्य श्रुतानिव असम्भ्रान्तोरणेविष्णुस्थ जग्राह कार्मुकम् । शरांश्चाशीविषाकारांस्तैलधौतान जिह्मगान् ततोऽभिसन्ध्य दैत्यांस्तानाकर्णाष्टकार्मुकः । अभ्यद्रवद्रणे क्रुद्धो दैत्यानीकेतुपौरपान् निमि विव्याध विंशत्या घाणानामग्निवर्चसाम् । मथनं दशभिर्वाणः शुभ्रं पञ्चभिरेवच एकेन महिषं कुद्धो विव्याधोरसि पत्रिणा। जम्भं द्वादशभिस्तीक्ष्णैः सर्वाश्चैकैकशोऽष्टमिः ॥ १३ ॥ तस्य तलाधयं दृष्ट्वा दानवाः क्रोधमूच्छिताः। मर्दमानाः प्रयत्नेन चरित्यद्भुतं रणम् ॥ विच्छेदाथ धनुर्विष्णोनिमिर्भलेन दानवः । सन्ध्यमानं शरं हस्ते चिच्छेद महिषासुरः पीडयामास गरदं जम्भस्तीक्ष्णस्तु सायकः । भुजं तस्याहनगाहें शुम्भोभूधरसन्निभ. छिन्ने धनुपि गोविन्दो गदा जग्राह भीपणाम् । तां प्राहिणोत्स चेगेन मथनायमहाहवे
४०४
* मत्स्यपुराणम् * [पञ्चाशदधिकशततमो
तामप्राप्तां निमिर्धाणश्चिच्छेद तिलशो रणे। तां नाशमागतां दृष्ट्वा हीनाने प्रार्थनामिव !
जग्राह मुद्गरं घोरं दिव्यरतपरिष्कृतम् । तं मुमोचाथ वेगेन निमिमुद्दिश्य दानवम् ।।
तमायान्तं वियत्येव प्रयो दैत्या न्यवारयन् । गदया जम्भदैत्यस्तु प्रसनः पहिशेन तु
शत्त्या व महिपो दैत्यः स्वपक्षजयकाङ्क्षया। निराकृतं तमालोक्य दुर्जने प्रणयं यथा
जग्राह शक्तिमुग्राग्रामप्टघण्टोत्कटस्वनाम् । जम्भाय तां समुद्दिश्य प्राहिणोद्रणभीषणः
तामम्बरस्थां जग्राह गजो दानवनन्दनः ।
गृहीतां तां समालोक्य शिक्षामिव विवेकिभिः ॥ २३ ॥
दृढं भारसहं सारमन्यदादाय कार्मुकम् । रौद्रास्तमभिसन्धाय तस्मिन् धाणं मुमोच ह
ततोऽस्त्रतेजसा सर्व व्याप्तं लोकं चराचरम् । ततो घाणमयं सर्वमाकाशं समदृश्यत ।
भूदिशो विदिशश्चैव याणजालमया यभुः । दृष्ट्वा तदस्त्रमाहात्म्यं सेनानीर्घसनोऽसुरः
ब्राह्ममस्त्रश्चचारासी सर्वास्त्रं विनिवारणम् । तेन तत्प्रशमयातं रौद्रास्त्रं लोकघस्मरम्
अस्त्रे प्रतिहते तस्मिन् विष्णुनिघसूदनः । कालदण्डास्त्रमकरोत् सर्वलोकभयङ्करम् ।
सन्धीयमाने तस्मिंस्तु मारुतःपरुपोवयो । चकम्पे च मही देवी दैत्याभिन्नधियोऽभवन्
तदस्त्रमुग्रं दृष्ट्वा तु दानवा युद्धदुर्मदाः । चक्रुरस्त्राणि दिव्यानि नानारूपाणि संयुगे॥
नारायणास्त्रं प्रसनो गृहीत्वा चक्रं निमिः स्वास्त्रवरं मुमोच ।
एकैकमस्त्रञ्च चकार जम्भस्तत्कालदण्डास्त्रनिवारणाय ॥३॥
यावन्न सन्धानदशां प्रयान्ति दैत्येश्वराश्चास्त्रनिधारणाय ।
तावत् क्षणेने जघान कोटीदैत्येश्वराणां सगजान् सहाश्यान् ॥३२॥
अनन्तरं शान्तमभूत्तदस्त्रं दैत्यास्त्रयोगेन तु कालदण्डम् ।
शान्तं तदालोक्य हरिः स्वशस्त्रं स्वविक्रमे मन्युपरीतमूर्तिः ॥३३॥
जग्राह चक्रं तपनायुताभमुग्रारमात्मानमिव द्वितीयम् ।
चिक्षेप सेनापतयेऽभिसन्ध्य कण्ठस्थलं बनकठोरमुग्रम् ॥३४॥
चक्रं तदकाशगतं विलोक्य सर्वात्मना दैत्यवराः स्ववीयैः ।
नाशक्नुवन् धारयितुं प्रवण्डं देवं यथा कर्म मुधा प्रपन्नम् ॥३५॥
ऽध्यायः] • देवासुरयुद्धवर्णनम् * ४०५ तमप्रतस्यं जनयत्नजय्यं चक्र पपात प्रसनस्य कण्ठे । द्विधा तु कृत्वा प्रसनस्य कण्ठं तद्रक्तधारारणघोरनाभिः । जगाम भूयोऽपि जनार्दनस्य पाणि प्रवृद्धानलतुल्यदीप्ति ॥३६॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे देवासुरसंग्रामे ग्रसनवधोनाम पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः । एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः तारकासुरोपाख्याने देवासुरयुद्धवर्णनम् । सूत उवाच। तस्मिन् विनिहते देत्ये ग्रसने लोकनायके । निर्मर्यादमयुध्यन्त हरिणा सह दानवाः ॥ पहिशेर्मुशलः पाशैर्गदाभिः कुशलैरपि । तीक्ष्पाननैश्च नाराचैश्चकै शक्तिभिरेव च ॥२ तानस्त्रान् दानवमुक्तान् चित्रयोधी जनार्दनः । एकैकं शतशश्चके वाणैरग्निद्विजोपमः ततः क्षीणायुधप्राया दानया भ्रान्तचेतसः । अस्त्राण्यादातुमभवन्न समर्था यदा रणे तदा मृतैर्गजैरश्वैर्जनार्दनमयोधयन् । समन्तात् कोटिशो दैत्या सर्वत प्रत्ययोधयन् यहु कृत्वा चपुर्विष्णुः किञ्चिच्चान्तभुजोऽभवत्। उवाचवगरुत्मन्तं सस्मिन्सुतुमुलेरणे गरत्मन् ! कचिदधान्तस्त्वमस्मिन्नपि साम्प्रतम् । यद्यधान्तोऽसि तद्याहि मथनस्य रथम्प्रति ॥ ७ ॥ श्रान्तोऽस्यथ मुहर्तन्त्वं रणादपस्तोभय । इत्युक्तो गरुडस्तेन विष्णुना प्रभविष्णुना। आससाद रणे दैत्यं मथनं घोरदर्शनम् । दैत्यस्त्वभिमुखं दृष्ट्वा शङ्खचक्रगदाधरम् ॥६॥ जवान भिन्दिपालेन शितवाणेन पक्षसि । तत् प्रहारमचिन्त्यैव विष्णुस्तस्मिन् महाहवे ॥ १०॥ जघान पञ्चभिर्वाणर्मार्जितैश्च शिलाशितै. । पुनर्दशभिरामस्तवताड स्तनान्तरे ॥११॥ विद्धो मर्मसु दैत्येन्द्रो हरियाणैरकम्पत । स मुहतं समाश्चास्य जमाह परिचन्तदा ॥
४०६
* मत्स्यपुराणम् * [ एकपञ्चाशदधिकशततमो
जम्ने जनार्दने चापि परिघेणाग्निवर्चसा । विष्णुस्तेन प्रहारेण किञ्चिदाधूणितोऽभवत्
ततः क्रोधविवृत्ताक्षो गदाञ्जग्राह माधयः । मथनं सरथं रोपानिप्पिपेपाथ रोपितः ।।
स पपाताथ दैत्येन्द्रः क्षयकालेऽचलो यथा । यस्मिन्निपतिते भूमौदानवे वीर्यशालिनि
अवसादं ययुदैत्याः कर्दमे करिणो यथा । ततस्तेषु विपन्नेषु दानघेप्यतिमानिपु ॥१६
कोपरक्ततया नाम महिपो दानवेश्वरः । प्रत्युद्ययो हरि रौद्रः स्वयाहुवलमास्थितः ॥
तीक्ष्णधारेण शूलेन महियो हरिमर्दयन् । शक्या च गरुडं पीरो महिपोऽभ्यहनद्धृदि ।
ततो व्यावृत्तवदनं महाचलगुहानिभम् । यस्तु मैच्छद्रणे दैत्यः स गरुन्मन्तमच्युतम्
अथाच्युतोऽपि विज्ञाय दानवस्य विकीर्पितम् ।
वदनं पूरयामास दिव्यैरस्त्रैर्महावलः ॥ २० ॥
महिपस्याथ ससृजे वाणोघं गरुडध्वजः । पिधाय वदनं दिव्यैदिव्यास्त्रपरिमन्त्रितैः ।।
स तैर्वाणैरभिहतो महिपोऽचलसन्निभः । परिवर्तितकायोऽधः पपात न ममार च ॥
महिपं पतितं दृष्ट्वा भूमी प्रोवाच केशवः । महिषासुर ! मत्तस्त्वं पधन्नास्वैरिहाईसि॥
योपियध्यः पुरोक्तोऽसि साक्षात् कमलयोनिना
उत्तिष्ठ जीवितं रक्ष गच्छास्मात् सङ्गरागुतम् ॥ २४ ॥
तस्मिन् पराङ्मुखे दैत्ये महिषे शुम्भदानवः । सन्दष्टौप्टपुट. कोपाद्धृकुटीकुटिलाननः
निर्मथ्य पाणिना पाणि धनुरादाय भैरवम् । सजञ्चकार सधनुः शरांश्चाशीविपोपमान्
स चित्रयोधी द्रढमुष्टिपातस्ततस्तु विष्णुं गरुडञ्च दैत्यः ।
याणे लवह्निशिखानिकाशैः क्षिप्तरसंख्यैः परिघातहीनः ॥ २७ ॥
विष्णुश्च दैत्येन्द्रशराहतोऽपि भुशुण्डिमादाय कृतान्ततुल्याम् ।
तया भुशुण्ड्या च पिपेप मेयं शुम्भस्य पत्रं धरणीधराभम् ॥२८॥
तस्मादवप्लुत्य हताच मेपाभूमी पदातिः स तु दैत्यनाथः ।
ततो महीस्थस्य हरि. शरोधान् मुमोच कालानलतुल्यभासः ॥ २६ ॥
शरैस्त्रिभिस्तस्य भुजं विभेद पड्भिश्च शीपं दशभिश्च केतुम् ।
विष्णुविकृष्टः श्रवणावसानं दैत्यस्य विव्याध विवृत्तनेत्रः ॥३०॥
४०७ ऽध्यायः] * देवासुरयुद्धवर्णनम् * स तेन विद्धो व्यथितो बभूव दैत्येश्वरो विस्रुतशोणितोत्रः । ततोऽस्य किञ्चिालितस्य धैर्यादुधाच शवाम्बुजशाईपाणिः ॥ ३१ ॥ कुमारिषध्योऽसि रणं विमुञ्च शुम्भासुर ! स्वल्पतरैरहोभिः। चधं न मत्तोऽर्हसि चेह मूढ ! वृथैव कि युद्धसमुत्सुकोऽसि ॥ ३२ ॥ शुम्भो धयो विष्णुमुखान्निशम्य निमिश्च निप्पेष्टुमियेष विष्णुम् । गदामथोद्यम्य निमिः प्रचण्डां जधान गाढा गरुडं शिरस्तः ॥ ३३ ॥ जम्भोऽपि विष्णुं परिघेण मूर्ध्नि प्ररुष्टरत्नौघविचित्रभासा। तो दानवाभ्यां विषमैः प्रहारैनिपेतुरुा घनपायकाभो ॥ ३४ ॥ तत्कर्म दृष्ट्वा दितिजास्तु सर्व जगर्जुरश्चैः कृतसिंहनादाः । धपि चास्फोट्य खुराभिघातळदारयन् भूमिमपि प्रचण्डाः । घासांसि चैवादुधुवुः परे तु दध्मुश्च शड्डानकगोमुखौधान् ॥ ३५ ॥ अथ संज्ञामवाप्याशु गरुडोऽपि सकेशवः । पराङ्मुखो रणात्तरमात् पलायतमहाजयः इति श्रीमस्त्यपुराणे देवासुरसंग्रामे एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय. । द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः तारकासुरोपाख्याने देवासुरयुद्धवर्णनम् । सूत उवाच । तमालोक्य पलायन्त विभ्रष्टध्वजकार्मुकम् । हरि देवः सहस्राक्षो मेने भन्नदुराहवे ॥१ दैत्यांश्च मुदितान् दृष्ट्वा कर्तव्यं नाध्यगच्छत । अथायान्निकटे विष्णोः सुरेशः पाकशासनः ॥ २ उवाच चैनं मधुरं प्रोत्साहपरिवृहकम् । किमेभिः क्रीडसे देव ! दानवैर्दुष्टमानसः ॥३ दुर्जनलब्धरन्ध्रस्य पुरुषस्य कुतः क्रियाः। शकेनोपेक्षितो नीचो मन्यते वलमात्मनः ॥ - ४०८ * मत्स्यपुराणम् * [द्विपञ्चाशदधिकराततमो तस्मान्न नीचं मतिमान् दुर्गहीनंहि सन्त्यजेत् । अथाग्रेसरसपत्या रथिनो जयमाप्नुयुः कस्ते ससाभवाने हिरण्याक्षबधे विभो !। हिरण्यकशिपुदैत्यो धीर्यशाली मदोद्धतः॥ त्वां प्राप्यापश्यदातुरो विपर्मस्मृतिविभ्रमम् । पूर्वेऽप्यतिवलायेच दैत्येन्द्राः सुरथिद्विपः विनाशमागताः प्राप्य शलभाइय पायकम् । युगे युगे च दैत्यानां त्वमेवान्तकरोहरे !॥ तथैवायेह मन्नानां भव विष्णो! सुराश्रयः । एवमुक्तस्ततो विष्णु यंवर्द्धत महाभुजः ऋद्ध्या परमया युक्त' सर्वभूताश्रयोऽरिहा । अथोघाच सहस्राक्षं कालक्षममधोक्षजः॥ दैत्येन्द्राः स्वर्वधोपायः शत्या हन्तुं हि नान्यतः । दुर्जयस्तारको दैत्यो मुक्वा सप्तदिनं शिशुम् ॥ ११ ॥ कश्चित् स्त्रीवध्यतां प्राप्तो क्धेऽन्यस्य कुमारिका । जम्भस्तु वध्यतां प्राप्तो दानवः क्रूरविक्रमः ॥ १२ ॥ तस्माद्वीर्येण दिव्येन जहि जम्भं जगद्वरम् । अवध्यःसर्वभूतानां त्वां विनासतु दानवः मया गुप्तो रणे जम्भं जगत्कण्टकमुद्धर । तद्वैकुण्ठयवः श्रुत्वा सहस्राक्षोऽमरारिहा ।। समादिशत् सुरान् सर्वान् सैन्यस्य रचनांप्रति । यत्सारं सर्वलोकेषु वीर्यस्य तपसोऽपि च ॥१५॥ तदेकादशरुद्रांस्तु चकाराग्रेसरान् हरि. । व्यालभोगाङ्गसन्नद्धा वलिनो नीलकन्धराः ।। चन्द्रलेखनचूडालामण्डितानुशिखण्डिनः । शूलञ्चालीभिषङ्गाढ्या भुजमण्डलभैरवाः॥ पिङ्गोत्तुङ्गजटाजूटाः सिंहचर्मानुपगिन । कपालीशादयो रुद्रा विद्रावितमहासुराः ॥ कपाली पिङ्गलो भीमो विरूपाक्षो विलोहितः। अजेशः शासनः शास्ता शम्भुः खण्डो ध्रुवस्तथा ॥ १६ ॥ एते एकादशानन्तवला रद्रा प्रभाविनः । पालयन्तो वलस्याने दारयन्तश्च दानवान् ॥ आप्याययन्तस्त्रिदशान् गर्जन्त इच चाम्बुदाः । हिमाचलाभे महति काञ्चनाम्बुरुहस्रजि ॥ २१ ॥ प्रचलच्चामरे हेमघण्टासड्ढातामण्डिते। ऐरावते चतुर्दन्ते मातङ्गेश्चलसंस्थिते ॥ २२ ॥ महामदजलस्रावे कामरूपे शतक्रतुः।
४०६ ऽध्यायः] * देवासुरयुद्धवर्णनम् * तस्यो हिमगिरेः शृङ्गे भानुमानिय दीप्तिमान् ॥ २३ ॥ वस्यारक्षत् पदं सव्यं मारुतोऽमितविक्रमः । जुगोपापरमनिस्तु ज्वालापूरितदिड्मुखः पृष्ठरक्षोऽभवद्विष्णुः ससैन्यस्य शतक्रतोः । आदित्या घसवो विश्वमरुतश्चाश्विनावपि गन्धर्चा राक्षसा यक्षाः सकिन्नरमहोरगाः । नानाविधायुधाश्चित्रा धाना हेमभूषणम् कोटिशः कोटिशः कृत्वा वृन्दं चिह्नोपलक्षितम् । विधाययन्त स्थाडीति यन्दिवृन्दपुरःसरा । चेरदैत्यवधे हृष्टाः सहेन्द्राः सुरजातयः ॥ २७॥ शतक्रतोरमरनिकायपालिता पताकिनी गजशतवाजिनादिता । सितातपत्रध्वजपटकोटिमण्डिता बभूव सा दितिसुतशोकवर्धिनी ॥ २८ ॥ भायान्तीमवलोक्याथ सुरसेनाङ्गजासुरः । गजरूपी महाम्भोदसवातो भाति भैरवः ॥ परश्वधायुधोदैत्यो दंशितोष्ठकसपुटः । ममर्दचरणे देवांश्चिक्षेपान्यान् करेण तु ॥३०॥ परान् परशुना जघ्ने दैत्येन्द्रो रौद्रविक्रम । तस्य पातयतः सेनां यक्षगन्धर्व किन्नराः मुमुचुः संहताः सर्वे चित्रशस्त्रास्त्रसंहतिम् । पाशान् परश्वधांश्चक्रान् भिन्दिपालान् समुद्गरान् ॥ ३२ ॥ कुन्तान् प्रसानसींस्तीक्ष्णान मुद्गरांश्चापि दुःसहान् । तान् सर्वान् सोऽग्रसदैत्य कवलानिय यूथप ॥ ३३ ॥ कोपास्फालितदीर्धाप्रकरास्फोटेन पातयन् । विचचार रणे देवान् दुष्प्रेक्ष्यो गजदानवः यस्मिन् यस्मिन्निपतति सुरवृन्दे गजासुर । तस्मिन् तस्मिन् महाशब्दो हाहाकारकृतोऽभवत् ॥ ३५ ॥ अथ विद्रवमाण तद्वलं प्रेक्ष्य समन्तत । रद्रा. परस्परं प्रोचुरहङ्कारोत्थितार्चिपः ॥३६ भो! भो! गृहीत दैत्येन्द्र मर्दतैनं हताश्रयम् । कतैनं शितै शूलै अनश्च मर्मसु ॥ ३७॥ फपाली पाक्यमाकर्ण्य शूलं शितशिखामुखम् । सम्माय॑ घामहस्तेन संरम्भविवृतेक्षणः अधायद् भृकुटीवक्रो दैत्येन्द्राभिमुखो रणे । ढेन मुष्टियन्धेन शूलं विष्टभ्य निर्मलम् ॥ ४१० * मरस्यपुराणम् * [द्विपञ्चाशदधिकशततमो जधान कुम्भदेशे तु कपाली गजदानवम् । ततो दशापि ते रुद्रा निर्मलायोमय रणे ॥ जम्नुः शूलैश्च दैत्येन्द्र शेलवर्माणमाहवे । तशोणितरन्ध्रस्तु शितशूलमुखादितः ॥ बभौ कृष्णच्छचिर्दैत्यः शरदीवामलं सरः । प्रोत्फुल्लारुणनीलाजसङ्घातः सर्वतोदिशम् भस्मशुभ्रतनुच्छायै रुदैहंस रिघावृतः। उपस्थितातिदैत्योऽथ प्रचलत्कर्णपल्लवः ॥४३॥ शम्भु विभेद दशनैर्नाभिदेशे गजासुरः । दृष्ट्वा सक्तन्तु रुद्राभ्यां नवरुद्रास्ततोऽद्भुतम् ततक्षुर्विविधैः शस्त्रैः शरीरममरद्विपः । निर्भया वलिनो युद्धे रणभूमी व्यवस्थिताः ॥ मृतं महिपमासाद्य बने गोमाययो यथा। कपालिनी परित्यज्य गतश्चासुरपुङ्गवः॥४५॥ वेगेन कुपितो दैत्यो नवरुद्रानुपाद्रवत् । ममर्दवरणाघातैर्दन्तश्चापि करेण च ॥ ४६॥ स तैस्तुमुलयुद्धेन श्रममासादितो यदा । तदा कपाली जग्राह फरन्तस्यामरद्विषः ॥४७ भ्रामयामास वेगेन ह्यतीव च गजालुरम् । दृष्ट्वाश्रमातुरं दैत्यं किञ्चित्स्फुरितजीवितम् निरुत्साह रणे तस्मिन् गतयुद्धोत्सवोद्यमम् । ततः पतत एवास्य चर्म चोत्कृत्य भैरवम् ॥ ४६॥ स्रवत्सर्वाङ्गरक्तीचं चकाराम्बरमात्मनः । दृष्ट्वा विनिहतं दैत्यं दानवेन्द्रा महाबलाः ॥ वित्रेसुर्दुद्रुवुर्जग्मुनिपेतुश्च सहस्रशः । दृष्ट्वा कपालिनो रूपं गजचर्माम्बरावृतम् ॥५१॥ दिक्षु भूमो तमेवोग्रं रुद्रं दैत्या व्यलोकयन् । एवं बिलुलिते तस्मिन् दानवेन्द्रे महावले ।। ५२॥ द्विपाधिरूढोदैत्येन्द्रो हतदुन्दुभिना ततः । कल्पान्ताम्वुधराभेन दुर्द्धरेणापि दानवः ।। निमिरभ्यपतत्तूणं सुरसैन्यानि लोडयन् । यां यां निमिगजो याति दिशंतांतांसवाहनाः सन्त्यज्य दुद्रुवुर्देघा भयास्त्यिक्तहेतवः । गन्धेन सुरमातङ्गा दुद्रुवुस्तस्य हस्तिनः ॥ पलायितेपु सैन्येषु सुराणां पाकशासनः । तस्थौ दिक्पालकैः सार्द्धमष्टभिः केशवेन च संप्राप्तो निमिमातङ्गो यावच्छागजं प्रति । तावच्छ्रक्रगजो यातो मुक्या नादं स भैरवम् ॥ ५७ ।। ध्रियमाणोऽपि यत्नेन न स्वकैरपतिष्ठति । पलायिते गजे तस्मिन्नारूढः पाकशासनः॥ विपरीतमुखो युद्ध्यदानवेन्द्रयलं प्रति । शतक्रतुस्तु पत्रेण निर्मि पक्षस्यताडयत् ॥
. ऽध्यायः] • देवासुरयुद्धवर्णनम् . गदया दन्तिनधास्य गण्डदेशेऽहमद इदम् । तन्प्रदारमचिन्त्यप निमिनिर्भयपागमः ॥ ६॥ ऐरावतं फटोदेशे मुद्गरंणाम्यताउयन् । स हलो मुद्गरंणाय शमपुर थाये ॥ ६॥ जगाम पधायग्णधरणी भूधराति. लाघवान् क्षिप्रमुत्याय ततोऽमरमागतः ॥६२ रणादपससाशु मोपितो निमिस्तिना। ततो यायुर्वपो रक्षी यशरपांसुलः ॥६३ सम्मुगो निमिमानलो जयनाचटफापन निरनो यमी शैलो धनवारहदो यथा ॥ धनेशोऽपि गदा गुवीन्तस्य दानयादम्निनः । चिक्षेप येगाईत्येन्द्रो निपपाताम्य मुनि गनो गदानिरातेन स तेन परिमूतिः । दन्तभिन्या धगं येगात् पाताचलसग्निभः पतिने तु गजे तम्मिन् सिदनादो महाभूत । सर्गत मुरमैन्यानां गजहितदिनः ।। हेपाग्येण चाश्चानां गुणाम्फोटेश्च धन्विनाम् । गजन्तं निहतं दृष्ट्वा निमिधापि परामुपः ॥ ६८ ॥ श्रुत्या च सिंहनादध सुराणामतिकोपनः । जम्मो जग्पाल फोपेग पीताम्य इय पायफः स मुरान्कोपरताक्षीधनुष्यारोप्यसायकम् । तिष्ठतेत्यप्रवीत्तावत्सारथिंचाप्यचोदपत् धेगेन चलनस्तस्य तथस्थामवाति । यथादित्यसहस्रस्याभ्युदितस्योदयाचले १७१ पताफिना रथेनाजी फिदिणाजालमालिना । शशिशुभ्रातपत्रेण स तेन स्यन्दनेन तु ॥ घट्टयन सुरसैन्यानां हृदयं समदृश्यत । तमायान्तमभिप्रेक्ष्य धनुष्याहितसायकम् ॥७३ शतरतुदीनान्मा दृढमाधत्त काफम् । याणञ्च नेलधौताग्रमर्द्धचन्द्रमजिहागम् ॥७॥ तेनास्य सशरचापं रणे चिच्छेद वृत्रहा । क्षिप्र सन्त्यज्यतचापं जम्भो दानयनन्दन । अन्यत् फार्मुकमादाय वेगवद्धारसाधनम् । शरांश्चाशीविपाकायस्तैलधौतानजिह्मगान् शकं विव्याधदशमिर्जवदेशे तु पत्रिभिः । हृदये च विभिश्चापिद्वाभ्याशस्यन्धयोर्डयोः शमोऽपिदानन्द्राय चाणजालमपीदृशम् । अप्राप्तान दानवेन्द्रस्तु शरान शमभुजेरितान् विच्छेद दशामामो शरैरग्निशियोपः। ततस्तु शरजालेन देवेन्द्रो दालमेश्वरम् ॥ थाच्छादयत यत्नेन वर्षास्विच धनैर्नभ । दैत्योऽपि चाणजालन्तव्यधमत्सायकै.शितैः यथा पायुर्घनाटो परिवार्य दिशोमुखे । शकोऽथ क्रोधसंरम्भान्न विशेषयते यदा ॥
४१२ * मत्स्यपुराणम् * [द्विपञ्चाशदधिकशततमो दानवेन्द्र तदा चक्रे गन्धर्वास्त्र महागुतम् । तदुत्थतेजसा व्याप्तमभूगगनगोचरम् ॥ गन्धर्वनगर वापि नानाप्राकारतोरणं । अञ्चद्विद्धताकारैरस्त्रवृष्टि समन्तत ॥८३॥ अथास्त्रवृष्ट्या दैत्याना हन्यमाना महाचम् । जम्भ शरणमागच्छदप्रमेयपराक्रमम् ॥ व्याकुलोऽपि स्वय दैत्य सहस्राक्षास्त्रपीडित । स्मरन् साधुसमाचार भीतनाणपरोऽभवत् ॥८५॥ अथास्त्र मोसल नाम मुमोच दितिनन्दन । ततो यो मुसलै सर्वमभवत् पूरित जगत् एकप्रहारकरणैरप्रधृष्यै समन्तत । गन्धर्वनगरन्तेषु गन्धर्वास्त्रविनिर्मितान् ॥८॥ गान्धर्ममस्त्र सन्ध्राय सुरसैन्येषु चापरम् । एकैकेन प्रहारेण गजानश्वान्महारथान् ॥ रथाश्वान् सोऽहनत् क्षिप्रशतशोऽथसहस्रश । तत सुराधिपस्त्याष्ट्रमस्त्रञ्च समुदीरयन् सन यमानेततस्त्वाप्ने निश्चेरु पावकार्चिप । ततोयन्त्रमयादिव्यानायुधान्दुष्प्रधर्पिण तैयन्त्रैरभयद्वन्द्वमन्तरिक्ष वितानकम् । वितानकेन तेनाथ प्रथम मौसले गते ॥३१॥ शैलास्त्र मुमुचे जम्भी यन्त्रसवातताडनम् । व्यामप्रमाणरुपलैस्ततोवर्षमवर्तत ॥६२ त्याटस्य निर्मितान्याशु यन्त्राणि तदनन्तरम् । तेनोपलनिपातेन गतानि तिलशस्तत ॥३॥ यन्त्राणि तिलश कृत्या शैलास्त्र परिमूर्धसु । निपपातातिरेगेनादारयत् पृधिवी तत ॥१४॥ ततो बनास्तमकरोत् सहस्राक्ष पुरन्दर । तदोपलमहाहपं व्यशीर्यत समन्तत ॥६५ तत प्रशान्ते शैलास्ने जम्भो भूधरसन्निभ । ऐपीकमस्लमकरोदभीतोऽतिपराक्रम ॥ ऐपीनागमन्नाश पन्नास्त्र शस्यल्लभम् । विजृम्भत्यथ चैपीके परमास्त्रेति दुर्धर ।। जज्यलुर्देवसैन्यानि सस्यन्दनगजानि तु । दह्यमानेप्यनीरेषु तेजसा मुरसत्तम ॥६८ भाग्नेयमस्त्रमारोवल्यान् पाकशासन । तेनास्त्रेण ततस्त्वेन्द्रमनसत्तदनन्तरम् ॥ तस्मिन् प्रतिहते चास्पायकास्त्र यजम्मत ! जयालकायजम्भस्यसरथच ससारथिम् तन प्रतिहत सोऽय देत्येन्द्र प्रतिभानवान् । पानामुमोबाथशमनपायकार्चिषाम् तनो जल पर व्योमस्कुरद्वियुलनाकुले । गम्भीरमुरज पानेरापूरितमियाम्यरम् ॥१०२ ऽध्यायः] * देवासुरयुद्धवर्णनम् ॐ ४१३ करीन्द्रफरतुल्याभिर्जलधाराभिरम्वरम् । पतन्तीनिर्जगत् सर्व क्षणेनापूरित वा । शान्तमाग्नेयमस्वं तत् प्रविलोक्पसुराधिपः। घायव्यमस्त्रमफरोन्मेघसवातनाशनम् घायव्यास्त्रयलेनाथ निधूते मेघमण्डले । यभूव विमलं व्योमनीलोत्पलदलमभम् ॥ घायुना चातिघोरेण कम्पितास्ते तु दानवाः । न शेकुस्तत्र ते स्थातुं रणेऽतिवलिनोऽपि ये ॥ १०६ ॥ तदाजम्भोऽभवन्छेलो दशयोजनविस्तृतः । मारतप्रतिघातार्थ दानवानां भयापहः । मुक्तनानायुधोदनतेजोऽभिध्वलितद्रुमः । ततः प्रशमिते वायो दैत्येन्द्र पर्वतारुती॥ महाशनी पत्रमयी मुमोचाशु शतक्रतुः । तयाशन्या पतितया दैत्यस्याचलरूपिणः ॥ फन्दराणिव्यशीर्यन्त समन्तानिर्भराणि तु। ततः सा दानवेन्द्रस्य शैलमाया न्यवर्तत निवृत्तशैलमायोऽथ दानवेन्द्रो महोत्कटः । यभूव कुञ्जगे भीमो महाशैलसमारुतिः ।। स ममर्द सुरानीकं दन्तैश्चाप्यहनत् सुरान् । वभा पृष्ठतः कांश्चित्करणावेष्ट्यदानवः ।। ततः क्षपयतस्तस्य सुरसैन्यानि वृत्रहा । अस्त्रं त्रैलोक्यदुर्धर्ष नारसिंहं मुमोच ह ॥ तत सिंहसहस्राणि निश्चेमन्त्रतेजस' । कृष्णदंष्ट्राट्टहासानि क्रकचामनसानि च । तैर्विपादितगात्रोऽसौ गजमायांव्यपोथयत् । ततधासीविषोधोरोऽभवत्फणशताकुलः विषनिश्वासनिर्दग्धं सुरसैन्यं महारथः । ततोऽस्तं गारुडं चक्रे शक्रश्चारभुजस्तदा ॥ ततो गरुत्मतस्तस्मात् सहस्राणि विनिर्ययुः । तैर्गरत्मभिरासाय जम्मं भुजगरूपिणम् कृतन्तु सण्डशो दैत्य सास्यमाया व्यनश्यत । प्रनष्टायान्तु मायाया ततो जम्भो महासुरः ॥ ११८॥ चकार रूपमतुलं चन्द्रादित्यपथानुगम् । घिवृत्तवदनो प्रस्तुमियेष मुरपुङ्गवान् ॥ ११॥ ततोऽस्यविपिशुवत्र समहारथकुझराः । सुरसेनाविशत् भीमं पातालोत्तानतालुकम् सैन्येषु अस्यमानेषु दानवेन बलीयसा । शकोदैन्यं समापन्नः श्रान्तराहुः सवाहनः ।। फर्तव्यतां नाध्यगच्छत् प्रोवाचेदं जनार्दनम् । किमनन्तरमत्रास्ति फर्नन्यस्यावशेपितम् यदाश्रित्य घटामोऽस्य दानवस्य युयुत्सवः । ततो हरिरुपाचेदं पत्रायुधमुदारधीः ।। न साम्प्रतं रणस्त्याज्यस्त्यया फातरमरवः ।
४१४ * मत्स्यपुराणम् * [द्विपञ्चाशदधिकशततमो धर्द्धस्याशु महामायां पुरन्दर ! रिपुम्प्रति ॥ १२४ ॥ मयैप लक्षितोदैत्योऽधिष्ठित प्राप्तपौरुषः । मा शक! मोहमागच्छ क्षिप्रमस्त्रं स्मरप्रभो! ततः शक्र प्रकुपितो दानवं प्रति देवराट् । नारायणास्त्रं प्रयतो मुमोचासुरचक्षसि ॥ एतस्मिन्नन्तरे दैत्यो विवृतास्योऽग्रसत् क्षणात् । त्रीणि लक्षाणि गन्धर्व किन्नरोरगराक्षसान् ॥ १२७ ॥ ततो नारायणास्त्रं तत् पपातासुरवक्षसि । महास्त्रभिन्नहृदय सुनाव रुधिरञ्च स ॥ रणागारमिवोद्गारं तत्याजासुरनन्दन । तदस्त्रतेजसा तस्य रूपं दैत्यस्य नाशितम् ॥ तत एवान्तर्दधे दैत्यो वियत्यनुपलक्षितः । गगनस्थ सदैत्येन्द्रः शस्त्रासनमतीन्द्रियम् मुमोच सुरसैन्यानां संहारे कारणम्परम् । प्रासान् परश्वधांश्चक्रान् वाणान् वज्रान् समुद्गरान् ॥ १३१ ।। कुठारान् सह सङ्गैश्च भिन्दिपालानयोगुडान् । चवर्ष दानवो रौद्रो ह्ययन्ध्यानक्षयानपि तैरस्त्रैर्दानवैर्मक्तैर्देवानीकेषु भीषणैः । वाहुभिर्द्धरणिः पूर्णा शिरोभिश्च सकुण्डलैः ॥ ऊरुभिर्गजहस्ताभैः फरीन्द्रर्धाचलोपमे. । भग्नेपादण्डचक्राक्ष रथैः सारथिभिः सह । दुःसञ्चाराभवत् पृथ्वी मांसशोणितकर्दमा । रुधिरोघहदायर्ता शवराशिशिलोच्चयः । कयन्धनृत्यसड्कुले स्रवद्वसाम्प्रकर्दमे । जगत्त्रयोपसंहृती समे समस्तदेहिनाम् ॥ १३६ ॥ गालगृध्रवायसाः परं प्रमोदमादधुः । कविद्विराष्टलोचनः शयस्य रौति पायसः ।। विराटपीपरान्त्रकाः श्यान्ति जम्बुकाः कचित् । कचित् स्थितोऽतिभीपणः स्वतुण्डनिहितौरसः ॥ १३८ ॥ मृतस्य मांसमादाय श्चजातय संस्थिताः। फचिद् वृको गजासृजम्पयो निलीयतान्त्रतः ॥ १६॥ कचित्तुरङ्गमण्डलीविरप्यते श्यजातिभि ! कचित् पिशावजातकः प्रपीतशोणितासः स्यकामिनीयुते? तं प्रमोदमत्तसम्ममै । ममतदानयाननं पुरो यमस्तु मे प्रियः॥१४१॥ ! फरोऽयमज्यमन्निमो (१)ममास्तु फर्णपूरकः । सरोपमीक्षने परावपां विना प्रियं तदा पग प्रिया एवापयत् धृतोष्णशोणितासयम् । विकृप्य शापवर्म तत्प्रपद्धसान्द्रपटयम् ऽध्यायः] * देवासुरयुद्धवर्णनम् * ४१५ चकार यक्षकामिनीतलं कुठोरपाटितम् । गजस्य दन्तमारजं प्रगृह्य कुम्भसम्पुटम् ॥ १४ ॥ विपाट्य मौक्तिक पर प्रियाप्रसादमिच्छते । समांसशोणितासचं पपुश्च यक्षराक्षसाः ॥ १४ ॥ मृताश्च केशवासितं रसं प्रगृह्य पाणिना । प्रियाधिमुक्तजीवितं समानयामृगासवम् ।। न पथ्यतां प्रयाति मे गतं श्मशानगोवरम् । नरस्य तजहात्यसो प्रशस्य किन्नराननम् सताग एप नोमयं दधाति मुक्तजीवितः । तदानतस्य शरते मया तदेकयाननम् ॥ इति प्रियाय घलभा पदन्ति यक्षयोपितः । परे कपालपाणयः पिशाचयक्षराक्षसाः॥ चदन्ति देहि मे मम ममातिभक्ष्यचारिणः । परेऽवतीर्य शोणितापगासु धोतमूर्तयः ।। पितॄन् प्रतर्घ्य देवताः समर्चयन्ति चामिषैः । गजोडुपे सुसंस्थितास्तरन्ति शोणिनं हृदम् १५१ ॥ इति प्रगाढसङ्कटे सुरासुरे मुसङ्गरे । भयं समुभयदुर्जया भटाः स्फुटन्ति मानिनः ॥१५२ ॥ ततः शको धनेशश्च धरणः पचनोऽनलः । यमोऽपि निमंतिश्चापि दिव्यास्त्राणि महावलाः ॥ १५३ ॥ आकाशे मुमुचुः सर्वे दानवानभिसन्ध्य ते । अत्राणि व्यर्थतां जग्मुर्देवानां दानवान् प्रति ॥ १५४ ॥ संरम्भेणाप्ययुध्यन्त संहतास्तुमुलेन च । गति न विविदुश्चापिधान्ता दैत्यस्य देवताः दैत्यास्त्र भिन्नसङ्गा धकिञ्चित्करताङ्गताः । परम्परं व्यलीयन्त गापः शीतादिता इस सदयस्यान् हरिदृष्ट्वा देवान् शप्रमुवाच ह । ब्रह्मास्त्रंस्मर देवेन्द्र ! यस्याबध्योन विद्यते विष्णुना चोदितः शक्रः सस्मारास्त्रं महाजसम् ॥ १५ ॥ मंपूजितं नित्यमरातिनाशनं समाहितं याणममित्रघातने । धनुष्यजय्ये विनियोज्य बुद्धिमानभूततो मन्त्रसमाधिमानसः ॥५॥ स मन्त्रमुधार्य यतान्तराशयोयधाय दैत्यम्य धियामिसन्ध्य तु ।
४१६ * मत्स्यपुराणम् * [ द्विपञ्चाशदधिकशततमो विष्य कर्णान्तमकुण्ठदीधितिम् मुमोच वीक्ष्याम्वरमार्गमुन्मुखः ॥१५६ ॥ अथासुरः प्रेक्ष्य महास्नमाहितं विहाय मायामवनो व्यतिष्ठत। प्रवेपमानेन मुखेन शुष्यता चलेन गात्रेण च सम्भ्रमाकुलः ॥१६०॥ ततस्तु तस्यास्त्रवराभिमन्त्रितः शरोऽर्द्धचन्द्रप्रतिमो महारणे । पुरन्दरस्यासनयन्धुताङ्गतो नवार्कविम्ब घपुषा विडम्बयन् ॥१६१॥ किरीटकोटिस्फुटकान्तिसङ्कट सुगन्धिनानाकुसुमाधिवासितम् । प्रकीर्णधूमज्वलनाभमूर्द्धजम् पपात जम्भस्य शिर. सकुण्डलम् ॥१६२॥ तस्मिन् विनिहते जम्भे दानवेन्द्रा पराङ्मुखा. । ततस्ते भग्नसंकल्पाः प्रययुर्यत्रतारक: तांस्तु प्रस्तान् समालोक्य श्रुत्वा रोपमगात्परम् । सजम्भदानवेन्द्रन्तु सुरैरणमुखेहतम् सावलेपं ससंरम्भ सगर्व सपराक्रमम् । साविष्कारमनाकारं तारको भावमाविशत् ॥ स जैत्रं रथमास्थाय सहस्त्रेण गरुत्मताम् । स कोपादानवेन्द्राणां सुरै रणमुखे गत १६६ सर्वायुधपरिष्कारः सर्वास्त्रपरिरक्षितः । त्रैलोक्य ऋद्धिसंपन्नः सुविस्तृतमहाननः॥ रणायाभ्यपतत्तर्ण सैन्येन महता वृतः। जम्मा म्भास्त्रक्षतसर्वाङ्गं त्यक्तरावतदन्तिनम् ॥ सज मातलिना गुप्तं रथमिन्द्रस्य तेजसा । तप्तहेमपरिष्कार महारत्नसमन्वितम् ॥१६६ चतुर्याजन विस्तीर्ण सिद्धसङ्घपरिष्कृतम् । गन्धर्षकिन्नरोद्गीतमप्सरोनृत्यसङ्कुलम् १७० •सर्वायुधमसम्बाधं विचित्ररचनोज्वलम् । तं रथं देवराजस्य परिवार्य समन्ततः ॥१७॥ दंशिता लोकपालास्तु तस्थुः सगरुडध्वजाः । ततश्चवाल वसुधा ततो रुक्षो मरुद्धवी ॥ १७२ ॥ ततोऽम्बुधय उद्भूतास्ततो नष्टा रविप्रभा। ततस्तम समुद्भूतं नातोऽदृश्यन्त तारका ततो जज्वलुरस्राणि ततोऽफम्पत घाहिनी । एकतस्तारको दैत्यः सुरसवास्तु चैकतः लोकावसादमेकत्र जगत्पालनमेकतः । चरावराणि भूतानि सुरासुरविभेदतः ११७५ ॥ तद्विधाप्येकता यातं ददृशुः प्रेक्षका इच । यद्वस्तु किञ्चिल्लोकेषु निपु सत्तास्वरूपकम् । तत्त्वनादृश्यदखिलं सिलीभूतविभूतिकम् ॥ १७६ ॥ अत्राणि तेजांसि धनानि धैर्य सेनायलं धीर्यपराक्रमी च।
ऽध्यायः]
* देवासुरयुद्धवर्णनम् ।
सत्यौजसां तनिकरं यभूव सुरासुराणां तपसो वलेन ॥ १७७ ॥
अथाभिमुखमायान्तं नवभिनतपर्वभिः । वाणैरनलकल्पाविभिदुस्तारकं हृदि ॥१७॥
स तानविन्त्य दैत्येन्द्रः सुरवाणान् गतान् हृदि ।
नवभिनव भिर्वाणः सुरान् विव्याध दानयः ।। १७६ ॥
जगद्धरणसम्भूतः शल्यैरिच पुरःसरे । ततश्छिन्नं शरवातं संग्रामे मुमुचुः सुराः १८०
अनन्तरं व कान्तानामश्रुपातमिवानिशम् । तदप्राप्तं वियत्येव नाशयामास दानवः ॥
शरैर्यथा कुचरितः प्रख्यातं परमागतम् । सुनिर्मलं क्रमायातं कुपुत्रः स्वं महाकुलम् ॥
ततो निवार्य तद्वाणजालं सुरभुजेरितम् । घाणोम दिशः पृथ्वी पूरयामास दानयः ।।
चिच्छेद पुश्देशेषु स्थफैः स्थाने व लाघवात् ।
: पाणजालैः सुतीक्ष्णाः कवहिणवाजितैः ॥ १८४ ॥
+ फर्णान्तकृष्टैबिमलैः सुवर्णरजतोज्ज्वले. । शास्त्रार्थःसंशयप्राप्तान्यथार्थान् वै विकल्पितैः
ततः शतेन वाणानां शनं विव्याध दानवः ।
नारायणं च सप्तत्या नचत्या च हुताशनम् ॥ १८६ ॥
दशभिर्मास्तं मूनि यमं दशमिरेव च । धनदश्चैव सप्तत्या वरुणञ्च तथाटभिः ॥१८७ ॥
विंशत्या निर्गति दैत्यः पुनश्चाष्टामिरेव च । विव्याध पुनरेकैकं दशभिर्दशभिः शरैः॥
तथा च मातलि दैत्यो विव्याध त्रिभिराशुगः ।
गण्डं दशमिश्चैव स विव्याध पतत्रिभिः ॥ १८ ॥
पुनश्च दैत्यो देवानां तिलशो ननपर्वभिः ।
चकार धर्मजातानि चिच्छेद च धनूपि नु ।
ततो विफपचा देवा विधानुष्काः शरैः कृताः ॥ १० ॥
अथान्यानि चापानि तस्मिन् सरोपा रणे लोकपाला गृहीत्या समन्तात् ।
शररक्षपर्दानवेन्द्रं ततस्तु तदा दानवोऽमपंसंरक्नेः ॥ १६ ॥
शरानग्निकल्पान् घवर्षामराणाम् ततो पाणमादाय फल्पानलामम् ।
जधानोरसि क्षिप्रमिन्द्रं मुपादुम् महेन्द्रोऽप्यकम्पदयोपस्य पव ॥ १२॥
* मत्स्यपुराणम् * [ द्विपञ्चाशदधिकशततमो विलोक्यान्तरिक्ष सहस्रार्कविम्बम् पुननिधो विष्णुमुभूतवीर्यम् | शराभ्यां जघानांसमूले सलीलम् ततः केशवस्यापतच्छाझैमने ॥१३॥ ततस्तारकः प्रेतनाथं पृषत्कर्वसुं तस्य सव्ये स्मरन् क्षुद्रभाषम् । शरैरग्निकल्प लेशस्य कायम रणे शोषयद् दुर्जयो दैत्यराजः ॥१६॥ शरैइग्निकल्पैश्चकाराशु दैत्यस्तथा राक्षसान भीतभीता दिशासु । पृपत्वश्व रूविकारप्रयुक्तं चकारानिलं लीलयचासुरेशः ॥ १५ ॥ क्षणालुब्धवित्ताः स्वयं विष्णुशक्रानलाद्याः सुसंहत्य तीक्ष्णैः पृपत्कः । प्रचा प्रचण्डेन दैत्येन सार्धम् महासङ्ग सङ्गरग्रासकल्पम् ॥१६॥ अथानम्य चापं हरिस्तीक्ष्णवार्हनत् सारथिं दैत्यराजस्य हृद्यम् ॥ ध्वजं धूमकेतु. फिरी महेन्द्रो धनेशो धनुः काञ्चनानद्धपृष्ठम् । यमो वाहुदण्डं रथाङ्गानि घायुर्निशाचारिणामीश्वरस्यापि धर्म ॥१६॥ दृष्ट्वा तयुद्धममरैरकृत्रिमपराक्रमम् । दैत्यनाथः कृतं संख्ये स्वया युगवान्धवः ॥१६॥ मुमोच मुद्गरं भीमं सहस्राक्षाय सगरे । दृष्ट्वा मुद्गरमायान्तमनिवार्यमथाम्बरे ॥१६॥ रथादाप्लुत्य धरणीमगमत् पाकशासन. । मुद्गरोऽपि रथोपस्थे पपात परपस्चन ।। स रथं चूर्णयामाप्त न ममार च मातलि । गृहीत्वा पट्टिशं दैत्यो जघानोरसि केशवम् ॥ २०१॥ स्कन्धे गल्मतः सोऽपि निपसाद विचेतनः । खड्लेन राक्षसेन्द्रश्च चर्त नरपादनम् ।। यमच पातयामास भूमो दैत्यो भुशुण्डिना । पहिच भिन्दिपालेन ताडयामास मूर्द्धनि पायुश्च दोामुक्षिप्य पातयामास भूतले । जलेशञ्च घनुष्कोट्यायुयामासकोपनः ततो देवनिकायानामेकैकं समरे ततः । जघानास्त्ररसंख्येयेदैत्येन्द्रोऽमितविक्रमः ॥ लन्धसंश. क्षणाद्विष्णुधकं जग्राह दुर्द्धरम् । दानवेन्द्रयसासितं पिशिताशनकोन्मुसम् मुमोच दानवेन्द्रस्य दृढं पक्षसि केशवः । पपात चक्रं दैत्यस्य हृदये भास्करद्युति २०७ व्यशीर्यत तत फाये नीलोत्पलमिवाश्मनि । ततो पवं महेन्द्रस्तु प्रमुमोचावितञ्चिरम् यस्मिन् जयाशा शमस्य दानवेन्द्ररणे त्वभूत् ।
। ऽध्यायः] * देवासुरयुद्धवर्णनम् - ४१६ तारकस्य सुसंप्राप्य शरीरं शोर्यशालिनः ॥ २० ॥ व्यशीर्यत विकीर्णाविः शतधा सण्डताङ्गतम् । विनाशमगमन्मुक्तं वायुना सुरवक्षसि।। ज्वलितं ज्वलनाभासमङ्कुशं कुलिश यथा । विनाशमागतं दृष्ट्वा वायुश्चाङ्कुशमाहवे ॥२११ रुष्टः शैलेन्द्रमुत्पाट्य पुष्पितदुमकन्दरम् । चिक्षेप दानवेन्द्राय पञ्चयोजनविस्तृतम् ॥ महीधरं तमायान्तं दैत्यः स्मितमुखस्तदा । जग्राह घामहस्तेन शैलं कन्दुकलीलया ॥ ततो दण्डं समुद्यम्य कृतान्त क्रोधमूच्छितः । दैत्येन्दं मूनि चिक्षेपभ्राम्य वेगेनदुर्जयः सोऽसुरस्यापतन्मूनि दैत्यस्तञ्च न बुद्धवान् । कल्पान्तदहनालोक्यामजय्यांज्वलनस्ततः शक्ति विक्षेप दुर्द्धर्षा दानवेन्द्राय सयुगे । न घा शिरीपमालेव सास्य वक्षस्यराजत ॥ ततः सङ्गं समाप्य कोशादाकाशनिर्मलम् । भासितासितदिग्भागं लोकपालोपि नितिः ॥ २१७ ।। चिक्षेप दानवेन्द्राय तस्य मूर्ध्नि पपात च । पतितश्चागमत् सङ्गंस शीघ्रं शतखण्डताम् जलेशस्तूप्रदुर्द्धपं विषपावकभैरवम् । मुमोच पाशं दैत्यस्य भुजयन्धामिलापकः सदैत्यभुजमायाद्य सर्पः सद्यो व्यपद्यत । स्फुटितरविक्रूरदशनाहिमहाहनु ॥ २२० ॥ ततोऽश्विनी समस्त ससाध्याः समहोरगा. 1 यक्षराक्षसगन्धर्या दिव्यनानास्त्रपाणयः जम्मुर्दैत्येश्वरं सर्वे संभूय सुमहायलाः । न चास्नाण्यस्य सनन्त गारे पन्नाचलोपमे तती रथादवप्लुत्य तारको दानवाधिपः । जघान कोटिशो देवान् करपाणिभिरेव च हतोपानि सैन्यानि देवानां विप्रदुद्रुवुः । दिशोभीतानि सन्त्यज्य रणोपकरणानितु लोकपालांस्ततो दैत्यो धयन्धेन्द्रमुवान रणे । सकेशवान् हुदै पारीः पशुमारः पशुनिय स भूयो रथमास्याय जगाम स्वकमालयम् । सिद्धगन्धर्यसघुएविपुलाचलमस्तकम् ॥ स्तूयमानो दितिसुतरप्सरोमिर्विनोदितः । त्रैलोक्यलक्ष्मीस्तदेशे प्राविशन् स्यपुरंयथा निषसादासने पमरागरन विनिर्मिते । तत किन्नरगन्धर्षनागनारी विनोदिनः ।। क्षणं चिनोद्यमानस्तु प्रचलन्मणिकुण्डलः ॥ २२८ ।। इति श्रीमत्स्यपुराणे देवासुरसंप्रामे तारफजयलामो नाम द्विपञ्चाशद धिकशततमोऽध्यायः। ।
4 त्रिपश्चाशदधिकशततमोऽध्यायः तारकपीडितदेवः ब्रह्मस्तुतिकरणम् । सूत उवाच । प्रादुरासीत् प्रतीहारः शुभ्रनीलांशुकाम्बरः। स जानुभ्यां मही गत्वा पिहितास्य.स्वपाणिना ॥१॥ उवाचानाविलं पाक्यमल्पाक्षरपरिस्फुटम् । दैत्येन्द्रमर्कवृन्दानां विभ्रन्तं भास्वरं वपुः॥ फालनेमिः सुरान् वद्धांश्चादायद्वारि तिष्ठति । सविज्ञापयति स्थयंक चन्दिभिरितिप्रभो! तन्निशम्याब्रवीद् दैत्यः प्रतीहारस्य भापितम् । यथेष्टं स्थीयतामेमिह मे भुवनत्रयम् केलं पाशवन्धेन विमुक्तैरविलम्बितम् । एवं कृते ततो देवा दूयमानेन चेतसा ॥ ५ ॥ जग्मुर्जगद्गुरु द्रष्टुं शरणं कमलोद्घम् । निवेदितास्ते शकाद्या. शिरोभिर्धरणिङ्गताः तुष्टुवुः स्पष्टवर्थर्ववोभिः कमलासनम् ॥ ६ ॥ देवा ऊचुः। त्यमोङ्कारोऽस्यड्कुराय प्रसूतो विश्वस्यात्मानन्तभेदस्य पूर्वम् । सम्भूतस्यानन्तरं सत्वमूर्ते ! संहारेच्छोस्ते नमो रद्रमूर्ते ! ॥ ७ ॥ व्यक्ति नीत्वा त्वं घपुः स्वं महिना तस्मादण्डात् स्वाभिधानादचिन्त्यः । यावापृथिव्योरुदुर्ध्वखण्डावराभ्याम् हाण्डादस्मात्त्वं विभागकरोपि ॥ ८ ॥ व्यक्तं मेरी यजनायुस्तवाभूदेवं विद्मस्त्वत्प्रणीतश्चकास्ति । व्यक्तं देवा जन्मनः शाश्वतस्य धास्ते मूर्द्धा लोचने चन्द्रसूर्यो ॥६॥ व्याला. केशाः श्रोत्ररन्ध्रा दिशस्ते पादौ भूमि भिरन्ध्र समुद्राः । मायाकार कारणस्त्वं प्रसिद्धो वेदैः शान्तो ज्योतिपा त्वं विमुक्तः ॥१०॥ वेदार्थषु त्यां विवृण्वन्ति वुझ्या हृत्पद्मान्तः सन्निविष्टं पुराणम् । त्वामात्मानं लन्धयोगा गृणन्ति सायर्यास्ताः सप्त स्दमाः प्रणीताः॥११ --- . ऽध्यायः] * ब्रह्मरन्तदेवसान्त्वना * ४२१. तासां हेतुर्याष्टमी चापि गीता तस्यां तस्याङ्गीयसे चै त्वमन्तम् । दृष्ट्वा मूर्ति स्थूलसूक्ष्माञ्चकार देवैर्भावाः कारणैः कैश्चिदुक्ताः ॥१२॥ साभूतास्ते त्वत्त पवादिसर्गे भूयस्ता तां वासनान्तेऽभ्युपेयुः। त्वत्सङ्कल्पेनान्तमायाप्तिगूढः कालोमेस्रोध्वस्तसंख्याविफल्पः ॥२३॥ भावाभावव्यक्तिसंहारहेतुस्त्वं सोऽनन्तस्तस्य कर्तासि चात्मन् । येऽन्ये सूक्ष्माः सन्ति तेभ्योऽभिगीतः स्थूला भावाश्चावृतारश्च तेषाम् ॥१४॥ तेभ्यः स्थूलस्तैः पुराणैः प्रतीतोभूनं भव्यं चैवमुभूतिभाताम् । भाने भावे भावितं त्वा युनक्ति युक्तं युक्तं प्रतिमावान्निरस्य । इत्थं देवो भक्तिमाजां शरण्यस्त्राता गोप्ता नो भवानन्तमूर्तिः ॥१५॥ विरिश्चिममराः स्तुत्या ब्रह्माणमविकारिणम्। तस्युमनोमिरिटार्यसम्प्राप्तिप्रार्थनास्ततः एवं स्तुतो विरिचिस्तु प्रसादं परमं गतः । अमरान्वरदेनाह चामहस्तेन निर्दिशन् ॥१७॥ ब्रह्मोवाच । नारी याऽभर्ट काऽकस्मात् तनुस्ते त्यक्तभूषणा । न राजते तथा शन ! सानवाशिरोरुहा ॥ १८ ॥ हुताशन ! चिमुक्तोऽपि न धूमेन विराजसे। भस्मनेवप्रतिच्छन्नो दग्धदावश्चिरोपितः।। यमामयमयेनेच शरीरे त्वं विराजसे । दण्डस्यालम्बनेनेव हारच्छुस्तु पदे पदे ॥२०॥ रजनीचरनाथोऽपि कि भीत इव भापसे । राक्षसेन्द्रक्षताराते त्वमरातिशतो यथा ।। तनुस्ते परुणीच्छुप्का परीतस्येव घहिना । विमुक्करुधिरं पाशं फणिमिः प्रविलोकयन् घायो!भवान् विचेतस्कस्त्वं स्निग्धरिय निर्जितः । फिन्त्यं विभेपि धनद ! संन्यस्तैय कुवेरताम् ॥ २३ ॥ रुद्रास्तिशालिनः सन्तो घदध्वं घशालताम् । भवन्तः फेन तत् क्षितं तेजस्नु भवतामपि अफिश्चित्करतां यातः करम्नेन विमासते। अलं नीलोत्पलामेन चक्रेण मधुसूदन ! ॥ कि त्वयानुदालीनभुवनं प्रविलोकनम् । क्रियते स्तिमिताक्षेण भवता विश्वतोमुप !n एपमुक्ताः सुरास्तेन ब्रह्मणा ग्रहमूर्तिना । पाचां प्रधानमूतन्वान्मरतं तमचोदयन् ॥२७ ,
४२२
* मत्स्यपुराणम् * [त्रिपञ्चाशदधिकशततमी
अथ विष्णुमुखैर्देवैः श्वसनः प्रतिवोधितः । चतुर्मुखं तदा प्राह चराचर गुरुं चिमुम् ॥
न तु सि चराचरभूतगतं भवभावमतीष महानुच्छ्रितः प्रभवः ।
पुनरर्थिवचोविस्तृतश्रवणोपमकौतुकभावतः ॥ २६ ॥
त्वमनन्त करोपि जगद्भवताम् स चराचरगर्भविभिन्नगुणाम् ।
अमरासुरमेतदशेपमपि त्वयि तुल्यमहोजनकोऽसि यतः ।
पितुरस्ति तथापि मनोविकृतिः सगुणी विगुणो वलयानवलः ॥३०॥
भवतो घरलाभनिवृत्तभयः कुलिशाङ्गसुतो दितिजोऽतिवलः ।
सचराचरनिर्मथने किमिति कितवस्तु कृतोविहितो भवता ॥ ३१ ॥
किल देव त्वया स्थितये जगताम् महबद्भुतचित्रविवित्रगुणाः।
अपि तुष्टिकृतः श्रुतकामफला पिहिता द्विजनायक देवगणाः ॥३२||
अपि नाकमभूत्किलयज्ञभुजाम् भवतो विनियोगवशात्सततम् ।
अपहत्य बिमानगणं स कृतो दितिजेन महामरुभूमिसमः ॥३३॥
कृतवानसि सर्वगुणातिशयं यमशेपमहीधरराजतया ।
सममिङ्गितभावविधिः स च गिरिर्गगनेन सदोच्छ्रयतां हि गतः ॥३४॥
अधिवासविहारविधावुचितो दितिजेन पविक्षतङ्गतटः ।
परिलुण्ठितरत्नगुहानिवहो यादैत्यसमाश्रयताङ्गमितः ॥३५॥
सुरराज ! स तस्य भयेन गतं व्यदधादशरीर इतोऽपि वृथा
उपयोग्यतया विवृतं सुचिरं विमलद्युतिपूरितदिग्वदनम् ॥३६॥
भवतैव विनिर्मितमादियुगे सुरहेतिसमूहमनुत्यमिदम् ।
दितिजस्य शरीरमवाप्य गतं शतधा मतिभेदमिवारपमनाः ॥२७॥
यासारधूलिध्वस्ताङ्गा द्वारम्याः स्य कदथिनः । लधप्रवेशाः कृष्णवयं तस्यामरद्विषः
समायाममरा देव ! निरुटेऽप्युपोशिताः । वेघहस्तैरजरूपन्तस्ततोऽपद्दसितास्तु ते॥
महार्याः सिद्धसर्वार्था भवन्त स्वत्पभाषिणः ।
चाटुयुक्तमयो फर्म हामरा बहुभाषत ॥४०॥
-- ऽध्यायः] * ब्रह्मकृतदेवसान्त्वनम् । समयं दैत्यसिंहस्य सशक्रस्य तु संस्थिताः । घदतेति च दैत्यस्य प्रेष्यविहसिता बहु ॥४१॥ ऋतवो मूर्तिमन्तस्तमुपासन्ते ह्यनिशम् । कृतापराधसन्त्रासंन त्यजन्ति कदाचन ॥४२ तन्त्रीत्रयलयोपेतं सिद्धगन्धर्वकिन्नरः । सुरागमुपधानित्यं गीयते तस्य वेश्मसु ॥४३॥ हन्तास्तोपकरणमित्राणि गुरुलाघः । शरणागतसत्यागी त्यक्तसत्यपरिश्रयः ॥४४॥ इति नि.शेपमथवा निःशेषं वै न शक्यते । तस्यायिनयमारयातुं स्रष्टा तत्र परायणम् ।। इत्युक्तः स्वात्मभूर्देवः सुरेदैत्यविचेष्टिते । सुरानुवाच भगवांस्तत: स्मितमुखाग्घुजः ॥ ब्रह्मोचाव। भयध्यस्तारको दैत्यः सर्वरपि सुरासुरे। यस्य वध्यः स नाद्यापि जातस्त्रिभुवने पुमान् ॥४॥ मया स घरदानेन छन्दयित्वा निवारित । तपस साम्प्रतंराजानैलोक्यदहनात्मकात् ॥ सच पने वधं दैत्यः शिशुत. सप्तयासरात् । स सप्तदिवसो बालः शङ्कराद्यो भविष्यति तारकस्य निहन्ता स भास्कराभोभविष्यति । साम्प्रतंचाप्यपत्नीक शङ्करोभगवान् प्रभुः यचाह मुक्तवान् यत्या हातालकरता सदा । उत्तानो घरद. पाणिरेप देन्या सदैव तु ॥ हिमाचलस्य दुहिता सा तु देवी भविष्यति । तस्याः सकाशाद्य शस्त्वरण्यां पावको यथा ॥५॥ जनयिष्यति तं प्राप्य तारकोऽभिमविष्यति । मयान्युपायः सस्तो यथैहि भविष्यति शेषधाप्यस्य विभयो विनश्येत्तदनन्तरम् । स्तोककालं प्रतीक्षध्यग्निविशडून चैतसा ॥ इत्युक्तास्त्रिदशास्तेन साक्षात् कमलजन्मना । जग्मुम्तंप्रणिपत्येशंयथायोग दिपोकसः ततो गतेपु देवेषु ग्रहा लोकपितामहः । निशां सम्मार भगवान् स्वतनो.पूर्वसम्मयाम् ततो भगवती रात्रिरुपतस्ये पितामहम् । तां विविक्ते समालोक्य ग्रह्मोवाचविभावरीम् ब्रह्मोवाच । चिमारि! महत्कार्य विधानामुपस्थितम् ।
४२४ * मत्स्यपुराणम् * [त्रिपञ्चाशदधिकशततमो तत्कर्तव्यं त्वया देवि ! शृणु कार्यस्य निश्चयम् ॥५८॥ तारको नाम दैत्येन्द्र सुरकेनुरनिर्जित । तस्याभावाय भगवान् जनयिष्यति चेश्वर सुतं स भविता तस्य तारकस्थान्तकारक । शङ्करस्याभवत् पत्नी सती दक्षता तु या सा मृता कुपिता देवी कस्मिंश्चित्कारणान्तरे । भविताहिमशैलस्यदुहिता लोकभावनी विरहेण हरस्तस्या मत्वा शून्यं जगत्त्रयम् । तपस्यन् हिमशैलस्य कन्दरे सिद्धसेविते । प्रतीक्षमाणस्तजन्म कञ्चित्कालं निवत्स्यति । तयोः सुतप्ततपसोभविता यो महाबल' स भविष्यति दैत्यस्य तारकस्य विनाशक । जातमात्रातुसादेवीस्वल्पसंज्ञाचभामिनी विरहोत्कण्ठिता गाढं हरसङ्गमलालसा । तयोः सुतप्ततपसोः संयोगः स्याच्छुभानने। ततस्ताभ्यान्तु जनित स्वल्पो चाकलहोऽभवत् । ततोऽपिसंशयोभूयस्तारकंप्रतिदृश्यते तयो संयुक्तयोस्तस्मात्सुरतासक्तिकारणे । विप्रस्त्वयाविधातव्योयथाताभ्यांतथाणु गर्भस्थाने च तन्मातु स्वेन रूपेण रञ्जय । ततो विहाय शर्यस्ता विश्रान्तो नर्मपूर्वकम् भर्त्सयिष्यति ता देवी ततः सा कुपिता सती। प्रयास्यति तपश्चर्तुतत्तस्मात्तपसेपुनः जनयिष्यति यं शर्वादमितद्युतिमण्डितम् । स भविष्यति हन्ता वै सुरारीणामसंशयम्' त्वयापि दानवा देवि! हन्तव्यालोकदुर्जया. । यावच न सती देहसंकान्तगुणसञ्चया तत् सङ्गमेन तावत्त्वं दैत्यान् हन्तुं न शक्ष्यसे । एवं कृतेतपस्नप्त्यासृष्टिसंहारकारिणी समाप्तनियमा देवी यदा चोमा भविष्यति । तदा स्वमेव तद्रूपं शैलजा प्रतिपत्स्यते ॥ तनुस्तचापि सहजा सैकानंशा भविष्यति । रूपांशेन तु संयुक्ता त्यमुमायां भविष्यसि एकानंशेति लोकस्त्वां वरदे ! पूजयिष्यति । भेदैर्व विधाकारः सर्वगा कामसाधिनी ॥५॥ मोङ्कारपयत्रा गायत्री त्वमिति ब्रह्मयादिभिः । आकान्तिरूजिताकारा राजभिश्च महाभुजः ॥६॥ त्वं भूरिति विसं पातर शूदैः शेयीति पूजिता । क्षान्तिर्मुनीनामक्षोभ्या दया नियमिनामिति ॥७॥ * त्वंमहोपायसन्दोहानीतिर्नयविसर्पिणाम् । परिच्छित्तिस्त्यमानांत्वंमही प्राणिहच्छया ऽध्यायः] * ब्रह्माहत रात्रिप्रार्थनम् * ४२५ त्वं मुक्ति सर्वभूतानांत्वंगतिःसर्वदेहिनाम् । त्वञ्चकीतिमतांकीर्तिस्त्वं मूर्ति सर्वदेहिनाम् रतिस्त्वं रक्तचित्तानां प्रीतिस्त्वं दृष्टदर्शिनाम् । त्वं कान्तिः कृतभूषाणां त्वं शान्तिर्दुःखकर्मणाम् ॥८॥ त्वं भ्रान्तिः सर्ववोधानां त्वं गतिः क्रतुयाजिनाम् । जलधीनां महावेला त्वञ्च लीला विलासिनाम् ॥८॥ सम्भूतिस्त्वं पदार्थानां स्थितिस्त्वं लोकपालिनी । त्वं कालरात्रिनि शेषभुवनावलिनाशिनी ॥८२॥ प्रियकण्ठग्रहानन्ददायिनी त्वं विभावरी । इत्यनेकविधैर्देवि! रूपैलॊकत्वमर्चिता ॥८३ ये त्वां स्तोप्यन्ति परदे ! पूजयिष्यन्ति चापि ये । ते सर्वकामानाप्स्यन्ति नियता नात्र संशयः ॥८४|| इत्युक्ता तु निशा देवी तथेत्युक्त्या कृताञ्जलि । जगाम त्वरिता तूर्ण गृहहिमगिरेपरम् तत्रासीनां महाहय रत्नभित्तिसमाश्रयाम् । ददर्श मेनामापाण्डुच्छविवक्त्रसरोरहाम् किञ्चिच्छ्याममुखोदग्रस्तनभारावनामिताम् । महीपधिगणायद्धमन्त्रराजनिषेविताम् ॥८॥ उहत्फनकोन्नद्धजीवरक्षामहोरगाम् । मणिदीपगणज्योतिर्महालोकप्रकाशिते ॥८८ ॥ प्रकीर्णवहुसिद्धार्थे मनोजपरिधारके । शुचिन्यंशुकसच्छन्नभूशय्यास्तगणोज्वले ॥८६॥ धूपामोदमनोरम्ये सजसर्वोपयोगिके । ततः क्रमेण दिवसे गते दूरं विभावरी ॥६०॥ व्यजृम्भत सुखोद ततो मेनामहागृहे । प्रसुप्तप्रायपुरुषे निद्राभूतोपचारिके ॥३१॥ स्फुटालोके शशभृति भ्रान्तिरात्रिविहङ्गमे । रजनीचरभूतानां सहरावृतचत्वरे ॥१२॥ गाढकण्ठग्रहालयसुभगेष्टजने तत । किञ्चिदाकुलता प्राप्ते मेनानेत्राम्बुजद्वये ॥ १३ ॥ आरिवेश मुखे रात्रिः सुचिरस्फुटसङ्गमा । जन्मदाया जगन्मातुः क्रमेण जठरान्तरे ॥ भावियेशान्तरं जन्म मन्यमाना क्षपातु वै । अरआयच्छविन्देव्या गुहारण्ये विभावरी!! ततो जगत्पतिप्राणहेतुहिमगिरिप्रिया । ब्राह्म मुहर्ते सुभगे व्यस्यत गुहारणिम् ॥६६॥ तस्यान्तु जायमानयां जन्तवः स्थाणुजङ्गमाः।
४२६
* मत्स्यपुराणम् * [त्रिपञ्चाशदधिकशततमो
अभवन् सुखिनः सर्वे सर्वलोकनिवासिनः ॥on
नारकाणामपि तदा सुखं स्वर्गसमं महत् । अभवत् क्रूरसत्वानां चेतः शान्तंचदेहिनाम्
ज्योतिषामपि तेजस्त्वमभवत् सुरतोन्नता । धनाश्रिताश्चौषधयः स्वादुवन्तिफलानिच
गन्धयन्ति च माल्यानि विमलञ्च नभोऽभवत् । मारुतश्चसुखस्पोंदिशाश्चतुमनोहरा:
तेन चोद्भूतफलितपरिपाकगुणोज्ज्वलाः । अभवत् पृथिवी देवी शालिमालाकुलापिच
तपांसि दीर्घवीर्णानि मुनीनां भावितात्मनाम् ।
तस्मिन् गतानि साफल्यं काले निर्मलचेतसाम्॥१०२॥
विस्मृतानि च शस्त्राणि प्रादुर्भावं प्रपेदिरे ।
प्रभावस्तीर्थमुख्यानां तदा पुण्यतमोऽभवत् ॥१०३||
अन्तरिक्षे सुराश्चासन् विमानेषु सहस्रशः । समहेन्द्रहरिब्रह्मवायुचह्निपुरोगमाः ॥१०४
पुष्पवृष्टिं प्रमुमुचुस्तस्मिंस्तु हिमभूधरे ।जगुर्गन्धर्वमुख्याश्च ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥१०५
मेरुप्रभृतयश्चापि मूर्तिमन्तो महायलाः । तस्मिन् महोत्सवे प्राप्ते दिव्यप्रभृतपाणयः ।।
सरितः सागराश्चैव समाजग्मुश्च सर्वशः । हिमशैलोऽभवल्लोके तथा सर्वैश्चराचरः ।।
सेव्यश्चाप्यभिगम्यश्च सश्रेयांश्चाचलोत्तमः । अनुभूयोत्सवंदेवाजग्मुःस्वानालयान मुदा
देवगन्धर्वनागेन्द्रशैलशीलायनीगुणः । हिमशैलसुता देवी स्वयं पूर्विफया ततः ॥१०६
क्रमेण वृद्धिमानीता लक्ष्मी पानलसर्बुधैः । क्रमेण रूपसौभाग्यप्रयोधैर्भुवनत्रयम् ।।
अजयभूषयश्चाति निःसाधारैनंगात्मजा । एतस्मिन्नन्तरे शमो नारदं देवसम्मतम् ॥
देवर्षिमय सस्मार फार्यसाधनसत्वरम् ।
म्मृति शास्य विज्ञाय जातान्तु भगवांस्तदा ॥ ११ ॥
जगाम मुदा युक्तो महेन्द्रस्य नियेशनम् ।
नं सुदृष्ट्वा सहस्राक्षः समुत्याय मदासनात् ॥ १३ ॥
याणा मनु पायेन पूजयामास पासपः । शमप्रणीतान्तां पूजां प्रतिगृा यथाविधि ।
नाग्दः पुरालं देयमपृच्छन् पापशासनम् ।
पृष्टे च पुशले सत्तः प्रोपाच पचनं प्रभुः ॥ १५ ॥
ऽध्यायः] * नारदस्य हिमालयगृहगमनम् * ४२७ इन्द्र उघाव। कुशलस्याङ्कुरे तावत् सम्भूते भुवनत्रये । तत्फलोद्वसम्पत्ती त्वं भवातन्द्रितो मुने ! वेत्सि चैतत् समस्तं त्वं तथापि परिचोदकः । निवृति परमां याति निवेद्यार्थसुहजने तद्यथा शैलजा देवी योगं यायात् पिनाकिना । शीघ्रतदुद्यमः सर्वैरस्मत्पक्षैविधीयताम् अवगम्यार्थमखिलन्तत आमन्त्र्य नारदः । शक्रं जगाम भगवान् हिमशैलनिवेशनम् ॥ तत्र द्वारे स विप्रेन्द्रश्चित्रवेत्रलनाकुले । घन्दितो हिमशैलेन निर्गतेन पुरोमुनिः ।। सह प्रविश्य भवनं भुचोभूपणताहतम् । निवेदितेवयं हैमे हिमशैलेन विस्तृते ॥१२॥ महासने मुनिवरो निषसादातुलद्युतिः । यथार्ह वार्यपाद्यञ्च शैलस्तस्मै न्यवेदयत् ।। मुनिस्तु प्रतिजग्राह तमधं विधिवत्तदा । गृहीता मुनियरमपृच्छच्लक्ष्णया गिरा ॥ कुशलं तपसः शैल शनै स्फुल्लाननाम्युजः । मुनिरप्यद्विराजानमपृच्छत् कुशलं तदा ॥ नारद उवाच। अहोऽवतारिता. सर्वे सन्निवेशे महागिरे! । पृथुत्वं मनसा तुल्यं कन्दरापां तथावल! गुरुत्वन्ते गुणोघानां स्थावरादतिरिच्यते । प्रसन्नता व तोयस्य मनसोऽप्यधिकाचते न लक्षयामः शैलेन्द्र! शिष्यतेकन्ठरोदरात् । नवलक्ष्मीस्तथा स्वर्गे कुत्राधिकतयास्थिता नानातपोभिर्मुनिभि. ज्वलनासमप्रभः । पाचने पावितो नित्यं त्वत्कन्दरसमाश्रितः अधमत्य विमानानि स्वर्गवासविरागिणः । पितुर्य ह इचासन्ना देवगन्धर्वकिन्नराः ।। अहो! धन्योऽसि शैलेन्द्र ! यस्य ते कन्दरं हर । अध्यास्ते लोकनाथोऽपि समाधानपरायणः ॥ १३०॥ इत्युक्तवति देवी नारदे सादरगिरा। हिमशैलस्य महिपी मेना मुनिदिद्वक्षया ॥१३॥ अनुयाता दुहित्रा तु स्वत्पालिपरिचारिका । लजाप्रणयनम्राङ्गी प्रविवेश निवेशनम् ॥ तंत्र स्थितो मुनिवर शैलेन सहितो चशी । दृष्टा तु तेजसोराशि मुनि शैलप्रिया तदा पचन्दे गूढ़वदना पाणिपाहताअलि । तां विलोक्य महाभागो महपिरमितद्युति ॥१३४ माशीभिरमृतोद्गारस्पाभिस्तांव्यपर्धय । ततो विस्मितचित्ता तु हिमवगिरिपुनिका उदक्षन्नारदं देवी मुनिमगुतरूपिणम् ।
४२८
* मत्स्यपुराणम् *
[त्रिपञ्चाशद्धिकशततमो
एहि वत्सेति चाप्युक्ता ऋषिणा स्निग्धया गिरा ॥१३५॥
कण्ठे गृहीत्वा पितरमुत्सड्रेसमुपाविशत् । उवाव माता तां देवीमभिवन्दय पुत्रिके !
भगवन्तंततो धन्यपतिमाप्स्यसि सम्मतम् । इत्युक्त्वातु ततो मात्रा घनान्तपिहितानना
किञ्चित् कम्पितमूर्द्धा तु पाक्यं नोवाच किश्चन । ततःपुनरुवाचेदं वाक्यमातासुतान्तदा
वत्से ! धन्दय देवर्षि ततो दास्यामि ते शुभम् । रतक्रीडनकं रम्यं स्थापितंयश्चिरंमया
इत्युक्त्वा तु ततो वेगादुद्धृत्य चरणौ तदा । घवन्दे मूदुनिसन्धाय करपङ्कजकुड्मलम्
कृते तु चन्दने तस्या माता सखीमुखेन तु ।
चोदयामास शनकैस्तस्याः सौभाग्यशंसिनाम् ॥ १४१ ॥
शरीरलक्षणानान्तु विज्ञानाय तु कौतुकात् ।
स्त्रीस्वभावाद्यदुहितुश्चिन्तां हृदि समुद्वहन् ॥ १४२ ।।
झात्या तदिङ्गितं शैलो महिष्या हृदयेन तु । अनुद्गीर्णोक्षतिर्मने रम्यमेतदुपस्थितम् ॥
वोदितः शैलमहिपी संख्या मुनिवरस्तदा । स्मिताननो महाभागो वाक्यप्रोवाचनारदः
न जातोऽस्याः पतिर्भद्रे! लक्षणश्च विवर्जिता। उत्तानहस्ता सततं चरणर्व्यभिचारिभिः
स्वच्छायया भविष्येयं किमन्याहुभाप्यते । श्रुत्वैतत्सम्भ्रमाविष्टो ध्वस्तधैर्योमहाबलः
नारदं प्रत्युवाचाथ साधुकण्ठो महागिरिः।
हिमवानुवाच ।
संसारस्यातिदोषस्य दुर्विज्ञेया गतिर्यत ॥ १४७ ॥
सृश्यां चावश्यभाविन्यां केनाप्यतिशयात्मना ।
फर्ता प्रणीता मर्यादा स्थिता संसारिणामियम् ॥ १४८॥
यो जायतेहियद्वीजोजनितुः सासार्थक । जनिताचापिजातस्य नकश्चिदितियत्स्फुटम्
स्वकर्मणेच जायन्ते विविधा भूतजातयः । अण्डजो हण्डजाजात' पुनर्जायेत मानवः
मानुषाच सरीसृप्यां मनुप्यत्वेन जायते । तत्रापि जाती श्रेष्ठायां धर्मस्योत्कर्षणेनतु
अपुवजन्मिनः शेषाः प्राणिनः समवस्थिताः । मनुजास्तत्र जायन्ते यतो न गृहधर्मिणः
मामेणाश्रमसंप्राप्तिब्रह्मचारिखतादनु । तस्य फर्तुनियोगेन संसारो येन पद्धितः ॥१५३३॥
४२६ ऽध्यायः] * हिमालयस्य कन्याविषये दुःखप्रकटनम् * संसारस्य कुतो वृद्धिः सर्वस्युर्य्यदतिग्रहाः। अतः फ; तु शास्त्रेषु सुतलाभाप्रशंसितः प्राणिनां मोहनार्थाय नरकत्राणसंश्रयात् । स्त्रिया विरहिता सृष्टिजन्तूनां नोपपद्यते ॥ स्त्रीजातिस्तु प्रकृत्यैव कृपणा दैन्यभाषिणी। शास्त्रालोचनसामा मुज्झितंतासुवेधसा शास्त्रपूक्तमसन्दिग्धं पहुचारं महाफलम् । दशपुत्रसमा कन्या या नस्याच्छीलवर्जिता घासमेतत् फलभ्रष्टं पुंसि ग्लानिकरम्परम् । कन्या हि कृपणाऽशोच्या पितुर्दुःखविवद्धिनी ॥ १५८ ॥ यापि स्यात् पूर्णसर्वाढ्या पतिपुत्रधनादिभिः । किपुनर्दुर्भगा हीना पतिपुत्रधनादिभिः त्वंचीतवान् सुतायामेशरीरंदोपसंग्रहम् । अहो! मुह्यामिशुप्यामिग्लामिसीदामिनारद! अयुक्तमय वक्तव्यमप्राप्यमपि साम्प्रतम् । अनुग्रहेण मे च्छिन्धि दुःखंकन्याश्रयं मुने ! परिच्छिन्नेऽप्यसन्दिग्धे मनः परिभवाधयम् । तृष्णा मुष्णाति निष्णाता फललोभाश्रया शुभा ॥ १६२ ॥ स्त्रीणां हि परमं जन्म कुलानामुभयात्मनाम् । इहामुत्रसुसायोक्तं सत्पतिप्राप्तिसंज्ञितम् दुर्लभः सत्पति स्त्रीणांविगुणोऽपि पतिःकिल। नमाप्यते विनापुण्यै पति कदाचन यतो निःसाधनोधर्म परिमाणोज्झिता रतिः। धनं जीवितपर्याप्तंप तीनार्याःप्रतिष्ठितम् निर्धनो दुर्भगो मूर्खः सर्वलक्षणवर्जितः । देवतं परमं नार्याः पतिरुक्तः सदैव हि ।। त्वयाचोक्तहिदेवर्षे! न जातोऽस्याः पतिः किल। एतद्दीर्भाग्यमतुलमसंरयंगुरुदुःसहम् चराचरे भूतसर्गे यदद्यापि व नो मुने । न स जात इति पे तेन मे व्याकुलं मनः । मनुष्यदेवजातीनां शुभाशुभनिवेदकम् । लक्षणं हस्तपादादी विहितैर्लक्षणैः किल ॥ सेयमुत्तानहस्तेति त्वयोक्ता मुनिपुङ्गव ! । उत्तानहस्तता प्रोक्ता यावतामेव नित्यदा। शुभोदयानां धन्यानां न कदाचित् प्रयच्छताम् । स्वच्छाययास्याश्चरणी त्वयोक्तो व्यभिचारिणी ॥ १७१ ॥ तत्रापि श्रेयता ह्याशा मुने ! तु प्रतिभाति नः। शरीरलक्षणाश्चान्ये पृथक्फलनिवेदिनः सौभाग्यधनपुत्रायुःपतिलाभानुशंसनम् । तैश्च सर्वविहीनेयं त्यमात्य मुनिपुङ्गव!॥ त्वं मे सर्व विजानासि सत्यवागसि वाप्यतः । मुह्यामि मुनिशार्दूल! हृदयंदीर्यतीच मे * मत्स्यपुराणम् * [त्रिपञ्चाशदधिकशततमो इत्युनया चिरतःशैलो महादुःखविचारणात् ।धुत्वैतदखिलं तस्माच्छैलगजमुखाम्बुजात स्मितपूर्वमुवाचेदं नारदो देवचोदितः । नारद उवाच। हर्षस्थानेऽपि महति त्वया दुःखं निरूप्यते ॥ १७६ ॥ अपरिच्छिन्नवापाथै मोहंयासिमहागिरे !। इमां शृणु गिरंमत्तो रहस्यपरिनिष्ठिताम् समाहितोमहाशैल ! मयोक्तस्यविवारणे । न जातोऽस्याःपतिर्देव्यायन्मयोक्तमहायल! न स जातो महादेव भूतभव्यभवोद्भवः । शरण्यः शाश्वतः शास्ता शङ्करः परमेश्वरः ।। ब्राविष्ण्विन्द्रमुनयो जन्ममृत्युजरार्दिताः । तस्यैते परमेशस्य सर्वे क्रीडनका गिरे ! । आस्ते ब्रह्मा तदिच्छातः संभूतो भुवनप्रभुः । विष्णुर्युगे युगे जातो नानाजातिमहातनुः मन्यसे मायया जातं विष्णुञ्चापि युगे युगे। आत्मनो न विनाशोऽस्ति स्थावरान्तेऽपि भूधर ! ॥ १८२॥ संसारे जायमानस्य म्रियमाणस्य देहिनः । नश्यते देह एवात्र नात्मनो नाश उच्यते । ब्रह्मादिस्थावरान्तोऽयं संसारोयाप्रकीर्तितः । स जन्ममृत्युदुःखा? ह्यवश परिवर्त्तते महादेवोऽचलः स्थाणुर्न जातो जनकोऽजरः । भविष्यति पतिः सोऽस्या जगन्नाथो निरामयः ॥ १८५ ॥ यदुक्तञ्च मया देवीलक्षणैर्वजिता तव । शृणु तस्यापि वाक्यस्य सम्यक्त्वेनविचारणम् लक्षणं देविको ह्यङ्क. शरीरावयवाश्रयः। सर्वायुर्द्धनसौभाग्यपरिमाणप्रकाशकः ॥ अनन्तस्याप्रमेयस्य सौभाग्यस्यास्य भूधर ! निवाड्रो लक्षणाकारः शरीरे संविधीयते अतोऽस्या लक्षणं गात्रे शैल! नास्ति महामते!। यथाहमुकवानस्या[त्तानकरतां सदा उत्तानो घरद पाणिरेप देव्याः सदैव तु । सुरासुरमुनिनातवरदेयं भविष्यति ॥१०॥ यथा प्रोतं तदा पादी स्वच्छाया व्यभिचारिणी। अस्याः शृणु ममात्रापि पाग्युक्ति शैलसत्तम ! ॥ ११ ॥ चरणी पद्मशङ्काशावस्याःस्वच्छनपोज्यलो । मुरासुराणांनमतांकिरीटमणिकान्तिभिः विचित्रवर्णमासन्ती स्पच्छायाप्रतिविम्विती । भार्याजगद्गुरोह:पा तृपास्यमदीधर!
ऽध्यायः] * नारदकृत हिमालयसान्त्वनम् * ४३१ जननी लोकधर्मस्य सम्भूता भूतभावनी । शिवेयं पावनायैव त्वत्क्षेत्रे पावकद्युतिः ॥ १४ ॥ तद्यथा शीघ्रमेवैषा योग यायात् पिनाकिना । तथा विधेयं विधिवत्त्वया शैलेन्द्रसत्तम ! ॥ १५॥ अत्यन्तं हि महत्कार्य देवानां हिमभूधर!। सूत उवाच एवं श्रुत्वा तु शैलेन्द्रो नारदात् सर्वमेव हि ॥ १६६ ॥ आत्मानं स पुनर्जातं मेने मेनापतिस्तदा । नमस्कृत्य वृषाङ्काय तदा देवाय धीमते ॥ उवाच सोऽपि संहृष्टो नारदन्तु हिमाचलः । हिमपानुवाच । दुस्तरान्नरकात् घोरादुद्धृतोऽस्मि त्वया मुने ! ॥ १८ ॥ पातालादहमुधृत्यसप्तलोकाधिप कृतः । हिमाचलोऽस्मित्रिख्यातस्त्वया मुनिवराधुना हिमाचले चलगुणां प्रापितोऽस्मि समुन्नतिम् । आनन्ददिवसाहारि हृदयं मेऽधुना मुने! नाव्यवस्यति कृत्यानां प्रविभागविचारणम् । यदि धाचामधीशः स्यान्त्वद्गुणाना विचारणे ॥ २०१॥ भवद्विधानां नियतममोघं दर्शनं मुने!। तपास्मानप्रति चापल्यं व्यक्तं मम महामुने ! भवद्भिरेव कृत्योऽहं निवासायात्मरूपिणम् । मुनीनां देवतानांच स्वयं कर्तापि कल्मपम् तथापि घस्तुन्येकस्मिन्नाज्ञा मे सम्प्रदीयताम् । इत्युक्तपति शैलेन्द्रे स तदा हर्ष निर्भरे। तथाच नारदो पाक्यं कृतं सर्वमिति प्रभो !। सुरकार्ये य एवार्थस्तवापि सुमहत्तरः ॥ इत्युक्त्या नारदः शीघ्रं जगाम त्रिदिवं प्रति । स गत्वा शकभवनममरं सन्ददर्श ह ॥ ततोऽभिरूपे स मुनिरुपविष्टो महासने । पृष्टः शक्रण प्रोवाव हिमजासंश्रयांकथाम्।। नारद उवाच। समूह्य यत्तु कर्तव्यं तन्मया कृतमेव हि । किन्तु पञ्चशरस्यैव समयोऽयमुपस्थितः ॥ इत्युक्तो देवराजस्तु मुनिना कार्यदर्शिना । चूताड्डुरास्त्रं सस्मार भगवान् पाकशासनः ।
४३२ * मत्स्यपुराणम् * [ त्रिपञ्चाशदधिकशततमो संस्मृतस्तु तदा क्षिप्रं सहस्राक्षेण धीमता । उपतस्थे रतियुतः सविलासोझपध्वजः ।। प्रादुर्भूतन्तु तं दृष्ट्वा शमः प्रोवाच सादरम् । शक उवाच। उपदेशेन बहुना किन्त्वां प्रतिवदे प्रियम् ॥ २११ ॥ मनोभवासि तेन त्वं वेत्सि भूतमनोगतम् । तद्यथार्थकमेयत्त्वं कुरु नाकसदाम्प्रियम् शङ्करं योजय क्षिप्रं गिरपुञ्या मनोभव !। संयुतो मधुना चैव ऋतुराजेन दुर्जय ! २१३ इत्युक्तो मदनस्तेन शक्रेण स्वार्थसिद्धये । काम उवाच। अनया देवसामग्या मुनिदानवभीमया ॥ २१४ ॥ दुःसाध्यः शङ्करो देवः किन्न वेत्सि जगत्प्रभो!। तस्य देवस्य वेत्थ त्वं कारणन्तु यदव्ययम् ॥ २१५॥ प्रायः प्रसादः कोपोऽपि स! हि महतां महान् । सर्वोपभोगसारा हि सुन्दर्यः स्वर्गसम्भवाः ॥ २१६ ॥ अध्याश्रितञ्चयत्सौख्यं भवता नष्टचेष्टितम् । प्रमादादथ विभ्रश्येदीशम्प्रति विचिन्त्यताम् प्रागेव चेह दृश्यन्ते भूतानां कार्यसम्भवाः । विशेष काङ्गतां शक्र ! सामान्याद् भ्रंशनं फलम् ॥ २१८॥ श्रुत्वैतद्वचनं शक्रस्तमुपाचामरैर्युत । शक्र उवाच । घयं प्रमाणास्ते पत्र रतिकान्त! न संशयः ॥ २१६ ॥ सन्देशेन विना शक्तिरपकारस्य नेप्यते । कस्यविच कचिदृष्टं सामर्थ्य न तु सर्वतः ॥ इत्युक्त प्रययौ कामः सखायं मधुमानितः । रतियुक्तो जगामाशु प्रस्थन्तु हिमभूभृतः॥ सतु तत्राकरोचिन्तां कार्यस्योपायपूर्विकाम् । महार्था ये हि निष्कम्पा मनस्तेषां सुदुर्जयम् ॥ २२२ ॥ 'तदादावेव संक्षोभ्य नियतं सुजयो भवेत् । संसिद्धि प्राप्नुयुश्चैवपूर्वे संशोध्यमानसम् ऽध्यायः] * मदनस्य शिवान्तिकंगमनम् * ४३३ कथञ्च विविधैर्भावपानुगमनं चिना । क्रोधः क्रूरतरासगाद्रावणेयी महासखीम् ॥ चापल्यमूर्ध्नि विध्वस्तधैर्याधारां महाबलाम् । तामस्य विनियोक्ष्यामि मनसो विकृतिम्पराम् ॥ २२५ ॥ पिधाय धैर्यद्वाराणि सन्तोपमपकृष्य च । अवगन्तुं हि मां तत्र न कश्चिदतिपण्डितः विकल्पमात्रावस्थाने बैरूप्यं मनसो भवेत् । पश्चान्मूलक्रियारम्भगम्भीरावर्तदुस्तरः ॥ हरिप्यामि हरस्याहं तपस्तस्य स्थिरात्मनः । इन्द्रियग्राममावृत्य रम्यसाधनसंविधिः॥ चिन्तयित्वेतिमदनोभूतभर्तुस्तदाश्रमम् । जगाम जगतीसारं सरलद्रुमवेदिकम् ॥२२६॥ शान्तसत्वसमाकीर्णमचलप्राणसङ्कुलम् । नानापुष्पलताजालं गगनस्थगणेश्वरम् २३० निर्व्यग्रवृषभाध्युटनीलशाद्वलसानुकम् । तत्रापश्यत् त्रिनेत्रस्य रम्यं कञ्चिद्वितीयकम्॥ धीरकं लोकवीरेशमीशानसदृशद्युतिम् ! यक्षकुड्डुमकिञ्जल्फपुअपिट्नजटासटम् ॥ २३२॥ वेत्रपाणिनमव्यग्रमुग्रभोगीन्द्रभूपणम् । ततो निमीलितोन्निद्रपद्मपत्राभलोचनम् २३३ प्रेक्षमाणमृजुस्थानस्थितनासाग्रलोचनम् । श्रवस्तरससिंहेन्द्रवर्मलम्वोत्तरीयकम्॥२३४ श्रवणाहिफलन मुक्तनिःश्वासानलपिङ्गलम् । प्रेसत्कपालपर्य्यन्ततुम्बिलं विजटाचयम् ॥ २३५ ।। कृतघासुकिपर्यनामिमूलनिवेशितम् । ब्रह्माञ्जलिस्थपुच्छाग्रनिवद्धोरणभूषणम् ॥२३॥ ददर्श शङ्करं कामः क्रमप्राप्तान्तिकं शनैः। ततो भ्रमरझङ्कारमालम्बिद्रुमसानुकम् ॥ प्रविष्ट कर्णरन्ध्रेण भवस्य मदनो मनः । शङ्करस्तमथाकर्ण्य मधुरं मदनाश्रयम् २३८ सस्मार दक्षदुहितान्दयितां रक्तमानसः । ततः सा तस्य शनकैस्तिरोभूयाति निर्मला ॥ समाधिभावना तस्थौ लक्ष्यप्रत्यक्षरूपिणी । ततस्तन्मयतां यातः प्रत्यूहपिहिताशयः ॥ पशित्वेन बुबोधेशो विकृति मदनात्मिकम् । ईपत्कोपसमाविष्टोधैर्यमालम्ब्यधूज़टिमा निरासे मदनस्थित्या योगमायासमावृतः । स तया माययाविष्टो जज्वाल मदनस्ततः इच्छाशरीरो दुर्जेयो रोपदोपमहाश्रयः । हृदयाग्निर्गतः सोऽथ पासनाव्यसनात्मकः।। यहिस्थलं समालम्व्य छुपतस्थो भषध्वजः । अनुयातोऽथ हृद्येन मित्रेण मधुना सहा सहकारतरी दृष्ट्वा मृदुमारवनिर्धतम् । स्तयक मदनोरम्यं हरपक्षसि सत्परम् ॥२४५|| ।
४३४ * मत्स्यपुराणम् * [त्रिपञ्चाशदधिकशततमो मुमोच मोहनं नाम मार्गणं मकरध्वजः । शिवस्य हृदये शुद्ध नाशशाली महाशरः ॥ पपात परुषप्रांशुः पुष्पयाणो विमोहनः । ततः करणसन्देहोविद्धस्तु हृदये भवः॥२४७॥ वभूव भूधरौपम्यधैर्योऽपि मदनोन्मुखः । ततः प्रभुत्वाद्भावानां संक्षोभ समपद्यत ॥ वाहां बहु समासाद्य प्रत्यूहप्रसवात्मकम् । ततः कोपानलोद्भूतधोरहुङ्कारभीपणे ॥ बभूव पदने नेत्रं तृतीयमनलाकुलम् । रुद्रस्य रौद्रवपुपो जगत्संहारभैरवम् ॥ २५० ॥ तदन्तिकस्थे मदने व्यस्फारयत धूर्जटिः । तं नेत्रविस्फुलिङ्गेन क्रोशतान्नाकवासिनाम् गमितोमस्मसात्तूर्ण कन्दर्पः कामिर्पकः । सतुतं भस्मसात् कृत्वा हरनेत्रोद्भवोऽनलः व्यज़म्भत जगद् दग्धुं ज्वालाहुङ्कारघस्मरः । ततो भवोजगद्धेतोळभजजातवेदसम्॥ सहकारे मधौ चन्द्रसुमन सुपरेष्वपि । भृङ्गेषु कोकिलास्येपु विभागेन स्मरानलम् स वाह्यान्तरविद्धन हरेण स्मरमार्गणः । रागस्नेहसमिद्धान्तर्धावन् तीव्रहुताशनः ।। विभक्तलोकसंक्षोभकरोदुर्वारजृम्भितः । संप्राप्य स्नेहसंपृक्तंकामिनां हृदयंकिल॥२५६ ज्वलत्यहनिशं भीमो दुश्चिकित्स्यमुखात्मकः । विलोक्य हरहुङ्कारज्वालामस्मरुतं स्मरम् ॥ २५७ ॥ पिललाप रतिः क्रूरं बन्धुना मधुना सह । ततो विलप्य बहुशो मधुना परिसान्त्विता ॥ २५८ ॥ जगाम शरणं देवमिन्दुमीलिं त्रिलोचनम् । भृङ्गानुयातां संगृह्य पुष्पितां सहकारजाम् लतां पवित्रकस्थाने पाणी परभृतां सखीम् । निर्वध्य तु जटाजूटं कुटिलरलकै रतिः॥ उधूल्य गात्रं शुभ्रेण हृद्येन स्मरभस्मना ! जानुभ्यामवनिङ्गत्वा प्रोपाचेन्दुविभूषणम् रतिरुवाच । नमः शिवायास्तु निरामयाय नमः शिवायास्तु मनोमयाय । नमः शिवायास्तु सुरार्चिताय तुभ्यं सदा भक्तरूपापराय ॥ २६२ ।। नमो भयायास्तु भवोद्भवाय नमोऽस्तु ते ध्वस्तमनोभवाय । नमोऽस्तु ते गूढमहावताय नमोऽस्तु मायागहनाधयाय ॥ २६३ ॥ नमोऽस्तु शर्याय नमः शिवाय नमोऽस्तु सिद्धाय पुरातनाय ।
ऽध्यायः * रतिस्तशङ्करस्तुतिः * नमोऽस्तु कालाय नमः कलाय नमोस्तु ते ज्ञानवरप्रदाय ।। २६४॥ नमोऽस्तु ते कालकलातिगाय नमो निसर्गामलभूषणाय। नमोऽस्त्वमेयान्धकमर्दकाय नमः शरण्याय नमोऽगुणाय ॥ २६५ ॥ नमोऽस्तु ते भोमगणानुगाय नमोऽस्तु नानाभुवनादिकरें। नमोऽस्तु नानाजगतां विधाने नमोऽस्तु ते चित्रफलप्रयोक्त्रे ।। २६६ ॥ सर्वावसाने ह्यविनाशनेत्रे नमोऽस्तु चित्राध्वरभागभोक्त्रे । नमोऽस्तु भकाभिमतप्रदाने नमः सदा ते भवसङ्गहनें ॥ २७ ॥ अनन्तरूपाय सदैव तुभ्यमसहकोपाय नमोऽस्तु तुभ्यम् । शशाङ्क चिह्नाय सदैव तुभ्यममेयमानाय नमः स्तुताय ॥ २६८ ।। वृपेन्द्रयानाय पुरान्तकाय नमः प्रसिद्धाय महीपघाय । नमोऽस्तु भन्याभिमतप्रदाय नमोऽस्तु सर्वातिहराय तुभ्यम् ।। २६६ ॥ चराचराचारविचारवर्यमाचार्यमुत्प्रेक्षितभूतसर्गम् । त्वामिन्दुमालिं शरणं प्रपन्ना प्रिया प्रमेयं महतां महेशम् ॥ २७ ॥ प्रयच्छ मे कामयशः समृद्धि पुनः प्रभो! जीवतु कामदेवः । प्रियं विना त्या प्रियजीवितेषु त्वत्तोऽपरः को भुवनेप्विहास्ति ॥२७॥ प्रभुः मियायाः प्रसवः प्रियाणां प्रणीतपर्यायपरापरार्थः । त्वमेवमेको भुवनस्य नाथो दयालुरुन्मूलितभक्तभोतिः ॥२७२॥ इत्थं स्तुतः शङ्कर ईडय ईशो वृषाकपिर्मन्मथकान्तया तु । तुतोष दोषाकरपण्डधारी उवाच चैना मधुरं निरीक्ष्य ॥२७॥ शङ्कर उवाच । भवितेति च कामोऽयं कालात् कान्तोऽविरादपि । अनङ्ग इति लोकेषु स विस्थाति गमिष्यति ॥ २३४ ॥ त्युच्या शिरसा पन्य गिरिशट्ठामपल्लमा । उगामोपपनं रम्यं रतिस्तु हिमभूभृतः ॥ सरोद वापि यदुशो दीना रम्ये स्थले तु सा । मरणव्यवसायात्तु निवृत्तासा हराया । ४३६ * मत्स्यपुराणम् # [त्रिपञ्चाशदधिकशततमो अथ नारदवाक्येन चोदितो हिमभूधरः । मृताभरणसंस्कारां कृतकोतुकमङ्गलाम् ॥ स्वर्गपुष्परतापीडांशुमचीनांशुकाम्बराम् । सपीभ्यां संयुतांशैलो गृहीत्वास्थसुतान्ततः जगाम शुभयोगेन तदा संपूर्णमानसः । सफाननान्युपाकम्य घनान्युपवनानि च २७६ ददर्श रदती नारीमप्रतय॑महौजसम् । रूपेणासदृशी लोके रम्येषु धनसानुषु ॥२८०॥ कौतुकेन परामृश्य तां दृष्ट्वा रुदती गिरिः। उपसर्प ततस्तस्या निकटे सोऽभ्यगच्छत हिमवानुवाच । कासि कस्यासि कल्याणि ! किमर्थश्चापि रोदिपि । नैतदल्पं महासत्वे कारणं लोकसुन्दरि ! ॥ २८२ ॥ सा तस्य पचनं श्रुत्वा उचाच मधुना सह । रुदती शोकजननं श्वसती दैत्यपर्धनम् ॥ रतिस्वाच। कामस्य दयितां भायों रति मां विद्धि सुनत! । गिरावस्मिन्हाभाग ! गिरिशस्तपसि स्थितः ॥ २८४ ॥ तेन प्रत्यूहदृष्टेन विस्फार्यालोक्य लोचनम् । दग्धोऽसी झपकेतुस्तुममकान्तोऽतिबल्लभः अहन्तु शरणं यातात देवं भयविह्वला । स्तुतवत्यथ संस्तुत्या ततो मां गिरिशोऽब्रवीत् तुष्टोऽहं कामदयिते । कामोऽयन्ते भविष्यति । त्वत्स्तुति चाप्यधीयानो नरो भक्त्या मदाश्रयः ।। २८७ ॥ लप्स्यते काशित कामं निवर्त्य मरणादित । प्रतीक्ष्यती च तद्वाक्यमाशावेशादिभियहम् ॥ २८८ ॥ शरीरं परिरक्षिष्ये कञ्चित् कालं महाद्युते ।। इत्युक्तस्तु तदा रत्या शैल सम्भ्रमभीपित ॥ २८ ॥ पाणापादायहिसुतांगन्तुमैच्छत्स्वकम्पुरम् ।भाधिनोऽघश्यभावित्वादपित्रीभूतभाविनी लजमाना सखीमुखैस्वाव पितरगिरिम् । शैलदुहितोपाच। दुर्भाग्येन शरीरेण किं ममानेन कारणम् ॥ २६१ ॥ !
ऽध्यायः] * उमातपश्चर्यावर्णनम् * ४३७ कथं च तादृशं प्राप्तं सुखं मे स पतिर्भवेत् । तपोभिः प्राप्यतेऽभीष्टं नासाध्यंहितपस्यतः दुर्भगत्वं वृथा लोको चहते सति साधने । जीविताभगाच्यो मरणं ह्यतपस्यतः ।। भविष्यामि न सन्देही नियमः शोपये तनुम् । तपसि भ्रष्टसन्देहेउद्यमोऽर्थ जिगीपया॥ साहन्तपः करिष्यामि यदहं प्राप्य दुर्लभा । इत्युक्तः शैलराजस्तु दुहित्रा नेहविक्लयः । उचाच घाचा शैलेन्द्रो स्नेहगद्गदर्णया। हिमवानुवाच । उमेति चपले ! पुत्रि ! नक्षम तापकं घपुः ॥ २६६ ॥ ततः स चिन्तयाविष्टो दुहितां प्रशशंस च। ततोऽन्तरिक्ष दिव्या घागभूभुवनभूतले ।। उमेति चपले ! पुत्रि! त्ययोक्ता तनया ततः। उमेति नाम तेनास्था भुवनेषु भविष्यति सिद्धिचमूर्तिमत्येवासाधयिष्यति चिन्तिताम् । रतिश्रुत्यातुवचनमाकाशात्काशपाण्डुरः अनुशाय सुतां शैलो जगामाशु स्वमन्दिरम् । सूत उपाय। शैलजापि ययो शैलमगम्यमपि देवतैः ॥३०० ॥ ससीभ्यामनुयातानु नियता नगराजजा । शृङ्गं हिमवतः पुण्यं नानाधातुविभूपितम् ॥ दिव्यपुष्पलताकीण सिद्धगन्धर्वसेवितम् । नानामृगगणाकोणं भ्रमराभ्युटपादपम् ॥ दिव्यप्रस्रपणोपेतं दीर्घिकामिरलशम् । नानापक्षिगणाकीणं चायाकोपशोभितम् ॥ जलजम्थलः पुष्पैः प्रोत्फुलरुपशोभितम् । चित्रफन्दरसंस्थानं गुहागृहमनोहरम् ।। विदङ्गसङ्घसंजुष्टं फल्पपादपसङ्कटम् । तत्रापश्यन्महाशापं शापिनं हरितच्छदम् ॥ सर्य कुसुमोपेतं मनोरथशतोज्वलय् । नानापुष्पसमाकीर्ण नानाविधफलान्धितम् । नतं मूर्यस्य गचिनिर्मिनसंहतपल्ट्यम् । ताम्बराणि सन्त्यज्य भूपणानि च शैलजा ।। संपीता पल्मलदिव्यदर्भनिमितमेसला। त्रिः नातपाटलाद्वारा पभूप शरदां शतम् ॥ ३०८॥ शतमेशन शीर्णन पणेनापर्तयत्तदा । निराहारा शतं साभूत्ता नानासानिधिमा ३०॥ सत उजिताः सर्वे प्राणिनस्तत्तपोऽग्निना। ततः सम्मार भगवान मुनीन्सप्तशतरतुः ૪૨૮ * मत्स्यपुराणम् * [त्रिपञ्चाशदधिकशततमो ते समागम्य मुनयः सर्वे समुदितास्ततः। पूजिताश्च महेन्द्रेण पप्रच्छुस्तं प्रयोजनम् ॥ किमर्थन्तु सुरश्रेष्ठ ! संस्मृतास्तुवयन्त्घया। शक प्रोपाचशृण्वन्तु भगवन्तः ! प्रयोजनम् हिमाचले तपो घोरं तप्यते भूधरात्मजा । तस्या ह्यभिमतं कामं भवन्तः कर्तुमर्हथ ।। ततः समापतन् देव्या जगदथं त्वरान्विता.। तथेत्युत्तवातु शैलेन्द्र सिद्धसवातसेवितम् ऊचुरागत्य मुनयस्तामथी मधुराक्षरम् । पुत्रि! किन्ते व्यवसित काम-कमललोचने! तानुवाच ततो देवी सलज्ञा चित्रवाड्मुसी। तपस्यतो महाभागाः प्राप्य मौनं भवादृशान् ॥ ३१६ ॥ धन्दनाय नियुक्ता घीः पावयत्यधिकल्पितम् । प्रश्नोन्मुखत्वाचता युक्तमासनमादितः । उपविष्टाः श्रमोन्मुक्तास्ततः प्रक्ष्यथ मामतः । इत्युक्त्वा सा ततश्चक्रे कृतासनपरिग्रहान् सा तु तान् विधिवत्पूज्यान पूजयित्वा विधानतः । उवाचादित्यसंकाशान् मुनीन् सप्त सती शनैः ॥ ३१६ ॥ त्यक्त्या व्रतात्मकंमोनमौनंजग्राहहीमयम् । भावंतस्यास्तुमानान्तं तस्याः सप्तर्पयोयथा गौरवाधीनतां प्राप्ताः पप्रच्छुस्तां पुनस्तथा । सापि गौरवगर्भेण मनसा चारहासिनी मुनीन् शान्तकथालापान प्रोघाच प्रोज्भय घाग्यमम् । भगवन्तो विजानन्ति प्राणिनां मानसं हितम् ॥३२२॥ मनोवागभिरत्यर्थ कन्दर्प ते हि देहिनः । केचित्तु निपुणास्तत्र घटन्ते विधुधोद्यमैः॥ उपायैर्दुर्लभान्भावान् प्राप्नुवन्तिातन्द्रिताः । अपरेतु परिच्छिन्नानानाकारा-युपक्रमा देहान्तरार्थमारम्भमापतन्ति हितप्रदम् । मम त्वाकाशसम्भूतपुष्पदामविभूषितम् ॥३२५ पन्ध्यासुतं प्राप्तुकामा मनः प्रसरते मुहुः । अहं किल भवं देवं पति प्राप्तुं समुद्यता ॥ प्रकृत्यैव दुराधर्ष तपस्यन्तं तु संप्रति । सुरासुरैरनिणींतपरमार्थक्रियाश्रयम् ॥ ३२७ ॥ साम्प्रतं चापि निर्दग्धमदनं वीतरागिणम् । कथमाराधयेदीशं माशी तादृशं शिवम् ॥ इत्युक्ता मुनयस्तेतु स्थिरतां मनसस्ततः । ज्ञातुमस्या घचः प्रोचुः प्रक्रमात्प्रकृतार्थकम् । मुनय ऊचुः। द्विविधन्तुसुखन्तावत्पुत्रिलोकेषुभाव्यते । शरीरस्यास्यसम्भोगैश्चेतसश्चापिनिवृतिः ऽध्यायः] 1 * उमासप्तर्षि कथोपकथनम् * ४३६ प्रत्यासतुं दिग्वासा भीमः पितृवनेशयः । कपाली भिक्षुकोनग्नो विरूपाक्षास्थिरक्रियः प्रमत्तोन्मत्तकाकारो धीभत्संस्रतसंग्रहः । यतिनानेन का स्वार्थों मूर्त्तानर्थेन काक्षितः यदि हास्य शरीरस्य भोगमिच्छसि साम्प्रतम् । तत् कथन्ते महादेवात् भयभाजो जुगुप्सिताम् ॥ ३३३ ।। स्रवद्रक्तवसाभ्यक्तकपालमतभूपणात् । श्वसदुग्रभुजङ्गेन्द्र कृतभूपणभीपणात् ॥ ३३४ ।। श्मशानवासिनो रौद्रप्रमथानुगतात् सति! । सुरेन्द्रमुकुटवातनिएचरणोऽरिहा ।। हरिरस्ति जगद्धाता श्रीकान्तोऽनन्तमूर्तिमान् । नाथो यज्ञभुजामस्ति तथेन्द्रः पाकशासनः ॥ ३३६॥ देवतानांनिधिश्चास्तिज्वलनः सर्वकामरुत् । घायुरस्ति जगद्धातायः प्राणासर्वदेहिनाम् तथा वैश्रवणोराजासर्वार्थमतिमान् विभुः । एभ्यएकतमंकस्मात् नत्वंसम्प्राप्तुमिच्छसि उत्तानदेहसम्प्राप्त्या सुखं मनसेप्सितम् । एवमेतत्तवाप्यत्र प्रभवो नाफसम्पदाम् ॥ अस्मिन्नेह परत्रापि कल्याणप्राप्तयस्तव । पितुरेवास्ति तत् सर्व सुरेभ्यो यन्न विद्यते । अतस्तत्प्राप्तये क्लेशः स पाप्यत्राफलस्तव । प्रायेण प्रार्थितो भद्रे ! सुस्वल्पोह्यतिदुर्लभः अस्य ते विधियोगस्य धाता कर्तात्र चैव हि । सूत उवाच। इत्युक्ता सा तु कुपिता मुनिचर्येषु शैलजा ॥ ३४२ ।। उचाच कोपरक्काक्षी स्फुरद्भिर्दशनच्छदै.। देव्युवाच । असद्ग्रहस्य का प्रीतिर्व्यसनस्य क यन्त्रणा ॥ ३४३ ॥ विपरीतार्थयोद्धार सत्पथे केन योजिता. एवं मां वेत्थदुष्प्रज्ञा ह्यस्थानासद्ग्रहप्रियाम् न मां प्रति विचारोऽस्ति यत्रेहासनहावितौ । प्रजापतिसमा सर्वे भवन्तः सर्वदर्शिनः नूनं न वेत्थ तं देवं शाश्वतं जगत. प्रभुम् । अजमीशानमव्यक्तममेयमहिमोदयम् ।। आस्तान्तद्धर्मसद्धावसम्बोधस्ताबदगुतः । घिदुर्यन्न हरिब्रह्मप्रमुखाहि सुरेश्वराः ॥३४७ यत्तस्य विभवात्स्वोत्यंभुवनेषु विजृम्भितम् । प्रकटं सर्वभूताना तदप्यत्र नरेत्यकिम्
४४०
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* मत्स्यपुराणम् * [विपञ्चाशदधिकशततमो
फस्यैतद्गगनं मूर्तिः फस्याग्नि.कस्यमास्तः फस्यभू कस्य परुणः कश्चन्द्रार्कविलोचनः
फस्यार्चयन्ति लोकेषु लिङ्गमस्या सुरासुराः। यं ग्रुवन्तीश्वरं देवा विधीन्द्राधामहर्षयः
प्रभावं प्रभवञ्चय तेषामपि न वेत्थ किम् ।
अदितिः कस्य मातेयं कस्माज्जातो जनार्दन ॥ ३५१ ।।
अदितेः कश्यपाजाता देया नारायणादयः। मरीचेः कश्यपः पुत्रो हदितिर्दक्षपुत्रिका ।।
मरीविश्वापि दक्षश्चपुत्रांतीब्राह्मणः किल । ब्रह्मा हिरण्मयात्त्वण्डाहिव्यसिद्धिविभूषितात्
फस्यप्रादुरभूदयानात् प्रक्षुब्धाः प्राकृतांशकाः । प्रस्तोतुतृतीयायां मधुद्विड्जनन किया
जाता ससर्ज पड्वर्गान् बुद्धिपूर्वान् स्वकर्मजान् ।
अजातकोऽभवद्वेधा ब्रह्मणोऽव्यकजम्मनः ॥ ३५५ ॥
यः स्वयोगेन संक्षोभ्य प्राकृतं कृतवानिदम् । ब्रह्मणः सिद्धिसर्वार्थमेश्वर्यलोककर्तृताम्
विदुर्विष्ण्वादयो यच स्वमहिम्नासदैव हि । कृत्यान्यदेहमन्याद्वक्ताद्वक् कृत्यापुनहरिः
कुरुते जगतः कृत्यमुत्तमाधममध्यमम् । एवमेव हि संसारो यो जन्ममरणात्मकः ॥
कर्मणश्च फलं ह्येतत् नानारूपसमुद्भवम् । अथ नारायणोदेवः स्वकांच्छायांसमाश्रयत्
तत्प्रेरित. प्रकुरुते जन्म नानाप्रकारकम् । सापि कर्मण एवोक्ता प्रेरणी विवशात्मनाम्
यथोन्मादादिजुयस्य मतिरेव हि सा भवेत् । इष्टान्येव यथार्थानि विपरीतानि मन्यते ॥
लोकस्य व्यवहारेषु सृष्टेषु सहते सदा । धर्माधर्मफलावाप्ती विष्णुरेच नियोधितः ॥
अथानादित्वमस्यास्ति सामान्यात्तु तदात्मना ।
न हास्य जीवितं दीर्घदृष्टं देहे तु कुत्रचित् ॥ ३६३ ॥
भवद्विर्यस्य नोदृष्टमन्तमप्रमथापि वा । देहिनां धर्म एवैप कचिजायेत् कचिन म्रियेत्
क्वचिद्गर्भगतो नश्येत् क्वविजीवेजरामयः । क्वचित्समाः शतं जीवेत् कविद्याल्येचिपद्यते
शतायुःपुरुषो यस्तुसोऽनन्तःस्वल्पजन्मनः । जीवितोनम्रियत्यने तस्मात्सोऽमर उच्यते
अदृष्टजन्मनिधना ह्येवं विष्ण्वादयो मताः । एतत् संशुद्धमैश्वयं संसार को लभेदिह ॥
तत्र क्षयादियोगात्तु नानाश्चर्य्यस्वरूपिणी ।
तस्मादिवश्वरान् सर्वान् मलिनान् स्वल्पभूतिकान् ॥ ३६८ ॥
॥ ऽध्यायः] * उमासप्तर्षि कथोपकथनम् * नाहं भद्राः! किलेच्छामि ऋते शर्वात् पिनाकिनः । स्थितञ्च तारतम्येन प्राणिनां परमन्त्विदम् ॥ ३६६ ।। धीवलैश्वर्यकार्यादिप्रमाणं महतां महत् । यस्मान्न किञ्चिदपरं सर्व यस्मात् प्रवर्तते यस्यैश्वर्यमनाद्यन्तं तमहं शरणं गता । एप मे व्यवसायश्च दीर्थोऽतिविपरीतकः ॥३७१ यात वा तिष्ठतवाथ मुनयो ! मद्विधायकाः ! । एवं निशम्य वचनं देव्यामुनिघरास्तदा आनन्दाधुपरीताक्षाः सस्पजुस्ता तपस्विनीम् । ऊचुश्च परमप्रीताः शैलजां मधुरं पवः मृपय उचुः। अत्यद्भुतास्यहो देवि ! ज्ञानमूर्तिरियामला । प्रसादयति नो भावं भवभावप्रतिश्रयात् । न तु विद्मो धयन्तस्य देवस्यैश्वर्यमद्भुतम् । त्वनिश्चयस्य गृढ़तां वेत्तुं चयमिहागताः ।। अचिरादेव तन्वनि ! कामस्तेयंभविष्यति । क्वादित्यस्यप्रभायाति रत्नेभ्यःवद्युतिःपृथक कोऽर्थाचर्णालिका व्यक्त कयंत्वंगिरिशं विना । यामोनैकाभ्युपायेन तमभ्यर्थयितुंवयम् अस्माकमपि वै सोऽर्थः सुतरां हृदि वर्तते । अतस्त्वमेव सा वुद्धिर्यतो नीतिस्त्वमेयहि अतोनि.संशयं कार्यशङ्करोऽपिविधास्यति । इत्युक्ताः पूजितायाता मुनयोगिरिफन्यया प्रययुगिरिशं द्रष्टुं प्रस्थं हिमवतो महत् । गड्डाम्बुप्लावितात्मानं पिङ्गवद्धजटासटम् ॥ भृङ्गानुयातपाणिस्थमन्दारकुसुमस्रजम् । गिरेः संप्राप्य ते प्रस्थं ददृशुः शङ्कराश्रमम् ॥ प्रशान्ताशेपसत्वोघं नवस्तिमितफाननम् । निःशब्दाक्षोभसलिलप्रपातं सर्वतोदिशम् ॥ तत्रापश्यंस्ततो द्वारि घोरकं वेत्रपाणिनम् । सप्त ते मुनयः पूज्या विनीता: कार्यगौरवात् ॥ ३८३ ॥ ऊचुर्मधुरभापिण्या चावा ते वामिनाम्पराः। द्रष्टुं चयमिहायाताः शरण्यंगणनायकम् त्रिलोचन विजानीहि सुरकार्यप्रबोदिताः। त्वमेव नोगतिस्तत्त्वं यथाकालानतिक्रमः सत्कारितैप प्रायेण प्रतीहारमयः प्रभुः । इत्युक्तो मुनिभि. सोऽथ गौरवात्तानुवाच सः समन्यास्यापरां सन्ध्यामातुं मन्दाकिनीजले क्षणेन भविता विप्रास्तद्रक्ष्यथशूलिनम् इत्युक्ता मुनयस्तस्थुस्ते तत्कालपतीक्षिणः । गम्मीराम्बुधरं प्रावृट् तृपिताश्चातकायथा ततः क्षणेन निष्पन्नसमाधान क्रियाविधिः वीरासनं विभेदेशो मृगचर्मनिवासितम् ॥ ।
४४२
# मत्स्यपुराणम् * [त्रिपञ्चाशदधिकशततमो
ततो चिनीतो जानुभ्यामवलम्ब्य महीस्थितिम् । उपाच धीरकोदेवं प्रणामैकसमाश्रयः
सप्राप्ता मुनयः सप्त त्वां द्रष्टुं दीप्तचेतसः । विमो! समादिश द्रष्टुमवगन्तुमिहार्हसि ।।
इत्युक्तो धूर्जटिस्तेन धीरकेण महात्मना । भ्रूभङ्गसंशया तेषां प्रवेशाज्ञां ददौ तदा ॥
मूर्द्धकम्पेन तान् सर्वान् धीरकोऽपि महामुनीन् ।
आजुहाय विदूरस्थान दर्शनाय पिनाकिनः ॥ ३३॥
त्वरावद्धार्द्धचूडास्ते लम्यमानाजिनाम्बराः । विविशुर्वेदिकांसिद्धांगिरिशस्यविभूतिभिः
बद्धपाणिपुटाक्षिप्तनाकपुष्पोत्करास्ततः । पिनाकिपादयुगलं यथा नाकनिवासिनः ।।
ततः स्निग्धेक्षिताः शान्ता मुनयः शूलपाणिना ।
मन्मथारि ततो हृष्टाः म्यक् तुष्टुवुरागृताः ॥३६६ ॥
मुनय ऊचुः।
अहो कृतार्था घयमेव साम्प्रतं सुरेश्वरोऽप्यत्र पुरो भविष्यति ।
भवत्प्रसादामलवारि सेकतः फलेन कावित्तपसा नियुज्यते ॥३७॥
जयत्यसौ धन्यतरो हिमाचलस्तदाश्रयं यस्य सुता तपस्यति ।
सदैत्यराजोऽपि महाफलोदयो विमूलिताशेपसुरो हि तारकः ॥३६॥
त्वदीयमंशम्प्रचिलोक्य कल्मपात् स्वकं शरीरं परिमोक्ष्यते हि यः।
स धन्यधीलॊकपिता चतुर्मुखो हरिश्च यत्सम्भ्रमयहिदीपित ॥३६॥
त्वदघ्रियुग्म हृदयेन विभ्रतो महाभितापप्रशमैकहेतुकम् ।
त्वमेव चैको विविधकृतक्रियः किलेति घाचा विधुरैर्विभाष्यते ॥४००॥
अथाद्य एकस्त्वमवैषि नान्यथा जगत्तथा निवृणतान्तव स्पृशेत् ।
न वेतसि वा दुःखमिदं भवात्मिकं विहन्यते ते खलु सर्व निष्क्रिया ॥४१॥
उपेक्षसे चेजगतामुपद्रवं दयामयत्वं तव केन कथ्यते ।
स्वयोगमायामहिमागुहाश्रयं न विद्यते निर्मलभूतिगौरवम् ॥४०२॥
वयं च ते धन्यतराः शरीरिणां यदीदृशं त्वं प्रविलोकयामहे ।
अदर्शनं तेन मनोरथो यथा प्रयाति साफल्यतया मनोगतम् ॥४३॥
--- ऽध्यायः] * सप्तर्षीणां मेनयासह परामर्श:* जगद्विधानकविधौ जगन्मुखे फरिप्यसेतो घलभिचरा वयम् । विनेमुरित्यं मुनयो विसृज्य तां गिरं गिरीशश्रुतिभूमिसन्निधौ । उत्कृष्टकेदार इचावनीतले सुचीजमुष्टि सुफलाय कर्पकाः ॥ ४०४ ॥ तेषां श्रुत्वा ततोरम्यां प्रक्रमोपक्रम क्रियाम् । वाचं वाचस्पतिरिव प्रोवाव स्मितसुन्दरः शर्व उवाच । जाने लोकविधानस्य कन्यासत्कार्य्यमुत्तमम् । जाता प्रलेयशैलस्य सङ्केतकनिरूपणाः सत्यमुत्कण्ठिताः सर्वे देवकार्यार्थमुद्यताः। तेषां त्वरन्तिचेतांसि किन्तुकार्यविवक्षितम् लोकयात्रानुगन्तव्या विशेषेण धिवक्षणः । सेवन्ते ते यतो धर्म तत्प्रामाण्यात्परे स्थिता ॥ ४०८ ॥ इत्युक्त्या मुनयो जग्मुस्त्वरितास्तु हिमाचलम् । तत्र ते पूजितास्तेन हिमशैलेन सादरम् ॥ ४० ॥ ऊचुर्मुनिवराःप्रीता स्वल्पवर्णन्त्वरान्विताः । मुनय ऊचुः। देवो दुहितरं साक्षात् पिनाकी तव मार्गते ॥४१॥ उच्छीधं पापयात्मानमाहुत्येवानलार्पणात् । कार्यमेतच देवाना सुचिरं परिवर्तते ॥ जगदुद्धरणायेष क्रियतां वै समुद्यमः । इत्युक्तस्तैस्तदा शैलो हर्षाविष्टोऽवदन्मुनीन् ।। असमर्थोऽभयद्वक्तुमुत्तरं प्रार्थयञ्छिवम् । ततो मेना मुनीन्यन्द्य प्रोवाच स्नेहविक्लचा ॥ दुहितुस्तान मुनीश्चैव चरणाश्रयमर्थचित् । मनोवाच । यदथं दुहितुर्जन्म नेच्छन्त्यपि महाफलम् ॥ ४१४ ॥ तदेवोपस्थित सर्व प्रकामेणेय साम्प्रतम् । कुलजन्मययोरूपविभूत्या युतोऽपि यः ।। परस्तस्यापि चाहय सुता देवाघयाचत. । तत्समस्ततपोधोरं कथं पुत्री प्रयास्यति । पुत्रीवास्यायनास्ति विधेयं तद्विधीयताम् । इत्युक्ता मुनयस्ते तु प्रियया हिमभूभृतः।। ऊचुः पुनरदारा, नारीचित्तप्रसादकम् ।
* मत्स्यपुराणम् *
[त्रिपञ्चाशदधिकशततमो
मुनय ऊचुः।
ऐश्वर्यमवगच्छस्व शङ्करस्य सुरासुरैः ॥ ४१८ ॥
आराध्यमानपादाब्जयुगलत्वात् सुनिर्वृतैः । यस्योपयोगि यद्रूपं साचतत्प्राप्तयेविरम्
घोरं तपस्यते बाला तेन रूपेण निवृतिः । यस्तद्ब्रतानि दिव्यानि नयिस्यति समापनम्
तत्र सावहिता तावत्तस्मात् सैव भविष्यति । इत्युक्तागिरिणा सार्द्धन्तेययुर्यत्र शैलजा
जितार्कज्वलनज्वाला तपस्तेजोमयीह्युमा । प्रोस्तां मुनयःस्निग्धंसन्मान्य पथमागतम्
रम्यं प्रियं मनोहारि मारूपं तपसा दह । प्रातस्ते शङ्करः पाणिमेष पुत्रि ! ग्रहीष्यति ।
घयमर्थितवन्तस्ते पितरं पूर्वमागताः । पित्रा सह गृहङ्गच्छ वयं यामः स्वमन्दिरम् ॥
इत्युक्त्वा तपसः सत्यं फलमस्तीति चिन्त्य मा।
त्वरमाणा ययो वेश्म पितुर्दिव्यार्थशोभितम् ॥ ४२५ ॥
सा तत्र रजनी मेने वर्षायुतसमां सतीम् । हरदर्शनसञ्जातमहोत्कण्ठा हिमाद्रिजा ॥
ततो मुहूर्ते ब्राह्मे तु तस्याश्चक्रुः सुरस्त्रियः । नानामङ्गलसन्दोहान्यथावक्त्रमपूर्वकम्
दिव्यमण्डनमङ्गानां मन्दिरे बहुमङ्गले । उपासत गिरि मूर्ता ऋतकः सार्वकामिकाः ॥
चायचो धारिदाश्वासन समार्जनविधी गिरेः । हर्येपु श्रीःस्वयं देवी कृतनानाप्रसाधना
कान्तिः सर्वेषु भावेषु ऋद्धिश्चाभवदाकुला । चिन्तामणिप्रभृतयो रताः शैलं समन्ततः
उपतस्थुर्नगाश्चापि कल्पकाममहाद्रुमाः । ओषध्यो मूर्तिमत्यश्च दिव्यौषधिसमन्विताः
रसाश्च धातवश्चैव सर्वे शैलस्य किङ्करा.। किङ्करास्तस्य शैलस्य व्यग्राश्चाज्ञानुवर्तिन ।।
नद्यः समुद्रा निखिला स्थावरं जङ्गमञ्च यत् ।तत् सर्व हिमशैलस्य महिमानमवर्द्धयत्
अभवन्मुनयो नागा यक्षान्धर्वकिन्नराः । शङ्करस्यापि विबुधा गन्धमादनपर्यते ॥४३४
सर्वे मण्डनसम्भारास्तस्थुनिर्मलमूर्तयः । सर्वस्यापि जटाजूटे चन्द्रखण्डं पितामहः ॥
ववन्ध प्रणयोदारविस्फारितपिलोचनः। कपालमालां विपुलां चामुण्डामूदुर्व्यवन्धत
उपाव चापि पचनं पुत्रं जनय शङ्कर । यो दैत्येन्द्रकुलं हत्या मारक्तस्तर्पयिष्यति ॥
सौरिचलच्छिरोरतमुकुटवानलोल्यणम् ।
भुजगाभरणं गृह सज्ज शम्भोः पुरोऽभवत् ॥ ४३८ ॥
ऽध्यायः] * पार्वतीपाणिग्रहणा, हरस्य हिमालयगृहे गमनम् * शको गजाजिनं तस्य घसाभ्यक्तानपल्लवम् ॥ दने सरमसं स्विद्विस्तीर्णमुखपङ्कजम् ॥ ४३६ ॥ पायुश्च विपुलं तीक्ष्णटझं हिमगिरिप्रभम् । वृष विभूषयामास हरयानं महोजसम् ॥ वितेनुनयनान्तस्थाः शम्भोः सूर्यानलेन्दवः । स्वान्युति लोकनाथस्य जगतः कर्मसाक्षिणः ॥ ४४१ ॥ चिताभस्म समाधाय कपाले रजतपमम् । मनुजास्थिमयी मालामावबन्ध च पाणिना प्रेताधिपः पुरोद्वारे सगदः समवर्तत । नानाकारमहारत्नभूपणं धनदाहृतम् ॥ ४४३ ॥ विहायोदप्रसपेन्द्रकटकेन स्पापिना ! कर्णोत्तंसश्चकारेशो घासुकिन्तक्षक स्वयम् ॥ जलाधीशाहृतां स्थास्नुप्रसनावेष्टितां पृथक् । ततस्तुते गणाधीशा विनयात्तत्र धीरकम् प्रोचुर्व्यग्रारते! त्वन्नो समायेदय शृलिने । निष्पन्नाभरणं देवं प्रसाध्येशम्प्रसाधनः ॥ सतवारिधयस्तस्युः कर्तु दर्पणविभ्रमम् । ततो विलोक्तिात्मानं महाम्बुधिजलोदरे ।। धरामालिय जानुभ्या स्थाणुप्रोवाच केशवः । शोभसे देव! रूपेण जगदानन्ददायिना मातरः प्रेरयाकामवधू वैधव्यचिह्निताम् । फालोऽयमिति चालक्ष्य प्रकारेगितसंशया॥ ततस्तायोदिता देवमूचुः प्रहसिताननाः। रतिः पुरम्तय प्राप्ता नाभाति मदनोझिता। ततस्ता सन्निपार्याह घामहस्ताग्रसंशया । प्रयाणे गिरिजावक्रदर्शनोत्सुकमानस. ॥ ततो हरो हिमगिरिफन्दराकृतिम् समुसतं मृदुगतिभिः प्रचोदयन् । महावृषलणतुमुलाहिनेक्षण स भूधरानशनिरिघ प्रकम्पयन् ॥ १५२ ॥ ततो हरितपदपद्धतिः पुर सरः श्रमात द्रुमनिकरेषु विधमन् । धरारजःशवलितभूषणोऽप्रवीत् प्रयात मा फुरत पयोऽस्य सफटम् ॥४५३) प्रभोः पुनः प्रथमनियोगमूर्जयन् सुतोऽप्रवीभृकुटिमुपोऽपि पीरकः । पियशरा वियति विमस्तिफान्तकम् प्रयात नो धरणिधराऽपिरत ४५४ महार्णया: युस्त शिलोपमम्पयः सुरदिरा गमनमहातिकर्दमान् । गणेश्वराधपलतया न गम्यताम् सुरेन्वरः स्थिरमतिमिन्ध गम्यताम् ४५५॥ न भूगिणा म्यतनुमवेक्ष्य नीयते पिनायिनः पृथुमुपमण्यमप्रतः ।
४४६ * मत्स्यपुराणम् * [त्रिपञ्चाशदधिकशततमो वृथायमप्रकटितदन्तकोटरम् त्वमायुधं पहसि विहाय पञ्जरम् ॥ ४५६ ॥ पदनयद्रथतुरगैः पुरद्विषा प्रमुच्यते यदुतरमातृसङ्कुलम् । अमी सुराः पृथगनुयायिभिवृताः पदातयो द्विगुणपथान् हरप्रियाः ॥१५॥ स्ववाहन. पवनविधूतचामश्चलध्वजैर्वजत विहारशालिभिः । सुराः स्वकं किमिति न रागमूर्जितं विचार्यते नियतलयत्रयानुगम् ।। ४५८ ॥ न किन्नरैरभिभवितुं हि शक्यते विभूषणप्रचयसमुभयो ध्वनिः । स्वजातिकाः किमिति नपड्जमध्यमपृथुस्वरं यहुतरमत्र पक्ष्यते ॥४५६॥ नतानतानतनतनताङ्गताः पृथक् तया समयकृता विभिन्नताम् । विशङ्किता भवदतिभेदशीलिनः प्रयान्त्यमी द्रुतपदमेव गौडकाः ॥ ४६० ॥ विसंहताः किमिति न पाड्गवादयः स्वगीतललितपदप्रयोगः । प्रभोः पुरो भवति हि यस्य चाक्षतं समुद्गतार्थकमिति तत्प्रतीयते॥४६१॥ अमी पृथग्विरचितरम्यरासकं विलासिनो बहुगमकस्वभावकम् । प्रयुञ्जते गिरिशयशोविसारिण प्रकीर्णकं वहुतरनागजातयः ॥४६२॥ अमी कथं ककुभिकथा प्रतिक्षणं ध्वनन्ति ते विविधधधूपिमिश्रिताः। न जातयो ध्वनिमुरजासमीरिता न मूच्छिताः किमिति च मूर्च्छनात्मिकाः ।। श्रुतिप्रियक्रमगतिभेदसाधनं ततादिकं किमिति न तुम्वरेरितम् । न हन्यते बहुविधवाद्यडम्वरं प्रकीर्णवीणामुरजादि नाम यत् ॥ ४६४॥ इतीरिते गिरिमवधानशालिनः सुरासुराः सपदि तु धीरकाज्ञया। नियामितीः प्रययुरतीच हर्षिताश्चरावरं जगदखिलं ह्यपूरयन् ॥ ४६५ ॥ इतीस्तनत्ककुभिरसन्महार्णवे स्तनद्घने विदलितशैलकन्दरे । जगत्यभूत्तुमुल इवाकुलीकृतः पिनाकिना त्वरितगतेन भूधरः ॥ ४६६ ॥ परिज्वलत् कनकसहस्रतोरणं क्वचिमिलनमरकतवेश्मवैदिकम् । क्वचित् क्वचिद्विमलवैदूर्यभूमिकं कचिद्गलजलधररम्य निझरम् ॥ ४६७ ॥ चलध्वजप्रवरसहस्रमण्डितं सुरद्रुमस्तवफविकीर्ण चत्वरम् ।
ऽध्यायः] * पार्वतीपाणिग्रहणाथं शिवस्य हिमालयगृहे गमनम् * सिता सितारुणरुचिधातुवर्णकं नियोज्ज्वलं प्रपिततमार्गगोपुरम् ॥४६८॥ विजृम्भिता प्रतिमध्यनिवारिदं सुगन्धिभिः पुरपचनैर्मनोहरम् । हरो महागिरिनगरं समासदत् क्षणादिध प्रवरसुरासुरस्तुतः ॥ ४६६ ॥ तं प्रविशन्तमगात् प्रचिलोक्य व्याकुलतां नगरं गिरिभर्तुः । व्यग्रपुरन्ध्रिजनअवियानं धावितमार्गजनाकुलरथ्यम् ॥ ४७० ॥ हर्म्यगवाक्षगतामरनारीलोचननीलसरोरुहमालम् । सुप्रकटासमदृश्यत काचित्स्वाभरणांशुवितानविगूढा ॥ ४७१ ॥ काप्यखिलीकृतमण्डनभूपा त्यक्तसखीप्रणयाहरमेक्षत् । काचिदुचाच कलङ्गतमानाकातरतां ससि! मा कुरु मूढे ॥ ४७२ ॥ दग्धमनोभव एव पिनाकी कामयते स्वयमेवं विहर्तुम् । काचिदपि स्वयमेव पतन्ति प्राह परां विरहस्पलिताङ्गीम् ॥ ४७३ ॥ मा चपले मदनव्यतिपङ्ग शङ्करजं स्खलनेन पदत्वम् । कापि कृतव्यवधानमदृष्ट्वा युक्तिवशादगिरिशो धयमूचे ॥ ४७४ ॥ एप स यत्र सहस्रमपाद्या नाकसदामधिपाः स्वयमुक्तः । नामभिरिन्दुजटं निजसेवाप्राप्तिफलायनतास्तु घटन्ते ॥ ४७५ ॥ एप न चैप स एप यदने धर्मपरीततनुः शशिमोली । धावति पन्नधरोऽमरराजो मार्गममुं विवृतीकरणाय ॥ ४७६ ॥ एप स पद्मभयोऽयमुपेत्य प्रांशुजटामृगचर्मनिगूढः । सप्रणयङ्करघट्टितच किशिदुपाच मितं श्रुतिमूले ॥ ४७७ ।। एघमभूत् सुरनारिफुलानां चित्तचिसंप्ठुलता गुररागात् । शङ्करसंश्रयणादिगिरिजायाजन्मफलं परमन्त्विति चोचुः ॥ ४७८ ॥ ततो हिमगिरेश्म विश्वकर्मनिवेदितम् । महानीलमयस्तम्मञ्चलत्काञ्चनकुट्टिमम् ॥४७॥ मुक्तासालपरिप्कारं ज्वलितापधिदीपितम् । ॥ - * मत्स्यपुराणम् * [त्रिपञ्चाशदधिकशततमो क्रीडोद्यानसहलाढ्य काञ्चनाबद्धदीधिकम् ॥४८॥ महेन्द्रप्रमुखाः सर्वे सुरा दृष्ट्वा तदद्भुतम् । नेत्राणि सफलान्यद्य मनोभिरिति ते दधुः । विमर्दकीर्णकेयूरा हरिणा द्वारिरोधिता । कथञ्चित् प्रमुखास्तत्र विविशु कवासिनः प्रणतेनाचलेन्द्रेण पूजितोऽथ चतुर्मुखः । चकार विधिना सर्व विधिमन्त्रपुरःसरम् ।। शर्वेण पाणिग्रहणमग्निसाक्षिकमक्षतम् । दाता महीभृतान्नाथो होता देवश्चतुर्मुखः ॥ वरः पशुपतिः साक्षात् कन्या विभ्वारणिस्तथा। चराचराणि भूतानि सुरासुरवराणि च ॥४८५॥ तत्राप्येते नियमतो हमवनव्यग्रमूर्तयः । मुमोचाभिनवानसर्वान्सस्यशालीनरसौषधीः व्यग्रा तु पृथिवी देवी सर्वभावमनोरमा । गृहीत्वा घरुणः सर्वरतान्याभरणानि च ॥ पुण्यानि च पवित्राणि नानारत्नमयानि तु । तस्थौ स्वाभरणो देवोहर्षद सर्वदेहिनाम् धनदश्चापि दिव्यानि हैमान्याभरणानि च । जातरूपविचित्राणि प्रयत. समुपस्थितः घायुर्ववौ सुसुरभि. सुखसंस्पर्शनो विभुः । छत्रमिन्दुकरोद्गारं सुसितञ्च शतक्रतुः॥ जग्राह मुदितः स्रग्वी बाहुभिर्यहुभूपणै. । जगुर्गन्धर्षमुख्याश्च ननृतुश्चाप्सरोगणा पादयन्तोऽतिमधुरं जगुर्गन्धर्व किन्नरा.। मूर्त्ताश्च ऋतवस्तत्र जगुश्च ननृतुश्च वै॥ चपलाच गणास्तस्थौलयन्तो हिमाचलम् । उत्तिष्ठन् क्रमशश्चात्र विश्वभुग्भगनेत्रहा ॥४६॥ चकारीद्वाहिकं कृत्यं पल्ल्या सह यथोचितम् । दत्तार्यों गिरिराजेन सुरवृन्दैविनोदितः ॥४६४॥ अवसत् तां क्षपान्तन पन्या सह पुरान्तक । ततो गन्धर्वगीतेन नृत्येनाप्सरसामपि ॥४६५॥ स्तुतिभिर्देवदैत्याना विमुधो वियुधाधिपः । आमन्त्र्य हिमशैलेन्द्र प्रभाते चोमया सह जगाम मन्दरगिरि घायुवेगेन शृङ्गिणा ॥४६६॥ ततो गते भगवति नीललोहिते सहोमया रतिमलभन्न भूधरः । सयान्धवो भवति च फस्य नोमनो विहलञ्च जगति हि फन्यकापितु ॥४६७ । ऽध्यायः] * हरगोरीसहवासवर्णनम् *', ज्वलन्मणिस्फटिकहाटकोत्कटं स्फुटद्युतिस्फटिकगोपुरं पुरम् । हरो गिरौ चिरमनुकल्पितन्तदा विसर्जितामरनिवहोऽविशत्स्थकम् ॥४६८॥ तदोमासहितो देवो चिजहार भगाक्षिहा । पुरोधानेपु रम्येषु विवकेषु धनेषु च ॥४EE सुरक्तहृदयो देव्या मकराकपुरः सरः । ततो बहुतिथे काले सुतकामां गिरेः सुता ।। सखीभिः सहिता क्रीडां चक्रे कृत्रिमपुत्रकैः । कदाचिद्गन्धतैलेन गात्रमभ्यज्य शैलजा ॥५०॥ चूर्णरुद्धर्तयामास मलिनां तरितान्तनुम् । तदुद्वर्तनकं गृह्य नरं चक्रे गजाननम् ॥५०२ पुत्रक क्रीडती देवी तं चाक्षिपयदम्भसि । जाहव्यास्तु शिवासख्यास्ततः सोऽभूद्रहत् वपुः ॥५०३॥ कायेनातिविशालेन जगदापूरयत्तदा । पुत्रेत्युवाच तं देवी पुत्रेत्यूचे च जाह्नवी ॥५०४॥ गाङ्गेय इति देवस्तु पूजितोऽभूद्गजाननः । विनायकाधिपत्यञ्च ददावस्य पितामहः ॥ पुनः सा क्रीडनं चके पुत्रार्थ परपणिनी । मनोझमड्डुरं रूढमशोकस्य शुभानना ।। पर्द्धयामास तं चापि तसंस्कारमङ्गला। वृहस्पतिमु विप्रेर्दिवस्पतिपुरोगमः ॥ ततो देवैध मुनिभिः प्रोका देवी त्विदम्यच. भवानी भवतीभव्या संभूता लोकभूयते प्रायः सुतफलो लोकः पुत्रपौत्रैश्च लभ्यते । अपुत्राश्च प्रजाः प्रायो दृश्यन्ते देवहेतवः अधुना दर्शिने मार्गे मर्यादा कर्तुमर्हसि। फलं किम्मयिता देवि ! कल्पितैस्तरपुत्रके.॥ इत्युक्ता हर्षपूर्णाडी प्रोपाचोमा शुभाशिरम् । देव्युवाच । एवं निस्दके देशे य. कृपं कारयेद् युधः ॥१३॥ चिन्दी चिन्दी च तोयस्य घसेत् सम्वत्सरन्दिपि । दशकृपसमावापीदशवापीसमोहदः दशहदसमः पुत्रो दशपुप्रसमो द्रुम । एव मम मर्यादा नियता लोकमापिनी १५६३ इत्युक्तास्तु ततोधिप्रा वृहस्पतिपुरोगमाः । जग्मु स्यमन्दिराण्येवमयानींबन्ध सादरम् गतेषु तेषु देवोऽपि शङ्करः पर्वतात्मनाम् । पाणिना लम्यमानेन शनैः प्राशयमाम् चित्तप्रसादजननं प्रासादमनुगोपुरम् । लम्पोक्तिपदामानं मालिफाकुलयेदिकम् ॥
४५०
* मत्स्यपुराणम् * [विपञ्चाशदधिकशततमो
निधौंतकलधौतं च क्रीडागृहमनोरमम् । प्रकीर्णकुसुमोद्दाममत्तालिकुलकूजितम् ॥५१७
किन्नरोद्गीतसङ्गीतगृहान्तरितभित्तिकम् । सुगन्धिधूपसड्डातमनःप्रार्थ्यमलाली हितम् ।।
क्रीडन्मयूरनारीभिर्वृतं वै ततवादिभिः । हंससड्डातसंधुष्टं स्फाटिकस्तम्भवैदिकम् ।
अनारतमतिप्रीत्या बहुश किन्नराकुलम् । शुकैर्यत्राभिहन्यन्ते पद्मरागविनिर्मिता. ॥७२०
भित्तयो दाडिमभ्रान्त्या प्रति विम्वितमौक्तिकाः।
तत्राक्षक्रीडया देवो विहर्तमुपचक्रमे ॥ ५२१ ॥
स्वच्छेन्द्रनीलभूभागे क्रीड़ने यत्रधिष्ठितौ । घपु सहायतां प्राप्तौ विनोदसनिवृतौ ॥
एवं प्रक्रीडतोस्तत्र देवीशङ्करयोस्तदा ।
प्रादुर्भयन्महाशब्दस्तद्गृह रगोचर. ॥ ५२३ ॥
तच्छ्र त्या कौतुकाद्देवी किमेतदिति शङ्करम् ।
पप्रच्छ तं शुभतनुर्हरं विस्मयपूर्वकम् ।। ५२४ ॥
उवाच देवी नैतत्ते दृष्टपूर्व सुधिस्मिते ।
एते गणेशा. क्रीडन्ते शैलेऽस्मिन् मत्प्रियाः सदा ॥५२५॥
तपसा ब्रह्मचर्येण नियमै क्षेत्रसेवनः । येरहंतोपित पूर्व त एते मनुजोत्तमाः ॥५२६।।
मत्समीपमनु प्राप्ता मम हृया शुभानने । कामरूपा महोत्साहा महारूपगुणान्विताः ।।
कर्मभिर्भावस्मयं तेपा प्रयामि बलशालिनाम् । सामरस्यास्य जगत. सृष्टिसंहरणक्षमा. ।
ब्रह्मविष्ण्वीन्द्रगन्धयः सकिन्नरमहोरगैः।
विवर्जितोऽप्यहं नित्यन्नभिर्विरहितो रमे ॥५२६ ॥
हया मे चार सर्वाङ्गास्त एते क्रीडते गिरी।
इत्युत्तवा तु ततो देवी त्यत्वा तद्विस्मयाकुला ॥ ५३० ॥
गवाक्षान्तरमासाद्य प्रेक्षते विस्मितानना।
यावन्तस्ते हशा दीर्घा हस्या स्थूला महोदरा. ॥ ५३१॥
व्याप्रेमवदना. केचित् केचिन्मेपाजरूपिण ।
अनेक प्राणिरूपाश्च ज्वालास्या कृष्णपिङ्गला ॥ ५३२ ॥
ऽध्यायः] * पार्वती गणेशनाम्नः पुत्रप्राप्तिः * सौम्या भीमाः स्मितमुखाः कृष्णपिङ्गजटासटाः । नानाविहङ्गवदना नानाविधमृगाननाः ॥ ५३३ ॥ कोशेयचर्मवसना नग्नाश्चान्ये विरूपिणः । गोकर्णा गजकर्णाश्च बहुवनेक्षणोदराः ॥ ५३४ ॥ यहुपादा यहुभुजा दिव्यनानास्त्रपाणय. । अनेककुसुमापीडा नानाव्याल विभूषणाः ॥ ५३५ ॥ वृत्ताननायुधधरा नानाकवचभूपणाः । विचिनचाहनासहा दिव्यरूपा वियच्चराः ॥ ५३६ ॥ वीणा पायरवाघुष्टा नानास्थानकनर्नकाः। गणेशांम्तांस्तथा दृष्ट्वा देवी प्रोवाच शङ्करम् ॥ ५३७ ॥ देव्युवाच । गणेशाः कति सङ्ग्याताः किं नामानः किमात्मका । एकैकशो मम हिधिष्ठिता ये पृथक् पृथक् ॥ ३८ ॥ शङ्कर उवाच । कोटिसट्ग्या ह्यसयाता नानाविरयातपौरु.। जगदापूरित सरेभिर्मामे महावलैः ।। ५३६ ॥ सिद्धक्षेत्रेषु रण्यासु जीर्णाद्यानेषु चेमसु । दानपानां शरीरेषु थालेपून्मत्तकेषु च ॥ एने विशन्ति मुदिता नानाहारविहारिणः । ऊप्मपाः फेनपाथेर धूमपा मधुपायिनः ।। रकमा समाश वायुरा युभोजनाः । गेयनृत्योपहाराध नानायायायप्रियाः न होगं ये अनन्तवाद गुणान् वक्तुं हि शक्यते ।
४५२ [त्रिपञ्चाशदधिकशततमोर * मत्स्यपुराणम् * य एप गणगीतेपु दत्तकर्णा मुहुर्मुहुः । शर्व उवाच स एप धीरको देवि! सदा मधृदयप्रियः ॥ ५४६ ॥ नानाश्चर्य्यगुणाधारो गणेश्वरगणाचितः । देव्युवाच । ईदृशस्य सुतस्यास्ति ममोत्कण्ठा पुरान्तक ॥ ५४७ ॥ कदाहमीदृशं पुत्रं द्रक्ष्याम्यानन्ददायिनम् । शर्व उवाच। एप एव सुतस्तेऽस्तु नयनानन्दहेतुकः ॥ ५४८ ॥ त्वया मात्रा कृतार्थस्तु चीरकोऽपि सुमध्यमे !! इत्युक्त्वा प्रेषयामास विजयां हर्षणोत्सुका ॥ ५४६ ॥ पीरकानयनायाशु दुहिता हिमभूभृतः । सावरा स्वरायुक्ता प्रासादादम्बरस्पृशः ।। विजयोवाच गणपङ्गणमध्ये प्रवर्तिता विजयोवाच । एहि चीरक ! चापल्यात् त्वया देवः प्रकोपित ॥५५१ ॥ किमुत्तर पदत्यर्थे नृत्यरंगे तु शैलजा । इत्युक्तस्त्यक्तपापाणशकलो मार्जितानन ॥ भातस्तु तयोभूतमूलप्रस्तावशंसकः । देध्या. समीपमागच्छजययानुगतः शन. ! प्रासादशियरात्फ्लरक्ताम्बुजनिभाति । त दृष्ट्वा प्रस्तानरपस्वादुक्षीरपयोधरा ॥ गिरिजोधाच सस्नेहं गिरा मधुरधर्णया ॥ ५५४ ॥ अथ गधानि। रमोचाचा एलोहि यातोऽसि मे पुत्रतान्देव देवेनादत्तोऽभुनाचीरक ! ॥ ५५ ॥ इत्येवमट्टे निघायाथ त पर्यप्यजत् फ्पोले पलयादिनम् ।। ७७६ ॥ ५समाज्यंगात्राणिभूषयामास दिव्यः स्वयंभूषणः विहीणमेपलानपुरैर्मा- ऽध्यायः] * पार्वत्याः गणेशम्प्रति उपदेशः * णिस केयूरहारोरुमूलगुणः ॥५४॥ कामले पलपश्चित्रितश्चारुमिदिव्यमन्त्रोद्भवस्तस्य शुभैस्ततो भूरिभिश्वाकरोन्मिश्रसिद्धार्थकैरङ्गरक्षाविधिः ॥ ५.८ ॥ एषमादाय चोवाव कृत्वा संमूनि गोरोचनां पत्रमडोज्ज्वलः ॥ १५६॥ गच्छगच्छाधुना क्रीडसाद्धंगणैर- प्रमत्तोवसं श्वभ्रवशिनालमालाकुलाशैलसानुद्रुमदन्तिभिभिन्नसाराः परेसंगिनः ॥६०॥ जाह्नवीयं जलं क्षुब्धतोयाकुलम् कृलं मा विशेथा यहुव्याघ्र दुष्टे घने ॥५६१॥ चत्सासंख्येषु दुर्गागणेशेप्येतस्मिन् वीरके पुत्रभावोपतुष्टान्त. करणातिष्ठतु ॥५२ स्वस्य पितृजनप्रार्थितं भव्यमायातिभाविन्यसोभव्यता ॥ ५३॥ सोऽपि निभृत्य सर्वगणः सस्मयमाह चालत्वलीलारसाचिटधीः ॥५४॥ एपमात्रा स्वयं मे भूषणोऽत्र एपपटः पटलेविन्दुभिः सिन्दुवारस्य पुष्पैरियं मालतीमिश्रितामालिका मे शिरस्याहिता ॥ ॥ कोऽयमातोद्यधारीगणस्तस्य दास्यामि हस्तादिदं क्रीड- नम् ॥ ५६६ ॥ दक्षिणात पश्चिमं पश्चिमादुत्तरमुत्तरात् पूर्वमभ्येत्य सख्या युता प्रेक्षती तं गवाक्षान्तराद्वीरकं शैलपुत्री बहिः क्रीडनं यजगन्मातुरेप चित्तभ्रमः ॥ ५६७ ॥ पुत्रलुब्धो जनस्तत्र को मोहमायाति न स्वल्पचेताजडो मांसविण्मूत्रसवातदेहः॥५६८ द्रष्टुमभ्यन्तरन्नाफयासेश्वरैरिन्दुमौलि प्रविप्रेषु कक्षान्तरम् ॥६६॥ चाहनात्या- परोहागणास्तयुत्तोलोकपालास्त्रमूर्तोहायं पगो विपढ़करोनिर्ममः कृतान्तः कम्य पनाहटो धूत माने भवन्तोऽनदण्डन किं दुस्पृहा ॥ ७० ॥ भीममूर्त्यानने नास्ति सत्यगिरौ य एषोऽस्प्रशेन कि पध्यते ॥ ७९ ॥ माथा लोकपालानुगचित्तता एप मेयेतदित्यूचुरस्मै तदा देवताः ॥ १२॥ देवदेवानुगम्धीरक लक्षणाप्राह देवी धनपर्यता- निराण्यग्निदेव्यान्ययोभूनपानिराम्भोनिपातेषु निमज्जन ॥ 3 ॥ पुष्पजाला- चनपु धामस्पपिरोत प्रजुगनाट्रिफुजेष्यनुगर्जन्तु हे मारतां स्फोटसंक्षेपणान् फामतः ॥ १५ ॥ फाशनोत्तगटङ्गापरोहक्षिठी हेमरेणूत्करासयुतिम् । मेचराणां पनाधायिनि रम्ये यम्पसम्पन्प्रकरेगणान्यासितम् मन्दरफन्दरे मुन्दरमन्दार- पुष्पप्रपालाम्बुजे सिद्धनारीभिरापीतम्पामृतं विस्तृतर्नेत्रपाप्रेरनुनमेषिभिधारक शैल. पुत्री निमेशन्तरादम्मरम् पुधगृनी विनोदार्थिनीn "': ॥ सोऽपि ताहक क्षणायाम- ४५४ * मत्स्यपुराणम् * [ त्रिपञ्चाशदधिकशततमो पुण्योदयो योऽपि जन्मान्तरस्यात्मजत्वंगतः ॥५७६॥ कोडतस्तस्य तृप्तिः कथं जायते योऽपि भाविजगद्वेधसा तेजसः कल्पित प्रतिक्षणं दिव्यगीतक्षणो नृत्यलोलो गणेशः स्वप्रणत्यक्षणः सिंहनादाकुले गण्डशैलेऽराजद्रनजाले वृहत्सालताले क्षणे फुल्लनाना- तमालालिकाले क्षण वृक्षमूले विलोलोमराले क्षणे स्वल्पपड्के जले पङ्कजाढ्यक्ष मातुरङ्के शुभे निष्कलङ्के ॥ ५७७ ॥ परिक्रीडते चाललीलाविहारी गणेशाधिपो देवतानन्दकारी। निकुञ्जपु विद्याधरै गीतशील. पिनाकीव लीलाविलासैः सलील' ॥ ५७८ ॥ प्रकाश्य भुवनाभोगी ततो दिनकर गते । देशान्तरं तदा पश्चाद्दूरमस्तावनीधरम् ॥ उदयास्ते पुरोभावी यो हि चास्तेऽवनीधर. । मित्रत्वमस्य सुदृढं हृदये परिचिन्त्यताम् ॥ ५८० ॥ नित्यमाराधित श्रीमान् पृथुमूल समुन्नत । नाकरोत् सेवि मेरुरुपहारं पतिप्यत. ॥ ५८१ ॥ यतिष्ये मा व्यवस्थेति सधयेणाखिल बुध. 1 दिनान्तानुगतो भानु स्वजनत्वमपूरयत् सन्ध्यावद्धाञ्जलिपुटा मुनयोऽभिमुखा रचिम् । याचन्त्यागमन शीव निधार्यात्मनि भाविताम् ॥ ५८३ ॥ व्यजृम्भदथ लोकेऽस्मिन् क्रमाद्वैभावरन्तम । कुटिलस्येव हृदये कालुध्यन्दूपयन्मनः ।। ज्वलत्फणिफणारत्नदीपोद्योतितभित्तिके । शयन शशिसवातशुभ्रवस्त्रोत्तरच्छदम् ॥ नानारत्नातिलसच्छऋचापविडम्यकम् । रत्नकिङ्किणिकाजालं लम्यमुक्ताकलापकम् ॥ फमनीयचल्लोलवितानाच्छादिताम्वरम् । मन्दिरे मन्दसञ्चार शनैर्गिरिसुतायुतः॥ तस्यों गिरिसुप्ताघाटुलतामीलितकन्धर | शशिमोलिसितज्योत्स्नाशुनिपूरितगोचरः ।। गिरिजाप्यसितापाड़ी नीलोत्पलदलच्छवि. । विभावर्या च सपृक्ता यभूवातितमोमयी तामुचाच ततो देव क्रीडाकेलिकलायुतम् ।। ५८६ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे शिवपार्वतीसंवादघर्णनं नाम त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः।
चतुःपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः शिवपार्वतीसंवादवर्णनम् । शर्व उवाच । शरीरे मम तन्वनि ! सिते भास्यसितद्युतिः भुजङ्गीवासिता शुद्धा संश्लिष्टा चन्दने तरौ॥१॥ चन्द्रातपेन संपृक्ता रुचिराम्वरया तथा । रजनीवासिते पक्षे दृष्टिदोयं ददासि मे ॥२॥ इत्युक्ता गिरिजा तेन मुक्तकण्ठा पिनाकिना । उवाच कोपरक्ताक्षी भृकुटीकुटिलानना! देव्युवाच । स्वरुतेन जनः सों जाडयेन परिभूयते । अवश्यमर्थात् मानोति खण्डनं शशिमण्डन ! तपोभिदीर्घचरितैर्यश्च प्रार्थिवत्यहम् । तस्या मे नियतस्त्वेष ह्यवमान' पदे पढे ॥५॥ नवास्मि कुटिला शर्व ! विषमा नैव धूर्जटे!। स विपस्त्यङ्गतः प्याति व्यक्तं दोपाफराश्रयात् ॥ ६ ॥ नाहं पूष्णोऽपि दशना नेत्रे चास्मि भयस्य हि । आदित्यश्च विजानाति भगवान् द्वादशात्मकः ॥ ७ ॥ मूनि शलं जनयसि स्वैदॉपर्मामधिक्षिपन् । यस्त्वं ममाह सृष्णेति महाकालेतिविश्रुतः यास्याम्यहं परित्यक्या चात्मानंतपसागिरिम् । जीवन्त्यानास्ति मेस्त्यंधूर्तेनपरिभूतया निशम्य तस्या पचन फोपतीक्ष्णाक्षरम्भवः । उपाचाधिकसम्भ्रान्तः प्रणयेनेन्दुमौलिना शर्य उवाच। अगात्मजाति गिरिजे! नाहं निन्दापरस्तव । त्वददिबुद्धद्या तयांस्तयाहं नामसंधयम् विकल्पास्यस्थवित्तेऽपिगिरिजे! नैय फल्पना । यद्येचं पुपितामीर! त्यन्तपाइनपुनः नर्मवादी भविष्यामि जहि फोपं शुचिस्मिते! । शिरसा प्रणतयाहं रचितस्तेमयाज्ञलिः ग्मीनाप्ययमानेन निन्दितेनैव विनियाम् । तस्मान यातु राष्टस्य नर्मस्पृष्टो जन' फिल - * मत्स्यपुराणम् * [चतुःपञ्चाशदधिकशततमो अनेकैः स्वादुभिर्देवी देवेन प्रतियोधिता । कोपन्तीवन्न तत्याज सती मर्मणि घट्टिता अवष्टब्धमथास्फाल्य घासः शङ्करपाणिना। विपर्यस्तालका चेगाद्यौतुमैच्छत शैलजा ॥ तस्या वजन्त्याः कोपेन पुनराह पुरान्तकः । सत्यं सर्वैरवयवैः सुतासि सदृशी पितुः हिमाचलस्य शृङ्खस्तमेघजालाकुलैनभः । तथा दुरवगाह्येभ्यो हृदयेभ्यस्तवाशयः ॥१८॥ काठिन्याङ्कस्त्वमस्मभ्यं घनेभ्यो बहुधागता। कुटिलत्वञ्चवम॑भ्यो दुःसेव्यत्वं हिमादपि संक्रान्ति सर्वदेवेति तन्वङ्गि! हिमशैलराट् । इत्युक्ता सा पुनः प्राह गिरिशंशैलजातदा कोपकम्पितमूर्धा च प्रस्फुरद्दशनच्छदा। उमोवाच । मा सर्वान्दोपदानेन निन्दान्यान् गुणिनोजनान् ॥ २१ ॥ तवापिदुष्टसम्पर्कात् संक्रान्तंसर्वमेव हि । व्यालेभ्योऽधिकजिह्मत्वं भस्मनास्नेहवन्धनम् हृत्कालुष्यं शशाङ्कात्तु दुर्योधित्वं वृषादपि । तथा बहु किमुक्तेन अलं वाचा श्रमेण ते श्मशानवासान्निीत्वं नग्नत्वान्न तवत्रपा । निघृणत्वं कपालित्वाद्दया तेविगताविरम् इत्युक्त्यामन्दिरात्तस्मान्निर्ज़गामहिमाद्रिजा। तस्यांवजन्त्यांदेवेशगणैःकिलकिलोध्वनिः क मातर्गच्छसित्यत्त्वारुदन्तोधाविता:पुनः । विष्टभ्य चरणोदेव्यावीरकोषाप्पगद्गदम् प्रोवाचमातः! किन्त्येतत्वयासिकुपितान्तरा। अहंत्वामनुयास्यामिव्रजन्तीस्नेहवर्जिताम् सोऽहं पतिष्ये शिखरात्तपोनिष्टे त्वयोज्झितः । उन्नाम्य घदनं देवी दक्षिणेनतुपाणिना उवाच पीरकं माता माशोकं पुत्र! भावय । शेलाग्रात् पतितुं नैव नचागन्तुं मया सह युकन्तेपुत्र ! पक्ष्यामि येनकार्येणतच्छृणु । कृष्णेत्युक्त्वाहरेणानिन्दिताचाप्यनिन्दिता साहं तपःकरिष्यामियेन गौरीत्वमाप्नुयात् । एष स्त्रीलम्पटोदेवो यातायां मय्यनन्तरम् द्वाररक्षा त्वयाकार्यानित्यं रन्ध्रान्ववेक्षिणा । यथानकावित्प्रविशेद्योषिदत्रहरान्तिकम् दृष्ट्वा परस्त्रियश्चात्र पदेथा मम पुत्रक! । शीघ्रमेव करिष्यामि यथायुक्तमनन्तरम् ॥३३ एवमस्त्विति देवी स वीरकः प्राह साम्प्रतम् । मातुराज्ञामृताहादप्लाविताङ्गो गतज्वरः जगाम कक्ष्यां संद्रष्टुं प्रणिपत्य व मातरम् ॥ ३४ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे पार्वतीवनगमनं नाम चतुःपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।
* मत्स्यपुराणम् * [पञ्चपञ्चाशदधिकशततमो इत्युक्तो दैत्यसिंहस्तु प्रोधाचाम्बुजसम्भवम् । रूपस्यपरियों मे यदास्यात्पद्मसम्भव! तढा मृत्युर्मम भवेदन्यथात्वमरोह्यहम् । इत्युक्तस्तु तदोघाच तुष्टः कमलसम्भवः ।१६ यदा द्वितीयो रूपस्य विवर्तस्ते भविष्यति। तदा ते भविता मृत्युरन्यथा न भविष्यति इत्युक्तोऽमरतां मेने दैत्यसूनुर्महाबलः । तस्मिन् फाले तु संस्मृत्य तयधोपायमात्मन परिहर्तु दृष्टिपथं धीरकस्याभवत्तदा । भुजङ्गरूपी रन्ध्रण प्रविवेश दृशः पथम् ॥ २२ ॥ परिहृत्य गणेशस्य दानवोऽसौ सुदुर्जयः । अलक्षितो गणेशेन प्रविष्टोऽथ पुरान्तकम् ॥ भुजङ्गरूपं सन्त्यज्य बभूवाथ महासुरः । उमारूपी छलयितुं गिरिशंमूढचेतनः ॥ २४ ॥ कृत्वा मायान्ततोरूपमप्रतय॑मनोहरम् । सर्यावयवसंपूर्ण सर्वाभिज्ञानसंवृतम् ॥ २५ ॥ कृत्वामुखान्तरेदन्तान्दैत्योवनोपमान्द्रुढान् । तीक्ष्णाग्रान् वुद्धिमोहेनगिरिशंहन्तुमुद्यतः कृत्वोमारूपसंस्थानं गतो दैत्यो हरान्तिकम् । पापोरम्याकृतिश्चित्रभूषणाम्वरभूषितः तं दृष्ट्वा गिरिशस्तुष्टस्तदालिङ्गय महासुरम् । मन्यमानो गिरिसुतां सर्वरवयवान्तरः ।। अपृच्छत् साधुतेभाचोगिरिपुत्रि । न कृत्रिमः। यात्वं मदाशयं ज्ञात्वाप्राप्तेहवरणिनि! त्वया विरहितं शून्यं मन्यमानो जगत्त्रयम् । प्राप्ता प्रसन्नवदना युक्तमेवं विधत्वयि ॥ इत्युक्तो दानवेन्द्रस्तु तदा भापत् स्मयंश्छनै । नचावुद्ध्यदभिज्ञानं प्रायस्त्रिपुरघातिनः देव्युवाच । यातास्म्यहं तपश्चर्तु घलभ्यायतवातुलम् । रतिश्च तत्र मेनाभूत्तत प्राप्ता त्वदन्तिकम् ॥ इत्युक्त शङ्कर शङ्का काञ्चित् प्राप्यावधारयत् । हृदयेन समाधाय देवः प्रहसिताननः कुपिता मयि तन्वनी प्रकृत्या च दृढव्रता । अप्राप्तकामा संप्राप्ता किमेतत् संशयो मम इति चिन्त्य हरस्तस्या अभिज्ञान विधारयन् । नापश्यद्वामपार्वे तु तदङ्गे पमलक्षणम् लोमावर्तन्तु रचितं ततो देव पिनाकधृक् । अयुध्यदानवीमायामाकारं गृहयंस्ततः ॥ मेढ़े पत्रास्त्रमादाय दानवं तमशातयत् । अवुध्यद्वीरकोनैव दानवेन्द्र निपूदितम् ॥३७॥ हरेण सूदितं दृष्ट्वा स्त्रीरूपं दानवेश्वरम् । अपरिच्छिन्नतत्वार्था शैलपुत्र्यै न्यवेदयत् ॥ दूतेन मारुतेनाशुगामिना नगदेवता । श्रुत्वा घायुमुखाद्देवी क्रोधरक्तविलोचना ॥ अशपद्वीरकं पुत्रं हृदयेन वियता ॥ ३६॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे आडिदैत्यपधवर्णनं नाम पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः । -- पटपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः पार्वतीम्प्रति ब्रह्मवरदानम् । देव्युवाच। मातरं मां परित्यज्य यस्मात्त्वं स्नेहविक्वात् । विहितावसरः स्त्रीणां शङ्करस्यरहोविधी तस्मात्ते पुरुषा रूक्षा जडाहृदयर्जिता । गणेशक्षारसदृशी शिला माता भविष्यति ॥२॥ निमित्तमेतद्विण्यातं वीरकस्य शिलोदये । सोऽभवत्प्रक्रमेणैव विचित्रात्यानसंशयः॥ एवमुत्सृटशापाया गिरिपुध्यस्त्वनन्तरम् । निर्जगाम मुखात् क्रोधः सिंहरूपी महाबलः ॥ ४ ॥ सतु सिहः करालास्यो जटाजटिलकन्धरः । प्रोद्भूतलम्बलागूलो दंष्ट्रोत्कटमुखातटः व्यावृत्तास्यो ललजितः क्षामकुक्षिः शिरादिषु । तस्याशुवर्तितुं देवी व्यवस्वत सतीतदा शात्वा मनोगतं तस्या भगवांश्चतुरानन· । आगम्योवाच देवेशो गिरिजां स्पष्टया गिरा ब्रह्मोवाव । किं पुत्रि ! प्राप्नुकामासि किमलभ्यं ददामि ते ॥ ८ ॥ चिरम्यतामति केशात्तपसोऽस्मान्मदाशया। तछ त्योवाच गिरिजा गुरुङ्गौरवगभितम् पाक्यं चाचा चिरोद्गीर्णवर्णनिर्णीतघाञ्छितम् । देव्युवाच । तपसा दुष्करणात. पतित्वे शङ्करो मया ॥ १० ॥ समां श्यामलवर्णेति यहुशःप्रोक्तवान् भवः । स्यामहं काञ्चनाकारा पालभ्येनच संयुता भर्तुर्भूतपतेरङ्गमेकतो निर्विशेऽङ्कवत् । तस्यास्तदापितं श्रुत्वा प्रोधाच कमलासनः । एवं भव त्वं भूयश्च भदेहार्द्धधारिणी । ततस्तस्य तस्याजभृङ्गाङ्गं फुलनीलोत्पलत्वचम् ॥ त्वचा सा चामपदीता घण्टाहस्ताविलोचना । नानाभरणपूर्णाङ्गी पीतकोशेयधारिणी तामनमीत्ततो ब्रह्मादेवी नीलाम्युजत्वियम् । निशे भूधरजा देहसम्पर्कात्वं ममाया ।।
* मत्स्यपुराणम् * [सप्तपञ्चाशदधिकशततमो सम्प्राप्ता कृतक-यत्वमेकानंशापुराह्यसि । य एप सिंहः प्रोद्भूतो देव्याः क्रोधाद्वरानने स तेऽस्तु वाहनं देवि ! केतो वस्तु महाबलः । गच्छ विन्ध्याचलं तत्र सुरकार्य करिष्यसि ॥१७॥ पञ्चालो नाम यक्षोऽयं यक्षलक्षपदानुगः । दत्तस्ते किकरो देवि ! मया मायाशतैर्यत॥ इत्युक्ता कौशिकी देवी विन्ध्यशैलं जगाम ह । उमापि प्रातसङ्कल्पा जगाम गिरिशान्तिकम् ॥ १६ ॥ प्रविशन्तीति ता द्वारि ह्यपकथ्य समाहित । म्रोध वोरको देवों हेमवेत्रलताधरः।२०॥ तामुवाच च कोपेन स्पात्तु व्यभिवारिणीम् । प्रयोजन न तेऽस्तीह गच्छ यावल मेस्त्यसि ॥२१॥ देव्या रूपधरो दैत्यो देवं पञ्चयितुं त्विह । प्रविष्टो न च दृष्टोऽसौ स वै देवेन घातितः ॥२२॥ यातिने चाहमानप्तो नीलकण्ठेन कोपिना। द्वारेषु नावधान ते यस्मात् पश्यामिवै ततः भविष्यसि नमवाम्योच पूगान्यनेकश । अतस्तेऽत्र न दास्यामिप्रवेशंगम्यतांद्रुतम् इति श्री मस्त्यपुराणे पार्वतीम्प्रति ब्रह्मपरतानं नाम पट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय. । सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः वीरक पार्वती मंचादः। वीरक उवाच। एवमुक्या गिरिसुता माता मे स्नेहवत्सला । प्रवेशं लभते नान्या नारी कमललोचने ॥१॥ इत्युक्ता तु तदा देवी चिन्तयामास चेतसा । न सा नारीति देत्योऽसौ घायुर्मे याममाषत ॥॥
--- ऽध्यायः] * वीरककृतपार्वतीस्तुतिः * वृथच घीरकः शप्तो मया क्रोधपरीतया। अकार्य क्रियते मूढः प्रायः क्रोधसमीरितः क्रोधेन नश्यते फीतिः क्रोधोहन्ति स्थिरां श्रियम् । अपरिच्छन्नतत्वार्था पुत्रं शापितवत्यहम् ॥४॥ विपरीतार्थबुद्धीनां सुलभो विपदोदयः । सश्चिन्त्यैवमुवाचेदं वीरकं प्रति शैलजा ॥ लज्जासजविकारण घदनेनाम्बुजत्विषा । देव्युवाच । अहं चीरक! ते माता मा तेऽस्तु मनसो भ्रमः । शङ्करस्यास्मि दयिता सुता तु हिमभूभृतः । मम गात्रच्छविभ्रान्त्यामाशङ्कांपुत्र! भावय तुष्टेन गौरता दत्ता ममेयं पद्मजन्मना । मया शप्तोऽस्य विदिते वृत्तान्त दैत्यनिर्मिते॥ ज्ञात्वा नारीप्रवेशन्तु शङ्करे रहसि स्थिते । न निवर्तयितुं शक्मः शापः किन्तु ब्रवीमिते शीघ्रमेष्यसि मानुष्यात् स त्वं कामसमन्वितः । शिरसा तु ततोवन्धमातरंपूर्णमानसः उवाचाचितपूर्णेन्दुद्युतिञ्च हिमशेलजाम् ॥ १० ॥ घोरक उवाच। नतसुरासुरमौलिमिलन्मणिप्रचयकान्तिकरालनसाहिते। नगमुते ! शरणागतवत्सले ! तव नतोऽस्मि नतातिविनाशिनि ॥११॥ तपनमण्डलमण्डितकन्धरे ! पृथुसुवर्णसुवर्णनगद्युते । विषभुजननिषङ्गविभूषिते ! गिरिसुते ! भवतीमहमाश्रये ॥१२॥ जगति फःप्रणताभिमतन्ददी झटिति सिद्धनुते भवती यथा । जगति का न घाञ्चति शङ्करी भुवनधृत्तनये! भवतीं यथा ॥१३॥ विमलयोगविनिर्मितदुर्जयस्वतनुतुल्यमहेश्वरमण्डले । विदलितान्धकयान्धवसंहतिः सुरवः प्रयमन्त्वमभिष्टुता ॥१४॥ सितसटापटलोद्धतकन्धरामरमहामृगगजरथास्थिता। चिमटशक्तिमुपानलपिन्टायतभुजाधवि पिष्टमहामुग ॥२५॥ निगदिता भुपनैरिति चण्डिका जननि ! शुम्मनिशुम्भनिदनी ।
४६२ * मत्स्यपुराणम् * [सप्तपञ्चाशदधिकशततमो प्रणतचिन्तितदानवदानवप्रमथनैकरतिस्तरसा भुवि ॥१६॥ वियति घायुपथे ज्वलनोज्वलेऽवनितले तप देवि ! च यद्वपु । तदजितेऽप्रतिमे प्रणमाम्यह भुवनभाविनि । ते भववल्लभे ॥१७॥ जलधयो ललितोद्धतवीचयो हुतवहद्युतयश्च चराचरम् । फणसहस्त्रभृतश्च भुजङ्गमास्त्वदभिधास्यति मय्यभयङ्करा ॥१८॥ भगवति । स्थिरभक्तजनाश्रये । प्रतिगतो भवतीचरणाश्रयम् । करणजातमिहास्तु ममावलन्नुतिलवाप्तिफलाशयहेतुत ॥ प्रशममेहि ममात्मजवत्सले । नमोऽस्तु ते देवि । जगत्त्रयाश्रये ॥१॥ सूत उवाच प्रसन्ना तु ततो देवी वीरकस्येति सस्तुता । प्रविवेश शुभ भर्तुर्भवन भूधरात्मजा ॥२० द्वारस्थो धीरको देवान् हरदर्शनकाक्षिण । व्यसर्जयत् स्वान्येव गृहाण्यादरपूर्वक नास्त्यत्रावसरो देवा देव्यासह वृपाकपि । निभृत क्रीडतीत्युक्ता ययुस्तेचयथागतम् गते घर्पसहस्त्रे तु देवास्त्वरितमानसा । ज्वलन चोदयामासुआत शङ्करचेष्टितम्॥२३॥ प्रविश्य जालरन्ध्रेण शुकरूपी हुताशन । ददृशे नयने शवं रत गिरिजया सह ॥ २४ ॥ ददृशे तञ्च देवेशो हुताश शुकरू पिणम् । तमुवाच महादेव किञ्चित् कोपसमन्वित ॥ यस्मात्तु त्वत्तोविघ्नस्तस्मात्वय्युगपद्यते । इत्युक्त प्राञ्जलिर्वहिरपियद्वीर्यमाहितम् ॥ तेनापूर्यत तान्देवास्तत्तत्कायविभेदत । विपाट्य जठरन्तेषा घीय माहेश्वरन्तत ॥२७ निष्कान्त तप्तहेमाभ वितते शङ्कराश्रमे । तस्मिन् सरो महजात विमल बहुयोजनम् ।। प्रोत्फुलहेमकमल नानाविहगनादितम् । तच्छ्र त्वा तु ततो देवी हेमद्रुममहाजलम् ॥ तत्र कृत्वा जलक्रीडा तजस्तशेखरा । उपविष्टा ततस्तस्य तीरे देवी सखीयुता॥३०॥ पातुकामा च तत्तोयस्वादुनिर्मलपङ्कजम् । अपश्यन् कृत्तिका नाता पडद्युतिसन्निभम् । पद्मपने तु तद्वारि गृहत्वोपस्थिता गृहम् । हर्षादुवाच पश्यामि पद्मपने स्थिन पय ॥ ततस्ता ऊचुरसिल पृत्तिका हिमशैलजम्।
...
ऽध्यायः]-
* कुमारोत्पत्तिवर्णनम् *
कृत्तिका ऊचुः।
दास्यामो यदि ते गर्भ सम्भूतो यो भविष्यति ॥३२॥
सोऽस्माकमपि पुत्र स्यादरमझानाचघर्तताम् । भवेल्लोकेषु घिल्यात.सर्वेष्वपिशुभानने!
इत्युक्तोवाच गिरिजा कथं मगात्रसम्भवः । सर्वरययवैर्युक्तो भवतीभ्यः सुतोभवेत् ॥
ततस्तां कृत्तिकाऊचुविधास्यामोऽस्यधैवयम् । उत्तमान्युत्तमाहानि यद्येवन्तुभविष्यति
उक्ता वै शैलजा प्राह भवत्वेवमनिन्दिताः । ततस्ताहर्षसम्पूर्णाः पद्मपत्रस्थितं पयः ॥
तस्यैददुस्तयाचापितत्प्रीत क्रमशो जलम् । पीते नु सलिले तस्मिंस्ततस्तस्मिनसरोवरे
विपाट्य देव्याश्च ततो दक्षिणांकुक्षिमुद्गतः । निश्चक्रामागुतोवाल सर्वलोकविभासकः
प्रभाकरप्रभाकारः प्रकाशकनकप्रभः । गृहीतनिर्मलोदनशक्तिशूल: पड़ानन. ॥ ४० ॥
दीतो मारयितुं दैत्यान् कुत्सितान् कनकच्छविः ।
एतस्मात् फारणाद्देवः कुमारश्चापि सोऽभवत् ॥ ११ ॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे कुमारप्रादुर्भाधवर्णनं नाम सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।
अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
कुमारोत्पत्तिवर्णनम् देवकृतकुमारस्तुतिश्च ।
सूत उवाच।
घामं विदार्य निष्क्रान्त. सुतो देव्याः पुनः शिशुः ।
स्कन्दाच घदने घहः शुक्रात् सुवदनोऽरिहा ॥१॥
कृत्तिकामेलनादेवशापाभि सविशेषतः शापामिधा:समारयातापट वक्त्रे विस्तृताः
यतस्ततो विशापोऽसौ ख्यातो लोकेषु पण्मुगः ।
स्कन्दो विशारा. पड्ययनो कात्तिकेयश्च विश्रतः ॥ ३ ॥
चैत्रस्य बटुले पक्षे पञ्चदश्यां महारलो । मभृताचर्कसदृशी विशाले शरफानने ॥४॥
* मत्स्यपुराणम् * [अष्टपञ्चाशदधिकशततमो चैत्रस्यैव सिते पक्षे पञ्चम्यां पाकशासनः । बालकाभ्याञ्चकारकं मत्वा चामरभूतये ।। तस्यामेव तत पट्यामभिषिक्तो गुहः प्रभुः । सर्वैरमरसवातैर्ब्रह्मेन्द्रोपेन्द्रभास्करैः ॥६॥ गन्धमाल्यैः शुभैधूंपैस्तथा क्रीडनकैरपि । छत्रैश्चामरजालश्च भूषणश्च विलेपनैः ॥ ७ ॥ अभ्यचितो विधानेन यथावत्यण्मुखः प्रभुः । सुतामस्मै ददौ शको देवसेनेति विश्रुताम् पत्न्यर्थ देवदेवस्य ददौ विष्णुस्तदायुधान् । यक्षाणां दशलक्षाणि ददावस्मै धनाधिप. ददी हुताशनस्तेजो ददौ वायुश्च वाहनम् । ददी क्रीडनकन्त्वष्टा कुक्कुटं कामरूपिणम् एवं सुरास्तु ते सर्वे परिवारमनुत्तमम् । ददुर्मुदितचेतस्काः स्कन्दायादित्यवर्चसे ॥११ जानुभ्यामचनी स्थित्वा सुरसङ्घास्तमस्तुवन् । स्तोत्रेणानेन वरदं षण्मुखं मुख्यश.सुराः देवा ऊचुः। नमः कुमाराय महाप्रभाय स्कन्दाय व स्कन्दितदानवाय । नवार्कचिद्युद्युतये नमोऽस्तु नमोऽस्तु ते पण्मुख कामरूप !! ॥ १३ ॥ पिनद्धनानाभरणाय भत्रे नमो रणे दारुणदारणाय । नमोऽस्तु तेऽर्कप्रतिमप्रभाय नमोऽस्तु गुह्याय गुहाय तुभ्यम् ॥ १४ ॥ नमोऽस्तु त्रैकोक्मभयापहाय नमोऽस्तु ते बालकृपापराय । नमो विशालामललोचनाय नमो विशाखाय महावताय ॥१५॥ नमो नमस्तेऽस्तु मनोहराय नमो नमस्तेऽस्तु रणोत्काटाय । नमो मयूरोज्ज्वलवाहनाय नमोऽस्तु केयूरपराय तुभ्यम् ॥ १६ ॥ नमो धृतोदनपताकिने नमो नमः प्रभावप्रणताय तेऽस्तु । नमो नमस्ते घरवीर्यशालिने क्रियापराणां भवभव्यमूर्तये ॥ १७ ॥ क्रियापरा यज्ञपतिञ्च स्तुत्वा पिरेमुरेव घमराधिपाद्याः । एवं तदा पड्वदनन्तु सेन्द्रा मुदा सुतुष्टश्च गुहस्ततस्तान् । निरीक्ष्य नेत्रैरमरैः सुरेशान् शत्रून् हनिष्यामि गतज्वरा स्थ ॥ १८ ॥ कुमार उवाच। कंघः कामं प्रयच्छामि देवता ! व्रत निर्वृताः।
ऽध्यायः] * शक्रदूततारकासुरयोः कथोपकथनम् * यद्यप्यसाध्यं हृद्यं यो हृदये चिन्तितम्परम् ॥ १६ ॥ इत्युक्तास्तु सुरास्तेन स्तुत्वा प्रणतमौलयः । सर्वएव महात्मानं गुहं तद्गतमानसाः ॥ दैत्येन्द्रस्तारकोनाम सर्वामरकुलान्तत् । बलवान् दुर्जयोदुष्टो दुरावारोऽतिकोपनः।। तमेव जहि हृद्योऽयं एपोऽस्माकं भयापह । एवमुक्तस्तथेत्युक्त्या सर्वामरपदानुगः ॥ जगाम जगतां नाथ स्तूयमानोऽमरेश्वरैः । तारकस्य घधार्थाय जगतः कण्टकस्य वै॥ ततश्च प्रेषयामास शक्रोलब्धसमाश्रयः । दूतं दानपसिंहस्य परुपाक्षरयादिनम् ॥ २४ ॥ स तु गत्यात्रचोदैत्यं निर्भयो भीमदर्शनः । दूत उवाच। शकस्त्वामाह देवेशो दैत्यकेतो! दिवस्पतिः ।। २५ ॥ तारकासुर! तङ्क त्या घट शत्या यथेच्छया। यजगहलनादाप्तं किल्विषं दानव ! त्वया ॥ २६ ॥ तस्याहं शासकस्तेऽद्य राजास्मि भुवनत्रये । श्रुत्वैतदूतवचनं कोपसंरक्तलोचनः ॥२७ उवाव दूतं दुष्टात्मा नष्टप्रायविभूतिकः । तारक उवाच। दृष्टं ते पौरुषं शक ! रणेपु शतशो मया ॥ २८ ॥ निस्वपत्यान्न ते लजा विद्यते शक ! दुर्मते! । एवमुक्त गते दूते चिन्तयामास दानवः नालब्धसंश्रयःशमोत्तमेवं हि चाईति । जित: स शको नोऽकस्माजायतेसंध्रयाश्रयः निमित्तानि च दुष्टानि सोऽपश्यदुष्चेपितः 1 पांसुवर्षमसपातं गगनादयनीतले । भुजनेत्रप्रकम्पं च पशोपं मनोभ्रमम् । स्वकान्तावक्तपमानाम्लानताञ्चन्यलोकयत् दुष्टांश्च प्राणिनोरौद्रान् सोऽपन्यद् दुष्पवेदिनः । वचिन्त्वैव दितिजो न्यस्तचिन्तोऽभयन् क्षणात् ॥ ३३ ॥ यापद्गजघटाघण्टारणरफाररघोत्कटाम् । तद्वत्तुरगसड्डातक्षुण्णभूरेणुपिञ्जराम् ॥ ३४ ॥ बलस्पन्दनोदप्राध्याजराजिविराजिताम् । विमानधाताकारेशलितामरचामरः ॥३५॥ तां भूपणनियदाम फिनरोगीतनादिताम् । नानानायनान्फलासुमापीडधारिणीम् ।।
* मत्स्यपुराणम् * [ऊनपष्टयधिकशततमो विकोशास्त्रपरिष्कारांवर्मनिर्मलदर्शनाम् । वन्धुष्टस्तुतिरवां नानावाद्यनिनादिताम् सेनां नाकसदा दैत्यः प्रासादस्थो व्यलोकयत् । चिन्तयामास स तदा किविदुभ्रान्तमानसः ॥ ३८ ॥ अपूर्व को भवेद्योद्धा यो मया न विनिर्जित । ततश्चिन्ताकुलोदैत्यसुश्रावकटुकाक्षरम् सिद्धवन्दिभिरघुष्टमिदं हृदयदारणम् । अथ गाथा। जय अतुलशक्तिदीधितिपिचर! भुजदण्डचण्डरभस । सुखद् ! कुमुदकाननविकासनेन्दो ! कुमार! जय दितिजकुलमहोदधिवडवानल!॥४०॥ पण्मुख! मधुररवमयूररथ! सुरमुकुटकोटिघट्टितचरणनवाड्ङ्करमहासन ! ॥ जय ललिलतचूडाकलापनवविमलदल | कमलकान्त ! दैत्यवंशदुःसहदावानल ! ॥४१ जय विशाख ! विभो ! जय सकललोकतारक!। स्कन्द ! जय गौरीनन्दन! घण्टाप्रिय प्रिय ! विशाख! विभो! धृतपताकप्रकीर्णपटल | कनकभूपणभासुरदिनकरच्छाय!। जय जनितसभ्रमलीलालूना खिलाराते! जय सकललोकतारका दितिजासुरवस्तारकान्तक!। स्कन्द ! जय वाल ! सप्तवासर! जय भुवनावलिशोकविनाशन !॥४३॥ इति श्रीमत्स्यमहापुराणे कुमारस्तुतिर्नामाष्टपश्चाशदधिकशतमोऽध्याय । ऊनपश्यधिकशततमोऽध्यायः तारकोपाख्यानम् । सूत उवाच। श्रुत्वैतत्तारकः समुश्रुष्टं देववन्दिभि. । सस्मार ब्रह्मणोधाक्यं वधं वालादुपस्थितम् स्मृत्वा धर्म हवाङ्ग पदातिरपदानुग । मन्दिरान्निर्जगामाशु शोकनस्तेन चेतसा ॥
४६७ ऽध्यायः] * कुमारतारकयुद्धवर्णनम् * कालनेमिमुखा दैत्याः संरम्भाद्घान्तचेतसः। योधा! धावतगृह्णीतयोजयध्वंवरूथिनीम् कुमारं तारको दृष्ट्वा वभाषे भीपणारुतिः। किं वाल! यो कामोऽसि कोड कन्दुकलीलया ॥ ४ ॥ त्वया न दानवा दृष्या यत् सङ्गरविभीषकाः। बालत्यादथ ते बुद्धिरेवं स्वल्पार्थदर्शिनी॥ कुमारोऽपि तमग्रस्थं वभापे हर्पयन् सुरान् । शृणु तारक ! शास्त्रार्थस्तवचैव निरूप्यते शास्त्ररा न दृश्यन्ते समये निर्भये भटैः । शिशुत्वं मावस्था मे शिशुःकालभुजङ्गमः ॥ दुप्प्रेक्ष्यो भास्करो वालस्तथाहं दुर्जयः शिशुः । अल्पाक्षरो न मन्त्रः किं मुस्फुरो दैत्य ! दृश्यते ॥ ८॥ कुमारे प्रोक्तवत्येवं दैत्यश्चिक्षेप मुद्गरम् । कुमारस्तं निरस्याथ वजेणामोघवर्चसा ॥ ततश्चिक्षेप दैत्येन्द्रो भिन्दिपालमयोमयम्। करेण तच्च जग्राह कार्तिकेयोऽमरारिहा ॥ गदां मुमोच दैत्याय पण्मुखोऽपि सरखनाम् । तया हतस्ततो दैत्यश्चकम्पेऽचलराडिय ॥११॥ मेने च दुर्जयं दैत्यस्तदा पड्वदनं रणे । चिन्तयामास बुध्या वै प्राप्त कालोनसंशयः कुपितन्तु तमालोक्य कालनेमिपुरोगमा.। सर्वे दैत्येश्वरा जम्नु. कुमारं रणदारुणम् ॥ स तैः प्रहारैरस्पृष्टो वृधालेशो महाद्युतिः । रणशोण्डास्तु दैत्येन्द्रा पुन प्रासै शिलीमुखैः ॥ १४ ॥ युमारं सामरचन्नुर्यलिनो देवकण्टकाः । कुमारस्य व्यथा नाभृत्यास्तनिहतस्य तु ॥ प्राणान्तकरणो जातो देवानां दानवाहयः । देवाग्निपीडितान् दृष्ट्वाकुमार कोपमाविशत् ततोऽरनारयामास दानवानामनीकिनीम् । तैरस्त्रनिप्पतीकारस्ताडिताःसुरकण्टकाः फालनेमिमुसाः स रणादासन् परामुयाः । विद्रुतेप्यथ देत्येपु हतेषु चसमन्ततः । ततः बुद्धो महादैत्यस्तारकोऽसुरनायकः । जग्राह च गदां दिव्यां हेमजालपरिष्कृताम् ॥ १६ ॥ जग्ने कुमारं गदया निमकनकाङ्गदः । शरैर्मयूर विश्व चकार विमुपं रणे ॥on दृष्ट्वा पराड्मुपं देवो मुकरतं म्यवाहनम् । जग्राह शक्तिं विमलां रणे कनकभूषणाम् ।।
* मत्स्यपुराणम् * [ऊनषष्ट्यधिकशततमो चाहुना हेमकेयूररुविरेण षडाननः । ततो जवान्महासेनस्तारकं दानवाधिपम् ॥ २२ ॥ तिष्ट तिष्ट सुदुर्बुद्धे ! जीवलोकं विलोकय । हतोऽस्यद्य मया शक्त्या स्मर शस्त्रं सुशिक्षितम् ।। २३ ।। इत्युक्त्वा च ततः शक्ति मुमोच दितिजम्प्रति । सा कुमारभुजोत्सृष्टा तत्केयूररवानुगा ॥ २४ ॥ विभेद दैत्यहृदयं यज्रशैलेन्द्रकर्कशम् । गतासुः स पपातोळ प्रलये भूधरी यथा ॥ चिकीर्णमुकुटोप्णीपो विस्रस्ताखिलभूषणः । तस्मिन् विनिहते दैत्ये त्रिदशानां महोत्सवे ॥ २६ ॥ नाभूत् कश्चित्तदा दुःखी नरकेवपि पापकृत् । स्तुवन्त. पण्मुखं देवाः क्रीडन्तश्चाङ्गनायुताः ॥ २७ ॥ जग्मुः खानेव भवनान् भूरिधामान उत्सुकाः । ददुश्चापिघरं सर्वे देवा.स्कन्दमुखं प्रति तुष्टा. संप्राप्तसर्वेच्छाः सह सिद्धेस्तपोधनैः । देवा ऊचुः। यः पठेत् स्कन्दसंवद्धां कथा माँ महामति ॥ २६ ॥ शृणुयाच्छावयेद्वापि स भवेत् कीर्तिमान नर । यह्वायुः सुभगः श्रीमान् कान्तिमान् शुभदर्शनः ॥ २० ॥ भूतेभ्यो निर्भयचापिसर्वदु खविवर्जितः । सन्ध्यामुपास्य पूर्ण स्कन्दस्य चरितंपठेत् स मुक्त किल्विषैः सर्महाधनपतिर्भवेत् । बालानांव्याधिजुष्टानां राजद्वारञ्चसेवताम् इदं तत्परमन्दिव्य सर्वदासर्वकामदम् । तनुक्षये च सायुज्यं पण्मुखस्य व्रजेन्नरः ॥३३॥ इति श्रीमत्स्यपुगणे स्कन्दविजयपठनफलवर्णनं नामोनपाट्यधिकशततमोऽध्यायः ।
पल्यधिकशततमोऽध्यायः नरसिंहमाहात्म्यवर्णनम् । ऋपय ऊचुः। इदानी श्रोतुमिच्छामो हिरण्यकशिपोर्वधम् । नरसिंहस्य माहात्म्यं तथा पापविनाशनम् ॥ १॥ सूत उवाच । पुरा कृतयुगे विप्रा हिरण्यकशिपुः प्रभुः। दैत्यानामादिपुरुषश्चकार स महत्तपः ॥ २॥ दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च । जलवासी समभवत् स्नानमौनधृतवतः ॥३॥ ततः शमदमाभ्याञ्च ब्रह्मवर्येण चैव हि । ब्रह्मा प्रीतोऽभवत्तस्य तपसा नियमेन च ॥४॥ ततः स्वयम्भूभगवान् स्वयमागम्य तत्र ह । विमानेनार्कवर्णन हंसयुक्तेन भास्वता ॥५॥ आदित्यैर्वमुभिः साध्यैर्मरुद्भिर्दैवतस्तथा । स्ट्रैविश्वसहायश्च यक्षराक्षसपन्नगः ॥ ६ ॥ दिभिश्चैव विदिग्भिश्च नदीभिः सागरस्तथा। नक्षत्रैश्च मुहर्तश्च खेचरैश्च महाग्रहः ॥ ७॥ देवह्मर्षिभिः साद्धं सिद्धः सप्तर्षिभिस्तथा । राजर्षिभिः पुण्यकृद्धिगन्धर्याप्सरसाङ्गणैः ॥ ८॥ चराचरगुरु श्रीमान् वृतः सर्वैदियौकसः । ब्रह्मा ब्रह्मविदां श्रेष्ठो दैत्यं घचनमप्रचीत् ॥ ६ ॥ प्रीतोऽस्मि तच भक्तस्य तपसाऽनेनसुव्रत !। परं घरय भद्रं ते यथेष्टं फाममाप्नुहि ॥ हिरण्यकशिपुरुषाव। • न देवासुरगन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसाः । न मानुपाः पिशाचा पा इन्युर्मान्दयसत्तम! ऋग्यो पा न मां शापैः शपेयुः प्रपितामह । यदि मे भगवान् प्रीतो पर एष घृतोमया न चाम्प्रेण न शम्प्रेणागिरिणा पादपेन च । न शुष्केण न चाण नदिवा न निशाऽथवा ४७० * मत्स्यपुराणम् * [पष्ट्यधिकशततमो भवेयमहमेवार्कः सोमोघायु ताशनः । सलिलञ्चान्तरिक्षश्च नक्षत्राणि दिशो दश ।। अहं क्रोधश्च कामश्च वरुणो पासवोयमः। धनदश्च धनाध्यक्षो यक्षः किंपुरुषाधिपः । ब्रह्मोवाच । एते दिव्या घरास्तात ! मया दत्तास्तवामृताः सर्वान् कामान् सदा वत्स! प्राप्स्यसे त्वं न संशयः ॥ १६ ॥ एवमुक्त्वा स भगवान जगामाकाश एव हि । वैराजं ब्रह्मसदनं ब्रह्मपिंगणसेवितम् ॥ ततो देवाश्च नागाश्च गन्धर्धा ऋषिभिः सह । वरप्रदानं श्रुत्वैव पितामहमुपस्थिताः । देवा ऊचुः। घरप्रदानाद्भगवन् ! यधिष्यति स नोऽसुरः। तत्प्रसीदाशुं भगवन् ! घधोऽप्यस्य विचिन्त्यताम् ॥ १६ ॥ भगवन् । सर्वभूतानामादिकर्ता स्वयं प्रभुः । स्रष्टा त्वं हव्यकव्यानामव्यक्तप्रकृतिर्बुधः सर्वलोकहितवाक्यं ध्रुत्वा देवःप्रजापतिः। आश्वासयामास सुरान् सुशीतैर्वचनाम्बुभिः अवश्यं त्रिदशास्तेन प्राप्तव्यं तपसः फलम् । तपसोऽन्तेऽस्य भगवान् यधं विष्णुः करिष्यति ॥ २२॥ तच्छ्र त्या चिवुधा पाक्यं सर्वे पङ्कजजन्मनः । स्वानि स्थानानि दिव्यानि विप्रा जग्मुर्मदान्विताः ॥ २३ ॥ लब्धमात्रे घरे चाथ सर्वाः सोऽयाधत प्रजाः । हिरण्यकशिपुदैत्यो घरदानेन दर्पितः ।। आश्रमेपुमहाभागान् स मुनीनशंसितव्रतान् । सत्यधर्मपरान् दान्तान् धर्पयामासदानवः देवास्त्रिभुवनस्थांश्च पराजित्य महासुरः । त्रैलोक्यं वशमानीय स्वर्गे घसति दानवः ।। यदा घरमदोसिक्तचोदितः कालधर्मतः । यशियानकरोदैत्यानयज्ञियांश्च देवताः ॥२७ तदादित्याश्च साध्याश्च विश्वे च घसवस्तथा । सेन्द्रा देवगणायक्षाः सिद्धद्विजमहर्षयः शरणं शरणं विष्णुमुपतस्थर्महावलम् । देवदेवं यज्ञमयं घासुदेवं सनातनम् ॥ २६ ॥ देवा ऊचुः। नारायण! महाभाग! देवास्त्वां शरणंगताः ।
ऽध्याय.] * नरसिंहमाहात्म्यवर्णनम् . ४७१ त्रायस्व जहि दैत्येन्द्रं हिरण्यकशिपुं प्रभो! ॥ ३० ॥ त्वं हि न परमो धाता त्वं हि न परमो गुरुत्वं हि न.परमोदेवो ब्रह्मादीनां सुरोत्तम विष्णुरुवाच। भयन्त्यजध्यममरा अभयं यो ददाम्यहम् । तथैव त्रिदिवं देवाः प्रतिपद्यत मा चिरम् ॥ एषोऽहं सगणं दैत्यं वरदानेन दर्पितम् । अवध्यममरेन्द्राणं दानवेन्द्रं निहन्म्यहम् ॥३३ एचमुच्या तु भगवान् विज्यत्रिदशेश्वरान् । वधं सङ्कल्पयामास हिरण्यकशिपो प्रभुः सहायश्च महाबाहुरोट्रारं गृह्य सत्वरम् । अथोङ्कारसहायस्तु भगवान् विष्णुरव्ययः । हिरण्यकशिपुस्थानं जगाम हरिरीश्वरः । तेजसा भास्कराकारः शशी कान्त्येवचापरः नरस्य कृत्वाईत सिंहस्या तनुं तथा । नारसिंहेन वपुषा पाणि संस्पृश्य पाणिना ॥ ततोऽपश्यत विस्तीर्णा दिव्यां रम्यां मनोरमाम् । सर्वकामयुतां शुभ्रां हिरण्यकशिपोः सभाम् ॥ ३८ ॥ विस्तीर्णा योजनशतं शतमध्यर्द्धमायताम् । धैहायसीटामगमा पञ्चयोजनविस्तृताम् ।। जराशोकलमापेतां निष्पकम्पा शियां मुखाम् । वेश्महर्म्यवती रम्यां ज्वलन्तीमिच तेजसा ॥ ४० ॥ अन्त सलिलसंयुक्तां चिहितां विश्वकर्मणा । दिव्यरत्नमय क्षैः फलपुष्पप्रदैर्युताम् । नीलपीतसितश्यामः कृष्णलोहितकैरपि। अवतानम्तथा गुन्मेमरीशतधारिभिः ॥४॥ सिताभ्यनसङ्काशा प्लघन्तीय व्यदृश्यत । रश्मियती भाम्यरा च दिव्यगन्धमनोरमा ।। मुसुपा न च दुःसा सा न शीता न च धर्मदा । न क्षुपिपासे ग्लानि पा प्राप्यतां प्राप्नुवन्ति ते ॥ १४ ॥ नानारूपैप्परता विचित्ररति भास्वरैः । स्तम्भन चिभृता सा चै शाश्यती चाक्षपा सदा ॥४५॥ सर्वे च कामा: प्रचुरा ये दिव्या ये च मानुगः । रसयुक्तं प्रभूतश्च भक्ष्यमोऽयमनन्तयम् ॥ ४६॥ पुण्यगन्धनजथात्र नित्यपुष्पफर दुमाः। उपणे शीतानि तोयानिशीतवीणानिसंतिच
४७२
* मत्स्यपुराणम् * [पप्ट्यधिकशततमो
.पुष्पिताग्रा महाशाखाः प्रवालाङ्कुरधारिणः । लतावितानसंच्छन्ना नदीषु च सर.सु व
वृक्षान् वहुविधास्तत्र मृगेन्द्रो ददृशे प्रभुः । गन्धवन्ति च पुष्पाणि रसवन्ति फलानिव
नातिशीतानि नोष्णानि तत्रतत्र सरांसिच। अपश्यत् सर्वतीर्थानिसभायांतस्यसोविभुः
नलिनैः पुण्डरीकैश्च शतपत्रैः सुगन्धिभिः । रक्तः कुघलयन लैः कुमुदैः संवृतानि च ॥
सुकान्तैर्धार्तराष्ट्र श्च राजहंसैश्च सुप्रिय. । कारण्डवैश्चक्रवाकैः सारसः कुररैरपि ५२
विमलैः स्फाटिकामैश्च पाण्डुरैश्च दनैद्विजै । बहुहंसोपगीतानि सारसाभिरुतानि च
गन्धवत्यः शुभास्तत्र पुएमञ्जरिधारिणीः । दृष्टवान् पर्वतानेषु नागपुष्पधरा लताः॥
केतपशोकसरला पुन्नागतिलकार्जुनाः । चूता नीपा' प्रस्थपुष्पाः कदम्बाबकुलाधवाः
प्रियमुपाटलावृक्षा. शाल्मल्यः सहरिदकाः ।
सालास्तालास्तमालाश्च पञ्चकाश्च मनोरमाः॥५६॥
तथैवान्ये व्यराजन्त समायां पुष्पिता द्रुमाः ।
विद्रुमाश्च द्रुमाश्चैव ज्वलिताग्निसमप्रभाः ॥५७॥
स्कन्धवन्तः सुशाखाश्च बहुतालसमुच्छ्रया । अर्जुनाशोकवर्णाश्च यहव श्चित्रका द्रुमाः
वरुणो वत्सनामश्च पनसाः सह चन्दनः । नीला सुमनसश्चैवनिम्याअश्वत्थतिन्दुकाः
पारिजाताश्च लोधाश्च मल्लिकामद्रदारव.। आमलक्यस्तथाजम्वुलकुवाः शैलवालुका ।।
कालीयकादुकालाश्च हिङ्गवः पारियात्रकाः ।
मन्दारकुन्दलक्ताश्च पतङ्गाः कुटजास्तथा ॥६१॥
रक्ताः कुरण्टकाश्चैव नीलाश्चागरुभिः सह । कदम्बाश्चैव भव्याश्चदाडिमा घोजपूरकाः
सप्तपर्णाश्च विल्याश्च मधुपैरावतास्तथा । अशोकाश्च तमालाश्च नानागुल्मलतावृताः ॥
मधूकाः सप्तपर्णाश्च बहवस्तीरगा द्रुमाः । लताश्च विविधाकाराः पत्रपुष्पफलोपगाः ॥
एते चान्ये च बहवस्तत्र काननजा द्रुमाः । नानापुष्पफलोपेता व्यराजन्त समन्ततः ॥
चकोराः शतपत्राश्च मत्तकोकिलसारिकाः ।
पुष्पिताः पुष्पितानश्च सम्पतन्ति महाद्रुमाः ॥६६॥
रक्तपीतारुणास्तत्र पादपानगताः खगाः । परस्परमवेक्षन्ते प्रहृष्टा जीवजीवकाः ॥६॥
ऽध्यायः] * हिरण्यकशिपुवैभववर्णनम् . ૨૭૨ तस्यां सभायां दैत्येन्द्रो हिरण्यकशिपुस्तदा । स्त्रीसहस्रः परिवृतो विचित्राभरणाम्बरः अनयमणिवत्राविशिखाज्वलितकुण्डलः । आसीनश्वासने चित्रे दश नल्यप्रमाणतः ॥ दिवाकरनिमे दिव्ये दिव्यास्तरणसंस्तृते । दिव्यगन्धयहस्तत्रमारतालुसुस्रोपौ ॥७० हिरण्यकशिपुदैत्य आस्ते ज्वलितकुण्डलः । उपमहादैत्यं हिरण्यकशिपुं तदा ॥७२॥ दिव्यतानेन गीतानि जगुर्गन्धर्वसत्तमाः 1 विश्वाची सहजन्याच प्रम्लोचेत्यभिविश्रुता दिव्याथ सौरभेयीच समीची पुञ्जिकस्थली। मिश्रकेशीचरम्भाचचित्रलेखाशुचिम्मिता चारकेशी घृताची च मेनका चोर्यशीतथा । एताः सहप्रशश्चान्या नृत्यगीतविशारदाः उपतिष्ठन्त राजानं हिरण्यकशिपुं प्रभुम् । तत्रासीनं महायाहु हिरण्यकशिपुं प्रभुम् ।। उपासन्त दितेः पुत्रा. सर्वे लब्धवरास्तथा । तमप्रतिमकर्माणं शतशोऽथ सहस्रशः॥७६ यलिविरोचनस्तत्र नरक पृथिवीसुतः । प्रहादो विप्रचित्तिश्च गविष्ठश्च महासुरः ॥७॥ सुरहन्ता दुःपहन्ता सुनामा सुमतिधरः । घटोदरो महापार्श्वः कथनः फटिनस्तथा। विश्वरूपः सुम्पश्च स्वबलश्च महायलः । दशग्रीवश्व वालीच मेघवासा महासुरः ॥७॥ घटास्यो कम्पनश्चैव प्रजनश्चेन्द्रतापन । दैत्यदानवसंघास्ते सर्च ज्वलितकुण्डलाः ।। स्रग्विणो पाग्मिनः सर्वे सदैव चरितव्रताः। सर्वे लब्धवराः शूराः सर्वे विगतमृत्ययः ॥ ८१ ।। एने चान्ये च यहयो हिरण्यकशिपुं प्रभुम् । उपासन्ति महात्मानं सर्वे दिव्यपरिच्छदाः ॥ ८ ॥ विमानविविधाकारांजमानेरियाग्निमिः । महेन्द्रवपुषः सर्वे विवित्राङ्गदयाहयः ॥८३ भूषिताना दितेःपुत्रास्तमुपासन्त सर्वशः। तस्यां समायान्दिव्यायाममुराःपर्वतोपमाः ॥ हिरण्यवपुषः सर्वे दिवाकरसमप्रमाः । न श्रुतन्नेय दृष्टं हि हिरण्यकशिपोर्यथा ॥८५॥ पेश्वयं दैत्यसिंहम्य यथा तस्य महात्मनः । फनफरजतविश्वेदिकायां पडितरन विवियोथिकायाम् । स ददर्श मृगाधिपः समायां सुरवितातगवाक्षशोमितायाम् ॥ ८ ॥ , ४७४ * मत्स्यपुराणम् * [एकपष्ट्यधिकशततमो कनकधिमलहारविभूपिता दितितनयं स मृगाधिपो ददर्श । दिवसकरमहाप्रभालसं तन्दितिजसहस्रशतै निपेव्यमाणम् ॥ ८८ ॥ इति श्री मत्स्यपुराणे हिरण्यकशिपुवैभववर्णनंनाम पप्ट्यधिकशततमोऽध्याय. । एकपष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः नरसिंहमाहात्म्यवर्णनम् । सूत उवाच। ततो दृष्ट्वा महात्मानं कालचक्रमिवागतम् । नरसिंहयपुञ्छन्नं भस्मच्छन्नमिवानलम् ।। हिरण्यकशिपोः पुत्र. प्रहादोनाम वीर्यवान् । दिव्येन चक्षुपा सिंहमपश्यद्देवमागतम् ॥ तं दृष्ट्वा रुक्मशैलाभमपूर्वान्तनुमाश्रितम् । विस्मिता दानवाः सर्वे हिरण्यकशिपुश्च सः प्रह्लाद उवाच । महावाहो ! महाराज ! दैत्यानामादिसम्भव । न श्रुतं न च नोदृष्टं नारसिंहमिदं घपुः ॥ अव्यक्तप्रभवन्दिव्यं किमिदं रूपमागतम् । दैत्यान्तकरणं धोरं संशतीव मनो मम ॥५॥ अस्य देवाः शरीरस्था सागराः सरितश्चयाः । हिमवान्पारियात्रश्चयेचान्येकुलपर्वताः चन्द्रमाश्च सनक्षत्रैरादित्यैर्वसुभि सह । धनदो घरुणश्चैव यम शकः शचीपतिः ॥७ मरुती देवगन्धर्वा ऋषयश्च तपोधनाः । नागा यक्षाः पिशाचाश्च राक्षसा भीमविक्रमाः ॥८॥ ब्रह्मा देवः पशुपतिर्ललाटस्था भ्रमन्ति वै । स्थावराणि च सर्वाणि जगमानितथैवच ॥ भवांश्च सहितोऽस्माभि. सर्वैर्देवगणैर्वृतः । विमानशतसङ्कीर्णा तथैव भवतः सभा ॥ सर्व त्रिभुवनं राजन् ! लोकधर्माश्च शाश्वताः । दृश्यन्ते नारसिंहेऽस्मिंस्तथेदमपिलं जगत् ॥११॥ प्रजापतिश्चात्र मनुर्महात्मा ग्रहाश्च योगश्च महीरहाश्च ।
ऽध्यायः] * हिरण्यकशिपुनरसिंहयुद्धवर्णनम् * उत्पात्कालश्च धृतिर्मतिश्च रतिश्च सत्यञ्च तपो दमश्च ॥१२॥ सनत्कुमारश्च महानुभावो विश्वे व देवा ऋषयश्च सर्व । क्रोधश्च कामश्च तथैव हा धर्मश्च मोहः पितरश्च सर्वे ॥१३॥ प्रहादस्य पचः श्रुत्या हिरण्यकशिपुः प्रभुः । उवाच दानवान् सर्वान् गणांश्च स गणाधिपः ॥१४॥ मृगेन्द्रो गृहातामेप अपूर्व सत्यमास्थितः । यदि घा संशयः कश्चिद्वध्यता बनगोवरः ते दानवगणाः सर्वे मृगेन्दं भीमविक्रमम् । परिक्षिपन्तो मुदितास्त्रासयामासुरोजसा ॥ सिंहनादं विमुच्याथ नरसिंहो महाबलः । यमक्ष तां सभां सर्वा व्यादितास्यइचान्तकः सभायांभन्यमानायाहिरण्यकशिपुःस्वयम् । विक्षेपान्त्राणिसिंहस्यरोपाइयाउललोचनः सर्यास्त्राणामथ ज्येष्ठं दण्डमस्त्रं सुदारणम् । फालच. तथा घोरं विष्णुचक्र तथा परम् ॥१३॥ पैतामहं तथात्युग्रं त्रैलोक्यदहनं महत् । विचित्रामशनीञ्चैव शुष्काई चाशनिद्वयम् ॥ रौद्रं तथो शलञ्च कङ्कालं मुसलं तथा । मोहनं शोषणं चैव सन्तापनविलापनम् ॥ पायव्यं मथनं चैव कापालमथ कैङ्करम् । तथाप्रतिहतां शक्ति प्रौञ्चमस्नं तथैव च ॥ अम् ब्रह्मशिरश्चैध सोमास्त्रं शिशिरं तथा । कम्पनं शतनश्चैव त्याप्रश्व सुमेरयम् ।। फाल्मुद्गग्मक्षोम्यं तपन महायलम् । सघर्तनं मादनञ्च तथा मायाधरं परम् ॥२४॥ गान्धर्वमस्त्रं दयितमसिरतं च नन्दकम् । प्रस्यापनं प्रमथनं पारुणं चास्त्रमुत्तमम् । अस्त्रं पाशुपतश्चैव यम्याप्रतिहता गति ॥२५॥ अत्रं हयशिरश्चैव ब्राह्ममस्त्रं तथैव च । नारायणास्त्रमैन्द्रश्च सार्पमस्त्रं तथागुतम् ।। पेशाचमस्त्रमजितं शोषदं शामनं तथा । महापलं भायनं च प्रस्थापनधिकम्पने ॥२७॥ एतान्यस्त्राणि दिव्याणि हिरण्यकशिपुस्तदा । अमृजनसिंहस्य दातम्याग्नेरिघाइ तिम् ॥२८॥ यम्प्रेःप्रयलिने सिंहमाणोदमुरोत्तमाः । पिवम्यान् धर्मसमयेहिमयन्तमियांगुभिः सामानिलोधृतो दैत्यानां सैन्यसागरः । सणेन हापयामास मैनाफमिप सागरः ।
* मत्स्यपुराणम् * [ द्विषष्ट्यधिकशततमो मास. पाशश्च खरेश्च गदाभिर्मुसलैस्तथा । बजेरशनिभिश्चैव साग्निभिश्च महादुमैः । मुद्गरैमिन्दिपालैश्च शिलोलूखलपर्वतैः । शतघ्नीभिश्च दीप्ताभिर्दण्डैरपि सुदारुणः ॥ ते दानवाः पाशगृहीतहस्ता महेन्द्रतुल्याशनिवज्रवेगाः । समन्ततोऽभ्युद्यतबाहुकायाः स्थितास्त्रिशीर्षा इव नागपाशाः ॥ ३३ ॥ सुवर्णमालाकुलभूपिताङ्गा. पीतांशुकाभोगविभाविताङ्गाः । मुक्तावलीदामसनाथकक्षा हंसा इचा भान्ति विशालपक्षाः ॥ ३४ ॥ तेषां तु घायुप्रतिमोजसां वै केयूरमीलीवलयोत्कटानाम् । तान्युत्तमाङ्गान्यभितो विभान्ति प्रभातसूर्याशुसमप्रभाणि ॥ ३५ ॥ क्षिपद्विस्यैवलितर्महाबलमहास्त्रपूर्णः सुसमावृतो यभो । गिरिर्यथा सन्ततवर्षिभिर्धनैः कृतान्धकारान्तरकन्दरोद्रुमैः ॥ ३६ ॥ तैहन्यमानोऽपि महास्त्रजालैर्महायलदैत्यगणैः समेतः । नाकम्पताजी भगवान् प्रतापस्थितप्रकृत्या हिमपानिवावलः ॥३७॥ सन्त्रासितास्तेन नसिंहरूपिणा दितेः सुताः पापकतुल्यतेजसा । भयाद्विचेलुः पवनोद्भुताङ्गा यथोर्मयः सागरवारिसम्भवाः ॥३८॥ इति श्रीमत्स्यपुगणे हिरण्यकशिपुनरसिंह युद्धवर्णनं नामैकपश्यधिकशततमोऽध्यायः द्विपष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः अन्यदानवैः सह नरसिंहपुद्धम् । सूत उवाच । खराः समुपाश्चैव मकराशीवियाननाः । दामृगमुपाश्चान्ये घराहमुपसंस्थिताः ॥१॥ बालसूर्यमुपाधान्ये धृमरेतुमुसास्तथा । अड़चन्द्रार्धयत्राश्च अग्निदीप्तमुपास्तया ॥२ ईसकुमुटयपना ध्यादिताम्या भयायदाः । सिद्धास्थालेलिहानाच फायगृधमुपास्तथा
४७9
ऽध्यायः] * हिरण्यकशिपु नरसिंहयुद्धवर्णनम् *
द्विजिह्वकावक्त्रंशीर्षास्तथोल्का मुखसंस्थिताः । महाग्राहमुखाश्चान्ये दानवावलदर्पिताः
शैलसंवर्मणस्तस्य शरीरे शरवृष्टिभिः । अयध्यस्य मृगेन्द्रस्य न व्यथाञ्चकुराहवे ॥५॥
एवं भूयोऽपरान् धोरानसृजन् दानवेश्वराः।
मृगेन्द्रस्योपरि क्रुद्धा निश्वसन्त इवोरगाः ॥ ६ ॥
ते दानवशरा घोरा दानवेन्द्रसमीरिता. । विलयं जग्मुराकाशे सद्योता इव पर्वते ॥७॥
ततश्चकाणि दिव्यानि दैत्या क्रोधसमन्विताः । मृगेन्द्रायासृजन्नाशुज्वलितानिसमन्ततः
तैरासीद्गगनं च सम्पतद्विरितस्तत । युगान्ते सम्प्रकाश द्विश्चन्द्रादित्यग्रहरिव ॥६॥
तानि सर्वाणिचमाणिमृगेन्द्रेणाशमात्मना । ग्रस्तान्युदीर्णानि तदापावकार्चि.समानिये
तानि चमाणि पदनं विशमानानि भान्ति थे । मेघोदरदरीष्वेव चन्द्रसूर्यग्रहा इच ॥११
हिरण्यकशिपुदैत्यो भूयः प्रासृजदूर्जिताम् ।
शक्ति प्रज्वलिता घोरा धौतशस्त्रतड़ित्प्रभाम् ॥ १२ ॥
तामापतन्ती संप्रेक्ष्य मृगेन्द्रः शक्तिमुज्वलाम् । हुड्डारणध रौद्रेण यभञ्ज भगवांस्तदा
रराज भग्नासाशक्तिमृगेन्द्रेणमहीतले । स विस्फुलिङ्गा ज्वलिता महोल्केवदिवश्च्युता
नारावपडित सिंहस्य प्राप्ता रंजे विदूरत । नीलोत्पलपलाशानां मालेवोज्ज्वलदर्शना
स गजित्वा यथान्यायं विक्रम्य च यथामुखम् ।
तसैन्यमप्सारितवान् तृणापाणीच मारुतः ॥ १६ ॥
ततोऽश्मवर्ष देत्येन्द्रा व्यसृजन्त नभोगता 1 नगमानैः शिलापण्डैनिरिटमंदाप्रभ.।
तदश्मवर्ष सिंहस्य महन्मूर्द्धनिपातितम् । दिशोदश विकीर्णा वै पद्योतप्रफरा इस ॥
तदाश्मीदैत्यगणाः पुनः सिंहमरिन्दमम् । छायाया चतिरे मेघा धारामिरिय पर्वतम्
न चतंचालयामासुदैत्योपादेयसत्तमम् । भीमगोऽचलश्रेष्टं समुद्र इघ मन्दरम् ॥२०॥
ततोऽश्मवविदित जलवर्षमनन्तरम् । धागभिरक्षमात्राभिः प्रादुरासीत् समन्ततः ॥
नमसः प्रच्युताधारास्तिग्मवेगाः समन्ततः । आत्यसतो व्योमदिशश्योपदिशस्तथा
धारा दिपि च सर्वत्र पसुधायाच सश.।
न स्पृशन्ति च ता देवं निपनन्तोऽनि भुपि ॥२७॥
४७८ - * मत्स्यपुराणम् * [द्विषष्ट्यधिकशततमो बाह्यतो धवृपुर्वष नोपरिष्टाच वपुः । मृगेन्द्रप्रतिरूपस्य स्थितस्य युधि मायया । हतेऽश्मवर्षे तुमुले जलचर्षे च शोपिते। सोऽसृजदानवो मायामग्निवायुसमीरिताम् ॥ महेन्द्रस्तोयदैः साद्धं सहस्राक्षो महाद्युति । महता तोयवर्षेण शमयामास पावकम् ॥ तस्यां प्रतिहतायां तु मायायां युधि दानवः । असृजत् घोरसंकाशं तमस्तीवं समन्ततः तमसा संवृते लोके दैत्येप्यात्तायुधेषु च । स्वतेजसा परिवृतो दिवाकर इवावभौ ॥ त्रिशाखां भृकुटीञ्चास्य ददृशुर्दानवा रणे। ललाटस्था त्रिशूालावां गङ्गां त्रिपथगामिव तत. सर्वासु मायासु हतासु दितिनन्दनाः। हिरण्यकशिपुं दैत्यं विवर्णाः शरणं ययुः । ततः प्रज्वलितः क्रोधात् प्रदहन्निव तेजसा । तस्मिन् क्रुद्ध तु दैत्येन्द्रे तमोभूतमभूजगत् ॥ ३१ ।। आवह प्रवहश्चैव विवहोऽथ [दावह । परावहः संघहश्च महायलपराक्रमाः ॥ ३२ ॥ तथा परिवहः श्रीमानुत्पातभयशंसना । इत्येवं क्षुभिताः सप्त मरुतो गगनेवराः ॥३३॥ ये ग्रहाः सर्वलोकस्य क्षये प्रादुर्भवन्ति च । ते सर्वे गगने दृष्टा व्यवरन्त यथासुसम् ॥ 'अन्यलते चाप्यचरन्मार्ग निशि निशाचर । संग्रहः सहनक्षत्र राकापतिररिन्दमः ॥३५॥ विवर्णताच भगवान् गतो दिवि दिवाकरः । कृष्णं कवन्धं च तथा लक्ष्यते सुमहद्दिवि . अमुञ्चच्चार्चिपां वृन्द भूमिवृत्तिविभावसुः। गगनस्थश्च भगवानभीक्ष्णं परिदृश्यते ॥३७ सप्त धूम्रनिभा घोराः सूर्या दिवि समुत्थिताः। सोमस्य गगनस्थस्य ग्रहास्तिष्ठन्ति शृङ्गगा. ॥ ३८ ॥ चामेन दक्षिणे चैव स्थिती शुक्रवृहस्पती । शनैश्चरो लोहिताङ्गो उपलनाद्गसमुद्यती॥ समं समधिरोहन्तः सर्वे ते गगनेचराः । शृङ्गाणि शनकै?रा युगान्ताधर्तिनो ग्रहाः ॥ चन्द्रमाश्च सनक्षत्र है. सह तमोनुदः । चराचरविनाशाय रोहिणी नाभ्यनन्दत ॥४१॥ गृह्यते राहुणाचन्द्र उल्काभिरभिहन्यते। उल्काः प्रज्वलिताश्चन्द्रे विचरन्ति यथासुखम् देवानामपि यो देषः सोऽप्यवर्षतशोणितम् । अपतन् गगनादुरका विद्युपामहास्वनाः अकाले च द्रुमा.स पुप्पन्ति च फलन्ति च लताश्च सफला.सर्वा येवाहुदैत्यनाशनम् फलैःफलान्यज्ञायन्त पुष्प पुणं तथैव च । उन्मीलन्ति निमीलन्ति हसन्तिच स्दन्ति च ४७६ ॥ ऽध्यायः] * हिरण्यकशिपुनरसिंहयुद्धवर्णनम् * विक्रोशन्ति च गम्भीरा धूमयन्ति ज्वलन्ति च । प्रतिमाः सर्वदेवानां वेदयन्ति महद्भयम् आरण्यैः सह संसृष्टा ग्राम्याश्च मृगपक्षिणः । चक्रुः सुभैरवं तत्र महायुद्धमुपस्थितम् । नद्यश्च प्रतिकृलानि पहन्ति कलुपोदकाः । न प्रकाशन्ति च दिशो रक्तरेणुसमाकुलाः ॥ ४८ ॥ वानस्पत्यो न पूज्यन्ते पूजनार्हाः कथञ्चन । वायुवेगेन हन्यन्ते भज्यन्ते प्रणमन्ति च ॥ यदा च सर्वभूतानां छाया न परिवर्तते । अपराह्नगते सूर्य लोकानां युगसंक्षये ॥ ५० ॥ तदा हिरण्यकशिपोर्दैत्यस्योपरि वेश्मनः । भाण्डागारे युधागार निविष्टमभवन्मधु ॥ असुराणां विनाशायसुराणांविजयाय च । दृश्यन्ते विविधोत्पाता घोराधोरनिदर्शनाः एते चान्ये च बहवो घोरोत्पाताः समुत्थिताः । दैत्येन्द्रस्य विनाशाय दृश्यन्ते कालनिर्मिताः ॥ ५३॥ मेदिन्यां फम्पमानायां दैत्येन्द्रेण महात्मना । महीधरा नागगणा निपेतुरमितौजसः ॥ विषज्वालाकुलवक्त्रविमुञ्चन्तो हुताशनम् । चतुःशीर्षाः पञ्चशीर्षाः सप्तशीपाश्चपन्नगाः पाकिस्तक्षकश्चैव कर्कोटकधनबयो । एलामुखः कालिकञ्च महापद्मश्च वीर्यवान् ।। सहनशी नागोये हेमतालध्वजः प्रभुः। शेषोऽनन्तोमहाभागो दुष्प्रकम्प्याप्रकम्पितः दीप्तान्यन्तर्जलस्थानि पृथिवीधरणानि च । तदा क्रुद्धेन महता फपितानि समन्ततः ॥ ५८ ॥ जागास्तेजोधराश्चापि पातालतलवारिणः । हिरण्यकशिपुर्दैत्यस्तदा संस्पृष्टयान्महीम् न्दीष्टपुटः क्रोधाद्वाराह इव पूर्वजः । नदी भागीरथी चैव सरयू: कौशिकी तथा ॥ यमुना त्वध कावेरी कृष्णवेणी च निम्नगा । सुवेणा च महाभागा नदी गोदावरीतथा चर्मण्वती च सिन्धुश्च तथा नदनदीपतिः । कमलप्रमपश्चैव शोणोमणिनिमोदकः ॥ नर्मदा शुभतोया च तथा चेत्रवती नदी । गोमती गोकुलाकीर्णा तथा पूर्वसरस्वती ॥ ६ ॥ मही फालमही चैव तमसा पुष्पवाहिनी । जम्वृद्रीपं रनवटं सर्वरतोपशोभितम् ॥४॥ सुवर्णप्रकटश्चैव सुवर्णाकरमण्डितम् । महानदञ्च लौहिन्यं शैलफाननशोभितम् ॥३५॥ ।
४८० * मत्स्यपुराणम् * [द्विषष्ट्यधिकशततमो पत्तन कोशकरणं ऋपिवीरजनाकरम् । मागधाश्च महागामा मुडाः शुङ्गास्तथैव च ।। सुहा मल्ला विदेहाश्च मालवाः काशिकोसलाः । भवनं वैनतेयस्य दैत्येन्द्रेणाभिकम्पितम् ॥ ६७ ॥ कैलासशिखराकारं यत् कृतं विश्वकर्मणा । रक्ततोयो महाभोमो लोहित्यो नाम सागर. ॥ ६८ ॥ उदयश्च महाशैल उच्छ्रित शतयोजनम् । सुवर्णवेदिकः श्रीमान् मेघपक्तिनिषेवितः । भ्राजमानोऽर्कसद्दशैर्जातरूममयैर्दुमैः । शालस्तालैस्तमालश्च कर्णिकारश्च पुष्पितैः ॥६६ अयोमुसश्च विख्यातः सर्वतो धातुमण्डितः । तमालवनगन्धश्च पर्वतो मलयः शुभः ॥ सुराष्ट्राश्च सवाल्हीकाः शूराभीरास्तथैवच । भोजाः पाण्डयाश्च घणाश्च कलिङ्गास्ताम्रलिप्तकाः॥ ७२ ॥ तथैवोड्राश्च पौण्ड्राश्च चामचूडाःसकेरला । क्षोभितास्तेन दैत्येन सदेवाश्चाप्सरोगणाः अगस्त्यभवनञ्चैव यदगम्यकृतं पुरा । सिद्धचारणसङ्घश्च विप्रकीर्ण मनोहरम् ॥७४ ॥ विचित्रनानाविहगं सुपुप्पितमहाादुमम् । जातरूपमये. शृङ्गैर्गगनं बिलिसन्निध ॥ ७५॥ चन्द्रसूर्या शुसङ्काशैः सागराम्बुसमावृतैः। विद्युत्त्वान् सर्वः श्रीमानायतःशतयोजनम् ॥ विद्युता यत्र सवाता निपात्यन्ते नगोत्तमे । ऋषभः पर्वतश्चैव श्रीमान् वृषभसंशितः ।। फुञ्जर. पर्वतः श्रीमानगस्त्यस्य गृहं शुभम् । विशालाक्षध दुर्धर्षः सर्पाणामालयः पुरी॥ तथा भोगवतीचापि दैत्येन्द्रेणाभिकम्पिताः । महासेनो गिरिश्चैव पारियात्रश्च पर्वत । चम्पांच गिरिश्रेष्ठो घाराहश्चैव पर्वतः । प्राग्ज्योतिपपुस्चमापि ज तरूपमयं शुभम् ॥ यस्मिन्बसति दुष्टात्मा नरफो नाम दानयः । विशालाक्षध दुर्द्धों मेघाम्भीरनिस्वनः ॥ पहिस्तत्र सहस्राणि पर्वतानां द्विजोत्तमाः । तरुणादित्यसकाशो मेस्स्तत्र महागिरिः॥ यक्षराक्षसगन्ध नित्यं सेवितफन्दरः । हेमगों महाशैलस्तथा हेमससोगिरिः ॥८३॥ फलासधैप शैलेन्द्रो दानवेन्द्रेण कम्पिताः । हेमपुप्परसक्षेत्रं तेन चैपानसं सरः ॥८ent फम्पिनं मानसश्चैव इंसफारण्डयाकुलम् । विश्रङ्गपर्वतश्चय पुमारी च सरिद्वरा ॥८॥ तुगरचयसम्छमा मदिरश्चापि पर्यतः । उशीरविन्दुध गिरिश्चन्द्रप्रस्थस्तथाद्विराद ।। F ऽध्यायः] * नरसिंहमाहात्म्यवर्णनम् * ४८१ प्रजापतिगिरिश्चैव तथा पुष्करपर्वतः । देवाभ्रपर्वतश्चैव यथावै रेणुकोगिरिः ॥ ८ ॥ क्रोचः सप्तर्षिशैलश्च धूम्रवर्णश्च पर्वतः । एते चान्ये च गिरयो देशा जनपदास्तथा । नद्यः ससागराः सर्वाः सोऽकम्पयत दानवः। कपिलश्च महीपुत्रो व्याघ्रयांश्चैव कम्पितः ॥ ८६ ॥ पेचराश्च सतीपुत्राः पातालतलयासिनः । गणस्तथा परोरोद्रो मेघनामाङ्कशायुधः ॥ ऊर्ध्वगो भीमवेगश्च सर्व एवाभिकम्पिताः । गदी शली करालश्च हिरण्यकशिपुस्तदा। जीमूतधनसङ्काशो जीमूतघननिस्वनः । जीमूतघननिघोंपो जीमूत इव वेगवान् ॥ १२ ॥ देवारिदितिजो धीरो नृसिंह समुपाद्रवत् । समुत्पन्य ततस्तीक्ष्णेगेन्द्रेण महानरीः ॥ तदोङ्कारसहायेन विदार्य निहतोयुधि । मही च कालश्च घशी नभश्च ग्रहाश्च सूर्यश्च दिशश्च सर्वाः । नयश्च शैलाश्च महार्णवाश्च गताः प्रसादन्दितिपुननाशात् ॥ १४ ॥ ततः प्रमुदिता देवा ऋषयश्च तपोधनाः । तुष्टुयुर्नामभिर्दिव्यैरादिदेवं सनातनम् ॥६५॥ यत्त्वया विहितं देव ! नारसिंहमिदं वपुः । एतदेवार्चयिप्यन्ति परावरविदोजना. ॥ ब्रह्मोवाच । भवान् ब्रह्मा च रुद्रश्च महेन्द्रो देवसत्तमा !! भयान कर्ता विफर्ता च लोकानां प्रभवाप्ययः ॥ १७ ॥ पराञ्च सिद्धाञ्च परच देवं पच मन्त्रं परमं हविश्च । परञ्च धर्म परमञ्च विश्वं त्वामाग्ग्य पुरुषं पुराणम् ॥ १८ ॥ परं शरीरं परमञ्च ब्रह्म पस्य योगं परमाञ्च पाणीम् । परं रहस्यं परमाङ्गतिच त्यामारण्य पुरुष पुराणम् ॥ ६ ॥ एवं परस्यापि परं पदं यत् परं परम्यापि परख देघम् । परं परस्यापि परञ्च भूनन्त्यामाहुरग्यं पुरुपं पुगणम् ॥ १० ॥ परं परस्यापि पर निधानं परं परम्यापि परं पवित्रम् । परं परम्यापि परं च दान्तन्त्यामाटुंग्य पुगवं पुराणम् ।। १०१ ।।
४८२
* मत्स्यपुराणम् * [त्रिपष्ट्यधिकशततमो
एवमुक्त्वा तु भगवान् सर्वलोकपितामहः । स्तुत्वा नारायणं देवं ब्रह्मलोकं गतः प्रभुः।।
तप्तो नदस्सु तूर्येषु नृत्यन्तीप्वप्सर सु च । क्षीरोदस्योत्तरं कूलं जगाम हरिरीश्वरः ॥
नारसिहं घपुर्देवः स्थापयित्वा सुदीप्तिमत् । पौराणं रूपमास्थाय प्रययौ गरुडध्वजः ।
अष्टचक्रेण यानेन भूतयुक्तेन भाखता । अव्यक्तप्रकृतिर्देवः स्वस्थानं गतवान् प्रभुः
इति श्रीमत्स्यपुराणे नरसिंहमाहात्म्यवर्णनं नाम द्विपष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ।
त्रिपष्टयधिकशततमोऽध्यायः
मनुमत्स्यसंवादवर्णनम् ।
पय ऊचुः।
फथितं नरसिंहस्य माहात्म्यं विस्तरेण च । पुनस्तस्यैच माहात्म्यमन्यद्विस्तरतो घद ॥
पद्मरूपमभूदेतत् कथं हेममयं जगत् । कथश्च वैष्णवी सृष्टिः पद्ममध्येऽभवत्पुरा ॥२॥
सूत उवाच।
श्रुत्वा च नरसिंहस्य माहात्म्यं रविनन्दनः । विस्मयोत्फुल्लनयनः पुनः प्रप्रच्छकेशवम् ।
मनुवाच ।
कथं पाने महाकल्पे तव पद्ममयं जगत् । जलार्णवगतस्येह नाभी जातं जनार्दन ! Men
प्रभावात् पद्मनाभस्य स्वपतः सागराम्भसि । पुष्कर च कथं भूता देवाः सर्पिगणा.पुरा
एनमाण्याहि निसिलं योगयोगविदाम्पते !! 2ण्वतस्तस्य मे फीति नतृप्तिरुपजायते ॥
कियता चैच कालेन शेते चै पुरषोत्तमः ।
कियन्तं पा स्थपिति च फोऽस्य कालस्य सम्भवः ॥७॥
कियतापाथ फालेन ह्युत्तिष्ठति महायशा. । फयञ्चोत्थाय भगवान् सृजते निखिलंजगत्
के प्रजापतयस्तापदासन पूर्व महामुने !! फथं निर्मितवांश्चैव विवं लोकं सनातनम् ।।
प्रथमेकार्णवे न्ये नटरपायरजङ्गमे । दग्धदेवासुरनरे प्रनष्पोरगराक्षसे ॥ १० ॥
। ऽध्यायः] * मनुमत्स्यसंवादवर्णनम् * ४८३ नष्टानिलानले लोके नष्टाकाशमहीतले । केवलं गहरीभूते महाभूतविपर्यये ॥ ११ ॥ विभुमहाभूतपतिर्महातेजा महारुतिः । मास्ते सुरवरश्रेष्ठो विधिमाथाय योगवित् ॥१२ मृणुयां परया भत्त्या ब्रह्मन्नेतदशेषतः । वक्तुमर्हसि धर्मिष्ठ ! यशो नारायणात्मकम् ।। श्रद्धया चोपविष्टानां भगवान् ! वक्तुमर्हसि । मत्स्य उवाच। नारायणस्य यशसः श्रवणे या तव स्पृहा ॥ १४ ॥ तवंश्यान्वयभूतस्य न्याय्यं रविकुलपम !! गुप्यादिपुराणेषु वेदेभ्यश्च यथाश्रुतम् ॥ ब्राह्मणानाञ्च घदतां श्रुत्वा वै सुमहात्मनाम्। यथा च तपसा दृष्ट्वा वृहस्पतिसमद्युतिः॥ पराशरसुतः श्रीमान् गुरपायनोऽप्रयीत् । तत्तेऽहं कथयिष्यामि यथाशक्ति यथाश्रुति यद्विज्ञातुं मया शस्मृषिमात्रेण सत्तमाः!। कासमुत्सहते ज्ञातुं परं नारायणात्मकम् विश्वायनश्च यद्ब्रह्मा न वेदयति तत्त्वतः । तत्कर्म विश्ववेदानां तदहस्यं महर्षिणाम् तमीज्यं सर्वयमानां तत्तत्वं सर्वदर्शिनाम् । तदध्यात्मविदां चिन्त्यनरकन विकर्मिणाम् अधिदेवश्च यवमधियां सुसंगितम् । तद्भूतमधिभूतञ्च तत्परं परमर्पिणाम् ॥ २१ ॥ स यशो घेदनिर्दिष्टस्तत्तप. फचयो विदुः । यः कर्ता कारको बुद्धिर्मनः क्षेत्रा एव च प्रणयः पुरुषः शास्ता एकश्चेति विमाव्यते । प्राणः पञ्चविधश्चैव ध्रुव अक्षर एव च कालः शाकच यन्ता चद्रष्टास्वाध्यायएय च । उच्यते विविधयः स एवायं न तत्परम् स पर भगवान् सर्व करोति विकरांति च । सोऽस्मान् कारयते सन् सोऽत्येनि व्याकुलीरतान् ।। २ ।। यतामहे तमयायन्तमेयेच्छाम निताः । यो पता यच पकायं यथादन्तद्ग्रवीमि पः श्रूयने यश प धान्यंयशान्यत् परिजलप्यते । या कथाञ्चय पर्नन्त श्रुतयो पाय तत्पराः विश्वं विश्वपतिर्यध स तु नागयण स्मृतः । यत् सत्यं यदमृतमक्षरं परं यन् यद्भूतं परममिदं च यदभविष्यत् । यत् फिशिपरमवरं यदम्नि यान्य मन् मयं पुरम्परः प्रभुः पुगप||२८|| इति श्रीमन्मापुराणे मनुममयमंबादवर्णनं गाम विपरिधिमानतमोऽध्यापः।
૮૧
* मत्स्यपुराणम् *
[निषष्ट्यधिकशततमो
एवमुत्वा तु भगवान् सर्वलोकपितामहः । स्तुत्वा नारायणं देवं ब्रह्मलोकं गतः प्रभुः।
ततो नदत्सु तूर्येषु नृत्यन्तीप्वप्सर.सु च । क्षीरोदस्योत्तरं कूलं जगाम हरिरीश्वरः ।
नारसिंहं घपुर्देवः स्थापयित्वा सुदीप्तिमत् । पौराणं रूपमास्थाय प्रययौ गरुडध्वजः ।
अपचक्रेण यानेन भूतयुक्तेन भाखता । अव्यक्तप्रकृतिर्देधः स्वस्थानं गतवान् प्रभुः ॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे नरसिहमाहात्म्यवर्णनं नाम द्विपष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ।
त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
मनुमत्स्यसंवादवर्णनम् ।
ऋपय ऊचुः।
कथितं नरसिंहस्य माहात्म्यं विस्तरेण च । पुनस्तस्यैव माहात्म्यमन्यद्विस्तरतो घद ॥
पद्मरूपमभूदेतत् कथं हेममयं जगत् । कथञ्च वैष्णवी सृष्टिः पद्ममध्येऽभवत्पुरा ॥२॥
सूत उवाच।
श्रुत्वा च नरसिंहस्य माहात्म्यं रविनन्दनः । विस्मयोत्फुल्लनयनः पुनः प्रप्रच्छकेशवम् ।
मनुरवाच ।
कथं पाने महाकल्पे तव पद्ममयं जगत् । जलार्णवगतस्येह नामो जातं जनार्दन ! nel
प्रभावात् पद्मनाभस्य स्वपतः सागराम्भसि । पुष्करे च कथं भूता देवाः सपिंगणा पुरा
एनमायाहि निसिलं योगयोगविदाम्पते । ण्यतस्तस्य मे फीति नंतृप्तिरुपजायते ॥
कियता चैध कालेन शेते वै पुरुषोत्तमः ।
कियन्तं पा स्थपिति च फोऽस्य कालस्य सम्भवः ॥७॥
कियतापाथ कालेन शुत्तिष्ठति महायशा. फञ्चोत्थाय भगवान् सृजते निसिलंजगत् ।
के प्रजापतयस्तावदासन पूर्व महामुने !! फथं निर्मितवांश्चैव विनं लोकं सनातनम् ॥
प्रथमेकाणचे शून्ये नएन्यावरजङ्गमे । दाघदेवासुरनरे प्रनष्टोरगराक्षसे ॥ १० ॥
ऽध्यायः] * मनुमत्स्यसंवादवर्णनम् * ૨૮૨ नष्टानिलानले लोके नष्टाकाशमहीतले । केवलं गहरीभूते महाभूतविपर्यये ॥ ११ ॥ विभुमहाभूतपतिर्महातेजा महामतिः । आस्ते सुरवरश्रेष्ठो विधिमास्थाय योगवित् ।।१२ शृणुयां परया भक्त्या ब्रह्मन्नेतदशेषतः । वक्तुमर्हसि धर्मिष्ठ ! यशो नारायणात्मकम् ।। श्रद्धया चोपविष्टानां भगवान् ! घक्तुमर्हसि । मत्स्य उवाच। नारायणस्य यशसः श्रवणे या तव स्पृहा ॥१४॥ तवंश्यान्वयभूतस्य न्याय्यं रविकुलपम!! गुप्वादिपुराणेषु चेदेभ्यश्च यथाश्रुतम् ।। ब्राह्मणानाञ्च घदतां श्रुत्या वै सुमहात्मनाम्। यथा च तपसा दृष्ट्वा वृहस्पतिसमद्युतिः ।। पराशरसुतः श्रीमान् गुरुद्वैपायनोऽत्रवीत् । तत्तेऽहं कथयिष्यामि यथाशक्ति यथाश्रुति यद्विज्ञातुं मया शसमृपिमात्रेण सत्तमा.! । कः समुत्सहते ज्ञातुं परं नारायणात्मकम् विश्वायनश्च यद्ब्रह्मा न वेदयति तत्त्वतः । तत्कर्म विश्ववेदानां तद्रहस्यं महर्पिणाम् तमोज्यं सर्वयज्ञानां तत्तत्त्वं सर्वदर्शिनाम् । तदध्यात्मविदां चिन्त्यनरकन विकर्मिणाम् अधिदेवश्च यठेवमधियज्ञं सुसंज्ञितम् । तद्भूतमधिभूतञ्च तत्परं परमर्पिणाम् ॥ २१ ॥ स यज्ञो घेदनिर्दिष्टस्तत्तप फवयो चिदुः । य. कर्ता कारको बुद्धिर्मन क्षेत्रज्ञ एव च प्रणय. पुरुष शास्ता एकश्चेति विभाव्यते । प्राण पञ्चविधश्चैव ध्रुव अक्षर एव च कालः शाकश्च यन्ता चद्रष्टास्वाध्यायएव च ।उच्यते विविधैर्देवः स एवायं न तत्परम् स एव भगवान् सर्व करोति विकरोति च । सोऽस्मान् कारयते सर्वान् सोऽत्येति व्याकुलीकृतान् ॥ २५ ॥ यतामहे तमेवाद्यन्तमेच्छाम निवृता. । यो घता यच वक्तव्यं यचाहन्तद्रवीमि वः श्रूयते यच्च वै श्राव्यंयञ्चान्यत् परिजल्प्यते । या कथाश्चैव पर्तन्ते श्रुतयो चाथ तत्पराः विश्वं विश्वपतिर्यश्च स तु नारायण स्मृत । ॥ यत् सत्य यदमृतमक्षरं परं यत् यद्भूतं परममिदं च यद्भविष्यत् । यत् किश्चिञ्चरमवरं यदस्ति चान्यत् तत् सर्व पुरुषवरः प्रभुः पुराण ॥२८॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे मनुमत्स्यसंवादवर्णनं नाम निषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः।
चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः चातुर्युगगतिवर्णनम् । मत्स्य उवाच। ॥ चत्वार्याहुः सहस्राणि घर्षाणान्तु कृतं युगम् । तस्य तावच्छती सन्ध्या द्विगुणा रविनन्दन !॥१॥ यत्र धर्मश्चतुष्पादस्त्वधर्मः पादविग्रहः । स्वधर्मनिरताः सन्तो जायन्ते यत्र मानयाः॥ विप्राः स्थिता धर्मपरा राजवृत्ती स्थिता नृपाः । कृप्यामभिरता वैश्याः शूद्राः शुश्रूपवः स्थिताः ॥ ३ ॥ तदा सत्यञ्च शौचञ्च धर्मश्चैव विवर्धते । सद्विराचरित कर्म क्रियते ख्यायते व एतत् कार्तयुगं वृत्तं सर्वेषामपि पार्थिव ! । प्राणिनांधर्मसङ्गानामपि वै नीचजन्मनाम् त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेतायुगमिहोच्यते । तस्यतावच्छतीसन्ध्याद्विगुणा परिकीय॑ते द्वाभ्यामधर्मः पादाभ्यांत्रिभिर्धर्माव्यवस्थितः । यत्र सत्यञ्च सत्यञ्चत्रेताधर्मो विधायते त्रेतायां विकृति यान्ति वर्णास्वेतेन संशयः । चतुर्वर्णस्य वैकृत्याद्यान्ति दौर्बल्यमाधमाः ।। एपा त्रेतायुगगति विचित्रा देवनिर्मिता । द्वापरस्य तु या चेष्टा तामपि. श्रोतुमर्हसि ॥ द्वापरन्द्रे सहने तु घर्षाणां रविनन्दन ! । तस्य तापच्छती सन्ध्या द्विगुणा युगमुच्यते तत्र चापगः सर्वे प्राणिनो रजसा हताः । सर्वे नैष्कृतिका क्षुद्रा जायन्ते रविनन्दन ! द्वाभ्यां धर्मः स्थितः पदभ्यामधर्मस्त्रिभित्थितः । विपर्ययाच्छनैर्धर्मः क्षयमेति कलौ युगे ॥ १२ ॥ ब्राह्मण्यभावस्य ततो तोत्सुक्यं व्यशीर्यते । व्रतोपवासास्त्यज्यन्ते द्वापर युगपर्यये तथा वर्षसहस्रन्तु चर्याणां वेशते अपि । सन्ध्ययासह संख्यातं क्रूरङ्कलियुगं स्मृतम् ॥ यनाधर्मश्चतुष्पादः स्याद् धर्म.पादविग्रहः। कामिनस्तपसाच्छानाजायन्ते तत्र मानवाः ऽध्यायः] * प्रलयकालवर्णनम् * नैचातिसात्त्विकः कश्चिन्न साधुर्न च सत्यवाक् । नास्तिका ब्रह्ममका चा जायन्ते तत्र मानवाः ॥१६॥ अहङ्कारगृहीताश्च प्रक्षीणस्नेहबन्धनाः । विप्राः शूद्रसमाचाराः सन्ति सर्वे कलौ युगे । थाश्रमाणां विपर्यासः कलौ संपरिवर्तते । वर्णानाञ्चैव सन्देहो युगान्ते रविनन्दन ! ॥ विद्याद द्वादशसाहस्री युगारयां पूर्वनिर्मिताम् । एवं सहस्रपर्यन्तं तदहो ब्राह्ममुच्यते ॥ १६ ॥ ततोऽहनि गते तस्मिन् सर्वेषामेव जीविनाम् । शरीरनिति दृष्ट्वा लोकसंहारबुद्धितः ॥ देवतानाच सर्वासां ब्रह्मादीनांमहीपने ! । दैत्यानां दानवानाञ्च यक्षराक्षसपक्षिणाम् ॥ गन्धर्वाणामप्सरसां भुजङ्नानाञ्च पार्थिव !। पर्वतानां नदीनाञ्च पशनाञ्चैव सत्तम ! ॥ तिर्यग्योनिगतानाञ्च सत्वानां कृमिणान्तथा । महाभूतपतिः पञ्च हत्या भूतानि भृतन ॥ २३ ॥ जगत्संहरणार्थाय कुरते वैशसं महत् । भृत्या सूर्यचक्षुपी चाददानो भूत्या पायुः प्राणिनां प्राणजालम् । भूत्या परिनिर्दहन सर्व लोकान् भृत्वा मेघो भूय उग्रोऽप्यवर्षत् ॥ २४ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे चातुर्यगगतिवर्णनं नाम चतुरटवधिकशततमोऽध्याय । पञ्चपष्ठयधिकशततमोऽध्यायः प्रलयकालनर्णनम् । गन्स्य उपाचा भूत्या नारायणो योगी सत्यमूर्तिर्विभावमुः ! गमस्तिमिः प्रदीमाभिः संशोषयति सागरान् ॥१॥ सा पीन्यापंपान् सन्निदी कृपांध सर्यश. । परंतनाश सलिलं सयंमादायरमिति: ।
# मत्स्यपुराणम् * [पञ्चपट्यधिकशततमो भित्या गभस्तिभिश्चैव महीङ्गत्वा रसातलात् । पातालजलमादाय पिवन्नु रसमुत्तमम् मूनासृक्दमन्यञ्च यदस्ति प्राणिपु ध्रुघम् । तत् सर्वमरचिन्दाक्षमादत्ते पुरुषोत्तमः पायुश्च भगवान् भूत्वा विधुन्वानोऽपिलं जगत् । प्राणापानसमानाद्यात् घायूनाकर्पते हरिः ॥ ५॥ ततो देवगणाः सर्वे भूतान्येव च यानि तु । गन्धोघ्राणं शरीरश्च पृथिवी संश्रितागुणाः जिह्वा रसश्च स्नेहश्च संश्रिता सलिले गुणाः। रूपं चक्षुर्विपाकञ्च ज्योतिरेवाश्रितागुणा. स्पर्शः प्राणश्च चेष्टा च पवनेसंश्रितागुणा.। शन्दः श्रोत्रञ्च सान्येव गगनेसंश्रितागुणा. लोकमाया भगवता मुर्तेन विनाशिता । मनोयुद्धिश्च सर्वेषां क्षेत्रशश्चेति यः श्रुतः॥६ तं घरेण्यं परमेष्ठि हृषीकेशमुपाश्रिताः । ततो भगवतस्तस्य रश्मिभिः परिवारितः ॥ पायुनाक्रम्यमाणासु द्रुमशाखासुबाधिता. । तेषा सयलोद्भूत पावक शतधाज्यलन् अदहश्च तदा सर्व वृत सम्वर्तकोऽनल । सपर्वतद्रुमान् गुल्मान् लतावलीस्तृणानिच विमानानि च दिव्यानि पुराणि विविधानि च । यानि चाश्रयणीयानि तानि सर्वाणि सोऽदहत् ॥ १३ ॥ भस्मीकृत्वातत सर्वान लोकान्लोक्गुरहरिः । भूयोनिर्धापयामासयुगान्तेन च कर्मणा सहस्रवृष्टिः शतधा भूत्वा कृष्णो महावल । दिव्यतोयेन हविषा तर्पयामास मेदिनीम् तत क्षीरनिकायेन स्वादुना परमाम्भसा ! शिवेन पुण्येन महीं निर्वाणमगमत् परम् ॥ तेन रोधेन संच्छन्ना पयसां वर्षतो धरा । एकार्णधजलीभूता सर्वसत्वविवर्जिता ।। महासत्यान्यपि विभुं प्रष्टायमितौजसम् । नष्टा पवनाकाशे सक्ष्मे जगति संवृते ॥ संशोपमात्मना कृत्या समुद्रानपि देहिनः । दावा संहाव्य च तथा स्वपित्येकः सनातनः ॥ १६॥ पौराणं रूपमास्थाय स्थपित्यमितविक्रम । एकाचजलव्यापी योगी योगमुपाश्रितः अनेकानि सहस्राणि युगान्येकार्णधारभसि । न चैनं कश्चिव्यक्तं व्यक्तं वेदितुमर्हति फश्चैव पुस्पोनाम किं योग कश्चयोगवान् । असोफियत कालचएकार्णविधिप्रभुः फरिष्यतीति भगवानिति कश्चिान युध्यते । न द्रष्टाघ गमिता न ज्ञाता नैघ पार्श्वगः t ऽध्यायः] * यज्ञावतारवर्णनम् * तस्य न ज्ञायते किञ्चित्तमृते देवसत्तमम् । नमः क्षितिः पवनमपः प्रकाशं प्रजापति भुवनधरं सुरेश्वरम् । पितामहं श्रुतिनिलयमहामुनि प्रशाम्य भूयः शयनं घरोचयत् ॥ २४ ॥ इति श्री मत्स्यपुराणे प्रलयकालवर्णनं नाम पञ्चपट्यधिकशततमोऽध्यायः । पट्पष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः, यज्ञावतारवर्णनम् । मत्स्य उवाच। एवमेकार्णवोभूने शेते लोके महायुतिः । प्रच्छाद्यसलिलेनोवी हंसो नारायणस्तदा ॥ महतो रजसो मध्ये महार्णवसरःसु चै । विरजस्कं महायाहुमक्षयं ब्रह्म यं विदुः ॥२॥ यात्मम्पप्रकाशेन तमसा संवृतः प्रभुः । मनः सात्त्विकमाधाय यत्र तत् सत्यमासत ॥ याथातथ्यं परं ज्ञानं भूतन्तद्ब्रह्मणापुरा ! रहस्यारण्यकोद्दिष्टं यचोपनिषदं स्मृतम् ।। पुरुषोयाइत्येतत् यत्परं परिकीर्तितम् । यश्चान्यः पुग्पाग्यः स्यात स एष पुरुषोत्तमः।। ये च यशफरा विप्रा येत्विज इतिस्मृताः । अम्मादेवपुरा भृता योभ्यः श्रूयतां तथा| ब्रह्माणं प्रथमं पपत्रादुद्गातारच सागरम् । "होतारमपि चाध्ययु याहुभ्यामसृजत् प्रभुः ॥ ७॥ ब्राह्मणो ब्राह्मणाच्छसि प्रस्तोताच सर्वशः । तो मित्रावरुणो पृष्ठात् प्रतिप्रस्तारमेव च उदरात् प्रतिहारं होतारशेप पार्थिव ! अच्छावाफमधोरम्याग्नेष्टारचव पार्थिय। पाणिभ्यामय चाग्नीध्रमुबामण्यन जानुतः । मावस्तुतन्तु पादाभ्यामुग्नेताच यानुपम् एपमेवेष भगपान् पोडशेष जगत्पतिः । प्रवक्तन् सर्पयहानामृत्विजोऽमजदुत्तमान् ॥ तदेष चे घेदमय पुरुषो यासंस्थितः । घेदाञ्चैतन्मयाः सर्ने सागोपनिषदनियाः ॥ स्वपित्येकाणये चैप यदाधर्यमभूत् पुरा । श्रूयन्तां तया विमा ! मार्कण्डेययनहरम्॥ - ४८८ * मत्स्यपुराणम् [षट्पश्यधिकशततमो गीर्णा भगवतस्तस्य कुलावेव महामुनि । वहुवर्षसहस्रायुस्तस्यैव घरतेजसा ॥१४॥ अटस्तीर्थप्रसङ्गेन पृथिवीतीर्थगोचरान् । आश्रमाणि च पुण्यानि देवतायतनानि च १५ देशान् राष्ट्राणि चित्राणि पुराणि विविधानि च । जपहोमपर. शान्तस्तपोधोरं समास्थितः ॥ १६ ॥ मार्कण्डेयस्ततस्तस्य शनैर्वतत्राद्विनि मृत.। स निष्क्रामन्नवात्मानं जानीते देवमायया निष्क्रम्यान्यस्य पदनादेकार्णवमयो जगत् । सर्वतस्तमसाच्छन्नं मार्कण्डेयोऽन्ववैक्षत तस्योत्पन्न भयन्तीव संशयश्चात्मजीविते । देवदर्शनसंहयो विस्मयं परमङ्गत ॥१६॥ चिन्तयन् जलमध्यस्थो मार्कण्डेयोऽन्ववक्षत । किन्तु स्यान्मम चिन्तेयं मोहःस्वप्नोऽनुभूयते ॥ २० ॥ व्यक्तमन्यतमोभावस्तेषां सम्भावितो मम । नहीदृशं जगत् क्लेशमयुक्तं सत्यमर्हति ॥ नष्टचन्द्रार्कपवने नष्टपर्वतभूतले । कतम स्यादयं लोक इति चिन्तामवस्थित ॥२२॥ ददर्श चापि पुरुष स्वपन्त पर्वतोपमम् । सलिलेऽर्द्धमयो मग्नं जीमूतमिव सागर ॥२३ ज्वलन्तमिव तेजोभिर्गोयुक्तमिव भास्करम् । शर्वर्या जाग्रतमिच भासन्तं स्वेन तेजसा ॥२४॥ देवन्द्रधुमिहायात को भवानिति विस्मयात् । तथैव स मुनि कुक्षि पुनरेव प्रवेशित ॥२५॥ सम्प्रविष्ट पुन कुक्षि मार्कण्डेयोऽतिविस्मयः । तथैव च पुनर्भूयो विजानन् स्वप्नदर्शनम् स तथैव यथा पूर्व यो धरामटते पुरा । पुण्यतीर्थजलोपेता विविधान्याश्रमाणि च ॥ क्रतुभिर्यजमानाश्च समाप्तवरदक्षिणान । अपश्यदैवकुक्षिस्थान् याजकान् शतशोद्विजान सवृत्तमास्थिता. सर्व धर्णाब्राह्मणपूर्वका. । चत्वारश्चाश्रमा सम्यग्यथोद्दिष्टामया तव एवं पर्यशतं सायं मार्कण्डेयस्य धीमत । चरत पृथिवीं सर्वान्न कुक्ष्यन्तः समीक्षित तत. कदाचिदथ वै पुनर्वक्त्राद्विनिस्सृत । गुप्तं न्यग्रोधशाखायां वालमेकं निरक्षत ॥ तथैवैकार्णवजले नीहारेणावृताम्बरे । अव्ययः क्रीडते लोके सर्वभूतविवर्जिते ॥३२॥ स मुनिविस्मयाविष्टः कौतूहलसमन्वित ।
- ऽध्यायः] * भगवन्मार्कण्डेयसंवादर्णनम् * यालमादित्यसदाशं नाशकोदभिवीक्षितुम् ॥ ३३ ॥ स चिन्तयंस्तथैकान्ते स्थित्वा सलिलसन्निधौ । पूर्वदृष्टमिदं मन्ये शङ्कितो देवमायया ॥ ३४ ॥ अगाधसलिले तस्मिन् मार्कण्डेयः मुविस्मयः । प्लवंस्तथार्तिमगमत् भयात् सन्त्रस्तलोचनः ॥ ३५ ॥ स तस्मै भगवानाह स्वागतंघालयोगवान् ।धमापे मेघतुल्येन स्वरेण पुरपोत्तमः॥३६॥ माभै वत्स! न भेतव्यमिहयायाहि मेऽन्तिकम् । मार्कण्डेयोमुनिस्त्वाह वालन्तं श्रमपीडितः ॥ ३७॥ मार्कण्डेय उवाच । कोमानाम्ना कीर्तयति तपः परिभवन्मम । दिव्यं घर्षसहस्रात्यंधर्षयन्निवमेव यः ॥३८ नहोप घः समाचारो देवेष्वपि ममोचितः । मां ब्रह्मापि हि देवेशो दीर्घायुरिति भापते कम्तपो घोरमासाद्य मामद्य त्यक्तजीवितः । मार्कण्डेयेति मामुत्वा मृत्युमीक्षितुमर्हति एचमामाप्य तं क्रोधान्मार्कण्डेयो महामुनिः । तथैव भगवान् भूयो यभापे मधुसदन ॥ ४१ ॥ भगवानुवाच। अहं ते जनको वत्स! हृषीकेशः पिता गुरुः । आयुःपदाता पौराणः किमान्त्वन्नोपसर्पसि ॥४२॥ मां पुत्रकामा प्रथम पिना तेऽशिरसोमुनिः । पूर्वमाराधयामास तपस्तीनं समाश्रितः ।। ततम्त्यां घोरतपसा प्रावृणोदमितौजसम् । उक्तवानहमात्मस्थं महर्पिममितौजसम् ॥ यः समुन्सहने चान्यो यो न भूतात्मकात्मजः। दृष्टमेकार्णवगतं क्रीडन्तंयोगवर्मना तन प्रहृष्टपदनो विस्मयोत्फुललोचनः । मृदुनि यद्धाजलिपुटो मार्कण्डेयो महातपाः नामगोने ततः प्रोन्य दीर्घायुलॊकपूजितः । तम्मै भगवते भत्तया नमस्कारमयाफरोत् मार्कण्डेय उपात्र। इच्छेयं तत्त्वतो मायामिमां शातुन्तवान !!
४६० * मत्स्यपुराणम् * [पदपश्यधिकशततमो यदेकार्णयमध्यस्थः शेपे त्वं बालरूपवान् ॥ ४८ ॥ कि संज्ञश्चैव भगवन् ! लोके विज्ञायसे प्रभो! तर्कये त्वां महात्मानं को धन्यः स्थातुमर्हति ॥ ४६॥ श्रीभगवानुवाच । अहंनारायणो ब्रह्मन् ! सर्वभूः सर्वनाशनः । अहं सहस्रशीर्वात्ययः पदैरभिसंशितः ॥५० आदित्यवर्णः पुरुषो मखे ब्रह्ममयो मय । अहमग्निहव्यवाहो यादसां पतिरव्ययः ॥५१ अहमिन्द्रपदे शको पर्याणां परिवत्सरः । अहं योगी युगाख्यश्च युगान्तावर्तएच च ५२ अहं सर्वाणि सत्यानि दैवतान्यखिलानि तु । भुजङ्गानामहं शेपो ताक्ष्यों वै सर्वपक्षिणाम् ॥ ५३॥ कृतान्तः सर्वभूतानां विश्वेषां कालसंशितः । अहं धर्मस्तपश्चाहं सर्वाश्रमनिचासिनाम् अहं चैव सरिद्दिव्या क्षीरोदश्च महार्णव. । यत्तत् सत्यं च परममहमेकः प्रजापतिः ।। अहं सांख्यमहं योगोऽप्यहं तत्परमम्पदम् । अहमिज्या क्रिया चाहमहविद्याधिपःस्मृतः अहं ज्योतिरहं घायुरहं भूमिरहं नमः । अहमापः समुद्राश्च नक्षत्राणि दिशोदश ॥ अहं घर्षमहं सोमः पर्जन्योऽहमहं रविः । क्षीरोदसागरे चाहं समुद्रे घडयामुखः ॥ घह्निः संवर्तको भूत्या पिवंस्तोयमयं हविः । अहं पुराणः परमं तथैवाहं परायणम् अहं भूतस्य भव्यत्य वर्तमानल्य सम्भवः । यत् किञ्चित् पश्यसे विप्र ! यच्छृणोपि च किञ्चन ॥ ६० ॥ यल्लोके चानुभवसि तत् सर्व मामनुस्मर । विश्वसृष्टंमयापूर्व सृज्यं चाद्यापि पश्यमाम् युगे युगे च स्रक्ष्यामि मार्कण्डेयाखिलं जगत् । तदेतदखिलं सर्व मार्कण्डेयावधारय ।। ६२ ॥ शुश्रूपुर्मम धर्माश्च कुक्षौ वर सुखं मम । मम ब्रह्मा शरीरस्थो देवैश्च ऋषिभिः सह ॥ व्यक्तमव्यक्तयोगं मामवगच्छासुरद्विपम् । अहमेकाक्षरो मन्त्रस्त्र्यक्षरणचैव तारकः ।। परस्त्रिवर्गादोड्वार स्त्रिवर्गार्थ निदर्शनः । एधमादिपुराणेशो चदशेच महामतिः ॥६५॥ चक्त्रमाहृतवानाशु मार्कण्डेयं महामुनिम् । ततो भगवतः कुक्षिं प्रविष्टो मुनिसत्तमः ६६
ध्याय ] * भगवन्नाभित कमलोत्पत्तिवर्णनम् *
४६१
स तस्मिन् सुपमेकान्ते शुभूपुहंसमव्ययम् ।
योऽहमेच विविधतनु परिश्रितो महार्णवे व्यपगतचन्द्रभास्करे ।
शनैश्चरन् प्रभुरपि हससशितोऽसून जगद्विरहितकालपर्यये ॥६॥
इतिश्रीमत्स्यपुराणे मार्कण्डेयस्यभगवत्यु क्षिप्रवेशन नाम पटपाट्यधिकशततमोऽ याय
सप्तषप्ठ्यधिकशततमोऽध्यायः
भगन्नाभितः कमलोत्पत्तिवर्णनम् ।
मत्स्य उवाच।
थापच स विभुभूत्या चारयामास वेतप । च्छादयित्वात्मनोदेह यादसाङ्करसम्भवम्
ततो महात्मातिवली मति रोस्य सनने । महता पञ्चभूतानाविश्चोविश्चमचिन्तयत्
तस्य चिन्तयमानस्य नियाते सस्थितेऽर्णये । निराकाशे तोयमये सूक्ष्मे जगति गहरे
इंपत्सझोभयामास सोऽर्णपसलिलाप्रय । पान्तरोमिमि सूक्ष्ममथचिद्रमभृत् पुरा
शब्द प्रति तदोभूती मारतन्छिन्द्रसम्भव । स र चा तामक्षोभ्योध्यवर्धत समीरण
विपद्धतापरयतायेगादिक्षोभितोऽर्णय । तस्यार्णवस्य नुस्यतस्मिनभसि मन्धिते
कृष्णवर्मा समभवत् प्रभुन्यानरो महान् ।
तत स शोपयामास पापक सहिल यह ॥७॥
क्षयानिधेछिद्रमभयद्विस्तृत नम । आत्मतेजोद्धा पुप्या पापोऽमृतरसोपमा
आपारा छिद्रसम्भून घायुगकाशसम्भय । याम्यासहपोटभूतपायय घायुसम्मयम्
दृष्ट्वा प्रीतो महादेवो महाभूतविमायन । दृष्ट्वा भूतानि भगवाहोय मृष्टार्थमुत्तमम् ।।
प्राणी जन्मसहित पम्पो चिन्तयत् । चनुरांगामिलायाने सहन्नयुगपर्यये ॥१॥
पटुजन्मपिशुद्धामाह्मणेद मिरच्यने ।
यत् पृषिच्या हिनन्द्रामा तपसा भयितात्मा ॥२॥
[अषष्ट्यधिकशततमो
४१२
मत्स्यपुराणम् *
ज्ञानं दूएन्तु विश्वाथै योगिनां याति मुख्यताम् ।
तं योगवन्तं विशाय सम्पूर्णश्वर्यमुत्तमम् ॥१३॥
पदे ब्रह्मणि विश्वेशं न्ययोजयत योगवित् । ततस्तस्मिन् महातोये महीशो हरिरव्युत.
स्वयं क्रीडंच विधिवन्मोदते सर्वलोकात् । पद्मनाभ्युद्भवं चैकं समुत्पादितवास्तदा
सहस्रपणं विरजं भास्करामं हिरण्मयम् ।
हुताशनज्वलितशिखोज्ज्वलत्प्रभमुपस्थितं शरदमलातेजसम् ।
विराजते कमलमुदारवर्चसं महात्मनस्तनुरुहवारुदर्शनम् ॥१६॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे कमलोत्पत्तिवर्णनं नाम सप्तपष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ।
अष्टपष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
ब्रह्मण उत्पत्तिवर्णनम् ।
मत्स्य उवाच।
अथ योगवतां श्रेष्ठमसृजत् भूरितेजसम् । स्टार सर्वलोकानां ब्रह्माणं सर्वतोमुखम् ॥
यस्मिन् हिरण्मये पो यहुयोजनविस्तृने । सर्वतेजोगुणमयं पार्थिवर्लक्षणैर्वृतम् ॥२॥
तच पद्म पुराणशाः पृथिवीरूपमुत्तमम् । नारायणसमुद्भूतं प्रवदन्ति महर्षयः ॥३॥
या पद्मा सा रसा देवी पृथिवी परिचक्षते । ये पद्मसारगुरवस्तादिव्यानपर्वतान् विदुः
हिमवन्तं च मेरंच लीलं निरभ्रमेव च । कैलासं मुञ्जवन्तं च तधान्यं गन्धमादनम् ।।
पुण्यं निशिसरञ्चैव कान्तं मन्दरमेव व । उदयं पितरं चैव विन्ध्यवन्तं च पर्वतम् ।।
एते देवगणानाञ्च सिद्धानाच महात्मनाम् ।
आश्रयाः पुण्यशीलानां सर्वकामफलप्रदाः ॥9
पतेपामन्तरे देशो जम्वृद्रिीप इति स्मृतः।
जम्बूद्वीपस्य संस्थानं यशिया यत्र ये क्रिया ॥८॥
ऽध्यायः] * मधुकैटभारयानवर्णनम् * एभ्यो यत् स्रवते तोयं दिव्यामृतरसोपमम् । दिव्यास्तीर्थशताधाराः सुरम्याः सरितः स्मृताः ॥६॥ स्मृतानि यानि पास्य केसराणिसमन्ततः । असंरयेया पृथिव्यास्तेविश्वेवै धातुपर्वताः यानि पद्मस्य पर्णानि भूरीणि तु नराधिप । ते दुर्गमा शैलचिताम्लेच्छदेशा विकल्पिता. यान्यधोभागपर्णानि ते निवासास्तु भागश । दैत्यानामुरगाणाञ्च पतङ्गानाञ्चपार्थिव॥ तेषां महार्णयो यत्र तद्रसेत्यभिसंज्ञितम् । महापातककर्माणो मजन्ते यत्र मानवाः ॥ पद्मस्थान्तरतो यत्तदेकार्णवगता मही। प्रोक्ताथ दिक्षु सर्वासु चत्वारः सलिलाफराः एवं नारायणस्यार्थे मही पुष्करसाभवा । प्रादुर्भावोऽप्ययं तस्मान्नाम्ना पुष्करसंशित. पतस्मात् कारणात्तने. पुराणः परमर्पिभिः । याज्ञियैर्धेददृष्टान्तैर्यज्ञे पद्मविधिः स्नृतः एवं भगवता तेन विश्वया धरया विधिः । पर्वताना नदीनाञ्च ह्रदानां चैच निर्मित. ॥ विभुस्तथैवाप्रतिमप्रभावः प्रभाकराभो धरणासितद्युतिः । शनै. स्वयम्भू शयनं सृजत्तदा जगन्मयं पद्मविधि महार्णवे ॥१८॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे ब्रह्मणोऽनन्तरं देवदानवादीनां सृष्टिवर्णनं नामा- एपष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः। उनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः मधुकैटभाख्यानवर्णनम् । मत्स्य उवाच। विघ्नस्तपसि सम्भूतो मधुर्नाम महासुर. । तेनैव च सहोद्भूतो रजसा कैटभस्ततः ।। तो रजस्तमसी विघ्नसम्भूतो तामसी गणो। एकार्णवे जगत् सर्वं क्षोभयन्तीमहावली दिव्यरक्ताम्बरधरौ श्वेतदीप्ताग्रदष्ट्रिणी। किरीटकुण्डलोदनो केयूरयलयोञ्चलो ॥३॥ महाविक्रमताम्राक्षी पीनोरस्को महाभुजौ । महागिरे सहननो जगमाविध पर्वती। नगमेघप्रतीकाशायादित्यसदृशाननी । विद्युदाभी गदाग्राभ्या कराभ्यामतिभीपणी।
४६४ [ऊनसप्तत्यधिकशततमो * मत्स्यपुराणम् * तो पादयोस्तु विन्यासादुत्क्षिपन्ताविवार्णवम् । कम्पयन्ताविव हरि शयानं मधुसूदनम् ॥६॥ तो तत्र विचरन्ती स्म पुष्करे विश्वतोमुखम् । योगिनां श्रेष्ठमासाद्य दीप्तं दद्वशतुस्तदा ॥ ७ ॥ नारायणसमाज्ञातं सृजन्तमखिलाः प्रजाः । देवतानि च विश्वानि मानसानसुरानृषीन ततस्ताबूचतुस्तत्र ब्रह्माणमसुरोत्तमो । दीप्ती मुमू'संक्रुद्धौ रोपव्याकुलितेक्षणी ॥ ॥ फस्त्वं पुष्करमध्यस्थः सितोष्णीपश्चतुर्भुजः । माधाय नियम मोहादास्ते त्वं विगतज्वरः ॥१०॥ एह्यागच्छावयोयुद्धं देहि त्वं कमलोद्भव !। आवाभ्यां परमीशाभ्यामशक्तस्त्वमिहार्णवे ॥ ११ ॥ तत्र कश्चोद्भवस्तुभ्यं केन पासि नियोजितः । कास्त्रप्टा कश्चते गोप्ता फेननानाविधीयसे ब्रह्मोवाच । एक इत्युच्यते लोकैरविचिन्त्यः सहस्त्रदृक् । तत्संयोगेन भक्तोः फर्म नामावगच्छताम् ॥ १३ ॥ मधुकैटभावूचतुः। नावयोः परमं लोके किञ्चिदस्ति महामते !! नावाभ्यां छायते विश्वंतमसारजसाथ ये रजस्तमो मयायावामृपीणामवलम्बितौ । छाद्यमानो धर्मशीली दुस्तरी सर्गदेहिनाम् आवाभ्यामुघने लोको दुष्कराभ्यां युगे युगे। आवामर्थश्च कामश्च यज्ञः स्वर्गपरिग्रहः सुपंयत्रमुदा युक्तं यत्र श्री: कीतिरेव च । येषां यत्काशितं चैव तत्तदायां विचिन्तय ब्रह्मोवाच । यताद्योगयतो दृष्ट्या योगः पूर्व मयार्जितः । तं समाधाय गुणयन् सत्वं चास्मि समाश्रितः ॥ १८॥ यः परो योगमतिमान्योगारयः सत्यमेव च । रजसम्तमप्तश्चय यः स्रष्टाविश्वसम्भवः ततो भूतानिजायन्ते सात्विकानीतराणि च । स एप हि युवा नाशे घशी देवोहनिष्यति ४६५ ऽध्यायः] * ब्रह्मणस्तपश्चर्यावर्णनम् - स्वपन्नेव ततः श्रीमान् बहुयोजनविस्तृतम् । बाहुं नारायणो ब्रह्म कृतपानात्ममायया कृप्यमाणी ततस्तस्य वाहुना बाहुशालिनः । चेरतुस्तौ विगलिती शकुनाविध पीवरी ।। ततस्ताचाहतुर्गत्वा तदा देवं सनातनम् । पद्मनाभं हृषीकेशं प्रणिपत्य स्थितावुभौ ॥२३॥ जानीवस्त्वां विश्वयोनि त्वामेकं पुरुषोत्तमम् । त्वामाचाम्पाहि हेत्वर्थमिदं नो बुद्धिकारणम् ॥ २४ ॥ अमोघदर्शनः सत्वंयतस्त्वां विद्वशाश्वतम् । ततस्त्वामागतावावामभितः प्रसमीक्षितुम् तदिच्छामोदरंदेव ! त्वत्तोऽद्भुतमरिन्दम !। अमोघदर्शनोऽसित्वं नमस्तेसमितिञ्जय!॥ श्रीभगवानुवाच । किमर्थमद्भुतं बूथ घरं सुरसत्तमा ! । दत्तायुष्को पुनर्भूयोरहो जीवितुमिच्छथ ॥२७ मधुकैटभायूचतुः। यस्मिन्न कश्चिन् मृतवान् देव ! तस्मिन् प्रभो ! घधम् । तमिच्छायो वधं चैव त्वत्तो नोऽस्तु महाव्रत!॥ २८ ॥ श्रीभगवानुवाच । चादं युवान्तु प्रथरी भविष्यत्कालसम्भये । भविष्यतो न सन्देहः सत्यमेतद्रवीमि धाम् ॥ २६ ॥ घरं प्रदायाथ महासुराभ्यां सनातनो विश्ववरः सुरोत्तमः । रजस्तमोघर्गभवायनी यमी ममन्थतावूरुतलेन वै प्रभुः ॥ ३० ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे मधुकैटभवरदानप्राप्तिवर्णनं नामोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ब्रह्मणस्तपश्चर्यावर्णनम् । मत्स्य उवाच । स्थित्या च तस्मिस्तुमुले ब्रह्माब्रह्मविदाम्वरः । ऊबाहुमहातेजास्तपो घोरं समाधित:
* मत्स्यपुराणम् * [ सप्तत्यधिकशततमो
प्रज्वलन्निव तेजोभिर्माभिः स्वाभिस्तमोनुदः । बभासेसर्वधर्मस्थासहस्रांशुरिवाशुमिः
अथान्यदूपमास्थाय शम्भुर्नारायणोऽव्ययः । आजपाम महातेजा योगावा>महायशाः
सांख्याचार्यों हि मतिमान् कपिलो ब्राह्मणो घरः।
उभावपि महात्मानी स्तुवन्ती क्षेत्रतत्परौ॥४॥
तो प्राप्तावूचतुस्तत्र ब्रह्माणममितौजसम् । परावर विशेषज्ञो पूजिती च महर्षिभिः ।।
ब्रह्मात्मढवन्धश्च विशालो जगदास्थितः । ग्रामणीः सर्वभूतानां ब्रह्मा त्रैलोक्यपूजितः
तयोस्तद्वचनं श्रुत्वा विप्रोऽभ्याहृतयोगचित् ।
त्रीनिमान् कृतवान् लोकान्यथेयं ब्रह्मणः श्रुतिः ॥७॥
पुत्रश्च सम्भवे चैकं समुत्पादितवानृषिः । तस्याने घाग्यतस्तथौ ब्रह्माणमजमव्ययम् ॥
सोत्पन्नमात्रीब्रह्माणमुक्तवान् मानसःसुतः । किं कुर्मस्तवसाहाय्यंत्रवीतुभगवानृषिः ।।
ब्रह्मोवाच ।
य एप कपिलो ब्रह्म नारायणमयस्तथा । यदते भवतस्तत्वं तत् कुरुप्य महामते ॥१०
ब्रह्मणस्तु तदर्थन्तु तदा भूयः समुत्थितः । शुश्रूपुरस्मि युवयोः किं करोमि कृताञ्जलिः
श्रीभगवानुवाच ।
यत् सत्यमक्षरं ब्रह्मन् ! अष्टादशषिधन्तु तत् । यत् सत्यं यदृतं तत्तु परं पदमनुस्मर ।।
एतद्वचोनिशम्यैव ययो स दिशमुत्तराम् । गत्वा च तत्र ब्रह्मत्वमगमत् ज्ञानतेजसा ।।
ततो ब्रह्मा भुवन्नाम द्वितीयमसृजत् प्रभुः । सङ्कल्पयित्वा मनसा तमेव च महात्मना ।
ततः सोऽथ ब्रवीद्वाक्यं किं करोमि पितामह !! पितामहसमाज्ञातोब्रह्माणं समुपस्थितः
ब्रह्माभ्यासन्तु कृतवान् भुवश्च पृथिवीं गतः ।
प्राप्तश्च परमंस्थानं स तयोः पार्श्वमागतः ॥१६॥
तस्मिन्नपि गते पुत्रे तृतीयमसृजत् प्रभुः । सांख्यप्रवृत्तिकुशलं भूर्भुवं नामतोविभुम् ॥
गोपतित्वं समासाद्य तयोरेवागमद्गतिम् । एवं पुत्रास्त्रयोऽप्येते उक्ताशम्भोर्महात्मनः
तान् गृहीत्या सुतांस्तस्य प्रयातः स्वाजिताङ्गतिम् ।
नारायणश्च भगवान् कपिलश्च यतीश्वरः ॥ १६ ॥
ऽध्यायः • नानाविघटिपर्णनम् . यहालन्ती गती मुक्ता ममा त फालमेव हि । ततो घोरतमम्भूयः संश्रितः परमं प्रतम् न रेमेऽय ततो ग्रामा प्रभुरेफम्तपश्चरन् । शरीरात्तां ततो भायां समुत्पादिनयान शुभाम् ॥ २६ ॥ तपसा तेजसा चेय पर्चसा नियमेन च । सहशीमात्मनो देवी समर्था लोफसर्जने। ततो जगाद त्रिपदाङ्गायत्री येदपूजिताम् । एजन् प्रजानां पतयः सागरांधामजनिभुः ततो जगाद निपदागायत्री पदपूजिताम् । अपराधेप चतुरोयेदान गायत्रिसम्भवान् । मात्मनः सहशान् पुत्रानमृद्ध पितामहः । विश्व प्रजानां पतयो येभ्यो लोका पिनिःएताः ॥२०॥ विश्वेशं प्रथमं तायन्महातापसमात्मजम् । सर्वमन्त्रहितं पुण्यं नामा धर्म स सृष्टवान् दक्ष मरीचिमत्रिश्च पुलस्त्यं पुलई फतुम् । पसिष्टं गौतमञ्चय भृगुमगिरसन्मनुम् ॥ अथैयादुतमित्येते शेया: पैतामहर्षयः । प्रयोदशगुणं धर्ममालभन्त महर्षयः ॥ २८ ॥ अदितिदितिदनुः फाला अनायुः सिहिफामुनिः । ताम्रामोधा मुरसायिनताकटुरेपच दशस्यापत्यमेता वै फन्या द्वादश पार्थिव ! । मरीत्रे. फश्यपः पुत्रस्तपसा निर्मित किरल तस्मै पन्या द्वादशान्या दक्षमता: प्रददौ तदा। नक्षनाणि च सोमाय तदा ये दत्तवानृषिः ॥ ३१ ॥ रोहिण्यादीनिसर्वाणिपुण्यानिरविनन्दन !। लक्ष्मीमरुचतीसाध्याविश्वेशाचमताशुभा देवी सरस्वती चैच ब्रह्मणा निर्मिता. पुराः । एता पञ्च घनिष्टा ये सुरश्रेष्ठाय पार्थिव दत्ता भद्राय धर्माय ब्रह्मणा विश्वकर्मणा । या रूपार्द्धवती पनी ब्रह्मणः कामरूपिणी ।। सुरभिः सा हिता भूत्वा ब्रह्माणं समुपस्थिता। ततस्तामगमद् ब्रह्मा मैथुनं लोकपूजितः ॥ ३५ ॥ लोकसर्जनहेतुज्ञोगवामय सत्तमः । जज्ञिरे च सुतास्तस्यां विपुला धूमसन्निभाः ॥ नकसन्ध्याम्रसङ्काशाः प्रादहस्तिग्मतेजसः । ते रुदन्तो द्रवन्तश्च गर्हयन्त पितामहम् ।। रोदनाचणाश्चैव रद्रा इति ततः स्मृताः । नि तिश्चैव शम्भुर्वं तृतीयश्चापराजितः । मृगव्याधः कपी च दहनोऽथ परश्च यै ।अहिर्बुध्न्यश्च भगवान् कपालीचापिपिङ्गलः ।
॥ * मत्स्यपुराणम् * [सप्तत्यधिकशततमो सेनानीश्च महातेजा द्रास्त्वेकादश स्मृताः । तस्यामेव सुरम्याच गावो यज्ञेश्वराश्चवै प्रकृष्टाश्च तथा मायाः सुरभ्याः पशवोऽक्षराः । अजाश्चैव तु हंसाश्च तथैवामृतमुत्तमम् ओषध्य प्रवरायाश्च सुरभ्यास्ताः समुत्थिताः । धर्मालश्मोस्तथा कामं साध्या साध्यान् व्यजायत ॥४२॥ भवञ्च प्रभवञ्चवहोशञ्चासुरहं तथा । अरुण्यं चारुणिञ्चैव विश्वावसुयलध्रुवौ ॥४३॥ हविष्यञ्च चितानञ्च विधानशमितावपि । वत्सरञ्चैच भूतिञ्च सर्वासुरनिपूदनम् ॥४४॥ सुपर्वाण वृहत्कान्ति साध्या लोकनमस्कृता । तमेवानुगता देवो जनयामास वै सुरान् वरं वै प्रथमन्देव द्वितीयं ध्रुवमव्ययम् । विश्वावसुं तृतीयञ्च चतुर्थ सोममीश्वरम् ॥ ततोऽनुरूपमायश्च यमस्तस्मादनन्तरम् । सप्तमञ्च तथा घायुमष्टमन्निति घसुम् धर्मस्यापत्यमेतद्वै सुदेव्या समजायत । विश्वेदेवाश्च विश्वाया धर्माजाता इति श्रुतिः दक्षश्चैव महावाहु पुष्करस्वन एव च । चाक्षुषस्तु मनुश्चैव तथा मधुमहोरगी ॥४॥ विश्वन्तश्च वसुल्ला विस्कम्भश्चमहायशाः । गरुडश्चातिसत्वोजा भास्करप्रतिमद्युति. विश्वान् देवान् देवमाता विश्वेशाजनयत् सुतान् । मरत्वत्ती मरवतो देवानजनयत् सुतान् ॥५१ ॥ अग्नि चश्रविज्योति सावित्रं मित्रमेव च । अमरं शरवृष्टिश्च सुकर्पञ्च महाभुजम् ॥ विराजञ्चैव पाचश्च विश्वावसुमतिं तथा । अश्वमित्रं चित्ररश्मिन्तथानिषधन नृप! ॥ हयन्तं पाडवञ्चैव चारितं मन्दपन्नगम् । वृहन्त चै वृहदूपं तथा चै पूतनानुगम् ॥५४॥ मरुत्वती पुरा जज्ञे एतान्वै मस्ताङ्गणान् । अदितिः कश्यपाजशे आदित्यान् द्वादशैव हि ॥ ५५॥ इन्द्रो विष्णुर्भगस्त्वष्टा घरणो धर्यमा रचिः । पूषा मित्रश्च धनदो धाता पर्जन्य एव च इत्येते द्वादशादित्या धरिष्ठास्त्रिदिवौकस । आदित्यस्य सरस्वत्यांजज्ञातेती सुतीवरी तप श्रेष्ठी गुपिषश्रेष्ठी त्रिदिवस्यापिसम्मती । दनुस्तु दानपान जज्ञे दितित्यानव्यजायत फाला तु वैकालफेयानसुरान् राक्षसांस्तु वे । अनायुपायास्तनया व्याधय सुमहायलाः सिंहिका प्रहमातावै गन्धर्वजननीमुनिः । ताम्रा त्वप्सरसां माता पुण्यानांमारतोय!
ऽध्यायः] * विष्णो.प्रादुर्भाववर्णनम् * शोधायाः सर्वभूतानि पिशाचाश्चैव पार्थिव !। जझे यक्षगणांश्चैव राक्षसांश्च विशाम्पते ! ॥ ६१ ॥ चतुष्पदानि सत्वानि तथा गावस्तुसौरसाः । सुपर्णान् पक्षिणश्चैवविनताचाप्यजायत महीधरान् सर्वनागान् देवी कर्पजायत । एवं वृद्धि समगमन् विश्वे लोकाःपरन्तप! तदा वै पौष्प्ररो राजन् ! प्रादुर्भाचोमहात्मनः । प्रादुर्भावः पोकरस्तेमयाद्वैपायनेरितः पुराण पुरुषश्चैव मया विष्णुहरिः प्रभुः । कथितस्तेऽनुपूर्वेण संस्तुतः परमर्षिभिः ।। यश्चेदमयं शृणुयात् पुराणं सदा नरः पर्वसु गौरवण । अवाप्य लोकान् स हि वीतरागः परत्र च स्वर्गफलानि भुङ्क्ते ॥६६॥ चक्षुपा मनसा चाचा कर्मणाच चतुर्विधम् । प्रसादयतियः कृष्णं तंकप्णोऽनुप्रसीदति राजा च लभते राज्यमधनश्चोत्तमन्धनम् । क्षीणायुलभते चायुः पुत्रकामः सुतन्तथा यज्ञा वेदास्तथा कामास्तपांसि विविधानि च । प्राप्नोति विविधं पुण्यं विष्णुभको धनानि च ॥ ६ ॥ यद्यत् कामयते किञ्चित् तत्तल्लोकेश्वरादयेत् । स विहाय य इमं पठेत्पीकरकं हरे प्रादुर्भावं नृपश्रेष्ठ! न तस्य ह्य शुभं भवेत् । एप पौष्करको नाम प्रादुर्भायो महात्मनः कीर्तितस्ते महाभाग ! व्यासधुतिनिदर्शनात् ॥ ७१ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे पौष्करप्रादुर्भाववर्णनं नाम सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः । एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः विष्णोःप्रादुर्भाववर्णनम् । मत्स्य उवाच। विष्णुत्वं शृणु विष्पोश्च हरित्यञ्च ने युगे । वैकुण्ठत्वञ्च देवेषु कृष्णत्वं मानुषेषुच ईश्वरस्य हितस्यैपा, कर्मणांगहनागतिः। संप्रत्यतीतान् भव्यांश्चरणुराजन्! यथातथम्
[एकसप्तत्यधिकशततमो
५००
* मत्स्यपुराणम् *
अव्यक्तो व्यक्तलिङ्गस्थो यएपभगवान् प्रभुः । नारायणोहनन्तात्मा प्रभवोऽव्ययएवव
एप नारायणो भूत्वा हरिरासीत् सनातनः । ब्रह्मावायुश्चलोमश्च धर्म शक्रोवृहस्पतिः
अदितेरपि पुत्रत्वं समेत्य रविनन्दन! । एप विष्णुरितिख्यात इन्द्रस्यावरजो विभुः ॥
प्रसादजं ह्यस्य विभोरदित्याः पुत्रकारणम् । वधार्थं सुरशत्रूणां दैत्यदानवरक्षसाम् ॥
प्रधानात्मा पुरा ह्येप ब्रह्माणमसृजत् प्रभुः । सोऽसृजन् पूर्वपुरपः पुराकल्पेप्रजापतीन्
असृजन्मानवास्तत्र ब्रहावंशाननुत्तमान् । तेभ्योऽभवन्महात्मभ्यो बहुधाब्रह्म शाश्वतम्
पतदाश्चर्यभूतस्य विष्णोः कर्मानुकीर्तनम् ।
कीर्तनीयस्य लोकेषु कीर्त्यमानं निबोध मे ॥ ६ ॥
वृत्ते वृत्रय तत्र वर्तमाने कृते युगे । आसीत्रैलोक्यविख्यातः संग्रामस्तारकामयः ॥
यत्र ते दानवा घोरा सर्वे संग्रामदुर्जयाः । मन्तिदेवगणान् सर्वान् सयक्षोरगराक्षसान्
ते घध्यमाना विमुखा क्षीणप्रहरणा रणे । त्रातारं मनसा जग्मुर्देवं नारायणं प्रभुः
एतस्मिन्नन्तरे मेधा निर्वाणाङ्गारवर्चसः । सार्कचन्द्रग्रहगणंच्छादयन्तो नभस्तलम् ॥
वेणुर्विद्युद्गणोपेता घोरनिहादकारिणः । अन्योन्यवेगाभिहताः प्रधः सप्त मारताः ॥
दीप्ततोयाशनिधनैर्वज्रवेगानलानिलः । रवैः सुघोरैस्त्पातैर्दह्यमानमिवाम्वरम् ॥ १५ ॥
तत उल्कासहस्राणि निपेतुः खगतान्यपि ।
दिव्यानि च विमानानि प्रपतन्त्युत्पतन्ति च ॥ १६ ॥
चतुर्युगान्ते पर्याये लोकाना यद्वयं भवेत् । अरूपयन्ति रूपाणि (तस्मिन्नुत्पातलक्षणे ॥
जातच निष्प्रभ सर्व न प्राशायत किञ्चन । तिमिरीघपरिक्षिप्ता न रंजुश्च दिशोदश ।।
वियेश रूपिणी काली कालमेघावगुण्टिता । द्यौर्नभात्यभिभूता| घोरेण तमसा वृता
तान घोंघान् सतिमिरान् दोभ्यामाक्षिप्य स प्रभुः
यपुः स्वन्दर्शयामास दिव्यं कृष्णवपुर्हरिः ॥ २० ॥
यलाहकाअनमिम यलाहफ्तनूरहम् । तेजसा चपुपा चैध कृष्णं कृष्णमिवाचलम् ॥२१॥
दीप्तापीताम्बरधरं तप्तकाञ्चनभूपणम् । धृमान्धकारयपुष युगान्ताग्निमिपोधितम् ॥२२
चतुर्द्विगुणपानांसकिरीटच्छन्नमृजम् । यमौ चामीरपरयैरायुधरुपशोभितम् ॥ २३ ॥
ऽध्यायः] * विष्णोःप्रादुर्भाववर्णनम् - चन्द्रार्ककिरणोद्योतं गिरिकटमिवोच्छ्रितम् । नन्दकानन्दितकरं शराशीविषधारिणम्।। शक्तिचित्रफलोदप्रशङ्खचक्रगदाधरम् । विष्णुशैलं क्षमामूलं श्रीवृक्षं शाईधन्विनम् ॥ त्रिदशोदारफलदं स्वर्गस्त्रीचारुपल्लवम् । सर्वलोकमनः कान्तं सर्वसत्वमनोहरम् ॥२६ नानाविमानविटपन्तोयदाम्युमधुस्रवम् । विद्याहङ्कारसारायं महाभूतप्ररोहणम् ॥ २७ ॥ विशेपपत्रेनिचितं ग्रहनक्षत्रपुष्पितम् । दैत्यलोकमहास्कन्धं मर्त्यलोके प्रकाशितम् ।२८ सागराकारनिर्हादं रसातलमहाश्रयम् । मृगेन्द्रपार्शविततं पक्षजन्तुनिषेवितम् ॥ २६ ॥ शीलार्थचारुगन्धाढ्य सर्वलोकमहाद्रुमम् । अव्यक्तानन्तसलिलं व्यक्ताहङ्कारफेनिलम् ।। महाभूततरङ्गोघं ग्रहनक्षत्रबुवुदम् । विमानगरुतव्यातं तोयदाडम्यराकुलम् ॥ ३१ ॥ जन्तुमत्सजनाकोणं शैलशरफुलप्तम् । त्रैगुण्य विषयायतं सर्वलोकतिमिड्गिलम् ॥३२ पीरवृक्षलतागुल्मं भुजगोत्कृष्टशेषलम् । द्वादशार्कमहाद्वीपं रुदैकादशपत्तनम् ॥ ३३ ॥ घस्यष्टपर्वतोपेतं त्रैलोक्याम्भोमहोदधिम् । सन्ध्यासक्योर्मिसलिलं सुपर्णानिलसेवितम् ॥ ३४ ॥ देत्यरक्षोगणग्राहं यक्षोरगझपाकुलम् । पितामहमहावीर्य सर्वत्रीरत्नशोभितम् ॥३५॥ श्रीकीर्तिकान्तिलक्ष्मीभिर्नदीभिरुपशोभितम् | कालयोगिमहापर्वप्रलयोत्पत्तियेगिनम् तन्तु योगमहापार नारायणमहार्णवम् । देवाधिदेवं घरदं भक्तानां भक्तिवत्सलम् ॥३७ अनुग्रहकरं देवं प्रशान्तिकरणं शुभम् । हर्यश्वरथसंयुक्त सुपर्णध्वजसेविते ॥ ३८ ॥ ग्रहचन्द्रार्करचिते मन्दराक्षवरावृते । अनन्तरश्मिभिर्युक्ते विस्तीर्णे मेरुगहरे ॥ ३९ ॥ तारकावित्रकुसुमे ग्रहनक्षत्रवन्धुरे । भयेप्यभयदं व्योन्नि देवा दैत्यपराजिताः ॥ ४० ॥ ददृशुस्तेस्थितं देवं दिव्ये लोकमये रथे । ते कृताञ्जलयः सर्वे देवाः शक्रपुरोगमाः॥४१॥ जयशब्दं पुरस्कृत्य शरण्यं शरणङ्गताः । स तेषां तागिरं श्रुत्वा विष्णुर्दैघतदैवतम् ॥ मनश्चक्रे विनाशाय दानवानां महामृधे । आकाशे तु स्थितो विष्णुरुत्तमं घपुरास्थितः उवाच देवताः सर्वाः सप्रतिज्ञमिदं वचः। शान्ति व्रजत भई यो मा भैष्ट मस्ताङ्गणाः जिता मे दानवाः सर्वे त्रैलोक्यं परिगृह्यताम् । ते तस्य सत्यसन्धस्य विष्णोर्चाक्येन तोपिताः ॥ ४५ ॥ - ५०२ * मत्स्यपुराणम् * [द्विसप्तत्यधिकशततमो देवाः प्रीति समाजग्मुः प्राश्यामृतमनुत्तमम् । ततस्तमः संहृतं तद्विनेशुश्च बलाहकाः ॥ प्रववुश्च शिचा पाता प्रशान्ताश्च दिशो दश । शुद्धप्रभाणि ज्योतीपि सोमञ्चक्रुः प्रदक्षिणम् ॥४७॥ न विग्रहं ग्रहाश्चक्रुः प्रशान्ताश्चापि सिन्धयः । विरजस्का भवन्मार्गा नाकवर्गादयस्त्रयः यथार्थमृहुः सरितो नापिचुक्षुभिरेऽर्णवाः । आसंश्छुभानीन्द्रियाणि नराणामन्तरात्मसु महर्पयो धीतशोका वेदानुचैरधीयत । यज्ञेषु च हविः पाकं शिवमाप च पावक ॥५०॥ प्रकृत्तधर्माः संवृत्ता लोका मुदितमानसाः। विष्णोर्दत्तप्रतिज्ञस्य श्रुत्वारिनिधने गिरम् इति श्रीमत्स्यपुराणे विष्णोःप्रादुर्भाववर्णनं नामैकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः । , द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः दैत्यसैन्यविस्तारवर्णनम् । मत्स्य उवाचा ततो भयं विष्णुधवः श्रुत्वा दैत्याश्च दानवाः । उद्योगविपुलं चक्रुयुद्धाय विजयाय च मयस्तु काञ्चनमयं त्रिनल्वायतमक्षयम् । चतुश्चकं सुविपुलं सुकल्पितमहायुगम् ॥२॥ किङ्किणीजालनिर्घोष द्वीपिचर्मपरिष्कृतम् । रुचिरं रत्नजालैश्च हेमजालेश्च शोभितम् ॥ ईहामृगगणाकीर्णं पक्षिपतिविराजितम् । दिव्यास्त्रतूणीरधरं पयोधरविनादितम्॥४॥ स्वक्षं रथवरोदारं सूपस्थ गगनोपमम् । गदापरिघसपूर्ण मूर्तिमन्तमिवार्णवम् ॥५॥ हेमकेयूरवलयं स्वर्णमण्डलकूवरम् । सपताकध्वजोपेतं सादित्यमिव मन्दरम् ॥ ६ ॥ गजेन्द्राभोगवपुष क्वचित् केसरिवर्चसम् । युक्तमृक्षसहस्रेण समृद्धाम्वुदनादितम् ॥७॥ दीप्तमाकाशगं दिव्यं रथं पररथारुजम् । अध्यतिष्टद्रणाकाक्षी मेरुं दीप्तमिवांशुमान् ॥ तारमुत्क्रोशविस्तारं सर्व हेममयं रथम् । शैलाकारमसम्बाधं नीलाञ्जनचयोपमम् ॥६॥ कार्णायसमयं दिव्यं लोहेपायद्धकृवरम् । तिमिरोद्गारिकिरणं गर्जन्तमिव तोयदम् ॥
ऽध्यायः] * दैत्यसैत्यविस्तारवर्णनम् * ५०३ लोहजालेन महता सगवाक्षेण दंशितम् । आयसः परिघ. पूर्ण क्षेपणीयश्च मुद्गरैः ॥११॥ प्रास. पाशश्च विततर्नरसंयुक्तकण्टकः । शोमितं त्रासयानैश्च तोमरश्च परश्वधैः ॥१२॥ उद्यन्तं द्विषतां हेतोद्वितीयमिव मन्दरम् । युक्तं सरसहस्त्रेण सोऽध्यारोहद्रथोत्तमम् विरोचनस्तु संक्रुद्धो गदापाणिरवस्थितः । प्रमुखे तस्य सैन्यम्य दीलग्रह इवाचलः ॥ युक्तं रथसहस्त्रेण हयग्रीवस्तु दानवः । स्यन्दनं पायामास सपत्नानीकमर्दन ॥ १५ ॥ व्यायतं किप्कुसाहस्रं धनुर्यिस्फारयन्महत् । धाराहः प्रमुसे तस्थौ सप्ररोह इपावलः ।। सरस्तु विक्षरन्दान्नेत्राभ्यां रोपजं जलम् । स्फुरदन्तोष्टनयनं संग्राम सोऽभ्यकामत त्यष्टा त्यष्टगजं घोरं यानमास्थाय दानवः । न्यूहितुं दानवव्यूई परिचक्राम वीर्यवान् । विप्रचित्तियपुश्चैव श्वेतकुण्डलभूपणः । श्वेतः श्वेतप्रतीकाशो युद्धायाभिमुसे स्थितः अरिष्टोबलिपुत्रश्च परिष्ठाद्रिशिलायुधः । युद्धायाभिमुयस्तस्थौ धराधरविकम्पनः १२० किशोरस्त्वमिसात् किशोर इति चोदितः । सबला दानवाश्चैव सन्नान्ते यथाक्रमम् अभवदैत्यसैन्यस्य मध्ये रविरिवोदितः । लम्बस्तु नवमेधाभः प्रलम्बाम्बरभूपणः ॥२२ दैत्यव्यूहगतो भाति सनीहार इवांशुमान् । स्वर्भानुरास्ययोधी तु दशनीप्टेक्षणायुधः ।। हसंस्तिष्ठति देत्यानां प्रमुखे स महाग्रहः । अन्ये हयगतास्तत्र गजस्कन्धगताः परे ॥२४ सिंहव्याघ्रगताश्चान्ये घराहरूपु चापरे । केचित् परोट्रयातारः केविच्छ्चापदवाहनाः ।। पतिनस्त्यपरे दैत्या भीपणा विकृताननाः । एकपादाभ्रपादाश्च ननृतुयुद्धकाक्षिणः॥ आस्फोटयन्तो यहवः स्वेडन्तश्च तथापरे । दृष्टशार्दूलनि?षा नेदुर्दानधपुङ्गवाः ॥२७॥ ते गदापरिघेरनैः शिलामुसलपाणयः । याहुभिः परिघाकारस्तर्जयन्तिस्म देवताः ॥२८ पार्टी प्रासश्च परिघेस्तोमराङ्कुशपट्टिशैः । चिक्रीडुस्ते शतनीभिः शतधारैश्च मुद्गरैः ॥ गण्डशैलेश्च शैलैश्च परिघश्चोत्तमायसः । चक्रेश्च दैत्यप्रयराश्चरानन्दितं बलम् ॥३०॥ एतद्दानवसैन्यं तत्सर्व युद्धमदोत्कटम् । देवानभिमुखे तस्थौ मेघानीकमिवोद्धतम् ॥ तद्भुतं दैत्यसहस्रगाढ़ पाय्यग्निशैलाम्युदतोयकल्पम् । बलं रणोधाभ्युदयेऽभ्युदीणं युयुत्सयोन्मत्तमिवायमासे ॥३२॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे देत्यसैन्यविस्तारवर्णनं नाम द्विसप्तत्यधिकशतमोऽध्यायः ।
त्रिसतत्यधिकशततमोऽध्यायः सुरसन्यविस्तारवर्णनम् । मत्स्य उवाच। श्रुतस्ते दैत्यसैन्यस्य विस्तरो रविनन्दन | सुराणामपि सैन्यस्य विस्तर वैष्णव शृणु आदित्या घसवोरद्रा अश्विनीचमहावली । सरला सानुगाश्चैव सत्रहन्त यथाक्रमम् पुरुहूतस्तु पुरतो लोकपाला सहप्रदूक । ग्रामणी सर्वदेवानामारुरोह सुरद्विपम ॥३॥ मध्ये चास्य रथ सर्वपक्षिप्रवररहस । सुचारुचक्रवरणो हेमवज्रपरिष्टत ॥४॥ देवगन्धर्वयक्षोधैरनुयात सहस्रश । दीप्तिमद्धि सदस्यैश्च ब्रह्मर्षिभिरभिष्टत ॥५॥ चनविस्फूर्जितोद्भूतैर्विद्यदिन्द्रायुधोद्रित । युको बलाहकगणे पतिरिय कामगै ॥ यमारूढ स भगवान् पर्येति सकल जगत् । हविर्धानेपु गायन्ति विप्रा मखमुखे स्थिता ॥७॥ स्वर्ग शकानुयातेषु देवतूर्यनिनादिषु । सुन्दर्य परिनृत्यन्ति शतशोऽप्सरसाङ्गणे ॥८॥ केनुना नागराजेन राजमानो यथा रवि । युक्तो हयसहस्त्रेण मतो मारुतरहसा ॥६॥ सस्यन्दनवरोभाति गुप्तोमातलिना तदा । कृत्सम परिवृतो मेरुर्भास्करस्येव तेजसा । यमस्तु दण्डमुद्यम्य कालयुक्तश्च मुद्गरम् । तस्थौ सुरगणानीके दैत्यान्नादेन भीषयन् ॥ चतुर्मि सागरैर्यक्तो लेलिहानश्च पनगै । शङ्खमुक्ताङ्गदधरो विभ्रत्तोयमय वपु ॥१२॥ कालपाशान् समाविध्यन् हयै शशिकरोपमै । वाय्वीरितैर्जलाकार कुर्वन् लीला सहस्रश ॥१३॥ पाण्डुरोद्यूतवसन प्रवलन् रुचिराङ्गद । मणिश्यामोत्तमवपुर्हरिभारार्पितोघर ॥१४॥ । घरुण पाशधृड्मध्ये देवानीकस्य तस्थिवान् । युद्धवेलामभिलपन भिन्नवेल इवार्णव ॥ यक्षराक्षससैन्येन गुह्यकाना गणैरपि । युक्तश्च शङ्खपद्माभ्या निधीनामधिप प्रभु ॥ -- ऽध्यायः] * सुरसंन्यविस्तारवर्णनम् * राजराजेश्वरः श्रीमान् गदापाणिरदृश्यत । विमानयोधी धनदो विमाने पुप्पके स्थितः स राजराजः शुशुमे युद्धार्थी नरवाहनः । उक्षाणमास्थितः संख्ये साक्षादिव शिवः स्वयम् ॥१८॥ पूर्वपक्षः सहस्राक्षः पितृराजस्तु दक्षिण । वरुण. पश्चिमं पक्षमुत्तरं नरवाहनः ॥१६॥ चतुर्पुयुक्ताश्चत्वारो लोकपाला महावला । स्वासु दिक्षुस्वरक्षन्त तस्य देवयलस्य ते सूर्यः सप्ताश्वयुक्तेन रथेनामितगामिना । श्रिया जाञ्चल्यमानेन दीप्यमानश्च रश्मिभिः उद्यास्तगचरण मेस्पर्वतगामिना । त्रिदिवद्वारचक्रेण तपता लोकमव्ययम् ॥२२॥ सहस्त्ररश्मियुक्तेन भ्राजमानेन तेजसा । चवार मध्ये लोकानां द्वादशात्मा दिनेश्वरः ॥ सोम. श्वेतहये भाति स्यन्दने शीतरश्मिवान् । हिमवत्तीयपूर्णाभिर्भाभिराहादयजगत् ॥२४॥ तमृक्षपूगानुगतं शिशिरांशु द्विजेश्वरम् । शशछायाङ्कितत नैशल्य तमस क्षयम् ।। ज्योतिषामीश्वरं व्योनि रसानां रसदं प्रभुम् । ओषधीनां सहस्राणांनिधानममृतस्यत्र जगत प्रथमं भागं सौम्यं सत्यमयं रथम् । ददृशुर्दानवाः सोमं हिमाहरणं स्थितम् ॥ यः प्राणः सर्वभूताना पञ्चधा मिद्यते नृषु । सप्तधातुगतो लोकां स्त्रीन्दधार चचार च ॥२८॥ यमाटरग्निकर्तारं सर्वप्रभवमीश्वरम् । सप्तस्वरगतोयश्च निन्यङ्गीमिन्दीर्यते ॥ २६ ॥ यं पदन्त्युत्तमं भूनं यं वदन्त्यशरीरिणम् । यमाहुराकाशगमं शीघ्रगंशब्दयोगिनम्॥३०॥ सघायु सनभूतायुरुदभूत स्वेन तेजसा । पर्याप्रन्यथयन् दैत्यान् प्रतिलोमंसतोयदः मरतो दिव्यगन्धर्वविद्याधरगणः सह । विक्रीडुरसिभिः शुभ्रनिर्मक्तरियपनगः ॥२२॥ सृजन्त सर्पपतयस्तोवतोयमयं विषम् । शामना दिवीन्द्राणाश्चात्तानना दिवि ॥ पर्यतेध शिलारहः शतशश्चैव पादपैः । उपतम्थुः सुरगणाः प्रहत दानवे चले ॥३४॥ यः सदेयोहपोफेशः पमनाभरिन विफमः । युगान्ते कृष्णवर्णामो विश्यम्यजगत प्रभुः ॥ सर्वयोनिः स मधुदा हव्यभुक् मानुमंम्पितः । भम्पपोव्योमभूतात्मा श्यामः शान्तिफरोऽरिहा main * मत्स्यपुराणम् * [चतु सप्तत्यधिकशततमो अग्निममरादीनाञ्चक गृह्य गदाधरः । अर्क नगादियोद्यन्तमुद्यम्योत्तमतेजसा ॥३॥ सव्येनालम्व्य महती सर्वासुरविनाशिनीम् । करेण काली धपुपा शनुकालप्रदागदाम् अन्य जै प्रदीप्ताभैर्भुजगारि धज प्रभु । दधारायुधजातानि शादीनि महावल ॥ सकश्यपस्यात्मभुव द्विज भुजगभोजनम् । पचनाधिकसम्पातं गगनक्षोभण खगम् ॥ भुजगेन्द्रेण घदने निविष्टेन विराजितम् । अमृतारम्भनिर्मुक्त मन्दरादिमियोच्छ्रितम् ॥४१॥ देवासुरविमर्देषु बहुशोदृढविक्रमम् । महेन्द्रणामृतस्यार्थे पत्रेण कृतलक्षणम् ॥४२॥ शिखिन बरिनञ्चैव तप्तकुण्डलभूपणम् । विचित्रपत्रवसनन्धातुमन्तमिवाचलम् ॥४३॥ स्फीतकोडावलम्येन शीताशुसमतेजसा । भोगिभोगावसिक्तेन मणिरत्नेन भास्वता ॥ पक्षाभ्याञ्चारुपनाभ्यामावृत्यदिविलीलया। युगान्तेसेन्द्रचापाभ्यान्तोयदाभ्यामिवाम्वरम् नीललोहितपीतामि पताकाभिरलतम् । केतुधेपप्रतिच्छन्न महाकायनिकेतनम् ॥४६॥ अरुणावरज श्रीमानारह्य समरे विभु । सुवर्णस्वर्णवपुपा सुपर्ण खेचरोत्तमम् ॥४७॥ तमन्वयुर्देवगणा मुनयश्च समाहिता । गीभि परममन्त्राभिस्तुष्टुपुश्च जनार्दनम् ॥४८ तद्वैश्रवणसश्लिष्ट वैवस्वतपुर सरम् । द्विजराजपतिक्षिप्त देवराजविराजितम् ॥४६॥ चन्द्रप्रभाभिर्विपुल युद्धाय समवर्तत । स्वस्त्यस्तु देवेभ्य इति वृहस्पतिरभापत । स्वस्त्यस्तु दानवानीके उशना वाक्यमाददे ॥ ५० ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे सुरसैन्यविस्तारवर्णन नाम त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय । चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः देवासुरसंग्रामवर्णनम् । मत्स्य उवाच। ताभ्या वराभ्या सजज्ञे तुमुलोविग्रहस्तदा । सुराणामसुराणाञ्च परस्परजयैषिणाम् ॥
- । ऽध्यायः] * देवासुरसंग्रामवर्णनम् * ५०७ दानवा देवतः साद्धं नानाप्रहरणोद्यताः । समीयुयुध्यमाना वै पर्वता इच पर्वतैः॥२॥ तत् सुरासुरसंयुक्त युद्धमत्यद्भुतं वभो । धर्माधर्मसमायुक्तं दर्पण विनयेन च ॥ ३ ॥ ततोरथैप्रियुक्तैर्वारणैश्च प्रचोदितः । उत्पतद्विश्च गगनमसिहस्तैः समन्ततः ॥ ४॥ क्षिप्यमाणैश्च मुसलैः सम्पतद्भिश्च सायकैः । चापैविस्फार्यमाणेश्च पात्यमानश्च मुद्गरैः तयुद्धमभवधोरं देवदानवसड्डलम् । जगतस्त्रासजननं युगसंवर्तकोपमम् ॥ ६ ॥ हस्तमुक्तश्च परिधैप्रियुक्तश्च पर्वतैः । दानवाः समरे जन्नुर्देधानिन्द्रपुरोगमान् ॥ ७ ॥ ते वध्यमाना वलिभिर्दानवर्जयकाशिमिः । विषण्णवदना देवा जग्मुराति परामधे॥८॥ तेऽस्त्रशूलप्रमथिताः परिभिन्नमस्तकाः । मिन्नोरस्का दितिसुतैःमृरक्तं प्रणेहु ॥६॥ वेष्टिताः शरजालश्च निर्यताश्चासुरै रताः। प्रविष्टा दानवी मायान्न शेकुस्ते विचेष्टितुम् ॥ १० ॥ अस्त गतमिवाभाति निष्प्राणसदृशाकृति । वलं सुराणामसुरैनिष्प्रयत्नायुधं कृतम् ॥११ दैत्यचापच्युतान् घोरांण्डित्या पत्रेण तांग्छरान् । शको दैत्ययलं घोरं विवेश बहलोवनः ॥ १२ ॥ स दैत्यप्रमुपान् हत्वा तद्दानवबलं महन् । तामसेनास्त्रजालेन तमोभूतमयाकरीत्॥१३ तेऽन्योन्यं नावयुध्यन्त देवाना चाहनानि च । घोरेण तमसाविष्टाः पुरहतस्य तेजसा। मायापाशैचिमुक्तास्तु यतवन्तः सुरोत्तमाः । पूपि दैत्यसिंहानान्तमोभूतान्यपातयन्।। अपध्यस्ता विसंशाच तमसा नीलपर्चसा । पेतुस्ते दानवगणाश्छिन्नपक्षा इवादयः ।। तधनीभूतदैत्येन्द्रमन्धकार इघार्णवे । दानवन्देवक्दनन्तमाभूतमियाभवत् ॥ १७ ॥ तदाएजन्महामायां मयस्ता तामसीन्दहन् । युगान्तोद्योतजननी सृष्टामार्वेण घहिना॥ सा ददाह तत' सर्वान् मायामयविकल्पिता । दैत्याधादित्यवपुषः सद्य उत्तस्थुराइये। मायामाची समासाद्य दधमाना दिवौकसः । भेजिरे चेन्द्रविषयं शीतांशु सलिलप्रदम्॥ दद्यमाना घोण घहिना नएचेतसः। शशंसुर्यनिणं देवाः सन्तताः शरणषिणः ॥ सन्तो मायया सैन्ये हन्यमाने च दानवः । चोदितो देवराजेन घरणो घायमापीत् ।। आपों प्रातपितः शमः! तपस्तेपे सुदारुणम् ।
* मत्स्यपुराणम् * [चतु:सप्तत्यधिकशततमो और्वः स पूर्वतेजस्वी सदृशो ब्रह्मणो गुणः॥ २३ ॥ तं तपन्तमिवादित्यं तपसा जगदव्ययम् । उपतस्थुर्मुनिगणा दिव्या देवर्षिभिः सहः ॥ हिरण्यकशिपुञ्चैव दानवो दानवेश्वरः । ऋषि विज्ञापयामासुः पुरा परमतेजसम् ॥२५॥ ऊचुह्मार्पयस्तं तु पवनं धर्मसंहितम् । ऋषिवशेषु भगवंश्छिन्नमूलमिदं पदम् ॥ २६ ॥ एकस्त्वमनपत्यश्च गोत्रायान्यो न घर्तते । कौमारं व्रतमास्थाय हशमेवानुवर्तसे ॥ बहूनि विप्र! गोत्राणि मुनीनां भाषितात्मनाम् । एकदेहानि तिष्ठन्ति विविक्तानि विना प्रजाः ॥ २८ ॥ एवमुच्छिन्नमूलैश्च पुत्रों नास्ति कारणम् भवांस्तु तपसा श्रेष्ठो प्रजापतिसमद्युति ।। तत्र वर्तस्व वंशाय बर्द्धयात्मानमात्मनो । त्वया धर्मोऽर्जितस्तेन द्वितीयाङ्कुरु वै तनुम् स एवमुक्तो मुनिभिह्यो?मर्मसु ताडित'। जगहें तान् ऋषिगणान् वचनं चेदमप्रवीत् यथायं विहितो धर्मों मुनीनां शाश्वतस्तु स । आर्य वै सेवत.कर्म वन्यमूलफलाशिनः ब्रह्मयोनौ प्रसूनस्य ब्राह्मणस्यात्मदर्शिनः । ब्रह्मचर्य सुवरितं ब्रह्माणमपि चालयेत् ॥ जनानां वृत्तयस्तिस्रो यद् गृहाश्रमवासिनाम् । अस्माकन्तु घरं वृत्तिर्वनाश्रमनिवासिनाम् ॥ ३४ ॥ अब्भक्षा वायुभक्षाश्च दन्तोलूख लिनस्तथा । अश्मकुट्टा दश तथा पञ्चातपसहाश्च ये ॥ एते तपसि तिष्ठन्ति व्रतैरपि सुदुष्करैः । ब्रह्मवर्य पुरस्कृत्य प्रार्थयन्ति पराङ्गतिम् ॥३६ ब्रह्मचर्याद् ब्राह्मणस्य ब्राह्मणत्व विधीयते । एवमाहुः परे लोके ब्रह्मचर्यविदोजनाः ।। ब्रह्मचर्य स्थितं धैयं ब्रह्मचर्ये स्थितं तप । ये स्थिता ब्रह्मवर्येषु ब्राह्मणा दिघि संस्थिता ॥ ३८ ॥ नास्ति योग विना सिद्धिर्न वा सिद्धि विना यशः। नास्ति लोके यशो मूल ब्रह्मवर्यात् परन्तपः ॥ ३६॥ यो निगृह्येन्द्रियप्रामं भूतग्रामं च पञ्चकम् । ब्रह्मचर्य समाधत्ते किमतः परमं तपः ॥४० अयोगे केशधरणमसङ्कल्पव्रतक्रिया । अब्रह्मचर्ये चर्या च त्रयं स्याद् दम्भसंज्ञकम् ॥४१ कदाराः च संयोगः कच भावविपर्ययः । नन्वियं ब्रह्मणा सृष्टा मनसा मानसी प्रजा ऽध्यायः] * और्वनिर्मितमायावर्णनम् * ५०६ यद्यस्ति तपसो वीर्य युष्माकं विदितात्मनाम् । सृजध्वं मानसान पुत्रान् प्राजापत्येन कर्मणा ॥ ४३ ॥ मनसा निर्मिता योनिराधातव्या तपस्विभिः । न दारयोगो वीज वा व्रतमुक्तं तपस्विनाम् ॥ ४४ ॥ यदिदं लुतधर्मार्थ युप्माभिरिह निर्भय । व्याहृतं सद्भिरत्यर्थमसद्धिरिच मे मतम् पपुर्दीप्तान्तरात्मानमेतत् कृत्या मनोमयम् । दारयोगं विना मध्ये पुत्रमात्मतनूरहम् एवमात्मानमात्मा मे द्वितीयं जनयिष्यति । वन्येनानेन विधिना दिधिक्षन्तमिव प्रजाः और्वस्तु तपसाविष्टोनिवेश्योर हताशने । ममाथैकेन दर्भेण सुतस्य प्रभवारणिम् ॥१८॥ तस्योरं सहसा भित्वा ज्यालामाली ह्यनिधनः । जगतो दहनाकाझी पुत्रोऽग्निः समपद्यत ॥ ४६॥ ऊर्यस्योरं विनिर्भिद्यमी नामान्तकोऽनल.। दिधक्षनिव लोकांस्त्रीजनेपरमकोपनः उत्पन्नमात्रश्चोधाच पितरं श्लणया गिरा। शुधामे याधते तात!जगदश्ये त्यजस्चमाम् त्रिदिवारोहिभिालजम्ममाणो दिशोदशानिर्दयन् सर्वभूतानियवृधे सोऽन्तकोऽनल: एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा मुनिभ्य समाजयन् । उयाच पार्यतां पुत्रो जगतश्च दयावरु ॥१३॥ अस्थापत्यस्य ते विप्रः करिष्ये स्थानमुत्तमम् । तथ्यमेतद्वचः पुराणु त्वंचदताम्बरः ऊर्य ड्याचा धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यन्मेऽद्य भगवाच्छिशो । मतिमेतां ददातीह,परमानुग्रहायवे प्रभातकाले समाते काक्षिध्ये समागमे । भगवन् ! तपित पुत्रः कई व्यः प्राप्स्यते सुखम् ॥ १६ ॥ फुत्र चास्य निवास स्थादोजनं पा किमात्मकम् । विधास्यतीह भगवान् धार्यतुल्यं महौजस ॥७॥ ब्रह्मोपाय। पदयामुगेऽम्य घसति समुद्रेचे भपि यति। मम योनिलिंपिप्र! तम्य पीतयत सुषम् यत्रादमास नियतं पियन् पाग्मियं हवि । तयिम्तय पुत्रस्य विस्जाम्यालयच तत्।।
* मत्स्यपुराणम् #. [चतुःसप्तत्यधिकशततमो ततो युगान्ते भूतानामेप चाहञ्च पुत्रक !! सहितो विवरिप्यायो निप्पुत्राणामृणापहः एपोऽग्निरन्तकाले तु सलिलाशी मया कृतः । दहनः सर्वभूताना सदेवासुररक्षसाम्॥ एवमस्त्विति तं सोऽग्निः संवृतज्यालमण्डलः । प्रविवेशार्णवमुखं प्रक्षिप्य पितरिप्रभाम् प्रतियातस्ततो ब्रह्मा ये च सर्वे महर्षयः । ऊर्वस्याग्नेः प्रभा ज्ञात्वा स्वां स्वाङ्गतिमुपाश्रिताः ॥ ६३ ।। हिरण्यकशिपुर्दृष्ट्वा तदा तन्महदद्रुतम् । ऊच्चैः प्रणतसंङ्गो पाक्यमेतदुधाच ह ॥ ६ ॥ भगवन्नद्भुतमिदं सवृत्त लोकसाक्षिकम् । तपसा ते मुनिश्रेष्ट! परितुष्टः पितामहः ॥६५॥ अहन्तु तव पुत्रस्य तव चैव महाव्रत !। भृत्य इत्यवगन्तव्यः साध्यो यदिह फर्मणा । तन्मा पश्य समापन्नं तवैचाराधने रतम् । यदि सोदे मुनिश्रेष्ठ! तवैव स्यात् पराजयः।। ऊर्य उघाच । धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्यतेऽहं गुरु स्थितः । नास्तिमे तपसानेन भयमोहसुव्रत! तामेव माया गृह्णीप्व मम पुत्रेण निर्मिताम् । निरिन्धनामग्निमयीन्दुर्धर्षा पावकैरपि । एपा ते स्वस्य वंशस्य पशगारिविनिग्रहे । संरक्षत्यात्मपक्षञ्च चिपक्षञ्च प्रधर्षति ॥ ७० ॥ एचमस्त्विति ता गृह्य प्रणम्य मुनिपुङ्गवम् । जगाम त्रिदिवं हृष्ट कृतार्थो दानवेश्वरः एषा दुर्यिपहा माया देवैरपि दुरासदा । औषेण निर्मिता पूर्व पावकेनोवसूनुना॥७२॥ तस्मिस्तु व्युत्थितेदैत्येनिवीर्यपा न सशयः । शापोह्यस्या. पुरा दत्तोसृष्पायेनैवतेजसा यद्यपा प्रतिहन्तव्या कर्त्तव्यो भगवान् सुखी। दीयता मे सखा शक! तोययोनिनिशाकरः ॥ १४ ॥ तेनाहं सह सङ्गम्य यादोभिश्च समावृतः । मायामेता हनिष्यामि त्वत्प्रसादान्नसंशयः इति श्रीमत्स्यपुराणे और्वनिर्मितमायावर्णनं नाम चतु'सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ।
पश्चलप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः देवासुरसंग्रामवर्णनम् । मत्स्य उवाच। 'एवमस्त्विति संहृतः शक्रस्त्रिदशवर्धनः । सन्दिदेशाग्रतः सोमं युद्धाय शिशिरायुधम् ॥ गच्छ सोम ! सहायत्वंकुरुपाशधरस्य थे। असुराणां विनाशाय जयार्थञ्चदिवौकसाम् त्वं मत्तः प्रतिवीर्यश्च ज्योतिपाश्चेश्वरेश्वरः । त्वन्मयं सर्वलोकेषु रसं रसविदो विदुः । क्षयवृद्धी तव व्यक्ते सागरस्येव मण्डले । परिवर्तस्यहोरात्रं कालं जगति योजयन् ॥ लोकच्छायामयः लक्ष्म तवाङ्क. शशसन्निभः । न विदुः सोमदेवापि ये च नक्षत्रयोनयः त्वमादित्यपथादूध्वं ज्योतिषां चोपरि स्थितः । तमः प्रोत्सार्य सहसा भासयस्यखिलं जगत् ॥ ६ ॥ अधिकृत्कालयोगात्माइष्टोयज्ञस्यसोऽव्ययः । औषधीश क्रियायोनिरस्जयोनिरनुप्णमाः शीतांशुरमृताधारश्चपलः श्वेतवाहनः । त्वं कान्ति कान्तिवपुषात्वं सोम सोमपायिनाम् सौम्यस्त्वं सर्वभूतानां तिमिरवस्त्यमृक्षण्ट् । तद्गच्छ त्वं महासेन ! वरुणेन घरूथिना शमयत्वासुरी मायां यया दह्याम संयुगे॥६॥ सोम उपाय। यन्मां पदसि युद्धार्थे देवराज ! वरप्रद ! । एवं घर्षामि शिशिरन्दैत्यमायापकर्षणम् ॥ एतान् मच्छीतनिर्दग्धान् पश्य स्थहिमवेष्टितान् । विमायान् चिमदांश्चैव दैत्यसिंहान्महाहवे ॥ ११ ॥ तेषां हिमकरोत्सृष्टाः सपाशा हिमवृष्टयः । वेष्टयन्तिस्म तान् घोरान्दैत्यामेघगणाइप तो पाशशीतांशुधरी घरुणेन्दू महायली । जनतुहिमपातच पाशपातश्च दानवान् ॥१॥ द्वायम्बुनाधों समरे तो पाशहिमयोधिनी । मृधेचेरतुरम्मोमिः क्षुब्धाविच महार्णयो । ताभ्यामातापितं सैन्यं तहानवमदृश्यत । जगत् संघर्तकाम्भोदैः प्रविष्टेरियसंवृतम् ॥
# मत्स्यपुराणम् * [पञ्चसप्तत्यधिकशततमो साबुद्यताम्वनाथी तु शशाधरणायुभो । शमयामासतुर्मायां देवी देत्येन्द्रनिर्मिताम् शीतांशुजालनिर्दग्धाः पाशश्व स्पन्दिता रणे। न शेकुञ्चलितुं दैत्या विशिरस्काइघाद्रयः शीतांशुनिहतास्ते तु दैत्यास्तोयहिमादिताः। हिमालावितसर्वाङ्गा निरूप्माण इवाग्नयः ॥ १८ ॥ तेपान्तु दिवि दैत्यानां विपरीतप्रभाणि वै। विमानानि विचित्राणि प्रपतन्त्युत्पतन्तिव तान् पाशहस्तप्रथितांश्छादिताश्छीतरश्मिभिः । मयोददर्शमायायी दानवानदिविदानवः स शिलाजालविततां पगवर्माट्टहासिनीम् । पादपोत्कटफूटानां कन्दराकीर्णकाननाम् सिहव्याघ्रगणाकीर्णा नदद्भिर्गजयूथपैः। ईहामृगगणाकीर्णा पवनापूर्णितद्रुमाम् । निर्मिता स्वेन यत्नेन कूजितां दिवि कामगाम् । प्रथिता पार्वती मायामसूत्ससमन्तत' सालिशन्दै. शिलावर्षे. सम्पतद्विश्च पादपै. 1 जघान देवसवांश्च दानवांश्चाप्यजीवयत् नेशाकरी वारुणी च मायेऽन्तर्दधतुस्ततः । असिभिश्चायसगणैः किरन देवगणान् रणे ॥ २५॥ साश्मयन्त्रायुधधना द्रुमपर्वतसङ्कटा । अभवत् घोरसञ्चार्या पृथिची पर्वतैरिव ॥२६॥ अश्मना प्रहताः केचित् शिलाभि. शकलीरताः । नानिरुद्धो द्रुमगणेदेयोऽदृश्यत कश्चन तदपध्वस्तधनुषं भानप्रहरपापिलम् । निष्प्रयलं सुरानीकं वर्जयित्वा गदाधरम् ॥२८॥ स हि युद्धगत श्रीमानीशानोऽश्मध्यकम्पत! सहिष्णुत्वाजगत्स्वामी नचुक्रोधगदाधरः कालज. कालमेघाभः समीक्षन कालमाहवे । देवासुरविमर्दन्तु द्रष्टुकामस्तदा हरि ॥ ततो भगवता दृष्टो रणे पावकमारतौ । वोदिती विष्णुवाक्येन तो मायामपकर्पताम् ॥ ताभ्यामुभ्रान्तवेगाभ्यां प्रवृद्धाभ्यां महाहये । दग्धा सा पार्वती माया भस्मीभूता ननाश ह ।। ३२ ॥ सोऽनिलोऽनलसंयुक्तः सोऽनलश्चानिलाकुल । दैत्यसेनान्दतुर्युगान्लेविषमुच्छितो घायुः प्रधावितस्तत्र पश्चादग्निस्तु मास्तम् । चेरतुनवानीके क्रीडन्तायनिलानलौ ॥ भस्मावयवभूतेषु प्रपतत्सूत्पतत्सु च । दानयानां विमानेषु निपतत्सु समन्ततः ॥३५॥ पातस्कन्धापषिद्धेषु कृतकर्मणि पावके । मया यधे निवृत्ते तु स्तूयमाने गदाधर ॥३६ A ऽध्यायः] * देवासुरसंग्रामवर्णनम् * निष्प्रयत्नेषु दैत्येषु त्रैलोक्ये मुक्तयन्धने । संप्रदृष्टेषु देवेषु साधु साध्विति सर्वशः ॥ जये दशशताक्षस्य दैत्यानाञ्च पराजये। दिक्षु सर्वासु शुद्धासु प्रवृत्ते धर्मविस्तरे ॥३८॥ अपावृते चन्द्रमसि स्वस्थानस्थे दिघाफरे । प्रकृतिस्थेषु लोकेषु त्रिपु चारित्रवन्धुपु ॥ यजमानेषु भूतेषु प्रशान्तेषु च पाप्मसु । अभिन्नबन्धने मृत्यौ हयमाने हुताशने ॥४०॥ यज्ञशोभिपु देवेपु स्वर्गार्थ दर्शयत्सु च । लोकपालेषु सर्वेषु दिक्षु संयानधर्तिषु ॥४१॥ भावे तपास सिद्धानामभावे पापकर्मणाम्। देवपक्षे प्रमुदिते दैत्यपक्षे विषीदति ॥४२ त्रिपाढविग्रहे धर्म अधर्मे पादविग्रहे । अपावृत्ते महाद्वारे वर्तमाने च सत्पथे ॥ ४३ ॥ लोके प्रवृत्ते धर्मेषु सुधर्मप्याश्रमेषु च । प्रजारक्षणयुक्तेषु भ्राजमानेषु राजसु ॥ ४४ ॥ प्रशान्तकल्मषे लोके शान्ते तमसि दानये । अग्निमारतयोस्तत्र वृत्ते संग्रामकर्मणि ॥ तन्मया विपुला लोकास्ताभ्यां तजयक्रिया । पूर्वदेवमयं श्रुत्वा मारताग्निकृतंमहत् कालनेमीति विख्यातो दानमः प्रत्यदृश्यत । भास्कराकारमुकुटः शिञ्जिताभरणाङ्गदः । वाहुभिस्तुलपन् व्योम क्षिपन् पट्यां महीधरान् । ईरयन्मुखनिश्वासैप्टियुक्तान् बलाहकान् ॥ ४८ ॥ तिर्यगायतरकाक्षं मन्दरोदनवर्चसम् । दिधक्षन्तमिवायान्तं सर्वान् देवगणान् मृधे ॥ ४ ॥ तजयन्तं सुरगणांश्छादयन्तं दिशोदश । संवर्तकाले तृपितं दृष्ट मृत्युमिवोत्थितम् ॥ मुतलेनोच्छ्रपघता विपुलागुलिपर्पणा । लम्बामरणपूर्णेन किञ्चिलितकर्मणा ॥५१॥ उच्छ्रितेनाग्रहस्तेन दक्षिणेन धपुष्मता । दानवान् देवनिहतानुत्तिष्ठध्यमिति घुघन ॥५२ तं कालनेमि समरे द्विषतां फालचेष्टितम् । पीक्षन्तेस्म मुराः स भयवित्रस्तलोचनाः तं पीक्षन्तिस्म भूतानि क्रमन्तं कालनेमिनम् । विविक्रमाधिकमतं नारायणमिवापरम् सोऽत्युच्छयपुरः पादमास्ता धूपिताम्बरः । प्रामन्नसुरो युद्धे त्रासयामास देवताः समयेनासुरेन्द्रेण परिप्यक्तस्ततो रणे । फालनेमियमो दैत्यः स विष्णुरिघ मन्दरः । अथ पिव्यथिरे देवाः सर्वे शमपुरोगमाः ! फालनेमि समायान्तं दृष्ट्वा फालमिवापरम् । । इति श्रीमत्स्यपुगणे देवासुरसंग्रामवर्णनं नाम पञ्चसातत्यधिकशततमोऽध्यायः ।
पट्ससत्यधिकशततमोऽध्यायः
कालनेमिवृत्तान्तवर्णनम्
मत्स्य उपाचा
दानवानामनीकेषु कालनेमिमदापुर । विद्धितमहातेजास्तपान्ते जलदो यथा ॥ १॥
त प्रैलोक्यान्तरगतं दृष्ट्वा ते दानोश्यराः । उत्तरथुरपरिश्रान्ता. पीत्वामृतमनुतमम् ॥
ते पीतभयसन्त्रासा मयतारपुरोगमा. तारकामयसंग्रामे सतनं जितकाशिन' ॥३॥
रेजुरायोधनगता दानवा. युद्धका क्षणः । मन्त्रमभ्यसतान्तेपा म्यूहच परिधावताम् ।
प्रेक्षताचाभवत् प्रीतिर्दानर फालनेमिनम् । ये तु तत्र मयस्यासन् मुख्या युद्धपुर सराः
ते तु सर्वे मयन्त्यस्या हया योजुमुपस्थिता. ।
मयस्तारो घराहय हयग्रीवश्च वीर्यवान् ॥ ६॥
विप्रचित्तिात श्येन गरलम्बावुभावपि । अरिष्टोवलिपुत्रश्च किशोरारयस्तथैव च ॥
स्वर्भानुश्यामपरयो धक्क्योधी महासुरः । पतेऽस्त्रयेदिन सर्वे सर्वेतपसिसुस्थिता.
दानवाः कृतिनो जामु कालनेमि तमुद्धतम्। ते गदाभि शुण्डीमिधरथ परश्यधे ।।
कालकपैध मुसले क्षेपणीयञ्च मुद्गरे । अश्मभिश्चाद्विसदृशेर्गण्डशैलेश्च दारुण ॥
पहिशैभिन्दिपालेश्च परिघेश्चोत्तमायसै । घातनीमि सुगुभि शतघ्नीभिस्तयच व
युगैर्यन्तश्च निर्मुक्तर्गिणरुप्रताडितः । दोभिश्चायतदीतैश्च प्रासै पार्शश्च मूर्च्छनः ॥१२॥
भुजङ्गवक्त्रैर्लेलिहानैर्विसर्पद्भिश्च सायकै । पन्नः प्रहरणीयैश्च दीव्यमानश्च तोमरः ॥
विकोशैरसिभिस्तीक्ष्णै. शूलैश्च शितनिर्मल. ।
दैत्या. संदीप्तमनस प्रगृहीतशरासनाः॥ १४ ॥
तत पुरस्कृत्य तदा कालनेमि महाहवे ।
सा दीप्तशस्तप्रवरा दैत्याना रुरचे चमू ॥ १५ ॥
द्यौनिमीलितसर्वाङ्गा घना नीलाम्बुदागमे । देवतानामपि चमूर्मुमुदे शक्रपालिता ॥१६॥
ऽध्यायः] * कालनेमि वृत्तान्तवर्णनम् * 'उपेता सितकृष्णाभ्यां ताराभ्यां चन्द्रसूर्ययोः । वायुवेगवती सौम्या तारागणपताकिनी तोयदाविद्धवसना ग्रहनक्षत्रहासिनी । यमेन्द्रवरुणैर्गुप्ता धनदेन च धीमता ॥ १८ ॥ सम्प्रदीप्ताग्निनयना नारायणपरायणा । सा समुद्रौघसदृशी दिव्या देवमहावमूः ॥१६॥ रराजास्त्रवती भीमा यक्षगन्धर्वशालिनी । तयोश्वम्वोस्तदानीन्तु बभूव स समागमः ।। द्यावापृथिव्योः संयोगो यथा स्याद्युगपर्यये । तयुद्धमभवद् घोरं देवदानवसङ्कुलम् ॥ २१ ॥ क्षमापराक्रमपरं दर्पस्य चिनयस्य च । निश्चक्रमुलाभ्यान्तु भीमास्तत्र सुरासुराः ।। पूर्वापराभ्यां संरब्धाः सागराभ्यामिवाम्बुदाः । ताभ्यां चलाभ्यां संदृष्टाश्चेरुस्ते देवदानवाः ॥ २३ ॥ घनाभ्यां पार्वतीयाभ्यां पुप्पिताभ्यायथागजाः । समाजम्नुस्ततोमेरीःशवान्दध्मुरनेकशः स शब्दोद्यां भुवं सञ्च दिशश्च समपूरयत् । ज्याघाततलनि?पो धनुषां कृजितानि च दुन्दुभीनाञ्च निनदो दैत्यमन्तर्दधु स्वनम् । तेऽन्योन्यमभिसम्पेतुः पातयन्त परस्परम् यमञ्ज ाहुभिर्याहन् द्वन्द्वमन्ये युयुत्सवः । देवास्तु चाशनि घोरंपरिघांधोत्तमायसान् निस्त्रिशान् सघनुःसंरये गदागुवांश्च दानवाः। गदानिपान नाङ्गायाणश्च शकलीझताः परिपेतुर्भृशं फेचिन् पुन. केनित्तु जग्निरे । ततो रथः सतुरगैर्विमानैश्चाशुगामिभिः ॥ समीयुस्तेसुमरन्धा रोपादन्योन्यमाइये । संवर्तमानाः समरे सन्दष्टोप्टपुटाननाः ॥३०॥ रथारयनिरुध्यन्ते पादाताश्च पदातिभिः । तेषां स्थानान्तुमुलः स शब्दः शब्दयादिनाम् नमोनमश्चहि ययानभरपर्जलदस्वनः । यमञ्जुस्तु रथान् केचित् केचित् सम्पाटितारयः सम्याधमन्ये सम्प्राप्य न शेकुश्चलितुं रथान् । अन्योन्यमन्ये समरे दोमिक्षिप्य दंशिताः ॥ ३३ ॥ संवादमानाभरणा जन्नुम्तयापि चर्मिणः। अस्त्रैरन्ये विनिर्भिन्ना येम् र हतायुधि । . सरजलानां सहशा जलदानां समागमे । तेरस्त्रशस्त्रप्रथिनं क्षिप्नोन्क्षिप्तगदाविलम् । देवदानपसंभु सलं युद्धमारमौ । तदानरमहामेधं देवायुधपिराजितम् ॥ ३६ ॥ अन्योन्यवाणवप युद्धदुर्दिनमायमौ । एतस्मिन्नन्तरे मुद्धः कालनेमिः स दानव ॥
* मत्स्यपुराणम् * [ पट्सप्तत्यधिकशततमो व्यवर्धत समुद्रौद्यः पूर्यमाण इवाम्बुदः । तस्य विद्युच्चलापीडैः प्रदीप्ताशनिवर्षिणः॥३८ गात्रै गगिरिप्रख्या विनिपेतु लाहकाः । क्रोधाग्निश्यसतस्तस्य भूभेदस्वेदधर्पिणः ।। साग्निस्फुलिङ्गप्रतता मुसान्निप्पेतुरर्चिपः । तियगूर्ध्वञ्च गगने घवृधुस्तस्य वाहवः ।। पर्वतादिव निष्क्रान्ताःपञ्चास्या इव पन्नगाः । सोऽस्त्रजालैहुविधैर्धनुभिः परिघेरपि दिव्यमाकाशमाचवे पर्वतरुच्छ्रितैरिव । सोऽनिलोडूतवसनस्तस्थौ संग्रामलालसः ॥ सन्ध्यातपग्रस्तशिलः साक्षान्मेरुरिवाचलः । ऊस्वेगप्रमथितैः शैलश्रङ्गाग्रपादपै. ॥४३॥ अपातयद् देवगणान् पजेणेच महागिरीन् । बहुभिः शस्त्रनिस्त्रिशैच्छिन्नभिन्नशिरोरुहाः ॥ ४४ ॥ न शेकुश्चलितुं देवा. कालनेमिहता युधि । मुष्टिभिनिहताः केचित् केचित्तु विदाकृताः ॥ ४५ ॥ यक्षगन्धपतयः पेतुः सह महोरगैः । तेन वित्रासिता देवाः समरे कालनेमिना ॥४६॥ न शेकुर्यनवन्तोऽपि यत्नं कर्तुं विचेतसः । तेन शक्रः सहस्राक्षः स्पन्दितः शरवन्धनैः ऐरावतगतः संख्ये चलितुं न शशाक ह । निलाम्भोदसदृशो निर्जलार्णवसप्रभः ॥४८ निर्व्यापारः कृतस्तेन विपाशो घरुणोमृधे । रणोवैश्रवणस्तेन परिघेः कामरूपिणा ॥ वित्तदोऽपि कृतः संख्ये निजितः कालनेमिना । यम. सर्वहरस्तेन मृत्युप्रहरणे रणे ॥ ५० ॥ याम्यामवस्था सन्त्यज्य भीतः स्थन्दिशमाविशत् । स लोकपालानुत्सार्य कृत्वा तेपाच कर्म तत्॥ ५१ ॥ दिक्षु सर्वासु देहं स्वं चतुर्धा विदधे तदा । स नक्षत्रपथगत्या दिव्यं स्वर्भानुदर्शनम् ॥ जहार लक्ष्मी सोमस्य तं चास्य विषयं महत् । चालयामास दीप्ताशं स्वर्गद्वारात् स भास्करम् ॥ ५३॥ सायनचास्य विपयं जहार दिनकर्म च । सोऽग्नि देवमुसं दृष्ट्वा चकारात्ममुपाश्रयम् ॥५॥ घायुञ्च तरसा जिरया चकारात्मयशानुगम् ।
ऽध्यायः * कालनेमिना सह विष्णुयुद्धम् * स समुद्रान् समानीय सर्वाश्च सरितो वलात् ॥५५॥ चकारात्ममुखे वीर्यादेहभूताश्च सिन्धयः । अपःस्ववशमा कृत्वादिविजायाश्चभूमिजाः स स्वयम्भुवि घा भाति महाभूतपतिर्यथा । सर्वलोकमयो दैत्यः सर्वभूतभयावहः ॥ स लोकपालकवपुश्चन्द्रादित्यपहात्मवान् । स्थापयामास जगतीं सुगुप्तां धरणीधरैः पापकानिलसम्पातो रराज युधि दानव. । पारमेप्ठ्ये स्थित स्थानेलोकानां प्रभवोपमे तंतुष्ट दैत्यगपा देवा इव पितामहम् ॥ ५६ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे कालनेमिवृत्तान्तवर्णनं नाम षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः । सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः कालनेमिना सह विष्णुयुद्धम् मत्स्य उवाचा पञ्च तन्नाभ्यवर्तन्त विपरीतेन कर्मणा । वेदो धर्म क्षमा सत्यं श्रीश्च नारायणाश्रया स तेषामनुपस्थानात् सक्रोधोदानवेश्वरः । वैष्णवंपदमन्विच्छन्ययौनारायणान्तिकम् स ददर्श सुपर्णस्थं शङ्खचक्रगदाधरम् । दानवानां विनाशाय भ्रामयन्त गदा शुभाम् ।। सजलाम्भोदसदृशं विद्युत्सदृशवाससम् । स्वारूढ स्वर्णपक्षाट्य शिसिनकाश्यपं खगम् दृष्ट्वा दैत्यविनाशाय रणे स्वस्थमवस्थितम् । दानयो विष्णुमक्षोभ्यं धमापे लुन्धमानसः ॥५॥ अयं स रिपुरस्माकं पूर्वेषां प्राणनाशनः । अर्णवाचासिनश्चय मोर्चे कैटभस्य च ॥ अयं स विग्रहोऽस्माकमशाम्य किल कथ्यते । अनेन संयुगेप्यद्य दानवावद्दयो हताः अयं स निघृणोलोके स्त्रीयालनिरपरप. । येन दानयनारीणा सीमन्तोद्धरणं कृतम् ॥ अयं सविष्णुर्देवानांवैकुण्ठश्चदिवौकसाम् । अनन्तोमोगिनामप्सुस्वपन्नाद्य स्वयम्भुवः अयं स नाथो देवानामस्माकं व्यथितात्मनाम् ।
* मत्स्यपुराणम् * [सप्तसप्तत्यधिकशततमो अस्य क्रोध समासाद्य हिरण्यकशिपुर्हतः ॥१०॥ अस्य च्छायामुपाश्रित्य देवा मखमुखे श्रिताः । आज्यं महर्षिभिर्दत्तमश्नुवन्ति त्रिधा हुतम् ॥११॥ अयं स निधने हेतुः सर्वेपाममरद्विपाम् । यस्य चक्रे प्रविष्टानि कुलान्यस्माकमाहवे ॥ अयं स किल युद्धेषु सुरार्थे त्यक्तजीवितः । सवितुस्तेजसा तुल्यं चक्रं क्षिपतिशत्रुषु अयं सकालोदैत्यानांकालभूत समास्थितः । अतिक्रान्तस्यकालस्यफलंप्राप्स्यति केशवः दिष्ट्येदानी समक्षं मे विष्णुरेप समागतः । अद्य मद्वाहुनिष्पिष्टो मामेव प्रणमिष्यति यास्याम्यपचिति दिष्ट्या पूर्वेपामद्य संयुगे। इमं नारायणं हत्वा दानवानां भयावहम् ॥१६॥ क्षिप्रमेय हनिष्यामि रणेऽमरगणांस्ततः । जात्यन्तरगतो होष वाधते दानवान् मृधे ॥ एपोऽनन्तः पुरा भूत्वा पद्मनाभ इति श्रुतः । जघानेकार्णवे घोरे तावुभौ मधुकैटभी । द्विधाभूतं वपुः कृत्या सिंहस्या नरस्य च । पितरं मे जघानेको हिरण्यकशिपुरा ।। शुभं गर्भमधत्तैनमदितिर्दवतारणिः । श्रीन लोकानुजहारको क्रममाणस्विभिः क्रमैः ॥ भूयस्त्विदानी संग्रामे संप्राप्ते तारकामये । मया सह समागम्य स देवो विनशिष्यति ॥२१॥ एचमुक्या यहुविधं क्षिपन्नारयणं रणे । वाग्भिरप्रतिरूपाभियुद्धमेवाभ्यरोचयत् ॥२२॥ क्षिप्यमाणो सुरेन्द्रेण न चुकोप गदाधरः । क्षमावलेन महता सस्मितं चेदमत्रवीत् ।। अल्पं दर्पयलं दैत्य ! स्थिरमकोधजं बलम् । हतस्त्वं दर्पजैदपैहित्वा यदापसे क्षमम् अधीरस्त्वं मम मतो धिगेतत्तव घाग्यलम् । न यत्र पुरापाः सन्ति तत्र गर्जन्ति योपितः अहं त्वां दैत्य ! पश्यामि पूर्वेषां मार्गगामिनम् । प्रजापतितं सेतुं मित्या कः स्वस्तिमान् प्रजेत् ॥२६॥ मद्य त्यांनाशयिष्यामिदेवव्यापारघातकम् । स्थपुस्वेपुवस्थानेषुस्थापयिप्यामि देवताः एवं ग्रुपति पाक्यं तु मृधे श्रीवत्सधारिणि । जहासदानयाग्रोधादस्तांधनेसहायुधान् सपाहुशतमुद्यम्य सस्त्रिग्रहणं रणे । शोधाग्गुिणरताक्षो विष्णुपक्षस्यताडयत् ॥
- ऽध्यायः] * कालनेमिना सह विष्णुयुद्धम् * ५ दानवाश्चापि समरे मयतारपुरोगमाः । उद्यतायुधनिस्त्रिशा विष्णुमभ्यद्रवन् रपणे ॥३० स ताड्यमानोऽतिबलदै त्यैः सबंधितायुधैः । न चचाल ततो युद्धे कम्पमान इवाचलः ॥३१॥ संसक्तश्च सुपर्णेन कालनेमी महासुरः । सर्वप्राणेन महतीं गदामुद्यम्य याहुभिः ॥३२॥ धोरां ज्वलन्ती मुमुचे संधो गरुडोपरि । कर्मणातेनदैत्यस्य विष्णुविस्मयमाविशत् यदा तेन सुपर्णस्य पातिता मूलि सा गदा । सुपर्ण व्यथितं दृष्ट्वा कृतञ्च चपुरात्मनः फोधसंरक्तनयनो वैकुण्ठश्चक्रमाददे । व्यपर्द्धत स वेगेन सुपर्णेन समं विभुः ॥२५॥ भुजाश्चास्य व्यवर्द्धन्त व्याप्नुवन्तो दिशो दश । प्रदिशश्चैध सं गां वै पूरयामास केशयः ॥३६॥ पवृधे च पुनलोंकान कान्तुकाम इौजसा । तर्जनायासुरेन्द्राणां धीमान नभस्तले ॥ ऋषयश्चैव गन्धर्यास्तुष्टुयुर्मधुसूदनम् । सर्वान् किरीटेन लिइन् साम्रमम्बरमम्वरैः॥ पद्भ्याक्रम्य यसुधां दिशः प्रच्छाद्य वाहुभिः । स सूर्यकरतुल्या सहन्नारमरिक्षयम् ॥ दीप्ताग्निसदृशं घोरं दर्शनेन मुदर्शनम् । सुवर्णरेणुपर्यन्तं चननाम भयापहम् ॥४०॥ मेदोऽस्थिमजायधिरैः सिक्तदानघसम्भवः । अद्वितीयपहरणं क्षुरपर्यन्तमण्डलम् ॥४॥ नादाममालायिततं फामगं फामरूपिणम् । स्वयंस्ययम्भुवा सृष्टं भयदं सर्वविद्विषाम् महर्षिरोपराविष्टं नित्यमाहवदर्पितम् । क्षेपणाद्यस्य मुन्ति लोकाः सस्थाणुजङ्गमाः॥ फळ्यादानि च भूतानि तृप्ति यान्ति महामृधे । तदप्रतिमको समानं सूर्यवर्चसा ॥ चामुद्यम्य समरे शोधदीप्तो गदाधरः। समुष्णन् दान तेजः समरे येन तेजसा ।। चिच्छेद पामेण श्रीधरः फालनेमिनः । तथ पयत्रशतं घोरं साग्निपूर्णाहासि ये nen तम्य दैत्यस्य च ममाथ यलाचरिः। स नियार्यिशिरान ग्राफम्पतदानयः फयन्धोऽपस्थितः संध्ये पिशापाप पादपः । सम्वितन्यमापक्षीयायो:रत्यासमययम् उरता पातयामास गराट.फालनेमिनम् । स तम्य देदो यिमुपो पियाध परिभ्रमन् । - ५२० * मत्स्यपुराणम् * [सप्तसप्तत्यधिकशततमो निपपात दिवन्त्यत्त्या क्षोभयन् धरणीतलम् । तस्मिन्निपतितेदैत्येदेवाः सपिंगणास्तदा साधु साध्धिति वैकुण्ठं समेताः प्रत्य जयन् । अपसन्तु दैत्याश्च युद्धे द्रुष्पराक्रमाः ते सर्वे वाहुभिर्व्याप्ता न शेजुश्चलितुं रणे । कांश्चिन् केशेषु जग्राह कांश्चित् कण्ठेवपीडयन् ॥५२॥ चकर्ष कस्यचिद्वक्त्र मध्येऽगृह्यादयापरम् । ते गदावनिर्दग्धा गतसत्वा गतासवः ।। गगनाभ्रष्टसर्वाङ्गा निपेतुर्धरणीतले । तेषु दैत्येषु सर्वेषु हनेषु पुरुषोत्तमः ॥७॥ तस्थोशक्रप्रियं कृत्वा कृतकर्मा गदाधर । तस्मिन् विमर्दै निवृत्त संग्रामे तारकामये तं देशमाजगामाशु ब्रह्मा लोकपितामहः । सहर्षिभिः सार्धं गन्धर्याप्सरसाङ्गणै. ।। देवदेवो हरिं देवं पूजयन् वारसमयीत् । कृतं देव महत्कर्म सुराणां शल्यमुधृतम् ॥ यधेनानेन दैत्यानां वयं च परितोपिता । योऽयं त्वया हतो विष्णो! कालनेमी महासुर ॥५॥ त्वमेकोऽस्य मृधेहन्ता नान्य. कश्चन विद्यते । एपदेवान्परिभवन्लोकांश्चससुरासुरान् ऋषीणां कदनं कृत्वा मामपि प्रतिगर्जति । तदनेन तमायण परितुष्टोऽस्मि कर्मणा ।। यदयं कालकल्पस्तु कालनेमी नि रातितः । तदा गच्छस्व भदन्ते गच्छाम दिवमुत्तमम् ब्रह्मयस्त्वां तत्रस्था प्रतीक्षन्ते सदोगताः । पञ्चाहं तव दास्यामि घरं घरवताम्बर ! सुरेवथ च दैत्येषु वराणां वरदो भगान् । निर्यातयैतन्त्रैलोक्यं स्फोतं निहतकण्टकम् अस्मिन्नेव मृधे विष्णो! शकाय सुमहात्मने । एवमुक्तो भगवता ब्रह्मणा हरिव्ययः ॥ ६४ ॥ देवांश्चक्रमुखान् सर्वानुवाच शुभया गिरा। विष्णुरुवाच । मृण्वन्तु त्रिदशा. सर्वे यावन्तोऽत्र समागताः ॥६५॥ श्रवणावहितः श्रोत्रे. पुरस्कृत्य पुरन्दरम् । अस्माभि समरे सर्वे कालनेमिमुखा हताः दानवा विक्रमोपेता. शमादपि महत्तरा । अस्मिन्महति संग्रामे दैतेयो द्वौ विनि.स्तो विरोचनश्च दैत्येन्द्रः स्वर्भानुश्च महाग्रहः । स्वां दिशं भजतां शको दिशं वरुण एव च ऽध्यायः], * भवमाहात्म्यवर्णनम् * ५२१ याम्यायमः पालयितामुत्ताच धनाधिपः । ऋक्षैः सह यथायोगं गच्छतां चैवचन्द्रमाः अन्दं ऋतुमुखे सूर्यो भजतामयनैः सह । आज्यभागा. प्रवर्तन्तां सदस्यैरभिपूजिताः ।। हृयन्तामग्नयो विप्रर्वेददृष्टेन कर्मणा । देवाश्चाप्यग्निहोमेन स्वाध्यायेन महर्षयः ॥ ७॥ श्राद्धेन पितरश्चैव तृप्ति यान्तु यथासुखम् । घायुश्चरतु मार्गस्थ स्त्रिधा टीप्यतु पावकः श्रीस्तु वर्णाश्च लोकांस्त्रीस्तर्पयंश्चात्मजैर्गुणैः । कतयः सम्प्रचन्तिां दीक्षणीय द्विजातिभिः ॥ ७ ॥ दक्षिणाचीपपाद्यन्तां याज्ञिकेभ्य पृथक् पृथक् । गान्तु सूर्यो रसान् सोमो घायुः प्राणांश्च प्राणिषु ॥७४ ॥ तर्पयन्तः प्रवर्तन्तां सर्वएच स्वकर्मभिः । यथावदानुपूर्येण महेन्द्रमलयोद्भवाः ॥ ७९ ॥ त्रैलोक्यमातर'सर्वाः समुद्रयान्तु सिन्धयः । दैत्येभ्यस्त्यज्यतां भीश्च शांन्तिबजतदेवताः स्वस्ति घोऽस्तु गमिष्यामि ब्रह्मलोकं सनातनम् । स्वगृहे स्वर्गलोके वा संग्रामे पा विशेषतः ।। ७७ ॥ विधम्मो घो न मन्तव्यो नित्यं क्षुद्रा हि दानवाः । छिदेषु प्रहरन्त्येते न तेषां सस्थिति धुंवा ॥ ७८ ॥ -सौम्यानामृजुभावानां भवतामार्जवन्धनम् । एवमुक्त्वा सुरगणान् विष्णु सत्यपराक्रमः जगाम ब्रह्मणा साद्धं स्वलोकन्तु महायशाः । एतदाश्चर्यमभवत् संग्रामे तारकामये । दानवानाञ्च विष्णोश्च यन्मान्त्वं परिपृष्टवान् ॥ ८० ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे कालनेमियधवर्णनं नाम सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः । अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः भनमाहात्म्यवर्णनम् अपय ऊचुः। श्रुतः पद्मोदस्तात विस्तरेण त्वयेरितः। समासाट्सवमाहात्म्यं भैरवस्य विधीयताम् ।
५२२ * मत्स्यपुराणम् * [अष्टसप्तत्यधिकशततमो सूत उवाच। तस्यापि देवदेवस्य शृणुध्व कर्म चोत्तमम् । आसीदैत्योऽन्धको नाम भिन्नाञ्जनचयोपम ॥२॥ तपसा महतायुक्तोहवस्य त्रिदिवौकसाम् । स कदाचिन् महादेवपार्वत्या सहितप्रभुम्. क्रीडमान तदा दृष्ट्वा हतु देवी प्रचामे । तस्य युद्ध तदा घोरमभवत् सह शम्भुना ॥४॥ भावन्त्ये विषये घोरे महाकालवन प्रति । तस्मिन्युद्धे तदा रुद्रश्चान्धकेनातिपीडित ॥ सुपुवे वाणमत्युग्रनाम्ना पाशुपत हि तत् । रुद्रायाणविनिर्भेदाद्रुधिरादन्धकस्य तु ॥६॥ अन्धकाश्च समुत्पन्ना शतशोऽथ सहस्रश । तेषा विदार्यमाणाना रुधिरादपरे पुन ॥ बभूवुरन्धका घोरा याप्तमखिल जगत् । एव मायाविन दृष्ट्वातञ्च देवस्तदान्धकम् ॥ पानार्थमन्धकास्त्रस्य सोऽसृजन्मातरस्तदा। माहेश्वरी तथानामी कौमारी मालिनीतथा सौपर्णी ह्यथ चायव्या शाक्री चै नैऋती तथा। सौरी सौम्या शिवा दूती चामुण्डा चाथ घारुणी ॥१०॥ पाराहीनारसिंहीच वैष्णवीच चलच्छिया । शतानन्दाभगानन्दा पिच्छिलाभगमालिनी चला चातिवला रक्ता सुरभीमुखमण्डिका । मातृनन्दा सुनन्दाच विडाली शकुनी तथा रेवतीच महारक्ता तथैग पिलपिच्छिका । जयाच विजया चैव जयन्ती चापराजिता । फाली चैव महाकाली दूती चैव तथैव च । सुभगा दुर्भगा चैच कराली नन्दिनी तथा अदितिश्च दितिश्चैव मारीवै मृत्युरेघ च । कर्णमोटी तथा ग्राम्या उलूकीच घटोदरी॥ कपाली बज्रहस्ता च पिशाची राक्षसी तथा । भुशुण्डी शाङ्करी चण्डा लागली कुटभी तथा ॥ १६ ॥ खेटा सुलोचना धूम्रा एकवीरा करालिनी । विशालदष्ट्रिणी श्यामा त्रिजटीकुक्कुटीतथा वैनायकी च चैताली उन्मत्तोदुम्वरी तथा। सिद्धिश्च लेरिहाना व केकरी गर्दभीतथाt भृकुटी बहुपुत्रीच प्रेतयाना विडम्बिनी। क्रौञ्चा शैलमुखी चैव धिनता सुरमा दनु ॥१६॥ उपा रम्मा मेनकाच सलिलाचित्ररूपिणी । स्याहास्यधा चपट्कारा धृतिर्येष्ठाकपर्दिनी माया विचित्ररूपा व कामरूपा च सङ्गमा । मुरोचिला मङ्गला च महानासा महामुखी -- ऽध्यायः] * भवमाहात्म्यवर्णनम् * कुमारी रोचनाभीमा सदाहा सा मदोद्धता। अलम्वाक्षी कालपर्णी कुम्भकर्णीमहासुरी केशिनी शष्टिनीलम्वा पिट्नलालोहितामुखी । घण्टारवाथदंष्ट्राला रोचना काकजविका गोकणिकाच मुसिकामहाग्रीवा महामुसी। उल्कामुखीधूमशिपा कम्पिनी परिकम्पिनी मोहना कम्पनाक्ष्वेला निर्भया यादृशाहिनी। सर्पकों तथैकाक्षी विशोकानन्दिनीतथा जोत्स्नामुग्रीच रमसा निकुम्भा रक्तकम्पना । अविकारा महाचित्रा चन्द्रसेना मनोरमा प्रदर्शना हरत्पापा मातङ्गी लम्बमेपला । अवाला वञ्चना काली प्रमोदा लाङ्गलायती ।। चित्ता चित्तजला कोणा शान्तिकाविनाशिनी। लम्बस्तनी लम्यसटा विसटा पासचूर्णिनी ॥ २८ ॥ स्सलन्ती दीर्घकेशीच सुचिरा सुन्दरी शुभा । अयोमुसी कटुमुखी क्रोधनीव तथाशनी फुटुम्धिका मुक्तिका च चन्द्रिका बलमोहिनी । सामान्या हासिनी लम्बा कोविदारी समासी ॥३०॥ फडकर्णी महानादा महादेवी महोदरी । हङ्कारी रदसुसटा रदेशी भूतडामरी ॥ ३१ ॥ पिण्ड जिहा वलज्ज्याला शिवा ज्वालामुखी तथा। पताश्चान्याश्च देवेशः सोऽएजन्मातरस्तदा ॥ ३२ ॥ अन्धकानां महाघोराः पपुस्तद्रुधिरं तदा । ततोऽन्धकासृजः सर्वाः परां तृप्तिमुपागताः तासु तृमासु संभूता भूय एयान्धकप्रजाः । अदितस्तैर्महादेवः शृालमुद्गरपाणिभि. ॥३४ तन. स शङ्करो देवम्त्यन्यकाकुलोरतः । जगाम शरणं देवं पासुदेयमन विभुम् ।। ततस्तु भगवान् विष्णु मृष्टयान शुष्करेवतीम् । या पप सफलन्तेपामन्धकानामन्य क्षणान् ॥ यथा यथा च रुधिरं पियन्त्यन्धकसम्मयम् ॥ ३६॥ तथा तथाऽधिकं देवी संशुष्यति जनाधिप!। पीयमाने तयातेषामन्धकानां तथाजि मन्धफास्तु क्षयानीता सर्व ते त्रिपुगरिणा ॥ ३ ॥ मूलान्धफन्नु विषम्य तदाशरम्भिलोयधृक् । चकार येगाहलाग्ने सन्तुष्टापशद्धग्म् मन्यफस्तु महापीर्यस्तम्य तुष्टोऽमयदपः । सामीप्यं प्रददौ नित्यं गणेशत्यं तथप च Hrom
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० मागणा. [भागाधिपरामो
नमो मागमा मग पानामा नागिण्यामागदेवापुमानुपान
पत्रमादानगम् मगं गनुानुमानि।
गरपाना
गामिः प्रसा. मग पागंगा॥
मम्मापोगनगिमाया मा निराशाजमनाया गया।
मागमामुगुमायोपर गगगगगम् । लामो समयमाणे तुमा मागको
गमिभूमि देयां प्रदापी मापाय | भनादिनि मनांगागपापम् ।।
देवेन्टयरीमधिरगगिनाप्रमशानाम् । पिति महारष्ट्र पुणे माफण्टकम् ॥
कल्पान्तसारतसाधं सरपणंगगनमा
परमाणन गोगमाफर्णयादिनानगम् । मेरो मतीपाशगुदगम्ममेक्षणम् ॥४॥
दिमादिशिणगार भागदंष्ट्रीपलावगम् । नगनि गणराग्निपालासम्मालिगम् ।।
घमागदं मुमुकुट धारयेयम्भूषणम् । श्रोणीपत्रेण माना फायनेन यिराभितम् ॥४८॥
नीलोत्पलदलश्यामं पासीयुगपिभूषणम् । संसामान्तसपलयामाण्डागारसालम् ।।
पयनं भ्राम्यमाणानां नाहव्ययदार्जिाम् । बापतसहशापारः मंगुन देवलोम. ॥५०
सपुष्पपिवित्राश्च धाग्यन्तं महान जम् । स ध्यातमात्री भगयान् प्रददातस्य दर्शनम्
याहोनेयम्पेण ध्याते रहेण धीमता । ताहशेनेय रूपेण दुनिरीक्ष्येण देवतः ॥ ५२ ॥
प्रणिपत्य तु देयेशं तदा तुष्टाय शङ्करः।
शङ्कर उपाच ।
नमस्तेऽतु जगन्नाथ ! नरसिहयपुर्धर ! ॥५३॥
दैत्यनाथारनापूर्ण ! नपशक्तिपिराजित ! । ततः सकलसंलग्नहेमपिङ्गलपिग्रह ! ॥५४
नतोऽस्मिपद्मनाम!त्यांसुरशक!जगद्गुरो!। फल्पान्ताम्भोदनि?प! सूर्यकोटिसमप्रम
सहस्रपमसंक्रोध ! सहनेन्द्रपराक्रम !! सहस्रधनदस्फीत! सहस्रवरणात्मक ! ॥५६॥
सहस्रकालरचित ! सहननियतेन्द्रिय ! । सहस्रभूमिसद्धेर्य ! सहस्रानन्त! मूर्तिमन् ! ॥
सहस्रचन्द्रप्रतिम ! सहस्रग्रहविक्रम! । सहस्रदतेजस्क ! सहस्रग्रह्मसंस्तुत ! ॥ ५८॥
ऽध्यायः] शङ्करकृतनृसिंहस्तुतिवर्णनम् । ६२५ सहस्रबाहुवर्गोग्र! सहस्रास्य निरीक्षण! | सहस्रयन्त्रमथन ! सहस्रबधमोचन ! ॥५६ अन्धकस्य विनाशाययाःसृष्टाःमातरो मया । अनादृत्य तु मद्वायम्भक्षयन्त्यद्यताःप्रजाः कृत्या ताश्च न शक्तोऽहं संहर्तुमपराजित ! । स्वयकृत्वा कथन्तासांविनाशमभिकारये एवमुक्तः स रुद्रेण नरसिंहवपुर्धरः । ससर्ज देवोजिह्वायास्तदावाणीश्वरौं हरिः ६२॥ हृदयाच्च तथा माया गुह्याच्च भवमालिनी । अस्थिभ्यश्च तथाकाली सृष्टापूर्व महात्मना यया तटुधिरम्पीतमन्धकानां महात्मनाम् । याचास्मिन्कथिता लोकेनामतःशुष्करेवती द्वात्रिंशन्मातरः सृष्टा गात्रेभ्यश्चक्रिणा ततः । तासां नामानि वक्ष्यामि तानि मे गदतः शृणु ॥६५॥ सर्यास्तासु महाभागा घण्टाकणीं तथैव च । त्रैलोक्यमोहिनी पुण्या सर्वसत्ववशङ्करी तथा च चक्रहृदया पञ्चमी व्योमचारिणी । शलिनी लेखिनी चैव कालसर्पणी तथा इत्येता:पृष्ठगाराजन् ! वागीशानुचराः स्मृताः । सङ्कर्पणीतथाश्वत्थाचीजभावापराजिता कल्याणी मधुदंष्ट्री च कमलोत्पलहस्तिका । इति देव्यष्टकं राजन् ! मायानुचरमुच्यते अजिता सूक्ष्महृदया वृद्धा वेशाश्मदंशना । नृसिंहभैरया विल्या गरुन्महृदया जया ॥ भवमालिन्यनुचरा इत्यष्टौ नृपमातरः । आकर्णनी सम्भटा च तथैवोत्तरमालिका ॥७१ ज्वालामुखी भीषणिकाकामधेनुश्चयालिका । तथापनकराराजन् ! रेवत्यनुचराःस्मृताः अष्टो महायलाः सर्या देवगात्रसमुद्भवाः । त्रैलोक्यसृष्टिसंहारसमर्थाः सर्वदेवताः ॥ ताः सृष्टमात्रादेवेन फुद्धामातृगणस्य तु । प्रधायिता महाराज! क्रोधविस्फारितेक्षणाः अविषह्यतमन्तासां दृष्टितेजः सुदाणम् । तमेव शरणं प्राप्ता नृसिंहो वाक्यमत्रवीत् ॥ यथा मनु"या पशयः पालयन्तिचिरात् सुनान् । जयन्ति ते तयाशु यथायदेवतागणः भवत्यस्तु तथालोकान्पालयन्तु मयेरिताः । मनुजेश्च तथा देयैर्यजध्वं त्रिपुरान्तकम् ॥ नव यात्रा प्रफर्तव्या ये भक्कात्रिपुरान्तके । येय मां संस्मरन्तीह तेय रत्याः सदानराः यलिफर्म फरिष्यन्ति युप्माकं ये सदा नराः । सर्वकामप्रदास्तेषां भविष्यध्यन्तपच उच्छासनादिकं ये च फथयन्ति मयेरितम् । तेच रक्ष्याः सदालोफारक्षिनव्यं मदासनम् रोद्री चेय परां मूर्ति महादेपः प्रदास्यति । युप्मामुग्या महादेव्यस्तदुक्तं परिरक्षय ॥
* मत्स्यपुराणम् * [ऊनाशीत्यधिकशततमो मया मातृगणः संप्टो योऽयं विगतसाध्वसः । एप नित्यं विशालाक्ष्यो मयैव सह रंस्यते ॥२॥ मया सार्द्ध तथा पूजां नरेभ्यश्चैव लप्स्यथ । पृथक् सुपूजिता लोकः सर्वान् कामान् प्रदास्यथ ॥८॥ शुष्का संपूजयिष्यन्ति ये च पुत्रार्थिनो जनाः । तेषां पुत्रप्रदा देवी भविष्यन्तिनसंशयः एवमुक्त्वा तु भगवान् सह मातृगणेन तु । ज्वालामालाकुलवपुस्तत्रैवान्तरधीयत ॥८५ तत्र तीर्थ समुत्पन्नं कृतशोचेति यजगुः । तत्रापि पूर्वजो देवो जगदातिहरो हरः ॥८६ रौद्रस्य मातृवर्गस्य दत्त्वा रुद्रस्तु पार्थिव । रोद्रां दिव्यां तनुं तत्रमातृमध्येव्यवस्थितः सप्त ता मातरो देव्यः सार्द्धनारीनरः शिवः । निवेश्य रौद्रं तत् स्थानं तत्रैवान्तरधीयत समातृवर्गस्य हरस्य मूर्तिर्यदा यदा याति च तत्समीपे । देवेश्वरस्यापि नृसिंहमूर्तेः पूजां विधत्ते त्रिपुरान्धकारिः ॥८६॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे शङ्करकृतनृसिंहस्तुतियर्णनं नामाष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः । ऊनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः वाराणस्या माहात्म्यम् षय ऊचुः। श्रुतोऽन्धकवधः सूत! यथावत्त्वदुदीरितः । घाराणस्यास्तु माहात्म्यं श्रोतुमिच्छाम साम्प्रतम् ॥१॥ भगवान् पिङ्गलः फेन गणत्वं समुपागतः। अन्नदत्त्यञ्च सम्प्राप्तो घाराणस्यां महाद्युतिः क्षेत्रपालः कथं जातः प्रियत्वञ्च कथङ्गतः । एतदिच्छाम कथितं श्रोतुं ब्रह्मसुत! त्यया सूत उवाच। शृणुध्वं च यथा लेभे गणेशत्वं स पिङ्गलः ।
ऽध्यायः] • घाराणस्या माहात्म्यम् * ५२७ अन्नदत्वं च लोकानां स्थानं धाराणसी त्विह ॥४॥ पूर्णमद्रसुतः श्रीमानासीद्यज्ञः प्रतापवान् । हरिकेश इतिरयातो ब्रह्मण्यो धार्मिकच ह तस्य जन्मप्रभृत्यैव शर्वे भक्तिरनुत्तमा । तदासीत्तनमस्कारस्तनिष्ठस्तत्परायणः ॥६॥ आसीनश्च शयानश्च गच्छंस्तिष्ठमनुव्रजन् । भुसानोऽथ पियन्वापि रुद्रमेवान्वचिन्तयत् तमेवं युक्तमनसम्पूर्णभद्रः पिताधीत् । न त्यां पुत्रमहं मन्येदुर्जातो यस्त्वमन्यथा ॥८ न हि यक्ष फुलीनानामेतद्वृत्तं भवत्युत। गुह्यका घत यूयं वै स्वभावात् क्रूरचेतसम्म कन्यादाश्चैव किं भक्षा हिंसाशीलाश्च पुत्रफ । मैवं कापी ते वृत्तिरवं दृष्टा महात्मना ॥१०॥ स्वयम्भुवा यथादिष्टा त्यक्तव्या यदि नो भवेत् । आश्रमान्तरजं कर्म न फुपु हिणस्तु तत् ॥११॥ हित्वा मनुष्यमावं च कर्मभि विविधैश्चर । यत्त्वमेवं विमार्गस्यो मनुष्यानात एयव ॥ यथावद्विविधन्तेषां फर्म तनातिसंश्रयम् । मयापि विहितं पश्य फर्मतन्नात्र संशयः॥ सूत उवाच। एवमुच्या स तं पुत्रं पूर्णभद्रः प्रतापवान् । उवाचनिष्कमक्षिप्रंगच्छपुन! यथेच्छसि ततः स निर्गतस्त्यतया गृहं सम्बन्धिनरतथा। पाराणसी समासाद्यतपस्तेपे मुदुधरम् स्थाणुभूतो ह्यनिमिपः शुष्कफाष्ठोपलोपमः । सन्नियम्येन्द्रियग्राममयातिष्टत निश्चलः ॥ सथ तस्येवमनिशन्तत्परस्य तदा शिप. सदनमेकं पाणां दिव्यमप्यम्पयर्तत ॥१७n प.मीफेन समाकान्तो भक्ष्यमाण पिपीलिकः । पन्नासूचीमुपस्तीपणे बिध्यमानस्तौंप च ॥१८॥ निमांसरधिरत्यक च पुन्दशग्रेसप्रमः । यग्यिरोगेऽभयच्दर देयं पे चिन्तयन्नपि एतस्मिन्नन्तरे देयी विज्ञापयत शदूग्म् । देण्युपार। उपानं पुनरयेह द्रष्टुमिच्छामि सर्वदा ॥२०॥ क्षेत्रम्प देप माहात्म्यं धातुं कौतूहलं हि मे। यतच प्रियमेतत्ते तथास्य परमुत्तमम् ।
* मत्स्यपुराणम् [ ऊनाशीत्यधिकशततमो इति विज्ञापितो देवः शर्वाण्या परमेश्वरः । शर्वः पृष्टोयथातथ्यमारयातुमुपचक्रमे ॥ निर्जगाम च देवेशः पार्वत्या सद्द शङ्करः । उद्यानं दर्शयामास देव्या देव पिनाकधृक् देवदेव उवाच। प्रोत्फुल्लनानाविधगुल्मशोभितं लताप्रतानावनतं मनोहरम् । विरूढपुष्पैः परित' प्रियङ्गुभिः सुपुष्पिनैः कण्ट कितैय केतकः ॥२४॥ तमालगुल्मैनिचितं सुगन्धिमि सकणिकाकुलैश्च सर्वशः । अशोकपुन्नागवरः सुपुष्पितैदिरेफमालाकुलपुप्पसञ्चयः ॥२५॥ कचित् प्रफुल्लाम्बुजरेणुरूपितविहङ्गमैश्वारुकलप्रणादिभिः । विनादितं सारसमण्डनादिभि. प्रमत्तदात्यूहरतैश्च चल्गुभिः ॥२६॥ कचिच चक्राहरवीपनादितं क्वचिच्च कादम्बकदम्बकर्युतम् । कविध कारण्डवनादनादितं कचिच मत्तालिकुलाकुलीरतम् ॥२७॥ मदाकुलाभिस्त्वमराङ्गनाभि निषेवितञ्चारु सुगन्धिपुष्पम् । क्वचित् सुपुष्पै. सहकारवृक्षलतोपगृहै स्तिलकद्रुमैश्च ॥२८॥ प्रगीतविद्याधरसिद्धचारण प्रवृत्तनृत्याप्सरसाङ्गणाकुलम् । प्रहृष्टनानाविधपक्षिसेवित प्रमत्तहारीतकुलोपनादितम् ॥२६॥ मृगेन्द्रनादाकुलसत्वमानसः कचित् कवित्द्वन्द्वकदम्बकैमृगः । प्रफुल्लानानाविधवारुपङ्कजैः सरस्तटाकैरुपशोभितं क्वचित् ॥३०॥ निविडनिचुलनील नीलकण्ठाभिरामं मदमुदितविहङ्गवातनादाभिरामम् । कुसुमिततरशाखालीनमत्तद्विरेफ नघकिशलयशोभाशोभितप्रान्तशाखम्॥ कचिच्च दन्तिक्षतचारुयीरुध कचिल्लतालिङ्गितचारुवृक्षकम् । क्वचिद्विलासालसगामिवहिण निषेचितं किं पुरुषव्रजे. क्वचित् ॥३२॥ पारावतध्वनि विकृजितवारपरभ सितमनोहरचारुरूपै । आकीर्णपुष्पनिकुरम्बचिमुक्तहासैविभ्राजितं त्रिदशदेवकुलैरनेकैः ॥३३॥ फलोत्पलागुरुसहस्रवितानयुक्तं स्तोयावयैस्तमनुशोभितदेवमार्गम् ।
ऽध्यायः * वाराणसीमाहात्म्यम् * ५२६ मार्गान्तरागलितपुप्पपिचित्रभक्तिसम्बद्धगुल्मविटपैविगैरपेतम् ॥३४॥ तुङ्गायै नौलपुष्पस्तवकमरनतप्रान्तशाखैरशोक- मंत्तालिबातगीतश्रुतिसुखजनन सितान्तर्मनोज्ञः रात्री चन्द्रस्य भासा कुसुमिततिलकैरेकतां सम्प्रयात च्छायासुप्तप्रयुद्धस्थितहरिणकुलालुप्तदर्भाडुराप्रम् ॥३५॥ हंसाना पक्षपातप्रचलितकमलस्वच्छविस्तीर्णतोयम् तोयानां तीरजातप्रधिकचकदलीवाटनृत्यन्मयूरम् । मायूरैः पक्षचन्द्रः क्वचिदपि पतित रञ्जितक्ष्माप्रदेशम् देशे देशे विकीर्णप्रमुदितविलसन्मत्तहारीतवृक्षम् ॥३६॥ सारङ्गः कचिदपि सेवितप्रदेशं सच्छन्नं कुसुमचयः क्वचिद्विचित्रः । हृष्टाभिः क्वचिदपि किन्नराङ्गनाभिः क्षीयाभिः समधुरगीतवृक्षखण्डम् ॥३७ संसृष्टः क्वचिदुपलिप्तकीर्णपुप्पैरावासः परिवृतपादपं मुनीनाम् । आमूलात् फलनिचितैः क्वचिद्विशालैरुत्तुरैः पनसमहीरहैरुपेतम् ॥३८॥ फुल्लातिमुक्तकलतागृहसिद्धलील सिद्धाङ्गनाकनकन् पुरनादरम्यम् । रम्यप्रियङ्गतरुमारिसक्तभृङ्गं भृशावलीपु स्खलिताम्युकदम्यपुष्पम् ॥३॥ पुप्पोत्करानिलबिघूणितपादपायमग्रेसरोभुवि निपातितवंशगुल्मम् । गुल्मान्तरप्रभृतिलीनमृगासमूह संमुह्यतान्तनुभृतामपवर्गदातृ ॥४॥ चन्द्रांशुजालधचलैस्तिलकर्मनोह. सिन्दूरकुङ्कुमकुसुम्भनिर्भरशोकः । चामीकरामनिचयैरथ कर्णिकारैः फुल्लारिविन्दरचितं सुविशालशासैः ॥४१ कचिनजतपर्णाभः क्वचिद्विदुमसन्निभैः । कचित्काञ्चनसङ्काश. पुष्पैरावितभूतलम् ॥४२ पुन्नागेपु द्विजगणपिरतं रक्ताशोकस्तरकभरनमितम् । रम्योपान्तं श्रमहरपवनं फुल्लाब्जेषु भ्रमरविलसितम् ॥४३॥ सकलभुवनभर्ता लोकनाथस्तदानीन्तुहिन शिखरिपुन्याः सामिप्टगणेशैः। विविधतरुविशालं मत्तदृष्टान्यपुष्टमुपवनतरम्यं दर्शयामास देव्याः ॥ध्या * मत्स्यपुराणम् * [ऊनाशीत्यधिकशततमो देव्युवाच । उद्यानं दर्शितं देव ! शोभया परया युतम् । क्षेनस्य तु गुणान् सर्वान्पुनर्वकुमिहार्हसि अस्य क्षेत्रस्य माहात्म्यमपिमुक्तस्य तत्तथा । श्रुत्वापि हि न मे तृप्तिरतो भूयोपदस्यमे देवदेव उवाच। इदं गुह्यतमं क्षेत्रं सदा पाराणसी मम । सर्वेपामेव भूतानां हेतुर्मोक्षस्य सर्वदा ॥४७॥ अस्मिन् सिद्धा सदा देवि! मदीयं व्रतमास्थिताः । नानालिङ्गधरा नित्यं मम लोकाभिकाड्क्षिणः ॥ ४८॥ अभ्यसन्ति परं योगं मुक्तात्मानो जितेन्द्रिया. । नानावृक्षसमाकीर्णे नानाविहगजिते कमलोत्पलपुष्पाढ्यः सरोभिः समलते । अप्सरोगणगन्धर्वैः सदा संसेवितेशुभे रोचते मे सदा घासोयेन कार्येण तच्छृणु। मन्मना मम भक्तश्च मयि सर्वार्पितक्रियः । यथा मोक्षमिहाप्नोति धन्यत्र न तथा कचित् । एतन्मम परं दिव्यं गुह्याद्गुह्यतरं महत् ब्रह्मादयस्तु जानन्ति येऽपि सिद्धा मुमुक्षयः । अत प्रियतमं क्षेत्रं तस्माचेह रतिर्मम ॥ विमुक्तन मया यस्मान्मोक्ष्यते वा कदाचन । महत् क्षेत्रमिदं तस्यादविमुक्तमिदंस्मृतम् नैमिषेऽथ कुरुक्षेत्रे गङ्गाद्वारे च पुष्करे । स्नानात्संसेविताद्वापि न मोक्ष प्राप्यते यत इह सप्राप्यते येन तत एतद्विशिष्यते । प्रयागे च भवेन्मोक्ष इह घा मत्परिग्रहात् ॥५६ प्रयागादपि तीर्थाग्यादिदमेव महत् स्मृतम् । जैगीपव्य. परा सिद्धि योगतः स महातपा. ॥५७ ॥ अस्य क्षेत्रस्य माहात्म्याइत्या च मम भावनात् । जैगीषव्यो महाश्रेष्ठो योगिनां स्थानमिष्यते ॥ ५८॥ ध्यायतस्तत्र मा नित्यं योगाग्निर्दीप्यते भृशम् । कैवल्यं परमं याति देवानामपिदुर्लभम् अध्यक्तलिङ्र्मुनिभिः सर्वसिद्धान्तवेदिभिः । इह संप्राप्यते मोक्षो दुर्लभो देवदानवै ॥ तेभ्यश्चाहं प्रयच्छामि भोगैश्वर्यमनुत्तमम् । आत्मनश्चैव सायुज्यमीप्सितं स्थानमेवच कुबेरस्तु महायक्षस्तथा शर्पितक्रिय' । क्षेत्रसम्बसनादेव गणेशत्वमवाप ह ॥६२॥ सम्वतॊ भविता यश्च सोऽपि भत्त्या ममैव तु ।
ऽध्यायः] * वाराणसीमाहात्म्यम् * इहैवाराध्य मां देवि ! सिद्धिं यास्यत्यनुत्तमाम् ॥ ६३ ॥ पराशरसुतो योगी ऋपिया॑सो महातपाः । धर्मकर्त्ता भविष्यश्च वेदसंस्थाप्रवर्तकः ।। रंस्यते सोऽपि पद्माक्षि! क्षेत्रेऽस्मिन् मुनिपुङ्गवः । ब्रह्मा देवर्षिभिः साद्धं विष्णुर्वायुर्दिवाकरः ॥ ६५ ॥ देवराजस्तथा शको येऽपि चान्ये दिवौकसः। उपासन्ते महात्मानः सर्वे मामेवसुव्रते अन्येऽपि योगिनः सिद्धाश्छन्नरूपा महाव्रताः । अनन्यमनसोभूत्वा मामिहोपासतेसदा अलर्कश्च पुरोमेतां मत्प्रसादादवाप्स्यति । स चैना पूर्ववत्कृत्या चातुर्वाश्रमाकुलाम् स्फीतां जनसमाकीर्णा भत्त्याव सुचिरंनृपः । मयि सर्वार्पितप्राणो मामेव प्रतिपत्स्यते ततः प्रभृति चार्वह्नि! येऽपि क्षेत्रनिवासिन । गृहिणो लिनिनो वापि मङ्गता मत्परायणाः ॥ ७० ॥ मत्प्रसादादजिष्यन्ति मोक्षं परमदुर्लभम् । विषयासक्तवित्तोऽपि त्यक्तधर्मरतिर्नरः॥ इक्षक्षेत्रेमृत. सोऽपिससारंन पुनर्विशेत् । ये पुनर्निर्ममा धीरा.सत्वस्था घिजितेन्द्रियाः अतिनश्च निरारम्भा' सर्वे ते मयि भाविताः । देहभङ्गं समासाद्य धीमन्त सङ्गवर्जिताः गता एव परं मोक्षं प्रसादान्मम सुनते ! ॥ ७३ ॥ जन्मान्तरसहस्रेषु युञ्जन योगमवाप्नुयात् । तमिहैव परं मोक्षं मरणादधिगच्छति ।७४ एतत्सड्क्षेपतो देवि!क्षेत्रस्यास्य महत्फलम् । अविमुक्तस्य कथितं मया ते गुह्यमुत्तमम् अत.परतरं नास्ति सिद्धिगुह्य महेश्वरि । एतद्युध्यन्ति योगज्ञा ये च योगेश्वराभुवि ॥ एतदेव परं स्थानमेतदेव पर शिवम् । एतदेव परम्ब्रह्म तदेव परम्पदम् ॥ ७॥ वाराणसी तु भुवनयसारभूता रम्या सदा मम पुरी गिरिराजपुत्रि !! अत्रागता विविधदुष्कृतकारिणोऽपि पापक्षयाद्विरजस प्रतिभान्ति माः ।। एतत्स्मृतं प्रियतमं मम देवि! नित्यं क्षेत्र विचित्रतरगुल्मलतासु पुष्पम् । अस्मिन्मृतास्तनुभृतः पदमाप्नुयन्ति मूर्खागमेन रहितापि न संशयोऽत्र॥ सूत उवाच । एतस्मिन्नन्तरे देवो देवीं प्राह गिरीन्द्रजाम् । दातुं प्रसादायक्षाय परं भकाय भामिनि॥
* मत्स्यपुराणम् * [ऊनाशीत्यधिकशततमो भक्तो मम घरारोहे! तपसा हतकिल्विपः। अहो घरमसी लब्धमस्मत्तो भुवनेश्वरि ! ॥ एवमुक्त्वा ततो देवः सह देव्या जगत्पति । जगाम यक्षो यत्रास्ते कृशोधमनिसन्तत॥ ततस्तं गुह्यकं देवी दृष्टिपातैनिरीक्षती । श्वेतवर्ण विचर्माणं स्नायुपद्धास्थिपञ्जरम् ॥ देवी प्राह तदा देवं दर्शयन्ती व गुह्यकम् । सत्यं नाम भवानुनो देवरक्तस्तु शङ्कर ।। ईदृशे चास्य तपसि न प्रयच्छसि यद्वरम् । अत्र क्षेत्रे महादेव! पुण्येसम्यगुपासिते॥ कथमेवं परिलेशं प्राप्तो यक्षकुमारकः । शीघ्रमस्य वरं यच्छ प्रसादात् परमेश्वर ! ॥८६ एवं मन्वादयो देव! घन्ति परमर्षय. । रुष्टाद्वाचाथ तुष्टाद्वा सिद्धिस्तृभयतोभवेत् । भोगप्राप्रिस्तथा राज्यमन्तेमोक्ष सदाशिवात्। एवमुक्तस्ततो देव सह देव्या जगत्पति जगाम यक्षो यत्रास्ते कृशोधमनिसन्तत । त दृष्ट्वा प्रणतं भक्त्या हरिकेशं वृषध्वज ॥ दिव्यञ्चक्षुरदात्तस्मै येनापश्यत् स शङ्करम् । अथ यक्षस्तदा देशाच्छनैरुन्मील्य चक्षुषी अपश्यत् सग देव वृषध्वजमुपस्थितम् । देवदेव उवाच । घरं ददामि ते पूर्वं त्रैलोक्ये दर्शनं तथा ॥ ११ ॥ साधण्यं च शरीरस्य पश्य मां विगतज्वरः । सूत उवाच। तत स लम्चा तु घरं शरीरेणाक्षतेन च ॥१२॥ पादयोः प्रणतस्तथौकृत्वा शिरसिसाञ्जलिम् । उवाचाथतदातेन घरदोऽस्मीतिचोदितः भगवन्। भक्तिमव्यग्रा त्वय्यनन्या विधत्स्व मे । अन्नदत्वं च ते लोकाना गाणपत्यं तथाऽक्षयम् ॥ १४ ॥ अविमुक्तं च ते स्थान पश्येयं सर्वदा यथा। एतदिच्छामि देवेश त्वत्तो घरमनुत्तमम् ।। देवदेव उयावी जरा मरणसन्त्यक्त. सर्वरोगविवर्जित । भविष्यसि गणाध्यक्षो धनद सर्वपूजितः ॥ अजेयश्चापि सर्वेषा योगेश्वयं समाश्रित. । अन्नदश्चापि लोकेभ्य क्षेत्रपालोभविष्यसि महावलो महासत्यो ब्रह्मण्यो मम व प्रियः । त्र्यक्षश्च दण्डपाणिश्च महायोगी तथैषच ऽध्यायः] * वाराणसीस्थक्षेत्रमाहात्म्यम् १ उद्घमासम्नमश्चैव गणोतु परिवारको । तवाज्ञाञ्च करिष्येते लोकस्योभ्रमसम्भ्रमी सूत उवाच। एवं स भगवांस्तत्र यक्षं कृत्वा गणेश्वरम् । जगाम घामदेवेशः सह तेनामरेश्वर.॥१०० इति श्रीमत्स्यपुराणे घाराणसीमाहात्म्ये कुवेरवप्राप्ति मो- नाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः । - अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः वाराणसीस्थक्षेत्रमाहात्म्यम् । सूत उवाच । इमांपुण्योद्भवां स्निग्धांकथां पापप्राशिनीम् । शृण्वन्तु ऋपय सर्वसुविशुद्धास्तपोधनाः गणेश्वरपति दिव्यं रुदतुल्यपराक्रमम् । सनत्कुमारो भगवानपृच्छन्नन्दिकेश्वरम् ॥२॥ ग्रूहि गुह्यं यथा तत्वं यत्र नित्यं भव स्थितः। माहात्म्यं सर्वभूतानां परमात्मामहेश्वरः घोररूपं समास्थाय दुष्करं देवदानवै. । आभूतसंध्यं यावत् स्थाणुभूतो महेश्वर. ॥el नन्दिकेश्वर उवाच। पुरा देवेन यत्प्रोक्तं पुराण पुण्यमुत्तम् । तत्सर्व संप्रवक्ष्यामि नमस्कृत्य महेश्वरम् ।। ततो देवेनतुन उमाया प्रियकाम्यया । कथितं मुधिविरयातं यत्र नित्यं स्वयंस्थितः रुद्रस्यार्धासनगता मेरुद्रले यशस्विनी । महादेवं ततो देवी प्रणता परिपृच्छति ॥ ७॥ भगवन् ! देवदेवेश! चन्द्रार्द्धकृतशेखर ! 1 धर्म प्रचूहि मानां भुवि चैवोर्ध्वरेतसाम् जप्तं दत्तं हुतं चेष्टं तपस्तप्तं कृतञ्च यत् । ध्यानाध्ययनसम्पन्नं कथं भवति चाक्षयम् ॥ जन्मान्तरसहस्त्रेण यत्पापं पूर्वसञ्चितम् । कयं तन्क्षयमायाति तन्ममाचक्ष्व शङ्कर ! ॥ यस्मिन् व्यवस्थितो भक्त्या तुप्यसे परमेशर !! व्रतानि नियमाश्चैवाचारो धर्मएचव सर्वसिद्धिकरं यत्र ह्याक्षप्यगतिदायकम् । वक्तुमर्हसि तत्सर्व परं कौतृहलं हि मे ॥१२ महेश्वर उवाच। शृणु देवि ! प्रवक्ष्यामि गुह्यानां गुह्यमुत्तमम् ॥
* मत्स्यपुराणम् * [अशीत्यधिकशततमो सर्वक्षेत्रेषु विख्यातमविमुक्तं प्रिये मम ॥ १३ ॥ अष्टपष्टि पुराणोक्तास्थानानांस्थानमुत्तमम् । यत्रसाक्षात्स्वयंरुद कृत्तिवासा.स्वयंस्थितः यत्र सन्निहितो नित्यमविमुक्ते निरन्तरम् । तत्क्षेत्रं न मयामुक्तमविमुक्तं ततः स्मृतम् । अविमुक्तपरा सिद्धिरविमुक्ते परा गतिः । जप्तं दत्तं हुतं चेष्टं तपस्तप्तं कृतं च यत् ॥१६ ध्यानमध्ययनं दानं सर्व भवति चाक्षयम् । जन्मान्तरसहस्रेण यत्पापं पूर्वसञ्चितम् ॥ अविमुक्तं प्रविष्टस्य तत्सर्वं व्रजति क्षयम् । अविमुक्ताग्निना दग्धमग्नी तूलमिवाहितम् ब्राह्मणा क्षत्रियावैश्या शूद्रावैवर्णसङ्करा । कृमिम्लेच्छाश्चयेचान्ये सङ्कीर्णाःपापयोनय. फीटा पिपीलिकाश्चैव येचान्ये मृगपक्षिणः । कालेन निधनं प्राप्ता अविमुक्तेश्णुप्रिये! चन्द्राईमौलिन सर्वे ललाटाक्षा वृषध्वजा । शिवे ममपुरे देवि ! जायन्तेतत्र मानधा' अकामो या सकामोवापितिर्यग्गतोऽपि वा। अविमुक्तेत्यजन्मापानममलोकमहीयते अविमुक्त यदागच्छेत्कदावित्कालपर्ययात् । अश्मनाचरणी यध्या तत्रैव निधनं व्रजेत् अविमुक्तं गतोदेवि ! ननिर्गच्छेत्तत पुन. । सोऽपिमत्पदमाप्नोति नात्रकार्याविचारणा घस्त्रप्रदं स्द्रकोर्टि सिद्धेश्वरमहालयम् । गोकर्णं रुद्रकर्णञ्च सुवर्णाक्षं तथैव च ॥२५॥ अमरञ्च महाकाल तथा कायावरोहणम् । पतानि हि पवित्राणि सान्निध्यात् सन्ध्ययोर्द्वयोः ॥ २६ ॥ कालिञ्जरधनञ्चैव शङ्ककणं स्थलेश्वरम् । एतानि च पवित्राणि सान्निध्याद्धि ममप्रिये अविमुक्त घरारोहे ! त्रिसन्ध्यं नात्र सशयः ॥ २७ ॥ हरिश्चन्द्र पर गुह्य गुह्यमानातकेश्वरम् । जलेश्वरं परं गुह्य गुह्यं श्रीपर्वतं तथा ॥२८॥ महालयं तथा गुह्य कृमिवण्डेश्वरं शुभम् । गुह्यातिगुह्य केदारं महाभैरवमेव च ॥२६॥ अष्टावेतानि स्थानानिसान्निध्याद्धि ममप्रिये । अविमुक्तवरारोहे! त्रिसन्ध्यंनात्र संशयः यानि स्थानानि श्रूयन्तेत्रिषुलोकेषु सुव्रते । । अविमुक्तस्य पादेषु नित्यंसन्निहितानिवै अथोत्तरांकथादिव्यामचिमुक्तस्यशोभने।स्फन्दोवक्ष्यतिमाहात्म्यमृपीणांभावितात्मनाम् इति श्रीमत्स्यपुराणे पाराणसीस्थक्षेत्रमाहात्म्यवर्णनं नामा- शीत्यधिकशततमोऽध्यायः।
एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः वाराणसीमाहात्म्यम् । सूत उवाच। कैलासपृष्ठमासीनं स्कन्दं ब्रह्मविदाम्वरम् । पृच्छन्ति ऋषयः सर्वे सनकाद्यास्तपोधनाः तथा राजर्पय. सर्वे येभकास्तु महेश्वरे । हित्वंस्कन्द ! भूलोके यत्रनित्यंभवःस्थितः स्कन्द उवाच। महात्मा सर्वभूतात्मा देवदेवः सनातनः । घोररूपं समास्थाय दुष्करं देवदानवैः ॥३॥ आभूतसम्प्लवं यावत् स्थाणुमूतस्थितः प्रभु । गुह्यानां परमं गुह्यमविमुक्तमिति स्मृतम् अविमुक्ते सदा सिद्धियंत्रनित्यंव्यवस्थितः । अस्य क्षेत्रस्य माहात्म्यं यदुक्तत्वीश्वरेणतु स्थानान्तरं पवित्रञ्च तीर्थमायतनं तथा। श्मशानसंस्थितं वेश्म दिव्यमन्तहितञ्च यत् भूलोकेनैव संयुक्तमन्तरिक्षे शिवालयम् । अयुक्तास्तु न पश्यन्ति युक्ताः पश्यन्तिचेतसा ब्रह्मचर्यव्रतोपेता. सिद्धा वेदान्तकोविदा. । आदेहपतनाद्यायत् तत्क्षेत्र यो न मुञ्चति ॥ ब्रह्मचर्यव्रतः सम्यक्सम्यगि,मुखर्भवेत् । अपापात्मागतिः सर्या यातूकाबक्रियावताम् यस्तत्र निवसेद्विप्रो संयुक्तात्मासमाहितः । त्रिकालमपि भुक्षानो घायुभक्षसमोभवेत निर्मपमात्रमपि यो छविमुक्ते तु भक्तिमान् । ब्रह्मचर्यसमायुक्त' परमं प्राप्नुयात्तपः ॥ यत्र मास घसेद्धीरो लम्बाहारो जितेन्द्रियः। सम्यक् तेन व्रतं चीणं दिव्यं पाशुपतं महत् ॥ १२ ॥ जन्ममृत्युभयन्ती, स याति परमाङ्गतिम् । नैश्रेयसींगति पुण्यां तथा योगगतिजेत् न हि योगगतिदिव्या जन्मान्तरशतैरपि । प्राप्यते क्षेत्रमाहात्म्यात् प्रभावाच्छङ्करस्यतु ग्राहा योऽभिगच्छेत्तु अविमुक्तं कदाचन। तस्य क्षेत्रस्य माहात्म्यावरह्महत्यानिवर्तते भादेहपतनाद्यावत् क्षेत्रं यो न विमुञ्चति । न केयलं ब्रह्महत्या प्राकृता च निवर्तते ॥ प्राप्य विश्वेश्वरं देवं न सा भूयोऽमिजायते । अनन्यमानसोभूत्या यो विमुक्तनमुञ्चति .
, * मत्स्यपुराणम् * [व्यशीत्यधिकशततमो तस्य देवः सदा तुष्टः सर्वान् कामान् प्रयच्छति । द्वारं यत् साङ्ख्ययोगानां स तत्र घसति प्रभुः ॥ १८ ॥ सगणो हि भवो देवो भक्तानामनुकम्पया। अविमुक्तं परं क्षेत्रमविमुक्त परा गतिः ॥ अविमुक्त परा सिद्धिरविमुक्ते परं पदम् । अविमुक्तं निपेवेत देवपिंगणसेवितम् ॥ २०॥ यदीच्छेन्मानवोधीमान् न पुनर्जायतेकचित् । मेरोः शक्तो गुणानवक्तुंद्रीपानाञ्चतथैवच समुद्राणाञ्च सर्वेषां नाचिमुक्तस्य शक्यते । अन्तकाले मनुष्याणां छिद्यमानेषु मर्मसु ॥ वायुना प्रेर्यमाणानां स्मृति घोपजायते । अविमुक्त ह्यन्तकाले भक्तानामीश्वरः स्वयम् कर्मभिः प्रेर्यमाणानां कर्णजापं प्रयच्छति । मणिका त्यजन्देहं गतिमिष्टां व्रजेन्नरः ईश्वरप्रेरितो याति दुष्प्रापामकृतात्मभिः । अशाश्वतमिदं ज्ञात्वा मानुषं बहुकिल्विषम् अविमुकं निपेवेत संसारभयमोचनम् । योगक्षेमप्रदं दिव्यं बहुविघ्नविनाशनम् ॥ २६ ॥ विम्नश्वालोड्यमानोऽपियो विमुक्तंन मुञ्चति।स मुञ्चति जरामृत्युंजन्मचैतदशाश्वतम् अविमुक्त प्रसादात्तु शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे वाराणसीमाहात्म्यवर्णनं नामैकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः । द्रव्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः वाराणमीमाहात्म्यम् । देव्युवाच । हिमवन्तं गिरि त्यत्तवा मन्दरं गन्धमादनम् । कैलासं निषधञ्चैव मेरुपृष्ठं महाद्युतिम् ।। रम्यं त्रिशिखरज्वैव मानसं सुमहागिरिम् । देवोद्यानानि रम्याणि नन्दनं धनमेव च ॥ सुरस्थानानिमुख्यानितीर्थान्यायतनानिव । तानिसर्वाणिसन्त्यज्य अविमुक्तेरति:कथम् किमत्र सुमहत् पुण्यं परं गुह्यं पदस्व मे । येन त्वं रमसे नित्यं भूतसम्पद्गुणैर्युतः ॥ क्षेत्रस्य प्रवरत्पञ्च ये व यत्र निवासिनः । तेपामनुग्रहः कश्चित्तत् सर्व धूहि शङ्कर ! ॥
ऽध्याय.] * धाराणसीमाहात्म्यम् * ५३७ शङ्कर उवाच। अत्यद्भुतमिमं प्रश्नं यत्त्वं पृच्छसि भामिनि । तत् सर्व सम्प्रवक्ष्यामि तन्मेनिगदत शृणु वाराणस्यांनदीपुण्या सिद्धगन्धर्वसेविता । प्रविष्टा त्रिपया गडा तस्मिनक्षेत्रेममप्रिये! मामेवप्रीतिसन्तुष्टाकृत्तिवासाश्च सुन्दरि ! सर्वेपांचैवस्थानानां स्थानन्तत्तुयथाधिकम् तेन कार्येण सुश्रोणि ! तस्मिन् स्थाने रतिर्मम । तस्मिन् लिङ्गे च सान्निध्यं मम देवि ! सुरेश्वरि ! ॥ ६ ॥ क्षेत्रस्यच प्रवक्ष्यामिगुणान् गुणवताम्बरे । यान् श्रुत्वा सर्वपापेभ्योमुच्यतेनात्रसंशयः यदि पापो यदि शठो यदि वा धार्मिकोनरः । मुच्यते सर्वपापेभ्यो हविमुक्तबजेद्यदि प्रलये सर्वभूतानां लोके स्थावरजङ्गमे । न हि त्यक्ष्यामि तत् स्थानं महागणशतैर्वृत. यत्र देवाः सगन्धर्वाः सयक्षोरगराक्षसा । पक्त्रं मम महाभागे ! प्रविशन्ति युगक्षये । तेषां साक्षादहं पूजां प्रतिगृह्णामि पार्वति ! सर्पगुह्योत्तमं स्थानं मम प्रियतमं शुभम् ॥ धन्याः प्रविष्टा सुश्रोणि ! ममभक्ता द्विजातयः । मद्भक्तिपरमा नित्यं येमद्भक्तास्तुतेनराः तस्मिन् प्राणान् परित्यज्य गच्छन्ति परमाङ्गतिम् । सदा जयति देण सदा दानं प्रयच्छति ॥ १६ ॥ सदा तपस्वी भवति अविमुक्तस्थितोनरः । यो मां पूजयते नित्यं तस्य तुष्यामहं प्रिये सर्वदानानि यो दद्यात् सर्वयज्ञेषु दीक्षितः । सर्वतीर्थाभिषिक्तस्य सप्र पोत मामिह ॥ अविमुक्तं सदादेवि ! येवजन्तिसुनिश्चिताः । ते तिष्ठन्तीहसुश्रोणि ! त्वद्दताश्चत्रिविष्टपे मत्प्रसादात्तु ते देवि ! दीव्यन्ति शुभलोचने ! दुर्द्धराश्चैव दुर्द्धर्षा भवन्ति विगतवराः अविमुक्तं शुभं प्राप्य मद्भक्ताः कृतनिश्चयाः । निर्धूतपापा विमला भवन्ति विगतचराः।। पार्वत्युवाच । दक्षयज्ञस्त्वया देव ! मत् प्रियार्थे निपूदितः । अपिमुक्तगुणानान्तु न तृप्तिरिह जायते ईश्वर उवाच। क्रोधेन दक्षयज्ञस्तु त्वत् प्रियार्थेविनाशित' महाप्रिये! महाभागे! नाशितोऽयंवरानने अविमुक्ते यजन्ते तु मद्भक्ताः कृतनिश्चयाः । न तेषां पुनरावृत्तिः फल्पकोटिशतैरपि ।।
* मत्स्यपुराणम् * [द्वयशीत्यधिकशततमो देव्युवाच । दुर्लभास्तु गुणा देव ! अविमुक्ते तु कीर्तिता । सर्वा स्तन्मम तत्वेन कथयस्यमहेश्वर कौतूहल महादेव । हृदिस्थ मम घर्तते । तत् सर्व मम तत्वेन आख्याहि परमेश्वर ।। ईश्वर उवाच । अक्षया यमराश्चैव घदाहाश्च भवन्ति ते । मत् प्रसादाद्वरारोहे । मामेव प्रविशन्ति वै। ब्रूहि ब्रूहि विशालाक्षि । किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि । देव्युवाच । अविमुक्त महाक्षेत्रे अहो पुण्यमहो गुणा ॥ २८ ॥ न तृप्तिमधिगच्छामि हि देव ' पुनर्गुणान् । ईश्वर उवाच। माहेश्वरि । परारोहे | पृणु तास्तु मम प्रिये ! ॥२६॥ अविमुक्तेगुणायेतु तथान्यानपि तच्छृणु। शाकपर्णा शिनो दान्ता सप्रक्षाल्यामरीचिपाः दन्तोलूखलिनश्चान्ये अश्मकुट्टास्तथापरे । मासि मासि कुशाग्रेण जलमास्वादयन्ति वै वृक्षमूलनिकेताश्च शिलाशय्यास्तथापरे । आदित्यवपुप सर्वे जितक्रोधा जितेन्द्रिया एन बहुविधैर्धमॅग्न्यत्र चरितव्रता । त्रिकालमपि भुञ्जाना येऽविमुक्तनिवासिन ॥३३॥ तपश्चरन्ति चान्यत्र कला नाईन्ति पोडशीम् । येऽविमुक्त घसन्तीह स्वर्गे प्रतिवसन्तिते मत्सम पुरुषो नास्ति त्वत्समा नास्तियोषिताम् | अविमुक्तसम क्षेत्रनभूतनभविष्यति अविमुक्त परो योगो ह्यविमुक्ते परा गति । अविमुक्ते परो मोक्ष क्षेत्र नैवास्तितादृशम् पर गुह्य प्रवक्ष्यामि तत्वेन वरवर्णिनि । अविमुक्त महाक्षेत्रे यदुक्त हि मया पुरा ॥३७ जन्मान्तरशतैर्देवि योगोऽय यदि लभ्यते । मोक्ष शतसहस्रेण जन्मना लभ्यते न पा अविमुक्तेन सन्देहो मद्भक्त कृतनिश्चय । एकेन जन्मना सोऽपि योग मोक्ष च विन्दति अविमुक्ते नरा देवि ! ये व्रजन्ति सुनिश्चिता । ते विशन्ति परस्थानमोक्ष परमदुर्लभम् पृथिव्यामीद्गुश क्षेत्र नभूतनभविष्यति । चतुमूर्ति सदा धर्मो तस्मिन्सन्निहित प्रिये ! चतुर्णामपि वर्णाना गतिस्तु परमा स्मृता ।
ध्यायः * पाराणसीमाहात्म्यम् + देव्युवाच। ध्रुता गुणास्ते क्षेत्रस्य इह वान्यत्र ये प्रमो! ॥४२॥ घदस्व भुवि विप्रेन्द्राः कंघा यज्ञैर्यजन्ति ते । ईश्वर उवाच ! दृष्ट्या चैव तु मन्त्रेण मामेव हि यजन्ति ते ॥ ४३ ॥ न तेषांभयमस्तीतिभवंरुद्रं यजन्ति यत् । अमन्त्री मन्त्रकोदेवि ! द्विविधोविधिरुच्यते साड्वयं चैयाथ योगश्च द्विविधो योग उच्यते । सर्वभूतस्थित यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ॥ ४५ ॥ सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि धर्तते । आत्मौपम्येन सर्वत्र सर्वच मयि पश्यति तस्याहं न प्रणश्यामि सच मे न प्रणश्यति । निर्गुण सगुणोवापियोगश्च कथितोभुवि सगुणश्चैव विज्ञेयो निर्गुणो मनसः परः । एतत्ते कथितं देवि ! यन्मान्त्व परिपृच्छसि देव्युवाच या भक्ति स्त्रिविधा प्रोक्ता भक्तानां यहुधा त्वया । तामहं श्रोतुमिच्छामि तत्वतः कथयस्व मे ॥ ४६ ।। ईश्वर उवाच । शृणु पार्वति! देवेशि ! भक्तानां भक्तिवत्सले । प्राप्य सांख्यञ्च योगश्च दुःयान्तञ्च नियच्छति ॥५०॥ सदा यः सेचते भिक्षा ततो भवति रञ्जितः । रञ्जनात् तन्मयो भूत्या लीयने स तु मत्तिमान् ।। ५३ ।। शास्त्राणान्तु घरारोह ! योफारणदर्शिनः । नमां पश्यन्तितेदेवि! मानवालविवादिनः परमार्थज्ञानतृप्ता युक्ताजानन्ति योगिनः । विद्यया विदितात्मानो योगम्यच द्विजातयः प्रत्याहारेण शुद्धारमा नान्यथा चिन्तये। तत् । नुटिश्च परमां प्राप्य योगं मोक्षं परं तथा ॥ ५४॥ त्रिमिर्गुणैः समायुक्तो भानपान् पश्यतीह माम् ।
* मत्स्यपुराणम् * [घशीत्यधिकशततमी एतत्ते कथितं देवि ! किमन्यच्छ्रोतुमर्हसि ॥ ५५ ॥ भूय एव घरारोहे ! कथयिष्यामि सुव्रते ! । गुह्यं पवित्रमथवा यचापि हृदि घर्तते । तत्सर्वं कथयिष्यामि शृणुष्वेकमनाः प्रिये । देव्युवाच । त्यद्रूपं कीदृशं देव ! युक्ताः पश्यन्ति योगिनः ॥ ५७ ॥ पश्यन् मे संशयं ब्रूहि नमस्ते सुरसत्तम! । श्रीभगवानुवाच । अमूर्त चैव मूर्तञ्च ज्योतीरूपं हि तत् स्मृतम् ।। ५८॥ तस्योपलब्धिमन्विच्छन् यत्न कार्यों विजानता । गुणैर्वियुक्तोभूतात्माएवंवनशक्यते शक्यते यदि वक्तुं वै दिव्यैर्वशतैर्न चा। देव्युवाच । किं प्रमाणन्तु तत् क्षेत्रं समन्तात् सर्वतो दिशम् ॥ ६० ॥ यत्र नित्यं स्थितो देवो महादेवो गणैर्युतः । ईश्वर उचाव। द्वियोजनन्तु तत्क्षेत्र पूर्वपश्चिमतः स्मृतम् ।। ६१ ॥ अर्द्धयोजनविस्तीर्णं तत्क्षेत्रं दक्षिणोत्तरम् । वाराणसी तदीया च यावच्छुक्लनदी तु वै॥ भीष्मचण्डिकमारभ्य पर्वतेश्वरमन्तिके । गणा यत्रापतिष्ठन्ति सनियुका विनायका' कृष्माण्डराजःशम्भोश्वजयन्तश्चमदोत्कटाः । सिंहव्याघ्रमुखा केचिद्विकटाःकुजवामनाः यत्र नन्दी महाकालश्चण्डघण्टो महेश्वरः। दण्डचण्डेश्वरश्चैव घण्टाकर्णो महायल. ॥ एते चान्ये च बहवो गणाश्वैव गणेश्वराः। महोदरा महाकाया धनशक्तिधरास्तथा ॥ रक्षन्ति सततं देवि !'ह्यविमुक्तं तपोवनम् । द्वारे द्वारे च तिष्ठन्ति शूलमुद्गरपाणयः ६७ सुवर्णश्वी रौप्यखुराञ्चलाजिनपयस्विनीम् । वाराणस्यान्तु यो दद्यात्त्रिवर्णा कालोचने ! ॥ ६८॥ 'गां दत्त्वा तु घरारोहे ! ब्राह्मणे वेदपारगे। आसप्तमं फुलं तेन तारितं नात्र संशयः ॥
ऽध्यायः] * घाराणस्यां दानमाहात्म्यम् * यो दद्याद् ब्राह्मणे किञ्चित् तस्मिन् क्षेत्रे घरानने ! । कनकं रजतं घस्त्रमन्नायं बहु विस्तरम् ॥ ७० ॥ अक्षयं चाव्ययं चैव स्यातां तस्य सुलोचने ! । शृणुतत्वेनतीर्थस्य विभूति व्युष्टिमेवच तस्मात्या महाभागे ! भवन्ति निरुजा नराः । दशानामश्वमेधानां फलं प्राप्नोतिमानवः तदयानोति धर्मात्मा तत्र स्मात्या वरानने ! । बहुस्वरपेच यो दद्याद् ब्राह्मणे वेदपारगे शुभाङ्गतिमवाप्नोति अग्निपच्चैव दीप्यते । वाराणसीजाह्नवीभ्यां सङ्गमे लोकविश्रुते॥ दत्त्वान्नं च विधानेन न स भूयोऽभिजायते । एतत्ते कथितं देवि! तीर्थस्यफलमुत्तमम् उपचासन्तु य. कृत्वा विप्रान् सन्तर्पयन्नरः । सीबामणेश्च यज्ञस्य फलं प्राप्नोतिमानवः एकाहारस्तु यस्तिष्ठन्मासं तत्र वरानने! । यायजीवरतं पापं सहसा तस्य नश्यति ॥ अग्निप्रवेशं ये फुर्पुरविमुक्ने विधानतः । प्रविशन्ति मुपन्ते मे निःसन्दिग्धं घरानने ! ॥ दशौघणिकं पुष्पं योऽविमुक्त प्रयच्छति । अग्निहोत्रफलं धूपे गन्धदाने तथा Zणु ॥ भूमिदानेन तत्तुल्यं गन्धदानफलं स्मृतम् । संमार्जने पञ्चशतं सहस्त्रमनुलेपने ॥ ८ ॥ मालया शतसाहस्रमनन्त गीतवाद्यत.। देव्युवाच। अत्यद्भुतमिदं देव स्थानमेतत् प्रकीर्तितम् ॥ ८ ॥ रहस्यं श्रोतुमिच्छामि यदर्थन्त्वं न मुश्चसि । ईश्वर उवाच । आसीत् पूर्व परारोह ! ब्राह्मणस्तु शिरो घरम् ॥ ८२ ॥ पञ्चमं शृणु सुश्रोणि ! जातं फाञ्चनसमभम् । ज्यलत्तत पञ्चमं शीपंजातंतस्यमहात्मनः तदेयमापीदेवि ! जन्म जानामि ते पदम् । तत ग्रोधपरीतेन संरतनयनेन च neen पामांगुष्ठनपाप्रेण छिन्नं तस्य शिरो मया । प्रायोपाच। सदा निरपराधस्य शिरश्छिन्नं त्यया मम ॥ ८५॥ सम्मारछापसमायक्तः फपाली त्वं भविष्यसि । महन्याकुलोभूत्यारचरतीर्थानिभूतले * मत्स्यपुराणम् * द्विघशीत्यधिकशततमी 'ततोऽहंगतवान्देवि! हिमवन्तंशिलोच्चयम् । तत्र नारायण श्रीमान्मयाभिक्षांप्रयाचितः ततस्तेन स्वकं पावं नखाग्रेण विदारितम् । स्रवतो महतीधारा तस्य रक्तस्य निःसृता प्रयाता सातिविस्तीर्णा योजनार्द्धशतन्तदा । न संपूर्ण कपालन्तु धोरमद्भुतदर्शनम् ॥ दिव्यं वर्षसहस्रन्तु सा व धारा प्रवाहिनी । प्रोवाच भगवान्विष्णु कपाले कुत ईदृशम् आश्चर्यभूतं देवेश ! संशयो हृदि वर्तते । कुतश्च सम्भधो देव ! सर्व मे ब्रूहि पृच्छतः ॥ देवदेव उवाच । श्रूयतामस्य हे देव ! कपालस्य तु सम्भवः । शतं वर्षसहस्राणां तपस्तप्त्वासुदारुणम् । ब्रह्माऽसृजद्वपुर्दिव्यमद्भुतं लोमहर्षणम् । तपसश्च प्रभावेण दिव्यं काञ्चनसन्निभम् ॥६३ ज्वलत्तत् पञ्चमं शीपं जातं तस्य महात्मनः । निकृत्तन्तं मया देव ! तदिदंपश्यदुर्जयम् यत्र यत्र च गच्छामि कपालं तत्र गच्छति । एवमुक्तस्ततो देवः प्रोवाव पुरुषोत्तमः ॥ श्रीभगवानुवाच । गच्छ गच्छ स्वकंस्थानब्रह्मणस्त्वंप्रियङ्कुरु । तस्मिन्स्थास्यतिभद्रन्तेकपालंतस्यतेजसा ततःसर्वाणितीर्थानिपुण्यान्यायतनानिच । गतोऽस्मिपृथुलश्रोणि ! नक्कचित् प्रत्यतिष्टत ततोऽहं समनुप्राप्तो ह्यविमुक्त महाशये । अवस्थितः स्वके स्थाने शापश्च विगतो मम विष्णुप्रसादात् सुश्रोणि! कपालं तत् सहस्रधा। स्फुटितं बहुधा जातं स्वप्नलब्धं धनं यथा ॥REn ब्रह्महत्यापहं तीर्थ क्षेत्रमेतन्मया कृतम् । श्मशानमेतद्भद्रं मे देवानां घरणिनि ॥१०॥ कालो भूत्वा जगत् सर्व संहरामि सृजामिव । देवेशि ! सर्वगुह्यानांस्थानप्रियतरंमम मद्भक्तास्तत्र गच्छन्तिविष्णुभक्तास्तथैव च । येभक्ताभास्करदेवि ! लोकनाथे दिघाफर तत्रस्थो यस्त्यजेद्दे मामेव प्रविशेत्तु सः । देव्युवाच । अत्यद्भुतमिदं देव ! यदुक्तं पद्मयोनिना ॥१०३।। त्रिपुरान्तफरस्थानं गुह्यमेतन्महाद्युते । सन्निधानात्तु ते सर्वे कलां नार्हन्ति पोडशीम् यत्र तिष्ठति देवेशो यत्र तिष्ठति शङ्करः । गङ्गातीर्थसहस्राणां तुल्या भवति घा न घ॥
उध्यायः] * वाराणसीक्षेत्रमाहात्म्यम् * त्वमेव भक्तिदेवेश । त्वमेव गतिरुत्तमा । ब्रह्मादीनान्तु ते देव ! गतिरुक्ता सनातनी। श्राव्यते यद् द्विजातीनां भक्तानामनुकम्पया ॥१०६॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे शिवपार्वतीसंवादे वाराणसीमाहात्म्यवर्णनं नाम द्वयशीत्यधिकशततमोऽध्यायः । त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः वाराणसीक्षेत्रमाहात्म्यम् । महेश्वर उवाच। सेवितं बहुमिः सिद्धेरपुनर्भवकाक्षिभिः । विदित्वा तु परं क्षेत्रमचिमुक्तनिवासिनाम् तद्गुह्यं देवदेवस्य तत्तीथं तत्तपोवनम् । परं स्थानं तु ते यान्ति सम्भवन्ति न ते पुनः माने विहितनिष्ठानां परमानन्दमिच्छताम् । या गतिविहिता सद्भिः साविमुक्ते मृतस्य तु भवस्य प्रीतिरतुला ह्यविमुक्ते ह्यनुत्तमा । असपेयं फलं तत्र प्रक्षया च गतिर्भवेत् ॥ परं गुह्यं समारयातं श्मशानमिति संज्ञितम् । अविमुक्तं न सेवन्ते घञ्चितास्ते नरा भुवि ॥५॥ अविमुक्ते स्थित पुण्यैःपांसुभिर्वायुनेरित । अपिदुष्कृतकार्माणोयास्यन्ति परमाङ्गतिम् मेरमन्दरमात्रोऽपि राशिः पापस्य फर्मणः । अविमुक्तं समासाद्यतत् सर्वनजतिक्षयम् श्मशानमिति विख्यातमविमुक्तं शिवालयम् । तद्गुह्यं देवदेवस्य तत्तीथं तत्तपोवनम् वत्र ब्रह्मादयो देवा नारायणपुरोगमाः । योगिनश्च तथा साध्या भगवन्तं सनातनम् ॥ उपासन्ते शिवं मुक्ता मद्भक्ता मत्परायणाः । या गतिनितपसां या गतिर्यशयाजिनाम् 'अतिमुक्ते मृतानान्तु सा गतिविहिता शुभा । संहारश्च फारस्तस्मिन् ब्रह्मादयः सुराः ॥११॥ सम्राचिराण्मया लोका जायन्ते पुनर्मचाः । महर्जनस्तपश्चैव सत्यलोकस्तथैव व मनस परमोयोगोभूतमध्यमवस्य च । ब्रह्मादिम्यापरान्तस्ययोनी सायादिमोक्षयोः । K ५४४ * मत्स्यपुराणम् * [व्यशीत्यधिकशततमो येऽचिमुक्तं न मुञ्चन्ति नरास्ते नैव चिन्तिताः। उत्तमंसर्वतीर्थानां स्थानानामुत्तमञ्चयत् क्षेत्राणामुत्तमञ्चैव श्मशानानां तथैव च। तटाकानाञ्च सर्वेषां कृपानां स्रोतसांतथा॥ शैलानामुत्तमञ्चैतत्तडानां तथोत्तमम् । पुण्यकृद्भवभक्तश्च ह्यविमुक्तन्तु सेव्यते ॥१६॥ ब्रह्मणः परमं स्थानं ब्रह्मणाध्यासितञ्च यत् । ब्रह्मणा सेवितं नित्यं ब्रह्मणा चैच रक्षितम् ॥१७॥ अव सप्तभुवनं काञ्चनो मेरुपर्वतः । मनसः परमो योगः प्रीत्यर्थं ब्रह्मणः स तु ॥१८ ब्रह्मा तु तत्र भगवास्त्रिसन्ध्यंचेश्वरेस्थितः । पुण्यात्पुण्यतमंक्षेत्रपुण्यकृद्धिनिषेवितम् आदित्योपासनं कृत्वा विप्राश्चामरताङ्गताः। अन्येऽपियेत्रयोवर्णाभवभक्त्यासमाहिता. अविमुक्तेतनुन्त्यत्स्वागच्छन्तिपरमाङ्गतिम् । अष्टोमासाविहारस्ययतीनांसंयतात्मनाम् एकत्र चतुरो मासान् मासौ पा निवसेत् पुनः। अविमुक्तेप्रविष्टानांविहारस्तु न विद्यते न देहो भविता तत्र दृष्टं शास्त्र पुरातने । मोक्षो ह्यसंशयस्तत्र पञ्चत्वन्तु गतस्य वै । स्त्रियः पतिव्रतायाश्चभवभक्ता समाहिताः। अविमुक्तेविमुक्तास्तायास्यन्ति परमाङ्गतिम् अन्या याः कामवारिण्यः स्त्रियो भोगपरायणाः । फालेन निधनं प्राप्ता गच्छन्ति परमाङ्गतिम् ॥२५॥ यत्र योगश्च मोक्षश्च प्राप्यते दुर्लभो नरैः । अविमुक्तं समासाद्य नान्यद्गच्छेत्तपोवनम् सर्वात्मना तपः सेव्यं ब्राह्मणैर्नात्र संशयः । अविमुक्ते घसेद्यस्तु मम तुल्यो भवेन्नरः यतो भया न मुक्तं हि त्वविमुक्तं तत स्मृतम् । अविमुक्तं न सेचन्ते मूढायेतमसावृताः विण्मूत्ररेतसां मध्ये ते घसन्तिपुन पुन । कामक्रोधश्चलोभश्च दम्भस्तम्भोऽतिमत्सरः निद्रा तन्द्रातथाऽऽलस्यंपैशून्यमितितेदश । अविमुक्तेस्थिताविना.शक्रणविहिताःम्वयम्' विनायकोपसर्गाश्च सततं मूर्ध्नि तिष्ठति । पुण्यमेतद्भवेत् सर्व भक्तानामनुकम्पया ॥ परं गुह्यमिति ज्ञात्वा ततः शास्त्रानुदर्शनात् । व्याहृतं देवदेवस्तु मुनिभिस्तत्वदर्शिभिः ॥३२॥ मेदसा विप्लुता भूमिरविमुक्त तु घर्जिता । पूता समभवत् सर्वा महादेवेन रक्षिता ॥ संस्कारस्तेन क्रियते भूमेरन्यत्र सूरिभिः । ये भक्का परदं देवमक्षरं परमं पदम् ॥३४॥ .
ऽध्यायः] * पाराणसीमाहात्म्यम् * देवदानवगन्धर्षयक्षरक्षोमद्दोरगाः । अधिमुक्तमुपासन्ते सन्निष्ठास्तत्परायणाः ॥३५॥ ते विशन्ति महादेवमाज्याहुतिरिधानलम् । तं वै प्राप्य महादेवीमीश्वराध्युपितं शुभम् अविमुक्तं कृतार्थोऽस्मीत्यात्मानमुपलभ्यते । ऋषिदेवासुरगण पहोमपरायणः ॥३७॥ यतिमिक्षिकामेश्च ह्यविमुक्तं निपेव्यते । नाविमुक्त मृतः कश्चिन्नरकं याति किल्विषी ॥३८॥ ईश्वरानुगृहीता हि सर्वे यान्ति पराङ्गतिम् । द्वियोजनमयाईञ्च तत् क्षेत्र पूर्वपश्चिमम् ॥ अर्दयोजनविस्तीर्ण दक्षिणोत्तरतः स्मृतम्। पाराणसी तदीया च यायच्छुक्लनदी तु वै एतत् क्षेत्रस्य विस्तारप्रोक्तोदेवेनधीमता। लब्ध्यायोगञ्चमोक्षञ्चकाङ्क्षन्तोशानमुत्तमम् अविमुक्तं न मुञ्चन्तितन्निष्ठास्तत्परायणाः । तस्मिन्यसन्तियेमानतेशोच्या.कदाचन योगक्षेत्रं तपःक्षेत्र सिद्धगन्धर्वसेवितम् । सरितः सागराः शैला नाविमुक्तसमाभुवि ।। भूलोंके चान्तरिक्षे च दिवि तीर्थानि यानि च । अतीत्य वर्तते चान्यदविमुक्तं प्रभावतः ॥४॥ । तु ध्यानं समासाद्य मुक्तात्मान'समाहिताः । सन्नियम्येन्द्रियग्रामंजपन्तिशतरुद्रियम् भविमुक्ते स्थिता नित्यं कृतार्थास्ते द्विजातयः । भवभक्तिसमासाद्यरमन्तेतु सुनिश्चिताः संहृत्य शक्तित: कामान् विषयेभ्यो यहिः स्थिता । शक्तितः सर्वतो मुक्ताः शक्तितस्तपसि स्थिताः ॥४॥ करणानीह चात्मानमपुनर्भवभाविताः । तं वै प्राप्य महात्मानमीश्वरन्निर्भयाः स्थिताः न तेषां पुनरावृत्तिः फल्पकोटिशतैरपि । अयिमुक्त तु गृप्यन्ते भवेन विभुना स्वयम् उत्पादितं महाक्षेत्रं सिध्यन्ते यत्र मानवाः । उद्देशमात्रं फथिता अविमुक्गुणास्तथा समुद्रस्येव रवानामविमुक्तस्य विस्तरम् । मोहनं तदभकानां भक्तानां भक्तिपर्धनम् ।। मूदास्ते तु न पश्यन्ति श्मशानमिति मोहिताः। हन्यमानोऽपि यो विद्वान् घसेद्विमशनेरपि ॥५॥ स याति परमं स्थानं यत्र गत्वा न शोचति । जन्ममृत्युजरामुक्तपरंयाति शिवालयाम् यपुनर्मरणानां दि सागतिमोक्षफाक्षिणाम् । यांप्राप्यरतरत्यास्यादितिमन्येतपण्डित .
* मत्स्यपुराणम् * [चतुरशीत्यधिकशततमो न दानैर्न तपोभिर्वा न यह पि विद्यया । प्राप्यते गतिरिटा या ह्यविमुक्तेतु लभ्यते ॥ नानावर्णा विवर्णाश्च चण्डाला ये जुगुप्सिताः। किल्विपैः पूर्णदेहाश्च प्रष्टैःपातकैस्तथा ॥ ५६ ॥ भेषजं परमं तेषामविमुक्तं विदुर्बुधाः । जात्यन्तरसहस्रेषु ह्यविमुक्के म्रियेत यः ॥ ५७ ॥ भक्तो विश्वेश्वर देवे न स भूयोऽभिजायते । यत्र चेटं हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।। सर्वमक्षयमेतस्मिन्नविमुक्ते न संशयः । कालेनोपरता यान्ति भवे सायुज्यमक्षयम् ॥५६ कृत्वा पापसहस्राणि पश्चात् सन्तापमेत्य चै । यो चिमुक्त वियुज्येत स याति परमाङ्गतिम् ॥ ६ ॥ उत्तरं दक्षिणं चापि अयनं न विकल्पयेत् । सर्वस्तेषां शुभ कालो ह्यविमुक्त नियन्तिये न यत्र कालो मीमांस्यो शुभो घा यदि घा शुभः । तस्य देवस्य माहात्म्यस्थानमद्भुतकर्मणः ॥ ६२ ॥ सर्वेषामेव नाथस्य सर्वेपा विभुना स्वयम्। श्रुत्येदं ऋषयः सर्वे स्कन्देन कथितं पुरा अविमुक्ताश्रमं पुण्यं भावयेत् करणेः शुभैः ॥ ६३ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे घाराणसीमाहात्म्यवर्णनं नाम व्यशोत्यधिकशततमोऽध्यायः । चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः वाराणमीमाहात्म्यम् । सूत उवाच। अपिमुमदापुण्ये मास्तिकाः शुभदर्शनाः । विम्मयं पाम जमुईगंगद्दनिम्यनाः ॥१ ऊचुम्ने हुदमनसम्मन्दं धर्मपिदायरम् । ग्रामणोदेव! पौत्रस्त्वं ग्रामण्यो महान:प्रियः ग्रामणी प्रापिमाला मान्द्रो मामलोफरन् । प्रहरग्रामवारी त्वं प्रामादिनयत्सलः ग्रामनुल्योदपफरी मायनुन्य नमोऽम्नु ते । पयो मारितात्मानः धृत्ये पापनं महत् . ॥ .ऽध्यायः] * वाराणस्यां व्यासतपश्चर्यावर्णनम् * तत्यन्तुपरमं ज्ञातवज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते । स्वस्तितेऽस्तु गमिष्यामोभूलोक शहरालयम् यत्रासी सर्वभूतात्मास्थाणुभूतः स्थितःप्रभुः। सर्वलोकहितार्थायतपस्युग्रे व्यवस्थितः संयोज्य योगेनात्मानं रौद्रीं तनुमुपाश्रितः । गुह्यकैरात्मभूतस्तु आत्मतुल्यगुणैर्वृतः॥ ततो ब्रह्मादिभिर्देवैः सिद्धश्च परमर्पिमिः । विज्ञप्तः परया भक्त्या त्वत्प्रसादाद्गणेश्वर ! वस्तुमिच्छाम नियतमविमुक्त सुनिश्चिताः । एवं गुणे तथा मा विमुक्त घसन्ति ये धर्मशीला जितक्रोधा निर्ममा नियतेन्द्रियाः। ध्यानयोगपराः सिद्धिं गच्छन्ति परमाव्ययाम् ॥१०॥ योगिनो योगसिद्धाश्च योगमोक्षपदं विभुम् । उपासन्ते भक्तियुक्ताः शान्ता योगगतिलताः ॥ ११ ॥ स्थानं गुह्यं श्मशानानां सर्वेपामेतदुच्यते । न हि योगादृते मोक्षः प्राप्यते भुवि मानवैः भविमुक्ते तु बसता योगो मोक्षश्च सिध्यति । अनेन जन्मनैवेह प्राप्यते गतिरुत्तमा । एक एव प्रभावोऽस्ति क्षेत्रस्यपरमेश्वरि !! एकेन जन्मनादेवि ! मोक्षं पश्यन्त्यनुत्तमम् अविमुक्ते निवसता व्यासेनामिततेजसा । नैव लब्धा कचिदिक्षा भ्रममाणेन यत्नतः ॥ क्षुधाविष्टस्ततः कुद्धोऽचिन्तयंच्छापमुत्तमम् । दिनं दिनं प्रति व्यासः पण्मासं योऽवतिष्ठति ॥ १६ ॥ कयं ममेदं नगरं भिक्षादोपाधतन्त्विदम् । विप्रोवा क्षत्रियो घापिविधवा ब्राह्मणीपिया संम्रतासंस्मता पापिपरिपक्काः कथनमे । न प्रयच्छन्ति वै लोका ब्राह्मणाश्चर्यकारकम् एषां शापं प्रदास्यामि तीर्थस्य नगरस्यतु । तोर्थश्चातीर्थतां यातु नगरं शापयाम्यहम् मा भूत्रिपुरुषीविद्या मा भूत्रिपुरुषंधनम् । माभूत्रिपुरुषसत्यंच्यासोपाराणसीशपन् यविमुक्ते निवसतां जनानां पुण्यकर्मणाम् । विघ्नं सृजामि सर्वेषां येन सिदिनविद्यते व्यासचित्तं तदा सात्वा देघदेव उमापनिः । भीतमीतस्तदा गौरी तां मियां पर्यभाषत टए देवि! पचोमा यादशं प्रत्युपस्थितम् । कृष्णद्वैपायनः कोपान्छापं दातुं समुद्यतः देव्युपाच । निमय शपते मुद्धो घ्याप्तः येन प्रकोपिनः । किं कृतं भगम्तस्य येन शापं प्रयन्छति ५४८ * मत्स्यपुराणम् * [चतुरशीत्यधिकशततमो देवदेव उवाच । अनेन सुतपस्तप्तं यहून् घर्पगणान् प्रिये !। मौनिना ध्यानयुक्तेन द्वादशाव्दान् घरानने !! ततः क्षुधा सुसाता भिक्षामरितुमागतः । नैवास्य केनचिशिक्षा ग्रासार्द्धमपिभामिनि एवं भगवतः काल मासेत् पाण्मासिको मुनेः । ततः क्रोधपरीतात्मा शापं दास्यति सोऽधुना ॥ २७ ॥ यावन्नेप शपेत्तावदुपायस्तत्र चिन्त्यताम् । कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं प्रिये कोऽस्य शापान विभेति ह्यपि साक्षात् पितामहः । अदैवं दैवतं कुर्य्याद् दैवं चाप्यपदैवतम् ॥ २६ ॥ आधान्तु मानुपीभूत्वा गृहस्थाविहवासिनी । तस्य तृप्तिकरीभिक्षा प्रयच्छाधोधरानने एवमुक्त्वा ततो देवी देवेन शम्भुना तदा । व्यासस्य दर्शनं दत्त्वा कृत्वा पन्तु मानुपम् एहोहिभगवन्! सद्योभिक्षा ग्राहयसत्तम!। अस्मद्गृहे कदाचित्त्वं नागतोऽसिमहामुने! एतच्छ त्या प्रीतमना भिक्षा ग्रहीतुमागतः । भिक्षा दत्त्वा तु व्यासाय पनसाममृतोपमाम् ॥ ३३ ॥ अनास्वादितपूर्वासा भक्षिता मुनिनातदा। भिक्षा व्यासस्ततोभुत्तथा चिन्तयन्हष्टमानसः पचन्दे वरदं देवं देवीञ्च गिरिजा तदा । व्यासः कमलपत्राक्ष इदं वचनमब्रवीत् ॥३५॥ देयोदेवीनदी गङ्गामिष्टमन्न शुभागतिः । धाराणस्यां विशालाक्षि! घासः कस्यनरोवते एवमुक्तघा ततोव्यासो नगरीमवलोकयन् । चिन्तयानस्ततोभिक्षा हृदयानादकारिणीम् अपश्यत् पुरतो देव देवीञ्च गिरिजा तदा । गृहाङ्गणस्थित व्यासं देवदेवोऽब्रवीदिदम् इह क्षेत्रे न घस्तव्य क्रोधनस्त्वं महामुने!! एवं विस्मयमापन्नो देवं व्यासोऽब्रवीद्वचः - व्यास उद्यावा चतुर्दश्यामथाष्टम्यां प्रवेश दातुमर्हसि । एघमस्त्वित्यनुज्ञाय तत्रैवान्तरधीयत ॥४०॥ न तद् गृहंन सा देवी न देघो ज्ञायते क्ववित् । एवं त्रैलोक्यविख्यातः पुरा व्यासो महातपाः ॥ ४१ ॥ ज्ञात्वा क्षेत्रगुणान् सर्वान् स्थितस्तस्यैव पार्श्वतः। * । ऽध्यायः] पाराणसीमाहात्म्यम् * एवं व्यासं स्थितं ज्ञात्वा क्षेत्रं शंसन्ति पण्डिताः ॥ ४२ ॥ अविमुक्तगुणानान्तुकः समर्थो पदिष्यति । देवव्राह्मणविद्विष्णा देवभक्तिविडम्वकाः ॥ ब्रह्मनाश्च कृतनाव तथा नैष्कृतिकाश्च ये। लोकद्विपो गुरुद्विपस्तीर्थायतनद्रूपकाः ॥ सदा पापरताश्चैच ये चान्ये कुत्सिता भुवि । तेषां नास्तीति वासो चै स्थितोऽसो दण्डनायकः ॥४५॥ रक्षणार्थनियुक्त वै दण्डनायकमुत्तमम् । पूजयित्वा यथाशक्तया गन्धपुष्पादिधूपकैः ॥ नमस्कारं ततः कृत्वा नायकस्य तु मन्त्रवित् । सर्ववर्णावृते क्षेत्रे नानाविधसरीसृपे ।। ईश्वरानुगृहीता हि गति गाणेश्वरी गताः। नानारूपधरा दिव्या नानावेषधरास्तथा ॥ सुरा वैयेतु सर्वे च तनिष्ठास्तत्परायणाः । यदिच्छन्ति परं स्थानमक्षयन्तदयाप्नुयुः॥ परं पुरं देवपुराहिशिष्यते तदुत्तरं ब्रह्मपुरात् पुरस्थितम् । तपोवलादीश्वरयोगनिर्मितं न तत् समं ग्रहादिवौकसालयम् । मनोरमं कामगर्म ह्यनामयमतीत्य तेजांसि तपांसि योगवत ॥ ५० ॥ अधिष्ठितस्तु तत्स्थाने देवदेषो विराजते । तपांसि यानि तप्यन्ते बतानि नियमाश्च ये सर्वतीर्थाभिषेकं तु सर्वदानफलानि च । सर्पयज्ञेषु यत् पुण्यमविमुक्ते तदाप्नुयात् ॥ अत्तीत वर्तमानञ्चशानादज्ञानतोऽपि वा । सर्व तस्यचयत् पापं क्षेत्रं दृष्ट्वा पिनश्यति ॥ शान्तदन्तिस्तपस्तप्तं यत् किञ्चित् धर्मसंशितम् । सवं च तदयाप्नोति अविमुक्त जितेन्द्रियः ॥ ५४ ॥ अविमुक्त समासाद्य लिङ्गमर्चयते नर. । करपकोटिशतश्चापि नास्ति तस्य पुनर्भय ॥ अमरा पक्षपाश्चैव मोडन्ति भवसनिधी । क्षेत्रतीर्थोपनिषदमविमुक्त न संशयः॥५६॥ अविमुक्त महादेवमर्चयन्ति स्तुवन्ति चै। सर्वपापविनिर्मुकास्ते तिष्ठन्त्यजरामराः ॥५॥ सर्वफामा ये यशाः पुनरावृत्तिका. स्मृताः । अपिमुक्त मृता येव सर्वेते हानियतकाः प्रहनक्षत्रताराणां फालेन पतनाद्वयम् । अविमुक्त मृनानान्तु पतनं नैव विद्यते ॥ ५ ॥ कल्पकोटिसहस्तु फल्पको दिशतैरपि । न तेगं पुनरावृत्तिभृता ये क्षेत्र उत्तमे ।। संसारसागरे घोर भ्रमन्तः फालपर्ययात् । अधिमुक्तं समासाय गच्छन्ति मणिकणिकाम् ५५० * मत्स्यपुराणम् * [पञ्चाशीत्यधिकशततमो शात्या कलियुगं घोरं हाहाभूतमचेतनम् । अविमुक्तं न मुञ्चन्ति कृतार्थास्ते नरा भुवि ॥ ६२॥ अविमुक्तं प्रविष्टस्तु यदि गच्छेत्ततः पुनः । तदा हसन्ति भूतानि अन्योन्यं करताडनम् कामक्रोधेन लोभेन ग्रस्ता ये भुविमानवाः । निष्क्रमन्तेनरा देवि! दण्डनायकमोहिता. जपध्यानविहीनानां ज्ञानवर्जितचेतसाम् । ततो दु.खहतानाञ्च गतिराणसी तीर्थानां पञ्चकं सारं विश्वेशानन्दकानने । दशाश्वमेधं लोलार्कः फेशवो विन्दुमाधवः पञ्चमी तु महाश्रेष्ठा प्रोच्यते मणिकर्णिका । एभिन्तु तीर्थवर्यैश्च घमेते ह्यविमुक्तकम् एतद्वै कथितं सर्व देव्यै देवेन भाषितम् । अविमुक्तस्य क्षेत्रस्य तत् सर्व कथितं द्विजाः इति श्रीमत्स्यपुराणे घाराणसीमाहात्म्यसमाप्तिवर्णनं नाम चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्याय नृणाम् । पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः नर्मदामाहात्म्यप्रारम्भः। ऋषय ऊचुः । माहात्म्यमविमुक्तस्य यथावत् कथितन्त्वया । इदानीं नर्मदायास्तु माहात्म्यंवदसत्तम! यत्रोङ्कारस्य माहात्म्यं कपिलासङ्गमस्य च । अमरेशस्य चैवाहुर्माहात्म्यं पापनाशनम् कथं प्रलयकाले न नष्टा नर्मदा पुरा । मार्कण्डेयश्च भगवान्न विनष्टस्तदा किल । त्वयोक्तं तदिदं सर्व पुनर्विस्तरतो घद ॥ ३ ॥ सूत चवाच। एतदेव पुरा पृष्टः पाण्डवेन महात्मना । नर्मदायास्तु माहात्म्यं मार्कण्डेयो महामुनिः । उग्रेण तपसा युक्तो बनस्थो धनवासिना । पृष्टः पूर्वा महागाथां धर्मपुत्रेण धीमता। युधिष्ठिर उवाच । श्रुता मे विविधा धर्मास्त्वत्प्रसाद्विजोत्तम!। भूयश्चश्रोतुमिच्छामि तन्मेकथयमुव्रत!
ध्यायः * नर्मदामाहात्म्यवर्णनम् * कथमेपा महापुण्या नदी सर्वत्र विश्रुता । नर्मदा नाम विख्याता तन्मे ब्रूहि महामुने ! मार्कण्डेय उवाच नर्मदा सरितां श्रेष्ठा सर्वपापप्रणाशिनी । तारयेत् सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च ॥ नर्मदायास्तु माहात्म्यं पुराणे यन्मया श्रुतम् । तदेतद्धि महाराज ! तत्सर्वकथयामि ते पुण्या कनखले गङ्गा कुरक्षेत्रे सरस्वती । ग्रामे पा यदि चाऽरण्ये पुण्या सर्वत्र नर्मदा त्रिभिः सारस्वतं तोयं सप्ताहेन तु यामुनम् । सद्यः पुनाति गाड्डेयं दर्शनादेव नार्मदम् ॥ ११ ॥ फलिङ्गदेशे पश्चाद्धे पर्वतेऽमरकण्टके । पुण्ये च त्रिषु लोकेपु रमणीया मनोरमा ॥१२ सदेवासुरगन्धर्या ऋषयश्च तपोधनाः । तपस्तप्त्या महाराज ! सिद्धिञ्च परमाङ्गताः ॥ तर सात्वानरो राजन्नियमस्थो जितेन्द्रियः । उपोप्य रजनीमेकां कुलानां तारयेच्छतम् जलेश्वर नरः स्मात्या पिण्डं दत्त्वा यथाविधि । पितरस्तस्य तृप्यन्ति यायदाभूतसंप्ठवम् पर्वतस्य समन्तातु रदकोटिः प्रतिष्टिता । स्नात्या यः कुरुते तत्र गन्धमाल्यानुलेपनैः ॥ प्रीतस्तस्य भवेच्छयों रुद्रकोटिन संशयः । पश्चिम पर्वतस्यान्ते स्वयं देवो महेश्वरः ॥ तत्र मात्वा शुचिर्भूत्या ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः। पितृकार्यञ्च कुर्षीत विधिवनियतेन्द्रियः ॥१८॥ तिलोदन तय तर्पयेत् पितृदेवताः । आसप्तमं पुलं तस्य स्वर्ग मोदेत पाण्य ! ॥ पष्टिवर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते । अप्सरोगणसंकीर्णे सिद्धचारणसेविते ॥२०॥ दिव्यगन्धानुलिप्त दिव्यारङ्कारभूपितः । ततः स्वगात्परिभ्रष्टो जायते विपुले फुले ॥ धनधान् दानशील धार्मिकश्चैव जायते । पुनः स्मरति तत्तीपं गमनं तप रोचते ॥ कुलानि शारयेत् सप्त रदलोकं स गच्छति । योजनाना शतं साग्रं धूयते सरिदुत्तमा !! पिस्तारेण तु राजेन्द्र ! योजनद्वयमायता । पष्टितीर्थसहस्राणि पटिफोटरस्तष २॥ सयं तस्य समन्तात्तु तिष्टतेऽमरकण्टके । ब्रह्मवारी शुनिया जिनमोधो जिनेन्द्रियः॥ सदिसानिवृत्तम्नु सर्वभूतहिने ग्त । परंशसमाचारो यम्नु प्राणान् परित्यजेत् ॥ तस्य पुण्यफलं राजन् ! प्यादितो मम । शनयर्षसहप्राणांस्यर्गे मोदेत पाण्डप!
५५२ * मत्स्यपुराणम् . [पञ्चाशीत्यधिकशततमो अप्सरोगणसंकीर्ण सिद्धचारणसेविते । दिव्यगन्धानुलितश्च दिव्यपुष्पोपशोभितः ॥ क्रीड़ते देवलोकस्यो देवते. सह मोदते । ततः स्वर्गात्परिभ्रष्टो राजा भवति धीर्यवान गृहन्तु लभते स वै नानारत्नविभूषितम् । स्तम्भमणिमयेदिव्यर्वनपैदूर्यभूपितः ॥३०॥ आलेश्यसहितं दिव्यं दासीदाससमन्वितम् । मत्तमातङ्गशन्दैश्च हयानां हेपितेन च ॥ क्षुभ्यते तस्य तद्वारं इन्द्रस्य भवनं यथा। राजराजेश्वरः श्रीमान् सर्वखोजनवल्लभः ॥ तस्मिन् गृहे घसित्वा तु क्रीडाभोगसमन्विते । जीवेद्वर्षशतं सायं सर्वरोगविवर्जितः ।। एवं भोगो भवेत्तस्य यो मृतोऽमरकण्टके । अग्नी विपजले पापि तथा चैव ह्यनाशके ॥ ३४॥ अनिवर्तिकागतिस्तस्य पवनस्याम्बरे यथा । पतनं कुरुते यस्तु अमरेशे नराधिप! ॥ कन्यानां त्रिसहस्राणि एकैकस्यापि चापरे । तिष्ठन्ति भुवने तस्य प्रेपणं प्रार्थयन्ति च दिव्यभोगैः सुसम्पन्नः क्रीड़ते कालमक्षयम् । पर्वतस्य समन्तात्तुरुद्रको टिः प्रतिष्ठिताः स्मानं यः कुरुते तत्र गन्धमाल्यानुलेपनैः । प्रीतःसोऽस्य भवेत् सों रुद्रकोटिर्नसंशयः पश्चिमे पर्वतस्यान्ते ह्ययं देवो महेश्वर. । तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा ब्रह्मवारी जितेन्द्रियः पितृकार्यञ्च कुर्वीत विधिवन्नियतेन्द्रियः। तिलोदकेन विधिवत्तर्पयेत् पितृदेवताः॥४॥ आसप्तमं कुलन्तस्य स्वर्गे मोदेत पाण्डव!। पष्टिवर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते ।। दिव्यगन्धानुलितश्च दिव्यालङ्कारभूपितः । तत. स्वर्गात्परिभ्रष्टो जायते विपुले कुले ।। धनवान् दानशीलश्च धार्मिकश्चैव जायते । पुनः स्मरति तीर्थार्थ गमनं तत्र रोचते ॥ तारयेत्तुः कुलान् सप्त रुदलोकं स गच्छति । योजनानां शत साग्रं श्रूयते सरिदुत्तमा॥ ४४ ॥ विस्तारेण तु राजेन्द्र ! योजनद्वयमायता । षष्टितीर्थसहस्राणि पष्टिकोत्यस्तथैव च ॥ पर्वतस्य समन्तान्तु तिष्टत्यमरकण्टके। ब्रह्मवारीशुचिर्भूत्वा जितक्रोधो जितेन्द्रियः ॥ सहिंसानिवृत्तस्तु सर्वभूनाहिते रतः । एवं शर्वसमाचारो यस्तु प्राणान् परित्यजेत् ।। तस्य पुण्यफलं राजन् ! ऋगुप्वावहितो मम । शतं घर्षसहस्राणां स्वर्गमोदेतपाण्डव! प्रथिव्यामासमुद्रायामीदृशो नैव जायते । यादृशोऽयं नृपश्रेष्ठ ! पर्वतेऽमरकण्टके ॥४६ ऽध्यायः] * नर्मदामाहात्म्यवर्णनम् * तावत्तीयं तु विज्ञयं पर्यतस्य तु पश्चिमे। हदो जलेश्वरो नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ।। तत्र पिण्डप्रदानेन सन्ध्योपासनकर्मणा । पितरो दशवर्षाणि तर्पितास्तु भवन्ति वै ।। दक्षिणे नर्मदाकूले कपिलेति महानदी । सकलार्जुनसंच्छन्ना नातिदूरे व्यवस्थिता ॥५२ सापि पुण्या महाभागा विपु लोकेषु विश्रुता। तत्र कोटिशतं सायं तीर्थानां तु युधिष्ठिर ॥ ५३ ॥ पुराणेधूयतेराजन्! सर्वकोटिगुणं भवेत् । तस्यास्तीरंतुये वृक्षाः पतिताः कालपर्ययात् नर्मदातोयसंस्पृष्टास्तेऽपियान्तिपराङ्गतिम् । द्वितीया तु महाभागाविशल्यकरणीशुभा तत्र तीर्थे नरः स्मात्या विशल्यो भवति क्षणात् । तत्रदेवगणा सर्वे सकिन्नरमहोग्गाः यक्षराक्षसगन्धर्चा ऋषयश्च तपोधना. । सर्वे समागतास्तत्र पर्वतेऽमरकण्टके ।। ५७॥ तैश्च सर्वैः समागम्य मुनिभिश्च तपोधन. । नर्मदामाश्रिता पुण्या विशल्यानाम नामतः उत्पादिता महामागा सर्वपापप्रणाशिनी । तन मात्वा नरो राजन् ! ब्रह्मवारी जितेन्द्रियः ॥ ५ ॥ उपोष्य रजनीमेकाकुलानान्तारयेच्छतम् । कपिला च विशत्या व श्रूयते राजसत्तम ! ईश्वरेण पुरा प्रोक्त लोकानां हितकाम्यया । तत्र मात्वा नरो राजन्नध्यमेधफलं लभेत् अनाशकन्तुय.कुर्यात् तस्मिस्तीर्थ नराधिप!। सर्वपापविशुद्धात्मा स्वलोकंसगच्छति नर्मदायास्तु राजेन्द्र ! पुराणेयन्मया श्रुतम् । यत्र तत्र नर.स्नात्या बाश्वमेधफलं लभेत् ये घसन्त्युत्तरे कृले स्ट्रलोके घसन्ति ते । सरस्वत्याञ्च गङ्गायां नर्मदाया युधिष्ठिर!। समं स्नानं च दानश यथा मे शङ्करोऽत्रयोन् । परित्यजतिय.प्राणान् पर्वतेऽमरकण्टके पर्षकोटिशतं साग्रं दलोके महीयते । नर्मदाया जलं पुण्यं केनोमिभिरलयकृतम् ॥६६ पवितं शिरसा धन्यं सर्वपापै. प्रमुच्यते । नर्मदा पर्वतः पुण्या ब्रह्महत्यापहारिणी ।। अहोरागोपवासेन मुच्यते ब्रह्महत्यया । एवं रम्याच पुण्या व नर्मदा पाण्डुनन्दन !। प्रयाणामपि लोकानां पुण्या ह्येषा महानदी । घटेश्वर महापुण्ये गङ्गाद्वारे तपोचने ॥ एनेषु सर्वस्यानेषु द्विजाः स्युः संशितव्रताः । श्रुतं दशा पुण्यं नर्मदोदधिसमे ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे नर्मदामाहात्म्यवर्णनं नाम पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ।
पड़शीत्यधिकशततमोऽध्यायः नर्मदामाहात्म्ये ज्वालेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् । मार्कण्डेय उवाच । नर्मदा तु नदीधेष्ठापुण्यात् पुण्यतमाहिता । मुनिभिस्तुमहाभागैविभक्तामोक्षकांक्षिभिः यज्ञोपचीतमात्राणि प्रविभक्तानि पाण्डव । तेषुस्नात्वा तु राजेन्द्र ! सर्वपापैःप्रमुच्यते ज(ज्वा)लेश्वरं परन्तीर्थ त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । तस्योत्पत्ति कथयतः शृणु त्वं पाण्डुनन्दन ! ॥३॥ पुरा मुनिगणाः सर्वे सेन्द्राश्चैव मरुद्गणा । भयोद्विग्नाविरूपाक्षंपरित्रायस्व न प्रभो ! श्रीभगवानुवाच । स्वागतं तु सुरश्रेष्ठाः ! किमर्थमिह चागता. । किं दुःखं को नु सन्तापः कुतो चा भयमागतम् ॥५॥ कथयध्वं महाभागा एवमिच्छामि वेदितुम् । एवमुक्तास्तु द्रेण कथयन् संशितव्रताः॥६॥ ऋपय ऊचुः। अतिवीर्यो महाघोरो दानवो बलदर्पित । वाणोनामेतिविरयातो यस्य वै त्रिपुरंपुरम् गगने सततं दिव्यं भ्रमतेतस्य तेजसा । ततो भीता विरूपाक्ष ! त्वामेव शरणंगता. ॥ त्रायस्व महतो दु खात् त्वं हि नः परमा गति । एवं प्रसादं देवेश! सर्वेषांकर्तुमर्हसि येन देवाः सगन्धर्वाः सुसमेधन्ति शङ्कर!। परां निवृतिमायान्तितत्प्रभो ! कर्तुमर्हसि श्रीभगवानुवाच। एतत् सर्वं करिष्यामि मा विपादं गमिष्यथ । अचिरेणैच कालेन कुर्य्या युप्मत् सुखायहम् ॥ ११ ॥ आश्वास्य स तु तान् सन्निर्मदातटमाश्रितः। चिन्तयामासदेवेशस्तद्वधंप्रतिमानद!
4. ऽध्यायः] * पाणपुरे नारदगमनम् । अथ पेन प्रकारेण हन्तव्यं त्रिपुरं मया । परं मंचिन्त्य भगवान नारदं चास्मरत्तदा । स्मरणादेव ! संप्राप्तो नारदः समुपस्थितः नारद उवाच। आतापय महादेव ! किमर्थम्मृतो घदम् । कि कार्यन्तु मया देव ! फर्नव्यं फययम्य मे ॥ १४ ॥ श्रीमगवानुवाच । गच्छ नारद ! तबैध यत्र तत्यिपुरं महन् । पाणम्य दानयेन्द्रम्य शीनं गत्या च तत्पुरु या भन देपतास्तप्रियधाप्सरसासमाः । तासां ये तेजसावित्र! मने प्रिपुरन्दियि सत्र गया तु विन्द्र ! मतिमन्यां प्रयोधय । देवम्य पवन ध्रुत्या मुनित्यग्नियिममः खीणां हृदयनाशाय प्रविएस्तत् पुरं प्रति । शोमते नत्पुरं दिव्यं गानाकोपशोभितम् सनयोजनपिम्तीणं ततो निगुणमायनम् । ततोऽपश्यद्धि तय पाणन्नु परदर्पितम् ॥ मणिकुण्डलफेयामुकुटन पिराजितम् । वाग्दोग्नुपर्णध गाद्रपान्तयिभूषितम् ॥ २०॥ गाना तम्य माग या फनफमण्टिनी । गन्द्रकान्नमदापनमणि पिदुमभूपित ॥२१॥ हादशाकंद्युतिनिभे निषिप्रं परमात्मने । उस्थिती नारदं हवा दानवेन्द्रो मायनः ।।
* मत्स्यपुराणम् [पडशीत्यधिकशततमो आघ्रामर फपिथानि दराणि तयच च । पदम्पचापपाशोफाननेप विविधगुमान् ।। अध्यत्यपिप्पलाश्चवपदलीवटदाडिमार | पिचुमन्द मधूक च उपोप्य स्त्री ददाति या स्तनी कपित्थसदृशागुरू च फदीसमौ । सश्वत्थे पन्दनीया च पिचुमन्दे सुगन्धिनी चम्पके चम्पकामा स्यादा शोकयर्जिता 1 मधो मधुर घक्ति घटे च मृदुगानिका । बदरी सर्वदा स्त्रीणा महासौभाग्यदायिनी । पुस्मुटी फर्कटी चैव द्रव्यपष्ठी न शस्यते कदम्नमिश्रकनकमक्षरीपूजन तथा । अनग्निपध मन्नञ्च पक्षान्नानामभक्षणम् ॥ ३३॥ फलानाञ्च परित्याग सन्ध्यामौन तथैव च । प्रथम क्षेत्रपालस्य पूजा कार्या प्रयतत ॥ तस्या भवति वै भर्ता मुरप्रेक्ष सदानधे । अपमी च चतुथीं च पञ्चमी द्वादशी तथा सकान्तिविपुवच्चैव दिनच्छिद्रमुफ्तथा । एतास्तुदिवसादिव्यानुपवासन्तिया स्त्रिय तासान्तु धर्मयुक्ताना स्वर्गवासो न सशय ॥ ३६ ॥ कलिकालुप्यनिमुक्त। सर्वपापविवर्जिता । उपपासरता नारी नोपसर्पति ता यम ॥ जनौपम्योपाच अस्मत्तेन पुण्येन पुराजन्मशतेन घा । भवदागमन भूत किञ्चित् पृच्छाम्यह व्रतम् ॥ अस्ति विल्यावलि मयलिपत्नीयशस्विनी । श्वममापि विप्रेन्द्र । न तुष्यतिकदाचन श्वशुरोऽपि सर्वकालदृष्ट्वाचापि न पश्यति । अस्तिकुम्भानसीनाम ननान्दापापकारिणा दृष्ट्वा चैवाङ्गुलीभग सदा काल करोति च । दिव्येन तु पथा याति ममसौख्य कथ घद् ऊपरेण प्ररोहन्ति वीज कुर्यात् कथचन । येन व्रतेन चार्णेन भवन्ति घशगा मम ॥ तद्वत ब्रूहि विप्रेन्द्र । दासभाव ब्रजामि ते ॥ ४२ ॥ नारद उवाच। यदेतत्ते मयापूर्व व्रतमुक्त शुभानने ! अनेन पार्वती देवी चीर्णेन घरवर्णिनि । ॥४३॥ शङ्करस्य शरीरस्था,विष्णोर्लक्ष्मीस्तथैव च । सावित्रीब्रह्मणश्चैव घसिष्ठस्याप्यरुन्धती एतेनोपोषितेनेह भर्ता स्थास्यति ते घशे । श्वधूश्वशुरयोश्चैव मुखबन्धो भविष्यति एष श्रुत्वा तु सुश्रोणि यथेष्ट कर्तुमर्हसि । नारदस्यवव श्रुत्वा राज्ञी वचनमब्रवीत् ॥ प्रसाद कुरुविप्रेन्द्र ! दान ग्राह्ययथेप्सितम् । सुवर्णमणिरत्लानि घस्त्राण्याभरणानि च ।
ध्यायः] ॐ त्रिपुरविनाशार्थ खस्य वाणपुरे गमनम् * तव दास्यामहं विन! यच्चान्यदपि दुर्लभम् । प्रगृहाण द्विजश्रेष्ट' प्रीयेता हरिशङ्करी ॥४८॥ नारद उवाच ! अन्यस्मै दीयतांभद्रे ! क्षीणवृत्तिस्तु योद्विज । अहन्तुसर्वसम्पन्नोमझक्ति क्रियतामिति एव तासा मनो हत्या सर्वासान्तु पतिव्रता । जगाम भरतश्रेष्ठ ! स्वकीयस्थानकंपुन ततो हटदया अन्यतो गतमानला। पुरे छिदं समुत्पन्न घाणस्य तु महात्मन ॥५१॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे नर्मदामाहात्म्येवाणाख्यान वर्णन नाम पडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः त्रिपुरविनाशार्थ रुद्रस्य वाणपुरे गमनम् । मार्कण्डेय उवाच । यन्मां पृच्छसि कौन्तेय ! तन्मेकथयत गु । एतस्मिन्नन्तरे रद्रो नर्मदातटमाश्रित ॥ नानामहेश्वरं स्थानं त्रिपुलोकेषु विश्रुतम् । तस्मिनस्थानमहादेवोचिन्तयत्रिपुरे घधम् गाण्डीवं मन्दरं कृत्वा गुण कृत्वा च पासुकिम् । स्थानं हत्वा तु पैशाप्तं विष्णुं कृत्वा शरोत्तमम् ॥३॥ शल्येचानि प्रतिष्ठाप्य मुसे घायु समर्पयन् । हयाश्च चतुरो चेदान्सर्वदेवमयं रथम् ॥ अभीपयोऽश्विनी देघापक्षोपन्नधर स्वयम् । सतस्याज्ञा समादाय तोरणे धनद स्थित यमस्तु दक्षिणे हस्तेवामेकालस्तु दारण । चने त्वमरकोटयस्तु गन्धर्यालोकविश्रुता. प्रजापती रथश्रेष्ठ ब्रह्मा चैव तु सारथिः । एवं एत्वा तु देवेश सर्वदेवमयं रथम् ॥७॥ सोऽतिष्ठत् स्थाणुभूतस्तु सहस्रपरिवत्सरान् । यदात्रीणिसमेतानिअन्तरिक्षेस्थितानिये निर्वाणि त्रिशल्येन तदा तानि व्यभेदयत् । शर प्रचोदितस्तेन देना त्रिपुरं प्रति ME भ्रष्टतेजा स्त्रियो जाता यलन्तासा ध्यशीर्यत । उत्पाताश्चपुरेतस्मिन्प्रादुर्भूता सहस्रश * मत्स्यपुराणम् * [सप्ताशीत्यधिशततमी "त्रिपुरस्य विनाशाय कालरूपा भवंस्तदा । अट्टहासं प्रमुश्चन्ति हयाः काष्टमयास्तदा ॥ निमेपोन्मेपणञ्चैव कुर्वन्ते चित्ररूपिणः। स्वप्ने पश्यन्तिवात्मानंरक्ताम्बरविभूषितम् ।। स्वप्ने तु सर्वे पश्यन्त विपरीतानि यानि तु । एतान् पश्यन्त उत्पातांस्तत्र स्थाने तु ये जनाः ॥ १३ ॥ तेषां बलञ्च बुद्धिश्च हरकोपेन नाशिते । -तत. सांवर्तको घायुयुगान्तप्रतिमो महान् ॥ १४ ॥ समीरितोऽनलस्तेन उत्तमाङ्गेन धावति । ज्वलन्ति पादपास्तत्र पतन्ति शिखराणि च॥ सर्वतो व्याकुलीभूतं हाहाकारमचेतनम् । भग्नोद्यानानि सर्वाणि क्षिप्रं तत् प्रत्यभज्यत ॥ १६ ॥ तेनैव पीडितं सर्व ज्वलित त्रिशिखैः शरैः । द्रुमाश्चारामखण्डानिगृहाणि विविधानिव दशदिक्षु प्रवृत्तोऽयं समृद्धो हव्यवाहन । मन शिलानां पुनानि दिशो दश विभागशः शिखाशतैरनेकैस्तु प्रजज्याल हुताशन । सर्वं किंशुकघर्णाभं ज्वलितं दृश्यते पुरम् ॥ गृहादगृहान्तरं नैव गन्तुं धूमेन शक्यते । हरकोपानलैर्दग्ध क्रन्दमानं सुदुःखितम् ॥२० प्रदीप्तं सर्वतो दिक्षु दह्यते त्रिपुरं पुरम् । प्रासादशिखरामाणि व्यशोर्यन्त सहस्रशः ॥ नानामणिविचित्राणि विमानान्यप्यनेकधा । गृहाणि चैव रम्याणि दह्यन्ते दीप्तवह्निना ॥ २२॥ धावन्ति द्रुमखण्डेषु पलभीषु तथा जनाः । देवागारेषु सर्वेषु प्रज्वलन्त, प्रधाविताः॥ कन्दन्ति चानलस्पृष्टा रदन्ति विविधैः स्वरैः । दह्यन्ते दानवास्तत्र शतशोऽथ सहस्रशः हंसकारण्डवाकीर्णा नलिन्यः सहपङ्कजाः । दृश्यन्तेऽनलदग्धानिपुरोद्यानानि दीर्घिकाः अम्लानपङ्कजच्छन्ना विस्तीर्णा योजनायता । गिरिकूटनिभास्तत्र प्रासादा रत्नभूषिताः पतन्त्यनलनिर्दग्धा निस्तोया जलदा इव । घरस्त्रीवालवृद्धपु गोपु पक्षिषु घाजिषु ॥ निर्दयो व्यदहिहरक्रोधेन प्रेरित 1 सहस्रश प्रबुद्धाश्च सुप्ताश्च बहवो जना. ॥२८॥ पुत्रमालिङ्गय ते गाढं दान्ते त्रिपुराग्निना । अथ तस्मिन् पुरे दीप्ते स्त्रियश्चाप्सरसोपमाः ॥ २६ ॥ - ऽध्यायः] * त्रिपुरे नारीणां विलापनम् * ५५६ अग्निज्वालाहतास्तत्र पतन् धरणीतले । काचिच्छ्यामा विशालाक्षी मुक्तावलिविभूषिता ॥ ३० ॥ धूमेनाकुलिता सा तु पतिता धरणीतले । काचित् कनकवर्णाभा इन्द्रनीलविभूषिता । भर्तारं पतितं दृष्ट्वा पतिता तत्य चोपरि । काचिदादित्यसकाशाप्रमुक्ताच गृहेस्थिता ॥ अग्निज्वालाहता सा तु पतिता गतचेतना । उत्थितो दानवस्तत्र खड्गहस्तो महाबलः वैश्वानरहतः सोऽपि पतितो धरणीतले । मेघवर्णापग नारी हारकेयूरभूपिता ॥ ३४ ॥ श्वेतरूपधरा नारी वाल स्तन्यं न्यधापयत् । दह्यन्तं बालकं दृष्ट्वा रुदते मेघशन्दवत् ॥ ३५ ॥ एवं स तु दहन्ननिहरक्रोधेन प्रेरितः । काविञ्चन्द्रप्रभा सौम्या पत्रवैदूर्यभूपिता ॥३६॥ सुतमालिड्ग्य वेपन्ती दग्धा पतति भूतले । काचित् कुन्देन्दुवर्णाभा या शयाना गृहे स्थिता ॥ ३७॥ गृहे प्रज्वलिते सा तु प्रतियुद्धा सुदुःपिता । पश्यन्ती ज्वलितं सर्व स्वसुतोमेदिवङ्गतः सुनं सन्दग्धमालिंग्य पतिता धरणीतले । काचित् सुवर्णवर्णाभा नीलरनैविभूपिता ॥ धूमेनाकुलिता सा तु प्रसुप्ता धरणीतले । अन्या गृहीतहस्ता तु सपि! दहति यालिफाम् ॥ ४०॥ अनेकदिव्यरत्ताढ्या दृष्ट्वा दहनमोहिता । शिरसि हाञ्जलि कृत्या विज्ञापयति पायकम् ।। भगवन् ! यदि पैरन्ते पुरुषेप्चपकारिपु । स्त्रियः किमपराधन्ते गृहपअरफोफिला ॥ पापनिर्दयनिर्लज ! फस्ते फोप स्त्रियः प्रति । न दाक्षिण्यं न ते लबान सत्यं शौर्यधजिनम् ॥ ४३ ॥ अनेन तुपसर्गेण तूपालाभं शिपिन्यदान् । किं त्यया न श्रुतं लोके घरच्या शत्रुयोषितः किन्तु तुभ्यं गुणा होते दहनोत्सादनं प्रति । न कारण्यंदयावापिदाक्षिण्यनस्त्रियःप्रति दयां कुर्वन्ति म्लेन्डापि दहन्ती पीक्ष्य योपितम् । म्लेच्छानामपि कष्टोऽसि दुनियारो घचेतन. ॥ ४६॥ पने चेष गुणास्तुभ्यं ददनोत्सादनं प्रति । असायपि दुराचार स्त्रीणां किते निपातने
* मत्स्यपुराणम् * [ सप्ताशीत्यधिकशततमो
दुष्टनिघृणनिर्लज्ज ! हुताशिन् ! मन्दभाग्यक!! निराशत्वं दुरावास चलाद्दहसि निर्दय !
एवं चिलप्यमानास्ताजल्पन्त्यश्च वहन्यपि । अन्याःक्रोशन्तिसंक्रुद्धायालशोक्नमोहिताः
दहते निर्दयो वह्निः संक्रुद्धः पूर्वशत्रुवत् । पुष्करिण्यां जलं दग्धं कृपेप्वपि तथैव च ।।
अस्मान् सन्दह्य म्लेच्छ! त्वं काङ्गति प्रापयिप्यसि ।
एवं प्रलपतां तासां घहिर्वचनमबतीत् ॥ ५१ ॥
अग्निरुवाच।
स्वपशेनैव युप्माकं पिनाशन्तु करोम्यहम् । अहमादेशका घे नाहंकर्तास्म्यनुग्रहम् ॥
स्क्रोधसमाविष्टो विधिशामि यथेच्छया । ततो वाणोमहातेजास्त्रिपुरंधीक्ष्यदीपितम्
सिंहासनस्थः प्रोधाच ह्यहं देवैविनाशितः । अल्पसत्वैर्दुराचारैरीश्वरस्य निवेदितम् ॥
अपरीक्ष्य त्वहं दग्ध. शङ्करेणमहात्मना । नान्यः शक्तस्तु मा हन्तुंवर्जयित्वात्रिलोचनम्
उत्थितः शिरसा कृत्वा लिङ्गंत्रिभुवनेश्वरम् । निर्गत.सपुरद्वारात्परित्यज्यसुहृत्सुतान्
रतानियान्यनर्धाणिस्त्रियोनानाविधास्तथा । गृहीत्वाशिरसालिङ्गंगच्छन्गगनमण्डलम्
स्तुवंश्च देवदेवेशं त्रिलोकाधिपतिशिवम् । त्यक्त्वापुरीमया देव ! यदिवध्योऽस्मिशङ्कर
त्वत्प्रसादान्महादेव ! मा मे लिङ्गंविनश्यतु । अर्चितं हिमया देव ! भत्त्या परमया सदा
त्वत्कोपाद्यदि वध्योऽहं तदिदं माविनश्यतु । श्लाध्यमेतन्महादेव! त्वत्कोपाहहनं मम
प्रतिजन्ममहादेव! त्वत्पादनिरतो ह्यहम् । त्रो(तो)टकच्छन्दसादेवंस्तीमित्वांपरमेश्वर
शिवशङ्करशहराय नमो भव भीम महेश्वर शर्व नमः ।
कुसुमायुधदेहविनाशकर त्रिपुरान्तक अन्धकशूलधर ॥ ६२ ॥
प्रमदाप्रिय कान्त विभक्त नमः ससुरासुरसिद्धगणैर्नमित ।
यघानरसिद्धगजेन्द्रमुखादतिभास्वददीर्घविशालमुख ॥ ६३ ॥
उपलब्धुमशक्यतररमरैरसुरैः प्रथितोऽस्मि च बाहुशतैः ।
प्रणतोऽस्मि भवं भवभक्तिरतो चलचन्द्रकलाकुलदेव नमः ॥ ६४ ॥
न च पुत्रकलत्रहयादि धनं मम तु त्वदनुस्मरणं शरणम् ।
व्यथितोऽस्मि तु बाहुशतैर्बहुमिर्गमिता व महानरकस्य गतिः ॥६५॥
ऽध्यायः] * याणक्तशंकरस्तुति: * न निवर्तति जन्म न पापमति' शुचिकर्मनिषद्धमपि त्यजति । अनुकम्पति विभ्रमति सति मम चैव कुकर्म निवारयति॥६६॥ यः पठेत्रोटकन्दिव्यं प्रयः शुविमानसः । वाणस्येव यथा रुद्रस्तस्यापि घरदो भवेत् । इमं स्तवं महादिव्यं श्रुत्वा देवो महेश्वरः । प्रसन्नस्तु तदा तस्य स्वयं देवो महेश्वरः महेश्वर उवाच । न भेतन्यत्वयावत्स! सौवणे तिष्ठ दानव !! पुत्रपौत्रसुहृद्वन्धुभार्यावन्धुजन' सह ॥ अद्यप्रभृति वाण! त्वमवध्यस्त्रिदशैरपि । भूयस्तस्य परो दत्तो देवदेवेन पाण्डघ । ॥ अक्षयश्चाव्ययो लोके विचरस्वाकुतोभयः । ततो निधारयामास रठ. सप्तशिखं तदा ॥ तृतीयं रक्षितं तस्य पुरं तेन महात्मना । भ्रमत्तु गगने दिव्यं स्द्रतेज प्रभावत' ।। ७२ ॥ एव तु त्रिपुर दग्धं शङ्करेण महात्मना । ज्वालामालाप्रदीप्तं तत्पतित धरणीतले ।७३॥ एक निपतितं तत्र श्रीशैले त्रिपुरान्तके। द्वितीयं पतितं तस्मिन् पर्वतेऽमरकण्टके ७४॥ दग्धेषु तेषु राजेन्द्र ! रुद्रकोटिः प्रतिष्ठिता। ज्वलत्तद्पतत्तत्र तेन ज्वालेश्वर स्मृतः ॥ जदुर्बेन प्रस्थितास्तस्य दिव्यज्वाला दिवङ्गताः । हाहाकारस्तदा जातो देवासुरकृती महान् ॥ ७६ ॥ शरमस्तंभयद्रुद्रो माहेश्वरपुरोत्तमे । एवं वृत्तं तदा तस्मिन् पर्वतेऽमरकण्टके ॥ ७७ ।। चतुर्दशाख्यं भुवनं स भुक्त्वा पाण्डुनन्दन!। घर्पकोटिसहस्रन्तु त्रिंशत्कोट्यस्तथापरा' ।। ७८ ।। ततो महीतलं प्राप्य राजा भवति धार्मिक । पृथिवीमेकच्छत्रेण मुक्ते स तु नसशयः एवं पुण्यो महाराज ! पर्वतोऽमरकण्टके। चन्द्रसूर्योपरागे तु गच्छेद् योऽमरकण्टकम् अश्वमेधादशगुणं प्रपदन्ति मनीषिण । स्वर्गलोकमवाप्नोति दृष्ट्वा तत्र महेश्वरम् ॥८॥ ब्रह्महत्या गमिप्यन्ति राहुप्रस्ते दिवाकरे । तदेवं निसिलं पुण्यं पर्वतेऽमरकण्टके |८२ मनसापि स्मरेद्यस्तं गिरि त्यमरकण्टकम् । चान्द्रायणशतं सायं लभते नात्र संशयः।। प्रयाणामपिलोकानां विण्यातोऽमरकण्टकः । एषपुण्यो गिरिथेष्ट सिद्धान्धर्यसेचितः नानाद्रमलताफीणों नानापुप्पोपशोभित । मृगव्याघ्रसहस्रस्तु सेव्यमानो महागिरिः॥
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* मत्स्यपुराणम् * [ अष्टाशीत्यधिकशततमो
यत्र सन्निहितो देवो देव्या सह महेश्वरः । ब्रह्मा विष्णुस्तथा चेन्द्रो विद्याधरगणैःसह
ऋपिभिः किन्नरैर्य:नित्यमेव निषेवितः । वासुकिः सहितस्तत्र क्रीडते यन्नगोत्तमे ।।
प्रदक्षिणन्तु यः कुर्यात् पर्वतेऽमरकण्टके । पोण्डरीकस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः
तत्र ज्वालेश्वरं नाम तीर्थ सिद्धनिषेवितम् ।
तत्र स्मात्या दिवं यान्ति ये मृतास्तेपुनर्भवाः ।। ८६ ॥
ज्वालेश्वर महाराज! यस्तु प्राणान् परित्यजेत् ।
चन्द्रसूर्योपरागेपु तस्यापि शृणु यत् फलम् ॥ १० ॥
सर्वकर्मविनिर्मुक्त ज्ञानविज्ञानसंयुतः । रद्रलोकमवाप्नोति यायदा भूतसंप्लवम् ॥११॥
अमरेश्वरदेवस्य पर्वतस्य उभे तटे । तत्र ता ऋषिकोट्यस्तु तपस्तप्यन्ति सुव्रत !॥६२
समन्ताद्योजनक्षेत्रो गिरिचामरकण्टकः । अकामो घा सकामो घा नर्मदायां शुभे जले
स्नात्वा मुच्यति तै. पापै रद्रलोकं स गच्छति।
इति श्रीमत्स्यपुराणे नर्मदामाहात्म्ये ज्यालेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम
सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ।
अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
नर्मदामाहात्म्ये कावेरीसंगममाहात्म्यवर्णनम् ।
सूत उवाच ।
पृच्छन्ति ते महात्मानो मार्कण्डेयं महामुनिम् । युधिष्ठिरपुरोगास्तेऋपयश्च तपोधनाः
आख्याहि भगवन् । तथ्यं कावेरीसङ्गमो महान् ।
लोकानाञ्च हितार्थाय अस्माकञ्च विवृद्धये ॥ २ ॥
सदा पापरता ये च नरा दुष्कृतकारिणः ।मुच्यन्ते सर्वपापेभ्यो गच्छन्ति परमपदम् ।।
एतदिच्छाम विज्ञाएं भगवन् पक्तुमर्हसि ॥३॥
ऽध्यायः] * कावेरीसंगममाहात्म्यवर्णनम् * मार्कण्डेय उवाच । 2ण्वन्त्ववहिताः सर्वे युधिष्ठरपुरोगमाः। अस्ति चोरो महायज्ञः कुवेरः सत्पविक्रमः इदन्तीर्थमनुप्राप्य राजा यक्षाधिपोऽभवत् । सिद्धिप्राप्तो महाराज ! तन्मे निगदतःणु कावेरी नर्मदा यत्र सङ्गमो लोकविश्रुतः । तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा कुबेरः सत्यविक्रमः तपोऽतप्यत यक्षेन्द्रो दिव्यं घर्षशतं महन् । तस्य तुष्टो महादेवः प्रदातुं घरमुत्तमम् ॥७॥ भो भो यक्ष! महासत्व! वरं ब्रूहि यथेप्सितम् । ब्रूहि कार्य यथेष्टन्तु यद्वामनसिवर्तते कुवेर उवावा यदि तुष्टोऽसि मे देव! यदि देयो घरो मम । अद्यप्रभृति सर्वेषा यक्षाणामधिपोभवेत्।। कुवेरस्य वचः श्रुत्वा परितुष्टो महेश्वरः । एवमस्तु ततो देवस्तत्रैवान्तरधीयत ॥१०॥ सोऽपिलब्धवरो यक्ष शीघ्रं लब्धफलोदयः । पूजितः सतु यक्षैश्च ह्यभिपिक्तस्तु पार्थिव! कावेरीसतमं तत्र सर्वपापप्रणाशनम् । ये नरा नाभिजानन्ति वञ्चितास्ते न संशयः ॥ तस्मात् सर्वप्रयत्नेन तत्र स्नायौत मानयः । कावेरी च महापुण्या नर्मदाच महानदी॥१३ तत्र मात्वा तु राजेन्द्र । हर्वयेबृपमध्यजम् । अश्वमेधफलं प्राप्य स्ट्रलोके महीयते॥ अग्निप्रवेशयः कुर्याद्यश्च कुादनाशकम् । अनिवां गतिस्तस्ययथामे शङ्करोऽत्रवीत् सेव्यमानो परस्त्रीमिः क्रीडते दिवि रुद्रचत् । पष्टिवर्पसहस्राणि पष्टिकोट्यस्तथापराः। मोदते दलोकस्थो यत्र तत्रैव गच्छति । पुण्यक्षयात् परिभ्रष्टो राजा भवति धार्मिकः भोगवान दानशीलश्च महाकुलसमुद्भवः। तन पीत्वा जलं सम्यक् चान्द्रायणफलं लभेत् ॥ १८ ॥ स्वगंगच्छन्तिते मा ये पिवन्ति शुभंजलम् । गङ्गायमुनयोर्मध्येयत् फलं प्राप्नुयानरः फावेरीसङ्गमे स्नात्वा तत् फलं तस्य जायते ॥ १६ ॥ एपमादि तु राजेन्द्र ! कावेरीसङ्गमे महत् । पुण्यं महत्फलं तत्र सर्वपापप्रणाशनम् ॥ * इति श्रीमत्स्यपुराणे नर्मदामाहात्म्येकावेरीसंगमवर्णनं नामाटाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः . एकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः नर्मदामाहात्म्ये नानाविधतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् । मार्कण्डेय उवाच । नार्मदे चोत्तरे कूले तीर्थ योजनविस्तृतम् । मन्त्रेश्वरति विख्यातं सर्वपापहरं परम ।। तत्रस्नात्वानरो राजन् ! दैवतैः सह मोदते । पञ्चवर्षसहस्राणि क्रीडते कामरूपधृक् । गर्जनञ्च ततो गच्छेद्यत्र मेघस्तथोत्थितः । इन्द्रजिन्नाम संप्राप्तस्तस्य तीर्थप्रभावत ॥३॥ मेघनादं ततो गच्छेद्यत्र मेघानुगर्जितम् । मेघनादो गणस्तत्र परमां गणताङ्गतः ॥ ४ ॥ ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र ! तीर्थमानातकेश्वरम् । तत्र स्नात्वा नरो राजन् ! गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ५॥ नर्मदोत्तरतीरेतु तीर्थन्तु विश्रुतं भवेत् । तस्मिस्तीर्थे नरः स्नात्यो तर्पयेत् पितृदेवताः। सर्वान् कामानवाप्नोति मनसाये विचिन्तिताः । ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र ! ब्रह्मावर्तमिति स्मृतम् ॥ ७ ॥ तत्र सन्निहितो ब्रह्मा नित्यमेव युधिष्ठिर! । तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र ! ब्रह्मलोकेमहीयते ततोऽगारेश्वरं गच्छेनियतो नियताशनः । सर्वपापविनिर्मुक्तो रुद्रलोकं स गच्छति ॥ ततो गच्छेच राजेन्द्र ! कपिलातीर्थमुत्तमम् । तत्र स्नात्वा नरो राजन् ! कपिलादानमाप्नुयात् ॥१०॥ गच्छेत् करजतीर्थन्तु देवर्षिगणसेवितम् । तत्र स्नात्वा नरो राजन् ! गोलोकं समवाप्नुयात् ॥ ११ ॥ ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र ! कुण्डलेश्वरमुत्तमम् । तत्र सन्निहितो रद्गस्तिष्ठते ह्युमया सह। तत्र मात्वा तु राजेन्द्र ! हवध्यत्रिदशैरपि। पिप्पलेशन्ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम् तत्र स्मात्या तु राजेन्द्र ! रद्रलोके महीयते । ततो गच्छत्तु राजेन्द्र! विमलेश्वरमुत्तमम् तत्र देवशिला रम्या चेश्वरेण विनिर्मिता । तत्र प्राणपरित्यागाद्रुद्रलोकमवाप्नुयात् ।।
ऽध्यायः] नानाविधतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् ॥ तत.पुष्करिणींगच्छेत् तत्रस्नानसमाचरेत् । स्नातमात्रो नरस्ता हीन्द्रस्यासनलभेत् नर्मदा सरितां श्रेष्ठा रददेहाद्विनि स्ता । तारयेत् सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि व सर्वदेवाधिदेयेन त्वीयरेण महात्मना । फथिता ऋपिसट्टेभ्यो हास्माकञ्च विशेषतः ॥ मुनिभि. संस्तुता ोपा नर्मदा प्रवरा नदी । रहदेदाद्विनिप्यान्ता लोकाना हितकाम्यया ॥ १६ ॥ सर्वपापहरा नित्यं सर्वदेवनमस्टता । सस्तुता देवगन्धर्वैरप्सरोभिस्तथैव च ॥ २० ॥ नम. पुण्यजले ह्याये नमः सागरगामिनी! | नमस्ते पापशमनि ! नमोदेवि ! धरानने ! नमोऽस्तु ते ऋषिगणसिद्धसेचिते ! नमोऽस्तु ते शङ्करदेहनि सृते !! नमोऽस्तु ते धर्मभृतां वरप्रदे ! नमोऽस्तु ते सर्वपवित्रपावने ! ॥ २२ ॥ यस्त्यिदं पठतेस्तो नित्यं श्रद्धासमन्वितः । ब्राह्मणो वेदमाप्नोति क्षत्रियोविजयीभवेत् वैश्यस्तु लभते लामं शूद्रश्चैव शुभाङ्गतिम् । अर्थार्थी लभते हाथ स्मरणादेव नित्यशः नर्मदां सेचते नित्यं स्वयं देवो महेश्वर. । तेन पुण्या नदी शेया ब्रह्महत्यापहारिण। इति श्रीमत्स्यपुराणे नर्मदोत्तरेनानाविधतीर्थमाहात्म्यकथनं नामो- ननवत्यधिकशततमोऽध्याय. । नवत्यधिकशततमोऽध्यायः नर्मदामाहात्म्ये नानाविधतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् । मार्कण्डेय उवाच। तदाप्रभृति ब्रह्माद्या ऋषयश्च तपोधना. । सेवन्ते नर्मदा राजन् ! रागक्रोधविवर्जिताः युधिष्ठिर उवाच । कस्मिन्निपतितं शूलं देवस्य तु महीतले । तत्र पुण्यं समाख्याहि यथायन्मुनिसत्तम ! मार्कण्डेय उवाच । शूलभेदेऽति विख्यातं तीथं पुण्यतमं महत् । तत्र स्नात्वाऽर्चयेद्देवं गोसहस्रफलं लभेत् * मत्स्यपुराणम् * [नचत्यधिकशततमो त्रिरात्रङ्कारयेद्यस्तु तस्मिस्तीर्थ नराधिप!। अर्चयित्वा महादेवं पुनर्जन्म न विद्यते ॥ भीमेश्वरं ततो गच्छेन्नारदेश्वरमुत्तमम् । आदित्येशं महापुण्यं तथाघृत मधुस्त्रवम् ॥५॥ नन्दिकेशं परिष्वज्य पर्याप्तं जन्मनः फलम् । घरुणेशं ततः पश्येत् स्वतन्त्रेश्वरमेव च ॥ सर्वतीर्थफलं तस्य पञ्चायतनदर्शनात् ॥ ६ ॥ ततो गच्छेत्तुराजेन्द्र ! युजंयत्रसुसाधितम् । फोटितीर्थन्तु विख्यातममुरायत्रमोहिताः यत्रैघ निहता राजन् ! दानवा बलदर्पिताः । तेषां शिरांस्यगृह्णन्त सर्वे देवाः समागताः तैस्तु संस्थापितो देवः शूलपाणि पध्वजः। कोटिर्विनिहता तत्र तेन कोटीश्वरःस्मृतः दर्शनात्तस्य तीर्थस्य सदेहः स्वर्गमारहेत् । यदा विन्द्रेण क्षुद्रत्वाद्वन्नड्कीलेन यन्त्रितम् तदाप्रभृति लोकानांस्वर्गमार्गा निवारित. । सघृतं श्रीफलं जग्ध्वा कृत्वाचैधप्रदक्षिणम् पार्वतं सदीपन्तु शिरसा चैध धारयेत् । सर्वकामसुसम्पन्नो राजा भवति पाण्डव ? मृतो रुद्रत्वमाप्नोति ततोऽसौ जायते पुनः । स्वर्गादेत्य भवेद्राजा राज्यं कृत्वा दिवं व्रजेत् ॥ १३ ॥ बहुनेत्रं तत पश्येत् त्रयोदस्यान्तु मानवः । स्नातमात्रो नरस्तत्र सर्वयज्ञफलं लभेत् ॥ ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र ! तीर्थं परमशोभनम् । नराणां पापनाशाय ह्यगस्त्येश्वरमुत्तमम् तत्र स्नात्वा नरो राजन् ! ब्रह्मलोके महीयते । कार्तिकस्य तुमासस्य कृष्णपक्षेचतुर्दशी घृतेन स्नापयेद्देवं समाधिस्थो जितेन्द्रियः । एकविंशकुलोपेतो न च्यवेदैश्चरात् पुरात् धेनुमुपाहनच्छत्रे दद्याच्च घृतकम्बलम् । भोजनं चैध विप्राणां सर्व कोटिगुणं भवेत् ॥ ततोगच्छेचराजेन्द्र ! घलाकेश्वरमुत्तमम् । तत्र स्नात्वा नरोराजन् ! सिंहासनपतिर्भवेत् नर्मदा दक्षिणे कृले तोर्थं शकस्य विश्रुतम् । उपोप्य रजनीमेकां स्नानं तत्र समाचरेत् स्नानं कृत्वा यथान्यायमर्चयेच्चजनार्दनम् । गोसहस्रफलं तस्य विष्णुलोकं स गच्छति ऋषितीर्थ ततो गच्छेत् सर्वपापहरं नृणाम् । स्नातमात्री नरस्तत्र गोसहस्रफलं लभेत् ॥ २२ ॥ देवतीर्थ ततो गच्छेद् ब्रह्मणा निर्मितं पुरा । तर स्नात्वा नरो राजन् ! ब्रह्मलोके महीयते ॥ २३ ॥ ।
ऽध्यायः] * नानाविधतीमाहात्म्यवर्णनम् * अमरकण्टकं गच्छेदमः स्थापितं पुरा । स्नातमात्रो नरस्तत्र रुद्रलोके महीयते ॥२४॥ ततो गच्छेच राजेन्द्र ! रावणेश्वरमुत्तमम् । तत् पञ्चायतनं दृष्ट्वा मुच्यते ब्रह्महत्यया ॥ ऋणतीर्थ ततो गच्छेगुणेभ्यो मुच्यते ध्रुवम् । घटेश्वरं ततो दृष्ट्वा पर्याप्तं जन्मनः फलम् भीमेश्वरं ततो गच्छेत् सर्वव्याधिविनाशनम् । स्नातमात्रो नरो राजन् ! सर्वदुःखैः प्रमुच्यते ॥ २७ ॥ ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र! तुरासङ्गममुत्तमम् । तत्र सात्वामहादेवमर्चयसिद्धिमाप्नुयात् सोमतीर्थ ततो गच्छेत् पश्येचन्द्रमनुत्तमम् । तत्र स्नात्वा नरो राजन् ! भत्या परमया युतः ॥२६॥ तत्क्षणादिव्यदेहस्थः शिववन्मोदते चिरम् । पष्टिवर्पसहस्राणि रद्रलोके महीयते ॥३०॥ ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र ! पिङ्गलेश्वरमुत्तमम् । अहोरात्रोपवासेन त्रिरात्रफलमाप्नुयात् तस्मिस्तीर्थे तु राजेन्द्र ! कपिलां यः प्रयच्छति । यावन्ति तस्या रोमाणि तत्प्रसूतिकुलेषु च ॥३२॥ तावद्वर्षसहस्त्राणि रुद्रलोके महीयते । यस्तु प्राणपरित्यागं कुर्यात्तत्र नराधिप ! ॥३॥ अक्षयं मोदले कालं यावञ्चन्द्रदिवाकरौ । नर्मदातटमाश्रित्य तिष्ठेयुर्यत्र मानवाः ॥३॥ ते मृताः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनोयथा। सुरेश्वरंततोगच्छेनारना कर्कोटकेश्वरम् गङ्गायतरते तत्र दिने पुण्ये न संशयः । नन्दितीर्थं ततो गच्छेत् स्मानं तत्रसमाचरेत् ।। तुप्यते तस्य नन्दीश सोमलोके महीयते । ततो दीपेश्वरं गच्छेद्यासतीर्थतपोधनम् ॥ निवर्तिता पुरा तत्र व्यासभीता महानदी । हुङ्कारिता तु व्यासेन दक्षिणेन ततो गता॥ प्रदक्षिणं तु यः कुर्यात् तस्मिस्तीर्थे नराधिप । अक्षयं मोदते कालंयावश्चन्द्रदिवाकरी व्यासस्तस्य भवेत् प्रीतः प्राप्नुयादीप्सितं फलम् । सूत्रेण चेपयित्वा तु दीपो देयः सवेदिकः ॥४०॥ फ्रीडन्ति ह्यक्षयं कालं यथा दस्तथैव च । ततो गच्छेञ्चराजेन्द्र ! ऐरण्डीतीर्थमुत्तमम् सदमे तु नरः सात्वा मुच्यते सर्वपातकः । ऐरण्डी विपुलोकेपुविरयातापापनाशिनी अथवाश्वयुजे मासि शुक्लपक्षेतु पाष्टमी । शुचिर्भूत्या नरः । स्मात्या सोपवासपरायणः * मत्स्यपुराणम् * [ नघत्यधिकशततमो ब्राह्मण भोजयेदेक कोटिर्भवति भोजिता । मृत्तिका शिरसिस्थाप्यावगाह्मचर्य जलम् नर्मदोदकसमिश्र मुच्यते सर्वकिल्विषै । प्रदक्षिण तु य कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थ नराधिप ॥४५॥ प्रदक्षिणीकृता तेन सप्तद्वीपा घसुन्धरा । तत सुवर्णसलिले स्नात्वा दत्त्वातु काञ्चनम् काञ्चनेन विमानेन रुद्रलोके महीयते । तत स्वर्गाच्च्युत कालाद्राजा भवति वीर्यवान् ततो गच्छेच्च राजेन्द्र । हीथुनद्यास्तु सङ्गमम । त्रैलोक्मविश्रुतदिव्यतत्रसन्निहित शिव तत्र स्नात्वा नरो राजन् ! गाणपत्यमवाप्नुयात् । स्कन्दतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम् ॥४६॥ तत्तीथं त्रिविध पाप स्मानमात्रायपोहति । लिङ्गसार ततोगच्छेत् स्नानतत्र समाचरत् गोसहस्रफल तस्य रुद्रलोके महीयते । भङ्गतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम् ॥५१ तत्र गत्वा तु राजेन्द्र स्नान तत्र समाचरेत् । सप्तजन्मकृतै पापैर्मुच्यते नात्र सशय घटेश्वर ततो गच्छेत् सर्गतीर्थमनुत्तमम् । तत्र स्नात्वानरोराजन् । गोसहस्रफल लभेत् सङ्गमेशन्ततो गच्छेत् सर्वदेवनमस्कृतम् । स्नानमात्रान्नरस्तत्र चेन्द्रत्व लभेत् ध्रुवम् ॥ कोटितीर्थ ततो गच्छेत् सर्वपापहर परम् । तत्र स्नात्वा नरो राज्य लभते नात्र संशय ॥५५॥ तत्र तीर्थ समासाद्य दत्त्वा दान तु यो नर । तस्य तीर्थप्रभावेण सवं कोटिगुणभवेत् अथ नारी भवेत् काचित् तत्र स्नान समाचरेत् । गौरीतुल्या भवेत् सापि त्चिन्द्रपत्नी न सशय ॥५॥ अङ्गारेश ततो गच्छेत् स्नान तत्र समाचरेत् । स्नातमात्रो नरस्तत्र रुद्रलोके महीयते ॥ अङ्गारफचतुर्थ्यान्तु स्नान तत्र समाचरेत् । अक्षय मोदते काल शुचि प्रयतमानस ॥ अयोनिसम्भवे स्नात्वा न पश्येद्योनिसङ्कटम् । पाण्डवेशन्तु तत्रैव लान तन्त्र समाचरेत् ॥६०॥ अक्षय मोदते कालमवध्यस्त्रिदशैरपि । विष्णुलोक ततो गत्वा क्रीडते भोगसयुत ॥ तत्र भुक्त्वा महामोगान मर्त्यराजोऽमिजायते । फठेश्वरततोगच्छेत्तत्रस्नानसमाचरेत् ऽध्यायः] * नानाविधतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् * उत्तरायणसंप्राप्तो यदिच्छेत् तस्य तद्भवेत् । चन्दभागांततोगच्छेत्तत्रस्नानसमाचरेत् स्नातमात्रो नरो राजन् ! सोमलोके महीयते । ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र ! तीर्थ शक्रस्य विश्रुतम् ॥६॥ पूजितं देवराजेन देवैरपि नमस्कृतम् । तत्र स्नात्वा नरो राजन् ! दानंदत्त्यातुकाञ्चनम् अथवा नीलवर्णाभं वृषमं य समुत्सृजेत् । वृषभस्य तु रोमाणि तत्प्रसूतिकुलेषु च ॥ सावर्षसहस्राणि नरो हरपुरे वसेत् । तत स्वर्गात्परिभ्रष्टो राजाभवति वीर्यवान् । अश्वानां श्वेतवर्णानांसहस्राणां नराधिप । स्वामी भवति महँषु तस्य तीर्थप्रभावत. ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र ! ब्रह्मावर्तमनुत्तमम् । तत्रस्नात्वानरोराजन् ! तर्पयेत् पितृदेवताः उपोप्य रजनीमेकांपिण्डदत्त्या यथाविधि । कन्यागते तथादित्येअक्षयं स्यान्तराधिप! ततोगच्छेञ्चराजेन्द्र ! कपिलातीर्थमुत्तमम् । तत्रस्नात्वानरोराजन् ! कपिलाय प्रयच्छति सम्पूर्णपृथिवी दत्त्वा यत् फलं तवाप्नुयात् । नर्मदेशं परं तीर्थं न भूतं न भविष्यति ॥ ७२ ॥ तत्र स्नात्वा नरो राजन्नश्वमेधफलं लभेत् । नर्मदादक्षिणे कूले सलमेश्वरमुत्तमम् ॥७२ तत्र स्नात्वा नरो राजन् ! सर्वयशकल लभेत् । तत्र सांधतो राजा पृथिव्यामेव जायते ॥ ७० ॥ सर्वलक्षपासम्पूर्ण. सर्वव्याधिविवर्जित । नार्मदे चोत्तरे कृले तीर्थ परमशोभनम् ॥७५ मादित्यायतनं दिव्यमीश्वरेण तु भापितम् । तस्य तीर्थप्रभावेण दत्त भवति चाक्षयम् हरिद्राव्याधिनो ये तु ये च दुष्टतकर्मिण ।मुच्यन्ते सर्वपापेभ्यः सूर्यलोकंतु यान्ति ते माघमासेतु सप्राप्ते शुक्लपक्षस्य सप्तमी । घसेदायतने तत्र निराहारो जितेन्द्रियः ॥८॥ न जराज्याधितो मूको न चान्धो यधिरोऽथवा । सुभगो रूपसंपन्न स्त्रीणा भयंति घलभः ॥ ७ ॥ एवं तीर्थ महापुण्यं मार्कण्डेयेन भाषितम् । येन जानन्ति राजेन्द्र ! पश्चितास्ते न संशयः ॥ ८॥ गर्गेश्वरं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समावरेत् ।
* मत्स्यपुराणम् * [नवत्यधिकशततमो सातमात्रो नरस्तत्र स्वर्गलोकमवाप्नुयात् ॥ ८१ ॥ मोदते स्वर्गलोकस्थो यावदिन्द्राश्चतुर्दश । समीपतः स्थितं तस्य नागेश्वरतपोधनम् ॥ तत्र स्नात्यातु राजेन्द्र ! नागलोकमवाप्नुयात् । वद्विभिर्नागकन्याभिः क्रीडते कालमक्षयम् ॥ ८३॥ कुबेरभवनं गच्छेत् कुवेरो यत्र संस्थितः । कालेशरंपर तीर्थ कुवेरो यत्रतोपित. ॥८॥ तत्र नात्यातु राजेन्द्र ! सर्वसम्पदमाप्नुयात् । तत-पश्चिमतो गच्छेत् मारुतालयमुत्तमम् तन्न स्मात्वातु राजेन्द्र ! शुचिर्भूत्वासमाहितः । काञ्चनंतु ततोदद्यायथाशनिसुबुद्धिमान पुष्पकेण विमानेन घायुलोकं स गच्छति। यमतीर्थ ततो गच्छेन् माघमासे युधिष्ठिर! चतुर्दश्यां स्नानं तत्र समाचरेत् । नक्तम्भोज्यं तत कुन्निपश्येद्योनिसङ्कटम् अहल्यातीथं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत् । स्नातमात्रो नरस्तत्र ह्यप्सरोभिः प्रमोदते ॥ ८६ ॥ अहल्या च तपस्तत्वा तत्र मुक्तिमुपागता । चैत्रमासेतु संप्राप्ते शुक्लपक्षे चतुर्दशी ॥१०॥ कामदेवदिने तस्मिन्नहल्यां यस्तु पूजयेत् । यत्रयत्र नरोत्पन्नो घरस्तत्र प्रियो भवेत् ॥ स्त्रीवल्लभो भवेच्छीमान् कामदेव इवापरः । अयोध्यान्तुसमासाद्य तीर्थ रामस्यविश्रुतम् स्मातमात्रो नरस्तत्र सर्वपापै प्रमुच्यते। सोमतीर्थ ततो गच्छेत् स्नानं तत्रसमाचरेत् ॥ स्मातमात्रो नरस्तत्र सर्वपापैः प्रमुच्यते । सोमनहे तु राजेन्द्र ! पापक्षयकरं नणाम् ।। त्रैलोक्यविश्रुतं राजन् ! सोमतीर्थ महाफलम् । यस्तु चान्द्रायणं कुर्यात्तस्मिंस्तीर्थ नराधिप ! ॥ १५ ॥ सर्वपापविशुद्धात्मा सोमलोकं स गच्छति । अग्निप्रवेशेऽथ जले अथवापि धनाशके ।। सोमतीर्थे मृतो यस्तु नाऽसौ मत्यैऽभिजायते । शुभतीर्थ ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत् ॥ १७ ॥ स्नातमात्रो नरस्तत्र गोलोकेषु महीयते । ततोगच्छेच्च राजेन्द्र ! विष्णुतीर्थमनुत्तमम् योधनीपुरमारयातं विष्णुस्थानमनुत्तमम् । असुरा योधितास्तत्र धासुदेवेन कोटिशः तत्र तीर्थ समुत्पन्नं विष्णुः प्रीतो भवेदिह । अहोरात्रोपचासेन ब्रह्महत्यां व्यपोहति ।।
ऽध्यायः] * नानाविधतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् * ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र ! तापसेश्वरमुत्तमम् । हरिणीव्याधसन्त्रस्तापतितायत्रसामुगी जलेप्रक्षितयात्रा तु अन्तरिक्षं गता व सा । व्याधोविस्मितचित्तस्तु पर विस्मयमागतः तेन तापेश्वरं तीर्थ न भूतं न भविष्यति । ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र ! ब्रह्मतीर्थमनुत्तमम् ॥ अमोहकमिति रयातं पितॄश्चैवात्र तर्पयेत् । पौर्णमास्याममायान्तु श्राद्धं कुर्याद्यथाविधि ।। १०४ ।। तत्र स्नात्वा नरो राजन् ! पितृपिण्डन्तु दापयेत् । गजरूपा शिला तत्र तोयमध्ये प्रतिष्ठिता ॥ १०५॥ तस्यान्तु दापयेत् पिण्डवैशारयान्तुविशेषतः । तृप्यन्ति पितरस्तत्र यायत्तिष्ठति मेदिनी ततोगच्छञ्चराजेन्द्र ! सिद्धेश्वरमनुत्तमम् । तत्रस्नात्वानरोराजन् ! गणपत्यन्तिकं व्रजेत् ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र ! लियो यत्र जनार्दनः । तन स्नात्वा तु राजेन्द्र ! विष्णुलोके महीयते ॥ १०८॥ नर्मदादक्षिणे कृले तीर्थ परमशोभनम् । घामदेव. म्वयं तर तपोऽतप्यत वै महत् ।। दिव्यं धर्ष सहस्रन्तु शङ्करं पर्युपासत । समाधिभङ्गदग्धास्तु शङ्करेण महात्मना ॥११० श्वेतपर्वा यमश्चैय हुताश. शुनपर्वणि । प्ते दाधास्तु ते सर्वे कुसुमेश्वर सस्थिताः ।। दिव्यवसहस्रेण तुष्टस्तेषां महेश्वर. 1 उमया सहितो रदस्तुपस्तेषां पणदः ॥ ११२॥ मोक्षयित्वा तु तान् सर्वान् नर्मदातटमास्थित । ततस्तीर्थप्रभावेण पुनर्देपत्यमागताः ॥ ११३ ॥ त्पत्प्रसादान्महादेव ! तीर्थ भवतु चोत्तमम् । अर्द्धयोजनविस्तीर्ण क्षेत्रंदिक्षु समन्तत तम्मिती नर स्नात्या चोपचासपरायण । युसुमायुधरूपेण रदलोफे मदीयते ॥११५ पैचानरो यमाश्चय कामदेवम्तयामस्त् । तपस्तन्या तु राजेन्द्र पर्रासिद्धिमवाप्नुयुः अहोरम्य समीपे तु नास्तिदूरे तु तस्य घे । स्नानं दानव तप भोजनं पिपडमेय च थमिप्रवेशेऽथ जले अधया नुहानाशके अनियर्तिका गतिम्तम्य मृतम्यामुम जायते ।। यायन तु तोयेग यधर्म अपयेन्नरः । भोरमले दया नु पिण्ड चैय यथाविधि ॥ एप्पन्ति पितरस्तस्य यापचन्द्र दिपाफरौं । उत्तरे त्यपने प्राप्त गुणम्नानदुरोति यः॥ 1 * मत्स्यपुराणम् * [एकनवत्यधिकशततमो पुरपो वाथ स्त्री चापि घसेदायतने शुचिः । सिद्धेश्वरस्य देवस्य प्रातः पूजां प्रकल्पयेत् ॥ १२१ ॥ स याङ्गतिमवाप्नोति न तो सर्वैर्महामौः । यदाचतीर्णः कालेन रूपवान् शुभगो भवेत् मत्यै भवति राजा चत्वासमुद्रान्तगोचरे । क्षेत्रपालं न पश्येत्तु दण्डपाणि महावलम् ॥ वृथा तस्य भवेद्यात्रा ह्यदृष्ट्वाकर्णकुण्डलम् । एवं तीर्थफलं ज्ञात्या सर्वे देवा. समागताः मुञ्चन्ति कुसुमैर्वृष्टिं तेन तत् कुसुमेश्वरम् ॥ १२४ ॥ इति श्री मत्स्यपुराणे नर्मदादक्षिणोत्तरकृलयो नानाविधतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम नवत्यधिकशततमोऽध्यायः । एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः नर्मदामाहात्म्ये नानाविधतीर्थमाहात्म्यकथनम् । मार्कण्डेय उवाच । भार्गवेश ततो गच्छेदनो यत्र जनार्दन । असुरैस्तु महायुद्धे महावलपराक्रमैः ॥ १ ॥ हुङ्कारितास्तु देवेन दानवा प्रलयगताः । तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र ! सर्वपापैः प्रमुच्यते शुक्लतीर्थस्य चोत्पत्तिं शृणु त्वं पाण्डुनन्दन ! हिमवच्छिखरे रम्ये नानाधातुविवित्रिते तरुणादित्यसङ्काशे तप्तकाञ्चनसप्रभे । पत्रस्फटिकसोपाने चित्रवेदीशिलातले ॥ ४ ॥ जाम्यूनदमये दिव्ये नानापुष्पोपशोभिते । तत्रासीन महादेवं सर्वशं प्रभुमव्ययम् ॥५॥ लोकानुग्रहदं शान्तगणवृन्दै. समावृतम् । स्कन्दनन्दिमहाकालैीरभद्रगणादिभिः ॥६॥ उमया सहित देवं मार्कण्डि पर्यपृच्छत । देवदेव महादेव ब्रह्मविप्ण्विन्द्रसंस्तुत !७ ससारभयभीतोऽहं सुखोपायं ब्रवीहि मे। भगवन् ! भूतभव्येश! सर्वपापप्रणाशनम् ॥ तीर्थाना परमं तीर्थं तद्वदस्व महश्वर! ईश्वर उवाच । विप्र! महाप्राज्ञ ! सर्वशास्त्र विशारद ! स्नानायगच्छ सुभग ! ऋपिसङ्घसमावृतः ऽध्यायः] * शुक्लतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् * मन्वत्रिकश्यपाश्चैव याचल्योशनोऽडिराः । यमापस्तम्बसंघर्ताः कात्यायनवृहस्पती नारदो गीतमश्चैव सेवन्ते धर्मकाक्षिणः । गङ्गां कनखलं पुण्यं प्रयागं पुष्करंगयाम् कुरुक्षेत्रं महापुण्यं राहुग्रस्ते दिवाकरे । दिवा वा यदि चा रात्री शुक्लतीर्थ महाफलम् ॥ दर्शनात् स्पर्शनाच्चैव स्नानाहानात्तपोजपात् । होमाञ्चैवोपवासाच्च शुक्लतीर्थं महाफलम् शुक्लतीर्थमहापुण्यनर्मदायांव्यवस्थितम् । चाणक्यो नाम राजर्पिः सिद्धि तत्रसमागतः एतत् क्षेत्रं सुविपुलं योजनं वृत्तसंस्थितम् । शुक्लतीथं महापुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् ॥ पादपानेण दृष्टेन ब्रह्महत्यां व्यपोहति । जगतीदर्शनाच्चैव भ्रूणहत्यां व्यपोहति ॥ १६ ॥ अहं तत्र ऋषिश्रेष्ठ ! तिष्ठामि हुमया सह । वैशाखे चैत्रमासे तु कृष्णपक्षे चतुर्दशी :: कैलासाचापि निष्क्रम्य तत्र सनिहितो ह्यहम् । दैत्यदानवगन्धर्वाः सिद्धविद्याधरास्तथा ॥ १८ ॥ गणाश्चाप्सरसोनागाःसर्वेदेवाः समागता. । गगनस्था तु तिष्ठन्ति विमानःसार्वकामिक शुक्लतीथं तु राजेन्द्र ! ह्यागता धर्मकाक्षिण । रजकेन यथा धस्त्रं शुक्लम्भवतियारिणा आजन्मजनितं पापं शुलतीर्थ व्यपोहति । स्नानं दानं महापुण्यं मार्कण्डे ऋषिसत्तम । शुत्तीर्धात् परं तीर्थ न भूतं न भविष्यति । पूर्व वयसि कर्माणि कृत्वा पापानिमानयः अहोरानोपयासेन शुलतीर्थे व्यपोहति । तपसा ब्रह्मचर्येण यौर्दानेन या पुन ॥ २ ॥ देवार्चनेन या पुष्टिर्न सा ऋतुशतैरपि । कार्तिकस्य तु मासस्य कृष्णपक्षे चतुर्दशी । घृतेन स्नापयेद्देवमुपोप्य परमेश्वरम् । एकविंशकुलोपेतो न च्यवेदैश्यरात् पदात् ।। शुलतीर्घ महापुण्यमृपिसिद्धनिषेवितम् । तत्र स्नात्या नरो राजन् ! न पुनर्जन्मभाक् भवेत् ॥ २६ ॥ स्नात्या वै शुरुतीर्थ तु धर्चयेत् वृषभध्वजम् । कपालपूरणं इत्या तुप्यत्यत्र महेश्वरः अर्द्धनारीश्वरं देवं पटे भत्त्या लिसापयेत् । शड्नतृर्यनिनादैश्च ब्रह्मयोपैश्च सद्विजः॥२८ जागरं फारयेत्तत्र नृत्यगीतादिमङ्गलः । प्रभाते नीर्थ तु स्नानं वै देवतार्चनम् ॥ आचार्यान् भोजयेत् पधान्टियरतपरान् शुचीन् । दक्षिणाश्च यथाशक्ति वित्तशाटर विपर्जयेत् ॥३०॥ 1 ५७४ * मत्स्यपुराणम् ॥ [ द्विनवत्यत्यधिकशततमो प्रदक्षिणं ततः कृत्वा शनैर्देधान्तिकं व्रजेत् । एवं वै कुरुते यस्तु तस्य पुण्यफलं श्णु । दिव्ययानं समारूढ़ो गीयमानोऽप्सरोगणे. । शिवतुल्यवलोपेतस्तिष्ठत्याभूतसंलयम् ॥ शुक्रुतीर्थे तु या नारी ददाति कनकं शुभम् । घृतेन स्नापयेद्देवं कुमारं चापि पूजयेत् ॥ एवं या कुरुते भक्त्या तस्याः पुण्यफलंशृणु । मोदते शर्यलोकस्था यावदिन्द्राश्चतुर्दश पौर्णमास्यां चतुर्दश्यां संक्रान्ती विपुचे तथा। स्नात्वा तु सोपवासः सन् विजितात्मा समाहितः ॥ ३५॥ दानं दद्याद्यथाशक्त्या प्रीयता हरिशङ्करौ । एवं तीर्थप्रभावण सर्व भवति चाक्षयम् अनाथं दुर्गतं विप्रं नाथवन्तमथापि चा । उद्वाहयति यस्तीर्थे तस्य पुण्यफलं शृणु यावत्तद्रोमसंख्या व तत्प्रसूतिकुलेषु च । तावद्वर्पसहस्राणि शिवलोके महीयते ॥३८॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे नर्मदामाहात्म्ये शुक्लतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम- कनवत्यधिकशततमोऽध्यायः । ॥ ॥ दिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः नर्मदामाहात्म्ये नानाविधतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् । मार्कण्डेय उवाच । ततस्त्वनरकं गच्छेत् स्नान तत्र समाचरेत् । स्नातयात्रो नरस्तत्र नरकच न पश्यति । तस्य तीर्थस्य माहात्म्यं पृणु त्वं पाण्डुनन्दन!। तस्मिंस्तीर्थ तु राजेन्द्र | यस्यास्थीनि विनिक्षिपेत् ॥ २॥ विलयं यान्तिसर्वाणिरूपवान् जायते नर । गोतीर्थन्तु ततो गत्वा सर्वपोपात्प्रमुच्यते ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र कपिलातीर्थमुत्तमम् । तत्रगत्यानरोराजन् ! गोसहस्त्रफलंलभेत् ॥ ज्यैष्टमासे तु संप्राप्ते चतुर्दश्यां विशेषतः । तत्रोपोष्य नरो भत्तया कपिलाय प्रयच्छति घृतेन दीपं प्रज्वाल्य घृतेन स्नापयेच्छिवम् । सघृतं श्रीफलंजग्ध्वा दत्त्वाचान्तप्रदक्षिणम् घण्टाभरणसंयुक्तां कपिला य. प्रयच्छति । शिवतुल्यवलो भूत्वा नेचासो जायते पुन . ऽध्यायः] * नानाविधतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् * ५७५ अङ्गारकदिने प्राप्ते चतुझं तु विशेषतः । पूजयेत्तु शिवं भत्त्या ब्राह्मणेभ्यश्च भोजनम् अङ्गारफनवम्यां तु अमायाञ्च विशेषतः । स्नापयेत्तत्र यत्नेन रूपवान् सुभगो भवेत् ॥ घृतेन स्नापयेलिङ्ग पूजयेद्भक्तितो द्विजान् । पुष्पकेण विमानेन सहस्रः परिवारितः ॥ शैवं पदमवाप्नोति यत्र चाभिमतं भवेत् । अक्षयं मोदते कालं यथा रुद्रस्तथैव सः ।। यदा तु कर्मसंयोगान्मर्त्यलोकमुपागतः । राजा भवति धर्मिष्ठो रूपवान् जायते कुले । त्ततो गच्छेचराजेन्द्र! ऋपितीर्थमनुत्तमम् । तृणविन्दु म ऋपिः पापदग्धो व्यवस्थितः सत्तीथस्य प्रमाण शापमुक्तोऽभवद्विजः । तता गच्छेत्तु राजेन्द्र ! गङ्गेश्वरमनुत्तमम् श्रावणे मासि संप्राप्त कृष्णपक्षे चतुर्दशी । स्नातमात्रो नरस्तत्र रुद्रलोके महीयते ॥१५॥ 'पितॄणां तर्पण कृत्वा मुच्यते च ऋणत्रयात् । गङ्गेश्वरसमीपे तु गङ्गापदनमुत्तमम् ॥ अकामो पा सकामो घा तत्रस्नात्वातु मानवः । आजन्मजनितैः पापैर्मच्यतेनात्रसंशयः ततीर्थे नरः स्नात्वा बजेद्वै यत्र शङ्करः । सर्वदा पर्वदिवसे स्नानं तत्र समाचरेत् ॥ पितृणां तर्पणं कृत्वा ह्यश्वमेधफलं लभेत् । प्रयागे यत् फलं दृष्टं शङ्करेण महात्मना । तदेव निखिलं दृष्टं गङ्गावदनसङ्गमे । तस्यैव पश्चिमे स्थाने समीपे नातिदूरतः ॥ २० ॥ दशाश्वमेधजननं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । उपोप्य रजनीमेकां मासि भाद्रपदे तथा ॥ अमायाञ्च नर. स्नात्वा बजते यत्र शङ्कः । सर्वदा पर्वदिवसे स्नानं तत्रसमावरेत् ॥ पितृणां तर्पणं कृत्वा चाश्वमेधफलं लभेत् । दशाश्वमेधात् पश्चिमतो भृगुाह्मणसत्तमः ॥ २३ ॥ दिव्यं वर्षसहस्रन्तु ईश्वरं पर्युपासत । पत्मीकवेष्टितश्चासौ पक्षिणाञ्च निकेतन ॥२४॥ आश्चर्य सुमहजातमुमायाः शङ्करस्य च । गोरी पप्रच्छ देवेशकोऽयमेवन्तुसंस्थिता(त.) देवो पा दानवो वाथ कथयस्व महेश्वर !। महेश्वर उवाच । भृगु म द्विजश्रेष्ठ ऋषीणां प्रवरो मुनिः ॥ २६॥ मान्ध्यायते समाधिस्थो परं प्रार्थयते प्रिये!। ततः प्रहसिता देवी ईश्वरंप्रत्यभापत ॥ धूमवत्तच्छिवाजाताततोऽद्यापि न तुष्यसे । दुराराध्योऽसितेनत्वनात्रकायांपिवारणा प * मत्स्यपुराणम् '* [विनवत्यधिकशततमो महेश्वर उवाच । न जानासि महादेवि ह्ययं क्रोधेन वेष्टित' । दर्शयामियथातथ्यं प्रत्ययं ते करोम्यहम् ततः स्मृतोऽथ देवेन धर्मरूपो वृषस्तदा । स्मरणात्तस्य देवस्य वृषः शीघ्रमुपस्थितः घदस्तु मानुषी घाचमादेशो दीयतां प्रभो!। भगवानुवाच। घल्मीकं त्वं खनस्वैनं विप्रं भूमौ निपातय ॥ ३१ ॥ योगस्थस्तु ततो ध्यायन् भृगुस्तेन निपातितः । तत्क्षणात् क्रोधसन्तप्तो हस्तमुक्षिप्य सोऽशपत् ॥३२॥ एवं स भाषमाणस्तु कुत्र गच्छसि भो वृप!। अद्याहं संप्रकोपेन प्रलयं त्वान्नये वृप! धर्पितस्तु तदा विप्रश्चान्तरिक्षङ्गतोवृपम् । आकाशे प्रेक्षते विप्र एतदद्भुतमुत्तमम् ॥३४॥ तत्रप्रहसिते रद्र ऋपिरग्रे व्यवस्थितः । तृतीयलोचनं दृष्ट्वा चैलक्ष्यात् पतितो भुवि ।। प्रणम्य दण्डवद्भूमौतुष्टावपरमेश्वरम् । प्रणिपत्य भूतनाथं भवोद्भवं त्वामहंदिव्यरूपम् भवातीतो भुवनपते प्रभो ! तु विज्ञापये किञ्चित् ॥३६॥ त्वद्गुण निकरान् पक्तुं क शक्तो भवति मानुपो नाम । घासुकिरपि हि कदाचिद्वदनसहस्रं भवेद्यस्य ॥३७॥ भत्तया तथापि शङ्कर भुवनपते ! त्यत्सुतो मुखरः । घदत क्षमस्व भगवन् ! प्रसीद मे तव चरणपतितस्य ॥३८॥ सत्य रजस्तमस्त्वं स्थित्युत्पत्योर्विनाशने देव !! त्वा मुतवा भुवनपते ! भुवनेश्वर नैव दैवतं किञ्चित् ॥३॥ यमनियमयशदानवेदाभ्यासाश्च धारणा योगः। त्यदत्ते सर्वमिदं नाहति हि फलासहस्रांशम् ॥४०॥ उच्छिष्टरसरसायनसगांजनपादुका विवरसिद्धिर्या । चिह्न भयव्रतानां दृश्यति चेह जन्मनि प्रकटम् ॥४१॥ शाट्येन नमति यद्यपि ददासि त्वं भूतिमिच्छतो देव!।
५७७
ऽध्यायः]
* भृगुकृत करुणाभ्युदयनामस्तोत्रम् *
भक्तिर्भवभेदकरी मोक्षाय विनिर्मिता नाथ ॥४२॥
परदारपरस्वरतं परपरिभवदुःसशोकसन्तप्तम् ।
परवदनचीक्षणपरं परमेश्वर! मांपरित्राहि ॥४३॥
मिथ्याभिमानदग्धं क्षणभङ्गरविभवपिलसन्तम् ।
क्रूरं कुपथ्याभिमुपं पतितं मां पाहि देवेश! ॥४॥
दीने द्विजगणसाथै बन्धुजनेनैव दूषिता ह्याशा ।
तृष्णा तथाऽपि शङ्कर! किं मृदं मां विडम्बयति ॥४५॥
तृष्णा हरस्व शीघं लक्ष्मी प्रदख यावदासिनी नित्यम् ।
छिन्धि मदमोहपाशानुत्तारय मां महादेव ! ॥ ४६ ॥
करणाभ्युदयं नाम स्तोत्रमिदं सर्वसिद्धिदं दिव्यम् ।
यः पठति भक्तियुक्तस्तस्य तुष्येत् भृगोर्यथा च शिवः ॥४७॥
ईश्वर उवाच।
महंतुष्टोऽस्मिते घरस ! प्रार्थयस्वेप्सितं घरम् । उमया सहितो देवोपरंतस्यादापयत्
भृगुरुवाव।
यदि तुटोसि देवेश! यदि देयो घरो मम । रुद्रवेदी भवेदेवमेतत्सम्पादयस्व मे ॥ ४६॥
ईश्वर उवाच ।
एव भवतु विप्रेन्द्र ! कोधस्त्वा न भविष्यति। न पितापुत्रयोश्चैव त्वैकमत्यंभविष्यति
सदा प्रभृति ब्रह्माद्या सर्वदेवाः सकिन्नराः । उपासन्ते भृगोस्तीर्थ तुष्टो यत्र महेश्वरः
दर्शनात्तस्य तीर्थस्य सद्यः पापात् प्रमुच्यते।
अवशाः स्वयशा धापि नियन्ते यत्र मानवाः ॥५२॥
गुह्यातिगुह्यासु गतिस्तेषां नि संशयं भवेत् । एतत् क्षेत्रं सुविपुलं सर्वपापप्रणाशनम्
तत्र स्मात्या दिवं यान्ति ये मृतास्ते पुनर्भवाः । उपानहीच छपञ्च देवमन्नञ्च काञ्चनम्
भोजन यधाशया क्षयश्च तथा भवेत् । सूर्योपरागे यो दद्याहानं च यथेच्छया।
दीयमानस्तु तहानमक्षयं तस्य तद्भवेत् । चन्द्रसूर्योपरागेषु यत् फलं त्वमरकण्टके॥५६॥
५७८ * मत्स्यपुराणम् * [द्विनवत्यधिकशततमो तदेव निखिलं पुण्यं भृगुतीर्थ न संशयः । क्षरन्ति सर्वदानानि यज्ञदानतप.क्रिया ॥५७t न क्षरेत्तु तपस्तप्त भृगुतीर्थे युधिष्ठिर ! । यस्य वै तपसोग्रेण तुष्टेनैव तु शम्भुना ॥१८॥ सान्निध्य तत्र कथितं भृगुतीर्थे नराधिप!। प्रख्यातं त्रिपु लोकेषु यत्र तुष्टो महेश्वर. एवं तु वदतो देवीं भृगुतीर्थमनुत्तमम् । न जानन्ति नरा मूढा विष्णुमायाविमोहिता नर्मदाया स्थितं दिव्यं भृगुतीर्थ नराधिप!! भृगुतीर्थस्य माहात्म्यं यः शृणोति नरः क्वचित् ॥ ६१ ॥ चिमुक्त सर्वपापेभ्यो रद्रलोकं स गच्छति । ततोगच्छेत्तु राजेन्द्र ! गौतमेश्वरमुत्तमम् तत्र स्नात्वा नरो राजन्नुपवासपरायण. । फाचनेन विमानेन ब्रह्मलोके महीयते ॥६॥ धौतपाप ततो गच्छेत् क्षेत्रं यत्र वृषेण तु । नर्मदायां राजन् ! सर्वपातकनाशनम् तन तीर्थे नरः स्नात्या ब्रह्महत्यां विमुञ्चति । तस्मिस्तीर्थ तु राजेन्द्र ! प्राणत्यागं करोति यः॥६५॥ चतुर्भुजत्रिनेत्रश्च शिवतुल्ययलो भयेत् । घसेत् फल्पायुतं सानं शिवतुल्यपरामम ॥ फालेनमहता प्राप्त पृथिव्यामेकराट् भवेत् । ततो गच्छेशराजेन्द्र ! ऐरण्डीतीर्थमुत्तमम् प्रयागे यत् फलं दृष्टं मार्कण्डेयेन भापितम् । तत् फलं लभते राजन् ! स्नातमात्रो हि मानधः ॥ ६८॥ मासि भाद्रपदे चैव शुक्लपक्षे चतुर्दशी । उपोप्य रजनीमेकां तस्मिन् स्नानं समाचरेत् यमदृतैर्न याध्येत रदलोकं स गच्छति । ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र ! सिद्धो यत्र जनार्दन ॥ हिरण्यदीपेति विग्यातं सर्वपापप्रणाशनम् । तत्र स्नात्या नरो राजन् ! धनवान् रूपघान् भवेत्॥ ७१ ॥ ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र ' तीयेङ्कनसल महत् । गरडेन तपस्ततं तस्मिस्तीर्थ नराधिप । प्रग्यात निपुलोफेषु योगिनी तत्र तिष्ठति । पीडते योगिमि साई शिवेन सह नृत्यति तत्र स्नात्या नरो राजन् ! रुद्रलोके महीयते । तनो गच्छेत्तुराजेन्द्र! हंसतीर्थमनुत्तमम इंसास्तयिनिर्मुक्ता गताउदध्यं न संशयः । ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र ! सिदोयजनार्दन पाराहं म्पमास्थाय चित परमेश्वरः । पराइतीय नर.स्नात्या द्वादश्यान्नु विशेषतः , ऽध्यायः] * नानाविधतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् * ५७६ विष्णुलोकमवाप्नोति नरकं न च पश्यति । ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र ! चन्द्रतीर्थमनुत्तमम् पौर्णमास्यां विशेषेण स्नानं तत्र समाचरेत् । स्नातमात्रो नरस्तत्र चन्द्रलोके महीयते दक्षिणेन तु तीरेण फन्यातीर्थन्तु विश्रुतम् । शुक्लपक्षे तृतीयायां स्नानं तत्र समारेत् ।। प्रणिपत्य तु चेशानं बलिस्तेन प्रसीदति । हरिश्चन्द्रपुरं दिव्यमन्तरिक्षेच दृश्यते॥४०॥ शक्रध्वजे समावृत्ते सुप्ते नागरिके जने । नर्मदासलिलोधेन तरून् संप्लावयिष्यति ॥८॥ अस्मिन् स्थाने निवासः स्यात् विष्णुः शङ्करमत्रवीत् । दीपेश्वर नरः स्नात्वा लभेद् बहु सुवर्णकम् ।।८२ ॥ ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र ! कन्यातीर्थे सुसङ्गमे । स्नातमात्री नरस्तत्र देव्याः स्थानमवाप्नुयात् ॥ ८३ ॥ देवतीर्थ ततो गच्छेत् सर्वतीर्थमनुत्तमम् । तत्र स्नात्वा तुराजेन्द्र ! देवते. सह मोदते ततो गच्छेञ्च राजेन्द्र । शिखितीर्थमनुत्तमम् । यत्तत्रदीयते दानं सर्व कोटिगुणं भवेत् अपरपक्षे त्वमायान्तु स्नानं तत्र समाचरेत् । ब्राह्मणं भोजयेदेक कोटिर्भवति भोजिता भृगुतीर्थन्तु राजेन्द्र । तीर्थकोदिर्व्यवस्थिता। अकामो व सकामो वा तत्र स्नानं समाचरेत् ॥ ८७ ॥ अश्वमेधमवाप्नोति देवतैः सह मोदते । तत्र सिद्धि परां प्राप्तो भृगुस्तु मुनिपुङ्गयः । अवतार' कृतस्तत्र शङ्करेण महात्मना ॥ ८८॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे नर्मदामाहात्म्येऽनेकतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम द्विनयत्यधिकशततमोऽध्यायः त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः नर्मदामाहात्म्ये नानाविधतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् । मार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र शङ्कशेखरमुत्तमम् । दर्शनात्तस्य देवस्य मुच्यते सर्वपातकः ॥२॥ --- - * मत्स्यपुराणम् * [त्रिनवत्यधिकशततमो ततो गच्छेच्च राजेन्द्र!नर्मदेश्वरमुत्तमम् । तत्र स्नात्वा नरो राजन्! स्वर्गलोकेमहीयते अश्वतीयं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत् । सुभगो दर्शनीयश्चभोगवान् जायतेनरः पितामहं ततो गच्छेत् ब्रह्मणा निर्मितं पुरा। तत्र स्नात्वा नरो भत्त्या पितृपिण्डन्तु दापयेत् ॥ ४॥ तिलदर्भघिमिश्रन्तु [दकं तत्र दापयेत् । तस्य तीर्थप्रभावेण सर्व भवति चाक्षयम् ॥५॥ सावित्रीतीर्थमासाद्य यस्तु स्नानं समाचरेत्। विधूय सर्वपापानि ब्रह्मलोके महीयते ॥ मनोहरं ततो गच्छेत् तीर्थ परमशोभनम् । तत्र स्नात्वा नरो राजन् ! पितृलोकेमहीयते ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र! मानसं तीर्थमुत्तमम् । तत्र स्नात्वानरो राजन् ! रुद्रलोकेमहीयते ततो गच्छेच राजेन्द्र! कुञ्जतीर्थमनुत्तमम् । विख्यातं त्रिषु लोकेषु सर्वपापप्रणाशनम्॥ यान्यानकामयतेकामान् पशुपुत्रधनानिच । प्राप्नुयात्तानिसर्वाणि तत्र स्नात्वानराधिप ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र ! त्रिदशज्योतिविश्रुतम् । यत्र ता ऋषिकन्यास्तु तपोऽतप्यन्त सुव्रताः ॥ ११ ॥ भर्ता भवतु सर्वासामीश्वरः प्रभुरव्ययः। प्रीतस्तासां महादेवो दण्डरूपधरो हरः ।। विस्ताननबीभत्सुर्वती तीर्थमुपागतः । तत्र कन्या महाराज ! घरयन् परमेश्वरः ॥१२॥ 'फन्यां ऋपर्वरयतः कन्यादानं प्रदीयताम् । तीथं तत्र महाराज! ऋषिकन्येति विध्रुतम् तत्र स्नात्वा नरो राजन् ! सर्वपापैः प्रमुच्यते । ततो गच्छेच्च राजेन्द्र ! स्वर्णविन्दुत्पिति स्मृतम् ॥ १५॥ तत्र स्नात्था नरो राजन् ! दुर्गति न च पश्यति । अप्सरेशं ततो गच्छेत् म्नानं तन समाचरेत् ॥ १६ ॥ फ्रीडते नागलोकस्थो हप्सरैः सह मोदते । ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र नरक तीर्थमुत्तमम तत्र स्नात्यार्चयेद्देयं नरर्फ च न पश्यति । भारभूति ततो गच्छेदुपपासपरो जनः ॥१८ एतत्तीयं समासाद्य चावतारं तु शाम्मयम् । भर्वयित्या विरुपाक्षं रद्रलोके महीयते ॥ अम्मिस्तीर्थ नरः स्नात्यामारभूतो महात्मनः । यत्र तत्र मृतस्यापि ध्रुवंगाणेपरीगतिः फतिफस्य तु मासस्य एर्चयित्या महेश्वरम् । अश्वमेधादशगुणं प्रपदन्ति मनीषिणः ऽध्यायः] * नानाविधतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् * दीपकानां शतं तत्र घुनपूर्णन्तु दापयेत्। विमानः सूय॑सङ्काशेजते यत्र शङ्करः ॥२२॥. कृपभ यः प्रयच्छेत्तु शङ्ख कुन्देन्दुसप्रभम् । वृपयुक्तन यानेन रूटलोकं स गच्छति ॥२३॥ धेनुमेकान्तु यो दद्यात्तस्मिस्तीर्थ नराधिप। पायसं मधुसंयुक्तं भक्ष्याणिविविधानि च यथाशक्तयाचराजेन्द्र ! ब्राह्मणान् भोजयेत्ततः । तस्य तीर्थप्रभावेणसर्व कोटिगुणमयेत् नर्मदाया जलं पीत्वा धर्चयित्वा वृषध्वजम् । दुर्गतिञ्चनपश्यतितस्मिस्तीर्थेनराधिप ! ईसयुक्तेन यानेन दलोकं स गच्छति । यायचन्द्रश्च सूर्यश्च हिमांश्च महोदधिः ॥२७॥ गङ्गायाः सरितो यावनावत् स्वर्गेमहीयते । अनाशकन्तुय. कुर्यात्तस्मिस्तीर्थेनराधिप ॥ गर्भवासे तु राजेन्द्र! न पुनर्जायते पुमान् । ततोगच्छेत्तु राजेन्द्र ! आषाढीतीर्थमुत्तमम् तत्र स्नात्वा नरो राजन्लिन्द्रस्या सनं लभेत् । स्त्रियास्तीर्थ ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम् ॥ ३० ॥ तत्रापि स्नातमात्रस्य ध्रुवं गाणेश्वरी गतिः । ऐरण्डीनर्मदयोश्च सङ्गम लोकविश्रुतम् सच तीर्थ' महापुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् । उपवासपरो भूत्वा नित्यत्रतपरायणः ॥३॥ तत्र स्नात्या तु राजेन्द्र मुच्यते ब्रह्महत्यया । ततो गच्छेच राजेन्द्र ! नर्मदोदधिसङ्गमम् ॥ ३३ ॥ जामदग्न्यमिति ख्यात सिद्धीयत्र जनार्दन । यत्रेष्ट्वा यह भिर्यज्ञैरिन्द्रो देवाधिपोऽभवत् सत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र नर्मदोदधिसङ्गमे । त्रिगुणं चाश्वमेधस्य फलंप्राप्नोतिमानवः पश्चिमस्योदधेः सन्धी स्वर्गद्वारचिघट्टनम् । तत्र देवा सगन्धर्षा ऋषय सिद्धचारणाः आराधयन्ति देवेशं त्रिसन्ध्ये चिमलेश्वरम् । तत्र स्नात्वा नरोराजन् ! रुदलोकेमहीयते विमलेशं परं तीर्थ न भूतं न भविष्यति । तत्रोपपासं कृत्या ये पश्यन्ति विमलेश्वरम्॥ सप्तजन्मरतं पापं हित्वा यान्त्यमरालयम् । ततो गच्छेतु राजेन्द्र ! कौशिकीतीर्थमुत्तमम् ॥ ३९ ॥ । तर स्नात्वा नरो राजन्नुपवासपरायणः । उपोप्य रजनीमेकां नियतो नियताशनः ।। एतत्तीर्थप्रभावेण मुच्यते ब्रह्महत्यया । सर्वतीर्थाभिषेकन्तु यः पश्येत् सागरेश्वरम् ॥ योजनाभ्यन्तरे तिष्ठनापः संस्थित. शिवः । तं दृष्ट्वासर्वतीर्थानि दृष्टान्येव न संशयः॥
* मत्स्यपुराणम् * [चतुर्नवत्यधिकशततमो सर्वपापविनिर्मुक्तो यत्र रुद्र. स गच्छति । नर्मदासङ्गमं यावद्यायचामरकण्टकम् ॥४३ अत्रान्तरे महाराज! तीर्थकोट्यो दशस्मृताः। तीर्थात्तीर्थान्तरं यत्रपिकोटिनिषेवितम् साग्निहोत्रैस्तु विद्वद्भिः सर्वैर्ध्यानपरायणः । सेवितानेन राजेन्द्र ! त्वीप्सितार्थप्रदायिका ॥ ४५ ॥ यस्त्विदं वै पठेन्नित्यं नृणुयाद्वापि भावतः । तस्य तीर्थानि सर्वाणि ह्यभिपिञ्चन्ति पाण्डव ! ॥४६ ॥ नर्मदा व सदा प्रीता भवेद्वैनात्र संशय. । प्रीतस्तस्य भवेद्रुद्रो मार्कण्डेयो महामुनिः पन्ध्या चैव लभेत् पुत्रान् दुर्भगा सुभगा भवेन् । कन्या लभेत भर्तारं यश्च धान्छेत् तु यत् फलम् ॥ ४८ ॥ तदेव लभते सर्व नान कार्या विचारणा । ब्राह्मणो वेदमाप्नोति क्षत्रियो विजयी भवेत् वैश्यस्तु लभते लाभं शूद्रः प्राप्नोति सद्गतिम् । मूर्यस्तु लभते विद्या त्रिसन्ध्यं य. पठेन्नर. । नरकच न पश्येत्तु वियोगश्च न गच्छति ॥ ५० ॥ इति श्रीमस्त्यपुराणे नर्मदामाहात्म्यसमाप्तिवर्णनं नाम त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः। चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः भृगुवंशज-मपीणां नामगोत्रवंशप्रवरवर्णनम् । स्त उपाय। इत्याफर्ण्य स राजेन्द्र मोद्वारस्याभिवर्णनम् । तत. पप्रच्छ देवेशं मत्स्यरूपं जलाये॥ मनुस्याच! प्रापीणां नाम गोत्राणि यंशापतरण तथा। अपराणां तथा साम्पमसाम्यं पिस्तराद महादेवेन पयः शता. स्यायम्भुपान्तरे । तेषां पस्पते प्राप्त सम्मयं मम फाय॥
ध्यायः] *पोणां नामगोत्रवंशप्रवरवर्णनम् । दाक्षायपीनव तथा प्रजाः कोतय मे प्रमो। ऋषीणां च तथा यंशंभृगुवंशचिवर्धनम् ॥ मत्स्य उधावा मन्वन्तरेऽस्मिन् संप्राप्ते पूर्व वैषस्यते तथा। चरित्रं कथ्यतेराजन्! ब्रह्मण. परमेष्टिनः ।। महादेवस्य शापेन त्यतया देहं स्वयं था। ऋषयश्च समुद्भूताश्च्युते शुक्रे महात्मनः ।। देवानां मातरो ट्वा देवपल्यस्तथैव च । स्कन्नंशुक्रमहाराज! ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ॥७॥ तजुद्दाच ततो ब्रह्मा ततो जाता हुताशनात् । ततो जातो महातेजा भृगुश्च तपसां निधिः ॥ ८॥ अङ्गारप्वहिरा जातो हचिभ्योऽत्रिस्तथैव च । मरीविभ्यो मरीविस्तु ततो जातो महातपाः ॥ ६ ॥ केशैस्तु कपिशो जातः पुलस्त्यश्च महातपाः । केशः प्रलम्पैः पुलहस्ततोजातोमहातपाः घसुमध्यात् समुत्पन्नो घसिष्ठस्तु तपोधनः । भृगु पुलोम्नस्तुसुतांदिव्यांभार्यामचिन्दत यस्यामस्य सुता जाता देवा द्वादशयाशिकाः । मुचनो भौयनश्चैव सुजन्यः सुजनस्तथा शुचिकतुश्च मूर्धा च त्याज्यश्च वसुदश्च ह । प्रमयश्चाव्ययश्चैव दक्षोऽथद्वादशस्तथा ॥ इत्येते भृगयो नाम देवा द्वादश कीर्तिताः । पौलोम्यांजनयन् विप्रान्देवानांतुकनीयसः च्यवनन्तु महामागमाप्नुपानं तथैव च । आप्नुपानात्मजश्वीर्यो जमदग्निस्तदात्मजः ॥ औ© गोत्रकरस्तेपां भार्गवाणां महात्मनाम् । तत्र गोत्रकरास्त्वन्ये भृगोर्वं दीप्ततेजसः ॥ १६ ॥ भृगुश्च व्यवनश्चैव ाप्नुयानस्तथैव च । आर्यश्च जमदग्निश्च वात्स्यो दण्डिनडायनः चैगायनो धातिव्यः पैलश्चैवात्र शौनकः । शौनकायन जीवन्ति रावेदःफार्पणिस्तथा पैहीनरिविरूपाक्षो रोहित्यायनिरेव च । वैश्यान रिस्तथा नीलो लुब्धः सार्याणकश्चसः विष्णुः पौरोऽपि घालाकिरैलिकोऽनन्तभागिनः । भृतमार्गेयमार्कण्डजविनो पीतिनस्तथा ॥२०॥ मण्डमाण्डव्यमाण्डूकफेनपास्तनितस्तथा । स्थलपिण्डाशिखापर्णः शाराक्षिस्तथैपव जालधिः सौधिकः क्षुभ्यः कुत्सन्यो मौद्गलायनः ।
५८४ * मत्स्यपुराणम् * [चतुर्नवत्यधिकशततमी कर्मायनो देवपतिः पाण्डुरोचिः सगालवः ॥ २२ ॥ साकृत्यश्चातकि. सार्पियज्ञपिण्डायनस्तथा। गाायनो गायनश्च ऋपिाहायनस्तथा गोष्ठायनो चात्यायनो वैशम्पायन एव च । वैकणिनि. शाङ्करवो यायिर्धाष्ट्रकायनिः लालाटिर्नाकुलिश्चैच लौक्षिण्योपरिमण्डलौ। आलुकि. सोचकि. कौत्सस्तथान्य. पैङ्गलायनिः ॥ २५ ॥ सात्यायनिर्मालायनि. कौटिलिः कोचहस्तिकः । सोहसोक्ति सकौवाक्षिः कौसिश्चान्द्रमसिस्तथा ॥ २६ ॥ नैकजिहो जिल्लकश्च व्यधाद्यो लोहवैरिण । शारद्वतिकनेतिष्योलोलाक्षिश्चलकुण्डल पागायनिश्चानुमति पूर्णिमागतिकोऽसरत् ।सामान्येन यथा तेषां पञ्चैते प्रवरामताः ॥ भृश्च च्यवनश्चैव आप्यानस्तथैव च । शौर्षश्च जमदग्निश्च पञ्चैते प्रयरा मताः ॥२६ अत. परं प्रवक्ष्यामि शृणु त्वन्यान् भृगूद्वहान् । जमदग्निर्विदश्चैव पौलस्त्यो वैजभृत्तथा ॥ ३०॥ ऋपिश्चोभयजातश्च कायनि. शाकटायनः । औया मारुताश्चैवसर्वेषांप्रवराः शुभा. ॥ भृगुश्च च्यवनश्चैव आप्नुचानस्तथैव च । परस्परमवैचाया ऋपयः परिकीर्तिता ॥३२ भृगुदासो मार्गपथो ग्राम्यायनिकटायनी । आपस्तम्विस्तथा पिल्विनैकशिकपिरेचच आप्टिपेणो गार्दभिश्च कार्दमायनिरघच । पाश्चायनिस्तथारूपियें चायाः प्रकीर्तिता.॥ भृगुश्च च्यवनश्चैध आप्नुपानस्तथैवच । आर्टिषेणस्तथारूपिः प्रवराः पञ्चकीर्तिता. ॥ परस्परमवैचाहा ऋषय. परिकीर्तिता. । यास्को पा घीतिहव्यो घामथितस्तु तथादमः जैवन्त्यायनिमोक्षश्च पिलिश्चैव चलिस्तथा । भागिलो भागवित्तिश्च फौशापिस्त्यथ काश्यपिः॥ ३७॥ चालपिः श्रमदागेपिः सौरस्तिथिस्तथ घ च । गागीयस्त्वध जापालिस्तथा पोण्यायनो सृषिः ॥ ३८॥ ग्रामदश्च तथैतेपामाया. प्रपरा मता. । भृगुश्च पीतहव्यश्च तथा रेघसवैषसो १३६॥ परस्परमवैचाया ऋषयः परिकीर्तिताः । शालायनिः शाकटाक्षो मैत्रेयः साण्डपस्तथा ऽध्यायः] * अपीणां नामगोत्रचंशप्रवरवर्णनम् * द्रोणायनो रोक्मायना पिशली चापि फायनिः । इसजिहस्तथैतेषामायाः प्रवरा मताः ॥ ४१ ।। भृगुश्चैवाथ परश्यो दिवोदासस्तथं पच । परस्परमवैवाया अपय. परिकीर्तिताः ॥ एकायनो याजपतिर्मत्स्यगन्धस्तथैव च । प्रत्यूहश्च तथा सौरिश्चीक्षिधैं कार्दमायनिः तथा गृत्समदो राजन् ! सनकच महान् ऋषिः । प्रयरास्तु तथोक्तानामायाः परिकीर्तिताः ॥ १४ ॥ मृगुत्समदश्चेच आपविती प्रकीर्तितौ । परस्परमवैवाद्या ऋषी व परिकीर्तिती ॥ पते तथोक्ता भृगुवंशजाता महानुभावा गोत्रकाराः। एषां तु नाम्ना परिकीर्तितेन पापं समग्रं विजहाति जन्तुः ॥ ४६ ॥ इतिश्रीमत्स्यपुगणेपीणांनामगोत्रवंशप्रवरवर्णनंनाम चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः आशिरसवंशज-ऋषीणां नामगोमवंशप्रवरवर्णनम् । मत्स्य उवाच। मरीवितनया राजन् ! सुरूपा नाम विश्रुता। भार्या वाङ्गिरसो देपास्तस्याः पुत्रा देश स्मृताः ॥ १ ॥ आत्मायुर्दमनो दक्ष सद प्राणस्त घ च । हविष्मांश्च गविष्ठश्चमृत' सत्यश्च ते दश । एते धाङ्गिरसोनाम देवा पे सोमपायिन.। सुरूपा जनयामास ऋषीन् सर्वेश्वरानिमान वृहस्पतिङ्गीतमञ्च संवर्तमृषिमुत्तमम् । उत्तथ्यं घामदेवं व अजस्यमृपिजन्तथा ॥ ४ ॥ इत्येते अपय.सर्वेगोत्रकारा:प्रकीर्तिता । तेषां गोत्रसमुत्पन्नान गोत्रकाराननियोध में उतथ्योगौतमश्चैव तालेयोऽमिजितस्तथा । साधनेमि सलीगाक्षि क्षीर: कौष्टिकिरपव ૧૮ * मत्स्यपुराणम् * [पञ्चनवत्यधिकशततमो राहुर्काणः सौपुरिश्च कैराति.सामलोमकिः । पौषजितिर्भार्गघतो पिश्चैरीडवस्तथा ॥ कारोटकः सजीवी व उपविन्दुसुरैपिणो । चाहिनीपतिवैशाली कोप्टा चैवारुणायनिः सोमोत्रायनिकासोरुकीशल्याः पार्थिवास्तथा । रौहिण्यायनिरेवाग्नी मूलपः पाण्डुरेव च ॥ ६ ॥ क्षपाविश्वकरोऽरिश्च पारिकारारिरेव च । व्यायाः प्रघराश्चैव तेषां च प्रवरान् शृणु अङ्गिराः सुचचोतथ्य उशिजश्च महानृषिः । परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः ॥ आत्रेयायनिसौवेष्ट्या अग्निवेश्यः शिलास्थलिः । वालिशायनिश्चैकेपी पाराहिष्कलिस्तथा ॥ १२॥ सौटिश्चत्रिणकर्णिश्चप्रावहिश्चाश्वलाय निः । पाराहिहिसादी च शिखाग्रीविस्तथैव च कारफिश्च महाकापिस्तथा चोडुपतिः प्रभुः। कोचकिधूमितश्चैव पुष्पान्वेपिस्तथैव च। सोमतन्विब्रह्मतन्विः सालडिर्वालडिस्तथा । देवरारियस्थानिहरिकणिः सरिद्भविः ॥ प्रायेपिः साद्यसुग्रीविस्तथा गोमेदगन्धिकः । मत्स्याच्छाद्यो मूलहरः फलाहारस्तथैव च ॥ १६ ॥ गाङ्गोदधिः कोरुपतिः कौरक्षेत्रिस्तथैव च । नायफिर्जेत्यद्रौणिश्च जैह्वलायनिरेप च ।। आपस्तम्धिीअवृष्टिर्मार्टपिङ्गलिरेच च । पैलश्चैव महातेजाः शालङ्कायनिरेव च ॥ द्वयाप्ययोः मारतश्चैषां ध्यायः प्रवरो नृप !। अविराः प्रथमस्तेषां द्वितीयश्च वृहस्पतिः ॥ १६ ॥ तृतीयश्च भरद्वाजः प्रयराः परिकीर्तिताः । परस्परमवैचाहा इत्येते परिकीर्तिताः ॥२०॥ फाण्यायनाः कोपचयास्तथा वात्स्यतरायणाः । ब्रानन्द्राष्ट्रपिण्डी च लैन्द्राणिः सायफायनिः ॥ २१ ॥ फोटाक्षी यहुपीती च तालरन्मधुरावहः । लायसनालविद्गाथी मार्कटिः पालिफायनिः स्कन्दसच तया ची गायः श्यामायनिस्तथा । पालाकिः साहरिश्वैय पञ्चायाः प्रकीर्तिताः ॥ २३ ॥ अङ्गिराध महातेजा देवाचार्यो हम्पतिः । भरद्वाजस्तथा गर्गः सैन्यम्ध भगपानृषिः ।
ऽध्यायः] यगिरा * अपीणां नामगोत्रवंशप्रवरवर्णनम् * परस्परमवैवाहा ऋषयः परिकीर्तिताः । कपीतर: स्वस्तितरा दाक्षि शक्तिपतञ्जलिः || भूयसिर्जलसन्धिश्चविन्दुर्मादिःकुसीदकि । ऊर्यस्तु राजकेशी व घोपडिः शंसपिस्तथा शालिश्चकलीफण्टा पिःकारीरयस्तथा। काट्योधान्यायनिश्चैवभावास्यायनिरेव च भारद्वाजिःसोबुधिश्च लची देवमतीस्तथा । ध्यायोऽभिमतश्चैव प्रयरो भूमियोत्तम! दमबाह्यश्च तथा चैवाप्युरक्षयः । परस्परायण्वपर्णी व लौक्षिार्य हरिस्तथा गालविश्चैव ध्यायः सर्वेषां प्रघरो मत. 1 अगिरा संकृतिश्चैव गौरवीतिस्तथैव च ।। परस्परमवैयाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः । वृहदुक्यो पामदेयस्तथा त्रिः प्रवरा मताः ॥ अङ्गिरा बृहदुक्थच घामदेवस्तथैव च । कुत्साकुत्सरवैवाह्या एघमाहुः पुरातनाः ॥ रथीतराणां प्रयरा ध्याया. परिकीर्तिताः । अङ्गिराध विरूपश्च तथैवच रयीतरः ॥३३ रीतराह्ययवाहा नित्यमेव रथीतरः । विष्णुवृद्धिः शिवमतिर्जतणः कत्तृणस्तथा ॥३४ पुत्रश्च महातेजास्तथा वैरपरायणः । व्यायोऽभिमतस्तेषां सर्वेषां प्रवरो नृप! ॥ अङ्गिरा मत्स्यदग्धश्च मुद्गलश्च महातपाः । परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः ।। ईसजिलो देवजिहो ह्यग्निजितो विराडयः । अपाग्नेयस्चश्वयुश्च परण्यस्ताचिौद्गलाः ॥ ३७ ॥ न्यायाभिमतास्तेषां सर्वेषां प्रवराः शुभा.। अङ्गिपश्चैव ताण्डिश्च मौद्गल्यश्च महातपाः परस्परमवैयाह्या ऋपयः परिकीर्तिता.। अपाण्डुध गुरश्य तृतीयः शाकटायनः ॥३६॥ तत. प्रागाथमा नारी मार्कण्डो मरणः शिवः । कटुमर्कटपञ्चैव तथा नाडायनोसृषिः श्यामायनरतथैवेषां ध्याया. प्रवरा शुमाः । श्रनिराश्चाजमीदव कक्ष्यश्चय महातपाः परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिता. । तित्तिरिः फपिभूश्चैव गार्ग्यश्वैव महानृषिः । ध्यार्पयो हि मतस्तेषां सर्वेषा प्रवर. शुभ । अङ्गिरास्तित्तिरिश्चैव कविभूश्च महानृषिः परस्परमवैयाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः । अथ ऋक्षभरद्वाजी ऋषिवान् मानवस्तथा ॥ पिनवरश्चय पञ्चाया, प्रकीर्तिताः । अङ्गिराः समद्राजस्तथेच च वृहस्पति: ४५ पिमित्रवरश्चच ऋपिवान् मानवस्तथा। परस्परमवैवाह्या ऋषय. परिकीर्तिता-६ भारद्वाजो हुत शोशःशैशिरेयस्तथैव च । इत्येते कथिताः सर्वे स्यामुयायणगोत्रजाः * मत्स्यपुराणम् * [पण्णवत्यधिकशततमो पञ्चायास्तथा ोपा प्रवरा परिकीर्तिता. । अभिराश्च भरद्वाजस्तथैव च वृहस्पतिः ॥ मौद्गल्य शैशिरश्चैव प्रवरा. परिकीर्तिताः ॥४८॥ एते तवोक्ताङ्गिरसस्तु वंशे महानुभावा ऋपिगोत्रकाराः । येपान्तु नाम्ना परिकीर्तितेन पापं समग्रं पुरुषो जहाति ॥ ४६॥ इतिश्रीमत्स्यपुराणे ऋषीणानामगोत्रवंशप्रवरवर्णननाम पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः पण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः अत्रिवंशज-ऋषीणां नामगोत्रवंशप्रवरवर्णनम् । मत्स्य उवाच। - अत्रिवंशसमुत्पन्नान् गोत्रकारान्नियोध मे । कर्दमायनशाखेयास्तथा शारायणाश्च ये॥ उद्दालकि शोणकर्णिरथी शौकतवश्च ये । गौरग्रीवा गौरजिनस्तथा चैत्रायणाश्च ये॥" अर्द्धपण्या घामरथ्या गोपनास्तकिबिन्दव । कणजिहो हरग्रीति द्राणिः शाकलायनिः तैलपश्च सबैलेय अत्रिर्गाणीपतिस्तथा । जलदो भगपादश्च सौपुष्पिश्च महातपाः ॥४॥ छन्दोगेयस्तथैतेषां ध्याया प्रवरा मताः । श्यावाश्वश्च तथा विश्वभार्चनानशएव च ॥ परस्परमवैवाह्या ऋषय परिकीर्तिता. । दाक्षिलि पर्णविश्व ऊर्णनाभिः शिलार्दनिः पीजयापी शिरीपश्च मौञ्जफेशो गविष्टिरः । भलन्दनस्तथैतेपा व्याया प्रवरा मता ॥ अनिर्गविष्ठिरश्चैव तथा पूर्वातिथि स्मृत । परस्परमवैचाह्या ऋपय परिकीर्तिताः ॥८ आनेयपुनिकापुनानत उद्ध्वं नियोध मे । कालेयाश्च सवालेया घासरथ्यास्तथैव च धात्रेयाश्चैव मैत्रेयाम्ध्यायाः परिकीर्तिता. । अत्रिश्च घामरथ्यश्च पोनिश्चैवमहानृपि. परस्परमवैवाह्या अपय परिकीर्तिताः ॥१०॥ इत्यत्रिवंशप्रभवास्तवाह्या महानुभावा नृपगोत्रकाराः । येपा तु नाम्ना परिकीर्तितेन पापं समग्र पुरुषो जहाति ॥११॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे ऋपोणानामगोरवंशप्रयरवर्णनं पण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः ।
सतनवत्यधिकशततमोऽध्यायः
कुशिकवंशज-ऋषीणां नामगोत्रवंशप्रवरवर्णनम् ।
मत्स्य उवाच।
अरेयापरं वंशन्तव पक्ष्यामि पार्थिव!। अत्रे सोमः सुतः श्रीमांस्तस्य वंशोधोनूप ।।
विश्वामित्रस्तु तपसा ब्राह्मण्यं समवाप्तवान् । तस्य वंशमहं पक्ष्ये तन्मे निगदतः शृणु
विश्वामित्रो देवरातस्तथा वैकृतिगालवः । घतण्डश्च सलङ्कश्च ह्यमयश्चायतायन: ॥३॥
श्यामायना याज्ञवल्या जावालाः सैन्धघायनाः ।
बाभ्रव्याश्च करीपाश्च संश्रुत्या अथ संश्रुताः ॥४॥
उलूपा ओपगहया पयोदजनपादपा । खरपाचो हलयमाः साधिता वास्तुकोशिकाः ।।
ध्यायाः प्रवरास्तेषां सर्वेषां परिकीर्तिताः । विश्वामित्रो देवरात उहालश्च महायशाः
परस्परमवैधाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः । देवश्रयाः सुजातयाः सौसुफाः कारुकायनाः
तथा वैदेहराता ये कुशिकाश्च नराधिप ! । त्र्यायोऽभिमतस्तेपां सर्वेषां प्रवरःशुभः ॥
देवश्रवा देवरातो विश्वामित्रस्तथैव च।
परस्परमवैचाद्या ऋषयः परिकीर्तिता. हा
धनञ्जयः कपर्देयः परिकूटश्च पार्थिव । पाणिनिश्चैव ध्याया. सर्व एते प्रकीर्तिताः ।।
विश्वामित्रस्तथाद्यश्च माधुच्छन्दस एव च । व्यायाः प्रवरा होते ऋषयःपरिकीर्तिताः
विश्वामित्रो मधुच्छन्दास्तथा चैवाघमर्षणः । परस्परमयाह्यामृपया परिकीर्तिताः ॥
फमलायजिनश्चैव अश्मरथ्यस्तथैव च । चञ्चुलिश्चापि घ्यायः सर्वेषां प्रबरो मतः ॥
विश्वामित्रश्चाश्यरथो धलिश्च महातपाः । परस्परमर्यवाह्या अपयःपरिकीर्तिताः ।।
विश्वामित्रोलोहितश्च अष्टकः पूरणस्तथा । विश्वामित्रः पूरणश्च तयोद्वीप्रचरी स्मृती
परस्परमवैवाह्याः पूरणाश्च परस्परम् ।
लोहिता अष्टकाश्चैषां व्यायाः परिकीर्तिताः ॥३६॥
* मत्स्यपुराणम् * [अष्टनवत्यधिकशततमो विश्वामित्रो लोहितश्च अटकश्च महातपा । अप्रका लोहितैनित्यमवैवाह्या परस्परम् उदरेणु कथकश्च ऋपिश्चोदावहिस्तथा । शाट्यायनि करीराशी शालङ्कायनिलायकी मोजायनिश्चभगवान्च्याया परिकीर्तिता । खिलिखिलीस्तथाविद्योविश्वामित्रस्तथैवव परस्परमवैवाह्या ऋषय परिकीर्तिता ॥१६॥ एते तवोक्ता कुशिका नरेन्द्र महानुभावा सतत द्विजेन्द्रा । येपान्तु नाम्ना परिकीर्तितेन पाप समग्र पुरुषो जहाति ॥२०॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे कुशिकवशज ऋषीणा नामगोत्रवशप्रवरवर्णन नाम सत्यनवत्यधिकशततमोऽध्याय । अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः कश्यपवशज रूपीणा नामगोत्रयशप्रवरवर्णनम् । मत्स्य उवाच। मरीचे कश्यप पुन कश्यपस्य तथा कुले। गोत्रकारान् ऋषीन् पक्ष्ये तेपा नामानि मे शृणु ॥१॥ आश्रायणि पिगणो मेपकीरिटकायना । उदग्रजामाठराश्च भोजा विनयलक्षणा ॥ शालाहलेया कौरिटा कन्यकाश्चासुरायणा । मन्दाकिन्या वै मृगया श्रुतया भोजयापना ॥३॥ देवयाना गोमपानाह्यधश्छाया भयाश्च ये । कात्यायना शाम्याणा चहियोगगदायना ॥ भवनन्दि महाचनि दाक्षपायन एव च । योधयाना कार्तिवयो हस्तिदानास्तथैव च ॥ पात्स्यायनानि कृतजा हाश्यलायनिनस्तथा । प्रागायणा पौरमौलिराश्यवातायनस्तथा ॥६॥ फौवेरफाश्च श्याकारा अग्निशर्मायणश्च ये । मेषपा फैकरसपास्तथा चैव तु पनय ॥ प्राचेयो शानसशेया भाग्ना प्रासेव्य एप च । श्यामोदरा चैपशपास्तथाचैवोदयलायना ऽध्यायः * अपीणां नामगोत्रवंशप्रवरवर्णनम् । फाटाहारिणमारीचामाजिहायनहास्तिकाः वैकर्णेयाःकाश्यपेयासासिसाहारितायनाः मान्तगिनश्च भृगवस्न्यायाः परिकीर्तिताः । पत्सर: कश्यपश्चैव निध्वश्चमहातपाः परस्परमवैवाह्या ऋषय.परिकीर्तिताः । अतः परं प्रवक्ष्यामि यामुप्यायणगोत्रज्ञान अनसूयो नाकुरयः स्नातपो राजवर्तपः । शैशिरोदयहिश्चैव सैरन्ध्रीरोपसेवकिः ॥१२ या मुनिः कादुपिङ्गाक्षिः सजातम्विस्तथैव च । दिवावष्टाश्व इत्येते भत्या ज्ञेयाश्च काश्यपा ॥१३॥ व्यायाश्च तवैषां सर्वेषां प्रवराः शुभा. । वत्सरः काश्यपश्चैव घसिष्ठश्चमहातपाः ॥ परस्परमवैवाह्या अपयः परिकीर्तिता. । संयातिश्च नभश्चोभी पिप्पल्योऽथ जलन्धरः भुजातपूरः पूर्यश्च कर्दमो गईभीमुपः । हिरण्यवाहुकैरातात्रुभी काश्यपगोभिलो। कुलहो वृषकण्डश्च मृगकेतुस्तथोत्तरः । निदाघमसृपो भत्स्या महान्त केवलाश्च ये ।। शाण्डिल्यो दानधश्चैव तथा चै देवजातयः । गैप्पलादित्स प्रवरा ऋषय.परिकीर्तिताः ध्यायाभिमताश्चैपां सर्वेपा प्रवराः शुभाः । असितो देवलश्चैव कश्यपञ्च महातपाः । परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः ॥ १६ ॥ पिप्रधानस्य च कश्यपस्य दाक्षायणीभ्यः सकलं प्रसूतम् । जगत्समय मनुसिंह पुण्यं किं ते प्रवक्ष्याम्यहमन्तरेण ॥२०॥ इति श्रीमत्स्यपुराणेऋषीणांनामगोत्रवंशप्रयरवर्णनं नामाप्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः नवनवत्यधिकशततमोऽध्यायः वशिष्ठवंशज-कषीणां नामगोत्रवंशप्रवरवर्णनम् । मत्स्य उपाच। वसिष्ठवंशजान् विप्रान नियोघ वदतो मम । एकायस्तु प्रबरो वासिष्ठानां प्रकीतित: ॥२॥ वसिष्ठा एव वासिष्ठा अवियाहा यसिष्ठः । व्याघ्रपादाभीपायालयाः शाहलायना:
५६२ * मत्स्यपुराणम् * [नवनवत्यधिकशततमो कपिष्ठला औपलोमा अलब्धाश्चपठाः कठाः । गौपयानायोधपाश्चदाकव्याह्यथवाह्यकाः घालिशयाः पालिशयास्ततोवाग्ग्रन्थयश्चये। आपस्थूणाःशीतवृत्तास्तथाब्राह्मपुरेयकाः॥ लोमायना स्वस्तिकराः शाण्डिलिगाँडिनिस्तथा । वाडोहलिश्च सुमनाश्चोपावृद्धिस्तथैव च ॥ ५ ॥ चौलिचौलिब्रह्मवलः पौलिः श्रवस एव च । पौडवो याज्ञवल्म्मश्च एकायामहर्षयः ॥ घसिष्ठ एका प्रचर अवैवाह्या. परस्परम् । शैलालयो महाकर्णः कौरव्यः क्रोधिनस्तथा कपिञ्जलावालखिल्याभागवित्तायनाश्चये । कीलायन कालशिख.कोरकृष्णाःसुरायणाः शाकाहार्याः शाकधियः काण्वा उपलपाश्चये । शाकायनाउहाकाश्चअथमापशरावयः दाकायनावालवयोवाकयो गोरथास्तथा । लम्बायना श्यामवयो ये चकोडोदरायणाः प्रलम्यायनाश्च ऋपय औपमन्यव एव च । सास्यायनाश्चऋपयस्तथावै वेदशेरकाः पालङ्कायन उद्गाहा ऋपयश्च वलेक्षव । मातेया ब्रह्मवलिनः पर्णागारिस्तथैव च । ध्यायोऽभिमतश्चैषां सर्वेषां प्रवरस्तथा । भिगीवसुर्वशिष्ठश्च इन्द्रप्रमदिरेवच ॥१३॥ परस्परमवैवाह्या ऋपयः परिकीर्तिताः। औपस्थलास्वस्थलयो पालोहालो हलाश्च ये। माध्यन्दिनो माक्षतयः पैप्पलादिचिचक्षुपः । श्रङ्गायन सैवल्काः कुण्डिनश्च नरोत्तम! ध्यायाभिमताश्चैपां सर्वेषां प्रवराः शुभाः । घसिष्ठमित्रावरुणो कुण्डिनश्च महातपाः परस्परमवैधाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः । शिवकर्णो धयश्चैव पादपश्च तथैव च ॥१७॥ घ्यायोऽभिमतश्चैषां सर्वेपां प्रवरस्तथा । जातूकोवसिष्ठश्च तथैवात्रिश्च पार्थिव !॥ परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः ॥ १८॥ घसिष्ठवंशेऽभिहिता मयते ऋपिप्रधानाः सततं द्विजेन्द्राः। येषां तु नाम्ना परिकीर्तितेन पापं समनं पुरुषो जहाति ॥ १६॥ इति श्रीमन्स्यपुराणे ऋषीणांनामगोत्रचंशप्रयरवर्णनंनाम नयनवत्यधिकशततमोऽध्यायः द्विशततमोऽध्यायः अपीणामाल्याने निमेराख्यानवर्णनम् । मत्स्य उवाच। वसिष्ठस्तु महातेजानिमः पूर्वपुरोहितः । बभूव पार्थिवश्रेष्ठ यज्ञास्तस्य समन्ततः ।। श्रान्तात्मापार्थिवश्रेष्ठ ! विशश्राम तदा गुरुः । तं गत्वा पार्थिवश्रेष्ठो निमिर्वचनमधील भागवन्यष्टुमिच्छामि तम्मा याजयमाचिरम् । तमुवाच महातेजा पसिष्ट पार्थियोत्तमम् फश्चित्कालं प्रतीक्षस्य तव यः सुसत्तमः । धान्तोऽस्मि राजन् ! विश्रस्य याजयिष्यामि ते नृपः ॥ ४ ॥ एयमुक्त प्रत्युवाच पसिष्ठं नृपसत्तम ! । पारलौफिकफाय तु क. प्रतीक्षितुमुत्सहेत्॥ न च मे सौहृदं ब्रह्मन् ! कृतान्तेन चलीयसा । धर्मकार्ये त्वरा कार्या चलं यस्माद्धि जीवितम् ॥ ६ ॥ धर्मपथ्यौदनो जन्तुम तोऽपि सुखमश्नुते । श्वः कार्यमध कुर्वीत पूर्वाह्न चापराह्निकम् न हि प्रतीक्षते मृत्यु कृतञ्चास्य न पा कृतम् । क्षेत्रापणगृहासक्तमन्यत्र गतमानसम् ॥ वृकश्चोरणमासाद्य मृत्युरादाय गच्छति । नैकान्तेन प्रियः कश्चिद्वेभ्यश्चास्यन विद्यते आयुष्ये कर्मणि क्षीणे प्रसह्य हरते जनम् । प्राणवायोश्चलत्वञ्च त्वया विदितमेव च ॥ यव जीव्यते ब्रह्मन् ! क्षणमात्रन्तदमृतम् । शरीरं शाश्वतं मन्ये विद्याभ्यासे धनार्जने॥ अशाश्वतं धर्मकार्ये ऋणधानस्मि सङ्कटे । सोऽहं संभृत सम्भारोभवन्मूलमुपागत !! नद्याजयसे मां त्वं अन्यं यास्यामि याजकम् । एवमुक्तस्तदा तेन निमिना ब्राह्मणोत्तमः ॥ १३ ॥ शशाप तं निर्मि क्रोधाद्विदेहस्त्वं भविष्यसि। श्रान्तं मां त्वं समुत्सृज्य यस्मादन्यं द्विजोत्तमम् ॥ १४ ॥ धर्मशस्तु नरेन्द्र ! त्वं याजकं कर्तुमिच्छसि । निमिस्तं प्रत्युवाचाथ धर्मकार्यरतस्य मे - ५६४ * मत्स्यपुराणम् * [द्विशततमो विघ्नकरोषि नान्येन याजनंच तथेच्छसि । शापंददासियस्मात्वं विदेहोऽथभविष्यलि। एवमुक्ते तु तो जातौ विदेही द्विजपार्थिवौ । देहहीनो तयोर्जीचौ ब्रह्माणमुपजग्मतुः ॥ तावागतौ समीक्ष्याथ ब्रह्मावचनमब्रवीत् । अद्यप्रभृति ते स्थान निमिजीव ददाम्यहम् ॥ नेत्रपक्ष्मसु सर्वेषां त्वं वसिष्यसि पार्थिव । त्वत् सम्बन्धात्तथा तेषां निमेषः सम्भविष्यति ॥१६॥ चालयिष्यन्ति तु तदा नेत्रपक्ष्माणि मानवाः। एवमुक्ते मनुष्याणां नेत्रपक्षमसुसर्वशः। जगाम निमिजीवस्तु घरदानात् स्वयम्भुवः । वसिष्ठ जीवं भगवान् ब्रह्मा वचनमब्रवीत् मित्रावरणयो.पुत्रो घसिष्ठ ! त्वं भविष्यसि । घसिष्ठेतिचते नाम तत्रापिचभविष्यति जन्मद्वयमतीतञ्च तत्रापि त्वं स्मरिष्यसि । एतस्मिन्नेव काले तु मित्रश्च घरुणस्तथा ॥ यदर्याश्रममासाद्य तपस्तेपतुरख्ययम् । तपस्यतोस्तयोरेवं कदाचिन्माधवे ऋतौ ॥२४॥ पुष्पितद्रुमसंस्थाने शुभे द्वयितमारुते । उर्वशी तु धरारोहा कुर्वती कुसुमोच्चयम् ॥ सुसूक्ष्मरक्तवसना तयोर्दृष्टिपथगता । तां दृष्ट्वा सुमुखीं सुā नीलनीरजलोचनाम् ॥२६॥ उभी चुक्षुभतुर्धेयात्तद्रूपपरिमोहितो । तपस्यतोस्तयो वीर्यमस्खलच्च मृगासने ॥२७॥ स्कन्नं रेतस्ततो दृष्ट्वा शापभीती परस्परम् । चक्रतुः कलशे शुक्र तोयपूर्णे मनोरमे ।। तस्मादपिवरी जातो तेजसा प्रतिमो भुवि । पसिष्ठश्चाप्यगस्त्यश्वमित्रावरुणयोर्द्वयोः घसिष्ठस्तृपयेमेऽथ भगिनीं नारदस्य तु । अरुन्धती घरारोहां तस्यां शक्तिमजीजनत् ।। शक्त. पराशरः पुत्रस्तस्य वंश नियोध मे । यस्य द्वैपायनः पुनः स्वयं विष्णुरजायत ॥ प्रकाशो जनितो येन लोके भारत चन्द्रमाः। पराशरस्य तस्य त्वं शृणु वंशमनुत्तमम् काण्डपपो धारनपो जैह्मपो भौमतापनः । गोपालिरेषां पञ्चम एते गोरा. पराशराः॥ प्रपोहयायाह्य मया। रयाते याः कौतुजातयः । हर्यश्वि. पञ्चमो होपां नीलाशेयाः पराशरा. ॥३४ ॥ फायना फपि सुसार फाकेयस्थाजपातयः। पुष्करः पञ्चमश्चैपा कृष्णाशेया.पराशराः ॥ ३५ ॥ आविष्टायन पालेयास्वायटायोपयाश्च ये। पीकहस्ताश्चते वै पञ्चश्वेताः पराशराः ।।
ऽध्यायः] * ऋपीणां नामगोत्रवंशमवरवर्णनम् * ५६५ पाटिको बारिश्चैवस्तम्या वै क्रोधनायनारा मिरेपी पञ्चमस्तु एते श्यामाः पराशराः सल्यायनाः वार्णायनास्तैलेयः खलु यूथपाः। तन्तिरेषां पञ्चमस्तु एते धूम्राापराशराः उकास्तते नृप ! वंशमुख्याः पराशराः सूर्यसमप्रमावाः । येषां तु नाना परिकीर्तितेन पापं समय पुरुषो जहाति ॥ ३ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे ऋषीणां नामगोत्रवंशप्रवरवर्णनं नाम द्विशततमोऽध्यायः । एकाधिकद्विशततमोऽध्यायः अपीणां नामगोत्रवंशप्रयरवर्णनम् । मत्स्य उवाच। यतः परमगस्त्यस्य वक्ष्येवंशोद्धवान द्विजान् । अगस्त्यश्वकरम्भश्चकौशल्याकरटस्तथा सुमेधसोमयोभुवस्तथा गान्धारकायणाः । पौलस्त्याः पौलहाश्चैवक्रतुवंशभवास्तथा आयाभिमताश्चैपां सर्वेषां प्रचराः शुभाः । अगस्त्यश्च महेन्द्रश्च ऋषिश्चैव मयोभुवः परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः । पौर्णमासाः पारणाश्च प्रायाः परिकीर्तिताः अगस्त्यः पौर्णमासश्च पारणश्च महातपाः । परस्परमवैवाह्याः पौर्णमासास्तु पारणः एवमुक्तो ऋषीणान्तु वंश उत्तमपौरुषः । यतः परं प्रवक्ष्यामि किम्भवानद्य फथ्यताम् मनुरवाच । पुरुहस्य पुलस्त्यस्य क्रतोश्चैवमहात्मनः । अगस्त्यस्य तथा चैयकथं वंशस्तदुच्यताम् मत्स्य उवाच। ऋतुः पल्वनपत्योऽभूद्वाजन्वैवस्वतेऽन्तरे । इध्मवाहं स पुत्रत्वं जग्राह ऋषिसत्तमः ॥ अगस्त्यपुत्रं धर्म आगस्त्याः क्रतवस्ततः । पुलहस्य तथा पुत्रास्त्रयश्च पृथिवीपते !! तेपान्तु जन्म पक्ष्यामि उत्तरत्र यथाविधि । पुलहस्तु प्रजांदृष्ट्वानातिप्रीतमनाः स्यकाम् अगस्त्यजंदृढास्यन्तुपुरत्वेवृतमांस्ततः । पौलहाश्वतयाराजन् ! भागस्त्या:परिकीर्तिताः पुलस्त्यान्वयसम्भूतान् दृष्ट्वारक्ष समुद्वान् । अगस्त्यस्यासुनन्धीमान पुत्रत्येस्तवांस्ततः * मत्स्यपुराणम् * [व्यधिकद्विशततमो पौलस्त्याश्च तथा राजन्नागस्त्याः परिकीर्तिताः । सगोत्रत्वादिमे सर्वेपरस्परमनन्ययाः एते तवोक्ताः प्रवरा द्विजाना महानुभावा नपवंशकाराः। एपान्तु नाम्ना परिकीर्तितेन पापं समग्रं पुरुषो जहाति ॥ १४ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे पीणां नामगोत्रचंशप्रवरमाहात्म्यवर्णन नामैकाधिकद्विशततमोध्यायः । व्यधिकद्विशततमोऽध्यायः मनुमत्स्यसंवादे धर्मवंशवर्णनम् । मत्स्य उवाच। अस्मिन्वैवखते प्राप्ते शृणु धर्मस्य पार्थिव !। दाक्षायणीभ्यः सकलं वंशं दैवतमुत्तमम् पर्वतादिमहादुर्गशरीरणि नराधिप ! । अस्न्धत्याः प्रसूतानि धर्माद्वैवस्वतेऽन्तरे ॥२॥ अष्टो व घसवः पुत्राः सोमपाश्चविभोस्तथा । धरोध्रुषश्चसोमश्चापश्चैवानिलानली प्रत्यूपश्च प्रभासश्च घसयोऽष्टी प्रकीर्तिताः । धरस्य पुत्रो द्रविणः फाल पुत्रोध्रुवस्यतु कालस्याययवानान्तु शरीराणि नराधिप ! । मूर्तिमन्ति च कालाद्धि संप्रसूतान्यशेषतः सोमस्य भगवान् चर्चाः श्रीमांश्वापस्य फीर्त्यते । अनेकजन्मजननः कुमारस्त्वनलस्यतु पुरोजवाश्चानिलस्य प्रत्यूपस्य तुदेवलः । विश्वकर्मा प्रभासस्य त्रिदशाना स घर्धकिः समर्माहितकराः प्रोक्ता नागपीथ्यादयो नव । लम्बापुत्रःस्मृतोघोपोभानोःपुत्राश्चमानवः ग्रहाणाञ्च सर्वेषामन्येपा चामितौजसाम् । मरत्वत्यां मरत्वन्त.सर्वेपुत्राः प्रकीर्तिताः सङ्करपायाश्यसङ्कल्पस्तथापुत्रःप्रकीर्तितः। मुहर्ताश्चमुहर्तायाःसाध्या.साध्यासुता स्मृता मनोर्मनुश्च प्राणश्च नरोपानी च पीर्यवान् । चित्तहार्योऽयनश्चैवहंसोनारायणस्तथा पिभुश्चापिप्रभुञ्चैवसाध्याद्वादशकीर्तिताः। विश्वायाश्चतथापुत्राविश्वेदेवा.प्रकीर्तिता. मातुर्दक्षोयसुः सत्यः फालफामोमुनिस्तथा । कुरजोमनुजोयीजोरोचमानश्च ते दश ।। एतावदुक्तस्तव धर्मवंश. संक्षेपतः पार्थियवंशमुख्य !। व्यासेन यतुं न हि शक्यमस्ति राजन् पिना घर्षशतैग्नेकः ॥१४॥ इति धीमत्स्यपुराणे मनुमत्स्यसंपादे धर्मवंशवर्णनं नाम यधिकद्विशततमोऽध्याय ।
ज्यधिकद्विशततमोऽध्यायः मनुमत्स्यसंवादे पितृगाथावर्णनम् । मत्स्य उवाच। एतद्वंशभवा विप्राः श्राद्ध भोज्याः प्रयनतः । पितृणां घलभं यस्मादेषु श्राद्धं नरेश्वर ! ॥ १॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि पितृभिर्याःप्रकीर्तिताः । गाथा:पार्थिवशार्दूल ! कामयदिःपुरे स्वके अपि स्यात्स कुलेऽस्माकं यो नो दद्याजलाञ्जलिम् । नदीपु बहुतोयासु शीतलासु विशेषतः ॥३॥ अपि स्यात्स कुलेऽस्माकया श्राद्धनित्यमाचरेत् । पयोमूलफलभक्ष्यस्तिलतोयेनचा पुनः अपि स्यात्स कुलेऽस्माकंयोनोदयात्त्रयोदशीम् । पायसमधुसर्पिभ्यांवर्षासुचमधासुच अपि स्यात्स कुलेऽस्माकं खड्गमांसेन यः सहत् । श्राद्धं कुर्यात्प्रयत्नेन कालशाकेन वा पुनः ॥ ६ ॥ फालशाक महाशाकं मधु मुन्यानमेव च। विपाणवर्जा ये सगा आसूर्यन्तदशीमहि। गयायांदर्शनेराहोः खड्गमांसेनयोगिनाम् । भोजयेत्काकुलेऽस्माकंच्छायायांकुअरस्य च आकल्पकालिकी तृप्तिस्तेनास्माकं भविष्यति । दातासर्वेपुलोकेपुकामचारोभविष्यति आभूतसंप्लवं कालं नात्र कार्या विचारणा । यदेतत्पश्चकंतस्मादेकेनापिच यः सदा ॥ तृप्ति प्राप्स्याम चानन्तां किं पुनः सर्वसम्पदा । अपि स्यात्स कुलेऽस्माकं दद्यात् कृष्णाजिना यः ॥ १९॥ अपि स्यात्स कुलेऽस्माकंकश्चित् पुरुषसत्तमः प्रसूयमानां यो धेनुदद्याद्ब्राह्मणपुङ्गवे अपि स्यात्स फुलेऽस्माकं वृषभं यः समुत्सृजेत् । सर्ववर्गविशेषेण शुक्लनीलं पन्तथा अपि स्यात्स कुलेऽस्माकं यःकुर्यात्श्रद्धयान्वितः। सुवर्णदानंगोदानंपृथिवीदानमेय व अपि स्यात्स कुलेऽस्माकश्वित्पुरुषसत्तमः । कृपारामतडागानांधापीनांयश्वकारकः * मत्स्यपुराणम् * [ चतुरधिकद्विशततमो अपि स्यात्स कुलेऽस्माकं सर्वभावेन यो हरिम् । प्रयायाच्छरणविष्णुंदेवेशंमधुसूदनम् अपिन.सकुलभूयात्कश्चिद्विद्वान्विचक्षणः । धर्मशास्त्राणियोदयाद्विधिना विटुपामपि एतावदुक्तं तव भूमिपाल! श्राद्धस्य कल्पं मुनिसम्प्रदिष्टम् । पापापहं पुण्यधिचर्द्धनञ्च लोकेषु मुख्यत्वकरन्तथैव ॥ १८ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे मनुमत्स्यसंवादे श्राद्धकल्पवर्णनं नाम घ्यधिकद्विशततमोऽध्यायः। चतुरधिकद्विशततमोऽध्यायः धनुदानविधिवर्णनम् । मनुरुवाच । प्रसूयमाना दातव्या धेनुाह्मणपुङ्गवे । विधिना वेन धर्मज्ञ । दानं दद्याच्च किं फलम् ॥ मत्स्य उघाच। वर्णशृङ्गीरीप्यखुरामुक्तालागूलभूपिताम् । कास्योपदोहनांराजन् सवत्सांद्विजपुङ्गचे प्रसूयमानां गां दत्वा महत्पुण्यफलं लभेत् । यावद्वत्सो योनिगतो यावद्गर्भ न मुञ्चति ॥ ताप? पृथिवी ज्ञेया सलधनकानना । प्रसूयमाना यो दद्याद्धेनुं द्रविणसंयुताम् ॥४॥ ससमुद्रगुहा तेन सशैलपनकानना । चतुरन्ता भवेद्दत्ता पृथिवी नात्र संशयः ॥५॥ यापन्ति धेनुरोमाणि घत्स्यस्य च नराधिप । तावत्सड्रयं युगगणं देवलोके महीयते पितॄन् पितामहाश्चैप तथैव प्रपितामहान् । उद्धरिप्यत्यसदेहान्नरफाभूरिदक्षिणः ॥७ घृतक्षीरबहाः कुत्या दधिपायसकर्दमा. । यत्र तर गतिस्तस्य द्रुमाश्चेप्सितकामदाः । गोलका सुलभस्तस्य ब्रह्मलोकश्च पार्थिव ॥ ८॥ स्त्रियश्व तं चन्द्रसमानचकनाः प्रतप्तजाम्बूनदतुल्यरूपा । महानितम्बास्तनुवृत्तमध्या भजन्त्यजस्र नलिनाभनेताः ॥६॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे धेनुदानविधिवर्णनं नाम चतुरधिकद्विशततमोऽध्यायः ।
पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्यायः कृष्णमृगचर्मदानविधिवर्णनम् । मनुरुवाव। कृष्णाजिनप्रदानस्य विधिकाली ममानघ} ब्राह्मणच तयाचक्ष्व तत्र मे संशयोमहान् मत्स्य उवाच वैशायी पौर्णमासी व ग्रहणे शशिसूर्ययोः । पौर्णमासीतुयामायेद्यापाढीकार्तिी तथा उत्तरायणं द्वादशी वा तस्यां दत्तं महाफलम् । आहिताग्निदिजो यस्तुतद्देयंतस्यपार्थिव यथा येन विधानेन तन्मे निगदतः शृणु । गोमयेनोपलिप्ते तु शुचौ देशे नराधिप ne बादाचेच समास्तीर्य शोभनं शस्तमायिकम् । ततः सरहंसपुरमास्तरेत्कषणमार्गमम् फर्तव्यं रकमटझं तद्रौप्यदन्तं तथैव च । लाडलं मौक्तिकैर्युक्तं तिलच्छन्नंतयघ च ॥ तिलैश्च शिखितं कृत्वा पाससाच्छादयेच्छुवि। सुवर्णनाभं तत्कुर्यादलङ्कर्याद्विशेषतः रत्नर्गन्धैर्यथाशक्यातस्यदिक्षुचविन्यसेत् । कांस्यपात्राणिचत्वारितेषुदद्याद्यथा-मम् मृण्मयेषु च पात्रेषु पूर्वादिषु यथाक्रमम् । धुतं क्षीरं दधि क्षौद्रमेयं दद्याद्यशाविधि ॥ चम्पफस्य तथा शापामयणं कुम्भमेव च । / बाह्योपस्थापनं कृत्या शुभवित्तो निवेशयेत् ॥ १० ॥ सूक्ष्मवस्त्र शुभम्पीत मार्जनार्थ प्रयोजयेत् । तथा धातुमयी पात्रोः पादयोस्तस्यदापयेत् यानि कानि च पापानि मयालोभात् कृतानि । लोहपात्रादिदानेन प्रणश्यन्तुममाशुवै तिलपूर्ण ततः कृत्वा धामपादै निवेशयेत् । यानि कानिच पापानिकर्णोत्थानिहतानि च कांस्यपात्र प्रदानेन तानि नश्यन्तु मे सदा। मधुपूर्णन्तु तत्कृत्या पादे ये दक्षिणे न्यसैत् परापपादपैशून्यावृथा मांसस्य भक्षणात् । तत्रोत्थितञ्च मे पापं ताम्रपानात्प्रणश्यतु कन्यानृतात् गवाञ्चैव परदारामिमर्शनात् । रौप्यपानप्रदानाद्धि क्षिप्रं नाशं प्रयानु मे ॥ ऊर्ध्वपादे चिमे कार्य ताम्रस्य रजतस्य च । जन्मजन्मसहस्रेषु कृतं पापं कुयुद्धिना ।। सुवर्णपात्रदानानु नाशयाशु जनाईन ! | हेममुक्तापिदुमञ्च दाडिम बोजपूरकम् ॥१८॥ प्रशस्तपत्रे श्रवणे खुरे श्रङ्गाटकानि च । एवं कृत्या यथोक्तेन सर्वशाकफलानि च । । 4 ६०० * मत्स्यपुराणम् * [पडधिकद्विशततमो तत्प्रतिग्रह विद्विद्वानाहिताग्निर्द्विजोत्तमः। स्नातो वस्त्रयुगव्छनःस्वशत्या चाप्यलकृतः प्रतिग्रहश्च तस्योक्तः पुच्छदेशे महीपते ! । तत एवं समीपे तु मन्त्रमेनमुदीरयेत् ॥२१॥ कृष्णः कृष्णगलोदेवः कृष्णाजिनधरस्तथा । तद्दानाभूतपापस्य प्रीयतां वृषभध्वजः ॥ अनेन विधिना दत्त्वा यथावत् कृष्णमार्गकम् । न स्पृश्योऽसौ द्विजो राजन् ! चितियूपसमो हि सः ॥२३॥ स दाने श्राद्धकाले च दूरतः परिवर्जयेत् । स्वगृहात्प्रेष्य तं विप्रं मङ्गलस्नानमाचरेत् ॥ पूर्णकुम्भेन राजेन्द्र ! शाखया चम्पकस्य तु । कृत्वावार्यश्च कलशं मन्त्रेणानेन मूर्द्धनि । आप्यायस्वसमुद्रज्येष्ठाऋचासंस्नाप्यषोड़श । अहवालसीचत आचान्तःशुचितामियात् तद्वासः कुम्भसहितं नीत्वा क्षेप्यं चतुष्पथे । कृतेनानेन या तुहिन सा शक्या सुरैरपि वक्तुं हि नृपतिश्रेष्ठ ! तथाप्युद्देशतः शृणु । समग्रभूमिदानस्य फलं प्राप्नोत्यसंशयम् ॥ सर्वान् लोकांश्च जयति कामचारी विहङ्गवत् । आभूतसंप्लवं यावत्सर्गमाप्नोत्यसंशयम् न पिता पुत्रमरणं वियोगं भार्यया सह । धनदेशपरित्यागं न चैवेहाप्नुयात् कवित् ॥ कृष्णेप्सितं कृष्णमृगस्य चर्म दत्त्वा द्विजेन्द्राय समाहितात्मा। यथोक्तमेतन्मरणं न शोचेत् प्राप्नोत्यभीष्टं मनसः फलं तत् ॥३१॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे कृष्णमृगचर्मदानविधिवर्णनं नाम पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्यायः । पडधिकद्विशततमोऽध्यायः वृपोत्सर्गविधिवर्णनम् । मनुरुवाच। भगवंच्छ्रोतुमिच्छामि वृषभस्य च लक्षणम् । वृपोत्सर्गविधिश्चैव तथा पुण्यफलंमइत् मत्स्य उवाच। धेनुमादौ परीक्षेत सुशीलाञ्चगुणान्विताम् । अन्यङ्गामपरिशिष्ट जीवपत्सामरोगिणीम् स्निग्धपर्णा स्निग्धरां स्निग्धङ्गी तथैव च ।
ऽध्यायः] * वृपोत्सर्गविधिवर्णनम् . ६०१ मनोहराकृति सौम्यां सुप्रमाणामनुद्धताम् ॥ ३ ॥ भावतर्दक्षिणावर्तयुक्तां दक्षिणतस्तथा । वामावर्तमितश्च विस्तीर्णजधनां तथा ॥ ४॥ मृदुसंहतताम्रोष्ठी रक्तग्रीवासुशोभिताम् । अश्यामदीर्धास्फुटिता रक्तजिह्वा तथा व या विनावामलनेत्रा च शफैरविरलः । वैदूर्यमधुवर्णश्च जलयुयुदसन्निभैः ॥ ६ ॥ रकस्निग्धश्च नयनैस्तथा रक्तकनीनिकैः । सप्त चतुर्दशदन्ता च तथा चा श्यामतालुका पडुन्नता सुपाश्वोरुः पृथुपञ्चसमायता । अष्टायतशिरोनीया या राजन् ! सा सुलक्षणा मनुरुवावा पन्नता: के भगवन् ! केव पञ्चसमायता .। आयाताश्च तथैवाटी धेनूनाङ्के शुभावहाः मत्स्य उवाच। उरः पृष्ठं शिरः कुक्षी श्रोणी च पस्तुधाधिप!। पडुन्नतानि धेनूनांपूजयन्ति विचक्षणाः कर्णी नेत्रे ललाटञ्चपञ्चभास्करनन्दन ! । समायतानि शस्यन्ते पुच्छं साम्नावसक्थिनी चत्वारश्चस्तनाराजन् । ज्ञेयाह्यष्टोमनीपिभिः। शिरोग्रीवायताश्चैते भूमिपाल!दशस्मृताः तस्याः सुतं परीक्षेत वृपमं लक्षणान्वितम् । उन्नतस्कन्धककुदं ऋजुलाइगूलकम्यलम् महाकटितटस्कन्धं वैदूर्यमणिलोचनम् । प्रवालगर्भश्रङ्गानं सुदीर्घपृथुवालधिम् ॥१४॥ नवाष्टादशसहयैर्या तीक्ष्णानदर्शनै शुभैः । मलिकाक्षश्चमोक्तव्यो गृहेऽपिधनधान्यदः वर्णतस्ताम्रकपिलो ब्राह्मणस्य प्रशस्यते । श्वेतोरक्तश्च कृष्णश्च गौरः पाटल एच च ॥ ऋङ्गिणस्ताम्रपृष्ठश्च शबल पञ्चयालकैः । पृथुको महास्कन्धः श्लक्ष्णरोमाच योभवेत् रक्ताक्षः कपिलो यश्च रक्तश्रङ्गतलो भयेत् ॥१७॥ श्वेतोदरः कृष्णपाश्यों ब्राह्मणस्य तु शस्पते । स्निग्धा रक्तनवर्णेन क्षत्रियस्य प्रशस्यते कायनामेन वैश्यस्य कृष्णेनाप्यन्त्यजन्मनः । यस्य प्रागायते शृङ्गे भ्रूमुखाभिमुखे सदा सर्वेषामेव वर्णानां सर्वः सर्वार्थसाधक । मारिपादः फपिलोधन्यः फपिलपिङ्गलः ।। श्वेतो मार्जारपादस्तु धन्योमणिनिमेक्षणाः । फरटः पिङ्गलश्चैव श्वेतपादस्तथैव च ॥ सर्वपादसितो यश्च द्विपादः सत्यपच च । फपिझलनिभो धन्यस्तथा तित्तिरिसन्निभः आकर्ष मूलश्येतन्तु मुखं यस्य प्रकाशते । नन्दीमुखः स विशेयो रक्तपर्णो विशेषतः ॥
* मत्स्यपुराणम् * [पडधिकद्विशततमो श्वेतन्तु जठरं यस्य भवेत् पृष्टं च गोपतेः । वृषभः स समुद्राख्यः सततं कुलवर्धनः ।। मल्लिकापुष्पचित्रश्च धन्यो भवति पुङ्गवः । कमलमण्डलेश्चापि चित्रो भवति भाग्यदः अतसीपुष्पवर्णश्च तथा धन्यतरः स्मृतः । एते धन्यास्तथा धन्यान् कीर्तयिष्यामि ते नृप! ॥२६॥ कृष्णताल्बोष्टवदना रूक्षङ्गशफाश्च ये। अव्यक्तवर्णा हस्थाश्च व्याघ्रसिंहनिभाश्च ये। ध्वाक्षगृध्रसवर्णाश्चतथामूषकसन्निभाः । कुण्ठा.काणास्तथासाकेकराक्षास्तथैवव विषमश्वेतपादाश्च उद्भ्रान्तनयनास्तथा । नैते वृपाः प्रमोक्तव्या न च धार्यास्तथागृहे मोक्तव्यानाञ्च धार्याणां तेषां वक्ष्यामि लक्षणम् । स्वस्तिकाकारङ्गाश्च तथा मेघोघनिस्वनाः ॥ ३० ॥ महाप्रमाणाश्च तथा मत्तमातङ्गगामिनः । महोरस्का महोच्छाया महावलपराक्रमाः ॥३१ शिरः कर्णीललाटञ्चवालधिश्वरणास्तथा। नेत्रेपार्वेचकृष्णानि शस्यन्तेचन्द्रभासिनाम् श्वेतान्येतानिशस्यन्तेकृष्णस्यतु विशेषतः । भूमो कर्षति लागूलं प्रलम्बस्थूलयालधीः पुरस्तादुद्यतो नीलो वृपभश्च प्रशस्यते । शक्तिध्वजपताकाढ्या येषां राजी विराजते अनड्याहस्तु ते धन्याश्चित्रसिद्धिजयावहाः । पदक्षिणं निवर्तन्ते स्वयं ये विनिवर्तिताः समुन्नतशिरोनीया धन्यास्ते यूथवर्द्धना. । रक्तशृङ्गाग्रनयनः श्वेतवर्णों भवेद्यदि ॥३६॥ शफै प्रवालसदृश स्तिधन्यतरस्ततः । एते धार्याः प्रयत्नेन मोक्तव्या यदि वा घृपाः । धारिताश्च तथा मुक्ता धनधान्यप्रवर्द्धनाः । चरणानि मुखं पुच्छं यस्य श्नेतानिगोपतेः लाक्षारससवर्णश्च तं नीलमिति निर्दिशेत् । वृष एष स मोक्तव्यो न सन्धार्योगृहेभवेत् तदर्थमेपा चरति लोके गाथा पुरातनी । एपल्या यहयः पुत्रा योकोऽपि गयां प्रजेत् । गौरीश्चाप्युद्धहत्फन्यां नीलं पा वृपमुत्सृजेत् ।।४॥ एवं वृषं लक्षणसंप्रयुक्तं गृहोद्भवं मातमथापि राजन् ! मुक्ता न शोचेन्मरणं महात्मा मोक्षं गतवाहमतोऽभिधास्ये ॥२॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे वृषोत्सर्गपिधिवर्णनं नाम पडधिकदिशततमोऽध्यायः।
सताधिकद्विशततमोऽध्यायः पतित्रतामाहात्म्ये सावित्र्युपाख्यानम् | सत उघाचा ततः स राजा देवेशं पप्रच्छामितविक्रमः । पतिव्रतानां माहात्म्यं तत्सम्बन्धांकथामपि मनुरुवाचा पतिव्रतानां का श्रेष्ठा कयामृत्युः पराजित । नामसङ्कीर्तनं कस्याः कीर्तनीयंसदा नरैः सर्वपापक्षयकरमिदानी कथयस्व मे ॥२॥ मत्स्य उवाच चैलोम्यं धर्मराजोऽपिनाचरत्यथयोपिताम् । पतिवतानाधर्मज्ञ! पूज्यास्तस्यापिता.सदा अत्र ते वर्णयिष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम् । यथा चिमोक्षितो भर्ता मृत्युपाशाद्यतः स्त्रिया ॥ ४ ॥ मद्रेषु शाकलो राजा बभूवाश्यपति. पुरा । अपुत्रस्तप्यमानोऽसौ पुत्राधी सर्वकामदाम् आराधयति सावित्रीलक्षितोऽसोद्विजोत्तमैः । सिद्धार्थ यमानांसावित्रींप्रत्यहंद्विजः शतसंस्यश्चतुर्यान्तु दशमासागते दिने । काले तु दर्शयामास सान्तनुं मनुजेश्वरम् ॥ सावित्र्युवाच। राजन् ! भक्तोऽसि में नित्यं दास्यामि त्वां सुतो सदा । तो दत्तां मत्प्रसादेन पुत्री प्राप्स्यसि शोभनाम् ॥ ८॥ एतावदुत्या सा राज्ञः प्रणतस्यैव पार्थिव ! जगामादर्शनं देवी यथा ये नृप! वचला मालती नाम तस्यासीदास. पत्नी पतिव्रता | सुपु तनयां काले सावित्रीमियरूपतः । सापित्याहूतया दत्ता तपसदृशी तथा । सावित्री च भवत्येपा जगाद नृपतिदिजान् कालेन यौवनं प्राप्ता ददौ सत्यवते पिता । नारदस्तु ततः प्राह राजानं दीप्ततेजसम्॥ संघरसरण क्षीणायु भविष्यति नपात्मजः । सरकाया.प्रदीयाचितविधानराधिपः ra * मत्स्यपुराणम् * [अष्टाधिकद्विशततमो तथापि प्रददौ कन्या द्युमत्सेनात्मजे शुभे । साविध्यपि च भर्तारमासाद्य नृपमन्दिरे ॥ नारदस्य तु पाक्येन दूयमानेन चेतसा । शुश्रूषा परमा चक्रे भर्तृ श्वशुरयोर्वने ॥१५॥ राज्याद् भ्रष्ट सभार्यस्तु नएचक्षुर्नराधिप । न तुतोष समासाद्य राजपुत्री तथा स्नुषाम् ॥ १६ ॥ चतुर्थेऽहनि मर्तव्य तथा सत्यवता द्विजा ।। श्वशुरेणाभ्यनुज्ञाता तदा राजसुतापि सा चक्रे त्रिरात्र धर्मज्ञा प्राप्ते तस्मिस्तदा दिने । चारुपुष्पफलाहार सत्यवास्तु ययौवनम्॥ श्वशुरेणाभ्यनुज्ञाता याचनाभगभीरुणा । साविध्यपि जगामार्ता सह भ; महद्वनम् ॥ चेतसा दूयमानेन गूहमाना महद्भयम् । घने पप्रच्छ भर्तार द्रुमाश्चासदृशास्तथा ॥२०॥ आश्वासयामास स राजपुत्री कान्ता धने पद्मविशालनेत्राम् । सन्दर्शनेनाथ द्रुमद्विजानान्तथा मृगाणा विपिने नृवीर ॥ २१ ॥ इतिश्री मत्स्यपुराणे पतिव्रतामाहात्म्ये साविध्युपाख्यानवर्णन नाम सप्ताधिकद्विशततमोऽध्या - याय । अष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः सावित्र्युपाख्यानम् । सत्यवानुवाच । घनेऽस्मिन् शाद्वलाकीर्णे सहकार मनोहरम् । नेत्रपाणसुप पश्य घसन्त रतिवर्धनम् ॥ १॥ घनेऽप्यशोक दृष्ट्वन रागवन्त सुपुष्पितम् । यसन्तो हसतीवाय मामेवायतलोचने ॥ दक्षिणे दक्षिणनेता पश्य रम्या घनस्थलीम् । पुष्पिते किंशुयुत्ताज्यलितानल्सप्रभ मुगन्धियुसुमामोदो धनराजिविनिर्गत । फरोति पायुर्दाक्षिण्यमापयो मनाशनम् ॥ पधिमेन पिशालाक्षि फणिकार सुपुष्पिते । पाश्चनेन विमात्येपा धनराजीमनोरमा । ऽध्यायः] * सावित्र्युपाख्यानम् * अतिमुक्कलताजालरुद्धमार्गा वनस्थली । रम्या सा चारसर्वाङ्गी कुसुमोत्करभूपणा ॥६ मधुमत्तालिझङ्कारख्याजेन घरपणिनी । चापाकृष्टिं करोतीव कामः पायें जिघांसया ॥ फलास्वादलसद्भक्त्रपुस्कोकिलविनादिता। विभाति चारुतिलका त्वमिवैया वनस्थली कोकिलधूतशिखरे मञ्जरीरेणुपिञ्जरः । गदितैर्व्यक्ततां याति कुलीनश्चेष्टितैरिव ॥ ६ ॥ पुष्परेणुचिलिप्ताही प्रियामनु सरिखने । कुसुमं कुसुमं याति कूजन् कामी शिलीमुखः मञ्जरी सहकारस्य कान्तावचाग्रपीडिताम् । स्वदते बहुपुष्पेऽपि पुंस्कोकिलयुवा धने काकः प्रसूतां वृक्षाने स्वामेकाग्रेण चञ्चुना। काकी सम्भावयत्येप पक्षाच्छादितपुत्रिकाम् ॥ १२ ॥ शुभाङ्गनिम्नमासाद्य दयितासहितो युवा । नाहारमपि चादत्ते कामाकान्तः कपिञ्जलः ॥ १३ ॥ कलविङ्कस्तु रमयन् प्रियोत्सङ्गं समास्थित. । मुहुर्मुहुर्यिशालाक्षि ! उत्कण्ठयति कामिनः ॥ १४ ॥ वृक्षशाखां समारूढः शुकोऽयंसह भार्यया। करेण लम्वयन शाखां करोति सफलं शिरः ॥ १५ ॥ चनेऽत्र पिशितास्वादतृप्तो निद्रामुपागतः । शेते सिंहयुवा कान्ता चरणान्तरगामिनी ॥ १६ ॥ व्याघ्रयोमिथुनं पश्य शैलकन्दरसंस्थितम् । ययोर्नेत्रप्रभालोके गुहाभिन्नेव लक्ष्यते ॥ अयं द्वीपी प्रियां लेढि जिह्वाग्रेण पुन,पुन । प्रीतिमायातिव तयालिह्यमान स्वकान्तया उत्सङ्गकृतमूर्धान निद्रापहृतचेतसम् । जन्तद्धरणतः कान्त सुखयत्येव वानरी ॥ १६ ॥ भूमी निपतिता रामा मार्जारो दर्शितोदरीम् । नपैदन्तैर्दशत्येप न च पीडयते तथा ॥ २० ॥ शशकः शशकी चोभे संसुप्ते पीडिते इमे । संलोनगात्रचरणे कर्णेयंक्तिमुपागते ॥२१॥ स्नात्या सरसि पद्माढ्य नागस्तु मदनप्रियः। सम्भावयति तन्वणींमृणालकवलै: प्रियाम् कान्तप्रोथसमुत्थानः कान्तमार्गानुगामिनी । करोति कयलं मुस्तैर्वराही पोतकानुगा - ६०४ * मत्स्यपुराणम् * [अष्टाधिकद्विशततमो तथापि प्रददौ कन्यां द्युमत्सेनात्मजे शुभे । सावित्र्यपि च भर्तारमासाद्य नृपमन्दिरे । नारदस्य तु पाक्येन दूयमानेन चेतसा । शुश्रूषां परमां चक्रे भर्तृ श्वशुरयोर्वने ॥१५॥ राज्याद् भ्रष्टः सभार्यस्तु नष्टचक्षुराधिपः । न तुतोप समासाद्य राजपुत्री तथा स्नुपाम् ॥ १६ ॥ चतुर्थेऽहनि मर्तव्यं तथा सत्यवता द्विजा ! । श्वशुरेणाभ्यनुज्ञाता तदा राजसुतापि सा चक्रे त्रिरात्रं धर्मज्ञा प्राप्ते तस्मिंस्तदा दिने । चाहपुष्पफलाहारः सत्यवांस्तु ययौयनम् ॥ श्वशुरेणाभ्यनुज्ञाता यावनाभगभीरुणा । सावित्र्यपि जगामार्ता सह भ; महद्वनम् ॥ चेतसा दूयमानेन गूहमाना महद्भयम् । बने पप्रच्छ भर्तारं गुमाश्चासदृशांस्तथा ॥२०॥ आश्वासया स राजपुत्री क्लान्ता धने पद्मविशालनेत्राम् । सन्दर्शनेनाथ द्रुमद्विजानान्तथा मृगाणा विपिने नृवीरः ॥ २१ ॥ इतिश्री मत्स्यपुराणे पतिव्रतामाहात्म्ये साविध्युपाख्यानवर्णनं नाम सप्ताधिकद्विशततमोऽध्याय । अष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः सावित्र्युपाख्यानम् । सत्यवानुवाच। घनेऽस्मिन् शाद्वलाकीर्णे सहकारं मनोहरम् । नेवघाणसुसं पश्य घसन्त रतिपर्धनम् ॥ १॥ घनेऽप्यशोकं दृष्ट्वनं रागवन्तं सुपुष्पितम् । पसन्तो हसतीवायं मामेवायतलोचने ! ॥ दक्षिणे दक्षिणनैतां पश्य रम्या घनस्थलीम् । पुष्पितैः किंशुकयुक्तांचलितानलसप्रभ' सुगन्धिकुसुमामोदो धनराजिविनिर्गतः । फरोति घायुर्दाक्षिण्यमावयोलमनाशनम् । पधिमेन पिशालाक्षि! Wणकारीः सुपुष्पिते । काञ्चनेन विभात्येपा पनराजीमनोरमा ऽध्यायः] ॥ उत्सहस्तमूर्धानं निद्रापहृतचेतसम् । जन्तधरणतः कान्त सुपयत्येव वानरी॥ १६॥ स्नान्या सरसि पद्मादय नागस्तु मदनप्रियः। सम्भावयति तन्चङ्गींमृणालकवले प्रियाम् पान्तप्रोषसमुत्थान कान्तमार्गानुगामिनी । करोति कवलं मुस्तैर्वराही पोतकानुगा * सावित्र्युपारयानम् यतिमुकलताजालद्धमार्गा वनस्थली । रम्या सा चारुसवाडी कुसुमोत्करभूपणा ॥६ मधुमत्तालिझड्डाल्याजेन परयणिनी । चापाष्टिं करोतीव कामः पायें जिघांसया ॥ फलास्वादलसद्वक्त्रपुस्कोकिलपिनादिता। विभाति वारुतिलका त्वमिवैपा घनस्थली कोकिलभूतशिखरे मञ्जरीरेणुपिञ्जरः । गदितैर्व्यक्ततां याति कुलीनश्चेष्टितैरिव ॥ ६ ॥ पुप्परेणुविलिप्ताही नियामनु सरिहने । कुसुमं कुसुमं याति कृजन कामी शिलीमुखः मजरी सहकारस्य कान्तावाप्रपीडिताम् । स्वदते वहुपुष्पेऽपि पुंस्कोकिलयुवा पने काकः प्रसूतां वृक्षाने स्वामेकाग्रेण चञ्चुना । काकी सम्भावयत्येप पक्षाच्छादितपुत्रिकाम् ॥ १२ ॥ शुभाङ्गनिम्नमासाद्य दयितासहितो युवा । नाहारमपि चादत्ते कामाकान्तः कपिजलः ॥ १३ ॥ कलविङ्कस्तु रमयन् प्रियोत्सझं समास्थितः । मुहुर्मुझुर्विंशालाक्षि ! उत्कण्ठयति कामिनः ॥ १४ ॥ वृक्षशासां समारूढः शुकोऽयं सह भार्यया । करेण लम्पयन् शासां करोति सफल शिरः ॥ १५ ॥ धनेऽत्र पिशितास्वादतृप्तो निद्रामुपागतः । कान्ता चरणान्तरगामिनी ॥ १६ ॥ शैलकन्दरसंस्थितम् । ययोर्नेत्रप्रभालोके गुहाभिन्ने लक्ष्यते ॥ अथ दीपी प्रिया लेढि जिह्वाग्रेण पुनःपुनः । प्रीतिमायातिव तयालिह्यमानःस्वकान्तया भूमी निपतिता रामां मार्जारो दर्शितोदरीम् । नगर्दन्तर्दशत्येप न च पीडयते तथा ॥ २० ॥ नाशक. शशको चोभे संसुप्ते पीडिते इमे । संलोनगावचरणे कर्णैर्व्यक्तिमुपागते ॥२१॥ शेते सिंहय्या व्यायोमिथुनं पश्य -- * मत्स्यपुराणम् * [नवाधिकद्विशततमो टूढाइसन्धिर्मदिपः कर्दमाक्ततनुर्वने । अनुव्रजति धावन्ती प्रिययद्धचतुष्करः ॥ २४ ॥ पश्य चार्वङ्गि ! सारङ्गं त्वं कटाक्षविभावनैः । सभार्यमाहिपश्यन्तं कौतूहलसमन्वितम् पश्य पश्चिमपादेन रोही कण्डूयते मुखम् । स्नेहार्द्रभावात्कर्षन्ती भर्तारं श्रङ्गकोटिना॥ द्रागिमाञ्चमरी पश्य सितबालामगच्छतीम् । अन्यास्ते चमरः कामीमाञ्चपश्यतिगर्वितः आतपे गवयं पश्य प्रकृष्टं भार्यया सह । रोमन्थनं प्रकुर्वाणं काकङ्ककुदि धारयन् ॥२८॥ पश्येमं भार्यया सार्द्ध न्यस्तामवरणद्वयम् । विपुले यीस्कन्धे बदराशनकाम्यया २६ हंसं सभायं सरसि विवरन्त सुनिर्मलम् । सुमुक्तस्येन्दुविश्वस्य पश्य वै श्रियमुद्वहन् । सभार्यश्चक्रवाकोऽयं कमलाकरमध्यगः। करोति पद्मिनी कान्तां सुपुप्पामिव सुन्दरी ॥ ३१ ॥ मया फलोचयः सुभ्रु! त्वया पुष्पोच्चयः कृत । इन्धनं न कृत सुभ्र! तत्करिष्यामि सांप्रतम् ॥ ३२ ॥ स्वमस्य सरसस्तीरे द्रुमच्छाया समाश्रिता । क्षणमानप्रतीक्षस्य विश्रमस्वच भामिनि साविम्युवाव। एवमेत करिष्यामि मम दृष्टिपथस्त्वया । दूरं कान्त!न कर्तव्योविभेमि गहने घने ॥३४ मत्स्य उवाच। तत. स काष्ठानि चकार तस्मिन्वने तदा राजसुतासमक्षम् । तस्या दूरे सरसस्तदानी मेने च सा तं मृतमेव राजन् ॥ ३५ ॥ इति श्री मत्स्यपुराणे सावित्र्युपाख्यानेऽष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः । नवाधिकद्विशततमोऽध्यायः साविमुपाख्यानम् । मत्स्य उवाच। तस्य पाटयन. फाष्टं जो शिरसि वेदना । स वेदनातः सङ्गम्य भायां पचनमत्रवीत्॥१
ऽध्यायः]
* सावित्र्युपाख्यानम् *
६०७
आयासेन ममानेन जाता शिरसि वेदना । तमश्च प्रविशाीव न च जानामि किञ्चन ॥
त्वदुत्सङ्गे शिरः कृत्वा स्वतुमिच्छामि सांप्रतम् ।
राजपुत्रीमेवमुक्या तदा सुप्वाप पार्थिवः ॥ ३ ॥
तदुत्सने शिरः कृत्वा निद्रयापिललोचनः । पतियता महाभागा ततः सा राजकन्यका
ददर्श धर्मराज तु स्वयं तं देशमागतम् । नीलोत्पलदलश्यामं पीताम्बरधरं प्रभुम् ॥५॥
विद्युल्लतानिवद्धाङ्गं सतोयमिव तोयदम् । किरीटेनार्फवर्णेन कुण्डलेश्च विराजितम् ॥
हारभारार्पितोरस्क तथागदविभूषितम् । तथानुगम्यमानं च कालेन सह मृत्युना ॥७॥
स तु संप्राप्य तं देशं देहात्सत्यवतस्तदा । अंगुटमा पुरुष पाशरद्धं घशंगतम् ॥८॥
भाकृष्य दक्षिणामाशां प्रययौ सत्वरं तदा । साविन्यपि वरारोहा दृष्ट्वातं गतजीवितम्
अनुपवाज गच्छन्तन्धर्मराजमतन्द्रिता । स्तालिवाचाथ हृदयेन प्रवेपता ॥ १० ॥
इमं लोकं मातृभत्या पितृभचयातु मध्यमम् । गुरु शुश्रूपया चैच ब्रह्मलोकं समश्नुने॥
सर्वं तस्याद्रता धर्मा यस्यैतेत्रयभागृताः । अनादृतास्तु यस्यैतेसर्यास्तस्याफला क्रियाः
यावत्त्रयस्तेजीवेयुम्तायनान्यं समाचरेत् । तेषां च नित्यं शुश्रूषां कुर्यात्प्रियहिते रतः
नेपामनुपरोधेन पारतन्ध्यं यदाऽऽचरंतु ।
तत्तनिवेदयेत्तेभ्यो मनोवचनकर्मभिः । त्रिप्यप्येतेषु कन्यं हि पुरुषस्य समस्यते ॥१४॥
यम उचाचा
शतेन फामेन निवळयाशु धर्मा न तेभ्योऽपि हि उच्यते च ।
ममोपरोधस्तव चरमः स्यात्तथाऽधुना तेन तव प्रचामि ॥ १५ ॥
गुरुपूजारतिभक्ता त्वञ्च साध्या पवित्रता 1 विनिवर्तस्य धर्मशे ! ग्लानिर्भवति तेऽधुना
साविध्युवाच ।
पतिदि देपतं वीणां पतिीप परायणम् ।
अनुगम्यः स्त्रिया साध्या पतिः प्राणधनेश्वरः ॥१७॥
मितन्ददाति दिपिता मितं माता मितं मुतः ।
अमितम्य च दातार भत्तारं काम पूजयेत् ॥ १८॥
* मत्स्यपुराणम् * [एकादशाधिकद्विशततमो
भावार्यों ब्रह्मणो मूर्ति. पिता मूर्तिः प्रजापतेः ।
माता पृथिव्या मूर्तिस्तु भ्राता वै मूर्तिरात्मनः ॥ २१ ॥
जन्मना पितरौ क्लेशं सहेते सम्मवे नृणाम् ।
न तस्य निष्कृति शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि ॥ २२ ॥
तयोनित्यं प्रियं कुर्यादाचार्यस्य तु सर्वदा । तेप्वेव त्रिषु तुष्टेषु तपः सर्वं समाप्यते ॥
तेषां त्रयाणा शुश्रूपा परमन्तप उच्यते । न च तैरननुज्ञातो धर्ममन्यं समाचरेत् ॥२४॥
तएव हि त्रयो लोकास्तएव त्रय आश्रमा.तएव च त्रयोवेदास्तथैवोक्तास्त्रयोऽग्नय.
पिता चै गार्हपत्योऽग्निर्माता दक्षिणत. स्मृतः।
गुरुराहवनीयश्च साग्निता गरीयसी ॥२६॥
त्रिषु प्रमाद्यते नैपु त्रीन् लोकान् जयते गृही। दीप्यमानः स्वचपुपा देववद्दिवि मोदते
यम उवाच
कृतेन कामेन निवर्त भद्रे ! भविष्यतीदं सकलं त्वयोक्तम् ।
ममोपरोधस्तय च तमः स्यात् तथाऽधुना तेन तव प्रवीमि ॥ २८ ॥
इति श्री मत्स्यपुराणे सावित्र्युपाख्याने दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ।
एकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
सावित्र्युपाख्यानम् ।
सावित्र्युवाच ।
धर्जिने सुरश्रेष्ठ ! कुतो म्लानि. समस्तथा । त्वपादमूलसेघा च परमं धर्मकारणम् ॥
धर्मार्जनन्तथा कार्य पुरुषेण विजानता। तलामः सर्वलामेभ्यो यदा देव विशिष्यते ॥
धर्मधार्थच फामच त्रिधर्मो जन्मन फलम् ।
धर्महीनत्य फामायाँ पाध्यासुतसमौ प्रभो! ॥३॥
ऽध्यायः] * सावित्र्युपास्यानम् * धर्मादर्थस्तथा कामो धर्मालोफद्वयं तथा । धर्मएकोऽनुयात्येनं यत्र फवन गामिनम् ॥ शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यद्धि गच्छति । एको हि जायते जन्तुरेकएप विपद्यते॥५॥ धर्मस्तमनुयात्येको न सुहन्न च वान्धवाः । नियासीभाग्यलावण्यं सर्व धर्मण लभ्यते ॥६॥ नहोन्द्रोपेन्द्रशन्दुयमार्काग्न्यनिलाम्भसाम् । यस्यश्विधनदाद्यानों ये लोकाः सर्वकामदाः ॥ ७॥ धर्मेण तानवाप्नोति पुरुषः पुरुषान्तक !! मनोहराणि द्वीपानि वर्षाणि मुसुसानि च ॥ प्रयान्ति धर्मेण नरास्तथैव नरगण्डिफाः । नन्दनादीनि मुग्यानि देवोद्यानानियानि च। तानि पुण्येन लभ्यन्ते नाफपृष्ठन्तथा नरः । विमानानि पिवित्राणि तयवाप्सरसःशुमाः तेजसानि शरीराणिसदा पुण्यवतांफलम् । राज्यं नृपतिपूजा च फामसिद्धिस्तथेप्सिता संस्काराणि च मुग्यानि फलंपुण्यस्य दृश्यते। रुक्मवैदूर्यदण्डानि चण्डांशुसदृशानिच चामराणि मुराध्यक्ष ! भवन्ति शुमकर्मणाम् । पूर्णेन्दुमण्डलाभेन ग्वांशुफपिकाशिना धार्यतां याति छत्रेण नरः पुण्येन फर्मणा । जयशट्सम्यगण सूत्रमागधनिःम्यनैः।।१४॥ परासनं सभृट्वार फलं पुण्यस्य फर्मणः । घरानपानं गीतच भृत्यमान्यानुलेपनम् ।। रखापरवाणि मुग्यानि फलं पुण्यस्य फर्मणः । पौदार्यगुणोपेतास्त्रियश्चातिमनोहराः ।। पासः प्रासादपृष्ठेषु भयन्ति शुभकर्मिणः । सुवर्णफिद्विीमिश्रचामरापीडधारिणः ॥ पदन्ति नुरगा देय नरं पुण्येन फर्मणा । तम्य द्वाराणि यजनन्तपोदानन्दमः क्षमा॥१८॥ प्रासवर्ष वया सत्यतीर्थानुपरणं शुभम् । म्याध्यायसेयासाधूनां सपासः मुरार्चनम् गुरुपां चैय शुश्रूण ग्रामणानां च पूजनम् । इन्द्रियाणां जयशेष ग्रामचर्यममन्साम् ॥ २० ॥ सम्मानमा सदा पापोंनित्यमेव विज्ञानता । मदिप्रतासने मृत्युः एमपम्प च पाहता पालपपनसममनित्यं देव ! जाषितम् । फोदि जानानि फम्यायमृत्युरंपापनियनि । परपोऽप्यम्य लोपाम्प मरण पुरतः पितम् ! ममरम्व चरितमन्यायं मुगेत्तम ! गुपयापेक्षया पालोयसरयापेक्षया युपायोगसामागतः पवित्र मिमपाले २५ [दशाधिकद्विशततमो * मत्स्यपुराणम् * नीयते यत्र भर्ता मे स्वयं वा यत्र गच्छति । मयापि तत्र गन्तव्यं यथाशक्ति सुरोत्तम पतिमादाय गच्छन्तमनुगन्तुमहं यदा। त्वां देव ! न हि शक्ष्यामि तदा त्यक्ष्यामि जीवितम् ॥ २० ॥ मनस्विनी तु या काचित् वैधव्याक्षरदूपिता। मुहर्तमपि जीवेत मण्डनार्हा ह्यमण्डिता ॥ २१ ॥ यम उवाच। पतिव्रते ! महाभागे ! परितुष्टोऽस्मि ते शुभे ! । विना सत्यवतःप्राणैर्वरंधरय माविरम् सावित्र्युवाच। विनष्टचक्षुपोराज्यञ्चक्षुषा सह कारय । च्युतराष्ट्रस्य धर्मज्ञ ! श्वशुरस्य महात्मनः ॥ यम उवाच । दूरे पथे गच्छ निवर्त भद्रे ! भविष्यतीदं सकलं त्वयोक्तम् । ममोपरोधस्तथ च कुमः स्यात्तथाधुना तेन तब ब्रवीमि ॥ २४ ॥ इति श्री मत्स्यपुराणे सावित्र्युपाख्याने नवाधिकद्विशततमोऽध्यायः । दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः साविञ्युपाख्यानम् । साचिन्युवाच । कुतः समः कुतो दुःयं सद्धिः सह समागमे । सतान्तस्मान्न मे ग्लानिस्त्वत्समीपे सुरोत्तम ! ॥१॥ साधूनां धाप्यसाधूनां सन्त एव सदागतिः । नेवासतां नैव सतामसातो घमात्मनः विषाग्निसर्पशस्त्रेभ्यो न तथा जायते भयम् । अकारणं जगदेरिखलेभ्यो जायतेयथा सन्तः प्राणानपि त्यपत्या परायं कुर्वते यथा। .
-
ऽध्यायः]
* साविन्युपाख्यानम् *
६०६
तथाऽसन्तोऽपि सन्त्यज्य परपीड़ासु तत्पराः ॥ ४॥
त्यजत्यसूनयं लोकस्तृणपद्यस्य कारणात् । परोपघातशक्तास्तं परलोकन्तथा सतः ॥
निकायेपु निकायेपु तथा ब्रह्मा जगद्गुरुः । असतामुपधाताय राजानं ज्ञातवान् स्वयम्
नरान् परीक्षयेद्वाजा साधून सम्मानयेत्सदा । निग्रहञ्चासतांकुर्यात्सलोके लोकजित्तमः
निग्रहेणासतां राजा सताञ्च परिपालनात् । एतावदेव कर्तव्यं राज्ञा स्वर्गमभीप्सुना ।।
राजसत्यं हि लोकेषु नास्त्यन्यजगतीपते ! असतां निग्रहादेव सताच परिपालनात् ।।
राजमिश्चाप्यशास्तानामसतां शासिता भवान् ।
तेन त्वमधिको देखो देवेभ्यः प्रतिभासि मे ॥१०॥
जगत्तु धार्यतेसद्भिःसतामग्यस्तथाभवान् । तेन त्यामनुयान्त्या मे क्लमोदेव ! न विद्यते
यम उवाच।
तुष्टोऽस्मि ते विशालाक्षि! पचनर्धर्मसंगतः
चिना सत्यवतः प्राणाद् घरं घरय मा चिरम् ॥ १२॥
सावित्र्युवाच ।
सहोदराणां भ्रातृणां कामयामि शतं विभो !।
अनपत्यः पिता प्रीति पुनलामात् प्रयातु मे ॥ १३ ॥
तामुवाच यमो गच्छ यथागतमनिन्दिते ! । औचंदेहिककार्येषु यतं भर्तुः समावर ॥
नानुगन्तुमयं शपस्त्वया लोकान्तरं गतः । पतिव्रतासि तेन त्वं मुहृतमम यास्यसि ॥
गुरुशुश्रूषणादे ! तथा सत्यवतो महत् ।
पुण्यं समर्जितं येन न याम्येनमहं स्वयम् ॥ १६ ॥
एतापदेव फर्तव्यं पुरुपेण पिजानता । मातुः पितुश्च शुश्रूपा गुरोश्च घरपणिनि ! :१७
तोषितं अयमेतद्य सदा सत्यघता बने । पूजितं विजितः स्वर्गस्त्ययानेन चिरं शुमे ! ॥
तपसा बालचर्येण अग्निशुश्रूषया शुभे!। पुरुयः म्वर्गमायान्ति गुरुशुधूपया तथा ॥
आवार्यध पिता चैव माता माता च पूर्वजः ।
नातनात्ययमन्तव्या घालणा न विशेषतः ॥ २० ॥
* मत्स्यपुराणम् * [एकादशाधिकद्विशततमो
भाचार्यों ब्रह्मणो मूर्ति. पिता मूर्तिः प्रजापतेः ।
माता पृधिच्या मूर्तिस्तु भ्राता वै मूर्तिरात्मनः ॥ २१ ॥
जन्मना पितरो क्लेशं सहेते सम्भवे नृणाम् ।
न तस्य निष्कृति शक्या कर्तु वर्षशतैरपि ॥ २२ ॥
तयोनित्यं प्रियं कुर्यादावार्यस्य तु सर्वदा । तेष्वेव त्रिषु तुष्टेपु तप. सर्व समाप्यते ॥
तेपा त्रयाणा शुधूपा परमन्तप उच्यते । न च तैरजनुज्ञातो धर्ममन्यं समाचरेत् ॥२४॥
तएव हि त्रयो लोकास्तएव त्रय आश्रमा । तएच व त्रयोवेदास्तथैवोक्तास्त्रयोऽग्नयः
पिता चै गार्हपत्योऽग्निर्माता दक्षिणत. स्मृतः।
गुएराहवनीयश्च साग्निनेता गरीयसी ॥२६॥
त्रिपु प्रमाद्यते नैपु श्रीन लोकान् जयते गृही । दीप्यमान. स्पयपुपा देववद्दिपि मोदते
यम उवाच
कृतेन कामेन निवर्त भद्रे ! भविष्यतीदं सकलं त्वयोक्तम् ।
ममोपरोधस्तव वलमा स्यात् तथाऽधुना तेन सब ब्रवीमि ॥ २८ ॥
इति श्री मत्स्यपुराणे सावित्र्युपाख्याने दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ।
एकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
सावित्र्युपाख्यानम् ।
सावित्र्युवाच ।
धर्माने सुरश्रेष्ठ ! कुतो ग्लानि समस्तथा । त्यपादमूलसेवा च परमं धर्मकारणम् ।
धर्मार्जनन्तया कार्य पुरुषेण विज्ञानता । तल्लामा सलामेभ्यो यदा देघ विशिष्यते ।।
धर्मधार्थच फाम वियगा जन्मन फलम् ।
धर्मदीनस्य पामाओं याध्यासुतसमा प्रमो!॥३॥
ऽध्यायः] • सावित्र्युपास्यानम् * धर्मादर्थस्तथा कामो धर्माल्लोकद्वयं तथा । धर्मएकोऽनुयात्येनं यत्र क्कचन गामिनम् ।। शरीरेण समे नाशं सर्वमन्यद्धि गच्छति । एको हि जायते जन्तुरेकएव विपद्यते॥५॥ धर्मस्तमनुयात्येको न सुहृन्त च वान्धवाः । क्रियासौभाग्यलावण्यं सर्व धर्मेण लभ्यते ॥६॥ ब्रह्मेन्द्रोपेन्द्रशन्दुयमार्काग्न्यनिलाम्भसाम् । चस्वश्विधनदाद्यानां ये लोकाः सर्वकामदाः ॥ ७ ॥ धर्मपा तानवाप्नोति पुरुषः पुरुषान्तक !! मनोहराणि द्वीपानि वर्षाणि सुसुखानि च । प्रयान्ति धर्मेण नरास्तथैव नरगण्डिकाः। नन्दनादीनि मुख्यानि देवोद्यानानियानि च। तानि पुण्येन लभ्यन्ते नाकपृष्ठन्तथा नरैः। विमानानि विवित्राणि तथैवाप्सरसःशुभाः 'तैजसानि शरीराणिसदा पुण्यवतांफलम् । राज्यं नृपतिपूजा व कामसिद्धिस्तथेप्सिता संस्काराणि च मुख्यानि फलंपुण्यस्य दृश्यते। रुक्मवैदूर्यदण्डानि चण्डांशुसद्दशानिच चामराणि सुराध्यक्ष ! भवन्ति शुभकर्मणाम् । पूर्णेन्दुमण्डलाभेन रत्नांशुफविकाशिना धार्यतां याति छत्रेण नरः पुण्येन कर्मणा । जयशवस्घरोघेण सूतमागधनिःस्वनैः॥१४॥ घरासनं सभृङ्गारं फलं पुण्यस्य कर्मणः । धरानपानं गीतञ्च भृत्यमाल्यानुलेपनम् ॥ रत्नवस्त्राणि मुख्यानि फलं पुण्यस्य कर्मणः । रूपौदार्यगुणोपेतास्त्रियश्चातिमनोहराः॥ घासः प्रासादपृष्ठेषु भवन्ति शुभकर्मिणः । सुवर्णकिङ्किणीमिश्रचामरापीडधारिणः ॥ वहन्ति तुरगा देव नरं पुण्येन कर्मणा । तस्य द्वाराणि यजनन्तपोदानन्दमः क्षमा॥१८॥ ब्रह्मवयं तथा सत्यन्तीर्थानुमरणं शुभम् । स्वाध्यायसेवासाधूनां सहवासः सुरार्चनम् गुरूणां चैव शुश्रूषा ब्राह्मणानां च पूजनम् । इन्द्रियाणां जयश्चैव ब्रह्मवर्यममत्सरम् ॥ २० ॥ तस्माद्धर्मः सदा कार्यानित्यमेव विजानता । महि प्रतीक्षते मृत्युः कृतमस्य त्र या कृतम् चालएवचरेदर्ममनित्यं देव ! जीवितम् । कोहि जानाति कस्याद्यमृत्युरेवापतिप्यति । पश्यतोऽप्यस्य लोकस्य मरणं पुरतः स्थितम् । अमरस्येव चरितमत्याश्चयं मुरोत्तम ! युचत्वापेक्षया यालोवृद्धत्वापेक्षया युपा । मृत्योरुत्सदमारूदः सविसः किमपेक्षते ॥२४ * मत्स्यपुराणम् * [द्वादशाधिकद्विशततमो तत्रापि विण्ड(न्द)तस्त्राणं मृत्युनातस्यका गतिः । न भयंमरणश्चैवप्राणिनामभयंक्वचित् तत्रापि निर्भयाः सन्तः सदा सुकृतकारिणः ॥ २५ ॥ यम उवाच । तुष्टोऽस्मितेविशालाक्षि ! वचनैर्धर्मसङ्गतः। विना सत्यवतः प्राणान् घरंधरयमाचिरम् सावित्र्युवाच । घरयामि त्वया दत्तं पुत्राणां शतमौरसम् । अनपत्यस्य लोकेषु गतिः किल न विद्यते यम उवाच। कृतेन कामेन निवर्त भद्रे ! भविष्यतीदं सकलं यथोक्तम् । च क्लमः स्यात्तथाऽधुना तेन तव ब्रवीमि ॥२८॥ इतिश्रीमत्स्यपुराणे सावित्र्युपाख्याने यमसावित्रीसंघादे एकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः . द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः सावित्र्युपाख्यानम् । सावित्र्युघाच । धर्मामर्मविधानाश ! सर्वधर्मप्रवर्तक ! । त्वमेव जगतो नाथ. प्रजासंयमनीयमः ॥ १ ॥ कर्मणामनुरूपेण यस्माद्यमयसे प्रजाः । तस्माद्वै प्रोग्यसे देव ! यम इत्येव नामतः ॥ धर्मणेमाः प्रजाः सर्वा यस्मादयसे प्रभो! । तस्मात्ते धर्मराजेति नाम सद्विनिगद्यते। सुस्त दुष्कृतंचोमे पुरोधाय यदाजनाः । त्वत्सकाशंमृता यान्ति तस्मात्त्वं मृत्युरुच्यसे फालं फलाई फलयन् सर्वेषां त्वं हि तिष्ठसि । तस्मात् कालेति ते नाम प्रोच्यते तत्त्वदर्शिभिः ॥ ५॥ सर्वपामेव भूतानां यस्मादन्तकरो महान् । तस्मात्त्यमन्तकः प्रोक्तः सर्वदेवमहाद्युते ! ॥ विवस्वतस्त्य तनयः प्रथमं परिकीर्तित । तस्मादयस्वतोनाम्मा सर्वलोकेषु फथ्यते ॥ 1 ऽध्यायः * साविध्युपाय्यानम् - आयुष्ये कर्मणि क्षीणे गृह्णासि प्रसमञ्जनम् । तदा त्वं फथ्यसे लोके सर्वप्राणिहरतिवे तव प्रसादाद्देवेश सङ्करो न प्रजायते ! सतां सदा गतिर्देव त्वमेव परिकीर्तित. ॥ जगतोऽस्यजगन्नाथ मर्यादापरिपालक । पाहिमा त्रिदशश्रेष्ठ ! दुखिताशरणागताम् पितरौ च तथैवास्य राजपुनस्य दुखिती ॥ १० ॥ यम उवाच। स्तन भत्तयाधर्मज्ञे! मया तुऐन सत्यवान् । तब भर्ता विमुक्तोऽयल धकामाबजावले! राज्यं कृत्वा त्वया साद्धं वत्सराशीतिपञ्चकम् । नाफपृष्ठमथारह्य त्रिदशै' सहरंस्यते । त्वयि पुत्रशतञ्चापिसत्यवान् जनयिष्यति । ते वापिसर्व राजान क्षत्रियास्त्रिदशोपमाः मुरयास्त्वनाम पुत्रारया भविष्यन्ति हि शाश्वताः। पितुश्च ते पुरशत भविता तब मातरि ॥ १४ ॥ मालव्या मालवानामशाश्वता पुत्रपौत्रिण । भ्रातरस्ते भविष्यन्तिक्षत्रियात्रिदशोपमाः स्तोत्रेणानेनधर्मी कल्पमुत्थाय यस्तु माम् । कीर्तयिष्यति तस्यापिदीर्घमायुभविष्यति मत्स्य उवाच। एतावदुक्का भगवान् यमस्तु प्रमुच्य त राजसुत महात्मा। अदर्शन तत्र यमो जगाम कालेन साद्धं सह मृत्युना च ॥१७॥ इतिश्रीमत्स्यपुराणे साविध्युपाख्याने यमसावित्रीसंवादे द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः माविश्युपाख्यानम् । मत्स्य उवाच। सावित्री तु तत साध्योजगामघरपणिनी । यथा यथा गतेनैव यत्रासीत्सत्यवान्मृतः सा समासाद्य भर्तारं तस्योत्सङ्गगत शिर । त्या विवेश तन्वड्डी लम्बमाने दिवाकरे १ ६१४ * मत्स्यपुराणम् 7 [प्रयोदशाधिकद्विशततमो सत्यवानपि निर्मुक्तो धर्मराजाच्छनै शनै । उन्मीलयत नेत्राभ्या प्रास्फुरश्च नराधिप तत प्रत्यागतप्राण प्रिया पवनमब्रवीत् । क्कासी प्रयात पुरुषो यो मामप्यपकर्षति न जानामिवरारोहे ! कश्चासीपुरुप शुभे । घनेऽस्मिन्चारुसर्वाङ्गि! सुप्तस्यचदिनगतम् उपवासपरिश्रान्ता दु खिता भवती मया । अस्मदुई दयेनाद्य पितरो खितौ तथा॥ द्रष्टुमिच्छाम्यह सुभु! गगने त्वरिता भव ॥ ६ ॥ साविन्युवाच । श्रादित्येऽस्तमनुप्राप्ते यदि ते रुचित प्रभो । आश्रमन्तु प्रयास्याच श्वशुरोहीनवथुपी यथा वृत्तञ्च तत्रैव शृणु वक्ष्ये यथाश्रमे । एतावदुत्त्वा भर्तार सह मा तदा ययौ ॥८ भाससादाश्रम चैव सह भर्ना नृपात्मजा । एतस्मिन्नेव काले तु लब्धचधुर्महीपति ॥ द्युमत्सेन सभार्यस्तु पर्यतप्यत भार्गध ! । प्रियपुत्रमपश्यन्वै स्नुषाश्चैवाथ कर्शिताम् ॥ आश्वास्यमानस्तु तथा स तु राजा तपोधनै । ददर्श पुत्रमायान्त स्नुपया सह कानने सावित्री तु वरारोहा सह सत्यवता तदा । घवन्दे तत्र राजान सभायं क्षत्रपुङ्गवम् ॥ परिष्वक्तस्तदा पित्रा सत्यवान् राजनन्दन । अभिवाद्य तत सर्वान् घने तस्मिस्तपोधनान् ॥ १३ ॥ उपास तत्र मा रात्रिमृषिभि सर्वधर्मवित् । सावित्र्यपि जगादाथ यथावृत्तमनिन्दिता व्रत समापयामास तस्यामेव यथानिशि । ततस्तुयस्त्रियामान्ते ससैन्यस्तस्य भूपते ॥ माजगाम जन सर्वो राज्यार्थाय निमन्त्रणे । विज्ञापयामास तदा तत्र प्रकृतिशासनम्॥ विचक्षुषस्ते नृपते येन राज्य पुरा हृतम् । अमात्यै स हतो राजा भवास्तस्मिन् पुरेनृप एतच्छ्र त्या ययो राजा वलेनचतुरङ्गिणा। लेभे च सकल राज्य धर्मराजान महात्मन भ्रातृणा तु शत लेभे साविन्यपि घराङ्गना । एवम्पतित्रता साध्वीपितृपक्षनृपात्मजा उजहार घरारोहा भई पक्ष तथैव च । मोक्षयामास भर्तार मृत्युपाशगत तदा ॥२०॥ तस्मात्साव्य स्त्रिय पूज्या सतत देघवन्नरै । तासा राजन् । प्रसादेन धार्यते वै जगत्त्रयम् ॥ २६ ॥ तासान्तु पाक्य भयतीह मिथ्या न जातु लोकेषु चराचरेषु । ।
ऽध्यायः 'अमिपिकस्य राशकृत्यवर्णनम् * तस्मात्सदा ताः परिपूजनीयाः कामान् समग्रानभिकामयानः ॥२२॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे साविध्युपाख्याने पतिव्रतामाहात्म्यसमातियर्णनं नाम त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः । चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः अभिपिक्तस्यराज्ञःकृत्यवर्णनम् । मनुरुवाच। रामोऽभिषिक्तमात्रस्य किनुसत्यतमं भवेत् । एतन्मे सर्वमाचक्ष्य सम्यग्येत्तियतोमवान मत्स्य उवाच। अभिपकाईशिम्सा रामा राज्यावलोफिना। सहायपरणं फार्य तत्र राज्यं प्रतिष्टितम् ॥ यदप्यल्पतरं फर्म तदप्यफेन दुश्चरम् । पुरुषेणासहायेन चिमु राज्यं महोदयम् ॥ ३ ॥ तम्मात्सदायान् परयेत् फुलीनान्नृपतिः स्वयम् । शरान् पुन्लीनजातीयान् यलयुक्तान् श्रियान्वितान् ॥ ४॥ कपसत्वगुणोपेतान् सजनान् क्षमयान्वितान् । संक्षमान मदोत्साहान् धर्मशाध प्रियंपदान् ॥ ५॥ हितोपदेशफानरातःस्वामिभक्तान्यशोऽथिनः। एवंविधानसदायांश्वशुभकर्मसु योजयेत् गुणदीना अपितथा पिशाय नृपतिः स्ययम् । फर्मम्येच नियुीत यथायोग्येषु भागशः पुस्टीनः शीलसम्पमो धनुर्वेदपिशारदः । दस्तिशिक्षाश्चशिक्षामु पुरालासरणमारिता निपिने शाने पाते घेत्ताचप चिफिसिते । एता पर्मणां शरस्तथा शसदोशः॥ प्यूदतत्त्पविधानाः पन्गुसारपितवयित् । रामासेनापतिः कार्यों ग्रामणासत्रियोऽयपा मांगुः मुरुपो दक्षध प्रियपादी न चोधतः । दिनप्रावध सर्वेषां प्रतीदारो पिधीयते यधोनापादी दूतः म्यादेशमाणपिशारदः । शनः रासदी पामी देशकालपिमागयित् विनातादेशफालय दूतः स स्यान्मदीक्षितः पता म यम्य यः पाले मदतीनपतयेत् * मत्स्यपुराणम् * [चतुर्दशाधिकद्विशततमो प्रांशवो व्यायताः शूराः दृढभक्ता निराकुलाः । राज्ञा तु रक्षिणः कार्याः सदा क्लेशसहा हिताः ॥ १४ ॥ अनाहार्यो नृशंसश्च द्रुढभक्तिश्च पार्थिवे । ताम्बूलधारी भवति नारी घाप्यथ तद्गुणा ॥ पागुण्यविधितत्त्वज्ञो देशभापाविशारदः । सन्धिविग्रहक कार्यों राज्ञा नयविशारदः।। कृताकृतज्ञो भृत्यानां शेय. स्याद्देशरक्षिता । आयव्ययज्ञोलोकज्ञो देशोत्पत्तिविशारदः॥ सुरूपस्तरुणः प्रांशु ढभक्तिः कुलोचितः । शूर केशसहश्चैव खड्गधारी प्रकीर्तितः ॥ भारश्च बलयुक्तश्च गजाश्वरथकोविद. । धनुर्धारी भवेद्राज्ञः सर्वशसहः शुचिः ॥१६॥ निमित्तशकुनज्ञानी हयशिक्षाविशारदः । ह्यायु दतत्त्वज्ञो भुवोभागविवक्षण ॥२०॥ यलावलज्ञो रथिनः स्थिरदृष्टिः प्रियम्वदः । शूरश्च कृतविद्यश्च सारथिः परिकीर्तितः ॥ अनाहार्यः रुचिर्दक्षश्चिकित्सितविदाम्वर' । सूपशास्त्रविशेषज्ञ सूदाध्यक्षः प्रशस्यते ॥ सूदशस्त्रविधानज्ञाः परभेद्या कुलोद्गताः । सर्वे महानसे धार्याः कृत्तकेशनखा नराः ॥२३ समः शत्रौच मित्रेच धर्मशास्त्रविशारदः। विप्रमुख्यः कुलीनश्च धर्माधिकरणी भवेत् ॥ फास्तथाविधास्तत्र द्विजमुख्याः समासदः । सर्वदेशाक्षरामिशः सर्वशास्त्रविशारदः॥ लेखकः कथितोराज्ञः सर्वाधिकरणेषु वै । शीपोंपेतान् सुसम्पूर्णान् समश्रेणिगतान् समान् ॥ २६ ॥ आन्तरान्वै लिखेद्यस्तु लेखकः स घरः स्मृतः । उपायवाक्यकुशलः सर्वशास्त्रविशारदः बदर्थवक्ता चाल्पेन लेखकः स्यानृपोत्तम !! पुरुषान्तरतत्त्वज्ञा. प्रांशवश्चाप्यलोलुपा ॥ धर्माधिकारिणः कार्याः जना दानकरा नराः। एवम्विधास्तथा कार्या राज्ञा दौवारिका जनाः ॥ २६॥ लोहवस्त्राजिनादीनारत्नानाच विधानवित् । विज्ञाताफल्गुसाराणामनाहार्यःशुचि सदा निपुणश्चाप्रमत्तश्च धनाध्यक्षः प्रकीर्तितः । आयद्वारेषु सर्वेषु धनाध्यक्षसमा नराः ३१ व्ययहारेषु च तथा कर्तव्याः पृथिवीक्षिता । परम्परागतो यः स्यादष्टाङ्गे सुचिकित्सिते ॥ ३२॥ अनाहार्यः स वैद्यः स्यात् धर्मात्मा च कुलोद्गतः ।
ध्यायः 1 * राजसत्यवर्णनम् * प्राणाचार्यः स विज्ञेयो घरुणात्तस्य भूभुजा ॥ ३३॥ राजन् ! राक्षा सदा कार्य यथाकार्य पृथक् जनः । हस्तिशिक्षाविधानज्ञो घनजातिविशारदः ॥ ३४ ॥ शक्षमस्तथाराज्ञो गजाध्यक्षः प्रशस्यते । एतैरेव गुणयुक्तः स्वासनश्च विशेषतः ॥३५ गजारोही नरेन्द्रस्य सर्वकर्मसु शस्यते । हयशिक्षाविधानश्चिकित्सितविशारदः ॥ अश्याध्यक्षो महीम . स्वासनश्च प्रशस्यते । अनाहार्यश्च शरश्च तथा प्रासः कुलोद्गत। दुर्गाध्यक्षः स्मृतो राश उद्युक्त. सर्वकर्मसु । पास्तुविद्याविधानको लघुहस्तो जितभ्रमः दीर्घदशों च शरश्च स्थपति परिकीर्तिनः । यन्त्रमुक्त पाणिमुक्त विमुक्त मुक्तधारिते ॥ अस्त्राचार्यों निरुद्वेगः कुशलश्च विशिष्यते । वृद्धः कुलोद्गतः सूक्तः पितृपैतामह शुचिः॥ रासामन्त पुराध्यक्षो विनीतश्च तथेयते । एवं सप्ताधिकारेषु पुरुषाः सप्त ते पुरे॥३१॥ परीक्ष्य चाधिकार्याः स्युरामा सर्येषु फर्मसु ।स्थापनाजातितत्त्वतः सततं प्रतिजाप्रता राशः स्यादायुधागारे दक्षः फर्मसु चोद्यतः । फर्माण्यपरिमेयानि राशो नृपफुलोहह !!! उत्तमाधममध्यानि युध्या फर्माणि पार्थिवः । उत्तमाधममध्येपु पुरुषेषु नियोजयेत् ॥ नरफर्मविपर्यासादाजा नाशमवाप्नुयात । नियोग पौर भक्ति श्रुतं शीयं फुलं नयम् ॥ पान्या शृत्तिविधातल्या पुराणां महीक्षिता । पुरुपान्तरविज्ञानतत्त्वसारनिवन्धनात् ।। यामि मन्प्रयेत्कामं राजा मंन्त्रं पृथक पृथक । मन्त्रिणामपि नो फुर्यान्मन्त्रिमन्त्रप्रकाशनम् ॥४७॥ फचिन फम्य पिश्यासोमवती६ सदा नृणाम् ! निधपम्तु सदामन्त्र फार्पएपेनमूरिणा भयेदा निधयायातिः परयुट्युपीयनान । एफम्येच मदीमतुमयः फार्यों चिनिधय ॥ प्रामणान् पर्पपासीत प्रयीशास्त्रसुनिधितान् । नासब्यास्त्रपती महास्ते दिलोफम्य फण्टफाः ॥ ५० ॥ गृतान् हि नित्यं सेवेत पिशान् येदपिदा शुन् । नेम्पा शिक्षेत पिनपं पिनीतात्मा च निन्या ॥५॥ समनो पयर्गा पुष्पांत् पृपिपी माय मंशयः । यदपोपिनपाम्रष्टा राजानः सपरिषदाः # मत्स्यपुराणम् में [चतुर्दशाधिकद्विपाततमो घनस्थाश्चैव ययानि विनयात्प्रतिपेदिरे । विद्येभ्यस्त्रयीविद्यां दण्डनीतिं व शाश्वतीम् ॥ ५३॥ आन्वीक्षिकी त्वात्मविद्याम्यारिम्भाश्च लोकतः । इन्द्रियाणां जये योगं समातिष्ठेद्दिधानिशम् ॥ ५४ ॥ जितेन्द्रियोहि शक्नोति वशेस्थापयितुं प्रजा' । यजेतराजा वहुमि. क्रतुभिश्च सदक्षिणः धर्मार्थं चैव विप्रेभ्यो दद्याद्भोगान्धनानि च । साम्वत्सरिकमाप्तेश्च राष्ट्रादाहारयेयलिम् स्यात्स्वाध्यायपरोलोके वर्तेतपितृवन्धुचत् । आवृत्तानांगुरुकुलाद्विजानांपूजकोभवेत् नृपाणामक्षयो ह्येष विधिामोऽभिधीयते । ततस्तेनानया मित्रा हरन्ति न विनश्यति ।। तस्माद्राज्ञा विधातव्यो ब्राह्मो वै ह्यक्षयो विधिः । समोत्तमाधमे राजा ह्याहय पालयेत्प्रजाः ॥५६॥ न निवर्तेत सनामात् क्षात्रं वतमनुस्मरन् । संग्रामेस्वनिवर्तित्वं प्रजानां परिपालनम् ॥ शुश्रूषा ब्राह्मणानाञ्च राज्ञा निधेयसम्परम् । कृपणानाथवृद्धानां विधवानाञ्च पालनम् ॥ योगक्षेमञ्च वृत्तिञ्च तथैव परिकल्पयेत् । वर्णाश्रमव्यवस्थानं तथाकार्य विशेषत ॥६२॥ स्वधर्मप्रच्युतान् राजा स्वधर्म स्थापयेत्तथा । आश्रमेपुतथा कार्यमन्नं तैलञ्च भाजनम् स्वयमेवानयेद्राजा सत्कृतान्नाचमानयेत् । तापसे सर्वकार्याणि राज्यमात्मात्मनमेवच॥ निवेदयेत्प्रयत्नेन देववञ्चिरमर्चयेत् । द्वे प्रज्ञे वेदितव्ये च ऋज्वी धका च मानवै. ॥६५॥ घका ज्ञात्वा न सेवेत प्रतिबाधेत चागताम् । नास्य च्छिद्रं परो विन्द्याद्विन्द्याच्छिद्रं परस्य तु ॥ ६६ ॥ गृहेत्कर्म इवाङ्गानि रक्षेद्विधरमात्मन | न विश्वसेदविश्वस्तेविश्वस्तेनातिविश्वसेत् ॥ विश्वासाद्भयमुत्पन्न मूलादपि निकृन्तति । विश्वासयेचाप्यपरन्तत्त्वभूतेन हेतुना ॥६८ वकवचिन्तयेदर्थान् सिंहवञ्च पराक्रमे। वृकपचापि लुम्पेत शशवच विनिक्षिपेत् ।।६।। दृढप्रहारी च भवेत् तथा शूकरवन्नृपः । वित्राकारश्च शिखिवढभक्तस्तथा श्ववत् ॥ तथा व मधुराभाषी भवेत्कोकिलघन्नृपः । काकशड्डी भवेनित्यमज्ञातवसति घसेत् ॥ नापरीक्षितपूर्वञ्च भोजनं शयनं व्रजेत् । यस्त्रं पुष्पमलङ्कारं यच्चान्यन्मनुजोत्तम !॥७ - ऽध्यायः] * राजकृत्यवर्णनम् * ६१६ न गाहेजनसम्याधं नवाज्ञातजलाशयम् । अपरीक्षितपूर्वञ्च पुरुपैराप्तकारिभिः ॥ ७३ ।। नारोहेत्कुसरं व्यालं नादान्तं तुरगंतथा। नाविज्ञातां स्त्रियं गच्छेन्नैव देवोत्सवे घसेत् नरेन्द्रलक्ष्या धर्मज्ञ त्राता यत्तोभयेन्नृपः । सभृत्याश्च तथा पुष्टाः सततं प्रतिमानिताः राज्ञा सहायाः कर्तव्याः पृथिवीं जेतुमिच्छता। यथार्हञ्चाप्यसुभृतो राजा फर्मसु योजयेत् ॥ ७६ ॥ धर्मिष्ठान् धर्मकार्येषु शूरान् संग्रामकर्मसु । निपुणानर्थकृत्येषु सर्वत्रैच तथा शुचीन् । स्त्रीपु पण्ढं नियुञ्जीत तीक्ष्णं दारुणफर्मसु । धर्मे चार्थेच कामे च नये च रविनन्दन !n राजा यथाहाच्च उपधाभिः परीक्षणम् । समतीतोपदान भृत्यान् कुर्याच्छस्तवनेवरान् ॥ ७ ॥ तत्पादान्येपणो यत्तांस्तदध्यक्षास्तु कारयेत् । एवमादीनि कर्माणिनृपःकार्याणिपार्थिव सर्वथा नेप्यते राज्ञस्तीक्ष्णोपकरणकम. 1 कर्माणि पापसाध्यानियानि रानी नराधिप! सन्तस्तानि न कुर्वन्तितस्मातानित्यजेन्नृप । नेप्यतेपृथिवीशानान्तीक्ष्णोपफरणफिया यस्मिन् कर्मणि यस्य स्याद्विशेपेण च कौशलम् । तस्मिन् कर्मणि तराशा परीक्ष्य विनिवेशयेत् ॥८३॥ पितृपैतामहान् भृत्यान सर्वकर्मसु योजयेत् । विनादायादरुत्येपुपरीक्षा स्थरतान्तरान् नियुञ्जीत महाभाग ! तस्य ने हितकारिणः । परराजगृहात्मातान् जनसंग्रहकाम्यया । दुष्टान् पाप्यथवादुष्पान् आश्रयोत प्रयततः । दुष्टं विज्ञाय विश्वास न कुर्यात्तनभूमिपः वृत्ति तस्यापि धर्तेत जनसंग्रहकाम्यया । राजा देशान्तरप्राप्तं पुरुषं पूजयेद् भृशम् ॥८७ मामयं देशसम्मानो यामानेन चिन्तयेत । कामं भृत्यार्जन राजा नेव कुर्यानराधिप । नच पा संधिमक्तांस्तान भृत्यान् कुर्यात्कथन । शत्रयोऽगि विरं सो निम्तिश इति चिन्तयेत् ॥ ८ ॥ भृत्या मनुजशार्दूल ! रुपिताध तक्तः । तेषां चारेण चारित्रं राजा मिनायनित्यश' गुणिनां पूजनं पुर्यात् निर्गुणानाशशासनम् । फथिता सततंराजन् ! राजानधारवनुषः स्वके देशे परे देशेमानशीलान् पिवक्षणान् । मनाहायर्यान मेशसहानियत तथायरान ६२० * मत्स्यपुराणम् * [पञ्चदशाधिकद्विशततमो जनस्याविदितान् सौम्यान् तथा ज्ञातान् परस्परम् । चणिजो मन्त्रकुशलान् सांवत्सरचिकित्सकान् ॥१३॥ तथा प्रचाजिताकारांश्चारान् राजा नियोजयेत् । नैकस्य राजा श्रद्दध्यात् चारस्यापि सुभाषितम् ॥ १४ ॥ द्वयोः सम्बन्धमाज्ञाय श्रद्दध्यान्नृपतिस्तदा । परस्परस्याविदितो यदिस्याताश्च तात्रुभी तस्माद्राजा प्रयत्नेन गढांश्चारान्नियोजयेत् । रागापरागीभृत्यानां जनस्यवगुणागुणान् सर्व राज्ञां चरायत्तन्तेषु यत्नपरोभवेत् । कर्मणा केन मे लोके जनः सर्वोऽनुरज्यते ॥ चिरज्यते केन तथा विज्ञेयं तन्महीक्षिता। विरागजनक लोके पर्जनीयं विशेषतः ॥ ६८ तथा च रागप्रभवा हि लक्ष्यो राज्ञां मता भास्करवंशचन्द्र !। तस्मात्प्रयत्नेन नरेन्द्रमुख्यैः कार्योऽनुरागो भुवि मानवेषु ॥ १६ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणेऽभिषिक्तस्य राज्ञ कृत्यवर्णनं नाम चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः पञ्चदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः राजकृत्यवर्णनम् । मत्स्य उवाच यथा न घर्तितव्यं स्यान्मनो राज्ञोऽनुजीविना । तथा ते कथयिष्यामि नियोध गदतो मम ॥ १ ॥ राजा यत्तु घदेद्वाक्यं श्रोतव्यं तत्प्रयत्नत । आक्षिप्य घचनं तस्य न वक्तव्यं तथा चवः अनुकूलं प्रियं तस्य धक्तव्यं जनसंसदि । रहोगतस्य धक्तव्यमप्रियं यद्धितं भवेत् ॥३॥ परार्थमस्य वक्तन्यं समे चेतसि पार्थिव ! स्वार्थः सुहृदि वक्तव्यो न स्वयं तु कथञ्चन कार्यातिपातः सर्वेषु रक्षितव्य. प्रयत्नत । नव हिंस्यं धनं किश्चित् नियुक्तेनवकर्मणि नोपेक्ष्यस्तस्यमानश्च तथा राज्ञः प्रियो भवेत् । राज्ञश्चततथाकाय वेपभापितचेष्टितम् ऽध्यायः] राजरत्यवर्णनम् * ६२१ राजलीला न कर्तव्या तद्विद्विष्टश्च वर्जयेत् । राज्ञःसमोऽधिकोवानकार्योवेपोविजानता द्यूतादिषु तथैवान्यत् कौशलं तु प्रदर्शयेत् । प्रदर्श्यकौशलं चास्यराजानन्तु विशेषयेत् ॥ अन्तःपुरजनाध्यक्ष रित निराहतः। संसर्ग न व्रजेद्राजन् विना पार्थिवशासनात् ॥ ६ ॥ निस्नेहताञ्चायमानं प्रयत्लेन तु गोपयेत् । यच्च गुह्यं भवेद्राशो न तल्लोके प्रकाशयेत् ॥ नृपेण श्रावितं यत्स्यावाच्यावाच्यं नृपोत्तम!! नतत्संधावयेलोकेतथाराशोऽपियोभवेत् भाशाप्यमानेयान्यस्मिन्समुत्थायत्यरान्वितः। किमहङ्करपाणीतियाच्योराजाविज्ञानता कार्यावस्थां व विज्ञाय कार्यमेव यथा भवेत् । सतत क्रियमाणेऽस्मिन् लाघवन्तु ब्रजेद् ध्रुवम् ॥ १३ ॥ राशः प्रियाणि पाक्यानि न चात्यर्थपुन.पुनः । महासुशीलस्तुभवेत्नचापि भृकुटीमुसः नातिवक्ता न निर्यता न च मात्सरिकस्तथा । आत्मसम्भावितश्चैव न भवेत्तु कथञ्चन दुष्कृतानि नरेन्द्रस्य न तु सड्डीतयेत् क्वचित् । पस्त्रमस्नमलङ्कारं राज्ञा दत्तं तु धारयेत् ॥ १६ ॥ औदार्येण न तद्देयमन्यस्मै भूतिमिच्छता । तत्रयात्मासनं कार्य दिवा स्वप्नं न कारयेत् नानिर्दिष्टे तथाद्वारे प्रविशेत्तु कथञ्चन । न च पश्येत्तु राजानमयोग्यासु च भूमिषु ।। रास्तु दक्षिणे पार्ने पामे चोपविशेत्तदा । पुरस्ताच्च तथापश्चादासनन्तु विहितम् जम्मा निष्टीयनवासं फोपं पर्यस्तिकाभ्रयम् । भृकुटि पान्तमुद्गारन्त-समीपे चिवर्जयेत् स्वयं तत्र न फुर्वीत स्यगुणारयापनं युधः । स्वगुणारयापने युक्ता परमेय प्रयोजयेत् हृदयं निर्मलं त्या परां भक्तिमुपाधिते. । अनुजीविगणैर्भाव्यं नित्यं रामामतन्द्रितः ।। शाट्य लोल्यं च पैशन्यं नास्तिक्यं क्षुद्रता तथा । चापल्यञ्च परित्याश्यं नित्यं रामोऽनुज घिमिः ॥२३॥ श्रुतिपिद्यानुशीलंध संयोज्यात्मानमात्मना । राजसेवान्ततः कुर्याद् भृतयेभूतिपनीम् नमम्याः सदा चाम्य पुत्रयलममन्त्रिपः । सचिवधाम्यपियासीनतुकार्यः कयञ्चन अष्टश्चास्य म ग्रूयान् फार्म यूपातया यदि । हितं तथ्य पचनंदित सहामुनिश्चितम्
।
* मत्स्यपुराणम् * [पोड़शाधिकद्विशततमो
चित्तञ्चैवास्य विशेयं नित्यमेवानुजीविना । भर्तुराराधनंकुच्चित्तज्ञोमानवः सुखम्
रागापरागौ चैवास्य विज्ञेयो भूतिमिच्छता । त्यजेद्विरको नृपती रक्तवृत्तिन्तु कारयेत्
विरक्तः कारयेन्नाशं विपक्षाभ्युदयं तथा । आशावर्द्धनकं कृत्वा फलनाशं करोति च ॥
अकोपोऽपि सकोपाभः प्रसन्नोऽपि च निष्फलः ।
पाक्यं च समदं पक्ति वृत्तिच्छेदं करोति वै ॥ ३० ॥
प्रदेशवाक्यमुदितो न सम्भावयतेऽन्यथा । आराधनासु सर्वासु सुप्तवच्च चिचेष्टते ॥
कथासु दोषं क्षिपति पाक्यभङ्गं करोति च । लक्ष्यते विमुपश्चैव गुणसङ्कीर्तनेऽपि व
दृष्टिंक्षिपति चान्यन क्रियमाणे च कर्मणि । विरक्तलक्षण चैतत् ऋणु रक्तस्य लक्षणम्
दृष्ट्वा प्रसन्नो भवति पाक्यं गृह्णाति चादरात् । कुशलादिपरिप्रश्नं संप्रयच्छति चासनम्
विविक्तदर्शने चास्य रहस्येनं न शङ्कते । जायते दृष्ट्वदनः श्रुत्वा तस्य तु तत्कथाम् ॥
अप्रियाण्यपि वाक्यानि तदुक्तान्यभिनन्दते । उपायनञ्च गृह्णाति स्तोकमप्यादरात्तथा ॥
कथान्तरेषु स्मरति प्रहएक्दनस्तथा । इति रक्तस्य कर्तव्या सेवा रविकुलोद्वह !॥३७॥
मित्रं न चापत्सु तथा च भृत्या भजन्ति ये निर्गुणमप्रमेयम् ।
विभुं विशेषेण च ते ब्रजन्ति सुरेन्द्रधामामरवृन्दजुटम् ॥ ३८॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे राजकृत्यवर्णनं नाम पञ्चदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ।
पोड़शाधिकद्विशततमोऽध्यायः
राजकुत्यवणनम् ।
मत्स्यउवाच।
राजा सहायसंयुक्त प्रभूतयवसेन्धनम् । रम्यमानतसामन्तं मध्यमन्देशमावसेत् ॥१॥
वैश्यशूद्रजनप्रायमनाहायं तथापरे । किञ्चिद्ब्राह्मणसंयुक्त बहुकर्मकरन्तथा ॥२॥
अदघमातृकं रम्यमनुरक्तजनान्वितम् । करैरापीडितञ्चापि बहुपुष्पफलं तथा ॥ ३ ॥
ऽध्यायः] * राजकृत्यधर्णनम् * ६२३ अगम्यं परचक्राणां तद्वासगृहमापदि । समदुःखसुखं राज्ञः सततं प्रियमास्थितम् ॥४॥ सरीसृपविहीनच व्याघ्रतस्करवर्जितम् । एवंविधं यथालाभं राजा विषयमावसेत् ॥५॥ तत्र दुर्ग नृपः कुर्यात् पण्णामेकतमं बुधः । धनुर्दुर्ग महीदुर्ग नरदुर्ग तथैव च ॥६॥ चार्श चैवाम्बुदुर्गच गिरिदुर्ग व पार्थिव ! । सर्वेषामेव दुर्गाणां गिरिदुर्ग प्रशस्यते दुर्गच परिखोपेतं घप्राट्टालकसंयुतम् । शतनीयन्त्रमुख्यैश्च शतशश्च समावृतम् ॥ ८ ॥ गोपुरं सकपाटञ्च तत्र स्यात्सुमनोहरम् । सपताकङ्गजारूढोयेन राजा विशेत्पुरम्॥६॥ चतत्रश्च तथातत्र कार्यास्त्वायतवीथयः । एकस्मिंस्तत्र वीथ्यो देववेश्म भवेवढम् चीथ्यग्ने च द्वितीये चर जवेश्म विधीयते । धर्माधिकरणं कार्य पीथ्यग्रे च तृतीयके चतुर्थत्वथ पीथ्यग्रे गोपुरश्च विधीयते । आयतञ्चतुरस्रं पा वृत्तं पा कारयेत् पुरम् ।। मुक्तिहीनं त्रिकोणञ्चययमध्यं तथैवव । आयतञ्चनुरनं घा वृत्तं या कारयेत्पुरम् ॥१३॥ अर्द्धचन्द्रं प्रशंसन्ति नदीतीरेषु तद्वसन् । अन्यत्तत्र न कर्तव्यं प्रयत्नेन विजानता ॥१४॥ राशा कोशगृहं कार्य दक्षिणे राजवेश्मनः । तस्यापि दक्षिणे भागे गजस्थान विधीयते गजानां प्राङ्मुखी शाला कर्तव्यावाप्युदङ्मुखी । माग्नेये च तथा भागे आयुधागारमिप्यते ॥ १६ ॥ महानसश्च धर्मज्ञ ! फर्मशालास्तथापराः । गृहं पुरोधसः कार्य घामतो राजवेश्मनः ॥ मन्त्रिवेदविदाञ्चैव विकित्साकर्तुरेवच । तत्रच च तथा भागे फोष्ठागारं विधीयते ।। गयां स्थान तथचात्र तुरगाणां तथैवच । उत्तराभिमुखा श्रेणी तुरगाणां विधीयते ।। दक्षिणाभिमुपा घाथ परिशिष्टास्तु गहिताः । तुरगास्तेतथाधार्याः प्रदीपैःसार्वतिः कुक्कुटान पानरांश्चैव मर्कटांध विशेषतः । धारयेदश्वशालासु सवत्सां धेनुमेचच ॥ अजाश्च धार्या यत्नेन तुरगाणां हितैपिणा । गोगजाश्वादिशालासु तत्पुरीपस्य निर्गमः अस्तंगते न फर्तव्यो देवदेवे दिवाकर । तत्र तत्र यथास्थानं राजाविज्ञाय सारथीन । दद्यादापसथस्थानं सर्वेषामनुपूर्वशः। योधानां शिल्पिनाञ्चैव सर्वेपामविशेषतः॥२४॥ दद्यादायसधान् दुर्गे कालमन्त्रविदां शुमान् । गोयद्यानश्यवैद्यांश्च गजबंद्यांस्तथैवच ॥ भादरेत भृश राजा दुर्गे हि प्ररला रुतः । कुशीलयानां विप्राणां दुर्गे स्थान विधीयते ।
६२४ * मत्स्यपुराणम् * [पोड़शाधिकद्विशततमो न वहनामतो दुर्गे विनाकार्य तथा भवेत् । दुर्गे च तत्र कर्तव्या नानाप्रहरणान्विताः ॥ सहस्रघातिनो राजस्तैस्तु रक्षा विधीयते । दुर्गे द्वाराणि गुप्तानि कार्याण्यपि च भूभुजा ॥ २८ ॥ सञ्चयश्चात्र सर्वेपामायुधानां प्रशस्यते । धनुषा क्षेपणीयानान्तोमराणां च पार्थिवः।। शराणामथ खड्गानां कवचानां तथैवच । लगुडानां गुडानाश्च हुडानां परिषैः सह ॥ अश्मनाञ्च प्रभूतानां मुद्गराणां तथैवच । त्रिशूलाना पटिशानां कुठाराणाञ्च पार्थिव ।। प्रासानाञ्च सशूलानां शक्तीनाञ्च नरोत्तमः । परश्वधानां चक्राणां धर्मणाञ्चमभिः सह कुद्दालक्षुरक्षेत्राणां पीठकानान्तथैव च । तुपाणाञ्चैव दात्राणामगाराणाञ्च सञ्चयः ३३ सर्वेषां शिल्पिभाण्डानां सञ्चयश्चात्र चेष्यते । धादित्राणाञ्च सर्वेपामौषधीनान्तथैवच यवसाना प्रभूतानामिन्धनस्य च सञ्चयः । गुडस्य सर्वतैलानां गोरसानान्तथैव च ॥ घसानामथ मजानां स्नायूनामस्थिभिः सह । गोचर्मपटहानाञ्च धान्यानां सर्वतस्तथा तथैवाभ्रपटानाञ्च यवगोधूमयोरपि । रत्नानां सर्ववस्त्राणां लोहानामप्यशेषतः ॥ ३७॥ कलापमुद्गमापाणाञ्चणकानान्तिलः सह । तथा च सर्वशस्यानां पांशुगोमययोरपि । शणसर्जरसं भूज जतुलाक्षा च टकणम् । राजा सञ्चिनुयाद्दुर्गे यच्चान्यदपि किञ्चन ।। कुम्भाश्चाशीविषैः कार्या व्यालसिंहादयस्तथा। मृगाश्च पक्षिणश्चैव रक्ष्यास्ते च परस्परम् ॥ ४० ॥ स्थानानि च घिरुद्धानां सुगुप्तानि पृथक् पृथक् । कर्तव्यानि महाभाग ! यत्नेन पृथिवीक्षिता ॥ ४१॥ उक्तानि चाप्यनुक्तानि राजद्रव्याण्यशेषत । सुगुप्तानि पुरे कुर्याजनानां हितकाम्यया ॥ ४२ ॥ जीवकर्षभकाकोलमामलमाटरूपकान् । शालपर्णी पृष्ठिपर्णी मुद्गपर्णी तथैव च ॥४३ मापपणीं च मदद्वैसारिवेद्वेवलात्रयम् । पारा श्वसन्ती वृप्या च वृहती फण्टकारिका शृङ्गी शृङ्गाटकी द्रोणी वर्षाभूर्दर्भरेणुका । मधुपणी विदायेंद्रे महाक्षीरा महातपा ॥४५ धन्वनः सहदेवाह्वा फटुकरण्डकं विपः । पणीं शताहा मृद्वीका फल्गु पर्जरयष्टिकाः ॥
ऽध्यायः]
* राजधर्मवर्णनम् *
शुक्रातिशुककाश्मयञ्छनातिच्छनधोरणाः। चरिशुविकाराक्ष फाणिताचाच सत्तम ।।
सिंही व सहदेवी व विश्वेदेवाश्वरोधकम् ।
मधुक पुष्पहंसाख्या शतपुष्पा मधूलिका ॥ ४८ ॥
शतावरीमधूनेच पिप्पलन्तालमेव च । आत्मगुप्ता कट्फलाख्यादार्विका राजशीर्षकी ।
राजसर्पपधान्याकमृप्यप्रोक्ता तथोत्कटा । कालशाकं पद्मवीजं गोवल्ली मधुबलिका ॥
शीतपाकी कुवेराक्षी काकजिहोरपुष्पिका । पर्वतत्रपुसौ चोभी गुजातकपुनर्नये॥५॥
फसेरु कारकाश्मीरी बल्या शालूक केसरम् ।
तुपधान्यानि सर्वाणि शमीधान्यानि चैव हि ५२ ॥
क्षीरं क्षीदन्तथा तकं तैल मजा घसा घृतम् ।
नीपश्चारिष्टकाक्षोडघातामसोमवाणकम् ॥ ५३॥
एयमादीनि चान्यानि विज्ञेयो मधुरोगणः । राजा सञ्चिनुयात्सर्व पुरे निरवशेषत ५४
दाडिमाम्रातको चैव तिन्तिडीकाम्लवैतसम् । भव्यकर्कन्धुलकुचकरमईक्रूपकम् ५५॥
वीजपूरफकण्डूर मालतीराजवन्धुकम् । कोलकद्वयपर्णानि द्वयोगग्नातयोरपि ॥५६ ।।
पारायत नागरक प्राचीनोलकमेव च । कपित्थामलकं चुकफलन्दन्तशठस्य च ॥५७॥
जाम्बच नवनीतच सीधीरफरपोदके । सुरासपञ्च मद्यानि मण्डतदधीनि च ॥५८॥
शुलानि चैव सर्वाणि शेयमाम्लगण द्विज । एघमादीनि चान्यानि राजा सञ्चिनुयात्पुरे
सैन्धोद्विदपाठेयपाक्यसामुद्रलोमकम् । युप्यसौवर्चल विड बालस्य यवाहकम् ॥६०॥
और क्षारं कालभस्म विज्ञयो लवणोगणः ।
एघमादीनि वान्यानि राजा सचिनुयात्पुरे ॥ ६१ ॥
पिप्पली पिप्पलीमूलचन्यचित्रकनागरम् । थुनेरफं मरिचकं शिग्रुमल्लातसर्पपा ॥६२॥
कुष्टाजमोदाफिणिहीहिङ्गुमूलकधान्यकम् ।
फारपीकृतिका याज्या सुमुरण फार मालिका ॥६॥
फणिनफोयलशुन भूस्तुणा सुरसन्तथा ।
फायस्था च पयस्था चरितालं मन शिला॥ ६॥
* मत्स्यपुराणम् * [पोडशाधिकद्विशततमो अमृता च रुदन्ती च रोहिपं कुङ्कुमन्तथा । जया एरण्डकाण्डीरं सलकीहञ्जिका तथा ॥ सर्वपित्तानि मूत्राणि प्रायोहरितकानि च । फलानि चैव हि तथा सूक्ष्मैला हिगुपट्टिका एवमादीनि चान्यानि गण कटकसंज्ञितः । राजा सश्चिनुयाद्दुर्गे प्रयत्नेन नृपोत्तम !! मुस्तञ्चन्दनहीवेरकृतमालकदारवः । दरिद्रानलदोशीरनक्तमालकदम्बकम् ॥ ६८ ॥ दूर्वा पटोलकटुका दीर्घत्वक् पत्रकं घचा। फिराततिक्तभूतुम्वी विपा चातिविषा तथा ॥ ६६ ॥ तालीसपत्रतगरं सप्तपर्णविकङ्कता । काकोदुम्वरिका दिव्या तथा चैव सुरोद्भवा ॥ ७० ॥ पड्प्रन्धा रोहिणी मासी पर्पटश्चाथ दन्तिका। रसाञ्जनं भृगराजं पतनी परिपेलवम् ।। ७१ ॥ दु स्पर्शा गुरणी कामा श्यामाक गन्धमाकुली। रूपपणी व्याघ्रनसं मञ्जिष्ठा चतुरङ्गला ॥ ७२ ॥ रम्भा चैवाङ्करास्फोता तालास्फोता हरेणुका । घेत्रान वेतसस्तुम्बी विपाणी लोध्रपुष्पिणी ॥ ७३ ।। मालतीकर कृष्णाख्या वृश्चिका जीविता तथा । पर्णिका च गुडूची व सगणस्तिकसज्ञक || ७४ ॥ एघमादीनि चान्यानि राजा सशिनुयात्पुरे। अभयामल्के चोभे तथैव च विभीतकम्। प्रियड्डधातफी पुष्पं मोचाख्या चार्जुनासना.। अनन्तास्त्रीतुपरिकास्योनाङ्कट्फलन्तथा भूर्जपत्रं शिलापत्रं पाटलापत्रलोमकम् । समङ्गात्रिवृतामूल्फासगैरिफाजनम् ॥७॥ विद्रुमंस मधूच्छिष्टकुम्भिकाउमुदोत्पलम् । न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थकिंशुका.शिशुपाशमी प्रियालपीलुफासारिशिरीपा. पद्मकन्तथा । बिल्योऽग्रिमन्थ प्लक्षच श्यामाकश्च पफो धनम् ॥ ६ ॥ राजादनं करीश्च धान्यकं प्रियफस्तथा । फकोलाशोकवदाः फदम्यखदिरद्वयम् ।।८० एषां पत्राणि साराणिमूलानि पुसुमानिच । एघमादीनिचान्यानिकपायाख्योमतोरसः
ऽध्यायः]
* राजधर्मवर्णनम्
प्रयत्नेन नृपश्रेष्ठ ! राजा सचिनुयात्पुरे । कीटाश्च मारणे योग्या व्यङ्गतायां तथैव च ।।
पातधूमाश्च मार्गाणां दूपणानि तथैव च । धार्याणि पाथिवैर्दुर्गे तानि वक्ष्यामि पार्थिव
विषाणां धारणं कार्य प्रयत्नेन महीमुजा।
विचित्राचाङ्गदा धार्या विषस्य शमनास्तथा ॥ ८४ ॥
रक्षोभूततपिशावघ्नाः पापघ्ना पुष्टिवर्धनाः ।
कलाविदश्च पुरुषाः पुरे धार्या. प्रयत्नतः ॥ ८५॥
भीतान् प्रमत्तान् कुपितांस्तथैव च विमानितान् ।
कुभृत्यान् पापशीलाश्च न राजा घासयेत्पुरे ॥८६॥
यन्त्रायुधाट्टालचयोपपन्न समनधान्यौपधिसम्प्रयुक्तम् ।
पणिगजनैश्च वृतमावसेत दुर्ग सुगुप्तं नृपतिः सदैच ॥ ८७ !!
इति श्रीमत्स्यपुराणे राजधर्मवर्णनं नाम पोडशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ।
सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
मनुमत्स्यसंवादे राजधर्मवर्णनम् ।
मनुरुवाच।
रक्षोन्नानि विपन्नानि यानि धार्याणि भूभुजा ।
अगदानि समाचक्ष्य तानि धर्मभृताम्वर ! ॥१
मत्स्य उवाच।
विरवाटकी यवक्षारं पाटलावाहिकोपणा । श्रीपर्णी शल्लकोयुकोनिकाय प्रोक्षणपरम्
सविष प्रोक्षितं तेन सद्यो भवति निपिम् । यघसन्धयपानीयवस्त्रशय्यासनोदफम् ।।
फपचाभरणं छत्रं वालन्यजनयेश्मनाम् । शेलुः पाटलातिविपा शिशुमूर्षा पुनर्नया ॥४॥
समड़ावृपमूलञ्च फपित्यवृपशोणितम् । महादन्तशन्तिद्वत् प्रोक्षणं विपनाशनम् ॥५॥
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# मत्स्यपुराणम् * [सप्तदशाधिकद्विशततमो
लाक्षाप्रियंगुमञ्जिष्ठा सममेला हरेणुका। यष्ट्याह्वा मधुरा चैच वभूपित्तेनकल्पिताः।
निखनेद्गोविषाणस्थं सप्तरात्रं महीतले । ततः कृत्वा मणि हेम्ना वद्ध हस्तेन धारयेत्
संसृष्टं सविपन्तेन सद्यो भवति निर्विषम् । मनोहया शमीपत्रंतुम्बिका श्वेतसर्पपा.॥
कपित्थकुष्ठमञ्जिष्टाः पित्तेन श्लक्ष्णकल्पिताः।
शुनो गोः कपिलाश्च सौम्याक्षिप्तोऽपरोगदः ॥ ६ ॥
विपजित् परमं फायं मणिरत्नञ्च पूर्ववत् । मूषिका जतुका चापि हस्ते बद्धा विपापहा
हरेणुमांसी मञ्जिष्ठा रजनी मधुकामधु । अक्षत्यक् सुरसं लाक्षा श्वपित्तं पूर्ववद्भुवि
पादित्राणि पताकाश्च पिटरेतैः प्रलेपिताः । श्रुत्वा दृष्ट्वा समाधाय सद्योभवति निर्विषः
त्र्युषण पञ्चलवणं मञ्जिष्ठा रजनीद्वयम् । सूक्ष्मैलानिवृतापत्रं विडङ्गानीन्द्रधारुणी ॥
मधुकं चेतसं क्षीद्रं विपाणे च निधापयेत् । तस्मादुष्णाम्बुना मानं प्रागुक्तं योजयेत्ततः
शुक्लं सर्जरसोपेतसर्पपा एलवालुकैः ॥ १५ ॥
सुवोगा तस्करमुरौ कुसुमेरर्जुनस्य तु । धूपो घासगृहे हन्ति विष स्थावरजङ्गमम् ।।
न तत्र कीटा न विपन्द१रा न सरीसृपाः। न कृत्या कर्मणाश्चापि धूपोऽयं यत्र दह्यते
फरिपतचन्दनक्षीरपलाशदुमयल्फलैः । मूलायालुसरसानाकुलीतण्डुलीयकः ॥ १८ ॥
काथ. सर्वोदकार्येषु काफमाचीयुतो हितः । रोवनापत्रनेपालीफुडमैस्तिलकान् घहन् ।
विषेर्न याध्यते स्याच नरनारीनृपप्रियः । चूर्णे हरिद्रामविष्टाकिणिहीकणनिम्वजैः ।२०
1 दिग्धं निर्षिपतामेति गानं सर्वविपादितम् । शिरीपस्य फलं पत्रं पुप्पंत्परमूलमेव च ॥
गोमूत्रपुष्टो छगदः सर्वकर्मकरः स्मृतः । एफपीर ! महोपध्यः शृणु चातः परं नृप !
यन्ध्या फर्कोटकी राजन् ! विष्णुफ्रान्ता तथोत्कटा।
शतमूली सितानन्दा यला मोचा पटोलिफा ॥ २३ ॥
सोमापिण्डा निशा चेय तथा दग्घरहा च या ।
स्थले फलिनी या च पिशाली शवामूलिफा ॥ २४ ॥
चण्डाली इस्तिमगधा गोऽजापों फरम्भिफा ।
रता वैध महारता तथा पर्दिशियाच या ॥२५॥
ऽध्यायः * राजधर्मवर्णनम् * ६२६ कोशातकी नक्तमालं प्रियालश्च सुलोचनी । पारुणी घसुगन्धा च तथा वै गन्धनाकुली ॥ २६ ॥ ईश्वरी शिवगन्धाच श्यामला वंशनालिका। जतुकाली महाश्वेता श्वेता व मधुयष्टिका ॥ २७ ॥ चनकः पारिभद्रश्च तथा चै सिन्धुवारकाः । जीवानन्दा धसुच्छिद्रा नतनागरकपटका नालश्च जाली जातीच तथाव चटपत्रिका । कार्तस्वरं महानीला कुन्दुरहं सपादिका ॥ मण्डूकपर्णी धाराही हे तथा तण्डुलीयके । सर्पाक्षी लवली ब्राह्मी विश्वरूपासुखाकरा रजापहो वृद्धिकरी तथाचैव तु शल्यदा । पत्रिका रोहिणी चैच रक्तमाला महीपधी॥ तथामलकचन्दाकं श्यामचित्रफला च ण। काकोली क्षीरकाकोली पीलुपणी तथैव च ।। ३२ ॥ केशिनी वृश्चिकालीच महानागा शतावरी । गरुडीव तथा येगा जले कुमुदिनीतथा । स्थले चोत्पलिनी या च महाभूमिलता च या । उन्मादिनीसोमराजीसर्वरत्नानिपाथिय विशेषान्मरफतादीनि कीटपक्षं विशेषतः । जीवजाताश्च मणयः सर्वे धार्याः प्रयत्नतः॥ रक्षोनाश्च विपन्नाश्च कृत्यावैतालनाशनाः । विशेषान्नरनागाश्च गोसरोष्ट्रसमुद्भवाः ॥ सर्पतित्तिरगोमायुपत्र(क)मण्डफजाश्च ये। सिंहव्यावर्भमार्जारद्वीपिवानरसंभवाः ॥ कपिलला गजा पाजिमहिषेणमवाश्च ये ॥२७॥ इत्येवमेते. सफलरुपेतन्द्रव्यश्च सर्वः स्वपुरं सुरक्षितम् । राजा पसेत्तत्र गृहं सुशुम्नं गुणान्वितं लक्षणसंप्रयुक्तम् ॥ ३८ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे मनुमत्स्यसंवादेराजधर्मवर्णनं नाम सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः 7 ।
अष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः मनुमत्स्यसंवादे राजधर्मवर्णनम् । मनुरुवाच। राजरक्षारहस्यानि यानि दुर्गे निधापयेत् । कारयेद्वा महीभर्ता ब्रूहि तत्त्वानि तानि च ॥ १ ॥ मत्स्य उघाचा शिरीपोदुम्बरामीवीजपूरं घृतप्ततम् । क्ष्युद्योगः कथितो राजन् ! मासाद्धं तु पुरातनः ॥२॥ कशेरुफलमूलानि इक्षुमूलं तथा विसम् । दूर्घाक्षीरघृतैर्मण्डः सिद्धोऽयं मासिकः परः नरं शस्त्रहतं प्राप्तो न तस्य मरणं भवेत् । कल्माषवेणुना तत्र जनयेत्तु विभावसुम् ॥ गृहे त्रिरपसव्यन्तु क्रियते यत्रपार्थिव! । नान्योऽग्निचलते तत्र नात्र कार्याविचारणा कार्पासस्था भुजङ्गस्य तेन निर्मोचनं भवेत् । सर्पनिर्वासने धूपः प्रशस्तः सततं गृहे ॥६॥ सामुद्रसैन्धवयवा विद्युद्दग्धा च मृत्तिका । तयानुलिप्तं यद्वेश्म नाग्निना दह्यते नृप! दिया व दुर्गे रक्ष्योऽग्निर्वाति पाते विशेषतः । विपाञ्च रक्ष्योनृपतिस्तत्रयुक्तिनियोधमे क्रीड़ानिमित्तं नृपति रियेन्मृगपक्षिणः । अन्नं वै प्राक् परीक्षेत यही चान्यतरेषु च ॥ पस्त्रपुष्पमलङ्कारं भोजनाच्छादन तथा । नापरीक्षितपूर्वन्तु स्पृशेदपि महामतिः ॥१०॥ स्याचासो घक्त्रसन्तप्त. सोद्वेगञ्च निरीक्षते । विपदोऽथ विषं दत्तं यश्च तत्र परीक्षते॥ सस्तोत्तरीयो विमनाः स्तम्भकुड्यादिभिस्तथा । प्रच्छादयति वात्मानं लज्जते त्वरते तथा ॥ १२॥ भुवं चिलिखति ग्रीयां तथा चालयते नृप!। कण्डूयति च मूर्द्धानं परिलोड्याननन्तथा क्रियासु त्यरितो राजन् ! विपरीतास्वपि ध्रुघम् ।
। ऽध्यायः] * राजधर्मवर्णनम् । एचमादीनि चिह्नानि विपदस्य परीक्षयेत् ॥ १४ ॥ समीपविक्षिपदही तदन्नं त्यरयान्वितैः । इन्द्रायुधसवर्णन्तु रूक्षं स्फोटसमन्धितम् ॥१५ एकाचर्तन्तु दुर्गन्धि भृशघटवटायते । तद्भूमसेवनाजन्तोः शिरोरोगश्च जायते ॥१६॥ सविपेऽऽन्ने विलीयन्ते नव पार्थिव ! मक्षिकाः । निलीनाश्च विपद्यन्ते संस्पृप्टे सविपे तया ॥ १७ ॥ विरज्यति चकोरस्य दृष्टिःपार्थिवसत्तम। विकृतिञ्च स्वरो याति कोकिलस्यतथानृप! गतिस्पलति हंसस्य भृङ्गराजश्च कूजति । क्रौञ्चो मदमथाभ्येति ककवाकुपिरोति च ॥ विकाशतिशुकोराजन् !सारिफायमतेततः । चामीकरोऽन्यतोयातिमृत्युंकारण्डवस्तथा मेहते धानरो राजन् ! ग्लायते जीवजीवकः । द्रुष्टरोमा भवेद्वभुः पृपतश्चैव रोदिति ।। हर्षमायाति च शिसो विपसन्दर्शनान्नुप!! अन्नञ्च सविपं राजंश्चिरेण च विपद्यते तदा मपति निश्राव्यं पक्षपपुंक्तिोपमम् । व्यापनरसगन्ध चन्द्रिकाभिस्तया युतम् ॥ २३॥ व्यञ्जनानान्तु शुष्कत्वं द्रयाणां बुबुदोदयः । ससैन्धवानां द्रव्याणांजायतेफेनमालिता सस्यराजिश्च ताना स्यात् नीला च पयसस्तथा । फोकिलामा च मद्यस्य तोयस्य च नृपोत्तम ! ॥२५॥ धान्याहस्य तथा कृष्णा फपिला फोद्रयस्य च । मधुश्यामा च तस्य नीला पीता तथैव च ॥ २६ ॥ गुतस्योदफसङ्काशा फपोतामा च सत्तनुः । हरिता माक्षिकस्यापि तैलस्यच नथारुणा फलानामप्यपकानां पाक क्षिर्म प्रजायते । प्रकोपश्चैव पकानां माल्यानां मानता तथा मृदुता फटिनानां स्यात् मृहूनाश विपर्ययः । सत्मागां रूपदलनं तथा यातिरङ्गता । श्याममण्डलता चय पत्राणां घे तपैपच । लोहानाच मणीनाच मलपदोपदिग्धता ॥ अनुलेपनगन्धानां माल्यानाश नृशोनम । विगन्यता च विशेशालय राजन जलस्य नु दन्तकाप्टत्यवः श्यामास्तनुसत्यास्तथैव च । एयमादीनि विनानि पिरोयानि नृपोत्तम! तस्माद्राजा सदा तिष्टत् मणिमपियांगणः ।
* मत्स्यपुराणम् * [ऊनर्षिशत्यधिकदिशततमो उक्तः संरक्षितो राजा प्रमादपरिवर्जकः ॥ ३३॥ प्रजातरोमूलमिहावनीशस्तद्रक्षणाद्राष्ट्रमुपैति वृद्धिम् । तस्मात्प्रयत्नेन नृपस्य रक्षा सर्वेण कार्या रविवंशचन्द्र ! ॥ ३४ ॥ इतिश्रीमत्स्यपुराणे मनुमत्स्यसवादेराजधर्मवर्णनं नामाप्टादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ऊनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः राजधर्मवर्णनम् । मत्स्य उवाच। राजन् । पुत्रस्य रक्षा च कर्तव्या पृथिवीक्षिता । आचार्यश्चात्र कर्तव्यो नित्ययुक्तश्च रक्षिभिः ॥ १॥ धर्मकामार्थशास्त्राणि धनुर्वेदश्च शिक्षयेत् । रथे च कुअरे चैनं व्यायामकारयेत्सदा ।। शिल्पानि शिक्षयेच्चैनं नाप्तो मिथ्या प्रियं घदेत् । शरीररक्षाव्याजेन रक्षिणोऽस्य नियोजयेत् ॥ ३॥ नवास्य सङ्गो दातव्य कुद्धलुब्धावमानितः । तथा च विनयेदेन यथा यौवनगोवरे ॥ इन्द्रियैर्नापरष्येत सता मार्गात्सुदुर्गमात् । गुणाधानमशक्यन्तु यस्य कर्तुस्वभावय.॥ वन्धनं तस्य फर्तव्यं गुप्तदेशे सुखान्वितम् । अविनीतकुमारं हि फुलमाशु विशीर्यते । अधिकारेषु सर्वेषु विनीतं विनियोजयेत् । आदी स्वल्पे तत पश्चात्क्रमेणाथ महत्स्वपि मृगया पानमक्षांश्च घर्जयेत् पृथिवीपति । एतान्ये सेवमानास्तु विनष्टा. पृथिचीक्षित यहयो नरशार्दूल ! तेषां सड्वया न विद्यते । दिवा स्यापं क्षितीशस्तु पिशेपेणविवर्जयेत् पाक्पारुप्पं न फर्तव्यं दण्डपारुष्यमेव च । परोक्षनिन्दा च तथा पर्जनीया मदीक्षिता॥ अर्थस्य दूपणं राजा द्विपकारं घिवर्जयेत् । अर्थानां दूपण कं तथार्येषु च दूपणम् ॥११ प्राकाराणां समुच्छेदो दुर्गादीनामसलिया।
-- ऽध्यायः * राजधर्मवर्णनम् । अर्थानां दूषणं प्रोक्तं विप्रकीर्णत्वमेव च ॥ १२ ॥ अदेशकाले यदानमपात्रे दानमेव च । अर्थेषु दूपपां प्रोक्तमसत्कर्मप्रवर्तनम् ॥ १३॥ कामः क्रोधोमदोमानो लोभो हर्पस्तथैव च । एते घाः प्रयत्लेन सादरं पृथिवीक्षिता ॥ १४ ॥ एतेषां विजयं कृत्वा कार्यों भृत्यजयस्ततः । कृत्वा भृत्यजयं राजा पौरान जानपदान जयेत् ॥ १५ ॥ कृत्वा च विजयन्तेषां शत्रून् बाह्यांस्ततो जयेत् । वाह्यश्च विविधा ज्ञेयास्तुल्याभ्यन्तरकृत्रिमा ॥ १६ ॥ गुरपस्ते यथापूर्व तेषु यत्नपरो भवेत् । पितृपैतामहं मित्रममित्रञ्च तथा रिपोः ॥ १७॥ कृत्रिमञ्च महामाग ! मित्रं त्रिविधमुच्यते । तथापि च गुरु पूर्व भवेत्तत्रापि चागृतः ।। स्वाम्यमात्यो जनपदो दुर्ग दण्डस्तथैव च । कोशोमिञ्चधर्मज्ञ ! सप्ताहंराज्यमुच्यते सप्ताङ्गस्यापि राज्यस्य मूलस्वामी प्रकीर्तितः । तन्मूलत्वात्तथाङ्गानांसतुरक्ष्यः प्रयत्नतः पडङ्गरक्षा कर्तव्या तथा तेन प्रयतत ! अड्डेभ्यो यस्तथैकस्तु द्रोहमाचरतेऽल्पधीः ॥ चन्धस्तस्य तु फर्तव्यः शीघ्रमेव महीक्षिता । न राना मृदुना भाव्यं मृदुहि परिसूयते ।। न मान्यं दारुणेनातितीक्ष्णादुद्विजते जनः । काले मृदुर्गा भवति काले भवति दारुणः राजा लोकद्वयापेक्षी तस्य लोकद्वयं भवेत् । भृत्यैः सह महीपालः परिहासं विवर्जयेत् भृत्याः परिमपन्तीह नृपं हर्षपशङ्गतम् । व्यसनानि च सर्वाणि भूपतिः परिवर्जयेत् ।। लोकसंग्रहणार्थाय कृतफव्यसनी भवेत् । शोण्डीरस्य नरेन्द्रस्य नित्यमुद्रिक्तचेतसः ॥ जना विरागमायान्ति सदादुःसेव्यभाषतः । स्मितपूर्वाभिभापीस्यात्सर्वस्येवमहीपतिः यध्येयपि महामाग! मुफुटि न समाचरेत् । भाव्यधर्मभृतांश्रेष्ठ ! स्थूललक्ष्येणभूमुजा स्थूललक्ष्यरूप पशगा सर्वामयति मेदिनी । मदीर्घसूत्रश्च भवेत् सर्वकर्मसु पार्थिवः ॥ दीर्घसूत्रस्य नृपतेः कर्महानि पम्मवेत् । राणे दपै च माने च दोहे पाऐ च फर्मणि ॥ अप्रिये चैच फर्तव्ये दीर्घसूत्रः प्रशस्यते । राशा संवृतमन्त्रेण सदा भाव्यं नृपोत्तम!" तस्यासंवृतमन्त्रस्य रामः सर्गपदो ध्रुधम् । एतान्येच तु कार्याणि प्रायन्ते यस्यभूपतेः * मत्स्यपुराणम् * {ऊनविंशत्यधिकद्विशततमो नारब्धानि महाभाग ! तस्य स्याद्वसुधावशे । मन्त्रमूलंसदाराज्यंतस्मान्मन्त्रः सुरक्षितः कर्तव्य पृथिवीपालमन्त्रभेदभयात्सदा । मन्त्रवित्साधितो मन्त्रः सम्पत्तीनांसुखावहः मन्त्रच्छलेन वहयो विनष्टाः पृथिवीक्षितः । आकारैरिशितैर्गत्या चेष्टया भापितेन च ॥ नेत्रवक्त्रविकारैश्च गृह्यतेऽन्तर्गतं मनः । नयस्य कुशलैस्तस्य घशे सर्वा वसुन्धरा ।। मवतीह महीपाले सदा पाथिवनन्दन ! । नेकस्तु मन्त्रयेन्मन्त्रं राजा न यहुभिः सह ।। नारोहेद्विपमा नावमपरीक्षितनाविकम् । ये चास्य भूमिजयिनो भवेयुः परिपन्थिनः तानानयेद्वशे सर्वान् सामादिभिरुपक्रमैः । यथा न स्यात् कशीभावः प्रजानामनवेक्षया तथा राज्ञा प्रकर्तव्यं स्वराष्ट्र परिरक्षता । मोहाद्राजा स्वराष्ट्रं यः कर्पयत्यनवेक्षया । सोऽचिराद् भ्रश्यते राज्याजीविताच सवान्धवः । भृतो धत्सो जातवलः कर्मयोग्यो यथा भवेत् ॥ ४१ ॥ तथा राष्ट्रं महाभाग ! भृतं कर्मसहम्भवेत् । यो राष्ट्रमनुगृह्णाति राज्यं स परिरक्षति ॥ सातमुपजीवेत्तु विन्दते स महत्फलम् । गृह्याद्धिरण्यं धान्यञ्च महीं राजासु रक्षिताम् महता तु प्रयत्नेन स्वराष्ट्रस्य च रक्षिता। नित्यं स्वेभ्यः परेभ्यश्च यथा माता यथा पिता ॥४४॥ गोपितानि सदा कुर्यात् संयतानीन्द्रियाणि च । अजस्रमुपयोक्तव्यं फलन्तेभ्यस्तथैव च ॥ ४५ ॥ सर्व कर्मेदमायत्तं विधाने देवमानुषे । तयोर्देवमचिन्त्यश्च पौरुषे विद्यते क्रिया ॥४६॥ एवं महीं पालयतोऽस्य भर्तलोंकानुरागः परमो भवेत्तु । लोकानुरागप्रमचा च लक्ष्मीलक्ष्मीवतश्चापि पराच लक्ष्मी. १४७ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे मनुमत्स्यसंवादे राजधर्मवर्णनं नामो- नविशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।
विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः देवे पुरुषकारे च कि ज्याय्य इति मनुप्रश्ने मत्स्योत्तरम् । मनुरुवाच। देवे पुरुषकारे व किं ज्यायस्तरीहि मे ! अत्र मे संशयो देव! च्छेतुमर्हस्यशेषतः मत्स्य उवाच। - स्वमेव कर्म देघाप्यं विद्धि देहान्तरार्जितम् । तस्मात्पीरुपमेवेह श्रेष्ठमाहुर्मनीषिणः ॥२ प्रतिफलन्तथा देयं पौरपेण विहन्यते । मङ्गलाचारयुक्तानां नित्यमुत्थानशालिनाम् ।। येयां पूर्वकृतं कर्म सात्विकं मनुजोत्तम ! पौरुषेण विना तेयां केपाश्चिदृश्यते फलम् फर्मणा प्राप्यते लोके राजसस्य तथा फलम् । कृच्छ पा कर्मणा विद्धि तामतस्य तथा फलम् ॥ ५॥ पौरुपेणाप्यते राजन् ! प्रार्थितव्यं फलं नरैः । देवमेव विजानन्ति नराः पौरुपवर्जिताः तस्मात्रिकालं संयुक्तं दधन्तु सफलंभवेत् । पौरुपं देवसम्पत्त्या फाले फलतिपार्थिय! देवं पुरुषकारश्च फालश्च पुरषोत्तम! प्रयमेतन्मनुप्यस्य पिण्डितस्यात् फलायहम् ॥ कृष्टिटिसमा योगा दृश्यन्ते फलसिद्धयः । तास्नु फाले प्रदृश्यन्ते नेवाकाले फयमन तस्मात्सदेय कर्तव्यं सधर्म परिवं नरः । विपत्तायपि यस्येह परलोके ध्रुवं फलम् ॥ नालसाः प्राप्नुपन्त्यर्यान् न च देवपरायणा.। तस्मात्सर्यप्रयत्नेन आवरेधर्ममुत्तमम् त्ययाऽलसान् देघपरान् मनुष्यानुत्यानयुक्तान् पुरुषान् हि लक्ष्मीः । अन्विष्य यवाद् वृणुयानृपेन्द्र ! तस्मात्सदोल्यानवता हि भाव्यम् ॥१२॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे राजधर्मवर्णने पुरुषार्थप्राधान्यपर्णनं नाम विशत्यधिफद्विशततमोऽध्यायः।
एकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः राजधर्मवर्णने सामप्रयोगवर्णनम् । मनुरुवाच। उपायांस्त्वं समाचक्ष्व सामपूर्वान् महाद्युते ।। लक्षणञ्च तथा तेषां प्रयोगश्च सुरोत्तम! मत्स्य उवाच। सामभेदस्तथा दानदण्डञ्च मनुजेश्वर ।। उपेक्षा व तथा माया इन्द्रजालश्च पार्थिव/२॥ प्रयोगा. कथिता सप्त तन्मे निगदत शृणु । द्विविध कथितं साम तथ्यश्चातथ्यमेव च तत्राप्यतथ्यं साधूनामाकोशायव जायते । तत्र साधु प्रयत्नेन सामसाध्यो नरोत्तम ॥ महाकुलीना ऋजयोधर्मनित्याजितेन्द्रिया । सामसान्या नचातथ्यन्तेपुसामप्रयोजयेत् तथ्यं साम च कर्तव्यं कुलशीलादि वर्णनम् । तथा तदुपचाराणां कृतानाञ्चैव वर्णनम् । अनयच तथा युक्त्या कृतज्ञाख्यापन स्वकम् । एव साम्ना व कर्तव्या घशगा धर्मतत्पराः साम्ना यद्यपि रक्षासि गृह्णन्तीति परा श्रुति । तथाप्येतदसाधूनां प्रयुक्तं नोपकारकम् ॥ ८॥ अतिशङ्कितमित्येव पुरुष सामवादिनम् । असाधवो विजानन्ति तस्मात्ततेषु घर्जयेत् ॥ ये शुद्धवशा ऋजय प्रणीता धर्मे स्थिता सत्यपरा विनीता । ते सामसाध्या पुरुषा प्रदिष्टा मानोन्नता ये सततश्च राजन् ॥१०॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे मनुमत्स्यसवादे राजधर्मवर्णने सामप्रयोगव नाम- कविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय । - द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः राजधर्मवर्णने भेदप्रयोगवर्णनम् । मत्स्य उवाच। । परस्परन्तु ये दुष्टाः क्रुद्धा भोतावमानिताः । तेषां भेदं प्रयुक्षीत भेदसाध्या हि ते मताः ये तु येनैव दोघेण परस्मानापि विभ्यति । ते तु तद्दोपपातेन भेदनीया भृशन्ततः ॥२॥ आत्मीयां दर्शयेदाशां परस्माद्दर्शयद्वयम् । एवं हि भेदयेदिनान् यथावद्वशमानयेत् ॥३॥ संहितानि विना भेदं शक्रेणापि सुटु.सहाः । भेटमेव प्रशंसन्ति तस्मान्नयविशारदाः ।। स्वमुखेनाश्रयेद्वेदम्भेदम्परमुखेन च । परीक्ष्य साधु मन्येत भेदं परमुखाच्छ तम् ॥५॥ सद्यः खकार्यमुद्दिश्य कुशल्यहि भेदिताः । भेदितास्ते विनिर्दिष्टा नैव राज्ञार्थवादिभिः अन्त.कोपो बहिःकोपो यत्र स्यातां महीक्षिताम् । अन्तः कोपो महांस्तक नाशकः पृथिवीक्षिताम् ॥ ७ ॥ साम्ना न फोपोवाह्यस्तु कोपः प्रोक्तो महीभृत । महिपीयुचराजभ्यां तथासेनापते प अमात्यमन्त्रिणाञ्चैव राजपुत्रेतथैवच । अन्तः कोपो विनिर्दिष्टो दारुण पृथिवीक्षिताम् बाह्यकोपे समुत्पन्ने सुमहत्यपि पार्थिवः । शुद्धान्तस्तु महाभाग ! शीघ्रमेव जयी भवेत् अपि शम्समो राजाअन्त कोपेन नश्यति । सोऽन्त.कोपःप्रयत्नेन तस्माद्रक्ष्योभहीभृता परतः कोपमुत्पाद्य भेदेन विजिगीषुणा मातीना भेदन कार्य परेषा विजिगीषुणा ॥ रत्यञ्चय प्रयत्नेन ज्ञातिभेदस्तधात्मन. । हातयः परितप्यन्ते सतत परितापिता. ॥१३ तथापि तेपा फर्तव्यं मुगम्भीरेण चेतसा । ग्रहणं दानमानाभ्या भेदम्तेभ्यो भयङ्करः ।। न शातिमनुगृहन्ति न शाति चे श्वसन्ति च । शातिभिर्मेदनीयास्तु रिपघस्ते न पार्थिवः भिन्ना हि शक्या रिपधः प्रभूताः स्वल्पेन सैन्येन निहन्तुमाजी । सुसंहतानां हि तदस्तु भेदः फार्यो रिपूणां नपशास्त्रविधिः ११६ ॥ इतिश्रीमत्स्यपुराणे राजधर्मवर्णने भेदप्रयोगवर्णनंनाम द्वाविशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ---- त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः राजधर्मवर्णने दानप्रयोगवर्णनम् । मत्स्य उवाच। सर्वेषामप्युपायानां दानं श्रेष्ठतमं मतम् । सुदत्तेनेह भवति दानेनोमयलोकजित् ॥ १ ॥ न सोऽस्ति राजन् । दानेनवशगो यो न जायते । दानेन वशगादेवाभवन्तीहसदानृणाम् दानमेवोपजीवन्ति प्रजा सर्वा नृपोत्तम । प्रियो हि दानवान् लोके सर्वस्यैवोपजायते दानवानचिरेपौव तथा राजा परान् जयेत् । दानवानेव शनोति संहतान भेदितुं परान् । यद्यप्यलुब्धगम्भीराः पुरुषाः सागरोपमा । न गृह्णन्ति तथाप्येते जायन्ते पक्षपातिनः । अन्यत्रापि कृतं दानं करोत्यन्यान्यथा पशे । उपायेभ्य. प्रशसन्ति दानं श्रेष्ठतमं जनाः दान श्रेष्ठतमं पुंसा दानं श्रेष्ठतमं परम् । दानवानेच लोकेषु पुत्रत्वे धियते सदा ॥७॥ न केवल दानपरा जयन्ति भूलोकमेक पुरुषप्रवीराः। जयन्ति ते राजसुरेन्द्रलोक सुदुर्जयं यो विबुधाधिवास ॥८॥ इतिश्रीमत्स्यपुराणे मनुमत्स्यसंवादे राजधर्मवर्णने दानप्रयोगवर्णनं नाम त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः । चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः राजधर्मवर्णने दण्डोपायवर्णनम् । मत्स्य उवाच। न शक्या ये वशे कर्तुमुपायत्रितयेन तु । दण्डेन तान् घशीवुर्यात् दण्डो हि घशरन्नृणाम् ॥ १॥ सम्यक् प्रणयनं तस्य तथा फायं महीक्षिता । धर्मशास्त्रानुसारेण स सदायेन धीमना ऽध्यायः] राजघर्मवर्णने दण्डोपायवर्णनम् . तस्य सम्यक् प्रणयनं यथाकार्यमहीक्षिता । पानप्रस्थाश्च धर्मज्ञान्निर्ममान्निप्परिग्रहान् स्वदेशे परदेशेचा धर्मशास्त्रविशारदान् । समीक्ष्य प्रणयेद्दण्डं सर्व दण्डे प्रतिष्ठितम् ।। आश्रमी यदि चा धणी पूज्यो घाऽथ गुमहान् । नादण्ड्यो नाम राज्ञोऽस्ति यः स्वधर्मेण तिष्ठति ॥५॥ अदण्ड्यान् दण्डयेद्राजा दण्ड्यांश्चैवाप्यदण्डयन् । इह राज्यात्परिम्रप्टो नरपञ्च प्रपद्यते तस्माद्राशा यिनीतेन धर्मशास्त्रानुसारतः । दण्डप्रणयनं कार्य लोकानुग्रहकाम्यया ॥७ यन श्यामो लोहिताक्षोदण्डश्वरति निर्भय । प्रजास्तत्र न मुह्यन्ति नेता चेत्साधुपश्यति चालवृद्धातुरयतिद्विजस्त्रीविधवायत । मात्स्यन्यायेन भक्ष्येरन् यदि दण्डं न पातयेत् । देवदैत्योरगगणा सर्व भूतपतविण' । उत्कामयेयुर्मयांदां यदि दण्डं न पातयेत् ॥१०॥ एप ब्रह्माभिशापेषु सर्वप्रहरणेषु च । सर्वविक्रमकोपेषु व्यवसाये व तिष्ठति ॥ ११ ॥ पूज्यन्ते दण्डिनो देन पूज्यन्ते त्वदण्डिन न ब्रह्माणं विधातारं न पूषार्यमणावपि यजन्ते मानवा. केचित् प्रशान्ताः सर्वकर्मसु । रुद्रमग्निश्च शरमञ्च सूर्याचन्द्रमसो तथा विष्णुं देवगणांश्चान्यान् दण्डिनः पूजयन्ति च । दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एपाभिरक्षति ॥१४॥ दण्डः सुभेपु जागति दण्डं धर्म विदुधाः । राजदण्डमयादेव पापाः पाप न पुर्यते ॥ यमदण्डभयादेके परस्परमयादपि । एवं सांसिद्धिके लोके सवं दण्डे प्रतिष्ठितम् ॥१६॥ अन्धे तमसि मन्जेयुर्यदि दण्डं न पातयेत् । यम्माद्दण्डो दमयति अदपट्यान्दमयत्यपि दमनाद्दण्डनाच तस्माद्दण्ड पिदुधा. ॥ १७ ॥ दण्डस्य भीतैत्रिदशै समेतमांगोधृत शलघरम्य यो। दत्तं फुमारे ध्वजिनीपतित्यं परं शिानाञ्च भयानुयलस्य ॥१८॥ इति धीमत्स्यपुराणे मनुमन्स्यसंपादे राजधर्मपर्णने दण्डोपायघर्णनं नाम चतुर्यिशत्यधिकदिशततमोऽध्यायः ।
पञ्चविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः राजधर्मवर्णने राज्ञो देवसाम्यत्ववर्णनम् । मत्स्य उवाच। दण्डप्रणयनार्थाय राजा सृष्टः स्वयम्भुवा । देवभागानुपादाय सर्वभूतादिगुप्तये ॥ १ ॥ तेजसा यदमु कश्चिन्नैव शनोति पीक्षितुम् । ततो भवति लोकेषु राजाभास्करवत्प्रभु. यदास्य दर्शने लोक. प्रसादमुपगच्छति । नयनानन्दकारित्वात्तदा भवति चन्द्रमाः ॥ यथा यमः प्रियद्वेप्येप्राप्ते फालेप्रयच्छति । तथा राज्ञा विधातव्या प्रजास्तद्धि यमव्रतम् परुणेन यथा पाशैर्वद्धएव प्रदृश्यते । तथा पापान्निगृहोयाद् व्रतमेतद्धि पारुणम् ॥५॥ परिपूर्ण यथा चन्द्रं दृष्ट्वा हृष्यति मानव । तथा प्रकृतयो यस्मिन् स चन्द्रप्रतिमो नृप प्रतापयुक्तस्तेजस्वी नित्यस्यात्सर्वकर्मसु । दुष्टसामन्तहिंस्रषु राजाग्नेयवतेस्थितः ॥ यथा सर्वाणि भूतानि विम्रतः पार्थिवं मतम् । इन्द्रस्यार्कस्य घातस्य यमस्य परणस्य च ॥ ८॥ चन्द्रस्याग्ने पृथिव्याधतेजोव्रतं नृपश्चरेत् । धार्षिकाश्चतुरो मासान् यथेन्द्रोप्यथवर्षति तथाभिधत्स्वराज्यकाममिन्द्रवतस्मृतम् । अष्टोमासान्यथादित्यस्तोयंहरतिरश्मिभि. तथा हरेत्करं राष्ट्रान्नित्यकर्मप्रतं हि तत्॥ १० ॥ प्रविश्य सर्वभूतानि यथा चरति मारत. । तथा चारैः प्रवेष्टव्यं व्रतमेतद्धि मास्तम् ॥११ इति श्रीमत्स्यपुराणे मनुमत्स्यसंवादे राजधर्मवर्णने राश. देवसाम्यायवर्णनं नाम पञ्चविंशत्यधिफद्विशततमोऽध्याय.। पड्विंशत्यधिकदिशततमोऽध्यायः राजधर्मवर्णने दण्डविधानवर्णनम् । मत्स्य उपाचा निक्षेप्यस्य समं मूल्यं दण्ड निक्षेपमुफ्तथा । परमादिफ्समस्तस्य तदा धर्मोन दीयते | ऽध्यायः] * दण्डविधानवर्णनम् ॥ यो निक्षेप नार्पयति यश्चानिक्षेप्य याचते । तावुभौ चोरपच्छास्यो दाप्यो या द्विगुणन्धनम् ॥२॥ उपधाभिश्च यः कश्चित्परद्रव्यं हरेश्वरः । स सहायः स हन्तव्यः प्रकामं विविधैर्वधः यो याचितं समादाय न तद्दद्याद्यथाक्रमम् । स निगृह्य बलादाप्यो दण्ड्यो पा पूर्वसाहसम् ॥ ४ ॥ अज्ञानादि चा कुर्यात्परद्रव्यस्य विक्रयम् । निर्दोपो ज्ञानपूर्वन्तु चोरवद्वधमर्हति ॥५॥ मूत्यमादाय यो विद्यां शिल्पं घा न प्रयच्छति। दण्ड्यः समूल्यं सकलं धर्मज्ञेन महीक्षिता ॥६॥ द्विजमोज्ये तु सम्माते प्रतिवेश्ममभोजयन् । हिरण्यमापकं दड्यः पापे नास्ति व्यतिक्रमः आमन्त्रितो द्विजो यस्तु धर्तमानश्च स्वे गृहे । निष्कारणं न गच्छेद्यः सदाप्योऽष्टशतं दमम् ॥ ८॥ प्रतिश्रुत्याप्रदातारं सुपर्ण दण्डयेन्नृपः। भृत्यश्चाज्ञां न कुर्यायो दोत्कर्म यथोदितम् सदण्ड्य कृष्णलान्यष्टौ न देवश्चास्यवेतनम् । संगृहीतं न दद्याद्यः काले चेतनमेव च ॥ अकाले तु त्यजेद् भृत्यं दण्ड्यास्याच्छतमेव च । यो ग्रामदेशसस्यानां कृत्वा सत्येन सम्बिदम् ॥ ११ ॥ विसम्बदेनरो लोभात् तं राष्ट्राद्विप्रवासयेत् । क्रीत्वा विक्रयवान् किञ्चित् यस्येहानुशयो भवेत् ॥ १२ ॥ सोऽन्तर्दशाहात्तत्साम्यन्दद्याञ्चैषाददीत पा । परेण तु दशाहस्य न दद्यान्नैव दापयेत् ।। आददन्यिददंश्चैध राज्ञादण्ड्य शतानि षट् । यस्तु दोपवती कन्यामनाख्याय प्रयच्छति तस्य कुर्यान्नृपो दण्डस्वयं पण्णपति पणान् । अकन्यैवेतियः कन्यां घूयाद्दोपेणमानवः स शतं प्राप्नुयाइण्डं तस्या दोषमदर्शयन् । यस्त्वन्यां दर्शयित्वान्यां चोदुः कन्यां प्रयच्छति ॥ १६ ॥ उत्तमन्तस्य कुर्षीत राजा दण्डं तु साहसम् । घरोदोपाननाख्याय यः कन्यां परयेदिहा दत्ताप्यदत्ता सा तस्य राज्ञादड्यः शतद्वयम् । प्रदायकन्यायोऽन्यस्मैपुनस्तांसंप्रयच्छति * मत्स्यपुराणम् * [पड्विंशत्यधिकद्विशततमो दण्डः कार्यों नरेन्द्रेण तस्याप्युत्तमसाहसः। तत्प्रकारेण मा चाचा युक्तं पण्यमसंशयम् लुब्धोह्यन्यत्र विक्रेतापट्शतं दण्डमर्हति । दुहितुः शुक्लविक्रेता सत्यङ्कारात्तुसन्त्यजेत् द्विगुणं दण्डयेदेन मिति धर्मो व्यवस्थितः । मूल्यैकदेशं दत्वा तु यदि क्रेता धनन्त्यजेत् स दण्ड्यो मध्यमं दण्ड तस्य पण्यस्य मोक्षणम् । दुह्याद्धेनुञ्च यः पालो गृहीत्वा भक्तवेतनम् ॥ २२ ॥ सतु दण्ड्यः शतं राज्ञा सुपर्णश्चाप्यरक्षिता । दण्डं दत्वा तु विरमेत्स्वामित कृतलक्षणः बद्धः कार्णायसः पाशैस्तस्यकर्म करोभवेत् । धनुः शतपरीणाहो ग्रामस्य तु समन्ततः द्विगुणं त्रिगुणं वापि नगरस्य तु कल्पयेत् । वृत्तिं तत्र प्रकुर्वीत यामुष्टो नावलोकयेत्। छिद्रं घा घारयेत्सर्व श्वसूकरमुखानुगम् । यत्रापरिकृतं धान्यं विहिंस्युः पशवो यदि॥ न तत्र कारयेद्दण्डं नृपतिः पशुरक्षिणे । अनिर्दशाहाद्गां सूतां वृपं देवपशुं तथा ॥ २७ ।। छिदंचा धारयेत्सर्व न दण्डया मनुरप्रवीत् । अतोऽन्यथा विनष्टस्य दशांशं दण्डमर्हति पाल्यस्य पालकस्वामी विनाशे क्षत्रियस्य तु । भक्षयित्वोपविएस्तु द्विगुणं दण्डमर्हति विशं दण्ड्याइशगुणं विनाशे क्षत्रियस्यतु । गृहं तडागमाराम क्षेत्रं पापि समाहरन् । शतानि पञ्चदण्डःस्यादज्ञानाद् द्विशतोदमः । सीमावन्धनकाले तु सीमान्तं यो हि कारयेत् ॥ ३१॥ तेषां संज्ञां ददानस्तु जिह्वाच्छेदनमाप्नुयात्। मथैनामपियो दद्यात्संविदंवाधिगच्छति उत्तमं साहसं दड्य इति स्वायम्भुवोऽब्रवीत् । वर्णानामानुपूर्येण त्रयाणामविशेषतः अकार्यकारिणः सर्वान् प्रायश्चित्तानि कारयेत् । असत्येन प्रमाप्य स्त्रीशूद्रहत्याव्रतंवरेत् दानेन च धनेनैकं सादीनामशक्नुवन् । एकैकं स चरेत्कृच्छ द्विजः पापापनुत्तये ॥ फलदानाञ्च वृक्षाणां छेदने जप्यमृक्शतम् । गुल्मवल्ली लतानाञ्च पुष्पितानाञ्चवीरधाम् अस्थिमताञ्च सत्यानां सहस्रस्य प्रमापणे । पूर्णवानस्य घस्थातुं शूद्रहत्या व्रतञ्चरेत् ॥ किश्चिद्देयञ्च विप्राय दद्यादस्थिमतां पधे । अनस्न्याश्चैवहिंसायां प्राणायामै विशुध्यति अनादिजानां सत्याना रसजानाञ्च सर्वशः । फलपुप्पोद्गतानाञ्च घृतप्राशो पिशोधनम् कृष्टानामोपधीनाञ्च जातानाच स्वयं बने । वृथाच्छेदेन गच्छेत दिनमेकं पयोवती ॥४.
ऽध्यायः] * दण्डविधानवर्णनम् * एतैर्वतरपोह्यं स्यादेनोहिंसा समुद्भवम् । स्तेयकत्रपहर्तृणां धूयतां व्रतमुत्तमम् ॥४१॥ धान्यान्न धनचौर्याणि कृत्वा काम द्विजोत्तमः । सजातीयगृहादेव कृच्छ्रार्द्धन विशुध्यति ॥ ४२ ॥ मनुष्याणान्तु हरणे स्त्रोणां क्षेत्रगृहस्य तु कूपवापीजलानान्तु शुद्धिश्चान्द्रायणंस्मृतम् द्रव्याणामल्पसाराणां स्तेयं कृत्वान्ययेश्मतः । चरेत्सान्तपनं कृच्छ्रन्तन्निर्यात्य विशुद्धये ॥ १४ ॥ भक्ष्यभोज्यापहरणे यानशय्यासनस्य तु । पुष्पमूलफलानान्तुपञ्चगव्यंधिशोधनम् ॥४५ तृणकाष्ठगुमाणान्तु शुष्कान्नस्य गुडस्य च । चैलचर्मामिपाणान्तु निरात्रं स्यादभोजनम् ।। १६ ॥ मणिमुक्ताप्रवालाना ताम्रस्य रजतस्यच । अय:कांस्योपलानाञ्च द्वादशाहं कणान्नभुक् कार्पासकीटवर्णानां द्विशफैकशफस्य व । पक्षिगन्धीपधीनाञ्च रज्वाश्चैव व्यहं पयः॥ पतैव्रतैरपोहन्ति पापं स्तेयकृतं द्विज. । अगम्यागमनीयन्तु व्रतैरभिरपानुदेन् ॥ ४६॥ गुरुतल्पवतं कुर्याद्रेतः सिक्त्वा स्वयोनिषु । सख्युः पुत्रस्य च स्त्रीषु कुमारीष्यंत्यजासु च ॥ ५० ॥ पितृष्वत्रीयभगिनी स्वस्रीयां मातुरेव च । मातुश्च भ्रातुरा याङ्गत्वा चान्द्रायणं चरेत् एतास्त्रियस्तु भाथै नोपगच्छेत्तु बुद्धिमान् । शातीश्च मातुलेयास्ते पतिता उपयन्ति ये ॥५२॥ अमानुपीपु पुरुषो उक्यायामयोनियु । रेतःसित्त्वा जले चैव कृच्छ्र सान्तपनं चरेत्।। मैथुनच समालोर पुंसियोपिति वा द्विजः । गोयानेऽप्सुदिपावैवसवासालानमचरेत् चाण्डालान्त्यस्त्रियो गत्वा भुक्त्वा च प्रतिगृह्य च । पतत्यज्ञानतो विप्रो ज्ञानात्साम्यन्तु गच्छति ।। विप्रदुष्टां स्त्रियं भर्ता निरन्ध्यादेकवेश्मनि । यत्पुंसः परदारेषु तचनाञ्चारयेव्रतम् ॥ सा चेत्पुनः प्रदुष्येत्तु सदृशेनोपमन्त्रिता । रुच्चान्द्रायपश्चैव तत्तस्याः पावनं स्मृतम् ॥ ५ ॥ ॥
* मत्स्यपुराणम् * [पड्विशत्यधिकद्विशततमो य करोत्येकरात्रेण वृपलीसेवनं द्विज । तदेकभुक् जपेन्नित्य त्रिमिय॑पोहति ।। एपा पापस्तामुक्ता चतुर्णामपि निष्कृति । पतिते सप्रयुक्तानामिमा शृणुत निष्कृतिम् सवत्सरेण पतति पतितेन समाचरन् । याजना नाध्यापनाचौनादनुयानाशनासनात् ६०। यो येन पतितेनेपा ससर्ग याति मानवः । स तस्यैव व्रत कुर्यात् तत्ससर्गविशुद्धये ॥ पतितस्योदक कार्य सपिण्डे र्यान्धवै सह । निन्दितेऽहनि सायाह्ने शातिभिर्गुरुसन्निधौ ॥ ६२ ॥ दासीघटमपा पूर्ण पर्यम्येत्प्रेतवत्सदा । अहोरात्रमुपासीरन नाशीच बान्धवै सह ॥ निपतयेरस्तस्मात्तु सम्भाषणसहासनम् । दायादस्य प्रमाण यात्रामेचञ्चलौकिकीम् ज्येष्ठभावान्निवर्तेत ज्यष्ट्यावाप्त च च यत्पुन । ज्येष्ठाश प्राप्नुयाच्चास्य यो पा स्याद्गुणतोऽधिक ॥६५ ॥ स्थापिताञ्चापि मर्यादा ये भिन्यु पापकर्मिण । सर्वे पृथक् दण्डनीया राज्ञा प्रथमसाहसम् ॥ ६६ ॥ शत ब्राह्मणमाक्रुश्य क्षत्रियो दण्डमर्हति । वैश्यस्तु द्विशत राजन् । शूद्रस्तुव घमर्हति पञ्चाशद् ब्राह्मणो दण्ड्य क्षत्रियस्याभिशसने। वैश्यस्याप्यर्द्धपञ्चाशच्छूद्रे द्वादशको नम ॥ ६८॥ क्षत्रियस्याप्नुयाद्वैश्य साहस पुनरेव च । शूद्र क्षत्रियमाक्रुश्य जिह्वाच्छेदनमाप्नुयात् पञ्चाशत् क्षत्रियो दण्ड्यस्तथा वैश्याभिशसने । शूद्रे चैवार्द्धपञ्चाशत्तथा धर्मों न हीयते वैश्यस्याक्रोशने दण्ड्य शूद्रश्चोत्तमसाहसम् । शूद्राक्रोशे तथावैश्य शताद्धं दण्डमर्हति सवर्णाक्रोशने ड्यस्तथा द्वादशक स्मृतम् । पादेवपचनीयेषु तदेव द्विगुण भवेत् ॥ एकजातिद्विजातिन्तु घाचा दारुणया क्षिपन् । जिह्वाया प्राप्नुयाच्छेद जघन्य प्रथमो हि स ॥७३॥ नामजातिगृह तेषामभिद्रोहेण कुर्वत । निक्षेप्योऽयोमय शङ्कज्वलन्नास्ये दशाङ्गुल । धर्मोपदेश शूद्रस्तु द्विजानामभि कुर्वत । तप्तमासेचयेत् तैल पक्ने श्रोत्रेय पार्थिव ॥ श्रुतिदेशश्च जातिञ्च कर्म शारीरमेव च । यितथञ्च ब्रुवन् दण्ड्यो राजा द्विगुणसाहसम् है ऽध्यायः] * इण्डविधानवर्णनम् * यस्तु पातकसंयुक्त क्षिपेद्वर्णान्तरं नर । उत्तम साहसं दण्डः पात्यस्तस्मिन्यथाक्रमम् राज्ञो निवेशनियम वितथं यान्ति वै मिथः । सर्वे दिगुणदण्ड्यास्ते विप्रलम्भान्नुपस्य तु प्रीत्या मयास्याभिहित प्रमादेनाथ चा बदेत् । भूयो नवयं पश्यामि स तु दण्डाभाग भवेत् ॥ ७ ॥ काणं पाप्यथ वा खामन्धं वापि तथाविधम् । तथैवापि चन्दाप्यो दण्डं कापणं धनम् ॥८० ॥ मातरं पितरं ज्येष्ठ भ्रातर श्वशुरं गुरुम् । आक्रोशयन्शतं दण्ड्य पन्थानचार्थयन् गुरोः गुरुवर्यन्तु मार्गाह यो हि मागं न यच्छति । स दाप्य कृष्णलं रामस्तस्य पापस्य शान्तये ॥ ८२ ॥ एकजातिद्विजातिन्तु येनादेनापराध्नुयात् । तदेव च्छेदयेत्तस्य क्षिप्रमेधाविवारयन् ॥ अघनिष्ठीरतो दात् हाघोष्ठौच्छेदयेन्नृप । अघभूत्रयतोमेमपशब्दयतो गुदम् ॥८४] सहासनमभिप्रेप्सुरुत्कृष्टस्यापकृष्टज । कक्ष्या कृताङ्कोनिर्वास्य स्फिचवाप्यस्यफर्तयेत् केशेषु गृह्णतोहस्तं छेदयेदविवारयन् । पादयो न सिकायाञ्च ग्रीवाया वृपणेषु च ॥८६॥ स्वगभेदक शतं दण्ड्यो लोहितस्य व दर्शक । मासमेत्ता च पण्णिप्कान निर्यास्यस्त्वस्थिभेदक ॥ ८ ॥ अङ्गमङ्गकरस्याङ्गं तदेवापहरेन्नृप. ) दण्डपारध्यमद्दण्ड्यौ समुत्थानव्ययन्तथा ॥ ८॥ अर्द्धपादकर कार्यों गोगजाश्वोट्रघातक । पशुक्षुद्रमृगाणाञ्च हिंसाया द्विगुणो दम पञ्चाशञ्च भवेद्दण्ड्यस्तथैव मृगपक्षिषु । कृमिकीटेषु दण्ड्य स्याद्जतस्य च माषकम् ॥ तस्यानुरूपं मौल्यञ्च प्रदद्यात् स्वामिने तथा । स्वस्वामिकाना सफलं शेषाणा सकलं तथा ॥ ११ ॥ वृक्षन्तु सफलच्छित्या सुवर्ण दण्डमर्हति । द्विगुणं दण्डयेन्चैनं पथिसीम्नि जलाशये छेदनादफलस्यापि मध्यमं साहसं स्मृतम् । गुल्मवल्लीलतानाञ्च सुवर्णस्य च मापकम् वृथाच्छेदी तृणस्यापि दण्ड्य कार्यापणं भवेत् । त्रिभागं कृष्णला दण्ड्या प्राणिनस्ताडने तथा ॥ १४ ॥ - * मत्स्यपुराणम् * [षड्पिशत्यधिकद्विशततमो देशकालानुरूपेण मूल्यं राजा दुमादिषु । सत्स्वामिनस्तधा दण्ड्यादण्डमुक्तन्तुपार्थिय! यत्रातिवर्तते युग्यं वैगुण्यात्माजकस्यतु । तत्रस्वामीभवेद्दण्ड्योनाप्तश्चेत्माजकोभवेत् प्राजकश्च भवेदाप्तःप्राजको दण्डमर्हति । नास्ति दण्डश्न तस्यापि तथा व हेतुकल्पकः द्रव्याणि यो हरेद् यस्य जानतोऽजानतोऽपि धा। स तस्योत्पादयेत्तुष्टिं राज्ञो दद्यात्ततो दमम् ॥ १८ ॥ यस्तु रज्जु घटं कृपाद्धरेदिन्द्याच्च तां प्रपाम् । स दण्डं प्राप्नुयान्मापं तच्च सम्प्रतिपादयेत् ॥ ६ ॥ धान्यं दशभ्यः कुम्भेभ्यो हरतोऽभ्यधिकंचधः । शेपेऽप्येकादशगुणंतस्थदण्डंप्रकल्पयेत् तथा भक्ष्यानपनानां न तथाप्यधिके वधः । सुवर्णरजतादीनामुत्तमानाञ्च पाससाम् ।। पुरुषाणां कुलीनानां नारीणाञ्च विशेषतः । महापशूनां हरणे शस्त्राणामोषधस्य च ।। मुख्यानाञ्चैव रताना हरणे पधमर्हति । दध्नः क्षीरस्य तक्रस्य पानीयस्य रसस्य च ॥ वेणु वैदलभाण्डानां लवणानां तथैव च । मृण्मयानाञ्च सर्वेषां मृदो भस्मन एव च ।। कालमासाद्य कार्यश्च राजा दण्डं प्रकल्पयेत् । गोपु ब्राह्मणसंस्थासु महिपीषु तथैव च ॥ १०५ ॥ अश्वापहारकश्चैव सद्यः कार्योऽद्धंपादकः । सूत्रकासकिण्वानां गोमयस्यगुड़स्य व मत्स्यानां पक्षिणाञ्चैव तैलस्यवघृतस्यत्र । मांसस्यमधुनश्चैव यच्चान्यद्वस्तुसम्भवम् अन्येषां लवणादीनां मद्यानामोदनस्य च । पक्वान्नानाञ्च सर्वेपान्तन्मूल्याद् द्विगुणोदमः ॥ १०८ ॥ पुष्पेषु हरिते धान्ये गुल्मपल्लीलतासु च । अन्नेषु परिपूर्णेषु दण्डः स्यात्पञ्चमायकम् । परिपूर्णेषु धान्येषु शाकमूलफलेषु च ॥ १० ॥ निरन्वये शतं दण्ड्यः सान्वये द्विशतन्दमः । येन येन यथाङ्गेन स्तेनोऽन्येपु विचेष्टते ॥ तत्तदेव हरेत्तस्य प्रत्यादेशाय पार्थिवः । द्विजोऽध्यगः क्षीणवृत्तिविष द्वे च मूलके त्रपुसोर्वारुको द्वौ च तावन्मानं फलेषु च। तथाच सर्वधान्यानां मुष्टिग्राहेण पार्थिव ! शाके शाकप्रमाणेन गृह्यमाणेन दुष्यति । वानस्पत्यं फलं मूलं दार्वग्न्यर्थं तथैव च ।।
ऽध्यायः]
* दण्डविधानवर्णनम् *
तृणहोऽभ्यवहारार्थमस्तेयं मनुरप्रपीत् । अदेवघाटिनं पुष्पं देवतार्थ तथैव च ॥११४॥
आदानः परक्षेत्रात् न दण्ड दातुमर्हति ।
शृङ्गिणं नखिनं राजन् ! दंष्ट्रिणञ्च घधोद्यतम् ॥ १५॥
यो हन्यान्न स पापेन लिप्यते मनुजेश्वर! । गुरुंघा वालवृद्धं घा ब्राह्मणं धा बहुश्रुतम् ॥
आततायिनमायान्तं हन्यादेचाविचारयन् । आततायिवधे दोपो हन्तु भवति कश्चन ॥
प्रकाशं पाऽप्रकाशं वा मन्युस्तं मन्युमृच्छति ।
गृहक्षेत्राभिहारस्तथागम्याभिगामिनः ॥ ११८ ॥
अग्निदोगरदश्चैव तथा चाभ्युद्यतायुधः । अभिचारन्तु कुर्वाणो राजगामि च पैशुनम् ॥
एते हि कथिता लोके धर्मराततायिनः। परस्त्रीणान्तु सम्भाषे तीर्थेऽरण्ये गृहेऽपिवा
नदीनाञ्चैव सम्भेदैः स संग्रहणमाप्नुयात् । न सम्भाषेत्सहस्त्रीमि प्रतिपिद्ध समावरेत्।
प्रतिपिद्धे समाभाष्य सुवर्ण दण्डमर्हति । नैव चारणदारेपुविधिरात्मोपजीवियु ॥१२२
सजयन्ति मनुष्यस्ता निगूढं पाचरन्त्युत । किञ्चिदेवतुदाप्य स्यात्सम्मापेणापवारयन्
प्रेप्यासु चैव सर्वासु गृहप्रप्रजितासु च । योऽकामा दूपयेत्कन्यां स सद्यो वधमर्हति
सकामां दूपमाणस्तु प्राप्नुयाद्विशतं दमम् । यश्च संरक्षकस्तत्र पुस्प. स तथा भवेत्
पारदारिकचद्दण्ड्यो योऽपि स्यादवकाशद । वलात्सदूपयेद्यस्तु परभार्या नर क्वचित् ॥
पधो दण्डो भवेत्तस्य नापराधो भवेत्स्त्रिय.।
रजस्तृतीय या कन्या स्वगृहे प्रतिपद्यते ॥ १२७ ॥
अदण्ड्या सा भवेद्वाज्ञा परयन्ती पर्ति स्वयम् ।
स्वदेशे कन्यकान्दत्त्वा तामादाय तथा बजेत् ॥ १२८ ॥
परदेशे भवेद्वध्य. स्त्रीचोर. स यतो भवेत् । अद्रच्यां मृतपत्नीन्तु संगृह्णन्नापराध्यति
सदव्यां ता सग्रहीता दण्डन्तु क्षिप्रमर्हति। उत्कृष्टयाभजेत्कन्या देया तस्यैघसा भवेत्
यच्चान्यं सेवमानाञ्च संयता पासयेद्गृहे । जघन्यमुत्तमा नारी सेरमाना तथैव च ॥
भर्तारं लायेद्या स्त्री ज्ञातिभि लदर्पिता।
ताच निष्कासयेद्राजा संस्थाने बहुसंस्थिते ॥ १३२ ॥
६४८ * मत्स्यपुराणम् * [पविंशत्यधिकद्विशततमो हताधिकारी मलिनां पिण्डमात्रोपजीविनीम् । घासयेत् स्वैरिणी नित्यं सवर्णेनाभिदूषिताम् ॥ १३३ ॥ ज्यायसा दूपिता नारी मुण्डनं समवाप्नुयात् । पासश्चमलिनंनित्यंशिखांसंप्राप्नुयाद्दश ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः क्षत्रचिट्यूादयोपितः । ब्रह्मदाप्यो भवेद्राजादण्डमुत्तमसाहसम् वैश्यागमे व विप्रस्य क्षत्रियस्यान्त्यजागमे । मध्यमं प्रथमं वैश्योदण्ड्यःशूदागमाद्भवेत् शूद्रः सवर्णागमने शतं दण्ड्योमहीक्षिता । वैश्यस्तुद्विगुणराजन् ! क्षत्रस्तुत्रिगुणन्तथा ब्राह्मणश्च भवेद्दण्ज्यस्तथाराजश्चतुर्गुणम् । अगुप्तासुभवेद्दण्ड.स्थगुप्तास्वधिको भवेत् ॥ मातापितृष्वसावधूर्मातुलानी पितृव्यजा। पितृव्यसखिशिष्यत्री गर्भिणी तत्सखी तथा ॥ १३६ ॥ मातृभार्यागमे पूर्वाद् दण्डस्तु द्विगुणो भवेत् । चण्डालीञ्च श्वपाकीञ्च गच्छन् वधमवाप्नुयात् ॥ १४०॥ तिर्यग्योनिश्च गोवज्यं मैथुनं यो निपेवते । पपनं प्राप्नुयाद्दण्ड तस्याश्च यबसादिकम् सुवर्णश्च भवेद्दण्ड्यो गां प्रजन्मनुजोत्तम !। वेश्यागामी द्विजोदण्ड्यो वेश्याशुल्कसमम्पणम् ॥ १४२॥ गृहीत्वा वेतनं वेश्या लोभादन्यत्र गच्छति । चेतनं द्विगुणं दद्याद्दण्डञ्च द्विगुणं तथा अन्यमुद्दिश्ययोवेश्यांनयेदन्यस्यकारयेत् । तस्यदण्डोभवेद्राजन् ! सुवर्णस्थच मापकम् नीत्वा भोगान्न यो दद्याद्दाप्यो द्विगुणवेतनम् । राशश्च द्विगुणं दण्डस्तथा धर्मो न हीयते ॥ १४५॥ बहूनां बजतामेकां सर्वे ते द्विगुणन्दमम् । दधुः पृथक् पृथक् सर्वे दण्डञ्च द्विगुणं परम् ॥ १४६ ॥ न माता न पिता न स्त्री न ऋत्विग्याज्यमानवाः । अन्योन्यं पतितास्त्याज्या योगे दण्ड्याः शतानि षट् ॥ १४७ ॥ पतिता गुरवस्त्याज्या न तु माता कथञ्चन । गर्भधारणपोपाभ्यां तेन माता गरीयसी मधीयानोऽप्यनध्याये दण्ड्यः कार्यापणत्रयम् । अध्यापकश्चद्विगुणं तथाचारस्य लङ्घने ऽध्यायः] * दण्डविधानवर्णनम् * ६४६ अनुक्तस्य भवेद्दण्डःसुवर्णस्य च कृष्णलम् । भार्यापुत्रश्चदासश्चशिष्योभ्राताचसोदरः कृतापराधास्ताड्या स्यू रज्या येणुदलेन था । पृष्तस्तु शरीरस्य नोत्तमाझं कथञ्चन ॥ अतोऽन्यथा प्रहरत. प्राप्त.स्याच्चोरकिल्विपम् । दूती समाह्वयंश्चैवयोनिषिद्धसमाचरेत् आच्छन्नं वा प्रकाशं वा स दण्ड्य पाथिवेच्छया। घासांसि फलक श्लक्ष्णनिणिज्यादकः शनैः ॥ १५३ ।। अतोऽन्यथाहि कुवंस्तु दण्ड्यः स्याद्रुक्ममापकम् । रक्षास्वधितैश्चैवप्रदेययेविलुप्यते कर्षकेभ्योऽर्थमादाय यः कुर्यात्करमन्यथा । तस्य सर्वस्वमादाय तं राजा विप्रवासयेत् ये नियुक्ताः स्वकायपु हन्युः कार्याणि कार्यिणाम् । निपुणाः क्रूरमनसः सर्वे कर्मापराधिनः ॥ १५६ ॥ धनोष्मणा पच्यमानास्तालि स्वान्कारयेन्नृपः । कृटशासनकतश्चप्रवृत्तीनाञ्च दूपकान् स्त्रीबालबाह्मणांश्च पध्या द्विट्सेविनस्तथा । अमात्यः प्राविधाको पा यः कुर्यात्कार्यमन्यथा ॥ १५८ ॥ तस्य सर्वस्वमादाय तं राजा विप्रयासयेत् । ब्रह्मनश्च सुरापश्च तस्करो गुरुतल्पगः एतानसन्पृथहिस्यात्महापातकिनोनरान्। महापातकिनोवध्याब्राह्मणन्तुविवासयेत् कृतचिह्न स्वदेशाच्च शृणु चिह्राकृतिन्ततः । गुरतल्पे भग' कार्यः सुरापाने सुगध्वजः स्तेने तु श्वपदन्तब्रह्महण्यशिरा.पुमान् । असम्माप्याडसम्मोज्यासंघाह्याविशेषतः त्यकव्याश्चतथाराजन्! ज्ञातिसम्बन्धिवान्धवैः।महापातकिनोवित्तमादायनृपति स्वयम् अप्सुप्रवेशयेद्दण्डवरुणायोपपादयेत् । सहोदं न चिना चोरं घातयेद्धार्मिको नृपः ॥ सहोदं सोपकरणं घातयेदविवारयन् । ग्रामेष्वपि च ये केचिचोराणां भक्ष्यदायकाः ।। भाण्डावकाशदाश्चैव सर्यास्तानपिघातयेत् । राष्ट्रपु राज्ञाधिकृतासामन्ताश्चैवदूषकाः अभ्यघातेषु मध्यस्थाः क्षिप्रशास्यास्तु चोरघत् । ग्रामघाते मदाम पथिमोपाभिमर्दने शक्तितो नाभिधायन्तो निर्यास्याः सपरिच्छदाः । राज्ञः कोशापहतश्च प्रतिकूलेपु संस्थिताम् ॥ १६८ ॥ अरीणामुपजश्च धातयेविविधर्वधै। सन्धि कृत्या तु ये चौयं रात्रौकुर्वन्ति तस्करा:
* मत्स्यपुराणम् # [पड्विशत्यधिकद्विशततमो तेषां छित्वा नृपोहस्तौ तीक्ष्णशूले निवेशयेत् । तड़ागभेदकं हन्यादप्सु शुद्धपधेन तु यस्नु पूर्व निविष्टस्यात्तड़ागस्योदकं हरेत् । आगमञ्चाप्यपाभिन्द्यात्सदाप्यापूर्वशासनम् कोष्टागारायुधागारदेवागारविभेदकान् । पापान पापसमाचारान् घातयेच्छीघ्रमेव च ॥ समुत्सृजेद्राजमार्गे यस्त्वमेध्यमनापदि । स हि कापणं दण्ड्यस्तत्त्वमेध्यञ्चशोधयेत. अजङ्गमोऽथवा वृद्धो गर्भिणी बाल एव च । परिभाषणमर्हन्ति न च शोध्यमिति स्थितिः ॥ १७४ ॥ प्रथमं साहसं दण्ड्योयश्च मिथ्या चिकित्सते । परुषे मध्यमं दण्डमुत्तमञ्च तथोत्तमे ॥ छत्रस्य ध्वेजयष्टीनां प्रतिमानाञ्च भेदकाः । प्रतिकुर्युस्ततः सर्वे पञ्चदण्ड्याः शतानि च अदूपितानां द्रव्याणां दूषणे भेदने तथा । मणीनामपि भेदेन दण्ड्यः प्रथमसाहसम् ॥ समञ्च विषमञ्चैव कुरुते मूल्यतोऽपि घा। समाप्नुयात्स वै पूर्व दममध्यममेव च ॥ बन्धनानि च सर्वाणि राजमार्गेनिवेशयेत् । कर्पन्तो यत्र दिश्यन्ते विकृता-पापकारिणः प्राकारस्य च भेत्तारं परिखानाञ्च भेदकम् । द्वाराणां चैव भेत्तारं क्षिप्रं निर्वासयेत् पुरात् ॥ १८० ॥ मूलकाभिचारेषु कर्तव्यो द्विशतोदम । अवीजविक्रयी यश्च बीजोत्कर्षक एव च। मर्यादाभेदकश्चापि विकृतं यन्धमाप्नुयात् । सर्वसङ्करपापिष्ठं हेमकारं नराधिप ! ॥ अन्याये वर्तमानञ्च च्छेदयेल्लवशः क्षुरै । द्रव्यमादाय पणिजामनर्धेणावरुन्धताम् । द्रव्याणां दूपकोयस्तुप्रतिच्छन्नस्य विक्रयी। मध्यमं प्राप्नुयाद्दण्डं कूटक तथोत्तमम् राजा पृथक् पृथक् कुर्याद्दण्डं चोत्तमसाहसम् । शास्त्राणां यज्ञतपसां देशानां क्षेपको नरः ॥ १८५॥ देवतानां सतीनाञ्च उत्तमं दण्डमर्हति । एकस्य दण्डपारुप्ये बहूनां द्विगुणोदमः ॥१८६ कलहो यद्गतोदाप्यो दण्डश्च द्विगुणस्ततः । मध्यमं ब्राह्मणं राजा विषयाद्विप्रवासयेत् लशूनञ्च पलाण्डुञ्च शूकर ग्रामकुकुटम् । तथा पञ्चनसं सर्व भक्ष्यादन्यत्तु भक्षयेत् ॥ विवासयेत् क्षिप्रमेव ब्राह्मणं विषयात् स्थकात् । समक्ष्यभक्षणे दण्ड्यः शूद्रो भवति कृष्णलम् ॥ १८६ ।।
ऽध्यायः]
* दण्डविधानवर्णनम् *
ब्राह्मणक्षत्रियविशां चतुखिद्विगुणं स्मृतम् । यःसाहसंकारर्यात सदण्ड्यो द्विगुणन्दमम्
यस्त्येवमुक्याऽहन्दाता कारयेत्स चतुर्गुणम् । सन्दिष्टस्याप्रदाता व समुद्रगृहभेदका ॥
पञ्चाशत्पणिको दण्टस्तत्र कार्यों महीक्षिता।
अस्पृश्यञ्चास्पृशन्नाथ्र्यो ह्ययोग्योऽयोग्यकर्मकृत् ॥ १२॥
पुंस्त्वहतीपशूनाञ्च दासीगर्भविनाशरत् । शूदमनजितानाश्च देये पथ्ये च भोजक. ।।
अवजन् पाढ़मुक्त्वा तु तथैव च निमन्त्रणे । एते कापणशतं सर्वे दण्ड्या महीक्षिता
दुःखोत्पादिगृहे द्रव्यं क्षिपेदन्धस्यकृष्णलम् । पितापुत्रविरोधेव साक्षिणांद्विशतोदमः
स्यान्नरस्य तथार्यः स्यात्तस्याप्यटशतोदमः ॥१५॥
तुलाशासनमानानां कृटटन्नाणकस्य च । एभिश्च व्यवहां च स दण्ड्यो दममुत्तमम्
विषाग्निदाम्पतिगुरुनिज्ञापत्यप्रमापणीम् । विकर्णनासिकांव्योष्ठी कृत्यागोभिःप्रमापयेत्
सलस्य दाहका येव येव क्षेत्रस्य वेश्मनः । राजपल्यभिगामी व दग्धव्यास्तकटाग्निना
ऊन पाप्यधिकञ्चापि लिखेद्यो राजशासनम् । परदारिकचौरं चामुञ्चतो दण्ड उत्तमः
अमक्ष्येण द्विजं दूप्य दण्ड उत्तमसाहसः । क्षत्रियं मध्यमं वैश्यं प्रथमं शुदमर्द्धकम् ॥
मृताङ्गलग्नपिनेतुर्गान्तु ताडयतस्तथा । राजयानासनारोदुईण्ड उत्तमसाहसः ॥२०॥
यो मन्येताजितोऽस्मीति न्यायेनापि पराजितः ।
तमायान्तं पुनर्जित्वा दण्डयेद् द्विगुणन्दमम् २०२ ॥
आह्वानकरो मध्यः स्यादनाहाने तथाहयन् । दण्डिकस्य च योदस्तादमियुक्त पलायते
हीनपुरुषकारेण तं दण्ड्याहाण्डिकोधनम् । प्रेप्यापराधा प्यस्तु स दण्ड्याश्चार्द्धमेयव
दण्डाय नियमार्थश्च नीयमानेषु यन्धनम् । यदि कश्चित्पलायेत दण्डयाटगुणो भवेत्
अनिन्दिते विधादे तु नसरोमावतारणम् । कारयेद्यः स पुरुषो मध्यमं दण्डमर्हति ॥
यन्धनचाप्ययध्यस्य यलान्मोचयने तु यः। पन्ध्यं विमोचयेद्यस्तु दण्ड द्विगुणमाग्भवेत्
दुई व्यवहाराणां सम्यानां दिगुणोदमः । राजा त्रिशदगुणोदण्डः प्रक्षेप्य उदके भवेत्
अल्पदण्डेऽधिकं कुर्याद्विपुले चाल्पमेव च ।
ऊनाधिफन्तु तं दण्ड सम्यो दद्यात् स्पफादग्रहात् ॥ २० ॥
६५२ * मत्स्यपुराणम् # [सप्तविंशत्यधिकद्विशततमो याचानवध्यस्य धधे तावान् घध्यस्य रक्षणे । अधर्मोनृपतेष्टस्तथा यध्यस्य मोक्षणे ।। ब्राह्मण नैव हन्यात्तु सर्वपापेप्ववस्थितम् । प्रवासपेत स्वकाद्रामात्समग्रधनसयुतम् ॥ न जातु ब्राह्मणवन्यात् पातक त्वधिकभवेत। यस्मात्तस्मात्प्रयत्नेनब्रह्महत्याविवर्जयेत् अदण्ड्यान्दण्डयेद्राजादण्ड्याश्चैववायदण्डयन् । अयशोमहदाप्नोतिनरफञ्चाधिगच्छति ज्ञात्वापराध पुरपस्य राजा काल तथा चानुमत द्विजानाम् । दण्ड्येषु दण्ड परिकल्पयेत्तु यो यस्य युक्त ससमीक्ष्य कुर्यात् ॥२१॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे राजधर्मवर्णने दण्डविधानवर्णन नाम पविशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय । - सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः मनुमत्स्यसवादे विविधमहोत्पातेषु शान्तिविधानम् मनुरुवाच। दिव्यान्तरिक्षमोमेषु या शान्तिरभिधीयते । तामह श्रोतुमिच्छामि महोत्पातेपुकेशव । मत्स्य उवाच। ॥ अथात सम्प्रवक्ष्यामित्रिविधामद्भुतादिषु । विशेषेणतु भोमेषु शान्ति कार्यातथाभवेत अभया चान्तरिक्षेषु सौम्या दिव्येषु पाथिव ।। विजिगीषु पर राजन् ! भूतिकामस्तु यो भवेत् ॥ ३॥ विजिगीषु परानेयमभियुक्तस्तथा परै । तथाभिवारशङ्काया शत्रूणामभिनाशने ॥ ४॥ भये महति सप्राप्ते अभया शान्तिरिष्यते। राजयक्ष्माभिभूतस्य क्षतक्षीणस्य वाप्यथ । सौम्या प्रशप्स्यते शान्तिर्यज्ञकामस्य चाप्यथ । भूकम्पे च समुत्पन्ने प्राप्तवान्नक्षयेतथा अतिवृष्ट्यामनावृष्टया शलभाना भयेषु च । प्रमत्तेषु च चोरेषु वैष्पावी शान्तिरिष्यते पशूना मारपणे प्राप्ते नराणामपि दारुणे । भूतेषु दृश्यमानेषु रौद्री शान्तिस्तथेप्यते ॥८॥ वेदनाशे समुत्पन्ने जने जाते व नास्तिके। अपूज्यपूजने जाते ब्राह्मा शान्तिस्तथेप्यते ऽध्यायः] * विविधमहोत्पातेषु शान्तिविधानम् । भविष्यत्यभिपेके व परचक्रमयेऽपि च । स्वराष्ट्रभेदेऽरिवधे रौद्री शान्तिः प्रशस्यते ॥ ज्यहातिरिक्त पवने भक्ष्ये सर्वविहिते । वैरते चातजे व्याधी घायवी शान्तिरिप्यते अनावृष्टिमये जाते प्राप्ते विरुतिवर्षणे । जलाशयविकारेषु चारुणी शान्तिरिष्यते ॥१२॥ अभिशापभये प्राप्त भार्गवी च तथैव च । जाते प्रसवकृत्ये प्राजापत्या महाभुज!॥ उपस्कराणांवकृत्ये त्याष्ट्रीपार्थिवनन्दन! । बालानां शान्तिकामस्य कौमारीचतथानूप! कुर्याच्छान्तिमथाग्नेयी समाते पहिवैश्ते । आमाभले तु:समाते तथा भृत्यादिसझये अश्यानांशान्तिकामस्पतद्विकारेसमुत्थिते । अश्वानाकामयानस्यगान्धींशान्तिरिष्यते गजानां शान्तिकामस्यतद्विकारे समुत्थिते । गजानांकामयानस्य शान्तिराङ्गिरसीभवेत् पिशाचादिभये जाते शान्तिधै नै ती स्मृता । अपमृत्युभये जाते दुःस्वप्नेव तथास्थिते याम्यान्तु कारयेच्छान्ति प्राप्ते तु नरके तथा । धननाशे समुत्पन्ने कावेरी शान्तिरिप्यते वृक्षाणाञ्च तथार्थाना येते समुपस्थिते । भूतिकामस्तधा शान्ति पार्थिवी प्रतियोजयेत् प्रथम दिनयामे च रात्रीचा मनुजोत्तम!। हस्ते साती चचिनायामादित्येचाश्विनेतया भर्यम्णि सौम्य ! जातेपु धायन्यांत्वद्भुतेषु च । द्वितीये दिनयामे तु रात्रीचरचिनन्दन! पुष्पाने ये विशाखालु पियासु भरणीषु च । उत्पातेपुतथामाग्येआग्नेयीतेपु फारयेत् तृतीये दिनयामे च रानी च रविनन्दन ! रोहिण्या वैष्णये ब्राह्मे घासये वैश्वदेवते ॥ ज्येष्ठायाञ्च तथा मैने येभवन्त्यद्भुता.कचित् । ऐन्द्रीतेपु प्रयोक्तव्याशान्ती रविकुलोद्वह! चतुर्थे दिनयामे रात्री पा रयिनन्दन ! । सार्प पाणे तयाायामहिर्बुध्न्ये च दारणे ॥ मूले परुणदेत्ये ये भवन्त्यद्भुतास्तथा । पागणी तेषु फर्त्तव्या महाशान्तिर्महीक्षिता ॥ मित्रमण्डललासु ये भवन्त्यगुताः धचिन् । तर शान्तिद्वयं फायं निमिचेपुच नान्यथा निनिमित्तरता शान्तिर्निमित्तेनोपयुज्यते ॥ २८ ॥ याणप्रहारा न भवन्ति यहाजन्नृणां सन्नहनयुतानाम् । देषोपचाता न भवन्ति तद्वद्धर्मात्मनां शान्तिपरायणानाम् ॥ २६ ॥ इति धीमत्स्यपुराणे मनुमत्स्यसंवादे त्रिविधमहोत्पानेषु शान्तिविधानवर्णनं माम सप्तविशन्यधिकद्विशतनमोऽध्यायः ।
अष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
शान्तिविधानवर्णनम्
मनुरुवावा
अद्भुतानां फलं देव ! शमनञ्च तथा बद । त्वं हि बेन्सि विशालाक्ष ! शेयंसर्वमशेपतः ॥
मत्स्य उवाच।
अत्र ते वर्णयिष्यामि यदुवाच महातपाः । अत्र ये वृद्धगर्भस्तु सर्वधर्मभृतां घरः ॥२॥
सरस्वत्याःसुखासीनंगगं श्रोतसि पार्थिव ! । पप्रच्छासी महातेजा अत्रिमुनिजनप्रियम्
अत्रिस्वाच।
नश्यतां पूर्वरूपाणि जनानां कथयस्व मे । नगराणां तथा राज्ञा त्वंहि सर्व वदस्वमाम्
गर्ग उवाच ।
पुरुषापवारानियतमपरज्यन्ति देवताः । ततोऽपरागाद्देवानामुपसर्गः प्रवर्तते ॥५॥
दिव्यान्तरिक्षभौमञ्च त्रिविधं संप्रकीर्तितम् । ग्रहःवैकृतं दिव्यमान्तरिक्षं नियोध मे ॥
उल्कापातो दिशान्दाह परिवेपस्तथैव च । गन्धर्वनगरञ्चैव वृष्टिश्च विकृता तु या ॥
एवमादीनि लोकेऽस्मिन्नान्तरिक्षं विनिर्दिशेत् ।
वरस्थिरभवभीमो भूकम्पश्चापि भूमिजः ॥ ८॥
जलाशयानां वैकृत्यं भौमं तदपि कीर्तितम् । भौमे त्वल्पफलं ज्ञेयं विरेण च विपच्यते
अभ्रज मध्यफलदं मध्यकालफलप्रदम् । अद्भुते तु समुत्पन्ने यदि वृष्टिः शिया भवेत्
सप्ताहाभ्यन्तरे ज्ञेयमद्भुतं निष्फलं भवेत् । अद्भुतस्य विपाकश्च विना शान्त्या न दृश्यते
विभिर्वस्तधा ज्ञेयं सुमहद्वयकारकम् । राज्ञः शरीरे लोके व पुरद्वारे पुरोहिते ॥१२॥
पाकमायाति पुत्रेषु तथा चै कोशवाहने । मृतुस्वभावादाजेन्द्र भवन्त्यद्गुतसंशिताः ।।
शुभावहास्ते विशेयास्तांश्च मे गदतः शृणु । घज्राशनिमहीकम्पसस्यानिर्घातनि.स्वना
परिवेषरजोधूमरक्तार्कास्तमयोदयाः । द्रुमोझेदकरस्नेहो बहुशः सफलद्रुमः ॥ १५ ॥
ऽध्यायः]
*शान्तिविधानवर्णनम् *
गोपक्षिमधुद्धिश्च शुभानि मधु माधये ।
ऋक्षोल्कापातकलुपे कपिलार्केन्दुमण्डलम् ॥ १६ ॥
कृष्णश्वेतं तथापीतं धूसरध्वान्तलोहितम् । रक्तपुष्पारुणं साध्यंनभः क्षुब्धार्णवोपमम्
सरिताञ्चाम्बुसंशोपं दृष्ट्वा ग्रीष्मेशुभं घदेत् । शनायुधपरीवेपं विधुदुल्काधिरोहणम् ।।
कम्पोद्वर्तनवैश्त्यं हसनं दारणं क्षितेः । नद्योदपानं सरसां विधूनतरणप्पाः ।। १६ ॥
ऋङ्गिणाच घराहाणां वर्षासु शुभमिप्यते । शीतानिलतुपारत्वं नईनं मृगपक्षिणाम् ।।
रक्षोभूतपिशाचानां दर्शनं घागमानुपी । दिशो धूमान्धकाराश्च स नभोवनपर्वताः ।२१
उच्चैः सूर्यादयास्तौ च हेमन्ते शोभनाःस्मृताः। दिव्यस्त्रीरूपगन्धर्वविमानादुतदर्शनम्
ग्रहनक्षरताराणां दर्शनं वागमानुपी । गीतयादित्रनिघोंपो धनपर्वतसानुपु ॥ २३ ॥
सत्यवृद्धी रसोत्पत्तिःशरत्काले शुभाः स्मृताः । हिमपातानिलोत्पातविरूपादुतदर्शनम्
कृष्णाञ्जनाममाकाशं तारोल्कापातपिक्षरम् । चिनगोंद्या स्त्रीपुगोऽजाश्वमृगपक्षिषु
पत्राडरलतानाञ्च विकारा शिशिरे शुभाः ॥ २५ ॥
ऋतुस्वभावेन विनागुतस्य जातस्य दृष्टस्य तु शीघ्रमेव ।।
यथागमं शान्तिरनन्तरन्तु कार्या यथोका पसुधाधिपेन ॥ २६ ॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे मनुमत्स्यसंवादे शान्तिविधानंवर्णनं नाम
अष्टाविशदधिकद्विशततमोऽध्याय ।
उनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
शान्तिविधानपणनम्
गर्गउपाचा
देवताः प्रनृत्यन्ति पन्ते प्रज्यलन्तिव । घमन्त्यग्नि तथा धूमं स्नेहं रक्तं तथा घसाम्
भारयन्ति रदन्त्येताः प्रस्यियन्ति सन्ति च ।
उत्तिष्ठन्ति निरीदन्ति प्रधापन्ति धमन्ति च ॥२॥
६५६ * मत्स्यपुराणम् * [ऊनत्रिशदधिकदिशततमो भुञ्जते विक्षिपन्ते धा कोशप्रहरणध्वजान् । अवाड्मुखा वै भवन्ति स्थानात् स्थानं भ्रमन्ति च ॥३॥ एवमाद्या हि दृश्यन्ते विकारा. सहसोत्थिता. । लिङ्गायतन विप्रेषु तत्र घासंनरोवयेत् राज्ञो धा व्यसनन्तत्र सच देशो विनश्यति । देवयात्रासु चोत्पातात् दृष्ट्वा देशभयंघदेत पितामहस्य हर्यपुतत्र घासंन रोचयेत् । पशूना जं ज्ञेयं नृपाणां लोकपालजम् ॥६॥ ज्ञेयं सेनापतीनान्तु यत्स्यात् कन्दविशाखजम् । लोकाना विष्णुवस्वीन्द्रविश्वकर्मसमुद्भवम् ॥ ७॥ विनायकोद्भवं ज्ञेयं गणाना ये तु नायका. । देवप्रेष्यान्नृपप्रेप्यादेव स्त्रीभिर्नुपस्त्रियः ॥ वासुदेवोद्भव शेय ग्रहाणामेव नान्यथा । देवताना विकारेषु श्रुतिवेत्ता पुरोहित ॥६॥ देवतार्वान्तु गत्या वै स्नानमाच्छाद्यभूषयेत् । पूजयेच महाभाग! गन्धमाल्यानसम्पदा मधुपर्कण विधिवत् उपतिष्ठेदनन्तरम् । पुरोधाजुहुयावही सप्तरात्रमतन्द्रित ॥११॥ विप्राश्च पूज्या मधुरान्नपान. सदक्षिण सप्तदिन नरेन्द्र !। प्राप्तेऽष्टमेऽह्नि क्षितिगोप्रदाने. सकाञ्चनै शान्तिमुपैति पापम् ॥ १२ ॥ इति श्री मत्स्यपुराणे शान्तिविधानवर्णन नामोननत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः । त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः शान्तिविधानवर्णनम् गर्ग उवाच । अनग्नि दीप्यते यत्र राष्ट्र यस्य निरन्धन. । न दीप्यते चेन्धनधान्तद्राष्ट्रपीड्यते नृपैः प्रज्वलेदप्सु मांस घा तथाई घापि किञ्चन । प्राकारन्तोरणं द्वारं नृपवेश्म सुरालयम् ।। एतानि यत्र दीप्यन्ते तत्र राज्ञो भय भवेत् । विद्युता या प्रदान्ते तदापि नृपतेर्भयम् ॥ अनैशानि तमासि स्युपिनापासुरजासि च । धूमश्चानग्निजोयत्र तत्र विन्द्यान्महाभयम् ऽध्याय ] * शान्तिविधानवर्णनम् * तडित्त्वनभ्रे गगने भयं स्यादृक्षवर्जिते । दिधा सतारे गगने तथैव भयमादिशेत् ॥५॥ ग्रहनक्षत्रवैरत्ये ताराविषमदर्शने । पुरवाहनयानेषु चतुप्पान्मृगपक्षिपु ॥ ६ ॥ आयुधेषु च दीप्तेषु धूमायत्सु तथैव च । निर्गमत्सु च कोशाच्च सग्रामस्तुमुलोभवेत् विनाग्नि विस्फुलिङ्गाश्च दृश्यन्ते यत्र कुत्रचित् । स्वभावाच्चापि पूर्यन्ते धनूपि विकृतानि व ॥ ८॥ विकारश्चायुधाना स्यात् तत्र संग्राममादिशेत् । त्रिरात्रोपोपितश्चात्र पुरोधा सुसमाहित ॥ ६ ॥ समिद्धि क्षीरवृक्षाणा सपैश्च घृतेन च । होम कुर्यादग्निमन्ाह्मणाश्चैव भोजयेत् दद्यात्सुवर्णश्च तथा द्विजेभ्यो गाश्चैव वस्त्राणि तथा भुवञ्च । एष ते पापमुपैति नाश यदग्निवैत्यभव द्विजेन्द ! ॥ ११ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे शान्तिविधानवर्णन नाम त्रिशदधिकद्विशततमोऽध्याय । एकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः शान्तिविधानवर्णनम् । गर्ग उवाच। पुरेपु येषु दृश्यन्ते पादपादेव चोदिता । रुदन्तो पा हसन्तो पा रचन्तोघा रसान्यहृन् अरोगाथा चिना पात शाखा मुश्चत्यथ द्रुमा । फल मूल तथा कालं दर्शयन्ति त्रिहायना ॥२॥ पूर्ववत्स्व दर्शयन्ति फल पुष्प तथान्तरे । क्षीर स्नेह तथारकमधु तोय सवन्ति च ॥ शुष्यन्त्यरोगा सहसा शुष्का रोहन्ति वा पुन । उत्तिष्ठन्तीह पतिता पतन्ति च तथोत्थिता ॥४॥ तत्र पक्ष्यामि ते ब्रह्मन् । विपाकफलमेव च । रोदने व्याधिमभ्येति हसने देशपिभ्रमम् शापाप्रपतनकुर्यात्सग्रामे योधपातनम् । बालाना मरण पुर्यात् याराना यालपुप्पिता। ४२-
* मत्स्यपुराणम् * [द्वात्रिंशदधिकदिशततमो
स्वराष्ट्रभेदं कुरुते फलपुप्पमथान्तरे । क्षयः सर्वत्र गोतीरे स्नेहे दुर्भिक्षलक्षणम् ।।
वाहनापचयं मद्ये रक्ते संग्राममाविशेत् । मधुस्रावे भवेदव्याधि जलनावे न घर्षति ॥
अरोगशोषणं ज्ञेयं ब्रह्मन् ! दुर्भिक्षलक्षणम् । शुष्केषु संप्रहरोहस्तु वीर्यमन्त्रञ्च हीयते ।।
उत्थाने पतितानाञ्च नयं भेदकरम्भवेत् । स्थानात् स्थानन्तु गमने देशभङ्गस्तथाभवेत्
ज्यलत्स्वपि च वृक्षेषु रुदत्स्यपि धनक्षयम् । एतत्पूजितवृक्षेषु सर्व राज्ञो विपद्यते ॥
पुष्पे फले वा विकृतेराशो मृत्यु तथादिशेत् । अन्येषु चैव वृक्षेपु वृक्षोत्पातेप्यतन्द्रित
आच्छादयित्वा तं वृक्षं गन्धमाल्यैविभूपयेत् । वृक्षोपरितथाछत्र कुर्यात् पापप्रशान्तये
शिवमभ्यर्चयेदेवं पशुञ्चास्मै निवेदयेत् । रुद्रेभ्य इति वृक्षेषु हुत्वा रदं जपेत्ततः ॥१४॥
मध्वाज्ययुक्तेन तु पायसेन संपूज्य विप्राश्च भुवञ्च दद्यात् ।
गीतेन नृत्येन तधार्चयेत्तु देवं हरं पापविनाशहेतोः ॥ १५ ॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे शान्तिविधानवर्णन नामकत्रिशदधिकद्विशततमोऽध्याय.।
द्वात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
शान्तिविधानवर्णनम् ।
गर्ग उवाव।
अतिवृष्टिरनावृष्टि दुर्भिक्षादि भयं मतम् । अनृतौ तु दिधानन्ता वृष्टिर्शया भयानका ॥
अनभ्रे वैरुताश्चैव विज्ञेया राजमृत्यवे । शीतोष्णाना विपर्यासे नृपाणा रिपुजं भयम्
शोणितं घर्षते यत्र तत्र शस्त्रभयम्भवेत् । अङ्गारपांसुवर्षेषु नगरन्तद्विनश्यति ॥ ३ ॥
मजास्थिस्नेहमांसाना जनमारभयम्भवेत् । फलं पुष्पन्तधा धान्यं परेणातिभयाय तु
पांसुजन्तुफलानाञ्च पर्पतो रोगजं भयम् । छिद्रेवान्नप्रवर्षेण सत्यानां भीतिवर्द्धनम्
चिरजस्के रवी व्यभ्रे यदा च्छाया न दृश्यते । दृश्यते तु प्रतीपा पा तत्र देशभयम्भवेत्
निरभ्रे घाथ रात्री वा श्वेतं याम्योत्तरेण तु ।
इन्द्रायुधं तथा दृष्ट्वा उल्कापातं तथैव च ॥ ७॥
'ऽध्यायः] * शान्तिविधानवर्णनम् * दिग्दाहपरिवेषौ च गन्धर्वनगरन्तथा । परचक्रभयं ब्रूयाद्देशोपद्वमेव च ॥ ८॥ सूर्येन्दुपर्जन्यसमीरणानां यागस्तु कार्यो विधिवद् हिजेन्द्र ! धनानि गौः काञ्चनदक्षिणा च देया द्विजानामधनाशहेतोः ॥ ६ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे शान्तिविधानवर्णनं नाम द्वात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः । त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः शान्तिविधानवर्णनम् । गर्गउचाव। नगरादपसर्पन्ते समीपमुपयान्ति च । नद्योहदप्रस्रवाणि विरसाश्च भवन्ति च ॥१॥ विवर्ण कलुपन्तप्तं फेनवजन्तुसड्डुलम् । स्नेहं क्षीरं सुरां रक्त घहन्ते घा कुलोदकाः ॥२ पण्मासाभ्यन्तरे तत्र परचमभयम्भवेत् । जलाशया नदन्ते वा प्रज्वलन्ति कथञ्चन ॥३ विमुञ्चन्ति तथा ब्रह्मन् ! ज्यालाधूमरजांसि च । अथवाते जलोत्पत्ति सुसत्या या जलाशयाः ॥ ४॥ सङ्गीतशब्दाः श्रूयन्ते जनमारभयम्भवेत् । दिव्यमम्भोमयं सर्पिर्मधुतैलावसेचनम् ॥५॥ जप्तव्या घारुणा मन्त्रास्तैश्च होमो जले भवेत् ॥६॥ मध्वाज्ययुक्तं परमान्नमत्र देयं द्विजानां द्विजभोजनार्थम् । गावश्च देयाः सितवस्त्रेयुक्तास्तथोदकुम्भाः सलिलाघशान्त्यै ॥७॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे शान्तिविधानवर्णनं नाम त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय. ।
चतुस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः शान्तिविधानवर्णनम् । गर्ग उवाच । अकालप्रसवा नार्यः कालातीतप्रजास्तथा। विकृतप्रसवाश्चैव युग्मसंप्रसवास्तथा ॥१॥ अमानुपा ह्यतुण्डाश्च सातव्यसनास्तथा । हीनाङ्गा अधिकाङ्गाश्च जायन्ते यदि घा स्त्रियः ॥ २॥ पशव. पक्षिणश्चैव तथैव च सरीसृपा । विनाशन्तस्य देशस्य कुलस्य च चिनिर्दिशेर विवासयेत्तान्नृपतिः स्वराष्ट्रात् स्त्रियश्च पूज्याश्च ततो द्विजेन्द्राः ।। कस्येच्छकै ाह्मणतर्पणञ्च लोके ततः शान्तिमुपैति पापम् ॥ ४॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे शान्तिविधानवर्णनं नाम चतुस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः । पञ्चत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः शान्तिविधानरर्णनम् । गर्ग उवाच । यान्ति यानान्ययुक्तानि युक्तान्यपि न यान्ति च । बोद्यमानानि तत्र स्यात् महमयमुपस्थितम् ॥ १ ॥ धाामाना न चाहन्ते चाहन्ते नात्यताहता. । अचलाश्च चलन्त्येव न चलन्ति चलानि च ॥२॥ आकाशे तूर्यनादश्च गीतगन्धर्वनिस्वना. 1 काष्ठींकुठारादि विकारं कुरुते यदि ॥ ३॥ -
ध्यायः]
* शान्तिविधानवर्णनम् *
गाची लांगलसद्देश्च स्त्रिय स्त्री च विघातयेत् ।
उपस्करादिविकृती घोरं शस्त्रमयम्भवेत् ॥ ४॥
पायोस्तु पूजां द्विजसक्तुभिश्च कृत्वा नियुक्तांश्च जपेञ्च मन्त्रान् ।
दद्यात् प्रभूतं परमानमत्र सदक्षिणन्तेन शमोऽस्य भूयात् ॥५॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे शान्तिविधानवर्णनं नाम पञ्चत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।
पट्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
शान्तिविधानवर्णनम् ।
गर्ग उपाय।
प्रविशन्ति यदा प्राममारण्या मृगपक्षिण ।
अरण्य यान्ति पा ग्राम्या स्थल यान्ति जलोद्भया ॥१॥
म्थलजाश्च जलं यान्ति घोरं पाशन्ति निर्भया । राजद्वारे पुरद्वारे शिया चाप्यशिवपदा
दिवारात्रिश्चरायापि राबायपि दिवानरा । ग्राम्यास्त्यजन्तिप्रामञ्चशून्यतातस्यनिर्दिशेत्
दीप्तापाशन्ति सन्ध्यासु मण्डलानि च कुर्वते । पाशन्तिविम्बरयमतदाप्येतत्फलं लभेत्
प्रदोषे फुटो घाशे मन्ते पापि कोफिल' । अर्कोदये त्वभिमुपी शिवारीति भयं पदेत्
गृहं फपोत प्रविशेत्मव्यादोभूमि लीयते । मधुया मक्षिका कुर्युमृत्युमुहपतेर्मवेत् ॥
प्राकारद्वारगेदेषु तोरणापणीथिपु। येनुच्छमायुधायेषु मच्याद प्रपतेयदि ॥ ७॥
जायन्तेपाथ पल्मीका मधु पा स्यन्दते यदि । सदेशोनाशमायाति राजा चम्रियतेतया
मूरफानशलमानदृष्ट्वाप्रभूतंश्चद्भयम्मयेत् । फाष्टोमुकास्थिरडाध्या.न्यानोमवेदनाः
दुर्भिक्षयेदना या फाफाधान्यमुग यदि। जनानमिभयन्तीह निर्मया रपयेदिन ॥१०
फाफो मैगुनसतध शेतस्तु यदि दृश्यते । राजा पा प्रियते तत्र सब देशो पिनश्यति
उलूको दृश्यते यत्र नृपद्वारे तथा गृह । यो गृहपतेमृत्युधननाशस्तपैप च ॥ १२॥
* मत्स्यपुराणम् * [सप्तत्रिंशदधिकद्विशततमों
मृगपक्षिधिकारेषु कुर्याद्धोमं सदक्षिणम् । देघा पोता इति वा जप्तन्याः पञ्चभिद्विजः
गावश्च देया विधिषद् द्विजानां सकाञ्चना घस्त्रयुगोत्तरीयाः।
एवं कृते शान्तिमुपैति पापं मृगैद्विजैर्वा विनिवेदितं यत् ॥ १४ ॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे शान्तिविधानवर्णनं नाम पत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।
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सप्तत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
शान्तिविधानवर्णनम् ।
गर्ग उवाच ।
प्रासादतोरणाहालद्वाप्राकारवेश्मनाम् । निनिमित्तन्तु पतनं ढानां राजमृत्यवे ॥५॥
रजसा पाथ धूमेन दिशो यत्र समाकुलाः । आदित्यचन्द्रताराश्च विवर्णा भयवृद्धये ॥२
राक्षसा यत्र दृश्यन्ते ब्राह्मणाश्च विधर्मिणः । ऋतधश्वविपर्यस्ता अपूज्यः पूज्यते जनः
नक्षत्राणि वियोगीनि तन्महद्भयलक्षणम् । केतूदयोपरागौ च छिद्रं पा शशिसूर्ययोः
ग्रहःविकृतिर्यत्र तत्रापि भयमादिशेत् । स्त्रियश्च कलहायन्ते याला निम्नन्तिबालकान
क्रियाणामुचितानाञ्च विच्छित्तिर्यत्र जायते । हूयमानस्तु यत्राग्निर्दीप्यते न च शान्तिषु
पिपीलिकाश्च क्रव्यादा यान्ति चोत्तरतस्तथा । पूर्णकुम्भाः स्त्रयन्तेचहविर्षा विप्रलुप्यते
मङ्गल्याश्च गिरो यत्र न श्रूयन्ते समन्ततः ।
क्षवथुर्वाधते वाथ प्रहसन्ति स्रवन्ति च ॥ ८॥
न च देवेषु धर्तन्ते यथावब्राह्मणेषु च । मन्दधोपाणि घाद्यानि पाद्यन्ते विस्वराणि च
गुरुमित्रद्विपो यत्र शत्रुपूजारता नराः। ब्राह्मणान् सुहृदो मान्यान् जनो यत्राधमन्यते ॥
शान्तिमङ्गलहोमेषु नास्तिक्यं यत्र जायते। राजा घा म्रियते तत्र स देशोघा विनश्यति
'राज्ञो विनाशे सम्प्राप्ते निमित्तानि नियोध मे।
ब्राह्मणान् प्रथमं द्वेष्टि ब्राह्मणश्व विरुध्यते ॥ १२ ॥
ऽध्यायः ] * ग्रहयज्ञादीनां विधानवर्णनम् । ब्राह्मणस्यानि वादत्ते ब्राह्मणांश्च जिघांसति । न व स्मरति कृत्येषु यावितश्च प्रकुप्यति रमते निन्दया तेषां प्रशंसां नाभिनन्दति । अपूर्वन्तु करं लोभात्तथा पातयते जने ॥१४ एतेप्यभ्यर्चयेच्छकं सपत्नीकंद्विजोत्तम !! भोज्यानिचैच कार्याणि सुराणां वलयस्तथा सन्तो विधाश्च पूज्याः स्युस्तेभ्यो दान दीयताम् ॥ १५ ॥ गायश्च देया द्विजपुङ्गवेभ्यो भुवस्तथा काञ्चनमम्वराणि । होमश्च कार्योऽमरपूजन एवं कृते पापमुपैति शान्तिम् ॥ १६ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे शान्तिविधानवर्णनं नाम सप्तत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः । अष्टत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ग्रहयज्ञादीनां विधानवर्णनम् । मनुवाच। ग्रहयज्ञः कथं कार्यों लक्षहोमः कथं नृपैः । कोटिहोमोऽपिवा देव ! सर्वपापप्रणाशनः ॥ क्रियते विधिनायेन यदृष्टं शान्तिचिन्तकः । तत्सर्व विस्तराद्देव! फययस्य जनार्दन! मत्स्य उपांची इदानों कथयिष्यामि प्रसङ्गादेव ते नृप । राक्षा धर्मप्रसक्तेन प्रजानाच हितेप्सुना ॥३॥ ग्रादयशः सदा फार्यो लक्षहोमसमन्वितः । नदीनां सट्नामे चैव सुराणामग्रतस्तथा ॥el मुसमे भूमिमागेच देशाधिष्ठितो नृपः। गुरुणा चैव ऋत्विभिःसार्द्ध भूमि परिक्षयेत् पनेत् कुण्डश तव सुसमं इस्तमात्रकम् । द्विगुणं लक्षहोमे तु फोरिहोमे चतुर्गुणम्॥ युग्मासु ऋत्विजः प्रोक्ता मष्टो घे घेदपारगाः। फन्दमूलपलाहारा दधिक्षीयशिनोऽपि घा॥ ७॥ घेद्यां निधापयेच्चैव रसानि विविधानिय । सिफतापरिवेषाध ततोऽग्निश समिन्धयेत् * मत्स्यपुराणम् * [अष्टत्रिंशदधिकद्विशततमो गायच्या दशसाहस्रं मानस्तोकेन पड्गुणः । त्रिंशद्ग्रहादिमन्त्रैश्च चत्वारो विष्णुदैवतैः कुष्माण्डैष्ठियात्पञ्च कुसुमाद्यैस्तु पोडश । होतव्या दशसाहस्र बादर्जातवेदसि ॥२० श्रियोमन्त्रेण होतव्या सहस्राणि चतुर्दश । शेषाः पञ्चसहस्रास्तु होतव्यास्त्विन्द्रदेवतः हुत्वा शतसहस्रस्तु पुण्यस्मानं समाचरेत् । कुम्भः षोडशसवय श्च सहिरण्य. सुमङ्गलः स्नापयेद्यजमानन्तु तत शान्तिर्भविष्यति । एवं सते ते यत्किञ्चिद्ग्रहपीडासमुद्भवम् ॥ तत्सर्व नाशमायाति दत्त्वा चै दक्षिणां नृप !! तस्मात्सर्वप्रयत्नेन प्रधाना दक्षिणा स्मृता ॥ १४ ॥ हस्त्यश्वरथयानानि भूमिवस्त्रयुगानि च। अनडुद्गोशतं दद्यादृत्विजां चैव दक्षिणाम् ॥ यथाविभवसारन्तु वित्तशाट्य न कारयेत् । मासे पूर्ण समाप्तस्तु लक्षहोमो नराधिप!! लक्षहोमस्य राजेन्द्र ! विधानं परिकीतितम् । इदानी कोटिहोमस्य शृणु त्वं कथयाम्यहम् ॥ १७ ॥ गगातटेऽथ यमुनासरस्वत्यो रेश्वर ! । नर्मदा देविकायास्तु तटे होमो विधीयते ! ॥ तत्रापि ऋत्विजः फार्या रविनन्दन पोडश । सर्वहोमेतु राज! दद्याद्विप्रेऽथ धा धनम् ऋत्विगाचार्यसहितो दीक्षां साम्वत्सरी स्थित । चैत्रे मासे तु सम्प्राप्त कार्तिके घा विशेषतः ॥ २० ॥ प्रारम्भ' फरणीयो पा घत्सरं वत्सरं नृप!। यजमानः पयोभक्षी फलाशीव तथानधः॥ यघादिग्रीहयो भाषास्तिलाश्च सह सर्पः। पालाशाः समिधःशस्ता घसोर्धारातथोपरि मासेऽथ प्रथमे दद्यात् ऋत्विाम्यः क्षीरभोजनम् । द्वितीये कृप्सरां दद्याधर्मकामार्थसाधनीम् ॥ २३ ॥ तृतीये मासि संपापो देयो चै रचिनन्दन!! चतुर्थे मोदका देवा विप्राणा प्रीतिमावहन पञ्चमे दधिमकन्तु पष्ठे ये सक्तमोजनम् । पूपाश्च सप्तमे देया हायमे धृतप्पकाः ॥२५॥ पच्चोदनञ्च नचमे दशमे यवपटिका ! एकादशे समापन्तु भोजनं रविनन्दन! ॥२६ ॥ द्वादशे त्यथ सम्माप्त मासे रविकुलोद्वहः । पसः सह भक्ष्यश्च भोजनं सार्वफामिफम् देया द्विजानां राजेन्द्र!मासि मासिच दक्षिणाः।
ऽध्यायः] * यात्राकालविधानवर्णनम् * अहतवासाः सम्वीतो दिनाई होमयेच्छुविः ॥ २८॥ तस्मात् सदोत्यितैर्भाव्यं यजमानैः सह द्विजैः । इन्द्रायादिसुराणाञ्च प्रीणनं सर्वकामिकम् ॥ २६ ॥ सत्वा सुराणां राजेन्द्र! पशुधातसमन्वितम् । सर्वदानानि देवानामग्निष्टोमच कारयेत्।। एवं कृत्या विधानेन पूर्णाहुति' शते शते । सहस्त्रे द्विगुणा देया यावच्छतसहन्नकम् ॥ पुरोडाशस्ततः साध्यो देवतार्थे च ऋत्विजैः । युक्तो घसन् मानवैश्च पुनः प्राप्तानान् विज्ञान् ॥ ३२ ॥ प्रीणयित्वा सुरान् सर्वान् पितृनेय ततः क्रमात् । कृत्या शास्त्रविधानेन पिण्डानाञ्च समर्पणम् ॥ ३३ ॥ समाप्तोतस्य होमस्यविप्राणामथ दक्षिणाम् | समाञ्चैवतुलां कृत्वायदुध्या शिक्षद्वयंपुनः आत्मानं तोलयेत्तत्र पत्नीश्चैव द्वितीयकाम् । सुवर्णेन तथात्मानं रजतेन तथा प्रियाम् तोलयित्वा देद्वाजा पित्तशाट्यविवर्जितः । ददेच्छतसहनन्तु रूप्यस्य फनफस्य च ॥ सर्वस्वं धा ददेत्तत्र राजसूयफलं लभेत् । एषत्वा विधानेन विप्रास्तांच विसर्जयेत् प्रीयतां पुण्डरीकाक्षः सर्वयशेश्वरो हरिः । तस्मिंस्तुष्टे जगत्तुष्टं प्रीणिते प्रीणितं भवेत् एवं सोपधाते तु देवमानुषकारिते । एवं शान्तिस्तवारयाता यां कृत्वा सुकुती भवेत् न शोचेजन्ममरणे कृतारतचिवारणे । सतीर्थपु यत्स्नानं सर्ययोपु यत्फलम् । सन्फलं समयानोति मृत्वा यात्रयं नृप ! ॥४१॥ इति श्रीमन्स्यपुराणे ग्रहया लक्षहीम फोटिहोमविधिवर्णनं नामा- प्रविशदधिकद्विशततमोऽध्यायः । ऊनचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः यात्राकालविधानवर्णनम् । मनुस्याच। इदानीं सर्वधर्म ! सर्वशास्त्रपिशारद !! यात्राफालविधा मे फयपस्थ मदीक्षिताम् ॥
* मत्स्यपुराणम् * [ ऊनवत्वारिंशदधिकद्विशततमो मत्स्य उवाच। यदा मन्येत नृपतिराक्रन्देन वलीयसा । पाणिग्राहाभिभूतोऽयं तदा यात्रां प्रयोजयेत्॥ दुष्टायोधा भृता भृत्याः साम्प्रतञ्चयलंमम । मूलरक्षासमर्थोऽस्मि तदायात्रां प्रयोजयेत् अशुद्धपाणिनृपतिर्नतु यात्रां प्रयोजयेत् । पाणिग्राहाधिकं सैन्यंमूले निक्षिप्यचवजेत् चैत्यांचा मार्गशीर्ष्या धा यात्रां यायानराधिपः। चैव्यां पश्येच्व नैदाधं हन्ति पुष्टिश्च शारदीम् ॥५॥ एतदेव विपर्यस्तं मार्गशीर्या नराधिपः । शत्रो; व्यसने यायात् कालएच •सुदुर्लभः दिव्यान्तरिक्षक्षितिजैरुत्पातःपीडितं परम् । पडक्षपीड़ासन्तप्तं पीड़ितञ्च तथा ग्रहः ॥७ ज्वलन्ती च तथैवोल्का दिश याञ्च प्रपद्यते । भूकम्पोल्का दिर्शयाति याञ्चकेतुःप्रसूयते निर्धातश्च पतेयत्र तां यायावसुधाधिपः । स बलव्यसनोपेतं तथा दुर्भिक्षपीड़ितम् ॥ सम्भूतान्तरकोपञ्च क्षिप्रं पायादरिं नृपः । यूकामाक्षीकबहुलं बहुपङ्कन्तथा विलम्॥१० नास्तिकं भिन्नमर्यादं तथा मङ्गलबादिनम् । अपेतप्रकृतिश्चैव निःसारच तथा जयेत् ॥ विद्विष्टनायकं सैन्यं तथा भिन्नं परस्परम् । व्यसनाशक्तनृपति बलं राजाभियोजयेत् ॥ सैनिकानां न शास्त्राणिस्फुरन्त्यनानियत्रव। दु.स्वप्नानिवपश्यन्तिवलन्तदभियोजयेत् उत्साहवलसम्पन्न स्वानुरक्तवलस्तथा । तुटपुटबलो राजा परानभिमुखो व्रजेत् ॥१४॥ शरीरस्फुरणे धन्ये तथा दुःस्वप्ननाशने । निमित्त शकुने धन्ये जाते शपुरं व्रजेत् ।। क्षेषु पसु शुद्धेषु ग्रहेप्चनुगुणेषु च । प्रश्नकाले शुभे जाते परान यायानराधिपः ॥ एयन्तु दैवसम्पन्नस्तथा पौरुषसंयुतः। देशकालोपपन्नान्तु यात्रां कुर्यान्नराधिपः ॥ स्थले नमस्तु नागस्य तस्यापि सजले चशे । उलूकस्यनिशि ध्याक्षः सचतस्य दिधापशे एवं देशञ्च फालच शात्या यात्रा प्रयोजयेत् ॥ १६ ॥ पदातिसागपालां सेना प्रापि योजयेत् । हेमन्त शिशिरे चैव रथयाजिसमाकुलाम् सरोष्टबहुलां सेनां तथा ग्रीष्मे नराधिपः ॥ २० ॥ चतुरङ्गयलोपेतां घसन्ते पा शरद्यथ । सेना पदातियहुला यस्य स्यात्पृथिवीपतेः ॥२१॥ अभियोज्यो भवेत्तेन शावैधममाश्रितः । गम्ये वृक्षावृते देशे स्थितं शत्रुन्तथैव च । म ऽध्यायः] * अङ्गस्फुरणविवारवर्णनम् * किञ्चित् पड्डे तथा यायाद् बहुनागो नराधिपः । तथाश्वयहुलो यायाच्छयूँ समं पथिस्थितम् ॥ २३ ॥ तमाश्रयन्तो बहुलास्तांस्तु राजा प्रपूजयेत् । खरोष्ट्रबहुलो राजा शत्रून्धेन संस्थितः यन्धनस्थोऽमियोज्योऽरिस्तथाप्रावृषिभूभुजा । हिमपातयुते देशेस्थितंग्रीष्मेऽभियोजयेन् यघसेन्धनसंयुक्तःकाल.पार्थिव ! हैमनः । शरद्वसन्तीधर्मज्ञ ! कालीसाधारणणीस्मृती विज्ञाय राजा हितदेशकाली देवं त्रिकालञ्च तथैव बुध्या । यायात् परं कालविदा मतेन सञ्चिन्त्य साद्धं द्विजमन्त्रविद्भिः ॥२७॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे यात्राकालविधानवर्णनं नामो- नवत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः। चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः अगस्फुरणविचारवर्णनम् । मनुरघाव। धूहि मे त्वं निमित्तानि अशुभानि शुमानि च । सर्वधर्मभृतां श्रेष्ठ ! त्वहिसर्व विदुच्यते मत्स्य उपाव। अदक्षिणभागे तु शस्तं प्रस्फुरणम्भवेत् । अथ शस्तं तथा धामे पृष्टस्य हृदयस्य व मनुख्याचा अङ्गानां स्पन्दन्चैव शुभाशुभविवेष्टितम् । तन्मे विस्तरतो हि येन स्यात्तद्विधो भुवि मत्स्य उवाच। पृथ्वीलामो भवेन्मूनि ललाटेरपिनन्दन ! स्थानं विवृद्धिमायाति बनसोः प्रियसङ्गमः भृत्यलब्धियाक्षिदेशे दृगुपान्ते धनागम. । उत्कण्ठोपगमो मध्येद्रराजन् !विवक्षण: ग्यन्धने सारे व जयं शीघ्रमानुपान्। योषिद्वीगोऽपाइदेशे श्रवणान्ते प्रियाश्रुतिः
* मत्स्यपुराणम् * [ एकवत्वारिंशदधिकद्विशततमो
नासिकाया प्रीतिसौख्यंप्रजाप्तिरधरोष्ठजे । कण्ठे तु भोगलाभःस्याद्धोगबृद्धिरथांसयोः
सुहृत्स्नेहश्च बाहुभ्यां हस्ते चैव धनागम | पृष्ठे पराजयः सद्यः जयो पक्ष स्थले भवेत्
कुक्षिभ्यां प्रीतिमदिष्टा स्त्रियाः प्रजननं स्तने । स्थानभ्रंशो नाभिदेशे अन्वेचैवधनागमः
जानुसन्धी परैः सन्धिलवद्धिर्भवेन्नृप ! । दिशैकदेशनाशोऽथ जवायां रविनन्दन ! ॥
उत्तमं स्थानमामोति पट्यां प्रस्फुरणान्नृप !! सलाभञ्ाध्वगमनं भवेत्पादतले नृप!
लान्छनं पिटकञ्चैव ज्ञेयं स्फुरणवत्तथा । विपर्ययेण विहिता सर्वस्त्रीणां फलागमः ।
दक्षिणेऽपि प्रशस्तेऽङ्गे प्रशस्तं स्याद्विशेषतः ॥१२॥
अतोऽन्यथा सिद्धिप्रजल्पनात्तु फलस्य शस्तस्य च निन्दितस्य ।
अनिष्टचिह्नोपगमे द्विजाना कार्य सुवर्णेन तु तर्पणं स्यात् ॥ १३ ॥
इति धीमत्स्यपुराणेऽङ्गस्फुरण विचारवर्णनं नाम
चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।
एकचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
मनुमत्स्यसंवादे स्वमदर्शनवर्णनम् ।
मनुरुवाच।
स्वप्नारयानं कथ देव ! गमने प्रत्युपस्थिते । दृश्यन्तेविविधाकारा:कयन्तेषांफलमवेत्
मत्स्य उवाच।
इदानी फथयिष्यामि निमित्त स्वप्रदर्शने । नाभिं विनान्यगानेषु तृणवृक्षसमुद्घः ॥२॥
चूर्णनं मूनि फास्याना मुण्डनं नग्नतातथा । मलिनाम्यरधारित्वमभ्यगः पङ्कदिग्धता
उद्यात् प्रपतनश्चैव दोलारोहणमेव च । अर्जनं पकलोहानां हयानामपि मारणम् ॥४॥
रक्तपुष्पद्रुमाणाञ्च मण्डलस्य तथैव च । घराहक्षयरोष्ट्राणां तथा चारोहणक्रिया ॥५॥
मक्ष पफमांसानां तैलस्य पसरस्य च । नर्तनं हसनश्चय पिपाहो गीतमेघ ॥६॥
। . ऽध्यायः ] * स्वमदर्शनविचारवर्णनम् * तन्त्रीवाद्यविहीनानां पाद्यानामभिवादनम् । स्रोतोऽघगाहगमनं स्नानं गोमयवारिणा॥ पड़ोदकेन च तथा महीतोयेन चाप्यथ । मातुः प्रवेशो जठरे चितारोहणमेव च ॥ ८॥ शक्रध्वजाभिपतनं पतनं शशिसर्ययोः । दि यान्तरिक्षमामानामुत्पानाञ्च दर्शनम् ॥ ६॥ देवद्विजातिभूपालगुरूणां क्रोधएव च । वालिङ्गनं कुमारीणा पुरुषाणाञ्च मैथुनम् ।। हानिश्चैव स्थगात्राणा विरेकवमनक्रिया । दक्षिणाशाभिगमनं व्याधिनाभिभवस्तथा फलापहानिश्च तथा पुष्पहानिस्तथैव च । गृहाणाञ्चैव पातश्च गृहसम्मानन्तथा । क्रीडा पिशाचक्रव्यादवानरक्षनरैरपि । परादभिभयश्चैव तस्माच्च व्यसनोदय ॥१३॥ कापायवस्त्रधारित्वं तद्वत् स्त्रीकीडनन्तथा । स्नेहपानावगाहोच रक्तमाल्यानुलेपनम् एवमादीनि चान्यानि दुस्थानानि विनिर्दिशेत् । एषा सङ्कथन धन्य भूय प्रस्थापनन्तथा ॥१५॥ कल्कस्नानन्तिले हॉमो ब्राह्मणानाञ्च पूजनम् । स्तुतिश्च पासुदेवस्य तथा तस्यैव पूजनम् ॥ १६ ॥ नागेन्द्रमोक्षश्रवणं ज्ञेय दुस्वप्ननाशनम् । स्थमास्तु प्रथमे यामे सम्वत्सरविपाकिन ।। पभिर्मासै द्वितीये तु त्रिनिर्मासैस्तृतीयके । चतुथं मासमात्रेण पश्यतो नात्र संशय अरणोदयवेलाया दशाहेन फलम्भवेत् । एकस्या यदि पा रात्री शुभं चा यदिपाशुभम् पश्चाद्ष्टस्तु यस्तत्रतस्यपाकविनिर्दिशेत् । तस्माच्छोमनरेस्वप्नेपश्चात्स्वप्नोनपश्यति शैलमासादनागाश्ववृषभारोहणं हितम् । द्रुमाणा श्वेतपुप्पाणा गमने च तथा द्विज ! द्रुमतृणोद्भपो नाभी तथैव बहुवाहुता। तथैव बहुशीर्पत्व फलितोदय एव च ॥ २२ ॥ सुशुक्माल्यधारित्व सुशुलाम्बरधारिता । चन्द्राताराग्रहण परिमार्जनमेव च ॥ २३ ॥ शक्रध्वजालिङ्गनञ्च तदुच्छायनिया तथा । भूभ्यम्मुधीना प्रसनं शत्रुणाञ्च वधक्रिया । जयो विवादे द्यूते च सग्रामे च तथा द्विज!। मक्षणञ्चामासानां मत्स्याना पायसस्य च ॥ २५॥ दर्शन रुधिरस्यापि स्नान घा रुधिरेण च ! मुरारुधिरमद्याना पान क्षीरस्य चाथवा ឱ១០ * मत्स्यपुराणम् * [द्विचत्वारिंशदधिकद्विशततमो अन्त्रैर्वा वेष्टनं भूमौ निर्मलं गगनं तथा । मुखेन दोहनं शस्तं महिषीणां तथा गधाम् ॥ सिंहीनां हस्तिनीनाञ्च घडवानां तथैव च । प्रसादो देवविप्रेभ्यो गुरुभ्यश्च तथा शुभः अम्भसा त्वभिषेकस्तु गवां शृङ्गाश्रितेन वा । चन्द्राद् भ्रष्टेन पा राजन् ! शेयो राज्यप्रदो हि सः ॥२६॥ राज्याभिषेकश्च तथाच्छेदनं शिरसस्तथा । मरणं घहिदाहश्व वह्निदाहो गृहादिषु ॥३० लब्धिश्च राज्यलिङ्गानां तन्त्रीवाद्याभिवादनम् । तथोदकानां तरणं तथा विषमलवनम् ॥ ३१ ॥ हस्तिनीवडवानाञ्च गवाच प्रसवो गृहे । आरोहणमथाश्वानां रोदनञ्च तथाशुभम् ॥ घरस्त्रीणां तथालाभस्तथालिङ्गनमेव च । निगडैर्यन्धनं धन्यं तथा धिष्ठानुलेपनम् ॥ जीवितां भूमिपालानां सुहृदामपि दर्शनम् । दर्शनं देवतानाञ्च विमलानां तथाम्भसाम् शुभान्यथैतानि नरस्तु दृष्ट्वा प्राप्नोत्ययत्नादु ध्रुघमर्थलाभम् । स्वप्नानि वै धर्मभृतां घरिष्ठ ! व्याधेविमोक्षञ्च तथाऽऽतुरोऽपि ॥३५॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे मनुमत्स्यसंवादे स्वप्नदर्शनविचारवर्णनं नाम- कचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः । द्विचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः यात्राममये मङ्गलामङ्गलासूचकशकुनवर्णनम् । मनुरुवाच। गमनं प्रति राक्षान्तु संमुसादर्शने च किम् । प्रशस्तांश्चैव सम्भाष्य सर्वानेतांश्चकीर्तय मत्स्य उयाचा औषधानि त्वयुक्तानिधान्यं कृष्णश्चयदयेत् । फार्पासश्चतृणं राजन् ! शुष्कंगोमयमेवच इन्धनच तथागारं गुई तैलं तथा शुभम् । अभ्यकं मलिनं मुण्डन्तथानग्नश्श मानवम् ॥
ऽध्यायः] * मङ्गलामङ्गलासूचकशकुनपर्णनम् . मुक्तकेशं स्नातच कापायाम्बरधारिणम् । उन्मत्तकन्तथा सत्वं दीनञ्चाथ नपुंसकम् ॥ अयः पङ्कस्तथा चर्म केशबन्धनमेव च । तथैवोद्धृतसाराणि पिण्याकादीनि यानि च ॥ चण्डालश्वपवाश्चैव राजवन्धनपालकाः। पधकाः पापकर्माणो गर्मिणी स्त्री तथैवच तुपमस्मकपालास्थिभिन्नभाण्डानि यानि व | रक्तानि चैव भाण्डानि मृतशाकिमेवच एवमादीनि चान्यानि प्रशस्तान्यभिदर्शने । यशस्तो पाहाशब्दश्च मिन्नभैरवजर्जरः ॥ ८॥ पुरतः शब्द पहीति शस्यते न तु पृष्टतः ! गच्छेति पश्चात् धर्मजो! पुरस्तात्तुविहितः क यासि तिष्ठमा गच्छकिन्तेतत्र गतस्य तु । अन्ये शन्दाश्च ये निष्ठास्तेविपत्तिकरामपि ध्यज्ञादिषु तथास्थानं कन्यादानां विगर्हितम् । स्खलनं पाहनानाञ्च घस्नसङ्गस्तथैवच निर्गतस्य तु द्वारादौ शिरसश्चामिघातिता । छत्रध्वजानां पत्राणां पतनश तथा शुभम् दृष्टे निमिसे प्रथमममङ्गल्ययिनाशनम् । केशवं पूजययेद्विद्वान म्तयेन मधुसूदनम् ॥१३॥ द्वितीये तु ततोदृष्ट प्रतीपे प्रविशेगृहम् । अथेष्टानि प्रयश्यामि मगल्यानि तथाऽनघ ! श्वेताः सुमनसः श्रेष्ठाःपूर्णकुम्मास्तयेच च । जलजा-पक्षिणश्चैयमांसं मत्स्याश्चपचिः गायस्तुरङ्गमा नागा बद्ध एकापशुस्त्वजः । त्रिदेशाः सुहृदो विप्रा ज्वलितश्च हुताशनः गणिका च महाभाग ! दूर्वा चाईच गोमयम् । रुममाप्यन्तथा तानं सर्वरतानि चाप्यय ॥ १७ ॥ औपचानिय धर्मः ययाः सिद्धार्थफास्तथा । नृपारामानं यान भदपीठन्तथैव च ॥ पचकं पताका च मृदधायुधमेव च । राजलिङ्गानि सर्वाणि सर्वे सदितर्जिताः ॥ पुतं दधि पयश्चय फलानिविविधानि च । स्वम्ति पर्वमानच नन्यावतं सोम्नुभम् पादिवाणां सुराः शन्दः गम्भीरः मुमनोहरः । गान्धारपड्जमपमा ये च शम्तास्तथा पराः ॥२१॥ पायुः सशरोमक्षः सर्वत्र समुपस्थितः । प्रतिलोमम्तया नीचो विभेयोमयरदद्विज!! अनुकूलोमृदुःस्निग्धामुपम्पर्शःमुपायदः । मशारक्षम्पराभद्राः प्रन्यादा परिगच्छनाम् मेघाः शम्ताधना स्निग्धागादितसनिमाः । अनुलोमाम्सहिच्छन्नाशययापन्तयेपर .
* मत्स्यपुराणम् * [ त्रिचत्वारिंशदधिकद्विशततमो
अप्रशस्ते तथा शेये परिवेषप्रवर्षणे । अनुलोमा ग्रहाः शस्ता पाक्पतिस्तु विशेषतः ।।
आस्तिक्यं श्रद्दधानत्वं तथा पूज्यामिपूजनम् ।
शस्तान्येतानि धर्मज्ञ! यश्च स्यान्मनस' प्रियम् ॥ २६ ॥
मनसस्तुष्टिरेवान परमं जयलक्षणम् । एकतः सर्वलिङ्गानि मनसस्तुष्टिरकतः ॥ २७ ॥
मनोत्सुकत्वं मनसः प्रहर्षः शुभस्य लाभो विजयप्रवादः ।
मङ्गल्यलब्धिः श्रवणञ्च राजन् ! ज्ञेयानि नित्यं विजयावहानि ॥२८॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे यात्रासमये मङ्गलामङ्गलसूचकशकुनविचारवर्णनं नाम
द्विचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।
त्रिचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
वामनावतारचरित्रवर्णनम् ।
अपय ऊचु.।
राजधर्मस्त्वया सूत ! फथितो घिस्तरेण तु । तथैघागुतमङ्गल्यं स्वमदर्शनमेव च ॥ १॥
विष्णोरिदानी माहात्म्यं पुनर्वमिहार्हसि। कथं स धामनो भूत्वा धवन्ध बलिदानवम्
ममतः कीदृशं रूपमासीलोकत्रये हरेः।
सूत उवाच ।
पतदेव पुरा पृष्टः कुरक्षेने तपोधनः ॥ ३॥
शौनफस्तीर्थयात्रायां घामनायतने पुरा । यदा समयभेदित्वं द्रोपद्याः पाथिवं प्रति ॥ष्ट
अर्जुनेन एतन्तत्र तीर्थयात्रां तदा ययौ। धर्मक्षेत्रे पुरक्षेत्रे घामनायतने स्थितः ॥ ५॥
दृष्ट्वा स पामनस्तम अर्जुनो पाफ्यमनपीत् ।
अर्जुन उवाच ।
फिनिमित्तमयं देवो पामनारूतिरिज्यते ॥६॥
ऽध्यायः] * अदितिकृतभगवत्स्तुति: * घराहरूपी भगवान् कस्मात्पूज्योऽभवत्पुरा । कस्माच घामनस्येदमिष्टं क्षेत्रमजायत ॥ ७ ॥ शौनक उवाच। पामनस्यच पक्ष्यामि धराहस्यच धीमतः । पुरा निवारिते शके सुरेषु विजितेपु च ॥ चिन्तयामास देवानां जननी पुनरद्भवम् । अदिति देवमाता च परमं दुश्चरं तपः ॥ ॥ तीपञ्चचारधर्षाणां सहस्रं पृथिवीपते ! । माराधनाय कृष्णस्य पाताहारा हामोजना ॥ दैत्यनिराकृतान् दृष्ट्वा तनयान् कुरुनन्दन !। वृथा पुत्राहमस्मीति निर्वेदात्प्रपाताहरिम् तुष्टाय धाग्मिरिष्टाभिः परमार्थ नियोधने । देवदेवं हृषीकेशं नत्वा सर्वगतं हरिम् ॥१२॥ अदितिरुवाच। नमः स्मृतातिनाशाय नमः पुष्करमालिने । नमः परमकल्याणकल्याणायादिवेधसे ॥ नम पङ्कजनेत्राय नमः पङ्कजनामये । श्रियः कान्ताय दान्ताय दान्तदृश्याय चक्रिणे ॥ नमः पङ्कजसम्भूतिसम्भवायात्मयोनये । नमः शड्वासिहस्ताय नमः कनफरतसे ॥१५॥ तथात्मजातविज्ञातयोगिचिन्त्यात्मयोगिने । निर्गुणायाधिरोपाय हरये ब्राह्मरूपिणे ॥ जगत्प्रतिष्ठिनं यत्र जगता यो न दृश्यते । नमः स्थूलातिसूक्ष्माय तस्मै देवाय शशिन यन्न पश्यन्ति पश्यन्ती जगदप्यसिलन्नराः । अपश्यादि जगत्यत्र न देवोहदि संस्थितः यस्मिन्नन्न पयश्चैव नद्यश्चयासिलं जगत् । सस्मै समस्तजगतामाधाराय नमोनमः ॥१६॥ आद्यः प्रजापतिपतिः यः प्रभूणांपतिःपरः पतिः सुराणां यस्तम्मनमः कृष्णाय वेधसे यः प्रवृत्ती निवृत्तौ च इज्यते फर्ममिः स्वकैः । म्यर्गापवर्गफलदो नमस्तस्मै गदाभृते यचिन्त्यमानो मनसा सद्यः पापं व्यपोहति । नमस्तम्मे विशुद्धाय पराय परिवेधसे । यं युद्ध्या सर्वभूतानि देवदेवेशमव्ययम् । न पुनर्जन्ममरणे प्राप्नुपन्ति नमामि तम् ॥ शो यो यापरमैरिज्यते यासंमितः । तं यापुग्यं विष्णुं नमामि प्रभुमीश्याम् ॥ २४॥ गीयते सर्पदेयेषु पेदविष्तिपिदांपति । यस्तम्मै येदवेयाय विष्णये जिप्प नमः॥२९॥ यतोपिश्यं समुत्पन्नं यस्मिंध लयमेष्यति । विश्यागममतिष्ठाय नमस्तम्मै मदात्मने ।
६७४ * मत्स्यपुराणम् * [ त्रिचत्वारिंशदधिकद्विशततमो ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं येन विश्वमिदं ततम् । मायाजालं समुत्तर्तुन्तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् ।। यस्तु तोयस्वरूपस्यो विभय खिलमीश्वरः । विश्वं प्रजापति विष्णुन्तनमामिप्रजापतिम् यमाराध्य विशुद्धेन मनसा कर्मणा गिरा । तरन्त्यविद्यामखिलान्तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् ॥ विपादतोपरोपाद्यैर्योऽजस्रं सुखदुःखजैः । नृत्यत्यखिलभूतस्थस्तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् ॥३० मूर्त तमो सुरमयन्तद्वधात् विनिहन्ति यः । रात्रिरूपी सूर्यरूपी तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् ॥ यस्याक्षिणी चन्द्रसूर्यो सर्वलोकशुभाशुभम् । पश्यत. कर्म सततमुपेन्द्रं तं नमाम्यहम् ॥ यस्मिन् सर्वेश्वरे सर्व सत्यमेतन्मयोदितम् । नानृतं तमजं विष्णुं नमामि प्रभवाव्यम् यञ्चैतत्सत्यमुक्तं मे भूयांश्चातो जनार्दन ।सत्येन तेन सकलाः पूर्यन्तां मे मनोरथाः ॥ शौनक उवाच। एवंस्तुतः स भगवान् घासुदेव उवाच ताम् । अदृश्यः सर्वभूतानां तस्याःसन्दर्शनेस्थितः श्रीभगवानुवाच । मनोरथांस्त्वमदिते ! यानिच्छस्थमिवाञ्छितान् । तांस्त्वं प्राप्स्यसि धर्मशे! मत्प्रसादान संशयः ॥३६॥ शृणुष्व सुमहाभागे घरो यस्ते हदिस्थित । तमाशु प्रियतां कामं श्रेयस्ते सम्भविष्यति मदर्शनं हि विफलं न कदाचिद्भविष्यति ।। ३७ ॥ अदितिरुवाच । यदि देव ! प्रसन्नस्त्वं मद्भक्याभक्तवत्सल !। त्रैलोक्याधिपतिः पुत्रस्तदस्तुममवासवः हृतं राज्यं हताश्चास्य यशभागा महासुरैः । त्वयि प्रसन्ने घरदे तान् प्राप्नोतु सुतो मम हतं राज्यं न दुःनाय मम पुत्रस्य केशव! । सापत्न्यादायनिभ्रंशो वाधां न कुरते हदि श्रीभगवानुवाच । पन्तः प्रसादो हिमया तव देवि ! यथेप्सितः । स्वांशेन चैवतेगर्भसम्भविष्यामिकश्यपात् तव गर्भसमुद्भूतस्ततस्ते ये सुरारयः । तानहं निहनिप्यामि निवृत्ता भव नन्दिनि ! ॥ अतिदिण्याच। प्रसीद देव ! देवेशनमस्ते विश्वभाधन ! 1 नाहं त्यामुदरे देव ! पोढुंशश्यामिकेशप!
ऽध्यायः] * बलिमहादसंवादवर्णनम् * यस्मिन् प्रतिष्ठित विश्व योविश्र्षस्थयमीश्वरः । तमई नोदरेणत्या चोळशक्ष्यामिदुर्धरम् श्रीभगवानुवाच । सत्यमाथिमहाभागे ! मयिसर्वमिदं जगत् । प्रतिष्टितं न मां शक्काचोढुंसेन्द्रादिवौकसः कि त्यहं सकलान् लोकान् सदेवासुरमानुपान् । जङ्गमान् स्थावरान् सर्वान् त्याच देवि ! सकश्यपाम् ॥४६॥ धारयिष्यामि भदन्ते तदलं सम्प्रमेण ते । न ते ग्लानिन ते स्वेदो गर्भस्थे भवितामयि दाक्षायणि! प्रसादन्तेकरोम्यन्यासुदुर्लभम् । गर्भस्थेमयिपुत्राणां तव योऽभिभविष्यति तेजसस्तस्य हानिश्च करिष्ये मा व्यथां कृथाः ॥ ४८॥ शौनक उवाच। एवमुक्त्वा ततः सद्यो यातोऽन्तर्धानमीश्वरः । सापि कालेन तं गर्भमयाप कुरुसत्तम! गर्भस्थितेततः कृष्णेचचालसकला क्षितिः । चकम्पिरे महाशैला: क्षोमक्षग्मुस्तथाब्धयः यतो यतोऽदितिर्याति ददातिललितं पदम् । ततस्ततः क्षितिःस्वेदात् ननामवसुधाधिप! दैत्यनामय सर्वेषां गर्भस्थे मधुसूदने । यभूव तेजसां हानिर्यथोक्तं परमेष्टिना ।। ५२ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणेऽदित्यै भगवद्वरप्रदानं नाम त्रिचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः । चतुश्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः बलिप्रहादसंवादवर्णनम् । शौनक उवाच। निस्तेजसोऽसुरान् दृष्ट्वा समस्तानसुरेश्वरः । प्रादमथ पप्रच्छ बलिरात्मपितामहम् ।। यलिस्वाचा तात! निस्तेजसोदत्या निर्दग्धा इव घहिना । किमेते सहसंपाद्य ब्रह्मदण्डहता इव ॥२ * मत्स्यपुराणम् * [चतुश्चत्वारिंशदधिकद्विशततमो दुरिष्टं किन्नुदैत्यानांकिकृत्यावैरिनिर्मिता । नाशायैपासमुद्भूतायया निस्तेजसोऽसुराः शौनक उघाव। इति दैत्यपतिधीर पृष्टः पौत्रेण पार्थिव!। चिरन्ध्यात्वा जगादैनमसुरेन्द्र वलिन्तदा । चलन्ति गिरयो भूमिर्जहाति सहसा धृतिम् । सर्वसमुद्राक्षुभितादैत्यानिस्तेजस कृताः सूर्योदयो यथा पूर्व तथा गच्छन्ति न ग्रहाः । देवानाञ्च परा लक्ष्मीः कारणैरनुमीयते । महदेतन्महावाहो! कारप दानवेश्वर !। न ह्यल्पमिति मन्तव्यं त्वया कार्य सुरादन! शौनक उवाच । इत्युक्त्वा दानवपति प्रह्लाद. सोऽसुरोत्तमः । अत्यन्तभक्तो देवेशं जगाम मनसा हरिम् स ध्यानयोगं कृत्वाऽथ प्रह्लाद. सुमनोहरम् । विचारयामास ततो यतो देवजनार्दनः ॥ सद्दीदरेऽदित्या प्रह्लादो घामनाकृतिम् । अन्तस्थान विभ्रतं सतलोकानादिप्रजापतिम् तदन्तस्थान् घसून रद्रानश्विनी मरुतस्तथा । साध्यान् विश्वांस्तथादित्यान् गन्धर्षोरंगराक्षसान् ॥ ११ ॥ विरोवनं स्वतनयं वलिश्चातुरनायकम् । जम्भं कुजम्भं नरकं तत्रैवान्यान्महासुरान १२ आत्मानमुङ्गिगनं घायुमम्भो हुताशनम् । समुद्रान्चै द्रुमसरित्सरांसि च पशून्मृगान् घयोमनुष्यानखिलांस्तथैव च सरीसृपान् ॥ १३ ॥ प्रहाद उवाच । घत्स!ज्ञातं मया सर्व यदर्थं भवतामियम् । तेजसोहानिरुत्वन्ना तच्छृणु त्वमशेषतः ॥ देवदेवो जगद्योनिरयोनिर्जगदादिरन् । अनादिरादिविश्वस्य घरेण्यो घरदो हरिः ॥१५ परम्पराणां परमः परः परयतामपि । प्रमाणञ्च प्रमाणानां सप्तलोकगुरोर्गुरः ॥ १६ ॥ प्रभुः प्रभूणां परमः पराणामनादिमध्यो भाधाननन्तः । त्रैलोक्यमंशेन सनाथमेप कर्तु महात्माऽदितिजोऽघतीर्णः ॥ १७ ॥ न तस्य स्ट्रो न च पद्मयोनिर्नेन्द्रो न सूर्यन्दुमरीचिमुग्याः । जानन्ति दैत्याधिप ! यत्स्वरुपं स घासुदेवः कलयावतीर्णः ॥ १८ ॥ योऽसौ फलांशेन नृसिंहरूपी जघान पूर्व पितरं ममेशः ।
ध्यायः] * प्रहादकृतभगवत्स्तुतिः * यः सर्वयोगी शमनो निवासः स वासुदेवः कलयावतीर्णः ॥ १६ ॥ यमक्षरं वेदविदो विदित्वा विशन्ति यं ज्ञान विधूतपापाः । यस्मिन् प्रविष्टा न पुनर्भवन्ति तं घासुदेवं प्रणमामि नित्यम् ॥ २० ॥ भूतान्यशेषाणि यतो भवन्ति यथोर्मयस्तोयनिधेरजनम् । लय यस्मिन् प्रलये प्रयान्ति तं वासुदेवं प्रणमाम्यविन्त्यम् ॥ २१ ॥ न यस्य रूपं न बलप्रभावो न यस्य भावः परमस्य पुंसः । विज्ञायते शर्वपितामहाचैस्तं घासुदेवं प्रणमाम्यजस्त्रम् ॥ २२ ॥ रूपस्य चक्षुर्ग्रहणे त्यनिष्टा स्पर्श ग्रहित्री रसना रसस्य । श्रोत्रञ्च शब्दग्रहणे नराणां प्राणच गन्धग्रहणे नियुक्तम् ॥ २३ ॥ येनेकदंष्ट्राग्रसमुंद्धृतेयं धरावलान् धारयतीह सर्वान् । यस्मिंश्च शेते सकलं जगच तमीशमाद्यं प्रणतोऽस्मि विष्णुम् ॥२४॥ न प्राणग्राह्य. श्रवणादिभिर्यः सर्वेश्वरो वेदितुमक्षयात्मा । शक्यस्तमीड्य मनसैच देयं ग्राान्ततोऽहं हरिमीशितारम् ॥२५॥ अंशावतीर्णन व येन गर्ने हतानि तेजांसि महासुराणाम् । नमामि तं देवमनन्तमीशमशेषसंसारतरोः कुठारम् ॥२६॥ देवो जगद्योनिरयं महात्मा स पोडशाशेन महासुरेन्द्र !। स देवमातुर्जटर प्रविष्टो हतानि वस्तेन यलादपूपि ॥२७॥ पलिस्थाच। सात ! कोऽयं हरिनामयतो नोभयमागतम् । सन्ति मे शतशोदैत्या घासुदेघवलाधिकाः विप्रचित्ति. शियि शङ्करय शङ्कुस्तथैव च । अय.शिराश्चाश्यशिरा भड्कारो महाहनु । प्रतापः प्रधस. शम्भु कुकुरश्च सुदर्जय' । एते चान्ये च मे सन्ति दैतेया दानवास्तथा । महावला महावीर्या भूभारोद्धरणक्षमाः। एपामेकैकश कृष्णो न घीर्यार्द्धन सम्मित । शौनक उवाच । पोत्रस्येतद्वचः श्रुत्या ग्रहादो दैत्यपुङ्गव । धिग्धिगित्याह स बलि चैकुण्टाक्षेपवादिनम्
६७८
* मत्स्यपुराणम् * [चतुश्चत्वारिंशदधिकद्विशततमो
प्रहाद उवाच।
विनाशमुपयास्यन्ति मन्ये दैतेयदानवाः ! । येषां त्वमीदृशो राजा दुर्बुद्धिरविवेकवान् ।
देवदेवं महाभागं वासुदेवमजं विभुम् । त्वामृते पापसङ्कल्पः कोऽन्य एवं पदिष्यति ।
य एते भवता प्रोक्ताः समस्ता दैत्यदानवाः । सब्रह्मकास्तथा देवाः स्थावरानन्तभूमयः
त्वचाहञ्च जगञ्चेदं साद्रिद्रुमनदीनदम् । समुद्रद्वीपलोकाश्च न समं केशवस्य हि ॥३६॥
यस्यातिवन्धवन्द्यस्य व्यापिनः परमात्मनः । एकांशेन जगत्सर्वं कस्तमेवं प्रवक्ष्यति ॥
ऋते विनाशाभिमुखं त्वामेकमविवेकिनम् । कुबुद्धिमजितात्मानं वृद्धानां शासनातिगम्
शोच्योऽहं यस्य मे गेहे जातस्तवपिताधमः । यस्य त्वमीदृशः पुत्रो देवदेवस्यनिन्दका
तिष्ठत्येपा हि संसारसम्भृताधविनाशिनी । कृष्णेभक्तिरहन्तावदवेक्ष्य भवता नु किम् ।
न मे प्रियतम कृष्णादपिदेहोमहात्मनः । इति जानात्ययं लोको न भवादितिजाधम!
न जानासि प्रियतरं प्राणेभ्योऽपि हरिं मम । निन्दा करोपि तस्य त्वमकुर्वनगौरवमम
विरोवनस्तव गुरुर्गुरस्तस्याप्यहं वले ! ।
ममापि सर्वजगता गुरोनारायणो गुरु ॥ ४३ ॥
निन्दा करोपियस्तस्मिनकृष्णेगुरगुरोर्गुरौ । यस्मात्तस्मादिहैश्वर्यादविरा_शमेष्यसि
मम देवो जगनाथो चले! तस्माजनार्दनः । भवत्वहमुपेश्यस्ते प्रीतिमानस्तु मे गुरुः ॥
एतावन्मात्रमप्येव निन्दितो जगतोगुरु. । नावेक्षितं त्वया यस्मात्तस्माच्छापन्ददामिते
यथा मे शिरसः च्छेदादिदं गुरतरं पचः । त्वयोक्तमच्युताक्षेपि राज्यभ्रष्टस्तथा पत ॥
यथा च कृष्णान्न परं परित्राणं भवार्णये । तथाऽविरेण पश्येयं भवन्तं राज्यविच्युतम्
शौनक उवाच ।
इति दैत्यपति. श्रुत्वा गुरोर्वचनमप्रियम् । प्रसादयामास गुरुं प्रणिपत्य पुनः पुनः ॥
यलिरयाच।
प्रसीद तात! मा कोपं कुरु मोहहते मयि । यलायलेपमत्तेन मयतद्वाश्मीरितम् ॥५०॥
मोहोपहतविज्ञानः पापोऽहं दितिजोत्तम!।
यच्छप्तोऽस्मि दुराचारस्तत्साधु भवता स्तम् ॥ ५१ ॥
६७६ ध्यायः] * ग्रहास्तवामनस्तुतिः * राज्यभ्रंशं वसुभ्रशं प्राप्ययन तथाप्यहम् । विषण्णोऽस्मि यथा तात! तथैवाधिनयेते त्रैलोक्यराज्यमेश्वर्यमन्यद्वा नातिदुर्लभम् । संसारे दुर्लमास्ते तु गुग्यो ये भवद्विधाः तत्प्रसीद न मे कोपं कर्तुमर्हसि दैत्यप!। त्वत्कोपदृष्टया ताताहं परितप्ये न शापतः । प्रहाद उवाच। चत्स ! कोपो न मोहेन जनितस्तेन ते मया । शापोदत्तो विवेकश्च मोहनापहृतोमम । यदि मोहेन में ज्ञाननक्षिप्तं स्यान्महासुर!। तत्कथं सर्वगं जाननहरिकिञ्चिच्छपाम्यहम् योऽयं शापो मयादत्तो भवतोऽसुरपुङ्गच ! भान्यमेतेन नूनन्ते तस्मान्मात्यविपीद बै अद्य प्रभृति देवेशे भावत्यच्युते हरौ । भवेथा भक्तिमानीशे स ते त्राता भविष्यति ॥ शापं प्राप्याथ मां धीर! संस्मरेथाः स्मृतस्त्वया । तथा तथा यतिष्येऽहं श्रेयसा योज्यसे यथा ॥ ५६ ।। एवमुक्त्वा स दैत्येन्द्र विरराम महाद्युतिः । अजायत सगोविन्दो भगवान् घामनाकृतिः अवतीर्णे जगन्नाथे तस्मिन् सर्वामरेश्वरे । देवाश्च मुमुचुर्दुःखं देवमाताऽदितिस्तथा ॥ पधुर्याताः सुखरूपर्शा विरजस्कमभून्नमः । धर्मे च सर्वभूतानां तदा मतिरजायत ॥६२ नागश्चाप्यभूतत्र मनुजेन्द्रासुरेष्वपि । तदादि सर्वभूतानां भूम्यम्यरदिवौकसाम् ॥६३ तं जातमात्रेभगवान ब्रह्मा लोकपितामहः । जातकर्मादिकं कृत्वा कृष्णं दृष्ट्वाच पार्थिच! नुशाव देवदेवेशभूपीणाञ्चैव शृण्वताम् ॥ ६४॥ ब्रह्मोवाच । जयायेश! जयाजय जय सर्वात्मकात्मक । जय जन्मजरापेत! जयानन्त! जयाच्युत! जयाजित! जयामेय ! जयाव्यक्तस्थिते ! जय । परमार्थार्थसर्वज्ञ! ज्ञानज्ञेयात्मनि स्त! जयाशेष! जगत्साक्षिन् ! जगत्कर्तः ! जगद्गुरो! जगतोऽस्यान्तद्देव स्थितिं पालयितुं जय ।। ६७ ॥ जयाशेष! जयाशेष! जयाखिल ! हदिस्थित!। जयादिमध्यान्त ! जय सर्वज्ञाननिधे ! जय ॥ ६८॥ मुमुक्षुमिरनिर्देश्य ! स्वयं दृष्टजनेश्वर !! योगिनां मुक्तिफलदक ! दमादिगुणभूपण .
* मत्स्यपुराणम् * [चतुश्चत्वारिंशदधिकद्विशततमो जयातिसूक्ष्म ! दुर्शेय ! जयस्थूल ! जगन्मय! । जय स्थूलातिसूक्ष्म ! त्वं जयातीन्द्रिय ! सेन्द्रिय ! ॥७॥ जय स्वमायायोगस्थ ! शेपभोग! जयाक्षर! जयैकदंष्ट्राप्रान्ताग्रसमुद्धृतवसुन्धर! ॥ नृकेसरिन् !जयारातिवक्षस्थलविदारण! |साम्प्रतंजयविश्वात्मन्! जयवामन! केशव! निजमायापटच्छन्न ! जगन्मूर्ते! जनार्दन !! जयाजित ! जयानेकस्वरूपैक विध!प्रभो! पर्द्धस्व पर्धिताशेपविकारप्रकृते ! हरे ! । त्वय्येपा जगतामीशे संस्थिता धर्मपद्धतिः । न त्वामहं न वेशानो नेन्द्राद्यास्त्रिदशा हरे ! । न ज्ञातुमीशा मुनयः सनकाद्यानयोगिनः त्वन्मायापटसम्वीते जगत्यत्र जगत्पते!। कस्त्वां वेत्स्यति सर्वेश त्वत्प्रसादंविना नरः त्वमेवाराधितो येन प्रसादसुमुख ! प्रभो!। स एकः केवलो देव ! वेत्तित्वानेतरेजनाः नन्दीश्वरेश्वरेशान ! प्रभोवर्धस्ववामन!! प्रभवायास्यविश्वस्यविश्वात्मन् ! पृथुलोवन! शौनक उवाच । एवं स्तुतो हुपीकेशः स तदा पामनातिः । प्रहस्य भावगम्भीरमुवाचाजसमुद्भवम् ॥ स्तुतोऽहं भवता पूर्वमिन्द्राद्यैः कश्यपेन च । मया च यः प्रतिज्ञातमिन्द्रस्य भुवनत्रयम् भूयश्चाहं स्तुतोदेव्यातस्याश्चापिप्रतिश्रुतम् । यथाशकाय दास्यामित्रैलोक्यंहतकण्टकम् सोऽहन्तथा फरिप्यामिमहेन्द्रोजगतः पतिः । भपिप्यति सहस्राक्ष.सत्यमेतद्ब्रवीमिवः ततः कृष्णाजिनं ब्रह्मा हुपीकेशाय दत्तवान् । यज्ञोपवीतं भगवान् ददौ तस्मै वृहस्पतिः ॥ ८३ ॥ आषाढमददाइण्डं मरीचिह्मणः सुतः । कमण्डलं घसिष्ठश्च कोशं वेदमथाङ्गिराः ॥ अक्षसूबञ्च पुलह. पुलस्त्यः सितयाससी । उपतस्थुश्च तं वेदाः प्रणयोचारभूपपाः ॥ शास्त्राण्यशेषाणितथासांख्ययोगोक्तयश्चयाः । सवामनोजटीदण्डीछत्रीधृतकमण्डलुः सर्गदेवमयो भूत्वा चलेरध्वरमभ्यगात् । यत्र यत्र पदम्भूयो भूभागे धामनो ददी ॥८॥ ददाति भूमिर्षियरं तत्र तत्रातिपीडिता । स पामनो जड़गतिदु गच्छन् सपर्वताम् ।। सान्धिद्वीपयती सर्वाचालयामास मेदिनीम् ॥ ८८॥ इतिश्रीमत्स्यपुराणे पामनप्रादुर्भापवर्णनं नाम चतुम्धत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यापः पञ्चचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः बलिशुक्रमन्त्रणम् । शौनक उवाच । सपर्वतमनामूर्वी दृष्ट्वा संक्षोभिता बलि' | पप्रच्छोशनसं शुद्ध प्रणिपत्य कृताञ्जलिः ॥१॥ आचार्य! क्षोभमायाता सान्धिभूभृद्धना मही । फरमाश नासुगन् भागान प्रतिगृह्णन्ति वह्नयः ॥२॥ इति पृष्टोऽथ यलिनाकाव्योवेदविदाम्बरः । उवाच दैत्याधिपति चिरन्ध्यात्यामहामतिः अवतीणों जगद्योनिः कश्यपस्य गृहे हरि । घामनेनेह रूपेण जगदात्मा सनातनः ॥४॥ स एप यज्ञमायाति तब दानवपुङ्गच !। तत्पादन्यासविक्षोभादियं प्रचलिता मही ॥५॥ फम्पन्ते गिरयश्चामी क्षुभितो मकरालयः । नैनं भूतपति भूमि सर्वार्था चोदुमीश्वरम् सदेवासुरगन्धर्वा यक्षराक्षसकिन्नरा । अनेनैव धृता भूमिरापोग्नि पवनो नभः ॥७॥ धारयत्यखिलान् देवो मन्त्रादीश्च महासुरः । इयमेव जगद्धेतोर्माया कृष्णस्य गह्वरी॥ धार्यधारकभावेन यया संपीडितं जगत् । तत्सन्निधानादसुरा भागार्हा नासुरोत्तम !॥ भुञ्जते नासुरान् भागानमी ते नैच चाग्नयः ॥ ६ ॥ बलिरुवाच। धन्योऽहं कृतपुण्यश्च यन्मे यज्ञपति स्वयम् । यज्ञमभ्यागतो ब्रह्मन् । मत्त कोऽन्योधिक. पुमान् ॥१०॥ यं योगिनः सदा युका परमात्मानमव्ययम् । द्रष्टुमिच्छन्तिदेवेशं स मेऽध्यरमुपैष्यति होताभागप्रदोऽयश्च यमुद्गाता च गायति । तमध्यरेश्वरं विष्णुं मन कोऽन्य उपैष्यति। सर्धेश्वरेश्वरे कृष्णे मध्यरमुपागते । यन्मया काव्य । कर्तव्यं तन्ममादेष्टुमर्हसि ॥१३ " शुक्र उवाच। यज्ञभागभुजो देवा वेदप्रामाण्यतोऽसुर! त्वया नु दानवा देत्या मखभागभुज. कृता.
દંત્ર * मत्स्यपुराणम् * [ पञ्चचत्वारिंशदधिकद्विशततमो अयञ्च देवः सत्वस्थः करोति स्थितिपालनम् । विसृष्टेरनुवान्नेन स्वयमत्ति प्रजाः प्रभुः त्वत्कृते भविता नूनं देवोविष्णु स्थिती स्थितः । विदित्वेतन्महाभाग! कुरुयत्नमनागतम् त्वयाहिंदैत्याधिपते !स्वल्पकेऽपिहिवस्तुनि । प्रतिज्ञान हिवोढव्यावाच्यसामवृथाफलम् नालन्दातुमहं देव ! दैत्य ! पाच्यंत्वया पवः । कृष्णस्य देवभूत्यर्थंप्रवृत्तस्य महासुर! बलिरुवाच । ब्रह्मन् ! कथमहं ब्रूयामन्येनापिहि यावित । नास्तीति किमु देवेन संसाराधौघहारिणा व्रतोपवासविविध. प्रतिसंग्राह्यतेहरिः । स चेद्वक्ष्यतिदेहीतिगोविन्दः किमतोऽधिकम् यदर्थमुपहाराद्या तपः शोचगुणान्वितैः । यज्ञा. क्रियन्ते देवेशः स मां देहीति पक्ष्यति तत्साधु सुकृत कर्म तप सुचरित मम । यन्मया दत्तमीशेश' स्वयमादास्यते हरिः ।। नास्ति नास्तीत्यहं पक्ष्ये तमप्यागतमीश्वरम् । यदा घञ्चामि तं प्राप्तं वृथा तन्जन्मन. फलम् ॥ २३॥ यशेऽस्मिन्यदि यज्ञेशो याचते मा जनार्दन । निजमूनिमप्यत्र तहास्याम्यविचारितम् नास्तीति यन्मया प्रोक्तमन्येषामपि याचताम् । वक्ष्यामि कथमायाते तदनभ्यस्तमुच्यते श्लाघ्य एव हि वीराणां दानादापत्समागम. 1 नावाधकारि यहानं तदङ्गमलवत्स्मृतम् मद्राज्येनासुरली फश्चिन्न दरिद्री नवातुरः । नाभूपितो न बोद्विग्नो नस्रगादिविधर्जितः हृष्टस्तुष्टः सुगन्धिश्च तृम सर्वसुखान्वितः । जन सर्वो महाभाग ! किमुताहंसदासुसी पतद्विशिष्टपात्रोऽयं दानयीजफलं मम । विदितं भृगुशार्दूल ! मयतत्त्वत्प्रसादतः ॥२६॥ पतहि जानता दानवीजं पतति चेद्गुरो ! । जनार्दनमहापात्रे किन्न प्राप्तन्ततो मया ॥ भत्तो दानमवाप्येशो यदि पुष्णाति देवताः । उपभोगाइशगुणं दानं लाभ्यतमं मम ॥ मत्प्रसादपरो नूनं योनाराधितो हरिः । तेनाभ्येति न सन्देहो दर्शनादुपकारकृत् ॥ अथ फोपेन चाभ्येति देवभागोपरोधिनम् । मां निहन्तुमनाश्चैव वधः लाम्यतरोऽव्युतात् ॥ ३३ ॥ तन्मयं सर्वमेवेदं नाप्राप्यं यस्य विद्यते । स मां याचितुमभ्येति नानुग्रहमृते हरिः।। य. मृजत्यात्मभूः सर्पञ्चेतसंघ च संहरेत् । स हन्तुं हषीकेश फयं यज्ञ फरिप्यति ध्यायः] * वामनाय पदत्रयभूमिदानम् * एतद्विदित्वा न गुरो ! दानविनकरेण च । त्वया भाव्यं जगन्नाथे गोविन्दे समुपस्थिते शौनक उवाच । इत्येवं बदतस्तस्य संप्राप्तः स जगत्पतिः । सर्वदेवमयो चिन्त्यो मायावामनरूपधृक् ॥ तं दृष्ट्वा यज्ञवाटान्त प्रविष्मराः प्रभुम् । जग्मुः सभासदः क्षोभन्तेजसातस्यनिष्प्रभाः जेपुश्च मुनयस्ता ये समेता महाध्वरे । वलिश्चैवापिलं जन्म मेने सफलमात्मनः ।। तत. संक्षोभमापन्नो न कश्चित्किञ्चिदुक्तवान् । प्रत्येक देवदेवेशं पूजयामास चेतसा । अथासुरपति प्रहं दृष्ट्वा मुनिचरांश्च तान् । देवदेवपतिः साक्षी विष्णुमिनस्पधृक् ॥४१ तुष्टाव यशवहिश्च यजमानमत्विज ! यज्ञकर्माधिकारस्थान सदस्यान् द्रव्यसम्पदः ।। ततः प्रसन्नमखिलं वामन प्रतितत्क्षणात् । यसवाटस्थितं पीः साधु साचित्युदीरयन् स चार्धमादाय वलिः प्रोद्भुतपुलकस्तदा । पूजयामास गोविन्दं प्राह चेदं महासुर ॥ बलिरधाव। सुवर्णरनसंधातं गजाश्यममितन्तथा । स्त्रियोवस्त्राण्यलङ्कारांस्तथा ग्रामांश्चपुष्कलान् सर्वस्वं सकलामुधी भवतो चा यदीप्सितम् । तद्ददामि शृणुप्य त्वं येनार्थीवामन.प्रियः इत्युक्तो दैत्यपतिना प्रीतिगर्भान्वितं वव । प्राह सस्मितगम्भीर भगवान् घामनाकृतिः ममानिशरणार्थाय देहि राजन् ! पदत्रयम् । सुवर्णग्रामरतानि तदर्थभ्य. प्रदीयताम् ॥ ४८ ॥ घलिरचाव। त्रिभि प्रयोजन किन्ते पादै. पदवताम्बर । शतं शतसहस्राणा पदाना मार्गता भवान् ॥ ४॥ चामन उधाचा 7 एतापतेव दैत्येन्द्र ! कृतकृत्योऽस्मि मार्गताम् । अन्येषामधिनां वित्तमोहितं दास्यते भवान् ।। ५०५ एतच्च त्वा तु गदितं धामनत्य महात्मनः । ददौ तस्मैमहाबाहु मिनायपदत्रयम्।। पाणोतु पतिते तोये धामनोऽभूदवामनः । सर्वदेवमयं रूपं दर्शयामास तत्क्षणात् ॥५६ - ॥ ६८४ * मत्स्यपुराणम् * [ पञ्चवत्वारिंशदधिकद्विशततमो चन्द्रसूर्योच नयनेद्योा वरणी क्षितिः । पादाङ्गुल्यःपिशाचास्तुहस्ताङ्गुल्यश्चगुह्यकाः विश्वेदेवाश्च जानुस्था जड्ये साध्याः सुरोत्तमाः । यक्षा नखेषु सम्भूता रेखाश्चाप्सरसस्तथा ॥ ५४ ॥ दृष्टो ऋक्षाण्यशेषाणि केशाः सूर्याशवः प्रभोः । तारकारोमकूपाणिरोमाणिच महर्षयः याहयो विदिशस्तस्य दिश धोत्रे महात्मनः । अश्विनी श्रवणेतस्यनासावायुमहात्मन. प्रसादश्चन्द्रमा देवो मनोधर्मः समाश्रितः । सत्यं तस्याभवद्वाणी जिला देवी सरस्वती ग्रीचा दिति देवमाता विद्यास्तद्वलयस्तथा । स्वर्गद्वारमभून्मत्रं त्वष्टा पूपाच वै भ्रुवी।। मुखं वैश्वानरश्चास्य वृपणी तु प्रजापतिः । हृद्यञ्चपरं ब्रह्मपुंस्त्वं चै कश्यपो मुनिः ।। पृष्ठेऽस्यवसवो देवा मरुत. सर्वसन्धिषु । सर्वसूक्तानि दशनाज्योतीपि विमलप्रभाः ॥ वक्षस्थले महादेवो धैर्ये वास्य महार्णवाः । उद्रेचास्यगन्धर्वाः सम्भूताश्चमहाबलाः लक्ष्मीमधाधृति कान्ति. सर्व विद्याश्चचै कटिः । सर्वज्योतीपिजानीहि तस्य तत्परम्महः तस्यदेवाधिदेवस्य तेजः प्रोद्भूतमुत्तमम् । स्तनोकुक्षी च वेदाश्च उदरञ्च महामसाः। इष्टयः पशुवन्धाश्च द्विजानां वीक्षितानि च । तस्य देवमयंरूपं दृष्ट्वा विष्णो महायलाः ॥ उपासर्पन्त दैत्येन्द्रा. पतङ्गा इव पावकम् । प्रमथ्य सर्वानसुरान् पादहस्ततलैविभुः ॥ कृत्वारूपं महाकायं जहाराशु समेदिनीम् । तस्य विक्रमतो भूमि चन्द्रादित्यो स्तनान्तरे नामी विक्रममाणस्य सक्थिदेशस्थितावुभौ । परं विक्रमतस्तस्य जानुमूले प्रभाकरीn विष्णोरास्तांमहीपाल ! देवपालनकर्मणि । जित्या लोकत्रयं कृत्स्नंहत्वावासुरपुगवान् पुरन्दरायनैलोक्यं ददी विष्णुर्जगत्पति । सुतलं नाम पातालमधस्ताद्वसुधातलात् ।। चलेर्दत्तं भगवता विष्णुना प्रभविष्णुना । अथ दैत्येश्वरं प्राह विष्णुः सर्वेश्वरेश्वरः ॥ यत्त्वयासलिलं दत्तगृहीतंपाणिनामया । कल्पप्रमाणे तस्मात्ते भविष्यत्यायुरत्तमम् ।। वैवस्वते तथातीते यले ! मन्वन्तरेद्यय । सावर्णिके तु सप्राप्त भवानिन्द्रो भविष्यति। साम्प्रतं देवराजाय त्रैलोक्यं सकलं मया। दत्तं चतुर्युगानाञ्च साधिका ोकसप्तति ॥ नियन्तव्या मया सर्वे येतस्य परिपन्थिनः 1 तेनाहं परयामत्या पूर्वमाराधितो यले. ॥ । सुतलंनाम पातालं त्वमासाद्यमनोरमम् । घसासुर! ममादेशं यथावत्परिपालयन् ७५॥
ऽध्यायः যবিযিনা ৫ तप दिरापनापने प्रामारामदरे । प्रवासात सयमसरिधरे ॥ ७ ॥ मुगन्यिधुपयापरामरणभूपिन । कानन्दनादिमुनितो गगनृत्यमनोरमे ॥ २ ॥ पानासमोगान् विविधान् उपभुदश्य महासुर! । ममाया फाटमिमं तिष्ठत्यं मनतं गृतः ।। ७८ ॥ यापरसुर विधान विरोधं फरिष्यसि । शायदेतानमामोगानपामयसि महामुर! यदाच देपविमाणाविरोधं करिष्यामि । यधिप्पन्तितदापाशावागणाम्त्यामसंशयम् धनजिदित्या भपता ममग्न. 17 विरोधः मुरैः फाप्यों पिप्रर्या दैत्यसत्तम! इत्येवमुको देयग विष्णुना प्रभविष्णुना । परिःप्राद महाराज ! प्रणिपन्य मुदायुतः ॥ यलियावा तत्रासतो में पाताले भगवा ! भवदारया । कि भविष्यत्युपादानमुपभोगोपपादपम् श्रीभगवानुपाचा নামিথিলার প্লান্যাগিলি । हुनान्यदया यानि तानि दाम्पन्ति ने फलम् ॥ ८५ ॥ अदशिणास्तथा यशः मियाधाविधिना ता । फलानि तव दास्यन्ति अधीतान्यवतानि ॥८॥ शानक उपाया यलेयरमिमं दत्त्या शकाय प्रिदिपं तथा । व्यापिना तेन रूपेण जगामादर्शनं हरि। प्रशशाप्तययापूर्वमिन्द्रम्प्रैलोरपूजित । सिपेयेच परान् फामान्यलि.पातालसंस्थितः रहेय देवदेयेन योऽसौदागयोत्तमः । देवाना फायफरणे भूयोऽपि जगति स्थितः ॥ सम्बन्धी ते महाभाग द्वारकाया व्यवस्थित. 1 दानवानांधिनाशायभागवतरणाय च गतोयदुकुले कृष्णा भवतः शनिग्रहे । सहायभूतः सारध्यं करिष्यति बलानुजः ।। एतत्सय समारयात धामनस्य च धीमत । अवतारं महावीर ! श्रोतुमिच्छोस्तवार्जुन! अर्जुन उवाच। श्रुतवानिह ते पृष्टं माहात्म्यं केशवस्य च । गङ्गाद्वारमितो यास्याम्यनुज्ञां देहि मे विभो ६८६ * मत्स्यपुराणम् *[पट्चत्वारिंशदेधिकद्विशततमो एवमुच्चा ययौ पार्थो नैमिषं शौनको गतः ॥ १२ ॥ सूत उवाच। इत्येतद्देवदेवस्य विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् । वामनस्य पठेद्यस्तु सर्वपापै. प्रमुच्यते ॥६३ बलिप्रहादसंवादं मन्त्रितं बलिशुक्रयोः । पलेविष्णोश्च कथितं यः स्मरिष्यति मानवः नाधयोव्याधयस्तस्यनच मोहाकुलंमनः। भविष्यतिकुरुश्रेष्ठ! पुंसस्तस्य कदाचन ॥६५ च्युतराज्यो निजं राज्यमिष्टाप्तिञ्च वियोगवान् । अवाप्नोति महाभागो नर. श्रुत्वा कथामिमाम् ॥ ६ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे घामनवरित्रपठनश्रवणफलवर्णनं नाम पञ्चचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः । षट्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः वराहावतारविषयेऽर्जुनप्रश्नः। अर्जुन उवाच । 'प्रादुर्भावान् पुराणेषु विष्णोरमिततेजस । सतां कथयतां विप्र धाराह इति नः श्रुतम् न जाने तस्यचरितं न विधि नच विस्तरम् । न कर्मगुणसंस्थानं न चाप्यन्तंमनीषिणः किमात्मको घराहोऽसौ किं मूर्ति कास्य देवता । किं प्रमाण. किं प्रभाव. किं पा तेन पुरा कृतम् ॥ ३॥ एतन्मे शंस तत्वेन पाराहं श्रुतिविस्तरम् । यथार्हश्च समेताना द्विजातीनां विशेषतः ॥ शौनक उचाव। पतत्ते कथयिष्यामि पुरा ब्रह्मसम्मितम् । महावराहवरितं कृष्णस्याभुतकर्मण. ॥४॥ यथा नारायणो राजन् ! पाराहं घपुरास्थितः । दंनया गां समुद्रस्थामुनहारारिमर्दनः छन्दोगीमिल्दारामिः श्रुतिभिःसमलट्कृत । मन प्रसन्नता इत्या निरोध विजयाधुना इदं पुरा परमं पुण्यं देव सम्मितम् । नानाश्रुतिसमायुक्त नास्तिकाय न फीर्तयेत् ॥
ऽध्यायः * घराहावतारस्य पूॉपक्रमवर्णनम् * ६८७ पुराणं वेदमखिलं साड्य योगच वेद यः । फात्स्न्येन विधिना प्रोक्तं सौरयाय वै पदिप्यति ॥ ६॥ विश्वेदेवास्तथा साध्या रुद्रादित्यास्तथाश्विनौ । प्रजानां पतयश्चैव सप्त चैव महर्षयः । मनः सङ्कल्पनाचैव पूर्वजा ऋषयस्तथा । घसयो मस्तश्चैव गन्धर्वा यक्षराक्षसाः ॥ दैत्याः पिशावा. नागाश्च भूतानि विविधानि च । ब्राह्मणाः क्षत्रियाः वैश्याः शूद्राः म्लेच्छाच ये भुवि ॥ १२ ॥ चतुष्पादानिसर्वाणितिर्यग्योनिशतानि च । जगमानिचसत्यानियञ्चान्यजीवसंज्ञितम् 'पूर्ण युगसहस्र तु ब्राह्मेऽहनि तथागते । निर्वाणे सर्वभूतानां सर्वोत्पातसमुद्भवे ॥ हिरण्यरेतास्त्रिशिखस्ततो भूत्वा वृषाकपिः । शिखाभिर्विधर्मंलोकानशोपयत वह्निना दह्यमानास्ततस्तस्य तेजोराशिमिरुद्गतः । विवर्णवर्णादग्धाङ्गा हतामिद्विराननैः ॥ साङ्गोपनिषदो वेदा इतिहासपुरोगमाः । सर्वविद्याः क्रियाश्चैव सर्वधर्मपरायणाः ॥१७ ब्रह्माणमप्रतः कृत्वा प्रभवं विश्वतोमुखम् । सर्वदेवगणाश्चैव त्रयस्त्रिंशत्तु कोटयः ॥१८ तस्मिनहनि संप्राप्ते तं हसं महदक्षरम् । प्रविशन्ति महात्मानं हरि नारायणं प्रभुम् ।। तेषां भूयः प्रवृत्तानां निधनोत्पत्तिरुध्यते । यथा सूर्यस्य सततमुदयास्तमने इह ॥ २०॥ पूर्ण युगसहनान्ते सर्वे निशेष उच्यते । यस्मिन् जीवकृतं सर्वे निःशेष समतिष्ठत ॥ संहृत्य लोकानपिलान् सदेवासुरमानुपान् । कृत्वामुसंस्थां भगवानास्तएकजगद्गुरुः स स्रष्टा सर्वभूतानां फल्पान्तेषु पुनः पुन' । अव्ययः शाश्वतो देवो यस्यसर्वमिदंजगत् नपार्क किरणो लोके चन्द्रग्रहविर्जिते । त्यक्तधूमाग्निपचने क्षीणयज्ञयक्रिये ॥ २४ ॥ अपक्षिगणसम्पाते सर्वप्राणिहरे पथि । अमर्यादाकुले रोद्रे सर्घतस्तमसावृते ॥ २५ ॥ अदृश्ये सर्वलोकेऽस्मिनभाये सर्वकर्मणाम् । प्रशान्ते सर्वसम्पाते नष्टे वैरपरिग्रहे ।। गते स्वभावसंस्थाने लोके नारायणात्मके। परमेष्ठी हषीकेशः शयनायोपचक्रमे ||Poit पीतवासा लोहिताक्ष कृष्णो जीमूतसग्निमः । शिपासहनविकचजटाभार समुहहन् ॥ २८॥ श्रीवत्सलक्षणधरं रक्तचन्दनभूषितम् । पक्षो विम्रन्महाबाहुः स विष्णुरिच तोयदः ।।
* मत्स्यपुराणम् * [ सप्तचत्वारिशदधिकद्विशततमो पुण्डरीकसहस्त्रेण स्नगस्य शुशुभे शुभा। पत्नी चास्य स्वयं लक्ष्मीदेहमावृत्यतिष्ठति ॥ ततः स्वपिति शान्तात्मा सर्वलोके शुभावहः । किमप्यमितयोगात्मा निद्रायोगमुपागतः ततो युगसहस्रे तु पूर्णे स पुरुषोत्तमः । स्वयमेव विभुर्भूत्वा बुध्यते विबुधाधिपः ॥ ततश्चिन्तयते भूयः सृष्टि लोकस्य लोककृत् । नरान् देवगणांश्चैव पारमेष्ठ्येन कर्मणा तत सञ्चिन्तयन् कार्य देवेषु समितिञ्जयः । सम्भवं सर्वलोकस्य विदधाति सतांगतिः कर्ता चैव विकर्ता च संहर्ता वै प्रजापतिः । नारायणं परं सत्यं नारायणः परं पदम् ॥ नारायणः परो यज्ञो नारायणः परा गतिः । स स्वयम्भूरिति शेयः स मष्टाभुवनाधिपः स सर्वमिति विज्ञेयो ोप यज्ञः प्रजापतिः । यद्वेदितव्यस्त्रिदशेस्तदेव परिकीर्त्यते ॥ यत्तु वेद्यं भगवतो देवा अपि न तद्विदुः । प्रजानां पतयः सर्वे ऋषयश्च सहामरैः ॥ नास्यान्तमधिगच्छन्ति विचिन्वन्त इति श्रुति. । यदस्य परमं रूपं न तत्पश्यन्तिदेवताः प्रादुर्भावे तु यद्रूपन्तदर्चन्ति दिवौकसः । दर्शितं यदि तेनैव तदवेक्ष्यन्ति देवताः ॥४० यन्न दर्शितवानेप कस्तदन्वेमीहते । ग्राम्याणां सर्वभूतानामग्निमास्तयोर्गतिः ॥ ४१ ॥ तेजसस्तपसश्चैव निधानममृतस्य च। चतुराश्रमधर्मेशश्चातुर्होत्रफलाशनः ॥ ४२ ॥ चतु सागरपर्यन्तश्चतुर्युगनिवर्तकः । तदेष सहृत्य जगत्कृत्वा गर्भस्थमात्मन. ॥ मुमोचाण्डं महायोगी धृतं घर्षसहस्रकम् ॥ ४३ ॥ सुरासुरद्विजभुजगाप्सरोगणैर्दु मौषधिक्षितिधरयक्षगुह्यकः । प्रजापति श्रुतिभिरसङ्कलं तदा स वै सृजजगदिदमात्मना प्रभुः ॥ ४४ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे घराहावतारस्यपूर्वोपक्रमवर्णनं नाम पट्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः । सप्तचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः वराहावतारचरित्रवर्णनम् । शौनक उपाय। जगदण्डमिदं पूर्वमासीदिव्यं हिरण्मयम् । प्रजापतेरियं मूर्तिरितीयं वैदिकी श्रुति ॥१॥ ॥
ऽध्यायः] * पृथिवीकृतवराहस्तुतिः तत्तु घर्षसहस्रान्ते विभेदोर्ध्वमुखं विभुः । लोकसर्जनहेतोस्तु विभेदाधोमुखं नृप! ॥ भूयोऽएधा विभेदाण्डं विष्णुर्वे लोकजन्मकृत् । चकार जगतश्चात्र विभागसविभागकत् यच्छिद्रमूर्द्धमाकाशं विघराकृतितां गतम् । विहितं विश्वयोगेन यदधस्तद्रसातलम् ॥ यदपडमकरोत्पूर्व देयोलोफचिकीर्षया । तत्र यत्सलिलंस्कन्नसोऽभवत्काञ्चनोगिरिः शैलः सहस्रमहती मेदिनी विषमाभवत् । तैश्च पर्वतजालौधैर्ययोजनविस्तृतैः ॥ ६ ॥ पीडिता गुरुभिधी व्यथिता मेदिनी तदा। महामते भूरिवलं दिव्यं नारायणात्मकम् ॥ हिरण्मयं समुत्सृज्य तेजो वै जातरूपिणम् । अशक्का चै धारयितुमधस्तात्माविशत्तदा पीऽयमाना भगवतस्तेजसातस्य सा क्षितिः । पृथ्वी विशन्तीं दृष्ट्वा तु तामधोमधुसूदनः उद्धारार्थ मनश्चक्रे तस्या ये हितकाम्यया ॥१०॥ भगवानुवाच। मत्तेज एपा घसुधा समासाद्य तपस्विनी। रसातलं प्रविशति पङ्के गौरिघ दुर्यला ॥ ११ ॥ पृथिव्युवाच । त्रिविक्रमायामितविक्रमाय महावराहाय सुरोत्तमाय । श्रीशाईचक्रासिगदाधराय नमोऽस्तु ते देवघर ! प्रसीद ॥१२॥ तव देहाजगजातं पुष्करद्वीपमुत्थितम् । ब्रह्माणमिह लोकानां भूतानां शाश्वतं विदुः ।। तव प्रसादाद्देवोऽयं दिवं भुक्ते पुरन्दरः। तब क्रोधाद्धि बलवान् जनार्दनजितोचलिः । धाता विधाता संहर्ता त्वयि सर्व प्रतिष्टितम् । मनुस्मृतान्तोऽधिपतिर्चलनः पचनोधनः वर्णाश्चाश्रमधर्माश्च सागरास्तरपो जलम् । नद्यो धर्मश्च कामश्च यहायज्ञस्य च क्रिया: विद्यावेद्यश्च सत्यञ्च हीः श्रीः फीति धृतिः क्षमा 1, पुराणं वेदवेदाङ्ग,सांख्ययोगी भवामयो । १७ ॥ जङ्गमं स्थाघरचैव भविष्यञ्च भवञ्च यत् । सर्वन्तञ्च त्रिलोकेषु प्रभावोपहितन्तय ॥१८ त्रिदशोदारफटदः स्वर्गस्त्रीचारुपल्लवः । सर्वलोकमन.कान्तः सर्यसत्यमनोहरः ॥१६॥ विमानानेकपिटपस्तोयदाम्बुमधुनयः। दिव्यलोफमहास्कन्धसत्यलोकप्रशावधान ॥
* मत्स्यपुराणम् *[ सप्तचत्वारिंशदधिकद्विशततमो
सागराकारनिर्यासो रसातलजलाश्रयः । नागेन्द्रपादपोपेतो जन्तुपक्षिनिषेवितः ॥२१॥
शीलाचारार्यगन्धस्त्वं सर्वलोकमयोद्रुमः । द्वादशार्कमयद्वीपो रद्रकादशपत्तनः ॥२२॥
यस्पष्टाचलसंयुक्तस्त्रैलोक्याम्भोमहोदधिः । सिद्धसाध्योमिकलिल सुपर्णानिलसेवितः
दैत्यलोकमहाग्राहो रक्षोरगरुपाकुल. । पितामहमहाधैर्यः स्वर्गस्त्रीरत्नभूपित. ॥ २४ ॥
धीधीहीकान्तिभि नित्यं नटीभिरुपशोभितः ।
कालयोगमहापर्वप्रयागगतिवेगवान् ॥ २५ ॥
त्वं स्वयोगमहावीर्यो नारायणमहार्णयः । कालोभूत्वा प्रसन्नाभिरदिर्हादयसे पुनः ॥
त्वया सृष्टास्त्रयो लोकास्त्वयैव प्रतिसंहृताः।
विशन्ति योगिन सर्वे त्वामेव प्रतियोजिताः ॥ २७ ॥
युगे युगे युगान्ताग्निः कालमेघो युगे युगे । महाभारावताराय देव ! त्वं हि युगे युगे।
त्वं हि शुक्. कृतयुगे त्रेतायां चम्पकप्रभः । द्वापरे रक्तसङ्काशः कृष्णःकलियुगे भवान्॥
वैवर्ण्यमभिधत्से त्वं प्राप्तेषु युगसन्धिषु । वैवयं सर्वधर्माणामुत्पादयसि वेदवित् ॥
भासि वालिप्रतपसित्वञ्च पासिपिचेपसे । क्रुध्यसिक्षान्तिमायासि त्व दीपयसिवर्पसि
त्वं हास्यसि न निर्यासि निर्वापयलि जाग्रसि ।
नि.शेषयसि भूतानि कालो भूत्वा युगक्षये ॥ ३२ ।।
शेषमात्मानमालोक्य विशेषयसि त्व पुन. । युगान्ताग्नावलीढेषु सर्वभूतेषु किञ्चन
यातेषु शेषो भवसि तस्माच्छेपोऽसि कीर्तितः ।
च्यवनोत्पत्तियुक्तेषु ब्रह्मेन्द्रवरणादिषु ॥३४॥
यस्मान्न च्यवसे स्थानात्तस्मात्सकीयंसेऽच्युतः । ब्रह्माणमिन्द्रञ्चयमं रुद्रं वरुणमेव च
निगृह्य हरसे यस्मात्तस्माद्धरिरिहोच्यसे । सम्मानयसि भूतानि वपुषा यशसा श्रिया
परेण घपुपा देव ! तस्माचासि सनातनः । यस्माद्ब्रह्मादयो देवा मुनयश्चोग्रतेजसः ।
न तेऽन्तं त्वधिगच्छन्ति तेनानन्तस्त्वमुच्यसे । नक्षीयसे न क्षरसेकल्पकोटिशतैरपि
तस्मात्त्यमक्षरत्वाच्च विष्णुरित्येव कीर्त्यले ।
विष्टब्धं यत्त्वया सवं जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥ ३६॥
ऽध्यायः] * पृथिवीकृतवराहस्तोत्रम् * जगद्विष्टम्भनाञ्चैव विष्णुरेवेति कीय॑से । विष्टभ्य तिष्ठसे नित्यं त्रैलोक्यं सवराचरम्॥ यक्षगन्धर्वनगरं सुमहद्भूतपन्नगम् ! व्याप्तं त्वयैव विशता त्रैलोक्यं सवराचरम् ॥४१॥ तस्माद्विष्णुरिति प्रोक्तः स्वयमेव स्वयम्भुवा । नारा इत्युच्यते ह्यापो ऋषिभिस्तत्वदर्शिभिः ।। ४२ ॥ अयनन्तस्यता. पूर्वन्तेन नारायणः स्मृत । युगे युगेप्रनष्टाङ्गां विष्णो ! चिन्दसितत्वतः गोविन्देतिततोनाम्नाप्रोत्यसेमृपिभिस्तथा। हृषीकाणीन्द्रियाण्याहुस्नत्यशानविशारदाः ईशिता च त्वमेतेषां हपोकेशस्तथोच्यते । घसन्ति त्वयि भूतानि ब्रह्मादीनि युगक्षये ॥ त्वं या वससि भूतेपु धासुदेवस्तथोध्यसे । सर्पयसि भूतानि कल्पे कल्पे पुनः पुनः ॥ ४६ ॥ तत सङ्कर्षणः प्रोक्तस्तत्वज्ञान विशारदः । प्रतिव्यूहेन तिष्ठन्ति सदेवासुरराक्षसा. ॥ प्रविद्युः सर्वधर्माणां प्रद्युम्नस्तेन चोच्यसे। निरोद्धा विद्यते यस्मान्न ते भूतेषु कञ्चन ॥ अनिरुद्धस्ततः प्रोक्तः पूर्णमेव महर्षिभिः । यत्त्वया धार्यते विश्वं त्वया संहियते जगत् त्वं धारयसि भूतानि भवन त्यं विभर्षि च । यत्त्वया धार्यते किञ्चित्तेजसाचवलेन व मया हि धार्यते पश्चान्नाधृतं धारये त्वया । न हि तद्विद्यते भूत त्वया यन्नात्र धार्यते त्वमेव कुरुपे ! देव ! नारायण युगे युगे । महाभारावतरणं जगतो हितकाम्यया ॥ तवैव तेजसाक्रान्ता रसातलतलङ्गताम् । प्रायस्व मां सुरश्रेष्ठ ! त्यामेव शरणंगताम् ॥ दानवै. पीड्यमानाहं राक्षसंश्च दुरात्मभि । त्वामेय शरणं नित्यमुपयामि सनातनम् तावन्मेऽस्ति भयं देव यायन त्यां ककुशिनम् । शरणं यामि मनसा शतशोऽप्युपलक्षये ॥ ५५ ॥ । शक्ताः कर्नु सेन्द्रा दिवौकस. 1 तत्वं त्वमेय तत्सि निरुत्तरमतः परम् शोनक उवाच । तत प्रीत. स भगवान् पृथिव्यै शाईचक्रधृक् । काममस्या यथाकाममभिपूरितवान् हरिः ॥५७ ॥ अप्रवीच महादेवि!माधवीयं स्तवोत्तमम् । धारयिष्यति योमोनास्तितस्यपराभवः उपमानन - .
* मत्स्यपुराणम् [सप्तचत्वारिंशदधिकद्विशततमो लोकानिष्कलमपाश्चैध वैष्णधान्प्रतिपत्स्यते । एतदाश्चर्यसर्वस्वंमाधवीयंस्तवोत्तमम् अधीतवेद. पुरुषो मुनि प्रीतमना भवेत् ॥ ६ ॥ श्रीभगवानुवाच । मा भैर्धरणि! कल्याणि! शान्ति बज ममाग्रत । एप त्वामुचित स्थान प्रापयामि मनीषितम् ॥ ६१ ॥ शौनक उवाच। ततो महात्मा मनसा दिव्यं रूपमचिन्तयत् । किन्नु रूपमहं कृत्वा उद्धरेय धरामिमाम् ॥ ६२ ॥ जलक्रीडारुचिस्तस्माद्वाराहं घपुरास्थित । अदृश्यं सर्वभूतानां घाड्मयं ब्रह्म सस्थितम् शतयोजनविस्तीर्णमुच्छ्रितं द्विगुणं तत । नीलजीमूतसङ्काशं मेघस्तनितनिस्वनम् ॥ गिरिसंहननं भीम श्वेततीक्ष्णाप्रदष्ट्रिणम् । विद्युदग्निप्रतीकाशमादित्यसमतेजसम् ॥ पीनोन्नतकटीदेशे वृपलक्षणपूजितम् । रूपमास्थाय विपुलं घाराहमजितोहरि. ॥६६॥ पृथिव्युद्धरणायैव प्रविवेश रसातलम् । वेदपादो यूपदंष्ट्र क्रतुदन्तश्चितोमुख ॥ ६७ ॥ अग्निजिहो दर्भलोमा ब्रह्मशीर्षों महातपा । अहोरावेक्षणधरो वेदाङ्गश्रुतिभूपणः ॥६८॥ आज्यनास स्वतुण्ड सामघोषस्वनोमहान् । सत्यधर्ममय श्रीमान्कर्मविक्रमसत्तम प्रायश्चित्तनखोघोर पशुजातुर्मखाकृति । उद्गाथा होमलिङ्गोऽथ वीजीपधिमहाफल । घाय्वन्तरात्मा यज्ञास्थिविकृति सोमशोणित । वेदस्कन्धो हविर्गन्धो हव्यकव्यविभागवान् ॥ ७१ ॥ प्राग्वशकायो द्युतिमान् नानादीक्षाभिरन्वित । दक्षिणाहृदयो योगी महासत्रमयो महान् ॥ ७२ ॥ उपाकर्मोप्ठरुचक प्रवर्यावर्तभूषणः । नानाच्छन्दोगतिपथो गुह्योपनिपदासन ॥ ७३ ॥ छायापत्नीसहायो वै मणिशृङ्गइवोच्छ्रित । रसातलतले मना रसातलतलङ्गताम् ॥७४ प्रभुलॊकहितार्थाय दनांग्रेणोजहार ताम् । तत स्वस्थानमानीय घराह पृथिवीधर ॥ मुमोच पूर्वं मनसा धारिताञ्च वसुन्धराम् ।
ध्यायः * क्षीरोदमथनप्रकरणवर्णनम् * ततो जगाम निर्वाण मेदिनी तस्य धारणात् ॥ ७६ ॥ चकार व नमस्कारं तस्मै देवाय शम्भवे । एवं यज्ञवराहेण भूत्वा भूतहितार्थिना ॥ उद्धृता पृथिवी देवी सागराम्बुगता पुरा। अयोधृत्य क्षिति देवोजगतःस्थापनेच्छ्या पृथिवीप्रविमागाय मनश्चक्रेऽम्बुजेक्षणः ॥ ७८ ॥ रसाङ्गतामवनिमविन्तविक्रमः सुरोत्तमः प्रवरचराहरूपधृक् । वृषाकपिः प्रसभमर्थकदंष्ट्रया समुदरद्धरणिमतुल्यपौरुषः ॥ ७६ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे घराहावतारचरित पृथ्ब्युद्धरणं नाम सप्तचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः । अष्टचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः क्षीरोदमयनप्रकरणवर्णनम् । ऋषय ऊचुः। नारायणस्य माहात्म्यं श्रुत्या स्त! यथाक्रमम् । न तृप्तिर्जायतेऽस्माकमतः पुनरिहोच्यताम् ॥ १॥ कथं देवा गताः पूर्वममरत्वं विचक्षपाः । तपसा कर्मणा वापि प्रसादात्कस्य तेजसा सूत उवाच। पत्र नारायणो देवो महादेवश्च शूलधृक् । तत्रामरत्वे सर्वेषां सहायो तत्र तो स्मृती पुरा देवासुरे युद्धे हताश्च शतशः सुरैः। पुनः सञ्जीविनी विद्या प्रयोज्य भृगुनन्दनः ।। जीयापयति दैत्येन्द्रान् यथा सुनोत्थितानिच । तस्य तुप्टेन देवेन शङ्करेण महात्मना। मृतसञ्जीचिनी नाम चिद्या दत्ता महाप्रभा । तां तु माहेश्वरी विद्या महेश्वरमुखोद्गताम् भार्गवे संस्थितां दृष्ट्वा मुमुहुः सर्वदानवाः । ततोऽमरत्वं दैत्यानां कृतं शुक्रेण धीमता या नास्ति सर्वलोकानां देवानां सर्वरक्षसाम् । न नागानामृपीणाश्चनच ब्रह्मेन्द्रविष्णुषु M
६४
।
* मत्स्यपुराणम् * [अष्टचत्वारिपाधिकद्विशततमो
तां लब्ध्या शङ्कराच्छुकः परां निर्वृतिमागतः । ततो देवासुरोधोरः समरः सुमहानभूत्
तत्र देवहतान् दैत्यान् शुक्रोविद्याबलेन च । उत्थापयति दैत्येन्द्रान् लीलयैव विचक्षणः
एवम्विधेन शक्रस्तु बृहस्पतिरुदारधीः । हन्यमानास्ततो देवाः शतशोऽथ सहस्रशः
विषण्णवदनाः सर्वे बभूवुर्विकलेन्द्रियाः । ततस्तेषु विषण्णेषु भगवान् कमलोद्भवः ।
मेरुपृष्ठे सुरेन्द्राणामिदमाह जगत्पतिः ॥ १२ ॥
ब्रह्मोवाच ।
देवा ! शृणुत मद्वाक्यं तत्तथैव निरूप्यताम् । क्षिपतां दानवैः सार्द्धसख्यमत्रप्रवर्तताम्
क्रियताममृतोद्योगो मथ्यतां क्षीरपारिधि. । सहायं घरुणंकृत्वाचक्रपाणिवियोध्यताम्
मन्थानं मन्दरं कृत्वाशेषनेत्रेण वेष्टितम् । दानवेन्द्रोवलिस्वामीस्तोककालनिवेश्यताम्
प्रार्थ्यतां कूर्मरूपश्च पाताले विष्णुरव्ययः। प्रार्थ्यतां मन्दर शैल. मन्थकार्यप्रवर्त्यताम्
तच्छ त्वा वचनं देवा जग्मुर्दानवमन्दिरम् । अलं विरोधेनवयंभृत्यास्तव बले ! ऽधुना
क्रियताममृतोद्योगो वियतां शेषनेत्रकम् । त्वया चोत्पादितेदैत्य ! अमृतेऽमृतमन्थने
भविष्यामोऽमरा. सर्वे त्वत्प्रसादान्न संशय । एचमुक्तस्तदा देवै. परितुष्ट स दानवः
यथा घदत हे देवा ! स्तथाकायं मयाऽधुना । शक्तोऽहमेकएपात्रमथितुं क्षीरपारिधिम्
आहरिप्येऽमृतं दिव्यममृतत्वाय धोऽधुना । सुदूरादाश्रयं प्राप्तान् प्रणतानपि वैरिणः
यो न पूजयते भक्त्या प्रेत्य चेह विनश्यति । पालयिष्यामिव सर्वानधुनास्नेहमास्थित
एचमुत्तवा स दैत्येन्द्रो देवैः सह ययौ तदा । मन्दरं प्रार्थयामास सहायत्वे धराधरम्
सखा भवत्वमस्माकमधुनाऽमृतमन्थने । सुरासुराणा सर्वेषा महत्कार्यमिदं जगत् ।२४
तथेति मन्दर' प्राह यद्याधारोभवेन्मम । यत्र स्थित्व भ्रमिष्यामिमाथिप्येवरुणालयम्
कल्प्यतां नेत्रकायें यः शक्त स्याद्वेष्टने मम। ततस्तु निर्गती देवी कूर्मशेषी महावलो।
विष्णोर्भागी चतुर्थाशाद्धरण्या धारणे स्थिती । ऊचतुर्गर्वसंयुक्तं वचनंशेषकच्छपौ ॥
त्रैलोक्यधारणेनापि न ग्लानिर्मम जायते। किमु मन्दरकात्क्षुद्राघुटिकासन्निभादिह
शेष उवाच।
ब्रह्माण्डवेष्टनेनापि ब्रह्माण्डमथनेन पा । न मे ग्लानि भवेहे हे किमु मन्दरवर्तने ॥२६॥
ऽध्यायः
* देवदानवकृतभगवत्स्तुतिः ॐ
तत उत्पाट्यशैलं तत्क्षणात् क्षीरसागरे। विक्षेप लीलया नागः कूर्मश्चाध.स्थितस्तदा
निराधारं यदा शैलं नशेकु देघदानवाः । मन्दरभ्रामणं कर्तु क्षीरोदमथने तथा ।। ३१ ॥
नारायणनिवासन्ते जग्मुर्वलिसमन्विताः । यत्रास्ते देवदेवेशः स्वयमेव जनार्दनः ॥३२
तत्रापश्यन्त तन्देवं सितपद्मप्रभ शुभम् । योगनिद्रासुनिरतं पीतवाससमच्युतम् ॥३॥
हारकेयूरनाङ्गमहिपर्यङ्कसंस्थितम् । पादपद्मन पद्मायाः स्पृशन्तं नाभिमण्डलम् ॥३४॥
स्वपक्षव्यजनेनाथ धीज्यमानगरुत्मता । स्तूयमानं समन्ताञ्च सिद्धचारणकिन्नरैः ॥३५॥
आग्नायै मूत्तिमद्विश्च स्तूयमानं समन्ततः । सत्यवाहूपधानं तन्तुष्टयु घदानवाः ॥३६
कृताञ्जलिपुटाः सर्वे प्रणताः सर्वतो दिशम् ।
देवदानवा ऊचुः।
नमो लोकत्रयाध्यक्ष ! तेजसामितभास्कर !॥३७॥
नमो विष्णो! नमो जिष्णो ! नमस्ते कैटभार्दन!।
नम सर्गक्रियाक जगत्पालयते नमः ॥३८॥
रुद्ररूपाय शाय नम संहारकारिणे । नमः शूलायुधाधृष्य नमो दानवघातिने ॥३६॥
नमः क्रमत्रयाकान्त त्रैलोक्यायाभवाय च । नमः प्रवण्डदैत्येन्द्रकुलकाल महानल!
नमो नाभिहृदोद्भूतपद्मगर्भमहावल!। पद्मभूत ! महाभूत ! कहजगत्प्रिय ! ॥४१॥
जनिता सर्वलोकेश ! नियाकारणकारिणे । अमरारिविनाशाय महासमशालिने ॥४२॥
लक्ष्मीमुखाब्जमधुप ! नमः कीर्तिनिघासिने । अस्माकममरत्वाय ध्रियता ध्रियतामयम्
मन्दरः सर्वशैलानामयुतायुतविस्तृतः । अनन्तवलवाहुभ्यामवष्टभ्येकपाणिना ॥ १४ ॥
मथ्यताममृतं देव ! स्वधास्थाहार्थकामिनाम् ।
तत. श्रुत्वा स भगवान् स्तोत्रपूवं वचस्तदा ।
विहाय योगनिद्रान्तामुवाच मधुसूदनः ॥ ४५ ॥
श्रीभगवानुवाच।
स्वागतं विवुधाः! सर्वे किमागमनकारणम् ।
यस्मात्कार्यादिह प्राप्तास्तद् व्रत विगतज्वराः॥४६॥
* मत्स्यपुराणम् [ अष्टचत्वारिंशदधिकद्विशततमो नारायणेनैव मुक्ताः प्रोचुस्तत्र दिवौकसः । अमरत्वाय देवेश! मध्यमाने महोदधौ । यथाऽमृतत्वं देवेश! तथा नः कुरु माधव!। त्वया विना न तच्छक्यमस्माभिः कैटमार्दन ! ॥४८॥ प्राप्तुं तदमृतं नाथ! ततोऽग्ने भव नो विभो!। इत्युक्तश्च ततोविष्णुरप्रधृप्योऽरिमर्दनः ॥ ४ ॥ जगाम देवैः सहितो यत्रासो मन्दराचलः । वेष्टितो भोगिभोगेन धृतश्चामरदानवैः ॥ ५० ॥ विषमीतास्ततोदेवा यतः पुच्छं ततः स्थिताः । मुसतो दैत्यसवास्तु मैं हिकेयपुर.सराः सहस्रवदनं चास्य शिरः सव्येन पाणिना । दक्षिणेन बलिदहं नागस्यारुष्टवांस्तथा ५२ दधारामृतमन्थानं मन्दरं चारुकन्दरम् । नारायणः स भगवान् भुजयुग्मद्रयेन तु ॥५३ ततो देवासुरैः सर्वे र्जयशन्दपुरःसरम् । दिव्यं वर्षशतं सानं मथितः क्षीरसागरः ॥५४ ततः श्रान्तास्तु ते सर्वे देवादैत्यपुर सराः । श्रान्तेपुतेपु देवेन्द्रोमेघोभूत्वाम्बुशीकरान् पवर्षामृतकल्पांस्तान् ववी वायुश्च शीतल' । भग्नप्रायेषु देवेषु शान्तेषु कमलासनः ॥ मथ्यतां मथ्यतां सिन्धुरित्युवाच पुनः पुनः । अवश्यमुद्योगवतां श्रीरपारा भवेत्सदा ग्रहाप्रोत्साहितादेवा ममन्युः पुनरम्बुधिम् । भ्रान्यमाणे ततः शैले योजनायुतशेखरे ॥ निपेतुर्हस्तियूथानि पराहशरभादयः। श्वापदायुतलक्षाणि तथा पुष्पफलाद्रुमाः ॥ ततः फलानां धीर्येण पुप्पोपधिरसेन च । क्षीरसङ्घर्षणाचापि दधिरूपमजायत ६०॥ ततस्तु सर्वजीवेषु चूर्णितेषु सहस्रशः । तदम्वुमेदसोत्सर्गाद्वारुणी समपद्यत ।। ६१ ॥ पारुणीगन्धमाघ्राय मुमुदुर्देवदानवाः । तदास्वादेन वलिनो देवदैत्यादयोऽभवन् ॥६२ ततोऽतिवेगाजगृहु र्नागेन्द्र सर्वतोऽसुराः । मन्यानं मन्थयप्टिस्तु मेरुस्तत्राचलोऽभवत् अभवचारतोषिष्णुर्भुजमन्दरवन्धनः । स पासुकिफणालमपाणिः कृष्णो ब्यराजत ॥ यथा नीलोत्पलयुक्तो ब्रह्मदण्डोऽतिविस्तरः । ध्वनिर्मघसहस्रस्य जलधेरुत्थितस्तदा ॥६५॥ भागे द्वितीये मघवानादित्यस्तु ततःपरम् ।
६९७ ऽध्यायः] * क्षीरोदमथनवर्णनम् * ततो द्रा महोत्साहा घसवो गुह्यकादयः ॥ ६६ ॥ पुरतो विप्रचित्तिश्च नमुचित्रशम्बरौ । द्विमूर्दा वनदंप्रश्व सैहिकेयो बलिस्तथा ॥६७ ॥ एतेचान्ये च बहवो मुखभागमुपस्थिता. 1 ममन्थरम्बुधि दृप्ता यलतेजोषिभूषिताः ॥ भूयात्र महाघोपो महामेघरपोपमः । उदधे मध्मानस्य मन्दरेण सुरासुरैः ॥ ६ ॥ तत्र नानाजलचग चिनिधूता महाद्रिणा । विलयं समुपाजग्मुः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ पारुणानि च भूतानि विविधानि महेश्वरः । पातालतलवासीनि विलयं समुपानयत् ।। तस्मिंश्च भ्राम्यमाणेऽद्री संघृष्टाश्च परस्परम् । न्यपतन पतगोपेताः पर्वताप्रान्महाद्रुमाः ॥ तेषां सङ्घर्षयाचानिरर्विभिः प्रज्वलन् मुहुः। विद्युद्भिरिय नीलाभ्रमावृणोन्मन्दरं गिरिम् ददाह फुजरांश्चैव सिहांश्चैव विनिःसृतान् । विगतासूनि सर्वाणिसत्यानिविविधानिच तमग्निममरश्रेष्ठः प्रदहन्तमितस्तत । पारिणा मेघजेनेन्द्रः शमयामास सर्चत ॥ ७५ ॥ ततो नानारसास्तत्र सुवुः सागराम्भसि । महाद्वमाणां निर्यासा बहपश्चीपधीरसाः ॥ तेपाममृतवीर्याणां रसानां पयसैव च । अमरत्वं सुरा जग्मु काशनन्छविसन्निभाः॥ अथ तस्य समुद्रस्य तनातमुदकं पयः । रसान्तरैर्विमिश्रञ्च ततः क्षीरादभूतम् ॥१८॥ ततो ब्रह्माणमासीनं देवा पवनमनुवन् । धान्ता.स्म सुभृश ब्रह्मनोद्भवत्यमृतञ्च यत् ।। ऋते नारायणात्सर्वे दैत्या देयोत्तमास्तथा । विरायितमिदश्चापि सागरम्य तु मन्थनम् ततो नारायणं देवं ब्रह्मा घचनमावीत् । विधत्स्यैषां यलं विष्णो! भवानेव परायणम् विष्णुरुवाच । यलं ददामि सर्वपां फर्मतये समास्थिताः । शुभ्यता प्रमशः समन्दर परिचय॑ताम् ॥ इति धीमत्स्यपुराणे क्षीरोदमधनेऽटचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।
ऊनपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः क्षीरोदमथनवर्णनम् । सूत उवाच । नारायणवचः श्रुत्वा वलिनस्तेमहोदधिम् । तत्पयः सहिताभूत्वा चक्रिरे भृशमाकुलम्॥ ततः शतसहस्रांशुसमान इव सागरात् । प्रसन्नाभः समुत्पन्नः सोमःशीतांशुरुज्ज्वलः ॥ श्रीरनन्तरमुत्पन्ना घृतात्पाण्डुरवासिनी । सुरादेवीसमुत्पन्ना तुरगः पाण्डुरस्तथा ॥२॥ कौस्तुभश्च मणिदिव्यश्चोत्पन्नोऽमृतसम्भवः । मरीचिधिकचः श्रीमान् नारायण उरोगतः ॥ ४॥ पारिजातश्च विकवकुसुमस्तवकाञ्चितः । अनन्तरमपश्यंस्ते धूममम्यरसन्निभम् ॥ ५॥ आपूरितदिशाम्भागं दु सहं सर्वदेहिनाम् | तमाघ्राय सुरा. सर्वे मूर्च्छितापरिलङ्किता. ॥ ६ ॥ उपाविशन्नधितटे शिर संगृह्य पाणिना । ततः क्रमेण दुर्धारः सोऽनलः प्रत्यदृश्यत ॥ ७ ॥ ज्वालामालाकुलाकारः समन्ताद्धीपणोऽर्चिषा । तेनाग्निनापरिक्षिप्ताः प्रायशस्तु सुरासुराः ॥ ८॥ दग्धाश्चाप्यर्द्धदग्धाश्च वभ्रमु सकला दिशः। प्रधाना देवदैत्याश्च भीपिनास्तेन पहिना अनन्तरं समुद्भूतास्तस्मात् डुण्डुभजातयः । कृष्णासामहादंट्रारक्ताश्च श्वेतपीतास्तथाचान्ये तथा गोनसजातयः । मशकाभ्रमरादशा मक्षिकाःशलभास्तथा।। कर्णशल्याः कृकलासा अनेकाश्चैव वभ्रमुः । प्राणिनो दंष्ट्रिणो रौद्रास्तथा हि विषजातयः ॥ १२ ॥ शाईहालाहलामुस्तयत्सकं गुरुभस्मगाः । पचनाशनाः॥
ऽध्यायः] * क्षीरोदमथनवर्णनम् - नोलपत्रादयश्चान्ये शतशो बहुभेदिनः । येषां गन्धेन दह्यन्ते गिरिराङ्गाण्यपि द्रुतम् ॥ १३ ॥ अनन्तरं नीलरसोधभृङ्गभिन्नाञ्जनाभं विपमं श्वसन्तम् । कायेन लोकान्तरपूरकेण केशश्च पहिमतिमैचलद्धिः ॥ १४॥ सुवर्णमुक्ताफलभूषिताङ्गं किरीटिनं पीतदुकूलजुधम् । नीलोत्पलामैः कुसुमैः कृताचं गर्जन्तमम्भोधरभीमवेगम् ॥ १५ ॥ अद्राक्षुरम्भोनिधिमध्यसंस्थं सविग्रहं देहि भयाश्रयन्तम् । विलोक्य वं भीपणमुप्रनेत्रं भूताश्च चिमुरथापि सर्च ॥ १६ ॥ केचिद्विलोक्यैव गता हामावं निःसंजतां चाप्यपर प्रपन्नाः । वेमुर्मुखेभ्योऽपि व फेनमन्ये केचित्त्ववाप्ता विषमामयस्याम् ॥ १७॥ श्यासेन तस्य निर्दग्धा ततो विविन्द्रदानवाः । दग्धाङ्गारनिभाजाता ये भूता दिव्यरूपिणः । ततस्तु सम्भ्रमाद्विष्णुस्तमुवाच सुरात्मकम् ॥ १८॥ श्रीमगवानुवाच । फो भवानन्तकप्रख्यः किमिच्छसि कुतोऽपि च । कि कृत्वा ते प्रियं जाये देवमानक्ष्य मेऽपिलम् ॥ १६॥ तश तस्य धरः श्रुत्वा विष्णोः फालाग्निसन्निभः । उपाच फालकृटस्तु भिन्लदुन्दुमिनिस्वन. ॥ २० ॥ कालकूट उवाच। अहं हि फालकृटारयो चिपोऽग्युधिसमुद्भवः । यदा तीनवमर्षः परम्परवपिभिः ॥ २१ ॥ मुरासुरविमधितो दुग्धाम्मोनिधिग्गुतः । सम्भूतोऽहं तदा सर्वान् हन्तुं देवान् सदानवान् ॥ २२ ॥ सानिद हनिप्यामि क्षणमात्रेण देहिनः ।
. ७०० - * मत्स्यपुराणम् * [ऊनपञ्चाशदधिकद्विशततमो मा मा असत वै सर्वे यात वा गिरिशान्तिकम् ॥ २३ ॥ श्रुत्वैतद्वचन तस्य ततो भीता सुरासुरा । ब्रह्मविष्णूपुरस्कृत्य गतास्ते शङ्करान्तिकम् निवेदितास्ततोद्वास्थस्ते गोशै सुरासुरा । अनुज्ञाता शिनाथविविशुर्गिरिशान्तिकम् मन्दरस्यगुहाहैमी मुक्तामालाविभूषिताम् । सुस्वच्छमणिसोपानावैदूर्यस्तम्भमण्डिताम् तत्र देवासुरै सधैं र्जानुभिर्धरणींगते । ब्रह्माणमग्रत कृत्वा इद स्तोत्रमुदाहृतम् ॥२७ देवदानवा ऊचु । नमस्तुभ्य विरूपाक्ष । सर्वतोऽनन्तवभुपे । नम पिनाकहस्ताय घज्रहस्ताय धन्विने ॥ २८ ॥ नमस्त्रिशूलहस्ताय दण्डहस्ताय धूर्जटे । नमस्त्रैलोक्यनाथाय भूतग्रामशरीरिणे ॥ २६ ॥ नम सुरारिहन्त्रे च सोमाग्न्याग्यचक्षुषे । ब्रह्मणे चैव रुद्राय नमस्ते विष्णुरूपिणे ॥ ब्रह्मणे वेदरूपाय नमस्ते देवरूपिणे । साडख्ययोगाय भूताना नमस्ते शम्मवाय ते ॥ मन्मथाङ्गविनाशाय नम कालक्षयङ्कर । रहसे देवदेवाय नमस्ते व सुरोत्तम | ॥३२॥ एकवीराय शर्याय नम पिडकपर्दिने । उमाभत्रै नमस्तुभ्य यशत्रिपुरघातिने ॥ ३३ ॥ शुद्धयोधप्रयुद्धाय मुक्तकैवल्यरूपिणे । लोकत्रयविधात्रे च वरुणेन्द्राग्निरूपिणे । ऋग्यजु सामवेदाय पुरुपायेश्वराय च। अग्यायचैवचोग्राय विप्राय श्रुतिचभुपे ॥३५॥ रजसेचैवसत्त्वाय नमस्ते स्तिमितात्मने । अनित्यनित्यभावाय नमो नित्यवरात्मने । व्यक्ताय चैवाव्यक्ताय व्यक्ताव्यक्ताय वै नम । भक्तानामातिनाशाय प्रियनारायणाय व उमाप्रियाय शर्वाय नन्दिवक्त्राञ्चिताय च | ऋतुमन्वन्तकल्पाय पक्षमासदिनालगने ॥ नानारूपाय मुण्डाय परूथपृथुदण्डिने । नम कमलहस्ताय दिग्वासाय शिखण्डिने ॥ धन्विने रथिने चैव यतये ब्रह्मचारिणे । इत्येवमादिचरितै स्तुत तुभ्य नमोनम ॥४०॥ एव सुरासुरै स्थाणु स्तुतस्तोषमुपागत 1 उवाव पाक्यभीतानास्मितान्वितशुभाक्षरम् श्रीशङ्कर उवाच। किमर्थमागता चूत त्रासग्लानमुखाम्बुजा ।। किं घाऽभीष्ट ददाम्यद्य काम प्रबूत मा चिरम् ।
ऽध्यायः] * क्षीरोदमथनवर्णनम् * ७०१ इत्युक्तास्ते तु देवेन प्रोचुस्तं ससुरासुराः ॥ ४२ ॥ सुरासुरा ऊचुः। अमृतार्थे महादेव ! मथ्यमानमहोदधौ । विषमद्भुतमुद्भूतंलोफसंक्षयकारकम् ॥४३॥ स उपाचायसर्वेषां देवानां भयकारकः । सर्वान्या भक्षयिप्यामि अथवा मा पियस्तथा तमशक्कावयं प्रस्तुं सोऽस्मान् शक्तोषलोत्कटः । एषनिश्वासमात्रेण शतपर्वसमद्युतिः।। विष्णुः कृष्णः कृतस्तेनयमञ्च चिपमात्मवान् । मूछिता:पतिताश्चान्येनिप्रणाशङ्गताःपरे अर्थाऽनर्थक्रियांयाति दुर्भगानां यथा चिमो ! दुर्यलानाञ्च संकल्पो यथामयतिचापदि चिपमेतत्समुद्भूतं तस्माद्वामृतकांक्षया । अस्माद्यान्मोचयत्वं गतिस्त्वञ्च परायणम् भकानुकम्पी भाचज्ञो भुवनादीश्वरो विभुः । यशाप्रभुक सर्वहविः सौम्यः सोमः स्मरान्ततरत् ॥ ४६॥ त्वमेको नो गतिर्देव गीर्वाणगणशर्मकृत् । रक्षास्मान् भक्षसंकल्पाद्विरूपाक्ष ! विषञ्चरात् ॥ ५० ॥ तक त्या भगवानाह भगनेत्रान्तरद्धः । भक्षयिष्याम्यहं घोरं कालकुटं महाविषम् तथान्यदपि यत्कृत्यं कृच्छ्रसाध्यं सुरासुपः!। तथापि साधयिष्यामि तिष्ठध्वं विगतज्वराः ॥ ५२ ॥ इत्युक्याहटरोमाणो पापगद्गदकण्ठिनः । आनन्दाचपरीताक्षाः सनाथाइव मेनिरे ।। सुरा ब्रह्मादयः सर्वे समाश्वस्ताः सुमानसाः ॥ ५३ ॥ ततोऽनजदु द्रुतगतिना फकुमिना हरोऽम्बरे पचनतिर्जगत्पतिः । प्रधावितरसुरसुरेन्द्रनायकैः स्वयाहने विगृहीत शुम्रवामरैः । पुरःसरैः स तु शुशुमे शुमाश्रयः शियो पशी शिपिकपिशोच॑जूटफः॥१४॥ भासाय दुग्धसिन्धुतं फालकृटं विपं यतः । ततो देवोमहादेवो पिलोक्यविषमंयिपम् ॥ डायास्थानकमास्थाय सोऽपियामपाणिना। पीयमानेषिपेतस्मिंस्ततोदेपा:महामुराः जगुध नन्तुचापि सिंहनादांच पुपालान् । चशम मुगाद्याश्च हिरण्याक्षादयस्तया स्नुपन्तश्चय येशं प्रसन्नाधामयस्तदा । फष्टदेशे ततःप्राते विषेदेषमपापन् । -MITA ७०२ * मत्स्यपुराणम् * [पश्चाशदधिकद्विशततमी विरिञ्चिप्रमुखा देवा बलिप्रमुसतोऽसुराः ।शोभते देव! कण्ठस्ते गात्रे कुन्दनिभप्रभ। भृङ्गमालानिभंकण्ठेऽप्यत्रैवास्तु विषं तव । इत्युक्त शङ्करोदेवस्तथा प्राह पुरान्तकृत् ॥ पीते विपे देवगणान् चिमुच्य गतो हरोमन्दरशैलमेव । तस्मिन् गते देवगणाः पुनस्तं ममथुरब्धिं विविधप्रकार. ॥ ६ ॥ इति श्री मत्स्यपुराणे क्षीरोदमथनवर्णनं नामोनपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः । - पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः क्षीरोदमथनवर्णनम् । सूत उवाच मथ्यमाने पुनस्तस्मिन् जलधौ समदृश्यत । धन्वन्तरि. स भगवान् आयुर्वेदप्रजापति मदिरा चायताक्षी सा लोकचित्तप्रमाथिनी । ततोऽमृतञ्च सुरभि सर्वभूतभयापहा ॥ जग्राह कमलां विष्णु कौस्तुभञ्च महामणिम् । गजेन्द्रञ्चसहस्राक्षो हयरतञ्च भास्करः धन्वन्तरिच जग्राह लोकारोग्यप्रवर्तकम् । च्छवं जग्राह वरुण कुण्डले च शचीपति पारिजाततरं घायुर्जग्राह मुदितस्तथा । धन्वन्तरिस्ततोदेवो चपुष्मानुदतिष्ठत ॥ ५॥ श्वेतंकमण्डलुचिभ्रदमृतं यत्र तिष्ठति । एतदत्यद्भुतं दृष्ट्वा दानवाना समुत्थितः ॥ ६॥ अमृतार्थ महानादो ममेदमिति जल्पताम् । ततो नारायणो मायामास्थितो मोहिनी प्रभुः ॥ ७॥ स्त्रीरूपमतुलंकृत्वा दानवानभिसंसृत । ततस्तदमृत तस्यै ददुस्ते मूढचेतना ॥ ८॥ स्त्रिय दानवदैतेयाः सर्वे तद्गतमानसा. ॥८॥ अथास्त्राणि च मुख्यानि महाप्रहरणानि च । प्रगृह्याभ्यद्रवन्देवान सहितादैत्यदानवाः ततस्तदमृतदेवो विष्णुरादाय पीर्यपान् । जहारदानवेन्द्रेभ्यो नरेण सहित प्रभु । ततो देवगणा. सर्वे पपुस्तदमृतं तदा । विष्णो. सकाशात् संप्राप्य संग्रामे तुमुलेसति ७०३ ऽध्यायः] * देवदानवयुद्धवर्णनम् * -ततः पिवत्सु तत्काल देधेष्यमृतमीप्सितम् । राहुविवुधरूपेण दानवोऽप्यपियत्तदा । तस्य कण्ठमनुप्राप्ते दानवस्यामृते तदा । माख्यातं चन्द्रसूर्याभ्यां सुराणां हितकाम्यया॥ ततो भगवता तस्य शिरश्छिन्नमलंहतम् । चक्रायुधेन चक्रेण पिवतोऽमृतमोजसा ।। तच्छलश्टङ्गप्रतिम दानवस्य शिरोमहत् । चक्रेणोत्कृत्तमपतञ्चालयन् वसुधातलम् ॥१५ ततो चैरविनिर्वन्धः कृतो राहमुखेन वै । शाश्वतश्चन्द्रसूर्याभ्यां प्रसह्याद्यापि बाधते ॥ विहायभगवांश्चापि स्त्रीरूपमतुलं हरिः। नानाप्रहरण मैदानवान् समकम्पयत् ॥ मासाः सुचिपुलास्तीक्ष्णाः पतन्तश्च सहस्रशः। ते सुराश्चक्रनिर्मिन्ना घमन्तोरधिरं बहु असिशक्तिगदाभिन्ना निपेतुर्धरणीतले । भिन्नानिपटिशश्चापि शिरांसि युधि दारुणः ततकाञ्चनमात्यानि निपेतुरनिशन्तदा । रुधिरेगावलिताङ्गा निहताश्च महासुराः ॥२०॥ अदिणामिव कृटानि धातुरकानि शेरते । ततो हलहलाशन्दः सम्बभूव समन्ततः ॥२१॥ अन्योऽन्यं न्छिन्दतां शरीरादित्ये लोहितायति । परिपश्चायसः पीतः सन्निकर्पश्च मुष्टिमिः ॥ २ ॥ निग्नतां समरेऽन्योऽन्य शदो दिवमिवास्पृशत् । च्छिन्धि मिन्धि प्रधायेति पातयेमिसरेति च ।। २३ ।। विधूयन्ते महाघोराः शब्दास्तत्र समन्ततः । एवं सुतुमुलेयुद्धे धर्तमाने महाभये ॥४॥ नरनारायणो देवो समाजग्मतुराहयम् । तत्र दिव्यं धनुर्दृष्ट्वा नरस्य भगवानपि । चिन्तयामास च विष्णुर्दानवसत्तमान् ॥ २५ ॥ ततोऽपराचिन्तितमात्रमागतं महाप्रमं चक्रममित्रनाशनम् । पिमापसोस्तुत्यमकुण्टमण्डलं सुदर्शनं भीममसरामुत्तमम् ॥ २६ ॥ तदागतं ज्वलितदुताशनप्रमं भयर फरिफरपारच्युत, । महाप्रभं दनुपुलदैत्यदारण तथोयलग्यटनसमानविग्रहम् ॥ २७॥ मुमोच पै तपनमुप्रयेगवान् महाप्रमं रिपुनगरायदारणम् । सम्परकम्पलनसमानपर्चसं पुनः पुनन्यपतन येगपत्तदा ॥ २८॥ प्यवारयहितिनगपान सहनश फरेलिं पुग्लयरेण संयुगे।
७०४
* मत्स्यपुराणम् * [एकपञ्चाशदधिकद्विशततमो
दहत् क्वचिज्ज्वलन इवानिलेरितं प्रसह्य तानसुरगणान्नकृन्तत ॥ २६ ॥
प्रवेरितं पियति मुहुः क्षितौ तदा पपी रणे रुधिरमयः पिशाचवत् ।
अथासुरा गिरिभिरदीनमानसा मुहुर्मुहु. सुरगणमर्दयंस्तथा ॥३०॥
महाचला विगलितमेघवर्चस. सहस्रशो गगनमहाप्रपातिन. ।
अथान्तराभरजननाः प्रपेदिरे सपादपा बहुविधमेघरूपिण. ॥ ३१ ॥
महाद्रयः प्रविगलिताग्रसानवः परस्परं द्रुतमभिपत्य भास्वराः ।
ततो मही प्रचलितसाद्रिकानना महीधराः पवनहताः समन्ततः ॥ ३२॥
परस्परं भृशममिगर्जितं मुहू रणाजिरे भृशमभि सम्पर्तते ।
नरस्ततो परकनकानभूपणे महेषुभि. पवनपथं समावृणोत् ॥ ३३ ॥
विदारयन् गिरिशिखराणि पत्रिभिर्महाभये सुरगणविग्रह तदा।
ततो मही लवणजलञ्च सागरं महासुराः प्रविषिशुरदिताः सुरे. ॥ ३४ ॥
वियद्गत ज्वलितहुताशनप्रभं सुदर्शनं परिकुपितं निशाम्य च ।
तत. सुरैविजयमधाप्य मन्दरः स्वमेव देशं गमितः सुपूजित ॥ ३५ ॥
चिनादयन् स्वदिशमुपेत्य सर्वशस्ततोगताः सलिलधरा यथा गतम् ।
ततोऽमृतं सुनिहितमेव चक्रिरे सुरा. परां मुदमभिगम्य पुष्कलाम् ।
ददुश्च त निधिममृतस्य रक्षितुं किरीटिने यलिभिरथामरैः सह ॥ ३६ ॥
इति श्री मत्स्यपुराणे क्षीरोदमथनवर्णनं नाम पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।
एकपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
प्रासादभवनादीनां निर्माणवर्णनम् ।
अपय ऊचुः।
प्रासादभवनादीनां निवेशं घिस्तराद्वद । कुर्यात्वेन विधानेन कश्च धास्तुरदाहृतः ॥१॥
७०५ ऽध्यायः] * प्रासादभवनादीना निर्माणवर्णनम् * सूत उवाच। भृगुरत्रिचशिष्ठश्च विश्वकर्मा मयस्तथा । नारदोनग्नजिच्चच विशालाक्ष पुरन्दर. ॥२॥ ब्रह्माकुमारो नन्दोश शोनको गर्ग एव च । वासुदेषोऽनिरुद्धश्च तथा शुक्रवृहस्पती॥ अष्टादशैते विरयाता वास्तुशास्त्रोपदेशका. । सझपेणोपदिष्टन्तु मनवे मत्स्यरूपिणा ॥४॥ तदिदानी प्रवक्ष्यामि धास्तुशास्त्रमनुत्तमम् । पुरान्धकवरेधोरे घोररूपस्य शलिन ॥५ ललाटस्वेदसलिलमपतद् भुवि भीषणम् । करालवदनं तस्मात् भूतमुद्भूतमुल्यणम् ॥६ असमानमिवाकाशं सप्तद्वीपा वसुन्धराम् । ततोऽन्धकाना रधिरमपिवत्पतित क्षिती॥ ७ ॥ तेन तत्समर सर्व पतित यन्महीतले । तथापि तृप्तिमगमन्न तद्भूतं यदा तदा ॥ ८॥ सदाशिवस्य पुरतस्तपश्चके सुदारुणम् । क्षुधाविष्टन्तु तद्भूतमाह जगतीत्रयम् ॥ ६॥ तत कालेन सन्तुष्टो भैरवस्तस्य चाहये । घरं वृणीव भदन्ते । यदभीतवानघ । तमुचाच ततोभूतं त्रैलोक्पग्रसनक्षमम् । भवामि देवदेवेश तयेत्युक्तञ्च शरिना ॥ ११॥ ततस्तत् त्रिदिवं सर्व भूमण्डलमशेषत । स्वदेहेनान्तरिक्षच न्धान प्रपतनुभुवि ॥ १२॥ भीतमीतस्ततोदेये ब्रह्मणा चाथ शूलिना । दानयासुरक्षोभिरयष्टध समन्तत ॥ १३॥ येन यत्रेयवाक्रान्तं स तवावसत्पुन । निवासात्सर्वदेवाना पास्तुरित्यभिधीयते ॥ अपर धाश्च तेनापि पिज्ञप्ता सर्वदेवता । प्रसीदप सुग सर्वं युप्माभिनिश्चलीरत स्यास्यामहं किमाकारो हपष्टत्यो हाधोमुप । ततो ब्रह्मादिभिः प्रोक्त पास्तुमध्ये तु यो पलि ॥१६॥ माहारो वैश्वदेवान्ते नूनमस्मिन्मविष्यति । धाम्नुपूजामकुणस्तपाहारी भविष्यति मशानात्तु एतो यशस्तपादारो भविष्यति । यसोत्सवादी चपलिस्तपाहारोभविष्यति पच मुनस्ततोहट सवास्तुरभवत्तदा । पास्नुयश स्मृतस्तम्मात्तत प्रभृतिशान्तये ।। इति श्रीमत्स्यपुराणे पास्तुपा विधानवर्णन नाम: फपञ्चाशदधिक द्विशततमोऽध्यायः ।
द्विपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः गृहनिर्माणकालवर्णनम् । सूत उवाच। अथात. सम्प्रवक्ष्यामि गृहकालविनिर्णयम् । यथा कालं शुभं ज्ञात्वा सदा मवनमारभेत् ॥ १ ॥ वैत्रेव्याधिमवाप्नोति यो गृहं कारयेन्नरः । वैशाख धेनुरत्नानि उठेमृत्युं तथैव च ॥ आपाढे भृत्यरत्नानि पशुधर्गमवाप्नुयात् । श्रावणे भृत्यलाभन्तु हानि भाद्रपदे तथा ॥ पतीनाशोऽश्विने विन्द्यात्कार्तिके धनधान्यकम् । मार्गशीर्षे तथा भक्तं पौपे तस्करतो भयम् ॥en लाभञ्च बहुशो विन्द्यात् अग्निं माघे विनिर्दिशेत् । फाल्गुने काञ्चनं पुत्रानिति कालवलं स्मृतम् ॥ ५॥ अश्विनीरोहिणीमूलं उत्तरात्रयमैन्दवम् । स्वातीहस्तोऽनुराधा व गृहारम्भे प्रशस्यते ॥ आदित्यभौमवास्तु सर्वेधाराः शुभावहाः। घज्यव्याघातगालेचव्यतीपातातिगण्डयोः विष्कम्भगण्डपरिधधनयोगेषु कारयेत् । श्वेते मैत्रेऽथ माहेन्द्र गान्धर्वाभिजिति रोहिणे ॥ ८ ॥ तथा वैराजसावित्रे मुहूर्ते गृहमारभेत् । चन्द्रादित्यवलं लञ्चा शुभलानं निरीक्षयेत् स्तम्भोच्छायादिकर्तव्यमन्यत्तु परिवर्जयेत् । प्रासादेष्वेवमेवं स्यात् कूपवापीपुचय हि पूर्व भूमि परीक्षेत पश्चाद्वास्तुं प्रकल्पयेत् । श्वेतारक्ता तथापीता कृष्णाचैवानुपूर्वशः । विप्रादेः शस्यते भूमिरत. काय्यं परीक्षणम् । विप्राणांमधुरास्वादाकटुकाक्षत्रियस्य तु तिक्ताकपाया च तथा वैश्यशूरेषु शस्यते । अरनिमात्रेवैगते स्पनुलिते च सर्वशः । पृतमामशरावस्थं कृत्वावर्तिचतुष्टयम् । ज्वालये परीक्षायं तत्पूर्णसर्वदिङ मुखम् ॥ दीप्तीपूर्वादिगृतीयाद्वर्णानामनुपूर्वशः । वास्तुः सामूहिकोनाम दीप्यते सर्वतस्तुयः ॥ 1
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ध्यायः]
* गृहनिर्माणवर्णनम् #
शुभदः सर्ववर्णानां प्रासादेषु गृहेषु च ।
अरनिमात्रमधोगते परोक्ष्यं खातपूरणे ॥ १६ ॥
अधिकेश्रियमाप्नोति न्यूनेहानिसमे समम् । फालकृष्ऽथवादेशे सर्ववीजानि धापयेत्
निपञ्चसरात्रे च यत्रारोहन्ति तान्यपि । ज्येष्ठोत्तमाकनिष्ठापूर्वर्जनीयतरा सदा॥१८॥
पञ्चगव्योपधिजल परीक्षित्वा च सेवयेत् । एकाशीति पदं कृत्वा रेपाभिःकनकेन च
पश्चास्पिष्टेनचालिप्य सूत्रेपणालोड्य सर्वतः । दशपूर्वायतालेखा दशचैवोत्तरायताः ॥
सर्ववास्तुविभागेषु विज्ञेया नयका नव । एकाशीति पदं कन्या पास्तुवित्सर्ववास्तुषु
पदस्थान् पूजयेद्देवां स्त्रिंशत्पञ्चदशैव तु |
द्वात्रिंशद्वाह्यतः पूज्याः पूज्याश्चान्तस्त्रयोदश ॥ २२ ॥
नामतस्तान् प्रवक्ष्यामि स्थानानि च नियोधत ।
ईशानकोणादिपु तान् पूजयेद्धविधा नरः ॥२३ ।।
शिपोचवायपर्जन्यो जयन्त कुलिशायुधः । सूर्यसो भृशश्चैव आकाशो वायुरेच च
पूपा च वितयश्चय गृहशतयमाधुभो । गन्धयाँ भृगराजश्व मृगः पितृगणस्तथा ॥२५
दीपारिकोऽथ सुग्रीव. पुष्पदन्तो जलाधिपः । असुर' शोषपापी चरोगोहिमस्यएपच
भल्लाटः सोमसी च अदितिश्च दितिस्तथा । यहि त्रिंशदेते तु तदन्तस्तु ततः शृणु
ईशानादिचतुष्कोणसंस्थितान् पूजयेद्युध. । आपश्चैवाथसावितो जयोरदस्तयंवच
मध्ये नवपदे ग्रहातल्याप्चसमीपगान् । साध्यानेकान्तराविद्यात्पूर्वाद्यान्नामत शृणु
अर्यमासविताय विचस्यान विबुधाधिपः । मित्रोऽधराजयक्ष्मावतथापृथ्वीधर स्मृतः
अपमधापपासम्नु परितो बामणः स्मृत । आपञ्चवापयत्सय पर्यनोऽमिदितिस्तथा
पदिकानान्तु वोऽयमेव फोणेप्यशेषतः । तन्मध्ये तु बहिर्विश द्विपदास्ते तु सर्वशः।
अमावलियम्यांध मित्रः पृथ्वीधरस्तथा।
ग्रामप. परितो दिनु पिपदारते तु सश. ॥ ३३॥
वंशानिदानी पक्ष्यामि अजूनपि पृथक पृथम् ।
घा यातधारोगात् पितृभ्यः शिरिन पुनः ॥ ३४ ॥
७०८ .. * मत्स्यपुराणम् * [ द्विपञ्चाशदधिकद्विशततमो मुख्यात्भृशं तथा शोषाद्वितथं यावदेव तु । सुग्रीवाददिति यावन् मृगात्पर्जन्यमेवच पतेवंशाः समाख्याताः क्वचिञ्च जयमेव तु । एतेपा यस्तुसम्पात पदं मध्यं समं तथा मर्मचैतत्समाख्यातं त्रिशूलं कोणगञ्च यत् । स्तम्भ न्यासेषुघानितुलाविधिपुसर्वदा कीलोछिटोपघातादि घर्जयेद् यत्नतो जन । सर्वत्र पास्तुनिर्दिष्टो पितृवैश्वानरायतः मुर्द्धन्यग्निः समादिष्टो मुसेचापःसमाश्रितः । पृथ्वीधरोऽर्यमाचैवस्तनयोस्तावधिष्ठितो वक्षस्थले चापवत्स पूजनीयः सदा बुधैः । नेत्रयोदितिपर्जन्यौ श्रोत्रेऽदितिजयन्तको सर्पेन्द्रावससंस्थौ तु पूजनीयौ प्रयत्नतः । सूर्यसोमादयस्तद्वत् चाहोः पञ्च च पञ्च व रुद्रश्च राजयक्ष्मा च वामहस्ते समास्थिती। सावित्रः सविता तद्वद्धस्तं दक्षिणमास्थिती ॥४२॥ विवस्वानथ मित्रश्च जठरे संव्यवस्थिती । पूपाच पापयक्ष्मा व हस्तयोर्मणिबन्धने । तथैवासुरशोपी व वामपाश्चं समाश्रितो । पायेंतु दक्षिणे तद्वत् वितथा सगृहक्षतः॥ ऊर्वोर्यमावुपी शेयो जान्योर्गन्धर्चपुष्पकी। जड्चयो भृगसुग्रीवौस्फिक्स्थौ दोघारिको मृगः ॥ ४५ ॥ जयशको तथा मेढ़े पादयोः पितरस्तथा । मध्ये नव पदे ब्रह्मा हृदये स तु पूज्यते ॥ चतु.पष्टि पदो पास्तुः प्रासादे ब्रह्मणास्मृतः । ब्रह्मा चतुप्पदस्तत्र कोणेप्यर्धपदास्तथा यहिः कोणेपु धास्ती तु सार्धाश्चोभयसंस्थिताः । विशति द्विपदाश्चैव चतु पष्टि पदे स्मृताः ॥ ४८॥ गृहारम्भेषु कण्डतिः स्वाम्यड्ने यत्र जायते । शल्य त्यपनयेत्तत्र प्रासादे भवने तथा ।। सशत्यं भयदं यस्मादशल्यं शुभदायकम् । हीनाधिकां गतायास्तोसर्वथातु विवर्जयेत् नगग्रामदेशेषु सर्वत्र विवर्जयेत् । चतु शाल विशालञ्च द्विशालं चैकशालकम् । नामतस्तान प्रवक्ष्यामि स्वरूपेण द्विजोत्तमाः॥ ५३॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे गृहनिर्माणवर्णनं नाम द्विपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।
। त्रिपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः भवन निर्माणवर्णनम् । सूत उवाच । चतु शालं प्रवक्ष्यामि स्वरूपन्नामतस्तथा । चतु शालचतुरैरलिन्दः सर्वतोमुखम् नाम्ना तत् सर्वतोभद्रं शुभं देवनृपालये । पश्चिमद्वारहीनच नन्यावर्त प्रचक्षते ॥ २ ॥ दक्षिणद्वारहीनन्तु वर्द्धमानमुपाहतम् । पूर्वद्वारविहीनं तस्वस्तिकं नाम विश्रुतम् ।। रचकंचोत्तरद्वारविहीनं तत्प्रवक्षते । सौम्यशालाविहीन यत्त्रिशालं धान्यकञ्च तत् ॥ क्षेमवृद्धिकरं नृपां वटुपुत्रफलप्रदम् । शालया पूर्वया हीनं सुक्षेत्रमिति विश्रुतम् ॥ ५॥ धन्यं यशस्यमायुष्य शोकमोह विनाशनम् । शालया याम्ययाहीनयद्विशालंतुशालया फुलक्षयकरंनृणां सर्वव्याधिविनाशनम् । हीनं पश्चिमया यत्तु पक्षनं नाम तन्पुन ॥७॥ मित्र वन्धून सुतान् हन्त तथा सर्वभयापहम् । याम्यापराभ्या शालाभ्या धनधान्यफलप्रदम् ॥ ८ ॥ क्षेमऋद्धिकरं नृणा तथापुत्र फलप्रदम् । यम सूर्यञ्चविज्ञेयं पश्चिमोत्तरशालिकम् ॥ ६॥ राजाग्निमयदं नृपा कुलक्षयकरं च यत् । उदक्पूर्वे तु शालेहं दण्डारये अब तद्भवेत् ॥ अकालमृत्युभयदं परचक्रभयावहम् । धनारय पूर्वयाम्याभ्या शालाभ्यायद्विशालकम् तच्छस्त्रभयदंनृणा पराभवभयाचदम् । चुल्लीपूर्वा पराभ्या तु साभवेन्मृत्युसूचनी ॥१२ वैधयदायक स्लीणामनेकभयकारकम् । कार्यमुत्तरयाम्याभ्याशालाभ्याभयदनृणाम्।। सिद्धार्थवज्रयाणि विशालानि सदावुधैः । अथात सप्रवक्ष्यामि भवनंपृथिवीपतेः पञ्चप्रकार तत्प्रोक्तमुत्तमादि विभेदत । अष्टोत्तरहस्तशत विस्तरश्चोत्तमोमत ॥ १५॥ चतुर्पान्येषु विस्तारो हीयतेचाएभिः फरः । चतुर्या शाधिकं दैन्यं पञ्चस्थपि निगद्यते युपराजस्य पक्ष्यामि तथाभवनपञ्चकम् । पड्मि पड्भिस्तथाशीतिहीयतेतविस्तरान् यशेन वाधिकद पश्चस्वपि निगद्यते । सेनापते प्रपक्ष्यामि तथा भवनपञ्चकम् ७१० * मत्स्यपुराणम् * [त्रिपञ्चाश-धिकद्विशततमो चतु षष्टिस्तुविस्तारात्पड्भि षड्भिस्तुहीयते। पञ्चस्वेतेषुदैर्ध्यञ्चपड्भागेनाधिकभवेत् मन्त्रिणामथ वक्ष्यामि तथा भवनपञ्चकम् । चतुश्चतुभिहींनास्यात् करषष्टि प्रविस्तरे अष्टाशेनाधिक देय पञ्चस्वपि निगद्यते । सामन्तामात्यलोकाना वक्ष्ये भवनपञ्चकम् चत्वारिंशत्तथाप्टौ च चतुभि हीयते क्रमात् । चतुर्था शाधिक दैव्यं पञ्चस्वेतेषु शस्यते शिल्पिना कञ्चुकीनाञ्च वेश्याना गृहपञ्चकम् । अष्टाविंशत् कराणान्तु विहीन विस्तरे क्रमात् ॥ २३ ॥ द्विगुप दैर्घ्यमेवोक्त मध्यमेष्वेवमेव तत् । दूतीकर्मान्तिकादीना वक्ष्ये भवनपञ्चकम् ॥ चतुर्थाशाधिकदैव्यं विस्तारोद्वादशैवनु । अर्धा किरहानि स्याद्विस्तारात्पञ्चश क्रमात् देघशगुरुवैद्याना सभास्तारपुरोधसाम् । तेपामपि प्रवक्ष्यामि तथा भवनपञ्चकम् ॥ चत्वारिंशत्तुविस्ताराच्चतुर्भिहीयते क्रमात् । पञ्चस्वेतेपु दैर्व्यञ्च षड्भागे नाधिकभवेत् चतुर्वर्णस्य पक्ष्यामि सामान्य गृहपञ्चकम् । द्वात्रिंशतिकराणान्तु चतुर्मिहीयते क्रमात् पापोडशादितिपर नूनमन्तेवसायिनाम् । दशाशेनाप्रभागेन त्रिभागेनाथ पादिकम् ॥ अधिकदेर्यमित्या ब्राह्मणादे प्रशस्यते । सेनापते पस्यापि गृहयोरन्तरेण तु ॥३० नृपवासगृहकार्य भाण्डागारन्तथैव च । सेनापते हस्यापि चातुर्य पर्यस्य चान्तरे ॥ घासाय च गृह कार्य राजपूज्येषु सर्वदा ॥३१॥ अन्तरप्रभवानाञ्च स्व पितु गृहमिप्यते । तथा हस्तशतादद्धं गदित धनवासिनाम् ।। सेनापते पस्यापि सप्तत्यासहितेऽन्यिते । चतुर्दश हृतेव्यासे शालान्यास प्रकीर्तित ॥ पञ्चविंशान्यिते तस्मिन्नलिन्द समुदाहृत । तथा पट्त्रिंशद्धस्ता नु सप्ताद्गुरुसमन्विता विप्रस्य महतीशाला न देयं परतोभवेत् । दशाङ्गुलाधिका तहत् क्षत्रियस्य न विद्यते पञ्चत्रिंशत्करावैध्ये अङ्गुरानि त्रयोदश । तावत्करैच शुद्रस्य युतापञ्च दशाङ्गुलै ॥३६॥ शालायास्तु विभागेन यस्याने वीथिका भवेत् । सोप्णीपनाम तद्वास्तु पश्चाच्छ योच्छ्रय भयेत् ॥ ३७॥ पार्श्वयोथिका यत्र सापटम्भन्तदुच्यते । समन्ताद्वीथिकायत सुस्थित तदिहोच्यते शुभदसर्वमेतत्स्या चातुर्वर्णे चतुर्विधम् । विस्तरात् पोडशोभागस्तथास्तचतुष्टयम् ॥
ऽध्यायः] * स्तम्भमाननिर्णयवर्णनम् * प्रथमोभूमिकोछाय उपरिष्टालाहीयते । द्वादशांशेनसर्वासु भूमिकासु तथोच्छ्रयः ४० पोष्टकाभवेदित्तिः पोडशशिन विस्तरात् । दारवैरपिकल्पास्यात्तथा मृन्मयभित्तिका गर्भमानेन मानन्तु सर्वचास्तुषु शस्यते । गृहव्यासस्य पञ्चाशदष्टादशभिरङ्गुलैः ॥४२॥ संयुतो द्वारविष्कम्भो द्विगुणश्चोच्छ्रयोभवेत् । द्वारशाखा सुचाहुल्यमुच्छ्राय करसम्मितैः ।। ४३ ।। अङ्गुलैः सर्वचास्तूनां पृथुत्वं शस्यतेवुधैः । उदुम्बरोत्तमागञ्च तर्धाधं प्रविस्तरात् ।। इति श्रीमत्स्यपुराणे भवननिर्माणवर्णनं नाम त्रिपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः । चतुप्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः स्तम्भमाननिर्णयवर्णनम् । सूत उवाच। अथात. संप्रवक्ष्यामि स्तम्भमान विनिर्णयम् । कृत्वास्थभुवनोच्छ्रायंसदासप्तगुणधुधः? यशीत्यश. पृथुत्वं स्यादनेणावगुण सह । रुचकश्चतुर स्यात्तु अष्टानो पन्न उच्यते ।। विपन्न पोड़शास्त्रस्तु द्वात्रिंशास्त्र प्रलीनकः । मध्यप्रदेशे यस्तम्भो वृत्तोवृत्तइति स्मृतः।। एतेपञ्च महास्तम्भाः प्रशस्ताः सर्यवास्तुषु । पद्मवल्लीलताकुम्भपनदर्पणरूपिताः ॥४॥ स्तम्भस्य नवमांशेन पद्मकुम्भान्तराणि तु । स्तम्भतुल्या तुला प्रोक्ता हीना चोपतुला ततः ॥५॥ त्रिमागे नेह सर्वत्र चतुर्भागेन चा पुनः । हीन हीनं चतुर्था शात् तथा सासु भूमिधु पासगेहानि सर्वेषां प्रवेशे दक्षिणेन तु । द्वाराणि तु प्रवक्ष्यामि प्रशस्तानीह यानि तु पूर्वणेन्हें जयन्तञ्चद्वारं सर्वत्रशस्यते ! याम्यञ्च वितधन्चैव दक्षिणेन विदुयुधाः ॥८॥ पश्चिमे पुष्पदन्तं च धारणा प्रशस्यते । उत्तरेण तु मल्लाटं सौम्यं तु शुभदम्भवेत्॥६॥ तधापास्तुषु सर्वप्र येधं द्वारस्य पर्वयेत् । दारे तु रप्पयापि भयेन् सर्वकुलशयः ॥
। ७१२ * मत्स्यपुराणम् * [चतुष्पञ्चाशदधिकद्विशततमो तरुणावपघाहुल्यं शोकः पड्केन जायते । अपस्मारो भवेचून कूपवेधेन सर्वदा ॥ ११ ॥ व्यथाप्रस्त्रवणेन स्यात्कीलेनाग्नि भय भवेत् । विनाशो देवताविद्ध स्तम्भेन स्त्रीकृतं भवेत् ॥ १२॥ गृहमतुर्विनाश स्यात् गृहेण च गृहे कृते । अमेध्यावस्करविद्धे गृहिणी बन्धकी भवेत् तथा शस्त्रमयं विन्द्यादन्त्यजस्य गृहेण तु । उच्छाया द्विगुणां भूमि त्यक्त्वा वेधो न जायते ॥ १४ ॥ स्वयमुत्पाटिते द्वारे उन्मादो गृहवासिनाम् । स्वयंचापिहिते विद्यात् कुलनाशविवक्षणः मानाधिके राजभयं न्यूने तस्करतो भवेत् । द्वारोपरि च यद्वारं तदन्तकमुखं स्मृतम् अध्यनो मध्यदेशे तु अधिको यस्य विस्तर। धनन्तु सङ्कट मध्ये सद्योभर्तुविनाशनम्।। तथान्यपीडितं द्वारं यहुदोपकरं भवेत् । मूलद्वारातथान्यत्तु नाधिकं शोभनं भवेत् ॥ कुम्भश्रीपणियल्लीभि मूलद्वारन्तु शोभयेत् । पूजयेचापि तन्नित्यं यलिनाचाक्षतोदकैः ।। भवनस्य घट पूर्व दिग्भागे सर्वकामिकः । उदुम्बरस्तथा याम्ये घारुण्यां पिप्पल. शुभः ॥२०॥ लक्षश्चोत्तरतोधन्यो विपरीतास्त्वसिद्धये। कण्टकीक्षीरवृक्षश्च आसनः सफलो द्रुम ।। भााहानी प्रजाहानी भवेतां क्रमशस्तदा । न च्छिन्द्यात् यदि तानन्यानन्तरे स्थापयेच्छुभान् ॥ २२ ॥ पुन्नागाशोकपपुलशमीतिलकचम्पकान् । दाडिमोपिप्पलीद्राक्षा तथा फुसुममण्डपान् जम्बीरपूगपनसद्रुमकेतकीभि ांतीसरोजशतपत्रिकमलिकाभिः । यन्नालिकेरफदलीदलपाटलाभिर्युक्तं तद्न भवन श्रियमातनोति ॥२४॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे स्तम्भमाननिर्णयवर्णनं नाम चतुष्पश्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।
पञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः भवननिर्माणवर्णनम् । सूत उवाच। उदगादिप्लवं वास्तु समानशिखरंतथा । परीक्ष्य पूर्ववत्कुर्यात्स्तम्भोच्छ्रायविवक्षण: न देवधूतंसचिवचत्वराणां समन्तत । कारयेद्वनं प्राज्ञो दुःखशोकमयं ततः ॥२॥ तस्य प्रदेशाश्चत्वारस्तथोत्सगोंऽग्रत शुभः । पृष्टत. पृष्ठभागस्तु सव्यावर्तः प्रशस्यते ॥ अपसन्यो विनाशाय दक्षिणे शीर्षकस्तथा । सर्पकामफलोनृणा सम्पूर्णों नाम धामत एवं प्रदेशमालोस यत्नेन गृहमारभेत् । अथ सांवत्सरेप्रोक्त मुहर्ते शुभलक्षणे ॥५॥ रतोपरि शिला त्या सर्वधीजसमन्विताम् । चतुर्मित्राह्मण स्तम्भं कारयित्वा सुपूजितम् ॥ ६॥ शुखाम्बरधरः शिल्पिसहितो वेदपारगः । सापितं विन्यसेत्तद्वत्सवौंपधिसमन्वितम् । नानाक्षतसमोपेतं घस्त्रालङ्कारसयुतम् । ब्रह्मधोयेण यायेन गीतमगलनि.स्वने ॥ ८ ॥ पायसं भोजयेद्विवान् होमन्तु मधुसपिपा । चाम्तोप्पनेप्रतिज्ञानीहि मन्त्रेणानेन सर्वदा सूत्रपात तथा कार्य्यमेवं स्तम्भोदये पुनः। द्वारवंशाच्छये तद्वत्प्रवेशसमये तथा ॥१॥ पास्तूपशमने तद्वद्वास्तुयशस्तु पञ्चधा । ईशाने स्वपातः स्यादाग्नेयेस्तम्भरोपणम् ॥ प्रदक्षिणच फुर्वीत पास्तोः पदविलेपनम् । तर्जनी मध्यमा चैव तपाङ्गुष्ठन्तु दक्षिणे ॥ प्रवालरतकनकफलं पिष्ट्वा कृतोदकम् । सर्वधास्तु विमागेषु शस्तं पदविलेदने ॥ १३॥ न भस्मानारकाप्टेन नपशस्त्रेण नमभिः । न शृङ्गास्थिफपालेश्च विद्वास्नु पिलेपयेत् ॥ १४ ॥ एभिर्विलिखितं दुय्यांददुपशोफमयादिकम् । यदा गृहप्रवेश स्याच्छिल्पी तत्रापि लक्षयेत् ॥ ३॥ म्तम्मनादिकं तदन्छुभाशुभफलप्रदम् । भादिन्यामिमुग रोनि शनि. पुरं यदि ७१४ * मत्स्यपुराणम् * [पञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमो तुल्यकालं स्पृशेदङ्गं गृहभर्तुर्यदात्मनः । धास्त्वनै तद्विजानीयान्नरशल्यं भयप्रदम् ॥ भङ्कनानन्तरं यत्र हस्त्यश्वश्वापदं भवेत् । तदङ्गसम्भवं विन्द्यात्तत्र शल्यं विचक्षणः ॥ प्रसार्यमाणे सूत्रे तु श्वागोमायुर्विलविते । तत्तु शल्यं विजानीयात् खरशब्देति भैरवे । यदीशाने तु दिग्भागे मधुरं रोति चायस. धनं तत्र विजानीयाभागे चास्याम्यधिष्ठित सूत्रच्छेदभवेन्मृत्युर्व्याधिः कीले त्वधोमुखे । अडारे तथोन्मादं कपालेषु च सम्भ्रमम् कावुशल्येषु जानीयात पोश्चल्यं स्त्रीपु वास्तुवित् । गृहभर्तु हस्यापि विनाशः शिल्पिसम्भ्रमे ॥ २२ ॥ स्तम्भे स्कन्धच्युते कुम्भे शिरोरोगं विनिर्दिशेत् । कुम्भापहारे सर्वस्य कुलस्यापि क्षयो भवेत् ॥ २३ ॥ मृत्युः स्थानच्युतेकुम्भे भग्नेबन्धं विदुर्घधा । करसख्याधिनाशे तु नाशंगृहपतेविदुः विजीपधिविहीनेतुभूतेभ्योभयमादिशेत् । तत प्रदक्षिणेनान्यान्यसेत्स्तम्भाविचक्षणः यस्माद्भयकरं नृणां योजिताह्यप्रदक्षिणम् । रक्षांकुर्वीत यत्नेन स्तम्भोपवनाशिनीम् ॥ तथा फलपती शाखा स्तम्भोपरि निवेशयेत् । प्रागुदप्रवणं कुर्याद्दिङ्मूढन्तु न कारयेत् ॥ २७ ॥ स्तम्भ धा भवनवापिद्वारं वासगृहं तथा । दिडमूढे फुलनाशः स्यान्नव संवर्द्धयेद् गृहम् यदिसंवर्द्धयेद्गेहं सर्वदिश्च विधयेत् । पूर्वेण पदितं धास्तु कुर्याद्वैराणि सर्वदा ।। दक्षिणे पद्धितं पास्तु मृत्यवे स्यान्न संशयः । पञ्चाद्विवृद्धं यद्वास्तु तदर्थक्षयकारका पञपित तथा सौम्ये वसन्तापकारकम् । आग्नेये यत्र वृद्धि.स्यात् तदग्निभयदं भवेत् पतिं राक्षमेकोणे शिशुक्षयकरं भवेत् । यध्यापि तन्तु पायव्ये घातयाधिप्रकोपरुन् ईशान्यां अन्नहानिःस्यात् चास्तीसद्धिनेसदा । ईशानेदेवतागार तथा शान्तिगृहंभवेत् मदानसन्तथाग्नेये तत्पााचोत्तरंजलम् । गृहस्योपस्करं सयं नै मृत्येम्यापयेत्युधः ॥ पधस्थानं घहिः कुर्यात् स्नानमण्डपमेव च । धनधान्यञ्च पायव्ये फर्मशालान्ततो पतिः एवं पास्तु विशेषः म्यात् गृहभर्तुः शुभावहः ॥ ३५ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे भवननिर्माणवर्णनं नाम पशपञ्चाशदधिकमिशततमोऽध्यायः ।
पटपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः दाहिरणवर्णनम् । सूत उवाच। अथातः संप्रवक्ष्यामि दाहरणमुत्तमम् । धनिष्ठापञ्चके मुक्त्वा विष्ट्यादिकमतःपरम् तत सांवत्सरादिष्टे दिने यायावन बुधः । प्रथमं बलिपूजाञ्च कुर्य्यावृक्षस्य सर्वदा॥ पूर्वोत्तरेण पतितं गृहदारु प्रशस्यते । अन्यथा न शुभं विन्द्यात् याम्योपरि निपातनम् ॥ क्षीरवृक्षोद्भवं दारु न गृहे विनिवेशयेत् । कृताधियास विहगैरनिलानलपीडितम् ॥४॥ गजाघरग्णञ्च तथा घिद्युभिर्धातपीडितम् । अर्द्धशुष्कं तथा दारुभग्नशुष्क तथैवच ॥५॥ चैत्यदेघालयोन नदीसङ्गमजातथा । श्मशानश्पनिलयं तडागादिसमुद्भवम् ॥ ६ ॥ पर्जयेत्सर्वथादात्यदीच्छेठिपुलाश्रियम् । तथा कण्टकिनोवृक्षान् नीपनिम्घविभीतकान् श्लेष्मातकानाम्रतरुन् वर्जयेद् गृहकर्मणि । आसनाशोकमधुकसर्जशाला शुभावहाः ॥ चन्दनं पनसन्धन्यं सुरदारहरिद्रयः । हाभ्यामेवेन वा कुर्यात् त्रिभिर्याभवनं शुभम् ।। यहुभिः कारितं यस्मादनेकभयदं भवेत् । एकैप शिशपा धन्या श्रीपर्णा तिन्दुकीतथा एता नान्यसमायुक्ताः कदाचिच्छुभकारकाः । स्यन्दनः पनसस्तद्वत्सरलार्जुनपाकाः पते नान्यसमायुक्ता पास्तुकार्यफलप्रदाः । तरुच्छेदे महापीतेगोधा विन्द्याद्विवक्षणः माञ्जिष्ठवणे भेकः स्यानीले सर्पादि निर्दिशेत् । अक्षणे सरलं विद्या मुक्ताभे शुकमादिशेत् ॥ १३ ॥ कपिले मूपकाग्विद्यात् गङ्गामे अलमादिशेत् । एवंविधं सगर्भन्तु पर्जयेहास्तु कर्मणि ॥ १४ ॥ पूर्वच्छिन्नातु गृहीयानिमित्तशकुनः शुभैः । व्यासेन गुणिते दर्यअष्टाभिहते तथा ॥ यच्छेवमायत विद्यादष्टभेदं पदामि यः । यज्ञो धूमश्च सिंहश्च वृषभः सर एव च ।। हस्ती पक्षश्च पूर्षायाः फरशेषाभपन्त्यमी । ध्वजःसर्वमुसोधन्यः प्रत्याहारी विशेषतः
* मत्स्यपुराणम् * [सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमो
उदङ्मुखो भवेत्सिंहः प्राङ्मुखो वृपभो भवेत् ।
दक्षिणाभिमुखो हस्ती सप्तभिःसमुदाहृतः ॥ १८ ॥
एकेन ध्वज उद्दिष्टस्त्रिभिःसिंहः प्रकीर्तितः । पञ्चभिवृषभःप्रोक्तोविकोणस्थाश्चवर्जयेत्
तमेघाटगुणंकृत्या करराशिं विचक्षणः। सप्तविंशावतेभागे ऋक्षं विद्याद्विचक्षणः ॥२०॥
अष्टभि जितेऋक्षेयःशेषःसन्ययो मत. 1 व्ययाधिकं न कुर्वीत यतोदोपकरम्भवेत् ॥
आयाधिके भवेच्छान्तिरित्याह भगवान् हरिः ॥२१॥
कृत्याग्रतो द्विजवरानथ पूर्णकुम्भं दध्यक्षताम्रदलपुष्पफलोपशोभम् ।
कृत्या हिरण्ययसनानि तदा द्विजेभ्यो मङ्गल्पशान्तिनिलयाय गृहं विशेत्तु ॥
गृह्योक्तहोम विधिना बलिकर्म कुर्यात् प्रासादवास्तुशमने च विधिर्य उक्तः।
सन्तर्पयेद्विजवरानथ भक्ष्यभोज्यैः शुक्लाम्बरः स्वभवनं प्रविशेत्सधूपम् ॥२३
इति श्रीमत्स्यपुराणे गृहप्रवेशवर्णनं नाम पट्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।
सप्तपञ्चाशदधिकद्विततमोऽध्यायः
क्रियायोगविधिवर्णनम् ।
अपय ऊचुः।
क्रियायोग. फयं सियेद् गृदयादिषु सर्वदा।
शानयोगसम्राति फर्मयोगी विशिष्यते ॥१॥
सूत उयाचा
मियायोगं प्रवक्ष्यामि देवता नुकीर्तनम् ।
भुनिमुत्तिमदं यम्मानान्यत् लोयेषु पिचते ॥२॥
प्रतिष्ठायां मुराणोतु देवतावानुनिनम् । देवयमोत्सयापि यन्धनाय न मुज्यते ।।
पिताम्तापत्प्रवक्ष्यामि याहमपं प्रशम्यने । शहरमाधरंशानं पमहस्नंगदाधाम् ॥४॥
ऽध्यायः]
* प्रतिमानिर्माणवर्णनम् *
च्छत्राकारंशिरस्तस्य कम्युग्रीवं शुभेक्षणम् । तुङ्गनासं शुक्तिकणं प्रशान्तोरभुजक्रमम् ॥
क्वचिदष्टभुजं विद्याश्चतुर्भुजमथापरम् । द्विभुजश्चापि कर्तव्यो भवनेषु पुरोधसा ॥६॥
देवस्याप्टभुजस्यास्य यथास्थानं नियोधत । पटगोगदाशरःपमं दिव्यं दक्षिणतो हरेः ।
धनुश्च खेटकञ्चैव शङ्खचक्रे च घामतः । चतुर्भुजस्य बन्यामि यथैवायुधसंस्थितिः ॥
दक्षिणेन गदापाचासुदेवस्य कारयेत् । वामतः शववके च कर्तव्ये भूतिमिच्छता ॥
कृष्णावतारं तु गदा घामहस्ते प्रशस्यते । यथेच्छया शङ्खचक्रे चोपरिणात् प्रकल्पयेत् ॥
अघस्तात् पृथिवी तस्य कर्तव्या पादमध्यतः ।
दक्षिणे प्रणतं तद् गरत्मन्तनिवेशयेत् ॥ ११ ॥
पामतस्तुभवेलक्ष्मीः पद्महस्ता शुभानना । गरुन्मानप्रतोवापि संस्थाप्यो भूतिमिच्छता
श्रीश्चपुष्टिश्च कर्तव्येपार्श्वयोः पद्मसंयुते । तोरणचोपरिष्टात्तु विद्याधरसमन्वितम् ॥१३
देवदुन्दुभिसंयुक्तं गन्धर्वमिथुनान्वितम् । पत्रचल्लीसमोपेतं सिंहव्यानसमन्वितम् ॥१४॥
तथाकल्पलतोपेतं स्तुयद्भिरमरेश्वरैः। एवंविधोभवेद्विप्णो स्त्रिाभागेनास्य पीठिका ।
नवतालप्रमाणास्तु देवदानवकिन्नराः । अत.परं प्रवक्ष्यामि मानोन्मानं विशेषतः ३६
जालान्तरप्रविष्टानां भानूनां यद्रजःस्फुटम् । त्रसरेणु-सविज्ञेयो चालानन्तैरथापुभिः ॥
तदष्टकेन लिशा तु यूकालिक्षाष्टकर्मता । ययो युकाटकं तद्वदभिस्तैस्तद्वंगुलम् ॥१८॥
स्वकीयांगुलिमानेन मुसं स्याद्वादशांगुलम् ।
मुसमानेन कर्तव्या सर्वावयवकल्पना ? ||
सौवणीराजतीवापि ताम्री रनमयी तथा । शैलीटारमयीचापि लोहसंघमयी तथा॥२०॥
रीनिकाधातुयुक्ताया ताम्रकास्यमयी तथा ! शुभदास्मयीयापि देवतार्चा प्रशस्यने ।।
अंगुष्टपादारभ्य वितस्तिर्यावदेव तु । गृहेषु प्रतिमा कार्या नाधिका शस्यते बुधैः ।
मापोटशा तु प्रासादे कर्तव्या नाधिका तत |
मध्योत्तमकनिष्टा तु कार्या वित्तानुसारतः ॥ २३ ॥
द्वारोच्छ्रायस्य यन्मानमय्या तत्तु फारयेत् ।
भागमेकं ततस्त्यत्या परिशिष्टन्तु यद्धयेत् ॥२४॥
* मत्स्यपुराणम् [सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमो भागद्वयेन प्रतिमा त्रिभागीकृत्य तत्पुनः । पीठिका भागतःकार्या नासिनीचा नवोच्छ्रिता ॥ २५ ॥ प्रतिमामुखमानेन नवभागान् प्रकल्पयेत् । चतुरंगुला भवेद्ग्रीवाभागेन हृदयंपुनः ॥२६ नाभिस्तस्मादधः कार्या भागेनैकेन शोभना । नितत्वेचिस्तरत्वे च अंगुलंपरिकीर्तितम् नाभेरधस्तथामेद् भागेनैकेन कल्पयेत् । द्विभागेनायतावूरू जानुनी चतुरंगुले ॥ २८ ॥ ज द्विभागविख्यातेपादौ च चतुरंगुली। चतुर्दशांगुलस्तद्वन्मौलिरस्य प्रकीर्तितः ॥ उदयमानमिदंप्रोक्त पृथुत्वञ्चनियोधत । सर्वावयवमानेषु विस्तारं शृणुत द्विजाः! ॥ चतुरंगुलंललाटं स्यादूर्ध्व नासा तथैव च । ईयगुलन्तु हनुज्ञेयमोष्ठ स्वांगुलसम्मितः॥ अधागुले ललाटे व तावन्मात्रे भ्रवौ मते । अर्द्धा गुलाभ्रुघोर्लेखा मध्ये धनुरिधानता ॥ उन्नतामा भवेत्पावें श्लक्ष्णा तीक्ष्णा प्रशस्यते। अक्षिणी द्वंयगुला यामे तदधं चैव विस्तरे ॥ ३३ ॥ उन्नतोदरमध्ये तु रक्तान्ते शुभलक्षणे । तारकार्धविभागेन दृष्टिःस्यात्पञ्चभागिका॥३४ द्वंयगुलन्तु भ्रुवोर्मध्ये नासामूलमथांगुलम् । नासाग्रविस्तरं तद्वत् पुटद्वयमथानतम् ॥ नासापुटविलंतर्धा गुलमुदाहृतम् । कपोले द्वंयगुले तद्वत् कर्णमूलाद्विनिर्गते ॥ ३६॥ हन्वनमंगुलं तर द्विस्तारो द्वयगुलो भवेत् । अर्धा गुलाभ्रुवोराजी प्रणालसदृशी समाप मर्दागुलसमस्तद्वदुत्तरोष्ठस्तु विस्तरे । निष्पायसदृशन्तद्वन्नासापुटदलं भवेत् ॥ ३८॥ सृकिणी ज्योतिस्तुल्ये तु कर्णमूलात् पडंगुले। फर्णा तु भ्रूसमी शेयो अदुव॑न्तु चतुरंगुली ॥ ३६ ॥ द्वंयगुलोकर्णपाश्चों तु मागामेकान्तु विस्तृतौ । कर्णयोम्परिटायमस्तकं द्वादशांगुलम् ललाटात्पृष्टतोऽर्धेन प्रोक्तमप्रादशागुलम् । पत्रिंशदगुलश्चात्य परिणादः शिरोगतः सशनिचयो यस्य द्विचत्वारिंशदंगुल.। केशान्तान्हनुका तादंगुलानि तु पोडश ॥ ग्रीधा मध्यपरीणाश्चतुर्विशतिकागुल । अदांगुला भवेदनीया पृथत्येन प्रशस्यते॥४३ स्तननीयान्तरं प्रोक्तमेकतालं स्वयम्भुवा । स्तनयोरन्तरं नह द्वादशांगुटमिध्यते ॥४४॥ स्तनधामण्डलंत उदयद्गुरु परिकीर्तितम् । न्यूयुको भण्डरस्यान्तर्पघमायामाम्मृती ध्यायः] * प्रतिमानिर्माणवर्णनम् * द्वितालचापि विस्ताराद्वक्षस्थलमुदाहृतम् । कसे पडंगुलेप्रोक्त बाहुमूलस्तनान्तरे ॥४६॥ चतुर्दशांगुलीपादावङ्गुष्ठौ तु त्रियंगुली। पञ्चांगुलपरीणाहमगुप्ताग्नं तथोन्नतम् ॥ अंगुष्ठकसमा तद्वदायामा स्यात्प्रदेशिनी । तस्याः पोड़शभागेन हीयते मध्यमांगुली ॥४८॥ अनामिकाष्टभागेन कनिष्ठा चापि हीयते । पर्यनयेणचांगुल्योगुल्फी चंयगुलको मतौ ।। पाणिद्वंयगुलमावस्तु कलयोशः प्रकीर्तितः । विपर्या गुप्तक.प्रोक्त परीणाहश्च द्वयगुलः प्रदेशिनी परीणाहस्व्यंगुलः समुदाहृतः । कन्यसा चाष्टभागेन हीयते क्रमशोद्विजा.॥ अगुलेनोच्छ्रयःकार्योः हांगुष्ठस्य विशेषतः । तदर्धेन तु शेषाणामंगुलीनान्तथोच्छ्रयः ॥ ५२ ॥ जडाने परिणाहस्तु अंगुलानि चतुर्दश । जड्डामध्ये परीणाहस्तथैवाष्टादशांगुलः ॥५३॥ जानुमध्ये परीणाह एकविशतिरंगुल । जानूच्छ्रयोऽङ्गुलप्रोक्तो मण्डलन्तु विरंगुलम् ॥ उरमध्ये परीणाहो ह्यष्टाविंशतिकांगुलः । एकत्रिंशोपरिपाच वृपों तु विरंगुली ॥ झंयगुलश्च तथामेव परीपाहः पड़ेगुलम् । मणिबन्धादधोविद्यात् केशरेखास्तथैव च ॥ मणिकोशपरीणाश्चतुरंगुल इष्यते । विस्तरेण भवेत्तद्वत्कटिरष्टादशांगुला ॥ ५७ ॥ द्वाविंशति तथा स्त्रीणां स्तनी व द्वादशांगुली । नामिमध्यपरीणाहो द्विवत्वारिंशदंगुलः ॥ ५८ ॥ पुरुषे पञ्चपञ्चाशत् कल्याञ्चैव तु घेटनम् । कक्षयोरुपरिष्टात्तु स्कन्धोपोक्ती पडंगुली अष्टांगुलान्तु विस्तारे ग्रीवाञ्चैव विनिर्दिशेत् । परीणाहे तथा ग्रीयां कला द्वादश निर्दिशेत् ॥६॥ आयामो भुजयोस्तद्वत् द्विवत्वारिंशदंगुलः । कार्यन्तु बाहशिपरं प्रमाणेशेड़शांगुलम् उर्ध्व यहाहुपर्यन्तं विन्द्यादष्टांगुलं शतम् । तथैकांगुलहीनन्तु द्वितीयं पर्व उच्यते ॥ पाहमध्ये परीणाहो भवेदष्टादशांगुलः । पोडशोक्त प्रवाहुस्तु पट्कलोग्रफरोमतः ॥ सप्तांगुलं करतलं पक्षमध्यांगुलोमता । अनामिका मध्यमाया: मनमागेन होयते ॥६॥ तस्यास्तु सभागेन कनिष्ठा परिहीयते।
७२०
* मत्स्यपुराणम् * [अष्टपञ्चाशदधिकद्विशततमो
अंगुष्ठस्तर्जनीमूलादध प्रोतस्तु तत्समः ! अंगुष्टपरिणाहस्तु विशेयश्चतुरंगुल १.६६॥
शेषाणामंगुलीनान्तु भागो भागेन हीयते ।
मध्यमामध्यभागन्तु अंगुलद्वयमायतम् ॥ ६७॥
यवो यवेन सर्वासान्तस्यास्तस्या' प्रहीयते । अंगुष्ठपर्वमध्यन्तु तर्जन्या सदृशं भवेत् ।
यवद्वयाधिकं तद्वदनपर्व उदाहृतम् । पर्वार्धे तु नखान्विद्यादंगुलीपु समन्ततः ॥ ६ ॥
स्निग्धंश्लक्ष्ण प्रकुर्वीत ईपद्क्तं तथाग्रतः । निम्नपृष्ठं भवेन्मध्ये पार्श्वत कलयोच्छ्रितम्
तत्रैव केशवल्लीयं स्कन्धोपरि दशाङ्गुला ।
त्रिय कार्यास्तु तन्वङ्गय स्तनोरुजधनाधिका ॥ ७१ ॥
चतुर्दशांगुलायाममुदरं नाम निर्दिशेत् । नानाभरणसम्पन्नाःकिञ्चित्श्लक्ष्णभुजास्तत
किञ्चिदीर्घ भवेवक्त्रमलकालिस्त्तमा । नासाग्रीघा ललाटञ्च सार्द्धमात्र निरंगुलम्
अध्यौं गुलविस्तारः शस्यतेऽधरपल्लय. । अधिकनेतयुग्मन्तु चतुर्भागेन निर्दिशेत् ॥
ग्रीवायलिश्च कर्तव्या किञ्चिदर्धा गुलोच्छ्रया । एवं नारीषु सर्वासुदेवानों प्रतिमासु व
तव चालमिदं प्रोक्तं लक्षणं पापनाशनम् ।। ७५॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे प्रतिमानिर्माणवर्णनं नाम सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः।
अष्टपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
देवाकारप्रमाणवर्णनम् ।
सूत उवाच ।
अत परं प्रवक्ष्यामि देवाकारान् विशेषत ।
दशताल स्मृतो रामो यलिरोचनिस्तथा ॥१॥
पराहो नारसिंहश्च सप्ततालस्तु धामन । मत्स्यगमों च निर्दिष्टौ यथाशोभं स्वयम्भुपा
मत परं प्रवक्ष्यामि दाद्याकारमुत्तमम् । स पीनोरभुजस्कन्धस्ततफाचनसप्रमः ॥३॥
ऽध्यायः] * देवाकारप्रमाणवर्णनम् * शुलोऽर्करश्मिसंघातश्चन्द्राडितजटोविभुः । जटामुकुटधारीच द्वयष्टचारतिश्च सः॥४॥ चाहुवारणहस्ताभो वृत्तजडोरमण्डलः । ऊर्ध्वकेशश्च कर्तव्यो दीर्घायतविलोचनः १५ व्याघ्रचर्मपरीधानः कटिसूत्रत्रयान्वित । हारकेयूरसम्पन्नो भुजगाभरणस्तथा ॥ ६ ॥ वाहपश्चापि कर्नव्या नानाभरणभूषिताः। पीनोलाण्डफलफः कुण्टलाम्यामलंस्तः ॥ बाजानुलम्बबाहुश्च सौम्यमूर्तिः सुशोभनः । पेटकं घामहस्ते तु शसञ्चैव तु दक्षिणे८॥ शक्ति दण्डं त्रिशलञ्च दक्षिणेषु निवेशयेत् । कपालं घामपश्यं तु नागं खट्यागमेव चार एकश्य घरदो हस्तस्तथाक्षवलयोऽपरः । वैशाखस्थानकं रुन्या नृत्याभिनयसंस्थितः। नृत्यन्दशभुज. फार्यों गजचर्मधरस्तथा । तथा त्रिपुरदाहे च वाहवः पोडशैव तु ॥१५॥ राहं यकं गदाशाई घण्टाताधिकामयेत् । तथाधनुः पिनाकञ्च शरो विष्णुमयस्तया चतुर्भुजोऽष्ट्याहुर्या ज्ञानयोगेश्वरी मतः। तीक्ष्णनासाग्रदशन. करालवदनो महान्॥१३॥ मैरयः शस्यते लोके प्रत्यायतनसंस्थितः । न मूलायतने कार्य भैरवस्तु भयष्टुरः॥ १४॥ नारसिंह घराहोपा तथान्येऽपि मयदराः । नाधिकाना न होनाडा कर्तव्या देवता. कवित् ॥२५॥ स्थामिनं घातयेन्यूना करालवदना तथा । अधिका शिरिपन हन्यात् रशा चैवार्थनाशिनी ॥१६॥ एशोदरी तु दुर्मिक्षं निमांसाधननाशिनी । पानासा तु दु.साय सक्षिप्ताङ्गी भयरी चिपिटा दु पशोकाय अनेया नेत्रनाशिनी । दुपदा होनयकमा तु पाणिपादरशा तथा दीनागा होनजहा च भ्रमोन्मादकरी नृणाम् । शुप्फयपत्रा तु राजानं फटिहीना च या मरेत् ॥ १६॥ पाणिपादविहीनो योजायते मारफोमहान् । जट्दाजानुविहीना र शत्रुपल्याणकारिणी पुत्रमित्रपिनाशाय दीनपक्षम्यला तु या । सम्पूर्णापश्या या नु मायुलक्ष्मीप्रदा सदा • एवं लक्षणमासा फतव्यः परमेम्परः । म्न्यमानः मुरः सर्यः समन्ताद येद्दरमा२२॥ रामेण नन्दिना चैव महापालेन शरम् । प्रणमा लोप पालाम्नु पाध्ये नु गणनायराः न्यद्भुट्टीरिटिश्यप भूतपेतालमनाः । सदृष्टास्नु पर्नय्या:स्नुपन्तः पामेन्याम्
७२०
* मत्स्यपुराणम् * . [ अष्टपञ्चाशदधिकद्विशततमो
अंगुष्ठस्तर्जनीमूलादधः प्रोक्तस्तु तत्समः । अंगुष्ठपरिणाहस्तु विज्ञेयश्चतुरंगुलः ॥६६॥
शेषाणामंगुलीनान्तु भागो भागेन हीयते ।
मध्यमामध्यभागन्तु अंगुलद्वयमायतम् ॥ ६७॥
यषो ययेन सर्वासान्तस्यास्तस्याः प्रहीयते । अंगुष्ठपर्वमध्यन्तु तर्जन्या सदृशं भवेत् ।
यवद्वयाधिकं तद्वदापर्व उदाहृतम् । पर्वार्धे तु नखान्विद्यादंगुलीषु समन्ततः ॥ ६ ॥
स्निग्धंश्लक्ष्णं प्रकुर्वीत ईपढ़क्तं तथाग्रतः । निम्नपृष्ठं भवेन्मध्ये पार्श्वताकलयोच्छ्रितम्
तत्रैव केशवल्लीयं स्कन्धोपरि दशाङ्गुला ।
स्त्रियःकार्यास्तु तन्यङ्गय. स्तनोरुजघनाधिका ॥ ७१ ॥
चतुर्दशांगुलायाममुदरं नाम निर्दिशेत् । नानाभरणसम्पन्नाःकिञ्चित्श्लक्ष्णभुजास्तत
फिश्चिद्दीयं भवेद्वक्त्रमलकावलिरुत्तमा । नासाग्रीवा ललाटञ्च सार्द्धमानं विरंगुलम्
अध्य‘गुलविस्तारः शस्यतेऽधरपल्लवः । अधिकनेत्रयुग्मन्तु चतुर्भागेन निदिशेत् ॥
ग्रीचावलिश्च कर्तव्या किञ्चिदर्धा गुलोच्छ्रया। एवं नारीपु सर्वासुदेवानों प्रतिमासु च
तव चालमिदं प्रोक्तं लक्षणं पापनाशनम् ॥ ७५॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे प्रतिमानिर्माणवर्णनं नाम सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।
अष्टपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
देवाकारप्रमाणवर्णनम् ।
सूत उवाच।
अतः परं प्रवक्ष्यामि देवाकारान् विशेषत ।
दशताल.स्मृतो रामो बलियरोचनिस्तथा ॥१॥
घरादो नारसिदश्च समतालस्तु घामन । मत्स्यक्रमौ च निर्दिष्टी यथाशोभं स्वयम्भुवा
मत परं प्रवक्ष्यामि दायाफारमुत्तमम् । स पीनोस्भुजस्कन्धस्ततफाचनसम्मः ॥३॥
ऽध्यायः] * देवाकारप्रमाणवर्णनम् * ७२१ शुकोऽर्करश्मिसंघातश्चन्द्राडितजटोचिभुः । जटामुकुटधारीच तयधर्षाकृतिश्च सः॥४॥ बाहुवारणहस्ताभो वृत्तजङ्कोरुमण्डलः । ऊर्ध्वकेशश्च कर्तव्यो दीर्घायतविलोचनः ॥५ व्याघ्रचर्मपरीधानः कटिसूत्रत्रयान्धितः । हारफेयूरसम्पन्नो भुजङ्गाभरणस्तथा ॥६॥ वाहपश्चापि कर्तव्या नानाभरणभूपिताः । पीनोरुाण्डफलकः कुण्डलाभ्यामलंहतः ॥ बाजानुलम्वयाहुश्च सौम्यमूर्तिः सुशोभनः । पेटकं चामहस्ते तु शङ्खश्चैव तु दक्षिणे८॥ शक्तिं दण्डं त्रिशूलञ्च दक्षिणेपु निवेशयेत् । कपालं घामपर्थे तु नागं खट्वाङ्गमेव च। एकश्च घरदो हस्तस्तथाक्षवलयोऽपरः । वैशाखस्थानकं कृत्वा नृत्यामिनयसंस्थितः॥ नृत्यन्दशभुजः कार्यों गजचर्मधरस्तथा । तथा त्रिपुरदाहे च वाहवः पोडशैव तु ॥११॥ शवं चक्रं गदाशाङ्गं घण्टातत्राधिकाभवेन् । तथाधनुः पिनाकञ्च शरो विष्णुमयस्तथा चतुर्भुजोऽष्टयाहु ज्ञानयोगेश्वरो मतः। तीक्ष्णनासाप्रदशनः करालवदनो महान्॥१३॥ भैरयः शस्यते लोके प्रत्यायतनसंस्थितः । न मूलायतने कार्य भैरवस्तु भयङ्करः॥ १४ ॥ नारसिंह घराहोवा तथान्येऽपि भयङ्कराः। नाधिकाङ्गा न हीनाङ्गा कर्तव्या देवताः कचित् ॥१५॥ स्थामिनं घातयेन्यूना करालवदना तथा । अधिका शिल्पिन हन्यात् शा चैवार्थनाशिनी ॥१६॥ पृशोदरी तु दुर्भिक्षं निमींसाधननाशिनी । घनासा तु दुःपाय सक्षिप्तानी भयङ्करी चिपिटा दुःपशोकाय अनेत्रा नेत्रनाशिनी । दुःखदा होनयक्त्रा तु पाणिपादरशा तथा हीनाङ्गा हीनजवा च भ्रमोन्मादकरी नृणाम् । शुष्फरपना तु राजानं फटिहीना च या भवेत्॥ १६॥ पाणिपादविहीनो योजायते मारफोमहान् । जहाजानुविहोना च शधुकल्याणकारिणी पुमित्रविनाशाय हीनपक्षस्थला तु या । सम्पूर्णावयपा या तु बायुलक्ष्मीपदा सदा 1 एवं लक्षणमासाद्य कर्तव्यः परमेश्वरः । स्तूयमानः सुरेः सर्वः समन्तादर्शयेदपम्॥२२॥ शमण नन्दिना चैव महाकालेन शङ्करम् । प्रणता लोकपालास्तु पाये तु गणनायकाः नृत्यङ्गीरिटिश्चैप भूतयेतालसंवृताः । सदृशास्तु फर्तव्याःस्तुपन्तः परमेश्वरम् ७२२ * मत्स्यपुराणम् * [ऊनपप्ठ्यधिकद्विशततमो गन्धर्वविद्याधरकिन्नराणामथाप्सरो गुह्यकनायकानाम् । गणैरनेके शतशो महेन्द्र मुनिप्रवीरैरपि नम्यमानम् ॥ २५ ॥ धृताक्षसूत्र. शतश प्रवालपुप्पोपहापचयन्ददद्भिः । संस्तूयमानं भगवन्तमीड्य नेत्रत्रयेणामरमर्त्यपूज्यम् ॥ २६ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे देवाकारप्रमाणवर्णनं नामाष्टपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः । ऊनपट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः देवाकारप्रमाणवर्णनम् । सूतउवाच। अधुना सम्प्रवक्ष्यामि अर्धनारीश्वर परम् । अर्धेन देवदेवस्य नारीरूपं सुशोभनम् ईशार्धे तु जटाभागो बालेन्दुकलयायुत । उमाधैवापि दातव्यो सीमन्ततिलकानुभोर पासुकिर्दक्षिणे कर्णे घामे कुण्डलमादिशेत् । बालिका चोपरिष्टात्तु कपालं दक्षिणेकरे त्रिशूल पापि कर्तव्य देवदेवस्य शूलिन ॥ ३ ॥ चामतो दर्पणं दद्यादुत्परन्तु विशेषत ॥४॥ चामबाहुश्च कर्तव्य क्यूरवलयान्वित । उपवीतश्च कर्तव्यं मणिमुक्तामयन्तथा ॥ ५ ॥ स्तनभारं तथार्धेतु पामेपीन प्रकल्पयेत् । परार्यमुज्ज्वलकुर्याच्छोण्यर्धेतु तथैव च ॥ लिङ्गार्द्धमूर्ध्वग फुर्यात् व्यालाजिनताम्बरम् । धामेलम्बपरीधानं कटिसूत्रत्रयान्वितम् नानारतसमोपेत दक्षिणेभुजगान्वितम् । देवस्य दक्षिण पादपद्मोपरिसुसंस्थितम् ॥८॥ कश्चिदर्थे तथा घामं भूपितं नूपुरेण तु । रविभूषितान कुव्दगुलीप्वगुलीयफान् ॥ ६ ॥ सालतकं तथापादं पार्वत्या दर्शयेत्सदा । अर्धनारीश्वरस्येदंरूपमस्मिन्नुदाहृतम्॥१०॥ उमामहेश्वरस्यापि लक्षण शृणुप्तद्विजा. । सस्थानन्तु तयोर्वक्ष्ये लीलाललितविनमम् ऽध्यायः] * देवाकारप्रमाणवर्णनम् * चतुर्भुजं द्विवाहु या जटाभारेन्दुभूषणम् । लोचनत्रयसंयुक्तमुमैकस्कन्धपाणिनम् ॥ दक्षिणेनोत्पलं शूलं घामेकुवमरेकरम् । द्वीपिधर्मपरीधानं नानारनोपशोभितम् ॥१३॥ सुप्रतिष्ठं सुवेपञ्च तथार्धेन्दुस्ताननम् । घामे तु संस्थिता देवी तस्योरो याहुगूहिता ॥१४॥ शिरोभूषणसंयुक्तरलकैललितानना । सवालिका कर्णवती ललाटतिलकोज्वला ॥१५॥ मणिकुण्डलसंयुक्ता कर्णिकाभरणा क्वचित् । हारकेयूस्यहुला हरवक्त्रावलोकिनी॥१६॥ पामांसन्देवदेवस्य स्पृशन्ती लीलया ततः । दक्षिणन्तु बहिःकत्या वाहु दक्षिणतस्तथा स्कन्ध्र चा दक्षिणे कुक्षी स्पृशन्त्यङ्गुलजैः क्वचित् । चामे तु दर्पणं दद्यादुत्पलं पा सुशोभनम् ॥ १८ ॥ कटिसूत्रत्रयंचव नितम्वे स्यात्प्रलम्बकम् । जया व विजयाचव कार्तिकेय विनायको पार्श्वयोईर्शयेत्तत्र तोरणे गणगुह्यकान् । माला विद्याधरांस्तद्वन्द्वीणापानप्सरोगणः एतद्वपमुमेशस्य कर्तव्यं भूतिमिच्छता । शिवनारायणं घश्ये सर्वपापप्रणाशनम् ॥ २१॥ पामा माधवं विद्याद् दक्षिणे शूलपाणिनम् । याहुद्रयञ्च कृष्णस्य मणिकेयूरभूषितम् ॥ २२॥ शङ्खचक्रधरं शान्तमारक्तांगुलिविसमम् । चक्रस्थाने गदां वापि पाणी दद्याद्गदाभृतः ॥ शसञ्चयेतरे दद्यात् कट्यवं भूषणोऽवलम् । पीतवस्त्रपरीधानं वर मणिभूपणम् दक्षिणार्धे जटामाग्मन्दुस्तभूपणम् । भुजङ्गहारयलर परदं दक्षिण फरम् ॥ २५ ॥ द्वितीयञ्चापि फुर्वोत त्रिशलपरधारिणम् । व्यालोपर्यातसयुक्त फट्यधं कृत्तिवाससम् मणिरतश्च संयुक्त पादं नागविभूषितम् । शिवनारायणस्वयं कल्पयेट्टपमुत्तमम् ।। मदायराहं पक्ष्यामि पमहस्तं गदाधरम् । तीक्ष्णदंशाप्रयोणास्यं मेदिनीवामपरम् ॥ दंशानेणोद्धृतां दान्तां धरणीमुत्पलान्यिताम् । विस्मयोत्फलपदनामुपरिपात्प्रकल्पयेत् ॥ २६ दक्षिणं फटिसंस्थन्तु फर तस्याः प्रकल्पयेत् । पिरि तथा पादमयं नागेन्द्रर्धनि ॥ संम्नग्मानं लोकेशोः समन्तात्परिकल्पयेत् । नारसिंहलुफर्तव्यं भुनाष्टकसमन्धितम् ।।
७२४
* मत्स्यपुराणम् * [ऊनपष्टयधिकद्विशततमो
रौद्रं सिंहासनं तद्वत् विदारितमुखेक्षणम् । स्तब्धपीनसटाकर्ण दारयन्तन्दितेः सुतम्
विनिर्गतान्त्रजालञ्च दानवं परिकल्पयेत् । घमन्तं रुधिरं घोरंभृकुटीचदनेक्षणम् ॥३३॥
युध्यमानश्च कर्तव्यः क्वचित्करणवन्धनैः । परिश्रान्तेन दैत्येन तय॑मानो मुहुर्मुहुः ॥
दैत्यं प्रदर्शयेत्तत्र खड्गखेटकधारिणम् । स्तूयमानं तथा विष्णुं दर्शयेदमराधिपः ॥३५॥
तथा त्रिविक्रम घक्ष्ये ब्रह्माण्डक्मणोल्वणम्। पादपायें तथा बाहुमुपरिटात्प्रकल्पयेत्
अधस्ताद्वामनं तद्वत्कल्पयेत्सकमण्डलुम् । दक्षिणे छत्रिकां दद्यान्मुखं दीनं प्रकल्पयेत्
भृङ्गारधारिणं तद्वद्वलि तस्य च पार्श्वत. । बन्धनञ्चास्य कुर्वन्तं गरुडन्तस्य दर्शयेत्
मत्स्यरूपं तथा मात्स्यं कृर्म कर्माकृति न्यसेत् ।
एवं रूपस्तु भगवान् कार्यों नारायणो हरिः ॥ ३६ ॥
ब्रह्माकमण्डलुधरः कर्तव्यः स चतुर्मुखः । हंसारूढः कवित्कार्यः क्वचिच्च कमलासनः
पर्णत पद्मगर्भाभश्चतुर्याहुः शुभेक्षण । कमण्डलु घामकरे सुवं हस्ते तु दक्षिणे॥४१॥
पामेदण्डधरं तद्वत् स्तुपञ्चापि प्रदर्शयेत् । मुनिभिर्देवगन्धर्धेःस्तूयमानं समन्ततः ॥४२॥
कुर्घाणमिच लोकांस्त्रीन् शुक्लाम्बरधरं विभुम् । मृगचर्मधरञ्चापि दिव्ययज्ञोपवीतिनम्,
आज्यस्थालिं न्यसेत्पार्वे वेदाश्च चतुरः पुनः ।
घामपार्वेऽस्य सावित्री दक्षिणे च सरस्वतीम् ॥ ४४॥
अग्रे च ऋपयस्तद्वत्कार्याः पैतामहेपदे । कार्तिकेयं प्रवक्ष्यामि तरणादित्यसप्रभम् ॥
फमलोदरवर्णाभं कुमारं सुकुमारकम् । दण्डकैश्वीरकैर्युक्तं मयूरघरघाहनम् ॥ ४६ ॥
स्थापयेत्स्येपनगरेभुजान्द्वादश फारयेत् । चतुर्भुजः खर्घटे स्याद्वनेग्रामे द्विवाहकः ।।
शक्तिः पाशस्तथा खड्गः शरःशूलं तथैवच । घरदश्चैकहस्तः स्यादथचाभयदो भवेत् ।।
एतेदक्षिणतोडेयाः केयूरकटकोज्यला.। धनुः पताकामुष्टिश्च तर्जनी तु प्रसारिता ४E
पेटकं ताम्रचूडञ्च घामहस्तेतु शस्यते । द्विभुजस्य फरे शक्तिर्यामे स्यात् फुक्युटोपरि॥
चतुर्भुजे शक्तिपाशो घामतो दक्षिणे त्वसिः । घरदोभयदोवापि दक्षिण स्यात्तुरीयकः
विनायकं प्रवक्ष्यामि गजवक्त्रं त्रिलोचनम् । लम्बोदरं शूर्पकर्ण व्यालयज्ञोपवीतिनम् ।।
ध्वस्तक वृहत्तुण्डमेकदंष्ट्र पृथूदरम् । स्पदन्तं दक्षिणकरे उत्पलञ्चापरे तथा ॥५३॥
ऽध्यायः] * नानादेवप्रतिमाप्रमाणवर्णनम् * मोदकं परशुश्चैव पामतः परिकल्पयेत् । वृहत्वात् क्षिप्तवदनं पीनस्कन्धाधिपाणिकम् युक्तन्तु ऋद्धिबुद्धिभ्यामधस्तान्मूपकान्वितम् । फात्यायन्याः प्रवक्ष्यामि रूपं दशभुजं तथा ॥ ५५ ॥ त्रयाणामपि देवानामनुकारानुकारिणीम् । जटाजूटसमायुक्तामद्धेन्दुफतलक्षणाम् ॥ १६ ॥ लोचनत्रयसम्पन्नां पद्मेन्दुसदृशाननाम् । अतसीपुप्पसङ्काशां सुप्रतिष्ठां सुलोचनाम् ।। नवयौवनसम्पन्नां सर्वाभरणभूषिताम् । मुचाख्दशनान्तद्वत्पीनोन्नतपयोधराम् ॥५८ ।। त्रिभङ्गस्थानसंस्थानां महिषासुरमर्दिनीम् । त्रिशूलं दक्षिणे दद्यात् खमंचक्र तथैवच तीक्ष्णं वाणं तथाशक्ति घामतोऽपि निबोधत । खेटकं पूर्णचापञ्च पाशमङ्कुशमेव च ॥ घण्टांवा परशुञ्चापि वामतः सग्निवेशयेत् । अधस्तान्महिपन्तद्वद्विशिरस्क प्रदर्शयेत् ॥ शिरच्छेदोद्भवं तहानवं खड्गपाणिनम् । रक्तरक्कीरताएंव रक्ताविस्फारतेक्षणम् ६२ चेष्टितं नागपाशेन भृकुटीमीपणाननम् । यमद्रुधिरवपत्रञ्च देव्याः सिंहं प्रदर्शयेत् ॥६॥ देव्यास्तु दक्षिणं पादं समं सिंहोपरि स्थितम् । किश्चिद्ध्वं तथा चाममंगुष्ठं महिपोपरि ॥ ६४ ॥ स्तूयमानश्च तटूपममःसन्निवेशयेत् । इदानीं सुरराजस्य रूपं पक्ष्ये विशेषतः ॥६५॥ सहस्रनयनं देवं मत्तधारणसंस्थितम् । पृथूरवक्षोपदनं सिंहस्कन्धं महाभुजम् ॥६६॥ फिरीदकुण्डलवर पीचरोस्भुजेक्षणम् । पत्रोत्पलधरं तद्वन्नानाभरणभूषितम् ॥ ७ ॥ पूजितं देवगन्धरप्सरोगणसेवितम् । छत्रचामरधारिण्यः स्त्रियः पार्चे प्रदर्शयेत् ॥ ६८ ॥ सिंहासनगतचापि गन्धर्वगणसंयुतम् । इन्द्राणी पामतधास्य कुर्यादुत्पलधारिणीम् ॥ ६ ॥ इनि श्रीमत्स्यपुराणे नानादेवप्रतिमाप्रमाणवर्णन नामोनस्टयधिकदिशततमोऽध्यायः।
पप्ठ्यधिकद्विशततमोऽध्यायः नानादेवप्रतिमाप्रमाणवर्णनम् । सूत उवाच प्रभाकरस्य प्रतिमामिदानीं शृणुत द्विजाः!। रथस्थं कारयेद्देवं पद्महस्तं सुलोचनम् ॥ १ ॥ सप्ताश्वञ्चकचकञ्च रथं तस्य प्रकल्पयेत् । मुकुटेन विचित्रेण पद्मगर्भसमप्रभम् ॥ २ ॥ नानाभरणभूषाभ्यां भुजाभ्यां धृतपुष्करम् । स्कन्धस्थे पुष्करे ते तुलीलयैष धृतेसदा॥ चोलकच्छन्नवपुपं क्वचिच्चित्रेषु दर्शयेत् । वस्त्रयुग्मसमोपेतं वरणौ तेजसावृतौ ॥ ४॥ प्रतिहारौ च कर्तव्यो पार्श्वयोर्दण्डिपिङ्गलो। कर्तव्यों खड्गहस्तौ तौ पार्श्वयोः पुरुषावुभौ ॥५॥ लेखनीकृतहस्तश्च पार्श्व धातारमव्ययम् । नानादेवगणैर्युक्तमेवं कुर्याद्दिवाकरम् ॥ ६ ॥ अरुणः सारथिश्चास्य पझिनीपत्रसन्निभः । अश्वी सुवलयग्रीवावन्तस्थीतस्य पार्श्वयोः भुजङ्गरज्जुभिर्वद्धाः सप्ताश्वा रश्मिसंयुताः । पद्मस्थं पाहनस्थं पा पद्महस्तं प्रकल्पयेत्॥ घस्तु लक्षणं वक्ष्ये सर्वकामफलप्रदम् । दीप्तं सुवर्णवपुषमर्धचन्द्रासने स्थितम् ॥६॥ पालार्कसदृशं तस्य घटनञ्चापि दर्शयेत् । यज्ञोपवीतिनं देवं लम्बवर्चधर तथा ॥ १० ॥ फमण्डलु पामकरे दक्षिणे स्वक्षसूत्रकम् । ज्वालावितानसंयुक्तमजवाहनमुञ्चलम् ॥ कुण्डस्थं पापि कुचीत मूनि सप्तशिखान्वितम्। तथ यमं प्रवक्ष्यामि दण्डपाशधरं विभुम् ॥ १२ ॥ महामहिपमारूढं कृष्णाजनचयोपमम् । सिंहासनगतश्चापि दीप्ताग्निसमलोचनम् ॥१३॥ महिपश्चित्रगुप्तश्च फराला.किङ्करास्तथा । समन्तादर्शयत्तस्यसौग्यासौम्या सुरासुरान् ७२७ ऽध्याय.] * नानादेवप्रतिमाप्रमाणवर्णनम् * राक्षसेन्द्रं तथा वक्ष्ये लोकपाल नैऋतम् । नरारूढं महामायं रक्षोभिर्वमिव॒तम् ॥ यड्गहस्तं महानीलं कजलाचलसन्निभम् । नरयुक्तविमानस्थं पीताभरणभूषितम् ।। घरणञ्च प्रवक्ष्यामि पाशाहस्तं महावलम् । शङ्खस्फटिकवर्णाभं सितहाराम्बरावृतम् ।। झपासनगत शान्तं किरीटाङ्गदधारिणम् । वायुरूपं प्रवक्ष्यामि धूम्रन्तु मृगवाहनम् ॥ चित्राम्बरधरं शान्तं युधानं कुञ्चितभ्रुवम् । मृगाधिरूढ़ घरदं पताकाध्वजसंयुतम् ॥ कुरेरच प्रवक्ष्यामि कुण्डलाभ्यामलंकृत्तम् । महोदरं महाकायं निभ्यष्टकसमन्वितम् ॥ गुह्य हुभिर्युक्तं धनत्र्ययकरैस्तथा । हारफेयूररचितं सिताम्बरधरं सदा ॥ २१ ॥ गदाधच कर्तव्यं घरदं मुकुटान्वितम् । नरयुक्तविमानस्थं एवं रीत्या च कारयेत् ॥ २२ ॥ तथैवेशं प्रवक्ष्यामि चल धवलक्षणम् । त्रिशूलपाणिनं देवं ध्यक्षं वृपगतं प्रभुम् ।। मातृणां लक्ष वक्ष्ये यथावदनुपूर्वशः । ब्रह्मागी ब्रह्मसदृशी चतुर्वक्त्रा चतुर्भुजा ॥२४ हसाधिरूढा फर्तव्या साक्षसूत्रकमण्डलु । महेश्वरस्य रूपेण तथा माहेश्वरी मता॥ जटा मुटसंयुक्ता वृपस्था चन्द्रशेपरा । कपालशूलपट्याङ्गघरदाढ्या चतुर्भुजा ॥२६॥ कुमाररूपा फौमारी मयूरवरवाहना । रक्तघरधरा तद्वच्छूलशक्तिधरा मता ॥ २७ ॥ दारकेयूरसम्पन्ना कयाकुधरा तथा । वैष्णवी विष्णुसदृशा गरडे समुपस्थिता ॥ २८ चनुाहुश्च घरदा शङ्कवागदाधरा । सिंहासनगता पापि यालरेन समन्विता ॥ २६ ॥ घाराहीञ्च प्रवक्ष्यामि महिपोपरि सस्थिताम् । पराहसदृशी देवी शिरश्चामरधारिणी ॥ १० ॥ गदाचप्राधरा तहदानवेन्द्रपिनाशिनी । इन्द्राणीमिन्द्रसद्दशी पनगलगदाधराम् ॥३६॥ गजासनगतां देवी लोचन मिताम् । ततकाञ्चनवर्णाभां दिव्याभरणभूषिताम् ॥ तीक्ष्णखड्गधरा तद्वद् पक्ष्ये योगेश्वरीमिमाम् । दीर्यजिल्हामूर्यकेशीमस्थिपणश्च मण्डिताम् ॥ ३३ ॥ दप्राफरालयदना पुप्याच्चैध शोदरीम् । फपालमालिनी देवी मुण्डमालाविभूषिताम् ।। ३४ ॥
७२८ * मत्स्यपुराणम् * [पष्ट्यधिकद्विशततमो कपालं वामहस्ते तु मांसशोणितपूरितम् । मस्तिप्काकञ्चविभ्राणां शक्तिका दक्षिणेकर गृध्रस्था घायसस्था या निर्मासा विनतोदरी । करालवदनातद्वत्कर्तव्या सा त्रिलोचना चामुण्डा पद्धधण्टा वा द्वीपिचर्मधरा शुभा। दिग्पासाः कालिका तद्वद्रासभस्था कपालिनी ।। ३७ ।। सुरक्तपुष्पाभरणा धर्धनी ध्वजसंयुता । विनायकच कुर्वीत मातृणामन्तिके सदा ॥ धीरेश्वरश्च भगवान् वृषारूढो जटाधरः । चीणाहस्तत्रिशूली च मातृणामग्रतो भवेत् ॥ नियं देवी प्रवक्ष्यामि नवे घयसि संस्थिताम् । सुयौवना पीतगण्डां रक्तोष्ठी कुञ्चितभ्रुवम् ॥ ४० ॥ पीनोन्नतस्तनतटां मणिकुण्डलधारिणीम् । सुमण्डलं मुखं तस्याः शिरः सीमन्तभूषणम् ॥ ४१ ॥ पद्मस्वस्तिकश; भूपिता कुपडलालकै । कञ्चुकावद्धगात्री व हारभूपी पयोधरी नागहस्तोपमो पाहू केयूरकटकोज्ज्वलो । पद्मं हस्ते प्रदातव्यं श्रीफलं दक्षिणे भुजे ॥ मेखलाभरणां तद्वत्तप्तकाञ्चनलप्रभाम् । नानाभरणसम्पन्नां शोभनाम्बरधारिणीम् ।। पाश्वतस्या स्त्रिय कार्याश्चामरव्यग्नपाणयः । पद्मासनोपविष्टा तु पद्मसिंहासनस्थिता करिभ्यास्नाप्यमानासौभृङ्गाराभ्यामनेकशः । प्रक्षालयन्तो करिणीभृङ्गाराभ्यांतथापरी स्तूयमाना च लोकेशैस्तथा गन्धर्चगुह्यक. । तथैव यक्षिणी कार्या सिद्धासुरनिपेविता ॥ ४७ ॥ पार्श्वयो. कलशो तस्यास्तोरणे देवदानवाः । नागाश्चैव तु कर्तव्या खड्गखेटकधारिण. ॥४८॥ अधस्तात्प्रकृतिस्तेषां नाभेरूव॑न्तु पौरुषी । फणाश्च मूर्ध्नि कर्तव्याद्विजिह्वायहघासमाः पिशावा राक्षसाश्चैव भूतबेतालजातय । निर्मासाश्चैव ते सर्वे रोद्रा चिकृतरूपिणः क्षेत्रपालश्च कर्तव्यो जटिलोविकृताननः । दिग्वासा जटिलस्वद्वच्छ्चागोमायुनिषेवितः रुपालं चामहस्ते तु शिर. केशः समावृतम् । दक्षिणे शक्तिका दद्यादसुरक्षयकारिणीम् अथात सम्प्रवक्ष्यामि द्विभुज कुसुमायुधम् ।
७२३ अध्यायः] * पीठिकालक्षणवर्णनम् * पायें वाश्वमुखं तस्य मकरध्वजसंयुतम् ॥ ५३ ॥ दक्षिणे पुष्पयाणञ्च घामे पुष्पमयं धनुः । प्रीतिःस्यादक्षिणे तस्य भोजनोपस्कंसन्विता रतिश्च घामपार्श्वेतु शयनं सारसान्वितम् । पटश्च पदहश्चैव खरः कामातुरस्तथा । पार्श्वतो जलवापी व वनं नन्दनमेव च । सुशोभनश्च कर्तव्यो भगवान् कुसुमायुधः संस्थानमीपद्वक्त्रस्याद्विस्मास्मितवक्त्रकम् । एतदुद्देशतः प्रोक्तं प्रतिमालक्षणं मया । विस्तरेण न शक्नोति वृहस्पतिरपि द्विजाः! ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे नानादेवप्रतिमालक्षणवर्णनं नाम पष्ट्यधिकद्विशतनमोऽध्यायः । . एकपष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः पीठिकालक्षणवर्णनम् । सूत उवाच पीटिकालक्षणं वक्ष्ये यथाघदनुपूर्वश । पीठोकायं यथायचभागान् पोडश कारयेत्।। भूमावेकः प्रविष्टः स्याच्चतुर्जिगतोमता । वृत्तोमागस्तयकाल्यावृत. पटलमागतः भागैन्त्रिभिस्तथा फण्डः कण्ठपट्टस्त्रिभागतः । मागाभ्यामूर्ध्वपट्टश्च शेषमागेन पट्टिका ॥ ३॥ प्रविष्ट भागमेकक जगतीयापदेवतु । निर्गमस्तु पुनस्तस्य यापढे शेषपट्टिका १४ ॥ पारिनिर्गमनार्यन्तु तत्र कार्य प्रणालकः ! पोटिकानान्तुसवांसामेतन्सामान्यलक्षणम् विशेगन् देवताभेदान् शृणुध्यं द्विजसत्तमाः! म्याण्डिला पाय पापीघा यक्षी वेदी र मण्डल पूर्णचन्दा च पत्रा च पापाशशिस्तथा । विकीपादशमीतासांसंगानं पा नियोधत म्पण्डिला चतुरमातु पर्जिता मेपलादिभिः। पापीतिमेपला प्रेया यक्षीय निमपाला चनुरप्रापता येदी न तो लिङ्गेषु योजयेत् । मण्डलायतलापानु मगलामिणप्रिया । .
७३० * मत्स्यपुराणम् * [द्विपश्यधिकद्विशततमी रक्ता द्विमेसलामध्ये पूर्णचन्द्रा तु सा भरेत् । मेखलायसयुक्ता पडसावनिका भवेत् पोडशास्त्रा भवेत्पद्मा किञ्चिद्भस्वा तुमूल्त । तथैव धनुषाकारा साईचन्द्रा प्रशस्यते त्रिशूलसदृशीतद्वत् त्रिकोणाार्वतोमता । प्रागुदक्प्रयणा तद्वत्प्रशस्तालक्षणान्विता परिवेषत्रिभागेन निर्गम तत्रकारयेत् । विस्तार तत्प्रमाणञ्च मूलेवाग्रे ततोदुर्घत ॥१३ जलमार्गश्च कर्तव्यस्त्रिभागेन सुशोभन । लिङ्गस्या विभागेन स्थौल्येन समधिष्ठिता मेखला तत्रिभागेन पातञ्चैव प्रमाणत । अथवा पादहीनन्तु शोभन कारयेत्सदा॥१४ उत्तरस्थ प्रणालञ्च प्रमाणादधिकारयेत् । स्थण्डिलायामथारोग्य धन धान्यञ्च पुष्करम् ॥१५॥ गोप्रदा च भवेद्यक्षी वेदी सपत्प्रदाभवेत् । मण्डलाया भवेत्कीर्तिर्वरदापूर्णचन्द्रिका । आयु प्रदा भवेद्वना पद्मा सौभाग्यदा भवेत् । पुत्रप्रदार्धचन्द्रा स्यात् त्रिकोणशत्रुनाशिनी ॥१७॥ देवस्य यजनार्थन्तु पीठिकादश कीर्तिता । शैले शैलमयीदद्यात् पार्थिवे पार्थिवी तथा दारजे दारुजा कुर्यात् मिमिश्रातथैवच । नान्ययोनिस्तुकर्तव्या सदा शुभफलेप्सुभि- अर्चायामासमन्दैर्घ्य लिङ्गायामसमन्तथा । यस्य देवस्य या पती ता पीठे परिकल्पयेत् ॥ एतत्सर्व समाख्यात समासात्पीटलक्षणम् ॥ २०॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे पीठिकालक्षणवर्णन नामैकपट्यधिकद्विशततमोऽध्याय । द्विपश्यधिकद्विशततमोऽध्याय. लिङ्गलक्षणवर्णनम् । सूत उपाय। अथात सप्रवक्ष्यामि लिङ्गलक्षणमुत्तमम् । सुस्निग्धञ्च सुवर्णश्च लिङ्ग कुर्याद्विचक्षणः ध्यायः] * लिङ्गलक्षणवर्णनम् । ७३१ प्रासादस्य प्रमाणेन लिङ्गमानं विधीयते । लिङ्गमानेन वा विद्यात् प्रासादं शुभलक्षणम् चतुरस्नेसमेगर्ने ब्रह्मत्रं निपातयेत् । वामेन ब्रह्मसूत्रस्य अर्चा वा लिङ्गमेव च ॥३॥ प्रागुत्तरेण लीनन्तु दक्षिणा परयाश्रितम् । पुरस्यापरदिग्भागे पूर्वद्वारं प्रकल्पयेत् ॥४॥ पूर्वणवापरंवार माहेन्हें दक्षिणोत्तरम् । द्वारं विभज्य पूर्वन्तु एकविंशतिमागिकम् ॥ ततो मध्यगतंज्ञात्वा ब्रह्मसूत्रप्रकरपयेत् । तस्याईन्तु त्रिधारत्या भागञ्चोत्तरतस्त्यजेत् एवं दक्षिणतस्त्यत्वा ब्रह्मस्थानं प्रकल्पयेत् । भागार्द्धन तु यलिङ्ग कार्यन्तदिह शस्यते पञ्चमागविभक्ते घा त्रिभागे जैप्टयमुच्यते । भाजिते नवधागर्भे माध्यमं पाञ्चभागिकम् एकस्मिन्नेव नवधा गर्भे लिङ्गानि कारयेत् । समसूत्रं विमव्याथ नवधा गर्मभाजितम् ॥ ६॥ ज्येष्ठमद्धकीयोऽधतथामध्यममध्यमम् ।एयंगर्भ समारयातस्त्रिभिांगविभाजयेत् ज्येष्ठन्तु विविध शेयं मध्यमन्निविधन्तथा । कन्यसं त्रिविधंतद्वन् लिङ्गभेदा नवैव तु नाभ्यधमष्टभागेन विमञ्याथ समं बुध. । भागत्रयं परित्यज्य विष्कम्भञ्चतुरनकम् अपात्रं मध्यमं प्रेयं भाग लिङ्गस्य चे ध्रुवम् । विकीर्ण चेत्ततो गृहा कोणाभ्यां लाञ्छयेह बुध ॥ १३ ॥ समानकारयेत्तद्वदुर्ध्वमप्येवमेव तु । पोडशाम्रीरनं पश्चाद्वर्तुलं कारयेत्तत ॥ १४ ॥ आयामा तम्य देवग्य नाभ्यां ये कुण्डलीमनम् । माहेश्वरं त्रिभागन्तु अदुर्यवृत्त त्यवस्थितम् ॥ १५ ॥ अधम्तादरमभागानु चनुग्नोषिधीयते । अष्टाम्रोवैष्णयोमागो मध्यस्तम्यउदाहत.॥ एरं प्रमाणसंयुक्त रिद्धिप्रदम्भवेत् । तथान्यदपि यक्ष्यामि गर्ममानं प्रमाणत. ॥१७ गर्ममानप्रमाणेन यहिङ्गमुचितं भवेत् । चनुांतद्विमन्याय विष्णुम्भन्तु प्रकल्पयेत् ॥ देवतायतने मूत्र भागमयविकल्पितम् । अधस्ताच्चतुरन्तु अष्टानं मध्यभागतः ।। प्रग्यमागम्ततोऽन्तु नाभिमागम्तयोच्यते । मापामे यरमन नादस्य चनुरके, चतुरयाई परित्याय यात्राम्यतु यायेत् । तम्याध्यापरित्यय ततोपत्तन्नु कारयेत् शि:प्रदक्षितम्य मंझिनं मूरतोन्यसेन् । ज्येष्म्यं मोटिनमधम्नाद्विपुलच यत् .
૭૨
* मत्स्यपुराणम् * [त्रिपष्ट्यधिकद्विशततमो
शिरसा च सदानिम्नमनोशंलक्षणान्वितम् । सौम्यन्तु दृश्यते लिहन्तवैवृद्धिप्रदं भवेत्
अथ मूले च मध्ये तु प्रमाणेसर्वतः समम् । एवम्विधन्तु यलिङ्गं भवेत्तत्सार्यकामिकम्
अन्यथा यदवेल्लिङ्गं तदसत्संप्रचक्षते । एवंरतमयंकुर्यात् स्फाटिक पार्थिवं तथा ॥२५
शुभं दारुमयञ्चापि यद्वा मनसि रोचते ॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे लिङ्गलक्षणवर्णनं नाम द्विपष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।
,
त्रिषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
देवप्रतिष्ठाविधिवर्णनम् ।
ऋषय ऊचुः।
देवतानामर्थतासां प्रतिष्ठाविधिमुत्तमम् । घद सूत ! यथान्यायं सर्वेषामप्यशेषतः ॥१॥
सूत उवाच।
अथात. संप्रवक्ष्यामि प्रतिष्ठाविधिमुत्तमम् । कुण्डमण्डपवेदीनां प्रमाणञ्च यथाकमम्
चैत्रे घा फाल्गुने चापि ज्येष्ठे वा माधवे तथा । माघेवासर्वदेवानांप्रतिष्ठाशुभदाभवेत्
प्राप्यपक्षं शुभंशुक्लमतीते दक्षिणायने । पञ्चमी च द्वितीया च तृतीया सप्तमी तथा ॥
दशमी पौर्णमासी च तथा श्रेष्ठा त्रयोदशी ।
आसु प्रतिष्ठा विधिवत् कृत्वा यहुफला लभेत् ॥ ५॥
आषाढे द्वे तथा मूलमुत्तराद्वयमेव च । ज्येष्ठाश्रवणरोहिण्य. पूर्वाभाद्रपदा तथा ॥
हस्ताश्विनीरेवती च पुष्योमृगशिरस्तथा । अनुराधा तथा स्वाती प्रतिष्ठादिषु शस्यते
चुधोवृहस्पति शुक्रस्त्रयोऽप्येते शुभग्रहाः । एभिनिरीक्षितं लग्नं नक्षत्रञ्च प्रशस्यते ॥८॥
ग्रहतारावलं लभ्वा ग्रहपूजां विधाय च।
निमित्तं शकुनं लब्ध्वा घर्जयित्वाद्भुतादिकम् ॥ ६॥
शुभयोगे शुभस्थाने क्रूरग्रहविवर्जिते । लग्नेऋक्षेप्रकुर्वीत प्रतिष्ठादिकमुत्तमम् ॥ १० ॥
[चतु षष्ट्यधिकद्विशततमी * मत्स्यपुराणम् * विप्राणाचार्चन पुर्याइंद्याच्छत्तया च दक्षिणाम् ॥ ३० ॥ गा मही कनकन्वैव स्थापकाय निवेदयेत् । रक्षण कारयेत्या मन्त्रेणानेन वै द्विज ॥ ॐ नमो भगवते तुभ्य शिवाय परमात्मने । हिरण्यरेतसे विष्णो विश्वरूपाय ते नम मन्त्रोऽय सर्वदेवाना नेत्रज्योतिष्यपि स्मृत । एवमामन्ध्य देवेश काञ्चनेन विलेखयेत्। मङ्गल्यानि च पाद्यानि ब्रह्मघोष सगीतकम् । वृद्-यथं कारयेद् विद्वान् अमङ्गल्यविनाशनम् ॥ ३४ ॥ लक्षणोद्धरण पक्ष्ये लिङ्गस्य सुसमाहित । त्रिधा विभज्य पूज्याया लक्षण स्याद् विभाजकम् ॥ ३५ ॥ लेखात्रयन्तु कर्तव्य यवाप्पान्तरसयुतम् । न स्थूल न श तन्न धक्तत्र छेदवर्जितम् निम्न यवप्रमाणेन ज्येष्ठलिङ्गस्य कारयेत् । सूद मास्ततस्तु कर्तव्या यथाम-यमकेन्यसेत् अपभक्त तत कृत्वा त्यत्तया भागत्रय बुध । लम्वयेत्सप्तरेखास्तु पार्श्वयोरुभयो समा तावत् प्रलम्वये द्विद्वान याचदागचतुष्प्रयम् । भ्राम्यते पञ्चभागो कारयेत्सङ्गमन्तत रेखयो सङ्गमे तद्वत पृष्ठे भागद्वय भवेत्। एवमेतत्समाख्यात समासालक्षण मया ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे देवप्रतिष्ठाविधिवर्णन नाम त्रिपष्टयधिकद्विशततमोऽध्याय । चतुःषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः देवप्रतिष्ठाविधियणनम् । सूत उवाच अत पर प्रवक्ष्यामि मूर्तिपानान्तु लक्षणम् । स्थापकस्य समासेन लक्षण शृणुत द्विजा ॥१॥ सर्वात्ययसम्पूर्णों वेदमन्त्रविशारद । पुराणवेत्ता तवज्ञो दम्भलोभविवर्जित ॥ २॥ कृष्णसारमयदेशे उत्पन्नश्च शुभारुति । शौचावारपरो नित्य पापण्डकुलनिस्पृह ॥
॥ ऽध्यायः] * देवप्रतिष्ठाविधिवर्णनम् * समः शत्रौ च मित्रे च ब्रह्मोपेन्द्रहरप्रियः । ऊहापोहार्थतत्वज्ञो धास्तुशास्त्रस्यपारगः।। आचार्य्यस्तु भवेन्नित्यं सर्वदोपविवर्जित. । मूर्तिपास्तु द्विजाश्चैव कुलीनामजवस्तथा द्वात्रिंशत् पोडशाथापि अप्टो पा श्रुतिपारगाः । ज्येष्ठमध्यकनिष्ठेषु मूर्तिपावः प्रकीर्तिता ॥ ६ ॥ ततो लिङ्गमथार्चा पा नीत्वा स्लपनमण्डपम् । गीतमङ्गलशब्देन स्लपनं तत्र कारयेत् ॥ ७ ॥ 'पञ्चगव्यकपायेण मृद्धिर्भस्मोदकेन था । शौचं तत्र प्रफुधीत वेदमन्त्रचतुष्टयात् ।। ८ ।। समुद्रज्येष्ठमन्त्रेण आपोदिव्येति वापरः । यासां राजेतिमन्त्रस्तु आपोहिष्ठेतिचापरः एवं स्नाप्य ततोदेवं पूज्य गन्धानुलेपनैः । प्रच्छाद्य वस्त्रयुग्मेन अभिवस्वेत्युदाहृतम् उत्थापयेत्ततोदेवमुत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते ! । अमूरजेति च तधारथे तिष्ठेति चापरः ॥११ ॥ रये ब्रह्मरथेवापि धृतां शिल्पिगणेन तु । आरोप्यच ततो विद्वानारष्णेन प्रवेशयेत् ॥ ततः प्रास्तीर्य शय्यायां स्थापयेच्छनफैर्युधः । फुशानास्तीर्य पुष्पाणि स्थापयेत् प्राड मुखं ततः ॥ १३ ॥ न्ततस्तु निद्राकलशं पस्त्रकाशनसंयुतम् । शिरोभागेतु देवस्य जपन्नेयं निधापयेत् ॥ आपोदेवीति मन्त्रेण आपोऽस्मान् मातरोऽपि च । ततो दुफुलपटेश्याच्छाद्य नेत्रोपधानकम् ॥ १५ ॥ दद्याच्चिरसि देवस्य कोशेयं या विचक्षणः । मधुनासर्पिपाभ्यन्य पूज्यसिध्यार्थकम्ततः आप्यायस्येति मन्त्रेण यातेरुदशियेति च । उपविश्यार्चयेद्देवं गन्धपुष्पैः समन्ततः॥१७॥ सितं प्रतिसरं दद्यात् पाईस्पत्येति मन्त्रतः । दुफलपट फार्पासनांनाचित्ररथापिघा ॥ आन्द्राय देयं सर्वत्र उप्रचामरदर्पणम् । पार्श्वतः स्थापयेत्तत्र पितानपुप्पसंयुतम् ।। नवान्योपधपस्तत्र गृहोपफरणानि च । माजनानि चिचित्राणि शयनान्यासनानि च ॥ अमित्या परमन्त्रेण यथा यिमयतो न्यसेत् । धार शादं पूर्व सात गत्यमोश्यान्य(प्र)पायसः ॥ २१ ॥ पपिधेश रमस्तइन् समन्तात् परिपूजपेत् । .
* मत्स्यपुराणम् # [चतुःषष्ट्यधिकद्विशततमो यलिं दद्यात् प्रयतेन मन्त्रणानेन भूरिशः ॥ २२ ॥ ध्यम्बकं यजामहे इति सर्वतः शनकवि । मूर्तिपानस्थापयेत्पश्चात्सर्वदिक्षुविचक्षणः चतुरो द्वारपालांश्च द्वारेषु विनिवेशयेत् । श्रीसूक्तं पापमानञ्च सोमसूक्तं सुमङ्गलम् ॥ तथाव शान्तिकाध्यायमिन्द्रसूक्तं तथैव च । रक्षोन्नञ्च तथा सूक्तं पूर्वतोवह चीजपेत रौद्रं पुरुषसूक्तञ्च श्लोकाध्यायं सशुक्रियम् । तथैव मण्लाध्यायमध्वर्युदक्षिणेजपेत् ॥ घामदेवं वृहत्साम ज्येष्टसाम रथन्तरम् । तथा पुरुषसूकञ्च रुद्रसूक्तं सशान्तिकम् ॥२७॥ भारुण्डानि च सामानि च्छन्दोगः पश्चिमे जपेत् । अथर्वोऽङ्गिरसं तद्वन्नीलं रौद्रं तथैव व ॥ २८ ॥ तथा पराजिता देवी सप्तसूक्तं सरौद्रकम् । तथैव शान्किाध्यायमथर्वा चोत्तरे जपेत् ।। शिरस्थाने तु देवस्य स्थापको होममाचरेत् । शान्तिकः पोष्टिकैस्तद्वन् मन्नैाहतिपूर्वकैः ॥ ३० ॥ पलाशोदुम्बराश्वत्थअपामार्गः शमी तथा । हुत्वा सहस्रमेकैकं देवं पादे तु संस्पृशेत्॥ ततो होमसहस्रेण हुत्वा हुत्वा ततस्तत । नाभिमध्यं तथावक्षःशिरश्चाप्यालभेत् पुन' हस्तमात्रेषु कुण्डेषु मूर्तिपाः सर्वतोदिशम् । समेखलेपुते कुर्युर्योनिवक्त्रेषु वादरात् ॥ वितस्तिमात्रायोनिःस्यद्गजोष्टसदृशी तथा। आयताच्छिद्रसंयुक्तापार्श्वत:कलयोच्छिता कुण्डात् कलानुसारेण सर्वतश्चतुरमुला । विस्तारेणोच्छ्रयातद्वचतुरम्ना समाभवेत् ॥ वेदीभित्ति परित्यज्य त्रयोदशभिरंगुलैः । एवं नवसु कुण्डेषु लक्षणश्चैव दृश्यते ॥३६ आग्नेयशाक्रयाम्येषु होतव्यमुदगाननैः । शान्तयोलोकपालेभ्यो मूर्तिभ्यःक्रमशस्तथा तथा मूर्त्यधिदेवानां होमं कुर्यात्समाहितः। वसुधा घसुरेता च यजमानो दिवाकरः ॥ ३८ ॥ जलं घायुस्तथासोम आकाशश्चाटमः स्मृतः । देवस्य मूर्तयस्त्वष्टावेता कुण्डेषु संस्मरेत् ।। ३ ।। एतासामधिपान्धक्ष्ये पवित्रान्मूर्तिनामत । पृथ्वी पाति शर्वश्च पशुपश्चाग्निमेव च ॥ यजमान तथैघोग्रो रद्रश्चादित्यमेव च । भघोजलं सदा पाति घायुमीशान एप च॥४१ .
ध्यायः]
* देवप्रतिष्ठाविधिवर्णनम् *
महादेवस्तथा चन्द्र भीमश्चाकाशमेव च । सर्वदेवप्रतिष्टासु मूर्तिपा होत एव च ॥४२॥
एतेभ्यो वैदिकर्मन्त्र यथास्वं होममाचरेत् ।
तथा शान्तिघटं कुर्य्यात् प्रतिकुण्डेषु सन्यसेत् ॥४३॥
शतान्ते चा सहस्रान्ते सम्पूर्णाहुतिरिप्यते ।
समपादः पृथिव्यान्तु प्रशान्तात्मा विनिक्षिपेत् ॥ ४४ ॥
आहुतीनान्तु सम्पातं पूर्णकुम्भेषु वै न्यसेत् । मूलमध्योत्तमाङ्गेषु देवं तेनावसेचयेत् ॥
स्थितश्च मापयेत्तेन सम्पाताहुतिवारिणा । प्रतियामेषु धूपन्तु नैवेद्यञ्चदनोदकम् ॥
पुनः पुनः प्रफुधीत होमः कार्यः पुनः पुनः । पुन. पुनश्च दातव्या यजमानेन दक्षिणा ॥
सितवस्त्रश्च ते पूजनीयाः समन्तत । विचित्रैमकटक हेमसूत्रांगुलीयकैः ॥४८॥
पासोभिः शयनीयैश्च परिधाप्याः स्वशक्तिः ।
भोजनचापि दातव्यं यावत् स्यादधिवासनम् ॥ ४ ॥
बलित्रिसन्ध्यं दातव्यो भूतेभ्यः सर्वतो दिशम् ।
ब्राह्मणान् भोजयेत् पूर्व शेपान् वास्तु फामतः ॥ ५० ॥
रात्री महोत्सवः कार्यो नृत्यगीतकमङ्गलैः । सदा पूज्याः प्रयत्नेन चतुर्थीकर्म यावता
विरात्रमेकरात्रं पा पञ्चपत्रमथापिचा । सप्तरात्रमथोकुर्यात् कचित्सद्योऽधिवासनम्
सर्वयज्ञफलो यस्मादधिवासोत्सवः सदा ॥ ५२ ॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे देवप्रतिष्ठाविधिधर्णने नाम चतु-पष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः |
पञ्चपट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
देवप्रतिष्ठारिधिवर्णनम् ।
सृत उपाय।
इत्याधिपास देवानां शुभं कुर्यात् समाहितः ।
प्रासादस्यानुरूपेण मान लिङ्गस्य पा पुनः॥१॥
। * मत्स्यपुराणम् # [पञ्चपश्यधिकद्विशत्तमो पुप्पोदकेन प्रासादं प्रोक्ष्य मन्त्रयुतेन तु । पातयेत्पक्षसूत्रन्तु द्वारसूत्रं तथैव च ॥ २॥ आश्रयेत्किञ्चिदीशानी मध्यं ज्ञात्वा दिशं बुधः। ईशानोमाश्रितदेवं पूजयन्तिदिवौकस आयुरारोग्यफलदमयोत्तरसमाश्रितम् । शुभं स्यादशुभं प्रोक्तमन्यथा स्थापनं वुधे ॥४॥ अध. कूर्मशिला प्रोक्ता सदा ब्रह्म शिलाधिका ! उपर्यवस्थिता तस्या ब्रह्मभागाधिका शिला ॥ ५॥ ततस्तु पिण्डिका कार्या पूर्वोक्त र्नामलक्षणः । तत प्रक्षालितां कृत्वा पञ्चगव्येन पिण्डिकाम् ॥६॥ कायतोयेन पुनमन्त्रयुक्तेन सर्वतः । देवताश्चियं मन्त्र पिण्डिकासु नियोजेत् ॥७॥ तत उत्थाप्य देवेशं उत्तिष्ठ ब्रह्मणेति व। आनीय गर्भभवनं पीठान्ते स्थापयेत्पुनः ॥८॥ अर्घ्यपाद्यादिकं तत्र मधुपर्क प्रयोजयेत् । ततो मुहूर्त विधम्य रतन्यासं समाचरेत् ॥६॥ पन्नमौक्तिकर्यदूर्यशङ्खस्फटिकमेव च । पुष्परागेन्द्रनीलञ्च नीलं पूर्वादि दिक् क्रमात् ॥ १० ॥ तालकञ्च शिलावन्नमानं श्याममेव काक्षीकाशी समाक्षीकं गौरिकञ्चादित क्रमात् ॥ ११ ॥ गोधूमञ्च यचं तद्वत्तिलमुद्रं तथैवच । नीवारमथश्यामाकं सर्पपं धीहिमेव व ॥ १२ ॥ न्यस्य क्रमेण पूर्वादि चन्दनं रक्तचन्दनम् । अगरुञ्चालनञ्चापि उशीरच ततः परम् ॥ वैष्णवी सहदेवीश्च लक्ष्मणाञ्च ततः परम् । स्वर्लोकपालनाम्नातु न्यसेदोकारपूर्वकम् सर्वयोजानि धातूश्च रत्नान्योषधयस्तथा । काञ्चनं पद्मरागन्तु पारदं पानमेव च ॥१५॥ कूर्माधरां वृषं तत्र न्यसेत्पूर्यादित क्रमात् । ब्रह्मस्थाने तु दातव्या संहता स्युः परस्परम् ॥१६॥ कनक विद्रुमं तानं कांस्यञ्चवारकूटकम् । रजतं विमलं पुष्पं लोहश्चैव क्रमेण तु ॥१७॥ काञ्चनं हरितालच सर्वाभावेऽपि निक्षिपेत् । दद्याद्वीजीपधिस्थाने सहदेवी यवानपि न्यासमन्त्रानतो पक्ष्ये लोकपालात्मकानिह । इन्द्रस्तुसहसादीप्त सर्वदेवाधिपो महान् वज्रहस्तो महासत्वस्तस्मै नित्यं नमोनमः । आग्नेयः पुरपोरक्त सर्वदेवमय शिखी॥ -
ऽध्यायः]
* देवप्रतिष्ठाविधिवर्णनम् *
૭૬
धूमकेतुरनाधृष्यस्तस्मै नित्यं नमोनमः ।
यमश्वोत्पलवर्णाभः किरीटी दण्डधृक् सदा ॥ २१॥
धर्मसाक्षी विशुद्धात्मा तस्मै नित्यं नमोनमः ।
निऋतिस्तु पुमान् कृष्ण. सर्यरक्षोऽधिपो महान् ॥ २२ ॥
रागहम्तो महासत्यस्तस्मै नित्यं नमोनमः । घरुणो धवलोविष्णुः पुरषो निम्नगाधिपः
पाशहस्तो महावाहुस्तस्मै नित्यं नमोनमः । वायुश्च सवर्णो वै सर्वगन्धवहः शुभः ।।
पुरपोचजहस्तश्चतस्मै नित्यं नमोनमः । गौरो यश्च पुमान् सौम्यः सर्वोपधिसमन्वितः
नक्षत्राधिपति. सोमस्तस्मै नित्यं नमोनमः ।
ईशानपुरपः शुक्लः सर्वविद्याधिपो महान् ॥ २६ ॥
शूलहस्तो विरूपाक्षस्तस्मै नित्यं नमोनमः । पद्मयोनिश्चतुमूर्तिदवासाः पितामहः ॥
यज्ञाध्यक्षश्चतुर्यक्त्रस्तस्मै नित्यं नमोनम । योऽसायनन्तरूपेण ब्रह्माण्डं सचराचरम् ॥
पुष्पवद्धारयेन्मूनि तस्मैनित्यं नमोनमः । ओङ्कारपूर्वका ह्येते न्यासे बलिनिवेदने ॥
मन्त्रास्युः सर्वकार्याणां वृद्धिपुत्रफलप्रदाः ।
न्यासं त्या तु मन्त्राणां पायसेनानुलेपिनम् ॥ ३०॥
पाटेनाच्छादयेत् श्चभ्रं शुरनोपरि यत्नतः । तत उत्थाप्य देवेशमिष्टदेशेतु शोभने॥३१॥
धुवा धोरितिमन्त्रेण ध्वम्रोपरिनिवेशयेत् । ततःस्थिरीस्तस्यास्य हस्तंदत्वातु मस्तके
ध्यात्या परमसदावाद्देवदेवञ्च निष्कलम् । देवनतं तथा सोमं स्टसूक्तं तव च ॥३॥
मात्मानमीश्वरं त्या नानाभरणभूषितम् । यस्य देवस्य यदपं तयाने संस्मरेत्तथा ॥
अतसीपुप्पसङ्काशं शनवागदाधरम् । संन्यापयामि देवेशं देवोभूत्वा जनार्दनम् ॥३५
ध्यक्ष दायाश चन्द्राधातशेषरम् । गणेशं यूपसंस्थञ्च म्यापयामि त्रिलोचनम् ॥
ऋषिभिः सस्नुनं देवं चतुर्यपत्रं जटाधरम् । पिनामदं महावाहु स्थापयाम्पम्युनोदयम्
सदनकिरणं शान्तमसरोगसंयुनम् । पमहम्नमहाराहम्पापयामि दियाफरम् ।
देवमन्त्रांम्तया रोद्रान रदस्य स्थापने जपेन् ।
पिणास्नु जयन्त प्राणान् ये ग्रामणो युध. ॥३॥
७४० * मत्स्यपुराणम् * [पञ्चपटयधिकद्विशततमो सौराः सूर्यस्य जप्तव्यास्तथान्येषु तदाश्रयाः । वेदमन्त्रप्रतिष्ठा तु यस्मादानन्ददायिनी स्थापयेद्यन्तु देवेशन्तं प्रधान प्रकल्पयेत् । तस्य पार्श्वस्थितानन्यान् संस्मरेत् परिचारितः ॥ ४१ ॥ गणं नन्दिमहाकालं वृषभृङ्गिरिटि गुहम् । देवीं विनायकश्चैव विष्णुं ब्रह्माणमेवच॥४२ रुद्रं शक्रं जयन्तञ्च लोकपालान् समन्ततः । तथैवाप्सरसः सर्वा गन्धर्वगणगुह्यकान् ।। यो यत्र स्थाप्यतेदेवस्तस्यतान् परितःस्मरेत् । आवाहयेत्तथा रुद्रं मन्त्रेणानेत यततः ॥ यस्य सिंहारथेयुक्ता व्याघ्रभूतास्तथोरगाः । ऋपयोलोकपालाश्च देव स्कन्दस्तथा वृपः प्रियो गणो मातरश्च सोमो विष्णुः पितामहः । नागा यक्षाः सगन्धर्चा ये च दिव्या नभश्चराः ॥४६ ॥ तमहं क्षमीशानं शिवं रुद्रमुमापतिम् । आवाहयामि सगणं सपत्नीकं वृषध्वजम् ॥ आगच्छभगवन् ! रद्रानुग्रहाय शिवोभव । शाश्वतो भवपूजां में गृहाण त्वं नमोनमः॥ ॐ नमः स्वागतं भगवते नमः ॐ नमः सोमाय सगणाय सपरिधाराय प्रतिगृह्णातु भगवन् ! मन्त्रपूतमिदंसर्वमयंपाद्यमाचमनीयमासनं ब्रह्मणाभिहितं नमोनमः स्वाहा । ततः पुण्याधोपेण ब्रह्मधोपैश्च पुष्कलः । स्नापयेत्तु ततो देवं दधिक्षीरघृतेन च ॥५०॥ मधुशर्फरया तद्वत् पुष्पगन्धोदकेन च । शिवध्यानैकचित्तस्तु मन्त्रानेतानुदीरयेत्॥५१॥ यजाग्रतो दूरमुदेति । ततोविराडजायत इति च । सहस्रशीर्षा पुरुषइति च । अभि- त्याशूरनोनम इति च। पुरुष एवेदं सर्वमिति। त्रिपादूर्ध्व मिति। येनेदं भूतमिति । नत्या अवीन्य इति । सर्वांश्चैतान प्रतिष्ठासु मन्नान् जप्त्वा पुनः पुनः । चतुःकृत्वा स्पृशेदद्भिर्मूलमध्ये शिरस्यपि ॥५२॥ स्थापिते तु ततोदेवे यजमानोऽथमूर्तिपम् । आचार्य पूजयेत्या धनालङ्कारभूषणैः ।। दीनान्धकृपणांस्तद्वये चान्ये समुपस्थिताः । ततस्तु मधुना देवं प्रथमेऽहनि लेपयेत् ॥ हरिद्रयाऽथ सिद्धार्थ द्वितीयेऽहनि तत्वतः। चन्दननायवैस्तद्वत्तृतीयेऽहनि लेपयेत् ॥५५॥ मनःशिलाप्रियङ्गभ्यां चतुर्थेऽदनि होपयेत् ।
ध्यायः] * देवप्रतिष्ठाविधिवर्णनम् + ७४१ सौभाग्यशुभदं यस्मालेपनं व्याधिनाशनम् ॥ ५६ ॥ परम्प्रीतिकरन्नृणामेतद्वेदविदो विदुः । कृष्णाचनन्तिलं तद्वत् पञ्चमेऽपि निवेदयेत् ॥ ५७ ॥ पण्डे तु सघृतंदद्याचन्दनं पद्मकेसरम् । रोचनागुरुपुष्पं तु सप्तमेऽहनि दापयेत् ॥ ५८ ॥ यत्र सद्योऽधिवासास्यात्तत्रसर्व निवेदयेत् । स्थितं न वालयेद्देवमन्यथा दोपभाग्भवेत् पूरयेसिकतामिस्तु निच्छिद्रं सर्वतोभवेत् । लोकपालस्य दिग्भागे यस्यसञ्चलते विभुः तस्य लोकपते शान्ति देयाश्चेमाश्च दक्षियाः । इन्द्रायाभरणं दद्यात् काञ्चनं चाल्पचित्तवान् ॥६१ ॥ अग्नेः सुवर्णमेवस्यायमस्य महिपं तथा । अन्नच काञ्चनं दद्यान्नै राक्षसं प्रति । चरणं प्रतिमुक्तानि सशुक्रीनि प्रदापयेत् । रीतिसं घायये दद्याद्वस्त्रयुग्मेन साम्प्रतम् ॥ सोमाय धेनुर्दातव्या रजतं सपंशिरे । यस्यां यस्यां सञ्चलनं शान्तिः स्यात्तत्र तत्र तु अन्यथा तु भवेद्वोरं भयड्कुलविनाशनम् । अचलं कारयेत्तस्मात्सिकतामि. सुरेश्वरम् अन्नं घस्त्रञ्च दातव्यं पुण्याहजयमङ्गलम् । त्रिः पञ्च सप्त दश चा दिनानि स्थान महोत्सवः ॥ ६६ ॥ चतुर्थेऽहि महास्नानं चतुर्थीफर्मकारयेत् । दक्षिणा च पुनम्तद्वद्देया नातिभनित ॥ देवप्रतिष्ठाविधरेप तुभ्यं निवेदित पापविनाशहेतोः। यम्मादु बुधः पूर्वमनन्तमुनमनेकविद्याधरदेवपूज्यम् ॥ ६८ ॥ इति धीमत्स्यपुराणे देवप्रतिष्ठाविधिवर्णनं नाम पञ्चपष्टयधिकदिशततमोऽध्यायः । . पट्पप्त्यधिकद्विशततमोऽध्यायः देवप्रतिष्ठाविधिरर्णनम् । मृत उयाच भधात. संप्रवक्ष्यामि देवाप्रपनमुत्तमम् । अर्धम्यापि समासेन थत्यं विधिमुत्तमम् ।।
७४२
*
मत्स्यपुराणम् *
[पट्पट्यधिकद्विशततमो
दध्यक्षताशापाणि क्षीरं टूर्या तथा मधु । यथा सिद्धार्थकास्तद्वष्टाङ्गोऽर्थः फल.सह
गजाश्वरथ्यावल्मीकघराहोत्पातमण्डलात् ।
अग्न्यागारात्तथा तीर्थाद् बजाद्गोमण्डलादपि ॥३॥
कुम्भे तु मृत्तिकां दद्यादुद्धृतासीति मन्त्रचित् ।
शन्नोदेवीत्यपां मन्त्रमापोहिष्ठेति वै तथा ॥ ४ ॥
साविन्यादायगोमूत्रं गन्धद्वारेतिगोमयम्।आप्यायरवेति वक्षीरं दधिकाव्णोतिवैदधि
तेजोसीति घृतं तद्वदेवस्यत्वेति चोदकम् । कुशमिधं क्षिपेद्विद्वान् पञ्चगव्यं भवेत्तत ॥
स्नाप्याथ पञ्चगव्येन दध्नाशुद्धेन वै तत. । दधिकाष्णोतिमन्त्रेण स्नापयेद्रलपारिणा ॥
कुशाम्भसा तत मान देवस्यत्वेति कारयेत् । फलोदकेन च स्नानमन आयाहि कारयेत्
ततस्तु गन्धतोयेन सावित्र्या वाभिमन्त्रयेत्।
ततो घटसहस्रेण सहस्रार्द्धन वा पुन ॥ ६ ॥
तस्याप्यर्धेन चा कुर्यात् सपादेन शतेन वा ।
चतु.पष्ट्या ततोर्धेन तदर्धान था पुन. ॥ १० ॥
चतुभिरथवा कुर्याद्वानामत्पवित्तवान् । सौवर्णराजतैर्चापि ताम्रर्धा रीतिकोद्भवैः ॥
कांस्यै पाथिर्वापि स्नपन शक्तितो भवेत् । सहदेवीवचाव्याघ्री वलाचातिवला तथा
शड्डपुष्पी तथा सिंही ह्यष्टमी च सुवर्चला । महोपध्यष्टक तत् महास्नानेषु योजयेत् ॥
यवगोधूमनीधारतिलण्यामाकशालयः । प्रियङ्गवो ब्रीहयश्च स्नानेषु परिकल्पिता: ३४॥
स्वस्तिकं पद्मकं शतमुत्पल कमलं तथा । श्रीवत्सं दर्पणन्तद्वन्नन्द्यावर्तमथाकम् १५/
एतानि गोमय कुर्य्यान सदा व शुभया तत ।
पञ्चवर्णादिकं तद्वत् पञ्चवर्ण रजस्तथा ॥ १६ ॥
दूर्चा कृष्णातिलान् दद्यान्नीराजनविधि तत ।
एवं नीराजन कृत्या दद्यादावमनं बुध. ॥ १७ ॥
मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापापहं शुभम् । ततोवस्त्रयुगं दद्यान्मन्त्रेणानेन यत्नत.॥
देवसूत्रसमायुक्ते यशदानसमन्विते । सर्ववणे शुभे देव घासली ते धिनिर्मिते ॥ १६ ॥
ऽध्यायः] * देवप्रतिष्ठाविधिवर्णनम् * ७४३ ततस्तु चन्दनं दद्यात् समं कर्पूरकुङ्कुमः । इममुच्चारयेन्मन्त्रं दर्भपाणिः प्रयत्लत ॥ शरीरन्ते न जानामि चेचच नैव च। मया निवेदितान् गन्धान प्रतिगृह्य विलिप्यताम् ॥ २१ ॥ चत्वारिंशत्ततो दीपान् दद्याश्चैव प्रदक्षिणान् । त्वं सूर्यचन्द्रज्योतीपि विद्युदग्निस्तथैवच त्वमेव सर्वज्योतीवि दीपोऽयं प्रतिगृह्यताम् । ततस्त्वनेन मन्त्रेण धूपं दद्याद्विचक्षणः पनस्पतिरसो दिव्यो गन्धाक्ष्यो गन्ध उत्तमः । मया निवेदितो भक्त्या धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥ २४ ॥ ततस्त्यामरणं दद्यान् महाभूपाय ते नमः । अनेन विधिना मत्या सप्तरात्र महोत्सवम् ॥ देवकुम्मस्ततः कुर्याद्यजमानोऽभिपेचनम् । चतुर्भिरभिर्वापि द्वाभ्यामेकेन वा पुनः ।। स पञ्चरतकलशे. सितवस्त्राभिवेरितः । देवस्यत्वेति मन्त्रेण साम्नाचाथर्वणेन च ॥ अभिषेके च ये मन्वा नवग्रहमसे स्मृताः । सिताम्बरधरः स्नात्यादेवान्संपूज्य यत्नतः। स्थापकंपूजयेद्भपत्याघस्रालङ्कारभूपणः । यज्ञभाण्डानि सर्याणिमण्डपोपस्करादिकम् यच्चान्यदपि तद्नेहे तदाचार्याय दापयेत् । सुप्रसने गुरौ यस्मात्तुप्यन्ते सर्वदेवता ।। नैततिशीलेन च दाम्भिन न लिङ्गिना स्थापनमन कार्यम् । विप्रेण कार्य श्रुतिपारगेण गृहस्थधर्माभिरतेन नित्यम् ॥ ३१ ॥ पासपिडनं यस्तु फरोति भतया विहाय विमान श्रुतिधर्मयुक्तान् । गुगं प्रतिष्ठादिषु तत्र नूनं फुलक्षयः स्यादनिरादपूज्यः ॥ ३२ ॥ स्थानं पिशाचे परिगृह्यते या अपूज्यतां यात्यचिरेण शोकः । विः तं यन्नुभदं फुले स्यात् प्रपूज्यतां याति चिरञ्च फालम् ॥ २३ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे देवप्रतिष्ठाविधिवर्णनं नाम पशष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।
सप्तपल्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
प्रासादविधिनिर्णयवर्णनम् ।
अपय ऊचुः।
प्रासादाः कीदृशाः सूत ! कर्तव्या भूतिमिच्छता । प्रमाणलक्षणंतद्ववदविस्तरतोऽधुना
सूत उवाच।
अथातः संप्रवक्ष्यामि प्रासादविधिनिर्णयम् ।
धास्ती परीक्षिते सम्यावास्तुदेहविचक्षणः ॥२॥
वास्तूपशमनं कुर्यात् समिद्भिलिकर्मणा । जीणोंद्वारे तथोद्याने तथा गृहनिवेशने ॥
नवप्रासादभवने प्रासादपरिवर्तने । द्वाराभिवर्तने तद्वत्प्रासादेषु गृहेषु च ॥ ४ ॥
वास्तूपशमनं कुर्यात् पूर्वमेव विचक्षणः । एकाशीतिपदं लिख्य वास्तु मध्ये च पृष्ठतः
होमस्त्रिमेखले कार्यः कुण्डे हस्तप्रमाणके । यवैः कृष्णतिलैस्तद्वत्समिद्भिःक्षीरवृक्षकैः ।
पालाशैःखादिरैश्चापि मधुसर्पिसमन्वितैः ।
कुशदूर्वामयैर्चापि मधुसर्पिसमन्वितैः ॥ ७ ॥
कार्यस्तु पञ्चभिविल्वैविल्ववीजैरथापि वा ।
होमान्ते भक्ष्यभोज्यस्तु वास्तुदेशे बलि हरेत् ॥ ८॥
तविशेषनैवेद्यमेवन्दद्यात्क्रमेण तु। ईशकोणे घृतान्नन्तु शिखिने विनिवेदयेत् ॥६॥
ओदनं सफलं दद्यात् पर्जन्याय घृतान्वितम् ।
जयाय च ध्वजान्प्रीतान् पैप्टं कूर्मञ्च सन्यसेत् ॥१०॥
इन्द्राय पञ्चरत्नानि पैटञ्च कुलिशं तथा । वितानकञ्च सूर्याय धूम्रं सकूँ तथैव च ॥११॥
सत्याय धृतगोधूमं मत्स्यदद्यानुभृशाय च । शष्कुलीश्चान्तरिक्षाय दद्यात्सतुंश्चवायचे
लाजाः पूष्णे तु दातव्याः वितथे चणकोदकम् ।
गृहक्षतायमध्यन्नं यमाय पिशितोदनम् ॥ १३ ॥
ऽध्यायः ७४५ * प्रासादविधिनिर्णयवर्णनम् * गन्धोदनञ्च गन्ध भृङ्गराजस्य भृ'गिकाम् । मृगाय यावकं दद्यापितृभ्यःकसरामता दीपारिके दन्तकाष्ठं पेष्ट कृष्णबलि तथा । सुग्रीवे पुष्पकं दद्यात् पुष्पदन्ताय पायसम् कुशस्तम्वेन संयुक्त तथा पाच पारणम् । पिटं हिरण्मयंदद्यादासुराय सुरा मता ।। पतौदनच शोपाय यवान्नं पापयक्ष्मणे । पुतलड्डुकांस्तु रोगाय नागे पुष्पफलानि तु सर्मुियाय दातव्यं मुद्गौदनमतः परम् । भलाटस्थानके दद्यात् सोमायतपायसम् भगाय शालिकं पिटमदित्य पोलिकास्तथा । दित्यतु पूरिका दद्यादित्येवंवाहातोवलिः क्षीरं यमाय दातव्यमापयत्साय वै दधि । साचित्रे लड्डकान् दद्यात् समरीचं कुशोदनम् ॥ २० ॥ सवितुर्गुड़पूपांस्तु जयाय घृतचन्दनम् । विवस्यते पुनर्दद्याद्रक्तचन्दनपायसम् ।। २१ ।। हरितालोदनं दद्यादिन्द्राय धृतसंयुतम् । धृतोदनच मित्राय रुद्राय धृतपायसम् ॥२२॥ श्रामंपर्क तथामांसं देयं स्याद्राजयक्ष्मणे । पृथ्वीधरायमांसानिकृष्माण्डानिच दापयेत् शर्करा पायसं दद्यादर्यम्णे पुनरेव हि । पञ्चगव्यं ययांश्चय तिलाक्षतमयं चरम् ॥२४॥ भश्यं भोज्यश्च विविधं ब्रह्मणे विनिवेदयेत् । एवंसम्पूजितादेवा.शान्तिकुर्वन्तिते सदा सर्वेभ्यः फाञ्चनं दद्याद् ब्रह्मणे गां पयस्विनीम् । राक्षसीनां वलियो अपि यादृक् यथा शृणु ॥ २६ ॥ मांसौदनं घृतं पद्मफेसरं रुधिरान्वितम् । ईशानभागमाश्रित्य चरक्यै विनिवेदयेत्॥२७॥ मांसोदनच रुधिरं हरिद्रौदनमेव च । आग्नेयीं दिशमाश्रित्य विदायें विनिवेदयेत् ॥ दथ्योदनं स रुधिरमस्थिखण्डेश्च संयुतम् । पीतरक्त वलिं दद्यात् पूतनायै सरक्षसे । चायव्यां पापराक्षस्यै मत्स्यमांसमुरासयम् । पायसञ्चापिदातव्यंस्वनाम्नासर्वतःकमात् नमस्कागन्तयुक्तेन प्रणवाद्येन संयुतः । ततः सर्वोपधीस्नानं यजमानस्य कारयेत् ॥३१॥ द्विजान सुपूजयेद्द्वक्त्या ये चान्ये गृहमागताः । एतद्वास्तूपशमनं कृत्वा कर्म समारभेत् प्रासादभवनोद्यानमारम्भे विनिवर्तने । पुरवेश्मप्रवेशेषु सर्वदोषापनुत्तये ॥ ३३ ॥ रक्षोनपापमानेन सूक्तेन भवनादिकम् । नृत्यमङ्गलवायेन कुर्यात् ब्राह्मणवाचनम् ॥ अनेन विधिना यस्तु प्रतिसम्वत्सरं वधः । गृहे पायतने कुन्नि स दुःखमवाप्नुयात् ७४६ * मत्स्यपुराणम् * [अष्टपष्टयधिकद्विशततमी न च व्याधिभयं तस्य न च बन्धुधनक्षयः । जीवेवर्षशतं स्वर्गे कल्पमेकञ्च तिष्ठति । इति श्रीमत्स्यपुराणे प्रासाविधिनिर्णयवर्णनं नाम सप्तपष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः । अष्टपट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः प्रासादविधिनिर्णयवर्णनम् । सूत उवाच। पवंवास्तुयलिंकृत्या भजेत्पोड़शभागिकम् । तस्यमध्येचतुर्भिस्तु भागेर्गर्भन्तु कारयेत् भागद्वादशकं साद्धं ततस्तुपरिकल्पयेत् । चतुर्दिक्षुतथाज्ञेयं निर्गमं तु ततो बुधैः ॥ २ ॥ चतुर्भागेन भित्तीनामुच्छ्राय:स्यात् प्रमाणतः । द्विगुणः शिखरोच्छ्रायो भित्त्युच्छाय(प्र)मान(जोतः ॥ ३ ॥ शिखरार्द्धस्य चार्धन विधेया तु प्रदक्षिणा । गर्भसूत्रद्वयंचाग्रे विस्तारो मण्डपस्य तु ॥ आयतःस्यात् त्रिभिर्भागैर्भद्र्युक्तःसुशोभनः । पञ्चभागेन संभज्य गर्भमानं विचक्षणः भागमेकंगृहीत्वा तु प्राग्नीचं कल्पयेवुधः । गर्भसूत्रसमादागादनतोमुखमण्डपः ॥६॥ एतत्सामान्यमुद्दिष्टं प्रासादस्यह लक्षणम् । तथान्यन्तुप्रवक्ष्यामि प्रासादंलिङ्गमानतः लिङ्गपूजाप्रमाणेन कर्तव्या पीठिकायुधः । पिण्डका विभागःस्यात्तन्मानेन तु भित्तयः याह्यभित्तिप्रमाणेन उत्सेधस्तुभवेत्पुनः । भित्त्युच्छायात्तुद्विगुणःशिखरस्य समुच्छ्रयः शिखरस्य चतुर्भागात् कर्तव्या च प्रदक्षिणा । प्रदक्षिणायास्तु समस्त्यग्रतो मण्डपोभवेत् ॥ १० ॥ तस्यवान कर्तव्यस्त्वतोमुखमण्डपः । प्रासादानिर्गतौकार्यों कपालौगर्भमानतः ॥ अचंभित्युच्छ्रयात्तस्य मञ्चरीन्तु प्रकल्पयेत् । मञ्जर्याश्चाईभागेनशुकनासांप्रकल्पयेत् उद्ध्वंतथाभागेन वेदीयन्धोभवेदिह । वेद्याश्वोपरि यच्छेपं कण्ठचामलसारकः ।। एवं विभज्य प्रासादं शोभनंकारयेवुधः । अधान्यच्चप्रवक्ष्यामि प्रासादस्यह लक्षणम् ।
ध्यायः ७४७ *प्रासदविधिनिर्णयवर्णनम् * गर्भमानप्रमाणेन प्रासादंशृणुतद्विजाः ! विभज्य नवधा गर्भ मध्येस्यालिङ्गपीठिका ।। पादाष्टकं नु रुचिरं पार्श्वतः परिकल्पयेत् । मानेन तेन विस्तारो मित्तीनान्तु विधीयते पादं पञ्चगुणं कृत्वा भित्तीनामुच्छ्रयो भवेत् । स एव शिपरस्यापि द्विगुण स्यात् समुन्क्रयः ॥ १७ ॥ चतुर्धाशिसभव्य अर्द्धभागद्वयस्य तु । शुफनासं प्रकुर्यात तृतीये घेदिका मता ॥१८॥ फण्डमामलसारं तु चतुर्थे परिकल्पयेत् । कपालयोस्तुसंहारो द्विगुणोऽत्रविधीयते ।। शोमनैः पत्रवल्लीभिरण्डकैश्चविभूपित । प्रासादोऽयं तृतीयस्तु मया तुभ्यंनिवेदितः ॥ सतउवाच। 1 सामान्यमपरं तवत् प्रासादं श्णुत द्विजाः !! त्रिभेदं कारयेत् क्षेत्रं यत्र तिष्ठन्ति देवताः ॥२१॥ रथाङ्कस्तेन मानेन याह्यभागविनिर्गतः । नेमीपादेन विस्तीर्णा प्रासाद स्यात् समन्ततः॥ गर्भन्तु द्विगुणं कुर्यात् तम्यमानं भवेदिह । स एच भित्तेस्त्सेधो द्विगुणः शिषरोमतः प्राग् ग्रीवः पञ्चभागेन निष्कासस्तस्य चोच्यते। फारयेत् सुपिरं तद्वत् प्राकारस्य विभागतः ॥२४॥ प्राग् ग्रीवं पञ्चभागेन निष्कापेण विशेषतः । कुर्यादापञ्चभागेन प्राग् ग्रीचे कर्णमूलतः स्थापयेत्कनकं तब गर्भान्ते द्वारमूलतः । एवन्तु त्रिविधं कुर्यात् ज्येष्टमध्यकीयसम् लिङ्गमानानुभेदेन रूपभेदेन चा पुनः । एते समासतः प्रोक्ता नामतः शृणुताधुना ॥२७॥ मेरुमन्दरकैलासकुम्भसिंहमृगास्तथा । विमानच्छन्दकस्तपञ्चतुरस्रस्तथैव च ॥ २८ ॥ अष्टास्त्रः पोडशास्त्रश्च धर्तल. सर्वभद्रक । सिंहास्यो नन्दनश्चैव नन्दिवर्धनफस्तथा ॥ हंसोवृपः सुवर्णेशः पद्मकोऽथ समुद्गकः । प्रासादा नामतःप्रोत्साचिमागं शृणुतद्विजाः! शातरङ्गश्चतुरो भूमिका पोडशोच्छ्रित. ( नानाविचित्रशियरो मेरुः प्रासाद उच्यते मन्दरो द्वादश प्रोक्त कैलासो नवभूमिकः । विमानच्छन्दकम्तद्वदनेकशिखराननः ॥ स वाष्टभूमिकस्तद्वत् सप्तमिर्नन्दिपर्धनः । पिपाणकसमायुक्तो नन्दनः स उदाहृतः ॥ पोडशास्त्रसमायुक्तो नानारूपसमन्वितः । अनेकशिषरस्तद्वत्सर्वतोभद्र' उच्यते ।। । .
[अष्टपष्टयधिकद्विशततमो * मत्स्यपुराणम् * चित्रशालासमोपेतो विज्ञेयः पञ्चभूमिकः । बलभीच्छन्दकस्तद्वदनेक शिखराननः ॥३५॥ वृषस्योच्छायतस्तुल्यो मण्डलवानपर्जितः । सिंहःसिंहाकृतियो गजो गजसमस्तथा ॥ ३६ ॥ कुम्भः कुम्भाकृतिस्तभूमिका नवकोच्छ्रयः । अड्डलीपुटसंस्थानःपञ्चाण्डकविभूषित पोड़शास्त्रः समन्ताच विज्ञेयः स समुद्गकः । पार्श्वयोश्चन्द्रशालेऽम्य उच्छायो भूमिकाद्वयम् ॥ ३८ ॥ तथैव पद्मक.प्रोक्तः उच्छ्रायोभूमिकात्रयम् । षोड़शानः स विज्ञेयो विचित्रशिखरःशुभ' मृगराजस्तु विख्यातश्चन्द्रशालाविभूपितः । प्रागग्रीवेण विशालेन भूमिकासु पडुन्नत अनेकश्चन्द्रशालश्च गनः प्रासाद इष्यते । पर्यस्तगृहराजो वै गरुडोनाम नामतः ॥४१॥ सप्तभूम्युच्छ्रयस्तञ्चन्द्रशालात्रयान्वितः । भूमिकापडशीतिस्तु याह्यतः सर्वतोभवेत्। तथान्योगरुडस्तद्वदुच्छ्याइशभूमिकः । भूमिकापोड़शाम्नस्तु भूमिद्वयमथाधिकः ॥४३ पद्मतुल्यप्रमाणेन श्रीवृक्षक इति स्मृतः । पञ्चाण्डको द्विभूमिश्च गर्ने हस्तचतुष्टयम् ॥ वृषोभवतिनानायं प्रासादःसार्वकामिकः । सप्तकाः पञ्चकाश्चैव प्रासादा पैमयोदिता सिंहास्येन समाज्ञया येचान्ये तत्प्रमाणकाः । चन्द्रशालैःसमोपेताः सर्वेप्राग्नीवसंयुताः ऐएका दारवाश्चैव शैला पा स्युः सतोरणाः ॥४६ ।। मेरुपञ्चाशद्धस्त स्यान्मन्दर पञ्चहीनकः । चत्वारिंशत्तु कैलासश्चतुस्त्रिंशद्विमानकः ॥४॥ नन्दिवर्द्धनकस्तद्वद् द्वात्रिंशत् समुदाहृतः । त्रिंशतानन्दनःप्रोक्तः सर्वतोभद्रकस्तथा ॥४८॥ चतुलः पद्मकश्चैव विशद्धस्त उदाहृतः । गज.सिंहश्य कुम्भश्च पलभी च्छन्दकस्तथा ॥ एते पोड़शहस्ताःस्युश्चत्वारो देववल्लभाः । कैलासो मृगराजश्व विमानच्छन्दकोमतः । पने द्वादशहस्ता:स्युरेतेपामिह मन्मतम् । गरुड़ोऽरफरोशेयो हंसोदश उदाहृतः ॥५१॥ एवमेते प्रमाणेन फर्तव्याः शुभलक्षणाः । यक्षराक्षसनागानां मातृहस्तान् प्रशंस्यते॥५॥ तथामेादयःसप्त ज्येष्ठलिड्ने शुभायहाः । श्रीवृक्षफादयध्याष्टी मध्यमस्य प्रकीर्तिताः । तथा हंसादयःपञ्च कन्यसे शुभदा मताः । पलमोच्छन्दफे गौरी जटामुकुटधारिणी ऽध्यायः] ७४६ । * मण्डपलक्षणवर्णनम् * घरदाभयदा तहत् साक्षसूत्रकमण्डलुः। गृहै तु रक्तमुकुटा उत्पलाडुशधारिणी। घरदाभयदा चापि पूजनीया सभर्तृका १५५ ॥ उपोयनस्थामितरां तो तु संपूजयेद्बुधः । देव्या विनायकस्तद्वत् बलभीच्छन्दके शुभः इति श्रीमत्स्यपुराणे प्रासाविधिनिर्णयवर्णनं नामाष्टपष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः । उनसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः मण्डपलक्षणवर्णनम् । सूतउवाच । अथातःसंप्रवक्ष्यामि मण्डपानान्तु लक्षणम् । मण्डपप्रवरान्वक्ष्ये प्रासादस्यानुरूपतः विविधा मण्डपा:कार्या ज्येष्ठमध्यक्नोयसः । नामतस्तान् प्रवक्ष्यामि शृणुध्वमृपिसत्तमाः ॥ २॥ पुष्पकः पुष्पभद्रश्च सुबतोऽमृतनन्दनः । कौशल्योयुद्धिसंकीर्णो गजभद्रोजयावहः ।। श्रीवत्सोविजयश्चैव वास्तुकीर्तिः श्रुतिजयः । यज्ञभद्रोविशालश्च, सुश्लिष्टः शत्रुमर्दनः भागपञ्चोनन्दनञ्च मानवोमानभद्रकः । सुग्रीयोहरितश्चैव कणिकारः शर्द्धिकः ॥५॥ सिंहश्च श्यामभद्रश्च सुभद्रश्च तथैव च । सप्तविंशतिराख्याता लक्षण शृणुत ! द्विजाः !॥६॥ स्तम्भा यत्र चतुःपटिपुष्पकः समुदाहृतः । द्विपष्टिपुष्पभद्रस्तु पष्टिःसुबत उच्यते॥७॥ अष्टपञ्चाशकस्स्तम्भः कथ्यते मृतनन्दनः । कौशल्यः षट्चपशाशच्चतुःपञ्चाशता पुनः नाम्ना तु युद्धिसंकीर्णो द्विहीनो गजभद्रकः । जयाधहस्तु पञ्चाशत् श्रीवत्सस्तविहीनकः ॥ ६॥ विजयस्तविहीनःस्यात् पास्तुकीतिस्तथैव च।
७५० [ उनसप्तत्यधिकद्विशततमो * मत्स्यपुराणम् * द्वाभ्यामेव प्रहीयेत ततः श्रुतिजयोऽपरः ॥ १० ॥ चत्वारिंशद्यज्ञभद्रस्तद्विहीनो विशालकः। पत्रिंशच्चैव सुश्लिष्टो द्विहीनः शत्रुमर्दन द्वात्रिंशदागपञ्चस्तु(?) त्रिशद्धिर्नन्दन स्मृतः । अष्टाविंशमानवस्तु मानभद्रो द्विहीनक चतुर्विशस्तुसुग्रीवो द्वाविंशो वर्पणो मत । विंशतिःकर्णिकार.स्यादष्टादश शतधिक सिंहोभवेद्विहीनश्च श्यामभद्रो विहीनकः । सुभद्रस्तु तथाप्रोक्तो द्वादशस्तम्भ उच्यते मण्डपा:कथितास्तुभ्यं यथावल्लक्षणान्विता. । त्रिकोणं वृतमर्द्धन्तु ह्यष्टकोणं द्विरष्टकम् ॥ १५ ॥ चतु कोणन्तु कर्तव्यं संस्थानं मण्डपस्य तु । राज्यञ्च विजयश्चैव आयुपर्धनमेव च ॥ पुत्रलाभःश्रियःपुष्टिस्त्रिकोणादि क्रमाद्भवेत् । एवं तु शुभदाः प्रोक्ताश्चान्यथा त्यशुभावहाः ॥ १७ ॥ चतुःपष्टिपदं कृत्वा मध्ये द्वारं प्रकल्पयेत् । विस्ताराद् द्विगुणोच्छ्रायं तत्रिभागः कटिर्भवेत् ॥ १८ ॥ विस्ताराोमवेद्गर्भो भित्तयोऽन्याः समन्ततः । गर्भपादेन विस्तीणं द्वारं त्रिगुणमायतम् तथा द्विगुणविस्तीर्णमुसस्तवदुदुम्परः । विस्तारपादमतिमंयाटुल्यंशास्खयोऽस्मृतम्() निपञ्चसप्तनवभि. शापाभिरिमिप्यते । कनिष्ठमध्यमज्येष्ठं यथायोगं प्रकल्पयेत् ॥२१ अङ्गुलानां शतं साई चत्वारिंशत्तथोन्नतम् । त्रिंशदुविंशोत्तरं चान्यद्धन्यमुत्तममेय व शतञ्चाशीतिसहितं पातनिर्गमने भयेत् । अधिकं दशमिस्तद्वत् तथापोडशभिःशतम् शतमानं तृतीयश्च नपत्याशीतिभिस्तथा । दश द्वाराणि वैतानि प्रमेणोक्तानि सर्वदा ॥ २४ ॥ अन्यानि पर्जनीयानि मनसोद्वेगदानि तु । द्वारवेधं प्रयत्नेन सर्यवास्तुपु पर्जयेत् ॥ वृक्षकोणम्रमिद्वारस्तम्भकृपध्वजादपि । कुयायभ्रण घा पिद्धं द्वारंन शुभदम्भवेत् ॥२६ क्षयश्च दुर्गतिञ्चय प्रयास. क्षुद्धयं तथा। दौर्भाग्यं यन्धनं रोगो दारिद्य फलई तथा ॥२७॥ विरोधधार्थनाशश्च स येधाइयेत् फ्रमात् । पूर्वण फलिनोरक्षा. क्षारयक्षात दक्षिणे ऽध्यायः] * फली भाविनूपान्ययवर्णनम् । ७५१ 'पश्चिमेन जलं श्रेष्ठंपद्मोत्प लविभूषितम् । उत्तरे सरलस्तालेः शुभास्यात् पुष्पयाटिका सर्वतस्तु जलं श्रेष्ठं स्थिरमस्थिरमेव च। पार्वतश्चापि कर्त्तव्यं परिवारादिकालयम् याम्ये तपोयनस्थानमुत्तरे मातृकागृहम् । महानसं तथाग्नेये नैऋत्येऽथ विनायकम् ॥ चारुपे श्रीनिवासस्तु पायव्ये गृहमालिका । उत्तरे यशशाला तु निर्माल्यस्थानमुत्तरे ॥ ३२ ॥ चारुणे सोमदेवत्ये बलिनिर्वपणं स्मृतम् । पुरतो वृपमस्थानं शेपे स्यात् कुसुमायुधः जलं चापि तथैशाने विष्णुस्तु जलशाय्यपि । एवमायतनंकुर्यात् कुण्डमण्डपसंयुतम् घण्टावितानकसतोरणचित्रयुक्त नित्योत्सवप्रमुदितेन जनेन सार्धम् । यः कारयेत् सुरगृह विविधध्याजाई श्रीस्तं न मुञ्चति सदा दिवि पूज्यते च ॥ ३५ ॥ 'एवं गृहार्चनविधावपि शक्तितः स्यात् संस्थापनं सकलमन्त्रविधानयुक्तम् ॥ ३६ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे मण्डपलक्षणवर्णनं नामोनसप्तत्यधिकदिशततमोऽध्यायः । सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः कलौ भाविनृपान्वयवर्णनम् । अपय ऊचु । 'पूरोवंशस्त्वया स्न! समविष्यो निवेदित । सूर्यवंशे नृपायेतु भविष्यन्ति हि तान्पद तथैव यादवे वंशे राजानः कीर्तिवर्धनाः । कलीयुगे भविष्यन्ति तानपीह घदस्य न ॥ वंशान्ते ज्ञातयो याश्च राज्यं प्राप्स्यन्ति सुबता.। ब्रूहि संक्षेपतस्तासां यथाभाव्यमनुक्रमात् ॥ ३॥ सूत उपाव। हदयलस्य दायादो पीरोराजा झुरक्षयः । उरक्षयसुतश्चापि यत्सद्रोहो महायशाः ॥ रत्सदोहात् प्रतिव्योमस्तस्यपुत्रो दिवाकरः। तस्यैव मध्यदेशे तु अयोध्यानगरी शुभा ७५२ * मत्स्यपुराणम् * [सप्तत्यधिकद्विशततमो दिवाकरस्य भविता सहदेवो महायशाः । सहदेवाच्च भविता ध्रुधाश्वो वै महामना । तस्य भाव्यो महाभागःप्रतीपाश्वश्च तत्सुतः। प्रतीपाश्वसुतश्चापि सुप्रतीपो भविष्यति मरदेव सुतस्तस्य सुनक्षत्रस्ततोऽभवत् । किन्नराश्वः सुनक्षत्रादविष्यति परन्तप ॥ किन्नराश्वादन्तरिक्षो भविष्यति महामनाः । सुपेणश्चान्तरिक्षाच्च सुमित्रश्चाप्यमित्रजित् ॥६॥ सुमित्रज्ञो वृहद्राजः वृहद्राजस्य वीर्यवान् । पुत्र' कृतञ्जयो नाम धार्मिकश्च भविष्यति ॥ १०॥ कृतञ्जयसुतो विद्वान् भविष्यति रणजयः। भविता सञ्जयश्चापि धीरो राजा रणेजयात् ॥ ११ ॥ सञ्जयस्य सुत. शाक्य शापमान्छुद्धोदनो नृप । शुद्धौदनस्य भविता सिद्धार्थः पुष्कल. सुत. ॥ १२ ॥ प्रसेनजित्ततो भाव्य. क्षुद्रको भविता ततः । क्षुद्रकात् कुलकोभाव्यः कुलकात् सुरथः स्मृतः ॥ १३ ॥ सुमित्रसुरथानातो अन्यस्तु भविता नृपः । एतेचैक्ष्वाकरः प्रोक्ताभविष्यायेकलीयुगे वृहदलान्यवाये तु भविष्याः कुलबर्द्धनाः । अत्रानुवंशश्लोकोऽयं विप्रैगीतः पुरातनः॥ इक्ष्याकृणामयंवश. सुमित्रान्तो भविष्यति । सुमित्रप्राप्यराजानंसंस्थाप्राप्स्यतिवैकली इत्येवं मानवोवंश प्रागेव समुदाहृत । अतऊथ्वं प्रवक्ष्यामि मागधा ये वृहद्रथाः ॥ पूर्वेण येजरासन्धात् सहदेवान्चये नृपाः । अतीता पर्तमानाश्च भविष्यांश्च निवोधत संग्रामे भारतवृत्ते सहदेवे निपातिते । सोमाधिस्तस्यदायादो राजाऽभूत्सगिरिव्रजे॥ पञ्चाशतं तथाष्टीय समाराज्यमकारयत् । श्रुतश्रयाश्चतुःपष्टिं समास्तस्यान्वयेऽभवत् ॥ अप्रतीपीय पत्रिंशत् समा राज्यमकारयत् । चत्वारिंशत् समास्तस्य निरमित्रो दियङ्गतः ॥२१॥ पञ्चाशत समा पद च सुरक्षा प्राप्तवान्महीम् । वृहत् फर्मा प्रयोविंशददं राज्यमफारयत् ॥ २२ ॥ ।
ध्यायः ], , सेनाजित 'कलौ माविनृपान्वयवर्णनम् * सम्प्रयातश्च भुक्वा पञ्चशतं महीम् । ध्रुतञ्जयस्तु घर्षाणि चत्वारिंशदविष्यति अप्राविंशतिवर्षाणि महीं प्राप्स्यतिचे विभुः । अष्टपञ्चाशतंपटच राज्येस्थास्यतिवशुचि अष्टाविंशत् समा राजा क्षेमो भोक्ष्यति वै महीम् । अनुवतधतु पष्टि राज्यं प्राप्स्पति वीर्यवान् ॥ २५ ॥ पञ्चविंशतिवर्षाणि सुनेत्रो भोक्ष्यते महीम् । भोक्ष्यते निर्वृतिश्चेमामपञ्चाशतंसमा' अपाविशन् समापज्यंत्रिनेत्रो भोक्ष्यते तन । चत्वारिंशत्तथाप्टोच द्युमत्सेनोभविष्यति प्रयस्त्रिंशत्तु घर्षाणि महीनेत्रः प्रकाश्यते। द्वात्रिंशत्तु समा राजा ह्यचलस्तु भविष्यति रिपुञ्जयस्तु वर्षाणि पञ्चाशत् प्राप्स्यते महीम् । द्वात्रिंशति नृपाद्यते भवितारोवृहद्रथा पूर्ण वर्षसहस्रन्तु तेषां राज्यं भविष्यति । जयतां क्षत्रियाणाञ्च बालकः पुलकोभवेत्॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे कलौ भाविनृपान्वयवर्णनं नाम सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः । । । एकसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः कलौ भाविनृपान्वयवर्णनम् । सूत उवाच । वृहद्रथेष्वतीतेपु चीतिहोवेष्वन्तिषु । पुलक स्वामिनं हत्या स्वपुत्रमभिषेक्ष्यति । मिपता क्षत्रियाणाञ्च वालक पुलकोद्भघ । सबै प्रणतसामन्तो भविष्यो न च धर्मत त्रयोविंशत् समापजा भविता स नरोत्तम । अष्टाविंशतिवर्षाणि पालको भविता नृप. विशारायूपोभविता त्रिपञ्चाशत्तथा समा. । एकविंशत्समा राजा सूर्यकस्तु भविष्यति पाराणस्या सुतं स्थाप्य श्रयिष्यति गिरिराजम् । शिशुनाकस्तु धर्षाणि चत्वारिंशद्भविष्यति ॥ ५ ॥ काफवर्णः सुतस्तस्य पड्विंशत् प्राप्स्यते महीम् ।' पटनिशय धर्षाणि क्षेमधोमा भविष्यति । mu * मत्स्यपुराणम् * [एकसप्तत्यधिकद्विशततमो चतुर्विशत्समाः सोऽपि क्षेमजित्प्राप्स्यते महीम् । अष्टाविंशति धर्षाणि चिन्ध्यसेनो भविष्यति ॥ ७॥ भविष्यतिसमाराजा नवकाण्यायनी नृपः । भूमिमित्रः सुतस्तस्य चतुर्दश भविष्यति अजातशत्रुर्भपिता सप्तविंशत् समानृपः । चतुर्विंशत्समा राजा वंशकस्तु भविष्यति । उदासीभविता तस्मात्त्रयस्त्रिंशत्समानुपः । चत्वारिंशत्समाभान्यो राजानन्दिवर्द्धनः चत्वारिंशत्त्रयश्चैव महानन्दी भविष्यति । इत्येते भवितारो चै दश द्वौ शिशुनाकजाः शतानि त्रीणिपूर्णानि पहिवर्षाधिकानि तु । शिशुनाकामविष्यन्तिराजानः क्षत्रबन्धयः एतैः साई भविष्यन्ति यावत्कलिनृपाः परे । तुल्यकालं भविष्यन्ति सर्वेहोतेमहीक्षितः चतुर्विशत्तथैक्ष्वाकाः पाञ्चालाः सप्तविंशतिः । काशेयास्तु चतुर्विशदष्टाविंशतु हैहयाः कलिङ्गाश्चैव द्वात्रिंशदश्मकाः पञ्चविंशतिः । कुरवश्चापि ट्विंशदष्टाविंशस्तु मैथिलाः शूरसेनास्त्रयोविंशद्वीतिहोत्राश्च विंशतिः । एतेसर्वे भविष्यन्ति एककालं महीक्षितः ॥ महानन्दिसुतश्चापि शूद्रायां कलिकांशजः । उत्पत्स्यतेमहापद्मः सर्वक्षत्रान्तको नृपः॥ ततः प्रभृतिराजानो भविष्याः शूदयोनयः । एकराट्समहापद्यो एकच्छनोभविष्यति ॥ अष्टाशीति तु घर्षाणि पृथिव्याञ्च भविष्यति । सर्वक्षत्रमथोत्साद्य भाविनार्थनवोदितः सुकल्पादि सुताह्यष्टीसमाद्वादशते नृपाः । महापास्य पर्यायेभविष्यन्तिनृपाःममात्॥ उद्धरिप्यति कौटिल्यः समेादशभिः सुतान् । भुक्त्वा मही वर्षशतं ततो मान गमिष्यति ॥ २१ ॥ भविता शतधन्वा च तस्य पुत्रस्तु पट्समाः। वृहद्रथस्तु वर्षाणि तस्य पुत्रश्च सप्ततिः ॥ २२ ॥ पट्त्रिंशत्तु समाराजा भयिता शक एव च । सप्तानां दशवर्षाणि तस्य नप्ता भविष्यति राजादशरथोऽष्टौतु तस्य पुत्रो भविष्यति । भविता नववर्षाणि तस्य पुत्रश्च सप्ततिः॥ इत्येते दशमीर्यास्तु ये भोक्ष्यन्ति बसुन्धराम् । सप्तत्रिशच्छतं पूर्ण तेभ्यः शुङ्गान् गमिप्यति ॥ २५ ॥ पुष्यमित्रस्तु सेनानीदधृत्य स बृहद्रथान् । कारयिष्यतिवं राज्यं पदिशतिसमानृपः ऽध्यायः] * फली भाचिनृपान्वयर्पर्णनम् * भवितापि वसुज्येष्ठः सप्तवर्षाणि वै नृपः । पसुमित्रस्तथाभाव्यो दशवर्षाणि वै ततः ।। ततोऽन्तकः समितुितस्यपुत्रोभविष्यति । भविष्यतितमस्तस्मात्रीण्येयंसपुलिन्दकः भविता धनमित्रस्तु समाराजा पुनर्भवः । द्वात्रिंशत्तु समामागः समाभागाचतो नृपः भविष्यति सुतस्तस्य देवभूमि समादश । दशैते क्षुद्रगजानोभोक्ष्यन्तीमां वसुन्धराम् शन पूर्ण शतेवेच तत. शुङ्गान् गमिष्यति । अमात्यो घसुदेवस्तु प्रसा ह्यवनी नृप. ॥ देवभूमिमथोत्साद्य शोङ्गस्तु भविता नृपः । भविष्यति समाराजा नयकाण्यायनो नृपः भूमिमित्र सुतस्तस्य चतुर्दश भविष्यति । नारायणः सुतस्तस्य भविताद्वादशैव तु ॥ सुशर्मा तत्सुतश्चापि भविष्यतिदशैव तु । इत्येतेशुभृत्यास्तुस्मृता काण्वायनानृपाः चत्वारिंशद्विजा ह्येते काण्या भोक्ष्यन्ति चै महीम् । चत्वारिंशत्पञ्च चैध भोक्ष्यन्तीमा वसुन्धराम् ॥ ३५ ॥ एते प्रणतसामन्ता भविप्या धार्मिकाश्च ये। येपा पर्यायफाले तु भूमिरान्ध्रान् गमिष्यति ॥ ३६॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे कलौ भाविनृपान्वयवर्णनं नामकसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय ! द्विसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः कली भाबिनपान्वयवर्णनम् । सूत उवाच। काण्वायनास्ततो भूपाः सुशर्माण प्रसहाताम् । शुङ्गानाञ्च यच्छेवं क्षपित्या तु बलीयस ॥ १ ॥ शिशुकोन्ध्र सजातीय प्राप्स्यतीमा घसुन्धराम् । अयोपिंशत् समाराजा शिशुकस्तु भविष्यति ॥२॥ धीमल्लुकर्णिमपिता तस्य पुत्रस्तु वै दश । पूर्णोत्सगस्ततोराजा वर्षाण्यष्टादशैव तु ।।
* मत्स्यपुराणम् *
[द्विसप्तत्यधिकद्विशततमो
पञ्चाशत समा.पट्च शान्तकणिर्भविष्यति । दशवाशे व वर्षाणि तस्य लम्बोदर मुत
आपीतकोदशद्वेच तस्य पुत्रो भविष्यति । दशवायी च वर्षाणि मेधस्वाति भविष्यति
स्वातिश्च भविता राजा समास्त्वष्टादशैव तु ।
स्कन्दरचातिस्तथा राजा सप्तव तु भविष्यति ॥ ६ ॥
मृगेन्द्र खातिकर्णस्तु भविष्यतिसमात्रयः । कुन्तलः स्वातिकर्णस्तु भविताष्टौसमानृपः
एकसंवत्सरं राजा स्वातिवर्णो भविष्यति ॥ ८॥
भवितारिक्तवर्णस्तु वर्षाणि पञ्चविंशति । तत संवत्सरान् पञ्च हालोराजा भविष्यति
पञ्चमन्दुलकोराजाभविष्यतिसमा नृप। पुरीन्द्रसेनो भविता तस्मात्सौम्योभविष्यति
सुन्दरः शान्तिकर्णस्तु अब्दमेकं भविष्यति ।
चकोर स्वातिकर्णस्तु पण्मासान् वै भविष्यति ॥ ११ ॥
भष्टाविंशतिवर्षाणि शिवस्वातिर्भविष्यति । राजा व गौतमी पुत्रोद्यकविंशत्यतोनृप ।।
अष्टाविंशतिसुतस्तस्यसुलोमावैभविष्यति । शिवश्री सुलोमात्तु सप्तैय भवितानप ॥
शिवस्कन्धशान्तिकर्णादविता ह्यात्मजः समा ।
नवविशतिवर्षाणि यज्ञः श्रीः शान्तिकणिकः ॥ १४॥
पडेव भवितातस्याद्विजयस्तुसमास्तत.। चण्डश्री शान्तिकर्णस्तु तस्य पुत्रः समादश
सुलोमा सप्तवर्षाणि अन्यस्तेषां भविष्यति।
एकोनविंशतिहोते आन्ध्रा भोक्ष्यन्ति वै महीम् ॥ १६ ॥
तेपा वर्षशतानि स्युश्चत्वारिषष्टिरेष च । आन्ध्राणा संस्थिताराज्येतेपांभृत्यान्वयेनृपा
सप्तवान्ध्रा भविष्यन्ति दशाभीरास्तथा नृपा । सप्तगर्दभिलाश्चापि शकाश्चाष्टादशैव तु
यवनाप्टौ भविष्यन्ति तुपाराश्च चतुर्दश । त्रयोदश गु(म)रुंडाश्च हुणाटकोनविशति
यवनाष्टीभविष्यन्तिसप्ताशीतिमहीमिमाम् । सप्तगई मिलाभूयोभोक्ष्यन्तीमावसुन्धराम्
सप्तवर्षसहस्राणि तुषाराणां मही स्मृता । शतानि त्रीण्यशीतिञ्च शतान्यष्टादशैव तु ॥
शतान्यर्द्धश्चतुष्काणि भवितव्यास्त्रयोदश ।
गु(म)रुण्डा वृपलः साधं भोक्ष्यन्ते म्लेच्छसम्भपा. ॥ २२ ॥
ऽध्यायः] । * कलौ भाविनृपान्ययवर्णनम् # शतानित्रीणिमोक्ष्यन्ते वण्येकादशैव तु । आन्ध्रा:श्रीपार्वतीयाश्चतेद्विपञ्चाशतंसमाः सप्तपपिस्तुवर्षाणि दशाभीरास्तथैव च । तेप्त्सन्नेषु कालेन ततः फिलफिलानृपाः ।। मयिष्यन्तीह यवनाधर्म: कामतोऽर्थतः । तबिमिश्रा जनपदाआर्याम्लेच्छाच सर्वशः विपर्ययेण वर्तन्ते क्षयमेष्यन्ति वै प्रजाः । लुब्धान्तनुपाश्चैव भवितारो नृपस्तथा ॥ करिकनानिहता.सर्वआयाम्लेच्छाचसर्वतः अधार्मिकाश्चयेऽत्यर्थपापण्डाञ्चयसर्वशः प्रणप्टे नृपवंशे तु सध्याशिद कलौ युगे । किञ्चिच्छिष्टाः प्रजास्तावै धर्म नष्टेऽपरिग्रहाः ॥ २८॥ असाधवी ह्यसत्वाश्च व्याधिशोकेन पीडिताः। अनावृष्टिहताश्चैय परस्परयधेप्सवः अशरण्या परित्रस्ता:सघोरमाश्रिताः । सरित्पर्वतवासिन्योभविष्यन्त्यखिला.प्रजा: पनमूलफलाहाराचीरपत्राजिनाम्यराः । वृत्यर्थममिलिप्सन्त्यश्चरिष्यन्ति धसुन्धराम् ।। एवं कष्टमनुप्राप्ता. प्रजाफाले युगान्तके। नि.शेपास्तु भविष्यन्ति सार्द्ध फलियुगेन तु क्षीणे कलियुगे तस्मिन् दिव्ये वर्षसहस्रके। ससन्ध्यांशे सुनि.शेपे कृतं तु प्रतिपत्स्यते ॥ ३३ ॥ एवं चंशक्रम कृत्स्नः कीर्तितो यो मया कमात् । थतीता वर्तमानाश्च तथवानागताश्च ये॥३४॥ महापयामिषेकात्तु यापजन्मपरीक्षित 1 एवं वर्षसहस्रन्तु ज्ञेयं पञ्चाशदुत्तरम् ॥ ५५ ॥ पौलोमान्तु तथान्ध्रास्तु महापद्मान्तरे पुन । अनन्तरंशनान्यष्टौ पत्रिंशत्तु समाम्तया तावत्कालान्तरं भायमान्भ्रान्तादापरीशितः । भविष्येते प्रसाट्याता पुराणः धृतर्षिभिः ॥ ३७॥ सप्तर्षयस्नदाप्रांशु प्रदीमेनाग्निना समा. 1 सप्तविंशतिभाव्यानां आन्ध्राणान्नुपदापुनः समर्षयन्तु वर्तन्ते यत्र नक्षत्रमण्डले । सप्तर्षयम्नु तिष्ठन्ति पर्यायेण शतं शतम् ॥ सप्तपरीणामुपये तन् स्मृतं वै दिव्यसंशया। समादिव्याः स्मृताः गरिदिन्याग्दानि तु सप्तभिः ॥ ४०॥ एमिः अपर्वते फालोदिव्यासप्तर्षिभिन्तुचे । सप्त मात्र यो पूर्वोदृश्येतादितोनिशि ७५८ * मत्स्यपुराणम् । [द्विसप्तत्यधिकद्विशततमो तयोर्मध्ये तु नक्षत्रं दृश्यते यत्समं दिवि । तेन सप्तर्पयोझया युक्ताव्योग्नि शतं समा नक्षत्राणामृपीणाञ्च योगस्यतन्निदर्शनम् । सप्तर्पयो मघायुक्ताः काले पारिक्षिते शतम् घ्राह्मणस्तु चतुर्षिशा भविष्यति शतंसमाः । तत.प्रभृत्ययं सर्वोलोकोव्यापत्स्यतेभृशम् अनृतोपहतालुब्धा धर्मतःकामतोऽर्थतः । श्रौतस्मातेति शिथिले नष्टयर्णाश्रमे तथा । सङ्करं दुर्बलात्मानः प्रतिपत्स्यन्ति मोहिताः । ब्राह्मणाः शूद्रयोनिस्याः शृद्रा वै मन्त्रयोनयः ॥ ४ ॥ उपस्थास्यन्ति तान्विप्रास्तदर्थमभिलिप्सवः । क्रमेणैव च दृश्यन्ते स्ववर्णान्तरदायकम् ॥ ४७ ॥ क्षयमेव गमिष्यन्ति क्षीणशेषा युगक्षये । यस्मिन्कृष्णोदिवं यातस्तस्मिन्नेव तदाहनि प्रतिपन्नं कलियुगं प्रमाणं तस्य मे शृणु । चतुःशतसहनन्तु घर्षाणां चै स्मृतं बुधैः ।। चत्वार्यसहस्राणि सङ्ख्यातं मानुषेण तु । दिव्यं वर्षसहस्रन्तु तदासङ्ख्या प्रवर्तते । निःशेपेतु तदा तस्मिन् कृतं वै प्रतिपत्स्यते । ऐलश्चेक्ष्वाकुवंशश्च सहदेवः प्रकीर्तिताः इक्ष्वाकोः संस्मृतं क्षत्रं सुमित्रान्तंभविष्यति । ऐलं क्षत्रसमाक्रान्तं सोमवंशविदोचिदुः एते विवस्वत पुत्राः कीर्तिता. कीर्तिवर्धनाः । अतीता घर्तमानाश्च तथैवानागताश्च ये ब्राह्मणा क्षत्रिया वैश्णस्तथा शूद्राश्च वै स्मृताः । वैवस्वतेऽन्तरे तस्मिन्निति वंशः समाप्यते ॥ ५४॥ देवापिः पौरवोराजा ऐक्ष्वाकोयश्च ते मत. । महायोगवलोपेतो कलापप्राममाश्रिती ॥ एती क्षत्रप्रणेतारौ नवविंशे चतुर्युगे । सुवर्चा मनुपुत्रस्तु ऐक्ष्वाकाद्यो भविष्यति ॥ नवविंशे युगेसो वै वंशस्यादिर्भविष्यति । देवापिपुत्र. सत्यस्तु ऐलानां भविता नृपः क्षत्रप्रवर्तकावेतो भविष्येतु चतुर्युगे । एवं सर्वेषु विज्ञेयं सन्तानार्थन्तु लक्षणम् ॥५८॥ क्षीणे कलियुगेचैव तिष्ठन्तीति कृते युगे । सप्तर्पयस्तु तैः साधं मध्ये त्रेतायुगे पुनः ॥ वीजार्थं वै भविष्यन्ति बहाक्षत्रस्तु वै पुनः । एवमेवं तु सर्वेषु तिप्यान्तेप्यन्तरेषु च ॥ सप्तर्षयोनृपः साद्धं सन्तानार्थं युगे युगे । एवं क्षत्रस्य चौत्सेध सम्बन्धोवैद्विनःस्मृतः मन्वन्तराणां सन्ताने सन्तानाश्चश्रुतीस्मृताः। अतिक्रान्तयुगाश्चैवब्रह्मक्षत्रस्यसम्भवाः .
७५६ ऽध्यायः] * फली भाषिनृपान्ध्यवर्णनम् - यथा प्रशान्तिस्तेषां वै प्रकृतीनां यथाक्षयः । सप्तर्षयो विदुस्तेषां दीर्घायुस्त्वं क्षयोदयौ ॥ ६३ ॥ एतेन क्रमयोगेन ऐला इक्ष्वाकवो नृपाः । उत्पद्यमानास्त्रेतायां क्षीयमाणाः कलौ युगे। अनुयान्ति युगास्यान्तु यावन्मन्वन्तरक्षयम् । जामदग्न्येन रामेण क्षत्रेनिरयशेपिते ॥ रिक्तयं घसुधासर्वा क्षत्रियर्वसुधाधिपः । द्विवंशकरणं सर्व कीर्तयिष्टे नियोध मे।६६॥ ऐलञ्चेश्याकुवंशच प्रकृति परिचक्षते । राजानः श्रेणिवद्धाश्च तथान्ये क्षत्रियाभुवि ॥ ऐलवंशास्तु भूयांसो न तथेत्याकयो नृपाः । एपामेकशतं पूर्ण कुलानामभिरोचते ॥ तापदेव तु भोजानां विस्ताराद् द्विगुणं स्मृतम् । मोजानां द्विगुणं क्षत्रं चतुर्दा तयथातथम् ॥६६॥ ते हातीताः स नामानो वृधतस्तान्नियोध मे । शतं ये प्रतिविन्ध्यानांश नागा.शतहयाः शतमेकं धार्तराष्ट्रा ह्यशीतिर्जनमेजयाः । शतं वै ब्रह्मदत्तानां धीराणां कुरवः शतम् ॥७१ ततः शतञ्च पश्चालाः शतं काशिकुशादयः । तथापरे सहस्रद्वे ये नीपा: शशविन्दवः ।। इष्टचन्तश्च ते सर्वे सर्वे नियुतदाक्षिणाः । एवं राजर्षयोऽतीताः शतशोऽथ सहस्रशः ।। मनोधस्वतस्यासन्वर्तमानेऽन्तरेविभोः । तेषांतुनिधनोत्पत्तोलोकसंस्थितयःस्थिताः न शक्योयिस्तरस्तेषां सन्तानस्य परस्परम् । तत्पूर्वापरयोगेन वक्तुं वर्षशतैरपि ॥७५| अष्टाविंशसमाख्याता गता वैवस्यतेऽन्तरे। ऐते देवगण. सार्द्ध शिष्टा ये सान्निबोधत चत्वारिंशस्त्रयश्चैव भविष्यास्ते महात्मनः । अवशिष्टायुगाख्यास्ते ततोवैषस्यतोह्ययम् एतद्वः कीर्तितं सम्यक समासव्यासयोगतः । पुनर्यक्तुं बहुत्यात्तु न शक्यविस्तरेण तु उक्ता राजर्षयो येतु अतीतास्ते युगैः सह । ये ते ययातिवंश्यानां ये च वंशा विशाम्पते कीर्तिता द्युतिमन्तस्ते य एतान् धारयेन्नरः । लभते स घरानपञ्चदुर्लभानिहलौकिकान् आयुः कीर्ति धनं स्वर्ग पुत्रयांश्वाभिजायते । धारणाच्छयणाचैव परं स्वर्गस्य धीमतः इति श्रीमत्स्यपुराणे कली भाचिनृपान्ययकीर्तनफलवर्णनं नाम द्विसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः।
. त्रिसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः पोडशमहादानानांवर्णनम् । ऋपय ऊचुः। न्यायेनार्जनमर्थानां धर्द्धनञ्चाभिरक्षणम् । सत्पात्रप्रतिपत्तिश्च सर्वशास्त्रेषु पठ्यते ॥१॥ कृतकृत्योभवेत्केन मनस्वी धनवान् बुधः। महादानेन दत्तेन तन्नो विस्तरतो धद ॥२॥ सूत उघाच। अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानानुकीर्तनम् । दानधर्मेऽपि यन्नोक्तविष्णुनाप्रभविष्णुना तदहं सम्प्रक्ष्यामि महादानमनुत्तमम् । सर्वपापक्षयकरं नृणां दुःस्वप्ननाशनम् ॥ ४ ॥ यत्तत् पोड़शधा प्रोक्तं वासुदेवेन भूतले । पुण्यं पवित्रमायुष्यं सर्वपापहरं शुभम् ॥५॥ पूजित देवताभिश्च ब्रह्मविष्णुशिवादिभिः । आद्यन्तु सर्वदानानां तुलापुरुषसंज्ञकम् ॥ हिरण्यगर्भदानञ्च ब्रह्माण्डं तदनन्तरम् । कल्पपादपदानञ्च गोसहस्रञ्च पञ्चमम् ॥ ७ ॥ हिरण्यकामधेनुश्च हिरण्याश्वस्तथैव च । हिरण्याश्वरथस्तद्वत् हेमहस्तिरथस्तथा ॥८॥ पञ्चलाङ्गलकं तद्वद् धरादानं तथैव च । द्वादशं विश्वचक्रन्तु तत' कल्पलतात्मकम् ॥३॥ सप्तसागरदानश्च रत्नधेनुस्तथैव च । महाभूतघटस्तद्वत् पोड़शं परिकीर्तितम् ॥ १० ॥ सर्वाण्येतानि कृतवान् पुरा शम्वरसूदन । पासुदेवस्तु भगवान् अम्बरीपोऽथ भार्गवः कार्तवीर्यार्जुनोनाम प्रहादः पृथुरेव च । कुर्युरन्येमहीपालाः केचिच्च भरतादयः ॥१२॥ यस्माद्विघ्नसहस्रेण महादानानि सर्वदा । रक्षन्तेदेवता सर्वा एकैकमपि भूतले ॥१३॥ एषामन्यतमं कुर्याद्वासुदेव प्रसादतः । न शक्पमन्यथा कर्तुमपि शक्रेण भूतले ॥१४॥ तस्मादाराध्य गोविन्दमुमापतिविनायको । महादानमखं कुर्याद्विप्रेश्चैवानुमोदितः ॥ एतदेवाह मनवे परिपृष्टो जनार्दनः । यथावदनुवक्ष्यामि शृणुध्वमृषिसत्तमाः! ॥१६॥ मनुरुवाच। महादानानि यानीह पवित्राणि शुभानि च । रहस्यानि प्रदेयानि तानि मे कथयाव्युत॥
ऽध्यायः ] -2----
* तुलापुरुपमहादानविधिवर्णनम् *
मत्स्य उवाच
यानि नोकानि गुह्यानि महादानानि पोडश । तानि ते कथयिष्यामि यथावदनुपूर्वश
तुलापुरुषयागोऽयं येषामादौ विधीयते । अयने विषुवे पुण्ये व्यतीपाते दिनक्षये ॥१६॥
युगादिपु परागेपु तथा मन्यन्तरादिषु । सक्रान्ती तोवैधृतिदिने चतुर्दश्यष्टमीषु च
सितपञ्चदशीपर्व द्वादशीप्यटकासु च । यज्ञोत्सव विवाहेपुटुः स्वप्नाभुतदर्शने ॥२॥
द्रव्यग्राह्मणलामे या श्रद्धा घा यत्र जायते । तीर्थ वायतने गोष्ठे कृपारामसरित्सु व
गृहे वायतने चापि तडागे रुविर तथा । महादानानि देयानि ससारभयभीरणा ॥२३
अनित्यं जीवितयस्मात् वसुचातीय चञ्चलम् । केशेप्पेवगृहीत सन्मृत्युनाधर्ममावरेत्
पुण्या तिथिमथासाद्य कृत्या ब्राह्मणवाचनम् । पोटशारनिमात्रन्तु दशद्वादशवाकरान्
मण्डप कारयेविहान चतुर्भद्रासनं बुध । सप्तहस्ता भोटेदी मध्येपञ्चकरा तथा ॥२६
तन्मध्ये तोरण कुर्यात् सारदारमय बुध ।
कुर्यात् कुण्डानि चत्वारि चतुदिक्षु विचक्षण ॥२७॥
समेखलायोनियुतानि कुर्यात् सम्पूर्णकुम्भानि सहासनानि ।
सुताम्रपानद्वयसंयुतानि सयज्ञपात्राणि सुविष्टराणि ॥ २८ ॥
हस्तप्रमाणानि तिलाज्यधूपपुष्पोपहाराणि सुशोमनानि ।
पूर्वोत्तरे हस्तमिताऽथ येदी ग्रहादिदेवेश्वरपूजनाय ॥ २६ ॥
अवार्चन ब्रह्मशिवाच्युताना तच काय्यं फलमाल्यवस्ने ।
लोकेशवर्णा. परित पताका मध्ये वज किङ्किणिकायुत स्यात् ॥३०॥
द्वारपु कार्याणि व तोरणानि नत्वार्यपि क्षीरवनस्पतीनाम् ।
द्वारेषु कुम्भहयमत्रकाय्यं प्रगगन्धधृपाम्बररत्नयुक्तम् ।। ३६ ॥
शालेगुदीचन्दनदेवदारश्रीपणिविल्वप्रियकाञ्चनोत्थम् ।
स्तम्भय हस्तयुगायपात हत्या दृढ़ पाकरोच्छ्रितच ॥ ३२॥
तदन्तरं इस्तचतुष्टयं स्यादयोदरच तदङ्गमेव ।
समानजातिध तुलावलाया हैमेन मध्ये पुरुषेण युक्ता ॥ ३३॥
* मत्स्यपुराणम् * [त्रिसप्तत्यधिकद्विशततम दैर्येण सा हस्तचतुष्टयं स्यात् पृथुत्वमस्यास्तु दशांगुलानि । सुवर्णपट्टाभरणा तु कार्या सा लोहपाशद्वयश्रङ्खलाभिः ॥३४॥ युता सुवर्णेन तु रत्नमाला विभूषितामाल्यविलेपनाभ्याम् । चक्रं लिखेद्वारिजगर्भयुक्तं नानारजोभि विपुष्पकीर्णम् ॥ ३५ ॥ विमानकञ्चोपरि पञ्चवर्ण संस्थापयेत् पुष्पफलोपशोभम् । अथत्विजो वेदविदश्च कार्याः सुरूपरेशान्वयशीलयुक्ताः ॥ ३६ ॥ विधानदक्षाः पटयोऽनुकूला ये चार्यदेशप्रभवा द्विजेन्द्राः । गुरुश्च वेदान्तविदार्यवंश समुद्भवः शीलकुलाभिरूपः ।। ३७ ॥ पुराणशास्त्राभिरतोऽतिदक्षः प्रसन्नगम्भीरसरस्वतीकः । सिताम्बर' कुण्डलहेमसूत्रकेयूरकण्ठाभरणाभिरामः ॥ ३८ ॥ पूर्वेण ऋग्वेदविदायथास्तां यजुर्चिदी दक्षिणतश्च शस्तौ । स्थाप्यो हिजो सामविदौ तु पश्चादाथर्वणावुत्तरतस्तु कार्यों ||३६ ।। विनायकादिग्रहलोकपालवस्वष्टकादित्यमरुद्गणानाम् । ब्रह्माच्युतेशार्कवनस्पतीनां स्वमन्त्रतो होमचतुण्यं स्यात् ॥ ४० ॥ जप्यानि सूक्तानि तथैव चैषामनुक्रमेणापि यथा स्वरूपम् । होमावसाने कृततूर्यनादो गुरु हीत्या बलिपुप्पधूपम् । आवाहयेल्लोकपतीन् क्रमेण मन्त्रैरमीभिर्यजमानयुक्तः ॥ ४१ ॥ पाँहि सर्वामरसिद्धसाध्यैरभिष्टुतो चनधरोऽमरेश । संवीज्यमानोऽप्सरसाङ्गणेन रक्षा चरन्नो भगवन्नमस्ते ॥ ४२ ॥ एह्येहि सर्वामरहव्यवाह ! मुनिप्रवीरैरभितोऽभिजुष्टः । तेजस्विता लोकगणेन साद्धं ममाध्वरं रक्ष कवे! नमस्ते ॥ ४३ ।। एह्यहि वैवस्वत धर्मराज ! सर्वामरैरवितदिव्यमूर्ते ! । शुभाशुभानन्दशुचामधीश! शिवाय नः पाहि मखं नमस्ते ॥४४॥ एहि रक्षोगणनायकस्त्वं सर्वंस्तु वेतालपिशाचसङ्घः ।
ध्यायः] * तुलापुरुषमहादानविधिवर्णनम् * ममाध्वरं पाहि शुभादिनाथ ! लोकेश्वरस्त्वं भगवन्नमस्ते ॥ ४५ ॥ पोहि यादोगणवारिधीनाङ्गणेन् पर्जन्यमहाप्सरोभिः । विद्याधरेन्द्रामरगीयमान ! पाहि त्वमरमान भगवन्नमस्ते ॥ ४६ ॥ एोहि यज्ञे मम रक्षणाय मृगाधिरूढः महसिद्धसङ्खः । प्राणाधिपः कालकवेः सहायः गृहाण पूजां भगवन्नमस्ते ॥४७॥ पोहि यज्ञेश्वर! यज्ञरक्षा विधत्स्व नक्षत्रगणेन सार्द्धम् । सौ पधीमिः पितृभिः सहेष गृहाण पूजां भगवन्नमस्ते ॥ १८ ॥ पोहि विश्वेश्वर! नस्त्रिभालकपालखट्वाङ्गधरेण सार्द्धम् । लोकेशयज्ञेश्वर यशसिद्ध्यै गृहाण पूजां भगवन्नमस्ते ॥ १६ ॥ पहोहि पातालधराधरेन्द्र ! नागाङ्गनाकिन्नरगीयमान!। यक्षोरगेन्द्रामरलोकसार्द्धमनन्त ! रक्षाध्वरमस्मदीयम् ॥ ५० ॥ एहोहि विश्वाधिपते ! मुनीन्द्र ! लोकेन साद्धं पितृदेवताभिः । सर्वस्य धातास्यमितप्रभाव विशाध्वरन्नो भगवन्नमस्ते ॥ ५५ ॥ त्रैलोक्ये यानि भूतानि स्थायराणिवराणिच। ब्रह्मविष्णुशिवः सार्धं रक्षांकुर्वन्तुतानिमे देवदानवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगा: 1 ऋषयो मनधोगावो देवमातर एव च ॥ ५३ ॥ सर्वे ममायरे रक्षांप्रकुर्यन्तु मुदान्विताः । इत्याबाह्य मुरान्दद्यादृत्विग्भ्योहेमभूपणम्॥ कुण्डलानिच हैमानि सूत्राणि फटकानिच । अंगुलीयपयित्राणि धासांसिशयनानिच ॥ द्विगुणं गुरवे दद्याभूषणाच्छादनानिच । जपेयुः शान्तिकाध्यायं जापका सर्वतोदिशम् तनोपितास्तु ते सर्वे कृत्वैवमधिवासनम् । श्रादायन्तेच मध्येवाग्राह्मणवाचनम् ततो मङ्गलशन्देन स्तापितो वेदपुगः । त्रिः प्रदक्षिणमावृत्य गृहीतकुसुमाञ्जलिः॥५८॥ शुझमाल्याम्बरोभून्या तो तुलाममिमन्त्रयेत् । नमस्तेसर्वदेवानांशक्तिस्त्वंसत्यमाथिता साक्षिभूता जगद्धात्री निर्मिता विश्वयोनिना । एकतः सर्वसत्यानित्थानृतशतानिव ।। धर्माधर्मरता मध्ये स्थापितासि जगद्धिते। त्वं तुले! सर्वभूतानां प्रमाणमिह कीर्तिता मा तोलयन्ती संसारादुक्षरस्य नमोऽस्तुते । योऽसौतन्चाधिपोदेव पुरुष.पञ्चविंशकः।
ឪខ * मत्स्यपुराणम् * [त्रिसप्तत्यधिकद्विशततमो स एकोऽधिष्ठितो देवि! त्वयि तस्मान्नमोनमः । नमोनमस्ते गोविन्द! तुलापुरुषसंज्ञक त्वं हरे ! तारयस्वास्मान्नस्मात् संसारकर्दमात् । पुण्यकालं समासाद्य कृत्वैधमधिवासनम् ॥ ६४ ॥ पुनः प्रदक्षिणां कृत्वा तुलामारोहयेद् युधः । स खड्गवर्मकवच सर्वाभरणभूपित. ॥६५॥ धर्मराजमथादाय हैम सूपेण संयुतम् । कराभ्यां बद्धमुष्टिभ्यामास्ते पश्यन् हरेर्मुखम् । ततोऽपरे तुलाभागे न्यसेयुद्धिजपुङ्गवाः । समादभ्यधिकं यावत् काञ्चनं चातिनिर्मलम् पुष्टिकामस्तु कुर्वीत भूमिसंस्थ नरेश्वर । क्षणमात्रं ततः स्थित्वा पुनरेवमुदीरयेत् ॥ नमस्ते सर्वभूताना साक्षिभूने ! सनातनि !। पितामहेन देवि ! त्वं निर्मिता परमेष्टिना ॥६६॥ त्वया धृत जगत्सवं सहस्थावरजङ्गमम् । सर्वभूतात्मभूतस्थे ! नमस्ते विश्वधारिणि! ततोऽवतीर्य गुरवे पूर्वमद्धं निवेदयेत् । ऋत्विाभ्यो परमर्धन्तु दद्यादुदकपूर्वकम् ॥७१।। गुरवे ग्रामरत्नानि ऋत्विाभ्यश्च निवेदयेत् । प्राप्य तेषामनुज्ञातु तथान्येभ्योऽपिदापयेत् दीनानाथविशिष्टादीन् पूजयेद्बाह्मणै सह । नचिरं धारयेद्गेहे सुवर्ण प्रोक्षितं वुधः ॥ तिठेद्भयावहं यस्माच्छोकव्याधिकरं नृणाम् | शीघ्र परस्वीकरणाच्छ यः प्राप्नोति मानवः ॥ ७४ ॥ अनेन विधिना यस्तु तुलापुरुषमावरेत् । प्रतिलोकाधिपस्थाने प्रतिमन्वन्तरं वसेत् ॥ विमानेनार्कवर्णन किङ्किणीजालमालिना । पूज्यमानोऽप्सरोभिश्च ततोविष्णुपुरंब्रजेत् कल्पकोटिशतं यावत्तस्मिन् लोके महीयते ॥ ७६ ॥ कर्मक्षयादिह पुनर्भुवि राजराजो भूपालमौलिमणिरक्षितपादपीठ । श्रद्धान्वितो भवति यशसहस्रयाजी दीप्तप्रतापजितसर्वमहीपलोकः ॥ ७७ ॥ यो दीयमानमपि पश्यति भक्तियुक्त कालान्तरे स्मरति घाचयतीह लोके ।। यो पा शृणोति पठतीन्द्रसमानरूपः प्राप्नोति धाम सपुरन्दरदेवजुष्टम् ॥७॥ इतिश्रीमत्स्यपुराणे तुलापुरयमहादानविधिवर्णनं नाम त्रिसनत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
चतुःसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
हिरण्यगर्भाख्यमहादानविधिवर्णनम् ।
मत्स्य उपाय।
अथात सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम् । नाग्ना हिरण्यगर्भारयंमहापातकनाशनम् ॥
पुण्यं दिनमथासाद्य तुलापुरुषटानवत् । ऋत्विग्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनाटिकम् ॥
कुर्य्यादुपोषितस्तल्लोफेशावाहनं बुधः । पुण्याहवाचनं कृत्वा तद्वत् कृत्याधिवासनम्
ब्राह्मणैरानयेत्कुम्भं तपनीयमयं शुभम् । द्विसप्तत्यंगुलोच्छ्रायं हेमपङ्कजगर्भवत् ॥ ४॥
विभागहीनविस्तारमाज्यक्षीराभिपूरितम् ।
दशाखाणि च रत्नानि दात्री सूची तथैव च ॥५॥
हेमनालं सपिठक यहिपदित्यसंयुतम् । तथैवावरणं नामेरपवीतञ्च फाञ्चनम् ॥ ६ ॥
पावंत म्थापयेत्तद्वत् हैमदण्डकमण्डलू । पद्माकारंपिधानस्यात्समन्तादंगुलाधिकम्
मुक्तावलीसमोपेतं पारागसमन्वितम् । तिलद्रोणोपरिगतं येदिमध्ये व्यवस्थितम् ॥८॥
ततो मङ्गलशब्देन ब्रह्मयोपरवेण च । साँपध्युदकस्नानस्नापितो चेदपुङ्गवै ॥ ६॥
शुरुमाल्याम्बरधरः सर्वाभरणभूषित । इममुद्यारयेन्मन्त्रं गृहीतकुसुमाञ्जलि ॥१०॥
नमोहिरण्यगर्भाय हिरण्यक्यचाय च । सतलोकसुराध्यक्ष जगद्धाने नमोनमः ॥१२॥
भूलॊकप्रमुखा लोकास्तयगर्ने व्यवस्थिता.।
प्रासादयस्तथा देया नमस्ते विश्वधारिणे ॥ १२ ॥
नमस्ने भुवनाधार ! नमस्ते भुवनाश्रय ! । नमो हिरण्यगर्भाय गर्ने यस्य पितामहः ।।
यतम्त्यमेव भूतात्मा भूतेभूते व्यवस्थितः । तस्मान्मामुद्धराशेषदुःपसंसारसागरात् ॥
पयमामन्य तन्मध्यमाविश्यास्त उदमुगः । मुष्टिभ्यो परिमंगृह्य धर्मराजचतुर्मुगाँ
आनुमध्ये शिर एत्या तिछेदुच्छ्यासपञ्चकम् ।
गर्भाधान सपनं सीमन्तोन्नयनं तथा ॥ १६॥
७६६ * मत्स्यपुराणम् * [चतुःसप्तत्यधिकद्विशततमो कुहिरण्यगर्भस्य ततस्ते द्विजपुङ्गयाः । गीतमङ्गलघोपेण गुरुरुत्थापयेत्ततः ।। १७ ॥ जातकर्मादिकाः कुर्युः क्रियाः पोडश चापराः । सूच्यादिकञ्च गुरवे दद्यान् मन्त्रमिमं जपेत् ॥ १८ ॥ नमो हिरण्यगर्भाय विश्वगर्भाय वै नमः । चराचरस्य जगतो गृहभूताय वे नमः ॥१६॥ यथाहं जनित. 'पूर्व मर्त्यधर्मा सुरोत्तम ! त्वद्गर्भसम्भवादेपदिव्यदेहो भवाम्यहम् । चतुर्भिः कलशैर्भूयः ततस्ते द्विजपुङ्गचा. । स्नापयेयुः प्रसन्नागाः सर्वाभरणभूषिताः ।। देचस्यत्वेति मन्त्रेण स्थितस्य कनकासने । अद्य जातस्यतेऽङ्गानि अभिपेक्ष्यामहे वयम् ॥ २२ ॥ दिव्येनानेन वपुषा विरं जीव सुखी भव । ततो हिरण्यगर्भ तन्तेभ्यो दद्याद्विचक्षणः ॥ पूज्याः सर्वभावेन चहयो वा तदाज्ञया । तत्रोपकरणं सर्व गुरवे विनिवेदयेत् ॥२४ पादुकोपानहच्छत्रचामरासनभाजनम् । ग्रामं वा विपयं चापि यदन्यदपि सम्भवेत् ॥ अनेन विधिना यस्तु पुण्येऽहनि निवेदयेत् । हिरण्यगर्भदानं स ब्रह्मलोके महीयते॥२६॥ पुरेपु लोकपालाना प्रतिमन्वन्तरं वसेत् । कल्पकोटिशतं यावद् ब्रह्मलोके महीयते ॥ २७ ॥ कलि कलुपविमुक्तः पूजित. लिद्धसाध्यैरमरचमरमालावोज्यमानोप्सरोभिः । पितशतमथ वन्धून पुत्रपौत्रान् प्रपौत्रान् अपि नरकनिमग्नांस्तारयेदेक एव ॥ २८ ॥ इति पठति य इत्थं यःणोतीह सम्यक् मधुरिपुरिच लोके पूज्यते सोऽपि सिद्धः । मतिमपि च जनानां यो ददाति प्रियार्थ विवुधपतिजनानां नायकः स्यादमोघम् ॥२६॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे हिरण्यगर्भाख्यमहादानविधिवर्णनं नाम चतुःसप्तत्यधिकद्विशततमोध्यायः ।
पञ्चसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
ब्रह्माण्डमहादानविधिवर्णनम् ।
मत्स्यउवाब।
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि ब्रह्माण्डविधिमुत्तमम् ।
यच्छ्रेष्ठं सर्वदानानां महापातकनाशनम् ॥ १ ॥
पुण्यं दिनमथालाद्य तुलापुरुषदानवत् ।
ऋऋत्विग्मण्डपसम्भारभूपणाच्छादनादिकम् ॥ २॥
लोकेशावाहनं कुर्य्यादधिवासनकं तथा । कुर्यादिशपलादूर्द्धमासहस्राच्च शक्तितः ॥
फलशद्वयसंयुक्तं ब्रह्माण्डं काञ्चनं बुधः । दिग्गनाटफसंयुक्तं पड्वेदाङ्गसमन्वितम् ॥
लोकपालाटकोपेतं मध्यस्थितचतुर्मुसम् । शियाच्युतार्कशिपरमुमालक्ष्मीसमन्वितम्॥
पस्यादित्यमरदम महारत्नसमन्वितम् । वितस्तेरंगुलशतं यावदायामविस्तरम् ॥ ६ ॥
फौशेययनसम्पीतं तिलद्रोणोपरि न्यसेत् ।
तथाप्टादश धान्यानि समन्तात्परिकल्पयेत् ॥७॥
पूर्वेणानन्तशयनं प्रद्युम्नं पूर्वदक्षिणे । प्रति दक्षिणे देशे सङ्कर्षणमत.परम् ॥ ८ ॥
पश्चिमे चतुरो घेदाननिरन्द्धमतःपरम् । अग्निमुत्तरतो हेमं घासुदेवमत परम् ॥ ६ ॥
समन्ताद गुड़पीठस्थानत्रयेत् फायनान् युध ।
स्थापयेस्त्रसम्पीतान् पूर्णकुम्मान् दशेष नु ॥ १० ॥
दर्शय धेनयो देयाः सहमाम्यरदोहनाः ।
पादुफोपानइच्छत्रचामरासनदर्पणः । भक्ष्यमोग्यान्नदीपेनुफलमाल्यानुलेपनः ॥२४॥
होमाधियासनान्ते घ म्नापितो येदपुगये । हममुन्यारयन्मन्त्रं त्रिः पृत्याय प्रदक्षिणम्
नमोऽस्नु पियोधर! पिश्यधाम ! जगत्सपिरे भगवन्नमस्त।
मापिलोपामरभूतन्श! गर्भग साधं पितरामिरक्षाम् ॥2॥
* मत्स्यपुराणम् * [पट्सप्तत्यधिकद्विशततमो ये दुखितास्ते सुखिनो भवन्तु प्रयान्तु पापानि चराचराणाम् । त्वद्दानशस्त्राहतपातकाना ब्रह्माण्डदोप प्रलय व्रजन्तु ॥ १४ ॥ एच प्रणम्यामरविश्वगभं दद्याद द्विजेभ्यो दशधा विभज्य । भागद्वय तत्र गुरो प्रकल्प्य सम भजेच्छेपमनुक्रमेण ।। १५ ।। स्वल्पे च होम गुरक एव कुर्य्यादथैकाग्निविधानयुक्त्या । स एव सम्पूज्यतमोऽत्पवित्ते यथोक्तवस्त्राभरणादिकेन ॥ १६ ॥ इत्थ य एतदखिल पुरपोऽत्र कुर्याद् ब्रह्माण्डदानमधिगम्य महद्विमानम् । निधूतकल्मषविशुद्धतनुर्मुरारेरानन्दकृत्पदमुपैति सहाप्सरोभि ॥ १७ ॥ सन्तारयेत् पितृपितामहपुत्रपौत्रवधुप्रियातिथिकलत्रशताप्रक स । ब्रह्माण्डदानशकलीकृतपातकोघमानन्दयेच्च जननीकुल्मप्यशेषम् ॥ १८ ॥ इति पठति शृणोति घा य एतन् सुरभवनेषु गृहेषु धार्मिकाणाम् । मतिमपि च ददाति मोदतेऽसावमरपतेर्भवने सहाप्सरोमि ॥१६॥ इतिश्रीमत्स्यपुराणे ब्रह्माण्डमहादानविधिवर्णन नाम पञ्चसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय पट्सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः कल्पपादपमहादानविधिवर्णनम् । मत्स्य उवाच। कल्पपादपदानारयमत परमनुत्तमम् । महादान प्रघक्ष्यामि सर्वपातकनाशनम् ॥ १॥ पुण्य दिनमथासाद्य तुलापुरपदानवत् । पुण्याहवाचन हत्या लोकेशायाहन तथा ॥२॥ ऋत्विग्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् । काञ्चन कारयेत् वृक्ष नानाफल्समन्वितम् ॥३॥ नानाविहगवस्त्राणि भूषणानि व कारयेत् । शक्तिस्त्रिपलादूर्ध्वमासहस्र प्रकरपयेत् ऽध्यायः] * कल्पपादपमहादानविधिवर्णनम् । ७६६ मर्धयलप्तसुवर्णस्य कारयेत्कल्पपादपम् । गुद्धप्रस्थोपरिधाच्च सितवस्त्रयुगान्वितम् ब्रह्मविष्णुशियोपेतं पञ्चशाख सभास्करम् । कामदेवमधस्ताच्च सफलत्रं प्रकल्पयेत् ॥ सन्तानं पूर्वतस्तद्वत्तुरीयांशेन कल्पयेत् । मन्दारं दक्षिणे पायें श्रिया साधं घृतोपरि ॥ पश्चिमे पारिजातन्तु साविघ्या सह जीरके । सुरभीसंयुतं तद्वत्तिलेषु हरिचन्दनम् ॥८॥ तुरीयांशेन कुचीत सौम्येन फलसंयुतम् । कौशेरावस्त्रसम्वीतानिक्षुमाल्यफलान्वितान् ॥ ६ ॥ तथाप्टो पूर्णकलशान् पादुकासनभाजनम् । दीपिकोपानहच्छत्रचामरासनसंयुतम् ॥१० फलमाल्ययुत तद्वदुपरिपात् वितानकम् । तथाप्टादशधान्यानि समन्तात् परिकल्पयेत् होमाधिवासनान्ते च नापितो वेदपुड्नच. । त्रि. प्रदक्षिणमावृत्य मन्त्रमेतमुदीरयेत् ॥ नमस्ते कल्पवृक्षाय चिन्तितार्थ प्रदायिने । विश्वम्भराय देवाय नमस्ते विश्वमूर्तये यस्मात् त्वमेव विश्वात्मा ब्रह्मा स्थाणुर्दिवाकर । मूर्तोऽमूर्त पर बीजमत. पाहि सनातन ! ॥ १४ ॥ त्वमेवामृतसर्वस्वमनन्तः पुरषोऽव्ययः । सन्तानावैरपेतास्मान् पाहि संसारसागरात् एयमामन्त्र्य त दद्यात्गुरवेकल्पपादपम् । चतुर्व्यश्वाथऋत्विग्भ्यासन्तानादीनप्रकल्पयेत् स्वरूपे त्वेकाग्निवत् कुर्यात् गुरवे चामिपूजनम् । न वित्तशाठ्यं कुर्वीत न च विस्मयवान् भवेत् ॥ १७ ॥ अनेन विधिना यस्तु महादानं निवेदयेत् । सर्वपापविनिर्मुक्त सोऽश्वमेधफलं लभेत् ।। यप्सरोमि परिवृतःसिद्धवारणकिन्नरः। भूतान् भाव्यांश्चमनुजांस्तारयेत् गोनसंयुतान्।। स्तूयमानो दिघः पृष्ठे पितृपुत्रप्रपौत्रकान् । विमानेनार्कवर्णेन विष्णुलोकं स गच्छति॥ दिवि फल्पशतं तिष्ठेत् राजराजो भवेत्ततः । नारायणवलोपेतो नारायणपरायणः ॥२० नारायणकथासक्तो नारायणपुरं व्रजेत् ॥ २१ ॥ यो चा पठेत्सकलकल्पनर प्रदान यो पा शृणोति पुरषोऽल्पधनम्मरेद्वा । सोऽपीन्द्रलोकमधिगम्य सहाप्सरोमिर्मन्वन्तरं घसति पापविमुक्तदेहः ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे कल्पपादपमहादानविधिवर्णनं नाम पटसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः।
सप्तसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
गोसहस्रप्रदानाख्य-महादान विधिवर्णनम् ।
मत्स्य उचाव।
अथात' सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम् । गोसहनप्रदानारयं सर्वपापहरं परम् ॥१॥
पुण्यां तिथिं समासाद्य युगमन्वन्तरादिकीम् । पयोवतंत्रिरात्रस्यादेकरात्रमथापि पा
लोकेशाचाहनं कुर्यात् तुलापुरुषदानयत् । पुण्याहवाचनं कुर्याद्धोमः कार्यस्तथैव च ।
गोसहस्रं बहिः कुर्याहस्त्रमाल्यविभूपणम् । सुपर्णङ्गाभरणं रौप्यपादसमन्वितम् ॥४॥
अन्तः प्रवेश्य दशकंवस्त्रमाल्यैश्च पूजयेत् । सुवर्णघण्टिकायुक्तं फांस्यदोहनकान्वितम्
सुवर्ण तिलकोपेतं हेमपट्टरलङ्कृतम् । कोशेयवस्त्रसम्धीतं माल्यगन्धसमन्वितम् ॥ ६ ॥
हेमरत्नमयः शृङ्गेश्चामरैरपशोभितम् । पादुकोपानहच्छत्रभाजनासनसंयुतम् ॥ ७ ॥
गवां दशक मध्येस्यात् फाञ्चनो नन्दिकेश्वरः ।
कौशेयवस्त्रसम्घीतो नानाभरणभूषित. ॥ ८॥
लवणद्रोणशिसरे माल्येक्षुफलसंयुत । कुर्यात् पलशतादृदुध्वं सर्वमेतदशेषतः ॥ ६ ॥
शक्तित पलसाहस्रत्रितयं यावदेव तु । गोशतेऽपि दशांशेन सर्वमेतत्समाचरेत् ॥१०॥
पुण्यकालं समासाद्य गीतमङ्गलनि स्पन. । सर्वोपध्युदकस्नानस्नापितो वेदपुगवे. ॥११
इममुच्चारयेन्मन्त्रं गृहीतकुसुमाञ्जलि. 1 नमोऽस्तु विश्वमूर्तिभ्यो विश्वमातृभ्य एव च
लोकाधिवासिनीभ्यश्चरोहिणीभ्योनमोनमः । गवामङ्गेपुतिष्ठन्ति भुवनान्येकविंशतिः ॥
ब्रह्मादयस्तथादेवा रोहिण्य.पान्तु मातरः । गावो मे अग्रत. सन्तुगायः पृष्ठत एव च ॥
गावः शिरसि मे नित्यं गवांमध्ये वसाम्यहम् । यस्मात्त्वं वृषरूपेण धर्म एच सनातनः
अष्टमूर्तरधिष्ठानमत पाहि सनातन !! इत्यामन्य ततो दद्याद् गुरवे नन्दिकेश्वरम् ॥१६॥
सर्वोपकरणोपेतं गोयुतञ्च विचक्षण । ऋत्विग्भ्यो धेनुमेकैकां दशकाद्विनिवेदयेत् ॥
गवाञ्च शतमेकैकं तद घाथ विंशतिम् । दश पञ्चाय या दद्यादन्येभ्यस्तदनुज्ञया ॥१८॥
ऽध्यायः] * कामधेनुमहादानविधिवर्णनम् * ७७१ नैका बहुभ्यो दातव्या यतो दोपकरी भवेत् । वयश्चैकस्य दातव्या धीमतारोग्यवृद्धये ॥ १६ ।। पयोवतः पुनस्तिप्ठेदेकाहं गोसहस्रदः । श्रावयेन्छृणुयाद्वापि महादानानुकोर्तनम् ॥२० तदिने ब्रह्मवारी स्यात् यदीच्छेद्विपुलांश्रियम् । अनेन विधिनायस्तु गोसहम्मदोभवेत् सर्वपाप विनिर्मुक्तः सिद्धचारणसेवितः ॥ २१ ॥ विमानेनार्कवर्णन किङ्किणीजालमालिना । सर्वेषां लोकपालानां लोके संपूज्यतेऽमरैः प्रतिमन्यन्तरं तिष्ठेत्पुत्रपौत्रसमन्धितः । सतलोकानतिक्रम्य ततः शिवपुरं व्रजेत् ॥२३॥ शतमेकोत्तरन्तपितॄणां तारयेद्बुधः । मातामहानां तद्वय पुत्रपौत्रसमन्वितः ॥ यावत्कल्पशतन्तिछेदाजराजो भवेत् पुनः ॥ २४ ॥ अश्वमेधशतं कुर्याच्छियध्यानपरायणः । वैष्णवं योगमास्थाय ततो मुच्येत बन्धनात् पितरश्चाभिनन्दन्तिगोसहनप्रदं सुतम् । अपिस्यात्स कुलेऽस्माकं पुत्रो दौहित्रपव पा गोसहस्रप्रदो भूत्वा नरकादुद्धरिष्यति ॥ २६ ॥ तस्य कर्मकरी पा स्यादपिष्टातथैव च । संसारसागरादस्माद्योऽस्मानसन्तारयिष्यति इति पठति य एतत् गोसहनप्रदानं सुरभुवनमुपेयात् संस्मरेद्वाथ पश्येत् । अनुभवति मुदं चामुच्यमानो निकामं महतकलुपदेहःलोऽपि यातीन्द्रलोकम् ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे गोसहस्रात्य महादान विधिवर्णनं नाम सप्तसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः। अष्टसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः कामधेनुमहादानविधिवर्णनम् । मत्स्य उवाच। अधातः सम्मयश्यामि फामधेनुविधि परम् । सर्वकामप्रदं नृणां महापातम्नाशनम् ॥ लोकेशायाहनं तद्वद्धोमः कार्योऽधियासनम् ।
७७२ * मत्स्यपुराणम् * [अष्टसप्तत्यधिकद्विशततमो तुलापुरुपयत्कुर्यात् कुण्डमण्डपवेदिकम् ॥ २॥ स्वल्पेत्वेकाग्निचत्कुर्यात् गुरुरेकः समाहितः । काञ्चनस्यातिशुद्धस्यधेनुवत्सञ्चकारयेत् उत्तमा पलसाहस्री तदर्धेन तु मध्यमा । कनीयसी तदर्धन कामधेनुः प्रकीर्तिताः ॥४॥ शक्तितरित्रपलादूर्द्धमशक्तोऽपीह फारयेत् । घेद्यां कृष्णाजिनं न्यस्यगुडप्रस्थसमन्वितम् न्यसेदुपरि तां धेनुं महारतरलताम् । कुम्भारकसमोपेतां नानाफलसमन्विताम् तथाप्टादश धान्यानि समन्तात्परिकल्पयेत् । इक्षुदण्डाएकं तद्वन्नानाफल समन्वितम् । भाजनचासनं तद्वत्ताम्रदोहनकन्तथा ॥ ७॥ कौशेयवस्त्रद्वयसंयुताहां दीपातपत्राभरणाभिरामाम् । सचामरां कुण्डलिनी सघण्टा सुवर्णशृङ्गी परिरूप्यपादाम् ॥ ८॥ रसश्च सर्वैः परितोऽभिन्नुष्टां हरिद्रया पुष्पफलैरनेकैः । अजाजिकुस्तुम्बुरुशर्करादिभिर्वितानकञ्चोपरि पञ्चवर्णम् ॥ ६ ॥ स्नातस्ततोमङ्गलवेयोपैः प्रदक्षिणीकृत्य सपुष्पहस्तः । आवाहयेत्तां गुरुणोक्तमन्त्रविजाय दद्यादथ दर्भपाणिः ॥ १०॥ त्वं सर्वदेवगणमन्दिरमङ्गभूता विश्वेश्वरित्रिपथगोदधिपर्वतानाम् । त्वदानशस्त्रशकलीकृतपापकौधः प्राप्तोऽस्मि नितिमतीव परां नमामि ।। लोके यथेप्सितफलार्थविधायिनी त्यामासाद्य को हि भुवि दुःखमुपैति मर्त्यः संसारदुःखशमनाय यतस्व कामं त्वां कामधेनुमिति देवगणा वदन्ति ।। आमन्व्य शीलकुलरूपगुणान्विताय विप्राय यः कनकधेनुमिमां प्रदद्यात् । प्राप्नोति धाम स पुरन्दरदेवजुष्टं कन्यागणः परिवृतः (पदमिन्दुमीले ॥१३॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे कामधेनुमहादानविधिवर्णनं नामा- टसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः।
ऊनाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः हिरपाश्चमहादानविधिवर्णनम् । मत्स्य उवाच। अथात सप्रवक्ष्यामि हिरण्याश्यविधि परम् । यस्य प्रदानादभुवने वानन्त्य फलमभुते पुण्या तिथिमथासाद्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् । लोकेशावाहन कुर्यात्तुलापुरपदानवत् ऋत्विकमण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् । स्वल्पे त्वेकाग्निवत् कुर्याद्धेमवाजिमखम्बुध ॥ ३ ॥ स्थापयेवेदिम ये तु कृष्णाजिनतिलोपरि । कोशेषवस्त्रसम्वोत कारयेन्हेमवाजिनम् ॥ शतितस्त्रिपलाडूमासहस्पलाद बुध । पादुकोपानहच्छत्रचामरासतभाजन ॥५॥ पूर्णकुम्माष्टकोपेत माल्ये सुफलसयुतम् । शय्या सोपस्करा तद्वत्हेममार्तण्डसयुताम् तत सर्वोपधीमाननापितो द्विजपुङ्गवै । इममुच्चारयेन्मन्त्र गृहीतकुसुमाञ्जलि ॥ ७॥ नमस्ते सर्वदेवेश! वेदाहरणलम्पट ' । पाजिरूपेण मामस्मात्पाहि ससारसागरात् ॥ त्वमेव सप्तधाभूत्वा छन्दोरूपेण भास्कर । यस्माद्भासयसेलोकानत पाहि सनातन एयमुच्चार्य गुरवे तमश्व विनिवेदयेत्। दत्या पापक्षयाद्धानोलोकमभ्येति शाश्वतम् ॥ १० ॥ गोभिर्विभवत सर्वान्नृत्विजश्चापि पूजयेत् । सर्पधान्योपकरण गुरवे विनिवेदयेत् ॥ सर्व शय्यादिक दत्वा भुञ्जीतातलमेव हि । पुराणश्रवण तहत् कारयेद् भोजनादिकम् ॥ १२ ॥ इम हिरण्याश्यविधिं करोति य सपूज्यमानो दिवि देवसदै । विमुक्तपाप स पुर मुरारे प्राप्नोति सिद्धरभिपूजित सन् ॥ १३ ॥ इति पठति य एतद्धेमवाजिप्रदान सकरकलुपमुक्त सोऽश्यमेधेन युक्त । कनकमयविमानेनार्कलोक प्रयाति त्रिदशपतियधूमि पूज्यते योऽभिपश्येत् ॥१५॥ यो या शृणोति पुरुषोऽल्पधन स्मरेद्वा हेमाश्यदानमभिनन्दयतीह लोके । सोऽपि प्रयाति हतकल्मपशुद्धदेह स्थान पुरन्दरमहेश्वरदेवनुष्टम् ॥ १५ ॥ इति धीमत्स्यपुराणे हिरण्याश्वमहादानविधिवर्णननामोनाशोत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
अशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
अश्वरथाख्यमहादानविधिवर्णनम् ।
मत्स्य उवाच।
अथातः संप्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम् । पुण्यमश्वरथं नाम महापातकनाशनम् ॥१॥
पुण्यं दिनमथासाद्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् ।
लोकेशावाहनं कुर्यात्तुलापुरुपदानवत्॥२॥
ऋत्विक्मण्डपसम्भारभूपणाच्छादनादिकम् ।
कृष्णाजिने तिलान् कृत्वा काञ्चनं स्थापयेद्रथम् ॥३॥
अष्टाश्वं चतुरश्वं पा चतुश्चक्र सक्वरम् । ऐन्द्रनीलेन कुम्भेन ध्वजरूपेण संयुतम् ॥
लोकपालाष्टकं तद्वत्पद्मरागदलान्वितम् । चतुर.पूर्णकलशान् धान्यान्यष्टादशैव तु ॥
फौशेयषस्त्रसंयुक्तमुपरिष्टाद्वितानकम् । माल्येक्षुफलसंयुक्तं पुरुषेण समन्वितम् ॥६॥
यो यद्भक्तः पुमान् कुर्यात् स तन्नाम्नाधिवासनम् ।
छत्रचामरकोशेयवस्त्रोपानहपादुकम् ॥ ७॥
गोभिर्विभवतःसाद्धं दद्याच्च शयनादिकम् । आभारात्रिपलादूवं शक्तित कारयेद्बुधः
भश्चाप्टकेन संयुक्तं चतुर्भिरथ वाजिभिः । द्वाभ्यामपियुतं दद्याद्धमसिंहध्वजान्वितम् ॥
चक्ररक्षावुभौ तस्य तुरगस्था यथाश्विनी ।
पुण्यकालमथावाप्य पूर्ववत्स्नापितो द्विजैः ॥१०॥
त्रिः प्रदक्षिणमावृत्य गृहीतकुसुमाञ्जलिः । शुक्लमाल्याम्बरो दद्यादिम मन्त्रमुदीरयेत् ॥
नमो नमः पापविनाशनाय विश्वात्मने वेदतुरङ्गमाय ।
धाम्नामधीशाय दिवाकराय पापीघदावानल ! देहि शान्तिम् ॥ १२ ॥
चखष्टकादित्यमरगणानां त्यमेव धाता परमं निधानम् ।
यतस्ततो मे हृदयं प्रयातु धर्मकतानत्यमोघनाशात् ॥१३॥
ऽध्यायः] * हेमहस्तिमहादानविधिवर्णनम् * इति तुरगरथप्रदानमेकं भवभयसूदनमत्र यः करोति । स कलुपपटलेविमुक्तदेहः परममुपैति पदं पिनाकपाणेः ॥ १४ ॥ देदीप्यमानवपुषां विजितप्रभावमाक्रम्य मण्डलमखण्डितचण्डभानोः । सिद्धाङ्गनानयनपट्पदपीयमानवक्त्राम्युजोऽम्बुजभवेन विरं सहास्ते ॥१५॥ इति पठति शृणोति वा य इत्यं कनफतुरगरथप्रदानमस्मिन् । न स नरकपुरं व्रजेत् कदाविन्नरकरिपोर्भवनं प्रयाति भूयः ॥ १६ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणेऽश्वरथाख्यमहादानविधिवर्णनं नामा- शीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः। एकाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः हेमहस्तिमहादानविधिवर्णनम् । मत्स्य उवावा अथात.संप्रवक्ष्यामि हेमहस्तिरथं शुभम् । यस्य प्रदानागुवनं वैष्णवं याति मानवः ॥ पुण्यां तिथिमयासाद्य तुलापुरुपदानयत् । विप्रयावनकं कुर्याल्लोकेशावाहनं युधः ॥२॥ ऋत्विकमण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् । अत्राप्युपोषितस्तद्ववाहाणैःसहभोजनम् । फुर्यात्पुप्परथाकारं काञ्चनमणिमण्डितम् पलीभिर्विचित्रामिश्चतुश्चक्रसमन्वितम् । कृष्णाजिने तिलद्रोणत्यासंस्थापयेथम् लोकपालाएकोपेतं ब्रह्मार्कशिवसंयुतम् । मध्ये नारायणोपेतं लक्ष्मीपुष्टिसमन्वितम् ॥ तयाष्टादश धान्यानि माजनासनवन्दनः। दीपिकोपानहच्छत्रदर्पणं पादुफान्वितम् । ध्वजे तु गाई कुर्यात् कृपराविनायकम् । नाना नाफलसमायुक्तमुपरिष्टाद्वितानकम् ।। फॉशेयं पञ्चवर्णन्तु अम्लानफुसुमान्वितम् । चतुर्भि फलशैःसाद गौमिरटामिरन्वितम् चतुमि ईममात मुंकादामविभूपितः। स्यरूपतःफरिम्याञ्च युक्तं कृत्वा निवेदयेत् ॥
* मत्स्यपुराणम् * [द्वयशीत्यधिकद्विशततमो कुर्यात्पञ्चपलादूर्ध्वमाभारादपि शक्तितः । तथा मङ्गलशब्देन नापितो वेदपुङ्गवैः ।। त्रिःप्रदक्षिणमावृत्य गृहीतकुसुमाञ्जलिः । इममुच्चायेन्मन्त्रं ब्राह्मणेभ्यो निवेदयेत् ॥ नमो नमः शङ्करपद्मजार्कलोकेशविद्याधरवासुदेवः । त्वं सेव्यसे वेदपुराणयहस्तेजोमयस्यन्दन पाहि तस्मात् ॥१२॥ यत्तत्पदं परमगुह्यतमं मुरारेयानन्दहेतगुणरूपविमुक्तमन्तः । योगेकमानसदृशो मुनयःसमाधौ पश्यन्ति तत्त्वमसि नाथ रथाधिरूढ़ !॥१३॥ यस्मात्त्वमेव भवसागरसंप्लुतानामानन्दभागमृतमध्वगपारपत्रम् । तस्मादघोघशमनेन कुरु प्रसादञ्चामीकरभरथ! माधव सम्प्रदानात् ॥ १४ ॥ इत्थं प्रणम्य कनकेभरथप्रदानं यः कारयेत् सकलपापविमुक्तदेहः । विद्याधरामरमुनीन्द्रगणाभिनु प्राप्नोत्यसौ पदमतीन्द्रियमिन्दुमोलेः ॥ १५ ॥ कृतदुरितवितानप्रज्वलदहिजालव्यतिकरकृतदेहोद्वेगभाजोऽपि बन्धून् । नयति स पितृपुत्रान् वान्धवानप्यशेषान् कृतगजरथदानाच्छाश्वतंसद्म विष्णोः ॥१६॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे हेमहस्तिमहादानविधिवर्णनं नामेकाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः । दव्यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः पञ्चलाइलकमहादान विधिवर्णनम् । मत्स्य उयाचा अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम् । पशलांगलकं नाम मदापातकनाशनम् ॥१॥ पुण्यां तिथिमयासाद्य युगादि ग्रहणादिकाम् । भूमिदानं नरो दद्यात् पश्चलागलफान्वितम् ॥ २॥ पर्व पेटकं पापि प्रामं पा सस्यशालिनम् । निवर्तनशतं पापि तदर्भ पापि शनिटः
ऽध्यायः]
७99
पञ्चलाइसकमहादानविधिवर्णनम् *
सारदारमयान् कृत्या हलानपञ्चविचक्षणः । सोंपकरणयुक्तानन्यान् पञ्च व काञ्चनान्
कुर्यात्पञ्चपलादूर्ध्वमासहस्रपलावधि ॥ ४ ॥
वृषान् लक्षणसंयुक्तान् दशचैव धुरन्धरान् । सुवर्णशृङ्गाभरणान् मुक्तालांगूलभूपणान् ।।
रूप्यपादाप्रतिलकान् रक्तकौशेयभूषणान् । घग्दामवन्दनयुतान् शालायामधिवासयेत्
धरण्यादित्यदेभ्यःपायसं निर्यपेच्चरम् । एकस्मिन्नेव कुण्डे तु गुरुस्तेभ्यो निवेदयेत्
पलाशसमिधस्तद्वदाज्यं कृष्णातिलास्तथा ।
तुलापुरपयत्कुाल्लोकेशावाहनं युधः ॥ ८॥
तनो मङ्गलादेन शुरुमाल्याम्बरो बुधः । आय द्विजदाम्पत्यं हेमसूत्रांगुलीयकैः ॥६॥
कौशेययनकटकमणिमिश्चाभिपूजयेत् । शय्यां सोपस्करां दद्या नुमेकां पयस्विनीम् ॥
तथाटादशधान्यानि समन्तादधिवासयेत् ।
ततः प्रदक्षिणीरत्य गृहीतयुसुमाञ्जलिः ॥ ११ ॥
इममुच्चारयेन्मन्त्रमय सयं निवेदयेत् ।
यस्माद्देवगणाः सर्वे स्थायराणि चराणि च ॥ १२॥
धुरन्धरा) तिष्ठन्ति तस्मादक्ति शिवेऽस्तु मे।
यस्माच्च भूमिदानस्य फलां नाईन्ति पोडशीम् ॥ १३ ॥
दानापन्यानि मे भक्तिधर्म पर दृढाभवेत् । दण्डेन सप्तहस्तेन निशद्दण्डं निवर्तनम् ॥
निमागहीनं गोचर्ममानमाह प्रजापति । माननानेन यो दद्यान्निवर्तनशनं युध ।
विधिनानेन तम्याशु क्षीयते पापसंदतिः ॥१५॥
तदर्दमयया दद्यादपि गोचर्ममात्रयम् ।
भयनापानमा पा सोऽपि पापै.अमुन्यते ।। ३६ ॥
यापन्ति म्याट्रन्टकमार्गमुपानि भूपेमासांपते दिनुरगजरोमकाणि ।
तापन्ति शदरपुरे स समा दितित् भूमिप्रदानमिद यः पुरते मनुषः ॥
गन्धर्यपिन्नासुरामुरसिद्धसरातचामामुपेन्य मद्विमानम् ।
मंपायने पितृपितामहपायुक्तः शम्मोपदंप्रति चामरनापफ सन् ॥१८॥
७५८ * मत्स्यपुराणम् * [यशीत्यधिकदिशततमो इन्द्रत्यमप्यधिगतं क्षयमभ्युपैति गोभूमिलाइलधुरन्धरसम्प्रदानात् । तस्मादधीघपटलक्षयकारिभूमे र्दानं विधेयमिति भूतिभवोद्भवाय ॥ १६ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे पञ्चलाङ्गलक-महादानविधिवर्णनं नाम व्यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः। व्यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः हेमधराख्पमहादानविधिवर्णनम् । मत्स्य उवाच। अथातः संम्प्रवक्ष्यामि धरादानमनुत्तमम् । पापक्षयकरं नृणाममङ्गल्यविनाशनम् ॥१॥ कारयेत् पृथिवीं हैमी जम्बुद्वीपानुकारिणीम् । मर्यादापर्वतपती मध्ये मेरुसमन्विताम् लोकपालाष्टकोपेतां नववर्षसमन्विताम् । नदीनदसमोपेतामन्ते सागरवेष्टिताम् ॥ ३ ॥ महारत्नसमाकीर्णा चसुरुद्रार्कसंयुताम् । हेम्नः पलसहस्त्रेण तदर्द्धनाथ शक्तितः ॥४॥ शतत्रयेण धा कुर्यात् द्विशतेन शतेन घा। कुर्यात्पञ्चपलादूर्ध्वमशक्तोऽपि विचक्षणः॥ तुलापुरुपयत् कुर्यालोकेशवाहनं वुध्रः । ऋत्विक्मण्डपसम्भारभूपणाच्छादनादिकम् ॥ ६ ॥ वेद्यां कृष्णाजिनं कृत्वा तिलानामुपरि न्यसेत् । तथाष्टादश धान्यानि रसांश्च लवणादिकान् ॥ ७॥ तथाष्टी पूर्णकलशान् समन्तात् परिकल्पयेत् । वितानकं व कौशेयं फलानि विविधानि च ॥८॥ तथांशुकानि रम्याणि श्रीखण्डशफलानिय । इत्येवं कारयित्वा तामधिवासनपूर्वकम् शुक्लमाल्याम्बरधरः शुक्लाभरणभूषितः । प्रदक्षिणं ततः कृत्वा गृहीतकुसुमाञ्जलिः॥१०॥ पुण्यं कालमथासाद्य मन्त्रानेतानुदीरयेत् । नमस्ते सर्वदेवानां त्यमेव भवनं यतः॥११॥ धात्री व सर्वभूतानामत.पाहि पसुन्धरे!। पसु धारयसे यस्माद्वसुबातीय निर्मलम् ऽध्यायः] ७७६ * विश्वचकारयमहादानविधिवर्णनम् * घसुन्धरा ततो जाता तस्मात्पाहि भयादलम् । चतुर्मुसोऽपि नो गच्छेद्यस्मादन्तं तवाचले ! १३ ॥ अनन्तायै नमस्तस्मात्पाहिसंसारकर्दमात्। त्वमेवलक्ष्मीगोविन्द शिवगौरीतिचास्थिता गायत्रीब्रह्मणापावें ज्योत्स्राचन्द्रेश्योप्रभा। बुद्धिवृहस्पतीरयाता मेधामुनिपुसंस्थिता विश्वं व्याप्य स्थिता यस्मात् ततो विश्वम्भरा स्मृता। धृति.स्थितिः क्षमा क्षोणी पृथ्वी पसुमती रसा ॥ १६॥ एताभिमूर्तिभि.पाहिदेवि ! संसारसागरात् । एवमुच्चार्यतादेवी ब्राह्मणेभ्योनिवेदयेत् धराद्धं घा चतुर्भागं गुरवे प्रतिपादयेत्। शेषञ्चाथ ऋत्विगभ्यः प्रणिपत्य विसर्जयेत् अनेन विधिना यस्तु कुर्याद्धेमधरां शुमाम् । पुण्यकालेतु संप्राप्ते सपदं याति वैष्णवम् विमानेनार्कघर्णेन किङ्किणी जालमालिना । नारायणपुरं गत्वा करपत्रयमथावसेत् ।। पितॄन् पुत्रांश्च पौत्रांश्च तारयेदेकविंशतिम् ॥ २०॥ इति पठति य इत्थं यः शृणोति प्रसङ्गादपि कलुपवितानैर्मुक्तदेहः समन्तात् । दिवममरवधूभियांति संप्रार्थ्यमानो पदममरसहस्त्रैः सेधितं चन्द्रमाले : २६ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे हेमधराख्यमहादानविधिवर्णनं नाम ध्यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः । चतुरशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः विश्वचक्राख्यमहादान विधिवर्णनम् । मत्स्य उचाचा अथात संप्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम् । विश्वचक्रमितिख्यातं महापातकनाशनम् ॥ तपनीयस्य शुद्धस्य विषुवादिपु कारयेत् । श्रेष्ठंपलसहस्त्रेण तदन तु मध्यमम् ॥ २॥ तस्यार्द्धन फनिष्ठस्यात्विश्यवामुदाहृतम् । अन्यद्विशत्पलादूर्ध्वमशक्कोऽपिनिवेदयेत् पोडशारं ततश्चक्रं भ्रमन्नेम्यष्टकावृतम् । नाभिपने स्थितं विष्णुं योगारूदवतुर्भुजम् ॥ शङ्खचक्रेऽस्यपार्वे तु देव्यष्टक समावृतम् । द्वितीयापरणे तद्वत् पूर्वतो जलशायिनम् ॥
[चतुरशीत्यधिकद्विशततमो * मत्स्यपुराणम् * अत्रि गुर्व शिष्टश्च ब्रह्मा कश्यप एव च । मत्स्य कृमों घराहश्च नरसिंहोऽध धामनः ।। रामोरामश्च कृष्णच युद्ध कल्कीतिक क्रमात् । तृतीयावरणे गौरी मातृभिर्वसुभिर्युता चतुर्थे द्वादशादित्या वेदाश्चत्वार एव च । पञ्चमे पञ्चभूतानि रुद्राश्चैकादशैव तु ॥८॥ लोकपालाष्टकं पष्ठे दिड्भातगास्तथैवच । सप्तमेऽस्त्राणि सर्वाणि मङ्गलानिच कारयेत् अन्तरान्तरतोदेवान् विन्यसेदष्टमे पुनः । तुलापुरुपयच्छेषं समन्तात् परिकल्पयेत् ॥१०॥ ऋत्विग्मण्डपसम्भारभूपणाच्छादनादिकम् । विश्वचक्रं तत'फुर्यात्कृष्णाजिनतिलोपरि तथाप्टादश धान्यानि रसांश्च लवणादिकान् । पूर्णकुम्भाप्टकञ्चैव वस्त्राणि विविधानिय माल्येशुफलरनानि चितानश्चापि कारयेत् । ततोमङ्गलशब्देन स्तात शुक्लाम्बरो गृही होमाधिवासनान्ते वै गृहीतकुसुमाञ्जलिः ॥१३॥ इममुच्चारयेन्मन्त्रन्त्रिः कृत्वातु प्रदक्षिणम् । नमो विश्वमयायेति विश्वचक्रात्मने नमः परमानन्दरूपी त्वं पाहिनः पापकर्दमात् । तेजोमयमिदं यस्मात्सदापश्यन्ति योगिनः हृदि तत्वं गुणातीतं विश्ववक्रं नमाम्यहम् । वासुदेवे स्थितं चक्रं चक्रमध्ये तु माधवः अन्योन्याधाररूपेण प्रणमामि स्थिताविह । विश्वचक्रमिदंयस्मात् सर्वपापहरं परम् आयुधश्चापि घालश्च भवादुद्धर मामतः । इत्यामन्ध्य च यो दद्याद्विश्वचक्र चिमत्सरः चिमुक्त सर्वपापेभ्यो विष्णुलोके महीयते । वैकुण्ठलोकमासाद्य चतुर्वाहुः सनातनः ।। सेव्यतेऽप्सरसांप्लङ्घस्तिष्ठेत्कल्पशतत्रयम् । प्रणमेद्वादश कृत्वा विश्वचक्र दिने दिने तस्यायुर्वर्धते नित्यं लक्ष्मीश्च विपुला भवेत् ॥२०॥ इति सकलजगत्सुराधिवासं वितरति यस्तपनीयषोडशारम् । हरिभवनमुपागतः ससिद्धैश्विरमभिगम्य नमस्यते शिरोभिः ॥ २१ ॥ शुभदर्शनतां प्रयाति शत्रोर्मदनसुदर्शनताञ्च कामिनीभ्यः । स सुदर्शनकेशवानुरूप कनकसुदर्शनदानदाधपाप ॥ २२ ॥ कृतगुरुदुरितानि पोडशारप्रचितरणे प्रवराकृतिर्मुरारेः । अभिभवति भवोद्भवन्ति भीत्या भवमभितो भुवने भयानि भूयः ॥ २३ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे विश्ववक्राख्यमहादानविधिवर्णनं नाम चतुरशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।
- पञ्चाशोत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः महाकल्पलताख्यमहादानविधिवर्णनम् । मत्स्य उवाच। अथातः सप्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम् । महाकल्पलता नाम महापातकनाशनम् ॥ पुण्यांतिथिमथासाधकृत्वाब्राह्मणवाचनम् ।ऋत्विग्मण्डपसम्भारभूपणाच्छादनादिकम् तुलापुरुषवत् कुर्यात् लोकेशावाहनं बुधः । वामीकरमयीः कुर्याइशकल्पलताः समाः॥ नानापुष्पफलोपेता नानांशुफविभूषिताः। विद्याधरसुपर्णानां मिथुनरुपशोभिता: हारानादित्सुभिःसिद्ध.फलानिवविहङ्गमै.। लोकपालानुकारिण्यः कर्तव्यास्तासुदेवताः ब्राहीमनन्तशक्तिञ्च लवणस्योपरि न्यस्येत् । अधस्ताहतयोर्मध्ये पद्मशटकरे शुभे ॥६॥ इभासनस्या तु गुड़े पूर्यतः कुलिशायुधा । रजनी संस्थिताग्नायी ध्रुवपाणिरथानले ॥ याम्ये च महिपारूढा गदिनी तपडुलोपरि । घृने तु नैऋतीस्याप्या सखड्गा दक्षिणापरे पाहणे पारुणी क्षीरे झपस्था नागपाशिनी । पताकिनी च वायव्ये मृगस्था शर्करोपरि ॥ सौम्या तिलेपु संस्थाप्या शालिनी निधिसंस्थिता। माहेश्वरी वृषारूढा नयनीते त्रिशूलिनी ॥१०॥ मोलिन्योपरदास्तद्वत्कर्तव्यावालकान्यिताः । शल्यापञ्चपलादूर्ध्वमासहस्रात्प्रकल्पयेत्॥ सर्यासामुपरि स्थाप्यं पञ्चवर्ण वितानकम् । धेनयो दशकुम्भाश्च वस्त्रयुग्मानि चैव हि मध्यमे द्वे तु गुरये ऋत्विग्भ्योऽन्यास्तथैवच । ततोमङ्गलशब्देन स्नातःशुलाम्बरो युधः नमो नमः पापविनाशिनीभ्यो ब्रह्माण्डलोकेश्वरपालिनीभ्यः । आशंसिताधिक्यफलप्रदाभ्यो दिगभ्यस्तथा फल्पलतावधूभ्यः ॥ १४ ॥ इति सफलदिगङ्गनाप्रदानं भवभयसदनकारि यः करोति। अभिमतफलदे स नागलोके घसति पितामहवत्सराणि त्रिंशत् ॥ १५ ॥ पितृशतमथ तारयेदपाश्र्भवदुरितौघरिघातशुद्धदेहः ।
७८२ * मत्स्यपुराणम् * [पड़शीत्यधिकद्विशततमो सुरपतियनितासहस्रसंख्यैः परिवृतमम्बुजसंसदाभिवन्धः ॥ २६ ॥ इति विधानमिदं दिगगनानां फनककल्पलताविनिवेदकम् । पठति यः स्मरतीह तथेक्षते स पदमेति पुरन्दरसेवितम् ॥ १७ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे महाकल्पलताख्यमहादानविधिवर्णनं नाम पञ्चाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः । . पड़शीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः सप्तसागरमहादानविधिवर्णनम् । मत्स्य उवाच अथातः संप्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम् । सप्तसागरकं नाम सर्वपापप्रणाशनम् ॥ १॥ पुण्यं दिनमथासाद्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् । तुलापुरुषवत्कुर्याल्लोकेशावाहनं बुधः ॥२॥ ऋत्विग्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् । कारयेत्सप्तकुण्डानि काञ्चनानि विचक्षणः ॥ ३ ॥ प्रादेशमात्राणि तथारतिमात्राणि वै पुनः । कुर्यात्सप्तपलादूर्ध्वमासहस्राच्च शक्तितः ।। संस्थाप्यानि च सर्वाणि कृष्णाजिनतिलोपरि । प्रथमं पूरयेत्कुण्डं लवणेन विचक्षणः द्वितीयं पयसा तद्वत्तृतीयं सर्पिषा पुन. । चतुर्थन्तु गुडेनैव दध्ना पश्चममेव च ॥६॥ षष्ठं शर्करया तद्वत् सप्तम तीर्थवारिणा । स्थापयेल्ल्यणस्थं तु ब्रह्माणं काञ्चनं शुभम् केशवं क्षीरमध्ये तु घृतमध्ये महेश्वरम् । भास्कर गुडमध्ये तु दधिमध्ये निशाधिपम् शर्करायांन्यसेलक्ष्मी जलमध्ये तु पार्वतीम् । सर्वेषु सर्वरत्नानि धान्यानि च समन्ततः तुलापुरुषवच्छेपमत्रापि परिकल्पयेत् । ततो घारुणहोमान्ते नापितो वेदपुङ्गवैः ॥१०॥ निःप्रदक्षिणमावृत्य मन्त्रानेतानुदीरयेत् । नमो पः सर्वसिन्धूनामाधारेभ्यः सनातनाः ।। जन्तूनां प्राणदेभ्यश्च समुद्रेभ्यो नमो नमः ॥ ११ ॥ क्षीरोदकाज्यदधिमाधुरलावणेक्षुसारामृतेन भुवननयजीवसवान् ।
अध्याय ] ' * रत्नधेनुमहादानवर्णनम् । आनन्दयन्ति पसुभिश्च यतो भवन्तस्तस्मान्ममाप्यविधातमल दिशन्तु ॥१२॥ यस्मात्समस्तभुवनेषु भवन्त एष तीर्थामरासुरसुचद्धमणिप्रदानम् । पापक्षयामृतविलेपनभूषणाय लोकस्य विभ्रति तदस्तु ममापि लक्ष्मी ॥१२॥ इति ददाति रसामृतसयुतान् शुचिरविस्मयवानिह सागरान् । कमलकाञ्चनवर्णमयानसो पदमुपैति हरेरमराचित ॥ १४ ॥ सकल्पापविधीतविराजित पितृपितामहपुत्रकलत्रकम् । नरकलोकसमाकुलमप्यय झटिति सोऽपि नयेच्छिवमन्दिरम् ।। १५ ।। इति श्रीमत्स्यपुराणे सप्तसागरमहादानविधिवर्णन नाम पडशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय । सप्ताशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय. रत्नधेनुमहादानविधिवर्णनम् । मत्स्य उघाव। अथात सप्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम् । रत्नधेन्विति विख्यात गोलोकफलद नृणाम् ॥ १॥ पुण्य दिनमथासाद्य तुलापुरपदानवत । लोकेशावाहन कृया ततो धेनु प्रकरपयेत् ॥ भूमो कृष्णाजिन कृत्वा लघणद्रोणसयुतम् । धेनु रत्नमयी कुर्यात सङ्कल्प्य विधिपूर्वकम् ॥ ३॥ स्थापयेत्पारागाणामेकाशीति मुखे बुध । पुष्परागशत तद्वद्धोणाया परिकल्पयेत् ॥ ललाटे हैमतिल्क मुक्ताफलशतदृशो । भूयुगे चिट्ठमशत शुक्री कर्णद्वये स्मृती ॥५॥ काञ्चनानानि च शृङ्गाणिशिरोचनशतात्मकम् । ग्रीवायानेत्रपटक गोमेदकशतान्चितम् इन्द्रनीलशत पृष्ठे बैदूर्यशतपाय। स्फाटिकैन्दर तत्सौगन्धिकशते फटिम् ॥ ७ ॥ खुरा हेममया कार्या पुच्छ मुक्तावलीमयम् । ।
७८४
* मत्स्यपुराणम् * [ अष्टाशीत्यधिकद्विशततमो'
सूर्यकान्तेन्दुकान्ती च घ्राणे कर्पूरचन्दने ॥ ८॥
कुङ्कुमानि च रोमाणि रोप्यनाभिं च कारयेत् । गारुत्मतशतं तद्वदपाने परिकल्पयेत् ॥
तथान्यानिवरत्नानि स्थापयेत्सर्वसन्धिषु। कुर्याच्छर्करयाजिह्वा गोमयञ्च गुडात्मकम्
गोमूत्रमाज्येन तथा दधिदुग्धे स्वरूपत. । पुच्छाग्ने चामरं दद्यात् समीपे ताम्रदोहनम्
कुण्डलानि च हैमानि भूषणानि च शक्तितः । कारयेदेवमेवन्तु चतुर्था शेन घत्सकम् ॥
तथा धान्यानि सर्वाणिपादाश्चेभुमया स्मृताः नानाफलानिसर्वाणिपञ्चवर्ण वितानकम्
एवं विरचनंकृत्वा तद्वद्धोमाधिवासनम् । ऋत्विग्भ्योदक्षिणांदद्यादेनुमामन्त्रयेत्तत ॥
गुडधेनुचदाबाह्य इदञ्चोदाहरेत्ततः ॥ १४ ॥
त्वा सर्वदेवगणधाम यत. पठन्ति रुदेन्द्रसूर्यकमलासनवासुदेवा।
तस्मात्समस्तभुवनत्रयदेहयुक्ता मां पाहि देवि ! भवसागरपीड्यमानम् ॥१५॥
आमन्त्र्य चेत्यमभित परिवृत्य भक्त्या दद्याद्विजाय गुरवे जलपूर्विका ताम् ।
यः पुण्यमाप्य दिनमत्रकृतोपघासः पापैविमुक्ततनुरेति पद मुरारेः ॥ १६ ॥
इति सफलविधिज्ञो रत्नधेनुप्रदान वितरति स विमानं प्राप्य देदीप्यमानम् ॥
सकळकलुपमुक्तो बन्धुभिः पुत्रपौत्र. स हि मदनसरूप' स्थानमभ्येति शम्भोः ॥१७॥
इति श्रीमत्स्यपुराणे रत्नधेनुमहादानफलवर्णनं नाम सप्ताशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।
१
अष्टाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
महाभूतघटमहादानविधिवर्णनम् ।
मत्स्य उवाच।
अथात संप्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम् । महाभूतघटं नाम महापातकनाशनम् ॥ १॥
पुण्या तिथिमथासाद्य कृत्या ब्राह्मणवाचनम् ।
ऋत्विगमण्डपसम्भारभृपणाच्छादनादिकम् ॥ २ ॥
ऽध्यायः] * फल्पानां कीर्तनम् * तुलापुरुषवत् कुर्याल्लोकेशावाहनादिकम् । कारयेत्काञ्चनंकुम्भं महारत्नाचितं बुधः ॥ प्रादेशादंगुलशतं यावत् कुर्यात् प्रमाणतः । क्षीराज्यपूरितं तद्वत् कल्पवृक्षसमन्वितम्।। पद्मासनगतास्तत्र ब्रह्मविष्णुमहेश्वरान् । लोकपालान् महेन्द्रांश्च स्वस्ववाहनमास्थितान् घराहेणोद्धृतां तद्वत् कुर्यात् पृथ्वी सपङ्कजाम् ॥ ५ ॥ घरुणंचासनगतं काञ्चनं मकरोपरि । हुताशनं मेपगतं चायुं कृष्णमृगासनम् ॥६॥ तथा कोशाधिपंकुर्यात् भूपिकस्थं विनायकम् । चिन्यस्यघटमध्येतान् वेदपञ्चकसंयुतान् ऋग्वेदस्याक्षसून स्यायजुर्वेदस्य पङ्कजम्। सामवेदस्य वीणास्याद्वेणु दक्षिणतोन्यसेत् अथर्ववेदस्यपुन चुक्चुची कमलङ्करे । पुराणवेदो घरद साक्षसूत्रकमण्डलुः ॥ ६ ॥ परित सर्वधान्यानि चामरासनदर्पणम् । पादुकोपानहच्छत्रं दीपिका भूपणानि च ॥ शय्याञ्च जलकुम्भाश्च पञ्चवर्ण वितानकम् । स्नात्वाधिवासनान्तेतु मन्त्रमेतमुदीरयेत् नमो घ. सर्वदेवानामाधारेभ्यश्चराचरं । महाभूताधिदेवेभ्यः शान्तिरस्तु शिवं मम ॥ यस्मानकिञ्चिदप्यस्ति महाभूतविना कृतम् । ब्रह्माण्डे सर्वभूतेषु तस्माच्छ्रीरक्षयास्तु मे इत्युञ्चार्य महाभूतघट यो विनिवेदयेत् । सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति परमाङ्गतिम् ॥ विमानेनार्कवर्णन पितृवन्धुसमन्वितः । स्तूयमानो घरस्त्रीमि पदमभ्येति वैष्णवम् । पोडशैतानि य कुर्शन महादानानि मानयः । न तस्य पुनरावृत्तिरिह लोकेऽमिजायते। इह पठति य इत्यं पासुदेवस्य पार्ये ससुतपितृकलत्रः संणोतीह सम्यक् मुररिपुभवने चै मन्दिरे पार्कलक्ष्म्यात्वमरपुरवधूभिर्मोदते सोऽपि नित्यम् ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे महाभूतघटदानवर्णनं नामाष्टाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः । ऊननवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः कल्पानां कीर्तनम् । मनुष्ठपाव। फापमानं त्यया प्रोक्तं मन्यन्तरयुगेषु च । इदानी फल्पनामानि समासात्कथयाच्युन ! .
७८६
* मत्स्यपुराणम् *
[ ऊननवत्यधिकद्विशततमो
मत्स्य उवाच।
कल्पानां कीर्तनं वक्ष्ये महापातकनाशनम् ।
यस्यानुकोर्तनादेव वेदपुण्येन युज्यते ॥२॥
प्रथमश्वेतकल्पस्तु द्वितीयो नीललोहितः । घामदेवस्तृतीयस्तु ततोराथन्तरोऽपरः ।।
रौरवःपञ्चमःप्रोक्तः पठो देव इतिस्मृतः । सप्तमोऽथ वृहत्कल्पः कन्दर्पोऽटम उच्यते ॥
सद्योऽथ नवम प्रोक्त ईशानो दशम स्मृतः । तम एकादशः प्रोक्तः तथा सारस्वत परः॥
त्रयोदश उदानस्तु गारुड़ोऽथ चतुर्दशः । कौमःपञ्चदश प्रोक्तः पौर्णमास्यामजायत ।
पोडशो नारसिंहस्तुसमानस्तु ततोऽपरः । आग्नेयोऽष्टादशःप्रोक्तः सोमकल्पस्तथापरः
मानवोविंशति.प्रोक्तस्तत्पुमानिति चापरः । वैकुण्ठश्चापरस्तद्वलक्ष्मीकल्पस्तथापरः ।।
चतुर्विशतिमःप्रोक्तः सावित्रीकल्पसंशकः । पञ्चविंशस्ततोधोरो धाराहस्तु ततोऽपरः
सप्तविंशोऽथ वैराजो गोरिकल्पस्तथापरः । माहेश्वरस्तु स प्रोक्तस्त्रिपुरोयत्रघातितः
पितृकल्पस्तथान्तेतु या कुहर्ब्रह्मणः परा । इत्येवं ब्रह्मणोमासः सर्वपातकनाशनः ॥
आदावेव हि माहात्म्यं यस्मिन्यस्य विधीयते । तस्य कल्पस्यतनामविहितंब्रह्मणापुरा
सङ्कीर्णास्तामसाश्चैव राजसाः सात्विकास्तथा ।
रजस्तमोमयास्तद्वदेते त्रिंशदुदाहृताः ॥ १३ ॥
सङ्कीर्णेषु सरस्वत्या पितृणां व्युष्टिरुच्यते । अग्नेः शिवस्यमाहात्म्यतामसेषुदिघाकरे
राजसेषुच माहात्म्यमधिकं ब्रह्मणः स्मृतम् । यस्मिन्कल्पेतुयत्प्रोक्तंपुराणंब्रह्मणापुरा
तस्य तस्य तु माहात्म्यं तत्स्वरूपेण पर्यते ।
सात्विकेष्यधिकं तद्वद्विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् ॥ १६ ॥
तथैव योगसंसिद्धा गमिष्यन्ति परांगतिम् । ब्राह्मं पाद्ममिमं यस्तु पठेत्पर्वणिपर्वणि ॥
तस्य धर्मेमतिब्रह्माकरोतिविपुलां श्रियम् । यस्तु दद्यादिमानकृत्वा हैमानपर्वणिपर्वणि
ब्रह्मविष्णुपुरे घासं मुनिभिः पूज्यते दिवि । सर्वपाप क्षयकर कल्पदानं यतो भवेत् ॥
मुनिरूपांस्ततः कृत्वा दद्यात्कल्पान् विचक्षणः ।
पुराणसंहिता चेयं तव भूप! मयोदिता ॥ २० ॥
७८७ ध्यायः ] ॐ मत्स्यपुराणान्तर्गतसम्पूर्ण विषयवर्णनम् * सर्वपापहरा नित्यमारोग्यश्रीफलपदा । ब्रह्मसंवत्सरशतादेकाहं शेषमुच्यते ॥ २१ ।। शिववर्षशनादेकं निमेष वैप्पायं पिदुः । यदा सविष्णुर्जागति तदेदं चेष्टते जगत् ॥२२ यदास्वपिति शान्तात्मातदा सर्व निमीलति । इत्युक्त्या देवदेवेशो मत्स्यरूपी जनार्दनः पश्यतां सर्वभूतानां तत्रैवान्तरधीयत । वैवस्वतो हि भगवान विसृज्य विविधाः प्रजाः ॥ २४ ॥ स्वान्तरं पालयामास मार्तण्डकुलपर्धन. । यस्य मन्यन्तप्तदधुना चानुवर्तते ॥२५॥ पुण्यं पवित्रमेतद्वः कथितं मत्स्य भाषितम् । पुराणं सर्वशास्त्राणा यदेतन्मूनि संस्थितम् इति श्रीमत्स्यपुराणे मनुमत्स्यसंवादे फल्पवर्णनं नामोननवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः नवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः मत्स्यपुराणान्तर्गतसम्पूर्ण विषयवर्णनम् । सूत उवाच। एतद्रः फधित सर्व यदुक्तं विश्वरूपिणा । मात्स्य पुराणमखिलं धर्मकामार्थसाधनम् यत्रादौ मनुसंपादो ग्रामाण्डफयनन्तया । सायं शारीरफं प्रोक्त चतुर्मुसमुपोद्वधम् । देपासुराणामुत्पत्तिमरितोत्पत्तिरप च । मदनद्वादशी तालोकपालामिपूजनम् ॥ ३ ॥ मन्यन्तराणामुद्देशो चैन्यराजाभिषर्णनम् । सूर्यवैषम्यतोत्पत्ति युधम्यागमनं तथा ॥४॥ पितृवंशानुफ्धनं श्राद्धफारस्तथप च । पितृतीर्थप्रपासध सोमोत्पतिस्तयेप च ॥५॥ फानन सोमयशस्य ययातिन रितं तया । फार्तपीर्षम्य महात्म्यं पृष्णियंशानुपर्ननम् ॥६॥ भृगुशापम्तया पिणोदत्यशापम्तयेप च । फोननं पुगोशम्य पंशो दौताशनम्तया १७ पुराणातनं तदत्मिपायोगम्तषैप या प्रतं नक्षत्रमण्याएं मार्तण्डरायनं तया ॥ ८ ॥ Pामी मोदिनीनन्द्रमसितम् । तहागविधिमादरम्य पादपोर्ग एप ॥ समापन समास्ययनमेप ग सपानातीपण नु सपन्यामिनी Pon ૭૮૮ # मत्स्यपुराणम् * [नवत्यधिकद्विशततमो आनन्दकरी तद्वतं सारस्वतं पुनः । उपरागाभिषेकश्च सप्तमीस्नपनं पुनः ॥ १६ ॥ भीमाख्या द्वादशी तद्वदनङ्गशयनं तथा । अशून्यशयनं तद्वत्तथैघाडारकवतम् ॥ १२ ॥ सप्तमी सप्तकं तद्वद्विशोक द्वादशी तथा । मेरु प्रदानं दशधा ग्रहशान्ति स्तथैव च॥१३॥ ग्रहस्वरूपकथनं तथा शिघचतुर्दशी । तथा सर्वफलत्यागः सूर्यचारवतं तथा ॥ १४ ॥ संकान्तिस्नपनं तद्वद्विभूतिद्वादशीव्रतम् । पष्टिव्रतानां माहात्म्यं तथा स्नानविधिक्रम.॥ प्रयागस्य तु माहात्म्यं सर्वतीर्थानुकीर्तनम् । पैलाश्रमफलं तद्वद्वीपलोकानुफीर्तनम् ॥ तथान्तरिक्षवारश्च ध्रुघमाहात्म्यमेव च । भुवनानि सुरेन्द्राणां त्रिपुराधोपणं तथा ॥ पितृपिण्डदमाहात्म्यं मन्वन्तरविनिर्णयम् । पत्राङ्गस्य तु संभूतिः तारकोत्पत्तिरेव च ॥ तारकासुरमाहात्म्यं ब्रह्मदेवानुकीर्तनम् । पार्वतीसम्भवस्तहत् तथा शिवतपोधनम् ॥ अनङ्गदेहदाहस्तु रतिशोकस्तथैव च । गौरीतपोवनं तद्वविश्वनाथप्रसादनम् ॥ २० ॥ पावतीऋषिसंवादस्तथैवोद्वाहमङ्गलम् । कुमारसम्भवस्तद्वत् कुमारविजयस्तथा।२१ तारकस्य पधो घोरो नरसिंहोपवर्णनम् । पद्मोद्भवविसर्गस्तु तथैवान्धकघातनम् ।।२२।। पाराणस्यास्तु माहात्म्यं नर्मदायास्तथैव च । प्रवरानुक्रमस्तद्वत् पितृगाथानुकीर्तनम् ततोभयमुखीदानं दानं कृष्णाजिनस्य च ।तथा सावित्र्युपाख्यानं राजधर्मास्तथैव च ॥ यानानिमित्तकथनं स्वप्नमङ्गल्यकीर्तनम् । घामनस्य तु माहात्म्यं तथैवाथ घराहजम् ॥ क्षीरोदमथनं तद्वत् कालकुटाभिशासनम् ॥ २६ ॥ प्रासादलक्षणं तद्वन् मण्डपानान्तु लक्षणम् ।पुरुवंशे तु संप्रोक्तंभविष्यद्राजवर्णनम्२७॥ तुलादानादि बहुशो महादानानुकीर्तनम् । फरपानुकीर्तनं तद्वद् ग्रन्थानुक्रमणी तथा ।। एनत्पवित्रमायुष्यमेतत्कार्ति विवर्धनम् । एतत्पवित्रं फल्याणं महापापहरं शुभम् ॥२६॥ अस्मात् पुराणादपि पामेकं पठेत्तु यः सोऽपि चिमुक्तपापः । नारायणान्यं पदमेति नूनमनङ्गवदिव्यसुपानिभुते ॥ ३० ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे ग्रन्थानुमामणीफथनं नाम नवत्यधिकदिशततमोऽध्यायः । समाप्तमिदं श्रीमत्स्यमहापुराणम् । ॐतत्मद् ब्रमार्पणमस्तु ।
श्रीगणेशाय नमः शुद्धाशुद्धिपत्रम् पृष्ठाडा, पतिः १ १ २ ४ ३ ૨ ५ २० ६ ६ अशुद्धपाठः चरणणाम्बुजाः यजग्गाद एतेदेकार्णवं वेदाभ्यासमरतस्यास्य सूनाः ततकं सर्ववेदानं भगवान् ममहदादि गन्धर्धारगरक्षसाम् शुद्धपाठः चरणाम्बुजाः यजगाद एतदेकार्ण वेदाभ्यासरतस्यात्य सुताः तद्भक्त्रं सर्ववेदानां भगवन् महदादि गन्धर्पोरगरक्षसाम् कल्पे कल्पे १६ ८ १२ ८ २१ १४ ८ कल्प ल्पे दूलूकः सर्वशेषतः स्थाव्यं मस्तोत्पत्ती ८ सर्वमशेषतः स्थातव्यं मदुत्पत्ती एच मन्यन्तरेषु २० मन्वन्तरेषु ७८८ * मत्स्यपुराणम् * [नवत्यधिकद्विशततमो । आनन्दकरी तद्वद्वतं सारस्वतं पुनः । उपरागाभिषेकश्च सप्तमीस्नपनं पुनः ॥ ११ ॥ भीमाख्या द्वादशी तद्वदनङ्गशयनं तथा । अशून्यशयनं तद्वत्तथैवाङ्गारकवतम् ॥ १२ ॥ सप्तमी सप्तकं तद द्विशोक द्वादशी तथा । मेरु प्रदानं दशधा ग्रहशान्ति स्तथैव च॥१३॥ ग्रहस्वरूपकथनं तथा शिघचतुर्दशी । तथा सर्वफलत्यागः सूर्यवारवतं तथा ॥ १४ ॥ संकान्तिस्नपनं तद्वद्विभूतिद्वादशीव्रतम् । पष्टिवतानां माहात्म्यं तथा स्नानविधिक्रम ॥ प्रयागस्य तु माहात्म्यं सर्वतीर्थानुकीर्तनम् । पैलाश्रमफलं तद्वद्द्वीपलोकानुकीर्तनम् ॥ तथान्तरिक्षवारश्च ध्रुघमाहात्म्यमेव च । भुवनानि सुरेन्द्राणां त्रिपुराघोपणं तथा ॥ पितृपिण्डदमाहात्म्यं मन्वन्तरविनिर्णयम् । वज्राङ्गस्य तु संभूतिः तारकोत्पत्तिरेव च। तारकासुरमाहात्म्यं ब्रह्मदेवानुकीर्तनम् । पार्वतीसम्भवस्तद्वत् तथा शिवतपोधनम् ॥ अनङ्गदेहदाहस्तु रतिशोकस्तथैव च । गौरीतपोधनं तद्वदिश्वनाथप्रसादनम् ॥ २० ॥ पावतीमृपिसंवादस्तथैवोवाहमङ्गलम् । कुमारसम्भवस्तद्वत् कुमारविजयस्तथा॥२१ तारकस्य वधो घोरो नरसिंहोपवर्णनम् । पद्मोद्भवविसर्गस्तु तथैवान्धकघातनम् ॥२२॥ धाराणस्यास्तु माहात्म्यं नर्मदायास्तथैव च । प्रवरानुक्रमस्तद्वत् पितृगाथानुकीर्तनम् ततोभयमुखीदानं दानं कृष्णाजिनस्य च । तथा सावित्र्युपाख्यानं राजधर्मास्तथैव च ॥ यात्रानिमित्तकथनं स्वप्नमगल्यकीर्तनम् । घामनस्य तु माहात्म्यं तथैवाथ चराहजम् ॥ क्षीरोदमथनं तद्वत् कालकुटाभिशासनम् ॥ २६ ॥ प्रासादलक्षणं तद्वन् मण्डपानान्तु लक्षणम् । पुरुवंशे तु संप्रोक्तंभविष्यद्राजवर्णनम्२७॥ तुलादानादि बहुशो महादानानुकीर्तनम् । कल्पानुकीर्तनं तद्वद् ग्रन्थानुक्रमणी तथा ।। एतत्पवित्रमायुष्यमेतत्कार्ति विवर्धनम् । एतत्पवित्रं कल्याणं महापापहरं शुभम् ॥२६॥ अस्मात् पुराणादपि पादमेकं पठेत्तु यः सोऽपि विमुक्तपापः । नारायणाख्यं पदमेति नूनमनङ्गवद्दिव्यसुखानिभुते ॥ ३० ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे ग्रन्थानुकमणीकथनं नाम नपत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः । समाप्तमिदं श्रीमत्स्यमहापुराणम् । ॐ तत्मद् ब्रह्मार्पणमस्तु ।
[३] पृष्ठाका पति शुद्धपाठ प्राडमुखा तिलोदकाञ्जलि ४ २१ ७५ २० २४ ५८ ६३ अशुद्धपाठ प्रादमखा तिलोदकालि घभृगु सोमोऽवच्छिशु त्रैलोक्य लक्ष्मीनारायण नवनिर्जित्य सम्प्रवक्ष्मामि देवायान्युवाच त्तपम ब्राह्माणो दु खात्मार्गघाण चार्यपर्पणी यजेदअश्वमेधेन घरवणिनी शर्मिष्ठ घावणी शुचिस्मते मन्युविद्यते भूणहेतुच्यते पाति १४ बभूव सोमोऽभवच्छिशु त्रैलोक्य रक्ष्मीनारायण त विनिर्जित्य सम्प्रवक्ष्यामि देवयान्युवाच त्तपस वाहाणो दु खान्मार्गमाण पार्षपर्वणी यजेदश्वमेधेन घरवर्णिनी शर्मिष्ठा पार्षपर्वणी शुचिस्मिते मन्युर्विद्यते भूणत्युच्यते याति 42. " ७३ ४ २० ६ ७८ ८ ७८ . ८० ८० ६ ८० इति २१ ह [ २ ] पृष्ठाड्ड। पङ्क्ति २२ २३ २३ , २६ २३ ८ अशुद्धपाठः प्रयन्ति पितणा पृथौ ततवन्द्रा मवाप्स्यसि भक्तिमन्त प्रसस्तानि माधिपत्ये कोकणान् त्राद्ध सपिण्डि मृद्धोपि शुद्धपाठ प्रयान्ति पितृणा पृथो ततश्चन्द्रा मघाप्स्यसि भक्तिमन्त प्रशस्तानि माधिपत्ये फोडणान् श्राद्ध सपिण्डी मृद्धोऽपि एव ८ १७ " ३६ ४० ४० " २५ ४२ ४२ ६ सकप्य ततृप्तये विविधह अकस्मत् तद्वक्यात् अभिनय पस्मिद् देय सङ्कल्प्य तत्तृप्तये विधिघद्ध अकस्मात् तहाश्चात् अभिनन्य फस्मिन् ૨૨ ४६ ५० हदे ভাদ " भगुने २५ [ ३ ] पृष्ठाडा पतिः २५ ४ ५४ २१ २० ५८ २० ११ अशुद्धपाठ मामखा तिलोदकालि घभूवु सोमोऽधच्छिशु लोवयं लक्ष्मीनाराय यनिर्जित्य सम्प्रवक्ष्मामि देवायान्युपाय त्तपम ब्राह्माणो दुःखात्मार्गवाण चापपर्पणी यजेदअश्वमेधेन घरपणिनी शर्मिष्ठ पार्षवणी शुचिस्मते मन्युविद्यते भूणहेतुच्यते पाति मेव शुद्धपाठ प्राङ्मुखा तिलोदकालि बभूवुः सोमोऽभवच्छिशु त्रैलोक्यं लक्ष्मीनारायणं तं विनिर्जित्य सम्प्रवक्ष्यामि देवयान्युपाच त्तपत ब्राह्मणो दु खान्मार्गमाण चार्यपर्वणी यजेदश्वमेधेन घरपर्णिनी शर्मिष्ठा पार्षपर्वणी शुचिस्मिते मन्युर्विद्यते भ्रूणहेत्युच्यते याति ६६ ११ है ४ २० ७८ ८ ७८ ५ ८० -- ८० १६ ૨૨ " इति [ ४, पृष्टाङ्काः पतिः शुद्धपाठ ग्रहीतुं ८१ अशुद्धपाठः गृहीतं शत्त्वा द्रा शप्त्वा " ६ स्वञ्च " पाप्पानं " २४ " यथास्थ राजपिः ८३ ४ . सहस्त्रं ८८ १३ ६० ६० १४ ६० स्वञ्च पाप्मानं यथार्थ राजर्षिः सहस्त्रं सप्तत्रिंशो प्लुतेन पुण्यकृत् अष्टत्रिंशो तन्नि.श्रेय नरेन्द्र तितिक्षा द्वीपेषु सहस्रणा पञ्चचत्वारिंशो अदृष्ट सात्वत मीदपम् कैकेय्यां ह्यमयं ६३ ६८ सप्तविंशो ल्पुतेन पुण्यकृन् त्रिंशो तन्निश्रेय नरेद्र तितीक्षा द्वीपेसु सहस्त्रेण पञ्चचत्वरिशो अदृष्ट सात्वद मीदुपम् कैकय्यां हाभयं आरण्या २ १०१ १०२ १०७ ३ १०८ १०६ २२ २५ भारण्याय [ ५ ] पृष्ठाड्डाः पति १२६ १२७ १३१ अशुद्धपाठः निवोधत निर्भत्स्य धामिकम् तमिन् स्तृत " ८ नपः १४० २३ ह्रदिनी प्रधाहणोग्नीऽध्र ह्यहिचुध्नो ह्यग्नि फर्मस्वस्थिता. शुद्धपाठ नियोधत निर्भर्त्य धार्मिकम् तस्मिन् स्मृतः स्मृतम् नृपः ह्रदिनी प्रवाहणोऽग्नीध्र ह्यहिर्बुध्न्यो ह्यग्नि फर्मास्यवस्थिताः युक्ताः कर्म प्रचिस्तरम् पुरुहूतवल्लभः प्रागुदक्प्रवणे सङ्गमाध्रद १२ १४१ १४२ २ १४२ ह्यका " १४४ ६ ३ १५८ प्रतिस्तरम् पुरुहुतघल्लम. प्रागुदक्प्रवणे संगमाद्धद किश्चत् भूमापरिन्दम् पञ्चगव्यञ्ज पिभो एचमस्त्यि १६२ २० किञ्चित् भूमावरिन्दम पञ्चगव्यश्च विभो एचमस्त्विति १० wr [६] पृष्ठाङ्काः पतिः २२ २२. अशुद्धपाठः मामेषु पक्ष्यामि भ्रयो श्रावयद्वापि पीडां वधुजनक्षयः ससप्तद्विपमखिलं कर्तl समन्वितां 8 शुद्धपाठः मासेषु पक्ष्यामि भ्रुधौ श्राषयेद्वाऽपि पीडा वंधुजनक्षयः ससप्तद्वीपमखिलं कर्तव्यं समन्वितान् नाशनं. धर्मशास्त्र २० १७७ 8 १० ह नाशन धर्माशास्त्र ११ ५ उघाच विविधानि १८६ १६० ६ राजन् २ १६१ १६१ उवाच विधिनानि राजत् ब्रह्मणाय देवपि सोम्य यामुप्पोष्य २० १६२ ब्राह्मणाय देवर्षि सोम्ये यामुपोष्य लवणं व्रतकथनं भुक्तिमुक्ति ४ लघण २०० ७ २०१ २०३ २०६ वकथनं मुक्तिमुक्ति मुर्द्धन्यपस्थान गुडत ७ मूर्धन्यपस्थान गुडपर्वत १० ५ [७] पृष्ठावाः पड्क्तिः २०८ .२ " २०६ २०६ ४ २११ २१२ २१४ ५ अशुद्धपाठः दद्याच्छर्व सप्ताशीतिमो नामोनवतितमो विश्वकम्भ सद्वव तृतीत. कृण्वन्नपि ग्रह संयुया कीकण्ठायेति लोकजुटम् त्पूरु दारिद तायत २० ११ शुद्धपाठः दद्याच्छर्यस्य सप्ताशीतितमो नामोननवतितमो विष्कम्भ सहैव तृतीयः कृण्वन्निति ब्रह्म संयुता श्रीकण्ठायेति लोकजुष्टम् त्यूरू दारिद्रय तावत् आसलाद महस्तदा ४ २२२ २२४ १२ २२८ २२ २२६ २० २२६ ૨૨ आसमाद महस्ता २३० २३१ ૨૨૨ २३६ २४४ पणनम् गवेत् घर्णनम् भवेत् २५ २१ तथ २४७ माहात्म्य २४८८ २२ महात्म्य फीतनात् सर्वग्रामसमृदै यांचा कीर्तनात् सर्पफामसमृद्ध २४ २२ यथया पृष्ठावा. पड्तितः २५२ [ ८ ] अशुद्धपाठ ब्रह्माणे ६ शुद्धपाठ ब्राह्मणे शास्त्र शास्त्र २५३ " महात्म्य ऋपयञ्च तिस्त्र देघानतर्ययत् यज्ञम्योऽपि " २५५ २५६ २५७ ર २६४ २६५ ह्यमयत स्वर्गापर्गाथ ७ २४ " माहात्म्य ऋपयश्च तित्रः देघानतर्पयत् यक्षेभ्योऽपि झुभयतः स्वर्गापवर्गाथ नघराष्ट्रा जाम्बूनद त्रयस्त्रिंशत् सकान्त खमुल्लिखद्धि भल्लातकैरिन्द्रय मन्दाकिनी गिरी ब्रह्मोत्तराश्च णित बाह्यत ह्यालोक पार्थिव यात्यविलम्वत १० नवरराष्ट्रा जावूनदं त्रयस्त्रिशत् सक्रान्त्र खमुलिदि भल्लातकैरिन्द्रिय मन्दकिनो शिरी २६८ २६६ २७१ ५ १२ २८० २८१ २८२ २८८ ८ २६२ २० ब्रह्मात्तराश्च पणित चाह्यत ह्यलोक पाथिय यात्यबिलम्बत ८ ૨૬૩ २६३ २० २६४ ८ पृष्ठाङ्काः पङ्क्तिः ३२६ ३२७ शुद्धपाठः द्रविणाधिपतिालं दृश्यन्ते गिरीन्द्र २१ ४ ३ तारकाख्या ३३५ २१ ३४१ ३४४ ७ ३ ३ अशुद्धपाठः द्रविणधिपव्यिाल दृश्यन्ने गिरन्द्र तारकाख्य खर्ग निपेस्तुस्ते साधयन्त्वपरे कालाम्बदाभाः चन्द्रःचंद्रश्च ज्यत्स्नापूर्णे गृहमात्मनमेवव सन्दोलनादुच्छसित तेचासीन पटिशानच्छक्तीः विनिष्क्रम्येशति तमिस्त्रिपुरे पितन् एतदिच्छाामहे युगाल्मकाः मध्येर्तयो पूर्णिमा क्षुतपिपासा प्राप्ति २ ३४७ ३४७ • खगे निपेतुस्ते साधयन्त्यपरे कालाम्बुदामाः चन्द्रश्चन्द्र ज्योत्स्नापूर्णे गृहमात्मानमेवच सन्दोलनादुच्छ्वसिते तेचासन् पट्टिशान्तीः विनिष्क्रम्यरशक्ति तस्मिस्त्रिपुरे पितृन् एतदिच्छामहे युगाल्पकाः मध्येतयो २२ ३४७ ૨૨ ३४६ ३५० ३५२ २३ पूर्णिमा क्षुत्पिपासा प्राप्तिः ३ ३५७ ३५७ ..
'[ ११ ] पृमाका पतिः अशुद्धपाठ स्वायम्भवे महारा धति अशातिश्चय me me8 शुद्धपाठ स्वायम्भुधे अहोराने थुति अशीतिश्चैव " ६ " १२ કર भद्राणामानि भाव अर्थशास्त्रयिकल्पाश्च पर्णाश्रमाचारी घेदायत्वा ऋजो निष्टन्तात् २० भद्राणीमानि माया अर्थशास्त्रविकरपाश्च घर्णाश्रमाचारो वेदयित्वा वो निष्ठान्तात् तपता " २१ " २४ " ६ तप्यता ૩૭૪ ३८० ३८६ कश्यपश्च घार्जियते कश्यप घानार्जयते ३ ૨૮૮ गदहस्ता रवि गदाहस्ता रपि ३८६ २० कृत त्वरिती सुनाव ४ त्वारतो मुस्नाय निशाचारयलानुग मातमलि नीडादपातयात् ३६६ ३६६ निशाचरयलानुग मूर्तिमन्ति नीडादपातयत् २१ [ १० ] पृष्ठावाः पतिः २ २१ ३२६ ३२७ ३३१ ३३३ ४ ११ ३३५ २१ ३४४ ३४५ ३४५ अशुद्धपाठ द्रषिणाधिपञ्यिाल दृश्यन्ने गिरन्द्र तारकाख्य खगै निपेस्तुस्ते साधयन्त्वपर कालाम्बदामा चन्द्र चद्रश्च ज्यत्स्नापूर्णे गृहमात्मनमेवव सन्दोलनादुच्छसिते तेचासीन पटिशानच्छक्तीः विनिष्क्रम्येशक्ति तमिस्त्रिपुरे पितन् एतदिच्छाामहे युगाल्मफा. मध्येर्तयो पूर्णिमा क्षुपिपासा মাধি शुद्धपाठः विणाधिपतिाल दृश्यन्ते गिरीन्द्र तारकाख्या खगे निपेतुस्ते साधयन्त्यपरे कालाम्बुदामा. चन्द्रश्चन्द्र ज्योत्स्नापूर्ण गृहमात्मानमेवव सन्दोलनादुच्छ्वसिते तेचासन् पट्टिशाक्ती विनिप्फम्यरशक्ति तस्मिस्त्रिपुरे पितृन् एतदिच्छामहे युगाल्पका मध्येतयो पूर्णिमा क्षुत्पिपासा प्राप्ति. ૨ ३४७ ३४७ ૨૨ २२ ३४६ ३५२ ૨૨ ૨૩ ३५३ १७ H ३५७ ३५७ [ १३ ] पृष्ठाङ्कः पतिः यशुद्धपाठः प्रत्तुङ्ग ४६० ४६१ ४६२ २० " ૨૨ ४६७ २४ २० ४७० १२ 40 ४७१ ४७१ शुदपाठः प्रोत्तुङ्ग देवी वास्तु यथा त्वय्युपपद्यते गृहित्वोपस्थिता चिनैश्च सर्वकामदम् आदिकर्ता अवध्यमरेन्द्राणा जराशोकलमोपेतां स्फाटिकाभैश्च चन्दन हाँ मृगेन्दो त्रैलोक्यदहनं दिव्यानि नृसिंहरूपिणा समद्युतिः जातरूपमये पुरधापि विधीयते पद्भ्यां ४७२ देवा चस्तु यंथा त्वय्युगपद्यते गृहत्योपस्थिता चिनेश्व सबकामदम् आदिकर्ता अवध्यममरेन्द्राण जराशोकनमापेतां स्फाटिकामेश्च बदन हर्षा मृगेन्द्रा त्रैलाक्पदहनं दिव्याणि मसिहरूपिणा समुद्यती जातरूपमय पुरस्चमापि विधायते पदम्यां 9 ७ ४७५ ४ 9 " २२ ४७६ १५ ४७८ ४८० ८ ४८० १६ ४८४ ४८४ [ १२ ] पृष्ठाङ्काः पतिः ૨૨ शुद्धपाठः रथादाप्लुत्य २२ " ૨૨ २२ ३६८ अशुद्धपाठः रथादाप्लत्य खङ्गं शकेन, केपाश्चिदपातयच्च तदकाशगतं प्रवृद्धानलतुल्यदीप्ति द्रढमुष्टिपात मस्त्यपुराणे प्रसानसी ४०४ २४ ४ ४०५ ४०६ ४०७ ४०६ १३ व्याम ४१२ ४१६ ४१७ ४१८ चर्मचोदयखण्डेन्दुदशकेन केषांचिदपातयच तदाकाशगतं प्रवृद्धानलतुल्यदीप्तिः दृढमुष्टिपात मत्स्यपुराणे प्राशानसी व्योम चतुयोजनविस्तीर्ण शास्त्रार्थः शरैरग्निकल्प विभुम् गिरिपुच्या जन्मनः नयिष्यति विविक्तपु कर्मभिर्विस्मयं भोमर्महाबलः जीर्णोद्यानेषु दत्तकों देव्याः किङ्किणी ६ ४२२ २ चतुर्याजनविस्तीर्ण शास्रार्थः शरैइग्निकल्पैः विमुम् गिरपुच्या जम्मन नयिस्यति विवक्तपु कर्मभिविस्मयं भीमैमहाबलः जीर्णाद्यानेषु दतकर्णा देयाः किड्डीण ४४० ४ ४४६ ४५० ४५१ ४५१ २ ४५२ ४५२ २५ [ १३ ] पृष्ठाड्डाः पतिः ४५३ २१ शुद्धपाठः प्रोत्तुङ्ग देवी वास्तु ४६० ३ २० यथा ४६२ २२ ४६७ २४ २० ४७० ६ ४७१ ४७१ १४ अशुद्धपाठः प्रत्तुङ्ग देवा चस्तु यंथा त्वय्युगपद्यते गृहत्वोपस्थिता चित्रेश्च सवकामदम् आदिकर्ता अवध्यममरेन्द्राणं जराशोकलमापेतां स्फाटिकामेश्च चदन हर्षा मृगेन्द्रा त्रैलारसदहनं दिव्याणि नसिहरूपिणा समुद्यती जातरूपमय पुष्यमापि विधायते पदभ्यां ४७२ ७ ७ ४७५ ४ त्वय्युपपद्यते गृहित्वोपस्थिता चित्रश्च सर्वकामदम् आदिकर्ता अवध्यमरेन्द्राणां जराशोफक्लमोपेतां स्फाटिकाभैश्च चन्दन हों मृगेन्द्रो बैलोक्पदहन दिव्यानि नृसिंहरूपिणा समद्युतिः जातरूपमये पुरचापि विधीयते पद्भ्यां २२ ४७५ ४७६ ४५८ १ ४८० ४८० ४८४ [ १४ ] पृष्ठाङ्काः पङ्क्तिः ४८५ ૨૨ ४८७ ६ ४८७ शुद्धपाठः पर्वतानाच एकार्णधी ग्रावस्तुतन्तु अङ्गिरसम्मनुम् चक्षु ४६७ ११ ४६८ ४६६ ६ ५०० ६ अशुद्धपाठः पर्वतनाच एफार्णपोभूते ग्रायस्तुतन्तु अंगिरन्मनुम् चक्ष पौष्करी सोऽसृजन् श्रुत्या प्रकृत्तधर्माः अभिसंर्यात् निर्मक्त कृष्णवर्णा महेन्द्रणा सौर्चा ५०१ ५०२ ५०३ ५०५ ५०५ ५०६ ५०६ पौकरो सोऽसृजत् श्रुत्वा प्रवृत्तधर्माः अभिसंमत निक्कै कृष्णवर्णाभो महेन्द्रेण ओ! २३ ७ श्लणया ५१२ १० ८ मायामसूत् तियगूध्वं छिन्नभिन्न क्षिपन्नारयणं पद्भ्याक्रम्य पाहश्चमेण कालनेमिमुखा श्लक्ष्णया मायामसृजत् तिर्यगृध्य श्छिन्नभिन्न क्षिपन्नारायणं पद्भ्यमाकम्य बाह चक्रण फालनेमिमुखा पद्मोद्धपः ५१६ " ५२० पद्मोन [ १५ ] पतिः अशुद्धपाठः तथैग राक्षसा २१ १४ कुन्दश दुसप्रभः सुगन्धिमि महीरहै विघूणित पुलारिविन्दरचितं २० इक्ष शरारस्य तथी पापप्राशिनीम् पुण्यमुत्तम् मान्त्व शुद्धपाठः तर्थव राक्षसी कुन्दशंखेन्दुसप्रभः सुगन्धिभिः महीरुहै विधुणित फुल्लारचिन्दरचितम् इह शरीरस्य तस्थो पापप्रणाशिनीम् पुण्यमुत्तमम् मान्त्वं चर घरणिनि तड़ागानां हटमनसः कर्णिकाम् १५ १२ रचर घरपणिनि ४ तडाना २१ १८ उवाच हदमनस. कणिकाम् चचाच पापकारिणा पवनमत्रतीत् प्रय परस्त्रीमि पापकारिणी घचनमब्रवीत् ४ प्रयत परस्त्रीमिः [ १६ ] पृष्ठाका पति २१ ६ १६ २१ ५७१ २१ " ८ ५७४ अशुद्धपाठ गच्छत्तु मार्गा त्रयोदस्यान्तु तार्थ यमाश्चैव पर्गसिद्धि प्रीयता तीर्थप्रभाषण तत्तीथस्य तर्पण मच्यते अचित समारेत् फतिकस्य सापणिफस्य ८ ५७४ ८ ५७५ " शुद्धपाठ गच्छेतु मार्गों त्रयोदश्यान्तु तीर्थ यमश्चैव परासिद्धि प्रीयेता तीर्थप्रभावेण तत्तीर्थस्य तर्पण र्मुच्यते अर्चित समाचरेत् पार्तिफस्य सापर्णिफस्य भृगु राहुपर्णि परिपीर्तिता प्रीतित परिपीर्तितन श्येतानि गृपारमन धर्मा " २५ ५७६ २५ ५८० २१ ८ ५८३ ५८५ ५८६ . २ २२ ५८७ ૨૨ मृगु रामुफणि परिपीर्तिता प्रीतित परिकीर्तितेन नेतानि नपामज धर्मा ५८८ २२ .
[ १७ ] पृष्ठाकाः पतिः १५ २३ शुद्धपाठः विधान व्यवहारेषु राजकृत्यधर्णनम् गुडानाञ्च सैन्धवो - દૂર ६२४ ६२५ ६२७ ४ ७ ८ ६३१ ६ अशुद्धपाठ विधानाक्ष व्ययहारेषु राजकुत्यपर्णनम् गुडानाच सैन्धी भूतत् सर्पपाः घृतप्ठतम् श्युद्योग पर्युपितो मवतीह लोकानुग्रह मर्थना ध्वेजयटिना पाथिव ब्राह्मा नामोनन ऋत्विाम्य शत्रू साधाणणी स्पन्दञ्चैव सिंहाना पर्थिव! ७ ६४२ ६ सर्पपा. घृतप्लुतम् क्षुद्योगः पर्यपितो भवतीह लोकानुग्रह अथैना ध्वजयटिनां पार्थिव ब्राह्मी नामोन ऋत्विाभ्य মান্ত বাঘা स्पन्दनञ्चैध सिंहीना पार्थिव! " २३ १५ ४ १८ ३ * श्री गणेशाय नमः * विनम्र निवेदन ईशावास्यमिद सर्व यत्किञ्च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः मागृधः फस्य खिद्धनम् ॥ (शुक्ल यजुर्वेद अध्याय ४० मन्त्र १) ईश्वर का आदेश है कि सृष्टि के सारे प्राणी मेरी ही आत्मा है । ज्ञ द्वारा प्राणीमात्र की पूर्णरूपेण रक्षा का ध्यान रखते हुए अपना भोग-जं प्रकृति द्वारा निर्दिए किया हुआ है-भोगो। (किसी की भी हिंसा मतं सभी प्राणी सृष्टि की परिचर्या में पूर्णरूपेण सहायक, है ।) किसी भी प्राण शक्ति (दूध) को हरण करने की मन में भावना भी न आने दो इसी में फल्याण है । “अथ त्रिविध दु खात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्तः पुरुषार्थः" परमात्मा के । का पालन करने से ही त्रिविध दुःखों की निवृत्ति होगी इसी में मानव जी 'सार्थकता एवं सफलता निहित है। "तस्माच्छास्त्रं प्रमाणाम्" । सत्व, रजस् और तमोगुण की साम्यावस्था के गुणों का अधिष्ठान है प्रकृति परमाशक्ति के रूपमें और प्रधान पुरुष सदाशिव के रूप में अभिव्यक्त है उन्हींकी इच्छानुसार त्रिगुणात्मिफासृष्टि का फ्रम यरायर चलता रहता है। इस में सत्य गुण प्रधानता से मानघ फी, रजोगुण प्रधानतासे पशु पक्षीकी और त प्रधानता से फीट पतङ्गादि की उत्पत्ति हुई। ये सब मानव के अविभाज्य में अतः प्राणीमात्र फी पूर्णरूपेण रक्षा फरते हुए अपनी शक्ति (आत्मयत वृद्धि करना ही मानव जीवन का परम लक्ष्य है। "फामये दुःसतप्ताना प्राणिनामातिनाशनम्" आपका सेप सेपर "नसुखरार नखरा ५, हाइप रो, फलफत्ता।
[ १५ ] पतिः २१ अशुद्धपाठः तथग राक्षसा कुन्दशङ्ग्रेसप्रभः सुगन्धिमि महीरहै विघूणित फुलारिविन्दरचितं शुद्धपाठः तथेच राक्षसी कुन्दशंखेन्दुसप्रमः सुगन्धिभिः महीरहै विघूर्णित फुल्लारविन्दरचितम् १४ २० ૨૩ शरारस्य तथी पापप्राशिनीम् पुण्यमुत्तम् मान्त्य शरीरस्य तस्थी पापप्रणाशिनीम् पुण्यमुत्तमम् मान्त्वं १८ ४ २१ घरवणिनि तडानां हृदमनसः कणिकाम् चवाच पापकारिणा घवनमव्रतीत् प्रयः परस्त्रीमिः घरपणिनि तड़ागानां हष्टमनसः फर्णिकाम् उवाच पापकारिणी घवनमत्रवीत् प्रयत: ६ errt [ १७ ] पृष्ठाडाः पतिः २३ w ६२२ ६२४ ६२५ ६२७ ६२८ ६३० ६ ४ ७ ६ ८ अशुद्धपाठ विधानाक्ष व्ययहारेषु राजकुत्यपर्णनम् गुडानाश्च सैन्धी भूतत् सर्पपाः घृतमृतम् भ्युद्योगः पऍपितो मवतीह लोकानुग्रह मथैना ध्वेजयष्टिनां पाथिच ब्राह्मा नामोनन ऋत्विग्भ्यः १२ ६ शुद्धपाठः विधान ध्यवहारेषु राजकृत्यवर्णनम् गुड़ानाच सैन्धवो भूत सर्पयाः घृतप्लुतम् क्षुद्योगः पर्युषितो भवतीह लोकानुग्रह अर्थना ध्वजयष्टिनां पार्थिव घ्राह्मी नामोन ऋत्विग्भ्य शत्रु साधारणी स्पन्दनञ्चैव सिंहीना ६३६ ७ " २३ १६ ६ १८ साधाणणी स्पन्दञ्चैव सिंहाना पर्थिव ! ३ १४ पार्थिव!
पृष्टाङ्काः पक्तिः २१ ६ ५७१ " ५७४ अशुद्धपाठः गच्छत्तु मार्गा त्रयोदस्यान्तु तार्थ यमाश्चैव परसिद्धि प्रीयता तीर्थप्रभावण तत्तीथस्य तर्पण मच्यते अचित समारत् कतिकस्य सावणिफस्य ५७४ ८ " शुद्धपाठः गच्छेत्तु मार्गों त्रयोदश्या तीर्थ यमश्चैव परांसिक्षि प्रीयेतां तीर्थप्रमा तत्तीर्थस्य तर्पण मुच्यते अर्चित. समावरेत कार्तिफर ৰাখিs भृगु राहुफर्णि परिफी प्रकीर्तित परिकीनि श्वेतानि नृपात्मज ५७८ २५ ८७६ २५ . २ ५८७ २२ २२ राहुकणिः परिकीर्तिता प्रफीतित परिफीर्तितेन इनेतानि नपात्मजः धर्मा २२ ६०३ धर्मा - [ १७ ] पृष्ठाका पड्कि ६१२ ૨૨ शुद्धपाटः विधान व्यवहारेषु राजरत्यवर्णनम् गुडानाच सैन्धवो ६ ६२४ ६२५ ६२७ १८ ६ ४ ६३० ७ ८ ૧૨ ६३४ अशुद्धपाठ विधानास व्ययहारेषु राजकुत्यवर्णनम् गुडानाच सैन्धी भूतत् सर्पपा घृतप्पतम् क्ष्युद्योग पर्पपितो मवतीह लोकानुग्रह मर्थना ध्वेजयष्टिना पाथिय ब्राह्मा नामोनन त्यिग्म्य আৰু साधाणणी स्पन्दञ्चैव सिंहाना पर्थिव ७ કંકર 8 सर्पपा घृतप्लुतम् क्षुद्योग पर्युषितो भवतीह लोकानुग्रह अथैना ध्वजयटिना पार्थिव ग्राह्मी नामोन ऋत्विग्म्य হার साधारणी म्पन्दनञ्चैव सिंहीना पार्थिव " ४ M ३ [११] मसुदपाठः नियोजेत् मार्ग . १२ २३ ६ नपः फतिमि शुद्धपाठः नियोजयेत् मञ्जरी घेक नृपः कीर्तयिष्ये दुध्य पापफाँघ. दामपत् लॉक मुद्यारये लोकेशा विपुषादिषु सहस्रेण माधारभ्यः पितृ माहात्म्यं . पापफौघ. दानघत लाफ मुशाये लोकेश विपुषादिषु सहस्त्रेण माधारैम्यः ३ २१ २१ प्रित महात्म्य १६ इति श्री मत्स्यपुराणस्य शुद्धिपत्रं समाप्तम् ॐ तत्सद् ब्रह्मार्पणमस्तु # श्री गणेशाय नमः * , -- विनम्र निवेदन ईशावास्यमिद सर्व यत्किञ्च जगत्या जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मागृध फस्य विद्धनम् ॥ (शुक्ल यजुर्वेद अध्याय ४० मन्त्र १) ईश्वर का आदेश है कि साप्ट के सारे प्राणी मेरी ही आत्मा है । द्वारा प्राणीमात्र की पूर्णरूपेण रक्षा का ध्यान रखते हुए अपना भोग प्रकृति द्वारा निर्दिष्ट किया हुआ है-भोगो। (किसी की भी हिंसा मत सभी प्राणी सृष्टि की परिचर्या में पूर्णरूपेण सहायक, है । ) किसी भी प्राप शक्ति (दूध ) को हरण करने की मन में भाषना भी न आने दो इसी में कल्याण है । “अथ त्रिविध दु खात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्त पुरुषार्थः” परमात्मा के का पालन करने से ही विविध दुखों की निवृत्ति होगी इसी में मानव जीव' 'सार्थकता एव सफलता निहित है। "तस्माच्छास्त्र प्रमाणम्" । सत्व, रजस् और तमोगुण की साम्यावस्था के गुणों का अधिष्ठान ही प्रकृति परमाशक्ति के रूपमें और प्रधान पुरुष सदाशिव के रूप में अभिव्यक्त हो उन्होंकी इच्छानुसार त्रिगुणात्मिका सृष्टि का क्रम वरावर चलता रहता है । इस में सत्व गुण प्रधानता से मानय की, रजोगुण प्रधानतासे पशु पक्षीकी और तमं प्रधानता से कीट पतङ्गादि की उत्पत्ति हुई। ये सब मानव के अविभाज्य अडू अत प्राणीमात्र की पूर्णरूपेण रक्षा करते हुए अपनी शक्ति ( आत्मवल वृद्धि करना ही मानव जीवन का परम लक्ष्य है। "कामये दुखतप्ताना प्राणिनामातिनाशनम्" आपका सेवक- मनसुसराय मोर --- 1 ५, क्लाइघ रो, कलकत्ता।