Adarsh Library, Jaipur

Shri Bhagwat Geeta Sadharan Paduch

2011/03

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श्रीपरमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता
पदच्छेद-अन्वय
और
साधारणभापाटीकासहित
त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
स्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेय
स्वमेव सर्व मम देवदेव ।।
गीताप्रेस, गोरखपुर
B5

मुद्रक तथा प्रकाशक
मोतीलाल जालान
गीताप्रेस, गोरखपुर

श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगीताजीकी महिमा
बास्तबमें श्रीमद्भगवद्गीताका माहात्म्य वाणीद्वारा वर्णन
करनेके लिये किसीका भी सामर्थ्य नहीं है, क्योंकि यह
एक परम रहस्यमय ग्रन्थ है । इसमें संपूर्ण वेदोंका सार सार
संग्रह किया गया है, इसका संस्कृत इतना सुन्दर और सरल
है कि थोड़ा अभ्यास करनेसे मनुष्य उसको सहज ही
समझ सकता है, परन्तु इसका आशय इतना गम्भीर है कि
आजीवन निरन्तर अभ्यास करते रहनेपर भी उसका अन्त
नहीं आता । प्रतिदिन नये नये भात्र उत्पन्न होते रहते हैं
इससे यह सदा ही नवीन बना रहता है । एवं एकाग्रचित्त
होकर श्रद्धा, भक्तिसहित विचार करनेसे इसके पद पढ़में
परम रहस्य भरा हुआ प्रत्यक्ष प्रतीत होता है । भगवान्के
गुण, प्रभाव और मर्मका वर्णन जिस प्रकार इस गीताशास्त्रमें
किया गया है, वैसा अन्य ग्रन्थों में मिलना कठिन है; क्योंकि
प्रायः ग्रन्थोंमें कुछ न कुछ सांसारिक विषय मिला रहता है,
परन्तु "श्रीमद्भगवद्गीता" एक ऐसा अनुपमेय शास्त्र भगवान्-
ने कहा है कि जिसमें एक भी शब्द सदुपदेशसे खाली नहीं
है। इसीलिये श्रीवेदव्यासजीने महाभारतमें गीताजीका वर्णन
करनेके उपरान्त कहा है कि-
,
--

(४) गीता सुगीता कर्तव्याकिमन्यैः शास्त्रविस्तरैः। या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता॥ गीता सुगीता करने योग्य है, अर्थात् श्रीगीताजीको भली प्रकार पढ़कर अर्थ और भावसहित अन्तःकरणमें धारण कर लेना मुख्य कर्तव्य है, जो कि स्वयं श्रीपद्मनाभ विष्णु भावान्के मुखारविन्दसे निकली हुई है, ( फिर ) अन्य शास्त्रोंके विस्तारसे क्या प्रयोजन है ? तथा स्वयं भगवान्ने भी इसका माहात्म्य अन्तमें वर्णन किया है (अ० १८ श्लो. ६८ से ७१ तक)। इस गीताशास्त्रमें मनुष्यमात्रका अधिकार है चाहे वह किसी भी वर्ण, आश्रममें स्थित होवे, परन्तु भावान्में श्रद्धालु और भक्तियुक्त अवश्य होना चाहिये, क्योंकि अपने भक्तोंमें ही इसका प्रचार करनेके लिये भगवान्ने आज्ञा दी है तथा यह भी कहा है कि स्त्री, वैश्य, शूद्र और पापयोनि- वाले मनुष्य भी मेरे परायण होकर परमगतिको प्राप्त होते हैं (अ० ९ श्लो. ३२ ) एवं अपने अपने स्वाभाविक कर्मोद्वारा मेरी पूजा करके मनुष्य परमसिद्धिको प्राप्त होते हैं (अ० १८ लो० ४६ )। इन सबपर विचार करनेसे यही ज्ञात होता है कि, परमात्माकी प्राप्तिमें सभीका अधिकार है। परन्तु उक्त विषयके मर्मको न समझनेके कारण बहुत-से मनुष्य जिन्होंने श्रीगीताजीका केवल नाममात्र ही सुना वे कह दिया करते हैं कि गीता तो केवल संन्यासियोंके लिये ही है और वे अपने बालकोंको भी इसी भवसे श्रीगीताजीका ,

,
अभ्यास नहीं कराते कि गीताके ज्ञानसे कदाचित् लड़का
घर छोड़कर संन्यासी न हो जाय, किन्तु उनको विचार करना
चाहिये कि मोहके कारण अपने क्षात्रधर्मसे विमुख होकर
भिक्षाके अन्नसे निर्वाह करनेके लिये तैयार हुए अर्जुनने
जिस परम रहस्यमय गीताके उपदेशसे आजीवन गृहस्थमें
रहकर अपने कर्तव्यका पालन किया, उस गीताशास्त्रका
यह उल्टा परिणाम किस प्रकार हो सकता है ।
अतएव कल्याणकी इच्छाबाले मनुष्योंको उचित है कि
मोहको त्याग करके अतिशय श्रद्धा, भक्तिपूर्वक अपने
बालकोंको अर्थ और भावके सहित श्रीगीताजीका अध्ययन
करावे, एवं स्वयं भी इसका पठन और मनन करते हुए
भगवानकी आज्ञानुसार साधन करनेमें तत्पर हो जायं;
क्योंकि अति दुर्लभ मनुप्यके शरीरको प्राप्त होकर अपने
अमूल्य समयका एक क्षण भी दुःखमूलक क्षणभंगुर भोगोंके
भोगनेमें नष्ट करना उचित नहीं है ।
श्रीगीताका प्रधान विपय
श्रीगीताजीमें भगवान्ने अपनी प्राप्तिके लिये मुख्य दो
मार्ग बताये हैं। एक सांख्ययोग, दूसरा कर्मयोग । उनमें-
(१) संपूर्ण पदार्थ मृगतृष्णाके जलको भांति अथवा
स्वप्नकी सृष्टिके सदृश मायामय होनेसे मायाके कार्यरूप
संपूर्ण गुण ही गुणोंमें वर्तते हैं ऐसे समझकर मन, इन्द्रियों
और शरीरद्वारा होनेवाले संपूर्ण कोंमें कर्तापनके अभिमानसे

(६) , रहितहोना (अ. ५श्लोक ८, ९) तथासर्वव्यापीसच्चिदानन्दघन परमात्माके स्वरूपमें एकीभावसे नित्य स्थित रहते हुए एक सच्चिदानन्दघन वासुदेवके सिवाय अन्य किसीके भी होनेपनेका भाव न रहना । यह तो सांख्ययोगका साधन है । ( २ ) और सब कुछ भगवान्का समझकर सिद्धि, असिद्धिमें समत्वभाव रखते हुए आसक्ति और फलकी इच्छाका त्याग करके भगवत्-आज्ञानुसार केवल भगवान्के ही लिये सब कोंका आचरण करना । (अ०२श्लो०४८,अ. ५ श्लो०१०) तथा श्रद्धा, भक्तिपूर्वक मन, वाणी और शरीरसे सब प्रकार भगवान्के शरण होकर नाम, गुण और प्रभाव- सहित उनके स्वरूपका निरन्तर चिन्तन करना-(अ०६श्लो. ४७)। यह निष्काम कर्मयोगका साधन है। उक्त दोनों साधनोंका परिणाम एक होनेके कारण वास्तवमै अभिन्न माने गये हैं (अ० ५श्लो० ४,५), परन्तु साधनकालमें अधिकारीभेदसे दोनोंका भेद होनेके कारण दोनों मार्ग भिन्न-भिन्न बताये गये हैं (अ. ३ श्लो. ३) इसलिये एक पुरुष दोनों मार्गाद्वारा एक कालमें नहीं चल सकता, जैसे श्रीगङ्गाजीपर जानेके लिये दो मार्ग होते हुए भी एक मनुष्य दोनों मार्गोंद्वारा एक कालमें नहीं जा सकता। उक्त साधनोंमें कर्मयोगका साधन संन्यास आश्रममें नहीं बन सकता, क्योंकि संन्यास आश्रममें कर्मोंका स्वरूपसे भी (७) . त्याग कहा है और सांख्ययोगका साधन सभी आश्रमों में F बन सकता है। यदि कहो कि, सांख्ययोगको भगवान्ने संन्यासके नामसे कहा है, इसलिये उसका संन्यास आश्रममें ही अधिकार है, गृहस्थमें नहीं, तो यह कहना ठीक नहीं है। क्योंकि दूसरे अध्यायमें श्लोक ११ से ३० तक जो सांख्य- निष्ठाका उपदेश किया गया है उसके अनुसार भी भगवान्ने जगह जगह अर्जुनको युद्ध करनेकी योग्यता दिखायी है। यदि गृहस्थमें सांख्ययोगका अधिकार ही नहीं होता तो इस प्रकार भगवानका कहना कैसे बन सकता ? हां, इतनी विशेषता अवश्य है कि सांख्यमार्गका अधिकारी देहाभिमानसे रहित होना चाहिये । क्योंकि जबतक शरीरमें अहंभाव रहता है, तबतक सांख्ययोगका साधन भल्लीप्रकार समझमें नहीं आता । इसीसे भगवान्ने सांख्ययोगको कठिन बताया है (गीता अ० ५ श्लो० ६ ) और निष्काम कर्मयोग साधनमें सुगम होनेके कारण अर्जुनके प्रति जगह जगह कहा है कि, तूं निरन्तर मेरा चिन्तन करता हुआ निष्काम कर्मयोगका आचरण कर । अथ ध्यानम् शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् ।। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्य वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥

,
(८)
अर्थ-जिसकी आकृति अतिशयशान्त है,जो शेषनागकी
शय्यापर शयन किये हुए है, जिसकी नाभिमें कमल है, जो
देवताओंका भी ईश्वर और संपूर्ण जगत्का आधार है, जो
आकाशके सदृश सर्वत्र व्याप्त है, नीलमेघके समान जिसका
वर्ण है, अतिशय सुन्दर जिसके संपूर्ण अङ्ग हैं, जो योगियों-
द्वारा ध्यान करके प्राप्त किया जाता है, जो संपूर्ण लोकोंका
स्वामी है, जो जन्ममरणरूप भयका नाश करनेवाला है, ऐसे
श्रीलक्ष्मीपति, कमलनेत्र विष्णु भगवानको मैं ( शिरसे )
प्रणाम करता हूं।
यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तदै-
वैदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः ।
ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो
यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥
अर्थ-ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र, रुद्र और मरुद्गण दिव्य स्तोत्रों-
द्वारा जिसकी स्तुति करते हैं, सामवेदके गानेवाले अङ्ग, पद,
क्रम और उपनिषदोंके सहित वेदोंद्वारा जिसका गायन करते
हैं, योगीजन ध्यानमें स्थित तद्गत हुए मनसे जिसका दर्शन
करते हैं, देवता और असुरगण ( कोई भी ) जिसके अन्तको
नहीं जानते उस ( परम पुरुष नारायण) देवके लिये मेरा
नमस्कार है।

श्रीपरमात्मने नमः श्रीमद्भगवद्गीताके प्रधान विषयोंकी अनुक्रमणिका अर्जुनविषादयोग नामक पहिला अध्याय ॥१॥ श्लोक विश्य १-११ दोनों सेनाओंके प्रधान प्रधान शूरवीरोंकी गणना और सामर्थ्यका कथन । १२-१९ दोनों सेनाओंकी शङ्खध्वनिका कथन । २०-२७ अर्जुनद्वारा सेनानिरीक्षणका प्रसङ्ग । २८-४७ मोहसे व्याप्त हुए अर्जुनके कायरता, स्नेह और शोकयुक्तं वचन । सांख्ययोग नामक दूसरा अध्याय ॥२॥ १-१० अर्जुनकी कायरताके विषयमें श्रीकृष्णार्जुनका संवाद । ११-३० सांख्ययोगका विषय ।

श्रीमद्भगवद्गीता ++ श्लोक विषय ३१-३८ क्षात्रधर्मके अनुसार युद्ध करनेकी आवश्यकताका निरूपण । ३९-५३ निष्कामकर्मयोगका विषय । ५४-७२ स्थिरबुद्धि पुरुषके लक्षण और उसकी महिमा । कर्मयोग नामक तीसरा अध्याय॥३॥ १-८ ज्ञानयोग और निष्काम कर्मयोगके अनुसार अनासक्तभावसे नियतकर्म करनेकी श्रेष्ठताका निरूपण । ९-१६ यज्ञादि कर्म करनेकी आवश्यकताका निरूपण । १७-२४ ज्ञानवान् और भगवान के लिये भी लोकसंग्रहार्थ कर्म करनेकी आवश्यकता । २५-३५ अज्ञानी और ज्ञानवान्के लक्षण तथा रागद्वेषसे रहित होकर कर्म करनेके लिये प्रेरणा । ३६-४३ कामके निरोधका विषय । ज्ञानकर्मसंन्यासयोग नामक चौथा अध्याय ॥४॥ १-१८ सगुण भगवान्का प्रभाव और निष्काम कर्मयोगका विषय ।

अनुक्रमणिका श्लोक দ্বিা १९-२३ योगी महात्मापुरुपोंके आचरणऔर उनकी महिमा २४-३२ फलसहित पृथक पृथक यज्ञोंका कथन । ३३-४२ ज्ञानकी महिमा । कर्मसंन्यासयोग नामक पांचवां अध्याय ॥५॥ १-६ सांख्ययोग और निष्काम कर्मयोगका निर्णय । ७-१२ सांख्ययोगी और निष्काम कर्मयोगीके लक्षण और उनकी महिमा । १३-२६ ज्ञानयोगका विपय । २७-२९ भक्तिसहित ध्यानयोगका वर्णन । आत्मसंयमयोग नामक छठा अध्याय ॥६॥ १-४ निष्काम कर्मयोगका विषय और योगारूढ़ पुरुषके लक्षण । ५-२० आत्म उद्धारके लिये प्रेरणा और भगवन-याति- वाले पुरुषके लक्षण। ११-३२ बिस्तारसे ध्यानयोगका विषय । ३३-३६ मनके नित्रहका विश्य । ३७-४७ योगन्नष्ट पुनपरी गतिका बयन- योगीकी नदिन। 5 १२ श्रीमद्भगवद्गीता -- विषय श्लोक ज्ञानविज्ञानयोग नामक सातवां अध्याय॥७॥ १-७ विज्ञानसहित ज्ञानका विषय । ८-१२ संपूर्ण पदाथोंमें कारणरूपसे भगवान्की व्यापकताका कथन । १३-१९ आसुरी खभाववालोंकी निन्दा और भगवद्भक्तोंकी प्रशंसा। २०-२३ अन्य देवताओंकी उपासनाका विषय । २४-३० भगवान्के प्रभाव और स्वरूपको न जानने- वालोंकी निन्दा और जाननेवालोंकी महिमा । अक्षरब्रह्मयोग नामक आठवां अध्याय॥८॥ -७ ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादिके विषयमें अर्जुनके सात प्रश्न और उनका उत्तर । ८-२२ भक्तियोगका विषय । २३-२८ शुक्ल और कृष्ण मार्गका विषय । राजविद्याराजगुह्ययोग नामक नवां अध्याय ॥९॥ १-६ प्रभावसहित ज्ञानका विषय । ७-१० जगत्की उत्पत्तिका विषय ।

अनुक्रमणिका श्लोक विषय ११-१५ भावान्का तिरस्कार करनेवाले आसुरी प्रकृति- वालोंकी निन्दा और दैवी प्रकृतिवालोंके भगवत्- भजनका प्रकार । १६-१६ सर्वात्मरूपसे प्रभावसहित भावान्के स्वरूपका वर्णन । २०-२५ सकाम और निष्काम उपासनाका फल । २६-३४ निष्काम भगवद्भक्तिकी महिमा । विभूतियोग नामक दशवां अध्याय ॥ १० ॥ १-७ भगवानकी विभूति और योगशक्तिका कथन तथा उनके जाननेका फल । ८-११ फल और प्रभावसहित भक्तियोगका कथन । १२-१८ अर्जुनद्वारा भगवान्की स्तुति एवं विभूति और योगशक्तिको कहनेके लिये प्रार्थना । १९-४२ भगवान्द्वारा अपनी विभूतियोंका और योग- शक्तिका कथन । विश्वरूपदर्शनयोग नामक ग्यारहवां अध्याय ॥११॥ १-४ विश्वरूपकादर्शन करानेके लिये अर्जुनकी प्रार्थना। ५-८ भगवान्द्वारा अपने विश्वरूपका वर्गन ।

१२ श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक विषय ज्ञानविज्ञानयोग नामक सातवां अध्याय॥७॥ १-७ विज्ञानसहित ज्ञानका विषय । ८-१२ संपूर्ण पदार्थों में कारणरूपसे भगवान्की व्यापकताका कथन । १३-१९ आसुरी स्वभाववालोंकी निन्दाऔर भगवद्भक्तोंकी प्रशंसा। २०-२३ अन्य देवताओंकी उपासनाका विषय । २४-३० भगवान्के प्रभाव और स्वरूपको न जानने- वालोंकी निन्दा और जाननेवालोंकी महिमा । अक्षरब्रह्मयोग नामक आठवां अध्याय॥८॥ १-७ ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादिके विषयमें अर्जुनके सात प्रश्न और उनका उत्तर । ८-२२ भक्तियोगका विषय । २३-२८ शुक्ल और कृष्ण मार्गका विषय । राजविद्याराजगुह्ययोग नामक नवां अध्याय ॥९॥ १-६ प्रभावसहित ज्ञानका विषयः । ७-१० जगत्की उत्पत्तिका विषय ।

अनुक्रमणिका श्लोक विषय ११-१५ भगवानका तिरस्कार करनेवाले आसुरी प्रकृति- वालोंकी निन्दा और दैवी प्रकृतिवालोंके भगवत्- भजनका प्रकार । १६-१६ सर्वात्मरूपसे प्रभावसहित भगवान्के खरूपका वर्णन । २०-२५ सकाम और निष्काम उपासनाका फल । २६-३४ निष्काम भगवद्भक्तिको महिमा । विभूतियोग नामक दशवां अध्याय ॥१०॥ १-७ भगवानकी विभूति और योगशक्तिका कथन तथा उनके जाननेका फल । ८-११ फल और प्रभावसहित भक्तियोगका कथन । १२-१८ अर्जुनद्वारा भगवान्की स्तुति एवं विभूति और योगशक्तिको कहनेके लिये प्रार्थना । १९-४२ भगवानद्वारा अपनी विभूतियोंका और योग- शक्तिका कथन । विश्वरूपदर्शनयोग नामक ग्यारहवां अध्याय ॥११॥ १-४ विश्वरूपकादर्शन करानेके लिये अर्जुनकी प्रार्थना। ५-८ भावान्द्वारा अपने विश्वरूपका वर्णन । .

श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक विश्य ९-१४ धृतराष्ट्रके प्रति संजयद्वारा विश्वरूपका वर्णन । १५-३१ अर्जुनद्वारा भगवान्के विश्वरूपका देखा जाना और उनकी स्तुति करना । ३२-३४ भगवान्द्वारा अपने प्रभावका वर्णन और युद्धके लिये अर्जुनको उत्साहित करना । ३५-४६ भयभीत हुए अर्जुनद्वारा भगवानकी स्तुति और चतुर्भुजरूपका दर्शन करानेके लिये प्रार्थना । ४७-५० भगवान्द्वारा अपने विश्वरूपके दर्शनकी महिमाका कथन तथा चतुर्भुज और सौम्यरूपका दिखाया जाना । ५१-५५ बिना अनन्यभक्तिके चतुर्भुजरूपके दर्शनकी दुर्लभताका और फलसहित अनन्यभक्तिका कथन । भक्तियोग नामक बारहवां अध्याय ॥ १२ ॥ १-१२ साकार और निराकारके उपासकोंकी उत्तमताका निर्णय और भगवत्-प्राप्तिके उपायका विषय। १३-२० भगवत्-प्राप्तिवाले पुरुषोंके लक्षण । क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग नामक तेरहवां अध्याय ॥ १३॥ १-१८ ज्ञानसहित क्षेत्रक्षेत्रका विषय ।

अनुक्रमणिका श्लोक विपय १९-३४ ज्ञानसहित प्रकृति-पुरुषका विषय गुणत्रयविभागयोग नामक चौदहवां अध्याय॥ १४॥ १-४ ज्ञानकी महिमा और प्रकृति पुरुपसे जगत्की उत्पत्ति । ५-१८ सत्, रज, तम तीनों गुणोंका विपय । १९-२७ भगवत्-प्राप्तिका उपाय और गुणातीत पुरुपके लक्षण । पुरुषोत्तमयोग नामक पंद्रहवां अध्याय ॥१५॥ १-६ संसारवृक्षका कथन और भगवत्-प्राप्तिका उपाय । ७-११ जीवात्माका विषय । १२-१५ प्रभावसहित परमेश्वरके स्वरूपका विषय । १६-२० क्षर, अक्षर, पुरुपोत्तमका विषय । दैवासुरसंपद्विभागयोग नामक सोलहवां अध्याय ॥ १६ ॥ १-५ फलसहित देवी और आसुरी संपदाका कथन । ६-२० आसुरी संपदावालोंके लक्षण और उनकी अधोगतिका कथन ।

श्रीमद्भगवद्गीता विषय श्लोक २१-२४ शास्त्रविपरीत आचरणोंको त्यागने और शास्त्रके अनुकूल आचरण करनेके लिये प्रेरणा। श्रद्धात्रयविभागयोग नामक सत्रहवां अध्याय ॥ १७॥ श्रद्धाका और शास्त्रविपरीत घोर तप करने- वालोंका विषय ७-२२ आहार, यज्ञ, तप और दानके पृथक्-पृथक भेद । २३-२८ ॐ तत्सतके प्रयोगकी व्याख्या । मोक्षसंन्यासयोग नामक अठारहवां अध्याय॥१८॥ १-१२ त्यागका विषय। १३-१८ कोंके होनेमें सांख्यसिद्धान्तका कथन । १९-४० तीनों गुणोंके अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुखके पृथक-पृथक भेद । ४१-४८ फलसहित वर्णधर्मका विषय । ४९-५५ ज्ञाननिष्ठाका विषय । ५६-६६ भक्तिसहित निष्काम कर्मयोगका विषय । ६७-७८ श्रीगीताजीका माहात्म्य । * ॐ तत्सदिति * हरिः ॐ तत्सत्, हरिः ॐ तत्सत, हरिः ॐ तत्सत् .श्रीपरमात्मने नमः श्रीमद्भगवद्गीताका सूक्ष्मविषय अर्जुनविषादयोग नामक पहिला अध्याय ॥१॥ विषय • १ युद्धके विपयमें धृतराष्ट्रका प्रश्न । २ धृतराद्रकृत प्रश्नके उत्तरमें द्रोणाचार्यके पास दुर्योधन के गमनका वर्णन । ३ पाण्डवसेनाको देखनेके लिये गुरुसे दुर्योधनकी प्रार्थना । ४-६ पाण्डवसेना प्रधान-प्रधान महारथियोंके नाम । ७ अपनी सेनाके प्रधान-प्रधान शूरवीरोंको जाननेके लिये गुरुसे दुर्योधनकी प्रार्थना । ८ दुर्योधनद्वारा अपनी सेनाके प्रधान-प्रधान महारथियोंके नामोंका कथन । ९ दुर्योधनद्वारा अपनी सेनाके शूरवीरोंकी प्रशंसा । १० दुर्योधनका पाण्डवसेनाकी अपेक्षा अपनी सेनाको अजेय बतलाना। ११ भीष्मकी रक्षा के लिये द्रोणादि शूरवीरोंके प्रति दुर्योधनकी प्रेरणा। १२ दुर्योधनकी प्रसन्नताके लिये भीष्मका गर्जकर शङ्ख बजाना । १३ दुर्योधनकी सेनामें नाना प्रकारके वाजोंका भयङ्कर शब्द होना। १४-१५ श्रीकृष्ण, अर्जुन और भीमसेनद्वारा शड्ढोंका बजाया जाना ।

(१८)
श्लोक
' विषय
१६ युधिष्ठिर, नकुल और सहदेवद्वारा शङ्खोंका बजाया जाना ।
१७-१८ पाण्डवोंकी सेनाके प्रधान-प्रधान योद्धाओंद्वारा शटोंका
बजाया जाना।
१९ पाण्डवसेनाकी शङ्खध्वनिसे धृतराष्ट्रपुत्रोंके हृदयोंका विदीर्ण होना।
२०-२१ दुर्योधनकी सेनाको युद्धके लिये तैयार देखकर दोनों सेनाओंके
वीचमें रथ खड़ा करनेके लिये भगवान्के प्रति अर्जुनकी प्रेरणा ।
२२-२३ दुर्योधनको सेनामें आये हुए शूरवीरोंको देखने के लिये
अर्जुनका स्वेच्छा प्रगट करना ।।
२४-२५ भगवान्का दोनों सेनाओं के बीचमें रथको खड़ा करना और
अर्जुनके प्रति कौरवोंको देखने के लिये आज्ञा देना ।
२६-२७ अर्जुनका दोनों सेनाओंमें स्थित हुए वान्धवोंको देखना ।
२८-३० स्वजनोंको युद्धके लिये तैयार देखकर अर्जुनके शरीर और
मन में कायरता और शोकजनित चिह्नोंके होनेका कथन ।
३१ अर्जुनका विपरीत लक्षणोंको देखकर युद्ध में स्वजनोंको
मारनेसे हानि समझना।
३२-३३ स्वजनवधसे मिलनेवाले राज्य, भोग और सुखादिको
अर्जुनका न चाहना ।
३४-३५ अर्जुनका त्रिलोकीके राज्य के लिये भी आचार्यादि स्वजनोंको
न मारने की इच्छा प्रगट करना ।
३६ अर्जुनका अपने आततायी बान्धवोंको भी मारनेमें पापसमझना ।
३७ स्वजनोंको न मारनेकी योग्यताका निरूपण ।
३८-३९ लोभके कारण दुर्योधनादिकी कुलनाशक कर्म में प्रवृत्ति देखकर
भी अर्जुनका अपने लिये उससे निवृत्त होनेको योग्य समझना।
४० कुलके नाशसे धर्मकी हानि और पापकी वृद्धि ।
४१ पापकी वृद्धिसे वर्णसंकरताकी उत्पत्ति ।
४२ वर्णसंकरतासे पितरोंको नरककी प्राप्ति ।
४३ वर्णसंकरकारक दोपोंसे जातिधर्म और कुलधर्मका नाश ।

विषय ४४ कुलधर्मके नाशसे नरककी प्राप्ति ४५ राज्यके लोभसे खजनोंको मारनेमें पाप समझकर अर्जुनका पश्चात्ताप करना। ४६ विना सामना किये कौरवोद्वारा मारा जानेमें अर्जुनका स्वकल्याण समझना। ४७ शोकयुक्त अर्जुनका धनुपयाण छोड़कर बैठना । सांख्ययोग. नामक दूसरा अध्याय ॥२॥ १ संजयद्वारा अर्जुनकी कायरताका वर्णन । २ अर्जुनके मोहयुक्त करुणाभावकी निन्दा । ३ कायरताको त्यागकर युद्ध करनेके लिये अर्जुन के प्रति भगवान्की आज्ञा । ४ अर्जुनका भीष्मादिके साथ युद्ध न करनेकी इच्छा प्रगट करना । ५ अर्जुनका, गुरुजनोंको मारनेकी अपेक्षा भीग्व. मांगकर खानेको श्रेष्ठ समझना। ६ अपने कर्तव्यके विपयमें अर्जुनको संशय होना । ७ अर्जुनका भगवान् के शरण होकर स्वकर्तव्य पूछना । ८ अर्जुनका त्रिलोकीके राज्यसे भी शोककी निवृत्ति न मानना | ९ अर्जुनका युद्धसे उपराम होना ।। १० ,अर्जुनकी अज्ञानतापर भगवान्का मुस्कुराना । ११ शोक करनेको अयोग्य बताते हुए भगान्ता अर्जुनके प्रति उपदेश आरम्भ करना । १२ आत्माकी नित्यताका निरूपण । १३ आत्माकी नित्यताका निरूपण और धीर पुरुपकी प्रशंसा । १४ इन्द्रिय और विपयोंके संयोगकी अनित्यताका निरूपण और उनको सहन करने के लिये आज्ञा । १५. तितिक्षाका फल। . .

(२०) श्लोक विषय १६ सत्-असत्का निर्णय । १७-१८ सत् और असत्के स्वरूपका कथन । १९ आत्माको मरने और मारनेवाला जो मानते हैं उनकी निन्दा । २० आत्माके शुद्धस्वरूपका कथन । २१ आत्माको अजन्मा और अविनाशी जाननेवाले की प्रशंसा । २२ वस्त्रोंके दृष्टान्तसे जीवात्माके शरीर-परिवर्तनका कथन । २३-२५ सर्वव्यापी आत्माके नित्यस्वरूपका विस्तारसे वर्णन । २६-२७ दूसरोंके सिद्धान्तसे भी आत्माके लिये शोक करनेका निषेध । २८ शरीरोंकी अनित्यताका निरूपण और उनके लिये शोक करनेका निषेध । २९ आत्मतत्त्वके ज्ञाता, वक्ता और श्रोताकी दुर्लभताका निरूपण । ३० आत्माकी नित्यताका निरूपण और उसके लिये शोक. करनेका निषेध । ३१-३२ क्षत्रियों के लिये धर्मयुक्त युद्धकी प्रशंसा । ३३-३४ धार्मिक युद्ध के त्यागसे स्वधर्म और कीर्तिकी हानि एवं पाप और अपकीर्तिकी प्राप्ति । ३५-३६ धर्मयुद्धके त्यागसे बड़प्पन और मानकी हानि होने का कथन । ३७ सब प्रकारसे लाभ दिखाकर अर्जुनको युद्ध करने के लिये आज्ञा देना। ३८ सुख-दुःखादिको समान समझकर युद्ध करनेसे पाप न लगनेका कथन । ३९ निष्काम कर्मयोगका विषय सुनने के लिये भगवान् की आज्ञा और उसके महत्वका कथन । ४० निष्काम कर्मयोगके प्रभावका कथन । ४१ निश्चयात्मक और अनिश्चयात्मक बुद्धिके स्वरूपका निरूपण । ४२-४३. सकामी पुरुषोंके स्वभावका कथन. ४४ सकामी पुरुषों के अन्तःकरणमें निश्चयात्मकवुद्धि न होने का कथन । ...-...- . । (२१) श्लोक বিষয় ४५ निकामी और आत्मपरायण होने के लिये आज्ञा । ४६ जलाशयके दृष्टान्तसे ब्रह्मज्ञानकी महिमा । ४७ फलासक्तिको त्यागकर कर्म करनेके लिये प्रेरणा और कर्मत्यागका निपेध । ४८ आसक्तिको त्यागकर समत्वबुद्धिसे कर्म करने के लिये आज्ञा । ४९ सकाम कर्मकी निन्दा और निष्काम कर्मयोगकी प्रशंसा । ५. निष्काम कर्मयोगीके पुण्य-पापोंकी निवृत्तिका कथन और निष्काम कर्म करने के लिये आज्ञा । ५१ कर्मफलके त्यागसे परमपदकी प्राप्ति । ५२ मोहका नाश होनेसे वैराग्यकी प्राप्ति । ५३ बुद्धिकी स्थिरतासे योगकी प्राप्ति । ५४ स्थिरबुद्धि पुरुपके विषयमें अर्जुनके चार प्रश्न | ५५ समाधिमें स्थित हुए स्थिरबुद्धि पुरुपके लक्षण । ५६-५७ स्थिरबुद्धि पुरुपके अन्तःकरण और वचनोंमें रागद्वेपादिके अभावका कथन। ५८ तीसरे प्रश्न के उत्तरमें कछुएके दृष्टान्तसे इन्द्रियनिग्रहका निरूपण । ५९ हठपूर्वक भोगोंका त्याग करनेसे भी आसक्ति नष्ट न होनेका और परमात्मदर्शनसे नष्ट होनेका कथन । ६० इन्द्रियोंकी प्रबलताका निरूपण । ६१ इन्द्रियोंको वशमें करके भगवत्-परायण होनेके लिये प्रेरणा । ६२-६३ विपयोंके चिन्तनसे आसक्ति आदि अवगुणोंकी क्रमसे उत्पत्ति और अधःपतन होनेका कथन । ६४-६५ चौथे प्रश्न के उत्तरमें रागद्वेपरहित इन्द्रियोंद्वारा कर्म करनेसे अन्तःकरण शुद्ध होकर बुद्धि स्थिर होनेका कथन । ६६ साधनरहित पुरुपको आस्तिकता, शान्ति और मुखकी अप्राप्ति । ६७ नौकाके दृष्टान्तसे वशमें न की हुई इन्द्रियोंद्वारा युद्धिके विचलित किये जानेका कथन ।

(२२) श्लोक विषय - ६८ स्थिरबुद्धि पुरुपके लक्षणोंमें इन्द्रियनिग्रहकी प्रधानता । ६९ अज्ञानियोंके निश्चयमें परमात्मतत्त्वके अभावका और आत्म- ज्ञानियोंके निश्चयमें सृष्टिके अभावका निरूपण । ७० समुद्र के दृष्टान्तसे निष्कामी पुरुषकी महिमा । ७१ संपूर्ण कामनाऔर अहंता, ममताके त्यागसे परमशान्तिकी प्राप्ति। ७२ ब्राह्मी स्थितिकी महिमा । कर्मयोग नामक तीसरा अध्याय ॥३॥ १-२ ज्ञान और कर्मकी श्रेष्ठताके विषयमें अर्जुनकी शङ्का और निश्चित मत कहनेके लिये भगवान्से प्रार्थना । ३ अधिकारी-भेदसे दो प्रकारकी निष्ठा । ४ भगवत्-प्राप्तिके लिये कर्मों के त्यागका निषेध । ५ विना कर्म किये क्षणमात्र भी किसीसे नहीं रहा जानेका कथन । ६ मिथ्याचारी पुरुषका लक्षण । ७ निष्काम कर्मयोगीकी प्रशंसा । ८ शास्त्रनियत कर्म करनेके लिये आज्ञा । ९ भगवदर्थ कर्म करनेके लिये आज्ञा । १०-११ प्रजापतिकी आज्ञानुसार कर्म करनेसे परम श्रेयकी प्राप्ति । १२ देवताओंको बिना दिये भोग भोगनेवालोंकी निन्दा । १३ यज्ञसे बचा हुआ अन्न खानेवालोंकी' प्रशंसा और इसवे विपरीत करनेवालोंकी निन्दा । १४-१५ सृष्टिचक्रका वर्णन। १६ सृष्टिचक्रके अनुसार न बर्तनेवालेकी निन्दा । १७ आत्मज्ञानीके लिये कर्तव्यका अभाव । १८ कर्म करने और न करनेमें ज्ञानीकी निःस्वार्थताका कथन ।

(:२३)
श्लोक
-विश्य
१९ अनासक्तभावसे कर्तव्य कर्म करने के लिये आज्ञा और उससे
भगवत्-प्राप्ति ।
२० जनकादिक दृष्टान्तसे कर्म करनेके लिये प्रेरणा ।
२१ श्रेष्ट पुरुपके आचरण प्रमाणस्वरूप माने जानेका कथन ।
२२-२४ भगवान्के लिये कोई कर्तव्य न होनेपर भी लोकसंग्रहार्थ
कर्म करनेकी आवश्यकताका निरूपण ।
२५ लोकसंग्रहार्थ अनासक्तभावसे कर्म करनेके लिये प्रेरणा |
२६ सकामी पुरुपोंकी घुद्धिमें भ्रम उत्पन्न करनेका निषेध ।
२७ मूढ पुरुषका लक्षण ।
२८ तत्त्ववेत्ता पुरुषका लक्षण ।
२९ अज्ञानियोंको काँसे चलायमान करनेका निषेध ।
३० संपूर्ण कर्म भगवान्में अर्पण करके युद्ध करनेकी आज्ञा ।
३१ भगवत्-सिद्धान्तके अनुकूल वर्तनेसे मुक्ति ।
३२ भगवत्-सिद्धान्तके अनुकूल न वर्तनेसे अधोगति ।
३३ स्वाभाविक कर्मोकी चेष्टामें प्रकृतिकी प्रबलता।
३४ राग-द्वपके वशमें होनेका निषेध ।
३५ स्वधर्मपालनसे कल्याण और परधर्मसे हानि ।
३६ बलात्कारसे पाप करानेमें कौन हेतु है इस विपयमें अर्जुनका
प्रश्न।
३७ बलात्कारसे पाप करानेमें कामरूप हेतुका कथन |
३८-३९ कामरूप वैरीसे ज्ञान ढका हुआ है । इस विषयका दृष्टान्तों-
सहित कथन ।
४० कामके वासम्यानोंका कथन ।
४१ इन्द्रियोंको वशमें करके कामको मारनेकी आज्ञा ।
४२ इन्द्रिय, मन और बुद्धिसे भी आत्माकी अति श्रेष्टताका कथन ।
४३ बुद्धिसे परे आत्माको जानकर और मनको वशमें करके कामको
मारनेकी आज्ञा।

(२४) ज्ञानकर्मसंन्यासयोग नामक चौथा अध्याय ॥४॥ श्लोक विषय १-२ योगकी परम्परा और बहुत कालसे उसके लोप हो जानेका कथन । ३ पुरातन योगकी प्रशंसा ४ श्रीकृष्ण भगवान्का जन्म आधुनिक मानकर अर्जुनका प्रश्न करना। ५ श्रीभगवान्द्वारा अपने और अर्जुन के बहुत जन्म व्यतीत होनेका कथन । ६ श्रीभगवान्के जन्मकी अलौकिकता । ७ श्रीभगवान्के अवतार लेने के समयका कथन । ८ श्रीभगवान्के अवतार लेनेके कारणका कथन । ९ श्रीभगवान्के जन्म-कर्मोको दिव्य जाननेका फल । १० श्रीभगवान्को प्राप्त हुए पुरुषोंके लक्षण । ११ श्रीभगवान्को भजनेवाले पुरुषोंके. अनुकूल भगवान्के वर्ताव- का कथन । १२ सकामी पुरुषोंको देवताओंके पूजनसे शीघ्र फल-प्राप्तिका कथन । १३ चारों वर्गों की रचना करनेमें भगवान्के अकर्तापनका कथन । १४ श्रीभगवान्के कर्मोंकी दिव्यता और उनके जाननेका फल । १५ पूर्वज मुमुक्षु पुरुषोंकी भाँति निष्काम कर्म करनेके लिये आज्ञा । १६ कर्म और अकर्मको तत्त्वसे जाननेका फल । १७ कर्म, विकर्म और अकर्मके स्वरूपको जानने के लिये प्रेरणा । १८ कर्म में अकर्म और अकर्ममें कर्मको तत्त्वसे जाननेका फल । १९ कामना और संकल्पहित आचरणवाले ज्ञानीकी प्रशंसा ।

श्लोक.
'विश्य ..
२० फलासक्तिको त्यागकर कर्म करनेवालेकी प्रशंसा ।
२१ केवल शरीरसंबन्धी कर्म करते हुए संन्यासीको पाप न
लगनेका कथन ।
२२ निष्काम कर्मयोग साधकका लक्षण और काँसे न बंधनेका
कथन ।
२३ यज्ञार्थ कर्म करनेवाले ज्ञानीकै संपूर्ण कर्म नष्ट होनेका कथन ।
२४ ब्रह्मयज्ञका कथन
२५ देवयज्ञ और ज्ञानयज्ञका कथन ।
२६ इन्द्रियसंयमरूप यज्ञ और विषयहवनरूप यज्ञका कथन ।
२७ अन्तःकरणसंयमरूप यज्ञ ।
२८ द्रव्ययज्ञ, तपयज्ञ, योगयज्ञ और स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञका कथन ।
२९ यज्ञरूपसे विविध प्राणायामका कथन ।
३० यज्ञरूपसे चतुर्थ प्राणायामका कथन और सब प्रकारके यज्ञ
करनेवालोंकी प्रशंसा।
३१ यज्ञ करनेवालों को भगवत्प्राप्ति और न करनेवालोंकी निन्दा ।
३२ यज्ञोंको तत्चसे जाननेका फल ।
३३ ज्ञानयज्ञकी प्रशंसा।
३४ ज्ञानके लिये ज्ञानवानोंकी शरण जानेका कथन ।
३५ ज्ञानका फल ।
३६ ज्ञानरूप नौकाद्वारा अतिशय पापीका भी उद्धार ।
३७ अमिक दृष्टान्तसे ज्ञानकी महिमा ।
३८ ज्ञानकी अतिशय पवित्रता और पुरुषार्थसे ज्ञान-प्राप्तिका कथन ।
३९ ज्ञानके पात्रका और ज्ञानसे परमशान्तिकी प्राप्तिका कथन ।
१० श्रद्वारहित संशययुक्त अज्ञानीकी दुर्गतिका कथन ।
४१ संशयरहित निष्काम कर्मयोगी के लिये कर्मवन्धनका निषेध ।
४२ निष्कामयोगमें स्थित होकर युद्ध करनेके लिये आज्ञा ।

(२६) कर्मसंन्यासयोग नामक पांचवां अध्यायः॥ ५॥ श्लोक विषय १ संन्यास और निष्काम कर्मयोगमें कौन श्रेष्ठ है यह जानने के लिये अर्जुनका प्रश्न । २ संन्यासकी अपेक्षा निष्काम कर्मयोगकी श्रेष्ठताका कथन । ३ निष्काम कर्मयोगकी प्रशंसा । ४-५ फलमें सांख्ययोग और निष्काम कर्मयोगकी एकता । ६ निष्काम कर्मयोगझी अपेक्षा सांख्ययोगके साधनमें कठिनता- का कथन । ७ निष्काम कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी लिपायमान नहीं होता है इस विषयका कथन । ८-९ सांख्ययोगीका लक्षण । १० भगवदर्थ कर्म करनेवालेकी निर्लेपतामें पद्मपत्रका दृष्टान्त । ११ आत्मशुद्धिके लिये योगियोंके कर्माचरणका कथन । १२ कर्मफलके त्यागसे शान्ति और कामनासे बन्धन । १३ सांख्ययोगीकी स्थितिका कथन । १४ परमात्मामें कर्तापनके अभावका कथन । १५ परमात्मा किसीके पाप-पुण्यको ग्रहण नहीं करता इस विषयमें कथन । १६ मूर्यके दृष्टान्तसे ज्ञानकी महिमा । १७ परमात्मामें तद्रूप हुए महात्माओंको परमगतिकी प्राप्ति । ८-१९ ज्ञानियोंके समत्वभावका कथन और उनकी महिमा । ०-२१ ब्रह्मज्ञानीके लक्षण और उसको अक्षय सुखकी प्राप्ति । २२ विषयभोगोंकी निन्दा । २३ काम-क्रोधके वेगको जीतनेवाले योगीकी प्रशंसा । ४-२६ ज्ञानी महात्माओंके लक्षण और उनको निर्वाण ब्रह्मकी प्राप्ति ।

(२७१) श्लोक विषय २७-२८ संक्षेपसे फलसहित ध्यानयोगका कथन । २९ प्रभावसहित परमेश्वरको जाननेसे शान्तिकी प्राप्ति । . आत्मसंयमयोग नामक छठा अध्याय॥६॥ १ निष्काम कर्मयोगीकी प्रशंसा । २ मंन्यास और निष्काम कर्मयोगकी एकता । ३ मुमुक्षुके लिये कल्याणके उपायका कथन । ४ योगारूढ पुरुपके लक्षण । ५-६ अपना उद्धार करनेके लिये प्रेरणा । ७-८ परमात्माको प्राप्त हुए योगीके लक्षण । ९ सबमें समबुद्धिवाले योगीकी प्रशंसा । १० ध्यानयोगका साधन करने के लिये प्रेरणा । ११ ध्यानयोगके लिये आसन-स्थापनकी विधि । १२ आसनपर बैठकर योगका साधन करने के लिये कथन । १३-१४ ध्यानयोगकी विधि । १५ ध्यानयोगका फल । १६ अनियमित भोजनादि करनेवालेको योगकी अप्राप्ति । १७ नियमित आहार-विहार आदि करनेवालेको योगकी प्राप्ति । १८ योगयुक्त पुरुषका लक्षण । १९ दीपकके दृष्टान्तसे योगीकै चित्तकी उपमा । २०-२२ ध्यानयोगकी परिपक्क अवस्थाके लक्षण और ध्यानयोगी आनन्दकी महिमा। २३ तत्पर होकर ध्यानयोग करनेके लिये कथन । २४-२५ अचिन्त्यस्वरूप परमात्माके ध्यानकी विधि । २६ मनको परमात्मामें लगानेका उपाय । २७-२८ ध्यानयोगसे उत्तम और अत्यन्त मुखकी प्राप्ति । २९ सर्वत्र आत्मदर्शनका कथन ।

(२८) श्लोक विषय ३. सर्वत्र परमात्मदर्शनका फल । ३१ सर्वव्यापी परमात्माका एकीभावसे ध्यान करनेवाले योगी- की महिमा । ३२ परमयोगी के लक्षण । ३३-३४ मनकी चञ्चलताकै कारण अर्जुनका ध्यानयोगको और मनके निग्रहको कठिन मानना। ३५ अभ्यास और वैराग्यसे मन वशमें होनेका कथन । ३६ मनके निग्रहसे ध्यानयोगकी प्राप्ति । ३७-३८ योगभ्रष्ट पुरुपकी गतिके संवन्धमें अर्जुनका प्रश्न और उभयभ्रष्ट होनेकी शंका करना। ३९ संशय निवारण करनेके लिये अर्जुनकी भगवानसे प्रार्थना । ४० अर्जुनकी शंकाके उत्तरमें निष्काम कर्म करनेवालेकी दुर्गतिका निषेध ४१ योगभ्रष्ट पुरुषको स्वर्गलोक और पवित्र धनवानोंके घरमें जन्म प्राप्त होनेका कथन । ४२-४३ वैराग्यवान् योगभ्रष्टकी ज्ञानियोंके कुलमें उत्पत्ति और साधनमें स्वाभाविक प्रवृत्ति होनेका कथन । ४४ पूर्वाभ्यासके वलसे पुनः योगसाधनमें लगनेका कथन. । ४५ परमगतिकी प्राप्तिके लिये अति प्रयत्नसे अभ्यास करनेकी आवश्यकता ४६ योगीकी महिमा और योगी वननेके लिये आज्ञा । ४७ सब योगियोंमें ध्यानयोगीकी श्रेष्ठता। ज्ञानविज्ञानयोग नामक सातवां अध्याय ॥ ७॥ १ ज्ञानसहित भक्तियोग सुननेके लिये अर्जुनके प्रति भगवान्की आज्ञा।

((२९)
श्लोक
विषय
२ विज्ञानसहित ज्ञानका वर्णन करने के लिये भगवान की प्रतिज्ञा
और उसकी महिमा ।
३ हजारों मनुष्योंमें भगवान्को तत्त्वसे जाननेवालेकी दुर्लभता-
का निरूपण ।
४ अपरा प्रकृतिका वर्णन।
५ परा प्रकृतिका वर्णन ।
६ संसारके कारणका कथन ।
७ परमेश्वरके सर्वव्यापी स्वरूपका कथन |
८ रसादिरूपसे जल आदिमें भगवान्की व्यापकताका कथन ।
९ गन्धादिरूपसे पृथिवी आदिमें भगवान्की व्यापकताका कथन ।
१० वीजादिरूपसे संपूर्ण भूतोंमें भगवान्की व्यापकताका कथन ।
११ बलादिरूपसे भगवान्की व्यापकताका कथन ।
१२ परमात्मसत्तासे त्रिगुणमय संपूर्ण पदार्थोंके होनेका कथन ।
१३ भगवान्को तवसे न जाननेके कारणका कथन ।
१४ भगवान्की दुस्तर मायासे तरनेके लिये सहज उपायका कथन ।
१५ पापकर्म करनेवाले मृद्रोंकी भगवद्भजनमें प्रवृत्ति न होनेका
कथन।
१६ चार प्रकारके भक्तोंका वर्णन ।
१७ ज्ञानी भक्तके प्रेमकी प्रशंसा।
१८ ज्ञानी भक्तकी विशेप प्रशंसा ।
१९ ज्ञानी महात्माकी दुर्लभताका कथन ।
२० अन्य देवताओंको भजने हेतुका कथन ।
२१ अन्य देवताओंमें श्रद्धा स्थिर करनेका कथन ।
२२ अन्य देवताओंकी उपासनाका फल ।
२३ अन्य देवताओंकी उपासनाके फलकी निन्दा और भगवद्भक्ति-
की महिमा ।
२४-२५ भगवानको न जानने हेतुका कथन ।

(३०) श्लोक विषय २६ भगवान्की सर्वज्ञताका कथन । २७ इच्छा-द्वेपसे मोहकी प्राप्ति । २८ भगवान्को भजनेवालोंके लक्षण । २९ ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मको जाननेमें भगवत्-शरणकी प्रधानता। ३० अधिभृत, अधिदेव और अधियज्ञसहित भगवान्को जानने- वालोंझी महिमा। अक्षरब्रह्मयोग नामक आठवां अध्याय ॥८॥ १-२ ब्रा, अध्यात्म और कर्मादिके विपयमें अर्जुनके ७ प्रश्न । . ३ ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मके विषयमें अर्जुनके ३ प्रश्नोंका उत्तर । ४ अधिभूत अधिदैच और अधियज्ञके विषयमें अर्जुनके ३ प्रश्नों- का उत्तर। ५ अन्तकालमें भगवत्-मरणका फल ( अर्जुनके सातवें प्रश्नका उत्तर)। ६ अन्तकालमें भावनानुसार गति होनेका कथन । ७ निरन्तर भगवत्-चिन्तन करते हुए युद्ध करने के लिये आज्ञा और उसका फल । ८ निरन्तर चिन्तनसे परम दिव्य पुरुपकी प्राप्ति । ९-१० परम दिव्य पुरुषके स्वरूपका वर्णन और उसके चिन्तनकी विधि। ११ अक्षरस्वरूप परमपदकी प्रशंसा । १२-१३ ध्यानयोगकी विधिसे ओंकारका उच्चारण और भगवत्स्वरूपका चिन्तन करते हुए मरनेवालेकी परमगति होनेका कथन । १४ नित्य-निरन्तर भगवत्-चिन्तनसे भगवत्-प्राप्तिकी सुलभता । १५-१६ भगवत् प्राप्तिका महत्त्व ।

•- (( ३१६) श्लोक विषय १७ ब्रह्माके दिन-रात्रिकी अवधिका कथनः ।। १८-१९ ब्रह्मासे संपूर्ण भूतोंकी बारम्बार उत्पत्ति और प्रलयका कथन । २० सनातन अव्यक्त परमेश्वरके स्वरूपका कथन । २१ अव्यक्त, अक्षर और परमगति तथा परमधामकी एकता। २२ अनन्यभक्तिसे परम पुरुष परमेश्वरकी प्राप्ति । २३ शुक्ल-कृष्ण मार्गका विपय कहने के लिये भगवान्की प्रतिज्ञा । २४ फलसहित शुक्ल-मार्गका कथन । २५ फलसहितः कृष्ण-मार्गका कथन । २६ शुक्र कृष्ण गतिकी अनादिताका कथन । २७ दोनों मार्गोको जाननेवाले योगीकी प्रशंसा । २८ तत्त्वसे दोनों मागाँको जाननेका फल राजविद्याराजगुह्ययोग नामक नवां अध्याय ॥९॥ १ विज्ञानसहित ज्ञानका कथन करनेकी प्रतिज्ञा । २ विज्ञानसहित ज्ञानकी महिमा । ३ विज्ञानसहित ज्ञानमें श्रद्धारहित मनुप्योंको जन्म-मृत्युकी प्राप्ति । ४-५ प्रभावसहित भगवान्के सर्वव्यापी स्वरूपका कथन । ६ आकाशके दृष्टान्तसे भगवान्के सर्वव्यापी स्वरूपका कथन । ७ सर्वभूतोंकी उत्पत्ति और प्रलयका कथन । ८ सर्वभूतोंकी पुनः-पुनः उत्पत्तिका कथन । ९ भगवान्को कर्म न बांधने में हेतुका कथन । १० भगवान के सकाशसे प्रकृतिद्वारा चराचर जगत्की उत्पत्ति । ११ भगवान्का तिरस्कार करनेवालोंकी निन्दा । १२ राक्षसी और आसुरी प्रकृतिवालोंके लक्षण । १३..दैवी प्रकृतिवाले महात्माओंकी प्रशंसा ।

(८. ३०) श्लोक विषय . २६. भगवान्की सर्वज्ञताका कथन । २७ इच्छा-द्वेपसे मोहकी प्राप्ति । २८ भगवान्को भजनेवालोंके लक्षण । २९ ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मको जाननेमें भगवत्-शरणकी प्रधानता । ३० अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञसहित भगवान्को जानने- वालोंकी महिमा। अक्षरब्रह्मयोग नामक आठवां अध्याय ॥८॥ १-२ ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादिके विपयमें अर्जुनके ७ प्रश्न । ३ ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मके विपयमें अर्जुनके ३ प्रश्नोंका उत्तर । ४ अधिभूत; अधिदैव और अधियज्ञके विपयमें अर्जुनके ३ प्रश्नों- का उत्तर। ५ अन्तकालमें भगवत्-स्मरणका फल ( अर्जुनके सातवें प्रश्नका उत्तर)। ६ अन्तकालमें भावनानुसार गति होनेका कथन । ७ निरन्तर भगवत्-चिन्तन करते हुए युद्ध करने के लिये आज्ञा और उसका फल । ८ निरन्तर चिन्तनसे परम दिव्य पुरुपकी प्राप्ति । ९-१० परम दिव्य पुरुपके स्वरूपका वर्णन और उसके चिन्तनकी विधि। ११ अक्षरस्वरूप परमपदकी प्रशंसा ।. १२-१३ ध्यानयोगकी विधिसे ओंकारका उच्चारण और भगवत्स्वरूपका चिन्तन करते हुए मरनेवालेकी परमगति होनेका कथन । १४ नित्य-निरन्तर भगवत्-चिन्तनसे भगवत्-प्राप्तिकी सुलभता । १५-१६ भगवत्-प्राप्तिका महत्व ।

.. ((३१६) श्लोक विषय १७ ब्रह्माके दिन-रात्रिकी अवधिका कथनः। १८-१९ ब्रह्मासे संपूर्ण भूतोंकी बारम्बार उत्पत्ति और प्रलयका कथन । २० सनातन अव्यक्त परमेश्वरके स्वरूपका कथन । २१ अव्यक्त, अक्षर और परमगति तथा परमधामकी एकता। २२ अनन्यभक्तिसे परम पुरुप परमेश्वरकी प्राप्ति । २३ शुक्ल-कृष्ण मार्गका विपय कहने के लिये भगवान की प्रतिज्ञा । २४ फलसहित शुक्ल-मार्गका कथन | २५ फलसहितः कृष्ण-मार्गका कथन । २६ शुक्ल-कृष्ण गतिकी अनादिताका कथन । २७ दोनों मार्गोको जाननेवाले योगीकी प्रशंसा । २८ तवसे दोनों मागोंको जाननेका फल राजविद्याराजगुह्ययोग नामक नवां अध्याय॥ ९॥ १ विज्ञानसहित ज्ञानका कथन करनेकी प्रतिज्ञा । २ विज्ञानसहित ज्ञानकी महिमा । ३ विज्ञानसहित ज्ञानमें श्रद्धारहित मनुप्योंको जन्म-मृत्युकी प्राप्ति । ४-५ प्रभावसहित भगवान्के सर्वव्यापी स्वरूपका कथन । ६ आकाशके दृष्टान्तसे भगवान्के सर्वव्यापी स्वरूपका कथन । ७ सर्वभूतोंकी उत्पत्ति और प्रलयका कथन । ८ सर्वभूतोंकी पुनः-पुनः उत्पत्तिका कथन । ९ भगवान्को कर्म न बांधनेमें हेतुका कथन । १० भगवान्क सकारासे प्रकृतिद्वारा चराचर जगत्की उत्पत्ति ११ भगवान्का तिरस्कार करनेवालोंकी निन्दा । १२ राक्षसी और आसुरी प्रकृतिबालोंके लक्षण । .. देवी प्रकृतिवाले महात्माओंकी प्रशंसा ।

. (३०) श्लोक विषय . , शरणकी प्रथा भगवान्को ज प्य ... ७ २६ भगवान्की सर्वज्ञताका कथन । २७ इच्छा-द्वेपसे मोहकी प्राप्ति । २८ भगवान्को भजनेवालोंके लगाया २९ ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मक ३० अधिभूत, अधिदैव और वालोंकी महिमा । अक्षरब्रह्मयोग नामक १-२ ब्रह्म, अध्यात्म और .. ३ ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मक ४ अधिभूत, अधिदैव और । का उत्तर। ५ अन्तकालमें भा .. .. 14 उत्तर )। ६ अन्तकालमें भावनानुसार गाः ७ निरन्तर भगवत्-चिन्तन के और उसका फल । ८ निरन्तर चिन्तनसे परम दिव्य ९-१० परम दिव्य पुरुपके स्वरूपका . विधि। ११ अक्षरस्वरूप परमपदकी प्रशंसा । १२-१३ ध्यानयोगकी विधिसे ओंकारका चार चिन्तन करते हुए मरनेवालेकी परमगति १४ नित्य-निरन्तर भगवत्-चिन्तनसे भगवत् १५-१६ भगवत्-प्राप्तिका महत्त्व ।

अंग
३ प्रभावहिन पनियाने मानने पल।
- भगवान बुद्धि आदि भावाच्च उत्पनिन कयन ।
६ भगवान के मंच मुतानि और ननकादिकोंकी उत्पत्तिका
कथन।
७ भगवानकी विमृति र योगचे नवसे जाननेका फल ।
८ भगवानक प्रभावी सनामर भरनेवाली प्रना।
९ भगवत-भन्नोंक तबग और उनके नापनका कयन ।
१०-११ प्रीतिक निगन्ना भन्ननेचा पल।
१२-१३ अर्जुनद्वारा भगवानची स्तुति ।
१४-१५ अनाग भगवान के प्रभावका बनन।
१६ भगवानकी विभूतियों को जानने के लिये अजुनही हव्हा ।
१७ भगाव-चिन्तनके विषय में अर्जुनका ग्रन्न ।
१८ योगमति और विभूतियोंकी विनामे कहनेके लिये
अर्जुनकी प्रार्थना।
१९ अपनी विच विभूतियों कहनेक लिये भगवान प्रतिना।
२० मतान्नपने भगवान के वरुपका कथन ।
२१. विष्णु आदि विभूतियोंका कथन ।
२२. मानवंद आदि विनियोंज्ञा क्यन ।
२३ शंकर आदि विमृतियों का कयन।
२४ चूइसति भाटि विमृतियोंशा क्यन ।
२५ भूगु आदि विभूतियोश क्यन ।
२६ अबन्ध आदि विमनियाका कथन ।
२७ उर्चःश्रवा आदि विमृतियों कयन ।
२८ बन आदि निमुनियोंन कयन ।
२९ अनन्न आदि विमृतियांश कथन !
३० प्रहात आदि विमृतियोंच कयन ।

( ३४..) विषय क १ पचन आदि विभूतियोंका कथन । १२. भगवान्की योगशक्तिका और अध्यात्मविद्यादि विभूतियोंका कथन। ३३ अकार आदि विभूतियोंका कथन । ३४ मृत्यु आदि विभूतियोंका कथन । ३५ बृहत्साम आदि विभूतियोंका कथन । ३६ द्यूत आदि विभूतियोंका कथन । ३७ वासुदेव आदि विभूतियोंका कथन । ३८ दण्ड आदि विभूतियोंका कथन । ३९ सर्वरूपसे प्रभावसहित भगवान्के स्वरूपका कथन । ४० भगवत्-विभूतियोंकी अनन्तताका कथन । ४१ भगवान्के तेजके अंशसे संपूर्ण वस्तुओंकी उत्पत्तिका कथन । ४२ भगवान्की योगशक्तिके एक अंशसे संपूर्ण जगत्की स्थितिका कथन । विश्वरूपदर्शनयोग नामक ग्यारहवां अध्याय॥११॥ १ अपने मोहकी निवृत्ति मानते हुए अर्जुनद्वारा भगवत वचनोंकी प्रशंसा। २-३ भगवत्द्वारा सुने हुए माहात्म्यको अर्जुनका स्वीकार करना विश्वरूपको देखने के लिये इच्छा प्रकट करना । ४ विश्वरूपका दर्शन कराने के लिये अर्जुनकी प्रार्थना । ५-६ विश्वरूपको देखने के लिये अर्जुनके प्रति भगवान्का कथ ७ विश्वरूपके एक अंशमें संपूर्ण जगत्को देखनेके भगवान्का कथन ।

(३५)
श्लोक
বিষয়
८ विश्वरूपको देखनेके लिये अर्जुनके प्रति भगवत्द्वारा दिव्य
नेत्रोंका प्रदान ।
९ अर्जुनके प्रति भगवान्द्वारा अपने विश्वरूपका दिखाया जाना !
०-११ संजयद्वारा विश्वरूपका वर्णन ।
१२ विश्वरूपके प्रकाशकी महिमा ।
१३ अर्जुनका विश्वरूपमें संपूर्ण जगत्को एक जगह स्थित देखना।
१४ विधरूपका दर्शन करके अर्जुनका विसित होना ।
१५ विश्वरूपमें देवता और ऋपि आदिको देखना ।
१६ विश्वरूपको अनेक वाहु और उदर आदिसे युक्त देखना ।
१७ विश्वरूपको किरीट, गदा और चक्र आदिसे युक्त देखना ।
१८ विश्वरूपकी स्तुति ।
१९ अनन्त सामर्थ्य और प्रभावयुक्त विश्वरूपका दर्शन ।
२० अद्भुत बिराटरूपसे संपूर्ण जगत्को व्याप्त देखना ।
२१ विश्वरूपमें प्रवेश करते हुए देवादिकोंका और स्तुति करते हुए
महर्पि आदिकोंका दर्शन।
२२ विश्वरूपको देखते हुए विस्सययुक्त रुद्रादिकोंका दर्शन ।
२३-२५ भगवान् के भयङ्कर रूपको देखकर अर्जुनका भयभीत होना ।
६-२७ दोनों सेनाओंके योद्धाओंको विराट् स्वरूपके मुखमें प्रवेश
होकर नष्ट होते हुए देखना ।
२८ नदी और समुद्र के दृष्टान्तसे प्रवेशक दृश्यका कथन ।
२९ दीपक और पतंगके दृष्टान्तसे नाशके दृश्यका कथन ।
३० सब लोकों को ग्रसन करते हुए तेजोमय भयानक विश्वरूपा
वर्णन।
३१ उग्ररूपधारी भगवान्को तत्त्वसे जानने के लिये अर्जुनका प्रश्न
३२ लोकोंको नष्ट करने के लिये प्रवृत्त हुआ मैं महाकाल हूं इत्यादि
वचनोंसे भगवान्का उत्तर ।

(३६) लोक विषय ३३-३४ निमित्तमात्र होकर युद्ध करनेके लिये अर्जुनके प्रति भगवान्- की आज्ञा। ३५ भगवान्के वचनोंको सुनकर अर्जुनका भयभीत और गद्गद होना। ३६-३७ भगवान्के महत्त्वका वर्णन । ३८-३९ अनन्तरूप परमेश्वरकी स्तुति और वारम्बार नमस्कार । ४० सर्व ओरसे भगवान्को नमस्कार और उनकी अनन्त सामर्थ्यका कथन । ४१-४२ अपराध-क्षमाके लिये अर्जुनकी प्रार्थना । ४३ भगवान्के अतिशय प्रभावका कथन । ४४ प्रसन्न होनेके लिये और अपराध सहने के लिये अर्जुनकी प्रार्थना। १५-४६ चतुर्भुजरूप दिखानेके लिये अर्जुनकी प्रार्थना। ४७-४८ भगवान् के द्वारा अपने विश्वरूपकी प्रशंसा । ४९ अर्जुनको धीरज देकर अपना चतुर्भुजरूप दिखाना । ५० चतुर्भुजरूप दिखानेके उपरान्त सौम्यरूप होकर अर्जुनको पुनः धीरज देना। ५१ भगवान्के मनुष्यरूपको देखकर अर्जुनका शान्तचित्त होना । ९२-५३ चतुर्भुजरूपके दर्शनकी दुर्लभता और प्रभावका कथन । ५४ अनन्यभक्तिसे भगवत्-प्राप्तिकी सुलभताका कथन । ५५ अनन्यभक्तके लक्षण और उसको परमात्माकी प्राप्तिका कथन। भक्तियोग नामक बारहवां अध्याय ॥१२॥ १ साकार और निराकारके उपासकोंमें कौन श्रेष्ठ है यह जाननेके लिये अर्जुनका प्रश्न ।

(३७) श्लोक विश्य २ भगवान्के सगुणरूपकी उपासना करनेवालोंकी श्रेष्ठताका कथन। ३-४ निराकार ब्रह्मके स्वरूपका कथन और उसकी उपासनासे भगवत्-प्राप्ति । ५ निराकारकी उपासनामें कठिनताका कथन । ६ भगवान्के सगुणरूपकी उपासनाका कथन । ७ अपने भक्तोंका शीघ्र उद्धार करनेके लिये भगवानकी प्रतिज्ञा। ८ ध्यानसे भगवत्-प्राप्ति। ९ अभ्यासयोगसे भगवत्-प्राप्ति । १० भगवानके लिये कर्म करनेसे भगवत्-प्राप्ति । ११ सर्व कर्मोक फल-त्यागसे भगवत्-प्राप्ति । १२ सर्व कर्म-फल-त्यागकी प्रशंसा । १३-१४ सय भूतोंमें द्वेषभावसे रहित और मंत्री आदि गुगोंसे युक्त प्रिय भक्तके लक्षण। १५ हर्षादि विकारोंसे रहित और सबको अभय देनेवाले प्रिय भक्तके लक्षण। १६ निःस्पृहादि गुणोंसे युक्त सर्वत्यागी प्रिय भक्त के लक्षण । १७ हर्पशोकादि विकारोंसे रहित निष्कामी प्रिय भक्त के लक्षण । १८-१९ शत्रु-मित्रादिमें समभाववाले स्थिरबुद्धि प्रिय भक्तके लक्षण! २० उपरोक्त गुणोंका सेवन करनेवाले भक्तोंकी महिमा । क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग नामक तेरहवां अध्याय॥ १३॥ १ क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके स्वरूपका कथन । २ जीवात्मा और परमात्माकी एकताका निरूपण ।

(३८) रोक त्रियय ३ विकारसहित क्षेत्र और प्रभावसहित क्षेत्रज्ञका स्वरूप सुननेके लिये भगवानकी आज्ञा। ४ क्षेत्र और क्षेत्रजक विषयमें ऋपि, वेद और ब्रह्मसूत्रका प्रमाण । ५ क्षेत्रके स्वरूपका कथन । ६ क्षेत्र विकागेका कथन । ७ ज्ञानक नाधनोंमें अमानिन्वादि ९ गुणोंका कथन । ८ ज्ञानके साधनोंमें अहंकारक अभावका और चैराग्यका कथन । १. ज्ञानक साधनोंमें आसक्तिके अभावका और चित्तकी समताका कथन । १० ज्ञान के साधनों में अव्यभिचारिणी भक्तिका और एकान्त दशक सेवनका कथन । ११ ज्ञान साधनों में निदिध्यासनका कथन और ज्ञानसाधनोंसे विपरीन गुणोंको अज्ञान बताना । १२ जानने योग्य परमात्माके स्वरूपका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा और उसके निर्गुण स्वरूपका वर्णन | १३ परमात्माके विश्वरूपका कथन । १४ परमेश्वरके सगुण और निर्गुण स्वरूपकी एकताका कथन । १५ सर्वान्मरूपसे परमात्माकी व्यापकताका कथन । १६ उत्पत्ति, पालन और संहार करनेवाले परमेश्वरके सर्वव्यापी स्वरूपका कथन । १७ ज्ञानद्वारा प्राप्त होने योग्य परमात्माके परम प्रकाशमय स्वरूपका कथन । १८ क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेयका तच्च जाननेसे भगवत्-प्राप्ति होनेका कथन। १९ प्रकृति-पुरुपकी अनादिता तथा प्रकृतिसे विकार और गुणोंकी उत्पत्तिका कथन । .. ।

( ३९ । स्लोक विषय २० कार्य-करणकी उत्पत्तिमें प्रकृतिकी और सुख-दुःखोंके भोगने- में पुरुषकी हेतुताका कथन । २१ प्रकृतिक सङ्गसे पुरुषको भोग और नाना योनियोंकी प्राप्ति । २२ पुरुपके स्वरूपका निरूपण | २३ प्रकृति-पुरुषको तत्चसे जाननेका फल । २४ ध्यानयोग, ज्ञानयोग और कर्मयोगसे भगवत्प्राप्तिका कथन। २५ महान् पुरुपोंके कथनानुसार उपासना करनेसे भगवत्- प्राप्तिका कथन । २६ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके संयोगसे जगन्की उत्पत्तिका कथन । २७ अविनाशी परमेश्वरको सर्वत्र समभावसे स्थित देखनेवाले- की प्रशंसा । २८ परमेश्वरको सर्वत्र समभावसे स्थित देखनेका फल । २९ आत्माको अकर्ता देखनेवालेकी प्रशंसा । ३० संसारको परमात्मामें स्थित और परमात्मासे ही उत्पन्न हुआ देखनेका फल । ३१ अविनाशी परमात्मा गुणातीत होनेसे न कर्ता है और न लिपायमान होता है इस विपयका कथन । ३२ आकाशके दृष्टान्तसे आत्माकी निर्लेपताका कथन । ३३ सूर्यके दृष्टान्तसे प्रकाशखरूप आत्माके अकापनका कथन । ३४ क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके मेदको तथा प्रकृतिसे छूटने के उपायको जाननेका फल। गुणत्रयविभागयोग नामक चौदहवां अध्याय ॥ १४ ॥ १-२ अति उत्तम परम ज्ञानको कथन करनेकी प्रतिज्ञा और उसकी महिमा ।

श्लोक
विषय
३-४ प्रकृति-पुरुपके संयोगसे सर्वभूतोंकी उत्पत्तिका कथन ।
५ प्रकृतिसे उत्पन्न हुए तीनों गुणोंद्वारा जीवात्माके वांधे
जानेका कथन ।
६ सत्त्वगुणद्वारा जीवात्माके वांधे जानेका प्रकार ।
७ रजोगुणद्वारा जीवात्माके बांधे जानेका प्रकार ।
८ तमोगुणद्वारा जीवात्माके बांधे जानेका प्रकार !
९ सुख, कर्म और प्रमादमें तीनों गुणोंद्वारा जीवात्माका
जोड़ा जाना।
१० दो गुणोंको दबाकर एक गुणके बड़नेका कथन ।
११ सत्वगुणकी वृद्धिके लक्षण ।
१२ रजोगुणकी वृद्धिके लक्षण ।
१३ तमोगुणकी वृद्धिके लक्षण ।
१४ सत्वगुणकी वृद्धि में मरनेका फल ।
१५ रजोगुण और तमोगुणकी वृद्धिमें मरनेका फल ।
१६ सात्विक, राजस और तामस कर्मोंका फल ।
१७ सत्वगुणसे ज्ञान और रजोगुणसे लोभ तथा तमोगुणसे प्रमाद,
मोह और अज्ञानकी उत्पत्ति ।
१८ सात्विक, राजस और तामस पुरुषोंकी गतिका कथन ।
१९-२० आत्माको अकर्ता और गुणातीत जाननेसे भगवत् प्राप्ति ।
२१ गुणातीत पुरुपके विषयमें अर्जुनके तीन प्रश्न ।
२२-२५ पहिले और दूसरे प्रश्न के उत्तरमें गुणातीत पुरुषके लक्षणोंका
और आचरणोंका वर्णन।
२६ तीसरे प्रश्नके उत्तरमें भगवान्की अनन्यभक्तिसे गुणातीत
होनेका वर्णन।
२७ भगवत्-स्वरूपकी महिमा ।

(४१) पुरुषोत्तमयोग नामक पंद्रहवां अध्याय १५ श्लोक বিধ १ वृक्षरूपसे संसारका वर्णन और उसके जाननेवालेकी महिमा । २-३ संसारवृक्षका विस्तार और उसको असङ्गशस्त्रसे छेद करनेके लिये कथन । ४ परमपदकी प्राप्तिके निमित्त भगवान्के शरण होने के लिये प्रेरणा। ५ भगवत्-प्राप्तिवाले पुरुषोंके लक्षण । ६ परमपदके लक्षण और उसकी महिमा । ७ जीवात्माके स्वरूपका कथन । ८ वायुके दृष्टान्तसे जीवात्माके गमनका विषय । ९ मन-इन्द्रियोंद्वारा जीवात्माके विषय-सेवनका कथन । १०-११ सर्व अवस्यामें स्थित आत्माको मृह नहीं जानते और ज्ञान जानते हैं इस विपयका कथन । १२ परमेश्वरके वेजकी महिमा । १३ संपूर्ण जगत्को पृथिवीरूपसे धारण करनेवाले और चन्द्र- रूपसे पोपण करनेवाले परमेश्वरके प्रभावका कथन । १४ वैश्वानररूपसे संपूर्ण प्राणियोंके शरीरमें परमात्माकी व्यापकताका कथन । १५ प्रभावसहित भगवान्के स्वरूपका कथन । १६ क्षर और अक्षरके स्वरूपका कथन । १७ पुरुषोत्तमके स्वरूपका कथन । १८ पुरुषोत्तमकी महिमा । १९ भगवानको पुरुषोत्तम जाननेवालेकी महिम २० इस अध्यायमें कहे हुए उपदेशका बल प्राप्ति ।

( ४२ ) दैवासुरसंपद्विभागयोग नामक सोलहवां अध्याय ॥१६॥ श्लोक विषय १ देवी संपदाके अभय आदि ९ गुणोंका कथन । २ दैवी संपदाके अहिंसा आदि ११ गुणोंका कथन । ३ दैवी संपदाके तेज आदि ६ गुणोंका कथन । ४ संक्षेपसे आसुरी संपदाका कथन । ५ देवी और आसुरी संपदाका फल । ६ विस्तारसे आसुरी स्वभाववाले पुरुपोंके लक्षण सुनने के लिये भगवान्की आज्ञा । ७ आसुरी संपदावालोंमें सदाचारके अभावका कथन । ८ आसुरी संपदावालोंकी नास्तिकताका कथन । ९-१२ आसुरी प्रकृतिवालों के दुराचारका वर्णन | १३-१५ आसुरी प्रकृतिवालोंके ममता और अहंकारयुक्त अनेक मनोरथोंका वर्णन। १६ आसुरी प्रकृतिवालोंको घोर नरककी प्राप्ति । १७-१८ आसुरी प्रकृतिवालोंके लक्षण । १९ द्वेप करनेवाले नराधमोंको आसुरी योनिकी प्राप्ति । २० पुनः आसुरी खभाववालोंको अधोगतिकी प्राप्ति । २१ काम, क्रोध और लोभरूप नरकके तीन द्वारोंका कथन । २२ श्रेयसाधनसे परमगतिकी प्राप्ति । २३ शास्त्रविधिको त्याग कर इच्छानुकूल वर्तनेवालोंकी निन्दा । २४ शास्त्र के अनुकूल कर्म करनेके लिये प्रेरणा ।

श्रद्धात्रयविभागयोग नामक सत्रहवां अध्याय ॥ १७॥ स्लोक विषय १ शास्त्रविधिको त्याग कर श्रद्धासे पूजन करनेवाले पुरुषोंकी निष्ठाके विषयमें अर्जुनका प्रश्न । २ गुणोंके अनुसार तीन प्रकारकी स्वाभाविक श्रद्वाका कथन । ३ श्रद्वाके अनुसार पुरुपकी स्थितिका कथन । ४ देव, यक्ष और प्रेतादिक पूजनसे त्रिविध श्रद्धायुक्त पुरुषोंकी पहिचान। ५-६ शास्त्रसे विरुद्ध घोर तप करनेवालोंकी निन्दा । ७ आहार, यज्ञ, तप और दानके भेदोंको सुननेके लिये भगवान्की आज्ञा । ८ साविक आहारके लक्षण | ९ राजन आहारके लक्षण । १० तामस आहारके लक्षण । ११ साधिक यज्ञके लक्षण । १२ राजस यजके लक्षण । १३ तामस यजके लक्षण । १४ शारीरिक तपके लक्षण । १५ वाणीमुंबन्धी तपके लक्षण । १६ मानसिक तपके लाग । १७ साविक तपके लक्षण । १८ राजस तपके लक्षण। १९ तामस नपके लक्षण। २० साचिक दानके लक्षण । २१ राजस दानके लक्षण।

( ४४ ) इलोक विषय २२ तामस दानके लक्षण । २३ ॐतत् सत्की महिमा । २४ ओंकारके प्रयोगकी व्याख्या । २५ तत् शब्दके प्रयोगकी व्याख्या । २६-२७ सत् शब्दके प्रयोगकी व्याख्या। २८ अश्रद्धासे किये हुए कर्मकी निन्दा। मोक्षसंन्यासयोग नामक अठारहवां अध्याय ॥१८॥ १ संन्यास और त्यागका तत्त्व जाननेके लिये अर्जुनका प्रश्न । २-३ त्यागके विषयमें दूसरोंके ४ सिद्धान्तोंका कथन । ४ त्यागके विषयमें अपना निश्चय कहनेके लिये भगवान्का कथन। - ५ यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंके त्यागका निषेध । ६ यज्ञ, दान और तप आदि कर्मों में फल तथा आसक्तिके त्यागका कथन । ७ तामस त्यागके लक्षण । ८ राजस त्यागके लक्षण । ९ साचिक त्यागके लक्षण । १० रागद्वपके त्यागसे त्यागीके लक्षण । ११ स्वरूपसे सर्व कर्म-त्यागमें अशक्यताका कथन और कर्मफल- के त्यागसे त्यागीका लक्षण। १२ सकामी पुरुषोंको कर्मफलकी प्राप्ति और त्यागी पुरुषों के लिये सर्वथा कर्मफलके अभावका कथन । १३-१५ संपूर्ण कर्मोंके होने में अधिष्ठानादि पञ्च हेतुओंका निरूपण । १६ आत्माको कर्ता माननेवालेकी निन्दा ।

(४५)
लोक
विश्य
१७ आत्माको अकर्ता माननेवाले की प्रशंसा ।
१८ कर्मप्रेरक और कर्मसंग्रहका निर्णय ।
१९ तीनों गुगोंके अनुसार ज्ञान, कर्म और कर्ताके भेदोंको
सुननेके लिये भगवान्की आज्ञा ।
२० साचिक ज्ञानके लक्षण |
२१ राजस ज्ञानके लक्षण |
२२ तामस ज्ञानके लक्षण ।
२३ साचिक कर्मके लक्षण ।
२४ राजस कर्मके लक्षण ।
२५ तामस कर्मके लक्षण ।
२६ साचिक कर्ताक लक्षण ।
२७ राजस कर्ता लक्षण ।
२८ तामस कर्ताके लक्षण ।
२९ तीनों गुणोंके अनुसार बुद्धि और धृतिके मेदोंको सुननेके लिये
भगवान्की आज्ञा ।
३० सात्विकी युद्धिके लक्षण ।
३१ राजसी बुद्धिके लक्षण ।
३२ तामसी बुद्धिके लक्षण ।
३३ साविकी धृतिके लक्षण |
३४ राजसी धृतिके लक्षण ।
३५ तामसी धृतिके लक्षण ।
६-३७ तीनों गुणोंके अनुसार मुखके मेदोंको सुननेके लिये
भगवान्की आज्ञा और साचिक सुखके लक्षण ।
३८ राजस मुखके लक्षण ।
३९ तामस मुखके लक्षण ।
४० तीनों गुणों के विषयका उपसंहार ।

(४६)
श्लोक
विषय
४१ वर्णधर्मके विषयका आरम्भ ।
४२ ब्राह्मण के स्वाभाविक काँका कथन ।
४३ क्षत्रियके स्वाभाविक कर्मोंका कथन ।
४४ वैश्य और शूद्रके स्वाभाविक कर्मोंका कथन ।
४५-४६ स्वाभाविक कमोंसे भगवत्-प्राप्तिका कथन और उनकी विधि ।
४७ स्वधर्म-पालनकी प्रशंसा ।
४८ स्वधर्मत्यागका निषेध ।
४९ सांख्ययोगसे भगवत्-प्राप्तिका कथन ।
५० ज्ञानयोगके अनुसार भगवत्-प्राप्तिकी विधिको समझनेके लिये
अर्जुनके प्रति भगवान्की आज्ञा ।
५१-५३ ज्ञानयोगके अनुसार भगवत्-प्राप्तिका पात्र बननेकी विधि ।
५४ ज्ञानयोगसे परा भक्तिकी प्राप्ति ।
५५ परा भक्तिसे भगवत्-प्राप्ति ।
५६ भक्तिसहित निष्काम कर्मयोगसे भगवत्-प्राप्ति ।
५७ भक्तिसहित निष्काम कर्मयोग करनेके लिये भगवान्की
आज्ञा।
५८ भगवत्-चिन्तनसे उद्धार और भगवत्-आज्ञाके त्यागसे
अधोगति ।
५९-६० विना इच्छा भी स्वाभाविक काँके होने में प्रकृतिकी प्रबलता-
का निरूपण ।
६१ सबके हृदयमें अन्तर्यामी परमात्माकी व्यापकताका कथन ।
६२ ईश्वरके शरण होने के लिये आज्ञा और उसका फल ।
६३ उपदेशका उपसंहार ।
६४ अर्जुनकी प्रीतिक कारण पुनः उपदेशका आरम्भ ।
६५ भगवान्की भक्ति करनेके लिये आज्ञा और उसका फल ।
३

(४७) श्लोक विषय ६६ सर्व धर्मोंका आश्रय त्यागकर केवल भगवत्-शरण होने लिये आज्ञा । ६७ अपात्रके प्रति श्रीगीताजीका उपदेश करने के लिये निषेध । ६८-६९ श्रीगीताजीके प्रचारका माहात्म्य । ७० श्रीगीताजीक पठनका माहात्म्य । ७१ श्रीगीताजीके श्रवणका माहात्म्य । ७२ गीताश्रयणसे अर्जुनका मोह नष्ट हुआ या नहीं यह जानने लिये भगवान्का प्रश्न । ७३ अपने मोहका नाश होना स्वीकार करके अर्जुनका भगवत- आज्ञा माननेकी प्रतिज्ञा करना। ७४-७५ श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादकी महिमा । ७६ श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादसे संजयका हर्पित होना । ७७ भगवान्के विश्वरूपको स्मरण करके संजयका हर्पित होना। ७८ श्रीकृष्ण और अर्जुनके प्रभावका कथन । ॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥ * इति श्रीमद्भगवद्गीताका मूक्ष्मविषय समाप्त * हरिः ॐ तत्सत् हरिः ॐ तत्सत् हरिः ॐ तसद

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बाँकेविहारी
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वंशाविभूषितकरान्नवनीरदाभात्पीताम्बरादरुणविम्बफलाधरोष्टात्
ती तत्वमहं न जाने ।।

धृतराष्ट्र उवाच 17 श्रीपरमात्मने नमः अथ श्रीमद्भगवद्गीता भापाटीकासहित प्रथमोऽध्यायः धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥ पदच्छेदः धर्मक्षेत्रे, कुरुक्षेत्रे, समवेताः, युयुत्सवः, मामकाः, पाण्डवाः, च, एव, किम्, अकुर्वत, संजय ॥१॥ হাল্কা शब्दार्थ , अन्वयः अन्चयः . धृतराष्ट्र बोला- संजय =हे संजय मामकाः = मेरे धर्मक्षेत्रे =धर्मभूमि च =और कुरुक्षेत्रे =कुरुक्षेत्रमें एव समवेताः =इकठे हुए पाण्डवाः = पाण्डुके पुत्रोंने (युद्रको किम् क्या युयुत्सवः इच्छात्राले अकुर्वत = किया * यहां "य" शब्द समुचयार्थ है । %3D ५० श्रीमद्भगवद्गीता संजय उवाच दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा । आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥ दृष्ट्वा, तु, पाण्डवानीकम्, व्यूढम्, दुर्योधनः, तहा, आचार्यम्, उपसंगम्य, राजा, वचनम्, अब्रवीत् ॥ २ ॥ -- इसपर संजय बोला- -उस समय राजा राजा पाण्डवा- -कहा तदा दृष्ट्वा = देखकर तु और आचार्यम् = द्रोणाचार्यके दुर्योधनः =दुर्योधनने उपसंगम्य = पास जाकर व्यूढम् = व्यूहरचनायुक्त ( यह ) (पाण्डवोंकी वचनम् = वचन नीकम् सेनाको अब्रवीत् पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् । व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥ पश्य, एताम्, पाण्डुपुत्राणाम्, आचार्य, महतीम्, चमूम्, ब्यूढाम, द्रुपदपुत्रेण, तब, शिष्येण, धीमता ॥ ३ ॥ आचार्य हे आचार्य =आपके धृष्टद्युम्नद्वारा धीमता = बुद्धिमान् (व्यूहाकार शिष्येण शिप्य व्यूढाम् (खड़ी की हुई दुपदपुत्रेण द्रुपदपुत्र নৰ अध्याय १ - अत्र . पाण्ड =पाण्डुपुत्रोंकी महतीम् -बड़ी भारी पुत्राणाम् चमूम् - सेनाको एताम् इस पश्य देखिये अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि । युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥ अत्र, शूराः, महेष्वासाः, भीमार्जुनसमाः, युधि, युयुधानः, विराटः, च, द्रुपदः, च, महारथः ॥ ३ ॥ -इस (सेना) में ( सन्ति ) =हैं (जैसे ) (बड़े बड़े महेप्यासाः युयुधानः = - सात्यकि धनुपांत्राले और युधि = युद्धमें विराटः =विराट भिीम और भीमार्जुन- = अर्जुनके {समान महारथः =महारथी शूराः बहुतसे शूरवीर द्रुपदः 3राजा द्रुपद धृष्टकेतुश्चकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् । पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ॥ धृष्टकेतुः, चेकितानः, काशिराजः, च, वीर्यवान्, पुरुजित, कुन्तिभोजः, च, शैब्धः, च, नरपुङ्गवः ॥ ५ ॥ व %3- -तथा समाः श्रीमद्भगवद्गीता --- च , = और पुरुजित् = पुरुजित् धृष्टकेतुः = धृष्टकेतु कुन्तिभोजः कुन्तिभोज चेकितानः = चेकितान और तथा मनुष्योंमें वीर्यवान् नरपुङ्गवः = बलवान् श्रेष्ठ काशिराजः = काशिराज शैव्यः = शैब्य युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् । सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥ युधामन्युः, च, विक्रान्तः, उत्तमौजाः, च, वीर्यवान्, सौभद्रः, द्रौपदेयाः, च, सर्वे, एव, महारथाः ॥ ६ ॥ =और = और विक्रान्तः = पराक्रमी युधामन्युः = युधामन्यु पांचों पुत्र ( यह) वीर्यवान् = बलवान् उत्तमौजाः =उत्तमौजा = ही सुभद्रापुत्र सौभद्रः अभिमन्यु महारथाः = महारथी हैं। अस्माकंतु विशिष्टाये तान्निबोधद्विजोत्तम। नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते॥ च द्रौपदेयाः = द्रौपदीके च - तथा सर्वे - सब एव अध्याय १ , , %3- %- अस्माकम् , तु, विशिष्टाः, ये, तान् , निबोध, द्विजोत्तम, नायकाः, मम, सैन्यस्य, संज्ञार्थम् , तान् , ब्रवीमि, ते॥७॥ द्विजोत्तम =हे ब्राह्मणश्रेष्ठ |ते = आपके अस्माकम् = हमारे पक्षमें संज्ञार्थम् =जाननेके लिये तु मम = मेरी ये =जो जो सैन्यस्य =सेनाके विशिष्टाः =प्रधान है। (ये) =जो जो तान् उनको नायकाः = सेनापति हैं (आप) तान् = उनको निबोध = समझ लीजिये ब्रवीमि = कहता हूं भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः । अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥ भवान् , भीष्मः, च, कर्णः, च, कृपः, च, समिर्तिजयः, अश्वत्थामा, विकर्णः, च, सौमदत्तिः, तथा, एव, च ॥८॥ एक तो स्वयम्-- भवान् -आप -और और समितिजयः संग्रामविजयी भीष्मः =पितामह भीष्म कृपः -कृपाचार्य च =तथा कर्णः = कर्ण तथा %3D %3D श्रीमद्भगवद्गीता নখt च एच सौमदत्तिः = सोमदत्तका = वैसे और. =ही अश्वत्थामा=अश्वत्थामा विकर्णः = विकर्ण पुत्र भूरिश्रवा अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः । नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ अन्ये, च, बहवः, शूराः, मदर्थे, त्यक्तजीविताः, -. १३ नानाशस्त्रप्रहरणाः, सर्वे, युद्धविशारदाः ॥६॥ तथा--- च नानाशस्त्र- अन्ये =और मदर्थे = मेरे लिये =भी जीवनकी त्यक्त- बहवः आशाको = बहुत-से जीविताः शूराः शूरवीर त्यागनेवाले अनेक प्रकारके सर्वे -सबके सब -शस्त्र अस्त्रोंसे युद्ध- प्रहरणाः युक्त अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् । पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥ अपर्याप्तम् , तत, अस्माकम् , बलम् , भीष्माभिरक्षितम् , पर्याप्तम् , तु, इदम् , एतेषाम् , बलम् , भीमाभिरक्षितम्॥१०॥ विशारदाः} = युद्धमें चतुर हैं , अध्याय १ और- %3D =यह = सेना 'सब प्रकारसे भीप्माभि (भीष्मपितामह-तु =और रक्षितम् द्वारा रक्षित भीमाभि- _(भीमद्वारा अस्माकम् =हमारी रक्षितम् रक्षित एतेषाम् = इन लोगोंकी तत् - वह इदम् बलम् |बलम् =सेना जीतनेमें अपर्याप्तम् पर्याप्तम् अजेय है सुगम है, अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः । भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥ अयनेषु, च, सर्वेषु, यथाभागम् ; अवस्थिताः, ... भीष्मम् , एव, अभिरक्षन्तु, भवन्तः, सर्वे, एव, हि ॥११॥ = इसलिये सर्वे =सबके सब सर्वेपु -सन एवं =ही हि = निःसन्देह अयनेषु =मोचोंपर 'भीम- (अपनी अपनी भीष्मम् पितामहकी भागम् जगह एवं =ही अवस्थिताः = स्थित रहते हुए । भवन्तः =आपलोग , यथा- अभिरक्षन्तु रक्षा में (सब ओरले %3D श्रीमद्भगवद्गीता तस्य संजनयन्हर्ष कुरुवृद्धः पितामहः । सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्ख दध्मौ प्रतापवान् ॥ तस्य, संजनयन् , हर्षम् , कुरुवृद्धः, पितामहः, सिंहनादम् , विनद्य, उच्चैः, शङ्खम् , दध्मौ, प्रतापवान्॥१२॥ इस प्रकार द्रोणाचार्यसे कहते हुए दुर्योधन के वचनोंको सुनकर- कुरुवृद्धः = कौरवोंमें वृद्ध संजनयन् = उत्पन्न करते हुए प्रतापवान् = बड़े प्रतापी उच्चैः = उच्चस्वरसे पितामह पितामहः = भीष्मने (उस (दुर्योधन) विनद्य = गर्जकर =शङ्ख हर्षम् = हर्ष दध्मौ ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः । सहसैवाभ्यहन्यन्त सशब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥ ततः, शङ्खाः, च, भेर्यः, 'च, पणवानकेंगोमुखाः, सहसा,'एव, अभ्यहन्यन्त, सः,शब्दः,तुमुलः, अभवत् ॥१३॥ सिंहनादम्= सिंहकी नादके समान तस्य के (हृदयमें) शङ्खम् बजाया । ततः उसके उपरान्त भेर्यः =नगारे शहाः शल च और च स्तथा अध्याय १ पणव- ढिोल मृदङ्ग अभ्यहन्यन्त = बजे आनक- =और नृसिंहादि गोमुखाः वाजे (उनका) = वह शब्दः -शब्द बड़ा भयंकर a Jiiii =ही . अभवत्। हुआ ततः सहसा -एक साथ तुमुलः एव ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ । माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शौ प्रद्ध्मतुः ॥ ततः, श्वेतैः, हयैः, युक्त, महति, स्यन्दने, स्थितौ; माधवः, पाण्डवः, च, एव, दिव्यौ, शङ्खौ, प्रदध्मतुः॥१४॥ = इसके अनन्तर (श्रीकृष्ण श्वेतैः =सफेद महाराज यैः = और युक्ते पाण्डवः = अर्जुनने -युक्त भी महति दिव्यौ =अलौकिक स्पन्दने =रथमें =शङ्ख स्थितौ पाञ्चजन्यं हपीकेशो देवदत्तं धनंजयः। पौण्ड् दध्मौ महाशङ्ख भीमका वृकोदरः ॥ माधवः %3D =घोड़ोंसे एव =उत्तम %3D % 3D -बैठे हुए शङ्खौ प्रदध्मतुः = बजाये श्रीमद्भगवद्गीता ८ Kri ---- पाञ्चजन्यम्,, हृषीकेशः, देवदत्तम्, धनंजयः, पौण्ड्रम, दध्मौ, महाशङ्खम्, भीमकर्मा, वृकोदरः ॥१५॥ उनमें- श्रीकृष्ण सयानक हृषीकेशः भीमकर्मा महाराजने कर्मवाले पाञ्चजन्य पाञ्चजन्यम् वृकोदरः = भीमसेनने नामक शङ्ख धनंजयः =अर्जुनने पौण्ड्रम् = पौण्ड्र नामक देिवदत्त महाशङ्खम् = महाशल देवदत्तम् = नामक शङ्ख ( बजाया ) दध्मौ बजाया अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । नकुलः सुघोषमणिपुष्पकौ ॥ अनन्तविजयम्, राजा, कुन्तीपुत्रः, युधिष्ठिरः, नकुलः, सहदेवः, च, सुघोषमणिपुष्पकौ ॥१६॥ कुन्तीपुत्रः =कुन्तीपुत्र =राजा सहदेवः युधिष्ठिरः = युधिष्ठिरने = सहदेवने अनन्तविजय सुघोष और विजयम् नामक शङ्ख सुघोषमणि-मणिपुष्पक (और) पुप्पको नामवाले नकुलः शङ्ख (वज सहदेवश्च , स्तथा राजा अनन्त- -नकुल 《《《《《 - अध्याय १ काश्यश्च परमेष्वासःशिखण्डी च महारथः । धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यक्रिश्चापराजितः ॥ काश्यः, च, परमेष्वासः, शिखण्डी, च, महारथः, धृष्टद्युम्नः, विराटः, च, सात्यकिः, च, अपराजितः॥१७॥ - परमेष्वासः- श्रेष्ठ धनुषवाला धृष्टद्युम्नः धृष्टद्युम्न काश्यः -काशिराज -तथा और विराटः -राजा विराट महारथः महारथी च =और शिखण्डी =शिखण्डी अपराजित-अजेय च और सात्यकिः = सात्यकि द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते । सौभद्रश्च महावाहुःशङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक्॥ द्रुपदः, द्रौपदेयाः, च, सर्वशः, पृथिवीपते, सौभद्रः, च, महाबाहुः, शङ्खान्, दध्मः, पृथक, पृथक्॥१८॥ %3D , तथा द्रुपदः च = राजा द्रुपद द्रौपदेयाः = पांचों पुत्र द्रौपदीके D और ६० श्रीमद्भगवद्गीता च =अलग -अलग =और पृथिवीपते = हे राजन् बड़ी महाबाहुः पृथक सुजात्राला पृथक सौभद्रः सुभद्रापुत्र (अभिमन्यु शलान् =शल सर्वशः = इन सबने दध्मः = बजाये, स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्। नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥ सः, घोषः, धार्तराष्ट्राणाम्, हृदयानि, व्यदारयत, ६६, नभः, च, पृथिवीम्, च, एव, तुमुलः, व्यनुनादयन् ॥१९॥ , =और व्यनुनादयन् (शव्दायमान करते हुए. घोषः धार्तराष्ट्राणाम् (धृतराष्ट्र- (पुत्रोंके तुमुलः भयानक = शब्दने नभः -आकाश च और पृथिवीम् = पृथिवीको एच हृदयानि -हृदय व्यदारयत् (विदीर्ण कर दिये - 1035 अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वाधार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः। प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥

अध्याय १ career हपकिशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते । सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥ अथ, व्यवस्थितान् , दृष्ट्वा, धार्तराष्ट्रान् , कपिध्वजः, प्रवृत्ते, शस्त्रसंपाते, धनुः, पाण्डवः, हृपीकेशम्, तदा, वाक्यम् , इदम्, आह, महीपते, सेनयोः, उभयोः, मध्ये,रथम् ,स्थापय,मे, अच्युत॥२०-२१॥ उद्यम्य, महीपते- =हे राजन् | उद्यम्य -उठाकर अथ = उसके उपरान्त हिपोकेश हृषीकेशम् = श्रीकृष्ण कपिध्वजः = कपिध्वज महाराजसे पाण्डवः = अर्जुनने (इदम् - यह व्यवस्थितान्= खड़े हुए वाक्यम् = वचन आह - कहा अच्युत हे अच्युत दृष्ट्वा =देखकर = मेरे -तदा स्थम् शिस्त्र चलनेकी उभयोः =दोनों - शस्त्रसंपाते -तैयारीके सेनयोः --सेनाओंके प्रवृत्ते समय मध्ये -बीच में स्थापय खड़ा करिये धार्तराष्ट्रान् = पुत्रोंको में %3D - धनुः धनुष श्रीमद्भगवद्गीता यावदेतानिरीक्षेऽहं योडुकामानवस्थितान् । कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ॥ यावत् , एतान् , निरीक्षे, अहम् , योडुकामान् , अवस्थितान् , कैः, मया, सह, योद्धव्यम् , अस्मिन् , रणसमुद्यमे ॥२२॥ . ' , यावत् -जबतक अस्मिन् =इस अहम् = मैं युद्धरूप रणसमुद्यमे एतान् =इन अवस्थितान् = स्थित हुए मया = सुझे युद्धकी कैः = किन-किनके योडुकामान्= कामना- वालोंको सह -साथ अच्छी प्रकार युद्ध करना योग्य है निरीक्षे = देख लूं (कि योद्धव्यम् = योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः । धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ योत्स्यमानान् , अबेक्षे, अहम् , ये, एते, अत्र, समागताः, धार्तराष्ट्रस्य, दुर्बुद्धेः, युद्धे, प्रियचिकीर्षवः ॥ २३ ॥ , अध्याय १ %3D अत्र =इस सेनामें -उन योत्स्यमानान् युद्ध करने- ये % 3D और--- दुर्बुद्धः =दुर्बुद्धि धार्तराष्ट्रस्य = दुर्योधनका समागताः =आये हैं युद्धे युडमें (तान् ) कल्याण प्रियचिकीर्षवः- चाहनेवाले वालोंको =जो जो | अहम् एते ये राजालोग अवक्षे = देखूगा संजय उवाच एवमुक्तों हपीकेशो गुडाकेशेन भारत सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥ भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् । उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ॥ 10 एवम्, उक्तः, हपीकेशः, गुडाकशन, भारत, " सेनयोः, उभयोः, मध्ये, स्थापयित्वा, रथोत्तमम् ॥२४॥ भीष्मद्रोणप्रमुखतः, सर्वेषाम् , च, महीक्षिताम् , उवाच, पार्थ, पश्य, एतान्, समवेतान् , कुरून् , इति ॥२५॥ मा , . संजय बोला- भारत -इस प्रकार = हे धृतराष्ट्र एवम् गुडाकेशेन = अर्जुनद्वारा उक्तः ६४ श्रीमद्भगवद्गीता रथोत्तमम् कहा (कि) = हे पार्थ च महाराज राजाओंके हृषीकेशः = श्रीकृष्ण- महीक्षिताम् सामने = उत्तम रथको उभयोः = दोनों स्थापयित्वा = खड़ा करके सेनयोः - सेनाओंके इति =ऐसे मध्ये बीचमें उवाच भीष्म और पार्थ भीष्मद्रोण- द्रोणाचार्यके एतान् -इन प्रमुखतः सामने समवेतान् = इकट्ठे हुए और कुरून् = कौरवोंको सर्वेषाम् = संपूर्ण पश्य = देख तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितृनथ पितामहान् । आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन् पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥२६॥ श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि । तत्र, अपश्यत् , स्थितान् , पार्थः, पितन् , अथ, पितामहान् , आचार्यान् , मातुलान् , भ्रातॄन् , पुत्रान् , पौत्रान् , सखीन् , तथा, श्वशुरान् , सुहृदः, च, एव, सेनयोः, उभयोः, अपि उभयोः दोनों पार्थः = पृथापुत्र अर्जुनने अपि =ही सेनयोः =सेनाओंमें अथ उसके उपरान्त तत्र -उन अध्याय १. -स्थित हुए %D % 3D % 3A स्थितान् पौत्रान् = पौत्रोंको (पिताके तथा तथा पितॄन भाइयोंको सखीन् = मित्रोंको : पितामहान् = पितामहोंको श्वशुरान् = ससुरोको आचार्यान् = आचार्योको =और मातुलान् =मामोंको सुहृदः सुहृदोंको भ्रातृन् =भाइयोंको एन पुत्रान् =पुत्रोंको अपश्यत् =देखा तान्समीक्ष्यस कौन्तेयःसर्वान्वन्धूनवस्थितान् कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् । तान्, समीक्ष्य, सः, कौन्तेयः, सन्,ि बन्धून्, अवस्थितान् ॥ कृपया, परया, आविष्टः, विपीदन, इदम्, अन्नवीत् । %3D =भी इस प्रकार- कृपया -करुणासे तान् =उन अवस्थितान् खड़े हुए सर्वान् = संपूर्ण बन्धून् बन्धुओंको समीक्ष्य =देखकर , =वह आविष्टः. -युक्त हुआ कौन्तेयः = कुन्तीपुत्र अर्जुन विषीदन् शोक करता हुआ %D -यह बोला परया =अत्यन्त अब्रवीत -

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अध्याय १ गाण्डीवम्, संसते, हस्तात्, त्वक, च, एव, परिदह्यते, न, च, शक्नोमि,अवस्थातुम्, भ्रमति, इव, च, मे, मनः॥३०॥ तथा- भ्रमति इव = च % 32 हस्तात् हाथसे मे =मेरा गाण्डीवम् = गाण्डीव धनुष मनः -मन स्रंसते =गिरता है (भ्रमित-सा और हो रहा है त्वचा (अतः) = इसलिये (मैं) एव भी अवस्थातुम् खड़ा रहनेको परिदह्यते = बहुत जलती है |च =भी Dथा न शक्नोमि-समर्थ नहीं हूं निमितानि च पश्यामि विपरीतानि केशव । त्वक न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥ , , निमित्तानि, च, पश्यामि, विपरीतानि, केशव, न, च, श्रेयः, अनुपश्यामि, हत्वा, खजनम्, आहवे ॥३१॥ और- केशव =Dहे केशव पश्यामि =देखता हूं (तथा) निमित्तानि लक्षणोंको आहवे =युद्धमें -भी खजनम् =अपने कुलको विपरीतानि = विपरीत (ही.)हत्वा -मारकर ६८ श्रीमद्भगवद्गीता -कल्याण श्रेयः न = नहीं अनुपश्यामि देखता नकाङ्केविजयंकृष्णनच राज्यं सुखानि च। किंनोराज्येनगोविन्दकिंभोगै वितेन वा॥ न, काङ्के, विजयम्, कृष्ण, न, च, राज्यम्, सुखानि, च, किम्, नः, राज्येन, गोविन्द, किम्, भोगैः, जीवितेन, या ॥३२॥ और- नः वा कृष्ण =हे कृष्ण ( मैं) (काझे)=चाहता विजयम् = विजयको गोविन्द =हे गोविन्द नहीं =हमें काले चाहता राज्येन =राज्यसे -और किम् = क्या (प्रयोजन है) राज्यम् =अथवा =ন भोगः = भोगोंसे (और) सुखानि =सुखोंको =सुखोंको (भी) जीवितेन =जीवनसे ( भी) किम् = क्या (प्रयोजन है) येपामर्थ काङ्कितं नो राज्यं भोगाः मुखानि च।। तइमेऽवस्थितायुद्धेप्राणांस्त्यक्त्वाधनानि च। येषाम् ; अर्थे, कार्तितम्, नः, राज्यम्, भोगाः, सुखानि, च, ते, इमे,अवस्थिताः, युद्धे,प्राणान्, त्यक्त्वा धनानि, च॥३३॥ न -नहीं अध्याय १ %3D च %3D % 3D क्योंकि =हमें इमे =यह सब येषाम् = जिनके धनानि =धन अर्थे = लिये -और राज्यम -राज्य -भोग जीवन भोगाः प्राणान 3 और (कीआशा) को सुखानि =सुखादिक त्यक्त्वा -त्यागकर काशितम् = इच्छित हैं युद्ध युद्धमें ते घे (ही) अवस्थिताः खड़े हैं आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः । मातुलाश्वशुराःपौत्राश्याला सम्बन्धिनस्तथा आचार्याः, पितरः, पुत्राः, तथा, एव, च, पितामहाः, मातुलाः, श्वशुराः, पौत्राः, श्यालाः, सम्बन्धिनः, तथा ॥३४॥ जो कि- आचार्याः =गुरुजन मातुला:- पितरः श्वशुराः ससुर पुत्राः =लड़के पौत्राः- =और श्यालाः वैसे तथा : : तथा एव (और भी) पितामहाः = दादा सम्बन्धिनः सम्बन्धी लोग हैं , , =मामा =ताऊ चाचे . पोते च %D - साले तथा =ही श्रीमद्भगवद्गीता ७० . < एतान्न हन्तुमिच्छामि नतोऽपि मधुसूदन । अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृत॥ एतान्, न, हन्तुम्, इच्छामि, नतः, अपि, मधुसूदन, अपि, त्रैलोक्यराज्यस्य, हेतोः, किम्, नु, महीकृते ॥ ३५ ॥ इसलिये- . , =इन सबको घ्नतः = { मधुसूदन =हेमधुसूदन(मुझे) एतान् =मारनेपर हन्तुम -मारना अपि =भी (अथवा) न =नहीं त्रैलोक्य तीन लोकके इच्छामि = चाहता ( चाहता (फिर) राज्यस्य राज्यके (पृथिवीके हेतोः = लिये महीकृते = अपि =भी ( मैं .) । नु किम् = कहना ही क्या है निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः काप्रीतिःस्याजनार्दन । पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः।३६।। निहत्य, धार्तराष्ट्रान्, नः, का, प्रीतिः, स्यात्, जनार्दन, पापम्, एव, आश्रयेत्, अस्मान्, हत्वा,एतान्, आततायिनः॥ जनार्दन =हे जनार्दन निहत्य धार्तराष्ट्रान् = पुत्राको =मारकर (भी) =हमें क्या का अध्याय १ ७ हत्या । , . प्रीतिः -प्रसन्नता ( तो) स्यात् =होगी अस्मान् = हमें एतान् -इन | पापम् पाप आततायिनः =आततायियोंको एव म्ही मारकर, आश्रयेत् =लगेगा तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्ववान्धवान्। स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥ तस्मात, न, अर्हाः, वयम्, हन्तुम, धार्तराष्ट्रान्, स्वबान्धवान्, स्वजनम्, हि, कथम्, हत्वा, सुखिनः, स्याम, माधव ॥३७॥ तस्मात् = इससे न अर्हाः = योग्य नहीं हैं = हे माधव हि क्योंकि स्वबान्धवान्=अपने बान्धव खजनम् =अपने कुटुम्बको हत्वा = मारकर (हम) कथम् हन्तुम् = मारने के लिये सुखिनः सुखी वयम् =हम यद्यप्यते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः । कुलक्षयकृतं दोष मित्रद्रोहे च पातकम्॥ यद्यपि, एते, न, पश्यन्ति, लोभोपहतचेतसः, कुलक्षयकृतम्, दोपम्, मित्रद्रोहे, च, पातकम् ॥ ३८ ॥ माधव % 31 % 3D धार्तराष्ट्रान् = (धृतराष्ट्रके %3D स्याम -होंगे श्रीमद्भगवद्गीता चित्त हुए - यह लोग = पापको न कुलक्षयकृतम्- नाशकृत • यद्यपि = यद्यपि च और लोभोपहत- लोभसे भ्रष्ट- मित्रोंके साथ चेतसः मित्रद्रोहे विरोध करनेमें एते पातकम् कुलके नहीं दोषम् =दोषको ... पश्यन्ति = देखते हैं कथन ज्ञेयमस्माभिः पापादस्पानिवर्तितम् । कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यहिर्जनार्दन ॥ कथम्, न, ज्ञेयम्, अस्माभिः, पापात, अस्मात् , निवर्तितम्, कुलक्षयकृतम्, दोषम्, प्रपश्यद्भिः, जनार्दन ॥ ३९ ॥ परन्तु.. % 3D कुलक्षयकृतम्=करनेसे न जनार्दन = हे जनार्दन अस्मात = इस कुलके नाश पापात = पापसे निवर्तितुम = हटनेके लिये होते हुए कथम क्यों दोषम् दोषको = नहीं प्रपश्यद्भिः =जाननेवाले ज्ञेयम अस्माभिः =हमलोगोंको । कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः । धर्म नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥ विचार करना चाहिये ...

अध्याय १ प -- =पाप कुलक्षये, प्रणश्यन्ति, कुलधर्माः, सनातनाः, धर्म, नप्टे, कुलम्, कृत्स्नम्,अधर्मः,अभिभवति, उत॥४०॥ क्योंकि- कुलके नाश कुलक्षये कृत्स्नम् =संपूर्ण होनेसे कुलम =कुलको सनातनाः -सनातन अधर्मः कुलधर्माः =कुलधर्म प्रणश्यन्ति = नष्ट हो जाते हैं उत =भी धर्मे =धर्मके अभिभवति नप्टे। .. =नाश होनेसे र लेता है अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः। स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥ अधर्माभिभवात, कृष्ण, प्रदुप्यन्ति, कुलस्त्रियः, स्त्रीपु, दुष्टासु, वार्णेय, जायते, वर्गमंकरः ॥४१॥ %3D %3D बहुत दबा . तथा- =हे कृष्ण कृष्ण (और) अधर्माभि _(पापके अधिक वार्ष्णेय = हे वार्ष्णेय भवात बढ़ जानेसे स्त्रीपु =स्त्रियोंके कुलस्त्रियः = कुलकी स्त्रियां | दुष्टासु कुलकी स्त्रियां दुष्टासु = दृषित होनेपर दूपित हो वर्णसंकरः =वर्णसंकर . प्रदुप्यन्ति जाती है जायते = उत्पन्न होता है. .

नाममा च संकरो नरकायैव कुलन्नानां कुलस्य च । पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥ संकरः, नरकाय, एव, कुलनानाम्, कुलस्य, च, पतन्ति, पितरः, हि, एषाम्, लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥४२॥ और वह- संकरः - वर्णसंकर लोप हुई कुल- लुप्तपिण्डो-पिण्ड और कुलन्नानाम् = घातियोंको दकक्रियाः जलकी =और क्रियावाले कुलस्य एषाम् =इनके पितरः =पितरलोग (जानेके लिये हि =भी = ही (होता है) पतन्ति = गिर जाते हैं दोषैरेतैः कुलमानां वर्णसंकरकारकैः । उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥ दोषैः, एतैः, कुलनानाम्, वर्णसंकरकारकैः, उत्साद्यन्ते, जातिधर्माः, कुलधर्माः, च, शाश्वताः ॥४३॥ और- =इन दोषैः -दोषोंसे वर्णसंकर वर्णसंकर- कुल- कारकैः कुलनानाम् घातियोंके कुलको (नरकमें ले नरकाय एव , , एतैः । । कारक अध्याय १ ४८. और 51 शाश्वताः -सनातन जातिधर्माः जातिधर्म कुलधर्माः = कुलधर्म (नष्ट हो उत्साद्यन्ते = जाते हैं उसन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन । नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥ उत्सन्नकुलधर्माणाम, मनुष्याणाम् , नरके, अनियतम्, वासः, भवति, इति, अनुशुश्रुम ॥४४॥.. 1. मनुष्याणाम्, जनाईन,'3E तथा-- %3D नष्ट हुए वासः =वास जनार्दन =हे जनार्दन नरके = नरकमें उत्सन्नकुल- धर्माणाम् कुलधर्मवाले भवति = होता है मनुष्याणाम= मनुष्योंका इति = ऐसा अनन्त (हमने) अनियतम् कालतक अनुशुश्रुम = सुना है स अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् । यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥ अहो, बत, महत्पापम्, कर्तुम्, व्यवसिताः, वयम्, यत्, राज्यसुखलोभेन, हन्तुम् , स्वजनम् , उद्यताः ॥१५॥:: m प्रमाला - - ।

1 श्रीमद्भगवद्गीता ७४ ८..! संकरो नरकायैव कुलनानां कुलस्य च । पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥ संकरः, नरकाय, एव, कुलनानाम्, कुलस्य, च, पतन्ति, पितरः, हि, एषाम्, लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥४२॥ , और वह- कुलन्नानाम् ={वालयों को = इनके संकरः वर्णसंकर लोप हुई लुप्तपिण्डो-पिण्ड और घातियोंको दकक्रियाः जलकी च =और क्रियावाले कुलस्य =कुलको एषाम् (नरकमें ले पितरः पितरलोग नरकाय. (जानेके लिये हि =भी एवं =ही (होता है), पतन्ति = गिर जाते हैं दोषैरेतैः कुलनानां वर्णसंकरकारकैः । उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्वशाश्वताः॥ दोषैः, एतैः, कुलनानाम्, वर्णसंकरकारकैः, उत्साद्यन्ते, जातिधर्माः, कुलधर्माः, च, शाश्वताः ॥४३॥ और- एतैः इन दोषैः -दोषोंसे वर्णसंकर वर्णसंकर- कुल- कारकैः कुलन्नानाम् घातियोंके , कारक अध्याय १ 51 शाश्वताः = सनातन जातिधर्माः जातिधर्म कुलधर्माः = कुलधर्म उत्साद्यन्ते नष्ट हो =और जाते हैं उन्नेिकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन । नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥ ARH उत्सन्नकुलधर्माणाम्, मनुष्याणाम, जनाईन, . नरके, अनियतम्, वासः, भवति, इति, अनुशुश्रुम ॥४४॥ नथा-- वासः =वास %3D जनार्दन =हे जनार्दन नरके = नरकमें उत्सन्नकुल- नष्ट हुए धर्माणाम् कुलधर्मवाले भवति =होता है मनुष्याणाम= मनुष्योंका इति = ऐसा (अनन्त (हमने) अनियतम् = कालतक अनुशुश्रुम =सुना है अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् । यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥ अहो, बत, महत्पापम्, कर्तुम्, व्यवसिताः, वयम्, यत, राज्यसुखलोभेन, हन्तुम् , स्वजनम् , उद्यताः ॥४५॥ ܕܐܢ ܐ وار الام , ७.६ श्रीमद्भगवद्गीता licy हैं बत राज्य और वयम् अहो =अहो व्यवसिताः तैयार हुए हैं =शोक है (कि.) यत् =जो कि हमलोग राज्यसुख- = (बुद्धिमान् लोमेन सुखके लोभसे होकर भी) स्वजनम् = अपने कुलको महत्पापम् =महान् पाप हन्तुम् =मारनेके लिये कर्तुम् =करनेको उद्यताः = उद्यत हुए हैं यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः । धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥ the . ..::.:..:: यदि, माम्, अप्रतीकारम् , अशस्त्रम्, शस्त्रपाणयः, धार्तराष्ट्राः, रणे, हन्युः, तत, मे, क्षेमतरम्, भवेत् ॥४६॥ यदि यदि रणे रणमें माम् -सुझ हन्युः =मारें (तो) अशस्त्रम् = शस्त्ररहित तत् = वह (मारना भी) इन सामना मेरे लिये अप्रतीकारमर करनेवालेको क्षेमतरम् = शस्त्रपाणयः =शस्त्रधारी [ कारक धार्तराष्ट्राः =धृतराष्ट्र के पुत्र भिवेत् मे अति कल्याण- अध्याय १ a %3- संजय उवाच एवमुक्त्वार्जुनःसंख्ये रथोपस्थ उपाविशत् । विसृज्य सशरं चापं शोकसंविनमानसः ॥ एवम् , उक्त्वा, अर्जुनः, संख्ये, रथोपस्थे, उपाविशत् , विसृज्य, सशरम् , चापम् , शोकसंविग्नमानसः ॥४७॥ संजय बोला कि--- संख्य = रणभूमिमें सशरम् बाणसहित शिोकसे शोकसंविग्न- चापम् =धनुपको = उद्विग्न मानसः विसृज्य =त्यागकर मनवाला अर्जुनः =अर्जुन रथके पिछले रथोपस्थ । एवम् (भागमें इस प्रकार उक्त्वा कहकर उपाविशत् = बैठ गया ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन- संवादेऽर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्रविषयक श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें "अर्जुनविषादयोग' नामक पहला अध्याय ॥१॥ हरिः ॐ तत्सत् हरिः ॐ तत्सत् हरिः ॐ तत्सत् %3D श्रीपरमात्मने नमः अथ द्वितीयोऽध्यायः संजय उवाच तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् । विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥ तम् , तथा, कृपया, आविष्टम् , अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् , विषीदन्तम् , इदम् , वाक्यम् , उवाच, मधुसूदनः॥१॥ संजय बोला कि- _(उस (अर्जुन) तथा तम् = पूर्वोक्त प्रकारसे = करुणा करके - यह के प्रति कृपया आविष्टम् = व्याप्त ( और ) मधुसूदनः = भगवान् (आंसुओंसे पूर्ण (मधुसूदनने अश्रुपूर्णा- (तथा) व्याकुल इदम् कुलक्षणम् नेत्रोंवाले वाक्यम् = वचन विषीदन्तम् = शोकयुक्त %Dकहा श्रीभगवानुवाच कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् । अनार्यजुष्टमस्वय॑मकीर्तिकरमर्जुन ॥२॥ उवाच

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॥ कैव्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते । शुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वात्तिष्ठ परंतप ॥ .

अध्याय २ . . त्वा नि तो श्रेष्ठ (न स्वर्गको कुतः, ला, कश्मलम्, इदम्, विपमे, समुपस्थितम्, अनार्यजुष्टम, अस्वय॑म्, अकीर्तिकरम्, अर्जुन ॥ २ ॥ अर्जुन · =हे अर्जुन (यह) = तुमको ( इस ) विषमें = विपमस्थलमें अनार्यजुष्टम् = पुरुपोंसे इदम् -यह . आचरण किया गया है कश्मलम् =अज्ञान कुतः = किस हेतुसे अस्वय॑म् = देनेवाला है समुपस्थितम्=प्राप्त हुआ न कीर्तिको अकीर्तिकरम् ( यतः); क्योंकि करनेवाला है क्लैव्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते। क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप ॥ क्लैव्यम्, मा, स्म, गमः, पार्थ, न, एतत, त्वयि, उपपद्यते, क्षुद्रम्, हृदयदौर्बल्यम्, 'त्यक्त्वा, उत्तिष्ठ, परंतप ॥ ३ ॥ इसलिये- पार्थ = हे अर्जुन त्वयि तेरेमें क्लैन्यम् = नपुंसकताको न उपपद्यते योग्य नहीं है मा स्म गमः= मत प्राप्त हो परंतप =हे परंतप एतत् -यह क्षुद्रम् तुच्छ %3D श्रीमद्भगवद्गीता २० उत्तिष्ठ हृदय- दौर्बल्यम् हृदयकी दुर्बलताको युद्धके लिये खड़ा हो -त्यक्त्वा -त्यागकर , किस प्रकार इषुभिः . अर्जुन उवाच कथं मीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन । इषुभिः प्रति योत्स्यामि पूजाविरिसूदन ॥ कथम्, भीष्मम्, अहम्, संख्ये, द्रोणम्, च, मधुसूदन, इषुभिः, प्रति, योत्स्यामि, पूजाहीं, अरिसूदन ॥ ४ ॥ तव अर्जुन बोला कि- मधुसूदन =हे मधुसूदन कथम् अहम् =मैं = बाणों करके संख्ये रणभूमिमें योत्स्यामि =युद्ध करूंगा भीष्मम् =भीष्मपितामह (यतः) = क्योंकि और अरिसूदन =हे अरिसूदन द्रोणम् =द्रोणाचार्यके (तौ) =वे दोनों ही प्रति = प्रति पूजाडौं = पूजनीय है सुरूनहत्वा हि महानुभावान श्रेयो भोक्तुं भक्ष्यमपीह लोके। हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिदेव भुञ्जीयभोगान्रुधिरप्रदिग्धान्॥ ५॥ च -अध्याय. २: गुरून्, अहत्वा, हि, महानुभावान्, श्रेयः, भोक्तुम्, भैक्ष्यम्, अपि, इह, लोके, हत्या, अर्थकामान, तु, गुरून, इह, एव, भुञ्जीय, भोगान्, रुधिरप्रदिग्धान् ॥ ५ ॥ . , इसलिये इन- =इस लोकमें सने हुए अर्थकामान्-कामरूप महानु-) गुरुन् =गुरुजनोंको -महानुभाव भावान् हत्वा -मारकर गुरुन् = गुरुजनोंको (अपि) =भी अहत्वा. न मारकर इह.. =इस रुधिर (रुधिरसे लोके =लोकमें प्रदिग्धान् भैक्ष्यम् = भिक्षाका अन्न (अर्थ और अपि -भी भोक्तुम् = भोगना भोगान् =भोगोंको श्रेयः =कल्याणकारक =ही (समझता हूं) तु = क्योंकि HT भुञ्जीय =भोगूंगा न चैताद्वैद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नोजयेयुः। यानेव हत्वा नजिजीविपाम- स्तेऽवस्थिताःप्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥६॥ । chee श्रीमद्भगवद्गीता , , च न न न, च, एतत, विद्मः, कतरत, नः, गरीयः, यद्वा, जयेम, यदि, वा, नः, जयेयुः, यान्, एव, हत्वा, न, जिजीविषामः, ते, अवस्थिताः, प्रमुखे, धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥ और हमलोग- एतत् = यह जयेयुः -वे जीतेंगे =भी (और) नहीं यान् जिनको विद्मः =जानते (कि) हत्वा = मारकर (हम) नः =हमारे लिये (जीना भी कतरत् =क्या (करना) जिजीविषामः नहीं चाहते गरीयः = श्रेष्ठ है अथवा (यह भी एव -ही यद्वा - नहीं जानते कि) धार्तराष्ट्राः = धृतराष्ट्र के जयेम =हम जीतेंगे पुत्र यदिवाया प्रमुखे =हमारे सामने नः =हमको अवस्थिताः =खड़े हैं कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः । यच्छेयःस्यानिश्चितं ब्रूहि तन्से शिष्यस्तेऽहंशाधि सांत्वांप्रपन्नम् ॥ olt अध्याय २ ८३ कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः, पृच्छामि, त्याम्, धर्मसंमूढचेताः, यत्, श्रेयः, स्यात्, निश्चितम्, बहि, तत्, मे, शिष्यः, ते, अहम्, शाधि, माम्, त्वाम्, प्रपन्नम् ॥ ७ ॥ , इसलिये- श्रेयः = स्यात् =हो कार्पण्य- कायरतारूप कल्याणकारक दोप करके साधन दोपोपहत- उपहत हुए स्वभावः स्वभाववाला तत् वह (और) मे = मेरे लिये [धर्मके त्रिपयमें वहि = कहिये (क्योंकि) धर्म- = मोहितचित्त. अहम् =मैं संमूढचेताः हुआ (मैं) . ते =आपका त्वाम् =आपको शिष्यः= शिप्य हूं (इसलिये) पृच्छामि =पूछता हूं =जो (कुछ) प्रपन्नम् शरण हुए निश्चय किया माम् = मेरेको निश्चितम् = हुआ शाधि = शिक्षा दीजिये नाहि प्रपश्यामिममापनुद्याद् यच्छोकमच्छोपणमिन्द्रियाणाम त्वाम् = आपके यत ८४ , = क्योंकि श्रीमद्भगवद्गीता अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥८॥ न, हि, प्रपश्यामि, मम, अपनुद्यात्, यत, शोकम्, उच्छोषणम्, इन्द्रियाणाम्, अवाप्य, भूमौ, असपत्नम्, ऋद्धम्, राज्यम्, सुराणाम्, अपि, च, आधिपत्यम् ॥ ८ ॥ हि (तत्) = उस (उपाय)को भूमौ =भूमिमें नहीं असपत्नम् = निष्कण्टक प्रपश्यामि =देखता हूं ऋडम् धनधान्यसंपन्न यत् -जो कि राज्यम् राज्यको =मेरी -और इन्द्रियाणाम् = इन्द्रियोंके सुराणाम् =देवताओंके आधिपत्यम्= स्वामीपनेको उच्छोषणम् = सुखानेवाले = प्राप्त होकर शोकम् =शोकको अपि =भी (मैं) अपनुद्यात् = दूर कर सके मम %3D च । अवाप्य संजय उवाच एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परंतप । नयोत्स्य इतिगोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥ एवम्, उक्त्वा, हृषीकेशम्, गुडाकेशः, परंतप, न, योत्स्ये, इति, गोविन्दम्, उक्त्वा, तूष्णीम्, बभूव, ह॥९॥ m-rrru अध्याय २ =हे राजन् इति %3- %3D =हो गया। انہ संजय बोला- परंतप गोविन्दम् = (श्रीगोविन्द निद्राको भगवान्को गुडाकेशः = जीतनेवाला न योत्स्ये = युद्ध नहीं अर्जुन करूंगा अन्तर्यामी =ऐसे हपीकेशम् = श्रीकृष्ण महा-है -स्पष्ट राजके प्रति उक्त्वा कहकर एवम् -इस प्रकार तूष्णीम् =चुप । उक्त्या = कहकर (फिर ) बभूव तमुवाच हृपीकेशः प्रहसन्निव भारत । सेनयोरुभयोर्मध्ये विपीदन्तमिदं वचः॥१०॥ तम्, उवाच, हपीकेशः, प्रहसन, इव, भारत, सेनयोः, उभयोः, मध्ये, विषीदन्तम्, इदम्, वचः ॥१०॥ उसके उपरन्त- हे भरतवंशी | तम् = उस भारत धृतराष्ट्र अन्तर्यामी विपीदन्तम् शोकयुक्त अर्जुनको हपीकेशः = श्रीकृष्ण प्रहसन् इव हंसते हुए-से महाराजने = दोनों इदम् .” = यह सेनयोः . =सेनाओंके .. वचः -वचन मध्ये =वीचमें उिवाच कहा r . उभयोः % 3D %D -- %D श्रीमद्भगवनाता श्रीभगवानुवाच अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे। गतासूनगतासुंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥ अशोच्यान, अन्वशोचः त्वम्, प्रज्ञावादान् , च, भाषसे, गतासून् , अगतासून्, च, न,अनुशोचन्ति, पण्डिताः॥१०॥ हे अर्जुन- - - च जिनके प्राण त्वम् =तूं जिनके प्राण नशोक करने गतासून् =चले गये हैं। अशोच्यान् योग्योंके लिये उनके लिये अन्वशोचः = शोक करता है च और और (पण्डितोंके (से) अगतासून् = नहीं गये हैं प्रज्ञावादान् = वचनोंको उनके लिये भाषसे = कहता है (भी) (परंतु) नहीं पण्डिताः = पण्डितजन अनुशोचन्ति-शोक करते हैं नत्वेवाहं जातु नासंन त्वं नेमे जनाधिपाः। न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥ न, तु, एव, अहम्, जातु, न, आसम्, न, त्वम्, न, इमे, जनाधिपाः, न, च, एव, न, भविष्यामः सर्वे, वयम्, अतः, परम्, ॥ १२ ॥ -/4. TA अध्याय २. (al %3D % 3D -- %3D =किसी कालमें (एवम्) = ऐसा %3- क्योंकि आत्मा नित्य है इसलिये शोक करना अयुक्त है। वास्तवमें- -न न = नहीं =तो (आसन्) =थे .. = ऐसा च और एव = ही (है कि) न अहम् जातु | एव न =नहीं =ही (है कि) आसम् अतः =था (अथवा) = इससे त्वम् आगे |परम् = नहीं वयम् =हम (आसीः) = था (अथवा) सर्वे =सब =यह न =नहीं जनाधिपाः = राजालोग भविष्यामः = रहेंगे देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा। तथा देहान्तरप्राप्तिर्धारस्तत्र न मुह्यति ॥ देहिनः, अस्मिन् , यथा, देहे, कौमारम्, यौवनम् , जरा, तथा, देहान्तरप्राप्तिः, धीरः, तत्र, न, मुह्यति, ॥१३॥ किन्तु- यथा -जैसे =देहमें देहिनः =जीवात्माकी अस्मिन् . इसः यौवनम् इमे %3- , कौमारम् = कुमार- युवा (और ८८ श्रीमद्भगवद्गीता जरा = उस विषयमें -धीर पुरुष -वैसे ही न [अन्य शरीरकी =वृद्ध अवस्था तत्र ( होती है) धीरः तथा नहीं देहान्तर- प्राप्तिः प्राप्ति होती है । मुह्यति =मोहित होता है- अर्थात् जैसे कुमार, युवा और जरा अवस्थारूप स्थूल शरीरका विकार अज्ञानसे आत्मामें भासता है वैसे ही एक शरीरसे दूसरे शरीरको प्राप्त होनारूप सूक्ष्म शरीरका विकार भी अज्ञानसे ही आत्मा भासता है इसलिये तत्त्वको जाननेवाला धीर पुरुष इस विषयमें नहीं मोहित होता है- मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेयशीतोष्णसुखदुःखदाः आगमापायिनोऽनित्यास्तास्तितिक्षस्वभारत मात्रास्पर्शाः, तु, कौन्तेय, शीतोष्णसुखदुःखदाः, आगमापायिनः, अनित्याः, तान्, तितिक्षस्व, भारत ॥१४॥ कौन्तेय = हे कुन्तीपुत्र तु =तो सदी गर्मी आगमा- शीतोष्ण- पायिनः क्षणभङ्गुर सुखदुःखदाः दुःखको (और) देनेवाले अनित्याः = अनित्य हैं इिन्द्रिय और (इसलिये) मात्रास्पर्शाः = विषयोंके हे भरतवंशी संयोग अर्जुन और सुख } भारत अध्याय २ के विषय) न भलेट-पुरुषको तान् = उनको (तूं) तितिक्षस्व =सहन कर यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुपं पुरुपर्षभ । समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ यम्, हि, न, व्यथयन्ति, एते, पुरुषम्, पुरुषर्षभ, समदुःखसुखम्, धीरम्, सः, अमृतत्वाय, कल्पते ॥१५॥ हि क्योंकि एते (यह (इन्द्रियों- पुरुपर्पभ =हे पुरुषश्रेष्ठ दुःखसुखको समदुःख- व्याकुल नहीं = समान समझने- व्यथयन्ति कर सकते सुखम् वाले यम् = जिस = वह धीरम् -धीर अमृतत्वाय%= मोक्षके लिये कल्पते = योग्य होता है नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥ न, असतः, विद्यते, भावः, न, अभावः, विद्यते, सतः, उभयोः, अपि, दृष्टः, अन्तः, तु, अनयोः, तत्त्वदर्शिभिः॥१६॥ और हे अर्जुन- असत् (वस्तु) का भावः = अस्तित्व तो न. = नहीं. 310-ros , N असतः- ८८ श्रीमद्भगवद्गीता तत्र = धीर पुरुष तथा न जरा =वृद्ध अवस्था = उस विषयमें (होती है) धीरः = वैसे ही नहीं.. देहान्तर- (अन्य शरीरकी प्राप्तिः प्राप्ति होती है मुह्यति =मोहित होता है- अर्थात् जैसे कुमार, युवा और जरा अवस्थारूप स्थूल शरीरका विकार अज्ञानसे आत्मामें भासता है वैसे ही एक शरीरसे दूसरे शरीरको प्राप्त होनारूप सूक्ष्म शरीरका विकार भी अज्ञानसे ही आत्मामें भासता है इसलिये तत्त्वको जाननेवाला धीर पुरुष इस विषयमें नहीं मोहित होता है- मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेयशीतोष्णमुखदुःखदाः आगमापायिनोऽनित्यास्तास्तितिक्षस्व भारत मात्रास्पर्शाः, तु, कौन्तेय, शीतोष्णसुखदुःखदाः, आगमापायिनः, अनित्याः, तान्, तितिक्षस्व, भारत ॥१४॥ कौन्तेय हे कुन्तीपुत्र तु तो सिदी गर्मी शीतोष्ण- सुखदुःखदाः दुःखको देनेवाले अनित्याः = अनित्य हैं इन्द्रिय और (इसलिये) मात्रास्पर्शाः = विषयोंके हे भरतवंशी संयोग (अर्जुन , , आगमा- पायिनः क्षणभङ्गुर और सुख ( और ) - भारत

Shri Bhagwat Geeta Sadharan Paduch

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Not Available
Title
Shri Bhagwat Geeta Sadharan Paduch
File name
Shri Bhagwat Geeta Sadharan Paduch
Text
OCR done
Published
2011/03
Publisher
Gorakhpor,the Geeta Printing Press
Language
Sanskrit
Pages
101
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
History
DLI number
552246
Barcode
4990010032991.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
I2OfarnPg41
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