Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Pappu
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पप्पू रांगेय राघव से याराने के पांच वर्षों का सफरनामा
मनमोहन ठाकोर
जम 26 जुलाई 1923 आगरा (उ० प्र०)
शिक्षा एम० ए० (इतिहास), आगरा विश्वविद्यालय (1945)
भातभाषा गुजराती । पितभापा राजस्थानी (हाडौती)।
अन्य भापाएं हि दी अग्रेजी उदू एव बगला।
प्रकाशित पुस्तके एक नास्तिक की तीथपाया (हिमालयी यात्रा वणन)
सोमित्र सकल्प (कविता संग्रह)
सेलेक्टेड सालेलिक्वीज़ (35 हिंदी कविताआ +
अग्रजी अनुवादो का सक्लन)
सम्पादन सचयन (कहानी संग्रह)
सक्रा त (अनियतकालीन लघु पत्रिका)
रूपाम्बरा (अग्नजी)
पोइम्स आव नवल
अनुवाद उर्दू बगला, गुजराती असमिया, अंग्रेजी स हि दी मे
एव हिदी से अंग्रेजी म प्राय दो सौ स अधिक कवि
ताओ का तथा गुजराती वगला एव अग्रेजी स प्राय
15 नाटको का हिदी में अनुवाद ।
सम्प्रति जून 1988 स चीन गणराज्य के विदेशी भाषा
प्रकाशन गह, पेइचिङ म हि दी परामश दाता ।
सम्पर 5 ए ग्रीक चच राई वलत्ता 700026
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एकमात्र वितरक
पशील प्रकाशन
फिल्म कालोनी, जयपुर 302003
पप्पू मनमोहन ठाकोर / PAPPU MANMOHAN THAKORE
(An Account of his years with Rangeya Raghava)/ प्रथम
सस्करण 1991 / सर्वाधिकार मनमोहन ठाकोर / मुद्रक शाति
मुद्रणालय, विश्वासनगर, दिल्ली-32 | प्रकाशक
अलीक प्रकाशन,
'भूमिका' 2 घ 26, जवाहर नगर, जयपुर-302004/मूल्य पचास रुपये।
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10 फोट या राजा की मण्डी स्टेशन पर उतरकर मुझे तागे-स्कूटर को याग मुजफ्फर खा घुमाकर बल्लावस्ती ले जाने की इच्छा होती है । रितु तभी याद आ जाता है कि अब वाग मुजफ्फर खा ही वहा रह गया है व तो उसे डा० रागेय राघव माग बना दिया गया है। जतएव यही निश्चय किया गया था कि प्रस्तुत सस्मरणो के माध्यम म रागय राघव को, बजरिए पपू के, देखने का प्रयाम किया जाए । इसीलिए पहला खण्ड लिखने का भार मुझे दिया गया था क्योकि 1939 म आगरा के सेंट जोस कालेज' म दाखिला लेने के बाद वहा विताए गए छ वर्षों के दौरान पप्पू और मैं माफी निक्ट आ गए थे। हम दोनों का जन्म 1923 मे हुआ था, उसका जनवरीम और मेरा जुलाई म। 1940 मे हम दोना ही सरह वप के 'अडरटीन' ये। हम दोना ही तत्कालीन राष्ट्रीय तथा अतर्राष्ट्रीय राजनैतिक परिस्थितियो से ममान रूप से प्रभावित होत रहते थे। इसी काल मे पप्पू का रचनाधर्मी साहित्यकार भी बडी तजी स करवटें लेने लग गया था और तभी प्रगतिशील लेखक संघ की आगरा शाखा की स्थापना भी प्रत्यक्ष तथा परोक्ष दोना प्रकार बहुत सहायक सिद्ध हुई थी। यो तो प्रत्येक बालक विपुल सम्भावनाओ को साथ लिए ही ज म लेता है, कि उसम निहित कुछ शक्तियो का विकास उसकी पारिवारिक तथा सामाजिक परिस्थितिया के अनुरूप ही हो पाता है। पप्पू भी इस सामाय नियम का अपवाद नही पा । एक दाक्षिणात्य प्रवासी, तमिल भापी, तत्का लीन भरतपुर राज्य के एक गाव वैर, के माफीदार, विद्वान, पडित, ब्राह्मण परिवार मे जनमे पप्पू की मानसिकता को गढने मे इनम से प्रत्येक तथ्य का बडा हाप रहा था। अतएव डॉ० रागेय राघव तथा उनके रचना ससार को समझने के लिए उनकी इस पष्ठभूमि को समझ लेना भी आवश्यक हो जाता है। यही सब सोचकर मैंने इन सस्मरणो को लिपिबद्ध करना आरम्भ किया था। इसे लिखते समय मेरी एक भय चेष्टा भी रही थी। मैंने पप्पू के माध्यम से स्वयं अपने को भी खोजा है, ठीक उसी प्रकार जसे प्रत्येक कवि अपनी कविता म और कथाकार अपने कहानी-उप यासोम अपने और अपने वक्त को तलाशता रहता है । स्वीकार करू कि मैंने यह चेष्टा जानबूझकर ही की है और इसके लिए मुझे कोई सफाई देने की आवश्यकता महसूस नही हो रही। हा, इस बात का मैंने अवश्य पूरा पूरा ध्यान रखा है कि इन सस्मरणो मे ऐसी एक भी घटना का समावेश न हो जिसका मैं चश्मदीद गवाह न रहा होऊ । पप्पू के लिए न तो मैंने सर्टिफिकेट बटोरे हैं और न उसको सीढी बनाकर अपना कद ऊचा करने की चेष्टा ही की है । मैं अपनी 5 फुट 2 इच की काया मे ही बहुत खुश हू । और जहा तक पप्पू का प्रश्न है, उसको अतिरिक्त महिमा से मण्डित कर देख पाना मेरे लिए सचमुच बहुत कठिन है। मैं उसका 'फैन' नही था। वह मेरा यार था। और यारा के बीच न कोई छोटा होता है, न बडा। एक वात और । तीन वप पूर्व एक अत्यत आत्मीय, दिग्गज साहित्य कार मित्र ने इन सस्मरणो की पाडुलिपि पढने के पश्चात् मेरे एक अन्य मित्र को लिखे गए पा मे अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लिखा था "यह ठाकुर साहब के जीवन का आगरा खण्ड है जिसमे रागेय राघव भी कही कही आ गए हैं।" सयोगवश वह पत्र मैने भी पढ लिया था, और तभी स यह वाक्य मुझे रह रहकर चेतावनी देता रहा है । बहुत सोचा है इस सबध मे, बहुत विचार किया है और फिर भी अतत यही तय रखा कि पाडुलिपि जस की तस रहे, उसम कोई परिवतन न किया जाए। अर्थात, यदि इसम पप्पू 'आउट ऑफ फोकस' हो जाता हो, तो हो जाए और यदि वह फोकस बार-बार मुझ पर केन्द्रित हो जाता हो, तो होता रहे । उसे आप मेरे फोटो खीचने की तकनीक का अज्ञान मान लें, मुझे कोई ऐतराज नहीं । परतु ईमानदारी की बात यह है कि जब देखने वाला मनमोहन ठाकोर है. तो पप्पू को भी उसी के सदभ मे इन सस्मरणो म आना पडेगा। यह डॉ. रागेय राघव का जीवन चरित्र नहीं है, केवल पप्पू की यादो को दुहराने का प्रयास मात्र है। इस प्रकाशन से सबंधित सभी समस्याओ का भार प्रियवर अशोक शास्त्री ने अपने व्यस्त कधो पर लकर मुझे जो चिन्ता विमुक्त कर दिया है, उसके लिए मात्र शाब्दिक आभार प्रकट पर मैं उन महत्त्व पाक्दापि हीन महीं करूगा। हा, हजारो मील दूर, विदेश मै बैठा मैं उनका अपने मततम 12 फास- के आशीर्वाद अवश्य भिजवाना चाहूगा । और अन्त मे अनक ध यवाद मेरे प्रिय मित्र श्री चिरजीलाल चमडिया को जि होने अपने चाय बागान, कोवा टी एस्टेट, के शात तथा सुरम्य प्राकृतिक परिवेश मे पद्रह दिन तक आतिथ्य प्रदान कर मुझे इस पुस्तक को समाप्त करने का अवसर ही नहीं दिया, अपने सुरुचिपूण साहित्यिक सुझावो से भी लाभान्वित किया था। 8512, फ्रेंडशिप होटल, -मनमोहन ठाकोर पइचिड (चीन)
उनको
मुबारक जिन लोगो को
सच्चे दोस्त और यार मिले,
मेरे लिए तो एक वही था
सच्चा था या झूठा था ।
-फिराक गोरखपुरी
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प्रोफेसर अताणी के यहा हर साल नवरात्रि का पर्व बडी धूमधाम से मनाया जाता था । अष्टमी के दिन हवन होता था और उस दिन हम सब का प्रसाद लेन का निमन्त्रण रहता था। प्रो० अताणी सेट जॉस कालेज कैमिस्ट्री के प्राध्यापक थे । लम्ब से दुबले से । गोरे गट्ट । लम्बा कोट, चूडीदार पाजामा और सिर पर काठियावाडी पगडी। अपनी काठियावाडी पगडी तथा तीखी आवाज में बेलौम, बेबाक बातें करने और चुस्त-दुरुस्त अग्रेजी म धाराप्रवाह, धारदार, व्यग्यपूण भाषण देने के लिए सारे आगरे मे प्रसिद्ध थे । विद्यार्थियो के प्रति उनका स्नेह असीम था। शायद इसीलिए अनुशासन के प्रति उनकी दष्टि भी अचून रहा करती थी। बावजूद इसके, वे बेहद लोकप्रिय थे। उनक घर पर निमत्रित होना इक्जत की वात हुआ करती थी। ता प्रो० अन्ताणी के घर हवन-समाप्ति के बाद बड़े बूढे बातचीत में लगे थे और हम बच्चे धमाचौकडी मचाने मे। यह वात होगी शायद 1935 36 की। तभी, मेरे मामाजी ने नीली नेकर और सफदखुले कॉलर की कमीज पहने एक लडके को दिखाते हुए कहा, 'यह लडका मद्रासी है। इसका बडा भाई हमारे ही कॉलेज म पढ़ता है। वहा अच्छा स्टूडेन्ट है वह । उसकी अग्रेजी ता बस कमाल की है।' उन दिनो हम सबका विश्वास था कि अग्रेजी तो सिफ 'मद्रासियो' की ही कमाल की होती है । इसमे तो काई आश्चय की बात नही थी। पर 'उस' मदामी लडके को देखकर तो मैं सचमुच चौंक पड़ा था। यह सहका, और मद्रासी! गोरा चिट्टा!! नाव-नक्श, चाल-ढाल, वजम- 16 पप्पू क्तम, वहीं स भी तो 'मद्रासी नहीं लग रहा था वह । यह चार क्या पता चला कि साहबजाद को पप्पू कहा जाता है । अताणी साब के पडोस म ही रहत हैं ये लाग। तीन भाइ हैं-आचार्या नदस । पूरा नाम कोई नहीं जानता। 'मद्रासी नाम याई जान भी तो नहीं सकता। गुहम- गुडुम गुडुम, कुछ-कुछ आचार्या । बस, उस दिन हम वच्चा की चचाया विषय यही गारा भभूका 'मद्रासी' और उसकी 'मदासी' जबान ही बने यह था रागय राघव स मेरा प्रथम साक्षात्कार । उस समय मेरी उम्र थी 11-12 की और पप्पू रहा होगा 12-13 मा । पर यह मात्र साक्षा स्वार ही रहा । उसके बाद पप्पू न ता दिखाई पड़ा और न मभी स्वरू वातचीत करत का ही मौका मिला। परिचय होने म अभी 56 साल की देर थी। मैं राजामण्डी म अपने ननिहाल म रहता था। राजामण्डी और वाग मुजफ्फर खा म वैस तो कोई खास पासला नही था । यही कोई 15 मिनट लगते थे पैदल जाने में। वितु, उस जमाने मे जीवन की गति प्राय नुहल्ले पाडे तक ही सीमित रहती थी। हर मुहल्ले की अपनी एक विशिष्ट जीवन प्रणाली थी । अपना तौर तरीका था। यहा तक कि एक ही श द को विभिन्न मुहल्लो मे विभिन तरह से बोला जाता था। जाग चलकर, घनिष्ठता बढ़ जाने पर, मेरा पपू का यह प्रिय शगल बन गया था कि लोगा के उच्चारणों के ढग से हम उनके मुहल्लो का अनुमान लगाया करते थे। इस हिंसाब से, राजामण्डी का जीवन बनिया प्रधान था और बाग मुजफ्फर खा का खत्री-प्रधान । अतएव काई सास जीवित सम्पक इन दा मुहल्लो मे या नहीं। सम्मक-सूत्र या सेण्ट जास कालेज।हमारे घर के सारे विद्यार्थी सद जाँस म ही पढ़ते थे। और पप्पू के दोनो बड़े भाई भी इसी कालेज के छान थे । अतएव, हमारे घर पर वप मे तीन बार कॉलेज मगजीन आती था। उसी के द्वारा जाना था कि पप्पू के सबस बड भाई--श्री टी० एन० पप्पू 17 ऐल० ऐन० आचाय-पी० सी० ऐस० (प्राविशियल सिविल सर्विस) गे परीक्षा में उत्तीण होकर किसी अच्छे सरकारी मोहदे पर नियुक्त हो में थे। उस जमान म पी० सी० ऐस० म चुन लिया जाना सूचनु मुश्किल होता था। आगरा जैसे मुफस्सिल शहर म आई० मी०= दशाब्दिया मे एक आध हा पाता था। अतएव पी० सी० एम निम्न मध्यवगियो की निगाह मे आज के आई० ए० कही अधिक हुआ करती थी। तो, 'आचार्या परिवारीज- दार' परिवारो में से एक गिना जाने लगा था। कॉलेज मैगजीन के हिदी विभाग मे एक- ची० आचाय के नाम से छपी। पर उनका परकर- कि 'आचाय जी' आगे चलकर काई वटा ₹ 27 छायावादी कविताओ का । और आचाय अत्र कम साता दिखाई देता था। न ही इ7-दहन था। तो फिर उन कविताआ वा मेर गम्भीरतापूर्वक लेता? ऐम एम 'दिवा -ra खच्चियो भर मिल जात हैं। आगरे के क्मिी कवि सम्म सुना था। डा० पहि श्री हरिशकर शर्मा बाmarrier थे । नागरी प्रचारिणी मगर सूर-जयन्ती, नागरी मटा Prior form आयोजित किये जान amaz krn, अपनी व्रज तथा पुरी चाय को तो aft firrrrars सुनने भी वह टम (3wry-न्हें टी० एन. मे।
18 पप्पू दाखिला लिया। खीच खाच कर पाच फुट का भी नही था तब । आख पर माइनस सविन का चश्मा। पीछे लटक्ती थी 89 इच की चुटिया जिसे गाधी टोपी मे दुवकाये फिरता था। नये लोगो और अपरिचित माहौल मे मैं आज तक सहसा सहज नही हो पाता। 'फस्ट ईयर फून' बनाये जाने के किस्से, होश सभाला नभी से सुनता आया था। और मेरी हुलिया कुछ ऐसी थी कि मर सहपाठियो न पिछले एक साल से कहना शुरू कर दिया था कि, 'बटा सण्ट जोस मे जा रहा है। वहा लडके तो लडके, लडकिया भी बनाएगी तुये।" और लडक्यिो का यह खौफ मेरी रग राम समा गया था । मेरा आत्म-सम्मान लडक्यिो द्वारा बुद्ध बनाये जाने को किसी शत पर तैयार न था। सो, तरकीब यह निकाली कि जसे ही कोई पीरियड खाली मिला कि मैं अपने घर का रुख करता। तेज तज चलने से प्राय 8-10 मिनट मे घर आ पहुचता और फिर क्क्षा शुरू होने के दस बारह मिनट पहले वापस कॉलेज । सोचता था कि न मैं कॉलेज मे रहूगा और न मुझे कोई बना पायगा। पर आखिर क्व तक चलती यह दिनचर्या । व्यवधान आना ही था, और वह आया हमार कालज क अग्रेजी के अध्यापक, और हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक श्री प्रकाश च द्र गुप्त की माफत । एक दिन घर से जरा जल्दी ही लौट आया था मैं । वक्त गुजारने के लिए कॉलज के नोटिस बोड पर टगे काम-बेकाम के सभी नोटिस दुबारा तिवारा पढ रहा था कि गुप्ता साहब ने पीछे से कधे थपयपाये । मुडकर देखा तो आश्चय (और कुछ-कुछ भय) क मारे हक्का-बक्का रह गया। उस जमाने में अध्यापकगण वाकई आदर तथा सम्मान के पात्र हुआ करते थे । गुप्ता साहब तो हिदी के प्रति- प्ठित आलोचक के रूप म भी ख्याति अजित कर चुद थे। अतएव मैं उनकी ओर मुह बाये देखता खहा रहा । आश्चय इसलिए और भी अधिक हो रहा था क्यायि गुप्त साहब हमे पढ़ाते नहीं थे। वे भला इम नय छात्र को क्यो पहचानन लग । गुप्ता साहब ने मुझे उनके द्वारा संचालित 'प्राइडे की अगली बैठक में शरीक होने का निमत्रण दिया । हमारा कॉलेज जुम्म के ज़म्म एक बजे - बद हो जाता था। आगरा मुस्लिम प्रधान शहर था। जुम्मा की नमाज मुसलमान छात्र शामिल हो सकें इसलिए उन दिनो स्कूल-कॉलूज एक बजे ही बद हो जाते थे। इसी का फायदा उठाकर प्रो० गुप्त ने, इलाहाबाद यूनिवमिटी को भाति, हमारे कालेज मे भी 'फ्राइडे क्लब' स्थापित किया था। इसके अधिकाश सदस्य होते थे कुछ एम० ए० के छात्र, चुने हुए प्रोफेसर और 3 4 इटर वी० ए० के विद्यार्थी । इसकी सदस्यता का अपना एक रोब था। मुझे इस अप्रत्याशित निमश्रण पर कुछ तो आश्चय हुआ और कुछ वही पर गव का अनुभव भी। बहरहाल, अगले शुक्रवार को जब मैं प्रो. गिडियन के कमरे पर पहुचा तो वहा टी० एन०वी०आचाय को भी देखा ।। वह तब यड ईयर का छात्र था। उस शाम आचाय से मात्र परिचय हुआ, निता त औपचारिक परि- चय । बातें कुछ नहीं हुइ । फिर भी, अब कॉलज के कारिडार मे, या सामू- हित प्राथना से बाहर निकलते, यदि उसमे भेंट हो जाती तो हलो' का आदान प्रदान होने लगा। कुछ दिनों बाद ही प्रारम्भ हुइ प्रथम सत्र को परीक्षायें । सामूहिक प्राथना के बाद कॉलेज हाल मे प्रत्येक कक्षा और प्रत्येक विषय म प्रथम एव द्वितीय होने वाले छात्र छात्राओ के नाम प्रिसीपल रबरेड केनन टी०डी० सले स्वय घोषित करते थे । उस सत्र मे अपनी कक्षा मे मैं द्वितीय हुआ। फस्ट हुई थी मेरी एक महपाठिनी-कुमारी नेलसन । हॉल से बाहर निकलने पर अनेक बधाइया मिली और साथ ही मदु मजाक भी सुनाई पडा-"अबे, लड़की से हार गया। अगली बार फस्ट माना है तुझे। इन बधाई देने वालों मे आचाय भी था। प्राय 2 बजे मैं अपनी कक्षा स निकल, घर की ओर रवाना हो रहा था कि आचाय दिखाई पडा। वह भी बाहर जा रहा था । अपने पर नहीं, कालेज के पास ही एक चाय की दुकान पर । वह अकेला नही था। उसके साथ दो और विद्यार्थी थे। मैं नजरें झुकाये उनके पास से, तज-तेज कदम बढाता, गुजरा तो आचाय ने, "अरे, सुनो तो जरा" कहकर मेरी ओर एक मीठी मुस्कान 20 पप्पू फेंकी। उसके लहजे मन तो व्यग्य था, शैतानी। पर हाठो पर खेलती मुस्कराहट के कोनो पर मेरे सशकित हृदय को 'बनाने' का भाव दीख पड़ा। मेरी इस एक क्षण की हिचकिचाहट को वह भाप गया । अपने स्वर को और भी सहज बनाता बोला, 'तुम्ही से कह रहा ह बरस रदार । घबरा क्यो रहे हो ? चलो तुम्हें चाय पिलायें। आज सुवह तुम्हारे नम्बर सुनकर बहुत अच्छा लगा। पर यार ये सकिड वैकि ड का क्या चक्कर है ? और वो भी उस काले नमक से?" "काला नमक ? मैं समझा नही ।' मैं खूब समझ रहा था पर कहता आचाय ने एक जोर का ठहाका मारा । और लोग भी हस पडे । मुम्कान तो मेरे होठो पर भी खेल गई थी पर मैन उसे स्पष्ट नही होने दिया । सीनियरो के समक्ष लडकियो को लेकर मजाक ऐजाय नही करना चाहिए यह उन दिना की सवमा य परम्परा थी। "fफडडी भाई को जानते हो।' सहसा आचाय ने प्रश्न किया। "पिड्डी भाई? यह कौन हैं ?" 'ली, तीन महीने से कालेज मे हो और फिडडी भाई को नहीं जानते? अमा, करते क्या रहे हो इस वीच? फिडडी भाई, माने, केडरिक बासमैना साइस डिपाटमेट के डिमा सट्रेटर । उहें नहीं जानते ?" आचाय ने पूछा। 'जी नाम तो सुना है उनका । पर कभी काम नही पडा उनसे।" 'कोई बात नहीं । जल्दी ही मिलवा देंग हम। बडे यारवाश आदमी हैं। मिलोगे तो तबीयत खुश हो जायगी। यही तुम्हारी उस पलास फैलो को क्या नाम है उसका अरे भाई वही जो इस बार फस्ट आई है मिस नेलसन, ईवा क्वीनी नेलसन," मैंने नाम बताया। तभी आचाम का एक साथी मुझे धूरत हुए ह ह ह ह ह ह ह हसा और मेरी पीठ पर हाप मारते हुए बोला, "यार, हो तो इतने से, पर हो काफी घुटे हुए। पूरा नाम रट रखा है उसका । शावास बरपुरदार, नाम करोगे।' "उस्ताद बुरी बात है। बच्चे से मजार नही होगा । आज तो पहला दन है। देखोदेचारा कसा लाल हो गया तुम्हारीधात सनपर"आचाय पप्पू 21 मरी हिमायत मे बाला। हम साथ-साथ चल रहे थे। बाग मुजफ्फर खा का चौराहा आया तो मैंन विदा लेनी चाही । आचाय ने मेरी एक न सुनी। मुझे उनके साथ चाय की दुकान पर जाना ही पडा-धडकता दिल और लरजते पाव लिये। इस चाय की दुकान को वे लोग रेस्तरा कहते थे । दूकानदार था नस्थीलाल । उसका लडका था बाबू । वही चाय, सिगरेट और पान 'सर्व' करता था । उसकी दुकान कहलाई 'बाबू का रेस्तरा' । आचाय के सम्पूर्ण व्यक्तित्व के निर्माण और विकास के साथ इस 'बाबू के रेस्तरा' का अवि- च्छिन सबध रहा है । जैसा था 'तीन वर्ष' के भगवतीचरण वर्मा के साथ मिया जगाती का। टूटी मज और उसके दोनो ओर बिछी दो लम्बी बैच । दीवारो पर वर्षों में एक बार की गई पुताई मोर उन पर टगे दो-तीह मडियल कलेंडर। इन वैचों पर दस बजे से आ जमते थे आचाय और उसके मित्र। सभी सण्ट जॉस कॉलेज के विद्यार्थी । जिसका पीरियड शुरू हो जाता, वह उठ- कर सड़क पार कर क्लास म चला जाता । जिसकी रक्षा समाप्त हो जाती वह उसको जगह आ वठता। चाय और सिगरेट के दौर चलते रहते और चलता रहता एक दूसरे की टाग खिंचाई का अखण्ड प्रवाह । फूटत रहते ठहाके और बहस मुबाहिसो के बीच होते रहत तनाव खिंचाव । मगर, उन सब तनावो खिचावो का अत होता गहरे मजाको मे ही । मजाल है कि काई वहा से झगड कर चला जाए। प्रात काल दस बजे से शुरू होन वाली इस बैठक का पहला दौर चलता रहता था शाम के साढे चार-पाच बजे तक। फिर अधिकाश लोग चल पडते 'ठडी सडक पर हवा खाने । बाग मुजफ्फर खा के चौराहे से चलते- बलत मडली पहुचती दिल्ली दरवाजे के पास तालाब के किनारे। वहा प्राय पौन एक घण्ट बैठार हवा खाई जाती। कभी कभी आचाय अपनी, या किसी और की, कविता सुनाता। और, सात बजते न बजते सब लोग अपने-अपने घर की राह लेते। इस नित्य नैमित्तिक क्रम में सम्मिलित होने के लिए आवश्यक था केवल एक गुण-प्रत्युत्प नमति का प्राचुय, मजाक को मजाक की तरह 22 पप्पू । लेकर, विला शर्मो लिहाज़ के रेकी व तुर्की मजार मे ही जवाब दे पाना । नहले पर दहला। आप म अगर वह क्षमता है तो फिर 'बाबू के रेस्तरा' और 'पप्पू की बठक' के दरवाजे आपके लिए खुले थे फिर चाहे आप 'फस्ट ईयर फूल' ही क्या न हो। मगर, जो कहीं आप मजाक का दुरा मान गय, या सिफ हिनहिनाना कर ही खीसें मिपोर दी, तो गय काम स । फिर तो आपका वही हाल हागा जा मोहनलाल तिवारी का हुआ था । बेचारा फोथ ईयर म था जव उमने इस गिरोह में शामिल होना चाहा था। दो दिन उस्ताद से लगाकर जगदीश तक सभी इस लिहाज स निहायत शराफत के साथ पश आए कि वह मेरा दूर का रिश्तदार या । मगर मन की भी तो इतिहा होती है। तीसरे दिन तक हजरत की कलई खुल चुकी थी । सो, नातका बाद कर दिया गया उसका और तिवारी जो बगटूट भागा है कि पूछिये मत । खर, इस रेस्तरा की बात तो बाद मे होगी। फिलहाल वापस उसी बात पर आ जाऊ -वही पहले दिन की मुलाकात की बहुत कुछ अशो म हमारा 'लव एट फस्ट साइट' हो गया था । झेंपना, बगलें झाकना और मजाक का मजा न ले पाना मरे दुर्गुण भी नहीं रहे । अतएव, विस्मिल्लाह ही दुरस्त हो गयी। हम लोग तेजो से एक दूसरे के करीब आत गये-लाखन सिंह, आचाय, उसके बड़े भाई किच्चू, विजय सिंह नादि सभी अच्छे मित्र बन चले । अब मरा आत्म विश्वास भी क्रमश बढ़ने लगा था। एक मोर प्रोफसर लोग मुझसे 'हलो' करने लगे थे और दूसरी ओर कॉलेज के सीनियरी ने भी मुझे लिफ्ट देना शुरू कर दिया था, इस बाबू के रेस्तरा वाले गिरोह के कारण । क्लास में प्रथम आ गया था, छ माही परीक्षा म। इस तरह, मेरी चादी ही चादी हो रही थी। और तभी एक और घटना घट गई। कॉलेज की 'रूरल डेवेलपमेण्ट सोसाइटी के तत्वावधान म आगरा के आस पास के क्सिी गांव म महीन मे दा बार रविवार को, जाकर विद्यार्थी 'ग्राम-सुधार' का मायक्रम चलाते ये। गाव की सफाई सोक्-पिट खोदना, दवाइया वाटना और प्रौढ़ शिक्षण -ऐसे ही कुछ सुधारवादी किस्म के कायक्रम चला करते थे । उस वप इम - पप्पू 23 । कायक्रम का चाज, मिला था प्रोफेसर नाहौर रजन सरकार को। कोई तीस- बतीस की उम्र रही होगी. सरकार साहब' की। खासे 'छोरे' लगते थे वे। बगाली क्रिश्चियन । रहते गम्भीर थेपर मुस्कुरात तो आसपास धूप छिटक जाती। तो, साइकिल पर सवार हम 10 12 लडके और साथ मे सरकार साहब, सर्दी की सुहाती धूप में चले जा रहे थे। मेरे साथ चल रहा था मेरा सहपाठी अमरेन्द्र नाय भट्टाचाय । सडक के किनारे एक गाव पडा, लोगों की भीड दिखाई पड़ी कि मेरे अदर मे बैसाख्ना निकल पडा एक नारा-इलाब । अमरेद्र ने स्वर मिलाया-जि दावाद । लोगो ने हमारी ओर देखा । मैंने फिर से नारा लगाया और इस बार सिर्फ अमरेद्र ही नहीं वे लोग भी पुकार उठे~-'जि दाबाद'। मेरे साथ के लडके, और मरवार साहब, भी अब पीछे मुड कर मुझे देखने लगे थे। मेरा उत्साह सरकार साहब की उपस्थिति का ध्यान आत ही, रुडा पड गया । प्राफेसर थे वे, ईसाई थे वे, और जमाना लडाई का था। अग्रेजा का राज था। काग्रेस, और गैर कानूनी कम्यूनिस्ट पार्टी, युद्ध के खिलाफ थी। स्व० भगत सिंह के दिय हुए नारे-इकलाब जिन्दाबाद पर अब तक कम्यूनिस्टो का करीब करीब 'कॉपीराइट' हो चुका था। अनजाने मे ही मैंने इस नार द्वारा अपने कम्यनिस्ट पार्टी से सम्बधित होने की घोषणा सी कर दी थी। डर लगना स्वाभाविक था। पर जब देखा कि सरकार साहब मुस्कुरा रहे थे, तो मजा आ गया। जोश दूना हो गया। अब तो दूसरा गाव नजदीक आया नो और भी ऊवे गले से मैंने नारा लगाया-"सानाज्यवादी युद्ध मे ना एक पाई, ना 'एक भाई"। इस बार दूसरे लडके भी मेर साथ थे । नारे लगत गए, सरकार साहब मुस्कुराते गए। हम लोग बेहद प्रसन्न थे माना हमने कोई बहुत बड़ा और खतरेभरा काम अजाम दे दिया हो। गाव पहुचने पर, जैस ही मौका मिला सरकार साहब मुझे एक ओर ले गए। कुछ ही देर मे हम दोना एक दूसरे को जान गए। आगरे मे कम्यूनिस्ट नेताआ की गिरफ्तारी के बाद, हम 45 विद्यार्थी और 6 7 मरे लाग, ही कम्युनिस्ट पार्टी के नाम लेवा पानी देवा रह गए थे।
24 पप्पू ? हमन अपना छोटा-सा सगठन बरकरार रखा था। स्टूडेण्टस फेडरेशन के माध्यम से हम लोग जो कुछ समझ में आता, करते रहते थे। एक्दम कटे हुए थे, शहर से भी और केन्द्र से भी। फकत पदमकुमार जन के जरिए 'कम्यूनिस्ट' पत्रिका की प्रतिया मिल जाया करती थी--वही थी हमारी रहनुमा। अतएव, जब पता चला कि सरकार साहब को भी कम्यूनिस्ट पार्टी मे गहरी दिलचस्पी है, तो मरी प्रसन्नता का पार नहीं रहा। साथ ही, एक गहरा भय भी समा गया। कही सरकार साहब एजेट प्रावोकेटयोर ती नहीं हैं, अग्रेजी सरकार के जासूस? ईसाइया मे कम्यूनिस्ट कहा से आया सो, उस समय तो मैंने उह कुछ गोलमोल जवाव दकर पिण्ड छुडाया। थोडी और तहकीकात कर लू फिर इनक प्रति अपना रवैया तय करूंगा, यह साच कर। कितु, अगले दिन ही सरकार साहब ने मुये शनिवार को प्रो० प्रकाश चन्द्र गुप्त के घर साढे छ बजे तक स्टडी सकिल' मे शरीक होन मा निमत्रण दिया। पूरे सप्ताह मेर पाव ज़मीन पर नहीं पड रहे थे। प्रो० गुप्ता के घर पर जाने का निमत्रण | मुझ जस फस्ट इयर के विद्यार्थी को । मदिया कटरा में रहते थे गुप्ता साहा। तोत के ताल' के सामने । वगला-नुमा मकान । स्वच्छ परिच्छन परिवश । ट्रे मे रखा था टी सट । और, कमरे मे उपस्थित थे प्रो० सरकार, प्रो. गिडियन, विजय सिंह ('उस्ताद' लाखन सिंह के बड़े भाई और कॉलज यूनियन के प्रेसीडेण्ट) तथा पाच छ अम जाने अनजाने चेहर। उन सबके बीच भयानक हीनता-बाध से ग्रस्त हाकर बैठा था मैं । वैसे 'स्टडी सक्लि कोई नयी बात नहीं थी मेरे लिए। नवी कक्षा से ही कम्यूनिस्ट कायकर्ताओ के सम्पक म आ चुका था। न जाने क्तिनी बार कॉमरेड महादेव नारायण टडन ने 'स्टडी सक्लि' लिए होगे। माक्सवाद का ककहरा प्रायः मुखस्य हो चुका था मुझे। अतएव जय सरकार साहब स्टडी सक्लि ल चुके और प्रश्नोत्तरों की बारी माई तो मैंने कुछ प्रश्न पूछे जिनस वे भली भाति समा गए किम इस क्षेत्र म नितात नौसिखिया नहीं है। उसी शाम स प्रारम्भ हो गए पप्पू 25 गुप्ता साहब और सरकार साहब के साथ पार्टी स्तर के मेरे सम्बध । इस घटना का यहा उल्लेख केवल इसलिए किया है कि इसी के बाद मैं आचाय की अतरंग गोष्ठी का सदस्य बन सका । बिजय सिंह ने घर जाकर मेरी और मरे प्रश्नो की चर्चा की जपने छोट भाई, 'उस्ताद लाखन सिंह से और शायद लाखन ने बात आगे चला दी आचाय स । सो, जब अगली बार में बाबू के रेस्तरा पर पहुवा तो आचाय ने अगले राज मुझे अपने घर आने का निमत्रण दिया। उन दिना रकानूनी कम्यूनिस्ट पार्टी और कम्यूनिजम दोनो का जिक्र बडे आदर के साथ होता था--विशेष कर शिक्षित वर्ग म। भगतसिंह और चन्द्रशेखर आजाद के बाद यदि कोई श्रातिकारी समझे जात थे तो कम्यूनिस्ट ही। मेरठ पड्यत्र कस की स्मति उस समय तक ताजा थी, और आगरा मे कॉ० महादेव नारायण टडन तथा विशनलाल जोशी ने युवको मे साम्यवाद को 'इज्जतदार' बना दिया था। आचाय का घर बाग मुजफ्फर खाम था। कॉलज के पास ही। वहा पहुचा तो 'उस्ताद तो मिले ही, और भी कुछ 'विभूतिया' के दशन हुए--- सुन्दरसिंह, किशन खना और पिच्चू । किच्चू, अर्थात् टी० ऐन० के० आचाय, पप्पू के बड़े भाई । भाई नम्बर दो। एम० एस सी० के विद्यार्थी। गठा, छरहरा बदन, क़द्र लम्बे और बेहद पुर मजाक। दस मिनिट बात कीजिए तो यारी दोस्ती पर उतर आए। मैं पहुचा तो सुदर सिंह और उस्ताद म आखो मे इशारे हुए और दाना दे ओठा पर खेल उठी शरारती मुस्कान । उधर आचाय ने भी इस मुस्कान को भाप लिया और मैंने भी। आचाय ने आंख तरेरकर 'शतानी नहीं होगी' का इशारा किया और मैं निहायत अप्रतिम हुआ अपना सम्भ्रम दुरुस्त रखने की चेष्टा करने लगा। उस दिन मुझसे कोई विशेष बात नहीं हुई। इधर-उधर की, सामान्य शिष्टाचार वाली बातें, जो प्राय पहली मुलाकात पर हुआ करती है- कहा रहते हो, अलावा कोस की किताबो से और क्या पढत हो वगंरा- वर्गरा । हो, मुझे अनेक कई बाता की नसारी हुई उस दिन । जैसे कि, 1 धोरण प धन्ना 26 पप्पू पप्पू बेहद सिगरेट पाता था और सुदर सिंह तथा विच्चू चोडी फूलते थे। बोडी खत्म हो जाएं तो विच्चू पप्पू मे बडे दोस्ताना ढग मे सिगरट माग लिया करता था । और यह भी दि पप्पू ने एक उप याम लिखना शुरू किया कुछ ही दिना बाद प्रारम्भ हो गयो गर्मी की छुटिटया। 1940 की गर्मी । लडाई चल भी रही थी और नही भी। हिटलर न झास पर पद्रह दिन में ही कब्जा कर लिया था। कक से अग्रेज फौजें बचकर निवल आइ थी। और अब दानो पक्ष जरा चुप थे। जिसे बाद में 'फोनी वार' की सज्ञा दी गयी, महायुद्ध उस दौर से गुजर रहा था। इन छुटिटयो के दौरान मैं नित्य, विला नागा, मध्याह्न म, 12 और 1 के बीच आचाय के घर पहुच जाता था। वह एक उप यास लिख रहा था-उसका प्रथम उप यास, 'घरौदे' । रोज लिखता और रोज़ सुनाता । वडा मजा आता था उस सुनन म क्योंकि उसके सभी पात्र या तो जाने पहचाने छात्र थे या दो तीन छात्रो की विशेषताए लिये एक अलग ही पात्र बन गये थे । अधिकाश घटनाए अत्य त सुपरिचित थी जो आचाय की सहज धाराप्रवाह और ओजपूण भाषा के माध्यम से अभिनव प्रभाव उत्पन्न करती थी। इससे पूर्व आचाय मुख्यत' कविताए लिखा करता था, और बीच बीच मे, जायका बदलन के लिए, छोटी कहानिया। उपयास पर पहले- पहल हाथ माज रहा था वह। मैं दिन के बारह साढे बारह के बीच पहुंचता, किवाड पर दस्तक देता और पदिमनी भाभी (सबसे बड़े भाई की पत्नी) दरवाजा खोलती और गलियार से ही आवाज लगाती-'पप्पू, योर मिड-डे विजिटर हैज एरा इण्ड ।' आचाय अपने कमरे से उठकर बैठक में ना जाता। वहा उसका स्थान नियत पा। एक लोह मी छड़ वाला जगला जिस पर टगी रहती थी चिक । उसमे सटी एक बडी सी मेज और आरामकुर्सी। पास मे एक रिवा ल्डिंग रक जिसम पुस्तकें भरी रहती थी। आवाय ने उसी कुर्सी पर बैठकर साहित्य सृजन किया था, 1945 तक । मगन होता तो कुर्मी को आगे-पीछे हिलाता आफैं अमिची कर लेता और सिगरेट का लम्बा मा क्श ले, फिल्मी स्टाइल म घुए वे छल्ले छोह, हसता रहता। गम्भीर होता, तो सिर ४ पप्पू, 27 ~ झुकाये या तो लिखता रहता या फिर मानो किसी से कुछ मनलब ही नही ऐसे सिगरेट पीता रहता। लेकिन ऐमा एक भी दिन मेरी जानकारी में नहीं, गुर्जरों जब उसके, आस-पास चार-पाच लोग न बैठे रहते हो, हमी मजाक का अनवरत प्रवाह न चलता रहता हो और उन मजाका के दौर मे वह समान हिस्मा न बढाता रहा हो और, इस सबके बीच, अपनी लेखनी को च नाना न रहा हो वह। 'घरौदे' इसी वातावरण मे लिखा गया, हि दुस्तानी एकेडेमी द्वारा पुरस्कृत लम्बी कविता, 'मेधावी का निर्माण ऐसे ही हुआ और ठीक इही ठहाको के बीच लिखे गये थे 'अजेय खण्डहर' तथा 'विपाद मठ'। 'पच परमेश्वर' जसी उत्कृष्ट कहानिया एव असख्य गीत और कविताए यदि बोल सक्ती तो आपको वे उन तमाम सुबहो और दिनो की बड़ी ही दिल चस्प और पुरमजाक घटनाओ की एक लम्बी दास्तान सुनाती जो उम कमरे म नित्य वा कायक्रम बन चुकी थी। आज जब मैं उस बैठक का माहौल अपनी कल्पना द्वारा पुननिर्मित करन की चेष्टा कर रहा हू तो मेरी आखो के सामने धूम जात हैं वे तमाम चेहरे जिनमें से प्रत्येक अपने-आप मे बहुमुखी प्रतिभा का धनी था, जिसकी प्रत्युत्पनति का लाहा सारा विद्यार्थी वग मानता था और जो अपन अपने क्षेत्र मे आज भी सुप्रतिष्ठित बने हुए हैं । जैसे कि किशन भाई । पूरा नाम श्रीकृष्णचन्द्र खन्ना । पप्पू के घनिष्ठ- तम मिय होने का दावा अगर कोई पर सकता था तो किशन भाई। देखने- सुनने मे निता त निरीह । बातचीत कम । पप्पू के लगोटिया यार। खत्री गली की सभ्यता का अगाध ज्ञान लिये, विशन भाई किसी की भी व्यक्ति- गत समस्या पर पूण सहानुभूति तथा समझदारी स नक सलाह देते रहत हैं । लिखने पर माए तो अच्छे अच्छे लेखनो को चकाचौंध परदें, अध्या- पन किया तो डी० ए० वी० कालेज के प्रधानाध्यापक बने । आदि-आदि। किशन भाई की चर्चा चली है तो वह अविस्मरणीय घटना भी लिख पपू के पिता, यो रगाचार्य, तिजारी के बुखार को एक xvi 28 पप्पू खिलाफर ठीर पर दने के लिए मुहल्ले म काफी प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके थे। मरीज उनके पास आता तो वे एक पान पर कुछ रेयायें खींच कर फुसफुसाते हुए कोई मत्र पढते और उस पान को बुखार चढ़ने से एक घण्टा पहले पा लेने का आदेश देत । रहते हैं कि पान चवा लेने के बाद बुखार आना बद हो जाता था। मो, एक दिन किशन भाई भी मरीज बनकर पिताजी के पास आए। नयोग से पपू भी वही वठा था। पान स बुखार ठीक हो जान की बात का कुछ मजाक उड़ाया उसने और दावा किया दिमत्र वा कुछ नहीं होता, यह तो मरीज को नास्था का फल है कि बुखार नही चढता। पप्पू यह भी कह बैठा कि अगर वह सुद पान पर अपना मात्र फूष दे तो भी किशन भाई का बुखार उतर जायगा । पिताजी ने चुनौती स्वीकार कर ली। पप्पू ने भी मैदान नही छोडा। पूरे माडम्बर क साथ पान पर स्वस्तिक बनाया, हल्दी रोली के छीटे मार नीर ठीक पिताजी के बदाज में कुछ मत्र- सा बुदबुदाया। किशन भाई पान ले गये। पूरी श्रद्धा से उस खा लिया और-दुसार सचमुच गायब हो गया। दूसरे दिन पप्पू के यहा जुटी हमारी जमात ने उसकी पीठ ठोकते हुए जब उसस मत्र बताने की बहुत जिद की तो काफी हील हुजत के बाद, वह बोला कि मत्र के नाम पर उसने फुसफुसाया था- टिव कल टिवल लिटिल स्टार किशन भाई जैसा ही उसका लगोटिया था सुदर सिंह । खभी गली के पास ही रहता था । लम्बा, दुबला । गोरा भी हो सकता था अगर कम- जोर स्वास्थ्य ने चमडी पर एक पीली परत न चढा रखी होती। निचला मोठ कुछ-कुछ भागे । उमम वह प्राय' चिपकार्य रहता था एक सुलगती बीडी । ऊपर के ओठ पर चिपकी रहती थी हिटलर छाप भूछे। पहन रहता था, अधिक्तर, अलीगढी तग मोहरी का पाजामा और उस पर झुलाये रखता था एक कमीज। सदर सिंह आगरा कालज का छात्र था। हमारी टोली मे वही एक मात्र आगरा कालज वाला था। पर पहा टिक पाता था वह अपने कलिज मे पीरियड खाली होत ही वह ठडी सडक नापने लग जाता था। इतने पप्पू 29 फेरे लगते थे उसके बाग मुजफ्फर खा के चौराहे और आगरा कॉलेज के बीच कि यारो ने उसे 'वेयर आफ इमह रोड' कहना शुरू कर दिया था। उन दिनों हमारी ठडी सडक का सरकारी नाम हुआ करता था 'ड्रमड रोड' रहे होगे कोई क्लक्टर-कमिश्नर मि० इमड कभी । आज, आजादी के बाद, वह वेचारो सडक भी, देश को अय सैक्डो प्रमुख सडको की भाति, महात्मा गाधी की स्मति को समर्पित होकर महात्मा गाधी रोड बन गयी है और अपने सिकुडे सिमटे रूप मे कही जाती है एम० जी० रोड । बहरहाल इस ठडी सडक पर सुदर सिंह को सुबह, शाम, दोपहर कभी भी चक्कर लगाते में अपने स्कूली दिनो से ही देखा करता था। सुनता रहता था कि उसकी अग्रेजी बहुत अच्छी है। पास आने पर इस प्रवाद की सस्दीक भी हो गयी। धाराप्रवाह बोलता था कम्बरत । पर लहजा ठेठ देसी ही हुआ करता था। इस मामले मे उस्ताद लाखन सिंह और राजे द्र सिंह चौहान उसस अधिक नम्बर ले जाते थ। ये दोनों किंग्स इगलिश' को 'किंग' की तरह ही बोलते थे। हमारा सुदर सिंह उनस तनिक भिन था। उसके शब्दों के चयन पर, बिना उच्चारण का सीफ खाये, मुग्ध हुआ जा सकता था, मजा लिया जा सकता था। और उसकी मजाक पसदी, 'से स ऑफ ह्य मर', गजब था। पप्पू को वह हमेशा 'एम क्यूब' कहा करता था~मीन माइडेड मद्रासी। जब जब पप्पू काली शेरवानी और लट्टे का सफेद झक फडफडाता पाजामा पहनकर घर से निकलता तो सुदर सिंह अवश्य ही कह उठता पा--"रागेय राघव विद हिज फ्लोटिंग हेयर लेडीज़ बिवेयर, बिवेयर, बिवेयर एक बार सु दर सिंह की कक्षा में अध्यापक ने हरेक छात्र से उसकी राजनीतिक विचारधारा पूछना शुरू किया । किसी ने अपने को राष्ट्रवादी बताया, किसी ने ममाजवादी, तो किसी ने साम्यवादी। सुदर सिंह की बारी आयी तो वह वेझिझक बोल उठा था, "सर, मैं अवसरवादी हूँ।" एक दिन पप्पू और मैं कॉलेज के सामने मैदान मे फुटबाल मैच देख रहे थे। शाम के चार बजे हागे । देखा, सुन्दर सिंह दो केले और तीन सतरे लिए मा खडा हुआ हमारे पास । "अवे, भाज यह रईसी? किसकी जैव .
30 पप्पू काटी?" पप्पू ने पूछा । 'पाटनर, चलो तुम्हें ऐश करा लायें," सुदर सिंह हम प्राय खीचत हुए बोला । काफी उत्तेजित लग रहा था वह । पता चला कि हजरत न उसी दिन सुबह मैडिकल कॉलेज के अस्पताल म दाखिला ले लिया था । बीमार तो वह किसी न किसी रोग से रहा ही वरता था, सो इसम कोई आश्चय की बात नही थी । परतु दाखिला लिये बाद, उस वक्त वह कालेज की फील्ड पर क्या करने और कस आ धमका इसके उत्तर में सु दर सिंह ने जो बताया वह केवल वही कह सकता था। 'यार, हॉस्पिटल में बड़ी अच्छी अच्छी खूबसूरत नसे हैं। और पाटनर, वहा फूट्स को मिलते हैं। यू डोट हैव टुपे ए सिंगिल फादिंग फॉर सब लूशस वैनानाज एट और जेज।" जब उस कले और सतरे मुफ्त मिले तो उसे यारा की याद सताने लगी । चार से छ बजे तक विजिटर्स टाइम रहता है न, सो वह अपने पडोसी रोगी को पटाकर वहा स भाग निकला कि 'टस' यारो के साथ शेयर कर ले। अव तुरत उसे वापस भागना है, पर वह अकेला लौट गया तो हम लोग उन ईक्वली लूशस' सों को कैसे देख पायेंगे? गरज कि हमे करीब करीब दौडते हुए सु दर सिंह के साथ अस्पताल जाना पडा । अपने पलग पर बैठने के बाद ही उसने केले सतरे छीले । साते खाते मैंने पूछा कि उस क्या बीमारी है । दर सिंह ने बडी शान से बताया - 'ऐ डोमट्राइटिस' । कुछ देर बाद एग्लो इडियन नस आयो। सदर सिंह के मुह म थर्मामीटर लगा था। मैंने नस से पूछा कि मरे दोस्त को यह पौत-सी बीमारी लग गयी एडोमंदाइटिस ? चप्स ! इतना सुनना था कि मस तो लगी खिलखिलाने । हसते हसते वह दोहरी हुए जा रही थी। उधर, सुदर सिंह और हम दाना के परले कुछ नही पड रहा था। हसी का दोर थमने पर नर्स ने खुलासा किया कि एडोमाइटिस तो एक स्त्री रोग का नाम है। अब दुहरा होन की हमारी बारी थी। और सुदर सिंह ? उसका तो चेहरा दपन काबिल था। चारे को सुबह क्सिी नस ने मजाक मे यह दिया था और वह इस भारी भरकम नाम या मडिल की तरह छाती पर लगाए घूमना चाह रहा था। पर उस दिन गाही नाव पर सवार हो गयी थी। फिर तो जब भी सुन्दर सिंह ग्यादा धपर करता, सिफ 'एडो.
पपू 31 मैट्राइटिस' कह दन स ही उसका चेहरा उतर जाता था। एक और दोस्त था पप्पू का-सोना नाई। पप्पू के रक्त म आभिजात्य धुला था । साफ साफ बहू-उसमे अनेक साम ती तत्त्व थे। यथासभव शारीरिक श्रम से बचता रहता था। इसी चक्कर में उसने सायकिल चलाना नही सीखा (अबे, मैं काई दूधवाला हूं ?), तैरना नहीं सीखा (मुझे कोन तैराकी के मेले में जाना है ) स्टोव जलाने को उसने कभी कोशिश भी नहीं की। (कैरोसीन की बदबू हाथो मे घटो बनी रहती है) और जहा तक सभव हुआ जपन हाथो शेव नही किया । तो, राजकुमार की दाढी बनाने आता था सोना । बूढा, मलगजा, चिपचिपी आखो वाला सोना अक्सर मुये दाढी बनाता मिल जाता। कितनी बातें करता रहता था वह । जान-जहान की। और पप्पू बेहद रस लेकर सुनता चलता था। पहले विश्व- युद्ध मे (1914 18) भारतीय फौज में नाई बनकर यूराप घूम आया था। उस मास बहुत पमद आया था । 'क्या पूछो हो, पप्पू भैया, म्हा 4 ऐसी ऐसी मलूक मैमिया थी कि बस क्या बताऊ।" उन फासिसी मैमो का वणन करते हुए बस उसकी लार टपकना ही बाकी रहता था। उधर, पप्पू भया मगन होते रहत। पर उस दिन तो साना न हद ही कर दी। बातो की झाक मे बह वठा "सच्ची क रिह्या हू साब, कसम ल लो जो झूठ बोलता होऊ तो। आज भी म्हा पं मर चार छ लौंडे घूम रए होगे।" अचानक पप्पू गरज उठा- "चो-प, खबरदार जो और बोला तो।" साना अभी भी झोक म था, "ईमान से 2 रिह्याऊ पप्पू भैया। चार छै तो कमती सैकमती बता रिह्याऊ । दा चार ज्यादा ई होमेंगे।" पप्पू का पारा चरम पर पहुच गया, ' साल नाई के, फ्रास जस खूबसूरत देश को बिगाड के रख माया। मनमोहन, थार सोच भरा, अगर इसकी शक्ल के चार-पाच फासिसी हो गय तो फ्रास की तो रेड मार के रख दीन इस बदमाश न ?" पप्पू गप तो आसानी से बर्दाश्त कर लेता था, मगर कल्पना मे भी कहीं मोदय पर आच आये यह उसे हगिउ गवारा नहीं था। सन 1940 की गर्मिया बीती । कालज पुन जुलाई म खुल गया। आगरा कम्यूनिस्ट पार्टी के संगठनकर्ता और मेरे राजनीति के गुरु, कॉम- 32 पप्पू रेड महादेव नारायण टडन, गिरफ्तार किये जाकर राजस्थान मे दवली कैम्प में भेजे जा चुके थे। उनके साथ कॉ० अब्दुल हफीज़, राम ना शास्त्री आदि भी वही पहुचा दिए गए थे। बच गए थे सिफ पदम कुमार जन, बी० पी० शुक्ला, काशीचरण पाडे । साम्राज्यवादी दमन अपने पूर शवाय पर था । कम्यूनिस्ट पार्टी का के द्र, 'लेनिन भवन नाम का कमरा वद था और साथियो के नाम पर रह गए थे हम आधा दजन विद्यार्थी । सेट जास कॉलेज से अकला मैं, बलवत राजपूत कॉलेज स देशराज मैडिकल कॉलेज से बी० पी० शुक्ला और आगरा कॉलेज से वीरेन्द्र और सत्यनारायण दुब। काशी चरण पाडे निजी कारणो से पढाई छोड प्राय निस्त्रिय हो गए थे। तथापि स सक्ट काल मे भी आगरा विद्यार्थी सघ पूरी तरह से मक्रिय था । इसी कारण जिले म कम्यूनिस्ट आदोलन की चिनगारी बुझ नहीं पाई थी। हमे गैर कानूनी माम्यवादी साहित्य, विशेषकर 'कम्यूनिस्ट अखबार की प्रतिया प.मकुमार जैन के माध्यम से बराबर मिलती रहती पी और उसी के आधार पर हम अपनी अधपकी बुद्धि के अनुसार आ दा लन चलात रहत थे। हमारे 'स्टडी सकिल' भी बाकायदा चाल थे। इसी ममय मे स्थापित हुआ 'आगरा प्रगतिशील लेखक सघ । प्रो० प्रकाशच द्र गुप्त ने इसकी स्थापना की। गुप्ता साहम हिदी जगत म अपनी रेखाचित्र द्वारा प्रसिद्ध हो चु थे। हस' म प्रकाशित उनक लेख और आलोचनायें यथेष्ट लोकप्रिय मिद हुइ। उनके प्रयत्नो के फलस्वरूप मागरा में हास्य--पग्य मामिन 'मतवाला' क प्रकाशक, श्री ओमप्रकाश शर्मा के घर पर प्रगतिशील लेखक सथ भी बैठक नियमित रूप स होने लगीं। इन घटका म गुप्ता साहब की मेहरबानी से मुझे भी प्रारम्भ में ही निमप्रित किया जाने लगा। यही मेरा परिचय श्री भारत भूषण अग्रवाल और श्री नेमिचद्र जैन मे हुआ। मारत भाई बडे अच्छे कवि प । अण्ट भी उनका अपनी विशिष्टता लिए था। हमारे पलिज वे ही छात्र में भारत भूषण और नैमि भाई । गुप्ता साहब कृपा पात्र हान पारण यो माह स प्रगतिशील लेयर मम भी गोप्टियों मभाग सेत पे। मापी मुखरित रहता पाउनपावर। उन दिनों इन गाप्टिया मागराम हि दी बोर उदूक प्राय सभा पप्पू 33 प्रमुख साहित्यिक अपनी रचनाओ का पाठ करना अपना क्तव्य मानते थे। बाबू गुलाबराय, महे द्रजी प्रो० विश्वम्भर 'मानव' मखमूर अकबराबादी, लाम० अहमद साहब-सभी नियमित रूप से आते थे। पप्पू भी इन बैठवा मे अपनी रचनाए बराबर सुनाता था। ओमप्रकाश भाई बाग मुजफ्फर खा मे ही रहते थे, सेट जास कालेज के पास ही।व भी इसी कलिज के छात्र थे । पप्पू के पारिवारिक मित्र थे । प्रगतिशील लेखक सघ में आने वाले सभी लेखक कम्यूनिस्ट पार्टी के समथक नही थे। कुछ तो बाकायदा साम्यवाद विरोधी थे। प्रो० विश्वम्भर 'मानव' समस्त प्रगतिशील साहित्य के मुखर और कटु आलोचका मे अग्रणी थे। मखमूर साहब भी माहित्य की 'शाश्वत' परम्पराओ की रक्षा के नाम पर प्रत्येक प्रगतिशील रचना पर मुह सिकोड लेते थे। एक दिन जब गोष्ठी मे किसी ने जून बनाने वाले चमार को नायक बनाकर कहानी मुनाई तो मखमूर साहब का धय छूट गया। 'लाहौल बिला कूबत । आपको क्या चमार ही मिला था कहानी गढ़ने को? म्या अगर कहानी ही लिखनी है तो चाद पर लिखो, ताजमहल पर लिखो। यह पया अधेर कर रहे हो?" वे भडक उठे थे। इन गोष्ठियो मे हर नये लेखक को बडा प्रोत्साहन मिलता था। मेरा एक सहपाठी था, वहाबुद्दीन । दा-तीन गोष्ठियो म आया और उस माहौल से प्रेरणा प्राप्त कर उसने भी एक बड़ी खूबसूरत कहानी लिखी, 'लोहे- शाह' । गुप्ता साहब ने तुर त उम 'हस' म छापे जान की व्यवस्था कर दी थी। वहाब अपने साहित्य सजन का पूरा श्रय प्रगतिशील लेखक संघ को 'दिया करता था। मुझे याद है कि इहीं बठको मे पप्पू न भी एक लम्बी कहानी पढ़ी थी। शायद दो या तीन गोष्ठियो मे समाप्त हुई थी वह । एक चार मज़िल की इमारत के माध्यम से समाज के विमिन वर्गों का चित्रण था उसमें । बहुत चौका था मैं इस कहानी को सुनकर, बहुत मुग्ध हुआ था। बिना माक्सवादी मुहावरे का प्रयोग किये, उसने इस कहानी मे साम्यवाद के वग- 1 नरक 34 पप्पू युद्ध के मोलिन सिद्धात को किस रोचर ढग से स्पष्ट उजागर पिया था। विन्तु भारत भूषण ने इस कहानी को जिस तरह आलाचना की, मजाक बनाया उसस मुझे बहुत धका लगा था। मैं तव तम 'साहित्य की राजनीति सक्तई अनजान था। नया कम्यूनिस्ट हुआ था और उम्र भी तब बच्ची ही थी। इन तथाकथित बौद्धिक दशव-पेंचो से नितान्त अपरि- चित । अतएव मुझे सासी झुझलाहट हुई थी भारत भाई ने इस रवैये पर। यह युझलाहट और भी बढ़ गई थी जब मैंन गुप्ता साहब को भी 'नरा वा कुजरो वा जैसी राय प्रक्ट परत देखा। बहुत बाद में जाकर समझ सका था कि 'सच्चा' कम्यूनिस्ट बुद्धिजीवी उन सबको अपना विरोधी मान बैठन की गलती प्राय कर लेता है जो उसको पार्टी का सदस्य न हो । सकीण मनोवत्ति के इस विस्फोट का कितना वडा मूल्य पार्टी को चुकाना पड़ा था यह तो रणदिव युग की समाप्ति के बाद ही समझ पाई थी पार्टी खुद भी। इमक बावजूद, प्रगतिशील लेखक संघ की गोष्ठिया अबाध चनती रही। मेरा पप्पू की बठक पर जाना प्रमश बढ़ता गया। अम्मा ने भी अब मुझ पर अपना अगाध स्नह ढालना प्रारम्भ कर दिया था। मैं उस मित्र मण्डली का बाकायदा सदस्य बन चुका था। इस दौरान मैं जा रभ्यूनिस्ट पार्टी मे टिका रह सका उसका सारा थेय प्रोफेसर नीहार रजन सरकार और प्रोफेसर प्रकाशचन्द्र गुप्त को जाता है। सरकार साहब पो खास तौर पर। व वगाली ईसाई थे। कलकत्ता के निकट श्रीरामपुर के निवासी। पिता पादरी थे। एक बहिन और एक भाई और थ । विद्यार्थी थे तभी कम्यूनिस्ट बन गय । नतीजे मे दो वप रेगुलेशन 3 मे नजरबद रहना पडा उनको। एम० ए० करने के बाद, ईमाई होने क नात सट जास बालज में अथशास्त्र के लक्चरार नियुक्त हो गये। 30 32 की आयु । हसमुख, मिलनसार । जब उह पता चल गया कि मैं भी कम्यूनिस्ट हूँ वे अक्सर मुझे और वहाबुद्दीन का विशप फ च हॉस्टल में शाम की चाय पर निमत्रित करने लगे। मावसबादी पुस्तको का सासा भण्डार था उनक पास। मुझे तो. मानो स्वग ही मिल गया। जब भी मेरा पीरियड खाली होता, मैं उनके पप्पू 35 कमरे मे जा बैठता । उह पढाने जाना होता तो कमरे की चाबी मुझे दे जाते । कई बार मरे घर भी पहुच जात । उस जमाने म किसी कॉलेज के प्रोफेसर का अपने छात्र के घर जा पहुचना प्राय अकल्पनीय ही था। परतु सरकार साहब की तो बात ही निराली थी। रूरल डेवपलमेट सोसा यटी' तो उही की देख रख मचलती थी । मैं भी उनका अधिक से अधिक सानिध्य प्राप्त करने के लोभ वश इस सोसायटी में बड़ी दिलचस्पी लेने लगा था। पप्पू इस सोसायटी के आस पास नहीं जा पाता था। एक तो उसे सायकिल चलानी नही आती थी, और दूसरे गाव को धूल और गदगी उसके लिए मतई नाकाबिले बर्दाश्त थी। प्रत्येक दिसम्बर मे हमारी इस सोसायटी का वापिन कैम्प लगा करता था। हम अपने गाव म जा पहुई। प्राय 15 लोग थे । इस वप प्रो० गुप्ता भारत भूषण और नेमिचन्द्र जैन भी इस कम्प म शरीक थे। तम्बुआ में रहना, पुआल पर बिस्तर विछा कर मोगा। सुबह उठते ही गाव की सफाई के लिए झाड लेकर निकल जात थे हम लोग । एक टोली नालिया के पास गड्ढे खाद कर उनमे क्कड पत्थर भर देती। इहे हम 'सोक पिट' बहते थे। एक और टोली दवाए बाटने और प्राथमिक चिकित्सा म जुट जाती। शुरू शुरू में गाव वाले हमसे बहुत सशक्ति रहत थे । वे हमे फौजी भर्ती करन वाले मरकारी आदमी समझते थे। किस्मत स उस गाव में एक पढे लिखे सज्जन हमे उपलब्ध हो गये। थी उत्तम चद। वे आस पास के इलाक के एक मात्र ग्रेजुएट थे जो वहीं रह कर खेती करते थे। हमने उनको अपन उद्देश्य की जानकारी दी तो वे भी हमारे साथ पूरे उत्साह 'जुट गये । उनको साथ ले लेन के बाद तो हमारा काम बहुत आसान हो गया। गाव के अय नौजवान भी भाकर सहायता करन लग । कैम्प मे आय दूसरा दिन था। सुबह सबेरे अपने तम्बू के पास ही एक चबूतरे पर बैठा मैं नीम की दातोन से दान घिस रहा था। पीछे मरी चुटिया साथ साथ फुदक रही थी। गुप्ता साहब न उस दवा ता चुपचाप इशार से, वहाबुद्दीन से कैचो मगवाई और मुझे पता भा न चला, सपाक सबटिया जह से काट दी। अब आस-पास जो हसी का रेला उठा तो 36 पप्पू मेरा ध्यान उधर गया। देखा सरकार साहब गाठ बधी चुटिया को चाबो के गुच्छे की तरह उगली पर नचा रहे हैं । उस समय तो मैं भी जी खोल कर हसा था। पर घर लौटने के बाद जव कैफियत देनी पड़ी तो बडी लानत पड़ी थी मुझ पर चारो तरफ में। "हम तो पल ही जानते थे कि इस तरह के कैम लगाय जाते हैं लोगो को ईसाई बनाने के लिए । ब्राह्मण के बटे की दो ही ता पहचान होती हैं- शिखा और सूत्र । आज शिखा गवाई है अब देख लेना, बहुत जल्दी हो जनेक भी गायब हो जायगा। फिर जीना, वेटा, भगी बनकर"-सभी बडे बूढो ने सुस्पष्ट भविष्यवाणी कर दी थी। तथापि जनेऊ से इतनी यासानी से मुक्ति कहा मिल पायी थी। कम्प से लौटने के बाद जब हमारी टोली को मेरे शिखा-कतन का किस्सा वहाब ने सविस्तार सुनाया तो पप्पू ने बडी पीठ ठोकी थी। 'अब तू आदमी लगने लगेगा। खबरदार अगर अपनी चुटिया फिर से बढ़ाई तो।' सन 1941 मे मैंने इटरमीडियेट की परीक्षा दी। उही दिनो गाधी जी ने 'व्यक्तिगत सत्याग्रह शुरू कर दिया था। 'स्टेटसमैन तब विशुद्ध अग्रेजी साम्राज्यवाद का मुखपत्र था। वह इस सत्याग्रह के समाचार केस कानर' के शीप से छापा करता था। उसकी निगाह मे यह विशुद्ध पागलपन था। मेरे बढे मामाजी, श्री कुजीलाल नागर, न भी इसमे हिस्मा लिया। पाकायदा कलेक्टर का सूचना दी कि अमुक माच का व सिकदरा जाकर युद्ध-विरोधी नारे लगायेंगे।घर से चलने से पहल उह माला पहनायी गयो, आरती उतारी गयी और फिर मायक्ल पर वठ दे चले सिक्दरा- आगरा म करीव पाव मोल दूर, जहा सम्राट अकबर का मकबरा है । दूसरे दिन मेरी इतिहास की परीक्षा पो। वितु जब मरे अभिमावा जेल जान थाले हों तो मैं कम घर पर बैठा रह जाता? हम दोनो सिकन्दरा पहुचे । निर्धारित समय (4 बजे) पर मामाजी मे युद्ध विरोधी नारे लगाय। पर यह क्या? यहा दूर दूर तब किसी पुलिस पान रा नाम निशान तक नहीं पा। अब व गिरधार मस हो 7 पप्पू 37 । और गिरफ्तार न हो तो, गाधीजी के आदशानुसार उह चलते चले जाना था दिल्ली की ओर, जब तक उसे पक्डन लिया जाता। वडी विचित्र परिस्थिति उत्पन हो गयी थी। दिल्ली की ओर चल पड़ने में कोई तक्तीफ न होतो अगर मामाजी अपने साथ एकाघ कम्बल या पुलावर ले आये होते । रात मे सर्दी रहती है। अतएव उहोने मुझे वापस घर जाकर कम्बल आदि ले जाने को कहा। मैंने सोचा कि क्यो व्यथ में मामाजी का कष्ट दिया जाय दिल्ली की ओर कूच करन का । अतएव मैं घर की बजाय सीधा चता गया आगरा कोतवाली । कोतवाल, श्री फिलिप्स, मुझसे परिचित थे। उह जब पूरी स्थिति स जवगत कराया तो फाइलें टटोलने के बाद पता चला कि उन्हें उस दिन ये सत्याग्रह की कोई जानकारी ही नहीं थी। कलेक्टर के यहा से कोई सूचना नहीं दी गई थी। बहरहात, कातवाल साहब ने हरीपवत वे थानेदार को आदेश दिया कि वह मामाजी को गिरफ्तार कर ले। यह थानेदार, शेरखा, कक्षा- 3 से 5 तक गवर्नमेट हाई स्कूल मे मेरे साथ पढा था। वर्षों बाद मिलने पर भी मुझे तुरत पहचान गया । बडी इजत स, मामाजी का तागे पर बठा कर, थाने लाया । मिठाई-नमकीन खिलायी। जिस कोठरी मे उन्ह सारी रात रखना था, उस धुला पुछार साफ करवाया। घर चला ताकि मामाजी का बिस्तर लाकर उन्हे दे दू। घर पर सभी इतनी दर हो जान से चितित हो रहे थे। उहें विस्तार से समाचार दिए और विस्तर को सायकिल पर लाद कर पुन थान की ओर चला। मुश्किल से सट जॉस कॉलेज तक पहुचा था कि देखा मामाजी पैदल- पदल चले आ रहे है । पता चला कि सिकदरा पर कोई भी आदमी गवाही दन को तैयार नहीं हुआ था कि मामाजी ने कोई नारे लगाए थे। वहा के लोगों ने सोचा होगा कि कौन कोर्ट कचहरी के चक्कर मे पडे । 'एक नना सौ दुख हरे' वाली मसल हो गई। और मामाजी, अदम गवाही म साफ छाड दिए गए। दूसरे दिन हम सब इस घटना को दुहरा दुहरा कर हस हस कर दुहरे हुए थे । पप्पू ने, रितु, इसको अपने एक उपयास म (अगर भूल नहीं 38 पप्पू करता तो कदाचित विषाद मठ' म) ज्यो का त्यो इस्तमाल दिया था। उस वप मैं इंटरमीडियेट की परीक्षा म फस्ट डीवीज़न में पास हो गया । सारे कालज मे बडी खुशी मनाई गई क्योकि उस जमाने म आट स म फस्ट डिवीजन बहुत ही यदा कदा आता था। प्रि सीपल सले ने कालेज खुलने पर कॉलेज हाल में सामूहिक प्राथना समाप्त होने पर, उच्छवसित प्रशसा की थी मरी और व्यक्तिश बधाई भी दी थी। परतु इसी 1941 मे 22 जून को बवर हिटलर की फासिस्ट फौजो ने सोवियत यूनियन पर हमला बोल दिया था। सोवियत देश जिसके लिए हम बडे जोश भरे स्वरोम गाया करते थे- सोवियत देश किसका है ? किसका है ? मजदूरो और किसाना का, जनता हित जनता सारी का। उसी लाल क्राति की मशाल को वुझाने के गहित उद्देश्य स सारे यूरोप को पाव तले रौंटने के बाद अब उसने अपने वाले हाथ बढा दिए थे लेनिन द्वारा स्थापित और स्तालिन द्वारा पापित सावियत भूमि की ओर । एक बार तो हम सब भौंचक्के रह गये थे। तमाम यूरोपीय देशो में उसकी नाजो फौजें इस आसानी स घुसती चली गई थी जैसे मक्खन में छरी । तो क्या हिटलर की दम्भपूण उक्ति आखिर सच सिद्ध हो रहेगी मि दस हफ्ते बीतते-न-बीतत मास्को पर जमन सेनाओ का अधिकार हो जायगा? परतु ज्यो ज्या समय बीनता गया, सारा ससार आश्चयक्ति होकर लाल फौज के रणकौशल और अप्रतिम वीरता का कायल होने लगा। शिव मगल सिंह सुमन ने ही सव प्रथम पहा पा--'दस हफ्त दस मास हो गए मास्को अब भी दूर है हम लोग भी कुछ कुछ आश्वस्त होने लगे । तपापि यह भी सच है कि हमारे दश मे उन लोगो की भी कमी नहीं थी जा हवा के रख के साथ बहकर 'हिटलर महान' और 'इटली का माना मुसोलिनी' जैस प य घडाघड लिखबर छपवाने लग गये थे। 'जसी बहे । , धयार इसी वप, पॉलज घुलने पर पता चला रिप्रो० प्रकाशपद्र गुप्त और पप्पू 39 प्रो० सरकार दोना मेट जॉस कॉलेज म अयत्र चले गये हैं। गुप्ता साहब इलाहाबाद विश्वविद्यालय क अग्रेजी विभाग मे, और सरकार साहब क्लक्ला के म्कॉटिश चच कालेज में । वडा दुख हुआ था, परतु चारा भी क्या था? पप्पू का 'घरौंदे' समाप्त हो चुका था। कविताओ और कहानियो की तो न उसने कभी गिनती रखी थी, न हमने। हा एक लम्बी कविता उसने लिखना शुरू किया था उन दिनो-'मेधावी । अनेर विषया का समावेश था इस कविता म । इसम नक्षत्रोक समवेत नृत्य वाली उसकी पक्तियो ने बडी गहरी छाप छोडी थो मन पर। नित्य लिखता और नित्य सुनाता । उसमा कण्ठ अपूव था। बेहद प्यारा गाता था । मुग्ध होकर हम सुनते रहत और समाप्त होने पर शुरू हा जाती चुहलबाजिया। इही दिनो की बात है। मेरी एक सहपाठिनी थी । गोरी सी, नाटी सी । आखें बडी बडी । अलग से देखो तो कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता था। बस ठीक ठीक ही थी। पैदल पैदल चलकर कॉलेज आती। पप्पू के घर के सामने से नित्य प्रति गुजरना पडता था उस । घर दाहिनी आर के फुटपाथ से लगा था। पप्पू ने जगले पर पडी चिक को एक तीली-उसी की खातिर--तोड ली थी। अब वे उस झीनी सी झि स एक दूसरे को देखने लग गये। बस, केवल इतना भर, अधिक कुछ नहीं। उसके आने का समय होता कि पप्पू लिखना बद कर, मारामकुर्सी पर पीछे की ओर यूलने लगता। सिगरेट सुलगा लेता और इधर उधर की बातें शुरू कर देता। हम समझ जात कि वक्त हो गया है देवीजी के प्रादुर्भाव का। वह फुटपाथ बदलकर इस ओर मा जाती, आखें गडा कर पप्पू को दखती और चेहरे पर जरा-सी भी शिकन लाय बिना कॉलेज की ओर चली जाती। "इसे देखकर साले पप्पू की बैठे बैठे चाल बदल जाती है।" बडी सटीक उक्ति थी उस्ताद लाखन सिंह की ।यो, पप्पू को छेडने की सातिर एक चालू किस्म की तुवदी मैंने भी इस "भसा से दीदो धाली" की शान मै गढ ली थी। कुछ पक्तिया आज भी याद रह गई हैं-- ।
40 पप्पू नित्य सबेरे पौने दस स देखा करता वाट तुम्हारी जब तुम आती मुझे घूरती मैं हा जाता पानी पानी वगैरा-वर्गरा। सुदर सिंह ने उस बाकायदा 'भाभी' कहना प्रारम्भ कर दिया था। । पप्पू यो रोमास के आस पास जात दखन का यह पहला मौका था। या, इस क्षेत्र मे अब तक, वह काफी झेंपू किस्म का सिद्ध हुआ था । मुष व्यक्तिगत जानकारी थी कि मुहल्ले के अपने एक मित्र के घर के पासस एक रात वह प्राय नौ बज निकला था । उस मित्र की अविवाहिता वहिन ने उसे घर के अदर निमत्रित किया । पप्पू सहज भाव से चला गया। वहा जान पर उस पता चला कि घर मे उस बहिर के अलावा और कोई नहीं है, मिनेमा देखने गए हैं सब लोग। पाच सात मिनिट इधर उधर की बात करन के बाद उसने स्पष्ट प्रस्ताव रख दिया। और पप्पू की तो फूक ही खिसक गई। हडबडा कर भाग निकला या उस रात । फिर दसर दिन जब अतरग मित्रो के बीच उसने यह किस्सा सुनाया तो लापन न ही कहा था, "सान, भरी पाली पर लात मार आया है। अब, वेटा, दान-दाने को तरमगा।' अतएव, पप्पू के प्रति इस मौन और एकागी प्रेम को देखकर हम लाग केवल यदा कदा उसकी टाग खीच कर ही रह जाते थे। किस्सा कितना गाढा हुआ था उसका अन्दाज़ ता तीन वप बाद पता चला था। उसकी चर्चा बाद में। इन दिनों तो हमने उस या ता कहानिया कविताए लिखत देखा था या यारो के माप मौज मस्ती करत । हा, अब वह माक्सवादी साहित्य भी बाकायदा, गम्भीरतापूर्वक, पढन लग गया था। बहुधा मुझम इस सबध में बात भी करता था। अपने अधकचरे ज्ञान का बडे उत्साह के साथ मैं उसके गल उतारता रहता था। बात है दीवाली के बाद देवोत्थान एकादशी की। उस दिन सुबह सुबह मैं उसके घर पहुचा। बात-बात में देवोत्थान एकादशी की चर्चा पप्यू . निकल आई। मैंने मजाक मे कह दिया कि अगर आप सचमुचना जोग कर इस धराधाम पर नजर डालें तो बचार जागा मजदूर पिसागर की टोलिया और गगनचुम्बी लाल झण्डे क दल बादल देंरकर, घबरा कर वापस स्वग म जा छिपेगे। पप्पू ने मजाक को और भी मजाल-लेकर, आग बढाया। इस बीच अम्मा चाय लेकर आ गइ। हमे हसत खवर कारण पूछा और हमन बडा रस लेकर अपनी कल्पना सविस्तार उह भी सुनायी । नीम झिडकी भर शब्दो मे, 'अरे वेटा, देवी-देवताआ का मजाक नही उडात,' कवर अम्मा वापस चली गई। शाम को पुन पहुचा तो पप्पू देवोत्थान' शोपक कहानी लिख चुका था। पढ़कर सुनाया ता मुझे गव सा अनुभव हुआ कि इसकी पृष्ठभूमि में मैं भी था। यह कहानी हमारे कॉलेज की मंगज़ीन मे छपी थी। भविष्य म उसने इसे अपने किसी 'देवदासी' सग्रह में सम्मिलित किया था। इसी वप मुझे यह भी पता चला कि पप्पू पडित वालेश्वर नाथ शास्त्री जी से वाकायदा सस्कृत पढ रहा है। मप्ताह में एक या दो दिन आते थे पडित जी और पढात थे दण्डी, भारवि, श्रीहप की रचनाए । मैंने केवल दर्जा सात और आठ म मस्कृत पढी थी। अब जा पप्पू ने दण्डी के तीन- चार पक्तियो वाले समास प्रधान शब्द (जी हा, वाक्य नही, एक शब्द) दिखाए तो मैं बहुत ही गहरे प्रभावित हुआ था दण्डी से भी और उसकी रचनाओ को पढकर समझ लेने वाले पप्पू से भो । पप्पू का यह सस्कृत पान उसके लिए आग चलकर बेहद लाभदायक सिद्ध हुआ जब उसने कालिदास मादि के मथो का हिदी पद्य में अनुवाद कर डाला या। पप्पू का एक और शौक था-चित्रकारी। जब तव कागज और रग लेकर बठ जाता और आक्ने लग जाता बडे सु दर-सुदर चित्र । अधिक्तर वाटर क्लर मे । लम्बूतरे चेहरो वाले पुरुष और मगनयनी स्त्रिया। बहुत कुछ मजता एलोरा के चित्रो जसी आकृतिया हुआ करती थी। एक बार, धुन चढ़ जाने पर, उसन अपनी वैठन की चारो दीवार पर प्राय तीन फोट घौड कागजा पर चित्र बना वर जड दिए थे। बहुत मुदर हा गया था वठक का परिवश। एक गुजराती कहावत है-'जेवा रहिये जैन साप, तवा यइय छटठे ।
42 पप्पू मास' । सीमा प्रभाव सदा दुनियार मिद्ध होता है। हम दाना एक छुट्टी 4 दिन सध्या को कॉलज क सामन यो पोल्ड पर घूम रह थ । चार-साढ़े चार या समय था । हल्ली हली बदा-यादी हान लगी। बारिश से बचने के लिए हम कॉलेज लाययेरी एटीम वाल बरामद म आ43। वोहार सेज हुई तो पप्पू न सिगरट सुलगा ली। हम बातें करते रहे विवासर हो गई। मुझ ठड लगी ता पपू न एक सिगरट मरी ओर बढ़ा दी "ल, पीले मर्दी म बच जायगा।' उम दिन तक मैंने कभी पप्पू के मामने मिगरेट नही पी थी । वम भी, कुल मिलाकर शायद पद्रह पीस सिगरेटें पो होगी तब तक-नितात बाल मिश्रा के साथ । उम दिन जव पप्पू ने सिगरट वढाई तो एक बार तो मैन मना कर दिया पर जैम ही उसने दुवारा कहा, "अवे पो भी ले,' मैंने सिगरेट जला ही ली। पिझक खुलन भर की देर थी, फिर तो मैं भी उसा 'सिगरेट लव का वकायदा सदस्य हो गया। एक दो सप्ताह बीते कि मरी जेब म भी पासिंग शो और डिलक्स टेनर' के पैकेट आ विराजे । पप्पू की दी सिगरटें कब तक पीता रहू, मुझे भी तो उसे ऑफर धरना चाहिए--- यह विचार रहता था मर दिमाग म। इस प्रकार मुझे सिगरट का लत लगान का पूरा श्रेय जाता है हि दो साहित्य के प्रकाण्ड लखक, रवि, उपन्यासकार आदि आदिश्री रागय राघव को। मैंन थड ईयर (बी० ए० प्रीवियस) पास किया तब तक कम्यूनिस्ट पार्टी मे द्वितीय महायुद्ध के चरित्र को लेकर गहन मथन, बहस और विचार विमण प्रारम्भ हो गया था। पार्टी के अधिकाश नेता जल म थे। वही इस विचार विमश क वाद अधिकाश के मतानुसार, सोवियत यूनियन के युद्ध म घसीट लिए जाने के बाद अब वह युद्ध साम्राज्यवादी युद्ध नही रह गया था। अब वह जनयुद्ध (पीपुल्म वार) हो गया था । पार्टी गर कानूनी थी। हम तागो के पास इन समस्त बहस मुबाहिसो की विस्तत रिपोट साइक्लोस्टाइल किए गए कागजो मे 'जेल डाक्यूम टस के नाम स आती रहती थी। उ ह पढकर, पहले तो मुझे लगा था कि यह हमारे नेताओ की जेल म बाहर आने की चाल मात्र है। भला सोवियत यूनियन पर आक्रमण होन स, अप्रेशी साम्राज्यवादियो म क्या अतर आने पप्पू 43 वाला है और क्यो आने वाला है उनके दृष्टिकोण मे काई अन्तर? यह तो बकौन बिहारी- कहलाने एक्त बसत अहि, मयूर मग, वाघ। जगत तपोवन सो दियो दीरघ दाघ निदाघ ।' वाली मसल है कि आज चचित और स्तालिन दोनो को एक ही सफ म खडे हो जाना पहा है। कि तु 1941 क दिसम्बर म पटना में होने वाले अखिल भारतीय स्टूडे टस फहरेशन के अधिवेशन ने जब इस युद्ध का 'जनयुद्ध' करार दे दिया, तो मुपे लगा था रि मामला सगीन हो गया है। बहरहाल, अपने अन्य विद्यार्थी कम्यूनिस्ट साथिया की तरह मैं भी इस 'जनयुद्ध' वे सिद्धा त को गले नहीं उतार पाया था । मौभाग्यवश, मिमस की छुट्टिया स पुछ ही पहले, आगरा कालेज में, तत्कालीन प्रिंसीपल, मिस्टर काल के तानाशाही रवैय के खिलाफ, हर- ताल हो गई थी। उन दिनो हमारे विद्यार्थी सघ के अखिल भारतीय नेताओ मे कॉमरेड यज्ञदत्त शर्मा भी थे। वे दिल्ली में रहते थे और जागरा में उनकी रिश्तेदारी थी। अतएव वे प्राय आगरा आते रहते थ । क्रिसमस को छुट्टियो मे ही हमने उनसे सम्पक क्यिा और जब जनवरी 1942 में कॉलेज पुलने का वक्त आया तो हमने उह नागरा कॉलेज की हडताल के सिलसिले म विद्यार्थियो की आम सभा मे भाषण देने के लिए बुलवाया। कॉमरेड यनदत्त शर्मा का आगरा आना हमार लिए वरदान सिद्ध हुआ। हमने उनसे लगातार तीन दिन, करीब 7 8 घण्टे रोज, खुलकर बहस की। माक्सवाद की सभी जानी-अधजानी उक्तियो और सूक्तियो का जमकर प्रयोग किया और फिर तीसरे दिन, कॉमरेड यनदत्त के तर्को स निरुतर हो, हथियार डाल दिये। अब हमारे लिए भी यह युद्ध मनसा, वाचा, कमणा जनयुद्ध हो गया था। पप्पू को जो यह बात मानने में अधिक समय नहीं लगा, इसे मैं अपनी कामयाबी मानता हूँ । और जब पप्पू ने इसे जनयुद्ध करार दे दिया तो वह 44 पप्पू अपनी कविता मे भी इस सिद्धात का प्रतिपादन करने लगा। उसन एक कविता लिखी थी- टेम्स हो या हा यागत्सीक्याग वोल्गा हो या गगा हो, सबकी एक लडाई है दुनिया की आजादी की। सिंह द्वार पर बबर नान आह विकल तू क्यो अभिभूत' जग रे हि दुस्तानी जाग आधी वह बरवादी की। कोमी जग म चल बढ चल कातिल का दम आज बुचत, दुनिया की जनता है साथ राह यही आजादी की। भला इससे अधिक सहज, सरल और सरस और कोई व्याख्या हो सकती है 'जनयुद्ध' की? सन 1942 की ही गमियो की छुट्टियो की बात है । मैं प्रति वप इन छुट्टियो में अपने पिताजी के पास बूदी चला जाता था। वूदी राजस्थान में एक छोटी सी दशी रियासत थी। इतिहास प्रसिद्ध हाडा वश का राज्य पा। मेरे दादा वही जा बसे थे। थप म 2-3 सप्ताह के लिए मुझे वहा जाना पड़ता था। बूटी मे महिला अस्पताल की मुख्य चिक्त्सिक थी पप्पू की मौसी- डा० श्रीरगम्मा । इस वप उन्होंने पप्पू को वूदी आने का निमत्रण दिया। पप्पू वहा पहुचा। मुझे इसने अपन आगमन की कोई सूचना नहीं दी थी। न भी इस का ही जिक्र किया था उसने कि वूदी म उसकी मौसी रहती हैं। एक दिन मुबह जब मैं अपन तिबारे मे वठा सुबह की चाय पो रहा था तो आवाज सुनाई दा, 'मनमोहन' । पप्पू वा आंगन म पहा देख कुछ क्षण तो मैं हतवाक् रह गया और फिर 'अवे साले, तू ?' कहता-वहता मीडिया परगना नीच उतरा । पप्पू और मैं वाहो म मुये खहे थे। माखो पप्पू 45 में शरारत की चमक और मुह पर दुष्टता भरी मुस्कान बिखरी पडी जा रही थी कि देख बेटा, कैसा चरका दिया है तुये? तूने तो कभी स्वाब में भी नहीं सोचा होगा कि मैं यहा भी आ धमगा। पप्पू मौसीजी के तागे पर बैठ कर आया था। छोटो भी रियासत म तागे ही मिलते थे अफमरी को अपने व्यवहार के लिए। पर उस जमाने म इन तागो का जो रोब था वह आज कारा का कदापि नहीं है। और पप्पू बडी देर तक इस बात का रौब, रह रहकर, मुझ पर डालने की चेष्टा करता रहा था कि वह 'मोसोजी के तागे' पर आया है। ऐसा कोई भी मौका वह कदापि नही चूकता था जब वह अपनी शात बघार सके । उसक अहम् की सतुष्टि वह इन छोटी-छोटी बातो में कर लिया करता था। तो जब वह बार बार उस तागे का जिक्र करने लगा ता मुझसे न रहा गया। “अबे ओ तागे वाले, पल्ली पार चलेगा?" वस इस एक वाक्य ने ही उसे तागे से उठा कर जमीन पर ला खडा किया। फिर तो हम दोनो तीन चार दिन तक घण्टो साथ बैठ कर वापस वूदी मे आगरा से आए। उसका बूदी आगमन मेर लिए तो खैर अविस्मरणीय बन ही गया, मर अनेक सगे सम्ब धी जिनस मैंने उसका परिचय कराया था, आज तक वे उस 'वेहद खूबसूरत, शिष्ट और तेजस्वी मित्र की चर्चा कर लिया करत हैं। गर्मी की छुट्टिया बीती और मैं वापस आगरा लौट आया। देश का राजनीतिक वातावरण बेहद गम हो उठाया। गाधीजी की लेखनी 'हरिजन' मे हर हफ्ते आग उगल रही थी । अतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी लग रहा था कि अब निर्णायक क्षण आ पहुचा है। नाजी फौजें स्तालिनग्राद की भार बढ रही थीं। जापान ने दक्षिण पूर्व एशिया में तहलका मचा रखा था। सिंगापुर इदोनेशिया से बढ़कर जापानी फौजें बर्मातक आ गई थी। सुभाष- घद्र बोस ने आजाद हिंद फौज बना ली थी। वर्मा के बाद भारत का ही नम्बर माने वाला था। कलकत्ता और पूर्वी तट पर लाखो दिल घडाने संग गए थे। जापानिया का राज हो गया तो? हमार देश में एसे लोगो को कतई कोई कमी नही थी जो अप्रेजा की हार की अतरतन स कामना करत घे भले उसक बाद हमारे देश पर जापानियो का ही राज क्यो न हा जाय । यावा तुजसीदास न उनपे लिए 46 पप्पू एक चौपाई सबडा साल पहले ही अता पर छोडी थी-कोक नृप होउ हमे का हानी, चेरी छाडि न होउव रानी-वाली । 'दुश्मन का दुश्मन हमारा दोस्त है' के सूत्रानुसार जापान भारत का मिन राष्ट्र या उनकी निगाह मे, और दुश्मन का दोस्त, सोवियत यूनियन, उतना ही गहित शन जितना जग्रेजी साम्राज्यवाद । देखते देखते अगस्त आ गया और आने के साथ साथ अपना रग दिखाने लगा। गाधीजी न नारा दिया-अग्रेजो, भारत छोडो। सारा देश सास रोके प्रतीक्षा करने लगा 9 अगस्त से बम्बई में होने वाले ए० आइ० मी० सी० के अधिवेशन की। लग रहा था कि जरूर कुछ होगा इस बार जो पहले सभी आ दोलना से भिन होगा। वही हुआ भी । गाधीजी ने कह दिया-रो या मरो और इसके पहल कि काग्रेस देश के सम्मुख कोई स्पष्ट रूपरेखा रख पाती कुछ करन की, कुछ करते करते मरने की, उसी रात सारे नेताजा को गिरफ्तार कर अज्ञात स्थाना पर ले जाया गया। काग्रेस गैर कानूनी करार दे दी गई। उधर कम्युनिस्ट पार्टी के नेतागण जेलो से छाड दिए गए थे। देवली कम्प ब द कर दिया गया था। का. महादेव नारायण टहन, अब्दुल हफीज और रम ना शास्त्री वापस आगरा लौट आए थे। उनका नेतत्व फिर स प्राप्त हो चुका था। अत 9 अगस्त की शाम को जैस ही हम लोगो ने रेडियो पर य समा. चार सुने, हम स्वत स्फूर्त जा जुटे सुदर होटल की छत पर जहा कम्यू: निस्ट पार्टी और अय सस्थाआ के दफ्तर थे। अभी तक कम्यूनिस्ट आन्दालन को आगरा जिले म हम मुट्ठी भर विद्यार्थी ही चला रह थे, अतएव उस शाम छत पर हमारी ही सख्या अधिक थी । अधिक बहस की तो गुजायश थी नहीं । तुर त फैसला ले लिया गया कि नेताओ की गिरफ्तारी के प्रतिवाद म 10 अगस्त को सभी स्कूल कालेजा म हडताल की फैसला लेने के बाद हम मब चल पडे अपने अपने वालेज व हास्टलो को भार ताकि हॉस्टल वासियो को इसके लिए प्रस्तुत किया जा सके। आज इस बात की कल्पना भी शायद मुश्किल से की जा सकेगी वि तक । हम । जायगी।
पप्पू 47 किसी कारज में, विरुप र स ट जॉन्स कॉलज जैस मिशनरी पलिजम, एक दिन की हडताल परवान को चेष्टा कितना कठिन वाम था। हमार पलिज में ईसाई और मुसलमान छात्रा की सख्या यथेष्ट पी। अधिकाश इसाई छात्र छात्रायें मिशन 7 वजीफा पात पाहताल की और वजीफा ३६। मुमलमान छान, युछ अपवादा यो छाबर, काग्रेस विराधी थे। जमाना जिना और लियार त अली का पा। मुस्लिम लीग के आदोलन या गढ़ डा दिना सयुक्त प्रा न (यू० पी०) हा तो था। छात्रो को कोई समस्या हा तो उह भी साय लिया जा सकता था । आगरा कॉला मा हाल मे व हमारे माय थे ही। किन्तु राजनतिर आ दोलन म 4 हमारा माथ देंगे, इसकी परप अभी होना बाकी थी। एम और पाज था-वलय त राजपूत इटर पालज । अधिकाश छाव या तो राजपूत या जाट जमीदारा के बेटे । व ता पुरत दर पुश्त अग्रेजा के खरवाह हुआ करत थे। उनका रवैया क्या रगा, हम नही जानत थासाट जॉस कॉलज वा भार मर सर पर था। इस कॉलेज में आज तक कभी पाई हडताल नही हुई भी हॉस्टल में चक्कर लगाने पर आश्वस्त हुआ कि 10 अगस्त को मेरी ना नही कटेगी। सभी ने हाताल म भाग लेना स्वीकार किया। वहा से छूटत ही पहुचा 'बाबू के रेस्तरा'। 'वायू के रेस्तरा' पर सभी मिल गए। सभी व्यग्र थे, सभी आशकित 4-हडताल हो सकेगी? न हो सकी, तो कितने शम की बात साबित होगी? ईसाई लडक्यिा मुसलमान लडके-उहें कैस रोकोग अदर जाने से पुलिस क्या चुपचाप खडी तमाशा देखती रहेगी ? जैसे ही मैं पहुचा, प्रश्नों की बौछार होने लगी मुझ पर। और सबमे महत्त्वपूर्ण प्रश्न जो हर भाई बार-बार कह रहा था, वह था-सेण्ट जॉस मे, आज तक कभी हड- ताल नही हुई । सेण्ट जा स और आगरा कॉलेज मे बडा फक है। इसी- लिए ता आगरा कॉलेज वाले इसे क या पाठशाला कहते हैं । सच कहू तो यही समस्त आशकाए मेरे अ दर भी गहरी पैठी हुई थी। विद्यार्थी सघका उपमत्री था उन दिनो। मेरी इज्जत अचानक दाव पर आ लगी थी। अगर कल हडताल न हो सकी तो क्या मुह दिखाऊगा 48 पप्पू टडनजी पदम और शुक्ला को? उस रात हम लोग रीव क्दस बजे तक परस्पर सलाह मश्रा करते रहे । मुये अभयदान दिया लाखन सिंह ने--"जरा सी भी फित्र मत करो, मैं किस दिन काम आगा? बस तुम साढे नौ बजे कालज पहुच जाना। मैं आठ बजे से ही इतजाम मे जुट जाऊगा।" लाखन सिंह ईमाई था लेविन कैसा? धार्मिक सकीणता के मामले म मैंने ईसाइयो को भी उन समस्त रोगा से ग्रस्त पाया है जिनका आम हिंदू या आम मुसलमान भारतीय शिकार हुआ करता है। मसलन, छुआछूत, दहेज का लेन देन, भूत प्रेत से भय इत्यादि। लाखन सिंह और उसका परिवार इन रोगा मे मुक्त था। जब तर कोई बताए नहीं, जापको अ दाज ही न हो कि ये लोग ईसाई हैं। लाखन मारे कालेज मे 'उस्ताद के नाम से मशहर वैस ही नहा हो गया था । खुद ता मिफ बी० ए० पास थे हजरत पर एम० ए० इगलिश के तीन-चार चानो को मुफ्त पढात रहत थे । भूगोल और अथशास्त्र म भी इसका लोहा उच्छ अच्छे मानत थे । बी० ए० पाम किए दा वप बीत चुक थे तथापि नित्य प्रात कान नौ बजे पाजामा कमीज पर कोट डाल साइ किल पर सवार हाकर मित्र दरा के पास जपने मकान स चलकर काज आ पहचता था । हममुख, हाजिर जवाब विविध विषयो पर सक्षिप्त, कितु, मटीक राय देने वाला लाखन सिंह हम सबका वाकई उस्ताद था- मरा तो विशप रूप से था, क्याकि बी० ए० को परीक्षा क दिना में दस बजे रात स प्रात काल चार बजे तक बिला नागा मैंने उसमे अग्रजी के चारो पेपस पढे थे और, स्वीकार करू कि उमन जिस प्रकार पढाया था, मुझे उन पपस म अच्छे नम्बर मिल सके थे। बहरहान, जव लायन सिंह ने हडताल सफल बनाने का जिम्मा न लिया तो मै निश्चित हो उस रात घर लौटा था। दूसरे दिन साढे नौ की बजाय नौ बजे ही कॉलेज जा पहुंचा था मैं । मुये सुराद आश्चय हुआ था यह देख कर वि लाखन पप्पू और पाच छ अय हास्टलवासी मेर मित्रो सहपाठिया ने वालज म प्रवेश लने वाल पाचौ फाटकोपर पाच पाच छात्रा को पिक- टिंग के लिए तैनात कर रखा था। मैं पहुचा तो-"क्या पता पुनिस पप्पू 49 तुये गिरफ्तार कर ले, या लाठी मार मार कर इस काबिल ही न छोडे कि तू चाय पी सके । सो कॉमरेड पहले एक एक कप चाय तो पो ही ली जाय," कहते लासन मुखे मारे रेस्तरा म ले गया। पप्पू और दो और सहपाठी साथ थे। तनावपूण मानसिक स्थिति को मजाकों द्वारा सहज करने का निष्फल प्रयास करते रहे थे हम उस समय । चाय पत्म हुई तब तक कालज का घण्टा बजने लगा था। ठीक पौने दस से हर आधे मिनट बाद टन टन करता यह घण्टा मक्डो छात्र छात्राओ को नित्य आमत्रित करता रहता था। हम सब उसकी ध्वनि के आवषण से मन मग्ध से कॉलेज का रुख किया करते थे। पर आज इस घटे का जादू यथ सिद्ध होने जा रहा था । हम सब उठ खडे हुए। चाय पीने हुए ही यह तय हो गया था कि पप्पू मुख्य प्रवेश द्वार रहेगा और मैं और लाखन खड़े होगे डेविस हॉस्टल के सामने वाले द्वार पर। डविम हॉस्टल हमारे कालेज की छात्राओ का हॉस्टल है । अधिकाश ईसाई लडकियों का । पचास साठ छायाए यदि झुण्ड बनाकर कॉलेज मे घुस पडी तो हमारी एक न चलेगी। उस जमाने म लडक्यिो से अभद्र व्यवहार करने, उन पर तानाकशी करने की बात भी हम लोगो के दिमाग म नही आती थी। यहा लाखन सिंह की उपस्थिति वहद आवश्यव थी। उमे वे लडकिया न केवल अच्छी तरह जानती ही थी, उसका लिहाज भी करती थी । वह उन्हें पाठ्य क्रम में सहायता जो दिया करता था। लाखन की बहिन मरी सहपाठिनी थी। उसी के कारण यह सभव होता था । आज लाखन ने उस भी ममय से पहिले ही डेविस हॉस्टल मे भिजवा दिया था। दस बजने म पाच मिनट बाकी थे कि देखा हमारे प्रिसीपल, रेवरेड कनन टो० डी० सले, सडक पार कर उसी द्वार पर आ पहुचे । उनका बगला डेविस हॉस्टल के पास ही था। सले साहब को देखते ही हम लोगो की नारेबाजो तेज हा गयी-"अग्रेजा भारत छोडा', "हमारे नेताआ को रिहा करो" आदि-आदि । लडकिया सडक के उस पार खडी तमाशा देख रही थी। हमारे पास भीड बढ़ती जा रही थी। "मनमोहन, व्हाट इज ऑन दिस?' सले माहब आवेश मे मुझस पूछ - 50 पप्पू रहे थ। - 'नथिंग सर, वी आर ऑन स्ट्राइक टु डे," मैंने उत्तर दिया। बट वट व न्हाइ? हाट हैव आइ डन?' आवेश म सले साहब हकलाने लगते थे। 'नो सर इट इज नाट अगे स्ट यू ऐट आल,' मैंने उहे आश्वस्त किया, इट इज टु प्रोटस्ट अग स्ट द ऐरस्ट आफ आवर नेशनल लीडस।" "ओह, आ, एम सो रिलीड । बट ," और उसके बाद उन्होने जो कहा वह इतना अप्रत्याशित, इतना स्नेह जटिल और इतना आतरिक उच्छवामपूण था कि हम सब सक्त म रह गए थे। उहोने कहा था कि यदि हम पिकेटिंग ही करना है तो सड़क पर खडे रह कर न करें, कालेज कमाउण्ड म आक्र करें, क्यापि सट पर वे पुलिस स हमारी रक्षा नहीं कर सकेंगे। कॉलेज कम्पाउण्ड म बिना उनकी आज्ञा पुलिस अदर प्रवेश नहीं पर मकगी। इतना कहकर सले साहब कॉलेज म प्रवेश कर गए । उ हें रोकना हम अभीप्ट भी नहीं था। पर तु हम सबको काफी कुछ क्षण लग थ पुन सहज हान म । सल साहब अग्रेज थे और तब तक हम नार लगा रहे थे-- 'अग्रेजो भारत छोडो।' सले साहा व चते जान वयात, मरी हिम्मत ही नहीं पड़ी इस नारे को दुहरान की। किस मुह म ऐस अग्रेज यो भारत छोड़ने की बात यही जाए ता उस दिन हमारी हडनाल पूण सफल रही-मट जॉस कॉलेज के इतिहाम को पहनी हडताल । हम पर पुलिस को लाठिया भी नहीं बरसी, पारि कुछ ही र वाद हम जुलूम वनावर चल पडे व नागरी प्रचारिणी समाकी आर जहा छात्रा की महती जनसभा होन वाली थी। उस जन सभा या मभापतित्व पिया या मानपुर व छात्र नता सायी धमहिन। घमवेश उमप यू०पी० छात्र मय र महामन्त्री और किमी कारणवश आगरा आए हुए थे। सभा म भाषण दिए थे, माने पर पाई गरदार TT TT गिह और मैंन । ह- मासूम पानि म सभा मयामा अप हागा रिमार नाम वारष्ट पट जायेंगे। मेरबहेमामाजीनामानी बीमारी का बहाना 7 वहीमा श्रीमुम पप्पू 51 बनाकर ग्वालियर भिजवा दिया दो दिन बाद ही, ताकि मैं पक्डा न जाऊ । ग्वालियर देशी राज्य था और वहा मरे छोट मामाजी नौकरी करते थे। पर तु पार्टी का आदेश था कि जिस विसी के नाम वारण्ट नियले वह भागे नहीं । अतएव ग्वालियर पहुच कर जब मैंने दखा कि मेरी नानी पूर्ण स्वस्थ हैं, तो यथासभव शीघ्र मैं वापस आगरा लौट आया। 26 अगस्त का। मैंने बहाना बनाया था कि मुझे कॉलज स अपनी छात्रवृति की रकम लेनी है । कॉलेज जाकर रकम वसूल की और वही से चला गया पप्पू से मिलने। देखा वहा बैठा था दीपनारायण सिंह । अत्यात मेधावी छात्र । मैथ- मटिक्स म एम० ए० कर रहा था। ग्वालियर मे बी० ए० पढत समय स हो माक्सवाद म रुचि लने लग गया था। स्टूडे टम फेडरशन का एक्छन नतत्व क्यिा था ग्वालियर म। आगरा जाकर हम सबक साथ भी घुल- मिल चला था। मेरे कालज व विशप फे च हास्टल में रहता था। लम्बा, तगडा, छाटी छाटो आखें, चरटी सी छोटी नाक, काला रंग, माटा चश्मा । मोटी स मोटी खादी का ढीला कुर्ता, उतनी ही माटी खादी की घाती जो प्राय मली रहती। मामा य म कुछ अलग स्वर जो खुशी मे और भी अधिक भिंच जाता। बातें अधिकतर अपन बार म ही करना प्रिय था उसे, मसलन, विक्टोरिया कालेज, ग्वालियर मे उसने प्रोफेसरो और प्रिंसीपल से कैस कैसे मोर्चे लिए । अटल बिहारी बाजपेयी का कब और कैस शिकस्त दी। प्रो० गुरु प्रसाद टडन से कब झडपें हुइ । खुद को 'क्सिान का बटा' कहा करता था दीप नारायण । बडा गव था उस अपनी इस किसानियत का। और उसस भी अधिक गव था उसे स्तालिन पर। अघ भक्त समझिए। कि तु कम्यूनिस्ट पार्टी की मदस्यता न मिली थी अब तक-न ग्वालियर मे, न आगरा मे। हम लोग उस पार्टी का 'आनररी' सदस्य कहा करते थे, मजाक मे । पार्टी सदस्यता से वचित रहने की एक बड़ी वजह थी उसकी आत्म परकता। 'मैं', 'मैंने' और 'मुझको' कुछ इतना अधिक रहा करता था उसम कि नाप उसकी इज्जत तो कर सकत थे, वितु उमस प्यार कर पाना सचमुच कठिन था । निश्छल ईमानदारी, स्पष्टवादिता, सच्चरित्रता, निर्भीकता तथा प्रखर मेघा-समी 52 पप्पू गुण उसम थे। तथापि, वह लोकप्रिय नहीं बन पाया था- इसी आत्म केद्रिता के कारण। स्वीकार करता ह कि मैं भी उगे अधिक पस द नहीं कर पाया था, बावजूद इस तथ्य के कि उन दिनो माक्सवादी छात्रा की खोज म रहा करत थे हम सब । जहा कही गघ भी आ जाती कि अमुक छात्र 'मिम्पेय टिक' है हम लपक कर उससे घनिष्ट होने की चेष्टा म ग जाया कल थे। मैं वहुमा उममे मजार मे वह वैठता था- 'चम्पा तो मे तीन गुण रूप, रग अरु बास, अवगुण तो मे एक है भ्रमर न आवत पास । तो ऐसे दीपनारायण को उस शाम पप्पू के कमरे मे बठा देख मुझे बड़ा आश्चय हुआ था । और बेहद हमा था मैं उसकी हुलिया देखकर । कुर्ता धाती गायब । काट पेण्ट पहन क्सी अजीव हुलिया बना ली थी उसने। पता चला कि हजरत 'अण्डर ग्राउण्ड हैं। करो या मरो म नगे हुए है पिछा पद्रह दिन से । कम्यूनिस्टो से वेहद नाराज हैं कि वे इस 'राष्ट्रीय संग्राम की विरोधिता कर रहे है । मुझे देखते ही वरम पडा था दीपनारायण सिंह । कहने न कहने की सारी बातें उस एक घण्टे में हमने एक दूसरे को जी खोल कर सुना दी थी। हम दोनो को बहस जो प्राय शिष्ट गाती गुफ्ताको लक्ष्मण रेखा अब लाघे -~-तब लाघे वाले स्तर पर आती जा रही थी उसे पप्पू मूक श्रोता बना सुनता रहा था। बहुत मुमकिन है वह स्वय तय नहीं कर पाया था कि इम 'सन बयालीस के विद्रोह का साथ दिया जाय कि नही । इतना आसान था भी तो नही यह प्रश्न । सारा राष्ट्र इसी उहापोह 'मे पड़ा हुआ था उन दिनो। प्राय एक घटे की तू-तू मैं में क बाद दीपनारायण ने विदा ली। वह रहा था कि किसी 'एक्शन में जाना है। मैं भी दस झाय झाय म बोर हो चुका था। करीब 20 25 मिनिट बाद वहा से चलकर घर आ गया। सतोप मुझे केवल इतना ही था कि चलने से पहले मैं पप्पू का यह समयाने में सफत हा मका था कि तोड फोड को राष्ट्रीय जा दोलन की सज्ञा पप्पू 53 कदापि नहीं दी जा सकती। दूसरे दिन सुबह 10 बजे मैं गिरफ्तार कर लिया गया-भारत सुरक्षा कानून की धारा 129 के तहत । दो महीने के लिए डेटे यू' रहना या अब नागरा की सेट्रल जेल मे। जेल पहुच कर देखा कि दीपनारायण सिंह भी वहा मौजूद है। पप्पू के घर से निकलन के कुछ देर बाद ही उसे गिरफ्तार कर लिया गया था। जौर जेल में आते ही उसका तेज़ झगडा हा गया था श्रीकृष्ण दत्त पालीवाल से जो उन दिनो यू० पी० काग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे। पालीवालजी नित्य सायकाल गीता पर प्रवचन दते थे । उस दिन अपन प्रवचन मे व स्तालिन को मा बहन को गालिया द रह मे । दीप- नारायण भी वही बैठा था। तुर त उठकर पालीवालजी की गालिया उसे हा तुर्वी वतुर्की वापस लौटाने लगा। बस उसी क्षण से दीपनारायण फिर स माक्सवादी हो गया। मेर दो महीन के जेल प्रवास के दौरान दीपनारायण हमारे जेल कसो- लिडेशन सेल का बाकायदा सदस्य बना रहा। अपनी स्पष्टवादिता के कारण उस एक बार और झडप लेनी पडी थी-श्री महावीर त्यागी से। उस घडप का अत हुआ था त्यागीजी द्वारा उसस मावजनिक तौर पर क्षमा याचना करने के बाद। इन दो महीनो मे हम बहुत निकट आ गये । था बहुत वर्षों पश्चात् एक बार सुना था कि दीपनारायण सिंह फतेहपुर का नामी वकील हा गया था और हो गया था वहा की बीडी मजदूर संघ का नेता। फिर कुछ समय पश्चात विमी ने बताया था कि वह एम० एल० ए० पुन लिया गया था । अब यह कहा है, पता नहीं। प्रखरता और उसके ग्राम्य व्यवहार को स्मृति आज भी तरोताजा है। पा महीने बाद जेल से छूटा तो मैंने खुद को अपने कलिज का छोटा- मोटा हीरो बना पाया। साठ दिन वे इस छाट-से बरसे मही कई परिवर्तन भा स्पष्ट दिखाई दिय । सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण परिवतन या कि मरा सहपाठी, और थो वृष्ण चन्द्र खन्ना या छाटा भाई विशन खाना कम्यूनिस्ट पार्टी का पाायदा सदस्य बन गया था। उसी के साथ-साथ, श्री राजेन्द्र रघुवंशी भी पार्टी मे आ गये थे।
54 पप्पू दे दिया था हम । बिशन और राजेद्र रघुवशी बडे गहरे दोस्त थे-एक जान, दा कालिब । छुटपन मे ही नाटकीय : राजे द्र रघुवशी तो आज इप्टा(भारताय जन नाटय सघ) के अखिल भारतीय नेता हैं। विशन ने भी बम्बई म पहले इप्टा मे, और बाद म स्व० बलराज साहनी के साथ अनेक फिल्मो में, विभिन्न भूमिकायें निभाइ । कि तु अभी तो वात 1942 की ही करू । जेल जाने से पहिले 10, 11 और 12 अगस्त को कॉलेज म हडताल रही। 12 अगस्त को विद्यार्थी सघ न हडताल समाप्त करने का फैमला लिया। उस दिन जब मैं कालजये मुख्य प्रवेश द्वार पर खडा यह घोषणा करने लगा, तो विशन खन्ना ने क्या क्या गालिया नही दी थी, मुये, कम्यूनिस्ट पार्टी को। 'गद्दार करार जब वह विशन पार्टी का सदस्य हो गया था। किमाश्चयमत परम । यह परिवतन क्या और कैस हुआ, मैं नहीं जानता । पर इतना अवश्य जानता है कि उसके बाद जब तक आगरा रहे, विशन न ना पार्टीका उतना ही कटार भक्त रहा जितना कट्टर वह पहले उसका दुश्मन था। विशन बहद भावुक जो पा। पार्टी मे आ जाने के याद उसका पपू के घर जाना-जाना बहुन वर गया। अब वह हर बात में पप्पू को मलाह भी देने लगता, उसकी आलो चना भी पर बैठना । कदाचित् उसको लगता था कि पप्पू भी प्राय वम्यू निस्ट है ही अतएव अब वह उसकी यात अधिक गम्भीरता से लेगा। पपूपर इमकी दिल उल्टी प्रतिक्रिया होती थी। पपू उसायडे भाई या मित्र या। अतण्य उसने विशन यो सदा पाम बहन जूनियर माना था । या भी पपू अपनी आलोचना पदाहि बर्दाश्त नहीं कर पाता पारग मामले म उममा अहम बहुन विस्फारित पा। जिहें यह अपना गमरसस्योगार पर सा, उनी आलोया यह पिर भी सहन परमता। पिनुरिया उमन हम यहाागमाना पा। उम यह कम बगल एर धाग-गा frazा मनारकर, प्रमंग पारमा गया । पम्यूनित पार्टीमापारि मारपसममान काठ कॉमरम
पप्पू 55
सि हा। उनके दो-नीन पत्र पप्पू के पास जाये, "कविता भेजिये ।" पप्पू ने
एक 'माचिग मोंग' लिखा और प्रेषित कर दिया। उन दिनो जोश मलीहा-
बादी का एक गीत बडा लाकप्रिय हुआ था--रवा दवा बढे चलो। उसी
शैली म पप्पू ने लिखा-
ये फरफरा उठी हवा
ये खेत लहलहा उठे,
कि जिदगी की आबरू
पुकार गीत गा उठे
कि जिनकी मेहनतो पे
पल रहा है पेट विश्व का
कदम मिला गरज उठो
बढे चलो, बढ़े चलो।
गगन मे लाल सूय है
चमक उठा, दमक उठा,
कि लाल झण्डा सर उठा
लहर लहर फहर उठा,
महल की रोशनी है मद
क्राति है बुला रहा
बिरादराने नौजवान
बढ़े चलो, बढे चला।
जब तक यह गीत लिखा नहीं गया था, विशन रोज सुबह आकर
तकाजा मार जाता या- 'पपू भाई, रमेश सिहा ने आगे बढ के-
यविता मागी है। कितनी बडी इज्जत की बात है। लियो भय, कुछ
बढ़िया सी चीज लिख के जल्दी स भिजवा दो।" पप्पू ने जाने क्यों 'लाय
युद्ध' म अपनी रचना भेजने न कतरा रहा था। टाल जा रहा था। जब
दो-तीन पत्र आ गए तो मैंने भी आग्रह करना प्रारम्भ कर दिया । टहनजी
न भी।
1 इस पक्ति के विषय में मैं निश्चित नहीं है।
56 पप्पू आपिर पप्पू ने यह गीत भज ही दिया। दा तीन सप्ताह बाद गोठ छप भी गया 'लोक्युद्ध' ये अतिम पृष्ठ पर। पितु रमश सिहा न सम्पादकीय अधिकार का उपयोग कर इसम स सार 'वि' काट दिए थे। इन कि' अभाव म गोर पगु हो गया था । अर आया ता, हम सब धक रह गए । यह क्या दिया पामरट सिहा ने ? पपू ता साक्षात अग्निशर्मा बन गया था उस सुबह । उसकी बैठक म वठे हम सब दात रियविचा रह थे। उसी समय पधार कामरड विशन य ना। "वधाई हो, पप्पू भये पविता छप गई। मजा आ गिया । क्या साव अब तो तुम्हारा सारे देश में नाम हो गया। पप्पू क तो तन बदन म आग लगी हुई थी। वह चुप रहा । विशन ने मेरी ओर देखकर आखा आखा म पूछा- 'क्या बात है?" मैंने धीमे से उस बताया कि क्या घट गया है। और कोई होता तो बात सभालल जाता। पर बिशन सना भला क्यो चुप रहता ? फौरन बोल उठा, "तो इसम इतन अफसोस की क्या बात है। साब, मेरी राय म तो अब जे कबिता और भी वढिया हो गयी है। लपफाजी थोडेइ चले है बम्यूनिस्ट पार्टी के पपर म। रमश सिहा इत्तै बढे सम्पादक है। उहोन कुछ सोच समझकर ही जे तरमीम करी होगी, पप्पू भाई।" पप्पू बमक उठा, "विशन, जो बात समझ म न आए उस पर राय क्यो द रहा है ? यह साहित्य है, कविता है। पार्टी का मेनिफेस्टो नहीं है कि जो तबीयत जाए लिख दो।" वगरा-चगरा क्या कुछ नहीं कह दिया था पप्पू ने उस दिन । नतीजा यह हुआ कि पप्पू ने भविष्य मे 'लोक्युद्ध मे कभी कुछ ध्पवान की कसम खा ली और कामरेड रमश सिहा को भी अपने इस निश्चय की सूचना दे दी। मुये आज भी विश्वास है कि यदि उस दिन विशन ने यह सब न कहा हाता तो बात इस हद तक न जाती। कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति उसके मन म यह पहली दरार आयी थी। बाद मतो इस प्रेम का धागा अनेक बार चिटक कर टूटा, और जब जब टूटा, उसकी गाठा में इजाफा होता न गया।
पप्पू 57 दरअसल, पप्पू अपने लिखे की आलोचना सह पाने में शुरू से ही असमय था। उसकी व्यक्तिगत आदतो के बारे मे उसे कोई कुछ भी कह ले वह बुरा नहीं मानता था। परतु यदि किसी ने उसके लेखन को खराव या गलत कह दिया, तो वह कहने वाले की जान को आ जाता। उसकी नीयत पर शका करने लगता। यह कमज़ोगे उसमे शुरू से ही थी और आखीर तक रही। इससे उसे काफी नुकसान भी हुआ। पर रहा मत तक अपनी आदत से लाचार | अपनी रचनाओ का घटिया कहने का अधिकार वह केवल अपना मानता था, सिफ अपना । कम्यूनिस्ट पार्टी की सदस्यता उसन कभी नही स्वीकारी, यद्यपि मैं खुद गवाह है कि उसे कई बार आमत्रित किया गया था। मैं भी उस यही सलाह देता रहता था कि वह पार्टी का चाहे जितना काम करे, सदस्य कभी न बने । कारण, कि मैं उसके अहम् के विस्तार से बखूबी परिचित था। उसम रचे बस सामती और उच्च मध्यम वर्गीय सस्कार उसे पार्टी के कठोर अनुशासन मे रहने न देत और उसे बार बार झगडा करना पडता। कितु यह तो आगे की बात कर बैठा। सन 1942 के नवम्बर- दिसम्बर को सबम प्रमुख घटना थी सालिनग्राद में लाल फौज द्वारा बवर हिटलरो नाजी फौजा को दी गई मुह-तोड शिकस्त । उन दिनो सारे ससार की आखें वोल्गा तट पर अवस्थित इम नगर की ओर लगी हुई थी। स्तालिन का नाम दिया गया था इस नगर का, जिस पहिले सारिस्तिन कहा जाता था। क्दाचित् इसी कारण हिटलर की जीभ इस नगर को निगल जाने के लिए लपलपा रही थी। उसको दृष्टि मे स्तालिनग्राद का जीतने का मनोवैज्ञानिक अर्थ स्वय स्तालिन का जीत लेना था। पिछले डेढ वप मे नाजी फौजें जिस आसानी स सोवियत यूनियन म घसती चली जा रही थी उसस ससार के स्वतत्रता-प्रेमी, फासिस्ट विराधी गभार चिता और आशका म पड गये थे। अवश्य मॉस्को और लेनिन- ग्राद निवासी भी अपने-अपने नगर की रक्षा मे अदम्य साहम, वीरता, बलिदान और शौय को नित नई मिसाल कायम करते जा रहे थे। किन्तु स्तालिनग्राद तो और भी कई पदम आगे जा पहुचा या । पाच 58 पप्पू लाख नागरिका का यह नगर वाल्गा नदी के तट पर वमा था। यहा दोल्ला पश्चिम को ओर माड लेती है। इसीस प्राय चालीस किलोमीटर की दूरी पर एक और सुप्रसिद्ध रूसी नदी है-दोन । हि दी साहित्य प्रेमी इन दानो नदिया के नाम मे भली भाति परिचित हैं, राहुलजी की 'वोल्गा से गगा तथा रूसी उपयासकार मिखाइल शोलाखोव के अमर उप यास 'धीर बहे दोन रे' (एण्ड क्वायट फ्लोज द डोन') के कारण । सन 1919 20 मे स्तालिनग्राद न एक और भीषण युद्ध दखा येला था। नब इसे त्सारिस्तिन कहा जाता था। ससार के समस्त पूजीवादी साम्राज्यवादी देशो न मन 1917 को साम्यवादी प्राति के बाद सोवियत यूनियन की स्थापना के साथ माथ ही, मजदूर किसाना के इस प्रथम राज्य को मटियामेट कर देने का पहयत्र करना आरम्भ कर दिया था। फर स्वरूप 1919 मे प्रथम महायुद्ध की समाप्ति के तुरत वाद रूस म गृह युद्ध छिड गया था। साम्यवाद के विरुद्ध वाले गये जिहाद मे पूजीवादी दशो ने, अपनी परम्परा का निर्वाह करते हुए रूस के समस्त प्राति विरोधियों को प्रचुर धन और अस्त्र शस्त्र की सहायता देना प्रारम्भ कर दिया था। उस ममय इस मार्च की कमान सभालने लेनिन न स्वयम स्तालिन और वोरोशिलाव को भेजा था । वह सग्राम भी सोवियत यूनियन के अस्तित्व के लिए निर्णायक युद्ध सिद्ध हुआ था। दो दशक बीतते-न-बातते उसी नगर को एक बार फिर अपने अस्तित्व की लडाई म झोक दिया गया था। तो नवम्बर दिसम्बर 1942 मे स्तालिनग्राद म छिडे प्रचण्ड युद्ध म विगय किसकी होगी, इसकी प्रतीक्षा सारा ससार सास राके कर रहा था। ठीक उसा तरह जम कुछ वर्षों पूर्व अमरीकी फौजों द्वारा ढाये जा रहे विनाश व ताण्डव र सम्मुख वियतनाम के प्रतिरोध का क्या हश्र हाता है, इसकी व्यग्र प्रतीक्षा की थी हम मयन । मितम्बर 1942 म जनरल फान पाउलस की कमान म बाईस डिवी जनो न स्तालिनग्राद पर मर्वात्मक हमला बोला था। सोवियत सना यो मात्र मालह डिवीजन उनका मुकाबला कर रही थीं। कौरवो को अठारह मसाहिणा के मुकाबल म पाण्डवों की ग्यारह अक्षौहिणा व समान । पला करना भी कठिन है कि इस एक मगरम लगातार तीन महीनो पप्पू 59 तक रात दिन घनधार लडाई चलती रही थी। एक-एक मकान के एक- एक तल्ले पर तीन नीन चार चार दिन तक सिपाही परस्पर गुथे रहे थे। नवम्बर आते आते पामा पलटना शुरू हो गया। जनरल जुकोव ने प्रत्या क्रमण प्रारम्भ कर दिया। नाजी फौजें चारोबार स घिरती चली जा रही यी और घेरा तेजी स छोटा हाता चला जा रहा था। इस युद्ध का अ त हुआ था फरवरी 1943 म जब फान पाउलस को अपन तीन लाख से भी अधिक सिपाहियों को मौत के घाट उतरवा दने के के पश्चात बाकी बचे लाखो सिपाहियो के साथ विना शत आत्म समपण करना पड़ा था, ठीक जैसे जनरल नियाजी न बागला देश में जनरल जगजीत सिंह अरारा के सम्मुख किया था। स्तालिनग्राद के इस युद्ध की इतनी विशद चर्चा मैंने जान-बूझकर की है। उन दिनों हम युवका के मन मस्तिष्क पर इस सग्राम का कितना गहरा प्रभाव पडा था, इसका जीव त दस्तावज है पप्पू का 'अजेय खडहर'। पहले उसने इसका नाम दिया था स्तालिनग्रेद । याजना बनायी थी कि इसक प्रत्येक पद का अन्तिम शब्द स्तालिनग्रेद ही रखेगा। इसी झोक मे दस-बारह पद लिख भी डाले। किंतु फिर शीघ्र ही यह याजना बदत देनी पड़ी थी उसे। पास जो तेजी से समाप्त हात चल जा रह थे। और, मेरी समझ मे यह अच्छा ही हुना, अ यया बडी कृत्रिम हो जाती यह समूची पुस्तक-अग्रेजी सॉनेट सरीखी। 'घरौंद' की भाति, मैं 'अजेय खडहर' की रचना प्रक्रिया का भी प्रत्यक्षदर्शी रहा हूँ । उस समय जितन भी समाचार-पत्र-पत्रिकायें उपलब्ध हो सकती पों, उन सबका पप्पू सग्रह करता था, घण्टो अध्ययन करता था। कॉलेज-लायरी मे ईगलड से 'टाइम्स', 'इलस्ट्रेटेड लदन वीकली' आदि आ जाते थे। वह उहें भी चाट जाता। विशद नाम वनाता । जहा सम्भव होता, बटिंग रख लेता। इन अवधारो से भी अधिक मसाला उसे सावियत पुस्तकों तथा पत्र-पत्रिकाओ से मिल जाता था। हिटलरी हमले का एक अप्रत्यक्ष लाभ यह हुआ था कि भारतवप म अव सोवियत प्रकाशनो, पत्रिकाओ और पुस्तकों का अप्रेजी शासर अपक्षा- कृन आसानी में आ जाने दते थे। हमारे कॉमरेड पद्म कुमार जन तो पहले - 60 पप्पू से ही किताबो के कोडे थे। जहां भी, जो भी पुस्तक उहे महत्त्वपूर्ण लगी, घट खरीद लो । ढेर लगा दिया था भारत मे यध और अवैध ढग से उप लन्ध माक्सवादी कम्यूनिस्ट साहित्य का। उधर श्री कृष्णा स्यामो तथा राम ना शास्त्री अपनी 'सोशलिस्ट लिट रचर सीरीज़' म सस्त दाम को किंतु अत्यन महत्वपूण, साम्यवादी पुस्तको का प्रकाशन घडरले स कर रहे थे। इन दोनों की जोडी विचित्र थी। दाक्षिणात्य, पुराने प्रातिकारी, वर्षों स यू० पी० म आ बसे थे। आगरा में रह रहे थे उन दिनो। कभी पार्टी सदस्य नहीं बन । रितु युद्ध छिडने पर, गिरफ्तार कर देवली कैम्प मे नजरबंद कर दिये गये थे। साम्यवाद को प्रवुद्ध जनता तक पहुचाकर उसे लोकप्रिय बनाने में इन दोनो का योगदान अविस्मरणीय रहगा, इसमे कोई सदेह नहीं। पप्पू इन दोनो सूत्रो से लाभ उठा लेता था। पदम और शास्त्री स्वामी दोना प्राय उसके यहा जाते रहते थे और उसे इनसे उसके काम की पुस्तकें पत्र-पत्रिकायें उपलब्ध हा जाती। इस अध्ययन न साम्यवाद म उसकी आस्या और दढ कर दी। हिंदू दशन तो उसे तमिल ब्राह्मण पुरोहित परि- वार म ज म लेने के कारण पुट्टी में ही मिल गया था। अब वह इन दोनो का तुलनात्मक विवेचन कर पाने की स्थिति म तेजी से आता जा रहा था। पपू का मानस साम्यवाद को भारत की समस्याओ के समाधान का श्रेष्ठतम हल इसीलिए मानने लग गया था क्योकि उसे अपने देश के गरीबों सचमुच बेहद प्यार था। स्वयं अजेय खडहर' इसका साक्ष्य पद-पद पर दता है । इस खण्ड काव्य म तीन लम्बे खण्ड भारतीय दष्टिकोण से सा लिनग्राद युद्ध का महत्त्व दिग्दशित करने के विचार से उसमें जोडे थे । आज मेरे सामने वह पुस्तक नहीं है । तथापि मात्र स्मृति के सहारे उसकी कुछ पक्तिया मेरी इम स्थापना की पुष्टि म उदधत कर रहा हूं-- एक जारित्सिन लडा था एक स्तालिनप्रद दो से हिद हित युद्ध यह एक x x न
पप्पू 61
"एक नगा वृद्ध
जिसका नाम लेकर मुक्त
हाने को उठा मिल हिंद
कापते थे सिधु ओ साम्राज्य
सिर झुकाते थे सितमगर श्रस्त
आज वह है बद
देश मेरे हि दुस्तान
बबर आ रहा जापान
जागो जिन्दगी की शान"
x x
"उठी हैं शक्ति फासिस्टी
कुचलना है हम इनको
बनेंगे दास मृत्युजय
युका दो दप कातिल का
खडा हर मुल्क लडन को
कुचल दो आज पूजीवाद का
अतिम प्रयत्न विषाक्त यह
ओ गीत "
भारतीय जन मन की स्वतत्रता-कामी भावना द्वारा लडे जा रहे सग्राम
का एकमात्र प्रतीक पप्पू को सदैव महात्मा गाधी ही लगे थे, पूरनचद्र जोशी
नही। तथापि, साम्राज्यवादी शोषण, दासत्व तथा दारिद्रय के विरुद्ध लडे
जाने वाले सग्राम का तीक्ष्णतम हथियार उसे साम्यवाद ही माय था।
पहले ही चर्चा कर चुका हू उसके उस अमर गीत की-~-
"टेम्स हो या हो याग्सीक्याग
वोल्गा हा या गगा हो
सबकी एक लडाई है
दुनिया की आजादी की"
सच्चा देशभक्त कभी भी विश्व मानवता का विरोधी नही हो सकता।
अपने देश के पीडित, शोपित सवहारा वग से आन्तरिक प्यार हुए विना
में 60 पप्पू से ही किताबो के कीडे थे । जहा भी, जो भी पुस्तक उहे महत्त्वपूर्ण लगी, चट खरीद ली । ढेर लगा दिया था भारत मे बंध और अवैध ढग से उप- लब्ध माक्सवादी कम्यूनिस्ट साहित्य का । उघर श्री कृष्णा स्वामी तथा रामना शास्त्री अपनी 'सोशलिस्ट लिट रेचर सीरीज म सस्ते दाम को कितु अत्य न महत्त्वपूण, साम्यवादी पुस्तको का प्रकाशन धडल्ले स कर रहे थे। इन दोनो की जोडी विचित्र थी। दाक्षिणात्य, पुराने नातिकारी, वर्षों से यू० पी० म आ बसे थे। आगरा रह रहे थे उन दिनो। कभी पार्टी सदस्य नही बने । वितु युद्ध छिडने पर, गिरफ्तार कर देवली नटवर दिये गये थे। साम्यवाद को प्रबुद्ध जनता तक पहुचाकर उसे लोकप्रिय बनाने में इन दोनो का योगदान अविस्मरणीय रहेगा इसमे कोई स देह नहीं । पप्पू इन दोनो सूत्रो से लाभ उठा लेता था । पद्म और शास्त्री स्वामी दोनो प्राय उसके यहा जात रहते थे और उसे इनसे उसके काम की पुस्तके, पत्र पत्रिकायें उपलब्ध हो जाती। इस अध्ययन न साम्यवाद मे उसकी आस्या और दृढ कर दी। हिट दशन तो उसे तमिल ब्राह्मण पुरोहित परि- वार मे जन्म लेने क कारण घुटटी में ही मिल गया था। अब वह इन दोनो का तुलनात्मक विवचन कर पान की स्थिति म तेजी से आता जा रहा था। पपू का मानस साम्यवाद को भारत की समस्याओ के समाधान की थेष्ठतम हल इसीलिए मानने लग गया था क्योकि उसे अपने देश के गरीबों स सचमुच बेहद प्यार था। स्वय अजेय खडहर' इमका साक्ष्य पद-पद पर देता है । इस खण्ड काव्य मे तीन लम्बे खण्ड भारतीय दष्टिकोण सस्ता लिनग्राद युद्ध का महत्त्व दिग्दशित करने में विचार से उसमे जोडे थे । आज मरे सामने वह पुस्तक नहीं है । तथापि मात्र स्मृति के सहारे उमकी कुछ पक्तियां मेरी इम स्थापना की पुष्टि म उदधत कर रहा हू- "or जारिस्सिन लडा था एक स्तालिनग्रद कि हित युट दो यह . x पप्पू 61 "एक नगा वृद्ध जिसका नाम लेकर मुक्त होने को उठा मिल हिंद कापत थे सिधु औ साम्राज्य सिर झुकाते थे सितमगर त्रस्त आज वह है बद देश मेरे हिंदुस्तान बर्बर आ रहा जापान जागो जिन्दगी की शान" x x "उठी हैं शक्ति फासिस्टी कुचलना है हमे इनको बनेंगे दास मृत्युजय झुका दो दप कातिल का खडा हर मुला लडन को कुचल दो आज पूजीवाद का अतिम प्रयत्न विपाक्त यह ओ गीत" भारतीय जन मन की स्वतत्रता-कामी भावना द्वारा लडे जा रहे सग्राम का एकमात्र प्रतीक पप्पू को सदैव महात्मा गाधी ही लगे थे, पूरनचन्द्र जोशी नही। तथापि, साम्राज्यवादी शोषण, दासत्व तया दारिद्र्य के विरुद्ध लडे जाने वाले सग्राम का तीक्ष्णतम हथियार उसे साम्यवाद ही माय था। पहले ही चर्चा कर चुका हू उसके उस अमर गीत की- 'टेम्स हो या हो याग्सीक्याग वोल्गा हा या गगा हो सबकी एक लडाई है दुनिया की आजादी की" सच्चा देशभक्त कभी भी विश्व मानवता का विरोधी नही हो सकता। अपन देश के पीडित, शोयित सवहारा वग से आन्तरिस प्यार हुए बिना 60 पधू - - से ही विनायो वे कोडे थे । जहाँ भी, जो भी पुस्तक रहें महत्वपूर्ण लगी, घट सरोद सोहर लगा दिया था भारत मध और अवैध ढगस उप- सम्य माक्सवादी कम्यूनिस्ट साहित्य वा। उघर यो पृष्णा स्वामो तपा रामना शास्त्री अपनी 'सोशलिस्ट लिट- रेचर सीरीज म सस्त दाम की रितु अरपन महत्वपूण, साम्यवादी पुस्तो मा प्रान घटने ग पर रहे थे। इन दोनों की जोडी यिचिन यो। दाक्षिणात्य, पुराने पातिवारा, वर्षों स यू० पी० मा यस थे। आगराम रह रहे थे उन नि।पभी पार्टी समय नही afrयुट दिने पर, गिरनार पर देसी पम्प म मरवदमर दिये गये थे। साम्यवादको प्रयुगाना सापहवापर उस साप्रिय बनाने म इन दोनोमा पोगदा अविस्मरणीय रहगा इसम बाई मरेह हो। पपूइन दाना मूत्रागसाभ उठा सेता पापा और कास्त्री स्वामी दोमाय उस यहा जा रहा और जगनग उमरे गाम पो पुस्तमें, पर-पत्रिकायें उता हा जाती। इस रान गाम्या' म उगयो आया और शरणालिन ता उमरामिण प्राह्मग पुरराहिन परि- शार मालनपारा पट्टी म ही मिल पा था। अब यह दोनों पातुम बियपन पर पाापी स्थिति मतको ग आजारहा था। पyा मागमापारी भारत की समस्याओं में समाधान । ममम मानिए माया पाप मान देशर गरी मे गपाप पार पा र समरा पग पर mtri साप मन मार भारतीय चिया Frपुरामपाल पारग उगमे बाईप । मान at गारीमाRinार उगपुर मरी पारीदिए:- मा - sent x
पप्पू 63
रा आज तक किया गया है और न सोवियत यूनियन
। हमारे दश मे तो रागय राघव को स्व० मारत
नजाक मे दिया गया फतवा कि पप्पू कागज तोरावर
। रागेय राघव की 'स्टैड' आलोचना मान लिया
जाश्चय तव हाता है जब में प्रतिवप लक्ष्य करता
ती जैसी रचनाा पर बड़ी आसानी से सोवियत
की बदौलत अथ और यश की सहज ही प्राप्ति हा
दानीन सप्ताह सरकारी मेहमान बन सोवियत
आते हैं, उनकी तुलना में 'अजेय पडहर' किसी भी
“वपूण कृति है और न कम उत्कृष्ट माहित्यिक रचना
परिप्रेक्ष्य म एक और बात याद आ गयी। इस
। पार्टी सगठन का सुदृढ़ बनाने में विचार स आगरा
*। डॉ० सुवर मुहम्मद अगर पार्टी में अखिल
4 । गजब के वक्ता, इतिहास व अतर्राष्ट्रीय रुपाति
र बैठ गय उस स्थान के माहौल मा गुलबार पर
से उनम ।
। पप्पू न उहें
साहब
.
62 पप्पू 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का नारा लगाने वाला प्राय बेईमान हुआ करता है। पप्पू बेईमान कदापि नहीं था। पप्पू ने 'अजेय खडहर लिखना शुरु कर दिया और हस्वमामूल अपना रोज का लिखा रोज अपने मित्रो को सस्वर सुराने भी लगा। एक दिन बडी मजेदार घटना हुई । एष पद कुछ इस प्रकार था-- 'तीन मास हा नब्बे दिन तक हा, घटे इक्कीस सौ साठ।" ये दो पक्लिया इस पर म बार बार दुहराई जा रही थी और पद यत होता था- "रहे जमन खेन।" तभी सुदर सिंह चहक उठा, "अबे, ये तू कविता लिख रहा है कि एरिथमेटिक पढ़ा रहा है" और इसी के साथ छतफोड-दीवाल तोड मामूहिक अट्टहास । उधर पप्पू ? बेहद अप्रतिभ, बेहद झेपा हुआ, मानो दिगत व्यापी नभ की ऊचाइयो से कोई धम मे आ गिरे प्रशान महासागर के अतल तल मे । सुदर सिंह ने उसकी जो यह हालत देखी तो और भी जोश म आ गया। 'कमाल है साहब । तीन महीने, नब्बे दिन और इक्कोस सौ साठ घण्टो तक लडाई चलती रही और खेत रह सिफ जमन ? रूसी दस पाच भी नही मरे ?" अब जो ठहाको का दौर शुरू हुआ उसमे, उस सुबह, पप्पू का यह अमर काय बेचारा बहते ब्रहते बचा था । स्तालिनग्राद के युद्ध ने सावियत जमन युद्ध का पासा पलट दिया। हिट- लरकी याजना सोवियत यूनियन को दस सप्ताह मे नेस्तनाबूद कर अफगा- निस्तान होकर दिल्ली जीत लने के पश्चात चीन विजय करने की थी। इस दूसरे सिर दर का विश्व विजयी वीर बहलाये जाने का स्वप्न चूर चूर हो गया था वोल्गा तट पर बसे स्तालिनग्राद में ऐसी करारी शिक- स्त दी लाल फौज ने पि भव पीछे हटने की वारी आ गयी खबर नाजी पोजो की। लाल फौजी ने जो अब आगे बढना शुरू किया ता दो वर्ष बाद सोधे वलिन पहुंच कर ही दम लिया। दस महान सग्राम का अविस्मरणीय दस्तावेज है अजेय खडहर'। खेद केवल यही है कि इस कृति का सही मूल्याकन न तो हमारे हिटी क पप्पू 63 धुरधर आलोचका द्वारा आज नक किया गया है और न सोवियत यूनियन भारत-विदो द्वारा। हमारे दश मे तो रागेय राघव को स्व० भारत भूपण अग्रवाल द्वारा मजाक मे दिया गया फतवा कि पप्पू कागज तोतकर लिखता था, जाज भी रागेय राघव की 'स्टैडड' आलोचना मान लिया जाता है। किन्तु मुये आश्चय तव होता है जब में प्रतिवप लक्ष्य करता रहता हूँ कि आज जैसी जैसी रचनाओ पर बड़ी आसानी से 'सोवियत लैण्ड नहरू पुरस्कार' की बदौलत अब और यश को सहज ही प्राप्ति हा जाती है, उनके लेखक दो-तीन सप्ताह सरकारी मेहमान बन सोवियत यूनियन की यात्रा कर आत हैं, उनकी तुलना में 'अजेय खडहर' किसी भी अग में न तो कम महत्त्वपूण कृति है और न कम उत्कृष्ट माहित्यिक रचना - 'अजेय बडहर' के परिप्रेक्ष्य में एक और बात याद आ गयी। इस वप डॉक्टर अशरफ का पार्टी संगठन को सुदृढ बनाने के विचार से आगरा भिजवा दिया गया था। डॉ० वर मुहम्मद अशरफ पार्टी ये अखिल भारताय स्तर के नता थे। गजब बक्ता, इतिहास अतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान और जहा बैठाय उस स्थान के माहौल का गुलजार कर देन की अपूर्व क्षमता पो उनमे । एप गाम डॉक्टर साहब मेरे साथ पप्पू के घर गये। पप्पू न रहे "अजय बाहर' का एक सासा वडा अश सुनाया और उनकी राय मांगी। डाटर साहब ने कहा "पप्पू, एक शाम परो। करीव छ महीनों के लिए इसे भूल जाओ। महीने बाद जब तुम इन पुन पढ़ने बैठागे वो इसको कमजारिया और पुरतगी का फैमला तुम खुद ही कर सकाग, क्योरि तर सुम्हारी नजर एव तटस्य पाठक की नजर बन चुदेगी।' पपून ठीक यही विचा और जब छ सात महीनों के बाद उसने दुसरा पहना शुरू किया तो प्रथम प्रारूप मअनेक परिवतनपर दिये, अनेर पददुगरा लिये। पतइकोई पद नहीं हुआ पा पप्पूको ऐमारन म। यह सो डॉ० अगर को इस सलाह के लिए बहुत कृमता अनुभव करता रहा यहन दिना तर । बाद मे तो उसने अपने नयन बोकमहीने भर जाने पानिपम ही मना लियापा।
64 पप्पू कदाचित इसी सलाह का प्रभाव था कि एक दिन मैंने उसे अपने मैक्डा गीता को रद्दी की टोकरी मे डालते अपनी आखो म दखा था। उसकी यह हरक्त मुझे उस वक्त बहुत नागवार प्रतीत हुई थी। किन्तु पप्पू खुश था कि "कचरा छट गया।" चार पाच वप में उपकी रचना प्रक्रिया का चश्मदीद गवाह रहा हू। लिखना उसकी आवश्यक्ता थी-प्राथमिक आवश्यक्ता शोक नहीं । इस मामले में उसका मिजाज लडक्पन से आशिकाना था। लेखन उसके लिए बडी सहज साधारण त्रिया थी। दूसरे लेखको की अपेक्षा चौगुना लिया करता था। सुबह कविता, दोपहर को कहानी तो रात्रि म उप यास लिखकर वह अपनी थकान 1943 मे भी मिटा लिया करता था जब वह एम० ए०का विद्यार्थी मात्र था। लेकिन अपने लिखे के प्रति इतना सजग और किसी हद तक निमम आत्मालोचक मैंने अपने बहुत कम लेखक मित्रो को पाया है। काग़ज तोलकर लिखन वाले' रागेय राघव को मैंने कागज तोलकर अपने लिख को फाइते भी देखा है। यही एक बात और कह दू। अभी कुछ दिन पहले मैंने रागेय राघव पर लिखा गया एक शाध ग्रय पढा । उसमे विद्वान शोधकर्ता ने लिखा है कि रागेय राघव ने अतुका न कविताए इसलिए अधिक लिखी है क्याकि उहे तुक मिलाने में बडी कठिनता अनुभव होती थी। पता नही इस अनूठे तथ्य का पता उह कहा स मिला था । सकडो गीत फाडने की चर्चा मैंने अभी की है। उस जमाने में गीत केवल सतुकात होत थे, आज भी प्राय वही स्थिति है । वरन मैंन पप्पू का बहुधा कहते सुना था कि जब तक कोई कवि दा तीन सौ कवित्त, सर्वये न लिख ले, उसे नई कविता करने का अधिकार ही नहीं दिया जाना चाहिए । कागज तोल कर लिखन के सदन में याद आया कि मैं। पप्पू को 'स्ताखनोवाइट कहा करता था। सोवियत यूनियन म उन दिनो स्ताखनोव नामक एक मजदूर बहुत प्रसिद्ध हो गया था, क्योकि वह अपने निर्धारित उत्पादन के परिमाण की अपेक्षा, निर्धारित समय के अ दर हो, दुगुना तिगुना उत्पादन सम्पन कर लिया करता था। सोवियत यूनियन का वह .
पप्पू 65 हीरो बन गया था और उसी के नाम से सारे देश मे 'स्तावनोवाइट -आ दोलन' चल निकला था। काश, स्वतनता प्राप्ति के पश्चात् हमारे देश में भी कोई स्ताखनाव पैदा हो जाता तो देश का चेहरा ही बदल गया होता। इसी वप मैंने बी० ए० पास किया। एम० ए० में प्रवेश लेना था। जुलाई मे कॉलेज खुला तो पहल दिन पप्पू और लाखन सिंह के साथ यू ही भटकत हुए कॉलेज-लायब्रेरी मे जा घुसा। प्रवेश पर भरना बाकी था अभी क्योकि फोस का पूरा सा जुगाड नही हो पाया था। वैसे यह निश्चित ही था कि मैं हि दी मे एम० ए० करूगा। बचपन में ही हि दी साहित्य से मेरा प्रथम प्यार रहा था। कॉलेज लायग्नेरी म कुछ समय बिता हम बाहर निकल ही रहे थे कि प्रोफेमर तालुक्दार की निगाह हम पर पड गई। प्रोफमर जीवन वन्द्र तालुक्दार इतिहास के विभागाध्यक्ष थे। सुप्रसिद्ध संगीतकार श्रीमती दीपाली नाग इ ही की पुत्री हैं । तालुक्दार माहा बीसियो वर्षों स नागरा मे रहत चले आये थे । उनकी एक अपनी ही शान थी, रोब था और थी हिदी बालने की अपनी ही निराली अदा। यू० पी० के प्रवासी बगालियो से शायद वे अकेले थे जिन्होंने हिदी सोय कर नहीं दी और फिर भी विद्यार्थियों से बातें करते समय यथासभव हिदी का ही प्रयोग किया। मुझ पर असीम कृपा थी उनकी । प्राय कहते, 'मोनमोहोन बाबू, तुमि तो हमारा लेडका का माफिक। उस दिन तालुकदार साहब करीब आधे घण्टे तक मुझे समझाते रहे कि मुझे हिदी म नही, हिस्ट्री में एम० ए० करना चाहिए । भनेक आश्वासन दिए, भने तक रख । पप्पू जोर लाखन साप ही बैठे सुन रहे थे बाहर निक्ले तब तक मुझ से ज्यादा 'बेन वॉशिग' हो गया था पप्पू का। बाबू के रेस्तरा में बैठकर करीब एक डेढ़ घंटे तक वह भी मुझे समझाता रहा कि जब तालुकदार साहब इतने स्नेह से. इतना जोरदार, इतिहास मे एम० ए० करने का आग्रह कर रहे हैं तो मुझे उनकी बात मान ही लेनी चाहिए। नतीजा यह हुआ कि मेरे अदृष्ट भविष्य की धारा ही बदल गई। , 66 पप्पू आज तक, हिदी मे एम० ए० कर पी एच० डी० हान की साध बाकी ही रह गई है मेरी। अब तक 1942 का आ दालन क्रीव क्रीव समाप्त हो चुका था। काग्रेस तथा कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के नता या तो जेल म थे या भूमिगत हो चुके थे। एक विचित्र सौ जहता व्याप्त थी समूच देश मे। कम्यूनिस्ट पार्टी कानूनी करार द गयी थी। हम लोग हमारे साप्ताहिक मुख पत्र 'लोक युद्ध' के विभिन भापायी सस्करणा की विक्री करने नगर मे टोली बनाकर घूमते थे। हॉररा की तरह चिल्ला चिल्ला कर बेचा करत थे अपनी पत्रिकायें और नुक्कड-नुक्क्ड पर पय सभायें जुडा कर भाषण दिया करते नारे लगाया करते। पप्पू को यह काम कभी पसद नहीं आया। उसका आभिजात्य उसे हॉकरो की तरह सडक पर चीखन चिल्लाने की कभी इजाजत नहीं दे पाया । एकाध बार हिम्मत भी को तो वक्त से पहिले ही खिसक गया। नुक्कड मभाओ म भाषण दने का तो कभी प्रश्न ही नही उठता था। माव- जनिक मच से भाषण देने के स्याल स ही उसकी नानी मरती थी। इसी चक्कर म बाद मे भी, अनेक आमत्रण निमत्रणो के बावजूद, और अत्यात सुरीला कण्ठ होत हुए भी, वह कवि-सम्मेलना मे शरीक नहीं होता था। मात्र एक बार शिकोहाबाद गया था किसी कवि सम्मेलन मे कविता पढने । कि तु उसके बाद ही उसन जो तौबा की वह मेरी जानकारी मे तो कभी नहीं टूटी। तथापि, इस वर्ष के दौरान वह कम्यूनिस्ट पार्टी के बाफी निक्ट आ गया था। प्रगतिशील लेखक संघ की बैठको मे वह विला नागा शरीक होता था। इसी वप डाक्टर राम बिलास शर्मा आगरा आ गये, वलय त राजपूत कालेज म अग्रेजी विभागाध्यक्ष हार। यू०पी० के प्रगतिशील लेखक संघ के महामत्री का आगरावासी बनते देखकर हम सब सचमुच बहुत प्रसन हुए थे। अपनी अगली गोष्ठी म उ ह निमत्रित करने, मुझे सूब याद है पप्पू और में ही गये थे। डाक्टर साहब कम्यूनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य थे। उनके आ जाने से प्रो० प्रकाश चन्द्र गुप्त का अभाव पूरा हो जाएगा, यह विचार बडा पपू 67 सुखद लगा था। महाप्राण निराला और अमृतलालजी नागर के परम मित्र, 'अगिया वैताल' के नाम स करारी व्यग्य कविताओ के सीता) गम्भार मालोचक एव विद्वान के रूप में डॉक्टर साहब की ख्याति उनसे बहुत पहले ही आगरा आ पहुची थी। परतु दुर्भाग्यवश पहले दिन ही मक्खी छौंक गई । नागरी प्रचा- रिणी सभा के प्रागण म पेड़ के नीचे बुसिया बिछा कर वठप होने वाली थी। करीब बारह-पन्द्रह लाग आये थे। अधिकाश कम्यूनिस्ट के छात्र वायकर्ता विशन ख ना एक रूसी गुरिल्ला की कहानी का अनुवाद कर लाया था। वगाली भी था वहा। पद्म कुमार जैन का सबसे छोटा भाई। डॉ० बगाली कुमार जैन हिंदी और भारतीय संस्कृति का गौरव विगत पद-बीस वर्षों से पेरिस विश्वविद्यालय के सास्कृतिक विभाग से सम्बद्ध हो बढा रहा है। तब वह इटरमीडियेट का छात्र था। पढाई लिखाई मे तज पुस्तके चाटने गे पदम की प्रतिमूर्ति । तव तक लिखना शुरू नहीं दिया था। किंतु आगरा प्र० ले० स० मे प्रारम्भ से ही सभावित लखको कविया का अपनी गोष्ठियो म स्वागत किया था। इसी नीति के चलत बिना कुछ लिखे में भी प्रथम बैठक स ही वहा बुलाया जाता था। उस दिन डॉक्टर राम विलाम शर्मा कुछ देर स पहुचे । हम सब उनकी उत्सुक प्रतीक्षा कर रहे थे। व आये तो सबने पडे होकर उनका स्वागत किया। बैठक शुरू हो गयी। किंतु आज डॉक्टर साहब ने उसका ढाचा ही बदल दिया। अब तक इन गोष्ठियो का वातावरण बहुत मनोपचारिक खुला खुला सा रहता था। आज, कुछ देर बाद ही, हमे लगने लगा मानो हम क्लास रूम मे बैठे हैं। डॉक्टर साहब ने अपने निकट बैठे विशन खना को अपनी रचना पढने का आदेश दिया। बिशन पढ़ गया। "इस रचना के बारे में आपकी क्या राय है" विशन के पास बैठे व्यक्ति से उहोने पूछा और फिर, एक-एक कर, दायरे मे बठे हरेक मे यही प्रश्न दुहराया। अत में अपनी राप दे दी और फिर--'नक्स्ट' वाकई बहुत बोर किया था डॉक्टर साहब न उस दिन । पहला दिन पा, सो पप्पू सह गया। लेकिन यह गाडी ज्यादा खिंचता लगी नहीं । बुरा 68. पप्पू मुझे भी लगा था। मैं पार्टी आफिस गया तो मैंने अपनी भावनाओ का स्पष्ट प्रकट कर दिया । शायद पुछ अधिक ही मुखर हो गया था मेरा आक्रोश । कितु तब तक पार्टी मे 'क्रातिकारी भ्रातृत्व' की भावना खूब काम करती थी। अदन स अदना पार्टी सदस्य किसी भी भय सदस्य की आलोचना बडे छोटे के भेद भाव के बिना स्पष्ट व्यक्त कर दिया करता था और फिर जो भी सामूहिक निणय होता उसका ईमानदारी स पालन करता था। पप्पू तो पार्टी सरस्य था नही । वह क्यों लिहाज परता? उमन अपनी मण्डलीम और भी कडे शब्दो मे डाक्टर साहब के तोर तरीके को यखिया उधेडी। यदि उसी समय डाक्टर साहब और पप्पू परस्पर बातें कर लेते तो शायद क्टुता की नौबत ही न आती। परतु वह नहीं हुआ। हुआ यह कि कुछ ही दिना मे प्रगतिशील लेखक सघ मे आगरा के कुछ पार्टी वायकर्ता ही रह गये । गैर कम्यूनिस्ट लवको ने गोष्ठियों मे थाना धीरे धीरे कम कर दिया। फिर भी पप्पू बराबर जाता रहा। वह न नो गैर कम्यूनिस्ट था न कम्यूनिस्ट पार्टी का विरोधी। इसी वप महापण्डित राहुल सावृत्यायन आय थे। प्राय आगरा आते रहते थे राहुलजी। जब व आय समाज में काम करत घे तब, अनेक धो पहले, काफी समय के लिए आगरा में रह चुक थे। राहुलजी जब जब भात, हमारे लिए वह एक महत्त्वपूर्ण घटना होती थी। हम छात्र तो राहुलजी और यशपाल के लिखे को पढकर ही साम्यवादी विचारों के निकट आते थे। इस बार नागरी प्रचारिणी सभा म उनका भापण आयोजिन पिया गया था। इस भाषण मे अपने रूस प्रवास की चर्चा करते हुए उन्होंने वहाँ के जन-सामाय की दैनदिन दिनचर्या पर विशद प्रकाश डाला था। दूसरे दिन सायकाल पप्पू और मैं श्रीकृष्णा स्वामी एव राम ना शास्त्री के पर गये। राहुलजी वही रुके थे। क्स दरवाजे के पास गोकुलपुरा में। हॉ० पदम मिह गर्मा कमलेश' भी पास हो म रहते थे। राहुलजी जैसे महान व्यक्तित्व को निकट से देखने का यह मरा पहला अवगर था। बहा उत्साह अनुभव हा रहा था । उन्हीं दिना राहुलजी को समाज विज्ञान सवधी एवं पुस्तर प्रकाशित पप्पू 69 - हुई थी जिस समपित क्यिा या उनकी रूसी पत्नी को। फोटो के नीचे लिखा था, 'ममक पुत्रा वरटा तपस्विनी'। वह लेनिग्रान मे रहती थी। अनक महीनो स राहुलजी का उसका कोई समाचार नहीं मिला था। न नह पुत्र इगोर राहुलोविच का। लेनिनग्राद पर नाजी फौजें कब स धेरा डाल हुए थीं । नित्य बोसियो बार उनके बमवपक वायुयान संकड़ा हजारो टन के बम गिराकर लेनिन के इस नगर का धूलधूसरित करने की कुचेष्टा म लगे रहन थे। लनिनग्राद वासियो को राशन पानी मिलना प्राय समाप्त हो गया था। उत्तरी ध्रुव की सीमा रखा क निक्ट अवस्थित लेनिनग्राद को रूस के नेपोलियन विजयी भयकर शीत से बचने के लिए न बिजली मिल पा रही थी, न लकडी कोयला । फिर भी वहा का बच्चा बच्चा जूझे जा रहा था, धन-जन की प्रचुर हानि की परवाह किये बिना । राहुल पत्नी भी उही लाखों वीर नागरिको में एक यो । इतनी दुश्चि ताआ मे घिरे थे राहुलजी उन दिनो। तथापि उनकी मुस्कान न उस भयकर आपत्तिकात में भी उनका साथ नहीं छोड़ा था। मरी दष्टि म उनकी वह भुवन मोहिनी मुस्कान उनक व्यक्तित्व का सबस प्रमुख आक्पण था। क्या नहीं मिला था राहुलजी का-दीघ काया, सुपुष्ट देह, पाभ-स्कध, प्राय आजानुबाहु । फिर भी उनकी सहज, सरल, सतत मुस्कान इन सब पर भारी पड़ती थी। उस शाम प्राय एक घण्टे तक हम उनके साथ थे। राहुलजी की 'वाल्गा से गगा' के प्रकाशन के कुछ ही समय पश्चात प्रकाशित हुई थी डा० भगवत शरण उपाध्याय की 'सवेरा' । अनेक अशो म दानो की विषय- वस्तु एक सा ही थी। हस' म खासा विवाद चल निकला था कि कौन अधिक इतिहासनिष्ठ हैं- राहुलजी अथवा डॉ. भगवत शरण? इस सबध मे जब मैंने राहुलजी का मत जानना चाहा तो उ होने 'वोल्गा स गगा' मैंन अपन ऐतिहासिक ज्ञान के आधार पर लिखी है, और 'सवेरा' भगवत शरणजी ने अपने । अब यह ता पाठक ही तय करेगा कि कौन अधिक सही है । मैं भला क्या कह सकता उस दिन समझ म आया था कि महान व्यक्ति का सवप्रधान लक्षण केवल इतना ही कहा था, हा है"
70 पप्पू
उसका विनय हाता है । जिस हाल पर पल जितने ही अधिक लगे हात हैं,
वह उतनी ही मुकी होती है, धरती के पास होती है।
श्री कृष्णा स्वामी राहुलजी म पप्पू का परिचय तमिल भाषीप स्प
म करवाया था।वीच बीच म पपू और स्वामीजी तमिल में बात भा पर
लेत ये । अतएव राहुलजी ने पाम रखो एक तमिल पत्रिसरा पप्पू की मार
बढ़ावर उमम छपे एक लख का पद जाने की सिफारिश की। उस समय
तब मरा भी यही हाल था कि अम्मा और अते म धाराप्रवाह तमिल
बालन याले पप्पू को तमिल लिखना-पढना भी आता हा हागा । परतु
पपून उस दिन बहा लज्जित हात स्वीकार दिया था रि यह समिल पवन
योल ही साता है। और तब राहुलजी बिलबिलाार हस पहे पे । बाल,
'पy, तब तो तुझम अच्छा 'मद्रामी' मैं हूँ। मैं तो तमिल लिय बाल पर
लेता हूँ।
इमर याद भविष्य म राहुलजी व साथ और भी अनक अबसरा पर
भाने करन का सौभाग्य मुपे मिला । जव जव भी मिला प्रयन यार मरे
सम्मुय उना महमुखी, बहरगी शक्तिस्य का एपन्न-एए स्प उजागर
हुआ। पितो मरस मन प, मितने महाविद्या दानि पिनय, विनया
पाति पाता र मूतमान उगहरण ।
सन् 1944 पपू प निरा बनर पो म माशो महत्पूण रहा ।
पर उमन एम. ए. पाम मर लिया। प्रश उठा, भय भाग बारिता
जाय । उग गरामनगम हा अपाती मिल रही पी।हि।
विमागा. प्राहरिहराय टन, न मानिए बार मापदा
freeपर नौती र म मा पा नहीं पा और उमरा महगाग
अभी मोसरह था।माएव उमर टन माहब का बही गम
परमार टाम nि रियर पी-ग. स. पाहा fri
बाम उमा बड़े भाई मारन उगमयन यमाया है।
दुनियह मानारदा भी। भाई गाहा मायम मिह
मार, सभामर ५ मा, मोर गार
TET गझोर परागारागारमा
भासन-11 . और प.मी मामीमा माटा
पप्पू 71 था वहा । भाई साहब न आग्रह किया भी था कि वह लखनऊ रहकर ही रिसच कर ले। आगरा के रहने वालो के लिए वाजिद अलीशाह और आसफुद्दौला का नवाबी नगर, तपनऊ, उन दिना पेरिम की हैसियत रखता था। वहा लोहा मण्डी, राजा मण्डी, रावतपाड़ा नमक की मण्डी और कहा कैंसर वान, चौक-नख्वास और हजरतगज । काई तुलना ही नहीं थी । नाम के वास्ते यू०पी० की राजधानी इलाहाबाद भले ही हो, असल राजधानी तो लखनऊ ही थी, जहा गवनर रहा करता था और जहा प्रातीय धारा सभा की बैठकें हुआ करती थी। शिक्षा के क्षेत्र म भी लखनऊ विश्वविद्यालय की गिनती इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के बाद ही होती थी। आगरा यूनिवमिटी वेचारी तो उसके आगे यही टिक्ती ही नहीं थी। डॉ. निमल कुमार सिद्धात और प्रो० धूजटी प्रसाद मुखर्जी जैस जमर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान उसम सम्ब- धित थे उन दिनो। पप्पू जब आगरा मे चना तो मानार ही चला था कि अब वह दो वप राखनऊ म ही बितायेगा। पर पप्पू का मन वहा लगा ही नहीं। नागरा के रहन वालो को या भी और काई नगर पसद आता भी नहीं है । मजबूरी को बात अलहदा है । अतएव मुश्किल से दो महीने बीते होगे कि जहाज के पछी की भाति, भाई-भाभी को निराश पर पप्पू मिया वापस आ पहुचे अम्मा अतगा' अक्का के पास, अपने यारा के पास । एक कविता लिखी थी उसन इस लखनऊ प्रवास के दौरान, जिस पर वह स्वयं मुग्ध था। पहली परित थी- 'ऐ जवानी नाज कर जो मिल कभी पाया न प्यार' इस कविता म उसन 'गजिग' को निक्ली अभिसारिका-सी आधुनिकासा के सबध म जो लिखा था, वह कुछ इस प्रकार था--- "प जो कूल्हों को नचाती जा रही विफरी हुई 1 मौसी 72 पप्पू कल का डर दिल मे समाया हाय सी बिखरी हुई।" आज बयालीस वप पश्चात मात्र स्मृति के सहारे लिखी गयी इन पक्तिया मे एकाध श द इधर उधर हो गया हो तो क्षमा चाहूगा। आगरा लौटकर कई दिनो तक वह लखनऊ विश्वविद्यालय की छात्राओ के उ मुक्त उच्छ खल व्यवहार की चर्चा करता रहा था। उसका ऐसा करना दाभाविक भी था। हमारे आगरे मे तो तब तक औरतें चादर लपट कर ही सडक पर निकलती थी और कालेज की लडक्यिा बहुत हुआ, ता दो चोटियो को सामने झुला लिया करती थी। हमारे कालेज की ईसाई लडक्यिो तक, सडक पर न चहक सक्ती थी, न खिलखिला कर हस सक्ती थी, यद्यपि वे टाली बनाकर हास्टल स बाहर आती थी, प्राय शाम को घूमने फिरने। लखनऊ से लौटकर पप्पू ने वहा की लडकिया के बारे मे ठीक उसी प्रकार विस्तार से चर्चा करनी शुरू कर दी जैस कोई क्स्बे देहात का लडका शहर से लौटकर अपने साथिया से नगर क अजूबा की बातें करे। इस क्षेत्र म उसका दृष्टिकोण और उसकी मानसिक्ता ठेठ निम्न मध्यमवर्गिया वाली थी। हमन पप्पू को इतना रम लेकर लडकियो की चर्चा करत पहली बार ही सुना था । बडा अच्छा लगा था उसका जवान हो जाना । मैंन अम्मा स वार बार कहना शुरू कर दिया कि अब इसकी शादी कर ही दो । अम्मा तो अपने 'पापू' की बहू लान के लिए, ससार की हर अम्मा की तरह, आतुर ही बैठी थी । सिफ पप्पू के राजी हा जाने भर की देर थी। और पप्पू था कि राजी होने का नाम नहीं ले रहा था ! एक दिन मैं पप्पू के घर गया तो उस वठक मे किसी लडकी से बातें करत पाया। बैठक म सिफ व दो ही थे। मैं चौक द पार उसके कमर में जा बैठा । कुछ ही देर हुइ थी कि पपू चौक मेजा गया और धीमस बोला, "मनमोहन इधर आ।" मैं बाहर निकला तो उसने कान मे फुस- फुमाया, "तू कहता रहता है न कि ब्याह कर ल । तो दखल, साल, एक एमी ही डाइनासोर मरे भी पल्ले पड़ जायेगी। अभी पपू की शादी म पूरे पप्पू 73 बारह वप यानी थे। जुलाई म बॉलज घुला और तभी मरी विमाता या दहा त हो गया। गर्मों की छुट्टिया म मैं उन्हें उन मब, सालावाड (राजस्था7) म पहचा वर आया था तारि वे अनीमिया रोगस मुक्ति पा लें। चार दिा पहिले ही आगरा नापाया कि पिताजी ने तार द्वारा उनकी मृत्यु को सूचना दी। झालावाडये डाक्टर ने इजक्शन लगात समय सुइका ठाक से स्टरलाइज' नहीं दिया। टिटनम (धनुषटकार) हो गया और इस बारह घटे म ही उनका दहान्न हो गया। मेरो विमाता जिह में शायो पहता था, उस विमाता का प्रतिनाम था जिसका चित्रण युग युगा स साहित्य म हाता रहा है अथवा जिस पिल्मो म दर्शाया जाता है। ऐसी विमाता ता हर किसी को मिल । ममता और स्नह या मसोम महार। मुझे तो पभी यह महमूस ही नहीं हुआ कि वे मरा अपनी मा नहीं थी। पिताजी की आज्ञानुमार उनका याद कम मुझ परना पड़ा था। वापी म उत्पन्न मेरा छोटा भाई तब बहुत छोटा था। आगरा म सम्पन हाना पा दसवें, ग्यारहवें और बारहवें दिन वा श्राद्ध कम । सिर मुडवाये मैं यमुना पिनारे बैठा ब्राह्मण देवता के आदेशो पर यशापयीत का दायें-बायें बधा पर बल्लता रहा था तीन दिन तक। इसी बीच, शायद ग्यारहवें दिन, पप्पू के साथ दो-तीन मित्र यमुना तट पर आ पहुचे। हमारी मित्र मण्डली ने कॉलेज यूनियन के अध्यक्ष पद के लिए मेरा नाम प्रस्तावित करने का निणय लिया था। मरे दस्तखत ला आय प्रस्ताव पत्र पर । वितु मैन तो तब तक कॉलेज की फीस तक नहीं भरी थी। "चि ता मत करो। हम सब सभाल लेंगे। तुम्ह व वेसिंग नहीं करना पडगा।' मुझे पता नहीं कि फोस क्सिने भरी, कवेसिंग किसन किसने किया, क्स किया। निश्चय हो उस्ताद ताखन सिंह ने इसम बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की होगी, क्याकि मेरी विजय का आधार बडी मख्या म मिली । ईसाइ वाट थी। उस युग म कॉलेज यूनियन के चुनाव धम के आधार पर होत थे । हिदू छात्र अपन प्रतिनिधि चुनते थे, मुसलमान और ईसाई अपने- 74 पप्पू अपने। 50 प्रतिशत हिदू प्रतिनिधि और 25-25 प्रतिशत वाकी दानों। आज यह स्थिति विचित्र लग सकती है, वितु तव राज्य था अग्रता का जिनके साम्राज्य की नीव ही डाली गई थी फूट डाला और राज्य करावे सिद्धात पर। बहरहाल, दोस्तो ने मुझे कॉलज का सबसे बड़ा पद दिलवा दिया और मुझ कुछ भी नहीं करना पडा । पैसा एक खच नहीं हुआ और रिसा स मुझे वाट की भीख नही मागनी पडी । यह थी हमारी बाबू क रेस्तरा' की टोली -एक सबक लिए, सब एक के लिए। इस साल एक नया अडडा खुल गया हम लागो का--विशप फ्रेंच हास्टल म मर सहपाठी, जयराम भारद्वाज, का कमरा। जयराम बी०ए० स मर साथ पढ रहा था, पर दोस्ती हाल हाल म ही हुई थी। लम्बा तडगा, सबसे कटा क्टा। कंधे तक झूलत सुमित्रानदन पत स्टाइल के बाल । जावाज़ छोरिया सरीखी पतली। शिकाहाबाद के एक सास धनी वकील का बटा जयराम भारद्वाज जाज ता खुद ही आगरा का अच्छी खासी प्रक्टिस और आमदनी वाला वकील बन गया है । भारद्वाज स मित्रता का आधार था उसका साहित्य प्रेम । कविता लिखा करता था और एक-दो बार उसकी कविताए कॉलज की मगजीन म छपी भी थी। फिलासफी (दर्शन शास्त्र) मे एम० ए० कर रहा था वह । कालज प्रिसीपल, कनन सले का वह प्रिय छात्र था। सले साहब स्वय दशन विभाग के अध्यक्ष थे । मचमुच बडा ही विचित्र था जयराम भारद्वाज उन दिना। आज तो वह सभ्य नागरिक हो गया है। तब के भारद्वाज से एकदम विपरीत, जिसके कमर म पुस्तको क नाम पर रहती थी क्वल एक माटी डिक्शनरी और कापिया क नाम पर मात्र एक पाइल, जिस हाथ मयुलाता झुलाता वह कक्षा म प्रवेश करता और फिर जा बठता खिडकी स सटी सीट पर। अध्यापक क्या पढ़ा रहा है, इसस मानो उस कुछ लना-देना ही न हो। वह ता खिडकी सक्वल बाहर ही देखता बैठा रहता। बा०ए० की छमाही परीक्षा चल रही थी। अग्रेजी साहित्य की। नाटक का पेपर था। पता चला, साहबजादे ने अपना ही एक नाटक लिख मारा ।
पप्पू 75 था उत्तर के रूप में। शोषक के ऊपर एक छाटी सी प्राथना थी परीक्षक के नाम कि यदि उहे नाटक पसदन आये तो वे वेवल इतनी कृपा करें कि उस काट-पीट कर उसकी हुलिया न बिगाड दें, नम्बर भल व कुछ भी न दें। उस परीक्षा म उसे मिला तो जीरो ही, कि तु साथ ही प्रो० शर्मा की भरपूर आतरिक प्रशसा भी मिली भी उसे । इसी प्रकार इतिहास के हमारे विभागाध्यक्ष, तालुक्दार साहब ने हम इस्टन क्वश्चन पर एक निव ध लिखने को दिया तो हजरत न एक कविता लिख डाली थी जिसकी प्रथम पक्ति मुझ आज भी याद है "हिस्ट्री इज द फास ऑफ ह्य मन इग्नोरेंस" (इतिहास मानवीय अज्ञान का हास्यास्पद नाटक मात्र है) कॉलेज मे ऐसी विचित्र प्रतिभा का धनी कब तक हमारी मण्डलीस अलग रह सकता था ? वास कर जब कि चाय और सिगरट उसके एक मात्र पेय हा । कब और कम वह बावक रस्तरा' म जाने लगा, आज याद नहीं । इतना जरूर अच्छी तरह याद है कि हमारी समूची टोला बहुत शीघ्र ही उसके हास्टल के कमर म जा वठने लगी। कमरे मे थी एक खाट एक कुर्सी, एष मेज़, एक हुक्का और एक शत रज का सट । खाट सबने बठने में काम आती, हुश लगाने के काम और शतरज की वाजी जमान वाल भी एक दो निकल ही आत । एक प्राइमस स्टाव भी था वहा, जिस पर जब जी म माया हम चाय बना लिया परत घ । धम, अथ, काम, मोक्ष-चारा पदाथ हम सहज ही उपलब्ध हा गय थे जयराम के कमरे म । अब हमारे दिन बीतन लग यहा, और शामे बाबू के रेस्तरा पर। जयराम और पपू म अक्सर ठन जाया करती थी। दोना का रयाल था कि वे हिदी व विद्वान हैं । संस्कृत म भी नोनो को अपन अपने शाा पर यथष्ट आस्था थी। गडबड हो जाती थी जग्रजी में। उन दिनो हम सबम पप्पू की अग्रेजी अपक्षाकृत वमजार थी। या लोग भाज जती अग्रजो लिख बोलकर रौब जमा लते हैं उनकी अपक्षा पप्पू को अधिय अच्छी अग्रेजी पाती थी। पर जब वह यारों से टकरान लगता ती मार खाना पट जाती थी उस । जयराम या पलहा निश्चित परा 76 पप्पू क्षेत्र म भारी पड़ जाता था। और इसी बात को लेकर एक-दूसरे को टाग खिचाई चलती रहती थी। पहले भी वह चुका हूँ और फिर दुहरा रहा है, कि पप्पू का अहम बहुत जाग्रत था अत्य त सवेदाशील था। टाली के दूसर मित्र भी अपने अपने क्षेत्र में महान थे। कोई स्वय को किसी दूसरे से रत्ती भर कम मानन को तैयार नहीं था। यही एक भ्रमपूण धारणा का निराकरण कर देना चाहगा। रागेम राघव का रचना समार' नामक एक बेहद सु दर तथा उपादेय पुस्तक में पहल पहल पदा और बाद मे ऊपर जिस शोध पथ की चर्चा की है उसम भी पुन देखा कि बाबू के रेस्तरा और राजामण्डी के होटला के विला का भुगतान पप्पू की जेब स ही होता रहता था। यह पनई गलत बान है। हमारी मित्र-मण्डली म परोपजीवी की गुजायश ही नहीं थी। और, न पप्पू इतने रईस खानदान का बेटा ही था कि आठ दस मित्रा के चाय सिंगरट, नाश्ते पानी का विल वर्षा तक अपनी जेब स भरता रहे। सचाई तो यह है कि हम सवम 'पैस वाला' अगर कोई था तो वह जयराम भारद्वाज था। सन 1943 44 मे उसके पिता उसको हर महीने सौ रूपये भेगत थे। कॉनन अध्यापन का यदि प्रारम्भ मे सौ रुपये की नौकरी मिल ज ती थी तो वह सौभाग्यशाली गिना जाता था । पद्रह-बीस रुपये मासिक हाथग्वव मिल जाय तो दडे ठाठ स चाय सिगरेट पीत सिनेमा देखते, महीना बिताया जा सकता था। हास्टल मे महीन भर का खाने का खर्च आर दम रुपए माया करता था । इममे प्रत्येक रविवार तथा त्योहार के दिन खीर पूडा तथा अ य परवाना का खच भी शामिल होता था। अतएव पप्पू को अपनी जब से सबका बिल चुकाने की कोई जरूरत कभी नहीं पडती थी।हा, उसकी बैठक में रखो के विभिन दराजो म वह वीडी के बण्डल और पासिंग शो, डोलक्स टार, कवेंडर आदि विभिन्न विस्म की सिगरेटा के पैकेट रखता था। सुदर सिंह मागे तो उस घोडी थमाता, वसल को पासिंग शो जयराम का कवे डर और मुझे डीलक्स। कहा, "टू इच अकोडिंग टू हिज नोडस।" 1944 म हमारी मण्डी म एष और इजाफा हुना । सुरज नारायण पप्पू 77 मुशी का । मुझसे भी ज्यादा नाटा और दुबला। एम० एन० राय की रडि कल डमोनटिक पार्टी का आगरा सगठक । कानपुर लखनऊ वे आस पास का। जवान में पूर्वी लहजा इतना स्पष्ट था कि हम सब मजा म, उस आत ही बाल उठने, "लो भई आ गया कान ही पूर वाला।" एम० एन० रॉय उन दिशा बदनाम हो गये थे। भारत सरकार सेण्ट्रन एसम्बली मे स्वीकार करने को बाध्य हो गई थी कि 'वार-एफट स' म सहायता देने की शत पर उनकी पार्टी को वह तरह हजार रुपय प्रति मान मा अनुदान दे रही है । आज यह रकम वडी सामा य जान पडेगी। पर तु उस ज़माने म अच्छी सासी मानी जाती थी। पह पहला अवसर था जब किसी भारतीय राजनैतिक दल न सरकारी आर्थिक सहायता स्वीकार की थी। बदनामी को होनी ही थी। या रम्यू निस्ट पार्टी भी द्वितीय महायुद्ध को लोक युद्ध धापित कर चुकी थी। कि तु इस खातिर अग्रेज शामको से धन ले जथवा अन्य किसी प्रकार की सहा- यता स्वीकार कर, यह उसके लिए असभव था । या कम्यूनिस्ट विराधी ता आज तक कम्युनिस्ट विरोधी पार्टी को 'बयालीस आदोलन' या विरोध करने के अपराध म गद्दारा की पार्टी कह बठते हैं। उन दिनो रायिस्टों और कम्यूनिस्टा मे गहरा पारस्परिक विरोध था 'एक दूसर का दस नही सकते थे। फिर भी जा मुशी हमारी टोली का अतरग सदस्य बन गया, उसका कारण था उसकी बौद्धिक सचेतनता, 'मजाक पसदी और आलोचना पर बौखला न उठने की अद्भुत क्षमता। हम उसके राजनैतिक मतवाद से परिचित थे और वह हमारे । अतएव, हम यथासभव उसस राजनतिक बहस मे नही उलयत थ । पितु यदि कभी मुशी अपनी रॉयवादी बातें करने ही लग जाता तो क्या पप्पू और क्या दूसरे मित्र, फौरन उमे चुप हो जाने पर बाध्य कर देत ये। मेर अतिरिक्त और काई मित्र कम्यूनिस्ट नहीं था, कि तु कम्यूनिस्ट 'पार्टी विरोधा भी उनमे एक भी नही था। इतनी राजनैतिक समझ और सूझबूझ उनम थी कि 'सरकारी' और 'गैर सरकारी' कम्यूनिस्टो म फक कर सकें। मुशी के माय दोस्ती के प्रश्न पर मुझसे भी पार्टी में जवाब तलब किया - 78 पप्प गया था। कुछ साथियो ने आक्षेप भी लगाय थे। मैंने, अपनी निगाह मे, कोई गुनाह नही किया था। मनुष्य अच्छा हो तो उससे दोस्ती क्यो न की जाय? हा, राजनीति के क्षेत्र मे कतई कोई समझौता नहीं होना चाहिए, यह मैं तब भी मानता था आज भी मानता है । लेकिन मुझसे भिन्न राज नैतिक मत म विश्वास करने वालो को मैंने अछूत कभी नही समझा । छूत- छात कमजोरी की निशानी होती है। ब्राह्मणा को डर लगा तो फतवा दे दिया, 'न गच्छेत् जैन मदिरम"। मैंने पप्पू की गवाही दिलवा कर यह मिद्ध कर दिया कि हमने मुशी की राजनीति का सदैव तीव्र विरोध किया है । यो, पार्टी के कट्टर विरोधी मेरे बड़े मामाजी भी थे जि होने मुझे पाला पोसा था । तो क्या मैं उनसे भी मम्बध विच्छेद कर लेता? डाक्टर अशरफ ने मेरे इस तक का समर्थन किया और इस प्रक र मुशी क माथ हमारी दोस्ती पर कोई आच नही आयी। इसी वप श्री पद्मसिंह शर्मा कमलेश' भी हमारे बहुत निकट आ गये । कमलेशजी कमाल के आदमी थे। बड़ी गरीबो मे पल कर बडे हुए आगरा के दनिक पनों सैनिक' और जागरा पच' हार रहकर बचपन से कमाई करा की मजबूरी मे जूझत हुए वे 'विशारद' और 'साहित्य रत्न' की परीक्षाआ म ससम्मान उत्तीण हुए। कविता तो अनेक वप पहले से ही क्यिा करते थे। कण्ठ भी मधुर था। नागरी प्रचारिणी सभा मे हिदी साहित्य सम्मलन की परीक्षाआ के विद्यार्थियो के जन प्रिय शिक्षक थ और थे साहित्य रल भण्डार क स्वामी महे द्रजी के दाहिने हाथ । उन दिना वे मैट्रिक की क्वल अग्रेजी को परीक्षा देने की तैयारी कर रहे थे । अंग्रेजी उहान कभी पढ़ी नहीं थी, अब सीख रहे थे। वा के रेस्तरा मे आने लगे तो यारो ने उहें भी नही वरशा । "अच्छा, कमलेश, बताओ तो, मैं जाता तो हू की अग्रेजी क्या होगी?' और कमलेशजी बड़ी निरीहता स उत्तर देत "आइ डू गो।' इसी बीच कोई पूछ बठना, 'द ब्लंक कैट संट आन द रैड मैट की हिदी बोलो।" व मतेशजी उसका भी उत्तर उतनी ही सादगी से देने लग जाते। वास्तव में कमलेशजी जसा भला और सरल व्यक्तित्व मैंने नहीं देखा।
पप्पू 79 अपने ही अध्यवमाय और लगन के बूते पर कमलेशजी ने हि दी मे एम०९० किया पी एच०डी० की उपाधि ली, आगरा कॉलेज के हिती विभाग प्रवक्ता बने और वन कुरुक्षन विश्वविद्यालय मे हि दी के प्राचाय । 'आगरा पच' का गली गली बेचने वाला बालक, और क्तिनी सीढिया ऊपर उठना? तारीफ यह थी कि इन समस्त उपलब्धियो के बावजूद उ हाने अपनी जमीन नहीं छोडी। साक्षात्कार विधा के माध्यम म कमल शजी न हिंदी साहित्य को अनेक महत्त्वपूण एव स्मरणीय कृतिया प्रदान की। उन सरीखे यक्ति को अपना घनिष्ठ मित्र कह पाने वा हमारी टोली के मभी सदस्यो को आजीवन गव रहेगा। सन 1944 मे ही बछगाव मे यू० पी० किसान सम्मेलन हुआ। बछ- गाव फोरोजाबाद स दस बारह मील दूर एक गाव है। किसान सम्मेलन की अध्यक्षता करने वाले थे राहुलजी । पप्पू, व्रजराज सिंह मैं और मर कालेज का एक वी० एस सी० का छात्र, मिश्रा, हम चारा न सम्मेलन म जाने का निश्चय किया। मिश्रा की परीक्षाए होने वाली थीं। अतएव उमने हमस वायदा ले लिया कि हम दूसरे दिन लोट आयेंगे। काराजाबाद पहुच कर पता चला कि बछगाव जाने के लिए वैल- गाहिया पर वठ कर जाना पडेगा। इसक पहिले हमन बलगाडी का मफर कभी क्यिा नहीं था। बडे उत्साह सजा चढे । अब जो दो मील भी मुश्किल सचले होग तो हमारा जी इम सवारी से एकदम ऊब गया । कितनी धीमी, कितनी उबाऊ । शरीर के अजर-पजर ढील होने लग गये । मारा गाली बैलगाडी को। चलो, पैदल ही निकल चलते हैं " हम सवने एक स्वर से निश्चय कर लिया। भोपहर बीत चुकी थी, शाम के तीन साढे तीन से सम्मेलन शुरू हो जाएगा। तज-तेज चलने लग हम चारो । सात आठ मील की दूरी हाती ही कितनी है । "अभी पहुच जाते हैं' हम एक दूसरे को हिम्मत बधात जा रहे थे। शाम के साय लम्बे होने लगे तो जरा चिता बढ़ी। हर दस-पद्रह मिनिट बाद सडक पर चल रहे लोगो स पूछना शुरू किया, 'चो भैया, जे वडगाव रित्ती दूर है ?' हरेक का एक ही उत्तर था "बस अब ता पास हो त । जेई कोई एक कोसा" परन्तु क्तिना लम्बा होता है गाव वालो 4 80 पप्पू - या एक कोस । थकान और भूख प्याग परेशान कर रही थी। वह 'एक कोस' हमारे लिए उम दिन मग मरीचिका सिद्ध हो रहा था। बछाव पहुचे तो साढे पाच बज चुके थे। सम्मेलन का उदघाटन, नेताको भाषण, यहा तक कि राहुलजी का भापण भी समाप्त हो चुका था। डा० अशरफ ने मजाक बनाना शुरू क्यिा-'यह आप लोग क्या नौ दिन चल कर भाए हैं इस अढ़ाई कोस की दूरी का? और शुक्र है कि आता पहुचे । कास में शिरकत नहीं कर पाए, कोई हज नहीं । कल्चरल सशन शुरू होगा । पप्पू तुम भी सुनाओगे न, गीत पविता?" पप्पू ने तो साफ मना कर दिया था । मच से कविता सुनान स वेद घबराता था वह । लेकिन उस दिन विचार के निरक्षर जन कवि रामकर ने जब खुल गले से गाना शुरू किया- बिटेसिया सुन रे मुन र सुखी रही चाहे रज रहो, तुम अपने घरै हम अपने घरे' तो हजारा ला के साथ हम भी आनद के मानवें आसमान पर जा पहुंचे थे। गजब ये धेय दो जन-ववि। एक का नाम था धमपाल । हजारा हजार लोगो को अपनी वग चेतना सिक्त कविताओ स मत्र मुग्ध कर लेना उनके बायें हाथ का खेल था। लिखना पढना जानत नहीं थ, मो अपनी बनायी एक-एक पक्ति को बीस तीस बार रटना पडता था उनको। गजब की थी उनकी स्मति और मजय का था उनका काव्य पाट। और इन दोनो स बढ़ पर गजब की थी उनको राजनैतिक सूझ-समझ। बडे बडे सिद्धाता को पानी की तरह साफ मुघरी भोजपुरी मे कविता म परिणत पर देते थे वे दोनों। बछगाव सम्मेलन म ही नागार्जुनजी से हमारा परिचय हुआ था। तब बौद्ध भिक्षुत्व मे छुटकारा पावर नागार्जुन पुन गहस्थ बने थे। बिहार विमान ममा का नतत्व उन दिना स्वामी महानद और राहुल जी के हायो मया। सहजान दी तो तब भी सयाप्ती थे। राहतजी बौद्ध एम त्याग कर कुछ वप पूर्व कम्यूनिस्ट हुए थे। अव नागाजुनजी भी आ पप्पू 81 जुटे। बिहार किसान सभा को हम लोग मजाक मे 'साधुओ की जमात' कहा करते थे। नागार्जुन को देखकर आज भी अदाज लग जाता है कि इन साधुआ की इमारत कितनी बुल द रही होगी। रात के ग्यारह बजे खा पीकर निबट ही थे कि मिया मचल गया- "आपने वायदा किया था कि मुझे क्ल मुबह आगरा वापस पहुचा देंगे। चलिए अभी, इसी वक्त । कम्यूनिस्ट जपने वायदे से कभी नही मुकरत । चलिये, अभी, इसी वक्त।" पप्पू ब्रजराज सिंह मैं सभी समझा समया कर हार गए, वह टस से मम नहीं हुआ। डॉ० अशरफ, टडनजी मभी न जोर लगा लिया। पर शाबास मिश्रा, तुलसी के चातक की तरह एक ही रट रही उमकी-चलिए अभी, इसी वक्त । पप्पू उसकी जिद से इस क्दर तग आ गया कि ताव म आकर बोल उठा---- 'चल साले, द भी क्या याद रखेगा कि क्सिी र स स पाला पड़ा है ।"और हम चारो ने, रात के बारह बजे था- फिर से शुरू कर दिया लैपट- राइट लफट । इस बार अलीगढ के एक शायर और आ जुटे थे हमारे साथ दूल्हे मिया। शेर ओ शायरी के इनन कद्रदा इकटठे शायद नहीं मिले थे उहे इमस पले । जो कुछ याद था यार जा रहे थे दूल्हे मिया। वक्त अच्छा ही कट रहा था। मुश्विले सिफ दो थो-हम बेहद थर चुके थे, और कि जब भी कोई गाव आ जाता था, वहा क कुत्ते एक साथ मिलकर भौंकने लगत थे। बडा वफादार होता है कुत्ता, लेकिन वफादारी निभाने के जुनून में राह चलतो और चोरो मे जब फर नहीं करता तो बडी कोफ्न होने लगती है । आखिरकार हम फोरोज़ाबाद पहुच ही गए और किम्मत वाले थे लिहाजा स्टेशन पर मुश्किल से पाच सात मिनट प्रतीक्षा करनी पडी होगी, गाडी आ गई । अलस्सुबह थी, माच की बयार थी और थे गाडी के हिच- कोले । नीद ने धर दबोचा हम सबको। वन मिना जागता रहा था। उसी की वजह से हम राजा की मण्डी स्टेशन पर उतर सके वरना सोले- सात न जाने कहा जा पहुचत । सन 1944 की सबम अधिक अविस्मरणीय घटना थी वह विपत्ति जा अग्रेजी शासका ने जान-बूझ कर हमारे राष्ट्र पर लादी पीचगाल का - -
82 पप्पू
अकाल । आज भी याद करके रोगटे खडे हो जाते हैं। कितना भयानक
समय था जब सुजला, सुफला शस्य श्यामला बगाल के लाखा लोग दा मुट्ठी
अनाज की तलाश म अपने-अपने गावा से निकल कर भाग रहे थे शहरा की
ओर और सड़को पर ही दम तोड़ रहे थे। लाशो के अम्बार लग गए थे।
भूख और केवल भूख का अखण्ड साम्राज्य स्थापित कर दिया था सूमचे
वगाल पर । इस बुमित पडया मे शामिल थे अग्रेज और उनके क्रीतदास,
वगाल के कुछ पूजीपति जिनका सरगना था इस्फहानी।
हमारे देश की एक विशेषता रही है-मुसीबत आ पड़ने पर हम सब
एक हो जात है । दूमर मटा मे, कहा जा सकता है कि मुमीवत जब तक
नहीं आ पडती, हम आपम मे लडते-झगडत ही रहते हैं।
वगाल के इस अभूतपूर्व दुर्भिक्ष का सामना भी हमारे देश न अभूतपूर्व
एकता स किया। अविभक्त भारत के कोने कोने तक अकाल की विभी-
पिका को पहुचाने के लिए विनय रॉय का दत निक्ल पडा था। बिनय दा
और उनक माथियो द्वारा गाये गए गीता को सुनना एक रोमाचकारो अनु-
भव होता था। उनकी टोली आगरा भी आई।
आगरा कॉलेज क तनालीन मैस्टन हाल (वतमान गगाधर शास्त्री
सभागार) म जब उ होने गाना शुरू किया-
सुनो हिद के रहने वालो सुनो सुनो।
आजादी का झण्डा जिसने मचा रखा है
दुश्मन के मुकाबिल जिसन मैदान लिया है
आज हिंद के रहने वाले, वगला ये इसान
भूख से लडकर कर रहे हैं जि दगी कुर्बान ।
तो ममूचा हाल सास रोक कर जा षठा वह तब तक बैठा रहा था जब तक
इस अमर गीत का अतिम पद नही आ गया था, जिसम बिनय दा और
उन 'कल्चरल स्क्वाड के साथी गा रहे थे-
माओ हिंदू-मुस्लिम आओ
अपना जा कुछ है सग लामो
हाथ मिलाआ आज बगला स
चालीस करोड अब कदम उठाओ, सुनो सुना।
पप्प 83 आगरा हिलाकर रख दिया था विनय दा और उनके साथियो ने। हॉल से निक्ल कर हम लोग चले गए पप्पू के माथ, उमके घर । रात साढ़े ग्यारह बजे तक बैठे विचार विमश के बाद तय हुना कि शीघ्र ही कुछ ऐसा करना है जो अभी तक आगरा में न हुआ हो। उस वप में आगरा विद्यार्थी संघ का भी अध्यक्ष था। सघ की वाय- कारिणी समिति ने एक सांस्टतिव' आयोजन की रूपरखा बनाई जिसमे एक एकाकी नाटक खेलने का निश्चय किया गया था। नाटक लिखा पप्पू ने और नाटक के रिहसल भी उसी की बैठक म होने लगे। एक सप्ताह मे नाटक तैयार हो गया। मुख्य अभिनता था मैडिकल कालेज का एक छान जो हमारे विद्यार्थी संघ का उप सभापति भी था। उसकी अभिनय क्षमता पर हमे बडी आस्था हो चली थी वयादि मान तीन- चार दिन के रिहसलो मे ही उसन अपने मवाद मुखस्थ कर लिये थे बाग मुजफ्फर खा स्थित मुरारीलाल खत्री गल्स स्कूल के हॉल में उम शाम तिल धरने की जगह बाकी नहीं थी। आगरा के क्लक्टर, कमिश्नर और प्राय सभी गण्य माय लोग वहा उपस्थित थे। हमारे प्राग्राम क ढेरो टिक्टि बिक चुके थे । हम गदगद थे। मच पर किशन भाई की छाटी-छोटी बच्चियो क प्यार प्यारे नाचो ने बडी प्रशमा पाई । अब बारी आई छात्र-युवको को । एक मडिकल कालेज का लड़का गाने आया तो नही जमा। दूसरे कॉलेजो के छात्रो ने उस हूट कर दिया । मैडिकल कालज के छात्रो ने इस अपना अपमा मान लिया ओर सामूहिक रूप स हाल स निकल गए। उनका यह वाक आउट हमारे लिए बहुत बड़ी मुसीबत साबित हा गया। हमारे नाटक का हीरो भी मैडिकल कालेज का छात्र था । उस भी व लोग अपने साथ ही समेट ले गए । अब हम क्या करें? बडो विकट समस्या उत्पन हो गई। समस्या से मुक्ति दिलाई थी पुत्तूलाल दुबे ने। आज तो पुत्तूलाल ग्वालियर के बहुत नामी यकील बन गए हैं। उन दिनो वे पप्पू के घर में ही उसके परिवार का अग बनकर रहते थे। हमारे रिहसलो में वे चुप- चाप श्रोता बन बठ रहते थे । यो भी पुत्तूलाल बोलने में कम ही विश्वास परत थे। उहे जब जो करना होता, बस, कर गुजरते थे। सारा सेट 84 पप्पू जॉ म कलिज उनकी इस मूक कायक्षमता को अच्छी तरह जानता था। वनिज मे काफी नाम था उना। ता जब हम 'अब क्या होगा' का काई समाधान निकालन म प्राय असमय हाकर फैसला करने ही वाल थे कि नाटक कैमिन तभी बिलकुल हिदी फिल्मा के हीरो वाली मुद्रा म पुत्तूलाल प्रक्ट भये । बोले 'नाटक हागा ज़रूर होगा। रिहगल मुनत मुनते मुय समाद याद हो गये हैं । कुछ तुम लोग पीछे स प्रॉम्प्ट कर दना । काम चल जायगा।" काम चला ही नहीं, यूब चला था। इस नाटक म जतनलाल ठाकोर, ने भूपे वगाली का पाट दिया था। जतनलाल मूरत शरल म तव भी भूसे बगाली लगत थे, आज भी लगते हैं । पप्पू न नाटकमा अत करवाया था उनके एक लम्बे हायलॉग म जिसे बालत बोलत ये मच म नी । उतर आत हैं अपनी झाती फैलाय लोगो म बंगाल के अकाल पीडिता की महायताथ मुक्त हस्त सदा देने की अपील परत हुए। जतनलाल पा अभिनय इतना सजीव हुआ था, उसके गम्याद इतन घटीले थे कि उनकी शोली म ता रुपया और गहनों पी वर्षा हुई हो, विग स निरलपर विद्यार्थी राध में पायरश्रिा की मालियां भी भर गयी थी। अनेक महिलाआ न हापों स पहिया उतार दी यो अपनी गीत्री आंगो ये मम्मान म । पह सस्थतिय आयोजन हमारी बहुत बड़ी उपलब्धि पो, जिमरा सारा श्रेय पप्पू के लिग नाटक का जाना है। आपने दम एकांती या उमने अपन विषाद मठ म ज्या या त्यों समाहित कर लिया है। इम मसता म प्रेरणा प्राप्त पर आगरा विद्यापी मन और ऐसा निश्चम रिया जो विद्यार्थी सर की क्मिी भीमापान अभी तक नहीं लिया पा-यगाल १ अगलगोटिलों को राहत पहचान लिएर मपिन जरया मनने का। हम वरीप्रमनताई जय मरिपस तिज में मापियों ने अपने सामान की बात भूमार इस ये मामिम हान का निपय पिया। मैजिम्परा नेनार र मागमा यम प्रमिट. म्ही.जी.र. परेर मुर, मलापस्ती, मही राहत मोर कम्पनि । गन् माग की माप रहे पे ! गरी, - MA पप्पू बलौस बात कहत हैं और कदाचित इसीलिए आज भी सब बदा-भाजन हैं। इस जत्य के साथ रिसाटर के रूप मे पप्पू को भी भेजा गया। इस निणय ने हिन्दी साहित्य का दिया तूफानो के बीच'। तब तक हिंदी में रिपार्ताज प्राय नहीं लिखे गए थे। पप्पू को बगाल के दुर्भिक्ष ने कितने निकट म प्रभावित किया था, इमका जीवत दस्तावेज़ है 'तूफाना के बीच' जिसका शड' शब उस आग से भरपूर है जो उस युग के किसी भी सच्चे देशभक्त व इन्य म साम्राज्यवादी सरकार के इस इच्छा कृत कुकृत्य ने सुलगा दी थी। काश, तूफानो के बीच का हमारे विद्वान आलाचका तथा विद्वानाने अधिक गभीरता म लिया हाता । पप्पू जब वगाल स लोटा था ता अपने साथ कुछ चार चार पक्तियो की वही प्यारी प्यारी कवितायें लिखार लाया था। प्राय 30-35 कवि- तायें थी। उदाहरणाथ- "अमल स्नेह से गुजित पर दो मरे मन की सूनी वीणा, फिर एसो चितवन जग जाये, असमय सोयी आस मलीना।" "आलादिनी, स्नेह म तर क्तिन ही हस हस रो देंगे, पर जो प्यार करे ज्वाला का उसस भी एसी निष्ठुरता?" "आज दीप इस परवाने के जलत पख देख हसता है कह दू, रानी खीज न जाना- जलने वाला ही बुझता है। और, "विजन मरु म साथ जिसके यह मुसाफिर चल रहा था, लुट गया जब कारवाही हाय ! क्या पद चिह्न खाजू।"
86 पप्पू ज्योत्सना सिक्त रात्रि में पूर्व वग की पमा तथा मघना नदिया का स्टीमर से पार करत ममय लिखी गयों इक्कीस वर्षीय पप्पू के अतम स निस्सन विशुद्ध प्रेम की इन कविताओ पर उसन बडे मनोयोग से, प्रत्यक कविता के क द्रीय भाव पर रगोन चित्र बनाये। महादेवीजी की दीप शिखा' सरीखें। जेबी डायरी साइज क सफेद कागजा पर धन ये चित्र और प्रत्येक चित्र के नीचे, ऊपर अथवा बीच मे लिखी कवितायें, यदि बची रहती तो पपू के कवि का एक अद्भुत आयाम प्रस्तुत करती। पर पप्पू ने तो इह किसी और उद्देश्य स लिखा था। जव सार चित्र बन गये ता उसन अपने मझले भाई विच्चू का पक्डा। पिच्चू भाइ उन दिनो अमेरिका के आगरा स्थित फौजी डिपो म काम करत थे । प्लास्टिक नया नया चला था । पप्पू उनके जरिय डायरी के कवर के लिए प्लास्टिक की दा माटी शोट उसी साइज को कटवा मगवायी। वडा ही नफोस क्वर बन गया। और एक दिन पप्पू न पापित कर दिया कि उसकी वह डायरी कही खा गयी । खासा नाटक क्यिा था पहल उस खोजन का और फिर न मिलने के अफसास का । डायरी मिलती वहा से? वह तो उ ही दवीजी के पास पहुच गयी था जो नित्य पप्पू का देखने फुटपाथ बदला करती थी। काफ लव (किशोरावस्था का प्यार) करन का अधिकार पप्पू का भी तो था ही न आसिर । आगरा विद्यार्थी सघन मडिकल मिशन के वापस आन के बाद एक 'पोस्टर प्रदशनी का आयोजन किया। प्राय तीन सप्ताह नित्य छ सात घण्टे तक तन-तोड महनत कर वगाल क अकाल की विभीपिका का बहे- बड पोस्टरो पर चित्र रूप में परिणत किया पप्पू न, विशन ख ना न और अनेक उन साथियो ने जिहें चित्र बनाना आता था। अनव आकडे, अनेक फाटो और अनेक सूत्रवाक्या का छाटे वडे पास्टरा पर ढाला। प्रदशनी लगायी गयो सट जाँस कॉलेज में। उद्घाटन के लिए बुलाया था बलवन्त राजपूत कालज क प्रि सीपल डा. रामकरन सिंह का। बडाधूम मची यो इस पोस्टर प्रदशनी की भी। बगाल के अकाल ने हमारी मित्र मण्डली को एक और अच्छा लखक पप्पू 87 दिया। श्री जतनलाल ठाकोर की चर्चा ऊपर की है । नाटक मे अभिनय परने के पश्चात् उन पर कुछ ऐसा गहरा प्रभाव पड़ा कि उहान भी एक नाटक लिख डाला--प्लासी के युद्ध की पष्ठभूमि पर । जब वह नाटक पप्पू की बठक मे पढा गया तो हम सभी अवाक रह गय थ। जतनलाल से यह उम्मीद कभी किसी ने नही की थी। सग टोप' का प्रत्यक्ष प्रमाण उपस्थित किया था जतनलाल ठाकोर ने। जतनलाल रिश्त म मरे मामा हाते हैं-~मरी मा के खास ममर भाई। उम्र म मुझसे दस महीन छोटे ह, लिहाजा बचपन से यार ज्यादा हैं, मामा कम । साथ-साथ, एक ही मकान म पढे-बढे हैं हम दोनो। कालज मे भी वह सिफ एक क्लास पीछे थे । बाबू के रेस्तरा मे कभी-कभी आ जाते थे। सबमे साहब सलामत हो गयी थी। अब जो जतनलाल का साहित्यकार जाग बठा तो आलम यह हो गया था कि वे किसी दिन नाटक लिय चले आ रहे है तो किसी दिन कहानी । कुछ दिन बाद देखा ता कविता पर भी हाथ चलान लग गये। उस्ताद लाखन सिंह ने उस दिन कहा था, 'लो भाई, अब जतन को कितना भी सुननी पडेगी।" श्री जतनलाल ठाकोर नाज भी कविता आदि लिखत रहत हैं । उही की एक वडी प्यारी कविता है- ज़िन्दगी काटे न कटती वक्त वाटे जा रहा है। सचमुच अगर जि दगी न उन्हें जरूरत से ज्यादा धक्क न दिये होते तो जतनलाल का माहित्य म अपना एक स्थान अवश्य होता। इसी यप पप्पू के पिताजी या दहातहागया। श्रीरगाचाय, जिनक नाम पर पप्पू ने अपन को रागेय कहा था, सस्कृत और तमिल के विद्वान पे, फारमी म भविता कर लेते थ । अपेक्षाकृत कम बोलत थे । नजर उनकी वडो पंनी थी, हर चीज पर रहा करती थी। अधिकतर वैर म रह्न पे जहा व रामानुज सम्प्रदाय क सीतारामजी २ मदिर व आवाय थे। मुझे याद है कि एक दिन सुबह जब मैं पप्पू के घर गया तो वे स्नान कर रह या पपू म पूछा कि कौन है तो उमन बहा "मनमोहन है । अरे वही, नीच नागर जाति वाला।" पिताजी ने तुरन्त प्रतिवाद दिया था, "अरे, नागर 88 पप्पू ता हम पच द्रविडो म एक हैं। य तो हमारे भाई है।' उस दिन स मैं पिताजी की इस भाई वाली बात को, जब तब याद दिला दिया करता था पप्पू को ताकि वह उस रिश्त क नाते मुझे 'चाचाजी' कहा करे। पप्पू को अपने पिता स गहरा प्यार था। प्राचीन भारत, भारतीय परम्पराओ तथा ब्राह्मणत्व सस्कारो के प्रति उसका मोह अधिकाश उसके पिताजी स विरासत में मिला था। भविष्य में लिख जाने वाली उसकी प्राचीन भारतीय परम्परा और इतिहास 'प्राचीन भारतीय पुनर्जागरण की भूमिका, तथा भारतीय चिनन' सरीखी गम्भीर रचनालो की पष्ठभूमि म पितृ दत्त सस्वारा की बड़ी भूमिका रही थी। तथापि यह भी निस्सदेह है कि विद्यार्थी जीवन म वह इन सस्कारो स मुक्ति पान के लिए आप्राण चेष्टा करता रहा था । बहुधा कहा करता था "यार अक्सर दिमाग म यह सदह तो हो जाता है कि भूत प्रेत वास्तव म है कि नहीं हैं। पर तु ईश्वर---उसके सबध म तो मुझे कोई भ्रम नहीं रह गया है कि उसका अस्तित्व केवल मनुष्य की कल्पना की ही उपज 'तूफाना के वीच' के तुरत वाद पप्पू ने हाथ लगाया मायको सकी की विनाआ के अनुवाद पर। उस मायकाव्सकी के जीवन और मरण, दोना न बहुत प्रभावित किया था। पप्पू बडा सजग अनुवादक था। अनु. वाद मरा भी प्रिय कम रहा है। प्राय बातें होती थी कि अच्छा अनुवाद किस कहा जायेगा । शाब्दिक अनुवाद को वह घटिया अनुवाद मानता था। यदि अनुवाद स्वय अपनी भाषा की एक उत्कृष्ट रचना न बन सका तो बात ही क्या बनी? मायको सकी की एक प्रसिद्ध रचना है-लफ्ट लपट, लफ्ट'। कहते हैं लेनिन को यह कविता बहुत प्रिय थी। पप्पू ने अनुवाद किया था-- बाया कदम, किवाया कदम, कि वाया बलम चलें सब साथ।' इसी जनुवाद-काल की रोचक घटना याद ना गयी। पप्पू की मेज पर पप्पू 89 । मायकोब्सको की कविताओ का सकलन पड़ा हुआ था। प्राय पन्द्रह- वीम रविनालो का अनुवाद कर चुका था वह । उस दिन आगरा के एक बड नता पप्पू के घर आये। काफी दर बातें की। चलत चलत सकलन पर नजर पड़ा तो बडी मासूम सजीदगी से पप्पू को उपदशात्मक मुद्रा म कहने लग, 'मायकोव्सकी बडा अच्छा लेखक है रूस का। पप्पू, पढा करो, रूसी साहित्य पढा करो। खासकर मायकोव्सको और पुश्किन का। बडे महान लखक थे ये दोनो। कस कस उप यास लिब गए हैं । आहा मजा आ जाता है उह पढकर ।" हम दोनो उह देख रहे थे और देख रह थे एक-दूसर का । मायको- मकी और पुश्किन उपन्यासकार ? सौभाग्य स नेताजी बाहर निकलत- निकलते ही यह 'नयी' और नितान्त भोलिक सूचना दे गए थे। उनके चले जाने के बाद मैं तो पेट पकड कर हसे जा रहा था, और पप्पू दात पीसता रहा था काफी दर तक। सन् 1944 स ही कम्यूनिस्ट पार्टी जोर शोर से आ दोलन करती चली आ रही थी काग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौत के लिए। यह साफ साफ दिखायी देने लग गया था कि अग्रज अब और ज्यादा दिन भारत पर राज्य नहीं कर सकेंगे। स्वतत्रता के लिए काग्रेस और मुस्लिम लीग के पारस्परिक मतभेदा का समाप्त होना बहुत आवश्यक प्रतीत होने लग गया था, क्योकि यही वह दरार थी जिसको अग्रेज सरकार बराबर चौडा करती चली जा रही थी हमारे देश पर 'यावच्च द्र दिवारी राज्य करते रहने के लिए। अतएव कम्यूनिस्ट पार्टी ने नारा दिया था काग्रेस के नेताओ वा अवि- लम्ब जेल से छाड दिये जाने का और गाधीजी तथा जिन्ना कबीच मम- भौता हान का। बगाल के अकाल की छाया अभी भी देश पर मडरा रही थी। यह स्पष्ट हो चुका था कि साम्राज्यवादी शासक एसे ऐस अनक घणित पडयत्र कर हमारे दश मे भूख और महामारी का ताण्डव नत्य परवात चल जाएगे । चचिल स और बाशा भी क्या की जा सरती थी? कम्यूनिस्ट पार्टी की इस नीति के समथन म पप्पू ने एक बड़ा प्यारा गीत लिखा था- ५७ पप्पू हाथ वढाओ "बापू बाल, बोल बोल, यह है देश की पुकार, जिन्ना बोल, बोल, वोल, यह है दश की पुकार। सान की इस बग भूमि म मचता हाहाकार, मानवता से टकराया है वकालो का ज्वार । बापू बाल आज करोडो की आशा की तुम दानो पतवार रूठे माझी डूब रही है नाव । बापू बोल यह गीत उन दिनो बहुत लोकप्रिय हुआ पा । नगर नगर म कम्यू- निस्ट कायकर्ताआ की टोलिया प्रभात फेरी लग समय यह गाना गाया करती थी । पप्पू ने इसे लिखा भी प्रभात फेरियो म गाये जाने के लिए ही था । सन् 1945 के प्रारम्भ से ही यह लगने लगा था कि अब हमारी मित्र मण्डली क विखरन के दिन आ चले । पप्पू ने रिसच करने का निश्चय कर लिया था। 'गारखनाथ और उनके युग' पर काम करने लग गया था। शान्ति निकेतन जाना पड़ेगा हजारी प्रसादजी द्विवेदी के पास, यह विचार उस काफी आनद दिया करता था। 'आचाय' द्विवेदी के पास जायगा टी० एन० वी० 'आचाय -बहे गव म कहता था। 'बाणभट्ट' और चारुचन्द्र लेख' तब तक प्रकाशित हो चुकी थी जिनके कारण शानि निकेतन के 'मास्टरजी' समस्त हि दी जगत के 'आचाय द्विवेदी बन चुके थे। उनके सानिध्य में रहने का उत्साह पप्पू के हृदय म होना स्वाभाविक ही था। इस वप जयराम भारद्वाज और मैं एम०ए० को परीक्षा दन वाल थे।गत वप मरी विमाता की मृत्यु हो जाने के बाद से ही मेरे पिताजी ने रट लगा दी थी कि एम० ए० को परीक्षा समाप्त होत ही वे मेरा विवाह पप्पू 91 सम्पन करवा कर ही दम लेंगे । उनका वश चलता तो जब मैं मिडिल पास हुआ था तभी मरा विवाह कर चुप होत। राजस्थान मे ता आज भी मिनिस्टर तक अपनी नाबालिग पुत्रियो का विवाह धूम धडाक से कर दिया करते हैं । मर पितानी भी राजस्थान में ही रहते थे। जहा तक आज याद आ रहा है, इसी वप के प्रारम्भ म उदयशकर अपने ग्रुप के साथ आगरा आए थे। उन दिना उनका नृत्य-कला-के द्र अलमोडा मे था। उमी कद्र की सहायताथ धनराशि एकत्रित करने के विचार स वे नगर नगर घूम रहे थे। साथ म थे महाकवि सुमित्रानन्दन पन्त। हमने जब सुना कि पतजी आगरा आये हुए हैं तो तुर त निश्चय कर लिया कि यदि सभव हा तो अगले दिन प्रगतिशील लेखक सघ की बैठक में उहे बुलाया जाय। माम्या' के प्रकाशन के बाद पतजी प्रगति- शील लेखको क भी बहुत प्रिय हो गये थे । स्वणधूलि तथा 'स्वकिरण' का प्रकाशन अभी नहीं हुआ था। गाधीजी के साथ-साथ माक्स पर भी कविता लिखन वाले पतजी हम अपन लग रहे थे तब । उहें नित्रित कर लान का भार दिया गया पप्पू और मुझका । उदयशकर का दल ठहरा था आगरा केंट क एप हाटल म । उम दिन, हम दोना कुछ जल्दी ही निकल पडे ध, अतिरिक्त उत्साहवश। रास्ते में ही सोचा कि अभी तो पतजी भोजन के पश्चात् आराम कर रह हागे। हम शाम चार-साढे चार बजे उनम पास जाएगे। तब तब आगरा के लाल किल के पास घूमत वक्त बिता लें। एम०ए० के मेरे सात प्रश्नपत्रो मे एक शिवाजी तथा पशवामा सबधी या। उन दिनो मैं शिवाजी पोट रहा था। आगरा ये मिल के पास भटकत- भटक्त याद आया कि इही टीलो-खण्डहरा म कही रहा हागा राजा जयसिंह का निवास स्थान और यही कही वी वनापर रखा गया होगा शिवानी का। टीलो पर उतरत चढ़त हम शिवाजा की स्मृति म मग्न हा गए थे । दानों वो म भर ली थी मूगपलिया। वह घोलत चबात चल जा रह पे सत्रहवी शताब्दीमा सहसा मन स्वयं को एक छोट स अनिस्तान में पाया! इसा 92 पप्पू यानिस्तान म । विले से कुछ ही दूर । जरा देर दम लेने के विचार से यहा जा बैठे। एक कम पर नजर पड़ी तो हम चौक । मृत्यु तिथि पो मई 1857 की। अब तो आम-पास की क्ये देखनी शुरू की तो पता चला कि समस्त कने मई 1857 के तीन चार दिनो म मर लोगो की थी। गदर म मारे गये अग्रेजा-स्त्री पुरपो यो । उनम दो तीन वने पाच मात वप के बच्चा की भी थी। अब शिवाजी तो तिराहित हो गये। म पर सवार हो गया 1857 का सग्राम । कुचक्री अग्रज व्यापारियो द्वारा धन लालुप भारतीय राजा- रजवाडो को हल बना वर एक समूच दश को हडप बैटने की साजिश के विरुद्ध कुछ स्वतता प्रेमी छोटे छोटे राजाओ जमीदारा द्वारा लडा गया सपाम । तात्या टोपे, कुवर सिंह, रानी लक्ष्मी बाई, नाना माहब-- एक एक कर सबका स्मृति-नपण किया था हमने उम ढलती दापहरी म । और साथ ही किया था यह अनुभव भी कि युद्ध कितना नशस बना देता है मनुष्य का कि उस पाच वर्षीय दुधमुहा मी अपना शत्रु नज़र आने लगता है जिस मार कर ही शा त हो पाता है वह । बातो ही बाता म समय कब बीत गया पता ही न चला। शाम होने लगी तो हम जा पहुचे होटल । दरवाजे से ही शुरू हो गया था बगीचा । वृक्षा के नीचे रहा नहा खडे थे महान नतक उदयशकर के दल के युवक- युवतियो के युग्म । उनकी उपस्थिति के कारण बडा वायवीय बन गया था वातावरण । कविस्तान की ठास वास्तविकता से एक्दम विपरीत । उदयशवर होटल के सामने की सीढियो पर खड़े टोस्ट पर मक्खन लगा रहे थे। जब हमने पतजी से मिलने की इच्छा प्रकट की तो वही से खडे खडे उहो आवाज लगायी-पतजी, देखिये आपसे मिलने आये हैं य लोग।" सचमुच वेहद खूबसूरत थे उदयशवर, देवताओं सरीखा बदन मिला था उनको। म टक्टकी वाधे देखते रहे थे उनकी ओर। उत्पशक की आवाज पर पतजी बाहर निकले । पहली बार देख रहे. ये हम उस अनुा लालित्य की राशि को। पतजी ठीक वैसे ही थे जस हम उायी फा । म उह देखन चले आ रहे थे। कक्षा पाच मे पढते थे तब स । व हा लहरात बल पात केश । ठीक वही चश्मा, जिसकी सुनहरी पपू 93 कमानी उनकी कनपटी पर उगे वाला के माथ साथ ही मुड जाती थी। आज प्रेसठ वप का होने पर भी मैं उस शाम को, उसके एक एक क्षण का, उदयशकर और पतजी के उदात्त पौरुषेय सौदय को, बिना तरल हुए दुहरा पाने म असमथ हो रहा हूं, इसी से अदाज लगा लीजिये क्या स्थिति रही होगी हमारी उस समय । तव ता हम दोनो ने बाईस वर्ष पूरे नहीं किये थे। पतजी तो नहीं आ सके थे हमारी गोष्ठी म । दूसरे दिन उनका बहुत व्यस्त कायक्रम था और तीसरे दिन उह प्रस्थान करना था। परतु हमे पतजी ने जिद करके दूसरे दिन होने वाले शो के चार पास दे दिये । गए थे निमत्रण देने खुद निमत्रित होकर आ गये। दूसर दिन पप्पू, जयराम भारद्वाज, ब्रजराज सिंह और मैं-हम चार जा पहुचे 'ताज टॉकीज' । ब्रजराज सिंह मेरा सहपाठी था। राजनीति म बहुत दिलचस्पी थी उसकी । कम्यूनिस्ट नहीं था वह तब भी। दवे दवे शब्दो मे विरोध ही करता रहता था। किंतु था मारी गोष्ठी का सदस्य । मागे चल कर वह पार्लियामेण्ट का सदस्य और अपने समाजवादी ग्रुप या नेता भी चुना गया था। फिर एक दिन अखबार मे पढा कि उसका देहान हो गया। उदयशकर ये प्रोग्राम का आरम्भ ही पतजी द्वारा अपनी दो कविताओ के पाठ से हुआ था। पतजी स उनकी कविताए प्रत्यक्ष सुनना या तो मरे जीवन को बहुत बड़ी घटना थी। याद भी रखे हुए हू उस स्मृति को भाज तक। तथापि, स्वीकार करू कि उनका कण्ठ कुछ अधिक ही कोमल था। पाठ भगिमा भी अधिक प्रभावशाली नहीं थी। निराश हुए थे हम- कविताओ स नही, उनके पाठ से। निराला, दिनकर, बच्चन--यहा तक कि महादेवीजी भी इस क्षेत्र मे उनकी अपक्षा अधिक गहरी छाप छोड । गई हैं। कि तु जव उदयशकर ने पतजी की 'मुक्त करो नारी को मानव' के आधार पर अपना नत्य प्रस्तुत किया तो हम अश-अश कर उठे। पतजी की उस अमर रचना की गरिमा में चार चाद लगा दिये थे उस अप्रतिम, नृत्य के जादूगर ने । और फिर जब उसका 'टाइम मशीन' आया तो सच- 94 पप्पू मुच अवाक रह जाना पटा था। पला के विस सोपान पर चढ़ गये थे उदयशकर, इसका अदाजा आज का युग नहीं लगा पायेगा। उस राधिका अन्तिम नृत्य पा 'राजहस वी मृत्यु' । उहाने प्रख्यात रूसी बलेरिना, अना पावलोवा, से सीण या यह नृत्य । मैंने पावनोवा के नृत्य की फिल्म भी देखी है। नहीं कह सकता कि कौन किसस बढकर था। कही पढ़ा था, 'राम रावर्णेयुद्ध राम रावणोरिव'-राम और रावण का युद्ध राम और रावण द्वारा ही लडा जा सकता था । अय किसी के भी बूते के बाहर था वसा लड़ पाना । ठीक यही बात पावलोवा और उदयशकर के 'राजम को मृत्यु' के बारे में कहीं जा सकती है। केवल पावलोवा और केवल उदशकर ही उस कोटि का नृत्य प्रस्तुत कर सकत थे। पतजी को कोटिश घ यवाद कि उहोने हमे यह अवसर प्रदान कर दिया। अप्रेल मे मेरी परीक्षायें प्रारम्भ हो गइ। क्वल तीन पेपर देन थे। अतिम पेपर निबध का था। 12 अप्रैल को मैं अकेला ही ठडी सडक पर सायकाल घूम रहा था । मन उदाम-उदास था। कुछ ही देर पहले रेडियो पर अमेरिका व राष्ट्रपति रूजवेल्ट की सहसा हृदयगति रुक जाने स हुई मृत्यु का समाचार सुना था। रूजवेल्ट भारतवप की स्वतत्रता के बडे मशक्त प्रयास कर रहे थे। चचिल पर जर ही अदर दबाव डालते रहत थे। काहिरा तथा तहरान मे चचिल एव स्तालिन क साथ हुई वठकाम उनका रुख चचिल की अपेक्षा कही अधिक जनवादी था। नाजी फौजा के विरुद्ध पश्चिमी यूरोप म एक दूसरा मोर्चा खुलवाने के सोवियत प्रयासो की सफलता की पृष्ठभूमि म रूजवेल्ट का नेतत्व था। अब जवकि सोवियत सेनायें बलिन के निकट पहुंची थी और जबकि महायुद्ध के समाप्त होने के आसार स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगे थे, रूजवेल्ट मा निधन दुर्भाग्यपूण लगा था मुझे। उपराष्ट्रपति ट्रमेन का व्यक्तित्व प्रभावशाली या ही नहीं। 'अब क्या होगा' का प्रश्न मुझ तग कर रहा था। दिल्ली दरवाजे के पास पहुंचा तो लाखन पपू और कमलेशजी मिल गये । रूजवट का शोक उन पर भी छाया हुआ था। पर तु हम सब मआश्वस्त ये कि उनके देहात का कोई प्रभाव युद्ध पर नहीं पहेगा । जनरल आइमनहाँदर और माँटगोमरी के नेतृत्व मे अमेरिका और इगलण्ड की पप्पू 95 तथा मागल जुकोव को कमान म सोवियत यूनियन की फौजें बडी तजी से हिटलर गौरिंग की समस्त विश्व को पददलित करन की अभिलाषाआ का जनाजा निकाले दे रही थी। बलिन का पतन अब हुआ तब हुआ की स्थिति में था। उसी दिन पप्पू और लाखन दोनो ने मेरे विवाह के सम्बध म विस्तार से चर्चा की थी। आगामी 27 अप्रैल को विवाह होन वाला था । पप्पू की बड़ी इच्छा थी बारात में जाने को। परतु जब मैंने उसे बताया कि वह हमार साथ एक पक्ति मे बैठकर भोजन तक नही कर पायेगा, क्योकि चालीम धप पहले हमारे बडे-बडे नागरो के अतिरिक्त और किसी के साथ वैठकर खाना नहीं खा पाते थे, तो वह बहुत निराश हुआ था। 13 अप्रैल को मेरा आखिरी पेपर समाप्त हुआ और 19 को मैं चला गया दिल्ली अपनी बहिन को लिवाने । लौटकर मात्र एक दिन आगरा रुका और फिर निकल गया राजस्थान विवाह के लिए। विवाह के बाद जब मैं सपत्नीक अपने पंतक नगर, बूदी, पहुचा तो समाचार पत्रो में ज्ञात हुआ था कि एक रात पहले ही इटली के फासिस्ट-विरोधी गुरिल्ला छापा- मारो न मुसोलिनी को गाली मार दी थी। एक बडे अयायी राक्षम की समापित क बाट उसका अभि न मित्र हिटलर भी अपन जीवन की अनिम श्वास लेन लगा था। महायुद्ध की विभीषिका का मत स्पष्ट दिखाई देने लग गया था। बूदी रहते ही मैंने जयपुर के निकट चलाये जाने वाले वनस्थलो विद्यापीठ मे अध्यापकी की दरख्वास्त दे दी थी और शीघ्र ही वहा मेरी नियुक्ति भी हो गई । आगरा छूटने जा रहा था-आगरा जहा मेरा जन्म हुआ था, मरी शिक्षा दीक्षा हुई थी और जहा जीवन के बाईस वप बिताये थे मैंने । आगरा, जिसका गत चार पाच वर्षो म मेरे लिए क्वल मात्र अथ रह गया था पप्पू लाखन, जयराम भारद्वाज और इन सरीखे अनेक प्यारे- प्यार मिनो का अहर्निश हसी ठहाको भरा साथ । आज याद करता हू तोहसी आती है कि आगरा से अपनी किताबें और घोडा सा सामान बटारकर जब आगरा फोट से जयपुर जाने वाली ट्रेन में मैं बैठा था तो गाडी के प्लेटफाम छाडते ही मेरी आखो ने जो आसू बहाने 96 पप्पू शुरू किये थे वे भरतपुर तक बहते ही रहे थे। इसके पहले, और इसके बाद मैं, अपने आसुओ के सामने इस कदर भी बेबस नही हुआ। आगरा छूटा तो छूटा, पप्पू भी छूट गया। 1945 के बाद आगरा जाना तो बरावर जारी रहा, कि तु वहा हफ्ते दस दिन रह पाना और सभव नहीं हो सका । वनस्थली विद्यापीठ में अध्यापकी करते हुए एक बार जाया तो बाग मुजफ्फर खा मे घुसत ही सुदर सिंह मिल गया। "अबे आजकल क्या कर रहा है ?" वे उत्तर मे पता चला कि हजरत अदालत म नर्जीनवीस हो गए हैं। "यू नो पाटनर, माई टोटल इनकम फ्रॉम मीस बोय आस्टेंसि- बिल एण्ड नॉट सा आस्टेंसिविल टोटल्स अप टु हण्ड्रेड टवटी नाइन रुपीज़, इलेविन आनाज । (मरा आमदना वध और अवैध दोना ज़रिया का मिला कर कुल जमा 129 रु0 11 आना है।) और पप्पू वह अपनी शोध म तग गया था । शाति निकेतन लखनऊ और आगरा के बीच झूलने लग गया था वह । मैं जब भी आगरा गया, और यदि वह वही हुआ, तो बडे तपाक स मिलता "अवे फिर चला आया, चूतिया उनन " और इसके बाद एक प्रगाढ आलिंगन जिसम भिंच कर एक दिन तो मर चश्मे के दो टुक्डे हा गए थे और इसके बाद हम दाना का उमुक्त अट्टहास सडक चलत लोगो को ठिठका दिया करता था। पितु वक्त बीतने के साथ साथ आलिंगन का क्साव ता ढीला न हुआ हा, मिलने के अवसर ही कम और कम होत चले गए। वनस्थली में एक वष पढाकर मैं राजस्थान मे कम्युनिस्ट पार्टी का काम करने लग गया था। आये दिन जेल जाना रहता था। पप्पू क्रमश कम्यूनिस्ट पार्टी से दूर होन लग गया था । अब उसकी धमनिया म उस द्रविड या तप्त लोहू खोलने लगा था जो 'वणदभी जातिदी गौर आर्यों से गरज कर'लडा था। उसकी यह प्रसिद्ध कविता जब मैंने वनस्थली रहते पढी यी तो मैं काफी चौंका था। पप्पू की कविता का मुहावरा बदल चला था, अर्थात पप्पू बदल चला था। बहुत शीघ्र ही पप्पू न पप्पू रहा न आचाय । अब मैं आगरा जाता तो उस उन लोगो से घिरे देखता जा उसे 'डाक्टर साहब' कहा करते थ । उमे पहा वालो की सख्या तजी से कम होती जा रही थी। एक दिन 'बाबू पणू 97 PER में TARI. मामा, मरा परिपर परमाग, पद पानमन अर-गात पमा मनोरपिता महाता यह ঘর মানঃ স ম প, মা খাবি দাদয় নি গনম से र पान मम पापा पूरापदस्पा, परमानामागीमट हासन म जय नयीं पाम पापापायाम सिमरी मानिमा मिया पा। पग परिपिायापार मायाम मरपामरे भी परिमन परे । भान पाद मारहा१1947 यह जिस स्थान प्रानिये बार र यागरा गया पान ने अपनी र म यति स्वर में 14 15 मारत मध्य रात्रिमा विन्यास हुए पहा पा, 'जय मुपेता परमानी 7 पापण मि म सय गगी माने गाया सामन- पोहन, एप ए मा उहापाप में सा उग तिहासिक सनम यूजेसमय-यााहो मे अभय बर पासा यह पुरुष 19491 में पसरसागमा आया और पटना प्रवाह म यहता एक मारवाड़ी गस्थान म मौकरी परन पर याप्य हा गया। पत्नी से आग्रह पर पंट गट पहा पर पार गमगाए यार पैट पट पहनकर आगरा जा पहपा । पपू उन दिनाय भी बीमा गर म रहने लग गया था। उसके पर पट्टा तो धूस ही याला, असे यह पता को पाना भयरा 'पहरने पगा?" उपो भविष्यवाणी पली पो। अगस्त 1952 में मैंने सिधिया स्टीम नैविगगन पम्पनी मी वसवताशाया ये पेश विभाग म क्ली परना शुरू पर दिया । महानगर ये महावापा यो क्षेलता, प्रत्येक मही रपया या अभाव महता में विगी प्रकार दुरुपम-मुपाम, अपना पालयापन कर रहा पासपुछ दिनो पूर्व ही स्तालिन मा निधन होमर घुषा था। मैं बहुत उदाम या उन दिना । माघ 1953 पा महीना था। पपू या एप डाई पक्तियों का पास्टपाट मिला, होली से पहले । लिया था, 'पल रात बडी दर तक पासितायो पार बाती रही । तरा भी भाइ । क्या येच रहा है इस दिशो' .
98 पप्पू पप्प का पत्र पाकर अदर तक हिल उठा था मैं। क्या लिखू, कसे लिवू? जब लिपने बैठा तो निम्न पविता के शब्द स्वत उभर उठे- पप्पू प्यारे, पत्र तेरा मिल गया था आज स कुछ दिवस पहले । तु उत्तर दे सकू बाकी न थी क्षमता तनिक भी, क्योकि मनमोहन कि जिसकी हास्य ध्वनि सुन गूज उठता रेस्तरा था, मर चुका कुछ दिवस पहले । जि दगी यदि नाम है जिन्दादिली का, तो यही कहना उचित है---आज तो शव जी रहा है। - आज रह रह याद आत-किशन, बावू और लाखन । और सुदरसिंह भारद्वाज- सब ही झिलमिलाते तारको सम हृदय पट पर। और मच तो है यही- यह याद ही इतनी सुखद है सास जिसस चल रही है आज भी। तुम कहा करते सदा थे- इकलाबी हो नही सक्ता कभी भी मध्यवर्गी युवक सच्चे मायनो मे। क्रोध आता था इसे सुन । तक करता था कि लेनिन, वह महत्तम पुरुष जिसने सवहारा वग का शासन जमाया रस म था, कौन था? या मध्यवर्गी । स्वय एगिल्स, माक्स दानो थे इसी ही वग को सतान आज पर लगता मुझे है तथ्य या इस बात में कुछ अ यथा किस भाति समव हो सकी यह वात जिसस वह कि जिसने शस फूका जागरण का उस नगर मे जो युगो से या सुरक्षित दुग सामती, युका पाई यो न जिसको
पपू 99
मिleat पारागृहोंगी, और जिसो पुष्ट मारे ग प्रनोमन,
मा महिमा गत्यादी बागियों पोंही यार
उमा सामन माह रथ,
भारता यह रह गया
एरपामन पसर!
बन गया है एर पुरी
उस अपूर्व विराट मोरा
लिजियम पिम रहे गरमाया।
पर रही मोपण मनत
जो नापिर्शा समारोंगा,
जोपलानपात मदन म
निरतर प्रिया को सम्पनीले।
आज यो चिar बना है मुझे क्या?
कंगवर का रोज ही मिल जाय यस यल स ।
हृदय पाह पाहता हो दौड़ जाना उस समा म,
शोर से मायूल जहाँ सायों युवर-युवती यो हा मौन, उसमी याद म
जापा मसीहा
इस शती में विश्य ये हमस परोड़ों मानयो का।
वितु जब तक मिस न जाए पंशय बेलेस,
वाउचर डिस्पस वरपे देन
को कहा है?
आज मरा अहम् मुझस पर उठा विद्रोह,
तान भारता है।
पान म विद्रूप स है गुनगुनाता और अक्वर का निरन्तर
"क्या कह अहवाल, चया बारे-नुमापांकर गए,
बी० ए० क्यिा, नौकर हुए, पशन मिली और मर गए।'
100 पप्पू
तिलमिला उटठा इसे सुन
चाहता हू ताड फेंकू आहनी अदृश्य बधन
जो अभी जकडे मुये है
गुलामी म नौकरी म।
कि तु तव,
तत्काल ही हैं घूम जाते चक्षु सम्मुख वे
कि जिनसे मिल बना परिवार मेरा
वद्ध वह मेरे पिता
अरमान जिनके थे सभी केद्रित मुझी मे
ताश के पत्तो सदृश पर महल जिनका ढह चुका है।
और वह सुकुमारि,
जिसका हाथ लेकर हाथ म,
मैं चल पडा जीवन डगर पर ले हजारा साध मन म
नयन-पलका पर कि जिसको चाहता रखना सदा था
किन्तु ढोना पड़ रहा है
जिदगी का भार जिसको।
और नहा दीप
मेरी देह का जो देह
मेरी श्वास का जो श्वास,
मेरे प्राण का जो प्राण,
कर दिया जिसन उजाला, तीन वर्षों पूर्व पर मे
आज जब वह रुग्ण होता, मोजता हू एक होम्योपय ।
काश, तुम अनुमान कर पाते पिता की भावनायें
जब कि मित्रो बीच बहता हूँ
कि मेरे पुत्र को अच्छा न लगता दूध विचित
पy 102
मानिस पाता पीए गर यह पानी
frगिन पुस रहा हा दूध पाय।
मानता,
पर पहैं पार हीरा
पाराम मपसादरे,नराग्य मे,
जा योग्य हा समानहीं उग व्यतिर
जग निरी है मान भी गम हुए पनिष्ट
आज भी जो आस्था रपता आपरत मानस-मनिा और
स्तालिनयादम।
है जिस विन्याम, हागा फिर या निर्माण इस जगमा
मजिसम आज सरसतान मनु की
बिताती अपनी जवानी देर म, दारिद्रय में।
मानता हू सत्य है यह
पर गये
है मत्य यह भी
आज ताडूबा हुआ हूँ गहनतम जीवन उदधि म ।
क्षमा परना,
इसलिए यदि आ न पाऊ मूड मजिसम कि उत्तर स्वत ही लिख
जाप उस स्ट्रेन मनिमम लिया है पत्र तुमन।
पर भी लेकिन तुम्हार, मैं परमा पिर प्रतीक्षा ।
-मैं, तुम्हारा मित्रा
मनमोहन
पपू न उत्तर दिया था, "कविता यच्छी है । तू रोता है तो बडा अच्छा
लगता है।"
इस पश्चात बहुत दिनों तर योई सम्पक नहीं रहा हम दोनो के
102 पप्पू मध्य । पपू आगरा छोडकर अपने गाव, वर, म रहन लग गया था। 1956 मे उसने विवाह कर लिया। आगरा गया ता सूचना मिली थी। 1958 मे एक बार जयपुर पहुंचा तो मरे प्रिय कवि मित्र, जगदीश चतुर्वेदी ने बताया कि डाक्टर साहब यही रहने लगे हैं। जगदीश के साप उसके घर पहुचा । बाहर से ही पता चला कि वह अपनी पत्नी का दिखाने अस्पताल गया है। हम दाना अस्पताल II पहुचे। देखा पप्पू चला आ रहा है । सुलोचनाजी का रिक्शे मे कठाकर घर भेज चुका था, स्वय दवा खरी दने पैदल पंदल जा रहा था । बडा धक्का लगा था उसे देखकर। सिर पर गाधी टोपी उडे हुए बालों को ढकने का असफल प्रयास कर रही थी। काफी दुबला हो गया था । परतु उसको आत्मीयता मे कही कोई कमी नहीं आयी थी। उसी तपाक से मिला था उस सुवह भी जैसे आगरा म मिलता रहता था। उसने बताया कि अम्मा भी वही हैं । हम दोनो घर गये । अम्मा बडी प्रसन हुई पी मुझे देखकर। उन दिनो मैं बहुत ऊचा मुनने लगा था। पप्पू ने अम्मा को जोर से बोलने को कहा, 'साला बहरा हो गया है।' अम्मा ने आवाज में अमीम फरुणा घोलत हुए पूछा, 'अरे बेटा जे कैस हैगो ?" मैंने बडी निरीह मुद्रा मे उत्तर दिया, "ऐसा है अम्मा कि मुझे सिधिया यूनियन के चक्कर मे अक्सर हवाई जहाज से बम्बई आना जाना पड़ता है। इसलिए कान खराब हो गए हैं।" और फिर तुरत पप्पू को ओर मुखातिब होकर मैंन उसी निरीह मुद्रा में उससे पूछ लिया, "पप्पू, तूने कभी हवाई यात्रा की है ?' पप्पू दात पीसकर रह गया था। काफी देर तक हमी मजार करते रह थे उस दिन । सुलोचनाजी से साक्षात्कार नहीं हो पाया था। वे अस्वस्थ जो थी। इसक बाद 1959 लगते ही अम्मा के देहात का समाचार मिला। मैं जानता था कि पप्पू को अम्मा स कितना अधिक प्यार था। अम्मा ने भी पप्पू के प्रत्येक मित्र को पप्पूवत ही समझा था। बडा दुख हुआ था इस अप्रत्याशित समाचार से । मैंने पप्पू को समवदनात्मक पत्र लिखा। उहीं दिना उसका एक उप यास पढ़कर समाप्त कर चुका था । आज उस पप्पू 103 उपन्यास का नाम याद नहीं आ रहा। वह उप यास मुझे कतई अच्छा नहीं लगा था। 'गदल' जैसी कहानी का सशक्त लेखक और इननी कमजोर रचना ' पत्र मे मैंने लिख दिया कि तरा उप यास पढकर अफसोम हुआ। बस, काफी था पप्पू के आहत अहम के लिए यह वाक्य । उस मुझमे कम्यूनिस्ट पार्टी दीख रही थी, 'शाति के पुत्र का प्रतीक लग रहा था मैं, और उसने झल्लाया हुआ पत्र लिखा, "अभी ता तुम्हें अफसोस ही हुआ है ? मैं अभी और भी लिखूगा जिस पढकर तुम आठ आठ आसू रोओगे।" मैं उसके लिए तू से तुम हो गया । गुस्सा मुझे भी बहुत आया। उसी रौ मे लिख बैंठा- "आदरणीय डॉक्टर साहब, गलती मेरी थी। पत्र लिखा था पप्पू को और पता लिख बठा डा० रागेय राघव का । याद ही नही रहा कि पप्पू तो कई वप पहले ही मर चुका था । विश्वास कीजिये यह गलती दुबारा नहीं होगी।" अब पप्पू मुझसे इस बात पर खफा हो गया था कि मैंने उसे मरा 'घोषित कर दिया था। इसके बाद सिफ एक बार और भेंट हुई थी हमारी। वह भी धनश्याम की जिद पर । नतीजा वही हुआ जिसकी मुझे आशका थी । बेहद बदमजगी के वातावरण मे हमन एक दूसरे से विदा ली थी उस रात डा० आकारदव की डिस्पेंसरी स । वह सब कसे हुआ, इसकी कहानी घनश्याम ही लिख सकता है, मैं नहीं । क्योकि, वह हमारी आखिरी मुलाकात थी। काश, उस दिन घनश्याय ने जिद करके हम न मिलाया होता। तुर्शी से तो बच गयी होती मरी यादें। लेक्नि, जो हुआ उससे कही काई फक नही पडता। पप्पू के साथ हुई यारी, उसके साथ विताये गये पाच वर्षों की सुनहली स्मृतिया, क्सिी भी एक जिंदगी को मुअतर बनाये रखने के लिए काफी हैं। उनके मुका- बले मे एकदो क्डवी यादें भी जुड जायें तो अच्छा ही है। मीठी यादे दोबाला हो उठती हैं। आगरा अब भी जाता है। बाग मुजफ्फर खा की सडक को आगरा कॉरपोरेशन ने 'डॉक्टर रागेय राघव माग' बना दिया है। बाबू का रेस्तरा
104 पप्पू
अव कहा है, पता नही । स ट जॉस कॉलेज बाज भी सूली सर पर लादे
खडा है। केवल नहीं है ता यारो की टोली नही है, जिनके साथ रोज
दस बारह घण्टे बीतत थ, वर्षों तक । आज तो उधर से गुजरो पर एक
पक्ति बडी शिद्दत से माथे म गूज उठती है-
जा थल की हे बिहार अनेकन
ता थल काकरी बैठि चुयो करें।
डर लगता है कि कुछ वप बीतते न-बीतत उस सडक का नाम भी
सिकुड सिमट कर कही डी० आर० भार० रोड न रह जाय। और, यह
सोचकर कि अगर लोगा ने उसे हिदी मे डा० रा० रा० मार्ग कहना शुरू
कर दिया तो पप्पू बडी जार से खिलखिला कर हस उठेगा, कहेगा, "दख
साले, क्या छाटकर नाम रखा था मैंने? सुनकर लगता है न कि सितार का
झाला बज रहा हो।"
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