Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Matasya Puran Khand-2
Front matter
दो शब्द पुराणो का मुख्य उद्देश्य घम-कथानो और धर्म इतिहास का वर्णन करना माना गया है, पर बहुसख्यक पुगणो मे इनक अतिरिक्त विभिन्न कलाओ और विद्याओ का विवचन भो बडे विस्तारपूर्वक किया गया है। नारद पुराण, गरुड पुराण, अग्नि पुराण, विष्णु धर्मोत्तर पुराण आदि इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। नारद पुराण मे वद के छ अगों-शिक्षा, कला, व्याकरण, निरुक्त. ज्योतिप, छन्द शास्त्र का जैसा विस्तृत और विशद वणन किया गया है उस देखकर आश्चय होता है। गरुड पुराण में रोग जोर औषधियो का जितना वर्णन मिलता है, उसे एक छोटा-मोटा पृथक आयुर्वेद ग्रय ही कहा जा सकता है । विष्णु धर्मो- तर पुराण मे राज-धर्म और राज्य सञ्चालन सम्बन्धी सकडो पृष्ठव्यापी एक पूरा शास्त्र हो मौजूद है । 'मत्स्यपुराण' के इस दूमर खण्ड म भी 'राज धर्म' 'राजनीति गृह निर्माण विद्या' और 'मूर्तिकला' का प्राप्त विस्तार के साथ वर्णन पाया जाता है। इस नक्वल गजा क कर्तव्य और प्रजापालन का उपदेश दिया गया है, वरन् गजधानी का गर किस प्रकार बसाया जाप, किलाबन्दी किस प्रकार की जाय, अपनी रक्षा और शत्रु ओ का सामना करने के लिये उसमे कैसे अस्त्र-शस्त्रो, युद्ध-सामिग्री और हर तरह की घायलो को चिकित्सार्थ जडी-बूटियो तथा औषधियो का संग्रह किया जाय इसका वणन दस-बीस अध्यायो में विस्तार के साथ किया गया है। प्रसाद, भवन, ह आदि के निमाण में भी इस देश के प्राचीन 'वास्तु-विद्या' (इजीनियरिङ्ग) का ज्ञान भली प्रकार प्रदर्शित किया गया है । मकानों मे द्वार किस तरफ कैसे बनाय जायें और खम्भो क निर्माण मे किन बातो का ध्यान रखना आवश्यक है ? इसम चौकोर से लेकर वतीस पहलो तक के तरह-तरह के खम्भो का जो वणन मिलता है उसस उस जमाने के लोगो की क्लाप्रियता का परिचय मिलता है।
पाले स्वरूप देवताओं की मूत्ति निर्माण में तो काफी जानकारी का होना अनिवार्य ही है। प्रत्येक देवता की मत्ति मे क्या विशेष लक्षण रखे जायें जिससे उसे ठीक-ठीक पहिचाना जाय और उसके समस्त साम्प्रदायिक चिन्ह उसमे स्पष्ट दिखाई सके ? उदाहरण के लिये विष्ण-भगवानु को मूत्ति-निर्माण मे वणन किये कुछ लक्षण यहाँ दिय जाते हैं- "शख, चक्र, पद्म पोर गदा धारण करन बाला--परम प्रशान्त उनका मस्तक छत्र के आकार से सयुन होता है । शख के समान ग्रीया, शुभ नेत्र, ऊँची नाक, सीप के से कान, परम प्रशान्त उरु वाला उनका रूप होता है । उनकी मूत्ति कहीं आठ भुजाओ और कही चार भुजाओ से युक्त होती है। यदि आठ भुजा बनाई जाये तो खङ्ग, गदा, शर, दिव्य पद्म ये सब प्रायुध विष्णु जी के दक्षिण भाग मे होने चाहिए और धनुप, खेटक, शख, चक्र य चार वाम भाग मे रहने चाहिये । चार भुजा मे गदा और पद्म दक्षिण भाग पे और शख तया चक्र वाम भाग मे रखे जायें । उनके नीचे की ओर परो क मध्य भाग मे पृथ्वी की कल्पना करनी चाहिय । दक्षिण भाग मे प्रणति करते हुये गण और वाम भाग मे हाथा मे पद्म धारण किये लक्ष्मी देवी को विराजमान करना चाहिये। विभूति की इच्छा रखन वाले यति को गरुण की स्थापना भगवान क मम्मुख भाग मे करनी चाहिय । दोनो पाश्वो मे पदम से सयुत श्री तथा पुष्टि की स्थापना करे। विद्याधरो के ऊपर तोरण बनावे और उसे दुन्दुभिनाद करते हुये गन्धर्व, लगाये, सिह और व्याघ्र प्रादि से जाये।" इसी प्रकार प्रत्येक देवता के विशेष चिन्हों को मूतियो मे दर्शाने का पूरा विवरण दिया गया है। अन्त मे सब मूत्तियो के अग अनुपात के अनुसार कितन बड़े और छोटे होने चाहिय इसको भी स्पष्ट कर दिया गया है । एक जगह कहा गया है कि "मूत्ति की कटि अठारह अगुल की होनी चाहिये । स्त्री-मूत्ति की कटि बाईस अगुल की रखी जाती है और दोनो स्तन बारह-बारह अगुल के हात हैं। नाभि के मध्य का परीणाह । यालीस अंगुन का अभीष्ट होता है । पुस्यो में यह विमार पचपन अंगुल होता है। दोनो कन्धे छ -छः अगुल के बताये गये हैं । प्रोवा आठ अगुल और दोनो मुजाप्रो का आयाम व्यालीम अगुल का होता है ।" इसी प्रकार मगेर के प्रत्यक प्रग की-हथेलियों और पावों अगुलियो तक की नाप ठीक-ठीक वनलाई गई है, जिससे मूति सब प्रकार से मुन्दर दिखलाई दे और उसमे वहीं वेडौलपन प्रकार हो । और भी कई अन्य महत्त्वपूर्ण विषय इस खण्ड में मिलते हैं । भृगु, अगिरम, अत्रि कुगिक, कश्यप, वसिष्ठ आदि सभी प्रमुख कृपया के नाम, गोत्र, वश, प्रवर स्पष्ट रूप में दिये गये हैं। ये ही ऋषि भारतीय सस्कृति के आदि जनक माने जान हैं और अधिकाश पौराणिक उपाध्यान इन्ही वगो से किसी न किमी रूप में सम्बन्धित है। नरसिंह और वाराह अवतारों के चरित्र के विषय म भी मत्स्य पुराण का वर्णन कुछ विशेषता लिये हुए हैं । देवासुर मप्राम मे दानो पक्षो के मना• नायको तथा दीरो का परिचय और उनका मग्राम कवि कल्पना का अच्छा परिचय देने वाला है । सावित्री-मत्यवान की पा इम पुगण मे भी छ.-स त अध्यायो म दी गई है और उसकी वर्णन शैली प्रभावशाली है । मगन-अमंगल मूचक शकुनो, तरह-तरह के स्वप्नो और अगो क फढकने का जो फलादेश दिया गया है वह अधिकाश पाठको को मारक पान पडेगा। अठारहों पुराणो के स्तर पर विचार करते हरे 'मरम्य पुगण' को महत्त्वपूर्ण हो माना जायगा। यह न बहुत अधिक बड़ा है और न बहुत छोटा और पुराण के पांची अमों के माष इममे पर्याप्त जीवनोप- योगी और ममाज की दृष्टि मे प्रगतिशील विद्याओ और कनायो का परिचय दिया गया है । यद्यपि हम एक हजार पृष्ठ में सव दातों को पूर विस्तार के साथ नहीं दे सकते तब मो इम सशोधित संस्करण में पाठको को सभी आवश्यकीय दातो वा ज्ञान हो सागा और वे स्वय इसके महत्त्व को अनुभव कर सकेंगे। -सम्पादक विषय-सूची ( द्वितीय खण्ड) का विषय दृष्ट ... ... ... २१ २८ ४६ ... ६० ... ६१- नमिह माहात्म्य वणन ६२-नरसिंह हिरण्यकशिपु युद्ध वर्णन ६.-अन्य दानको के साथ नरसिंह का युद्ध ६.-मनु मम्य सम्वाद वर्णन ६५-णुि प्रादुर्भाव वर्णन त्य स य विस्तार वर्णन ६६--सुरमं य विस्तार वर्णन ६८-देव सुर संग्राम वणन (१) ६६-दवासुर संग्राम वर्णन २) ७०-कालतमि वृतान्त वर्णन ७१-कालनेमि और विष्णु का युद्ध ७२-भव माहात्म्य वर्णन ७३-वाराणसी क्षेत्र माहात्म्य ७४-वाराणसी माहात्म्य ५-- नर्मदा माहात्म्य ७६-नमंदा से सम्बन्धित अन्य तीर्थों का माहात्म्य ७७-भगु व श ने ऋषियो के नाम-गात्र-वश-प्रवर वर्णन ७८-अङ्गिरस वशज म्हाषयो के नाम-गोत्र वश-पवर वर्णन ... ७:-अत्रि वशज ऋषियो क नाम-गोत्र-बश-प्रवर वर्णन ८७ ... १०७ १२२ ... ... ... ... १६१ १७२ १८१ १८८ ...
क्रम विषय पृष्ठ १६ २०२ -११ २१५ 20-कुशिक बगज ऋपिया के नाम गात्र वश प्रवर वर्णन ५१-कश्यप वशज ऋषियो क नाम गोत्र वश वर्णन ८. वशिष्ठ वाज सपिया क नाम-गोत्र-वश प्रवर वणन . -ऋषियो क आस्यान म निर्मम कर वन ८४-ऋपिया क नाम मात्र वा प्रवर वणन ८५--मन मत्स्य सम्बाद म धम दश वणन ८६-पतिव्रता माहाम्य म सावित्री उपाख्यान ८७-सावित्री उपाधान (२) ५६-सावित्रो उपास्यान (0) -सावित्रा उपाख्यान ( ३) ६०-सावित्री उपाख्यान (४) ६१---सावित्री उपाख्यान (५) मावित्री उपाम्यान (६) ६३-अभिषिक्त राजा का कृत्य वर्णन ६२--राज य दणन (1) ८५--राजकृय वगान - .) १६-राधम वणन । १) ६७- राजघम वणन (-) १५-गजधम वणन (३ --देव और पुरुषार्थ म कौन पडा है ? १००-राजधम वणन मामपि वपन १०९-राजधम वर्णन म मद श्योग वणन १०२-राधम वर्णन मदान प्रयोग दणन 10 -राजम दणन मापाय वणन १०४-राजधम वनने य५३ माम्यव दण में २३५ २४० २४३ २४७ २६० C ३०७ ०६ ३१८ ३२५ ३३८ (१) ३८७ ३.४ १०५-ग्रह रजादि का विधान वर्णन १०६-यात्राकाल विधान बर्णन २०७-अग स्फुरण विचार 1०८-स्व न दर्शन वर्णन १०६-यात्रा के समय मङ्गल अमङ्गल सूचक गकुन वर्णन ११०-वराहावतार के विषय मे अजुन का प्रश्न (११-वराहावतार चरित्र वर्णन ११.-पीरोद मथम वर्णन ( ११३-क्षीरोद मथन वर्णन (२) ११५-क्षीरोद मयन वर्णन (३) १९५-प्रासाद भवन आदि निर्माण (१६-गृह निर्माण काल वर्णन ११७-भवन निर्माण वणन २८-स्तम्भमान निर्णय वर्णन । १६-भवन निर्माण वण न /१२०-दाहिरण वण न १२१-प्रतिमा निर्माण वर्णन । १२२-देवाकार प्र ण वर्णन62) * । १२२ दव फार प्रमाण क्षण न २)* १९.४-नाना व प्रतिमा प्रमाण वण २0* 19.५ पोटिका लक्षण वणन १२६-लिग ल प वणन १.७-देव प्रतिष्ठा विधि वर्णन (१) १५८ प्रतिष्ठा विधि वणन(२) १२8-4गीन भावी ४०६ ४१३ . ४२४ ४२ ४८४ M
मत्स्य पुराण
[द्वितीय खण्ड]
६१-नरसिंह माहात्म्य वर्णन
इदानी श्रोतुमिन् छामो हिरण्यकशिपोर्वधम् ।
नरसिंहस्य माहात्म्य तया पापविनाशनम् ।।१
पुग कृतयुगे विप्रा हिरण्यकशिपु. प्रभुः ।
दत्यानामादिपुरुपश्चकार स सहत्तपः ॥२
दशवपसहस्राणि दशवर्षशतानि च ।
जलवासी ममभवत् स्नानमोनघृतदत. ॥३
ततः शमदमाभ्याञ्च ब्रह्मचर्येन चंव हि ।
ब्रह्मा प्रीतोऽमवत्तम्य तपमा नियमेन च ।
ततः स्वयम्भूनगवान् स्वयमागम्य तरह।
विमानसावर्णन हसयुक्तेन भास्वता १५
आदित्यवमुभिः साध्यमद्भिदेवतस्तथा ।
रुद्रविश्वसहायश्च यत्तराक्षमपन्नगः ।।६
दिभिश्चंब विदिभिश्च नदीभि सागरम्तया।
नक्षत्रंन्न मुहूर्तश्व मेचरश्च महाग्रहैः ॥७
ऋषिगण ने कहा-हे मुन्नवर ! म गमय में कम लोग हिरण
पनि के वध विषय में अवग करने की इछ गत है नया भगवान
मत्स्यपुराण नरसिंह प्रभु के माहात्म्य को भी सुनना चाहते हैं जो सम्पूर्ण पापो का विनाश करने वाला है ॥१॥ महा महपि श्री सूतजी ने कहा-हे विप्र- वृन्द । पहिले वृत युग मे हिरण्य कशिपु प्रभु दंत्यो का आदि परप था और उसने दश सौ दश हजार वर्ष त महान् घोर तपश्चर्या की थी। बह स्नान-मौन और व्रत को धारण करने वाला होकर जल में ही निवास करने वाला हो गया था ॥३॥ इसके अनन्नर उस हिरण्य कशिपु दैत्यगज के उस महान् उग्र तप से और नियमो के परिपालन से-शम-- दम और ब्रह्मचर्य के द्वारा ब्रह्माजी उस पर वहुत प्रसन्न हो गये थे। जय बे अत्यधिक प्रसन्न हो गये तो स्वयम्भू भगवान् स्वय ही वहाँ पर उसके तप वे स्थल पर आ गये थे। हसयुनत सूय के समान वर्ण वाले भास्वान् विमान के द्वारा ब्रह्माजी ने वहां पर पदार्पण किया था। उस समय में उनके साथ ग्रादित्य-वसुगण-साध्य-मरुद्गण-देवत- रुद्र-विश्व सहायक-यक्ष-राक्षस-पस्नग -दिशाएं -विदिशाए-नदियो-सामर नक्षत्र-मुहूर्त-खेचर और महान ग्रह सब थे॥ ४।५। ६ । ७ ।। देवब्रह्मपिभि साद्ध सिद्ध': सप्तर्षिभिस्तथा। राजर्षिभिः पुण्यकृद्भिर्गन्धर्वाप्सरसाङ्गणं. ।। चराचरगुमः श्रीमान् वृतः सर्वेदिवौकसै. । ब्रह्मा ब्रह्मविदा श्रेष्ठो दैत्य वचनमब्रवीत् ।। प्रीतोऽस्मि तव भत्तस्य तपसाऽनेनसुव्रत ! । वर वरय भद्र ते यथेष्ट काममाप्नुहि ॥१० न देवासुरगन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसाः । न मानुपा. पिशाचा वा हन्युमन्देिवसत्तम ! ॥११ ऋपयो वा न मा शाप. शपेयुः प्रपितामह । याद में भगवान प्रोता वर एप वृतोमया ॥१२ न चारदोण न मारत्राण परिणामादपन च । नपण न घाण • दिवा न माय ।।१२ ११ नरसिंह माहात्म्य वर्णन - भवेयमहमेवार्क सोमोवायुहु ताशन । सलिलञ्चान्तरिक्षञ्च नक्षत्राणि दिशो दश ॥१४ अह क्रोधश्च कामश्च रुणा वासवोयमः । धनदश्च धनाध्यक्षो यक्ष. किंपुरुषाधिप ॥१५ ब्रह्माजी जब वहाँ आये थे तो वे देवगण - ब्रह्मपि-सिद्ध और सप्तपियो के साथ मे थे । बडे २ राजर्पि-पुण्यवान-गन्धव-अप्सराओ के समुदाय तथा समस्त दिवोक्सो के साथ मे वे चरो और अचरो के गुरु- ब्रह्मवेत्ताओ मे परम श्रेष्ठ श्रीमान् ब्रह्माजी परिवृत थे। वहां पहुंच कर जगद्गुरु ब्रह्माजी ने उस दैत्यराज से यह वचन कहा था ।। ८ हे मुद्रत ! तुम मेरे परम भक्त हो। मैं इस समय में आपके इस अत्यन्त उग्र तप स परम प्रसन्न हो गया हूं। आपका कल्याण हो, अब जो मी काई वरदान मुझसे चाहते हा माँग लो और जो भी आपको परम अभीप्ट कामना हो उप प्राप्त करलो ॥ १०॥ यह ब्रह्माजी का वचन सुनकर हिरण्य कशिपु ने कहा-ह देव सत्तम ! मैं यही चाहता हू कि देव-असुर-गन्धर्व-यक्ष-उरग-राक्षस-पिशाच और मानुप कोई भी मेरा हनन न करें॥११॥ हे प्रपितामह ! ये ऋषिगण भी अपने शापो के द्वारा मुझे अभिशप्त न करन पावे । यदि भगवान् आप मुझ पर पूर्णतया प्रसन्न हो गये हैं तो मैं आपस यही वरदान प्राप्त करना चाहता हूँ॥१२॥ हे भगवन् ! मेरी मृत्यु का साधन कोई भी अस्त्र-शस्त्र--गिरि--पदप प्रादि न होवे अपति इनमे क्मिी के भो द्वारा मैं न मारा जा सकें। मैं पिसी भी शुष्क स्थल में अर्यात भूमि पर और बाद भाग मे अर्थात् जल मे न मरूं। मुझे दिन म तया गत्रि म Fिसी भी समय म मृत्यु न आये अनि मुझे दिन और रात में कोई भी न मार सर ॥ १३ ॥ हे ब्रह्मन् ! मैं ही सूर्य हो जाऊं नया मोम-वायु और नाशन में ही वन राऊ अय त् इन सी शक्ति मेर अन्दर ही हो जावे; मैं ही मनिम- अन्तरिक्ष-नार-दो दिसाए हो जाऊँ भान इन म कि माही १२ मत्स्यपुराण अन्दर उपस्थित हो जावें । हिरण्यकशिपु ने कहा कि मैं ही क्रोध-काम- वरुण-इन्द्र-यम-धनद-धन का स्वामी किम्पुश्पो का अधिप यक्ष होजाऊँ अर्थात् इन सबकी क्षमता मेरे ही अन्दर हो जानी चाहिए और मेरे सामने ये सब शक्तिहीन हो जायें ॥११॥ एते दिव्या वगस्तात ! मया दत्तास्तवाद्भुताः। सर्वान् कामान् सदा वत्स प्राप्स्यसे त्व न संशयः।।१६ एवमुक्त्वा स भगवान जगामाकाश एव हि। वराज ब्रह्मसदन ब्रह्मर्पिगणसेवितम् ॥१७ ततो देवाश्च नागाश्च गन्धर्वा ऋषिभिः सह । वरप्रदान श्रुत्वैव पितामहमुपस्थिता. ॥१८ वरप्रदानाद्भगवन् । बधियति स नोऽसुरः। तत्प्रसीदाशु भगवन् ! वधोऽप्यस्य विचिन्त्यताम् ॥१६ भगवन् ! सवभूतानामादिकर्ता स्वय प्रभु । स्रष्टा स्व हव्यकव्यानामव्यक्त प्रकृतिबंध. ॥२० सर्वलोकहितवाक्य श्रुत्वा देव प्रजापतिः । आश्वासयामास सुरान सुशीतर्ववचनाम्बुभिः ॥२१ ब्रह्मा जी ने कहा-हे तात ! ये सब दिव्य वरदान हैं और बहुत ही अदभुत हैं किन्तु मैंने तुमको ये सभी वरदान दे दिये हैं। हे वत्स ! तुम अपने सम्पूर्ण कामो को सदा प्राप्त कर लोगे- इसमे लेश मात्र भी समय नहीं है ॥ १६॥ इस प्रकार से उन भगवान् ब्रह्माजी ने कहा था पौर पिर पाराशने मार्ग से ही वापिस चले गये थे । ब्रह्माजी उस समय में ब्रह्मपि गणो से सेविन ब्रह्माजी का घर दैराज को चले गये थे ।।१७।। इसके पश्चात् देव-नाग-म•एवं यादि सब ऋषिगण के साथ इम को प्रदान को सुनकर ही ब्रह्माजी पितामह के समीप में उपस्थित हए थे ॥१८॥ देवगण ने कहा-हे भगवन् ! आपके इस प्रकार के परमानी के दे देने में तो यह हमारा मका वध घर शलेगा।
नरसिंह माहात्म्य वर्णन हे भगवन् ! इमलिये प्राप प्रसन्न होइये और शीघ्र ही इसका कोई घध होने का उपाय भी सोचिए ।।१६।। हे भगवन् ! आप तो समस्त भूतो के आदि कर्ता हैं और स्वयं प्रभु हैं। आप हध्यकव्यो के सृजन करने वाले हैं। अन्यक्त प्रकृति और परम बुध हैं। इस समस्त लोको के हित करने वाले वाक्य को सुनकर प्रजापनि देव ने सब सुरो को सुगीत पचन स्पो सुन्दर जलो के द्वारा समाश्वासन दिया पा ॥२०॥॥२१॥ अवश्य निदशास्तेन प्राप्तव्यं तपमः परम् । तपसोऽन्तेऽस्य भगवान् वध विष्णुः करिष्यति ॥२२ तच्छ वा विबुधा वाक्य सर्वे पड़जजन्मन. । स्वानि स्थानानि दिव्यानि विप्रा जम्मुमुदान्विता ॥२३ लन्यमाने बरे चाथ सर्चाः सोऽवाधत प्रजा । हिरण्यकशिपुर्दैत्यो वरदानेन दर्पितः ॥२४ आश्रमेपुमहाभागान स मुनीनमसितदतान् । सत्यधमपरान दान्तान् धर्मयामासदानव ॥१ देवास्त्रिभुवनस्थाश्च पराजित्य महासुरः । वलोक्य वशमानीय स्वर्गे यसति दानव ११२६ यदा परमदत्सित्तरचोदित कालधमत. । यज्ञियानकरोइत्यानजियाश्च देवता ॥२७ नदादित्याश्च साध्याश्च विश्वे च वसवस्तथा । मेन्द्रा देवगणायक्षा सिद्धद्विजमहपय ॥ शरण शरण विष्णुमुपतस्युमहारलम् । देवदेव यज्ञमय वासुदेव सनातनम् ॥२८ हे देवगणो ! उम असुर न तपस्या की है अतएव उमका पल तो उसे अवश्य ही प्राप्त करना हो था। इस तप व फल के अन्त हो जाने पर इसरा बध भगवान विष्णु ही परे म ॥२२॥ है विप्रो! उम समय में १४ मत्स्यपुराण सब देवो ने पङ्कज से जन्म ग्रहण करने वाले पितामह के इस वाक्य को श्रवण कर प्रसन्नता से युक्त होकर अपन दिव्य स्थानो को वे सब चले गये थे ॥ २३॥ ऐस वरदानो को प्राप्त होन के साथ ही वह दैत्यराज सम्पूर्ण प्रजाओ को बाधा में पहुँचाने लगा था। घह दैत्यराज हिरण्य कशिपु वरदान प्राप्त करने स अत्यन्त हर्पित हो गया था अर्थात् उसे बडा घमण्ड हो गया था ॥ २३ ॥ २४॥ वह दानव जो अपने २ आश्रमो मे रहने वाले महाभाग मुनिगण थे और जा शासित ब्रतो वाले-सत्यधर्म मे परायण एव परम दमनशील सत्पुरुष थे उन सबको धषित करने लगा था ॥ २५॥ त्रिभुवनी मे स्थित देवो को उस महासुर ने पराजित करके पूर्ण प्रैलोक्य को अपने वश म ल लिया था और वह दानद स्वय स्वर्ग में निवास किया करता था। जिम समय में वह वरदान के मद से अत्यन्त ही उत्मिकन हा गया था तब वह काल के घम स प्रेरित हो गया और दैत्यों को यज्ञिय बना दिया था और अय जियो को देवता कर दिया था ॥ २६ २७॥ उस समय म आदित्य-साध्य-विश्वेदेवा-- चमुगणः --इन्द्र के सहित देवगण-यक्ष -मिड--द्विज और महाप- वृन्द मबई मब महान् बम सम्पन्न भगवान विष्णु की शरणागाल मे परचे थे जो प्रभु देवो न भी देव--यज्ञमय सनातन वासुदेव गे और बारहो हमार शरण अर्थात् रक्षक है-यह प्रार्थना करने लगे ।। २८, २६॥ नारायण । महाभाग। देवास्त्वां शरणगता:। प्रायम्व जाहि देत्येन्द्र हिरण्यकशिपु प्रमो। ।३० त्व हिनापरमा धाता व हि न परमा गुरुः । व्व हिन परमादेयो ब्रह्मादीना गुगंत्तम ।।३१ अपत्यजध्यममग अभप बाददाम्यहम्। तथैव विदिय देया प्रतिपचत गा चिरम् ॥३२ नमिह माहात्म्य दर्शन - एपोह सगण दैत्य वरदानेन दोपतम् । अवध्यममरेन्द्राण दानवेन्द्र निहन्म्यम ॥३३ एवमुक्त वा तु भगवान् विमृज्यनिदशेश्वरान् । वध सङ्कल्पयामास मिरण्यकशिपो प्रभुः ॥३४ सहायश्च महाबाहुरोङ्कार गृह्य सत्वरम् । अथोद्वारसपायस्तु भगवान् विष्णुरव्यय. ॥३५ देवगम ने भगवान् विष्णु स कहा- हे नारायण! आप तो महान् भाग वाले हैं। हम समस्त देवगण आपकी शरणागति म उपस्थित हो गये हैं । हे प्रभो! आप हमारी रक्षा करो और इस देत्येन्द्र हिरण्य मशिपु का चध करो।।३०॥ हे मुगेतम! हम सवरे आप ही परम धाता है और आप ही हमारे परम गुरु है-आप ही हमार सर्बोपार विराजमान देव हैं और ब्रह्मा आदि ग्बम आप सबंधष्ठ देव है ।।३।। भगवान् विष्णु ने पहा-है अमर गणो ! नय का पूर्ण स स त्याग करदो-मैं आपको धभर का दान करता हूँ । ह देवता! पूर्व का ही माति आप मव लोग अपन शिव को पुन. बहुत ही भीत्र प्राप्त कर लोगे 11:00 यह में ही वरदान प्राप्त करन म अत्यन्त धम म भरा हुआ जा यह ईयराज है उमको गणो क महित मार दूगा जाकि यह दानवेन्द प्राय सब अमरेन्द्रो के द्वारा अवध्य ॥३३॥ इन र म बहकर भगवान् ने उन सब विशेश्वो को विमग्नि पर दिया पा और फिर प्रभ न उस पेन्द्र हिरण्य कशिपु + ६५ करन र लिय मन में मातरिया था । ३५॥ सहायता करन वान महावाहु प्रभु ने बत हो शीघ्र औटार वा प्रहम किया था । इमा अनन्नर अप भगवान् विष्णु ओबरको महायता वाले हो गय थ ॥३॥ हिरण्यकशिपुम्यान जगाम हगिरीक्षा। तेजना भायरामार शशा का त्वचा पर ॥३६ नरम्प कृत्वावंतनु मिहम्याद्ध'तनु तथा ।
मत्स्यपुराण नारसिंहेन वपुपा पाणि सस्पृश्य पाणिना ।।३७ ततोऽपश्यत विस्तीर्णा दिव्या रम्या मनोरमाम् । सर्वकामयुता शुमा हिरण्यकशिपो सभाम् ॥३८ विस्तीर्णा योजनशत शतमध्यर्द्धमायताम् । वहायसीङ्कामगमा पञ्चयोजनविस्तृताम् ।।३६ जराशोकक्लमापेता निष्प्रकम्पा शिवा सुखाम् । वेश्महम्यवती रम्या ज्वलन्तीमिव तेजसा ॥४० अन्त पलिलसयुक्ता विहिता विश्वकम्मणा । दिव्यरत्नमयवृक्ष. भलपुष्पप्रदर्युताम् ।।४१ नीलपीतसिश्यामः कृष्णर्लोहितवरपि । अवतानस्तथा गुल्ममंजरीशतधारिभि. ॥४२ ईश्वर हरि भगवान् हिरण्य फशिपु के स्थान को गये थे। उस समय मे यह तेज से भास्कर के आकार के तुल्य और कान्ति से एक दूसरे चन्द्रमा के समान थे । ना का आधा शरीर बना कर तथा आधा शरीर सिंह का धारण करके नरसिंह वपु से युक्त होकर, पाणि के द्वारा पाणि का स्पश करते हुए हरि हिरण्य कशिपु की सभा मे पहुँचे थे । वहा पहुँच पर उन्होने अस्यान विस्तीण-दिव्य-रम्य-मनोरम-समस्त कामो रो समन्वित और सुप्र दैत्यराज हिरण्य वशिषु की सभा का अवलोकन पिया पा ।।३६, ३७, ३८] वह ममा सो योजन विस्तार वाली रात मध्यदं वायत-वहायसो-पाम पूर्वक गमन करने वाली तथा पाच योजन विस्तन पो॥३६।। हिरण्यकशिपु की समा जरा, शोक और कलम से अपेत अनि रहित पी तथा निष्प्राकम्प-शिव-गुणप्रद-वेश्म और हस्यों से सपुत राय एव संत्र में जाज्वल्यमान जंगी पी॥ ४० ॥ इस सभा के पर में मनिन रहता था और इसकी रचना विश्वकर्मा के द्वारा की गयी थी। वह गमा परम दिप पल-पुष्प प्रदान करने वाले एनो परिपूर्ण वृक्षा से समन्वित थी। नीस-पीत-सित-श्याम-कृष्ण नरसिंह माहात्म्य वर्णन १७ लोहित अवतानों से युक्त तथा मन्जरी शतधारी गुन्मो से संपुन वह सना थी जिसकी वर्णनीय शोमा हो रही यो॥४१, ४२॥ सिताम्रप्रनसवाशा प्लवन्तीव व्यदृश्यत । रश्मिवती भास्वरा च दिश्यगन्धमनोरमा ।।४३ मुमुखा न च दुखा सा न होता न च घपंदा। न क्षुपिपासे ग्लानि वा प्राप्यता प्राप्नुवन्ति ते ॥४४ नानात्परपकृता विचित्र रति भास्वरः। स्तम्भनं विभृता सा वं शाश्वती चाक्षया सदा ॥१५ सर्वच कामाः प्रचुरा ये दिव्या ये च मानुणः । रसयुक्त प्रभूतञ्च भक्ष्याभोज्यमनन्तकम् ॥१६ पुष्यगन्धनजस्चात्र नित्यपुप्पफलद्रमाः । उप्णे शोतानि तोयानि शीतचोप्मानिसंतिच ।।४७ पुष्पिताग्रा महाशाखाः प्रवालाकुरधारिणः । लतावितानवच्छन्ना नदापु च सर.सु च ॥४८ वृक्षान् बहुविधास्तत्र मृगेन्द्रा दहगे प्रभु । गन्धवन्ति च पुष्पाणि रमनन्ति फ्लानिच ॥ पित मेघाघ्र र सहा वह समा प्लवन करती हुई जैसी दिखलाई दिया करती थी। रश्मियो स युक्त-परम भास्कर और दिव्यगन्ध से समन्वित एव मनोर घो॥४॥ मुन्दर मुयो म परिपूर्ण-दुखों से रहित- न अधिक जोउ युक और न धर्म को प्रदान करन वाली थी। वहा पर जो भी पहुंच जारा करते वे फिर भूद-प्दाम और ग्नानि को प्राप्त नहीं हुआ करत थे। नाना प्रकार के रूपा वाले-दिवित्र और भाम्बर स्तम्भों में टपत बढ़ ममा घो। वह विभूता नहीं पीप्रत शम्दनी तया सदा अक्षया थी। उस समा में ममी कामनाएँ चाहे वे दिम्य हो या मानुषी हो प्रचुर मात्रा में विद्यमान रहा करती थी। रम में मुन-अन्न से शून्य प्रमून माय एवं भोग्द पापं उसमें रहा करते थे ॥४४, ४५॥
१८ मस्त्यपुरा ॥४६॥ इस देत्यराज की महामभा मे पुण्य गन्ध वाले सराज भी और यहाँ के वृक्ष बारहो महोन नित्य हा पुरुष और फ्ला के प्रदान करन वाले थे। वहा पर उष्ण काल मे शीतल और शीत काल में उप्ण जल रहा करते थे ।।४७|| नदियों में और सरोवरो मे ऐसे वृक्ष थे जिनके अग्रसर पुटियत थे-जिनकी महान् शाखाऐ थी और जो प्रवालाकुरो पे धारण करने वाले थे तथा लताओ के वितानो से सच्छन्न थे ॥४८॥ मोन्द्र प्रभु न बहर पर इस प्रकार के बहुत सी तरह के वृक्षो को देखा था जिनमे गन्ध से युक्त पुष्प थे और रस से समन्वित फल थे ॥४॥ तस्या सभाया दैत्येन्द्रा हिरण्यकशिपुस्तदा । स्तीसहस्र परिवृतो विचित्राभरणाम्बर ॥५० अनयमणिवाचिशिखाज्वलितकुण्डल । आसोनश्चासने चित्रो दश नल्वप्रमाणत: ।।५१ दिवाकरनिभे दिव्ये दिव्यास्तरणसस्तृते । दि यगन्धवहस्नत्रमारुत सुसुखोववो ॥५२ हिरण्यकशिपुदत्य आस्ते ज्वलितकुण्डल । उपचा महादस्य हिरण्यकशिपु तदा ॥५३ दिघतानन गोतानि जगुर्गन्धर्वसत्तमाः। विश्वाची सहजन्याच प्रम्लोचेत्यभिविश्रुता ॥५४ दिव्याथ मौरभेयीन समीचो पजियस्थली । मिश्रकशीचरम्भाचित्रलेखाशुचिस्मिता ॥५५ चारुकेशी घृताचो च मेनका चावशीतथा । एता सहस्रराश्चान्या नत्यगीतविशारदा ॥५६ उस समय में उप सभा म वह दस्यन्द्र हिरण्य कशिपु समस्थित पा जो स्त्री समुदायो की सहस्र सरया स प.िवृत था तथा विचित्र घाभग्ण और वस्त्रो में ममलया था ॥४०॥ बहुमूल्य मणि और बचो की रश्मियो मोशियाओ से ग्वलित कुण्डको वाला था। दश नत्व प्रमाण से युक्त नरसिंह माहात्म्य वर्णन १३ विचित्र मिहामन पर वह दैत्य राज समर्वा यत्र था । वह मिहामन सूर्य के समान परम दिव्य एव दिव्य अन्तरण से संस्तृत था। वहा पर दिव्य गन्ध के वहन करने वाला सुन्दर सुख का देने वाला वायु वह्न कर रहा या 11५१, ५२|| (दहा पर जाज्वल्यमान कुण्डली वामा हिरन कशि देवराज स्थित था। उस समय में हिरण्य कशिपु दैत्यराज की परिचर्या वहुत सी अप्सराएं कर रहीं थीं ॥५३॥ येष्ठ गन्धर्वगा दिव्यतान के द्वारा गोदों का गान कर रहे थे। विश्वाची-सहजन्या-अभिविश्रुत- प्रलोचा-दिव्या-सौरमेयी-हमीच-पुजिक स्थली-मित्र केशो- रम्भा-शुचिस्मित वाली चित्र लेखा-चार केशी-पुलाची-मनका और उर्वशी ये और सहनो अन्य अमराऐं जो नृत्य तया गीतों के गायन करने में परम विशाग्द् उम दैत्य राज को परिचर्या कर रहीं घों ॥ २४ ॥) उपतिष्ठन्त गजान हिरण्यकशिप्रभुम् । तत्रामीनं महागाह हिरण्यकशि अनुम् ॥५७ उपामन्त दितः पुत्राः सर्वे लब्धवरास्तथा । तमप्रतिमकर्माण शतमोऽय महवा, ।।५८ वनिविगेचनन्ना नकः पृथिवीनुन । प्रहलादो विप्रचित्तिश्च गविष्ठश्च महासुरः । ५६ मुन्न्ता दुखहन्ता मुनामा मुमतिवः। घटादगे महापाव नयनकठिनन्तथा ॥६. विश्वम्पः मुन्पश्च न्बलश्च महाबलः । दशग्रीवश्च वालीच मेघवामा महासुरः। ६१ घटायो कसनश्चंद्र प्रजननेन्द्रलापन:। देवदानतधाम्ने म ज्वलितण्डला ॥३२ बग्विगो वाग्मिन. मवें मदद चरितद्रता. । सर्वे लब्धाराः शूगः मर्वे विगतमृत्यः १३ मत्स्यपुराण वहा पर उस महती राज सभा में समस्थित महान वाहो वाल महाराज हिरण्य कशियु प्रभु की सवा मे सब उपस्थित होकर सवाए कर रहे थे ॥५७।। दिति के सभी पुत्र जिन्होने वरदान प्राप्त कर लिये थे वे सब सैक्डो और सहस्रो की सख्या मे अप्रतिम कर्म वाले उस दैत्यराज की उपासना कर रहे थे। उन दैत्यो मे बाल-विराचन-नाक-पृथिवी सुल प्रहाद-विप्रचित्ति-श्रदासुर विष्ठ-सुरहता दुख हाल-सुनामा- सुमति वर - घटोदर-महापाव-धन-कठिन- विश्वरूप--सुरूप- सबल-महाबक-दृशग्रीव-वाली-महासुर मेघ वासा-धरास्य-धम्पन- प्रजन-इन्द्र तापन आदि थे। इन सब दैत्य दानवो के सघ से जो सभी जाज्वल्पमान कुण्डलो वाने थे ॥५७, ५८ ५६, ६०, ६१, ६२॥ सभी लोग सग्दी अथात् मालाधारी-दाग्मी और सदैव चरित व्रत वाले थे। इन सभी ने वरदान प्राप्त कर लिये थे-सब शूर वीर और मृत्यु के भव से रहित थे । ६॥ एते चान्ये च बदवो हिरण्यकशिपु प्रभुम् । उपासन्ति महात्मान सर्वे दिव्यपरिच्छदा ॥६४ विम नविविधाकारजिमानरिवाग्निभि । महन्द्रवपुप सर्वे विचित्राङ्गदवाव ॥६५ भूपिताना दिते पनास्तमुपासात सवश । तस्या समायान्दिन याममुग पवतोपमा ॥६६ हिरण्यवपुष सर्व दिवाकरसमप्रभा । न श्रुतन्न दृप्ट हि हिरण्यकशिपायथा ॥६७ ऐश्यय देयासहस्य यथा तस्य महात्मन । पनकरजतचित्रवेदिवाया रत्नविचित्रवीथिकायाम्। स पदर्श मृगाधिप सभाया सुरचितरत्नगवाक्षशोभितायाम् । १० पनवविमलदारविभूपिताङ्ग दितितनय स मृगाधिपोददश । दिवसारमहाममालम तदितिजसहनशत निबन्धमाणम् ॥६६ नरसिंह हिरण्य कशिपु युद्ध वर्णन २१ ये तथा अन्य बहुत-से दिव्य परिच्छदो वाले सब असुरगण महान् आत्मा वाले उस प्रभु हिरण्य कशिपु की उपासना कर रहे थे ॥६॥ विविध भांति के आकार प्रकार वाले अग्नि के सदृश भ्राजमान विमानो के द्वारा अद्भुत अङ्गदो समलकृत वाहुओ वाले और महेन्द्र के तुल्य वपु को धारण करने वाले-भूपिन अङ्गो से युक्त सव दिति के पुत्र सभी ओर से उस दैत्यराज की समुपासना कर रहे थे। उस महान् राजसभा मे जो कि अत्यन्त दिव्य थो सभी असुरगण पर्वत के समान विशाल थे। ॥६५, ६.11 सभी लोग हिरण्य वपु वाले वहा पर थे जिनकी दिवाकर के तुल्य प्रमा थो दैत्यो में सिंह के ममान उस महान् आत्मा वाले हिरण्य कशिपु का जैसा ऐश्वयं था वैमा न तो कभी क्मिो का देखा गया था र न कही पर सुना हो गया था। जिस सभा में स्थित होकर वह मृगाधिप नरसिंह देव रहे थे वह भली भांति निमित गवाक्षो से सुशोभित थी और परिहृत किये हुए र ना स विचित्र वीथिका दाली थी तथा सुवर्ण एव चांदी को निर्मिन अद्भुत वेदिका से समन्वित थी। उन मृगा. धिप नरसिंह प्रभु ने सुवर्ण के विमल हारो से विभूषित अङ्गो वाले तया सूर्य के तुल्य महतो प्रभा स युक्त और संक्डा एव सहस्रा दैयो के द्वारा सवित उम दिति के पुत्र हिरण्य कशिपु को दवा था ॥ ६७ ।। ६०॥६६॥ ६२ -नरसिंह हिरण्यकशिपु युद्ध वर्णन ततो दृष्ट्वा महात्मान कालचक्रमिवागतम् । नमिहापुन्छन्न भम्मन्छन्नमिवानलम् ॥१ हिरण्यकशिणे पम प्रह्लादोनाम योयवान् । दिव्येन चक्षुष, मिहमपश्यद्दमागतम् ॥२ २२ मत्स्यपुराण त दृष्ट वा रुवमर्शलाभतपूर्वान्तनुमाश्रितम् । विस्मिता दानवा सर्वे हिरण्यकशिपुश्च स ॥३ महाबाहो । महाराज । दैत्यानामादिसम्भव । न श्रुत न च नोह ष्ट नारसिंहमिद वपु ॥४ महाबाहो । महाराज । दैत्यानामादिसम्भव । दैत्या तकरण घोर सशतीव मना मम ॥५ अस्य देवा शरीरस्था सागरा सरितश्चया । हिमवान्पारियात्रश्चयेचान्येकुलपवता । ६ चन्द्रमाश्च सनक्षतौरादित्यवसुभि सह । धनदो वम्णश्चव यम शक्र शचीपति ॥७ महषि श्री मूतजी ने कहा---जिस समय मे नरसिंह भगवान उस सभा में पहुँचे थे तो उस समय मे हिरण्य कशिपु क पुत्र वीयवान् प्रहलाद ने महान् आत्मा वाले नरसिंह क शरीर में छिपे हुए साक्ष त् आये हुए काल चक क समान तया भस्म मे छ न अग्नि के समा उनको प्रारम्भ में देखा था ।।? २॥ वहा पर स्थित सब दानवा ने और उस हिरण्य व शिषु ने भी पूव शरीर मे समाश्रित सुवण के परत की आभा वाले उन नरसिंह प्रभु को देखकर सभी को उस समय मे बहुत विस्मय हो गया था ॥३॥ उसी समय मे प्रह्लाद न कहा था-हे महान् वाहुआ वाले । हे महा- राज । हे त्या ये आदि ज मधारी । मैंने तो अब तक ऐसा नारसिंह वपु न कभी देखा है और न कही पर सुना हो है । यह अव्यक्त प्रभव (जम) बाला-परम दिव्य क्या रूप सामन में आ गया है ? मरे मन मे तो ऐसा हो सशय हो रहा है कि यह कोई घार स्वरूप वाला दैत्यो के अत कर दन वाला ही यहा आकर समुपास्थन हुआ है ।। ५।। इनक इस विज्ञान र म समस्त देवगण स्थित है -सब सागर-समस्त नदियो- हिमवान-पारिया और अ य मव कुल पवत भी इनके शरीर म विद्यमान हैं। समस्त नक्षत्रा के साथ तथा वसु गण और आदित्या क नरसिंह हिरण्यकशिपु युद्ध वर्णन सहित च द्रमा भी इसमें वर्तमान हैं । धनद ( कुवेर )-वरुण-यम और शची का पति इन्द्र देव भी इनके इस नारसिंह शरीर में विद्यमान दिखलाई दे रहे हैं ।।६, ७॥ मरुतो देवगन्धर्वा ऋपयश्च तपोधनाः । नागा यक्षाः पिशाचाश्च राक्षसा भीमविक्रमाः ।। ब्रह्मा देवः पशुपति ललाटस्था भ्रमन्ति वै। स्थावराणि च सर्वाणि जङ्गमानितथैवच ।। भवाश्च सहितोऽस्माभिः सर्वैर्देवगणंवृतः। विमानशतसङ्कीर्णा तथैव भवतः सभा ॥१० सर्व त्रिभुवन राजन् ! लोकधर्माश्च शाश्वताः । दृश्यन्ते नारसिंहेस्मिस्तथेदमखिलं जगत् १११ प्रजापतिश्चात्र मनुमहात्मा ग्रहाश्च योगश्च महीरहाश्च । उत्तात्कालश्च तिमंतश्च निश्च सत्यञ्च तपो दमश्च ११२ सनत्कुमारश्च महानुभावो विश्वे च देवा ऋपयश्च सर्वे। क्रावश्च कामश्च तयव हर्षा धर्मश्च मोह पितरश्च सर्वे ॥१३ प्रादस्य वच. थत्वा हिरण्यकशिपु. प्रभुः । आच दानवान् मर्वान् गणाश्च म गणाधिपः ॥१४ मृगेन्द्रा गृह्यतामेप अपूर्व सत्वमास्थित.। यदि वा संशयः कश्चिद्वध्यता वनगोचरः ॥१५ मरद्गण-देव--गन्धर्व-तप के ही धनो वाले सब ऋषि वृन्द- नाग-यक्ष-पिशाच--भीम विक्रम वाले राक्षस-ब्रह्मा-देव पशुपति ये सब इनके ललाट प्रदेश में स्थित हुए भ्रमण कर रहे हैं । सम्पूर्ण स्थावर तथा सभी जगम जीव इनके गरीर मे दिखलाई दे रहे हैं ॥८,६। सव देवा से परिवृत हम मबक सहित पाप भी इनक शरीर म स्थित देखे जा रहे हैं । सकडो विमानो से सोणं यह आपकी महती राज समाथा है राजन् यह सम्पूण निभुवन और ममस्त शाश्वत लोक धर्म इस ना मिह २४ मत्स्यपुराण शरीर में दिखाई दे रहे हैं । उसी भांति यह सम्पूर्ण जगत्-महात्मा प्रजा- पति मनु-सब ग्रह-योग-महीरुद्र इसमे दृष्टिगत हो रहे हैं ॥१०॥ ॥११, १२॥ इनके अतिरिक्त उत्पात का काल -ति-मति-रति- सत्य-तप-दम इप्समे विद्यमान हैं । महानुभाव सनत्कुमार-विश्वेदेवा- सब ऋषिगण-क्रोध-काम-हर्ष-धर्म-मोह-सब पितृगण इनके इस महान् विशाल एव परम दिव्य शरीर में प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दे रहे है। ॥१३।। इस प्रकार के कहे हुए वचन का श्रवण कर वह गणो का अधिप प्रभु हिरण कशिपु समस्त दानवो और गणो से यह बोला या-देखो, आप सब मिलकर इस अत्यन्त अद्भुत अपूर्व सत्त्व के रूप मे सस्थित नर- सिंह को पकड लो और यदि कुछ भी सशय हो तो इन वन मे भ्रमण करने वाले को मार डाला ॥१४, १५॥ ते दानवगणा सर्वे मृगेन्द्र भीमविक्रमम् । परिक्षिपन्ता मुदितास्त्रासयामा पुरोजसा ॥१६ सिंहनाद विमु-याथ नरसिंहो महावल । वभजता सभा सर्वाव्यादितास्य इवान्तक. ॥१७ समायाभज्यमानायाहिरण्यकशिपु स्वयम् । चिक्षेपान्नाणिसिंहस्यरोषाच्या फुललोचनः ॥१८ सर्वास्त्राणामथ ज्येष्ठ दण्डमस्त्र सुदारुणम् । कालचक्र तथा घोर विष्णुचक्र तथा परम् ॥१६ पैतामह तयात्युग्र दौलोक्यदहन महत् । विविनामशनीञ्चव शुष्कादं चाशनिद्वयम् ।।२० औद्र तथोर शूलञ्च व ड्वाल मुसल तथा । मारन शोषण चैव सन्तापनविलापनम् ॥२५ हिरण्य वशिपु के इस आदेश यो प्राप्त कर वे समस्त दानवगण उस भीम विक्रम वाले मृगेन्द्र पर परिक्षा करते हुए बहर ही प्रमान हो रहे थे और के गय अग्ने औज के बल स उन नरसिंह प्रभु को त्रास देन नरसिंह हिरण्यकशिपु युद्ध वर्णन लगे थे ॥१६॥ उस समय में महान् बलशाली नरसिंह प्रभु ने एक सिंह- नाद करके उस सम्पूर्ण हिरण्य कशिपु की सभा का फैलाये हुए मुंह वाले अन्लक काल के समान भङ्ग कर दिया था ॥१७। जिस समय मे वह पूरी सभा भज्यमान हो गई थी तव हिरण्य कशिपु ने स्वय ही रोप से व्याकुल नेत्रो वाला होकर उन नरसिंह भगवान् के शरीर पर अपने ही अस्त्रो का प्रयोग प्रारम्भ कर दिया था। समस्त प्रस्त्रो मे सबसे बडा- महान् दारुण दण्ड अस्त्र-चोर काल चक्र-परमोत्तम विष्णुचक्र तथा अत्यन्त ही उग्र पितामह का अस्त्र जो इस महान् त्रैलोक्य के दाह कर देने वाला था इन सब अस्त्री से हिरण्य कशिपु ने नारसिंह वपु पर प्रहार किये थे । विचित्र अशनी तथा शुष्क और आई दोनो प्रकार क अशनि- रौद्र तथा उग्रशूल-कवाल--मुसल-मोहन-शोपण-सन्तापन-विला- पन नाम वाल अस्त्रो से दैत्यराज ने नरसिंह प्रभु के शरीर पर डर-डर कर प्रहार पर प्रहार किये थे ।।१८, १९, २०, २१।। वायन्य मथन चैव कापालमथ कैङ्करम् । तथाप्रतिहता शक्ति प्रौञ्चमस्न तथैव च ॥२ अस्त्र ब्रह्मशिरश्चंव सोमास्त्र शिशिर तथा । कम्पन शतनञ्चैव त्वाष्ट्र-चैव सुभैरवम् ।।२३ कालमुद्गरमक्षोभ्य तपनञ्च महावलम् । सवतन मादनञ्च तथा मायाधर परम् ॥२४ गान्धवमस्त्र दयितमसिरत्न च नन्दकम् । प्रस्वापन प्रमथन वारण चास्त्रमुत्तमम् ।। अस्त्र पाशुपतञ्चव यम्याप्रतिहता गति ॥२५ अस्न हशिरश्व ब्राह्ममस्त्र तथैव च । नारायणास्त्रमन्द्रञ्च सापमस्त्र तथाद्भुतम् ॥२६ पैशा मामजित शापद शामन तथा । महाबल भावन च प्रस्थापनविकमान ।।२, २६ मत्स्यपुराण एतान्यस्त्राणि दिव्याणि हिरण्यरशिपुस्तदा। असृजन्नरसिंहस्य दीप्तस्याग्नेरिवाहुतिम् ॥ वायव्य, मपन, कापाल, पंचर, अयुतिहता शास्ति, नौश्च मस्त्र, ब्रह्म शिरास्त्र, सोमास्त्र, शिशिर. व-पन, शतन, स्वाष्ट्र सुभरव, कालमु. दगर, अक्षोम्य, महावल, तपन, एम्वतन, मादन, परमायाधर, गान्धर्वास्त्र, दयित, असिरत्न, नन्दक, प्रस्वापन, प्रमयन, उत्तम वारुणास्त्र और पशुपत अस्त्र जिसको गति अप्रतिहत हुआ करती है ॥२२, २३, २४, २५१ हय. गिर अस्त्र, ब्राह्मास्त्र, नारायणास्त्र, ऐद्र, अद्भुत साप अस्त्र, पैशाचास्त्र, मजित, शोषद, शामन, महावल, भावन, प्रस्थापन, विकम्पन इन सब अस्त्रो को जो महान् दिव्य थे दैत्यराज हिरण्य कशिपु ने भावान् नरसिंह के शरीर पर छोड़ दिया था किन्तु वे सब मात्र उनक शरीर का स्पश करते ही ऐसे नष्ट भ्रष्ट होपर भस्मसात् हो गये थे जिस तरह स प्रदीप्त हुई अग्नि में हवि पडले ही जल कर भस्म हो जाया करती है ॥२६॥ ॥२७,२८॥ अस्त्री प्रज्वलित सिंहमावृणोदसुरोत्तमा । विवस्वान् धर्मसमयेहिमवन्तमिवाशुभि ॥२८ स ह्यमर्षानिलोधूतो दैत्याना सैन्यसागर । क्षणेन प्लावयामास मनाकमिव सागर ॥३० प्रास पार्शश्च खङ्गश्च गदाभिमुसलैस्तथा। वज्रशानिभिश्व साग्निभिश्च महाद्रम १३१ मुद्गरभिन्दिपालश्च शिलोलुखलपवतं । शतघ्नीभिश्च दीप्ताभिदण्डरपि सुदारण ॥३२ ते दान वा पाशगृहोतहस्ता महेन्द्र तुल्याशनिवनवेगा । समन्ततोऽध्यातवाहकाया पितास्त्रशी व नागपाशा ॥३३ सुवर्णमालाकुलभूपिताङ्गा पोतासुधाभाविभाविताड़ा। मुतावसोदामसनामा हसा | माति विशालपक्षा । ३४ नरसिंह हिरण्यकशिपु युद्ध वर्णन चन असुरोत्तमो ने धर्म के समय में विवस्वान् अपनी किरणो से हिमवान् की तरह प्रज्वलिन अस्त्रो के द्वारा उन नृसिह प्रभु को आवृत्त कर दिया था ॥ २६॥ अमर्प की अग्नि से उद्भूत दैत्यो के उस सेना- रूपी सागर ने क्षण भर में मनाक को समुद्र की भांति सबको प्लावित कर दिया था ।।३०।। असुरों की उस विशाल सेना ने प्राश-पाश- खङ्ग-गदा-मूसल-वज्र-अशनि-अग्नि के सहित महान् द्रम-मुद्गर- मिन्दिपाल, शिला, उलूखल, पर्वत, दीप्त शतघ्नी और सुदारुण दण्ड आदि के द्वारा नृमिह प्रभु पर प्रहारो की भरमार करदी थी ॥३१, ३२।। पाशो को हाथों में ग्रहण करने वाले, महेन्द्र के समान अशनि बच के वेग से युक्त सभी ओर से अभ्युदत वाहु और काया वाले वे सब दानव तीन शोपों वाले नागपाशो की भांति स्थित ये ।। ३३ ।। सुवर्ण की मालाओं के समूह से विभूषित अङ्गो वाले तथा पीत वर्ण के वस्त्ररूपी आमोग से विभावित अङ्गो से युक्त और मुकावली को माला से समन्वित कक्षो से सयुत विशाल पक्षो वाले हसो के तुल्य वे दानवगण शोभित हो रहे थे ॥३४॥ तेषा तु वायुप्रतिमोजसा व केयूरमौलीवलयोत्कटानाम् । तान्युत्तमाङ्गान्यभितो विभान्ति प्रभातसूर्याशुसमप्रभाणि ॥३५ तिपद्भिरुग्रवलितमहावलमहास्वपूर्ण सुसमावृतो वभा। गिरियथा सन्ततवपिभिधन वृतान्धकारान्तरकन्दरो मं ॥३६ हिन्यमानोऽपि महास्त्रजालमंहावलदैत्यगणः समेतं. । नारम्यताजी भगवान् प्रतापस्थितप्रकृत्या हिमवानिवाचल..:३७ सन्यासितास्तेन नमिह पिणा दितेः सुता: पावातुल्यतेजसा । मयाद्विलुः पवनोद्ध ताङ्गा यथोमयः सागरवारिसम्भवाः ॥३८ वायु के समान ओज मे युक्त, देयर-गको यौर बलय से उत्सद उन दानयों के उत्तम अङ्ग मभी ओर से प्रात काल के मूर्य की किरणो के तुन्य प्रभा वाले विमान हो रहे थे।॥ ३५ ॥ वह नरसिंह प्रभु महान ८ मत्यपुराण बलो वाले, उग्र, ज्वलिन, दानवो के द्वारा प्रक्षिप्त किये हुए महान अस्त्रों के समूहो से भली भांति आवृत होकर कन्दरामो के आदर अधिकार कर देने वाले द्रमो से और निरन्तर वर्षा करते हुए मेघो से पर्वत की मांति सुशोभित हो रहे थे ।। ३६ ।। महान् बलवान्सब ओर से एकत्रित हुए जन दे-य गणो के द्वारा महान अस्त्रो के जाल से हन्यमान भी वह नृसिंह प्रभु उस युद्ध स्थल में प्रताप से स्थित प्रवृति के द्वारा हिमाचल की भांति बिल्कुल भी कस्पायमान नहीं हुए थे।। ३७ ॥ उन नृसिंह के प- धारी भगवान के द्वारा जिनका पावक के समान तेज था वे सब दिति के पुत्र दैत्य सन्नासित कर दिये गये थे और वे सब भय से भीत होकर पवन से उधूत अङ्गो वाली सागर के जल मे समुत्पन्न मियो की भांति भय से विचलित हो गये थे अर्थात भयभीत होकर इधर-उधर भाग गये थे ।।३८॥ ६२--अन्य दानवों के साथ नरसिंह का युद्ध खरा. खरमुखाइ मकराशीविषाननाः। ईहामृगमुखाश्चान्ये वराहमुखसस्थिता ॥१ वालसूर्यमुखाश्चान्ये धूमकेतुमुखास्तथा । अर्द्धचन्द्रार्धवकनाश्च अग्निदीप्तमुखास्तथा ।।२ इसकुक्कुटववत्राश्च व्यादितास्या भयावहाः । सिंहास्यालेलिहानाश्च काकगृध्रमुखास्तथा ॥३ द्विजिह्वकाक्शीपस्तिथोल्का मुखसस्थिता । महाग्राहमुखाश्चान्ये दानवापादरिता ॥४ होलस५८मणस्तरय दारीर श ष्टाम.। अबध्यस्य मृगेन्द्रस्य न यथावऋराहये ।।५ एव भूयान् घारानगृजन दानवेश्वरा ।
खाय दानवों के साय नरसिंह का युद्ध में बहुत मृगेन्द्रस्योपरि ऋद्धा निश्वसन्त इवोरगाः ॥६ ते दानवशरा घोरा दानवेन्द्रसमीरिताः । विलयं जग्मुराकाशे खद्योता इव पर्वते ।।७ महर्षि प्रवर सूनजी ने कहा-उस महान् भीषण पुद्ध से दानवो ने नृसिंह भगवान् से युद्ध किया था जिनके नाम ये हैं-खर, पर पुख, मकराशी, विषानन, ईहामृगमुख, वराह मुख, बाल सूर्यमुख, घूमकेतु मुखअई चन्द्राधं मुख,अग्निदीप्तमुख,हस कुक्कुट मुख ब्यादितास्य,मयावह मिहास्य लेलिहान, काक गृध्रमुख, द्विजिह्व, द्विवक्त्र, द्विशोपं, उस्कामुख, महाग्राह मुख प्रादि महान् भीषण मुखाकृतियो वाले बल के घमण्ड से परिपूर्ण दानव थे जो शैल के समान सवमं वाले और दघ के अयोग्य भगवान् मृगेन्द्र के शरीर मे निरन्तर शरो की वर्षा से भी युद्ध मे किश्चिद मात्र भो व्यया न कर सके थे ।। १, २, ३, ४, ५। इसी प्रकार से फिर दूसरी बार उन दानवेश्वरो ने अत्यन्न क्रोधित होकर गर्म श्वास छोडते हुए फुस्वारे करने वाले सों की भांति मृगेन्द्र प्रभु के शरीर के ऊपर दूसरे परम घोर अस्त्रो को छोडा घा॥ ६॥ वे सब दानवेन्द्रो के द्वारा प्रक्षिप्त किये हुए अतीव घोर दानवीय शर पर्वत में खद्योतो की भांति आकाश में जा र पिनय को प्राप्त हो गये थे ॥७॥ ततश्चक्राणि दिव्यानि दंत्या क्रोधसमन्विताः । मृगेन्द्रायासृजन्नाशु ज्वलितानिसमन्तत. 15 तंगसीद्गगनं चक्र: सम्पतद्भिरितस्ततः । युगान्ते तम्प्रकाशभिश्चन्द्रादित्यग्रहैरिव ॥६ तानि सर्वाणिचत्राणिमृगेन्द्रणाशमात्मना । ग्रस्तान्युदीर्णानि तदापावकाचि.समानिव ॥१० तानि चक्राणि वदनं पिशमानानि भान्ति । मेघोदरदरीप्वेद चन्द्रसूर्यग्रहा इव : ११ हिरण्यकशिपुदैत्यो भूयः प्रासृजदूजिताम् ।
मत्स्यपुगण शक्ति प्रज्वलिता घोरां धौतशस्त्रतडित्प्रभाम् ११२ तामापतन्ती सप्रेक्ष्य मृगेन्द्रः शक्तिमुज्वलाम् । हुङ्कारेणव रोद्रेण बभञ्ज भगवास्तदा ॥१३ रराज भग्नासाशक्तिमृगेणमहीतले । स विस्फुलिङ्गा ज्वलिता महोल्केवदिवश्च्युता ॥१४ इसके उपरान्त उन दैत्यो ने महान क्रोध से समन्वित होकर चारों ओर से प्रज्वलित होने वाले दिव्य चको को नरसिंह प्रभु के शरीर पर बड़ी हो शीघ्रता से छोड़ दिये थे ।।८॥ इधर-उधर गिरने वाले उन पक्रो से युग के अन्त मे भली भांति प्रकाश करने वाले च द्र-सूर्य ग्रहो की भांति उस समय में प्राकाश था | अशमात्मा उन मृगेन्द्र (नरसिंह) के द्वारा वे समस्त चक्र उस समय में अग्नि की अथियो के तुल्य ग्रस्त और उदीर्ण होते थे ।।१०11 वे सब चक्र जो दानवो के द्वारा नरसिंह प्रभु पर छोड़े गये थे उन्हीं के मुख में प्रवेश प्राप्त करते हुए मेघोदर हरीयो में चन्द्र-सूर्य ग्रहों के समान शोभा दे रहे थे॥११॥ हिरण्य कशिपु दैत्यराज ने पुनः अत्यन्त प्रज्वलित-१रम घोर-पोत शस्त्र विद्युत की प्रभा से समन्वित अतीव अजित शक्ति का प्रहार नरसिंह भगवान् पर पिपा था ।। १२ ।। उस समय मे अत्यन्त समुज्वल अपने ऊपर आयतन परती हुई शक्ति को देखकर नृसिंह भगवान् ने महान् रौद्र गुहार पोनि से ही उसका भजन पर दिया था ॥१३॥ महीतल मे मृगेन्द्र भगवान के द्वारा भग्न को हुई वह शक्ति विस्फुलिङ्गो से युक्त और प्रग्वलित दिवलोक से घ्युत महोत्रा के समान शोभित हो रही पी॥१४॥ नाराचपइपित सिंहस्य प्राप्ता रेजे विदूरतः । नीलोत्पलपलाशाना मालेबोज्ज्वलदर्शना ॥१५ स गजिस्ता यथान्माय विक्रम्य च यथासुखम् । तरसन्यमप्सारितवान् तृणाप्राणोव मास्तः ।।१६ अन्य दानवों के साय नरसिंह का युद्ध ततोऽश्मवर्ष दैत्येन्द्रा व्यसृजन्त नभोगताः । नगमानैः शिलाखण्डैगिरिशृङ्ग महाप्रभः ।।१७ तदरमव सिंहस्य महन्मूद्ध निपातितम् । दिशादश विकीर्णा दे खद्योतकरा इव ॥१८ सदाश्मोघंर्देत्यगणा. पुनः सिंहमरिन्दमम् । छायायां चक्रिरे मेघा धाराभिरिव पर्वतम् ।।१६ न च तं चालयामासुदैत्योधादेवसत्तमम् । भीमवेगोऽचलश्रेष्ठ समुद्र इव मन्दरम् ।।२० ततोऽश्मवविहिते जलवपमनन्तरम् । धाराभिरक्षमात्राभिः प्रादुरासीत् समन्ततः ॥२१ नृसिंह भगवान् के शरीर पर प्राप्त हुई नाराों को :क्ति से ही नीलोत्पन के पलाशों की उज्वल दर्शन वाली माता के समान दीप्तिमान हो रहो यो ।। १५ ।। नृसिंह महाप्रभु ने न्यायानुसार गर्जना करके और सुखपूर्वक पल-विक्रम दिखाकर नस दानवेन्द्र को सेना को तिनकों के अप्रभागो को वायु की तरह अपसारित कर दिया था ।। १६ ।। इसके उपरान दैत्येन्द्रो ने बाकाश में स्थिति हो। हुए नग मान शिला खण्डो के द्वारा, महती प्रभा मे युक्त गिरि के शृङ्गो के द्वारा पापाणों को वर्षा का विसर्जन कर रहे थे। वह पत्यरों की मह न वर्ण नरसिंह प्रभु के मस्तक पर डाली गयी थी और वह दशो दिशायो मे द्योतों के प्रकरों को भौति विकीर्ण हो गयी यो।। १७,१८॥ अरियो क द रन करने वाले नृमिह प्रभु को फिर उन द-यो क गो ने पावाणो को वष्टि में डाले हुए पत्थरों के द्वारा मेघ मे अपनी वर्षाई हुई जल की धाराओं में पर्वत को ढोक दिया करते है वैसे ही छाया में कर दिया था।।१६। उन दैत्यों के विशाल समुदायों ने देवों में परम थेट नसिंह महा प्रभु को जिस प्रकार से भीम वेग वाला सागर अवलो में श्रेष्ठ मन्दरान को चलायमान कर दिया परता है उसी तरह से चलायमान कर दिया था ।।२०।।
मत्स्यपुराण इसके उपरात उस पाषाणो को की गई वर्षा के अन तर जल की वृष्टि से अक्षमान धारामा के द्वारा चारो ओर से प्रादुर्भूत हो गये थ ॥२१॥ नभस प्रच्युताधारास्तिग्मवेगा समन्तत । आवृत्यसवतो व्योमदिशश्चोपदिशस्तथा ॥२२ धारा दिवि च सवन वसुधायाश्च सवश । न स्पृशन्ति च ता देव निपतन्तोऽनिश भुवि ।।२३ बाह्यतो ववृषुधष मोपरिप्टाच्च ववृषु । मृगेन्द्रप्रतिरूपस्य स्थितस्य युधि मायया ॥२४ हतेऽश्मवर्षे तुमुले जलवर्षे च शोषिते । सोऽमृजद्दानवो मायामग्निवायुसमीरिताम् ॥२५ महे द्रस्तोयदै साद्ध सहस्राक्षो महाद्युति । महता तोयवर्पण शमयामास पावकम् ॥२६ तस्मा प्रतिहताया तु मायाया युधि दानव । अमृजत् घोरसकाश तमस्तोत्र सम तत ७ तमसा सवृते लोके दत्यप्वात्तायुधेपु च । स्वतजसा परिवृतो दिवाकर इवावभौ ॥२८ आकाश से अत्यन्त तीन वेगा वाली गिरी हुई धाराऐ चारों ओर से आवृत परवे सभी व्योम शिया और उप दिशाओ को घेर करके हो रही थी तथा शिवलोक मे और सवत्र पश्वी मै निर तर गिरती हुई वे घाराऐ इस भूमण्डस मे उन नृसिंहदेव का फिर स्पश नहीं कर रही पी।। २, २३ ।। वे धाराए वाहिर से ३५ रहीं पी वितु उनके कार ये नहीं वरस रही थी उस युद्ध स्थल में एक मृगेन्द्र प्रतिस्प धारण रोवाल प्रभावी माया । उस तुमुल पाषाणोपी प पे हत होने पर तपाजली वर्षात एपदम गोपिरान पर पिर उस दानव ने पनि और वायु ग समोरित माया | पुजा पिया पा॥२४, २५।।
अय दानवी के साथ नरसिंह का युद्ध ३३ उस समय में महान धुति वाले सहस्राक्ष महेन्द्रदेव ने जलदो के द्वारा महान् जल की वृष्टि से उस मायाकृन अग्नि का शमन कर दिया था। जब वह माया भी प्रतिहत करदी गई तो उसके पीछे युद्ध में उस महा- दानव ने चारों ओर में महान् घोर तम का वही हो तीव्रता के साथ विशेष रूप से सृजन किया था ॥ २६, २७ । सम्पूर्ण लोक तम से जब परिवृत हो गया था तो उस समय में युधो के धारण करने वाले उन देत्या के विशाल समुदाय में वह महाप्रभू नृसिंहदेव अपने ही तेज से परिवृत्त होकर दिवाकर के समान शोभा सम्पन्न होगये थे ॥२८॥ लिशास्त्रा भृकुटीञ्चाम्य ददृशुर्दानवा रणे। ललाटस्था त्रिशूलाझा गङ्गा त्रिपथगामिव १२६ तत सर्वासु मायासु हतासु दितिनन्दना । हिरण्यकशिपु दंत्य विवर्णा शरण ययु ॥३० तत प्रज्वलित. मोधात् प्रदहन्निव तेजसा। तस्मिन् कद्ध तु दंत्येन्द्र तमाभूतमशूज्जगत् ।।३१ भावाह प्रवचव विवहोऽय [ दावहः ! परावह सवहश्च महावलपराधमा ॥३२ तथा परिवहः श्रीमानुत्पातभयशसना. । इत्येव क्षुभिताः सप्त मरुतो गगनेवग ।।३३ ये महा सर्वलोकस्य क्षये प्रादुभवनि वै । ते सर्वे गगने दृष्टा व्यचरल यथासुखम् ॥३४ अन्यङ्गते चाप्यचरन्मार्ग निशि निशाचर.। सग्रहः सहनक्षत्र राकापतिररिन्दम. ॥३५ रपस्यल में स्थित दानवो ने फिर इन नृसिंह प्रभु को तीन पासाओं वाली भृकुटी का त्रिशूल से अद्वित ललाट प्रदेश मस्थित विषय गामिनी गङ्गा की भांति दर्शन क्यिा था। इसके अनातर जब सभी को गयो मायाऐ हत हो गयी थी तो वे सब दिति पुत्र महादस्य गण विवर्ण मस्य पुराण नद्यश्च प्रतिकूलानि वहन्ति कलुपोदकाः । म प्रकाशन्ति च दिशो रक्तरेणुसमाकुलाः ।।४८८ वानस्पत्यो न पूज्यन्ते पूजनार्दो कथञ्चन । वायुवेगेन हन्यन्ते भज्यन्ते प्रणमन्ति च ॥४६ ज्योतिष के अनुसार युगान्तकारी महान् मीपण ग्रहों की स्थिति जो उस समय हुई थी-यह जत्तला कर उसका प्रतिपल बतलाते हुए कहते हैं कि समस्त देवो का भी जो देव है वह भी इस भोपण ग्रहो की स्थिति के कारण रक्त को वर्षा कर रहा था और गगन से महान् घोर ध्वनि करने वाली विद्युत् के स्वरूप में स्थित उस्काओ का पतन हो रहा था ॥४३॥ अकाल मे ही सब वृक्ष पुष्प और फल देने वाले हो गये थे जो कि महान् उत्पात के सूचक थे । सम्पूर्ण लताएं भी फ्लो से युक्त हो गई थी जो देस्यो के विनाश को स्पष्ट तया बतला रही थी||१४|| फलो मे से फल और पुष्पो के द्वारा पुष्पो को उत्पत्ति हाने लग गयी थी। ये सब उन्मीलित और निमीलित हुआ करते थे तथा कभी २ मते थे और किसी समय मे रुदन करने वाले थे। ये सब महा विनाश की सूचना करने वाले हो गये थे ॥४५॥ समस्त देवो की प्रतिमाएं जो अति गम्भीर घी-धूमित बना रही थी और प्रज्वलित हो जाया करती थी। ये सभी महान भय के समागम को प्राट कर रही थी और महान असगुन को ज्ञात कराती थी। ग्राम्य पशुगण और पक्षिवृन्द आरण्यक ( जगली ) पशु-पक्षियो के साथ समुष्ट हाने लगे थे। वहा पर अपन्न भैरव उपस्थित मह न युद्ध करने लगे थे । क्लुपित जलो से युक्त होकर सभी नदियाँ प्रतिवूल रूप से बहने लगी थी। सभी दिशाएं लाल वर्ण की रेणुओ से समाकुल होकर प्रकाश नहीं करने वाली हो गई थी। पूजन करने के याग्य वनस्पतियां किसी भी समय में पूजित नहीं हो रही थी और वायु घे वेग से वे सब हन्य- मान-मजन शोल और नीचे को और भुकी हुई हो गई थी ॥१६॥ ॥४७,४८,४६॥
अन्य दानदो के साथ नरसिंह का युद्ध
यदा च सर्वभूतानां छाया न परिवर्तते।
अपह्णगते सूर्य लोकाना युगसक्षये ॥५०
तदा हिरण्यकशिपोर्दत्यस्योपरि वेश्मनः ।
भाण्डागारे युधागारे निविष्टमभवामधु १५१
असुराणा विनाशायसुराणाविजयाय च ।
दृश्यन्ते विविधोत्पाता घोराघोरनिदर्शना ॥५२
एते चान्ये न बहवो घोरोत्पाताः समुत्थिताः ।
दंत्येन्द्रस्य विनाशायदृश्यन्तै कालनिर्मिताः ॥५३
मेदिन्या कम्पमानाया दंत्येन्द्रण महात्मना ।
महीधरा नागगणा निपेतुरमितौजस ॥५४
विपज्वालाकुलर्वज्ञवत्र विमुञ्चन्तो हुताशनम् ।
जातु शीपाः पनाशी सप्तशीपश्चपन्नगाः १५५
वासुकिस्तक्षकश्चोय कर्कोटकघनञ्जयो ।
एलामुख, कालिकश्च महापश्च वीर्यवान् ।।५६
सहस्रशी नागाचं हेमतालध्वजः प्रभुः ।
शेषाऽनन्तोमहामागो दुष्प्रकम्प्य प्रकाम्पत. 1 ५७
दीनान्यन्तजलस्थानि पृथिवीधरणानि च।
तदा क्रुढेन महता कम्पितानि समन्ततः ॥५८
जिस समय में समस्त प्रणियो को छम्या परिवतित नहीं होती है
और लोको के युग सक्षय में सूयं भगवान् अपराह्न गन हो जाया करने
हैं ॥५०॥ उम समय में दैत्यराज हिरण्य कशिपु के निवास-गृह के ऊपर
भाण्डागार और आपुधापारये मधु निविष्ट हो गया था 1५111 घोर
निदर्शन वाले विविध भांनि दे स्वरूप वाले महान् उत्यात इन असुरों के
विनाश के लिय तथा देवगणो की विजय प्राप्त होने के लिये दिखलाई दे
रहे थे ॥५२॥1 अन्य भी और वो बहुत से अत्यन्त पोर उत्पात उठ खड़े
हुए थे ये सब वाल दलार द्वारा विनिमिन उस दै-न्द्र र सर्व तो भाष
मत्स्यपुराण से विनाश के लिये हो दिखलाई दे रहे थे ॥५३।। उस महान आत्मा वाले दैत्येन्द्र के द्वारा कम्पायमान इस मेदिनी मे आमत ओज से सम्पन्न महीधर और नागगण गिर गये थे ॥५४॥ चार शीर्ष वाले-पांच फण्यों से मुन्क और सात मस्तको पाले पन्नग (सर्प विष की ज्वालाओं से समाकुल मुखो से हुताशन का विमुञ्चन कर रहे थे। प्रमुख पन्नगों मे वासुकि-तक्षक-कर्कोटक-धनञ्जय-एलामुख-कालिक और महान वीर्य- शाली महापद्म एव सहस्र शीर्षों वाला- मग-हेमताल ध्वज -प्रभु शेप और महाभाग अनन्त-दुष्प्रकप्य-प्रकम्पित-जल के अन्दर स्थित रहने वाले दोप्त और पृथिवी धारण थे। उस समय मे सब चारों ओर मे महान् ऋद्ध उसके द्वारा कम्पित हो गये थे ॥ ५५ ॥ ५६ ।। ५७॥ ५५ ॥ नागास्तेजोधराश्चापि पातालतलचारिणः | हिरण्यकशिपुर्देत्यस्तदा सस्पृष्टवान्महीम् ॥५६ सन्दष्टौष्टपुटः क्रोधाद्वाराह इव पूवजः । नदी भागीरथी चव सरयू: कौशिकी तथा ।।६० यमुना त्वथ कावेरी कृष्णवेणी च निम्नगा। सुवेणा च महाभागा नदी गोदावरीतथा ।।६१ चर्मण्वती च सिन्धुश्च तथा नदनदीपतिः । कमलप्रभवश्व शोणोमणिनिभोदकः ॥६२ नमंदा शुभतोया च तथा वेभवती नदी । गोमती गोकुलानी तथा पूर्वसरस्वती ।।६३ मही कालमही नैव तमसा पुष्पवाहिनी। जम्बूद्वीप रलवट सवरत्नोपशोभितम् ॥६४ तेज धारण करने वाले और पाताल तल मे सचरण करने पाने नाग भी पम्पायमान हो गये थे। उस समय मे दैत्यराज हिरण्य रशिपु ने इस मही की मस्पर्श किया था और यह क्रोध से अपने होटो को अन्य दानवो के साथ नरसिंह का युद्ध कारता हुआ पूर्वज वाराह की भांति हो गया था। समस्त नद और नदिया भी प्रकम्पित हो गये थे जिनके प्रमुख नाम ये है-भागीरथी नदी-सरयू- कशिकी-यमुना--कावेरो-कृष्ण वेणी निम्नगा-सुवेगा--महाभागा गोवरी नदी-चर्मवती-मिन्घुनद -नद नदीपति-कमल प्रमन और मणि के सदृश स्वच्छ जल वाला शोणनद-शम तोया नर्मदा-वेत्रवती नदी- गोमती- गोकुलाकीर्णा तथा पूर्व सरस्वनी-मही-वालमही-तमसा और पुष्प वाहिनी ये सभी नद और नदिया प्रकम्पित हो गये थे। जम्बू द्वीप और सब प्रकार के रत्नो से उपशोभित रत्नव भी कम्पापटमान थे। ॥५६, ६०, ६६, ६२, ६३, ६४. सुवर्णप्रकटञ्चैव सुवर्णाकरमण्डितम् । महानदञ्च लौहित्य लकाननशाभितम् ॥६५ पतनं कोशकरण ऋपिवारजनाकरम् । मागधाश्च महापामा मुडाः शुङ्गास्तथैव च ॥६६ सुह्मा मल्ला विदेहाश्च मालवा. काशिकोसला:। भवन वैनतेयस्य दत्येन्द्रणाभिकम्पितम् ॥६७ कैलासशिखराकार यत् कृत विश्वकमणा। रक्ततोयो महाभीमो लौहित्यो नाम सागरः ॥६८ उदयश्च महाशैल उच्छिन शतयोजनम् । सुवर्णवैदिक. श्रीमान् मेघडक्तिनिपेवित ॥ भ्राजमानोऽकसदृशेर्जातस्ममयंद्रमैः । शाल स्तारतमालश्च कणिकारश्च पुष्पित. ॥६६ सुवर्ण के अाकरो (खानो) से मण्डित मुवर्ण प्रकट तथा शैल और काननो से शोमा मयुत लौहित्य महान्-अपि और वीरजनो की खान कोश करण पत्तन-मागध-महाग्राम-मुड तथा शुङ्ग-मुहा-पल्ला-विदेहलव- काशी-कोसल और वैनतेय का मदन ये सब देश और म्यल उस दैत्येन्द्र हिरण्य कशिपु के द्वारा अभिकम्पित होगये थे ॥६५, ६६, ६७, यह भवन मत्स्यपुराण क्लास पर्वत की शिखर के समान यापार वाला था और विश्वकर्मा के द्वारा इसकी रचना की गयी थी। महान् भीम स्वरूप वाला जिसका जलरक्त वण का था ऐसा लोहित्य नाम वाला सागर - उदय महाशैल जिसकी सो योजन ऊँचाई थी-मेघो की पत्तियो से निपेविन सुवर्ण वेदिक जो पुष्पित वर्णिकार, शाल, ताल, तमाल, सूर्य के सदृश जात रूपमय द्र मो से भ्राजमान था ॥६६, ६६|| अयोमुखश्च विख्यात सर्वतो धातुमण्डितः । तमालवनगन्धश्च पर्वतो मलय शुभ ॥७० सुराष्ट्राश्च सवाल्हीका शूराभीरास्थैवच १७१ भोजा पाण्डयाश्च वगाश्च कलिङ्गास्ताम्म्रलिप्तका ।।७२ तर्थवोड्राश्च पौण्ड्राश्च वामचूडा सकेग्लाः । क्षोभितास्तेन दैत्येन सदेवाश्चाप्सरोगणा ॥७३ अगस्त्यभवनञ्चैव यदगम्यवृत पुरा सिद्धचारणसपश्च विप्रकीर्ण मनोहरम् ।७४ विपिनानाविहग सुपुष्पितमहाद्रुमम् । जातरूपमय शृङ्गगगन विलिखन्निव ॥७५ चन्द्रसूर्या शुसद्धाशै सागराम्बुसमावृते. । विद्युत्वान् सर्व श्रीमानायत शतयाजनम् ।७६ विद्युता यत्र सड्याता निपात्यन्ते नगात्तमे । पभ पवतश्व श्रीमान् वृषमसहित ७७ अयोमुख परम विख्यात था जो सभी ओर से धातुओ से मण्डित था तथा तमाल के वनो की गन्ध से युक्त मलय पर्वत परम शुभ था । सुराष्ट्र-वाहीक-गर- आभीर-भोज-पाण्डय - वङ्ग-वलिङ्ग- ताम्रलिप्त-उग-पौण्ड--वाम चूड-करल इन सब देशा को उस दैत्य ने क्षोम युक्त बना दिया था और देवो वे सहित अप्सराओ के समु. दायो वो भी क्षुग्ध कर दिया था ॥७०,७१, ७२, ७३1 अगस्त्य भवन अन्य दानवो के साथ नरसिंह का युद्ध जो कि पहिले अगम्य कर दिया था वह सिद्ध-चारणों के समूहों से विप्रकोणं योर अत्यन्त मनोहर या ।।७४। उसमें विचित्र भांति के अनेक विहग रहते ये तथा सुन्दर पुष्पों से युक्त महान् वृक्ष लगे हुए थे। उसके सूवर्णमय शिखर इतने ऊचे थे मानो वे गगन को लिखित बना रहे हैं । 1७५॥ वह सागर के जलो से समावृत चन्द्र सूर्य की किरणो के सदृश विद्य त वाला शोमा से सुसम्पन्न सो योजन पर्यन्त आयति वाला या । जिस नगोतम पर विद्य तो फे सघातो का निपातन किया जाता था ऋपम और प्रो सम्पन्न वृषभ संज्ञा वाला पर्वत था ||७५, ६७॥ कुञ्जरः पर्वत. श्रीमानगस्त्यस्य गृह शुभम् । विशालाक्षश्च दुधपः सर्पाणामालय पुरी ॥७८ तथा भोगवतीचापि दत्येन्द्रणाभिकम्पिताः । महामेनो गिरिश्चैव पारियात्रश्च पर्वतः ।।७६ चक्रवाश्च गिरिश्रेष्ठो वाराहरीव पवत. । प्रागज्योतिपपुरज्चमापि जातरूपमय शुभम् ।।८० यस्मिन्वसति दुप्टात्मा नरको नाम दानवः । विशालाक्षश्च दुर्व्ह'पो मेघगम्भीरनिस्वनः॥८१ पप्टिस्तन सहस्राणि पर्वताना द्विजोत्तमाः । तरुणादित्यसकाशो मेरुस्तत्र महागिरिः ।।२ यक्षराक्षसगन्धर्वनित्यं सेवितकन्दरः। हेमगर्भो महाशैलस्तथा हेमसम्बोगिरि.॥८३ कलासश्चैव शैलेन्द्रो दानवेन्द्रण कम्पिता:। हेमपुष्परसक्षेत्र तेन वखानसं सरः !!८४ थी से सम्पन्न कुजर पर्वत अगस्त्य का परम शुभ गृह या भोग- वती भी उस दैत्येन्द्र के द्वारा अभिकम्पित हो रही थी। महासेन पर्वत- पारियाव मिरि-चक्रवान् श्रेष्ठ गिरि-वाराह पर्वत-प्रामज्यो-िपपुर जो परम शुम और जातरूप मय था। जिसमे दुष्ट आत्मा वाला नरक नाम-
मत्स्यपुराण
धारी दानव निवास किया करता था वह मेघ ये समान गम्भीर ध्वनि वाला
दुधपं विशालाक्ष पा ७,७६, २०, २॥ हे त्रिोत्तमो! वहा पर
साठ हजार पर्वत थे और वहा तरुण आदित्य के सह महान् गिरि मेह
था ।।२।। यक्ष-गन्धर्व-राक्षसो के द्वारा नित्य ही जिसकी बन्दाओं
का सेवन किया जाता था वह महान शैल हेम गम पा तथा हेम सघा
गिरि था1८३11 ये समस्त महा शैल और चैलो का प्रमुख स्वामी बैलास
को भी उस दानवेन्द्र ने कम्पित कर दिया था । उसने हेम पुष्प रस क्षेत्र
खानस सरोवर को भी प्रकम्पित कर दिया था ।1८४||
कम्पित मानसीव हसकारण्डवाकुलम् ।
त्रिशृङ्गववतञ्चय कुमारी च सरिद्वरा ॥९५
तुपारचयसञ्चन्ना मन्दरश्चापि पवत ।
उशीरबिन्दुश्च गिरिश्चन्द्रप्रस्थस्तथाद्रिराट ।।८६
प्रजापतिगिरिश्व तथा पुष्करपवत.।
देवाभ्रपर्वतश्चैव यथाव रेणुकोगिरि ॥८७
कौञ्च सप्तपिशैलश्च धूम्रवर्णश्च पवत. ।
एते चान्ये च गिरयो देशा जनपदास्तथा ।
नद्य ससागग सर्वा सोऽकम्पयत दानव ।
कपिलश्च महीपुत्रो व्याघ्रवाणीव कम्पित ॥
खेचराश्च सतीपुत्रा. पातालतलवासिन ।
गणस्तथा परोरौद्रो मेघनामाकुशायुध १६०
ध्वगो भीमवेगश्च सव एवाभिकम्पिता।
गदी शूली करालश्च हिरण्यकशिपुस्तदा ॥६?
हसों और कारण्डवो से समाकुल मानस सरोवर को भी कम्पाय
मान कर डाला था । त्रियङ्ग पर्वत, सरिताओ मे परम श्रेष्ठ, तुषार के
समुदाय से सञ्छन्त कुमारी नदी, मन्दर पव त, उशीर बिन्दु गिरि,
अद्रियों का राजा चन्द्रप्रस्थ, प्रजापति गिरि, पुष र पर्वत, देवान्न पर्वत
अन्य दानवो के साथ नरसिंह का युद्ध
रेणुक गिरि, क्रौञ्च, सप्तपि, शल, धूम्रवर्ण पर्वत, तथा अन्य गिरिगण,
देश तथा जनपद, सागरो के सहित समस्त नदियो भादि को उस महा
दानव ने कम्पित कर दिया था। मही का पुत्र कपिल और व्याघवान्
पर्वत को भी कम्पायमान बना दिया था ॥५,८६,८७, ८८, ८६
खेचर, सतीपुत्र, पाताल तल के निवासि गण, पर रोद्र, मेघ नाम वाला
अकुशायुध, कवंग और भीम वेग ये सभी अभिकम्पित हो गये थे । उस
समय मे हिरण्य कशिपु गदा के धारण करने वाला, शूलधारी और महान्
कराल हो गया था ।1६०, ६१॥
जीमूतघनसङ्काशो जीमूतघननिस्वनः ।
जोपृतघननि?पो जीमूत इव वेगवान् ॥६२
देवारिदितिजो वीरो नृसिंह समुपाद्रवत् ।
समुत्पत्य ततस्तीक्ष्णमृगेन्द्रेण महानख. ॥६३
तदोङ्कारसहायेन विदार्य निहतोयुधि ।
मही च कालश्च वशी नभश्च ग्रहाश्च सूर्यश्च दिशश्च सर्वाः ।
नद्यश्च शैलाश्च महाणवाश्च गता. प्रतादन्दितिपुत्रनाशात् ।।६४
तत प्रमुदिता देवा ऋषयश्च तपोधना ।
तुष्टुवुर्नामभिदिव्यरादिदेव सनातनम् ॥६५
यत्वया विहित देव । नारसिंहमिद वपु ।
एतदेवामिप्यन्ति परावरविदोजना ॥६
भवान् ब्रह्मा च रद्रश्च महेन्द्रो देसतमा ।
भवान् कर्ता विकर्ता च लाकाना प्रभवाप्यय ॥६७
पराञ्च सिद्धाञ्च पररुच देव परञ्च मन्त्र परम हविश्च ।
परञ्च धर्म परमञ्च विश्व त्वामाहुरय पुरप पुराणम् ।।६८
उस हिरण कशिपु का स्वरूप उस काल म जीमूत कृष्णमेघ क
समान था और मेघ के ही तुल्य घोर ध्वनि वाला वह था। उसको घोर
४४ मत्स्यपुराण गर्जना भी मेघ के ही तुल्य थी तथा जीमूत के समान ही वेग से युक्त या ॥१२॥ इस प्रकार के स्वरूप वाला वह दिति का पुत्र और देवो का शत्रु था उस वीर ने नृसिंह महाप्रभु पर आक्रमण किया था। इसके अनन्तर उसी समय मे ओङ्कार की सहायता वाले मृगे द्र नै उछाल मारकर अपने परम तीक्ष्ण विशाल नषो से उस दानवेन्द्र हिरण्य कशिपु को पाड कर विदीर्ण कर दिया था और नसिंह प्रभु के द्वारा यह युद्ध में निहत हो गया था। दिति पुत्र के विनाश हो जाने से यह मही-काल- वशीनम-सूप-सम्पूर्ण ग्रह-समस्त दिशाऐ-नदिया-शैल और महासागर सब परम प्रसन्नता को प्राप्त हो गये थे ॥६३१४॥ इसके पश्चात सब देव वृन्द-ऋषिवग और तापस गण परम प्रमुदित हो गये थे और फिर उन्होने दिव्य नामो के द्वारा उन सनातन आदि देव का स्तवन किया था ॥६५॥ उन्होने कहा-हे देव । आपने जो यह नारसिंह वपु धारण किया है आपके इसी स्वरूप का परावर वेत्ता जन अर्चन किया करेंगे ॥६६॥ ब्रह्माजी ने कहा-हे भगवन् । पाप ही ब्रह्मा-रुद्र-महेन्द्र और परम श्रेष्ठ दव हैं। आप ही इन लोकों के कर्ता-विकर्ता-प्रभव और अप्यय हैं ॥६७ ॥ आपको ही परम सिद्ध-परात्पर देव-परम मन्त्र-परम हवि-परम धर्म-परम विश्व और सबसे प्रादि मे हाने वाले पुरातन पुरुष बह्ते हैं ॥१७॥ पर शरीर परमञ्च ब्रह्म परञ्च योग परमाञ्च वाणीम् । पर रहस्य परमाङ्गतिञ्च त्वामाहुरग्य पुरुप पुराणम् ।।६६ एव परस्यापि पर पद यत् पर परस्यापि परञ्च देवम् । पर परस्यापि परञ्च भूतन्यामाहुरय पुराणम् ॥१०० पर परस्यापि पर निधान पर परस्यापि पर पवित्रम् । पर परस्यापि पर दान्त त्वामाहुरग्य पुष्प पुराणम् ।।१०१ एवमुक्त था तु भगवान सवलोव पितामह । रतुत्वा नारायण देव ब्रह्म गोय गत प्रभुः ॥१०२
अन्य दानवो के साथ नरसिंह का युद्ध
१५
तप्तो नदतमु तूर्येषु नृत्यन्तीवमर.सु च ।
क्षीरोदस्यात्तर कूल जगाम हरिरीश्वरः ।।१०३
नारसिंह वपुर्देव. स्थापयित्वा सुदीप्तिमत् ।
पौराण रूपमास्थाय प्रययौ गरुडध्वजः ॥१०४
अष्टचक्रेण यानेन भूतयुक्तेन भास्वता।
अव्यक्तप्रकृतिदवः स्वस्यान गतवान् प्रभुः ॥१०५
हे भगवन् ! आपको हो परम शरीर-परम प्रहा-परमयोग-परम
वाणी-परम रहस्य तथा परम गति एव आद्य पुराण पुरुष कहा करते
हैं । इस प्रकार से जो परकामी परम पद है और परकामी परम देव है
तथा परकामी परमभूत है उस आद्य पुरुष एवं परम पुराण आपको ही
कहते हैं । ६६ | १००। इसी भांति परकामी परम निधान-परकामी
परम पवित्र तथा परसेवी परम दान्त आच पुराण पुरुप आपको हो कहते
हैं ॥१.१। इस रोति से समस्त लोको के पितामह भगवान ने नारायण
देव का स्तवन करके प्रार्थना की और फिर वे प्रभु अपने ब्रह्मलोक को
वापिस चले गये थे ॥१०२॥ इसके अनन्तर तृयों के धोप होने पर और
अप्सराओ के नृत्य होने पर ईश्वर श्री हरि क्षीरसागर क उत्तर कूल पर
गमन कर गये थे ।।१०३॥ देवेश्वर ने सुदीति से युक्त नारसिंह वधु
को स्थापना कराकर फिर गरुडध्वज प्रभु पौराण स्वरूप में समास्थित
होकर प्रयाग कर गये थे। भूतयुक्त-मास्वान आठ चक्रो वाले यान
के द्वारा अव्यक्त प्रकृति देव प्रभु अपने स्थान को चले गये थे। १०४
॥ १०५॥
४६
मत्स्यपुराण
६४-मनुमत्स्य संवाद वर्णन
पद्मरूपमभूदेतत् कथ हेममय जगत् ॥१
कथञ्च वैष्णवी सृष्टि पद्ममध्येऽभवत्पुरा ॥र
श्रुत्वा च नरसिंह माहात्म्य रविनन्दन ।
विस्मयोत्फुल्लनयन: पुन प्रप्रच्छकेशवम् ॥३
कथ पाय महाकल्पे तव पद्यमय जगत् ।
जलाणवगतस्येह नाभी जात जनार्दन ॥४
प्रभावात् पद्मनाभस्य स्वपतः सागराम्भसि ।
पुष्करे च कथ भूत। देवा सपिंगणा पुरा ।।५
एनमाख्याहि निखिल योग योगविदाम्पते ।
शृण्वतस्तस्य मे कीर्ति नंतृप्तिस्पजायते ॥६
पिपता चैव कालेन शेते व पुरुषात्तम ।
कियन्त वा स्वपिति च कोऽस्य कालस्य सम्भव ॥७
ऋषिगण ने कहा- हमारी यह प्रार्थना है कि सृष्टि रचना को
कुछ और अधिक विस्तार के साथ माप वर्णन कीजिए ॥ १, २ ॥ यह
सम्पूर्ण जगत् विस प्रकार से हेममय पद्म के स्वरूप वाला हो गया था
मौर पहिले उस पद्म के मध्य मे यह वैष्णवी सृष्टि किस प्रकार से हुई
पी॥ ३ ॥ महा महापि श्री मूतजी ने कहा- रविनन्दन ने प्रभु नारसिंह
पे माहात्म्य का श्रवण करके विस्मय रो उत्फुल्ल नेत्रो वाला होकर पुन.
उसने बेशव प्रभु से पूछा या ।'४ ॥ मनु ने कहा- हे जनार्दन ! पाद्म
महा पल्प में जिम समय में माप जलापंव में लीन होकर स्थित थे तब
मह पदममय जगत् आपषी नापि से किस प्रकार उत्पन्न हुआ था?
मागर के जल में शयन करने वाले पदमनाभ प्रभाव से उम पुप्पर
में पहिल देव-शपिगण और समस्त भूत पिस रीति से समुहाल हुए थे
॥५॥ हे योग में वेतापी व स्वामिन् ! इस सम्पूर्ण योगरा वर्णन
मनुमत्स्य सवाद वर्णन
१८७
कृपा करके कीजिए ! उसकी कोत्ति का श्रवण करने वाले मेरे हृदय की
तृप्ति नहीं हो रही है। पुरषोत्तम प्रभु क्तिने लम्बे समय से वहां पर
शयन किया करते हैं और किस काल पयन्त शयन करते रहते हैं । इस
काल की उत्पत्ति क्या है? ॥६, ७॥
कियतावाथ कालेन ह्य तिष्ठति महायशा ।
कथञ्चोत्थाय भगवान् सृजते निखिलजगत् ।।
के प्रजापतयस्तावदासन पूर्व महामुने ।।
कथ निमितवाश्चैव चित लोक सनातनम् ॥६
प्रथमेकार्णवे शून्ये नष्टस्थावरजङ्गमे ।
दग्धदेवासुरनरे प्रनष्टोरगराक्षसे ॥१०
नष्टानिलानले लोके नप्टाकाशमहीतले ।
केवल गह्वरीभूते महाभूतविपर्यये ॥११
विभुमहाभूतपतिमहातेजा महाकृतिः।
आस्ते सुरवरश्रेष्ठो विधिमास्थाय योगचित् ।।१२
श्रृणुया परया भक्त्या ब्रह्मन्नेतदशेपत ।
वक्त मर्हसि धर्मिष्ठ । यशो नारायणात्मकम् ॥१३
यह महान् यशस्वी प्रभु कितन काल मे वहाँ पर उत्थित हुआ
फरते हैं और किस प्रकार से उठकर इस सम्पूण जगत् का सृजन भगवान्
किया करते हैं ? हे महामुने । पहिले कौन प्रजापति थे और इस अत्यन्त
विचित्र जगत् तथा सनातन लोक का पिस प्रकार से निर्माण किया था।
॥८,६॥ प्रथम इस एक मात्र भार्णव मे जव कि सभी स्थावर और
जङ्गा नष्ट होकर यह एकदम शून्य था और सब देव- असुर एव नर
दाध हो गये थे तथा उरग और राक्षस भी सब नष्ट हो गये थे। अनित
और अनल भी विनष्ट हो गय थे । लोक मे आकाश एव महीतल का
नाम निशान भी नहीं था। महाभूतों के विपर्यय हो जाने पर यह केवल
एक गह्वर के तुल्य ही था । उस समय में महान् आकृति वाले-महान्
४८
मत्स्यपुराण
तेजस्वी-सुरवरों में परम घg-महाभूतो के स्वामी-योगवेत्ता विभु
विधि मे समास्थित होकर थे ।। १०, ११, १२ ॥ हे ब्रह्मन् ! मैं परम
भक्तिपूर्वक पूर्णरूप से इस सबको श्रवण करना चाहता हूँ। हे धम्मिष्ठ !
आप इस नारायण के ही स्वरूप वाले परम यश का वर्णन करने के योग्य
होते हैं ।।१३।।
श्रद्धया चोपविष्टाना भगवान् ! वक्तुमर्हसि ।
नारायणस्य यशस श्रवणे या तव स्पृहा ।।१४
तद्वश्यान्वयभूतस्य न्याय्य रविकुलपभ!।
शृणुष्वादिपुराणेषु वेदेभ्यश्च यथा तम् ॥१५
ब्राह्मणानाञ्च वदता श्रुत्वा वै सुमहात्मनाम् ।
घथा छ तपसा दृष्ट्वा वृहस्पतिसमद्य तिः ॥१६
पराशरसुत. श्रीमान् गुरुद्वैपायनोऽब्रवीत् ।
तत्तेऽह कथयिष्यामि यथाशक्ति यथाथ ति ।।१७
यद्विज्ञातु मया शक्यमृपिमालोण सत्तमाः ।।
कः समुत्सहते ज्ञातु पर नारायणात्मकम् ॥१८
विश्वायनश्च यद्ब्रह्मा न वेदयति तत्त्वत.।
तत्वम्म विश्ववेदाना तद्रहस्य महर्षिणाम् ॥१६
तमीज्य सर्वयज्ञाना तत्तत्त्व सर्वदर्शिनाम् ।
तदध्यात्मविदा चिन्त्यनरकन विवामिणाम् ।।२०
अधिदेवञ्च यवधियज्ञ सुसज्ञितम् ।
तद्भूतधिभूतञ्च तत्पर परमपिणाम् ॥२१
हम सर श्रमाये साप अयण परने के लिए पर समुपस्थित है
माप अब रहने की कृपा वीपिए क्योंकि इसके वर्णन करने की पूर्ण
क्षमता रयते है । मस्त भगवान ने कहा-जो यह आपसी स्पहा भगवान्
मारायन में पा को श्रवण करने की समुहान हुई है वह है रविकुलपम!
सीर में होने पासे पाय में उत्पन आपकी बहत उषित ही है।
मनुमन्य सदाद वर्णन ४६ देदों से तया आदि पुरतों में जिस प्रकार से सुना पसा है उसका अब पवन करो॥ १४, १५॥ सुन्दर बोर महान जाला बाते बोलते हुए बानो का कपन सुनकर बोर वृहस्पति के समान ति वाले, पारागर के पुन्न धीमान गुरु पान ने जिस प्रकार से वार्या के द्वारा देख कर बोला या उसी को मैं अपनी शक्ति और धवन के अनुसार आपको सब कहूंगा ।। १६, १७ ॥ हे वमो! ऋषि मात्र मेरे द्वारा जो भी जाना जा सकता है उस परम नारायण के स्वरूप को मन्य कोन जानने का उत्साह कर सकता है ॥ ॥ विश्व जिसको अपन बनाता है वह ब्रह्माजी तात्त्विक रूप से जिसको नहीं जानते हैं । विश्व वेदो का यह कम्म मह. पियों के लिये भी एक रहस्य हैं। सब यज्ञों के यजन करने के योग्य वह सर्व दशियों का वल है। वह अध्यात्म के वेताओं के चिन्तन के योग्य विषय है और विम्मियो का नरक नहीं है । वह अधिदैव और अधियज्ञ सज्ञा से युक्त एवं वह भूत मधिभूत है तथा परमषियो का वह परम है ॥ १६,२०,२॥ स यज्ञो वेदनिर्दिष्टस्तत्तपः कवयो विदु.। यः कर्ता कारको बुद्धिमनः क्षेत्रज्ञ एव च ॥२२ प्रणव. पुरुषः शास्ता एकश्चेति विभा यते। प्राणः पञ्चविधश्चैव ध्रुव अक्षर एव च ॥२३ कालः शाकश्च यन्ता पहष्टास्वाध्यायएव च। उच्यते विविधदेवः स एवाय न तत्परम् ॥२॥ स एव भगवान् सर्व करोति विकरोति च । सोऽस्मान कारयते सर्वात सोऽत्येति व्याकुलीकृतान्॥२५ यतामहे तमेवाद्यन्तमेवेच्छाम निवृता.। यो वक्ता यच्च वक्तव्य यच्चाहन्तद्ब्रवीमि वः ॥२६ धूयते यच्च वै श्राव्य यञ्चान्यत् परिजल्प्यते। या.कथाश्च व वर्तन्ते च तयो वाथ तत्पराः ॥२७ मत्स्यपुराण विश्वं विश्वपतिर्यश्च स तु नारायण. स्मृतः । यत् सत्यं यदमृतमक्षर पर यत् यद्भूत परममिद च यद्भविष्यत् । यत् किञ्चि रमचर यदस्ति चान्यत् तत् सर्व पुरुषवर प्रभुः पुराणः ।। २८ वह वेदो के द्वारा निर्दिष्ट यज्ञ है और कविगण उसको तप कहते हैं | जो कर्ता-कारक-बुद्धि-मन-क्षेत्रज्ञ-प्रणव-पुरुष-शास्त्र और एक ही विभावित होता है। पांच प्रकार का प्राण-ध्रुव और अक्षर है । काल-शाक-यन्ता-दृष्ट' और स्वाध्याय है। विविध देवी के द्वारा वह देव कहा जाता है और यह वह ही है उससे पर कोई नहीं है। वह ही भगवान् सब कुछ किया करते हैं और बिगाडते हैं। वह इन सबको कराता है और व्याकुलोकृतो का अतिगमन करता है ।। २२, २३, २४, २५ ।। उसी आदि मे होने वाने के लिये हम यत्न किया करते हैं और निवृत ( प्रसन्न ) होकर उसी को हम सब चाहते हैं । जो वक्ता है पोर जो वक्तव्य है तथा जो मैं हूँ उसको ही मै आपको बतलाता हूं। जो श्राप सुना जाता है और जा अन्य परिजल्पित किया जाता है । जो क्याऐ वर्तमान हैं । जो श्रुतियां हैं वे तत्पर ही हैं । यह विश्व और विश्व का स्वामी है वह ही नारायण कहा गया है । जो सत्य है-अक्षर और पर है। जो परम भूत है और भविष्यत् है-जो चर-अचर तथा जो मन्य है वह सभी पुरुषों में श्रेष्ठ पुराण प्रभु है ॥२६॥२७।२८।। ६५ --विष्णु प्रादुर्भाव वर्णन विष्णत्व शृणु विष्णोश्च हरिस्वश्च कृते युगे। वैकुण्ठत्वञ्च देवेषु कृष्णत्व मानुपेपुच ।।१ ईश्वरस्य हितस्यपा काम गागहनागति. 1
विष्णु प्रादुर्भाव वर्णन
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संप्रत्यतीतान् भांश्चश्राणुराजन् ! यथातथम् ॥२
अव्यक्तो व्यक्तलिङ्गस्थो यएपभगवान् प्रभुः।
नारायणोह्यनन्तात्मा प्रभवोऽव्ययएवच ॥३
एष नारायणो भूत्वा हरिरासीत् सनातनः ।
ब्रह्मावायुश्चसोमश्च धर्म शक्रोवृहस्पतिः ।।४
अदितेरपि पुत्रत्वं समेत्य रविनन्दन!।
एप विष्णुरितिख्यात इन्द्रस्याजो विभुः ॥५
प्रसादजं ह्यस्य विभोरदित्याः पुत्रकारणम् ।
बधार्थ सुरशत्रूणां दैत्यदानवरक्षसाम् ॥६
प्रधानात्मा पुरा ह्येप ब्रह्माणममृजत् प्रभुः।
सोऽसृजन पूर्वपुरुषः पुराकल्पेप्रजापतीन् ॥७
श्रीमत्स्य भगवान ने कहा- अब तुम विष्णु के विष्णुत्व का
श्रवण करो और कृत युग में हरित्व का--देवो में वंकुण्ठत्व का और
मनुष्यो में कृष्णस्व के स्वरूप का भी श्रवण कर । हितकारी ईश्वर
की यह मम्मों की एक अतीव गहन गतियां हैं। हे राजन् ! अब इस
समय मे जो व्यतीत हो गये हैं उनको तथा आगे जो होने वाले
हैं उनको ठीक ठीक रीति से श्रवण कर लो ॥१॥ २ ॥ यह
जो अव्यक्त भगवान् प्रभु हैं वह व्यक्त लिङ्गो (चिह्नो ) में
स्थित होते हैं वही अनन्त आत्मा वाले सबका प्रभव । उत्पत्ति । और
अविनाशी साक्षात् नारायण ही हैं ॥३॥ यह पहिले नारायण होकर
सनातन श्रीहरि हुए थे। हे रवि के नन्दन ! फिर इसने ही ब्रह्मा-
-सोम-धर्म -~-इन्द्र -वृहस्पति तथा अदिति के पुत्रत्व को प्राप्त
किया था और यह ही फिर इन्द्र का छोटा पीछे उत्पन्न होने वाला भाई
विभु विष्णु इस नाम से विख्यात हुए है ।। ४, ५ ॥ देवगण इस विभु के
पुत्र होने का कारण उनको प्रसन्नता होने वाला समझते थे जो कि ।
सुरो के शत्रु दैत्य-शानद और राक्षको के वध करने के लिये ही था।
-
वायु-
५२ मत्स्यपुराण पहिले प्रसन्न आत्मा इस प्रभु ने ब्रह्मा का सृजन किया था। फिर उस पूर्व पुरुष ने पहिले कल्प मे प्रजापतियो का सृजन किया था ॥६॥७॥ असृजन्मानवास्तत्र प्रह्मवशाननुत्तमान् । तेभ्योऽभवन्महात्मभ्यो बहुधाब्रह्म शाश्वतम् ।। एतदाश्चर्यभूतस्य विष्णो: कर्मानुकीर्तनम् । कीर्तनीयस्य लोकेषु कीत्यमान निबोध मे ।। वृत्ते वृत्रवधे तत्र वर्तमाने कृते युगे। आसीत्तलोक्यविख्यात. सग्रामस्तारकामयः ।।१० यत्र ते दानवा घोरा: सर्वे सग्रामदुर्जयाः । नन्तिदेवगणान् सर्वान् सयक्षोरगराक्षसान् ।।११ ते वध्यमाना विमुखाः क्षीणप्रहरणा रणे। सातार मनसा जग्मुर्दव नारायण प्रभु ॥१२ एतस्मिन्नन्तरे मेघा निर्वाणाङ्गारवर्चसः । साकंचन्द्रग्रहगणच्छादयन्तो नमस्तलम् ।। १३ वेणुविंद्युद्गणोपेता घोनिलादकारिणः । अन्योन्यवेगाभिहता. प्रवु सप्त मारुता. ॥१४ पही पर मायुत्तम ब्रह्मा के वंश पाले मानवों का उनने सजन पिया या फिर उन सय महान् बारमानो पालो से यह शाश्वत प्रा ही यहद से स्वरूपों मे समुत्पन्न हुआ था। यह ही थापचय स्वरूप वाले भगवान विष्णु रेपौ वा पनुशीतन है। लोको में पौतम करने के मोग्य के वरीयमान सम्मको अब मुजारी नुम मसीमाति समासो। ॥ १९॥ दतमान कान युग में भगुर उपस्थित होने पर पही परिभुबन में विकराल तारणामय समाम हुमा पा। जिस युव संग्राम में दुर्गम समान पार राम गण यक्ष-उरण मोर पनसों सहित सरदेवो नन निपापरले थे ।। १.१।। उस रण में यध रिपे म
विष्णु प्रादुर्भाव वर्णन
जाते हुए क्षीण आयुधो वाले विमुख होकर सबके सब मन से घाण करने
वाले प्रभु देव नारायण की शरण मे गये थे ।।१२।। इसी बीच में निर्वाण
अङ्गार वचस वाले मेघ, सूर्य, चन्द्र आदि ग्रहो से युक्त नमस्तल का
आच्छादन करते हुए छा गये थे। ये मेघ वेणु विद्य दगण से युक्त थे तथा
घोर गर्जन करने वाले थे। परस्पर मे वेग से अभिहत सातों मरुत वहन
करने लगे थे ।।१३।१४।।
दीप्ततोयाशनिवजवेगानलानिले ।
र सुघोरैरुत्पातदह्यमानमिवाम्बरम् ।। १५
तत उल्कासहस्राणि निपेतु खगतान्यपि ।
दिव्यानि च विमानानि प्रपतन्त्युत्पतन्ति च ॥१६
चतुर्युगान्ते पर्याये लोकाना यद्भय भवेत् ।
अरूपवन्ति रूपाणि तम्मिन्न पातलक्षणे ।।१७
जातञ्च निष्प्रभ सर्व नाजायत किञ्चन ।
तिमिरोधपरिक्षप्ता न रेजुश्च दिशोदश १९८
विवेश रूपिणी काली कालमेघाव गुण्ठिता।
द्योनमात्यभिभूतार्का धोरेण तमसा वृता ।।१६
तान धनौघान् सतिमिरान् दो माक्षिप्य स प्रभु ।
वपु सन्दर्शयामास दिव्य कृष्णवहरि १२०
बलाहकाञ्जनमिम इलाहातनूरुहम् ।
तेउसा वपुपा शेव कृष्ण कृष्णमिवाचलम् ॥२१
उस समय मे यह सम्पूर्ण आकाश दीप्त तोय और अशनि (बत्र)
से सयुत धनो के द्वारा बच्च वेग अनल और अनिलो के द्वारा-सुधोर
वनि और उत्पातो से दह्यमान की तरह हो रहा था ॥ १५॥ इसक
पश्चात् आकाश में स्थित भी सहनो उल्काऐ गिर गयो थो तया दिव्य
विमान उडत थे और नीचे की ओर गिरते थे ।१६। चतुयुगो के अन्त मे
लोको वे पश्याय में जो भय होता है उस उत्पात के लक्षण मे सभी रूप
मस्स्यपुराण बिना रूप वाले हो जाते हैं ॥ १७ ॥ लोगों में सभी कुछ प्रभा से हीन हो जाता है और कुछ भी नही जाना या समझा जाया करता है। अन्ध- पार के अत्यन्त घोर एव गहन समुदाय से परिक्षिप्त हुई तो दिशाएं प्रकाशित नहीं होती थी। उस समय मे हाल मेघ मे अवगुण्ठित होकर रूमधारिणी काली का प्रवेश हो जाता था। अत्यन्न घोर तम स समान्त दिवलोक तथा अन्तरिक्ष जिममें सूर्य एक्दम अभिभूत होजाता है बिल्कुल भी दिखलाई नहीं दिया करता है ॥ १८, १६ ॥ तिमिर से परिपूर्ण उम धनो के समूहो को वह प्रभु अपने हाथो से भाक्षिप्त करके कृष्ण वपुधारी श्री हरि अपने दिव्य शरीर को दिखाया करते थे ॥ २० ॥ बलाइक के सदृश काले बलाइक के समान गेमो से युक्त-क्षु और तेज से एक वृष्ण अचल की भांति कृष्ण स्वरूप को प्रकट किया था।॥२१॥ दीप्तापीताम्बरधर तप्तकाञ्चनभूपणम् । धूमान्धकारवपुष युगान्ताग्निमिवास्थितम् ।।२२ चतुद्विगुणपीनासङ्किरोदर छन्नामूद्ध जम् । वभौ चामीरप्रख्यरायुधरुपशाभितम् ॥२३ चन्द्राककिरणोद्योत गिरिकटमिवोन्छ्तिम् । नन्दवानन्दितकर शराशीविषधारिणम् ।।२४ शक्तिचित्रफ्लोदग्रशङ्खचक्रगदाधरम् । विष्णुशल क्षमामूल श्रीवृक्ष शान्विनम् ।।.५ विदशोदारफलद स्वगस्त्रीचारपल्लवम् । सवलोक मन कान्त सवसत्व मनोहरम् ।२६ नानाविमानविटपरतोयदाम्बुमधुरम् । विद्याहवारसाराध महाभूतप्ररोहणम् ॥२७ विशेषपनिचित ग्रहनक्षत्रपुष्पितम् । दत्यलोकमहारकाध मत्यलोके प्रकाशितम् ।।२८ विष्णु प्रादुर्भाव वर्णन वह दीप्तियुक्त पीत अम्बर को धारण करने वाला तथा तपे हुए सुवर्ण भूपणो से सयुन-धूम सहित अन्धकार के शरीर वाला युशन करने वाली अग्नि के तुल्य समुपस्थित हुमा या ॥ २॥ चौगुने और दुगुने पीन बस से समयुक्न-किरीट से समाच्छन्न केशो वाला वह दिन वपु चामोर प्रख्य आयुशे से उपशोभित होकर प्रकट हो रहा या॥२३॥ चन्द्र और मूय्य की किरणो के उद्योत वाला अत्यन्त ऊँचे गिरि के शिखर के सहा था। नन्दक से आनन्दित करो वाला-शर तथा माशीविप के धारण करने वाला~समा का मूल-विष्णु शैल-श्री वृक्ष और शाङ्ग धनुप के धारण करने वाला वह दिव्य स्वरूप या ॥ २५, २५ ।। उसी दिव्य स्वरूप का वपन किया जा रहा है-वह देदो का उदार फल देने बाला-स्वर्गीय स्त्रियो का चारु पल्लव-सब लोगों के मन को रमणीय- सब जीवो मे अत्यन्त मनोहर-नाना विमानो के विटपो वाला-मेघों के जलरूप मधु का श्रवण करने वाला- विद्या के अद्विार-सार का आध- महान् भूतो का प्ररोहण करने वाला--विशेष पत्रों से निचित-प्रह और नक्षत्र रूपी पुष्पो से सयुन और वह दिव्य रूप दैत्यो के लोक का महान् स्कन्ध था जो कि इस मयं लोक में प्रकाशित हुआ था ॥२६॥ २७ २८॥ सागराकारनिर्हाद रसातलमहाश्रयम् । मृगेन्द्रपार्शर्वितत पदजन्तुनिषेवितम् IRE शीलार्थचारुगन्धाढ्य सवलोकमहाद्रुमम् । अव्यक्तानन्तसतिल व्याहवारफेनिलम् ॥३० महाभूततरङ्गौष ग्रहनक्षत्रबुद्बुदम् । विमानगस्तव्याप्त तायदाडम्बराकुलम् ॥३१ जन्तुमत्सजनाकोण शलशवकुलयु तम् । गुण्यविषयावर्त सवलोतिमिङ्गिलम् ॥३२ बीरवृक्षलतागुल्म भुजगोत्कृष्टशवलम् ।
मत्स्य पुराण द्वादशार्कमहाद्वीप रुद्रकादशपत्तनम् ॥३३ वस्वष्टपर्वतोपेत औलोक्याम्मोमहोदधिम् । सन्ध्यासड्खयोर्मिसलिल सुपर्णानिलसेवितम् । ३४ दैत्वरक्षोगरणग्राह यक्षीरगझपावुलम् । पितामहमहावीच्य सर्वस्त्रीरत्नशोभितम् ।।३५ पुनरपि उसी परम दिव्य स्वरूप को वणित किया जा रहा है कि सागर के आकार के तुल्य निहटि था और रसातल के महान् आश्रय वाला था । मृगेन्द्र के पाशों से वितत-पक्षिगण एव जन्तुओं से निवित- शीलार्य और सुन्दर गाध से आढ्य-सव लोको का महान् द्रभ-अव्यक्त एव अनन्त सलिन बाला-व्यक्त अहसार से फेनयुक्त-महान् भूतों को तरङ्गो के ओघ वाला-ग्रह तथा नक्षत्रों के बुलबुलो से सर्मा वत- विमान गरुत व्याप्त प्रौर तोयदो के आडम्बर से समाकुल था ॥ २६, ३० ६१ ।। वह रूप जन्तुओ वाला-जनो से समाकीर्ण-शैल शखो के कुलों से सयुत-वैगुण्य के विषयो का प्रावत-समस्त लाको का तिमिङ्गिल- वीर रूपी वृक्ष लता और गुल्मो वाला-भुजङ्गो क उत्कृष्ट शैवाल वाला- द्वादश सूर्यो के महाद्वीपो वाला-एकादश रुद्रो के पत्तनो से युक्त- आठ वसुरूपी पर्वतो से युक्त-लोक्य रूपी महा सागने वाला-सन्ध्या सपा को कमियो का सलिल-सुपर्ण की वायु से सेवित-~दत्य और रक्षीगण रूपी ग्राहों वाला-यक्ष और उरग रूपी मुजो से समाकुल. पितामह के समान महान् बोय वाला और सब स्त्रियों के स्वरूप थाले रनों से मुशोभित पा 11३२-३॥ योर्कोतिकातिलक्ष्मोमिनदीभिरुपशोभितम् । घालयोगिमहापवग्रलयोहत्तिवेगिनम् । ३६ तन्तु पांगमहापार नारायणमपाणयम् । देवाधिदेव वरद भत्ताना भक्तिवत्समम् ।।३७ विष्णु प्रादुर्भाव वर्णन अनुग्रहकर देव प्रशान्तिकरण शुभम् । ह्यश्वरथसयुक्ते सुपणध्वजमेविते ॥३८ ग्रहचन्द्राकरचिते मन्दराक्षवरावृते । अनन्तरश्मिभियुक्त विस्तीर्णे मेरुगह्वरे ।३६ तारकाचित्रसुमे ग्रहनक्षत्रवन्धुरे । भयेप्वभयद व्याम्नि देवा दंत्यपराजिता. ॥४० ददृशुस्तेस्थित देव दिव्ये लोकमये रथे। ते कृताञ्जलयः सर्व देवा शपुरोगमा ॥४१ जयशब्द पुरस्कृत्य शरण्य शरणगता । स तेषा ताङ्गिर श्रुत्वा विष्णुर्दैवतदैवतम् । ४२ उसी दिव्य स्वरूप का वर्णन करते हुए बतलाते हैं कि वह दिव्यरूप श्रीकान्ति और लक्ष्मी से तथा नदियो । उपशोभित था - कालयोगी और महापर्व एव प्रलयत था उत्पत्ति के वेग वाला था। तन्तुयोग का महापार--नारायण रूपी महार्णव स युक्त-देवो का भी अधिदेव-वर देने वाला जा अपन भक्तों को प्रदान करत थे-भक्तो पर प्यार करने वाला वह स्वरूप था ।। ३६, ३७ ॥ वह अनुग्रह करन वाला-देव-प्रशान्ति कान वाल-शुभ था । हर्यश्व रय से सर्मा वन-ध्वज से सवित-ग्रह चन्द्र और मूर्य स विरचित-मन्दराक्ष वर स आवृत- अनन्त रश्मियों से युक्त-विस्तीर्ण मेरु गह्वर से युक्न-जार रूप विचित्र कुसुमो से परिपूर्ण-ग्रह और नक्षत्रा स बन्धुर सुडौल)-भय क अवसरो पर अभय देने व ले उस स्वरूप को व्याम मे दैत्या से पराजित देवा न देखा था। उन दवा न परम दिव्य लोषमय र५ म स्थित देव का दर्शन प्राप्त किया था। उस समय म इन्द्र का अपना अग्रणी बना कर उन समस्त देवों ने अपनी अलियो का बद्ध कर लिया था। शब्द को पहिल समुच्चरित करक शरण्य प्रभु को दे सब शरणागति मे प्राप्त हागय थ । उन दवो क भा दवश्वर विष्णु भगवान् न दवगण जयकारक
द
मस्यगन
को शरणागति में प्राप्त होने के लिए वयित वाली वा किया था
॥३८-४२॥
मनचा विनाशाय दानवाना महामृधे।
आराश तु स्थितो विष्णुमत्तम पपुरास्थित्त १४३
उवाच दवता सर्वा सप्रतिजमिद वच ।
शान्ति द्रजत भद्र वो मा भैप्ट मरताङ्गणा ॥४४
जिता मे दानवा सर्वे लोवय परिगृह्यताम् ।
ते तस्य सत्यसन्धस्य विष्णार्वाक्येन तापिता ॥१५
देवा प्राति समाजम्मु प्राश्यामृतमनुत्तमम् ।
ततस्तम राहत तद्विनशुश्च वलाहका ४६
प्रववुश्च शिवा वाता प्रशाश्च दिशो दश ।
शुद्धप्रभाणि ज्यातीपि सामञ्चन, प्रदक्षिणम् ।।४७
न विग्रह ग्रहाश्चक, प्रशान्ताश्चापि सिन्धव ।
विरजस्का भवन्मार्गा नाक्वर्गादयस्त्रय ॥४८
याथाथमूह सरितो नापिचक्षुभिरेऽणवा ।
आसश्छुभानोद्रियाणि नराणामन्तरात्मसु ॥४६
महषयो वीतशोका वेदानुच्चरधीयत ।
यज्ञषु च हरि पाक शिवमाप च पावक ॥५०
प्रकृत्तधर्मा सवृत्ता लोना मुदितमानसा ।
विष्णोदतप्रतिज्ञस्य श्रुत्वारिनिधन गिरम् ॥५१
देवी की परित्राण के लिये कहा हुई वाणी को सुनते ही विष्णुदेव
में उस महान् युद्ध में दानवो के विनाश करने के लिए मन मे स्थिरता
करली थी। उस समय मे भगवान् विधा उत्तम वपु मे समास्थित होकर
आकाश में ही स्थित थ। उहोने समस्त देवो स प्रतिज्ञा के सहित यह
वचन कहा था कि अब आप सब नाग शाति धारण करे अर्थात् एकदम
प्रशान्त हो जाव । हे मस्ता के गणा! अब आप डरो मत-आपका
विष्णु प्रादुर्भाव वर्णन
कल्याण होगा । मैंने सभी दानवो को जीत ही लिया है-ऐसा समझ लो
और अब इस त्रैलोक्य को जो तुमसे उन्होंने डीनकर अपना अधिकार
कर लिया है पुन. वापिस ग्रहण करलो। इस प्रकार के वचन जब उन
समस्त देवगण ने सत्य प्रतिज्ञा वाले विष्णु भगवान के सुने थे तो उनके
वाक्य से सबको बहुत ही अधिक सन्तोष हो गया था ॥ ४३, ४४, ४५॥
उस समय मैं उस बयुत्तम अमृत का प्राशन करके देवगण परम प्रीति
को प्राप्त हो गये थे। इसके बाद वह सम्पूर्ण अन्धकार नष्ट हो गया था
और सभी वल्वाहक विनाश को प्राप्त हो गये थे। सर्वत्र परम मङ्गल-
कारी वायु वहन करने लगी थी और दशो दिशाऐ एक दम प्रशान्त हो
गयी थी शुद्ध प्रभा वाली ज्योतिया अर्थात् नक्षत्रादि साम को प्रदक्षिणाऐं
करन लगी थीं ॥४६॥४७॥ उस ममय में ग्रह गण परम्पर में कोई भी
विग्रह नही करते थे और सभी सिन्धु परम प्रशान्त हो गये थे । स्वर्ग
वर्गादि तीनो ही रज से रहित मार्गों वाल हो गय थे। सम्पूर्ण सरिताऐ
ठोक मार्ग स यथार्थ रूप मे वहन कर रही थी और आर्णवो मे मी किमी
भी प्रकार का क्षोभ नहीं हो रहा था। सभी मनुष्यो की अन्तरात्माओ
मे परम शान्ति थी और इन्द्रियां परम शुम वृत्ति वाली हागई थी॥४८,
४६।। सव महपिंगण शोक से रहित होकर वेदो का उच्च स्वर से
अध्ययन कर रहे थे। यज्ञो मे जा मा हवि प्रक्षिप्त किया जाता था
पावक उसका पति शिव पाक करने लगा या ॥ ५॥ सभी लाक परम
प्रमुदित मनो वाले होरि अपने २ घमो म प्रवृत्त हो गए थे जिस समय
में सत्य प्रतिज्ञा वाले भगवान् विष्णु की समस्त शत्रु ओ क विनाश कर
देने को बाणो का सदन श्रवण कर लिया था सभी का परमानन्द
प्राप्त हो गया था ॥५१॥
मत्स्यपुराम ६६---दैत्य सैन्य विस्तार वर्णन ततो भय विष्णुवचः श्रुत्वा देत्याश्च दानवा.) उद्योगविपुल चक्र युद्धाय विजयाय च ॥१ मयस्तु काम्चनमय विकल्वायत मक्षयम् । चतुश्चक सुविपुल सुकल्पितमहायुगम् ॥२ किङ्किणीजालान |प द्वीपिचमरिष्कृतम् । रुचिर रत्नजालश्च हेमजालश्च शाभितम् ॥३ ईहामृगगणाकीणं पक्षिपड्क्तिविराजितम् । दिव्यास्त्रतूणीरधर पयोधरविनादित्तम् ।।४ स्वक्ष रथवरोदार सूपस्थ गगनापमम् । गट,परिघसपूर्ण मूर्तिमन्तमिदाणवम् ।।५ हेमकेयूरवलय स्वणमण्डलकूवरम् । सपताकध्वजोपेत सादित्यमिव मन्दरम् ॥६ गजेन्द्राभोगवपुष क्वचित् केसरिवचसम् । युक्त मृक्षसहस्रण समृद्धाम्वुदनादितम् ॥७ दीनमाकाशग दिल्य रथ पररथारजम् । अध्यतिष्ठद्रणाकाक्षी मेरु दीप्तमिवाशुमान ॥ श्री मत्स्य भगवान ने कहा-इसके अनन्तर उस अभय से पूर्ण भगवान् विष्णु के वचन का श्रवण करके दैत्यो और दानवो ने विजय की प्राप्ति करने के लिए विपुल उद्योग वाला युद्ध किया या ||१॥ विभिन्न दानवो के द्वारा किये जाने वाले युद्ध का वर्णन किया जाता है-मय दानव ने जिस रथ में विराजमान हाकर समर किया था वह काञ्चनमय था-पिनत्व आयन और अक्षय था । उस रथ मे चार चक्र थे--अतीव विपुल पा और सुन्दर बाना किया हुआ महायुग वाला था ॥ २ ॥ मय का रप विणी जातो वे निर्घोष स युक्त-हाथियो के धर्म से परिपूत- दत्यमन्य विस्तार वर्णन ॥३, वाला रत्नो के जालो मे अत्यन मनोरम-उम रचिन जानों से शोभित-ईहा मृग गणों मे नमायो-पक्षियो को पक्ति में शोमा मम्मन्न-दिय अन्न और तूर को धरने वाला नथा पयोधरों के मयान ध्वनि से पूर्ण या ४ ॥ मुन्दर अओं वाला प्रेष्ठ ग्थो में भी अनोव उदार-सूपस्य- गगन के सह-गदा और परिघ मे परिपूर्ण मूत्तिमान एव अणव के हो समान वह यम का रथ ॥१॥ वह हैम के केयूर और पलय से युक्त- स्वर्ण माडन कबर बराला-ताओं के हित वसा वाला और आदित्य म मन्दगावल के समान दिखलाई देता था ।। ६ ।। गजेन्द्र के आमोग वपु - किसी स्थल पर देगरी के वर्चम से युस-सहनरे ऋक्षी स युक्त-ममृद्ध बम्वुद के समान गमन 11-दीप्त-आवास में यमन करने वाला-पर रथारुज दह अनीव दिव्य रथ था। जिस तरह स बेशुमान् दीप्त मेरु पर मधिरहर किया करता है कि ठीक उसी मोति बह रप की आकाक्षा रखने वाला मय दानप उम प्रपन पूर्वोक्त प्रकार के रप पर मधिष्ठिन हुआ था ।।७, ८ ॥ नारमुन्क्रारिम्नार हेममय रयम् । शलाकारममम्बाध नीलाजनचयापमम् ।। पायसमय दिव्य लोहेपाहवरम् । तिमिगेद्गारिदिरण गजन्तमिव तोयदम् ॥१० लोहजालेन महना मग पाक्षेण दशितम् । आयस परिषं पूर्ण क्षेपणायश्च मुद्गरः ॥११ प्रन पार्शच विततं गमयुक्तकण्टर । गोभिन वानयानश्च तोमरंच परवध ॥१२ उद्यन्त द्विषता तोहिनीयमिव मन्दम् । युक्त घरसह्मण मोऽध्यारोन्द्रयातमन ॥१३ विरोचनम्नु मादा गदापानिन्वन्धिन । प्रमुने तम्य संन्यम्प दीप्नग्रह इवाचन १४ मत्स्यपुराण तार का रथ उत्क्रोश के विस्तार वाला था और वह सम्पूर्ण रथ हैम से परिपूर्ण था। वह रथ शैल समान प्राकार वाला~बाधाओ से रहित-नील अज्जन के निचय की उपमा वाला-काले लोह से पूर्ण--- दिव्य-लोहफा से युद्ध कूबर वाला- तिमिर के उद्गरण करने वाली किरणो से संयुत-गर्जना करने वाले तोयद के सदृश-गवाक्ष से युक्त महान् हेम जाल से दशित - आयस परिधो से तथा क्षेपणीय और मुद्गरो से पूर्ण-प्रासो, पाशो और वितत नर सयुक्त कण्ठको से शेभित---त्रास पानो, तोमरी और परश्वधो से शोभा सम्पन्न -- द्विष पुरुषो के कारण हो उदीयमान दूसरे मन्दर के ही समान वह रथ था। सहस्र खरों से सयुत वह उत्तम रथ पर जिस पर उस दानव ने अध्यारोहण किया था ।। ६ । १०। ११ । १२ 1 १३ ॥ विरोचन तो भली भांति कुद्ध होता हुआ अपने हाथ म गदा उठाकर उसकी सेना के सामन दीप्तग्रहो धाले अचल के समान अवस्थित होगया था॥११॥ युक्त रथसहस्र ण ह्यग्नीवस्तु दानवः । स्यन्दन वाहयामास सपत्नानीकमर्दन ॥१५ व्यायत रिकुसाहस्र धनुविस्फारयन्महत् । चागहः प्रमुखे तस्थौ सप्ररोह इवाचल. ११६ खरस्तु विक्षरन्दग्नेिवाभ्या रोपज जलम् । स्फुरदन्तोष्ठनयन सग्राम साऽभ्यमाइक्षत ॥१७ स्वप्टा त्वष्टगज घोर यानमास्थाय दानवः । ध्यूरितु दानवव्यूह परिचमाम वीर्यवान् ॥१८ विचितिवपुरचव श्वेतकुण्डलभूषणः । वेत श्वेतप्रतीकाशी युद्धायाभिमुसे स्थित १६ अरिष्टोवलिपुत्रश्च वरिष्टाद्रिशिलायुधः । यदायाभिमुपस्तस्थो धराधरविसम्मनः ॥२० तिसारस्वभिमात् पिशोर इति चोदितः।
दैत्यसन्य विस्तार वर्णन ६३ सबला दानवाश्चैव सन्नह्यन्ते यथाक्रमम् ॥२। शत्रुओ की सना का मर्दन करन वाला हयग्रीव नाम वाले दानव ने एक सहस्र रथो से युक्त अपने स्यन्दन (रय ) को वाहित किया था ॥ १५ ॥ एक सहन किकुओ से समन्वित-व्यायत महान् धनुष को विस्फारित करता हुआ वाराह समुख मे प्रगेह से मयुत एक अवल की भात समवस्थित हो गया था ॥ ६॥ घर नामधारी दानव घमण्ड से अपने नत्रो के द्वारा रोष से समुत्पन्न जल को विक्षरित कर रहा था और वह भा जिसके दांत-ओष्ठ और नेत्र फड़क रह थे सग्राम करने का आकाक्षा कर रहा था ॥१७॥ त्वष्टा नाम वाला दान व आठ हापियो वाले परम घोर गान मे समास्थित होकर वीर्य वाला वह दानवो क व्यूह को भली भांति व्यूहित करने के लिय चारो ओर घूम रहा था ।। १८॥ श्वेत वर्ण के कुण्डलो से विभूषित विचित्त वयु वाला श्वेत प्रतीकादा श्वेत युद्ध करने के लिए आभमुख मे समवस्थित हो गया पा ॥१६॥ बड़े बड़े पर्वतो को भी काम्पत कर देने वला-बरिष्ठ पर्वत की शिलाओं प आयुधों स समदित होकर अरिष्ट और वलि का पुत्र सग्राम करन के लिए सामने स्थित हो गया था । पभि सङ्घप से पिशोर और विगोर इसी नाम से प्रेरित होने वाला था 1 इस प्रकार से अपने अपने बली के सहित दानव मण यया क्रम युद्ध के लिय सन्नद हो रह थे॥२१॥ अभवत्ममंन्यस्य मध्ये रविग्विोदित । लम्बस्तु नसमेघाभ प्रलम्बावरभूपण ॥२. दत्यव्यूहगतो भाति सनोहार इवाशुमान् । स्वर्भानुरास्ययोगो तु दशनीप्ठेक्षणायुध । २३ हमस्तिष्ठति देत्याना प्रमुखे स महाग्रह । अन्ये ह्यगतास्तत्र गजस्कन्धगना पर 1-४ सिंहव्याघ्रगताचान्ये वराहक्षेषु चापरे ।
मत्स्यपुराण केवित् खरोष्ट्रयातार केचिन्छवापदवाहना: ॥२५ पतिनस्त्वपरे देत्या भीषणा विकृताननाः । एकपादाद्ध पादाश्च ननृतुयद्धकाइक्षिण ॥२६ आस्फोटयन्तो बहवः क्ष्वेडन्तश्च तथापरे । हृष्टशार्दूलनिर्घोषा नेदुर्दानवपुङ्गवाः ॥२७ ते गदापरिघेरुनः शिलामुसलपाणय । वाहुभि. परिघाकारस्तजयन्तिस्म देवताः ।।२८ दत्यो की सेना के मध्य मे प्रलम्ब अम्बर और भूषणो से सयुत- नूतन मेघ की आभा के तुल्य आभा वाला लम्ब नाम वाला दैत्य सूर्य के समान उदित हो गया था ।। २२ ।। दैत्यो के व्यूह मे प्राप्त होने वाला- माम्ययोधी-दांत, प्राष्ठ, नेत्र और आयुधो वाला स्वर्भानुनी हार से अशुमान के समान शोभित हो रहा था। २३ ।। वह महान ग्रह दैत्यो के समय मे हँसता हुप्रा स्थित था। वहां पर अन्य हयो पर स्थित थे और दूसरे गमो के स्कन्धो पर समवस्थित थे ॥२४॥ कुछ सिंहो तथा व्याघ्रो पर सवार थे और दूसरे चराह एव ऋक्षो पर अधिरूढ थे। कुछ लोग सरा तथा उष्ट्री के द्वारा गमन करने वाले और पुछ श्वापदे के वाहनो वाले ये ।। २५ ।। ( अ-य सेनापति दैत्य परम भीषण और विकृत मुखो घाले थे। कुछ एक पैर वाले और कोई आधे पैरो वाले थे जो की इच्छा से युक्त होकर नृत्य कर रहे थे ॥ २६ ॥)बहुत से आस्फोटन पर रहे थे-दूसरे ट्वहन करने वाले थे। प्रसन्न शार्दूल के समान गजन पी पनि करने वाले दानव श्रेष्ट निघोंप कर रहे थे ।। २७॥ वे सब शिलाएँ और मूसल हाथो मे लिये हुए अत्यन्त उप गदा मौर वारिधो के दास तथा परिघा के आकार वाले बाहुमो के द्वारा देवगणों जनाएं (फरकार दे रहे थे ॥ ८॥ पार्श. प्रासंश्व परिघस्तोमराशपट्टिशः। चित्रीस्ते शतघ्नौमि शतधारश्च मुद्गरैः ।।२६ करने सुरसंन्य विस्तार वर्णन गण्डशैलश्च शैलश्च परिघंश्चोत्तमायसः । शक्रश्च दंत्यप्रवराश्चक रानन्दितं वलम् ॥३० एतद्दानवसन्य तत्सद य दमदोत्कटम् । देवानभिमुसे तस्थौ मेघानीकमिबोद्धतम् ॥३१ तद्भुतं दैत्यसहस्रगाढं वाय्वग्निशैताम्बुदतोयकल्पम् । बल रणोधाभ्युदयेऽम्य दीर्ण युयुत्सयोन्मत्तमिवावभासे ॥३२ वे दानव गणो पाशो-प्रासो-परिघो-तोपर-मंकुश और पटियो-शतघ्नी-दाधार और मुद्गरो से क्रीडा कर रहे थे ॥ २६॥ वै दैत्यों में प्रवर गण्डशलों-शैलो- उत्तम आपस वाले परिघो मोर चको के द्वारा अपने बल को आनन्द ने युक्त बना रहे थे।॥ ३०॥ युद्ध करने के मद से अत्यन्त उत्स्ट यह समूर्ण दानवों की सेना उद्धत मेघो को अनीक के ममान देवों के अभिमुख में स्थिन यी ॥३१॥ वह अनि अदभुत-सहस्रो दैत्यों से अत्यन्त गहन-वायु अग्नि, जल और अम्बुद सोय के तुल्य दानवो का बल ( मेना) रणो के समूह के अभ्युदय में अपुदीन युद्ध करने की इच्छ से उन्मत के समान अवमामित हो रहा पा ॥३२॥ . ६७-सुरसैन्य विस्तार वर्णन अतस्ते दत्संन्यस्य विस्तरो रविनन्दन !" सुराणामपि संन्यस्य विस्तरं वैष्णव शृण ॥१ आदित्या वसवोस्दा बश्विनीच महाबलो। सबलाः सानुगाचव सन्नन्त यपाक.मम् ॥२ पुरहूतस्तु पुरतो लोकपालाः सहरका । ग्रामणी. सवदेवानामारहोमुरद्विपम् ॥३ मास्यपुराण मध्ये चास्य रथ सर्वपक्षिप्रवरग्स ! सुचारचक्रचरणो हेमवपरित ॥४ देवगन्धवपक्षाघरनुयात. सहस्रश. । दीप्तिगद्धि सदस्यैश्च ब्रह्मपिभिरभिष्टुतः ।।५ वज्रविस्फूजितोद भूतविद्युदिन्द्राय न्द्राय धादित. । य क्तो बलाहक्गण. पवतरिव कामग ॥ यमारूढ़ स भगवान् पर्योति सरल जगत् । हविर्धानेपु गायन्ति विप्रा मखमुखे स्थिताः ।।७ श्री मत्स्य भगवान् ने कहा-हे रविनन्दन ! तुमने दैत्यो को सेना के विस्तार का वणन श्रवण गत कर लिया है । अब सुरगणों की सेना का भी वैष्णव विस्तार श्रवण करलो। द्वादश आदित्य- आठ वसुगण-एकादश रुद्र-महान् बल सम्पन्न अश्विनी कुमार य सब बलो और अनुगामियो के सहित क्रम के अनुसार ही स•मद हो गये थे ।। १।२।। समक्ष मे सहस्र नत्रो वाले इन्द्रदेव-समस्त लोकपाल-सब देवो की ग्रामणी सुगे के शत्रु पर समारोहण करने वाले हो गय थे ॥ ३ ॥ मध्य मे समस्त पथियो मे श्रष्ठ (गरुड) के वेग वाले इनका सुचारु ( सुन्दर चक्र चरणी वाला हेम और बच से परिष्कृत रथ या ।।४।। उस रथ के पीछे सहस्रो देव-गन्धर्व-और यक्षो के समुदाय अनुगमन करने वाले थे तथा धे दीप्तिमान् सदस्यो क द्वारा और ब्रह्मपियो के द्वाग अमिष्टुत हो रहे थे ॥ ५॥ बच के तुल्य विम्फू'जत एव उद्भूत-विध त् और इन्द्रायुधो स समुदित स्वेच्छया गमन करने वाले पर्वता के समान बलादको के गण। से युक्त थे ।। ६ ।। जिस रथ पर वह भगवान् समारूढ थे वह रथ समस्त जगत मे परिगमन करता था और यज्ञशालाओ मे समवस्थित दिगण हविर्धानो मे गायन किया करते थे। ७॥ स्वर्गे शकानुयातेषु देवतूर्यनिनादिषु। पुदर्श परिनृत्यन्ति शतशोऽसरसाङ्गणे 11 सुरपन्य विस्तार वर्गन केतुना नागराजेन राजमानो यथा रविः । युक्तो हयसरण तमो मारतरंहसा II सस्यन्दनवरोभाति गुप्नोमातलिना तदा। कृत्स्नः परिवृतो मेरुर्भारस्करस्येव तेजसा ॥१० यमस्तु दण्डमुद्यम्य कालय स्तश्च मुदगरम् । तस्थौ सुरगणानीके दत्यानादेन भीषयन् ॥११ चतुभिः सागरयुक्तो लेलिहानश्च पन्नग.) शतमुक्ताङ्गदधरो विभ्रत्तोयमयं वपुः ॥१२ कालपाशान् समाविध्यन हगैः शशिकरोपमै.। वाय्वीरितजंलाकारः कुर्वन् लीलाः सहस्रशः ॥११ पाण्डुरोदधूतवसनः प्रचलन रुचिरागदः । मणिश्यामोत्तमवहरिभारापितोवरः ॥१४ वरुणः पाशघडमध्ये देवानीकस्य तस्थिवान् । यद्धवेलामभिलपन मिन्नवेल इवाणंवः ॥१५ स्वर्ग मे देव तूर्गा को निवादिन धरने वालो का इन्द्र के पीछे अनुगमन होने पर अप्सराओ के प्रोगन मे सैन्डो सुन्दरिया नत्य कर रहा थीं ॥८॥ नागराज वे तु से युक्त वह रथ सूर्य के समान राजमान ही रहा था तपा मारुन के तुल्य वेग से सयुत एक सरस अश्वो से सम्पन्न माना गया है, उस समय में मातलि के द्वारा परम सुरक्षित यह प्ठनम स्यन्दन (ग्य ) पूमतया चारो ओर से परिवृत होकर भगवान् भार के तेज से मेरु के समान शोभित हो रहा था ।।१०।। काल रो युक्त यमराज दण्ड और मुद्गर को उठाकर घोर गर्जन के द्वारा दस्यो को भय उत्पन्न करते हर सुरंगो को मेना में सस्थित थे ॥१०॥ ११॥ देवगणो की सेना के RE में युद्ध के समय की अभिलाषा परते हुए वेला के भेदन करने वाले आर्णव के महा पाश को धारण करने वाले स्थित हो रहे थे जो चारों सागरों तथा जीभ निशाल पर ६८ मत्स्य पुराण सर्पो से युक्त थे और तोथमय वपु को धारण करने वाले शंख-युनाजद को धारण कर रहे थे। वायु स प्रेरित-जल के आकार वाले-चन्द्र की किरणो के द्वारा कालपाशो को समाविद्ध करने वाले थे और सहस्रों प्रकार की लीलाऐ कर रहे थे । पाण्डुर वर्ण के वस्त्र को उद्धृत करने हुए तथा हिलने वाले रुचिर अङ्गदो के घारी-मणि के सदृश श्याम एव उत्तम वपु वाले और हदिभार से अपित वरदान से युक्त वरुण देव थे ।। १२-१५॥ यक्षराक्षससन्मेन गुह्यकाना गणैरपि । यु क्तश्च शङ्खपमाभ्या निधीनामधिप प्रभु ।।१६ राजराजेश्वर. श्रीमान् गदापाणिरदृश्यत । विमानयोधी धनदो विमाने पुष्पके स्थित. ॥१७ स राजराज शुशुभे य द्धार्थी नरवाहनः । उक्षाणमा स्थित. सख्ये साक्षादिव शिव. स्वयम् ।।१८ पूर्वपक्ष. सहस्राक्षः पितृराजस्तु दक्षिणः । वरण. पश्चिम पक्षमुत्तर नरवाहनः ।।१० चतुर्पुयुक्ताश्चत्वारा लोकपाला महाबला। स्वासु दिक्षुस्वरक्षन्त तस्य देवबलस्य ते ॥२० यक्षो और राक्षसो की सेना और गुह्यको के गणा से समन्वित तथा शख-पद्मो को धारण करन वाल निधियो क स्वामी प्रभु-गदा हाथ मे ग्रहण किये हुए-विमानो के द्वारा युद्ध करने वाल राजराजेश्वर श्रीमान् धन अर्थात् कुवेर पुष्पक विमान में स्थित दिखलाई दे रहे थे ।।१६,१७।। युद्ध करने की इच्छा रखने वाले राजाओ क भी राजा मरवाहन वृषभ पर समास्थित युद्ध मे साक्षात् स्वय शिव के ही सगान शोभित हो रहे थे 1 १८ ।। पूर्व दिशा मे पक्ष वाले सहस्राक्ष इन्द्र देव धे। दक्षिण दिशा मे पितराज थे-पश्चिम में वरुण देव और उत्तर पक्ष मे नर वाहन थे। Praट में चारो पक्षा में चार महान् बल वित्रम शाली लोकपाल धे सुरमय विस्तार वणन और वे अपनी-अपनी दिशाओं म उम देवों को सेना की रक्षा कर रह थ॥१६॥ सूय सप्ताश्वयुक्तेन रथेनामितगामिना । थिया जाज्वल्यमानेन दीप्यमानश्च रदिभि. ॥२१ उदयास्तगचरण मेश्पवनगामिना । निदिवद्वारचा ण तपता लाक्मव्ययम् । २२ सहमरश्मियुक्तेन प्राजमानन तेजसा। चचार मध्य लाकाना द्वादशात्मा दिनश्वर ॥२३ साम श्वतहये भाति स्यन्दन शीतरश्मिवान् । हिमवत्तायपूर्णामिभाभिरालादयजगत् ॥२१ तमृक्षपूगानुगत शिशिला द्विजेश्वरम् । शाच्छायाङ्किततनु नशम्य तमस क्षयम् ॥२५ ज्यातिपामीश्वर व्याम्नि रसाना रसद प्रभुम् । आपधीना सहस्राणानिधानममृतम्यच ॥२६ जगत प्रथम भाग सौम्य सत्यमय रथम् । दगुर्दानवा माम हिमप्रहरण स्थितम् ॥२७ य प्राण सवभूताना पन्चधा मिद्यत नषु । सनधातुगतो लोका स्त्रोन्दधार चचार च । अमितगामी-धीस तथा दीप्यमान रश्मियो स जाज्वल्यमान रथ के द्वारा द्वादश स्वरूप वाल दिनस्वर लाों क मध्य म सचर कर रह थे। वह मूय देव का रथ उश्य और अस्त में गमन करन वाता- मह पवत पर जान वाता-त्रिवि द्वार क चक्र से समायुक्त-अव्यय लोक को ताप देन वाला-सहन रस्मिया से युक्त और भ्राजमान तज स सम्पन्न पा ।।२१, २२, २६ ।। गोल रश्मिया वार सामदव हिम म सावन न स परिपूण दाप्तिपास सम्पूप जग्द को समाहादित करत हुए श्वन अबों वार रथ म गामा पा रह य ॥४॥ उन सब दानवों ३ मरस्यपुराण ने हिम के अस्त्र वाने वहाँ पर स्थित सोमदेव को देखा था जो नसों के समुदाय से अनुगत--शिशिर रिणो पाला-हिजेश्वर-शश की छाया से चिह्नित शरीर के पारण करने वाला-रानिय तम का क्षय करने दाला-समस्त ज्यातिया व व्योम म स्वामी-रसो मे रस का प्रदान करने वाले-प्रभु-सहस्रो औषधिया क तथा अमृत के निधान थे ॥ २५, २६, २७ ॥ जो समस्त भूतो का प्राण है और नरो में पांच प्रकार फा होकर स्थित रहा करता है तथा सातो धातुओ में जल होकर तीनो लोको का धारण किया करता है और सञ्चरण करने वाला भी था॥२८॥ यमाहुरग्नि कर्तार सवप्रशवमीश्वरम् । सप्तस्वरवगतोयश्च निरङ्गीभिस्दीयते ॥२६ य वदन्त्युत्तम भूत य वदन्त्यशरीरिणम् । यमाहुराकाशगम शीघ्रगशब्दयोगिनम् ॥३० स वायु सवभूतायुरभूत स्वेन तेजसा । ववीत्रव्यथयन् दैत्यान् प्रतिलोमसतोयद ॥३१ मरुला दिव्यगन्धर्वविद्याधरगण सह । चिक्रीडुरसिभि शुभ्रनिर्मुक्तरिवपन्नग ॥३२ सृज त सर्पपतयस्त व्रतोयमय विषम् । शरभुता दिवीन्द्राणाञ्चेरुयत्तिानना दिवि ॥३३ पवतश्च शिलःशृङ्ग शतशश्चैव पादयं । उपतस्थु सुरगणा प्रहत्तु दानवे बले ॥३४ य सदेवाहृषीकेश पद्मनाभस्त्रिविक्रम.। युगान्ते कृष्णवर्णामो विश्वस्यजगत प्रभु ।। ५ जिराको अग्नि की रचना करन वाला--सबका प्रभव उत्पत्ति- ईश्वर-कहा गया है और जा सात स्वग म रहने वाला नित्यङ्गियो के द्वारा उदीरित किया जाता है । जिसका सबस उत्तम भूत कहत है और मुरमैन्य विम्बार वर्णन ७१ जिमको विना शरीर दाला कहते हैं तथा जिमको आकाश में गमन करने वाला-पोप्रगामी और शब्दयोगी कहा गया है ।।६, ३०॥ वह वायु अपने तेज से सम्पूर्ण मूतों का आयु उद्भूत हुआ है वह तोय देने वाला प्रतियोम में दत्यो को प्रकृष्ट रूप से व्यथित करता हुआ बह्न करने लगा था। दिय गन्धवों के और विद्याधर गणो के साय मस्त मुन्न नियुक्त पन्नों के तुल्य अमियो (खङ्गों) स प्राडा करने वाला था । ॥३१,३२॥ सर्पो के स्वामी गण तीद्र तायपूर्ण विप का सृजन करते हुई दिवीन्द्रो के भरभूत दनकर दिवलोक में मुख फंनाये हुए सचरण कर रहे थे ।। ३३॥ मुरगत पर्वतो हिला के शिखरो और सैकडों पादपो के द्वारा दानवो की सेना में प्रहार करने के लिये अस्थित हो गये ये ॥ ३४ 19 जो वह देव ही ये वह पद्मनाभ-त्रिविक्रम- इम विश्व और और जगत प्रभ युग के अन्त में कृष्ण वर्ण की प्रामा वाले ये॥३५11 मर्वयोनिः स मधुहा व्यभुक् तुसस्थित । भूभ्यपान्योमभूनात्मा श्याम शान्तिकरोऽरिहा ॥३६ मरिघ्नममरादीनाञ्चक गृह्य गदाधरः । अक नगादिवोद्यन्तमुद्यम्योत्तमतेजसा ।।३७ सव्येनालम्व्य महती सर्वामुरविनाशिनीम् । क्रेण काली वपुषा शान कालप्रदागदाम् ॥३८ अन्यभुज. प्रदीप्तान जगारिध्वजः प्रभु । दधारायुधजातानि शाङ्गोदौनि महाबलः ॥३६ सकश्यप-यात्मभुद्विज मुजगभाजनम् । पवनाधिकसम्यान गगनशामन खगम् ।।१० मुजगेन्द्रंग बदन निविप्टेन विराजतम् । अमृताम्म निर्मुक्त मदिराद्रिमिवाच्चिनम् ॥११ दवामुरविमर्देषु वहशाहविक्रमम् ।
૭૨ मत्स्यपुराण महेन्द्रणामृतस्यार्थे वजेण कृतलक्षणम् ।।४२ वह मधुदत्य का हनन करने वाले--सबकी योनि तथा उत्पत्ति का स्थान-हव्य को खाने वाला-ऋतुओ मे संस्थित-भूमि, जल और व्योम भूत स्वरूप-श्याम और अरियो का हनन करने वाला णान्तिकर था ॥ ३६ ।। उन गदाधर प्रमु मे देवगणो के अरियो के मारने वाला चक्र ग्रहण किया था। यह चक्र अपने उत्तम तेज से मग से उदीयमान सूर्य के सदृश प्रतीत हो रहा था ॥३७।। सव्य कर से समस्त असुरो के विनाश करने वाली महती और वपु से शत्रुओं के काल को प्रदान करने वाली गदा को प्रभु ने ग्रहण किया था ॥३८॥ भुजगो के आर ( गरुड ) को ध्वजा वाले महान् बलवान् प्रभु ने अपनी अन्य भुजाओ के द्वारा जो कि प्रदीप्त प्राभा वाली थी आक आदि प्रायुधो को धारण किया था। ॥३६॥ वह प्रभु कश्यप महर्षि के पुत्र • भजगो का भोजन करने वाला पक्षी - पवन से भी अधिक वेग से युक्त - गगन को क्षुब्ध करने वाला- खग-मुखमे निविष्ट भुजगेन्द्र के द्वारा विराजमान-अमृत के आरम्भ से निमुक्त अत्यन्त उच्ज मन्दरणों के ममान स्थित थे । वह गरुड देवो के और असुरो के विमर्दन करने वाले युद्धो मे बहुत ही अधिक विक्रम से युक्त अमृत के लिये वज्र के द्वारा महेन्द्र से कृत लक्षण वाले थे ॥४०॥ ॥४१॥४२॥ शिखिन बलिनञ्चव तप्तकुण्डलभूषणम् । विचित्रपत्रवसनन्धातुम तमिवाचलम् ।।४३ स्फीतक्रोडावलम्वेन शीताशुसमतेजसा । भोगिमोगावसिक्तेन मणिरत्नेन भास्वता ॥४४ पक्षाभ्याञ्चरपनाभ्यामावृत्यदिविलीलया। युगान्तेसेन्द्र चापाभ्या-तोयदाभ्यामिवाम्बरम् ॥४५ नीललोहितपीताभिः पताकाभिरलड्कृतम् । येतुवेपप्रतिच्छन्न महामायनिकतनम् ।।४६ सुरसंन्य विस्तार वर्णन ७३ अरगावरजं श्रीमानारुह्य समरे विभुः । सुवर्णस्वर्णवपुपा सुपर्ण खेचरोत्तमम् ।।१० तमन्वयुवगरा मुनयश्च समाहिताः। गीमि परममन्त्राभिस्तुष्टुवुश्च जनार्दनम् ॥५८ तवैश्रवणनश्लिष्ट देवस्वतपुरःमरम् । द्विजराजपतिक्षिप्त देवराजविराजितम् ॥१६ चन्द्रप्रभाभिविपुल युद्धाय समवर्तत । स्वस्त्यम्नु देवेभ्य इति वृहस्पतिभारपत ।। स्वस्त्यस्तु दानवानोके उगन, वाश्यमाददे ॥१०॥ वह गरुड पक्षिराज-शिखो-बली- तप्न कुण्डर मुसवाना- विचित्र पत्रों के वस्त्रो से युक्त घातुमान् ए मचल रे तुल्य स्थित था ॥ १३ ॥ दह गड स्फीन (लम्ब चौई)ोड में अवलम्ब वाले- जीताशु (चन्द्रमा) ममान तेजयुक्त-मो गयों के मोग में अवसिक्त भावान् मणि रत्न मे गोभिन पा। वह अपने मुन्दर पत्रों वाले पक्षों से युगान्त में इन्द्र के वापी में युक्त तोपदो से बम्बर की भांति दिवलोक में लीना से आवरण कर म्पित था। वह मम्ड देव नीललोहित सौर पीन वर्ण वाली पनाराओं में ममलंकृत-तु के देप में प्रतिच्छन्न- महान काया के निनन वाले अरमदेव रे छोटे भाई थे। उन गाह पर वर्ग वाने मुवर्ण र वपु से मुरगं और खेचरों में सर्वोत्तम थे श्रीमान प्रभु ने ममर में अवसर पर समारोहण पिला पा ॥४४.४५, ४६, 311 उन प्रभु पोधे गमन करने वाले देवाण और परम समा. हित मुनिाप थे। जिन्होंने परम घंठ मन्त्रों से समन्वित वारियों के द्वारा भगवान् जनार्दन मुका म सदन पिया या ।। ४। उन प्रमुके साप में श्रदन पुरेर थे और वंदम्वन ( यमन ) उन आगे थे। जिगरे पति में लिप्त और देवगर में मोमिन छ इस प्रकार का राप्रमाओ मे परम विकुन वह मु युद्ध र नेरे लिये प्रस्तुत ही 2
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उत्स्यपुराण
उस अवसर पर सुरों के गुरु वृहस्पति ने देवो का मङ्गल हो-ऐसा
आशीर्वादात्मक वचन कहा था। उधर उशना असुरो के गुरु ने दानवो की
सेना में स्वस्ति हो-यह वाक्य कहा था।
६८-देवासुर संग्राम वर्णन (१)
ताभ्या बलाभ्या सजज्ञे तुमुलोविग्रहस्तदा।
सुराणामसुराणाञ्च परस्परजयैषिणाम् ॥१
दानवा देवतः साद्धं नानाप्रहरणोद्यता. ।
समीयुयुध्यमाना वै पर्वता इव पर्वतैः ॥२
तत् सुरासुरसयुक्त युद्धमत्यद्भुत बभो।
धर्माधर्मसमायुक्त दर्पण विनयेन च ॥३
ततोरथैविप्रयुक्त वरिणश्च प्रचोदितः ।
उत्पतद्भिश्च गगनमसिहस्तं समन्ततः ॥४
क्षिप्यमाणश्च मुसल सम्पतद्भिश्च सायक।
चाविस्फार्यमाणेश्य पात्यमानश्च मुद्गरं. ५
तयुद्धमभवद्घोर देवदानवसङ्कलम् ।
जगतस्त्रासजन युगसवर्तनोपमम् ॥६
हस्तमुक्नैश्च परिविप्रयुक्तैश्च पर्वतः।
दानवा. समरेजघ्नुर्देवानिन्द्रपुरोगमान् ॥७
श्री मत्स्प भगवान ने कहा--उस समय में उन दोनो रोनाओं से
एक महान तुमस युद्ध उत्पन्न हा गया या । यह युद्ध परस्पर मे भय यो
मभिवापाये गा घामे मुर और अगर इन दोनों या ही हुआ था ॥१॥
बगर प्रकार के अयथा में उद्यत हो । वास दानव देवगणी के साथ
सोपी हो भौति गुड वग्न हा गगर में पपस्थित हो पर थे ॥२॥
देवासुर संग्राम वर्णन ७५ वह सुरो और असुरो का सयुक्त युद्ध अत्यन्न ही अद्भुत शोभा दे रहा था क्योकि वह विनय और दर्प से, धर्म तथा अधर्म समायुक्त था। देवो मे विनय और धर्म था तो असुरो म घमण्ड और अधर्म था ।। ३ ।। इसके अनन्तर विशेष रूप से प्रयुक्त और प्रकृष्ट स्पस प्रेरित पजी के द्वारा खङ्ग हाथों में ग्रहण करने वाले चारो ओर से गगन में उत्पतन कर रहे थे। प्रक्षिप्न किये हुए मुमल-सम्मतन वाले साय-विस्फार्य माण चाप और पात्यमान मुद्गरो के द्वारा वह देवो और दानवो का सकुल महान् घोर युद्ध हुआ या और यह युद्ध सब जगत् को नास देने वाला था तथा युग के सम्यता के ही तुल्य या ॥ ४, ५. ६ ॥ हाथो से छोडे परिघो द्वारा तथा विशेष रूप से प्रयाग मे लाये हुए पवतों के द्वारा दानव गण देवो का जिनमें महन्द प्रमुख अग्रणी था हनन करने लगे थे।॥७॥ ते वध्यमाना वलिभिर्दानवेर्जयराशिभिः । विषण्णवदना देवा जग्मुराति परामृधे ॥ तेऽस्त्रशूलप्रमथिता परिधर्भिन्नमस्तकाः । भिन्नोरस्का दितिसतंबैमूरक्त वर्णवह ॥ वेष्टिता. शरजालेश्च निर्यलाचामुरहताः। प्रविष्टा दानवी मायान्न शेकुम्ने विष्टिनुः अस्त गतमिवाभानि निष्प्राममा हति। वल सुराणाममुरैनिप्प्रयत्वापुर टन । दैत्यवापन्युतान् घोगश्यिया वतन वटाद। शको दंश्यवल घोर विदेश म दैत्यप्रमुग्यान हत्या दहान्दः ! ताममेनाम्नजान दगनमा तेन्योन्य नाटकालन। पोरण तमनविधानमा .
मत्स्यपुराण उस महान् युद्ध में जय काशी बलशाली दानवो के द्वारा वध किये जाने वाले के देवगण विषाद युक्त मुखो वाले होकर महान् पीडा को प्राप्त हुए थे॥८॥ वे सब देवता लोग त्रिशूलो से प्रमाणित -परिधो के द्वारा भिन्न मस्तकों वाले और दिति के पुत्रों के द्वारा भिन्न उर स्थल वाले शरीरो में होने वाले वणो से बहुत रक्त का वमन करने लगे थे ॥६॥ शरो के जालों से उनको एकदम वेष्टित करके असुरो ने यलों से रहित कर दिया था। देवगण दानवों की माया में प्रविष्ट होकर कुछ भी विशेष चेष्टा करने मे समर्थ नही रहे थे ॥ १०॥ असुरों के द्वारा सुरगणो के बल को प्रयत्न से रहित आयुधो वाला बना दिया था और यह प्राणो से रहित के समान आकृति वाला अर्थात मुर्दे की भांति अस्त को प्राप्त हुआ सा ही प्रतीत हो रहा था ॥ ११॥ द-यो के चापो से एटे हुए उन परम घोर शरो को बज के द्वारा छेदन करके बहुत अधिक नेत्रो वाले इन्द्र ने उस अत्यन्त घोर दैत्यों को सेना में प्रवेश किया था ॥ १२॥ उम महेन्द्र ने प्रमुख दैत्यो का हनन करके फिर उस महान दानवो के बल को तामस अस्त्रो के जाल से उसे एकदम तमोभून अप व अन्धकार मय पर दिया था।॥ १३ ॥ इन्द्र के तेज के प्रभाव से उस परम थोर सर से पाविष्ट होरर वे देत्यगण परसार मे दरयो वो और देवो के पाहनों को भी नहीं जान पा रहे थे ॥१४॥ मायापार्शविमुक्तास्तु यत्नवन्तः सुरोत्तमाः । यापि दैत्यसिहानान्तमोभूतान्यपातयन् ॥१५ अपध्वस्ता सिज्ञाश्च तमसा नीलवचसा । पेनुस्ते दानवणास्टिमक्षा इयाद्रय: ।।१६ सदपनाभूतदयेन्द्रमधवार इवाणवे। दानयन्दवादनम्तमाभतोमवाभवत् ।।१० सदागृजामहामाया मयस्ता तामसीन्दन । गगातापातजननी गृष्टामावण पहिलना ॥१८
देवासुर संग्राम वर्णन
सा ददाह ततः सर्वोन् मायामयविकल्पिता।
दत्याश्चारित्यवपुषः सद्य उत्तस्थुराहवे ॥१६
मायामौवी समासाद्य दह्यमाना दिवौकसः ।
भेजिरे चेन्द्रविषय शीतांशु सलिलप्रदम् ॥२०
ते दह्यमाना ह्यौर्वेण वहिन ना नष्टचेतसः।
शशंमुर्वनिणं देवाः सन्तप्ता: शरणैषिणः ॥२१
माया के पाशो से विमुक्त हुए यलो पाले सुरोत्तम तमोभूत
दैत्यों के मिहों के समान परीरो को भूमि पर मार कर गिराने लगे थे
॥ १५॥ नील वर्चस तम से एकदम अपध्वस्त और ममा (पेतना एवं
होश ) से रहित रे दानव गण पक्षो के छेदन हो जाने वाले पर्वतो के हो
सम्गन भूमि पर पतित हो रहे थे ॥ १६ ॥ अजंव में अन्धकार के समान
उस घनीभूत दैत्येन्द्र और देवो के दाग क्दन किये गये दानव तमोभूत
पी ही तरह हो गया था ॥१७॥ उस समय में मप दानव मे देवों के
द्वारा की हुई उम तामसी माया को दग्ध करते हुए एक अपनी महामाया
का सजन किया था जो औवं वरिन के द्वारा सृजि हुई
मे उचोत (प्रकाश) की जननी यो ॥२८॥ मयदानव के द्वारा
विरचिन उस माया ने सबका दहन कर दिया था और फिर तुरन्त ही
देस्यगण देवो के वपु याल होकर उस रण स्थल में समुत्थिन हो गये थे।
धौवीं माया को प्राप्त कर दाण होते हुए देवगण इन्द्र का वियप मलित
का प्रदान करने वाले प्रोतानु का सेवन करने लगे थे। प्रोपं बहिन से
दहमान होकर वे देवमण एकदम नष्ट चोटाओं पाले हो गये थे। मौर
फिर वे सतप्त हुए देवता लोग शरण पी इच्छा पाने होते हुए इन्द्र से
रहने सये थे ।।१६.२०, २१॥
सन्तप्ते मायया संन्ये हन्यमाने च दानवः ।
चोरितो देवराजेन वरुणो वाक्यमग्रवीत् ॥२२
ओों यातिजा ! तपस्ते पे सुदाराम
और युगान्त
मत्स्यपुराम
और्व स पूर्वतेजस्वी सदृशो ब्रह्मणो गुण ।।२३
त तपन्तमिवादित्य तपसा जद्वदश्यम्।
उपतस्थुमुनिगणा दिव्या देवर्षिभि सह ॥२५
हिरण्यकशिपुञ्चैव दानवो दानवेश्वरः ।
ऋषि विज्ञापयामासु पुरा परमतेजसम् ॥५
ऊचुब्रह्मपगस्त तु वचन धर्मसहितम् ।
ऋषिवशेषु भगवछिन्नमलमिद पदम् ॥२६
एकस्त्वमनपत्यश्च गोत्रायाग्यो न वतते।
कोमान वनमास्थाय क्लेशमेवानुवर्त से ॥२७
बहूनि विप्र । गोत्राणि मुनीना भावितात्मनाम् ।
एकदेहानि तिष्ठन्ति विविक्तानि विता प्रजा. ।।२८
मय दानव की रचित माया स सेना क सन्तप्त हो जाने पर तथा
दानवो के द्वारा हनन दिये जाने पर देवराज के द्वारा प्रेरित किये हुए
वरुण देव ने यह व क्य रहा था--हे इन्द्र ! ब्रह्मपि से जन्म लेने वाले
और्व ने सीव दारण तार्या की थी। यह औव पूर्व का ही तेजस्वी
था तथा गुणा के द्वारा ब्रह्मा के महा था ।। . 1 २३ ।।
तप के द्वाग
इस अवश्य जगत को 'त्य पे समान तपाते हुय उसका देवपियो के
सहित दिव्य मुनिगणो ने सस्तवन किया था ।
दानवेश्वर दानव ने
हिरण्यकशिपु को पहिले परम तेजम्बी पिको विज्ञापित किया था।
।।२१।२५ ।। ब्रह्मविया ने उस परम धम्मं से सहत वचन वहा पा--
हे भगवन् ! ऋपियो थे वर्णो मे यह छिन मूल वाला ही है। आप एक
ही सन्तान गे रहत है और गोत्र पे लिये अन्य पाई भी नहीं। आप
इस कौमार प्रत में समास्थित होकर वेवल क्लेश का ही अनुवनि पर
रहे हैं। रविवादिन थारमा वाले मुनियों के बहुत-स गोत्र ऐरी है
षो प्रजागा न निा ए दही या विवित्रा स्थित रहा करते हैं
।। २६,२७,२८॥
देवानुमान वर्ग
एवमुन्नमूलश्च पुतैना नान्ति कारणम् ।
भवास्तु तपसा श्रेफो प्रनापतिसमद्य तिः ॥२६
तत्र तंव वेगार दईयात्मानवात्मना ।
त्वया धर्मोचिंतन्तेन द्वितीयांकुरु व तनु ॥३०
स एवमुक्तो मुनिभिह्मावभौमनु ताडितः ।
जगहें तान् पिगणान् वचनं चेदमब्रवीत् ॥३५
यथा विहितो धर्मो मुनीना शाश्वनस्तु स .
आप व मेवतःमं वन्यमूलपनाशिनः ॥३२
ब्रह्मयोनो प्रमूतस्य ब्राह्मणस्पात्मदर्मिनः ।
ब्रह्मचर्य सुचन्ति ब्रह्माणमपि चालयेत् ।।३३
जनाना वृत्तयन्तिस्रो यद् गृहाश्रमवासिनाम् ।
अम्माकन्तु वरं वृत्तिवनाश्रमनिवासिनाम् ॥३४
इस प्रकार से उच्छिन्न मूलो वाले पुगे से हमारा कोई कारण
नही है और आपको न.पापा में परम थे एव प्रजापति के समान रनि
वाले हैं। अब उसमें अप वश के लिये हो परसाव करे और आत्मा
द्वारा मामा की वृद्धि करै । आपन धर्म का तो पनि अर्जन कर हो
लिया है । दूसरा शरीर भो बनाइये ॥२६।३०।। मुनिगो के द्वारा
जब इस प्रकार से उन मुनि से कहा गया तो वह और मर्म स्थत में
साहित क्यिा गया था। उसने उन पिगमी को गर्दा को यो और फिर
उनसे यह पचन बोसा था। जिस प्रकार में मेरे दाग यह धर्म विहित
दिया गया है वह मुनिको का परम पावन धाम है। धन में समुत्पन्न
मूल और पनो का नगन बरने वाले तया आप रम को संरन पर
पाने-ल यानि में ममुत्पन्न-मात्मसी प्राह्मण या भलो मानि चरित
महापापा बटा महान माहाम्य है यह तो ब्रह्मा से भी
कर देने वाला होता है। जो गृद्धाश्रम निवामी न है उन
.
८०
मत्स्यपुराण
वृत्तियाँ होती हैं । हम जो बनाश्रम निवासी हैं उनकी यही वृति परम
श्रेष्ठ हैं ॥ २६-३४ ।।
अब्भक्षा वायुभक्षाश्च दन्तोसुखलिनस्तथा।
अश्मकुट्टा दश तथा पञ्चातपसहाश्च ये ॥३५
एते तपसि तिष्ठन्ति व्रतैरपि सुदुष्कर।
ब्रह्मचर्य पुरस्कृत्य प्रार्थयन्ति पराङ्गतिम् ॥३६
ब्रह्मचर्याद् ब्राह्मणस्थ ब्राह्मणत्व विधीयते ।
एवमाहुः परे लोके ब्रह्मचर्यविदोजनाः ॥३७
ब्रह्मचर्ये स्थित धैय ब्रह्मचर्ये स्थित तपः।
ये स्थिता ब्रह्मचर्येषु ब्राह्मणा दिवि सस्थिता ॥३८
नास्ति योग विना सिद्धिन वा सिद्धि विना यश. "
नास्ति लोके यशो मल ब्रह्मचर्यात् परन्तपः ॥३६
यो निगृह्येन्द्रियग्राम भूतग्राम च पञ्चकम् ।
ब्रह्मचर्य समाधत्ते किमतः परम तप. ॥ ४०
अयागे केशधरणमसङ्कल्पव्रतक्रिया।
अब्रह्मचर्ये चर्या च त्रय स्याद् दम्भसज्ञकम् ॥४१
क्व दारा क्वच सयोग. क्वच भावविपर्ययः ।
नन्विय ब्रह्मणा सृष्टा मनसा मानसी प्रजा ॥४२
जल के भक्षण करने वाले - वायु के भक्षण करने वाले तथा
दन्तोलूखली-दश अश्म बुट्ट और जो पाच सातपो के
सहन
करने वाले
हैं । ये तप में आस्थित रहा करते हैं और जो परम दुष्कर प्रतो के द्वारा
अहाचर्य वा पूर्ण परिपालन करके परागनि की प्रार्थना किया करते हैं ।
॥३५॥३६॥ परलोक में भी ब्रह्मचर्य के महान् महत्व के ज्ञाता लोग इसी
प्रकार से कहा करते हैं Eि ब्रह्मवयं से ही ग्राह्मण का याह्मणत्व स्थित
रहा करता है । ३७। इस ब्रह्मचर्य में ही धंय की स्थिति रहा करती है
भौर हम ब्रह्मचम्य में ही तपस्थित रहता है। जो ग्राह्मण अपने पूर्ण
देवासुर संग्राम वर्णन
प्रह्मचयं व्रत में दिख हुये हैं वे दिवलोक में सम्यिति रक्क्षा करते हैं।
॥३८॥ योग के बिना कोई भी सिदि नही हुआ करती है और जब कोई
सिद्धि नहीं होनी है यश भो लोक में नहीं हुप्रा करना है तथा लोक में
पश का मूल नहीं है और ब्रह्मचर्य से अधिक कोई भी तप नहीं होता
है ॥३६॥ जो कोई भी पुस्प अपनी इन्द्रियों के समूह को पांचो भून.
प्रामों को निग्रहीत करके ब्रह्मचर्य व्रत का पूर्ण पालन किया करता है
फिर इससे अधिक अन्य क्या तुप हो सकता है। यही सबसे परम श्रेष्ठ
तप होता है ॥४०॥ अयोग में कैगो का धारण करना -विना ही किमी
सहला के प्रतो की क्रिया का सम्पादन करना और प्रब्रह्मचर्य में अपनी
धर्या रखना ये तीनों पम्म दम्म को मना वाले ही कहे गये हैं ॥ ४१।।
पहां तो दारा का सयोग हुआ था और वहां भावो का विपर्यय ही हुआ
था अर्थात् दारा-संयोग और भावो की विपरीतता ये तीनो ही वानों
का बिल्कुल अभाव या तो भो ब्रह्मा के द्वारा मन से ही यह मानसी
प्रज्ञा का सृजन किया गया था ।।४॥
यद्यस्ति तपसो वीयं युष्माक विदितात्मनाम् ।
सृजव म नमान् पुत्रान् प्रजापत्येन कर्मणा ४३
मनसा निर्मिता योनिराधातव्या तपस्विभिः ।
न दाग्योगो वीज वा वनमुक्त तपस्विनाम् ॥४४
यदिद सुमधर्मार्थ युप्या भरिह निभः ।
ध्याहृत सद्भिरत्ययमद्भिरित्र मे मतम् ॥ ४५
वपुर्दीतान्तरात्मानमेतत् कृत्वा मनोमयम् ।
दारयोग विना सूक्ष्ये पुत्रमात्मतनूरुहम् ।।४६
एवमात्मानमात्मा में द्वितीय जनयिष्यति ।
धन्येनानन विधिना विधिक्षन्तमिव प्रजा: ॥४.
और्वन्तु तपसाविष्टोनिवेश्योग हताशने ।
ममन्यन दर्मेण सुतम्त प्रमवारगिम् ॥४८
तम्योर महमा मित्वा चालामाली ह्या
.
१२ मस्थ पुराण जगतो दहनाकाक्षी पुत्रोऽग्नि समपद्यत ॥ ४६ यदि आत्मा के ज्ञान को जानने वाले आप लागो में कुछ तप का वीर्य विद्यमान हैं तो आप प्रजा पत्य कर्म के द्वारा मा-स पुत्रों का सृजन करिए ।। ४३ ।। मन के द्वारा ही निमित की हुई योनि ही तपस्वियो को आधान करनी चाहिए। दारा क साथ दोग करना तथा वीज का प्रयोग करना तपस्वीयो का व्रत नहीं बताया गया है ।। ४४ ॥ यहा पर आप लोगो ने जो भी निर्भय होकर इस लुप्त धर्म और अर्थ से युक्न वचन वो कह डाला है । यद्यपि आप लोक ससुरुष है जिन्होने इसको यहा पर प्रति पादन किया है तोभी वह मुझको असत्पुरुप के कथन के समान ही प्रतीत होता है मैं इस होप्त अन्तरात्मा वाले वपु को मनोयम करके दारा के योग के बिना पो प्रात्म तनुरुह पुन का सृजन करूंगा। इसी प्रकार से यह मेरी प्रात्मा द्वितीय आत्मा नो जन्म ग्रहण करायेगी और इमी वन्य विधि के द्वारा प्रा की भाँति ही जलाने वाली ही जायगी। उस ओर्व ने तप से समाविष्ट होकर अपने अरुको हुताशनो निवेशित कर निया णा और एक धम मे सुनकी दर्भारणि का मथन किया था ।। ४५ ।। ४६ ।। ४७ ।। ४८ ।। उस के मह का सहसा भेदन करक विना ही ई धन बाला ज्बालाभाली और इस जगत् को ह्यच कर देने की आऊडक्षा वाला अग्नि पुन समु-हुमा था ॥ ४६॥ ऊवस्योरु विनिभिद्य और्चा नामान्तकोऽनल। दिधक्षमिव लोकास्त्राज्जपेपरमकोपन. १५० उत्पन्नमात्रश्चोवाच पितर श्लणया गिरा। क्षुधामे वाधते तात ! जगद्भक्ष्ये त्यजस्वमाम् ॥५१ प्रिदिवाराहिभिज़िम्भमाणा दिशोदश । निर्दयन् सवंभूनानिववृ साऽन्तकोऽनल: ५२ एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा मुनिमूर्व सभाजयन् । उनाच वार्यता पुत्रो जगतरच दयाकुरु ॥५३ देवासुर संग्राम वर्णन ८३ अस्यापत्यम्य ते विप्र! करिष्ये स्थानमुत्तमम् । तथ्यमेतद्वच पुर! शृणु त्ववदताम्बर ॥५४ धन्योऽभ्यनुगृहीतोऽस्मि यन्मेऽद्य भगवाच्छिशो । मतिमेता ददातीह परमानुग्रहायव ॥५५ प्रभातकाले सप्राप्ते काक्षितव्ये समागमे । भगवन् ! तपित पुत्र कंय. प्राप्स्यते सुखम् ॥ ५६ कुत्र चास्य निवास म्याद्भोजन वा किमात्मकम् । विधास्यतीह भगवान् वीर्यतुल्यं महौजसः ॥ ५७ सर्व की हा विनिमेंदम करके और्वा नाम वाला अनल अन्त कर देने वाला परम कोर से समन्वित तीनो लोकोमोग्य सा परता हुआ समुत्पन्न हुआ था। उत्पन्न होने के ही साथ उसने परम विनम्र वाणी से अपने पिता से प्रार्थना की थी कि हे ताना मुझे यह क्षुधा अत्यन्त अधिक्ता क साथ सना रही है। मैं इस जगत का भक्षण करूगा आप मुझे अपनी क्षुधा के निवारण करने के लिय मुझे छुट्टी दे दीजिए १५०,५१॥ निदिव में समारोहा करने वाली व लाओं म दशो दिशाओ में जृम्ममाण होता हुआ ममत भूतो को दम स रहित होकर दलित परता हुमा गया था। इसी बीच में वह अन्तक अनल वृद्धि का प्रप्त हो प्रह्मा ने मुन का समाजन करत हुए उसर का थाकि हे पुत्र'यसका वारण करो तथा इस जगत् पर दया करो।५२, ५३॥ हे विर! मैं आपकी इस सन्तति का समुचित स्थान स्थिर कर दूंगा। हे पुष ! बोलने वालो में पग्म मार मेर अतीव तथ्य वचन का प्रवण करो॥५४॥ ऊब ने कहा-मैं परम धन्य और प्रतीव अनुगृहीत हू कि प्राज भगवान् मापन इस समय मे इस शिशु को ऐसी बुद्धि मुझपर परम अनुग्रह करने के लिय प्रदान की है। प्रभात काल के सम्प्राप्त होने पर आपका समागम आकाङ्क्षणीय है । हे भगवन् ! यह वनलाइये दि किन हायो स पित हुआ मेरा पुत्र मुख प्राप्त करेगा? इमरा निवास म्पल यहाँ पर होगा और दमक
मरस्यपुराण
पा स्वरूप होगा? भगवान् माप इस महा। ओज वान वीर्य र
तुल्य ही इन याता की व्यवस्था पर द ग ।। ५४-५७ ।।
वडवामुसेऽस्य वसति समुद्र व भविष्यति ।
मम योनिजलविप्र! तस्य पीतवत सुखम् ।। ५८
यत्राहमास नियत पिवन वारिमय हवि ।
तविस्तव पुत्रस्य विसृजाम्यलयन्च तत् ॥५६
ततो मुगा ते भूतनामेप चाहनव पुत्रक।
सहितौ विचरिप्यावा निप्पुत्राणामृणापह ॥६०
एषोऽग्निरन्तकाल तु सनिलाशी मया कृत ।
बहन सवभूताना सदवासुररत्तसाम् ॥ ६१
एवमस्त्वितित सोऽग्नि सवृतज्वालमण्टल ।
प्रविवेशाणवमुख प्रक्षिप्य पितरिप्रभाम् ॥६२
प्रतियातस्ततो ब्रह्मा ये च सर्व महषय ।
ऊवम्याग्ने प्रभा ज्ञात्वा स्वर स्वाङ्गतिमुपाश्रिता ॥६३
श्री ब्रह्माजी ने कहा-समुद्र मे वडवा के भूख में इसका निवास
स्थल होगा। हे विष। मेरी उ पत्ति की योनि जल पीने वाले इसको
सुखकर होगा और जहाँ पर हूँ वही पर नियत रूप से वारिमय हवि का
पान करेगा तथा वह हदि आपके पुत्र के निमित्त मैं लय कान पय त
विसजित कर देता हू ।। ५८ । ५६ ।। इसके पश्चात हे पुत्र | भूता के
युग के अ त मे यह आपका पुत्र और मैं दोनो एक साथ मे मिलकर
निप्पुत्रो के ऋ" का अपहरण करने वाले विचरण करेगे। इस अग्नि
को अन्तकाल में मैंने सलिल का अशन करने वाला कर दिया है जो
समस्त भूता का तथा देव-असुर और राक्षसो का दमन करने वाला
होगा ! ऐसा ही होवे-यह कहकर वह अग्नि सवृत ज्वालाओ के मण्डल
वाला अपने पिता ऊव मे प्रभा को प्रक्षिप्त करक अदि के मुख मे
प्रवेश कर गया था। इसके अन तर ब्रह्माजी तर गब महषिगण प्रति
देवासुर समाम वर्गत
६२
यान कर गये ये 1 की अग्नि की प्रभा दो जानकर सब अपनी गति
का आयर कर गये 21$e-६॥
हिरण्यकशिपु प्वा तदा तन्महद्भुतम् ।
कचः प्रपतसर्वाङ्गो वाक्यमेतदुवात्र ह ॥६४
भगवन्नद्भुतमिदं संवृत्त लोकसाक्षितम् ।
तपसा ते मुनिश्रेप्! परितुष्टः पितामहः ६५
महन्नु तव पुत्रस्य तब चंद महाव्रत !
भृत्य इत्यवगन्तव्यः साध्यो यदिह कर्मणा ॥६६
तन्मां पश्य समापन्न तवंवाराधने रवम् ।
यदि नीदे मुनिश्रेष्ठ! तवंव स्यात् पराजयः ॥७०
घन्योजम्बनुग्रहीताऽस्मि यस्यतेऽह गुरः स्थितः ।
नास्तिमे तपसानेन भय मद्येमुब्रत !॥७१
तामेव माया गृहलाप्य मम पुन्नोग निमिताम् ।
निन्धिनामग्निमयीन्दुधपा पादकरपि ॥७२
एपा ते स्वस्य वंगस्य वशगारिविनिग्नहे।
संरक्षयात्मपतञ्च विपञ्च प्रपंति ॥७०
उसी समय में उस महान् अद्भव को हिरप्य काग देखकर
उच्च भाव ने सब बङ्गो को प्रश्न करने वाला होकर यह वाय दोला
था ॥ १९॥ हे मुनिश्रेष्ठ! यह लोर का साक्षिक बद्भुन हो गया है ।
हे भगवन् ! आपको तपश्चमी ने पितामह भी परितु हो गये हैं ।।६।।
है महादत ! मैं तो आपरे पुत्र का और भापका भून्य ही है-ऐसा हो
अवगमन कर लीजिए जो कि यहां पर कम्म के द्वारा साधना के योग्य
है । इमलिदै उन मुजको मापने ही सगराधन में सम्मन्न हो देदिव।
है मुनि ! यदि मैं आरका अनुम्ममा सेब होकर भी दुखित रहता
हूं तो यह बाप ही पराउक होगन कहा-मैं परम धन्य हूँ
और परम अनुगृहीत हूं कि जिस नाम गुर समस्थित हो गया हूं।
५६
मत्स्यपुराण
हे सुव्रत । आज यहां पर मेरे इस तप से कोई भी भय नहीं है। मेरे पुष
के द्वारा निर्मित उसी माया को ग्रहण करो जो बिना ई धन वाली पावकों
द्वारा भी दुर्धष और अग्निमयी है। यह मेरे अपने वश ये वश म गमन
करने वाले अरियो से विशेष निग्रह में अपने पक्ष की रक्षा करेगी और
विपक्ष को प्रधर्पित करेगी॥ ६६-७०।।
एवमस्त्विति ता गृह्य प्रणम्य मुनिपुङ्गवम् ।
जगाम निदिव हृष्ट कृतार्थो दानवेश्वर । ७१
एषा दुर्विपहा माया देवैरपि दुरासदा ।
और्वेण निर्मिता पूर्व पावकेनोवसूनुना ।।७२
तस्मिस्तु व्युत्थितेदैत्येनि:र्यपा न संशय ।
शापोह्यस्या पुरा दत्तोसृष्टायेनैवतेजसा ।।७१
यद्यषा प्रतिहन्तव्या क्त्तन्यो भगवान् सुखी ।
दीयता मे सखा शक | तोययानिनिशाकर ।।७४
तेनाह सह सङ्गम्य यादोभिश्च समावृत ।
मायामेता हनिष्यामि त्वत्प्रसादान्नसशय ।। ७५
ऐसा ही होगा-ऐसा कहकर उसको ग्रहण किया था और फिर उस
श्रेष्ठ मुनि को प्रणाम करके दानवेश्वर प्रस न एव कृनाथ होकर निदिव को
चना गया था ॥७१। यह माया दुविपह है और देवगणो के द्वारा भी
दुरासह है । इसको ऊब के पुत्र पावक औव के द्वारा पूर्व मे निर्माण किया
गया था ॥७२॥ उस दैत्य के व्युत्थित होने पर यह निर्वीय्य हो जाया
बरती है इस मे कुछ भी सराय नहीं है । जिस जिस तेज के द्वारा इस का
सृजन दिया गया था उसी के द्वारा पहिल इस को शाप भी दिया गया
है। यदि मह माया प्रतिहनन के योग्य करनी है तो भगवान को सुख
से
समत एवम् प्रम न जग्ना चहिए । हे इ द्रदेव ! अतएव तोय की योनि
निशाकर मरा सखा दगे॥७३॥७४।। उसके साथ मैं सगत होकर और
SS मत्स्यपुराण तथा देवगणो की विजय प्राप्त करने के लिये ही होगा ||१||२. हे सोम ! आप मत्त हैं और मुकाबले के प्रतिवीयं-चित्रम वाले हैं तथा आप समस्त ज्योतियो के ईश्वरो के भी ईश्वर हैं। रसों के वेत्ता लोग सब लोको मे आप से परिपूर्ण रस को भली भाति कहा करते एवं जानते हैं ॥३॥ मण्डल मे सागर की ही भौति आपको क्षीणता तथा वृद्धि स्पष्ट हैं और जगत् मे महोरात्र के कार को योजित करते हुए आप परिवतित हुआ करते हैं। आपका यह शश के सदृश जो अङ्क में चिन्ह है यह लोकों की इच्छा से ही परिपूर्ण है और इस को नक्षत्रो की योनि वाले जो देवगण भी हैं वे भी हे सोम 1 नही जानते है ।।४ ॥५।। आप आदित्य के पथ से भी ऊपर सब ज्योतियो के उ भाग में समवस्थित हैं। आप सहसा इस तम को प्रोत्साहित करके सम्पूर्ण जगत् को अपने सुन्दर प्रकाश से भासित कर दिया करते हैं ॥६॥ आप अधिकृत कालयोग के स्वरूप वाले १-यज्ञ के अभीष्ट और अविनाशी हैं । आप ओषधियो के स्वामी 1- सब क्रियाओ को योनि-अब्ज योनि और शीतल दीप्ति से समन्वित है ॥७॥ शीताशुरमृताधारश्चपलः श्वेतवाहन । त्वं कान्ति कान्तिवपुषात्व सोम.सोमपायिनाम् ।। सौम्यस्त्व सर्वभूताना तिमिरघ्नस्त्वमृक्षराट् । तद्गच्छ त्व महासेन । वरुणेन वरूथिना ॥ शमयत्वासुरी माया यया दह्याम सयुगे ॥६ यन्मा वदसि युनार्थे देवराज ! वरप्रद ! । एक वर्षागि शिशिरदैत्यमायापक्षणम् ।।१० एतान् मच्छीतनिदग्धान पश्य स्वहिमवेष्टितान् । विमायान् विमदाश्चत्र दंत्यसिंहा महाहवे ॥११ तेषा दिमागेत मृष्टा सपाशा हिमवृष्टयः । वेष्टयन्तिस्म तान् घोरान्दै त्यान्मेघगणाइन ॥१२ देव मुर पग्राम वर्णन तो पाशशीताशुधरी वरणेन्दू महायतो। जनतुहिमपातश्च पाशपातश्च दानवान् ।।१३ द्वावम्बुनायो समरे तो पाह्मियोधिनी । मृधे चेरतुरम्मोभिः क्षुब्धाविव महार्णवी ॥१४ हे सोम ! आप शीतल किरणों वाले अमृत के आधार~चपल प्रदेत वाहन हैं। आप इस गाने कान्तिपूर्ण शरीर के द्वारा स्वयं हो कान्ति हैं और मोम के पान करने वालो के लिए माक्षात सोम स्वस्थ वाले हैं। आप समस्त भूतो के लिये परम सौम्य हैं तथा सब ऋक्षा में राजा और तिमिर के श करने वाले हैं। इसीलिये है महासेन ! वस्थी वरण के साथ महायता करन के लिए आप शीघ्र ही चल जाइय नया जिससे हम सब युद्ध में दग्ध हुए जा रहे हैं उम इस आमुरी माया वा शमन कीजिए ॥८॥8॥ इन्द्रदेव के इस प्रकार से प्रार्थना करने पर सोम ने कहा है देवराज । हे वर प्रदान करने वाले देव । जो बाप युद्ध करने के लिये मुझे कह रहे हैं। मैं अभी दैत्यों की माया के अपकर्षण करने वाले शिशिर को वर्षा करता हूँ। बाप इन सबको मेरे हिम में सवेष्टिन और मेरे शोर से निर्दग्ध देखिये ! इम महायुद्ध में इन सब दैत्य पिहों को मद और माया से रहित हुए ही आप देखेंगे ।।1० १११॥ उनको मिकिरणो स समुस्मृष्ट पाशा के सहिन हिम को दृष्टियो मे घोर दत्यो को मेघ गणो की ही भां न वैश्ति कर दिया था ।। १२ ।। महान् बलवान् पाश और शीतल किरपा को धागा बरन वाले वक्ष्ण और चन्द्र दानो न उन दानवों का हिमके पानी तथा पाशो के पातों में हना कर दिया था ॥१३॥ वे दोनों अम्बुर स्वामी-पाश गेर हिम में युद्ध करन वाले उम महान् घोर रण में जलो म भुध दो महार्णवों श्रीमद ही विचरण कर हे थ ॥१४॥ ताभ्यामात्रावित मैन्य तदानमःम्या। जगत् मवर्तकाम्मीद. प्रविष्टग्विगवार III
६०
मत्स्यपुराण
तावुद्यताम्बुनायौ तु शशाङ्कवरुणावुभौ ।
शमयामासतुर्माया देवी दैत्येन्द्रनिर्मिताम् ॥१६
शीताशुजाल निदग्धा पाशश्च स्पन्दिता रणे।
म शेकुश्चलितु दैत्या विशिरस्काइवाद्रयः ।।१७
शीताशुनिहतास्ते तु दत्यास्तोयहिमादिता ।
हिमालावितसर्वाङ्गा निरूष्माण इवाग्नयः ॥१८
तेषान्तु दिवि दैत्याना विपरीतप्रभाणि वै।
विमान.नि विचित्राणि प्रपतन्त्युत्पतन्तिच ॥१६
सान् पाशस्तथिताश्छादिताश्छीतरश्मिभि ।
मयोददर्शमायावी दानवादिविदानवः ।।
उन दोनोस आप्लाविन दानवो की सेना उस समय मे दिखलाई
नहीं दे रही थी और यह सम्पूर्ण जगत् प्रविष्ट हुए सम्वत्तक अम्भोदो
के द्वारा सवत की तरह ही हो गया था ।।१५।। उन समुपत हुए
शशाक और वरुण दोनो अम्बुनायो ने देवो ने दैत्यों के द्वारा निर्माण की
हुई उस माया का एकदम शमन कर दिया था। शोताशुओं के जाल से
निर्दग्ध हुए तथा पार्टी से रणस्थल में स्पन्दित हुए सब दैत्यगण बिना
शिर वाले पवतों के समान ही चलने में असमर्थ हो गये थे ।।१६, १७ ।।
शीत किरणो से निहत हुए तथा जल और हिम स आदत तथा हिम से
प्लाविन समस्त अङ्गो वाले सब दत्यगण विना ऊष्मा ( ताप) बाली
अग्नियो व ही तुल्य हो गये थे ।।१८|| दिवलोक मे उन दैत्यो के विपरीत
प्रभा वाले विचित्र विमान कार उहत थे और नीचे भूमि पर गिर जाया
करत थे। उस समय में दिवलोक में मायावो दानव मय ने उन सब
दानव को पाश हस्त प्रथित और शीत रश्मियो स समाच्छादित देखा
या॥१६,२०॥
स शिलाजालवितता खङ्गवट्टिहासिनीम् ।
पादपोत्यटयूटाग्रा प दर कोणमाननाम् ।।२१
देवासुर संग्राम वर्गत मिहन्याघ्रगणाकीर्णा नदभिगंजयथपः । ईहामृगगणाकीणां पवनापूर्णितमाम् ॥२२ निमिता स्वेन यत्नेन कूजिता दिवि कामगाम् । प्रथितां पार्वती मायाममृत्मसमन्ततः।। ३ सासिगन्दः गिलावः सम्पतद्भिश्च पादप: । जधान देवसधांश्च दानवांश्चयजीवरत् ।।२४ नंशावरी वारणी च मायेऽन्नर्दधनुस्तत । समिभिश्चायसगण किरन देवगणान् ग्मे ।२५ साश्मयन्त्रायुधधना द्रमपवतसङ्कटा। अभवत् पोरसञ्चार्या पृथिवी पवा व १२ अ-मना प्रहताः केचिन् शिलाभिः वाकलीकृता.। नानिरुद्धो द्रुमगद वोऽश्यन क्रचन ।२७ तदपध्वस्तधनुप भग्नग्रहणाविलम् । निष्प्रयत्न सुगनाक वर्जयित्वा गदाधरम् । २८ उम समय में उम मय दानव ने शिला के बालो से विनन-सुङ्ग चर्मों के अट्टहाम वाली-पादपो के उलट कूटो के अग्र भाग वाली- कदराओ से समाकीगं, काननो स युक्त-मिह एवं यानी के गपो स सफुल --विधाहत हुए गजओ के यूथो में समन्विन-मृग गो मे माको-पवन में आपूर्णिन द्रुमे दाली-दिबलोक में स्वेच्च्या गमन करने वाली-बूजिन और अपने ही एल से निर्माण की हुई एग्म प्रथिन पान माया को चारो बोर सृजित कर दिया था। उसने अमि के शब्दों मे-शिलाओ को दी स-र सम्मान करने वाले पादपो मे दबी के सों का हनन कर दिया था तथा दानवो को जीवित कर दिया था। उस पानी माया मे नंगाकरी और वारुणी दोनों मायाऐ अन्नहित हो गई थी और देवगगा को असि तया आयास गो से रण में तितर- बितर कर दिया या ॥२१, २२, २३, २४, २५॥ अश्म यन्त्र और
मास्यपुराण
प्रायुधों से घन-द्रम और पर्वतों से संकट वह माया पर्वतो से पृथिवी
के समान अति घोर संचरण के योग्य हो गई थी ।। २६!! कुछ पाषारणे
से प्रहृत हुए थे और कुछ शिलायो से खण्ड २ कर दिये गये थे और
द्वै मगणेर से अनिरुद्ध कोई भी देवता दिखलाई नहीं दे रहा था। भगवान
मदाधर को वजित करके सम्पूर्ण सुरो की सेना अपध्वस्त धनुपो वाली-
मम्म प्रहरणा से आविल ( मलिन ) और प्रयत्न सहित बन गई थी
॥ २७, २८॥
स हि युद्धगत धीमार्तीशानोश्मव्यकम्पत।
सहिष्णुत्वाज्जगत्स्वामी नचुक्रोवमदाधरः ॥२६
कालज्ञः कालमेघाभ. समीक्षन कालमाहवे।
देवा पुरविमदन्तु द्रष्टुकामस्तदा हरिः ॥३०
ततो भगवता दृष्टौ रणे पावकमारतो।
चादितौ विष्णवाक्येन दो मायामपकषताम् ॥३)
लाभ्यामुग्रान्तदेगाभ्या प्रवृद्धाभ्या महाहवे ।
दधा सा पावती माया भस्मीभूता ननाश ह॥३२
सोऽनिलोऽनलसयुक्तः सोऽन लश्चानिलाकुलः ।
दत्यसेनान्ददहतुयुगान्तेष्विवमू छतो ॥३३
वायु प्रधावितस्तत्र पश्चादग्निस्तु मारुतम् ।
चेरत्तुनवानी के नीडन्तावनिलानलो ।।३४
वा समय युद्ध में ममन करने वाले श्रीमान् ईशान पापाणी
से कपि हो मये 4 किन्तु जगत के स्वामो भगदान गदाधर ने सहि.
गुना के गुण होने कणसे को वही किया था। काल के ज्ञाता--
कालीप व तुल्य आमा वाले हरि ने उस समय में उप युद्ध मे काल को
रेखन हा वर दवामुरा के दिम को दसन की कामना ब्राले हो गये थे।
मा उपरान्त भगवान् ने उत्त रण में पावक और मारत को देखा था
और ये सोनो वि + वायय ये प्ररित होकर उस मया का अपर पंण
मत्स्यपुराण पर एवं वात स्कन्ध से अपविद्ध हो जाने पर पावक के द्वारा किए हुए कम मे मय का बध हो गया था और भगवान् गदागर का स्तवन किया गया था ।। ३५, ३६ ॥ जिस समय मे मय दानव का वध हो गया था तो सभी दैत्य निष्प्रयत्न हो गये थे तथा नौलोक्य वाधन से मुक्त हो गया था । सब देवगण अत्यन्त प्रसन्न हुए थे और, सभी ओर "साधु- साधु' अर्थात् अच्छा हुआ की ध्वनिया होने लगी थी ।। ३६ ॥ इन्द्रदेव को जय होने पर और दैत्यो का पराजय हो जाने पर मब दिशाएँ विशुद्ध हो गई थी एव धर्म का विस्तार प्रवृस हो गया था ॥३८॥ चन्द्रदेव अपावृत हो गये थे तथा दिवाकर अपने स्थान पर स्थित हो गये थे एव चरित्न के वधु तीनो लोक अपनी स्वाभाविक अवस्था मे स्थित हो गये थे ।। ३६ ॥ यजमानो मे और मूतो मे पाप प्रशान्त हो गये थे तथा अभिन्न बन्धन बाला मृत्यु अग्नि मे हूयमान होगया था ॥ ४०॥ सब देवगण यज्ञो मे शोभा प्राप्त करने लगे तथा स्वर्ग के अथ का प्रदर्शन करते थे। सभी लोकपाल अपनी २ दिशाओं में यानो मे वस मान हो गये थे ।। ४१ । उस समय म मिद्धो का तपश्चर्या मे भाव स्थित हो गया था और जो प प पूण कर्म करने वान थे उनकी अभाव में स्थिति थी। देवो का पक्ष परम प्रमुदित हो गया और देयो का पक्ष एकदम विषाद से अम्त था।४२॥ त्रिपादविग्रहे धर्म अधर्म पादविग्रह अपावृत्त महाद्वारे वर्गमाने च सत्पथे ।।४३ लोके प्रवृत्तं धर्मेपु सुधर्मेप्वाश्रमेषु च । प्रजारक्षणयुक्तेषु भ्राजमानेपु राजसु ॥४५ प्रशान्तकल्मपे लोके शान्ते तमसि दानवे। अग्निमास्तयोस्तन वत्ते सग्रामकम्मणि ॥५५ तन्मया विपुला लोकास्ताभ्या तज्जयकृसुक्रिया। पूर्वदेवभय श्रवा मारतातिगहत ।।४६
देदार नान वान
म
काननमीति विस्तातो दानवः प्रत्यहम्पत ।
भाजाकारमुकुः शिञ्जिताभरपाङ्गः ॥४०
बाहुनिस्तुलयन व्योन क्षिपन् पद्धया नहीधरान् ।
ईत्यन्मुखनिवानवृष्टियक्तान् बनाकान् ॥
उमममय पे तीन पादो दाना धर्म का निरह पा और पधर्म
पेवल एक ही पाद से दुक्त पा । महाद्वार के अपावृत्त होने पर सब लोग
मन्यय में वर्तमान हो गरे थे ॥४॥ लोक अपने २ धर्मों और बापमो
प्रवृत्त
घे
'तया सव नृपति गप अमनो प्रश की रक्षा कार्य मे युक्त एवं
भ्राजमान होगये थे ।। १ ।। मम्पूर्ण लोक प्रशान क्ल्मपो वाले ये एक
दानवीय तम भी एक दम मान्त होगया था। वहीं पर अग्नि और मारत
का समाम बच हुआ था तभी यह तर होगया था बहुत से तोक तन्नर
होगये थे और उन दोनो से उनके दिजर की करने वालोनिया भी हुई
थो । मारत और अग्नि के द्वारा किये हुए महान् पूर्व देबो का भय भवष
करफ परम विस्यान कालनमि नाम बाला दानव वहाँ पर दिखलाई दिया
था जिसका भास्कर के आकार के सहा मुकुट पा और यह शिजित
आभरणो एघ अङ्गदो वाला था। यह काल नेनि अपनी बाहुओ से योम
तोलन करने लगा और पैसे से बडे २ महोघरो को भी हि करता था।
वह वृष्टि से युक्न बलाहको को मुख के निश्वासो क द्वारा प्रेरित करता
या ।।४४-४०॥
तियंगायतरक्ताक्ष मन्दरोदनवर्चसम् ।
दिधक्षन्तमिवायान्त सर्वान् देवगणान् मृधे ॥४६
तजयन्त सुरगणाश्छादयात दिशोदश ।
सवर्तकाले तृषितं दृष्ट मृत्युमिवोत्थितम् ।।५०
सुतलेनो छयवता विपुलाङ्ग लिपर्वणा ।
लम्बाभरणपूर्णेन किञ्चिचलितकर्मणा ॥५१
उच्छ्रितेनाग्रहस्तेन दक्षिणेन वपुष्मता ।
मत्स्यपुराण
दानवान् देवनिहतानुत्तिष्टाध्यमिति युवन ॥५२
त कालनेमि समरे द्विपता कालनेष्टितम् ।
वीक्षन्तैस्म सुराः सर्वे भयवित्रस्तलोचनाः ।।५३
तं वोक्षन्तिस्म भूतान ममन्त कालनेमिनम् ।
त्रिविक्रमाधिकमत नारायणमिवापरम् ॥५४
सोऽत्युच्छयपुरः पादमारता घूणिताम्बरः ।
प्रक्रामन्नसुरो युद्ध त्रासयामास देवताः ॥५५
समयेनासुरे द्रेण परिष्वक्तस्ततो रणे।
कालनेमिबभौ दत्यः स विष्णुरिक मन्दरः॥५५
अथ विध्यथिरे देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः ।
कालनेमि समायान्त दृष्ट्वा कालमिवापरम् ॥५७
जिस समय में वह कालनेमि वहाँ रणस्थल में समागत हुआ
था उस समय वह तिर्यक-वायत और रक्त नेतो वाला था-उसका
स्वरूप मदर गिरके तुल्य उदग्न वर्चस से युस था-युद्ध मे सब देवो
को समाप्त
रता हुआ समायात हुअ या।।४६) समस्त सुगेको डांटता
फटकारता हुआ दशों दिशाओ मे समाच्छादन करता हुआ और सम्वत्त
काल मे तापत समुत्यिा मृत्यु को भौति दिखलाई दिया था। उच्छय से
युक्त-सु दर तल वाले -विपुल अ गुलियो के वर्षों से पूर्ण-लम्बे
आभरणो से सयुत-कुछ चलित कर्मों वाले--उन्छिन-वपुष्मान दाहिने
हाथ से देवो के द्वारा मारे हुए दानवो से उठकर खड़े हो जाओ'--ऐसा
कह रहा था ॥४१-५२॥ उस समर क्षेत्र मे द्वेष करने वाले शत्रु ओ
का काल चेष्टित कालनेमि को भय से विशेष भीत लोचनी वाले
समस्त सुरगण देख रहे थे ।। ५३ ॥ चारो ओर ब्रमण करते हुए उस
कालनेमि को त्रिविक्रम { वामन ) से भी अधिक माने हुए दूसरे
नारायण के भी समान स्वभूता (प्राणी) देखते थे ।।५४॥ अत्यन्त
उच्छयपुर पाले- परी को मारत पूणित अम्बर से सम्पन्न उस सुर ने
६८ मत्स्यपुराण थी मत्स्य भगवान ने कहा -दानयो की सेना मे महासुर काल• नैमि विशेष दधित हुए महान् तेज वाला तप वे अन्न में जलद 2 तुल्य हो था ॥ १ ॥ त्रैलोक्य के अन्तर्गत उसको देखकर ही दानवेश्वर अत्युत्तम अमृत का पान करके अपरिश्रान्त होत हुए उठकर खड होगय थे ।।२।। तारकामय सग्राम मे निरन्तर जित काशी के सब दानव जिनमें मय और त र पुरोगामी थे भय और सन्त्रास को व्यतीत कर देने वाले थे ॥ ३ ॥ मन्त्रो का अभ्यास करने वाले और व्यूह का परिधावन करने घाले उनमे युद्ध की इच्छा रखने वाले नानव युद्ध स्थल मे पहुँच कर अधिक शोभा एव दीप्ति को प्राप्त हुए थे ॥ ४ ॥ जो लोग वहाँ पर मय दानव के परम मुख्य युद्ध पुर पर थे कालनेमि दानव को देखने वाले उनकी अत्यधिक प्रीति हो गयी थी ||५|| वे सभी भय का त्याग करके परम हर्षित होते हुए युद्ध करने के लिये वहा पर अस्थित हुए थे । उनमे मप-नार-वराह -वीर्यवान्-हयग्रीव-विधित्तिका पुत्रश्वेत दोनो खर और लम्ब – बलिका पुत्र अष्टि और किशोर नामधारी- स्वर्भानु-- --अमर प्रखप-महासुर वक्त्र पोधी ये सभी अस्त्रो के ज्ञाना तथा सभी तपश्चर्या मे भी सुस्थित रहने वाले थे ।।८। दानवा कृतिनो जम्मु कालनेमि तमुद्धनम् । ते गदाभिभुशुण्डीभिस्चन रथ परश्वधै ।।६ कालकल्पश्च मुसल क्षेपणीयश्च मुद्गरे । अश्मभिश्चाद्रिसदृशगण्डशैलेश्च दारुणे. ॥१० पट्टिशेभिन्दिपालैश्च परिश्चोत्तमागसै.। घातनीभि सुगुर्वीभि शतघ्नीभिस्तथैव च ॥११ युगेयन्त्रौश्च निमुक्तांगणेग्रताडिौ । दाभिश्चायतदीप्तेश्च प्रासी पाशैश्च मच्छगै ॥१२ भुजङ्गमौलिहानविसर्पद्भिश्च सायकै । वज्र प्रहरणीयश्च दोध्यमानश्च तोमर ॥१३ पालनेमि वृतान्त वर्णन ६६ विकोशेरसिभिस्तीर्ण. शूलैश्च शितनिर्मलैः । दत्या: सदीप्न मनस: प्रगृहीतशरासनाः ।।१४ ये समस्त परम कृती दानव उप अतीव उद्धत कालनेमि के समोप में पहुंचे थे। ये समो दैत्यगण बहुत से हथियारों से समन्वित थे जिनमे गदा-भुशुण्डो-चक्र-परश्वध-काल क्ल्प मुमल-क्षेपणीय-मुद्गर- अद्रि सदृश अश्म (पापाण)-दारुण मण्ड शंल-पहिश-मिन्दि पाल- उतमायम परिप-घातिनी और अन्यन्त गुरु । भारी एव बहुत विशाल ) रातनी (तोप)-युग यन्त्र - उप ताडित नियुक्त मार्गण (शर )-- आयत और दीप्त भुजाएँ -प्रास-मूछन पाश -भुजङ्गो के तुल्य मुखी पाले सेलिहान ( फुस्कारे भरने वाले ) और विशेष रूप से सर्पण करने वाले सागक-व-प्रहरणीय-दीव्य मान तोमर-पिना कोश ( भ्यान) पाले सङ्ग-शीत निर्मल तोमर आदि अनेक आयुध थे। इन सभी प्रकार के अनेक अस्त्र-शस्त्रो स सुसज्जित होकर सभी दानव सोप्न मन पाले थे और शरासनी को प्रण किए हुए वहा पर युद्ध स्थल में समुप. स्थित होगये थे ।।६-१४॥ तत. पुरस्कृत्य तदा कालनेमि महाहवे। सा दानशस्तप्रवरा दैत्याना रचे चमूः ।।१५ द्योनिमीलितसर्वाङ्गा घना नीलाम्बुदागमे । देवतानामपि चम्मुमुदे शरपालिता ॥१६ सपेता मितवृष्णाम्या तारा या चन्द्रमूर्ययोः । यायवेगवती सौम्या तारागणपताकिनी ॥१७ तोपदाविद्धवमना ग्रहनक्षग्रहासिनी। यमेन्द्रवरणगुप्ता धनदेन च धीमता 11१८ सम्प्रदीप्ताग्निनयना नारायणपरायणा । सा समुद्रोपमहशो दिया देवमहाचम् ॥१६ रराजास्त्रवती भीमा यक्षगन्धवंशालिनी !
૧૦૦ मत्स्यपुराण तयोश्चम्वोस्तदानीन्तु बभूव स समागमः॥२. द्यावापृथिव्यो सयोगो यथा स्याधुगपयये । तयुद्धमभवद् घोर देवदानवस फुलम् ॥२१ उस समय मे उस महान् रण स्थल मे ये सघ कालनेमि को अपना पुरोगामी बनाकर उपस्थित हो गये थे और वह दैत्यों की विशाल पेना परम दीप्त-प्रशस्त एवं अतीत श्रेष्ठ होकर दीप्तिमती हो गई थी। ।।१५।। इसी भांति महेन्द्र के द्वारा सुरक्षित देवो की भी सेना दिघलोक मे निमीलित समस्त अड़ी वाली नीलाम्बुदागम मे धनी परम प्रहृष्ट हो रही थी ॥१६॥ चन्द्र मोर सूर्य के श्वेत एव कृष्ण ताराओ से समुपेत वह देवो की सेना थी जो वायु के सदृश वेग से युक्त परम सौम्य और तारागणों की पताकाओ वाली थी ॥ १७ ॥ तोयटो से आविद्ध वसनों चालो-ग्रहो तथा नक्षत्रो के हास से सयुत थी। वह देवा की विशाल सेना यम-इन्द्र-वरुण और परम धोमान् धनद कुवेर के द्वारा सुर- क्षित थी ॥१८॥ अत्यन्त सम्प्रदीप्त अग्नि नयनो वाली-नारा- यण प्रम मे परायण एव समुद्रो के पोध के समान वह देथा की अतीय महान् एव विशाल सेना दिव्य हो रही थी ।। १६ ।। यक्षो और गन्धयों की शोभा से सुपम्पन्न-भाम स्वरूप वाली तथा नाना भाँति के अस्त्र- शस्त्रो से युक्त होती हुई दीप्तिमती हो गई थी। उसी समय मे उन दोनों दैत्यो तथा देवो की सेनाओ का वहाँ पर समागम होगया था 101 जिस प्रकार से युग के विपर्यय उपस्थित होने पर द्यावा पृथ्वी का सयोग हो जाया करता है उसी भांति वह देवा और दानवो का परम सकुल घोर युद हो गया था ॥२१॥ क्षमापराक्रमपर दपस्य विनयस्य च । निश्चक्रमुबलाभ्यान्तु भीमास्तत्र सुरासुराः ।।२२ पूर्वापराभ्या सरब्धा. सागराभ्यामिवाम्बुदाः । ताभ्या बलाम्या सदृप्टारचे हस्ते देवदानवाः ।।२३ कालनेमि वृतान्त वर्णन वनाभ्या पार्वतीयाभ्या पुष्पिताभ्यायथागजाः । समाजघ्नुस्ततोभेरी शहान्दध्मुरनेकशः ॥२४ स शब्दोद्या भुव खञ्च दिशश्च समपूरयत् । ज्याघातलनि?पो धनुपा कूजितानि च ॥२५ दुन्दुभीनाञ्च निनदो दैत्यमन्तदंधु स्वनम् । तेऽन्योन्यमभिसम्पेतु पातयन्त परस्परम् ॥२६ चभजु हुभिर्वाहून द्वन्द्वमन्ये युयुत्सव । देवास्तु चाशनि घोरपरिघाश्चोत्तमायसान् ॥७ निस्त्रिशान् ससृजु सख्ये गदागुर्वीश्च दानवा । गदानिपातभंग्नागावाणश्च शकलीकृता.॥२८ वह युद्ध दर्प तथा विनय का क्षमा एवं पराक्रम में परायण था । वहाँ पर उन दोनो ही सेनाओं से अतीव भीम ( भयावह ) स्वरूपो वाले सुर और असुर निकल पडे थे अर्थात युद्ध करने के लिय मैदान में आ गये थे। पूर्व और अपर सागरो से सरध अम्बुदों के समान उन दोनो ही दलोस बाहिर निकल कर देखे गय वे देव तथा दानद वहाँ रणस्थल मे विचरण कर रहे थे । २२।२३।। पुष्पा में समन्वित पर्वतीय वनो से जिस तरह गज निकल आया करते है उसी तरह से उन देव-दानवा ने सेनाओ के समुदाय से वाहिर निकल कर अनेक भेरी और शखों की ध्वनि भूमण्डल-दिवलोक और सब दिशामा मे पूरित हो गयी थी। धनुषा की प्रत्यमाओ के पात से समुचित निघोप-धनुषो के कूजित दुन्दुभियो को वरि यह सब देय ध्वनि मे अतहित हो गयी थी। वे परस्पर में प्रस्त्रो का सम्पानन करते हुए एक दूसरो का नीचे गिराने नगे थे। बाहुओं से बाहुओं या भजन करने लगे थे और दूसरे योधा इन्दयुद्धरन वो इच्टा वाले भी ५ देवगण परम पार अशनि और उनमायस रियो को प्रयोग उम युद्ध में कर रहे थ। दानव गण युद्ध में निरिसा वा तथा अपिल भारों एवं विशाल गाओको गनुओ पर शाह
१०२
मत्स्य पुराण
रहे थे । गदाआ प्रहारो से सैनिक भग्न अङ्गा वाले तथा वाणा के द्वारा
खण्ड खण्ड अगो वाले होगय थे ।। २४-०८।।
परिपेतुभ श वेचित् पुन केचित्तु जनिरे ।
ततो रथ सतुरगविमानश्चाशुगामिभि ॥२६
समीयुस्तेसुसरधा रोपाद यान्यमाहवे ।
मवतमाना समरे स इष्टोष्टपुटानना ॥३०
रथारथनिरुच्यन्ते पादाताश्च पदातिभि ।
तेषा रथाना तुमुल स शब्द शब्दवाहिनाम् ।। १
नभोनभश्चहि यथानभस्यजलदस्वनै ।
बभञ्जुस्तु रथान् केचित्केचित् सम्पाटितारथे ।
सम्बाधमन्ये सम्प्राप्य न शेकुश्चलितु रथान् ।
अन्यो यम ये समरे दोामुक्षिप्य दशिता । ३३
सह्रादमानाभरणा जस्तनापि चमिण ।
अस्त्र रन्ये विनिभिन्ना वेमू रक्त हतायधि ॥ १
क्षरज्जलाना सदृशा जल दाना समागमे ।
तरस्त्रशस्त्रग्रथित क्षिप्ताक्षिप्तगदाविलम् ॥३५
परस्पर में इस तरह से शास्त्रास्त्रो के प्रहारो से कुछ तो नीचे
गिर गये थे और कुछ उठकर पुन हनन किया करते थे। इसके उपगत
रथों तुरङ्गो और घ्रगामी विमानो के द्वारा वे समक्ष मे समागत हुए
थ ।। २६ ॥ उस महायुद्ध म वे रोपादेश में परस्पर मे अत्यन्त सरब्ध
हो। र समागत हुए थ । समराङ्गण म वत्त मान होकर अपने मुखो के
ओप्टो को मोध स काट रहे थे ॥५०॥ रथो पर सवार रथ बालो से
और 4-7 सना वीर पतियों के साथ युद्ध कर रहे थे। शब्दचाही
उना रथा का - भत्य त सुमन हा रहा था ।। ३१ । जिस कार स
नमस्य जन-1 की जान 111 है वस ही 14 नम स टकरा रहा था।
पूछ लागा । रचा बामपन किया भा और कुछ लोग सम्पादित रची
कालनेमि वृतान्त वर्णन १०३ के द्वारा सम्वाध कर रहे थे । अन्य लोग ऐसी सम्बाधा प्राप्त करके रथो के आगे चलाने में भी असमर्थ हो गये थे। दूसरे लोग उस समर मे परस्पर मे हाथो से ऊपर को क्षिप्त करके दाशित हुए थे ॥३२॥१३॥ वहाँ पर भी चम्मंघारी गण संह्रादमान आभरण वाले होकर हनन कर रहे थे। अन्य लोग अस्त्रो से निमित्त होकर युद्ध में आहत हुए रक्त का वमन करते थे। जलदों के समागम काल मे क्षरण करते हुए जलो के सदृश हो गये थे। उन सबके द्वारा वहां युद्ध शस्त्रो और अम्त्री से प्रथित तथा क्षिप्त एव उरिक्षप्त गदाओ से अवलिया ॥३४॥३॥ देवदानवसंक्षुब्ध संकुल युद्धमावभो । तदानवमहामेधं देवायुविराजितम् ॥६६ अन्योन्यवाणवण युद्धदुर्दिनमावभौ । एतस्मिन्नन्तरे ऋद्ध. कालनेमिः स दानवः ।।३७ व्यवधंत समुद्रौघः पूर्यमाण इवाम्बुदः । तस्य विद्य चलापोः प्रदीप्ता नवपिंग.॥३८ गात्री गिरिप्ररया मिनिपेतुवंलाहकाः । क्रोधान्निश्वसतस्तस्य भूभेदस्वेदवर्षिणः ॥३६ साग्निस्फुलिङ्गप्रतता मुखान्निप्पेतुरचिपः। तियगूवञ्च गगने ववृधुस्तस्य वाहवः ।।४० पवतादिव निष्क्रान्ता.पश्चास्या इव पन्नगाः । मोऽस्त्रजालंबहुविधनुभिः परिधपि ॥४१ दिध्यगाकाशमावत पवतरुच्छितरिव । सोऽनिलोड तवसनस्तस्थी मग्रामलालसः । १२ वह देवो और दानवो से परम संक्षोभ वाला एव म यम युदमा था । यहा युद्ध दानव रूपी महान मेघो वाना और दया या प्राणी में शोभा नया परम्पर में एक दूसरो पर वारी वर्गान के समान ही शमा देहारा था! मी दीप am4m
१०४
मत्स्यपुराग
कालिनेमि दानव समुद्री के ओघो से पूर्य माण एक अम्बुद के तुल्य बढ रहा
था । विच त के चलायमान आपीडो के द्वारा प्रदीप्त अशनि की वर्षा करने
उप्त के अङ्गो से नागगिरि नाम वाले बलाहक निपतित हु। थे। भोहो के
भेद स समुत्पन्न स्वेद की वर्षा करने वाले-क्रोध से उष्ण और लम्बी
श्वास लेने वाले उसके मुख से अग्नि के कणो से प्रतत भूचियां निकलने
लग गई थी। गगन मे ऊपर और तिरछी उस की बाहुएं बढ गई थी
जो कि पर्वत से मानो निकले हुए पाँचुमुखो वाले पन्नगो के ही समान
थीं। वह कारिनेमि दानव अनेक प्रकार के अस्त्रो के जालो से-धनषो
से और परिधो के भी द्वारा उत्पन्न ऊचे पर्वतो की भाति दिध्य आकाश
स बातें कर रहा था। वह सग्राम करने की लालसा वाला जिसके वस्त्र
स उद्धृत हो रहे थे वहां रणस्थल मे स्थित हो गया था।
।। ३६-४२॥
सन्ध्यातपनस्तशिल साक्षान्मेरु रिवाचल ।
ऊम्वेगप्रमथितं शैलशृङ्गाग्रपादपै । ४३
अपातयद् देवगणान् वज्रणेव महागिरीन् ।
बहुभि शस्त्रनिस्विछिन्नभिन्न शिरोरहा । ४४
न शेकुश्चलितु देवा कालनेमिहता युधि ।
मुष्टिभिनिहता केचित् वेचित्तु विश्लोकृता ।।४५
कालनेमि वृतान्त वर्णन सन्ध्याकालीन आतप से जिसकी शिलामो को ग्रसित कर लिया है ऐसा साक्षात् मेरु पर्वत के तुल्य वह करुओ के वेग स प्रमयित हुए पर्वत की चोटियो के अग्रभाग में स्थित पादपा स सत्र के द्वारा महान् पर्वतो के ही तुल्य देवगणो का पालन कर रहा था। बहुत से शस्त्र और निस्त्रिशो से छिन्न-भिन्न शिरोरहो वाले युद्ध मे कालनेमि के द्वारा निहत हुए देवगण चलने में भी असमर्थ हो गये थे। कुछ तो मुष्टियो के प्रहार से निहत किये गये थे और कुछ देवगण बिदली कृत कर दिय गय थे । ॥ ४३, ४४ ४५॥ यक्ष और गाधव यतिगण महोरगा के साथ ही नीच निपतित हो गये थे। उम कालनमि के द्वारा समर भूमि म सम्स्त देवगण विशेष रूप से वसत कर दिय गय थे ।५६ ।। वे सब दक्षता ऐसे विगत चेतना वाले हो गय थे कि वे यत्न करत हुए भा अर्थात् यत्न करन की पूर्ण चेष्टा करने पर भी क्छ भी यत्न नहीं कर सर थे। उसन सहन नत्रा वाले इन्द्र को भी शरीर बन्धनो सस्पन्दित कर दिया था ।। ७ ।। वह यद्यपि अपन ऐरावत हाथी पर स्थित या तो भी वहाँ महिल नहीं सकता था। वह बिना जल वाल अम्भाद ( मघ) सदृश तण निन्न अर्णव के तुल्य प्रभा वाला हो गया था ॥ ४८ ।। युद्ध मे विना पाश बदले वरण वा उसने विना व्यापार वाला बना दिया था। काम स्पी उसने परिघो वे दाग वैश्रवण का भी विरत कर दिया था ॥४॥ वित्तदोऽपि कृत मरये निजित कालनमिना । यम सर्वहरम्तेन मृत्युप्रहाणे रणे ।५. याम्यामवस्था सारज्य भीत म्वन्शिमाविशत् । स लोरपालानु माय कृत्वा तेपाच कम्म तत् ॥५१ दिक्ष मर्वामृ वह स्व चतुर्धा विदधे रदा । स नक्षत्रपथगत्वा दिव्य स्वर्भानुदशनम् ॥५२ जहार लक्ष्मी मामस्य त नारय विषय महत् ।
१०६ मत्स्यपुराण करने लगा था। चालयामास दीप्ताश स्वगद्वागत् स भास्करम् ॥५३ सायनञ्चास्य विपय जहार दिनकम्म च । सोऽग्नि देवमुख दृष्ट्वा चकारात्ममुखाश्रयम् ।।५४ वायुञ्च तरसा जित्वा चकारात्मवशानुगम् । स समुद्रान् समानीय सर्वाश्च सरितो बलान् ॥५५ चकारात्ममुखे वीर्याद्दहभूताश्च सिन्धव । अप स्ववशगा कृत्वादिविजा याश्च भूमिजा ॥५६ उस महा दानव कालनमि ने युद्ध मे वित्तद ( कुबेर) को भी निजित कर लिया या। मृत्यु के प्रहरणे' वाले उस रण मे उसने सवदा यम को भी विजित कर दिया था और अपनी माम्य अवस्था का परि त्याग करके वह भयभीत होकर अपनी दिशा में प्रवेश कर गया था। उमने सब लोपालो को -टाकर और उनका जो वम था उस स्वय ही उस समय मे सब दिशाओ मे अपने ही देह को उसने चार रूपो में बनाकर स्थित कर दिया था। नक्षत्रों के मार्ग में पहुँच का वह दि य स्वर्भानु का दशन करता था ।।५० ५१ ५२ ।। उसने सोम की लक्ष्मी और इसके मान् विषय का हरण कर लिया था। उसने दीप्त अगुवाल भास्कर को स्वग के द्वार मे चालित कर दिया था। इसके सायन विषय को तथा दिन क फम्म का भा समाहृत कर दिया उम कालनम ने देवमुख अग्नि को दखबर से अपने मुख के आथय वाला बना लिया था।॥५३ ५४ ॥ उसने वायुदेव को मी बडे ग म जीतकर अपन वश म रहन वाला अनुग बना लिया था। वासनमि दानव न बलपूर समस्त समुद्रा और मरिताप्रो को भी Bार अपो ही मुए म पर लिया था। उगर वीप से सब मि धु उगा द"भूत यन गय थ । मोन दिवलाव म समुप न थे और जा भूमिज थ। उसमयका अपा हो याम रहन वाल कर पिया था पा। ५१,५६॥ पा। उम कालनेमि वृतान्त वर्णन १०७ स स्वयम्भुवि वा भाति महाभूतपतियथा । सर्वलोकमयो दैत्य. सवभूतभयावहः ।।५७ स लोकपालंक्वपुश्चन्द्रादित्यग्रहात्मवान् । स्थापयामास जगती सुगुप्ता धरणीधरैः ।।५८ पावकानिलसम्पातो रराज युधि दानव । पारमेष्ठय स्थित. स्थाने लोकाना प्रभवोपमे। त तुष्टुवुर्दस्यगणा देवा इव पितामहम् ॥५६॥ वह स्वय ही भूमण्डल में भूतो के पति के समान शोभित हो रहा था। वह देरय सद लोको से परिपूर्ण और समस्त प्राणियो को भय देने वाला था। वह लोकपालो के एक ही वपु वाला स्वय था और चन्द नथा आदित्य ग्रहो के भी स्वरूप वाला था। उसने घरणो घरो के द्वारा सम्पूर्ण जगती को सुगुप्त कर स्थापित किया था। युद्ध मे वह दानव पावक और अनिल के सम्पात वाला दीप्तिमान हो रहा था। वह लोको के प्रभवोपम स्थान पारमेहच मे स्वयं ही निधन हो गया था। पितामह को देवा की भांति ही सब दैत्यगण उसका सस्तवन किया करते थे ॥ ५७ ।५८1५E0 ७१ --कालनेमि श्रीर विष्णु का युद्ध पञ्च तन्नाभ्यवतन्त विपरीतेन कम्मंगा। वेदो धम्म क्षमा सत्य श्रीश्च नारायणाथया ॥१ स तेयामनुपस्थानात समोधोदानवेश्वर. । बष्णवरदमवि जन्ययानारायणान्तिकम् ॥र म ददन सुपणस्वशवनगदाधरम् । दानवाना विनाशाय भ्रामयात गदा गुभाम् ।।३ सजलाम्भोदसहम विद्यमशवाससम् ।
२०८ मत्स्यपुराण स्वारूढ स्वर्णपक्षाढय शिखिनंकाश्यपं खगम् ।।४ दृष्ट्वा देस्यविनाशाय रणे स्वस्थमवस्थिम् । दानवो विष्णमक्षोभ्य बभाषे लुब्धमानसः ॥५ अय स रिपुरस्माक पूर्वेपा प्राणनाशनः । अर्णवावासिनश्चैव मधो कैटभस्य च ॥६ अय स विग्रहोऽस्माकमशाम्य मिल कथ्यते। अनेन सयुगेष्वद्य दानवाबहवो हताः ।।७ श्री मत्स्य भभवान् ने कहा-उस समय मे विपरीत कम्मे के होने के कारण से वेद-धर्म-क्षमा-सत्य और नारायण प्रभु के समाश्रय करने वाली श्री-ये पांच नही रहे थे। इन पांचो के उपस्थित न रहने से वह दानवेश्वर बडे कोध से युक्त हो गया था और फिर भगवान् विष्णु को प्राप्त करने की इच्छा करता नारायण प्रभु के समीप में प्राप्त हो गया था। उमने वहाँ पर सुपणं पर समवस्थित-दानवा के विन श करने के लिये अपी परम शुभ गदा को घुमात हुए शख-चक्र और गदा के धारण करने वाले प्रभ को देखा था।।१,२,३।। वहाँ पर नारायण का स्वरूप जल सहित मेघ के समान था -विद्यु व तुल्य क्सन धारण क ने वाला उनका रूप था तथा वे कश्यप के पुत्र-स्वण पक्षो से समन्वित शिवी खग पर समारूढ़ थे।॥४॥ इस तरह के स्वरूप की शोभा से समस्या एव परम स्वरूप और रण मे दैत्यो क विनाश करने के लिए उन विष्णु भगवान को देखकर लुब्ध मन वाला वह दानव क्षोभ म करने योग्य शिणु भगवान से बोला ।। ५।। एकनाशन है जो हमारे पूर्वजो प्राणो या नाश करने वाला है तथा अणंद मे आवास करने वाले मधु तगा वंटन का प्राण लेने वाला है । यही माग वह विप्र । जाशमान न परन पे पाग्य कहा जाया करता है। आमटाने हा रणक्षेत्र म यहन-से दानवा या हनन किया है। यह ही हम लागो का कालनेमि और विष्णु का युद्ध १०६ मय स निघृणोलोके स्त्रीवालनिरपत्रपः । येन दानवनारीणा सीमन्नोद्धरण कृतम् । अय सविष्णुर्देवानावैकुण्ठश्चदिवौकसाम् । अनन्तोमोगिनामप्सुस्वपन्नाद्य. स्वयम्भुवः । अय स नाथो देवानामस्माक व्यथितात्मनाम् । अस्य को समासाद्य हिरण्यकशिपुहंत ॥१० अस्य छायापाश्रित्य देवा मखमुवे श्रिताः । आज्य महर्षिभिदत्तमश्नुवन्ति विधा हूतम् ॥११ अय स निधने हेतु. सर्वेपाममरद्विषाम् । यस्य चक्र प्रविष्टानि कुलान्यस्माकमाहवे ।।१२ अय स किल युद्धपु सुराथें त्यक्तजीवित । सवितुस्तेजसा तुल्य चक्र क्षिपतिशत्र पु॥१३ अय सकालोद त्यानाकालभूत समास्थितः । अतिमान्तस्यकालम्यफलप्राप्स्यति केशवः॥१४ यह वह है जो अत्यन्न ही निघृण और स्त्री तथा बालको मे भी निर्जन है जिसने दानवा की नाग्यिो का श्रीमन्तो का उद्धरण किया यह ही वह विष्णु है जो दिवनोक में रहने वाले देवा का पुण्ठ है-योगियो या अनन्त और जल मे शयन करन घाला आद्य स्वयम्भुव है। यह हो व्यथित आत्मा वाले हमारे देवा का नाथ है। इसी के क्रोध की प्राप्ति कर हिरप्य कशिपु मारा गया था IE, १०॥ इसी की छत्रछाया का उपाश्रय प्राप्त करके देवगण मखो के मुख श्रित हुआ करते हैं और तीन प्रकार से हुन महपिया के द्वारा समपिन प्राज्य का अशन किया करते हैं ॥ १ ॥ समस्त देवा के दुश्मनों के निधन होने मे यह ही एक हेतु है। जिसके चक्र मे युद्ध क्षेत्र में हमारे कुल सब प्रदिष्ट हो गये हैं अर्थात सुदर्शन चक्र के द्वारा कृती के इस मारे गये होकर समूल नष्ट हो गये हैं। यही वह है जो गुग के लिये था।1८1 में
मत्स्यपुराण
-
युद्धो मे अपना जीवित भी त्याग देने वाला हो जाया करता है और जो
सूर्य के तेज के तुल्य अपने सुदर्शन चक्र को शत्रुओं पर प्रक्षिप्त किया
करता है। यह दैत्यो का वह साक्षात् काल है जो कि कालभूत हो र
समास्थित रहा करता है। यह केशव अतिधान्त काल का फल प्राप्त
करेगा ॥१-१४॥
दिष्टय दानी समक्ष मे विष्णुरेष समागत ।
अद्य मद्वाहुनिष्पिष्टो मामेव प्रणमिष्यति ।।१५
यास्याम्यपचिति दिष्टया पूर्वेपामद्य सयुगे।
इम नारायण हत्वा दानवाना भयावहम् ।।१६
क्षिप्रमेव हनिष्यामि रणेऽमरगणास्तत ।
जात्यन्तरगतो ह्यप बाधते दानवान् मृधे ।।१७
(पोऽनन्त पुरा भूत्वा पद्मनाभ इति श्रुत ।
जघाने काणये घोरे तावुभौ मधुकटभो ।। १८
द्विधाभूत वपु कृत्वा सिहस्याद्धनरस्प च ।
पिनर म जघानका हिरण्यकपिपु पुरा ॥१६
शुभ गभमवत्तौनतिर्देवतारणि ।
ग्रीन लोका. जहारका क्रममाणस्त्रिभि. क्रमै ॥२०
भूयरित्वदानी सम्रामे सप्राप्त तारकामये ।
मया सह समागम्य स देवा विशिष्यति ।।२१
धडे ही ह्य की बात है कि इस समय में यह विष्णु मेरे समक्ष मे
समागत हो गया है। आज यह मेरी वाहुओ से निष्पिष्ट हाकर मुझको
प्रणाम करेगा। घटी ही प्रसन्नता की बात है कि आज युद्ध क्षेत्र में मैं
अपर पूर्व पुरुपी को अपचिति का प्राप्त करूगा अर्थात उनके साथ
विय व्यवहार वा वदना लूगा ।
आज दानवो का पय देने वाले
मारायण का मैं हनन व के ही बदला ले लूगा ।। १५॥ १६॥ यह
जान म प्र तर्गत अर्थात् अ य जाति वात्रा विष्णु युद्ध मे दानवा को
कालनेमि और विष्णु का युद्ध धाज में वाधाएं दिया करता है। वहुन ही शीघ्र रण मै इसके पश्चात् सब देवगणों का भी वध कर डालूगा । यह पहिले अनन्त होकर पद्म- नाम-इस नाम से मुना गया है । इसन ही परम घोर एकाद में उन दोनो मधु कंटम का हनन किया था। पहिले इसने दो प्रकार का शरीर धारण किया था जो प्राधा तो सिंह का था और आधा नर का था । इमी एक ने मेरे पिता हिरण्य कशिपु का हनन किराया ॥ १७ ॥ १८ । १६ ।। अदिति ने परम शुभ गर्भ धारण किया था और देवनारथि इसी एक ने तीन पंडो के कम से क्रममाण हाने हुए तीना लोको का उद्धरण कर डाला था। पुन: इस समय में इस तारकामय संग्राम के सम्प्राप्त होने पर मेर साथ समागम करके वह देव विनष्ट हो जायगा 1301 २१ ।। एवमुक्त्वा बहुविध नियन्नारयण रणे। वाभिरप्रतिरूपाभियुद्धमेवाभ्यरोचयत् ।। क्षिप्यमाणो मुरेन्द्रण न चुकोप गदाधरः । क्षमावलेन महता सस्मित चेदमब्रवीत् १२३ अल्प दपवल दत्य । स्थिरममाघज वलम् । हतस्त्व दपजविहित्वा गद्धापमे तमम् ।।२४ अधीरस्त्व मम मतो घिगेतता वाग्वलम् । न यत्र पुस्पाः सन्ति तब गजन्ति योषितः ॥२५ अह त्वा दत्य ! पश्यामि पूर्वया मागंगामिनम् । प्रजापतिकृत सेतु भित्वा कः स्वस्तिमान व्रजेत् ॥२६ अद्य त्वानाशयिष्यामिदेवव्यापारघातकम् । स्वेप्स्वेपुचस्थानेपुस्थापयिष्यामि देवताः ।।७ एव व वति वाक्य तु मृधे श्रीवत्सधारिणि । जहासदानव क्रोधादस्ताश्च सहायुधान् ।।२८ इस प्रकार से अने रोनिया में बहकर तथा नारायण पर रण ११२ मत्स्यपुराण में आक्षेपी की बौछार परके अप्रतिरूप घाणिया के द्वारा उसन युद्ध करने को ही पस द किया था ।। २२॥ इस तरह उस असुरेन्द्र के द्वारा आक्षिप्त होते हुए भी गदाधारी प्रभु ने कोई क्रोध नहीं किया था और महान् क्षमा के चल का सहारा लेते हुए मुस्करा कर यह वचन कहा था। २३ ।। दर्प का बल अल्प होता है, हे दै य | जो बिना किरी क्रोध से उत्पन्न होने वाला बल होता है वह स्थिर बल हुमा करता है । तू क्षमा का त्याग करके जो कुछ भी इस समय मे बोल रहा है इन दर्प (घमण्ड से उत्पन हुए दोपो से ही हत हो गया है ॥ २४॥ मेरी मति म तो तू बहुन ही अधीर है । तेरे इस बचने के बल को धिक्कार है जहाँ पर कोई वलशाली पुरुष नहीं रहा करते हैं वहाँ पर स्त्रियाँ भी इसी प्रकार से गजन किया करती हैं ॥ २५॥ हे दैत्यराज ! मै तो तुपको अपने पूर्व न पुरखा भो के ही मार्ग का अनुगमन करने वाला देख प्रजापति के द्वारा किये हुए सेतु का भेदन करक कौन पुरुष कल्याण वाला हो सकता है ? अर्थात् वह कभी भी कल्याणकारी हो ही नही साता है ।२६। मैं आज ही देवा के व्यापारो क घात करने घाले तुझको नष्ट कर ड लूगा और उन देवताओ को उनके अपने अपने स्थानो पर स्थापित कर दूंगा ।। ७ ॥ उस महान् युद्ध क्षेत्र मे श्रीवत्स + चिह्न को धारण करने वाले प्रभु के द्वारा इस प्रकार से बोलने पर वह दानव कालनमि बहुत हंमा था और उसने बहुत ही क्रोध से अपने हाथा का आयुधो स युक्त पर लिया था ॥२८॥ स वाहुशतमुद्यम्य सस्निग्रहण रणे। क्रोधाद्विगुणरक्ताक्षा विष्णुवक्षस्यताडयत् ।।२६ दानवाश्चापि समरे मयतारपुगेगमा । उद्यतायुनिस्त्रिशा विष्णुगभ्यद्रवन् रणे ॥३० स तायमानातिवलदैत्य सर्वोद्यतायुध । न चचाल तता युद्ध कम्पमान इवाचल ॥३१ कालनेमि और विष्णु का युद्ध संसक्तश्च सुपर्णेन कालनेमी महासुरः । सर्वप्राणेन महती गदामुद्यम्य वाहुमिः ॥३२ घोरां ज्वलन्ती मुमुचे सरधो गरुडोपरि । कर्मणातेनदत्यस्य विष्णुविस्मयमाविशत् ॥३३ यदा तेन सुपर्णस्य पातिता मूनि सा गदा । सुरणं म्यथित दृष्ट्वा कृतञ्च वपुरात्मनः । ३४ क्रोधसरक्तनयनो वैकुण्ठश्चक्रमाददे। व्यवद्ध'त स वेगेन सुपर्णेन समं विभुः ॥३५ उस दानव ने उस रण स्थल मे सभी प्रकार के अस्त्री को ग्रहण करने वाले सैकडी बाहुओ को उठाकर क्रोध से द्विगुणित लाल नेत्रो वाले ने भगवान् विष्णु पर उनके वक्षःस्थल पर प्रताडित किया था २६ अन्य दानव भी जिनमे मय और तार पुरोगामी थे सवने निस्त्रिश और अन्य आयुधो को समुद्यत करके भगवान् विष्णु पर रण मे पात्रमण कर दिया था ।। ३०॥ सब प्रकार के समुद्यत आयुधो वाले अत्यन्त बलशाली द-यो के द्वारा इस भांति तायमान होते हुए भो भगवान् विष्णु उप युद्ध मे बिना कम्प वाले एक पर्वत की तरह स्थित रहते हुए वहाँ पर बिल्कुल भी चलित नहीं हुए थे ॥३१॥ विष्णु प्रभु सुपणं पर ही संसक्त थे कि महासुर उस कालनेमि ने अपना पूर्ण जोर लगाकर प्राण- पण से महान् विशाल गदा को बाहुओ से उठाकर जो कि अत्यन्त घोर और जाज्वल्यमान थी बहुत ही सरब्ध होते हुए गरुड के ऊपर उसे छोड दिया था। दंत्य के उस कम से भगवान् विष्णु को भी बडा विस्मय हो गया था ॥ ३२, ३३॥ जिस समय मे उस दानव ने सुपर्ण के मस्तक पर उस महती गदा को पातित किया था सुपर्ण को देखकर उन्होने अपना वयु व्यषित कर दिया था फिर महान् क्रोध मे सरक्त नयनो वाला होकर भगवान् मैकुण्ठनाथ ने अपना चक्र ग्रहण किया था और सुपर्ण के साथ ही वह विभु आगे को बढ गये थे॥३४, २५।।
मत्स्यपुराण भुजाश्चास्य व्यवद्धत व्याप्नुवन्ता दिशा दश । प्रदिशचव ख गा व पूरयामास शव ॥३. ववृधे च पुनर्लोकान् कान्तुकाम इवोजसा । तजनायासुरे द्राणा वर्द्धमान नभस्तले ॥३७ ऋषयश्चैव गन्धर्वास्तुष्टवुमधुसूदनम् । सर्वान् विरीटेन लिहन माभ्रमम्बरमधर ॥३ पद्भ्याक्रम्य वसुधा दिश प्र-छाद्य बाहुभि । स सूयकरतुल्याभ सहस्रारमरिक्षयम् ॥३६ दीप्ताग्निसदृश घोर दशनेन सुदशनम् । सुवणरेण पय त वज्रनाभ भयापहम ॥४० मेदाऽस्थिमज्जारुधिरै सित्तन्दानवसम्भव । अद्वितीयप्रहरण क्षुरपयन्तमण्डलम् ४१ सग्दाममालावितत कामग कामरूपिणम् । स्वयस्वयम्भुवा मृष्ट भयद सवविद्विषाम् ॥४२ इनकी भुज ऐ दशो दिशाओ मे व्यापक होती हुई बढ गयी थी और भगवान के शव ने उनको सब प्रदिशाओ मे -- भूमि तथा आवास म पूरित कर दिया था । फिर महान् आज से समस्त लोको का क्रमण करने की इच्छा वाले प्रभु और भी वधित हो गये थे तथा नभस्तल में भी उन असुरे द्रो के मजन के लिये व बद्धमान हो गये थे। के द्वारा अघ्र सहित अम्बर की भांति किरीट के द्वारा सबका स्पश करते वे उस समय म हो गये थे तथा वहाँ पर मधुमूदन प्रभु का सस्तवन ऋषिगण और गन्धव लोग करने लगे थे ।। ३७, ३८ ।। धरणो से सम्पूर्ण वसुधा को समाप्रान्त करके बाहुओं मे सभी दिशाम्रो को प्रच्छादित कर दिया था तथा उनने फिर सूय्य की किरणों के तुल्य बामा वाले-सहस्र असे से समर्मावत और अरियों के क्षय को करन याल उठ चक्र को प्रयुक्त दिया था ।। ३६॥ अम्बरी प्रभु ने अपने वह चादीप्त अग्नि के कलनेमि और विष्णु का युग ११५ - समान महान् घोर था तथा देखने से वह सुन्दर दर्शन वाला अर्थात् सुद- शंन नामधारी था । सुवर्ष रेणुपर्यन्त - बचनाम--भयों का अपहरण करने वाला-दानवा के शरीरा स समुत्पन्न मेदा, अस्थि, मज्जा तथा रुधिर से मिक्त-सुर पर्यन मण्डल वाला-एक परम अद्वितीय प्रहरण ( अस्त्र)-सगदाम (मालाएँ । से विनत--स्वेच्छया गमन करने वाला- कामरूपो -समस्त शत्रुओ को भय देने वाला और स्वय ही स्वयम्भू प्रभु के द्वारा वह सृजित किये जाने वाला था ॥४०-४२॥ महपिरोपराविष्ट नित्यमाहवदर्पितम् । क्षेपणाद्यस्य मुह्यन्ति लोका. सस्याण जङ्गमाः ॥४३ अव्यादानि च भूतानि तृप्नि यानि महामृधे । तदप्रतिमकर्मोन समान सूयवर्चसा ॥४४ चक्रमुद्यम्य समरे कोधदीप्तो गदाधरः । समुष्णन् दानव तेजः समरे स्वेन तेजसा ।।४५ चिच्छेद वाहूश्चक्रेण श्रीधर. कालनेभिनः । तन्च वक्त्रशत घोर साग्निपूर्णाट्टहासि वै ॥४६ तस्य दत्यस्य चक्रण प्रममाथ बलाद्धरिः । सच्छिन्नवाहुविशिरा न प्राकम्पतदानव ॥४७ कबन्धोऽवस्थित संख्ये विशाखइव पादप । सम्वितत्यमहापौवायो कृत्वासमञ्जवम् ।।४ उरसा पातयामास गरुड.कालनेमिनम् । स तस्य देहो विमुखो विवाहुश्च परिभ्रमन् ।।४६ वह ऊपर मे बतलाये गुणगणो वाला सुदर्शन चक्र महर्पियो के रोषो से समाविष्ट था और नित्य हो युद्ध में दर्द से समायुक्त रहने वाला था। जिसके क्षेपण करने से सभी स्थावर एव जनम लोक मूटित ही जाया करते हैं । महान् युद्ध मे क्रयाद प्रादि जो भून हैं वे उस चक्र के द्वारा प्रवाहित हुए शत्रुओ के रक्त में पान से परम तृप्ति को प्राप्त
११६
मत्स्यपुराण
गरुड ने
हुमा करते हैं ऐसे उस अनुपम कर्म के करने से उग्र और सूर्य के वर्चम
के तुल्य उस अपने सुदर्शन चक्र को उठाकर समर मे क्रोध से दीप्त
गदाधर ने छोडकर अपने तेज के द्वारा युद्धस्थल मे दानवा के तेज का
वेदन कर दिया था और श्रीधर प्रभु ने उस अपने चक्र से कालनेमि को
बाहुओ को भी काट डाला था। उस दानव के अग्नि से परिपूर्ण अट्टहास
वाले सो परम घोर मुखो का श्री हरि ने उसी चन के द्वारा बलपूर्वक
प्रमथन कर दिया था। किन्तु वह दानव बाहुओ शिर के फट जाने पर
भी वहां पर प्रकम्पित नहीं हुआ था ।
उसका वह कबन्द ( घड ) युद्ध
स्थल मे बिना शाखा वाले पादप के समान अवस्थित था।
अपने पखो को फैलाकर तथा वाय के समान वेग को करके अपन उर.
स्थल के द्वारा उस कालनेमि के घड को नीचे गिरा दिया था और उसकी
वह बिना मुख तथा बाहुओ वाला देह इधर-उधर परिभ्रमण कर रहा
था ॥४३-४
निपपात दिव-त्यक्त्वा क्षोभयन् धरणीतलम् ।
तस्मिन्निपतितेदैत्येदेवाः सपिंगणास्तदा ।।५०
साधु साध्धिांत वैकुण्ठ समेता. प्रत्यपूजयन् ।
अपसपन्तु दैत्याश्च युद्ध हष्टपराक्रमा । ५१
ते सर्व वाहुभिर्याप्ता न शेऋश्चनितु रणे।
काश्चित् केशेषु जग्राह काश्चित् कण्टेप्वपीडयन् ।।५२
चाप कस्यचिद्ववत्र मध्येगृणादथापरम् ।
ते गदाचक्रनिदग्धा गतसत्वा गतासवः॥५३
गगनादप्रष्टराङ्गा निपेतुघरगीतले ।
तेषु दत्येषु सर्वेपु हतेपु पुरषोत्तमः ॥५४
तस्थौशय प्रिय वृत्वा वृतवर्मा गदाधरः।
तम्मिन् विमर्द निवृते समामे तारकामय । ५५
त देशमाजगामाशु ग्रह्मा लोमपितामहः
कालनेमि और विष्णु का युद्ध ११७ सर्वब्रह्मपिभिः साद्ध गन्धर्वाप्सरसाङ्गणे ॥५६ वह घरणी तल को क्षोमित करता हुआ दिवलोक को त्याग कर के भूमि पर गिर गया था। उस समय मे उस महा दानवेश्वर के निप. तित हो जाने पर समस्त देवगण और ऋपि वृन्द "साधु-साधु'' अर्थात बहुत ही अच्छा हआ यह कहते हुए सव एकत्रित होकर भगवान् बैकुण्ठ- नाथ की पूजा करने लने थे। युद्ध में दैत्यगण पराक्रम देख लेने वाले अपमर्पण कर जावे । किन्तु बाहुओ से व्याप्त वे सब रणस्थल में चल नहीं सकते थे। उनमे से कुछ को तो केश पकड कर ग्रहण किया था और कुछ को कण्डो में ताडित किया था ।। ५०, ५१, ५२ ॥ किसी के मुख को पकड कर कपित किया था और दूसरे को मध्य भाग मे ग्रहण किया था। वे सव गदा और चक्र के प्रहारो से निदग्ध-गत प्राण और हीन तत्वा वाले हो गये थे ।। ५३॥ गगन से उद्धृष्ट समस्त अङ्गो वाल धरणी तल मे सब निपतित हो गये थे । उन सब दैत्यो के निहत हो जाने पर पुरुषोत्तम प्रभ गदाधारो महेन्द्र का कर्म सम्पादन करके तथा इन्द्र का प्रियकम करक उस विमदं तारकामय सग्राम क निर्वृत होने पर बहाँ पर ही समवस्थित हो गये थे। उसी स्थल पर लोको के पिता यह ब्रह्मा जी समस्त ब्रह्मर्षिगण और गधर्व एव अग्सरागणो के साथ शीघ्र ही आकर उपस्थित हाग्रये थे 1५४-५६|| देवदेवो हरि देव पूजयन् वाक्यमब्रवीत् । कृत देव महत्वम सुराणा शल्यमुद्धतम् । ५७ वधेनानन दैत्याना वय च परितोषिता । याऽय त्वया हतो विष्णो | कालनमी महासुर ।।५८ त्वमेकोऽस्य मृधेहन्ता नान्य कश्चन विद्यते । एपदवान्परिभवन्तोकाश्चससुरासुरान् ॥५६ ऋपोणा वदन कृत्वा मामपि प्रतिमति । तदनन तवाग्येण परितुष्टोऽस्मि फमणा ॥६०
११.
मत्स्यपुराण
से
1
यदय बालकल्पस्तु कालनेमी निपातित ।
तदा गच्छस्व भद्र ते गच्छाम दिवमुत्तमम् ॥६१
ब्रह्मषयस्त्वा तवस्था प्रतीक्षन्ते सदोगता ।
कञ्च ह तव दास्यामि वर वरवताम्बर 1६
सुरेष्वथ च द त्येषु वराणा वरदो भवान् ।
निर्यातयततोलोक्य स्पीत निहतकण्टकम् ॥६३
देवो के देव न श्री हरिदेव का अभ्य चन करते हुए यह वाक्य
कहा था कि हे देव । आपने बहुत बडा कम सम्पादित किया है और
सु गणो के गल्य का आपने उद्धृत कर डाला है । दत्यो के इस बध
आपन हम सबको परितोषित कर दिया है जो कि हे विष्णो | आपने
इस महासुर कालनमि को निहत कर डला है । ५७ ५८। इस
युद्ध म आप ही एक इसके हनन करन वाले थे अ य कोई भी आपके
अति रक्त नहीं है। इससे सब देवा को परिभूत कर fया है
और सुरो एव असुरा के सहित लोको का भी परिभव किया है ।
यह ऐसा दुए था कि यह ऋषियो का कदन करके मुझको भी अपनी
गजना निखाता था। आपके अ युत्तम इस कम्म से मैं बहुत ही परितुष्ट
हुआ हू ।। ५. ६०॥ जा यह काल के सदश कालनमि आपके द्वारा
निपतित हुआ है यह बहुत ही अच्छा हो गया। अब आप पधारिय आप
का परम मङ्गल होवे – अब हम भी उत्तम दवलोक को चलते हैं । वहाँ
पर सदागत समपस्थित ब्रह्मपि गण आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं । हे
वरन दन वालो में परमश्रष्ट ! मैं प्रारको कौन-सा वरदान दूंगा।
आप मुरी म और दत्यो म वरदाना को प्रदान करन वाले वरद हैं । इस
परम विरतत अलावय वा निहन कण्टक वाला निर्यात कर दालिये।। ६१
-
अस्मि नव मृध विष्णा ! शनाय सुमह (मने।
एवमत्ता भगवता ब्रह्मणा हरिर यय ॥६४
११६
कालनमि और विष्णु का युद्ध
देवाश्छमुखान् सर्वानुवाच शुभया गिरा।
शृण्वन्तु निदशा सर्वे यावन्तोऽत्र समागता ॥६५
श्रवणावहित श्रोत्रो पुरस्कृत्य पुरन्दरम् ।
अस्माभि समरे सर्वे कालनमिमुखा हता ॥६६
दानवा विक्रमापेता शनादपि महत्तरा !
अस्मिन्महति मग्रामे दैतेयो द्वौ विनि सृतौ ॥६७
विरोचनश्च द त्येन्द्र स्वर्भानुश्च महाग्रह ।
स्वा दिश भजता शत्रो दिश वरण एव च ॥६८
याम्यायम पालायतामुराञ्च धनधिप ।
ऋक्ष सह यथायोग ग-छता चवचन्द्रमा ॥६६
अब्द तुमुखे सूर्यो भजतामयन सह ।
आज्यभागा प्रवतन्ता सदस्यरमिपूजिता ॥७०
ह विष्णा । इमो युद्ध म ापन महान् आत्मा वाले इद्र क
लिय यह सब कर दिया है । इस प्रकार स भगवान् ब्रह्माजी क द्वारा
अविनाशी श्री हरि से कहा गया था। तब श्री हरि न इन्द्र जिनम प्रधान
थ उन समस्त दवा से परम शुभ वाणी से कहा था-विष्णु भगवान् ने
कहा था-अब सब देवगण श्रवण करला जितन यहा पर इस समय म
सगागन हुए हैं ।। ६४, ६५ ॥ श्रवण म परम समाहिन श्रोत्रा स पुर दर
आगे को करक हमन समर म कालनाम प्रमुख सब दानव निहत कर दिय
थ। ये समस्त दानव विक्रम स उपन थ तथा इन्द्र से भा महत्तर थ । इस
महान् मग्राम म दो देतय विनि सृत हुए थ ॥ ६६, ६॥ एष तो दे ये द्र
विगेचन था दूमरा महान् ग्रह स्वर्मानु था।
अब दद्र अपनी दिशा का
सवन बरे और वरुण अपनी दिशा म चल जाव ॥६५॥ ६॥ याम्य
दिरा म यम 37 जाव । घनाघिय उत्तर दिशा म पच जाव । ऋक्षा
के महित यथा योग च द्रमा मा चल नाव । ऋतु मुख म अयनो के साहत
भस्य पुरान
गूयं अन्द का सेवन करे । सदस्यों के द्वारा अभिमूहित याग्यभाग प्रवृत्त
हो जाने ॥ ६६,७०॥
हूयन्तामग्नयो विददृप्टेन कर्मणा।
देवाश्चाप्यग्निहोमेन स्वाध्यायेन महर्षय. ॥७१
श्राद्ध'न पितरश्चैव तृप्ति यान्तु यथासुखम् ।
वायुश्चरतु मागस्थ स्विधा दीप्यतु पावकः ॥७२
प्रोस्तु वर्णाश्च लोकास्त्री स्तर्पयश्चात्मज गुण. 1
क्रतवः सम्प्रवर्तन्ता दीक्षणीयद्विजातिभिः ।
दक्षिण,श्चोपपाद्यन्ता याज्ञिकेभ्यः पृथक् पृथक ।
गान्तु सूर्यो रसान् सोमो वाय प्राणाश्च प्राणिषु १७४
तपंयन्तः प्रवतन्ता सर्वएव स्वकर्मभि ।
यथावदानुपूर्येण महेन्द्र मलयोद्भवाः ॥७५
बोलोक्यमातर सर्वा समुद्रयान्तु मि.घवः ।
दत्येभ्यस्त्यज्यना भीश्च शान्तिबजतदेपता । ७६
स्वस्ति वोऽस्तु गमिप्यामि ग्रह्मलोक सनातनम् ।
मग स्लोवेवामामेवा विra.10..
.
१२२ मरस्यपुराण ७२-भर माहात्म्प वर्णन श्रत पद्मोद्धस्तात विस्तेण त्वयेरित. । समासाद्भवमाहात्म्य भैरवस्य विधीयताम् ।।१ तस्यापि देवदेवस्य शृणध्व वर्म चात्तमम् । आसीइत्योऽधको नाम भिन्नाजनचयोपम ॥२ तपसा महतायुक्तोहबध्य स्त्रिदिवौकसाम् । स कदाचिन् महादेवपावत्या सहितप्रभुम् ।13 बीडमान तदा दृष्ट्वा हतुं देवी प्रचक्रमे । तस्य युद्ध तदा घोरमभवत् सह शम्भुना । ४ आवन्त्ये विपये घोरे महाकालवन प्रति । तस्मिन्यु तदा रुद्रश्चान्धकेनातिपीडितः ॥५ सुपुवे वाणमत्यु ग्रनाम्ना पाशुपत हि तत् । रद्राबाणविनि दाद्रुधिरादन्धवस्य तु ॥६ अन्धकाश्च समुत्पन्ना. शतशोऽथ सहस्रश. । तेपा विदार्यभाणाना रुधिरादपरे पुन १७ ऋषिगरा ने कहा-हे भगवन् । आपके द्वारा वणित विस्तार- पूर्वक पद्मोद्भव का श्रवण कर लिया है। अब आप सक्षेप से भैरव का भघ माहात्म्य वर्णित कीजिए ॥ १॥ महा महषि सूतजी ने कहा-देवो के देव उसका भी उत्तम कर्म का आप श्रवण करो। • दाला भिन्नाजन चय वाला वैत्य था ॥२॥ वह दैत्येन्द्र महान तप से युक्त था और देवो का वध न करने के योग्य था उसने किसी समय में पार्वती के सहित प्रभु महादेव को क्रीडा करते हुए देख लिया था और उसी समय मे उस दैत्य ने देवी पावनी के हरण करने का उपक्रम दिया था। उसी गमय म उस दैत्य का शम्भु के साथ परम पोर मुद्ध प्रा था ।। ३, ४ || आनन्त्य घोर विषय म महावाल वन के प्रति एक अन्धक नाम
भव माहात्म्य वर्णन
१२३
उस समय मे उस महायुद्ध मे अन्धक के द्वारा रुद्रदेव को अत्यन्त उत्पी-
डित किया था ।शा पाशुपत नाम वाले अत्यन्त उग्र वाण को प्रसूत किया
था । रुद्रदेव के बाण के द्वारा विशेष निर्भद को प्राप्त होने वाले अन्धक
के रुधिर से सैकडी और सहस्रो अन्धक समुत्पन्न हो गये थे। जब उनका
विदारण किया गया तो फिर विदीयमाण उनके रुधिर से दूसरे और फिर
अन्धक पैदा होगये थे।। ६,७ ॥
वभूबुरन्धका घोरा र्याप्तमखिल जगत् ।
एव मायाविन दृष्ट्वा तञ्च देवस्तदान्धकम् ।।
पानार्थमन्धकारस्य सोऽसृजन्मातरस्तदा ।
माहेश्वरी तथाब्राह्मी कौमारी मालिनीतथा ।
सौपर्णी ह्यथ वायव्या शाक्री वैन मृती तथा ।
सौरी सौम्या शिवा दूती चामुण्डा चाथ वारुणी ॥१०
वाराहीनारसिहीच वैष्णवीच चलछिखा ।
शतानन्दाभगानन्दा पिच्छिलाभगमालिनी ।।११
बला चातिबला रक्ता सुर भी मुखमण्डिका ।
मातृनन्दा सुनन्दाच विडाली शकुनी तथा ।।१२
रेवतोच महारक्ता तथंग पिलपिछिका।
जयाच विजया चव जयन्ती चापराजिता ॥१३
काली चव महाकाली दूती चव तथंव च ।
सुभगा दुर्भगा चंब कराली नन्दिनी नथा ॥१४
उस समय मे परम घोर अन्धक उत्पन्न हो गये थे जिनसे यह
समस्त जगत् एक्दम व्याप्न हो गया था । उस समय में इस प्रकार से
मायावी अन्धक को दव ने देखकर उस अन्धकासत्र के के लिए
उस समय मे उन्होने माताओ का गृजन दिया था। अब उन माताओं
के नाम बतलारे जाते हैं ---माहेश्वरी-ब्राह्मी-कौमारी-मातिनी
मौणि -वायव्या-गानी-नंती-मोरी-मोया-गियानी-
मस्य पुराण ૧૨ चामुण्डा-वाणी ।।८।८।१०॥ वाराही-नारसिंही-वांगवी- चलच्छिखा-शतानन्दा-भगानन्दा-पिछला-मममालिनी--बषा- अतिबला - रवता-सुरभी-मुद्रमण्डिका-मात नन्दा- मुनन्दा--विहाती- दाकुनी-रेवती-महारवता-पितपिटिका-या-विजया-जयन्ती- अपराजिता-काली-महाकाली दूती-सुभमा-दुभंगा-करानी-नन्दिनं ११-१४॥ अदितिश्च दितिश्चव मारी मृत्युरेव च । कर्णमोटी तथा ग्राम्या उल्लू कीच घटोदरी ॥१५ कपाली वजहस्ता च पिशाची राक्षसी तथा । भुशुण्डो शाकरी चण्डा लागली कुटभी तथा ॥१॥ खेटा सुलोचना धूम्रा एकवीरा करालिनी । विशालदष्ट्रिणी श्यामा त्रिजटीकुक्कुटीतथा ।।१७ वैनायकी च वैताली उन्मत्तोदुम्वरी तथा। सिद्धिश्च लेलिहाना च केकरी गर्दभीतथा ॥१८ भृकुटी बहुपुत्रीच प्रेतयाना विडम्विनी। प्रौञ्चा शैलमुखी चव विनता सुरमा दनु ॥१६ उपा रम्मा मेनकाच सलिलाचित्ररूपिणा । स्थाहास्वधा वषट्कारा तिर्येष्ठाकदिनी ॥२० माया विचित्ररूपा च कामरूपा च सङ्गमा। मुखेविला मङ्गला च महानासा महामुखी ॥२१ अदिति--दिति-मारो-मृत्यु-कर्णमोटी-ग्राम्या- पटोदरी-पाली- वजहस्ता--पिशाची-राक्षसी- भुशुण्डी-शाकरी-- चण्डा-लागली-कुटभी-घेरा-सुलोचना-धूम्रा-एव वीरा-करालिनी - विशाती दष्टिगो-श्यामा-त्रिजटी-कुक्कुटी-नायकी-वैताली-उन्मत्ता- उदुम्बरी-सिद्धि-ललिहाना-केरी गदभी- मृकुटी-बहुपुत्री--प्रेतयाना- विम्बिनी-कौवा-शैलमुखी-विनता-सुग्मा-नु-उपा-रा-- - - उलूको- मव माहात्म्य दर्शन १२१ मेनका-मलिला-चित्ररूपिणो-स्वाहा--स्वधा-दषट्कारा-ति-ज्येष्ठा- कदिनी-माया--विचित्र रूपा-कामरूपा-सङ्गना-मुक्षेक्षिा--मङ्गला- महानाथा-महामुखी ॥१५-२१॥ कुमारी रोचनाभीमा सदाहा सा मदोद्धता । अलम्वाक्षी कालपर्णी कुम्भकर्णीमहासुरी ॥२ फेमिनी शङ्घिनीलम्बा पिङ्गलालोहितामुखी । घण्टारवाथदष्ट्राला रोचना काकडिका ॥२३ गोणिकाच मुखिकामहाग्रीवा महामुखी। उल्कामुखीधूमशिखा कम्पिनी परिकम्पिनी ॥२४ मोहना कम्पनावेला निर्भया वाहुशाह्निी। सपी तथैकाक्षी विशोकानन्दिनीतथा ।।२५ जोत्स्नामुखोच रभसा निकुम्भा रक्तफम्पना । अविकारा महाचित्रा चन्द्रसना मनारमा ॥२६ अदर्शना हरसापा मातङ्गो लम्बमेखला । अवाला वञ्चना काली प्रमादा लागलावती ॥२७ चिता चित्तजला कोणा शान्तिकाविनाशिनी। लम्बम्तनी लम्पसटा विसटा वासचूणिनी ॥२८ कुमारी-रोचना-पोमा-~-साहा--मदोडता अलम्बाक्षी- फालपर्णी-कुम्भपर्णी---महासुरो-वेरिना-राखिनी-लम्बा-पिङ्गला- लोहितामुखी -घटावा-दष्ट्राला-रोचना-पार विरा-गोरणिका- मुखिका-~~-महाप्रोवा- महामुखी-उल्लामुखी-घूमशिधा-कम्मिनी-परिक- स्पिनो मोहना -कमना ६वलानिया-वाहशाहिनी-मपर्णी- एकाक्षी-विमोका-ज्योत्स्नामुखी-रभता-निकुम्मा-- अविकारा-महाधिका-चन्दसेना-मनोमा-प्रदशना-हापापा-मातङ्गो- सम्र मेखा-भवान'- वञ्चना-नालो-प्रमोदा-साङ्गलापनी-चिन्ता- -रवपिना--
मत्स्यपुराग
चित्त-जला-कोणा-शान्तिका-अप विनाशनी-लम्बस्तनी--सम्बसटा-
विसटा-वास पूणिनी | ॥२२-२७॥
स्खलन्ती दोघकेशीच सुचिरा सुन्दरी शुभा ।
अयोमुखी कटुमुखी क्रोधनीच तथाशनी ॥२६
कुटुम्विका मुक्तिका च चन्द्रिका वलमोहिनी ।
सामान्या हासिनी लम्बा कोविदारी समासवी ॥३.
ककुकर्णी महानादा महादेवी महोदरी।
हुड्डारी रद्रसुसटा रुद्रेशी भूतडामरी ।।३१
पिण्डजिह्वा चतज्ज्वाला शिवा ज्वालामुखी तथा।
एताश्चान्याश्च देवेश सोऽमृजन्मातस्तदा ॥३२
अन्धकाना महाघोरा: पपुस्तद्गुधिरं तदा ।
ततोऽन्धकामृज सर्वा परा तृप्तिमुपागताः ॥३३
तासु तृप्तासु सभूता भूय एवाधिकप्रजाः ।
अदितम्तमहादेव शूलमुद्गरपाणिभिः ॥३५
तत स शङ्करो देवस्त्वन्धर्षाकुलीकृत.।
जगाम शरण देव वासुदेवमज विभुम् ।।३५
स्खलनी, दीर्घकशी, सुचिरा, सुन्दरी, शुभा, अयोमुखी, कटुमुखी,
कोयनी, अशनी, कुटुम्बका, मुक्तिका, चन्द्रिका, बलमोहिनी, सामान्या,
हासिनी, लम्बा, कोविदारी, समास वी, ककुकर्णी, महानादा, महादेवी,
महोदरी, हुकारी, रुद्र सुसटा, रुदशी, भूतडामारी, पिण्डजिह्वा, चल.
ग्वाला, शिवा, ज्वालामुखी, इन इतनी तथा अन्य माताओं का देवेश्वर
ने उस समय मै सृजन किया था ॥ २६, ३०, ३१, ३२ ॥ उस एमय में
इन महा घोराओ न अधिक रुधिर का पान दिया था । इसको अनन्तर
अन्धको के रुधिर से सभी माताए परम तृन्त्रि को प्राप्त हुई थीं। उनके
तृप्त होने पर भी पुन. अधरों की प्रजा उत्पन्न हुई थी। दाल और
मुद्गर हाया में धारण करन याने उनो द्वारा महादेव बहुत ही अदित
-
भव माहात्म्य वर्णन ૧૨૭ हुए थे। इसके उपरान्त वह देव शंकर अन्धको के द्वारा व्याकुल कर दिये गये थे और फिर वे अज-प्रभु वासुदेव भगवान् की शरणागति मे प्राप्त हुए थे ।।३३-३॥ ततस्तु भगवान् विष्णुः सृष्टवान् शुष्करेवतीम् । या पपो सकलन्तेपामन्धकानामसृक् क्षणात् ।। यथा यथा च रुधिरं पिबन्त्यन्धकसम्भवम् ।।३६।। तथा तथाऽधिक देवी सशुप्यति जनाधिप ! । पीयमाने तयातेपामन्धकानां तथासृजि ॥ अन्धकास्तु क्षयन्नोताः सर्व ते त्रिपुरारिणा ॥३७॥ मूलान्धकन्तु विक्रम्य तदा शर्वस्त्रिलोकधृक् । चकार वेगाच्छूलाग्रे सचतुष्टावशङ्करम् ॥३८ अन्धकस्तु महावीर्यस्तस्य तुप्टोऽभवद्भवः । सामीप्य प्रददौ नित्य गणेशत्व तथैव च ॥३६ ततो मातृगणाः सर्वे शङ्कर वाक्यमब्रुवन् । भगवन् । भक्षपिप्यामः स देवासुरमानुपान् ॥४० त्वत्प्रसादाज्जगत् सर्व तदनुज्ञातृमहिस । भवतीभिः प्रजा: सर्वा रक्षणोया न संशयः ॥५१ तस्मादोरानभिप्रायान्मन शीघ्र निवत्यताम् । इत्येव पारेणोक्तमनादृत्य वचस्तदा ॥४२ इसके अनन्तर भगवान् विष्णु ने शुष्क रेवती की सृष्टि की थी जिसने क्षण भर मे ही उन अ-घको के रक्त को पी लिण पा । है जना. धिप ! जैसे २ वे उस अधिक वे रुधिर का पान करती थी वैमे २हो देवी अधिक शुष्क हो जाया परतो पी । उस प्रकार से माया गया। पान कर लेने पर वे सद अन्धक त्रिपुरारि के द्वारा प्रात पर दिये गये थे।।३६,३७॥ उस समय में जो मूख अपि विसोनी के धारण करने वाले भगवान् शिवन विमर --
मत्स्यपुराण
-
उसको अपने त्रिशूल के अग्रभाग पर कर दिया था। उस अन्धक ने फिर
भगवान् शकर का स्तवन किया था। वह अन्धक महान वीर्य घाला था
और उससे भगवान् भव परम तुप हो गये थे। फिर तो शकर ने उसको
अपनी समीपता को रहने का पद तथा गणेश व पद का प्रदान किया
था ॥ ८, ३६ || इसके अन तर सब मातगणो ने भगवान शकर से
यह वाक्य कहा था-हे भगवन् । हम अब सब देव-असुर और मानवो
का भक्षण करे गी क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत आपके ही प्रसाद से समुत्पन्न
हुआ है और स्थित है सो अब आप हमको आज्ञा प्रदान करने के योग्य
होते हैं। भगवान् शङ्कर ने उनसे कहा था । झकर बोले-आप सबको
इन प्रजाओ की रक्षा करनी चाहिए। इसमे कुछ भी संशय नही है ।
इसलिये इन घोर जो प्रजानो के भक्षण कर आने के अभिप्राय है उनसे
शीघ्र ही अपने मन को हटालो।
इस प्रकार से कहे हुए इन भगवान
शकर के बदनो का उन मातृमणो ने उस समय मे अनादर कर दिया था
"४०,४१४२॥
क्षयामसुरत्युग्रास्गलोक्य सचराचरम् ।
तोक्य भक्ष्यमाणे तु तदा मातृगणेन वै ।।४३
नसिंहमूति देवेश प्रदध्यो भगवान्वि ।
अनादिनिधन दव सवलोकभवोद्भवम्।।४५
दैत्येन्द्रवक्षोरुधिरचचितापमहानखम् ।
विद्युज्जिह्व महादष्ट्र स्फुरस्केसरकण्टकम ।
कल्पान्तामस्तक्षब्ध सप्तपणसमस्वनम् ।।४५
वनतीदानप धोरमाकप्यादिताननम् ।
मेरुशलप्रतीकासमुदयाक्समेक्षणम् । १६.
हिमाद्रिशियराकार चारदप्ट्रोज्वलाननम् ।
नमनि सारोपाम्नि ज्वालावेसरमालिनम् ॥४७
वाङ्गद मुमुकुट हारवे यूरभूपमम् ।
१२६ भव माहात्म्य वर्णन श्रोणीसूत्रण महता काञ्चनेन विराजितम् ॥ नीलोत्पलदलश्याम वासोयुगविभूपणम् । तेजसाक्रान्तसकलब्रह्माण्डागारसंलम् ॥ ४६ अत्युप्र स्वरूप वाली उन माताओं ने इस चरानर सम्पूर्ण जगत् तथा लोक्य का भ्रमण करना आरम्भ कर दिया था। उस समय में मातगण के द्वारा इम त्रिलोको के भक्ष्यमाण होने पर भगवान् शिव ने देवेश श्री नृसिंह मूर्ति का ध्यान दिया था जिनका स्वरूप आदि और अन मै रहित है और जो इस सम्पूर्ण लोक के उत्सत्ति को करने वाले हैं । दैत्येन्द्र हिरण्य कशिपु के वक्ष स्थल के रुधिर से चर्चित महान् नखों वाले-विद्य त के तुल्य जीम से युक्त-महान दाढी वाले--स्फुरित हुए फेसरो के कण्टकों से सम्युत-कल्प के अन्त मे क्षाभ से पूर्ण मारत से सम- वित तया सपृपणं वृक्षों के तुल्य ध्वनि वाले थे। बर के समान तामा नखो वाले-घोर-कानों तक याहित मुख दाले--मेरु पर्वत के सदश- उदय कालीन मूर्य के समान नेत्रो वाले-हिमालय को शिखर के समान आकार मे सयुत-मुन्दर दाडो सनुग्बल मुख वाले-नखो मे निकली हुई रोपाग्नि को ज्वालामओ को माला वाल-बच के अङ्गा क धारण पर्ता-मुकुट से युक्त-हार ओर क्यूरो के आमरण स भूपित--तेजस समाकान्त सम्पूण ब्रह्माण्ड के आगार से सकुन उनका स्वरूप था। ॥४३-४६॥ पवन ग्राम्यमाणाना हुतहम्यवहाचिपाम् । आवर्तसदृशाकार. सयुक्त देहलामज. ॥५० सवंपुप्पविचिनाञ्च धारयन्त महास्रजम् । सध्यतमात्री भगवान प्रददौतस्य दर्शनम्॥५१ यादृोनवरूपेण ध्याते रद्रेण धीमता। तादृशेनंव रूपेण दुनिरीक्ष्येण देवतः ॥५२ मत्स्यपुराण १३० 1 प्रणिपत्य तु देवेश तदा तुष्टाव शङ्कर । नमस्तेऽतु जगन्नाथ । नरसिंहवपुधर ! ॥५३ दत्यनाथासृजापूण नखशक्तिविराजित || तत सकलसलग्न हेमपिङ्गल विग्रह । ॥५४ नतोऽस्मिपद्मनाभ वासुशक ! जगद्गुरो। कल्पान्ताम्भोदनिर्घोप । सूयकोटिसमप्रभ ।।५५ सहस्रयमसक्रोध | सहस्रन्द्र पराकम ।। सहस्रधनदस्फीत | सहस्रवरुणात्मक 1 ॥५६ हुत को हुई हप्प को वहन करने वाले अग्नि की भ्रम्यमाण चियो के पवन, आवत के सहश आकारो वाले देह के लोमजी से सयुक्त, सभी तरह के पुष्पो से अदभुत महामाला को धारण करने वाले श्री नसिंह का स्वरूप था । जसे ही शिव ने उन का उपयुक्त स्वरूप से समवत वपु का ध्यान किया था वैसे ही तुर त उन्होने शिव को अपना दर्शन दिया था। जिस प्रकार : स्वरूप का धीमान् रुद्रदेव क द्वारा ध्यान दिया गया था उसी प्रकार के देवो के द्वारा भी दुनिरीक्षणीय स्वरूप में वह वहां उपस्थित हुए थे। भगवान् शकर ने उनको प्रणिप त करके फिर स्तुति की थी। भगवान् शकर ने कहा हे जगत् के स्वामिन् आप तो नर और सिंह दोनो क स्वरूप को धारण करने वाले हैं। ऐसे आपको नमस्कार है । हे दैत्यमाथा के रक्त से आपूर्ण हे नखा की शक्ति से विराजमान ! हे सम्पूण सलग्न हेम के सदृश पिङ्गल विग्रह दाल ! हे पदमनाभ 1 मैं आपका प्रणत होता हूँ। हे सुरो के शक गुरा हे वल्पात में अम्भोद के समान निर्घोष वाले ! आप तो करोड़ गूथ्यों के समान प्रभा वाले हैं । आपका श्रोध सहस्रो यमो के समान है। थाप सहस्रों द्रों के समान परात्रम वान है। आप सहस्रो धनदो वे तुल्य सकोत हैं और आप सहस्रो वरुणो वे स्वरूप वाले हैं। | ५५-५६ ।। 1
भव माहात्म्य वर्णन
१३१
सहस्रकालरचित ! सहस्रनियतेन्द्रिय ।
महसूभूमिसद्ध य ! सहस्त्रानन्त ! मतिमन ! ॥५७
सहस्रचन्द्रप्रतिम ! सहस्रग्रहविक्रम ।।
सहस्ररद्रतेजस्क ! सहस्रब्रह्मसस्तुत ! ।।५८
सहस्रबाहुवर्गोग्र! सहस्रास्य निरीक्षण
सहस्रयन्त्रमथन ! सहस्रवधमोचन ॥५६
अन्धकस्य विनाशयया.सृष्टा.मातरो मया।
अनाहत्य तु महाक्यम्भक्षयन्त्यद्यता प्रजा ॥६.
कृत्वा ताश्च न शक्तोऽह सहर्तमपगजित ।
स्वयकृत्वा कथन्तासाविनाशमभिकारये ॥६२
एवमुक्त: स रुद्रेण नरसिंहवपुर्धर ।
ससर्ज देवोजिह्वायास्तदावाणीवरी हरि. ॥६२
हृदयाच्च तथा माया गुह्याच्च भवमालिनी ।
अस्थिभ्यश्च तथाकाला सृष्टापूर्व महात्मना ॥६३
है सहस्र कालो से रचित । हे सहन नियन इन्द्रिया वाले !
है सहस्र भूमि सद्धर्य ! है सहस्रानन्त ! हे मूर्तिमन् ! है
सहन चन्द्रो की प्रतिभा वाले । आप तो सहस्रो ग्रहो के विक्रम
वाले हैं और सहस्र चन्द्रों के तेज से सयुन है। आप सहनी ब्रह्माओ
के द्वारा संस्तुत हैं । है सहस वाहु वर्गोय! है सहसाक्ष क समान
नेत्रों वाले ! हे सहसू यन्त्रय मन! हे सहस बघ मोवन ! मैंने अधिक
दत्य के विनाश के लिये जिन मातृगण का सृजन किया था वे ही आज
मेरे वचन का अनादर करके उन प्रामो का मक्षण कर रहे हैं। हे अप.
रानिन! उस मातृगण को सृजन करके अब उसके सहार करने में मैं माल
हो रहा हूं क्योकि स्वय ही मैंन जिस वाया था उस का विनाश मैं
ही स्वप से कह । इस प्रकार से रददेव + द्वारा उन नरसिंह वपु के
पारी प्रभु में जब वहा गरा था उन सरिदेश ने जिह्वा की वाणीतरी की
१३२
मत्स्यपुराण
रचना की थी। हृदय से माया-गुह्य से भवमालिनी और अस्थियो से
कोली का पहिलै उस महारमा ने सृजन किया था ।। ५७-६३ ।।
यया तद घिरम्पीतमन्धकाता महात्मनाम् ।
याचास्मिन्कथिता लोकेनामत शुष्करेवती ॥६४
द्वात्रिशन्मातर सृष्टा गानोभ्यश्चक्रिणा तत ।
तासा नामानि वक्ष्यामि तानि मे गदत शृणु ॥६५
सर्वास्तासु महाभागा घण्टाकर्णी तथैव च ।
त्रैलोक्यमोहिनी पुण्या सवसत्ववशङ्करी ।।६६
तथा च चक्रहृदया पञ्चमी व्योमचारिणी ।
शाडिसनी लेखिनी चव कालसङ्कपणी तथा ॥६७
इत्येता पृष्ठगाराजन् । वागीशानुचराः स्मृता ।
सङ्कपणीतथाश्वत्थायीजभावापराजिता ॥६-
कल्याणी मधुदेष्ट्री च कमलोत्पलहस्तिका ।
इति देव्यप्टक राजन् ! मायानुचरमुच्यते ॥६६
जिसने महात्मा प्रधको वा रुधिर पान किया था और जो नाम
से लोक म गुप रेवती कही गयी थी। इस पश्चात चधारी प्रभु ने
अपने ही गातो स दत्तोम माताओ का सृजन किया था।
मामो को ववालाने माल मान अब तुम मुनलो ॥ ६४, ६५॥ उनमें
सभी महान भागो वाली थी। घण्टा वर्णी-हौनोवप मोहिनी- पुष्पा
रायसरय शरी- हृदया-विवी व्योमचारिणी-गाविमी-लेखिती
पाप शापिणी २ सय, राजन् । उस बागीशा के पीछे गमन बरने वाली
धनुधारिणी पो-एमा बहा गया है। रामपणी-अस्वस्था---बीप्रभावा-
HTRIfxता-स्थाना--मधुदाट्री और पमना तथा उत्ताल हस्तिया
१ राजन् ! देवियों का काम पा वह मायानुपर बहा आता है।
उन सबके
11-11
१३३
भव माहात्म्य वर्णन
अजिता सूक्ष्महदया वृद्धा वेशाश्मदंशना।
नृसिंहभरवा विल्वा गरुत्महृदया जया ||७०
भवमालिन्यनुचरा इत्यष्टौ नृपमातरः।
आकर्णनी सम्मटा च तथवोत्तरमालिका ७१
ज्वालामुखी भीपणिकाकामधेनुश्चवालिका।
तथापकराराजन् ! रेवत्यनुचरा.स्मृता ॥७२
अष्टौ महावलाः सर्वा देवगात्रसमुद्भवाः ।
त्रैलोक्यसृष्टिसंहारसमर्थाः सर्वदेवताः।।७३
ताः सृष्टमात्रादेवेन क्रुद्धामातृगणस्य तु ।
प्रधाविता महाराज ! क्रोधविस्फारितेक्षणाः ।।७४
अविषह्यतमन्तासा दृप्टितेजः सुदारुणम् ।
तमेव शरण प्राप्ता नृसिंहो वाक्यमब्रवीत् ॥७५
यथा मनुष्याः पशवः पालयन्तिचिरात् सुतान् ।
जयन्ति ते तथवाशु यथावदेवतात सुतान् ॥७६
भवत्स्तु तथालोकान्पालयन्तु मयेरिताः ।
मनुजश्च तथा देवयंजध्व त्रिपुरान्तकम् ।।७७
यजिता, सूक्ष्महृदया, वृद्धा, वेशाश्म दशना, नृसिंह भैरवा. बिल्वा
गरुत्महृदया, जया और भवमालिनी ये आठ अनुचर नृप माताएं थीं।
प्राकंपानो, सम्भरा, उत्तर मालिक, ज्वालामुखी, भीषणिका, कामधेनु,
बालिका, देणजन् ! पद्मक रा ये रेवती को अनुचारिणी थी-ऐसा कहा
गया है। ये आठ महाबल वाली और सभी देव के गात्रो से समुत्पन्न होने
वाली पी। ये सब देवता लोक्य की सप्टि एवं सहार करने में समर्थ
थी। वे देव के द्वारा सृष्ट मात्र होते ही हे महाराज ! मनि क्रुद्ध होकर
प्रो मे विस्फारित नेत्रो वाली मातृगण के पीछे प्रधावित हुई थी। उनकी
दृष्टि का तेज अविषह्यतम और परम सुदारुण था। उन सबने उन्हीं की
चरणागति प्राप्त की थी तद श्री सिंह प्रभु ने यह वाक्य कहा था-जिम
१३४
मास्यपुराण
प्रकार से मनुष्य और पशु चिरकाल तक सुतों का पालन किया करते हैं
उमी भारी देवगण के समान शोघ्न हो जय को प्राप्त होत हैं । आप लोग
मेरे द्वारा प्ररित होकर लोकों का पालन करे तथा मनुष्य और देवगण
सब त्रिपुरा तक का अभ्यचन किया करें ||७०, ७१, ७२ ८३,७४॥
॥७५,७६, ७॥
नच बाधा प्रकतव्या ये भक्तास्त्रिपुरान्तके ।
येच मा सस्मरन्तीह तेच रक्ष्या सदानरा ॥७८
बलिकम करिा त युष्माक ये सदा नरा ।
सवकामप्रदारतेषा भविष्यध्व तथच । ७६
उ-छासनादिक ये च कथयति मयेरितम् ।
तेच रक्ष्या सदालोकारक्षित य मदासनम् ।।८०
रौद्री चव परा मूर्ति महादेव प्रदास्यति ।
यूष्म मुरया महादव्यस्तदुक्त परिरक्षय १०९
मया मातृगण सृष्टा योऽय विगतसाध्वस ।
एप नित्य विशालाक्ष्यो मयव सह रस्यते ।।८५
मया साद्ध तथा पूजा नरेभ्यश्चव लफ्यथ ।
पृथक् सुपूजिता लोक सर्वान् कामान् प्रदास्यथ । ८३
शप्का सपूजयिात ये च पुनाचिनो जना ।
तेपा पुत्रप्रदा देवी भविष्य तनसशय ।८४
भगवान् त्रिपुरा तक के जो भी भक्तगण हो उनको कोई भी बाधा
नहीं करनी चाहिए। जो मनुष्य यहा पर मेरा स्मरण किया करत हैं
उनको भी सदा रक्षा करनी चाहिए । जो नर आपका सवदा बलियम्म
दिया परते हैं अर्थात् आपको वन समर्पित परत है उनकी समस्त काम
नामा के प्रान बरने वार य प लोग उसी भांति बन जाइये। मेरे द्वारा
प्रेरित जो उच्छाशनादिव का पपन परत है उन स्रोको यी सदा रक्षा करनी
भारिप और गा मामन का मुसा करने की कृपा करें। महादेव परा
भव माहात्म्प वर्णन रोद्रो मूत्ति का प्रदान करेंगे। प्रापमे जो मुस्य महादेवियां हैं वै सद उपर्युक्त सत्रकी रक्षा करे । मेरे द्वारा इस मातृगण का सृजन किया गया है जो यह इस समय में विगत मय वाला है यह नित्य ही विशाल नैनो वाली मेरे ही साथ रमण में रमण करेंगे। मेरे ही ये नरों से पूजा प्राप्त परेंगी। यदि इन्हे पृथक् भी समर्चन क्यिा जावेगा और लोग ऐसा करेंगे तो ये सभी मनोकामनाओं की प्राप्ति करा देंगी। जो पुत्री के प्राप्त करने को इच्छा वाले है उन जनो को यह देवी पुत्र प्रदा अवश्य ही हो जायेगी-- इसमें तनिक भी सशय का कोई अवसर ही नहीं रहना है ॥ ७८,७६ ॥ 11९०,८१,८२,८३,८४|| एवमुक्त्वा तु भगवान् सह मातृगणेन तु । ज्वालामालाकुलवपुस्तन वान्यरधीयत ॥८५ तत्र तीर्थ समुत्पन्न कृतशोचेति यज्जगुः। तत्रापि पूर्वजो देवो जगदातिहरोहर ।।८६ रोदम्य मातृवगम्य दत्त्वा रद्रस्तु पार्थिव । सैद्रा दिव्या तनु तत्रमातृमध्येव्यवस्थित ॥२७ सप्त ता मातरी देव्य. सादगारोनरः शिव.। निवेश्य गेद्र तत् स्थान तोवान्तरघीयत 145 स मातृवगस्य हरस्य मूत्तिदा यक्ष याति च तत्समीपे । देवेश्वरम्यापि नृसिंह मूत. पूजा विधत्ते विपुरान्धकारि ६ इस प्रकार में कार वह भगवान् माताण के साय ही ज्वालाओं की मालाओं मे समावुल वपु वाले वहा पर अन्नहित हो गये थे 1८५|| यहां पर एष तीर्य की उत्पत्ति हो गई यो जिमको नसोचा-इम नाम म गान क्यिा जाना था। यहा पर भी पूर्वज देव इस जान की आतिश (पोटावा) हरण करने वाले हर ही ये ॥६६॥ है पार्थिव ! भगवान् पटव मातवांदोग: दिश्य तब प्रटान पर वहा पर मात माप मे प्ययित ही न थे। देसात तो माताएँ देविपा हैं और साद .
मत्स्यपुराण
नारी नर शिव हैं । उस रोद स्थान को निर्देशित करके वहीं पर अन्तर्धान
हो गये थे। वह जब जब भी वह मात वर्ग की हर की मूर्ति उसके समीप
में जाती है तब त्रिपुरान्धकारि शिव देवेश्वर नसिंह मूत्ति की भी पूजा
किया करते हैं ।।८७,८८, ८६॥
७३-वाराणसी माहात्म्य
श्रु तोऽन्धकबधः सूत ! यथावत्त्वदुदीरितः ।
वाराणस्यास्तु माहात्म्य श्रोतुच्छिाम साम्प्रतम् ॥१
भगवान् पिङ्गलः केन गणत्वं समुपागतः ।
अन्नदत्त्वञ्च सम्प्राप्तो वाराणस्यां महाद्युतिः ॥२
क्षेत्रपालः कथ जात: प्रियत्वञ्च कथङ्गतः ।
एतदिच्छाम कथितं श्रोतु ब्रह्मसुत ! त्वया ॥३
शृणुध्व व यथा लेभे गणेशत्व स पिङ्गलः ।
अन्नदत्वं च लोकानां स्थान वाराणसी विह ॥४
पूर्णभद्रसुतः श्रीमानासोद्यज्ञः प्रतापवान् ।
हरिकेश इतिख्यातो ब्रह्मण्यो धामिकश्च ह ।'५
तस्य जन्मप्रभुत्यंव शर्वे भक्तिरनुतमा।
तदासीत्तन्नमस्कारस्तनिष्ठस्तत्परायणः ॥६
आसीनश्च शयानश्च गच्छस्तिष्ठन्ननुव्रजन् ।
भुजानोऽथ पिबन्वापि रुद्रमेवानचिन्तयत् ।।७
ऋपि वृन्द ने कहा-हे सूतजी! आपके द्वारा वणित ठीक २
रीति से हमने अधिक का वध श्रवण कर लिया अब इस समय मे वारा-
णसी पुरी का माहात्म्य हम धवण करने की सब अभिलाषा रखते हैं।
॥१॥ भगवान् पिङ्गल किरा के द्वारा अथवा किस कारण से मणत्व को
प्राप्त हुए थे ? यह महा धति से सुसम्पन्न वाराणसी मे अन्न कस्य को
१३७
वाराणसो माहात्म्य
मी सम्प्राप्त हो गये हैं ? ॥२॥ यह क्षेत्रपाल कैसे हुए और त्रियत्व की
प्राप्ति भी किस तरह से हुई थी? हे ब्रह्माजी के पुत्र ! यह सब आपके
द्वारा वर्णित हम सब प्रवण करना चाहते हैं । महा महर्षि श्री सूतजी ने
कहा- उस पिङ्गल ने जिम रीति से गणेशत्व की प्राप्ति की यो उमे माप
लोग मुगिय । लोको को अन्न देने वाले और यहा पर यह वाराणसी का
स्थान जैसे प्राप्त हुआ वह भी मुनिये १३, ४॥ पूर्णभद्र का पुत्र प्रताप
वाला श्रीमान् यन था । वह हरिकेश-इम नाम से विख्यात था और
परम धाम्मिर तथा ब्रह्मण्य या ॥५॥ उसकी जन्म आरम्भ से ही नकर
भगवान् शिव में अतीव उत्तम भक्ति थी। उस समय म शिव काही
नमस्कार करने वाला-उन्हीं में पूर्ण निष्ठा रखत हुए यह पवदा उन्ही
मे परायण रहा बना था ॥६॥ यह बैठा हुमा- शयन करता हुन
गमन करने हुए-स्थित रहत हुए-अनुवउन परत हुए-माजन रन
की दशा म तथा पान करते हुए भी रुद्र का ही मदा अनुचिन्तन रिया
परता था।
तमेव युक्तमनसम्पूर्णभद्रः पिताबवीन ।
न त्वा पुनमह मन्येदुर्जातो यम्त्व मन्यथा ।
न हि यक्ष कुलीनानामेतद्वत भवत्युन ।
गह्या वत यूय दै स्वभावात् ऋचेतसHE
कन्यादाश्चव कि भक्षा हिमाशोलाश्च पुत्र ।
मंव कापीनते वृत्तिव दृष्टा महान्मना ।
म्वयम्भुवा यवादिष्टा त्यतया यदि नो भवेत् ।
आश्रमान्तरज कम न कुर्युगृहिणस्तु तत् ।।११
हित्वा मनुप्यमाव च मभि विविधश्चर।
यन्वमेव विमा गम्यो मनुप्याजान एयच ॥१२
ययावद्विविधन्नेपा कम नज्जानिमययम् ।
मपापि विहित पाय कमतन्नार माय. ।।१३
-
मत्स्यपुराण
-
-
इस प्रकार से युक्त मन वाले उससे उसके पिता पूर्ण ने कहा था-
मैं
पुत्र तुझको दुर्जात नहीं मानना हूं जो कि तू अन्यथा रहा करता है।
11८1। यक्ष कुलो में समुत्पन्नों का यह चरित नहीं हुआ करता है । वेद
है आप लोग गुह्यक हैं स्वभाव से क्रू र चित्त वाले हुआ करते हैं ।।६।।
है पुत्रक ! कव्याद लोग क्या भक्षण करने वाले हैं और हिंसा करने के
स्वभाव वाले होते हैं। ऐसा मत करो। महान् अारमा वाले के द्वारा
तुम्हारी इस प्रकार की वृत्ति नही देखी गयी है ॥१०॥ स्वयम्भू ने जो
समादिष्ट की है यदि आपमें हो तो उसे त्याग देना चाहिये । जो गृही
होते हैं वे दूसरे आश्रम मे उत्पन्न होने वाले कर्म को नहीं किया करते हैं
और न उन्हे करना ही चाहिये ॥११॥ मनुष्यों के भाव को छोड़ कर
विविध भांति के कम्मों के द्वारा चरण करो। जो तू इस प्रकार से विमाग
मे स्थित है तो तू मनुष्य से ही समुत्पन्न हुआ है। यथावत् उनके अनक
कर्म है जो उनकी जाति का सश्रय रखने वाला है । मैंने भी काम किया
है उसे देखो। इससे इसमे कुछ भी सराय नहीं होगा ॥१२, १३।।
एवमुक्त्वा स त पुत्र पूर्णभद्रः प्रतापवान् ।
उवाचनिष्क्रम क्षिप्रगच्छपुत्र ! यथेच्छसि । १४
ततः स निर्गतस्त्यक्त्वा गृह सम्बन्धिनस्तथा ।
वाराणसी समासाद्यतपस्तेपे सुदुश्चरम् ॥१५
स्थाणुभूतो ह्यनिमिषः शुष्ककाष्ठोपलोपमः ।
सन्नियम्येन्द्रियग्राममवातिष्टत निश्चल: ॥१६
अथ तस्यंवर्मानशन्तत्परस्य तदा शिपः ।
सहस्रमेक वणि दिव्यमप्यध्यवतत ॥१७
वल्मीकैन समाकान्तो भक्ष्यमाण, पिपीलिकः ।
बज्रमूनीमृग्नस्तीपण विध्यमानस्तथंव च ॥१८
निमासमधिरत्वक च कुन्दशट व दुसप्रभः ।
अस्थिटोपोऽभवच्छवं देवं वचिन्तयन्नपि ।।१६
वाराणसी माहात्म्य
एतस्मिन्नन्तरे देवी विज्ञापयत शङ्करम् ।
उद्यान पुनरेवेह द्रष्टुमिन्छामि सर्वदा ॥२०
क्षेत्रस्य देव माहात्म्य श्रोतु कौतूहल हि मे ।
यतश्च प्रियमेतत्ते तथास्य फ्लमुत्तमम् ॥२१
१४० मत्स्यपुराण इति विज्ञापितो देव शर्वाण्या परमेश्वर । शव पृष्टायथातथ्यमारयातुमुपचक्रमे ।।२२ निजगाम च दवेश पावत्या सह शङ्कर । उद्यान दशयामास देव्या देव पिनाकधूक ॥२३ प्रोत्फुल्लनानाविधगुल्मशोभित लताप्रतानावनत मनोहरम् । विरूढपुष्प परित प्रियगुभि सुपुष्पित कण्टक्तिश्च केतकं ॥२४ तमाल गुल्मनिचित सुगन्धिभि सकणिकारकुलश्च सवश । अशोकपुन्नागवर सुपुष्पितद्विरेफमालाकुलपुष्पसञ्चय ॥२५ वचित्प्रफुल्लाम्बुज रेणुरूपितविहङ्गमश्चारुकलप्रणादिभि । विनादित सारसमण्डनादिभि प्रमत्तदात्यूहरतश्च वल्गुभि ॥२६ क्वचि-च चकारवोपनादित क्वचितच कादम्बकदम्बकयू तम्। क्वचितच कारण्डवनादनादित- क्वचिच्च मत्तालि कुलाकुलीकृतम् ॥२७॥ मदाकुलाभिस्त्वमराङ्गनाभि निषेवितधारु सुगन्धिपुष्पम् । क्वचित् सुपुष्प सहकारवृक्षलतोपगूढस्तिलकद्रुमश्च ।२८ शर्वाणी के द्वारा परमेश्वर देव को यह विज्ञापित किया गया था और पाथातथ्य का जब शिव प्रभु से पूछा गया तो वह पूछे हुए हाकर इस कहन के लिये उपत्रम करने लगे थे ॥२२॥ देवेश्वर भगवान शहर पावती देवी के साथ ही निकलकर चले गये थे। फिर पिनाकधारी देव ने धह उद्यान देवी को दिखलाया था ॥२॥ देवो के देव वाले-यह उद्यान विकसित नाना भाति के गुल्मा स शोमा वाला था । लतामो के प्रतानो स प्रवनत एव मनोहर था। दोनों ओर विरुद्ध पुप्पो वात प्रिय गुभो से- मुदा पुषों से ममा वत कष्टक्ति ये तूका स-मुगघ युक्त तमाल में गुस्मा सनिमित और राव आर बगिकारा य सहित वनो से वह समयत पा ॥२५, २५॥ दिरफों (भोरो) की मालामो स समान पुप्पो व सञ्चय एस मुक्ति मोर पुनाग बरोस सयुत है ॥२५ । स उद्यान में नहीं वाराणसी माहात्म्य १४१ चर प्रफुल्ल कमलो के रेषु से रूपित तथा चारू एवं कल (मधुर) प्रणाद करन वाल विहगमो से यह निनादित हो रहा था तथा किसी जगह पर सारस मण्डन आदि से एव परम वल्गु प्रमत्त दात्यूहो क शब्दों से शन्दाय- मान था २६ क्सिी स्थल पर चक्रवाको की ध्वनियो से निनादित और कही पर कदम्बो के समूहों से यह उद्यान समुन था। किसी स्थान में कारण्डको की कल ध्वनियो से निनादित था और वहीं पर प्रमत्त अलियो के कुलो से आकुलीकृत हो रहा था !!२७ ॥ महान् कुलो वाली अमरों की अङ्गनाओ के द्वारा मेवित तथा सुन्दर एव सुगन्धित पुष्पो से परिपूर्ण यह उद्यान था। कही पर सुन्दर पुप्पो वाले सहकार में वृक्षो से तथा लताओ से उपगूढ तिलक के दूमो से समन्वित था ॥२८॥ प्रगीतविद्याधरसिद्धचारण प्रवत्तनृत्याप्सरसागणाकुलम् । प्रहृष्टनानाविधपक्षिसेवित प्रमतहारीतकुलोपनादितम् ।।२६ मृगेन्द्रनादाकुलसत्वमानसंः क्वचित् वचितद्वन्द्वकदम्बक मृगैः। प्रफुल्लानानाविधचारुपङ्कज सरस्तटाकरुपशोभित क्वचित् ॥३० निविडनिचुलनील नीलकण्ठाभिराम- मदमुदितविहङ्गवातनादाभिरामम् । कुसुमिततरशाखालोनम द्वरेफ- नवकिशलयशोमाशोभितप्रान्तशाखम् ॥३१॥ क्वचिन्च दन्तिक्षतचारबोरा क्वचिल्लतालिङ्गितचासवृक्षकम् । वचिद्विलासालसगामिवहिण निपेवित कि पुरुपव्रज क्वचित् ॥३२ पारावतध्वनिविकूजितचारुशृङ्गरपं. सितमनोहरचारस्पः। आकोर्णपुष्पनिकुरम्बविमुतहासविम्रास्ति- विदशदेवपुलरने ॥३॥ फुल्लोत्पतागुरुराहरवितानयुक्तः । स्तोयावयंस्तमनुशोभितदेवमार्गम् ।।
११२ मत्स्यपुराण मार्गान्तरागलितपुष्पविचित्रभक्ति- सम्बद्धगुल्मविटपविगैरपेतम् ॥३४ तुङ्गान नीलपुष्पस्तवकभरनतप्रान्तशाचरशोक मत्तालिबातगीतअतिसुखजनन सितान्तमनोज्ञ । रात्रौ च द्रस्य भासा कुसुमिततिलकैरेकता सम्प्रयात छायासुप्तप्रबुद्धस्थितहरिणकुलालुप्तदर्भात राग्रम् ॥३५ (वह उद्यान विद्याधर-सिद्ध और चारणो के गीतों से परिपण- नत्य करने मे प्रवृत्त हुई अप्सराओ के गणो से समाकुन था परम प्रहप वाने अनेक भौति के पक्षियो के द्वारा यह उद्यन सेवित था। यह उद्यान प्रमत्त हारीत नाम वाले पक्षियो वे समूह से उपनारित था ॥२६॥ किसी स्थल पर मृगे दो को गजनो से सत्वो के मानसो को समाकुलित करने वाला था। कोई भाग इसका मृगो के जोडो के समुदायो से मुक्त था। कही पर खिते हुए अनक तरह के चार कमलो स युक्त सरोवर मौर तडागो के द्वारा यह उद्यान शोभा वाला या ॥३०॥ यह उद्यान घने निचुलो सनील वण वाला गोल कण्ठो स अभिराम-मद से परम प्रस न पक्षिया वे समू! क मा- स परम मनोहर था । पुष्पो वाले वृक्षो की शाखाओ म जिस उद्यान म भौरे प्रमत होत हुए लीन हो रहे थे और नुतन पत्रो की गोमा स शोभित प्रा त शाखाओ वाला वह उद्यान था। वही पर गजो के द्वारा किय गये क्षतो स सुदर थोरधा वाला था और पही पर मतानों के द्वारा सुदर वृक्षो का आलिङ्गन किया जा रहा था। विमो स्थल पर दिलास म अनस गमन करने वास यहि पाला तथा यही विम्युम्यगण उग उथान का सवन पर रह थे ॥३ ध्वनि स विप प स दूजित गुर शिवरो स जो मि आकार को पूने चार पर ही ऊप य और स्वत एव मनोहर चाह रूप स युक्त थे वह उपान विभाजित हा रहा था और समायोof पुप्पों में निपुरम्य स विमुक्त हास्य वास धारदार मा तारा वह विन था ॥३॥ ए ३२॥ पारायतों की वाराणमी माहात्म्य १४३ बडे २ सहस्रो उन्पलों के वितानों से युक्त नोयाबों में मोमा वाले देवमार्ग वाला वह उद्यान बहुत ही सुन्दर हो रहा था। मार्ग के बीच मे गलिन हुए पुप्पो से विचित्र भक्ति से सम्बद्ध झाडियो तथा बिपों से समायुक्त या बहुतही कचे जिनक मप्रमाग हैं ऐसे नील पुप्पो के स्तवको के भार से अवना मासाओं वाले प्रशोर के वृक्षो से समायुक्त या तथा अत्यन्त प्रमत्त भमरों के समुदायों के गुन्जिन गौतो से कानो को सुख समुत्पन्न करने वाले और अन्दर मनोजना को भासित करने वाले तिलकों के मुमी के द्वारा तथा रात्रि में चन्द्र को दीप्ति से एक्ता को प्राप्त हुआ और छाया में प्रसुप्त होकर फिर अंगे हुए सस्थित हिरनो के कुलो स आलुप्त दर्मों के अधुरो वाला वह उद्यान या अर्थात् वहा पर लेटे हुए हरणो के समूह में डाभों में अकुर दवे ए हो गये थे ॥३४, ३५१॥ हमाना पक्षातनिरकमलम्वच्छविस्तीर्णतोयम् तोयाना तीरजाताविकचक्दलीवाटनृत्यन्मयरम् । मायरं पक्षचन्द्र क्वचिदपि पतित जिनक्षमाप्रदेशम् देगे देशे विकीपंप्रमुदितविलसन्मत्ताहागेतवृक्षम् ॥३६ सारङ्ग चिप मेवितप्रदेश मच्छन्नं कुमुगचय क्वचिद्विः। हृष्टामि क्वचिदपि विन्नरागना मः क्षीवाभिः ममधुरगीतवृक्षखण्डम् ॥३७ समृप्ट क्वचिदुपलिप्तरीपुष्परावास परिवृतपादप मुनीताम् । आमलान् फलनिचिन. चिहिमालमत्तृङ्गः पनसमहीरहेम्पेतम् ॥ पुन्लातिमुत्तवलतागृहसिलील , महाङ्गनानिवनगुरनादाम्पम् । रम्परिया तहमन्जरिसामृग भगावलीषु ।। स्खलिताम्बुवदम्बरम् ॥६॥ पुमोनिविधूपिनषादरानमग्रेमगे मुधि निपानितवशगुल्मम् । गुल्मान्तरसनितीन मृगायमूह ममुह्यता-तनुभनामस्वगंदात ॥
११४ मत्स्यपुराण चन्द्राशुजालघवलस्तिलकमंनोज: सिन्दूरकुडा मसुम्भनिर्भरशोक । चामीकराभनिचयरथ कणिकारे फुल्लारिविन्दरनित मुविशालशाखे ।।१ क्वचिद्रजतपर्णाभं क्वचिद्विद्रुमसन्निभ । क्वगितकाळानसङ्काशे पुष्पैराचितभूतलम् ॥ ४२ अभी तक निरन्तर उसी उद्यान को शोमा का हो वर्णन किया जा रहा है वह उद्यान है कि पखो के प्रपात से विचलित होने वाले कमलो के द्वारा परम स्वच्छ एव विस्तीण जल वाला था। जलाशयो के तट पर समुत्पन्न एव प्रबिकई कदलियो के वाट म नृत्य करने वाले मयूरो से युक्त वह उद्यान था । किसी स्थल पर गिरे हुए मयूरो के पक्ष चन्द्रो के द्वारा रजित दामा प्रदेश वाला था तथा देश-देश मे विकीर्ण--प्रमुदित-विल. राव मस्त हारीतों स सयुत वृक्षो वाला उद्यान या ॥३६। कहीं पर सारङ्गो सेविन प्रदेश वाला और किसी स्थल पर विचित्र कृसुमों से चयो से सच्छन दिमो स्थान पर परम क्षोव एव प्रहपित किन्नरो की अङ्गनाभी क द्वाग सुमधर गीता वाले क्षो के खण्डो से समन्वित वह उद्यान या 11३७) कही पर सस ट तपा उपलिप्त प्रकीर्ण पुष्पो से युक्त मुनियों के निवास स्थानो से परिवत पादपो से समन्वित वह उद्यान था। कही पर अत्यन्त विशाल एवं उत्तुङ्ग और मूल से ही लेकर फलो से निचित पनरा वटहट) के वृक्षों से उपे। वह उद्यान था ॥३८॥ विकसित और प्रतिमुक्त सतामों के गृहो में सिद्धो की लीला वाला या तथा सिसो की अङ्गनाओ के सुवर्ण रवित नूपुरों क माद स परम सु दर वह उद्यान पा। परमरम्य प्रियगु के वृक्षो की मजरियों में सप्तत नमरो से समः वित तपा मङ्गों की तारो म स्खलित होन वाले जस बदम्बा के पुष्पों स सपुत्र वह उद्यान पा ॥३६।। कुमुमा के उपरोस मिश्रित वायु से विपूर्णिन वृक्षो र अप्रमाग वाला तथा भूमण्डल म निपातित मौसोपी
वाराणसी माहात्म्य
१४५
शाडियो से युक्त था ! गुल्मों के बीच में मीन होने वाम गोप गाय
वाला--सम्मोह को प्राप्त रेहधारियों को प्रवर्ग को प्रा
चन्द्रमा की किरणों के समान धवल मनोतियRTNxn
और मसुम्भ के तुल्य प्रशोको से-धामीवर (स) RPM
कणिकारो से और परम विशाल गालाओं के द्वmar ytirtan
रचित वह उद्यान था। वहीं पर तो 7 Mys
कहीं पर द्र मो के सदृश-वहीं पर गुवर्ण x PURARIA
भूगल वाला वह उद्यान पा ॥४१, ४२||
पुन्नागेषु द्विजगतिस्त रक्तागाकार Myrel
रम्योपान्त श्रमहरपवनं फुलला sureshiytes
सकलभुवनभर्ता लाकनाथस्तानी
हिमशिखरिपुत्र्याः साद मिष्टंग
विविधतरुविशाल मत्तहष्टान्य
मत्स्याराण से नमित था जिसके उपान्त परमरम्य थे-शारीरिक श्रम को हरण करन घाला वायु जिसमे वहन कर रहा था तथा विकसित कमलो मे जिस उद्यान मे भ्रमरो का विलास हो रहा था ॥४३॥ उस समय म समस्त भुवनो के भरण करन वाले-लोको के नाथ ने अपने इष्ट गणेशो के साथ मे तुहिना शिखर हिमालय अद्रिराज की पुत्री दवी पार्वती को अनेक प्रकार के वृक्षो अत्य त विशाल-मत्त एव हृष्य अन्यो के द्वारा पुष्प और उपवन वे तमओ स रम्य उम नद्यान को दिखा दिया था ॥४॥ देवी ने कहा- हे देव । परा शोभा से युक्त इम उदयान को तो आपने दिखला दिया है । अब समस्त इस क्षेत्र के गुणो को यहां पर आप कहने के योग्य है । अवि. मुक्त इस क्षेत्र के माहात्म्य को श्रवण करके भो मुझे पूर्ण तृप्ति नहीं हुई है । इसलिए इसे ही पाप पुन मुझे श्रवण कराइये ।।४५, ४६॥ देवो के देव ने कहा- यह अत्य त हो गुह्यतम क्षेत्र है जामदा मेग वाराणसी है । यह सबद सभी प्राणिया क मोटा का हेतु होता है |॥१७॥ हे देवि ! इम क्षेत्र मे मदा द्धिगण मेरे ही वन म समास्थित रहते हैं। ये लोग विभिन्न प्रकार व चि हा क धारण करने वाले और नित्य ही मरे लोक थे प्राप्त करन की अ भा इसा वाले थे ॥४८1। मुक्त अस्मा वा जिते दि सो भो म मनातीग और नाम प्रकार के विगो से यूजित ग स्थल मे पर योग का मम्याग क्यिा करते हैं । ४६॥ कमलोत्पलपुप्पाढय सरोभि समलडकृते । अप्परागणगन्ध सदा रासक्तेिशुभे ॥५० रोचत म सदा वासायन यार्यग तच्छृणु । मम्मना मम भक्तश्च मयि सपितनियः ॥५१ गया माक्षमिहाप्नोति धन्यत्र न तथा यचित् । एस.मम पर 'दब गुह्याद्गृहपतर महत ॥५२ प्रमादयस्नु जातियपि सिद्धा मुमुक्षय । धन प्रियतम र तस्मा-पह रतिमम ।। १३ वाराणसी माहात्म्य विमुक्त न मया यस्मान्मोक्ष्यते वा कदाचन। महत क्षेत्रमिद तस्यादविमुक्तमिदम्मृतम् ।।५४ नमिपेऽय कुरुक्षेत्र गङ्गाद्वारे च पुष्करे। स्नानात्मंसेविताद्वापि न मोक्ष. प्राप्यते यतः ॥५५ इह सप्राप्यते येन तत एतद्विमिप्यते । प्रयागे च भवेन्मोक्ष इह वा मत्परिग्रहात् ॥५६ कमल-उत्पल पुणे से आइप सरोवरों से समलकृत-अप्सराओं के गण और गन्धयों के द्वारा सदा से सेवित शुम स्थल यह है । जिस कार्य के कारण मुझे सदा इसा निकाय पसन्द है उसे भी मुनलो। मेरे में ही मनको निवेशित करने वाला मुझ मे ही नर्वस्व मस्ति कर देने वाला वया सव रिय हुए कर्मों को भी मेरी ही सेवा में अपित करने वाला मेरा भक्त जिस प्रकार से यहा मोक्ष की प्राप्ति कर लेता है वैमा अन्य किसी भी स्थान में नहीं कर सकता है। यह ही मेरा परम दिप-महत और गुस्य से गुह्यतम क्षेत्र है ॥५०,५१, ५२।। ब्रह्म दिक देवगण और जो भी मुमुक्षु मिद्ध लोग है वे इस भली भांनि गनन हैं। इसीलिये मेग यह सबसे अधिक प्रिय क्षेत्र है और इसी कारण से मेरी यहा पर अयधिक रति है। इसी में मैंने इसको कभी नहीं छोडा है और न भविष्य में भी मेरे द्वारा इसका त्याग पिया जायगा इसी से उसका यह महत् क्षेत्र है और यह उसका अविमुक्त कहा गया है ।।५३, ५॥ नमिप-कुरुक्षेत्र गङ्गाद्वार और पुष्कर में स्नान करने से तथा सेवित करने से भी मोक्ष प्राप्त नहीं किया जाता है । नहीं परम दुलंम मोक्ष यहाँ पर मम्प्राप्त कर लिया जाया करता है इसी से यह सब से विशिष्ट होता है। या तो प्रयाग में इम मोक्ष की प्राप्ति हानी है अथवा यहाँ पर मेरे परिग्रह करन से मुक्ति हो है 11४५, ५६॥ प्रयागादपि तीर्थाग्यादिदमेव महत् स्मृतम् । जैगीपन्य. परा सिद्धि योगतः स महातपाः॥५५ वाराणसी माहात्म्य १४६ देवि । यहां पर ही मेरी समाराधना करके प्रत्युत्तम सिद्धि को प्राप्त करेगा ।। ६३॥ पराशरसुतो योगी ऋपिासो महातपाः । धर्म भविष्यश्च वेदमस्थाप्रवतकः ॥६४ रस्यते सोऽपि पाक्षि ! क्षेऽस्मिन् मुनिपुङ्गवः । ब्रह्मा देवपिभि. साद विष्णुर्वायुर्दिवाकर. ॥६५ देवगजस्तथा शको येऽपि चान्ये दिवौकस । उपासन्ते महात्मानः सर्वे सामेवसुव्रत ।।६५ अन्येऽपि योगिनः सिद्धाश्छन्नरपा महाव्रता । अनन्यमनसोभूत्वा मामिहोपासतेसदा ॥६७ अलक्श्च पुरोमेताम् मत्प्रसादादवाप्स्यति । स चना पूर्ववत्कृत्वा चातुर्वर्णाश्रमाकुलाम् । ६८ स्फीता जनसमावीणों भक्त्याच गुचिरनृप. । मयि सर्वामितप्राणो मामेव प्रतिपम्यते ॥६६ ततः प्रभृति चावनि! येऽपि क्षेत्रनिवासिनः। गृहिणो लिङ्गिनो वापि मङ्गक्ता मत्परायणाः ।।७० मत्प्रसादाजिप्यन्ति मोक्ष परमदुलभम् । विषयासकचित्तोऽपि त्यक्तधर्मरतिर्नरः ॥७१ इक्षक्षनेमृत सोऽपिससारन पुनविशेत् । ये पुननिमंमा धीरा सत्वस्था विजितेन्द्रिया ॥७२ पराशर मुनि का पुत्र--महान तपस्वो बोर योगी ऋषि व्यासदेव धम्मों का करने वाला-आगे भविष्य में होन वाला वेदों की सस्थाका प्रबरी होगा ६४॥ है पदाक्षि! वह मुनियो मे परम श्रेष्ठ भी इसी क्षेत्र में रमण करेगा । ब्रह्मा-दवपियों क माय विष्णु-बाय-दिव कर- देवा का राजा इन्द्र और 4.1 जा देवगण है व समी महान् अात्माओ
मत्स्यपुराण
अस्य क्षेत्रस्य माहात्म्याद्भक्त्या च मम भावनात्।
जैगीषव्यो महाश्रेष्ठो यागिना स्थानमिप्यते ॥ ५८
ध्यायतस्तत्र मा नित्य योगाग्निर्दीप्यते भृशम् ।
कैवल्य परम याति देवानामपिदुर्लभम् ॥ ५६
अव्यक्त लिमुनिभि. सवसिद्धान्तवेदिभिः ।
इह सप्र.प्यते मोक्षो दुर्लभो देवदानवै ॥६०
तेभ्यश्चाह प्रयच्छामि भोगैश्वयंमनुत्तमम् ।
आत्मनश्चैव सायुज्यमीप्सित स्थानमेवच ॥६१
कुबेरस्तु महायत्तस्तथा शर्वापिंतक्रियः।
क्षेत्रसम्वसनादेव गणेशत्वमवाप ह ॥ ६२
सम्वतॊ भविता यश्च सोऽपि भक्त्या ममैव तु ।
इहैवाराध्य मा देवि । सिद्धि यास्यत्यनुत्तमाम् ॥ ६३
समस्त तीर्थों में प्रथम प्रयाग से भी यह हो महान् तीर्थ कहा
गया है । वह महान तपस्वी जंगीपव्य योग से परम सिद्धि को इस क्षेत्र
के हो माहात्म्य से - भक्ति से और मेरी भावना से महान श्रेष्ठ जंगीपका
योगियो के स्थान को प्राप्त करता है ॥५७, ५८। वहा पर नित्य ही मेरा
ध्यान करने वाले की योगाग्नि अ यन्त दीप्त हो जाया करती है और फिर
वह देवो को भी दुर्लभ परम वरूप पद को प्राप्त करता है । अध्यक्त
लिङ्गो बाले- सम्पूर्ण सिसा तो को जानने वाले मुनियों के द्वारा यहाँ पर
ही मोक्ष की प्राप्ति को जाया करती है जो देवो और दानवो के द्वारा भी
अतीव दुर्लभ है ।।१६, ६०! उन मेरे परम भक्तो को मैं
अत्युत्तम
भोग
एवं ऐश्वर्य प्रदान किया करता हू । तपा उनको अपना सामुज्य पद एवं
अभीप्सित स्थान का प्रदान दिया करता हूँ। महान् यक्ष कुवेर तथा
मिव के लिये ही मपनी समस्त प्रियाओ को अपित कर देने वाला इसी
संत्र में सम्म बरने होस गपेशव को पद को प्राप्त हो गया था
॥ ६१. ६२॥ भोर को सम्पर्श होगा यह भी मेरी ही भक्ति से है
वाराणसी माहात्म्य १४६ देवि। यहा पर ही मेरी समाराधना करके प्रत्युत्तम सिद्धि को प्राप्त करेगा ॥ ६३॥ पराशरसुतो योगी ऋपियासो महातपा । धर्मका भविष्यश्च वेदमस्थाप्रवतक ॥६४ रस्यते सोऽपि पद्माक्षिा क्षेत्रेऽस्मिन् मुनिपुङ्गव । ब्रह्मा देवपिभि साद्धं विष्णुर्वायुदिवाकर ॥६५ देवगजस्तथा शको येऽपि चान्ये दिवौकस । उपासन्ते महात्मान सर्वे सामेवसुव्रत ।।६५ अन्येऽपि यागिन सिद्धाश्छन्नस्पा महाव्रता । अनन्यमनसोभूत्वा मामिहोपासतेसदा ॥६७ अलकंश्च पुरीमताम् मत्प्रसादादवाप्स्यति । स चैना पूर्ववत्कृत्वा चातुर्वधिमाकुलाम् । ६८ स्पाता जनसमाकीर्णा भक्त्याच मुचिरनृप । मयि सर्वाप्तिप्राणा मामेव प्रतिपत्स्यते ॥६॥ तत प्रभृति चावङ्गि। येऽपि क्षत्रनिवासिन । गृहिणा लिङ्गिना वापि मङ्गक्ता मत्परायणा ।।७० मत्प्रसादाभजियन्ति माक्ष परमदुलभम् । विपयासकचित्तोपि त्यवतधर्मरतिर्नर ॥७१ इक्षक्षत्रामृत सोऽपिससारन पुनविशेत् । ये पुननिममा धीरा सत्वस्था विजितेन्द्रिया ॥७२ पराशर मुनि का पुत्र-महान तपस्वी और योगी ऋषि व्यासदव धम्मो का करन वाला-आग भविष्य म हान वाला वदों को सस्था का प्रवर्सर होगा .६४॥ ह पाक्षि! वह मुनियो में परम श्रेष्ठ भी इसी सत्र म रमण करेगा। ब्रह्मा-दपिया के माय विष्णु-वायु-दिव पर- दवा का राजा और वन्य जी दवा है व सभा महान् अत्माओं
१५०
मत्स्यपुराण
वाले हे सुव्रते ! मेरी ही उपासना किया करते हैं। इनके अतिरिक्त अन्य
भी योगीजन-सिद्धगण और छिपे हुए महान व्रतो वाले लोग अनन्य मन
वाले होकर यहा पर सर्वदा मेरी ही उपासना किया करते हैं । अलकं इस
पुरी को मेरे ही प्रसाद से प्राप्त करेगा और वह इस पुरी को पूर्व की ही
भांति करके जो चारो वर्षों से समाकुल-स्फीत और जनो से समाकीर्ण है।
वह नृप बहुत समय पर्यन्त अपनी भक्ति की उत्कट भावना के द्वारा प्राप्त
करेगा और फिर सर्वापित प्राण वाला होकर मन्त
मे को ही प्राप्त
पर लेगा। हे चाङ्गि | तभी से लेकर जो भी इस क्षेत्र के निवास करने
वाले गृही एव लिङ्गो क धारण करने वाले-मुझमे ही परायण रहने वाले
मेरे भक्त परम दुर्लभ मोक्ष का सेवन करेंगे और वह मेरे ही प्रसाद से
होगा। विषयों में समासक्न चित्त वाला भी घम में रति के त्याग करने
वाला मनुष्य इम परम पुण्य मय क्षेत्र मे मृत्युगत होकर फिर ससार मे
प्रवेश प्राप्त नही किया करता है और जो निमम एव धौर तथा सत्त्वस्थ
इन्द्रियों को नियन्त्रित रखने वाले हैं उनकी तो बात ही क्या है ।।६।।
॥६,६७,६८, ६६, ७०,७१,७२॥
यतिनदच निरारम्भाः सर्वे ते मयि भाविता ।
देहभङ्ग समासाद्य धीमन्त सङ्गजिताः ।।
गता एव पर मोक्ष प्रसादान्मम सुव्रते 1७३
जन्मान्तरसहर पु युजन् योगमवाप्नुयात् ।
तमिव पर मोक्ष मरणादधिगच्छति ।।७४
एतस्मशेरनो देवि धोत्रस्यास्य महत्पलम् ।
अविमुक्तम्य पषित मया ते गृहमुत्तमम् । ७५
अत गरलर नास्ति मिद्विगृह्य महेश्वरि ! ।
पतयुध्यन्ति योगशा गे न योगेश्वगभुवि । ७६
व पर माननिदेव पर शिवम् ।
तिवसमा सनदे। पम्पदम् ॥"
वाराणमो माहात्म्य
ब्रतो के धारण करने वाले-आरम्भो से रहित जो जन हैं वे सभी
मुझमे भावित होते हैं और सर्व सङ्ग से रहित वे धोयान देहो के मङ्ग को
प्राप्त वनक हे सुव्रते ! मेरे ही प्रसाद से परम मोक्ष को प्राप्त हो ही गये
हैं 11७३।। सहस्रों जन्मो म योग का अभ्यास करके जिसकी प्राप्ति की
जाती है उसी परम मोक्ष को यहा पर मरण करने से ही मनुष्य प्राप्त
कर लेता है ॥७४) हे देवि ! यह अति सक्षेप से अविमुक्त इस क्षेत्र का
महान् पल जो परम उत्तम और अत्यन्त गुहातम है मैंने आपको बतला
दिया है। हे महेश्वरि ! इससे परनर कुछ भी सिद्धि गृह्य नहीं है ।
इसको योग क जाना और मूमण्डल में स्थित योगेश्वर गण हो जो होते
हैं व हो जानते हैं । यह ही सर्वोपरि परम स्थान है-यह ही परम शिव
है-यह ही परम ब्रह्म है और यह ही सर्वोत्कृष्ट परम पद है ।। ७५॥
11७६.७७॥
वाराणसी तु भुवन नयसारभूता रम्या-
सदा मम पुरी गिरिराजपत्रि!।
अनागता विविधदुष्कृतकारिणोऽपि-
पापक्षयाद्विरजस प्रतिभान्ति मा.॥७८
एतस्मृत प्रियतम मम देवि !
नित्य क्षेत्र विचित्रतरगल्मलतासु पुष्पम् ।
अस्ति मृतास्तनुभृत पदमाप्नुवन्ति-
मूर्खागमेन रहितापि न सशयोऽत्र list
एनम्मिन्नन्तरे देवो देवी प्राह गिरीन्द्रजाम् ।
दातु प्रसादाद्यक्षाय वर भक्ताय भामिनि ८०
भक्तां मम वरारोहे । तपसा हतकिस्विप ।
अहो वरमसौ लब्धमस्मत्तो भुवनेश्वरि ! -१
एवमुक्त्वा ततो देव मह देव्या जगत्पात ।
जगाम यक्षा यत्रास्ते वृशोधमनिसन्तन 11८२
मत्स्यपुराण करते हैं। ततस्त गुह्यक दवी दृष्टिपातनिरीक्षती। श्वेतवर्ण दिचामाण स्नायुवास्थिपञ्जरम् ॥ २३ दवी प्राह नदा दव दर्शगन्ती च गुह्यकम् । सत्य नाम भवानुग्रो दवम्वतस्तु शङ्कर ! ॥८४ यह वाराणसी पुरी हे गिरिराज पुत्रि तीनो भुवनो की सार भूता-सदा अतीव रम्य मेरी पुरी है। यहां पर आय हुए अनेक प्रकार के दुष्कृतों को करने वाले भी मनुष्य पापो के क्षय हो जाने से परम शुद्ध होकर तीप्तिमान हो जाया करते हैं । हे देवि । यह मेरा प्रियतम क्षत्र है और नित्य है । यहा पर विचित्र तह और लता तथा गुल्मो में पुष्प हुआ इस मृयु का प्राप्त होने वाले देहधारी लोग अत्य त मूख एव आगो रहित हाते हुए भी परम पद को प्रा त किया करते हैं इसमे विचि मात्र भी साय नही है । ७८ ७६॥ महामहपि श्री सूतजी ने कहा-इसी अतर मे वह देव गिरिजा देवी से भवत यक्ष के लिये इस नता स वरदान प्रदान करने के लिय बोते थे-हे भामिनि । हे वरारोहे ! पह मरा भक्त है योर तपश्चर्या के द्वारा इसने अपने सब पापो को हत कर लिया है । हे भुवनेश्वरि । इसन हमस वर प्राप्त कर लिया है । इस प्रकार से कहकर जगत के पति देव अपना देवी के साथ वहा पर गय थे जहा पर अत्य त वृश क्वल घमनिया ही नप रहने वाला यक्ष तप में निमग्न पा। इसक बन तर उस देवी ने अपनी दृष्टिक पातो से स गयर का निरीक्षण किया था। वह एकदम श्वेत वर्ण वाला-धाम से रहित और स्नायुओं स बद्ध अस्थियो र पञ्जर वाला था। उस समय में दवी न उस गृहया को दिखलाते हुए ही देव स बहा था कि ह शहर जसा मि दवो न रहा था आप सचमुच ही बहुत उग्र रूप एव स्वभाव वास है 15.१२,८३ || ईदा चाम्य तपगि न प्रयच्छसि यद्वरम् । अत्र क्षत महायव ! पृण्यसम्यगुपास्ति ।।८५
मत्स्यपुराण
१५४
और उसने गणो के सहित यहा पर समुपस्थित वृपावज देव को देखा
था ।।८८८,८६, ६०॥
वर ददामि ते पूर्व नौलोक्ये दशन तथा ॥६१
सावण्यं च शरीरस्य पश्य मा विगतज्वर ।
स्त स लब्ध्वा तु वर शरीरेणाक्षतेन च ॥६२
पादयो प्रणतस्तथोकृत्वा शिरसिसालिम् ।
उवाचाथतदातेन वग्दोऽस्मीतिचोदित ॥६३
भगवन् । भक्तिमव्यग्रा त्वय्यनन्या विधतस्व मे ।
अनदत्व च ते लोकाना गाणपत्य तथाऽक्षयम् ।१४
अविमुक्त च ते स्थान पश्येय सवदा यथा ।
एतदिन्छामि देवेश त्वत्तो वरमनुत्तमम् ॥६५
जरा मरणस त्यक्ता सवरोगविवजित ।
भविष्यसि गणाध्यक्षो धनद सवजित ॥६६
अजेयश्चापि सर्वेषा योगश्वयं समाथित ।
अनदश्चापि लोकेभ्य क्षे-पालोभविष्यसि ॥६७
महावतो महासत्वो ब्रह्मण्या मम च प्रिय ।
श्यक्षश्च दण्डपारिणश्च महायोगी तथव च ॥
उदभम सम्नमश्चव गणोतु परिवारयो ।
तवान्च परिप्यते लोपस्योद् नमो
एव स भगवास्ता यक्ष वृत्ता गणेश्वरम् ।
जगाम यामदवेश सह तनामरेश्वर ||१००
यो प भी दवम का- पहित तस यान दता है तथा
सापय दादता । पर विगत वर याला हाक र शरारको
गवता और यो बा १ । श्री गनभी न पहा-सा उप
पागन बा पापर प्रात जर ग शिव परमो
६ मत [ग पर दा पा को अन्नात वापर वहां पर
1 समन
वाराणमी माहात्म्य स्थित हो गया था फिर उमने उस समय में कहा था कि हे भगवन ! मैं वर प्राप्त होने वाला हो गया हूं। अब तो बाप अपने में अव्यग्र और अनन्य भक्ति मेरी कर देवें तथा लोकों को अन्न का देने वाला एव उच्क्षय गाणपत्य पद प्रदान कीजिए । ६२, ६३, ६४|| मुझे ऐसा ही वा दीजिये कि मैं सर्वदा प्रापके अविमुक स्थान का दर्शन करता रहू । हे देवेश्वर ! आप म मैं यही उतम वरदान चाहता हू ॥६५देवो के देव ने कहा- नरा (वृद्धता) और मौत इन दोनो से मन्त्यक्त होता हा तू एव गंगों में वजित रहेगा तथा सबके द्वारा पूजिन गगो का अध्यक्ष धनद हो जायगा। योग के ऐश्वयं का समाश्रय करके मबका तू अजेय होगा और गांको लिये अन्न का प्रदान करने वाला क्षेत्रपाल होगा । इमी प्रतिकित महान वल वाला-महान् सत्व से युक्न-बाह्मण्य वृक्ष (नीन नेत्री दास, दण्डाणि-महायोगी और मेग प्रिय हो जायगा |IES, 2017 और सम्भ्रम ये दो गण तुम्हारे परिचारक होगे । लौह सम्घ्रम तरी आज्ञा को करेगे सूत जी ने कहा- हम द?tar यक्ष को गणेश्वर बनावर अमरेश्वर वामदेव मी * right ॥६६.१०० ।।
मत्स्यपुराण पुरा देवेन यत्प्रोक्त पुराण पुण्यमुत्तम् । तत्सर्वं सप्रवक्ष्यामि नमस्कृत्य महेश्वरम् ॥५ तता देवेनतुष्टेन उमाया प्रियकाम्यया । कथित भुविविख्यात यत्र नित्य स्वयस्थित ॥६ स्द्रस्यार्धासनगता मेरशृङ्ग यशस्विनी । महादेव ततो देवी प्रणता परिपृच्छति ॥७ महर्षि श्री सूतजी ने कहा- सुविशुद्ध-तप के धन वाले सब ऋषिगण आप लोग इस पुण्य से उत्पन्न हुई–पापो के नाश करने वाली अत्यन्त स्निग्ध कथा का श्रवण करिये ॥२॥ भगवान् सनत्कुमार ने गणे श्वरो के स्वामी-दिव्य और रुद्र के तुल्य पगक्रम से सम्पन्न नन्दिकेश्वर से पूछा था ॥॥ हे भगवन् ! परम गुह्य तत्त्व जहाँ पर भगव न नित्य ही स्थित रहा करते हैं-समस्त भूतो का माहात्म्य और परमात्मा महेश्वर देव-दानवा क माथ अतिदुष्कर और परम घोर रूम मे समास्थित होकर स्थाणु भूत महश्वर सब भूता का सप्लव होता है तब तक रहा करत है। ॥३, ४।। नन्दिक श्वर न कता-पहिले सभ्य म जो परम उत्तम पुराण पुण्य म मयुन देव ने कहा था वही सब मैं अब भगवान् महेश्वर का नम- नमस्कार व रय व हू गा ॥२।। इस अनन्तर परम सन्तुष्ट हुए देव न उमा कप्रिय की कामना स भूमण्डल मे विरूपात को वहा था जहा कि यह रवय सस्थित थे ॥६॥ रद ये अर्धामन पर स्थित--मरु शृङ्ग मे सस्थित यशस्विनी देवी महादव र सामन प्रणत हुई पूछनी है ॥७॥ भगवन् । दवदवदा । चदाई तहरोखर !। धर्म प्रवृहि मत्र्याना भुपि चंयोध्वरेतसाम् ।। जा दत्त दृत चेप्ट तपस्तप्त वृतञ्च यत् । ध्यानाध्ययनराम्प न यथ भवति चाक्षयम् पर जन्मा. महमण या प पूवसावा। पंथ तनावमायाति तामगाचद शपुर 1१० वाराणसी क्षेत्रमाहात्म्य यस्मिन् व्यवस्थितो भवत्या तुष्यसे परमेश्र!। व्रतानि नियमाश्चवआचारो धर्मएवच ।।११ सर्वसिद्धिकर यत्र ह्यक्षय्यगतिदायकम् । वक्त मर्हसि तत्सर्व परं कौतूहल हि मे ॥१२ शृणु देवि ! प्रवक्ष्यामि गुह्याना गह्यमुत्तमम् । सर्वक्षेत्र पु विरवातमविमुक्त प्रिये मम ।।१३ अष्टपष्टि.पुराप्रोक्तास्थानानास्थानमुत्तमम् । यवसाक्षात्स्वयरुद्र कृत्तिवासा स्वयस्थितः ।।१४ है भगवन् ! हे देवदेवेश! हे आये चन्द्र को शिर मे धारण करने वाले । अप कृपया भूमण्डल मे मनुष्यो का और ऊर्व रेताओ का धर्म बतलामो ॥५॥ जाप-दान-हवन-इष्ट-तप और किया हुआ ध्यान- अध्ययन आदि यह सभी किस प्रकार मे अक्षय होता है जो कभी भी क्षीण ही न होवे ? हे शङ्कर देव ! सहस्रो अन्य जन्मो मे पूर्व से ही सश्चित क्यिा हुआ जो पाप है वह किस प्रकार से क्षय को प्राप्त हुआ करता है- यह समी आप मुझको बतलाइये ॥६, १०|| जिसमे विशेष रूप से अव- स्थित होकर भक्नि से आप सन्तुष्ट हुआ करत हैं ह परमेश्वर ! उन वो को-नियमो को-आचार को और घम्म को आप बतलाने के योग्य हैं जिसमे अक्षय गति के देने वाला और जो सम्पूर्ण सिद्धियो के करने वाले हो-यह सभी पाप मुझे परम अनुग्रह करके बतलाइये । मेरे हृदय मे इसके श्रवण करने का बड़ा भारी कोतहल हो रहा है ॥११, १२॥ भग- वान् महेश्वर ने कहा-हे देवि ! आप सुनिये ! मैं गोपनीय स भी अधिक गोपनीय और उत्तम जो भी है उसे अब तुमको बतला दू गा । हे प्रिये ! समस्त क्षेत्रो मे विध्यात अविमुक्त क्षेत्र मेरा अत्यन्त प्रिय होता है ॥१६॥ पहिले अडसठ म्यानो में अत्युत्तम स्थान बतलाये हैं जहा पर कृत्तिका वसन धारण करने वाले माक्षात् स्क्य रुद्र स्थित रहा करते हैं ॥१४॥ यत्र सन्निहितो नित्यमविमुक्ते निरन्तर ती मागविगुग नत माम् ॥१५ धरोपण द्वितिय गगन । ना दाम घटना न पा॥१६ ध्यानमध्ययन दाम भरि पापम् । जापानमा पाप पूर्वाञ्चता अविवापिष्टस्य सत्यं जति क्षयम् । अविनाग्निगा मानो तूलमिवाहितम् ।।१८ वाराणासविधायया शूदा यमग । मिछागपंचान्ये गोणपापयोनय: १६ बीटा दिपोजियाम्चय येचा मृगपक्षिण ! पातेन निधन प्रामा विगुपोशानिये ! ॥१० म.ट्रामोलिन म ललाटाक्षा पध्वजा । शिये ममपुरे देवि ! जायन्तेतन मानयाः ॥२१ जिस अविमुनत म निरन्तर नित्य ही में निहित रहा वरता हू और मेरे द्वारा वह मात्र कभी भी मुश्त नही दिया जाता है इमोनिये दह वाविमुक्त-इस नाम म वहा गया है ॥१॥ उस अविमुक्त स्थान में सर्वा. सम परा सिदि होती है और उस अविमुक्त में परागति हुआ करती है । जाप-दान-हुत-चेया-तल तपस्या और क्यिा ध्यान-अध्ययन-दानादि यह मी वहां पर अक्षय हा है। सहलो पूर्व मे हुए जन्मो में जो भी कुछ पाप कर्म सञ्चित हो गया है वह भी सब अविमुक्न नामक मेरे परम प्रिय स्थन में प्रवेश करने वाले पुरुष के सभी कुछ तुरन्त ही क्षय को प्राप्त हो जाया करत हैं। वह सब अग्नि में साहित तूल की ही भौति प्रविमुत्रन स्थल को अग्नि से दग्ध हो जाया करता है ।।१६, १७, १८१ ब्राह्मण-शात्रिय-वश्य शूद्र और वर्णसकर- कृमि - म्लच्छ और जो अन्य सवीर्ण पाप योनि वाने है तथा कोर-- पिपीलिका (चीटियाँ) और जो अन्य मृग एन पक्षिगण हैं है प्रिये। वे सब हमा धम्म मामा- वाराणमी क्षेत्रमाहात्म्य १५४ काल से अविमुक्त होत्र में मृत्यु को प्राप्त होते हैं उनके विषय मे श्रवण करलो। हे देवि! वे समी चन्द्राय मौलि वाले-मध्य बोर लल द में नेत्र वाले होकर मेरे शिवपुर में मानव होकर जन्म प्रण किया करते हैं ||१६,२०,२१॥ अकामो वा सकामोवापितियंगतोऽपि वा। अविमुक्तेत्यजन्प्राणान्ममलोकेमहीयते ॥२ अविमुक्त यदागच्छेनुकदाचित्कालपर्ययात् । अश्मनाचरणो बद्ध्वा तत्रैवनिधन ब्रजेन् ।।२३ नविमुक्त गतोदेदि ! ननिर्ग-छेत्तत, पुन. । सोऽपिमत्पदमाप्नोति नानकार्याविचारणा ॥२४ वस्त्रप्रद रुद्रकोर्टि सिद्धेश्वरमहालयम् । गोकर्ण रुद्रकर्णञ्च मुवर्णाक्ष तथैव च ॥२५ अमरच्च महाकाल तथा कायावरोहणम् । एतानि हि पविनाणि सानियात् सन्ध्ययोद्वंयोः ।।२६ कालिञ्जरवनञ्चैव शकु वर्ण स्थलेश्वरम् । एतानि च पवित्राणि मान्निध्याद्धि ममप्रिये ॥ अविमुक्ते वगरोहे ! त्रिमन्य नान सशयः॥२७॥ हरिश्चन्द्र पर गुह्यं गुह्यमाम्रात्तवेश्वरम् । जलेश्वर पर गुह्य गुह्य श्रीपर्वत तथा ॥२८ बिना कामना वाला हो अथवा सकाम हो बयवा तियंग योनि में रहने वाला हो कोई भी वैसा ही हो अविमुक्त क्षेत्र में प्राणों का त्याग करना हुप्रा फिर मेरे ही लोक में जाकर प्रतिष्ठिन हा करता है। किसी भी समय में काल के पर्यय से अब भी उस अदिमुक्त में चला जवे तो पापाग में मरने चरणो को वारकर वहीं पर निधन को प्राप्त हो जाना चाहिए अर्याच वहा पहुंच कर फिर उस क्षेत्र को किसी भी वरह से मृत्यु वक नहीं छोड़ना चाहिौ ।।२२, २३॥ को कोई भी क्सिी मी तरह से -- १६० मत्स्यपुराम य स्थल भी दोनो यदि मेरे परम प्रिय अविमुक्त क्षेत्र मे एक बार प्राप्त हो जाये तो फिर उसमे कभी भी निकन कर नहीं जाना चाहिये । वह पुरुष भी मेरे पद को प्राप्त हो जाया करता है - इसमे कुछ भी विचार करने को आवश्याता नहीं है ॥२४॥ वस्त्रप्रदरद कोटि -सिद्धेश्वर महालय-गोकर्ण- रहाण - सुपर्णाक्ष-अमर- महाकाल-वायावरोहण सन्ध्यामी के सान्निध्य होन स परम पवित स्थल हैं ॥ ५॥ कालिजर वन-शपुवर्ण-स्थलश्वर प स्पल भी पवित्र है हे प्रिये ! मेरे सान्निध्य होने व कारण मे ही ये पवित्र हात हैं। हे वरारोह । अविमुक्त मे तिस- है-इमम कुछ भी सशप नही है ।।२६, २७॥ हरिश्चाद्र परम गुह है थोर आपातकार भी गापनीर है । अवशर गुप है तथा थोपवत भी मी नि गुहा स्पर है ॥२॥ महालय तथा गुए वृमिघण्टेश्वर गुभम् । गुर तिगृद्य पदार महाभयमेव च ॥२६ जातातिधानानिमानिध्यादि ममप्रिये !। विमायरामा बिमध्यनाय समय ।।३. पनि भान यन्तपिपुगोवे गुयते ! । मियतम्य पादपुरिस्थन्निहिताम्यि ॥१ प्रधानरापयादिभ्यामयिमपास्यशोमो। सन्दामाहापाजामावितात्मनाम् ।।११ ।
मत्स्यपुराण
इस सबका विस्तार पूर्वक वर्णन करने को आप कृपा कीजिए॥३॥ श्री
मूतजी ने कहा- यह ही प्रश्न इसी तरह से महा-मा पाण्डव ने महामुनि
मार्कण्डेय से पूछा था जिसमें नर्मदा का माहात्म्य भी था । मार्कण्डेय महा-
मुनि परम उग्र तप मे युक्त थे उनसे वन में ही निवास करने वाले धीमान
घमं पुत्र ने पहिली इस महा माषा को पूजा पा ॥४॥ युधिष्ठिर ने
पहा- दिनो मे परम उतम ! आपके ही प्रसाद से मैंने अनेक प्रकार
रेघम्मो का धवण दिया था। हे सुदन ! अब
पुनः उनको ही माना
पाहता हूँ सो पार मेरे सामने उन्हे पाहिए ।।६।। यह महान पुण्यो वाली
नदी सर्वत्र सम प्रस्ट हुई है ? तथा इममा नर्मदा-यह नाम भी किस
भगार में हे महामुने ! विरयात हुआ है - इसे ही आप सर्व प्रथम मुझे
बतुपाने
नमदा सरिता थप्टा सघपापप्रणासिनी।
सारयेत राव नतानि स्थायर्माण चराणि च 115
गमंदापारतु माहारम्य पुराणे यःमया धुतम् ।
सदनद्धि महाराज ! सतमय यथयामि ते ॥
या वनारे गहा पुरक्षेत्र गरम्यतो।
cावा यदि वारा या सयम नममा १०
निगारवा सीप मप्ताहे। तु मागुनम्
गर पुनाति पायदानादेव नागदम् ।।1
वनिमी परमाईगरप।
पुरी पनि गोरगती मारमा १२
गदेवागुग्गा पायाप पोधगा ।
मातका माग गरिय परमासा ॥१३
नावानरागनियमादी मिनिमः।
iral पारसार 111
मत्स्यपुरण १६४ पष्टिवषसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते । अप्सरोगणसकीणे सिद्धचारण सेविते ॥२० दिव्यगन्धानुलिप्तश्च दि यालङ्कार भूपित । तत स्वर्गात्परिभ्रष्टो जायते विपुले कुले ॥२१ जलेश्वर मे मनुष्य स्नान करके दिधि पूर्वर पिण्डदान करके पितृगण भूतो के सवल पय्यन्त सतृप्त रहा करते हैं ।।१५। पति के पारो ओर रुद्र कोटि प्रतिष्ठित है वहां पर स्नान करके जो कोई गध माल्यो और अनुलेपनो से अभ्यचन किया करता है उससे रुद्र कोटि शर्म परम प्रसन्न होते हैं- इसमे कुछ भी स शय नहीं है। पवत के अत मे पश्चिम मे स्वय महेश्वर देव समवस्थित रहा करते है ।।१६11१७॥ वहा पर स्नान करके और परम शुचि होकर ब्रह्मचय से रहने वाले जितेद्रिय पुरुष को इन्द्रियो को नियत रखते हुए -विधि पूर्वक पितृ काय्य करना चाहिए ।। १८ । वहीं पर तिलोदर के द्वरा पितृ देवताओ का तपण परना चाहिये । हे पाण्डव | उप्स के सात कुल तक स्वग मे आन द पूर्ण निवास किया करते हैं ।।। अप्सराओ के गणो से सेवित एवं सकीण तथा सिद्धा एच चारणा स रिपेधित स्वग लो। म यह साठ हजार वर्ष पय्य त प्रति रिटन रहा तरता है ।।२०।। दिध्य ग.धो से अनुलिप्त एवम् दिव्य आमरणो स विभूषित घह स्वर्गीय सुख भोग फरये जब वहां से परिभ्रष्ट होता है तो इस भूमण्ड में विसी बडे श्री सम्पन्न कुल में जन्म पण लिया करता है ॥१॥ धनवान् दानशीलश् च घामिवरचंय जायते । पुन स्मरति तत्तोपं गमन तय रोचते ॥२२ पुनानि तारयेत् सप्त रद्रलोप रा गच्छति । योजनाना शत साग्र श्रयते सरिदुत्तमा ॥२३ विस्तारेण तु राजेन्द्र । योजनद्वपमायता। पष्टितीपराहयाणि पप्टिमोटघरतर्थव च ॥ २४
नमंदामाहात्म्य
१६५
सर्व तम्य ममन्तातु निप्टन मरकण्टके।
ब्रह्मचारी शुचिभूखा जिनक्रोयो जितेन्द्रियः ।।२५
महिंझानिवृत्तम्नु सवभूतहिते रत ।
ब्रह्मचारी गुचिभूत्वा जितनोधौ परित्यजेत् ॥२६
तम्य पुष्पपल गजन् । मृणुष्वावहितो मम ।
शतवपमहरापास्वर्ग मोदैन पाण्टव ! ७
अप्यगगणसकीर्ण विद्धचारणमेविते।
दिव्यगन्धानुलिप्तरच दिव्यपुप्पापशोभितः॥२
क्रीडते देवलोम्यो ददन सह मोदते ।
तन म्वन्धरिम्रप्टो राजा भवति वीर्यवान् ॥२६
वह रहा पृथ्वी नल में समुत्पन्न होकर दहुन सटा धनी-दान
वरन क स्वभाव दाला और धाम्मिक हुआ करता है। वह फिर उमीतार्थ
का स्मरण करता है और वहा पर गमन करता से अच्छा लगता है।
वह अपन सात कुतो को तार दिया करता है और वह न्द्र लोक में चला
जाता है । यह उनम मरिन् हेट मौ योजनों के दिम्नार दानी मुनी जाती
हाह गजेन्द्र । यह दो योजन दिनार स आयत है । माड
सहस्र ताय तया साठ वराड तीथ उसके चारो और अमर अष्टक में
स्थिन हैं । जो वो ब्रह्मचय पालन करने वाला-परम शुद्धि-द्रोध को
जीतने वाला और इन्द्रियों को वश म रखने वाला होरर सभी प्रकार को
F'मा मे निवृत्त-समम्न प्राणों के हित म रति रखने वाला मगदान
शब म ही समाचरण करत हुए जान प्रापा का परित्याग किया करता है
ह राजन् ! उमर होन दाल पुष्यों के मन को तुम परम सावधान होकर
श्रवा करो।ह पाण्डव । वह पुरुष सो सहन वप तक स्वर्ग में आनन्दित
जोवन यापन किया करता है ॥२४,२५,२६, २७॥ अमराओ क गणों
म समान मिद और चारणा के द्वारा दिनु स्वग मदिन्यगन्न म
अनुषप्त एव ।दर पुन उपजामिन हा दृशा देव ला म थिन
है ॥२२,
मत्स्यपुराण होकर देवगणो के साथ क्रीडा और प्रानन्द किया करता है फिर उस स्वर्ग से जब परिभ्रष्ट होता है तो परम बल-वीयं वाला राजा होता है । १२८, २६॥ गृहन्तु लभते स व नानारत्नविभपितम् । स्तम्भर्मणिमर्यदिव्यैर्वज्रवेदूर्यभूषितेः ॥३० आलेख्यसहितं दिव्यं दासीदाससमन्वितम् । मत्तमातङ्गमब्दश्च हयाना हेपितेन च ॥३१ क्ष भ्यते तस्य तवारं इन्द्रस्य भवनं यथा । राजराजेश्वरः श्रीमान् सर्वस्त्रीजनवल्लभः ॥२ तस्मिन् गृहे वसित्वा तु कोड़ाभोगसमन्विते । जीवेद्वषशत साग्न सवरोगविवजितः ॥३३ एव भोगो भवेत्तस्य यो मृतोऽमरकण्टके । अग्नी विषजले वापि तथा चैव ह्यनाशके ॥३४ अनिवर्तिकागतिस्तम्य पवनस्याम्बरे यथा । पतन कुरुते यस्तु अमरेशे नराधिप ! ॥:५ लम को यहां पर गृह भो अनेक रत्नो से समलकृत-हीरा और चंदूय मणियो से परिपूर्ण, दिव्य स्तम्भो से समन्वित-आलेख्यो से चित्रित- दास और दासियो से सयुत था। प्रमत्त हाथियों के विचाडो से तथा अश्वो को हिनहिनाटो से उसके गृह का द्वार इन्द्र के भवन को भांति शुब्ध रहा बरता था। उम घर मे श्री सम्पन्न सब स्त्री जनो का वल्लभ वह राज राजेश्वर निगस किया करता है जा पूर्ण क्रीड़ा और भोगो से युक्त था। वहा पर सभी प्रकार के रोगो से रहित होकर वह डेढ सौ वर्ष तक जीवित रहता है। जो पोई पुरुप उस अमर व ण्टक में मृ यु को प्राप्त होता है सगे मी प्रकार के भोगो उपभोग करने का अवसर प्राप्त होता है। जो अग्नि में-पिपजस में तग अनाक में है नराधिप ! अमरेश में पनन विया करता है उसकी अम्बर में पवन को गति अनिव- सतिगत मा करती है ॥३०,३३, ३२, ३३, ३४, ३२॥
नर्मदामाहात्म्य
१६७
कन्याना त्रिसहस्राणि एकस्यापि चापरे ।
तिष्ठन्ति भुवने तस्य प्रेपण प्राथयन्ति च ॥३६
दिव्यभोगः सुसम्पन्नः क्रीडते कालमक्षयम् ।
पर्वतम्य समन्तात्तु रुद्रकोटिः प्रतिष्ठिताः ॥३७
स्नान य. कुरुते तन गन्धमाल्यानुलेपनैः।
प्रीतःसोऽस्य भवेत् सर्वो रुद्रकोटिनसशय. ॥३८
पश्चिमे पर्वतस्यान्ते ह्यय देवो महेश्वरः ।
तत्र स्नात्वा शुचिभूत्वा ब्रह्मचारोजितेन्द्रिय. !!३६
पितृकार्यञ्च कुर्वीत विधिवन्नियतेन्द्रियः।
तिलोदकेन विधिवत्तपयेत् पितृदेवताः ॥४०
आसप्तम कुलन्तस्य स्वर्गे मोदेत पाण्डव!।
पष्टिवर्पसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते ॥४१
दिव्यगन्धानुलिप्तश्च दिव्यालङ्कारभूपितः।
तत. स्वगत्पिरिभ्रप्टो जायते विपुले कुले ।।४२
तीन सहन कन्याएँ और एक-एक को दूसरे उसके भुवन में स्थित
रहनी हैं एक प्रेषण को प्रार्थनाऐ किया करती है। इस प्रकार से परम
दिय भागो से सुमम्मन्न होकर वह अक्षय काल पयन्त क्रीडा करता है ।
उस पवन के चारो ओर रुद्र कोटि प्रतिष्ठित हैं। जो पुरुष वहा पर स्नान
किया करता है और दिव्य गन्धो के अनुलपनो से सयुत हाता है उस पर
वह सम्पूर्ण रुद्र कोटि परम प्रसन्न होता है-इसमे तनिक भी संशय नहीं
है ॥३६, ३७, ३८॥ इस पर्वत के पश्चिमीय अन्त भाग में यह महेश्वर
देव स्वय विराजमान हैं । वहा पर स्नान करके और शुचि होकर--
ब्रह्मचारी एव इन्द्रिय जीत रहकर जो नियत इन्द्रियो वाला अपन पितृगण
के अभ्यर्चन-तर्पण आदि का विधि के साथ कार्य किया करता है और
विला के सहित उदक से विधि पूर्वक पित देवताओ का तर्पण करता है
है पाण्डव | उमा सान कुला तक के सब लाम स्वर्ग का आनन्द निवास
मत्स्यपुराण
प्राप्त करते हैं और साठ हजार वर्ष तक वे नल और स्वयं वह स्वर्ग लोक
में प्रतिष्ठित पद पर समास्ढ रहता है फिर स्वर्गीय सुखोपभोग की अवधि
समाप्त होने पर वहा से परिभ्रष्ट होकर दिव्यगन्ध से समनुलिप्त तथा
परम दिव्य आभूषणो से परिष्कृत होकर यहाँ किसी बहुत बड़े कुल में
समुत्पन्न हुआ करता है ॥३६, ४०, ४१, ४२॥
धनशन दानशीलश्च धार्मिकश्चंव जायते ।
पुनः स्मरति तीर्थार्थ गमन तन्त्र रोचते ॥४३
तारयेत्तु कुलान् सप्त रुद्रलोकं स गच्छति ।
योजनानां शतं सानभूयते सरिदुत्तमा ।.४४
विरुनारेण तु राजेन्द्र ! योजनद्वयमायता ।
पष्टितीर्थसहस्राणि पष्टिकोटय स्तथैव च ॥४५
पवंतस्य समन्तात्तु तिष्ठत्यमरकण्ट के ।
ब्रह्मचारी शुचिर्भूत्वा जितत्रोधो जितेन्द्रियः ।।४६
सर्वहिंसानिवृत्तस्तु सर्वभूतहिते रतः ।
एवं शवंसमाचारो यस्तु प्राणान् परित्यजेत् ।।४७
तस्य पुण्यफलं राजन् । शृणप्वावहितो मम ।
शत वर्षसहस्राणां स्वर्गमोदेतपाण्डव ! ॥४८
पृथि यामासमुद्रायामीहशो नव जायते ।
यादृशोऽयं नृपथं प्ठ ! पर्वतेऽमर ण्ट के ।।४६
वह यहा पर उत्पन्न होकर बहुत बड़ा धनी-दाता धाम्मिक होता
है और फिर भी वह सो तोपं का स्मरण किया करता है तथा वही पर
गमन करने की जमको रांच रहती है ! वह अपने सात कुलोको तार दिया
करना है और अन्त में रद मोकको चला जाना है। यह उत्तम गरिता
सो और पचास योजना में मार दामो गुनी जाती ॥४४॥ हे
हिन्द यह यो योजनतिन पायी है। अमर इन्टर में उसके
पारी पोर बनाई मी गपश साठ हजार तपाmx पोर
-
नर्मदामाहात्म्य
बताई जाती है । वहा पर ब्रह्मचारो-शुचि-जितक्रोध-जितेन्द्रिय--
सब प्रकार की हिंसा से निवृत-सबभूतो के हित में रत और शिव मे
समाचरण करने वाला जो अपने प्राणों का त्याग करता है हे राजन् !
उस का जो परम महान् पुष्य-पल हुआ करता उसे अवहित होकर सुन
लो। है पारसुव ! वह पुरुष एक सो सहन वर्ष पर्यन्त स्वर्ग में आनन्द
प्राप्त किया करता है समुद्र पर्यन्त पृथ्वी में इस प्रकार का कोई भी उत्पन्न
नही होता है, हे नृप थेष्ठ । जैसा यह अमरकण्टक पर्वत मे हुआ करता
है ।। ६५, ४६,४७, ४८, ४६॥
तावत्तीथं तु विज्ञेय पर्वतस्य तु पश्चिमे ।
ह्रदो जलेश्वरो नाम त्रिपु लोवेपु विधन ।।५०
तत्र पिण्डप्रदानेन साध्योपामनकमणा ।
पितगे दशवर्षाणि तर्पितास्तु भवन्ति च । ५१
दक्षिणे नमटाकूले कपिलेति महानदी ।
सकलार्जुनसन्छन्ना नातिदूरे व्यवस्थिता ।।५२
सापि पुण्या महाभागा त्रिपु लोपु विश्रता।
तन कोटिशत मान तीर्थाना तु युधिष्टिर ॥२३
पुराणेश्रूयतेगजन् । सर्वकोटिगुण भवेत् ।
तस्यास्तीरेतुये वृक्षा: पतिता कानपययान । ५४
नमंदातोयसस्पृष्टाम्तेऽपियान्तिपराङ्गतम् ।
द्वितीया तु महाभागाविशल्यकरणोगुभा . ५५
नत्र तीर्थ नर स्नात्वा विशल्यो भवति शात् ।
तदेवगणा सर्वे सकिन्नरमहोगा. १५:
यक्षराक्षमग धर्म अपयश्च नपोधनाः।
सर्वे समागतास्त पवतेऽमरकण्टके ॥५७
उस पर्वत के पश्चिम भाग में उस तीर्य को जान लेना चाहिये त्रिम
का जलेश्वर हद है मौर यह तीनों लोकों में बहुत ही विख्यात है ॥१०॥
०७०
मास्यपुराण
वहा पर पिण्डो का प्रदान करने से तथा सन्ध्योपासना के कर्म से पितृ-
गण दशवर्षों तक परम तृप्त रहा करते हैं । नर्मदा नदी के दक्षिण तट पर
कपिला नाम वाली एक महानदी है । वह सम्पूर्ण अर्जुन के वृक्षो स
सच्छन्न रहने वाली है और वह उससे अधिक दूर मे व्यवस्थित नहीं है
अर्थात् बहुत ही समीप मे ही है ।।५१, ५२।। वह नदी भी अति पुषमयी
और महाभागा है तथा लोको मे बहुत प्रसिद्ध भी है । हे युधिष्ठिर । वहा
पर डेढ सौ करोड तीर्थ हैं ॥५३॥ हे राजन् । पुराण मे यह श्रवण किया
जाता है कि सब कोटि गुण वाला होता है । उस के तट पर जो वृक्ष काल
क विपर्यय से पतित हो गये हैं और नर्मदा नदी के जल से जिनका
सस्पर्श हा गया है वे जड भी परमोत्तम गति को प्राप्त किया करते हैं ।
दूसरी एक नदी परम शुभ महाभागा व शल्य करणी है। उस तीर्थ मे
मनुष्य स्नान करके क्षणमात्र में ही विगत शल्य वाना हो जाया करता
है। वहा पर उस अमरकण्टक पवत मे समस्त देवगरण - विन्नर---
महोर-य- राक्षरा-गन्धर्व और तप के ही धन घाले ऋषि वृन्द
समागत होते हैं ।।५४, ५५, ५६, ५७|!
तैश्च सर्व समागम्य मुनिभिश्च तपोधनं ।
नमदामाश्रिता पुण्या विशल्यानाम नामत ॥५८
उसादिता महाभागा मवपापप्रणाशिनी ।
तम स्नात्वा नरा राजन् । ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय ॥५६
सपोप्य रजनीमेरासुलानान्तारयेच्छतग
पिता विशल्या न ध यत राजसत्तम । १६०
ईश्वरण परा प्रात लोकाना हितकाम्यया ।
तर स्नात्वा नरा गजानवमघपल नभेत् ॥६१
अशा पर स्मिस्तीर्थे नराधिप ।
सवपरिशुद्धामा ग्लोरमगन्छति ॥ २
-
नर्मदा माहात्म्य
नर्मदायान्तु राजेन्द्र ! पुराणेयन्मया श्रुतम् ।
यत्र तत्र नर स्नात्वा चाश्वमेधफललभेत् ॥६३
इन सबने जो तपोधन मुनिगण थे वहा पर एकत्रित होकर नर्मदा
नदी का समाप्रय प्राप्त किया था तथा विशल्या नाम वाली पुण्यमयी नदी
को समुतादित किया था। जो महान भाग वाली और सभी प्रकार के
पापो का विनाश करने वाली थी। है राजन् ! उममें मनुष्य म्नान करके
जितेन्द्रिय तथा ब्रह्मचारी रहकर एक रात्रि में वहा पर निवास करता है
तो वह अपने सौ कुलों का उद्धार कर दिया करता है। हे राजाओ में
परम श्रेष्ठ ! कपिला और विशल्या इनके विषय में मुना जाता है कि
प्राचीन काल में ईश्वर ने लोगो क हित की कामना से ही इनको पता
या । है राजन् ! वहा पर स्नान इये ममुर अश्वमा यस पृर फल
को प्राप्त क्यिा करना है ।।५८॥५६॥६०६१।६-६३||
ये वसन्त्युत्तरे कूले म्द्रलोके वनि ते।
मरस्त्याश्च गङ्गाया नर्मदाया युधिष्टिर ! ॥६१
सम स्नान च दानञ्च यथा मे शङ्करोगबोन् ।
परित्यजतियः प्राणान् पर्वतेऽमरकण्टके ।।५
वपकोटिशत मान रद्रलोके महीयने ।
नर्मदाय। जल पुण्य केनोमिमिग्लान् । ६६
पविन शिग्सा वन्ध सबपाप प्रमुच्यते।
नर्मदा पवन पृण्या ब्रह्महत्यापहारिणी।
अहोगबोपवामेन मु यते ब्रह्महत्यया ।
एव रम्या च पुण्या नमदा पाण्डुनन्दन १६८
त्रयाणामपि लोकाना पुण्या ह्य पा महानदी ,
वटेग्यो महापण्ये गङ्गाद्वारे तपोवन । ६६
एतेषु मवम्यानपु द्विजाः स्यु मणितरना ।
शुत दशगण प ण्य नमंदोदधिमङ्गमे 10
-
मा यपुगण जो लोग इसके उत्तर दिशा वाले तट पर निवास किया करते हैं वे अन्त मे जाकर रुद्रलोक मे वास पाते है । हे युधिष्ठिर ! सरस्वती मे- गङ्गा मे और नर्मदा मे स्नान और दान सम होता है जैसा कि भगवान् शङ्कर ने मुझे बतलाया था। जो अमरकण्टक पर्वत में अपने प्राणो का परि स्याग किया करता है वह डेढ़ सौ करोड वर्ष पय्यंन्त रुद्रलोक मे प्रतिष्ठित होता है । नर्मदा महानदी का जल परम पुण्यमय है और केनकी उमियो से समलकृत है । यह परम पवित्र है तथा शिर से वन्दना करने के योग्य है इसके जल का स्पर्श करके ही मनुष्य सब पापो से छुटकारा पा जाया करता है । नर्मदा पर्वतपुण्या है और ब्रह्महत्या के महा पातक का हरण करने वाली है । एक महोरात्र वहां पर स्थित रहकर उपवास करने से ब्रह्म हत्या से छुटकारा हो जाया करता है। हे पाण्डु नन्दन ! इस प्रकार से यह नमंदा रभ्य और पुण्य शालिनी महान दी है ॥६५॥६५॥६६॥६७।। ॥६॥ यह तीनो लोको मे परम पुण्य शालिनी महानदी है जो वरेश्वर मे-महापुण्य मय गङ्गा द्वार में और तपोवन मे इन स्थानों में जिगरण मपित व्रतो वाले होत हैं उनके उस पुण्य से दश गुना नर्मदा और उनधि के सङ्गम में सुना गया है ।।६६, ७०॥ अधिन पुण्य ७६-नर्मदा मे सम्बन्धित अन्य तीर्थों का माहात्म्य ततो गन्ठेत जिद्रपद शेखर मुत्तमम् । दामासस्य देवम्य मु-यते सयपातयं.१ तनो गन्च गजेन्द्र । नगदेश्वर मुत्तमम् । सम ग्नान्या नरो राजा । स्वगलांवेगहीयते ।।२ धरतीपंतनी गन्तग्न न गमाचरेत् । गमगा दमानीययभागवान नायगरः॥
नर्मदा से सम्बन्धित अन्य तीर्थो का माहात्म्य
पितामह ततो गन्छेत् ब्रह्मणा निर्मित प रा ।
तर स्नात्वा नरो भक्तया पितृपिण्डन्तु दापयेत् ॥४
तिलदविमिश्रन्तु ह्य दक तन दापयेत् ।
तस्य तीर्थप्रभावेण सर्व भवति चाक्षयम् १५
सावित्रीतीर्थमासाद्य यस्तु स्नान समाचरेत् ।
विधूय सवपापानि ब्रह्मलोके महीयते । ६
मनोहर ततो गच्छेत् तीथ' परमशोभनम् ।
तत्र स्नात्वा नरो राजन् । पितृलोकेमहीयते ॥७
मामुनि माकण्डेय जी ने कहा- हे राजेन्द्र । इसके अनन्तर
उत्तम अकुशेखर पर जाना चाहिए । वहाँ पर उन देव के दर्शन स ही
मनुष्य सब प्रकार के पापो से मुक्त हो जाया करता है ।।१॥ इसके
उपरान्त फिर हे राजेद्र । उत्तम नर्मदश्वर तार्थ म गमन करे । ह
राजन् । वहां पर स्नान करके मनुष्य स्वगलोक में एक परम प्रतिष्ठित
पद पर सम रूढ हुप्रा करता है ।। • ॥ फिर अश्वतीय को गमन करना
चाहिय और वहां पर पहुँच कर स्नान करे । इसका ऐसा फल होता है
कि वह मनुष्य परम सुभग दर्शनीय और भोगो के करन वाला हुमा करना
है। इसके पीछे पितामह नाम वाले तीर्थ पर जावे जिसको पहिल
ब्रह्माजी न निमित किया था। वहाँ पर मनुष्य का स्नान करके भक्ति-
भाव से पितृगणो का पिण्डदान करना चाहिए ।। ३ । ४ ॥ तिला और
डामो से मिश्रित जल भी तर्पण के लिय पितृगणरे को देवे । उस तीर्थ
का ऐसा अद्भुन प्रभाव है कि वहां पर किया सभी अक्षय हो जाया
करता है ।। ५ ।। सावित्री तीर्थ पर पहुँच कर जो भी व्यक्ति उसम
स्नान किया करता है वह अपने समस्त पापो को विधूनिन करके अन्त म
ब्रह्म लोक मे प्रतिष्टिन हाता है। फिर मनोहर नामक ती पर गमन
बरे जो कि एक परम शोभन तीर्थ है । हे राजन् । उस - म स्नान
करन वाला मानव द्रनो म प्रतिष्ठित होता है ॥६॥७॥
मरस्यपुरा
१७४
ततो गच्छेत्तु राजेद्र | मानस तीथमुत्तमम् ।
तन स्नात्वानरा गजन् । रुद्रलो महीयते ।।
ततो गच्छे च राजेन्द्र । कुञ्जतीथमनुत्तमम् ।
विरयात त्रिषु लोकेषु सवपापप्रणाशनम् ।।६
यान्यान्कामयतेकामान् पशुपुनधनानिच ।
प्राप्नुयात्तानिसर्वाणि तत्र स्नात्वानराधिप ।।१०
ततो गच्छेत्त, राजेद्र ! त्रिदशज्योतिविश्रुतम् ।
यत्र ता ऋषिक यास्तु तपाजण त सुव्रता । ११
भर्ता भवतु सर्वासामोश्वर प्रभुरव्यय ।
प्रीतस्तासा महादेवो दण्डरूपधरो हर ॥१२
विकृताननीवभत्सुव्रती तीथमुपागत ।
सन क या महाराज ! वरयन् परमेश्वर ॥१३
कन्या ऋपेवरयत 4 यादान प्रदीयताम् ।
तीय तत्र महागज ! पिक येति विश्रतम् ॥१४
इस अन तर हे राजद्र । उत्तम मानस तीय पर गमन करना
पाहिए । ह राजन् ! वहाँ पर स्नान कर मनुष्य द्रलोक मे प्रतिष्ठित
हो जाता है। फिर हे राजद्र । मर्वोत्तम कुजतीथ मे गमन करे जो
सभी लाया म अत्यधिश विख्यात है और सब प्रकार के पापो के विनाश
करन वाला है । उस सीप पर जो-जो भी कामनाओं के प्राप्त करने
की इच्छा करता ह जस पुत्र-पशु और धन मादि उन सभी को प्राप्ति
है नराधिप यहाँ पर स्नान वरस प्राप्त कर लेता है। इसके पधात हे
राबवियाति विश्रत नाम वान तोच पर आना चाहिये जहाँ
पर पे पियारा गुदर तो वानी होर तपश्चर्या करती थी ।।८।
६।१०।११।। उन पापा का यही मनोगादि हम रावका भर्ता
बपिनानी प्रभु ईयर होय । उनी तपस्या दहा धारण पने
बार १९ मा व परम प्रम न हो गए 4। यह सर विर मुघ पास
नर्मदा से सम्बन्धित अन्य तीयों का माहात्म्य १७५ - वोमनु ब्रती उम तीर्घ पर यमागत हुए थे। वहां पर है महाराज परमेश्वर ने उन कन्याओ का वरण किया था। कन्या का वरण करने को ऋपियो ने कन्यादान दो। हे महाराज पि कन्या इम नाम वाला एक प्रसिद्ध तीर्थ या ॥१:-१४॥ तत्र स्नात्वा नरो राजन् । सर्वपाप: प्रमुच्यते । ततो गच्छेन्च राजेन्द्र ! स्वर्णनिन्दुर्वाित स्मृतम् ॥१५ तत्र स्नाता नरो राजन् ! दुति न च पश्यति । अप्सरेश ततो गच्छेत् स्नान तत्र समाचरेत् ॥१६ भीडते नागलोकम्यो एप्सर सह मोदते । ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र नरक तार्थमुत्तमम् ॥१५ तत्र स्नात्याचयेदेव नरक च न पश्यति । भारभूति तता गच्छेदुश्वासपरो जन. ॥१८ एतत्तीथ समासाद्य चावतार तु शाम्भवम् । अचयित्वा विस्पाक्ष रुद्रलोक महीयते ।।१६ अस्मिस्तोणे नर स्नात्वाभारभूतो महात्मन । यत्र तत्र मृतस्यापि घ्र वगाणेश्वरीगतिः ।। कतिकस्य तु मासस्य हाचयित्वा महेश्वरम् । अश्वमेघादशगुण प्रवदन्ति मनीपिण. ॥२१ है राजद ! उम तीर्थ में मनुष्य स्नान करके सभी पापो से प्रमुक्त हो जाता है । है राजेन्द्र | इसके पश्चात् स्वर्ण विन्दु इस नाम स विश्रत तीय' में जाना चाहिये ।। १५ ।। हे राजन् । उस तीर्य मे स्नान करके मनुष्य दुर्गति को कभी भी नहीं देखता है। इसके अनन्तर बस- देश नामक तीर्थ पर गमन करे और वहां पर स्नान कर समाचरण करना चाहिए ॥ १६ ॥ इस तीर्थ के स्नान का यह फल होता है कि वह नागलोक में समस्थित होकर अप्सराओ के साथ आनन्दानुभव किया करता है। ह राजेन्द्र । फिर वहाँ में नरक नामक उत्तम तीर्थ मे गमन
मत्स्यपुराण
करे। उस तीर्थ मे स्न न करके देव वा अम्यचन करे तो वह मनुष्य
कभी भी नरक को नहीं देखता है । इसके अन'तर भारभूति नाम वाले
सीध पर जावे और उपवास मे परायण होवे ।। १७ । १८ ।। फिर इसक
उपरान्त ऋचावतार शाम्भव तीर्थ का समासादन करे तथा वहाँ पर
भगवान् विष्णु का अचन करने से वह मनुष्य रुटलोक मे प्रातष्ठित होता
है ॥ १६ ॥ इस तीर्य मे जिसका नाम भारभूति है स्नान करके जहाँ तहाँ
मृत हुए महात्मा की भी निश्चय ही गणेश्वरी (गणेश सम्बधिनी ) गति
हुआ करती है। कार्तिक मास म महेश्वर का समचन करके अश्वमेध यज्ञ
के पुण्य से दशगुना फल प्राप्त हुआ करता है-ऐसा महामनीषी लोग कहा
परते हैं ।।२०।२१।।
दीपकाना शत तन घृतपूणन्तु दापयेत ।
विमान सूय्यमङ्काशवजत यत्र शङ्कर ॥२२
वृषभ य प्रसन्छेत्त, शरदकुन्देन्दुसप्रभम् ।
वृशयुक्त न यानेन रुद्रलोक स गछति ॥२३
धेनुमेवान्तु यो दद्यात्तस्मिम्तोणे नराधिप ।।
पायस मधुसयुक्त भक्ष्याणिविविधानि च ॥२४
यथाशक्त्याच गजेन्द्र । ग्राह्मणान् भोजयत्तत ।
तस्य तीर्थ प्रभावणसर्व वोटिगुणभवेत् ॥२५
नम्मदाया जल पीत्वा ह्यचयित्वा वृपध्वजम् ।
दुगतिश्चनपश्यतितस्मिस्तीर्थेनराधिप । ॥२६
हमयुक्त न यान स्नोष स गच्छति ।
याव- चन्द्रश्च मूयश्च हिमवारच महोदधि ॥२५
मनाचा सरिता यायत्तावत् स्वर्गेमहीयते ।
बनाना तुय बुर्यातस्मिरतीर्थेराधिप ॥२८
गन्याय तु ।द्र ! न पुनर्जाया पुमान् ।
सतागोत. रारद । आषाढीतीमुत्तमम् ॥२६
नर्मदा से सम्बन्धित अन्य तीयों का माहात्म्य तल स्नात्वा नरो राजनिन्द्रस्यासिन लभेत। स्त्रियास्तोर्थ ततो गच्न मर्वपापप्रणाशनम् ॥३० वहाँ पर एक सौ दीपा का घृत म पूर्ण करक प्रज्वलित करे और उनका दान करे। वह पुरप जहाँ भगवान् शदूर होते हैं मय्यं के सदृश विमानों के द्वारा गमन विया करता है जो आदमो, शख- कुन्द और इन्दु के समान प्रमा से सम्पन्न वहां पर वृपा का दान दिया करता है वह वृप से समन्वित धान के द्वारा हलो मैं गमन किया करता है ॥ २३॥ हे नराधिप । उम तीर्थ म जो कोई एक धेनु का दान किया करता है-~मधु से सयुक्त पायस और अनेक प्रकार क मक्ष्यों को यया शक्ति है राजेन्द्र । ब्राह्मणो क लिय भोजन बगता है । उस तीपं के प्रभाव से यह सभी करोड गुना फल वाला होता है ॥ २४॥२५॥ है नराधिप । नर्मदा के जल का पान ररके और वृपध्वज का अभ्यर्चन करके उस तीयं म जाने वाला मनुष्य कभी भी अपनो दुर्गति को नही देखना है । वह मनुष्य हस स युक्त यान के द्वारा सीधा रदलोक को चला जब तक चन्द्र-सूर्य-हिमवान् -महोदधि और गङ्गा आदि सरिताएँ संसार में स्थित है तब ता वह स्वगलोर में प्रतिष्टा प्राप्त किया करता है। ह राजेन्द्र ] गर्भक बास का फिर कभी भी प्राप्त नहीं किया करता है । इसके अनन्तर है राजेद्र ! बाम आपाढी तीर्थ में गमन करना चाहिए । हे राजन् ! उस तीय में स्नान करके मनुष्य इन्द्र के आधे आरान पर अपनी सस्मिति प्राप्त किया करता है । इसक पीछे स्त्री के तीर्थ मै गमन करे जो सब प्रकार के पापो का नाश करने वाला है ॥२६-३०}} ततापि स्नातनामस्य ध्रुव गाणेश्वरी गति । ऐरण्डोनम्मंदयोश्च सङ्गम लोकविश्रु तम् ॥३१ तच्च तो महापुण्य सर्वपापप्रणाशनम् । उपवासपरो भूत्वा नित्यत्रतपरायण. ॥३२ जाता है।
नर्मदा से सम्बन्धित अन्य तीयों का माहात्म्य १७६ एतत्तीर्थप्रभावेण मुच्यते ब्रह्महत्यया । सर्वतीर्थाभिषेकन्तु य पश्येत् सागरेश्वरम् ॥४१ योजनाभ्यन्तरे तिष्ठन्नावर्ते सस्थित. शिव. । ते दृष्ट्वा सर्वतीर्थानि दृष्टान्येव न सशयः ॥४२ पश्चिमोदाद्य की सन्धि मे स्वर्गद्वार विघटन है। वहाँ पर देव- गण-गन्धर्व ऋषिवृन्द-सिद्ध और चारण ये सव तीनो सन्ध्याओ मे विमलेश्वर देवेश की समाराधना किया करते हैं। हे राजन् । वहाँ पर मनुष्य स्नान करके रुद्रलोक मे प्रतिष्ठा प्राप्त किया करता है। यह विम- लेश परम प्रमुख तीर्थ है जो न हुआ और न हो । यहाँ पर उपवास करके जो भगवान् विमलेश्वर का दर्शन किया करते हैं वे सब अपने पहिले जन्मो में सात जन्मो के किये हुए पापो से मुक्त होकर सीधे अन्त समय अमरालय को चले जाया करते हैं। इसके पीछे है राजेन्द्र | उत्तम कोशिकी तीर्घ मे गमन करे ॥३६॥ ३७॥ ३८ ! ३६॥ हे राजन् ! वहाँ पर स्नान करके उपवासों मे पररायण होवे और एक रात्रि मे वहां निवास करके नियत अगन वाला तथा नियत जो रहता है वह इस तीर्थ के प्रभाव से ब्रह्म हत्या से मुक्त हो जाया करता है । जो मनुष्य सर्व तीर्थों के अभिषेक सागरेश्वर का दर्शन किया करता है। योजन के अभ्यन्तर मे आवत्त में प्रभु शिव स्थित रहते हुए वहाँ पर समस्थित रहते हैं। उसका केवल एक ही तीर्थ का दर्शन करके उस दर्शक ने सभी तीर्थों को देखा हुआ ही समझ लेना चाहिये अर्थात उसने अन्य सभी का दर्शन कर लिया है-इसमे कुछ भी संशय नहीं है ।।४०-४०11 सर्वपापविनिर्मुक्तो यत्र रुद्रः स गच्छति । नर्मदासङ्गम गवद्यावश्चामरकण्टकम् ॥४३ क्षत्रान्तरे महाराज! तीर्थकोटयो दशस्मृताः । तीर्थात्तीर्थान्तर यवपिकोटिनिषेवितम् ॥४५
मत्स्यपुरण
१७८
तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र ! मुच्यते ब्रह्महत्यया ।
ततो गच्छेच्च राजेन्द्र ! नम्मदोदधिसङ्गमम् ॥३३
जामदग्न्यमिति ख्यात सिद्धोयत्र जनादन ।
यत्रष्ट्वा वहुभिर्यज्ञरिन्द्रो देवाधिपोऽभवत ॥३४
तन स्नात्वा तु राजेन्द्र । नम्मदादधिसङ्गमे ।
निगुण च'श्वमेधस्य फलप्राप्नोतिमानव ॥३५
वहाँ पर भी केवल स्नान भर कर लेने वाले की निश्चय ही
गाणेश्वरी गति हुआ करती है । ऐण्डी और नम्मदा इन दोनो सरिताप्रो
का सङ्गम लोक म परम प्रसिद्ध है । वह तीर्थ महान् पुण्य वाला है और
समस्त पापो के नाश करने वाला भी है। वहां पर उपवास मे परायण
होकर तथा नित्य ही व्रतो मे तत्पर होकर वहाँ स्नान कसे हे राजेद्र ।
मनुष्य ब्रह्महत्या से भी मुक्त हो जाया करता है ।
इसके उपरान्त हे
राजेद्र । नर्मदा और उदधि का जहाँ सङ्गम होता है वहा जाना चाहिए ।
वहाँ जाने वाला मानव अश्वमेघ यज्ञ के पुण्य से तिगुना पुण्य-फल प्राप्त
किया करता है ।। ३१-३५ ।।
पश्चिमस्योदधे सन्धौ स्वगद्वार विघट्टम् ।
तत्र देवा सगन्धर्वा मृषय सिद्धचारणा ॥३६
आराधयन्ति देवेश त्रिसन्ध्य विमलेश्वरम् ।
तन स्नात्वा नरोराजन् । गद्रलोकेमहीयते ॥३७
विमलेश पर तीर्थ न भत न भविष्यति ।
तत्रोपवास कृत्वा ये पश्यन्ति विमलेश्वरम् ।।३८
सप्तजामकृत पाप हित्वा यान्त्यमरालयम् ।
ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र | कौशिकीतीर्थमुत्तमम् ॥३६
तत्र स्नात्वा नरो राजन्नुपवासपरायण ।
उपोप्य रजमोमेका नियतो नियताशन ॥४०
नमदा से सम्बन्धित अन्य तीथों का माहात्म्य गण- एतत्तीर्थप्रभावण मुच्यते ब्रह्महत्यया । सवतीर्थाभिपेक्तु य पश्यत् सागरश्वरम् ॥४२ योजनाभ्यन्तरे तिष्ठन्नाव सस्थित शिव । त दृष्ट्वा सर्वतीर्थानि दृष्टान्येव न साय ॥४२ पश्चिमोदाद्य को सन्धि म स्वर्ग द्वार विघटन है। वहाँ पर देव- - गन्धर्व-ऋपिवृन्द-सिद्ध और चारण य सब तोनो सन्ध्याओ म विमलेश्वर देवेश को समाराधना किया करत हैं। हे राजन् । वहाँ पर मनुष्य स्नान करके रुद्रलोक मे प्रतिष्ठा प्राप्त किया करता है । यह विम- लेश परम प्रमुख तोय है जा न हुआ और न हो। वहां पर उपवास करके जो भगवान् विमलेश्वर का दर्शन किया करत हैं वे सब अपन पहिल जन्मों म सात जन्मों के क्यि हुए पापा से मुक्त होकर सीधे अन्त समय अमरालय को चले जाया करत है। इसके पीछे ह राजेन्द्र ! उत्तम कोशिकी तीर्थ म गमन करे ॥ ३६॥ ३७॥ ३८॥ ३६ हे राजन् । वहाँ पर स्नान करक उपवासों में परायण होव और एक रात्रि में वही निवास करक नियत अगन वाला तथा नियत जो रहता है वह इस तीर्थ के प्रभाव से ब्रह्म हत्या से मुक्त हो जाया करता है। मनुष्य सर्व तीर्थों के अभिषेक सागरेश्वर का दशन किया करता है। योजन के अभ्यन्तर म आवर्त म प्रभु शिव स्थित रहते हुए वहाँ पर समवस्थित रहत है। उसका केवल एक ही तीर्थ का दर्शन करके उस दर्शक ने सभी तीर्थों को देखा हुआ ही समय लेना चाहिये अर्थाद उसने अय सभी का दर्शन कर लिया है-इसम कुछ भी संशय नहीं है ॥४०-४० ॥ सवपापविनिमुक्तो यत्र रद्र स गछति । नम्मदासङ्गम यावद्यावश्चामरकण्टकम् ॥४३ क्षत्रान्तरे महाराज । तीथकोटयो दशस्मृता ! तीर्थात्तीर्थान्तर यनपिकाटिनिपेवितम् ।।४५ १८० मन्स्यपुराण साग्निहोत्रस्तु विद्भि सर्वानपरायणे । सेवितानेन राजे द्रा वीप्सिताथप्रदायिया ॥४५ यस्त्विद व पठेन्नित्य शृणुयाद्वापि भारत । तस्य तीर्थानि सर्वाणि ह्यभिषिञ्चन्ति पाण्डव ! ॥४६ नम्मंदा च सदा प्रीता भवेढे नात्र संशय । प्रीतस्तस्य भभेद्रुद्रा माकण्डेयो महामुनि ।।४७ वन्ध्या चैव लभेत् पुत्रान् दुभगा सुभगा भवेत् । पन्या लभेत भर्तार यश्च वान तु यत् फ्लम् ॥१८ तदेव लभते सव नात्र कार्या विचारणा । ब्राह्मणो वेदमाप्ताति क्षत्रिया विजयी भवेत् । ४६ वश्यस्तु लभते लाभ शूद्र प्राप्नोति सद्गतिम् । मूखस्तु लभते विद्या निस ध्य य पठेन्नर ॥ नरपञ्च व एश्येत्तु वियोगञ्च न गछति ॥५०॥ पह पुरुष सभी पापो से छटकारा पाकर वहा पर ही चला जाता है जहां पर साक्षात भगदान रुद्र विराजमान रहा करते हैं और वहा पर यह सब तब रहता है जब तक नमदा का सङ्गम और अमरकण्टक ससार मस्थित । ५३। इसी बीच मे हे महाराज । दश तीथ कोटिया बनाई गई है। तीय स दूसरे तीथ म जहा पर ऋषि कोटि निषेवित है । अग्नि होत्र करने यान-ध्यान मे परायण समस्त विद्वानो के द्वारा सेवित हुए इससे हे राजद्र। यह अभीष्ट अर्थ को प्रदान करने वाली हुआ करती है १४४, ४५॥ है पाण्डव ! जो तीर्थों में य का नित्य ही पाट किया
१८१
भृगु दशज ऋषियो के नाम गोत्र वश प्रवर वर्णन
और जो दुर्भगा होती है वह सुभगा होजाया करती है । जो कन्या होती है
मनोभीप्ट स्वामी की प्राप्ति कर लेती है और जो भी कोई जैसा भी कुछ
पल चाहता है वह उसी समय मे तुरन्त ही सब कुछ पा जाया करता है-
इस विषय मे कुछ भी विचारण (व्यर्या) करन की आवश्यकता ही नहीं
है । जो ब्राह्मण होता है उसको वेद के ज्ञान का लाभ होता है और जो
क्षत्रिय है वह सदा युद्ध मे विजय प्राप्त करने वाला होता है । वैश्य अपन
व्यवसाय मे लाभन्वित होता है तथा शूद्र की सद्गति हो जाया करती है।
जो महामूढ होता है उसे विद्या का लाभ होता है । जो नर इमका तीनो
सध्याओ मे पाठ किया करता है वह कभी भी नरक का दशन नहीं किया
करता है और न कभी किमी से उम का वियोग ही हुआ करता है ।
॥४७, ४८,४६, ५०॥
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७७-भृगुवंशज ऋपियों के नाम गोत्र वंश प्रवर वर्णन
इत्याकर्ण्य स राजेन्द्र ओडारस्याभिवर्णनम् ।
तत. पप्र-छ देवेश मत्स्यस्प जलाणवे ।।१
सपीणा नाम गोत्राणि वशावतरण तथा ।
प्रवगणा तथा साम्यमसाम्य विस्तराद ॥२
महादवेन ऋपय शप्ता स्वायम्भुवान्तरे
तेपा वैवस्वते प्राप्त सम्भव मम कोत्तय १३
दाक्षायणीनच तया प्रजा कीर्तय मे प्रभो।
ऋपीणा च तथा वश भृगुवविवर्धनम् ॥४
मन्वन्तरेऽम्मिन् मप्राप्न पूर्व वैवस्वते तथा ।
चरित्र क्थ्यतेगजनु । ब्रह्मण परमेष्ठिन ॥५
महादेवम्य शापन त्यानवा दह स्वय तथा ।
सृपयरच समुद्भूता युते शुक्र महात्मन ॥६
१८२ मत्स्यपुराण देवाना मातरो दृष्ट्वा देवपल्यस्तथैव च । स्कन्नशुक्र महाराज । ब्रह्मण परमेष्ठिन ॥७ महर्षि श्री सूतजी ने कहा-ह राजेद्र । इस प्रकार से इस मोकार के अभिवणन का श्रवण करके फिर इसके उपरान्त उस मस्य के स्वरूप वाले देवेश्वर से उस जलाणव पूछा गया था। श्री मनुजी ने कहा- हे भगवन् । अब ऋषियो के शुभ नाम तथा गोन-शो का अव तरण एव प्रवरो को समता और असम्यता आप कृपा करके विस्तार के साथ वणन कीजिएगा ।।१, २१ स्वायम्भुव म व तर मे महादेव जी के द्वारा ऋषियो को शाप दे दिया गया था वैवस्वत प्राप्त होने पर उनका भी सम्मद आप मुझ कात्तिन करके श्रवण कराइये 1॥ हे प्रमो | आप मरे सामन दाक्षायणी ( दक्ष प्रजापति मे समुत्प न ) जो प्रजा हुई पो उसका भी वणन करिये तथा ऋषियो का वश एव भृगु के वश की विरोप वृद्धि भी बतलाइये ॥२॥ श्री मत्स्य भगवान् ने कहा-हे राजन् ! पहिले इस वैवस्वत माव नर के सम्प्राप्त होने पर परमेष्ठी ब्रह्माजी का जो चरित्र है वह वहा जाता है। महादेव जी व शाप से स्वयं ही देह का त्याग पर महात्मा शुक्र व ध्युत हो जाने पर ऋषिगण समुत्पन हुए थे। दवा कोमातायें देख कर उसी मानि देव पलिया भी ६ महाराज ' परमेष्ठी ब्रह्माजी का शुत्र (वीय ) स्कान हो गया था। 11,६,७॥ तज्जुहाव सता ब्रह्मा ततो जाता हुताशनात् । सता जाता महातजा भगुश्च तपसा निधि 16 अहारङ्गिरा जाना याचिभ्यो निम्तथैव च । मोचिभ्यो मरीनिस्तु ततो जाता महातपा ॥ यस्तु पनिमा जान परस्त्यश्च महातपा । पण प्रताव पुनहस्तताज तामहातपा ॥१० यगमध्यात समुत्पमा बगियानु तपोधन । 'समुत्पन हुई भगुवाज ऋषियो के नाम गोत्र वश प्रवर वर्णन १८३ भगु पुलोम्नस्तुसुतादिव्याभार्यामविन्दत ॥११ यस्यामस्य सुता जाता देवा द्वादशयाशिकाः । भुवनो भौवनश्चंव सुजन्यः सुजनस्तथा।।१२ शुचितुश्च मूर्धा च त्याज्यश्च वसुदश्च ह । प्रभवश्चा ययश्चैव दक्षोऽथद्वादशस्तथा ।।१३ इत्येते भृगवो नाम देवा द्वादश कीर्तिताः । पौलोम्याजनयन् विप्रान्देवानातुक्नीयसः ॥१४ इसके अनन्तर ब्रह्माजी ने हवन क्यिा था फिर हुताशन से उत्पत्ति हुई थी। इसके उपरान्त महान् तेज वाले तपो की निधि भृगुदेव समुपन हुए थे ।।८।। अङ्गारो मे अङ्गिरा उत्पन्न हुए और हुनासन को अचियो से अनि ऋपि की उत्पत्ति हुई थी और इस अनन्तर मरीचियो म महान् तपस्वी महर्षि मरीचि उत्पन्न हुए थे II शो से कपिश और महान् तपस्वी पुलस्त्य उत्पन्न हुए। पुलम्ब देशों से फिर महान तपस्वी पुलह समुत्पन्न हुए ॥१०॥ वपु के मध्य मे तप के ही धन वाल वसिष्ठ ऋषि प्रसूत हुए थे । भृगु महर्षि ने पुलोमा की पत्नी को अपनी दिव्य भार्या बनाई थी ।।११।। इसी मार्या में उम महर्षि के द्वादश याज्ञिक सुत उत्पन्न हुए थे। उन बारह सुनो के नाम ये है-~भुवन-मौवन-सुजन्य- मुजन-शुचि ऋतु - मूर्दा-त्याज्य-वसुद-प्रभव-अध्यय और दक्ष ये द्वादप हैं । य स भृगु श वाल बारह देर कोतित हुए थे जो पौलोमी म देवो के छोटे भाई विप्रा को जन्म ग्रहण कराया था ।।१२, १३, १४॥ •यवनन्तु महाभागमाप्नुवान तथैव च । आप्नुवानात्मजश्चौवो जमदग्निस्तदात्मजः ॥१५ और्वो गोवरेस्तेपा भागवाणा महात्मनाम् । तत्र गारगम्वन्य भृगावं दीप्ततेजस १६ भगुरुच च्यवनश्चर आप वानस्तथैव च । औवश्व जमदग्नितश्च वात्स्यो दण्डिनंडाचन.॥१७ मत्स्यपुराण वगायनो वीतिहश्य पंलश्चैवान शौनक । शौनकायन जीवन्ति रावेद कापणिस्तथा ११८ वहीनरिविरूपाक्षो रोहित्यानरेव च । वश्वानरिस्तथा नीलो लुब्धा सावणिकश्चस ॥१६ विष्णु पौरोऽपि वालाकि रैलिकोऽनन्तभागिन । भतभायमाकण्डजविना वीतिनस्तथा ॥२० मण्डमाण्डव्यमाडूकफेनपास्तनितम्तथा । स्थलपिण्ड शिखावण शाकराक्षिस्तथैवच ।। १ महाभाग ध्यवन तथा आनुवान् उपन हुए। आप्नुव नका आत्मज ओव हुआ और उसका पुत्र जमदग्नि हुआ था। उन महान् आ मा वाला भार्गवो क गोत्र के करने वाला औव हुआ था तथा भय दीप्त तज वाले भृगु व गोकर हुए थ ।।१५ १६७। अब उन सब के नामो पा उल्लेख दिया जाता है ~ भगु-च्यवन -आप्नुवान-और-जम दग्नि-वात्स्य - दण्डिनडायन-वगायन-वीति हव्य--शौनकायन- जीवति- आवद-वाणि-दहीनरि-विरूपाक्ष-- रोहित्यायनि-- श्वानरि-नील-सुध- सावणिव-विष्णु-पौर-बालाकि - ऐलिव- अनत भागिन-भूत-भाव-माण्ड-दिन-योतिन--मण्ड-- माण्डप-माष्ट्रा-पेनप-स्तनित-स्थल किस-गियावण और बार ॥१७॥१८९६-१ जाधि मौधिय सभ्य पुरस यो मौदगलायन । धमायना दवपति पाण्डुरोचि रागालव ॥२ गायत्ययातषि मावियापिलायनस्ता। गाग्र्याय। गाय प्रापिपिनस्तथा ॥२३ गोपापना पास्यायना यशापापन व च। समणि दुग्धा यायिष्टिवायft Item पामादिलिपंच सौमिप्यापरिमारसो।
शपियो के नाम गोत्र वश प्रवर वर्णन आलुकि. सौचकि: कौत्सरतथान्यः पंगलायनिः ।। ५ सात्यायनिर्मालापनि कौटिलि: कोचहस्तिक. । सौहसोक्ति. सकौवाक्षि कोसिश्चान्द्रमसिस्तथा ॥२६ नकजिह्वो जिह्मकश्च व्यधाद्यो लोहवैरिण. । शारद्वतिकनेतिप्योलोलाक्षिश्चलकुण्डल. ॥१७ वागायनिश्चानुमति पूर्णिमामतिकोऽसकृत् । सामान्येन यथा तेपा पञ्चते प्रवरामता: ॥२८ जालघि-सौधिक-क्षुभ्य-कुत्मन्य-मौद्गलायन-कर्मायन-देवपति- पाण्डरोचि-सग्गलव-साकृत्य-चालकि-सारि-यज्ञपिण्डायन-गायन-- गायन-ऋषि--गायन-गोष्ठायन-वात्सायन - वैशम्पायन--कणिनि- माङ्करव-पाजेयि-भ्राष्ट्र कायनि-जालाटि-नालि-लौक्षिण्य-परिमण्डल आलुकि-सोचकि-बोत्स-पङ्गलायनि-सात्यायनि--मालायनि- कौटिल- कोच हस्तिक-सोहमोनि--सकोवाक्षिकोसि-चान्द्रमसि-लजिह्व- जिहाक-व्यधाय-लोहरिण-शारद्वतिकन-विष्य-लोलाक्षि-चल कुपड 7-~ वागायनि-~-अनुमति--पूर्णिमा गतिक ये सब सामान्य रूप स थे । नम पांच सब मे प्रवर माने गये हैं ।।२२।२३१२४१२ ५.२५॥२॥२८॥ मृणुश्च च्यवनश्चय आप्नुवानस्तथव च । औवश्च जमदग्निश्च पञ्चंते प्रवरा मता ॥ अत. पर प्रवक्ष्यामि शृणु त्वन्यान् भगूदहान् । जमदग्निविदश्चव पोलस्त्या वंजभृत्तथा ॥३० ऋपिश्चभयजातश्च कार्यान. शाकटायनः । औया मारुताश्चंदसवपाप्रवरा शुभाः ॥३१ भृगुश्च च्यवनश्चैव आप्नुवानम्तथव च । परस्परगवाह्या नरपय. परिकीर्तिता. ॥३२ भगुदासा मागपथा ग्राम्यायनिकटायना । आपस्तविम्तया विल्विनकाशिः कपिरेवच ॥३३ १८६ मत्स्यपुराण आष्टिपेणो गादभिश्च कादमायनिरेवच । आश्वायनिस्तथारूपियें चाया प्रकीत्तिता ॥३४ भृगुश्च च्यवनश्चैव आप्नुवानस्तथैवच । आष्टियेणस्तथारूपिः प्रवरा पञ्चकीर्तिताः ॥३५ वे पांचो प्रदरो के नाम ये हैं- भगु-च्यवन-आप्नुवान-और्व मोर जमदग्नि ये ही पांच प्रवर माने गये हैं ॥२६॥ इसके आगे मैं अन्य भूग- दहो को बतलाता हू । उनका श्रवण तुम करलो-जमदग्नि-विद-पौलस्त्य- जमृत्त-ऋषि-उभय जात-कायनि-शाकटायन-औवेय और मारुत सबमे प्रवर एव शुम थे ॥३०1३१।। मुगु-च्यवन और याप्नुवान ये सब परस्पर में अवैवाह्य ऋषिगण कत्तित किये गय हैं ॥३।। भृगुशास-मागपथ- ग्राम्यायनि-क्टायनि-यापस्तम्वि-विल्वि-नकशि-कपि-आस्टिपेण- हपि-ये सब आप परियोतित हुए हैं । इनम भगु-च्यवन-आप्नुवान- बाप्टिपण और रूपिय व प्रवर माने गय हैं ॥३३॥३४॥३५॥ परस्परमवैवाह्या पय परिवीतिता । मास्का वा वोतिहव्यो वा मधिनस्नु तथादम ॥३६ जैव-त्यागनिमौजश्च पिलिपचव नलिस्तथा । भागिलो भगावित्तिश्च वौसापिस्त्वथ काश्यपि ॥३७ यासपि मागपि सौरस्तिथिरतयं व च। गार्गीयरत्यथ जायालिस्तथा पोटण्यायनो यपि ॥३८ प्रामस्य सधनपामापया प्रवरा मता । भगुर पीताम्यश्न तथा वयसो ३८ परम्परमवारा प्रापथ परिवीतिता । मानायनि मापटाक्षाय पाण्वस्तथा ।।। ट्रोणायनो रोषमायना शिसवी गाविपापनि । हावापामाचा प्रग मता ॥४॥ पापा म र शपिपीतित हैं। पार-ft ऋषियों के नाम गोत्र दश प्रवर वर्णन १८० हव्य-मथित- -दम -जैवान्त्यायनि-मौज-पिलि-चलि-भगिल- मागवित्ति-केशापि-काश्यपि बालपि-श्रमदागेपि-सौर--तिथि-गार्गोय- जावालि-पोषण्यायन ऋषि और ग्रामद य सब आय एव प्रवर माने गये हैं । भृगु-वीतहव्य-रेषस ये सब परस्पर मे अवैवाह्य ऋषिगण कहे गये हैं । शालयनि-शाकटाक्ष-मैत्रेय-खाण्डव-द्रोणायन-रोक्मायन-- पिशली-कायनि--हसजिव ये सब आर्षेय प्रवर माने गये हैं ॥३६॥ ॥३७, ३८.३६,४१, ४१॥ भृगुश्चेवाय वध्यपवो दिवोदासस्तथं वच । परस्परमवैवाह्या ऋपय परिकोतिता ॥४२ एकायनो याज्ञपतिमत्स्यगन्धस्तथैव च । प्रत्यूहश्च तथा सोरिश्चौक्षि कादमानि ॥४३ तथा गृत्समदो राजन् । सनकश्च महान् ऋपि । प्रवरास्तु तथाक्तानामापंया परिकीर्तिता ॥४४ भृगुगृत्समदश्चैव आपविती प्रकीत्तितौ। परस्परमवैवाह्या ऋपी वै परिकीतितौ ॥४५ एते तवाक्ता भृगुवंशजाता महानुभावा नृप गात्रकारा । एपा तु नाम्ना परिकीर्तितेन पाप समग्र विजहातिजन्तु ॥४५ भृगु-वध्यश्व-दिवोदास य सब परस्पर म अवैवाह्य ऋषिगण परिकीतित किये गये हैं। एकायन-यापति--मत्स्यगन्ध-प्रत्यू:- सौरि-~-मोक्षिकादमायानि-हे राजन् ! गृत्समद और महान् ऋषि सनक ये कहे हुए ऋषिया मे प्रवर तथा अन्य कहे गय हैं । भगु-~~ गृत्समद ये दोनो माप कीत्तत किय गय हैं। य दोनो परस्पर म पि अवैवाह्य कोतित हुए हैं। ये भृगु के वश म उत्पन्न महानुभाव गोत्र वरने वाल हैं । हे न इन नामो क कीर्तन से जन्तु समम पपा को योग दिश करता है १४२, ५३ ४४, ४५, ४६॥
मत्स्यपुराण १८८ ७८-आङ्गिरसवंशज ऋषियों के नाम गोत्र वंश प्रवर वर्णन मरीचितनया राजन् ! सुरूपा नाम विभुता । भार्या चाङ्गिरसो देवास्तस्याः पुत्रा दश स्मृताः ।।१ आत्मायुर्दमनो दक्षः सदःप्राणस्तथं व च । हविष्माश्च गविष्ठश्चऋतः सत्यश्च ते दश ॥२ एते चाङ्गिरसोनाम देवा व सोमपायिनः । सुरूपा जनयामास ऋषीन् सर्वेश्वरानिमान् ॥३ वृहस्पतिङ्गीतमञ्च सवत्तमृपिमुत्तमम् । उतथ्य वामदेवं च अजस्यमृपिजन्तथा ॥४ इत्येते ऋषय.सर्वेगोत्रकारा:प्रकीर्तिताः । तेषां गोत्रसमुत्पन्नान् गोत्रकारान्निबोध मे ॥५ उतथ्योगौतमश्चीव तौलेयोऽभिजितस्तथा । साधनेमिःसलोगाक्षिःक्षीरः कौष्टिकिरेवच ॥६ राहुकणि: सौपुरिश्च करातिःसामलोमकिः । पोपजितिर्भागवतो ह्य विश्वोरीडवस्तथा ॥७ श्री मरम्य भगवान ने कहा-हे राजन् मरीचि के पुत्री सुरूपा-- इस नाम से प्रसिद्ध भार्या थी। आङ्गिरस देव उम ये दश पुत्र बताये गये हैं ॥१॥ पारमायु-दमन-दक्ष-सदः प्राण-हविष्मान-गविष्ठ-त- सत्ये ये दश उनके नाम थे । ये सब आङ्गिरस नाम वाले सोमपायी देव थे । इन सवेश्वर सब पियो को सुरूपा ने ही जन्म दिया था ॥२, ३॥ वृहस्पति - गौतम-सम्वर्त-उत्तम ऋषि-उतथ्य-वामदेव---अजस्म - ऋपिज-ये सव ऋपिगरण गोत्रकार कहे गये हैं । अब उनके गोत्र में ममुत्पन्न जो गोत्र कार है उनको भी मुझसे जान लेना चाहिये । उतथ्य- गौतम-तोय-अभिजित-साधनेमि-एलौगाक्ष-क्षीर-कोप्टिक- राहकणि-सौतरि-कारसति-सामलोमक-पोजिति - भागवत - अपि- ऐरोटय 18-31 ऋषियो के नाम गोत्र वश प्रवर वर्णन १८९ कागेटकः सजीवी च उपविन्दुसुपिणी । वाहिनीपतिवैशाली क्रोप्दा चैवारुणानिः । सोमोत्रायनिकामोरुकोशल्या पार्थिवास्तथा। रोहिण्यायनिरेवाग्नी मूलप: पाण्डुरेव च ॥६ क्षपाविश्वकरोपिच पारिकारारिरेव च । व्यायाः प्रवगश्चैव तेपा च प्रवरान् शृणु ॥१० अङ्गिग सुवचोतय्य उशिजश्च महानपिः। परस्परमववाह्या पयः परिकीर्तिता.१११ आत्रेयायनिमौवेष्टयौ अग्निवेश्य. शिलास्थलि। वालिशायनिश्केपी वारार्वािकलिस्तथा ॥१२ सोटिश्चत्रिणकर्णिश्चप्रावहिश्चाश्वलायनि । वाराहिबंहिंसादी च शिखाग्रीविस्तथ व च ।।१३ कारकिश्च महाकापिस्तथा चोडुपति प्रभु । कोचकिधू मितश्च व पुप्पान्वेपिस्तथैव च । १४ कारोटक-सजीवी-उपविन्दु-सुरैपिण-वाहिनीपति-वैशाली- प्रोप्टा-वारुणायनि-मोमोत्रायनि- कासोह----कौशल्य-~-पार्थिव- रोहिण्यान- अग्नि~मूलप-~पाण्ड-अपाविश्वकर-अरि-पारिकारारि- येत्याय और प्रवर थे अब आगे उनके प्रवगे का श्रवण करो । अङ्गिरा- सुवचौतथ्य-शिज-महाधि--ये सब परस्पर में अवैवाह्य ऋषिगण कोतित क्येि गये हैं। प्रात्रेयायनि-सौवेष्टय-अग्निवेश्य-शिलास्थल- वालिशायनि-एकैपि-बाराहि-वहिसाही-शिखाग्रीवि-कारवि-महाकापि- उडुअति प्रभु-कौचकि-धूमति-पुप्पान्वेपी ८, ६, १०, ११, १२॥ ॥१३, १४॥ सोमतन्विब्रह्मतन्वि: सालडिलिडिस्तथा। देवरारिदेवस्थानिहीं रकाणिः सरिद्धवि. ॥१५ प्रावेपिः साद्यमुनाविस्तथा गोमेदगन्धिकः ।
१६० मत्स्यपुराण मत्स्याच्छाद्यो मलहरः फलाहारस्तथं व च ॥१६ गाङ्गोदधि. कोरुपतिः कौरक्षेत्रिस्तथैव च । नायकिअंत्यद्रौणिश्च जैवलायनिरेव च ॥१७ आपस्तम्बिमौजवृष्टिमष्टिपिङ्गलिरेव च । पैलश्च व महातेजा शालङ्कायनिरेव च ॥१८ द्वय ख्येयो मारुतश्चंपा न्यायः प्रवरो नप!। अङ्गिरा प्रथमस्तेषा द्वितीयश्च वृहस्पतिः ॥१६ तृतीयश्च भरद्वाजः प्रवराः परिकीर्तिताः। परस्परमवैवाह्या इत्येते परिकीर्तिताः ॥२० काण्वायनाः कोपचयास्तथा वात्स्यतरायणा. भ्राष्ट्रकृद्राष्ट्रपिण्डी च लेन्द्राणिः सायकार्यान ।।२१ सोमतन्वि-ब्रह्मतन्धि-सालडि-बालडि-देरारि देव स्थानि-हारि- पणि-सरिद्रवि-भावेपि-साय सुग्रीवि-गोमेद गन्धिक-मत्स्याच्छाद्य-- मूलहायलाहार-गोदधि-कोरुपति-कौरक्षेनिनामकि-जत्यद्रोणि- जैबनायनि-मानम्बि-मोठन दृष्टि-माष्टपिङ्गालि-पल-महातेजा--- लष्कपनि पाम्यय-मारत-न्याय-~-प्रवर-हे नप ! उनमे अगिरा प्रथम था और दिताय वहम्पति था। तीसरा भरद्वाज ये सब प्रवर कोतित किये गये हैं । ये परस्पर में अमेवार कहे गये हैं। पाण्यायन-कोपनय- वारस्य तरायण-नाष्ट्रकृत-राष्ट्रपिण्डी-संन्द्राणि-सायकायनि ॥१५॥ १६, १७, १८,१६,२०,२१॥ कोप्टातो वहयोती च तालकृन्मधुरावहः । लावद्गालविद्गायो मायटि: पोलिफायनि. ॥२२ सन्द्रगश्व तथा चको गाग्य. श्यामायनिस्तथा । यालाफि माहरिश्चं व पचाया. प्रकीर्तिताः ।।२३ अङ्गिराच महातेजा देवाचार्यों बृहस्पतिः। भरद्वाजत्रया गर्ग: संम्परम भगवानपिः ॥२४ ऋपियो के नाम गोत्र वश प्रवर वर्णन परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकोर्तिताः । कपीतर: स्वस्तितरो दाक्षि.शक्तिःपतञ्जलिः ॥२५ भ्यसिजलसन्धिश्चविन्दुर्मादिःकुसोदकिः । वस्तु राजकेशी च वोपडि. शसपिस्तथा ॥२६ शालिश्चकलशीकण्टःपि:कारीरयस्तथा । काटयोपान्यायनिश्च वभावास्यायनिरेव च ॥२७ भारद्वाजि.सोवुधिश्च लध्वी देवमतीस्तथा। ध्यायाऽभिमनश्च व प्रवरो भूमिपोत्तम ॥२८ क्रोप्टाक्षी-बीती-तालकृत-मधुरावह-लावकृत-गाल- विद-माधी-मार्कटि-पोलकायनि-स्कन्दस-चक्री-गाग्य-श्यामायनि- वालाकि, साहरि, ये पांच आय प्रीत्तित हुए हैं। अङ्गिरा, महातेजा, देवाचार्य वृहस्पति, भरद्वाज, गर्ग, सैन्य, भगवान् ऋषि ये परस्सर में अवैवाह्य ऋषिगण कहे गये हैं। पीतर, स्वस्तितर, दाक्षि, शनि, पतञ्जलि, भूयसि, जलसन्धि, विन्दु माहि, कुसीदकि, कवं, रजवेशी, वोपडि, शसपि, शालि, कलशीकण्ट, सपि कारीरय, काटय, धान्यायर्यान भावास्यानि, भारद्वाज, सोधि, लम्बी, देवमती, हे भूमिपोत्तम ! ये दाय, अभिमन प्रवर वाले थे २०,२३,२४,२५, २६, २७, २८॥ अङ्गिरा दमवाह्यश्च तथा चं वाप्युरक्षयः । परस्परायण्वी च लौक्षिस्य॑ हरिस्तथा ॥२६ गालविश्व व्यायः सर्वेपा प्रवरो मतः । अङ्गिरा सकृतिश्च व गौरवोतिस्तथैव च ॥३. परस्परमवैव ऋपय. परिकोतिताः। वृहदुक्यो वामदेवस्तथा लि. प्रवरा मता ॥३१ अङ्गिरा वृहदुक्थश्च वामदेवस्तथं व च। कुत्साकुत्सरववाह्या एवमाहुः पुरातना ।।३२ मस्यपुराण रथोतराणां प्रवरा व्यायाः परिकीर्तिताः। अङ्गिराश्च विरूपश्च तथवच रथीतरः ।।३३ रथीतराह्यवाह्या नित्यमेव रथीतरः । विष्णुवृद्धिः शिवमतितृणः कत्तुणस्तथा ॥३४ पुत्रवश्च महातेजास्तथा वरपरायणः। ल्यायोऽभिमतस्तेषां सर्वेषा प्रवरो नृप ! ॥३५ अङ्गिरा, दमबाह्य, उरुक्षय, परस्परायण्वपर्णी, लौक्षि, गाय, हरि, गालवि, न्याय, सबका प्रवर माना गया है। अङ्गिरा, संकृति, गोर घोति ये सव परस्पर मे अवैवाह्य ऋषिगण कोतित किये गये हैं। वृहदुक्थ, वामदेव ये त्रिप्रवर माने गए हैं । अङ्गिरा, वृहदुक्थ, वामदेव, कृत्साकुत्स से ये अववाह थे-ऐसा पुरातन मनीषी गण कहते हैं । रथीतरों में प्रवर ये न्याय परिकीर्तित हुए हैं । अङ्गिरा, विरूप और उसी भांति से रथीतर ! रथोतरों से नित्य ही विवाहन करने के योग्य थे ! विष्णु वृद्धि, शिवमति जतृण कत्त ण, पुत्रव, महातेजा, वरपा ायण हे नृप उन सबका न्याय प्रवर अभिमत था 1॥२६॥३०॥३१,३२॥३३॥३४॥३५॥ अङ्गिरा मत्स्यद-धश्च मुद्गलश्च महातपाः । परस्परमवैवाह्या ऋपय: परिकीर्तिताः ॥३६ हसजिह्वो देवजिह्वो ह्यग्निजिह्वो विराडपः । अपाग्नेयस्त्वश्वयुश्च परण्यस्ताविमौद्गलाः ॥३७ व्यायाभिमतास्तेषां सर्वेषां प्रवरा: शुभाः । अङ्गिराश्चैव ताण्डिश्च मौद्गल्यश्च महातपाः ॥३८ परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः। अपाण्हुश्च गुरुश्चैव तृतीयः शाकटायनः ।।३६ ततः प्रागाथमा नारी मार्कण्डो मरणः शिवः । पटुमकंटपश्च व तथा नाडायनायपिः ।।४० प्रयामायनम्तथ वैयां व्यायाः प्रवरा शुभाः।
ऋपियो के नाम गोत्र वश प्रवर वर्णन
१६३
अङ्गिराश्चाजमीणश्च कटघरचं व महातपाः ॥४१
परस्परमवंगाह्या ऋपय परिकीतिता. ।
तित्तिरि: कपिभूश्च व गाग्यश्च व महानृषिः ॥४२
अङ्गिरा, मस्त्यदय, मुद्गल, महापा ये ऋषिगण आपस में
अवाह्य रहे गये हैं । हमजिव, देवजित, अग्नि जिल, विराडप,
अपाग्नेय, अश्वयु, परप्पास्ताविमद्गल ये उनके व्यय सबके परम शुभ
प्रवर अभिमत हुए हैं । अङ्गिरा, ताण्डि, मौद्गल्य, महातपा ये सव
ऋषिगण आपप्त मे विवाह न करने के योग्य थे-ऐसे कहे गये हैं । अपाण्डु,
गुरु, तनीय शाक्टायन, इसके उपरान्त प्रागाथमा नारी, मार्कण्ड, मरण,
शिव, १ टुमकटप, नाडायन, ऋषि, श्यामायन उसी प्रकार से न्याय इनके
शुभ प्रवर थे । अङ्गिरा, आजमीद, क्टय, महातपा ये सब परस्पर मे
ऋषिगण मौवाह्य कहे गये हैं। सितिरि, कपिभू, गाम्यं और महान
ऋपि।।३६, ३७, ३५, ३६, ४.,११,४२।।
ध्यापयो हि मतस्ते सर्वपा प्रवर शुभः ।
अङ्गिरस्तित्तिरिश्चं व कविभूश्च महानपि ॥४३
परस्परमवैवाह्या ऋषय परिकीर्तिता.।
अथ मृक्षभरद्वाजी ऋपिवान मानवस्तथा ॥४४
ऋापमक्वरश्चंव पञ्चाया. प्रकीतिता.।
अङ्गिराः सभरद्वाजस्तथैव च वृहस्पतिः॥४५
ऋपिमित्रवरश्च व पिवान् मानवस्तथा।
परम्परमवैवाह्या ऋपय. पारकोतिता ॥४६
भारद्वाजो हुतःशौङ्ग शशिरेयस्तथैव च ।
इत्येते कथिता सर्वे द्वचामुप्यायणगोत्रजाः ।।४७
पञ्चायास्तथा ह्येपा प्रारा. परिकीतिता ।
अङ्गिराश्च भरद्वाजस्तथैव च वृहस्पति ।।
मौद्गल्य. शशिरश्चं व प्रवरा. परिकीर्तिता. ॥४%
मत्स्यपुराण
१६४
एते तवोक्ताङ्गिरसस्तु वशे महानुभावा पिगोयकारा ।
येषान्तु नाम्ना परिकीतितेन पाप समग्र पुरुषा जहाति ॥४६
उन सबका न्यर्षेष शुभ प्रवर माना गया है । अङ्गिरा, तितिरि,
कविभू, महानृषि, ये सब परस्पर मे आवाह्य ऋषिगण कीर्तित किय
गये हैं । इसके उपरान्त ऋक्ष, भरद्वाज, ऋपिवान, मानव ऋषि और
मैत्रवर ये पांच आय कोतित पिये गये हैं। अङ्गिग, भरद्वाज वृहस्पति
ऋषि, मिनवर, ऋषिवान मानव ये सब परस्पर म अवाह्य ऋषिगण
वहे गये हैं । भारद्वाज, हुत, शौङ्ग, शशिरेय, य सब यामुष्यायण गोत्र
मे सम्पन्न कहे गए थे ॥४३, १४, १५, १६, ४७।। इन सबके पांच
पाप प्रवर परिकीतित हुए हैं उनमे अगिरा, भरद्वाज, वृहस्पति, मौद
गल्य, शशिर ये प्रवर कहे गये हैं ||४|| ये सब आङ्गिस के वश मे
महानुभाय गोत्रकार सृषिगण आपको बतला दिये गये हैं। जिनके केवल
नाम मात्र के ही कीर्तिन करने से पुरुष अपना समग्र पाप को त्याग दिया
करता है रक्षा
७७-अत्रिवंशज ऋपियों के नाम गोत्र वंश प्रपर वर्णन
अविवशसमुत्पन्नान् गोत्रकारान्निबोध मे।
फर्दमायनशाखेयास्तथा शारायणाश्च ये ॥१
उद्दालकि शोणकरिणरथी शोतवश्च ये ।
गौराग्रीवा गौरजिनस्तथा च पायणाश्च ये ॥२
अद्ध पण्या वामरध्या गोपनास्तविबिन्दव ।
पणजितो हरप्रीतिनंद्राणि शाक्लायनि ॥३
तलपश्च सवलय अधिगाणीपतिस्तथा ।
जलदो भगपादश्च सौपुप्पिच महातपा ॥
ऋषियों के नाम गोत्र वश प्रवर वर्णन छन्दोगेयस्तथतेपा व्याया: प्रवरा मनाः। श्यावाश्च तथा निश्चमानानशएव च ॥५ परस्परमवैवाह्या ऋपय परिवीतिता। दाक्षिवलिः पणविश्च ऊनामि: शिलादनिः ॥६ वीजवापी शिरोधश्च मौजकेशो गतिष्ठिरः। भलन्दनस्तथ तेषा न्याया. प्रवरा मताः ।। श्री मत्स्य भगवान ने कहा-अवि के वश में उत्पन्न होने वाले गोत्रकारों का ज्ञान मुझसे प्राप्त करलो जो कदमायन शालेय उपा शारा- यण थे । उद्दालकि, शोण, कणिरय और जो शोकृतव ये। जो गौर ग्रीव, गोजिन तया चैन यण थे । अर्द्धपण्य, वामरथ्य, गोपन, तकि विन्दु, कण- जिह, हरप्रीति, नेद्राणि, शाकलायनि, तैलय, सवैलेप, अत्रि, गोणीपति- उलद, भगपाद, सो पुष्पि, महानपा और छन्दोगेय, इनके न्याय प्रवर माने गये हैं • श्वाश्य, त्रिश्च और आर्चनानश ये आरम मे अवैवाह्य ऋषिगग कहे गये हैं। दक्षि, वलि, पर्णवि, ऊर्णनभि शिलानि, वीजवापी शिरोप, मोजकेश, गतिष्ठिर और मलन्दन ये इनके प्रवर और त्र्याय माने गये हैं॥१-011 अधिगविष्ठिरश्च व तथा पूर्वातिथिः स्मृतः। परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीतिता. तर आनेयपुत्रिकापुत्रानत अदध्वं निबोध मे। कालेयाश्च सचालेया बासरथ्यास्तथ व 1E धानेयाश्च व मंगेयाच्यायाः परिकीर्तिता.। अत्रिश्च वामरथ्यश्च पौत्रिश्चं वमहानृषिः परस्परमवैवाह्या ऋषय. परिकीतिताः ॥१० इत्यत्रिवशप्रभवास्तवाह्या महानुभावा नृपगोत्रकाराः येपा तु नाम्ना परिकीर्तितेन पाप समग्र पुरपो जहाति ।।११
मत्स्यपुराम
अत्रि गविष्ठिर पूर्वातिथि य ऋषिगण परस्पर मे अव वाह्य परि
घोत्तित किय गय हैं ।।८॥ अव आत्रय पुत्रिया के पुत्रा वो भी मुपस
समझ लो । काय सचानेय वासरध्य पात्रय मंत्रय यार दौतिन
किये गये हैं । अत्रि वामरध्य पौत्रि महान् पि स सब ऋषिगण आपस
मे विवाह न करने के ही योग्य ५ । य सब अनि के वश म उत्पन होन
घाले नपगोत्रकार महानुभाव हैं जो तुम्हारे सामन वणित कर दिय गए
हैं । जिनके शुभ नामो के कीर्तन मात्र स ही पुरुष समग्र पाप का याग
कर दिया करता है । -११॥
८०-कुशिकवशज मृपियों के नाम गोत्र यश प्रपर वर्णन
अओरेवापर वश तव पक्ष्यामि पार्थिव ।।
अन्ने सोम सुत श्रीमास्तस्य वशोद्भवानप ॥१
विश्वामित्रस्तु तपसा ब्राह्मण्य समवाप्तवान् ।
तस्य वशमह वक्ष्ये त मे निगदत शृणु ॥२
विश्वामिनो देवरातस्तथा वतिगालव ।
चतण्डश्च सलवश्च ह्यभयश्चायतायन ||३
श्यामायना याज्ञवल्क्या जाबाला सधयायना ।
बाभ्रव्याश्व करीपाश्च सम्त्या अथ सश्रुता ॥४
उलपा औपगहचा पयोदजनप दपा ।
खरवाचो हलयमा साधिता वास्तुकौशिका ॥५
च्याया प्रवरास्तेपा सवधा परिकीत्तिता ।
विश्वामित्रो देघरात उद्दालश्च महायशा ॥६
परस्परमववाह्या ऋषय परिकीत्तिता ।
देवश्रया सुजातेया सोसुका पारुषायना ।।
पियो के नाम गोत्र वश प्रवर वर्णन तथा वैदेहराता ये कुशिकाश्च नराधिप !। च्यार्ययोऽभिमतस्तेपा सर्वेपा प्रवर शुभ: 115 श्री मत्स्य भगवान ने कहा-हे पार्थिव ! अब मैं अत्रि के दूसरे वश का वर्णन करूगा। हे नृप ! सोम अत्रिका सुत धीमान् सोम उसका पशोद्भव था । विश्वामित्र ने तपश्चर्या के द्वारा ब्राह्मणत्व की प्राप्ति कर ली थी। मैं अब उसके वश का भी वर्णन करूंगा। बतलाने वाले मुझमें उसका आप लोग श्रवण कर लेवें। विश्वामित्र-देवरात-वकृतिगालव- वतण्ड-- सल-अभय-आयतायन-श्यामायन-याज्ञवल्का-जावाल- संधिवायन-वाभ्रव्य-करीप-संश्रुत्य-सश्रुत-उलूप-ओपगहय---- पयोद जन याप—खरवाच-हलयम-साधित वास्तु कौशिक - उन सबके व्यय प्रवर कोसित किए गए हैं। विश्वामित्र- देवगत-महा- यशा उद्दाल थे परस्पर मे विवाह न करने के योग्य ही है---ऐसे ही ऋपि- गग कहे गए हैं । देवश्रया-सुजातेय-~~सोसुक -कारकायन-तथा वैदेहर त-हे नराधिप ! जो कुणिक है इन सबका शुभ प्रवर व्यणेय अभिमत है ।।१- देवश्रवा देवरातो विश्वामित्रस्तथैव च । परस्परमववाह्या ऋषय. परिकीर्तिताः ॥६ धनञ्जय कपर्देय. परिकूटश्च पार्थिव । पाणिनिश्चंव व्यापंथी सर्व एते प्रकीर्तिताः ॥१० विश्वामित्रस्तथाद्यश्च माधु-छन्दस एव च । न्याया प्रवरा ह्य ते ऋषयः परिकीत्तिता. ११ विश्वामित्रो मधुझ्छन्दास्तया चंवावमर्पण । परस्परमववाह्याऋपयः परिकीर्तिता. ॥१२ कमलायजिनश्चव अश्मरथ्यस्तथैव च । वलिश्चापि त्याय सपा प्रवरो मतः ॥१३ विश्वामित्रश्चाश्वरथो वलिश्च महातपाः ।
मास्यपुराण
१६६
परस्परमवैवाह्या शपय परिवीतिता ॥१४
देयथवा, देवरा तथा विश्वामित्र पिगण परस्पर विवाह न
परने के योग्य पहे गम है HEME पापित ! धनस्य पय, परिबूट
और पाणिनि ये सब घ्याय वौतित दिए गये हैं ॥१०॥ विश्वामित्र
तथा आद्य और मापुच्छ दस ये न्याय प्रवर ऋषिवग बताय गए हैं ।।११।।
विश्वामित्र मधुच्छ द, अपमपण ये आपस मे अवाह्य ऋषिगण कीर्तित
हुए हैं ॥१२॥ कमलायजनि अश्मरथ्य, चलि सयका न्याय प्रवर
माना गया है । १३ । विश्वामित्र अश्वस्थ, महातपा वजुलि य परस्पर
मे अवैवाह्य ऋषिगण परिकीर्तित हुए हैं ॥१४॥
विश्वामित्रोलोहितश्च अप्टक पूरणस्तथा ।
विश्वामित्र पूरणच तयोद्वीप्रदरो स्मृतौ ॥१५
परस्परमवैवाह्या पूरणाश्च परस्परम् ।
लोहिता अष्टकाश्चंपा च्याया परिकीर्तिता ॥१६
विश्वामित्रो लोहितश्च अष्टकश्च महातपा ।
अष्टका लोहितनित्यमववाह्या परस्परम् ।।१७
उदरेण अथकश्च ऋषिश्चोदावहिस्तथा ।
शाध्यायनि करोराशी शालङ्कायनिलावकी ॥१८
मौजायनिश्चभगवान्च्याया परिकीतिता ।
खिलिखिलीस्तथाविद्योविश्वामित्रस्तथवच ॥
परस्परमववाह्या मृषय परिकीतिता ॥१६॥
एते तवोक्ता कुशिका नरेन्द्र ! महानुभावा सततद्विजे द्रा।
येषातु नाम्ना परिकीतितेन पाप समग्र पुम्पो जहाति ॥२०
विश्वामित्र और लोहित-अष्टक-पूरण-विश्वामित्र और पूरण
इन दोनों के शो प्रवर कहे गए हैं । पूरण आपस मे अवैवाह है । लोहित
और अष्टक इनके न्याय वताय गए है ॥१५ १६॥ विश्वामित्र लोत
महातपा अष्टक ये अप्टक लोहितो के साथ आपस मे अवव हय हैं ॥१७॥
ऋषियों के नाम गोत्र वश वर्णन उदरेणु, यक, ऋपि उदावहि,शाटयायनि, करीराशी,शालयड्राय, निला- वकि, मौजायनि, भगवान् ये न्याय कीर्तित हुए हैं । खिलिखिलि, विद्य तथा विश्वामित्र ये परस्पर मे भूषिगण अवैवाह्य कहे गए हैं ।।१८,१६॥ हे नरेन्द्र । ये भापको द्विजेन्द्र महानुभाव सतत कुशिक सव वतला दिये गए हैं जिनके परम शुभ नामा के सकीर्तन मात्र से ही पुरुष अपने समस्त पापा को त्याग कर दिशुद्ध हो जाया करता है ॥२०॥ ८१-कश्यपवंशज-ऋपियों के नाम गोत्र वंश प्रवर वर्णन मरीचे कश्यपः पुत्रः कश्यपस्य तथा कुले । गोत्रकारान् सुपीन् वक्ष्ये तेपा नामानि मे शृणु ॥१ आश्रायणि ऋसिगणो मेपकोरिटकायना । उदग्रजामाठराश्च भोजा विनयलक्षणा. ॥२ शालालेया कोरिप्टा कन्यकाश्चासुरायणा । मन्दाकिन्या वै मृगया श्रुतया भोजयापनाः ॥३ देवयाना गोमयानह्यधश्छाया भयाश्च ये। कात्यायना शाम्याणा हियोगगदायना.॥४ भवनन्दि महानि दाक्षपायन एव च । योधयाना कातिवयो हस्तिदानास्तथैव च ॥५ वात्स्यायनानि कृतजा ह्याश्वलायनिनस्तथा । प्रागायणा पौलमोलिराश्ववातायनस्तथा ॥६ कौवेरकाश्च श्यात्तरा अग्निशर्मायणश्च ये। मेपपा. कंकरसपास्तथा चैव तु वभ्रव ७ प्रो मत्स्य भगवान् ने कहा-महामहपि मरीचि का कश्या पुत्र हुआ था तथा कश्यप व कुल म जो गोत्रकार ऋषिगण हुए थे उनकी शुभ मत्स्यपुराण २०० नामावली अव आप मुझसे श्रवण करलो ॥१३॥ आधारिण ऋषिगण, मेप- कीरिटकायन, उदग्रजामाठर, भोज, विनय लक्षण, शालाहलेय, कोरिष्ट, कन्यक, आसुरायण, मन्दाकिनी मे मृगय, ध्रुतम, भोजयापन, देवयान, गोमयान, अधश्छय्या, भया, कात्यायन, शाक्रयाण, बहियोग गदायन, भव. नन्दि, महाचकि, दाक्ष पायन, योधयान, कातिवय हस्तिदान, वात्स्यायनि कृतज, आश्वलायनि, प्रागायण, यौलमौलि, आश्व वातायन, कविरक, श्याकार, अग्निशर्मायण, मेषप, करसप, तथा वभ्रव ॥२-७।। प्राचेयो ज्ञानसज्ञया आग्ना प्रासेव्य एव च । श्यामोदरा वैवशपातथाचवोद्वलायनाः ॥ काप्ठाहारिणमारीचाआजिहायनहास्तिका । वकणेया काश्यपेया सासिसाहारिलायना ME मान्तगिनश्च भृगवस् यायाः परिकीर्तिता । वत्सर कश्यपश्चव निघ्वश्चमहातपा ॥१० परस्परमवैवाह्या अपय परिकीर्तिता । अत पर प्रवक्ष्यामि यामुध्यायणगोजान् ॥११ अनसूयो नाकुरय स्नातपो राजवतप । शशिरोदवहिचंव संग्-ध्रीरोपसेवविः ॥१२ या मुनि वाइपिङ्गाक्षि सजातम्दिस्थैव च । दिवावप्टाव इत्येते भवत्या ज्ञेयाश्च काश्यपा ।।१३ ध्यायाश्च तथंबंपा सपा प्रवरा शुभा । वत्मर काश्यपश्चंव वसिष्ठश्चमहातपा. ॥१४ प्रय, नान मोय, अग्नि, प्रारोष्य, श्यामोदर, बाप, उपाय, पाटाहारिण, मीराच, यानिहायन, हास्तिर, मेणे, पायपेय, सामि माहारिलायन, म नाग्नि, गुगल य मय न्याय परिकीनित है । भर यहा । बाग माग गातो विषय ग घणन बरंगे । अनार, नारम नाराय, राज दराप राहि. भोप .
ऋपियो के नाम गोत्र वश प्रवर वर्णन
२०१
यामुनि, कापिङ्गाक्षि, सजातम्बि, दिवावप्टाश्व ये इतने भक्ति भाव से
काश्यपो का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए । इनके सबके व्याय शुम प्रवर
हैं । वत्सर, काश्यप, वसिष्ठ महातपा 18-१४||
परस्परमवैवाया ऋपयः परिकीर्तिताः ।
संयातिश्च नभश्चोभो पिप्पल्योऽय जलन्धरः ॥१५
भुजातपूरः पूर्यञ्च कर्दमो गईभीमुखः ।
हिरण्यवाहुकरातावुभौ काश्यपगोभिलो ॥१६
कुलहो वृपकण्डश्च मृगकेतुस्तथोत्तरः ।
निदाघमसृणो भत्स्या महान्त: देवलाश्च ये ।।१७
शाण्डिल्यो दानवश्व तथा व देवजातयः ।
पैल्पलादित्स प्रवरा ऋपय:पारकोतिताः ॥१८
व्यायाभिमताश्नोपा सपा प्रवरा: शुभा. ।
असितो देवलश्चैव कश्यपश्च महातपा.॥
परस्परमवैवाह्या ऋपय परिकीर्तिता. ।।१६॥
ऋषिप्रधानस्य च कज्यपस्य दाक्षायणीभ्य: मकलप्रसूतम् ।
जगत्समग्र मनुसिंह पुण्य किं ते प्रवक्ष्याम्यहमन्तरेण ।। २.
ये समस्त ऋषिगण परस्पर में अौवाह्य वतलाये गये है। सयानि,
नभ ये दोनो, पिप्पल्य, जलन्धर, भजातपूर, पूर्व, क्र्दम, गर्दभी मु,
हिरण्य वाहुक, काश्यप, गोभिल, कुलह, वृपाण्ड, मृगये नु, उतर, निद घ,
मसूण, भत्स्य, महान्त केबल, शाण्डिल्य, नव, देवजाति, पप्पल दिस.
सब ऋपिवृन्द प्रवर कहे गए हैं इन सबके शुभ प्रवर घ्याय अमिमा हुए
हैं । असित, देवल और महातपा कश्यप ये ऋषिगण परस्पर में अविव हा
है-ऐसा कोत्तित किंगा गया है । समम्न पियो म परम प्रधान व शप
के दाक्षायणीयो से यह सम्पूर्ण प्रमून हुआ है । यह सम्पूर्ण जगत सिंह के
तुल्य मनु का पुण्य रूप है । अब मैं इसके उपरान्त आपको क्या बतलक
॥१५-२०॥
मत्स्यपुराण
२०२
८२-शिष्ठ वशज पियों के नाम गोत्र वश प्रवर वर्णन
वसिष्ठवराजान विप्रान निबोध वदतो मम।
एकापयस्तु प्रवरा वासिष्ठाना प्रवीतित ॥१
वसिष्ठा एव वासिष्ठा अविवाह्या वसिष्ठ ।
व्याघ्रपादाऔपगवावक्लवा शादलायना ॥२
कपिष्ठला औपलोमा अलब्धाश्च पठा वठा ।
गौपयानाबोधपाश्चदारव्यापथवाह्यका ॥३
वालिशया पालिशयास्ततोवान्ग्रन्ययश्चये।
आपस्यूणा शीतवृत्त स्तथाग्रामपुरयका ॥४
नामा ना स्वस्तिारा शाण्डिनगीडिनिस्तथा ।
वाहोहनिश्च सुमनाश्चापावृद्धिस्तथैव च ॥५
चौविनिग्रह्मवत्र पोनि श्रवस एव च ।
पोवा यामवल्पयश्च एमायामपय ।
वसिष्ठ एपा प्रवर अधवाह्या परस्परम् ।
शनायो महागं कौरव्य प्राधिनस्तथा ।।७
ऋपियों के नाम गोत्र दश प्रवर वर्णन
कपिजलावालखिल्याभागवित्तायनाश्चये।
कोलायन कालशिख:कोरकृष्णा सुरायणाः ।।
भाराहार्या. शाकधिय. काण्वा उपलपाश्चये।
शाकायनाउहाकाश्चअथमापशरावयः ।।
दावायनावालवयोवाकयो गोरथास्तथा ।
लम्बायना श्यामवयो ये चकोडोदरायणाः ॥१०
प्रलम्बायनाश्च ऋपय ओपमन्यव एव च ।
साडग्य यनाम्चऋपरस्तथा वेदशेरका ॥११
पालनायन उद्गाहा अपयश्च वलेक्षव ।
मातेया ब्रह्मलिन पगारिस्तथैव च ।१२
व्यायाभिमानावा सपा प्रवरम्नथा ।
भिगोवसुवशिष्ठश्च इन्द्रप्रमदिरेवच १५३
परस्परमवैवाह्या उपय. परिकीतिना ।
औपस्थलास्वस्यलया पालोहाला लाश्च ये ।।१४
फाजिल, वाल जिन्य, माग वित्तायन, कोलायन, काल शिछ,
कोर कृष्ण, मुगयण, शाकाहाय, पारधी, GE, उपलप, शारापन.
उहार, मापारावय, दावशयन, बालवय, वावय, गारथ, लम्बापन, श्याम
वय वोडोदगमन, प्रलम्बापन नापिया, श्रीपमन्यव, सास्यायन ऋषि-
वर्ग, वैदोरम, पतायन, उदाह दिगण, वलेक्षव, मातय, ब्रह्मानन,
पांगारि, इस मबरे प्रवर याय अभिमत है । भिगोदमु वशिष्ठ और
द्र प्रमाह ये एपिगण आपम ५ विवाह विधि नहीं परन के योग्य होन
है-ऐमा ही कहा गया है। मोपम्पल मस्पन ये-पासोहन--
1-१४॥
माध्यमिनो मानाय पंपादिनिक्षपः।
ज्ञापन मंकता युनिश्च नरातम! १५
ध्यायाभिमतामा मया प्रवरा भा।
मत्स्यपुरा २०४ वसिष्ठमित्रावरुणो कुण्डिनश्च महातपा ।।१६ परस्परमवैवाह्या ऋपय परिवीतिता । शिवकर्णो वयश्व पादपश्च तथैव च ॥१७ न्मायोऽभिमतरचेपा सर्वपा प्रघरस्तथा । जातक्र्योवसिष्ठश्च तथैवानिश्च पार्थिव ।। पषस्परमवैवाह्या ऋषय परिकीतिता ॥१८ वसिष्ठवशेऽभिहिता मयते ऋषिप्रधाना सतत द्विजेन्द्रा । येषा तु नाम्ना परिकीतितेम पाप समग्र पुरुपो जहाति ॥१॥ माध्यन्दिन, माक्षतप पप्प त्रादि, विचक्षुप, चशृङ्गायन संवल्क, कुण्डिन हे नरोत्तम । इन सब के परम शुभ प्रवर न्याय अभिमत हैं । वसिष्ठ, मित्रावरुण, महातपा कुण्डिन ये ऋपि वृ द परस्पर म अशवाय है-ऐसा कीर्तित किया गया है। शिवकण, वय न्याय प्रवर अभिमत है । हे पार्थिव । जातकर्य वसिष्ठ तथा अनि य ऋषि वृन्द आपस में विवाहन करने के योग्य ही कहे गय हैं । १५ १८ मैंने आपको वसिष्ठ के वश मे सपियो मे प्रशान और निरन्तर द्विजे द्र आपको कह दिये गये है जिनके परम शुभ नामो के परिकीनि स पुरुष अपने सम्पूर्ण पापो का त्याग कर दिया करता है ।।१६।। पादप इन सवका ८३-पियों के आख्यान में निमि का वर्णन वसिष्टस्तु महातेजानिमे पूवपुराहित । वभूक पार्थिवध प्ठ | यज्ञास्तस्य सम तत ॥१ श्रान्तारमापार्थिवथप्ठ । विशथाम तदा गुरु । त गत्वा पार्शिवश्रीटा निमिवचनमब्रवीत् ॥२ भगवन्यष्टमिच्छामि तन्मा याजयमाचिरम् ।
पिया के आध्यान म निमि का वर्णन
२०५
तम्याच महातेजा वसिष्ठ पाथिवोत्तमम् ॥३
चित्काल प्रताक्षस्व तव यज्ञ सुमत्तम ।
श्रान्ताऽस्मि राजन् ! विश्रभ्य याजयिष्यामि ते नृप ।।४
एवमुक्त प्रत्युवाच रसिष्ठ नपसत्तम ।।
पारलौक्तिकार्य तु क प्रतीक्षितमुत्सहत ।।५
न च मे सोहृद ब्रह्मन् । एतान्तेन बलीयसा ।
धमकायें त्वरा कार्या चल यस्मानि जीवितम् ॥६
धमपथ्यौदना जन्तुमृताऽपि सुखमश्नुते ।
श्व काय्यमद्य कुर्वीत पूगणेचापगह्निाम् ॥७
श्री मत्स्य भगवान् न वहा-महर्षि वसिष्ठ महान् तेजस्वी थे
और निमि के पूर्व प्राहित थे । है पार्थिव श्रष्ठ उस चारा आर यन थे
उस समय म थान्त अ मा गुरु म विधाम किया था। उमरे ममीप म
जार निमि ने यह पचन पहा पा । भगवन
,
दखना चाहता हूँ-
मझ शीन यजन कराइये। मह न तज वाले मिठ जी ने उस थष्ठ
राजा स कहा था-वुछ समय तद प्रतीक्षा करो। आपके परम श्रष्ठ
यो स ह राजन् । में सा गया हूँ मैं वुर ममय तर विश्राम करक
ही याजन गागा ॥१४॥। इस प्रर र म जर कहा गया था उसने हे
नप रष्ठ । वशिष्ठ जी से कहा था शि पारनोकिन काम्य म कौन मम्प्य
हामा जो तो बरन का उसाह करणा। ह ग्रह्मन् ! उस मन् वा
यमराज स मरी कोई मित्रता नहीं है। धम्म र पाप म ता गोप्रना
करनी चाहिए या यह मानव का जीवन सा चर और परिधर हमा
करता है ।।५, ६ घम्म यो पर आग्न वाना यह जतु मृत होकर भी
भान मार रिया करता है । जो दाम्य अथार धम्म
मम्ब धी बम्म रन बरन का विचार हो उम मात्र ही करना
पाहिए और जो दारहर र चार वरन या हो उसका दोपहर में
पूर हा पर दान-दमी प्रकार पामिर पृयका हा स्तिनी
पियों के नाम गोत्र वश प्रवर वर्णन
२००
6
ही इस शरीर को शाश्वत मानता हूँ! धर्म कार्य में मैं इसको अधाश्वत
मानना हूँ । इन मकर में ऋगवान हूँ। वह में सम्भृत सम्भार वाला मूल
को उपागत हुआ हो गया था। यदि आप मुझे याजन नहीं कराया तो
मैं किसी अन्य याजक के समीप में चला जाता। इस प्रकार से उस
समय में उस निनि के द्वारा वह श्रेष्ठ वाह्मण जद कहा गया था तो उमने
महान कोध से उम तिमि को शाप दे दिया था कि त विद हो जायेगा
क्योंकि परम थाल मुझ को त्याग करके किसी अन्य द्विजोत्तम के समीप
वाना चाहता है।1८-१४॥
धर्मशस्तु नरेन्द्र ! त्व याजक कतु मिन्छसि ।
'नमिस्तं प्रत्युवाचाथ धर्मकार्यरतस्य में ॥१५
विघ्नकरोपि नान्येन याजनच तथेच्छसि ।
शापंददासि यस्मात्व विदेहोज्यभविष्यसि ॥१६
एवमुक्त तु तो जातौ विदेही द्विजपार्थिवी।
देहहीनो तयोर्जीवी ब्रह्माणमुपजग्मतुः ॥१७
तावागतो ममीक्ष्याय ब्रह्मावचनमब्रवीत् ।
अद्यप्रति ते स्थान निमिजीव ददाम्यहम् ।।१८
नेत्रपमनु सर्वेपा ल वमिप्यमि पार्थिव ।
त्वन सम्बन्धात्तथा तेपा निमेष सम्मविष्यति ॥१६
चालयिष्यन्ति तु तदा नेत्रपक्ष्माणि मानवाः ।
एवमुक्त मनुष्याणां नेत्रपक्षमतु सवंशः १२०
जगाम निमिजोवस्तु वरदानात् स्वयम्भुवः ।
वसिष्ठ जीव भगवान ब्रह्मा वचनमत्रवीत् ।।२१
हे नरेन्द्र ! धर्म के नाडा आप है और आप यात्रा करना चाहते
हैं। इसके अनतर निमि ने उसको इसका उत्तर दिया था कि धर्म मे
रति रखने वाले मेरे वार्य में विघ्न करते हैं और अन्य के द्वारा कराये
जाने वाले याजन को नहीं चाहते हैं। इसीलिए आप शार दे रहे हैं कि
२००
मत्स्यपुराण
तू चिन्ह हो जायगा तो त भो विदेह हा जायगा । इस प्रकार स कहने
पर वे दोनो ही द्विज और पार्थिव विदेह हो गये थे। उन दानों क देह
से हीन जीवा मा ब्रह्म जी के समीप मे पहुंचे थे। उन दानो का समागत
हुए देखकर ब्रह्माजी न यह वचन वहा-ग्राज से लकर हे निमि के जीव ।
सुथको मैं स्थान देता हू हे पार्थिव । तुम सब क नेत्रो के पक्ष्म म निवास
करोगे ।।१५-१६॥ मनुष्य उस समय मे नत्रो के पक्ष्मो का चलन करेंगे।
एस तरह मे कहने पर सब ओर मनुष्यो के नेत्रो के पक्ष्मो पर वह निमि
का जीव स्वयम्भू प्रभ क वरद न म चला गया था। फिर ब्रह्माजी ने
वसिष्ठ महर्षि के जीव से यह वचन कहा था-२० २१॥
मित्रावरुणयो युनो वमिष्ठ । त्व भविष्यसि ।
वसिष्ठेतिचते नाम तत्रापिचभविष्यनि १-२
ज मद्वयमतोतञ्च तत्रापि त्व स्मरिष्यसि ।
एतम्मिनव काल तु मिनश्च वरुणस्तथा ॥२३
वदर्या ममासाद्य तपस्तेपतुरव्ययम् ।
त स्यताम्तयोरेव पदाचि माव तौ ।।२४
पप्पितद्रुमसस्थान शुभे द्वयितमारते।
उवशा तु वरारोहा युवती कुसुमाञ्चयम् ।।२५
सुसूश्मरक्तवसना तयाह ष्टपथङ्गता ।
ता दृष्टवा सुमुखी सुभ्र नीरनीरजलोचनाम् ।।२६
उभी चक्षुभतुर्धयात्तद्रूपपरिमाहिती।
तपस्यनोम्तयो वीयमस्सलच्च मृगासने ॥२७
स्वप्न रतस्तना हप्टवा शापभीतो परस्परम् ।
चात ३ग शुभ तायपूर्ण मनोरमे ।।२८
हे वमि । त मित्रावरणों या पुत्र होगा । वहां पर भी
सिट -यह तरा नाग होगा ॥ २॥ वहा पर भी तत बीत इए दो
anों बाहरण हागा । सो समय म मित्र और वरण वांधा को
ऋपियों के नाम गोत्र वश प्रवर वर्णन
में परम शुम
प्राप्त करके अध्यय तपस्या का सतपन दरने लगे थे। उन दोनों के इस
प्रकार त तपश्चर्या करन पर किसी ममय माधव मृतु
और
वहन करने वानी द युसे युक पुस्पिन टु मो क सस्थान में फूलों के स्तव को
उछालनी हुई वरारोहयातो उर्वशी जा fr अत्यत वागेक और रक्तवर्ण
के वस्त्र धाररा कर रही थी तप करने वाल उन दोनो की दृष्टि में आ
गई थी अर्यात दोनो ने उर्वशी को देख लिया था। उस नील कमलो के
सदृश लोचनो वाली सुन्दर मुख स सम्पन्न सुन को देख कर उसके रूप
लावण्य पर मोहित हुए वे दानो ही धर्यहीन होकर क्षोभ वाले हो गये
थे । तपस्या करत हुए उन दानो का वीर्य मृगासन पर स्खलित हो गया
पा। इसके उपर न्त जब उन्होंने आने स्पन्न हुए वीर्य को देखा तो वे
दोनो शाप से भयभीत हो गय थे और उन्होंने वहां पर स्थित जल से
भरे हुए मनोहर कलश मे उस पीयं वा डाल दिया था ।। २३, २४, २५
२६, २७, २८।।
तस्मापिवगै जातो तेजसा प्रतिमौ भुवि ।
वसिष्टश्चाप्यगम्त्यश्चमित्रावरणयाद्वंयोः ॥२६
वसिष्ठस्तूपयेमध्य भागिनी नारदस्य तु ।
अरुन्धती वरारोहा तस्या शक्तिमजोजनत् ।।
शक्तेः पराशर पुत्रस्तस्य वश निवोध मे।
यस्य द्वैपायनः पुत्र स्वय विष्णुरजायत ।।३१
प्रकाशो जनितो येन लोके भारत चन्द्रमाः।
पराशरस्य तस्य त्व शृणु वशमनुत्तमम् ॥३२
काण्डपपो वाहनपो ब्रह्मपो भौमतापनः।
लिरेषा पन्चम एते गौग पराशराः ३३
प्रपोयावाह्य मया: स्याते या कौतुजातय ।
हयंश्विः पन्चमो ह्यषा नीला या. पराशराः ॥३४
कार्णायना. कपि सुखा. कायस्थाजपातयः ।
मस्यपुराण ०१० पुष्कर पन्चमश्चपा कृष्णाजया पराशरा १.५ उसी वीय से भूमण्डल म तेज स समवित उन दोनो मित्रावरमों के दो ऋपियो म परम श्रष्ठ समुत्पन हुए थे। उनम एक का नाम वसिष्ठ था और दूसरे का नाम अगस्त्य था | वसिष्ठ ने नारद की भगिनी के साथ विवाह किया था जिस बरारोहा का नाम अरु धती था। उस अरुधती मे उसने शक्ति का समुप न दिया था। शक्ति का पुत्र जिस पराशर का स्वय विष्णु द्वपयन यून उत्पन्न हुआ था ।। ३०, ३१ । यह ऐसा था जिसने लोक में भारत चन्द्रमा प्रकाश को प्रसून किया था काण्डपप-वाहनप-जंहाप-भीम तापन और इनमे पांचवा गोपा था। ये गौर पागशर थे ॥ ३३ ॥ प्रय-हयाबाह्य मय और ख्यात मे कौतुक जातिया है तथा पञ्चम हय शिवम नीलाम य पराशर हैं ॥ ३४ परागर हुआ था। अव उसका जो भी वश हा उसे मूमसे समझ लो। उम पराशर मुनि का जो उत्तम वश था उसे तुम श्रवण बरलो ।।३२१ कार्णायन-कपिसुख-काकेयस्थ-जपाति और इनमे पाचवा पुष्कर सब कृष्णा ज्ञय पा शिर हैं ।। ३५॥ आविष्टायन वालेयास्वायष्टाश्चोपयाश्च ये। इपोकहस्ताश्चत व पञ्चश्वेता पगशरा ॥ ६ पाटिका वादरिश्चवस्तम्बा व बोधनायना । क्षमिरेषा पञ्चमस्तु एते श्यामा पराशरा ॥३७ खल्यायना वार्णायनास्त नेय खलु यूथपा । तिरेपा पञ्चमस्तु एते धूम्ना पराशरा ॥३८ उक्तास्वते नृप । वशमुख्या पराशरा सूयसमप्रभावा । येपा तु नाम्ना परिकीर्तितेन पाप समग्र पुरपो जहाति ॥ ३६ धाविष्टायन-वाय-स्वायट-उप-पौर हस्त य पाँच वेत पराशर थे ||१६॥ पाटिव-वादरि-स्तम्ब क्रोधानायन और इनका पाचया समि य श्याम पराशर हुए थे । वस्यायन-वाप्यापिन-तलेय- भूपियों के नाम गोत्र वश प्रवर वर्णन २११ यूथप और इनमे पञ्चम तलिये मव घूम्र परागर है । हे नप! ये मूर्य के समान प्रभाव वाले दश प्रमुख पराशर सब आपके समक्ष में वर्णित कर दिये गये हैं जिना शुभ नामों के ही कीर्तन करने से मनुष्य अपने समस्त पापों से छुटकारा पार परम विशुद्ध हो जाया करता है ।। ३७, ३८ । ३६॥ ८४-ऋपियों के नाम गोत्र वंश प्रवर वर्णन अत' परमगस्त्यस्य वक्ष्येवशोद्भवान्द्विजान् । अगस्त्यचकरम्भश्चकौशल्प करटम्तथा ।। सुमेघसोमयोभुवस्तथा गान्धारकायणा । पौलस्त्या पोलहाश्चैवातुवगभवास्तथा ॥२ मायाभिमताश्चौपा सपा प्रदरा. शुभाः। अगम्त्यश्च महेन्द्रश्च ऋपिश्चैव मयोभुव ॥३ परस्परमवंवाह्या ऋपय परिकीर्तिता. । पौर्णमामा: पारणाश्च आया परिकीर्तिताः ॥४ अगम्त्यः पौर्णमासश्व पारणश्च महातपाः। परस्परमवैवाह्याः पौर्णमासास्तु पारणः ॥५ एवमुक्तो ऋपोणान्तु वश उत्तमपोरूप । अतः पर प्रवक्ष्यामि किम्मवानय कथ्यताम् ॥६ पुलहस्य पुलस्त्यम्य मोनौवमहात्मन. । अगस्त्यस्य तथा चंवक्य वशम्नदुच्यताम् ॥७ यो मरस्य भगवान् न कहा-अब इसमे आगे मैं अगस्त्य मुनि के वंश में समुत्पन्न द्विजों का दर्णन करता हूं-अगस्त्य-करम्म-कौशल्य- हरट-सुमेजस-मयोभुव-गान्धारकायण-पौलस्त्प-पोलह-ऋतुदश भव- मत्स्यपुराण २१२ ? इन सबके शुभ प्रवर आर्षेय अभिमत है । अगस्त्य-महेद्र धौर भयोभुवं ऋपि ये समस्त ऋषिगण परस्पर मे अभी बाह्य हैं एसा परिकीर्तित किया गया है। पौण मास और धारण आय कीर्तित किये गये हैं । अगस्त्य- पौर्ण मास तथा मान तपस्वी पारण-ये प्रापस मे वियाह करन क योग्य नहीं थे और पौर्ण माम पारणो के साथ विवाह्य नहीं था। इस प्रकार स ऋषियों का उत्तम पौरुप यात्रा वश मैंन कह दिया है । इससे भागे आज क्या कहू आप ही ग्रह मुझ बतलाइये। महर्षि मनु ने कहा- पुलह पुलस् य-ऋतु जो मह न् आत्मा धाला या रथा मगस्त्य का वंश कस हुआ-यही भव बतलाइये ।। १-७।। ऋतू खल्वनपत्योऽभूद्राजन्ववस्वतेऽ तरे । इध्मवाह स पुनवे जग्राह ऋषिसत्तम ॥८ अगस्त्यपुत्र धमज्ञ आगस्त्या व्रतवस्तत । पुलहस्य तथा पुत्रास्त्रयश्च पृथिवीपते ।।६ तेपातु ज म वक्ष्यामि उत्तर यथाविधि । पुलहस्तु प्रजाइष्टवानातिप्रीतमना स्वकाम् । अगस्त्यमहढास्य तुपुत्रत्वेवृतवास्तत पौलाहाश्चतयाराजन् । आगस्त्या प रकीतिता ॥११ पुनस्त्या वयसम्भूतान् दृष्टवारक्ष समुद्भवान् । अगस्त्यस्यसुत धीमान् पुत्रस्वेवृतवास्तन ॥१० पौलस्त्याश्च तथा राजनागस्त्या परिकीतिता । सगोग्रस्वादिमे सर्नेपरस्परमन क्या ।।१३ एते तवोत्ता प्रवरा द्विजाना महानुभावानृपवशवारा। एपातु नाम्ना परिकोतितेन पाप समग्र पुरुषा जहाति ॥११ थी मत्स्य भगवान् में यहाह राजन् ! ववस्वत मक्तर में *तु बिना म तान पाता हुआ था। उस श्रष्ठ अपि ने हमवाह को पुत्रस्य के रूप में ग्रहण किया पा॥८॥ वह धम मा माता भगर य का .
मनुत्स्थ सवादे यर्म वंश वर्णन २१३ पुत्र था। इसके पश्चात् ऋतुगण्य आगस्त्य कहे गये थे। है पृथिवी पते! पुलह के तीन पुत्र थे। बव में उत्तर में ययाविधि उनके जन्म के विषय मे वर्णन करूंगा। पुलह ने अपनी प्रजा को देखा था तो वह अन्यन्त प्रोति युक्न मन वाला नहीं था। इसके उपरान्त उमने दृास्य जगस्त्य से समुत्पन्न को पुरत्व के स्प में वरण कर लिया था। है राजन् ! उसी प्रकार से पोलह आग-त्य परिकीर्तित हुए थे। पुलस्त्य के अन्वय में ममुद्गलो को राक्षमो से ममुभव वाले देख कर धीमान ने अगस्त्य के सुन को हो पुनस्व में वृत कर लिया था I 1॥१०॥११॥२गा तथा हे राजन् ! वे पौलस्त्य लागस्त्य कीर्तिन हुरे। सगोन होने से ये सब परस्पर में अन्वय वाले नहीं थे। ये सब सपो के वशर महानुभाव द्विजों में, प्रवर थे ? इनका वर्णन आपको सुना दिया है ! इनके नामो के कीर्तन से मनुष्य अपने सम्पूर्ण पापो को त्याग देता है ।।१३॥१४॥ ८५-मनुमत्स्य संवादे धर्म वंश वर्णन अस्मिन्वैवस्वते प्राप्ते शृणु धर्मस्य पार्थिव ।। दाक्षायणीभ्यः सकल वा दवतमुत्तमम् ॥१ पर्वतादिमहादुर्गशरीराणि नराधिप!! अरुन्धत्या, प्रसूतानि धर्माद्ववस्वतेऽन्तरे ॥२ अप्टी च वमव पुत्रा सोमपाश्चविभास्तथा। घरोध्रुवश्चसामश्चआपौवानिलानलो ।.३ प्रत्यपरच प्रभामश्च दमोऽष्टो प्रकोतिता। धरम्य पुत्रो द्रविण कात नोभ्रवस्यतु ॥४ कालम्यावयवानान्तु गगेगणि नगधिप!। मृतिमन्ति च कालादि मप्रसूतायनपत. ५ मत्स्यपुराण २१४ सोमस्य भगवान् वर्चा श्रीमाश्चापस्य कीत्यते । अनेकजन्मजनन कुमारस्त्वनलस्यतु ॥६ पराजवाश्चानिलस्य प्रत्यूपस्य तु देवल । विश्वकर्मा प्रभासस्य त्रिदशाना स वधकि ॥७ श्री मस्य भगवान् ने कहा-हे पार्थिव । इस वैवस्वत अन्तर के प्राप्त होने पर दाक्षायणियो से सम्पूर्ण उत्तम अस्मि दैवत वश का श्रवण कीजिएगा ॥१॥ हे नराधिप । इस ववस्वत अतर मे धम्म से अरु धती से पर्वत आदि महा दुर्ग शरीर प्रसूत हुए थे ॥ २॥ आठ वसुगण पत्र-विम के सोमप धर ध्र व-सोम-आप-अनिल-अनल-प्र यूप प्रभास ये सब अष्ट सुगण कोतित किये गये हैं। घर का पुत्र द्रविण हुआ और काल ध्रुव का पुत्र हुआ था । हे नराधिप । काल क अवयवो के शरीर मूरिमान् सम्पूण काल स ही सम्प्रसृत हुए थे ।। ३, ४ ५॥ सोम का सुत भगवान् दर्चा था और जल का पुन धीमान हुआ था-ऐसा कहा जाता है। अनल का पुत्र अनेक जम जना कुम र था। प्रनिल का मात्मज पुरोजदा तथा प्रत्यू प का पुत्र देवल प्रसूत्र हुआ था। प्रभास की पुत्र विश्वकर्मा था तथा त्रिदशो का यह वधक था ॥६,७॥ समीहितकरा प्रोक्ता नागवीध्यादयो नव । लम्बापुन स्मृतोघोपोभानो पुत्राश्चभानव ॥ ग्रहरिणाञ्च सर्वेपामन्येपा चामितौजसाम् । मरत्वरया मरत्व त सपना प्रकीतिता ६ सहपायाश्चसइल्पस्तथापुत्र प्रकीसित । महूर्ताश्च मुहताया साध्या साध्यासुता स्मृता ॥१॥ मनोमनश्च प्राणश्च नरोपानी च वीयवान् । पित्तहार्योऽयापचवमानारायणस्तथा ॥११ विभवापिसभुश्कोवसाध्याद्वादशपातिता । विश्यायाचाषाभावि यदया प्रमादिता ॥१२
मत्स्यपुराण
२१६
पतियतानाधमज्ञ पूज्यास्तस्यापि ता सदा ॥३
अन त वरणयिष्यामि वथा पापप्रणाशिनीम् ।
यथा विमोक्षितो भर्ता मृत्युपासाद्यत लिया।
मद्रपु शाक्लो राजा बभूवाश्वपति पुरा ।
अपुत्रस्तप्यमानाऽमौ पुत्रार्थी सवामदाम् ।।५
आराधयति सावित्रीलक्षिताऽसौद्विजात्तम
मिद्धार्थक हूं यमानासावित्रींप्रत्याद्विज ॥६
शतसस्यश्चनुा तु दशमासागत दिन ।
बात तु दायामास म्वा तन मनुजश्वरम् ॥७
पनिव्रता माहात्म्य मे सावित्री उपाध्यान २९७ सावित्री देवी की समाराधना की थी। सिद्धार्थक द्विजो के द्वारा प्रतिदिन वह सावित्री दवी हूयमान हुई यो ।।६।। वे द्विज शन सम्या वाले थे मोर जव दम मास व्यतीत हा गये तो चतुर्थी के दिन मे समय बाने पर उन मनुजेश्वर को सावित्री न प्रत्यक्ष होकर अपना माक्षात् दमन दिया राजन् ! भक्तोऽसि मे नित्य दास्यामि त्वा मुता सदा । ता दत्ता मत्प्रसादेन पुत्री प्राप्स्यसि शोभनाम् ॥ एतावदुत्तवा सा राज्ञ प्रणतम्यव पार्थिव । जगामादर्शन देवी यथा वै नृप । चञ्चला II मालती नाम तम्यामोद्राज्ञ पत्नी पतिव्रता। सुपुवे तनया काले मावित्रीमिव म्पत ॥१० सावित्र्याहूतया दत्ता तद्रूपमदृशी तया। सावित्री च भवत्वेपा जगाद नपतिद्विजान् ।।११ गालेन यौवन प्राप्ता ददां मत्यवते पिना। नारदम्तु ततः प्राह राजान दीमतेजमम् ।।१० सबत्मरेण नीणाय भविष्यति नपात्मज. । मकृत्वन्या प्रतीयन्तेचिन्तयित्वानराधिप ।।१३ तथापि प्रददौ कन्या मत्मनात्मजे मुझे। सावित्र्यपि च भरिमामाद्य नपमन्दिर ।।१४ सावित्री न वहा~रजन् । आप मेर निन्य ही परम नति करन वाले हैं। मैं भी अति प्रसन्न होकर तुमको एक मुना दूगी । मेरे प्रमाद से दी हुई परम शोमन उस पुत्री को आप प्राप्त कर लेंग ॥ ८॥ ह पाविव । बम क्या इतना ही कहार वह देवा प्रगाम करते हुए गजा ने मामन म अदर्शन को प्रान हा गई यी जम विद्य त छिप जाया करनी है ॥६॥ उम राजा की ए मानना नाम वाली पनिवता पत्नी थी उमन समय मम्प्राप्त द्वान पर पलाव माथाद माविकी मत्स्यपुराण २१८ देवी के सहा तनया को प्रसूत क्यिा या ॥१०॥ समाहुत हुई सावित्री ने उसके ही रूप के समान उसे प्रदान किया था। राजा ने द्विजो से कहा था कि यह नाम से सावित्री हो होये ।।११।। समय आने पर वह यौवन को प्राप्त हो गई थी और उसके पिता ने सत्यवान नाम वाले वर को उसका दान कर दिया था। इसके उपरात देवर्षि नारदजी ने दीप्त तेज वाले राजा से कहा था कि यह नृप का आत्मज एक ही वप मे शीण आयु वाला हो जायगा। नराधिप । भली भाति विचार करके ही वया को एक ही बार प्रदान किया जाया करता है ॥ १२ ॥ १३ ॥ तो भी उस राजा ने द्य म सेन के पुत्र को जो शुभ था अपनी क या सावित्री का दान कर दिया था। उस सावित्री ने भी नप को मदिर मे अपने स्वामी को प्राप्त कर लिया था ॥ १४ ॥ नारदस्य तु वाक्येन दूयमानेन चेतसा । शुश्रूषा परमा चक्र भतृ श्वशुरयोवने ॥१५ राज्याद् भ्रष्ट समायस्तु नष्टचक्षुनराधिप । न तुतोप समासाद्य राजपुत्री तथा स्नुपाम् ॥१६ चतुर्थेऽहनि मत य तथा सत्यवता द्विजा ।। श्वशुरणाभ्यनुज्ञाता तदा राजसुतापि सा ॥१७ चक्र विराम धमज्ञा प्राप्ते तस्मिस्तदा दिने । चारगप्पफ्लाहार सत्यवासु ययौवनम् ॥१८ स्वरेणाभ्यनुनाता याचनाभङ्गभीरुणा । साविया जगामार्ता सह भी महद्वनम् ॥ ६ चतसा दूयमानन गृहह्माना महद्भयम् । वन पन छ भर्तार द्रुमाश्चासदृशास्तथा ।२० आश्वासयामास सराजपुत्री वातावनपविशा नेत्राम् । सदाननाथ द्रुमद्विजाना तथा मृगाणा विपिन नवोर ॥२१ थी माग्दजी क वाक्य स यमान हृदय स उम स वित्री ने धन सावित्री उपाख्यान २.६ में अपने स्वामी और श्वशुर की अत्यधिक शुश्रूषा करती थी ।। १५ ।। राज्य से प्रष्ट-चझुओ के नष्ट हो जाने वाले भार्या मे सयुत नराधिप उस राजपुत्री स्नुषा को प्राप्त करके सन्तुष्ट नहीं हुए थे ॥ १६ ॥ हे द्विजगग ! सत्यवान को आज से चौथे दिन मे मरना है । उम समय में उस राज- सुता को श्वसुर ने अभ्यनुज्ञात किया था अर्थात् आज्ञा थी। उस समय मे उस दिन के आने पर धर्म की ज्ञाता त्रिरात्र ( बत) किया था । थारु पुप्प और फलों के आहार वरने वाले सत्यवान् वन में चले गये थे। याचना क भङ्ग से भयभीत श्वसुर के द्वारा याज्ञा प्राप्त करन वाली वह सावित्री भी अपने स्वामी के साथ हो उस महान् वन को चली गयो यो। बहुत ही दुखित चित्त से उस महान् भय को मन्दर ही दिपाती हुई उमने वन में भर्ता से और प्रमद । से पूछा था। बन मे उसने परम क्लान्त-पद्म के समान विशाल नेत्रो वालो उम राजपुमो को नृवीर ने विपिन मे मृगो तथा दुमो और द्विजों ( पक्षियो) के सन्दर्शन के द्वारा समाश्वासन दिया था ॥ १७ । १८ । १६।२०।२१।। ८७-मावित्री उपाख्यान (१) वनेऽस्मिन् शाहलाकोणे सहकार मनोहरम् । नेत्रघ्राणसुख पश्य वसन्त गतिवर्धन ॥१ चनेऽप्यशोक दृष्टवन रागवन्त मुपप्पितम् । वमन्ती हसतीवाय ममेवायतनोचने । ॥२ दक्षिणे दक्षिणनंता पश्च रम्या वनस्थलीम् । पुष्पितः किंशुकयुक्तावलिनानलमप्रभः ॥३ सुगन्धिकुपुमामोदो वनराजिविगिंत.। करोति वायुर्दाक्षिण्यमावयो क्लमनागनम् ॥
मत्स्यपुराण - के पश्चिमेन विशालाक्षि ! कणिकारः मुषुप्पितः काञ्चनेन विभात्येपा वनराजीमनोरमा ।।५ अतिमुक्तलताजालरुद्धमार्गा वनस्थली। रम्या सा चारसर्वाङ्गी कुमुमोत्करभूपण ॥६ मधुमत्तालिकट्ठारव्याजेन वरणिनी । चापाकृष्टि करोतीव कामः पावें जिघांसया ॥७ सत्यवान् ने कहा-इस वन में जो शाहल से एकदम समाकीर्ण है मनोहर सहकार को तथा नेत्रों एव घ्राण को सुखकर-रति के वर्धन करने वाले वसन्त को देखो ॥१॥ हे ग्रायत लोचनो वाली ! यह वसन्त इस वन में राग से सुसम्पन्न और सुन्दर पुष्पो से समन्वित अशोक को देवकर मानो मेरा उपहास कर रहा है ।। २॥ दक्षिण मे दाहिनी और जलती हुई अग्नि की प्रभा के सदृश प्रभा वाले पृष्पित किशुको ( ढाक वृक्षों से युक्त-परम रम्य इस धनस्थली को देखो।। ३ ।। वन की पंक्ति से निकला हुआ सुगन्धित कुसुमो के आमोद ( गन्ध ) से युक्त यह वायु हम दोनो के बलम के नाश करने वाले दाक्षिण्य को कर रहा है। ॥४॥ हे विशालाक्षि ! पश्चिम दिशा में यह परम मनोरम वनो की राजि सुन्दर पुप्पो वाले कणिकारी से काञ्चन के वर्ण के तुल्य शोभित हो रही है ।। ५ ।। अति मुक्त लतानो के जाल अवरुद्ध मार्गों वाली यह वनस्थली चार ( सुन्दर ) सम्पूर्ण अङ्गो वाली तथा कुसुमों के उत्करो के भूपरणो वाली वहरम्य ललना के तुल्य शोभा दे रही है ॥ ६॥ यह वर- वणिनी के समान ही है और पावं मे कामदेव मारने की इच्छा से चाप का आवपंण मानों कर रहा है ।। फलास्वादलसद्वक्यपुस्कोकिलविनादिता । विभाति चापतिलका त्वमिवंपा वनस्थली ।। कोकिलरचताशखरे मजरोरेणुपिजर. । गदितव्यक्तता याति कुलीनधेष्टितंरिव ॥
सावित्री उपाध्यान
૨૨૬
पुप्परेविलिप्ताङ्गी प्रियामनु सरिद्वने।
सुम कुमुम याति कूजन कामी शिलीमुखः ॥१०
मञ्जरी सहकारस्य कान्तावच्चाग्रपीडिताम् ।
स्वदते बहुपुष्पेऽपि पुस्कोकिलयुवा वने ।।११
काक. प्रसूता वृक्षाग्रे स्वामेकाग्रेण चन्बुना ।
काकी सम्भावयत्येप पक्षाच्छादितनिकाम् ॥१२
शुभाङ्गनिम्नमासाद्य दयितासहितो युवा ।
नाहारमपि चादत्ते कामानान्तः कपिजलः ॥१३
कलविवस्तु रमयन् प्रियोत्सङ्ग समास्थितः ।
मुहर्मुहुविशालाक्षि ! उत्कण्ठयति कामिनः ।।१४
फ्नो के आस्वाद से शोभित मुख वाली कोयलों को ध्वनियों से
विशेप नाद वातो. -चार तिला से सयुत यह वनस्पती तुम्हारी ही तरह
पोभित हो रही है ।। ८ ।। आम्र वृक्ष की शाखाओं के निप' पर मज्जरी
के पराग मे पिजर वर्म वाली वोरिल अपनी मधुर ध्वनि से ही अपने
पेप्टिनो मे कुलीन की भांति ही प्रकटता को प्राप्त हुआ करता है ।।६।।
इम मरिता से समन्वित वन में ग्रह महाकामी भौरा पुष्पों के पराग से
विगेप मासे लिप्न भागों वाली अपनी प्रिया के पौधे पीछे मुन्नार करता
हा फूल से घर पर जाया करता है । वन में यु।। कोषित बहुत प्रकार
रे पुष्पों से समन्वित हाने पर भी कान्ता की भांति अनुपीडित सहकार
को मजरी का मास्वाद लिया करता है ।।१०,११॥ यह बोआ वृक्ष
वे अपमाग मे प्रमूना और पक्षों में आम्दानि पुत्रिया वाली बानी
त्रिया पारी (कोप्रा को पन्नी) से एकाग्र पोच प्याररता है
॥१२॥ काम में समाशाला-दयिता के साथ रहने वाला युवा
परिसर नमाज निम्न को प्राप्त बर माहार भी ग्रहण नहीं कर रहा
है ॥ १४ ॥ हे विलाधि! प्रपनी प्रिया में उन्मन में सम्पित हुमा
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में मेटीहै॥1॥ पर्वतीबाग में सस्थित दोपाधो और बीदगो निदोनो मेनोप्रमा प्राव से गहा मिन-सीई समय में पता मिनमानशेतातो उसको परम प्रमतता गरा पहनीमोर माता पने वाले तथा निता से मसिना पाती है ।।१०। यह हाथी पानी बिहारे अप भाग से मत्स्यपुराण २२२ रमण करने वाला कलवित बारम्बार कामी पुरुष को उत्कण्ठिन कर रहा है ॥१४॥ वृत्तशाखां समारूढः शुकोऽय सह भार्यया । करेण लम्बयन् शाखां करोति सफल शिरः ॥१५ वनेऽत्र पिशितास्वादतृप्तो निद्रामुपागतः । शेते सिंहयुवा कान्ता चरणान्तरगामिनी ॥१६ व्याघ्रयोमिथुन पश्य शलकन्दरसस्थितम् । ययोनॆत्रप्रभालोके गुहाभिन्नेव लक्ष्यते ॥१७ अय टोपी प्रिया लेढि जिह्वाग्रेण पुनः पुनः । प्रीतिमायातिच तयालिह्यमान स्वकान्तया ॥१८ उत्सङ्गकृतमूर्धान निद्रापहृतचेतसम् । मन्तूदरणतः कान्त सुम्पयत्येव वानरी ॥१६ भूमो निपतिता रामा मार्जारो दशितोदरीम् । नवदन्तदशरयेष न च पीडयते तथा ।।.. शाक शशको चाभे ससुमे पीडिते इमे। सलीनगात्रचरणे वर्णव्यक्तिमुपागते ॥२१ वृक्ष वी शाबा पर अपनी प्रिय भार्या के साथ समारूढ़ यह तुक अपने पर सशामा सो सम्मित करता हा शिर यो सपन करता है। ॥ १४ ॥ इस वन में मांस के स्वाद से तृप्त हुआ मिह निद्रा को उपागत हो गया है और उमरी माता उम अपने मा सिंह ने परणी ने मम्म और अपनी सासारा कुन.-]. अग्नी तियाना वाटा है।
सावित्री उपाध्यान २२३ अपहन चेतना वाले अपने कान्त का जन्तुओं के उद्धरण के द्वारा सुखित ही किया करती है ॥ १९ ॥ यह मार्जार भूमि में पड़ी हुई और अपने उदर को दिखाने वाली अपनी रम्या पत्नी को नाखून और दशनों से उसका दशन करता है दिनु उसको किमी प्रकार की पीडा नहीं पहुंचाता है ।। २० ।। ये शशा और शशकी दोनो पीड़ित होकर सो गये हैं। इनके गात्र और चरण संप्रत थे और पानी के द्वारा ही प्रकटता को प्राप्त होते हैं ।॥२१॥ स्नात्वा सरसि पाटय नागस्तु मदनप्रिय. । सम्भावयति तन्वङ्गीमृणालकबल.प्रियाम् ।।२२ कान्तप्रोथसमुत्यानः कान्तमार्गानुगामिनी । करोति कवलं मुस्तैदराही पोतकानुगा ॥२३ दृटाङ्गसन्धिमहिपः कर्दमाक्तसनुवने । अनुप्रजजि धावन्ती प्रियबद्धचतुष्करः ।।२४ पश्य चाङ्गि! सारङ्गत्वं कटाक्षविभावनः । सभायमाहिपश्यन्त कौतूहलममन्दिम् ॥२५ पश्य पश्चिमपादेन रोही कण्डूयते मुखम् । स्नेिहामावालपंत भत्तीरं शृङ्गकोटिना ॥२६ द्रागिमाञ्चमरो पश्य सितवालामगन्तीम् । अन्वास्ते चमरः वामी मान्चपश्यतिगवित. ॥१७ अतिपे गदयं पश्य प्रष्ट भायंया सह। रोमन्यनं प्रकुर्वाण काककुदि वारयन् ।।२८ पद्मों से बाघ सरोवर मे मदन घिय नाग अपनी तन्वङ्गी प्रिया मृगाल के कावली के द्वारा प्रणय का प्रदर्शन पर रहा है । अपने गन्चो के पोधे अनुगमन करने वाली वाराही अपने कान्त के प्रोत्य समुन्यानो से मान के ही मार्ग का अनुमरण करने वाली होती हुई मुस्तों से कवल किया परती है ।। २३॥ वन मे हा प्रङ्गो की सन्धि वाला- २२४ मत्स्यपुराण वीच मे अक्त शरीर वाला और प्रिय बद्ध चतुष्कर महिप धावन करती हुई महिषी के पीछे दौड लगा रहा है ॥२४॥ हे चारु अङ्गो वाली ! तुम इस सारङ्ग को देखो जो अपने कटाक्षा क विभावना से भार्या के सहित एक कौतूहल से युक्त मुझको देख रहा है ॥ २५॥ स्नेह के आई भाव से अपने सीग की नोक से स्वामी का कपण करती हुई रोही अपने पीछे के पैर से मुख को खुजला रही है-इसे भी देखलो ॥२६ ।। बहुत ही शीघ्र इस सित बालो वाली और गमन न करती हुई वमरी को देखिए । यह कामी चमर इसके पीछे है तथा अत्यन्त गवित होता हुमा मुझको देखता है ।। २७ ॥ रोम थन करता हुआ ककुद पर कौए का निवारण करने वाले अपनी भायों के साथ आतप मे प्रकृष्ट इस गवय को देखलो ॥२८॥ पश्येम भार्यया साद्ध न्यस्ताग्रचरणद्वयम् । विपुले वदरीस्कन्धे वदराशनकाम्यया ॥२६ हस सभायं सरसि विचरन्त सुनिमलम् । सुमुक्तस्येन्दुविम्वस्य पश्च व श्रियमुद्वहन् ॥३० सभायश्चक्रवाकोऽय कमला रमव्यग । करोति पद्मिनी कान्ता सुपुष्पा व सुन्दरी ॥३१ मया फल्गेचय सुभ्र । त्वया पुष्पोच्चय कृत । इन्धन न कृत सुभ्र तत्करिष्यामि साप्रतम् ॥३२ स्वमस्य सरसस्तोरे द्रुमच्नया समाथिता। क्षणमाग्रप्रतीक्षस्व विथमस्वच भामिनि ॥३३ एवमेतत्वरिष्यामि मम दृष्टिपथस्त्वया । दूर वान्त । न वतव्याविभेमि गहन वन ॥३४ तत स वाप्ठानि चयार तस्मिन्दन तदा राजसुतासमक्षम् । तस्या ह्यदूरे मरसस्तदानी मेन च सा त मृतमेव राजन् ॥३५ माया साथ म रहन वात्र-दोनो चरणो को आगे त्यस्त सावित्री उपास्थान २२५ करन वाले बेरों के खाने की कामना से विपुल बदरी स्कन्ध मे दोनों चरणो को आगे रखकर स्थित इसको देखो॥२६॥ सुमुक्त इन्दु बिम्ब को श्री को उद्वहन करते हुए भार्या के सहित सरोवर मे सुनिर्मल विचरण करते हुए इस को देख लो ॥ ३० ॥ भार्या के सहित रहने वाला यह चक्रवाक पक्षी जो कि इस कमला कर ( तालाव ) के मध्य में गमन कर रहा है। वह अपनी सुन्दरो कान्ना को सुम्दर पुष्पो वाली पद्मिनी के समान कर रहा है ॥ ३१॥ है सुभ्र ! मैंने तो फलो का उच्चय किया है और तुमने पुष्पो का उच्चय किया है किन्तु हे सुभ्र, हममे से किसी ने भी ई धन एकत्रित नहीं किया है सो अब मैं उसे करूंगा ॥३२॥ हे भामिनि ! तुम इस सरोवर के तट पर स्थित वृक्ष की छाया में समाश्रित होकर रहो और एक क्षण के लिये मेरे आने की प्रतीक्षा करना ॥ ३३॥ सावित्री ने कहा-मैं जैसा भी आप कहते हैं वही करूंगी। आप मेरी दृष्टि से ही मार्ग मे रहेगे अर्थात इतनी दूरी पर हो रहिए कि मैं आपको देखती रहूं। हे कान्त ! आपको अधिक दूर नहीं जाना चाहिए। मैं गहन वन मे डरती हूँ ॥ १४ ॥ भगवान् ने कहा-इसके पश्चात् उसने उस बन मे काप्टो को एकत्रित किया था और उस समय में राजसुता के सामने ही किया था। है राजन् ! उस सर के समीप मे ही उस समय मे उस सावित्री ने उसे मृत ही मान लिया था ॥३५॥ श्री मत्स्य ८८-सावित्री उपाख्यान (२) तस्य पाटयत: काप्ठ जज्ञ शिरसि वेदना । स वेदनातं. सङ्गम्य भार्या वचनमब्रवीत् in आयासेन ममानेन जाता शिरसि वेदना ।
मत्स्यपुराण २२६ तमश्च प्रविशामीव न च जानामि किचन ॥२ त्वदुत्सङ्ग शिरः कृत्वा स्वप्तुमिच्छामि सांप्रतम् । राजपुत्रीमेवमुक्त्वा तदा सुष्वाप पार्थिवः ॥३ तदुरसङ्गे शिरः कृत्वा निद्रयाविललोचनः । पतिव्रता महाभागा ततः सा राजकन्यका ॥४ ददर्श धर्मराजं तु स्वयं तं देशमागतम् । नीलोत्पलदलश्यामं पीताम्बरधरं प्रभुम् ॥५ विद्यु लल्तानिवद्वाङ्ग सतोयमिव तोयदम् । किरीटेनार्कवर्णन कुण्डलश्च विराजितम् ॥६ हारभारापितोरस्कं तथाङ्गदविभूपितम् । तथानुगम्यमानं च कालेन सह मृत्युना ॥७ श्री मत्स्य भगवान् ने कहा- [-- काष्ठ का पाठन करते हुए उस के शिर में बडी वेदना समुत्पन्न हो गई थी। वह उस समय में उस वेदना से समुत्पीड़ित होकर अपनी भार्या सावित्री के समीप मे आकर उससे यह पचन शेला--बिना पास वाले इस काष्ठ-सञ्चय के कार्य करने से मेरे शिर में वेदना समुत्पन्न हो गई है। मुझे ऐसा अनुभव हो रहा है कि किसी अन्धकार में मैं प्रवेश कर रहा हूँ-में कुछ भी नहीं जान पा रहा है कि क्या कारण है । अब तो मैं तुम्हारी गोद में अपना शिर रखकर सोना चाहता हूँ । वह पार्थिव उस राजपुत्री सावित्री से इस प्रकार से कह पर सो गया था ॥१, २, ३।। उसके उत्सङ्ग में अपना मस्तक रख कर वह निद्रा से आविल (मलिन) लोचनों वाला हो गया था। इसके अनन्तर उस महाभागा राज कन्या पतिव्रता ने स्वयं ही उस स्थल पर समागत हुए धर्म राज को देखा था जो नील कमल के दल के समान श्याम वर्ण पाला-पीताम्बर धारी-विचल्लता से निवद्ध बङ्ग वाले जल से युक्त मेष थे. सहा था तथा मूयं समान वर्ण वाले किरीट और पुण्डली से पौमित था। यह धर्मराज उरःस्थल में हारों के भार से भूपित था सावित्री उपास्यान २२७ तथा भुजाओं मे अङ्गद धारण किये हुए था और उसके पीछे काल मृत्यु स्तथ में चला आ रहा था | स तु संप्राप्य तं देशं देहात्सत्यवतस्तदा। अंगुष्ठमा पुरष पाशवद्ध वशंगतम् ॥ आकृष्य दक्षिणामाशां प्रययौ सत्वर तदा। सावित्र्यपि वरारोहा दृष्ट्वातं गतजीवितम् ॥ अनुवव्राज गच्छन्तन्धमंराजमतन्द्रिता। कृताञ्जलिरुवाचाथ हृदयेन प्रवेपता ॥१० इमं लोकं मातृभक्त्या पितृभक्त्यातु मध्यमम् । गुरु सुथ पया चव ब्रह्मलोक समश्नुते ।।११ सर्वे तस्यादृता धर्मा यस्यतेत्रय आताः। अनाहतास्तु यस्यतेसर्वास्तस्याफला.क्रिया ॥१२ यावत्ययस्तेजीवेयुस्तावनान्यं समाचरेत् । तेषां च नित्यं शुश्रूपा कुर्याप्रियहिते रतः ॥१३ तेपामनुपरोधेन पारतन्ध्यं यदाचरेत् । तत्तनिवेदयेत्तभ्यो मनोवचनकमभिः ।। त्रिवप्येतेषु कृत्य हि पुरुषस्य समस्यते ॥१४॥ पह धामराज उस स्थल पर पाकर सत्यवान चे शरीर से उस समय में अंगुष्ठ मात्र जो लिङ्ग शरीरधारी पुरष था उसको पानावद्ध करके अपने वश मे कर सोचार शीघ्रता से दक्षिण दिशा की भोर उसी समय पल दिया था। वह वरारोहा सावित्री भी उस अपने स्वामी को जीवित रहित देशार प्रतन्द्रित होती हुई उसी के पोछे अर्याद गमन करने पाले घमंरान के पौधे २ पल दी पी। इसरे उपरान वह हाप गोड़ परसपते हुए हृदय से यह बोली-11८, ९, १०॥ यह जीवारमा माता की भक्ति सम सोको-पिता की भमि से मध्यमको और पी सुपूषा से ब्रह्मलोर को प्राप्त शिरता है। उस पृथ्ष ने सभी । -
मत्स्यपुराण
२२८
का समादर कर लिया है जिसने इन तीनो ऊपर बनाये हुए धर्मों को पूर्ण
कर लिया है । जिसने इन तीनो का प्रादन नहीं किया है उसकी समस्त
अ य क्रियाएं बिल्कुल ही फलहीन हुआ करती हैं । जब तक ये तीतो हो
जीवित हैं तब तक अन्य किसी का समाचरण नहीं करना चाहिए । जो
प्रिय के हित मे रत है उसे उनकी नित्य ही शुश्रू पा करनी चाहिए । उनके
अनुपरोध से जब भी पारत-त्र्य का माचरण करे वह-वह सब उनको
मन बचन और कम के द्वारा निवेदन कर देना चाहिये । पुरुप का इन
तीनो मे भी पूर्ण कृत्य स्थित रहा करता है ।।११-१४॥
कृतेन कामेन निवर्तयाशु धर्मा न तेभ्योऽपि हि उच्यते।
ममोपरोधस्तव च क्लम स्यात्तथाऽधुना तेन तव ब्रवीमि ॥१५
गुरुपूजारतिभता त्वञ्च साध्वी पतिव्रता ।
विनिवतस्व धमज्ञ । ग्लानिभवति तेऽधुना ॥१६
पतिहि दवत स्त्रीणा पतिरेव परायणम् ।
अनुगम्य स्त्रिया साध्व्या पति. प्राणधनेश्वर ॥१७
मितन्ददाति हि पिता मित भ्राता मित सुत ।
अमिनस्य च दातार भार का न पूजयेत् ॥१८
नीयते यत्र भर्ती मे स्वय वा यन गन्छति ।
मयापि तत्र गन्तव्य यथाशक्ति सुरात्तम । 111
पतिमादाय गच्छन्तमनुगन्तुमह यदा।
त्या दव । न हि शक्ष्यामि तदा त्यक्ष्यामि जीवितम्।।२०
मास्विनी तु या याचित् वैधव्याक्षरदपिता।
मुहर्तमपि जीवेत मण्डनार्हा ह्यमण्डिता ।।११
वृत बाम रा अब तुम अति शीप निवृत हो जानो उनमे लिये भी
पाम नही है-यह कहा जाता है। मेरा परोध और तुम्हारा पलम (श्रम)
हागा। अब इसी कारण मैं दोसता हूँ॥१५॥ भाप तो गुरवण
नि बाली--शाम्बी और पनिषता है। है पम ! यहां
सावित्री उपाख्यान
२२६
आप वापिस लौट जाइये। अब आपको बहुत ग्लानि हो रही है ।।१६।।
सावित्री ने कहा -स्त्रियो का परम देवना पति ही होता है और पति ही
परायण होता है। अतएव साध्वी स्त्री के द्वारा प्राण धनेश्वर पति का
सर्वदा अनुगमन करना चाहिए ।।१७। स्त्री को उसका पिता परिमित हो
दिया करता है - भाई और सुत भी स्त्री को परिमित हो दिया करते
हैं। अपरिमित का दाता अपने स्वामी का पूजन कोन सी स्त्री नहीं करेगी?
।।१८॥ है सुरोतम ! जहा पर मेरे स्वामी को ले जाया जा रहा है
अथवा स्वय आप जहां पर जा रहे हैं । मुझको भी यया शक्ति वही पर
जाना चाहिए ॥१६॥ जब मैं मेरे पति को लेकर गमन करने वाले आपका
हे देव ! मैं अनुगमन नहीं कर सकू गी तो मैं अपने भी जीवन का त्याग
कर दूगी ॥२०॥ जो कोई भी मण्डन के योग्य मनस्विनी स्त्री जब
वैधव्य के अक्षरो से दूषित होकर अमण्डित हो जाती है तो वह एक
मुहूर्त भर भी जीवित रहेगी ? ॥२२।।
पतिदते ! महाभागे ! परितुष्टोऽस्मि ते शुभे ।।
विना सत्यव्रत प्राणवरंवरय माचिरम् ॥२२
विनष्टचक्षुपोराज्यञ्चक्षुपा सह कारय ।
च्युतराष्ट्रस्य धर्मज्ञ | श्वशुरस्य महात्मन ॥२३
दूरे पथे गच्छ निवतं भद्रे । भविष्यतीद सकल त्वयोक्तम् ।
ममोपरोधस्तव च क्लम स्यात्तथाधुना तेन तव ब्रवीमि ।।२४
यमराज ने कहा-हे पनिवते ! हे महान भाग वाली । हे शुभे !
तुम
बहुन
हो सन्तुष्ट हो गया है। अब तुम सत्यवान् क प्राणो के
बिना अन्य कोई भी वरदान मुझस मांग लो और अधिक विलम्ब मत
सावित्री ने कहा-हे धम्मज्ञ
विनष्ट नेली वाले
मेरे महान् प्रात्मा वाले श्वसुर को जिनका कि राज्य व्युत हो गया है
बब आप उनको आँखो क महित पुन, राज्य प्राप्त करा दोजिये ॥३॥
यमराज हा-है पढ़े। दर मार्मम तुम चली जाओ और वापिस
करो॥२२॥
मत्स्यपुराण २६० लौट जाओ। जो आपने कहा है वह सभी कुछ हो जायगा । अब मैरी ओर से रोक होगी और तुमको परिश्रम होगा इसीलिए मैं उक्त तुमसे यह कह रहा हूँ ॥२४॥ बह-सावित्री उपाख्यान (३) कुत: क्लमः कुतो दुखः सद्भिः सह समागमे । सतान्तस्मान्न मे ग्लानिस्त्वत्समीपे सुरोत्तम ! ॥१ साधूनां वाप्यसाधूनां सन्त एव सदागतिः । नवासताः नैव सतामसन्तो नवमात्मनः ।।२ विधाग्निसपंशस्त्रोभ्यो न तथा जायते भयम् । अकारणं जगद्वैरिखलेभ्यो जायतेयथा ॥३ सन्तः प्राणानपि त्यक्त्वा परार्थ कुर्वते यथा । तथाऽसन्तोऽपि सन्त्यज्य परपीड़ासु तत्परा. ॥४ त्यजत्यसूनयं लोकस्तृणवद्यस्य कारणात् । परोपघातशक्तास्त परलोकन्तथा सतः ॥५ निकायेषु निकायेपु तथा ब्रह्मा जगद्गुरुः । असतामुपधाताय राजान ज्ञातवान् वयम् । नरान् परीक्षयेद्राजा साधून सम्मान येत्सदा । निग्रहश्चासतांकुर्यात्स लोके लोकजित्तमः ।।७ -सत्पुरुषों के माप समागम होने पर दु.ए बहा है और बालम भी रहा है। हे गुरोत्तम ! आपके समीप मे जो कि मापुरष है मुझे तो यिस्कुल भी ग्लानि नहीं होती है। साधु पुरुष हो भपया प्राणु मन हों इन गयी सात ही मा गति प्रा करते हैं पनि राममा उदार मन हो fण मस्त है। ओ अमत है वे को सावित्री ने कहा- सावित्री उपाख्यान सत्पुरुषो कान असत्पुरुपो का और अपने आपका ही उद्धार किया करते हैं असन्तो मे उद्धार करने की कोई भी क्षमता ही नहीं हुआ करती है।॥२॥ विप-अग्नि--सर्प और शस्त्र से उतना भय नहीं होता है जैसा बिना ही कारण के इस जगत् के वैरी खलों से भय उत्पन्न हो जाया करता है । सन्त पुरुप तो अपने प्राणों का भी परित्याग करके सदा दूसरो के अयं को पिया करते हैं उसी भांति असन्त पुरुष भी प्राणो तक परि- त्याग कर दूसरो को पीडा देने में परायण रहा करते हैं ॥३, ४॥ यह लोक जिसके कारण से प्राणो को तिनके के समान त्याग देता है। उसी प्रकार से सत्पुरुष जो परायो उपघात में समर्थ होते हैं वे परलोक को भी त्याग दिया करते हैं ।।। उमी प्रकार से इस जगत् के गुरु श्री ब्रह्माजी ने निकाय-निकायों में असत्पुरुषो के उपद्यात के लिये स्वयं ही राजा को भात किया है ॥६॥ राजा का कर्तव्य है कि वह नरो को परीक्षा करे और सदा साधुपुरषो का सम्मान करना चाहिए। जो रजा अमत्पुरुषों का निग्रह किया करता है और उमको ऐसा करना भी चाहिए क्योंकि उसका यह कर्त्तव्य भी है वही इस लोक में लोको का परम श्रेष्ठ जेता होता है ।। निग्रहेणासता राजा सताच परिपालनम् । एतावदेव कर्तव्य राज्ञा स्वगंमभीप्सुना HS राजकृत्य हि लोकेपु नास्त्यन्यज्जगतोपते । अमता निग्रहादेव सनाञ्च परिपालनात् ।। राजभिश्चाप्यशास्तानामसतां शामिता भान् । तेन त्वमधिको देगे देवेभ्यः प्रतिनमामि मे।।१० जगत्तु धायनेमद्भिसतामग्यस्तयाभवान् । तेन त्वामनुयान्त्या मे क्लमादेर ! न विद्यते ॥११ तृप्टोऽम्मि ते विशालाक्षि । वचनंघमंसगतः । विना मन्यवत प्राणाद् वर वरय मा चिम् ॥१२ मत्स्यपुराण २३२ सहोदराणा भ्रातृणां कामयामि शत विभो!। अनपत्य. पिता प्रीति पुत्रलामात् प्रयातु मे ॥१३ तामुवाच यमो गच्छ यथामतमनिन्दिते !। औध्वंदेहिककार्येषु यत्न भतु:समाचर ।।१४ असतो का निग्रह और सत्पुरुषो का परिपालन करने से वह वस्तुतः राजा कहलाने के योग्य होता है जो स्वर्ग की प्राप्ति करने का इच्छुक है उस राजा का यही इतना कर्तव्य होता है । हे जगतीपते ! लोको मे राजा का यही कृत्य होता है इसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है असतो का निग्रह और सतो के परिपालन का क्त्तव्य हो तो राजाओ का पापं हुआ करता है। राजाओ के द्वारा भी जो शासित नहीं होते हैं उन असतो वे सदके शासन करने वाले फिर आप होते है। इसी कारण से मुझे तो समस्त देवो से भी अधिक देव आप ही प्रतीत हो रहे हैं । 11८1६ । १० ।। यह जगत तो सत्पुरुषो के द्वारा ही धारण पिया जाता है और उन सत्पुरुषो मे आप सब प्रधान है। इसी कारण से आपके पीछे अनुगमन करने वाली मुझको हे देव । कोई भी बलम नही होता है। यमराज ने कहा- हे विशालाक्षि तुम्हारे इन धर्मसङ्गत वचनों से मैं तुमसे परम सन्तुष्ट एय प्रमन्न हो गया हूँ। सत्यवान के प्राणो को छोडवर अन्य जो भी आप चाहे वह वरदान मुझसे मांगलो। विमान मन परो ।। ११ । १२ ।। सावित्री ने कहा है विभो ! मैं अपने मो महोदरी के प्राप्त करने की कामना रखती हूँ। मेरे पिता सन्तान होन हैं मो वे पुत्री के नाम गे प्रसन्न हो जाये । पिर यमराज ने उम गावित्री में बहा है अनिन्दिनं ! अब तुम जिा मार्ग से आई हो पापिग पलो जायो और अपने स्वामी रे ओ देहि रायमरने मे पस्न परी ॥१.१४ ।। नुगन्तुमय दायरल्या लोकान्तरं गतः । पतिव्रतागि नेन त्य महतं मग यास्यसि ॥१५ मत्स्यपुराण माता पर्थिवी की मूत्ति है और भाई तो अपनी आत्मा को ही मूत्ति हो है ॥२१॥ जन्मना पितरौ क्लेश सहेते सम्भवे नणाम् । न तस्य निष्कृति शक्या कर्तुं वपशतरपि ॥२२ तयोनित्य प्रिय कुर्यादार्यस्य तु सवदा । तेष्वेव त्रिषु तुष्टेषु तप सर्व समाप्यते ॥२३ तेषा त्रयाणा शुक्रपा परमन्तप उन्यते । न च तैरननुज्ञातो धममन्य समाचरेत् ॥२४ तएव हि यो लोकास्तएव त्रय आश्रमा । तएव च वयावेदास्तथैवोक्तास्त्रयोऽग्नय ॥२५ पिता व गाहपत्योऽग्निर्माता दक्षिणत स्मृत । गुरुराहवनीयश्च साग्निता गरीयसो ॥२६ विपु प्रमाद्यते नपु त्रीन् लोकान् जयते गृही। दीप्यमान स्ववपुषा देववदिवि मादते ॥२७ कृतेन कामेन निवर्त भद्रे । भविष्यतीद सकल त्वयोक्तम् ममोपरोधस्तव च बलम स्पाद तयाऽधुना तेन तवब्रवीमि ।।८८ मनुष्यों के समुस न होने मे उसके माता-पिता जाम से ही पूर्ण क्लेश को सहा करते हैं उस फ्लेश की निष्कृति मनुष्य सौ वर्षों में भी महीं कर सकता है ।।२२।। अतएव मनुष्य का यह परम कत्तव्य होता है वि उनका नित्य ही उसे प्रिय करना चाहिए तथा जो आचाय्य हो उसका भी सर्वदा प्रिय करे। इन तीनो के तुष्ट होने पर ही मनुष्य का सभी प्रकार का तप समाप्त हो जाया करता है। वे तीनो ही उमके तीन लोग है-ये सी11 उमो 117 आश्रम हैं-ये तीनो ही तीन वेद हैं तथा ये ही सीन मनुष्य की तीन पग्नियां हैं। पिता गाहपत्य अग्नि-माता ददि- नाग्नि मोर गुर आहवनाय अग्नि है। यह सबसे बड़ी तीन अग्नियो बाला वह माना जाना है। इन सोना व विपय म कभी भी प्रमाद नही नाना पाहिए । जो समापन करता है यह गृहो तीनो लोकों - सावित्री उपाख्यान २३५ को जीत लिया करता है और अपने शरीर की कान्ति से वह दीप्यमान होता हुआ देव के ही समान दिवलोक मे आनन्द का अनुभव किया करता है ॥२३-२७॥ यमराज ने कहा-हे भद्रे ! कृत काम से निवृत हो जाओ जो तुमने कहा है वह सम्पूर्ण हो जायगर । मेरी भोर से उपरोय होगा और तुमको श्लम होगा। इसी से तुमसे यह मैं बोलता हूं ॥२८॥ १०-सावित्री उपाख्यान (४) धर्माजने सुरश्रेष्ठ ! कुतो ग्लानिः क्लमस्तथा । त्वपादमूलसेवा च परम धमकारणम् ॥१ धर्माजनन्तया काय पुरुपेण विजानता । तल्लाम. सवलाभेभ्यो यदा देव विशिष्यते ॥२ धर्मश्चार्थश्च कामश्च त्रिवों जन्मन: फलम् । धर्महीनस्य कामाथी बन्ध्यासुतसमौ प्रभो ! ॥३ धर्मादधस्तथा कामो धर्माल्लोक्प तथा। धर्मएकोऽनुयात्येन यन क्वचन गामिनम् ।।४ शरीरेण सम नाश सर्वमन्यद्धि गच्छति । एको हि जायते जन्तुरेकएव विपद्यते ॥५ घमस्तमनुयात्येयो न सुहृन्न च बान्धवाः । क्रियासौभाग्यलावण्य सर्व धर्मेण लभ्यते॥ ब्रह्मन्द्रीपेन्द्रशन्दुययाग्न्यिनिलाम्म साम् । वस्वश्विधनदाद्याना ये लोका. मवकामदाः ।। हे सुरश्रेष्ठ! धर्म के अजंन करने में ग्लानि और स्लम क्यो होगा? आपरे चरणो को भूल सका ही परम धर्म या कारण है ॥१॥ विशेष शान रखने वाले पुरम 1 उस) झाति से धमरा भजन करना मत्स्यपुराण २३६ । में मे से चाहिए। हे देव । जबकि उस धर्म का लाभ सभी प्रकार के सामा विशिष्ठ हमा करता है ॥२|| धम्म-अथ और काम यही त्रिवर्ग मनुष्य जम का परम फल होग है । हे प्रभो ! जो धर्म से हीन पुरुष है उसके काम और अथ यध्या के सुनो के ही समान हुआ करते हैं ॥३॥ धम से अयं तथा काम और धर्म से दोनो लोक होते हैं । जहा पर भी यह गमन करता है उसक पीछे एक धम्म हो अनुगमन किया करता है ।।। मय सभी कुछ शरीर के ही साथ मे नाश को प्राप्त हो जाया करता है । यह जतु एक ही अकेला समुत्प न हुआ करता है और एक ही अवेला मृत्यु को प्राप्त होता है ॥५॥ जब यह मृ युगत होता है तो उस समय केवल एक मात्र धम्म ही उसका अनुगमन किया करता है । उस समय न तो कोई मित्र साथ मे जाया करता है और न वाधव ही उसके साथ जाते है । क्रिया-सौभाग्य और रूप लावण्य ये सभी कुछ धम्म के द्वारा ही प्राप्त किये जाया करते है ।।६।। ब्रह्मा-इ द-उपे द्र-शव--दु- यम --अक–अग्नि-अनिल-जल--वसु- अश्विनी कुमार और धनद आदि वे जो समस्त कामनाओ के प्रदान करने वाले लोक हैं इनकी प्राप्ति मनुष्य धम्म के ही द्वारा किया करता है । हे पुरुषो के अत करने वाले । धर्म से ही मनोहर द्वीप और सु दर सुख देने धनो को यह पुरुष प्राप्त परता है ।।७॥ धर्मेण तानवाप्नोति पुरुष पुस्पान्तक । मनोहराणि द्वीपानि वर्षाणि सुसुखानि च ॥ प्रयान्ति धर्मेण नरास्तथैव नरगण्डिका । नन्दनादीनि मुरयानि देवोद्यानानियानि च ॥६ तानि पण्यन लायन्ते नाक्पृष्ठन्तथा नरं । विमानानि विचित्राणि तथवाप्सरस शुभा ॥१° तनमानि सरोगसदा पुष्पवतापलम् । राज्य नपतिपूजा च यामसिस्तिथेप्सिता ॥११ सावित्री उपाध्यान ! मस्काराणि च मुरणानि फलपुण्यस्य दृश्यते । स्वमवंयंदण्टानि चण्डाशुसदृशानिच ॥१२ चामराणि सुराध्यक्ष ! भवन्ति शुभमणाम् । पूर्णेन्दुमण्डलाभेन रलाशुविकाशिना ॥१३ धार्यतां याति दृोण नरः पुण्येन कर्मणा। जयशवस्वरोधेण सूतमागधनिः स्वनः ।। मनुष्य धर्म के द्वारा हो मरगण्डिका को प्राप्त किया करने हैं मोर नन्दन यादि मुख्य देवो के जो उद्यान है उनम चले जाया करते हैं । पुण्य के द्वारा ही इन मबको प्राप्ति होती है तथा मनुप्यो के द्वारा नाक- पृष्ठ को भी प्राप्त किया जाता है। विचित्र विमान तथा परम गुन अप्सराऐं और तेजम शरीर यादि सब सदा पृष्य वालो का ही पर है । गग्य - नृपतियों के द्वारा पूजा-ईमित काम सिद्धि एव मुख्य मस्कार यह सभी पुण्य का ही पल दिखाई देता है। हे सुराध्यक्ष ! सावर्ण एव वैदूर्य के दण्ड जो कि मूर्य के ही समान हैं और चामर इन सबकी प्राप्ति होना शुभ कम्मो का ही पल होता है । पूर्ण चन्द्र की बाभा वाले और रत्नामुक विनाशी छत्र धारण करने का अवसर मनुष्य पुग्ध कर्म के द्वारा ही प्राप्त किया करता है। जयकार बतलाने वाले गधी क स्वर- समूह में तथा मूत और मागधो को ध्वनियों से ममदिन भी मनुप्य पुण्य पर ही होता है ।।६-४।। वरासन सभृङ्गार फल पुण्यस्य कर्मण. । वरानपान गीतञ्च भृत्यमाल्यानुलेपनम् ॥१५ रत्नवस्त्राणि मुरयानि फल पप्पम्य क्मण. । रूपौदार्यगुणोपेतास्त्रियश्चातिमनोहरा ।।१६ वामः प्रामादपृष्ठेषु भवन्ति भुभव मिग । सुवरगकिङ्किणोमिप्रचामरापोडधारिणः । १७ वहन्ति तुरगा देव नर पुण्येन कर्मणा।
प्राह्मगका अभ्यर्चन-इन्द्रियो के ऊपर विजय-मरसरता का अभाव- मत्स्यपुराम २३८ तस्य द्वाराणि यजनन्तपोदानन्दमः क्षमा ||१८ ब्रह्मचर्य तथा सत्यन्तीर्यानुभरण शुभम् । स्वाध्यायसेवासाधूना सहवास: सुराचथम् ॥१६ गुरूणां चैव शुश्रू पा ब्राह्मणाना च पूजनम् । इन्द्रियाणा जयश्चव ब्रह्मचयममत्सरम् ॥२. तस्मादमः सदा कार्यानित्यमेव विजानता। नहि प्रतीक्षते मृत्युः कृतमस्य च वा कृतम् ।।२१ मृङ्गार के सहित बरासन भी पुण्य कर्म का फल होता है श्रेष्ठ अन्न-पान-गीत-मृत्य-मात्य और अनुलेपन-रल औ वस्त्र इस प्रकार की मुख्य वस्तुऐ प्राप्त होना भी परम पुण्य कर्म का फल होता है । रूप लावण्य एव अनेक सद्गुणो से सम्पन्न अतीव मनोहर स्त्रिया-वडे महलो में निवास शुभ कम वालो को ही होता है । हे देव सुवर्ण की किंकणी से मिश्रित चामर एव प्रापीड के धारण करने वाले तुरग मनुष्य को पुण्य कर्म से वहन किया करते हैं। उस पुरप के द्वार- यजन - तप-दान-दामा- ब्रह्मचर्य-सत्य-शुभ तीर्थानुभरण-स्वा- ध्याय-साधु सेवा-सहवास-सुरो का अर्चन-गुरुवर्ग की सुश्र पा - भी इन सबकी प्राप्ति गुण्य कम्मं के द्वारा हुआ करती है ॥ १५, १६, १० ८, १६, २०॥ इस कारण से शानवान पुरुषो को नित्य ही धर्म का समाचरण करना चाहिए क्योकि मृत्यु इसके कृत तथा अमृत की कुछ प्रतीक्षा नहीं पिया करती है।॥२१॥ बालएनचरेदमममित्य देव ! जीवितम् । मोहि जानाति स्याद्यमृत्युरेवापतिप्यति ॥२ पश्यतोम्यस्य लोकस्य मरण प रत स्थितम् । अमरस्येव परितमत्याश्वयं सुरोत्तम । ।।२३ युवरवापेक्षया बालोवृद्धत्वापेक्षया युवा ।
सावित्री टपाथ्यान २६ मृत्योमत्सङ्गमास्टः म्यविरः किमपेझते २४ तत्रापि विण्डन्दितस्त्र.ण मृत्युनातस्यका गतिः । न भयमरणञ्चंवप्राणिनाममय क्वचित् ॥ तत्रापि निर्भया: सन्तः सदा मुकृतकारिणः ॥२५ तुप्ठोऽस्मितेविशालाक्षि ! वचनंधममगतः । विना सत्यवतः प्राणान् वरवरयमाचिरम् ॥२६ वरवामि त्वया दत्तं पत्राणा शतमोरनम् । अनपत्यस्य लोकेषु गतिः किल न विद्यते ॥२० वृतेन कामेन निवतं भद्रे! भविष्यतीद सकल ययोत्तम । ममोपरोधस्तव च क्लमः म्यात्तथाधुना तेन तव ब्रवीमि ॥२- है देव ! बालक को ही नित्य धम्नं का आचरण करना चाहिए क्योंकि यह बीदिन अनिार है। कौन जानता है कि दिनको मृत्यु आज ही या जायगी। इम लोक के दैवते ही हुए मौत सामने स्थित रहा करती है। हे सुरोतम! देव के समान इमरा चरित होता है-यही महान आश्चर्य की बात है। युवावस्या में स्थित को बोला दालक और दृढता वो अपेक्षा युदा इन मृत की गोद में समाहट हो रहा है । जो एक्दम स्थविर है वह फिर किम अवस्या को अपेक्षा किया 'ता है। ॥२,२३,२५॥ उम दगा में भी यु के द्वारा कान की प्राप्ति करने वाले उसको का गति होगी। मरण नप नहीं है। प्राणियों को अभय का है। जो सुन के करने वाले है वे वहाँ पर भी महा मन्त पुरुष निमप होत है ॥२॥ यमराज ने कहा-है विशालाक्ष ! तुम्हारे धम्मं मे सद्गा वरनों से प्रत्यन ही परितुष्ट हो गया हूं किन्तु सत्यवान के प्राणों को छोडकर मोम ही मुममराई मा वरदान मांगने । सावित्री ने कहा है भगवन् ! आप द्वारा दिये हुए सौ और पुत्रों का वरदान मैं चाहती हूं क्योंकि जो सन्तान ने हीन है उसकी लोगो म कोई भी गति नहीं है। यमराज ने कहा-हे मोअब वेरा गाम पूर्ण हो गया है
मत्स्यपुराण
२४०
तुम वापिस लौट जाओ। जो भी तुमने कहा है वह सभी हो जायगा।
साथ चलने मे मेरा उपरोध ( रुकावट ) है और तुमको व्यर्थ श्रम होता
है। इसी से मैं तुमसे यह बोल रहा हूँ ।। २६,२०,२८।।
११-सावित्री उपाख्यान (५)
धर्माममंविधानाज्ञ! सर्वधमंप्रतक!।
त्वमेव जगतो नाथः प्रजासयमनोयमः ।।:
कर्मणामनुरूपेण यस्माद्यमयसे प्रजाः ।
तस्मा प्रोग्यसे देव ! यम इत्येव नामतः ॥२
धर्मणेमाः प्रजा सर्वा यस्माद्रश्जयसे प्रभो!।
तस्मात्तं धमराजेति नाम सद्भिनिगद्यते ॥३
सुकृतं दुष्कृतचोभे पुरोधाय यदाजनाः ।।
तत्सकाशमृता यान्ति तस्मात्त्व मृत्युरुच्य से ।।
काल कलाद्ध कलयन् सर्वेषां त्वं हि तिष्ठसि ।
तस्मात् कालेति ते नाम प्रोच्यते तत्त्वदशिभिः ॥५
सर्वेपामेव भूतानां यस्मादन्तको महान् ।
तस्मात्त्वमन्त कः प्रोक्तः सर्वदेवमहाद्युते ! ॥६
विवस्वतस्त्वं तनयः प्रथम परिकीर्तितः।
सस्मताद्वैवस्वतोनाम्ना सर्वलोकेषु कथ्यते ।।
सावित्री ने कहा- है सब धर्मों के प्रवत्तक! आप तो धर्म के
मर्म पा जो.विधान है उसके माता है और माप ही इन जगतों के नाप
है तथा प्रमाा, संयमन परने वाले यम है ॥१॥ कर्मों के अनुरूप
गिग वारण से थाप प्रजोओ का मन किया करो है हे देव ! इस
पारण "यम" - इस नाम से आपको पुकारा जाया करता है । हे
सावित्री उपाख्यान
२४१
प्रभो। क्योकि धर्म के द्वारा इन समस्त प्रजामो का आप रञ्जन किया
करते हैं इसी से सत्पुरुषो के द्वारा आप "धर्मराज "--इस नाम से पुकारे
जाया करते हैं ।। २, ३ ॥ जब मनुष्य सुकृत और दुष्कृत इन दोनो को
आगे रखकर मृत्युगत होकर आपके समोप मे जाया करते है इसी कारण
से आपको “मृत्यु"
-इस नाम से कहा जाया करता है। काल को
कलाद्धं फलन करते हुए सबके मध्य में आप स्थित रहा करत हैं इसी
कारण से तत्त्वदशियो के द्वारा "काल यह नाम आपका कहा जाता
है। क्योकि सभी प्राणियो के आप महान मात कर देने वाले हैं इसी
कारण से हे महायुते । समस्त देवो के द्वारा आपका अन्तक' कहा गया
है । माप विवस्वान् के पुत्र प्रथम कहे गये हैं इसीलिये समस्त लोको में
'वैवस्वत-इस नाम से आपको कहा जाता है ।।४-७॥
भायुष्ये कर्माण क्षीणे गृहणासि प्रसभञ्जनम् ।
तदा त्व कथ्यसे लोके सवप्राणिहरेतिदे 14
तव प्रसादाद्देवेश । सरो न प्रजायते ।
सता सदा गतिर्देव ! त्वमेव परिकोतित ।
जगतोऽस्पजगन्नाथ । मर्यादापरिपालक ।
पाहि मा ग्रिदशश्रेष्ठ दुखताशरणागताम् ।
पितरौ च तवास्य राजपुत्रस्य दुखितो ॥१०
स्तवेन भक्त्याधर्मश मया तुप्टेन सत्यवान् ।
तव भर्ता विमुक्तोऽयलब्धकामाबजावले ॥११
राज्य कृत्वा त्वया साद्ध वत्सराशोतिपञ्चकम् ।
नाकपृष्ठमथारुह्य विदश सहरयते ।।१२
त्वयि पुत्रशतञ्चापिसत्यवान जयिष्यति ।
ते चापिसवें राजान क्षत्रियास्त्रिदशोपमाः। १३
मुख्यास्त्वनाम पुत्रास्या भविष्यन्ति हि शाश्वताः ।
पितुश्च ते पुत्रशत भविता तव मातरि ॥१४
भी दीप पाहो जायगी ।।१५।१६ ॥मारय भगवाने पहा-इतना मत्स्यपुराण ૨૪૨ यमराज यह सत्यवान् तुझमे सौ पुत्र समृत्पन आयुष्य मे कर्म के क्षीण होने पर आप मनुष्य को बलपूर्वक ग्रहण किया करते हैं उस समय मे लोक मे आप "सवं प्राणिहर" इस नाम से कहे जाते हैं । हे देवेश ! आपके प्रसाद से सङ्कर नही होता है । हे देव सत्पुरुषो को सदा आप ही गति कीर्तित किये गये है। है जगन्नाथ । भाप इस जगत् के मर्यादा के परिपालक हैं। हे देवो मे परमश्रेष्ठ! शरणागति मै समागत दुखिता मेरी रक्षा करो। इस राजपुत्र के माता पिता इसी भांति परम दुखित हो रहे हैं ॥८, ६, १०॥ कहा-हे धमझे ! तेरे इस स्तव से और भक्तिभाव से तुष्ट हुए मेरे द्वार तेरा स्वामी सत्यवान छोड दिया गया है। हे अबले ! अवलब्ध का पाली तुम यहाँ स चली जाओ। यह अब तेरे साथ राज्य का सुख भो कर पिचासी वष तक जीवित रह कर फिर अन्त मे स्वर्ग पर समारोहण कर देवो के साथ रमण करेगा। परेगा। वे भी सब देवताओ के समान क्षत्रिय राजा लोग होगे । तुम्हार माम से पुत्रो की आख्या वाले प्रमुख एव शाश्वत होगे और तुम्हारी माता मे तुम्हारे पिता से भी एक सौ पुत्र उत्पन्न होगे ॥ ८, ६, १०, ११॥ १२, १३, १४॥ मालव्या मालवानामशाश्वता पुत्रपौत्रिण । भ्रातरस्ते भविष्यन्तिक्षत्रियास्त्रिदशोपमा ॥१५ स्तोत्रणानेनधमज्ञ ! कल्पमुत्याय यस्तु माम् । पीतयिष्यति तस्यापिदीर्घमायुभविष्यति ॥१६ एतावदुत्ता भगवान् यमस्तु प्रमुच्य त राजसुत महात्मा ! अदशन सत्र यमो जगाम वालेन साद सह मृत्युना च ।। मालपों के माम वाले मालवो में शाश्वत पुन एप पौत्र होगे। थे देवों के ममान उपमा पाने क्षत्रिय तेरे भाई होगे। हे धर्म ! को पुष्प प्रात.पारन में उठार इस स्तोत्र के नारा मेरा वीसन करेगा उसकी सावित्री उपाम्यान २५३ कहकर महात्मा भगवान् यमराज ने उस राजपुत्र को छोडकर वहीं पर वह यमराज काल और मृत्यु के साथ ही प्रदर्शन को प्राप्त हो गये थे।१७॥ १२-सावित्री उपाख्यान (६) सावित्री तु ततः साध्वीजगामवरणिनी। यथा यथा गतेनैव यत्रासीत्सत्यवान् मृतः॥१ सा समासाद्य भर्तारं तस्योत्सङ्गगतं शिरः । कृत्वा विवेश तत्वङ्गो लम्बमाने दिवाकरे ॥२ सत्यपानपि निर्मुक्तो धर्मराजान्छन. शनः । उन्मोलयत नेत्राभ्यां प्रास्फुरच्च नराधिप ! ॥३ ततः प्रत्यागप्राण. प्रिया वचनमब्रवीत् । क्वासो प्रयातः पुरुयो यो मामप्यपकर्षति ॥४ न जानामिवगरोहे ! कश्चासौपुरुप.शुभे। वनेऽस्मिन्चारसर्वाङ्गि ! सुप्तस्यचदिनगतम् ॥५ उपवासपरिधान्ता दुःखिता भवती मया । अस्मदुहृदयेनाद्य पितरो दुःखितो तथा । द्रष्टुमिच्छाम्यहं सुभ्र ! गगने त्वरिता भव ॥६ श्री मरस्य भगवान ने कहा-इसके बनसर वर वलिनी साधी सावित्री से मार्ग से गयी थी और जहाँ पर मृत सत्यवान था वैसे हो वह पत्नी गयी थी। उसने अपने स्वामी को प्राप्त करके जिसका गिर उसके गोद में पा इस तरह से उसरे गिर को रखकर दिवाकर के सम्नमान होने पर उस तन्वङ्गो ने उस स्थल पर प्रवेश किया था॥१॥ ॥२॥ सत्यवान का जीवात्मा धर्मराज से घोरे धीरे निर्मुक्त होकर है नराधिप! उसने नेत्रों का उन्मोचन लिया था और वह of our मत्स्यपुराण २४४ इसके पश्चात् प्रत्यागत प्राण वाला वह होकर अपनी प्रिया से यह वचन धोला-~-वह पुरुष कहां चला गया जो मुझको भी अपकर्षित कर रहा है। है वरारोहे । हे शुभे । मैं नहीं जानता हू यह कौन पुरुष था । हे चार- सर्वाङ्गि । आज इस वन मे सोते हुए मुझको पूरा दिन व्यतीत हो गया है । मैंने उपवास से परिश्रा त आपका भो दुखित किया है । हमारे बुरे हृदय से आज हमारे माता-पिता भी बहुत दुखित हुए हैं । हे मुध्र ! मैं माता पिता के दर्शन करना चाहता हूं अब गमन करने मे शीघ्रता वाली हो जाओ । ३-६॥ आदित्येऽस्तमनुप्राप्ते यदि ते रुचित प्रभो ।। आथमन्तु प्रयास्याव श्वशरोहीनचक्षुपी ।।७ यथा वृत्तश्च तव शृणु वक्ष्ये यथाश्रमे । एतावदुक्त्या भर्तार सह भर्घा तदा ययौ ।। बाससादाश्रम चैव सह भर्ता नृपात्मजा। एतस्मिन्नय काले तु लब्धचक्ष महीपति घमासन सभायस्तु पयतप्यत भागव ।। प्रियपत्रमपश्यन्वं स्नुपाञ्चयाप वर्शिताम् ॥१० भाग्वाम्यमानस्तु तथा स तु राजा तपोधनं । ददर्श पत्रमाया त स्नुपया सह मानने ।।११ सावित्री तु पराराहा मह सत्यवता तदा । पदन्द तन राजानसभार्य समपुङ्गवम् ॥१२ परिप्वत्तस्तदा पिना सत्यवान् राजनादन । अभिवाच सप्त सर्वान् यन सस्मिस्तपाधना ॥१३ उयास तम गौ रात्रिमूपिभि रावधमवित् । गाविध्यार जगादाय यथावृत्तमादिसा ॥१४ नावीने पहा प्रभो ! भगवान सूप भरलता बो माने पर परिवार पाहा तो भायम गवास पर यि जात है 11 १५,६,१७ १८ १९ २०, २१॥ न वापर १४६ मत्स्यपुराग उज्जहार वरारोहा भतृ पक्ष तथैव च । मोक्षयामास भर्तार मृत्युपाशगत तदा २० तस्मात्साव्य स्त्रिय पूज्या सतत देववन्नर । तासा राजन् । प्रसादेन धायते व जगत् यम् ।।२१ तासान्तु वाक्य भवतीह मिथ्या न जातु लोकेषु चराचरेषु । तस्मात्सदा ता परिपूजनीया कामान सममानभिकामयान ॥२२ उसी रात्रि मे जो महावत ग्रहण किया था उसको समाप्त किया या। इसके अनन्तर सभी जन उस राजा की स्त्रियो के समीप मे सेना के सहित तुय वाद्यो से समन्वित राज्याय के लिये निम त्रण मे वहाँ पर समागत हुए और उस समय मे उ होने प्रकृति शासन को विज्ञापित किया था। हे नृपते । नेत्रहीन आपका जिसने पहिले राज्य अपहृत किया था उस राजा को आपक ही अमा या ने मार डाला है और अब आप ही उस पुर के राजा हैं। यह श्रवण करके वह राजा द्य म सेन चतुरङ्गी वल के साथ वहाँ पर चला गया था और महा मr मराज से अपने सम्पूर्ण राज्य को पुन प्राप्त कर लिया था। वराङ्गना सावित्री ने भी सो भाइयो की प्राप्ति करली थी। इस प्रकार से उस परम साध्वी पति प्रत्ता ने जो नप की आमजा थी अपने पिता के पक्ष का भी उद्धार कर दिया था तथा उस वरारोहा ने भाइयो के पक्ष का भी उद्धार कर दिया। उस समय में पातिव्रत के महान प्रबलतम वल स अपने भाको मृत्यु पे परम घोर पाप से मुक करा लिया था। इसी कारण से मनुष्यो का पूजा करनी चाहिए । ह राजन् । उनके ही प्रसाद स य तीनो भुक्न धारण 1 लोम कभी भी उन मतमध्वो महिलामो कपन मिथ्या नहीं हुआ परख है मो कारण स मम्घूण वासनामा यो प्राप्त करन वाल मनुष्यो र हरा मदा रन नारिया को अन्यचना पवश्य ही करना चाहिए । -
अभिपित्त राजा का कृत्य वर्णन
१४७
६३-अमि पक्त राजा का कृत्य वर्णन
राज्ञोऽभिषिक्तमात्रस्य किनुकृत्यतमं भवेत् ।
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व सम्यग्वेत्तियतोमवान् ॥१
अभिषेकाशिरसा राज्ञा राज्यावलोकिना।
सहायवरण कार्य तत्र राज्य प्रतिष्ठितम् ॥२
यदप्यल्पतरं कर्म तदप्यवेन दुश्चरम् ।
पुरुपेणासहायेन किम राज्य महोदयम् ॥३
तस्मात्महायान् वरयेत् कुलीनान्नृपतिः स्वयम् ।
शूगन् कुलोनजातीयान् बलयुक्तान् श्रियान्वितान् ॥
स्पसत्वगुणापेतान् सज्जनान् समयान्वितान् ।
कशक्षमान् महोत्साहान् धमज्ञाश्च प्रियवदान् ॥५
हितोपदेशकानराज्ञ स्त्रामिमक्तान्यशोऽर्थिनः ।
एवविधान्साहायाश्चशुभकर्मसु योजयेत् ।।६
गुणहीना आप तथा विज्ञाय नृपतिः स्वयम् ।
कर्मस्वैव निय ब्जीत यथायोग्येषु भागशः ॥७
महपि मनु ने कहा-जिस राजा का राज्यासन पर अभिषेक कर
दिया जावे उस अभिषिक्त नृपति का नया तय है क्योरि केवल उसका
भरमा पर ही हमा है। यह सभी कुछ मुझे बतलाइये क्योंकि आप
तो सभी युछ को भली भांति जानने हैं ॥१॥ श्री मत्स्य भगवान ने
पहा-अमिर के द्वारा भीगे हुए मस्तर वाले धौर राज्य के कार्यों के
देघने वाले राजाको वाहिए कि पहम प्रतिदिन राज्य में वहां पर मपनी
सहायमा परने वालों का वरण परे ॥ २॥ पाहे बहुत ही छोटा सा भी
बोई कार्य हो रितु वह मा एक द्वारा पूर्ण कर लेना महान कटिन
हमा परता है जिम पुरप का कोई भी सहायर न हो। यह साधारण
म माधारण कामे के विषय में भी ऐसा ही देखा जाता है किन्तु राम्र
मत्स्यपुराण २४% शासन तो महान् उदय वाला एक परम विशाल कार्य है ॥ ३॥ अतएव नृपति को स्वयं ही कुलीन सहायको का वरण करना चाहिए वे सहायक ऐसे होने चाहिए जो शूरवीर हो-अच्छे कुल और उत्तम जाति में समुत्पन्न होने वाले हो- -बल से सम्पन्न एव श्री से समन्वित होवे ॥४॥ राजा को अपने सहायको के वरण करने में देखना चाहिए कि वे रूप और सत्त्व गुण से युक्त हो-सज्जन हो- -क्षमा से सयुक्त होमलेशों के सहन करने में समर्थ हो-महान उत्साह वाले हो--धर्म के माता हो-प्रिय वचन बोलने वाले हो । राजा को सदा हित का उपदेश करने वाले-स्वामी के परम भवन और यश क चाहने वाले हो। इस तरह फे भली भांति खूब देखभाल कर सहायको का वरण राजा को करना चाहिए और फिर उनको शुभ कर्मों में योजित करना चाहिए । बो गुणों से हान हा इनका भी राजा स्वय जानकर यया योग्य का में भाग करके नियुक्त करना चाहिए ॥५,६,७॥ कुनीन शाल सम्पन्नो धनुर्धेदविशारद । हस्तिशिक्षाध्यशिक्षासु कुशल प्लक्ष्णभाषिता । निमित्त शकुने जाते वैत्ताचंव चिक्तिसिते । पृता पमगा शूरस्तथा वनेशराहोएजुः ।। प्यूहतरिधाना फ गुसारविशेषवित् । गसामनापति कार्यों ब्राह्मण क्षत्रियोऽयया ॥" प्रामु गुरुपा दसरप प्रिययादीन गोश्तः । पित्तप्राश्च सपा प्रतीहारो विधीयते ।।११ पघातगादी दूत स्याहाभापाविशारद । सापोणगहो वा.गी दालविभागवित् ।।१२ विमानादागामश्च दागम्यामहाशित । यता न गाय य पागदता पतभवेत् ।।१३ प्रागा सायना मृग हटापा निभा ।
अभिपिक्त रोजा का कृत्य वर्णन
राज्ञा तु रक्षिण. कार्या. सदा क्लेशसहा हिताः ।।१४
सेनापति राजा का एक परम सहायक अङ्ग होता है। वह कैसा
होना चाहिए यह बतलाया गया है। राजा का सेनापति-शोल स्वभाव
से
युक-धनुर्विद्या का सहान् विद्वान-हाधियो और अश्वो की शिक्षा मे
परम प्रवीण कोमल और मधुर मापण करने वाला-शकुन के निमित्तो
का जानने वाला-चिकित्सा के विषय का ज्ञाता-कृता-की से शूर-
क्लेशो का सहिष्णु-मरल-गूढ तत्वो के विधान का ज्ञाता-निरर्थक एव
सार के तत्वो का जानबार ऐसे अनेक गुणो से विशिष्ट सेना का स्वामी
राजा को बनाना चाहिये क्योकि सेना ही राज्य एव प्रजा की रक्षा करने
बालो होती है और सेनापति उसका प्रधान होता है। वह सेनापति
जाति का ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय होना चाहिए। वह प्राशु-मुन्दर रूप
वाला-दक्ष और प्रियवादी होना चाहिये उद्धत स्वभाव वाला उसको नहीं
रहना चाहिये । राजा का दून समो के चित्त को ग्रहण करने वाला और
प्रतीहार बनाना चाहिये । दूत को जैसा भी कहा जाये वही रहने वाला
तथा देश भाषा का विद्वान होना चाहिए । जा राजा का दून हो उसको
शक्तिशाली-लेतो का सहन करन वाला-वाग्मी-देश और काल के
विभाग का ज्ञान रखने वाला तथा देश एवं काल का विमाता होना
आवश्यक है। जो जिसके काल में वक्ता नहीं है यही दूत राजा का
हाना है ।। ८,६, १०, ११, १२, १३ ॥ राजा को अपनी रक्षा करने
वाले ऐमे ही व्यक्तियो को करना चाहिए जो प्राशु-व्यायत-मूर इ
भस-निराल-सदा क्लेशो के महन करने के स्वभाव वाले तथा हित
हा।।१".
अनाहार्यो नशसश्च इनुमक्निश्च पाथवे ।
ताम्बलधारी भवति नाग वाथ तद्गुणा ।।१५
याद्गुण्यविधितत्वज्ञो देशमायाविशारद.।
मधिविग्रहक कार्यों राजा नविशारद ॥१॥
सा-प्राण-रद भवितासा-समुसि पल म मुलग्न-रवीर-यो
मत्यपुराण
२५०
कृताकृतज्ञो भृत्याना ज्ञेयः स्याद्देशरक्षिता।
आयव्ययज्ञोलोकज्ञो देशोत्पत्तिविशारदः ॥१७
सुरूपस्तरुण प्राशु द्वंढभक्ति कुलोचित.।
शूरः क्लेशसहश्चैव खड्गधारी प्रकीतितः ॥१३
शूरश्च बलयुक्तश्च गजाश्वरथकोविदः ।
धनुर्धारी भवेद्राज्ञः सर्वक्लेशसह शुचि ॥१६
निमित्तशकुनज्ञानी हयशिक्षाविशारदः ।
हयायु र्वेदतत्त्वज्ञो भुवोभागविचक्षण. ॥२०
बलावलज्ञो रथिन स्थिरदृष्टि प्रियम्वदः ।
शूरश्च वृतविद्यश्च सारथि. परिकीर्तितः॥२१
राजा का साम्बूलधारी अनाहार्य-अनुशप्त और गजा में हर
भक्ति वाला होना चाहिये अथवा उन्ही गुणो वाली पुरुष न होकर
ताम्बूनधारिणो नारी भी हो सकती है ॥ ५॥ राजा के द्वारा पाडगुण्य
विध सत्व का ज्ञाता-दश भापा या विद्वान् और नीति शास्त्र या
पण्डित, गघि एप विग्रह करन वाला नियुक्त होना चाोि । देश का
रमिता भूत्यो रे कृत और भकृत के जानन याम्य होवे । जो आय और
प्पय का गाना हाना है वह लोर का वेत्ता तथा देश की उत्पत्ति का
मनीपी मनुष्य होना पाहिय । रामा का यहधारी गुन्दर हर वातार
अभिषिक्त राजा वा कृत्य वर्णन
२५१
विषय मे भलीभांति विज्ञता रखना हो। म्पिर दृष्टि वाता-घिर जानन
वाला-पूर-कृतविद्य हो ।। १७-२१॥
अनाहाय. मचिदक्षञ्चिकित्सितविदाम्बरः।
सूमशास्त्राविगेपनः सूदाध्यक्षः प्रशम्पते ॥२.
सूदशस्त्रविधानना: परभेद्या कुलोद्गताः ।
सर्वे महानसे धार्याः कृत्तवेगनग्या नगः13
समः गायीच मिवेच धर्मशास्त्रविशारदः।
विप्रमुख्यः कुलीनश्च धर्माधिकरणी संदेट 152
कार्यास्तथाविधास्ता द्विजमुम्मा ममामः।
सवर्दशाक्षराभिनाः मवमास्त्रविशार"
लेखक. कथितोगन: मर्वाधिक
शोपोपतान् सुमम्पूर्णान् ममनिमा
मान्तरावं लिमेद्यम्नु नेपामा
पायवाक्यमल: मयंगा.
बर्यता चापन नम:,
पम्पान्तरतत्त्वमा प्राटा2-25
मत्स्यपुराण
२५२
जो शोपको से सर्मा वत-सुसम्पूर्ण-सम और समान धणी मै गत
अ तरो को लिखा करता है। है नृपोत्तम । जो बहुत ही योडे में बहुत
बडे अधिक अथ का कहने वाला हो-उपाय वाक्यो मे कुशल हो और
समस्त शास्त्रों का महा पण्डित हो ऐसा ही लेखक होना चाहिये । जो
दानदाता हो वे भी राजा के द्वारा ऐसे पुरुषो को नियुक्त किया जाना
चाहिये जो दूसरे पुरुषो के अतर को पहिचानने वाले हों अर्थात् अ ये
के हृदय के तत्वा के ज्ञाता हो-प्राशु एव अलोलुप भी होवे ॥ २३ ।
२५ २६ २७, ८॥
धर्माधिकारिण कार्या जना दानकरा नरा ।
एवम्विधास्तथा कार्या राज्ञा दौवारिका जना । २६
लोहवस्त्राजिनादीनारत्नानाञ्च विधानवित् ।
विज्ञाताफल्गुसाराणामनाहाय शुचि सदा ॥३०
निपुणश्चाप्रमत्तश्च धनाध्यक्ष प्रीस्ति ।
आयद्वारेषु सर्वेषु धनाध्यक्षसमा नरा ।।३१
व्यवहारेषु च तथा क्तव्या पृथिवीक्षिना।
परम्परागतो य स्यादष्टाङ्ग सुचिकित्सिते ॥३२
अनाहाय स वद्य स्यात् धर्मात्मा च कुलोद्गत
प्राणाचाय स विज्ञ या वरणात्तस्य भूभुजा ॥३३
गाजन् । राना सदा कायं यथाकार्य पृथक जन ।
स्तिशिक्षाविधाननो वनजातिविशारद ॥३४
कोशक्षमस्तयाराजा गजाध्यक्ष प्रशस्यते ।
तैरव गुणयुक्त स्वासनश्च विद्यापत ॥३५
उपयुक्त गुणणे म दिगिप्ट नर हा दान परल वाले धर्माधिकारी
निपसरा पा । राजा ये तारामी मार दीवारों की
नियुक्ति करनी चाहिए ना सार-यात्र--अनि मा-ि--नों ही
विnिy II भर जाना-या पातु पगु भोर या मारा?
अभिपिक्त राजा का कृस्य वर्णन
२१३
समम्त आयक
है-इसके ज्ञाता अनाहार्य-सदा शुचि-निपुण और अप्रमत्त मनुष्य
हो राजा क धन (कोप) का अध्यक्ष होना चाहिए ।
द्वारो म धनाध्यक्ष क तुल्य हो नर नियुक्त होने चाहिए !! २६,३०,१॥
व्यय हारों में भी राजा को उसी प्रकार के मनुष्यो की नियुक्ति, करनी
चाहिए। जो अप्दामों में मनी भौति चिकित्सा का मान रखता हा-
परम्पग से समागत हो-यत्मिा-अच्छे कुल में प्रमुस्पन्न हो जोर
अनाहाय्यं हो वही पुरुष राजघर मे देद्य होने का अधिकारी होता है ।
राजा के द्वारा वरण से उमका वह प्राणाचार्य जानना चाहिए । है
राजन् राजा के द्वारा सदा बनो से पृयक यया कायं वन जाति का
पण्डित और हाथियों को शिक्षा के विधान का ज्ञाता एव क्लेशो के मन
करने में समय ऐसा गजा का गजाध्यक्ष परम प्रसस्त माना जाता है और
इन्हीं गुणों से समन्विन अपन आसन दाना भी विशेष रूप के प्रशस्त होता
है ।।३२, ३३, ३४, ३५॥
गजारोही नरेन्द्रम्य मवकर्मसु शम्यते।
शिक्षाविधानश्चिकित्सितविशारदः ॥३६
अश्वाध्यक्षो महीभत्तुं. स्वासनश्च प्रशस्यस्ते ।
अनाहार्यश्व शूरश्च तथा प्राप्त. कुलोद्गतः ॥३७
दुर्गाध्यक्ष स्मृतो रान उक्तः सवकममु।
वास्तुविद्या विधानशो लघुहस्ती जितश्रम. ॥३८
दोघदर्शीच सरदच स्वपति परिकीर्तितः ।
यन्यमुक्त पाणिमुक्त विमुक्त मुक्नधारिते ॥३६
अम्प्राचार्यों निम्द्वेगः कुशलश्व विशिष्यते ।
वृद्ध. कुलोद्गतः मूक्त पितृपंतामह ाँच ॥४.
राजामन्त पुराप्यतो विनोच तयेप्यने
एव सप्ताधिरारेषु पुरपाः सप्त ते पूरे ॥४१
परीक्ष्य चाधिकार्या स्यू रामा सर्वपु कमंसु ।
पास पर पुर में सात पुरुप राजा के द्वारा मली भौति परीक्षा करके
नियाग पोग्पक्तियत पाय पुत यम् ।।४५
मरस्यपुराण
२५४
स्थापनाजातितत्त्वज्ञ सततं प्रतिजाग्रता ||४२
राजा का गज पर समारोहण करने वाला सभी प्रकार के कम्म
मे प्रशसनीय होता है । अश्वो की शिक्षा के विधान का जानने वाला
तथा चिकि सा के विषय मे पण्डित राजा का अश्वो पर रहने वाला
अध्यक्ष और स्वासन प्रशस्त माना जाता है। अनाहाय और शूर तथा
प्रान एव अच्छे कुल मे उत्प न राजा का दुग का अध्यक्ष कहा गया है
जो सभी प्रकार के कर्मों में उद्युक्त रहा करता है। वास्तु कला की
विद्या मे महा पण्डित-हलके हाथ वाला-श्रम को गोत लेने वाला-
दोघदर्गी और शूर स्थपति कोसित किया गया है । य त्र मुक्त मै-पाणि
मुक्त मे-विमुक्त मे और मुक्त धारित में प्रस्त्राचाय उद्व ग से रहित
एव कुल विशिष्- हुमा करता है। पिता-पितामह से चले जाने
वाला-पवित्र-वृद्ध तथा कुलीन सूक्त एव विनीत राजाओ का अ त पुर
का अध्यक्ष अमाप्ट हुआ करता है । इस प्रकार से इन स त अधिकार के
भधिकार योग्य नियुक्त करना चाहिये जो कि सभो की मे उपयुक्त
हाव और सभी वमों में निरतर प्रति जाग्रत और जाति के नस्व के ज्ञाता
को इनका स्थापन करना चाहिए ॥३६-४ ॥
रान्न स्थादायुधागारे दक्ष वमसु चाद्यत ।
कर्माण्यपरिमेयानि राशो नुपकुलोढह ! ४३
उत्तमाघममध्यानि युद्ध्वा कर्माणि पार्थिव ।
उत्तमाघममध्येपु पुरपेषु नियोजयेत् ॥४१
नरममविपर्यागाद्राजा नाशमवाप्नुयात्
गात्वा वृत्तिविधात या पुरुषाणा महीक्षिता ।
पूरपा तारिजानतत्त्वसायि धात् ।।४६
घमिमन्त्रयावाम राजा मत पथक पृथय ।
अभिपित राजा का कृत्य वर्णन मन्त्रिणामपि नो कुर्यात्मनिमन्त्रप्रकाशनम् ॥४७ क्वचिन्न कम्य विश्वासो भवतीह मदा नृपाम् । निश्चयत्तु सदामन्त्र कार्यएक्न सूरिणा ॥४. भवेद्वा निश्चयावाप्ति. परवुद्ध्युपजीवनात् । एक्स्यद कार्यमतुभूय. कार्यों विनिश्चयः ॥४ नृपति के अायुधों के भागार में ऐसा हो व्यक्ति नियुक्त किया जाना चाहिये जो दक्ष हो और सभी सम्मों में उद्यत रहता हो। है नप कुलोदह ! रारा के यहां उसके अपरिमेय कन्म हा करते हैं । पिव का क्तव्य है कि वो की उनम-मध्यम और बत्रम अंगियों को मा पर ही तत्तम-मध्यम-अधम पुष्पों में से ददनुसार ही पुरपी को निया- रित करे । यदि उत्तम कम में मध्यम और मध्यम कर्म में उत्तम पृप को विपर्याय में नियुक्ति की जावेगी तो इस विरोखता से नृप का नाम हो जायेगा। गवा को नियोग-पौरप-नि-न-चौब-दुल और नर इन सबको भली भांति सम्म बूझ कर है पुग्यों की वृनिका विधान करना चाहिये और दूसरे पुलों के पितान एवं नत्वमार के विवधन से हो नियुक्ति करने की निदान आवम्यादा होती है ॥ ४३,४५,४५, ४६ ॥ राग को चाहिए कि वह पृपान्या वहन में लोगों में स्वच्दया मात्रा करे और अपने मन्त्रियों में भी अपने मन्त्र का प्रागन कमी नहीं करना चाहिए ॥४७॥ इम मनार में राधानोराकी पर भी किमी का विकास नही हुआ करता है और मदा पिमो भी एक मूरि म अपने विचारनीय मन्त्र में निारय पर मना चाहिए। मरवा राजाको अपने निम्बर की प्राप्ति पर दुधिर जीवन में किमी की जमे हो हो जाये तो भी पुनः उमा यि निम्दर बवाद ही छ.यो रे द्वारा भी करना चाहिये ।।४८,॥ ग्राह्मगान पर पामोत ममाम्यनिस्चिनान् । नामछान्यवनो मुटाम्नेह मोरस पटराः॥५०
मत्स्यपुराण
वृद्धान् हि नित्य सेवेत विप्रान् वेदविद शुचीन् ।
तेभ्य शिक्षेत विनय विनीतात्मा च नित्यश ।५१
समग्रा वशगा कुर्यात् पृथिवी नात्र संशय ।
वह्वोविन याद्भ्रष्टा राजान सपरि-छदा ॥५२
वनस्थाव राज्यानि विनयात्प्रतिपेदिरे ।
गैविद्यभ्यस्त्रीविद्या दण्डनोति च शाश्वतीम् ॥५३
आन्वाक्षिको त्वात्मविद्याम्बारिम्भाश्च लोकत ।
इन्द्रियाणा जये योग समातिष्ठेद्दिवानिशम् ॥५४
जितेन्द्रियोहि शक्नोति वोस्थापयितु प्रजा ।
यजेतराजा बहुभि प्रतुभिश्च सदक्षिणं ॥५५
धर्मार्थचय विप्रेभ्यो दद्याभोगानधनानि च ।
साम्यस्मरियमाप्तश्च राप्दादाहारयेलिम् ॥५६
अभिपिक्त राना का कृत्य वर्णन
सीखने मे समास्थित होना चाहिए ॥ ५३, ५४|| जो राजा इन्द्रियो पर
नियन्त्रण रखर जितेन्द्रिय होता है वह अपनी प्रजा को वश मे रख
सकता है। राजा का परम कर्मन्य है कि वह दक्षिणा से सयुत्त बहुत से
क्रतुओ के द्वारा यजन किया करे । धर्म और अर्य के लिये विप्रो को भोग
एव धनो का दान देना चाहिए । प्रति सम्वत्सरो तथा मासों के हिसाब से
उसे राष्ट्रों से वलि मा आहरण करना चाहिए ॥५५, ५६॥
स्यात्स्वाध्यायपरोलोके वर्तेतपितृवन्धुवव ।
आवृत्तानागुरुकुलातद्विजानापूजकोभवेत् ॥५७
नपाणामक्षयो ह्यप विधिर्वाह्मोऽभिधीयते ।
ततस्तेनानवा मित्रा हरन्ति न विनश्यति ।।५८
तस्माद्राशा विधातव्यो ब्राह्मो व ह्यक्षयो विधिः ।
समोत्तमाधम राजा ह्याहूय पालयेत्प्रजा. १५६
न निवर्तत सम्रामात् क्षात्रं व्रतमनुस्मरन् ।
सग्रामेस्वनिवतित्व प्रजाना परिपालनम् ॥६०
शुश्रूषा ब्राह्मणनाञ्च राज्ञा निश्रेयसम्परम् ।
कृपणानाथवृद्धाना विधवानाम्न पालनम् ॥६१
योगक्षेमञ्च वृत्तिञ्च तथैव परिकल्पयेत् ।
वर्णाश्रमव्यवस्थान तथाकार्य विशेषत. ॥६२
स्वधर्मप्र-युतान् राजा स्वधर्म स्थापयेत्तथा।
आश्रमेपुतथा कार्यमान तैलध्व भाजनम् ।।६३
नृप
को लोग मे सर्वदा स्वाध्याय परायण होना चाहिए और
प्रजाजनों में सबके साप तदनुकूल पिता एव बन्धु क तुल्य ही व्यवहार
करे । जो दिन गुरुकुलो से अपनी अवधि पूर्ण कर वापिस आवें उनकी
पूजा राजा को बरनी चाहिए ।।५७॥ राजाओं के लिए यह विधि अक्षय
एव ग्राहा हो जाती है । इससे वह अनव मित्रो का हरण किया करते है
सपा भी विनाश को प्राप्त नही होता है। अतएव राजा को इस
मत्स्यपुराण विशेष प से वणी एवं आथमो की व्यवस्था का कार्य सम्पन करना करके कत्तंव्य से च्युत हो गये हैं उनको पुन अपने उचित धर्म के मार्ग पर राजाको स्थापित करना चाहिए। जो आथम वासी हैं उनके आश्रमो में अन्न-नल मोर भोजन आदि की व्यवस्था नप कोही बर देनी चाहिए २५० ॥६०-६३॥ अक्षय विधि को करना ही चाहिए । राजा का कर्तव्य है कि वह सम- उत्तम और अधमो के द्वारा समाह्वान कर प्रजाजनो का पालन किया फरे ।।५८, ५६। नप को कभी भी अपने क्षत्रियो के व्रत एव धम का स्मरण करते हुए सग्राम से मुह नही मोडना चाहिए । समामो मे अनिवृत्त होना भी प्रजा का पूण परिपालन ही होता है। प्राह्मणों की शुश्रूषा राजाओ के कल्याण करने वाली परम श्रेय ही होती है। राजा का कर्तव्य है कि जो कृपण-मनाय-वृद्ध एव विधवा हो उनका भली भांति पालन करे और उनका योग क्षेम तथा वृत्ति की परिकल्पना कर देवे । राजा का नितान्त आवश्यक पाय है । जो मनुष्य अपने घम का त्याग स्वयमेवानयेद्राजा सत्कृतान्नावमानयेत् । तापसे सयकार्याणि राज्यमारमात्मनमेवच ।।६४ निवदयत्प्रयत्नेन देववच्चिरमचयत । दप्रो वदितध्ये च प्रज्वी वा च मामयं ॥१६ गृहत्वम याङ्गानि रक्षेद्विवरमात्मन । म विश्वसेदविश्वस्तेविश्वस्तेनातिविश्वसेत् ।।५७ विश्वासाद्भयमुत्पन मलादपि नियन्तति । विश्वास चाप्यपरतन्तत्यभूतेन हेतुना ॥६८ पश्चिन्तयेद गिवच्च पराक्रमे । वृपयापापि तुम्पत पासवाच विनिक्षिपेत ॥६६ महारी भयत तथा शूरव नृप । चित्राारस्य सिगिवतमयतस्तथा यवत् ।।
अभिषिक्त राजा का कृत्य वणन २५६ आश्रमो मे जो आवश्यक वस्तुएँ हो उनको व्यवस्था राजा को स्वय ही पानयन कर करनी चाहिए। जो सत्कार करने के याग्य पुरुष हैं उनका कभी भूलकर भी राजा को अपमान नहीं करना चाहिए । राजा को अपने समस्त काम्य-राज्य और अपने आपको भी तपस्वियो के लिये समर्पित कर देना चाहिये और प्रयत्न पूर्वक निवेदन करके देवो की भांति हो चिरकाल पर्यन्त उनकी अभ्यर्चना करे। मनुष्यों के द्वारा दो प्रकार की बुद्धियो का ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिये जो कि ज्वी और वक्रा नाम वाली कही जाया करती हैं। जो वक्रा वुद्धि है उसका ज्ञान प्राप्त करके उसे कभी भी सेवन नहीं करना चाहिए । जव भी वह आकर वत्रावुद्धि उपस्थित तो उसका प्रातबाध कर देना चाहिए । ऐसे ढग से रहना चाहिए कि कोई भी दूसरा इसक छिद्र को न जान सके और दूसरे के छिद्र को स्वयं ममझ ने ॥६४, ६५, ६६|| अपन गुप्त अङ्गो की मौत हो अपने कर्म को गोपनीय रखना चाहिये तथा अपने आपके छिद्र की रक्षा करे। जो पुरुष विश्वास करने के योग्य नहीं है उस पर कभी विश्वास नहीं करे किन्तु जो विश्वास का पात्र हो उस पर भी प्रत्य- धिक पूर्ण विश्वास नहीं करना चाहिए । विश्वास के घात से जा भय समुत्पन्न होता है वह मूलो का भी छेदन कर दिया करता है। तत्त्वमूल हेतु से दूसरे को भी विश्वास दिला देना चाहिए ॥६७, ६८।। बगुला की भाँनि अर्यों का चिन्तन करे और सिंह के समान परामम स यत्न करे। वक (भेडिया) के तुल्य लुप्त होकर हिप जावे तथा शश के सदृश विनिक्षेप करन वाला होवे । नृप को एक गूकर के समान दृढ प्रहार करने वाला होना जाहिये । शिखि के तुल्य चित्रकार तथा कुत्ते के तुल्य हदमक्ति वाला होना चाहिए ॥६६, ७० ॥ तथा च मधुराभाषी भवेत्कोक्लिवन्नृपः। काकराकी भवेनित्यमज्ञातवसतिं वसेत् ॥७१ नापरीक्षितपूर्वञ्च भोजन शयन प्रजेत् ।
अभिषिक्त राजा का कृत्य वर्णन प्राप्त करने की इच्छा रखता है उसको चाहिए कि अपने महायता करने वाले लोगों को बनाये। राजा को रचित योग्यता रखने वाले प्राणधारियों को ही क्रम में योजित करना चाहिए ७३.५६।। जो पुरुप परम धम्मिष्ठ हो उनको ही धर्म के कार्यों में और जो अतीव शुरवीर हों उन्हें संग्राम कार्यों में एवं जो परम निपुण हों उन्हें मर्य सम्बन्धी कृत्यों में और जो पवित्र हों उनसे ही सभी कम्मो में योजित परना चाहिए ॥७॥ स्त्रीपु पप्ट नियुञ्जीत तीक्ष्णं दारण दारणाममु। धर्म चाच कामे च नये च रविनन्दन ! ॥७८ राजा यथाहंड्र्याच्च उपधाभिः परीक्षणम् । समतीतोपदान नृत्यान् कुर्याच्छम्तवनेवरान् ॥७६ तत्पादान्वेषणो यतास्तदध्यक्षांस्तु कारयेत् । मवमादोनि कपिनृप कार्याणिपार्थिव 11८० सर्वथा नेप्यते राजस्ताक्षगोपकरणक्रमः । कर्माणि पापमाध्यानियानि राम्रो नराधिप ! 1? सन्तम्तानि न कुर्वन्तितस्मात्तानित्यजेन्नृपः । नेप्यतेपृथिवीगातान्तीक्ष्णोपकरणक्रिया ॥२ यस्मिन् कर्मणि यस्य स्याद्विगेपेण च कौशलम् । तस्मिन् कर्मणि त राना परीक्ष्य विनिवेदयेत् ।।८३ पितृपंतामहान् मृत्यान् मवकर्ममु योजयेत् । विनादायादत्यपुपरीक्षा स्वकृतान्तरान् ।।६४ स्थिर्यों में सम्बधित मभी कार्यों में नपुमा पुरयों को नियुक्ति परे तपा जो अत्यन्त दान कम हो उनमे तीन प्रकृति वाले पुरुषों को ग्गे । हे रानन्दन ! :-प्रपं-राम और नय में रात्राको उपधाओं मेवारा मनी मानि परोपरे हो जो प्रिम गरे ने की क्षमता भरा हो टमी को उसम नियुक्ति करनी चाहिए। समीपर रों
पौरारिपना परिवाराचा पमर भूमिरा
मत्स्यपुराण
२६०
वस्त्र पुष्पमलद्वार यच्चान्यन्मनुजात्तम । ॥७२
न गाहेज्जनसम्बाध नचाज्ञातजलाशयम् ।
अपरीक्षितपूवञ्च पुरुपराप्नकारिभि ।।७३
नारोहेकुञ्जर व्याल नादात तुरगतथा
नाविशाता स्त्रिय गच्छेन्नव देवोत्सवे वसेत ७१
नरेन्द्रलक्षम्या धमज्ञ साता यत्तोमवेन्वृप ।
सभृत्याश्च तथा पुष्टा सतत प्रतिमानिता ॥७५
राज्ञा सहाया क्तव्या पृथिवी जेतुमिन्छता ।
यथाहन्चाप्यमुभतो राजा कमसु योजयेत् ।।७६
मिष्ठान धमकार्येषु शरान् सनामकमसु ।
निपुणानथकृत्येषु सवीव तथा शुचीन् ।।७७
नप को कोषित व समान मधुर आभाषण परन पासा होना
पाहिए। जो वसति प्रज्ञान है उसी में वास करना चाहिए । राजाको
पौए के तुल्य गदायुक्त रहना चाहिये । बिना परीक्षा किए हुए कभी भी
रामागे भोजन एव शयन नहीं करना पाहिए। हे मनुशोत्तम सो
पाति में पति पराम रमे हो वस्त्र-प-प्रसार सपा अय पान
। उपयोग म माना पाहिए । ७१, ७॥ विसी भी अन सम्या AT
गाहा म परे पोरवा जमानप अज्ञात है उसम भी -तर प्रगति
राजपा नहीं रहना चाहिए । इन सबकी परीक्षा भी प्राप्त पुरुषो
•हारा हा पहिए करा सनी चाहिए। राजा Erfani
परिम काही तरह माननला गयादा से गज--प्यास तथा
बार बार पर समारोहल नही । जिमीन विषय में पूण भान
मालिया पार उमरा नमन नागोमदी नाना पाहिए और
म सभी भी नियम न करे। पारि R RRE
HA GHEE होता है उसको पास भरपा रोगमा परिपुष्ट
अभिषिक्त राजा का कृत्य वर्णन प्राप्त करने की इच्छा रखता है उसको चाहिए कि अपने सहायता करने वाले लोगों को बनावे । राजा को उचित योग्यता रखने वाले प्राणधारियो को ही कम्मों में योजित करना चाहिए ।।७३-७६॥ जो पुरुष परम धम्मिष्ठ हो उनको ही धर्म के कार्यों में और जो अतीव शूरवीर हो उन्हे संग्राम के कार्यों में एव जो परम निपुण हों उन्हें अर्थ सम्बन्धी कृत्यो मे और जो पवित्र हो उनको ही सभी फम्र्मों मे योजित करना चाहिए ॥७॥ स्त्रीषु पण्ढ नियुञ्जीत तीक्ष्ण दारुण दारुणकर्मसु । धर्म चार्थेच कामे च नये च रविनन्दन ! ॥७८ राजा यथाहंड्र्याच्च उपधाभिः परीक्षणम् । समतीतोपदान् मृत्यान् कुर्याच्छस्तवनेचरान् ॥७६ तत्पादान्वेपणो यत्तास्तदध्यक्षास्तु कारयेत् । सवमादीनि कर्माणिनृप कार्याणिपार्थिव ।।८० सर्वथा नेप्यते राज्ञस्तीक्ष्णोपकरणमः । कर्माणि पापसाध्यानियानि राज्ञो नराधिप ! ॥१ सन्तस्तानि न कुर्वन्तितस्मातानित्यजेन्नपः । नेष्यतेपृथिवीशातान्तीक्ष्णोपकरणक्रिया ||८२ यस्मिन् कर्मणि यस्य स्याद्विशेपेण च कौशलम् । तस्मिन् कर्मणि त राज्ञा परीक्ष्य विनिवेशयेत् ॥८३ पितृपंतामहान् भत्यान् सवकर्मसु योजयेत् । विनादायादकृत्येपुपरीक्षा स्वकृतान्तरान् ।।८४ स्त्रियों से सम्बंधित सभी कार्यों में नपुसक पुरुषो की नियुक्ति करे तथा जो अत्यन्त दारण कम्मं हो उनमे तोरण प्रकृति वाले पुरुषो को रंगे । है रावनन्दन ! धम्म-अयं-काम और नय में राजा को उपधाओ रे द्वारा भली मांति परीक्षण पर हो जो जिस वायं के ने की क्षमता arrश ही उसी को उसम नियुक्ति करनी चाहिए। समतीतीपर चरों
मत्स्यपुराण
२६२
को शस्तवक मे भृत्य बनावे ॥७८, ७E 11 उनके पादान्वेषण करने वाले
उनक अध्यभो को भी नियोजित करे । इसी प्रकार के सभी कर्मों को
नपो के द्वारा पूर्ण करना चाहिए । हे पार्थिव । राजा का सर्वथा तीक्ष्ण
उपकरण का क्रम अभीष्ट नही हआ करता है। है नराधिप ! राजा
के
जो कुछ ऐसे कम्म होते हैं जो कि पापो द्वारा साध्य हुमा करते हैं सन्त
पुरुप उनको कभी नही किया करते हैं प्रतएव राजा का कर्तव्य है कि
उनको त्याग देवे । राजाओ को तीक्षण उपकरणो की क्रिया कमी भी
अभीष्ट नही-हुआ करती है । जिस म्म मे जिस पुरुष की विशेष रूप
से कुशलता हो उस कम्म मे राजा को उसकी परीक्षा करके ही उस पुरुष
का विनिवेश करना उचित होता है। जो ऐसे मृत्य हैं कि उनके पौर
अपने पिता-पितामह के समय से ही चले आने वाले हैं उनको सभी
प्रकार के कर्मों में नियुक्त कर देना चाहिए । स्वकृतान्तरो को द याद
कृयो मे परीक्षा के बिना भी नियुक्त कर देवे । ८० ८४॥
नियुज्जीत महाभाग । तस्य ते हितकारिण ।
परराजगृहात्प्राप्तान जनसग्रहकाम्यया ।।
दुप्टान वाप्यथवादुष्टान आश्रयीत प्रयत्लत ।
दुष्ट विज्ञाय विश्वास न कुर्यात्तत्रभूमिप ॥८६
वृत्ति तस्यापि वर्तेत जन सग्रहकाम्यया ।
राजा देशान्तरप्राप्त पुस्प पूजयेद् भृशम् ॥
मामय दशसम्प्राप्ता वहुमानेन चिन्तयेत ।
याम भत्याजन राजा नव तुर्यानराधिप ॥८८
न च या सविभक्तास्तान मृत्यान् युर्यास्वथश्चन ।
शयागिविष मो निस्त्रिशति चिनयेत् MEE
भृत्या मनुजवाद ल । पिताश्च तयवत ।
तपा चारण चारित्र राजा विज्ञायनित्यश uto
अभिषिक्त राजा का कृत्य वर्णन घिक । उन हे महाभाग ! जन-संग्रह को कामना से दूसरे राज गृह से प्राप्त हुए उसके उन हितकारियों को नियुन करना चाहिए । दुष्ट हों अथवा अदुष्ट हो प्रयत्न से उनको आश्रय देवे। राजा को को जानकर उसका विश्वास नहीं करना चाहिए । जन-सग्रह की कामना से उसकी वृति कर देनी चाहिए । राजा को अन्य देश से प्राप्त हुए पुरप की बाय. पूजा करनी चाहिए 11८५, ८६,८1। यह मेरे देश में प्राप्त हुआ है यतएव उमके विषय में बहुमान चिन्तन करना चाहिए ! हे नरा- विप ! राजा को इच्छापूर्वक मृन्यान नहीं करना चाहिये ।।८ भृत्यों को किमी भी प्रकार से मविभक्त नहीं करे । त्रुओं को प्रग्नि- विष-सर्प और विमित्रा ऐमा ही चिन्तन करना चाहिए ॥८६॥ है मनुज घाल ! जो मत्य रपित हो जावें उनके विषय में एक ओर से राजा को चारों के द्वारा नित्य ही चरित्र का विशेष ज्ञान करते रहना चाहिये ॥६॥ गुणिना पूजन कुर्यात् निगुणानाञ्चशासनम् । कयिता.सततराजनू ! राजानश्चारचक्षुपः। स्वके देने परे देशे ज्ञानशोलान् विपक्षणान् । अनाहार्यान् कशमहान्नियुजोत तयाचरान् ।।६२ जनम्याविदितान् सौम्यान् तथा ज्ञातान परम्परम् । वणिजो मन्त्रकुशलान् सावत्सरचिकित्सकान् ।।६३ तथा प्रवाजिताकारावारान् राजा नियोजयेत् । नंकम्य राजा श्रद्दध्यान् चारस्यापि सुभाषितम् ॥६४ द्वयोः सम्बन्धमाशाय श्रद्दध्यान्नपतिस्तदा । परम्परयाविदिती यदिग्यानाञ्च तावुभौ ॥३५ तस्माद्राजा प्रयत्नेन गूटाचाराग्नियोजयेत् । रागापगगौमत्वाना जनम्यचगुणागुणान् ।। सर्व राजा चरायत्तन्तेषु यलपरोमवेत् ।
मत्स्यपुराण २६४ कमणा केन मे लोरे जन सर्वोऽनुरज्यते ।।६७ विरज्यते केन तथा विज्ञ य तन्महीक्षिता विरागजनक लोके वजनीय विशेषत तथा च रागप्रभवा हि लक्ष्म्यो राजा मताभास्करवशचन्द्र । तस्मात्प्रयत्नेन नरेन्द्र मुख्य कार्योऽनुरागो भुवि मानवेषु ॥६ राजा का कत्तव्य है कि जो गुणीजन हो उनका सत्कार एवं पूजन करे तथा जो गुणहीन हों उन पर शासन करे। हे राजन् ! राजा लोग निर तर चारो के चक्षुओ वाले ही कहे जाया करते हैं ॥११॥ अपने राष्ट तथा देश मे तथा दूसरे देश मे ज्ञान के शील वाले-विचक्षण- अनाह यं और क्लेश सहचरी की नियुक्ति करनी चाहिए ।।६२॥ राम का कर्तव्य है कि ऐसे गुप्तचरी को नियुक्त करे जिनकी साधारणत मनुष्य नही जानते हो-सौम्य-परस्पर मे ज्ञात-वणिज मत्र कुशल - साम्वत्सर चिकित्सक-प्रवाजितो (साधु स यासियो) के आकार अर्थात् वेश-भूषा वाले हो । राजा को किसी भी एक गुप्तचर के कथन पर भी श्रद्धा कभी नहीं कर लेनी चाहिए ॥६३, ६५।। जब दो धार उसी एक विषय का समान रूप से प्रतिपादन करे तभी राजा को विश्वास करना चाहिए कि तु दोनो के सम्बध को पहिले समझ कर ऐसा करे । यदि वे दोनो भी परस्पर म अविदित हा तो उनके सम्बध का जान लेना बहुत-ही आवश्यक है। इसी कारण स राजा को अस्पन गूढ घरो की नियुक्ति करना उचित है । भृत्यो के राग और अपराग तथा जनो के गुण और अरगुण का जान लेना सब कुछ गुप्तचरोक हो ( गज ओ का) अधीन होता है अतएव गजामो को उन के विषय म यत्न परायण होना ही चाहिए । राजा का परम कर्तव्य यही है कि वह यह सवदा जानता- ममाता रह पि मेर किस कम्म से लोक म सब लोग म अनुरञ्जित होते हैं और कौन सा भरा बम्म है जिससे लोगों को बुरा मासूम होता है जो लोमा म विराग समुत्पन्न करने वाला पाय है । उसको पूण सर से वजिर राजकृत्य वर्णन २६५ कर देना चाहिए । हे भास्कर वेश के चन्द्र ! राजाबो की लक्ष्मी राग से समुत्पन्न होने वानी हैं-ऐसा ही माना गया है। इस कारण से राज- प्रमुखो को चाहिए कि प्रयत्न पूर्वक भूमण्डल में मानवो में गजाओ को भली भांति अनुराग करना चाहिए ।।६५-६६।। १४-राजकृत्य वर्णन ( १) यथा न वर्तितव्य स्यान्मनो राज्ञोऽनुजीविना । तथा ते कथयिष्यामि मिवोध गदता मम॥१ राजा यत्तु वदेद्वाक्यं श्रोतव्य तत्प्रयत्नत.। आक्षिप्य वचन तस्य न वक्तव्य तथा वचः ॥र अनुकूल प्रिय तस्य वक्तव्य जनससदि । रहोगतस्य वत्तव्यमप्रिय यद्धित भवेत् ॥३ परार्थमस्य वक्तव्य समे चेतसि पार्थिव । स्वार्थः मुहद्भि वक्तव्यो न स्वय तु कथञ्चन ॥४ कार्यातिपात. सर्वपु रक्षितव्यः प्रयत्नतः । नच हिंस्य घन किञ्चित् नियुक्तेनचकमणि ॥५ नोपेक्ष्यस्तस्यमानश्च तथा राज्ञ प्रियो भवेत । राजश्चनतथाकाय्यं वेषमापितचेष्टितम् ॥६ राजलीला न क्तव्या तद्विद्विच्च वर्जयेत् । गज्ञ समोऽधिकोवानबावियोविजानता ॥७ श्री मत्स्य भगवान ने कहा- राजा के अनुजीवी के द्वारा मन जिस प्रकार मे नही बरतना चाहिए वही में आपको बनलाऊंगा। अब आप मुयमे इस समय लो 1 जिसको कि मैं कह रहा हूँ ॥१॥ र जा जा कुछ भी वचन कहे उसे प्रयत्न पूवा श्रवण कर देना चाहिए। उनके
मत्स्यपुराण
२६६
पचन पर आक्षेप करके फिर कुछ भी अपना वचन नही कहना चाहिए।
॥२॥ जन ससद मे उस नृप का प्रिय और अनुकूल ही वचन बोलना
चाहिए। यदि कोई उसके हित को बतलाने वाला भी वचन कहना हो तो
उसे चाहे वह अप्रिय भी हो उसी समय मे उससे कहना चाहिए जब
एकात
में स्थित हो ॥३।। हे पार्थिव । इसका परमार्थ चित्त के सम होने
पर ही बोलना चाहिए। यदि अपना कोई स्वाथ हो तो उसे स्वय कभी
भी न कहकर मित्रो के द्वारा ही कहलाना चाहिए ॥४॥ सब मे कार्याति
पात प्रयत्न पूवक रक्षित रखना चाहिये । कम मे नियुक्त होने पर कुछ भी
धन नहीं मारना चाहिए ॥५॥ उसके मान की कभी भी उपेक्षा नही करनी
चाहिए । इसी प्रकार से मनुष्य राजा का प्रिय हो जाया करता है । राजा
तुल्य वेप-भाषित और चेष्टित जैसा भी वैसा ही स्वय नही करना
चाहिए ॥ ६ ॥ राजा की लीला नही करे और उसका जो भी कुछ
विद्विष्ट हो वह भी वजित कर देना चाहिए। राजा के ही समान
अपरा उससे भी अधिक वेष अच्छी तरह से जानते हुए कभी नही करना
चाहिए । ७॥
द्यूतादिपु तथैवान्यत कौशल तु प्रदशयेत ।
प्रदपर्यकौशल चास्यराजानन्तु विशेषयेत् ॥
अत पुरजनाध्यव रिदूत निराकृत ।
ससगं न व्रजद्राजन विना पार्थिवशासनात् ॥६
निस्नहताचावमान प्रयत्नेन तु गोहयेत् ।
यच्च गुह्य भवद्रानो न तस्ना प्रकाशयेत ॥१०
न पेण थावित यत्स्याद्वान्यावाच्य न पातम ।।
नतत्सथावयालाप तयारानाऽप्रियोभवेत ॥११
आनाप्यमावा यस्मिन समत्थायवरान्वित ।
मिहरयाणातिच्याराजाविजागता ॥१२
सायर्यावरवा च विनाय पायम र यथा गमत् ।
राजकृत्य वर्णन साथ- सततं क्रियमाणेस्मिन लाघवन्तु बजेद् ध्रुवम् ॥१३ राक्ष प्रियाणि वाक्यानि चात्यथं पुन:पुनः । महासुशीलस्तुभवेत्नचापि भकुटीमुखः ।।१४ उसो मानि छुत (खेल) आदि में अन्य कोमल का प्रदर्शन करे और इसका कोशल प्रशिन करके राजा को विशेषता का प्रदर्शन करना चाहिए । है राजन् ! राजा के शासन के विना अन्तः पुर के जनाध्यक्षों के 1-शत्रु के दूतों के साप धौर जो राजा के द्वारा निराकृत हो उनके साथ संसर्ग नहीं करना चाहिए ॥८, ६॥ स्नेह के अभाव को और अवमान को प्रयत्न के साप गोपन करके रखना चाहिए और जो राजा का कोई भी गोपनीय विषय हो तमना भी कभी प्रकाशन नही करे। हे नृपोतम ! वाच्य तथा अवाच्य नृप के द्वारा जो भी याविन हो उसे लोक में कभी भी यावित न करे। ऐमा करने से राजा का वह उसे अप्रिय हो जाया करता है । विसो भी दूसरे को आज्ञा देने पर भी शीघ्रता से स्वय ठकर राजा से यह कहना चाहिये कि क्या मैं इस काग्य का सम्पादन करलू- यही एक साता पुरुष का कत्तम्य है ।।१०, ११, १२॥ वायं की अवस्था को विशेष रूप से जानकर जमा भी वह काय्य होवे उसको निरन्तर करते हुए भी लाद्यव निश्चय प से करे ॥१३ । राजा के प्रिय वाक्यो को अत्यधिक और दारम्बार नही रहे । राजा के समक्ष में महान मुणील ही रहना चाहिए तथा कभी भटियो को चढ़ाकर न रक्मे ॥१॥ नातिवक्ता न निवक्ता न च मात्सरिस स्तथा । आत्मसम्मावितश्चव न भवेत्तु कयञ्चन ॥१५ दुष्कृतानि नरेन्द्रस्य न तु सड्डीतयेत् चित् । स्त्रमस्त्रमलङ्कार राना दत्त तु धारयेत् ॥१६ औदार्गेण न तदयम-यम्म भूतिमिच्छता। तत्रैवात्मामन कार्या दिवा स्वप्न कारयेत् ।।१७ नानिदिष्टे तयाद्वारे प्रविशत्तु करञ्चन ।
मत्स्यपुराण २६० भी प्रकार से प्रवेश नहीं करना चाहिए। अयोग्य भूमियो में समवस्थित राजा को कभी नहीं देखना चाहिए। सवदा राजा क दक्षिण तथा वाम भाग म ही उपविष्ट होना चाहिए। राजा के आगे अथवा पीछे अपना शासन रखना गहित होता है ॥१८ १।। र जा के समीप मे जब भी कमी उपस्थित हाव तो मनुष्य को चाहिए कि जभाई-यूब का यूना- पासना -- पयस्तिका (मस द । आदिका सहारा लवर बठना--भवटि चढ़ाना-वान्ति धरना---डकार लना इन सबका वजन कर देवे । बुध पुरुष को गा र ममक्ष म स्वय अपन गुणा या व्यापन अपन मुख स नहा करना चाहिए प्रत्युत अपन गुणो व प्रख्यापन परत के लिय दूम) हा प्रयोजित TI TII-O, २॥ न च पश्येत्तु राजानमयोग्यासु च भूमिपु॥१८ राजस्तु दक्षिणे पावें वामे चोपविर्शतदा । पुरस्ताच्च तथापश्चादासन तु विहितम् ॥१६ जम्भा निष्ठीवनड्डास कोप पर्णस्तिकाश्रयम् । भृकुटि वान्तमुदगारन्तत्समीपे विवजयेत ॥२० स्वग तन्न न कुर्वीत स्वगुणाख्यापन बुध । स्वगुणारयापने युक्ता परमेव प्रयोजयेत् ॥२१ राजा के मामने न तो अत्यधिक बोलने वाला ही रहे और न बिल्कुल न बोलने वाला मौन होकर हो रहे । मत्सरता से युक्त भी होकर न रहे तथा किसी भी प्रकार से आत्म सम्भावित भी नहीं रहना चाहिए NEशा जो कुछ भी राजा के द्वारा किये हुए दुष्कृत हों उनका कभी भी कही पर सकीत्त न नहीं करना चाहिए । जो भी कभी देवात् राजा के द्वारा प्राप्त वस्त्र--अस्त्र और अलङ्कार हो तो उनको धारण करके रहना चाहिए ॥१६॥ भूति क चाहने वाले को उदारता स उनको कभी दूसरे को नहीं दे डाले और वही पर अपना आसन रखना चाहिए तथा दिन में स्वप्न नही करे ॥ १७॥ जो द्वार अनिर्दिष्ट हो या माग हो उसमे किसी राजकृत्य वर्णन २६६ हृदय निमल कृत्वा परा भक्तिमुपाश्रित । अनुजीविंगण न्य नित्य राज्ञामतन्द्रितै ।।२२ शाठय लोल्य च पैशून्य नास्तिक्य क्षुद्रता तथा । चापल्यञ्च परित्याज्य नित्य राज्ञोऽनुजोविमि ॥२३ श्रुतिविद्यासुशीलंश्च सयोज्यात्मानमात्मना । राजसेवान्तत कुर्याद भूतयेभूतिवर्द्धनीम् ।।४ नमस्कार्या सदा चास्य पुनवल्लभमन्त्रिण । स चर्वश्चास्यविश्वासोनतुकार्य कथञ्चन ॥२५ अपृष्टश्चास्य न ज्यात काम ब्रूयातथा यदि । हित तथ्यञ्च वचनहित सहसुनिश्चिनम् ।।२६ चित्तञ्चेवास्य विज्ञेय नित्यमेवानृजीविना । भत्तराराधनकुर्यान्चित्तज्ञोमानव सुखम् ॥२५ रागापरागो चवास्य विज्ञ यो भूतिमिच्छता । त्यजेद्विरत्तो नृपती रक्तवृत्तिन्तु कारयेत् ॥२८ विरक्त कारयेन्नाश विपक्षाभ्युदय तथा । आशावद्ध नक कृत्वा फलनाश करोति च ॥२॥ अकोपोऽपि सकोपाभ प्रसन्नोऽपि च निप्पल । वाक्य च समद वक्ति वृत्तिच्छेद करोति व ॥३० जो राजाओ के अनुजीवी गण हो उनका अपना हृदय निमल करके परामक्ति का उपायय करते हुए नित्य हो अद्रित रहना चाहिए। राजा के अनुजीवियो को शठता-लोय- पय-नास्तिकता-शुद्रता-चापल्प- इन दोनो का सवंदा परित्याग कर दना चाहिए।०२, २३॥ युनि-विद्या और सुशोलता गुणा वाले पुरुषो को मात्मा के द्वारा अपनी आत्मा को सयोजित करके अन्तत 4भव को प्राप्ति के लिय मात के वधन करन कालो राजा को सवा परनी चाहिए । राजा र पत्र-वलम व मत्रियों को सदा नमस्कार करना उचित है। सचिवों के द्वारा इसका किसी प्रकार भी विश्वास नही करना चाहिए। •४, १५॥ बिना कुछ पूछ हुए इसस मत्स्यपुराण १०० भाषण करे । यदि इच्छा वाने तो हितो व सहित अनि सुनिश्चित हित और तथ्य वचन बोलना चाहिये ॥ ६॥ जा राजा के अनुजीवी हा उनको नित्य ही इसके चित्त को यत्ति को जानत रहना चाहिय । चित्त की वृत्ति का ज्ञान रखने वाले मानव को सुख पूर्वक स्वामी का समाराधन करना चाहिए । विभूति के प्राप्त करने की इच्छा धाने पुरुष को इस राजा के 'राग एव अपराग को अच्छी तरह से जान लेना अत्य त आवश्यक है । इनको जान कर फिर त्याग करे। विरक्त नही रहे । मपति रक्त वत्ति करावे । विरक्त नाश कराता है और विपक्ष का अभ्युदम कराता है। आशा की वृद्धि करके फल का नाश किया करता है। बिना काम वाला भी क्रोध से युक्त के समान होता है। प्रस न होता हुआ भी निष्फत है तथा मद से युक्त वाक्य बोलता है और वृत्ति का छेदन कर देता है । । 1 क ॥२०-३०० प्रदेशवाक्यमुदितो न सम्भावयतेऽ यथा । आराधनासु सर्वासु सुप्तवच्च विचेष्टते ॥३१ कथासु दोष क्षिपति वाक्यभङ्ग परोति च । लक्ष्यते विमुखश्चव गुणसङ्कीतनेऽपि च ॥३२ दृष्टिक्षिपति चान्यन नियमाणे च कमणि । विरक्तलक्षण चतत् शृणु रक्तस्य लक्षणम् ॥३३ दृष्ट्वा प्रस नो भवति वाक्य गृह्णाति चादराद। कुशलादिपरिप्रश्न सप्रयच्छति चासनम् ॥३॥ विविक्तदशने चास्य रहस्येन न शकते । जायते हृप्टवदन थुत्वा तस्य तु तत्कथाम् ॥३५ अप्रियाण्याप वावधानि तदुक्तान्यामन दते । उपायनश्च गृह्णाति स्तावमप्यादरात्तथा ॥३६ राजकृत्य वर्णन कथान्तरेषु स्मरति प्रहृष्टवदनस्तथा । इति सतस्य तंव्या सेवा रविकुलोहह । ॥३७ मिन न चापत्सु तथा च भृत्या भजन्ति ये निगुणमप्रमेयम् । विभु विशेपेण च ते व्रजन्ति सुरेन्द्रधामामरवृन्दजुष्टम् ॥३८ उदित हुआ प्रदेश वाक्य को अन्यया सम्भावित नहीं होता है और सब आगधनाओ में सुप्त की भांति विचेष्टित किया करता है। क्याओं में दोषी का क्षेप किया करता है और वाक्य का भङ्ग करता है। गुणो के सही न करने पर भी विमुख के समान दिखलाई देता है। कमों के करने पर भी अन्यत्र हष्टि डालता है-ये ही एक विरक्त पम्प के लक्षण हुमा करते हैं । यत्र यो अनुरक्त होता है उसके लक्षणों का भी श्रवण करलो। देखकर परम प्रसन्न अनुरक्त हुआ करता है और जो भी वाक्य कहा जाता है उसे बड़े हो बाद मे ग्रहण करता है । बुचल क्षेम क प्रश्न आदि करता है और उपविष्ट होन के लिये आसन दिया करता है विविन दशन में और इसके एकान में इसकी शङ्का नहीं करता है। उसकी उन क्या को श्रवण करके प्रसन मुख हो जाया करता है ।। ३१-५ ।। उसके द्वारा कहे हुए अप्रिय वारो को भी अभिनन्दित किया करता है तथा पोडे से भी उपायन को दडे यादर से प्रहण करता है। कथाओं में प्रहष्ट मुख दाना होकर म्मरण करता है । है रविकुलोदर इम प्रकार के अनुरक्त को सेवा करनी चाहिए। आपत्ति क समयों म मित्र को उस प्रकार से नहा जिस तरह मृत्यगण हैं वे अप्रमेय और निर्मुरारी सेवा करते हैं। वे मुत्य देववृन्दा के द्वारा सविन मुरेन्द्र र घाम यो तथा विशेष रूप से विभु को प्राप्त किया परते हैं ॥ ३६॥ ३७ ॥३०॥ अन्य मत्स्यपुराण ३७२ ६५-राजकृत्य वर्णन (२) राजा सहायसयुक्त प्रभुतयवसेन्धनम् । रम्यमानतसामन्त मध्यमन्देशमावसेत् ॥१ वश्यशूद्रजनप्रायमनाहार्य तथापरं । किञ्चिदाह्मणसयुक्त बहुवर्मकरन्तथा ॥२ अदेवमातृक रम्यनुरक्तजनान्वितम् । करेरापीडितच्चापि बहुपुष्पफल तथा ।।३ अगम्य परचक्राणा तद्वासगृहमापदि । समदु खसुख राज्ञ सतत प्रियमास्थितम् ॥४ सरीसृपविहीनञ्च व्याघ्रतस्करवजितम् । एवविध यथालाभ राजा विषयमावसेत् ॥५ सत्र दुर्ग नृप कुर्यात् पष्णामेकतम बुध । धनुदु गं महीदुर्ग नरदुर्ग तथैव च ॥६ वाक्ष वाम्बुदुग च गिरिदुर्ग च पार्थिव ।। सर्वेपामेव दुर्गाणा गिरिदुग प्रशस्यते ॥७ श्री मत्स्य भगवा न कहा-गजा को अपने सहायकों से सम- वित होकर प्रभूत यवस पोर इन्धन वाले रम्य एव आनत सामन्तों धाले मध्यम देश में निवास करना चाहिए ॥१॥ वह स्थल ऐसा होना चाहिए जिसमें राजा का निवास हो वैश्य और शूद्रजन बहुतायत से रहते हो एव दूसरों के द्वारा जो आहाय न हो सके। राजा का निवास स्थल कुछ प्रह्मणो स भी युक तथा बहुत कमौ के करने वाला होये ॥२॥ माता -रम्य-मनुरजित जनों से युक्त-परों से प्रापीडित तथा यहत पुष्प एव फना वाला- पर ( दानु ) वे धक्रों की अगम्य ऐसा धापत्ति पान म वास गृह होना चाहिए। सुख और दुख म सम-निर तर राजा का प्रिय-- सरीसपा से बिहीन व्याघ्र और तस्करों से भदेव मत्स्यपुराण २७४ 1 के अग्रमाग मे परम सुदृढ देव का बालय होना चाहिए। दूसरे वीथी के अग्रभाग मे राजा क रहने का वेश्म गृह निर्मित किया जाना चाहिए । तीसरी वोयी के अग्रभाग मे धम का अधिकरण करना चाहिये और चतुर्थ वीथी के अग्रभाग मे गोपुर विरचित करे । इस प्रकार स उस पुर को चौकोर-आयत गोरु वृत्त कराना चाहिए | मुक्तिहीन-त्रिकोण-- पवमध्य अथवा चौकोर और आयत यद्वादत्त पर की रचना करावे । नदी के तौर पर निवास करते हुए अध चन्द्र को प्रशसा किया करते हैं। इसके अतिरिक्त अ य प्रयत्नपूर्वक विशेष ज्ञाता को नहीं करना चाहिए। --१४॥ राज्ञा कोशगृह काय दक्षिणे राजवेश्मन । तस्यापि दक्षिणे भागे गजस्थान विधीयते ॥ ५ गजाना प्रामुखी शाला कतव्यावाप्युडदमुखी। भाग्नेये च तथा भागे आयुधागागमष्यते ॥१६ महानसश्च धमज्ञ | कमशालास्तथापरा । गृह पुरोधस काय वामतो राजवेश्मन ॥१७ मन्त्रिवदविदाऽचव चिकित्साक्त्त रेवच । तोव च तथा भागे कोष्ठागार विधीयते ॥१८ गया स्थान तथैवान तुरगाणा तथैवच । गत्तराभिमुखा श्र णी तुरगाणा विधीयते ॥१६ दक्षिणाभिमुखा याय परिशिष्टास्तु गहिता । तुरगास्तेतथाधाया प्रदीप सावरात्रिक ॥२० घुटान वानराश्व मटोश्च विशेषत । धारयेदश्यशालामु सवत्सा धेनुमवच ॥२१ राजा व निवास गृह र दक्षिण भाग म राजा को अपना बोपगृह पनाना चाहिए। उससे भी दक्षिण भाग में गजी के रहने का स्थान निमित कराये ॥१५॥ यशाला का गुण पूब अथवा उत्तर दिशा की राजकृश्य वर्णन २०५ भोर परवाना चाहिए। आग्नेय भाग में आयुधों का आगार बनाना सभीष्ट हाता है। हे धम्मंज! महानस ( रसोई घर) दूसरी कम- शालाऐं और पुरोहित का गृह ये सब राजा के वैश्म के वाम भाग म निर्मित करावे। वहीं पर उसी भाग मे मन्त्री वेदवेता और चिकित्सा करने दाने का गृह तथा कोटागार भी निर्मित करान चाहिये ॥१६ । १७ 1८॥ यही पर गौओ का स्थान -तुरङ्गो वा स्थान करावे । तुरङ्गो की जो प्रेणी है वह उत्तर की ओर मुख वालो होनी चाहिये : अयदा दक्षिणाभिमुख हो। परिशिष्ट सभी गहित कही गयी हैं । वे तुरग सम्पूर्ण रात्रि मे जलने वाले प्रदीपो के साथ रखने चाहिए। उन अवशालाओ में कुक्कुटों-वानरो-~मपंटो और विशेष रूप से वल्म क सहित धेनु को भी रखना चाहिए ॥११,२०, २१॥ अजाश्च धार्या यत्नेन तुरगाणा हितषिणा। गोगजाश्वादिशालासु तत्पुरोषस्य निर्गमः ॥२२ अस्तगते न क्तव्यो देवदेव दिवाकरे। तत्र तत्र यथास्थान राजाविज्ञाय सारथीन् ।।३ दाद्यादावसथस्थान सर्वपागनुपूवशः । योघाना शिल्पिनान्चंद सर्वेपामविशेषत ॥२४ दद्यादावसथान् दुर्गे कालमन्त्रविदा गुभान । गोवद्यानश्ववद्याश्च गजवद्यास्तवय २५ आहरेत भृश राजा दुर्गे हि प्रवला रजः। कशीलवाना विप्राणा दुर्गे स्थान विधीयते । न बहूनामतो दुर्गे विनाशय तथा भवेत् । दर्गे च तत क्तव्या नानाग्रहरणान्विताः ।। सहलघातिनो राजस्तैस्तु रक्षा विधीयते। दुर्गे द्वाराणि गुप्तानि कार्यान्यपि च भूभुजा ॥२८ अरयो के हित चाहने वाले को यत्नपूर्वक अराओं को भी वही
मत्स्यपुराण
दुर्ग में कार्य के बिना
पर रखना आवश्यक होता है। गोलाज और अश्व आदि की शालाओ
में उनके पुरीष (मल ) का निर्गम निकालना) देवो के देव भगवान्
दिवाकर के अस्त हो जाने पर नहीं करना चाहिए । यहाँ-वहाँ पर स्थानो
के अनुसार राजा को विशेष रूप से समझ कर सारथियो की नियुक्ति
करे तथा उन सबके प्रानुपूवश आवसथ { रहने का ) स्थान भी देवे ।
योधाओ को तथा शिल्पियो को सबके साधारण रूप से और काल मन्त्र
घेत्ताओ को परम शुभ आवसथ दुर्ग मे देवे ।
राजा को चाहिए कि वह
गौत्रो के वध-अश्वो के धंध और गजो को चिकित्सा करने वाले लोगो
को अच्छी तरह से अधिक संख्या में लाकर रक्खे क्योकि दुर्ग में बीमा-
रियां भी बहुत प्रथल हुआ करती हैं। कुशीलव विप्रो का दुर्ग मे स्थान
किया जाता है ।। २०, २३ २४. २५, २६ ॥
फालतू बहुतो को उस प्रकार से स्थान नहीं दवे । हे राजन् । दुर्ग में
अनेक प्रकार के प्रहरणो (शास्त्रो) से समन्वित सहस्र घातियों को
नियुक्त करना चाहिए क्योंकि उनके द्वारा रक्षा की जाया करती है।
राजा पे द्वारा अपने दुर्गम गुप्त द्वार भी निर्मित करा कर रखने
पाहिए ।। ७,२८॥
सञ्चयश्चान सर्वेषामायुधाना प्रशस्यते ।
धनुपा क्षेपणीयानान्तोमराणा च पाथिक ॥२६
शगणामथ सगाना ववचाना तथवच ।
सगुष्टाना गुडानाश्च हुडाना परिप सह ।।३०
शामताच प्रभताना मगराणा सधषच ।
राजकृत्य वर्णन २०० सर्वपा शिल्पिभाण्डाना सचयश्चात देप्यते। वादित्राणाञ्च सर्वपामौषधीनान्तयंवच ॥३४ यवसाना प्रभूतानामिन्धनस्य च सन्चय.। गुडम्य सर्वतलाना गोरसानान्तथैव च ॥३५ यहाँ पर दुर्ग में सभी आयुधों का साह रखना परम प्रगत होता है। पायिद को धनुषों का-क्षेपणीया का और तोमरों का सञ्चय रखना आवश्यक है । शरी का-कवचों का-मुङ्गों का--लगुगुडान- हड और परिघों का भी सग्रह करै। बहुत तादाद में पापागों का- मुद्गरी का--त्रिशूलों का-पदियों का मौर है पायिद कुटारों का भो संग्रह करना चाहिए ॥२६,३०, ३१ ।। नरोत्तम का प्रास-माल- शक्ति-परश्वय-चक्र-नमक महित दमों का भी वहीं सर्ग म सग्रह होना चित होता है । वुद्दाल-र-दर-पीटक-तुप-दात्र और अङ्गारों का भी सन्जय कर। ममी प्रकार गिल्पियों के भाण्डों का सञ्चय भी दुर्ग में अभीष्ट होता है। अब तरह के वादिन और सभी यौपधियां तथा प्रभूव यवस और इधन का मचय वहाँ रवने । गुह, समी तरह के तेल और गोरसों का सह दुर्ग में करना मावस्यक है ॥ ३२॥३३ वसानामय मज्जाना म्नायूनामस्थिमि सह । गोचमपटहानाच यवगोयूमयोरपि ॥३६ तथैवाभ्रटानांच यवगोधूमयोरपि । रलाना सववम्बामा लोहानामप्यगेपन । ३७ कलापमुद्गमापाणावरानन्तितः सह । तया च सर्वशाम्याना पाशुगामययोरपि 13 शरणमजरन भूज उतृलाक्षा च टवणम् । गजा मचिनुयाददगे या चान्यदपि विचन ॥३॥ कुम्माचाशाविप कार्या व्यालसिंहादयस्तथा।
मत्स्यपुराण २७८ मृगाश्च यक्षिणश्चैव रक्ष्यास्ते च परस्परम् ॥४० स्थानानि च विश्वाना सुगप्तानि पृथक पृथक् । कर्तव्यानि महाभाग ! यत्नेन पृथिवीक्षिता ॥४१ उक्तानि चाप्यनुक्तानि राजद्रव्याण्यशेषतः। सुगुप्तानि पुरै कुर्याज्जनाना हितकाम्यया ॥४२ राजा का परम कर्तव्य है कि वह वसा--मन्त्र-मस्थियो के साय स्नागु-गोचर्म-पटह-सभी प्रकार के धान्य-अअपर-यव- गोधूम ( गेहूं )-रत्न-सभी वस्त्र-सम्पूर्ण प्रकार के लौह-कलाप- मुद्ग-माष (उद )-तिल-चना-सभी तरह के शस्य-पासु-गोमय- शण -सर्व रस-भूर्ज-जतु-लाक्षा-टहण (सुहागा) और अन्य भी जो कुछ हो इन सबका सञ्चय दुर्ग मे राजा को करना ही चाहिए। आशी- विषो के द्वारा कुम्भो के करै तथा व्याल--सिंह आदि मृग और पक्षिगण इन सबकी परस्पर मे रक्षा करनी चाहिये ॥३६ । ३७ ॥ ३८ ॥३०॥ आपम मे जो भी जीव विरोध रखने वाले हैं उनका अलग २ स्थान निर्मित करावे और अच्छी तरह उन्हें गुप्त रवसे। हे महाभाग ! राजा को यल के साथ यह सभी कुछ करना चाहिए। और जो नही भी कहे गये हैं उन मम्पूर्ण राजद्रव्यो को पुर मे सुगुप्त जनता के हित की कामना से रखना चाहिए ।। ४५ ४॥ जीवकपभकाकोलमामलक्याटरूपकान् । शालपर्णी पृष्ठिपर्जी मुद्गपर्गी तथैव च ।।४३ मापपर्णी च मदद्वंसारिवद्वेबलात्रयम् । वारा श्वसन्ती वृप्या च वृहती कण्टकारिका ॥ शृङ्गी शृद्गाटवी द्रोणी वर्षाभूदभरेणुका। मधुपर्णी विदायेंदे महाक्षीरा महातपाः ।।४५ धन्यतः महदेवावा पटवरण्डक विपः । पर्णी शताया मृतोतापल्ग, खरयष्टिकाः ॥४६ जो बता दिये गये है मत्स्यपुराण २८० । एवमादीनि चान्यानि विज्ञेयो मधुरोगणः राजा सञ्चिनुयात्सर्वं पुरे निरवशेषतः ॥५१ दाडिमानातको चंव तिन्तिडीकाम्लवेतसम् । भव्यकर्कन्धुलकुचकरमईकरूपकम् ॥५५ बीजपूरककण्डूरे मालतीराजबन्धुकम् । कोलकद्वयपर्णानि द्वयोराम्नातयोरपि ॥५६ राज सर्षप-धान्याक-मृष्यप्रोन-उत्कटा-काल शाक-- पद्म वीज-गोवल्ली--मधुवल्लिका-शीतपाकी-कुवेराधी-काक जिह्वा- उरु पुष्पिका- पर्वत-त्रयुष-गुञ्जा तक-पुनर्नवा दोनों-- कसेरु-कारु काश्मीरी-वल्या-शालूक--केसर--सब तुप धान्य-क्षीर-क्षौद्र-- तक्र-तेल-बसा- मन्त्रा-धृत-नीप-अरिष्टक-क्षोड़ वाताय-- सोमवाणक- इस प्रकार के धान्य मधुरोगण-इस सभी का पूर्ण रूप से सञ्चय राजा को करना आवश्यक है ।। ५०, ५१, ५२, ५३, ५४ ॥ दाडिम-आम्रातक-तिन्तिडीक-आम्लवेतस-भव्य कन्धु - लकुच- करमई - '- करूषक --बीजपूरक-कण्डर-मालती-राजवन्धुक-दोनो कोलक पर्ण-दोनो आग्नात ।। ५५, ५६ ।। पारावत नागरकं प्राचानोलकमेव च । कपित्यामलक चुक्रफलन्दन्तशठस्य च ॥५७ जाम्बवं नवनीतञ्च सौवीरकरुपोदके । सुरासवञ्च मद्यानि मण्डतक्रदधीनि च ॥५८ शुक्लानि चंव सर्वाणि ज्ञेयममलगण द्विज । एवमादीनि चान्यानि राजा सञ्चिनुयात्पुरे ॥५६ संन्धोद्धिदपाठेरपाक्यसामुद्रलोमकम् । कुष्यसौवर्चल विड़ वालकेय यवादकम् ।।६० औवं क्षारं कालभस्म विज्ञ यो लवणोगणः। एवमादीनि चान्यानि राजा सञ्चिनुयारपुरे ॥६१ राजकृत्य वर्गन २८१ पिप्पली पिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरम् । कुवेरक मरिचकं शिन भल्लातसपपा. ॥६२ कुष्ठाजमोदाकिणिहीहिडगुमूलकधान्यकम् । कारवीकुञ्जिका याज्या मुमुखा कालमालिका ॥६३ पारावत-नागरक-प्राचीनोलक-कपिन्थ-आमलक-चुत्रफल- दन्तशठ-जाम्बव-नवनीन-सौवीरक-रुपोदक-सुरा-आसव-मद्य- मण्ड-तक- दधि-सब शुक्ल पदार्थ-हे द्विज [ और अम्लगण इस प्रकार के सभी पदार्थों का सञ्चय राजा को अपने पुर मे करना चाहिए । सैन्धोद्भिद-पाठेय-पाक्य- सामुद्र--लोमक-पुप्य-सौवर्चल-विड- बालवेय --यवाहक-और्व-क्षार-कालभस्म लवण गण- इस भांति के पदार्थो का पूर मे मग्रह राजा को करना मावश्यक है । पिपली- पिप्पली मूल -- चष्य-चित्रक-नागर-कुबेरक-मरिच-शिन-भरुलात- सर्पप-कुष्ठ – अवमोद-आकिणि-हिङ्ग.---मूलक -धायक-कारवी. कुञ्जिका-याज्या-सुमखा-काल मालिका-~||५७-६ ।। फणिज्जकोथलशुन भस्तृणा सुग्सन्तथा। कायस्था च वयस्था च हरिताल मन शिला ॥६४ अमृता च रुदन्ती च राहिप कुङ्क.मन्तथा । जया एरण्डकाण्डीर सल्लकीहजिका तथा ॥६॥ सर्वपित्तानि मत्राणि प्रायोहरितकानि च । फलानि चैव हि तथा सूक्ष्मला हिङ्ग पट्टिका ॥६६ एवमादोनि चान्यानि गणः कटकसजितः । राजा सविनुयादुर्ग प्रयलन नपोत्तम ! १६५ मुस्तश्चन्दनहोवेतमालकदारवः । दरिद्रानलदानारनक्तमालरदम्बकम् ।।६८ दूर्ग पटोलाटुका धत्वक् पत्रकं यचा। किरातविक्तभूतुम्त्री विपा चाठिविपा तया ॥६६ मत्स्यपुराण २८२ ताल, तालीसपत्रतगरं सप्तपर्णविकताः । काकोदुम्बरिका दिव्या तथा चैव सुरोद्भवा ।।७० फणिज्ज, कोथ, लशुन, भूस्तण, सुरस, कायस्य, वयस्थ, हरि- मैनशिल, अमृता, रुदन्ती, रोहिप, कुकुम, जया ऐरण्ड, काण्डीर, सल्लकी, हञ्जिका, सभी पित्ता, मूत्र, प्रायोहरितक, फल, सूक्ष्मएला, हिंगुपट्टिका इस प्रकार क सब धान और कटक सज्ञा वाला गण । है नृपोत्तम ! राजा को अपने दुर्ग मे सबका सञ्चय करना चाहिए। मुस्त, चन्दन, हीबेर, कृतमालक, दारु, दरिद्र, अनलद, उशीर, नक्तमाला कदम्मक, दूर्वा, पटोल, कटुका, दीर्घत्वक, पत्रक, वचा, किरात, तिक्त, भूतुम्बी, विषा, अतिविषा, तातीस पत्र, तगर सप्तपर्ण, विता, काका दुम्वरिका, दिव्या, सुरोद्भवा॥ ६४-७०॥ पग्रन्था रोहिणी मासो पपंटश्चाथ दन्तिका । रसाजन भङ्गराज पतङ्गा परिपेलवम् ।।७१ दु स्पर्शा गुरुणी कामा श्यामाक गन्धनाकुली। रूपपर्णी व्याघनख मजिष्ठा चतुरङ्गाला ॥७२ रम्भा वाकुरास्फोता तालास्फोता हरणुका । वेत्रान वैतसम्तुम्बी विषाणो लोध्रपुष्पिणी ।।७३ मालतीर पवृष्णाख्य वृश्चिमा नायिता तथा । पणिमा च गुट ची च सगणस्तिक्तसनमः ॥७४ एवमादीनि चान्यानि राजा सश्चिनुयात्पुरे । अभपामलके चोभे तथैव च विभीतम् ।।७५ प्रिय धातकी पुष्प मोचाख्या पाजुनासनाः । अनन्तास्त्रीतुवरिका स्योनाइट्फलन्तथा ॥७६ भूजपत्रशिलापन पाटलापत्रलोमकम् । गगहातिवृतागूनयासिरियाजना ॥७॥ पापा, गाणी, मामी गपंट, सनया, शासन, गमा
राजकृत्य दान
२८३
पनङ्गी, परिपलव, दुस्पर्शा, गुरुणी, कामा, श्यामा, मनाकुली, रूप.
पर्णी व्याघनख, मन्ठिा, चतुरगुला, रम्मा, अगरफोता, ताला
स्फोता, हरेणुगा, वेन ग्र, वैतस, तुम्बी, विपाणी, लोध्राष्पिणो,
मालती, काकृष्णा, वृश्चिका, जोविना, परिणवा, गुड़वी, मरण, तिवत
संज्ञावाला इसतरह के सभी पदापों का सञ्चय राजा का अपने पुरमे करना
चाहिए । अमया, आमला, विभीतक, प्रियमु, घातकी, पुष्प मोच,
बज नासन, अनन्ना स्त्री, तुदरिका स्य'ना, क्ट फ्ल, भूर्जपत्र, शिलापत्र,
पाटला पत्र, लोमक, समना, विवृतामल वापस, गैरिक, अञ्जन
10१.७७॥
विद्रुमं स मधूच्छिप्टकुम्भिकाकुमुदोत्पलम् ।
न्य माधोदुम्बराश्वस्शुिका. शिशुपा शमी ।
प्रियालपीलुकासारिशिरीपा. पद्मकन्तया ।
विल्वोऽग्रिमन्यः प्लक्षञ्च श्यामा श्च वको धनम् ॥७६
राजादन करीरञ्च धान्यक प्रियकस्तथा ।
कदोलासोकबदरा: दम्वखदिरद्वयम् ।।८०
एपा पत्राणि साणिमूलानि कुसुमानिच ।
एवमादीनिवान्या निपायास्यामतोरसः ॥८१
प्रयत्नेन नपोष्ठ । राजा सञ्चिनुयात्पुरे ।
कोटाश्व मारणे याग्या व्यङ्गताया तथंवच ॥८२
वातधूमाश्च मार्गाणा दूपणानि तथंव च ।
धार्याणि पाथिटुंगे तानि वदयामि पार्थिव ॥८३
विपाणा धारण कार्य प्रपलेन महीभृजा ।
विचित्राश्वाङ्गदा धार्या विपम्य समनास्तथा र
मत्स्यपुराण मे करीर-धा यक-प्रियक-ककोल-अशोक-बदर-कदम्ब -सदिर-इनके पत्र-सार-मूल और कुसुम इस प्रकार के तथा अ य आदि कषाय नाम वाला रस माना गया है। हे नपो मे परमश्रष्ठ ! राजा को चाहिए इन सबका प्रयत्नपूवक अपने पुर मे सञ्चय करे। व्यङ्गता मे मारण योग्य कोट-मागों के वातधूम तथा दूषण राजाओ को दुर्ग मे रहने चाहिए है पार्थिव । उनको मैं बतलाऊंगा। महीभुन को प्रयत्न पूर्वक विपी को धारण करना चाहिए। विचित्र अङ्गद तथा विष के शमन करने वाले भी रखने चाहिए ॥७८-८४॥ रक्षोभूतपिशाचघ्ना पापघ्ना पुष्टिवधना । क्लाविदश्च पुस्पा पुरे धार्या प्रयत्नत ॥ ५ भीतान् प्रमतान् कुपितास्तथैव च विमानितान् । व भत्यान् पापशीलाश्च न राजा वासयेरपुर ८६ यन्त्रायुधाटटालचयोपपन्न समाधायोपधि सम्प्रयुक्तम्। वणिगजनदच वृतमावसेत दुर्ग सुगत नपति सदव ॥८७ राजा र द्वारा अपने पुर मे राक्षस, भूत और पिशाचो में हमन परने वात-पापों का विनाश करन वान-वटि के बढ़ाने वाले लामों गवता पुरुष प्रयत्न पूर्वक रखने चाहिए । ॥५॥ जो पुरुष भीत-- प्रमात-पित--विमानित-पापील और दुभत्यो को अपने पुर में नाही बसाना पाहिए || नर * युE- ममूर म उपपन तथा सम्पूण थ य एप बोधियो स मयुत-पपिनो के maruf और लोभाति रक्षित दुग होजाको सय नियम करना चाहिए ॥७॥ :- मिराम
राजधर्म वर्णन
२८१
१६--राजधर्म वर्णन (१)
रक्षोनानि विपघ्नानि यानि धार्याणि भूभुजा ।
अगदानि समाचक्ष्व नानि धर्मभृताम्बर ! ॥१
विल्वाटकी यवक्षार पाटलावालिकोपणाः ।
श्रीपर्णी शल्लकीयुक्तोनिक्वाथ प्रोक्षणपरम् ॥२
सविप प्रोक्षित तेन सद्यो भवति निविपम् ।
यवस-घरपानीयवस्त्रशम्यासनोदकम् ॥३
कवचाभरण छत्र चालव्यजनवेश्मनाम् ।
शेलु. पाटलातिविपा शिग्रुमूर्वा पुननवा ।।४
समनावृषमूलञ्च कपित्थवृपशोणितम् ।
महादन्तशठन्तद्वत् प्रोक्षण विषनाशनम् ॥
लाक्षाप्रियग मजिप्ठा सममेला हरेणुका
यष्टचावा मधुरा व वधूपित्तेनकल्पिता: ॥६
निखनेद्गोविषाणस्थ सप्तरात्र महीतले ।
तत. कृत्वा मणि हेम्ना बद्ध हस्तेन धारयेत् ।।७
महर्षि मनु ने कहा-हे धर्मधारियो मे परम! राक्षों के
हनन करने और विपी का नाश करने वाले भी राजा को धारण
परने अर्थात रखने चाहिए तन अगदो को भाप बतलाइ ॥१॥श्रीमत्स्य
भगवान् ने कहा-वित्वाटकी, यवक्षार पाटला, वाहिल कोपणा, पोपी
और शल्लको इनका क्वाप सर्वश्रेष्ठ प्रोशण होता है। यदि कोई भी
विपयुक्त हो तो उससे प्रीक्षित होकर वह तुरन्त ही निविप हो जाया
परता है ! यद, सन्धव, पानी, वस्त्र, शय्या, भासन, उदर, स्वचामरण,
वाल व्यंजन, वेशम, इनके विष का नाम रोल, पाटल, प्रनिविषा, शिप..
मूर्ग, पुनर्नवा, समङ्गा, वृपमूल, पित्य, दृपयोजित और महाविशद
इन सबके उसी मांति प्रोक्षण करने से हो जाया करता है।॥२॥३१॥
मत्स्यपुराण
२८८
। ५। लामा, प्रिाङ्ग, मजिया ये सब समान भाग और एना (इता
पची), हरेणुका, यप्टि नामवानो, मधुरा व पित्त स कस्थित पर
रखे। इसो अनन्त र मणि का हेम से बद्ध बस हाय म धारण करना
चाहिय ।। ५.७॥
ससृप्ट सविप तेन सद्यो भवति निविषम् ।
मनोह्वया शमीपत्र तुम्बिका श्वेतसधपा 15
कपित्यकुष्ठमजिष्ठा पितेन श्लक्ष्णकल्पिता ।
शुनो गो कपिलाश्च सौम्याक्षिप्तोऽपरोगद 11
विपजित् परम काय मणिरत्नञ्च पूर्ववत् ।
मूषिका जतुका चापि हस्ते बद्धा विषापहा ।।१०
हरेणमामी मजिष्ठा रजनी मधुकामधु ।
अक्षत्वा सुरस लाक्षा श्वपित्त पूर्वबद्भुवि ॥११
वादित्राणि पताकाश्च पिष्टैरेते प्रलेपिता ।
श्रुत्वा दृष्टवा समाध्राय सद्योभवति निविष ॥१२
“युषण पञ्चलवण मञ्जिष्ठा रजनीद्वयम् ।
सूक्ष्मलात्रितापत्र विडङ्गानीन्द्रवारुणी ॥१३
मधुव वेतस क्षौद्र विषाणे च निधापयेत् ।
तस्मादुष्णाम्बुना माव प्राग क्त योजयेत्तत । १४
शुक्ल सर्जरसोपेतसर्परा एलवालुके ॥१५
सुवोगा तस्करसुगै कुसुमैरजु नस्य तु ।
धूपो वासगृहे हन्ति विप स्थावरजङ्गमम् ॥१६
इससे ससृष्ट सविष तुरन ही निर्षिप हो जाया करता है।
मनोया, शमीपत्र, तुम्बिका खेत सषय कापित्य, कुण्ठ मनिष्ठा,
पित के द्वारा श्लक्ष्ण कल्पित किये हुए है सौम्य ! कुता, गो और
कपिला के लिये अक्षिप्त यह दूसरा अगद होता है 11 पूर्व को
भौति मणिरल परम विनित करना पाहिए ! मपिका और जतुका
भी
राजधर्म वर्णन २८७ हाय में बांधने पर विप के अपहरण करने वाली होती है ।। १०॥ हरेणु मासो, मन्जिष्ठा, रजनी हल्दी', मधुका, मधु, अभावक, मुरम, लाक्षा (लाख)-इनको पूर्व को ही मानि श्वान को पिठ लेकर पेपण करे करे और इनसे वादिनी और पताकाओ पर प्रलेप करे तो घवण करके- देव करके और मूघ करके तुरन्त ही विप से रहित हो जाया करता है। ॥ ११ ॥ १२॥ न्युषण-पांचों लवण-मजीठ-दोनो प्रकार की हल्दी- छोटी इलायची--शिवतापत्र- विडङ्ग-इन्द्र वारणी-मधुक वेलस और क्षोद्र-इन सबको विपाए में निधाषित करो केवल उष्ण जल से पहिले वताये हुए को योजित करना चाहिए। शुक्लमर्ज ग्म से युक्त-सपंप- और एलव लुको से समन्वित-मुदोगा-न-कर-मुर तथा अर्जुन वृक्ष के पुप्प इनके द्वारा निर्मित धूप निवास गृह मे देवे दो स्यावर और जङ्गम दोनो के विप का हनन हो जाया करता है ।।१३-१६॥ न तर कोटा न विपन्ददुंरा न सरीसृपाः । न कृत्या कर्मणाञ्चापि धूपोऽय या दह्यते ।।१७ कल्पितंश्चन्दनक्षीरपलाशद्रुमवल्कल । मूर्वेलावालुसरसानाकुलीतण्डलीयकः ॥१८ क्वायः सर्वोदकार्यपु काकमाचोयुता हित. । रोचनापयनेपालीकुङ्क मस्तिलकान् वहन् ॥१६ विपनं वाध्यते स्याच्च नरनारीनृपप्रिय.। चूर्ण हरिद्रामञ्जिष्ठापिणिहीनिम्बजं. ॥२० दिग्ध निविपतामेति गात्र सर्वविपादितम् । शिरीपस्य फल पत्रं पुप्पत्वइमलमेव ॥२१ गोमूलपृष्टो ह्यगदः सर्वकमकरः स्मृत । एकवोर ! महीपध्यः शृणु चातः पर नृपः ! ॥२२ बिस स्थान में इस पृप को जलाया जाता है वहां पर कोई भी पोट नहीं रहते हैं। न कोई दिएराप्रमार ही रहता है और दर
मत्स्यपुराण
तथा सरीसृप भी नहीं रहा करते हैं । वहाँ पर कृत्या के भी कम्मो की
स्थिति नहीं होती है ॥ १७ ॥ चन्दन, क्षीर, पलाश, इम वल्कस, मूर्वा,
एला, वालु. सरसा, नाकुली और तण्डलीय इससे कल्पित क्वाथ जो कि
काकमोची से युक्त हो तो वह सब उद कार्यों में हितप्रद होता है।
रोचना पत्र, नेपाली और कुकुम से युक्त तिलो को वहन करने वाला
भर-नारी, नप प्रिय कभी भी विषो से वाधिन नहीं हुआ करता है ।
हरिद्रा, मजीठ, किण ही कण और निम्बज इनसे दिग्ध गात्र जो सब
विषों से अदित हो शीघ्र ही निविषता को प्राप्त हो जाता है । शिरीप
वृक्ष के फल पत्र, पुष्प, त्वचा और मूल इन पाँचो अङ्गो को गोमूत्र के
साय पीस डाले तो यह सब काम करने वाला अगद हो जाता है-ऐसा
कहा गया है । हे एक वीर! हे नृप ! इससे भी परम महौषधियों के
विषय में मुझसे प्राप धवण कीजिए ।॥१८-२२॥
बन्ध्या कर्कोटको राजन् ! विष्णुकान्ता तथोत्कटा।
शतमली सितानन्दा बला मोचा पटोलिका ॥२३
सामापिण्डा निशा चव तथा दग्धम्हा च या।
स्थले कर्मालनी या च विशाली शङ्खमूलिका ।।२४
चण्डाली हस्तिमगधा गोऽजापर्णो करम्भिका ।
रक्ता चैव महारक्ता तथा वहिशिखा च या ॥२५
फोशातको नक्तमाल प्रियालन्च सुलोचनी।
धामणी वसुगन्धा च तया वं गन्धनाकुली ॥२६
ईश्वरी शिवगन्धाच श्यामला वंशनालिका ।
जानुकाली महाश्वेता श्वेता च मधुष्टिका ॥२७
वज्रमः पारिभद्रश्च तथा वै सिन्धुवारकाः ।
जीवानन्दा वसुच्छिद्रा नतनागरकण्टका ॥२८
है गजन् ! बन्ध्या, कर्कोटको, विष्णुकान्ता, उक्तटा, शतमूली,
सितानादा, यता, मोधा, पटोनिका, सोमापिण्डा, निशा, दयाहा, स्पल
राजधर्म वर्णन २९६ कमलिनी, विशाली, गख मूलिका, चण्डाली,' हस्ति मगधा, गोऽजापर्ण, परम्भिका, रक्ता, महारक्ता, वहिशिखा, कोशातकी, नक्तमाल, प्रियाल, सुलोचनी, वारुणी, वसुगन्धा, गन्धनाकुली, ईश्वरो, शिवगन्धा, श्यामला, धशनालिका, जतुकाली, महाश्वेता. श्वेता, मधुयष्टिका, वधक, पारिभद्र, सिन्धुधारक, जीवानन्दा, वसुच्छिद्रा, नत नागर कष्टका ।। २३, २४,०५ २६, २७,२८॥ नालश्च जाली जातीच तथाच वटपत्रिका । कास्वर महानीला कुन्दुरुहं सपादिका ॥२६ मण्डूकपर्णी वाराही द्वे तथा तण्डुलीयके । साक्षी लवली ब्राह्मी विसरूपासुखाकरा ॥३० रुजापहो वृद्धिकरी तथागैव तु शल्यदा । पत्रिका रोहिणी नैव रक्तमाला महोषधी ॥३१ तथामलकवन्दाक श्यामचित्रफला च या। काकोली क्षोरकाकोली पीलुपी तथैव च ।।३२ केशिनी वृश्चिकालीच महानागा शतावरी । गरुडीच तथा वेगा जले कुमुदिनीतथा ॥३३ स्थले चोत्पलिनी या ध महाभूमिलता च या। उन्मादिनीसामराजीसवरलानिपाथव ॥३४ विशेषान्मरकतादोनि कीटपक्षं विशेषतः । जीवजाताश्च मणयः सर्वे धार्याः प्रयत्नतः ॥३५ नाल, जाली, जाती, वट पत्रिका, कातं स्वर, महानीला, पुग्दु. रई, ममारिका, मण्डूक पर्णी, वृद्धिकरी, शल्यदा, पत्रिका, रोहिणी, रक्त- माता, महोपपी, आमलक, मन्दाक, पयाम चित्रफला, वाकोली, क्षीर काकोली, पोलुपर्णी, केशिनी, वृश्चिकाली, वाराही दोनों-तण्डुलीपर, साक्षी, लवली, पाह्मी, विवरूपा, मुसा करा, सुरजापर, महानामा, सापरी, गरूडो, वेगा, जल में कुमुदिनी, स्पल में उत्पत्तिनी, महाभूमि- युधोग धितो राजन् ! मायादं पुरातनं २ मत्स्यपुराण २६० r लता, उन्मादिनी सोमराजी, हे पार्थिव । समस्त रल, विशेष रूप से मर- कत आदि-विशेष रूप से कीटपक्ष, जीवजात मोर सब मणियां यत्नपूर्वक धारण करने चाहिए।। २६-३५।। रक्षोध्नाश्च विषघ्नाश्च कृत्यावंतालनाशना' । विशेषान्नरनागाश्च गोखरोष्ट्रसमुद्भवा ॥३६ सपतित्तिरगोमायुवस्त्र(क)मण्ठकजाश्च ये। सिंहव्याघ्रर्भमार्जारद्वीपिवानरसभवा ॥ कपिजला गजा वाजिमहिषणभवाश्च मे ॥३७॥ इत्येवमेत सकलरपेतन्द्रव्यश्च सर्व स्वपुर सुरक्षितम् । राजा वसेतत्र गृह सुशुभ्र गुणान्वित लक्षणसप्रयुक्तम् ॥३८ राक्षसो के हनन वाल-विष के नाशक, कृत्या मोर बैताल के मारा करने वाले--विशेप रूप से नर और नाग-गोखर उष्ट्रो समुभव पाले-सपं, तित्तिर, गोमायु वस्त्र और मण्डकज-सिंह, व्याघ्र क्ष, मारि, टीपी और वानरों से समुत्पन्न-कपिजल, गज, गाजि, महिष और एण स प्रमूत इस प्रकार से इन सबसे समुपेत तथा सब द्रव्यो र द्वारा सुरभित अपन पुर में राजा शिवाम करना चाहिए जो कि राजा पा गृह मुगुन-गुणो से समन्वित और सभी सुदा लक्षणो स सम्प्रयुक्त होना पाहिए ।। ३६, १७, ३०।। ९७-राजधर्म वर्णन (२) राजरतारहस्यानि यानि दुर्गे निधापयेत् । पारपेटा महीमा हि तत्वानि तानि च शिरीपोदुम्बरणमोपीजपूर पृतप्ततम् ।
राजधर्म वर्णन
२६१
कशेरुफलमूलानि इक्षुमूलं तथा विसम् ।
दुर्वाक्षीरघृतमण्ड: सिद्धोऽयं मासिकः परः ॥३
नर शस्त्रहत प्राप्तो न तसा मरण भवेत् ।
कल्मापवैणना तत्र जनयेत्तु विभावसुम् ।।४
गृहे निरपसव्यन्तु नियते यत्र पार्थिव !।
नान्योऽग्निज्वलते तत्र नात्र कार्याविचारणा ॥५
कार्पासस्था भुजङ्गस्य तेन निर्मोचन भवेत् ।
सपंनिर्वासने धूपः प्रशस्तः सतत गृहे ॥६
सामुद्रसैन्धवयवा विद्यु दग्धा च मृत्तिा।
तयानुलिप्त यवैश्म नाग्निना दह्यते नृप! ॥७
महर्षि मनु ने कहा-मही के भरण करने वाला अपने दुर्ग में
जिन राज्य की रक्षा के रहस्यो को निधापित करे अथवा करावे पाप
कृपा करके उन तत्वो को बतलाइये ॥१॥ श्रीमत्स्य भगवान् ने
कहा-
हे राजन् ! शिरीप, उदुम्बर, शमा, बीजपूर को घृत से प्लुत करे इसको
पुगतन लोगों के द्वारा ध्युद्योग कहा गया है जो मास के अद्धं तक होता
है ।। २॥ कशेरु के फल और मूल, ईख का मूल, विस, दूर्वा, क्षीर घृत,
से मण्ड मिद्ध होता है जो पर एवं मासिक होता है ॥ ३ ॥ शस्त्र से हत
हुए नर को प्राप्त हो जावे तो उसका मरण नहीं होता है । जहाँ पर
कल्माष वेणु से विभावसु का जनम करना चाहिए। हे पार्थिव ! जहां
पर गृह मे तीन बार अपसव्य किया जाता है । वहाँ पर अन्य कोई भी
अग्नि नहीं जलती है--इस विपय मे कोई विचारण करने की आवश्यकता
नहीं है । कार्पास मे स्थित हो तो उससे भुजङ्ग का निर्मोचन हो जाता
है । यह धूप निरन्तर सपों के निर्वासन करने के कम्मं मे परम प्रशस्त
होता है ।। ३, ४, ५, ६॥ सामुद सैन्धव, यव, विद्युत से दग्ध मृत्तिका,
इससे जो गृह अनुलिप्त किया जाये तो हे नृप ! वह वेश्म अग्नि से कभी
भी दग्ध नहीं किया जाता है |
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मत्स्यपुराण २६० लता, उन्मादिनी सोमराजी हे पार्थिव । समस्त रत्न, विशेष रूप से मर- फत आदि-विशेष रूप से कीटपक्ष, जीवजात मौर सब मणियां यत्नपूर्वक धारण करने चाहिए ।। २६-३५॥ रक्षोघ्नाश्च विषनाश्च कृत्यावतालनाशना । विशेषानरनागाश्च गाखरोष्ट्रसमुद्भवा ॥३६ सपतित्तिरगोमायुवस्त्र(क)मण्ठकजाश्च ये। सिंहव्याघ्रक्षमार्जारद्वीपिवानरसभवा । पपिजला गजा वाजिमहिषणमवाश्च गे ॥३७॥ इत्येवमेत सक्लरुपेतन्द्रव्यश्च सर्व स्वपुर सुरक्षितम् । राजा वसेतत्र गृह सुशुभ्र गुणान्वित लक्षणसप्रयुक्तम् ।।३८ राक्षसो के हनन वाल-वियन नाशक कृत्या पौर बेताल के नाश करन वान-विशेष रूप से नर और नाग-गोषर उष्ट्रो समुभव पारे-सप, तितिर गोमामु वस्त्र पौर मण्डाज-सिंह, उपाय, मार, दीपी और वानरों से समुत्पन-पिजल, गज बाजि, महिए और एण म प्रमूत इस प्रकार स इन सबस समुपेत तथा सबको द्वारा मुरित अपन पुर में राजा को शिवाम करना चाहिए जानिराशा पा रह मुगुप्र-गुणों से समापत और सभी गुम्न लक्षणो स सम्म पुरस हाना पाहिए ॥३६, ३७, ३८॥ १७-राजधर्म वर्णन (२) राजरतारहस्याति यानि दुर्गे निधापयेत् । पारयदा महोगा हि तत्वानि ताति घt निरोपायरामोधीजपूर पृप्ततम् । मुपाग पिता रामापापुरातन ॥२ राजधमं वर्णन २६३ छिपा लिया करता है और उसी प्रकार से लज्जा करता है एवं शीघ्रता किया करता है ।। ११, १२ ।। हे नृप ! भूमि पर लिखता है-गरदन को घुमाया करता है-मस्तक को खुजलाता है और अपनी आत्मा का परि- लोडन किया करता है नया हे राजन् ! इन विपरीत क्रियाओं मे मी निश्चय ही शीघ्रता वाला होता है । इसी तरह के जो चिह्न होते हैं उन पिपद के लक्षणो की परीक्षा करनी चाहिए।। १३, १४॥ समीपविक्षिपेद्वह्नौ तदन्न त्वरयान्वितैः । इन्द्रायुधसवर्णन्तु रक्षं स्फोटसमन्वितम् ॥१५ एकावतंन्तु दुर्गन्धि भृशञ्चटचटायते । तद्ध मसेवनाज्जन्तोः शिरोरोगश्च जायते ।। ६ सविपेऽऽन्ने विलीयन्ते न च पार्थिव ! मक्षिका. । निलोनाश्च विपद्यन्ते सस्पृष्टे सविपे तथा ॥१७ विरज्यति चकोरस्य दृष्टि: पार्थिवसत्तम!। विकृतिञ्च स्वरो याति कोकिलस्यतथानृप । ॥१८ गतिस्खलति हसस्य भृङ्गराजश्च कूजति । कोचो मदमथाभ्येति कृकवाकुविगैति च ॥१६ विक्रोशतिशुकोराजन् ! सारिकावमतेततः । चामोकरोऽन्यतोयातिमृत्युकारण्डवस्तथा ॥२० मेहते वानरो राजन् ! ग्लायते जीवजीवकः । दृप्टरोमा भवेद्वः पृपतश्चव रोदिति ॥२१ समय में स्थित लोगो को वैग से समन्वित होते हुए ही उस यान को अग्नि में प्रक्षिप्त कर देना चाहिए । इन्द्रायुध के वर्ण के समान- श, स्फोट से सपुत, एमावत', दुग-ध से युक्त होकर प्रन्यन्त घर-चर पनि रिण करती है। उसो धम के सेन से जन्तु वे शिर में वेदना ओर गंग ममुतान हो जाया करता है ॥ १५, १६॥ हे पार्थिव ! विष म पुल मन म मागयो बिलौन नही हुमा करती हैं तथा सविप अन्न
मत्स्यपुराण
दिवा च दुर्गे रक्ष्योऽग्निर्वाति वाते विशेषत.।
विषाच्च रक्ष्योनृपतिस्तत्रयुक्ति निबोधमे ।।८
कोडानिमित्त नृपति रियेन्मृगपक्षिण ।
अन्न वै प्राक परीक्षेत वह्नो चान्यतरेषु च ॥
वस्त्र पुष्पमलद्वार भोजनाच्छादन तथा ।
नापरीतितपूर्वन्त स्पशेदपि महामति ॥१०
स्याच्चासौ वक्त्रसन्तप्त सोद्वगञ्च निरीक्षते ।
विषदोऽथ विष दत्त यच्च तत्र परीक्षते ॥११
स्रस्तोत्तरीयो विमना, स्तम्भकुड्यादिभिस्तथा ।
प्रन्छादयति चारमान लज्जते त्वरते तथा ॥१२
भुव विलिखति ग्नीवा तथा चालयते नृप ।।
पण्डूयति च मूर्धान परिलोडचाननन्तथा ॥१३
क्रियासु त्वरितो राजन् ! विपरीतास्वपि ध्र.वम् ।
एवमादीनि चिह्नानि विपदस्य परीक्षयेत् ॥१४
दिन के समय मे दुर्ग मे अग्नि को रक्षा करनी चाहिए । विशेष
रूप से उस समय मे रक्षा करनी आवश्यक है जब वायु वहन किया
परता है। खास तौर से नृपति की सुरक्षा अवश्य ही करनी चाहिए ।
इसमें जो युक्ति अमल में लाई जावे उसयो भी तुम मुझसे समा लो।
॥८॥ीर के निमित राजा पो मृगो और पक्षियों को धारण करना
पाहिये । सर्व प्रथम अग्नि में अन्न को परीक्षा र पेनी अत्यावश्यक है।
हाय तर पर पो में भी परत्र, पुष, अरद्वार, मोअन तथा आग्छादन
इन रावरा महान् मति वाले रामाशे पहिले भली भाति परीक्षा विये
बिना कभी भी स्पछ मही परना पाहिए ।।६,१०॥ यह वक्त सन्तप्त
होने और नगर सहित विपत्तियों को देखता है। यहाँ पर दिये हुये
विपीको परोक्षा परता है अपने उतरीय वस्त्र पो छोड़ देने वामा-
IIT COIR दृष्प fea अपा मापा लिया रतामा
राजधर्म वर्णन २६३ छिपा लिया करता है और उसी प्रकार से लज्जा करता है एव शीघ्रता किया करता है ॥ ११, १२।। हे नृप ! भूमि पर लिखता है-गरदन को घुमाया करता है-मस्तक को तुजलाता है और अपनी आत्मा का परि- लोडन किया करता है क्या हे राजन् ! इन विपरीत क्रियाओं में भी निश्चय ही शीघ्रता वाला होना है। इसी तरह के जो चिह्न होते हैं उन पिपद के लक्षणों की परीक्षा करनी चाहिए।। १३, १४ ।। समोपविक्षिपेद्वह्नौ तदन्न त्वरयान्वितैः । इन्द्रायुधसवर्णन्तु स्क्ष स्फोटसमन्वितम् ॥१५ एकावतंन्तु दुगन्धि भृशञ्चटचटायते । तद्ध मसेवनाज्जन्तोः शिरोरोगश्च जायते ॥१६ सविषेऽऽन्ने विलीयन्ते न च पार्थिव । मक्षिका । निलोनाश्च विपद्यन्ते सस्पृष्टे सविपे तथा ॥१७ विरज्यति चकोरस्य दृष्टि. पार्थिवसत्तम!। विकृतिञ्च स्वरो याति कोकिलस्यतथानृप ! ॥१८ गतिस्खलति हसस्य भृङ्गराजश्च कूजति । प्रौञ्चो मदमथाभ्येति कृकवाकुविगैति च ।।१६ विक्रोशतिशुकोराजन् । सारिकावमतेततः । चामोकरोऽन्यतोयातिमृत्युकारण्डवस्तथा ॥२० मेहते वानरो राजन् ! ग्लायते जीवजीवकः । दृष्टरोमा भवेद्वम्र पृषतश्चव रोदिति ॥२१ समीप मे स्थित लोगो का लंग से समन्वित होते हुए ही उस अन्न को अग्नि मे प्रक्षिप्त कर देना चाहिए । इन्द्रायुध के वर्ण के समान- रूप, स्फोट से सयुत, एकावतं, दुगन्ध से युक्त होकर अन्यन्त चर-चर ध्वनि किया करती है। उसक घम के सेवन से जन्तु के शिर में वेदना और गैग समुत्पन्न हो जाया करता है ॥ १५, १६ ॥ ह पार्थिव ! विप से युक्त अन्न म मक्खियां विलीन नही हुआ करती हैं तथा सविप अन्न
२६४
मरम्यपुराण
के सम्पर्श होने पर वे मक्षिकाएं उसी में विलीन हो जाया करती हैं।
॥ १७ ॥ हे पार्थिव श्रेष्ठ ! चकोर पसी की दृष्टि विगत अर्थात हीनता
को प्राप्त हो जाया करती है। इस की गति जो कि अति प्रशसनीय
होती है स्खलित हो जाया करती है -भृङ्गराज कूजन करता है | कोन्च
मद को प्राप्त हो जाता है और वृक्वाकु विस्त करने लगता है। है
राजन् । शुक विक्रोशन करता है--सारिका वमन करती है। चामीर
अन्य ओर जाता है--कारण्डव मृत्यु को प्राप्त होता है. है राजन् ! वानर
मेहन करता है-जीव जीवक ग्लानि करता है--वा हृष्ट रोमो वाला
होता है और पृषत रुदन करता है ॥ ८-२१॥
हेपमायाति च शिखी विषसन्दर्शनान्नृप ! ।
अन्तञ्च सविप राजश्चिरेण च विपद्यते ।।२२
तदा भवति नि श्राव्य पक्षप'पितोपमम् ।
व्यापनरसग-धञ्च चन्द्रिकाभिस्तथा युतम् ।।२३
न्यजनानान्तु शुष्कत्व द्रवाणा बुद्बुदोद्भवः ।
ससैन्धवाना द्रव्याणाजायतेफेनमालिता ॥२४
सस्यराजिश्च ताम्रा स्यात् नीला च पयसस्तथा ।
कोकिलाभा च मद्यस्य तोयस्य च नपोत्तम ! ॥ ५
धान्याम्लस्य तथा कृष्णा कपिला कोद्रवस्य च ।
मधुश्यामा च तस्य नीला पीता तथैव च ॥२६
घृतस्योदकसनाशा कोताभा च सत्तनुः ।
हरिता माक्षिकस्यापि तैलस्यच तथारुणा ॥२७
फलानामध्यपकावना पाक. क्षिप्र प्रजायते ।
प्रकोपश्चैव पक्वाना माल्याना म्लानता तथा ॥२८
हे नपा विष के मदर्शन से शिखी हर्ष को प्राप्त होता है। हे गजन्!
विप के सहित अन्न चिरकाल मे विपान करता है । उस समय मे नि:
थाप्य - यापन्न रस और गाध से युक्त चन्दिकालो से समन्वित और
राजधर्म वर्णन
२६५
पक्ष पपितोपम हो जाता है ॥२, २३।। व्यजनों में शुष्मता-द्रव
पदों में बुद्ध दो की उत्पत्ति और जो संघद मे युक्त पदार्थ हैं उनमें फेन
मालिता उत्पन्न हो जाया करती है। जो सम्यों राजि है ताम्र वर्ण वाली
और पय की आमा नीली हो जाती है । मद्य एव तोय की यामा कोक्सिा
के तुल्य हो जाया करती है । है नौतम ! धान्याम्ल की कृपा और को-
द्रव की कपिल-तक्रकी मधुश्याम, नील, पोत, हो जाया करती है। धृत
की उदक के समान तथा कोन जमी आमा हो जाती है। माक्षिक
(शहद) की हरी एवं तन की अरुण आमा होती है। जो फल भपवच
होते हैं उन पर प्रकोप होता है तथा माल्या की म्लानता हो जाया करती
है ॥२४-२८॥
मृदुता कटिनाना म्यान् मृदूनाञ्च विपर्ययः ।
सूक्ष्माणा स्पदलन तथा चैवातिरङ्गता ॥२६
न्याममण्डलता चैव वस्त्राणा व तश्वच ।
लोहानाञ्च मणीनाञ्च मलपङ्कोपदिग्धता ॥३०
अनुलेपनगन्धाना माल्यानाच नृपोत्तम ।
विगन्धता च विज्ञयातया राजन् । जलस्य तु ॥३१
दन्तकाष्ठत्वच. श्यामास्तनुमत्वास्तथैव च ।
एवमादीनि चिह्नानि विज्ञेयानि नृपोतम ! ||३२
तम्माद्राजा सदा तिन् मणिमन्त्रोपचागणः ।
उक्न सरक्षितो राजा प्रमादपरिवजंक: ३३
प्रजावराम लमिहावनीशस्तदक्षगादाष्ट्रमुपैति वृद्धिम् ।।
तस्मात्प्रयत्नेन नृपस्व रक्षा सर्वेण कार्या रविवशचन्द्र ३५
वोपठिन एव कठोर दृश्य हैं उनमें कोमलमा और जो स्वभाव
से ही मृदु पदार्थ हैं उनमे विषय हो जाया करता है। मूदन पार्यो ।
रूप का दल न होता है तथा अतिङ्गिता या गाया करती है। यात्रों में
पाप मण्डलवा हाती है। सद प्रहार ६ लोह और मणियों में मल के
मरस्यपुराण
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पड़ की उपदिग्यता हो जाती है । हे नृपोत्तम । जो अनुलेपन करने के
द्रव्य हैं जिनमे सुदर गध होती है उनमे और माल्यो मे तथा जाल मे
विग घता उत्पन्न हो जाया करती है । दन्तकाष्ठ की त्वचा श्याम पोर तनु
सत्य हो जाती है । हे नृपोत्तम | इस प्रकार से इन चिन्हो को जान लेना
चाहिए। इसी कारण से राजा को सर्वदा मणि-मन्त्र और औषधों के
गणो से सयुत होकर ही निवास करना चाहिए अथवा स्थित रहना चाहिए
इन उक्त पदार्थों से अच्छी तरह से सरक्षित एवं प्रमाद से परिवजित
राजा को होना चाहिए ॥२६-३३।। यहा पर प्रवीश जा के तरु का
म्ल होता है। उसका सरक्षण रहने से ही राष्ट्र वृद्धि को प्राप्त होता
है। हे रविवश चन्द्र । इसी कारण से सब प्रकार के प्रयत्न से नृप
की
रक्षा करनी चाहिए । ३४॥
१८-राजधर्म वर्णन (३)
राजन् । पुत्रस्य रक्षा च तव्या पृथिवीक्षिता।
आचायश्चाभ क्तव्यो नित्ययुक्तश्च रक्षिभि। ११
धमकामार्थशास्त्राणि धनुवदञ्च शिदयेत् ।
रथे च कुञ्जरे चैन यायामकारयेत्सदा । २
शिल्पानि शिक्षायेगेन नाता मिथ्या प्रिय वदेत् ।
शरीररक्षाव्याजेन रक्षिणाऽस्य नियोजयेत् ।३
नचास्य सङ्गो टातव्य क्र उलुब्धावमानित ।
तथा व विनयेदेन यथा च यौवनगोचरे ॥४
इन्द्रिय पपृष्येत सता मार्गासुदुर्गमात् ।
गुणाधानमरावयन्तु यस्य व स्वभावय ॥५
इन्धन तस्य क्तव्य गुप्तदेश सुखान्वितम् ।
अविनीतकुमार हि कुलमाशु विशीर्यते ॥६
राजधर्म दान २७ अधिकारेषु सर्वेषु विनीत विनियोजयेत् । आदो स्वल्पे तत. पश्चात्क्रमेणाय महत्स्वपि ॥७ श्री मत्स्य भगवान् न रहा-हे राजन् ' राजा को अपने पुत्र की रक्षा करनी चाहिये और रक्षा करने वाली के सहित नित्य युक्त यहाँ पर याच यं को नियुक्त करना चाहिए ॥१॥ उस पुत्र को धर्म --काम और अयं गास्त्रो को तथा धनुर्वेद को शिक्षा दिलवानी चाहिए । रथ मे तया कुञ्जर में भी दीक्षित करावे और सदा इम अपने व्यायाम करवाना चाहिए ||२|| इस पुत्र को बनेक मिल्पो की शिक्षा दिलदादे । एमा प्रयत्न करे !क वहा प्राप्त अर्थात् सत्य वना होवे और कभी उसे मिथ्या बोलने का अवसर हो न हावे । राजा क पुत्र के शुगर की रक्षा के मिप से रक्षियों को नियोजित करना चाहिए ।।३।। ऋद्ध- लुब्ध और अपमानित हुए व्यक्तियो के साथ इम पुत्र का सङ्ग कभी भी न होने देवे । जैस ही यह यौवन में पदार्पण करे इमको विनीत बनाना चाहिए ।।४11 मज्जनी के मृदुर्गम मार्ग से इन्द्रियो के द्वारा अपकृष्ट नहीं होन देवे । स्वभाव म ही अशक्य गुणो का आधान करना चाहिये। विमा गुर देश मे मुख से समन्विन उमका वन्यन करना चाहिए। जो राज कुमार अविनीत होता है उसका कुल शीघ्र ही दिशीणं हुआ वरना है । सभी अधिकार के कार्यो मे विनीत का नियोजन करना चाहिए । आदि मे छोटे पद पर इसके पश्चात् कम से बड़े पदो पर भी नियुक्तियां रे ॥५, ६, ।। मृगया पा-मक्षाश्च वर्जयेत् पृथिवीपति.। एनान्ये सेवमानास्तु विनष्टाः पृथिवीक्षतः ।। कहो नरणादल ! तपा मखया न विद्यते। दिवा स्वाप क्षितीशम्नु विशेपेणविवजयेत् ।। वापामध्य न कर्न य दण्डपा.प्यमेव च । पक्षनिन्दा च तथा वजनीया महीतिना।।. अर्थस्य दृषण गजा द्विप्रकार विवजयेन् ।
२६८
मत्स्यपुराण
अर्थाना दूपणञ्चक तथार्थेषु च दूपणम् ॥११
प्राकाराणा समुन्छेदो दुर्गादीनामसलिया।
अर्थाना दूषण प्रोक्त विप्रकोणत्वमेव च ॥१२
अदेशकाले यदानमपाशे दानमेव च ।
भर्थेपु दूषण प्रोक्तमसत्कर्मप्रवतनम् ॥१३
काम क्रोधोमदोमानो लोभो हपंस्तथैव च ।
एते वाः प्रयत्नेन सादर पृथिवीक्षिता ।।१४
जो पृथिवी का स्वामी हो उसको मृगया ( शिकार )-मदिरा
पान और अक्षकोडा (त) का परिवर्जन कर देना चाहिए । इन का जो
सेवन किया करत हैं वे भूपतिगण विनष्ट हो जाया करते है। है नरशा-
टूल ऐसे बहन-से राजा लोग हैं उनकी कोई भी संख्या नहीं हैं राजा
को दिन मे निद्रा लेना विशेष रूप से वजित कर देनी चाहिर । राजा का
कर्तव्य है कि ह कभी भी वाणी की कठोरता न करे तथा दण्ड देने में
भो अत्यन्त कठोर उसे नहीं होना चाहिए । नपति को परोक्ष मे किसी की
भी निन्दा नहीं करनी चाहिए। अथ के दो प्रकार के दूषण का वजन
राजा को करना आवश्यक है-एव अर्थों का दूपण तथा अर्थों मे दूषण ।
प्रकारो का समुच्छेद और दुर्गादि की असक्रिया यही अर्थों का दूषण
कहा गया है तथा विप्रकोणता भी अर्थो का दूपण होता है। अनुचित देश
तश अनुपयुक्त काल मे जो दान दिया जाता है और दान का जो पात्र
हो नही है उसको दान देना एव असम्म में प्रवत्तंन करना अर्थो में
दूपरण बताया गया है। पृथिवी के स्वामी को प्रयत्न पूर्वक आदर के
सहित काम-क्रोध-मद-मान- लोम और हपं इनका वजन अवश्य
ही कर दना चाहिए।-१४॥
एतेपा विजय वृत्या कार्यो मृत्यजयस्ततः ।
कृत्वा मृत्यजय |जा पोगन् जानपदान् जयेत् ॥१५
वृत्वा च विजयन्तपा शयन वाह्यास्ततो जयेत् ।
राजधर्म वर्णन
वाह्याश्च विविधा ज्ञयास्तुल्याभ्यन्तरकृत्रिमाः ।।१६
गुरदस्ते यथापूर्व तेषु यत्नपरो भवेत् ।
पितृपतामह मित्रममित्रञ्च तथा रिपोः । १७
कृत्रिमञ्च महाभाग !त्रि विविधमुच्यते ।
तथापि च गुरुः पूर्व भवेत्तत्रापि चाहतः ।।१८
स्वाम्यमात्यो जनपदो दुर्ग दण्डस्तथैव च ।
फोशोमित्रञ्चधर्मज्ञ ! सप्ताङ्ग राज्यमन्यते ॥१६
सप्ताङ्गस्यापि राज्यस्य मूलस्वामी प्रकीर्तितः।
तन्मूलत्वात्तथाङ्गाना सतुरक्ष्यः ॥२०
पडङ्गरक्षा कतव्या तथा तेन प्रयत्नतः।
अङ्गभ्यो यस्तथास्तु द्रोहमाचरतेऽल्पधीः ॥२१
इन सब पर अपना पूण विजय कर के ही राजा को फिर अपने
भृत्यों पर भी जय प्राप्त करना चाहिए । जब भृत्यो पर विजय करली
जावे तो फिर इसके उपरान्त पौरो एव जानपदो पर विजय करना
आवश्यक होना है ११॥ इन सब पर विजय को स्थापित करके इसके
अनन्नर हो राजा को वाहिर रहने वाले शत्रओ पर जय का लाभ लेना
चाहिए । जो बाह्य शत्रु होते है ये अनेक प्रकार के हुग्रा करते है। वे
तुल्य -आभ्यन्तर और कृत्रिम होते हैं ।।१६। वै यया पूर्व बहुत बहे
हुआ करते हैं इसलिए उनमे यत्न परायण राना को होना आवश्या है।
पिता पितामह के समय से चले आने वाला मित्र तथा रिपु का अमित्र
(शत्रु है महाभाग ! कृत्रिम मित्र तीन प्रकार का कहा जाता है। तो
भी पूर्व गुरु होता है। उसम भा आदृत होना चाहिए। है धर्मज्ञ !
म्वामी 1-अमात्य-जनपद-दुग-दण्ड-कोश और मित्र इन सात
अङ्गो वाला राज्य कहा जाया करता है। यपि राज्य के ये उपयुक्त
मात अङ्ग होन है ता भी इन सातो म भी मूल स्वामी ही कत्तित किया
गया है । सभी अगों का उसको मूल होन से उसकी प्रयत्न पूर्वक रक्षा
।
-
मत्स्यपुराण
करनी चाहिए । अन्य छै अङ्गों की भी उसके द्वारा प्रयत्न के साथ सुरक्षा
करनी चाहिए । इन बगो मे जो कोई एक द्रोह किसी भी अङ्ग से करता
है वह अल्प बुद्धि वाला ही होता है ॥१७-२१॥
बन्धस्तस्य तु कतव्य शीघ्रमेव महीक्षिता।
न राज्ञा मृदुना भाव्य मृदुहि परिभूयते ॥२२
न भाव्य दारुणेनातितीक्ष्णादुद्विजते जनः ।
काले मृदुर्यो भवति काले भवति दारणः ॥२३
राजा लोकद्वयापेक्षी तस्य लोकद्वय भवेत् ।
भत्यै सह महीपाल परिहार्स विवर्जयेत् ॥
॥२४
भृत्या. परिभवन्तीह नृप हपशङ्गतम् ।
व्यसनानि च सर्वाणि भूपति परिवजयेत् ॥२५
लोकसग्रहणार्थाय कृतकव्य सनो भवेत् ।
शौण्डीरस्य नरेन्द्रस्य नित्यमुद्रिक्तचेतस ॥२६
जना विरागमायान्ति सदादु सेव्यभावत.।
स्मितपूर्वाभिभापीस्यात्सवस्यंवमहीपति ॥२७
बध्येष्वपि महाभाग | भृकुटि न समाचरेत् ।
भाध्यधम भूत श्रेष्ठ ! स्थूललक्ष्येणभूभुजा । २८
राजा वा कर्तव्य है कि ऐसे द्रोह करने वाले व्यक्ति का बन्ध
कर देव और शीघ्र ही उसको जोध कर ब द कर देना चाहिए। राजा
को मृदु नहीं हाना चाहिए जो राजा मृदु होना है वह परिभूत हो जाया
परता हूँ .२९॥ राजा को अत्यन्त दारुण भी नहीं होना चाहिए क्योकि
अत्यन्त नीण राका रो प्रजाजन उद्विग्न हो जाया करत हैं । जो राजा
उचित समय पर मृदु होता है तथा मावश्यकता के अनुसार चित अवसर
पर कारण होता है वह दोनों लोगो की पेक्षा वासा हुआ करता है और
उगा दानों से लोक सफल हुमा करते है । राजा को अपन भत्यो क साथ
भी भी परिदात न करना चाहिए। जो राजा हर्षक वराङ्गत हो
राजयम वर्णन
जाया करता है उसको मृत्य परिभून कर दिया करते है । राजा को सभी
प्रकार के व्यसनों को परिवजित कर देना चाहिए। लोक के सग्रहण के
लिए यदि कोई व्यसन करने वाला भी हो तो उसे कृतक ध्यसनी हो
होना नगहिए । जो नरेन्द्र सोण्डोर होता है उससे नित्य ही उद्रित चित्त
वाले मनुष्य दिराग को प्राप्त हो जाते हैं और उनके हृदय में सदा दु सेव्य
भावना उत्पन्न हो जाया करती है । महीपति का कर्तब्य है कि सभी के
साथ मुस्कराते हुए भाषण करने वाला हो । जो लोग अपरायो के कारण
वध के भी योग्य हो है महाभाग ! उन पर भी राजा को अपनी भौहें
तिरछी नहीं करनी चाहिए। हे धर्मधारियो मे परम श्रेष्ठ ! राजा को
सर्वदा स्थल लक्ष्य से युक्त हो होना चाहिए ।।२३-२८॥
स्थूललक्ष्यस्य वागा सर्वाभवति मेदिनी ।
अदीर्घसूत्रश्च भवेत् सर्वकर्मसु पार्गिवः ।
दीर्घमूत्रस्य नृपतेः कर्महानिध्रुवम्भवेत् ।
रागे दर्प च माने च द्रोहे पापे च कमणि ॥३०
अप्रिये चैव कर्तव्ये दोघमूत्रः प्रशस्यते ।
राजा सतमन्त्रण मदा भाव्यं नृपोत्तम ! ॥३१
तस्यासंवृतमन्यस्य राज्ञः सर्वापदो ध्रुवम् ।
कृतान्येव तु कार्याणि ज्ञायन्ते यस्यभूपतेः ।।३२
नारब्धानि महाभाग ! यस्य स्याहसुघावशे ।
मन्त्रमूलसदाराज्यंतस्मान्मन्त्रः सुरक्षितः ॥३३
कर्तव्यः पृथिवीपालमन्त्रभेदभयात्सदा
मन्त्रावत्साधितो मन्त्रः सम्पत्तीनासुखावहः ॥३४
मन्त्रन्छलेन बहवो विनष्टाः पृथिवीक्षितः ।
आकारैरिङ्गितंगत्या चेष्टया भापितेन च ॥३५
निम नका मूल लक्ष्य होता है उसको यह सम्पूर्ण भूमि वश.
गामिनी हुआ करती है। पार्थिव को समस्त कर्मों में दीर्घमूत्री नहीं
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३०२ मत्स्यपुराण रहना चाहिए। जो नृपति दीप सूत्री होता है उसके कर्मों को हानि निश्चित रूप से हो जाया करती है। राग मे-हप मे-मान मे-द्रोह मै-पाप कम्म मे और अप्रिय कत्त व्य मे दीपसूत्र होना प्रशस्त माना गया है। हे नृपोत्तम ! राजा को अपना मन्त्र सवृत रखने वाला सवदा होना चाहिए । जो राजा अपन मात्र को असवृत रखता है उसको सभी आपत्तिया निश्चित रूप से मा जाया करती हैं। जिस राजा के काम्प किय जान पर ही लोगो को मालूम हुआ करते हैं और हे महाभाग भारम्भ किये हुए या पूर्व मे नही ज्ञात होते हैं उस राजा के वश यह समग्र वसुधा हुआ करती है। राज्य का मूलतत्व म ही सदा होता है इसलिए म त्र को पूर्ण रूप से सुरक्षित रखना चाहिए। मन के भेद के होने वाले भय मे राजाओ को सदा उसे पूण रक्षित रखना प्रावश्यक है। मत्र के ज्ञाता के द्वारा सुमाधित न व सभी सम्पत्तियो का धौर सुख का देने वाला हुआ करता है। मात्र छल स बहुत राजा लोग विनष्ट हो गये हैं। याका दङ्गिन-गति--चेष्टा~भापत नेत्र तथा मुख की विकृति - इन द्वारा बन्तगत मनका ज्ञान हो जाया करता है और ना नीति शास्त्र म कुनत्र हात है 4 सभी कुछ मन का भाव जान लिया बरत हैं और जा ए7 कुशल हैं उनके वश में यह सम्पूर्ण वसुधरा रहा करती है ।।२६-३६॥ नमय विकारश्च गृह्यतऽतगत मन । मयस्य युगलस्तस्य वश सर्वा वसुन्धरा ॥३६ मवताह महोसार सदा पाथिवनन्दन ।। नास्तु मन्त्रयामप्र राजा न बहुभि सह ॥३७ नाराह द्विपमा नावमारोक्षितिनाविकम् । य चास्य भूमिजयिना नवयु परिधान ॥३८ तानानया मवान् मामादिभिरपक्रम । यथा न स्यात् हसाभाय प्रगामिनवेक्षया ॥३६ राजधर्म वर्णन तथा राज्ञा प्रकर्तव्यं स्वराष्ट्रपरिरक्षाता । मोहाद्राजा स्वराष्ट्र यः कर्पयत्यनवेक्षया ॥४० सोऽचिराद् भ्रश्यते राज्याज्जीविताच्च सबान्धव. । भतो वत्सो जातवत: कर्मयोग्यो यथा भवेत् ॥४१ तथा राष्ट्र महाभाग ! भृत कमंसहम्भवेत् । यो राष्ट्र मनुगृह्णाति राज्यं स परिरक्षाति ॥४२ हे पार्थिव नन्दन ! ऐसे परम-कुदाल राजा के वश मे यहाँ पर यह पृथ्वी वशीभूत रहा करती है । राजा को कभी एक अकेला ही मन्त्रणा नहीं करनी चाहिए और वहुतों के साथ भी अपने गुप्त मन्त्रों के विषय पे मन्त्रणा नहीं करे । राजा को कभी भी विषम नौका पर समा- रोहण नहीं करना चाहिए जिसके नाविष के विषय मे पहिले परीक्षण नहीं कर लिया हो । जो इसकी भूमि पर विजय प्राप्त करने वाले परि- पन्थी हो उन सबको साम आदि उपक्रमों के द्वारा अपने वश मे ले आना राजा का कर्तव्य होना चाहिए। जिससे प्रजाओ के प्रनवेक्षण से फुशी- भाव न होने पावे। अपने राष्ट्र का पाररक्षण करने वाले नृप को उसी भांति करना चाहिए कि मोह से जो मनवेक्षण करके अपने राष्ट्र का अपनी ओर आर्पण कर लेवे। जो ऐसा नहीं करता है वह नृप बान्धवो के सहित शीघ्र ही अपने राज्य से और जीवन से मी ध्रप्ट हो जाया करता है । अतएव ऐसा ही होवे जो भृत-वत्स-जातबल और कर्म के गेग्य होवे । हे महाभाग ! राष्ट्र को उसी भांति करे जो भृत और कर्म सह हो जावे । जो राष्ट्र पर अनुग्रह किया करता है यह राज्य का परि- रक्षण करता है॥३७-४२।। सञ्जातमुपजीवेत्तु विन्दते स महत्फलम् । गृह्याद्धिरण्य धान्यञ्च मही राजासु रक्षिताम् ॥४३ महता तु प्रयत्नेन स्वराष्ट्रस्य च रक्षिता । नित्य स्वेभ्यः परेभ्यश्च यथा माता यथा पिता ॥४ मास्यपुराण गोपितानि सदा कुर्यात् सयतानीन्द्रियाणि च । अजस्त्रमुपयोक्तव्य फलन्तेभ्यस्तथैव च ।।४५ सर्व कर्मेदमायत्त विधाने देवामानुपे । सयोर्देवमचिन्त्यञ्च पौरुषे विद्यते किया ॥४६ एव मही पालयतोऽस्य भतु लॊानुराग परमो भवेत्तु । लोकानुरागप्रभवा च लक्ष्मीलक्ष्मीवयश्चापि पराचलदमी।।४७ जो सजात है उमको उपजीवित करे तो महान् फल वह प्राप्त किया करता है। वह राजा हिरण्य-यान्य-और सुरक्षित मही का ग्रहण करता है। बडे भारी प्रयत्न से अपने राष्ट्र की जो रक्षा करने वाला है बह नित्य हो अपने लोगो से और दूसरो से माता तथा पिता को भौति ही समादर प्राप्त करता है। राजा का कस ध्य है कि वह सदा इन्द्रियो को सयत एवं गोपित करे और निरन्तर उनसे उपयुक्त पल प्राप्त करना चाहिए ॥४३, ४४, ४५।। देवमानुष विधान में सम्पूर्ण यह बम अधीन है उन दोनो मे जो देवी विधाम है वह विशेष चिन्तन के योग्य नहीं है और पौरुप मे ही किया विद्यमान रहा करती है ।।४।। इम प्रकार से इस मही के पालन करने वाले इस नृप का परम लोकानुगग हुआ करता है। जब लोक का अनुराग राज होता है तो उसी से समुत्पन्न होने वाली लक्ष्मी हुभा करती है और लक्ष्मीवान की ही परा- सश्मी होती है ॥४७॥ ६६-देव पीर पुरुषार्थ मे कीन बड़ा है ? देवे पुस्पकारे च वि ज्यायस्तरबोहि मे ! अन मे सशयो देव । च्छेनुमर्हस्यशेषत ॥१ स्वमेव कर्म देवारय विद्धि देहान्तराजितम् । तस्मात्पीरुपमेह श्रेष्ठमाहुमनीषिण ॥२ देव और पुरुषार्य में कौन वडा है ? ३०५ प्रतिकूलन्तथा देव पौरपेण विहन्यते । मङ्गलाचारयुक्ताना नित्यमुत्थानशालिनाम् ॥३ येपा पूर्वकृत कर्म सात्विक मनुजोत्तम !। पोरुपेण विना तेपा केपाश्चिदृश्यते फलम् ॥४ कमणा प्राप्यते लोके राजसस्य तथा फ्लम् । कृच्ण कर्मणा विद्धि तामसस्य तथा फलम् ॥५ पौरुपेणाप्यते राजन् । प्रार्थितव्य फल नरं । देवमेव विजानन्ति नरा पौरुदपजिता.॥६ तस्मात्विकाल सयुक्त देवन्तु सफल भवेत् । पौरुप देवसम्पत्त्या वाले फलतिपार्थिव ॥७ महपि मनु ने कहा --हे देव! देव और पुरुषकार मे कौन बड़ा है। यह मुझे बतलाइये। इसमे मुझे सशय हो रहा है सो इसका छैनन आप पूर्णतया कर दीजिये ॥१॥ श्री मत्स्य भगवान ने वहाव नाम वाला जो कर्म है वह भी अपना ही कर्म समझना चाहिय वयोकि वह वही अपना किया हुमा कर्म है जो दूसरे (प्रथम ) देह क द्वारा अजित किया गया है। इसीलिये मतीपोलोग इस ससार मे पौरुप को हो येष्ट कहा करते हैं ।।२॥ यदि देव प्रतिकूल भी होता है तो उसका पौरुष के द्वारा हनन हो जाया करता है। ऐसा देखा जाता है कि जो मङ्गल आवार से युक्त और नित्य हो उत्थानशाली लोग होते हैं वे पौरुप से प्रतिकूल देव को विनष्ट कर देते हैं ॥ ३॥ हे मनुजोत्तम जिन पुरुषी का पूर्ण जामो मे किया हुमा सात्विक कर्म होता है ऐम कुछ पुरुषो का बज्छा पल विना हो पौरप के किये देखने में आता है ॥ लोक में राजस मं का फल मं के द्वारा ही प्राप्त किया जाता है । तामस मं का फन कठिन कम्म के द्वारा समझ तो॥५॥ हे राजन! पोस्य के द्वारा मनुष्यों को प्रापित फ्ल की प्राप्ति को जाया करती है। जो मनुष्य पोरप से जित हुआ करते हैं वे तो देवल एक देव को हो जाना मत्स्यपुराण करते हैं ।। ६ ।। इसलिये त्रिकाल से सयुक्त देव सफल हुपा करता है । हे पार्थिव ! पौरुष जो है वह देव को सम्पत्ति से समय पर फल दिया करता है ॥७॥ देवं पुल्पकारश्च कालश्च पुरुषत्तम ! । त्रयमेतन्मनुष्यस्य पिण्डितस्यात फलावहम् ॥८ कृष्टिवृष्टिसमायोग दृश्यन्ते फलसिद्धयः । तास्तु काले प्रदृश्यन्ते नेवाकाले कथञ्चन ॥ तस्मात्सदैव कर्तव्य सधर्म पौरुपं नरैः । विपत्तावपि यस्येह परलोके ध्रुवं फलम् ॥१० नालसाः प्राप्नुवन्त्यर्थान् न च देवपरायणाः । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन आचरेद्धमंमुत्तमम् ॥११ त्यक्त्वाऽलसान् देवपरान् मनुष्या- नुत्थानयुक्तान्पुरुषान् हि लक्ष्मीः । अन्विष्य यत्नाद् वृणुयान्न पेन्द्र ! तस्मात्सदोत्थानवता हि भाव्यम् ॥१२ है पुरुषोत्तम! देव-पुरुषकार और काल-ये तीनों का तिगड्डा पिण्डित होकर ही मनुष्य को फल देने वाला हुआ करता ॥ ८ ॥ कृष्टि और वृष्टि के समान ही योग फल सिद्धियो के दिखलाई दिया करते हैं । पे काल के उपस्थित होने पर ही अच्छी तरह से दिखलाई दिया करते हैं और असमय में किसी भी प्रकार से दिखलाई नहीं देते हैं। इससे मनुष्यो को सदैव धर्म के सहित पौरुष करना ही चाहिये । चाहे विपत्ति भी क्यों न हो पुरुषकार करे क्योकि जिसका इस लोक में और परलोक मे निश्चित फल होता है । जो आलसी नर होते हैं वे और केवल देव को हो मानने मे परायण होते हैं वे लोग अर्थों की प्राप्ति नहीं किया करते हैं। इसलिये सभी प्रकार के प्रयन्नो से उत्तम धर्म का समाचरण करत पाहिए । हे नपेन्द्र ! यह लक्ष्मी अलस-
राजधर्म वर्णन में साम प्रयोग वर्णन
३०७
करके नत्यान से युक्त पुरुषों को ही खोज करके यलपूर्वक वरण किया
करती है। इसी कारण से मनुष्य को सदा सत्यान वाला ही होना चाहिए
॥६-१२॥
१००-राजधर्म वर्णन में साम प्रयोग वर्णन
उपायांस्त्व समाचक्ष्व सामपूर्वान् महाद्युते ।
लक्षणञ्च तथा तेषां प्रयोगञ्च सुरोत्तम ! ॥१
सामभेदस्तया दानदण्डञ्च मनुजेश्वर !।
उपेक्षा च तथा माया इन्द्रजालञ्च पार्थिव ! ॥२
प्रयोगाः कथिता सप्त तन्मे निगदतः शृणु ।
द्विविधं कथित साम तथ्यश्चातथ्यमेव च ॥३
तमाप्यतथ्य साधूनामाकोशायव जायते ।
तत्र साधु प्रयत्नेन सामसाध्यो नरोत्तम ! ॥
महाकुलीना ऋजवोधर्मनित्याजितेन्द्रियाः ।
सामसाध्या न चातध्यन्तेपुमामप्रयोजयेत् ।।५
तथ्य साम च कर्तव्य कुलशीलादि वणनम् ।
तथा तदुपचाराणा कृतानाञ्चैव वर्णनम् ॥६
महर्षि मनु ने कहा है महाद्युत वाले ! है मुरोत्तम ! अब
माप साम पूर्वक जो उपाय हो उनका वर्णन कीजिए । उन उपायो का
सभण पोर प्रयोग भी बतलाने की कृपा कीजिये ।।१॥ यो मत्स्य
भगवान ने पहा-है मनुजेश्वर ! हे पार्थिव ! साम, मेद, दान, दण्ड,
उपेशा, माया और इन्द्रजाल-ये सात प्रयोग कह गये हैं। मैं अब
उनसे कहता हूँ सो आप मुन्नमें उनका प्रवण कर लो। यह साम दो
मारा कहा गया है। एक तथ्य साम होता है और दूसरा मउप्य
मत्स्यपुराण करत हैं ॥ ६ ॥ इमलिये त्रिकाल से सयुक्त देव सफल हुमा करता है । हे पार्थिव । पौष जो है वह देव का सम्पत्ति से समय पर फल दिया करता है ॥७॥ देव पुरपकारश्च कालश्च पुरुप तम!। त्रयमेतन्मनुष्यस्य पिण्डितस्यात फलावहम् ॥ कृष्टि वृष्टिसमायोग दृश्यन्ते फलसिद्धय । तास्तु काले प्रदृश्यन्ते नैवाकाले कथञ्चन ॥ तस्मात्सदव कतव्य सधर्म पौरुष नर । विपत्तावपि यस्येह परलोके ध्रुव फलम् ।।१० नालसा प्राप्नुवन्त्यर्थान् न च देवपरायणा । तस्मात्सवप्रयत्नेन आचरेद्धममुत्तमम् ॥११ त्यक्त्वाऽलसान् देवपरान् मनुष्या- नुत्थानयुक्तान्पुरुपान् हि लक्ष्मी । अन्विष्य यत्नाद् वृणुयानृपेन्द्र ! तस्मात्सदोत्थानवता हि भाव्यम् ।।१२ हे पुरुषोतमा देव-पुरुपकार और काल-ये तीनों पा तिगडा पिण्डित होकर ही मनुष्य को फल देने वाला हुमा करता ।।5।। कृष्टि और वृष्टि के समान ही योग फल सिद्धियो के दिखलाई दिया करते हैं । थे कार के उपस्थित होने पर ही अच्छी तरह से दिखलाई दिया करते है और असमय में निसी भी प्रकार से खिलाई नहीं देते हैं। इससे मनुष्यो को सदैव घम सहित पौरुष करना ही चाहिये । चाहे विपत्ति भी क्यों न हो पुरुषकार करे क्योकि जिसका इस लोक मे और परलोक में निधिन पर होता है। जो नसी नर होते हैं वे और देवल देव को हो मानने म परायण होते हैं वे लोग अपों को प्राप्ति नहीं किया करते है। इसलिये समो प्रकार के प्रयग्नो से उत्तम धमका समाधरणपरता चाहिए । हे नपे। यह लक्ष्मी अलरा-देव परायण मनुष्यों को श्याग
राजधर्म वर्णन में साम प्रयोग वर्णन
३०७
करके उत्थान स युक्त पुरुषो को ही खोज करपे यलपूर्वक वरण किया
करतो है। इसी कारण स मनुष्य को सदा उत्थान वाला ही होना चाहिए
॥६-१२ ॥
१००-राजधर्म वर्णन में माम प्रयोग वर्णन
उपायास्त्व समाचक्ष्व सामपूर्वान् महाद्युते !!
लक्षणञ्च तथा तेषा प्रयोगञ्च सुरोत्तम !?
सामभेदस्तथा दानदण्डल्च मनुजेश्वर ।।
उपेक्षा च तथा माया इन्द्रजालन्च पार्थिव ॥२
प्रयोगा कपिता सप्त तन्मे निगदतः शृणु।
द्विविध कथित साम तय्यञ्चातथ्यमेव च ॥३
तथाप्यतथ्य साधूनामाकोशायद जायते ।
तत्र साधु प्रयत्नेन सामसाध्यो नरोत्तम ! ॥
महाकुलीना ऋजवोधनित्याजितेन्द्रिया ।
सामसाध्या न चातथ्यन्तेपुसामप्रयोजयेत् ॥५
तथ्य साम च क्तव्य कुलशीलादि वणनम् ।
तथा तदुपचाराणा वृतानाञ्चव वणनम् ॥६
महपि मनु न रहा है महादयुत वाले ! है मुरीतम ! अब
माप साम पूर्वक जो उपाय हो उनका वर्णन कीजिए। उन उपायो का
लाग पोर प्रयोग भी बतलाने की कृपा कीजिये ॥१॥ थी मरस्य
भगवान ने पहा-हे मनुजेश्वर । हे पापित ! साम, भेद, दान, दण्ड,
उपेमा, माया और इन्द्रमाल- सात प्रयोग कहे गये हैं। मैं अब
उनसे कहता हूँ सो आप मुझम उनका श्रवण कर लो। यह साम दो
प्रकार का महा गया है। एक तम्य ग्राम होता है और दूसरा अउथ्य
मत्स्यपुराण साम हुआ करता है ।।२।३॥ इन दोनो में जो अतथ्य साम साधु पुरुषों के भाक्रोश के लिये ही हुमा करता है । हे नरोत्तम ! उसमे प्रयत्नपूर्वक साधु साम ही साध्य होना चाहिये ।। ४ ।। महान कुलीन, सरल, नित्य धर्म करने वाले और जितेन्द्रिय पुरुष साम के द्वारा माध्य हमा करते हैं। उनमें कभी भी अतथ्य साम का प्रयोग नहीं करना चाहिये । तथ्य साम काही प्रयोग करना चाहिये जिसमे कुल और शील यादि का वर्णन होता है तथा किये हुए उसके उपचारो का वर्णन किया जाता है ।। ५.६॥ अनयेव तथा यक्त्या कृतज्ञाख्यापनं स्वकम् । एवं साम्ना च कर्तव्या वशगा धर्मतत्पराः ॥७ साम्ना यद्यपि रक्षांसि गृह्णन्तीति परा ध्रुतिः । तथाप्येतदसाधूनां प्रयुक्त नोपकारकम् ।। अतिङ्कितमित्येव पुरुषं सामवादिनम् । असाधवो विजानन्ति तस्मातत्तेषु वर्जयेत् ॥ ये शुद्धवंशाः ऋजधःप्रणीता धर्मस्थिता: सत्यपराविनीता। ते सामसाध्या: पुरुपा:प्रदिष्टा मानोलता ये सतसञ्च राजन् ॥१० इसी युक्ति से अपने कृतन्नता का ख्यापन इस प्रकार से माम के द्वारा धर्म मे परायण मनुष्य अपने वशवर्ती करने चाहिए ॥७॥ यद्यपि साम के द्वारा गक्षस भी ग्रहण किये जाते हैं-ऐसी पराश्रुति है तो भी यसाधु पुरुषों में प्रयोग किया हुआ यह कभी उपकार करने वाला नहीं होता है ॥८॥ जो मसाधु पुरुष होते हैं वे सामवादी पुरुष को प्रतिङ्कित है-ऐसा ही हमेशा जाना करते हैं। इसीलिए इस साम का प्रयोग उनमें जित हो कर देना चाहिए। जो शुद्ध वश वाले-सरल सीधे-प्रणीत-धर्म मे स्थित-सत्य परायण और विनीत पुरुष है उन्ही पुरुषों को साम के द्वारा साध्य कहा गया है । हे राजन् ! जो निरन्तर ही मानोन्मत होते हैं वे ही साम से साध्य हुआ करते हैं ।।।, १०॥
राजधर्म वर्णन में भेद प्रयोग वर्णन ३०४ १०१-राजधर्म वर्णन में भेद प्रयोग वर्णन परस्परन्तु ये दुप्टा ऋद्धा भीतावमानिताः। तेपा भेद प्रयुञ्जीत भेदसाध्या हि ते मताः ।।१ ये तु येनैव दोपेण परस्मानापि विभ्यति । ते तु तदोपपातेन भेदपौया भूशन्ततः ॥२ आत्मीया दशयेदाशा परस्माद्दशैयेद्भयम् । एव हि भेदयेद्भिन्नान यथावद्वशमानयेत् ॥३ सहितानि विना भेद शक्रणापि सुदु सहा. । भेदमेव प्रशसन्ति तस्मानयविशारदाः ॥४ स्वमुसेनाश्रयेद्भेदम्भेदमरमुसेन च । परीक्ष्य साधु मन्यंत भेद परमुखान्छ तम् ॥५ सद्य स्वकायमुद्दिश्य कुललयेहि भेदिता. । भेदितास्ते विनिदिप्टा नैव राज्ञार्थवादिभि ॥६ अन्न कोपो बहि कोपो यत्र स्याता महोक्षिताम् । अन्त. कापा महास्मन नाशक पृथिवोदिताम् ॥७ प्रो मत्स्य भगवान ने कहा--जो दुष्ट पक्ष्प परस्पर में - भीत और अवमायित हैं । उनका भेद प्रयुक्त करना चाहिए क्योंकि वे लोग भेद के द्वारा ही साध्य होते हैं- ऐमा माना गया है ॥१॥ जो सोग जिस हो दोप में दूसरे से भी नहीं डरत है वे उस दोष के पास से अस्पन्न ही भेदन करने में योग्य हात है ॥२॥ अपनी बाबा को दिय- माये और दूसरे स भय का प्रदान करना चाहिए । इसी प्रसार में मिनी का भेदन कर और यथावत् उनको अपन वश मे लाना चाहिये ।।३।। जो महित ये पिना भर क इन्द्र र दाग भी मुसह हुमा करने हैं । इमलिप ऐअपर पर नप शा डिन सा भेद की ही प्रसना frया परत है। पान मुग म मा आश्रय र भोर पराय मुसस ३१० मत्स्यपुराण भेद ग्रहण करे । अतएव भली भांति भेद की जांच करके ही पराये मुख से सुने हुए भेद को मानना चाहिए ।। ४ ॥ ५॥ तुरन्त ही अपने कार्य का उद्देश्य करके कुशल पुरुषों के द्वारा जो भेदित होते हैं वे ही भेदित विनिर्दिष्ट होते हैं और राजा के द्वारा अर्थवादियों से भेदित नहीं हुआ करते हैं ।। ६ ।। जहां पर राजाओं का अन्तःकोप और वहिःकोप हुआ करता है । इनमे जो अन्तःकोप होता है वह महान है और नाश करने वाला होता है जो नृपों का विनाशक है ॥ ७ ॥ साम्ना न कोपोवाह्यस्तु कोपः प्रोक्तो महीभृतः । महिषीयुवराजभ्यां तथासेनापतेनूप ८ अमात्यमन्त्रिणाञ्चव राजपुत्रोतथैवच । अन्तः कोपो विनिर्दिष्टो दारुण पृथिवीक्षिताम् ॥६ बाह्यकोपे समुत्पन्न सुमहत्यपि पायिवः । शुद्धान्तस्तु महाभाग ! शीघ्रमेव जयी भवेत् ॥१० अशिक्रममो राजा अन्तःकोपेन नश्यति । सोऽन्तः कोपःप्रयत्नेन तस्माद्रक्ष्योभहीभृता ॥११ परतः कोपमुताद्य भेदेन विजिगीषुणा । जातीनां भेदनं कार्य परेषां विजिगीषुणा ।।१२ रक्ष्यञ्चव प्रयत्नेन ज्ञातिभेदस्तथात्मनः । ज्ञातयः परितप्यन्ते सततं परितापिता: । १३ तथापि तेपां कर्तव्य सुगम्भीरेण चेतसा । गहरण दानमानाभ्यां भेदस्तेभ्यो भयङ्कर. ॥१४ न ज्ञातिमनुगृह्णन्ति न ज्ञाति वै श्वसन्ति च । ज्ञातिमझेदनायास्तु रिपवस्ते न पाथिवः । १५ भिन्ना हि शक्या रिपकः प्रभूताः स्वल्पेन संन्येन निहन्तमानी। मुसंहताना हि तदस्तु भेद. कार्यों रिपूणा नयशास्त्रविदिम ॥९६ रात्राका कहा हा कोर जो पाप पाह्य होता है वह साम के राजधर्म वर्णन में दान प्रयोग वर्णन ३११ द्वारा नही शान्त नहीं होता है। हे नृप! राजाओ का अन्त.कोप महिषी- युवराज-सेनापति-अमात्य मन्त्री और राजपुत्र का महान दारुण विनि- दिष्ट किया गया है ||८,६॥ सुमहान् वाह्य कोप के समुत्पन्न होने पर भी हे महाभाग ! अन्त करण मे शुद्ध राजा बहुत ही शीघ्र जयशील हुआ करता है ॥१०॥ भले ही कोई राजा इन्द्र के समान ही क्यो न होवे वह भी अन्त: कोप से विनष्ट हो जाया करता है। इस कारण से राजा के द्वारा प्रयत्न पूर्वक अन्त कोप की रक्षा करनी चाहिए ॥११॥ विजय प्राप्त करने की इच्छा वाले के द्वारा मंद से दूसरे से कोप का उत्पादन करावे दूसरो के 'विजिगीषु को शातियो का भेदन करना चाहिए ॥१२॥ तथा अपना ज्ञाति भेद अत्यधिक प्रयत्न से रक्षित रखना चाहिए। परिता- पित की हुई ज्ञातियाँ निरन्तर परितप्त हुआ करती हैं ॥१३॥ तो भी सुगम्भीर चित्त के रखने वाले को उनका दान तथा मान से ग्रहण करना चाहिए। उनो साथ भेद करना तो महान भयङ्कर हुमा करता है ॥१४॥ राजाओ के द्वार। शत्रुगण ज्ञातिया से भेदन करने के योग्य होते हैं अर्थात साघुओं को ज्ञातियो में भेद कर देना चाहिए और ऐमा कर देवे कि वे अपनी शातियो पर अनुग्रह तथा विश्वास बिल्कुल हो नही करे ॥१५॥ भेद के द्वारा भिन किये हुए यहुत से यात्रु भी युद्ध बहुत हो थोडी सेना के द्वारा मारे जा सकते हैं नये शास्त्र के माताओ को जो सुसहत हो उनका भेद कर देवे और रिपुओ का भेद अवश्य ही कर देना चाहिए ॥१६॥ १०२-राजधर्म वर्णन में दान प्रयोग वर्णन मर्चेपामप्यपायाना दान श्रेष्ठतम मतम् । सुदत्तनेह भवति दानेनोमयलोकजित् ।। न सोऽस्ति राजन् ! दानेन वगगो यो न जायते । दानेन वशगा देवामन्तोहमदान माम् ॥२
मन्स्यपुराण
दानमेवोपजीव त प्रजा सर्वानपोत्तम ।।
प्रियो हि दानवान् लोके सवस्यवोपजायते ॥३
दानवानचिरेणव तथा राजा परान् जयेत् ।
दानवानेव शक्नोति सहतान् भेदितु परान् ।।४
यद्यप्यलुब्धगम्भीरा पुरुषा सागरोपमा ।
न गृह्णन्ति तथाप्येते जायन्ते पक्षपातिन ॥५
अन्यत्रापि कृत दान करोत्य पायथा वशे ।
उपायेभ्य प्रशसन्ति दान श्रष्ठतम जना ॥६
दान श्रष्ठतम पुसा दान भष्ठतम परम् ।
दानवानेव लोकेषु पुत्रत्वे ध्रियते सदा ॥७
न केवल दानपरा जयन्ति भूलोकमेक पुरुषप्रवीरा ।
जयति त जसुरे द्रलोक मुदुजय यो विबुधाधिवास ।।
श्री म स्य भगवान ने कहा- जितने भी उपाय बतलाये गये हैं
उन सब मे दान का उपाय सबसे परम श्रष्ठ उपाय माना गया है । यहाँ
संसार में अच्छी तरह से दिए हुए दान से मनुष्य उभ्य लोको का विजेता
हो जाया करता है ।॥१॥ हे राजन् । इस लोक मे ऐसा कोई भी पुरुष
नहीं है जो दान के द्वारा वशवत्ती न हो ज वे यह द न तो एक ऐसा
उत्तम स धन है कि इस दान से सदा मनुष्यो के वश मे देवगण भी आ
जाया करते हैं ।।२। हे नृपोतम । सम्पूर्ण प्रजा दान को ही समाश्रित कर
के उपजीवित रहा करती हैं। इस लोक मे विप्र तो सबका ही दानवान्
उत्पन हुभा करता है ॥३॥ दान देने वाला राजा हुत ही शीघ्र शत्रुओं
को जीत लिया करता है और जो दान वाला होता है वही सहत परो को
भ' युक कर सकता है । यद्यपि ऐसे भी पुरुष होते हैं जो अनुन्ध
और गम्भीर सागर के सम न हैं जा ग्रहण रहा किया करते हैं तो भी
पापा हो जात हैं ।। ५ । अ यत्र भी किया हुआ दान किस तरह से अ यो
का वग म रा दिया करता है कि मनुष्य उपाय सबि ए दान को
।
राजधर्म वर्णन में दण्डोपाय वर्णन परम श्रेष्ठ तप कह कर इसको प्रशंमा किया करते है। इन हीर का परम श्रेष्ठ साधन होता है और दान की परम नाहीती। जो दानवान् होता है वह ही लोक में मदा पृश्य में मनि टा है ।।६, ७॥ जो दान परायण प्रवर पुण्य होते हैं, वेबसाइमन- लोक को ही नहीं जीतते हैं वे तो मृदुनय गर मुंदडीगीत लिया करते हैं जो देवगणो के निवास का दर इंटा है १०३-राजधर्म वर्णन में ट्राडाकाय बन १ शवया ये बगे कन्न। दण्डेन तान् वीकृति मिणाम् ॥? सम्यक् प्रणयन तम्ब १८treats धर्मशास्त्रानुमान Brazir तस्य सम्यक प्रमzrtrees वानप्रस्थाश्च zirnistant स्वदेशे परटी दास समीक्ष्य प्रगट REET थाश्रमी यतिm;A मंzाद ! नादण्या दामन रिट अदापाटयान: इह गाaving तम्माडामा uxargere. दपायन या ३११ मत्स्यपुराण - हो अपने वश मे करना चाहिए क्यो कि यह दण्ड ऐसा साधन है जो मनुष्यो को वश मे कर देने वाला होता है ।।१॥ राजा के द्वारा इस दण्ड को प्रणायन भली भांति करना चाहिए और धीमान किसी सहायक के साथ एव घम शास्त्र के अनुसार ही दण्ड का प्रयोग करे ॥२ । राजा क द्वारा उस दण्ड का प्रणयन जिस प्रकार से करना उचित है वह बहुत अच्छा होना चाहिए । वानप्रस्थ-~धम के ज्ञाता-ममता से रहित-निष्परिग्रह- अपने या पराये देश मे धर्म शास्त्र के महा पण्डितो को भनी भाति दक्षिण करके दण्ड का प्रणयन करना चाहिए क्योकि इस दण्ड मे सभी कुछ प्रति- ष्ठित होता है ॥३, किसी आश्रम मे सस्थित हो-वर्णी (ब्रह्मचारी, हो-पूज्य-महार और गुरु हो ता ऐसा पुरुष राजा के द्वारा दण्ड देने के योग्य नहीं हुआ करता है क्योकि वह तो अपने धम मे सस्थित रहता है। निप यह है कि जो भी कोई अपने धम क माग पर भली भांति पा रहा है वह कभी भी रण्डनीय नही होना है ॥२॥ जो पुजा दण्ड न देने के यारा पुरया को दण्डित करता है और दण्ड देने के योग्य हा जनको दण्ड नहीं देता है वह राजा यहा पर राज्य से परिभ्रष्ट होकर अत में नरक का गामी होता है। इस कारण स विनीत भव वाले राजा के द्वारा लोका के ऊपर अनुग्रह करने की कामन से धम्म शास्त्र के अनुसार ही दण्ड का प्रणयन करना चाहिए। यत्र श्यामो लोहिताक्षादण्डश्चरति निभय । प्रजास्तत्र न मुह्यात नेता चेत्साधुपश्यति । बाल वृद्धातुरयतिद्विजस्त्राविधवायत । मात्म्यन्य यन भक्ष्यरत् यदि दण्ड न पातयेत् ॥ दरद योगगणा सर्षे भतपतत्रिण । उमामये यमर्याक्ष यदि दण्ड न पातयत् । १० पहाभिमापे मवप्रहरणेषु न । गाविध पवमाय च तिष्ठति १?
राजमण वजन म दहापाय वर्णन पूज्य ते दण्डिना दवन पूज्यन्ते त्वण्टिन । न ब्रह्माण विधातार न पूपारमरणावपि ॥१२ यजन्ते मानवा. वेचित् प्रशाला सववममु। स्द्रमग्निच शवञ्च सूर्याचन्द्रममो तया ॥१३ विष्णु देवमणाश्चान्यान् दण्डिन पूजयन्ति च । दण्ड शास्ति प्रजा सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति ॥१४ जहा पर श्याम लाहिवार दण्ड इनमय होकर चरण दिया करता है वहा पर प्रजा को कोई भी मोह नहीं होता है यदि नता अच्छी प्रकार म दरता है। यदि दण्ड का पालन नहीं किया जाना है तो वाला- वृद्ध-आतुर-यति-द्विज-यो विधवा इनका मग्य न्याग स ही दुट लो। मा जाया करत हैं। यदि दण्ड का पातानी दिया जाता है ता दव, दत्य, उरग गण सब भून और पनत्री मयादा का उत्रमण पर दवें। HE, १०॥ या ब्रह्माभिमाम-समम्म प्रहाणा म-सब वितम कापों म और व्यवसाय म मिथन रहा करता है॥०१ । दाडा दवा द द्वाग पूज जाया करत हैं और जो अपना हान है व नही पूज जात हैं। विधाता ब्रह्मा और पूषा अयमा को भा पूजा गरी करत है। समस्त कर्मों में कुछ समान मानव वन विया वरन हैं। न्द्र आग्न है, मूय्य, चद्रमा, विष्णु, देवगण और अ य दापिडाप की पूजा करत हैं। सही प्रजा का मामन frदा करता है और दहीमर प्रजा का अभिरमण पिया करता ६ ॥१०.१३ ॥४॥ दण्ड सुप्त माति दष्ट ६म मिदुधा । गजदण्डमबार स पाप न वुवत ॥१४ यमदण्डभयानक परस्परमयादपि । एव मामिद्धि र लार मर द प्रनिटिनम् ।१६ अ ध तमाम जयदि दण्ड न पातयत् । यम्माइण्टा दमर्यात अदम्या दश्यत्पति । - मत्स्यपुराण दमनाद्दण्डनाच्चैव तस्माद्दण्ड विदुबुंधा ॥१७॥ दण्डस्य भौतस्त्रिदश समेतैर्भागोघृत शूलधरस्य यज्ञे । दत्त कुमारे ध्वजिनीपतित्व र शिशूनाञ्च भयाद्वलस्य ॥१८ सुप्त हुओ मे दण्ड ही जगता है और बुध लोग दण्ड को ही धम्म जानते हैं । राजा के द्वारा प्राप्त होने वाले दण्ड के भय से ही पापी लोग पाप कम नहीं किया करते हैं ॥१५) कुछ लोग यमराजे के द्वारा मिलने वाले दण्ड के भय से और पारस्परिक दण्ड के भय से भी पाप कम नहीं करते हैं । इस प्रकार से इस नासिद्धिक लोक मे सभी कुछ दण्ड में ही प्रतिष्ठित है ।।१६।। यदि दण्ड का पातन नहीं किया जावे तो सब लोग अघतम मे मजन किया करे । क्योकि दण्ड दमन किया करता है और जो अदण्डनीय है उनका भी दमन किया करता है। दमन करने से और दण्डन करने से युर लोग इसको दवड करत हैं दण्ड से भीतहुए समेत देवो ने यज्ञ में भगवान शूलधर का भाग घृत किया था कुमार मे सेनापतित्व का पद दिया था और बल के भय से शिशुओ का घर दिया था ॥१७, १८॥ १०४-राजधर्म वर्णन में देवसाम्यत्व वर्णन दण्डप्रणश्नार्थाय राजा सृष्ट स्वयम्भुका । दवभागानुपादाय सवभूनादिगुप्तम ॥१ सजसा रदमु कश्चिनव शक्नोति कोक्षितुम् । तता भवति लोये पु गजाभास्करवत्प्रभु ॥र यदास्य दान सोर प्रसादमुपग-छति । नयनादिरियात्तदा भवति चन्द्रमा ३ पघा या प्रियदप्येप्राप्ते याप्रय छति। सपा राणा विधातव्या प्रजास्तदि यमवतम् ।।
राजधर्म वर्णन में देवमाम्याच वर्णन वरुणेन यथा पार्शबंद्धएव प्रदृश्यते । तथा पान्निगृहणीयाद् व्रतमेतद्धि वारुणम् ॥५ परिपूर्ण यथा चन्द्र दृष्ट्वा हृष्यति मानवः । तथा प्रकृतयो यस्मिन् स चन्द्रप्रतिमो नप. १६ प्रतापयुक्तम्तेजस्वी नित्यस्यात्सर्वकर्मसु । दुष्टसामन्तहि पु राजान्नेयवस्थितः १७ श्री मन्स्य भगवान ने कहा- भगवान् स्वयम्भू ने दण्ड के प्रपयन के हो लिये गजा का सृजन किया था और इस को सृष्टि देवरों के भागों को ग्रहण करके समस्त मूतो को रक्षा के लिए को ममी पो ॥१॥ राजा बहुत तेज होता है और तेज कोई भी इसको देख नहीं सकता है। इसके अनन्तर ही सोको में राजा भगवान भास्कर के ही समान प्रभु हुआ करता है । जिस समय में इस राजा के दर्शन में लोक प्रसाद की प्राप्ति किया करता है उस समय मे यह नयनों से आनन्दकारी होने से चन्द्रमा हो जाता है '२, ३॥ जिस प्रकार से पमराज प्रिय या देव्य कोई सा भी हो काल आने पर वह अपने दूत भेजकर बुला ही लेता है उसी भांति राजा को भी प्रजा के साथ करना चाहिए और चयत्रत धारण कर लेवे। वण के द्वारा जिस तरह पाशो से बद्ध होकर ही दिखलाई दिया करता है उसी मावि पापों 8 निगृहीत करे-यही वारण व्रत कहलाता है ।।५, ५॥ जिस तरह परिपूर्ण चन्द्रमा सा दर्शन प्राप्त कर मानव परम हपित हुना ररता है उसी मोदि जिसमें प्रकृतियां है और वह नृप चन्द्रमा के समान ही होता है। राजा नित्य ही समस्त कर्मा में प्रताप से मुक्त अत्यन्त तेजस्वी होता है । दुष्ट धामन्त और हिंसक जीयों में राजा माम्नेय द्रव में स्पित रहा करता है ॥६,७|| यया सर्वाणि भूतानि विभ्रतः पार्थिव दतम् । इन्द्रस्यास्य वातस्य यमस्य वरणस्य च ।। चन्द्रस्याग्ने पृथिध्याश्चतेजोबत नृपश्चरेत् ।
११८ मत्स्यपुराण वापिकाश्चतुरौ मासान् यथै द्रौप्ययवति ॥६ तथाभिवत्स्वराज्यकामि द्रातस्मृतम् । अप्टोमासान्यादित्यस्तोयहरतिरश्मिभि । तथा हरेत्तर राष्ट्रान्नित्यकमवत हि तत् ।।१० प्रतिश्य सवभूतानि यथा चरति मारत । तथा चारै प्रवेष्टव्य प्रसमेतद्धि मारुतम् ॥११ जिस तरह स सब भूतो का विशेष मरण करन वाले का पार्थिव प्रत होता है । इद्र सूप वायु यम वरुण, चन्द्र अग्नि और पृथिवी । जोव्रत नप को चरण करना चाहिए । वर्षा के चार मास) में जिस तरह से इद्र देव वर्षा किया करते हैं उसी भांति से राजा को अपने राज्य में प्रजा को कामनामा को पूति दर्श भली भांति करनी चाहिए - इसी को इवत कहा जाता है । जिस तरह से आठ मास तक सूरय अपनी किरणो के द्वारा जल का हरण किया करता है उसी तरह स राजा राष्ट्र स कर का आहरण करे-यही नित्य कर्मव्रत कहा गया है 10, १०॥ मारुत समस्त भूतो में प्रवेश करके जिस तरह से सचरण किया करता है वैसे ही चारा के द्वारा राजा को प्रवेश करना चाहिए यही मास व्रत कहा जाता है ॥११॥ १०५-~ग्रह यज्ञादि का विधान वर्णन सहयन क्थ कार्यो लक्षहोम कथ नपै । कोटिहोमोऽपिवा देव ! सर्वपापप्रणाशन १ क्रियत विधिना यन यद्दष्ट शान्तिचिन्तक । तत्सव विस्तराद्दव । क्थयस्व जनादन पर इदानों कथयिष्यामि प्रसङ्गादेव त नृप !
ग्रह य बादि का विधान वर्णन ३१६ राज्ञा धर्मप्रक्तन प्रजानाञ्च हितेप्सुना ॥३ प्रहयज्ञः सदा कार्यो लक्षहोमसमन्वितः । नदीनां सङ्गमे चव सुगणामग्रतस्तथा ॥४ सुसमे भूमिभागे च देवज्ञाधिष्ठितो नृपः । गुरुणा चव ऋत्विभिः सार्द्ध भूमि परिक्षयेत् ॥५ खनेट कुण्डञ्च तत्रैव सुसम हस्तमात्रकम् । द्विगुणं लक्षहोमे तु कोटिहोमे चतुर्गुणम् ॥६ युग्मायु ऋत्विजः प्रोक्ता अष्टौ वं वेदपारगाः। कन्दमूलफलाहारा दधिक्षीराशिनोऽपि वा। महपिवर मनु ने कहा है देव ! नृपो के द्वारा ग्रह यज्ञ और लक्ष होम किस प्रकार से करना चाहिए ? अथवा पटि होम भी रिस तरह से करे जो कि मभी तरह के प्रवल पापों का विनाश करने वाला होता है । ॥२॥ जिस विधि से यह किया जाता है और जो शान्ति चिपक लोगो ने देखा है है जनार्दन देव ! उसका वर्णन आप विस्तार पूर्वक सब कीजिएगा ॥२॥ मरस्य भगवान् ने कह-हे नृप । अब प्रसङ्ग से ही तुमको पहूंगा । प्रजाओं के हित के चाहने वाले और धर्म में प्रसक्त नृप एक लाख होम से सयुन ग्रह यज्ञ सदा ही करना चाहिए । यह यज्ञ नदियो के सङ्गम मे तथा देवो के प्रागे ही करना चाहिए ॥३, ४॥ देवों से अधिष्ठिर ना को समतल भूमि के भाग में गुरुदेव और ऋवित्रो के साथ भूमिका परिक्षय करना चाहिए । वहीं पर सुसम और एक हाथ लम्बा घोडा कुण्ड 'भो खोदना चाहिए । एक लक्ष के होम करने में यह कुण्ड दुगुना बनावे तथा कोटि होम करना हो तो चौगुना बडा यनवाना पाव- श्यक है 11५, ६॥ दोनो में वेदो के पारगामी आठ ऋत्विज बताये गये हैं जो कि कन्द-मूल और फलो के आहार करने वाले अपवा धि तथा क्षीर के अशन करने वा होने चाहिए ॥७॥ वेद्या निधापयेचंव रतानि विविधानि । द्वारा मत्यपुराण सिकतापरिवेपाश्च ततोऽग्निञ्च समिधयेत् ॥ गायच्या दशसाहस्र मानस्तोकेन पड़गुणः । त्रिंशद्ग्रहादिमोश्च चत्वारी विष्णदेवत: 11E कुष्माण्डर्जुहुयात्पञ्च कुसुमाद्यरतु थोडश । होतव्या दशसाहस्र बादरेजतिवेदसि 11१० श्रियोमन्लोण होतव्या सहस्राणि चतुर्दश । शेधाः पञ्चसहवास्तु होतव्यास्त्विन्द्रदेवतैः ।।११ हुत्वा शतसहस्रस्तु पुण्यस्नान समाचरेत् । कुम्भः पोडशसङ्ख्यं श्च सहिरण्यः सुमङ्गलैः ॥१२ स्नापयेद्यजमानन्तु ततः शान्तिभविष्यति । एवं कृते ते यतिञ्चिद्ग्रहपीडासमुद्भवम् ।।१३ तत्सर्व नाशतायाति दत्त्वा वै दक्षिणां नप ! । तस्मात्सर्यप्रयत्नेन प्रधाना दक्षिणा स्मृता ॥१४ जो वैदी निर्मित कराई जाये उसमे अनेक प्रकार के रन्नो को निधापित करे और उस वेदी का सिकता से परिवेष बनवाना चाहिए । इसके अनन्तर उसमे अग्नि को समिन्धित करे ।। गायत्री से दश सहर अहूतियाँ देवे । मानस्तोक से षड्गुण-ग्रह आदि के मन्त्रो से तीस- जिगके विष्णु देवता है उन मन्त्रो से चार - कूष्माण्डों से पांच-कुसुम आदि से पोडश और बादरो से दश सहस्र अग्नि मे हवन करना चाहिए। 1६, १०॥ श्री के मन्त्र से चौदह सहन आहूतियों द्वारा हवन करे । क्षेश जो पाच सहन आहतियां हैं वे इन्द्र देवत मन्त्रो से हवन करनी चाहिए । ॥५१॥ सौ सहस पाहूतियो का हवन करके फिर पुश्य स्नान करे जो सुमङ्गल-साहिरण्य सोलह संख्या वाले कुम्भो के द्वारा किया जाना चाहिए ॥१२|| इस तरह से यजमान का स्नपन करावे। इसके अनन्तर शान्ति होगी। इस तरह से करने पर जो कुछ भी कष्ट ग्रहो की पीड़ा से सपुत्पन्न होगा वह सब नाश को प्राप्त हो जाता है । हे नृप ! फिर दक्षिणा प्रहयज्ञादि का विधान वर्णन ३२१ देवे। सब प्रकार के प्रयत्नों से अच्छी दक्षिणा देनी चाहिए क्योंदि यज्ञ में दक्षिणा परम प्रधान यही गयो है ॥१३, १५ हस्त्यश्वरथयानानि भूमिवस्त्रयुगानि च । अनडुद्गोशत दद्यात्विजा चंव दक्षिणाम् ॥१५ यथा विभवसारन्तु वित्तशाठय न कारयेत् । मासे पूर्ण समाप्तस्तु लक्षहोमो नराधिप ।।१६ लतहोमस्य राजेन्द्र ! विधान परिकीतितम् । इदानी कोटिहोमस्य शृण त्वं कथयाम्यहम् ।।१७ गङ्गातटेऽय यमुनासरस्वत्यो रेश्वर !। नमदा देविकायास्तु तटे होमो विधीयते ॥१८ तयापि त्विजः कार्या रविनन्दन ! पोडश । सर्वहोमेतु राज ! दद्याद्विप्रेऽथ वा धनम् ॥१६ त्विगाचार्यसहितो दीक्षा साम्वत्सरी स्थितः । चने मासे तु सम्प्राप्त कातिके वा विशेषत ॥२० प्रारम्भः करणीयो वा वत्सर वत्सरं नप!। यजमानः पयोमक्षी फलाशीच तथानघ! ॥२१ ऋत्विजो को दक्षिणा में हाथी- अश्व, रप, मान भूमि, वस्त्र, युग, अनवान्, सौ गो आदि सति करे ॥१५॥ जैसा मी अपना वैभव हो उसी के सार के अनुसार ऋत्विजो को दक्षिणा देवे पोर घन अतुल होते हुए भी दक्षिणा मे कृपणता करने कावित शाठय नहीं करना चाहिए हे नराधिप ! एक मास पूर्ण हो जाने पर यह एक लक्ष आहूतियों का होम समाप्त होजाया करता है। हैराजेन्द्र ! यह एक लक्ष के होम का पूर्ण विधान कोत्तित कर दिया गया है अब मैं कोटि होम के विधान को कहता हूँ उसका आप श्रवण करिये ॥१५-१७॥ हे नरेश्वर ! गङ्गा के तट पर- यमुना सरस्वती के तौर पर-नर्मदा अथवा देविका नदी के तट पर यह होम करे । हेरविनन्दन! उसमे भी सोलह ऋत्विज नियोजित करने चाहिए। है प्रहयज्ञादि का विधान वर्णन देवे और छठवे मास में सत्त का भोजन देना चाहिए । सातवे मास में पूषा देनी चाहिए तया आठवे महीना में धन पूपक का भोजन देवे । 11.४।२५॥ नवम मास में पाठयोदन दवे और दशम मास में यव पप्टका का भोजन देना चाहिए । ह रविनन्दन! एकादश मास मे माप के सहित भोजन देवे । हे रवि कुलोदह । द्वादश माम के सम्प्राप्त होने पर-पट्रसों के सहित भदयों से मुक्त मवं काम करन दाला भोजन द्विजो को देना चाहिए। हे राजेन्द्र ! मास-माम में दक्षिणा भी द्विजों को अवश्य ही देनी चाहिए । अहतबामा और सम्बीत होकर परम शुचि होने और दिनार्ड में होम करना चाहिए ।। २६-२८॥ तस्मात् सदोत्यितर्भाश्य यजमान. सह हिजै । इन्द्राद्यादिमुराणाञ्च प्रीणन सवामिकम् ॥२६ कृत्वा मुराणा राजेन्द्र ! पशुधातसमन्वितम् । सर्वदानानि देवानामग्निप्टोमन्च कारयेत् ॥३० एव कृत्वा विधानेन पूर्णाहुति शते शते । सहस्र द्विगुणा देया यावच्छतसहस्रकम् ॥३. पुराडाशस्तत. माध्या देवतार्थ च ऋत्विज.! युक्तो वसन् मानवश्च पुन प्राप्तानान् द्विजान्। ३२ प्रीणायित्वा सुरान् सर्वान् पितृ नेब तत प्रमात् । कृत्वा शास्त्रविधानेन पिण्डानाञ्च ममर्पणम् ॥३३ समाप्तीनस्य होमस्यविप्राणामथ दक्षिणाम् । समाजोवतुला कृत्वावद्ध्वा शिवचयपुनः ॥३४ आत्मान तोलयेत्तत्र पत्नीञ्चव द्वितीयकाम् । सुवर्णेन तथात्मान रजतेन तथा प्रियाम् ॥३५ इसलिये द्विजो के हो साथ मे यजमानो को सदा उठना चाहिए। इन्द्रादि देवों का प्रोणन सब कामनाएं पूर्ण करने वाला होता ॥ २६॥ है राजेन्द्र ! इस प्रकार स सुरो का पमुघात से समन्वित प्रोणन का ५२४ मध्यपुराण सम्पादन करके समस्त प्रकार के दान देवे तथा देवो का अग्निष्टोम करावे इस रीनि से सब सम्पदन करके एक • एक शत पर पूर्णाहुति करनी चाहिए। जब सहन आहुतियां हो जाये तो यावच्छन सहस्रक द्विगुणा माहुति देनी चाहिये । इसके अनन्तर देवता लिये विजी के द्वारा पुरोडाश साध्य करे तण युक्त होता हुआ वास करे । पुनः मानवों के द्वारा द्विजो का अचंन करना चाहिये ॥ २६, ३०, ३१. ३२ ।। सब मुरो का प्रीणन (प्रसन्नता ) करके पितृगण के लिये कम से शास्त्र मे चणित विधान के द्वारा पिण्डो का समर्पण करना चाहिये ।। ३३ ।। उस होम को समाप्ति होने पर विश्री को दक्षिणा के देने की व्यवस्था करनी चाहिये । तुला को समान करके दोनो पलडो को भली भांति बाँध करके उसमें अपने आपको और दूसरी फ्नी रली का शोलन करे। सुवर्ण से अपने आपको तोले और चांदी से अपनी प्रिया का वोसन करे १३५ १३५४ तोलयित्वा ददेद्राजा वित्तशाठयविजितः। ददेच्छतसहस्रन्तु रूप्यस्य कनकस्य च १३६ सर्वस्व वा ददेतन राजसूयफल लभेत् । एतकृत्वा विधानेन विप्रास्ताश्च विसर्जयेत् ॥३५ प्रोयता पुण्डरीकाक्षः सवयजेश्वरी हरिः । तस्मिस्तुष्टे जगत्तष्टं प्रीणित भवेत् ॥३८ एव सर्वोपपाते तु देवमानुपकारिते। एवं शान्तिस्तवाख्याता या कृत्वा सुकुती भवेत् ॥३६ म शोचेज्जन्ममरणे कृताकृतविचारणे । सर्वतीर्थेषु यत्म्नान सर्पयज्ञेषु यत्फलम् ॥४॥ तत्फल समवाप्नोति कृत्वा यज्ञमयं नृप ! ॥४१ राजा को इस प्रति तोलन करके वित्त की शठता का परियाग करते हुए दान देना चाहिए ।। ३६ ।। अथवा अपना सर्वस्व दान कर देवे !
यात्राकाल विधान वर्णन तो वहाँ पर राजसूय यज्ञ के पुण्य फल की प्राप्ति का लाभ करे। इस रीति से विधान के साथ सब कुछ करके फिर उन सब वित्रों को विसजित कर देना चाहिए। उस समय में यह प्रार्थना करनी चाहिए-भगवान् समस्न यज्ञो के ईश्वर श्री हरि पुण्डरीकाक्ष प्रसन्न होवें। उन प्रभु के पूर्णतया सन्तुष्ट हो जाने पर यह सम्पूर्ण जगत तुष्ट हो जाया करता है और उनके प्रीणित होने पर सब प्रीणित हो जाते हैं। इस प्रकार से देवमानुपो के द्वारा कारित सर्वोपद्यात होने पर इस रीति से आपको शान्ति बताई गई है जिसको करके तुम सुकृति हो जानोगे । जन्म और मरण के विषय मे कुछ चिन्ता नहीं करे तथा कृत एव अकृत क विषय में भी शोच न करे। हे नृप ! समस्त तीर्थों मे स्नान करने का जो पुण्य-फल होता है और सब यज्ञो मे जो फल होता है वह सम्पूर्ण फल ये तीन यज्ञ करके ही मनुष्य प्राप्त कर लिया करता है ।। ३७ ॥ ३८॥ ३०। ४०1४१॥ १०६-यात्राकाल विधान वर्णन इदानी सर्वधर्मज्ञ | सर्वशास्तविशारद ।। यात्राकालविधानमे कथयस्व महीक्षिताम् ॥१ यदा मन्योत नृपतिराक्रन्देन बलीयसा । पाणिग्राहाभिभूतोऽय तदा यात्रा प्रयोजयेत् ॥२ दुष्टायोघा भृता भृत्या साम्प्रतञ्चवलमम। मूलरक्षासमर्थोस्मि तदायाया प्रयोजयेत् ॥३ अशुद्धपाष्णिनृपतिनतु यात्रा प्रयोजयेत् । पाष्णिग्राहाधिक संन्यामूले निक्षिप्यचव्रजेत् ॥४ चेन्या वा मागशोा वा यात्रा गयान्नराधिपः । चैत्या पश्योच्च नंदाघ हन्ति पुष्टश्च शारदीम् ॥५ यात्राकाल विधान वर्णन ३२७ - विद्विष्टनायक सैन्यं तथा भिन्न परस्परम् । व्यसनाशक्तनृपति वलं राजाभियोजयेत् ॥१२ संनिकानां न शास्त्राणिस्फुरन्त्यङ्गानियत्रच । दुःस्वप्नानिचपश्यन्तिवलन्तदभियोजयेत् ।।१३ उत्साहवलसम्पन्नः स्वानुरक्तबलस्तथा। तुष्टपुष्टवलो राजा परानभिमुखो व्रजेत् ।।: ४ .दिव्यान्तरिक्ष और क्षिति से समुत्पन्न उत्पानो से परम पीडित- पडक्ष पीडा से सन्तप्त तथा ग्रही से पीडित - जलती हुई उल्का जिस दिशा को जाती है-भूवम्पोल्का जिस दिशा को जाती है और केतु को प्रसूत किया करती है । जहाँ पर निर्धात गिरता है उसी दिशा को राजा को गमन करना चाहिये । नस नप को बल..व्यसन मे युक्त-दुर्भिक्ष से पीडित और जिसके अन्दर कोप ममुत्पन्न हो गया हो ऐस शत्रु पर शोघ्र ही चढाई नृप को कर देनी चाहिए । जिसमे यूगा और यक्षिकाएं बहुत हो-अधिक पङ्घयुक्त-बिल -नास्तिक -भिन्न मर्यादा वाला-मङ्गलवादी- अपेत प्रकृति वाला और निस्सार को जीत लेना चाहिए ॥७,८,६, १०, ११ ।। जिस राजा की सेना ऐसी हो कि उसक नायक से विद्वीप हो और जो परस्पर मे भिन्न हो-जिस राजा की आसक्ति वासनो मे हो ऐसे बलहीन नृप के साथ अभियोग करना चाहिए अर्थात् युद्ध करे। जिसके सैनिको क पास शस्त्र न दो और जिममे अङ्ग स्फुरित होते हो- जो बुरे स्वप्न देखते हो ऐमो पर बल का आभयोजन करना चाहिए। उन्मा और वल से युक्त-जिसको सेना पूर्ण अनुराग वाली हो--तुष्ट जल वाला राजा ही अपने शत्रुओं से युद्ध करने को अभिमुख १३, १४ ।। शरीरसारणे धन्ये तथा दुस्वप्ननाशने । पे जाते शत्रुपुर व्रजेत् ॥१५ गहेष्वनुगुणेषु च।
३२६ मत्स्यपुराण एतदेव विपर्यस्त मागशीया नराधिप । शत्रो व्यसने यायात कालएवं सुदुलभ ॥६ दिव्यान्तरिक्षक्षितिजपात पोडित परम् । पडक्षपोडास-तत पीडितञ्च तथा ग्रहै १७ महर्षि मनु ने कहा-हे सव धमज्ञ ! आप तो सभी शास्त्रो के महान मनीषी है इस समय मे राजाओ की यात्रा-काल का जो कुछ विमान हो उसे आप कृपा करके मुये बतलाइये ॥ १॥ श्री मत्स्य भग खान ने कहा-जिस समय में नृपति वलीयान् आ द से युक्त मान लेवे उस समय में पारिणग्राह से अभिभूत इसको तीथ यात्रा की प्रयोजना करनी चाहिए । दुष्ट योधा-भृत भृत्य है इस प्रकार से इस समय में मा बल विद्यमान है। मैं इस समय मे मूल रक्षा में समथ हूँ। उसी ममय में यात्रा को प्रयोजित करा चाहिए ॥ २॥३॥ जो नृपति अशुद्ध परिण वाला हो उस यात्रा प्रयाजित नही करना चाहिए ! पाणिग्राह से अधिक स य को मूल म निक्षिप्त करके गमन करे । ४॥ नराधिप को चत्री अथवा मागणीर्षी पूर्णिमा मे यात्रा के लिये गमन करना चाहिए । चंत्री में निदाघ के दृश्य को देखे और शारदी टिका हनन करता है ५। यह ही मागशीर्षी म विषयस्त होता है। नराधिप शत्रु के व्यसन म गमन करे क्योकि यह काल हो सुदुभ होता है ॥६॥ ज्वलन्ती च तथवोल्का दिश याञ्च प्रपद्यते भूकम्पोल्का दिशय ति याश्चतु प्रसूयते 15 निर्धातश्च पतेदयत्र ता यायावसुधाधिप । सवल यसनापेत तथा दुभिक्षपीडितम् ।। सम्भूता तरकोपञ्च क्षिप्र प्रायादार नृप । यूगामापीक हुल यहुपच तथा विलम् ॥१० नास्तिक भिन्नमर्याद तथा मङ्गनवादिनम् । अपतप्रतिगाव निसारच तथा जयत् ।।११ ३२८ मत्स्यपुराण प्रश्नकाले शुभे जाते परान् यायानराधिप ॥१६ एवन्तु देवसम्पन्नस्तथा पौरपसयुत । देशकालोपपन्नान्तु यात्रा कुन्निराधिप ॥१७ स्थले नमस्तु नागस्य तस्यापि सजले वशे । उलूकस्यनिशि वाडक्ष सचतस्यदिवावशे ॥१८ एव देशञ्च कालञ्च ज्ञात्वा यात्रा प्रयोजयेत् ॥१६ पदातिसागबहुला सेना प्रावृषि योजयेत् । हेमन्ते शिशिरे चैव रथवाजिसमाकुलाम् ।। खरोष्ट्रबहुल' सेना तथा पीष्मे नराधिप ॥२०॥ चतुरङ्गबलापेता वसन्ते वा शरद्यथ । सेना पदातिब हुला यस्य म्यात्पृथिवापते । २१ अभियोज्यो भवेत्तेन वा शतत्र विषममाश्रित । गम्ये वृक्षावृते देशे स्थित शत्रुन्तथैव च । २२ परम ध य अदि अनुकूल शरीर के स्फुरण होने पर, दुस्वप्नो के नाश होने पर और अच्छे निमित्त एव शकुनो के होने पर ही राजा को अपने शत्र के नगर में प्रवेश करना चाहिए छ नक्षत्रो के पर तथा ग्रहों के बिल्कुल अपने अनुकूल हो जाने पर ही जब प्रश्न काल परम शुभ होवे तभी राजा को शत्रुओ के ऊपर चढाई करनी चाहिए । इस प्रकार से देव (भाग्य) से सुसम्पन होकर पौरुष से पी पूर्ण समन्वित राजा को देश तथा काल से उपप न यात्रा क नी चाहिए । स्थल में नारा पौर सजल देश मे नक के वश मे होने पर तथा रात्रि में उलूक एक दिन मे वाहक्ष (कोआ) के वशगत होने पर ही इस प्रकार से देश र कालमा शान प्राप्त करके राजा को अपनी गात्रा करनी चाहिए ॥ ११५ १६११७११८॥१६॥ वर्षा ऋतु ममी सेना को संपार करे जिसमे पानि मंनिब अधिक हो। हेपत और शिशिर ऋतु मे अधिक रथी एवं अवों को समावुलता होनी चाहिये । धिर को गोम ऋतु में पर -
मत्स्यपुराण
कर तथा दैत्र निकाल को भी जानकर कान के वेत्ता ज्योतिपियो मत
पूण रूप स जानकर एव द्विज और मन्त्र वेतामो के साथ भली भांति
चि तन करके ही यात्रा मे गमन तथा शत्रु पर अभियोजन करना चाहिए
॥२४-२७॥
१०७-अङ्ग स्फुरण विचार
हि मे त्व निमित्तानि अशुभानि सुभानि च ।
सवधमनता श्रष्ठ । त्वहिसविदुच्यते ॥१
अगदक्षिणभागे तु शस्त प्रस्फुरणम्भवत ।
अथ शस्त तथा वामे पृष्ठस्य हृदयस्य च ॥२
अङ्गाना स्पदचव शुभाशुभविचेष्टितम् ।
तन्मे विम्तो हि येन स्यात्तद्विधो भुवि ॥३
पृथ्वीलामो भवे मूर्त न ललाटेरविन दन ।।
स्थान विवृद्धिमायाति भ्रूनसो प्रियसङ्गम ।।
भृत्यधिश्चाक्षिदेशे दृगुपन्त धानगम ।
उत्खण्टोपगमो मध्येदृष्टराजन् । विचक्षण ।
हमन्यन सगर च जय शीघ्रमवाप्नुयात ।
योपिद्भागोऽपाङ्गतशे श्राणा त प्रियाभुति ॥६
नासिकाया प्रीनिसीस्य प्रजागिरधराष्टजे ।
यण्टे तु भागाभ स्याद्भागवृद्धि रथासयो । ७
-विमान पर हसमस्त धम धारिया म पग श्रष्ट दर !
आपका ता गभी दुध मा। कहा जा है। अतएव अद थाप वृषा
परब आ निमित्त महा और गा परम अशुभ है। उनका भी
बाधा कोनि मत्स्य भगदान 7 बहा~मानव व अङ्ग
३३२ मत्स्यपुराण विपर्ययेण विहिता सर्वस्त्रीणां फलागमः ।। दक्षिणेऽपि प्रशस्तेऽङ्ग प्रशस्तं स्याद्विशेषतः ॥१२ अतोऽन्यथा सिद्धिप्रजल्पनात्तु फलस्य शस्तस्य च निन्दित्तस्य । अनिष्टचिह्नोपगमे द्विजानां कार्य सुवर्णेन तु तर्पणस्यात् ।।१३ वाहुओ के प्रस्फुरण से सुहृत का स्नेह और हाथ में होने से धन का समागम हुमा करता है । पृष्ठ में होने से तुरन्त ही पराजय होती है तथा वक्षः स्थल में स्पन्दन से जय हुआ करता है। कुक्षियो में होने से प्रोति उपदिष्ट की गई है और स्तन में स्पन्दन से स्त्री के प्रजनन हुआ करता है। नाभि देश मे प्रस्फुरण होने से स्थान का भ्रश हुमा करता हैं तथा अत्र में होने से धन का आगम होता है । जानुओं की सन्धि में प्रस्फुरण होने से परों से सन्धि होती है जो कि बहुत बलवान् हुआ करते हैं । हे ना! हे रविनन्दन ! दिशा के एक देश में होने से नाश होता है तथा जवा में स्पन्दन हो तो उत्तम स्थान का लाभ होता है और परो मे होने से लाभ के सहित मार्ग का गमन होता है । हे नृप ! पादतल मे होने से लच्छन लगता है और स्फुरण को ही भांति फिर कभी जान लेना चाहिए । यह पुरुष के विषय में ही कहा गया है स्त्रियों के विषय में विपर्यय से फलागम हुआ करता है । प्रशस्त अङ्ग दक्षिण मे भी विशेष रूप से प्रशस्त होता है इसलिए अन्यथा सिद्धि के प्रजल्पन से प्रशस्त और निन्दिन फलका घनिष्ट चिन्हो के उपमम होने पर द्विजो का सुवर्ण के दाग तर्पण करना चाहिए 14-१३॥ १०८-स्वप्न दर्शन वर्णन स्वप्नास्यान काय देव ! गमने प्रत्युपस्थिते । रायतविविधाकारा.कथातेपपिलभवेत् ॥१
स्वप्न दर्शन वर्णन
इदानी क्थयिष्यामि निमित्त स्वप्नदशने ।
नाभि विनायगानेषु तृवृक्षसमुदभव ॥२
चणन मूनि कास्यामा मुण्डन नग्नतातथा ।
मलिनाम्बरधारित्वमभ्यङ्ग पङ्कदिग्धता । ३
उ-चात् प्रपतनञ्चौव दोलारोहणमेव च ।
अर्जन पक्कलोहाना हयानामपि मारणम् ।।४
रक्तपुष्पद्रमाणाञ्च मण्डलस्य तथव च ।
वराहक्षखरोष्ट्राणा तथा चारोहणक्रिया ॥५
भक्षण पक्वमासाना तैलस्य कृसरस्य च ।
नतन हसनञ्चैव विवाहा गीतमेव ॥६
त-त्रीवाद्यविहीनाना वाद्यानामभिवादनम् ।
स्रोतोऽवगाहगमन स्नान गोमयवारिणा ॥७
महा महषि मनु ने कहा है देव ! कही पर गमन के प्रयुपस्थित
होने पर स्वप्न का प्रास्यान किस प्रकार से हुआ करता है ? ये स्वप्न तो
अनेक एव विभिन्न आकार वाले दिखालाई दिया वस हैं फिर उन सबका
पल किस प्रकार से हुआ करता है। ॥श्री मत्स्य देवन कग-इस
समय मे मैं स्वप्नों के दर्शन में जा निमिन होता है उस ही बन जाता है।
केवल एक नाभिको छाड कर शरीर के प्रय किसी भी अङ्ग म तृण और
वृभा को सम्पत्ति - मस्तक का चण हो जाना--कास्यो का मुण्डन तपा
नग्नता--मलिन वस्त्रों का धारण करना, अभ्यङ्ग, एक स दिग्धता, ऊँचे
से पतन होना, दोला पर समारोहण करना, पक्क लोहो का अजन, हयो
का मारण रक्त पुष्प वाले दुमो के मण्डल का तथा वराह बोछ, खर
पौर उष्ट्रो के ऊपर आरोहण करना-पके हुए मास का भक्षण परना
तया तेल और वृसर का खाना, मावना, हसना, विवाह, गीत, तन्त्रीय
दारा वजन वाले वाद्यो से रहित अय वाद्यो का अभिवादन करा स्रोत का
अवगाहन गमन करता, गोमयवारि से स्नान करना आदि ये सब दु स्वप्न
होते हैं ॥२-७॥
मत्स्यपुराण
पवादकेन च तथा महीतायेन वायथ ।
मातु प्रवेशो जठरे चितारोहणमेव च ॥८
सक्रध्वजाभिपतन पतन शशि सूर्ययो.।
दिव्या-तरिक्षभौमानामुत्पानाञ्च दर्शनम् ।।
देवद्विजातिभूपालगुरूणा क्रोधएव च ।
आलिङ्गन कुमारीणा पुरुपाणाञ्च मथुनम् ॥
हानिश्चैव स्वगात्राणा विरेकवमनक्रिया ।
दक्षिणाशाभिगमन व्याधिनाभिभवस्तथा ।।११
फलापहानिश्च तथा पुष्पहानिस्तथैव च ।
गृहाणाञ्चैव पातश्च गृहसम्माजनन्तथा।।?
भीडा पिशाचाव्यादवानरक्षनररपि ।
पगदभिभवश्चैव तस्माच व्यसनोद्भव ॥१३
कापायवम्बधारित्व तद्वत् स्त्रीगोडगन्तथा।
लेहपानावगाहोच रक्तमाल्यानुनेपनम् ॥१४
पवे मिश्रित जल ग स्नान, मही तोय से स्नान माता ये उदर
में प्रवेश परना,
विना पर ममारोहगा, शक ध्वज का गिरना, घर और
मूर्य या पतन, दियामरिक्ष भीमो का और उत्पानो का दर्शन, देय,
जानि, गजा और गुरु वा क्रोध, पुमारियो वा लिङ्गन, पुरुष मथुन,
अपने गायों की हानि, विरचन पौर घमन, दक्षिण मापी और गमन
परना, ध्यापि स पापभव, पत्र को आ हानि, पुण हानि, गृहा का
गिरना, रामम्मान, पिशाव राक्षग, वानर, प्राक्ष और नरी के
गाय नोटा परता, दूगर से अभिभव और उसकी प्यमान को उत्पत्ति,
मेरमा यो का धारण काम, मो शाश नीटन, स्नेह काम और
पा र माप और अनुपन परना ये सब दुरण होते
11-141
स्वप्न दर्शन वान
एवमादीनि चान्यानि दुम्रप्नानि विनिदिगत् ।
ऐषा सङ्कथान धन्य भूय प्रगपनन्तथा ॥१५
पलस्नानन्तिले हामा जाह्मणानाञ्च पूजनम् ।
स्तुतिश्च वासुदवस्य तथा तम्यव पूजनम् । १६
नागेन्द्रमोक्षधदण जय टु स्वप्ननाशनम् ।
स्वमान्तु प्रथम याम सम्बत्मर्गापाकिन ।।१७
पभिमास द्वितीय तु निभिर्मासस्तृतीके।
चतुर्य मासमानण पश्यतो नान सशय ,१९
अरणादयवलाया दशाहन फ्लम्भवेत् ।
एक्स्या यदि वा रानौ गुम वा यदिवाशुभम् ॥१६
पश्चादृष्ट यस्ततास्यपावितिदिशत।
तस्माछाभनवेस्वप्नश्चातस्वप्नानपश्यति ॥
इमी प्रकार क तथा एम हा अन्य टु म्पन्न हुआ करत है-ऐसा
ही विनिर्देश करना नाहिए। ऐसे टु स्वप्ना का भलो मोल कथन तथा
ऐन स्वप्न देखकर फि
ना है इसका फल फिर
पुरा मही रहा करता है। र म म्नान लिसोम मोर प्राहामा का
पूजन, मावान् वासुदधाम्नवन मथा उनका श्रीपूनन मोर न मोक्ष
कोवा काश्रवण करना-इनस द्रवाना माप पत्र का नाम
हो जाया करना है। स्वान यदि यम हो याम हाव तो उमया पल एr
वप तर दिपार पो दाम पहुंचना है। दूसर प्रहर मम्मप्न होतो
छ मास माना है । तोमरे रात्रि र म म्वान दाता
सीन मामों में पन हुआ यता है पोर चौथ प्र म म्वप्न जो दिसाइ
देता है उसमापन एक मास महुआ करता है इमम कुछ मा मगय नही
है। यदि महगादय व समय म स्थान हो तो दिन मत होना है।
एक हो रामि म सुम और अतुम स्वन हा ताजा पीट दियाद दना है
उसी का पानि.प्ट करना चाहिए। इमो का यदि वाद अन्त
स्वपन वरनाच्न
माम्यपुराण
स्वप्न हो और पीछे स्वप्न नहीं देखता है तो अहा है अता अछा
स्वप्न देखकर फिर सोना ही नहीं चाहिए ॥१५-२०॥
शैलप्रासादनागाश्ववृषभारोहण हितम् ।
द्रुमाणा श्वेतपुष्पाणां गमने च तथा द्विज ॥२१
द्रुमतृणोदभवो नाभी तथैव बहुवाहता।
तथे वहशीपत्व पलितोद्भव एव च ॥२२
सुशुक्लमाल्यधारित्व सुशुक्लाम्बर धारिता ।
चन्द्राताराग्रहण परिमार्जनमेव च ॥२३
शक्रध्वजालिङ्गनञ्च तदुच्छायकिया तथा।
भूम्यम्बुधीना ग्रसन शत्रणाञ्च बधनिया ॥२४
जयो विवादे चुते च सग्रामे च तथा द्विज ! ।
भक्षणञ्चामासाना मत्स्याना पाय सस्य च ॥२५
दशन रुधिरस्यापि स्नान वा धिरेण च ।
सुरामधिरमद्याना पान क्षीरस्य चाथवा ॥२६
अर्वा वेष्टन भूमो निमल गगन तथा ।
मुखेन दोहन शस्त महिषीणा तथा गवाम् । २७
सिहाना हस्तिनोनाञ्च वडवाना तथैव च ।
प्रसादो देवविप्रेभ्यो गुरुभ्यश्च तथा शुभः ।।२८
अब अच्छे स्वप्नो के विषय मे बतलाया जाता है-नागेल, शैल,
अश्व, मामाद और वृषभ का समारोहण हितकर हा करता है। हे
दिज । श्वेत पुष्पो वाले द्रमो का गमन मै आरोहण भी शोभान होता है।
नाभि मे द्रुम और तृणों का उद्भव तथा बहुत सी बाहुओ की उत्पत्ति हो
जाना-बहुत सारे मस्तकों का होना और फलितोद्भव, सुन्दर शुक्ल
मालाओ का धारण करना शुक्ल वस्त्रो का धारण, चन्द्र, सूर्य और तारा
का ग्रहण, परिमार्जन, शक को ध्वजा का आलिङ्गन, उसके उच्ट्राय की
क्रिया, भूमि तथा अम्बुधियो का प्रसन, शत्रुओ के वध करने का कर्म,
स्वप्न दर्शन विचार वर्णन
विवाह, सग्राम और ध न मे जीन, आई मांस का भक्षण,मत्स्यो का भक्षण,
पायस का खाना मधिर का दर्शन, घिर से स्नान, सुर, घिर मद्य का
पान करना अथवा क्षोर का पान, आंतो के द्वारा वेष्टन जो भूमि मे हो,
निर्मल गगन, मुख के द्वारा भयो नया गौनो का दोहन प्रगस्त होना है।
सिंहनियो का, हयिनियो का और बड़वाओ का भी दोहन प्रशस्त है । देव
तथा विप्रो की प्रसन्नता और गुरु वर्ग का प्रसाद भी शुभ होता है ।
॥२१-२८॥
अम्भसा त्वभिपेकस्तु गवा शृङ्गाग्रितेन वा !
चन्द्राद् भ्रष्टेन वा राजन्! ज्ञ या राज्यप्रदो हि स. ME
राज्यामिपेकश्च तथान्छेदन शिरसस्तथा ।
मरण वह्निदाहश्च वह्निदाहो गृहादिपु ॥३०
लम्धिश्च राज्यलिङ्गाना तन्त्रीवाद्याभिवादनम् ।
तपोदकाना तरणं तथा विषमलड्धनम् ॥३१
हस्तिनीवडवानाञ्च गवाञ्च प्रसवो गृहै।
आरोहणमयाश्वानां रोदनञ्च तथाशुभम् ॥३२
वरस्त्रीणां तपालामस्तपालिङ्गनमव च ।
निगडंबन्धन धन्यं तथा विष्ठानुलेपनम् १३३
जीवितां भूमिपालाना सुहृदामपि दर्शनम् ।
दर्शनं देवतानाञ्च विमलाना तथाम्भसाम् ।।३४
शुभान्यर्थतानि नरस्तुदृष्ट्वा प्राप्नोत्ययत्नाद्ध्वमर्थलाभम् ।
स्वप्नानि वै धमता वरिप्ट ! व्याधेविमोक्षञ्च तथाऽनुरोपा १३५
जल के द्वारा अभिषेक का होना अथवा गोमो के गुङ्गो के
आश्रित जल के द्वारा अभिपिजन होना, हे राजन! चन्द्र से घ्रप्ट के
दाग मिपिचन का होना तो राज्य को प्रदान करने वाला ही जानना
पाहिए ॥२६॥ राज्याभिषेक का होना, शिर का ऐदन हो जाना, मरण,
मग्निका दाह, गृह आदि ये अग्नि के द्वारा दाह का हो जाना, राज्य के
मस्यपुराण चिन्हों की प्रप्ति का हो जाना, तन्त्री वाले वायो श अभिवादन होना, जलो मे तैरना, विषम स्थान का लवन करना, गृह म हथिनो, घडवा सधा गोमो का प्रमब होना, अश्वा पर समारोहण करना शुभ होता है । अच्छी स्वियो का लाभ करना तथा वस्त्रियो का समालिङ्गन करना, निगडा क द्वारा बन का होना विष्ठा से अनुलेपन होना यह सब धन्य एव शुभ होता है । जीवित भूमिपालों का नया सुहृदो या दर्शन प्राप्त करना देव क दशन करना विमल जलो का देखना ये सत परम शुभ स्वप्न हुना करते है। मनुष्य इन ऐसे शुभ स्वप्नो को देख कर बिना ही यल के किये घरूम से भय काल मप्र किया करता है । हे धर्म- पारियो म वरिष्ठ । भातुर हो कर भी व्याधियो का विमोक्ष होना शुभ स्वप्न होता है ॥३०-३५।। १०१-यात्रा के समय मङ्गल-अमङ्गल सूचक शकुन वर्णन गमन प्रति राज्ञान्तु समृखादशने च रिम् । प्रसारताने सम्भाप्य सर्वानताश्चकोर्तय ॥१ औषधानि त्वयुक्तानिधान्य वृष्णश्चपद्भवेत् । पापामश्च तृण राजन् । शुष्क गामयमेवध ॥२ ६-धनञ्च तथाङ्गार गृड तल तथा शुभम् । अध्यक्त मलिन मुण्डन्तपानग्नञ्च मानवम् ।।३ मुक्तवश रजातच कापायाम्बरधारिणम् । उमित्तान्तया सच दौगञ्चाथ नपुसाम् ॥४ य परम्तथा चम पेशवन्धनमेव च । तर्थवान तमाण पिम्यावादीनि यानि च ॥५ चण्डालश्वपारी राजबन्धनपालश।
यात्रा के समय मगल-अमगर मुचर गान वर्णन
वधका पापकर्माणो गभिणा स्लो तथैवच ६
तुपमस्मकपा तास्थिभिनभाण्डानि यानि ।।
रक्तानि चैन भण्डानि मतशाङ्गिकमवच ७
एवमादीनि चान्यानि प्रशस्तान्यभिदर्शने।
अशस्ता वाह्यशब्दश्च भिन्नभैरवजजर 11
महर्षि मनु ने कहा-ह भगवान् । जिस समय म राजा लोग
गमन किया करत हैं तो समुख म दान करने में क्या-क्या प्रशस्त हुआ
करते हैं यह बतलाकर इन सम्पूण शकुनो का वर्णन कृपा करक करिय।
॥१॥श्री मम्य भगवान ने कहा-ह राउन् । अयुक्त प्रौषध अपरा
धान्य कपास, तृण, शुष्क गामय ईधन अङ्गार, गुड तेल य सब शगुन
शुम हुमा करते हैं । अभ्यङ्ग किया हुआ, मलिन, मुण्ड नग्न मानव, कशो
को सुने हुए रखने वाला, रोग स आतं कापाय वस्त्र धारण करन
वाला, उन्मत्त मत्त्व, दीन नपुन्मक, लाहापन चम, वंशवान, पिण्याक
आदि सार वस्तुए बन्धन पालर, दधर, पाप कर्म बरन वाल, गभिगी
स्त्री तुप, भस्म कपाल अस्थि मिन भाण्ड रक्त वण के भाण्ड, मृत,
शालिक इस प्रकार म इत्यादि अभिदशन म अशस्त होने हैं। वाय
शब्द और मिन भैरव जजर शब्द भी अशस्त हुआ करता है ।।२-८॥
पुरत शब्द एहीति शस्यते न तु पृष्ठत ।
गन्छेति पश्चात् धमज्ञो । पुरस्तात्तुविहित 15
क्व यामि तिष्ठमा गपिन्ततत्र गतम्य तु ।
बन्ये शब्दाश्च ये निष्ठाम्तेविपत्तिकराअपि ॥१०
ध्वजादिषु तथास्थान नव्यादाना विहितम् ।
स्पलन वाहनानाञ्च वस्त्रसङ्गस्तथैवच १११
निगतस्य तु द्वारादौ शिरसश्चाभिधातिता।
मध्यजाना वस्ताणा पतनञ्च तया शुभम् ॥१२
दृष्टे निमित्त प्रथममम गल्यविनाशनम् ।
मत्स्यपुराण 1॥११ - केशव पूजययेद्विद्वान् स्तवेन मधुमूनम् ।।१३ द्वितीये तु ततोदृष्ते प्रतीपे प्रविशेद्गृहम् । अथेष्टानि प्रवक्ष्यामि मनालगानि तथाऽघि धागे की पोर स ाओ-यह शब्द शस्त होता है पीछे की ओर से प्रशस्त नहीं होता है । हे धम्मज्ञ पीछे की ओर से 'गच्छ अर्थात् जाप्रो-यह शब्द शस्त कहा गया है जो कि सामने गहित माना गया है। कहा जाते हो-हाजाओ-वहा पर जाने से तुझको क्या प्रयोजन है'-ये इस तरह के तथा ऐसे ही अन्य शब्द जो होते हैं वे विपत्ति करने पाले भी हा करते हैं । ॥ यादो राक्षसो का ध्वज आदि मे स्थान गहित हुआ करता है। पाहनो का खलन वस्त्र सङ्ग द्वार आदि मे निगमन बरन वाले के शिर का अवयात तथा छत्र, ध्वज और वस्त्रो का पतन भी शुभ होता है। प्रथम मे ही निमित्त के देखने पर अमङ्गल्य पा विनाश होता है । विद्वान् पुरुष का क्त्तव्य है कि भगवान् शिव का पूजन परे और मधुसूदन प्रभु या स्तवन करना चाहिये ।।६-१३॥ हे अनप फिर दितीय प्रतीप देसन पर गृह में प्रवेश कर लना चाहिए । इसके पश्चान इप्ट मङ्गना व विषय म मैं वणन करू गा ॥१४॥ स्वता सुमास श्रेष्ठा पूणपुम्भास्तथं व च । जलजा पक्षिणश्चवमास मत्स्याश्चपथिय । ॥१५ गावस्तुरङ्गमा नागा बद्ध एव पशुस्वज । विदशा मुददो विप्रा ज्वलितश्च हुताशन ॥१६ गणिया च महाभाग ! दूर्वा चाव्य गोमयम् । रपमरूप्यन्तया ताम्र सवरत्नानि चाप्पथ ॥१७ भोपधानिक धमा । यता सिद्धार्थवास्तपा। मवााधमान यानन्य भद्रपीटन्तर्थव प ॥१८ पल पर पताका घ मृदयायुधमेय प।
यात्रा के समय मगल-अमगल सूचक शकुन वर्णन ३४१ घृत दधि पयश्चच फलानिविविधानि च । स्वस्तिक वद्धं मानञ्च नन्द्यावतं सकौस्तुभम् ॥२० वादित्राणा सुख शब्द गम्भीर सुमनोहर । गाधारपड्जपमा ये च शस्तास्तथा खरा. ॥२१ हे पार्थिव । 'वेत पुप्प परम श्रेष्ठ होते हैं तथा पूण कुम्भ भी परम गुम हुआ करते हैं । जलज-पपीगण-मास-मत्स्य-गौऐ - तुरङ्गम-नाग-बद एवं पशु-अज--विदश-सुहृद विप्र--जलती हुई अग्नि-गणिका-तान और हे महाभाग ! सब प्रकार के रत्न हे धम्मंज' र्या-आद्रं गोमय-सुवर्ण-रूप्या-औषध-यव-सिद्धार्यक- मनुप्यो के द्वारा वाह्यमान यान-भद्रपीठ -सङ्ग-चक्र-पताका- मृत्तिका-आयुध-सम्पूण -राजा के चिह्न जो रदित स रहित होव । पृत- [-दधि---पय-विविध भौति क फल-स्वस्तिक-वर्तमान-नन्द्या- वत-कौस्तुभ - वादियों का सुमुकर शब्द जो गम्भीर एव मनोहर हो-धार, पड्ड-पम जो कि शरत्र तथा घर हैं ।। १५, १६, १७ १८,१६,२०,२१॥ वायु सशर्वरोरक्ष सर्वत्र समुपस्थित । प्रातलोमस्तथा नाचो विज्ञयोभयवृद्विज ॥२२ अनुकूलोमृदु स्निग्ध सुखस्पश सुखावह । रक्षारक्षस्वराभद्रा काव्यादा परिगच्छताम् ।।२३ मेधा शस्तापना स्निग्धागजवृहितमन्निभा । अनुलामास्तडिच्छता गावापन्तथैवच ४ अप्रशस्त तथा ज्ञय पग्विपप्ररपणे। अनुलामा ग्रहा दस्ता वाक्पतिस्तु विदोपत ।।२५ आस्तिक्य श्रद्दधानत्व तथा पूज्याभिजनम् । शम्नान्यतानि धमज । पच म्यागनम प्रियम् ॥२॥ मासस्नुप्टिरवाट परम जयलक्षणम् ।
मत्स्यपुराण
केशव पूजययेद्विद्नान् स्तवेन मधुमनम् ।।१३
द्वितीये तु ततोदृष्ते प्रतीपे प्रविशेद्गृहम् ।
अथेष्टानि प्रवक्ष्यामि मङ्गालगानि तथाऽपि
॥१५
आगे की ओर से अओ--यह शब्द शस्त होता है पीछे की ओर
से प्रशस्त नहीं होता है । हे धम्मज्ञ पीछे की ओर स 'गच्छ अर्थात्
जानो--यह शब्द शस्त कहा गया है जो कि सामन गहित माना गया
है । कहा जाते हो- रुक जाओ - वहा पर ज ने से तक्षको क्या प्रयोजन
है -ये इस तरह के तया ऐसे ही अय श जो होते हैं वे विपत्ति करने
वाले भी हझा करते हैं । ८०॥ प्रध्यादो राक्षसो का ध्वज आदि मे
स्थान गहित हुआ करता है। वाहनो का ग्खलन वस्त्र सङ्ग द्वार आदि
मे निगमन करने वाले के शिर का अवघात तथा छत्र, ध्वज और वस्त्रो
का पतन भी शुभ होता है। प्रथम में ही निमित्त के देखने पर अमङ्गल्य
फा विनाश होता है । विद्वान् पुरुष का कत्त व्य है कि भगवान् के शव का
पूजन करे और मधुसूदन प्रभु का स्तवन करना चाहिये ॥६-१३।। हे
अनघ । फिर द्वितीय प्रतीप के देखने पर गृह में प्रवेश कर लेना चाहिए ।
इसके पश्चान इष्ट मङ्गलो के विषय मे मैं वणन करू गा ॥१४।।
श्वेता सुमनस थ ष्ठा पूणकुम्भास्तव च ।
जलजा पक्षिणश्चवमास मत्स्याश्चपथिव ! ||१५
गावस्तुरङ्गमा नागा बद्ध एक पशुस्त्वज ।
विदशा सुहृदो विप्रा ज्वलितश्च हुताशन ॥१६
गणिका च महाभाग ! दूर्वा चारच गोमयम् ।
रुक्मरुप्यन्तथा ताम्र सवरत्नानि चाप्यथ ॥१७
औपधानिव धमज्ञ । यना सिद्धाधकास्तथा।
नृवाह्यमान यानञ्च भद्रपीठन्तथव च १८
खन चा पताका च मृदश्वायुधमव च ।
राजलिङ्गानि सर्वाणि सर्वे गदित जता ॥१९
यात्रा के समय मगल अमगल सूचक शकुन वर्णन ३४१ - . घृत दधि पयरचंद फलानिविविधानि च । स्वस्तिक वद्ध मानञ्च नन्द्यावतं सकौस्तुभम् ॥२. वादिनाणा सुख शब्द गम्भीर. सुमनोहर.। गान्धारपड्जरूपमा ये च दास्तास्तथा खरा. ॥२१ है पार्थिव । “दत पुष्प परम ग्रेट होते हैं तथा पूर्ण कुम्भ भी परम गुम हुआ करते हैं । जलज-पपोगण-माम-मत्स्य-गोए. तुरङ्गम-नाग-बद्ध एक पशु-अज-विदग-मुहृद विप्र-जलतो हुई अग्नि-गणिवा-ताम्र और हे महाभाग ! सब प्रकार के रत्न- हे धम्मंज। दूर्वा-आई गोमय- मुवर्ण-स्प्या-प्रोषध-यव-मिदाथंक- मनुप्पो के द्वारा वाह्यमान यान-भद्रपीठ -खङ्ग-चक्र-पताका- मृत्तिका-आयुध-सम्पूण-रानाक चिह्न जा रदित स रहित हावे । पत-धि-पप-विविध भांति क फल-स्वनिक-वद्ध मान-नन्या- वत्त-कौस्तुभ- वादियों का मुकर गन्द जो गम्भीर एव मनोहर हो-गन्धार, पह-रूपम ना कि शस्त्र तय खर है ।। १५, १६, १७ १८.१ ,२०,२॥ वायु सशरोरक्ष सर्वत्र समुपस्थित । प्रातलोमस्तया नाचो विज्ञयोमयवृद्विज । ॥२२ अनुकूनौमृदु स्निग्ध मुखस्पश मुखावह । रक्षारक्षबरामद्रा प्राध्यादा परिंगच्छनाम् ।।२३ मघा शम्नाधना स्निग्धागजवृहितमग्निमा । बनुलामासडिच्छन्ना मनचापन्तथवर 12 अप्रशस्त तथा शय पग्वेिषप्रवपणे। अनुनामा ग्रहा गम्ता वाक्पतिन्तु विपत 11२५ आस्तिक्य श्रद्दधानत्व तया पूज्यामिपूजनम् । सम्नान्यनानि धमजाच म्यागनम प्रियम् ।।२६ मनसम्नुप्टिरवाट परम जयलक्षणम् ।
मत्स्यपुराण एक्त सवलिङ्गानि मनसस्तुप्टिरेवत [२७ मनोत्सुकत्व मनस प्रहर्ष शुभस्य लाभो विजयप्रवाद । मङ्गल्यलब्धि श्रवणञ्च राजन् । ज्ञ यानि नित्य विजयावहानि।।२८ धूलि के सहित मक्ष वायु जो कि सभी जगह समुपस्थित है। ह द्विज! जो प्रतिलोम और नीच है वह भय करने वाला ही समझना चाहिए। अनुकूल-कोमल-स्निग्ध -- सुख देने वाले स्पर्श से युक्त- सूख का आवाहन करने वाला-रुक्ष-अरूक्ष स्वर-अभद्र-परिगमन करने वालो के वयाद-हाथियो के हित के सदृश धने स्निग्ध मेघ प्रशस्त होते हैं । अनुलोम विद्युत से छन-शनचाप तथा परिवेप मे प्रवषण प्रशस्त जानने चाहिए । जो ग्रह अनुलोम होते है वे प्रशस्त हुआ करते हैं और वावपति विशेष रूप से प्रशस्त माने गये है। आस्तिकता- श्रद्दधानता-पूज्यगण का अभिपूजन- हे धम्मज्ञ | ये सब प्रशस्त हुआ करते हैं और वह भी परम प्रशस्त माना गया है जो अपने मन के लिय अतिशय प्रिय होता है । यहा पर अपने मन की जो तुष्टि हुआ करती है वह हा परम जय का लक्षण हुआ करता है । एक ओर तोय सभी चिह्न हाते हैं और एक ओर अपने मन की तुष्टि हुआ करती है। मन की उत्सुक्त अर्थात उत्साह और मनमे होने वाला प्रहप यह ही शुभ का लाभ और विजय का प्रबाद होता है। मङ्गल्य की लमि और उसका श्रवण हे राजन् । नित्य ही विजय के प्रावह वरन वाने जाने चाहिए ॥ २२-." ११०-मराहवतार के विषय में अर्जुन का प्रश्न प्रादुर्भावान पुराणेषु विष्णोरमिततेजस । सता वयना प्रवाह इति न ध्रुतम् ।। न जान तम्यरत न विधि नप निम्तग्ग।
वराहदतार के वियप में अर्जुन का प्रश्न न कमंगुणसंस्थानं न चाप्यन्तंमनीपिणः २ विमात्मको वगहोऽसौ कि मूत्ति. कास्य देवता। कि प्रमाण. कि प्रभाव: कि वा तेन पुरा कृतम् ॥३ एतन्मे शस तत्वेन वाराह धुतिविस्तरम् । ययाहच समेताना द्विजातीना विशेषतः ॥४ एतत्ते कथयिष्यामि पुगण ब्रह्मसम्मितम् । महावराहचरित कृष्णस्याद्भुतर्मणः ॥५ यया नारायणो राजन् ! वागह वपुरास्थितः। दष्ट्रया गा ममुद्रस्थामुज्जहारारिमदनः ॥६ छन्दोगीनिरुदागभिः अतिभि समलकृत । मन प्रसन्नता करवा निबोध विजयावुना ॥७ अर्जुन ने कहा है विप्न । अपरिमिन ठेज से युक्त भावान् विष्णु पुरानो मे प्रादुर्भावो को कहत पाने सन्युम्पो में हमने एक बारह मा भी प्रादुर्भाव सुना है ।।१।। उम वागह का चरित्र में नहीं जानना है और न तो उसे कोई विधि ही मुझे मालू' है और न कुद विस्तार काही ज्ञान है। उनर कम और गुतो का सस्यान क्या या-यह भो मैं नहीं जानता हूँ ! उन अत्यात मनोयो प्रमु का तो अद्मत ही कर्म- गुण सम्यान होगा ॥२॥ यह वराह दिस स्वल वाला घाटमार था? इनकी कमी मूनि यो और इनका देवता कौन या? इनका प्रमाण विनना या और क्या प्रमाव या तया पहिल उन्होंन का किया था ? ॥३॥ अनि दिप्तार इस वाराह को आप तात्त्विक ससे मुके मव बलाइये? वरीय म ने ये पत्रित हुए द्विबन गए हैं इनर बनुमार जा भी योग हा या कराइये। ४॥ श्री गौन जी न कहा-अदमुन व व भगवान श्रीकृष्ण इस महा नगद चरित्र को बा ब्रह्म मम्मित पुगा है में जाको रहू" ।। ५। हे मरन् । दिन प्रगर न भगवन मा ओ व मदन करने वाले नागाण न वागहरे व ममाम्पित
३४४
मत्स्यपुराण
होकर अपनी दाढ से इस समुद्र में स्थित भूमि को उठाकर इसका उद्धार
किया था ॥ ६॥ छद, वाणी, उदार तियो से सम्यम् प्रकार से
अलकृत होकर तथा मन की प्रस नता करके अब उस विजय का ज्ञान
फरलो ।। ७॥
इद पुराण परम पुण्य वेदश्च सम्मितम् ।
नानाथ तिसमायुक्त नास्तिकाय न कोत्तयेत् ॥
पुराण वेदमखिल साङ्खच योगञ्च वेद य ।
कात्स्येन विधिना प्रोक्त सोरयाथ व वदिष्यति ॥६
विश्वेदेवास्तथा साध्या रुद्रादित्यास्तथाश्विनौ।
प्रजाना पतयश्चव सप्त चैव महपय ॥१०
मन सङ्कल्पजानोव पूवजा ऋषयस्तथा।
वसवो मरुतश्चव गधा यक्षराक्षसा । १
दत्या पिशाचा नागाश्च भूतानि विविधानि च ।
ब्राह्मणा क्षत्रिया वैश्या शूद्रा म्लेच्छाश्च ये भुवि।।१२
चतुष्पादानिसर्वाणि तिय्यग्योनिशतानि च ।
जङ्गमानिचसत्वानिय चान्यज्जीवसज्ञितम् ।।१३
पर्णे युगसहस्र तु ब्राह्म ऽहनि तथागते ।
निव्वणि सवभूताना सर्वोत्पातसमृद्भवे ।।१४
यह वराह पुराण परम पुण्यमय है और समस्त वदो के
सम्मत है । यह अनेक थु तियो स भी समायुक्न है । इसका कीत्तन
किसी भी नास्तिक के समक्ष मे नही करना चाहिए यह सम्पूर्ण पुराण
वेद ही है । जो सास्य और योग को जानता है वह पूण विधि से कथित
इसको सौख्य सम्पादन करने के लिये कहेगा ॥८॥ विश्व वा
माध्य, रुद्र, आदित्य अश्विनी कुमार और प्रजाओ के पतिगण सप्त महस्य
है। पूवज जो शामिण थे वे सब मन के महला से ही समु प न हुए
है । वमुग्ण महदगण, गधव यक्ष, राक्षरा, द य, पिशाच नाग, विविध
वगहवतार के विषय में अर्जुनका प्रश्न ३४५ भन, ब्राह्मण, क्षनिय, वैश्य, शूद्र और जो नूमण्डल में म्लेच्छ है--समस्त चतुप्पाद, नियंग्यो निगत संक्डों जङ्गम सत्त्व और जो अन्य जीव सन्ना मे युक्त सब एक सहन्न युगा के पूर्ण होन पर ब्रह्माजी के दिन के समागत हो जान पर सर्वोत्यातों के ममुद्गव वान ममम्त नूनों का निर्वाा होगया था ।।१०-१४॥ हिरण्यरेताग्निशिखम्नतो भूत्वा वृपारपि । शिखाभिविधमल्लोशनशोपयत वह्निना ॥१५ दह्यमानास्ततस्तम्य तेजोराशिभिन्द्गतः । विवर्णवर्णादग्घाङ्गा ताचिप्मदिभराननं ॥१६ साङ्गोपनिपदो वेदा दतिहामपुरोगमा । सवविद्या क्रियाश्चैव मवधमपरायणा. ।।१७ ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा प्रभव विश्वतोमुखम् । सवदेवगणाश्व त्रयस्त्रिशत्त कोटय ॥१% तम्मिन्ननि सप्राप्त त हह्न मदक्ष म् । प्रविशन्ति महात्मान हरि नारायण प्रनुम् ॥१६ तेपा भूप. प्रवृत्ताना नियनोत्पत्तिम्च्चन । यथा मूयम्य मतनमृदयाम्नमन इह २० पूर्ण युगसहन्नान्ने म नि गेप उच्यते । यम्मिन् जीवकृत सबै निशप नमनिष्ठत ॥२१ इमक अनन्नर हिरण्य रता त्रिनिख वृषा माप होरर मिनारों म लोगों को विशेष म्प मे घमन करत हुए वलि क द्वारा मवका शापण कर दिया था । इस अननर समुद्गत टमा तर की राशियों म दह्य- मान होत हुए अथिमान आननो क विवण वदन वान दग्ध प्रगा से युक्त हार हन हो ग्य थे। माङ्गवेद नया उपनिषद, इनिहामो को आगे करक मम्पूर्ण विद्या-मर्द धर्म पगवण किया और विश्व तो मुनु प्रभव ब्रह्मात्री को थाा करके तेतीन क्राट समस्न दवगण उस दिन मात्र नहानगर महदमार, महात्मा, हम उन प्रम नारायण हरि द धाम मे प्रदश करत मत्स्यपुगम हैं। प्रवृत्त हुए उनके पुन निधन से उत्पत्ति यही जाती है जिस तरह से यहां पर निरन्तर सूर्य का उदय और अस्तमन हुआ करते हैं। एक सहन युगो के पूर्ण हो जाने पर सबका निशेष कहा जाता है जिसमें सब जीव- कृत नि शेष समवस्थित हुआ था1१५-२१॥ सहत्य लोकानखिलान् सदेवासुरमानुपान् । कृत्वासुसस्था भगवानास्तएकजगद्गुर ॥२२ स स्रष्टा सर्वभूताना कल्पान्तेषु पुन पुनः । अव्यय शाश्वतो देवो यस्यसर्वमिदजगत् ।।२३ मष्टाकिरणो लोके चन्द्रग्रहविजिते । त्यक्तधूमाग्निपवने क्षीणयज्ञबद्रिये ॥२४ अपक्षगण सम्पाते सवप्राणिहरे पथि । अमर्यादाकुले रौद्रे सवतस्तमसावृते ॥२५ अदृश्ये सर्वलोकेऽस्मिन्नभावे सबकमणाम् । प्रशान्ते सवसम्पाते नष्टे वैरपरिग्रहे ।।२६ गते स्वभावसस्थाने लोके नारायणात्मके। परमेष्ठी हपीकश शयनायोपचत्र मे ॥२७ पीतवासा लोहिताक्ष कृष्णो जीमूतसन्निभ । शिक्षासहलविचजटाभार समुद्रहम् ।।२८ धीवत्सलक्षणधर रक्तचन्दनभूपितम् । वक्षा विभन्महाराहु स विष्णुरिव तोयद । २६ सरस देव, असुर और मानव के सहित पूरा सम्पूर्ण लोको का संहार कस जगत् मे गुरु एक हो भगवान् असुसस्था करक स्थित हुवा परत है। इस तरह वही कल्याक अ त म पुन पुन समस्त भूतो का स्रष्टा दोन हैं। वह अव्यय याश्वत देव हैं जिमका यह सम्पूण जगत् है । गूर्य की रिण जिमम नष्ट हो गई हैं और चन्द्र तथा ग्रहो स जो वजित है-घर बग्न और 977 7 भी जिराका पग पर दिया है तथा अग्नि वराहवतार के विषय में अर्जुन का प्रश्न रहित और यज्ञ एव वयट क्रिया से क्षीण, पक्षिगण के सम्पात से शून्य, समस्त प्राणियो क हरण करने वाले, अमर्यादा से आकुल, रौद्र, सब ओर से अन्धकार से समावृत मार्ग मे सब लोको के दृश्यमान होने पर, सब कर्मों के अभार में सव सम्पात के प्रशान्त हो जान पर इस नारायण्यमक लोक मे स्वभाव सस्थान के गत होने पर परमेष्ठी हृषीकेश ने अपने शयन करने का उपक्रम किया था। पीत वस्त्रधारी, लोहित नेत्रो वाले, मेघ के सदृश, सहस्री शिखाओ के विकच जटाओ के भार का समुदहन करन वाले श्रीकृष्ण विराजमान थे ।। ७,२३, ४, २५, २६, २७, २८॥श्रीवत्स के लक्षण को धारण करने वाले और रक्त चन्दन से विभूषित वक्ष:म्यल को रखने वाले 1-महान् वाहुओ से युक्त वह तोयद क समय ही श्री विष्णु भगवान् थे ॥ २६॥ पुण्डरीकसहस्रेण स्रगस्य मुशुभे शुभा । पत्नी चास्य स्वय लक्ष्मोहमावृत्यतिप्ठति । ३० ततः स्वपिति शान्तात्मा सर्वलोके शुभावहः । किमप्यमितयोगात्मा निद्रायोगम्पागन ।।३१ ततो युगसहस्र तु पणे स पुरपोत्तमः । स्वयमेव विमुभू त्वा बुध्यते विबुधाधिप ॥३२ ततश्चिन्तयत भृय. सृष्टि लोरस्य लोककृत् । नरान् देवगणारचव पारमेष्ठ्य न कमणा ।।३३ तत. सञ्चिन्तयन् कायं ददेपु समितिञ्जयः । सम्भव सवलोम्य विदधाति सतागतिः ॥३४ कर्ता चैव विकता च सहता व प्रजापति । नारायण पर सत्य नागयण पर पदम् ॥३५ इन विष्णु भगवान् की पत्नी स्वय साक्ष लक्ष्मी का देह को प्राथन करक स्थिन रहती हैं एक पहल पुण्डरीको की माला से वह शुमा शामित हो रही थी ॥३०॥ इस उपरान्त समस्त लोक मे सुख का मत्स्यपुराण भावहन करने वाले प्रशात यात्मा ३ सम्मन शयन किया करते हैं । वह अमित योग के स्वरूपधारी विसी योग निद्रा को प्राप्त हो गये थे ।।३।। इसके अनतर एव सहस युगो के पूर्ण हो जान पर वह विमु पुरुषोत्तम जो विबुधों के स्वामी हैं स्वयमेव हो प्रबुद्ध हो जाया करते हैं ॥२२॥ इसके पश्चात लोको के करने वाले न फिर लोक सृष्टि के विषय में चिन्तन किया था। नरगण और देवगणों का पारमेष्ठय कम द्वारा चितन करते हैं। फिर समिजय प्रम देवो के विवय में कार्य का चिन्तन करते हुए मत्पुरुषो को गति प्रभु समस्त लोक की उपत्ति को किया करते हैं। वह प्रजापात इस जगत के कर्ता विकर्ता और स ार के कर्ता हैं। नारायया परसत्य है-नारायण परम पद ह ।। ३३-३५ ।। न रायण परो यज्ञो नारायण परा गति । स स्वयम्भूरिति ज्ञ य स स्रष्टाभुवनाधिप ॥३६ स समिति विज्ञ यो ह्य प यज्ञ प्रजापति । मदितव्यस्त्रिदर्शस्त दष परिकात्यते ॥३७ यत्त वेद्य भगवतो देवा अपि न तद्विदु प्रजाना पतय सर्वे ऋपया सहामर ॥३८ नास्या तमधिगमछा त विचि व त इति श्रुति । यदस्य परम रूपन तत्पश्या त देवता ॥३६ प्रादुर्भावे तु यद् प तदति दिवोक्स । दशित यदि तेनव तदवेक्ष्यन्ति देवता ॥४५ य न दर्शितवानप कस्तदन्वेष्टुमीहते । प्राम्याणा सवभूतानाम िनमारुतयोगति ॥४१ तेजसस्तपसश्चव निधानमभृतस्य च । चतुरामश्रमधमाश्चात)नफ्लाशन ॥४२ गतु सागरमय तश्चतुय गनिचतर । तत्प सहत्य जगत्वा गभस्थामात्मन, बराहवतार के वियप म अजुन का प्रश्न ३४६ मुमोचाण्ड महायोगी धत वर्षसहस्रकम् ।।३।। सुरासुरद्विजमुजगाप्रोगणद्रुमौपधिक्षितिधरयक्षगुह्यकं । प्रजापति श्रुतिभिरसक ल तदा सवैसृजज्जगदिदमात्म ना प्रभु । नारायण पर यज्ञ हैं-नारायण परगति है-वह स्वयम्भू-यह जानने के योग्य है--वह भुवन का स्वामी सूजन करन वाल हैं ? वह सब कुछ है-ऐसा ही समझना चाहिए । यही यज्ञ और प्रजापति है । जो देवो के द्वारा जानने के योग्य है और वह ऐसा हो कीत्रित किया जाता है । जो कुछ भी भगवान् का वेद्य (जानने योग्य हैं । उस देवगण भी नही जानते हैं । न प्रजापति जानत हैं और अमरगणो के साथ पि लोग ही जानते हैं ।। ३६ । ३७ । ३८ 11 विशेष रूप स खोज करत हुए भी इस प्रभु के अत का ज्ञान कोई भी प्रप्त नही किया करत हैं-ऐसी श्रुति है । जो इसका पद रूप होता है उस देवगण भी नहीं देख पात हैं। जय इनके प्रादुर्भाव का कोई स्वस्प होता है उसी का दवगण अभ्यचन किया करते हैं । यदि इहीं न उस दिखल दिया है ता दवता लोग उस देख पाते हैं । जो कभी भी 3 होने नही दिखलाया है उसकी खाज करन को कौन इच्छा करना है । अथात् उसका अवपण काई भी नहीं कर पाता है। ग्राम्य समस्त प्राणियो की गांत अग्नि और मारुत की होती है। तेज तप और अमृत का निधान-चारा आश्रमा के धर्म का ईश-चातु दत्रिका फलाशन-चार सागरो की सीमा तक रहन वाला-चारो युगा का निवर्तक वह इसका सहार करके फिर अपन गम म स्थित जगत् को रचना करता हुआ महायागी एक सहस्र वप तक धारण किये अण्ड को छोड़ देता था। सुर-असुर-द्विज-भुजग और अप्पराआ क गणो स युक्त--औषधि-क्षितिघा--यक्ष और गुह्यका से समवित-श्रुतियो स असकुल इस जगत् को उस समय म वह प्रजापति प्रभु आत्मा से ही सृजन किया करता है ।। ३०-४४।।
३५०
मत्स्यपुराण
१११-राहवतार चरित्र वर्णन
जगदण्डमिद पूर्वमासीदिव्य हिरण्मयम् ।
प्रजापतेरिय मूतिरितीय वैतकी श्रुति ॥१
तत्तु वर्षसहस्रान्ते विभेदध्वमुस विभु ।
लोकसर्जनहेतोस्तु बिभेदाधोमुख नृप ! 1.
भूयोऽष्टधा विभेदाण्ड विष्णवं लोक जन्मकृत् ।
चकार जगतश्चान विभागविभागकृत् ॥३
यछिद्रमद्धमाकाश विवराकृतिता गतम् ।
विहित विश्वयोगेन यदधस्तद्रसातलम् १५
यदण्डमकरोत्पूर्व देवोलोचिकोपया ।
सत्र यत्सलिलस्नसोभवतकाञ्चनोगिरि. ॥५
शैलं महवं महती मेदिनी विषमाभवत् ।
संश्च पयत जालौघययोजनविस्तृत ॥६
पोडिना गुरुपिर्देवी व्यथिता मेदिनी तदा ।
महामते स्विस दिव्य नागपणागकम् ॥७
महविधान जी ने वहा या जगत का अ पहिल परम दिव्य
हिरण्य था। यह जगण्इ माक्षात प्रजाति की मुक्ति ही था-ऐसा
युति का वचन रहता है ।१॥ वद । सहस्र वर्ष के अन्त मे विभुन
हो विभेदन पिया पा) है नप । लोन एन पे हेतु रो
अधोमुगवान गया था। लादे नाम करने वाले भगवान
faryनरिमा को पार भागो म भेदन किया विभाग में
ने या प्रशु ने यस पर जात या विभाग पिया था | उर्व बाश
मेदिपाय नि की भाति को प्राप्त हो गया था। विके
मोग 10 अयामाग पा जग मातम रिया था। बाना हिने जो
मा पाप गारो पना की राहो पा ।
वराहवतार चरित्र वर्णन
३५१
वहा पर जो सलिल स्कन्न हुआ था वह सुवर्ण गिरि हो गया था । सहस्रो
शंलो के होन से यह मस्ती मेदिनी विषम हो गई थी जो कि बहुत से
योजनो क विस्तार से युक्त पवतो के बालो के ओपो से मुक्त थी। उम
समय में इन बडे भारी पर्वनो मे यह पीडित एव वयथित मेदिनी देवी हो
गयो थो हे महामते ! यह अण्ड परम दिव्य-बहुत अधिक बल वाला
नारायणक स्वरूपम सम्पन्न था॥ll
हिरण्य समुत्सृज्य तेजो व जातरूपिणम् ।
अशक्ता वै धारयितुमधस्तात्माविशत्तदा ।
पोटचमाना भगवतस्तेजसा त्स्य सा क्षिति. ।
पृथ्वी विशन्ती दृष्ट्वा तु तामधोमधुसूदन. HE
उद्धारार्थ मतश्चक्रे तस्या व हितकाम्यया ॥१०
मत्तेज एपा वसुधा समासाद्य तपम्बिनी ।
रमातल प्रविशति पक गौरिव दुर्बला ॥११
त्रिविक्रमायामितविक्रमाव महावराहाय सुरोत्तमाय ।
श्रीशान चक्रासिगदाधराय नमोऽस्तु ते देववर ! प्रसीद
तब देहाज्ज गज्जात पुष्कन्द्वीपमुत्थितम् ।
ब्रह्माणमिह लोकाना भूताना शाश्वतविदुः ॥१३
तव प्रसादाद्देवोऽय दिव भुदक्ते पुरन्दरः ।
तब क्रोधाद्धि बलवान् जनादनजितोदलि. ॥१४
जातरूपी हिरण्मय तेज का समुन्मृजन करके उसे धारण करने के
लिए अशक्त होकर उस समय मे नीचे की ओर प्रवेश कर गया था। उस
समय में भगवान् के तेज से वह शिनि पीडर माना हो गई थी। भगवान्
मघुसूदन ने अधोमाग में प्रवेश करती हुई उस पृथ्वी को देखा था और
फिर उस पृथ्वी के हित की कामना से उस उद्धार करने के लिये मनमे
विचार क्यिा था ।।१०॥ श्री भगवान् न कहा-इस उपस्विनी
वसुधा ने मेरे तेज को प्राप्त करके वह दुर्वल गौ पछ्, मै जिस तरह
३५०
मस्वराज
१११-राहरतार चरित्र वर्णन
जगदमिद पूर्वमासीदिव्य हिरण्मयम् ।
प्रजापतरिय मूर्तिरितीय यतको श्रुति ॥१
तत्तु वपसहस्राते विभेदध्वमुस विभु ।
लोर सजाहेतोस्तु बिभेदाधोमस नृप ।।
भूयोऽष्टधा विभेदाण्ड विष्णवे नोकजन्मवृत् ।
धकार जगतश्चात विभागसविभागकृत ॥३
छिद्रमूद्ध माझाश विवराकृतिता गतम् ।
विहित विश्वयोगेा यन्धस्तद्रसातलम् ।।
यदण्डमकरोत्पव दवोलाकचिकीषया।
सन यत्सलिलस्नसोऽभवत्काञ्चनोगिरि ५
शैल सहस्र महता मेदिनी विषमाभवत् ।
सश्च पवतजालौघव योजनविस्तृत । ६
पीडिता गरपिर्देवी व्यथिता मेटिनी तदा।
महामते भरियल दिव्य नागयरणात्मकम् ॥७
महर्षि गौनक जो ने कहा यह गत का अण्ड पहिो परम दिव्य
हिरण्य था। यह जगदण्ड साक्षात् प्रजापति की मृत्ति ही या-ऐसा
ध्रुति का वचा कहता है ।।१। वह एक सहस्र वष के अन्त मे विमुने
ऊध्व मुख को विभेदन किया था हे नप । लोक के सजन के हेतु से
अधोमुख का भेदन किया था। लोको के जम के करने वाले भगवान्
विशुन फिर उस अप को आठ भागो में भेदन किया था। विभाग के
करने वाले प्रभु ने यहाँ पर जगत् का विभाग किय था। अव्व आकाश
मे जो छिद्र था वह विबर को आकृति को प्राप्त हो गया था। विश्व के
योग से जो अभाग था उसे रसात किया था। देवने जो पहिने जो
अण्ड किया था वह नाम को रचना करन की इच्छा से ही किया था ।
वराहवतार चरित्र वर्णन तरु, जल, नदियां, धर्म, काम, यज्ञायन की क्रियाएं -विद्या, वेद्य, मन्द, ह्री श्री, कीति, धृति, क्षमा, पुराण, वेद, वेदो के समस्त अङ्ग शास्त्र, साङ स्य, योग, भव, अभव, स्थावर, जङ्गम, भविष्य, भवत् यह सभी कुछ तीनो लोकों में आपका ही प्रभाव है ॥१५-१८॥ देवो के उदार फल के दाता-स्वर्गीय स्त्रियो के चारु पल्लव-सब लोकों के मन के कान्त- सव सत्त्वो के मनोहर-विमानों के अनेक विटप-मेधो के जल का मधु- स्ताव-दिव्य लोक के महा स्वन्ध-सत्यलोक के प्रशाखा वाले--सागर के आकार का निर्यास-~-रसातल के जल का प्राश्रय-नागेन्द्र पादयों से समुपेत-जन्तु और पक्षिगण से निपेवित आप ही हैं !।१६-२१।। शीलाचारायंगन्धस्त्व सर्वलोकमयोद्रुमः । द्वादशाकमयद्वीपो रुद्र कादशपत्तनः ॥२२ वम्बष्टाचलसयुक्तस्त्रीलोक्याम्भोमहोदधि. सिद्धसाध्योमिकलिल.सुपर्णानिलसेवितः ॥२३ दैत्यलोकमहाग्राहो रक्षोरगरपाकुलः । पितामहमाधयं. स्वर्गस्त्रीरत्नभूपितः ॥२४ धीश्रीह्रोकान्तिभि नित्य नदीभित । कालयोगमहापर्वप्रयागगतिवेगवान् ।।२५ त्व स्वयोगमहावीर्यो नारायणमहार्णवः । कालोभूत्वा प्रसन्नाभिरभिर्लादयसे पुनः ॥२६ त्वया मृष्टास्त्रयो लोकास्त्वयव प्रतिसहताः। विशन्ति योगिनः सर्व त्वामेव प्रतियोजिता. ॥७ युगे युगे युगान्ताग्नि कालमेघो युगे युगे। महाभारावताराय देव ! त्व हि युगे युगे ॥२८ आप ही शोलाचार के आर्यगन्ध हैं । सर्व लोक मय आप म है। द्वादश सूर्यों से परिपूर्ण द्वोप, एकादश रुद्रो के पत्तन, अष्ट वसुओ के बल सयुक्त त्रिभुवनो के जल के महा समुद्र, सिद्ध और साध्यो की अमियो से
३५२
मरस्यपुराण
विषण्ण होती है उसो भौति यह मेदिनी रसातल में प्रवा करती है। ॥
पृथिवी ने कहा- हे देव वर । त्रिविक्रम से आयामित विक्रम वाले मुरा
में उत्तम-~श्री शाङ्ग चक्र असि और गदा के धारण करने वाल महा
घराह के लिये नमस्कार है । आप प्रसन होइये ॥१२॥ आपक ही देह से
यह सम्पूर्ण जगत् समु पन हुआ है और पुष्कर द्वीप उचित हुआ है ।
यहा पर ब्रह्मा को लोको के और भूतो का शाश्वत जानना चाहिए । हे देव!
यह आपका हो प्रसाद है कि इन्द्र देव दिवलोक का उपभोग किया करते
हैं । आपके ही क्रोध से भगवान् जनादन के द्वारा यह महा बलव म् बलि
जीतमलिया गया है ॥१३ १४ ।
धाता विधाता सहा त्वयि सर्व प्रतिष्ठितम् ।
मनु कृतान्तोऽधिपतिज्वलन पवनोचन ॥१५
वर्णाश्चात्रमधर्माश्च सागरास्तरवो जलम् ।
नद्यो धमश्च नामश्च यज्ञायज्ञस्य च क्रिया ॥१६
विद्यावद्यञ्च सत्वञ्च हो श्रो कीतिति क्षमा ।
पुराण वेदवेदाङ्ग सारययोगो भधाभवौ ॥१७
जङ्गम स्थावरचैव भविष्यञ्च भवञ्च यत् ।
सव तच्च श्रिलोवेपु प्रभावोपहित तव ॥१८
त्रिदशोदारफलद स्वगस्त्रीचारपल्लव ।
सवलोकमन कान्त सवसत्वमनोहर ।।१६
विमानानेक विटपस्नोयदाम्वुमधुस्रव ।
दि यलोकमहास्वन्धसत्यलोकप्रशाखबान् ॥२०
सागरावरनिर्यासो रसातलजलाश्रय ।
नागे द्रपादपोपेता ज तुपक्षिनिवित ॥२१
है भगवन् । आपक अ दर पाता विधाता और सहार करने वाला
इन तीनों सम्मो न करने की शक्ति विद्यमान है। गनु अघिपति कृतात,
..firror पन चारी वण घरा ब्रह्मवर्यादि आयमो के धम्म, सागर,
वराहदतार चरित्र वर्णन तरु, जल, नदियां, धर्म, काम, यज्ञायज्ञ को निश-विद्या, वैद्य, मन्द, ह्री श्री, कोति, धृति, क्षमा, पुराण, वेद, देदो के समस्त अङ्ग शास्त्र, साइ स्य, योग, भव, अमद, स्यावर, अङ्गम, मविप्य, मवत् यह सभी कुछ तीनो लोकों में आपका ही प्रभाव है ॥१५-१८॥ देवों के उदार फ्ल के दाता-स्वर्गीय स्त्रियो के चार पल्लव-सब लोगों के मन क कान्त- सब सत्वो के मनोहर-विमानों के बनक विटप-मेशा के जल का मघु- स्ताव-दिव्य लोक के महा स्कन्ध-सत्यलोक प्रशाखा दाल-सागर के आकार का निर्यास-रसातल के जल का प्राश्रय-नागेन्द्र पादयों से समुपेत-जन्तु बौर पक्षिगण से निपेक्षित आप ही हैं !!१६-२१॥ शीलाचारायंगन्धस्त्व सर्वलोक्मयोद्रुमः। द्वादशार्कमयद्वीपो रुद्रं कादशपत्तन ॥२ वस्वष्टाचलसयुक्तम्बोलोक्याम्भोमहोदधि सिद्धसाध्योमिलिल सुपर्णानिलसेवित Ila दत्यलोकमहाग्राहो रक्षोरगरपाकुलः। पिनामहमाधयं स्वर्गस्त्रीरत्नभूपित ॥२४ घोश्रीह्रोकान्तिभि नित्य नदीभित । कालयोगमहापर्वप्रयागगतिवेगवान् ॥२५ व स्वयोगमहावीर्यो नारायणमहार्णवः । कालोमत्वा प्रसन्नाभिरदिभादयसे पुन. ॥२६ त्वया मृष्टास्त्रयो लोकास्त्वयैव प्रतिसहता. । विशन्ति योगिनः सर्वे त्वामेव प्रतियोज्तिा ॥७ युगे युगे युगान्तानि कालमेघो युगे युगे। महाभारावताराय देव ! त्व हि युगे युगे ॥२८ आप ही शोलाचार क आर्यगन्ध हैं । सर्व लोक मय आप द्रम है। द्वादश सूर्यों से परिपूर्ण द्वीप, एगदश रुद्रो के पत्तन, अप्ट वसुओं के बल से सयुक्त त्रिभुवनी के जन के महा समुद्र, सिद्ध और साध्वों को अमियों
मत्स्यपुराण
स कलिल मुपानिल से सविन दै यो के लोको के महान् ग्राह राक्षस
और उरगो के रोप से समाकुल पितामह के महान् धेय्य, स्वग का स्त्रियो
रूपी रत्नो मे भूपित, धी ह्नी श्री और काति इनसे तपा नित्य ही
नदियो से उपशोभित कालयोग महान् पक्ष के प्रयाग की गति और वेग
पाले आप अपने योग के महान् वीय तथा मारायण महार्णव हैं । आप
पात्र होकर परम प्रसन्न जनो से पुन आह्लादित किया करते हैं । आपने
ही इन तीनो लोको का सजन किया है और आपने ही इनवा प्रति सहार
भी किया है । सब योगीजन प्रतियोजित होकर आप में ही प्रवेश किया
करते हैं । हे देव । आप ही युग युग में युगो के अत करने वाली अग्नि
हैं-युग युग मे आप ही काल मेघ है और इस महाभार के अवतारण
परन के लिए आप ही युग-युग म हुमा करते हैं ॥२२-२८॥
(व हि शुक्ल कृतयुगे तापा चम्पप्रभ ।
द्वापरे रखतसद्वाश वृष्ण कलियुगे भवान् ।।२६
वैदण्यमभिधत्से त्व प्राप्त षु युगसन्धिषु ।
वबण्य मवधर्माणामुत्पादयसि वेदवित् ॥३०
भासि वासियतपमित्वञ्च पासिविचेप्टसे ।
मध्यसिक्षान्तिमायासि त्व दीपयसियसि ।।३१
त्व हास्यसि न निर्यासि निव पर्यास जाग्रसि ।
निशेषयसि भूतानि वातो भूत्वा युगक्षये ।।३२
दोषमात्मानमालोक्य विशेषयसि ए पन ।
युगा ताग्नावलीपु सयभतेषु विश्चन ॥३३
यातेपु पापा भवसि तस्मापोऽसि यातित ।
ध्यपगोतात्तिय पुबह्म वाणादिपु ॥३४
यस्मान व्ययग स्यात्तम्मारसहीत्यराऽच्युत ।
वामदायमरद दरणमेव च ॥३५
६५ सग म बाप ही मुबर ५ का लता में
३५६ मत्स्यपुराण यक्षगन्धर्वनगर सुमहद्भूतपन्नगम् । व्याप्त त्वयैव विशता होलोक्य सचराचरम् ॥४१ तम्माद्विष्णुरिति प्रोक्तः स्वयमेव स्वयम्भुवा । नारा इत्युच्यते ह्यापो ऋषिभिस्तत्वदशिभिः ॥४२ हे भगवन् ! ब्रह्मादि सबका निग्रह करके आप इनका हरण किया करते हैं इसी कारण मे आपको 'हरि '-इस नाम से कहा जाता है । आप समस्त भूतो का दयु से, यश से, श्री से सम्मान किया करते हैं । हे देव ! पाप पर वपु से सम्मान किया करते हैं इसी कारण से सनातन है। पयो कि ब्रह्मादि देवगण और उग्र तेज धाले मुनि वृद सब आपके अन्त को प्राप्त नहीं हुआ करते हैं इसीलिये आप अनन्त इस नाम से कहे जाते हैं और संकडों करोड क्ल्पो मे भी आप न तो क्षरित होते हैं मोर नक्षीण ही हुआ करते हैं । इसी अक्षर होने के हेतु से आप अक्षर हैं और विष्णु इसी नाम से कीत्तिन किये जाते हैं। आपन इस स्थावर, जङ्गम जगत सवको विस्टक्ध कर दिया है ॥३६-३०।। इस सम्पूर्ण जगत के विष्टम्भन होने से आपका नाम विष्णु-यह कातित किया जाता है क्योकि इस त्रिलोकी को विष्टब्ध करके जिसमें सभी चर एव अचर विद्यमान हैं नित्य स्थित रहा करते हैं १४०,४१॥ इसी लिये स्वयं भगवान् स्वयम्भू ने विष्णु यह नाम कहा है। नारा, इससे जल हे जाया करते हैं जिसको सत्य दी ऋषियो ने वहा है। वही जल पहिने उनके अयन निवास स्थान हुए थे इसीलिए आपका मारायण यह माम हा गया है । हे विष्णो ! माप तो पुग-युग में प्रनष्ट मङ्गो को तात्विक रूप से प्राप्त किया पाते हैं 11४०,४३॥ अयमन्तस्यता: पूर्वन्तेन नागयण स्मृतः । युगे युगेप्रनष्टाङ्गा विष्णो ! विन्दसितत्वत. १३ गोविन्दतिततानाम्नाप्रोग्यसेमिस्तथा । हपीकाणीन्द्रियाण्याहुरतत्वज्ञानाविशारदाः [[४ वराहवतार चरित्र वर्णन ईशिता च त्वमेतेपा हपीकेशस्तथोन्यते । वसन्ति त्वयि भूतानि ब्रह्मादीनि युगक्षये ॥४५ त्व वा वससि भूतेषु वासुदेवस्तथो यसे । सङ्कर्पयसि भूतानि कल्पे कल्पे पुनः पुनः ॥४६ तत सङ्कपण प्रोक्तस्तत्वज्ञान विशारद । प्रतिघ्यूहेन तिष्ठन्ति सदेवासुरराक्षसा ॥४७ प्रविद्यु. सवधर्माणा प्रद्युम्नम्तेन चाच्यसे । निरोद्धा विद्यते यस्मान ते भूतेषु कश्चन ॥४८ अनिरुद्धस्तत प्रोक्त पूर्वमेव महपिभि । यत्वया घायंते विश्व त्वया सहियते जगत् VE क्योंकि पाप प्रनर अगों का लाभ करते हैं इसी लिये आपको "गोविन्द"-इस नाम से पुकारा जाया करता है और ऋषिगण गोविन्द कहा करते हैं । हपीर विषन्द्रियो को कहा जाता है जिनको कि तत्त्वज्ञान के विशारद कहते हैं । आप इनक ईशिता है इसी कारण से आपको हपी कैश नाम से कहा जाया करता है। युग ब्रह्मा आदि समस्त मृत आप ही म निवास किया करते हैं अथवा आप सब भूतो मे निवास क्यिा करते हैं इसी लिए आपको वासुदेव कहा जाया करता है । बारम्बार आप कल्प कल्प मे भूतो का सर्पण किया परत हैं अत एव तत्त्वज्ञान के विशारदों के द्वारा आरको सक्षण कहा गया है । ममस्त देव असुर और राक्षस प्रतिग्रह स स्थित रहत हैं और सब धर्मो क प्रदिद्य है अतएव आपको प्रद्य म्न इस शुभ नाम स कहा जाया करता है। आपका भूतो में कादि कोई भी निरोद्धा नहीं है इमीलिए पहिलेही महर्षियों ने आपका नाम अनिरुद्ध कहा गया है। हे भगवन । आपके द्वारा इस विश्व को धारण किया जाता है और आपके ही द्वारा इस जगत का सहार किया जाता है ॥४४-४६॥ ख धारयास भतानि भवन व विपि च । के क्षय मे मत्स्यपुराण यत्यया धार्यते विञ्चित्तेजसाववलेन च ॥५० मया हि घायते पश्चानाधृत धारये त्वया । न हि तद्विद्यते भूत त्वया सन्नान घायते ॥५१ त्वमेव कुस्पे ! देव । नारायण युगे युगे। महाभारावतरण जगतो हितकाम्यया ॥५२ तवैव तेजसाक्रान्ता रसातलतलगताम् । जायस्व मा सुरश्रेष्ठ | त्वामेव शरणगताम् ॥५३ दानवै पीडचमानाह राक्षसंश्च दुरात्मभि । स्वामेव शरण नित्यमुपयामि सनातनम् ॥५४ साव-मस्ति भय देव । यावन वा ककुमिनम् । शरण यामि मनसा शतशोऽप्युपलक्षये ।।५५ उपमान न ते शक्ता कत्तुं' सेन्द्रा दिवौकस । तत्व त्वमेव यदत्सि निरुत्तरमत परम् ।।५६ हे भगवन् । आप समस्त भूतो को धारण किया करते हैं और आप भवन का भरण किया करते हैं और अपके द्वारा तेज और बल के कुछ भी धारण किया जाता है इसके पीछे मेरे द्वारा धारण किया जाता है और जो आपके द्वारा अधृत है उसे में धारण करती हूं। ऐसा कोई भी भूत विद्यमान नहीं है जो आपक द्वारा धारण न किया जाता हो । हे दव । हे नारायण । इम जगत् के हित का कामना से युग- युग म आप ही इस महान् भार का अवतरण किया करते हैं । ह सुर श्रेष्ठ | आपके ही तज से यात्रत, रसातल मे गई हुई और आप को ही शरणागति म गई हुई मेरा परित्राण कीजिए। म दुरात्मा दानवा तथा रामसी द्वारा पीडधमाना मैं आप ही नित्य एव सनातन प्रभु को शरण म जानी हूँ । हे देव ! मुर लय तक ही भय होता है जब तक कमी धापको प्रारए म मन स नही जाती हूँ। मैं मंबडा का उपलक्षित वरती वितु आपकी समाना इ. पादिदवगण व रन म ममय हो द्वारा जो
वराहवतार चरित्र वर्णन
३५६
होते हैं । इसके तत्त्व को आप ही जानते हैं और इससे पर निरुत्तर है
1॥५०-५६॥
ततः प्रीतः स भगवान् पृथिव्य शाङ्गचक्रघृक् ।
काममस्या यपाकाममभिपूरितवान् हरिः ॥५७
अब्रवीच्च महादेवि ! माधवीय स्तवोत्तमम् ।
धारयिष्यति योमोनास्तितस्यपरामकः ।।५८
लोकान्निप्कल्मपाश्चैव वैष्णवान्प्रतिपत्स्यते ।
एतदाश्चयंसर्वस्वमाधवीयस्यवोत्तमम् ॥ ५६
अधोतवेद. पुरुपो मुनिः प्रीतमना भवेत् ॥६०
मा भधरणि ! कल्याणि | शान्ति व्रज ममाग्रतः ।
एप लामुचितं स्थान प्रापयामि मनीपितम् ।।६१
ततो महात्मा मनसा दिव्य रूपमचिन्तयत् ।
किन्नु स्पमह कृत्वा उद्धरेय धरामिमाम् ॥६२
जलक्रीडारचिस्तस्माद्वाराह वपुरास्थितः ।
अदृश्य सर्वभूताना वाङ्मय ब्रह्म सस्थितम् ।।६३
महपि शौनक जी ने कहा-इसके पश्चात् भगवान् शाङ्ग योर
चक के धारण करने वाले उस पृयित्री देवी पर परम प्रसन्न हो गये थे
और उन हरि भगवान् ने इसकी कामना को यथोप्सित रूप से पूरित
कर दिया थ॥५७॥ और भगवान ने उसमे कहा था-हे महादेवि !
आपके द्वारा कहा गया जो यह माधवीय स्तव है वह प्रनोव उत्तम है ।
जो मनुष्य इस स्तव को धारण करेगा उमका कभी भी परामव नहीं होता
है ।।५८। यह आश्चयों का सर्वस्व माधवीय उत्तम स्तव है । इसके धारण
करने वाला कल्मपो से रहिन वैष्णव लोकों को प्राप्ति किया करता है ।
IHASI वेदों के अध्ययन करने वाला पुष्प प्रोनि से युक्त मन वाला मुनि
हो जाता है ।।६०॥ श्री भगवान् ने कहा- घगि! हे कल्यागि !
उरामन ! मेरे आगे शान्ति को धारण करो। में तुमको मनो.
३६२
मत्स्यपुराण
रसाङ्गतामवनिमचिन्तविक्रम. सुरोत्तम. प्रवरवराहरूप घृक् ।
वृषाकपि.प्रसभमर्थकदष्ट्रया समुद्धरद्धरणिमतुल्यपौरप ।। ७६
वायु के अन्तरात्मा वाले-यज्ञो की अस्थि विकृतियों से सयुत-
सोम के शोणित से समवित-वेदो के स्कन्ध वाले हवि की गन्ध से
सम्पन्न-हव्य और कल्प के विभाग वाले प्राग्वश की काया से युक्त-
धु तिमान्-अनेक दीक्षाओ से समन्वित-दक्षिण हृदय-- महासत्रमय--
महान् योगा--उपा कर्मोष्ट रुचक-प्रवग्यावत भूषण - नाना छ दोगति
पय-गुह्योपनिषद सन-उच्छिन मणिभृङ्ग की भांति छाया पी सहम्म
प्रभु न रसालल के तल मे मग्न और रसातल के सल मे गई हुई उस भूमि
का लोको के हित के लिये दष्ट्रा के अग्रभाग से उद्धार किया था। इसके
अनन्तर पाथवी के धारण करने वाले वराह भगवान ने उसे अपने स्थान
पर लाकर पग्लेि मन से धारित वसुधरा को छोड़ दिया था। फिर यह
मेदिनी उस धारण करने से निर्वाण को प्राप्त हो गई थी। उस पृथ्वी
ने उन शम्भु देव के नमस्कार विया था । इस प्रकार से भूतो के हित
के चाहने वाले यश वराह भगवान ने वराह होरर पहिले सागर के जल
म गयी हुई प्रथिवी देवा को उदधृत किया था। इसवे अनन्तर देव ने
क्षिमि को उदधृत करक इस जगत् की स्थापा करने की इच्छा से भम्यु.
जगण न पृथिवी के प्रविमाग करन के लिए मन मे विचार किया था।
॥१.७२।७३।७४।७५ | ७६ । ७७१७८ || अचिननीय विषम
धान गुगम श्रेध प्रवर वराह के स्वरूप को धारण करत हुए भगवान ने
ओ वा पाप अजित पोरप स सम्पा थे रसातल म गई हुई धरणी को
चलया का वाद से समुद्घृत पिया था॥७॥
क्षीरोद मयन वर्णन
११२-क्षीरोद मथन वर्णन (१)
नारायणस्य माहात्म्य थत्वा मूत ! यथाक्रमम् ।
न तृप्तिर्जायतेऽस्माकमतः पुनरिहोच्यताम् ।।१
कथ देवा गता पूर्वममरत्व विचक्षणा ।
तपसा कर्मणा वापि प्रसादात्कस्य तेजमा ॥२
यत्र नारायणो देवो महादेवश्च शुलक ।
तत्रामरत्वे सर्वपा सहायो तत्र ता स्मृती ॥३
पुरा देवासुरे युद्ध हताश्च शतशः मुरैः।
पुनः सन्जीविनी विद्या प्रयोज्य भगुनन्दनः ।।४
जीदापति दैत्येन्द्रान् यथा मुप्तोत्यितानिव ।
तम्य तुप्टेन देवेन शङ्करेण महात्मना ।।५
मृतसजाविनी नाम विद्या दत्ता महाप्रभा ।
ता तु माहेश्वरी विद्या महेस्वरमुखोद्गताम् ॥६
भार्गवे सस्थिता दृष्ट्वा मुमुहः सवदानवा ।
ततोऽमरत्व दैत्याना कृत शुक्रेण धीमता ।।७
ऋषिगण ने कहा-हे मूजा! भगवान् नारायण के यथाक्रम
माहात्म्य का श्रवण करके हमारी तृप्ति नहीं होती है अतएव पुन. पाप
दर्णन कीजिये ॥ ५॥ विचार दव किस प्रकार स पहिले अमर-ब को
प्राप्त हुए थे। क्मिी तप के द्वारा व्यदा कम से या किसी के प्रमाद स
या देज के द्वारा देवा को कायाना प्राप्त हुई थी? श्री मूतजी ने कहा-
जहां पर देव नारायण और शूल को धारण करन वाल महादव विद्यमान
थे वे दानों उन मबर अमरत्व प्रतिपादन करन में सहायक कहे गय हैं
॥३॥ प्राचीन समय में देवामुर युद्ध ने मुरों के द्वारा मकहा
दे यन्द्र निहत कर दिय गये थे फिर भृगुनन्दन ने अपनी सजावनी विद्या
* प्रयाग पर माकर उठे हुओ की भाति जीवित कर दिया था ।
मत्स्यपुराण
महात्मा देव शहर ने परम सतुष्ट होकर महान् प्रभाव एवं प्रभा वाली
सज्जीवनी विद्या उसको प्रदान कर दी थी । महेश्वर के मुस स समुदत
उस माहेश्वरी विद्या को भागव महर्षि म सस्थित देखकर समस्त दानव
मोह को प्राप्त होगधे थे। इसके अन तर धीमान् शुक्र ने दत्यों का अमरत्व
कर दिया था ॥५-७॥
या नास्ति सवलोकाना देवाना सवरक्षसाम् ।
न नागानामृषीणाञ्चनच ब्रह्म द्रविष्णुपु ॥८
ता लब्ध्वा शङ्कराच्छुक परा निकृतिमागत ।
ततो दवासुराघोर समर गुमहानभूत् ।।६
तत्र देवहतान दत्यान् सनोविद्याबलेन च ।
उत्थापयति दत्ये द्रान् नी लयवविचक्षण |
एवम्विधेन शस्तु बृहस्पतिरुदारधी ।
ह यमानास्ततो देवा शतशोऽथ सहस्रश ॥११
विषण्णवदना सर्वे बभूवुविकलेद्रिया ।
ततस्तेषु विषण्णेसु भगवान कमलोद्भव ।।
मेरुपले सुरे द्राणामिदमाह जगत्पत्ति । १२॥
देवा शृणत मद्वाक्य तत्तथव निरूप्यताम् ।
क्षिपता दानव साई मरयमनप्रवतताम् ।१३
नियताममृतोद्योगो मथ्यता तौरवारिधि ।
सहाय वरुणकृवाचक्रपाणिविबोध्यताम् । १४
बा विद्या समस्त लोको के पास नही थी तथा देवो ओर राक्षसो
के समीप मै श्री विद्यमान नहीं थी एवं नाग ऋषिगण और ब्रह्मा इन्द्र
था विष्णु के पास भी नहीं रही उस महान प्रभाव वाली इस विद्या को
भगवान् शहर स प्राप्त कर शुक्राचाय परम निवृति को प्राप्त हुए थे।
इमक यत् सुमहश्वर देवासुर घार समर हुआ
1111 यहाँ
ग गरे ? - या को शुग च य 7 विद्या के चल के द्वारा
+
क्षीरोद मयन वणन उन दैत्ये द्रों को लीला ही से विचक्षण ने उठा दिया था। इस प्रकार से इद्र और उदार बुद्धि बाल वृहस्पति तथा हयभाव सैकडों और सहस्रो देवगण सबके सब दिपाद युक्त मुखो वाल विकद्रिय हो गये थे । इसक पश्चात् उनक विषण्ण होन पर भगवान् कमलोद्भव जगत के स्वामी न मरु पवत के पृष्ठ भाग पर यह सुरेद्रो से कहा था ।। १० । ११ । १२ ।। ब्रह्माजी ने कहा-हे देवगणा ! मेरा यह वाक्य सुनो और उसे वस ही करो। दानवो के साथ यहाँ पर सस्य भाव कर डालो । अमृत की प्राप्ति का उद्योग करो तथा क्षार सागर का म यत करो। वरुण को सहायक बनाकर भगवान् चक्रपाणि को प्रयुद्ध करना चाहिए ॥ १५॥ १४ ॥ मन्थान मन्दर कृत्वाशण्नेटोण वेष्टितम् । दानवेन्द्रोवलिस्वामीस्तोत्र कालनिवश्ग्ताम् ।।१५ प्राथ्यता कूमरूपश्च पाताल विष्णुरव्यय । प्रार्थ्यता मदर शल मन्थकाराप्रवर्त्यताम् ॥१५ तच्छत्वा वचन दवा ज मुगनवमन्दिरम् । अल विराधेनवगभृत्वाम्तव वल । धुना ।।१७ क्रियताममृतोद्योगा दियता शपनत्रकम् । त्वया चात्पादितदत्य । अमृतेऽमृतमन्थन ।।२८ भविष्यामाऽमरा सर्वे त्वत्प्रसादान्न सशय । एवमुक्तस्तदा देव परितुष्ट स दानव ॥१६ यथा वदत हे दवा । स्तथामार्य मयाऽधुना । शक्तो-हमेक एवात्रमथिनु क्षीरवारिधिम् ।।.. आहरिप्येऽमृत दि यममृतत्वाय योऽधुना। सुदूरादाश्रय प्राप्तान् प्रणतानपि वरिण ॥२१ यो न पूजयते भक्त्या प्रत्य चेह विनश्यति । पालयिष्यामिव सर्वानघुनास्नेहमास्थित ॥२२ मदराचल पर्वत को मचान बनाकर उस शपनाम व नत्र स मत्स्यपुराण ( नेती से वेष्टित करो। दानवों का इन्द्र स्वामी बलि को थोड़े समय सक निवेशित करो। पाताल मे अविनाशी भगवान् विष्णु जो कूर्म रूप वाले हैं उनको शर्थना करो। शैलगज मन्दराचल की भी प्रार्थना करो और फिर मन्थन का कार्य प्रवृस कर दो। इस वचन को देवी ने श्रवण किया था और फिर वे सब दानवों के मन्दिर मे गये थे। हे बले ! अब माप विरोध मत करो हम सब आपके मृत्य अब तो सब मिलकर अमृत की उपलब्धि का प्रयोग करो और मन्धन कार्य का नेन शेषनाग को बना डालो। हे दै य ! आपके द्वारा इस अगृत मन्थन मे अमृन के समुत्तादिन होने पर सब अमर हो जायेंगे और यह आपके ही प्रसाद से सुसम्पन्न होगा- इसमे सनिक भी समय नहीं है । इस तरह से उन देवा के द्वारा कहे जाने वाला वह दानव बहुत परितुष्ट हो गया था। हे देव- गण ! आप लोग जसा भी कहते हैं हम भी सब वैसा ही मुझे भी इस समय मे करना ही है। यह पर मैं अकेला ही इस क्षीर वारिधि को मन्थन करने में समर्थ हूँ और अब मैं आपको दिश्य अमृत अमृतत्व लिये लाकर दे दूंगा। सुदूर से आश्रय को प्राप्त होने वाले वंरियो का जो भक्तिभाव मे पूजन नही किया करता है वह यहाँ पर मरकर मिष्ट हो जाया करता है । अब मैं स्नेह मे समस्थित होकर आप सब लोगो का पालन करूंगा॥१५-२२॥ एवमुक्त्वा स दैत्येन्द्रो देवः सह ययो तदा। मन्दर प्रार्थयामास सहायस्वे धराधरम् ॥२३ सखा भवत्वमस्माकमधुनाऽगृतमन्यने । सुरासुराणां सर्वपा महत्त्वामिद जगत् ॥२४ तथेति मन्दरः प्राह यद्याधारोभवेन्मम । यत्र म्यिस्वयाभ्रमिष्यामिमथिप्येवरुणालयमा १२५ फप्यतां नेभकामें म. शक्तः स्याद्वेष्टने मम। सतस्तु निगतो वो कर्मोपो महावलो १२६ के
क्षीरोद मथन वर्णन
२६७
विष्णोर्भागी चतुथाशाद्धरण्या धारणे स्थिती।
ऊचतुगवंसंयुक्त वचनगेपकन्छपी ॥७
लोक्यधारणेनापि न ग्लानिमम जायते ।
किमु मन्दारयात्क्षुद्रात्पुटिकासन्निभादिह ॥२८
उसी समय में वह दत्यराज इस प्रकार से देवगण के साथ चला
गया था। घराघर मन्दर की सहायता करने के लिए प्रार्थना को यो।
उसने कहा था-हे पर्वत वर ! इस समय में आप हमारे इस अमृत के
मन्थन मे सखा हो जाय ! इस जगत में सब सुर और असुरो का यह
एक बहन वहा कार्य है । ऐसा ही हो जायगा-यदि मेरा कोई वाधार
हो जायगा जिस पर स्थित होकर मैं भमण करुंगा भोर सागर का
मन्यन करूगा ।। २३, २४, ०५ ॥ नन बनने के काय म जो भी समर्थ
हो और मेरा वेन कर सके उसकी कल्पना करिये। इसके पश्चात् महा
बलवान् कूर्म और शेष निर्गत हो गय थे । भगवान् विष्णु के माग घरणी
के चतुर्थ यग से धारण करने में स्थित हो गय ये । शेप और मच्छर
दोनो गई। समन्वित वनन कहने लगे थे।
इम निलोको के धारण
करने से भी मुझको कोई ग्न नि नहीं होती है फि एक घुटिया व सदृश
यहाँ पर इस शुद मन्दर स्थल में क्या ग्लानि अर्थात् पान हो सस्तो
है ।।६-२०॥
ब्रह्माण्डवेष्टनेनापि ब्रह्माण्डमथनेन वा ।
न मे ग्लानि भवेहेहे किमु मन्दरवतने ।।२६
तत उत्पाटश्चतशल तत्क्षणात् क्षीरसागरे ।
चिक्षेप लोलया नाग: कूर्मश्चाघ.स्थितस्तदा ॥३०
निराधार यदा शैल नशेवुदेवदानवाः ।
मन्दरनामण कक्षोरादमयने तथा ॥३१
नागयणनिवासन्ते जम्मलिसमन्विताः।
यमास्ते देवदेवेशः स्वयमेर जनार्दनः ॥३२
मत्स्यपुराण तत्रापश्यत तन्देव सितपद्मप्रभ शुभम् । योगनिद्रासुनिरत पीतवाससमा युतम् ॥३३ हारवे यूरनदाङ्गम हिपयङ्कसस्थितम् । पादपम न पाया स्पृशत नाभिमण्डाम् ॥३४ स्वपक्षव्यजनेनाथ दीज्यमानगरुत्मता । स्रायमान समतारचसिद्धचारणकिन्नर ॥३५ भगवान रोप ने कहा-इस पूरे ब्रह्माउ क वेष्ठन स मी तथा पूर्ण ब्रह्माण्ड के मथन से भी मुझ कोई ग्लानि नही होनी है फिर इस मदर के वेष्टन में क्या मुझे हानि हो सकती है ।।६। इसके अन तर उमीण म उस मदर शैल को उत्पानित कर क्षीर सागर में उस समय में लीला ही सानिया पा और मम तथा नाग नीचे स्थित हो गय ।।३०॥ जिरा समय में वेक और दानव धीरोद के म पन में निराधार गैर को सपा करन समर्म न होस थे तो वे सब बलि के सहिन नारायण प्रभुर निवास स्थान पर गये प यहाँ पर देवो कभी देवेश्वर भगवान् जनादन स्वयं ही विरावमान थे। .१ ३२॥ वहां पर उन सबने थे। पदम के समान प्रभाव से योग निहा में निरत- पीताम्बाधा अशुन देव या दर्शन frपापा। वह म हार और देपूर व नवस और पद पयपर दायान वाल- पमा पार पदम स नामि माइन । स्पा परत हुए विराजमान थे। पर उस गमा म बानो मा ध्यान पर रदय और गिट पारण सपा गरयावास र निजाद ॥३-३५॥ म्नाय भूसिमभिर म्यूगमा समतत । सम्पयाहपधान त प्टन देवदााया ॥१६ धृतानमारा मय प्रणता गवता दिया। नमा माया तिममित राहार ! माEिITAL REATMEL मादा।
क्षारोद मथन वर्णन नमः सर्गक्रियाने जगत्पालयते नमः ॥३, रुद्रम्पाय शर्वाय नम. संहारकाग्णेि। 'नमः शूलावुधाधृष्य नमो दानवघातिने ॥३६ नमः क्रमसयाक्रान्त औलोक्यायाभवाय च । नमः प्रचण्डदैत्येन्द्रकुलकाल महानल ! ]]४० नमो नाभिहृदोद्भूतपद्मग महाचल !। पद्मभूत ! महाभूत ! कर्तेहों जगत्प्रिय ! ॥४१ जनिता सर्वलोकेश ! क्रियाकारणकारिणे । अमरारिविनाशाय महासमरशालिने ॥४० उन नारायण प्रमू के चारो और मूतिमान माम्नाय स्थित होकर स्तुति कर रहे थे। मव्यवाहु उपधान वाले उन प्रभु नारायण का समस्त देवों और दानवों ने वहा पर स्तवन किया था ॥३६॥ सभी दिशाओ में वे मब अपनी अञ्जलियः वांधकर तथा प्रणत होते हए स्थित हो गये थे। देव दानवो ने कहा-हे तीनो लोको के स्वामिन ! आपकी सेवा में हमारा नमस्कार समर्पित है । आपतो अपने तेज के द्वारा अमिन भास्कर के समान हैं । हे विष्णो ! हे जिणो ! हे करम दैत्य के मदन करने वाले ! आपको हम सबका वारम्बार नमस्कार है। समस्त क्रियाओं के करने वाले योर इस जगती तल के परिपालन करने वाले आपको सेवा में हमारा नमस्कार है ।।३७, ३८१॥ संहार के करने वाले रुद्र रूप धारी भगवान् शव के लिए हमारा नमस्कार है । है शूल के अपने आयुध से नघर्पण करने के योग्य ! दानवों के धान करने वाले आपको नमस्कार है ॥३६॥ हे प्रम के त्रय से आक्रान्त ! है प्रचण्ड दैत्येन्द्रो के कुल के लिए पाल ! हे महानल ! लोक्य स्वरूप और अभव आपकी सवा में बारम्बार प्रणाम समर्पित है । आपतो अपनी नामि रूपी हृद से उत्पन्न पदम गर्भ से महान् अचल हैं । हे पद्म भूत ! हे महाभूत ! हे जगत के परम प्रिय ! सबके वर्ता और हत्ता आपके लिये नमस्कार है ।। ४०.४१ । - के मत्स्यपुराण 1 हे सब लोको के ईश ] आज ही सबके जनन करने वाले हैं। देवो के शत्रुओ के विनाश करने वाले और महा समरशाली तथा क्रिया और कारण के करने वाले आपकी सेवा मे हम सबका प्रणाम उपस्थित है ।। ४२॥ लक्ष्मीमुखाब्जमधुप । नम कीर्तिनिवासिने । अस्माकममरत्वाय ध्रियता घियतामयम् ॥४३ मदर सवर्शलानामयतायुतविस्तृत । मन तवलबाहुभ्यामवष्टभ्यकपाणिना ।।४५ मथ्यताममृत देव । स्वधास्वाहाथकामिनाम् । तत श्रुत्वा स भगवान् स्तोत्रपूव्द वचस्तदा ।। विहाय योगनिद्रातामुवाच मधुसूदन ॥४५ स्वागत विबुधा । सर्वे किमागमनकारणम् । यस्मात्यायर्यादिह प्राप्तास्तद् व्रत विगतज्वरा ४६ नारायणेनैव मुक्ता प्राचुस्तत्रदिवौक्स । अमरत्वाय देवेश ! मध्यमाने महोदधो । १७ यथाऽमृतत्व देवा । तथा न कुरु माधव ।। स्वया विना व छवयमस्माभि क्टभादन । ॥ प्राप्तु तदमृत नाप ! ततोऽग्रे भव नो विभा ।। इत्युक्तश्च ततोविष्णुर प्रधृष्यारिमदन IVE हे समोर मुख रूसी क्मत के रसास्वादन करने वाले मधुप पीति निवासी आपके लिये नमस्कार है। हम सब के अमरख प्राप्ति के लिय भाप इस समस्त भेलों में अयुनायुत विस्तार वार मदरायल को धात पर सम्रन वाहनो ग प्रवष्टब्ध परखे एप हाप से धारण ने पीपा पोाि और दम घारण पगए ॥४३, ४ा हे देव ! स्वधा स्वाहा की वासना करनाल में मरा मायन वाजिए । इस उप- मारायण भगवान्न सन पूधर इस वचन पर ध्यण प्रिया पा क्षीरोदमयन वर्णन उसी समय मे मधु मृदन प्रभु ने उस अपनी परम प्रिय योग निद्रा का त्याग करसे उनमें यह वचन बोले थे-श्री भगवान् ने कहा- देवगणे! आपका स्वागत है । मो आप यह वनसाइये कि यहां पर इस समय में आप लोगों के पहीं आने का क्या कारण है ? जिस कार्य को लेकर इस समय मे प्राप लोग यहा प्राप्त हुए हैं टमको अब मरे मामने बिल्कुल दुख रहित होकर बतलाये ।।४५, ४६ नगवान् नारायण के द्वारा इस तरह से कहे हुए वहा पर देवगरा ने कहा-हे देवेश ! अमरत के लिए मध्यमान महोदधि मे जिस प्रकार में हमारा अमृतत्व सम्पादित हो सके वैसा ही है माधव ! आप करिए । हेटमादन ! आपके बिना हम लोगों के द्वारा यह नहीं किया जा सकता है ।।४७, १८॥ हे नाथ ! उस अमृत को प्राप्त करने के लिए हे विमो] आप हमारे सबके आगे हो जाइए ! इस तरह से रहे गये रियो के मर्दन करने वाले और अप्रघृष्य विष्णु उनके पाय चल दिये थे ॥४६॥ जगाम देवः सहितो यत्रासो मन्दराचलः । वैष्टितो भोगिोगेन धृतश्चामरदारवं ॥५. विपभीतास्ततादेवा यत. पुच्छ ततः स्थिता । मुखता दंत्यसधास्तु मैहिकेयपुरः सराः ॥५१ सहस्रवदन चाम्य शिरः सव्येन पाणिना। दक्षिणेन वलिदह नागस्याकृष्टवास्तथा ॥५२ दधारामृतमन्यान मन्दरं चाकन्दरम् । नारायण स भगवान् भुजयुग्मद्वयेन तु ॥५३ ततो देवासरः सर्वं जयजन्दपुर सरम् । दिव्य वर्षशत सात्र मथिनः क्षीरमागरः ॥५४ ततः आन्तास्तु ते सर्व देवादत्यपुर सराः। धान्तेपु तेषु देवेन्द्रो मेघोमूत्वाम्बुशोकरान् ॥५५ ७० मास्यपुराण हे सर्व लोकों के ईश ! आप हो सबके जनन करने वाले हैं। देवों के शत्रुओ के विनाश करने वाले और महा समरशाली तथा क्रिया और कारण के करने वाले आपकी सेवा में हम सबका प्रणाम उपस्थित है ।॥४२॥ लक्ष्मीमुखाब्जमधुप ! नमः कीर्तिनिवासिने। अस्माकममरत्वाय ध्रियतां ध्रियतामयम् ॥४३ मन्दरः सर्वशैलानामयुतायुतविस्तृतः । मनन्तवलबाहुभ्यामवष्टम्यकपाणिना ॥४॥ मथ्यताममृत देव ! स्वधास्वाहार्थकामिनाम् । ततः श्रुत्वा स भगवान् स्तोत्रपूर्व वचस्तदा ।। विहाय योगनिद्रान्तामुवाच मधुसूदनः ॥४५ स्वागत विबुधा ! सर्वे किमागमनकारणम् । यस्मात्का-दिह प्राप्तास्तद् द्यूत विगतज्वराः १४६ नारायणेनैव मुक्ताः प्राचुस्तत्रदिवौकसः । अमरत्वाय देवेश ! मथ्य माने महोदधौ । ४७ यथाऽमृतत्वं देवेश ! तथा नः कुरु माधव ! । त्वया विना वच्छक्यमस्माभि: कैटभादन ! ॥१८ प्राप्तुतदमृतं नाथ ! ततोऽग्ने भव नो विभा !। इत्युक्तश्च ततोविष्णुरप्रधृष्योऽरिमर्दनः ।।४६ हे लक्ष्मी के मुख रूपरी कमल के रसास्वादन करने वाले मधुप ! कोति निवासी आपके लिये नमस्कार है। हम सब के अमरत्व प्राप्ति के लिये आप इस समस्त शैलों मे अयुतायुत विस्तार वाले मन्दराचल को अनन्त बल सम्पन्न वाहुओ से अवष्टब्ध करके एक हाथ से धारण के ने को कृपा कीजिए और इसे धारण कागए ।।४३, ४४॥ हे देव 1 स्वधा, स्वाहा की कामना करने वालों के अमृत का मन्यन कीजिए । इसके उप- रान्त नारायण भगवान ने स्तवन पूर्वक इस वचन का श्रवण किया था।
क्षीरोद मथन वर्णन ३७१ उसी समय मे मधु सूदन प्रभु ने उस अपनी परम प्रिय योग निद्राका त्याग करके उनसे यह वचन बोले थे-श्री भगवान ने कहा देवगणो ! आपका स्वागत है । हमको आप यह बतलाइये कि यहां पर इस समय में आप लोगो के यहां आने का क्या कारण है ? जिस कार्य को लेकर इस समय मे प्राप लोग यहा प्राप्त हुए हैं उसको अब मेरे सामने बिल्कुल दु.ख रहित होकर वतलाये ।।४५, ४६।। भगवान् नारायण के द्वारा इस तरह से कहे हुए वहा पर देवगरण ने कहा-हे देवेश ! अमरत के लिए मध्यमान महोदधि मे जिप्ट प्रकार से हमारा अमृतत्व सम्पादित हो सके वैसा ही हे माधव ! आप करिए । हेकटमार्दन ! आपके विना हम लोगो के द्वारा यह नही किया जा सकता है ।।४७, ४८ हे नाथ ! उस अमृत को प्राप्त करने के लिए हे विमो | आप हमारे सबके आगे हो जाइए । इस तरह से कहे गये रियो के मदन करने वाले और अप्रघृष्य विष्णु उनके साथ चल दिये थे ॥४६॥ जगाम देवः सहितो यत्रासौ मन्दराचलः । वेप्टितो भोगिभोगेन धृतश्चामरदारवं. १५० विपभीतास्ततादेवा यतः पुच्छ ततः स्थिताः । मुखता दंत्यसधास्तु सैहिकेयपुरः सराः ॥५१ सहस्रवदन चास्य शिर: सव्येन पाणिना। दक्षिणेन बलिदेहं नागस्याकृष्टवास्तथा ॥५२ दधागमृतमन्थान मन्दरं चारुकन्दरम् । नारायणः स भगवान् भुजयुग्मद्वयेन तु ॥५३ ततो देवासुरैः सर्व जयशब्दपुरःसरम् । दिव्यं वर्षशत सान मथितः क्षीरसागरः ॥५४ ततः श्रान्तास्तु ते सर्वे देवादत्यपुरः सराः । श्रान्तेषु तेषु देवेन्द्रो मेघोभूत्वाम्बुशोफरान् ॥५५ मत्स्यपुराण ववर्षामृतकल्पास्तान् वयो वायुश्च सोतल । भग्नप्रायपु देवपु शा-नपु कमलासन ॥५६ भगवान् विष्णु उन सब देवा व हा सहित वहा पर चने गये थ जहां पर यह म दराचल विधमान था । वह म दराचल भागे शेष क भोग के द्वारा वेष्टित था और अमरो तथा दान यो के द्वारा घृत हो रहा था । ॥५०॥ क्योकि देवगण विप से भयभीत होकर शेश नाग की पूछ को थोर स्थित हो रहे थे तथा संहिक्य जिनके आगे था एसे देश्या क सङ्घ शेष के मुख को आर समवस्थित थे । सहस्र मुखो वाला इसके शिर को बलि ने सध्य दक्षिण हाय स आषित किया था ।।५१,५२।। उन भगवान् नारायण न अपनी दोनो भुजाओ से सु दर कन्दराओ वाले म दराचल को अमृत का म थान धारण किया या ॥५३ । इसके अनतर समस्त देवो और असुरो न जय पाद के उच्चारण पूवक दिव्य डेढ सौ वप तक उस क्षीर सागर का म थन किया था ।।५४। इसके पश्चात् वे सब दत्य पुरस्सर देवगण अत्यात धान्त हो गये थे। उन सबवे थकित होने पर देवेद्र ने मेघ होकर उन अमृत के समान जल के सीक्रो को वर्षा की थी। तथा शीतल वायु बहने लगा। जब देवगण भग्न प्राय हावर शात हो गये थे तो उस समय पर कमलासन प्रभु ने उनको प्रोत्साहन दिया था जिससे मन्थन काय बगबर चलता रहे ।।५५, ५६॥ मध्यता मथ्यता सिधुरित्युवाच पुन पुन । अवश्यमुद्योगवता श्रीरसारा भवेत्सदा ॥१७ ब्रह्मप्रोत्साहितादेवा ममन्यु पुनरम्बुधि । भ्राम्यमाणे तत शैले योजनायुतशेखरे १५८ पेतुहस्तियूथानि वराहशरभादय । श्वापदाय तलक्षाणि तथा पुष्पफलाद्रुमा ॥५ तत फ्लाना वोhण पुष्पोपधिरसेन च । क्षीरसह्यपणान्चापि दधिरूपमजायत ।।६० क्षीरोद मधन वर्णन ३७३ ततस्तु सर्वजीवेपु चूर्णितेषु सहस्रश. तदम्वुमेदसोत्सर्गाद्वारुणी समपद्यत ॥६१ वारुणीगन्धमाघ्राय मुमुदुर्देवदानवाः । तदास्वादन वलिनो देवदैत्यादयोऽभवन् ॥६२ ततोऽविवेगाज्जगृह नागेन्द्र सर्वतोऽसुराः । मन्यान मन्ययप्टिस्तु मेरुस्तवाचलोऽभवत् ।।६३ कमलासन प्रभु ने सिन्यु का मन्यन करो मायन करो-यह बार २ कहा था। जो उद्योग में पराग हुआ करते है उनको सदा ही अपार श्री हुआ करती है । इस तरह से ब्रह्माजी के द्वारा प्रोत्साहित हुए देवो ने पुन. अम्मुधि का मन्यन किया था। फिर दश हजार योजन के सिर वाले शैल के भ्राम्यमाण होन पर हल्लियो के यूय, वराह, शरभ आदि, सहस्रो एव लाखो श्वापद, पुष्प तथा फलो वाले वृक्ष, फ्लो के वीय से तथा पुष्पा और पोषधियो रस म एव क्षीर सघर्षण से भी वह सागर दधि के रूप वाला हो गया था ॥५७-६०। इसके पश्चात् सहस्रो समस्त जीवो के चूर्णित होने पर उस अपु मेद के सोसर्ग से वारुणी ममुत्पन्न हुई थी।६१) उस वारुणी को गन्ध को मूघ कर सव देव और दानव बहुत ही अधिक प्रसन्न हुए थे उमक आस्वाद से देवगण और दैत्य आदिव सव वलो हो गय थे ।।१२।। इस उपगन्न असुरो न सभी ओर वग के साथ उम नागेन्द्र को ग्रहण क्यिा था और वह माधान तथा मन्थयप्टि मेरु वहा पर अचल हो गया था ॥६॥ अभवच्चाग्रतोविष्णु भुजमन्दरवन्धन. । स वामुक्फ्णिालनपाणि कृष्णा घराजत ।।६४ यथा नीलोत्पलंयुत्तो ब्रह्मदण्डोऽतिविस्तर । ध्वनिमंघमहरूस्य जलधेरुत्थितस्तदा ॥६५ भागे द्वितीय मघवानादित्यस्तु तन परम् । ततोन्द्रा महोत्साहा वमवो गुह्यादय ॥६६
३७४
मत्स्यपुराण
पुरतो विप्रचत्तिश्च नमुचित्रशम्बरौ ।
द्विमूर्द्धा वज्रदष्ट्रश्च सेहिकेयो बलिस्तथा ॥६७
एतेचान्ये च बहवो मुखभाममुपस्थिता ।
ममन्युरम्बुधिं दृप्ता वलतेजोविभूषिताः ।।६८
बभूवान महाघोषो महामेघरवोपमः ।
उदधे मध्मानस्य मन्दरेण मुरासुरः ॥६६
तत्र नानाजलचरा विनिधूता महाद्रिणा।
विलय समुपाजग्मुः शतशोऽथ सहस्रशः ॥७.
आगे की ओर भुजमन्दर बन्धन वाले विष्णु थे और वह वासुकि
के फणो मे सलान हाथ वाले कृष्ण शोमा दे रहे थे ॥६४। उस समय में
जिस प्रकार से नीलोत्पलो से युक अति विस्तार वाला ब्रह्मदण्ड हो ।
रस समय मे सहस्रो मेघो को ध्वनि उस सागर से उठकर सुनाई दे रही
थी ॥६५द्वितीय भाग में भगवान और उसके आगे आदित्य थे। इसके
पश्चात रुद्रगण और महान उत्साह वाले वसुगण तथा गुह्यक आदि थे।
आगे को और विप्रचित्ति, नमुचि तथा वृत्र और शम्बर थे द्विमूर्धा, वज
दष्ट्र, संहिवय तथा बलि था ।।१६,६।। ये सब तथा अन्य बहुत-से मुख
भाग की ओर उपस्थित थे। उन सवने बल एव तेज से विभूषित हाते
हुए दृप्त होकर अम्बुधि का माधन किया था ।।६। सुरो असुरो क द्वारा
मन्दराचल से मथ्यमान सागर का महान् मेय की ध्वनि के तुल्य महान
घोप हुआ था। उस महादि से वहा पर अनेक जलचर विनित हो गये थ
और संक्डो तथा सहस्रो तो विलय को प्राप्त हा गय थे ।।६८, ७०॥
वारणा नि च भूतानि विविधानि महेश्वर ।
पातालतलवासानि विलय समुपानयत् ॥७१
तस्मश्च माध्यमाणेऽद्री सघृष्टाश्च परस्परम् ।
न्यपतन पतगापेना. पवतानान्महाद्रमा ७२
वराहवतार चरित्र वर्णन ३७५ तेषां सघर्पणाच्चाग्निरचिंभिः प्रज्वलन मुहुः । विद्युद्भिरिव नीलाभ्रमावृणोन्मन्दरं गिरिम् ॥७३ ददाह कुञ्जरांश्चव सिंहांश्चंव विनिःसृतान् । विगतासूनि सर्वाणिसत्वानिविविधानिच ॥७४ तमग्निममरथेप्ठः प्रदहन्तमितस्ततः । वाणिा मेघजेनेन्द्रः शमयामास सर्वतः ।।७५ ततो नानारसास्तत्र सुम्र वुः सागराम्भसि । महाद्रुमाणां निर्यासा ववश्चौपधीरसाः ॥७६ तेपाममतवीर्याणां रसानां पयसव च । अमरत्व सुरा जग्मुः काञ्चनच्छविसन्निभा: ७ महेश्वर भगवान् ने पाताल तल के निवास करने वाले विविध वारुण भूतो को विलय को प्राप्त कर दिया था। उस पर्वत के भ्राम्य- माण होने पर परस्र मे सङ्घर्ष को प्राप्त हुए पर्वत के अग्रमाग से पक्षियो से सयुत महान् म नीचे गिर गये थे ॥७१।७२।। उनके सघर्ष होने से अग्नि अचियो के द्वारा बारम्बार जलती हुई ने विद्यु तो के द्वारा नाल अभ्र की भांति उस मन्दराचल को समावृत कर लिया था। निकले हुए कुञ्जरी को तया मिहो को-विगत प्राणो वाले सब अनेक सत्त्वा को दग्य कर दिया था। ममरों में ग्रेट ने इधर-उधर जलती हुई उस अग्नि को इन्द्रदेव ने सभी ओर मेघ से समुत्पन्न जल के द्वारा शान्त कर दिया था ॥ ७३ ७१।७५॥ इमो अनन्तर वहाँ पर सागर के जल मे नाना प्रकार के रमो का स्राव होने लगा था । उममे महान वृक्षो के निर्याम थे और यहुत-सी औषधियों के रस थे । उन अमृत वीर्य वले सो वे पय से ही सुरगण काञ्चन छवि के सदृश होते हुए अमृतत्व को प्राप्त हो गये थे ॥७५-७७॥ अय तम्य ममुद्रम्प तज्जानमुटकः पयः । रसान्नविमियच्च ततः दौरादघृतम् ॥७८
३७६
मत्स्यपुराण
ततो ब्रह्माणमासीन देवा वचनमब्रुवन् ।
प्रान्ता स्म सुभृश ब्रह्मनोद्भवत्यमृतञ्च ॥७६
ऋते नारायणात्सर्वे देत्या दवोत्तमास्तथा
चिरयितमिदञ्चापि सागरस्य तु म थनम् ॥८०
ततो नारायण देव ब्रह्मा वचनमब्रवीत् ।
विधत्स्वषा बल विष्णो । भवानेव परायणम् ।।८१
बल ददामि सर्वेषा कमतद्य समास्थिता ।
क्ष भ्यता क्रमश सर्वम दर परिवत्यताम् ॥८२
इसक अन तर उस समुद्र का जो जल था वह पय हो गया था
और वह रसान्तरो से विमिश्रित हो गया था। इसके पश्चात् क्षीर से
वह घत हो गया था ।। ७८। इसके उपरात वहाँ पर समासीन ब्रह्माजी
म देवगण ने यह वचन कहा था-हे ब्रह्मन् | हम लोग अत्यधिक था त
हो गये हैं और वह अमृत उपन नही हो रहा है । भगवान नारायण के
बिना समस्त दत्य और सब देवोत्तम गए ने इस सागर के मथन को
करते हुए बहुत अधिक समय व्यतीत किया था। इसके पश्चात् ब्रह्माजी
ने देव नारायण से यह वचन बहाहे विष्णो | आप इनको बल का
प्रदान करें। आप ही परायण हैं। भगवान विष्णु ने कहा--जो इस
कम वे करन में समास्थित हैं उन सबको मै बत्र का प्रदान करता है।
सवयो क्रम से इसम क्षोभ पर ा चाहिए और मदराचन यो घुमाना
चाहिए ।। ७६- ॥
११३-क्षीरोद मथन वर्णन (२)
नारायणवच थत्या वाला गदादधिम् ।
तताय सहितामवा चमिरे भृशमानम् ॥
सोरोद मथन दर्शन
तत शतसहन्नामुसमान इव मागरान् ।
प्रमन्नाम. समुत्पन्न. सोम. गीतांमुरुज्ज्वलः ॥२
श्रीरनन्तरमुत्पन्ना धृतात्पाण्डुरवासिनी।
सुगदेवीसमुत्पन्ना तुरग: पाण्टुरस्तथा ॥३
कौस्तुभश्च मणिदिव्यश्चोत्लन्नोग्मृतमम्भवः ।
मरीचिविकर: श्रीमान् नागयण उरोगत. ॥४
पारिजातश्च विचमुमस्तवकाञ्चितः ।
अनन्तरमपश्यस्ते धूममम्बरमन्निभम् ॥५
बापूरितदिशाम्भाग दुसह सर्वदेहिनाम् ।
तमानाय सुगः सर्वे मूच्तिापरिलड़िघताः ॥
स्पाविगन्नधितटे निर. सगृह्य पाणिना ।
तत. क्रमेण दुर्वानः सोनलः प्रत्यदृश्यत ।।
महर्षि मूनजी न कहा-भगवान् नारायण के वचन का श्रवण
कर वे बलवान् भव माहित होकर उस महादधि के मय को अत्यन्त ही
अधिक उन्होंने आकुल कर दिया था। इसके पश्चात् उन सागर न एक
पर मनायु के ही समान प्रसन्न आमा दाला उज्वल शीदागु
मोम. समुन्दन्न हुआ था इसके अनन्तर 4 से पाष्टर वासिनी श्री
समुत्पन्न हुई थी फिर मुरा देवी सन्न्पन्न हुई तथा पाष्टु तुरन हान्न
हुपाया १.२३॥ फिर अमृत ने मम्मत्र होन वाला परम दिव्य
कौस्तुन मणि समुत्पन्न हुई यी को मरीचियो से विस्थ एव श्री सम्पन्न
थी और नागा उर.म्पन म प्राप्त हा गई यो ॥ ४॥ पारिजात
की ममुन्पनि हुई या जो विवामिन कुमुमो क मदको से आञ्चत था ।
इन अनन्तर उन सबने अम्बर के महम घूम का देखा था ।।२॥ सद
दिनानो माग को मयाग्नि-मब वाग्दिो का दु मह एम उम
धूम का समाधान का भी मुग्मग मूरिन् ओर परिलवित हो गये
य ॥६॥ सबक समय में अपन ह स शिर पकड़ कर सागर
२७E मत्स्यपुराण के तट पर बैठ गये थे और इसके उपरान्त वह अनल अन्यन्ताही क्रम से दुर्वार होकर दिखाई देने लगा था ॥७॥ ज्वालामालाकुलाकार समन्ताद्धीपणोऽचिपा। तेनास्तिनापरिक्षिप्ता प्रायशस्तु सुरासुरा. १८ दग्धाश्चाप्यर्द्ध'दग्धाश्च वभ्रमु सकला दिश । प्रधाना देवदंत्याश्च भीपिनास्तेन बह्निना HE अनन्तर समुद्भूतास्तस्मात् डुण्डुभजातय । कृष्णासामहादष्ट्रारक्ताश्च पवनाशना । १० श्वेतपोतास्तथाचान्ये तथा गोनसजातय । मशकाभ्रमराद शा मक्षिका शलभास्तथा ॥११ कर्णशल्या. कृकलासा अनेकाश्चंव बभ्रमु । प्राणिनो दष्ट्रिणो रौद्रस्तथा हि विपजातय ।।१२ शाङ्गहालाहलामुस्तवत्सक गुरुभस्मगा । नीलपत्रादयश्चान्य शतशो वहुभेदिन ।। येषा गन्धेन दह्यन्ते गिरिशृङ्गाण्यपि द्रुतम् ॥१३ ज्वालामी की माला स समाकुल आवार वाला और अचि से सभी ओर महान् भोषण वाले उस अग्नि से प्राय सभी सुर और असुर परिक्षिप्त हो गये थे। वे कुछ दग्ध और कुछ आधे दग्ध होकर सभी दिशाओं में प्रमण बरन लगे थे। प्रधान देव और देश्य उस वह्नि के द्वारा घोषित हो गय थे। इसक अनन्नर उससे हुण्डम जातियां समुद्भूत हो गये थे। वृष्ण सप-महान दाढ़ी वाल-रक्त-पवा का अशन करन वाले-श्वेत-पीत तया अन्य गामस जाति वाले-मशर-भ्रमरदशा- मतिका-वभ-वर्णशल्य-पलास एस अनेक वहां पर भ्रमण कर रहे पौर व एस सधी प्राणी थे जो दादा से सम्पन-रौद्र और विपयुक्त लागि पाल पगाई हालाहल-मुस वरसक-गुरुभस्मग और अय मार पर मारि माया यहाग भद स मुक्त ५। जिनकी गध ही
क्षीरोद मपन वर्णन
ऐसी प्रवल थी कि जिससे गिरिया के शिखर भी बहुत ही शोघ्र दग्प हो
जाते थे ।।८-१३ ॥
अन तर नीलरसोधभृङ्गभिनाजनाभ विषम वसन्तम् ।
कायेन लोकान्तरपूरकेण केशश्च वह्निप्रतिमज्वभि ॥१४
सुवर्णमुक्ताफ्लभूपिताङ्ग किरीटिन पीतदुकूलजुष्टम् ।
नीलोत्पलाभं कुसुमं कृताधं गजन्तमम्भोधरभीमवगम् ।।१५
अद्राक्ष रम्भोनिधिमध्यसस्थ सविग्रह दहि भयाश्रयन्तम् ।
विलोक्य त भीषणमुग्रनेन भूताश्च वि सुरथापि सर्वे ॥१६
वैचिद्वलोक्यव गता ह्यभाव नि सज्ञता चाप्यपरे प्रप ना ।
वममु सेभ्योऽपि च फेनमन्ये कचित्त्ववाप्ता विपमामवस्थाम् ।।१७
श्वासन तस्य निद ग्धा ततो विष्ण्विन्द्रदानवा
दग्धाङ्गारनिभाजाता ये भूता दिव्यरूपिण ॥
ततस्तु सम्भ्रमाद्विष्णुस्तमवाच सुरात्मकम् । १८
को भवानन्तकारय किमि छसि कुतोऽपि च ।
किं कृत्वा ते प्रिय जाये दवमाचक्ष्व मेऽखिलम् ॥१६
तच्च तस्य वच श्रत्वा विष्णो कालाग्निसन्निभ ।
उवाच कालकूटस्तु भिन्न दुन्दुभिनिस्वन ।।२०
इसके अन तर नील रस क आप स मिन भृग एव गञ्जन की
आभा वाले विषम श्वास लता हुआ लोका तर पूरक काया से युक्त
जलती हुई अग्नि के तुल्य कशा से सयुत-सुवण और मुक्ता फ्लोस
विभूषित अङ्गा वाला, किरीट धारी पीतबण के वस्त्र से वेष्टित, नौलो
सल के समान आभा वाले पुष्पा स कृत अघ वाला अम्भोधर तुल्य
भोम वेग वाला गजन से सर्मा वत विग्रहधारी देही जो भय का समायय
था समुद्र के मध्य म सस्थित एवम दखा था एम उस भीपण उग्र नया
मे सम्पन को देखकर समम्त भन वित्रम्त हा गय थ । कुछ l 37
दखन क साथ ही अभाव को प्राप्त हो गय य और कुछ इसर देहा।
मत्स्यपुराण
7
को प्राप्त हो गये थे । अन्य लोग अपने मुखों से फेनो का वमन कर रहे
थे और कुछ तो विपम दशा को ही प्राप्त हो गये थे। उसके श्वास से
ही बहुत से निदग्ध हो गये थे। इसके पश्चात् विष्णु, इन्द्र और दानव
सबके सब दग्ध अङ्गार के तुल्य हो गये थे जो भूत परम भव्य दिव्य
रूप वाले थे। इसके अनतर भगवान् विष्णु सुरात्मक उससे बडे ही
सम्भ्रम से बाल-थी भगवान् ने कहा-आप एक अतक की प्रास्या
पाल कौन हैं हम सबको आपका परम प्रिम क्या कम करना चाहिए।
जिससे देव को प्रसन्न करे । यह समस्त प्रभ्य हमको बतलाइये । वह
वालाग्नि के सदृश भगवान् विष्णु के इस वचन का श्रवण करके वह
पालकूट विष जो मूत्तिमान या भिन्न डु-भि के समान ध्वनि वाला यह
बोला-11१४-० ।।
अह हि फालक टाख्यो विपोऽम्बुधिसमुद्भय ।
यदा तीव्रतराम परस्परवपिभि । १
मुरासुरविमथितो दुपाम्भोनिधिरद्भुत ।
सम्भूताऽह सदा सर्वान् हन्तु देवान् सदानवान् ॥२२
सर्वानिह हनिष्यामि क्षणमाताण दहिन ।
मा मा ग्रसत वै सर्वे यात वा गिरिशान्तिकम् । २३
थुवितदचन तस्य तता भीता सुरासुरा ।
ब्रह्मविष्णपुरस्टत्य गतास्त शङ्करातियम् ॥२४
निवादतारततावास्यस्त गणेश सुरासुरा ।
अनुमाता शिवनावियि मुगिरिमाविषम् ॥२५
मन्दरम्य गुहारमी मतामा विपिताम् ।
गुम्य- मणिगोपाध्यम्नममण्डिताग ।।.६
चन दागर गय नागभिमरणीतं ।
क्षीरोट मथन वर्णन ३८१ वाला विष हू जिम समय में तीव्रतर अमर्ष वाले.और परस्पर मे वध करने की इच्छा से युक्त सुरों और असुरों के द्वारा यह अद्भुत दुग्याम्भोधि का विमथन किया गया तो मैं उमी समय मे इन समस्त दानवो के सहित देवो का हनन करने के लिए ही समुत्पन्न हुआ हूं। ग्रब मैं क्षण भर मे यहाँ पर सब देह धारियों को मार डालूगा। सब लोग मुझको प्रसित मत करो अथवा भगवान् गिरीश के समीप में चले जाओ ॥२१, २२,२३।। उसके इस वचन को सुनकर सव सुर और असुर भयभीत हो गये थे और उन्होने ब्रह्मा तथा विष्णु को अपना नेता बनाकर वे सब भगवान् शङ्कर के समीप में जाकर प्राप्त हुए थे। वहा पर द्वारपर स्थित गणेशो के द्वारा उन सुरासुरो का आगमन निवेदित किया गया था। इस पर शिव के द्वारा वे आज्ञा को प्राप्त करके फिर भगवान् शिव के समीप मे पहुँच गये थे । वहा पर मन्दराचल को एक गुहा थी जो सुवर्ण मयो थी और मोतियो की मालाओ से विभूपित थी तथा गसमे अतीव निर्मल मणियो के सोशन बने थे एवं वैदूयं मणियो के स्तम्मो से बह गुहा मण्डित थी। वहा पर सभी देव और असुर अपने घुटने भूमि पर टेककर बैठ गये थे । उन्होने अपने भागे ब्रह्माजी को सस्थित करके इस स्तोत्र का कथन करना आरम्भ कर दिया था ॥२०-२७॥ नमस्तुभ्य विरूपाक्ष ! सर्वतोऽनन्तचक्षुपे । नम पिनाकहस्ताय वज्रहस्ताय धन्विने ॥२८ नमस्त्रिशूलहस्ताय दण्डहस्ताय धूर्जटे। नमस्त्रैलोक्यनाथाय भूतग्रामशरीरिणे ॥२८ नमः सुरारिहने च सोमाग्न्याग्यचक्षुपे । ब्रह्मणे चव स्द्राय नमस्ते विष्णरूपिणे ॥३० ब्रह्मणे वेदरूपाय नमस्ते देवरूपिणे । साह्मयोगाय भूताना नमस्ते शम्भवाय ते ॥३१ मन्मथाङ्गविनाशाय नमः कालक्षयङ्कर।
मागण रहसे देवदयाय नमस्ते च मुत्तम ! ॥३: एकवीराय शर्वाय नग. पिङ्गकदिने । उमाभत्र नमस्तुभ्य यसिपघातिने ॥३३ शुद्धयोधप्रयुद्धाय मुक्तावल्यरूपिणे । लोकत्रयविधाने च वरणेन्द्राग्निरूपिणे ॥४ ग्यजुः सामवेदाय पुरुषायेश्वराय च । अ यायचंचोप्राय विप्राय अतिचा पै ॥३५ देवों तथा दानवो ने कहा है विरूपाक्ष देव ! सभी ओर से अनन्त चक्षु वाले आपके लिए हमारा सवका नमस्कार है । पिनाक को हाय सुने वाले-वघहस्त और सम्बी अापकी सेवा मे नमस्कार समर्पित २।। त्रिशूल हाथ में रखने वाले. -दण्ड धारा और धूजदि आपको प्रणाम है। त्रैलोक्य के नाथ और भूत ग्रामों के शरीर को धारण करने वाले आपकी सेवा में नमस्कार है ॥२६॥ सुरो के शत्रुओ का हनन करने वाले-सोम, अग्नि, भक के उत्तम नेनो वाले को प्रणाम है । ब्रह्मा, रुद्र और विष्णु के रूप वाले आपको हमारा नमस्कार है । वेदरूप ब्रह्मा और देव रूपी आपके लिए नमस्कार है । भूतों के साङ्ख्य योग के लिए और शम्भु प्रापके लिए नमस्कार है । कामदेव के अङ्गका विनाश करने वाले आपको हमाम प्रणाम है । हे काल के क्षय करने वाले ! हे सुरो मे उत्तम ! रेवों के देव ! आपकी सेवा में नमस्कार है ॥३०,३१, ३२।। एक बीर, शबं और पिङ्ग कपर्दी आपके लिये प्रणाम है। उमा देवी के भर्ता और यज्ञ त्रिपुर के घात करने वाले आपके लिए नमस्कार है। ।। ३३॥ शुद्ध वोध प्रवोघ, मुक्त, कैवल्य रूपी, तीनो लोको के विधाता तथा वरुण, इन्द्र और अग्नि के रूप व ले आपकी सेवा मे नमस्कार है। ॥४॥ ऋक् यजु, मामवे पुरुष, ईश्वर, अग्य, उग्र, विप्र और श्रुति के चक्षु वाले आपके लिए हम सबका नमस्कार समर्पित है ।।३।। रजसेचैवसत्त्वाय नमस्ते स्तिमितात्मने ।
क्षारोद मपन वर्णन
३०३
अनित्यानित्यभावाय नमो नित्यचरात्मने ॥३६
व्यक्ताय चवाव्यक्ताय व्यक्ताव्यक्ताय वै नम..
भक्तानामातिनाशाय प्रियनारायणाय च ॥३७
उमाप्रियाय शर्वाय दन्दिवत्रान्चिताय च।
ऋतुमन्वलरकल्पाय पक्षमासदिनात्मने ।।३८
नानास्पाय मुण्डाय वस्थपृथुदण्डिने ।
नम: कमलहम्ताय दिग्वासाय शिखण्डिने ॥३६
धन्विने रथिने चंब यतते ब्रह्मचारिणे ।
इत्येवमादिचरित स्तुत तुभ्यं नमोनमः ॥४०
एव सुरासुरं स्थाणुः स्तुतस्तोपमपागतः ।
उगाच वाक्यमीतानास्मितान्वितशुभाक्षरम् ॥४१
स्तिमित आत्मा वाले-रजगुण और सत्व के लिए नमस्कार है।
अनित्य नित्यभाव और नित्य चरात्मा के लिये नमस्कार है। व्यस्त,
अव्यवन और व्यक्ताव्यक्त को प्रणाम है। भक्तों की प्राप्ति के नाश
करने वाले और नारायण प्रभु के प्रिय, उमा के परम प्रिय, शर्व, नाल्दि
वक्त्राजित ऋतु मन्वन्तर कल्प, पक्ष मास दिन स्वरूप वाले. नानारूप,
मुण्ड, वरूथ पृथु दण्डी, कमल हस्त, दिग्दास, शिखण्डी, धन्वी, रयो, यति,
ब्रह्मचारी, इत्येवमादि चरितों से स्तुत आपके लिए बारम्बार नमस्कार
है। इस प्रकार से सुर और असुरी के द्वारा स्तुति किये गये भावान्
स्थाणु परम तोप को प्राप्त हुए थे। भौतों के स्मित से समन्वित शुभ
अक्षरों वाला वाक्य उन्होंने कहा था-~-1३६-४१॥
किमयमगता त त्रासग्लानम्याम्वुजाः।
निवाऽमीप्ट ददाम्यद्य काम प्रात मा घिम् ।।
इत्युक्तास्ते तु देवेन प्रोचुस्त समुगाग 1
अमृतार्थे महादेव । मथ्यमानमहायो।
विषमभुतमुद्भूतलोकसायमारकम्
मत्स्यपुराण
स उवाचाथसर्वपा देवाना भयकारक !
सर्वान्वा भक्षयिष्यामि अथवा मा पिवस्तथा ॥४४
तमशक्तावय ग्रस्तु सोऽस्मान् शक्तोत्रलोत्कटः।
एपनिश्वासमागेण शत वसमद्युतिः ॥१५
विष्णु कृष्ण कृतस्तेनयमश्च विषमात्मवान् ।
मनिता पतिताश्चान्येविप्रणाशङ्गता परे । ६
अर्याऽनर्थ नियायाति दुर्भगाना यथा विभो ।।
दुबलानाञ्च रालो यथाभवतिचापदि । ४७
विषमेतत्समुद्भत तस्माद्वामृतकाक्षया ।
अस्माद्भया मोचयत्व गतिस्त्वञ्च परायणम् ॥
भक्तानुकम्पो भावज्ञो भुवनादीश्वरो विभु ।
यज्ञाप्रभुक सवहवि सोम्य सोम. स्मरान्ततकृत् ॥४६
ड्र ने
कहा-त्रास से म्लान मुख कमल वालो ।
आप लोग हा सि प्रयोजन के लिए समागत हुए है ? आज मैं आपका
क्या अभीष्ट प्रदान कर आप स्वेच्छया शीघ्र बतलाइये और इसके
मताने म विलम्ब न करिये । इस तरह स जब महादेव के द्वारा उनसे कहा
गया था तो वे सर सुर और असुर उनसे कहने लगे थे---४२५ सुर
और असुगे ने कहा-हे महादेव । हम लोग अमृत के लिये इस महो-
दधि का मापन्न कर रहे थे उस मध्यमान सागर स अद्भुत और लोको
के सक्षय को कने वाला विष समुत्पन्न हुपा था। वह हम सब देवो को
भय वरने वाला बोला था कि मैं आप सबको भक्षण कर जाऊंगा अथवा
मेरा पान करो।।४३, ४४॥ उमा असन करन के लिए हम सब अशक्त
म उत्सर वही हमारे ग्रसने म समर्थ है। यह केवल
विश्वास मात्र से ही ग्रस्त कर सकता है । वह शतपव की पति के समान
पुति घाला है । उसन विष्णु को कृष्ण कर दिया था और आस्मवान्
उसो यम को विष कर दिया था। कुछ लोग उसने मूच्छिन पर दिये
भगवान श्री
हैं प्रत्युन
क्षीरोद मथन वर्णन
थे, अन्य गिरा दिये थे तथा दूसरी को प्रनष्ट कर दिया था। हे विमो !
जैसे बुरे माग्यो वालो को हुआ करता है वैमे ही सब अर्थ अनर्थ क्रिया
प्राप्त हुआ करते हैं जिस तरह से यापत्ति काल में दुर्वलो का सकल्प
हुआ करता है । यह विष उससे समुद्भूत हुआ है शायद यह अमृत की
आकाङ्क्षा से ही हुआ है । अब ग्राप इस भय से हमारा मोचन करिये ।
आप ही हमारी अब गति हैं और आप ही परायण हैं । आप अपने भक्तो
पर अनुकम्पा करने वाले, भावो के ज्ञाता, भुवनादीश्वर, विभु हैं तथा
यज्ञो मे सबसे आगे भोग करने वाले, सर्व हवि, सोम, सौम्य और आप
कामदेव के अन्त कर देने वाले हैं ॥४५-४६॥
लमेको नो गतिर्देव गीर्वाणगणशर्मकृत् ।
रक्षास्मान् भक्षसंकल्पाद्विरुपाक्ष ! विपज्वरात् ।।५०
तच्छ त्वा भगवानाह भगनेत्रान्तकृद्भवः ।
भक्षयिष्याम्यह घोर कालकूटं महाविषम् ॥५१
तथान्यदपि यतकृत्यं कृच्छ्रसाध्य सुरासुराः ।।
तच्चापि सार्धायष्यामि तिष्ठध्वं विगतज्वराः॥५२
इत्युक्त्वाहृष्टरोमाणो वाप्पगद्गदकण्ठिनः ।
आनन्दाधुपरीनाक्षाः सनाथाइव मेनिरे ॥
सुरा ब्रह्मादय. सर्वे समाश्वस्ताः सुमानसाः ।।५३
ततोऽब्रजद् द्रुतगतिना ककुझिना हरोऽम्बरे पवनगतिजगत्पतिः ।
प्रधावितरमुसरेन्द्रनायके. स्ववाहने विगृहीतगुम्रचामरैः।।
पुर.सरैः स तु शुशुभे शुभाश्रयः ।
शिवो वशी शिखिकपिशोवंजूटकः ।। ५४
आसाद्य दुग्धसिन्धु तं कालकूट विप यतः।
ततो देवोमहादेवो विलोक्यविपमविपम् ॥४५
च्छायास्थानक मास्थाय सोऽपिबद्वामपाणिना ।
पीयमानेविपेतस्मिस्ततादेवा. महासुराः॥५६
३८६ मस्यपुराण हे देव ! आप ही एक हमारी गति हैं और देवो के समुदाय के कल्याण करन वाल है । हे विरूपाक्ष | मक्षण करने के सकल्प वाले इस महाविष के १ र से हमारी आप रक्षा कोजिए ॥५०॥ यह श्रवण करके भग के नेत्रो के अन्त कर देने वाले भव प्रभु ने कहा-मैं इस घोर महा- विष कालमूट का भक्षण कर जाऊंगा। हे सुरासरी । इसके अतिरिक्त अन्य भी जो कृच्छ्रसाध्य कृत्य होगा उत्तको भी साध्य कर दूगा। आप लोग सय विगत ज्वर होकर स्थित रहिए ॥५१, ५२।। इतना कह कर वह शान्त हो गये । किन्तु देवगण प्रहृष्ट रोमो वाले, वाष्प से गद्गद् कठो पाले आनन्द के अश्रुओ से परीत नेनो वाले सबन अपने माप सनाथ की तरह से मान लिया था । ब्रह्मा आदि समस्त देवगण सुमानस एव समा- भवम्त हुए थे। इसक उपरान्त म पवन क समान गति वाले जगत के स्वामी हर ने आकाश में द्रुत गति वाले ककुद्मी के द्वारा चने गये थे । ग्रहण किये हैं शुभ्र चामर जिन्होने ऐसे वाहनो से समन्वित और प्रधावित असुर और सुरेन्द्रनायको को आगे करके वह शिखी क समान कपिश और सर्व जूट वाले वशी भगवान शिव इन शुभ आश्रयो वालो के सहित परम सुन्दर शोभा को प्राप्त हुए थे ॥५३-१६॥ जगुश्च ननतुश्चापि सिंहनादाश्च पुष्कलान् । घक शक्रमुखाद्याश्च हिरण्याक्षादयस्तथा ।।५७ स्तुवन्तश्चैव देवेश प्रसनाश्चाभवस्तदा । अण्ठदेशे तत प्राप्त विपेदेवमयाब्रुवन् ॥५८ विरिञ्चिप्रमुखा देवा बलिप्रमुखतोऽसुरा । सोमते देव ! कण्ठस्ते गाणे कुन्दनिभप्रभे ॥५६ भृङ्गमालोनिभकण्ठेऽप्य वास्तु विप तव । इत्युक्त शङ्कगेदेवस्तथा प्राह पुरान्तकृत् ॥६० पोते विपे देवगणान् विमुन्य गतो हरो मन्दरशैलमेव । तस्मिन् गते देवगणा पुनस्त ममायुरब्धि विविधप्रकार. ।।९१
क्षीगेद मथन वगन
३०७
(उस समय मै इन्द्र प्रादि जिनमें प्रमुख घे ऐसे समस्त देवगण तथा
हिरण्याक्ष प्रमृति दानव गग ममी गान करने लगे थे एव नृय कर रहे ये
और पुष्कल सिंह के समान नाद करते थे । देवेश्वर का स्तवन करते
वे सब उस प्रवमर पर परम प्रसन्न हो गये थे । जब वह महा कालकूट
विप उनके कण्ट देश मे प्राप्त हो गया था तो दे सद इसके अनन्नर देव
से कहने लगे थे। ब्रह्मा है प्रधान जिनमें ऐसे सव सुरगण और वलि
जिनमें
प्रमुख
धे वे सब यसुरगण महादेव जी से वोले-हे देव ! कुन्द
के
पुष्प के तुल्य परम स्वच्छ श्वेत प्रभा वाले प्रापरे गात्र मे आपका यह
कण्ठ भाग शोभा युवत हो रहा है। भौरो की माला के तुल्य यह महा-
विप आपो इस कण्ठ मे ही यहीं पर स्थित रहे । इस तरह से उनके द्वारा
कहे हुए देव विपुर के विनाश शकर न उनमें कहा था और विप के
पान कर लेने पर भगवान हर उन देवगगो को छोड कर मन्दर शेल क
ही सभीष में चले गए थे। उनके वहा पर पहुंच जाने पर उन देव गों
ने फिर मनेक प्रकारों से उस सागर का मन्यन करना शुरू कर दिया
पा ।।५७-६१॥
११४-क्षीरोद मथन वर्णन (३)
मप्यमाने पुनम्तस्मिन् जलधौ समदृश्यत ।
धत्वन्तरि. म भगवान् आयुर्वेदप्रजापति.।।१
मदिरा चायताक्षी सा लोचित्तप्रमायिनी।
ततोऽमृतश्च सुरभि सर्वभूतभयापहा ..
जग्राह कमला विष्णु. कौस्तुभन्न महामणिम् ।
गजेन्द्रञ्चमहस्राक्षो पग्लन्च भास्कर. ॥३
धन्वन्तरिच जग्राह तारारोग्यप्रवतकम् ।
छत्र जग्राह वरुणः कुण्डले च शचीपति. ॥४
३८.
मत्स्यपुराण
पारिजाततर वायुजग्राह मुदितस्तथा ।
धन्वारस्ततादवो वपुष्मानुदतिष्ठन ।।५
श्वतक मण्डलु विभ्रदमत यत्र तिष्ठति ।
एतदत्यदभूत द्वष्टवा दानवाना समुत्थित । ६
अमतार्थे महानादो ममेदमिति जल्पताम् ।
ततो नाययणो मायामास्थितो मोहिनी प्रभु ॥७
महा महर्षि श्री सूतजी ने कहा-पुन उस जलधि के मध्यमान
होन पर वह भगवान् आयुर्वेद क प्रजापति थी ध व तरि दिखलाई दिय
थे। समस्त जोको के चित्तो को प्रमथन करने वाली और अायत नेत्रो स
समवित वह मूत्तिमती मनिरा दिखलाई दी थी और इसके अन तर अमृत
तपा सब लोको क भय का अपहरण करने वाली सुरभि तथा कमला
प्रकट हुइ । भगवान् विष्णु ने उस कममा को और कोलम मरिण को
ग्रहण पर लिया था। सहवाग ने गजेद्र को और भास्कर देव ने पर न
का ग्रहण किया था एव लोगो व आरोग्य के प्रवर्तक भगवान् घ तरि
पा भी ग्रहण रिया था। छत्र यो वरुण ने और सीधे स्वामी ने
पुण्डो को ग्रहण रिया पर किया था। पारिजात नाम बाल तो
वायु दर न पहण दिया था और वह परम मुन्ति हुए प।पिर देव वपु
प्मान व तरि उरिघा हुए थे। उना हाय में एक श्वेत वण का
पमा पा जिसमें अमृत स्थित था। म परम अनसय को देखकर
दानपी का महान् ना- समुचित हो गया था। उस अमृत र सिए यह
भरा है-ऐगा ही गय पह रहे थे। इसर उपरान्त नारायण प्रभु मोहिनी
या मास्चित हुए 1-।
स्त्रीरुपमतुरूपत्वा दायाभिसगा ।
सतम्नदमत तस्य ददुग्ने मूढयता
स्त्रियं दानवदनमा गर्ने लक्ष्गत
যথায়ালি থ মুয়াবি শাই
17
क्षीरोद मथन वर्णन
प्रगृह्याभ्यद्रवन्देवान सहितादत्यदानवाः ॥
ततस्तदमृतदेवो विष्णुरादाय वीर्यवान् ।
जहारदानवेन्द्रेभ्यो नरेण सहितः प्रभुः ॥१०
ततो देवगणाः सर्वे पपुस्तदमृत तदा।
विष्णो. सकाशात सप्राप्य सगामे तुमुलेसति ।।११
ततः पिवत्स तत्काल दवेवमठमीप्सितम् ।
राहुविवुधरूपेण दानवोऽपिवत्तदा ॥१२
तस्य कष्ठमनुप्राप्ते दानवस्यामृते तदा ।
आस्यात चन्द्रमूय भ्या मुराणा हितकाम्यया ।।१३
ततो भगवता तम्य शिररिटन्नलकृतम् ।
चक्रायुधेन चक्रेण पिवतोऽमतमोजसा ॥१४
श्री नारायण प्रभु ने अनुपम स्त्री का स्वरूप धारण किया या
और फिर वे उन दानवो व समुख
में
समागत हुए
1इमा अनन्नर उन
मूड बुद्धि वाले दानवो ने वह अमृत का कलश उम मोहिनी को मपित
२२ दिया था ।।८।। दानव और देवगण मभी उम स्त्री में समासन मन
वाले हो गये थे क्योकि उन मोहिनी का रूप लावद ही अद्भत व पंप
करने वाला था। इसके उपगन्त में सब द य और दानव एकत्रित होर
अनेक यन्त्र तथा मुय्य महान प्रहरमा को ग्रहा करके मवक मव देवानो
पर आक्रमण कार्गो गय थे। इसके पश्चात वोर्यवान् भगवान् विष्णु न
उस अमृत को लेकर नर सहित प्रभु न दानवो से हरण कर लिया
था। इमरे उपरान्त उमी ममय में उन देवगणो ने उम अमृत का पान
कर डाला था। उस समय में तुमुल मद्राम उपस्थित हो गया या तो भी
देवमण ने विष्णु २ उमे अमृत का प्राप्त कर लिया था ॥६, १०.१॥
उम अमृत वा देवो के द्वारा पान इग्ने पर जो उनका परम अनीप्ट
था। उन देवानाम राहु देव भी देवता का दरूप दनाकर बैठ गया
पा और उम गमय म उसने मा उम *मृत गे लिया था। उग दाना
मत्स्यपुराण समर मे अन्योऽन्य का निहनन करने वालों का शब्द दिवलोक को मानो स्पर्श कर रहा था। काटो, भेदन करदो. दौडो, गिरादो, दोडकर धावा कर घेरलो, दत्यादि शब्द जो नि महान् घोर थे वहा पर सभी मोर सुनाई दे रहे थे। इस तरह से महान् भय देने वाले तुमुल युद्ध के वर्तमान होने पर नर और नारायण दोनो देव उस समर स्थल म समागत हो गये थे। वहा पर भगवान ने भी नर के दिव्य धनुष को देखकर भगवान् विष्णु ने दानव थेप्ठो के हनन करने के लिये चक्र का चिन्तन किया था। उसी समय में जैसे ही चक्र या चितन विया या अम्बर तल से वह सुदर्शन चक्र आ गया था जो महती प्रभा से युक्त और शओ के नाश परने वाला था। उस चक्र की दीन्ति मूर्य व तुल्य थी-उसका मण्डल कुण्ठा स रहित या-वह सुन्दर दर्शन व ला-भीम-असह्य और उत्तम था ॥२-०६। उस समागत हुए, जन्नती हुई अग्नि व समान प्रभा वाले, मयकर, महा प्रभा से युक्त, दनुवुल व कोका दारण करने वाले तथा जग्नता पग्नि व ममान विग्रह वाल उस चर कारिप वर सदृश वाह वात अच्युत भ न छोड दिया था। उस समय में अति प्रगयान, तपन महाप्रभा रा युक्त, गाव नगरी का पदारण मरने वाला, गम्य । नप बालीन अग्नि ) हि मे तुरय वचस वाला और वेग पुक्त वह घर वागवार गिरा करता था ।।२७, २८॥ व्यदाग्यदितितनपान सहयश परेरित पुरपवरेण मयूगे। दत पर्वाचावला इवानिलग्ति प्रमाद्य तातमुरगणान्नवृन्त ता २६ प्रवेरित विपति मुटु सिनो सदा पो रणे रधिरमय पिशाचयत् । यथागुरा गिरिमिन्दीनमानमा महमहु मरणमदयस्तथा ॥६० महामानिनिमेघवारा महायशी गगनमताप्रपातिन । अपातरारजनमा प्रदिर मपाल यादध मेगापिण ? माप प्रविरिताप्रमानव पर ट्रेनमभिश्य भास्यरा । तामहीप्रसिदिरानाधा पका मन्तत • सोरोद मयन वर्णन परस्पर भृशममिगजित मुहू रणाजिरे भृशमभि सम्प्रत्तते। नरस्ततो वरकनकाग्रभूपणं महेपुभि पवनपथ ममावृणात् ।।३३ विदारयन् गिरिशिखराणि पत्रिभिर्महाभये सुरगावग्रहे तदा ततो मही लवणजलञ्च सागर महामुग प्रविविशुदिताः मुरे ॥३४ वियद्गत ज्वलितहुताशनप्रभ सुदर्शन परिकुपित निशाम्य च । तत सुरैविजयमवाप्य मन्दरः स्वमेव देश गमित सुपूजितः ॥२५ नविादयन् स्वदिश मुपेत्य सर्वशस्ततोगताः सलिलघरा यथा गतम् । ततेोऽमृत सुनिहितमेव चक्रिरे सुरा पररा मुदमभिगम्य पुक्लाम् । ददुश्च त नियिममृतस्य रक्षितु किरीटिने वलिभिरथमार सह ॥३६ उस सयुग में पुरुष श्रेष्ठ के हाथो से ईरित उस चा ने महस्रो को मस्या मे दिनि क पुत्री को विदीर्ण कर दिया था। किमी स्थान पर अग्नि की भांति जो कि दायु स मम्प्रेरित होता है बल पूर्वर उन अमुर गणो को दग्भ करता हुआ काट रहा था । आकाश म प्रवेरित, पृन क्षिति मे उस समय में मधिर मर पिशाच की भाति रण स्थल में रक्त का वह चक्र पान कर रहा था । प्रमुग्गण अदीन मन वाले होकर पर्वतो पुनः पुन सुरगणो को अदित कर रहे थे । ०॥ महतो की मम्या में स्थित महान् अचल विगलित मेघो कवचम वाल गगन म महान् प्रपात फरत हुए, पादपों के सहित वहुन प्रकार के मेघो के स्वरूप वाल अन्तरा- मरजनन वाले हो गये थे ॥३१॥ अागे के शिवरी व प्रविनित हो जाने वाले महान् पर्वत परम्पर में योग ही अभिनित हार भास्वर हो रहे थे । इमक अनन्तर मी जिमम आई और कानन चनाय मान हो रहे थे ऐसी हो गई थी और मभी आर महीधर पवन द्वारा आहन हा र थे। उम रण के आंगन म आरम म अत्यन्त प्रधिन अभिजित बारम्बार अधिकाधिक प म सम्प्रावृत रहा था। इस अनन्ता नर न श्रष्ठ कला अग्रभूपणा दारे में म् वाणास उस पवन के मार्ग का समायन कर दिया या ॥३३।। उस समय में महान् भयानक उस मुगको से
३६५
मत्स्यपुराण
के
युद्ध में पत्रियो के द्वारा पर्वतो के शिखरो को विदीर्ण करते हुए सुरो
के द्वारा अर्दित हुए महासुर मही-लवण जल वाले सागर मे प्रवेश कर
गये थे ॥३४॥ आकाश में गये हुए जलती हुई अग्नि के समान प्रभा वाले
परिकुपित सुदर्शन का श्रवण कराकर सुरगणो के द्वारा विजय प्राप्त
करके वह मन्दराचन सुपूजित होता हुआ अपने ही देश को भेज दिया
गया था ॥३५।। अपनी दिशा में प्राप्त होकर विनाद करता हुआ वह
चला गया था। इसके अनन्तर सलिलधर सभी ओर वहा में जैसे समागत
हुए थे वैसे ही चले गये थे। इसके उपरान्त सुरो ने अत्यधिक परम
आनन्द की प्राप्ति कर उस अमृत को सुनिहित ही कर दिया था फिर
बलशाली अमरो के सहित उस अमृत की निधि की रक्षा करने के लिए
उस किरीट धारी प्रभु को दे दिया या ।।३।।
११५-प्रासाद, भवन आदि निर्माण
प्रासादभवनादीना निवेश विस्तराद्वद ।
कुर्यात्वेन विधानेन फरव वास्तुरुदाहृतः । १
भगुरनिर्वशिष्ठश्च विश्वकर्मा मयस्तथा।
नारदोनानजिच्चव विशालाक्ष पुरन्दरः ।। २
ब्रह्माकुमारी मदोश. शोनको गर्ग एव च ।
वासुदेवोऽनिरुद्धश्च तथा शुक्रवृहस्पती ।३
महादर्शते विरयाता वास्तुशास्त्रोपदेशका ।
राहक्षपेणोपदिष्टन्तु मनवे मत्स्यरूपिणा ॥४
तदिदानी प्रवक्ष्यामि वास्तुशास्त्रमनुत्तमम् ।
पुगधर यधेधोरे घोररूपस्य शूलिनः !!५
मलाटस्वेदसलिलमपतद् भुवि भीपणम् ।
प्रासाद, भवन आदि निर्माण करालवदन तस्मात् भूतमुद्भूतमूल्वणम् ॥ ६ असमानमिवाकाश सप्तद्वीपां वसुन्धराम । । ततोऽन्धकाना रुधिरमपिवत्ततित क्षितो॥ ऋपिगण ने कहा- हे भगवन् ! अव कृपा करके आप प्रासाद-- भवन आदि के निवेश को विस्तार पूर्वक वतलाइये । किम विधान से इसे करना चाहिए और कौन सी वस्तु वास्तु, इस नाम मे कही जाती है.? ॥१॥श्री सूतजी ने कहा भृगु, पत्रि, वशिष्ठ, विश्वकर्मा, मय, नारद, नम्नजित, विशालाक्ष, पुरन्दर, ब्रह्मा, कुमार, नन्दीश, शौनक, गर्ग, वासुदेव, अनिरुद्ध, शुक्र, और वृहस्पति ये अठारह दास्तु शास्त्र के उप- देशक विख्यात हुए हैं । मत्स्य के स्वरूप को धारण करने वाले भगवान् ने भी मनु के लिए सड क्षेप से इसका उपदेश दिया है ।।२,३, ॥ सो अब मैं इस वास्तु के उत्तम शास्त्र का वर्णन करूगा । प्राचीन समय में घोर रूप वाले भगवान् शूली के घोर अन्धक के वध होने पर शिव के ललाट से भीपण स्वेद का सलिल भूमि पर गिर गया था। उसम कराल वदन वाला एक अत्यन्त उल्वण भूत उद्भत हुआ था ।। ५, ६॥ वह आकाश को प्रसन्न हुआ था और सात दीपो वाली इस सम्पूर्ण वसुन्धरा को प्रसित-सा करता हुप्रा प्रतीत हो रहा था। इस भूमि पर माधकों का जो मी जितना रुधिर पतित होना था उसको वह तुरन्त ही पी जाया करता था." तेन तत्समरे सवं पतितं यन्महीतले । तथापि तृप्तिमगमन्न तदभूत यदा तदा । सदाशिवस्य पुरतस्तपश्चक सुदारणम् । क्षुधाविष्टन्तु तद्भुतमाहतुं जगतात्रयम् IIE ततः कालेन सन्तुष्टो भैरवस्तस्य चाहवे। वरं वृणीव भद्राते ! यदमीष्टन्तवानघ !॥१० तमुवाच ततोमूत लोपथग्रसनक्षमम् ।
मत्स्यपुराण भवामि देवदवेश तथेत्युक्तञ्च शूलिना ।।१: ततस्तनिदिव सर्व भूमण्डलमीपत । स्वदहेना तरिक्षञ्च सन्धान प्रपतद्भुवि ॥१२ भीतभीतस्ततादव ब्रह्मणा चाथ शूलिना। दानवासुरक्षोभिष्टन्ध समन्तत ॥१३ येन यौवचामान्त स तौवावसत्पुन । निवासात्सवदवाना वास्तुरित्यभिधीयते ॥१॥ उसने उस युद्ध मे महीतल पर जो भी जितना रधिर पतित हुआ था उसने उस सयका पान कर लिया या । तो भी वह भूत जब तक तप्नि को प्राप्त नहीं हुमा था। वह भगवान् सद शिव के आगे बडा ही दारुण तप किया करता था और क्षुधा से प्राविष्ट वह भूत इस जगती श्रय का भाहरण करने को सदन हो रहा था। कुछ समय मे उसकी उस महा दारुण तपस्या से उस युद्ध में भरव उमस अत्यत स तप्ट हो गय थे। भवन उससे कहा-है अनघ । तुमको जो भी अभीष्ट हो वह वर मुझ स माग लो तेरा कल्याण हो । इसके अन तर उस भूत न भैरव म कहा- हे देव दवेश | मैं इस बलोस्य के रासन करने की सामथ्य बाला हो शाऊँ । इस पर शूली ने ऐसा ही होगा -यह रह दिया था ॥६-११॥ इसक उपरात वह सम्पूण त्रिदिव समय भूम उल और अपन देह से रधान अन्तरिक्ष भूमि पर गिर पड़ा था ।१२। इसके पश्चात् डरे गये हुए देवो ब्रह्मा-गूनी और दानव असुर तथा राक्षसो क द्वारा सभा ओर अवष्टदध हो गया ||१३ जिस द्वारा जहा पर ही आग्रमण किय गया पा वह फिर वही पर निवाप सरन लगा था। समस्त देयो क निवास से वास्तु -इस नाम म पग जाता है। १४।। अवस्ट धारच तनापि विज्ञप्ता पदवता । प्रमोदध्य मग सर्वे युप्माभिनिएन नीरत ॥१५ स्माम्यागह विमागरा त्यवधो यचाय ।
गृह निर्माण काल वर्णन
३६७
ततो ब्रह्मादिमि. प्रोक्त वास्तुमध्ये तु यो वलि ॥१६
आहारो वैश्वदेवान्ले नूनमस्मिन्भविष्यति ।
वास्तुपूजामकुर्वाणम्नवाहारो भविष्यति ॥१७
अज्ञानात्त कृतो यज्ञस्तवाहागे भविष्यति ।
यज्ञोत्मवादो च वलिस्तवाहारोमविष्यति ॥१८
एव मुक्तम्ततोहष्ट- सवास्तुरभवत्तदा ।
वास्तुयज्ञः स्मृतस्तस्मात्तनः प्रभृतिशान्तये ॥१६
उमके द्वारा अबप्टब्ध सब देवगण विज्ञप्त हो गये थे कि है
समस्त सुग्गणो! आप प्रमन्न हो जाइये प्रापने मुझे निश्चयोभूत बना
दिया है । अब मैं नीचे की ओर मुख वाला अघटन हुआ किस आकार
वाला होकर स्थित रहूंगा? इसका उत्तर ब्रह्मादि सबने यही दिया था
कि वास्तु के मध्य में जो बलि है इसमे निश्चय ही वश्व दवान्त मे आहार
हो जायगा ।।१५,१६ १७॥ जो यज्ञ अज्ञान से किया गया है वह भी
तेरा आहार होगा। यज्ञोत्सव आदि मे जो वाल है वह तेरा आहार
होगा । इस प्रकार से कहे जाने पर वह परम प्रसन्न होकर उस समय में
वास्तु हो गया था 1 इसी कारण ने तभी से लेकर शान्ति के लिए वास्तु
या यह कहा गया है ।।१८, १६॥
११६-गृह निर्माण काल वर्णन
अथात. सम्प्रवक्ष्यामि गृहकालविनिर्णयम् ।
यथा काल गुभ ज्ञात्वा सदा मवनमारभेत् ॥१
चंव्याधिमवाप्नोति यो गृह कारयेन्नर ।
वैशाखे धेनुरत्नानि ज्येप्टेमृत्यु तयंव च ॥२
आपाट भूत्यरत्नानि पशुवगमवाप्नुयात् ।
मरस्यपुराण श्रावणे भत्यलाभन्तु हानि भाद्रपदे तथा ॥३ पत्नीनाशोऽश्विने विन्द्यात्कातिके धनधान्यकम् । मागशी तथा भक्त पौपे तस्करतो भयम् ।।४ लाभञ्च वहुशो विन्द्यात् अग्नि माघे विनिदिशेत् । फाल्गुने काञ्चन पुनानिति कालवल स्मृतम् ।। अश्विनीरोहिणीमूल उत्तरात्रयमन्दवम् । स्वातीहस्तोऽनुराधा च गृहारम्भे प्रशस्यते ॥६ आदित्यभौमवास्तु सर्वेवारा शुभावहा । वज्यव्याघातशूलेचव्यतीपातातिगण्डयाः ।। थी सूतजी ने कहा -इसके अनन्तर गृहकाल का विशेष निर्णय # बनलाता हू । जिस प्रकार से शुभ काल को ज नकर सदा भवन के निर्माण का आरम्भ करना चाहिए ॥ १॥ जो मनुष्य चैत्र मास मे गृह का निर्माण कराता है तो व्याधि की प्राप्ति किया करता है । वैशाख माम मे धेनु और रत्नों का लाभ होता है तथा ज्येष्ठ मास मे गृह के निर्माण का कर्य आरम्भ कराने से मृत्यु हो जाया करती है । आपाढ़ मे भृय और रत्न तथा पशु वर्ग का लाभ होता है । श्रावण मास मे भृत्यो का लाभ होता है तथा भाद्रपद मास में गृह निर्माण कराने से हानि हुआ करती है । आश्विन मास में पत्नी का विनाश ज्ञानना चाहिए। कात्तिक क महीने मे गृह के निर्माण कराने से धन-धान्य का लाभ होता है। मागंशीय में मन वा साभ तया पोप में तस्करी से भय उत्पन्न होता है एवं बहुत सा लाम भी होता है । माघ मे अग्नि का भय होता है। परगुन मास में पाश्चन और पुत्रों की प्राप्ति होती है यह कास पावल बता दिया गया है।३,४५॥ मब नक्षत्रों के विषय में विचार प्रबाट पिया जाता है-आश्विी, रोहिणी, मूल, तीनों उत्तरा, ऐन्दव, स्वाती, हस्त, अनुराधा ये नक्षत्र गृह निर्माण के कार्य मे परम प्रशस्त माने गय है। आदित्य, भौम इन दो वारों को वर्जित कर गृह निर्माण मास
गृह निर्माण काल वर्णन
मे अन्य सभी वार शुभावह हुआ करते हैं। ध्याघात, शूल, पतीपात,
अतिगण्ड ये चत्रित करने के योग्य होते हैं ।। ६,७॥
विष्कम्भगण्डपरिघवज्रयोगेषु कारयेत् ।
श्वेते मैत्रेऽथ माहेन्द्र गान्धर्वामिजिति रौहिणे ॥3
तथा वैराजसावितो मुहूर्ते गृहमारभेत् ।
चन्द्रादित्यबल लब्दा शुभलग्न निरीक्षयेत् ॥
स्तम्भोच्छायादिवर्तन्यमयन्तु परिवर्जयेत् ।
प्रासादेप्वेवमेवं स्यात् कूपवापीपुचैव हि ।।१०
पूर्व भूमि परीक्षेत पश्चाद्वास्तुप्रकल्पयेत् ।
श्वेतारक्ता तथापीता कृष्णाचैवानुपूर्वशः ।।११
विप्रादे. शस्यते भूमिरतः कार्य परीक्षणम् ।
विप्राणामधुरास्वादाकटुकाक्षत्रियस्य तु ॥५२
तिक्ताकपाया च तथा वश्यशूद्रेषु शस्यते ।
अरलिमानोवैगर्ते स्वनुलिप्ते च सर्वशः ।१३
धृतमामशरावस्थं कृत्वावर्तिचतुष्टयम् ।
ज्वालयेद्भपरीक्षायं तत्पूर्णसर्वदिङ्मुखम् ॥१४
निष्कम्भ, गण्ड, परिध मोर वय ये योग श्रेष्ठ होते हैं. इनमे
गृह का निर्माण कराना चाहिये। श्वेत, मैत्र. माहेन्द्र, गान्धर्व, अभिजित्,
रोहिण, वैरान, सावित्र-इन मुहूतौ मे गृह के निर्माण का प्रारम्भ
कराना चाहिए । चन्द्र और सूर्य के दल को प्राप्त कर शुभ लग्न को भी
देख लेना चाहिए । अन्य स्तम्भोच्छाय आदि कर्त्तव्य को परिवजित कर
देना चाहिए । जो प्रासादों का निर्माण कराया जावे उनमे इसी प्रकार से
विचार करना नितान्त आवश्यक है तथा वूआ और बावही आदि के
विपर में भी यही विचार करे। सबसे पहिने भूमि की परीक्षा करनी
पाहिए इसके पश्चात् वस्तु को प्रकल्पना करे। कृष्णा, रक्ता, श्वेता
वया पीता अर्थात् सद, पोला और काला इनकी आनुपूवी से
तात,
मत्स्यपुराण
कल्पना करे। विप्रो आदि की भूमि प्रशस्त कही जाती है । अतएव
परीक्षण करना ही चाहिए। विप्रो का मधुर आरवाद-क्षत्रिय का क्टु
का और वश्य तथा शद्रा मे तिक्त एव पाय आवाद प्रशस्त होता है।
एक अनि मात्र गत्त मे जो कि सभी ओर से भली भांति निप्त कर
दिय गया हो उसमे एक कच्चे सकोस मे घन भर कर चार वत्तियों
सप्तमे डाने और उनको जलाकर उस पूण दीपक को सभी दिशाओ की
ओर मुख करके भूमि की परीक्षा के लिये रखना चाहिए । ६, १०
११ १२ १३ १४॥
दीप्तो पूर्वानिगृह्णायाद्वर्णानामनुपवश ।
वास्तु साहिकानाम दीप्यते सवतस्तुय ॥१५
शुभद सववर्णाना प्रासादपु गृहेषु च
अरनिमात्रमधागर्ते परीक्ष्य खातपूरणे ॥१६
अधिकेश्रियमानाति यनेहानि समे समम् ।
फा नकृष्टेऽथवादा सवत्रीजानि वापयेत् ॥१७
विपञ्चसप्तराने च यत्रारोहन्ति ता यपि ।
ज्येष्ठातमाकनिष्ठाभवजनोयतरा सना । १८
पञ्चगव्योपधिजल पराक्षित्वा च सेचयेत ।
एकाशीति पद कृत्वा रेखाभि कनकन च ॥१६
पश्चास्पिष्टेचालिप्य सोणालाडय सवत ।
दशपूर्वायतारखा दशचवोत्तरायता ॥२०
सबवास्तुविभागेपु विज्ञ या नवका नव ।
एकागोति पद कृत्वा वास्तुवित्सववास्तुपु ।। १
उसको दौति म पूर्वाति को आमुपूयश गणो का ग्रहण करना चाहिए
वास्तु-यह मामहिम नाम है जो सभी मोर दीप्त होता है ॥ १५॥ यह
प्रासाम और गृहा म सब पणों का गम देने वाला होता है । मारिन
मात्र मानपूग्ण नीर गर म परीक्षण करा व योग्य है ।।१६। अधिक
मत्स्यपुराण होवे । बत्तीस वाह्य भाग मे पूजने चाहिए और अदर मे तेरह की पूजा करनी चाहिए ॥२२ ।। अब हम नामों का उल्लेख करके उनको बालाये गे उनके स्थानो को जानलो । उस मनुष्य को चाहिए कि ईशान आदि चारो कोणो मे सस्थितो का पूजन करे और उस हवि के द्वारा ही करना चाहिए । २३ ॥ शिखी-पज य-जय त-कुलिशायुध- सूर्या-सस्य -भश-आकाश-वायु-पूषा-वितष- गृहक्षत-यम- पधव-भृङ्गराज-मृग-पितृगण-दौवारिक- सुग्रीव-पृष्पद त- जलाधिा--असुर-शोप-पाप-चरोग-आदि-मुख्य-मल्लाट- सोम-सप-अदिति-दिति -बाहिर ये बत्तीस होते हैं । उसके अन्त में जो होते हैं उनका श्रवण करो। ईशान आदि चतुष्कोणो मे सस्थितो का चुध पुरुष को पूजन करना चाहिए । आप-सावित्र-जय-रुद्र ।। २३ २४ २५,२६ २७, २८॥ मध्ये नवपदे ब्रह्मायस्याष्टोचसमीपगान् । साध्यानेकान्तरान्दिद्यातपूर्वाद्यान्नामत शृणु ॥२६ अय्यमासवितावविवस्वान्विबुधाधिप । मित्रोऽथराजयक्ष्माचतथापृथ्वीधर स्मृता ३० अष्टमश्चापवत्सस्तु परितो ब्रह्मण स्मृत । आपकौवापवत्सश्च पय्यग्नोऽग्निदितिस्तथा ॥३१ पदिकानान्त वर्गोऽयमेव कोणेष्वशेषत । तन्मध्ये तु बहिविश द्विपदास्ते तु सवश ॥३२ अय्यमा च विवस्वाश्च मित्र पृथ्वीधरस्तथा । ग्रह्मण परितो दिक्ष विपदास्ते तु सर्वश ।।३३ घशानिदानी वक्ष्यामि अजूनपि पृथक् पृथक् । वायु यावत्तथारोगात् पितृभ्य शिखिन पुन ॥३४ मुख्यारमश तथा शोषाद्वितथ पायदव तु। सुग्रीवाददिति यावन् मृगात् ४०३ गृह निर्माण काल वर्णन मध्य नवपद में ब्रह्मा और उसके आठ समीप में गमन करने वाले --एक क अन्तर से युक्त साध्यो को जान लो अब पूर्वाद्यों के नामी का श्रवण करो।॥ २६ ॥ अर्यमा-सविता-विवस्नाम्-वसुराधिप-मित्र- राजयक्ष्मा-पृथ्वीघर-आठवा आपवास-परित ब्रह्मण--आप-अपवत्स- पर्यग्न-अभिदिति इस प्रकार से यह पदिको का यह वर्ग है इसी तरह से कोणो में पूर्ण रूप से हैं। उनके मध्य में सब ओर वे वाहिर बोस द्विपद हैं ।। ३०, ३१, ३२ ॥ अर्थमा-विवस्वान्-मित्र-पृथ्वोधर-दिशाओं में वे सब ओर ब्रह्मा के दोनों ओर त्रिपदा हैं ।। ३३ ॥ अब मैं सरलो को भी पृथक २ बतलाऊंगा। तथा रोग से जहां तक वायु को फिर पिनगण से शिति को वनलाता हूँ ॥३४॥ मुख्य से भरा तथा शोप से वितय पयंन्त-सुग्रीव से जहाँ तक अदिति है और मृग से पर्जन्य पर्यन्त है ।। ३५॥ एतेवंशाः समाख्याता: क्वचिच्च जयमेव तु। एनेपा यस्तुसम्पात पद मध्य सम तथा । ३६ ममंचतत्समास्यात त्रिशूलं कोणगञ्च यत् । स्तम्भ न्यासेपुवानितुलाविधिपुमर्वदा ॥३७ कोलोच्छिप्टोपघातादि वर्जयेद् यत्ततो जनः । सर्वत्र वास्तुनिदिप्टो पितृवैश्वानरायत.।।३८ मूर्दन्यग्नि. समादिप्टो मुखेचापः समाश्रितः । पृथ्वीधरोऽयमावस्तनयोस्तावधिष्ठिती ॥३६ वक्षस्थले चापवत्स: पूजनीयः सदा बुधः । नेत्रयोदितिपर्जन्यौ पोतेऽदितिजयन्तको॥४० सन्द्रावससंस्थौ तु पूजनीयौ प्रयलत । सूर्यप्तोमादयस्तद्वत् बाह्वोः पञ्च च पञ्च च ॥४१ रुद्रश्च राजयक्ष्मा च वामहस्ते समास्थिती। सावित्रः सविता तद्वद्धम्त दक्षिणमास्थितौ ।।४२ मत्स्यपुराण ये वस समाख्यात किये गये हैं और कही पर तो जय ही है । इनका जो सम्मात है मध्य पद तथा सम है । यह मम कह दिया गया है जो विशल काण गत है। सब ओर न्यासो मे स्तम्भ है और तुला विधियों में वार्य हैं । मनुष्य को कोलोच्छिष्ट उपघात मादि का पल से पजिन बर देना चाहिए। सब जगह पर धास्तु का पितृवैश्वानरायत निदिष्ट है। मूर्दा म अग्नि का निर्देश दिया गया है-मुख मे पाप ममाधित है। पृथ्वीधर और अर्थमा वे दोनों स्तनो में अधिष्ठित हैं । यक्ष स्थल में आपवरस का वुध रिपो को सदा पूजन करना चाहिए । नेत्रो में दिति और पजन्य, थोत्र में अदिति जयन्तक, दो सन्द्र बस में स स्थित प्रयत्न पूर पूजन करने के योग्य होते हैं । उसी तरह से बाहो मे पार-पाच मूय सोमादिक पूजनाय हैं । पौर राजयक्ष्मा वामहस्त मे दोनो समास्थित है। इसी प्रकार से सावित्र सविता दक्षिण हाप मे भास्थित है।३-४२॥ विवस्वानय मित्रश्च जठरे सध्यवस्थिती। पूपाच पापयक्षमा च हस्तयोमणिव धने ॥४३ सवामुग्मोपी च घामपाश्यं समाधितो। पाइयत दक्षिणे तहत् वितप सगृहप्ततः ॥१ उर्गेयमायुषी शेयो जावोगधयपुप्पो । जइपया भंगमुग्रीवोरिपवस्थौ दौवारियो मृगः ।४५ जपशी तथामे पायो पितरत्नपा । मध्य नव पदे ब्रह्मा हृदये स तु पूज्यते ॥४॥ पत. पष्टि पदो वास्तु प्रामादब्रह्मणारगृन । प्रया पतपत्र पाप्यमातथा यहि बागा वास्तौ त गार्धाश्योगगरियता । विसनि पिसाव पनु पष्टिपाता 16 होति. पाप या जायते ।
गृह निर्माण क्ला वर्णन ४०५ शल्य त्वपनयेत्तत्र प्रासादे भवने तया ॥४६ सशल्य भयद यस्मादशल्यं शुभदायकम् । होनाधिका गतावास्तोसवथातु विवजयेत् ।।५० नगरग्रामदेगेषु मवंनव विवजयेत् । चतः शालं विशालञ्च द्विशाल शैकशालकम् ॥ नामतस्तान् प्रवक्ष्यामि स्वरूपेण द्विजोत्तमा. ॥५१॥ इमके अनन्तर विवस्वान् और मित्र जहर में भली भांति व्यव- स्थित है। पूपा और पाप यक्ष्मा हायों के मणिबन्धन में हैं । उमी प्रकार में अमुर और शोष वाम पाश्व में समाधित है। दक्षिण पाद में उमी भौति विनय और मगृहत हैं। दोनो काओं में यम और अम्बुय जान लेने के योग्य हैं। दोनों जानुओ मे गन्धर्व और पुष्पक है। दानो अदाओ में भंग और सुग्रीव सममियत हैं और स्पिन भागों में दौत्रा- रिक और मृग स्थित होते हैं ।। ५३, ४४, ४५ ॥ जप और गर मेढ़ में सस्थित हैं और दोनों पादरी में पितर समधिन रहा करते हैं । मध्य नव पद में ब्रह्मा हैं और वह हृदय में पूजित होने हैं । ब्रह्माजी के द्वारा यह वास्तु चौमठ पद वाला कहा गया है। वहां पर ब्रह्मा चतुष्पद है तथा कागो में अर्ध पद है। दाहिर क पो म वास्तु मे माध उमय सस्थित होते हैं । बीम रिपद है और वोम पर बनाय गये है ।। ४. ४७, ५८॥ ग्रहो के पा.म्म कानों में स्वामी क यही में यहां पर मदत होती है वहां पर प्रामाद तपा मवन मे शल्य का पनयन करना चाहिए । गल्प ने सहित भयाद हुमा करता और प्रारूप अभदायक होना है। हालाकि कोगन वान के मयं या विजित कर दन चाहिए।
मत्स्यपुराण ११७-भवन निर्माण वर्णन चतु शाल प्रवक्ष्यामि स्वरूपन्नामतस्तथा। चतु शालञ्चतुरिरलिन्दै सर्वतोमुखम् ॥१ नाम्ना तत् सवतोभद्र शुभ देवनृपालये । पश्चिमद्वारहीनञ्च नन्द्यावर्त. प्रचक्षते ॥र दक्षिणद्वारहीनन्तु वद्धं मानमुपाहृतम् । प्रवद्वारविहीन तत्स्वस्तिक नाम विश्व तम् ।।३ रुचकचोत्तरद्वारविहीन तत्प्रचक्षते । सौम्यशालाविहोन यत्तिशाल धान्यकञ्च तत् ॥४ क्षेमवृद्धिकर नृणा बहुपुत्रफलप्रदम् । शालया पूर्वया हीन सुक्षेत्रमिति विश्रुतम् ।।५ धन्य यशस्यमायुष्य शोकमोह विनाशम् । शालया याम्ययाहीनद्विशालतुशालया । कुलक्षयकरनृणा सर्वव्याधिविनाशनम् । होन पश्चिमया यत्तु पक्षघ्न नाम तत्पुन ॥७ महामहपि श्री सूतजो मे कहा-अब मैं चतु शाला का नाम पौर स्वरूप स वर्णन करता हूँ। चतुशाला चार द्वारों और सर्वतोमुख अलि दो से युक्त हुना करता है ।।१॥ देव और नृप के आलय मे वह नाम से सर्वतोभद्र परम शुभ होता है V पश्चिम द्वार से होन नन्द्यावरी कहर जाता है ॥२॥ जो दक्षि द्वार से हीन होता है वह वढमान उपाहृत होता है। पूर्व द्वार स रहिन वह स्वस्तिक इस नाम से प्रसिद्ध है ॥३॥ उत्तर दार से जा विहीत होत है वह रचक माम वाला होता है। मो मोम्यशाला से रहित होता है वह विशाल और धायक होता है ।। यह मनुष्यों को राहत स पुत्रों की प्राप्ति व पल को प्रदान करने वाला सपा सेम और मृतिक परन याम होता है। पूर्व पाला से होन
भवन निर्माण वर्णन
४०७
'सुक्षेत्रम' इस नाम से विश्रुत होता है ॥५॥ यह परम धन्य, आयुष्य
(आयुको वृद्धि करने वाला)-शोक और मोह का विनाश करने वाला
होता है । याम्य (दक्षिण) शाला से होन और शला से विशाल होता
है वह मनुष्यो के कुल का क्षय करने वाला और समस्त प्रकार की
व्याधियों का नाश करने वाला हुआ करता है । जो पश्चिम दिशा मे
होने वाले द्वार से रहित होता है उसका नाम "पक्षघ्न"-हुआ करता है
1७11
मित्र बन्धून सुतान हन्त तथा सर्वभयापहम् ।
याम्यापराभ्या शालाभ्य धनधान्यफलप्रदम् ।।
क्षेमवृद्धिकर नणा नथापुत्र फलप्रदम् ।
यम सूर्यञ्चविज्ञय पश्चिमोत्तरशालिकम् ।।
राजाग्निभयद न णा कुलक्षयकर च यत् ।
उदक्पूर्वे तु शालेह दण्डारुये यत्र तद्भवेत् ।।१०
अकालमृत्युभयद परच भयावहम् ।
धनारय पूर्वग्राम्याभ्या शालाभ्यायद्विशालकम् ॥११
तच्छ भयदनृणा पराभवभयावहम् ।
चल्लोपूर्ण पगभ्या तु साभवेन्मत्युसूचनी ॥१२
वैधव्यदायक स्त्रीणाम नेकभयकारकम् ।
कार्यमुत्तरयाम्पाभ्याशालाभ्याभयदनृणाम् ।।१३
सिद्धार्थवाणि विशालानि सदावुधे ।
अथात सप्रवक्ष्यामि भवनपृथिवीपते ॥१४
याम्या पर शालाओ से मित्र-बन्धु-और सुनों की प्राप्ति होती है
तथा मर्वप्रकार भयो का अपहरण एव धन और धान्य के फन का दान
करन वाला पनन हुआ करता है । पश्चिमात्तर शालिक मनुष्यों के क्षेम
एव वृद्धि का करने वाला है और पुत्र की प्राप्ति का फल प्रदान करने
वाला है । इममा नाम यम मूयं जानना चाहिए ॥६, ६॥ उत्तर और पूर्व
मत्स्यपुराण
की शालाऐ जहा पर होती हैं उनका नाम दण्ड होता है । यह मनुष्यो
को राजा, अग्नि और मृत्यु का भय देने वाली है तथा कुल का क्षय करने
पाली हैं ।। ।। पूर्व और याम्य शालाओ से जो विशालक होता है उस
का नाम धन है । यह अकाल मृत्यु और भय का प्रदान करने वाला तथा
परचक्र के भय देने वाला होता है । पराओ स जो चूल्ली पूर्वा शाला
होती है वह मृत्यु की सूचना देने वाली हुआ करती है ।।१", १२।।
स्त्रियों को वैधव्य के देने वाला-अनेक भयो का करने वाला होता है ।
उत्तर और याम्य की शाला से मनुष्यो को भय दान होता है । अतएव
बुध पुरुषो को सदा सिद्धाथ वज्र वज्य विशाल ही करनी चाहिए। इसके
अन तर अब मैं पृथिवी पति के भवन का वणन करूगा ॥१३ १४।।
पञ्चप्रकार तत्प्रोक्तमुत्तमादि विभेदत ।
अगत्तरहस्तशत विस्तर श्चोत्तमामत (१५
चतुप्वन्येषु विस्तारा हीयतेचाष्टभि परै ।
चतुर्था शाधिक द यं फचस्वाप निगद्यते ॥१६
युवराजस्य वक्ष्यामि तथाभवनपञ्चकम् ।
पडभि पड भिस्तथाशीतिहीयतेतविस्तरात् ॥१७
-यशन चाधिक्दयं पञ्चस्वाप निगद्यते ।
सनापत प्रवक्ष्यामि तथा भवनपञ्चकम् ।।१८
चतु पप्टिस्तुविस्तारात्पडभि पडभिस्तुहायते ।
पञ्चस्वतेपुदध्यञ्चपडभागेनाधिक्भवेत ॥१६
मात्रणामय वक्ष्यामि तथा भवनप चकम् ।
चतश्चतुभिहींनास्यात् करष्टि प्रविस्तर ॥..
अप्टाशनाधिक देध्य पञ्चम्वपि निगद्यत ।
माम तामात्यत्रोसाना वय मदनप चवम् ॥ १
Vयह नृप वा भवन उत्तम अदि भदा स पाच प्रकार का बताया
गया है । जो एष मो आठ ह य र विस्तार पाना हाता है वह ही उत्तम
.
भवन निर्माण वर्णन ४०६ माना गया है ॥१५॥ अन्य जो नार प्रकार के भवन कहे गये हैं उनमें जो विस्तार होता है वह आठ हाथो का कम ही हुआ करता है । इन पांचो में लम्वाई से चतुर्थाश मे अधिक दीर्थता बताई गया है । अब मैं युवराज के पांच प्रकार के भवनो के विषय में कहता हूं वहा पर अम्सी के विम्नार से छ-छ हाथ कम होता जाया करता है । इन पांचों में भी तीन अश से अधिक दीर्घता कही जाती है। प्रब सेनापति के पांच प्रकार के भवनों के विषय मे वर्णन किया जाता है ॥१६, १७, १८॥ ये भवन चौसठ के विस्तार से छ-के हाथ प्रत्येक मे कम होता जाया करता है। इन पांचो मे चौडाई पड्भाग से अधिक ही हुप्रा करती है ।।१६।। अब राजा के मन्त्रियों में भी भवन पांच प्रकार के ही हुआ करते हैं उनका वर्णन किया जाता है । इनका विस्तार साठ हाथ का होता है और ये भी श्रम से चार-चार हाथ कम होते हैं ॥२०॥ इन पांचो मे भी आठ अश से अधिक दीर्घना हुआ करती है। अब इसके उपरान्त राजा के सामन्न- आमान्य और लोको के भी पांच प्रकार के भवनों का वर्णन यहा पर दिया जाता है ।।.१॥ चत्वारिंशत्तथाप्टौ च चतुमिहीयते व्रमात । चतुर्थी शाधिक देय पञ्चम्वैतेशस्यते ॥२२ शिल्पिना कञ्चकोनाञ्च वेश्याना गृहपञ्चाम् । अष्टाविंशत् कराणा.तु विहीन विम्तरे कमात् ॥२३ द्विगुण दंध्यमेवोक्त मन्यमेप्येवमेव तत् । दूनीकर्मान्तिकादीना वक्ष्ये भवनपञ्चकम् ॥२४ चतुवाशाधिवदंध्यं विस्तारोद्वादशव तु । अर्धाधकरहानि: स्याद्विम्तागपञ्चराः मात् ॥२५ दं वज्ञवद्याना ममाम्नारपुगेधमाम् । तेपामाप प्रवक्ष्यामि तथा भदन पन्चनम् ॥२६ नत्वारिकशास्ताग नभिहीयते जमान।
४१० मत्स्यपुराण । पञ्चस्वेतेपु वंध्यञ्च पडभागे नाधिवभवेत ॥२७ चतुवर्णस्य वक्ष्यामि सामान्य गृहपञ्चकम् । द्वात्रिशतिकराणान्तु चतुभिहीयते क्रमात ये भवन चालीस और आठ अडतालीस हाथ के विस्तार वाले हुआ करते हैं और क्रम से बार-बार हाय न्यून हो जाया करते हैं । इनमे भी चौपाई अंश से अधिक दीर्घता चौडाई) इन पांचो मे अणस्त हुआ करती है ॥२२॥ नृप के यहा पर जो शिल्पी-कञ्चुकी और वैश्याएँ होते हैं उनके भी भवन पांच तरह के उत्तम आदि भेदो बाले हुआ करते हैं । अट्ठाईस हाथ के विस्तार वाले होते हैं और कम से प्रत्येक मे हीनता भी होती चली जाया करती है ॥२३॥ दुगुन दोघता भी बताई गयी है । इसी प्रकार से मध्यमी भी होती है। अब दूतीकम करने वाले और मन्तिकादि के पांचो भवनो को बतलाते हैं ! चतुर्थाश से अधिक दोधता होती है और विस्तार बारह का हुआ करता है । आधे-आधे हाथ की 'यूनता विस्तार से क्रम में पांचो मे हो जाती है ।।२४, २५।। राजा के यहा रहने वाल देवज्ञ (ज्योतिषी)-गुरु, वद्य सभास्तार पुरोहित इनके भी पान-पाच प्रकार के उत्तमादि भेद से भवन हुआ करते हैं । उनको बत नात है-चालीस हाथ के विस्तार से युक्त ये हात है और चार-चार हाथ कम से होत होते हैं। इन पांचो म दीघता पडभाग से अधिक हुआ करती है। पर ब्राह्मणादि चार वर्णों क सापाप पाचोरदों के विषय में कहत हैं । ५ बत्तीस हाथ के विस्तार स मयुत हुआ करते है और कम से भार-बार वो हीनता हुआ करती है ॥२६ २७, १८॥ आपोडशादितिपर नूतम तेवसायिनाम् । दशानाष्टभागन विभागनाथ पादियम् ॥६ जधादयमित्या ब्राहाणाद प्रशस्यते । मापतेन पस्यापि गृह्यारलाग तु ॥३० वामगृहवाश्य "गण्गा तथा च ।
भवन निर्माण वर्णन ४११ सेनापतेगृहस्यापि चातुर्वर्ण्यस्य चान्तरे ।। वासाय च गृह कार्य राजपूज्येषु सर्वदा ॥३१॥ अन्तरप्रभवानाञ्च स्व पितु गृहमिप्यते । तथा हस्तशतादद्धं गदित वनवासिनाम् ॥३२ सेनापतेन परस्यापि सप्तत्यासहितेऽन्विते । चतुर्दा हृतेव्यासे शालान्यासः प्रकीतित. ॥३३ पन्चत्रिशान्विते तस्मिन्नलिन्द समुदाहतः । तथा पत्रिंशद्धस्ता तु सप्ताङ्ग लसमन्विता ॥३४ विप्रस्य महतीशाला न देयं परतोभवेत् । दशाङ्गलाधिका तद्वत् क्षत्रियस्य न विद्यते ॥३५ पोडश से लार इति पर निश्चय हो अन्तेव क्षत्रियों का भवन होता है । दशाश से-अष्ट भाग से और विभाग से पार्दिक होता है । ब्राह्मणादि की दीर्घता अधिक प्रशस्त होती है-ऐमा रहते हैं। सेनापति और नृप के भी गृहो मे अन्तर होता है ॥२६. ३०॥ नृप के निवास या गृह तया भाण्डागार दोनो का निर्माण कराना चाहिए । सेनापति वा गृह और चारो वर्णों वालो का गृह अन्नर मे ही होना आवश्यक है। निवास के सवंदा राज पूज्यो मे गृहा करना चाहिए ।। १॥ जिनका अलर में प्रभव हो उनको अपने पिता का ही यह अभीष्ट होना चाहिए । वन- मो हाय का आधा भाग वहा गया है ॥३२॥ सेनापति का भी जो कि राजा का होना है, मान (मत्तर) के महित एव अन्वित तथा चतुदरा ध्यास ये हत होने पर पाल' पानित किया गया है। उमर पन्ज शिवित होन पर यह प्रालिन्द पहा गया है। त्या छत्तीस हाय वाली और मान अगुती म समन्निन विध की महती पाता होती है पर मे उसकी दोघता नहीं होनी चाहिए। उमी नानि दश अगुल से अनिश्यि मीनही होती है,३४.२५ वासियो का गृह
४१२
मास्यपुराण
पश्चभिशवरावश्ये अङ्ग लानि प्रयोदश ।
तावखरंच शूद्रस्य युतापञ्च दशाङ्ग । ३६
शालायास्तु विभागेन यस्याग्ने वीथिका मवेत् ।
सोप्णीपनाम तद्वास्तु पश्चान्छे योच्छ्य भवेत् ॥३७
पायो/थिका यत्र सावप्टम्भन्तदुच्यते ।
समन्ताद्वीशिवायन सुस्थित तदिहोज्यते ॥३८
शुभदसवमेतत्स्या चातुवर्णं चतुर्विधम् ।
विस्तरात पोडशा भागस्तयाहस्तचतुष्टयम् ।।३६
प्रथमोभूमिकोच्याय उपरिप्टात्ग्रहीतते ।
द्वादशाशेनसर्वासु भूमिकासु तथाच्छय ॥१०
प्रक्वेष्टकाभवेदित्ति पोडशाशेन विस्तराद !
दारवर पिकल्पास्यात्तथा मृन्मयभितिका ॥४१
गर्भ मानन मान तु सर्ववास्तुपु शस्यते ।
गृहव्यासस्य पञ्चाशदष्टादशभिरङ्ग ले ॥४२
सयुतो द्वारविष्वम्भो द्विगुणश्चोच्छयाभवेत् ।
द्वारशाखा सुवाहल्यमुछाय करसम्मत १४३
अगल सवास्तूना पृथुत्व शस्यतेबुधै ।
उदुम्बरोत्तमागञ्च सदधि प्रविस्तरात् ।।४४
बंय की शाना पच्चीस कर विस्तृत तथा प्रयोदश अगुल होनी
चाहिए । उतन ही हाथो के विस्तार से युक्त पद्रह-अगुल सहित शुद्ध की
शाला हानी चाहिए ॥३६॥ शाला के विभाग से जिसके आगे एक
वीथिका का होना आवश्यक है । जिसका पोछा उन्य वाला हो वह धेय
और सोष्णीप नाम वाला बास्तु होता । जिसके पावों में बीथिवा हो
उसका नाम सावष्टम्भ कहा जाता है । जिसक सब ओर वीथिका हो
उसका नाम यहा पर स्थित वहा जाया करता है । चातवर्गों में यह चारो
प्रकार समब शुभ व हाता है। विस्तार म यह पोइश भाग
स्तम्ममान निर्णय वर्णन
होता है तथा चार हाथ हुआ करता है ॥३७, ३०, ३६॥ प्रथम भूमिको-
च्छाय कार से हीन होता है । द्वाददा अश से सब भूमिकाओं मे उसी
प्रसार का उच्छ्य होता है ॥४०॥ पोडश अश से विस्तार युक्त पकी हुई
ई टो की मिति होनी चाहिए । दारव अथात् काप्ठों से भी निमित होवे या
मृन्मय भित्ति होवे ॥४१।। गर्भमास से मान सब वास्तुआ मे प्रशस्त होता
है । उस गृह मास पचास और अप्टादश अगुलो से सयुत द्वार विष्कम्भ
होता है और द्विगुण उच्छर होता है। द्वारशाखा सुवाहुन्य कर सम्मित
से उच्छ्राय होता है। सब वास्तुओ का अगुली से पृथक्व बुधो के द्वारा
प्रशास्त माना जाता है । उदुम्घरोत्तम और आग उसके अर्घ का अर्घ
विस्तार से होता है ।।४-४४।।
११८-स्तम्भमान निर्णय वर्णन
अथात सप्रवक्ष्यामि स्तम्भमान विनिर्णयम् ।
कृत्वास्वभुवनोच्छ्राय सदामातगुणबुधः ॥१
अशोत्यश पृथुत्व स्यादनेणावगुण सह ।
रुचकश्चतर. स्यात्तु अष्टास्रो वन उच्यते ॥२
द्विवज्र पोडशास्रस्तु द्वात्रिंशास्त्र प्रलीनकः ।
मध्यप्रदेशे यस्तम्भो वृत्तोवृत्तइति स्मृतः ।।३
एतेपञ्च महास्तम्भा प्रशस्ता. सवास्तुपु ।
पद्मवल्लीलताकुम्भपत्रदर्पणरूपिता. ॥४
स्तम्भस्य नवमाशेन पाकुम्भान्तगणि तु।
स्तम्भतुल्या तुला प्रोक्ता हीना चोपतुला तत. ॥५
त्रिभागेनेह सर्वत्र चतुर्भागेन वा पुन ।
हीन हीन चतुर्था शात् तथा सर्वासु भूमिपु ।।६
मन्स्याराण वासगेहानि सर्वपा प्रवेशे दक्षिणेन तु, द्वाराणि तु प्रवक्ष्यामि प्रशस्तानीह यानि तु ॥७ महा महर्षि श्री सूतजी ने कहा- इसके अनन्तर अब मैं स्तम्भो के मान का विदोष निणय दिया जाता है। अपने भुवन का उच्छ्राय फरक बुधो के द्वारा सद सप्त गुग्ण होना चाहिए ॥१॥ अस्सी अश स्तम्म का प्रयुत्व होना चाहिए । अग्रभाग से अवगुणो के साथ चार वाला रुचक होता है। आठ अस्रो वाला वन-इस नाम से कहा जाया करता है। पोडश अन वाला द्विवन और बत्तीस से संयुत प्रलीनक कहा जाता है मध्य भाग में जो स्तम्भ हुआ करता है उसको वृसोवृत इस नाम से पुकारा जाया करता है | इस तरह से रुचक-ब-द्विवच--- प्रलीनक और वृत्तोवृत्त ये पांच महान स्तम्भ सर्व धास्नुओ मे परम प्रगस्त कहे जाते हैं । पद्मवत् लीलता कुम्भ पत्र दर्पण से रुपित हुआ करते हैं । ॥४॥ सम्म का नवम अश गेहा उमी से पद्म कुम्भ के अन्तर होते हैं । स्तनम के तुल्य ही तुला कही गयी है और जो हीन होती है वह उप- तुला हती है ॥५॥ यहाँ पर समी जगह विभाग स अथवा चतुर्भाग में उसी भांति स मियो मे पतुर्थ अश से होन-हीन होती है। सबके निवास करने योग्य गेहों में दक्षिण भाग से प्रवेश करने मे जो द्वार हुमा परते हैं जो कि परम प्राप्त होते हैं उन्ही के विपरम अब में वर्णन परता पूर्वगेन्द्र जयन्तच्चद्वार सर्वप्रशस्यते । याम्यञ्च वितथञ्चव दक्षिणेन विदुवुधा. 16 पश्चिमे पुष्पदन्त च वारगञ्च प्रशस्यते । उत्तरेण तु भन्नाट गौम्य त सुमदम्भवेत् सथावास्तुपु सत्र के द्वारस्य यजयेत् । द्वारे तु ग्यापिद्ध भोत् मया वक्षयः ।। . सरुगादपवारपशीर: पहन जायते ।
स्तम्भमान निर्णय वर्णन ४१५ अपस्मारो भवेतून कूपवेधेन सर्वदा ॥११ व्यथाप्रलवणेन स्यात्कीलेनाग्नि भय भवेत् । विनाशो वेवताविद्ध स्तम्भेन स्त्रीकृत भवेत् ।।१२ गृहभर्तु विनाशः स्यात् गृहेण च गृहे कृते । अमेध्यावस्वरविद्ध गृहिणी बन्धको भवेत् ।।१३ तथा शस्त्रमय विन्द्यादन्त्यजस्य गृहेण तु । उच्छाया द्विगुणा भूमि त्यक्ता वेधो न जायते ॥१४ पूर्व दिशा में होने वाले इन्द्र और जयन्त द्वार सर्वत्र बहुन ही प्रशस्त होते हैं । बुध लोग जो दक्षिण भाग मे द्वार होता है उसे याम्य और वितथ कहा करते हैं 11|| पश्चिम दिशा में होने वाले द्वार को पुष्प दन्त और वारुण कहा जाता है, जो कि प्रशस्त होता है। उत्तर में होने वाला द्वार भल्लाट और मौम्य कहलाता है यह भी शुभ के प्रदान करने वाला होता है । उसी प्रकार से सभी जगह पर द्वार का वेध वजित होना चाहिए । रध्या मे जो विद्ध वार होता है उसमें तो सम्पूर्ण कुल का क्षय हो जाया करता है अर्थात ऐमा द्वार तो कभी भी कगना ही नहीं चाहिए ॥१०॥ तरुण से वेप वा वाहुल्य होता है और पद मे शोक हुआ करता है । सवंदा कूप वेघ से निश्चय रूप से अपस्मार हुआ करता है। ॥११॥ प्रस्रवण से व्या हाती है और कील से अग्नि का मय हुआ परता है। देवता के विद द्वार में विनाश होता है। स्तम्भ वे द्वारा स्वीकृत होता है ॥१२॥ गृह के द्वारा गृह के करने पर गृह का जो भर्ता होता है उस ग्रह के स्वामी का विनाश हो जाया करता करता है। यमेध्य (अपवित्र) अवस्करों के द्वारा पिड द्वार के होने पर गृहिलो बन्धकी हो जाया करती है। विमी अन्त्यज के गृह व द्वारा वेध होने पर शास्त्रमय जानना चाहिए या प्राप्त करे। उच्छाय से हिगुपित भमि का त्याग करके वेध नहीं हुआ करता है ।।१३, १४॥ स्वयमुताटिते द्वारे उन्मादो गृहवासिनाम् ।
मत्स्यपुराण
स्वयवापिहितेविद्यात् कुलनाशविचक्षण ॥१५
मानाधिके राजभय न्यने तस्करतो भवेत ।
द्वारोपरि च ग्वार तदन्तकमुख स्मृतम् ॥१६
अध्वनो मध्यदेवो त अधिको यस्य विस्तर ।
वज्रन्त सङ्कट मध्ये सद्योभत विनाशनम् ॥१७
तथान्यपीडिस द्वार वहुदोषकर भवेत ।
मूलद्वारातथान्यत्तु नाधिक शोभन भवेत् ॥१८
कुम्भश्रीपणिवल्लीभि मलद्वारन्त शोभयेत।
पूजयच्चापि तग्नित्य बलिनाचाक्षतोदकं ॥१६
भवनस्य वटपूर्वे दिमागे सर्वकामिकः ।
उदुम्बरस्तथा याम्ये वारुण्या पिप्पल: शुभ १२०
स्वय द्वार के उत्पादित होने पर जो गह में निवास करने वाले
होते हैं उनका उमाद हो जाया करता है। अण्वा स्वय ही पिहित करने
पर विचक्षगा पुरुष को अपन फुल का नाश समझ लेना चाहिए ।।१५।।
यदिटार जो भी उमा मान स्वीकृत याममा है उससे अधिक हो तो
राज से होने वाला भय होता है पोर यदि भोमित मान से न्यून हो सो
सरो से भय रहा करता है । द्वार के कार जो द्वार होता है उसको
अन्नक मुश नाम वाला कहा गया है ।।१६।। मध्य देश मे जिसका अधिक
विस्तार हो यह अध्यन पाता है। मध्य मे सङ्कट वस होता है और
यह तुरत ही स्वामी का
विरो वाला हुमा करता है। तपा अन्य
सपीरित भार बहन-से दोषो र वरल वाला होता है । जो मूल द्वार
होता है उसी अन्य दार xि मोमत नही मास115, १८)
पुम्भ, पौणि और पल्लियारे द्वारा गत द्वार को शामिन रमा
पा उमद्वारा निरय हो गरे तया तोस अप एक
fami पाना चाहिए। मया के पूर्व तिरे भाग में गड बामगाओ
पूर्ण परन पाोदा समारोपण परला पाहिए- fem
स्तम्भ मान निर्णय वन ४१७ के भाग में उदुम्बर (गूलर) का वृक्ष और वारुणी दिशा मे परम शुभ पीपल का वृक्ष समारोपित करना चाहिए ॥१६॥२०॥ प्लक्षश्चोत्तरतोधन्यो विपरीतास्त्वसिद्धये। कण्टकीक्षीरवृक्षश्च आसनः सफलो द्रुमः ॥२१ भार्याहानौ प्रजाहानो भवेनां क्रमशस्तदा। नच्छिन्द्यात् यदि तानन्यानन्तरे स्थापयेच्छुभान ॥२२ पुन्नागाशोकवकुलशमीतिलकचम्पकान् । दाडिमीपिप्पलीद्राक्षा तथा कुसुममण्डपान् ।।२३ जम्बीरपूगपनसद्रमकेतकीमिर्जातीसगेजशतपत्रिकमल्लिकाभिः । यन्नालिकेरकदलीदलपाटभियुक्त तदत्र भवन श्रियमातनोति । २४ भवन के उत्तर दिग्भाग में प्लक्ष (पाखर) के वृक्ष का समारोपण करे । इस तरह से गृह को इन चारो दिशाओ में उपर्युक्त चार प्रकार के वृक्षो का समारोपण सिद्धि दायक हुआ करता है। इनके विपरीत आरो- पण से असिद्धि होती है । कांटेदार क्षीर देने वाला वृक्ष और आसन सफल इम होना है । उस समय में क्रम से भार्या की हानि और प्रजा की हानि हुआ करती हैं। यदि उनको दमरों के अन्तर मे शुभ वृक्षों को स्थापित करे तो फिर इनका चेदन कभी भी नही करना चाहिए ॥२१,२०॥ पुन्नाग-प्रशोक-वकुल-दामो-तिल-चम्पफ-दाहिम-पिप्पली-द्राक्षा- कुसुम मण्डप---जम्बीर-पूग--पनसद्र,म-केतकी--जाती-सरोज- पात पत्रक-मल्लिका-नालिकेरवदली दल-पाटल इन समस्त वृक्षो के समारोहण से समन्वित होता है वह थी का विस्तार किया करता ॥२३,२४॥
४१८
महायपुगण
११६-भवन निर्माण वर्णन
उदगादिप्लव वास्तु ममानशिखरतथा ।
परीक्ष्य पूर्ववत्कुत्स्तिम्भोन्यायविचक्षणः ।।१
न देवधूत सचिव चत्वराणा समन्तत ।
कारयेद्भवन प्राज्ञो दु खशोकभय तत ॥
तस्य प्रदेशाश्चत्वारस्तथोत्सर्गोऽग्रत शुभ ।
पृष्टत पृष्ठभागस्तु सव्यावन प्रशस्यते ॥३
अपसव्यो विनाशाय दक्षिणे शीषकस्तथा ।
सर्वकामफलोनृ णा सम्पूर्णो नाम वामत ।।
एव प्रदेशमालोक्य यत्नेन गृहमारभेत् ।
अथ सावत्सरेप्रोक्ते मुहूर्ते शुभलक्षणे ॥५
रत्नोपरि शिला कृत्वा सवबीजसमन्विताम् ।
चतुभिब्राह्मण स्तम्भ कारयित्वा सुपूजितम् ॥६
शुक्लाम्बरधर शिल्पिसहितो वेदपारग. ।
स्नापित विन्यमेत्तद्वत्सवौषधिसमन्वितम् ॥७
नानाक्षतसमापेत वस्त्रालदारसयुतम् ।
ब्रह्मघोपेण वाद्यन गीतमङ्गल नि स्वन |
महर्षिवर श्री सूतजी ने कहा-विचक्षण पुरुष को चाहिए कि
उदगादि प्लव तथा समान शिखर वाले वास्तु की परीक्षा परके पूर्व की
माति स्तम्भो की ऊंचाई करनी चाहिए ॥१॥ प्राज्ञ पुरप का कर्तव्य
है कि अपने भवन के चारो मार देव-धूल-सचिव और चत्वरो का
भवन नहीं बनवाना चाहिए क्योकि इससे फिर दुख और शोर तथा
भय होता है । उसके चार प्रदेश होते हैं तथा आगे की ओर उत्सर्ग
परम शुभ हुआ करता है। पीछे की ओर उसका पृष्ठ भाग सप्याव
प्रशस्त होता है ।।३।। जो अपसव्य होता है वह विनाश के लिये ही हुआ
भवन निर्माण वर्णन
४१६
करता है । दक्षिण में शीर्षक मनुष्यों के सब कामनाओं क फल वाला
हुमा करता है और वाम माग म सम्पूर्ण होता है । इस प्रकार प्रदेश का
समालोक्न करने ही य नपूर्वक गृह के निर्माण का मारम्भ करना चाहिए
और वह भी साम्बत्मर प्रोक्त किसी शुभ लक्षण वाले मुहूर्त में करे
॥४॥ ५॥ समस्त वीजो स सयुन शिला को रत्नो के ऊपर करक चार
ब्राह्मणो के द्वारा भलीभांति अचित स्तम्भ का निर्माण कराव॥६॥ वेदों
के पारगामी विद्वान् ब्राह्मणो के द्वारा शिलिया + सहिन शुल्क अम्बरों
के धारी को स्तापित करक विन्यस्त करना चाहिए। उसी के समान
सर्वोपधियो स समन्वित - नाना अक्षतों से समुपैन-वस्त्र एटा आभूपणा
से युक्त करके ही विन्यास करना चाहिए । ब्रह्मपोप ( वेदध्वनि )
वाद्य और गीत ए1 माङ्गलिक ध्वनिया के द्वारा विन्यस्त करे।
11७,50
पायस भोजयेद्विप्रान् हामन्तु मधुसपिपा ।
वास्तोप्पतेप्रतिजानीहि मोगानेन सर्वदा VE
सूत्रपाते तथा वाय्यमव स्तम्भोदये पुन ।
द्वारवंशो-छये तद्वत्प्रवेशसमये तथा ॥१०
वास्तूपशमने तद्वद्वास्तुयज्ञस्तु पन्चधा।
ईशाने सूत्रपात स्यादाग्नेयेस्तम्भरोपणम् ।।११
प्रदक्षिणञ्च कुर्वीत वास्तो पदविलेखनम् ।
तर्जनी मध्यमा चैव तयाङ्ग.प्ठस्तु दक्षिणे॥२
प्रवालरत्नम्न फल पिष्ट्वा कृतोदकम् ।
सर्ववास्तुविभागेषु शस्त पदक्लिदने ॥१३
न भस्माङ्गारवाप्ठेन नखशराण चमि ।
न शृङ्गास्थिक्पालेश्च क्वचिद्वास्तु विलेखयेत् ॥१४
पिर वित्रों को पायस का भोजन करावे और मयु और पुन के
द्वारा होम करे। सर्वदा वास्तोगति स इस मन्त्र के द्वारा प्रतिमा करे।
४२० मत्स्यपुराण उस प्रकार से सूत्रपात मे करे और पन स्तम्भोदय के समय में भी करना पाहिए । द्वार वश के उच्छ्य म तथा उसी भांति से प्रवेश के समय में करना चाहिये। उसी तरह से वास्तु के उपशमन के अवसर पर उसी तरह से वास्तु यज्ञ पांच प्रकार का होता है। ईशान मे सूत्रपात होता है-आग्नेय में स्तम्भ का रोपण होता है और वास्तु के पदविलेखन का प्रदक्षिण करना चाहिए । तर्जनी, मध्यमा तथा दक्षिण मे अगुष्ठ रक्खे । प्रमाल, रल, दमक फल (धतूरे का फल ) को जल के साथ पीस कर सम्पूर्ण वास्तु के विभागो मे पदविलेखन करे । पद बिलेखन करने में यह परम प्रशस्त कहा गया है । वास्तु का बिलेखन कही पर भी भस्म- अङ्गार और काष्ठ से भी नहीं करे तथा सोग, अस्थि और कपालो के द्वारा भी पद बिलेखन नहीं करे 18-१४॥ एमिविलिखित कुर्यादुः खशोकभयादिकम् । पदा गृहप्रवेश. स्याचिल्पी तत्रापि लक्षयेत् ।।१५ स्तम्भसूत्रादिक तद्वछभाशुभफ्लप्रदम् । आदित्याभिमुख रोति शकुनि पुरुप यदि ॥१६ तुल्यकाल स्पृशेदङ्ग गृहभतुर्यदात्मनः। धास्त्वङ्ग तद्विजानीयान्नशल्य भयप्रदम् ॥१७ अनानन्तर यत्र हस्त्यश्वश्वापद भवेत् । सदङ्गसम्भव विद्यालय दशल्य विचक्षणः ॥१८ प्रसार्यमाणे सूशे तु स्वागोमायुविलयिते । सत्तु शल्य विजानीयात् परशब्देति भैरवे ॥१६ यदोशने तु दिमागे मधुर रोति यायस.। धन तन विजनीमाभागे वास्वाम्पधिप्टिते ॥२० सूत्र भिवेन्मृयाधि कीले स्वधोमुमे । बगारेपुतपोन्माद पपालेषु प सम्ममम् ॥२१ मनन निर्माण वन ४२१ दिईन नामनन मिनी ने एक बार लिन किया है तो इसका पणिनपुर का है। और दुर- शोर और च नदि दृमा बने हैं। जिनमें प्रदेश के कई पर नी रिनीको लक्षित करना चाहे ॥ १५॥ सन्म दिने इनो भाति गुम मौर शुभ फल प्रान करने वाले होते है। सद पनि नर्मदे नन्न पुपये प्रतिमान करता है और दुकानो मेंह के बानी के इमर्ग का है और अपने मन को श्रा चोकको भर प्रशन करने वानरय सान नार १६१ बडून के मनन्तर जिन हन्दी-57 और साद होने को स्वको दी पर विचाप पुरपन होने दाल सच नम्॥१८॥ पंवाद जाने पर दह रवान और गोमा सय दिन हव हो जाने दो उनको भी शक हो जान लेना कार नफा भैरव में दर द हो उसको भी अब सम्म दे ॥ १६, वो शान मोज में हिसार में वामन (कौनपुर पति-करना दोबा वहां पर उस मार में न का होना माल लेना बाहिर अपना म्बानी के द्वारा जि मार में धन जाननी ।।२०।। ३ का डोज दिन किया है किसी को वरह ने घेटन हो गये दो मृत्यु जान दे ताकीत रे नीचे की ओर मुन्द्र वानी हो जान पर व्याधि होन का दान कर दे । अहारों में हात पर उन्माद और कान्गे हो जाने पर नान होना माना चाहिए ।। २९ ॥ पन्तदेपु जानीयान् पाँचत्रीपु वान्तुवित् । गृहमनु स्यापि दिनाश: शिालसम्मनेर स्तम्भ बन्दच्युते कुम्भे गिरोगेन विनिदिशेत् । कुम्भारदारे मवम्य दुसन्यापि भयो भवेत् ॥२३ मृत्युः म्यानचुनेम्भे भन्नेबन्ध दिव॒धाः । वरल्याविना त नागहमनेदिदु ॥
४२२ मरस्यपुराण विजऔषधिविहीनेतृभूतेभ्योमयमादियोत् । सत प्रदक्षिणेनान्यानन्यकेत्स्वम्भान्विचक्षणे ॥२५ यस्माद्भयकर न णा योजिताह्यप्रदक्षिणम् । रक्षाकुर्वीत यत्नेन स्नम्मोपद्रवनाशिनीम् ॥२६ तथा फलवती शाखा स्तम्भोपरि निवेशयेत् । प्रागुदप्रवण कुर्याद्दिङ्मूढन्तु न कारयेत् ।।२७ स्तम्भ वा भवनवापिद्वार वासगृह तथा । दिड मूढे कुलनाश स्यान्नच सवयेद् गृहम् ॥२८ कम्बुशल्यो मे वास्तु के वेत्ता को स्त्रियो क विषय मे पोश्चल्य का ज्ञान प्राप्त कर लना चाहिय । शिल्पी के सम्भ्रम हो जाने पर गृह क स्वामी का और गृह का भी बिनाश हो जाता है । स्तम्भ मे कुम्भ क Fध स च्युत हो जाने पर शिरोरोग का होना जान लेवे । कुम्भ का याद अपहरण ही हो जावे तो समझ लेना चाहिए कि सम्पूण ही कुल का क्षय हो जावेगा ।। २२, २३ ।। कुम्भ के निर्दिष्ट स्थान से च्युत हो जाने पर मृत्यु की सूचना होती है-ऐसा जान लेवे । यदि कुम्भ का भग हा जावे तो बुध लोग उसको बन्धन का सूचक बतलाया करते हैं । करो की सख्या के विनाश हो जाने पर गृहप त का नाश कहा करते हैं। बीजो पौर औषधियो के विहीन होने पर भूतो से भय प्राप्त होने की सूचना हमा करता है। इसीलिये विचक्षण पुरुष का कत्त व य है कि उसे प्रदक्षिण मे अन्य स्तम्भो का पास करे । जिससे मनुष्यो को भय बने वाना कुछ हो उस अप्रदक्षिण म योजित करे और स्तम्भा को होने वाल जो उपद्रव होवे उनके विनाश करने वानी की प्रबल प्रयना क साथ रक्षा करनी चाहिए ॥२४, २५, २६॥ उसी प्रकार से फलो से युक्त एक शाजा को स्तम्भ क ऊपर निशित पर देना चाहिए। उसे पूर्व और उनर की मोर मुख वाली ही विनर्वागत करनी चाहिए तथा दिक समूह उम नहीं कराना चाहिए ॥१७ । तम्भ हो या भवन हो तथा - भवन निर्माण वर्णन ४२३ द्वार हो अथवा निवास करने का गृह हो इसमें दिड मूढता कभी भूल कर भी नही करे क्योकि दिछ मूढ होने पर कुल का नाश ही हो जाया करता है और गृह को फिर वह कभी भी संवद्धित नहीं किया करता है ॥२८॥ यदिसवद्धयेद्गेह सवदिक्ष विवढे येत् । पूर्वेण वद्धित वास्त, कुदिराणि सर्वदा ।।२६ दक्षिणे वद्धित वास्तु मृत्यवे स्यान्न सशयः । पश्चाद्विवृद्ध यद्वास्तु तदर्थक्षयकारक । ३० वर्धापित तथा सौम्ये बहुसन्तापकारकम् । आन्नेये यत्र वृद्धिः स्यात् तदग्निभयद भवेत् ॥३१ वद्धित राक्षसेकोणे शिशुक्षयार भवेत् । ववापि तन्तु वायव्ये वातव्याधिप्रकोपयत् ॥३२ ईशान्या अन्नहानि: स्यात् वास्तोसवद्धि तेसदा। ईशानेदेवतागार तथा शान्तिगृहभवेत् ॥३३ महानमन्तथाग्नेये तत्पावेंचोत्तरेजलम् । गृहस्योपस्कर सर्व नैऋत्येस्थापयेवुध. ॥३४ वधस्थान वहि कुर्यात् स्नानमण्डपमेव च । धनधान्यच्च वायव्ये कर्मशालान्ततो वहि ॥ एव वास्तु विशेष. स्यात गृहमतुं गुभासह १३५ यदि गृह को सबदिन करे तो सभी दिशाओम उस विदित करना चाहिए । पूर्व दिशा म यदि वास्तु वदित हावै तो सर्वदा वैरो को किया करता है ॥२॥ दक्षिण दिशा में वास्तु का बद्धन होवे तो वह निस्सन्देह मृत्यु क ही किये हुआ करता है। पोछे अयात पश्चिम की और वास्तु विदित होवता वह अय सय करने वाला होता है । सोम्य दिमाम दिन वास्तु बढ़। अधिक सन्तार वा कारक हुमा करता है। जहां पर आग्नेय कोण म इस ॥ वृद्धि होती है ता यह अग्नि म
४२४
मत्स्यपुराण
होने वाले भय को प्रदान करने वाला हुआ परता है।
राक्षस कोण में
वद्धित वास्तु शिशुओ के क्षय का करने वाला हुआ करता है। वायव्य
कोण की दिशा मे तन्तु को बद्ध करके भी बातजन्य व्याधि के प्रकोप को
करने वाला हुआ करता है। ईशान दिशा मे अन को हानि सदा होती
है जब कि उस और वास्तु सद्धित होता है। ईशान मे देवता का
प्राभार तथा शाति गृह होना चाहिये ।। ३०, ३१, ३२, ३ ॥ आग्नेय
कोण मे महानस ( रसोई पर) और उसके पाश्व मे उत्तर दिशा में जल
के रहने का स्थान और बुध पुरुष को नैऋत्य कोण मे गृह के सभी
उपस्कर स्थापित करने चाहिए अर्थात् भण्डार गृह बनाना चाहिए ।
बाहिरी भाग मे बध का स्थान बनाना चाहिए तथा स्नान मण्डप भी
बाहिर ही बनाना चाहिये। वायव्य कोण मे धन-धान्य का स्थान बनावे
और इससे आगे बाहिर कमशाला का निर्माण कराना उचित है । इस
प्रकार से विष रूप वाला वास्तु ग्रह के स्वामी के लिए परम शुभ के
प्रदान करने वाला हुआ करता है ।। २४, ३५।।
१२०-दाहरण वर्णन
अथात सप्रवक्ष्यामि दाहिरणमुत्तमम् ।
निष्ठापञ्चकै मुक्तवा विष्टयादिक्मत परम् ॥१
तत सावत्सरादिष्टे दिने याया द्वन बुध ।
प्रथम वलिपूजाऊन कुर्यावृक्षस्य सवदा ॥२
पूर्वोत्तरेण पतित गृहतार प्रशस्यते ।
अन्यया न शुभ विन्द्यात पाम्योपरि निपातनम् ॥३
क्षारक्षोभय दारुन गह विनिवेशयेत ।
वृताधिवास वि, गरनिनारहितम् ।।
दावहिरण वर्णन ४२५ गजावग्णन्च तथा विद्युनिर्घातपीडितम् । अर्द्ध शुष्क तथा दारुभग्नशुष्क तथंवच ।।५ चंत्यदेवालयोता नदीसङ्गगजन्तथा। श्मशानकूपनिलय तडागादिसमुद्भवम् ॥६ वर्जयेत्सवथादाम्यदीच्छेद्विपुलाश्रियम् । तथा कण्ट किनोवृतान् नीपनिम्बविभीतकान १७ श्लेष्मातकानाम्रतस्न् वर्जयेद् गृहकमणि । आसनाशोक मधुकसजशाला: शुभावहा । चन्दन पनमन्धय सुरदारहरिद्रवः । द्वाभ्यामेवन वा कुर्यात मिभिर्वाभवन शुभम् ।। महा महपि श्री सूतजी ने कहा-इमके अनन्तर उत्तम दाहरण के विषय में कहता हूँ । धनिष्ठादि पांच नक्षत्रो पो छाइकर और इसके मागे विष्टयादि (भद्रा) को त्याग कर बुध पुरुष को साम्वत्सार स इष्ट दिन प वन मे गमन करना चाहिए । सवया प्रथम वृक्ष की वनि पूजा करनी चाहिए ॥१२॥ पूर्वोत्तर मा मे पतित गृह का दारु (पाठ) प्रशस्त होता है । अ यया याम्य दिशा में ऊपर नियातन शुभ का लाभ नही किया करता है । भीर वृक्ष स ममुत्पन्न हान वाना काष्ठ कभी भी गृह में विनिवशिन न परावे । पक्षियो के द्वारा अधिवास किया हुमा- अनिल और अनल स पीडित - गज से अवरुण-~विद्य न ब निर्यात से पोहिन-अद्ध गुरुक-दारु क भग्न होन स गुप-चत्य और दशालय म ममुपन-दयो क समम पिजन वाला-मशान मार धूप के निलय वाला-नाग आदि म ममुद्रत हान गला ऐम बाष्ठ का सत्या जिन कर दना चाहिए। यदि विपुल श्रार प्राप्त करन वा इदा हृदय म हो । वाट वान वो रो-नाप, निव, विभतकोमानो को, आग्न तमा रोगह + निर्माण + म म यजिन पाना चाहिए । भासन-प्रशोर-मधुर और सजमाल य मर गुमावह हाल है। पन्दन- ४२६ मत्स्यपुराण पनस परम धन्य हैं। सुरदारु और हरिद्रव इन दोनों में से एक के द्वारा अथवा तीनों के द्वारा शुभ भवन का निर्माण करना चाहिए। बहुभि. कारित यस्मादनेकभयद भवेत् । एकैव शिशपा धन्या श्रीपर्णी तिन्दुकोतथा १० एता नान्यसमायुक्ता. कदाचिच्छुभकारकाः । स्यन्दनः पनसस्तद्वत्सरलार्जुनपाकाः ॥११ एते नान्यसमायुक्ता वास्तुकार्यफलप्रदा,। तरुच्छेदे महापीतेगोधा विन्द्याद्विचक्षणः ।।१२ माजिष्ठवर्णे भेक स्यान्नीले सर्पादि निदिशेत् । अरुणे सरठ विद्यान्मुक्ताभे शुकमादिशेत् ।।१३ पपिले मूषकान्विद्यात् खड्गाभे जलमादिशेत् । एवविध सगर्भन्तु वजयेद्वास्तु कर्मणि ॥१४ यो क बहुतो के द्वाग जो कराया जाता है वह अनेक भयो के प्रदान करने वाला होता है । एक ही शिशपा का वृक्ष परम धन्य होता है और श्रीपर्णी तथा तिन्दुकी भी उसी प्रकार से परम धन्य हैं। ये अन्य से समायुक्त न होकर किसी समय मे शुभ कारस होत है। उसी तरह स्यन्दन-पनस--सरल-अर्जुन और पद्मक भी हैं। ये अन्य स समा युक्त न हात हुए वास्तु कार्य के फल के प्रदान करन वाले हैं। विचक्षण पुरुष महापीन तरु के छेदन होने पर गोया की प्राप्ति करे। यजिष्ठा के वर्ग में भेक हावे सपा नोल म सादि का विनिर्देश करना चाहिए । अरुण वण मे सर को जानना चाहिए। मुला की भाभा वाले में शुक फा महादेश करे। १.-१३ वपिल वर्णम मूपकों को जानना चाहिए। रङ्गको आमा बाले मे जल का समादश कर । इस प्रकार के सभ को मास्तु धार्म म यजित पर देना माहिए ॥११॥ -
दाहिरण वर्णन
पूर्वच्छिन्नन्तु गृहणीयानिमित्तशकुनः शुभैः ।
व्यासेन गुणिते देध्यंअप्टाभिवते तथा ॥१५
यच्छेपमायत विद्यादप्टभेद वदामि वः।
ध्वजो धूमश्च मिहान वृपभ. खर एव च ।।१६
हस्तीध्वाक्षश्च पूर्वाद्या. करशेपाभवन्त्यमी ।
ध्वजः सवमुखाघन्यः प्रत्यगद्वारीविशेषत ॥१७
उदङ्मुखो भवेत्मिह प्राड मुखो वृपभो भवेत् ।
दक्षिणाभिमुखो हम्तो मप्तमि ममुदाहन. ॥१८
एकेन ध्वज उद्दिष्टस्तिभि सिंह प्रतितः ।
पमिपम प्रोतोविकोणस्थाश्चवजयेत् ।।१६
तमेवाष्टगुणकृत्वा वरगशि विचक्षण ।
समविशाहतेभागे ऋक्ष विद्या द्विचक्षण २०
गुम निमित्त शत्रुनों के द्वारा पूर्व च्छिन्न का प्रण करना
चाहिए । व्यास के द्वारा गुणित हान पर आटो म बटन होन पर दीपंता
होती है। उसस जो मेष है-वह अायत जानना चाहिए । मैं आपको
आठ भेद बतलाना हू-ध्वज, घम, मिह. वृषन, मुर, हस्ती और प्वइस
पूर्व द्या कर शेष होत हैं । ध्वज मवंमुस घन्य होता है और विरोप स्प
स प्रत्यम् द्वार होता है ।।१५, १६, १७॥ उत्तर की आर मुख वाला सिंह
होता है और पूर्व की ओर मुम मे सुन वषम होता है । दक्षिण दिया क
अभिमुम हाने वाला हस्टी है तथा इमो प्रचार में यह मान प्रकार वाला
उद्दन किया गया है ।।१८।। एक द्वारा वर कहा गया है-तीन के
दारा सिंह कीतिन दिया गया है - पांवों में वृषभ उक्त हुआ है। जो
त्रिकोण मे म्यन हान हैं दे मब वरिन मान गय है अत उनका -िपिट
मानना चाहिए । दिक्षा पुष्प वा चाहिए उनार गरिकी अटगुना
पर प्रदर्शन जाट म गुना व मनाम भाग मम हत करे और टमी
सर (133) राजन नना नदिए 1, oil
१२८
मत्स्यपुराण
अष्टभिर्भाजितेऋक्षेय शेप सत्ययो मत ।
व्यायाधिक न कुर्वीत यतोदोपकरम्भवेत् ॥
आयाधिके भदेच्छातिरित्याह भगवान हरि ॥२१
कृलाग्रतो द्विजवरानथ पूण कुम्भ ,
दध्यक्षताम्रदलपुष्पफलोपशोभम् ।
कृत्वा हिरण्यवसनानि तदा द्विजेभ्यो
मङ्गल्यशान्तिनिलयाय गृहविशेत्तु ।।२२
गृह्यातहोमविधिमा बलिकर्म कुर्यात्-
प्रासादवास्तुशमने च विधियउक्त ।
सतपयेद्विजवरानथ भक्ष्यभोज्य
शुक्लाम्बर स्वभवन प्रविशेसधूपम् ॥२३
असे भाजित करने पर जो नक्षत्र शेष होता है वह समय
माना गया है । व्यय से अधिक नहीं करना च हिए क्योकि वह दोषकर
होता है । भगवान थी हरि ने यही कहा है कि आयाधिक मे शति होती
है।1-1 FH क अन तर द्विज थष्ठो को आगे करके दधि अक्षत, आदल,
पुष्प, फल इनस उपशोभित पूर्ण कुम्भ को करके द्विज गणो के लिए
उस समय म सुवर्ण तथा वस्त्रादि देकर मङ्गल्य शाति निलय के लिये
माह में प्रवेश करना चाहिए। फिर गृह्य म वणित हाम के विधिक
साथ बलि का करना चाहिए । यही प्रासाद क वास्तु का शयन करने
मे विधान बनाया गया है। इसके उपरात मध्य भोज्यो के द्वारा
थप्ठ दिन गणो को सतप्त करना चाहिए और स्वर शुक्ल बस्यो को
प्रारण करन वाला धप के दान के सहित अपन भवन में प्रवेश करे
प्रतिमा निर्माण वर्णन
४२३
१२१-प्रतिमा निर्माण वर्णन
क्रियायोगः कथ सिद्ध येद् गृहस्थादिषु सर्वदा ।
ज्ञानयोगसहस्राद्धि कर्मयोगा विशिष्यते ।।१
क्रियायोग प्रवक्ष्यामि देवतार्चानुषीतनम् ।
भुक्निमुक्तिप्रद यम्मानान्यत् लोपु विद्यते ।.२
प्रतिष्ठाया सुराणा तु देवाता_नुकोर्तनम् ।
देवयज्ञोत्मवन्चापि बन्धनाद्ये न मुच्यते ॥३
विष्णोस्तावत्प्रवक्ष्यामि यादृग्रूप प्रशस्यते ।
शह चक्रधरशान्त पग्रहस्तगदाधरम् ।।
च्छवासारशिररम्तम्य कम्युग्रीव शुभेक्षणम् ।
तुङ्गनाम मुक्तिकर्ण प्रशान्लोरुभुजक्रमम् ॥५
पचिदष्टभुज विद्याच्चतुर्भुजमथापरम् ।
द्विभुजम्चापि कनव्या भवनेषु पुरोधमा ॥६
देवस्याप्टभूजस्यास्य यथाम्यान निवोधत ।
खड़गोगटार. पद्म दिव्य दक्षिणतो हरेः ।।
ऋषि वाद ने कहा-गृहस्थ आदि में किया पा योग किस प्रकार
से सवंदा मिट होता है यह कृपया बतलाइये क्यापि सहनों गान योग से
कर्म योग विशिष्ट इसा परता है ॥१॥ महा महर्षि श्री सूतजी ने कहा-
में अब उम क्रिया योग को बतलाना हूँ जिममें देवगग के अर्चना का
धनुरीतन किया जाता है कोरि उससे अन्य लोगो मे मनि और मुक्ति
का प्रदान करने वाला कोई भी नहीं होता है ॥२॥ मुरगणों पीप्रनिहाय
देवताओ रे अम्पन का अनुशीर्तन और देवयमों का उत्सव भी होता
है । जो ऐसे नहीं करते हैं वे बन्धन से मुक्त नहीं होते हैं । भगगन वित
विषक में में वर्णन करता हू जैसा कि उनका मसन रहा जाया
बरता है। मघ-चरु भौर गदा में धारण करने वाना-परम प्रशान्त
४३०
मत्स्यपुराण
हाथ मै पदम तथा गदा को धारण किए हुए-उ7का शिर छन क आकार
से सयुत है-कम्बु के समान ग्रीवा वाला-शुभ नत्रो से युक्त--तुङ्ग
(केची ) नासिका से सम्पन शुक्ति थे, तुल्य कानो वाला- परम
प्रशान्त जरुयुग और भुज ओ के क्रम से समन्वित कही पर आठ भुजाओ
से युका और दूसरा चार भुजाओ से युक्त एवं भुजाओ से भी सम्मान
उनका स्वरूप होता है । भवनो मे पुगेहित क द्वारा ऐसा ही उपयुक्त
स्वरूप से समन्वित उनका स्वरूप करना चाहिए । अष्ट भुजाधारी इस
देव को यथा स्थान समझ लेना चाहिए । खङ्ग--गदा-शर-दिव्य
पद्म-ये सब आयुध भगवान् विष्णु के दक्षिण भाग में होने चाहिए
॥३-७॥
धनुश्च खेटकञ्चैव शवयक च वामत ।
चतुर्भुजस्य वक्ष्यामि यथवायुधसस्थिति ॥८
दक्षिणेन गदापद्म वासुददस्य कारयेत् ।
वामत शसवा च वर्तव्ये भूतिमिच्छता ॥६
कृष्णावतारे तु गदा वामहस्ते प्रशस्यते ।
यथेच्या दहचन घोपरिप्टात् प्राल्पियेत॥१०
अधरतात पृथिवी तम्य कर्तव्या पादमध्यत ।
पक्षण प्रणन तद् गहरमन्तनिवेशयेत् ॥११
बामनस्तुभवललक्ष्मी पास्ना शुभानना ।
गरत्मानपतोवापि सम्थाप्या भूमि-छता ॥२
औराष्टिश्च यतव्याश्यया पग्रसयुते ।
तारणमापरिष्टात विद्याधरसमन्वितम् ।।१३
दयदुदुभिसयुस गन्धयमिथुनापितम् ।
पत्रकात्रीसमापत सिंह याघ्रसमन्वितम् ॥१५
धनुप-पटर-गर-पत्र में पार आप उन वाम भाग में रहने
पाहिए। यह प्राट मात्रों व प्रामृधौ धरणाम होता है।
प्रतिमा निर्माण वर्णन वाम अब चतुर्भुज भगवान विष्णु के आयुधो को धारण करने के क्रम एवं सम्थिति का वर्णन किया जाता है। भगवान् वासुदेव के दक्षिण भाग में गदा और पद्म इन दो प्रायुधो को धारण कराना चाहिए । वाम भाग मे जो भूति के प्राप्त करने की इच्छा रखता है उस भक्त को चाहिए कि वाम भाग मे शख और चक्र इन दो आयुओ को धारण कराना चाहिए । भगवान् के कृष्णावतार मे गदा वाये हाथ मे हो प्रशस्त मानी गयी है। अपनी इच्छा के अनुसार ही ऊपर से शस तथा चक्र इन दो आयुधो को कल्पना करनी चाहिए । उनके नीचे की ओर पाद के मध्य भाग मे पृथिवी को कल्पना करनी चाहिए और दक्षिण भाग मे उसी प्रकार से प्रति करते हुए गरुड का निवेश करना चाहिए ||८-११॥ भगवान् के भाग में पद्म हाथो मे धारण करने वाली तथा परम शुभ मुख पाली लक्ष्मी देवी विराजमान होनी चाहिए । विभूति की इच्छा रखने वाले पुरुप को चाहिए कि भगवान् के आगे गाड की मी सस्थापना करनी चाहिए । दोनो पाश्वं भागो मे पदों से मयुर थी और बुष्टि इन दोनो की सस्थापना करे। विद्याधर मे मयुत ऊपर के भाग में तोरण वनावे।१२ ११३। देवो की दुन्दुमि नाद वाले वाद्य से युक्त गन्धों के जोहे से सम- यित-पत्रवल्लो समोपेत -सिंह और ध्यान से युक्त भगवान् को स्थापना वहा पर करनी चाहिए ॥१४॥ तथाकल्पलतोपेत स्तुवद्भिरमरेश्वरैः । एवविधोमवेहिष्णो स्त्रिामागेनास्य पीटिकाः ॥१५ नवतालप्रमाणास्तु देवदानवकिन्नराः । अतः परं प्रवक्ष्यामि मानोन्मानं विशेषत. ॥१६ जालान्तरप्रविष्टानां भानूना यद्रज: स्फुटम् । प्रसरेणुः सविनेपो वालाग्रन्तग्याप्टभिः ।।१७ सदष्टकेन लिक्षा तु यूकालिक्षाप्टकमंता। यवो पूराष्टकं तद्वदप्टमिस्तस्तदगुलम् ॥१८ ४३२ मत्स्यपुराण स्वकीयांगुलमानेन मुख स्याद्वादशागुलम् । मुख मानेन कतव्या सवयवकल्पना ॥१६ सौवीराजतीवापि ताम्री रलमयो तथा। शैलीदारमयीचापि लोहसघमयी तथा ॥२० रीतिकाधातुयुक्तावा ताम्रकास्यमयी तथा। शुभदारमयीवापि देवतार्चा प्रशस्यते ॥२१ करुपलता से सयुत तथा देवगणो के द्वारा स्तुति किये जाने वाले भगवान् विष्णु को स्थापित करे। इन विष्णु की तीन भाग से वहा पर पीटिका होनी चाहिए ॥१५३वह पीठिका जो है इसके समीप मे नवताल प्रमाण वाले देव गधव और किनर स्थापित करे। अब इसक आगे विशेष रूप से मानो मान के विषय में वर्णन करता हूँ ॥१६॥ बाल के अतर में प्रविष्ट भानु की किरणो के द्वारा जो स्फुट रूप से ग्ज के कण दिखलाई दिया करते हैं उनको उस रेशु जानना चाहिए। वे बाल के अग्न भाग के समान होते हैं। उन आठो की एक लिक्षा होती है। पाठ लिक्षाओ की एक युका मानी गयी है । पाठ यूकानो का एक यव होता है और पाठ यवा का एक अगुल हुआ करता है ||१७ १८|| अपने अंगुल के मान से द्वादश अगुलो का मुख होता है। इस मुख के मान के द्वारा हो समस्त प्रत्यवो की कल्पना करनी चाहिए ॥१६गवान् की प्रति- माएँ मुवण से-रजत (च'दी) से निर्मित होती हैं तथा ताम्र और रस्नो के द्वारा निर्मित की हुई हुआ करती हैं । शली अर्थात् पाषाण से-दारुमयी अर्थात विसुख काष्ठ स भी निर्माण की हुई प्रतिमाएं होती हैं और लोह सघ से पूर्ण होती हैं । रौति का अथवा धातु से युक्त-- ताम्र और कास्य मिश्रण से निर्मित या गुम काष्ठ के निग्रह वालो देवता की प्रतिमा की सी प्रास्त होती है ॥२०,२१॥ अमुष्ठपर्वादारभ्य वितस्तिर्यावदेव तु । गृहेषु प्रतिमा कार्या नाधिका शस्यते बुध ॥२२ प्रतिमा निर्माण वर्णन आपोडशा तु प्रासादे कतव्या नाधिका तत. । मत्योत्तमकनिष्ठा तु कार्या वित्तानुमारत ॥ ३ द्वारोच्छायस्य यन्मानमष्टधा तत्तु कारयेत् । भागमेक ततस्त्यक्त्वा परिशिष्टन्तु यद्भवेत् ।।२४ भागद्वयेन प्रतिमा विभागीकृत्य तत्पुनः । पीठिका भागत कार्या नातिनीचा नचोन्छिना ॥२५ प्रतिमामुखमानेन नवभागान् प्रकल्पयेत। चतुरगुना भवेद्ग्रीवाभागेन हृदयपुन ॥ नाभिस्तस्मादध: कार्या भागेनकेन शोभना । निम्नवेविस्तरत्वे च अगुलपरिकीर्तितम् ॥२७ नाभेरधस्तथामेट भागेनकेन कल्पयेत् । द्विभागेनायतावरू जानुनी चतुरगुले ।। अपने अंगूठे के पर्व से आरम्भ करके एक विनस्ति (दिलाद या वलिदत) पर्यन्त लम्बी और बही देव प्रतिमा निर्मित करानी चाहिए । बुध पुरुषो के द्वारा इस प्रमरण से अधिक बडी प्रतिमा को प्रशस्त नही बतलाया गया है ॥२२॥ जो प्रासाद ही उसमे पोहा से अधिक वडी प्रतिमा कमी नहीं करानी चाहिए। अपने दित्त के अनुमार उत्तम-मध्यम और कनिष्ट प्रतिमा का निर्माण कराना आवश्यक है ।।२३।। द्वार के उच्छाय का जो मान है उसको आठ भाग करे । उनमें से एक भाग का त्याग करके जो परिशिष्ट होवे ॥२४॥ उनमें से दो भागों के प्रमाण से प्रतिमा की रचना करानी चाहिए। फिर उसके तीन भाग करके भाग से पीठिया की रचना करे। वह पीठिका न तो अत्यन्त नीवी होनी चाहिए योर न भधिक उच्छित हो होनी चाहिए ॥२५।। प्रतिमा के मुख मान से नो भागो की प्रकल्पना करनी चाहिए। चार अगुल वाली ग्रीवा होवे और फिर भाग के द्वारा हृदय की रचना होनी चाहिए ॥६॥ उसके अर्थाद उर.स्थल के नीचे एक भाग से परम शोमन नाभि का निर्माण
मत्स्यपुराण
१६ || KTM और विस्तार मे अंगुल ही कीतित किया
१५ | ut मोरे एक भाग म मद की रचना की कल्पना करे
और भागो के द्वारा पायत अरुओ एम चार अगुल के प्रमाण वाले
भानुओं की रचना करनी चाहिए ! ७, ८॥
जड्घेदिवभागेविरयातेपादौ च चतुरगुली।
चतदशागुलस्तद्वन्मौलिरस्य प्रकोतिर ITE
उदध्वमानमिदप्रोक्त पृथुत्वञ्चनिबोधत ।
सवियत्रमानेषु विस्तार शृणुत द्विजा ॥३०
चतुरगुललाट स्याद्ध्व नासा नथैव च ।
दृय गुलन्तु हनुज्ञेयमोष्ठ स्वागुलसम्मित ।।३१
अष्टागुले ललाटे च तावन्मान भ्रवो मते ।
अर्धा गुलाभ्रुवोर्लेखा मध्ये धनुरिवानता ३२
उन्नताना भवेत्पावें श्लक्ष्णा तीणा प्रशस्यते ।
अक्षिणो द्वचगुला यामे तदधं चैव विस्तरे ॥३३
उन्नतोदरमध्ये तु रक्तान्ते शुभलक्षणे ।
तारकाविभागेन हष्टि स्यास्पञ्चभागिका ॥३४
द्वचगुलन्त ध्रुवोमध्ये नासामूलमथागुलम् ।
प्रतिमा निर्माण वर्णन
४३५
मात्रा वाली ही मोहे मानी गयी हैं। धूओं के लेबा आधे अंगुल को होतो
हैं जो भ्रू ओ के मध्य म घनुप की नौनि मानन हुआ करती है। पावं
भाग में वह उन्नत अग्र भाग वानी होती है तथा इलामा और तोरण
प्रशस्त कही जाया करती है। दो अगुल की याम वाली दो पक्षियों होनी
चाहिए और विस्तार में इससे भाधी होवे ।।३१.३२, ३३।। उन्नत उदर
के मध्य भाग वाली और यन्त में रक्त वण स युन ने शुभ लक्षण से
सम्पन्न हुधा करती हैं । तारक के अध विभाग म दृष्टि परंच मग वाली
होती है ॥३॥ भोही के मध्य मे दो अगुत के प्रमाण वाला गसिका का
मूल होता है और एक अगुल नामिका के अग्नभाग का विस्तार हुआ
करता है। इसी भांति स आनन नामिका क दो पुर हुआ करत
हैं ।। ३५॥
नासापुटदिलतद्वदर्धा गुलमुदाहतम् ।
कपोले द्वगुले तद वन कर्णमूलादि वनिगते ।।३६
हन्व ग्रमगुल तद्विस्तारो द्वध गुलो भवन् ।
अर्धा गुलाबोराजी प्रणालसदृशी ममा ॥३५
अर्दा गुलसमस्तद्वदुत्तराष्ठम्तु वित्तर।
निप्पावसदृशन्नद्वन्नासापुटदल भवन ॥३८
मुक्किरणी ज्योतिस्तुल्ये तु कर्णमूलात् पदगुले ।
वो तु ममोस यो ऊद्वन्त चतुरगुलो ॥३६
दृचालोकर्णपाश्चौ त मात्रामेकान्तु विस्तृतो।
कणयोरपशिष्टान्चमस्तक हादशागु लम् ॥ ४०
ललाटात्पृष्ठनोभेन प्रोतमष्टादमागुलम् ।
पशिशा लश्चान्य परिणाह. शिरोगत. ॥४१
सकेशनिचयो यम्य द्विचत्वारिंशद गुल. ।
वैशान्तानुका तददगुलानि तु पोडश ।।४२
प्रतिमा निर्माण वर्णन अग प्ठकसमा तद्वदायामा स्यात्प्रदेशिनी . तस्या पोडशभागेन हीयते मध्यमाग ली।४८ अनामिकाप्टभागेन कनिष्ठा चापि हीयते। पर्वत्रयेणचागुल्यागल्फो द्वयगलको मतो ॥४६ ग्रीवा के मध्य का परीणाह चौबीस अगुल का होना चाहिए। आठ अगुल की ग्रीवा जो होती है पृथुत्व से प्रशस्त मानी गयी है ।।४।। स्वयम्भू ने स्तनो और ग्रीवा का अन्तर एक ताल वहा है। दोनो स्तनो का अन्तर उसी भांति से बारह अंगुल का होना चाहिए जो कि अभीष्ट है ।।४४।। स्तनों का मण्डल भी उसी प्रकार से दो प्र गुल का परिकीत्तित किया गया है । स्तनों के चूचुक (घुण्ड) उस मण्डल के अन्दर दोनो यव मात्र होनी चाहिए--ऐसा कहा गया है ।।४शा विस्तार से वक्षः स्थल भी द्विताल बताया गया है। बाहुओं के मूल मे स्तनो के बीच में दोनो कक्षो का परिमाण छ- अ गुल वा कहा गया है !!४६।। चौदह अ गुल के दोनो पैर और तीन प्र गुल के परिमाण से युक्त दोनो अमुष्ठ होते हैं । पांच अगुल के परीणाह ग युक्त एव उन्नत अंग का अग्र भाग होता है । अगुष्ठ के ही समान उसी के समान आयाम वाली प्रदेशिनी होती है। उसके सोहल- भाग से मध्यालि हीन होती है ।।४७, || अनामिका आट भाग से और कनिष्ठा भी होन हुआ करती है। तीन पर्व से अगुलियां और दोनो गुल्फ दो अगुल के माने गये हैं ॥ ४६॥ पाणि चगु लमानस्तु कलशाच प्रकीर्तितः। द्विपगि प्ठः प्रोक्त परीणाहश्च चगुल.॥५० प्रदेशिनी परीणाहस्त्यग ल. समुदाहृत.। कन्यसा चाप्टभागेन हीयते क्रमशोद्विजाः ॥५९ अगलेनोच्छरः गर्यो. ह्य गप्ठस्थ निशेषत. । तदर्धन त शेणामगलानान्तथो घर । ३२ जड्याग्रे परिणाहस्त अगलानि चतदया।
मत्स्यपुराण नासिका के पुट का दिल उसी भौति से आधे अगुल का कहा गया है । दो अगुल के प्रमाण से युक्त दोनों कपोल होने चाहिए जो कर्ण- मूल से विनिगंत हुआ करते हैं ।।६६॥ दनु के प्रप्रभाग का विस्तार दो मंगुल और पह एक बंगुल होता है । घओं की राजी आधी अंगुल वाली होती है जो प्रणाम के सदृश एवं सम हुआ करती है ॥ ३७ ॥ विस्तार मे उसी को भौति उत्तरोष्ठ अद्ध अंगुल के समान होना चाहिए। उसी तरह से निष्पाप के समान नासापुटों का दल होता है ।।३८॥ को के मूल से छ अंगुल परिमाण वाली ज्योति के तुल्य सृविकणी होनी चाहिए । और दोनो कान घूहो के समान जानने चाहिए जो ऊर्व भाग में चार अगुल प्रमाण वाले हों ।।३६॥ कणों के पार्थ भाग दोनों दो अगुल के होने चाहिए और एक मात्रा दिस्तृत होवें। दोनों कानों के कपर मस्तक बारह अगुल का होना चाहिए। ललाट से पृष्ठ भाग में इसके आधे भाग से युक्त कहा गया है जो अठारह अंगुल होना चाहिए । इसके शिर में होने वाला परिणाह छत्तीस अगुल का होता है । जिसके केशो के निचय के साथ परिमणि क्यालीस अ गुल का होता है। केशान्त उसी भांति दनु का सोलह अंगुल की होती है ॥४०-४ ।। ग्रीवा मध्यपरोणाहश्चतुर्विशतिकांगुलः । अष्टांगुला भवेद ग्रीवा पृथुत्वेन प्रशस्यते ।।४३ स्तनग्रीवान्तरं प्रोक्तमेकताल स्वयम्भुवा। स्तनयारन्तरं तद्वद् द्वादशांगुलमिष्यते ॥४४ स्तनयोमंण्डलतद्ववचङ्गलं परिकीर्तितम् । चूचुको मण्डलस्यान्तयंवमात्रावुभौस्मृती ॥४५ द्वितालञ्चापि विस्तराद्वक्षन्यलमुदाहृतम् । कक्षे पग लेप्रोक्ते वाहुमूलस्तनान्तरे ॥४६ चतुर्दशांगुलीपादावमाप्ठो तु प्रियंगु लो। पञ्चांग लपरोणाहमह गुप्ठाय तथोन्नतम् ।।१७ प्रतिमा निर्माण वर्णन - अग प्ठक्समा तहदायामा स्यात्प्रदेशिनी , तम्या पोडशमागेन होयते मध्यमागली अनामिकाप्टभागेन कनिष्ठा चापि हीयते। पवयेणचागल्यागल्फो द्वन्चगलको मतौ ॥४६ ग्रीवा के मध्य का परीगाह चौबीस अ गुल का होना चाहिए । आठ व गुल की ग्रीवा जो होती है पृयुव स प्रास्त मानी गया है ।।४।। स्वयम्भू न स्तनों और ग्रीवा का अतर एक ताल रहा है। दोनों स्तनों का अन्तर उसी मांति स दारह अंगुल का होना चाहिए जानि अभीष्ट है ।।४४॥ स्तनों का मण्डत भी उसी प्रकार स दो भ गुल का परिकीतित किया गया है । स्तनों व चूचुक (घुण्ड) उस मण्डल के अन्दर दोना यव मात्र हानी चाहिए-एमा कहा गया है ॥४ा विस्तार स पक्ष स्थल भी द्विताल बताया गया है। बाहुओं के मन म स्तनों बीच में दोनों कक्षा का परिमारा ; अ गुल का कहा गया है ॥४६॥ चौदह अगल क होना पैर और तीन प्रगुल के परिमाण से युक्त दाना अगुष्ठ हात हैं। पांच बगल में परह ग युक्त एवं उनत अंगठ का वा नाग होता है । अगुष्ठ हो समान टमी के समान आयाम वाली प्रदगिनी होती है। उस सोल भाग स मध्यागनि हीन हाती है ॥४७, El अनामिका आट भाग मोर कनिष्टा भी हीन हुआ करती है। तीन पव स बलियो और दोनों गुरूप मान + मान गय हैं ॥४६॥ पाणि चगु लमानस्त क्लयाच प्रकीर्तित । द्विपर्वा गप्टन प्राक्त परीणाहश्च दयाल ॥५० प्रदशिनी परीगाह यगल समुदाहृत । बन्यमा चाप्टमागेन हायत जमशोदिजा ॥११ वगतनाच्छर कार्यों ह्य गप्टम्य जिमपत । तदर्धन तगामगगनान्तया छ र जदयाय परिणाहनालानि चरम।
४३८ मत्स्यपुराण - जड घामध्ये परीणाहस्तथैवाष्टादशाग ल ५३ जानुमध्ये परीणाह एकविशतिरगुल. । जानूच्छ्योऽङ्ग लप्रोक्तो मण्डलन्तु निरग लम् ॥५४ उरुमध्ये परीणाहो ह्यष्टाविंशतिकाग ल । एकनिशोपरिष्टाच वृषणी तु विरग लो ।।५५ द्वयग श्च तथामेढ़ परीणाह पडग लम् । मणिबन्धादधोविद्यात् केशरेखास्तथैव ।।५६ पाणि दो अगुल परिमाण वाला कला से उच्च कोत्तित किया गया है । अगुष्ठ दो पर्यों वाला कहा गया है और परीणाह भी दो अगुल वाला होता है । प्रदेशिका का परीणाह तीन अगुल वाला कहा गया है । हे दिगण पत्यमा आठ भाग से कम से हीन होती है । एक अ गुल था उच्छ्य अ गृष्ठ का विशेष रूप से करना चाहिए । उसके माध भाग से पोप अ गुलियों या उसी भांति उच्छ्य होना चाहिए ।।५०,५१, ५२॥ जहाओ य प्रम भाग में पौदह अ गुलो वा परीणाह होता है। जांघों में मध्य में परीणाह उसी भाति अठारह अ गुल का होता है ॥५३॥ जानुभो * मध्य में जो परीगाह है वह इवास प गुल र परिमाण वाला है। जानुओं या उच्छुप एक अ गुत पहा गया है और म०इल तीन अ गस वा शेता है ॥५४॥ अरुप्रो के मध्य में अट्ठाईस गुल के परिमाण स युक्त परीशाह होता है । और कार सत्तीम गुल का होता है। दोनो तीन अंगुन वाल है। दा अगुल का मेद है सपा इसका परीगाह छ अगम का होता है। उगी भांति से मगिम्य स मीप बरा रयाएँ जाननी पारि ॥५५ ५६॥ मणियापरीणादग्गन इप्यते । विस्तरण भयसाटिरष्टादशा।। ५७ द्वाविशति तथा स्त्रीणा स्तनो पदासागुनो। नाभिमप्य परीणाम दियावारिशद ग1. ॥२८ वृषण
प्रतिमा निर्माण वर्णन
४३६
पुरुपे पञ्चपञ्चाशत् कटयाञ्चंव तु वेप्टनम् ।
वक्षयोम्परिप्टात्तु स्कन्धोप्रोक्तो पडगुलौ ॥५६
अष्टाग लान्तु विस्तारे ग्रीवाचव विनिदिशेत् ।
परीणाहे तथा ग्रीवा कला द्वादश निदिशेदः। ६०
आयामो भुजयोस्तद्वत् द्विचत्वारिंशद गुल ।
कार्यन्तु वाहुशिखर प्रमाणेपोडागुलम् ॥६१
उद्धवं यद्वाहुपर्यन्त विन्द्यादप्टागुल शतम् ।
तथैकाग लहीनन्तु द्वितीय पर्व उच्यते॥६२
वाहुमध्य पराणाहो भवेदप्टादशाग ल.।
पोडशोक्तः प्राहुस्तु पट्कोग्रक्रोमतः ।।६३
मणि कोश का परीणाह चार अ गुल का अभीष्ट होता है। उसी
भांति विस्तार से कटि अठारह अ गुल की होनी चाहिए ।।५७ स्त्रियो की
कटि बाईस अ गुल की होती है और दोनो स्तन बारह अ गुल के होते हैं।
नाभि के मध्य का परीणाह क्यालोस अ गुल वाला अभीष्ट होता है।
॥५८॥ पुस्प मे पचपन और पटि मे वेष्टन तथा दोनो कक्षो के ऊपर छ
अंगुल के स्वन्ध बताये गये हैं। विस्तार मे ग्रीवा को आठ अ गुल की
विनिर्दिष्ट करनी चाहिए और परीणाह मे ग्रीवा को बारह क्ला निर्दिष्ट
करना चाहिए ॥५६, ६०॥ दोनो भुआनो का आयाम उसी भांति म
बयालीस अंगुल का होता है। बाहुशिखर को प्रमाण मे सोलह अगल
का करना चाहिए । ६१ अन्द भाग में बाहुपर्यन्त एक सौ आठ अंगल
का लाभ करना चाहिए। उसी प्रकार से एक मगल हीन दूपरा पर्व
कहा जाता है। वाहुआ क मध्य म अठारह अगुल का परीणाह होना
चाहिए । प्रवाह पाइश कहा गया है और न कर पट्कना वाला माना
गया है ॥६२, ६३॥
सप्तागल करतल पञ्चमध्याग लीमना ।
अनामिा मध्यमाया ममभागेन होया ॥६४
मत्स्यपुराण तस्यास्तु पञ्चभागेम कनिष्ठा परिहीयते । मध्यमायास्तु होना वं पञ्चभागेन तजनी ॥६५ अगुष्ठस्तजनीमूलादध प्रोवतस्तु तत्सम । अगष्टपरिणाहस्तु विज्ञ यश्चतुरग ल ॥६६ शेषाणामगुलीनान्तु भागो भागेन हीयते । मध्यमामध्यभागन्तु अग लद्वयमायतम् ॥६७ यवो यवेन सर्वासान्तस्यास्तस्या प्रहीयते । अगष्ठपवमध्यन्तु तजन्या सदृश भवेत् ॥६८ यवद्वयाधिव तद्वदग्रपव उदाहृतम् । पों तु नखान्विद्यादगुलीषु समन्तम १६६ स्निग्ध श्लक्ष्ण प्रकुर्वीत ईषद्रक्त तथाग्रत । निम्नपृष्ठ भवेन्मध्ये पाश्वत क्लयोनिछतम् ॥७० सात अ गुल का करतल होता है और पांच मध्यागुली मानी गयो है । अनामिका, मध्यमा अगलि से सात भाग से हीन हुआ करती है ॥ ६॥ उसके पाँच भाग से हीन पनिष्ठा कही जाया करती है। मध्यमा से होन नजेनी पाच भाग से हुआ करती है। सजनी के मूल से नीचे उसी के समान अगष्ट कहा गया है । अग ४ का परीणाह तो चार अ गुल का जानना चाहिए ॥ ६५ । शेप अ गुलियो का भाग म हीन होता है। मध्यमा के मध्य भाग दो अगल आयत बाग होता है ॥६७। सबका २व यव स उस-उसका प्रयित हुमा करता है । अग छ के पर्व का मव्य तर्जनी के ही सदश हुमा करता है। उसी माति अग्रपर्व दो यव स अधिक उदाहृत दिया गया है। अगलियो को सभी आर पूर्वाद्ध' म खो को जानना पाहिए ॥६,६६॥ अग्रभाग म थोड़ा रन-स्निग्ध और पण करना पाए। मध्य म मि न पृष्ट पोर पार्क में वला स उच्छित हाता पाहिए ॥७॥ इस
प्रतिमा निर्माण वर्णन
४४१
तत्रैव केशवल्लीय स्वन्धोपरि दशाइगुला।
स्त्रियः कार्यास्तु तन्वङ्गय स्तनोग्जधनाधिका ७१
चतुर्दशागुलायाममुदरं नाम निदिशेत् ।
नानाभरणसम्पन्नाः किञ्चित्श्लक्ष्णभुजास्तत.७२
किञ्चिद्दीर्घ भवेद्वक्त्रमलकावलिमत्तमा ।
नासाग्रीवा ललाटञ्च साढे मात्र बिरगुलम् ।।७३
अध्या गुलविस्तारः शस्यतेऽधरपल्लवः ।
अधिक्नेयुग्मन्तु चतुर्भागेन निदिशेत् ।७४
ग्रीवावलिश्च क्तव्या किञ्चिदर्धा गुलान्छ्या।
एव नाराषु सर्वासुदेवाना प्रतिमासु च ॥
तव बालमिद प्रोक्त लक्षण पापनाशनम् ।।७५
वही पर केशो की वल्ली स्कन्धो के ऊपर दश अ ग ल परिमाण
वाली होनी चाहिए। स्त्रियों का विग्रह तनु अर्थात् कृश अङ्गो वाला
करना चाहिये । इनके तो केवल स्तन अरु और जड्डाऐं ही अधिक परि-
पुष्ट होने चाहिएँ ।।७१।। चौदह अंगल के आयान वाला उदर निर्दिष्ट
करना चाहिये । नाना आमरणो स सम्पन्न और कुछ इलक्षण मुजाओं स
युक्त स्त्रियो विपह होना चाहिए । कुछ दीर्घ वक्त्र होवे और उस पर
उत्तम अलको की अबत्ती होनी चाहिये । नासा-ग्रीवा और ललाट माढे
तीन प्रगल का होवे । अघर परलव स्त्रियो वा अध्यगिल विस्तार से
मन्वित प्रशस्त हुआ करता है । अधिक दोनो नेत्रो का मुग्म चतुर्माग से
विनिर्दिष्ट करना चाहिए । अर्द्धा गुल उठ्य वाली ग्रीवा की अवली
करनी चाहिए । इमी प्रकार से समस्त नारियों में और देवो को सब
प्रनिमामो मे रचना वगनी चाहिए। आपको यह अधिक लक्षण बतला
दिया है । यह पापो का नाम करने वाला है ॥ ॥
४४२
मत्स्यपुराण
१२२-देवाफार प्रमाण वर्णन (१)
अतः पर प्रवक्ष्यामि देवाकारान् विशेषतः ।
देशताल. स्मृतो रामो कलिवैरोचनिस्तथा ॥१
बराहो नारसिंहाच पप्ततालस्तु वामन, ।
मत्स्यकूमौ च निर्दिष्टौ यथाशोभ स्वयम्भुवा ॥२
मतः पर प्रवक्ष्यामि रद्राद्याकारमुत्तमम् ।
स पीनोग्भुजस्कन्धस्तप्तकाञ्चनसप्रभः ॥३
झुक्नोऽकरदिमसघातदपन्द्राद्वितजटाविभुः।
अटामुकुटधारी व द्वयष्टवकृतिश्च स. ॥४
बाहवारणहस्ताभो वृत्तजमारुमण्डल ।
अन्दववंशश्च क्तव्यो दीर्घायतविलोचन, ॥५
ध्याघ्रचर्मपरीधानः पटिगूत्रत्रयान्वित. ।
धारचेघरसम्मन्नो भुजङ्गागरणस्तथा ।
यावश्चापि क्तंभ्या नानाभरणभूषिताः।
पानोरगण्डपलप कुण्डलाभ्यामलत. ॥७
देवाकार प्रमाण वर्णन
एव ऊरुओ के मण्डल से युक्त-ऊध्र्ष भाग की ओर केशों वाले तथा दीर्घ
एवं आयत नेत्रो वाला स्वरूप करना चाहिए । व्याघ्र के चर्म से परीधान
परने वाले-कटि में तीन मूत्रो से संयुन हार, क यूर और अन्य सुन्दर
आभरणो से सम्पन्न-सों के आभूषणो से शोभित करे ।
और ऐसे
वहुत-से अनेक प्रामरणो से विभूषित विरचित करे। पोन करू गण्ड
फ्लक वाला तथा कुण्डलो मे समल कृत बनावे ॥ १-७ ।।
आजानुसम्बवाहुश्च सौम्यमूर्ति सुशोभन ।
सेटक वामहस्ते तु शखञ्चैव तु दक्षिणे ॥८
शाक्ति दण्ड निशुलञ्च दक्षिणेषु निवेशयेत् ।
कपाल वामपश्र्वे तु नाग खट्वाङ्गमेव च ॥६
एक्श्च वरदो हस्तस्तयाक्षवलेयोऽपर ।
वैशासस्थानक कृत्वा नत्या भनयसस्थिव. ॥१०
नृत्यन्दशभुज कार्यों गंजचर्मघरस्तथा।
तथा निपुरटाहे च बाहवः पोडशेव तु ।।११
शड ख चक्र गदाशाङ्ग घण्टातत्राधिकाभवेत् ।
तथाधनु पिनारञ्च शरो विष्णुमयस्तथा ॥२
चतुभु जोऽप्टवार्वा ज्ञानयागेश्वरी मतः ।
तीक्ष्णनासाग्रदशन करालयदना महान् ॥१३
भग्व शस्यते लोके प्रत्यायतनमस्थित ।
न मृलायत्ने कार्य भैरवस्तु भयड्वर ॥१४
जानु पर्यन्त लम्बी वाहओ स युम-सौम्य मूत्ति सुदर दोभा से
संयुत वाम हम म पेटव धारण करन वान तथा दाहिन हाय म शख का
धाण ये हुए एवं दक्षिणो म भक्ति-दण्ड और निशूल का नवशित
वरना चाहिए। एक हाय ता वर प्रदान करने वाला मुद्रा में होना
चाहिए और दूसरा पक्षो क लय वाला हाय । (वंशाव स्थानक बरक
नत्या के अभिनय करन स सम्यिन हाना चानिए । नृत्य पन्ते हुए
स भुजाओ वाला एवं गज के घमा धारा स्टदवा स्वस्प निम्ति
मध्यपुराण
करे तथा त्रिपुरासुर के दाह करने में सोलही बाहुऐं व्यस्त हो।)वहाँ
पर शख-चक्र-गदा - शाङ्गहों और अधि का घण्टा होना चाहिये।
तमा पिनाक धनु और विशुमय शर होना चाहिए ।/चितुभुज अथवा
माठ बाहुओ वाला ज्ञान योग के ईश्वर को माना गया है। तीक्ष्ण नासा
तथा अन दशन वाले-कराल बदन से युक्त-महान और प्रत्यायसन मे
में सस्थित भरवलोक मे परम प्रशस्त कहे गये हैं । मूलायसन मे भैरवा
भगवान कभी भी भयङ्कर नही निर्मित करना चाहिये ।। ८-१४॥
नारमिह वराहोवा तथान्गेऽपि भयङ्कराः ।
नाधिकाङ्गा न हीनाङ्गा कतव्या देवताः क्वचित् ॥१५
स्वामिन घातयेन्यूना करालवदना तथा ।
अधिका शिल्पिन हन्यात् कृशा वा धनाशिनी ॥१६
कृशोदरी तु दुर्भिक्ष निमासाधननाशिनी।
वक्र नासा तु दुखाय सक्षिप्ताङ्गी भयङ्करी ॥ ७
चिपिटा दुखशोकाय अनेत्रा नेत्रनाशिनी ।
दुखदा हीनवक्त्रा तु पाणिपादकृशा तथा ॥१८
हानाङ्गा होनज ड्धा च भ्रमोन्मादकरी मृणाम् ।
शुष्व वदना तु गजान कटिहीना च या भवेत् ।।१६
पाणिपादविहीनो योजायते मारकोमहान् ।
जड,धानुविहीना ध शन कल्याणकारिणी ॥६०
पुत्रामविनाशाय हीनवक्षस्थला तु या।
सम्पूर्णावयवा या तु आयुलक्ष्मीप्रदा सदा ॥२१
मसिंह अथवा वराह तथा अन्य भी भयङ्कर होते हैं किन्तु
कभी भी और वही पर भी देवा की प्रतिमाओं को अधिन अगो वासो
नही बनानी चाहिये ॥ १५ ॥ जा कोई देवमूत्ति न्यून अङ्गो वाली होती
है अथवा परम
से युक्त होती है वह स्वामी का पात दिया करती
है। जो अधिक अहो बाली अषया वृश होती है, वह उसपे निर्माण
मुख
देवाकार प्रमाग वर्णन करने वाले शिल्पकार का हनन प्रिया करती है और अर्थ का विनाश करन वाली होती है ॥ १५, १६ ॥ जो काई देवता की प्रतिमा कृश उदर से युक्त निर्मित कराई जावे तो वह दुर्भिक्ष करने वाली हुआ करती है तथा मास से हीन यदि देव प्रतिमा को निर्मित कराई जावे तो उसका यह बुरा फल होता है कि यह एन वा विनाश किया करती है। नासिका वाली देव प्रतिमा दुख के हो लिये हुआ करती है। जिस प्रतिमा के अङ्ग सरिसप्तहो तो वह मय करने वाली हुआ करती है। जो भूति विपिटा होती है वह दुख और शो के लिये ही हुआ करती है । जिसके नेत्र नही होत हैं अर्थान् नेत्री की रचना न की गई हो वह देव प्रतिमा नत्रो के विनाश करन वाली हुआ करती है। हीन मुख वाली प्रतिमा की रचना वा यह दुष्परिणाम होता है कि वह सर्वदा दुख प्रदान क्यिा करती है तथा हाय और चरणो स कृश प्रतिमा हो-होनाङ्गा-- हीनजघा हो यह मनुष्यों का भ्रम एग उन्माद करन वाली हुआ करती शुष्क मुख वालो पोर कटि स होना जा होनी है वह राजा को किया करती है। पाणि और पाद स वा विहीन होकर समुत्पन्न होता है वह महान् मार हुआ करता है । जो जघा और जानु से मिहीन होती है तो वह शत्रु के कल्याण करने वाली होती है। जो हीन वक्षःस्थल वाली होती है वह पुन और मित्र के विनाश के लिये हुआ करती है। जो सम्पूर्ण अवयवो म युक्त होती है वह सदा आयु और लक्ष्मी के प्रदान करने वाली होती है ॥१७-२१॥ एव लक्षणमासाद्य कर्तव्य परमेश्वरः । स्तूयमान सुरै सर्व समन्ताद्दर्शयेद्भवम् ॥२२ शरण नन्दिना चव महाकालेन शङ्करम् । प्रणता लोग्पालास्त पार्वत गणनायकाः ।।२३ नत्यभृङ्गारिटिश्चव भूतवेत.लसवृता.। सदृष्टास्तु व तंव्या स्तुवन्त परमेश्वरम् ॥२४ मत्स्य पुराण ग.धर्वविद्याधरकिन्नराणामथाप्सरी गुह्यकनायकानाम् । गणरने के: शतशो महेन्द्र मुनिप्रवीरैरपि नम्मानम् ।। २५ धृताक्षसूतैः शतश: प्रवालपुष्पोपहारप्रचयन्ददद्भिः । संस्तूयमानं भगवन्तमीडय नेत्रयेणामरमत्यपूज्यम् ॥२६ इस प्रकार से लक्षणो की प्राप्ति करके परमेश्वर की प्रतिमा की रचना करानी चाहिये। भगवान भव को इस प्रकार से दर्शित कराना चाहिए कि वह सब ओर से समस्त सुरगणो के द्वारा स्तूयमान हो रहे हैं ॥२२॥ इन्दु के द्वारा-नन्दी और महाकाल के द्वारा शङ्कर की स्तुति की जा रही हो। भगवान् के पाश्व मे सब गण नायक और लोकपाल प्रणत हो रहे हों । भगवान् को प्रतिमा को इस प्रकार सनिर्मित कराना चाहिए कि उनके समक्ष मे भृङ्गी और रिटि नृत्य कर रहे हो तथा भूतो और वैतालों से संवृत हो । सब परम प्रसन्न होते हुए परमेश्वर की स्तुति करने वाले हो।) गन्धर्व - विद्याधर --किन्नर-अप्सराये . गुह्यक-नायक इनके अनेक संकडो गा के द्वारा-महेन्द्रो के द्वारा- और मुनि प्रवरो के द्वारा नम्यमान होवे । सैकडो अक्ष सूत्रो के पारण करने वाले प्रवाल-पुणो के उपहार के प्रचयो के समर्पित करने पालों के द्वारा स्तूयमान-तीन नेत्रो से युक्त देवगण और मनुष्यो के परम पूज्य-ईडय भगवान की प्रतिमा का निर्माण कराना चाहिए । ॥२२-२६ ॥ १२३-देयाकार प्रमाण वर्णन (२) अधुना सम्प्रवक्ष्यामि अर्धनारीश्वरं परम् । अघन देवदेवस्य नारीरूप सुशोभनम् ।।१ तु जटाभागो बालेन्दुसयायुतः । ईशा देवाकार प्रमाण वर्णन उमाधेचापि दातव्यो सीमन्ततिलकावुभौ सन वासुविदक्षिणे कर्ण वामे कुण्डलमादित् । वालिका चोपरिप्टात्त कपाल दक्षिणेकरे ।। त्रिशूलं वापि कर्तव्य देवदेवस्य शूलिनः ॥३ वामतो दर्पणं दद्यादुत्पलन्तु विशेषत. ॥४ वामबाहुश्च कर्तव्यः केयूरथलयान्वितः । उपवीञ्च कतव्य मणिमुक्तामयन्तथा ॥५ स्तनभारं तथा तु ठगमेपीन प्रकल्पयेत् । पराध्यंमुज्ज्वलकुच्छिोण्यधंतु तथैव च । ६ लिङ्गाद्ध'मूध्वग कुर्यात व्यालाजिनकृताम्बरम् । वामेलम्बपरीधानं कटिसूत्रयान्वितम् ॥७ महामपि प्रवर धीमून जी ने कहा--प्रव परम अर्धनारीश्वर भगवान् के विषय मे कहते हैं । देवो के देव के अधं भाग से सुशोमन नारी का रूप है ।।१॥ ईश के अचं मांग में जटा का भाग है और बाल- चन्द्र की क्ला से युक्त है नथा उमादेवी का जो अर्घ भाग है उससे सीमन्त और तिनक य दोनो देने के योग्य है। भगवान शिव के दक्षिण कर्ण मे वासुकि सप शोभित हो रहे हैं और वामकर्म में कुण्डल धारण किया हुआ है । कार में वानिका है दक्षिण कर मे कपाल धारण किये देवो के देव भगवान शूली के कर मे त्रिशूल धारण कराना चाहिये । वाम भाग में दर्पण और विशेष रूप से उत्पल धारण करावे । ॥ १, २, ३.४॥ वामबाहु को वे यूर और वलय से समन्वित करे। तथा मणि मुक्ताओ से परिपूर्ण उपवीत भी धारण कराना चाहिए ॥ ५॥ वाम अर्घ भाग में पीन स्तन वा भार प्रकल्पित करे तथा श्रोध में उसी भांति उज्ज्वल पराध्य को करना चाहिए । व्याल और अजिन से सम्बर करके ऊबंग लिङ्गाध करे तया वाम भाग में कटि मूत्र त्रय से समन्वित लम्चे परीधान को धारण कराना चाहिए ।।२-७॥
४४
मत्स्यपुराण
नानारत्नममापेत दक्षिणेभुजगान्वितम् ।
देवस्य दक्षिण पादपद्मोपरिसुसस्थितम् ।।
कञ्चिदर्थे तथा वाम भूपित नूपुरेण तु ।
रत्नविभूषितान् कुर्याद गुलीन गुलीयकान् ।।६
सालक्तक तथापाद पार्वत्या दयेत्मदा।
अर्धनारीश्वरस्यैद रूपमस्मिन्नुदाहृतम् ।।१०
उमामहेश्वरस्यापि लक्षण शृणुतद्विजाः ।
सस्थानन्तु
तयोर्वक्ष्ये लोलाललितविनमम् ।।११
चतुर्भुज द्विवाहु वा जटाभारेन्दुभूपणम् ।
लोचनत्रयसयुक्तमुमक्स्कन्धपाणिनम् ॥१२
दक्षिणेनोत्पल शूल कामेचमरेकरम् ।
हीपिचर्मपरीधान नानारत्नोपशोभितम् ॥१३
सुप्रतिष्ठ सुवैपञ्च तथाघेन्दुताननम् ।
चामे तु सस्थिना देवी तस्योरी याहुहिता ॥१४
देवाकार प्रमाण वन
४४४
ही मे उमा महेश्वर दोनों का होता है ।। ११, २२।। दक्षिण पर मे
उत्पल को ग्रहण करने वाले तथा सूत को नियंदर और काम कर में
स्तन व मार को मम्हारे हुए-द्वीप के वर्म का परीधान धारण करन
वाले एवं अनेक रत्नो मे ममुप मोमिन-मुन्दा प्रतिया मे युक्न- गुन्दर
वेष वाले तथा अर्घ चन्द्र मे मुख को करन वानप में युक्त भगवान्
भव का स्वरूप है । उनके कर पर वाम माग में बाहुओं म गृति मादेवी
विराजमान हैं ॥१३, १४॥
शिरोभूयणसयुक्तरलयंलिनाननना।
सवालिका वर्णवती ललाटविनकावरा
भणिकुण्डलमयुक्ता पणियामरा उद।
हारक्यू'बहला हरवत्रावतीदिनी
वामासन्देवदेवम्य स्मन्नी नाराट ।
दक्षिणन्तु बहि. इन्वा बाई टिक १५
सन् वा दक्षिो वृनी गyिा
वामे तु दपण दयाराम 111
कटिमूत्रययचंद दिन्द्र राय,
जया च विवाद
पाम्बवादगीनामा
४५० मत्स्यपुराण उन देवी के लीला से देवो के भी देय भगवान शिव के वाम अंश वा स्पश करने वाली-दक्षिण घाई को बाहिर करपे दक्षिण की ओर से दक्षिण वुक्षि म में गुलियो से स्कन्ध का स्पश करनी हुई श्री उमादेवी विराजमान हैं। इनके वाम हस्त मे दपण समर्पित करना चाहिए अथवा परम शोभा स सुसम्पन उत्पल देना चाहिए ॥ १५ १६, १७ १८ ।। नितम्ब भाग मे कटि का सूत्र त्रय होना चाहिए तथा प्रलदक का होना भी अत्यावश्यक है। जया और विजया तथा स्वामी कात्तिकेय और विघ्न विनाशक विनायक ये सब उन महादेवी दोनो पाश्व भागो मे वहाँ पर तोरण मे गणा और गुह्यको को दिखलावे ---इसी प्रकार से माला-विद्याधने को तथा अप्सराओ के समुदाय को दिखलाने प्रदर्शित करने चाहिये ।। १६, २०॥ जो मनुष्य भव की इच्छा रखने वाला है उसको चाहिए कि इस तरह का उपरिवणित महेश्वर भगवान् का स्वरूप धनाचे । अब मैं इस प्रकार से शिव नारायण के मिश्रित स्वरूप का वर्णन करूगा जो समस्त प्रकार के महापापो का विनाश करने वाला है ॥२१॥ वामा माधव विद्याद् दक्षिणे शूलपाणिनम् । बाहुद्वयञ्च कृष्णस्य मणिकेयूरभूषितम् ।।२२ शङ्खचक्रधर शान्तमारक्तागुलिविभ्रमम् । चक्रस्थाने गदा वापि पाणी दद्याद्गद भृतः॥२३ शाइखञ्चवेतरे दद्यात् वटयध भूपणोज्वलम् । पीतवस्त्रपरीधान चरण मणिभूपणम् । २४ दक्षिणा जटाभारमधदुकृतभूषणम् । भुजङ्गहारवलय वरद दक्षिण वरम् ॥२५ द्वितीयञ्चापि कुर्वीत त्रिशूलवरधारिणम् । व्यालोपवीतसयुक्त क्व्ययधं कृत्तिवाससम् ॥५६ मणिरत्नश्च सयुक्त पाद नागविभपितम् ।
देवकार प्रमाण वर्णन ४५१ शिवनारायणस्यैव कल्पये द्रूपमुत्तमम् ।।२७ महावराहं वक्ष्यामि पद्महस्तं गदाधरम् । तीक्ष्णदष्ट्राग्रघोणास्य मेदिनोवामकूपरम् ।।२८ श्री शिवनारायणात्मक स्वरूप में वाम भाग मे भगवान् माधव को जानना चाहिए और दक्षिण माग मे शूल हाय में धारण करने वाले शिव का स्वरूप समझ लेवे। भगवान श्रीकृष्ण के दोनो बाहुओ को मपियो जटित केयूरो से समलकृत करे ॥ २२ ॥ भगवान् माधव का स्वरूप शख और चक्र को धारण करने वाला हो-परम शान्त - आरक्त अंगुलो के विभ्रम से संयुत हो-अयवा भगवान् गदाधर के कर मे चक्र के स्थान मे गदा को ही धारण करा देवे । दूसरे कर मे शंख को धारण कराना चाहिए। भगवान के कटि का अघं भाग भूषण से समुज्ज्वल बनावे । पीतवर्ण वाले वस्त्र का उनका परीधान करावे और मणियो से जटित भूषण स युक्त चरण प्रदर्शित करे । इस तरह से वाम भाग मे रमा के ईश्वर भगवान् का स्वरूप प्रदर्शित कराना चाहिये । अब दक्षिण अर्घ भाग मे भगवान् शिव के स्वरूप का प्रदर्शन होना चाहिये । वह शिव का स्वरूप जराओ के भार से युक्त है प्रोर अर्ध चन्द्र के द्वारा भूषण किये हुए हैं-भुजङ्गो के हार एवं वलय वाला है और जिस शिव स्वरूप का दक्षिण कर वर के प्रदान करने वाला है । दूसरे स्वरूप को भी करना चाहिये जो त्रिशूल वर का धारण करने वाला व्यालो के उप- वीत से समन्वित है तथा कटि का प्रघंभाग कृत्ति (गज चम) के वस्त्र से समावृत है । मणि रत्नो के द्वारा पाद संयुक्त हैं तथा नागो से विभूपित है। इस प्रकार से शिव और नारायण के मिश्रित उत्तम स्वरूप की कल्पना करनी चाहिए । अव में महा वराह के स्वरूप का वर्णन करूंगा। महा वराह का स्वरूप पद्म हाय में धारण करने वाला है-गदा के धारण करने वाला- तीक्ष्ण दष्ट्रा से युक्न अग्र घोणा (नासिम) और आस्य (मुख) वाला है जिसके वाम पर पर मेदिनी है ॥२३-२८॥
मत्स्यपुराण
1
दष्ट्राग्रेणोद्ध ता दान्ता धरणी मुत्पलान्विताम् ।
विस्मयोत्फुल्लवदनामुपरिष्टात्प्रतल्पयेत् ॥२६
दक्षिण कटिसस्थन्तु कर तस्या प्रकल्पयेत् ।
कूर्मोपरि तथा पादमेक नागेन्द्रमूर्धनि ॥३०
सस्तूयमान लोकेशे. समन्तात्परिकल्पयेत ।
नारसिंहन्तु तिव्य भुजाष्टकसमन्वितम् ॥३१
रौद्र सिंहासन तद्वत् विदारितमुखेक्षणम् ।
स्तब्धपीनसटाकणं दारयन्तन्दिते सुतम् ।।३२
विनिगतान्त्रजालञ्च दानव परिकल्पयेत ।
वम त रधिर घोर भृकुटीवदनेक्षणम् ॥३३
युध्यमानश्च कतव्य क्वचित्करणवन्धन.।
परिधान्तेन दंत्येन तज्यमानो मुहुमुह ॥३४
दैत्य प्रदशयत्तत्र खङ्गखेटकधारिणम् ।
स्तूयमान तथा विष्णु दर्शयेदमगधिपं ॥ ५
उम महा वराह के स्वरूप मे धरणी का दलना भी करनी
चाहिये जो दाढ के अग्रभाग से उदघृत हो-उत्पलो स समन्धित हो-
विस्मय से उत्फुल्ल वदन वाली हो ऐसी धरणी को कार के भाग मे
रचना करावे उस महा वराह की प्रतिमा का दक्षिण कर कटि पर स्थित
हो-ऐसी फल्पना करे। उस महा वराह का एक चरण फर्म के ऊपर
मोर एक पाद नागेन्द्र के मस्तक पर स्थित होने की कल्पना करनी
पाहिए ॥३०॥ सब ओर से लोकपालों के द्वारा सस्तूयमान होने वाले
स्वरूप को परिकल्पित करे । नरसिंह भगवान के शरीर को आठ भुजाओ
से समर्मावत कलित करना चाहिये ॥३॥ उनका महान रोडवरूप
माला सिंहासन होता है और उसी तरह से विद्यारित मुघ एव नेन होते
है। स्तम्य पुष्ट सरापो म युक्त कणों वाला वह स्वरूप होता है जो
दिति के पुहिरम शिपु वे हृदय के विदीरण बसा हुआ विद्यमान है
देवाकार प्रमाण वर्णन
.
॥३२॥ उस दानद के आंतो का जाल विदीर्ण करने से वाहिर निकला
हुप्रा हो ऐसा ही स्वरूप परिकल्पित करना चाहिए जो कि अत्यधिक घोर
रुधिर का वमन कर रहा हो जो भृकुटि-मुख और नेत्रों से वह रुधिर
निकलने वाला हो ॥३३।। कहीं किसी स्थल पर ऐसा भी स्वरुप कल्पित
किया जा सकता है जो करण बन्धनो के द्वारा युद्ध करता हुआ हो और
दैत्य परिधान्त होकर बारम्बार तर्जन किया जाने वाला हो। युद्ध करने
की अवस्था मे दैत्य को सङ्ग और खेटक का धारण करने वाला प्रदर्शित
करना चाहिए। उस समय में यह भी प्रदर्शित करे कि प्रमराधिप गणो
के द्वारा विष्णु स्तवन किये जा रहे हो ॥३४,२५॥
तथा त्रिविक्रम वक्ष्ये ब्रह्माण्डक्रमणोल्वणम् ।
पादपाश्र्वे तथा वाहुमुपरिप्टात्प्रकल्पयेत् ॥३६
अधस्ताद्वामन तद्वत्कल्पयेत्सकमण्डलुम् ।
दक्षिणे छत्रिका दद्यान्मुख दीन प्रकल्पयेत् ॥३७
भृङ्गारधारिण तद्वद्वलि तस्य च पाश्वतः ।
बन्धनञ्चास्य कुर्वन्त गरुडन्तस्य दर्शयेत् ॥३८
मत्स्यस्प तथा मात्स्यं कूम वर्माकृति न्यसेत् ।
एव म्पस्तु भगवान् कार्यो नारायणो हरिः ३६
व्रह्याकमण्डलुधरः कर्तव्य. स चतुर्मुख ।
हंपारद क्वचित्काय्यः क्वचिच्च कमलासनः ॥४०
वर्णतः पद्मग मश्चतुर्बाहु शुभेक्षण ।
कमण्डल वामको स्रव हस्ते तु दक्षिणे ॥४१
वामेदण्डधर तद्वत् स्तुवञ्चापि प्रदर्शयेत् ।
मुनिभिर्देवगन्धर्व स्तूयमान समन्तत ॥४२
अब भगवान् विविश्मक विषय मे वणन क्यिा जाता है जो इस
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के रुपण करने में प्रत्यन्त ही उस्वरण थे। पद के पावं
में तथा ऊपर वाह की कल्पना करनी चाहिए । नीच की और उसी भौति
मत्स्यपुराण वामन देव की कमण्डलु के सहित वर्तमान होन को पल्पना करनी चाहिए । उन वामन देव प्रभु व दाहिने हाथ में एक छोटा सा छन देवे और उनका मुख दीनता से परिवयाप्त हो कल्पित घरै। उनके पावं भाग मे भृङ्गार के धारण करने वाले राजा बलि को प्रदात करना चहिए । वामन देव को इस दैत्यो वे राजा बलि का वधन करते हुए हो दर्शित करना चाहिए तथा उनके समीप म ही गरुड को भी दिखलावे ।।३६, ३७, ३८॥ वही पर मत्स्य रूपी मात्स्य एव वूम की आकृति से युक्न कूर्म का भी न्यास करना चाहिए । इस प्रकार के स्वरूप स सुस- म्पन भगवान् नारायण हरि का स्वरूप वहा पर करना आवश्यक है ॥२॥ चारो मुखो से युक्त कमण्डलु क धारण करने वाले ब्रह्मा जी को वहा पर दिखलाना चाहिय । किसी स्थल पर उन ब्रह्मा को हस पर सम रूढ और कहीं पर कमल के आसन पर विराजमान दिखलावे ॥४०॥ ब्रह्मा का वण कमल की आभा के सदृश-चार भुजाओं से युक्त-शुभ नत्रा वाला-बाये हाथ मे कमण्डलु लिये हुए तथा दाहिने हाय म स व धारण करने वाला दिखलाना चाहिये ।।४१।। उसी भाति वाम हस्त दण्ड को धारण करने वला और स्तुव का धारी प्रदर्शित करे। सभी ओर मुनिगण-देवगण और गधों के द्वारा स्तूयमान होने वाला श्री वामन दव को दिखलाना चाहिये ।।..|| कुर्वाणमिव लोकास्त्रीन् शुक्लाम्बरधर विभुम् । मृगचमघरञ्चापि दिध्ययज्ञापवीतिनम् ।।४३ आज्यस्थालि न्यसेत्पावें वेदाश्च चतुर पुन । वामपार्वेऽस्य सावित्री दक्षिणे च सरस्वताम् ॥४४ अग्रे च पयस्तद्वत्ता पतामहपदे । कार्तिकेय प्रवक्ष्यामि तम्णादिस्यसप्रभम् ॥४५ कमलादरवणाभ कुमार सुमारकम् । दण्डक्श्चीरययुक्त मयूरवरवाहनम् ।।४६ मे देवाकार प्रमाण वर्णन ४५५ - स्थापयेतस्वेष्टनगरेमुजान्द्वादश कारयेत् । चतुर्भुजः खवंटे स्याने ग्रामे द्विवाहुकः 1:४७ शक्तिः पाशस्तथा सङ्गः शूलं तर्थवच । वरदश्चकहस्तः स्यादथचाभयदो भवेत् ॥४८ एतेदक्षिणतोज्ञया. कयूमटकोज्वलाः । धनुः पताकामुष्टिश्च तर्जनो तु प्रसारिता ॥४ श्री वामन देव का स्वरूप वहा पर ऐसा प्रदर्शित करे मानों वे तीनों लोकों की रचना कर रहे हों। शुक्ल वर्ण वाले वस्त्रों के धारी- विभु-मृग के चर्म के धारण करने वाले -दिव्य यज्ञोपनीत से सम्पन्न वामन देव के स्वम्प को दिखाना आवश्यक है। उनके समीप मे बाज्य की स्थाली रक्से और चारो वेदों को भी स्थापित करे। इन वाम पात्र में सावित्री देवी और दक्षिण पाश्व में मरस्वती देवी की उपस्थिति दिखानी चाहिए ।।४३. ४४थामे को ओर उन पितामह के पद में उसी तरह से ऋषिगण की रचना करनी चाहिये "अब हम स्वामि कातिक र के तरण मादित्य के समान प्रभा वाले स्वरूप का वर्णन करते हैं ॥४॥ कातिय प्रभु का वर्ष कमल के उदर की प्रभा के तुल्य है । और वह कुमार अत्यन्त ही मुकुमार हैं कुमार का स्वरूप दण्डक एव चीरकों से ममायुक्त है एवं घे? मयूर के वाहन वाला है ॥४६॥ अपने अभीप्मिन नगर में उनकी स्थापना करे तथा द्वादश मुजामो की बल्लना करे। सर्वट मे चार भुजाओ वाला स्वरूप-वन तथा ग्राम में दो वाहुओं वाला स्वरूप- प्रदर्शित करना चाहिये । किन-पाश-खग-गर-मूल-ये अ युध हापों में धारण करने वाला स्वस्प हो और एक हाय वरदान देने वाला एव एक हाप समय के देने वाला होना चाहिये । ये सब दक्षिण भाग में जानने चाहिये-वेयूर, कटारग्वन, धनुष, पताका, मुष्टि तपा ननंनो प्रमारित होनी चा.िये ॥४७-४॥ सेटक ताम्रचूडञ्च यामहस्तेनु शस्यते ।
४५६ मत्स्यपुराण द्विभुजस्य करे शक्तिवमि स्यात् कुक्कुटोपरि ।।५० चतुर्भुजे शक्तिपाशो वामतो दक्षिणे त्वसि । वरदोभयदोवापि दक्षिण स्यात्तुरीयक १५१ विनायक प्रवक्ष्यामि गजवक्न त्रिलोचनम् । लम्बोदर शूर्पकर्ण व्यालयज्ञोपवीतिनम् ।।५२ ध्वस्तकणं बृहत्तुण्डमेकदष्ट्र पृथूदरम् । स्वदन्त दक्षिणकरे उत्पलञ्चापरे तथा ॥५३ मोदक परशुञ्चैव वामतः परिकल्पयेत् । वृहत्वात् क्षिप्तवदन पीनस्कत्धाङ्घ्रिपाणिकम् ॥५॥ युएनन्तु ऋद्धिबुद्धिभ्यामधस्तान्मूषकान्वितम् । कात्यायन्या प्रवक्ष्यामि रूप दशभुज तथा ।।५५ त्रयाणामपि देवानामनुकारानुकारिणीम् । जाजूटसमायुक्तामद्धन्दुकृतलक्षणाम् ॥५६ खेटक-तामृचूड ये दोनो वाम हस्त मे प्रशस्त होते है । जो दो मुगाओं वाले स्वरूप के वाम हस्त मे कुक्कुट के ऊपर मे शक्ति धारण करावे । चतुर्भुज स्वरूप मे वाम भाग मे शक्ति और पाश तथा दक्षिण हाथ में सि धारण करावे वर देने वाला और अभय का दान करने वाला भी दक्षिण हाथ ही तुरीयक (चतथ) होना चाहिय ॥५०, ५१।। थव श्री विनायक के स्वरूप का वर्णन मै करता हूँ जिनका गज के समान मुख है और तीन लोचन है । भगवान् विनायक लम्ब उदर वारे-शूपक सदश कर्णो स युक्त और व्यालो ने यज्ञोपवीत को धारण करने चले हैं, ध्वस्त कणों वाले-वृहत् तुण्ड से युन-ए दांत से सयुत-गृथु (विशाल) उदर वार है । यह अपने दनिहाय म १ स्वाद लने पान और दूसरे हाथ म उनात रागने वान हैं ॥५२,५३|| मोदा और परतुवा ग्रहण परला याममेरपित करना चहिय तहमारण गति पदन वन और पान (परिपुष्ट) सन्य-चरण और पाणि (हाप, वार देवाकार प्रमाण वर्णन ४५७ हैं तथा ऋद्धि और बुद्धि दोनो से युक्न हैं । इ-के नीचे मषक पाहन के रूप में स्थित है अतः उसमे समन्वित है । इसके उपरान्त में भगवती का कात्यायनी देवी के विषय मे वर्णन करता हू-इनका स्वरूप दो भुजामो वाला है ।।५, ५५।। यह देवो तीनो बडे देवों के अनुकार का अनुसरण करन वाली हैं। इनकी भी आकृति जटा जूटो से समायुक्त है तथा अर्घ चन्द्र के द्वारा किये हुए लक्षण स युन है ॥५६॥ लोचनत्रयसम्पन्ना पद्मन्दुमदृशाननाम् । अतसीपृप्पसङ्काशा सुप्रतिष्ठा सुलोचनाम् ॥५७ नव्यौवनसम्पन्ना सर्वाभरणभूपिताम् । सुचारुदतनाम्मद्वत्पीनोन्नतपयोधराम् ॥५८ विभङ्गस्थानसस्थाना महिपासुग्मदिनीम् । त्रिशूल दक्षिणे दद्यात खङ्ग चक्र तथैवच ।।५६ तीक्ष्ण वाण तथाशक्ति वामताऽपि निवोधत । खेटक पूर्णचापच्च पाशमङ्क शमेव च ॥६० घण्टावा परशुञ्चापि वामतः सन्निवेशयेत् । अधस्तान्महिपन्तद्विशिरस्क प्रदर्शयेत् ।।६: शिरच्छेदोद्भव तहदानव खड्गपाणिनम् । रतरतीकृताङ्ग च रक्ताविस्फारतेक्षणम् ॥६२ वेष्टित नागपाशेन म कुटीमीपणाननम् । वमद्रुधिरवक्वञ्च देव्या सिंह प्रदर्शयेत् । ६३ या यायनी देवी तानो लोचनो से सुसम्पन्न-पद्म तथा चन्द्रमा के ममान मुख वाली-अतसी + पुष्प ६ तुल्य स्वरूप स युक्त-मुन्दर प्रनिहा स समन्वन एव रचिर नोचनो वाली हैं। नूतन यौवन से युक्त- मम्पूर्ण आभरणों में विभूषित -मुन्दर दातो वाली और उमी तरह पीन एवं उन्नत पयोधगे म युक्त हैं ॥५७, ५८|| तीन भङ्गा से युक्त स्थाना र सस्थान वाली और महिषासुर व मदन बरन वाली है। इन दक्षिण ४५८ म स्यपरण कर मे त्रिशूल धारग करावे और खङ्ग एव चक भी दवे । तीण वण तथा शक्ति को बाम कर मे धारण कराना चाहिए। इनके अतिरिक्त वाम भाग में खरा-पूणचाप-नाश-अकुश-घण्ट -परशु य भी सब निद- शित करने चाहिए। इन देवी के चरणो के नीचे के भाग में दो शिरो वाले महिषासुर को भी प्रदर्शित करे ॥५८, १०, ६१॥ शिर ६ छन । होन से समुत्पन्न रवत स स्वीकृत अङ्गो वाला- ग्यत से विस्फारित नेत्रो से सयुत-खडग हाथ म धारा यि हुय उस दानव का वरूप दिखाना च हिय । ६ । नागास वेष्टित -ध्र कुटी सयुन भीषण आनन वासा-बहते ना धिर म सुक्न मुख वाला दवी का वाहन सिंह भी देवी की प्रतिमा क साथ ही समीप म प्रदगित करना आवश्यक है।। ६३ । दयास्तु दक्षिण पाद सम सिहोरि स्थितम् । विञ्चिद्ध्वं तथा वाममगृष्ठ मत्पिापरि ॥६४ स्तूमानश्च तद्पममर सन्निवेशयत् । इदानी मरगजस्य प वक्ष्य विपत ॥१५ महसनयन देव मत्सवारणसस्थितम् । पृथूरवक्षोवदन सिहस्व ध महाभुजम् ॥६६ गेटगुण्डधर पाचगा भुज"म् । चापलधर नानाना मरणभूषितम् । ६५ पुाजत दवग धरणरागणमविनम् । घरामधारण्य त्रि पायें प्रसायतु ।।६८ सिहामनगतच ग घ गणनयनम् । १.दीपा वामनाय पर्यादतनधारिणीम् ।
नानादेव प्रतिमा प्रमाण वर्णन
४५६
सन्निवेशित करना चाहिये। अब इसके उपरान्त में सुरराज महेन्द्र देव
के स्वरूप का वर्णन करता हूं-इन्द्रदेव का स्वरूप सहन नयनो वाला है
तथा मत्त गजेन्द्र पर ममारूद-पृथु (विशाल) ऊरु, भुज और वक्षस्थल
से समन्धित है । सिंह के समान स्कन्धो वाला~-महान भुजाओ से युक्त,
Fट एवं कुण्डनो के धारण करने वाला-गीवर ऊम, भुजा एव ईभयो
वाला है। वज एव उत्पल का धारी तथा उसी भांति अनेक प्रकार के
प्रामरणो से विभूषित - देवो और गन्धवों से पूजित-अप्सरा गणो के
दरा मक्ति इन्द्र का स्वरूप कराकर उनके पाश्वं मे छत्र एवं चमरों के
धारण करने वाली स्त्रियो को प्रदर्शित करना चाहिए ॥६४-६८॥ इन्द्र
देव को सिंहासन पर मयिन-गन्धवं गण वे द्वारा सेवित निर्देशित करे
और इन के वाम भाग में उत्प) के धारण करने वाली इन्द्राणी कोकल्पित
करना चाहिए ।
१२४-नानादेव प्रतिमा प्रमाण वर्णन
प्रमाकरस्य प्रतिमामिदानी शृणुत द्विजाः!।
रथस्थं कारयेदेव पधहस्त सुलोचनम् ।।१
सप्ताश्वञ्चकचरञ्च रथ तस्य प्रारूपयेत् ।
मुकुटेन विचित्रोण पगभसमप्रभम् ॥२
नानाभरणभूपाभ्या भुजाम्या धृतपुष्करम् ।
सन्धस्य पृष्फरे ते तु लीलयंत्र धृतेसदा ॥३
चालक नवयुप चिन्चितीषु दश मेत् ।
वस्त्रयुग्मसमोपेत चरणी तेजसानो ।।
प्रतिहागे च कतव्यो पाश्वयोदण्डिपिहली।
कनमा गङ्गदम्तो तो पाश्वंयो. पु. पावुभौ ॥५
लेसमीकृतहातन्य पावें तारमरयम् ।
मध्यपुरण - नानादयगणयुक्त मेव कुर्यादिदवाकरम् ॥६ अम्ण सारथिश्चास्य पिधिनीवनमान्नम । अश्वी सुवलय ग्रीवावर स्थीतस्य पार्वया ॥७ महर्षि प्रवर गूजी न कहा-है द्विजगणो अब याप लोग प्रभा. कर की प्रतिमा के स्वरूपादि के विषय या श्रवण करिए । यदव को रथ में विराजमान-पद्म हाय म धारण किय हुए एव मुन्दर लोचना वाला प्रदशिन करना चाहिए । १ । सूय काय सात अश्वा स सर्मा वत एवं एक चक्र वाला परिकल्पित कर । शिखर एक विचित्र मुकुट स समति मोर पद्म क मध्य भाग के समान प्रभा वाला करे ॥२॥ अनक आमरण और भूपओ स युक्त जामो क द्वारा पुष्करा धारण करने वाल और सदा लीला स हो स्कन्धा पर पुष्प वा धारण किय हुए इन्द्र दव का स्वरूप है। वही पर चित्रो मे चोक स सवत इद्र का स्वरूप दशित करना चाहिए । दोनो चरण तेज से ममावृत होव और दोनो पा- भागो म दपनी जीर पिङ्गल ये दोनो प्रतिहारी करने चाहिए । ये दोनो पुरुष हाथो म खड्गधारी नियोजित करन चाहिए । पाश्व म हो हाथ लेखनी धारण करने वाले अपय पाता को दशित कराव। इस प्रार स नाना प्रकार के देवगणो से युबन भगवान् भवन भास्कर को प्रदर्शित करना चाहिय ।। ,४,५,६।। इस दिवाकर सारथि यरुण है जो पधिनी व सदृश है। इसक पापों म सुवलय ग्रीवा वा7 अ तस्थ दो अश्व हाने चाहिय।। ।। भुजङ्गरज्जुभिवता सप्ताश्वा दिम सयुता । यस्थ वाहनस्थ वा पद्महस्त प्रकल्पयेत् ॥ हलेस्तु लक्षण वक्ष्ये सबकामफलप्रदम् । नीत सुवणवपुपमधच द्रासन स्थितम् ॥ यानावम श तस्य व.नमावि दयित् । यमोपवीतिन दव लम्बवू चर तथा ॥१॥ में नानादेव प्रतिमा प्रमाण वर्णन कमण्डलु वामकरे दक्षिणे त्वक्षसूत्रकम् । ज्वालावितानसयुक्तमजवाहन मुज्वलम् ।।११ कुण्डस्थ वापि कुर्वीत मूनि सप्तशिसान्वितम् । तथ यम प्रवक्ष्यामि दण्डपाशधर विभुम् ।।१२ महामहिपमास्ट कृष्णाजन वयोपमम्। सिंहासनगतञ्चापि दोप्ताग्निसमलोचनम् ॥१३ महिपश्चिनगुमश्च कराला. विरास्तथा । समन्ताद्दायत्तस्यसौम्यासौम्यानमुरासुरान् ।।१४ रश्मियो से ( वागडोग से) सयुत सात उनके अश्व हैं जो कि मुजङ्गो की रज्जुबी स बद्ध हैं। अकण देव को पद्म पर स्थित-वाहन के ऊपर समाहद और पदम हाथ में ग्रहण करन वाल परिकल्पित करना चाहिए ॥८॥ अब बहिनदेव के लण का वर्णन करूंगा जो सम्पूर्ण कामनाप्रो क फन को प्रदान करन वल है। इनका स्वरूप परम दीप्ति से युर-मुवर्ण क लुन्ग वपु वाला अब वामन पर ममवस्थित है 1180 दाल मूयं सदृश इनका मुख प्रगिन परे। इन देव को यज्ञोपवीत धारी तथा लम्बी दाही स मत दिखलाना चाहिय ॥१०॥ इनके वाम र मे कमल-दक्षिण हस्त में अभमूत्र-ज्यालाओं के विज्ञान से मयुर और उज्वल ए ! अज के वाहन व ला कल्पित करना चाहिए ॥१॥ मस्ता पर मान शिवाओ मे युक्त इस अग्निदेव को पृण्ड मे ममास्थित करे । इमो अनन्नर दण्ड और पाश दे धारण करने वाले विभु यमरेव के स्वरूप का वर्णन करूंगा 1॥ महान् विशाल महिप क पा समाद - कृष्ण अमन चे ममुदाम के समान काले वर्ण वाला-सिंहासन पर स्थित-दीप्त अग्नि ये तुला लोचनी वाला यमराज या स्वमा है ऐमा हो दगिन करना चाहिये । महिप और चित्र गप्न य इम देव के परम करार बिदर हैं जिनका कि इन मारो मोर दिया। .
४५२ मत्स्यपुराण - और अन्य सौम्य स्वरूप वाले असुरों को यमराज के सब और दिखलाना पाहिए ॥२॥१॥ राक्षसेन्द्र तथा वक्ष्ये लोकपालच्च नतम् । नरारूढ महामाय रक्षोभिवहुभिवृतम् ॥१५ खड्गहस्त महानोल कज्जलाचलसन्निभम । नरयुक्ततिमानस्थ पीताभरणभूषितम ॥१६ वरुण च प्रवक्ष्यामि पाशहस्त महाबलम । शस्फटिकवर्णाभ सित हाराम्बरावृतम । १७ झषासनगत शान्त किरीटाङ्गदधारिणम् । वायुरूप प्रवक्ष्यामि धूम्रन्नु मृगवाहनम् ॥१८ चिनाम्बरधर शान्त युवान कुश्चितभ्रुवम् । मृगाधिरूढ वरद पताकाध्वजसयतम् ।।१६ पुबैग्च प्रवक्ष्यामि कुण्डलाम्यामलकतम् । महोदर महाकाय निध्यकसमन्वितम् ।।२० गुह्यकंबहुभियुक्त धन व्ययकरस्तथा । हारवेयरचित सिताम्बर सदा ॥२१ गदाधरमच तव्य वरद मुकदाचितम । नरयुक्त विमानस्थ एव रीस्या च कारयेत् ॥२२ अब उसी तरह से राक्ष के स्वामी और लोकपाल नैऋत के विषय में वर्णन वलगा। यह नर पर समान महती माया ससम्म न घहुत से राधामों से सवत म य त गीत वर्ण वाले हाथ म खड्ग को धारण किये हुए-काजल र पर्वत क मगान स्थित-नर स युक्त विमान में स्थित है तथा पीत वर्ण आभरणा से समर्मावत इनका स्वरूप होता है १४||१६॥ अव करुण देव के स्वरूप का वणन किया जाता है -यह PL म पात यो धारणा वात-महान बलवान्-शंस और स्परिक मणि व वण व दुरूप याग पार पवत हार एव यात्रा से समावृत-अप नानादेव प्रतिमा प्रमाप वर्णन ४६३ ( मस्य) के आमन पर स्थित~परम माग्न और पिरोट तथा अङ्गदो 4 धारण करन वार है। प्रब वाय देव ने स्वरूप का वर्णन दिया जाता है-वायु का वर्ग घूम होता है नया मृग क वाहन पर विराजमान रहा रत हैं। इनका बम्प विनित्र वा के धारण करने वाला--रम शान-युगवाया म पुश कुसिन प्रभा व लाया पर समघिस्द- वरदान प्रदान बरन वाला-THI) तथा चबा म युक्त होता है-एसा हो इना प्रदर्शन करना चाहिए इमा अनन्तर दुघर के स्वरूप का वर्णन करता हूं--यह युवा स मनात हान है-इन। स्वरुप महान उदर वाला-महान वाया दाला--आठ निधियों म समन्दिन--बहुर-- म गुावा म युक्त गधिन व्यय बग्न वाल हैं गदा के धारण करन वाला-वर ने बाला-मर म मन और मरों से युक्त विमान में मममियत होता है । इना गात : कुवर र स्वरूप को प्रदर्शित करना पाहिय ॥१७-२३॥ तथैवेश प्रमामि धवन धवनक्षगम । पिशनि देव यक्ष वृषगत प्रभम्।। मातृगा ल ग य याचनुपवश ब्रह्माणी ब्रह्मममी च वस्त्रा चतुर्भुजा ।।२४ हमाविष्टा कनकम साक्षसूकमण्डलु । महावरम्य पेण तया माहश्वरी मता ॥२४ जा मटस युक्ता पम्या चन्द्रशेखरा । पारश खट्वाङ्गवपदाटवा चतुर्भुजा ।।.६ फुमारस्पा कोमागे मयरवरवाहना। रक्तवस्त्रवरा तदनशक्निघरा मता ॥२. हारक्यूरसम्पन्ना इकवाकुघरा तथा । बंगवी विष्णुमदृशा गाड ममुपस्थिता ॥२८ चतुहिश्च वरदा शङ्खचक्रगदाधरा ।
मत्स्यपुराण सिंहासनगता वापि बालवेन समन्विता १२६ वाराहीञ्च प्रवक्ष्यामि महिपोपरि सस्थिताम। वराहसदृशी देवी शिरचामरधारिणी ॥३० इसी प्रकार से भगवान् ईश के स्वरूप का मैं अव वर्णन करता हूँ-शिव का स्वरूप एकदम धवल होता है तथा इनवे नेत्र भी श्वेत हुआ करत हैं । शिव के हाथ मे त्रिशूल होता है-तान नैनो से युक्त-- वृषवाहन पर स्थित-ऐसे यह प्रभुदेव होते हैं--ऐसा ही इनका स्वरूप दशित करावे । अब इसके अनन्तर मातगण के स्वरूप का वर्णन किया जाता है और इनके स्वरूप को यथा रोति से आनुपूर्वाश बतलाया जाता है --यह ब्रह्माणी-ब्रह्म के सदृश-चार मुखा वाली-चार भुजाओ से युक्त इस पर समधिरूढ-अक्षसूत्र एक कमण से युक्त ही इनका स्वरूप यतलाना चाहिए । भगवान् महेश्वर के रूप के साथ उसी भौति माहेश्वरी को भी माना गया है। यह भी जटा और मुकुट म सयुत्त-वृष पर विराजमान-मस्तक पर चन्द्र का धारण करने वाला-चारो भुजाओ मे त्रमश पाल-चूल-खट्वाङ्ग और वरदान रहा करते है एसी ही चार भुजाओ वाली हैं ॥ २३, २४, २५, २६ ॥ मयूर के श्रेष्ठ वाहन कौमारी कुमार के स्वरूप से मुसम्पन्न है-रक्त वस्त्रो को धारण करती हुई शूल और शक्ति का धारण करने वाली इनको माना गया है ।। हार तथा क्यूरो के धारण करती हुई कताकु धारिणी है - सिंहासन पर स्थित रहती हुई वाला स सवित है। चार बाहुप्रो वाली-बरदान प्रदान करती हुई भख, चक्र और गदाधारिणी है। महिष पर समार-- घराह के सहम यह देवी चिस्याल तक मस्तक पर चामरो को धारण करती है ॥ २८-३०॥ गदाचवधरा तददानवेन्द्रविनाशिनी। इन्द्राणोमिन्द्र सरशी वच्चशलगदाधराम ॥३१ गजासनगता देवी लोचनबहुभिवृताम् । सप्तावनामा दिशाभरणमपिताम् ॥३२
नानादेव प्रतिमा प्रमाण दर्णन
४६५
तोपड्गधरा तद्वद् वश्य योगेश्वरीमिमाम् ।
दीघजिह्वामूध्वकेशीमस्थिसप्डेश्च मण्डिताम् ॥३३
दष्ट्राकरालवदना कुर्य्याच्चव कृशोदरीम्।
कपालमालिनी देवी मुण्डमालाविभूषिताम् । ३४
कपाल वामहस्ते तु मासशाणितपरितम्।
मस्तिप्काक्तञ्चविमाणा शक्तिका दासणेकरे ॥३५
गृध्रस्या वायसस्था वा निमासा विमतादरी ।
करालवदनातहत या सा निलोचना ३६
अव महिप के कार विराजमाना बगह क ही तुल्य स्वरूप व ली
वाराही गदा और चक्र के धारण करन वाली है और दानवे द्रो को उमी
तरह से विनाम करती है। इन्द्र के पहा बन पूल और गदा को
धारण करने वाली इन्द्राणी है ।:१॥ गज व आमन पर स्थित-बहन
से लोचनो स युक्त यह देवी होती है--- न मुवण के समान वर्ण को
आभा से युक्त दिवाभरणा स मन्विन एवं विभूपिन-तीक्षा खड्ग
को धारण करने वाली प्रब इस योमरी का मैं वर्णन करगा। यह
योगेश्वरी दवी लम्बी जिह्वा वानी-उव की पोर जान वाले केशों मे
मयत और अम्यि खण्डो से मण्डिन है। २.३३ ।। ददा के द्वारा
काल वदन वालो इस कृण उदर से मम्मन्न दवो का दशित करनी
चाहिए । कपाल मालिनी दगे मुण्डो की मालाओं स गामित है। यह
माम और शोगिन म परिपूर्ण पाल को अपन वाये हाथ मे प्रण किया
करती है तथा वर मस्तिष्क म अक्त होता है एव दक्षिण कर मे शक्ति
को धारण करन वाला है। गृध्र पर स्थित-वायम पर ममत-दिना
माम बाली--विशेष रूप स नत उदर स युका-गल मुख वाली और
उसो मांति इस स्वरूप का तीन लोवनो वाला करना चाहिय ।। ३४ ।
३५॥ ३६॥
मत्स्यपुरम चामुण्डा वद्धघण्टा वा द्वीश्चिमधरा शुभा । दिग्वासा कालिका तहद्रासभस्था कपालिनी ३७ सुरक्तपुष्पाभरणा वर्धनी ध्वजसथुता। विनायकञ्च कुर्वीत मातृ.णामन्तिके सदा ॥ वीरेश्वरश्च भगवान् वृषारूढो जटाधर । वीणाहस्तत्रिशूली च मातृ णामग्रतो भवेत् ।। श्रिय देवी प्रवक्ष्यामि नवे वयसि सस्थिताम् । सुयौवना पोतगण्डा रक्तोष्ठी कुञ्चितभ्र वम् ।४० पीनोन्नतस्ततटा मणिकुण्डलधारिणीम् । सुमण्डल मुख तस्या शिर मीमतभूषणम् ।।४१ यस्वस्तिकशड खैर्वा भूपिता कुण्डलालकं । कञ्चकावद्धगात्रौ च हारभूपौ पयोधरौ ॥१२ चामुण्डा-बद्धघण्टा-द्वीमि (गज के) चम को धारण करने वाली अर्थात् नग्न-कालिका-रासभ (गधा पर सस्थित-पालो के धारण करने वाली- मु दर रक्त वर्ण वाल पूछतो के आभरणो से समलकृत-- वधनी-और ज म सयुत पपल मालिनी आदि का स्वरूप हाता है । मात गणों व समोर मे सदा भगवान् विन य क वो अवश्य ही समवस्थित काना चाहिए। और घोरेश्वर भगवान्-वृप पर समारूढ-- जटा जूट के धारण ११ वाले-हाय मे वीणा रखन यात्र-विशल धारी उन मात. गणों के आगे विराजमान होन नाहिए ॥३७, २८, ३६।। अब हम श्री देवी र स्वरूा के विषय में वर्णन करेग जागि नूतन वय मे सस्थित है-मुन्दर योवन स सम्पान-पीनमा बाली-रत आष्ठो स स गुन- पुचित भौगो बाली-पीन एव उनन्त स्तनतट स युक्त-मणि अटित पुण्डमा धारण करत द ली है । उन श्री देवी का मुख गुदर मण्डल वाला है तथा शिर मीमत भूषण गुप्त है ।।४०, ४१॥ पद्म परिमा, घसा दारा अपवा अमष भार अलावारा भपित है। पञ्चुकी नानादेव प्रतिमा प्रमाण वर्णन से आवद्ध गानो वाले-हार की भूपा मे भूपित श्री देवी से दोगोपयोधर नागहस्तोपमो वाहू वेयरपटगोज्यलो। पा हस्ते प्रदात य श्राफ्स दक्षिणे भुजे ॥४॥ मेखनामरणा तद्वत्तप्तकाञ्चनसप्रगाम् । नानाभरणसम्पन्ना शोभनाम्बरधारिणीम् ।।४४ पाश्वतस्या स्त्रियः पारश्चिामरध्यप्रपाणयः । पद्मासनोपविष्टा तु पसिंहासनस्थिता ॥४॥ परिभ्याम्नाप्यमानासोभृङ्गाराभ्यामयशः । प्रक्षालयन्तौ करिणीमद्भागभ्यातथापरी ॥४६ रतूयमाना च लोरेशातथा गन्धय गुम । तथा यक्षिणी कार्या सिद्धानपयिता ।। पाश्यया कलशा तस्यास्तोरणे दगदानवा. । नागारीव तु रतल्याः राङगोटरघरिण अधस्तारप्रतिस्तेण नामे वन्तु पौरपी । पणानं यतथ्य दिग्हिारदा गमा [IVE नाग (गज) के हरन (मूड गटग दाना या है जो ना और वटा आभूषणों से गाय हैं। इनर हाय पद्म lim तथा दक्षिण परम श्री पर दना घाए तप्त पानी मेघला व प्राण ग युक्त - भूपमा गम मुस-11 II बापान में धारण करने यी भगवती या दया का KETrt in पार्य भाग में चामर म युन हामी यसो frammar tun unt है। वह देवी पदम 7 आमर पा उilan In 1.1Mm निमित सिदामन पानमति, 211 Milam हती है। अना यार Enr Marr है तथा दूमर महारा Mintuk मम्यपुराण एव ग धव और गुह्यको के द्वारा वह दवी स्तूयमान होती हुई प्रदर्शित करे । इसी भांति म सिद्धो और असुरो क द्वारा निपेवित यक्षिणी को भी दिखलाना उचित होता है। उसके दानो पाव भागो म दो कलश सस्था पित होने चाहिए था तोरण मे देव और दानवो को स्थित करे । खडग और खेटक के धारण करने वाले नागो की भी स्थिति करनी चाहिए । उनके नीचे के भाग में प्रकृति होवे तथा नाभि के ऊध्व भाग मे पोरुपी होनी चाहिए मूर्धा मे फरणा दशित करे और सम द्वि जिह्व (सर प्रदशित करन चाहिये ॥४-१३॥ पिशाचा राक्षसाकोव भूतवेतालजातय । निमासाश्चैव ते सर्वे रोद्रा विकृतरूपिण ॥५० क्षेत्रपालश्च कर्तव्यो जटिलोविकतानन । दिग्वासा जटिलम्वद्व छागामायनिपेवित ॥५१ वपाल वामहस्ते तु शिर केशे समावृतम । दक्षिणे शक्तिका दद्यादभुरक्षयकारिणाम ॥५२ अथात सम्प्रवक्ष्यामि द्विभज सुमायधम । पार्वं चाश्वमुख तस्य मा जसंयुतम् ॥५३ दक्षिणे पुष्पवाण-च वामे पुष्पमय धनु । प्रीति स्यादक्षिणे तस्य भोजनोपस्करान्विता ।५४ रतिश्च वामपातु शयन सारसान्वितम् । पटश्य पटहश्चैव पर कामातुरस्तथा ॥५॥ पाश्चता जलपापी च वन नन्दनमेव च । मुशामनश्च ति या भगवान् पसुमायुध ।। रास्थानमोपद्वक्त्र स्थादिम्मास्मितघवयम् ।।५।। निदात प्रावन प्रतिमालक्षण मया । विस्तरण नाति वृहस्पतिपि हिना | Is पीठिका लक्षण वणन सब निर्मा पिशाच-राक्षस-भूत-वेताल जाति वाले ये और विकृत रूप वाले होने चाहिये । जटाधारी तथा विवृत आनन वाला क्षेत्रपाल भी वहाँ पर स्थापित कर दशित करे जो दिशामो के वसन वाला (नग्न) जाटन कुत्तों और गोमायु (गोदड) आदि से ऐसा यिक्ति हो कि उसक साय रुला हे हा। उमके वाम हस्त मे कपाल हो तथा उस का शिर कशो से समावृत होवे । दाहिन हाथ में अमुरो के क्षय के करने वाली शक्तिका का देव-ऐसा हो उनका बप दिखलावे । इसके अनन्तर अब दो भुजाओ वाले कुमुमायुर कामदेव का वणित किया जाना है। उसक पाश्व म मकरध्वन से सयुत अश्व मुख को सस्थित करना चाहिए ॥१०-1३11 उमके दाहिने हाथ मे पुप्पो का बाण और बाम हस्त पुष्पमय धनुप होना चाहिये । उमा दक्षिण इस्त्र में भोजन के उपस्करों से समम्बित प्रोति होनी चाहिय । वाम पावं मे रति और सार सावित शयन-पट-पटन-खर जो काम से आतुर हो दिखाना चाहिये । उसके पाश्वं मजल की वापी प्रौर नन्दन वन दिखावे । इस प्रकार से भगवान् कुसुमायूध को मुन्दर गोमा स ममन्वित प्रदर्शित करना चाहिये। कुसुमायुध क मस्थान म ईपद वक्त होना चाहिये और वह स्मित से युक्त मुख वरिपत करे। यह मैने उद्देश से कुसुमायुध आदि समस्त देवो की प्रतिमाओ का नए बनला दिया है । इन प्रतिमाओं का विस्तार पूर्वक वपन करन की मामथ्यं तो हे द्विजगन ! दवो के आचार्य वृहस्पति म भी नहीं है।।५५-५७ १.५-पीठिका लक्षण वर्णन पीटिकालक्षण वारे यथावदनुपुवंश । पोठीच्छये यथ वच्च भागान् पाटा कारयेन् । भूमावेकः प्रविष्ट, स्याच्नतुभिर्जगतीमता।
मत्स्यपुराण
वृत्तोभागस्तथा स्यावृत पटलभागत ॥२
भागस्त्रिभिस्तथा कण्ठ कण्ठपट्टस्त्रिभागत ।
भागाभ्यामूध्वपट्टश्च शषभागेन पटिटना ॥३
प्रविष्ट भागमेकक जगतीयावदवतु ।
निगमस्तु पुनस्तस्य यावद्व शेषपटिटका ।।।
वारिनिगमनाथ तु तनकाय्य प्रणालक ।
पाठिकानातुसर्वासामेतत्सामा यलक्षणम् ॥५
विशेपान देवताभेदान् शृणुध्व द्विजसत्तमा ।।
स्थ ण्डल बाथ वापा वा यक्षी वेदी च मण्डला ॥६
पूणच द्रा च वज्र च पद्मावाधशशिस्तथा ।
निणादशमोतासासस्थान वा नबोधत ।।
महपि प्रवर श्री मूत जी ने कहा-अब मैं ययावत आनुपूर्वी से
पीठिका कारण बतलाऊ गा । पीठिका की ययावत् ऊचाई और इस के
मोह भागो को कराना चाहिए | उनमे एक भ ग भूमि मे प्रविष्ट
हाये और चार भागो व द्वारा यह जगतातल माना गया है तथा एष
भाग वत्त होना चाहिए और वत पटल ये समागत होवे 1॥२॥ त न भागो
वे द्वारा कण्ठ तीन भाग से कट पट्ट-दो भागो से उध्व यह पौर
प भ ग स पट्टिा करे ॥३२जितनी भी जगती है उसमे एक एक भाग
प्रविष्ट है । फिर उसका जितना निगम है यह दोष पट्टिया है ॥१॥ जस
र निगमन बनिये वह
पर प्राला वरना आवश्यक है। समस्त
पाठिमा वा यह सामय सभण है ॥५॥ है । अब
गिरनामा क भ पाश्रवण का स्वा-या यक्षी-देवी-
मपन-गदा-पया-परमा-अध शनि-निकोशमी है। अब
उसामधान कासमपसना म ६७॥
स्थ पिना चग्या मजिता मालानि ।
वा माना गया यशानिमा
पीठिका लक्षण दर्शन
-
चतुरवायता वेदी न ता लिङ्गपु योजयेत् ।
मण्डलावतुलायात मेखलाभिर्मणप्रिया 11
रक्ता द्विमेखलामध्ये पूर्णचन्द्रा तु सा भवेत् ।
मेखलायसयुक्ता पडसावधिका भवेत् ॥१०
पोडशाम्रा भवेत्यमा किञ्चिद्भस्वा तु मूलत ।
तथैव धनुपासारा साद्धचन्द्रा प्रशस्यते ॥११
त्रिशूलसदृशोतद्वत् त्रिकाणाह्य दध्वतोमता।
प्रागुदप्रवणा तद्वतप्रशस्तालक्षणान्विता ॥१२
पग्वेिपत्रिभागेन निगम तत्र कारयेत् ।
विस्तार तत्प्रमाणञ्च मूलेचाग्रे ततोद वंतः॥१३
जलम ग च कतव्यन्त्रिनागेन सुशोभनः ।
लिङ्गस्याद्ध विभागेन स्थौल्येन समधिष्ठिता । १४
मेखला तलिमागेन खातचंब प्रमाणत ।
अथवा पादहानन्तु शोभन कारयेत्सदा ॥१५
स्याडला चौकोर होती है और वह मेखला आदि से रहित ही
हुआ करती है । वापा को दो मेवलाए होनो है तथा यक्षी की तीन मेख.
लाऐं बताई गयी है । वेदी चतुरसायना होती है और लिङ्गो म योजित
नही करनी चाहिये । मण्डला जा होती है वह वत्त ला होती है मेखलाओ
से मणप्रिया है ।।५, ।। जो दो मेखपाओ क मध्य मे रक्ता है वह ही
पूर्ण चन्द्रा होती है। तीन मेखनाओ से सयुक्न ; क.णो वाली वचिका
होतो है । पोइ अघों वाली पदमा कही जाती है। जो मूल कुछ
हम्ब हाती है तथा धनुप आकार वाली होती है वह साधं चन्द्रा
प्रशस्त कही जाती है । उनी तरह से त्रिशल के सदृश त्रिकोणा अर्व
भाग स मानी गयो है । उनी भांति से प्राग और उदव को और जो
भवणा हाती है वह लक्षणो मे अन्तिम प्रगस्त कही जाती है । वहा पर
परिवा निगम तीन भागो म हराना चाहिए। विस्तार और उसका
-
लिङ्ग लक्षण णन
४७३
होता है ||१८|| इस प्रकार से देवो के यजन करने के लिए पीठिया दश
तरह की कीतित की गयी है शिल मे शैलमयो ही पीठिया देनी चाहिये
और पार्थिव मे पार्थिवी देवे । जो दारू (काप्ठ) से जात हो यहां पर
दारुजा करे तथा मिश्रित होवे तो पोठिया भी मिश्रा ही परनी चाहिये।
जो
शुभ फल की इच्छा रखने वाले पुरुप हैं उनको चाहिये कि पीटिया
अन्य योनि की कभी भी न करें और जैसी होघे सी ही सदा पीटिका
को रचना करावे ॥१६॥ अर्चा में आमम देध्यं तथा लिङ्गा में थमम
करे । जिस देव को जो पत्नी होवे उसयो पीठ पर पति करना
ही चाहिए। यह सब सक्षेप से हमन पीठमा लक्षण वा दिया
है ।। २० ॥
१२६-लिङ्गलनण वर्णन
अथात. सप्रवक्ष्यामि विमरमटन्न ।
मुस्निग्धञ्च सुवर्णश्च त्रिग झवा.112
प्रासादम्य प्रमाणेन लिङ्गमा टे।
लिनमानेन वा विद्यालयमा
चतुरने समेगर्ने भनिन्।
वामेन ब्रह्ममयपत्र
प्रागुत्तरंण चीन निरमा
१७४
मध्यपुरान
महाप प्रवर मतजी ने कहा- अब इस अन तर मैं लिङ्गका
उत्तम लक्षण बतलाता हु। विचक्षण पुरुप को सुस्निग्ध और सुवर्भ लिङ्ग
करना चाहिए ॥१॥ प्रासाद प्रमाण स ही लिङ्ग व मानना विधान
किया जाता है अथवा लिङ्ग क मान से ही प्रासाद शुभ लक्षण से मुक्त
माना जाया करता है ।। - 1) चतुरस्त ( चौकोर ) समग मे ब्रह्मसूत्र
का निपात करना चाहिए। ब्रह्मान के वाम भाग से अा अथवा
विजहता है ॥३॥1 पूर्व और उत्तर म लोन दक्षिणा परयाधिन पुर के
ममर दिमाम म पूध दार को परिवपित करना चाहिय ॥ पूब
अपर द्वार माहे दक्षिणोत्तर द्वार का विभान पर पूर्व का एक
विधान भागत र मायात बाजान प्राप्त रकम मूनो
प्रतिवरना भागिा । भाम अप सजा मिजा यह ही यहा पर
करना पति और यही प्रशस्त कहा जाता है ॥५, ६,७॥
पञ्च माविमत्त वा विभागे जप्टयमुष्यत ।
भाजिानवधाग माध्यम पापियाम ||
पवस्मि नय न्या गर्भरिगाति पारयत ।
मगसून विम्याप नयधा गभभाजितम् ।।
उपटमदनीतियामध्यगमध्यगम् ।
[भ मानिभिर्मामाजगत ॥१.
पष्ट तु विधियानदिप राधा।
पन्यम विक्षिपसदसभेमपनु ॥११
नागौ।
लिङ्ग लक्षण वर्णन ४७५ पाँच भाग में विभक्त मे अथवा विभाग में जहध हा जाता है। गर्म में नौ प्रकार से भाजित करने पर पान्ज भागिक माध्यम होता है। एक ही मे नौ प्रकार से गर्भ में लिगो को कराना चाहिये । सम मूत्र का विभाजन करके इसके अनन्तर नौ प्रकार से गर्म भाजित करे ॥८, अर्ध ज्येट-अर्धकनीय तथा मध्यम होता है । इस प्रकार से गर्म का समा- श्यान दिया गया है। तीन भागो से विभाजन करना चाहिए । लिङ्ग के भेद नो हुआ करते हैं- तीन प्रकार का ज्येष्ठ जानना चाहिये इसी तरह से मध्यम भी तीन प्रकार का है और तद्वत् कन्यस तीन तरह का होता है । लिङ्ग के नौ प्रकार के भेद हा करते हैं ॥१०, ११॥ नाभि के अर्ध भाग को अपग से विभाजित करके इस अनातर बुध पुरुषो को चाहिए कि मम तीन भागो का परित्याग कर देवें। यह चतुरस्रक विषम्म होता है । आठ प्रस्र वाला मध्यम जानना चाहिये जो कि लिङ्ग का निश्चित भाग होता है । यदि विकोण हो तो उस से ग्रहण करपे युध पुरुप को कोणो से लाञ्छित करना चाहिए ॥१२, १३।। अष्टास करना चाहिये । उसी भाति कार्य को भी करावे । पीछे पोडशा श्रीकृत को वतुल कराना चाहिये । १४ ॥ आयाम. तभ्य देवम्य नाम्या वै कुण्डलीकृतम् । माहेश्वर विभागन्तु उद्ध्वं वृत्त त्वस्थितम् ॥१५ अधस्ताद्ब्रह्ममागग्तु चतु'स्रोविधीयते । अप्टाम्रोवैष्णवीमागो मध्यस्तम्य उदाहृत ॥१६ एव प्रमाणमयुक्त तिनवृद्धिप्रदम्मवेत् । तथान्यदपि वक्ष्यामि गभमान प्रमाणत. ॥१७ गममानप्रमाणेन यल्लि गमुचित भवेत् । चतुर्धान द्विभज्याथ विपम्भन्तु प्रकल्पयेत् ॥१८ देवतायनने मूत्र भागनयरियलितम् । अपम्नाच्नतुरन्त अप्टान मध्यभागतः ।।१६ ४७६- मत्स्यपुराण पूज्य भागस्ततोऽद्धन्तु नाभिभागस्तथोत्यते । आयामे यद्भवेत्सूत्र नाहस्य चतुरस्रके ॥२० चतुरस्राद्ध परित्यज्य अष्टास्त्रस्य तु यद्भवेत । तम्याप्यद्ध परित्यज्य ततोवृत्तन्तु कारयेत् ।।२१ उस देव के आयाम नाभि मे कुण्डली कृत है । माहेश्वर तीन माग ऊद वृत्त अवस्थित है ॥ ५॥ नीचे की ओर ब्रह्मभाग चतुरस्र (चौकोर) विहित किया जाता है । अ ट्रास्त्र वैष्णव भाग उदाहृत कर दिया गया है । इस प्रकार से प्रमाण से संयुक्त लिङ्ग वृद्धि का प्रदान करन वाला होता है । उमी तरह से और भी गभमान प्रमाण से बत- साऊंगा ।। १६ ॥ १७ ॥ मर्भमान के प्रमाण स जो लिङ्ग उचित होवे उमको चार भागो में विभयन करके विष्कम्म यो प्रकल्पित करे ॥१ ।। देवता के अ यान मे सूत्र को तीन भागो मे विशेष रूप से पल्पित करे । नीचे की योर चतुरस-मध्यमाग मे अटास इससे आधा पूज्य भाग है तथा वह नाविभाग कहा जाया करता है । अयाम मे नाह के चतुरस्रक मे मायाम म को सूत्र होता है उस मनुर साधं का परित्याग कर देवे पौर जो प्रष्टास होता है उसके भी अधमाग का परित्याग करके इराक पश्चात फिर यत्त का कराना चाहिय ॥२०॥२१॥ गिर प्रदक्षिण तस्य सक्षिप्त मूलतोयसेत् । ज्येप्टपूज्य भल्लि गगधस्ताविपुलमन यत् ॥२ सिरसा च मदानिम्नमनाश लक्षणान्वितम् । मौम्यन्तु श्यते लिनियमिद भवेत ॥२३ स्थ मन च मध्य तु प्रभासवत. समम् । विधान पस्ति वेत्तत्मावागिरम ।।२४ अ यया यादमा तदरमप्रपात । एम्नमय कुर्मान् पाटिव धिय तथा ॥५ मदारमागिहा मनसि रानी ।।
देव प्रतिष्ठा विधि वर्णन
१७
उमका सक्षिप्त प्रदक्षिण शिर मूलमे व्यास करना चाहिए। जो
नीचे की ओर विपुल है यह ज्येष्ठ पूज्य लिग होना चाहिय ॥२२॥ सदा
शिर स निम्न एवं मनोज्ञ लक्षणादिन होता है । जो सौम्य लिङ्ग
दिखलाई देता है वह निश्चित रूप स वृद्धि क प्रदान करने वाला होता
है। इससे अनन्तर मूल मे-मध्य मे और प्रमाण म सभी ओर से सम
है । इस प्रकार का लिङ्ग है वह सर्वकारिक होता है अर्थात सभी
फामनामी को पूर्ण करने वाला होता है । इसके विपरीत अन्य प्रकार का
जो लिंग होता है वह असत् ही कहा जाता है। इस रीति से इमको
रत्नो स परिपूर्ण-स्फटिक मणि के द्वारा रचित तथा पार्थिव करना
चहिये अथवा मन को रुविकर हो ता दारमय भी परम शुम होता है ।
॥ २३-०६॥
१२७-देव प्रतिष्ठा विधि वर्णन (१)
देवतानामर्थतासा प्रतिष्ठाविधिमुत्तमम् ।
वद सूत । यथान्याय सर्वेपामप्योपत ॥१
अथात मप्रवक्ष्यामि प्रतिष्ठा विधिमुत्तमम् ।
कुण्डमण्डपवेदीना प्रमाणञ्च यथाक्रमम् ॥२
चैो वा फाल्गुने दापि ज्येष्ठे वा माघवे तथा ।
माघेनामवदेवानाप्रतिष्ठाशुभदाभवेत् ।।३
प्राप्यपक्ष गुंभमुक्लमतीते दक्षिणायने ।
पन्चमा च द्वितीया च तृतीया सप्तमी तथा ॥४
दशमी पौर्णमामी च तथा श्रेष्ठा प्रयोदशी।
आसु प्रतिष्ठा विधिवत् कृत्वा वफना लभेत् ।।५
जापाद तथा मूलमुतगद्वयमेव च ।
ज्येष्ठाश्रवणराहिण पूर्वाभाद्रपदा तया ॥
मत्स्यपुराण
हस्ताश्विनोरेवती च पुष्योमृगशिरस्तथा।
अनुराधा तथा स्वाती प्रतिष्ठादिपु शस्यते । १७
ऋषिगण ने कहा--हे श्री सूतजी ! अब इस सबके कथन के
अनन्तर आप जो भी जांचन हो पूर्ण रूप से इन समस्त देवों की प्रतिष्ठा
की विधि का वर्णन करिये ।। १ ।। श्री सूतजी ने कहा-इसके अन तर
उत्तम प्रतिष्ठा की विधि के विषय मे में वणन करता हूँ और कुण्ड---
मण्डप तथा वे दयो का भी यथा कप (भाग बलाऊंगा ॥२॥ चत्र मे,
फाल्गुन में, ज्येष्ठ में)अयदा माधव मे या माघ म स मे सब देवा की प्रतिष्ठा
शुभ देने वाली होती है ॥३॥ दक्षिणायन के समाप्त होने पर परम शुभ
शुक्लपक्ष को प्राप्त करके पञ्चमी द्वितीया, तृतीय, सप्तमी, दशमी,
पौर्णमासी और त्रयोदशी ये तिथियाँ परम श्रेष्ठ होती हैं। इन तिथियों में
विधिपूर्वक प्रतिष्ठा करने पर वह बहुत अधिक फल का लाभ किया
करता है। अय नक्षत्रो के विषय मे बतलाया जाता है दोनो आषाढा--
मूल, दोनों उत्तरा ज्येष्ठा, श्रवण, रोहिणणे पू िभाद्र गदा, हस्त, अश्विनी,
रेवती पुष्य, मृगशिरा, अनुराधा, स्वाती य नक्षत्र प्रतिष्ठा आदि कार्यों
मे प्रशस्त माने जाया करते है॥४-७॥
बुधावृदम्पति शुक्रस्नयाऽप्येते शुभग्रहा ।
एभिनिरीक्षित लग्न नक्षनञ्च प्रशस्यते ।।
महताराबल लम्वा ग्रहपूजा विधाय च ।
निमित्त शकुन लब्ध्वा वयित्वाद्भुनादिकम् ॥
शुभयोगे शुभस्याने क्रूरग्रह विवजिते ।
लग्नेऋक्षेप्रति प्रतिष्ठादिकमुत्तमम् ।।१०
अपने विपुवे तद्वत पडशीतिमुखे तथा ।
एतेषु स्थापनवार्य विधिप्टेन कमणा ॥११
प्राजापत्ये तु शयन श्वेते तूत्थापन तथा ।
मुहूर्तेस्थापनघुर्यान पुनर्वाह्य विचक्षण ॥१२
।
देव प्रतिष्ठा विधि वर्णन ४०६ प्रासादस्योत्तरेवापि पूर्वेवा मण्डपो भवेत् । हस्तान् पोडाकृतिदशद्वादश वा पुन ॥३ मध्येवेदिकयायुक्त परिक्षिप्त ममन्तत । पञ्चसप्तापि चतुर करान् कुर्वीतवेदिकाम् ॥१४ बुध, बृहस्पति और शुक्र ये तोना प्रह परम शुभ होते हैं । । प्रहो के द्वारा देखो गई लग्न और नक्षत्र प्रगस्त कहे जाया करते हैं। घह और ताराओ का वल प्राप्त करके तथा ग्रहो की पूजा करके एक निमित्त और शकुन पाकर तथा अद्भन आदि को वजित करके शुभ गोग मे-तुम स्थान मे कर ग्रहों पे विवजित लग्न मै तथा नक्षत्र में प्रतिष्ठा आदि उत्तम कम को करना चाहिए ॥ १०॥ बियुव अयन मे उसी भनि पडशीनि मुख में विधि के दाग इट कर्म से इनमें ही स्थापना करनी चाहिए ॥११॥ प्रजापत्य म शयन तथा श्वेत मे उत्यापन पिचeण पुम्प को पुनर्वाहह्म मुहूर्त में स्थापन करना चाहिए ॥१२॥ प्रामाद के उत्तर भाग म अयश पूर्व भाग में मण्डा होना चाहिए। वह भी दश हाथ या द्वादश हाथ प्रयधा मोलह हाथ का विस्तृत बन ना घाहिए ॥ १३ ॥ मध म वेदी स युक्त तथा चारो ओर से परिक्षित होना चाहिो । वेदी भी पाच मान और चार हाय विस्तार वाली निमित शरावे ॥१४॥ चतुभिस्तोरणयुक्तो मण्डप स्याच्चतुर्मुखः । नक्षद्वारं भवेत्पूर्व याम्येचौदुम्वर भवेत् ॥१५ पश्चादश्वराटित नयग्रोध तथोत्तरे । भूमौ हस्तप्रविष्टानि चतुहंस्तानिचोन्ड्रये ॥१६ सूपलिप्त तथा श्लक्ष्ण भूतल स्यात् मुशोभनम् । वत्व ननाविध स्तहत् पुष्पपल्लवशोभितम् ॥१७ कृत्वव मण्डप पूर्व चतुरेिगु विन्यसेत । अप्रणान् कलशानप्टो ज्वललामचनभिनान ॥१८ ४८० मर यपुगण चूतपल्लवसच्छन्नान् सितवस्त्रयुगान्वितान् । सौषधिफलोपेताश्चन्दनोदकरितान् ॥१६ एव निवेश्य तद्गर्भ गन्धधूपाचनादिभि । ध्यजादिरोहण कार्य मण्डपस्य समन्तत ॥२० ध्वजाश्च लोकपालाना सवदिक्षु निवेशयेत् । पताकाजदाकारामध्येस्यान्मडपस्यतु ।।२१ मण्डप चार मुखा वाला चार तोरणा से युक्त होना चाहिये । पूर्व दार मे प्लक्ष ( पाखर ) वृक्ष वाला होना चाहिए । दक्षिण द्वार में उदुम्बर का वृक्ष होना चाहिए । पश्चिम दिशा में जो द्वार हो वह अश्व- स्य (पीपल ) से युक्त एव घटित होना चाहिए तथा उत्तर दिशा मे म्यग्रोध ( वट) का वृक्ष होना चाहिए भूमि म एक हाथ प्रविष्ट और ऊँचाई मे चार हाय होना आवश्यक है। भूमि का भाग अच्छी तरह से उपलिप्त-पलक्षा एका शोभन होना आवश्या है। नाना प्रकार के वस्त्रो के द्वारा भूपित-पुष्प और पल्लवो से शोभित पहिल मण्डप की रचना करार फिर इस प्रकार से चारों द्वारो मे विन्यास करना चाहिए अर्थात् प्रण से रहित-ज्वन काञ्चय अर्थात देदीप्यमान सुवर्ण जिनक मध्य मे प्रक्षिप्त लिया गया हो ऐसे आठ कलशों का प्रत्या द्वार पर दो. दो विग्यस्त बरे ॥ १५, १६, १७, १८ ।। माघ्र के पल्लवा रा सच्छन- श्वेन दो वस्त्रो से समर्मावत-सीपधि एटा फ्लोस उपेत- चन्दन ये पन से पूरित आठ पालशो को वहाँ पर निवेपित करके उनके मध्य मे गघ-धूप और अनि बादि मे सयत परखे मण्डप के पागे ओर उठाना आदि में उगे मुगोभित करना चाहिए | १९, २० । समस्त दिशा में सोपालोको नामाको निवेतित करना चाहिए । मण्डप ने मध्य भाग में जनद र मापार थाली पता होनी चाहिए ॥२१।। गन्धधूपादिष पुर्या स्वस्वर्गन्य रनमात् । यलिञ्चलोषपागम्य स्वमप्रोण निवेदयत् ।।२२ व प्रतिया विधि वर्णन ४८१ ऊर्ध्वन्तु ब्रह्मणे देय त्वधस्तारछेपवासुके । महितायान्तु ये मत्रा तवत्या. श्रुतौ स्मृता ॥३ तैः पूजा लोकपालाना कर्तव्या च समन्ततः । विरानमेकरात्र वा पञ्चरात्रमथापि वा ॥२४ अथवा सप्तरावन्तु कायं स्यादधिवासनम् । एव सतोरणकृत्वा अधिवासनमुत्तमम् । २५ तस्याप्युत्तरत कुर्यात् स्नानमण्डपमुत्तमम् । तदर्धन विभागेन चतुर्मागेन वा पुनः ।।२६ आनीय लिङ्गमच्ची वा शिल्पिन पूजयेद्बुधः । वस्त्राभरणरत्नेश्च येऽपि तत्परिचारकाः ।।२७ क्षमध्वमितितान् ब याद्यजमानाप्यत. परम् । देव प्रस्तरणकृत्वा नेत्रज्योतिः प्रकल्पयेत् ॥२८ ऋतुम से अपने २ मत्रो के द्वारा गन्ध-धूप आदि सव करना चाहिये । अपने मन्त्रो से लोक्पालो के लिये बलि निवेदित करे ।। २९॥ ऊपर की और ब्रह्माजी को बलि समर्पित करे और नीचे की ओर शेप तथा वासुकि को बलि देनी चाहिए । जो मन्त्र सहिता म है वह वती की श्रुति मे रहे गये हैं ॥ २३॥ उनसे ही सभी ओर लोकपालो की पूजा करनी चाहिए । तीन रात्रि तक-एक राधि पञ्च रात्रि अथवा सप्त राति पर्यन्त अधिवामन करना चाहिए। इस प्रकार से सतोग्ण उत्तम अधिवासन करके उसके भी उत्तर मे उत्तम स्नान मण्डप की रचना करनी चाहिए। उनके अर्धभाग से-~-तीन भाग म अथवा चार भाग से लिङ्ग को लाकर अथवा अर्धा को लार बुध पुरुष को शिल्पी को पूजा करनी चाहिए । जो भी उनके परिचारक हो उनको भी वस्त्र-आभरण और रलों से पूजा करे। उसके धागे देव के समय में यजमान को 'क्षमा कीजिए- ऐसा बोलना चाहिये और फिर देव को प्रस्तरण पर करफ नेत्रो की ज्योति को परिकल्पना करे ॥४-२-1॥
४८२ मत्स्यपुराण अक्षणोरुद्धरण वक्ष्ये लिङ्गस्यापि समासत । सर्वतस्तु बलि दद्यासिद्धार्थनपावसं ||२६ सुवलपुष्परलकृत्य घृतगु गुलधूपितम् । विप्राणान्चाचन कुर्याद्यान्ठक्त्या च दक्षिणाम् । ९० गा महीं कनकञ्चैव स्थापकाय निवेदयेत् । लक्षण कारयेद्भक्षा मन्त्रोणानेन द्विज ॥३१ नमो भगवते तभ्य शिवाय परमात्मने । हिरण्यरेतसे विष्णो विश्वापाय ते नम ॥३२ मन्त्रोऽय सर्वदेवाना नेत्रज्योतिपि स्मृत.। एवमामन्य दवेश वाचनेन विलेख येत् ॥ ३ मङ्गल्यानि च वाद्यानि ग्रह्मघोष संगीतकम् । वृद्ध्यर्थ कारपेद् विद्वान् अमङ्गल्यविनाशनम् ॥३॥ लक्षणोसरण वक्ष्य लिगम्य गुसमाहितः । प्रिया विभज्य पश्याया लाण स्याद् विमाजरम् ।। ३५
देव प्रतिमा विधि वर्णन
=3
करन वाल मङ्गल वाच -गीतों व महित ब्रह्म घोष वृद्धि के निच करान
च यि ।। ४।। यब मैं मुममाहित हार लिङ्ग ३ लषण का उद्धरण
पहूंगा पूज्या म तीन प्रकार से दिमाग करके लक्षण विमान हाला
है ।।३।।
लेखानयन्न क्तंय यवाप्यन्तरसयुतम् ।
न स्थूल न कृश तहान वत्र छेदवजितम् ॥३६
निम्न यवप्रमाणेन ज्यप्ठलिड्गस्य वाग्यन् ।
सूक्ष्मास्ततस्तु क्त या यथामध्यमकेप्यमेत ॥३७
थप्टभक्त नत वृत्ता त्यक्तावा भगाय दुध ।
लम्बयत्सप्तरेम्वास्तु पाश्वयौम्भया समा ॥३८
सावत प्रलम्बयद्विद्वान यादमागचनुष्टयम् ।
भ्राम्यत पन्चमागोवं कारयत्मडगमन्तत ॥३६
रसया मगमे तद्वत् पृष्ठ भागद्वय भवन् ।
एवमनासमास्यात ममायाल्लक्षण मया ॥४०
अष्टयवो व अन्नर स सयुत तीन लेखायें करनी चाहिए । न तो
अनि स्यूल हो और न अत्यनाही हा और उमी भाति दक्न छैद
वजित नहीं होना चाहिय ।। ३६ ॥ ग्वष्ठ लिङ्ग का यव क प्रमाण स
निम्न कराना चाहिये । इमा उपरान्त सूक्ष्म करन चाहिए और यया
मध्यमक मन्याम करे1 बुध पुष्प का चाहिय फिर अप्ट भक्त करक
माग अय को त्याग दवे और दाना पावों में समाप्त रखामों का लम्ब.
मान करे। विद्वान को तब तक प्रलम्बित करना चानिय जन तक चार
भाग हावे । पांव नाग कार की आर भ्रामित क्यि बात हैं और अन्तत
सङ्ग कराना चाहिब दोना रेखाओ के सङ्गम म उसी तरह स पृष्ठ म
दो माग होने चहिये । इस प्रकार स मैंन समेएम लाण को वनला
'दया है ॥३७-४०॥
४८४
मत्स्यपुराण
१२८--देवप्रतिष्ठा विधि वर्णन (२)
अतः पर प्रवक्ष्यामि मूर्तिपानान्तु लक्षणम् ।
स्थापकस्य समासेन लक्षण शृणुत द्विजा. 1||१
सर्वावयवसम्पूर्णो वेदमन्त्रविशारदः ।
पुराणवेत्ता तत्वज्ञा दम्भलोमविजित..
कृष्णसारमयेदेशे उत्पन्नश्च शुमाकृतिः ।
शोचाचारपरो नित्यं पापण्डकुलनिस्पृहः ॥३
सम शत्रौ च मित्रौ च ब्रह्मोपेन्द्रहरप्रियः ।
ऊहापोहार्यतत्वज्ञो वास्तुशास्त्रस्यपारंग ॥४
आचार्यस्तु भवेग्नित्य सवंदोपविजित ।
मूर्तिपास्तु द्विजाश्चैव कुलीनामृजवस्तथा ॥५
द्वात्रिंशत् पोडशाथापि अष्टो वा श्रतिपारगाः ।
ज्येष्ठमध्यकनिष्टेपु मूर्तिपाव: प्रकीर्तिता ।।६
ततो लिङ्गमथार्चा वा नीत्वा स्नपनमण्डपम् ।
गीतमङ्गलशब्देन स्नपन तन कारयेत् ।।७
महषि प्रवर सूतजी ने कहा- इससे आगे मैं मूत्तियो के लक्षण
बतलाता हूँ । हे द्विजगण ! जो मूर्तियो की स्थापना करने वाले पुरुष हैं
उनके लक्षणो को आप लोग श्रवण करें ||१॥ स्थापा को दिन २ गुणो
से सुसम्पन्न होना आवश्यक है-यह बतलाते हुए कहते है जो पुरुष देवों
की प्रतिमा की स्थापना करता है वह अपने शरीर के सम्पूर्ण अवयवो से
सयुत होना चाहिये- वेदो के मन्त्रो का पण्डित पुराणो का ज्ञाता-तत्वो
का जानकार-दम्भ, लोम से रहित भी होना उसका आवश्यक है। सब
के बपन का निचोड यही है कि उपयुंक्त गुणो से हीन पुरुप मूर्ति स्थापक
होने का पात्र ही नहीं हाता है ॥२॥ मूति स्थापन कृष्णसारी से परि-
पूर्ण देशो में समुत्पन्न हो और शुभ प्रारति वाला होना चाहिए । वह
देव प्रतिष्ठा विधि वर्णन
शौच के आचार मे परायण तथा नित्य ही पापण के कुल
मे
स्पृहा न
रखने वाला भी होना आवश्यक है [१३|| देवमूर्ति का स्थापक पुरुष शत्रु
और मित्र दोनो में समान व्यवहार रखन वाला होवे - ब्रह्मा-विष्णु पौर
शिव का प्रिय हो-हा और अपोह में के तत्त्वो का ज्ञाता तथा वाम्मु
शास्त्र का पारगामी विद्वान् होना चाहिए ॥४ा स्थापना कराने वाला
प्राचाय्यं नित्य ही सभी दोषो से विशेष रूप में रहित होना चाहिए । जी
भी द्विजगण मूत्तिप हों वे सभी अच्छे शुद कुलो में समुत्पन्न और गारद
स्वभाव एव व्यवहार वाले हो ।।५।। बतीस-सोलह-आठ ऐमी ही मध्या
उन द्विजो की होनी चाहिए जो देव प्रतिमा की स्थापना गर्ने
मे मम्मिलित हो तथा ये ममा श्रुति के पारगामी पण्टिन मोहन मागि।
ये ज्येष्ठ-मध्यम और कनिष्ठ-इन तीन श्रेणियों में विमान का
जो भी मूत्तिा कहे गये हैं । ६॥ इमचे अनन्तर व गड
शिवाजी
को लेकर स्नपन मण्डप में प्राप्त होकर वहा पर मीना की
से स्नान करावें ॥७॥
देव प्रनिष्ठा विधि वर्णन ४-७ आप्यायस्वेति मन्त्रोण यातेरशिवेति च । उपविश्याय देव गन्धपुष्प समन्तत ॥१७ सित प्रतिसर दद्यात् वार्हस्पत्योति मन्त्रतः । दुकुलपट्टः कामिन नाचिनौरथापिवा || आच्छाद्य देव सर्वत्र छत्रचामरदपंणम् । पावंत. २थापयेत्तत्र दितानपप्प सयुतम् ॥१६ रत्नान्योपध्यस्तत्र गृहोपकरणानि च । भाजनानि विचित्राणि दायनासायनानि च ॥२० अभित्वा शूग्मन्द्रोण यथा विभक्तो न्ययेत् । तीर क्षद्रि पृत त्वृत भक्ष्य भोज्या-म(न) पारसं॥२१ पविधैश्च रसस्तद्वत् समन्तात् परिपूजसेत् । बलि दद्यात् प्रयत्नेन मन्त्रोणानेन भूरिशः ॥२२ "आपो देवी"- इत्यादि मत्र से स्था "आपोऽस्मान् मातरो- ऽपिच"- इत्य दि मन्त्र के द्वारा दल पट्टो से समाच्छादन करके देव प्रतिमा के शिरो भाग में नेत्रोपधानक अथवा कौशेय देना चाहिये- यह विचक्षण पुरष का परम कर्तव्य है। फिर इसके उपरान्त में मधु और सपि से (घृत स) अम्यजन करक सिद्धार्थ को के द्वारा पूजा करे। आप्या- रास्व' इत्यादि मन्त्र स 'यातेरदशिव' इत्यादि मन्त्र के द्वारा वहाँ पर उपविष्ट होकर सब ार से गन्धाक्षत पुप्पो से देव का अभ्यर्चन करना चाहिये ॥ १५. १६.७ । 'वाहस्पत्य' - इत्यादि मात्र के द्वारा देव को सित प्रतिसर समर्पित करना चाहिए। दवूल पट्टो व द्वारा अथवा अनेक प्रकार के पाम सूती वस्त्रो से सर्वत्र देव प्रतिमा का मली भौति समान्छादन करे और वहा पर पर्व भाग मे छत्र-चामर और दर्पण स्थापित करना चाहिए। वहा पर पुष्पा स सयुक्त एक वितान निर्मिन करावे । र न-औषधियाँ गृह के अन्य समम्न उपकरण-भाजन- विचिन शयन-आमन मूर मन्त्र के द्वारा अभिन को अने दभव के देव प्रतिष्ठा विधि वर्णन ४८ तथा पराजिता देवी सप्तसूक्त सरौद्रकम् । तथव शान्तिकाध्यायमथर्वा चोत्तरे जपेत् ॥RE शिरः स्थाने तु देवस्य स्थापको होममाचरेत् । शान्तिक: पौष्टिकस्तद्वन् मन्तीहितिपूर्वकः ॥३० पलाशोदुम्बराश्वत्यअपामार्ग: शमी तथा। हुत्वा सहस्रमेकक देव पादे तु सस्पृशेत् ॥३१ ततो होमसहस्रण हुत्वा हुत्वा ततस्ततः । नाभिमध्य तथावक्षः शिरश्चाप्यालभेत् पुनः ॥३२ हस्तमानेषु कुण्डेषु मूर्तिपा: सर्वतोदिशम् । समेखलेपुते कुयुोनिवक्तन्नेतु चादरात्॥३३ विस्तिमात्रायानिः स्यद्गजोप्ठसद्दशी तथा । आयताच्छिद्रसयुक्तापावंतः कलयोच्छिता ।।३४ कुण्डात कलानुसारेण सर्वतश्चतुरङ्ग ला । विस्तारेणोच्छ्यातद्वच्चतुरस्रा समाभवेत् ॥३५ अथर्वा मनीपी को पराजिता देवी-सप्त सूक्त, रौद्रक और शान्ति का ध्याय का पाठ तथा जाप उत्तर दिशा में करना चाहिए ॥२६॥ देव प्रतिमा के शिर के भाग की ओर स्थापक को होम का समाचरण करना चाहिए और वह होम शान्तिक पौष्टिक व्याहृतियों से युक्त मन्त्रों के द्वारा उसी भांति करे ॥३०॥ पलाश- ढाक) उदुम्बर (गूलर)- अश्वत्य (पीपल --अपामार्ग (आधा)-शमी (छौंकर) इनको समिधाओ से एक-एक सहस आहूतियां देवर देव के चरण मे स्पर्श करे ।३१। एक- एकसहस आहूतियों से होम करके फिर नाभि के मध्य भाग का-वक्षःस्थल का और शिरका आलमन करना चाहिए।३१ सव दिशाओं मे एक हायके विस्तार वाले कुण्डोमे जोकि मेन लाओ मे युवतहान चाहिए और योनिवका वाले हो उनमे बड़े ही आदर के साथ उन मूत्तिपाओ को करना चाहिए। 13. उनकी योनि एक वितरित (बालिग्न ) मर विस्तार वाली गज के
मत्स्यपुराण
ओष्ट के तुल्य होनी चाहिए। वह आयत-छिद्र सयुक्त-पाश्व भाग में
कला से उच्छित-कला के अनुसार कुण्ड से सब ओर चार अ गुल वाली-
विस्तार उच्छय-चतुरस्र और सम होनी चाहिये ॥३४ ३५।।
वेदीभित्ति परित्यज्य त्रयोदभिरगुलं ।
एव नवसु कुपरेषु लक्षण चव दृश्यते ॥३६
आग्नेयशाक्याम्येषु होत यमुदगाननै ।
शान्तयालोकपालभ्यो मूर्तिभ्य क्रमशस्तथा ॥३५
तथा मूत्यधिदेवाना होम कुर्यात्समाहित ।
वसुधा वसुरेश च यजमाना दिवाकर ॥३८
जल वायुस्तथासाम अकाशश्चाष्टम स्मृत ।
देवस्य मतयस्त्वष्टावेता कृण्टेषु सस्मरेत १६
एतासामधिपानमध्ये पवित्रा मतिनामत ।
पृथ्वी पाति शवश्च पशुपश्चाग्निमेव च । १०
पजमान तथवाग्रो द्रिश्चादित्यमव च।
भवोजल सदा पाति वायूमोशान एव च ॥४१
महादेवस्तथा च द्र भीमश्चाव। मेव च ।
सवदवप्रतिष्ठामु मूर्तिपा ह्यत एव च ॥१२
४६२ मत्स्यपुराण पुन करे तथा बारम्बार होम करना चाहिन । यजमान के द्वारा पुन पुन दक्षिणा भी देना परमावश्यक हाता है | सभी ओर से श्वेत वस्त्रों से उनकी सबकी पूजा करनी चाहिये । अपनी आर्थिक शक्ति एव सामथ्य क अनुसार उनको विचित्र सुवण के कटक-हेम सूत्र तथा सुवण की अगुली यक समर्पित करके उ हे पहिनावे ११४५-४८॥ वासोभि शयनीयश्च परिधाच्या स्वशतित । भाजनञ्चापि दातव्य यावत् स्यादधिवासाम् ॥४६ बलिस्त्रिसन्ध्य दातव्यो भूतेभ्य सवतो दिशम् । ब्राह्मणान् भोजयेत पूव शयान् वर्णा स्तु कामत ॥५० रानी महोत्सव कार्यों नृत्यगीतक्मङ्गल । सदा पूज्या प्रयत्नन चतुर्थीकम यावता ॥५१ विरानमेक रात्र वा पञ्चरात्रमथापिवा । सप्तरात्रमथोक्र्यात क्वचित्सद्योऽधिवासनम् ॥ सवयज्ञफलो यस्मादधिवासात्सव सदा ॥५|| उन सबका सतार वस्त्रो के दायनीया क द्वारा अच्छी रीति स परना चाहिये भोर य सबको परिघापन कराव । जब तक इनका वहां पर अधिवासन होये तब तब सबको भोजन भी दना चाहिए ॥ ४६ ।। सभी दिशामा म भूमो के लिय यलि मा ताना स च्याओ समय मदनी पहिया सरम पूरा ब्राह्मणो या भोजन करादे और इसमे उपरात गेष सभी वर्गों को इच्छा पूर्वव भाजन दवे ।।५० ।। नयीत और अन्य मङ्गलोर द्वारा रात्रि के समय में महान् उस्मय रना चाहिय । जब मर यह पतुर्थी म रहे सरा प्रयत्न धक सोपूना बर। विरात्र- ए रान-पय रान अपवा सण पत्र पयम्त पर। कही पातुर ती पधिवागन रक्षा मनोविरामद हम Eat .१ बापामा वरना ॥५१, २॥
कलियुगीन भावी रारा
४६३
१२६-कलियुगीन भावी राजा
शिशुको ध्र सजातीय प्राप्स्यतीमा वसुन्धराम् ॥१
नयाविंशत समाराजा शिशुकस्तु भविष्यति ॥२
श्रीमल्लपणिभंविता तस्य पुत्रस्तु वै दश ।
पूर्णोत्सगस्ततोगजा वर्षाण्यप्टादशव तु॥३
पञ्चाशतं समा. पट्न शान्तकर्णिभविष्यति ।
दशचाप्टौ च वर्षाणि तस्य लम्बोदर सुतः ।।
आपीतकादशद्वैच तस्य पृनो भविष्यति ।
दशचाप्टौ च वर्षाणि मेघस्वाति भविष्यति ॥५
स्वातिश्च भविता राजा समास्त्वष्टादशंव तु ।
स्कन्दरचातिस्तथा राजा सप्तव त विध्यति ।.६
मृगे द्रस्वानिवर्णस्तु भविष्यतिसमास्त्रयः ।
कुन्तल स्वातिकर्णस्तु भवितप्टोसमान प.॥७
महवि प्रवर सूतजो ने कहा-शिशुकोन्ध्र इम वसुन्धरा को प्राप्त
कर लेगा । वह शिशुक तईस दप पर्यन्त राजा रहेगा 1१, फिर उसका
पुत्र श्री मल्ल णि दश वर्ष गजा होगा। इसके पश्चात अट्ठारह वप
तक पूर्णो सङ्ग इस भूमि पर शासन करेगा ||३|| पञ्जाशत और छ वप
तक शान्तकणि राजा होगा। उसका पुत्र लम्बोदर अठारह वर्ष तक
राजा होगा । फिर आपीतक उसका पुत्र दश और दो वप तक राजा
होगा। अठारह वर्ष तक मैधस्वाति राजा इस मही मण्डल पर राज्य
करेगा। इसके अन तर अप्टादश वर्ष तक स्वाति इस मही का राना
होगा फिर सात वर्ष यय्यन्त सन्दर चाति राजा होगा। तीन वप तक
महेन्द्र स्वाति कर्ण इस वसुन्धरा पर राज्य करेगा। कुन्तल और स्वाति
कर्ण आठ वर्ष तक इस पृथ्वी पर नृप होगा |
एकसवत्सर राजा स्वातिवर्णो भविष्यति ।
भवितारिक्तवणस्तु वर्षाणि पञ्चविंशति ।
१६४ मत्स्यपुराण तत सवत्सरान् पन हालोराजा भविष्यति ॥ पञ्चमन्दुलकोराजाभविष्यतिसमा नृप। पुरीन्द्रसेनो भविता तस्मात्सौम्योभविष्यति ॥१० सुन्दरः शान्तिकणस्तु अब्दमेक भविष्यति । चकोर स्वातिकणस्तु पण्मासान व भविष्यति ।।११ अष्टाविंशतिवीण शिवस्वातिभविष्यति । राजा च गौतमो पुत्रोहरविंशत्यतोनप १२ अप्टाविंशतिनुतस्तस्यसुलोमावैभविष्यति । शिवधा सुलोमत्तु सप्त व भवितानप ॥१३ शिवस्वन्धशान्तिकांविता ह्यारमज. समा. । मवविंशतिवीण यज्ञ श्री शान्ति णिम ॥१४ एक वर्ष तक स्वानिवणं इस पृथ्वी का गजा होगा ॥८॥ १च्चीम पता रितपण शासन परेगा। पिर इसा पश्नात पाँच वर्ष ताल राजा होगा। ह नुप ! फिर पश्च भन्दुना राणा होगा- पुरीन और इमरा सौम्प नपति हाना। मुनर गामिन ए कप पपन्त इस दगुराना राजा होगा। नपा स्वनिमास तक पहागा ॥६, १०, ११॥ अट्ठाई वा पप्यन्त गिय स्वाति इस महा मानपानमति बनगा । गौतमी का पुत्र र जाससीस वपना रहा। उमरा गुमाया प्रदटाईम १५ पपल राजा हो। उग गुलाम । गगन या सात 04 प. ना रहमा | Ram से शिव समय होगा। उन्नीस व ताया था, रिण का हो ।(१३ . बड़े भवितास्मस्जिगातुममारतत । सण्या वापिगग्तु तप : गमादा ॥१॥ मुमामा मणि थायस्तपा भविष्यति एकातिनमान मामा भानगरीम ॥१६ नेपा वपना पिटिर .
कलियुगीन म वी राजा
आन्ध्राणा सस्थिताराज्येतेपाभृत्यान्वयेनृपाः ॥१७
मप्तवान्ध्रा भविष्यन्ति दशामीरास्तथा नृपाः
सप्तगदभिलाश्चापि शकाश्चाष्टादर्शव
तु
111८
यवनाष्टौ भविष्यन्ति तुपाराश्च चतुदश ।
त्रयोदश गु(मु) मंडाश्च हूणाह्य कोनविंशतिः ।।१६
यतनाप्टौभविष्यन्तिसप्ताशोतिमहोमिमाम् ।
सप्तगर्दमिलाभूयोभोक्ष्यन्तीमावसुन्धराम् ॥२०
सप्तवपसहस्राणि तुपागणा महो स्मृता ।
शतानि वीण्यशीतिञ्च शतान्यप्टादशव तु ॥१
है द्विज ! इमके पश्चात् केवल छ वर्ष ही इसका राजा हुआ था।
डथी और शान्तिकर्ण उसका पुत्र दश वर्ष तक शामक रहा था ।
सुनोमा मप्त वर्ष तक होगा फिर उनका अन्य होगा इस तरह से ये
इक्कीस आन्ध रजा इस मही का भोग करेंगे ।।१५, १६।। उनके शासन
का काल एक सौ वर्ष और चौंसठ होगा आन्ध्रो के राज्य मे उनके भृत्यो
के वश म नृप मस्थित होगे । मात ही आन्ध्र तथा दश बाभीर नृप होगे।
सात गमिल भी हागे तथा द्वारठ शक होगे । आठ यवन राजा होगे
और चौदह तुपार नृपति होगे । तरह गुरु ड राजा होगे तथा उ नीस हूण
राजा इस मही का शासन करेंगे। इस मही को सत्तासी वर्ष तक पाठ
यवन भोगेगे तथा मान गर्दभिल फिर इस वसुन्धरा का उपभोग करेंगे।
यह मही सात हजार वर्ष तक तुपारो की वतलाई गई है । तीन सौ अस्सी
पौर अट्ठारह सौ वष तक का समय बताया गया है ॥१७-२१॥
शतान्यद्धञ्चतुप्काणि भवितव्यास्त्रयोदश ।
गु(मु रुण्डा वृषलं. सार्घ मोक्ष्यन्ते म्लेच्छसम्भवाः ।।२२
शतानित्रोणिभाक्ष्यन्ते वर्षाण्येकादशैव तु ।
आन्ध्राः श्रीपान्वंतीयाश्चतद्विपञ्चाशतसमा ॥२३
सप्तपप्टिस्तुवर्षाणि दशाभीरास्तथैव च ।
तेपूत्सानेपु कालेन तत. क्लिकिलान्पाः ।।२४
मत्स्यपुराण भविष्यन्तीह यवनाधमत कामतोऽर्थत । तविमिधा जनपदाआर्याम्लेच्छाश्च सवश ॥२५ विपययेण क्तन्ते क्षयमेष्यन्ति व प्रजा । लुब्धान्त वाश्चैव भवितारो नुपास्तथा ॥२६ कस्किनानिहता सर्वे आर्वाम्लेिच्छाश्चसर्वत । अधामिकाश्चयेऽत्यथ पाषण्डाश्चैवसवश ॥२७ प्रणष्टे नृपवशे तु सध्याशिष्ट कलो युगे। किडिचण्टा प्रजास्ताव धर्म नष्टेऽपरिमहा ॥२८ डेढ सौ और चार वर्ष तक तेरह होग। वृषलो के साथ म्लेच्छों समु पन्न गुरुण्ड इस भूमि का उपभोग करगे ||.२॥ तीन सो ग्यारह आप तक आन्ध्र नृप इस भूमण्डल का उपभोग करे गे और श्री पार्वतीय द्विपञ्चायत वर्ष पर्पत इस वसु धरा पर शासन करेगे। उसी भौति दश आभीर सइसठ वर्ष तक इसका उपभोग करेगे। समय आने पर उन सबके उत्पन्न हो जाने पर फिर इस मही मण्डल पर किलक्सिा तुप होगे जो यहा पर काम से-अथ से प्रौर अधम से यवन होगे। उन से मिले हुए जनपद सद और प्राप्य और म्लेच्छ हो जायगे। सब विपययम धरताय करे गे और प्रजा क्षय को प्राप्त हो जायेगा । राजा लोग आम तौर पर बडे ही लालची तथा मिथ्या मापण करने पाले हो जायगे। फिर ये सब आर्य तथा म्लेच्छ सब और में कल्कि के द्वारा निहत होगे। जो भी उम समय में अधार्मिक और अत्यन्त ही पापण्डी होगे ये सब निन हो जायगे। इस तरह स नपा के वश में प्रनष्ट हो जाने पर और मलि- युग प म घ्या भाग पे बाकी रहन पर कुछ थोडी सी प्रजा के जन शिष्ट रहग और व भा धम्मंक नष्ट होमाने पर पर 'होग॥२३.२८॥ .
कलियुगीन भावी राजा पन्नमलफलाहाराश्चीरपत्राजिनाम्बरा । वृत्त्यर्थमभिलिप्सन्त्यश्चरिष्यन्ति वमुन्धगम् ।।३१ एवं कष्टमनुप्राप्ता प्रजाकाले युगान्तके । नि गैपास्तु भविष्यन्ति साद्धं कलियुगेन तु ॥३२ क्षीणे कलियुगे तस्मिन् दिव्ये वपसहस्रके । ससन्याशे सुनि. शेपे कृत तु प्रतिप-स्यते । ३३ एव वशनम: कृत्स्न कोतितो या मया क्रमात् । अतीता वर्तमानाश्च तथैवानागताश्च ये ॥३४ महापाभिषेकातु यावग्जन्मपरीक्षित एव वपसहस्रन्तु जय पञ्चाशदुत्तरम् । ३५ प्रजाजनो में सभी अमाघु वृत्ति वारे-पत्व से हीन तथा व्याधियाँ एव शोको से उत्गैटिन होग। अनावृष्टि म अर्थात् वर्षा के पूर्ण तया अमाव होन से मव लग हत होगे और सब लोग परम्पर मे वध करने को इच्छा रखन वाले हो जायगे । सव रक्षक से रहित- भयभीत तथा परम घोर सङ्कर को प्राप्त करन वाले-मही. तरु और पर्वतो मे निदास करने वाले सभी प्रजाजन उस भीषण एवं महान् दारुण समय में हो जायगे । भोजन के अभाव मे सब लोग पत्त-मूल और फ्ला के माहार करने वाल होगे तथा चोर पत्र-वर्म के वस्त्र धारण किया करे ग । सब लोग अपनी वृत्ति के प्राप्त करन की इच्छा स सम्पूण पृथ्वी पर इधर- उधर घूमते फिरे गे। इस प्रकार से युग के अन्न करने वाले प्रजा के समय मे सभी इस कलियुग के साथ ही निः शेष हो जायगे । उस कलियुग कक्षीण हो जाने र दिव्य पर्व सहन वाले सन्ध्यण के समय में जो कि उम समय ये सुनि शेष है कृपयुन ही प्राप्त हो जायगः ॥२६, ॥३१, ३२, ३३॥ इस रीति से मैंन यह दश दा क्रम पूर्ण रूप से तथा क्रम से आप सब लोगो क सामने कह दिया है। इस वश मम जी राजा लोग पहिले हो चुके हैं वे सद, वर्तमान दात म जितने भी विद्य- भान हैं वे सब त्था जो भविष्य महागे वे सभी कात्तित कर दिय गय
मत्स्यपुराण
-
हैं । महा पदम से अभिषेक से जब तक परीक्षित राजा याम था एक
सहन और आगे पञ्चाशन वर्ष समझने चाहिए ।।३१, ३५।।
पौलोमास्तु तथा धास्तु महापमान्तरे पुन
अनन्तरशतान्यष्टी पर ग्रंशत्तु समास्तथा ॥३६
तावकालान्तर भाग्यमान्ध्रान्तादापरीक्षित ।
भविष्येते प्रसङ्ख्याता पुराणज्ञ श्रुतपिभि ।।३७
सप्तपयस्तदाप्राशु प्रदीप्तेनाग्निना समा ।
सप्तविंशतिभाव्याना आन्ध्राणान्तुयदापुन ॥३८
सप्तपयस्तु वर्तन्ते यत्र नक्षत्रमण्डले ।
सप्तपयस्तु तिष्ठन्ति पर्यायेण शत शतम् १०६
मतपी पामुपदं तत् स्मृत व दिपसज्ञया ।
समादि या स्मृता पष्टिदिव्यावदानि तु सप्तमि ॥१०
एम प्ररतत कालोदिप सप्तपिभिस्तुव ।
समीणाञ्च या पूर्वी दृश्येता दित्तोनिारा ४१
तयामध्ये तु नक्षत्र दृश्यत यत्सम दिवि ।
सन सप्नपयोज या युक्ताव्याम्नि शत ममा ॥४२
पिर पोत्रोम और पाए उम महा पदमान्तर में अन तर आठ सौ
छतीस यप पप्पन ममय था। तब तक भिन ना स र अन्धो र
भन तर होगा । श्रुपि पुराणो व ज्ञाताश्रीन य सय मनिध्य म समा-
न रिय है ॥३६३७॥ उम ममप म प्र प्राप्त अनि ममान
सप्तापगण में होने वार सताईम आघोबा फिर सप्तविमण है जिस
नक्षत्र मा म पयपारी) स सौ-सौ सकिग स्थित रहा करते
है। सरिया र कार में भी बताय गम है व रिम्प समा सनिाम पप
हो रह गए हैं। वे हर वर्ष माठ और सात माघ ३ ॥३८ ३६,४०॥
हमा समायोमास प्रवस । मजपियो ६ जो दापूध
में होने वाल निषा मे न सिपाई देन है उन दोनों मध्य मे को
कलियुगीन भावों राजा
नक्षत्र सम दिवनीक में दिखलाई देता है उनमें व्योम में नो बप तक
मुक्त सप्तपिगण मनन व पाग्य है ।।१,४ ।।
नक्षत्राणामृपीणाञ्च योगस्यंतनिदशनम् ।
सप्नपयो मघायुक्ता. काले पानिक्षिते शतम् ।.२३
ब्रह्मणस्नु चतुर्विशा भविष्यति शतपमा. ।
तन प्रभृत्स्य सर्वोलोकाध्यापन्यतेमशम् । ४४
अन्नारहतालमा धमत कामनाध्यतः ।
श्रौतस्मातति शिथिले नष्टवर्णाश्रमे तथा।।
सकर दुबलात्मान. प्रतिपत्स्यन्ति माहिता ।
ब्राह्मणा शूद्रयोनिम्धा शूद्रा वं मन्त्रयोनय. १४६
स्पस्यास्यन्ति ताविप्रास्तदथमप्रिलिय. ।
प्रमेण च दृश्यन्ने स्ववर्णान्तरदायकम् ॥४७
क्षम्मेव गमिष्यनि क्षाणापा युगक्षय ।
यस्मिन् कृष्णादिव यातस्तम्मिन्न ३ तदाहनि । ४८
प्रतिपन्न कलियुग प्रमाण तस्य मे शृण ।
चतु शनसहस्रन्नु वाणा व स्मृत दुध ४
नक्षत्रों क और ऋषियों में याग का यह निदान है। पानि
काल मे सौ मघा से युक्त सप्तपि ग" हैं। मो वप तक चौबीम ब्रह्मण
होगे । तब से लेकर यह सद लाक अपन्न हो अधिा आसन को सप्त
होगा। धर्म मे और काम मे होन-अनन स उरत-लु कम होगे।
श्रीन और स्मात धम्म एक मशिविर हा जाने पर वनों और प्राधनो
के नष्ट होन पर दुबन मा वान परम मोह के प्राप्त हुए लाग सरता
को प्राप्त हा जाग द्राह्मम लो। यूद योनियों में स्थित जांगे और
जो शूद्र हागे वे मन्त्रयोनि वाल हा जाग ॥४-४६सरे अध के
जानन की इच्छा वाले विप्र गण उन पदों के समीप में मुमुगास्थन हुमा
करेगे। इमी म स दिसलाई देगे। अपन वर्ग के अन्ला को दन वल
युग के क्षय म क्षोष शेष सब क्षय ही प्राप्त हो झापगे। जिस दिन
मत्स्यपुराग मे भगवान् कृष्ण दियलोक मे अन्तदित होकर चले गये थे उमो समय में और उस ही दिन मे यह कलियुग प्रतिपन्न हो गया था । उसका प्रमाण अब आप मुझसे श्रयण करिये । बुध जनो के द्वारा चार सो महस षष अर्थात् चार लाख बताण गया है ।४७.४८, ६।। चत्वायष्टसहस्राणि सवयात मानुषेण तु । दिव्य वषसहस्र-तु तदास व या प्रवर्तते ॥५० नि शेपेतु तदा तस्मिन् कृत वै प्रतिपत्स्यते । ऐलश्चेवाकुर्यशश्च सहदेव प्रकीत्तिता ।।५१ इक्ष्वाको सस्मृत क्षन सुमित्रान्तविप्यति । ऐल क्षत्र समाधान्त मोमवविदोविदु १९५२ एते विवस्वत पुत्रा कीर्तिता. कीर्तिवर्धनाः । अतीता वतमानाश्च तथैवानागताश्च ये । ५३ बाह्मणा क्षत्रिया वैश्यास्तथा शूद्राश्च वै स्मृता । वैवस्वतेऽन्तरे तम्मिन्नि त वश. समाप्यते ।५४ देवापि पौरवोगजा ऐक्ष्वाकोयश्च ते मत । महायोगबलोपेती कलापप्राममाश्रितौ ॥५५ एतो शत्रप्रणेतारौ नवविशे चतुयुगे सुवर्चा मनपुत्रस्तु ऐनाकाद्यो भविष्यति ॥५६ मानूप ने बत्तीस हजार ५ सयात पिया है। उस समय में विश्य सहन वष की सख्या प्रवृत्त होनी है ॥५०॥ उस समय मे उस कलियुग के नि शेष हो जाने प ही कृतयुग प्राप्त हो जायगा । ऐल भोर सहदेव स्वाकु घ प्रोसित किये गय है। इवाकु का मामृत पत्र मुमित्र के अन्त तक होगा। ऐल क्षत्र समाक्रान्त को सोम वश के वेता लाग जानते है । य सब विषस्वान थे पीति में वधन मरने वाले पुत्र नीतित किये गये हैं जो म्यतीत हा पुरे हैं -वर्तमान काल में विद्यमान ६ सपा जो अब ता बनापन है अर्थात भविष्य में होन वाले हैं ॥५॥ ॥५२, ५३। बाहाग-क्षत्रिय-श्य और शूद्रय पार वर्ण रहे गये हैं।
कलियुगीन भावी राजा
उस वैवस्वत मन्वन्तर मे यह वश समाप्त हो जाया करता है ।। ५४॥
देवापि और पौरव राजा जो आप ऐक्ष्वाक मानते हैं । ये दोनो महान्
योग बल से समुपेत थे तथा कलाप ग्राम मे पाश्रय ग्रहण करने वाले थे।
ये दोनो ही नवविंश चतुयुग मे क्षत्र के प्रणयन करने वाले थे । मनु का
पुत्र सुवर्चा ऐक्ष्वाको मे सब से आदि मे होने वाला होगा। ५५, ५६॥
नवविशे युगेसो वं वशस्यादिर्भविष्यति ।
देवापिपुत. सत्यस्तु ऐलाना भविता नृपः ।।५७
क्षत्रप्रवतकावेतो भविष्येतु चतुयुगे।
एव सर्वेषु विज्ञेय स तानार्थन्तु लक्षणम् ॥५८
क्षीणे कलियुगेचव तिष्ठन्तीनि वृते युगे।
समर्प यस्तु तं साधं मध्ये नातायुगे पुनः ॥५६
वीजार्थ व भविष्यन्ति ब्रह्मक्षवस्तु वै पुनः ।
एवमेवतु सर्वेषु तिष्यान्तेष्वन्तरेषु च .
सप्तपयोनृपं साद्ध सन्तानार्थ युगे युगे।
एव क्षत्रस्य चौल्मेध सम्बन्धोवद्विजे स्मृतः ॥६१
मन्वन्तराणा सन्ताने सन्नानाश्चश्र नौस्मृता ।
अतिकान्तयगाश्चैवव्रह्मक्षत्रस्यसम्भवाः ।।६२
यथा प्रशान्तिस्तेपा व प्रकृतीना यथाक्षयः ।
सप्तपयो विदुस्तेपा दीर्घायुस्त्व क्षयोदयौ ॥६३
नवदिश युग में वह बम का आदि होगः । देवारि का पुत्र सय
ऐलो का नप हागा । भविष्य चतुर्युग में ये दोनो क्षत्र के प्रवर्तक होंगे।
इसी प्रकार से पब मे समझ तश जान लेना चाहिए। सबका समान अय
वाला लक्षण है ॥५९, ५ ॥ कलियुग के क्षीण हो जाने पर कृत युग मे
सप्तपिंगण स्थिन रहा करते हैं। मध्य में त्रेता युग में पुन, उनके साथ
रहते हैं ॥५॥ पुन: वाज के लिये वे होगे । पुन' ब्रह्म और क्षत्र होगे।
इस प्रकार मे सब तियान अन्तगे ये युग युग में सन्तान के लिये नृपो
के साथ में मप्तपिगण होगे। इस तरह से क्षत्र का सेध द्विजो के साथ
सम्बन्ध कहा गया है। मावन्तगे क सन्तान मे सन्तात यति में कहे गये
-
मस्यपुराण
हैं। अतिक्रान्त युग बाल ब्रह्म मोर क्षत्र के सम्भव बताये गये हैं ।६०-६८
जिम प्रकार से उनकी शान्ति और जिस तरह स प्रकृतियो का क्षय,
दानो क्षय और उदय सप्तपिंगणा उना दीर्घायुस्त्व
स्वमा जानत हैं ।। ६३॥
एतेन मयागेन ऐला याक्वो नपाः।
उत्पद्यमानास्त्रोताया क्षीयमाण. पलो युगे ॥६४
अनुयान्ति युगारयान्तु यावामावतिरक्षयम् ।
जामदग्न्येन रामेण क्षोनिरक्शेपिते ॥६५
रिक्तेय वसुधासर्वा क्षत्रियवसुधाधिपः ।
द्विवशकरण सर्व कीतयिष्टे निबोध मे १६
ऐतञ्चक्ष्वा युवश च प्रकृति परिचक्षते।
गंजान श्रणिनद्धाश्च तथान्ये ६ लियाभूवि ।।६७
ऐलवशास्तु भूयासो न तथेयाक् वो नपा ।
एप मेषश्त पूर्ण कुलानामभिरोचते ॥६८
तावदव तु भोजाना विस्तागद द्विरण रमृत्म् ।
भाजाना द्विगुण क्षत्र चतुर्दा तद्यथातरम् ।
ते ह्यतीता स नामनो नवतस्तान्निबोध मे ।
शत प्रतिविध्यानाशतनागा इताया ।।
इम क्रम योग स ऐल और इक्ष्व कु नृप प्रेता मे उत्पद्यमान
होते हैं और कलियुग मे क्षोयमाण हुआ करते हैं ।।६४।। जब तक मन्वन्तर
का क्षय होता है युगाच्या को अनुमान किया करते है । जामदग्नि (परशु-
गम) के दाग गमस्त क्षत्रियो के निरवदोषित होने पर इस सम्पूर्ण वसुधा
पेम्बामो भत्रियो से यह समस्त वसु धग स्मित हो गई थी। सब हिनश
करण को मैं कोनित करूगा । उसे अब भाप लोग मुझसे समझ लेगे।६५
१६॥ ऐसहा और इ. वायु यश प्रति पे अनपल होत हैं। श्रेणीबद्ध
गजा लोग तथा अन्य भूमहल मे सन्यिगण है। एलर्मा पाले बहुत अधिक
है और उस तरह से दवा पे भरा वाले नृप नहीं हैं। इन पुलो के पूण
परत अभिक्ति होता है। उतना ही विसा से भोजोका दिगुण पहा
५०३ अवशिष्ट युगास्यास्त तताववतोद्ययम् ।।८७ कलियुगीन भावी राजा पाहै । भोत्रा का द्विगुण क्षत्र यथातथ है ।६.-६६। वे सब अतीत होगये {। उनक नामो को बतलाने वाले मुझसे आप लोग ज्ञान प्राप्त कर लेवे । एकसौ प्रतिबच्यों के थे। सौ नागो के थे और एकशत हय थे ॥७॥ शतमेक धातराष्ट्रा ह्यशीतिजनमेजया । शत वै ब्रह्मदत्ताना वीराणा कुरव शतम् ॥७१ तत शतञ्च पञ्चाला शत काशिवुशादय । तथापरे सहस्रद ये नीपा शशविन्दव ।।७२ इष्टव तश्च ते सर्वेसर्वे नियतदक्षिणा । एका राजर्षयोऽतीता शमशऽथ सहस्रश ॥७३ मनावैवस्वतस्यासन्वतमानेऽन्तरविभो । तपातुनिघनोत्पत्तोलोक्सस्थितय स्थिता ॥७४ न शक्योविस्तरस्तेपा सन्तानस्य परस्परम् । तत्पूर्वापरयागेन ववत वपशतैरपि ॥५५ अष्टीविसमाग्याता गता वैवस्वतेऽतरे । ऐत दवगण साई शिष्टा ये तान्निबोधत ॥५६ चत्वारिंशत्ययश्चव भवियास्त महामन ।
५०४
मत्स्यपुराण
एतद्व कीर्तित सम्यक समासव्यासयोगत.।
पुनर्वक्त बहुत्वात्तु न शक्यविस्तरेण तु ७८
उक्ता राजथयो येतु अतीतास्ते यगे सह ।
ये ते ययातिनश्याना गे चशा विशाम्पते ॥७६
कीर्तिता द्युतिमन्तस्ते य एतान् धारयेन्नरः ।
लभते स वरानपञ्चदुर्लभानिहलौकिकान् ।110
मायुः कीति धन स्वर्ग पुत्रवाश्चाभिजायते ।
धारणान्छवणाचैव पर स्वगस्य धीमतः ॥८१
यह संक्षेप और विस्तार के योग से भली भांति आपको बतला दिया
है और फिर अधिक होने के कारण विस्तार के साथ बतलाया नहीं जा
सकता है । जो गजपिगण बतलाये गये है वे सब युगो के साथ अतीत हो
गये हैं वे जो ययाति के वश में होने वाले है और जो विशाम्पति के वश मे
हैं वे द्युतिमान सब कीत्तित कर दिये गये है इनको जो नर धारण करता
है वह पाच लौकिक दुर्लभ वरी को प्राप्त किया करता है - आयु, कोत्ति,
धन, स्वर्ग और पुत्रवान् अभिजात होता है । उस धीमान को इनके धारण
करने से, श्रवण करने से स्वर्ग मे परम पद प्राप्त हुमा करता है॥७८-८१॥
एतद: कथित मर्व यदुक्त विश्वरूपिणा ।
मात्स्य पुराणमखिल धर्मकामार्थसाधनम् ॥८२
एतत्पवित्रमायुध्यमेतत्कोतिविवधनम् ।
एतप्पवित्र कल्याण महापापहर शुभम् १०३
अस्मात् पुराणादपि पादमेक पठेत्तु य. मोऽपि विमुक्तपापः।
नारायणाश्य पदमेति नूनमनङ्गवद्दिव्यसुखानिभड़त ८४
मत्स्यपुराण एतद्व कीर्तित सम्यक समासव्यासयोगत । पुनर्वक्त बहुत्वात्तु न शक्यविस्तरेण तु ॥७- उक्ता राजषयो येतु अतीतास्ते यगं सह। ये ते ययातिनश्याना ये व अशा विशाम्पते ॥७६ कीर्तिता धुतिमन्तस्ते य एतान् धारयेन्नरः । लभते स वरानपञ्चदुर्लभानिहलौकिकान १८० आयु कीति धन स्वर्ग पुत्रवाश्चाभिजायते । धारणान्छवणाचैव पर स्वगस्य धीमत ॥८१ यह सभेप और विस्तार के योग से भली भाति आपको बतला दिया है और फिर अधिक होने के कारण विस्तार के साथ बतलाया नहीं जा सकता है । जो राजर्षिगण बतलाये गये हैं वे सब युगो के साथ अतीत हो गय हैं वे जो ययाति के वश में होने वाले है और जो विशाम्पति के वश में हैं वे द्य तिमान सब कीत्तित कर दिये गये है इनको जो नर धारण करता है वह पाच लोकिक दुर्लभ वरो को प्राप्त किया करता है - आयु, कीति, धन स्वर्ग और पुत्रवान् प्रमिजात होता है। उस धीमान् को इनके धारण परन से, श्रवण करने से स्वर्ग मे परम पद प्राप्त हुमा करता है॥७०-८१॥ एतद्व कथित सर्व यदुक्त विश्वरूपिणा। मात्स्य पुराणमखिल धर्मकामार्थसाधनम् ॥८२ एतत्पवित्रमायुध्यमेतत्वीतिविवधनम् । एतत्पवित्र कल्याण महापापहरे शुभम् ॥८३ अस्मात् पुराणादपि पादमेक पठेत्तु य माऽपि विमुक्तपाप । नारायणाख्य पदमेति नूनमनङ्गवहिव्यसुखानिमुक्त ॥८४ यहां तक विश्व स्वरूप भगवान मरस्य का वहा हुआ पुराण वह दिया गया आसमस्त धम, अर्थ, काम का सिद्ध करने वाला है ॥२॥ यह पवित्र महा पुगण आयु और बीति की वृद्धि परन बाला और परम पाया है। बड़े स बड़े पाप भी श द्वारा दूर हो जाते हैं ।। मोतई इस पुराण का एक श्लोज भी पढगा वह पाप से विमुक्त हो जायगा और भगमन को पास देवताओं के समान दिव्य मुयोरा उप- मास्य-पूराण समाप्त। जागा HAVI