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Mandukyopanisad
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(२) ... जे उपनिषद्हें सोब्रह्म आत्माकी अभेदताके बोधकहें परन्तु उन अस्सृष्टिकरण अरु प्राणादिकोंकी उपासनाआदिक अन्य प्रसंगभी है अरु इस उपनिपटें केवल ॐकारके प्रतिपादनसे ब्रह्मआत्मा की अभेदताही प्रकाशित है, तिससे इतर सृष्टिकरणादिक नहीं, अतएव यह उपनिषद केवल बल्ल आत्माकी अभेदताका योधक होनेसे सर्व उपनिपदों में मुख्यहै । अंतऍवे उक्त हेतुओंकरके इस उपनिषद्को मुख्यत्व होनेसे श्रीशंकराचार्य महाराजके परमगुरु श्रीगौडपादाचार्य कृत इसके अर्थवोधक इलोकवद्ध कारिका है, तित कारिकाके चारप्रकरणहैं नहां,प्रथम आगमप्रकरण, द्विती- य वैतथ्याख्याकरण, तृतीय अद्वैताख्य प्रकरण, चतुर्थ अलातशा- न्ताख्य प्रकरण, इसप्रकार चार प्रकरण हैं॥अरु इन चारोंप्रकरण से वाय इमभापा भाष्यकारकृत सर्व उपनिपदोंमेंसे संग्रह किया प्रणवोपासना, अरु सप्तसिद्धान्तियों के मतानुसार प्रणवोपासना अरुप्रणवकेमारादिदशनामोंके अर्थविचार, अरु अन्यऋपियों के मतानुसार मात्राओकभेदसे उपासनविचार,अरु अकारादि मात्रा का क्रमशः लय चिंतबनविचार, इन सर्वके संग्रहका, एक संग्रह प्रकरणनाम पंचम प्रकरणभी कहाहै, सोएतदर्थ है कि प्रणवोपा. सनाके जिज्ञासुको इस एकही पुस्तक के अबलोकन से अनेक ऋपियोंके मतानुसार ॐकारकी उपासना जानने में आवे । अरु श्रीगौडपादीय कारिका सहित इस उपनिपऊपर श्रीभगवत्पाद पूज्य श्रीशंकराचार्यजीकृत संस्कृत भाष्य है अरु तिसभाष्यपर संस्कृतमें आनन्दगिरिकृत टीका, अरु तिसभाष्य अरु टीकाके अनुसारही द्विजवर श्रीपंडितराज पीताम्बरजी महाराज कृत भाषा दीपिकानामटीकाहै । अरु जैसे सम्यक् प्रकार संस्कृत विद्याके अभ्यास विना अरु किसीश्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ आचार्यसे अध्ययन किये बिना सभाप्य उपनिपदोंका अर्थ जानने में आवे नहीं, अरु तैसेही जो केवल भाष्यके अक्षरानुसारही जे पंडित पीताम्बरलीकृत अक्षरार्थ टीका तिसका भी यथार्थ जानना सर्व - सांधारणपुरुषों को सुगम नहीं। एतदर्थ मैं श्रीपरिव्राजाचार्य परमहंस स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वतीजी महाराजका अतिअल्पज्ञ शिष्य यमुनाशंकर नामक नागर ब्राह्मण, उक्त भाष्यकार अरु टीकाकार के कहे अनुसारही भापाभाष्य नामक टीका करता? तिसमें अपनी अल्प बुद्धि के अनुसार कुछ विशेप भी कहाँगा । सवसे साधारण विनय।। मुझ अल्पज्ञकरके कहेहुये इस मांडूक्यउपनिषद् के भापा भाष्य में जो कछु अनुचित कथनहोय तिसको सर्वविवेकी पाठ- कजन क्षमाकरके सुधारलेवें इंति ॥ सूचना इस भाषाभाष्यान्तर चिह्नोंकी। इस चिहान्तर में भाषान्तर मूल श्रुति, श्लोक | इस चिह्नान्तर में भाषान्तर श्रुति,श्लोकके अक्षरार्थ ।। "इसं चिहान्तरमें प्रमाणविपयक अन्य श्रुति, श्लोक। ki इसचिह्नान्तरमेंप्रमाणविषयक श्रुतिश्लोककेअक्षरा।। इस चिहान्तरमें संक्षेपसे आनन्दगिरिका अक्षरार्थ। इस चिह्नान्तर में भाषाभाष्यकारकृत अर्थानुवाद । इत्यादि-चिह्न साधारण विराम ॥ इति चिह्नसूचना ॥
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(४)
अथ शान्तिपाठः॥
ॐ सहनाववतुसहनोभुनक्तुसहवीर्य करवायहै । तेजस्वीनाय
धीतमस्तु माविद्विपावहै ॥
ॐशान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
शान्तिःपाठगुरुस्तुति ॥
ॐशन्नोमित्रः शंवरुणः शन्नोभवत्वर्यमाशनइन्द्रोबृहस्पतिः
शनोविष्णुरुरुक्रमः नमोब्रह्मणेनमस्तेवायोत्वमेवप्रत्यक्षब्रह्मासि
स्वमेव प्रत्यक्षबावदिप्यामिऋतंवदिष्यामिसत्यवदिष्यामितन्माम
धतु तद्वतारमवतुअवतुमामवतुवक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः३॥
अंब्रह्मविदाप्नोतिपरम् ॥
ॐ सत्यज्ञानमनंतब्रह्म । “सोयमात्मा" "नांतःप्रज्ञन पहिः
प्रशंनोभयतोप्रशं नप्रज्ञानघननप्रझं नाप्रज्ञं अदृष्टमव्यवहार्यमया
ह्यमलक्षणम् चिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपंचोपशम
शिवसद्वैतचतुर्थमन्यन्ते। "सआत्मा, अपहतपाप्मा विजरोविम्म
त्यविशोकोविजिघत्सोपिपासःसत्यकामः सत्यसंकल्पःसोन्वेष्टव्य
सविजिशासितव्यः। “तोति। "इहैवान्तःशरीरे सौम्यसपुरुषः"
निहितंगुहायो " दृश्यतेत्वग्रयाबुद्ध्यासूक्ष्मयासूक्ष्मदर्शिभिः।
"आत्मावाअरेदृष्टव्योश्रोतव्योमन्तव्यो निदिध्यासितव्योसाक्षा
स्कति "सयोह वै तत्परमं ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति"
"नात.परमस्ति।
"ब्रह्मानन्दंपरमसुखदं केवलज्ञानमन्ति"
"दहातीतंगगनसदृशंतत्वमस्यादिलक्ष्य"
“एकनित्यविमलमचलंसर्वधीसाक्षिभूतं"
"भावातीतंत्रिगुणरहितंसद्गुरुंतनमामि"
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အ श्रीपरमात्मने नमः अथ अथर्ववेदीय ॥" मांडूक्योपनिपद्- -- श्रीगौड़पादीयकारिका सहित मांडूक्योपनिषद्धारभ्यते ६ ॥ श्रीमद्भाष्यकारस्वामी श्रीशंकराचार्यकृत। मंगलाचरणम् प्रज्ञानांशुप्रतानैःस्थिरचरनिकरव्यापिभिर्व्याप्यलो कान् भुक्ताभोगान् स्थविष्ठान् पुनरपिधिषणोझासितान- कामजन्यान् ॥ पीत्वासर्वान् विशेषान् स्वपितिमधुरभु माययाभोजयन्नोमायासंख्यातुरीयं परममृतमजंब्रह्मम त्तन्नतोऽस्मि १॥ हे सौम्या भाष्यकार श्रीशंकराचार्य कहते हैं किपरममृत- मजं ब्रह्म यत्तन्नतोऽस्मिा अमृत अज जो परब्रह्म है तिसको में नमता (नमस्कारकुरता) हा[अर्थात, श्रीगौडपादाचार्य को श्रीनारायणके (वा श्रीशुकाचार्यके ) प्रसाद से प्राप्तहुये,अरु मांडूक्यउंपनिपके अर्थको प्रकटकरनेके परायण जो श्रीगोड़पा- वाचार्यकृत कारिका संज्ञक श्लोकतिनसहित मांडूक्योपनिषद्के व्याख्यान करनेको इच्छा करतेहुये भगवान भाष्यकार श्रीशङ्करा चार्य आपकरके करने को इच्छित जे भाष्य तिसकी निर्विघ्न समाप्ति के अर्थपर देवता के सरूप के स्मरणपूर्वक शिष्टाचाररूप प्रमाणकरके सिद्ध तिस पर देवताके अर्थ नमस्कार रूप मंगला.. चरणकोकरतेहुये,अर्यसेइस ग्रन्थके आरंभविपेचांछित विपयादिक + ६ मांडूक्योपनिपद् । अिर्थात् ग्रन्थके प्रयोजन, विषय, सम्बन्ध, अरु अधिकारी चार प्रकारके अनुबंधको भी सूचित करतेहें । तिनमें विधिमुखसे वस्तु का प्रतिपादनहै, इस प्रक्रिया को देखावते हैं । अरु यहां ब्रह्म यत्तन्नतोऽस्मि ? (जो परब्रह्म है तिसको में नमताहों) इस कहने करके मैं (इसअहं) शब्दकेविषयत्वंपदके लक्ष्यों अर्थकी तिस तत् शब्दके लक्ष्यार्थसे एकता के स्मरणरूप नमनको सूचितकरनेवाले आचार्य ने तत्पदके लक्ष्यार्थरूप ब्रह्मका प्रत्यगात्मापना सूचन करके तत्पपअरु त्वंपदके अर्थकी एकतारूप ग्रन्थका विषय सूचि- त किया।अरु" यत्" (जो)इस शब्दको प्रसिद्ध अर्थका प्रकाशक होनेसे वेदान्तशास्त्र करके प्रसिद्ध जो ब्रह्म है तिसको मैं नमता हौं, इस संवन्ध से मङ्गलाचरणभी श्रुतिकरकेही करते हैं । अरु ब्रह्मको अद्वितीय होनेसेही जन्ममरण के अभाव से अिर्थात् एक अद्वैत परिपूर्ण अखण्डब्रह्म में जन्ममरणके हेतुरूप द्वैतका अभाव है तातो "अमृतम" (अमृत अरु अजन्मा) इस प्रकार कहा है अरु जन्म मरणरूप जो वन्ध है सोई संसार है। अिरु ब्रह्म में जन्मरणरूप वन्धलक्षण संसारका अत्यन्ताभाव है। तोते तिस वन्धके निपेधसे आत्मावि स्वरूपसेही असंसारीभावके देखा- वनेवाले आचार्यने यहां सर्व अनर्थों की निवृत्तिरूप इस ग्रन्थका प्रयोजन प्रकाशित किया है ] ॥ वो परब्रह्म कैसाह " प्रज्ञानांशु पूतानः प्रकृष्ट ज्ञानरूपहै । अर्थात् [ जब घेदान्तशास्त्र उपनि- पद् प्रमाणसे सिद्ध, ब्रह्म, स्वरूपसे अद्वितीय अरु असंसारी तव तीन अवस्था करके युक्त भोक्ता जीवहै इसप्रकारका अनुभव कैसेहोताहे । अरु जिीको दुःखसुखका । भोगावनेवाला कोई, ईश्वरह इसप्रकार केसे श्रवणहोताहै । अरु विषयोंका समूहरूप भोज्य ( भोगनेयोग्यसामग्री) ब्रह्मसे 'भिन्न कैसे दृष्टआपती. है। सो यह सर्वएक अद्वैतपिपे विरोधको प्राप्तकरेगा। यह आशं. काकरके एकअद्वैत ब्रह्मविपे जीव, जगत्, अरु ईश्वर, यह सर्व । रज्जुमें सर्पवत् । कल्पित संभषे है , इसअभिप्रायले यहांकहते , र मांडूक्योपानेपद् । है।जन्मादिजायते । अस्ति, वर्द्धते, विपरिणमते, विपक्षीयते विनश्यति, यह पदभात्र । विकार रहित प्रकृष्ट ज्ञानस्वरूप जो ग्रह्म है "प्रज्ञानंब्रह्मे"(प्रज्ञान ब्रह्महै) इसश्रुति प्रमाणसे, । तिस सूर्यवंत विम्वस्थानी ब्रह्मके किरणरूप, जो सूर्यके प्रतिविम्ब के तुल्य निरूपण कियाहै । अरु बिम्बके तुल्य ब्रह्मसे पृथक् वा भेद करके असत्य चिदाभास (चैतन्यब्रह्मकाआभास) जीव है, तिनके वृक्षाटिक स्थिर, अरु मनुप्यादिकचर, इसप्रकारके उद्भिजावि चारखानिके स्थिर चर प्राणियों के समूह विषे व्यापनेवाले वि- स्तारों से लोक जो विषय तिनके अर्थ व्याप्तहोके [इस कथन उक्त विषयोंसे जीवोंका सम्बन्ध कहा ] देवताके अनुयह सहित बालेन्द्रियोंद्वारा बुद्धि के तिस तिस विषयाकार परिणामसे जन्य- तारूप अतिशय स्थूलतावाल सुखदुःखके साक्षात्काररूप भोगों को भोगिके, अर्थात् [ यहाँ 'तान्भुक्त्वा” (तिनको भोगके) इस पदसे अरु " स्वर्पितीति" (सोवता है । इस अधिमकहने के पदसे सम्बन्ध है । इस कथनसे जाग्रदवस्था ब्रह्मविपे कल्पित है, ऐसा कहाजानना ] पुनः [ यहाँसे तिसही ब्रह्माधिपे स्वमकी कल्पनाको देखावत हैं ] भी बुद्धिसे प्रकाशितहुये, अरु अविद्या, काम, अरु कर्म, से जन्य भोगोंको भोगके सर्व[ इसप्रकार ब्रह्म विपे । जाग्रत् स्वप्न दोनों अवस्थाकी कल्पना को देखायके अब तहाही सुषुप्तिकी कल्पनाको देखावह ] जायत् अरु स्वमरूप स्थूल अरु सक्ष्म विषयों को अज्ञातरूप अपने आत्मा विषे लय करके जो ब्रह्म सोरता है, अर्थात् कारणके अभावसे स्थित होताहै, अरु जी मधुरभुक् [सुपुतिविपे आनन्दकी प्रधानता है इस अभिप्रायते ब्रह्मको मिधुरभुक् वा आनन्दभुक् । यह विशे- पण देते हैं ] (आनन्दका भोक्ता) है, अरु जो ब्रह्म प्रतिविम्बके तुल्यहआ हमारेविपे मायाकृत मिथ्यारूपा.तीनोंअवस्थाके संव- न्धीपनेवत् सम्बन्धीपनेको सम्पादनकरके हमकोमायासे भोगा- यताहुआ वर्त्तता है । अरु निममायाकल्पित मिथ्यासंग्याकोअपे- -- 1 .. मांडूक्योपनिषद । योविश्वात्मा विधिज विषयान्प्राश्यभोगान्स्यविष्ठा न् पश्चाच्चान्यानस्वमति विभवानज्योतिषास्वेनसमा न् । सर्वानेतानपुनरपिशनैःस्वात्मनिस्थापयित्वा, हि वासर्वानविशेषाविगतगुणगणःपात्वसौनस्तुरीयः २ चासे तुरीय (चतुर्थ) अिर्थात् शुद्ध आत्माकोचतुर्थ संख्यासे कहा है सोमायांकरके कल्पित जाग्रदादि तीनोंअवस्था तिसकीअपे. क्षासे है नतु सर्वसंख्याऽतीत पिपे संख्या कोई नहीं । तिसही ब्रह्मकोतीनोंअवस्थासे पृथक्होनेकरके तिसकीज्ञानमात्र स्वरूप. ताको देखावे हैं ] मरणरहित अमृत अरु जन्मरहित अज, पर [अर्थात् ब्रह्मको मायावी होनेकरके तिस विपे निकृष्टभावकी प्राप्तिकी आशंकाकरके तिसके निवारणार्थ पर। यह पदकरके उत्कृष्टताही कहिये है, क्योंकि ब्रह्माकोमाया (आरोप) द्वारातिस मायासे सम्बन्धके हुयेभी स्वरूप करके मायासे ब्रह्मका सम्बन्ध नहीं। क्योंकितुल्य जातीय वाधर्मादिकवालों का सम्बन्ध सम्भ- वे हे अरु ब्रह्म सत्यनैतन्य आनन्द निर्गुण एकरसहे अरु माया तिससे विपरीति असत्य जड़दुःख सगुणनानारूप वालीहे, ताते उक्त प्रकारके ब्रह्माका उक्तप्रकारकामायालेसम्बन्ध स्वरूप सेही संभवे नहीं। एतदर्थ ब्रह्मविपे कैसे निकृष्टताहोवेगी किन्तु किसी प्रकार भी नहीं।यह अर्थह ] ब्रह्मकेअर्थमें नमस्कारकरताहीं॥ हे सौम्याजो [प्रथमश्लोक विपे विधिमुखसेवस्तु के प्रतिपादन कोप्रतिज्ञाको आयकरके 'तत्' पदके लक्ष्यांअर्थसे आरंभ करके तिसकी 'वं' पदके लक्ष्यार्थभूत प्रत्यगात्मस्वरूपता प्रतिपादन किया। अरुविषय अरु फलके कथन से,सम्बन्ध, अरु अधिकारी सूचनकिये । अब इस द्वितीय श्लोकाविपे निषेधमुसद्वारा वस्तु मात्रके प्रतिपादनकी प्रतिज्ञाको आश्रय करके 'वं, पदकेवाच्या से प्रारम्भकरके तिसकी 'तत् , पदके लक्ष्यार्थ भूतअसंसारी शुद्ध मरूपनाकी प्रतीति करारने हैं। तहां प्रथम स्वं, पदये .
मांडूक्योपनिषद् । लश्यार्थरूप ततःसिद्ध चिदात्माधिपे आरोपित जायदवस्थाको उदाहरण करते हैं ] यह प्रत्यगात्मा अविद्या अरु कालसे उत्पन्न हुये जे धर्म अधर्मरूप विधि तिससे जन्यजे सूर्यादिक देवता तिनके अनुग्रह सहित बाह्यकरण (चक्षुरादि इन्द्रिय)द्वाराथुद्धि के परिणाम विषय होने करके अत्यन्त स्थल अरु भोगने के योग्य होनेकरके भोगशब्दके वाच्य भोग्योको साक्षात् अनुभव करके स्थितहुआ, पंचीकृत पंच महाभूत अरु तिनका कार्यरूप स्थूल जगन्मय विराट्का शरीररूप विश्व है तिल जायत् स्थानरूप विश्वषिपे अहंमम (मैं अरु मेरा) यह अभिमान वान हुआ विश्व ( विश्वाभिमानी ) जीवरूप होता है। अरु पश्चात् [ अबतिसही चैतन्य आत्मा रिषे स्वप्नावस्थाके आ- रोपको कहते हैं ] जे जाग्रत् के हेतु कर्महे तिनके क्षयहोने से अ- नन्तर स्वप्न के हेतुजे कर्म हैं तिनके उद्भव होनेसे जामत्के स्थूल विपयों से इतर अरु तिसही हेतुसे सूक्ष्म, अरु बाह्म इन्द्रियोको विषयों से निवृत्त होनेकरके 'अविद्या, काम,अरु कर्म, इनसे प्रे- रणाको प्राप्तहुई अपनी बुद्धि तिसके प्रभावसेही उत्पन्नहुये अ- न्तःकरणकी वासनामय, अरु स्वप्नविषे भी सूर्यादिकों के प्रकाश के जिो केवल जायत्के सूर्यादिकों के प्रकाशके संस्कार युक्त घुद्धिकरके कल्पित हैं। अस्तहुये केवल स्वियज्योतिः । आत्मरूप प्रकार करकेही प्रकाशित हुये (विषय किये गये जे भोग्यपदार्थ तिनको अनुभव करके, अपंचीकृत तिन्मात्रारूप । पंचमहाभूत अरु तिनके कार्यरूप सूक्ष्म प्रपंचमय हिरण्यगर्भ के शरीररूप स्वप्नावस्थाके ताई अभिमान (अहंमम (में मेरा) भाव करता हुआ चैितन्यआत्माही । तैजसनामक जीवरूप होता है । पुनः [अत्र तिसही.चिदात्माविपेसुपुप्ति अवस्थाकी कल्पना को देखा- वे हे ] भी स्थूल अरु सूक्ष्म उभय शरीररुप उपाधिद्वारा जायत् अरु स्वानरूप उभय अवस्थारूप स्थानों विपे प्रवृत्ति होनेसे हुआ जो श्रम तिमकी उत्तिके अनन्तर तिस श्रमके परित्याग करने मांडूक्योपनिषद् । की इच्छाके होनेसे स्थूल अरु सूक्ष्मके विभागकरके जायत् अरु स्वप्नरूप उभयस्थानों विपे स्थित, इन प्रसंग विष प्रासहुये सर्व भी भोग्यरूप विशेषों को धीरेसे क्रिमशः वा चिनाही क्रमशः । अज्ञात कारणरूप अपने स्वरूप विपे । अर्थात् सुपुप्ति से उठके कहता है कि ऐसे सोये जो कुछ भी खबर न रही इस अज्ञात ल- क्षणवान् कारण अविद्या तिसकी पृथक्सत्ताका अभाव है, क्योंकि उस अज्ञात अविद्याका परिणाम उसके प्रकाशक साक्षी अधिष्ठान ज्ञानस्वरूप आत्माविपे होता है जैसे कल्पित सर्पका रज्जयिपे, अरु जिसका परिणाम जिस अधिष्ठानरूप होताहै सो उसहीका स्वरूप होताहै, ताते अपनी पृथक् सत्ताके अभावसे अध्यस्त अ- विज्ञातरूप अविद्या भी सर्वाधिष्ठान आत्मस्वरूपही है स्थिापन करके अव्याकृतरूप उपाधिकी प्रधानतावाला हुआ । वोही चै- तन्यआत्मा प्राज्ञनामक जीवरूप होताहै। सो[अव जायदादि तीनों अवस्थारूप स्थानों करके युक्त, अरु “नान्तःप्रज़नवहिःप्र- शं" (अन्तःप्रज्ञनहीं, बाह्यप्रज्ञनहीं) इत्यादि निषेधमुख श्रुतिवाक्य श्रवणसे उत्पन्न हुआ जोप्रमाणज्ञान तिसविपेआरूढ़हुये तिसही प्रत्यगात्माके कार्य कारणरूप सर्व अनर्थ विशेषों को श्रुतित्रमाण जन्यज्ञान के प्रभाव सेही त्यागकरके निरुपाधि परिपूर्ण ज्ञानरूप सेही सिद्धहुये तत्वको कथन करते हैं । अरु मंगलार्थ तिसकी प्रार्थना करते हैं ] यह सर्वगुणोंके समूहकी कल्पनासे रहित अरु नित्य ज्ञानरूप स्वस्वभाववाला तुरीयरूप परमात्मा सर्व कार्य कारणरूप अनयों के भेदोंको भी श्रुतिप्रमाण जन्य ज्ञानके प्रभाव सही परित्याग करके, अरु व्याख्यानके कर्ता होनेकरके अरु श्री- ताहोने करके स्थितहुये हमको पुरुषार्थ चिपे विनकारी कारण के । अर्थात् पुरुषार्थ पिपेजे विश्नों के कारण तिनके । निषेध (अभाव) पूर्वक मोक्षके प्रदानसे अरु तिसकेहेतु ज्ञानके प्रदान से रक्षणकरो २॥ इति भाग्यकारकृतमंगलाचरणम्॥
मांडूक्योपनिपद् । 'अथभाप्योपरिटीकाकारस्वामीआनन्दगिरि कृतमंगलाचरणम् ॥ परिपूर्णपरिज्ञानपरितृप्तिमतेराते । विष्णवेजिष्णवेतस्मैक 'इणनामभृतेनमः १ शुद्धानन्दपदाम्भोजद्वन्द्वमद्वन्द्वतास्पदम् । नमस्कुर्वे पुरस्कर्तुन्तत्त्वज्ञानमहोदयम् २ गौडपादीयभाप्यंहित- सन्नमिवलक्ष्यते । तत्थोऽतिगम्भीरम्ब्याकरिष्येवशक्तितः ३ पूर्वेयद्यपिविद्वांसोव्याख्यानमिहचक्रिरे । तथापिमन्दबुद्धीनाम- पकाराययत्यते ४॥ अमित्येतदक्षरमिदउंसर्वतस्योपव्याख्यानंभूतंभव द्भविष्यदितिसर्वमोंकारएव.-। यच्चान्यस्त्रिकालातीतंत दप्योंकारएव १॥ हे सौम्य, ! यह [जिसको उद्देश करके मंगलाचरण किया, तिसको कथन करने को आदिविपे व्याख्यान करनेयोग्य मंत्रके प्रतीक प्रिथमपद । को ग्रहणकरते हैं ] ॐ इसप्रकारका जो अ- क्षरहै, सो यह सर्वहै । तिलका उपव्याख्यान वेदान्त [यह क्या शास्त्रपने करके व्याख्यान करने को इञ्छित है, या प्रकरणपने करके व्याख्यान करने को इच्छितहै। तहां जो प्रथमपक्ष कहो कि शानपने करके व्याख्यान करनेको इच्छित है, सो बने नहीं, क्योंकि इसघिय शास्त्र के लक्षणके अभावसे इस अन्यको अशा- खपनाह ताते । अरु एक प्रयोजन से सम्बन्धवाला सर्व अर्थका प्रतिपादक शास्त्रहोता है । सो इस ग्रन्थविषे एक मोक्षरूप प्रयो- जनपना तो है परन्तु सर्व अर्थका प्रतिपादकपनानहीं। एतदर्थ शास्त्रके लक्षणके अभावसे इसगन्थको अशाखपना युकही है। अरु जो द्वितीयपक्ष कहो कि इसको प्रकरणपने करके युक्त होने से व्याख्यान करने को इच्छित है, तो सो भी बने नहीं, क्योंकि प्रकरणके लक्षण का भी इसप्रिपे अभाव है। यह आशंका करके कहेहे यहां यह अर्थ है कि शायके एकदेशसे सम्बन्धवाला अरु १२ मांडूक्योपनिषद् ! 'शालके अन्यकार्य विषे स्थित जो होय सो प्रकरण ऐसा कहते हैं। अरु यह प्रन्थ प्रकरणपने करके व्याख्यान करने को इतिहे क्योंकि यह निर्गुण वस्तुमात्र का प्रतिपादकहै ताते, अरु तिमके प्रतिपादन के संक्षेपरूप अन्यकार्योंका भी होनाहे ताते, इसग्रन्थ विषे प्रकरण के लक्षण सर्वही है ताते यिग्रन्थ व्याख्यान करने को इच्छित है। शास्त्र के अर्थकासार संग्रहरूप चारप्रकरणवा- ला “ॐ मित्येतदक्षरमित्यादि " ( यह ॐ इसप्रकारका अक्षर हे) इत्यादिरूप धन्य है तिसका आरम्भ करते हैं [इसग्रन्थ को प्रकरण रूपहुये भी विषयादिक अनुवन्ध रहिततारूप दोपकी की हुई इस ग्रन्थके व्याख्यान करनेकी अयोग्यताहै,यह आशंका फरके कहतेहें] याहीते इससे पृथक् सम्बन्ध विषयअरु प्रयोजन कथनकरनेको योग्य नहीं, किन्तु जो वेदान्तशास्त्रवि सम्बन्ध विषय अरु प्रयोजनहें सोई यहां कथनकरनेयोग्यहैं। तथापि प्रक- रणके व्याख्यान करनेकी इच्छावाले पुरुपकरके संक्षेपले कथन करनेयोग्य है। तहां श्रीभाष्यकार स्वामीकरके प्रयोजनादि अनु- पन्धके कथनकी योग्यताके सिद्धहोनेसे शास्त्रअरु प्रकरणकेमोक्ष रूप प्रयोजनवान्पनेकी प्रतिज्ञा करतेहैं] प्रयोजनवत् साधनोंका प्रकाशक होनेकरके विषयसे सम्बन्धवाला जो शास्त्र सो परम्परा से श्रेष्ठ विषय, सम्बन्ध, अरु प्रयोजनवाला होताहै।प्र०॥ पुनः तिसकाप्रयोजन क्या?, उ०॥ तहांकहतेहैं, जैसेरोगकरके आतु. रपुरुपकोरोगकी निवृत्ति होनेसे स्वस्थता होती है, तैसेही अन्तः- करणादि उपाधिवाले दुःखी आत्माको । दुःखकेहेतु । द्वैतप्रपंच की निवृत्तिके होनेसे जो अद्वैतभावरूप स्वस्थताहोवे है सोईप्र. योजन । अरुद्वेतप्रपञ्च अविद्याका किया है अतएव विद्याकरके तिसकी नियत्ति होती है एतदर्थ ब्रह्मविद्याके प्रकाशनार्थ इसग्रन्थ का आरम्भ करतेहें “यत्राहि द्वैतमिवभवति"""यत्रवाऽन्यदिवस्या तत्रान्योऽन्यत्पश्यदन्योऽन्यद्विजानीयात्" “यत्रत्वस्य सर्वमारम- पात्तत्कनकंपश्येत्केनकं तद्विजानीयात् , इत्यादि " (जहाही मांडूक्योपनिषद् । देतवत् होताहै, जहांवा अन्यवत् होताहे,तहां अन्य अन्यकोदेखे, अन्य अन्यको जाने । अरु जहांतो इसको सर्व आत्माही होता हुआ तहांकिसकरके किसकोदखे किमकरकेसिको जाने। इत्या- दि अनेक श्रुतियोंके प्रमाणकरके इसकी सिद्धिहै । तहां [वि. षय प्रयोजनादि अनुनन्धकेआरंभद्वारा ग्रंथके आरंभके स्थित हुये आदिधिषे इस कारिकारूपा ग्रंथके चारप्रकरण एकसेएक अमि- लित विषय, ज्ञानकी सुगमताके अर्थ सूचनकरनेको योग्यहै,इस प्रकार कहके प्रथम प्रकरणके विषयकोनिरूपण करतेहैं][गौड़पा- दीय कारिकाविये प्रथम ॐकारके निर्णयार्थ आगमप्रधान आत्म. तत्वके निश्चयका उपायरूप प्रथम प्रकरण है । अरु रज्जुआ. दिको विषे सादिकों के विकल्पकी निवृत्ति होनेसे रज्जुकेयथार्थ स्वरूपकी प्राप्तिवत्, जिस [अव वैतथ्यनामक द्वितीय प्रकरण के अवान्तर विपयको देखावते हैं ] द्वैतप्रपंचकी निवृत्ति होनेसे अद्वैतकी प्राप्तिहोतीहै, तिस द्वैतके हेतुसे मिथ्यापनेके प्रतिपाद- नार्थ द्वितीय प्रकरणहै। अब अदेत नामक तृतीय प्रकरणकेअर्थ विशेषकेकहनेकाआरंभ करतेहें] तैसे अद्वैतकोभीद्वितकी सापेक्ष- तासे मिथ्यापनेकी प्राप्ति के हुये युक्तिमे तिसके परमार्थपने के 'जखानेके अर्थ तृतीयप्रकरणहै [अब अलातशान्ति नामक चतु- र्थ प्रकरणके अर्थ विशेष मे कहतेहैं ] अद्वैतके परमार्थभावके नि- श्चयके विरोधीरूपजे वेदनिरुद्ध अन्यवादह तिनको परस्पर में विरोधी होनेसे उनको अयथार्यताके कारण युक्तिकरकेही तिनके निराकरणार्थ चतुर्थ प्रकरणहै । पुनः [ ॐकारके निर्णयरूप द्वार से आत्मज्ञान प्राप्तिका उपायरूप प्रथम प्रकरणहै, इसप्रकारजो कहा सो अयुक्त है, क्योंकि ॐकारके निर्णयको आत्मज्ञान होने की हेतुताकी अयोग्यता है । अर्थात् आत्मज्ञान होनेकी हेतुताके योग्य कारका विचार नहीं | अरु अन्य अर्थकाज्ञान अन्यअर्थ के ज्ञानविषे व्याप्तिविना उपयोगताशे पायता नहीं, अर्थात् ॐकारके अर्थका ज्ञान आत्मज्ञानके अर्थज्ञानमें अव्यान होने मे मांडूक्योपनिषद् । ॐकारके अर्थकाज्ञान आत्मज्ञानहानेमें उपयोगी होतानहीं । अरु यहाँ । ॐकारके विचार अरु आत्मज्ञानविपे धम अरु अग्निवत् व्याप्ति देखते नहीं, अरु ॐकारको आत्माका कार्यपना युक्तनहीं। क्योंकि आकाशादिकोंका अवशेषहै ताते। अरु तिस ॐकारको आत्मावत् सर्वात्मा होनेकरके तिसके कार्यपने का व्याघात है ताते । इसप्रकार मानताहुआ वादी पूर्व कहे प्रमाण प्रथम प्रकर- णके अर्थविये आक्षेप करे ] ॐकारकै निर्णयविषे आत्मतत्वकी प्राप्तिका उपायपना कैसे प्रतिपादन करतेहो, इस शंकापर कह- तेहैं [हम धूम अग्निवत् । अनुमान प्रमाणके आश्रयसे ॐकारके निर्णयको आत्मज्ञानका उपायनहीं जानते कि जिसकरके व्या- प्तिका अभावरूप दोप प्राप्तहोवे, किन्तु श्रुतिवाक्यके शब्द प्रमाण से ॐकारका निर्णय आत्मज्ञानका हेतुहै, इसप्रकार समाधान करतेहैं] "मित्येतत्"। "एतदालम्बनंश्रेष्ठम्"। "एतदै सत्यकाम परश्चापरश्च चहा यदोंकारः । तस्माद्विद्वानेतेनैवायतने नैकतर मन्नेति"। " अमित्यात्मानंयुञ्जीत" । "अमितिन"। ॐ कार एवेदं सर्वम्" (ॐ इसप्रकारका यह, आलम्बन श्रेष्ठ है, हे सत्यकाम!यह जो पर अरु अपररूप ब्रह्महै सो ॐकार है, ताते विद्वान इसही साधनमे उभयके मध्य एकको प्राप्त होता है, ॐ इसप्रकार आत्मा (बुद्धि) को योजनाकरे, यह ब्रह्महै, ॐकार ही यह सर्व है। इत्यादि अनेक श्रुतियों के प्रमाणसे। सर्पादि [ननु आपकरके व्याप्तहुये भ्रांतिवाले सन्मात्र चिदात्माविपे प्राणादि विकल्पको कल्पित होनेसे आत्माको सर्वका आश्रयपनाहे परन्तु ॐकारको वो सर्वका आश्रयपनाहै नहीं क्योंकि तिसके अनुस्यू- तपनेका अभावहै ताते, यह आशंका होनेसे तहां कहतेहैं] विकल्प के आश्रय रज्ज्यादिकोवत् , जैसे अद्वैतरूप आत्मा परमार्थकरके सत् रूपहुआ प्राणादि विकल्पोंका आश्रय है । तैसे प्राणादिरूप विकल्पों को विषय करनेवाला वाणीरूप प्रपंच ॐकारही है। अरु सो [ ननु अर्थों के समूह को आत्मरूप आश्रयवाला होने माडूक्योपनिषद्। करके, अकाररूप आश्रयवालाहोनेकरके, वाणीरूपं पंचको दोनों आश्रय प्राप्तहुये, ऐसा कहना बनेनहीं, इसपूकार कहते हैं] ॐकार आत्माका स्वरूपही है, क्योंकि ॐकार आत्माका वाचक है ताते । अरु ॐकार के विकार शब्दके उच्चारणका विषय प्राणादि सर्वआत्माका विकल्पनामसे भिन्ननहीं, क्योंकि "वाचारम्भणंविकारोनामधेय (वाणी से उच्चारणकिया विकार नाममात्र है) अरु “ तदस्यदेवाचातन्त्या नामभिर्दामभिः सर्च सितम् । “सबहीदंनामानीत्यादि" (सो इसका यह सर्ववाणी रूप तन्तुसे नामरूपा दामों ( रज्जुओं) से बद्ध (धंधे ) हैं। सर्व ही यह नामाविषे हैं । इत्यादि श्रुतियोंके प्रमाणसे ॐकारकोसर्व का आश्भयपना धनेहै। [ पृथम पूकरणके अर्थको प्रतिपादन क- रके तिस अर्थविषे मूल श्रुतिको प्रकट करतेहें] एतदर्थ यह श्रुति अमित्येतदक्षरमिदछसव्व। इसप्रकारका यह अक्षर यह सर्वहै ? इसपूकारकहे हैं। जोयहविषयरूप अर्थोका समूहहे तित. कोनामसे अभिन्न होने करके, अरु नामको कारसे अभिन्न हो- ने करके ॐकारही यह सर्वहै । अरु जोपरब्रह्म नामके कथनरूप उपाय पूर्वकही जानने में आवता है सो अंकारही है। [अब "तस्य (तिसका) इत्यादिरूप मूलश्रुतिफेभागको प्रकटकरके व्याख्यान करते है ] | तस्योपव्याख्यानंभूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोंकारएव । तिसका उपव्याख्यानहै, भूत, वर्तमान, भ- विष्यत् यह सर्व प्रकारही है । अर्थात् तिस इस पर अरु अपर रूप 'ॐ इसप्रकार के अक्षरको ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय होनेसे, अरु ब्रह्मके समीप (नाम) होनेकरके विप्रकृष्ट कथनरूप प्रसंगविषे प्राप्त जो उपाख्यानहै, सो सम्यक्प्रकार जानने के योग्य है । अरु उक्त न्यायसे 'भूत, वर्तमान, भविष्यत्' इन तीनोंकालोंकरकेप- रिच्छेद (भेद ) करने के योग्य जो वस्तुहे सोभी सर्व ॐकारही ह। यच्चान्यत्रिकालातीतंतदप्योङ्कारएव जोअन्य तीनोंका- लों से अतीत (भिन्न) है सो भी अंकारही है । अर्थात् जो अन्य , मांडूक्योपनिषद् । सर्वधंधेतमायमात्माब्रह्मसोयमात्माचतुष्पात् ।। तीनोंकालों से पृथक कार्यरूप लिंगसे जानने योग्य. अरु काल करके परिच्छेद करने को अयोग्य कारणरूप । अव्याकृतादिक हैं।वा सर्वका कारण परमात्मा है। सो भी ॐकारही है। अ र्थात् आकाशको सर्वत्र पूर्ण होनेसे उसको देशकृत परिच्छेद न- हीं, परन्तु "एतस्माद्वाएतस्मादात्मन आकाशःसंभूत" इत्यादि प्रमाणसे आकाशको उत्पत्तिवाला होनेसे वो अपनी उत्पत्ति के पूर्वकाल में अभावरूप हे ताते आकाश को कालकृत परिच्छेद है, तोते आकाशादि सर्वकार्य भूत, भविष्यत्, वर्तमान, इनकालत्रय कृत परिच्छेदव लाहै, अरु आकाशादि सर्वकार्योका करण जे सत् चेतन्य परमात्मा वाहे सो "अजोनित्यः" इत्यादि अनेकश्रुति- यों के माणसे उत्पत्ति विनाश से रहित अजन्मा नित्य सत्यहे, एतदर्थ उसविप कालकृत भी व्यवधान नहीं। इस कहने का अ- भिप्राय यह है कि "भूतंभवद्भविष्यदितिस मोंकारएव " इस श्रुतिले आकाशादि सर्वकार्य जो उत्पत्ति विनाशवालाहे सो सर्व कालत्रय के परिच्छेदवाला ॐकारमा वाच्यहे "तदेवाच्यप्रण- वोहिनाचको" इत्यादिप्रमाणसे । अरु " यच्चान्यस्त्रियालातीतं तदप्योंकारएव" इम श्रुतिवाक्यरो, जो कालत्रय विच्छेदवा कार्यरूप पदाथोंसे अन्यजो सर्वका कारण अधिष्ठान सर्वात्मा परनन सो ॐकारकालक्ष्यहे, ऐमाजानना यहां [वाच्य अरु वाचकको एकही सत् वस्तविपे कल्पिनहोने करके तिनकी एक रुपताको कथनफियाहेतात, पुनः (सर्वयहनह्महे) इसप्रकार क्यों कहते हैं, ऐमा जहां विकल्प है, नहीं उक्त अर्थके अनुवादपूर्वक आदिमवाक्य के फलसहित तात्पर्य को करतेह] नाम (वाचक) अरु नामी वाच्य ) इनकी एकता के होने से भी नामकी प्रा- धान्यता से यह निर्देश दिया १॥ २हेसोम्य.!"ॐ"[वाच्यको बाचकपने क्थन करकेही निन -- मांडूक्योपनिषद् । विाच्य वाचककी । एकताकी सिद्धिसे, पुनः वाचक की वाच्य रूपताका कथनरूप व्यतिहार (उलटायके कथन) करना व्यर्थ है, यह आशंका करके कहते हैं। यहां यह अर्थहै कि वाच्य से चककी एकताको न कथन करके वाचकसेही वाचक की एकता के कथन करने से उपाय अरु उपेय की करीहुई जो एकता, सो मुख्यनहीं, किन्त गौणहै, इसप्रकारकी आशंका प्राप्त होगी,ति- सके निवारणार्थ व्यतिहारका कथन सफल है] “मित्येतद- क्षरमिदंसः" इत्यादि नामकी प्रधानता से निर्देशकरी वस्तुका पुनः नामी की प्रधानता से जो निर्देश कहिये कथन है, सो नाम अरु नामी की एकताके निश्चयार्थ है । अरु अन्यथा नामके विधे नामीका निश्चय होवेगा, अरु नामीकी नामरूपता गौणहै, इस प्रकारकी शंका उत्पन्न होवेगी। अरु वाच्य अरु वाचकरूप ना. मी अरु नामकी एकता के निश्चयका इन दोनोंको एकही प्रय- न से एक कालविषे लय करताहुआ तिससे विलक्षण ब्रह्मको [कि जिसविषे नाम अरु नामी इत्यादि कोई भी कल्पना नहीं। प्राप्त होता है, यह प्रयोजन है । अरु तैसेही आगे कहेंगे कि “पादामात्रामात्राश्चपादा" (पाद जो हैं सो मात्रा हैं अरु जो मात्रा सो पादहैं ) । सोई [कहेहुये वाचकके वायसे अभेदविपे वाच्यको प्रकटकरके योजना करते हैं ] कहते हैं सबछानबह्मा यमात्माब्रह्म सर्वही यह ब्रह्महै, यह आत्माब्रह्म है । अर्थात् सो सर्वकार्य अरु कारणही ब्रह्महै । सर्व जो यह ॐकारमात्र है, इसप्रकार श्रुतिने कहाहै,सो यह ब्रह्महै। इसप्रकार सो परोक्षपने करके कथन किये ब्रह्मको प्रत्यक्ष (अपरोक्ष) विशेष करके निर्देश करते हैं। यह आत्माब्रह्महै। यह "अयं" यह इसकरके 'विच, तेजस, प्राज्ञ, अरुतुरीय, इन चार पादवाला होने से विभाग को प्राप्त हुये आत्माको प्रत्यगात्मारूप होने करके कथन करने को जो इच्छित अर्थ तिसके निश्चयार्थकसाधारण शरीके हस्तान (अंगुली वा करतल ) को अपने हृदय देशपर्यंत लेआवनेरुप मांदूक्योपनिषद् । व्यापारमय अभिनय से "अयमात्मा" ( यह आत्मा है ) अर्थात " अंगुठमात्रःपुरुपोऽन्तरात्मा- सदाजनानांहृदये सन्निविष्टः" इत्यादि श्रुतिप्रमाणसे अंगुप्तप्रमाण हृदयनामक मांसपिंडी जो वक्षस्थलके मध्य है, तिसके संम्बन्धसे तिलकेमध्य 'घटमें आका- गवत, अंगुष्टमात्र चैतन्य पुरुष है तिसको सर्वका द्रष्टा होने से प्रत्यक्षकरके 'अहं आत्माहै, इसप्रकार अंगुलि निर्देशसे कहते हैं। इसप्रकार कहते हैं। सोऽयमात्मा चतुप्पात् सो यह आत्मा चारपादवाला है अर्थात् सो [अव "सोऽयं” (सो यहहै) इत्या. दिरूप अन्यवाक्य को प्रकटकरके व्याख्यानकरतेहैं ] यह अंका- रका वाच्य अरुं पर (सर्वाधिष्ठान) अरु अपर (प्रत्यगात्मा) रुप होनेकरके स्थितहुआ आ मा चारपादयालाहे । तहारपान्त कहते हैं, कापणके पादवत्, [ आत्माको सर्वाधिष्टान होने फरके अपरोक्षतासे पर (श्रेष्ठ) पनाहे.अरु उसको प्रत्यगात्मरूप- ताले अपर (अश्रेठ) पनाहे, तित हेतुकरके कार्यकारण रूपसे सर्वका स्वरूप (अपनाआप) होने करके स्थितहुआ जो आत्मा तिसके ज्ञानकी सुगमताके अर्थ उस विपे चारपाद की कल्पना किया, तिस रिपे दृष्टान्त कहते हैं। यहां यह अर्थहे कि कोई एक देश विप पोड़गपण अन्नके माप करने के पात्र विशेषका नाम 'कापण, कहते हैं, अर्थात् किसी एकपान विशेपमें एकमनके प्रमाण अन विशेष पूर्णता से आवताहे अरु उस एकही पात्र में 'एकमन, पीनगन, आधमन, पावमन, इसप्रकारमापने के चार चिह होनेसे उस पात्रकी चार पादवाला कल्पना करते हैं तसे तहां उसपात्रयिप व्यबहारकी याहल्यता सिवधर्थ पादोंकी बिशेप कल्पना करते हैं,तिसेही इस आत्मा विप भी पादोंकी कल्पना जाननी । परन्तु जरो गोको चार पादवाली कहते हैं तमे आत्मा चार पादयाला कहनेको शस्य नहीं क्योंकि आत्माकोजोनिष्कल निरक्यमादि भावकी प्रतिपादक श्रुतियां तिनसे विरोध होगा मात ] गोके पादयत् नहीं [विश्यमे आदिलेके त्तगयपर्यन्नाचार 7 मांडूक्योपनिषद् । जागरितस्थानोबहिःप्रज्ञःसप्ताङ्गरकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग्वैश्वानर प्रथमःपादः.३॥ पादरूप ,पदार्थाविषे जो पाद शब्द है, सो जव करण व्युत्पत्ति वाला । अर्थात् साधनरूप अर्थवाला होवे तब विश्वादिकोंबन तुरीयकेभी साधन कोटिविषे प्रवेशके होनेरो,ज्ञेयवस्तुकी अर्थात् मुमुक्षुपुरुष करके श्रवणादि साधनोंद्वारा तुरीयआत्माको आत्म- वसे जानना है तिसकी असिद्धि होगी, अरु जब पाद शब्द -विश्वादिक सर्वविष कर्म व्युत्पत्ति (विषयरूपअर्थ) वालाहोने है, तय सर्व को शेयरूप होने से उनको ज्ञानके साधनताकी असि- द्धि होवेगी। यह आशंकाकरके पादशलकी प्रवृत्तिको विभागकर के प्रकट करते हैं ] विश्वादिक तीनोंके मध्य पूर्वपूर्व पिादोंकेउत्तर उत्तर,पादों विपे। विलयकरने से तुरीयाका निश्चय होता है । अरु इसप्रकार होनेसे पादशब्द तुरीयाके कारणभावका लाधन होताहै, अरु प्राप्तहोता है । इसप्रकार होनेसे पादशब्द तुरीयके कर्म कहिये 'विषय, भावका साधन होता है। परन्तु निरवयवरूप 'आत्माको उभयप्रकारके पोदोंकी कल्पना बने नहीं २॥ .,--- १३ हे सौम्य! [आत्माकेचारपाद तो दूरसेही निपेकियेह; इस प्रकारवादीशंकाकरे है]प्र०॥ आत्माका चारपादकरके युक्तपना कैसेहै, उ०॥ तहां कहते हैं, जिागरितस्थानोवहिन जागरि तस्थान बहिःप्रज्ञ है, अर्थात् जाग्रत् अवस्था है भ्यिान अर्थात् अभिमानका विषय जिसका, ऐसाजागरितस्थान है । अम वहिर जो आत्मा को अपने आप आत्मत्वसे मिन विषय, तिन विषे हे प्रज्ञा [प्रज्ञा जो बुद्धि, तिसो प्रथम अन्तर होने की प्रसिद्धि से, तितका "वहिःप्रज्ञः-८ वाहा के पिपर्य वाली, यह विशेषण अयुक्त है, ऐसी आशवाकरके तितका व्याख्यान करते हैं। यहां यह भावाहे कि,चैतन्यरूप जो स्वरूप भून प्रज्ञा हेसो वाद्य विपयों विष भामती नही. क्योंकि यो प्रज्ञा विषय मांडूक्योपनिपद् । की अपेक्षासे रहित है ताते, किन्तु वुद्धिरूपजो प्रज्ञाहै सो वाह्यके घिपयों विपे भासतीहै ] जिसकी सो कहिये पहिःप्रज्ञ । अर्थात् अविद्याकृत [वाह्य विषयोंका वास्तवकरके अभावसे, वो प्रज्ञा जिो अन्तर है। सोबाह्यविषयोंविषे कैसे भासती है, ऐसीआशङ्का करके कहते हैं । यहां यहतात्पर्य है कि, आत्मविषयिणी स्वरूप भूत जो प्रज्ञा है, सो वास्तवसे वाह्यविषयवाली नहीं अङ्गीकार कियाहै, परन्तुबुद्धिवृत्तिरूप जो विपयादिवस्तुविषयिणी निश्च- यात्मक । अज्ञानकरके कल्पित प्रज्ञाहै,सो वाह्यविपयोंवालीप्रज्ञा होता है । अरु सो बुद्धिवृत्तिरूप प्रज्ञाभी वास्तवसे वाह्य विषय भावको अनुभव नहींकरती क्योंकि अज्ञानकरके कल्पित होनेसे वास्तवमें उस प्रज्ञाका अभावहे । अरु उस प्रिज्ञाका विषयाबाह्य विषय सोभी अज्ञानकरके कल्पित है ताते । एतदर्थ बुद्धिवृत्तिका जो बाह्य विपर्योका प्रकाशकपना है सो प्रातिभासिक (कल्पित) है]जोबाह्यप्रज्ञाहै सोवाह्य के विषयवाली (विपयाकार) हीभासे है तेसे [अव पूर्व के विशेषणसे इतर विशेषणको योजनाकरते हैं ] "तस्यहवैतस्यात्मनो वैश्वानरस्यमद्वैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणःपृथग्वमात्मा सन्देहोवहुलोवस्तिरेवरयिः पृथिव्येवपादो." "अग्निहोत्र कल्पनाशेपत्वेनाग्निमुखत्वेनाहवनीय उक्तः" तिस इस वैश्वानररूप आत्माका सुन्दरतेजवाला स्वर्गलोक मस्तक है, अरु श्वेतरक्तादि नानाप्रकारके गुणांवाला सूर्य उसका चक्षु, है, अरु नानाप्रकारकी तिर्यक गतिसे विचरनेके स्वभाववाला वायु उसका प्राणहै, अरु विस्तृततारूपगुणवाला आकाश उसका देहमध्यभाग है, अरु उनका हेतुरूप जल उसका मूत्रस्थान है, अरु पृथिवी उसके दो पादहें । अरु अग्निहोत्रकी कल्पना विपे उपयोगी होनेकरके आह्वनीय नामवाला जो अग्निहै सो उसके मुखरूपसे कहा है । इसप्रकारश्रुतिकरके उक्त यहसातहें अङ्गजिस- के ऐसा सप्तांगासातअहवाला, हे । अरु एकोनविंशतिमुखः। एक ऊन पीस मुम्बवालाहे अर्थात् नैसेही[अब अन्य विशेष- . माडूक्योपनिषदः। णोंकी योजना करत ] पांच ज्ञानेन्द्रिय अरु पांचकम्भेन्द्रिय अरु प्राणादिभेदसे पांच वायु, अरु'मन, बुद्धि, चित्त, अरु अहङ्कार, यह चार अन्तःकरणकी वृत्तियां, यह सर्व मिलके हुये जो उन्नीस १६ सोई मुखवतु उसके मुख (ज्ञानकेद्वार) [यहां ज्ञानपदकर्मकाउप- लक्षण है, एतदर्थ ज्ञानके साधन अरु कर्मके साधन इस विश्व नामवाले जीवके मुख (ज्ञान अरु कर्मके साधन ) हैं। यहां इस प्रकार विवेचन करने को योग्य है, तहां पांच ज्ञानेन्द्रियां अरु एक मन अरु एक बुद्धि, इिनसातको पदार्थोंकों को ज्ञानविषे साधन- पना प्रसिद्ध है, अरु वागादि कर्मेन्द्रियों को वचनादि कर्मों विषे साधनपना प्रसिद्ध है । पुनः प्राणों को ज्ञान अरु कर्म इन दोनों विषे परम्परासे साधनपना है । क्योंकि प्राणों के होनेसेही ज्ञान अरु कर्मकी उपपत्ति है, अरु तिनकेअभारसे ज्ञान कर्मकीअनुप. पत्तिहै ताते । अरु अहङ्कारको भी प्राणवत् ज्ञान कर्म दोनोंविषे साधनपना माननेके योग्यही है।अरु चित्तको भी चैतन्याभास के उदयविषे साधनपना कहाहै] जिसके, इसप्रकारका उन्नीस १६ मुखवाला है । अरु " स्थूलभुग्वैश्वानरःप्रथमःपादः। स्थूल भुक् वैश्वानर है सो प्रथम पादहै, अर्थात् [पूर्वोक्त विशेषणों करके युक्त वैश्वानरका " स्थूलभुक् " ऐसा अन्य विशेषण है, तिसका विभागकरते हैं, यहां शब्दादिक विषयोंका स्थलपना है सो दिशादिक देवता के अनुग्रह सहित श्रोत्रादिक इन्द्रियों से ग्रहणहोनेरूप है] सो ऐसे विशेषणोंवाला वैश्वानर उक्त उन्नीस दारोंसे शब्दादिक स्थूल विषयोंको भोगता है ताते सो ' स्थूल मुक् हे, अरु [अब वैश्वानर शब्दका प्रसंग विपे प्राप्त विश्व "तीवको विषय करनेपना स्पष्ट करते हैं ] “विश्वेपानरा- गामनेकधानयनाद्विश्वानरः, । यद्वाविश्वश्चासो नरश्चेति वेश्यानरः विश्वानर एव वैश्वानरः". सर्व नरों को अनेक कारसे लेजाता है एतदर्थ विश्वानर है, अथवा विश्व ऐसा मोनर सो कहिये विवानर । विश्वानरही सर्व [ विश्व ऐसा मांडक्योपनिषद् । पनाहै। अतएव ऐसे अध्यात्म अरु अधिदेवके अभेदको लेने उक्त प्रकारसे चार पादवानपनेको कहने को इच्छित होने से पूर्व पूर्व पादको उत्तरोत्तर पाटरूप से विलय करने रो जिज्ञासुकी तुरीय स्वरूप विपे स्थिति सिद्धहोतीहै ] यह दोपहै नहीं, क्योंकि अधि देव सहित सर्वप्रपंचके इसआत्माके स्वरूपसे चारपादपना कह- ने को इच्छित होनेकरके । अरु ऐसे [जब इसप्रकार जिज्ञासु मुमुक्षुकी तुरीय विषे स्थिति अंगीकार करते हैं, तब तत्त्वज्ञानके प्रतिबंधक प्रातिभासिक कहिये कल्पित द्वैतकी निवृत्ति के हुये अद्वैत परिपूर्णब्रह्म में ही इसप्रकार महाराश्यार्थका साक्षात्कार सिद्धहोवह इसप्रकार मलितको कहते हैं ] सर्व प्रपंचीनिवृत्तिके हुये, अद्वैतकी सिद्धि होतीहै, सो सर्व भूतोंविपे स्थित एक आत्मा दखा (अनुभवकिया) होताहै, असे सर्व भूत आत्मांविष देखेहुये होते हैं । इसप्रकार “ यस्तुसर्वाणिभूतान्यात्मन्येवानुपश्यति जो सर्वभूतोंको आत्माविषेही देखता है । इसईशावास्यउपनि- पदके पाठ मन्त्ररूप श्रुतिका अर्थ समाप्त कियाहोताहै [अध्यात्म अरु अधिदेवके अभेदके अंगीकार रूपद्वार से पोंक्तरीत्या तत्त्व ज्ञानके होनेके । अंगीकारविये दोष कहते हैं। अन्यथा अपने देहकरके परिच्छिन्नही प्रत्यगत्मिा सांख्यादिमतवादियोंवत् अनु- भव कियाहोवेगा । अरु तैसे [ननु, आत्माकी एकता विपे सुसा- हिकोंके भेट्टकी व्यवस्था असंभव.से.. अर्थात,जो, कपि.सई. शरीरों में एकही आत्मा मानिये तो एकके सुखसे सर्वही सुखी, अरु एकके दुःखसे सर्वही दुःखी, अरु एकके वझसे सर्वही बंद्ध, अरु एकके मुक्तसे सर्वही मुझं, ऐसा होना चाहिये, परन्तु सोने होके कोई सुखी है, कोई दुःखी हैं, कोई बद्धहे, कोई मुक्त है, सो सर्वको प्रकट अरु युक्तही है, अरु शरीर २ प्रति भिन्न भिन्न आत्मा मानने से कोई सुखी अरु कोई दुःसी इत्यादि जो लोक चिपेव्यवस्था है सो यथार्थ है अरुसोईसर्व गरीरोचिपे भिन्न भिन्न आत्माका बोधक लिंग है। शरीर शरीरकेप्रति आत्माका भेद २६ मांडूक्योपनिषद् । स्वप्नस्थानोऽन्तः प्रज्ञः सप्ताङ्गएकोनविंशतिमुर्खः प्रविविक्तभुक्तैजसोद्वितीयःपादः ४॥ सका व्याख्यान करते हैं] “स्वप्नस्थानो" स्वप्नरूप स्थान वाला ? अर्थात् स्वप्न, हेममलक्षण अभिमानका विपयरूपस्थान जिस तैजसरूप द्रष्टाका ऐसा जो स्वप्नस्थानवाला, ['स्वप्न' इस पदके निरूपणार्थ तिसके कारणको निरूपण करते हैं ] जाग्रत् की जोप्रज्ञा (बुद्धि) है सो अनेक साधनोंवाली अरुवाह्य (स्थूल) को विषयकरनेवाली हुयेवत् भासमान, अरु मनरूप स्फुरण- मात्रहुई तिसप्रकारके संस्कारको मनविपे धारणकरे है। तैसे संस्कारवाला सोमन, चित्रित [ जाग्रत्की वासनाकरके युक्त हुआ जो मन सो स्वप्नविपे जाग्रत्वत् भासताहै, इस अर्थ विपे दृष्टान्त कहतेहैं । जैसे चित्रकरके युक्तहुआ जो पट सो चित्रवत् भासताहै । अर्थात् अनेक रंगोंके सूत्रकरके निर्मित चेल बूटादि वाला पट चित्रवत् भासताहै । तैसे जाग्रत्के संस्कार करके (जो मनही करके कल्पित हैं ) युक्त हुआ जो मन सोजाग्रत्वतही भासताहै, यह युक्तहै, इत्यर्थः ] पटवत्वाह्यके साधनकी अपेक्षा से रहित,अरु अविद्या,काम, कर्म, से प्रेरणा को प्राप्तहुआ जाग्रत् वत् भासताहै । अरु ऐसेही वृहदारण्यकी श्रुतिथिपे कहा भी है "अस्य 'लोकस्य सवितोमात्रामपादायति" "तथा परे देवे मनस्येकीभवतीति " " प्रस्तुत्यात्रेप देवःस्वप्नेमहिमानमनुभवती त्याथर्वणे' - इस सर्व साधनकी सम्पत्तिवाले लोककी मात्रा (लेशरूप वा सूक्ष्म वासना) को ग्रहणकरके सोवता है । अरु ऐसेही अथर्वणवेदके ब्राह्मण पूश्नोपनिपद्विषेभीकहाहे, तथाच ८ मनरूप परदेव विषे एकवत् होताहे? ऐसे प्रसंगविपे प्राप्तकरके 'इस स्वप्नविष यह (मनास्य) देव महिमाको अनुभव करताहै' अरु [ननु विश्वकी वाह्यइन्द्रियों से जन्य प्रज्ञाको, अरु तेजस यी मनसे जन्य पूज्ञाको अन्तर स्थितहोनेकी तुल्यता से, तेजस का मांडूक्योपनिषद् । अन्तःप्रज्ञः".८ अन्तरकी प्रज्ञावाला यह विशेषण व्यावर्तक (विश्वादिकोंसे पृथक् करनेवाला)नहीं है, जहां ऐसी शंकाहै,तहां कहते हैं] इन्द्रियों की अपेक्षासेमनको अन्तर स्थित होनेकरके स्व- नवि अन्तर है, तिसमनकीवासनारूपप्रज्ञाहै जिसकी.ऐसाजो "अन्तःप्रज्ञ" अन्तरकी प्रज्ञावाला है । अरु सप्ताङ्गः एकोन विंशतिमुखः" सातअंग अरु उन्नीस मुखवाला है, अर्थात् यह तेजस.जो अन्तर की प्रज्ञावालाहै सो पर्वके विश्ववत सात अंग अरु उन्नीस मुखवालाहै.। अरु "प्रविविक्तभुक्तैजसोद्वितीयः पादः वातनामय सूक्ष्म भोगवाला है तैजस द्वितीयपादहे. अर्थात् प्रविविक्तभुक्, कहिये वासनामय सूक्ष्मभोग वा विरल भोगका भोक्ताहै ननु, विश्व अरु तैजसका, प्रविविक्तभुक वासनामय समभोगोंका भोक्ता यह विशेषणतुल्य है, क्योंकि । विश्व अरु तैजस इनाउभयकीविाह्य अरु अन्तरांप्रज्ञाको भोज्य- प्रनेकी तुल्यता है ताते, ऐसा जो वादीका कथन सो बने नहीं, क्योंकि उक्त उभयकी प्रज्ञाको भोज्यपने की तुल्यता के हुये भी तिस प्रज्ञाविषे मध्यके भेदसे.विश्वकीभोज्य (भोगने योग्य)जो प्रज्ञाहे, सो विषय सहित होनेसे स्थूलंकरके जानी जातीहै । अरु जो तैजसकी प्रज्ञाहै सो विषयके सम्बन्ध से रहित केवल वास- नामात्र रूपवाली है, इसकरके तैजस विषे सक्षमभोग सिद्धहोते है, इसप्रकार कहा ] जाग्रत् बिपे विश्वको विषयसाहित होनेसे. स्थूल प्रज्ञाका भोग्यपनाहै। अरु यहां स्वप्नविषे जिसकरके केवल वासनामात्र स्वरूपवाली.पज्ञा भोग्यहै, एतदर्थ पविविक्त (सक्षम) भोगह । अंस. स्वप्नके अभिमानी को तेजके.कार्यहोनेके अभाव से तैजसपना कासे होवेगा, यह आशंका करके कहते हैं ] विपंथ रहित केवल प्रकाशस्वरूप प्रज्ञाविपे प्रकाशकपने करके होवे हैं। अर्थात् स्वप्नका, अभिमानी तेजकाकार्य नहीं. परन्तु स्वम का प्रकाशक है एतदर्थ उसको तेजसपना होता है । इसकरके,जो तेजसह सो द्वितीयपाद है। .
२८ मांडूक्योपनिषद् । यंत्र सुप्तोनकञ्चनकामंकामयतेनकञ्चनस्वप्नंपश्य तितत्सुषुप्तम् । सुषुप्तस्थानएकीभूतःप्रज्ञानधनएवानन्द मयोगानन्दभुक्चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयःपादः ५ ॥ ५ हे होम्य[उक्तप्रकार विश्व अरु तेजसा दोनों पादों की व्याख्याकरके अव तृतीयपादके व्याख्यान करतसन्ते व्याख्यान करने के योग्य श्रुतिविपे “नकंचन" किरीकोभी नहीं इत्यादि विशेषणों के तात्पर्य को कहते हैं। यहां यह अर्थ है कि स्थल वि- पयवाले ज्ञानकी जहां प्रवृत्ति है ऐसा जो जाग्रदादिथा सो दर्शन वृत्तिकहतेहँ अरु स्थूलविषयके दर्शनसे (ज्ञान ) से इतर जे दर्शन (ज्ञान) सो केवल वासनामात्र होनेसेअदर्शन है, तिस वासना मयकी वृत्ति जहाँ है सो स्वान, तिस स्वप्नकोअदर्शनवृत्ति कहते हैं। अरु तिन । दर्शनवृत्ति, अरु अदर्शनवृत्ति । दोनों विये सुपु. प्तिवत् तत्त्वके अग्रहणरूप निद्राको तुल्यहोने से। " यत्रसुप्तो" ( जहां सोयाहुआ, इत्यादि विशेषणोंकी तिन उिक्तउभय वृत्ति- यों में प्राप्तिके हुये, तिनसे भिन्नकरके सुपुप्तिकेग्रहणार्थ “यत्र सुप्तो" (जहाँ सायाहुआ. इत्यादिरूप मूलश्रुतिके वाक्यविषे "नकंचन" किसी को भी नहीं , इत्यादिरूप विशेषण हैं, सो जाग्रत् अरु स्वन उभयस्थानों से पृथक् करके सुपुप्तिको ही प्र. हण करायता है]" यत्रमुप्तोनकञ्चनकामं कामयतेनकञ्चनस्वनं पश्यतितत्सुपुप्तम्" जहां सोयाहुआ किसी भी कामकी काम- ना करता नहीं, किसी भी स्वन को देखता नहीं, सो सुपुप्तिवाला है अर्थात् दर्शन (ज्ञान)अम अदर्शन (अज्ञान) दोनोंवृत्तियांवाली जाग्रत् अरु स्वप्न अबस्थाधिपे सुपुप्तिवत् तत्वके अयोधरूपनिद्रा को तुल्य होनेकरके, सुप्तिके यहणार्थ इसउपनिषदके पंचममा • न्त्र (श्रुतिवास्य) विष “यत्रसुप्नो” जहां सोयाहुआ? इत्यादि कप विशेषणहें। ["नकञ्चनस्वपश्यति" किसी भी स्वप्नको देखना नहीं। इसही विशेषण करके दोनोंस्थानों (जामत्स्यप्त) . मांडूक्योपनिषद् । से सुषुप्तिकभेदका सम्भवहोनेसे. अन्य विशेषण जोहैं सो“अकि- श्चित्कर" निष्प्रयोजन है, यह आशंकावरके कहतेहैं । यहां यह अर्थहै कि तत्त्वका अपयोधरूपजोनिद्राहतिसकोजाग्रदादि तीनों अवस्थारूप स्थानोंविषे तुल्यहोनेसे तिीनों स्थानों को समता है, अतएव । जाग्रत् अरु स्वप्नसे विभाग करके सुपुप्तिके लखावनेके अर्थ अन्य “ यत्रमुतो" इत्यादि विशेषण हैं ] अथवा जाग्रदादि तीनों अवस्थारूप स्थानों विषे भी तत्वकी अबोधतारूप जो निद्राहै सो समानहै, एतदर्थ पूर्वके जाग्रत् स्वप्नरूप स्थानों से सुषुप्तिरूप स्थानका विभाग करते हैं, जिसस्थानका वा कालविषे सोया हुआ पुस्प किसीभी भोगकी इच्छा करतानहीं,अरु किसी भी स्वप्नको देखता नहीं। [एकही विशेषणको व्यावर्तकपनेका संभव होनेसे, दो विशेषणोंका क्या प्रयोजनहै, यहआशंका करके दोनों विशेषणों को विकल्पकरके व्यावर्त्तपनेका संभव है, ताते व्यर्थ न होयके दोनोंही सप्रयोजन हैं, ऐसा मानके कहतेहैं, जिस । करके सुपुप्तिविपे पूर्वके जायत् अरु स्वप्नरूपस्थानोंवत् विपरीत ग्रहणरूप स्वप्नका दर्शन वा कोईभी कामना विद्यमान नहीं है, एतदर्थ सो सुपुप्ताहिये सुपुप्तिहै।सो सुषुप्तिहै स्थान जिंसप्रज्ञा- का ऐसा सुषुप्तिस्थानवालाहै । अरु सुषुप्तिस्थान एकीभूतःप्र. ज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतोमुखःप्राज्ञस्तृतीयःपादः" सापुन्तिस्थालत्पलाहै,एकीभूत है,ज्ञालपलही होताले कालन्द- मयहै, आनन्दका भोक्ताहै, तोमुखहै, प्रज्ञा,तृतीयपाद अर्थात् उक्तप्रकार सुपुप्तिरूप स्थानवालाहै, अरु एकीभूतहै, [उक्तदोनों किसी विषय वा भोगको इच्छता नहीं, अरु किसीभी स्वप्न को देखता नहीं, इन)विशेपणोंकरके विपरीतं ग्रहणसे रहितपना अरु भोगके सम्बन्धसे रहितपना कहने को इच्छित है] अरु जाग्रत् [इस देतसहित प्राज्ञ जीवका एकीभतपनेरूप विशेषण कैसे संभवे, यह आर्शका करके कहतेहैं ] अरु स्वप्न दोनों अब- स्थारूप स्थानों वि विभागकोपाया जो मनकास्फुरणरूप द्वैत .
मांडूक्योपनिषद् । कासमूह, सो जैसे अपुनरूप आत्मासे भिन्न है, तैसेही तिसंरूप के अपरित्यागसे, रात्रिके अन्धकारकरके ग्रस्त दिशा वा दिवस- वत् अविवेककरके युक्तहुआ अपने विस्तारसहित कारण (अव्या. कृत) रूप होता है । तिस अवस्थाविपेतिस (अव्याकृत, कारण रूप) उपाधिवाला हुआ आत्माको एकीभूत कहते हैं। [ यद्यपि सुपुप्ति अवस्थाविषे सर्व कार्योंका समूह कारणरूप होता है, तय तिसकारणरूप उपाधिवाला हुआ. आत्मा. 'एकीभूत, विशेषण वाला होताहै, तथापि कारणरूप उपाधिवाले आत्माका "प्रज्ञा- नघन' प्रज्ञानघनहै? यह विशेषण अयुक्तहै क्योंकि सिर्व उपाधि सेरहिता निरुपाधिरूप आत्माकोही "प्रज्ञानघ न इत्यादि विशे. पणका होना संभवेहै, यह आशंकाकरके कहते हैं] एतदर्थ,स्वप्न अरु जायतत्विषे मनकास्फुरणरूप जो प्रज्ञानहै सो सुपुतिविपे घनी भूतहुयेवत् होता है । सो इस (सुपुप्ति) अवस्थाको अविवेकरूप होनेसे घनप्रज्ञा "प्रज्ञानघन" इस विशेषणसे कहतेहैं । जैसेरात्रि विषे रात्रिके घन अन्धकारसे अविभागको पाया सर्व पदार्थ धन. वत् होताहै अिर्थात् जायत्, स्वप्न अवस्थामें मनका स्फुरणरूप जो घट पटादिकोंका नाना विभागयुक्त प्रज्ञानहै सो सुपुप्ति अव. स्थामें जबकि बुद्धि तमोगुण अविवेककरके आवृतघन अंधकार रूप होतीहै तब जाग्रत् स्वप्न अवस्थाका मनकास्फुरणरूप घट पटादि सर्व पदार्थ जैसे रात्रिके घन अंधकारकरके अविभागको पायासता घट पटादि सर्व पदार्थ घनवत होता हे तिसे प्रात्मा प्रज्ञान धनही होताहै। [यहां "एव" शब्दकेपर्याय "ही,, शब्दक- रके अज्ञानसे इतर जाति सूचित नहीं है, यह अर्थ होताहै ] अरु मनको विषय अरु विषयीके आकारसे स्फुरण होनेसे हुआ जो 'श्रम तज्जनित दुःखके अभावसे । उस अवस्थामें । आनन्दकी -बाहुल्यतासे आनन्दमय है, आनन्दरूपही नहीं, क्योंकि वो सुप्तानन्द अविनाशी आनन्दसे रहित है ताते अिर्थात् सुपुति का जो मानन्दहे सो मनकी स्फुरणाजन्य श्रमजनित दुःख के .
मांडूक्योपनिषद् । अभावसे हैं, ताते वो अविनाशी आनन्द न होके नाशवान होनेक- रके स्वरूपानन्द नहीं किन्तु आनन्दप्रायः है । जैसे लोकविषे गिमनादि । श्रमसे रहितहोयके स्थितहुये पुरुपको सुखी आनन्द, का भोक्ता कहते हैं । तैसेही सुपुतिविपे यह प्रिज्ञाविशिष्ट चैतन्या पुरुष जिसकरके अत्यन्तश्रमरहित स्थितको अपनेविषे अनुभव करताहे, तिसकरके इसको आनन्दभुक् (आनन्दका भोक्ता)कह- तेहैं “एपोऽस्य परमआनन्द इतिश्रुतेः" यह इस पुरुपका परम आनन्दहै? इस श्रुतिके प्रमाणसे, अरु [प्राज्ञकाही चेतोमुखः" यहजो अन्य विशेषण है अव तिसका व्याख्यान करते हैं ] स्वप्न अरु जाग्रत्मय प्रतिबोधरूप चित्तके प्रतिद्वारभूत होने पे चेतोमुख है, वा वोधरूप चित्तहै 'स्वप्नादिकोंके आगमनप्रति मुंख कहिये द्वार जिसको, ऐसाहै एतदर्थ सो चेतोमुख है। अरु [ इस सुपुप्ति के अभिमानीको भूत अरु भविष्यत् विपयों विषे ज्ञातापना है, तैसे सर्व वर्तमान विषयोंविषे भी ज्ञातापना है। एतदर्थ प्रकर्ष करके जो जानताहै सो प्रज्ञहै, अरु जो प्रज्ञहै सोई प्राज्ञनामसे कहाजाताहै भूत अरु भविष्यत्का ज्ञातापना अरु सर्व विषयों का ज्ञातापना इसकोहीहै, एतदर्थ यह प्राज्ञ है। सुषुप्तिविषे सर्व विशेषों के ज्ञान के विलयहुये प्राज्ञको ज्ञातापना कैसे होवेगा, यह आशंकाकरके कहते हैं, यहां यह अर्थ है कि यद्यपि सुषुप्तिवाला पुरुष तिस अवस्थाविषे सर्व विशेषके ज्ञानसे रहित होवेहै,तथापि जोग्रत् अरु स्वप्न विषे उत्पन्नहुई जे सर्व विषयोंके ज्ञातापने रूपगति, ताते प्रकर्पकरके (सम्यक्प्रकार) सर्वको सर्वओरसे जा- नताहै, एतदर्थ सो प्राज्ञशब्दका वाच्य (प्राज्ञनामवाला नामी) होताहै,] सुषुप्तिको प्राप्तहुआ पुरुपभी स्वप्न अरु जाग्रत्विषे व्य- तीतहुई सर्वविषयोंके ज्ञातापनेरूप पूर्वकीगति इसकरके (सुषुप्ति- स्थ पुरुषको प्राज्ञ कहते हैं। अथवा िितस अवस्थाविये जिसक: रके प्रज्ञप्तिमात्र अर्थात ज्ञेयके अभायसे ज्ञाता विशेषणरूपवि. शेषतासे रहित निर्विशेषको प्रज्ञप्तिमात्र, कहतेहैं। इसहीका रूप ૨૨ मांडूक्योपनिषद्'। एषसर्वेश्वरएषसर्वज्ञएषोऽन्तर्याम्येषयोनिः । स स्यप्रभवाप्ययौहिभूतानाम् ६॥ है, तिसकरके यह प्राज्ञहै । ऐसा कहतेहैं । अरु अन्य दोनों अ- वस्थाविपे विशिष्टज्ञानभीहै,अरु सुपुतिविषे अन्यज्ञानरूप उपाधि से रहितज्ञानहै,सोज्ञानइसप्रज्ञाकास्वरूपभूतहोनेसे प्रज्ञप्ति'नाम से कहतेहैं, सो यह प्रिज्ञप्तिनामवाला प्राज्ञ तृतीयपाद है ५ ॥ ६हे सौम्य !"एपसर्वेश्वर,, यहसर्वेश्वरहै अर्थात् यह प्राज्ञही स्वरूप अवस्थावाला हुआ सर्वका ईश्वरहै, अर्थात् अधिदेव स- हित सर्व भेदोंके समूहका नियन्ताहै, इस हेतुसे अन्य नैयायि- कादिकोंवत् अन्य जातिरूप नहीं "प्राणवन्धनधेहि सौम्य मनः हे साम्य! प्राणरूप धन्धनवालाही मनहै । इस श्रुतिवाक्यसे । अब प्राज्ञकेही अन्य विशेषणोंको साधतेहें] यहहीसर्व अवस्था के भेदवालाहुआ सर्वका ज्ञाताहै अिर्थात् जाग्दवस्थाविपे स्थूल जगत्को अरु स्वप्नावस्थाविपे सूक्ष्म जगत्को अरु सुपुप्ति अवस्था विपे उभयके कारणमूला विद्याको,इसप्रकार सर्वकोसम्यक्प्रकार जानताहै। एतदर्थ यह सर्वज्ञहै । [अरु अन्तर्यामीपने रूप अन्य विशेषणको स्पष्ट करतेहैं ] तेसेही सर्वके अन्तर प्रवेशकरके सर्व भूतोंका नियामक होनेसे, यहही सर्वका अन्तर्यामीभी है। अरु जिसकरके यह उक्तप्रकारका भेदसहित सर्व जगत इससेही उपजता है तिसहीकरके यह सर्वकी योनि (कारण वा उत्पत्ति स्थान है। जिसकरके जगत्यिपे निमित्त अरु उपादान कारण काभेदनहीं, अर्थात् यहजगत् अभिन्ननिमित्त उपादान कारण मांडूक्योपनिषद् । अथ गौडपादाचार्यकृततदुपनिषदर्थाविष्कर णरूपश्लोकावतरणम् ॥ M Ham अत्रैतेश्लोकाः ॥ बहिःप्रज्ञोविभुर्विश्वोह्यन्तःप्रज्ञस्तुतैजसः । घनप्रज्ञ स्तथाप्राज्ञएकएवविधास्मृतः १॥ अथ गौडपादाचार्यकृतकारिकायां प्रथम आगमाख्यप्रकरणभाषाभाष्यप्रारम्भः॥ १॥हे सौम्या श्रीगौडपादाचार्य्यनेमांडूक्योपनिषद्को अध्ययन करके "अत्रैते श्लोकाः” व्यहांये श्लोकहैं। इसप्रकारतिस उपनि- पद्के व्याख्यानरूप नव ६ श्लोकोंका अवतरण किया, तिसका अनुवादकरके भाष्यकारश्रीशङ्कराचार्या व्याख्यान करते हैं] यहाँ इस कथनकिये उपनिपद्के 'पट्६, मन्त्रोंके अर्थविषे यह गौडपा- दाचार्यकृत 'नव ६, श्लोकहैं “वहिःप्रज्ञो विभुर्विश्वो ह्यन्त प्रज्ञ- स्तुतैजसः" वहिःप्रज्ञविभुविश्वहै, अन्तःप्रज्ञतो तैजसहै, अर्थात् चाहिरकी स्थूिल प्रज्ञावाला विभुरूप विश्वहै । अरु अन्तरकी सूक्ष्म । प्रज्ञावाला तो तैजसही है “घनप्रज्ञस्तथाप्राज्ञएकएव त्रिधा स्मृतः" तैसे घनप्रज्ञ प्राज्ञहै, एकही तीनप्रकार से कहा हैं, अर्थात् विाह्यकी प्रज्ञावाले अरु अन्तरकी प्रज्ञावाले वत् । घनीभूतहुई प्रज्ञावाला प्राज्ञहै, इसप्रकार एकही पुरुष को तीन प्रकारसे कहाहै । इसका यह अभिप्राय है कि [जव आत्मा के चेतनपनेवत् जाग्रदादि तीनोंस्थान स्वाभाविक होवें, तव चेतन पनेवत् सो तीनोंस्थान आत्मासे व्यभिचार पावनेयोग्य न होवें गे, अरु तीनों स्थान क्रमकरके अरु अक्रमकरके आत्मासे व्य. भिचारको पावते हैं। क्योंकि आत्मा को तीनस्थानवालापना है ताते, एतदर्थ उनतीनों स्थानों से आत्माका अभिन्नपना -- । .
- मांडूक्योपनिषद् । ३५ 'दक्षिणातिमुखेविश्वोमनस्यन्तश्चतैजसः । श्राकाशे चहदिप्राज्ञस्त्रिधादेहेव्यवस्थितः २॥ । अरु चक्षुके उभय गोलको अनुग्रहका कर्त्ता विराट् आत्मा तिससे अन्य नहीं, अरु व्यष्टिदेहका अभिमानी दक्षिण नेत्र विष स्थित द्रष्टा, दोनोंचक्षु अरु करणोंका नियामक, अरु कार्य, कारण का स्वामी क्षेत्रज्ञहै, सो तो उन दोनों समष्टि देहके अभिमानी हिरण्यगर्भ अरु विराट् से इतर अंगीकार करते हैं। इस प्रकार होने से समष्टि अरु व्यष्टिपनेकरके स्थित जीवके भेदसे कथन करि जो एकता सो अयुक्त है, इसप्रकारका जो वादीका कथन सो बनेनहीं, क्योंकि कल्पितभेदके होतेभी वास्तवकरके अभेद्कै अलंगीकार होने से । अरु " एको देवः सर्वभूतेषुगूढ इतिश्रुतेः ।। ८ एकदेव सर्व भूतों विपे गूढ़ है ? इस श्रुति के प्रमाण से । अरु “ क्षेत्रज्ञश्चापिमा विद्धि सर्वक्षेत्रेषुभारत " अविभक्तश्च भूतेषु विभक्तमिवचस्थितमिति" ८ हे भारत ! सर्वक्षेत्रों (शरीरों) विपे क्षेत्रज्ञ (क्षेत्र को जाननेवाला) भी मुझेही को जान । अरु सर्व भूतोविष विभाग से रहित हुआ भी विभाग को प्राप्तहुयेवत् स्थितहै, इस गीतास्मृति के प्रमाण से । अरु सर्व करणाविपे समानहुये भी दक्षिणनेत्र विपे ज्ञानकी स्पष्टता के देखने से तहां विश्वजीवका विशेषकरके कथन है । अरु दक्षिण नेत्र विपे, [यद्यपि देहके देशके भेदविषे विश्वको अनुभव करते हैं, तथापि जाग्रतविपे तैजमको कैसे अनुभव करते हैं, यह आशं- काकरके द्वितीयपादका व्याख्यानकरते हैं। यहां यह अर्थ है कि 'जैसे स्वप्नविषे जायची वासनारूपसे प्रकटहुये पदार्थोके समूह को द्रष्टा अनुभव करताहै, तसेही जायपि दक्षिण नेत्रमें द्रष्टी' होकर स्थितहुआ अश्रेष्ठ रूपको देखके गुनः नेत्रमंदके, पूर्वदेवा जो रूप सो रूपके ज्ञान से जन्य (उद्धृत) वासनारूपसे मनविष प्रकट होताहे, तिनको सारणारतीहुआ विश्वही तेजस होताहे। , मांडूक्योपनिषद् । अंरु उक्तप्रकार होनेसे उन विश्व अरु तैजसके भेदकी शंका ने नहीं,] स्थित जो विश्वहै, सो कुरूपको देखके देहुये नेत्रवाला हुआ तिसही देखेहुये कुरूपको मनके भीतरस्मरणकरताहुआ स्व- मवत् वासनारूपसे प्रकटहुये तिसही रूपको देखता है । जैसे यहां जाग्रत्विषे देखताहै । तैसेही वहां स्वप्नविपेभी देखताहै। एतदर्थ "मनस्यन्तश्च तेजसः" :मनके अन्तर तो तैजसहै ? अर्थात् मन के अन्तर तेजसभी विश्वहीहै । अरु "आकाशेचहृदिप्राज्ञः" हृद- याकाशविपे प्राज्ञहै अर्थात् [ अव तृतीयपादका व्याख्यान करते हुये जाग्रत्विही सुपुप्तिको देखावतेहैं। यहां यह अर्थहै कि, जो विश्व तेजस भावको प्राप्तहुआहै सो पुनः स्मरणरूप व्यापारकी निवृत्तिके होनेसे हृदयान्तर आकाशधिपे स्थितहुआ प्राज्ञ होयके तिस प्राज्ञके लक्षणकरके युक्तहोता है । अरु रूप विषयके दर्शन अरु स्मरणको छोड़के श्रेष्ठ आकाश (अव्याकृत) विषे स्थितहुये तिस जीवको प्राज्ञसे अन्य अर्थपना नहीं, एतदर्थ सो 'एकीभूत, (विषय अरु विपीके आकारसे रहित)है। अमजिसकरके एकीभूत हे इसहीकरके धनप्रज्ञ अर्थात् विशेषज्ञान अरु अन्यरूपसे रहित, . हुआ स्थित होताहे । इत्यर्थः] जो विट्य तेजसभावको प्राप्त आहे सो पुनः स्मरणरूप व्यापार की निवृत्तिकेहये हदयगत आकाश विपे स्थित हुआ प्राज्ञ एकीभूत अरु घनश्नही होता है, क्योंकि मनके व्यापार का अभाव है ताते । अम दर्शन अरु स्मरणरूपही मनके स्फुरण व्यिापारी है, तिनका अभावहोने से हृदयान्तरही अव्याकृतमय प्राणरूपसे अयस्थानही जाग्रत्पिपे सुपुति"प्राणों येतान् सर्वान् संवृत इनि श्रुनेः, प्राणही इनसबको अपने घिपे संहार करता है, इस श्रुतिके प्रमाणसे । याने अव्याकृतमय प्राणरूपसे जाप्रत्गतमुपुप्तिविपेप्राज्ञाअवस्यान जोकहासोयुफ हो । अरु [पूर्वही विश्व सम विराद की एकताको अनन्तर प्राज्ञ अरु व्याकन की एकताको लम्बाई हुई होनम, अनेजस ओं हिरण्यगर्भके न कथन किये,अरु कहने योग्य अभेदको अयकहनेह। . R , मांडूक्योपनिपद् । तैजस जोहै सो हिरण्यगर्भरूपहे, क्योंकि लिंगशरीररूप मनविपे स्थितहै ताते, अर्थ यहहै जो,हिरण्यगर्भको समष्टि मनविपे स्थित होनेसे, अरु तैजसको व्यष्टि मनविष स्थितहोनेसे, अरु उससमष्टि अरु व्यष्टिरूप मनको एकरूपहोने से, तिन व्यष्टि समष्टि विषे स्थित तैजस अरु हिरण्यगर्भकीभी एकता कचित्है] तैजस जोहै सो हिरण्यगर्भहै, क्योंकि "मनोमयोऽयं पुरुष, इत्यादि श्रुतिभ्यः” व्यहपुरुष मनोमयहै, इत्यादि श्रुतिके प्रमाणकरके । मनजोहै सो लिंगरूपहे, अरु इस मनविपे स्थितहोनेसे तेजस अरु हिरण्यगर्भ की एकतायुक्तहै । ननु, [अव प्राणके पूर्वोक्त अव्याकृतपनेके अर्थ वादी आक्षेपकरताहै। यहां यहअर्थ है कि सुषुप्तिविपे प्राण जोहे सोनाम अरु रूपकरके व्याकृत (स्पष्टं) युक्त है, क्योंकि तिसप्राण के व्यापारको सोयेहुये पुरुपकेपास वैठेहुये मनुष्योंकरके अतिशय स्पष्ट देखतहे ताते] सोयेहुये पुरुषकेपास बैठे हुये जनोंकरके प्राण केव्यापारको स्पष्टदेखनेसे सुपुप्तिविपे जो प्राणहै सोनामअरुरूप करकेव्याकृत कहिये स्पष्टहै । अरु श्रुतिधिपे,करणजोहैं सो उसके प्राणरूपहोते हैं, इसप्रकारकहाहै,एतदर्थभीतिसप्राणकीव्याकृत- ताही सिद्ध होतीहै।ताते । पाणकेअर्थ तुमने कहीजो । अव्या- कृततासा कैसे संभवेगी, इसपकार वादीकी शंकाहै । तहां क- - हतेहैं, यह जिो तूनेकहा सो दोपनहीं, क्योंकि अव्याकृतको देश अरु कालकूत परिच्छेदका अभाव है ताते। अरु जैसे देशकालरुत परिच्छेदसे रहित अव्याकृत कहिये मायाहे, तैसेही सुपुप्तिवान् पुरुपकी रष्टिसेप्राणभी देशकालकेकिये परिच्छेदसे रहितहै। एत- दर्थ सुषुप्तिवान्के पाणकी अरु अव्याकृतकी एकतायुक्त है । अरु जो कदापि परिछिन्न अभिमानवाले पुरुषोंके मध्य यह मेरापूरण है, इसपूकार प्राणके अभिमानकेहये प्राणकी व्याकृतताही सिद्ध होती है । तथापि सप्ति अवस्थाविपपिंड (देह) करके परिच्छिन्न जो विशेप लिसको विषयकरनेवाला जो यह मेरा पाणहै,इस प्रकारका अभिमानहे तिसका निरोध प्राणविपे होताहै, एतदर्य " ८ सो सत् मांडूक्योपनिषद् । ३६ णादि शब्दका वाच्य कहने को इच्छित होय तय "नेतिनेति" कार्यरूप नहीं, अरु कारणरूप भी नहीं , अरु “यतोवाचो निवर्तन्त' जिससे वाणियां निवृत्त होती हैं। अरु "अन्यदेवधि- दितादयोऽविदितादधि" ८ सो विदित (कार्य) से अन्यही है, अरु अविदित (कारण) से भी अन्यही है, इस श्रुतिके प्रमाण से 2 अरु तैसेही “ नसत्तन्नासदुच्यत, इतिस्मृतेः नहीं अरु असत्भी नहीं ऐसा कहतेहें, इस स्मृनिकेभी प्रमाणसे, ब्रह्मको शब्दकी विषयताका निषेध कियाहै, एतदर्थ भी विरोध होवेगा । किम्वा जब निर्वीजरूप होनेसेही ब्रह्म इस प्रकरणविषे कहने को इच्छितहोय तो सुषुप्ति अरु पूलयमें सद्ब्रह्मविपे लीन अरु एकरूपहुये जीवोंके पुनः उत्थान का असंभव होवेगा । अ थवा मोक्षदशा विपे सत्नाको प्राप्तहुये मुक्त पुरुषों की पुनरा. वृत्तिका प्रसग होवेगा । अरु सर्वको अज्ञानरुप चीजके अभावकी तुल्यता, अरु ज्ञानागिसे दाह करने के योग्य चीजके अभाव हुये ज्ञानको व्यर्थताका पूसंग होवेगा । एतदर्थ सर्वश्रुतियोवि वीज सहित ताके अंगीकार सेही सत्व झको प्राणभावका कथन अरु कारणभावका कथन है । अरु इसही करके "अक्षरात्परतः परः" “सवाह्याभ्यन्तरोह्यजः” “यतोवाचोनिवर्तन्ते" "नेतिनेतीत्या- दिना" पररूप अक्षरसे परहे,'बाह्य अन्तर सहित है, जिससे वाणियां निवृत्तहोती हैं, अरु नेतिनेति, इत्यादि अनेक श्रुतियों करके बीज सहित ताके निषेधसे ब्रह्मका कथन है । अरु तिसही प्राज्ञशब्द के वाच्य (नामी) की तुरीयरूपतासे देहादिक संघात के सम्बन्धसे रहित तिस परमार्थ रूपा अवीज अवस्थाको यह श्रुति आगे भिन्न करेगी। अरु "नकिञ्चिदवेदिपमिति” में कुछ भी नहीं जानताहुआइसप्रकार सुपुप्तिसे उत्थानपाये पुरुष के स्मरणको देखते हैं ताते, जीवकी अनस्था भी अनुभव करतेही है"त्रिधादेहेव्यवस्थितःतीनिप्रकारसे देहविपे स्थित हुआ है, अर्थात् उक्तरीतिसे यहजीव उक्त तीनप्रकारकरके देह चिपस्थित मांडूक्योपनिषद् । विश्वोहिस्थूलभुङ्गित्यंतैजसः प्रविविक्तभुक् । अनि न्दभुक्तया प्राज्ञस्त्रिधाभोगनिबोधत ३॥ स्थूलंतर्पयतेविश्वप्रविविक्तन्तुतैजसम् । आनन्द श्चतथाप्राज्ञंत्रिधातृप्तिनिबोधतष्॥ हुआ । अर्थात् अभिमानको फाया वा अभिमानी हुआ है ऐसा कहते हैं २॥ ३॥ हे सौम्य! [इसप्रकार विश्वादि तीनोंकी देहविषे तीनप्र- कारसे स्थितिको प्रतिपादन करके, अव तिनकेही तीनप्रकारके भोगोंको सूचित करते हैं, ] “विश्वोहिस्थूलभुनित्यतेजसःप्र- विविक्तभुक्" विश्व नित्यही स्थूलभुक् है, तेजस प्रविविक्तभुक् है ? अर्थात् । जायदवस्थाका अभिमानी । विश्व नित्यही स्थूल भोगोंका भोक्ताहै । अरु स्विप्नावस्थाका अभिमानी। तेजसा नि- त्यही वासनामय सूक्ष्म भोगों का भोक्ताहै । अरु “आनन्दभुक्त था प्राज्ञस्त्रिधाभोग नियोधत" तैसे प्राज्ञ आनन्दभुक् है तीनप्रकारके भोगों को जानो, अर्थात् । जैसे जायदवस्थाका अभिमानी विश्व स्थूल विषयोंका, अरु स्वभाभिमानी तेजस वासनामयसूक्ष्म भोगोंका, भोक्ताहै । तैसेही सुपुप्ति अवस्थाका अभिमानी प्राज्ञ आनन्दका भोक्ता है, इसरीति से तीनप्रकारके भोगोंकोजानो ३॥ ४॥ हे सौम्य! [अव भोगोंसेहुई जो तृप्ति तिसको तीनप्रकार से विभाग करके देखावेहें ] "स्थूलं तर्पयते विश्वं प्रविविक्तन्तु तेजसम् स्थूलभोग विश्वको तृप्त करेहे, समतो तेजस को तृप्तकरे है, अर्थात् शब्दादि स्थूल विषयभोग विश्वको तृप्तकरता है । अरु जाग्रतकी वासनामय सूक्ष्म : स्वनाभिमानी तेजसको तृप्तकरता है । तैसेही "आनन्दश्चत थापाज्ञविधातृनिनियोधत" तेमेआनन्द पाजको तृप्तकर है। तीनपूकारको तृप्तिको जानो, अर्थात् िजैसे विश्वको स्थूलभोग A .
गौडपादीय कारिका प्रथम प्रकरण १। 'त्रिषुधामसुयोज्यंभोक्तायश्चप्रकीर्तितः । तदेतदु भयंयस्तुसभुजानोनलिप्यते ५ ॥ प्रभवः सर्वभावानांसतामितिविनिश्चयः । सर्च जनयतिप्राणश्चेतोंऽशून्पुरुषःप्टथक् ६ ॥ अरु तैजसको सूक्ष्म भोग तृप्तकरेहै । तैसेहीसिपुप्तिके अभिमानी प्राज्ञको आनन्दरूप भोग तृप्तकरे है, ऐसे तीनपकारकी तृप्तिको जानो ४॥ ५हे सौम्य ! अच [प्रसंग विषे प्राप्त भोक्ता अरु भोग्य, इन उभय पदार्थों के ज्ञानके मध्यके फलको कहते हैं ] f त्रिपुधामसु यद्भोज्यं भोक्तायश्चपूकीर्तितः तीन धामविपे जो भोज्य, अरु जो भोक्ताकहे हैं । अर्थात् जागदादि तीनों स्थानों विपे जो 'स्थूल, सूक्ष्म, अरु आनन्द, नामवाला एकही तीनपूकारका हुआ भोज्यहै, अरु विश्व तेजस अरु प्राज्ञ, इन नामवाला “ सोहमि- ति" सोमहों, इस एकताके अनुसंधानसे, अरु द्रष्टापन के अविशेषसे एकही भोक्ताकहा है। अरु । तदैतदुभयंयस्तुसभुजा- नोनलिप्यते। जो इन दोनोंको जानता है सो भोक्ताहुआ भी लिप्त होतानहीं, अर्थात् जो भोज्य अरु भोलापनेकरके अनेक पूकारके भेदवालेहुये इन ( भोज्य अरु भोक्ता । दोनोंको जानता है सो भोक्ताहुआ भी लिप्त होता नहीं, क्योंकि सर्व भोग्य एकही भोक्ताका भोग्य (भोगने योग्य) है ताते।अरु जिसकाजोविषय है सो तिस विषयकरके घटता नहीं, अरु वढ़ता भी नहीं जैसे अग्नि कासादिरूप अपने विषयको दग्ध वा भस्म करके घटता नहीं, वा बढ़ता नहीं, तैसे ५ ॥ ६ हे सौम्य![पूर्व "एप योनिः" यहयोनि (कारण) है,इस पष्टमन्त्रविषे प्राज्ञको प्रपंचकाकारणपना पूतिज्ञाकियाहै।तहांसत् कार्यके प्रतिपाज्ञको कारणपना है, वा असत्कार्यके पूति कारण- पनाहै, । इस संशयकेहुये तिसका निहार करनेकों अब आरम्भ ६ मांडूक्योपनिषद् । वरते हैं, 1 " प्रभवःसर्वभावनांसतामितिविनिश्चयः । सर्वर्जन यतिपाणश्चेतोऽशून पुरुपःपृथक् । विद्यमान सर्वपदार्थों की उत्पत्ति होती है, यह निश्चय है। प्राणरूप पुरुष सर्व चैतन्य के अंशोंको पृथक् २ उपजावताहै । अर्थात् विद्यमान पदार्थों की उत्पत्तिका निश्चय है, याते पाणरूप पुरुष सर्व जगत् को अरु चिदा सरूप चैतन्यकेअंश (जीवों) को पृथक् २ उपजावताहे ॥ [ननु सवरूप पदार्थों को सतरूप होनेसेही तिनकी उत्पत्ति असम्भव है, क्योंकि सत्रूप ब्रह्मविपे अति प्रसङ्ग होताहै तात, । यह आशङ्काकरके श्लोकके पूर्वार्द्धका व्याख्यान करते हैं । यहाँ यह अर्थहै कि अपने अधिष्ठानरूपसे ही विद्यमान (सतरूप) पदार्थों काही अविद्याकृत मिथ्या आरोपित स्वरूप है, तिसकरके उत्पत्तिरूप संसार होये है ] अपने अधिष्ठान रूपसे विद्यमान 'विश्व तैजस, अरु पाज्ञरूप भेद वाले सर्व पदार्थोंकी अविद्या रचित नामरूपमय मिथ्यास्वरूप से उत्पत्ति रूप संसारहोताहै। अरु जिसको वंध्यापुत्रकहतेहें सोयथार्थ (सत्य)रूपसे वा मिथ्या रूपसेभी जन्मतानहीं, इसप्रकार आगेकथनकरेंगे । अरु जो अस. पदार्थकाही जन्महोय, तो व्यवहारकरने (जानने) जोनम तिसके ग्रहणविषे द्वाररूप लिंगके अभावसे असत्पनेका प्रसंग होवेगा । अरु अविद्यारचित मिथ्या वीजसे उत्पन्न हुये रज्जुसर्पा- दिकोका रज्जुआदिक [अविष्ठान ] रूप से सद्भाव देखाहे । अरु किसीभी पुरुपने अधिष्ठान(आश्रय)रहित रज्जुसर्प अरु मरुस्थल जलआदिक कहींभी देखेनहीं। अर्थात रज्जु मरुस्थल, शुक्तया. दिरूप, आश्रयविना 'सर्प जल, रजतादिरूप भ्रान्ति होवे नहीं। 'अरुजेसे रज्जुविपे सोत्पत्तिसे पूर्व रज्जुरूपसे सर्पसत्यही होता है। अर्थात जिस अधिटानविपे जो अभ्यस्त होता है सो अपने अधिष्ठानकी सत्यतासे सत्यरूप होताहे,क्योंकि अधिष्ठान कल्पित होतानहीं । तेसेही सर्व पदार्थाका अपनी उत्पत्तिसे पूर्व प्राण- मय चीजरूपसेही सद्भाव है। एनदर्थ "नाम" " आत्मवेदमन - . गौडपादीय कारिका प्रथम प्रकरण १। ४३ विभूतिप्रसवन्त्वन्येमन्यन्तेसृष्टिचिन्तकाः, । स्वप्न मायास्वरूपेतिमृष्टिरंन्यर्विकल्पिता ७॥ ३.. आसीदित्यादि" ब्रह्मही यहहै,आत्माही यह आगेथा? इसपकार श्रुतियां भी कहती हैं । इसप्रकार प्राण वीजरूप व्यवहारकी यो- ग्यतासेसर्व अचेतन (जड़)रूपजगत्को उपजावताहै । अरु सर्यके किरणोंवत् चैतन्यरूप पुरुपके चैतन्यरूप, अरु जलगत सूर्यके प्रितिविम्बके समान 'प्राज्ञ, तेजस,अरु विश्व, भेदसे 'देव,मनुष्य, तिर्यकादिक, देहके भेदोंबिपे भासमान जो चैतन्यके किरणोंवत् चेतनके अंशरूपजीव हैं, तिन विषयभावसे विलक्षण, अरु अग्निके विस्फुलिंगवत्, अरु जलगत सूर्यवत् चैतन्यके लक्षणसहित जीव रूप अन्यसर्व पदार्थोको प्राण वीजरूप पुरुप उपजावताहै “यथो- र्णनाभिस्सृज्यते” “यथाग्नेविस्फुलिंगाःसहस्रशः" जैसे ऊर्जनाभी (मकड़ीआदिक जन्तुविशेष) से तन्तु (जाला), अरु अग्निसे चिनगारे, होतेहैं, तो। इत्यादि श्रुतिप्रमाणसे ६ ॥ है.सौम्य! [अब जड़ चेतनरूप जगत्की उत्पत्तिको प्रसंगाव प्राप्तहुये अपने मतके विवेचनार्थ अन्यमतके कहने का प्रारंभ करते "] "विभूति जसवन्दन्ये मन्यन्तेस्मृष्टिचिन्तका अन्य सृष्टिके चिन्तनकरनेवाले विभूतिकी उत्पत्तिको मानते हैं, अर्थात् विद- मतावलम्बियोंसे । अन्य जे सृष्टिकेचिन्तक (कहनेवाले ) हैं, सों ईश्वरकी अपने ऐश्चर्यमय विस्ताररूप विभूतिकी उत्पत्तिको स- पिरिति” सृष्टि है, ऐसा मानते हैं। परमापके चिन्तनकरने वाले तत्ववेत्तोंका तो सृष्टिविपे आदर है नहीं, क्योंकि “इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयत इत्यादि" इन्द्र (परमात्मा) मायाकरके बहुरूप प्रतीतहोताहै इत्यादि श्रुतिके प्रमाणसे।अरुजैसेमाया का रचनेवाला मायावी पुरुषहै सो सूत्रके आकाश विपे फेकके पुरुप तिस सूत्रके आश्रय खड्गादि आयुधसहित युद्धार्थ चढ़के अदृश्यहुआ युद्धमें खंड खंडहोय पतनहुमा पुनः T पुन-वो मायावी गौडपादीय कारिका प्रथम प्रकरण १ । भोगार्थसष्टिरित्यन्येक्रीडामितिचापरे । देवस्यैष स्वभावोऽयमाप्तकामस्यकांस्टहा ६ ॥ क्योंकि ईश्वर सत्यसंकल्पहे ताते, जैसे घटादिरूप जो सृष्टिहै सो कुलालका | संकल्पमात्रहीं है, संकल्पसे इतर घटादि कुछ भी नहीं ॥ अरु | कालात्पूसूर्तिभूतानांमन्यन्तेकालचिन्तकाः। कालके चिन्तन करनेवाले कालकरकेही भूतोंकी उत्पत्ति मा- नते हैं अर्थात् कोई एकजे कालकें चिन्तन करनेवाले ज्योतिप- शास्त्रके वेत्ता हैं सो कालसेही जगदुत्पत्तिको मानते हैं । । अरु कहते हैं कि जब सृष्टिकी उत्पत्तिका काल आवताहै तब उत्पत्ति, अरु प्रलयका काल आवता है तब प्रलय होताहै। ॥ ६. हे सौम्य! भोगार्थसृष्टिरित्यन्येक्रीडार्थमितिचाप अन्य भोगार्थ सृष्टिहै ऐसे, अरु अन्य क्रीडार्थ है ऐसे, मानते हैं अर्थात् उक्त वादियों से अन्यवादी कहते हैं कि यह साष्टि भोगके अर्थहै। अरु उनसे अन्यबादी कहते हैं कि यह सृष्टि क्रीड़ाके अर्थ है । अ- न्यार्थनहीं। अव सिद्धान्तको कहते हैं। देवस्यैपस्वभावोऽयमाप्त कामस्यकास्पृहा। यहदेवका स्वभावहे, पूर्णकामको कौनइच्छा है अर्थात् यहसृष्टि स्वियंप्रकाशा परमेश्वरका स्वभावहे, उस पूर्ण कामदेवको कौन इच्छाहै किन्तु कोईभी नहीं । अर्थात् यावत् कार्यकारणात्मक स्थूल सूक्ष्मनामरूप सृष्टिहै सो सर्व उसपरिपूर्ण देवके आश्रय उसहीविषे उससे अनन्य है तब इच्छा किसकी होय, किन्तु किसीकीभी नहीं अरुइच्छा जोहोतीहै सोअपनेसे अन्य- प्राप्तवस्तुविपे होतीहै,सोउस एक परमात्मदेवते अन्य अरु अप्राप्त वस्तु कुछभी नहीं] यहां स्वभाव जो कहा,सो क्याहै । इसप्रकार पूछे हुये स्वाभाविक अपरोक्ष जो मायाशब्दका अर्थ, तिसकानाम स्वभावहै, इसप्रकार कहतेहें] 'यहां स्वभाव पक्षका आश्रयकरके उक्त दोनों पक्षोविपे अथवा सर्व पक्षाविप दूषणकहा, असे [पूर्व आठवें श्लोकविषे जो "कालात्प्रसूर्तिभूतानिमन्यन्ते" काल से मांडूक्योपनिषद् । भूतोंकी उत्पत्ति मानते हैं इसप्रकार कंहाहै, तहां कहते हैं। यहां यह अर्थहै कि जैसे अधिष्ठानभूत रज्जुआदिकों के स्वभावरूप अपने अज्ञानसेही सादिकोंकाआभासपनाह, तैसेही परमात्माको अप- नीमायाशक्तिके वशते आकाशादिकोंका आभासपनाहै "एतस्मात् आत्मनःआकाशःसंभूतः आत्माले आकाश होताहुआइसश्रुति केप्रमाणसे। परन्तु कालको भूतोंका कारणपना नहीं क्योंकि तिस विपे श्रुतिके प्रमाणकाअभावहै] रज्जुआदिकोंको अविद्यारूप स्व: भावविना सादिक आकारके भासने विपे कारणपना कहनेको 'अशक्य । तसेहीपरमात्माको मायारूप स्वभावविना आकांशादि रूपाकारसे भासनेविपे कारणपना कहनेको शक्य नहीं है, उपनिपदर्थ। हे सौम्या अंकारके तीनपादोंकी व्याख्याकरनेसे, व्याख्या करनेके योग्यहोनेसे क्रमके वशते प्राप्तहुये चतुर्थपादकी व्याख्या करनेको आग्रिम ग्रन्यकी प्रवृत्तिहै] अवक्रमसे प्राप्तहुआ जो चतु- थपाद सो कहने (व्यास्याकरने) को योग्यहै । एतदर्थ यह उप- निषद् कहतेहैं निान्तःप्रज्ञ, नवहिःप्रज्ञ, नोभयतःप्रज्ञ, न प्रज्ञान धनं, नप्रज्ञ, नाप्रज्ञम् अन्तःप्रज्ञ नहीं, बहिःप्रज्ञ नहीं, उभयतः प्रज्ञ नहीं, प्रज्ञानधन नहीं, प्रज्ञ नहीं, अप्रज्ञ नहीं, अर्थात । जो निर्विशेष निरूपाधि सर्वकासाक्षी प्रत्यगात्सा है सो । अन्तःप्रज्ञ फहिये भीतरकी प्रज्ञावाला तिजसा सोभी नहीं। अरु बहिःप्रज्ञ कहियेवाहरकीप्रज्ञावाला विश्यांसोभीनहीं । अरु उभयतःप्रज्ञक- हिये उभयओरके प्रज्ञावाला, सोभीनहीं। अरुणज्ञानधन किदिये, अन्तर बाहाके भेद रहित धनप्रज्ञावाला प्राज्ञ । सोमी नहीं। अरु प्रजभी नहीं । अरु अष्टमव्यवहार्य्यमयाधमलक्षणमचिन्य मव्यपदेश्यमेशात्म्यप्रत्ययसारं प्रपंचोपशमंशान्तंशिवमवेतचतुर्थ मन्यन्ते सआत्मा सविज्ञेयः । अष्टहै, अव्यवहार है, अमान्य है, अलक्षणहै, अचिन्त्य है, अव्यपदेश्यह, एकताके ज्ञानकासार हे प्रपंचके उपामवालाहे, शान्तहे, शिवहे, अद्वेतह, चतुर्थ है , . गौडपादीय कारिका प्रथम प्रकरण १ । उपनिषद् ॥ नान्तः प्रज्ञंनबहिःप्रज्ञं नोभयतः प्रज्ञंनप्रज्ञानघनं न प्रज्ञनाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचि न्त्यमव्यपदेश्यमेकात्म्यप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमंशान्त शिवमद्वैतंचतुर्थमन्यन्तेसआत्मासविज्ञेयः ७॥ 'ऐसा, मानतेहै, सो आत्माहै, सो जाननेके योग्यहै अर्थात् नि- रुपाधि निर्विशेप सर्वाधिष्ठान सर्वका साक्षीशुद्ध आत्मा 'नेत्रमा वा ज्ञानका विषय न होनेसे 'अष्टहै । अरु ज्ञानेन्द्रियोंका विषय न होनेसे 'अव्यवहार्य है, । अरु कर्मेन्द्रियोंका अविपय होने से वा उसको कर्माका फलरूप न होनेसे वो अग्राह्य है। अरु प्रति- योगिता वा सापेक्षताके अभाषसे वो 'अलक्षणहै,। अरु अन्तः- करणका अविपयहोनेसे वो 'अचिन्त्यहै, । अरु वाणीवा शब्दादि प्रमाणोंका अविपयहोनेसे वो उपदेशकरनेके योग्य नहीं,ताते सो 'अव्यपदेश्यहै, । तथाच “ नविद्योनविजानीमोयथैतदनुशिष्या त् ,, इत्यादि श्रुतिप्रमाणसे ॥ इसपूकार निषेधमुखकहके अव विधिमुख कहते हैं । वो आत्मा एकताके प्रत्यय ज्ञानका सारहै. "प्रतिबोध विदितं' अरु उसके सम्यक् ज्ञानसे समूल द्वैतरूप पूपंच (जगत् ) का अत्यन्ताभाव होताहै ताते वो प्रपंचके उप- शम वालाहै । अरु अन्तःकरणके मनआदिकोंकेसंकल्पादिकावंत क्षोभसे रहित परमशान्त है । अरु परमानन्दमय होनेसे शिव है। अरु सर्वत्रपूर्ण अखंड अनन्त निराश्रय होनेसे अद्वैत है। अर्थात् 'अदृष्ट, अव्यवहार, अग्राह्य, अलक्षण, अचिन्त्य, उपदेश के अयोग्य, । एकताके ज्ञानकासार,प्रपंचके उपशमवाला,शान्त, शिव, अद्वैत, । इसप्रकारकाजो पदार्थ हे तिसको चतुर्थपाद करके मानते हैं । अर्थात् जिसको उक्तप्रकार निषेधमुखसे कहीं सो किसीभी संस्थामे वडनहीं, परन्तु उसको जो चतुर्थपाद करके मांडूक्योपनिषद् । कहाहै सो पूर्वोक्त तीनपादोंकी अपेक्षासे है, नतु वास्तव करके उस निर्विशेष तत्त्व विषे संख्या अरु पादपना कोई भी नहीं। अरु सोई एक निर्विशेष चिन्मात्रतत्त्व जायदादि स्थानरूप उपाधि रहित निरुपाधि परमशुद्ध सर्वका प्रत्यगात्मा है, अरु सोई मुमुक्षु जिज्ञासुजनों करके जानने योग्यहै ॥ हे प्रियदर्शन! यहां "नान्तः प्रशं” (अन्तःप्रज्ञनहीं) इत्यादि पदोंसे यह श्रुति 'सर्व शब्दोंकी प्रवृत्तिके निमित्तसे शन्य (रहित) होनेसे उस आत्माको शव्दकी विषयताहोगी अर्थात् तत्व में शब्दकीप्रवृत्ति का निमित्त विशेषताहै, निर्विशेष तत्त्वमें निमित्तके अभाव से शब्दकी प्रवृत्तिवने नहीं, अरु उस निर्विशेषको विधिमुख कहनेसे शब्दकी विषयता होतीहै ताते। इस अिन्तः प्रज्ञतादि रूप। विशेषके निषेधसेही निर्विशेष। तुरीयपादको कहनेकी इच्छा करती है ॥ ननु, तब सो तुरीय शून्यही होवेगा, इिसप्रकारके जो वादीका कथन सो घने नहीं, क्योंकि मिथ्या विकल्पको शब्दप्रवृत्तिके निमित्तसे रहितपनेका असंभवहे ताते, अरु जिस करके जो रजत, सर्प, पुरुप, अरु मृगतृष्णाकाजल, इत्यादि विकल्प हैं, सो 'सीपि, रज्जु, स्थाणु अरु ऊपरभूमि, इत्यादि- कोंसे इतर होनेसे अवस्तुपनेके आश्रयहुये कल्पना करने को शक्य नहीं । अर्थात् रज्जु शुक्तिकादिकों विपे जो सर्प रजतादि विकल्पफल्पनाहै सो रज्जुशुक्ति आदिकोंकेही आश्रय है क्योंकि निराश्रय कल्पना होती नहीं, अरु जो रज्जु शुक्ति आदिकों से भिन्न सर्प रजतादिकोंका विकल्प करना इच्छिये तो उन कल्पित होनहार सर्प रजतादिकों को अवस्तुपनेके आश्रयहोनेसे सो कल्पनाकरनेको शक्य होतेनहीं। अरु निराश्रय विकल्पकल्पना होवे नहीं, यह अनिवार्य सिद्धान्तहै। एतदर्थ तिन विश्वतेजसा. दिक,का विधिमुख निषेधमुख, वा अस्तिनास्ति, वाशुन्यअशून्य, आदिक विकल्पों । का अधिधानरुप तुरीय शून्यसे विलक्षण सत्रूपकरके माननाचाहिये क्यिोंकि शून्यहे, इसविकल्पकल्पना . गौडपादीय कारिका प्रथम प्रकरण १ । ४६ का आश्रय अधिष्ठान शून्य से विलक्षण किसी भी तत्व को सत् है, ऐसा न मानने से अवस्तुपने के आश्रयतेरा शून्य है, यह वि- कल्प होनेको अशक्य है। ननु, जब इसप्रकार है, तव प्राणा. दिक सर्व विकल्पों को आश्रय होने से तुरीया को 'जलादिकों का आश्रय घटादिकोंवत् , शब्दकी वाच्यता निामका नामीपना वा शब्दकी विषयता । होगी, निषेधों से प्रतीत करावने की योग्यता न होगी । अर्थात् निर्विशेष तुरीया को प्राणादि विकल्पों का आश्रय अधिष्टान होने से शब्द की, वाच्यता प्राप्त होगी, अरु तैसे हुये “ नान्तःप्रज्ञं ” इत्यादि निषेध मुख वाक्यों से जो उसकी निर्विशेषता से प्रतीति है तिस की यो- ग्या न होगी। इस प्रकारका जो वादीका कथन । सो कथन बने नहीं, क्योंकि 'शुक्ति आदिकों विषे रजतादिवत् , प्राणादि वि. कल्पको किल्पित होनेसे असत्यपना है ताते । अरु असत्यको शब्द की प्रवृत्ति के निमित्तवाला अवस्तुरूप होने से विो केवल वाचारंभा (कहने)मात्रही हैं, एतदर्थ उन का किया निर्विशेष तुरीयाविषे वाचकाना भी वाचाग्भण मात्रही है । सत् अरु अ- सत्वस्तुका सम्बन्ध है नहीं। अरु आत्माको स्वरूपसे गी आदि- कोंवत् अन्य प्रत्यक्षादि प्रमाणों की विषयताभी नहीं । अरु पाच- कादिकोंवत् क्रियावान्पना भी नहीं । अरु नील पीत घटादिका वत् गुणवान्पना भी नहीं क्योंकि निराकार है तातेविक- ल्प क्या कल्पित अविधानपना हेतु किया है, या वास्तविक अधिष्ठानपना हेतुकिया है, तहां जो प्रथमपक्ष । कहो कि 'क- ल्पित अधिटानपना हेतु किया है, तो सो कहना | धने नहीं। क्योंकि तिस कल्पित अधिष्टानपने को वास्तविक घाच्यताका असाधकपना हे ताते, अरु वास्तविक वाच्यतापने विपे क्रमका विरोध है नहीं। अरु जो, द्वितीयपक्ष किहो कि वास्तविक अ. विष्ठानपना हेत किया है, तो सोभी बने नहीं। क्योंकि, शुकि आदिकोविये कल्पित रजनादिकों को अवस्तु होने पनेवत्, तुरी- क . माडूक्योपनिषद् । यावि भी कल्पित प्राणादिकोंको अवस्तुरूप होने से,तिसप्रति योगीवाले अधिष्ठानपने को वास्तविकता की अयोग्यता है ताते अर्थात् वास्तविक अधिष्ठान तुरीया विपे अध्यस्त ( कल्पित.) प्राणादिकों को अवस्तुपना होने से उस तुरीयांका अधिष्ठानपनी अवस्तुपने का प्रतियोगी होनेसे वास्तविकपने के योग्यनहीं। इंसमकार सिद्धांति दूपण कहता है, एतदर्थ आत्मा । शाब्दि आदिक प्रमाणों का अविपय होने से शब्द से कहने के योग्य नहीं शंका । ननु, तब आत्मा को शशशृंगादिकों के तुल्यहोनेसे असत्पना प्राप्तहोवेगा, । समाधान । यह कहना वनेनहीं, क्योंकि शुक्ति के ज्ञानहुये रजतेकी तृष्णाकी निवृत्ति होनेवत् तुरीया के सर्वात्मभाव से ज्ञान हुये, तिसज्ञान को अनात्मवस्तुकी तृष्णा की निवृत्ति का हेतुहोने से, अरु तुरीयाके स्वात्मभावसे ज्ञानहुये का- रण । अविद्या अरु | तिसकाकार्य तृष्णादिकदोपतिनका संभव होना हैनहीं। अरु तुरीया के आत्मभावके ज्ञानविपे हेतुका अ. भाव भी नहीं, क्योंकि " तत्त्वमसि " सो तहै । "तत्सत्यम् " "अयमात्मात्रा” “सआत्मायत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म ।। "सावाह्या- भ्यन्तरोह्यजः" "आत्मैवेदसर्व" सो सत्यहै । यह आत्मा ब्रह्म है। सो आत्मा है जो साक्षात् परोक्षवहा है। वाहर अन्तर सहित अजन्माहै । आत्माही यह सर्व है. इत्यादि श्रुतिवाक्यों से सर्व उपनिपदों को तिसही प्रयोजनार्थ होनेकरके परिसमाप्त होनेसे । सो [ इसप्रकार निषेध मुखसेही तुरीयाका प्रतिपादन है, विधि मुखसे नहीं, इसप्रकार प्रतिपादन करके, अव कहे हुये अर्थ के अनुवाद पूर्वक अग्रिम कहने के अर्थ को प्रकटकरते हैं ] यह आ. स्मा परमार्थ रूपसे चारपदों वाला है इसप्रकार पूर्व द्वितीयमंत्र करके कहाथा, तिसके अपरमार्थरूप अविद्यारचित रज्जुसदि- को के तुल्य वीज अरु अंकुरस्थानी तीनपादोंका लक्षण पूर्वकहा। अब इस मन्त्र थिपे अविजात्मक परमार्थ स्वरूप रज्जुस्थानीय चतुर्थपादको "नान्तःप्रज्ञ" अन्तःप्रज्ञनहीं इत्यादिरूप वाक्यसे ५.९. । गौडपादीय कारिकाप्रथम प्रकरण १ । सर्पस्थानीय जाग्रदादि तीनोंस्थानों के निराकरणसे कहते हैं। शंका ननु, आत्मा के चारपाद करके युक्तपनेकी प्रतिज्ञा करके पादत्रयके कथनसेही चतुर्थ पादकीअन्तःप्रज्ञआदिक तीनपादोंसे: पृथक् सिद्धिसे नान्तःप्रशं"-८ अन्तःप्रजनहीं? इत्यादि निषेध अनर्थक (व्यर्थ) होगा, इसप्रकार जोवादीका कथना सो कथनः घनेनहीं; क्योंकि सादिरूप विकल्प के निषेधसेही रज्जुके स्वरूप. के निश्चयवत्तीन अवस्थावाले आत्माकोही तुरीयरूप होने से "तत्त्वमसि' सोतूहै? इसवाक्यवत् । अरु [ननु, जाग्रदादि तीन अवस्था करके विशिष्ट आत्माको तुरीयत्व नहीं, क्योंकि तुरीयको विशिष्ट से विलक्षण होने करके उिस विशिष्टसे अत्यन्त पृथक्ताहै एतदर्थ उस विशिष्ट आत्माका तुरीयपना अग्रिमकहनेकेंथकरके कैसे प्रतिपादन करतेही; इसप्रकारकी जहां वादीकी शंकाहै तहां कहते हैं। यहां यह अर्थ हे कि, तुरीयाकी प्रातिभासिकसे विलक्षण; ताके हुये भी विशिष्ट अरु उपलक्षित । अर्थात् विशेपण अरु उप- लक्षणवाले आत्माकी अत्यन्त. विलक्षणता न होनेसे, तुरीया का विशिष्टसे वास्तवकरके भिन्नपनाहै नही, अरु अन्यथा अत्यन्त भिन्न अरु: परस्परके सम्बन्ध रहित, होनेसे; इन । विशिष्ट अरु अविशिष्ट दोनों के उपाय (साधन ) अरु उपेय (साध्य) भावकी अयोग्यतासे, तुरीयके ज्ञानविये विशिष्ट आत्मा कोद्वार (कारण) होनेके अभावहोने से, अरु: तिस (तुरीया) के ज्ञानके द्वाररुप अन्यवस्तु के अदर्शन होने से, तुरीयाका-अनिश्चयही होवेगा: जव तीन अवस्थावाले आत्मासे विलक्षण अन्य तुरीया होय, तव तिसके अस्तित्व के निश्चय होने के द्वारके अभावसे शास्त्रका उपदेश अनर्थक (व्यर्थ ) होवेगा, अथवा शन्यता प्रातहोवेगी। जैसे:यहां यह अर्थहै कि विशिष्टकेही निश्चय से तुरीयाका अः निश्चय होनेसे, निश्चित हुये जे विश्वादिक विशिष्ट आत्मा ति- नका उलटा उदय होवेगा, अरु वास्तवसे अन्य (तुरीया).को अनिश्चित होनेसे निरात्मकताकीही वुद्धि प्राप्तहोवेगी, अधिष्ठान मांडूक्योपनिषद् । रज्जु । अभ्यस्त । सर्पादिकों से भेदको पावनी है, तैसेही जब तीनोंस्थानों विपेभी एकही आत्मा अन्तःप्रज्ञत्रादिकोंसे भेदको प्राप्तहोताहे, तब अन्तःप्रजवादिपने के निषेधके ज्ञानरूप प्रमाण के सम कालही आत्माविषे अनर्थरूप प्रपंचकी निवृत्तिरूप फल परिसमाप्तहोवे है। जैसे [ सम्बन्धीके परोक्षज्ञानके हेतु शब्दको असम्बन्धीके अपरोक्षज्ञानकी हेतुताका असंभव होनेसे, तुरीयाके ज्ञानविषे अन्य प्रमाण मानना चाहिये, इस पक्षके । कहने वाले के प्रति कहते हैं। यहां यह अर्थहै कि तुरीयाके साक्षात्कारविषे शब्दसे इतर प्रमाण खोजने के योग्य नहीं, क्योंकि शव्दको विषय के अनुसार हानेसे प्रमाणका हेतुपना है ताते, अरु तुरीय रूप विषय को सम्बन्धरहित अपरोक्ष रुपता ताते, ] रज्जु अरु सर्प के विवेकहोनेके समकालमें (साथही) रज्जु विषे सर्पकी निवृत्ति रूप फलके हुये, रज्जुके ज्ञानका अन्य फल वा अन्य प्रमाण वा अन्य साधन, अन्वेषण करनेको योग्य नहीं । तैसेही तुरीया के ज्ञानहुये । तिसज्ञानसे । अन्य प्रमाण वा साधन अन्चेपणकरना योग्य नहीं। पुनः [ विषयगत प्रकटपना प्रमाणका फलहै, अ- ध्यस्त (कल्पित) की निवृत्ति प्रमाणा फलनहीं, यह आशंका करके कहते हैं, यहां यह भावहै कि अपने विषयके अज्ञान निवा- रणार्थ प्रवृत्ति हुई जो प्रमाणकी क्रिया सो अपने विषयविपेस- भावरूप अतिशयताको जब धारण करे है, तव निवारणरूप अर्थ की तुल्यतासे । छेदनरूप क्रिया भी छेदनकरने योग्य काष्ठ के संयोगके निवारणसे पृथक् अतिशयको धारण करेगी। अरु संयोग के विनाशसे इतर विभागविपे अनुभव है नही । अरु प्रकटता के प्रकाशपने के हुये ज्ञानवत् जिसे शब्दके अर्थविज्ञानस्थित होवे हे तैसे अर्थ विपे स्थितपना न होगा । अरु अप्रकाशपनेके हुये अर्थविपे स्थितपनाहोवेगा, तिस हेतुसे अर्थकेविना अर्थ नहीं है, जिनके मतविषे अन्धकारके अभावकरने बिना घटादिकों के ज्ञान चिपे प्रमाण प्रपर्त होताहे, निनके मतमें छेदनकरने योग्य वृक्षके , गौडपादीय कारिका प्रथम प्रकरण ।। ५३ अवयवके सम्बन्ध वियोग किया विनाहीं दोनों अवयवों में से एक अवयव विषेभी छेदनरूपकिया प्रवर्त्तहोतीहै,इसप्रकारकहना होवेगा। [अज्ञानका निवर्तक ही प्रमाणहै, इसपक्ष में विषय के स्फुरणविषे कारणके अभावसे विषयका स्फुरणं न होगा, यह आशङ्काकरके कहतेहैं। यहांयह अर्थ है कि अन्धकारसे आवृतहुआ घट व्यवहारके योग्य स्थित होता है, तिसको अन्धकार से वाह्य करने तिसकी व्यवहारकी योग्यताके सम्पादनविपे प्रत्यक्षादिक प्रमाण प्रवृत्त होते हैं, सोप्रमाण जवग्रहण करनेको अनिच्छित अरु प्रमाणज्ञान(प्रमाणजन्यज्ञान) के अविपय अन्धकारकीनिवृत्ति रूपं फलविपे स्थितहोवे, तव घटको स्फुरणरूप प्रयोजनवाला प्रमाणका फल होताहै। जैसे छेदनरूप जो किया है:सो,छेदने करनेयोग्य वृक्षके दोनों अवयवोंके परस्परके संयोगके निवारण विपे प्रवृत्तहुई उस छेदनकरने योग्य वृक्षके दोनों शिावारूप- अवयवोंके द्विधाभाव (होने) रूपफलविपस्थित होतीहै, परन्तु वृक्षके दोनों अवयवों में से एक भी अवयंविषेभी छेदनरूपक्रिया प्रवृत्ति होती नहीं। तैसेहीयहांभी अन्धकारकी निवृत्तिविषे.प्रमाण निवृत्ति होवे है, परन्तु घटका स्फुरणतो तिसका फलहै ।अरु तिस प्रमाणको स्थिरपना नहीं, क्योंकि प्रकाशक प्रमाताके व्यापार को अस्थिरताहै ताते;] अरुजवपुनःछेदनकरने योग्य वृक्षके अवयवक दोभाग करने चिाहोने रूपफलविप अन्तविपे छेदनरूप क्रिया किजिससे दोभाग होताहेतिसअन्तवालीक्रियावत् घट अरु अ- न्धकारके विवेक के करने विपे प्रवृत्तहुआ जो प्रमाणसो तो ग्रहण करने कोअनिच्छित, अरु अविषयरूप अन्धकारकी निवृत्तिरूप फ- लबिपे अन्तवाला होताहै, तब अन्तरायवाले (तमच्छिन्न)घटका ज्ञानहै नहीं, इससे सोप्रमाणका फलनहीं तैसे[किंवाघटादिक जड़ोंको संवित् (चैतन्य) की अपेक्षावाला होनेसे, तिसविपे संवित् को प्रमाणकी फलरूपता होनेसे भी एक संवितरूप अजई आत्मा विमनमें आरोपितधर्मकीनिवर्तकताके बिना संवित्तीजनकता ५४ . ज * मांडूक्योपनिपेद् । रुपयांपार.संभवे नहीं,इसप्रकार कहतेहैं,यहांयह अर्थहै कि तुरीय रूप.आत्माविषे प्रमाणको संवेदनका.जननरूप व्यापार:कल्पते नहीं, क्योंकि, यह तुरीय संवित् (चैतन्य) रूपहै ताते, अरु आरों पितकी निवृत्तिके विना प्रमाणजन्य फलरूपसंवितकी अपेक्षा काअभावहै ताते, आत्माविपे आरोपित अन्तःप्रज्ञपने आदिकों के विवेकके करनेवि प्रवृत्तहुये निषेधके ज्ञानरूप प्रमाणकाग्रहण करनेको अनिच्छित जे अन्तःप्रज्ञपनादिक तिसकी निवृत्ति के विना तुरीयविपे व्यापारका सम्भव नहीं, क्योंकि अन्तःप्रज्ञपने आदिकोंकी निवृत्तिके समकालही प्रमातापने आदिकाभेदकी निवृत्तिहै ताते, इसप्रकार अग्रिम कहेंगे। तथाच "ज्ञाते द्रुतं न विद्यतइति”जानेहुये द्वैतविद्यमान है नहीं। इसवाक्यप्रमाण से॥ किंवा ज्ञानके आधीन द्वेतकी निवृत्ति करके युक्तक्षणविना अन्यक्षणविषे ज्ञान स्थितहोनेको समर्थ नहीं । अरु अस्थिरहुश्री ज्ञान व्यापारार्थ परिपूर्ण नहीं, अरु तेसे हुये. ज्ञानको द्वैतकी निवृत्तिसे भिन्न आत्माधिपे व्यापारनहीं, इसप्रकार कहतेहैं,] ॥ ज्ञानको भेदकी निवृत्तिरूप फलविनाअन्यक्षणविषे अस्थिरताके हुये, अरु [ननु, ज्ञान जोहे सो द्वैतका निवर्शकहुआ हुआभी अपने स्वरूपको निवर्तकरता नहीं, क्योंकि निवर्त होनेकी योग्य. ताका अरु निवर्तकतारूप धर्मका एकही धर्मीविपे होनेकावि- रोध है ताते । याते यावत् पर्यन्त ज्ञानका निवर्तक अन्यन आवेगा तावत् ज्ञान स्थिर होगा, यह आशङ्का के हुये समाधान कहते हैं। यही यहभाव कि, द्वैतके निवर्तक ज्ञानको द्वेतकी निवृत्तिके अनन्तरं भी अपने अन्य निवर्तक की अपेक्षा करके स्थितंहुये उ. न उन ज्ञानयो अन्य अन्य निवर्तक की अपेक्षावाला होने से प्रा. थर्मज्ञानको भीनिवर्तकरनेकी असिद्धी होवेगी ] ज्ञानके स्थिर हुये अनवस्था प्रसंग होनेसे द्वैतकी अनिवृत्ति होगी। [यहां य- अर्थ है कि ज्ञानको अपने निवर्तकपनेकाअसम्भव नहीं क्योंकि ज्ञानको अपन अरु दूसरेके विरोधी बहुत पदार्थों की प्रतीति है -- गौडपादीय कारिका प्रथमं प्रकरण १ । ५५ है ताते] एतदर्थ निषेधके ज्ञानरूप प्रेमाणकेव्यापरिके समकाल में हीआत्माविषे आरोपितजे अन्तःप्रज्ञतापनादिक अनर्थ तिनकी निवृत्ति होती है, इसप्रकार सिद्धहुआ ॥ अव तात्पर्य सहित मूल श्रुतिका अर्थ कहते हैं । यहाँ " नान्तःप्रज्ञमिति अन्तःप्रज्ञ नहीं इसपद से तैजसका निषेधे किया,"नेवहि प्रजमिति ब. हिः प्रज्ञनहींइसपदसे विश्वका निषेध किया, अरु "नोभयतः प्रज्ञमिति" उभयतः ८ प्रजनहीं। इसपद करके जाग्रत् अरु स्वप्नकी सन्धीरूपमध्य अवस्थाका निषेध किया,अरु "नप्रज्ञान घनमिति" -प्रज्ञानघन नहीं इस पदसे सुपुत्ति अवस्था कानि पेधकिया,क्योंकि सुषुप्तिको वीजभावकी अविवेक रूपताहै ताते, अरु “नप्रज्ञमिति” प्रज्ञनहीं? इस पद करके एककाल विपे सर्व विषयों के ज्ञातापने का निषेध किया, अरु “नाप्रज्ञमिति" अप्रज्ञनहीं इसपद से अचेतनपने का निषेधकिया । शङ्का ननु पुनःआत्माविषे प्रतीयमानजे अन्तःप्रज्ञ आदिकं तिनकारज्जु- दिकों विसपादिकोंवत् निषेध होनेसे असत्पना कैसे जानिये, समाधान तहां कहते हैं। अन्तःप्रज्ञआदिकों के ज्ञानस्वरूप होने विपेअविशेषताके हुये २भीरज्जुआदिकों विपेसर्प जलधारादिको के कल्पित भेदवत् परस्पर असत्पना है । अर्थात् जैसे एकही रज्जुरूप अधिष्ठान विषे अध्यस्त जे 'सर्पदण्ड, जलधारी, सो कल्पित अंरु परस्पर में व्यभिचारी अर्थात जिसकालमें रज्जुविपे सर्पकी प्रतीति है तिसहीकालमें दंड अरु जलधारी की नहीं अरु जिसकाल विषेदण्डकी प्रतीति है.तिसवील चिये सर्प अरु जल- धाराकी प्रतीति नहीं,अरु जिंसकाल में जलधारा की प्रतीति है तिसकाल में सर्प अरु दंडकी प्रतीति नहीं, ताते अधिष्ठान रज्जु से वास्ता करके अपृथक् भी जे कल्पित 'सर्प, दण्ड,जलधारा, सो उक्त प्रकार परस्पर में व्यभिचारी.अरु कल्पित होनेसे असत् है। तैसेही विश्वादिक भी अपने अधिष्ठान से पृथक् सत्तावाले 'नहीं परन्तु परस्पर व्यभिचारी अरु कल्पित होनेसे असत् हैं। । -- N ५६ मांडूक्योपनिषद् ।... अरु रज्जुआदिकोंवत् अव्यभिचारतासे तिनके ज्ञान स्वरूप का सत्यपनाहै |अरु जो ऐसाकहे कि तिनका ज्ञानस्वरुप भी सुपुति विपे व्यभिचारको पावताहै, सो वने नहीं क्योंकि सुप्तिवान् पुरुष अनुभव का विषय है ताते। अरु “नहिविज्ञातुविज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यतइतिश्रुतेः” विज्ञाताकी विज्ञतिका लोपाविद्यमान नहीं, इस श्रुतिके प्रमाण से,अरु जव ऐसा है एतदर्थही "अदृष्टम् अदृष्ट है ? अरु जिसकरके अदृष्ट है, तिसही करके " अव्यव- हार्यम्" अव्यवहार (व्यवहार करने के अयोग्य.) है, अरु अ- व्यवहार होनेसे " अग्राह्य".अग्राह्य (कर्मेन्द्रियोंसे ग्रहण करने के अयोग्य ) है, ताहीते "अलक्षणम् " अलक्षणः कहिये लिंग रहित । अर्थात् अनुमान प्रमाणका अविषय है। अरु जव ऐसाहै तवहीं “अचिन्त्यम् " अचिन्त्य (अन्तःकरण की वृत्तियों का अविषय) है । अरु जिसकरके ऐसा तिसही करके “अव्यप, देश्यम्”, अव्यपदेश्य (शब्दप्रमाणका अविषय होने से उपदेश करने वा कहने के अयोग्य) है । अरु जव ऐसाहै.तय ".एकात्म्य प्रत्ययसारम् एकात्म्य प्रत्ययसारहै, अर्थात् जाग्रदादि अवस्था रूपी स्थानोंदिपे यह आत्मा एकहै, इसप्रकार अव्यभिचारी जो प्रत्यय (ज्ञान.) तिसकरके अनुसरने (विचार वा अनुभव करने) योग्यहै । अथवा जिस तुरीया की प्राप्ति विपे एक आत्मज्ञानरूप ही सार (मुख्यप्रमाण) है, इसप्रकार का सो तुरीया हे आत्मे स्येवोपासीतइतिश्रुतेः" आत्माहे इसप्रकारहीउपसिना करना अिर्थात् आत्माको अस्तिभावसेही निश्चय करना, “ अस्तीत्ये- वोपलब्धव्य" इत्यादि अन्यश्रुतिके प्रमाणसे। इस प्रकार अ. न्तःप्रज्ञत्वादि । भावप्रापक जाग्रदादि । स्थानोंके अभिमानी के धर्म का निषेध किया । अरु "प्रपञ्चोपशममिति" प्रपंच से रहित हैं। इस प्रकार आित्मावि जादादि स्थानों के धर्मको हो । अरु उक्त प्रकारका होने सेही " शान्तम्" यान्त गाई विकार अरु विक्रिया रहित) हे । इसही से अभ गौडपादीय कारिका प्रथम प्रकरण १ । "शिवम् शिव (शुद्धबुद्ध मुक्तस्वभाव परमानन्द बोधस्वरूप) है।अरु "अद्वैतम्" अबैत अर्थात जिसकरके सर्वभेद विकल्पसे रहित । है, तिसही से चतुर्थम् चतुर्थ है अर्थात् तीन पादों की अपेक्षासे, चतुर्थः। तुरीयपदि मन्यन्ते मानते हैं? क्योंकि प्रतीयमान जे विश्वादिक तीन पाद,तिनसे विलक्षण है ताते “सआत्मा सवितेय" सो आत्माहै सो जानने योग्य है। अरु जैसे प्रतीयमानजे 'सर्प, भूमिकी दरार, दंड,जलधारादिक, तिस सर्वसे पृथक्-अरु तिनसवका आश्रय अधिष्ठान रज्जु है। तैसे." तत्त्वमसि सो तूहै इत्यादि महावाक्योंका लक्ष्य- रूप जो आत्मा अर्थात्-जायदादि अवस्थारूप स्थानोंका, अरु तदभिमानी विश्वादिकों का-आश्रय अधिष्टान अ. सर्वके धर्म कर्मादिकों से पृथक् सर्वकाप्रकाशक साक्षी निरुपाधिशुद्ध विज्ञान धन निर्विशेष निरुपाधि जो अत्मा सो | अष्ट (चक्षुरादिकों का अविषय ) हुआ, चक्षुरादि सर्वका द्रष्टाहै, अरु " नहिंद्रष्टुष्टे विपरिलोपोविद्यत, इत्यादि द्रष्टाकी दृष्टिका विपरिलोप-वि; द्यमान नहीं , इत्यादि श्रुतियों ने कहा है, ताते सोई सर्वका अनुभवी अपना, आप सत्य प्रत्यगात्मा है । सो जानने योग्यहै।। यहाँ "साविज्ञेयः ८ सो जानने योग्यहै ? इसप्रकार कहाहै-सो। पूर्व । अपने आप आत्माको अज्ञात अवस्थाविपे । अर्थात् अपने आप वास्तविक स्वरूपको यथार्थ न जानने रूप अवस्थाविपे। आत्मा विषयक ज्ञेयपनेकेहुये,आत्मा को जाननेयोग्य है, इसप्र- कारकहा । अरु | महावाक्योंके लक्ष्यार्थयो- सम्यक्प्रकार अपने आप आत्माकरके जानेहुये 'ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय, इस त्रिपुटि के विभाग रूप द्वैतका अभाव होताहे-७॥ हे सौम्य अत्रेतेश्लोकाभवन्ति यहांयह श्लोक होतेहैं। अर्थात् यहाँ[अव नान्तःप्रज्ञत्वादि"अन्तःप्रज्ञत्वनहीं इससप्त संख्यावाले श्रुति मन्त्रकरके उतार्थ विषेतिसके वर्णनरूपगोड: पादाचार्य कृन नव दलोकोंको प्रकट करते ]: नियत्तेः सर्व pe yl4 2 ५८ मांडूक्योपनिपद् । ' (गौडपादीयोपनिषदर्थाविष्करणम् ॥ निवृत्तेःसर्वदुःखानामीशानःप्रभुरव्ययः ॥ अद्वैतः सर्वभावानांदेवस्तुर्योविभुःस्मृतः १०॥1... अथ गौडपादाचार्यकृत कारिका । दुःखीनामीशानः प्रभुरव्ययः सर्वदुखोंकी निवृत्तिका ईशानप्रभु है, अव्यय है, अर्थात् 'प्राज्ञ, तेजस, विश्वरूप लक्षणवाले जीवोंके सर्वदुःखोंकी निवृत्तिका ईशान कहिये नियामक तुरीयरूप आत्मा है। सो प्रभुहै । अर्थात् यहां ईशान, पदकां व्याख्यान रूपे 'प्रभु, पंदहे, एतदर्थ ईशान कहिये सर्व दुःखोंकी निवृत्ति के अर्थ प्रभु सिमर्थ होताहै । अर्थात् जो सर्वदुःखोंकी निवृत्तिकरने में समर्थ होने तिसको 'प्रभु, इसनामसे कहते हैं, सो एक आत्माहीअपने सम्यक् ज्ञानद्वारा अध्यात्मिकादि त्रिविधतापोंको समूल अशेष निवृत्तकरताहे ताते तुरीय आत्माके 'ईशान,इस विशेषणकाअर्थ प्रभुहै । क्योंकि सर्व दुःखोंकी जो निवृत्ति है सो तिस (आत्मा) केज्ञानरूप निमित्तसे होती ताते । अरु यह प्रत्यगात्मा जिससे वास्तवकरके स्वरुपसे व्यभिचारको पायता नहीं तिस हीसे अव्यय है । अरु “ अद्वैतः सर्वभावानां देवतुर्यो विभुः स्मृतः सर्वभावोंके मिथ्याहोनेसे अद्वैनहे, देव तुरीय विभु (व्यापक) कहाहे । अर्थात् 'जाग्रदादि अवस्थारूप तीनोंस्थान अरु तिनके विश्वादिक तीनों अभिमानी सो सर्व । रज्जुमें सर्पवत् असत् होनेसे । उन सर्वका आश्रय अधिष्टानरुप तुरीय आत्मा । अद्वैत है। अरु एतदर्थही । अर्थात् सर्वभावोंको मिथ्याहोनेसेही व्यिय (व्यभिचार) के हेतु जे द्वैतवस्तु तिमके अभावसे आत्मा अव्यय है । अरु सो यह सर्वका प्रकाशक होनेसे देव । अर्थात् जाग्रदादि । स्थानों सहित विश्वादिकोंके 'रज्जु में सर्पवत् अध्यस्तरूप भाव । 7. को, अरु स्वरूपसे उनके अभावको, उनका अधिष्टान साक्षीहोके .
है गौडपादीय कारिका प्रथम प्रकरण १ । कार्यकारणबदौताविष्यतेविश्वतैजसोमा प्राज्ञःका रणवन्द्वस्तुहौतौतुर्येनसिध्यतः ११ ॥ प्रकाशताहै ताते आत्मा सर्व प्रकाशकों का प्रकाशक देवा है। अरु विश्वादिकों की अपेक्षा चतुर्ध होने से तुरीय, अरु सर्व में व्यापक होने से विभुहै, ऐसा कहते हैं.१०॥ , ११॥हेसौम्य अवतुसंकेयथार्थ आत्मपने के निश्चर्यार्थ इस श्लोकके तात्पर्य को कहतेहें] "कार्य कारणयचौताविप्यतेविश्व तेजसौ” सो विश्व तैजसदोनों कार्यकारण से बद्ध अंगीकार करते हैं? अर्थात विश्वादिकाकासामान्य अरु विशेषभाव निरु- पण करते हैं [ विश्वादिको विपे मध्यकी विशेषतांचा विलक्षण- ताके निरूपण करनेद्वारा तुरीयाकोही निरधार करते हैं ] यहाँ 'करते हैं, ऐसा जो फलंभाव, सो कार्यहे । अरु करता है, ऐसा जो वीजभाव, सो कारण हैं। तिन तत्वके अग्रहण अरु अन्यथा अहणरुप बीजभाव अरु फलमाव । अर्थात् तत्यका अंग्रहण (अज्ञान ) सोई बीजभार अरु तिसीवीज हेतुसे हुआ जो तत्त्व विषयक कर्तृत्वभोक्तृत्वादि अन्यथाग्रहणभाव सोई उक्त बीजका फलभाव है। तिनसे वे पूर्वोक्त विश्व अरुं तेजैस ये बद्ध अंगीकार करते हैं अरु "प्राज्ञः कारणवद्धस्तु दोतो तुर्येन सिध्यतः" प्राज्ञ तो कारण भावसेही वृद्धहै, विश्व अरुं तैजस येदोनों तुरीयाविषे सिद्ध होते नहीं, अर्थात् प्राज्ञतो वीजभावरुप कारण सेही पद्धहै अर्थात् तत्तका अवोधमात्रही जो वीजभाव सोई प्राज्ञपने विषे निमित्त । एतदर्थवे बीजभाव अरु फल भावमय तत्व के अप्र- "हण अरु अन्यथाग्रहणरूप विश्व अरु तेजस यह दोनों तुरीया 'विषे सिद्ध होते नहीं ११॥ १२॥हे सौम्य ! प्रश्न पुनःप्राज्ञको कारणसे वद्धफ्ना कैसेहैं। वा नुरीयाविषे तत्व के अग्रहण अरु अन्यथाग्रहणरूप वह जो बिझ आ तेजस सो तिसप्रकारके सिद्ध होते नहीं, उत्तर तहाँ , - । . मांडूक्योपनिषद् ! .. ; नात्माननापरांश्चैवनसत्यनापिचाऽनृतम् ॥ प्राज्ञः किश्चनसंवेत्तितुर्य्यतत्सर्वहक्सदा १२॥ कहते ते हैं, "नात्मानं नापरांश्चैव न सत्यं नापि चाऽनृतम, प्राज्ञः किञ्चन संवत्ति” :प्राज्ञहै सोनं आपको न'परको न सत्यको न अनृत (झूठ) को, कुछभी जानता नहीं , अर्थात् 'जिसकरके प्राज्ञ जोहै सो विश्व अरु तैजसवत् कुछ भी आप को जानता नहीं, अरु अविद्यारूप वीजसे उत्पन्न वाह्यके द्वैतरूप, अन्यों को भी जानता नहीं, अरु सत्यको ।' दृष्टयादिकोंके विपर्य कार्यको जानता नहीं । अरु तैसेही अविद्यात्मक वीजरूप अनृते (अवि- -पयकारण) कोभीजानता नहीं। एतदर्थ यह प्राज्ञ अन्यथाग्रहण . 'कहिये 'विपरीत ज्ञान, के वीजमय अग्रहणरूप अज्ञान से बद्ध होताहे । अरु " तुऱ्यातत्सर्वरक् सदा" तुरीया सर्वदा सर्वदृक् है। अर्थात् जिसकरके तुरीया अपनेसे इतर (अविद्यो केअभाव से सर्वदा सर्वदृक् (सर्वरूपअरुसर्वकाद्रप्टा) है। एतदर्थ तिसधिपे 'तत्वका अग्रहणरूप (अविद्यात्मक)वीजनहीं, क्योंकि वो तिस का भी प्रकाशक द्रष्टा है ताते, अरु जघ उसधिपे उक्त धीजनहीं 'तिसहीकरके तिसवीजसे उत्पन्न हुआ जो अन्यथाग्रहरुपअिर्थात् विपरीतज्ञान, जीवभावरूप फलकाभी तिसविपेअभाव है। जैसे सर्वदा प्रकाशरूप सूर्यविपे अप्रकाशता वा अन्यथाप्रकाशनासं. भवे नहीं अिथवा जसे सर्वदा स्वयंप्रकाशरूप सूर्य विपे अंधकार नहीं अरुतिसके अभावहुये तिसकाकार्य जो पदार्थका अन्यथा भासना सोभीनहीं। तेसे सर्वदा स्वयंज्योतिःद्रप्टारूपतुरीयावि घीजरूप मूलाज्ञान अरु तिसकाकार्य अन्यथाग्रहण (विपरीतज्ञा न, जीवभाव) रूपफल दोनों नहीं क्योंकि "नहिद्रप्टेदृप्टेविपरि लोपो विद्यत इतिश्रुतेः" द्रष्टाकी दृष्टिका यिपरिलोप (अभाव) विद्यमान नहीं इसश्रुतिके प्रमाणसे अरु वो सर्वका द्रष्टा तुरीया पदार्थका अयणरूपवीजसुपुप्तिका अतिसकेकार्यविप गौडपादीय कारिका प्रथम प्रकरण १ । द्वैतस्याग्रहणंतुल्यमुभयोःप्राज्ञतुर्य्ययोः । वीजनिद्रा युतः प्राज्ञः सा च तुर्थेन विद्यते १३ ॥ रीतज्ञानरूप फलका प्रकाशक द्रष्टाहै, अरु घिंटद्रष्टाघटाद्भिन्नः। इसें न्यायप्रमाण दृश्यसे द्रष्टापृथक् होनेसे उसविपे उक्त वीज अरु फलका अभावसिद्धहै। अथवा जाग्रत् अरु स्वप्नादि सर्व अवस्थामें सर्व भूतों विपे स्थितिवाला सर्ववस्तुओं का द्रष्टा आभास (प्रतिविम्बरूप प्रकाश ) है सो तुरीयाही है क्यिोंकि बिम्बसे प्रतिविम्बकी पृथक्सत्ताका अभावहे ताते । एतदर्थ सो सुरीया सर्वदा सर्वदृक् (सर्वांद्रष्टा) है क्योंकि अविद्यासे रहित सर्वदा जाग्रत् स्वभाव है । तथाचे “ नान्यदतोऽस्तिद्रष्ट इत्यादि श्रुतेः" इससे अन्य द्रष्टा है नहीं ? १२॥ १३॥ हे सौम्य! ,अब निमित्तान्तरसेप्राप्तहुई शङ्काकी निवृत्ति कैअर्थ यह श्लोकहै ।अर्थात् तुरीयाविपे अन्यनिमित्ततासे प्राप्तहुई कारणता तिससेहुई जो वद्धपनेकीशबा तिस बद्धपनेकीशङ्का की निवृत्तिके अर्थ यह इलोकहै । कैसे कि । विवादका विषय . जो तुरीय सो कारणसे बद्ध कहिये सम्बन्धवाला है, द्वैतका अग्र- हणहै ताते, प्राज्ञवत् । यहां अनुमानकोही देखावते हुये, प्राज्ञ को कारणकरके बद्धपने विपे अन्यनिमित्तकोही प्रकटकरते हैं। दोनोंविषे द्वैतके अग्रहणरूप निमित्तकी तुल्यताहै ताते । इसे प्रकारकी जो शङ्काप्राप्तहुई 'सो शङ्का, प्राज्ञकोही कारण से बद्ध 'पनाहे तुरीयाकोनहीं, इसप्रकारनिवारण करते हैं " द्वैतस्याग्रहणं तुल्यमुभयोः प्राज्ञतुर्ययोः" प्राज्ञ अरु तुरीया दोनोंको द्वैतका अमहणतुल्यहै । अर्थात् यद्यपि प्राज्ञ अरु तुरीया इन दोनों को द्वैतका अग्रहण तुल्यही है । तथापि “वीज निद्रायुतः प्राज्ञ सा 'च तुयेन विद्यते" प्राज्ञ वीज निद्रायुक्त है, सो तुरीया विषे विद्यमान नहीं है अर्थात् प्राज्ञ जोहे सो विशेषके विश्व तेजसा- दिरूप दैतके । वोधके उत्पत्तिका कारण जो तत्वका अबोधरूप । ६२ मांडूक्योपनिषद् । १., स्वप्ननिद्रायुतावाद्यौप्राज्ञस्त्वस्वप्ननिद्रया ॥ न नि द्रांनैवचस्वप्नं तुर्येपश्यन्तिनिश्चिताः १४॥ बीजनिद्रा (मूलाविद्या) तिसकरकेयुक्तहै। अरु तुरीयाको सर्वदा सर्वका द्रष्टा स्वभाववालाहोनेसे सो 'तत्त्वका अबोधरूप निद्रा (मूलाविद्या), तुरीयाविषे है नहीं एतदर्थतिस तुरीया विषे कारण का सम्बन्ध नहीं, यह अभिप्राय सिद्ध है १३ ॥ १४॥हे सौम्य!, [अव, “कार्यकारणबद्धौताविष्यतेविश्वत जसौ” विविश्वअरुतैजसकार्य अरुकारणकरकेबद्ध हैं। इसअष्टा; दश १८ में इलोकविपे उक्त अर्थको, अनुभवके आश्रयसे वर्णन करते हैं ] “ स्वप्ननिद्रायुतावाद्यो प्राज्ञस्वस्वप्ननिद्रया" आय दोनों स्वप्न अरु निद्राकरके युक्त है, अरु प्राज्ञ तो स्वप्नसे रहित निद्राकरकेही युक्त है, अर्थात् आद्य (प्रथमकहे)जे विश्व अरु तैजस सो दोनों 'रज्जुधिपे सर्पवत्, । अध्यस्त । जे अन्याग्रह- णरूप स्वान, अरुतत्व के अवोधमय अज्ञानरूप निद्रा, तिन स्वप्न अरु निद्रा दोनोंकरकेयुक्तहै । एतदर्थ वे विश्व अरु तैजसो कार्य अरु कारण दोनोंसे बदहें, इसप्रकारपूर्वकहा। अरु प्राज्ञते स्वत से रहित केवल निद्रा (अज्ञान)सेहीयुक्तहै । एतदर्थ कारणसे बद्ध है, इसप्रकार पूर्व कहा अरु “ननिद्रानेवचस्वप्नंतुर्ये पश्यन्ति निश्चिताः निश्चयको प्राप्तहुये, तुरीयाविपे स्वप्नकोनहीं देखते अरु निद्राको भी नहीं देखते , अर्थात् जो ' महावास्यार्थ के सम्यक् ज्ञानारके। निश्चयको प्राप्तहुये ब्रह्मवेत्ता, सो ‘सूर्यविषे अन्धकारवत् विरुद्ध धर्माहोनेसे, तुरीयाविपे स्वानको देखते नहीं, अरु निद्राको भी देखते नहीं। एतदर्थही जो । सर्वका प्रकाशक द्रष्टा । तुरीया है, सो कार्य अरु कारण दोनों से वद्ध नहीं; इसप्रकार पूर्व कहा है १४ ॥ १५ ॥ हे सोम्य!,शमाानन एम्पस्वनविपेस्थित कवहोताहे, अरु निद्राविप कब होता है; अरु तुरीयाविपे निश्चयको प्राप्त M गौडपादीय कारिका प्रथम प्रकरण ११ अन्यथाग्रह्णतः स्वप्नोनिद्रातत्त्वमजानतः ।। विपर्या सेतयोक्षीणेतुरीयंपदमश्नुते १५ ॥ हुआ कव होताहै, । समाधान तहां कहते हैं "अन्यथा ग्रहतः स्पनो निद्रातत्वमजानतः तत्त्व अन्यथा ग्रहणवाले को स्वप्नहोताहै, अरुन जाननेवाले को निद्रा है, अर्थात् स्वप्न अरु जाग्रतत्विषे 'रज्जुमें सर्पवत्, तत्त्वको अन्यथा (ओरप्रकारसे) ग्रहण करनेवाले पुरुपको स्वप्नहोताहे, अंरु तत्त्वके न जाननेवाले को तीनों अवस्थाविपे तुल्य निद्रा है। यहां स्वप्न अरु निद्राविये तुल्यतोंके होने से विश्व अरुं तेजस, इनदोनों को एकराशी (कोटि) पनाहै | अरु तिनधि अन्यथाग्रहणसे अरुप्रधान (मुख्य) होनेसे गुणरूप निद्राहै अरुविपरियास स्वप्नहै । अरु तृतीयस्थाने द्वितीयकोटि प्राज्ञविपेतो तत्त्वका अज्ञानलक्षणरुपनिद्राही केव ल विपरियांसहै। एतदर्थ "विपरियासे तयोक्षीणेतुरीयं पदमेनु ते विपरियासके क्षीणहुये तुरीय पदको पावताहै । अर्थात् उन कार्य अरु कारण रूप उभय स्थानों के अन्यथा ग्रहणं अ अग्रहण लक्षणमय कार्य-कारण से वद्धरूप विपरियांस के "पर- मार्थ तत्व के प्रतियोधकरके, क्षीण(विनाश) हुये तुरीयपदको पात्र ताहै। अर्थात् जिंब उक्तप्रकार का विपरियास नाश होता है तब तिस तुरीयाविप उभय प्रकार के बन्धके रूपको न देखता (अनु. भवकरता) हुआ पुरुप तुरीयाविपे निश्चयको प्राप्तहुआ हो. ता, १५ ॥ १६॥ हे सौम्ये! [विपर्ययके नाशकाहेतु तत्त्वज्ञान कवहोती है। इसप्रकार प्रश्न करने की इच्छाके होनेसे कहते हैं]" अनादि माययासुप्तो यदा जीवः प्रवुद्धयते यह जीव अनादि मायाँ करके सोया,सो जैव प्रबोधवान् होताहै। अर्थात् जो यह संसारी जीवहे सो तत्वके अयोधमय वीजरूप अरु अन्यथा ग्रहण फलं रूप, जो अनादि काल से प्रवर्तहुये उभय लक्षणवाले मायारूप - . मांडूक्योपनिषद् । ... ।' अनादिमाययासुप्तोयदाजीवप्रबुद्ध्यते । अजम निद्रमस्वप्नमद्वैत बुद्ध्यतेतदा,१६ ॥i.in स्वप्न, तिनकरके “ यह मेरा पिता है, यह मेरा पुत्र है, यह मेरा पौत्रहै, यह मेरा क्षेत्रहै, यह मेरा पशुहै, मैं इनका पोषक, स्वामी हो, दुःखीही, इनसे क्षयको पायाहों, अरु इनसे वृद्धि को भी पायाहाँ,, । इत्यादि प्रकारके स्वप्नोंको जाग्रत् अरु स्वप्न, उभय स्थानोंविषे देखताहुआ अिनादि कालसे- सोवताहै । अरु " अजमनिद्रमस्वप्नमतं वुद्धयते तदा। जब वोधको प्राप्त होता है तब 'अजहै, अनिद्रहै, अस्वप्नहै, अद्वैत है, ऐसे जानता है। अर्थात् सो । अनादि कालका सोयाहुआ जीव । जव वेदान्त के अर्थरूप तत्त्तके जाननेवाले परमदयालु आचार्य से "तू इन पुत्रादिकों का हेतु अरु फलरूप नहीं' किन्तु " तत्त्वमसीति ।। सो (ब्रह्म)तूहै। इसप्रकार श्रवण करके प्रबोधको प्राप्त होता है, ( अर्थात् सहस्रावधि माता पिताओं से अधिक जीवोंपर परम कृपाकरके, इस उक्त स्वप्न के जन्म मरणादि महानदुःखों से ग्रसित देख आप आचार्य द्वाराहोके "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य व रान्निबोधत । इत्यादि अपने परम उदारवाक्योंसे अज्ञान निद्रा से जगाय पुनः कहती है कि हे सौम्य ! जैसे सर्व जातिके वृक्षों- कारस मक्षिकाके उदरमें भेदरहित,समान मधुभावको प्राप्तहो, ताहै, तैसेही यह सर्व चिदाभास जीव सुपुप्ति अवस्था में समान एक विम्बरुप चैतन्य भावको प्राप्त होते हैं अरु जहां पुत्र पितादि वा ब्राह्मण क्षत्रियादि वा मनुष्य पशुवादि वा जड़ चैतन्यादि कोई भी भेदभाव विशेष रहता नहीं, अरु जहां को प्राप्तहुये विद्वान पुनः जीव,भावविपे आवते नहीं । रा आत्मातत्वमसि' साई सर्वका अपना आप प्रत्यगात्माहे, सोई आत्मा तुहे । इसप्रकार जब परमहितकारणी श्रुति महावाक्योंके लक्ष्यार्थको जाननेनाले ब्रह्मनिष्ठ आचार्यद्वारा अपने वाक्योंसे इनजीवोंको जो अनादि - गौडप दीय कारिका प्रथम प्रकरण १। कालसे मायाकरके सोयेहुये नानाप्रकार के जगतरूप स्वमों को देखते जन्म मरणादिकों के महान क्लेशोंको पात्रते हैं, जगायके सावधान करती है। तब ऐसे जानता है। पूरन । केसेजानता है, उत्तर । इस आत्माविषे बाह्य (कार्य) अरु अन्तर (कारण) वा जन्मादि पद भावविकार हैं नहीं। अतएव अजन्मा है, अर्थात् आित्मा। बाह्य अन्तर सहित अरु वाह्य अन्तरके धर्मादि सर्व भावविकार करके वजित (रहित) है। अरु जिस करके इस आत्माविषे जन्मादिकों की कारणरूपा अविद्या अरु अज्ञान स्व- रुप वीजमय निद्रा नहीं, एतदर्थ यह अनिद्र है । अर्थात् सर्वदा वोधस्वरूप है । अरु जिसकरके सो तुरीया अनिद्र िअवोध र- हित है, तिसही करके अस्वप्न है, क्योंकि अन्यथा ग्रहणरूप जो स्वमहे सो अवोधरूप निद्राके निमितवाला है । अरु सो निद्रातु रीय आत्मा चिपे है नहीं, अतएवं तन्निमित्तक उक्त स्त्रन भी तिस विपनहीं। अरु जिसकरके अनिद्र अरु अस्वप्न है, तिसही करके अजन्मा अरु अद्वैत है, इसप्रकार तुरीयरूप आत्माको तव जा. नता है । जब स्वस्वरूप विषे जागता है १६॥ ११७॥ हे सौम्य!!शंका जयंप्रपंचकी निवृत्तिसे अद्वैतको,जान- ता,नव प्रपंचके अनिवृत्तहुये अद्वैत कैसे सिद्ध होताहै, जहां ऐसी शंका तहकिहतेहैं, जो कि परमार्थ सही प्रपंच विद्यमान होय तब उसप्रकार अद्वैतकी असिद्धि होती है, यह तेराकथन सत्यहे, परन्तु 'रज्जुविपे सर्पवत्, कल्पित होनेसे सो प्रपंच । विद्यमान नहीं, एतदर्थ अद्वैतही सिद्ध होताहै अरु प्रिपंचोयदिविद्येत नि- वतंतनसंशयः जो कदापि प्रपंच विद्यमान होय तो निवृत्त होय इसमें संशय नहीं है अर्थात् जो यह प्रपंच स्वरूपसेहीवि. शुमान होवे तो निवृत्तहो। अिर्थात् जो कदापि यह प्रपंच स्व. रुपसेही विद्यमान होय तो इसकी निवृत्ति हये अद्वैत सिडहोंने परन्त असे रज्जवि भ्रान्तिबुद्धि करके कल्पित जो सर्प सो विद्यमान हुआ हुआ भी विवेकसे निवृत्त होताहे, एतदर्थ वस्तुसे । यथार्थ 'मांडूक्योपनिषद् । प्रपञ्चोयदिविद्येतनिवर्ततनसंशयः । मायामात्र मिदंदैतमद्वैतपरमार्थतः १७॥ है नहीं । अर्थात् जैसे रज्जुविपे सर्प,तैसे आत्माविषे प्रपंच-का- ल्पित होनेसे रज्जुके यथार्थ विवेकहुये उस प्रपंचके हुये हुये भी सत्यरूप रज्जुवत् एक आत्मतत्त्वही सत्य अद्वैत होवेहैं, क्योंकि प्रपंच भ्रान्ति करके कल्पित है ताते, वा जिनको रज्जुका विवेक नहीं तिनको द्वैतरूप सर्प सत्यवत् हैं, परन्तु उस भ्रान्ति कालविपे भी सर्प कल्पित होनेसे रज्जु अद्वैतही है, इसप्रकार अविवेक करके प्रपंचकी सत्य प्रतीतिकाल में भी प्रपंचको भ्रां- तिमात्र होनेसे, आत्मा अद्वैतही है। इसप्रकारद्वैतरूप प्रपंच के होतेसंते भी अतही सिठहै । अरु जैसे मायावी पुरुप ने देखाई जो माया सो विद्यमान हुई हुई भी तिसके देखनेवाले पुरुष के नेत्रनन्धके दूरहुये निवृत्त होती है, क्योंकि वास्तवसे है नहीं । ते. सेही मायामात्रमिद्वैतमद्वतपरमार्थतः।यहद्वैत मायामात्र है अरु परमार्थ से अद्वैत है। अर्थात् जैिसे रज्जुधिपे सर्प अरु मायावी विपे माया तसे यह प्रपंच नामवाला द्वैत मायामात्र भ्रिान्ति करके कल्पित है। अरुरज्जु अरु मायावीवत् परमार्थ करके 'अद्वेतही है । एतदर्थ कोईभी/ अविवेकीको प्रवृत्त हुआ वा, विवेकीको निवृत्त हुआ । उभयप्रकार | प्रपंच हैही नहीं। इति सिद्धम् १७ ॥ १८॥हे सोभ्य!! शंका। शास्ता (उपदेष्टा)मात्र,अरु शिष्य, इसप्रकारको विकल्प ( अद्वेनविप केसे प्रवृत्त होताहे, जहां ऐसी शंकाहे, तहां कहते हैं। समाधान विकल्पोविनिवर्तेतकल्पितो यदिकेनचित् । यदिविकल्प फिसी करके कल्पित होय तो नि- वर्ग होताहे । अर्थात् विकल्प निवत होताहै जो किसीकरके क. ल्पित होय तो। जैसे,यह प्रपंच मायावी की माया अरु रज्जविप सर्पब प्रयोच । यथार्थ ज्ञान रो पूर्वहं । तैसे यह शिष्यादि भेद + गौडपादीय कारिका प्रथम प्रकरण १ ॥ विकल्पोविनिवर्ततकल्पितोयदिकेनचिताउपदेशादयंवा दोज्ञातेतन विद्यते१८॥ उपनिपद Mira सोऽयमात्माऽध्यक्षरमोङ्कारोधिमात्रम् ।' पाद्रामात्रा मात्राश्चपादाअकारउकारोमकारइति । रूपाविकल्प भी तित्वको प्रोधर यथार्थज्ञान) के पूर्वहीं उपदेश 'के. निमित्त है । याते । उपदेशादयंवादोज्ञातेद्वैतं न विद्यते। यह वाद उपदेश जानेहुये द्वेत है नहीं, अर्थात यह शिष्य शास्ता अरुःशास्त्ररूप: जो व्यावहारिकी कथन है सो तत्वोपदेशने पूर्वहै, 'अरु उपदेशके कार्यरूपाज्ञानके पूर्णहये परमार्थ तत्वके जाननेसे पुनः उपदेष्टादिरूप । द्वैतहै,नहीं १८..." अथ उपनिषदर्थ हे सौम्य! [उक्तयूकार तत्त्वज्ञानविषे समर्थ उत्तम अरु मध्यम अधिकारियोंको अध्यारोप अरु अपवादसे पारमार्थिक तत्व उप- 'देशकिया। अव तत्त्वके ग्रहणमें असमर्थ कनिष्ठ अधिकारि को आत्माके ध्यानविये विधानार्थ आरोपदृष्टिकोही आश्रयकरके मल श्रुतिके चारमन्त्रों का व्याख्याने करते हैं जो वाच्यकी प्रधान. तावाला कार चारपादवाला आत्मा है इसप्रकार व्याख्यान किया सोऽयमात्माऽव्यक्षरमोङ्कारोऽधिमात्रम्हा सोयह आ- माअध्यक्षर है, ॐकार है, अधिमात्र अर्थात् जो पूर्व कार चारपादवाला 'आत्माकहां; सो यह आत्मा अध्यक्षर है, अर्थात् वाचककी प्रधानता से अक्षरको आश्रय करके वर्णन किया ऍ- तदर्थः अध्यक्षर कहते हैं। प्र०ा पुनः सो अक्षर क्याहै । उ०। तहां कहते हैं। सो अक्षर अंकारहै । अरु सो यह ॐकार पादों से विभाग पायाहुओ अधिमान है। अरु मात्राको आश्रय करके वर्त्तता है ताते अधिमान है। शंका निनु, आत्माही पादोंसे वि- भागकों पावताहे, असे मात्राको आश्रय करके ॐकार स्थित हो- ताहे, ताते पादोंसे विभागको प्राप्तहुये उधारका अधिमात्रपना .
मांडूक्योपनिषद् । जागरितस्थानोवैश्वानरोऽकारः प्रथमामात्राऽऽप्तेरा दिमत्वाहाऽऽप्नोति हवैसर्वान् कामानादिश्च भवतिय एवंवेद६ ॥ केसे है, जहां ऐसा शंकाहै, तहां कहते हैं, “पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति, पादहैं सो मात्रा; मात्रा सो पादहें, अकार उकार मकार यह । तीन अंकारकी मात्रा, अर्थात आत्माके जे पादहें सो कारकी मात्रा हैं, अरु जे ॐ. कारकी मात्रा हैं सो आत्माके पादहैं । अतएव पाद अरु मात्रावी एकतासे यह कथन विरुद्ध है, ताते कौनसी वो ॐकारकी मात्रा है, जहां ऐसा प्रश्न है, तहां कहते हैं, अकार उमार अरु मकार, यह तीन ॐकार की मात्रा हैं ८॥ ॥हे सौम्या तहां [पादों के मध्य अरु मात्राओं के मध्य विश्व नामक भेदयी अकार रूपताको सचन करते हैं ] विशेषको नियम करतेहैं "जागरितस्थानोवेश्वानरोऽकार-प्रथमामात्रातरादिम त्वाद्वाऽऽनोति जाग्रत् स्थानवाला वैश्वानरहे सो अकाररूप प्रथमा मात्राहै, व्याप्तिसेवा आदिवाले होनेसे आप्नोति, अर्थात् जो जाग्रत् स्थानवाला वैश्वानर है सो ॐकारकी अकाररुप • प्रथम मात्राहै। प्र०। किस तुल्यता करके दोनोंकी एकता है, उ- तर व्याप्तिसे वा आदिवाले होने से। जैसे अकारसे सर्व वाणी व्याप्तहे "अकारोवैसीवागितिश्रुतेः' / अकारही सर्व वाणी है , इस श्रुतिके प्रमाणसे । अरु तैसेही वैश्वानरसे जाग्रत् व्याप्त है। तथाच “ तस्यहयेतस्यात्मनोवेश्यानरस्यम?वसुतेज, इत्यादिश्रु- तिः” तिस प्रसिद्ध इस वैश्वानररुप आत्माका मस्तकही स्वर्ग है, इत्यादि श्रुतियोंके प्रमाणसे, वाच्य (नामी)वाचक (नाम) की एकताको हम कहते हैं "आदिश्चभवति आदिवाला हो- ता, अर्थात् जिसकी आदिहै, तिसकी आदिवाला कहते हैं । अरु जसे आदि । प्रथमता वाला अकार नामवाला अक्षर है, ते.
गौडपादीय कारिका प्रथम प्रकरण १। सेही आदिवाला वेश्यानर है । एतदर्थ तुल्य होनेसे वैश्वानरको अकारपना है ॥ अव तिन अकार अरु वैश्वानर की.एकताके ज्ञाताके अर्थ फल कहते हैं। हवैसर्वान्कामान् आप्नोति;यएवंवेदन जो ऐसे जानता है सो निश्चय करके सर्व कामोंको पावताहै। अर्थात् जो वैश्वानर अरु अकारको उक्तप्रकार एकताको जानता है सो निश्चय करके सर्व भोगोंको, पावताहै,, अरु सो आदिश्च भवति : प्रथम होता है । अर्थात् ; ज्येष्ठ श्रेष्ठों के मध्य प्रथम (मुख्य) होताहै ६u:::: ॥१०॥हे सौम्य ! अब द्वितीयपादं अरुं द्वितीयमात्राकी एकता को कहते हैं] स्विप्नस्थानस्तेजस उकारो द्वितीयामात्रोको दुभ- यत्वात् । स्वग्नस्थानवाला तेजस उकाररूप द्वितीया मात्रा है, उत्कर्षसे वा उभयरूप होनेसे अर्थात् जो । दितीयं । स्वन स्थानवाला तैमसहै सो कारकी उकार रूप द्वितीया मात्रा है। प्रश्नः। किस तुल्यतीले दोनोंकी एकताहै। उत्तर उत्कर्पता सेवा द्वितीयरुपहै ताते । जैसे पाठके कमसे अकार से उकार उत्कृष्ट है । अर्थात् प्रणवके उच्चार करने में अकार हस्व, उकार दीर्घहै, ताते.अकोरसे उकार, उत्कृष्ट है । तैसेही स्थूल उपाधि वाले विश्वले सूक्ष्म उपाधिवाला तैजस उत्कृष्ट ( श्रेष्ठ), है । । अर्थात् स्थूल भूतरूप उपाधिवाले. स्थूल देहकी अपेक्षा सूक्ष्म अपंचिकृत भूतोरूप.उपाधिवाला सक्ष्मदेह अविनाशिहै, एतदर्थ विश्य से जिस उत्कृष्टहै। तिस उत्कर्षसे उन उिकार अरु तेजसा की एकताह । अथवा जैसे अकार अरु मकारके मध्यविस्थित उकारहै, तैसेही विश्व अरु प्राज्ञके मध्यविस्थित तेजसहै, एत- दर्थ उनकी उभयरूपताकी तुल्यतासे एकताहैं । अब उनकी एक- तोके जाननेवाले.विद्वानको जो फल प्राप्तहोता है सो कहते हैं। "उत्कर्षति हवे ज्ञानसन्ततिसमानश्चभवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति य एवं वेद जो. ऐसे जानताहै सो ज्ञान सन्ततिको बढ़ावताहै अरु समान होता है 'अरु इसके कुलविषे अब्रह्मवित् . -- X मांडूक्योपनिषद् ! स्वप्नस्थानस्तैजसंउकारो द्वितीयामात्रोत्कर्षादुम यत्वाद्वोत्कर्षति हवैज्ञानसन्तति समानश्चभवतिनास्या ब्रह्मविकुलेभवतियएवंद १० ॥ होता नहीं, अर्थात् जो उक्तप्रकार उकार अरु तैजसकी एकता को जानताहे । सो विद्वान् अपने पुत्र वा शिष्यवर्गों में ज्ञानसंत- तिको वद्धमान करताहै, अतएव उसके कुल (पुत्रों वांशिष्यों) में अब्रह्मवेत्ता (ब्रह्मका न जाननेवाला) कोई होता नहीं। अरु पुनः यो समान होताहै; अर्थात् मित्रके पक्षवत् शत्रुके पक्ष में भी द्वेषकरतानहीं उभयमें समभावही रखता है: १.० ॥ ११॥ हे सौम्य ! [अब तृतीय पाद अरु तृतीय मात्राकी एकताको कहते हैं ] सुषुप्तस्थानःप्राज्ञोमकारस्तृतीया मात्रा, मितेरपीते- चा सुपुप्तिस्थानवाला प्राज्ञ मकाररूप तृतीयामात्राहै, परि- माणसेवा एकतासेअर्थात् जो सुपप्तिस्थानवाली प्राज्ञहै सो ॐकारकी मकाररूपा तृतीयामात्राहै। प्रश्न । किस तुल्यताकरके दोनोंकी एकताहै। उत्तर । परिमाणसे वा एकता. से । यहां इस प्रकार इन प्राज्ञ अरु मकारमाना। दोनोंकी एकताहै, प्रस्थ (धान्यके परिमाण मापने; के पात्र ) से यव धान्यादिक अन्न के परिमाण (मोप) वत्, जैसे लय अरु उत्पत्तिविपे प्रवेश अरु निकसनेसे । अर्थात् लयविपे प्रवेश अरु उत्पत्तिविपे निकसने से प्राज्ञकरके विश्व अरु तेजस परिमाणकिये (मापे) यत् . होते हैं। तैसेही अकार अरु उकार, यह दोनों अक्षर, ॐकारके उच्चारकी समाप्तिविपे अरु पुनः उच्चारके प्रारंभविपेमकार में प्रवेश करके निकसे हुयेवत् होतेहैं । अर्थात् ॐकारके उच्चारण करते प्रथम अकार निकलताहै सो. उकारके उच्चारणहुये उकारम लंयहुयेवत् होताहे अरु अन्त के मकारके उच्चारणहुये यो उकार मकारमें लयहुयेवत् होताहै, इसप्रकार अकार उकार दोनों अक्षर ॐकारके उच्चारकी समाप्तिविपे मकारमें प्रवेशहुयेवत् हो- . गौडपादीयःकारिका प्रथम प्रकरण १ । सुपुप्तस्थानःप्रांज्ञोमकाररततीयामात्रा । मितेर पीता - मिनोतिहवाइदथंसवमपीतिश्चभवतियएवं वेद ११॥ तेहै । अरु पुनः ॐकारके उच्चारके प्रारंभमें वे दोनों अक्षर :अ, उ, मकारसे निकसहुयेवत् होते हैं। तातेसो अकार अरु उकार । मकारकरके परिमाणकिये (मापे) वत् होतेहैं । एत- दर्थ तिन । प्राज्ञ अरुमकारोदोनोंकी तुल्यतासे एकताहै । अथवा जैसे कारके उच्चारकिये मकार रुप अन्तिम अक्षरविपे अकार अरु उकार यहेदोनों एकरूप हुयेवत होतेहैं, तैसे सुप्तिकालविषे विश्व अरु तैजस प्राज्ञविषे एकहुयेवत होते हैं। एतदर्थ तुल्यहोनेसे प्राज्ञ अरु मकारकी एक्ताहै। अव तिन प्राज्ञ अरु मकार की एकताके जाननेवाले विद्वान्को जोफलं प्राप्तहोताहे सोकहतेहैं। मिनोतिहवाइदई सर्वमपीतिश्चभवति यएवं वेद । जो ऐसे जानताहे सोसर्वको जानता जगत्का कारण होता है, अर्थात् जो उक्सप्रकार प्राज्ञअरु मैकारमात्राको एककरकेजानताहै सोकिारण का ज्ञाताहोनेसे, सर्वको जानता । अर्थात् प्रा अरु मकारकी एकताका जाननेवाला निश्चयकरके इसकिार्यकारणात्मक सम- स्तजगत्को यथार्थ जानता है, अरुआप 'प्राज्ञरूप मकारमात्राका ज्ञाता (अभेदोपासक) होनेसे जगतके कारण भावको प्राप्त होताहै ॥ यहाँ[एकताके ज्ञानविपे फलके भेदके कथनसे उपा- सनाका भेद होगा , यह आशंकाकरके साधनोविये फल के भेदकी श्रुतिके अर्थ चादपनेको अंगीकारकरके कहे हैं ] अया- न्तर फलका जो कथन है सो मुख्य साधनकी स्तुत्यर्थ है ११ ॥ हे सौम्य ] यहांजो विश्व , तेजस, प्राज्ञ, इनपादोंकी क्रमशः 'अकार, उकार, मकार, इनमानाओं के साथ एकता कही है तहां तिनके साथ में जामदादि स्थानोंकी भी एकता चिन्तनीय है, इसका विचार इसथके अन्तमें प्रकाशित करेंगे। - - ७२ . मांडूक्योपनिषद् । गौडपादीय श्लोकाः॥ विश्वस्यात्वविवक्षायामादिसामान्यमुत्कटम् । मात्रा सम्प्रतिपत्तौस्यादाप्तिसामोन्यमेवच १९॥ । तैजसस्योत्वविज्ञाने उत्कर्षोदृश्यतेस्फुटम् । मात्रा सम्प्रतिपत्तौ स्यादुभ्यत्वंतथाविधम् २०॥ गौडपादीय कारिका॥ १६ ॥ हेसौम्य![पादोंका अरु मात्राओंका जो सनिमित्तके एकत्व चार मन्त्रों करके श्रुतिने, कहा, तिसविषयक पूर्ववत् श्रुत्यर्थके वर्णनरूप गौडपादाचार्यकृतपट् श्लोकनको प्रकट करते हैं .] "गौडपादीय श्लोकाः। अत्रैते श्लोका भवन्ति यहां यह गौडपादाचार्यकृत श्लोक, (मन्त्र)होतेहैं, "विश्वस्यात्वविव. पायामादिसामान्यमुत्कटम् । विश्वके कहनेकी इच्छाकेहुयेआदि पनेकी तुल्यता.श्रेष्ठ देखतेहैं । अर्थात् विश्व के अकारमात्रा रूप पनेके कहनेकी, इच्छाके हुये, अर्थात् विश्वका अकारमात्रारूप पना जघ कथनकरनेको इच्छितहोय, तव उक्त न्यायसे आदि पनेकी तुल्यता श्रेष्ठ देखते हैं । अरु मात्रासम्पतिपत्तौ स्यादा- तिसामान्यमेवच मात्राके निश्चयविपे व्याप्तिकी तुल्यताही श्रेष्ठहै । अर्थात् मात्राकी एकताविपे कहिये विश्वका अकारमात्रा. पना, चा मात्राकी विश्वरूपता, जव निश्ययकरतेहें तय । उस एकताके निश्चयविपे । व्याप्तिकी तुल्यताही श्रेष्ठहै १६ ॥ २०॥हे सोम्य! "तेजसस्योत्वविज्ञाने उत्कर्षों दृश्यते स्फुटमा तेजसके ज्ञानविपे उत्कर्परूपता स्पष्ट दीखतीहै । अर्थात् तेजस के उकारमात्रापेनेके ज्ञानविपे, अर्थात् तेजप्तके उकाररुपमात्रा पनेके कहनेकी इच्छाके होनेसे । तिसकथनार्थ । उत्कर्परूप तुल्यता स्पष्ट देखते हैं । अरु मात्रासम्प्रतिपत्तौ स्यादुभयवंतथा विधम् मात्राके निश्चयधिपे तिसही प्रकारका उभयपना -- गौडपादीय कारिका प्रथम प्रकरण १ । ७३. भकारभावे प्राज्ञस्य मानसामान्यसुत्कटम् । मात्रास म्प्रंतिपत्तौतु लयसामान्यममेवचे २३॥ त्रिषुधामसुयत्तुल्यं सामान्यवेत्तिनिश्चितः । सम्पू ज्यःसर्वभूतानां वन्द्यश्चैषमहामुनिः २२ कहिये द्वितीयपना, स्पेष्टही है | और सर्व पूर्व श्रुतिके दशमंत्र के भाष्य में कहे प्रमाण जानलेना २० ॥ ना२१॥ हे सौम्यांमकारभावपाज्ञस्यमानसामान्यमुत्कटम् । प्राज्ञके मकार भाववि मानकी लमता श्रेष्ठहै, अर्थात् प्राज्ञके. मकार मात्रारूप भाव (होने) विपेमान (परिमाण वामाप) की तुल्यताही श्रेष्ठहै। अरु fमात्रासम्प्रतिपत्तौतुलयसामान्यमेवचः। मात्राके निश्चयविषे तोलयकी तुल्यताही श्रेष्ठहै ।२१ ॥ इसका विशेषार्थ मूल श्रुतिके एकादश मन्त्रके भाष्यमें कहे प्रमाण जानना.॥ २.२॥ हे सौम्य ! त्रिपुधामसुयत्तुल्यसामान्यवेत्तिनिश्चित तीनधामोंविषे. जो तुल्यसमताकोनिश्चयको पायासता जो जा- तताहै, अर्थात्, उक्तत्रकारके जागत्, स्वप्न, अरु सुपुप्तिरूपतीनों स्थानोंविषे.जो तुल्य समता कही है, तिसको 'यह समता इस- प्रकारही है, इिसमें संशय नहीं। इसप्रकार निश्चयको प्राप्तहुआ जो जानताहै सो सम्पूज्यःसर्वभूतानांबन्धश्चैपमहानुनि सर्व भूतोंकरके सम्यकप्रकार पूजनेयोग्य बन्दनाकरनेयोग्य महामुनि होताहे अर्थात् जो उक्त प्रकार अकारादि तीनमात्रा अरु विश्वादि तीनपाद इनकी अभेदताको निश्चय पूर्वक यथार्थ जानता है, सो, विद्वान इस लोक सर्व प्राणियों करके पूजने (मान्यदेने) अरु वन्दना (नमस्कारादि) करनेयोग्य महामुनि (आत्मवेत्ता) होवहै:२२ ॥EE २३॥ हे सौम्या अपः[पूर्वोक्तपाद अरु मात्राओंकी समताके ज्ञानवालेध्याननिष्टके फलंकोकहते हैं अकारोनयतेविश्वमुका- १० ७४ मांडूक्योपनिषद् । अकारोनयतेविश्वमुकारश्चापितैजसम्मकारश्चपु- नःप्राज्ञनामात्रेविद्यतेगतिः २३ ॥ रश्चापितैजसम् । अकार विश्वको प्राप्त करताहै, अरु उकार तैजसको प्राप्त करता है, अर्थात्, उक्त कारकी तुल्यतासे आत्मा के विश्वादि। पादोंकी, अकारादि । पादोंके साथ एकताको करके अिर्थात् ॐकार के वाचकपने अरु लक्ष्य वाच्यकी एकता को निश्चय करके । पुनः उक्त कारके ॐकार को सम्यक्पकार जानके जो ध्यावता ध्यिानकरता है तिसको, अकार जो है सो विश्वके अर्थ प्राप्तकरताहै । अर्थात् अकाररूप आलम्बन (पूधा- नता) वाले ॐकार को जाननेवाला पुरुप वैश्वानरके भावको प्राप्त होताहै । अरु तैसेही उकार भी तैजसके अर्थ प्राप्त करता है। अर्थात् उकाररूप आलम्बन(प्रधानता) वाले ॐकारका जा. ननेवाला विद्वान् हिरण्यगर्भके पदको प्राप्त होताहै । अरु मि- कारश्चपुनःपासृनामात्रेविद्यतेगतिः। पुनःमकार प्राज्ञके अर्थ प्राप्त करता है, अमानविपे गति विद्यमान नहीं अर्थात् उकार की गतिके पश्चात् मकाररूप मात्राके आलम्बन (पूधानता) वाले ॐकार का जाननेवाला विद्वान् अव्याकृत भावको प्राप्त होताहै । अरु [अब यहां तो पादोंका अरु मात्राओं का विभाग है नहीं । अरु तिस ॐकाररूप तुरीय आत्मा विपे स्थितहुये पु- रुपको, प्राप्त होनेवाला, अरु प्राप्त होने योग्य, अरु प्राप्ति इस तीनोंरूप त्रिपुटीका विभाग है नहीं। इसप्रकार कहते हैं । यहां यह अर्थ है कि 'स्थूलप्रपंचजायदवस्था, अरु विश्व अभिमानी यह तीन अकारमात्रा रूप हैं। अरु सूक्ष्मपंच, स्वनावस्था, ते- जस अभिमानी, यह तीन उकार मात्रारूपहें । अरु स्थल सूक्ष्म उभय पंचों का कारण, सुपुप्ति अवस्था, प्राज्ञ अभिमानी, यह तीन मकार मात्रारूप हे । अरु तिनमात्राओं में पूर्व पूर्व मात्रा उत्तर उत्तर मात्राके भावको प्राप्त होती हैं । अर्थात् स्थूले अकार ७५ गौडपादीय कारिका प्रथम प्रकरण १। उपनिषद् ॥ अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यःप्रपंचोपशमः शिवोऽढे त एवमोंकार आत्मैव संविशत्यात्मनाऽऽत्मानं य एवं वेदयएवंवेद १२॥ । इतिमांडूक्योपनिषन्मूलमन्त्राःसमाप्तिङ्गताः॥ ॐ तत्सत्॥ मात्रा सूक्ष्म मकार मानाके भावको, क्योंकि स्थूलका कारण सूक्ष्म है । अरु सूक्ष्म उकारमात्रा सर्वके कारण मकार मात्राके भावको, क्योंकि स्थूल सूक्ष्म सर्वकार्योको अपने कारण भावकी प्राप्ति होती है, इसप्रकार पूर्व पूर्वमात्रा उत्तरोत्तर मात्राके भाव- को प्राप्त होतीहैं । सो इसप्रकार सर्व ॐकार मात्र, रीति से ॐकारका ध्यान करके स्थितहुये, अरु जो एतावन्त काल पर्यन्त ॐकार रूंपसे ज्ञातकरी वस्तु, शुद्ध ब्रह्मही है। इसपूकार आचार्यके उपदेश से उत्पन्न हुये ज्ञान करके मकारपनेसे ग्रह- ण किये, जोपूर्वोक्त सर्व विभागोंका निमित्त अज्ञान तिसके क्षय होनेसे शुद्धब्रह्म विपे स्थितहुये पुरुषकी कहीं भी गति कहिये ग- मन सम्भवे नहीं, क्योंकि देशकालादिकों के परिच्छेद के अभाव से व्यापकता प्राप्त होनेसे ] मकारके क्षयहुये वीजभावके अभाव से अमात्ररूप ॐकार विधे । प्राप्तहुये को कहीं भी गति लो- कान्तर को गमना नहीं क्योंकि "ब्रह्मविहीवभवति" ब्रह्मका जाननेवाला 'व्यापक' ब्रह्मही होताहै २३॥ अथ उपनिपदर्थ -१२॥ हेसौम्य ![ॐकारका स्फुरणरूप जो प्रत्यक् चैतन्य है । अर्थात् ॐकारके स्फुरणसेलक्षित लक्ष्यरूप प्रत्यक् चैतन्य है। सो तिनमात्रावाले अध्यस्त (कल्पित)कारके साथ तादात्म्य- तासे ऊकार नामसे कहाजाताहै। तिसकी “अमात्रः" अ- मात्रहे. इत्यादिरूप यह घारहवीं संख्यावाली श्रुतिके मन्त्र . मांडूक्योपनिषद् । । । करके परब्रह्मके साथ एकता, कहनेको इच्छितहै, तिसको प्रकट करके व्याख्यान करते हैं ] fअमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्य पंचो पशमः शिवोऽद्वैत एवमोंकार आत्मैव । अमात्र है, चतुर्थ है, अव्यवहारहै, पंचके उपशमवाला है,शिवहै,अद्वैत है,ऐसे,अंकार आत्माही है, अर्थात् नहीं है मात्रा जिसकी ऐसा जो लक्ष्य रूप । ॐकार सो अमात्र है, अरु चतुर्थ कहिये तुरीय रूपहुआ केवल आत्माही है, अरु वाचक अरु वाच्यरूप जो वाणी अरु सन तिनको 'मूलाज्ञानके क्षयहुये, क्षीणहोनेसे व्यवहार करने को अयोग्यहुआ । आत्मा अव्यवहार्य है । अरु पूपंचके उपशम वाला होनेसे । अर्थात् सकारण प्रपंचके उपशमहुये आत्मापूकट भानहोता है ताते पंचके उपशमवाला है, वा अद्वैत आत्माके सम्यक् ज्ञानहोने से पूपंच उपशम भावको प्राप्त होताहै ताते प्रपंचके उपशमवालाहै । उसको प्रपंचोपशम, इस विशपणसे कहते हैं। अरु शिन (कल्याणस्वरूपहै)अरु अद्वैत है अर्थात जिस एक संख्याकी पूतियोगी दो संस्था अरु जोदो संस्थाकी पति- योगी एक संख्या तिनसे रहित, अर्थात् एक अरु दो, यह जो संख्याहै सो सापेक्षिक अरु सम विषम भाववालीहै, अरु आत्मा है सो सापेक्षता अरु समविपम भावसे रहित होनेसे सर्व संख्या- तीत अद्वेत है, वो संख्यावद्ध परिच्छिन्नतासे रहित होने करके सर्व संख्यातीत अद्वैत है। ऐसे उक्तपूकारके । ॐकारके लक्ष्य आत्माके । ज्ञातापुरुपकरके उच्चारण कियाहआ ॐकार विाचक वाच्यकी अभेदतास तीममात्रावाला अरु नीनपादवाला एक आत्माही हे हे सोम्योयहां एक यहभी विचार हे कि जैसेरज्जु विपे अध्यस्त जे सर्पवत् सर्परूप अरु तिसका नामसर्प, यह दोनों नाम नामीकी रज्जुकेअज्ञानमें एकताहै, अर्थात् उसअध्य- स्त सर्पका नामरूप दोनों रज्जुके अज्ञानमे कल्पित होने करके उस अज्ञानमें दोनोंकी एकनाहे । अरु रज्जुके ज्ञानहुये उनदोनों को कल्पित होनेसे उनकी असत्यतामें एकता है । अरु रज्जुके - रज्जु गौडपादीय कारिका प्रथम प्रकरण १। ७७ ज्ञानहुये उस कल्पितंसर्पके नामरूपका परिणाम सत्य रज्जुरूप है, क्योंकि उसकी रज्जुसे पृथक् सत्ता का अभाव है ताते। अरु जो जिसकी अन्तःस्थिति है सोई उसकी आद्यस्थिति है, अरु जो आद्यन्तःस्थिति सोई उसकीवर्तमान स्थिति है।तथाच आदो- वन्तेचअन्नास्ति वर्तमानेपि तंतथा "अव्यक्तादीनि भूतानि इत्यादि प्रमाणसे । अर्थात् रज्जु विपे भासमान जो सर्पः सो भ्रान्तिकालसे पूर्व द्वैतके अभावसे रज्जुरूप है अरु भ्रान्ति के निवृत्तकाल में भी.वो अपनी पृथक् सत्ताके अभावसे रूपंहे अरु भ्रान्तिकाल में जो अपने नामरूपसहित जोइतरवतू भासताहै सोई भ्रान्तिहै नतु सर्प, दंड,जलधारा, भूदरार,इत्यादि नामरूप से एक रज्जुही सुशोभितहै, अरु तिसं विपेजोःसादि कों का कथन व्यापार है.सो " वाचारम्भणं विकारो.नामधेयं” इत्यादि अतिप्रमाणसे वाचारंभणमात्रहीहै । हेसौम्य!इस दृष्टांत के विचारप्रमाणही रष्टान्त भूत अमात्रिक निर्विशेष तुरीय रूपं आत्माविपेभी विश्वादि तीनोंपाद अरु अकारादि तीनोमात्राका विचारजानना अरु सिंविशत्यात्मनाऽऽत्मानंयएवंवेद यएवंवेद" जोऐसे जानताहसो अपने आत्मरूपसे अपनेपरमार्थरूप आत्मा विपेसम्यप्रकार प्रवेशफरताहै,यहाँजो।'यएवंवेद, दोबारकहा, सो उपनिपकी परिसमाप्तिके अर्थहै अर्थात् जोउक्तप्रकार अिमा त्रिक चतुर्थ तुरीय आत्माको । जानता है सो अपनेही आत्मा चिदाभासरूप से अपनेपरमार्थरूप प्रत्यक् चैतन्यसाक्षी आ त्माविपेसम्यकप्रकार प्रवेशको पावताहै। अर्थात सपति नामवाले तृतीयस्थानरूप वीजभावको जोक्रमशःवाविनाही क्रमशःजाग्रत स्वप्नस्थानद्वयरूप अंकुरोत्पत्तिकाकारण स्थानरूपवीजको, चतुर्थ अमात्रिक तुरीय आत्माके । सम्यक् ज्ञानरूप अग्निसे दग्ध कर- के परमार्थदर्शी आत्मवत्ताओं के आत्माविषे प्रवेशको पाय पुनः जन्मको पात्रता नहीं अिर्थात् जैसे अंकुरद्वयके उत्पत्तिके स्थान रूप कारण बीजके दग्धहुये वीजान्तर जो एक महासूक्ष्म सत्ताहै ra . , जन मांडूक्योपनिपद् । सो अंकुर भावपूर्वक वृक्षभावको प्राप्त होती नहीं, तैसेही स्थल सूक्ष्म शरीर द्वयरूप अंकुर के उत्पत्तिका कारण स्थान अविद्या- मेक सुपुतिरूप वीजके, सम्यक् ज्ञानाग्नि करके दग्धहुये 'वी- जान्तर सूक्ष्म सत्तावत, सुपुप्तिरूपवीजान्तरतद्विशिष्ट जोचिदा- भास जीवसत्ता है सो उक्त अग्निद्वारा उक्तवीजके सम्यकप्रकार दग्धहुये पुनः स्थूल सूक्ष्म शरीरद्वयात्मक अंकुरभाव पूर्वक सं. साररूप वृक्षभावको प्राप्त होता नहींक्योंकि तुरीयाको मूला. ज्ञानके दग्धहुये । अवीजरूपता होती है ताते ।जैसे रज्जु अरु सर्पके विवेकके हुये रज्जुविपे प्रवेशको पाया जो सर्प, सो पुनः तिन । रज्जुसर्प । के विवेकी पुरुपको भ्रान्ति ज्ञानके संस्कार से पूर्ववत् । उदयों होता नहीं । क्योंकि उसविवेकी पुरुषको 'भ्रा- न्तिज्ञानका कारण अज्ञानरूपीज (जोकि सर्परूप अंकर अरु तज्जनित भयादिरूप वृक्षोत्पत्तिका निमित्त है, सम्यक् विवेक रूप अग्निसे दग्धहोता है ताते । तैसे यहां भी जानना। अरु साधक भावको प्राप्तहुये, सत्मार्ग में वर्तनेवाले, अरु मात्रा अरु पादोंकी सम्यकप्रकार निश्चित एकताके जाननेवाले, ऐसे जे मन्दमध्यम चुद्धिचाले संन्यासी हैं, तिनको तो उिक्तप्रकार मा. त्रा अरु पादों की अभेदतासे । यथार्थ उपासना किया ॐकार "एतदालम्बनंश्रेष्टमेतदालम्बनम्परम् , एतदालम्बनंज्ञात्वा ब्रह्मलोको महीयते " इत्यादि श्रुतियों के प्रमाणसे । ब्रह्मकी प्राप्ति (कममुक्ति) के अर्थ । अर्थात् केवल प्रणवोपासना का मध्यमाधिकारी संन्यासीको उक्तप्रकार यथार्थ त्रिमात्रिक प्रणव की उपासना से ब्रह्मलोककी प्राप्तिरूप आयान्तर फलहोय वहां ब्रह्माद्वारा अमात्रिक तुरीय आत्माका सम्यगलान होनेसे केवल्य मोक्षकी प्राप्ति है। परम आलम्बन है।तेसे अग्रिम कहेंगे “आ- थमास्त्रिविधा हीना इत्यादि"१२॥ इतिश्रीमांडूक्योपनिपन्मूलमन्त्रभापाभाप्यंसमाप्तम् ॥ अन्तत्सद्धरिःॐ॥
७६ गौडपादीय कारिका प्रथम प्रकरण १। गौडपादीयश्लोकाः॥ अंकारंपादशोविद्यात्पादामात्रानसंशयः । ॐका- रंपादशोज्ञात्वानकिञ्चिदपिचिन्तयेत् २४॥ युजीतप्रणवेचेतःप्रणवोब्रह्मनिर्भयम् । प्रणवेनि- त्ययुक्तस्यनभयविद्यतेक्वचित् २५॥ २४॥हेसौम्य! “पूर्ववदत्रैतेश्लोकाभवन्ति' पूर्ववत्यहांये गिो डपादाचार्यकृत । श्लोक होतेहैं ? [जैसे पूर्व गौडपादाचार्यने श्रु- त्यर्थके प्रकाशक श्लोक रचेहैं, तैसे पश्चात् भी उक्त आचार्यकृत श्लोक श्रुत्यर्थ विषे संभवे हैं, यह कहते हैं] fओंकारंपादशोवि- द्यात्पादामात्रानसंशयः पादही मात्रा हैं, अरु मात्राही पाद हैं, यामें संशय नहीं, अंकारको पादोंसे जानना अर्थात् उक्त प्रकारकी तुल्यतासे । विश्वादि । पादही मात्रा, अरु (अकारा- दि मात्राही पादहैं, इस विषय में कुछ भी संशयं नहीं, अरु - कार (आत्मा)पादों करकेही जानना । अरु । ॐकारं पादशो ज्ञात्वानकिञ्चिदापचिन्तयेत् । ॐकारको जानके कुछ भी चिः न्तन करना नहीं , अर्थात् ॐकार (तुरीय) को पादोंसे (वि- श्वादि पादोंकी विशेषतासे) जानके (निर्विशेप आत्माको अनुभव करके ) दृष्ट अर्थरूप (इसलोकके विपय) अरु अदृष्ट अर्थरूप (परलोकके विषय) प्रयोजन को चिन्तन करना नहीं क्योंकि सिर्वरूपसे एक ॐकार आत्माही है इसप्रकार का जाननेवाला कृतार्थ, (ज्ञातज्ञेय) होताहै ताते २४॥ गौडपादीय कारिका॥ २५॥ हे सौम्य! [ॐकारकेध्यानविषेकुशलपुरुषको सर्वद्वैतके अपवाद करनेवाले कारके सम्यक् ज्ञानसेही कृतार्थता होती है, इसप्रकार कहा । अव तिस ॐकारके ज्ञानसे रहित अरु परके उपदेशमात्रको आश्रय करनेवाले पुरुपके अर्थ ध्यानकी वर्तव्य- ता कहते हैं ] "युजीतप्रणवेचेत.प्रणयोनह्मनिर्भयम् । ॐ .
गौडपादीय कारिका प्रथम प्रकरण १। ८१ तर है । अरु इससे वाह्य अन्य वस्तुनहीं अतएव अवाय । अरु इसको कार्यता नहीं ताते अन पर है । अरु. इसका नाश नहीं ताते.अव्यय है “सवाह्याभ्यन्तरोएजः” “सैन्धवधनवदितिश्रु- तेः" इत्यर्थः २६॥ २७॥ हे सौम्य ! "सर्वस्यप्रणवोह्यादिमध्यमान्तस्तथैवच। सर्वका आदिमध्य पुनः तैसेही अन्तॐकारहै, अर्थात् जैसे माया का । किसी-शिल्पी आदिमायावी रचित. हस्तिं, रज्जुकासर्प; मृगतृष्णाका जल, अरु स्वामके पदार्थादिकों का. जो केवल भ्रांतिमात्र अध्यस्त हैं। आदि मध्य अरु अन्त, मायावी रज्जु ऊ: पर आदिक अधिष्ठान है। अर्थात् जो वस्तु अध्यस्त.(कल्पित) भ्रांतिमात्र होतीहै, तिसका आदि, अन्त, मध्य, अधिष्ठानरूपही होताहै। तैसेहीमिथ्या (भ्रांतिमात्र) उत्पन्न हुये आकाशादिक सर्व प्रपंचका आदि, मध्य, अरुं तैसेहीअंत, एक ॐकार तु. रीय आत्मा ही है, अर्थात् जैसे आकाश में जो नीलिमा की भ्रांति िकि आकाश से इतर नीलिमा कुछ वस्तु है; तिसभ्रांति काल के पूर्व वो नीलिमा आकाशरूप है, ताते उस कल्पित, नी- लिमाकी आदि आकाश है, अरु आकाश अरु तिस विप अध्यस्त नीलिमा तिनका जव यथार्थ विवेक होता है तब उस अभ्यस्त नीलिमा का परिणाम आकाशरूप होनेसे उसनीलिमाका अन्त भी आकाशरूप है, अरु जब वो नीलिमा अपने आदि अन्तमें आ काशरूप है तब अपनी पृथक् सत्ता के अभावसे अपने भ्रांतिरूप से वर्तमान काल में भी आकाशरूप है ताते उसका मध्य भी आ काशरूपा है। इसप्रकार आकाश में अध्यस्त नीलिमा तीनोंकाल अध्यस्तरूप है, तैसेही आकाशादि.सर्व प्रपंचं एक चैतन्य आत्मा विपे अध्यस्त होनेसे तीनोंकाल सोईरूप है | अरु. एवहिण- बंज्ञालाव्यश्नुतेतदनन्तरम् ऐसेही ॐकारको जानके तिसके. अनन्तर प्राप्तहोताहै, अर्थात् ऐसेंहीमायावीरज्जु आदिक स्थानी ॐकार (तुरीयआत्मा) को जानके तिसके अनन्तर (तिलही मांडूक्योपनिषद् । प्रणवोहीश्वरंविद्यात्सर्वस्यहदिसंस्थितम् । · सर्व व्यापिनमोंकारंमत्वाधीरोनशोचति २८॥ क्षणसे) तिस परमार्थ वस्तु के आत्मभावको प्राप्त होताहै "ब्रह्म चिौवभवति" २७॥ २८.हे.सौम्य ! "प्रणवंहीश्वरंविद्यात्सर्वस्यहृदिसंस्थितम, सर्वव्यापिन" सर्वकेहृदयविषे स्थितईश्वररूप कारको सर्व- व्यापी जानना, अर्थात् सर्वप्राणियों के समूह के स्मरणरूपवृत्ति के आश्रय हृदय विपे स्थित ईश्वररूप ॐकारको 'आकाशवत् सर्वव्यापी जानना । अरु ॐिकारंमत्वाधीरोनशोचति। धीर पुरुष ॐकारको मानके शोचता नहीं, अर्थात् सिर्व प्राणियों के हृदय विपे आकाशवत् महासूक्ष्म चैतन्य सर्वव्यापी जो आत्मा तिसको। बुद्धिमान् पुरुप असंसारी जिायदादि स्थान अरु तिनके धादिकोंसे असंग अलिप्त,सदाशुद्ध वुद्धि मुक्त स्वभाव मानके शोच करता नहीं क्योंकि उक्तप्रकारके आत्मा विषयक जो अज्ञान सोई अपने विपे जन्ममरणादि क्लेशसे जन्यशोक का निमित्त तिसका आत्माके सम्यक् ज्ञान से अभाव होताहै ताते "तरतिशोकमात्मविदिति” आत्मवेत्ता शोककोतरता है: २८॥ २६ हे सौभ्य! [अवतुरीयभाव को प्राप्तहुये ॐकार को जो सम्यक्प्रकार जानताहे तिसकी प्रशंसाकरते हैं] "अमात्रोऽनन्त मात्रश्चद्वैतस्योपशम:शिवः अमात्र है, अनन्तमात्रह, उपशमरूप है, शिवरूपहै, अर्थात् ॐिकारकालक्ष्य अमात्र(तुरीयपद है,अरु जिसकरके ॐकारका परिमाण कियाजाय ऐसा जो परिच्छेद, सो कहिये मात्रा । सो उक्त लक्षणवाली मात्रा हैं अनन्त जिस की ऐसा जो कार सो अनन्तमात्र है । अर्थात् इस आत्माका एतनापना। यह आत्मा एतना है, इसप्रकारका एतनापनाप- रिच्छेद करनेको शक्य नहीं, अरु द्वैतका उपशमरूप है अर्थात् सर्व द्वेतका उपशमआरमरूप है । अरु ऐसा होनेसेही शिवरूपहै। , गौडपादीय कारिका प्रथम प्रकरण १ । अमात्रोऽनन्तमात्रश्चद्वैतस्योपशमःशिवः । ॐ का रोविदितोयेनसमुनिर्नेतरोजनः २६ ॥ इति मांडूक्योपनिषदाविष्करणपरायांगौडपादीयकारिकायां प्रथममागमप्रकरणपूर्णम्तस्सद्धरिः ॐ ॥ इसप्रकार व्याख्यान किया fॐकारोविदितोयेनसमुनिनेंतरोज नः ॐकार जिसकरके विदित हुआहै सो मुनिहै इतर नहीं अर्थात् ॐकार जिसको सम्यक्प्रकार ज्ञातहुआ है सोई परमार्थ तत्त्वका मनन करता मुनि है, इससे इतरजन मुनि नहीं २६ ॥ इति श्रीमांडूक्योपनिषद्मूलसहितगौडपादीयकारिकाप्रथमा ऽऽगमप्रकरणभाषाभाष्यपूर्णम् ॐ तत्सद्धरिः ॐ॥ अथ गौडपादाचार्यकृतकारिकायांवैतथ्याख्यद्वितीय प्रकरणंभाषाभाष्यं प्रारभ्यते ॥२॥ १ हे सौम्य ! [प्रथम प्रकरणविपे आगमकहिये श्रुति तितकी मुख्यता करके अद्वैतको प्रतिपादन करनेवाले आचार्य ने तिस (अद्वैत) के विरोधी द्वैतका मिथ्यापना श्रुितिके अर्थ से कहा अव तिस अिद्वैतके विरोधी । द्वैतका मिथ्यापना 'यद्यपि सर्व में प्रधानजे श्रुति तिसके प्रमाणसे कहा है, तथापियुक्तिकी मुख्यता से भी द्वैितका मिथ्यापना। जानने को शक्य है । इसप्रकार देखावने के अर्थ । अर्थात् विचारवानों के मध्य प्रकट करणार्थ । द्वितीय प्रकरणको प्रकट करतेहुये, आदि विपे प्रपंचके मिथ्यापने में स्वप्न के दृष्टान्तकी सिद्ध्यर्थ तिस स्वप्नके मिथ्यापनेविपेअिर्थात् जिसवस्तुको दृष्टान्तप्रमाणसे, सत्यया असत्य, सिद्ध करनी है, तहां प्रथम उस वस्तुके दृष्टान्तकी, सत्यता वा असत्यताका सिद्ध करना अवश्य है एतदर्थ सर्व प्रपंचके मिथ्यापने के सिद्ध करने में दृष्टान्तप्रमाण जो स्वप्न तिसकी असत्यता की सिध्य.
८४ ८ मांडूक्योपनिषद् । ॐअथवैतथ्याख्यंद्वितीयंप्रकरणम् ॥ ॐवतथ्यंस-भावानांस्वप्नाहुर्मनीषिणः । अ- न्तःस्थानात्तुभावानांसंटतत्वेनहेतुना १ ॥ र्थ । युक्ति सहित वृद्धपुरुषोंकी संमतिको कहते हैं ] "ज्ञाते द्वैतं न विद्यत" इस वाक्यवाले । पञ्चीसवें श्लोक विपे “एकमेवा द्वितीयम्" । इत्यादि श्रुतियोंके प्रमाणसे, जो पूर्वद्वैतका मिथ्या- पनाकहा, सो आगममात्र । अर्थात् श्रुतिकी प्रधान प्रामाण्यया से व्याप्त । है, युक्तिसे सिद्ध नहीं, परन्तु तिस शास्त्रकरके ज्ञात हुये अर्थ । दैतके मिथ्यापने । विपे युक्तिकी प्राधान्यतासेभी द्वैत का मिथ्यापना जानने को योग्य है। क्योंकि प्रमाणों की आधि- क्यतासेनिश्चयहुई वस्तुविपे संशयरहेनहीं ताते। द्वितीयप्रकरण का आरंभकरते हैं " वैतथ्यंसर्बभावानांस्वप्नआहुर्मनीषिणः। बुद्धिमान स्वप्नवत् सर्व भावपदार्थों के असत्यपने को कहते अर्थात् प्रत्यक्षादि । प्रमाणोंके ज्ञातकरके कुशलजेश्रोत्रि- स अरुब्रह्मनिष्ठत्व उन उभयलक्षणों करके युक्त । बुद्धिमान् पुरुपहें सोस्सिन विषे उपलभ्यमान (अनुभव किये जे वाह्य के घटादि सर्व पदार्थ, अरु अन्तर (अन्तःकरण के सुखादिक । सर्व पदार्थोके असत्यपने को कहते हैं। अरु तिनके असत्यपने विषे हेतुको कहते हैं । अन्तःस्थानात्तु भावानां संवृतत्वेन हेतु- ना सर्व पदार्थोंको शरीरके, मध्यरूपस्थान वाले होने से, अर्थात् जिसकरके स्वप्न विपे हस्ति पर्वतादि सर्व पदार्थ कि जिनका शरीरके भीतर समाना किसीप्रकार भी संभव नहीं सो शरीरके भीतरही प्रतीत होते हैं,। 'उस अवस्थामें, शरीरसेवाहर नहीं, एतदर्थ सो सर्व (समकेपदार्थ) मिथ्या होनेकोही योग्य हैं । शंका । ननु, अन्तर्ग्रहादिकों के भीतर प्रतीयमान घटादिको के हुये, यह उक्त हेतु व्यभिचारी होवेगा, । यह आशंकाकरके। समाधान । कहते हैं । शरीरान्तर संकुचित स्थानवाले होनेरूप गौडपादीय कारिका द्वितीय प्रकरण २ । प्रदीर्घत्वाचकालस्यगत्वादेशान्नपश्यति । प्रति बुद्धश्चवैसर्वस्तस्मिन्देशेन विद्यते २॥ हेतुसे । अरु जो देहान्तर आवृत नाडियाह तिनविषे पर्वतहस्ति आदिकों का सद्भाव नहीं अरु जब देह विही पर्वतादिक नहीं तब देहान्तर्गत जो "ता वाअस्यैताहितानाम नाड्यो यथाक्लेशः सहस्रधा भिन्नस्तावताऽणिम्नातिष्ठन्ति, इत्यादि" इत्यादिश्रु- तियोंके प्रमाणसे ' खड़ेकेशके सहस्रवें भागप्रमाण अतिसूक्ष्म नाड़ियां जिोकि स्वप्नरूप भ्रान्ति दर्शनका स्थानहै । हे तिनविषे पर्वत हस्ति आदि कहांसे होवेंगे किन्तुकहीं भी कदापिनहीं। अतएवं स्वप्नके पदार्थ अिपने होनेयोग्य । देश (स्थान) से रहित होनेसे । अर्थात् जिनमहा सूक्ष्मनाड़ियों में स्वप्न होताहै तिनमें वाह्यके परमाणुका भी प्रवेशवनेनहीं तव वाहके पर्वत सागर वहां कैसे समायेंगे किन्तु कदापि नहीं, ताते वहां स्वप्नके पदार्थोंके होनेयोग्य स्थानके अभावसे । रज्जुसादिकोंवत् असं- त्यही होनेको योग्य हें ॥ २ हे सौम्य! शंकानिनु,स्वप्नविषे देखनेयोग्यपदार्थों का शरीर के भीतर आवृत कहिये संकुचित 'तंग, स्थानहै यह कथन अ- सिद्धहै, क्योंकि पूर्व के देशों में सोयाहुआ पुरुष उत्तरके देशोंविषे 'स्पप्नोंको देखेहयेवत् देखता है। यह आशंका करके समाधान; कहतेहैं, पूादिकके देशमें सोयाहुआपुरुप । शरीरसेवाह्य । उ- त्तरादिकोंके अन्यदेशोंमेंजायके स्वप्नोंको देखता नहीं, किन्तु शरीरके भीतरही अिर्थात पूर्वदिशाके किसी एक देशविपे सोया पुरुप जो उत्तरदिशाके किसी एकदेश विशेष सहित वहांके पदार्थों को स्वप्नविपे देखताहै सोशरीरसे बाह्यके उपदेशमेंजायके स्वप्न को नहीं देखता, किन्तु जैसे स्वप्नमें शरीरान्तर जिनवस्तुओं के स्थानके अभावसे भी 'समुद्र, पर्वत, हस्ति, आदिक पदार्थों को भ्रांतिकरके वां जायतके अध्यास संस्कार करके देसताहै तेसेही उसदेशको अरु पदार्थोंको देहान्तरही देखता है । अरु जिसकरके ६६ मांडूक्योपनिषद् । सोयाहुआ पुरुष, तत्कालही देहके (जहां सोयाहै ) देशसे सो योजनके अन्तरायवाले अरु मासमात्रके कालकरके प्राप्तहोने योग्य देशोंविषे स्वप्नोंको देखेहुयेवत् देखताहै । अरु उस देशकी प्राप्ति अरु वहाँसे पुनः आगमनके योग्य दीर्घकालहे नहीं अिर्थात् जिसकरके सोयाहुआ पुरुष जाग्रत्की निवृत्तिके तत्कालही स्वप्न को देखता है तहां जिसदेशमें सोयाहै तहांसे शतावधि योजनोंके अन्तराय (दूर) वाले,अरु एकमासदिवसकी अवधिसभी अधिक दिवसोंके कालसे प्राप्तहोनेवाले, देशोंको अरु वहां के पदार्थोंको जाग्रत्मेंदेखेहुयेवत् देखता है । परन्तु उस स्वप्नमें जिस दूरस्थ देशको देखताहे सोजहांसोयाहै तहांसे अतिदूरहै,अरु तिसदेशकी प्राप्त अरु वहाँसें आगमन अिर्थात् स्वप्नमें जिसदूरदेशको देखता है तहां जाने के अरु वहांसेस्वदेशमें आवने योग्य जो आपेक्षय दीर्घकाल सोहनहीं,क्योंकि जाग्रतकी निवृत्तिके क्षणही स्वप्न देखताहेअरुस्वप्नकी निवृत्तिकेक्षणही जिसदेशमें सोयाहैतिसही स्थानमें जाग्रत् होताहै, । एतदर्थ, "अदीर्घत्वाच्चकालस्य गत्वा देशान्न पश्यति। कालकी अदीर्घतासे देशोविजायके देखता नहीं, अर्थात् । वायकेदूर देशको जाय अरु वहांसे पुनः स्वदेश में आवे एतना । दीर्घकाल न होनेसे स्वप्नको देखनेवाला पुरुप अपने सोवने से अन्य देशमें जायके स्वप्नको देखता नहीं। किम्बा " प्रतिबुद्धश्चवेसर्वस्तस्मिनदेशेन विद्यते । जाग्रत् को प्राप्त हुये को निश्चय करके तिस देश में कुछ भी विद्यमान नहीं, अर्थात् स्वप्नका द्रष्टापुरुप जिस देशको स्वप्नमें देखता है।तिस स्वप्न दर्शनके देश विपे निश्चय करके प्रवोध (जाग्रत) को पायाहुआ है नहीं । अर्थात् जो कदापि स्वप्नका द्रष्टापुरुष अन्यदेश विपे जायके स्वप्नको देखता होय तो जिस देशविप जायके स्वप्न देखे तिसही देश विपे प्रयोध (जागरण) प्राप्त हुआ चाहिये, परन्तु सो होता नहीं, किन्तु जिस टेदा चिपे सोवता हे तहां ही जागता है । किम्वा रात्रि विप [गरी को गौडपादीय कारिका द्वितीय प्रकरण २। के अन्तरही स्वप्नका देखना होता है, इस प्रकार सिद्धहुये दूिरदेश के गमनागमन । योग्य काल के अभाव से स्वप्न का मिथ्यापना है, इस प्रकार कथन किये अर्थका वर्णन करते हैं, यहाँ यह अर्थहै कि, यद्यपि विो स्वप्नका द्रष्टापुरुष । रात्रिविषे सोवता है, तथापि दिवस में । सूर्यादि पदार्थ कि जिनका रात्रि में सर्वथा असंभव है । देखे हुयेवत् देखता है । अरु सोयाहुआ चक्षुरादि इन्द्रियों के संकोच हुये भी रूपादि विषयों को देखता है, अरु सोयाहुआ भी विचरता है अिर्थात् जाग्रत्की ज्ञानेन्द्रिय अरु कर्मेंद्रियों के उपराम हुये भी स्वप्न में उभय इन्द्रियों के व्यापारको करता है । अरु यद्यपि वो पुरुप संहकारियोंसे रहित 'अकेला, सोवता है, तथापि बहुत से । सहचारियों के साथ मिलाहुआ स्वप्न में स्वप्नके पदार्थों को देखता है । एतदर्थ दि. शान्तरके गमनागमन योग्य दिीर्घ । कीलके, अरु उिभयाई- द्रियोंके, अरु सहकारियोंके जिो दर्शनादिकोंकी मुख्य सामग्री है। अभाव हुये भी जो दूर देशादिरूप पदार्थों को देखता सुनता लेता देता आवाजाता आदिक व्यापार होता भासता है, ताते इस अनुमान लक्षणसे भी । स्वप्नका मिथ्यापना सिद्ध है ] सो- याहुआ पुरुष दिवसवत् । सूर्यादि । पदार्थों को देखता है, अरु वहुतों के साथ मिलता है । अरु जिों कदापि शरीर से बाह्य नि- कलके स्वप्न में किसी से मिलताहोय तो जिनसे मिलता है तिन्होंकरके जाग्रत् कालबिपे पहिचाना चाहिये, परन्तु उसकरके पहिचाना जातानहीं । क्योंकि जो सोयाहुआ पुरुष शरीरके वा- प्रदेशमें स्वप्नविषे मिलाहोय तो 'आज मैंने तुझको अमुक स्थानविषे देखाथा, इस प्रकार तिसपुरुप ने । कि जिसके साथ स्वप्नका द्रष्टा स्वप्न में मिला है। कहना चाहिये, परन्तु इस प्र- कार कोई किसीसे कहता नहीं। अतएव स्वप्नविषे अन्यदेशको जातानहीं। हे सौम्य! यहपुरुप स्वप्नविपे जिनपदार्थों को देखता है सो चिरकाल तैसाही न रहके अति शीघ्र अन्यभावको प्राप्त मांडूक्योपनिपद् । अभावश्चरथादीनांश्रूयतेन्यायपूर्वकम् । वैतथ्यंते- नवैप्राप्तस्वप्नआहुःप्रकाशितम् ३॥ हुआ देखताहै । अर्थात् प्रथम मनुष्यको देखताहै, देखतेही देखते तिसही क्षणमें उसही को वृक्षादिरूपसे देखने लगता है, अरु मथुरादि देशोंको देखता २ उसही क्षणमें उसको काशी आदिक देशोंको देखता है वा मिश्रित वा विपरीत देशकाल प्रामादिकों को देखता है, तैसा वाह्यका देशादिक अति अल्पकालमें अन्यथा भावको पावते नहीं, मनुष्य वृक्षाकार होते नहीं। इत्यादिक स्वप्नके अरु पाह्यके देशकाल वस्तु आदिकों में व्यभिचार ता. रतम्यताके देखने से भी, अरु चिरकालके मृतकहुओं को भी स्वप्नमें देखनेसे 'कि जिनका उस स्वप्नकालमें पाहोना सर्वथा असंभव है, यह स्पष्ट सिद्धहै कि रवप्नकाद्रष्टा शरीर के बाह्यके देशों में जायके स्वप्न देखता नहीं २॥ ३॥ हे सौम्य ! इस अग्रिम कहनेके हेतुसेभी स्वप्नधिपेदेखने योग्य पदार्थ सर्व मिथ्या है । क्योंकि । अभावश्चरथादीनांधूयते न्यायपूर्वकम् । स्थादिकों का अभावन्यायपूर्वक सुनते हैं अर्थात जिसकरके खप्नविप देखने योग्य (देखेहुये)जे रथादिकतिनका अभाव “ नतत्ररथानरथयोगानपंथानोभवति, इत्यादि श्रुतिः" तहां रथनहीं, रथमें योजना करने योग्य अश्वचक्रादि नहीं, अरु । रथके मार्गभी नहीं होते ? इत्यादिक श्रुति करके न्याय (युक्ति) पर्वक श्रवण करते हैं। अतएव । वैतथ्यतनवैप्राप्तस्वप्नआहुः प्रकाशितम् । तिससे स्वप्न विपे प्राप्तहुआही मिथ्यापना प्रकाशित किया कहते हैं । अर्थात् तिता स्वप्नद्रष्टा के। शरीर के मध्य । महासूक्ष्म | नाडीरूप स्थान वि संकोचको प्राप्तहोने (स्थानके अभार) आदिक हेतु से स्वप्न विपे प्राप्त हुआही जो मिथ्यापना, तिसको अनुवाद करने वाली अर स्वप्नविपे आत्माके.यज्योतिपने प्रतिपादनविषे नत्पर जो - -- ह . गौडपादीय कारिका द्वितीय प्रकरण २ । अन्तस्थानात्तुभेदानांतस्माज्जागरितेस्मृतम् । यथा तत्रतथास्वप्नेसंस्तत्वेनभिद्यते ४॥ यह बृहदारण्यक उपनिर्पद् सम्बन्धी श्रुतिहै, तिसने प्रकाशित कियाहै, इसप्रकार ब्रह्मवेत्ता कहते हैं ३ ॥ ४ हे सौम्य! [उक्त रीतिसे स्वप्नरूप दृष्टान्तके असत्पनेके। सिद्धहुये, फलित अर्थरूप अनुवादको कहतेहैं ] "अन्तस्थानात्तु भेदानां तस्माज्जागरितेस्मृतम् । यथातत्रतथास्वने संवृतत्वेन भिद्यते। जैसे तहां स्वप्नमें है, तैसे जाग्रत् विषे भीहै । ताते जाग्रत्विष जान्या है, भेदको प्राप्तहुये को संकोच को प्राप्तहोने करके भेदको पावताहै । अर्थात् जैसे तिस स्वप्नविषेहै, तैसेही तिस जाग्रत्विपे भीहै, तस्मात् जाग्रन्त्रिपे भी तैसेही जान्याहै। परन्तु स्वान विषे जाग्रत्के पदार्थोंसे भेदको प्राप्तहुये पदार्थोंको शरीरके मध्य । सूक्ष्मनाड़ी। रूप स्थानवाले होनेसे जाग्रत्से स्वप्न भेदको पावताहै । इसका यह अभिप्राय है कि जाग्रतविपे दृश्य पदार्थोंको यावत् इन्द्रियादिकोंका विषयहै तिनसर्वको। मिथ्यापनाहै, यह तो प्रतिज्ञाहै, क्योंकि दृश्य इन्द्रियादिकों का विषय है ताते । यहहेतु है । अरु, स्वप्नविषे सर्व दृश्य पदा- अॅवत्, यह दृष्टान्त है अरु जैसे तिस स्वियोग्य स्थानके अभाव वाले स्वप्नविपे दिखेहुये वा देखने योग्य । दृश्य पदार्थोंका मिथ्यापनाहै, तैसे जाग्रविये दृश्यपना । दृश्यपदार्थोंको मिथ्या- पना । समानहीहै, यह हेतुका उपनयहै। एतदर्थ जाग्रधिपे भी मिथ्यापना जान्याहै यह निगमन है। अरूं शरीरके मध्य सूक्ष्मनाड़ी रूप स्थानवाले होनेसेअरु संकोचको प्राप्तहोनेकरके स्वमविपे दृश्य पदार्थोंका जाग्रत्के दृश्य पदार्थोंसे भेद भासता है । अरु विास्तवकरके । दृश्यपना अरु मिथ्यापना जाग्रत् अरु स्वप्नविषे तुल्यही । अर्थात् जैसे स्वप्नका दृश्य अपने योग्य स्थान के अभावसे सत्य न होयके केवल भ्रान्तिमात्रहीं है, तेसेही 4 80 मांडूक्योपनिषद् ।। स्वप्नजागरितेस्थानेह्येकमाहुर्मनीषिणः । भेदानांहि समत्वेनप्रसिद्धनवहेतुना ५.॥ जागत्का सर्व दृश्य अपने योग्य स्थानके अत्यन्त अभावसे के- वल भ्रान्तिमात्रहीहै । क्योंकि एक अद्वैत निराकार परिपूर्ण वि- ज्ञानघन चैतन्यके शिलवत् सर्वत्र सघन अस्तित्वमें तिससे पृथक् रीति स्थानका अभाव है, अतएव जायत् अरु स्वप्न, इन उभय स्थानकास्थूल सूक्ष्म यावत् इन्द्रियादिकोंका विपय दृश्य प्रपंच है सो स्वयोग्य स्थानके अत्यन्तअभावरूप. हेतुसे केवल भ्रान्ति- मात्रही है। ऐसा ब्रह्मवेत्तोंका निश्चितार्थ है इति सिद्धम् ४ ॥ ५. हे सौम्य! स्वप्नजागरितेस्थाने ह्येकमाहुर्मनीषिणः । भेदा- नाहिसमत्वेनप्रसिद्धेनैवहेतुना भेदोंको प्राप्तहुये को प्रसिद्ध हेनुसे समानता करकेही मननशील स्वप्न अरु जाग्रत् इन उभय स्थानोंको एकसेही कहतेहैं । अर्थात् । परस्पर उक्तप्रकार भेद को प्राप्तहुये जे जाग्रत् अरु स्वामके पदार्थ तिनको ग्राह्य अरु ग्राहक होनेसे दृश्यतारूप प्रसिद्ध हेतुकरके समानता होनेसे, मनीपी । मननशील विवेकी । जन, सो, स्वप्न अरु जाग्रत् इन ' दोनों स्थानों के एक (तुल्य) ही कहतेहैं। यहां [जाग्रत् अरु स्वप्नविपे वर्तमान परस्पर भेदवाले पदार्थोंका ग्राह्यपना और ग्राहकपना समानहै । अरु तिस दृश्यरूप । हेतुसे तिनका मि- ध्यात्यकरके समभाव प्रसिद्धही है। अरु तिसप्रिसिद्धसमभावरूप हेतुकरके विवेकी पुरुपोंको जाग्रत् अरु स्वप्नरूप दोनों स्थानोंकी एकता वांछितहै। इसप्रकार जो पूर्व अनुमान नाम प्रमाण सिद्ध किया, तिसही का उभयस्थानोंकी एकतारूप, फल इसश्लोक करके कहाहै। इसप्रकार श्लोककी योजनासे देखावते हैं ] यह पूर्व सिद्ध प्रमाणका ही फल कहा ५ ॥ ६हेसोम्य भेदको प्राप्तांपरस्परमें विलक्षणांहयेजाधिपेजे दृश्यपदार्थ तिनका आदि अरु अन्तविपे अभाव होनेसे अर्थात् या:
. गौडपादीय कारिका द्वितीय प्रकरण २ । आदावन्तेचर्यन्नास्तिवर्तमानेपितत्तथा । वितथैः सदृशाःसन्तोऽवितथाइवलक्षिताः६॥ वत् उत्पत्तिमान पदार्थह सोसर्वअपनी उत्पत्तिसे पूर्व अभावरूपहें, अरु उत्पत्तिमान् पदार्थकोअन्तवालाहोनेके निश्चयसे,सोउत्पत्ति मान् वस्तुअपने अन्तके पश्चात् भीअभावरूपहै।इसकहनेके हेतु सेभी तिनका मिथ्यापनाहै आिदावन्तेचयनास्ति वर्तमानेपित- तथा जो आदिविपे अरु अन्तविपे नही है सो वर्तमानमें भी तैसाहीहै अर्थात् जो मृगतृष्णादिवस्तु आदि विषे अरु अन्त विषे नहींहै, सो अपने वर्तमान कालविपेसी है नहीं, यह लोकविये निश्चितहै । अरु वितथैः सदृशाःसन्तोऽवितथा इवलक्षिनाः। मिथ्यासे सदृशहुयेसन्तेभी अमिथ्या (सत्य) वत् जानतेहैं; अर्थात् तैसेही यह भेदको प्राप्तहुये जाग्रत् के दृश्यपदार्थ अपने आदि अन्तविणे अभाव रूपहोनेसे मृगतृष्णा आदिक मिथ्या पदार्थोंसे तुल्यहुये ( तुल्य होनेसे) सन्ते मिथ्याहीहै । तथापि वो अनात्मज्ञानी मूढ पुरुषोंकरके सत्यवत् जाने जातेहै ६ ॥ ७ हे सौम्य! उिक्तार्थपर वादीशंका करताहै ।। ननु, स्वप्नके दृश्य पदार्थोंवत् जाग्रत्के दृश्य पदार्थोगोभी असत्पना कहा सो अयुक्तहै । अरु जाग्रत्के दृश्य जे अन्न पान अरु वाहनादिकहै, सोक्षधा तृपा आदिकोंकी निवृत्तिको अरु गमनागमन आदिरूप कार्य (व्यवहार ) को करतेहुये प्रयोजन सहित उनको देखते हैं, अरु स्वप्नके दृश्य पदार्थोको वो प्रयोजन सहितपनाहे नहीं। ताते स्वनके दृश्यपदार्थांनत जाग्रत्के दृश्यपदार्थोका असत्पना मनोरथ (कल्पना) मात्र है । इसप्रकारका जो वादीका कथन सो वने नहीं, क्योंकि " सप्रयोजनतातेपां स्वप्नेविप्रतिपद्यते । तिनकी सप्रयोजनता स्वप्नविपे विरोधको प्राप्तहोतीहै अर्थात् जिसकरके जाग्रतविपे उन अन्नपानादिकोकीजोप्रयोजनसहित- ताको देखतेह सोस्यानविषे पिरोधको प्राप्तहोती है। जैसे स्वनाविप ६२ मांडूक्योपनिषद् । सप्रयोजनतातेषांस्वप्नेविप्रतिपद्यते । तस्मादायत तत्वेनमिथ्यैवखलुतेस्मृताः७॥ अन्नादिक भोजन अरु जलादिक पानकरके आतृप्त हुआ पुरुप भी जब उत्थान (जायत् ) को पावताहै तव अपने को क्षुधा तृषाकरके युक्त अतृप्तही मानताहै । तैसेही जागत्विषेभी भोजन पानादि करके तृप्त,क्षुधा तृषारहित होयके सोयाहुआपुरुप,तत्का- लही स्वप्नमें क्षुधा तृपादिकरके अति पीडित दिनरात्रिविषे जल पान अरु भोजनसे रहित अपने को मानता है । अतएव जाग्रत्के दृश्यों का स्वप्नविषेभी विरोध देखाहै अिर्थात् जैसे स्वप्नम भोजन पानादिकरके तृप्तहुआ पुरुषजव जागताहे तव अपनेको क्षुधातृपा करके युक्तहीदेखताहै ताते यह निश्चय होता है कि स्वप्नविपे किया खानपानादि सर्वदृश्य जायतहुये असतही होताहै, तैसेही जायत् में सम्यक् प्रकार खान पानादिकरके आतृप्तहुआ पुरुप सोवता है तब तत्कालही स्वप्न में अपने को क्षुधातृपा करके पीड़ित देखता है, तिसकरके यह निश्चय हुआ कि जाग्रत्के खानपान तृप्ति स्वप्न- वानको असत्यही है । अरु जाग्रत् में जाग्रत् सत्य अरु स्वप्न असत्यहै अरु स्वप्नमें स्वप्नसत्य अरु जाग्रत् असत्य है, ताते इन दोनों की सत्यता असत्यता सापेक्षिक अरु व्यभिचारी है ताते दोनोंही असत्य भ्रान्तिमात्र हे ताते तिन जायत् के दृश्यों का भी असत्यपना स्वमके दृश्योंवत् शंकाकरने के योग्यनहींअर्थात् जैसे स्वप्नके दृश्यों के असत्पने में शंका नहीं,तेसेही जायत्के दृश्योंके भी असत्पने में शंका नहीं, अरु जिनको हे तिनको भ्रान्ति है। ऐसा हम मानते हैं . ' तस्मादाधन्ततत्त्वेन मिथ्येवखलुतेस्मृ ताः। ताते आदि अन्तवाले होने से वे निश्चय करके मिथ्या ही जानने अर्थात् तिसकरके आदि अरु अन्त करके युक्तपना जाग्रत् अरु सप्त इन दोनों विपे समानहीं है, । तात तिस आदि अन्तवाले होने करके वे मननशील जाग्रत् के दृश्यों को , ६.३ गौडपादीय कारिका द्वितीय प्रकरण २। 'अपूर्वंस्थानिधर्मोहियथास्वर्गनिवासिनाम् । तानयं प्रेक्षतेगत्वायदैवेहसुशिक्षितः निश्चय करके मिथ्याही जानते, मानते, कहते हैं ७॥' ८ हे सौम्य! [पुनः वादी शंकाकरेहै । ननु स्वप्न अरु जाग्रत्के पदार्थोको तुल्यहोनेसे जाग्रत्के पदार्थोंका जो असत्पना कहा, सो असंगतहै, क्योंकि दृष्टान्तको असिद्धताहै ताते । कैसे कि जाग्रत्विषे देखेहुये ये पदार्थही स्वप्नविपे देखतेहोवें ऐसा नहीं किन्तु स्वप्नविपे अपूर्व पदार्थोको देखताहै। क्योंकि जिसकरके स्वप्नविपेचारदांतवाले हस्तिपर आरूढ़ अष्ट भुजावाला आपको देिखता मानताहै, अरु अन्य तीननेत्रवान्पनादिक भी अपने विषे देखता मानताहै । इत्यादि प्रकार अपूर्व ( पूर्वनदेखे ) को स्वप्नविषे देखताहै, एतदर्थ स्वप्न अन्य असत्यके तुल्य नहीं, किन्तु उक्तरीत्या सत्यही है । याते जागत् के मिथ्यापने के साधनेविपे जो स्वप्नका दृष्टान्तहै सो असिद्धहै, एतदर्थ स्वप्नवत् जो जागत् को असत्पना कहाँ सो अयुक्तहै,। इसप्रकारका जो वादीका कथन सो वने नहीं। क्योंकि, हे वादिन् ! स्वप्नविषे देखेहुये पदा- थोंको जो तू अपूर्व मानताहै, सोतो जड़होनेकरके स्वतः सिद्ध - नहीं है, किन्तु अपूर्वंस्थानिधर्मोहियथास्वर्गनिवासिनाम् । अपूर्व स्थानीका ही धर्म है, जैसे स्वर्गके निवासियोंकाहै अर्थात् सो अपूर्व स्वप्नके द्रष्टारूप स्वमस्थानवाले तैिजसरूप । स्थानीकाहीधर्महो। जैसे स्वर्गकेनिवासीइन्द्रादिकोंका सहस्राक्ष पनाआदिकधर्म,,तसे यह अपूर्व स्वप्नस्थानीस्वानके द्रष्टाका धर्म है,द्रष्टाके स्वरूपवत् स्वतः सिद्ध नहीं अर्थात् स्वर्गरूप स्थानको प्राप्त हुयेकोवहांकास्थानीपना अरुस्थानके सम्बन्धसे सहस्राक्षप- नादि धर्म उसके होतेहैं, अरु जब वो इसलोकरूप स्थानको प्राप्त होताहे तब यहाँका स्थानीपना अरु द्विभुजादिक धर्म उसके होते हैं, तातेस्थानके सम्बन्धसे प्राप्तहुये धर्म उस स्थान के स्वरूपवत् ६४ मांडूक्योपनिपद् । स्वप्नदत्तावपित्वन्तश्चेतसाकल्पितन्वसत् । बहि श्चेतोगृहीतंसहतंवैतथ्यमेतयोः ॥ स्वतः सिद्ध न होने से रात हैं, क्योंकि जब वो स्वर्गकास्थानीय होताहै तब वहां उसके द्विभुजादि धर्म न होयके सहस्रनेत्र चतु- (जादि धर्महोतेहैं, अरु जव वो इसलोककास्थानी होता है तब यहां उसके सहस्रनेत्रादि धर्म न होयके द्विभुजादि धर्महोताहै, ताते स्थानमें अरु स्थान सम्बन्धी धर्मो में व्यभिचारके होनेसे वे असत् हैं अरु उस स्थानीके वास्तविक स्वरूप में व्यभिचार न होने से वो सत्यहै । तैसे ही आत्माको स्वप्नकास्थानी होनेसे वहाँका अपूर्वदृश्य उसका धर्महोताहै सपूर्व नही, अरु जब वो जाग्रत्का स्थानी होताहै तब यहांका सपूर्व उसका धर्महोताहै अपूर्व नहीं, अरु जैसे जाग्रत् स्वप्नरूप स्थानोंका परस्परमें व्यभिचारहै तैसे तिनसम्बन्धी सपर्व अपूर्व दृश्यरूपधर्मों में भी व्यभिचारहै परन्तु उभय स्थानके स्थानीरूप आत्माके अव्यभिचारी स्वरूपचत् स्वतः सिद्ध न होने से दोनों स्थान अरु तत्सम्बन्धी धर्म दोनों तुल्यही असत्हैं । अरु | तानयंप्रेक्षतेगत्वा यदेवेहसुशिक्षितः। तिनको यह जायके देखताहै जैसेही यहां सम्यक् शिक्षापाया। देखताहै। अर्थात् तिन इसप्रकारके अपने चित्तके विकल्परूप अपूर्व पदार्थों को यह स्थानी स्वप्नका द्रष्टा स्वामरूप स्थानविपे जायके देखता है, जैसे यहां लोकविषे शिक्षाको पाया । पुरुप जो देशान्तरका मार्गहे तिसमार्गसे देशान्तरको जायके तिन ( देशान्तरके प. दार्थों को देखता है, तद्वत् । एतदर्थ रज्जु सर्प अरु मृगतृष्णादिक स्थानीके धर्ममा असत्पना है, तेसे स्वमविपे देखेहुये अपूर्वदृश्य पदार्थाको स्थानीका धर्मपनाही है एतदर्थ असत्पना भी है। ताते स्वप्न के दृष्टान्तका । अर्थात् जाग्रत्के दृश्य पदार्थों के असत् होने में जो सनरूप दृष्टान्त तिसके असत्पनेका असिद्धपना नहीं किन्तु उसका असत्पना सिही है। ८ ॥ । -- ६४. ...', मांडूक्योपनिपद् । स्वप्नत्तावपित्वन्तश्चेतसाकल्पितन्त्वसत् ।। हि श्चेतोगृहीतंसहतंवैतथ्यमेतयोः ६॥ स्वतः सिद्ध न होने से असत् हैं, क्योंकि जवं वो स्वर्गकास्थानीय होताहै तब वहां उसके द्विभुजादि धर्म न होयके सहस्रनेत्र चतु. (जादि.धर्महोतेहैं, अरु जब वो इसलोककास्थानी होता है तब यहां उसके सहस्रनेत्रादि धर्म न होयके द्विभुजादि धर्महोताहै, ताते स्थानमें अरु स्थान सम्बन्धी धर्मों में व्यभिचारके होनेसे वे असत् हैं अरु उस स्थानीके वास्तविक स्वरूपमें व्यभिचार न होने से वो सत्यहै । तैसे ही आत्माको स्वप्नकास्थानी होनेसे वहांका अपूर्वदृश्य उसका धर्महोताहै सपूर्व नहीं, अरु जब वो जामत्का स्थानी होताहै तब यहांका सपूर्व उसका धर्महोताहै अपूर्व नहीं, अरु जैसे जाग्रत् स्वामरूप स्थानोंका परस्परमें व्यभिचारह तसे तिनसम्बन्धी सपूर्व अपूर्व दृश्यरूपधर्मोमेंभी व्यभिचारहे परन्तु उभय स्थानके स्थानीरूप आत्माके अव्यभिचारी स्वरुपयत् स्वतः सिद्ध न होने से दोनों स्थान अरु तत्सम्बन्धी धर्म दोनों तुल्यही असतहें । अरु " तानयंप्रेक्षतेगत्वा यदेवेहसुशिक्षितः तिनको यह जायके देखताह सही यहां सम्यक् शिक्षापाया। देखताहे, अर्थात् तिन इसप्रकारके अपने चित्त के विकल्पररूप अपूर्व पदार्थों को यह स्थानी स्वप्नका द्रष्टा स्वप्नरूप स्थानयिपे जायके देखता है, जैसे यहां लोकविषे शिक्षाको पाया । पुरुपाजो देशान्तरका मार्गहै तिसमार्गसे देशान्तरको जायके तिन । देशान्तरके 14. दार्थीको देखता है, तद्वत् । एतदर्थ रज्जु सर्प अरु मृगतृष्णादिक स्थानीके धर्मशा असत्पना है, तेसे स्वमविपे देखेट्टये अपूर्वदृश्य पदार्थाको स्थानीकाधर्मपनाही हे एतदर्थ असत्पना भीह । ताते स्वप्न के दृष्टान्तका । अर्थात् जाग्रत्के दृश्य पदाथोंके असत् होने में जो स्वप्नरूप दृष्टान्त तिसके असत्पनेका मिसिद्धपना नहीं किन्तु उसका असत्पना सिद्धही है। 5 ॥
गौडपादीय कारिका द्वितीय प्रकरण २। 'जायद्वत्तावपित्वन्तश्चेतसाकल्पितन्त्वसत् । वहिश्चेतोगहीतंसद्युक्तंवैतथ्यमेतयोः १० ॥ ६.हे सौम्य जाग्रविये देखनेयोग्य पदार्थोकाजो मिथ्यापना है सो तिसविषे सत् अरु असत्के विभागकी प्रतीति से विरुद्ध है यह शंकाकरके तिसको दृष्टान्त से समाधान करते हैं ] स्वप्नरूप दृष्टान्तके अपूर्वपने की शंकाका निषेध करके, पुनःजायत के पदा' थोकीस्वप्नके पिदार्थोंसे तुल्यताकोवर्णन करतेहुयेकहतेहैं " स्वप्न वृत्तावपित्वन्तश्चेतसाकल्पितन्वसत् । ६.स्वप्नवृत्ति विपे भी अन्तर तो चित्त से कल्पित असत् है, अर्थात् स्वप्नवृत्ति (स्वप्ना- वस्था)रूपस्थानविपेभी शिरीरको अन्तर तो चित्तसे मनोरथ करके कल्पना किया वस्तु तो असतहै, क्योंकि अन्य कल्पना व सङ्कल्पके उत्थानके । समकालही तिसका अदर्शनहै ताते।अरु विहिश्चेतोगृहीतं सदृतंवैतथ्यमेतयोः वाह्य चित्तसे ग्रहण किया असत् है इनका मिथ्यापना देखाहै । अर्थात् तिसही स्वप्न विषे वाह्यचित्तकरके चक्षुरादि इन्द्रियों द्वारा ग्रहण किया जो घटादि वस्तु सो सत्य है । असत्य है, इसप्रकार निश्चय किये हुये भी सत् अरु असत्य का विभाग देखाहै । अरु इन अन्तर अरु बाह्य चित्तसे करपनाकिये दोनों वस्तुओंका । कलित होनेसे मि- ध्यापनाही देखाहै ॥ १० हे सौम्य! जागद्वत्तावपित्वन्तश्चेतसाकल्पितन्त्वसत् जागतकी वृत्तिबिये भी अन्तर तो चित्तसे कल्पना तो असत् है, अर्थात् जाग्रत की वृत्तिरूपस्थानविपेभी अन्तरचित्तकरके कल्पना किया बस्तु तो असत् है । अरु घिहिश्चेतोरहीतंसधुक्तवतर्य मेतयोः । बाहिर चित्तसे ग्रहणकिया सतहै इनको मिथ्यापना ही युक्त है, अर्थात तिसही जागविपे वायचित्तसेचक्षुरादिइंद्रियों द्वारा गृहणकिया घटादिवस्तु सत्है । असत् है इसप्रकार निश्चय कियेहुये भीसत् असत्का विभागदेखाहै। अरु इनसत् अरु असत् मांडूक्योपनिषद् । उभयोरपिवैतथ्यभेदानांस्थानयोर्यदि । एकतान्व- ध्यतेभेदान्कोवैतेषांविकल्पकः ११॥ का मिथ्यापना युक्तहीहै,क्योंकि अन्तर अरुवाह्य चित्तसे कल्पित पनेकी तुल्यताहै ताते १०॥ ११ हे सौम्य! अव सर्वको मिथ्यापनाहोनेसे प्रमाता प्रमाणा- दिक व्यवहारका असम्भवहोनेसे, पूर्ववादीविशेप शंकाकोकरता हुआ कहे है " उभयोरपिवैतथ्यं भेदानांस्थानयोर्यदि। यदि उभयस्थानोविये भेदोंको मिथ्यापनाही है । अर्थात् जव जागत् अरु स्वप्नइन उभय स्थानोंविषे पदार्थोंके भेदोंका मिथ्यापनाही है, तब एकतान्वुद्धयतेभेदान् कोवेतेपविकल्पकः। भेदों को कौनजानेगा अरु तिनका निश्चयकरके विकल्पक कौन होवेगा; अर्थात, इन अन्तर अरु वाह्य चित्तसे कल्पना किये जे पदार्थों के भेद तिनको कौनप्रमाताजानेगा अरु तिनका निश्चयकरके वि. कल्प (कल्पना) करनेवाला कौन होगा। यहां अभिप्राय यह है कि तिनकी स्मृति [यहां यह अर्थहै कि कार्यकाकर्ता जोहै सो पर्व अनुभवकिये कार्यको स्मरणकरके तिनके सदृश जातिवाले अन्य कार्योको,इसप्रकार स्मृतिअरु अनुभवके आश्रयके आक्षेपसे को का आक्षेपकहनेको इच्छितहै । तैसा होनेसे सर्वके मिथ्यापनेके सिद्धहुये कर्त्ता आदिकोंके व्यवहारका असंभव निवारण करनेको अशक्य होवेगा ] अरु अनुभवाविपे आश्रय कौन होवेगा, जो अध्यात्मरूप प्रमाता (बुद्धिरिशिष्ट चैतन्य जीव) है अरु जे अधि- देवरुप जगत्का का ईश्वरहे, यह दोनोभी मिथ्या, इसप्रकार अगीकार करनेसे प्रमाता आदिकोको असत्पना होवेगा, यह शंकाकरके पूर्ववादी कहताहै । यहां यह अर्थहै कि 'जय प्रमाता वाकर्ता तुम्हींकरके अंगीकार नहीं किया है, तब, तुमको निरात्म भाव (शून्यपना) अभीष्टही होवेगा, परन्तु सो देखनेको शक्य नहीं । उसका देखनाअशक्यहे । क्योंकि आत्माविपे चिक्षुरादि ६७ गौडपादीय कारिका द्वितीय प्रकरण २। कल्पयत्यात्मनात्मानमात्मदेहःस्वमायया । सएच बुझ्यतेभेदानितिवेदान्तनिश्चयः १२ ॥ करणों इिन्द्रियों की प्रवृत्तिका असंभव है, अरु निषेधकरनेवाला ही आत्माहै ताते, ] जब उनका कोई भी प्रमाता (प्रमाणकर्ता) वा कर्त्ता न मानेगे तव तुमको निरात्म (शून्य ) वाद अभीष्ट होवेगा ११॥ १२ हे सौम्य! कल्पयत्यात्मनात्मानमात्मदेहःस्वमायया। आत्मारूपी देव अपनेविपे अपनी मायासे आपकरके अपनेको कल्पताहै । अर्थात् [अवसिद्धान्ती कती अरु कार्यादिकोंकी व्य- वस्थाके असंभवको दूर करताहै ] जो आत्मारूपी देव अपनेविषे स्वमायासे आपकरके आपको रज्जु आदिकोंविपे सर्पादिकोंवत् अग्रिम कहनेके भेदके आकारवाला दिही कल्पताहै । अरुसि- एवबुध्यतेभेदानितिवेदान्तनिश्चयः ४ सोई ही भेदों को जानता है ऐसा वेदान्तका निश्चयहै अर्थात् तैसे सोई। आत्म- देव तिन भेदोंको जानताहै, इसप्रकारका वेदान्त (उपनिषद् वा ब्रह्ममूत्र) शास्त्रका निश्चयहै। एतदर्थ अनुभवज्ञान अरु स्मृति ज्ञानका आश्रय आत्मदेवसे। अन्य नहीं । अरु क्षणिकवादियों- - वत् अनुभवज्ञान अरुस्मृतिज्ञान निराश्नयनहीं। इत्यभिप्रायः१२॥ १३हे सौम्प!प्रश्न । कौनसकल्पकरताहुआकिसप्रकारसेकल्प- नाहै, तहाँ। उत्तर कहते हैं, "विकरोत्यपरान्भावानन्तश्चित्ते व्यवस्थितान् , नियतांश्चवहिश्चित्त एवंकल्पयतेप्रभुः। प्रभु . पदार्थोंको चित्तके अन्तर स्थित नियमित पुनः अनियमितपदा- अॅको नाना करता है, अर्थात् प्रभु (समर्थ) जो ईश्वर आत्मा है सो याह्य चित्तवालाहुआ बाह्य अपर 'लोकप्रसिद्ध, शब्दादि रूपपदार्थोंको, अरु अन्य शास्त्रप्रसिद्ध । वासनारूपसे अन्तर चित्तविषे मिायारूप चित्तके अन्तर स्थित अस्पष्ट पृथिव्यादि नियमित (स्थिर)अरु विद्युतादिक अनियमित (अस्थिर) पदार्थों X मांडूक्योपनिषद् । विकरोत्यपरान्भावानन्तश्चित्तेव्यवस्थितान् । नि- यतांश्चवहिरिबत्तएवंकल्पयतेप्रभुः १३ ॥ को नानाप्रकारसे करताहै । तैसे अन्तर चित्तवालाहुआ मनोर- थादिरूप आपविपे स्थित पदार्थोंको [ यहां यह अर्थ है, कि वाह्य चित्तवालाहुआ आत्मा वहिर्मुख (बाह्यके व्यवहारयोग्य ) पदा- ऑको कल्पताहै । अरु अन्तरचित्तवाला हुआ तिन वायव्यव- हारयोग्य पदार्थों से इतर आपविपे स्थित मनोरथादि लक्षण रूप व्यवहारके योग्य पदार्थोको कल्पके पुनः व्यवहारकी यो- ग्यताके अर्थ कल्पताहै। यहां यह कथन किया कि जैसे लोक *विये कुलाल वा तन्तुवाय (वस्त्ररचनेवाला) घट वा पटरूप कार्यके करनेकी इच्छावालाहुआ आदिविपे व्यवहारके योग्य . व्यक्तिको कार्यके आकारको जानके या प्रकटकरके, पश्चात् तिसही व्यक्तिको वाहिरके नामरूपकरके सम्पादनकरताहे।तेसे- ही यह आत्माख्य । आदिकर्ता भीमायालक्षणरूप अपनेचित्त विपे नामरूपकरके अप्रकटरूपसे स्थितहुये सृजनेयोग्य पदार्थों कोप्रथमसृजने की इच्छा आकारसे प्रकट करके पश्चात् वाहिर सर्व ज्ञानके साधारण रूपसे सम्पादन करताहे । इसप्रकार प्रपञ्च की कल्पना विपे क्रमका ज्ञान हे ] घायके योग्य कल्पना करके पुनः व्यवहार की योग्यताके अर्थ कल्पता है १३ ॥ १४ हे सोम्य!। शंका। ननु, स्वप्नवत् चित्तकरके कल्पित सर्व जावत् का जगत्। है यहअद्यावधि निर्धारहुआ नहीं। अरु चित्तसे कल्पित चित्त करके जाननेयोग्य मनोरथादि रूप पदार्थों से, घाह्य के पदायोंकी परस्पर जाननेकी योग्यता रूप विलक्षणताह, एतदर्थ जाग्रत् का सप्नवत् मिथ्यापना अयुक्त है, [जेसे स्वप्न गिपे देखने योग्य सर्व कल्पित दृश्य वस्तु मिथ्याही अंगीकार करते हैं, तसेदी जाग्रत् विपे भी देखनेयोग्य सर्व वस्तु चित्त करके भासमान हैं, इसहेतुसे कल्पित मिथ्या है, ऐसा अद्यावधिनि- गौडपादीय कारिका द्वितीय प्रकरण २ । 88 चित्तकालाहियेऽन्तस्तुद्वयकालाश्चयेवहिः । कल्पि ताएवतेस.विशेषोनान्यहेतुकः १४ ॥ र्धारकिया नहीं, इस विषय में पूर्ववादी हेतु कहता है । यहां यह अर्थहै कि, आत्माकी अविद्याकरके कल्पित जो चित्त, तिस चित्तकरके प्रथम चित्तकेही अन्तररचित, अरु तत्रही वर्तमानम- नोरथ ( संकल्म ) रूप पदार्थ, अरु वायके रज्जुसादिक पदार्थ सो चित्तकरकेही परिच्छेद भिद को पावनेयोग्य है। अरु जिल करके वो कल्पनाकालविही होनेवाले पदार्थ प्रमाणज्ञान (प्र- माणजन्यज्ञान) के विषयहोते नही, जिसकरके तिनके साथ मन से वाह्य जाग्रत् विपे देखनेयोग्य भावों ( पदार्थों ) का वि- लक्षणपना, अरु परस्पर में परिच्छेद्यताके पावने की योग्यता, अरु दोनों कालोंकरके परिच्छिन्न होने करके प्रत्यभिज्ञारूप ज्ञानकी विपयता देखते हैं, तिसकरके जाग्रत् का स्वप्नवत् मि- थ्यापना अयुक्त है, ] उत्तर । यह शंका युक्तनहीं, इसप्रकार मूल के श्लोक के अक्षरों से उत्तर कहते हैं, चित्तके किल्पना काल से इतर अन्य परिच्छेद करनेवाला काल नहीं है जिनका । ऐसे जे चित्त से परिच्छेद करनेयोग्य । अर्थात् 'चित्तकी कल्पना काल विही जानने के योग्य पदार्थ सो [जो मनके अन्तर मनोरथरूप पदार्थ हैं, सो चित्तकाल वाले होते हैं, तिनके चित्त कालको स्पष्टकरते हैं ] चित्तकालवाले कहते हैं, अरु जो पर- स्पर परिच्छेद करने (पृथक् २ जानने ) योग्य पदार्थ हे तिनको दोनों कालवाले कहते हैं। यहां यह अर्थ है कि, जो पदार्थ मन से वाह्य दीखते हैं सो भेदकालवाले हैं। क्योंकि काल का जो भेद सो कहिये भेदकाल, सो भेदकाल जिनकाहे ऐसे जे पदार्थ तिनको भेदकालवाले कहते हैं । इस व्युत्पत्ति से । ताते सो पूर्वके अन्यकाल करके अरु पीछेके अन्यकाल करके परिच्छेद को प्राप्त होने योग्य हैं। अरु भिन्नकाल से परिच्छिन्न होने करके .
१०० . मांडूक्योपनिपद् । "सो यह है" इस आकारवाले प्रत्यक्ष ज्ञानकी सामग्री सहित संस्कारसे जन्य प्रत्यभिज्ञा ज्ञानके विषय होते हैं ] जैसे [जा- अत्के पदार्थों की प्रत्यभिज्ञा ज्ञानकी विषयताको उदाहरण करके स्पष्ट करते हैं ] देवदत्त गौके दोहन पर्यन्त स्थित होताहै, सो यावत् स्थितहोताहै तावत् गौको दोहन करताहै, अरु यावत् गौको दोहनकरताहै तावत् स्थितहोताहै, अरु तितने कालप. चन्त यहहै, अरु एतने कालपर्यन्त सो है । इसप्रकार वाह्य के प- दाको परस्पर में परिच्छेदकपनाहै, एतदर्थ उनको उभयकाल वाले कहते हैं । एतदर्थ " चित्तकालाहियेऽन्तस्तु द्वयकालाश्च येवहिः, कल्पिताएवतेसर्वे विशेषोनान्यहेतुकः । जो अन्तर विपे तो चित्तकालवाले पदार्थ हैं अरु वाह्य उभयकालवाले प. दार्थ हैं, सो सर्व कल्पितही हैं, विशेष अन्यहेतुवाला नहीं, अर्थात् जो अन्तर (स्वप्न ) विपे तो चित्तकालवाले पदार्थ हैं, अरु वाह्य (जाग्रविपे) दोनों कालपाले पदार्थ हैं, सो सर्व जिाग्रत्स्वप्न के कल्पितही हैं। वायका दोनोंकाल करके युक्ततारूप जो वि. शेपहे सो कल्पितपने से अन्य हेतुवाला नहीं, क्योंकि कल्पित विपे भी तिसप्रकारके विशेपका सम्भवहै ताते, अतएव यहां जाग्रत् विपे भी स्वप्नका दृष्टान्त स्पष्ट होताही है [इसका यह रहस्यहै कि जो कल्पनाकालविपे होनहार पदार्थ मनके अनन्तर वर्तते हैं, अरु जो प्रत्यभिज्ञा ज्ञानके विषयहोने करके पूर्वोत्तर कालविपे होनेवाले अरु चाहरही व्यवहारके योग्य देखियेह, सो सर्वकल्पितहुये मिथ्याही होने के योग्यहें । अरु प्रत्यभिज्ञा ज्ञान की विषयतारुप जो विशेप, सो वस्तके कल्पितपने का फियाह, पयोंकि स्वप्नादिकोंकी कल्पित वस्तुविपे भी “ सो यहहै" इस प्रकार प्रत्यभिज्ञा ज्ञानकी विपयता देसते ताते १४॥ १५हेसोम्य ! अव्यक्ताएवयेऽन्तस्तु स्फुटाएवचपेवहिः। क- ल्पिताएरतेस जो अन्तर असष्टी है, अम जो वायही है, सो सर्व कल्पितही हैं। अर्थात् जो मनके अन्तरभावनारूप हो.
गौडपादीय कारिका द्वितीय प्रकरण २। अव्यक्ताएवयेऽन्तस्तुस्फुटाएवचयेबहिः । कल्पिता एवतेस।विशेषस्त्विन्द्रियान्तरे १५॥ ने से अस्पष्ट पदार्थही है, अरु जो मनके ,वाह्य जो प्रतीयमान पदार्थ स्पष्टहोतेहैं सो सर्व मनके स्फुरणमात्र रूपहोनेसे कल्पि. तहीहें । अरु " विशेषस्त्विन्द्रियान्तरे। विशेष इन्द्रियोंके भेद के कियेहैं । अर्थात स्पष्टतारूप विशेष तो अन्तर अरु पाह्य इ. न्द्रिय भेदकेहये (इन्द्रियोंके भेदरूप निमित्तवाला है,तिसविणे मिथ्यापना वा अमिथ्यापना उपयोगको प्राप्तहोता नहीं॥इ- सका यह भावार्थहै कि, यद्यपि मनके अन्तर मनकी वासना- मात्रसे प्रकट हुये पदार्थोंका अस्पष्ट (अप्रकट ) पनाहै, वा मनसे, बाह्य अरु चक्षुरादि इन्द्रियोंके अन्तर पदार्थोंका स्पष्टपना यह विशेष है । तथापि यह विशेष पदार्थोकी सत्यता कियानही क्योंकि स्वप्नविपेभी तैसेही देखते हैं । किन्तु यह विशेष इंद्रियों, के भेदांका कियाहै, एतदर्थ जायत्के पदार्थ भी स्वप्नके पदा- वित् कल्पितहीहैं । इति सिद्धम्, यह सिद्ध हुआ १५ ॥ १६ हे सोम्य प्रश्न । ननु, वाह्य अरु अन्तरके पदार्थों की 'परस्परके निमित्त अरु नैमित्तिक होनेकरके' कल्पनाविप कारण क्याहै । उत्तर । तहां कहतेहैं, भात्मा जो है सोअपनीमायाकेवश से सीको करप्ताहुमा मादिरियो 'मैंगरताहो' मेरेकोस्लुस्टुःखहे, इसलक्षणवाले जीवंकल्पयतेपूर्वं ततोभावान्पृथविग्धान् । जीवको पूर्व कल्पता हे तिसके अनन्तर 'पृथक् २ भावों को 'कल्पता अर्थात उक्तलक्षणवाले, जीवोंको ‘रज्जुविपसर्पवत् । " सत्यज्ञानमनन्तंब्रह्म" इत्यादि । श्रुतिउक्त लक्षणवालेही शुद्ध आरमाधिपे विशिष्टरूपसे पूर्व कल्पता है, अतएव तिसके अर्थहोने करके 'क्रिया, कारक, फलके भेदसे प्राणादिक नानाविध पाएक अरुअन्तरकेपदार्थीको कल्यताहै। प्रश्नाातिस कल्पनाविपे क्याहेतु है।उत्तर ॥तहां कहते हैं, "चाहानाध्यात्मिकश्चेिवयथाविधस्त- Raluettatun १०२ मांडूक्योपनिषद् । जीवकल्पयतेपूर्वततोभावान्टथग्विधान् । बाह्याना- ध्यात्मिकांश्चैवयथाविद्यस्तथास्मृतिः.१६॥ थास्मृतिः। जैसी विद्या वाला है तैसी. स्मृतिवाला होता है तिसकरके, बाह्य अन्तरके पदार्थोंको सृिजता है। अर्थात् जो यह आप कल्पितहुआ जीव सर्व कल्पना करनेविपे. अधिकारी है सो जैसी विद्या (विज्ञान) वालाहै तैसीही स्मृति वाला होताहै। [यहांयह अर्थ है कि, अन्नपानादि उपभोगके होते तृप्ति आदिक होतीहै, अरु तिन उिपभोग के न होनेसे होतेनहीं। इस अन्वय व्यतिरेक रूप युक्तिसे भोजनादिक हेतहै । ऐसी कल्पना का विज्ञान उपजता है, ताते पुष्टयादिक फलहै, ऐसीकल्पना का विज्ञान उपजताहै, तिस करके अन्य किसी दिवस में कथन किये दोनों भी हेतु अरु फलकी स्मृति होती है, तिस करके फलके साधनसे असमान (भिन्न ) जातिवाले अन्य साधनविपे कर्त- व्यता का विज्ञान होताहै, तिससे वांछित तृप्ति आदिक.फलकी प्रयोजनता विपे पाकादिक क्रिया अरु तिसके कारक (सामग्री) तंडुलादिक अरु तिनके फल अन्नकी सिद्धि आदिक के सम्बन्धी विशेप विज्ञानादिक होते हैं, तिसकरके हेतु आदिकों की स्मृति होती है, ताते तिस साधनका अनुष्टान होताहै. ताते पुनः फल होताहै । इस क्रम करके परस्पर हेतुमद्भावस कल्पना होती है, इस करके हेतुकी कल्पना के ज्ञानसेफलकाज्ञानहोता है, ताते हे. तुके फलकी स्मृति होती है, तिसकरके तिसकाज्ञान अरु तिसके अर्थ किया कारक, अरु तिसकेफलके भेदकेज्ञान होतेहैं,तिनकरके तिनकी स्मृति होतीहै, अरु तिस स्मृति से पुनः तिसके ज्ञानहो तेहैं तिन ज्ञानसे तिनकी स्मृति होती हे अरु तिसस्मृति से पुनः तिनके ज्ञान होतेहैं। इसप्रकार बाह्य अरु अन्तरके पदार्थोंकोपर सर निमित्त अरु नेमित्तिकभावसे अनेक प्रकारकल्पता हे १६॥ .. १७ हे सोम्य !तिसपूर्वोक्त इलोकविजीवकी कल्पना सर्यक गौडपादीय कारिका द्वितीय प्रकरण २। अनिश्चितायथारज्जुरन्धकारेविकल्पिता । सर्पधा- रादिभिर्भावस्तहदात्माविकल्पितः ॥१७॥ ल्पनाका मूलहै, इसप्रकारकहा। सोई जीवक्री कल्पना किसनि- मित्तवाली है इसको अव दृष्टान्तकरके प्रतिपादन करतेहैं । अ- निश्चितायथारज्जुरन्धकारेविकल्पिता, सर्पधारादिभिर्भावः । जैसे अन्धकार विषे अनिश्चित हुई रज्जु सर्प अरु जलधारा आदिक भावकरके विकल्प को प्राप्तहोता है । अर्थात् जैसे लोक विपे मन्द अन्धकार विपे रही वस्तु अहं अमुक वस्तुही है, इस प्रकार अपने स्वरूपसे अनिश्चय को प्राप्तहुई सो क्या सर्प है वा जलधाराहै, वा चक दंड है, वा भूमिकी दरार है, इत्यादि प्रकारसे सर्पधारा आदिक भावकरके अनेक प्रकार से विकल्पको प्राप्तहोवेहैं । अर्थात् रज्जु विषे सर्प अरु थाणू (ढूंठ) विषे जो पुरुपकी भ्रांति होती है सो मन्द अन्धकारके समय होती है. घन अन्धकारमें अरु स्पष्ट प्रकाश में नहीं क्योंकि जिसकालमें रज्जुके सामान्यअंश, सर्पवत् वक्राकार, की प्रतीति, अरु विशेष अंश त्रिवली (ऐंठन) की अप्रतीति होती है तिसकालमें सादि भ्रान्ति होती है, अरु वादीने भ्रांती होनेकी सादृश्यतादि अनेक सामग्री कहीहैं परन्तु, मुख्यसामग्री उक्कप्रकारका अन्धकारही है, क्योंकि अन्धकारके अभावकी सामग्री दीपकादिकों के प्रकाश करकेही भ्रान्ति में उपयोगी अन्धकार सहित सर्व सामग्री अभाव होती है अन्धकारमें स्थित रज्जुको सम्यक् प्रकारसे रज्जु ही है ऐसे जानने के अर्थ एक प्रकाशही सामग्री का उपयोग है, भ्रान्ति कालवत् अनेक सामग्री का नहीं। अरु रज्जुवि भ्रान्ति कालमें जो प्रायः सपकी स्मृति अरु भ्रान्ति अधिक, अरु दंड- धारादिकों की कचित् होती है, तहां सर्पकीभ्रान्ति अधिक होने में विशेष करके मरणका भय हेतुहै, क्योंकि सर्पके डैशसे मरण का भय हे दंड धारादिकों से नहीं ताते ॥ अरु ऊपर भूमि में .
१०४ मांडूक्योपनिषद् । निश्चितायांयथारज्ज्वां विकल्पोविनिवर्त्तते । रज्जुरेवे तिचाद्वैतंतहदात्मविनिश्चयः १८ ।। जलकी अरु शुक्तिका में रजतकी भ्रान्ति है सो अन्धकार में न होयके प्रकाश में होतीहै, परन्तु द्रष्टाके देशसे दूरदेशमें अरु दृष्टि- गोचरतासे होती है । अरु शुक्तिकी साहश रजतलोह काग़ज़ आदि होते हैं, परन्तु विशेषकरके तहा रजतकी भ्रान्तिहोती है तहां प्रा. यः लोभहेतु है, क्योंकि अन अशनादि निमित्तक क्लेशादिकों की निवृत्ति रजतरूप द्रव्यसे होती है ताते । जैसे स्वरूप से यथार्थ निश्चय कियेहुये अपने हस्तकी अंगुली आदिको विषे सर्प वा जलइत्यादि विकल्प देखतेनहीं, तैसेही रज्जुको स्वरूप से सम्य- प्रकार निश्चय कियेहुये सम्मुखवर्ती रज्जुरूप वस्तुविषे सर्पा- दि विकल्प होतानहीं। अरु जिसकरके सिदिविकल्प । हो- ताहै ' एतदर्थ (तिस विकल्पसे । पूर्व रज्जु के स्वरूपका अनि- इचयही- निश्चयका न होनाही तिसका निमित्त है ।जैसे यह दृष्टांत है " तद्वदात्माविकल्पितः । तैसे आत्मा विकल्पकोप्राप्त हुआहे । अर्थात् जैसे उक्त दृष्टांतहै तेसेहेतु अरु फलादिक संसा- रके धर्मरूप अनों से विलक्षण होनेकरके अपने शुद्ध ज्ञान- मात्र सत्तासमान अद्वैतरूप करके अनिश्चय होनेसे । अर्थात् अपनेआप आत्माके शुद्धबुद्ध मुक्त ज्ञानमात्र सत्तासमान एक अ. द्वैत स्वरूपका सम्यक्प्रकार यथार्थ निश्चय न होनेसे जीव अरु प्राणादिक अनेक भावोंके.भेदों से आत्मा विकल्पको प्राप्त हुआहै । इसप्रकार यह सर्व उपनिषदोंका सिद्धान्त है १७॥ १८ हेसौम्य![ अविद्यासे रचितजीवकी कल्पनाहै, इसप्रकार अन्वयरूप दारसे कहा, अघ तिसहीको व्यतिरेक रूपद्वारसे दे. खावे ]" निश्चितायांयथारज्ज्यां विकल्पोविनिवर्तते।' रज्जु रेवेति, असे यह रज्जुहीहै, ऐसे रज्जुके निश्चयहुये विकल्प सर्वथा निवृत्त होताहै । अर्थात् जैसे यह रज्जुहीहै' इसप्रकार . गौड़पादीय कारिका द्वितीय प्रकरण २ । १०५ प्राणादिभिरनन्तैश्च, भावैरेतैर्विकल्पितः। मायैषातस्यदेवस्य यथासम्मोहितःस्वयम् १९॥ रज्जुके-निश्चय होने से तिसके अज्ञानकी निवृत्ति से तिससे उत्पन्नहुआ-जो-सादिरूप विकल्प सो सर्वथा निवृत्त होता है, अरु रज्जुमात्र अवशेपरहे हैं, तद्वदात्मविनिश्चयः ॥ तैसे आ; रमाविषे निश्चय प्राप्त होताहै । अर्थात् जैसेही जब आत्माविपे श्रुतिवाक्यानुसार निश्चय प्राप्त होताहै, तब आत्माकी अविद्या करके कल्पित जे जीवादिक विकल्प तिनकी अशेप :निवृत्तिसे एक अद्वैत आत्मतत्वही परिअवशेष रहताहै। यह तो दलोक का अक्षरार्थ है। अब इसका भावार्थ कहते हैं । जैसे रज्जुरेवेति? रज्जुही है ? इसप्रकार निश्चयके होनेसे सर्व विकल्पोंकी निवृत्ति . के होने से रज्जुही अद्वैतहै, इसप्रकार "नेति नेति नइति नइति सूक्ष्मभी नहीं, स्थूलभी नहीं, कार्यभी नहीं, कारणभी नहीं, मूतभी नहीं अमर्त्तभी नहीं । इत्यादि इस सर्व संसार के धर्म से रहित वस्तुके प्रतिपादक शास्त्र से जनित ज्ञानरूप प्रकाश का किया जो यह आत्माका निश्चय है सोई."आत्मैवेदं सर्व" अपूर्वमनन्तरमबाह्य.” "सबाह्याभ्यन्तरोह्यजः " "अजरोऽमरों ऽमृतोऽभय एवाद्वयइति" आत्माही यह सर्व है ? अपूर्व है; अन, परहै, अनन्तरहै, अबाह्यहै, वाह्यान्तरके सहितहै, असे जन्मरहित अजहै, अजरहै; अमरहै; अमृत (रोगरहित) है । अर्थात् जन्मादि षड्भावविकार रहित है | अभयही है। इसप्रकारकाजो, अपने आप आत्माका दृढ़ निश्चय है, सोई अद्वितीय परिशेप रहता है, पुनः द्वैत,सर्वही निवृत्त होताहै: १८ ॥ १६॥ हे सौम्य!"यद्यात्मक एवेति जव आत्मा एकही है। अर्थात् जब उक्तप्रकार से आत्मा एकही है, इसप्रकार का निश्चय है तब प्राणादिभिरनन्तश्च भावरेतैर्विकल्पितः, मायेपा तस्य देवस्य प्राणादि अनन्तभावों करके विकल्पको प्राप्त हुआ है, १४ . मांडूक्योपनिषद् । यह उस देवकी मायाही है, अर्थात् जब निश्चय करके सर्व सं. सार धर्मरहित आत्माएकही है, तब इन संसाररूप प्राणादि अनन्तभावसे कैसे विकल्प को प्राप्त होता है, जिही इसप्रकार का संशय है। तहां कहते हैं, श्रवणकरो, यह उस आत्मरूप देवकी माया है । जैसे मायावी पुरुष करके प्रेरणा को प्राप्तहुई 'जों उसकी मायासों अतिशय निर्मल जो आकाश, तिसकों पुष्पपत्र सहित वृक्षोंकरके पूर्णहुयेवत् पूर्णकरेहें, तैसें यह आत्म देव की माया भी है। अरु जैसे इन्द्रजाली की माया से लो किक द्रष्टा जने उस मायाकृत मोहसें उस मायांकेही वशहुये देखते हैं तैसें अपनी मायासेही यह आत्मा । अपने चिदा भासरूपसे। आप भी मोह को प्राप्तहोताहै। एतदर्थ मोहरूपकार्य द्वारा आत्माविपेही मायाका ज्ञान होताहै । अर्थात् मूलाज्ञानकी शक्ति जो शुद्ध माया तद्विशिष्ट आत्माको माया के कार्य मोह करके अपने विपे माया का ज्ञान होताहै, अरु सर्व शब्दके अर्थ की साम्यता जो माया तिसका ज्ञाता होनेसे उसको सर्वज्ञकहते हाअरु वो मायासे रहित अरु. माया का आश्रय शुद्ध अविशिष्ट अपना सत्य स्वरूप तिसको स्वरूपसेही जानता है ताते ईश्वर हैं। अरु अज्ञानकी द्वितीय शक्ति मलिन अविद्या तद्विशिष्टजीव अविद्याके कार्य मोहरूपनिमित्तसे उसको अविद्याका ज्ञान होता . है कि मुझविपे अविद्या वा माया, अरु तिससे पृथक् अपनेआप शुद्ध स्वरूप को विना आचार्य के उपदेशके, जानता नहीं ताते जीवहे, अरु एतदर्थहीश्रुति कहती हैं कि आचार्यवान् पुरुपोवेद' अरुमाया अरु अविद्यारूप उपाधिके अभावसे उभयविशिष्ट चैतन्ये आत्माकी अविशिष्ट ज्ञप्तिमात्र तत्त्वविपे.एकताहै पिरन्तु आचार्य के उपदेशद्वारा:सम्यक् 'प्रकारके आत्मज्ञान विना माया अरु अ. विद्याकी निवृत्ति होवे नहीं। तथाच “मममायादुरत्यया, मेरी माया दुःखसे.तरने योग्य है ? इस गीतोक्ति से भगवान्ने भीमायाँ .को मोहकी-हेतुता कही हे १६EET N गौडपादीय कारिका द्वितीय प्रकरण २। i:प्राणइतिप्रणिविदो तानीति च तद्विदः । गुणाइति गुणविदस्तत्वानीति च तद्विदः २० ॥ १-२०॥ हे सौम्य ! [कोनसेवेप्राणादिक अनन्तभाव हें कि जिन करके माया से आत्मा भेदको पावता है, इसप्रकार के प्रश्नकी इच्छा के हुये प्राणादिकों की कल्पना को उदाहरण करके कहते हैं। प्राणइतिप्राणविदोभूतानीति च तद्विदः प्राण ऐसे प्राणके वेत्ता, अरु भूत ऐसे भूतकेवेत्ता कहते हैं । अर्थात् प्राण कहिये सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ जगत्का ईश्वर वा जगत्का हेतु है । इस प्रकार प्राणकेवेत्ता हिरण्यगर्भ के उपासक अरु वैशेषिकमताद- लम्बी कल्पनाकरते हैं, सो,केवल कल्पनामात्रही है, क्योंकि उस 'हिरण्यगर्भको जगत्का हेतुहोने के विषय में प्रमाणका अभाव है (अरु हिरण्यगर्भ उत्पत्तिवाला है तातो-अरुं पृथिवी-जल अग्नि वायु, यह चार-भूतही जगत्का कारण हैं । इनसे इतर ईश्वराटि कोई नहीं, इसप्रकार चार्वाक कल्पना करते हैं, सो भी कल्पना- मात्रही है, क्योंकि इनभूतों को जड़ होनेसे स्वतःसिद्धता जिगत् की रचना में स्वतन्त्रता नहीं ताते । अरु "गुणा इतिगुणविद स्तत्वानीतिचं तद्विदः। शुण ऐसे गुणके वेत्ता, अरु तत्व ऐसे तत्वके वेत्ता कहते हैं। अर्थात् सत्वरज तम इन तीनोंगुणोंकी साम्यावस्थाजगत्का कारण है, इसप्रकार सांख्यमतवादी मानते हैं, सो भी कल्पनामात्रही है, क्योंकि साम्यावस्थाको प्राप्त हुये गुणोंको जड़त्व होने से उनविपे ईक्षण घनेनहीं अरु श्रुतिप्रमाण से ईक्षणपूर्वक सृष्टिहै, ताते श्रुतिवाय होनेसे गुणोंको जगत्का कारणव कल्पनामानही है । अरु आत्मा, विद्या, अरु शित्र,यह तीनतत्व जगत्के प्रवर्तक हैं, इसकार शैवमतवादी,मानते हैं, परन्तु श्रुतिवाह्यहोने से सोभी केरल कल्पनामात्रही है २०॥ २१॥हे,सौम्य! पादाडतिपादविदोविषयाइति च तद्विदः। पाद है ऐसेपादवेत्ता अरु विषय ऐसे विषयके वेत्ता, कहते हैं, -- मांडूक्योपनिषद् । पादाइतिपादविदोविषयाइति च तद्विदः।लोकाइति लोकविदोदेवाइति च तद्विदः २१॥ अर्थात् एक आत्मा के जे विश्वादिक पाद हैं सोई सर्व व्यवहार के हेतु हैं, इसप्रकार पादों के वेत्ता कहते हैं, तथापि सोभी कल्पना मात्रहीं है, क्योंकि एक निरंशआत्मा के विषे विश्वादि अंशों का भेद अनुपन्न है अर्थात् एक निरंश आत्मा विपे पादरूप अंशभेद वास्तव से नहोयके केवल अविद्याकरके कल्पित है ।। अरु शब्दा. दिविषय वारंवार भोगेहुये परमार्थ तत्व है, इसप्रकार उन विषयों के वेत्ता वात्स्यायनादिक काव्यके कर्ता कहते हैं, सो कहना विभ्रममात्र है, क्योंकि विषयोंका विप से भी अति निकृष्टपना है, विषभक्षण करने से अर्थात् भक्षणकिया विप एकबार हनन क- रता है, अरु विषय स्मरणमात्रसेही जन्मजन्मान्तर में भी मार- ताही रहता है । अरु विपयोंका अनुसंधान सर्वथा निदितहै ताते निन्दितों को पारमार्थिक तत्वभाव मानना सर्वथा अयोग्य है "लोकाइति लोकविदो देवाइति च तद्विदः।। लोक ऐसे लोक के वेत्ता अरु देवता ऐसे देवता के वेत्ता | मानते हैं। अर्थात् भर भूवर स्वर, इन तीन व्याहृतिरूप पृथिवी (मनुप्यलोक) अन्तरिक्ष (पितृलोक) स्वर्ग (देवलोक) यह तीनों लोकही परमार्थ वस्तुरूप हैं, इसप्रकार लोको के वेत्ता पौराणिक कल्पना करते है, सो उनका विभ्रममात्रही है, क्योंकि इनकी तीन सरन्यावाले अरु स्थानभेद वाले व्यभिचारी अरु कम्मौका फल अरु "कर्मजितोलोक.क्षीयत ? इत्यादि प्रमाण से विनाशीहोनेसे अरु अग्नि बायु अरु इन्द्र, इत्यादि देवता । अपने अनुग्रह तिन तिन । यज्ञादि कर्मों के फलफेदाता हैं, इनसे इतर ईश्वर कोई नहीं, इसप्रकार देवताओं केवेत्ता कल्पना करते हैं, सोभी फ्ल्पनामात्रही है, क्योंकि देवताओं को उत्पत्ति विनाशवान् अरु आत्माके जानने में संशययुक्त विषयासक्त अहंकारीहोनेसे उनको . से . गौडपादीय कारिका द्वितीय प्रकरण २। चेदाइति च वेदविदो- यज्ञाइति च तद्विदः । भोक्तेति च भोक्तृविदो भोज्यमिति च तद्विदः २२॥ . परमार्थरूपता अयोग्य है ताते २१ ॥ २२॥हे सौम्य! वेदाइति च वेदविदो यज्ञाइति च तद्विदः। वेद ऐसे वेदकेवेत्ता अरु यज्ञ ऐसे यज्ञकेवेत्ता किल्पना करतेहैं, अर्थात्, ऋग्वेदादि चारवेदही परमार्थरूपहें क्यिोंकि ब्रह्माद्वारा वेदही सर्वजगत् के प्रवर्तक हैं ताते। इसप्रकार वेदकेवेत्ता पाठक कल्पना करते हैं, सोभी कल्पनामात्रही है, क्योंकि वेद जोहे सो लौकिक अकारादि स्वर अरु ककारादि व्यंजन, इनवर्णो से इतर दीखते नहीं, अरु विदवाणीका विवर्त्तहोनेसे वाणी के अभावहुये अभावरूपहे, अरु आदिपुरुष जो ब्रह्मा तिसद्वारा स्फुरणहुये हैं, अरु निर्विशेष आत्माविपे अवेदरूप है, ताते वेदको लोकान्तर लौकिकहोनेसे । वेदको परमार्थरूपता सम्भवे नही। अरु ज्यो- तिष्टोमादिक यज्ञ परमार्थ वस्तुरूपहें इसप्रकार यज्ञोंकेवेत्ता वौ- धायनादिक यज्ञकर्ता कल्पना करतेहैं, सोभी भ्रान्तिमात्रहीहै, क्योंकि “ यज्ञं व्यास्यास्यामो द्रव्यं देवता त्याग इति" यज्ञको कहताहों तहां तिसकी समिध हवि कुण्डादिक सामग्री, अरु य. ज्ञाभिमानी देवता अरु यज्ञमें त्याज्य वस्तुको । अरु यज्ञकी सर्व कारक सामग्री प्रत्येकजड़हैं ताते काष्टभारवत् यज्ञकी समुच्चयता को जड़त्वहोनेसे उसको यज्ञका विज्ञाननहीं, अरु यज्ञकर्त्ताके आधीन जड़हैं, अरु यज्ञकर्म के कर्ता कर्मकेफलमें अति रागवान् (आसक्त) होनेसे परमार्थतत्त्वको न जानके यज्ञकोही परमार्थ तत्व मानतेहै ताते । अरु भोक्तेति च भोक्तविदो भोज्यमिति च तद्विदः।भोक्ता ऐसे भोक्ताकेवेत्ता, अरु भोज्य ऐसे भोज्यके वेत्ता किल्पना करतेहैं। अर्थात् भोक्ताही आत्माहै, कर्त्ता नहीं, इसप्रकार आत्माको केशल भोक्ताही माननेवाले जे सांख्यशास्त्र के वेत्ता कल्पना करते हैं, सोभी भ्रांतिमात्रही, है क्योंकि जो क- मांडूक्योपनिषद् । पादाइतिपादविदोविषयाइति च तद्विदः।लोकाइति लोकविदोदेवाइति च तद्विदः २१॥ अर्थात् एक आत्मा के जे विश्वादिक पाद हैं सोई सर्व व्यवहार के हेतु हैं, इसप्रकार पादों के वेत्ता कहते हैं, तथापि सोभी कल्पना मात्रहीं है, क्योंकि एक निरंशआत्मा के विपे विश्वादि अंशों का भेद अनुपन्न है अिर्थात् एक निरंश आत्मा विषे पादरूप अंशभेद वास्तव से नहोयके केवल अविद्याकरके कल्पित है। ॥ अरु शब्दा. दिविषय वारंवार भोगेहुये परमार्थ तत्त्व है, इसप्रकार उन विषयों 'के वेत्ता वात्स्यायनादिक काव्यके कर्ता कहते हैं, सो कहना विभ्रममात्रहै, क्योंकि विपयोंका विप से भी अति निकृष्टपना है, विपभक्षण करने से अर्थात् भक्षणकिया विप एकघार हनन फ- रता है, अरु विपय स्मरणमात्रसेही जन्मजन्मान्तर में भी मार- ताही रहता है । अरु विपयोंका अनुसंधान सर्वथा निंदितहे ताते निन्दितों को पारमार्थिक तत्त्वभाव मानना सर्वथा अयोग्य है "लोकाइति लोकविदो देवाइति च तद्विदः।। लोक ऐसे लोक के वेत्ता अरु देवता ऐसे देवता के वेत्ता मानते हैं । अर्थात भूर भयर् ,स्वर, इन तीन व्याहृतिरूप पृथिवी (मनुष्यलोक) अन्तरिक्ष (पितृलोक) स्वर्ग (देवलोक) यह तीनों लोकही परमार्थ वस्तुरूप है, इसप्रकार लोकों के वेत्ता पौराणिक फल्पना करते हैं, सो उनका विभ्रममात्रही है, क्योंकि इनकी तीन सरल्यावाले अरु स्थानभेद वाले व्यभिचारी अरु कम्माका फल अरु कर्मजितोलोकाक्षीयत । इत्यादि प्रमाण से विनाशीहोनेसे अरु अग्नि वायु अरु इन्द्र, इत्यादि देवता । अपने अनुग्रह से। तिन निन । यज्ञादिकम्मों के फलफेदाता हैं, इनसे इतर ईइबर कोई नहीं, इसप्रकार देवताओंकवत्ता कल्पना करते हैं, सोभी फल्पनामात्रहीं है, क्योंकि देवताओं को उत्पत्ति विनाशवान अरु आत्माके जानने में संशययुक्त विषयासक्त अहंकारीहोनेसे उनको . है 3 गौडपादीय कारिका द्वितीय प्रकरण २ । वेदाइति च वेदविदो. यज्ञाइति च तद्विदः, भोक्तेति च भोक्तृविदो भोज्यमिति चतद्विदः २२ ॥ परमार्थरूपता अयोग्य है ताते २१॥ २२॥ हे सौम्य! वेदाइति च वेदविदो यज्ञाइति च तद्विदः। धेद ऐसे वेदकवेत्ता अरु यज्ञ ऐसे यज्ञकेवेत्ता किल्पना करतेहैं। अर्थात्, ऋग्वेदादि चारवेदही परमार्थरूपहें क्यिोंकि ब्रह्माद्वारा वेदही सर्वजगत् के प्रवर्तक हैं ताते । इसप्रकार वेदकेवेत्ता पाठक कल्पना करते हैं, सोभी कल्पनामात्रहीं है, क्योंकि वेद जोह सो लौकिक अकारादि स्वर अरु ककारादि व्यंजन, इनवोंसे इतर दीखते नहीं, अरु वेिदवाणीका विवर्त्तहोनेसे वाणी के अभावहये अभावरूपहे, अरु आदिपुरुप जो ब्रह्मा तिसद्वारा स्फुरणहुये हैं, अरु निर्विशेष आत्माविषे अवेदरूप है, ताते वेदको लोकान्तर लौकिकहोनेसे । वेदको परमार्थरूपता सम्भवे नहीं। अरु ज्यो- तिष्टोमादिक यज्ञ परमार्थ वस्तुरूपहें इसप्रकार यज्ञोंकेवेत्ता चौ- धोयनादिक यज्ञकर्ता कल्पना करते हैं, सोमी भ्रान्तिमात्रहीहै, क्योंकि “ यज्ञं व्यास्यास्यामो द्रव्यं देवता त्याग इति" यज्ञको कहताही तहां तिसकी समिध हवि कुण्डादिक सामग्री, अरु यः ज्ञाभिमानी देवता अरु यज्ञमें त्याज्य वस्तुको । अरु यज्ञकी सर्व कारक सामग्री प्रत्येकजड़हें ताते काठभारवत् यज्ञकी समुच्चयता को जड़वहोनेसे उसको यज्ञका विज्ञाननहीं, अरु यज्ञकर्ताके आधीन जड़हें, अरु यज्ञकर्म के कर्ता कर्मकेफलमें अति रागवान् (आसक्त) होनेसे परमार्थतत्वको न जानके यज्ञकोही परमार्थ सत्त्र मानते हैं ताते । अरु " भोक्तेति च भोक्तृविदो भोज्यमिति च सद्विदः।भोक्ता ऐसे भोक्ताकेवेत्ता, अरु भोज्य ऐसे भोज्यके वेत्ता कल्पना करतेह ।। अर्थात् भोक्ताही आत्माह, कर्त्ता नहीं, इसप्रकार आत्माको केरल भोताही माननेवाले जे सांस्यशास्त्र के वेत्ता कल्पना करते हैं, सोभी भ्रांतिमात्रही, हे क्योंकि जो क- मांडूक्योपनिषद् । पादाइतिपादविदोविषयाइति च तद्विदः।लोकाइति लोकविदोदेवाइति च तद्विदः २१॥ अर्थात् एक आत्मा के जे विश्वादिक पाद हैं सोई सर्व व्यवहार के हेतु हैं, इसप्रकार पादों के वेत्ता कहते हैं, तथापि सोभी कल्पना मात्रहीं है, क्योंकि एक निरंशआत्मा के विषे विश्वादि अंशों का भेद अनुपन्न है अिर्थात् एक निरंश आत्मा विषे पादरूप अंशभेद चास्तव से नहोयके केवल अविद्याकरके कल्पित है ।। अरु शब्दा. दिविषय वारंवार भोगेहुये परमार्थतत्व है, इसप्रकार उन विषयों के वेत्ता वात्स्यायनादिक काव्यके कर्ता कहते हैं, सो कहना विभ्रममात्र है, क्योकि विषयोंका विप से भी अति निकृष्टपना है, विपभक्षण करने से अर्थात् भक्षणकिया विप एकबार हनन क- रता है, अरु विपय स्मरणमात्रसेही जन्मजन्मान्तर में भी मार- ताही रहता है । अरु विषयोका अनुसंधान सर्वथा निदित है ताते निन्दितों को पारमार्थिक तत्त्वभान मानना सर्वथा अयोग्य है लोकाइति लोकविदो देवाइति च तद्विदः । लोक ऐसे लोक के वेत्ता अरु देवता ऐसे देवता के वेत्ता मानते हैं। अर्थात् भर भवर स्वर, इन तीन व्याहृतिरुप पृथिवी (मनुष्यलोक) अन्तरिक्ष (पितृलोक) स्वर्ग (देवलोक) यह तीनों लोकही परमार्थ वस्तुरूप हैं, इसप्रकार लोको के वेत्ता पौराणिक कल्पना करते है, सो उनका विभ्रममात्रही है, क्योंकि इनकी तीन सरयानाले अरु स्थानभेद वाले व्यभिचारी अरु कम्मको फल अरु "कर्मजितोलोक.क्षीयत इत्यादि प्रमाण से पिनागीहोने से अरु अग्नि वायु अरु इन्द्र, इत्यादि देवता । अपने अनुग्रह से। तिन तिन । यज्ञादि कम्मों के फलकेदाता है, इनसे इतर ईदवर कोई नहीं, इसप्रकार देवताओंफेवेत्ता कल्पना करते हैं, सोभी । फल्पनामात्रही है, क्योंकि देवताओं को उत्पत्ति विनाशवान अरु आस्माके जानने मे संशययुक्त विषयासक्त अहंकारीहोनेसे उनको १ * गौडपादीय कारिका द्वितीय प्रकरण २। १०४ वेदाइति च वेदविदो. यज्ञाइति च तद्विदः । भोक्तेति च भोक्तृविदो भोज्यमिति च तद्विदः २२ ॥ परमार्थरूपता अयोग्य है ताते २१॥ - २२॥हे सौम्य वेदाइति च वेदविदो यज्ञाइति च तद्विदः। श्वेद ऐसे वेदवेत्ता अरु यज्ञ ऐसे यज्ञकेवेत्ता किल्पना करतेहैं , अर्थात्, ऋग्वेदादि चारवेदही परमार्थरूपहें क्यिोंकि ब्रह्माद्वारा वेदही सर्वजगत् के प्रवर्तक हैं ताते। इसप्रकार वेदवेत्ता पाठक कल्पना करते हैं, सोभी क्ल्पनामात्रहीं है, क्योंकि वेद जोहे सो लौकिक अकारादि स्वर अरु ककारादि व्यंजन, इनवाँसे इतर दीग्वते नहीं, अरु वेदवाणीका विवर्त्तहोने सेवाणी के अभावहये अभावरूपहे, अरु आदिपुरुप जो ब्रह्मा तिसद्वारा स्फुरणहुये हैं, अरु निर्विशेष आत्माविषे अवेदरूप है, ताते वेदको लोकान्तर लौकिकहोनेसे वेदको परमार्थरूपता सम्भवे नहीं। अरु ज्यो- तिष्टोमादिक यज्ञ परमार्थ वस्तुरूपहें इसप्रकार यज्ञोंकेवेत्ता चौ- धायनादिक यज्ञकेका कल्पना करतेहैं, सोभी भ्रान्तिमात्रहीहै, क्योंकि " यज्ञ व्याख्यास्यामो द्रव्यं देवता त्याग इति" यज्ञको कहताहौं तहां तिसकी समिध हवि कुण्डादिक सामग्री, अरु य. ज्ञाभिमानी देवता अरु यज्ञमे त्याज्य वस्तुको । अरु यज्ञकी सर्व कारक सामग्री प्रत्येकजड़हें लाते कारभारवत् यज्ञकी समुच्चयता को जड़त्वहोनेसे उसको यज्ञका विज्ञाननहीं, अरु यज्ञकर्ताके आधीन जड़हैं, अरु यज्ञकर्म के कती कर्मफलमें अति रागवान् (आसक्त) होनेसे परमार्थतत्त्वको न जानके यज्ञकोही परमार्थ तत्व मानते हैं ताते । अरु " भोक्तेति च भोक्तविदो भोज्यमिति च तद्विदःभोक्ता ऐसे भोक्ताकेवेत्ता, अरु भोज्य ऐसे भोज्यके वेत्ता किल्पना करते हैं। अर्थात भोक्ताही आत्माहै, कर्त्ता नहीं, इसप्रकार आत्माको केरल भोक्ताही माननेवाले जे सांस्यशास्त्र के वेत्ता कल्पना करतेहैं, सोभी भ्रांतिमात्रही, है क्योंकि जो क- .
.मांडूक्योपनिषद् । सूक्ष्मइतिसूक्ष्नविदःस्थूलइति च तद्विदः । मूर्तईति मर्त्तविदो अमूर्तइतितद्विदः २३॥ दापि सांख्यमतवादी तिस आत्माविषे जो भोत्कृत्वरूप विक्रिया स्वरूपसेहीस्वीकारकरते हैं तवं अनित्यत्वादिक्योंनहीं अंगीकार करते, किन्तु करनी चाहिये, अरु आत्माविषे जो भोक्तापने की प्रतीति है सो विषयकी सांनिध्यतासे स्फटिक में रक्तादिवत् है तिसको वास्तवसे मानना भ्रान्तिहै । अरु जे भोज्यवस्तु के वेत्ता सूपकार (रसोई करनेवाले स्वादके वंशहुये भोज्यकोही ,पर- मार्थपने की प्रतिज्ञा करते हैं २२.॥ - २३॥ हे सौम्य! "सूक्ष्मइति सूक्ष्मविदः स्थूल इति च तद्विदः सूक्ष्म ऐसे सूक्ष्मवेत्ता, अरु स्थल ऐसे तिसकेवेत्ता । कल्पते है। अर्थात् आत्मा परमाणु के परिमाण सूक्ष्म है । अरु सोई पर- मार्थ वस्तुहै। इसप्रकार कोई एक सूक्ष्मतत्त्वकेवेत्ता -कल्पना करतेहैं, सोभी यथार्थ नहीं, क्योंकि जो आत्मा अणुपरिमाण होवे तो शरीरान्तर अणुपरिमाण देशही होवेगा अरु जो अणुपरिमाणदेश व्यापि आत्माहुआ तो तिसयो- चैतन्यहोनेसे तिसही देशके सुख दुःश्वका अनुभवहोना चाहिये अन्यदेशका नहीं, परन्त आत्मा पादायसे लेकरके मस्तकापर्यन्त आका- शवत् नखशिखमें व्याप्तहै क्योंकि पादाग्रमें मेरे को व्यथाहै अरु मस्तक में सुखहे इसप्रकार शरीरमें हुये सुख दुःखका समकाल मेंही अनुभव होताहै ताते, अरु श्रुतिने भी आत्माको सर्वव्यापी विभुकहाहै, ताते आत्माको जो अणुपरिमाण कहते हैं सो भ्रांति से श्रुतिबाट कहते हैं । अरु स्थूलदेह आत्माहे अिरु सोई पर- मार्थतत्त्वहे । इसप्रकार तिस स्थूलवेत्ता कोई एक चार्गक कहतेहै । सोभी कल्पनामात्रहीहै, क्योंकि मृतक अरु सुपुप्नि विप भी भूतोंके संघातरूप शरीरसे चैतन्य पृथकही हे शरीर आ. मानहीं क्योंकि जिनभूनों का संघात शरीर हे मो प्रत्येकभूत an गौडपादीय कारिको द्वितीय प्रकरण २। कालइतिकालविंदोदिशइति च तद्विदः । वादाइति वादविदोभुवनानीतितद्विदः २४॥" को चैतन्यत्वके अभाव से जड़त्व है ताते जड़भूतोंका संघातरूप शरीर काष्ठभारवत् जड़होने से इसको आत्मत्व सम्भवेनहीं। अरु f मूर्तइतिमूर्तविदो- अमृतइतितद्विदः मूर्तऐसे मूर्त के वेत्ता अरु अमर्त्त ऐरो तिनकेवेत्ता किल्पना करते हैं, अर्थात् त्रि. शूलादिकोंके धारणकरता महेश्वर अरु चक्रादिकों के धारणकरता ' विष्णु यह मूर्तपदार्थ परमार्थरूप है, ऐसे मूर्तकेवेत्ता आगमा- भिमानी कल्पना करते हैं, परन्तु सोभी भ्रान्तिमात्रही है क्योंकि मूर्तपदार्थ एकदेशी परिच्छिन्न कल्पहोने से नाशवान् होवेहै ताते। अरु सर्वआकार से रहित निःस्वभाव जो अमूर्त सो परमार्थरूप है, इसप्रकार तिस अमूर्त के वेत्ता शून्यबादी कल्पना करते हैं, सो भी केवल भ्रान्तिमात्रही है २३॥T- . 7/२४॥ हे सौम्य ! कालइतिकालविदोदिआइति च तद्विदः' काल ऐसे कालकेवेत्ता, अ6 दिशा ऐसे दिशाके वेत्ता किल्पना करते हैं, अर्थात् कालकेवेत्ताजे ज्योतिपी सो कालकोही परमार्थ- रूपसे केल्पना करते हैं, परन्तु सो कालभी परमार्थतत्त्वनहीं, क्योंकि कालका एकरूपहोवै तो मुहूर्तादि व्यवहार, कि यह मुहूर्त श्रेष्ट है, अरु यह मुहूर्त नेष्ट है, तिसकी अयोग्यता है ताते, अरु तिन मुहर्तादि व्यापारकरके कालको श्रेष्ठता अश्रेष्ठता आदिकनानात्व है ताते; अरु कालअन्य विषयोंकरके प्रतीयमान होताहै । अर्थात् 'वृक्षके पत्र पातहोने से वसंतऋतु ज्ञातहोताहोतातें कालको स्व- तन्त्रता अरु स्विप्रकाशता नहीं अरु जो परमार्थतत्व हे सोनाना- खसे रहित एक एकरस सदी स्वतन्त्र स्वयंसिद्ध चैतन्यहै ताते कालके वेत्ताओंका कथन जो 'कालही परमार्थतत्तहे, सोध्रान्ति मात्रही है । अरु स्वरोदयशास्त्र के वेत्ता पूर्वादि दिशाही परमार्थ यस्तुहे इसप्रकार कहते हैं सोभी भ्रान्तिमानहीं है, अरु " वादा । , १११२ मांडूक्योपनिषद् । मनइतिमनोविदोबुद्धिरिति च तद्विदः । चित्तमितिषि त्तविदोधर्माधर्मों च तहिदः २५ ॥ इतिवादविदो भुवनानीतितद्विदः। बाद ऐगे वादकैवेत्ता; अरु भुवन ऐसे तिनकेवेत्ता किल्पना करते हैं । अर्थात् धातुबादरिसा- यनशास्त्र अरु मन्त्रवाद मिन्त्रशास्त्री इत्यादिवाद परमार्थवस्तु- रूप होते हैं, इसप्रकार वाद के वेत्ता कल्पनाकरते हैं, सो केवल कल्पनामात्रहीहै, क्योंकि तामादिधातु सुवर्णादि अरु सुवर्णादि धातु तामादि भावको प्राप्तहोते एकरसताको त्यागके व्यभिचारी हैं अरु ओपधीके योगसे अपने स्वरूप स्वभावको त्यागते हैं, अरु आकारवान् परिच्छिन्न जड़ अनेकरूप परतन्त्र है, ताते इत्यादि दूपणयुक्त लोभका विषय धातु परमार्थतत्त्व होने के योग्य नहीं । अरु मन्त्रवादभी साधककाल आदिक अपनी कारक सामग्री के आधीनहोने से परतन्त्रतादि दोपयुक्तहुये परमार्थतत्त्वरूप होनेके योग्य नही वेदवादरतापार्थ नान्यदस्तीतिवादिनः” “अन्या वाचोविमच्यथ, चाचोविग्लायनलंहि तत्" अरु चतुर्दश भुवन वस्तुरूप है, इसप्रकार उन भुवनकोशके वेत्ता कल्पना करतेहैं,सो भी कल्पनामात्रही है क्योंकि सो अदृष्ट अरु विवादका विषय हैं ताते २४॥ २५॥हेसौम्या मनइतिमनोविदोवुद्धिरिति च तद्विदः मनइस प्रकार मनकवेत्ता, अरुं वृद्धि ऐसे तिस बुद्धिकवेत्ता । कल्पना क- रते हैं। अर्थात् कोई एकमनकेवेत्ता चार्वाक्मतकेभेद विशेषफेमत. वादीपुरुप, मनही आत्मा परमार्थतत्व । है इसप्रकार कल्पना करते हैं, सो उनकाकहना भीभ्रांतिमात्रही है, क्योंकि मनस्वतन्त्र नहीं, चंचलहै अरु विषयासक्तहुआ विवेशून्य है, अरु अनात्मा होनेसे घटवत् करणविशेपहें अरु जिमेदीप पदार्थों को प्रकाशता परन्तु दीपकका प्रकाशक तिससे अन्य चक्षुहै, तैसे मन विप योंको प्रकाशता है परन्तु उसको जड़होने से उसका सिद्ध कर्ता . गौडपादीय कारिका द्वितीय प्रकरण । पञ्चविंशकइत्येके षड्विंशइतिचापरे। एकत्रिंशाह त्याहुरनन्तइतिचापरे २६ ॥ प्रकाशंक साक्षीआत्मा उससे भिन्नही है।ताते उक्त दोप भान वाला मन आत्मा परमार्थतत्व होनेके योग्यनहीं। अरु कोई एकजे बुद्धि के वेत्ता चौद्धमत वादी है सो, बुद्धिही आत्मा पर- मार्थ तसा है, इसप्रकार कल्पना करते है, सोभी भ्रान्ति सेही, करते हैं क्योंकि सुषुप्तियिपे ज्ञातसे रहित हुई वुद्धि अपने कारण अविद्या में लय होती है तब बुद्धिकीअभावरूप जड़ अंवस्था का प्रकाशक आत्मा पृथक्ही सिद्ध हे ताते वद्धिस्वरूपसेही ज्ञान शन्य जड़ परतन्त्र होने से आत्मा पिरमार्थतत्त्वां होने के योग्य नहीं । अरु “चित्तमितिचित्तविदोधर्माधम्नौ च तद्विद चित्त ऐसे चित्तके वेत्ता अरु धर्माधर्म ऐसे तिनके वेत्ता कल्पना करतहैं, अर्थात् चित्तही आत्मा परमार्थतत्त्व हे इसप्रकार चित्तके वेत्ता कल्पना करते हैं, सोभी भ्रान्तिमात्रही है,क्योकिचित्तको अन्ति.. करणकी वृत्ति विशेष होने से सोभी उक्तदोप करके अरु कचित् स्वस्थ अरु क्वचित् भ्रमी होनेसे परमार्थरूप होनेके योग्य नहीं। अरु जो धर्माधर्मके वेत्तामीमांसक धर्माधर्ममोही परमार्थरूम का हते हैं, सोभी श्रतिबाह होनेसे भ्रान्तिमात्रही है । तथाच अ. या यादन्यभायात्इत्यादि श्रुतिप्रमाणले 'परमार्थरूप आत्मा धर्मा धर्म से पृथकही है २५ ॥ २६॥ हे सौम्या पञ्चविंशक इत्येके पशिइतिचापरे पञ्च विंशत्यात्मक ऐसे कोई एक अरु पइविंशत्यात्मक ऐसे कोई एक पल्पना करते हैं । अर्थात् [प्रधान,जो है सो मूलप्रकृति (मूलका रण है) है, अरु मह तत्व अहंकार अरु पंचतन्मात्रा (सूक्ष्मभूत) राष्ट्र सात प्रकृति विकृति हैं। अर्थात् उक्त जो महदादि सप्त है सो अग्रिम कहने के पोडश पदार्थ जो केवल विकृति (कार्य)ही है तिनकी अपेक्षा से प्रकृति (कारण) है,अम पूर्वकहा जोप्रधान मूल . ११४ मांडूक्योपनिषद् । लोकॉल्लोकविदःप्राहुराश्रमाइतितद्विदः । स्त्रीपुन्नपुंस कैलेंङ्गाःपरापरमथापरे २७॥ प्रकृति तिसकी अपेक्षा से विकृति (कार्य) ही है। अरु . पांच ज्ञानेन्द्रियां, पांचकर्मेन्द्रिया,पोच विषय, अरु एकमन, यह घोडश पदार्थ केवल विकृति ( कार्य ) मात्रहीहै । इन पोडश विकृति प. दार्थ कहे हैं तिन में जो पंच विषय हैं तिनके स्थान में कोई पंच महाभतों को भी स्वीकार करते हैं, क्योंकि विषयकोही तन्मात्रा कहते हैं सो पूर्व प्रकृति विकृति में कहा है ताते । अरु पुरुष तो सर्व का द्रष्टा रुपही है, वो किसीका भी कार्य कारण नहीं। इसप्रकार पंचविंशति संख्यावाला प्रपंच वास्तव है, इसप्रकार सांख्यवादी कहतेहैं, सोभी कल्पनामात्रही है । अरु उक्त पंचवीस तत्त्वसे एक ईश्वर अधिकहोनेसे छब्बीस संख्यावाला प्रपंच पर- मतत्व है इसप्रकार छब्बीसतत्ववेत्ता'पातंजलि कल्पना करते हैं, सो कल्पनाभी अयुक्तहीहै, क्योंकि ईश्वरका पुरुपयिषे अंतर- भावहै ताते, अरु जो ईश्वरका पुरुपविषे अन्तरभाव नहीं पृथक है तो ईश्वरको घटवत् अनीश्वरभावकी प्राप्तिका प्रसंगहोता है ताते । अरु “एकत्रिंशक इत्याहुरनन्त इति चापरे। एकतीस ऐसे कहतेहैं, अनन्त ऐसे अन्यकहतेहैं, अर्थात उक्त पंचत्रीसतत्त्व से राग, अविद्या, नियति, काल, कला, माया, यह छःअधिकहोने से' हुये जो इकतीस संख्यावाला प्रपंच सो वस्तुरूप है, इसप्रकार पाशुपत मतवादी कहतेहैं, सोभी कल्पनामात्रहीं है ।अरु पदार्थों के भेद अनन्तहैं नियमित [ कि यह इतनाही है ऐसा नहीं, ताते अनन्तपदार्थ वस्तुरूप हैं, इसप्रकार अन्य मतावलम्बीवादी कहते हैं, सोभी कल्पनामात्रही है २६ ॥ २७॥हे सौम्य! लोकान् लोकविकः प्राहुराधमाइतितद्विदः । लोकोंको लोकके वेत्ताकहतेहैं,अरु आश्रम ऐसे तिनकेवेत्ताकल्प- नाकरते हैं, अर्थात् लोकोंको रंजन (प्रसन्न) करनाही परमतत्व है, . गौडपादीय कारिका द्वितीय प्रकरण २ । ११५ सृष्टिरितिसृष्टिविदोलयइति च तद्विदः । स्थितिरिति स्थितिविदःसर्वेचेहतुसर्वदा २८ ॥ ऐसे लोककवेत्ता कहते हैं अर्थात् लोकोंको प्रसन्नकरनाही पर- मार्थ तत्वहै इसप्रकार लोकके वेत्ता लौकिकजन कल्पना करते, सोभी विभ्रममात्रही है, क्योंकि लोकोंकी भिन्न भिन्न रुची होने से उनके चित्तको अनुरंजन करना ईश्वर करके भी अशक्यहै ताते। अरु दक्षादि आश्रमही परमार्थरूपहैं, इसप्रकार तिन आश्रमों के वेत्ता कल्पनाकरते हैं, सोभी असतही हैं, क्योंकि आश्रम शब्दका अर्थ वेशहै तिस वेशकी शूद्रादिपर्यन्त भी व्याप्तिका प्रसंगादिदोषों की प्रवृत्ति है ताते । अस्त्रिीपुन्नपुंसकलेंगाः परापरमथापरे स्त्री, पुरुष, नपुंसक, लिंगवाले, अरु इतरपर अपरको कल्पना करते हैं, अर्थात् 'स्त्री, पुरुष, अरु नपुंसक, इनतीन लिंगात्मक शब्दों का समूहही परमार्थरूप है, इसप्रकार वैयाकरणी कल्पना करते हैं, सो भी अयुक्तही है । अरु कोई एक जे अपर अरु पर उभय ब्रह्मके माननेवाले हैं सो कहते हैं कि पर अरु अपर दोनों ब्रह्म परमवस्तु रूप हैं । सो उनका कथन भी यथार्थ नही, क्योंकि दोब्रह्म होनेसे परस्पर में परिच्छिन्नतादि दोषकी प्राप्ति होती है ताते २७ ॥ २८॥हे सौम्य सृष्टिरिति सृष्टिविदो लय इतिच तद्विदः सृष्टि ऐसे सृष्टि के वेत्ता, अरुलय ऐसे तिसके वेत्ता किहतेहैं, अर्थात् सृष्टि (जगदुत्पत्ति) ही तत्व है इसप्रकार सृष्टि के वेत्ता कहते हैं, वा कोई एकलयके माननेवाले कहते हैं कि लयही तत्व है, अरु स्थिति रितिस्थितिविदःसर्वेचेहतुसर्बदा स्थिति ऐसे स्थितिके वेत्ता अरु यह सर्वतो सर्वदाहै। ऐसे कहते हैं, अर्थात् स्थितिही परमार्थतत्व है ऐसी कल्पना करते हैं, अरु उत्पत्ति स्थिति लय यहही तत्वहै, इसप्रकार पौराणिक कल्पना करते हैं, सोभी अयुक्तही है, क्योंकि सत्से असत् की उत्पत्त्यादिकों का अभाव वक्ष्यमाण है ताते, ॥ हे सौम्य ! अब [ उक्त कल्पनाके अधिष्टानको सूचित करने है 1 १ , मांडूक्योपनिषद् । यं गानं दर्शयेद्यस्य तं भावं सतु पश्यति । तञ्चा वतिस भूत्वासौ तद्ग्रहः समुपैति तम् २६ ॥ उक्त अनुक्त । अर्थात् जो कहे सो, अरु नहीं कहे सो। यावत् क- ल्पना के भेद हे, सो सर्व यहां इस आत्माविपे तो सर्वदा कल्प- लावस्थाविषे कल्पना करते हैं, परन्तु | जिस कल्पक से यह क- ल्पितहे तिस आत्मा को कल्पितपना नहीं, क्योंकि जो आत्मा भी कल्पित होय तो सर्व कोही कल्पित होनेसे सर्व कोही अधि. हानपनेकी अयोग्यो प्राप्तहोती है ताते अरु जिो सर्वस कल्पक आमा, है सो कल्पित नहीं क्योंकि जिसको आत्मा का कल्पक मौनेंगे सो आत्मा करके कल्पितही होगा, अरु जो कल्पित होगा तिसको असत होनेसे उसविषे कल्पकपने का असंभव है । अरु अनवस्था दोप भी आवता है ताते । प्राणरूप प्राज्ञ सर्वका वीज रूप है, तिसके कार्य के भेदही अन्यस्थिति पर्यन्त अिपने का- रण के लक्षण से भिन्न कार्यपने के लक्षण की स्थिति पर्यन्त प. दार्थ हैं, अरु अन्य सर्व लौकिक प्राणियों की सर्व कल्पना के क- ल्पितं भेद हैं, तो जैसे रज्जुविपे सर्प, तैसे तिनसे रहित आत्मा विपे, आत्मस्वरूप के अनिश्चय की हेतु जोअविद्या तिम अविद्या करके कल्पित है,। यह .२१, ३ उलोक से,२८, वें श्लोक पर्यन्त नव श्लोकोंका समुदायरूप अर्थ है। प्राणादि रलोकनके एक एक पदार्थों के व्याख्यान का अल्पप्रयोजनके हुये प्रयत्न किया नहीं। यह भास्कराचार्य स्वामी की उक्ति है २८ ॥ 6.२६॥ हे सौम्यं यं भावं दर्शयेद्यस्यतं भावं सतु पश्यति। जिसे पदार्थ के ताई जिसको देखावे हे सोतो तिसको देसताहै, अर्थात् बहुत कहने से क्या है, किन्तु प्राणादिकों के मध्य ठेवा अनुक्त जिस. एक पदार्थ के ताई जिसको आचार्य वा अन्य अ. सुत जिाग्रत्हुआ । पुरुप “ इदमेव तत्त्वमिति" यहही तत्त्र है इसप्रकार देसावता (लसावता ) है सो पुरुष तो निसपदार्थ ।
. 4- . . गौडपादीय कारिका द्वितीय प्रकरण २ । एतैरेषोऽरथग्भावः एथेगेवेति लक्षितः। एवंयोवेदतत्त्वेन कल्पयेत्सोऽविशङ्कितः३०॥ को "अयमहमिति वा ममेति" यह मैं हूं वा मेरा है इस प्रकार आत्मरूप देखताह । अरु तिस देखनेवाले को यह पदार्थ जैसा गुरु आदिकों ने देखायाहै सो तैसा होके उसकी रक्षा करता है, अर्थात् अपने स्वरूपकरके उराको सर्व ओर से रोकताहै । अर्थात् मनुष्योंको आचार्य जिसपदार्थविषे निश्चयं करावताहै सो पदार्थ पुनः अपने से अन्य पदार्थों में उस पुरुपका निश्चय होने देता नहीं किन्तु अपनी ओरही खींचता है । तिञ्चावति स भूताऽसौतद् प्रहः समुपैतितम् । तितबिपे आग्रह हे सो तिसको प्राप्त होती है। अर्थात् तिस पदार्थविषे यहही तत्व है ऐसाजो आग्रहरुप अ- भिनिवेश है सो तिस ग्रहण करनेवाले को प्राप्त होता है, अर्थात् सो तिसके आत्मभाव को प्राप्त होताहै २६ ॥ ३०॥ हे सौम्य! उक्तज्ञानकी स्तुत्यर्थ यह श्लोक कहते हैं, -गएतैरेषोऽपृथग्भावै. पृथगेवेति लक्षितः । इन अपृथक्भावों से यह पृथकही है ऐसे लक्ष्यकरायाहै, अर्थात् इन प्राणादि आत्मा से अपृथक भतकरके अपृथकभावों से यह आत्मा सर्पादिक क- ल्पनारूप भावोसे रज्जुबत् पृथकही है, इसप्रकार लक्ष्यकराया है अिर्थात् रज्जुके आश्रय कल्पितसर्प रज्जुसे अपृथक्हुआ भावरूप है, परन्तु उस कल्पित सादिकों से अल्पित सत्यरूप रज्ज पृ- थकही है 'अर्थात कल्पितरार्पका आश्रय होने से उस अधिष्ठान- रूप रजनका उस सर्पविषे अन्वयहै,अरु उस अकल्पित अविधान- रूप रज्जविषे अध्यस्त सर्प का व्यतिरेक है, तैसे आत्मरूप अधि- मानके आश्रय कल्पित अरु अधिष्टान से अभिन्न भावरूप प्राणा- दिक तिसविष आत्मा का आश्रयरूप से अन्धय है, अरु उन क. ल्पित प्राणादिकों का अकल्पित आत्मरूप अधिष्ठानविपे व्यति- रेकहे, तात वो मत्यरूप आत्मा कल्पितभारुप प्राणादिकों से . मांडूक्योपनिषद् । पृथकही है, इसप्रकार आचार्य ने लक्ष्यकरायाहै । तथापि मूढ़ पुरुषों करके अलक्षितही है " विमूढानानुपश्यन्ति” । अर्थात् कल्पित प्राणादिकों की स्वाधिष्ठान आत्मा से पृथक् सत्ताके अ- भावसे सो आत्मरूपही है, परन्तु सो अविवेकी को तैसा भास- ता नहीं । अरु विवेकी पुरुषों को रज्जुविषे कल्पितं सादिकों वत् प्राणादिक आत्मा से पृथक् नहीं । अर्थात् जो जिसके आ. श्रयभासताहै तिसकी स्वसत्ताके अभावसे वो अपने आश्रयसे अ- पृथक्हुआ सोई रूपहै, इसप्रकार “पश्यन्तिज्ञानचक्षुप." विवेकी पुरुष देखते हैं । यह अभिप्राय है ॥ "इदंसर्व पदमात्मेति" व्यह सर्वपदआत्मा है। इस श्रुतिप्रमाण से। एवं यो वेदतत्त्वेन कल्प- येत्सोऽविशंकितः। इसप्रकार तत्त्वसे जानताहै सो शंकारहित हुआ कल्पताहै, अर्थात् जो उत्तप्रकार [ उक्त प्रकारके ज्ञान वाला जो पुरुषहै सो वेदका किंकर होतानहीं, किन्तु सो वेदके जिस अर्थको कहताहै सोई वेदार्थहोता है यह अर्थहै ] रज्जुस- पंवत् आत्माविषे कल्पित अनात्म पदार्थोंके स्वाधिष्ठानसे पृथक हुये असत्भावको, अकिल्पना कल्पितसेरहितानिर्विकल्पासर्वा धिष्ठान आत्माके सिद्भाव । को जोपुरुप। आत्मज्ञान (महा- वाक्यार्थज्ञान ) रूप तत्त्वकरके श्रुतिके वाक्य प्रमाणसे अरु अनुभव युक्तिप्रमाणसे जानताहै, सोशंकारहित हुआ यह वाक्य इसके अर्थ के परहै, अरु यह अन्य अर्थ के परहै, इसप्रकार वि. भागसे वेदार्थ को कल्पताहै । अरु यहाँ । इसअर्थवि मनुमहा- राजका वचन प्रमाणहे “ नानध्यात्मविद्वेदान् ज्ञातुं शक्नोति तत्त्वतः । नानात्मवित्कश्चिरिकयाफलमुपाउनुत, इति मनुष चनम् ,, 'अध्यात्मतत्व का न जाननेवाला वेटों को तत्वकरके जानने को समर्थहोता नहीं, अरु कोई भी अनात्मवेत्ता क्रिया (प्रमाण) के फल (तत्त्वज्ञानको पावतानहीं) यह मनुमहाराज का वचनहे ३०॥ ३१॥हे सोम्य! जिनयुक्तियों करके इस वेतल्याख्यप्रकरणविषे .
. गौडपादीय कारिको द्वितीय प्रकरण २ । ११६ स्वप्नमायेयथादृष्टे गन्धर्वनगरंयथा । तथाविश्वमि ददृष्टं वेदान्तेषुविचक्षणैः ३१॥ द्वैतका मिथ्यापना कहाहे तिनयुक्तियोंको प्रमाणके अनुग्रहकरके युक्त होनेसे तिनकीयथार्थता निश्चयकरनेकेयोग्यहै, ऐसे कहतेहैं] जो यह दैतका असद्भाव युक्तिसे कहा सोवेदान्त ( उपनिषद्)के प्रमाणसे निश्चितहै, इसप्रकारकहते हैं। स्विप्नमायेयथारष्टेगन्धर्व नगरंयथा जैसे स्वप्न माया देखे हैं,जैसे गन्धर्वनगर देिखेही, अर्थात् स्वप्न अरु माया (इन्द्रजालीकृतकोतुक) असत् वस्तु रूप असत्य हैं, तथापि सो अविवेकी जनोंकरके सत्वस्तुरूप हुये- वत् लखने में आवताहै,अरु सो (स्वप्न, माया) विवेकी जनोंकरके असलूप लखने में आवता है अिर्थात जो पुरुप स्वप्न अरु मायाके वर्तमानकालमेंही यह स्वप्न अरु माया ही है, इसप्रकार यथार्थ अनुभवसे सम्यक् प्रकार जानता है सो उनको असत्यही मान- ता है। अरु जैसे जहां तहां स्वपाणि प्रसारितवत् प्रकटताको प्राप्तहुये क्रयविक्रय करने योग्यादि रूप पदार्थों करके सम्पन्न हहों (वजारों ) करकेयुक्त गृहगोपुर अहालियां प्रासादादि अरु स्त्री पुरुप पशु आदिरूप व्यवहारों करके पूर्णहुयेवत् सतरूप 'करके देखाहुआ ही गंधर्वनगर अकस्मात् ही अभावको प्राप्तहोता देखा तथा विश्वमिदंदृष्टंवेदान्तेषु विचक्षणः। तैसेयह विश्व देखा है वेदान्त विपे विवक्षण पुरुषों । करके अर्थात् असे स्वप्न जगत, मायावी की माया, अरु गन्धर्व नगर, यह प्रत्यक्ष भासते संते भी असत्यही हैं, तेसे ही यह विश्वभी देखा है 'प्रश्न' कहां किन्होंने देखा है 'उत्तर' कहते हैं, “ नेहनानास्ति किञ्चन" "इन्द्रोमायाभिः "" आत्मे वेदमय आसीत्" "ब्रह्मे वेदमग आसीत् " " सत्त्वेर सौम्येदमन आसीत्" "द्विती. यादेभयंभवति " नतुतद्धितीयमस्ति " " यत्रत्वस्य सर्च मात्मेवाभूदित्यादिषु < यहां नाना कुछभी नहीं । परमात्मा १२० मांडूक्योपनिषद् । - न निरोधो नचोत्पत्तिर्नवदोनचसाधकः । नमुमु वैमुक्तइत्येषापरमार्थता ३२॥ माया करके नानारूप को प्राप्तहोता है। यह आगे आत्माही था। यहआगेब्रह्महीथा। हे सौम्य! यहआगे एकसतहीथा। दूसरेसे निश्चयकरके भयहोताहै । सो द्वितीय तोहै नहीं। जहां तो इसको सर्वआत्माही होताहुआ। इत्यादि उपनिषदप बैदान्तविपे लक्षित जे एक परमार्थ वस्तुके देखनेवाले अत्यन्त निपुणतर साक्षात् आत्मानुभवी आत्मवेत्ता पंडितरुप विलक्षण पुरुपकरके देखाह।। तथाच “तमः श्वभ्रन्निभंदृष्टं वर्षयुवुदसन्निभ, नाशप्रायं सुखा. छीननाशोत्तरमभावगमितिहि ", मन्द अन्धकारविपे स्थितरज्ज विषे भूच्छिदादिकों के तुल्य अरु वर्षा वुवुदके तुल्य नाशकरके अस्त सुग्वसेहीन नाशोत्तर अभावरूपताको प्राप्त होनेवाला विश्व विवेकियों करके दृश्य है, इस व्यास स्मृति के प्रमाणसेभी द्वैत वस्तु का असद्भावही निश्चित है ३१ ॥ ३२॥ हे सौम्य! प्रमाणअरु युकिसे द्वैतके मिथ्यापनेके साधने करके, अद्वैत ही पारमार्थिक है, इसप्रकार सिद्धहुये, तिसनिर्धार किये अर्थको इस लोक निपे संक्षेप से कहते हैं ? अब इिसद्धि तीय प्रकरणकी समाप्तिके अर्थ यह श्लोक कहतेहैं। जबद्धतमिथ्या है अरु एक अद्वेत आत्माही परमार्थसे सतरूपहे तव यह सिद्ध हुआ किन निरोधो नचोत्पत्तिर्न पद्धोनच साधकः, न मुम नमुक्त इत्येपा परमार्थता निरोध नहींपुनः उत्पत्तिभी नहीं, वदनहीं, साधकनहीं मुमुक्षु नहीं, मुक्त नहीं, यह परमार्थता नहीं अर्थात् यह ,संबलौफिक अरु वैदिक व्ययभर अविद्या का विपया अज्ञान पर्यन्त । हे तब निरोध कहिये प्रलय सो नहीं, उ. त्पत्ति कहिये जगत् का जन्म सो भी नहीं, असें जब जगदुत्पत्ति नहीं तय बद्ध कहिये संसारीजीव सोभी नहीं; अजय बद्धनहीं तब साधक कहिये मोक्षार्थ साधन करनेवाला सो भी नहीं, अम मांडूक्योपनिपद। "न निरोधो नचोत्पत्तिर्नवदोनचंसाधकः । नमुमुक्षुर्न वैमुक्तइत्येषापरमार्थता ३२ ॥ माया करके नानारूप को प्राप्त होता है। यह आगे आत्माही था। यहआगेब्रह्महीया। हे सौम्य! यहआगे एकसतहीथा। दूसरेसे निश्चयकरके भयहोताहै । सो द्वितीय तोह नहीं जहां तो इसको सर्वआत्माही होताहुआ। इत्यादि उपनिषद्रूप वैदान्तविपे लक्षित जे एक परमार्थ वस्तु के देखनेवाले अत्यन्त निपुणतर साक्षात् आत्मानुभवी आत्मवेत्ता पंडितरूप मिलक्षण पुरुपकरके देखाहै।। तथाच "तमः श्वभ्रन्निभंदृष्टं वर्षयुवुदसन्निभ, नाशप्राय सुखा- द्वीननाशोत्तरमभावगमितिहि " मन्द अन्धकारविपे स्थितरज्जु विषे भूच्छिदादिकों के तुल्य अरु वर्षा वुवुदके तुल्य नाशकरके ग्रस्त सुबिसेहीन नाशात्तर अभावरूपताको प्राप्त होनेवाला पिय विवेकियों करके दृश्य है, इस व्यास स्मृति के प्रमाणसेभी द्वैत वस्तु का.असद्भावही निश्चित है ३१ ॥ ३२॥ हे सौम्य! प्रमाणअरु युक्तिसे द्वैतके मिथ्यापने के साधने करके, अद्वैत ही पारमार्थिक है, इसप्रकार सिद्धहुये, तिसनिर्धार किये अर्थको इस श्लोक विषे संक्षेप से कहते है ? अव इिसद्वि- तीय प्रकरणकी समाप्ति के अर्थ यह श्लोक कहते हैं। जबद्वैतमिथ्या है अरु एक अद्वेत आत्माही परमार्थसे सत्रूपहे तव यह सिद्ध किन निरोधो, नचोत्पत्तिर्न बद्धोनच साधकः, न ममक्ष नवेमुक्त इत्येषा परमार्थता निरोध नहींपुनः उत्पत्तिभी नहीं, बद्धनहीं, साधकनहीं मुमुक्षु नहीं, मुक्त नहीं, यह ,परमार्थता नहीं अर्थात यह ,सर्वलोकिक अरु बेदिक व्यवक्षर अविद्या का विषय अज्ञान पर्यन्त । हे तब निरोध कहिये प्रलय सो नहीं, उ. सत्ति कहिये जगत् का जन्म सो भी नहीं, अरुं जय जगदुत्पत्ति नहीं तय बद्ध कहिये संसारीजी सो भी नहीं, अम जय बद्धनहीं तब सावकारहिये मोक्षार्थ साधन करनेवाला सो भी नहीं, अरु हुआ - गौडपादीय कारिका द्वितीय प्रकरण २। ३२१ मुंमुक्षु कहिये साधन सम्पन्न मोनकी इच्छावाला सो भी नहीं, अरु जब बद्धसे मुमुक्षु पर्यन्त नहीं त मुक्त कहिये सर्व बन्धनों से छूटा पुरुष सो भी नहीं । इस प्रकार उत्पत्ति प्रलयके अभाव से बद्धादिक कुछभी हैं नहीं, यह परमार्थता है।[उक्तार्थकोही प्रश्नोत्तर से विस्तार करते हैं ] प्रश्न उत्पत्ति अरुं प्रलय का अभाव कैसे है, उत्तरं । इस द्वैतके असद्भावसे उत्पत्ति अरु प्रलय का अभाव है, क्योंकि " यहि द्वैतमिव भवति, तदितर ईतरं पश्यति,"."याइहनानेव पश्यति" “ आत्मैवेदं सर्वम् ब्रह्मै वेदसर्वम्"#एकमेवाद्वितीयमिदं सर्वम् सर्व खल्वि दंब्रह्म""यदयमात्मा" नेहनानास्तिं किचन"जहाही द्वे- तवत् होता है तहां और का और देखता है, जो यही एक अद्वैत आत्म तत्त्वविषे नानात्ववत देखता है, आरमाही यह सर्व है, ब्रह्मही, यह सवाहेएकही अद्वितीय यह सर्व है, निश्चय करके सर्व ब्रह्मही है, जो यह आत्मा है, इत्यादि अनेक श्रुतियों करके द्वैत का असद्भावही सिद्ध है। अरु सत्व- स्तुकीही उत्पत्तिावा प्रलय होती है, शशशृंगसिरहाके सींग आदिक असत्पदार्थों की उत्पत्ति प्रलयहोवें नहीं अरु अहेतवस्तु भी उत्पत्ति था लय होती नहीं । अर्थात् जो वस्तु उत्पत्ति अरु लय होती है सौ दूसरेकी हेतुवाली है, क्योंकि जो उपजती है सो अपने,से इतर कारण से उपजती है अरु दूसरे में ही लीन होती है ताते अरु अद्वैत है सो उत्पत्तिवालाभी है यह कहना विरुद्ध है। एतदर्थ ही जो पुनःप्राणादिरूप अद्वैतका व्यवहार, सो रज्जु विषे सर्पवत् आत्मा विष कल्पित है, इस प्रकार कहाहै अरु रज्जु सादिरूप जो मनकी कल्पना है तिसके रज्जु विष उत्पत्ति वा प्रलयनहीं है, अरु तैसेही मनविये रज्जुसर्पकी उत्पत्ति वा प्रलय नहीं है । अरु रज्जु अरु मन दोनों से भी नहीं है तैसेही छैन को मनकी कार्यताके अविशेषसे । अर्थात् द्वैत प्रपंचको मनकी कार्यतारूप विशेषके अभाव सेतिस देनकी उत्पत्ति वा प्रलयवने . ..
१२२ मांडूक्योपनिषद् । नहीं । अरु जिस करके निरोध किये । अफुरहुये। मनविषे वो सुपुप्तिविपेद्वैत देखतेनहीं एतदर्थ मनकी कल्पनामात्रही द्वैत है यह सिद्धहुआ। तातेही कहा कि द्वैतके सुसद्भावसे निरोधादि- कों का अभाव परमार्थता है,॥ हे सौम्य! जव उक्तप्रकार द्वैतके अभाव विषे शास्त्रका व्यापार है, द्वैतविपे नहीं, क्योंकि अभावके वोधन वि.व्याप्तजो शास्त्र तिसका भाव के पोधनविषे व्यापार होनेका विरोधहै ताते। अरु तैसेहुये । अर्थात् अभाव घोधकशास्त्र को भावघोधनसे विरोधहुये। अद्वैतकी वस्तुरूपताविपे प्रमाण के अभावहुये अरु द्वैतके अभावहुये शून्यवादका प्रसंगप्राप्त होवेगा जिहां वादी की ऐसी शंका है। तहां सिद्धांती समाधान कहेहै, यह वादी का कथन घने नहीं, क्योंकि जैसे रज्जु सादिकों की कल्पना को निराश्रयता का असंभव है । अर्थात् रज्जु सादिक यावत्कल्पनाह सो निराश्रयहोतीनहीं तितही द्वैतकीकल्पनाको अधिष्ठान (आश्रय) से रहितपने का असंभव है ताते, एत- दर्थ तिस द्वैत का अधिष्ठान होनेकरके अद्वैत आस्था करने के योग्य है। इस प्रकार ॐकारके प्रकरणविपे इसशंकाकासमाधान हमने कियाहै तिसकोत पुनः कैसे उटावताहै यिह सिद्धान्तीके कहनेपर शून्यवादी। कहता है कि सादि सन विकल्पोंकी आय. य रूप जो रेज्जु सोभी तुम्हारे मतविपे कल्पितहीहै, इस प्रकार दृष्टान्त का सम्भन है, सो वादी का कथन वने नहीं, क्योंकि कल्पनाके यहुये अपशेष रही अवधिरूप सत्ताको रज्जु आदि- कों विपे देसतेताते । अरु द्वैतभ्रमके घोधका साक्षी होने करके जो स्फूर्त्तिमात्र चैतन्य हे तिसको अकल्पित होने करकेही सझार का सम्भव है ताते शून्यभारकी प्राप्ति हे नहीं । अरु जो कदापि ऐसा कहे कि रज्जु सर्पवत् अद्वैत का अमदान है, सो भी घने नहीं, क्योंकि आत्माभ्रिमरूप न होके भ्रमका साक्षी है नाते। सर्प के अभावके (भ्रान्ति) ज्ञानसे पूर्व अकल्पित रजके अंश- पत् नियमसे अफल्पितहै ताते । अरु कल्पनाके कतीको कल्पना गौडपादीय कारिका द्वितीयं प्रकरण २॥ १२३. . . की उत्पत्ति से पूर्व सिद्ध होनेके अंगीकारसे ही तिसके असद्भाव का असम्भव है । अर्थात् कल्पना के कर्ता की कल्पनासे पूर्व अरु' पश्चात् सिद्धिं होने से अरु कल्पना के भावाभाव का साक्षीहोने से तिसका असद्भाव कदापि सिद्ध होवे नहींअरु जो ऐसाकहे कि अद्वैत स्वरूप विषे व्यापारके अभावये पुनः शास्त्रको द्वैतके ज्ञानकी निवर्तकता कैसे होवेगी, सो दोषभी नहीं, क्योंकि रज्जु विषेसादिकों व आत्माविर्षे द्वैतको अविद्या करके अभ्यस्त- पना है ताते अिर अभ्यस्त द्वैतके निवर्तक शास्त्रको भी अध्यस्त पना है तातेप्रभा आत्माविषे द्वैतका अध्यस्तपना कैसेहैं। उत्तर जन्माहौं सुखीही, दुःखीही जीर्णहुआहौं, मरताहौं,मूहों देवान् हौं, देखताहों, स्थलहों, सूक्ष्महीं, कर्ताहों, भोक्ताही, संयोग वियोगवानहों, वृद्धहीं, जर्जर हों, यह मेराहे में इसकाों, इत्यादि सर्व-विकल्प आत्माविषे अध्यस्तहोवे है । जैसेसर्प जल- धारादिक भेदों विषे अव्यभिचारसे रज्ज अनुगत है। तेसे सर्वत्र अव्यभिचारसे इनविष आत्मा अनुगतहै। जब इसप्रकार विशेष्य के स्वरूपकी प्रतीतिको सिद्ध होनेसे, शास्त्रसे कर्त्तव्यता नहीं, अरु अकृतवस्तुका कर्ता जो शास्त्र है सो कृतवस्तु के अनुसारीपने के हो अप्रमाणहोवेगा। अरु-जिसकरके आत्माका अविद्य आरोपित सुखीपनादिक जे विशेष प्रतिवन्ध तिसके स्वरूपसे अ- - नवस्थान, अरु स्वरूपसे अवस्थान श्रेय है, ताते सुखीदुःखीपने आदिकोंका निवर्तक जो शास्त्र है सोनेति नेति"..." अस्थूल- मनएवं इत्यादिक श्रुतिवाक्यों से आत्माविषे असुखीपने आ- दिकोंकी प्रतीतिके करने से आत्मस्वरूपवत् असुखीपनादिक मी सुखीपने आदिक-भेदोविपे अनुगतधर्म नहीं है, अरु जब अनु: गतहोय.तब सो सखीपनेआदिकरूप विशेष आरोपित न होगा। जैसे उष्णतारूप गुणविशेषवाले अग्निविष शीतता है तैसे। एत- दर्थतिस निर्विशेषही आत्माविपे सुखीपने आदिक विशेष कल्पि- तहै । अरु.जो आत्माके असुखीपने आदिकों का जो प्रतिपादक .
. १.२४ मांडूक्योपनिषद् । भावैरसंदिरेवीयमहयेनंचकल्पितः। भावाअप्यद्वये नैव तस्मादयत्तांशिवा ३३॥ शास्त्रहै, सो तिसके सुखीपने आदिकः विशेषकी निवृत्तिके अर्थही है, यह सिद्धहुआ;। यहां"सिद्धन्तु निवर्तकत्वात्" सिद्ध है निवर्तक होनेसे इसप्रकार: वेदवेत्ता द्रविडाचार्य का सूत्र प्रमाण है ॥ [यहाँ इस सूत्रका यह अर्थ है कि ब्रह्मा विषे पदों की प्रवृत्ति के अभाव हुयेभी शास्त्रका प्रमाणिकपना सिद्धही है। क्योंकि अभावके योधनविपे प्रवृत्त "ना (नकार)"; पदकरके युक्त स्थूलादिक अर्थवालेपदों से स्वाभाविक द्वैत के अभाव के वोधन करके अध्यस्त का निवर्तक है ताते,]:३२.1 ३३॥ हेसौम्य! [निरोधादिक सर्व विशेपके अभावकरके उप. लक्षित जो वस्तुहै सो वास्तव रूप है, ऐसा उक्त श्लोक का अर्थ हैं। तिसको सामान्य विशेष वस्तुधिप विशेषता से आश्रय करके निरोधादिकों का सम्यक् साधनरूप होनेसें, तिसके असत्पनेकी शंकाकरतेहैं, तिसहेतुकरके तिसके साधनेकीअपेक्षा होनेसेतिसके लखावनेके परायण यहश्लोकह] अवपूर्वकहे इलोकका हेतुकहते हैं "भावरसद्भिरेवायमद्वयनचकल्पिता असरूपहीभावोंसे अरु अद्वैत से यह कल्पित, अर्थात् जेसे रज्जुविपे असत्रुप सर्प अरु जलधारादिकों से, अरु सद्रूप अद्वैत रज्जु द्रव्यंसे, यह सर्प है वो यह जलधारा है वा यह भूदरार हेवायह दण्ड है, इत्यादि प्रकार से रज्जु द्रव्यही कल्पना करते हैं। इसप्रकार ही अविद्यमान प्राणादिक अनन्त असत् वस्तुओंसेही यह आत्मा कल्पना करते है, परमार्थ से तिनकी सत्तानहीं। अर्थात आत्मासे इतर प्राणा- दिकों की पृथक् सत्ताके अभाव से यह प्राणहें यह मन में यह ई. द्रियहै, इसप्रकार आत्माकोही कल्पते हैं। अरु जिसकरके अचल सिंकल्पादि सर्ववृत्तिसे रहित अफर हुये मनवि कोईभी पदार्थ किसीकरके भी जाननेको शक्य होतानहीं अम आत्माको चलन --- गौडपादीय कारिका द्वितीयं प्रकरण २ । १२५. नात्मभावननानेदं नस्वेनापि कथञ्चन । नएथना एथकिञ्चिदितितत्त्वविदोविदुः ३४॥' कल्पना करने को अशक्यहै, अरु चंचलतासे रहित आत्माकेही प्रतीयमान जो भावहें सो परमार्थ से सतरूप कल्पना करने को शक्य हैं नहीं, एतदर्थ असदूपही प्राणादि भावोंसे, अरु रज्जुंवत् सर्व विकल्पके आश्रयभूत परमार्थ सत्रूप आपअद्वैतसे एकसत् स्वभाव वालाहुआ भी यहआत्मा आपही कल्पितहै। अरु "भावा अप्यद्वयेनैव तस्मादद्वयता शिवा भावभीअद्वयसेही कल्पिता हैं तस्मात् अद्वयता शिवहै । अर्थात् पुनः वे प्राणादि भाव भी सद्रूप अद्वैत आत्मासेही कल्पित हैं । अरु जिस करके अधिष्ठान (आश्रय रहित कोई भी कल्पना देखते नहीं, एतदर्थ सर्व क- ल्पना का अधिष्ठान होनेसे अपने स्वरूँपसे अद्वैतताके अव्यभि- चारसे कल्पनावस्थामें भी अद्वैतता शिर्व कहिये कल्याणरूपही है। अरु सो कल्पनाही तो रज्जु सर्पआदिको व जन्म मरणा- दि लक्षणरूपाभयकी कारण है एतदर्थही अशिवरूपहे, अरुभिय का कारण जे कल्पना तिससे पृथक् कल्पनारहित अरु तिनका आश्रय । जो अद्वयता सो जिसकरके अभयरूपहै क्यिोंकि "अ- भयं वै जनकप्राप्तोऽसीति" इत्यादि श्रुतिप्रमाणसे एक अद्वयरूप आत्माको जाननेवाला अभयरूप अपने आपको प्राप्तहोता है। ताते सोई सर्वका परमकल्याण शिवरूपहै । “विद्वान्न विभेति कदाचन"३३॥ ३४॥ हे सोम्य ! [ किंवा यह नानारूपं द्वैत क्या आत्माके तादात्म्य से सिद्धहोताहै, वा स्वतन्त्र सिद्धहोता है। यह विवेचन करने के योग्यहे । तिनमें प्रथमपक्ष आित्माकी तादात्म्यता वने नहीं। यहां यहअर्थहै कि यह नानारूपद्वैत आत्माके तादात्म्यसे सिद्ध होने केयोग्य नहीं, क्योंकि परस्परमें विरुद्धस्त्रभाववाले जे जड़ अरु अजड तिनके तादात्म्यको असम्भव हे ताने । अरु सर्व M ।
" - मांडूक्योपनिषद्। :, वीतरागभयनोधैर्मुनिभिर्वेदपारगैः । निर्विकल्पो ह्ययंदृष्टःप्रपञ्चोपशमोऽहयः ३५॥ भेदरहित जो आत्मा तिससे तादात्म्य के हुये द्वैतके नानापने की असिद्धिहोवेगी ताते] अद्वैतता शिवरूपकहाँसे होवेगी,क्योंकि जहां अन्य से अन्यका नानारूप भिन्नपना देखाहै तहां अशिव होता है, ऐसा जो, कदापि, वादी कहे सो नहीं। क्योंकि निात्मभावेन नानेदं न स्वेनापि कथंचन यह आत्मभाव से नाना नहीं, अपने से भी कदाचिन्नहीं, अर्थात् जिसकरके इस परमार्थ से सतरूप आत्मा विपे प्राणादिक,संसार का समूहरूप यह जगत् आत्मभाव (परमार्थरूप) से नाना कहिये आत्मा से अन्य वस्तुरूप होतानहीं। जैसे रज्जु स्वरूपसे प्रकाशकर निरूपण किया जो कल्पित सर्प सो नानारूप नहीं, तद्वत् । अरुअपने प्राणा- दिक स्वरूपसेभी यह जगत् कदाचित्भी विद्यमान है नहीं,क्योंकि रज्जु में सर्पवत् कल्पित है ताते, अरु जैसे अश्व से महिप पृथक ही विद्यमान है, तैसे प्राणादि वस्तु परस्परमें भिन्न नहीं। एतदर्थ निपृथङ्गापृथक्किश्चिदितितत्त्वविदोविदुः पृथक् अपृथक् कुछ भी नहीं ऐसे तत्वके वेत्ता कहते हैं । अर्थात् । नानात्वको असत् होने से परस्पर में वा अन्य से कुछ भी पृथक् नहीं, इस प्रकार परमार्थ तत्त्वके वेत्ता ब्राह्मण जानते हैं। एतदर्थ अशिव की हेतुता के अभाव से अद्वैतता ही शिवरूप है । यह अभि. प्राय है ३४॥ ३५ ॥ हेसौम्य! यह जोसम्यक् दर्शन कहा अबतिसकी स्तुति करते हैं। वीतरागभयकोधैर्मुनिभिर्वेदपारगैः रागभयकोध से रहित मुनि अरु वेदके पारको प्राप्तहुये पुरुपों करके अर्थात् विगतकहिये अभाव हुये हे रागभय क्रोधादिक सर्व दोप जिनके, ( अर्थात् राग भय कोधादिक दोपजे सम्यक् आत्मज्ञानकी प्राप्ति में प्रतिबंधक तिनकाहेतु अविद्या जन्य द्वैतभाव है सो जिसका h गोंडपादीय कारिका द्वितीय प्रकरण २। १२७ तस्मादेवं विदित्वैनमद्वैते योजयेत् स्मृत्तिम् । अद्वैतंसमनुप्राप्य जडवल्लोकमाचरेत् ३६ ॥ एक अद्वैत आत्मज्ञान करके निर्मूल होता तब रागादि सर्व दोषों का अभाव होता है, इस प्रकार जे रागादि दोप रहिता अरु सर्वदा मनन करने के स्वभाववाले मननशील परम विवेकी मुनि, अरु वेदके पारको प्राप्तहुये जे वेदार्थ तत्त्वके ज्ञाता अरु वेदान्तके अर्थविपे परम बोधवान्, ऐसे पुरुषोंकरकेही निर्वि- कल्पो ह्ययं दृष्टः प्रपञ्चोपशमोऽद्वयः निर्विकल्प प्रपंचके उप- शमवाला अद्वैतरूप यहदेखा (जान्या) है, अर्थात् उक्तप्रकारके मुनि ज्ञानी पुरुषोंकरके सर्व विकल्प से रहित अरु द्वैतभेद के विस्ताररूप प्रपंच के अभाववाला, इसहीसे अनरूप यह आत्मा देखा जान्या, यथार्थ अनुभवकिया है। इस कहनेका अभिप्राय यह है कि देवादिदोषरहित वेदांतके अर्थविषेतत्पुर पंडित संन्यासी करकेही परमात्मा देखने अनुभव करने को शक्य है । अरु तिनसे इतर रागादि दोषकरके मलिनहुये चित्तवाले, अरु अपने पक्षपातके देखनेवाले तार्किकादिको करके नहीं " न कम्मिणो प्रवेदयन्ते रागात्" "नेपा तर्केण मतिरापनेया" इत्यादि श्रुति. यों के प्रमाण से। ३५ ॥ ३६॥ हेसौम्य तस्मादेवं विटिलैनमद्वैते योजयेत् स्मृतिम् ताते ऐसे जानके अद्वैतविपे स्मृतिको जोड़ना अर्थात् । जिस करके परमार्थरुप अद्वय आत्मा उक्त प्रकारका शिवरूपहै। ताते इसप्रकार उपनिषदादि वेदान्त शास्त्रसे सम्यक प्रकार जानके अद्वैतविपे स्मृति को जोड़ना लिगावना अर्थात् अद्वैतके ज्ञानार्थ स्मृतिकरना वा रखना अर्थात् जवशास्त्रअरु आचार्यकरकेसम्यक् अद्वैततत्वका यथार्थ साक्षात् अनुभवपूर्वक उसका दृढनिश्चया- स्मक भाव होताहै तव असत् नामरूपाक्रियात्मक जगत् तिसकी सकारणविस्मृतिरूप निर्विकल्प अवस्थान समाधिसे जब उत्थान . १२८ मांडूक्योपनिषद् । निस्स्तुतिनिनमस्कारो निःस्वधाकार एंबच । चला चलनिकेतश्चयतिहिच्छिकोभवेत् ३७॥ होवे तेव प्रत्यक्ष भासमान जे मृगतृष्णाके जलक्तपञ्चविपयात्मक समस्त जगत् तिसविर्षे तिसके अधिष्ठानकी स्मृतिकरना.कि यह सर्व नानात्मक द्वैत अपने अद्वैताधिष्टान से इतर नहीं यह वोही रूपहै सो अद्वय अधिष्ठानही.सर्वात्मा है, ताते मत्तःपरतरन्ना- न्यत् किंश्चिदस्ति । मुंझं सर्वाधिष्ठानसे इतर कुछभी नहीं, इस प्रकार अपनी हद भावनारूप स्मृतिको अद्वैत तत्त्व में जोड़ना। अरु अद्वैतसमनुप्राप्यं जडवालोकमाचरेत् । अद्वैत को सम्यक् प्रकार प्राप्तहोके जड़वत् लोकविषे विचरे, अर्थात् उक्तप्रकार अद्वैतमें स्मृतिको योजनाकरके । इस अद्वैतको "अहं ब्रह्मास्मि'' समें ब्रह्महौं ऐसे :सम्यक्.प्रकार जानके सर्वलौकिक व्यवहार को त्यागके केवल शरीर यात्रामांत्रके लिये जड़ (मूर्ख ) वत् हुआ लोकविष विचरे । अभिप्राय यह है कि में इसप्रकार का यहहो,ऐसे आपको विद्या अरु कुलादिक से अप्रख्याताअरु अपने लक्ष्यको अप्रकट करताहुआ विद्वान् ज्ञानी लोक वि विचरे। "भैक्षचर्यचरन्ति ३६ ॥...... ... ३७॥हे सौम्य प्रश्न पूर्वकहा जो विद्वान् जड़वत्हुआ लोक पेि विचरे सो. किस आचरण से विचरे, ! उत्तर निस्स्तुति निर्नमस्कारो निःस्वधाकारणवच स्तुति से रहित, नमस्कार से रहित, स्वधाकारसे रहितही होवे । अर्थात् । अपने आत्मा से। अन्य देवताओं की स्तुति (आराधनादिक) से रहित होवे, अरु मनुपयों (ब्राह्मणादिकों) के अर्थ नमस्कारादिकों से रहितहोवे, अरु पितरों के अर्थ स्वधाकार से रहित होवे अर्थात् उक्तप्रकार का एकारपदी विद्वान् , स्तुति यज्ञादि देवकार्य से, अरु नम- स्कार आतिथ्यादि मनुष्यकार्यले,अरु स्वधाश्राद्धादिक पितृकार्य से, रहित यती (सन्यासी) ही होघे अभिप्राय यहह कि स्तुति , गौडपादीय कारिका द्वितीय प्रकरण २॥ १२६ नमस्कारादि सर्व कर्मों से रहित, अरु तिनकों में प्रवृत्ति के हेतु जे. वित्तपणा, पुत्रैषणा, लोकैपणा,अआत् वित्त पुत्र अरु स्वर्ग लोक, इनकी कामना तिसका अशेपत्यागी हुआ परम हंस परि- बाट आश्रमको प्राप्त होवे " पतंवैतमात्मानंविदित्वेत्यादिश्रुतेः “त द्धयस्तदात्मानस्तशिधास्तत्परायण इत्यादिस्कृतेश्च"इस प्रसिद्ध तिसआत्माको जानके । अरु तिसविपे बुद्धिवालेतिसरूप तिस विषे निष्ठावाले तिसपरायणहुये इत्यादि श्रुति स्मृतियों के प्रमाणसे । अरु चलाचलनिकेतश्चातिदृच्छिकोभवेत् च- लाचल निकेतवाला यतियादृच्छिकहोये, अर्थात्चलकहिये क्षण क्षणविपे अन्यथाभावहोनेरूपस्वभाववालाचलशरीर है, अरु नि- राकार सर्वत्र पूर्णहोने से अचलआत्माहै । तातेजव कदाचित भो- जनादिक व्यापारके निमित्त आकाशवत् अचलरूप आत्मतत्व रूप।अपने निकेत आश्रय, (आत्मस्थिति) को विस्मरण करके। अिर्थात् लोकदृष्टिमात्र विस्मरण करके क्योंकि स्मरण अरु बि- स्मरण अन्यविषे होता है ज्ञानोत्तर अपने आप आत्माविषे नहीं। महाँ ऐसे मानता है, विमाधारणलोक उसको यह भोजनआदि फरताह ऐसा मानतह तिससमय विद्वान् शरीररूप चल निकेत (आश्रय ) वाला होताहै, अरु तिल भोजनादि व्यापारसे अन्य कालविये आत्मतत्त्वरूप अचल निकेतवाला होवेहै । इसप्रकार यह विद्वान् चलाचल निकेतवाला है। परन्तु बाह्य विपयों के आश्रयवाला नहीं। अरु सो विद्वान् यादृच्छिक होबे है, अर्थात् यदृच्छा जो देवगति तिससे प्राप्तहुये अर्थात् विनायनकेअनाश्रित प्राप्तहुचे । कोपीन आच्छादन अरु ग्रासमात्र से देहकी स्थिति- वाला होवे ३७॥
१३० मांडूक्योपनिषद् । तत्वमाध्यात्मिकं दृष्ट्वा तत्त्वं दृष्ट्वातु बाह्यतः। तत्त्वी भूतस्तदारामस्तत्त्वादप्रच्युतो भवेत् ३८ ॥ इति गौडपादीयकारिकायां वैतथ्याख्यंद्वितीय प्रकरणं समाप्तम् ॥ ३८॥हे सौम्य![ "अहमेवपरब्रह्म नमत्तोऽन्यदस्ति किश्चिदि- ति" मैंही परब्रह्महीं मुझसे अन्य रंचकमात्रभी कुछनहीं। इस प्रकार की स्मृतिका सन्तान कहिये प्रवाह करना। अर्थात् अपने वास्तविक आत्मरूपका अनुसंधानरूप स्मरण प्रवाहरूपसेकरना। सोकोई एककालविपे करना ऐसा नियमित नहीं, किन्तु निरन्तर करनेको योग्यहै । “निमेपाई न तिष्ठन्ति वृत्ति ब्रह्ममयीं विना" | ऐसेकहा। इसरलोकका यह अर्थहे कि शरीरादिक कल्पित आध्यात्मिक वस्तुको अधिष्ठानमात्र देख के, अरु शरीर से चालवत् स्थितहुये पृथिव्यादिकों को कल्पितपने करके अव- स्तुरूप होनेसे सो अधिष्ठानही है इतरनहीं, इसप्रकार अनु- भव करके आप द्रष्टा पुरुषभी परमार्थ वस्तुके स्वभावको प्राप्त हुआ, तहांही आसक्त चित्तवाला,अरु चास्य विपयोंसे निवृत्तिबुद्धि वाला हुआ तिसही परमार्थ तत्त्वविपे स्थितहुआ तिसके ज्ञान विपेस्थितहोवे ] "वाचारंभणं विकारोनामधेयमित्यादि श्रुतेः' बाणीसे उच्चारण किया विकार नाममात्रहीहै? इत्यादि श्रुति प्रमाणसे, तत्वमाध्यात्मिकंवृष्ट्वा तत्त्वं दृष्ट्वातु वाथतः । आध्यात्मिकको तत्वदेखके,अरु वाह्यको तो तत्वदेखके अर्थात् रज्जुसर्पवत् अरु स्वप्न मायादिवत् असत् शरीर प्राण इन्द्रियादि रूप अध्यात्म . अन्तरवस्तु, को तत्व (अधिष्टान) स्वरूप देख- के। अरु शरीरादिकोंकी अपेक्षानेवाय पृथिव्यादिरूप वस्तुओं को भी तत्व (अधिष्टान) स्वरूप देखके, "सवायाभ्यन्तरोय" "अपूर्वोऽनपरोऽनन्तरोऽघायः" " कृत्स्नघन "आकाशयत् गौडपादीय कारिका द्वितीय प्रकरण २ । सर्वगतः” "सूक्ष्मोऽचलो, निर्गुणो, निष्कलो, निष्क्रियः” “तत् सत्यं स आत्मा तत्वमसीतिश्रुतेः ८ वाह्यान्तर सहित अज- न्माहे, अपूर्व है अनपरहै अनन्तरहै अवाहहै, सम्पूर्णहै, आकाश- वत् सर्वगतहै, सूक्ष्म है, अचलहै, निगुणहै, निष्कल है, निष्क्रिय है, सो सत् है सो आत्माहै सो तू है ? इत्यादि श्रुतियोंकी एक वा- क्यतासे, " तत्त्वीभूतस्तदारामस्तत्त्वादप्रच्युत्तोभवेत् । तत्त्व रूप अरु तिसविषे रमणवाला तत्त्वसे अच्युत हो । अर्थात उक्तप्रकार तत्वकी दृष्टि से तत्त्वस्वरूप अरु तिसविपे रमणवाला, अरु वाह्यविषयों विषे अरमणवाला हुआतत्त्वसे अचलित हो। 'जैसे कोई एक अतत्त्वदर्शी चित्तको आत्मत्त्वकरके जानता हुआ चित्तके चलने पीछे आत्माको चलितहुआ मानता सता 'अभी में आत्मतत्त्वसे चलितहुआहौं, इसप्रकार देहादिरूप आ- त्माको चलितहुआ मानताहै । अरु चित्तके एकायहुये कदाचित 'अभी में तत्त्वरूप हुआहौं, इसप्रकार प्रसन्न हुये चित्तरूप आ. स्माको तत्वरूप मानताहै । तैले आत्मवेत्ता होवे नहीं, क्योंकि आत्मा एकरूप एकरसहै ताते उसका स्वरूपसे चलना असंभव है। किन्तु “अहंब्रह्मास्मीति" मैं ब्रह्मही इसप्रकार ब्रह्मानु- संधान करताहुआ। सदेव तत्त्वसे अप्रच्युत ( अचलित)होवे। अभिप्राय यह है कि सदा अचलित आत्माके दर्शन (अनुभव) बालाहोय। "समोनागे समोमशके"" शुनिचैव वपाकेच। समं सर्वेषु भतेपु" - हाथी अरु मच्छर विपे समान है । श्वान विपे अरु चांडालविणे पंडित समदी है । अरु सर्व भूतों विपे समस्थितहोनेवाले आत्मरूप परमेश्वरको । विद्वान् आत्मनिष्ठ अनुभवकरताहै | इत्यादि श्रुति अरु गीतास्मृति के प्रमाणसे ३८ इति श्रीगौडपादाचार्यकृतमांडूक्योपनिपद्वारिकायां चैतथ्यात्य द्वितीयकरण भाषाभाष्य समाप्तम् २ ॥ ॐ तत्सब्रह्मार्पणमस्तु ॥ हरिः ॐ ॥ ॐ तत्सत् ॥
गौडपादीय कारिका तृतीय प्रकरण ३। अद्वैत तत्वके जानने के अर्थ अद्वैत संज्ञक तृतीय प्रकरण का आरंभकरतेहैं । पूर्वके द्वितीय प्रकरणविये उपास्य अरु उपासना 'आदिक भेदोंका समह सर्वमिथ्याहै अरु केवल अद्वैत आत्मा परमार्थ सत्यरूप है, इसप्रकार सिद्धहुआ है, एतदर्थ यहां आरंभ विपे उपासककी निन्दा करते हैं । उपसनाश्रितोधों जातेत्रहा- णिवर्तते, प्रागुत्पत्तेरजं सर्व तेनासौ करणः स्मृतः। धर्म उत्पन्नहुये ब्रमविपे वर्तताहै उत्पत्तिसे पूर्वसर्व अजन्माथा उपा. सनाको आश्रितहुआ तिससे यह कृपण चिन्तन किया है, अर्थात् देहके धारणले धर्म जो जीव सोआिकाशादिभूतोंके समुदाय के आकारसे उत्पन्न हुये ब्रह्मविपे तिसका अभिमानी होके वर्त- ता है । सो उत्पत्तिसे पूर्वसर्व अजन्माथा, इसप्रकार कालकरके परिच्छिन्न वस्तुको मानता है । सो (जीवा पुनः उपासना को • पुरुषार्थका साधन जानके तदाश्रितहुआ देहपात हुये पश्चात् तिसही ब्रह्मको प्रातहोवोंगा, इसप्रकार जिसकारण से मिथ्या ज्ञानवान् होयके स्थित होवेहे, तिसकारणसे यह ब्रह्मवेत्ता पुरुषों ने कृपण (अल्प)चिन्तन किया है। हे सौम्य ! इसका यह अभि. प्रायहे कि उपासनाके आशितहुआ । अर्थात् उपासनाको अपने मोक्षकारााधन मानके प्राप्तहुआ "उपासकोऽहं ममोपास्य प्रल, तदुपासनं कृत्वाजाते ब्रह्माणि इदानीं वर्तमानोऽजं भलशरीर पातादूर्ध्वप्रतिपत्स्ये प्रागुत्पत्तेश्चाजामदं सर्वमहंच " में उपारा- कहूं मेरा उपास्य बाल है तिसकी उपासनाकर के अवभूतों के संघातके आकार से उत्पन्नहुये ब्रह्म विपे वर्तमानहों, अरु शरीर के पानहुये पश्चात् अजन्मा ब्रह्मको प्राप्तहोवोंगा, अरु उत्पत्ति से पूर्व अवस्था विपे यह सर्व अजन्माथा अरु में भी तैसाही अजन्माया । इसप्रकार जिसकरके उपासक मानता हे एतदर्थ पूर्वावस्थाबाले नामको विपयरनेवाली अजन्मापनेकी श्रुति वने होअव" इयानी जातोजातेरमणियवर्तमानउपासनयापुनस्तदेव प्रतिपत्स्यइत्येवउपासनाश्रितोधर्मः " : उत्पत्ति अवस्था रिसे * १३४ मांडूक्योपनिषद् । अत्तोवक्ष्याम्यकार्पण्यमजातिप्सनताङ्गतम् । यथा न जायते किञ्चिन्जायमानं समं ततः २।८१॥ में जन्म को पाया हो, अरु इस स्थित अवस्थाविषे उत्पन्न हुये उमविषे । अर्थात् भूतोंके संघातरूप शरीराकारसे उत्पन्न हुये प्राधिषे । वर्तमानहीं , अरु उत्पत्ति से पूर्व जिसरूपवाला हुआ स्थित था तिसही को पुनः प्रलय अवस्थाविपे उपासनासे प्राप्त होबोंगा । इसरीति से उपासना के आश्रित हुआ साधक जीव तो जिस हेतुसे इसप्रकार करके अल्प ब्रह्मका वेत्ता है तितही हेतुसे यह नित्य अजन्मा प्रा के दर्शी ( अनुभवी ) महात्मा पुरुषों ने । उक्तप्रकार के उपागक को कृपण, दीन, अल्पक, करके चिन्तन कियाहै " यहाचानाभ्युदितं येनबाग युद्यतेतदेव ब्रह्म, लं,विद्धि, नेदयदिदमुशलत, इत्यादि" नोवाणीसे अप्रका. शित अर्थात् जिसकोबाणी कहनहींसक्ती अरु जिसकरकेवाणी प्रकाशित होती । अर्थात् जिसकी सत्तासे वाणी अन्योंको कहने में समर्थ होती है। तिसही को त बामकरके जान, जिसको यह भिदवादी लोक उपासते हैं सो बलानही , वा जिसकोलोक उपासते हैं तो साकार परिच्छिन्नहुये ग्राम होनेको योग्य नहीं। इत्यादि सामवेदीय तलवकारगासाकी श्रुतिकेप्रमाणाने ११०॥ हे सौम्य ! [ अद्वेत के विरोधी द्वैतवादी भेदी उपासकों की निन्दा करके अब सम्पत्ति अद्वेत प्रतिपादन की प्रतिज्ञा करते है]" सवायाभ्यन्तरोषजः" । इत्यादि अति प्रमाण से जो वाह्य अन्तर सहित अजन्मा आत्मा है । कि जिनके जानने से ओर का जानना अपशेप रहना नहीं । तिलके जानने में अस- मर्थ हुआ, अरु अभिचा करके अपने आपको दीन जानना हुआ "जातोऽहंजातेवाणिवर्तनपासनामिनः सन नाम निपनस्य" में जन्नाहो अरु उत्पन्न ये हाधिपे पनाही, अर निमकी उपासना के आश्रिा हुआ नारो प्रात होपोंगा । उन ..
गौडपादीय कारिका तृतीय प्रकरण ३। प्रकार जाननेवाला पुरुष कृपण होताहै । अर्थात् “न जायते नि- यते वा कदाचित्" इत्यादि श्रुति आदिकों के प्रमाण अनुभव से जो जन्म मरण रहित सदा एक रस आत्मा तिसको, अरु "स चाह्याभ्यन्तरोह्मजः" इत्यादि प्रमागसे सहित वाय अन्तर स- वाधिष्ठान सर्वरूपसे सुशोभित ब्रह्म तिसको । जो कि वास्तव दोनों एक अरु जन्मादि विकार रहित हैं। जन्मे मानके, तिनमें परस्पर स्वामी सेवकादि वा उपास्य उपासकादि भेद मानके अरु अपने आपको अति दीन अपराधी ईश्वरके आश्रित हुआ तिसकी उपासना से ब्रह्मभावकी प्राप्ति मानके जो उपासना करने वाले पुरुपहें सो आपभी मुये अरु ब्रह्मको भी मारा क्यों कि “जातस्यहि भुवोमृत्युर्बुवंजन्म मृतत्यच" इत्यादि प्रमागसे जो जन्मता है सो भरता है, अरु उस भेदीने जीवरूपसे आत्मा को अरु भूतों के संघात रूपसे ब्रह्मको जन्मा माना है, ताते उक्त प्रकारके भेदी उपासकों को अति अरु व्हावेत्तादि महात्मा - पण कहते हैं । एतदर्थ अव अजन्मा ब्रह्मरूप अकृपण भाव की कहताहौँ “यनान्योऽन्यत् पश्यत्यन्यच्छृणीत्यन्यद्विजानाति तद- ल्पं मर्त्यसदाचारंभणं विकारो नामधेयमित्यादि श्रुतिभ्यः जिसविषे अन्य अन्यको देखता है, अन्यको सुनताहे अन्य को जानता है सो अल्प भरनेके योग्यहै, पाणीसे कहा विकार नाम मात्रहै ? इत्यादिक श्रुतियों के प्रमाणसे । अरु सो उक्त प्रकारका (अर्थात् भेदी उपासक करके माना ब्रह्म कृपणभावका आ- श्रय है । अरु तिससे विपरीत अर्थात् श्रुतियों के वाक्य प्रमाण अभेदवादी ब्रह्मवेत्ताओं करके जाना वाह्य अन्तर सहित अज भूमाख्यत्रम अकृपणभावरूपहै । अरु जिसकोजानकेअविद्याकृत सर्वकृपणभावकी अशेष निवृत्तिहोवेहै तिसकोअकृपणसाव कहते हैं, तिस अरूपणभावको अब कहता हों, इत्यर्थः । अतोवक्ष्या- म्यकार्यण्यमजातिसमतांगतम् । अजाति हे समताको प्राप्त है अकृपणभावहै तिसको कहता हाँ अर्थात् सो ब्रह्म कैसा है कि " १३६ मांडूक्योपनिपद् । आत्मा ह्याकाशवज्जीवैर्घटाकाशैरिवोदितः । घटा- दिवच्च संघातर्जातायेतन्निदर्शनम् ३।८२॥ अजाति हे 'अर्थात् जाति जो जन्म तिसते रहित अजहै । वा जो जन्मवान् होताहै सो मनुप्यादि वा ब्राह्मणादि जातिवाला होता है अरु ब्रा अजन्मा होनेसे वाहणादि वा मनुष्यादि जातिवान् नहीं ताते सो अजाति अजन्मा है । अरु सर्व समताको प्राप्तहुआ है, क्योंकि उसनिपे अवयवोंकी विपमताका अभाव है। अरु जो साया वस्तु है तो अबयों की विषमतावाली होती है, इरा प्रकार कहते हैं । अरु यह । आत्मास्यवहा तो निरक्यवहे इस हेतु से समता को प्राप्तहुआ है। अरु सो ब्रह्म किसी भी अवयवों से जन्म पावता नही एतदर्थ सो सर्प ओरसे पूर्ण जन्मरहित अकृपणीव हे तिसको कहताहों। अरु " चथानजायते किश्चि- ज्जायमानं समंततः १:जैसे कुछ भी जन्मतानहीं जायमान सर्व ओर से वर्तता है । अर्थात् जेरो रज्जु विपे सर्प भ्रान्ति से जन्मता (उत्पन्नहोता) हे, तेही सर्व अविद्या कृत भ्रान्ति दृष्टिसे जन्मको प्राप्तहोनेकरके भासमान है, तथापि, जिनप्रकार से वस्तुकरके कुछ भी जन्नको पापता नहीं, किन्तु सर्व देशकाल अरु वस्तुसे पूर्ण कूटस्थ ही वस्तु होता है। अर्थात् सर्व देश काल अरु वस्तु रूपसे एक अद्वेन बलही मुशोभित है । तसे तिस प्रकार को श्रवणकर । यह इसका अर्थ हे ३ । ८१ ॥ ३।८२ हे सौम्य जन्मरहित ब्रह्मरूप अकृपणभावकोकाना हो, इसप्रकार प्रतिज्ञा निया जो वस्तुतिसकी सिद्धिके अर्थ हेतु अरु दृष्टान्त को कहते हैं, इसप्रकार कहता हो । आत्मा हा. काशवजीचटाकाशरिवोदितः। आत्मा आकाशात् है, अम. घटाकाशों से तुल्य जीवों से कहा है। अर्थात [प्रतिज्ञा किये वाक्य विपेत्रमाशब्द करके प्रमंग में प्रातकिया जो परमात्मा सो कैसा है, इसप्रकार प्रश्न करने की इच्छा के हुये कहते हैं।
मांडूक्योपनिषद् । घटादिषु प्रलीनेषु घंटांकाशादयोयर्थी । आकाशेस म्प्रलीयन्ते तद्वज्जीव इहात्मनि ४।८३॥ ,४८३॥हे सौम्य, घटादिपु प्रलीने घटाकाशादयो यथा। आकाशेसंप्रलीयन्ते तद्वज्जीवइहात्मनि जैसे घटोदिकों के लीन हुये घटाकाशादिक आकाशविपेलीनहोते हैं,तैसे इस आत्माधिप जीव होते हैं, अर्थात् जैसे घटमठादिकों के अपने कारण पृथिवी विपे लय होने से तद्गत जे घटाकाशादि संज्ञक आकाश सो अ- पने से अभिन्न महदाकाश विपे लीन होते हैं, तैसेही इस आ. काशवत् पूर्ण आकाश का भी आश्रय महासूक्ष्म अधिष्ठान धे- तन्य आत्माविपे, यह शरीरादि संघात विशिष्ट चिदाभास जीव लीन होता है। [जीवों के उत्पत्ति अरु प्रलय उपाधि के किये है, स्वाभाविक नहीं। अरु तिसप्रकार होने से उत्पत्तिकी प्रति- पादक श्रुतिसे होता जो अद्वैत का विरोध तिसके अभाववत् प्रलयकी श्रुतिसे भी अद्वैतका विरोध नहीं,इसप्रकार श्लोकके अक्षरों के व्याख्यानसे प्रकट करते हैं ] अर्थ यहहै जो,जैसे घटा- दिकों की उत्पत्ति से घटाकाशादिकों की उत्पत्ति होवे है, अरु जैसे घट मठादिकों के लय ये घटाकाशादिकों का भी लय होने है। तैसेही देहादिक संघातकी उत्पत्तिसे घिटाकाशयत् ।जीवोंकी उत्पत्तिहोती है, अरु तिन देहादि संघात का सकारण में लय होने से इन जीवोंका (संघातविशिष्ट चेतन्यका) इस (संघातोप- हित एक अद्वेत) आत्मा विपे लय होता है, परन्तु स्वरूप करके इस चेतन्य जीव का उत्पत्ति लय नहीं" न जायते म्रियते वा कदाचित् " इत्यादि श्रुतियों के प्रमाण से १।८३॥ ५माहे सौम्य,सन देहाधिपेआत्माकी एकताके होते,जन्म मरण अरु सुसादिक धर्मपाले एक आत्मा के हुये, सर्व आत्माको उन जन्मादिक धमासम्बन्ध होवेगा, और किया अरु फलका मिश्रभार होगा, इसप्रकार जो दैतवादी कहता है, निमके प्रति गौडपादीय कारिका तृतीय प्रकरण ३। यथैकस्मिन् घटाकाशे रजोधूमादिभिर्युते । नसमें सम्प्रयुज्यन्ते तहज्जीवाःसुखादिभिः ५।८४॥ अव यह उत्तर कहते हैं । यथैकस्मिन् घटाकाशे रजोधूमादिमि युतानि सर्वे सम्प्रयुज्यन्ते तद्वज्जीवाःसुखादिभिः। जैसे रज अरु धूमादिक करके युक्त एकघटाकाशके हुये, सर्व घटाकाशादि- के तिन रज धमादि करके संयोगको पावते नहीं तैसें जीव सु- खादिकों से संयोग को पावते नहीं, अर्थात् । अनेक घटों में आकाश एकही है सो घटरूप उपाधि के सम्बन्ध से अनेक आ- काश कहे जाते हैं, अरु उन अनेक घटाकाशों मेंसें एक घटाकाश को धूलि धमादि करके युक्त होने से सर्व घटाकाश तिन धलि धूमादिकों से सयोग को पावते नहीं, तैसे एक आत्मवाद विपे एक जीव को सुखादि करके युक्त हुये सर्वजीव सुखादिकन सें संयोग को पावते नहीं ॥ ननु, तक क्या सर्वत्र एकही आत्मा है, जहां ऐसीशंका है। तहां कहते हैं, यह तेरा कथन सत्य है । जो सर्वत्र एकही आत्मा है|शका । ननु,तिसं आत्मा की एकता युक्तिरहित हैं तिसको 'कैसे अंगीकार करते हो । उत्तर । तहाँ कहते हैं। सर्व संघातों विषे एकही आत्मा है, इसप्रकार जो हम ने पूर्व युक्ति सहित आत्मा की एकता कही सो क्या तेंने श्रवण किया नहीं। शंका॥ ननु, जब एकही आत्मा है तब सो सर्वत्र सुखी अरु दुःखी होवेगा। समाधान, तहां कहते हैं, यह प्रश्न सांख्यवादी का है, किंवा वैशेषिकादिकों का है। तिनमें जब यह सांख्यवादी का प्रश्न होवे, तब असंभव है, क्योंकि जिस करके सांख्यवादी जो है सो सुख दुःखादिकों के बुद्धि के समवाय स. म्बन्धके अंगीकार से आत्मा को सुख दुःखादिक धर्मवानपना इच्छता नहीं, अंरु ज्ञानस्वरूप आत्मा के भेद की कल्पना वि. प्रमाण नहीं, एतदर्य यह सख्यिका प्रश्न संभव नहीं ॥ अरुनो ऐसा कहे कि आत्मा के भेदके अभाव हुये प्रधानको पर के अर्थ .
१४०० .मांडूक्योपनिषद् । होनेका संभव होवेगा ऐसाकहे तो, सो वनेनहीं,क्योंकि प्रधानके भोग मोक्षरूप अर्थके आत्माविणे-अममवाय है ताते । अरु जय प्रधानका किया बंध वा मोक्षरूप अर्थ पुरुषोंविषे भेदकरके सम वायको प्राप्तहोवे, तब आत्माकी एकता करके प्रधानको परार्थ (जीवोंका शेष) होनेका असंभव होवे । एतदर्थ पुरुषके भेदकी कल्पनायुक्तहै,परन्तु सांख्यवादियोने बन्ध वा मोक्षरूप अर्थपुरुप से समवाय संबंधवाला अंगीकार कियानहीं,किन्तु निर्विशेप,चे- तनमात्र आत्मा अंगीकार कियाहै, एतदर्थ पुरुपकी सत्तामात्रका कियाही प्रधानका परार्थपना सिद्धहै, नतु पुरुपके भेदकाकिया। किंवा प्रधानका जो परार्थपनाहै सो अन्य शेपी की अपेक्षा करता है, तिसविपे भेदकी अपेक्षानहीं एतदर्थ पुरुपके भेदकी कल्पना विपे प्रधानका परार्थपना हेतु नहीं । अरुसांख्यवादियों को पुरुपके भेदकी कल्पनाविपे अन्य प्रमाणहै नहीं। अरुप्रधान जो है सो इस पर (पुरुप) की सत्तामात्रकोही निमित्तकरके आप पद्धहोवे है अरु मुक्त होवेहै । अरु सेश्वर सांत्यवादियों के मताधिपे पर जो ईश्वरहे सो ज्ञानमात्र सत्ता स्वरूप से प्रधानकी प्रवृत्तिविष हेतु नहीं, किन्तु किसीभीविशेषसे हेतुहोगा।एतदर्थसांख्यवादीकरके केवल मूढ़तासेही पुरुपके भेदकी कल्पना अरु वेदार्थका परित्याग किया, युक्ति अरु प्रमाणसे नहीं ॥अरु जो वैशेषिकादि मतवादी कहतेहैं कि इच्छा आदिक आत्मासे समवाय सम्बन्ध वालेहें, सो उनका कहनाभी असरहे । क्योंकि स्मृतिकेतु संस्कारोंके भवन यवरूप प्रदेशरहित । अर्थात् स्मृतिकेहेतु जे संस्कार तिन संस्कार रोंके अवयव रूप प्रदेश तिनसे रहित । आत्मावि समवाय का अभाव है तात तिनके सिद्धान्तकी असिद्धि होगी। अरु आत्मा अरु मनके संयोगसे स्मृतिकी उत्पत्तिका अगीकार करने से स्पृ. तिके नियमका असंभव होवेगा (आत्मा, मनके संयोगरूप स्मृति के कारण के होते अनुभव कालाविपेभीस्मृतिहोगी) या एककाल विपे सर्व स्मृतियों की उत्पत्तिका प्रसंग होगा। भिन्न [ किंवा गौडपादीय कारिका तृतीय प्रकरण ३। समान जातिवाले,अरु स्पर्शादिक गुणवाले पदार्थों का परस्पर सम्बन्ध देखाहै। जैसे मल्लोंका मेपों का अरु रज्जुघटादिकनका सम्बन्धहै । तिस समानजाति अरु स्पर्शादि गुणके अभावसे आ- स्माकीमनआदिकोंसे सम्बन्धकी असिद्धिते,अरु उक्त असमवायि कारणसे ज्ञानादि गुणोंकी उत्पत्ति सिद्ध होवेनहीं,इसप्रकार कहते हैं.] जातिवाले,स्पर्शादि गुणरहित जीवों का मन आदिकों से सम्बन्ध युक्तहै,नहीं । अरु नैयायिकनके [ गुणादिकों की समान जातिके अरु स्पर्शादिक गुणके अभावहुये भी द्रव्यसे सम्वन्धवाले आत्माका मन आदिकों से सम्बन्ध सिद्धहोता है, इसप्रकार जो कदापि वादी कहै,सोचनेनहीं ऐसा कहते हैं। यहां यह अर्थहै कि स्वतन्त्र जो सन्मात्रवस्तु सो यहां द्रव्य शब्दकरके कहते हैं । अरु वेदान्तियोंके मतविषेतिस द्रव्यसे भेदकरके गुणादिक विद्यमान हैं नहीं। क्योंकि "शुक्ल पटः पण्ढो गौरित्यादि " ८ शुक्लपट है, नपुंसक बैलहै इत्यादिस्थानमें गुण गणी आदिकोके समानाधि- करणके देखनेसे। अरु द्रव्यही कल्पनासे तिसतिप्त आकार करके भासताहै,इसप्रकार अंगीकार करनेसे एतदर्थ दृष्टान्तका असं- भवह नहीं मतविपे द्रव्यसे रूपादिक गुणर्म जातिविशेष अरु समवाय भिन्न हैं नहीं। अरु जब गुणादिक द्रव्यसे अत्यन्त भिन्न ही हो, अरु जव इच्छा आदिक आत्मासे अत्यन्त भिन्नहो, तर भी तैसही द्रव्यसे गुणादिकों के सम्बन्धका अरु आत्मासे इच्छा आदिकों के सम्बन्धका असंभव होवेगा । अरु जो कहे कि अयुत (अभिन्न) सिद्ध वस्तुओंका समवायरूप सम्बन्ध विरोधको पा- चतानहीं,सो कथन बनेनहीं[हे वादी ने जो यह गुणादिकों का अयुतसिद्धपना कहा, सो क्या अभिन्न कालवानपने रूपहै, किं वा अभिन्न देशवान्पने रूप है, किंवा अभिन्न स्वभाववान्पने रूप है, किंवा संयोग अरु विभाग की अयोग्यतारूप है, इस प्रकार यह चार पक्ष हैं। तिनमें प्रथमपक्ष बनेनहीं क्योंकि वि- कल्पको असहन करता है तात्त । इसप्रकारं कहते हैं ] क्योंकि मांडूक्योपनिषद् ।। ऐसे होने से अनित्य इच्छा आदिकों से पूर्व नित्य आत्मा सिद्ध है ताते । अरु आत्माके अयुत सिद्धपने का असंभव है [ यहां क्या इच्छा आदिकों की अपेक्षासे आत्माका अभिन्न कालवान्- पना है, किवा आत्माकी अपेक्षासे इच्छादिकों को अभिन्न का- लवान्पना है । इसप्रकार विकल्प करके प्रथम पक्षके अर्थ दूषण दिया है ] आत्मा से इच्छा आदिकन के अयुत सिद्धपने के होने से इच्छादिको को आत्मगत महत्पनेवत् नित्यता का प्रसंग हो- वेगा, सो अनिष्ट है, क्योकि इच्छादिकोंकी नित्यताके हुये आत्मा के मोक्षके प्रसंगका अभाव होवेगा ताते । अरु [ जब आत्मा के साथ इच्छा आदिको को अभिन्न कालवानपना है, तब आत्मा को अनादि होने से तिस विपे स्थित जो महत्पना तद्वत् तिन इच्छा आदिकों को भी नित्यताकी प्राप्ति होवेगी, इस प्रकार क- हते हैं ] समवाय सम्बन्धको द्रव्यसे इतरपने के हुये, जैसे द्रव्य अरु गुणका समवाय सम्बन्ध है, तेसे तिस समवायका द्रव्य से अन्य सम्बन्ध कहना योग्यहै। अरु जो ऐसा कहे कि समवाय नित्य सम्बन्धही है, एतदर्थ तिनका अन्य सम्बन्धकहना योग्यनहीं। तो तैसे समजायको नित्य सम्बन्ध रूप होने से समवाय सम्बन्ध चाले द्रव्य गुण आदिकों को भी इस नित्य सम्बन्धवाले होने से कदाचित्भी भेदकी अप्रतीतिने तिनके भिन्नपने की प्रसिद्धिका असम्भव होवेगा, इस प्रकार दूपण कहते हैं ] हुये समनाय सं- वन्ध वाले द्रव्य गुण आदिकों को भी नित्य सम्बन्ध के प्रसंगसे भिन्नता का असंभव होवेगा। अरु द्रव्यादिकों की अत्यन्त मि- नताकेहुये, स्पर्शवान् अरु स्पर्शनान् द्रव्यके असम्पन्धनत् तिनके सम्बन्धका असंभन होनेगा। अरु आत्माको गुणवानपने के हुये इच्छा आदिकोंकी उत्पत्ति अरु नाशात् आत्मा को अनित्यताका प्रसंगहोनेगा।अरु देह अरु फलादिकोनत् सावयनपना,अरु देहा- दिकोंबतही विकारान्पना यह उभय दोप निवारण करने को अयोग्य होवेंगे। जेसेजव आत्माको इच्छादिरा गुणरान्पना गौडपादीय कारिको तृतीय प्रकरण ३। १४३ रूपकार्यसमांख्याश्च भिद्यन्ते तत्र तत्र वै। आका शस्य न भेदोस्ति तहज्जीवेषु निर्णयः ६१८५॥ नहीं, तब तिसको बन्धके अभाव से मोक्ष न होवेगा, एतदर्थ बन्ध मोक्षकी व्यवस्थाके असंभवसे देह देहके प्रति सुख दुःखा- दि करके विशिष्ट आत्माके भेदकी सिद्धि है, इस प्रकारकी शंका करके कहते हैं ] आकाश को अविद्यासे आरोपित 'रज, धूम, अरु मलपने आदिक दोपवान्पना है, तेसेही आत्माको अवि- धाकरके आरोपित बुद्धि आदिक उपाधि के किये सुख दुःखादि दोषवान्पना है ऐसे अंगीकार किये व्यावहारिक बन्ध अरु मो- क्षादिक विरोध को पावते नहीं, क्योंकि सर्ववादियों करके अत्रि- याकृत व्यवहार,का अंगीकारहै ताते। अरु परमार्थ (मोक्ष) विपे व्यवहार का अनंगीकार है ताते। एतदर्थ तार्किको करके आस्मा के भेदकी कल्पना वृथाही किया है.५६॥ ६८५॥ हे सोम्य, शंका। ननु, एकहीआत्माविपेअविद्याकृत आत्माके भेद निमित्तक व्यवहार यद्यपि श्रुतिआदिकों से वनेहें, तथापि अनुमानसे कैसे बने हैं। समाधान। तहाँ कहते हैं, "रूप कार्यसमाख्याश्च भिद्यन्ते तत्र तत्र वै१ रूप कार्य अरु नाम तिन तिन त्रिपे भिन्न देखते हैं अर्थात् जैसे इस एकही आकाश विपे घट मठ कमंडलु अन्तर्यह मादिकों के सम्बन्धी आकाशके अल्पपने अरु महत्पने आदिक रूप. अर्थात् घटाकाशकी अपेक्षा मठाकासको महत्पना अरु कमंडलुगत आकाश को अल्पना' इत्यादि प्रकार एकही अरूप आकाशको घटादिकोंके सम्बन्धसे अल्पपना अरु महत्पना आदिरूप । अरु जलका लाना धारण करना अरु शयन करना, इत्यादि कार्य, अरु घटाकाश मटाकाश कमण्डल्वाकाश अरु अन्तर्यहाकाश, इत्यादिक तिन घटादि रूप उपाधियों के किये नाम अर्थात् एक आकाशप्रिपे जो घटाकाश मठाकाशादि नाम भेद हें सो उन घटादि उपाधिके सम्बन्धसे हैं १ .
। 3 मांडूक्योपनिषद् । "नाकाशस्य घटाकाशो विकारावयवौ यथा। नैवा त्मनःसदा जीवो विकारांवयवौ तथा ७॥८६॥ स्वरूपसे ही नहीं । यह सर्व तिस तिस व्यवहारविपे तहांतहां भिन्नभिन्न देखते हैं। अरु यह सर्व आकाशके रूपादिकोंके भेदोंका किया व्यवहार अपरमार्थसही है, अरु परमार्थसेतो "आकाशस्य न भेदोऽस्ति तद्वज्जीवेपु निर्णयः । आकाशका भेद है नहीं, तैसे जीवोंविपे निर्णय किया है । अर्थात् जैसे आकाशचिपे जो नाम रुप क्रियादि सहित भेद है सो घटादि उपाधि अरु तिनके भेद का किया है । अरु वास्तव करके तो आकाश का भेद है नहीं। अरु जैसे आकाश के भेदरूप निमित्त का किया व्यवहार सो घ. टादिक उपाधियों के किये द्वारविना है नहीं। तैसेही देहादिरूप उपाधि के किये घटाकाशादि स्थानीय जीवोरिपे भेदके निरूप- णसे बुद्धियों करके किया भेद है,वास्तव करके आत्मा के स्वरूप से भेद है नहीं, यह सम्यक् आत्मवेत्ताओं ने सम्यप्रकार नि- र्णय किया हे ६ । ८५॥ ७८६॥हे सौम्य,शिंका । ननु तहां घटाकाशादिकोंथिपे रूपअरु कार्य आदिकों फेभेदका व्यवहार परमार्थरूप आकाशका कियाही है। इसप्रकार का जो वादीका कथन सो बने नहीं। उ०।क्योंकि जैसे सुवर्ण का कुण्डल कंकणादि विकार है, वा जैसे जलका फैन बुद्बुद घरफआदि विकारहै, तैसे परमार्थ रूप आकाश का घटा. काश विकार है नहीं। अरु जैसे वृक्षकी शाखा आदिक अवयव हैं, तैसे भी आकाशका घटाकाशादि अवयव भी नहीं। ताते घटाकाशादिकों निपे जो भेद व्यवहार हे सो परमार्य रूप आ- काशका किया नहीं। ताते " नाकाशस्य घटाकागो विकाराव-. यवो यथा जैसे आकाश का घटाकाश विकार अरू अवयव नहीं, अर्थात् जैसे कुण्डलादिक सुवर्ण के अन बुबुदादि जलके पिकार अरु शाखादि वृक्षक अवयवह, नेसे घटाकागादि महदा- M ।
गौडपादीयाकारिका तृतीय प्रकरण ३। १४५ यथा भवति बालानां गगनं मलिनं मलैः। तथाभवत्यबुद्धीनामात्माऽपिमलिनोमलैः८।८७॥ काशके विकार अवयव नहीं । अरु निवात्मनःसदाजीवो विका; रावयवौ तथा तैसे आत्मा का जीव सर्वदा विकार अरु अव- यव है नहीं, अर्थात् जैसे आकाश के घटाकाशादि विकार अरु अवयव नहीं, तैसेही परमार्थ से,सत्यरूप महाकाशस्थानीय एक अखण्ड अहैत निराकार परब्रह्म से अभिन्न आत्मा का यह घटा- काशस्थानीय जीव सर्वदा (सर्वथा) उक्त दृष्टान्तवत् विकार नहीं, अरु अवयव भी नहीं, एतदर्थ आत्माके भेदका किया व्य- वहार मिथ्याही है। यह अर्थ है ७।८६॥ ८१८७॥ हे सौम्य! [जीव जो है सो ब्रह्मका अंश नहीं अरु विकारभी नहीं किन्तु उपाधि विपे प्रवेशको पाया ब्रह्मही जीव शब्दका वाच्यहै। इसप्रकार जो तुमने कहा सोअयुक्तहै। क्योंकि ब्रह्म तो । उपाधि से रहित । शुद्ध है ताते । अरु जीव जो है सो रागादिक मलबाला है ताते । अरु जीव अनेक हैं ताते, इत्यादि प्रकार से तिन ब्रिह्मजीव की एकताका असंभव है यह आशंका करके परमार्थ से जीव को भी मलवानपना आदिक है नहीं, ऐसा कहते हैं ] जैसे घटाकाशादिक जो नाम रूप कार्यादिक भेदका व्यवहार है सो भेदबुद्धिका किया है, तैसेही उपाधि वाले जीवोंका भेद अरु जन्म मरणादि व्यवहार हे सो (अविद्या के किये हैं। ताते तिस अविद्या रचित भेदका कियाही क्लेश कर्म फल अरु रागादिक मल करके युक्तपना है, परमार्थ से नहीं। इस अर्थको दृष्टान्त से प्रतिपादन करने को इञ्छते हुये कहते हैं "यथा भवति वालानां गगनं मलिनं मलैः जैसे चालकों को आकाश मल करके मलिन होता है, अर्थात् जैसे, लोक विपे (विचारशून्य । अविवेकी चालकों को, परम शुद्ध जो आकाश है सो मेघ रज धमादि मल करके मलिन (मेलवाला)भासता है, । -- *.- - ', मांडूक्योपनिषद् । परन्तु जो आकाश के स्वरूप स्वभाव के जाननेवाले जे विवेकी पुरुषहँ तिनको आकाश मलवाला प्रतीत होतानहीं । अर्थात् जिन पुरुषोंको आकाश के यथार्थ स्वरूप स्वभाव का ज्ञान है, तिनको आकाश में धूमधलि आदिकमलके होतेसंते भी, आकाश मलिन प्रतीत होके जैसा है तैसाही प्रतीत होता है । " तथा भवत्य बुद्धीनामात्माऽपि मलिनोमलैः। तैसे आत्मा भी अवुद्धियों को मलकरके मलिन होता है। अर्थात् जैसे अविवेकी पालकों को आकाश धूम धूलि करके युक्त मलिन भासता है । तैसे जो विज्ञाता प्रत्यक् चैतन्य परब्रह्म रूप आत्मा है, सो भी तिस प्रत्यगात्मा के यथार्थ विवेक से रहित अबुद्धिमान् (अज्ञानी) पुरुषों को क्लेश कर्म अरु कर्मफल इत्यादि मलों करके मलिन (विकारी) प्रतीत होता है । अर्थात् सर्व शरीरों में शुद्ध युद्ध मुक्तरूप एकही आत्मा है, परन्तु सो तेसा होता सत्ता भी अ.. विवेकी पुरुपों को देह इन्द्रिय मन प्राणादिकों के जन्म मरण केश क्रिया फलादि धर्मवानपने करके युक्त भासता है। परन्तु जैसे ऊपरदेश को देसके तिस विपे, जलकी कामना पाला तृपित पुरुप जल फेन तरंगादिकों का आरोप करता है, तथापि तिस असत् आरोप से वो ऊपरदेश जलफेन तरंगादि वाला हो. तानहीं, तैसेही सदा शुद्ध निर्विकार प्रत्यगारमा सो अयुद्ध अधि. वेकी अज्ञानी पुरुषों करके आरोप रिये क्लेशादिक मल तिन कर- के मलिन होता नहीं । अर्थात् जिन पुरुपों को अपने आप सदा शुद्ध युद्ध मुक्त स्वभाव प्रत्यगात्मा का यथार्थ ज्ञान नहीं सो पुरुष अपने आप आत्मायिपे देहेन्द्रिय मन प्राणादिकों के जन्म मर- णादि धोका आरोप करते हैं, परन्तु निनके आरोप से वो सदा शुध आत्मा कदापि किसी प्रकार से विकारयान मलिन सदोप, होता नहीं। इत्यर्थः ॥७॥ सौम्य! शंका निन,जीर जोनोमग्ण अनन्नर अपने धर्म (शुभाचरण) के अनुसार म्बर्गको जाता है, अम अधर्म , १४७ गौडपादीय कारिकी तूतीय प्रकरण ३ । मरणे संभवें चैव गत्यागमनयोरपि । स्थितौ सर्चशरीरेषु आकाशेनाविलक्षणः ॥८॥ (दुरोचरण) के वशहुआ नरक को पावताहे|अरुंधर्म अधर्म दोनों के सख दुःखादि फल भोग के अनन्तर उनके क्षीणहुये पुनःयहाँ आयके कोई एक योनि में जन्मताहै, असें तहांभी यावत् प्रारब्ध भोग है तावत् स्थिरहोय प्रारब्ध भोग आगे को धर्माधर्म कर्मकर पुनःभी परलोक के अर्थ गमनकरताहै (इसका आवागमन मिटा नहीं। इसप्रकार इसलोक अरु,परलोक में अपने कर्मानुसार वि. चरने रूप व्यापारवालाजीव सोआिवागमन से रहित सदाशुद्ध • बुद्ध मुक्तस्वभाव एकरस कैसे होवेगा।जहां इस प्रकारकी शताहै तहां कहते हैं ] पुनःभी उक्त अर्थकोही वर्णन करते हैं, "मरणेसं- भवे चैव गत्यागमनयोरपि । स्थितौ सर्वशरीरेषु आकाशेनाविल. क्षणः सर्व शरीरों विपे, जन्म, मरण, गमन, आगमन और स्थिति के हुये भी आकाशसे अविलक्षण है अर्थात् घटाकाशके जन्म मरण गमन आगमन अरु स्थितिवत् सर्व शरीरों विषे आ- माको जन्म मरण गमन आगमन औ स्थिति के हुये भी आत्मा आकाशसे अधिलक्षण (आकाश के तुल्य)प्रतीति करनेको योग्य हैं । अर्थात् घटाकाश जोहै सो घटकी उत्पत्ति होने से उत्पन्नहुये वत् अरु घटके ध्वंसहुये घंसहुयेवत् अरु घटकेगये गयेवत् अरु घटके आये आयेवत् अरु घटके स्थितहुये स्थितहुये वत, इत्यादि प्रकार घटाकाश विपे जो उत्पत्ति आदि प्रतीत होवे हे सो घटरूप उपाधि के सम्बन्ध से होवे है, परन्तु घटसे पृथक् दष्टिकर केवल आकाशकोही अनुभव दृष्टि से देखिये तो घटके वर्तमान कालमें 'भी आकाश उत्पत्ति विनाशादिकों से रहित अपने स्वरूप करके ज्योंका स्पों एक रसही है, तेही आकाश से भी महा सूक्ष्म परि- पूर्ण एकरस आत्मावि जो जन्म मरण सुख दुःख अरु परलोक में गमन पुनः आगमनइत्यादिप्रतीतहोताहे सोशरीरादि संघातरूप " . माडूक्योपनिषद् । संघाताःस्वप्नवत्सर्वे आत्ममायाविसर्जिताः। आधिक्येसर्वसाम्ये वा नोपपत्तिर्हि विद्यते १०१८९॥ उपाधिके सम्बन्धसे होताहै,नतु वास्तव अपने स्वरूप करके निरु- पाधि आत्मा आकाशवत् गमनागमनादि संघात के धर्मों से रहित सदा एकरस परिपूर्ण विज्ञानधनहीं है । इसप्रकार अपने आप आत्म विषयक प्रतीतकरनेकोयोग्यहै,यहइसकाभावार्थ है॥ १०८६ ॥ हे सौम्य! “संघाताःस्वप्नवत्सर्वे आरममाया विस- र्जिताः। सर्व संघात स्वप्नवत् आत्माकी मायासे रचित अर्थात् देह इन्द्रिय मन प्राणादियों का सर्व संघात तो स्वप्नविषे दृश्य (देखे) देहादिकोंवत्, अरु मायावी (इन्द्रजाली) पुरुषकरके किये देहादिकोवत् आत्माकी अविद्यारूपा मायासे रचितहै, पर- मार्थ से नहीं। अरु जिस करके तिर्यक (तिरछे चलनेवाले पक्षी आदिक) के देहादिकों की अपेक्षा से देवादिकों के कार्य कारण रूप संघातोंकी आधिक्ये सर्वसाम्ये वा नोपपत्तिहि विद्यते। आधिक्यता के हुये वा सर्व की साम्यता के हुये उपपत्ति विद्य- मान है नहीं, अर्थात् । तिर्यक् देहादिकों की अपेक्षा से देवादिकों के कार्य कारणात्मक संघातोंकी आधिक्यताके हुये [देवतादिकों के शरीरों को अति पूजनीय होने करके सर्व से अधिकताके अंगी- कार से तिनके असत्यपने की सिद्धि न होवेगी, यह शङ्काकरके, देहके भेदों विपे मूढ़पुरुपों की दृष्टि से चैतन्यकी अधिकता को कल्पितहुयेभी विवेकी पुरुषों की दृष्टि से सर्व देह समान पश्चभू- तात्मकहोने से सर्वकी समताके अंगीकार किये संघातोंकी सत्य- ता विपे कोई भी संभव नहीं इसप्रकार कहते हैं ] वा सर्वकी समताके हुये इन शरीरादि संघातों के सद्भावका प्रतिपादक हेतु नहीं । इत्यर्थः १०८६॥ ११॥६॥हेसोम्य! अब उत्पत्ति आदिकोंसे रहित इस अद्वेतरूप आत्माको श्रुतिरूप प्रमाणकरके सिद्धताके लखावने के अर्थ श्रुति . गौडपादीय कारिका तृतीय प्रकरण ३ । १४६ रसादयोहिये कोशा व्याख्यातास्तैत्तिरीयके। तेषामात्मापरोजीवः खंयथासंप्रकाशितः १११६॥ वाक्यों के कहनेकाआरंभकरतेहैं रिसादयोहिये कोशाव्याख्याता- स्तैत्तिरीयके । सादिक कोश तैत्तिरीयविपे व्याख्यान किये हैं। अर्थात् अन्नरसमय,प्राणमय मनोमयादिक, खड्गादिकों के कोश (म्यान) वत् जो पंचकोश हैं सो यजुर्वेदीय तैत्तिरीयोपनिषद विषे उत्तरोत्तरकी अपेक्षा से [जैसे खड्गादिकों के कोश जो हैं सो खड्गादिकों की अपेक्षाचाह्य होते हैं, तैसेही इन पञ्चकोशोंकोभी कहते हैं । तिस विपे हेतु कहते हैं, यहां यह अर्थ है कि पूर्व के अ- न्नमयादिक कोशों को पिछले पिछले प्राणमयादिकोंकी अपेक्षाले वाह्मपना होने करके, अरु सर्वान्तर आधाररूप ब्रह्मकी अपेक्षा से आनन्दमय को भी तिनके तुल्य वाह्य होने से, इन अन्नमयसे आनन्दमय पर्यन्त पांचोंका कोशपना तुल्यही है ] पूर्वके बाह्य भावसे व्याख्यान किये हैं । तेपामात्मापरोजीवः खयथासंप्रका- शितः तिनका पररूप आत्मा जीव है, जैसे आकाश सम्यक प्रकाश किया है, अर्थात् तिन अन्नमयादि कोशोंका परब्रह्मरूप आत्मा जीव है ॥शंका । सो आत्मा तिन कोशोंकाजीव कैसे है। समाधान । जिस अत्यन्त आन्तर आत्मा से यह पांच कोश भी आत्मावाले होते हैं, सो आत्मा सर्व कोशोंको जीवन का निमि- तहै, एतदर्थ तिर अन्नमयादि कोशोंका जीव है । सो कोन है। उ०। जो परब्रह्मरूप आत्मा पूर्व "सत्यज्ञानमनन्तंब्रह्म" सत्य ज्ञान अनन्त ब्रह्म है। इसप्रकार प्रसंगविपे प्राप्त किया है । ओ जिस आत्मा से स्वप्न अरु माया आदिकाँचत आकाशादिकों के क्रम से अन्नमयादि कोशम्प संघात आत्माकीमायासे रचित है, इसप्रकारकहा है । अरु सोआत्मा हमों करके जैसे आकाश,नसे "आत्माह्याफाशवत्" इत्यादि आरमा आकाशवत् है, यह इस प्रकरणके तीसरे श्लोक से सभ्य प्रकार प्रकाश किया। ।
. मांडूक्योपनिषद् । द्वयोईयोर्मधुज्ञाने परब्रह्मप्रकाशितम् । एथिव्यामुदरेचैव यथाऽऽकाशःप्रकाशितः १२।६१ ॥ परन्तु नैयायिकों करके कल्पित आत्मावत् पुरुपकी बुद्धि करके कल्पित प्रमाणों का विषयरूप आत्मा प्रकाश किया नहीं । यह अभिप्राय है ११ । ६०॥ १२।६१ ॥ हे सौम्य! मैं मनुष्यहो,प्राणीहों,प्रमाताहौं,कर्ताहों भोक्ताहों, इन उपाधि विशिष्ट पांचों का जो एकस्वरूप अनुस्यूत प्रत्यक् चैतन्यहै सो ब्रह्मही है, इसप्रकार जीव ब्रह्मकी एकताविषे तैत्तिरीय श्रुतिके तात्पर्य को कहके, अव तिसही अर्थविपे वृहदा- रण्यक उपनिषद्की श्रुतिकेभी तात्पर्यको कहते हैं । वृहदारण्यक उपनिषद्गत मधु ब्राह्मण विपे बहुत से पर्यायन में अधिदेव अरु अध्यात्मरूप भिन्नस्थानों विषे "अयमेवसइति" यहही सोहै। इसप्रकार परब्रह्मरूप प्रत्यगात्मा प्रकाश किया (लखाया) है एतदर्थ बृहदारण्यकश्रुतिका भी इसब्रह्म और आत्माकी अभेद एकताविपे तात्पर्य है । यह इसश्लोक के पूर्वार्द्ध का अर्थ है] किंवा "अधिदेवमध्यात्मञ्च तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषः पृथिव्याद्यन्तर्ग तो योविज्ञाता पर एवात्मा ब्रह्म सर्वमिति" अधिदैव अरु अ. ध्यात्मतेजोमय अमृतमय पृथिव्यादिकों के अन्तर्गत जो विज्ञाता पुरुप है सो परमात्माही है, सर्वब्रह्महै इसप्रकार द्वियोर्द्वयोर्म- धुज्ञाने परब्रह्मप्रकाशितम्। द्वय द्वयविपे परब्रह्म प्रकाश कियाहै मधुज्ञानविपे, अर्थात् उक्तप्रकार दोनों दोनों स्थानोंथिपे द्वैतके क्षय होने पर्यन्त परब्रह्म प्रकाशित किया।प्र०॥कहां प्रकाशित कियाहै।उ०। जिसविषे ब्रह्म विद्या नामक मधु (अमृत) अमृत- त्वका मोद न होने से । अर्थात् ब्रह्मविद्याका अमृतव (मोक्ष) परमानन्दकी प्राप्तिकाहेतु होने से मधु वा अमृत कहते हैं, अरु यही मुख्य अमृत है क्योंकि इसही करके जन्म मरणादि लक्षण वान् जीव सकारण मरण से रहित अमर अभय भावको प्राप्त गौडपादीय कारिका तृतीय प्रकरण ३॥ जीवात्मनोरनन्यत्वमभेदेनप्रशस्यते। नानात्वंनिन्द्य तेयच्चतदेवंहिसमञ्जसम् १३।९२॥ होता है । जानते हैं, ऐसा जो मधुज्ञान अर्थात् वृहदारण्य उप- निपद् के द्वितीय अध्याय के अन्तक मधु ब्रामण तिमविपे प्रकाशित किया है। पाकिसवत् प्रकाशित किया है उत्तर। "पृथिव्यामुदरे चैव यथाऽऽकाशः प्रकाशितः जैसे पृथिवी अरु उदर विषे आकाश प्रकाशित किया है जैसे लोक विपे पृथिवी विपे अरु उदर विपे एकही आकाश अनुमाने प्रमाण से प्रकाशित किया है, तैसे मधु ब्राह्मण में पृथिवी आदिको विषे अधिदेवरूप अरु शरीरादिकों विये अध्यात्म रूप से परब्रह्मही प्रकाशित किया है। इत्यर्थः १२६१॥ १३।६२ सौम्य! "जीवात्मनोरनन्यत्वमभेदेनप्रशस्यते। जीव अरु परमात्माका अनन्यपना अभेदकरके प्रशंसाका विषय करते हैं, अर्थात् जो कि युक्तियों से अरु श्रुतियों के प्रमाण सें निर्धार किया जीव अरु परमात्मा का अनन्यपना अिर्थात् "तत्वमस्यादि" महावाक्यों करके त्वंपद के लक्ष्य अरु तत्पद के लक्ष्यका अनन्य अभेदपना व्यासादिक महर्पियों करके शास्त्र (ब्रह्मसूरादि वेदान्त) से अभेद करके प्रशंसा का विषय किया है । अर्थात् श्रुतियों के महावाक्यों करके निर्जर निश्चित किया जो जीत्र अरु परमात्माका अनन्यपना अरु तिस अनन्यपने का यथार्थ ज्ञान, अरु तिस ज्ञानसम्पन्न ज्ञानी, इनको व्यासादि महर्पियों ने अपने ब्रह्मसूत्रादि शान करके प्रशंसा के विषय किये हैं "सत्यं वै अभेदो" ज्ञानादेवतु कैवल्यं" "ज्ञानविमोक्षाय" "ज्ञानलब्ध्या परांशान्तिमचिरेणाधिगच्छति' "तस्यादित्यव ज्ज्ञानं" "ज्ञानियात्मैव मेमतम्" इत्यादि प्रमाण से। अरु "नाना निन्द्यते यच्च तदेवं हिसमासम् नाताव निन्दाका विपय किया है, जो सो ऐसही समीचीन है, अर्थात्, जो १५.२ मांडूक्योपनिषद् । जीवात्मनोप्टथक्त्वंयत्प्रांगुत्पत्तेःप्रकीर्तितम् । भ- विष्यवृत्त्यागौणतन्मुख्यत्वंहिनयुज्यते १४ । ९३ ॥ सर्व प्राणियों को साधारण स्वाभाविक ( अविद्यारचित) शास्त्र से वाह्यकिये कुतर्को के कर्ता वादियों करके रचित नानात्व द- शन तिनको वेिदशास्त्राचार्य्यमहर्षियोंने निन्दाका विषय किया है। तथाच "नतुतद्वितीयमस्ति" "द्वितीयाद्वैभयंभवति उदरमन्त रंकुरुतेअथतस्य भयंभवति" "इदं सर्वम् यदयमात्मा" "मृत्योःस मृत्युमानोति, इत्यादि” सोद्वितीयनहीं है, द्वितीय से निश्चय करके भय होता है, जो यह सर्व है, सो यह आत्मा है, अल्पभी अन्तर को करताहै पश्चात् तिसको भयहोता है, सो मृत्यु.से मृत्यु को प्रातहोता है जो यहाँ (आत्मा अरु ब्रह्मा विषे) नानावत् देख- ताहै, इत्यादि श्रुति वाक्यों करके अरु अन्य ब्रह्मवेत्ता पुरुषों करके निन्दीका विषय किया है । अरु जो यह है सो ऐसेही समीचीन है । अरु जो तर्क करनेवाले पुरुषों करके कल्पना करीहुई कुंदृ- प्टियां हैं, सो तो समीचीन नहीं । अरु निरूपण करीहुई घटना को प्रकाशे भी नहीं ॥ यह अभिप्राय है १३।६२ ॥ १४१६३॥ हेसौम्य ! शंका ननु,सम्यक् ज्ञानसे पूर्व अर्थात तिस सम्यक ज्ञानरूप अर्थवाली उपनिषदों के वाक्यों से पूर्व कर्म काण्ड विपे। "इदंकामोऽदःकामइति" यह कामहै यह कामहै, इसप्रकार अनेक कामकरके कामनाके भेदसे जीवोंकाभेद कहा है असे परश्च सदाधारपृथिवीद्यामित्यादि मन्त्रवणः” सो परमात्मा इस पृथिवी अरुस्वर्गको धारणकरताहुआ,इत्यादि मन्त्रोंके कथन से तिन पृथिव्यादिकों से पृथक् परमात्मा कहाहै, इसप्रकार जो जीव अरु परमात्माका पृथपना कहा है। तहां कर्मकाण्ड अरु ज्ञानकाण्डके वाक्योंसे विरोधहुये ज्ञानकाण्ड के वाक्योंके एकता रूप अर्थकाही समीचीनपना कैसे निश्चय करतेहौ, जहां ऐसी शंकाहै, नहीं कहते हैं। समाधान जीवात्मनोः पृथक्कं यत्प्रागु- .. ". गौडपादीय कारिकीततीय प्रकरण ३ । ११५.३ स्पत्तेः प्रकीर्तितम् । सम्यक् ज्ञानरूप उत्तरकांड पूर्व जो जीव अरु परमात्माका पृथपना कहा है, अर्थात्मयतो वा इमानि भूतानि जायन्ते""यथाऽग्नेःक्षुद्राविस्फुलिङ्गाः” “तस्मद्वा एत- स्मादस्मिन आकांशा संभूतः तदेक्षत' "ततेजोऽमृजत,इत्या. दि जिससे सिद्ध यह भूत उपजतेहैं, जैसे अग्निसे क्षुद्रविस्फ लिंग होतेहैं । तिस वा इस आत्मासे आकाश उपजताहुआ, सो ईक्षणकरताहुआ,सो तेजको सृजताहुआ,इत्यादिक सम्यक ज्ञान रूप अर्थवाले उपनिषदोंके वाक्योंसे पूर्वकर्मकाण्डविषे जो जीव अपरमात्माका भिन्नपनाकहा है । भविष्यवृत्त्या गोणतन्मुख्य वहिनयुज्यते । सो भविष्यवृत्तिसे गौणहै निश्चयकरके मुख्य पना घटतानहीं, अर्थात् कर्मकांडविपे जो जीव असें परमात्माका पृयपना कहा है। सो परमार्थरूप-नहीं, किन्तु महदाकाश अरु घटाकाशके भेदवेत् ययौदन पचतीति"चावलकी रसोई। प्रकावताह इस वाक्यविजैसे भविष्यत् प्रवृत्तिले चावलोंविषे भोजनपना है,न्तिद्वत् गौण है, परन्तु भेदवाक्योंका कदाचितभी मुख्य भेदरूप.अर्थवान्पना घटतनिहीं, क्योंकि आत्माभिदके वाक्योंकोस्वाभाविक (अनादि-अविद्यावाले प्राणियोंकी भेद दृष्टिअनुवादी (अनुवादकरनेवाली) है ताते। अरु यहां उपनिषद् विवोउत्पत्ति अरु प्रलयादिकोंके वाक्यों से,अरु " तत्त्रमति" मअन्योऽसायन्योऽहमस्मीति नसवेद-गसो तूहै, यह अन्य है में अन्ग्रिहों, ऐसेंजो जानताहे सोनहीं जानता इत्यादि श्रुतिवाक्यों सेजिीवात्मा असापरमात्माका ऐक्यपनाही प्रतिपादनकरनेको इच्छितही एतदर्थ उपनिपदोंविपे.ऐकपना श्रुतिकरके प्रतिपादनं करमेको इच्छितहोवेगा, इसप्रकार भविष्यवृत्तिवाले उत्पत्त्यादि- कॉकरियोंकी मुख्यावृत्तिको आश्रय करके,जो लोकथि भेद दृष्टिकाअनुवाद है, सो गौणहीहै ।यहअभिप्रायह ॥अथवा "तदै- क्षत, तत्तेजोऽसृजत सो ईक्षगकरता (इच्छाचा देखता) हुआ, सोत्तेजको सृजताहुओंइत्यादिक वायों से "उत्पत्तेः प्रागको । २० ૧ પછ मांडक्योपनिषद मल्लाहविस्फुलिङ्गाद्यैःसृष्टिाचोदिताऽन्यथा । उ- पायःसोऽवतारायनास्तिभेद कथञ्चन १६ १९४॥ वाद्वितीयम्" उत्पत्तिसे पूर्व एकही अद्वितीयथा? इसप्रकार:एक पना कहाहै । अरु ," तत्सत्यं सआत्मा तत्वमसि, सो:सत् है, सोआत्माहै, सोतुहै। इसप्रकार सोई.एकपना होगा। इसप्रकार की जिस-भविष्यद्वृत्तिकी अपेक्षाकर केजो जीव अरु आत्माका भिन्नपना जहां किसी भी चाक्यविपे जानने में आवताहै, सो "य-, थोदनं पचतीति," चावलंकी रसोई:पकावताहै? इसवाक्य, विपे जैसे भविष्यवृत्तिसे तंडुलोषिपे भोजनपनाहै, तद्वत् गौण है। हे, लोमय यहांजो जीवअरु परमात्मा में भेदके वोधक कर्मकांडकेवेद मन्त्रको गौणपना कहाहे तिसका यह भी अभिप्राय जानना कि कर्मकांड चेद है सो यज्ञादि कर्मोद्वारा संसारकाही प्रवर्तक अरु प्रांपकहै, एतदर्थ उसको उपनिषद् ज्ञानकोण्ड जो समूल जगत् का निवर्तक अरु परमानन्द मोक्षका प्रापक है, विपेतनापरी ऋग्वेदो' इत्यादि वाक्यों करके अविद्यात्मक कहा है, एतदर्थ कर्मकांडकेवी अन्यके जे जीवात्मा अरु परमामाके भेदकेयोधक वाक्यहें तिनकी गोणींवृत्ति जाननी १४.६३॥ "१५६४ हेसोम्य!शिकाननु, यद्यपि उत्पत्ति से पूर्वजेन्मरहित सर्व एकही अद्वितीयर्थी, तथापि उत्पत्तिके अनन्तर यहसबै उस्प- नहुआहे अरु जीव भिन्न है, इसप्रकार मतिकहो क्योंकि उत्पत्ति कीश्रुतिका अन्यअर्थहे तातेअरुस्वप्नवदाममायाविसर्जिताः संघाताः घटाकाशोत्पत्तिभेदादिवज्जीवानामुत्पत्तिर्मंदादिरितिः' संघात स्वप्नवत् आत्मा की माया से रचित है, अरुघटाकाशकी उत्पत्ति अरुभेदादिकावत् जीवों की उत्पत्ति अरु भेदादिक है। इसप्रकार पूर्व भी हमने यह दोष निवारण किया हे, पतदर्थ मी यह प्रश्न अवकाग रहित है। अम इसही से उत्पत्ति अमभेद्रा- दिक की श्रुतियों से सींचके यहां पुनः उत्पत्तिकी श्रुनियों के ब्रह्म गौडपादीय कारिका तृतीय प्रकरण ३ । आरमा की एकताविषे तात्पर्य के प्रतिपादन करने की इच्छासे यह कहने का आरंभ है । तथाच मल्लाहविस्फुलिङ्गायैः सृष्टिा चोदितान्यथा मृत्तिका लोह अरु विस्फुलिङ्गादि से अरु अन्य प्रकार से जो सृष्टि कही है , अर्थात् यथा सौम्यैकेन मृ- पिण्डेन सर्व मृन्मयं विज्ञातं स्यात् ""यथा सौम्यैकेन नखनि कृन्तनेन सर्व कार्णायसंविज्ञातस्यात्” “यथा सुदीप्तात् पार्वका द्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते स्वरूपाः', इत्यादि, श्रुतियों करके कहे । मृत्तिका लोह अरु विस्फुलिङ्गीदिकन के दृष्टान्त के कथन से जो सृष्टि कही है, अरु अन्यप्रकारसे जो सष्टि कही है, सो सर्व सृष्टिको प्रकार हमारे (ब्रह्मवेत्ताओं के मतबिषे जीवात्मा अरु परमात्माके एक्ताकी बुद्धि की उत्पत्तिके अर्थ उपायहै । अरु जैसे प्राण अरु इन्द्रियों के संवाद विषवाक् आदिकों की आख्या- यिका श्रवणकरते हैं। अरु देवता असें असुरों के संग्राम विपे देवता ओंने उद्गातापने करके स्वीकार किये वाकादिकनके पापसे असुरों करके वधादि होनकी आख्यायिका श्रवण करते है, सो सर्व प्राण की श्रेष्ठता के वोधकी उत्पत्ति के अर्थ कल्पित है। तैसेही श्रुति उक्त सृष्टिआदिक की प्रक्रिया भी अद्वैत वोधकी उत्पत्ति के अर्थ कल्पित है । अरु जो ऐसा कहे कि संवाद श्रुति के मुख्यार्थ होनेसे सो अति उक्त उदाहरणभी असिद्ध होवेगा।सो कपनवने नहीं, क्योंकि अन्य शाखाविषे अन्य प्रकारसे प्राणादिकों के सं- वादकेश्रवणसेजच संवाद परमार्थरूपहीहोता,तब सो संवादएक रूपही सर्व शाखाओं विषेश्रवणकरनेमें औवता । अरु अनेक थि- रुद्ध प्रकारसे जो श्रवणकरने में आयता है सो तैसे सुनाजाता नहीं। [श्रुतियां कहीं कहीं प्राणादिक परस्परमें विवाद करतेहुये आपही अपने निर्णय करने में असमर्थ होय प्रजापति(ब्रह्मा) के पीसगर्यो अरु अपने परस्परके विवादिकेहेतुको श्रवणकराय अपने विवाद का निर्णय इच्छते हुये तव प्रजापति ने कहा कि तुम्हारे सर्व के मध्यसे। जिसके निकस जाने से यह शरीर अमंगलरुप गौडपादीय कारिकातितीय प्रकरण ३.१५७ स्परमें विरोध देखने से यहां कहते हैं तसेही उत्पत्ति के वाक्य भी शाखाओं के भेदसे विरुद्ध अनेक प्रकार के होने के कारण विो अपने मुख्याध विषे तात्पर्य वाले नहीं, किन्तु अन्य अर्थ विष तात्पर्य वाले है । अर्थात् सृष्टिको प्रतिपादक श्रुतियों का परस्पर में भिन्न भिन्न विरुद्ध कथन से प्रतीत होता है कि वास्तव करकेसृष्टिकुछ हुईनहीं, क्योंकि जो वास्तवकरके सृष्टि हुई होती तो सर्व श्रुतियोंकी एक वाक्यता अह एकही क्रमहोता, अरुति- सही करके उनी श्रुतियों के सृष्टि प्रतिपादक वाक्या अपने । मुख्याविषे तात्पर्यवाले नहीं, किन्तु अन्या मुख्यार्थ विपता- त्पर्य वाले हैं। अर्थात् सृष्टिप्रतिपदिका श्रुतियों विषे परस्पर में विरुद्ध महोने से प्रतीताहोता है कि उन श्रुतियों का तात्पर्यार्थ सृष्टि के प्रतिपादन-विपेन होंग्रके एक अद्वैत आत्मतत्त्वाल- खावने त्रिषे तात्पर्य है क्योंकि उन श्रुतियों विष क्रमका विरुद्ध भेदहै परन्तुःसर्वश्रुतियों ने सृष्टि का कारण अधिष्ठान एक सत् चैतन्य आत्माःब्रमही कहा, ताते उन सर्व श्रुतियों का मुख्य तात्पर्य एक अद्वैत आत्मतत्व के प्रकाशने विषे हैं अन्यविषे नहीं। अरु जो ऐसा कहे कि कल्पकल्पकी सृष्टिको भेदसे संवादकीशु- :तियों काभी सृष्टि सष्टि के प्रति अन्यथापनाहोवेगासो कथनवने नहीं, क्योंकि.उक्तवृद्धिकी उत्पत्तिरूपाप्रयोजनके विना संवादको श्रुतियोंकी निष्फलताहोतीहै ताते । अरु संवाद अरु उत्पत्तिको श्रुसियोंका; उक्त बुद्धिकी उत्पत्ति के विना अन्य प्रयोजनवान् पनाकल्पना करनेकोशक्ये नहींी अर्थात प्राणादिकों के संवाद की श्रुतियों का अरु सृष्टिंप्रतिपादक श्रुतियोंका; शरीरादिसंघातम सर्वका ज्येष्ठत्वपना, अरु आत्माको एक अद्वैतपनी जानने की बुद्धि की उत्पत्ति विना अन्य प्रयोजन कल्पना करने को श.. क्या नहीं। अरु जो ऐसा कहे किप्राणादि भावकी प्राप्तिकें लिये ध्यानार्थ प्राणाविकोका कीर्तन हैं। सो कहना बनेंनहीं, क्योंकि कलहकी उत्पत्ति अरु प्रलयकी प्राप्ति यह सर्वकाही अनिष्टहोत्र है ७ "- । माडूक्योपनिषद् ।। • श्राश्रमास्त्रिविधाहीनमध्यमोत्कृष्टदृष्टयः। उपासनों पदिष्टेयंतदर्थमनुकम्पया १६ ॥६५॥ ताते उक्त आख्यायिका प्राणका कीर्तननहीं। एतदर्थ उत्पत्त्या- दिकोंकी जो श्रुतियां हैं सो आत्माके एकताकी बुद्धिकी उत्पत्त्यर्थ हैं, अन्य अर्थवाली कल्पना करनेको योग्यनहीं। एतदर्थ, उत्पत्ति आदिकों का किया.भेद किसीप्रकार से भी है नहीं १५१६४॥ -१६।६५ हेसौम्य! शंका ननु, “एकमेवाद्वितीयम्” एकही अद्वितीयहै,इत्यादिश्रुतियोंके वाक्य प्रमाणसे यदि परब्रह्मरूपही आत्मा.नित्यशुद्ध, नित्यबुद्ध,नित्यमुक्त,स्वभाववाला एकेपरमार्थ रूपसत् है अरु अन्यअसत्यहै, तव "आत्मा वा अरेद्रष्टव्यः "या त्माऽपहतपाप्मा, सक्रतुंकुर्वीत" 1" " आत्मेत्येवोपासीतेत्यादि " अरेमैत्रेयी आत्मा निश्चय करके देखनेयोग्यहै, जो आत्मा पाप- रहितहै सो ध्यानकरने के योग्यहै, सो अधिकारी ऋतु (उपास्य के संकल्प ) को करे, आत्मा है इसप्रकारही उपासना करना। इत्यादि श्रुतिवाक्योंसे यह उपासना किस अर्थ उपदेशकियाहै। अरु अग्निहोत्रादि कर्म फिसवास्ते उपदेशकिये हैं। जहां ऐसी शंका तहां सिद्धान्ती कहे हैं, कि हे वादी तहां कारण श्रवणकर आश्रमास्त्रिविधाहीनमध्यमोत्कृष्टदृष्टयः। आश्रम तीन प्रकार के हैं. मन्द,मध्यम, अरु उत्कृष्ट, दृष्टिकरके युक्तहेंअर्थात् आश्रम । अर्थात् आश्रमवाले अधिकारी । अरु आश्रमशब्दके देवावने के अर्थ शूद्रसे पृथक् सन्मार्गगामी वर्ण (वर्णवाले अधिकारी) तीन प्रकारकेहैं। प्रश्न कैसे वे तीन प्रकार के हैं। उत्तराये,मन्द, कार्य ब्रह्मको विषय करनेवाली, अरु मध्यम, कारण ब्रह्मको विषय करनेवाली, अरु उत्कृष्ट, दाद्ध अढतको विषय करनेवाली, दृष्टि (खुद्धिकीसामर्थ्य)करके युक्त घिमिन्द वेश्यवर्ण, मध्यम क्षनिय वर्ण, उत्कृष्ट ब्राह्मणवर्ण, यहतीन कमरा उसप्रकारकी दृष्टिकरके युक्त उपासनोपदिष्टेयतदर्थमनुकम्पया निनकैअर्थदयाकरके --- . गौडपादीय कारिकी र्तृतीय प्रकरण ३ । १५ स्वसिद्धान्तव्यवस्थासुद्देतिनोनिश्चितादृढम् । पर स्परविरुध्यन्तेतैरियनविरुध्यते १७.९६ ॥. यह उपासना उपदेश किया है, अर्थात् तिनमन्द अरु मध्यम किार्यब्रह्मकी अंरु.कारण ब्रह्मकी दृष्टिवाले वर्णाश्रमियों के अर्थ; कि मन्द और मध्यम दृष्टिवाले सन्मार्गगामीहुये इससर्वोत्तम ब्रह्म आत्माकी एकताको सम्यक दृष्टिको कैसे प्राप्त होवेंगे, इनकोभी अभेद दृष्टि जोपरम कल्याणकारीहै, प्रांतहोनीचाहियो इसप्रका- र विचार के परमदयालु वेदाने उनपर दयाकर के यह उपासना उपदेश कहींहै अरु कर्म उपदेश किये हैं अर्थात् जो मन्द मध्यम अधिकारीहै, जिनकोअंभेद सर्वात्मदृष्टिं प्राप्तहोने की इच्छा है तिन पुरुषों के हितार्थ दयाकरके वेद भगवानन उनके अन्त:करणकी शुद्धिकेअर्थ विहित नित्य निष्कामकर्म अरु अन्तःकरणकी स्थिर- साको अर्थ प्रणवकीवाश्रवणमननरूपसे आत्माकी ज्ञानांगाउपाः सना कही है। क्योंकि अन्तःकरणके मलविक्षेपरूप दोष अभाव हुये बिना आवरण भेगपूर्वक सर्वात्म अभेददृष्टि प्राप्तहोवे नहीं। "आत्मैकएवाद्वितीय आत्मा एकही अद्वितीय है। इसप्रकारकी निश्चयात्मक उत्तमदृष्टि जिनको प्राप्तहुईहै तिनाउत्तमाधिकारी के अर्थ कर्मउपासना कहीनहीं क्योंकि यन्मनसान मनुते ये- माहुर्मनीमत तदेवब्रह्मत्रं विद्धि नेदं यदिदमुपासते "तत्वमसि "आस्मैवेदं सर्वमिति [उपास्य जोहैसो ब्रह्महीनहीं; इसप्रकार के निषेधसे उपासनाको मन्दसध्यम दृष्टिवाले पुरुषोंकी विपर्यतो भासती है, ऐसा कहते हैं जिसकों मनसे मननकरता नहीं, असे जिसने भनेको जान्यो है तिसहीकोतू ब्रह्मजान,जिस इसकोलोक उपासतेहैं यहब्रह्मनहीं। सोतूहै, आत्माही यहंसर्व है ॥ इत्यादि श्रुतियों से १६:४५ १७६६ हेसौम्य शास्त्रअरु युक्तिकरके निश्चितहोनेसे अद्वैत आत्माका दर्शन यियार्थअनुभवां सम्यक् दर्शनहै,ताते.अन्यदर्शन । १६० :: मांडूक्योपनिषद् । शास्त्र अरु-युक्तिसे वाह्य होनेकरके मिथ्यादर्शन हैं, यही निर्धार किया। अब इसकथनके हेतुसे भी द्वैतवादियोंका मिथ्यादर्शनहै, क्योंकि उनद्वैतवादियोंको रागद्वेपादि दीपोंकरके युक्तपनाहै ताते अिरु उनकेयहां अद्वैतवोधक श्रुतियोंका अग्रहण है अरुजो कदापि ग्रहणभी है तो विपरीत अर्थसे है तातो प्रश्न । उन द्वैतवादियोंको उक्त दोपकरके युक्तपना केसेहै,। उत्तर तहां कहतहस्विसिद्धान्त व्यवस्थासु द्वेतनो निश्चितादृढम्॥ वेतवादी अपने सिद्धान्तकी रचनाके नियमोवि दृढ़ निश्चितहुये, अर्थात् कपिल कणाद अरु घुद्ध इनआदिकोंकी दृष्टिके अनुसारी जो देतवादी हैं तो अपने सिद्धान्तकी रचनाके नियमों में "एवमेवेपपरमार्थानान्यथेति" यह ऐसही परमार्थ रूप है अन्यथा नहीं, इसप्रकार तहातको अपने अपने सिद्धान्तविपे । दृढ़ आसक्तहुये । अरु अपने प्रति पक्षीको देख तिसकेअर्थ द्वेपकरतेहुये अिर्थात् द्वैतादी अपने र कल्पितसिद्धान्तोंमें आसक्तयो अरु पिरस्पर विरुध्यन्ते तेरियन विरुष्यता परस्पर विरोधकरत तिसकरके यह विरोधकोपार- तानही अर्थात् कपिलादि तिवादी सकल्पित सिद्धान्तमै राग पूर्वक आसक्तये अपने प्रतिपक्षियों से द्वेपमान उनकी निन्दा पर्षक उनके सिधान्तोंका संदनकरते हैं इसप्रकार राग द्वेपकर के युक्तहुये अपने सिद्धान्त के दर्शन के निमितही परस्परविरोध कोपारते हैं। तिन परम्पर विरोवादियोंकरके यह हमारा वेदोक आत्माकी एकताके दर्शनका पक्ष सबसे अपृध (अनन्य) होमेस जैिसे पुरुष अपने हस्त पादादिकोसे विरोधको प्रामहोना नहीं, तैसेही, विरोधको पारना.नहीं सर्वत्र एक आत्माकी दृष्टि वाला सम्यक् आत्मवेत्ता "नानिगादी" अतिवादी रिसीवी निन्दा स्तुनिकरनेवाला होतानहीं। इसप्रकार रागडेपी ऊना- अवता (त्यागी) होनेसे आत्मासी एकनामी बुद्धिही सम्वाद ना. इतर नाहीत्वनिप्रायः १७१६६॥' २०६७ सौम्या मनारिमन करकेयह मिन सम्र्तामा, ।
गौडपादीय कारिका तृतीय प्रकरण ३ । अद्वैतपरमार्थोहिद्वैतत दउच्यते । तेषामुभयथा? तंतेनायनविरुध्यते १८ १९७॥ पंक्षतिन तिवादियोसविरोधको पावतानहीं, उत्तर। अद्वैतप- रमार्थोहिद्वैतंतद्भदउच्यते। अद्वैतही परमार्थरूप है, द्वैततिसका भेद कहते हैं । अर्थात् जिसकरके अद्वैतही परमार्थरूपहै, अरु द्वैत जो नानात्वं सो तिस अद्वैतका भेद कहिये कार्य कहते हैं | अ. र्थात् जितनाकुछ द्वैत नानालहै सो सर्व अद्वैतकाही भेदरूपकार्य है, क्योंकि एकमेवाद्वितीयम्, तत्तेजोऽजती एकही अद्विती- यहै, सो तेजको सृजताहुआ इसप्रकार श्रुतिका प्रमाणहै ताते। अरु निर्विकल्प समाधि विषे, अरुघन सुपुति विषे, अरु गाढमू- छ विपे, द्वैतके अभावहुये अपने चित्तके स्फुरणके अभावसे द्वैत के अदर्शनरूप युक्तिकरके अद्वैतही सिद्ध है । अर्थात् उक्तप्रकार समाधिसुपुति अरुमूर्छा इनतीनोंअवस्थाविपे चित्तवृत्तिके अफुर हुये द्वैत के अभावसे केवल उनका साक्षी अद्वैत आत्माही अव- शेष रहता है, इस युक्तिके सारानानात्वं चित्तकी स्फुरणाकरके कल्पित है, अरुं विना आश्रय कल्पना होवे नहीं, अतएव : एक अद्वैत आत्मसत्ताके आश्रय चित्तकी स्फुरण नानावकी कल्पना करहे।। ताते नानावको अद्वैतका कार्य कहते हैं, कारण नहीं। अरु तेिषामुभयथाद्वैतं तेनायनविरुद्धयते। तिनको उभयप्रकार सेभी द्वैतही है, तिनसे यह विरोधको पावता नहीं, अर्थात् तिन दैतवादियोंकोतो व्यवहार अरु परमार्थ इन उभयप्रकारसेमीद्वैत हीहै। अरु जब उन भ्रान्तभेदी पुरुपोंको द्वैतकी दृष्टिहै, अरुअस्म- दादि अभ्रान्त अभेदी पुरुषोंको अद्वैतकी दृष्टिहै,तबत्तिसहेतुकर- के यह हमारा अद्वैतपक्ष तिन्होंसे विरोधको पावता नहीं, इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते । नतुतद्वितीयमस्ति । इन्द्र माया करके बहुतरूप पात्रता है!-सोतो द्वितीय हैनहीं, इन श्रुतियों के पूमाणसे । [भ्रान्तिरूप मूल है जिसका ऐसे इतके सिद्धान्त, । ૨ ૬૨ मांडूक्योपनिषद् । माययाभिद्यते तन्नान्यथाऽजंकथञ्चन । तत्त्वतो भिद्यमानेहि मर्त्यताममृतंव्रजेत् १९९८ ॥ प्रमाणरूप मूल है जिसका ऐसा अद्वैत सिद्धान्त अविरुद्धहै, इस अर्थको यहाँ दृष्टान्तसे प्रतिपादन करतेहैं] जैसे उन्मत्त गजारूढ़ हुआ जो पुरुप सो पृथ्वी पर आरूढ़ हुए पुरुप के प्रति " गजा- रूढ़ोऽहं वाहयमा प्रतीति / मैं गजारूढ़ हौ मेरे प्रति वहन कर (लेजा) इसप्रकारके कहनेवाले भी उन्मत्त पुरुषों को देखिके तिसके ताई विरोध वुद्धिसे वहन करता नहीं, तद्वत् । ताते पर- मार्थ से ब्रह्म चैतन्य द्वैतवादियों का भी आत्माही है । इसहेतु से यह हमारा पक्ष तिन द्वैतवादियों से विरोध को पावता नहीं। क्योंकि अपने आप आत्मा से किसी का भी विरोध सम्भव नहीं १८।६७॥ १६१६८ हेसौन्य ! द्वैत जो है अद्वैतका भेदकहिये कार्यहे,इस प्रकारका जो कथन किया ताते द्वैत भी अद्वैतवत् परमार्थसे सत् होवेगा, जहां इसप्रकार की किसीको भी शंकाहोय तहां कहतेहैं। परमार्थ से सत्रूप जो अद्वैत है, यह तिमिर दोप करके युक्त दृष्टि वाले पुरुषो करके कल्पित अनेक चन्द्रमावत् , अरु सर्प अरु जल धारा आदिक भेदोंसे रज्जुबत् " मायया भिद्यते ।तन्नान्यथाऽज कथावन मायासे भेदको पावताहे, यह अजन्मा किसी भी प्रकाररो अन्यथा होता नहीं अर्थात् मायाकरके भेदको पावताहे, परमार्थ से नहीं [विवाद का विषय जो भेद, सो मिथ्या है,भेद होनेसे चन्द्रादिकोके भेदवत् ॥ विवादका विषय जो आत्मतत्त, सो स्वरूप से भेद रहित है, क्योकि निरसयवहे ताते, अरु नित्य देताते, अरु अजन्मा है ताते, व्यतिरेक से मृत्तिकादिकों वत् । इसप्रकार कहते हैं क्योंकि आत्मा निराकार निरवयव है ताते। अरु जिसकरके सायव वस्तु अग्यान के अन्यथा भाव से भेदको प्राप्त होता है। जैसे घटसरावादिकन के भेटी से मृत्ति गौडपादीय कारिका तृतीय प्रकरण ३ । अजातस्यैवभावस्य जातिमिच्छन्तिवादिनः । अजा तोह्यमृतोभावोमवंतांकथमेष्यति २०१९९.।। का भेद को पावती है, यह व्यतिरेकी दृष्टान्त है, ताते निर- वयत्र अरु अजन्मा जो अद्वैत सो किसी भी प्रकार से अन्यथा (भेदको प्राप्त) होता नहीं, यह अभिप्राय हैं। अरु तत्व तो भिद्यमानेहि मर्त्यताममृतं ब्रजेत् जाते तत्वसे भेदको प्राप्त हुये अमृते मरने की योग्यताको प्राप्त होगा अर्थात् जिसकरके परमार्थ से भेदको प्राप्त होनेके स्वभाव से अमृत असरणधर्मा। अरु अंजन्मा हुआअद्वेत मरणकी योग्यताको प्राप्तहोवेगा । जैसे अग्नि,शीतलताको प्राप्तहोने से सो स्वभाव के विपरीतपने की प्राप्ति, सर्व प्रमाणों के विरोधसे अनिष्टहै । अर्थात् अग्निका अप- नी स्वभावभूत उपणता को त्याग शीतलस्वभाव होना सर्व प्रमा- गों से विरुद्ध है, तैसे निरवयव निराकार अजन्मा एक अद्वैत स्वभाववाले आत्मतत्वका, सावयव साकार सजन्मा नानाद्वैत 'स्वभाववाला विनाशीधर्माहोना सर्व प्रमाणों से अरु युक्तिअनु- भव से विरुद्ध है, तातो किसीकोभी इटनहीं। एतदर्थ अजन्मा अविनाशी जो आत्मतत्व सो अपनी मायाकरके ही भेदको पात्रता हे परमार्थ से नहीं। एतदर्थ द्वैत किसीप्रकार भी परमार्थ से सत्य है नहीं १६८॥ २०१६-हे सौम्य !'जोन इस प्रकार अपने पक्षको कहके, अब अपने वेदान्ती के यूथविये परिगणित वादियोंके पक्षको अनु- वादकरके दूपण देतेह ] पुनः कोई एक उपनिषदों की व्याख्या क- रेनेवाले वाचाल ब्रह्मवादी (-उपासक) अजातस्यैन भावस्प जाति मिच्छन्तिवादिनः वादीलोक अजन्मा भावकी उत्त- तिको इच्छते हैं । अर्थात् जे अन्तरसे उपासना के आग्रहवाले अरु घाह्य अद्वेत ज्ञानके वक्ता ऐसे ने बाचाल ब्रह्मवादी सो स्वभावसे अजन्मा अरु अमररूपही आत्मतत्वरूप भावकी पर- +n 'मांडूक्योपनिपद् । नभवत्यमृतमयैनमर्त्यममृतन्तथा । प्रकृतेरन्यथा भावोनकथञ्चिद्भविष्यति २१।१००॥ मार्थसेही उत्पत्तिको इच्छतेहैं जिातंचेत्तदेवमयंतामेष्यत्यवश्यमा (जन्म को पाया है सो अवश्यही मरणकी योग्यताको प्राप्तहोवे- गा, इस न्यायसे तिनका सो आत्मा, स्वभाव से अजन्मा अरु अमृतभावरूपहुआ मरणकी योग्यताको कैसे प्राप्तहोवेगा, किन्तु किसी प्रकारसेभी मरणकी योग्यतारूप स्वभाव की विपरीतता को पावनेकानहीं। अिर्थात् जो तत्त्ववास्तवकरके अपने स्वरूपसेही अजन्मा अविनाशी शुद्धबुद्ध मुक्तस्वभावहै सो कभी किसीप्रकार सेभी अपने स्वरूप स्वभावसे अन्यथाभावको प्राप्तहोता नहीं। इत्यर्थः २०१६६ २१ । १०० हे सौम्य पदार्थों को स्वभावके विपरीतपने की प्रासिअघटितहै, ऐसा जोकहातिसहीको वर्णन करतेहै] निभव- त्यमृतमयनमर्त्यममृतन्तथा अपत मरनेकेयोग्य होता नहीं तैसे सरनेके योग्य अमृत होता नहीं, अर्थात् जिस करके लोक विपे अमृत (अविनाशी) वस्तु मरने (विनाशके ) योग्य होती नहीं। ताते अग्नि के यहां यह अर्थहै कि अग्नि के स्वभावरूप उष्णपनेको शीतलपनेकी प्राप्तिरूप विपरीतपना अयुक्तहै, तैसे अन्य ठिकाने भी स्वभाव का विपरीतपना अयुक्त है, क्योंकितैसे हुये स्वरूप के नाशका प्रसंग प्राप्तहोताहै ताते उष्णस्वभाववत् । ताते । प्रकृतेरन्यथाभावो नकथञ्चिद्भविष्यति। स्वभाव का अन्यथा भाव किसीभी प्रकारसे होता नहीं अर्थात् जैसे स्वरूप से हीजोअग्निका उप्णस्वभाव सोअन्यथाहोतानहीं तैसेहीस्वभाव का अन्यथाभाव (स्वरूपसे इतरपना) कदापि किसी प्रकारसेभी होगानहीं|हे सौम्यावस्तुको अन्यथाकरना जैसेआम्रकाफलप्रथ- म खट्टाहोताहे सोई पश्चात् परिपक्क अवस्था चिपे मधुर होता है सो कालकरके होताहै, क्योंकि वस्तुको अन्यथा करना कालका -- गौडपादीय कारिका तृतीय प्रकरण ३॥ स्वभावेनामतोयस्यभावोगच्छतिमर्त्यताम् । कृतके नामृतस्तस्यकथंस्थास्यतिनिश्चलः २२ १.१,०१॥ लक्षणहै, परन्तु जो वस्तु उत्पन्न होती है.सो कालके व्यवधानसे युक्तहोने करके, कदाचित् कालके प्रभावले अन्यथा भावको प्राप्त होवे तो होवे परन्तु जोअजन्मा कालके व्यवधानसे रहितसर्वदो एकरस स्वभाव है तिसका किसीकरके किसी प्रकार से भी अन्य- थाभाव होवे नहीं । यह परम सिद्धान्त है २१,१००॥ २२।१०१ हे सौम्य ! स्विभावेनामृतो यस्य भावो गच्छति मर्त्यताम्। जिसका स्वभावसे अमृतरूप भाव मरनेकी योग्यता को प्राप्त होता अर्थात् । शङ्का । ननु, ब्रह्म कारणरूपसे कार्यो- त्पत्तिके पूर्व मरणरहित हुआभी कार्यके आकार से उत्पत्तिके अ- नन्तर कालविमरणकी योग्यताको पावेगा, ताते स्वरूपके भेदसे दोनों अविरुद्धहें।जहां ऐसी शङ्काहै तहां कहते हैं। जिस वादीका स्वभावसे अमृतरूप भाव मरणकी योग्यता को पावताहै अिर्थात् परमार्थ से जन्मको पावता है तिस चादीकी । प्रागुत्पत्तेः स. भावः स्वभावतोऽमृत इति। सो भाव, उत्पत्ति से पूर्व स्वभाव से अमृत है । ऐसी जो पूतिज्ञा सो मिथ्याही होवेगी।पूश्न। तब कैसे है। उत्तर कृतकेनामृतस्तस्य कथं स्थास्यति निश्चलः" तिसका अमृत निश्चल हुआ केसे स्थितहोवेगा अर्थात् तिस वादीका जन्य होनेकरके अमृत, सो भाव निश्चलहुआ अिर्थात् अमृतपने के स्वभावकरके कैसे स्थित होवेगा, किन्तु किसी प्रकारसे भी स्थित होवे नहीं। इसका यह अभिप्रायहे कि आत्मा की उत्पत्ति वादीके मतविपे सर्वदा अजन्मा वस्तु कोई हे नहीं, किन्तु यह सर्ववस्तु मरणके योग्य है, इसकरके मोक्षके अभाव का प्रसंग प्राप्त होगा २२ । १०१ ॥ २३।१०२ हे सौम्य ! [परिणामवादकी सृष्टिप्रतिपादक श्रुतिके अनुसारसे अंगीकार करनेकीयोग्यताको शङ्काकरकेनिषेधकरतेह] मांडूक्योपनिषद्।। भूततोऽभूततोवाऽपिसृज्यमानेसमाश्रुतिः । निश्चितं युक्तियुक्तश्चयत्तद्भवतिनेतरत् २३ । १०२॥; शानिनु,ओत्माकीअनुत्पत्तिके वादीको सृष्टिकीपूतिपादक श्रुति- पूमाणिक नहोवेगी, जहांऐसीशबाहै तहों कहते हैं, सृष्टिको पति- पादकश्रुति हैं यह जो तेराकहनाहै सोसत्यहै परन्तु सो अन्यअर्थके परायण है, सष्टिपरायण नहीं। अरु यह हमने उपायःसोवताराय। सो अद्वैत बोधकी उत्पयर्थ उपायहै इस पूकरणके पंचदश १५ वें श्लोकवि कहाहै । अव समाधान के पूर्व कहे हुये भी तेरापूश्न अरु उत्तर जो कहतेहैं सो कहनेको वांछित अर्थकेप्रति सृष्टिपूति- पादकश्रुतिकेअक्षरोके अनुलोमपनेके विरोधकीशङ्कामात्रकेनिवा- रणार्थ है भूततोऽभूततोवाऽपि सृज्यमाने समाश्रुतिः। भूत से वा अभूतसभी उत्पन्न होनेवाले विपे श्रुतिसमहै अर्थात् भूतसे, कहिये परमार्थसे,उत्पन्न होनहार वस्तुविपे,वा अभूत,कहियेमाया से, वा माया विनाही सृज्यमान वस्तुविपे, सृष्टिकी श्रुति तुल्य है [यहां यह भावह कि, परिणमिवादविषे अरु विवर्तवादविपेसष्टि प्रतिपादक श्रुतियों के अविशेपसे अद्वैतके अनुसारी श्रुति अरुयुक्ति के वशते विवर्त्तवादकीही अंगीकारकरनेकी योग्यताहै] शङ्कानिनु, 'मुख्य अरु गौण दोनों कार्योके मध्य मुख्य विषे शब्दके अर्थका निश्चय युक्तहै,। इसप्रकारजोवादीने कहा सो चने नहीं, क्योंकि मिथ्यापने विना अन्यपूकारसे सृष्टिअप्रसिद्ध हैं ताते, अरु निष्प- योजन है तातेअिर्थात वास्तव सिद्धान्तके विचारसे देखिये तो आप्तकामएकअद्वैत परिपूर्णपरमात्माकोसृष्टिरचने के प्रयोजनका अभाव होनेसे सृष्टि अपयोजन है । अरु सिवाह्याभ्यन्तरोह्मजः। (बाह्य अन्तरसहित है अरु अजन्मा हे । इस श्रुतिकेप्रमाणसे । अरु अविद्या अवस्था विपेही विद्यमान सर्वगोणी (स्वप्नगत र. थादि ) अरु मुख्या जाग्रतगत घटादि रूपसृष्टि परमार्थ से हे नहीं, इसप्रकार हम कहते हैं। ताते [ सृप्टिकी श्रुति को अद्वैत - गौडपादीय कारिका तृतीय प्रकरण ३। 'नेहनानेतिचाम्नायादिन्द्रोमायाभिरित्यपि । अजा- यमानोबहुधामाययाजायतेतुसः २४ । १०३. ॥ के अनुसारी पनेकेहुये प्रमाण अरु युक्ति के अनुग्रह सहित अद्वैत ही अंगीकार करनेके योग्यहै, इस प्रकार फलित अर्थ कहतेहैं,] ताते " निश्चितं-युक्तियुक्तञ्च यत्तद्भवति नेतरत् । निश्चित युक्ति करके युक्त सोई होता है अन्यनहीं । अर्थात् श्रुति करके निश्चित जो एकहीं अद्वितीय अजन्मा अमृत रूप वस्तु हे, अरु युक्तियों करके युक्त है, सोई श्रुतिका, अर्थ होनेको योग्य है अन्य कदाचित् भी नहीं। इसपकार इस पूर्वके ग्रंथसे कहते हैं २३ । १०२ 11. " २४।१०॥ हेसौम्य! सृष्टिकमिथ्यापनेके स्पष्ट करनेरूपद्वारसे अद्वैतकोही ध्रुतिके अर्थपनेसे निर्धारकरनेकोश्रुतिकेनिश्चयकोही वर्णन करते हैं | श्रुतिका निश्चय कैसा है (उ० । जब भाव रूपही सृष्टिहोय तो तिसकरके नाना सत्यही होवेगा। अरु जय नानात्व सत्यहोय, एतदर्थ तिसकेअभावके दिखावनके अर्थ वेदका वाक्य न होवेगो अरु नेहनानेतिचाम्नायादिन्द्रोमाया- भिरित्यपि। इसवि नाना कुछ भी नहीं, यह वेदका आम्ना- य (वाक्य है, अरु इन्द्रमायाकरके ऐसे भी है । अर्थात् । “नेह नानास्तिकिञ्चन" | यह नाना कुछ भी नहीं , इत्यादि, यह द्वैतभाव के निपेचरूप अर्थवाला वेदका वाक्य,हे। अर्थात् जो यह सृष्टिभाव (सत्य, कुछवस्तु) रूप होती तो, सृष्टि प्रतिपादक श्रुतियां सर्व उपनिषदोंमें एकरूपही होती, अरु नेहनाना- स्ति किञ्चन । यह नानात्वके अभावके प्रतिपादक अर्थवाली श्रुति न होती, अतएव सृष्टिके वास्यों में विरुद्ध नानात्व अरु नानाखके निषेध की श्रुतियों के देखने से नानात्वका अभावही प्रतीत होताहे । ताते प्राणके संवादवत् । अर्थात् प्राण अरु इन्द्रियों के संवाद की जो आख्यायिका हे सो सर्व संघात में मालूक्योपनिषद् ।, प्राणकी ज्येष्ठता श्रेष्ठताके लखावनेके अर्थ कल्पित है, तैसेही एक अद्वैत आत्मतत्त्वके निश्चयकरावनेके अर्थ कल्पित जोसृष्टि सो मिथ्याही है अरु इन्द्रोमायाभिः । इन्द्रमायाकरके इसपूकार मिथ्या अर्थक प्रतिपादक मायाशब्दकरके कथन है तातोशङ्कानिनु, मायाशब्द पूज्ञाका वाचीहै, ताते मिथ्याअर्थवाला नहीं है, । उ०। यह जो तेरा कथन है कि मायाशब्द पूजाका वाची है सो सत्य है। [यहां यह अर्थ है कि मायाशब्द की वाच्य जो प्रज्ञा सो चैतन्य ब्रह्म है नहीं, क्योंकि "भूयश्चान्तेविश्वमायानिवृत्तिः । ८ पुनः अन्तधिषे विश्व झिायो अरु माया । कारण इसकी नि- वृत्ति होती है ? इत्यादिक श्रुतिवाक्यों से मायाकी निवृत्ति श्रव- ण करने में आवतीहे ताते। किन्तु यह प्रज्ञा इन्द्रियजन्य है अरु तिसको अविद्या के अन्वय अरु व्यतिरेक की अनुसारी होने से अविद्यारूप होने करके मिथ्या होनेसे मायाशब्द के मिथ्या अर्थ- वानपने विपे असंभन नहीं] तथापि इन्द्रियजन्य पूजाको अ- विद्यात्मक होने करके माया (मिथ्या) पनेके अंगीकारसे दोप नहीं । अर्थात् अविद्या से आकाशानि भून तिनसे इन्द्रियां तिनसे पूजा इसप्रकार होनेसे अविद्या का अन्वय जो अविद्यात्मक प्रज्ञा तिसको मायारूप से अंगीकार करने में दोप नहीं, एतदर्थ इन्द्र शब्द करके जो परमात्मा सो अविद्यारुप इन्द्रियजन्य धुनिवृत्ति मय माया करके बहुत रूपहुआ प्रतीन होता है । तथाच " अ. जायमानो वहुधा विजायत इति । ६ जन्मरहिन हुआ बहुतप्र- कारसे जन्मता है । इस श्रुतिके प्रमाणसे । ताते अजायमानो बहुधा मायया जायते तुमः । सो तो जन्म रहित हुआ माया करके ही बहुत प्रकार जन्मता है अर्थात् सो इन्द्र नामवाला परमात्मा मायाकरके ही बहुत रूपसे जन्मना है । मनगर जमे एकही अग्निरिपे शीतलता अग उष्णता 'जो परस्परम विरुद्ध है, इन दोनों का होना असंभन है, तमे एपही आत्मा धिये जन्महित अजपना, अरु बहुन प्रकार से जन्मपना, यह दोनों गौडपादीय कारिकी तृतीयं प्रकरण ३ । १६६ संभतेरपवादाच्चसम्भवः प्रतिसिद्दयते। कोन्वेनंजन- येदितिकारणेप्रतिसियते २५॥ १०४॥' जो परस्परमें विरोधी हैं। संभवे नहीं। एतदर्थ सो परमात्मा माया करकेही वहुत प्रकारसे जन्मताहै, यह कथन युक्तही है। अरु फलवान होने से आत्मा की एकता का ज्ञानहीं सृष्टिकी श्रुतियोंका निश्चितार्थ है "तत्र को मोहः कः शोकः एकत्व- मनुपश्यत तहां एकताके देखनेवालेको क्या मोह अरु क्या शोक है। इत्यादि वेदमंत्र का कथन है ताते । अरु “ मृत्योः समृत्युमानोति य इह नानेच पश्यति जो यह एक आत्मा विप नानाव को देखता है सो मृत्यु से मृत्यु को पावता है। इस प्रकार सृष्टि आदिक भेद दृष्टि निन्दित हैर४ ॥ १०३ ॥ २५१०४॥ हे सौम्य भेदं दृष्टि केमियापनेविअन्यहेतु कहते हैं] सम्भूतेरपवादाचसम्भवः प्रतिसिद्धते। संभतिके अपवाद (निन्दा) से संभव का निषेध करते हैं। अर्थात् “अंधतमः प्रविशन्तिये संभूतिमुपासते जो.संभूति की उपासना करतेहैं सोअन्यतम में प्रवेश करते हो इस अतिके प्रमाण करके संभति के उपासकों की निन्दां से संभव कहिये कार्य का निषेध किया है। अरु जिस करके परमार्थसे संभतिके विद्यमान होने से तिसकी निन्दा संभवे नहीं, अरु श्रुतिविष निन्दा कियाहै, एतदर्थ तिस- का अवस्तुपना ही सिद्ध हुआशंकी निनु, विनाश(कर्म)से सं- भूति कहिये देवताकी उपासना के समुच्चयार्थ संभूति की निन्दा है, जैसे "अन्तमः प्रविशन्ति ये अविद्यामुपासते" जो अवि- या (कर्म)को उपासतेसोअन्धतममें प्रवेश को पावते हैं। इस वाक्यबिषे कर्म से उपासना के समय की विधिअर्थ कर्मभी निन्दा हसे,समाचांना संभूति हिरण्यगर्भ)रूप विषयवाली देवताकी उपासना के, अरु विनाश दाद के वाच्य कर्म से.समु. वयं के विधानाध, संभूति की निन्दाहे, यह तेरा कथन सत्य है, २२ 'मांडूक्योपनिपद्ः। तथापि.जैसे, यहां यह अर्थ है कि कामचार (यथेष्टाचरण)काम वाद (यथेष्टकथन )अरु कामभक्षण (यथेष्टभोजन)इत्यादिस्वा- भाविक प्रमादमय प्रवृत्तिरूप अशुद्धिका वियोग रूप संस्कार जैसे नित्य अग्निहोत्रादिकों का फलहै, तैसें निष्काम पुरुष करके अनुष्ठान किये कर्म उपासनाके समुचंय का फलरूप काम नामक अशुद्धि की निवृत्तिहै, सोभी संस्कार है] पुरुपंकें संस्काररूप अर्थ वाले विनाशनामक कर्मको स्वाभाविक अज्ञानसे जन्य प्रवृत्ति रूप मृत्युका तरणरूप अर्थवान् पंना है, तैसे पुरुपके संस्काररूप अर्थवाले देवताके ज्ञान अरु कर्म के समुच्चय को, कर्मफल विप. यक रागसे जन्य जो प्रवृत्ति तिस प्रवृत्तिरूप साध्य अरु साधन इन दोनोंकी इच्छारूप मृत्युका तरनारूप अर्थवान् पनाहै। इस प्रकार कर्मरूप अविद्यासे दोनों एपणारूप मृत्यु से.तरे हुये, अरु उपनिषद्प शास्त्र के विचारविपे तत्परहुये, विरक्तको परमात्मा के एकताके विद्याकी उत्पत्ति अन्तरायवाली नहीं, इसप्रकार पूर्व होनेवाली कर्मरूप अविद्याकी अपेक्षासे पश्चात् होनेवाली अमृत भावकी साधनरुप ब्रह्मविद्या, एक पुरुपसे सम्बन्ध को प्राप्तहुई कर्मरूंप अविद्यासे समुच्चय को प्राप्त होती है, इसप्रकार कहाहे। एतदर्थ अन्यअर्थ के होनेसे अमृत भावकी साधनरुप ब्रह्मविद्या की अपेक्षाकरके संभतिका नो अपवादह सो निन्दा के अर्थ ही होताहै, समुच्चयकी विधिके अर्थनहीं। अरु यद्यपि कर्मअरु उपा- सनाका समुच्चय अशुद्धिके वियोग (अभाव ) का हेनुहे, एतदर्थ सोई तिसका अन्यार्थ होवेगा,अपवादरूप अन्यअर्थनहीं। तथापि परमार्थ से पवित्रतारुप फलके अभाव से अपवाद की सिद्धि एतदर्थ संभूतिके अपवादसे संभूतिका आपेक्षकही. संत्पना है, इसप्रकार परमार्थ सतपआरमाके एकताकी अपेक्षाकरके अमृत नामवाले संभव (कार्य) का निषेध किया। इसप्रकार मायासे रचित अरुअविद्या स्थित हुये जीवकोअविद्याके नाशट्टये स्वभाव रूप होनेसे परमार्थसेकोन्वेनं जनयेदिति कारणप्रतिसिद्धयते ।
गौडपादीय कारिका तृयीय प्रकरण ३ । १७१ स.एष नेति नेतीति व्याख्यातं निन्हुते यतः सर्व मग्राह्यभावेन हेतुनाऽज प्रकाशते २६ । १०५॥ उसको कौन उत्पन्नरेगा इसप्रकार करिणका निषेधकियाहै? अर्थात् इसको कौन उत्पन्न करेंगा किन्तु कोई भी नहीं। जैसे अविद्या से रज्जुबिषे आरोपित, अरु पुनः रज्जुके विवेक से नष्ट हुये सर्पको कोई भी उत्पन्न करता नहीं, तैसे इसको कोई भी उत्पन्न करतानहीं, इसप्रकार कारणका निषेध करिहै। अभिप्राय यह है जो, अविद्यासे उत्पन्नहुये अरु नष्टहुये जीवका उपजावने वाला कारण कुछ भी नहीं, क्योंकि यह किसीसे भी हुआनहीं अरु कोईभी नहीं होताहुआ “नाऽयकुतश्चिन्न वभूत्र कश्चिदिति श्रुतेः” २५॥ १० ॥ २६॥ १०॥ सौम्य! [इस कथन करनेसे वास्तव:रेके द्वैत होतानहीं इसप्रकार कहते हैं “अथातो नेति नेतीति आदेश अव ईसके अनन्तर नेति नेति यह आदेशहोताहै इसप्रकार सर्व- निषेधके प्रतिपादन किये आत्माके दुःखसे वोधन करनेकी योग्य ताको मानतीहुई श्रुति, वारम्वार अन्य उपायपने करके तिसही आरमाके प्रतिपादन करनेकी इच्छा जी जो व्याख्यान किया है तिनसर्वको निषेध करेहै, अर्थात [ सर्वको निषेध करहै ई- स्यादि रूप अर्थको स्पष्ट करतेहुये "सएपनेति नेतीति सो यह ऐसे नहीं, ऐसे नहीं इस श्रुतिवाक्यका व्याख्यान करते हैं। यहां यहअर्थ है कि सो यह ऐसे नहीं, ऐसे नहीं, इत्यादि रुप श्रुति विशेषके निषधमुख द्वारसे आत्माकी अदृश्यरूपताको दे- खावती हुई जो दृश्यरूप कार्य, मन अरु वाणीका विषय है विन सर्व को अर्थ से निषेध करेहे । सोई श्रुति परमार्थ से तो अदृश्य ऐसे कहतीहुई दृश्यका वस्तुपना वनेनहीं, इसप्रकार कहती है। अरु तेसहुये वस्तुपनेके असंभवसे दृश्यवर्गका अवस्तुपनाही सिद्ध हुआ] सिएपनेति नेतीतिव्याख्यातंमिन्हुते यतः। सो यहनेति १७२ १ 13. FT.मांडूक्योपनिषद् । नेति व्याख्यान करतेहैं जातेनिषेधकरतेहैं, अर्थात सोयहरेसानहीं ऐसानहीं इसप्रकार आत्माकी अदृश्यताको देखावतीहुई श्रुति, अर्थसे उत्पत्तिवाले बुद्धि के विषय ग्राह्यवस्तुको निषेधकरती हैं। अरु अर्थसेशिका ननु यह श्रुति प्रपंचके.समूहको क्योंनिपेधकरती है, अरु इसप्रकार होनेसे पंकप्रच्छालन, (कीचड़-के-धोनेके.) न्यायकी प्राप्ति व्याख्यानकिये अर्थकीत्यर्थता होवेगी,यह शंका करके "अग्राह्यभावेन, अग्राह्यभावसे? इत्यादिपदोंका व्याख्यान करते हैं। यहां अर्थ यह है कि देवावेत्यादि दोनों प्रसिद्ध? इत्यादि वाक्यकरके व्याख्यान किये, अरु ब्रह्म आत्मामात्रस्वरूप से स्थितिपर्यन्त अप्रतिपादन किये अरु ब्रह्मरूप उपेयवतु-उपाय- पनेसे मानेहुये प्रपञ्च के वास्तवपने करके जानने के योग्यता की जो शङ्का, सो नहोय, इसप्रकार सर्व प्रपञ्च से रहित होनेकरके अद्वितीय ब्रह्मस्वरूप के निर्धार करने के अर्थ श्रुति प्रपञ्च को आरोपित होनेसे 'तिसका निषेध करे है ] उपायको उपेय विपे स्थितिको न जाननेवाले पुरुपको उपायपनेकरके व्याख्यान किये वस्तुकी उपेयवत ग्राह्यता मतिहो, इस अभिप्राय से जित करके अग्राह्य भावरूप-हेतुसे व्याख्यान-किये सर्वको निषेध करते हैं । [ उपायको कल्पित होने करके उसको वास्तवपने का अभाव है] ताते, अरु उपेय (उपायकरके 'प्राप्तहोंने योग्य ब्रह्म) को कैसे तिसप्रकारसे उपायके अबस्तुपने के प्रकारसे या िितससत्यरूप प्रकारको वस्तुकी-प्राप्ति कैसे होगी। यह शङ्का करके "अज'' अजन्मा इत्यादि पदका व्याख्यान करतहें। यहां यह अर्थहे कि, आरोपित- सर्व प्रपञ्च के,निपेघसेही, आरोपित सादिकों के अधिष्ठानपने से भिन्न असत्पनेवत्, स्वतन्त्रपने करके । अर्थात् अधिष्ठानकी सत्ताविना मूर्तादि प्रपश्यरूप उपायके वास्तवपने के अभाप निश्चयसे, उपेवरूप अद्वितीय ब्रह्ममात्र स्वरूपना को ही प्राप्त हु, अरु बमकी, सदा एकरूपता फूटस्थता नित्यज्ञान स्वभावता आदिकोंके जाननेवाले जो पुरुप तिन उत्तमाधिकारि- गौडपादीय कारिका तृतीयप्रकरण ३॥ १७:३ सतो हिमाययाजिनमः युज्यते न तु तत्त्वतः तत्त्वतो जायते यस्य जातं तस्य हि जायते२५img योको अन्यकी अपेक्षालेविनाउक्त विशेषणवालआित्मतिलस्त्रयं अपिही प्रकाशितहोताहै। अरुकलितपेश्की जोउयायपनाह प्रतिविम्ब आदिकोंवत् अविरुद्धहै ताते.ऐसे उपायकी उपेय विर्षे स्थितिकोही.जाननेवालोको अरु उपेयकी नित्य एकरूपता है, इसप्रकारकें जाननेवाले तिस उत्तमाधिकारी पुरुषको बाह्य अन्तर सहिंताजन्मारहित अंजन्मा आत्मतत्व आपसे आपही प्रकाशताहै:२६॥ १०NUTE TIFFM २७१९०६॥हे. सौम्य![ओ आत्मतत्त्व है सो.अजन्मा अद्वितीय परमार्थ रूप है, अरु जो द्वैतहै. सो मायासे कल्पित असत्य है। इस प्रकार प्रतिपादन किया, तहांही अन्यहेतुको भी कहते हैं। इसप्र- कारही शताधिश्रुतियों के प्रमाणसे वाह्यान्तर सहित अजन्सी आरमतत्व अद्वैतहै, तोते अन्यह नहीं, इसप्रकार विद्वानों को निश्चितही है, अरुसो तेसे युक्तिसे भी निश्चितही है। अब यह ही आत्मतत्त जो श्रुतिके प्रमाणों से अरु युक्तियों से निश्चित किया है। पुनः अन्ययुक्ति से भी निर्धार करते हैं, ऐसे कहींहै। अरु जो ऐसा कहे कि तहां यह आत्मतत्व सदाही अग्राह्य है ताते असत् होवेगासोकयन वनहीं, क्योंकि कार्यरूप लिंगवाले अन- मोनके वशसे यहां यह अनुमानरूप अर्थह कि विवादका विषय जो जगत्का जन्म:सो सवरूप अधिष्ठानवालाहे, कार्य :होने से, प्रसिद्धकार्यवत] आत्मतत्त्वके अकारणपनेकरके सद्भावके निर्णय सेजिसे विद्यमान मायाविका मायाकरके जन्मरूप कार्य हे, तसे जगत्का जन्मरूप जो कार्य है. सो ग्रहण कियाहुआ मापात्रीवत् विद्यमान जगत् के जन्म अरु.मायाका आश्रयरूपही आत्मा को लखा है । जो. कारण, सहित इस जगत् का कोई आश्रय अधि- शान सत्य चेतन्य रूप है । अरु जिस करके विद्यमान कारण से मांडूक्योपनिषद् । असतोमायया जन्म तत्वतो नैव युज्यते बन्ध्या- पुत्रोनित्तत्त्वेन माययाचाऽपिजायते ॥१०॥ मायारहित हस्ति आदिक कार्योंवत् मायासे जगत्काजन्म घटे है, असत्कारण से नहीं,ताते कारणका सद्भाव विवाद से रहित है। अरु परमार्थसे तो आत्माकाजन्म घटता नहीं। अथवा जैसे विद्यमान रज्जुआदिक वस्तुकासर्प आदिकरूपसे जन्मवत्माया करके जन्म घटित है, स्वरूप करके तो नहीं। तैसे सितोहि 'मायया जन्मायुज्यते नतु तत्वतः सत्का माया से जन्म घटे है तत्त्वसे तो नहीं, अर्थात् जैसे रज्ज्वादिकों का सर्पादिरूप से जन्म घटे हातैसेअिग्राह्य सतरूप आत्माकाभी'मायासे जन्म घटितहै, परन्तु तत्र (परमार्थ) सेही अजन्मा आत्माका जन्म है नहीं। अरु तत्त्वतो जायते यस्य'जात तस्यहि जायते जिस के मितविर्षे जाते जन्मता तिसके मितविषे जन्मको पाय सत्ता जन्मतीहै । अर्थात् पुनः जिस वादीके मतविपे जिसकरके तत्त्रसे अिर्थात् परमार्थसतरूपसे अजन्मा आत्मतत्त्व जगतरूप से जन्मताहै, तिसवादीके मतविपे अजन्मा जन्मताहै,इसप्रकार कहनेको शक्य नहीं। क्योकि अजन्माका जन्मसे पिरोधहे ताते एतदर्थ तिसवादीके मतविपे,अर्थात् जन्मको पावताहुआ जन्म- ताहै,इसप्रकार प्राप्तहुआ। तिसकरके जन्मको प्राप्तहुये आत्मा को पुनः जन्मको प्राप्त होने करके अनवस्थाकी प्राप्तिहे अर्थात अजन्मा एकही आत्मतत्त्रहे, यह सिद्धहुआ २७ । १०६ ।। ३८ १९०७॥हे सोम्य[कार्यजोह सो सत्रूप कारण पूर्वक है, ऐसीव्याप्तिहे नहीं, क्योंकि असद्वादियों करके असदपकारण से सतरूप कार्यके जन्मका अंगीकारहे, “असदेवे दमय आमी. देकमेरा द्वितीय तस्मादसत सज्जायेत्" यहांका करके कहते है 14 असतो मायया जन्म तत्व तो नेव युज्यते। असत् का माया से वा तच से जन्म घटता नहीं । अर्थात् असत् वादि.
y गौडपादीय कारिकीर्तृितीयांप्रकरण ३ । १,७५ यथास्वप्ने, द्वयाभासं स्पन्दते मायया मनः यथाजा अद्वयाभासं स्पन्दते मायया मनः२९15705 योंके मंतविपे असत् पदार्थको मायोकरके वा तत्त्वसे किसी. भी प्रकारसे जन्म घटित नहीं, तिसको अष्टरूपताह ताते अरु' "बन्ध्या पुत्रो न तत्वेन मायया वापि जायते। बंध्याकापुत्रतत्त, करके वामायाकरके भी जन्मकोपावतानहीं, अर्थात् बंध्याकापुत्र' जो अत्यन्त असत् है ताते उसका वास्तव करके तो क्या किन्तु, माया करके भी जन्मको पावता नहीं, अतएव असहाद दूरसे: ही अघटित त्याजनीय है, इत्यर्थः २८ ११०७ ॥ २६३१०८॥हे सौम्या सत्वस्तुकाहीमायासेजन्महोताहै,इस प्रकारकथनकियेअर्थकोही प्रतिपादन करतेहैं] प्रश्नापुनःसत्वस्तु काही मायासे जन्म कैसे है। उत्तर तहाँ कहतेहैं, जैसे रज्जुविपे कल्पित सर्प अपने अधिष्ठान रज्जुरूपं से देखड्डये सत्यहै, इस प्र., कार मन जो है सो परमार्थ ज्ञानस्वरूप आत्मरूपसे देखाहुआ सत् है। यथास्वप्ने दयाभासंस्पन्दतेमाययामन जैसे मन स्वप्नविषे मायासे दैताभास रूपहुआ.स्फुरता है । अर्थात् जो मन अपने, अधिष्ठान रूपसे देखाहुआ सत् है, सो मन जैसे रज्जुमें सर्प तैसे मायाकरके ग्राह्य अरु ग्राहकरूप से द्वैताभासरूप हुआ-स्फुरता है। तैसेही तथाजावयाभासंस्पन्दतेमाययामनः। तैसे जा- अर्विषे मन मायाकरके द्वैताभास रूपहुआ,स्फुरता है । अर्थात जैसे मन स्वप्नविषे माया वा अविद्या करके द्वैताभास जगदा- भास । रूपहुआ स्फुरता है, तैसेही जाग्रत्विपे भी मन मायाक, रके जगदाभास रूपहुआ स्फुरता है । अर्थात् अविद्या के आश्रय हुआ मन स्वप्नविषे अध्यास संस्कार के वश आपही जगदाकार से स्फुरण होताहे, तहां जैसे पूर्व के संस्कार अध्याससेस्वममेंआ- पफो सोयाहुआ स्वमान्तर में देसताहे तसेही स्वमके जामतमेंसे स्फुरण के तीन संगसे उस जाग्रतन्तर इस दीर्य जाग्रतरूप .
-- मांडूक्योपनिषद् । "अहयाचयाभासं मनः स्वप्ने न संशयः । अहय- चद्वयाभासं तथाजायन्नसंशयः ३०।१०९॥ मनोदृश्यमिदंदैतं यत्किञ्चित्सचराचरम् । मनसो- ह्य मनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते ३५।११०॥ स्फुरण जगदाकार होता है । ताते यह सर्व स्वानरूपही है, परन्तु तैसा भासती तव है जब वोधरूप जाग्रत मे स्वस्वरूप विपे जा- गताहै अरु जाग्रत स्वप्नका जो भेदहै सो मनके 'मन्द मन्दतर तीव्र तीवतर स्फुरणको भेद है, परन्तु असत्यता अरु स्मृति- मात्रता में दोनों की तुल्यता है। २६ । १०८ ॥ ३०। १०६ ॥ हे सौम्य तव द्वैतका स्वीकार किया यह आशंका करके कहते हैं] अद्वयंचद्वयाभासंमन स्वप्नेनसंशय. स्वप्नविषे अद्वैतहुआ मन द्वैताभास स्फुरताहै यहां संशय नहीं, अर्थात् रज्जु सर्पगत् ‘परमार्थ से आत्मारूप करके अद्वैत हुआ मन स्वप्नविषे द्वैतीभासनिानारूप । होयके स्फुरता है । अरु स्वप्नविष हस्ति हयादिक ग्राह्य, अरु चक्षुरादिक ग्रहिक यह दोनों ज्ञानसे भिन्न- नहीं, एतदर्थ इसमें । मनके स्वप्नरूप से स्फुरणेविषे संशय न- हो। तैसेंही अद्वयञ्चद्वयाभासंतथाजाग्रन्नसंशयः। तैसेही जा ग्रंत्वि भी मन अद्वैतरूप हुआ सताभी दैताभास निानाप्रप- चौकार होय स्फुरता है इसमें भी संशयाकुउनहीं। क्योकि परमार्थसतरूपाविज्ञानमात्ररूपका अविशेपहै ताते अिर्थात् यावत् जाग्रत् स्वप्नमा नानारूप जगत है सो केवल एक मनके स्फुरणे- मात्रहै क्योंकि सुषुप्ति समाधिआदिको विपे मनके लयहुये जगत् का अभावही है ताते मनके स्फुरणसे इतर जगत्नहीं ३०१०६ ॥ ३१।११० सौम्य! मनोमात्र द्वैत है इस कथनां विये अब इमाण कहते है रज्जु सर्पवत् कल्पनारूप मनही द्वैतरूपसे युक्त है, तहां कान प्रमागहे, जव यह शंका हुई तब अन्वय अरुव्यतिरेक रूप अनुमानको कहते हैं। प्राइन । सो कैसा अनुमान है । उत्तर।
. गौडपाटीय कारिका तृतीय प्रकरण ३। १७७ आत्मसत्यानुवोधेन न संकल्पयते यदा। अमनस्तां तदायाति ग्राह्याभावेतदग्रहम् ३२ । १११ ॥ "मनोहश्यमिदंद्वैतंयत्किञ्चित्मचराचरम् । देखने योग्य जो कुछ यह चराचर द्वैतहै मनही है, अर्थात् तिसही कल्पना रूप मन से देखने योग्य जो कुछ यह सचराचर नानाद्वैतहै सो सर्व मिनकी कल्पनारूप होने से मनही है, यह प्रतिज्ञाहै, क्योकि तिस मनके भावहुये दैतका भाव अरु मनके अभावहुये द्वैतका अभाव होताहै ताते। अरु मनसोह्यमनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते। जाते मनके अमनीभावहुये दैतको देखते नहीं, अर्थात् जिस करके रज्जुविषे लयकोप्राप्त हुये सर्पवत् , विवेक ज्ञानके आभास अरु सम्यक् वैराग्यकरके समाधिविषे वा सुपतिविषे मनके अमन भाव (अफुर, निरोध) के हुये द्वैत प्रपंच देखते नहीं अिर्थात् रज्जुबिपे जब सर्पकी प्रतीति भ्रातिसे होती है तब तिस अध्यस्त सर्प से.भय कम्प स्वेदादिकहो आवते हैं। अरु तिसभ्रांतीरूपअ- वस्थाविषे जोभय कम्पत्वादि होतेह तिसका कारण अध्यस्त सर्प हैं रज्जु नहीं । अरु जब सत्यरूप रज्जुका सम्यक् वियेक ज्ञानहोता है तब उस अभ्यस्त सर्प के स्वाधिष्ठानमें लयहुये भय कम्पवादि सर्वका अशेष अभाव होता है, अरु एकसत्य रूप रज्जुही अब- शेष रहती है। तैसेही रज्जुस्थानीय एकअद्वैत सरूप आत्माविषे तिसके अज्ञानसे सर्पस्थानीय मन स्फुरण होताहै तिस मन करके भय कम्पत्वादि स्थानीय सचराचर प्रपंच 'तिरूप जगत् उप- जताहै, ताते द्वैतरूप प्रपंचका कारण मनका स्फुरणहै । अरु जब आचार्य करके अपने आप मत्यरूप आत्माका सम्यक् विवेकज्ञान होताहै तब निर्विकल्प वा विचार समाधि में मनके अमन अपुर' भावके प्राप्तहुये समस्त द्वैतभासका अशेष अभाव होताहे । एत- दर्थ यहाँ देतके अभावसे अद्वैत भाव सिद्धहै ३१॥ ११॥ ३२।१११॥ हे सोन्या [समाधि अरुसुषुप्तित्रिपेद्वैतको अप्रतीति १७८ मांडूक्योपनि । के हुये भी तितमा असत्पना ,नहीं, यह शंकाकरके प्रमाण के आधीन प्रमेयकी सिद्धिह इस अभिप्रायसे कहते हैं । अरु मनका जोअमन भावकहा, अव तिसको प्रतिपादन करते हैं। प्रश्न । पुनः इस मनका जिो द्वैतका कल्पकहै। अमनीभाव कैसे होता है, उत्तर "वाचारम्भण: विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् वाणीसे उच्चारकिया विकार नाममात्र कहनेमात्राही है अरु कृत्तिकाही सत्यहै। इस श्रुतिके प्रमाणसे मृत्तिकावत् आत्मरूप ही जो सत्यहै, तिस सत्का “ऐतदात्म्यमिद ५ सर्व तत्सत्य छ सआत्मा तत्त्वमसि" इत्यादि शास्त्रका आचार्य द्वारा उपदेशहोने के अनन्तर जो वोधहोताहै सो सत्यरूप आत्माका अनुरोध है, ऐसे कहते है । आत्मसत्यानुवोधेन न संकल्पयते यदा । सत्यरूप आत्माके अनुवोधसे जव 'मन' संकल्पको करता नहीं । अर्थात् तिस सत्यरूप आत्माके अनुवोधसे संकल्प के अभारसे युक्त होने करके जव (तिसकालविषे) मनासंकल्पको करता नहीं अर्थात् जैसे वरफकी पूतली सूर्यके तेजके प्रभाव से अपने कारण रूप जलमें लयहोती है,तैसे यह साधिष्टान से अभिन्न मन रूप पूतली आचार्यरूप सूर्य के उपदेशके प्रभावसे अन्तरमुख हुई बरफकी पूतलीवत् अपने कारण अधिष्ठान आ- स्मरूप जलमें लीन होता है, तन तिसकाल में वा तिस निर्वि- कल्प समाधिमे अपने अमनभावको प्राप्तहुआ संकल्प करता 'नहीं, अर्थात्स्फरणहोता नहीं। अमनस्तां तदायाति ग्राह्याभावे तदग्रहम् तिन बाह्यके अभावहुये ग्रहणरहित हुआ सो ‘मन, अमनभानको पावताहै । अर्थात् आत्मा के अनुयोवसे यह भन संकल्पको करता नहीं, तब, तिलकाल विपे, जलापने योग्य काष्ठादिकों के अभापहुये अग्निके जलने के अभाववत् , ग्राह्य यस्तुके अभावड्ये ग्रहणकी कल्पना से रहित हुआ सो मन अमन भापको प्राप्तहोताहै || अर्थात् “अमना शो" इत्यादि प्रमाणसे जैसा मनका अविष्ठान आत्मा अमन है तेसाही मन - गौडपादीय कारिको दृतीयप्रकरण ३॥ १७६ अकल्पकमजंज्ञानं जेयांभिन्नंप्रचक्षते । ब्रह्माजेयम नित्यमजेनाजंविबुध्यते ३३ । १३२॥ अमन होता है "ब्रह्मविद्रौवभवति" ३२ ० १११ ॥ ३३।११२॥ हे सौम्य ! जो यह मनप्रधान द्वैत असत है, तो यह समीचीन आत्मतत्व किसाकरके जानाजाताहै, जहां इस प्रकारकी शङ्का है तहां समाधान कहते हैं अकल्पकमज ज्ञानं ज्ञेयाभिन्नं प्रचक्षते। कल्पनारहित अजज्ञानस्वरूप को ज्ञेयसे अभिन्न कहते हैं । अर्थात् सम्यक् आत्मानुभावी जे ब्रह्मवेत्ताह सो सर्वकल्पनासे रहित अजन्मा अर्थात् “येनेद, सर्व विजाना- ति तं केन विजानीयात् : “यन्मनसान मनुते येनाइमनोमतं" इत्यादि श्रुतियों के प्रमाणसे, जो मन बुद्ध्यादिकों की कल्पनामें आवता नहीं अरु लो मन बुयादि 'अर्थात् तृणसे ब्रह्मपर्यन्त, सर्वका कल्पक है, अरु जो सर्वका कल्पक है सो कल्पित होती नहीं, इस परम सिद्धान्त से, सर्व कल्पनासे वर्जित है, अरु जि- सकरके सर्वकल्पनासे वर्जित है तिसही करके अजन्मा है। ऐसा जो ज्ञप्तिमात्र ज्ञानस्वरूप । आत्मा है तिसको परमार्थ से संत् ब्रह्मरूप ज्ञेय अभिन्न कहते हैं ।मुमुक्षुओंकरके अज्ञात अवस्थाम -जाननेयोग्य से अभिन्न कहते हैं अिर्थात् “अयमात्माब्रह्म" यह आत्माही ब्रह्म है, ताते “नातः परमस्ति" इस आत्मा से भिन्न 'ब्रह्म नहीं क्योंकि "तत्वमेवत्वमेवतत् तत्त्वमसि" इत्यादि श्रुतियों के महावाक्यों ने इस ज्ञानस्वरूप चैतन्य आत्मा कोही ब्रह्मकरके कहाहै,ताते सम्यक् आत्मानुभारी ब्रह्मवेत्ता इस ज्ञानरूप आत्माको उक्तप्रकार ज्ञेयरूप ब्रसे अभिन्न कहते हैं। क्योंकि, “न हि विज्ञातर्विज्ञातेर्विपरिलोपोविद्यते” “विज्ञान मानन्दं ब्रह्म “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म अग्निकी उष्णता- वत् विज्ञांती (बुद्धि) के विज्ञाताका लोपनहीं, विज्ञान आनन्द रूप ब्रह्म है, सत्य ज्ञान अनन्तब्रह्महै । इत्यादिश्रुतियों के प्रमाण . “ मांडूक्योपनिषद। निगृहीतस्य मनसो निर्विकल्पस्य धीमतः। प्रचारः स तु विज्ञेयःसुषुप्तेऽन्यो न तत्समः ३४ । ११३ ॥ से सो ज्ञान ब्रह्मरूप ज्ञेयसे अभिन्न है । अब तिस ज्ञानके विशे- पण कहते हैं। सो ज्ञान कैसाहै कि, "ब्रह्म ज्ञेयमजं नित्यमजेनाजं विबुद्ध्यते। ब्रह्मरूप ज्ञेयवाला अजन्मा नित्य है, अजन्मा से जन्मरहित को जानताहै । अर्थात् अग्नि से अभिन्न उष्णता अरु उष्णतासे अभिन्न अग्निवत् जिस ज्ञानके स्वरूपविषे स्थित ब्रह्म- रूप ज्ञेयहैं, इसप्रकारका ब्रह्मरूप ज्ञेयवालाहै । पुनः कैसाहै कि, अजन्माहै अरु नित्य है अिर्थात् जिस करके ज्ञानस्वरूप ब्रह्म है तिसहीं करके अजन्माहै अरु जिस करके अजन्मा तिसहीकरके नित्य है। तिस आत्मस्वरूप अजन्मा ज्ञान से जन्मरहित ज्ञेयको आत्मतत्व आपही सम्यक्प्रकार जानता है । अर्थात् जैसे सूर्य नित्य प्रकाशरूपहै, तैसे नित्य एकरस विज्ञानघन है ताते । अन्य ज्ञानान्तरकी अपेक्षा करता नहीं ।। इत्यर्थ ।। ३३ । ११२ ॥ ३४ । ११३॥ हे सौम्य ! [मुक्त पुरुपको जो ज्ञानका फलहै, सो स्वर्गादिवत् परोक्ष है नहीं, किन्तु प्रत्यक्ष है । एतदर्थ प्रसंग विपे प्राप्त हुये मनके निरोधरूप ज्ञानके फलकी प्रत्यक्षता के अर्थ प्रसंगको कहते हैं ] सत्यरूप आत्माके अनुबोधकरके सङ्कल्पको न करताहुआ घाय विषयों के अभावते इंधनादि रहित अग्नि- वत, मन जोहै सो शान्तता अरु निरोधता को प्राप्त होता है, इस प्रकार कहा अरु इसप्रकार मनके अमनीभाव के होनेसे द्वैतका अभावकहा अिव कहते हैं। निगृहीतस्य मनसो निर्विकल्पस्य धीमतः प्रचारः स तु विज्ञेयः सुपुतेऽन्यो न तत्समः। इनिग्रह किये सर्व कल्पना से रहित विवेकवाले मनका प्रचार सो तो जाननेयोग्य हे सुपुति विषे अन्य है, तिसके तुल्य नहीं , अर्थात् इसप्रकार तिस निग्रह किये सर्वकल्पनासे रहित (निर्विकल्प) अरु धीमान् (विवेकवाने) ऐसे मनका जो प्रचार प्रित्यगारम . गौडपादीय कारिका तृतीय प्रकरण ३ । १८१ रूपसेस्थिति सोतोकोई एकप्रकारकरके योगीपुरुषोंकरके जानने योग्य है ॥ शंका । ननु, सर्ववृत्तियों के अभावहुये मुषुप्ति विषे। स्थित मनका जैसा प्रचार है, तैसाही प्रचार निरोध अिरु निर्वि- कल्पता को प्राप्तहुये मनका भी होवेगा, क्योंकि उभय प्रकारसे वृत्तिकी निरोधता तुल्यहै ताते । अतएव तिस निरोधको प्राप्तहुये मनविषे क्या जानने योग्यहै । समाधान । सोयने नहीं, क्योंकि सुषुप्ति विषे अविद्या अरु तिसके कार्य मोहरूप अज्ञानसे ग्रस्त अरु अन्तर लीन (गुप्त) हुई अनेक अनर्थरूप फलवाली प्रवृत्ति- योंकी बीजरूपा वासनावाले उक्त प्रकारकीवासना करके युक्तां मनका प्रचार अन्यहै । अरु सतरूप आत्माके मिहावाक्यजन्यो, अनुबोधरूप अग्निसे अशेष नाशहुई है अविद्याऽऽदिक अनर्थरूप फलवाली प्रवृत्तियों की बीजरूपा वासना जिसकी, अरु शान्त हुये हैं सर्वक्लेशरूप मल जिसके, इसप्रकारके निरोधको प्राप्तहुये मनकाजोब्रह्मस्वरूप विषे स्थितिरूप स्वतन्त्र प्रचारहै सो अन्यहै अिर्थात् काम कर्म वासना अविद्या इत्यादि अनर्थ करके युक्त मनका जो सुषुप्ति विषेप्रचार(लय) है सो अविद्यालयहै,जैसे सधूम अग्नि आवरणको पाया लयहुयेवत् भासताहे तेसे । अरु महावाक्यार्थ के सम्यक् ज्ञानाग्निकरके जिसकी कामकर्म वासना अरु अविद्या, अशेष भस्महुई हैं, ऐसे मनकी जो निर्विकल्प समाधि विषे आत्मतत्व में लयता सो इिंधनादि उपाधि से रहितहुये अग्नि की अपने सामान्यनिर्विशेष रूपमें लयतावत्हे । ताते सुषुप्तिमें मनकी लयतासे यह ब्रह्मस्थितिरूपलयता अन्यही है, इस लयताको सोई जानता कि जिस योगीको निर्विकल्प समाधिप्राप्तहोएतदर्थ यह सुषुप्तिको प्राप्तहुये मनकाप्रकारतिस {आत्म स्थितिको प्राप्तहुये मनके प्रचार के तुल्य नहीं। जिस करके इस प्रकारहे, तिसही करके तिस निरोधको प्राप्तहुये मन को जाननेको वा करनेको योग्य । इत्यभिपाय:३४ । ११३॥ ३५।११४॥हे सौम्य ! पूर्व जोकहा कि मुषुप्तिको प्राप्तष्टये मांडूक्योपनिषद् । लीयतेहिसुपुप्ते तन्निग्रहीतंनलीयते । तदेवनिर्भयंत्र मज्ञानीलोकं समन्ततः ३५॥ ११४॥ मनके प्रचारका अरु निर्विकल्प। समाधिको प्राप्तहये मनके प्रचारका भेदहै, तिसविपे अब हेतु कहते है "लीयते हि सुपुप्ते तन्निग्रहीतं न लीयते। सुपुप्ति विपे सो लीन होताहै, गृहीत हुआ लीनरोतानहीं, अर्थात् जिसकरके सुपुप्तिविषे सोमनलीन होताहै, अर्थात् सर्व अविद्यादिक वृत्तियोंकी वीजरूप वासनाकरके सहित अंज्ञानमय अविशेष रूप वीज भावको पावताहे, भरु लो समाधिको पाया हुआ मन विवेक ज्ञानपूर्वक निरोधको पायासत्ता लीनहोता नहीं अर्थात् अज्ञानरूप,वीजभावको पावतानही।ताते सुयुप्तिवाले अरु समाधिपाले मनक्प्रचारका लीनताका भेदयुक्त हीहै। अरु जब समाधिको प्राप्तहुआ मन, ग्राह्य अरु ग्राहकरूप अविद्या के किये उभय मलसे रहित होताहै, तव सो मन परम अद्वैतरूप ब्रह्मभावकोहीप्राप्तहुआ होताहै। एतदर्थ तिदेवनिर्भयं ब्रह्म ज्ञानालोकं रामन्ततःसोई निर्भयहे ब्रह्मा ज्ञानालोक है सर्वओरसे है, अर्थात् जब सिम्यक् आत्मज्ञानको पायके यह सन अज्ञान रूप चीज भारसे रहित शुद्ध होताहै। तब सो मन परम अद्वैत रूप परब्रह्मही को प्राप्तहुआहै, एतदर्थ सोई भयर- हित निर्भय बल है। “विद्वान्न विभेति कदाचन" क्योंकि भयका निमित्तरूप जो द्वैत तिस द्वैत भारके ग्रहणका अभाव है ताते । नमशान्त अरु अभयहे । अव तिसही ब्रह्मको विशेषण देते हैं । सोई ब्रह्म ज्ञानालोकहे, अर्थात् आत्माकी सभावभूत चैतन्यस्वरूप ज्ञप्तिरूप ज्ञानहै आलोक कहिये प्रकाश जिसका । अर्थात् ज्ञान रूपहै प्रकाश जिसका । ऐसा जो ब्रह्म तिसको ज्ञानालोक एकरस ज्ञानघना कहते हैं, अरु सर्वओरसे है, तिाते उसको ‘समन्ततः' कहते है। अर्थात् आगत् सर्वओर से निरन्तर व्याप्त है "आकाशसर्वगतः सनित्यः" ३५J११४॥ .
। गौडपादीय कारिका तृतीय प्रकरण ३। अजमनिद्रमस्वप्नमनामकमरूपकम् । सकृतिभातंत यज्ञं नोपचार कञ्चन ३६ ॥ ११५ ॥ ३६ १९९५ ॥ हे सोन्य! [प्रसंगबिपे प्राप्तहुये अर्थ की अन्य प्रकारसे भी निरूपण करते हैं ] "अजमनिद्रमस्वंन मनामकम- रूपकम् । अज है अनिद्रा है अस्वप्न हे अनाम है .अरूप है। अर्थात् सोई नहीं । अर्थात् ब्रह्मनामक आत्मा जि जित, विपे ज्ञानद्वारा लीन हुआ मन ब्रह्मभाव को प्राप्त होताहै। जन्म के निमित्त के अभावसे "साह्याभ्यन्तरोह्यजः" वाह्य अन्तर सहित अजन्मा है । अरु जिसकरके रज्जुसर्पक्त अविद्यारूप निमित्त वाला जन्म है, इस पूकार हम कहते हैं । अर्थात् जन्म के निमित्त जे अविद्याकाम कर्मादिक तिनके अत्यन्ताभाव से ब्रहाविपेज. नर्मका हेतु न होनेसे वो वास्तव,करके सदा अजन्माही है, तिस विपे अद्वैत के बोधार्थ आरोपमात्र जन्मा (जगदुत्पत्ति) कही है, सों; जैसे भ्रान्तिरूप निमित्त से रन्जुका रार्परूपले जन्महै तैले उस अजनाका अविद्यारूप निमित्तवाला जन्महे ऐरन हम कहते हैं । अरु सो अविद्या आत्मारूप सत्य अनुवोध से निरोध को प्राप्तहुई है, एतदर्थ सो अजन्माहे । अर्थात् जैसे रन्जुको स्वस्वरूप विषपक भ्रान्तिका अत्यन्ताभान है ताते तो भ्रान्ति करके भी सर्परूप से जो केवल भ्रान्तिमात्रही है। जन्मवीन न होके सदा अर्जन्माही है, गोंकि रज्जु जो सर्द- रूप से भामती है तो भ्रान्तिकाल चिपे बुछिको भासती है स्वयंरज्जुको नहीं, तैसेही सदी ज्ञानप्रकाश स्वरूप अद्वितीय आस्मामे जन्म के निमित्त अविद्या आदिकों के अत्यन्तीभाव से उसके शुख सत्यज्ञान स्वरूप में द्वेतके अभाव से जन्म ? जगः दुत्पत्ति) अध्यारोपमान भी नहीं, ताते उसविषे जे जन्म (जगदुत्पत्ति ) अभ्यारोपमात्र कही हे सो भी अविद्याभितं पुखिने अद्वेन आत्मनल के निश्चयार्थ कही है, परन्तु, तिस १८४ मांडूक्योपनिषद् । अविद्यात्मक बुद्धिका उस आत्मदेव विषे सूर्यमें अन्धकारवत् अ- त्यन्त अभावहै, क्योंकि सो अविद्या अपने अधिष्ठान चैतन्यसत्ता के आश्रय चैतन्यवत् हुई स्वाधिष्ठान में जन्मादि (जंगदुत्पत्त्या- दि)कों की.कल्पना करती है, सो अविद्या आचार्य से.महांका- क्यार्थ का. ज्ञानोपदेश-पाय अपने अधिष्ठान आत्मारूप सत्यके अनुबोधवती हुई आप अपने सत्य चैतन्य अद्वैत आत्मारूप अ. धिष्ठान में निरोध (लय) को.प्राप्त होती है, ताते वास्तव करके आत्माधिपे उस कल्पक अविद्या के लयहुये, उस ब्रह्मनामक शुद्ध निरुपाधि निर्विशेष चैतन्य आत्माविषे कल्पना के भी निमित्त का अत्यन्ताभाव होने से अध्यारोपमात्र भी जन्म (जगत की उत्पत्त्यादि) नहीं। ताते वो नित्य अजन्मा है.अरु जिस करके सो अजन्मा है तिस करकेही अनिद्र(निद्रासे रहित) है अ. र्थात् निद्रादिक अविद्यात्मक बुद्धिको धर्म हे तिससे पृथक् जो अज'आत्मा तिसके नहीं. ताते सो अनिद्र है।। अरु जिस करके अविद्यारूप अनादि मायामय निद्रासे अद्वैतरूप आत्मतत्व विषे प्रवोध को पाया है, तिसकरके स्वप्नसे भी रहितहै अिर्थात् जा.. अत् स्वप्न सुपुप्ति आदिक जे अविद्यात्मक धुद्धिकी अवस्था तिन से रहित है । अरु जिसकरके अप्रवोधके किये जो अपने नामरूप है, सो रज्जुके ज्ञानसे सर्पवत् अपने पूवोध से नाश को प्राप्तहुये पश्चात् यह ब्रह्मनाम करके कहते नहीं अर्थात् एक अद्वैत नि. विशेष आत्मतत्त्वं विपे नामरूपादिकों की कल्पना करनेवाले के अभाव से उसविषेनामरूपादि दोनों नहीं था वो किसी भी प्रकारसे निरूपण किया जातानहीं क्यिोंकि वाणी आदिकों का अंविषय तातो ताते.सो.निर्विशेष आत्मतत्त्वं ऑकार विकार से रहित निराकार होने से नाम अरु रूप से रहित है “यतोत्राची निवर्तन्ते" जहां से वाणियां निवृत्ति होती हैं? इत्यादि श्रुतियों के प्रेमाणसे किया सकृद्विभातसर्वज्ञेनोपचारः कथञ्चन" सर्व- दाही प्रकाशरूप है सर्वज्ञहे किसी प्रकारसे भी उपचार है नहीं १८५ -- गौडपादीय कारिका तृतीय प्रकरण ३। सर्वामिलापविगतःसर्वचिन्तासमुत्थितः । सुप्र- शान्तःसकृज्ज्योतिःसमाधिरचलोभयः ३७।११६ ।। अर्थात् सो आत्मतत्व सर्वदाही प्रकाशरूप है, क्योंकि अग्रहण अन्यथा ग्रहण आविर्भाव अरुं तिरोभाव इन सर्वकाअभावहे ताते अरु । ग्रहण अरु अग्रहणरूप दिवस अरु रात्रि, अरु अविद्यारूप अन्धकार, यह तीन सदा अप्रकाशपने विषे कारण हैं, तिनका उस अद्वैत आत्मतत्व विषे अभावहै ताते । सो सर्वदा प्र. काशरूपही है । असे नित्य चैतन्य प्रकाशरुय होने से ब्रह्मका सर्वदाही प्रकाशरूप होना युक्तही है । इसही करके सर्वरूप जो ज्ञानस्वरूप सो कहिये ज्ञानस्वरूप सो कहिये सर्वज्ञ, ऐसा है [अर्थात् उस ज्ञानस्वरूपको सर्वरूप से सुशोभित होने करके उसको उक्तप्रकारका सर्वज्ञ कहते हैं । इसप्रकारके इस ब्रह्म (ब्रह्मवेत्ता) विपे किसीप्रकार से भी उपचार ( कर्तव्य ) है नहीं। जैसे अन्य अिनात्मवेत्ता को आत्म स्वरूप से इतर चित्तकी एकाग्रता आदिक कर्तव्य है, तेस ब्रह्मवेत्ता को नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभाव करके अविद्या के सम्यक् विनाशहुये कि. सी प्रकार से भी कर्तव्यताका संभव है नहीं [ यहां यह अर्थ है कि अविधादशाविही सर्व व्यवहारहै, अरु विद्यादशाविपे अविद्या को असत् होने करके कोई भी व्यवहारहै नहीं। परन्तु 'बाधिता- मुवृत्तिसे' अर्थात् बाधितहुये व्यवहारकी अनुवृत्ति से { विद्वान् विषे| व्यवहार के प्रतीति की सिद्धि है | प्रातिभासिकवत् । िितस करके उस विद्वान् के स्वरूप बिपे किञ्चितू भी क्षति नहीं ३६ । ११५॥
। - १८६ । मांडूक्योपनिषद् । के अर्थ कारण कहते हैं। सामिलाप विगतः सर्वचिन्ता समु. स्थितः सर्व अभिलापसे रहितहै, सर्वचिन्ता से सम्यक् उत्थान को पायाहै । अर्थात् भापणकरते हैं जिनकरण विशेपसे ऐसा जो सर्वप्रकारके जथनका करण वाणी, तिसको अमिलाप कहते हैं, तिस सर्वअभिलाप कथन से रहितहै "नातिवादी अर्थात्यह जो एक वागेन्द्रियको कहाहै सो उपलक्षमात्रके अर्थ है, एतदर्थ ब्रह्मरूपविद्वान् वागेन्द्रिय उपलक्षणकरके सर्व वाह्यकरणोंसेरहित है, यह इसकाअर्थ है। तैसेही जिसकरके चिन्तन करते हैं ऐसी जो बुद्धि तिसको चिन्ताकहते हैं, तिससर्व चिन्तासे सम्यकप्रकार उत्थानको पायाहै, अर्थात् बुद्धिउपलक्षण करके बुद्धि आदि सर्व अन्तःकरणों से रहितहै,क्योंकि "अप्राणोह्यमनाशुभ्रो रक्षरात्प- रत.परः" अप्रमाणहै अमन है, अरु शुभ्रकहिये शुद्धहै, अरुकार्य से पररूपअक्षर (कारण)तिससे परहै इस श्रुतिके प्रमाणकरके सर्वकरण अरु तिनके विपयादि इनसे रहितहै। असुप्रशान्तः सज्ज्योति समाधिरचलोऽभयः । निरन्तरशान्तहै, सर्वदाही प्रकाशरूपहै समाधिरूपहै अचलहै.अभयहै । अर्थात् जिसकरके वाह्यान्तरके करणादिकों से रहित है, इसहीकरके निरन्तरशान्तहै अरु आत्मचैतन्य स्वरूपसे सर्वदाही प्रकाशरूपहै, अरु समाधि रूप निमित्तवाली बुद्धिसे जाननेयोग्यहोनेसेसमाधिरूप है अर्थात् “दृश्यतेलग्रयाबुद्धया सूक्ष्मयासक्ष्मदर्शिभिः " "प्रज्ञानेनेनमाप्नु- यात्" इत्यादि श्रुतियों के प्रमाण से समाधिरूप, निमित्तवाली बु. द्धिका विषयहोने योग्य है,तातेसमाधिरूपहै, वा समाधानं क्रियते चित्तंयस्मिन् स समाधिः" 'जिस विप समाधानकरते हैं चित्तको सो कहिये समाधि,तातेभी आत्म चेतन्य प्रकाशको समाधिकहते हैं, ताते वो समाधि है, या इस परमात्मा विपे जीव वा तितकी उपाधि स्थापित करते हैं, या यह परमात्मा समाधि है अरू अचल ( सर्वकियासे रहित) है अरु जिस करके क्रिया का उस विपे अभार तिमही करके अभयहे ३७१ ११६ ॥ ।
गौडपादीय कॉरिका तृतीय प्रकरण ३॥ ग्रहो न तंत्र नोत्संगश्चिन्ता यत्र न विद्यते आत्मसं. स्थन्तदाज्ञानीजाति समतांगतम् ३८ ११७॥ ला३६११७॥ हे सौम्यगाप्रसंगवि प्रीतहुये अधिकारी ब्रह्म. विषे विधिनिषेधके आधीन लोमिकरूप अरुवेदिकरूप ग्रहण अरु त्याग व्यवहार है नहीं इस प्रकार कहते हैं। जिस करके ब्रह्म की समाधि अचल अरु अभय है इस प्रकार कहां है, एतदर्थ ग्रहो नतंत्र नोत्तर्गश्चिन्ता यत्र न वियते तिसविष ग्रहण नहीं त्याग नहीं, अरुं जिसविचिन्ता विद्यमान नहीं, अर्थात् तिप्तवझबिपे ग्रहण नहीं वा त्याग नहीं। अर्थात् जहाँ विकार वा विकारका विषयपना होता है, तहांग्रहण अरु त्याग होताहे। ताते अन्य विकार हेतुके अभावले अरु निरवयवहोने से इस प्रविप ग्रहण अरु त्याग दोनों.संभवेंनहीं याते तिस विप ग्रहण अरु: स्याग यह है भी नहीं अरुतिलें ब्रह्मविपे चिन्ता नहीं । अर्थात् जहां सर्वप्रकार मोक्षपर्यन्तों की भी चिन्तानहीं संभवेहै, अरु अमनीभाव है, तहाँ ग्रहण अरुं त्याग कहाँहोंगे किन्तु कदापि नहगि, इत्यर्थः। अरु जवही आत्मरुप सत्यका अनुबोध हुआ तत्रही विषयक अभावसे अग्निकी उप्णतावत् आिरमसंस्थन्त दाज्ञानमजाति समतां गतम्। आत्माविषही स्थितहुआजन्म से रहित समताको प्रातहुआ ज्ञान होता है । अर्थात् आत्माके सम्यक् बोधहुये विषयों के अभावसे अग्निविपे उष्णतावत् आ- स्माविही स्थितहा, अरु जन्म रहित. परमसमताको प्राप्त हुआ ज्ञानहोताहै "अतोश्याम्यकार्पण्यमजातिसमतां गतमि -तियाते जन्मरहित अरु समताको प्राप्तहुये अपणभावकों कहताहाँ इसप्रकार जो इस तृतीयप्रारणकी आदि के दुसरे इलोक में पूर्व प्रतिज्ञाकिया, सो यह युक्ति से अरु शास्त्र से कहा, सो यहाँ अजाति समतां गतम्गजन्मरहित समताको प्रा. सहुआ होताहे। इसप्रकार कहके समाप्तकिया। अरु इस आत्म १८८ मांडूक्योपनिषद् । : : अस्पर्शयोगोथै नाम दुर्दशःसर्वयोगिभिः । योगि नोविभ्यतिह्यस्मादभयेभयदर्शिनः ३६ ! ११८॥ -.' रूप सत्यके अनुवोधसे जन्य ज्ञान कृपणताको, विषयकरनेवाला है, क्योंकि “यो वा एतदक्षरं गार्यविदित्वा ऽस्माल्लोकात प्रैति स कृपण, इति" हे गार्गी! जो इस अक्षरको न जानके इस म- नुष्य शरीररूप लोकसे मरणको प्राप्तहोताहै सो कृपणहै ? इस प्रकार वृहदारण्यक उपनिषदके,पञ्चमाध्याय के अष्टम ब्राह्मण विपे याज्ञवल्क्यमहाराजने गार्गीप्रति कहाहै, इस श्रुतिके प्रमाण से इस तत्वज्ञानको पायके सर्वजन कृतकृत्य ब्राह्मण होते हैं। इत्यभिप्रायः ॥ “ यो वा एतदक्षरं गार्गि विदित्ला अस्माल्लोकात् प्रेति स ब्राह्मणः" इत्यादि श्रुतिः ३८1११७॥ ३६ । ११८॥ हे सौम्य ! यद्यपि [ परमार्थरूप ब्रह्मस्वरूप से स्थितिरूप फलवाला जव अद्वैतका ज्ञानहै, तब तिसका सर्वपु- रुप आदर क्योंनहीं करते, जहां ऐसीशंकाहै, तहां कहते हैं ] यह परमार्थरूपतत्त्व प्रत्यगात्मारूप कूटस्थ .सचिनानन्दस्वरूप ब्रह्म इसप्रकार पूर्वोक्तरीत्या तत्त्वज्ञानसे प्राप्तहोताहै तथापि (तिसकी अप्राप्सिसे संतोप को प्राप्तहुये जे मूढ़पुस्प सो तिसविपे निष्ठा- वान होतेनहीं इसप्रकार कहते हैं । अस्पर्श योगो वै नाम दुर्दशः सर्वयोगिभिः। अस्पर्शयोग नामवाला प्रसिद्ध स्मरण करते हैं, अरु योगियों से दुःखसे दर्शनकरने योग्य , सर्ववर्णाश्रमादि धर्म अरु पापाटिसल से सम्बन्धरूप स्पर्श से रहित ताते,अरु जीवको ब्रह्मभावविपे योजनाकरताहै, यह अद्वेता अनुभवरूप अस्पर्श योग उपनिषदाचिपे स्मरण करते हैं । अर्थात् उक्त योग उपनिषदोके वाक्य प्रमाण से निश्चित करते हैं। सो वेदान्तशास्त्र 1 उपनिषद् ब्रह्मसूत्रादि । के विज्ञानसे रहित बहिर्मुपजे कर्म निधरुप सर्वकर्मयोगी कासकोतिनोंकरके श्रवण मननादि रूप दान से देखने के योग्यहे । अर्थात कर्मासरत कर्मी पुरूंपोंकरके है गौडपादीय कारिका तूंतीय प्रकरण ३। मनसोनिग्रहायत्तमभयंसर्वयोगिनाम् । दुःखक्षयःप्र बोधश्चाऽप्यक्षयाशान्तिरेवच ४०।११९॥ वदान्तशास्त्र ब्रह्मविद्या के श्रवण मननादि साधनों के दर्शन भी अति दुःसाध्य हैं। क्योंकि “न कर्मिमणो प्रवेदयन्ति रागात् " इत्यादि श्रुतिप्रमाणसे उस कर्मनिष्टको कमोंके फलके निमित्त कर्ममें रागअधिक है ताते । अर्थात् आत्मरूप सत्यके अनुवोधरूप वस्तुकीप्राति सो श्रमसे होनेको योग्यहै । अरुण योगिनो विभ्य: ति ह्यस्मादभये भयदर्शिनः । भयरहित विषे भयको देखने के स्वभाववाले कर्मयोगी । भयको करते हैं । अर्थात् जिस करके भयरहित इस आिमरूप सत्यके अनुवोधरूपयोगविपे,भयका निमित्त जो अपना नाश तिसको देखनेके स्वभावधाले । अर्थात् अविनाशी अभयरूप अपनेआप आत्माविषनाशरूपभयके देखने के स्वभाववाले जे अविवेकी किर्मयोगी हैं सो अपने नाशरूप योगको मानतेहुये, सर्व भयसे रहितभी इस आित्मानुबोधरूप । योगसे, भयको करते हैं। ताते सो आित्मानुवोधरूप योग। सर्व योगियों करके दुःख सेही देखने (प्राप्तहोने) को योग्यहै, इसप्रकार इस उलोक के पूर्वार्द्धसे सम्बन्ध है ३६ ॥ ११ ॥ ४०१ ११६ हे सौम्य! उक्तप्रकार उत्तमबुद्धिवाले अधिकारी पुरुषों के अर्थ, अद्वैतमान अरु अद्वैत ज्ञानकाफलरूप मनके नि- रोधको कहके, अब मन्दबुद्धिवाले अधिकारी पुरुषोंके अर्थ मनके निरोध के आधीन आत्मज्ञान के कहने का आरंभ करते हैं ] पुनः जिनको ब्रह्मस्वरूप से भिन्न मन अरु इन्द्रियादिको आत्मा विषे रज्जविष सादिवत् कल्पितहीहै, परमार्थ से नहीं इसप्रकारका अनुबोध हुआ है। तिन ब्रह्मस्वरूप पुरुषों को अभय (तत्त्वज्ञान) अरु मोक्षनामक अक्षय शान्ति स्वभावसेही सिद्धहै, अन्यसाध- नोंके आधीन नहीं, क्योंकि, सकृदिभातसर्वशं नोपचार कथश्च न" किसी प्रकारसेभी उपचार कहिये कर्तव्य सोहेनहीं यह पूर्व -- मांडूक्योपनिपद् ।। १४. उत्सेकउदधेर्यहत्कुशाग्रेणेकविन्दुना । मनसोनिन- हस्तहद्भवेदपरिखेदतः ४१।१२०॥ 13 इसही प्रकरणके ३६ वें श्लोक विषे कहाहे ताते, इसप्रकार हम कहते हैं । अरु जो इन उत्तमाधिकारियों से अन्य सन्मार्गगामी मन्द अरु मध्यम दृष्टिवाले योगी (कर्मयोगी अरु उपसनयोगी) आत्मा से भिन्न मन अरु अन्य इन्द्रियादिक तिनको आत्माका स- प्रबन्धी देखते हैं तिनको मिनसो निग्रहायतमभयं सर्वयोगिनामो सर्व योगियोंको मनकोनिग्रह के आधीन अभयहै, अर्थात् जोमने अरु इन्द्रियोंको आत्माके सम्बन्धी देखते हैं तिन आत्मरूप सत्य के अनुबोधसे रहित, सर्व योगियों को मनके निग्रह के आधीन अभय (तत्त्वज्ञान) है । अर्थात् मनका संकल्पादिकों से अरु इन्द्रि- थोंका विपयोंसे यावनिग्रह होतानहींतारत यथार्थतत्व (आरम) ज्ञान होता नहीं इसप्रकार योगीजन मानते हैं। अथवा जिसकर- के अविवेकी पुरुषों को आत्मा के सम्बन्धी मनको चंचल होनेसे दुःखका क्षय होतानहीं, एतदर्थ उनको दुःख काक्षयमनके निग्रह के आधीन है अर्थात जो अविवेकी मनको आत्माका सम्बन्धी मानतेहैं तिनके मतमें आत्माको जो दुःखहै सोतिसके सम्बन्धी मनके चञ्चल होनेसेहे तोते आत्माके दुःखका क्षय मन के निग्रह . होनेके आधीनहे जय मनका निहाय तवही दुन्यका क्षयहोरे तिसविना नहीं। ताते दुश्वक्षयःप्रवोधश्चाऽप्यक्षया शान्तिध च। दुःख का क्षय आत्माका प्रबोध अरु अदाय शान्ति भी मिनके निग्रहसेही अर्थात् जो योगी पुरुप मनको आत्माका सम्बन्धी मानते हैं तिनके मतमेंदुःखकाक्षय अरु आत्मज्ञान अरु पराशान्ति मोक्ष यह मनके निग्रह के आधीनहीं है ४०१११६ ४१।१२० ॥ हे सोम्य![मोक्षकी इच्छावाले मुमुक्षुपुयाँ को मनका निरोध कैसे सिद्ध होरेगा, यह शङ्का करक कहतह ] त्मेि के उदधैर्यद्वत् कुशाग्रेगोकविन्दुना जैसे कुश के अग्र से गौडपादीयाकारिका तृतीय प्रकरण ३। उपायेन निग्रहीयाद्विक्षिप्तं कामभोगयो। सुप्रसन्न लयेचैव यथाकामो लयस्तथा ४२॥ २१ ॥ एक बिन्दुकरके समुद्रका उत्सेक हुआ है, अर्थात् जैसे अतिसू धम कुशाके अग्र करके वाह्यफेके हुये एक बिन्दु करके समुद्र का उत्सेक वाह्यफेंकनेका निश्चय टिटिभ नामक पक्षी को हुआ हैं। मनसो निग्रहस्तद्भवेदपरिग्वेदतः । तैसे अखेद से म- नका निग्रह भी होताहै। तैसे निश्चयवाले अरु उद्वेग रहित अन्तःकरणवाले जो हैं तिन पुरुपों को अनिर्वेदरूप अखेदसे खेद रहित । मनका निग्रह भी होताहै : अभ्यासेनतुकौन्तेय बैराग्ये णचगृह्यते.” ४१।१२०) । ११.४२ १ १२०॥ हे सौम्य! [समाधि करनेवाले पुरुषोंको तत्वके साक्षात्कार होनेके प्रतिवन्धक (विना लय, विक्षेप, रसास्वाद (सुरुचि) अरु कषाय (राग) है, तिन मे आगे कहने के उपाय करके मनका निग्रह करना, क्योंकि अन्यथा समाधिकी सफलता का असंभव है ताते, इस प्रकार कहतेहैं [प्रउन क्या खेदरहित निश्चयमात्रही मनका निग्रह होने विपे उपाय है। उ०। तहां 'नहीं, इस प्रकार कहते हैं। उपायेन तिम्हीयाद्विक्षितकाममो. गयोः। उपायसे,कामभोग विषे निक्षेपको प्राप्तहुये को निरोध करे अर्थात् खेदसे रहित निश्चयवान् हुआ अग्रिम कहनेके उ- पायसे कामभोग अरु विषयोंविषे प्रिक्षेपवान् हुये मनको आत्मा बिषेही निरोधकरे । अर्थात मन सहित सर्व उत्तम स्वर्गादिकों के अरू मध्यम इसलोकके यावत् दृश्य अरु अबश्य विपयादि भोगे है सो,एक सर्वाधिष्ठान आत्माविषे अध्यस्तहँ तातेस्वाधिष्ठान से उनकी इतरसत्ता के अभावले वो असत् है अरु उन सर्वका अधि- धान,आत्मा सत्य है, ताते जहां जहां जिन जिस विषे मनजाये, तहां तहां तिसको असत्य कल्पितजान तिनका आश्रया सत्यरूपं आनन्दधन आत्माका,निश्चयकर तहांहीं मनको स्थिर अरु , १६२ मांडूक्योपनिषद् । दुःखसर्वमनुस्मृत्य कामभोगान्निवर्तयेत् । अस. मनुस्मृत्यजातनैवतु पश्यति ४३ । १२२॥ सुप्रसन्नलये चैव यथा कोमोलयस्तथालय विषे प्रसन्नहुये को जैसा काम तैसा लय भी है, अर्थात्, किंवा जिस विषे मन लीनहोताहै, ऐसी जो सुपुति तिसको लय कहतेहैं, तिस लय वि- पे प्रसन्नहुये । अर्थात् खेद रहित हुये । भी मनको निरोध करे अिर्थात् प्राणादिकोंका निग्रहकरके समाधिमें स्थितहुआपुरुपअप- ने मनकोसपुप्ति,निद्रा,विपेन जानेदे क्योंकि निर्विकल्प चिन्मात्र स्थितिमें अविद्यारूप जड़ सुप्ति विघ्नकारी है ताते शङ्खा ॥ ननु जब मन प्रसन्न हुआ तव किसवास्ते तिसका निरोधकरिये । जहा इसप्रकारकी शहाहै, तहाँ समाधान कहतेहैं ।' सुप्रसन्नलयेचैव यथाकामो लयस्तथा लयधिपे प्रसन्नहुये को भी निरोधकरे। जैसाकाम है तैसाही लयभीहे अर्थात् सुषुप्ति में लयहुआ मन प्रसन्नहोताहै परन्तु सुपुप्ति अनिद्यरूप होनेसे तिस विपे लयहुआ मन पुनः जाग्रत् स्वमरूप विक्षेप दुःखकोही पावता है, ताते जैसा काम मनको अनर्थका हेतुहै, तेसाही सुषुप्तिविलयका होना भी अनर्थकारी है, अतएव कामको विषय करनेवाले मन के नियहयत्, । अर्थात् जेसे काम अरु विपयादिकों से मनका निग्रह करते हैं। निद्रारूप लयले भी मनका निरोध करनायोग्य है । अर्थात् लय । सुपुप्तिमें मनकालय (निद्रा)का होना, अरु विक्षेप, अफुरहुये मनमें संकल्पोंका फरना, अरु रसास्वाद, समा- धिसुखमें रागका होना, अरु क्पाय कर्मणी बुद्धिआदिक अन्तः- करणके दोष गोडपादीय कारिका तृतीय प्रकरण ३ । १६३ औत्माके श्रवण मननरूप ज्ञानका अभ्यास अरु समस्त नाम रूप क्रियात्मक जगत से वैराग्य । इनदोनों उपायों करके 'लय' अरु विक्षेप से निवर्त (निरोध) किया जो मन सोजव रागसे प्र. तिवन्धको प्राप्तहोने, तब श्रवण मनन अरु निदिध्यासन के अ. भ्यास से जन्य संप्रज्ञात (सविकल्प) समाधिपर्यन्त अभ्यास से तिस रागरूप प्रतिबन्ध से निवर्त करने को योग्य है । अर्थात् आत्मा के श्रवणादिकों के अभ्यासरूप उपाय करके इस मन को रागरूप प्रतिवन्ध से निवर्त करना योग्य है।] प्रश्न ।। तिस मनके ।। कि जिसका स्थित अचलहोना योगीजन इ. च्छतेहैं। निग्रह करने का उपाय कौन है, तहां ज्ञानाभ्यास अरु वैराग्य: उपाय- है, इस प्रकार उक्त प्रश्न का उत्तर कहतेहैं दुख सर्वमनुस्मृत्य कामभोगान्निवर्तयेत् -सर्व दुःखरूपही है इस प्रकार स्मरण करके कामके भोगको निवारणकरे, अर्थात् अवि- द्यारचित्त समस्त द्वैतसर्व दुःखरूपहीहै, इसप्रकार राज्येष्ठ श्रेष्ठों से वा शास्त्रसे स्मरणकर सर्वदा स्मृतिमें रखीके कामके भोग(रूपा- दिविषय) से प्रसरित हुये मनको । अर्थात् जो कामनाके वशहुआ मृगजलवत् इसलोक परलोकादिकों के उत्तम मध्यम विपयभोग तिनविषे आसक्त प्रसरितहुआ क्षणमात्रको भी विश्राम पावता नहीं, ऐसाजोविक्षेपवान् चञ्चलमन तिसको विराग्यकी भावना से निवारणकरे। अर्थात यावतु उत्तम मध्यम विषयभोग हैं, तिन विषे यद्यपि सुखभी प्रतीतहोना है, तथापि विषयुक्त अति सुन्दर स्वादिष्ट पाकवत् साधन परतन्त्रत अरु क्षीणत्व यहदो अनिवा. यदोपतिनकरके युक्त विषय दुःखरूपहीहं इसप्रकार सम्यक्जान के अनुभलकरके, अरु श्विोभावामर्त्यस्य यदन्तकैतत् सन्द्रिया- णारयन्ति- तेजः । इत्यादि श्रुतिवाक्यों से स्मरणकर उक्त प्रकार सर्वत्रसम्यकदोपदृष्टिरूपराग्यकीभावनाते निवारणकरे। अभिनं सर्वमनस्मृत्य जातं नैव तु पश्यति । अजन्मासर्व है ऐसा मरण करके उत्पन्न हुआ कुछभी तो जानता नहीं । अर्थात् १६४ मांडूक्योपनिषद् । लयेसम्बोधयेच्चित्तंविक्षिप्तंशमयेत्पुनः । सकषायंवि- जानीयात्समप्राप्तंनचालयेत् ४४।१२३ ।। अजन्मा ब्रह्मरूप सर्वहै, इसप्रकार श्रुति अरु आचार्यके उपदेशसे स्मरणकरके पश्चात् तिस ज्ञानाभ्यासके हदहोनेसे तिससर्वात्म भावसे विपरीत द्वैतके समूह को तितके अभाव से देखताही नहीं ४३ । १२२॥ ' ४४१२३॥ हे सौम्य लिये सम्बोधयेचित्तं विक्षिप्तशमयेत्पु- नः लयविषे चित्तको प्रबुद्धकरे विक्षेपके प्राप्तहुयेको शान्तकरे, अर्थात् उक्तप्रकारके इन ज्ञानके अभ्यास अरु वैराग्य रूप उभय उपायोंकरके लय (सुपुत्ति) विपे लीनहुये चित्तको जगावे। अर्थात् आत्माके अनुभव ज्ञान विपे लगावे। अर्थात् समाधिकाल में जय चित्त सुषुप्तिमें प्राप्तहोनेलगे तव लयहोने से पूर्व उस निर्विकल्प अवस्था विपे कि जहां मन अरु प्राण के अवरोध से विशेप वृत्ति आदिकों का अभाव असें सामान्य आत्मानुभवाकार वृत्ति का भाव है तिनभावाभाव' का प्रकाशक साक्षीआत्मा अज्ञात सु. पुस्तिसे पृथक् सिद्धहै कि जिसकरके अज्ञान सुपुप्ति सिद्धहोती है सो अनुभवतत्व लयादिकोंका साक्षी नित्य जाग्रत् (वोध )स्व- भाव है तिस अधिष्टानविपेचित्तको जोड़े। पुनः कामों के भोगों (विषयों) विप विक्षेपको प्राप्तहुये चित्तको शान्तकरे । इसप्रकार चारस्वार विचार अभ्यासकरनेवाले योगीका चित्त लयसेजगाया गया, अरु विषयोंसे निवृत्त कियागया,अरु समभावको प्राप्तहुआ नहीं, किन्तु मध्य अवस्थावालाहै, तब सो उस अवस्थामें कपाय दोपवालाहै । सकपायविजानीयात् समप्राप्तनचालयेत् कपाय सहितकोजाननासमप्राप्तको चलावेनहीं, अर्थात् लयतासेजागा अरु समता को प्राप्तहुआ नहीं ऐसेजो समाधिको मध्यमावस्था को प्राप्तहुआ चित्त सो कपायदोप सहित होताहे तब तिमकपाय रागके (वीज)सहितको जानना अरुतिस कपायसेभी सविकल्प गौडपादीय कारिका तृतीय प्रकरण ३ । १६५ नास्वादयेत् सुखं तत्र निःसंगप्रज्ञया भवेत् । निश्चलं निश्चरत् चित्तं एकीकुर्यात् प्रयत्नतः ४५। १२४ ॥ समाधिरूप प्रयत्नसे निर्विकल्प समाधिरूप समभाव को प्राप्तकरे है, परन्तु जब चित्त सर्व विशेष वृत्तियों को त्यागके केवल सम. भाव की प्राप्ति के सम्मुख होय तव तिस सम प्राप्तिवाले चित्त को चलावे 'स्फुरणा के सम्मुख करे नहीं ४४ । १२३ ॥ ४५३१२४॥ हे सौम्य ![समाधि करनेकी इच्छाविपे जो सुख उपजताहे तिससुखको विषय करनेवाली इच्छासे भी मनको रो- कना योग्यहै इसप्रकार कहते हैं] समाधि करनेकी इच्छावाले योगीको निास्वादयेत् सुखं तत्र निःसंगप्रजया भवेत्। सुख को स्वादन करे नहीं तहां प्रज्ञाकरके निःसंगहोय, अर्थात् निर्विक- ल्प । समाधि को प्राप्त होनेकी इच्छावाले योगीको । निर्विकल्प समाधि से पूर्व सविकल्प समाधि विपे चित्तको विषयोंसे उपराम अरु प्रत्यक् आत्मा के सम्मुख होनेसे जो सुख होताहे तिसको सोयोगी आस्वादन करे नहीं अिर्थात् सविकल्प समाधिके अन्त अरु निर्विकल्प समाधिके पूर्व में जो सुखहै तिसके आस्वादनको रसास्वाद कहते हैंतिस विप आसक्त होनही क्योंकि तिस स- माधि विपेजो सुख प्रतीत होताहै सो अविद्याकरके कल्पित वि- शेपके अभाव अरु अन्तर मुखता करके जन्य । मिथ्याहै क्यिोंकि वो सत्य आत्मानन्द सुखनहीं ताते। ऐसी विवेकवती युद्धिकरके निःसंग अर्थात् उक्त अविद्यात्मक सुखसे निस्पृहां हो अर्था- तु उस सुखकी स्पृहासे रहित असंगहुआ परमानन्दमय आत्मा की भावनाकरे, अर्थात् तिस समाधि सुखके रागसे भी चित्तको निरोधकर अराग आत्माकार होवे । अरु निश्चलं निश्चरत् चित्तं एकीकुर्यात् प्रयत्नतः निश्चल बाहर जानेवाले चित्तको प्रयत्नसे एकाकारकरना अर्थात् जब सुसके रागसे निवृत्तहोके निश्चल स्वभाववाला हुआ चित्त पुनः वाह्य जानेवाला होने मांडूक्योपनिषद् । यदा न लीयतेचित्तं नचविक्षिप्यते पुनः । अनिंगन मनाभासं निष्पन्नं ब्रह्म तत्तदा ४६।१२५॥ [ अर्थात् रसास्वादसे निवृत्त निश्चल हुआ चित्तभी जो कदापि पूर्वाभ्यासके संस्कारवश चाह्य विपयों के सम्मुख वा तिस अव- स्थाविपे दर्शितहुई जो सिद्धि तिसमें रागवान हुआ तिनके स- रमुख हो । तर तिस निश्चल हुये परभी पूर्व संस्कारों के वश वास जानेवाले चित्त को भी, तिन तिन विषयों से उक्त ज्ञाना- भ्यासादिक उपायों से रोंकके पुनः सविकल्प समाधिरूप प्रयत्न करके आत्माधिपेही एकरूप करना । अर्थात् निर्विकल्प समाधि करके युक्त चैतन्यस्वरूप सत्ता समान मात्रही सम्पादन करना । ( अर्थात् समाधि से उत्थान (पिपय सम्मुम) हुये चिराको पुनः सविकल्प समाधिरूप प्रयतसे अन्तर आत्माके सम्मुखकर अचे. त्य चिन्मात्र सत्ता समान स्वरूपचिपे अभेदतासे एकाकार स्थि. त करना१५।१२४॥
गौडपादीय कारिका तृयीय प्रकरण ३ । १६७ स्वस्थ शान्ति सनिर्वाणं अकोयं सुखमुत्तमम् । अज- मजेन ज्ञेयेन सर्वज्ञं परिचक्षते ४७।१२६ ॥ सम्पन्न होताहै, अर्थात् जब उक्तप्रकार अचल अरु अनाभास होताहै तवसोचिचब्रह्म स्वरूपकरके सम्पन्न होताहे ४६।१२५ ५७१२६ हे सौम्य! असंप्रज्ञात (निर्विकल्प) समाधि विपे जिसरूपकरके चित्त सम्पन्न होताहै तिस ब्रह्मस्वरूप को विशेषण देते हैं। स्वस्थं शान्तं सनिर्वाणं अकथ्यं सुखमुत्तमम् ॥ उत्तम सुखको स्वस्वरूप विषेस्थित शान्त निर्वाण अरु अकथ कहते हैं, अर्थात् उक्त प्रकारके योगीके प्रत्यक्ष परमार्थरूप सर्वोत्तमब्रह्म सुख को ब्रह्मवेत्ता'आत्मरूप सत्यका अनुवोधरूप स्वस्वरूपविये स्थित अरु सर्व अनर्थोकी (कामनाकी) निवृत्तिरूप शान्त, अरु निर्वाण मिोक्षकरके सहित वर्तमान, अरु असाधारण विपयवाला होने से कहने को अशक्य अर्थात् नेत्र में लगाया जननेत्र के अति समीप नेत्रान्तर होनेसे वो नेत्रका विषय नहीं, तैसेही वागादिक सर्व इन्द्रियों का अन्तरात्मा अत्यन्त निकट होनेसे वागादिकों का अविषय है। अरु " अजमजेन ज्ञेयेन सर्वज्ञ परिचक्षते । जन्मसेरहित अनुत्पन्नहुये शेयसे सर्वज्ञ ब्रमही कहते हैं, अर्थात जैसे स्त्रीसंगादि सुख विपयजन्य है। तैसे सर्वोत्तम ब्रह्मानन्द सुख विषयजन्य न होने से अरु केवल परमशान्त निर्माण रूप होनेसे वाणी आदिकों का विषय नहीं किन्तु जन्म से रहित अनुत्पन्न हुये ज्ञेय से अिर्थात् 'अज्ञान पर्यन्त जानने योग्य अरु चास्तबसे ज्ञानस्वरूप निर्विकल्प समाधि करके प्राप्त लो निर्षि- 'शेप ज्ञतिमात्र सत्तासमान आत्मतत्व सो अव्यक्तादिवतु जन्म- वान् न होनेसे जन्मरहित अजहै अरु (आकाशादिक जो ज्ञेय हे सो उत्पन्नहुये यह, अरु आत्मतत्व जो यह सो'मज्ञान पर्यन्त क्षेय हे वास्तवकरके अनुत्पन्न शेयहे । तिस जन्मरहित अनुत्पन्न हुये क्षेयसे अभिन्नहुआ अपने सर्वज्ञरूप से सर्व ब्रह्मही कहते हैं , १६८ मांडूक्योपनिषद् । न कश्चिज्जायते जीवः सम्भवोऽस्य न विद्यतें। एतत्तदुत्तमं सत्यं यत्र किञ्चिन्न जायते ४८।१२७॥ इति अद्वैताख्यं तृतीयं प्रकरणं समाप्तम् ॥ अिर्थात् निर्विकल्प समाधिकरके ब्रह्मको प्राप्तहुआ योगी "ब्रह्म विद्रौवभवति" इत्यादिप्रमाणसे ब्रह्मही होताहै ४७१,१२६ ॥ ४८, १२७॥हे सौम्य ![ उक्त उपायोंको परमार्थसे सत्य- ताके हुये अद्वैत की हानिहोवेगी, अरु अन्यथा उन उपायों का प्रमाज्ञान न होवेगा, यह शङ्काकरके तब कहतेहैं] मनके निग्रहा- दिक उपाय, अरु मृत्तिका सुवर्णआदिकोंवत् सृष्टि अरु उपासना, यह सर्वही परमार्थ स्वरूप की प्राप्तिके उपाय होने करके पर- मार्थरूप । कहे हैं, परन्तु वास्तवसे सत्य हैं नहीं, क्योंकि " न कहिचज्जायते जीवः संभवोऽस्य न विद्यते ।कोई भी जीव उत्पन्न होता नहीं, इसका कारण है नहीं, अर्थात्, मनके निग्रह आदिक जे उपाय (साधन कहे हैं सो परमार्थ से सत्य नहीं, क्योंकि परमार्थसे सत्यतो कोई भी करता भोक्तारूपजीव किसी भी प्रकारसे उत्पन्न होतानहीं। एतदर्थ स्वभावसे अजन्मारूप इस एकही आत्मा का कारण है नहीं। अरु जिस करके कारण नहीं तिसही करके कोई भी जीव उपजता नहीं। यह इसका अर्थ है । अरु एतत्तदुत्तमं सत्यं यत्रकिञ्चिन्न जायते। तिनके मध्य यह उत्चम सत्य है जहां (जिसविपे) कुछ भी उपजतानहीं , अर्थात् पर्वके यन्थविपे उपायपने करके कथन किये जो तिन व्यावहा- रिक सत्यरूप साधनों के मध्य यह उत्तम सत्यहे जिस सत्यरूप ब्रह्माधिपे कुछ (अणुमात्र) भी उत्पन्न होतानहीं १८११२७ ।। इतिश्रीगौडपादाचार्यरुतमांडूक्योपनिषद्कारिकायां -अद्वैतारयतृतीयपकरणभापाभाप्यं समाप्तम् ॥ हरिः ॐतत्सद्ब्रह्म - गौडपादीयकारिका चतुर्थ प्रकरण ४ । १६४ अथ गौडपादीयकारिकायां अलातशान्ताख्य. चतुर्थप्रकरणं प्रारभ्यते॥ ज्ञानेनाका कल्पेन धान् योगगनोपमान् । ज्ञेया भिन्नेनं सम्बुदस्तंवन्दे दिपदांवरम् ।। १२८ अथ गौडपादीयकारिकायां अलातशान्ताख्य, चतुर्थप्रकरणभाषाभाष्यं प्रारभ्यते । १११२८ हेसौम्योपूर्वके अरु पिछलेप्रकरणकेसम्बन्धकी सिद्धि के अर्थ पूर्वोक्त तीनप्रकरणों विषे उक्तार्थ को क्रमसे कथन करतेहें] ॐकारके निर्णयरूप द्वारकरके आगम नामक प्रथम प्रकरण से प्रतिज्ञा किये । अरु द्वितीय वैतथ्याख्य प्रकरण विपे वाह्य विषयों के भेद को मिथ्यापने से सिद्धहुये अरु पुनः अद्वैताख्य तृतीय पू- 'करणविषे शास्त्र अरु युक्तियों करके साक्षात् निर्धारकिये अद्वैत कातिदुत्तमं सत्यमिति । यह उत्तम सत्य है । यह इस तृतीय प्रकरणके अन्तके श्लोक विष । पूर्व प्रकरण की प्रतिज्ञा समाप्त किया। अरु तिस इस श्रुतिके अर्थरूप जोअद्वेत सिद्धांत तिसके विरोधी (प्रतिपक्षी) हुये जे भेद (द्वैत) वादी 'अरु वैनाशिक (निरात्मवादी) हैं तिनका परस्पर में विरोध होनेसे उनका राि- द्धान्त रागद्वेषादि क्लेशोंका आश्रय है अर्थात् सर्वभेद वादियों के सिद्धांतरूप वृक्ष रागद्वेषादि क्लेशरूप पक्षियों के विश्रामकाआश्रय हैं। अरु अद्वैतवादियों का जो सिद्धान्त है सो रागद्वेपादि क्लेशों का अनाश्रय हेअिर्थात् रागद्वेयादि क्लेशोंका आश्रय नहीं, क्योंकि रागदेवादि क्लेशपरस्परके भेदकोआश्रयकरके रहते हैं,अरु परस्पर काभेदद्वैनके आश्रयहे,अरुसोसर्वअनोंका आश्रय जोतिभाव सो अद्वैत सिडांतमें नाममानभीनहीं तातेतिनके आश्रितजेराग देपादि अनर्थ क्लेश सो कैसे होगा, किन्तु कदापि नहीं। या अद्वेत २००० ;, मांडूक्योपनिषद् ।। सिद्धान्तसे सर्वमात्मैवाभूत" जिनको सात्म दृष्टिहोनेसे उस को भेदके अभावसे रागद्देषादि क्लेशआश्रय करतेनहीं,अनिाति- बादी। वो अतिवादी होते नहींअर्थात् निंदास्तुति करतेनहीं। अरु भेदवादियों को परस्पर में रागद्वेषादि क्लेशोंका आश्रयपना, वैष्णव मतवादी अरु शैवमतवादियों में इस सांप्रतकालमें सर्वको प्रत्यक्ष है, ताते भेदवादियोंका सिद्धांत रागद्वेषादि क्लेशकाआश्रयहै। अरु अद्वैत सिद्धांतहे सो उक्तक्लेशोंका अनाश्रयहोनेसे सिम्यज्ञानहै। इसप्रकार अद्वैत ज्ञानकी स्तुतिके अर्थ,तिनाभेदेवादियोंके सिद्धांत का मिथ्या ज्ञानपना सूचित किया । अरु सो तिनके पक्षोंकामिथ्या ज्ञानपना यहां परस्पर विरुद्ध होने करके विस्तार से देखायके तिसके निपेध से अद्वैत लानकी सिद्धि, आवीत न्याय करके (आवीत न्याय नाम, व्यतिरेक न्यायका है जैसे जो कियाकरके साध्य है सो अनित्य है इस अन्वय से अनित्यताके जानेहुये भी जो अनित्य नहीं, सो क्रियाकरके साध्य भीनहीं, इस प्रकार का व्यतिरेक भी व्यभिचारकी शंकासे, रहित होने करके व्याप्ति के निश्चयार्थ अंगीकार करते हैं । अरु तैसे तर्कसे घटितहुयेअर्थक ज्ञान से जानेहुये भी विरोधी अन्यवादके निपेधके वर्णन बिना अन्यपक्ष के सम्यक् पनेकी शंकाहोवेगी। एतदर्थ अन्यवादोंके निषेधसे अ- द्वैत सिद्धांतकी सिद्धि समाप्त करने को योग्य है। इस अभिप्राय से अलात शान्ति,के (अर्द्धदग्ध काष्ठ के घुमावने,के), दृष्टान्तको उपलक्षित अलात शान्ति नामक चतुर्थ प्रकरण प्रारम्भ करतेहैं इत्यर्थः] समाप्त.करनेके योग्य है । एतदर्थ यह अलात शान्तिनामक चतुर्थ प्रकरण प्रारंभ करतेहैं । अरु तिस चतुर्थ प्रकरणत्रिये अद्वैत ज्ञानके सम्प्रदायके कर्त्ता नारायण भगवानरूप आचार्यके, अद्वेत स्वरूप सेही नमस्कारार्थ यह प्रथम श्लोकहै। आंटिअन्त अरु मध्य बिपे मंगलाचरण करके युक्त जो ग्रंथहें सो प्रवृत्तिथाले होते हैं, इस अभिप्रायसेश्रीगोपादाचार्य आदि विप कारके उधा- रणवत्,अम अन्तविपेपरदेवताके पूणामबन मध्यविपेभी परदेवना . गौडपादीय कारिका चतुर्थ प्रकरण ४। २०१ अस्पर्शयोगो वै नाम सर्वसत्त्वसुखोहितः। अवि-: वादोऽविरुद्दश्च देशितस्तं नमाम्यहम् २।१२९ ॥ रूप उपदेष्टा (आचार्य) को प्रणाम करते हैं। जिस करकें शा- खके आरंभ विषे बौछित अर्थकी सिद्धिके लिये आचार्यकी पूजा अंगीकार करते हैं। एतदर्थ यहां आचार्यको नमस्कार रूप मंगल करते हैं। ज्ञानेनाकांशकल्पेन धर्मान् योगगनोपमान ज्ञेयाभि- न्नेन सम्बुद्धस्तं वन्दे द्विपदावरम जो ज्ञेयोंसे अभिन्न आकाश के तुल्य ज्ञानसे आकाशकी उपमावाले. धर्मोको सम्यक् जानता हुआ,तिन द्विपदनके मध्य श्रेष्ठको वन्दनाकरताहाँ अर्थात् जोना- रायण नामक परमेश्वर अग्निकी उष्णताअरु सूर्य के प्रकाशवत् "उपाधि करके कल्पितभेदसे बहुरूप आत्मस्वरूपधर्मरूप ज्ञेयपने से अभिन्न आकाशके तुल्य यद्यपि [ आकाशको जड़ताकी अधि- कांसे स्वप्रकाशरूप ज्ञानको आकाशकी उपमाअपूर्ण है, तथापि ज्ञानके व्यापकपने आदिक विषे आकाशकी उपमा पूर्णताले जा. ननेयोग्य है ज्ञानरूपतासे आकाशके तुल्यताकी उपाशलेआत्मा के धम्मों को सम्यक्प्रकार जानता हुआ, तिस द्विपदो मनुष्य से उपलक्षित.पुरुषों के मध्यश्रेष्ठ (प्रधान) पुरुषोत्तम गौड़पादा: चार्य जो हैं सो पर्व नरनारायणकरकेआंश्रित चदरिकाश्रमविपे नारायण भगवान को चित्त में ल्यायके पड़े तपको तपते हुये, ताते नारायण भगवान प्रसन्न होयके तिनके अर्थ विद्या वरदान देतेहुये। तातेतिस नारायण भगवान् रूपं .परमेश्वरविष वेदान्त सम्प्रदायका परमगुरुपना प्रसिद्ध है। यह भावहै: कोमें धन्दना करता हो, यह अभिप्राय है | उपदेष्टा. आचार्य के नमस्काररूप से विरोधी पक्षों के निषेध द्वारा इसचतुर्थ प्रकरणविपे प्रतिपादन करने को इच्छित ज्ञान, ज्ञेय, अरु ज्ञाताकेभेद रहित अर्थात् ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय, इसत्रिपुटी से रहित । परमार्थ तत्वका ज्ञान परमार्थ बोधरूप प्रतिज्ञा कियाहोताहै :११:१२८ ॥ 20222 r 1 २०२ मांडूवयोपनिषद् । २।१२६ ॥ हेसौम्य! अब अद्वैत दर्शनरूप योगकी अर्थात् अद्वैत ज्ञानकी स्तुति के अर्थ तिसको.नमस्कारसे स्तुति करते हैं "अस्पर्शयोगोनाम सर्वसत्त्वसुखोहितः। अस्पर्शयोग प्रसिद्ध नामहै सर्वसत्त्व सुखहोताहै हितरूप अर्थात् जिसयोगका किसी सेभी कदाचित्भी स्पर्श सिम्बन्धी होवेनहीं, ऐसाजो ब्रह्मास्वरूप योग सो कहिये अस्पर्श योगानामहे , सो ब्रह्मवेत्ताओं को यह अस्पर्श योगहे अन्योंको नहीं यह प्रसिद्धहै । अर्थात् अस्पर्श योगनाम वाला अद्वैत ब्रह्मरूप ज्ञान है सो अद्वैत ब्रह्मके जानने वाले सम्यक् ब्रह्मवेत्ताओंको है । तिनसे इतरजे कर्मवादि तर्क- वादिआदिक भेदी हैं तिनकोनकर्मिणो वेदयन्ते" "नेपा तण मतिरापनेया" । इत्यादि. श्रुतिप्रेमाणसे सो ज्ञान नहीं । ॥ अरु कोई एक अत्यन्त सुखके साधन दिव्य सर्वोत्तम भोग्य साम- श्री करके युक्तहुआ भी योग दुःखरूप हैं।। जैसे तप, अरु यह ब्रिह्मरूप अस्पर्श योगीतेसा नहीं। किन्तु “सर्वेषां सत्वाना देह- भृतो सुखयतीति" इस व्युत्पत्त्यर्थ से जो सर्व देहधारी जीवोंको सुखी करे, सो सर्व सत्त्वसुखहे।।' ताते सो अस्पर्श नामयोग! सर्व जीवोंको सुखरूपहा अरु तैसेही इस योग करके हितहोता है अर्थात् जो कदापि किसी विषयका उपभोगरूप सुख है सो सुख तो है परन्तु सो हितरूप नहीं क्योंकि विपयों का उपभोग जन्य सुख है सो क्षणिक अरु परिणामी है ताते। अरु यह अिस्पर्श योगा सुखरूप हे, अरुहितरूप है, क्योंकि सोक्षणिक अरु परिणामीन होयको सर्वदा एकरस अचल स्वभावधालाई ताते किंवा अविवादोऽविरुवंश्चदेशितस्तं नमाम्यहम् अवि- वादह अविरुद्धहे उपदेशकियाहे तिसको में नमस्कार करताहों अर्थात् जिसविषेपक्ष अरु प्रतिपक्ष के ग्रहणसे विरुद्धकथनरूपवि वादनहीं, एतदर्थ अविवादह अर्थात् जहाँ द्वतह तहां स्वपक्षधर प्रतिपक्षका ग्रहण है तहांही परस्परमें राग द्वेप पूर्वक विरुद्धकथा रूपविवादहे अरुइसभेदरहित अदेत अस्पन नामयोगविष भेद - गौडपादीय कारिको चितुर्थी प्रकरण ४ । २०३ भूतस्य जातिमिच्छन्ति वादिनः केचिदेवहि । अभू- तस्यापरे धीरा.विवदन्तः परस्परम् ३११.३०॥ भतं न जायते किञ्चिदभूतं नैव.जायते। विवदन्तो द्वियाह्येवमजाति ख्यापयन्तिते ४।१३३॥. अभाव,सें स्वपक्ष अरु परपक्ष अरुं तदाचित रागद्वेष अरु पर- स्परका विरुद्ध कथनरूप विवाद समूलनहीं, ताते सो अविवाद है। अर्थात् जिस पुरुषको एकअद्वितीय श्रेलका सो रूपही अस्पर्श योग प्राप्तहुआ है सो विद्वान् “विद्वान् भवते नातिवादी" सम्य अद्वैत ज्ञानी हुआ किसीकी भी खंडन मंडनरूप विवाद करतानहीं, ताते सो अविवाद हे। क्योंकि अविरुद्ध है। अतएव ऐसा.जो (सर्वोत्तम. सुख रूप हितरूप अविवाद अरु अविरुद्ध 'योग जिसशास्त्रने सम्यक् उपदेशकिया है, तिस शोजको मैं नमस्कार करता हौं.२॥ १२६॥ ३११३०हे सौम्य! [अद्वैतवादको अविरुद्ध होने करके तिस विपे-विवादके अभावको स्पष्ट करनेको प्रथम द्वैतवादियों के विवा दको उदाहरण करके कहते हैं.] प्रश्नाद्वैतवादी परस्पर विरोध को कैसे प्राप्त होते हैं। उत्तरः। कहते हैं भूतस्य जातिमिच्छन्ति वादिनः केचिदेवहि कोई एकवादी विद्यमान भूतों (वस्तुओं) की उत्पत्ति इच्छते हैं, अर्थात जिस करके कोई एक सांख्यशास्त्र मतके अनुसारी द्वैतवादी विद्यमाने वस्तुकी उत्पत्ति को इच्छ. ते हैं, सर्व नहीं अरु अिभूतस्यापरेधीरा विवदन्तः परस्परम् । पंडितपने के अभिमानी अन्य अविद्यमान वस्तुकी उत्पत्तिको इच्छंते परस्पर विवाद करते हैं? अर्थात जोते सरियवादियों से अन्य अपनेविषे पंडितपने के अभिमानी वैशेषिक :अरु नैयायिक मतके, अविद्यमान वस्तुकी उत्पत्तिको इच्छते हैं, एतदर्थही पर- स्पर विवाद करते हैं (अन्यको जय करने को इच्छते हैं इत्यभि- प्रायः)३।१३०॥
२०४ मांडूक्योपनिपद् । ख्याप्यमानामजातिन्तैरनुमोदामहे वयम् । विवदामो न तैः साईमविवाद निबोधत ५। १३२॥ ४।१३१ हे सौम्य ! प्रश्न। इसकहे प्रकार विरुद्ध कथन से परस्परके पक्षके खंडनकर्ता वादियों करके सिद्धकिया क्याहोता है।उत्तर। तहां कहतेहैं भूितं न जायते किश्चिदभूतं नैव जायते। कुछभी भूत ( विद्यमान) उपजता नहीं, अविद्यमान उपजता नहीं, अर्थात् कुछ भी विद्यमान वस्तु उपजना नही, क्योंकि सो आत्मावत् विद्यमान है ताते, इसप्रकार कहताहुआ असत् वादी सत् के जन्मरूप सांख्यके पक्षका निषेध करताहै । अरु तैसे अविद्यमान वस्तुभी उपजतानहीं क्योंकि सो शशशृंगवत्अविद्य- मान है ताते। इस प्रकार कहताहुआ सांख्यवादी भी असत् के जन्मरूप असत्वादी के पक्षका निषेध करता है "विवदन्तोऽद्वया- खेवमजाति ख्यापयन्ति ते ऐसे अद्वैतवादी विवाद करते हुये अनुत्पत्तिको ख्यापन करते हैं । अर्थात् जो अद्वैतवादी हैं सो विवाद करते (निर्णयकरते) हुये । अरु सत् अरु असत् के जन्म रूप, इस परस्पर के पक्षरूप विवादको निषेध करतेहुये । कोई कहताहै इसविद्यमान बस्तुकी उत्पत्ति है कोई कहताहै अविद्य- मान की उत्पत्ति है इस प्रकार परस्परमें वादी विवाद करते हैं, तिनदोनोके पक्षको निषेध करतेहुये । सत् अमत् से भिन्न (विल- क्षण)वस्तुके अर्थ से अनुत्पत्ति को प्रकाश करते हैं ।।१३१ ।। ५।१३२ हेसौम्य! [तव वादियोंकरके उक्तहोनेसे अनत्पत्तिभी तुमकरके निपेध करनेको योग्यहै यह शंका करके कहते हैं [इस प्रकार तिनप्रतिवादियों करके । अर्थात् स्यिाप्यमानामनातिन्ते. रनुमोदामहे वयम्। तिनकरके प्रकाशित किया अनुत्पत्ति को हम अनुमोदन करते हैं, अर्थात् ऐसे तिन प्रतिवादियों करके प्रकाशित किया जो अनुत्पत्ति निसकोही इसप्रकार होवो, ऐसे हम केवल अनुमोदन करते हैं। परन्तु विवटामोन ते.साईम- गौडपादीयाकारिकी चतुर्थ प्रकरण ४ । २०५ अजातस्यैव धर्मस्य जातिमिच्छन्ति वादिनः। अजातो ह्यमृतो धर्मो मर्त्यतां कथमेष्यति ६।१३३ ॥ न भवत्यमृतं मयं न मर्त्यममृतन्तथा। प्रकृतेरन्यथाभावों न कश्चिद्भविष्यति ७।१३४ ॥ विवादं निवोधतो तिनके साथ विवाद करते नहीं अवि- वाद को श्रवणकरो, अर्थात् जैसे वे भिदवादी। परस्पर विवाद करते हैं, तैसे हम तिनके साथ पक्ष अरु प्रतिपक्ष के ग्रहण से विवाद करते नहीं । एतदर्थ हे हमारे शिष्यो! हमकरके अनुमोदनकिये अविवादको अिर्थात् विवाद से रहित परमार्थ रूप ज्ञान को श्रवण करो ५११३२॥ ; ६११३३ हे सौम्य! [उत्पन्नहुये वस्तुकेही जन्मकरके अनर्थकी प्राप्तिसे अरु अनवस्था दोषकी प्राप्तिसे अनुत्पन्नहुये पदार्थकेहीज, न्मको सतवादीअरु असतवादी सहीस्वीकार करते हैं।इसप्रकार अन्यवादियों के पक्षका अनुवाद करते हैं] अजातस्यैवधर्मस्य जातिमिच्छन्ति वादिनः सर्ववादी जन्मरहित धर्मकी उत्पत्ति को इच्छते हैं अर्थात् सर्व जो सत् असत्वादी है सो ,जो जन्म रहित ही धर्मनामवाला परमात्माहै,तिसकी उत्पत्ति को इच्छते हैं परन्तु अजातो ह्यमृतो धम्मों मर्त्यतां कथमेष्यति। अज- न्मा मरणरहित धर्म मरनेकी योग्यताको कैसे पावेगा अर्थात् । अजन्मा अरु अमृत भिरणरहित जो धर्म नामक परमात्मा सो मरणकीयोग्यताको कैसे प्राप्तहोवेगा,किन्तु किसीप्रकारसेभी प्राप्त होवे नहीं।अर्थात् जो जन्मताहै तिसका मरण भी निश्चित हे, ताते जो परमात्मा उत्पन्नहोय तो विनाशभी अवश्य होगा, परन्तु सो परमात्माश्रुतिके प्रमाण अरु अनुभवसे निराकार महासूक्ष्म एकअद्वैत परिपूर्ण अजन्माहे, अरु जिसकरके अजन्मा है तिसही करके कदापि मरणके योग्य नहीं ६.१३३॥ ७।१३४ हे सोम्य! [परिणामी ब्रह्मके वादविपे जो अब्रह्मवा- " -- -- २०६ मांडूक्योपनिपेट् । स्वभावेनामृतो यस्यै धौगच्छति मर्त्यताम् । कृतकेनाऽमृतस्तस्यं कथंस्थारयतिनिश्चल ८।१३५॥ दियों करके दूपण कहे हैं, सो भी हमने अनुमोदन किया है, इस प्रकार मानके कहते हैं,], न भवत्यमृतं मर्त्य न मयममृत तथा मरणरहित मरने के योग्य होता नहीं, तैसे मरनेके योग्य मरण रहित नहीं, अर्थात् मरणरहिताजो ब्रह्मसो मरने के योग्य होता नहीं, क्योंकि स्थितरूपका विरोधहै ताते । तैसेही मरने के योग्य कार्य सो स्वरूपकी स्थितिविपे वाप्रलय अवस्थाविपे मर- णरहितब्रमको पावता नहीं। एतदर्थ प्रिकृतेग्न्यथाभावो न कथ- श्चिद्भविष्यति। प्रकृतिका अन्यथा भाव किसीप्रकार से भी होगा नहीं :अर्थात् प्रकृति कहिये स्वभाव, का अन्यथा भाव किसी प्रकार से भी होनेका नहीं ॥ इति सिद्धम् ७११३४॥ .८९३५ हे सौम्य । स्वभावनामृतो यस्य धम्मोगच्छति मयताम्। जिसका स्वभावसेमरणरहित धर्म मरने की योग्यता को पावताहै, अर्थात जिस परिणामवादी के मतमें स्वभावसेही मरणरहित धर्म पिरमात्मा नामक पदार्थी'कार्यभावकी प्राप्ति से मरने की योग्यता को प्राप्तहोताहे कृितकेनाऽमृतस्तस्य कथं स्थास्यति निश्चलः तिसकासमुच्चयके अनुष्ठानसे मरणरहित निश्चलहुआ कैसे स्थित होवेगा, अर्थात् तिस वादी के मतविपे समुच्चय के अनुमान से मरणरहित अरु मुक्तहुआ कहने के योग्यहै । सो धर्म निचलहुआ फैसे स्थितहोवेगा, किन्तु किसी प्रकार से भी स्थितहोवे नहीं ॥ [पूर्व अढत नामक प्रकरण यिषे कथन कियाहे अर्थजिन्होंका ऐसे इन ६ से लेके र पर्यन्त तीन श्लोकों का जो पुन. यहां निवेश किया, सो अन्य चादियों के पक्षों के परस्पर विरोध करके प्रसिद्धहुये अपने अनुमोदन के ल. खारने के अर्थ किया है ८।१३५॥. " गौडपादीय कारिकी चतुर्थप्रकरण ४ । "२०७ सांसिद्धिकी स्वाभाविकीसहजा अकृताचया।प्रकृ. तिसेति विज्ञेयास्वभावान जहातिया । १३६ ६।१३६ हेसौम्य ! जिसकरके जैव यह लौकिक प्रकृति भी अन्यथाभावकोपावती नहीं, तबयह अजन्मा अरु अमृत स्वभाव वाली प्रकृति अन्यया भावको ने प्राप्तहोवे, इसमें क्या कहना है किन्तु कुछभीनहीं। प्रश्नाकौन यह प्रकृति है तहाँ।उत्तरकहतेहैं। सांसिद्धिकी स्वाभाविकी सहजी अकृता च या सांसिद्धिकी है स्वाभाविकी है सहजा अरु जो अकृतहै, अर्थात् प्रकृतिका अन्यथाभाव किसी भी प्रकार से होनेका नहीं, इस प्रकार ७वें श्लोकविषे कहां तहां प्रकृति शब्दके अर्थको कहते हैं ] सम्यक् सिद्धिविणे होनहार है एतदर्थ सांसिद्धिकी है जैसे सिंद्ध योगि- योंकी अणिमादि ऐश्वर्यकी प्राप्तिरूप जो प्रकृतिहै, सो भूत अरु भविष्यत्काल विषे अन्यथा भावको पावती नहीं, तैसेही सोप्र. कृति अन्यथा भावको पावती नहीं एतदर्थ तिसको सांसिद्धिकी कहतेहातैसेही स्वभावहीसें सिद्धहै याते सोई स्वाभाविकीहैं,जैसे अग्निआदिकोंकी उष्ण अरुं प्रकाशादिरूप प्रकृति है सोभीकाला न्तरविषे अरुदेशान्तर विभाव्यभिचारको प्राप्त होती नहीं,तसेही -ग्रहभीव्यभिचारको पावतीनहीं एतदर्थ इसको स्वाभाविकीकहते. हैं। अरु तैसेही सहजा आित्माके साथही होनहारोहै। जैसे पक्षी, आदिकों की आकाश विषे गमनादिरूप प्रकृति (स्वभाव) सह- जहै। तैसेंही यह आत्माके साथही होनेवाली है, ऐतदर्थ इसको सहज कहतेहैं। अरु अन्यमी जो कोई एक किसी निमित्त से भी अकृत (अरचित) होवे, जैसे जलकी अधोदेश वि गमनादि रूप प्रकृतिहै, अरु जैसें घटका घटत्वहै अरु पटका पंटोहै, तेसे अन्यभी जो कोई एक कदाचित भी स्वभावको त्यागेंनहीं सोस- प्रकृति है। इस प्रकार जाननेको योग्यहे । अरु प्रिकृतिःसेति विज्ञया स्वभाव न जहाति या जो स्वभावको त्यागेनहीं सो गौडपादीय कारिका चतुर्थ प्रकरण ४ । कारण यस्य वैकायाकारणं तस्य जायते। जायमानं कथमजं भिन्नं नित्यं कथञ्च तत् ११३८॥ विकार रहित जो आत्मा तिस विप विकार की कल्पना के हुये तिसकी वासना से उन चादियों को स्वभाव की हानिहीं होती हैं यह दोप है १.०१.१३७n: ११११३८॥ हे सौम्या प्रसंगविषे प्राप्त हुये अर्थको त्यागकेसांख्ये वादियोंके प्रक्षाविषे वैशेषिक,आदिकरके कथन किया अरु आप अ- द्वैत वादियों करके अनुमोदन किया जो दूषण है; तिसका अनुवाद करते हैं सत् कहिये विद्यमान वस्तुको उत्पत्ति के कहनेवाले सांख्य शादियों करके अवटित कैसे कहा है, जहां ऐसा प्रश्न है तहविशेषिककहते हैं। कारण यस्यं वै कार्य कारणं तस्य जायते। जिसके मात्र कारणाही कार्य होता हे तिसके मतविये कारण जन्मता है अर्थात्-जिस सारख्यवादियों के मतवि मृत्तिकावत उपाद्वानरूपाकारणाही कार्य होता है । जैसे मृत पिंङ घटरूप परिणाम को तैसे कारण कार्य के आकार सेप. रिणाम को प्राप्त होताहेत तितके मतविषे जन्मरहित ही कारण महत्चत्वादिःकार्य रूपसेही जन्मता है। अरु जव महत्तत्त्वादिकों के आकारसे उत्पन्न होनेवाला प्रधान है तव सो. अजन्मा अरु नित्य कैसे कहा है, पुतदर्थ जन्मता है अरु अर्जन्मातनित्य है, इसप्रकार तिन करके यह विरुद्ध कथन किया है. अरुःजाय मौन कथमन भिन्न नित्यं कथञ्च तत् सोजायमान है तब अजे कैसे होगा, अरु विदारण को प्राप्तहुआ नित्य कैसे होगा - र्थात सोप्रधान एकदेशसे भिन्नता भेद वोविंदारण) को प्राप्त हुआ नित्य कैसे होगा। विवाद का विषय जो प्रधान सो.. नित्य है, क्योंकि सावयव है तातेर घटादिकोंवत् इस अनुमान के अभिप्राय से दृष्टान्त को-साधते हैं ] जिसकरके लोक विपे सावयव एक देशसे फूटने रूप धर्मवाला घट नित्य देखा नहीं, ". २७ २१० मांडूक्योपनिषद् ।। कारणायद्यनन्यत्वमतः कार्य्यमजं यदि । जायमा नादि वै कार्यात् कारणं ते कथं ध्रुवम् १२ । १३९ ।। अजा जायते यस्य दृष्टान्तस्तस्य नास्ति वै । जा ताच्च जायमानस्य न व्यवस्था प्रसज्यते १३ । १४०॥ एतदर्थ एक देशसे विदारण को पाया जो प्रधान सो अजन्मा है अरु नित्य है, इसप्रकारजोउनसांख्यवादियों करके कथन किया है सो विरुद्ध किया है । यह इसका अभिप्रायहे ११११३८ । १२।१३६॥ हे सौम्य ! अव पूर्व देखाया जो कार्य कारणका भेववादातिसकेनिषेधरूप उक्तार्थही स्पष्ट करने के अर्थ कहते हैं कारणाद्यद्यनन्यत्वमतः कार्यमा जव कारण से अनन्यपना मानसा है तब कार्य अजन्मा है, अर्थात् जव जन्मरहित कारण से कार्यका अनन्यपना तेरेको वांछित (मन्तव्य) है, तब तिस प्रकारके (जन्मरहित; कारण से अपृथक् होने करके कार्य भी अजन्मा है, ऐसे प्राप्तहुआ। एतदर्थ तेरे मतको प्रधानका अज- न्यपना, अरु जन्यपना यह विरोध हुआ । अरु कार्य हे ओ अ- जन्मा है यह दूसरा विरुद्ध हुआ। किंवा कार्य कारण के अनन्य भावविषे अन्यदोष यह है कि यदि,जायमानाद्धि वै कार्यात का- रणं ते कथं ध्रुवम् जिव प्रसिद्ध जायमानकार्य से अनन्य कारण हे तब सो तेरे मतत्रिपे नित्य अरु अचल केसे होवेगा, किन्तु किसी प्रकारले भी होवे नहीं । अरु जैसे कोई कहै कि कुकुट (सुरगे) का एक अङ्ग मिस्तकादिकोई । भोजनार्थ पचावते (प- कावते) हे अरु दूसरा अंग गर्भाशय, अंडोंके जन्मार्थ कल्पना करते हैं रिहने देते हैं । सो कहना चने नहीं । तैसे कार्य से अ. भिन्न कारण नित्य अरु ध्रुव है, ऐमी व्यवस्था तेरे मतविपे बने नहीं, अरु अद्वेतवादियों के माया विवाद विपे कार्य कारण के अभेद होनेसे भी कार्य केही कारणमात्रपने के अंगीकार से यह दोप है नहीं यह सिद्धहुना १० । १३६ ॥
गौडपादीय कारिकी चतुर्थ प्रकरण । २११ हेतोरादिः फलं येषामादिहेतुः फलस्य च । हेतोः फलस्य चानादिः कथं तैरुपवय॑ते १४१४१॥ '१३३१४०॥हे सौम्प! अजाद्वैजायतेयस्य दृष्टान्तस्तस्य नास्ति वैर अजन्मासे जन्मता है तिसविषे दृष्टान्त है नही अर्थात् जिस प्रधानवादीके मतविपे अनुत्पन्न वस्तुसे कार्य उत्पन्न होताहै,तिस के मतविषे दृष्टान्त है नहीं। अरु दृष्टान्त के अभाव से केवल अर्थ करकेही अनुपन्न वस्तुसे कुछ भी, उत्पन्न होता नहीं, इसप्रकार सिद्ध होताहै । अरु जाताच जायमानस्य न व्यवस्था प्रल ज्यते उत्पन्न हुये से उत्पन्नहुयेका अिंगीकार है तव । सो व्यवस्थाको प्राप्त होता नहीं, अर्थात् जव पुनःउत्पन्नहुये कारण से उत्पन्नहुई वस्तुका अंगीकार है, तव सो अन्य उत्पन्नहुये से उत्पन्न होताहै, अरु सोभी अन्य उत्पन्न हुयेसही उत्पन्न होता है, इसप्रकार होनेसे व्यवस्था प्राप्तन होगी, किन्तु अनवस्था दोपही प्राप्त, होवेगा। इत्यर्थ १३,१४॥ १४।१४१॥हे सौम्य![द्वैतवादियोंकरके परस्परके पक्षके निषेधद्वारा सिद्धकिया जो वस्तुको जन्यपना, सो अद्वैतवादीने अनुमोदन किया। अब श्रुतिप्रतिपादित अरु विद्वान्के अनुभव का अनुसारी द्वैतका निषेध भी इस अद्वैतवादीने अनुमोदन कि- 1 याहीहै । इसप्रकार कहते हैं ]"वत्र वस्य सर्वमानैवाऽभूत्त- दिति”. ८ जहां तो जिस पुरुषको सर्च आत्माही होताहुआ? ईसप्रकार श्रुतिने परमार्थ से द्वैतका अभावकहाहै । तिसको आ- श्रयकरके कारणरूप द्वैतका दुर्निरूपणपना कहते हैं हेतोरादिः फलं येपामादिहेतुः फलस्य चाहजिसहेतुका आदि फल है अरु फलकाहेतु आदि है। अर्थात् जिन वादियों के मतविपे धम्मादि रूप हेतुका आदि कारण देहादि संघातरूप फल है, अरु दे. हादि संघातरूप फलका धम्मादिरूप हेतु आदि (कारण है। इसप्रकार हेतु अरु फलके परस्परके कार्य अरु कारणभावकरके -- गौडपादीय कारिका चतुर्थ प्रकरण ४ । २१३ सम्भवे हेतुफलयोरेषितव्यः क्रमस्त्वया। युगपत्स म्भवे यस्मादसम्बन्धी विषाणवते १६१४३ng सिफलादुत्पद्यमानः सन्न ते हेतु प्रसिद्ध्यति । अप्रसि दः कथा हेतु फलमुत्पादयिष्यति: १७११४४ वाट॥ हे.सौम्या प्रतीति से हेतु अरु फेलकी उत्पत्ति को स्वीकार करने योग्य होनेसे तिसका निषेध करना युक्त नहीं, यह शंकाकरके कहतेहैं] संभवेहेतुफलयोरेपितव्यः कमस्त्वया। हेतु अरु फलकी उत्पत्तिविष कम तुझकरके अन्वेषण करने को योग्य है, अर्थात्, हेवदिी, जवउक्त प्रकारका विरोध अंगीकार करनेकेयोग्य नहीं, ऐसे तूं मानताहै। तव हेतु अरु फलकी उत्पत्ति विष हेतु पूर्वहै फल पश्चात है इसप्रकारकाजोक्रम है सोतुझकरके अन्वेषण करने योग्य है । अ6। युगपत्सम्भवे यस्मादसम्बन्धी विषाणवत्" जाते एककालचिपे सम्भव के. हुये श्रृंगोंवत् अस- म्वन्धहोवेगा अर्थात जिसकरके एककाल विपे उत्पत्तिके होने से शृंगोवत् असम्बन्ध होवेगा, जैसे एक काल विषे उत्पन्न होने वाले वाम दक्षिणरूप"जो गौके दोनों श्रृंग तिनका परस्पर कार्य कारण भावकरके असम्बन्ध है, तैसेही एककालबिपे उत्पन्न हुये हेतु अरु फलको कार्य कारण भावसे असंम्बन्ध होवेगा, एतदर्थ तिनका क्रम तझकरके अन्वेषण करने के योग्य है १६१.१४३॥ २७।१४४॥ हे सौम्य! [अब' |F"पुण्यो वै पुण्येन कर्म णा भवति" पुण्य कर्म करके निश्चय पुण्यरूप होता है? इत्यार्दिक श्रुति प्रमाणसे धर्मादिकों विपे हेतु अरु फल भावकी शंका करके श्रुतिको अघटित अर्थ विपे प्रमाणहोने के असम्भव से श्रुतिका पूर्वापर भाव (प्रथम पश्चात्.पना) अवश्य कहने के पोग्य है, इसप्रकार कहते हैं ..प्रतवं तिनका हेितु अरु फलका सम्वन्ध कैसे हैं,1301 कहते हैं, फलादुत्पद्यमानः सन्न ते हेतुः प्रसिद्ध्यति । फलसे उत्पन्न होनेवाला हुआ हेतु M t r २१४ मांडूक्योपनिषद् ।- यदि हेतोः फलासिद्धिः फलसिदिश्च हेतुतः । कत रत्पूर्वनिष्पन्नं यस्य सिद्धिरपेक्षयो १८ । १४५ ॥ अशक्तिरपरिज्ञानं क्रमकोपोऽथवा पुनः । एवं हि सर्वथा बुद्धैरजातिः परिदीपिता १९ । १४६ ॥::, सिद्ध होगा नहीं. अर्थात् जन्य अरु स्वरूप से अप्रतीत रूपवाले फलसे उत्पन्न होनेवालाहुआ हेतु शशशृंग आदिक असत् वस्तु, वत सिद्ध न होवेगा । अर्थात् जन्मको न पावेगा । अरु अप्रः सिद्धः कथंहेतुः फलमुत्पादयिष्यति । अप्रसिद्धहुआ हेतु कैसे फलको उत्पन्न करेगा: अर्थात् शश,गादिकोंवत् अप्रतीतिरूप वाला अप्रसिद्धहुआ हेतु तेरेमंतविषे कैले फलको उत्पन्न करेगा। क्योंकि परस्परकी अपेक्षाकरके सिद्धिवाले शश,गके तुल्य वस्तु ओंका कार्य कारणभाव से कहीं भी सम्बन्ध देखा नहीं। यह अभिप्राय है १७।१४४॥ १८।१४५॥ हे सौम्य! "यदिहेतोः फलासिद्धिः फलसिद्धि इच हेतुतः। जव फलसे हेतुकीसिद्धि अरु हेतुसे फलकीसिद्धि है। अर्थात् असम्बन्धपने रूप दोपसे हेतु अरु फलके परस्पर कार्य कारण भावके निपेकियेहुये भी जव तुझकरके फलसे हेतुकी सिद्धि अरु हेतुसे फलकीसिद्धि अंगीकार कियाही है, तब क्ति । रत्पूर्वनिष्पन्न यस्य सिद्धिरपेक्षयापूर्वकी सिद्धिकी अपेक्षासे जिसकी सिद्धिहोती है ऐसा पूर्व उत्पन्न हुआ कौन है अर्थात् उक्त प्रकार जव हेतु अरु फलकी परस्परसे सिद्धि अंगीकार कियाहै, तव हेतु अरु फलके मध्य पूर्वी सिद्धिकी अपेक्षासे जिस प. श्चात होनहारकी सिद्धि होती है, ऐसा पूर्व उत्पन्नहुआ कौन है सो आप कहिये १८११४५॥ -१६१४६॥हे सौम्य! अशक्तिरपरिज्ञान क्रमकोपोऽथवापुनः अशक्ति अपरिज्ञान है, अथवा क्रम कोप होवेगा अर्थात् जय यह क्रम जाननेको अशाय हे, इसप्रकार मानता है, तब सो यह .. गौडपादीय कारिका चतुर्थ प्रकरण । वीजांकुराख्यो दृष्टान्तः सदा साध्यसमो हि सः । नहि साध्यसमो हेतुः सिद्धौ साध्यस्य युज्यते २०१६ १४७॥ अशक्ति । अर्थात् कहनेका असामर्थ्य अज्ञानहै, अर्थात् तत्वका अविवेकरूप मूढ़ताहै । अथवा पुनः जो यह तूने हेतुसे फलकी सिद्धि होती है,अरु फलसे हेतुकी सिद्धि होती है, इसप्रकार अ.' न्योन्यके पश्चात् होने रूप क्रमकहा अिर्थात् हेतुले पश्चात् फल होताहै अरु फल से पश्चात् हेतुहोता है ऐसाक्रम तूनेकहा ति- सका कोप अर्थात् अन्यथा भावरूपः विपर्ययो 'होवेगा। यह अभिप्राय है । अरु एवं हि सर्वथायुद्धैरजातिः परिदीपिता। ऐसे बुद्धिमानों ने सर्वप्रकारसेही अनुत्पत्तिही प्रकाशित किया है। अर्थात्, इसप्रकार [परस्पर के पक्षके निषेधरूप द्वारसे सत् , अरु असत् वस्तु के जन्म के निषेध कियेहुये क्रम अरु अक्रम करके उत्पत्तिके असम्भवसे वादियों करके देखाईहुई अनुत्पत्तिही हम को इष्ट होती है, इसप्रकार अजातवादको समाप्त करते हैं ] हेतु फलके कार्यकारण भावके असम्भवसे परस्परकी अपेक्षासे दोष के कहनेवाले वादीरूप पण्डितोंने सर्वप्रकारसेही सर्व वस्तु की अनुत्पत्तिही प्रकाशित कियाहै १।१४६॥ २०११४७॥हे सौम्य! अव पूर्वपक्षी शङ्काकरताहै । शङ्का हे सिद्धान्ती हेतु अरु फलका कार्य कारण भावहै, इसप्रकार हम ने कहाहै। अरु तेने 'जैसे पुत्रस पिताका जन्म होता है, अरु गोके शृङ्गोवत् असम्बन्ध होवेगा, इत्यादिरूप कहने को इच्छित अर्थसे रहित शब्दमात्र को आश्रयकरके, वहछल कहा है। अरु जिसकरके हमों ने असिद्ध हेतुसे फलकी सिद्धि, वा असिद्धफलं से हेतुकी सिद्धि, अंगीकार किया नहीं, किन्तु बीजांकुर न्यायवत् हेतु अरु फलका कार्यकारण भाव अंगीकार किया, तहां हमारे मतविपे कोई भी दोषनहीं। अब समाधान कहते हैं। बीजांकु राख्यो दृष्टान्तः सदा साध्यसमो हि सः बीज अंकुर नामवाला १ . मांडूक्योपनिषद् । जो दृष्टान्तहै सो सदा साध्यकरके तुल्यहै, अर्थात् जो वीजांकुर न्यायवाला दृष्टान्तहै सोमुझ मायावादी के मतविधे. साध्य करके सदा तुल्यही है,क्योंकि वास्तव करके कार्यकारणभावकी प्रतीति कही भी नहीं ताते। यह तात्पर्य है। शङ्का ननु, वीज़ अरु अंकुर का जो कार्यकारण भावहै सो प्रत्यक्ष अनादि है, इसप्रकार जेध वादी ने कहा तवा सिद्धान्ती समाधान कहता है, हे वादी! वीज अरु अंकुर व्यक्तिका कार्यकारणभाव तुझकरके अंगीकार कियाहै, किंवा बीज,अरु अंकुरके सन्तानका कार्याकारणभाव अङ्गीकार कियाहै,तहां.प्रथमपक्ष जो बीज अरु अंकुरकी व्यक्तिका कार्या- 'कारणभाव सोचिनेनहीं, क्योंकि पूर्वे पूर्व के पिछलेवत् आदि- मानेपनेकी अङ्गीकार है,तावे जैिसे, असी उत्पन्न हुआ वीजआ. दिकवाला पिछला अंकुराऔ पिछला वीज, अन्य अंकुर अरु वीज से पूर्वहै, एतदर्थ क्रमकरके उत्पन्न होनेसे आदिवाला है। इस रीति से एकएक सर्व वीज अरु अंकुराके समूह को आदिवाला होने से किसी के भी अनादिपनेका अर्थात् परस्पर कारणपनेकाi सम्भव नहीं, इसप्रकार हेतु अरु फलों के भी अनादिपनेका अरु परस्पर कारणपनेका सम्भव नहीं। अरु जो दूसरा पक्ष कहे कि वीज अरु अंकुरकी सन्तति (सन्तान) का अनादिपनाहै, तो सो भी,वनेनहीं, क्योंकि तिनकी सन्ततिकी एकरूपताकाअसम्भव ताते अरु जिसफरके उन वजिअरुअंकुरके अनादिपने के वादियों करके, पीज अरु.अंकर से मिन्न वीज अरु अंकुरका सन्तान नामक एक व्यक्ति अङ्गीकार क्रिया नहीं। अतएव हेतु अरु,फुल का अनादिपना उन वादियोंकरके कैसे वर्णन किया है, सो कहीं। तैसे हेतु अरु फलके कार्यकारण भाषकी कहीं भी प्रतीतिका.स Fभव न होनेसे अन्यभी जो हमोंने कहाहे सोछलरूपहनहीं यह अभिप्राय है । अरु लोक में प्रमाणधिपे कुशल पुरुषोंकरके निहि साध्यसमो हेतुःसिद्धी साध्यस्य यज्यते। साध्यसे नुल्यहेतुमाध्य को सिजी विपे जोड़ते नहीं, अर्थात् साध्यवस्तु से तुल्यहेतु काहि . - - गौडपादीय कारिका चतुर्थ प्रकरण । पपिरापरिज्ञानमजातेः परिदीपकम् । जायमाना- द्वि वैधम्मत्किथं पठन गृह्यते २.१ । १४८॥ स्वतो चा परंतो वाऽपि न किञ्चिद्वस्तु: जायते। स- दुसत्सदसहाऽपि न किञ्चिद्वस्तु जायते २२ ॥ १४९ ।। दृष्टान्त साध्यकी सिद्धिवि सिद्धिके निमित्त योजना करतेनहीं यहाँ हेतुशब्दके मुख्यार्थको त्यागके दृष्टान्तरूप गौणअर्थ कहने को इच्छित है, क्योंकि सूचकहै ताते । अरु जिसकरके प्रसंगविणे प्राप्त हुआ हेतुहेनहीं दृष्टान्तहै, यातेसोई ग्रहण कियाहै २०५१.४७॥ २१६१४८॥ हे सौम्य!! प्रश्न। पण्डितोंने सर्व वस्तुकी अनु- त्पत्ति कैसे प्रकाशित किया है, । उत्तर पूर्वापरापरिज्ञानमजा- तेः परिदीपकम्पपूर्वापर (कार्य कारण) का अपरिज्ञान अनुपत्तिका प्रकाशक है, अर्थात् जो यह हेतु अरु फलके कार्य अरु कारणभावका अपरिज्ञानहै सोई यह अनुत्पत्तिका प्रकाशक कहिये अवबोधकहै । अरु जिायमानादि वे धम्मत्किथं पूर्व न गृह्यते । उत्पन्न होनेवाले प्रसिद्ध 'धर्मसे पूर्व कैसे ग्रहण करते नहीं, अर्थात् जब उत्पन्नहोनेवाला धर्म कहिये कार्य ग्रहण करते हैं, तब उत्पन्न होनेवाले प्रसिद्ध कार्यरूप धर्मस पर्व (का- रण) कैसे ग्रहणकरते नहीं। अरु जिसकरके उत्पन्न होनेवाले कार्यके ग्रहणकरनेवाले पुरुषोंकरके तिसकाजनक अवश्यग्रहणं करनेयोग्य है, क्योंकि जन्यजनकका संबन्ध अभिन्न है ताते, अत: एंव सो.कार्य कारण का अज्ञान अनुत्पचि का प्रकाशक है इत्यर्थः २१ । १४८॥ २२॥ १४ ॥ हे सौम्याइस.कथनकरनेके हेतुसे कुछभी वस्तु.. जन्मता नहीं, इसप्रकार सिद्ध होताहै। अरु स्वितो वा परतो वाऽ. पिन किञ्चिद्वस्तु जायते । सदसत्तदसद्वाऽपि न किञ्चिद्वस्तु जा यते।. स्वतः या परतःवाउभयसे कुछभी वस्तु उत्पन्नहोता नहीं यातें सत्ता असता वा सदसत्, कुछभी वस्तु उत्पन्न होता नहीं ... २१८. -मांडूक्योपनिषदः । अर्थात् जिसकरके आपसे वा परसे वा दोनोंसेभी कुछभी वस्तु उपजता नहीं, एतदर्थ सत.. असतं, वा. सदसत् दोनों, रूपभी कुछभीवस्तु उत्पन्नहोता नहीं। अर्थात् जब स्वतः वा. परतः कुछ किसीप्रकारभी उत्पन्नहोतानहीं, तब सतरूपसे 'वा अस- तरूपसे वा सदसत् उभयरूपसे कुछभी उपनता नहीं । इसका यहभावार्थहै.किजो उत्पन्न होनेवाला वस्तुआपसे वा-पर-(दूसरे) सें वा. स्व, पर-दोनोंसे सत् वा असत् वा सदसत् उभयरूप उपज- ताहै, तिसका किसीभी प्रकारसे जन्म संभव नहीं। जैसे घट आपही तिसंहीघटसे उपजता नहीं, तैसेप्रथम आपही अनुत्पन्न होनेसे अपने स्वरूपसे उपजता नहीं जैसे घटसेपट अरु पटसे अन्यपट, उपजंता नहीं, तसे अन्यसें, अन्यभी उपजता नहीं। अरु जैसे घट अरुपट इन दोनों से घट-वाः पट उपजता नहीं, तैसे दोनोंसेभी कोईवस्तु उपजतानहीं। शंका । ननु, मृत्तिकासे घंट उपजेताहै अरु पितासे पुत्र उत्पन्नहोता है । तिव कैसेकहते. हो जो उक्त प्रकार कुछभी उपजता नहीं। समाधान। तहांकह: तेहैं 'मद पुरुषोंको उपजताहै, ऐसाज्ञान अरु शब्दहे, यह तेरा कथन सत्यहैं, तथापि सोईशब्द अरु ज्ञान विवेकी पुरुषों करके: वे शब्द अरु ज्ञान क्या सत्यहै वा..असत्य है, इसप्रकार यावत् परीक्षाकरते हैं तावत् वो मिथ्या है, क्योंकि तद्विपयक निश्चय नहीं। इसप्रकार परीक्षाहिये शब्द अरु जातका नियम घट पुत्रादिकरूप.जोबस्तुहै.सो शब्दमात्रहीहे वाचारंभाविकारो नामधेयम वाणी सें.उच्चारणकिया, विकार कहनेमात्रही है.2 इसश्रुतिके प्रमाणसे । अतएवं शब्द अरु ज्ञानको अर्थात् शब्द अरु तदाश्रितज्ञानको । असत्यविपयवान्पना माननेके योग्य हे अरु जयसत् हैं तब उपजता नहीं, क्योंकि सत्वस्तु उत्पत्तिमान होतीनहीं तोते, मृतपिंडादिवत् । अरु.जवअसतहे तोभीजन्म सानहीं (विद्यमान नहीं) क्योंकि शश,गवत् असतहै ताते:। अरू जवसदसदूपहै तोभीजन्मतानहीं, क्योंकि तमप्रकाशवत् परस्पर . -- गौडपादीय कारिका चतुर्थ प्रकरण । २१॥ ; हेतुर्नजायतेऽनादेः फल चापिस्वभावतः । श्रादिन विद्यते यस्य तस्य ह्यादिर्न विद्यते २३ । १५० ॥ विरुद्धरूपके एकवस्तुपनेका असंभव हैं ताते । एतदर्थ कुछभी वस्तु जन्मता नहीं, इति सिद्धम् । पुनः जिन बौद्धों के मत्त विपे उत्पत्तिरूप क्रियाही उपजतीहै, इसप्रकार क्रियाकारक अरुफल की एकता अरु वस्तुको क्षणिकपना अङ्गीकार किया है, एतदर्थ वेवादी दूरसही, युक्तिकरके रहित हैं, क्योंकि यह ऐले है, इस निश्चयकी स्थितिका अन्यक्षण विषे अभाव है ताते,अरु अनुभव किये वस्तुकी स्मृतिका अभाव है ताते २२ । १४६ ।। २३११५०॥ हे सौम्य किञ्च, हेतु अरु फलके अनादिपने को अंगीकार करनेवाले तुझ बादी करके बलात्कारसे हेतु अरु फल की अनुत्पत्तिही अंगीकार की होगी। प्रश्न | कैसे अंगीकार की होगी उत्तरं । तहाँ कहते है हितुर्नजायतेऽनादेः फलं चापि स्व- भावतः । आदिनविद्यते यस्य तस्य ह्यादिर्न विद्यते आदिरहित से हेतु जन्मता नहीं अरु आदि रहित हेतु से फल भी स्वभाव से 'उपजता नहीं'। अरु जिसकी आदि नही तिसकी आदि वि- थमाननहीं, अर्थात् आदि रहित फल से। । अर्थात् जो फल 'देहादिक आदि से है नहीं तिन सें । तिनसे हेतु (अदृष्ट) ज. न्मता नहीं, अरु आदि रहित हेतु से फल मी स्वभावसे । अपने आपसे जन्मता नहीं । अरुं जिस करके अनुत्पन्न हुये अनादि फल से अर्थात् जो उत्पन्नही नहीं हुआ ऐसे फल से । हेतुका जन्म, अरु आदि रहित अजन्मा हेतुसे फलभी स्वभावसेही अ- र्थात् निमित्त विनाही उपजता है इस प्रकार तुझ करके अङ्गी- कार न किया होगा । ताते हेतु अरु फल के अनादिपने के अङ्गी- कार करनेवाले तुझ करके हेतु अरु फलकी अनुत्पत्तिही अङ्गीकार किया है। एतदर्थ लोकविये जिसका आदि (कारण) हे नहीं । तिसकी आदि (उत्पत्ति) है नहीं । अर्थात् कारण वाले वस्तु २२० मांडूक्योपनिषद् । प्रज्ञप्तेःसनिमित्तत्वमन्यथाद्वयनांशतः । सङ्क्लेश स्योपलव्धेश्चपरतन्त्राऽसितामता २४ १,१५१ ॥ .. की ही उत्पत्ति अंगीकार करते हैं, कारणरहित की नहीं। एत; दर्थ अनादिरूप इन हेतु अरु फलकी अनुत्पत्तिही सिद्ध हुई। इति सिद्धम् २३ । १५०॥ २४ । १५१॥ हे सौम्य वस्तुके वास्तव करके जन्मके असं. भवसे एक अजन्मा विज्ञान धनमात्र तत्व है इसप्रकार कहा अब वाह्य अर्थके बाद को उठावते है ] उक्तार्थ को ही दृढ़ करने की इच्छा से पुनः आक्षेप करते हैं प्रजप्तेः सनिमित्तत्वमन्यथा द्वयनाशतः। प्रज्ञप्तिका निमित्त करके सहितपना है,अन्यथा द्वैतके नाशसे तिसका नाश प्राप्तहोवेगा अर्थात् शब्दादिकों की प्रतीति रूप जो ज्ञान सो प्रज्ञप्ति है' तिस प्रज्ञप्तिका विषय रूप निमित्त (कारण) करके सहितपना (आपसे पृथक् विपयवान् पना) है, इसप्रकार हम प्रतिज्ञा करते हैं। ताते शब्दादिकोंकी प्रतीति रूप प्रज्ञप्ति विषय रहित होवे नहीं, तिसको विषय रूप निमित्त करके सहितपनाहै ताते । अतएव इस प्रज्ञप्तिको आप्ते भिन्न वस्तुरूप विषयवान्पना युक्तहै । अन्यथा (अर्थात् तिसको विषय रहितपने के हुये) शब्द स्पर्श नील पीत रक्तादिकों के झरनों की विषयता रूप दैतका अभाव है नहीं, क्योंकि तो प्रत्यक्ष हे ताते । एतदर्थ ज्ञानो की विचित्रतारूप इतके दर्शन से अन्य वादियों का शास्त्र परतन्त्र है, इस प्रकार अन्यों का जो शास्त्र तिसके परतन्त्र आश्रयरूप ज्ञानसे | भिन्न बाहयार्थ की अस्तिता (विद्यमानता) माननी (हमको वांछित) है अरु प्रकाशवान् सरूप प्रज्ञासिका नील पीतादि वाह्य विषयोकी विचित्रता विना स्वाभाविक भेदसेही विचित्रफ्ना संभव नहीं, जैसे स्फटिक का नीलादिक उपाधिरूप आश्रयों के बिना विचित्रपना घटे नहीं, तेसे,यह अभिप्रायहे। इस [चालार्थपिना अग्निकरके दाहआदिकों गौडपादीयाकारिका चतुर्थ प्रकरण ४ । २२.१ प्रज्ञप्तेःसनिमित्तत्वमिष्यतेयुक्तिदर्शनात् । निमित्त स्यानिमित्तस्वमिष्यतेभूतदर्शनात् २५॥ १५२॥ केकिये दुःखकी प्रतीतिका असंभव है ताते, बाह्यार्थहै, इस प्रकार करतेहैं।] अन्य हेतुसेभी परतन्त्रआश्रयरूप ज्ञानसे पृथक् बाह्या- थकी अस्तिता (सद्भाव) है। अरु सिक्लेशस्योपलब्धेश्चपरतन्त्रा ऽस्तितामता क्लेशकी उपलब्धि से परतन्त्रको अस्तिता मानी है अर्थात् क्लेश. कहिये दुःख तिसकी प्रतीतिसे परतन्त्र की अस्तिता मानी है। जिसकरके अग्नि आदिक निमित्तका किया दुःखं प्रतीति होता है । अरु जब दाहाऽऽदिकों का निमित्त अग्नि आदिक,वाझवस्तु, ज्ञानसे भिन्न न होय तो दांहादिकरूप दुःख प्रतीत न होना चाहिये, परन्तु सो प्रतीत होताहै, एतदर्थ तिस प्रतीति करके बाह्यार्थ है, इस प्रकार हम मानते हैं । अरु जिस करके विज्ञानमात्र विषे क्लेशयुक्त नहीं, अरु अन्य सृक् चन्दनादि कोंके ठिकाने दुःखका अदर्शनहै ताते अर्थात अग्निदाहादिकों से केशकी प्रतीति है ताते, अरु सूक् चन्दनादिकों के ठिकाने दुःखका अदर्शनहे ताते। एतदर्थ ज्ञानसे भिन्न वाह्यार्थ के अभावहुये दुःख की प्रतीतिका अभाव है, ताते । ज्ञान से भिन्न वाह्यार्थ संभव है ताते । इत्यभिप्रायः २४१५१॥
१ २२४ मोडूक्योपनिषद्। निमित्तं न सदा चित्तं संस्टशत्यध्वसुत्रिषु । अनि मित्तो विपर्यासः कथं तस्य भविष्यति २७० १५४॥ कहिये भ्रम होवेगा, क्योंकि तिसकरके रहित वि तिसकी बुद्धि- रूप विपर्यास तिस प्रकार का है ताते, अरु विपास के अंगी- कार किये कहीं भी अविपर्यास कहिये अभ्रांति कहने के योग्यहै, क्योंकि अन्यथा ख्यातिवादियों करके भ्रान्तिको अभ्रान्ति पूर्वक तिसका अंगीकार है ताते ] अर्थाभास भी उक्त चित्तसे भिन्न है नहीं, किन्तु चित्त कहिये 'ब्रह्मचैतन्य, ही घादिरूप अर्थवत् भांसता है। जैसे स्वप्नविणे भासता है तैसे २६ । १५३॥ २७।१५४ हेसौम्य ज्ञानकोविषयींपआश्रयकरकेसहितता. के अभाव हुये तिसके तिसप्रकार होनेकी प्रतीति भ्रान्ति होवेगी, अरु भ्रान्ति जो है सो आभ्रान्तिरूप प्रतियोगीवाली है, इसप्रकार अन्यथा ख्यातिके मतकी शंका लेके कहते हैं ] शंका । ननु, तथ चैतन्यको असत् घटादिको विघटादिक की आभासतारूप चिप- येय (भ्रम) होवेगा, । अरु तैसे हुये कहिंक (किसी भी ठिकाने) अविपर्यक कहने को योग्य है । अर्थात् जब चैतन्य को असत् घ. टादिकों विपे घंटादिको की आभासतारूप भ्रम होवेगा तब तिस भ्रमका प्रतियोगी जो अभ्रम सो भी किसी न किसी विपे कहने - को योग्यही है। तहां उत्तर कहते हैं, [ भ्रान्ति तो अन्यपूफारसे भी होवेगी, इसपूकार कहते हैं । निमित्तंनसदाचित्तसंस्पृशत्य. ध्वसुत्रिपुरी निमित्त तीनमार्गो विपे भी सदा चित्त (चेतन्य) को स्पर्श करता'नहींअर्थात निमित्त जो है विषय सोभत भ- विष्यत् अरु वर्तमानरूप इन तीन मागा (कालों)विप भी चि. त्तास्य चैतन्य को स्पर्श करता नहीं, जब कहीं भी स्पर्श करतष सो परमार्थ से अविपर्यय है । एतदर्थ तिस चित्तके स्पर्शकीया. पेक्षा से असत घटबिपे घटका आभासप पिश्यसि होय हे, परन्तु सो चित्त (चेनन्य) का अर्थ (विषय) से कदाचित्भी स्पर्श गौडपादीय कारिका चतुर्थ प्रकरण । , २२५ तस्मान्नजायतेचित्तंचित्तदृश्यनजायते । तस्यपश्य- न्तियेजातिखेवैपश्यन्तितेपदम् ,२८।१५५॥ , :: नहीं | अनिमित्तो,विपर्यासःकथंतस्यभविष्यति । निमित्तर: तं विपर्यासें तिसको कैसे होवेगा, अर्थात् जव चैतन्यका अर्थ से स्पर्श किसी प्रकार भी नहीं; तातेनिमित्तरहित तिस चित्तको विपर्याप्त कहिये भ्रान्ति कैसे होगी, किन्तु किसी प्रकारसे भी विपास है नहीं। इत्यभिप्रायः। अरु यहहीचित्त (ब्रह्मचैतन्य) को स्वभाव कहिये अविद्याहै कि जो घटादिरूप निमित्तके अवि- द्यमानहुये तद्वत् (विद्यमान हुयेवत) भासना एतदर्थ अभ्रान्तिके अभावसे भ्रान्तिकेंभी असम्भवहुये। अर्थात् जो जिसका सापेक्ष- कहै सो तिसके अभावसे अभाव होताहै। ज्ञानकी असत् घटादि- को विषे घटादिकोंकी ऑभाप्तरूपता निर्वाह करते हैं. २७११५॥ -२६१५५॥ हे.सौम्य! इसप्रकार वाह्यार्थ वादी के पक्षको विज्ञानवादी के मतद्वारा निषेधकरके अब विज्ञानवादका भी नि- पेध करते हैं] "प्रज्ञतेः संनिमित्तत्वज्ञप्तिका निमित्त सहित पनाहै। इससे आदिलेके यहां पर्यन्त विज्ञानवादी जो बौद्ध ति- सकाबाझार्थ के वादीके पक्षके निषेध परायण वचनहें, सो . वार्यने अनुमोदन किया। अब तिसही वचनको हेतुकरके तित विज्ञानवादीके पक्षके निषेधार्थ यह कहते "तस्मान्न जायतेचित्तं चित्तरश्यं न जायतेोताते चित्त जन्मता नहीं जैसे चित्तका दृश्य जन्मता नहीं, अर्थात, जिसकरके विज्ञानवादीने असतही जो घटादिक तिसविषेचित्त.(चेतन्य) को घटादिकों की आंभा- : सरूपता अङ्गीकार किया, सो हमने भी परमार्थ दृष्टि से अनु- मोदन किया। अतएव तित चित्तकी भी जन्मके अविद्यमान हुये ही जानने में आवनहार वस्लुकी आभासरूपता होनेको योग्यहे एतदर्थ चित्त कहिये चैतन्याजन्मता नहीं; जिसे चित्तका दृश्य जन्मता नहीं तेसे। पंतदर्थतिसही चित्तकरके देखने को अशक्य 4 :
. २२६ माडूक्योपनिषद् । अजातंजायतेयरमादजातिःप्रकृतिस्ततः ।' प्रकृतेर न्यथाभावोनकथञ्चिद्भविष्यति २९ । १५६ ॥ चित्तस्वरूपके धर्म, तिसकारणसे .क्षणिकता दुःखरूपता अरु अनात्मरूपता, इत्यादिकों को देखतेहये तस्य पश्यन्ति ये जाति खेवैपश्यन्ति ते पदम्। जो तिसकी उत्पत्तिको देखते हैं सो आकागविषे पादोंको प्रसिद्ध देखते है । अर्थात् जो विज्ञानवादी तिस चित्त चैितन्य की उत्पत्ति को देखते हैं सो आकाश विषे अनहुये। पक्षि आदिकों के पादचिह्नों को प्रसिद्धा देखते हैं। एतदर्थ यह विज्ञानवादी अन्य द्वैतवादियों से भी अत्यन्त विचार शून्यहै । इत्यर्थः । अरु जे शून्यवादी हैं सो भी। सर्वकी शून्यता को देखते हुयेही अपने सिद्धान्तको भी शून्यताकी प्रतिज्ञा करते हैं, सो आकाशको मूठी विषे ग्रहण करने की इच्छा करते हैं । अतएव सो शून्यवादी विज्ञानवादी की अपेक्षा तिससे भी अधि: क्तर विचार शून्यही है २८ । १५५ ॥ २६ ! १५६ ॥ हे सौम्य ! "अजमेकंब्रह्मेति" अजन्मा एक ब्रह्महै ? इसप्रकार जो पूर्व प्रतिज्ञा कियाहै, तिसके कहेहुये है- तुओं से जो जन्मका अनिरूपण तिसकरके सो अजन्मा ब्रह्म सिद्ध हुआ। तिस सिद्ध हुये अर्थक फलकी समाप्ति के अर्थ यह श्लोक है । [ यहां यह अर्थ है कि, जव चैतन्यरूप स्फूर्ति अ. जन्मा इटहे, तब सो ब्रह्मही है, क्योंकि सो एक कूटस्य स. भाव वाला हे ताते अिर्थात् कूट नामे है लोहकार या सुवर्णकार की ऐरन का कि जिसके आश्रय वो सर्व कार्यों को करते हैं अरु यो जहां जैसा है तहां तेसाही निर्यिकार है, तद्वत् निरुपाधि निर्विकार एकरस चेतन्यको भी “कूटपत्तिष्टनीति कूटस्था इस व्युत्पत्त्यर्थ से उसको कूटस्थ कहते हैं। सो पुनः वास्तवसे अजन्माही है, तथापिमायामेजन्मवान् होता भासे है,इसप्रकार जन कल्पना करते हैं, तब तिस कूटस्थ को अर्जन्मा होनेकरके -- . " २२७ - गौडपादीय कारिका चतुर्थप्रकरण ४ । अनादेरन्तवत्वंचसंसारस्यनसेत्सति । अनन्तताचा दिमतोमोक्षस्यनभविष्यति ३०११५७ ॥ तिसकी अनुत्पत्तिही::अजन्मापनाही प्रकृतिः कहिये स्वभाव होताहै. "अजातंजायते यस्मादजातिप्रकृतिस्ततः । जिन सकरके अजन्मा जन्मता है, तिसकरके अनुत्पत्तिही प्रकृति है। अर्थात अजन्माही जो चैतन्य ब्रह्म है:सो जन्मता है, इसप्रकार वादियों करके कल्पनाकिया है । अरु जिसकरके सो चैतन्य ब्रह्म कूटस्थ, अजन्मा जन्मता है, एतदर्थ तिसकी अनुत्पत्ति प्रकृति. कहिये स्वभावहै।ताते प्रकृतेरन्यथाभावो नकथञ्चिन्द्रविष्यतिः। प्रकृतिका अन्यथाभाव: किसी प्रकारसेभी होतानहीं, अर्थात् जाते चैतन्य ब्रह्मकी अनुत्पत्तिही स्वभाव: प्रकृतिः, है ताते सो अनुत्पन्नतारूप प्रकृतिका अन्यथाभाव कहिये उत्पत्ति । जन्म किसी प्रकारसे भी होता नहीं॥ इति सिद्धम् ॥ २४ । १५६॥ ३०१,५७॥ हेसौम्य आत्माके विपे संसार अरु मोक्ष, इनके परमार्थसे सद्भावके माननेवाले वादियोंको यह दूसरादूषण कह; तेहैं। पूर्वधानहीं, इस अवच्छेदसे रहित अनादि संसारकी अन्त वानता कहिये समाप्ति युक्तिसे सिद्धन होगी। अरु जिस करके लोकविषे अनादिहुआ कोईभी पदार्थ,अन्तवान् देखानहीं, एतद- थै यहाँ यह अनुमानहै कि विवादका विषय जोसंसार सोअन्त- वान नहीं क्योंकि श्रात्मावतु अनादि भावरूपहेत्ताते यह अर्थ घटित है । अरु जो ऐसाकहे किवीज-अरु अंकुरका हेतु अरु फल भावसे जो सम्बन्धहे, तिसके सन्तानके अनादिभावरूप हयेभी .तिसका अन्त देखते हैं ताते, संसारकी अनन्तताके साधने बिपे अनेकान्तिकतेति" अनादिहोनेसे यह जो हेतु कहा तिसको व्यभिचारवानता,है।सों कथन बने नहीं, क्योंकि वीज अरु अंकुर के सम्बन्ध के संतानरूप वस्तुको एकरूपताके अभावकर के पूर्व इसप्रकरणके २० वें श्लोकसे निषेधक्रियाह। अरूं. अनन्तताचा- २२८ मांडूक्योपनिषद ... 'श्रादावन्तेचयन्नास्तिवर्तमानेऽपितत्तथाावित सहशाःसन्तोऽवितथाइवलक्षिताः ३१ । १५८ दिमतो मोक्षस्यनभविष्यति। आदिवाले मोक्षकी भी अन्तता न होगी अर्थात् तैसे ज्ञानकी प्राप्तिकालविपे उत्पत्तिरूपआदिवालें मोक्षकी अनन्तताभी न होगी, क्योंकि आदिवाले घटादिको विषे अनन्तताको देखते नहीं। अरु जोकहे कि घटादिक नाशवान हैं क्योंकि अवस्तुरूप हैं ताते, इसप्रकार मानहुये दोष नहीं, तो तैसाहोने से परमार्थसे मोक्षके सद्भाव प्रतिज्ञाकी हानिहोवेगी -अरु मोक्षको शशश्रृंगवत् असत् होतेही तिसके आदिवान्पनेको (ज्ञानसे उत्पत्तिका) अभाव होवेगा ३०।१५७ ॥ ३१।१५.८॥हेसौम्य! विादी कहताहतवमोक्षकों आदिअन्त वान्पना होहु,। तहां सिद्धान्ती कहताहै, आिदावन्तेचयन्नास्ति वर्तमानेऽपितत्तथा, वितथैःसदृशाःसन्तोऽवितथाइवलक्षिताः जो आदि अरु अन्तविपे नहीं है सो वर्तमानविय भी नहीं, जैसे मिथ्यावस्तुके सदृशहुयेभी सत्यवत् जानते हैं, अर्थात् मृगजला दिक वस्तुआदि अरु अन्तविपे हैनहीं सोअपने वर्तमानसमयभी तैसेही आदि अन्तवत्ही,नहीं । अिथवाजोवस्तु अपने अभाव हुये है नहीं, सोअपनी उत्पत्तिसे पूर्व भी नहीं अरु जो अपनेआदि अन्समें नहीं सो अपने वर्तमान कालमेंभी नहीं"अव्यक्तादीनि भूतानि" इत्यादि गीतोक्तिप्रमाणसे जैसे यह दृष्टान्तहे तैसेमोक्षा- दिक पदार्थभी सिम्यक् ज्ञानकरके जन्य होनेसे मिथ्यावस्तु के तुल्य है, तथापि उसको मढ़ पुरुष सत्यवत् जानते हैं। अर्थात् सत् शुद्ध स्वरूप आत्माविपे जो भ्रान्तिमात्र बंधहे सों अविवेकी को सत्यवत् भासताहै, तैसेही भ्रान्तिरूप बन्धका प्रतिपक्षी(सा. पेक्षिक)जो मोक्ष सोभी भ्रान्तिरूप असत है तथापि सो भी अविवेकी पुरुपोंको सत्यवत् भासताहै | ३१ । १५८ ॥ - १६३।१५६॥हेसौम्य!शिंकाराननु,मृगंजलादिकाले स्नानपाना- F . गौडपादीय कोरिका चतुर्थ प्रकरण ४। २.६६ संप्रयोजनतोतेषांस्वप्नेविप्रतिपद्यते । तस्मादाद्यन्त चत्वेनमिथैवखलुतेस्मृताः ३२।१५॥ दिरूप प्रयोजनकी अप्रतीति (असिद्धि) से सिौ मिथ्याहै, परन्तु 'मोक्ष अरु स्वर्गादिकों के सुखादिकों की प्राप्तिरूप प्रयोजन की प्रतीतिहै, ताते मोक्षादिकोंको मिथ्यापना नहीं, । यह शंकाकरके समाधान, कहते हैं सिंप्रयोजनतांतेषां स्वप्नेविप्रतिपद्यते। तिन की सप्रंयोजन संहितता स्वप्नवि विपर्ययको पावती है, अर्थात् तिन मोक्षादिकोंकी सप्रयोजनता स्वप्नविविपर्ययको प्राप्त होती है। अरु जैसे स्वप्नविषे देखेहुये पदार्थोकी विपरीतता(असत्यता) जाग्रत् विषे होती हैं। अर्थात् स्वप्नमें यह स्वप्नहै अरु मिथ्याहै ऐसी प्रतीत होतीनहीं अरु जब जाग्रतको प्राप्तहोताहै तब जाग्र- - तसे स्वप्नकी विपरीतता प्रतीतहोती हैतैसे जाग्रत्विषे देखेहुवे पदार्थोकी विपरीतता स्वप्नविषे होतीहै । अर्थात् जाग्रत्से विप- रीत स्वम हे अरु स्वमसे विपरीत जाग्रत् है इस कहने से स्वप्न 'विर्षे जायत नहीं अरु जाग्रत् विषे स्वप्न नहीं, अतएव ये दोनों पर स्पर विपरीत व्यभिचारी होनेसे मिथ्या हैं । यह अर्थहै । अरुति- स्मादायन्तयत्त्वेन मिथैवखलुतेस्मृताः। तस्मात् आदि अन्तः वान् होनेकरके तिनको निश्चयकरके मिथ्याही जाना है, अर्थात् तिस जिाग्रत अरु स्वप्न के परस्पर विपरीत व्यभिचारीपने के दृष्टा न्ती करके आदि अरु अन्तवान् होनेसे,विवेकी पुरुषों ने निश्चय करकें मोक्षादि सर्व मिथ्याही जानेहें। शिर्थात् जाग्रत् अरु स्वप्न वेत, बंध अरु मोक्ष यहभी परस्पर विपरीत व्यभिचारी, अरुसा- . पेक्षिक होनेसे मिथ्या,, अरु जैसे जाग्रत् स्वप्नका परस्पर व्यभि- चारहे,तेसे उनका एकसाक्षी आत्मासे भी व्यभिचारहे,तैसेहीइन वन्ध अरु मोक्षका परस्पर, अरु अव्यभिचारी निक्ष सत्य एक रूप आत्मासे, व्यभिचारहै, तोते ज्ञानवानोंने इन वन्ध अरु मोक्ष दोनों को निश्चयस मिथ्याकरकेही जाना है।। अरु यद्यपि..यह २३० :-माडूक्योपनिषद् ।- ' ::: सर्वेधर्मामृषास्वप्नेकायस्यान्तर्निदर्शनात् । संवत्ते ऽस्मिन्प्रदेशेर्वभूतानांदर्शनंकुतः३३ । १६०. दोनोंश्लोक द्वितीय प्रकरणमें व्याख्या किये हैं, तथापि यहांबंध अरु,मोक्षके अभावके प्रसंगसे पुनः पठनकिये हैं।, ताते यहां पुन- रुक्तिदोप विचारणीय नहीं ३२११५६ ।। - " ३३।१६० हे सौम्य ! " निमित्तस्यानिमित्तत्वमिष्यतेभूतदर्श नात् । परमार्थके देखनेसे निमित्तका अनिमित्तपना हमों करके अंगीकार किया है, यह २५ वें श्लोकविषे कथन किया,जो अर्थसो अव इन श्लोकोंसे विस्तारित करते हैं। जिस हेतुकरके स्वप्नका मिथ्यापना इष्टहै तिस हेतुको जाग्रत् विपेभी तुल्यहोनेसे जिायत् काभी मिथ्यापना इष्टकरके अजन्मा ( जन्मादिविकार रहित) ज्ञानमात्र तत्त्वही अंगीकार करनेयोग्यहै, इस कहनेके अभिप्राय से,कहतेहैं] सर्वधर्मामृपास्व कायस्यान्तर्निदर्शनात् । स्वप्न विषे सर्वधर्म मिथ्या है शरीरान्तर होनेसे अर्थात् जब शरीरान्त- रहोनेसे स्वप्नके सर्व पदार्थ असत्य हैं, तब विराट के शरीरान्तर सर्व जगत्के देखनेसे तिसका मिथ्यापना निवारणकरनेको शस्य नहीं। अर्थात् बृहदारण्यक,उपनिपद् विपे, शरीरके अन्तर एक खड़े केशके सहस्रवें भाग प्रमाण हितानाम्नि नाड़ियांहें तिनमेंसे एकनाड़ी के अन्तर स्वमजगत् भासता है, परन्तु स्वप्नके पर्वत सागरादि सहित जगत् के होने प्रमाण देशकाल वस्तुका अति संकोच अभाव होनेसे, अरु तिस नाड़ी के अन्तर भी महासक्षम आत्माकी पूर्णता से, एकठिकाने दोवस्तु रहे नहीं इस न्यायसे, उस नाडीके अन्नरस्थानादिकों के अभावसे वहां भासमान जो स्वमजगत् सो भ्रान्तिमान होनेसे असत् है । तेसेही इस जाग्रत् जगत्को विराट के शरीरान्तर होनेसे अरु तहाँभी इस व्यष्टिशरी- सत् देशकालादिकोंके संकोचसे अरु चेतन्य आत्माकी पूर्णव्या तिसे यहदृश्यमान जो जाग्रत् जगत् निसकोभी भ्रान्तिरूपहोने - गौडपादीय कारिका चतुर्थ प्रेकरण ४ । नियुक्तंदेर्शनं गत्वाकालस्यानियमाद्तौ । प्रतिबुद्धः श्चवैसर्वस्तस्मिन्देशेन विद्यते ३४॥ १६१ ॥ से तिसका मियोपना निवारण करनेको शक्य नहीं । अरु जो ऐसाकहो कि यह समस्त जाग्रत् जगत् विराट्रका वपुहै, विराट् के शरीरान्तर स्वप्नवत् नहीं, ताते असत्भीनहीं, तो श्रवणकरो हे सौम्य! आकाशसे भी महासूक्ष्म आत्मतत्व घनशिलावत् पूर्ण- तासे व्याप्त हैं, उससे खालीस्थान जगत्के रहनेको कोई नहीं, अरु एकठिकाने दोवस्तु रहेनहीं इसन्याय प्रमाण देखने से उस परिपूर्ण अखंड चैतन्यविपे उससे रीते स्थानके अभावसे आका- शादि सत्र जगत् उस अधिष्ठान तत्त्वविषे जुमें सर्पवत् अध्यस्त होने से भ्रान्तिरूप असत्यही निश्चयकरने के योग्यहै । यह अर्थ. है, किंवा, जब योग्य देशके अभावसे स्वप्नको मिथ्यापना दृष्ट है, तब प्रत्यगात्मा से अभिन्न अखंड एक रस अवकाश रहित इस ब्रह्मरूप देशविषे प्रसिद्ध विद्यमान वस्तु का दर्शन कहाँसे होगा, किन्तु ब्रह्मको आपसे इतर अवकाश रहित होनेसे किसी प्रकारसे भी उसविषे अन्यका दर्शन वनेनहीं, । अरु जिस करके स्थान विना जगत्का दर्शन होता है , तातेस्थान बिनाके स्वप्नवत् जाग्रत् जगत् भी मिथ्या है। यह इसका अर्थ है '३३ । १६०॥ १३४॥ १६ ॥ हे सौम्य ! अब उक्तार्थको ही वर्णन करते हैं "नयुक्तंदर्शनंगत्वा कालस्यानियसागतोगति विषे काल के अनियमसे जायके दर्शनयुक्तनहीं अर्थात् जैसे स्वप्नविषे देशान्तर को जाने में कॉलके अनियमसे देशान्तरको जायके देखना युक्त नहीं अर्थात् स्वप्न में जो अनेक योजनोंके। अन्तरवाले देशान्तर वा दीपान्तरको अरु तहाँके पदार्थोको पुरु देखता सो शरीरसें बाह्य उन देशान्तरवा दीपान्तरमें जायके देखता नहीं क्योंकि जाग्रत्को त्यागके स्वानको प्राप्त होने के मध्य इतना दीर्घ काल नहीं जो उन देशान्तरके प्राप्त होने में चाहिये, किन्तु शनैशनैः २३३ ITEमांडूक्योपनिषद् । जाग्रत्की निवृत्ति अरु स्वप्नकी प्रवृत्तिः प्रायः समकालही होती है, अरु तैसेही,स्वप्नकी निवृत्तिके. समकालही जायतकी प्राप्ति होती है ताते जागत्से स्वप्नमें जाने अरु स्वप्नसे जाग्रतमें आवने के मध्य इतना दीर्घकाल नहीं जो स्वप्नमें देहसे वाह्य देशान्तर को जाय अरु आवे तैसे जाग्रत विपे भी मरणोत्तरी अचिरादि मार्गसे जायके ब्रह्मका दर्शनःयुक्त नहीं, क्योंकि ब्रह्म जो है सो काल : अरु देश, के. अबच्छेदसे रहित अर्थात् यहां जो स्वमके दृष्टान्तसे जाग्रत्विषे मरणोत्तर अचिरादि मार्ग से जायके ब्रह्म के दर्शन युक्तं नहीं ऐसा कहाहै सो अस्तु परन्तु अर्चिरीदि उत्तः रायण-मार्ग के साधनेवालेको ब्रह्मात्माके अभेद ज्ञानीवत् शरीर से उत्क्रमण (निकसे)बिना यहांहीं ब्रह्मैवसन्ब्रह्माप्येति । नि- -विशेष ब्रह्म भावकी प्राप्तिवत्, ब्रह्म प्राप्ति नहीं; किन्तु उसको.. चिरादि क्रमसे ब्रह्मलोक प्राप्तिहै, ताते उसका मरणोत्तर बाह्य गमन युक्तहै "यचेमेऽरण्ये श्रद्धांतपइत्युपासते तेऽर्चिपमभिस. म्भवत्यचिपोऽहरह्र आपूर्यमाण यक्ष्मापूर्यमाणपक्षाद्यान् पडुद- ड्रेतिमासाधंस्तान् । मासेभ्यःसंवत्सर, संवत्सरादादित्य मादित्यांच्चन्द्रमसं चन्द्रमसोविद्युतं तत्पुरुषोमानवासएनां ब्रह्म ग़मयत्येपदेवयानःपन्था इति" " तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेतीति इत्यादि प्रमाण से अचिरादिकों के. उपासकको साक्षात् मोक्ष प्राप्ति न होयके उसको सुपुम्णानाडीके मार्ग देहसे उत्क्रमणहोय देवयान मार्गकी रीतिसे ब्रह्मलोक प्राप्ति अरु ब्रह्माके साथ.सा. पेक्षिक मोक्ष है , ॥ किंवा ॥"प्रतिबुद्धश्चवेसर्वस्तस्मिन्देशे नविद्यते। सर्वजन प्रबोधको पाया हुआ तिस देशयि विद्य- मान होता नहीं? अर्थात से सर्वजन जिस देशविषे स्थितहाय सोये हुये स्वप्नोंको देखते हैं सो पुनः प्रवोध (जायत्) को पाय के तिस देशविपे कि जिन देशान्तर वा द्वीपान्तरोंको स्वनमें दे. खताहै, स्थित होतानहीं। इसप्रकार होने से स्वमका मिथ्याप- नाही यांदित है । तैसे जाग्रधिपेभी जिस देहरूप देशवि स्थित - " गौडपादीय कारिका चतुर्थ प्रकरण ४ । मित्राद्यैःसह सम्मन्त्र्य सम्वुदो न प्रपद्यते। गृहीत श्वापि यत्किञ्चित् प्रतिबुन्दो न पश्यति ३५, १६२.॥ हुआ पुरुष.-संसारको अनुभव करताहै, पुनः ब्रह्मभावको पाया हुआ तिस देहरूप देशविषे स्थित नहीं है, क्योंकि परिपूर्ण ब्रह्मरूप होयके स्थित हुआहै। एतदर्थ जामतुका भी मिथ्यापना अंगीकार करने योग्य है । इस श्लोक का तात्पर्य्यरूप अर्थ यह है कि जाग्रतत्विषे गमनागमनके काल लो नियमितहैं.अरु जो देश प्रमाणसे हैं, तिनके नियमसे स्वप्नविषे देशान्तरको गमन होने नहीं, किन्तु देहके भीतर देशान्तरादि प्रपंच देखते हैं, तैसे जा: प्रविषे भी घटित हैं, याते तिन जाग्रत् अरु स्वप्न दोनों को तुल्यहोने से, उन दोनों का मिथ्यापनाभी तुल्यहीहै ३४।१६१॥ ३५११६२॥हे सौम्य! जैसे स्वमविषे विसंवादसे.अर्थातनि फल प्रवृत्तिके जनक भ्रमरूपतासे, अप्रमाणपनी इच्छित है, तैसे ही जायविषेभी ब्रह्मवादियोंके साथ मिल विचारकरके अविद्या निद्रासे सम्यक्प्रकार प्रबोधको पाया जो पुरुष, सोपुरुष परम श्रेया हमोंकरके साधनेयोग्यहै, विश नहीं। इसप्रकार विचार किये मोक्षके साध्यभावको जानता नहीं अिर्थात् ब्रह्मवेत्ताओंका सत्र संगी सम्यक् विचारवान आत्मानुभावि पुरुष मोक्ष हमों करके १ साधनेयोग्य है इस भावको जानता नहीं क्योंकि उसको सत्- संगके प्रभाव से आत्माकी एकता के अनुभवहुये सबकी नित्य मुक्तताका निश्चयहै ताते । एतदर्थ मुमुक्षपना अरु श्रवणादिसा: धनों की कर्तव्यताभ्रान्तिसेही है, इसप्रकार कहते हैं] मित्रास हसम्मन्न्य सम्बुद्धो न प्रपद्यते, गृहीतश्चापि यत्किञ्चित् प्रतियु दोन पश्यति मित्रादिकोंकेसाथ गुप्तभाषणकरके प्रबोधकोपायाः हुआ पावतानहीं, अरु ग्रहणकिये जिस किप्तीकोभी देखतानहीं, अर्थात स्वमविष मित्रादिकों के साथ गुप्त भाषण करके प्रबोधको , पायाहुआ:पावता नहीं। अरु [किंवा स्वप्नवत् अनुभवकिये उप- मांडूक्योपनिषद् । : ' रवप्ने चावस्तुकः कायः पृथगन्यस्य दर्शनात् । यथा कायस्तथा सर्व चित्तदृश्यमवस्तुकम् ३६ । १६३ ॥ देशादिकों को विद्वान देखता नहीं, क्योंकि तिस विद्वान् करके साध्य फलका अभावहै, उिससे श्रेष्ठ अरु अन्य कुछभी न होनेसे इसप्रकार कहते हैं] ग्रहणकिये जिसकिसको अर्थात् स्वप्नबिये ग्रहणकिया जो कुछ। सुवर्णादिपदार्थ तिनकोभी देखता (पावता) नही, अरु गया हुआ देशान्तरके ताई जातानहीं। अर्थात् स्वप्न चिपे जिन देशान्तरको जाता है, तिन देशान्तरको जाग्रत् हुआ जातानहीं ३५॥ ९६२॥ ३६ | १६३॥ हे सौम्य! [किंवा स्वप्नावस्था विपे जिस शरीर करके नदी अरण्यादिकोधिपे पिचरता है, सो मिथ्या है, क्योंकि तिस स्तमगत देहसे भिन्न निश्चल जायतगत शरीर को देखतेहैं, तैसे जायत् विपे भी जिस संन्यासी आदिक शरीरसेलोकोंकरके पूजने योग्य वा उपकरने योग्य देखते हैं, तिप्तको मिथ्या कहते हैं, क्योंकि तिस शरीरसे पृथक् ब्रह्मनामवाला कूटस्थरूप शरीर का यथार्थ अनुभवहे ताते, इसप्रकार कहते हैं स्वमे चापस्तु क. कायः पृथगन्यस्य दर्शनात स्वप्नधिपे जो शरीर हे सो अवस्तु रुप है, अन्य से पृथक् देखने से अर्थात् स्वप्नविपे अर- प्यादियों में भ्रमताहुआ जो शरीर देखते हैं सो अवस्तुरूप है, क्योंकि तिस स्वप्न के शरीर से पृथक् जाग्रत् का शरीर देखते हैं ताते यिथा कायस्तथा सर्व चित्तदृश्यमवस्तुकम्। जैसे शरीर तेसे चित्त का पृश्य सर्व अवस्तुरूप है, अर्थात् जैसे स्वप्नका दृश्य शरीर असत् है तमे जाग्रत् विष भी सर्व चित्तका दृश्य अव. मनुरूपही है, क्योंकि चित्तका दृश्य ( करिपन हे ताने । अम्बन के तुत्य होने से जाग्रत् भी अमत्यही है, ऐसा इस प्रकरण का अर्थ ३६ । १६३ ।। ३७ १ १६५ ॥ हे सोच [जमे जायत को अनुभव करने हैं, गौडपादीय कारिका चतुर्थ:प्रकरण ४॥ ग्रहणाजागरितवत्तहेतुःस्वप्न इष्यते । तहेतुत्वात्तु तस्यैव सजागरितमिष्यते ३७। १६४॥ तैसे स्वप्न को भी अनुभव करते हैं। अरू स्वप्न को जाग्रत्का कार्य होनेसे जो स्वप्नका द्रष्टा है तिप्तहीका जाप्रती स्वप्नरूप कार्य हुआ विद्यमान है । अरु स्वम असत् है । एतदर्थ स्वप्नवत जा- अत् का मिथ्यापनाही है। इस प्रकार कहते हैं। इस कहने के हेतु से भी जाग्रत् की वस्तुका असत्पना है ग्रहणाजागरित बत्त हेतुः स्वप्न इष्यते । जाग्रत्वत् ग्रहणसे तिस-हेतुवाला स्वप्न अंगीकार करते हैं अर्थात् जायत्वत् ग्राह्य ग्राहक रूपसे स्वन- के ग्रहणसे तिस जाग्रतरूप हेतुवाला जिाग्रत् का कार्य) स्वप्न अंगीकार करते हैं, किंवा, जाग्रतका अनेक पुरुषों को साधारण होने रूप जो विद्यमानपनाहे सोबास्तबसे है नहीं, क्योंकि स्वम का कारण है ताते, किन्तु, तैसे अनेक को सांधारणा होनेवत् भासमानपना है, इसप्रकार कहते हैं । तिस हेतुबाला होने से (जायतका कार्य होनेसे ) तिसही स्वप्नके द्रष्टाको जाग्रत् सत्य अंगीकार करते हैं, अन्योंका नहीं जैसे स्वम है। प्रमाता के होते बाध्य होनेरूप-स्वमका मिथ्यापना है, अरु जाग्रत को, (पुनः तिस वाध्यहोने की अप्रतीति से परमार्थ से सत्पना है, अरु कार्य को मिथ्यापने के हये कारणको भी-मिथ्यापना है, इस विषेप्र- माणके अभावसे सर्वको साधारण अरु विद्यमान जो जाग्रत् सो मिथ्याहोने के योग्य नहीं। यह शंकाकरके कहते हैं 1 यह अभि- प्राय है, जैसे स्वमजो है सो स्वप्नके द्रष्टाकोही. सत्य है, अर्थात् साधारण विद्यमान वस्तुवत् भासता है, तैसे तिस जागत् रूप कारणवाला होनेसे तिस स्वमका स्वमके द्रष्टाकोही. साधारण "विद्यमान वस्तुवत भासताहै, परन्तु साधारण विद्यमान जीवस्तु है सो स्वमवत् है नहीं। यह इसका अभिप्रायहे ३,७॥ १६४॥ ३८।१.६५ ॥ हे सोम्य! [स्वप्न अरु जाग्रत् के कार्य कारण :
। - ܩ २३६ मांडूक्योपनिषदे । उत्पादस्याप्रसिद्धत्वादजंसमुदाहृतम् । नचभूता दभूतस्य संभवोस्ति कथञ्चन ३८ । १६५ ॥ भावके हुये भी दोनोंका मिथ्यापना तुल्य नहीं क्योंकि सो पर- स्पर अत्यन्त विलक्षणहै । यह शंकाकरके कहते है ] शंकानिनु, 'जागत्के पदार्थको स्वप्नकी कारणताके हुये तिस जागत्के प- दार्थ का स्वप्नवत् अवस्तुपना न होवेगा, क्योंकि जिसकरके स्वप्न अत्यन्त अस्थिर है अरु जागत्को स्थिर देखते हैं, अतएव तिनकी परस्पर विलक्षणता है ताते। तहां सिमाधान। कहते हैं। हेबादी! तिसप्रकारका अनुभव अविवेकी पुरुषोंको होता है, यह तेरा कथन सत्य है, परन्तु विवेकी पुरुषोंको तो किसी भी वस्तुकी उत्पत्ति प्रसिद्ध है नहीं उत्पादस्याप्रसिद्धत्वादजं सर्व मुदाहृतम् । [उत्पत्तिको अप्रसिद्धहोने से सर्व अजन्मा कहाहै] अर्थात् विवेकी पुरुषोंको किसी भी पदार्थकी उत्पत्ति प्रसिद्ध नहीं, एतदर्थ उत्पत्तिको अप्रसिद्धहोनेसे अज आत्माही सर्व है "सवा ह्याभ्यन्तरोयज.” 'पाहर भीतर सहित है अरु अजन्मा है' इस श्रुतिके प्रमाणसे । इसप्रकार वेदान्तों विपे सर्व अजन्माहीकहा है। अरु सवरूप जाग्रत्से असरूप स्वप्न उपजाता है, इस प्रकार तू मानताहे, तथापि सो जाग्रत् । असतही है । क्योंकि निच भूतादभूतस्य संभवोस्ति कथश्चन । विद्यमान से अविद्यमानका किसीप्रकार से भी संभव नहीं ] अर्थात विद्यमान पदार्थ से अ विद्यमान वस्तुका फिसीप्रकार से भी संभवहोना संभव नहीं। अरु लोक विपे असत्यरूप शशशृंगादिकों का किसीप्रकार से भी 'सेभव होतानहीं अरु देखा भी नहीं ३८। १६५ ॥ । ३६ । १६६॥ हे सौम्य ! शंका । ननु, हे सिद्धान्ति तूनेही तो ३७वें श्लोकवि स्वप्न जायतका कार्य है इसप्रकार कहाहे तब उत्पत्ति अप्रसिद्ध है ऐसा कैसे कहता है, । तहां समाधान कहते हे पादी। जिमप्रकार कार्य कारणभार हमांकरके कोने को -~ गौडपादीयं कारिका चतुर्थ प्रकरण ४ । असज्जागरिते दृष्ट्वा स्वप्ने पश्यति तन्मयः। असत् स्वप्नेऽपि दृष्ट्वा च प्रतिबुद्धो न पश्यति ३९ । १६६॥ नास्त्यसद्धेतुकमसत्सदसद्धेतुकन्तथा । सच्चसहेतुके नास्तिसहेतुकमसत्कुतः ४०।१६७ ॥ इच्छित्तहैं, तैसे कहतेहैं, सो तू सावधानहोय. श्रवणकर अिसज्जा गरितेदृष्ट्वा स्वप्ने पश्यति तन्मयः । [जाग्रत् विपे असत्को देखके सन्मय हुआस्वप्नविषेदेखता है अर्थात् असत् (रज्जुसर्पवत्कल्पित) वस्तुको देखके तिसके भावकी भावना करके युक्त वा तिस अ. सत् वस्तुके ज्ञानके दृढ़ संस्कार करके युक्तं तन्मय हुआ पुरुष जाग्रत्वत् स्वप्नविषे ग्राह्य अरु ग्राहक (विषय अरु इन्द्रिय) रूप से कल्पना करता हुआ देखताहै, [जैसे जागविषे देखेहुये प्र. पञ्चको स्वप्नवि देखने से जामत्की वासनांके आधीन जो स्वप्न सोजाग्रत् का कार्य होने करके व्यवहार करते हैं, तैसें स्वप्नविषे देखेहुये प्रपंचको जाग्रविषेभी देखनेसे जाग्रतको तिस स्वप्नका कार्यपना सिद्ध होता है, यह शंका करके श्लोकके उत्तरार्द्ध को कहते हैं (व्याख्यान करते हैं)] तैसे अिसत्स्वऽपि दृष्ट्वा च प्रतिबुद्धो न पस्यतिस्वप्नविषे असत्को देखके जाग्रत्को प्राप्त हुआ देखता नहीं है अर्थात् 'जैसे जाग्रत् असत् पदार्थों में त- न्मय हुआ स्वप्नविर्षे तिनको देखताहै, तैसे स्वप्नधिपे भी असत् अविद्यमान, वस्तुको देखके जाग्रत् को प्राप्तहुआ पुरुष कल्पना न करताहुआ देखता नहीं, अरु तैसे कदाचित् जागत् विषे भी देखके स्वप्नविषे नहीं देखता है, यहअर्थ श्लोकके चकारसें वोधित है। ताते विशेषकरके स्वामको जाग्रतकी वासनाके आधीन होने से, जापतको स्वग्नका हेतु, इसप्रकार कहते हैं, परन्तु सो जा- ग्रत् । परमार्थसे सत्य है ऐसे करके कहते नहीं ३६।१६६ ४०।१६७ ॥ हे सौम्य [व्यवहार दृष्टि से जाग्रत् अरु स्वप्नका कार्य कारणपना कहा, अरु वास्तवदृष्टिस तो कहीं भी कार्य का.
२३६ 1 -- मांडूक्योपनिषद् ! रणपनाहै नहीं। इसप्रकार कहतेहुये वस्तुके अज्ञानसे अवस्तुही कार्यहोताहै,ऐसे कहनेवालेके मतका निषेध करतेहैं,] परमार्थसे तो किसीका भी किसीभी प्रकारसे कार्य कारणभाव संभवता 'नहीं। प्रश्न । कार्य कारणभाव कैसे नहीं संभवे.है,। उत्तर। तहां प्रथम , जो वस्तु के अज्ञानसेही अवस्तुरूप कार्य होता है, ऐसे माननेवाले • पुरुषोंप्रति-कहते हैं, नास्त्यसद्धेतुकमसत्-सद सहेतुकन्तथा । [असत् हेतुवालेको असत्-कहते हैं सो है नहीं, सत् असत् हेतुवाला है नहीं-] अर्थात् असत् जो शशगादिक सो जिस असत्काही कारण है ऐसे जे आकाशके पुष्पादिक ति- नको असत् हेतुवाला असत् कहतेहैं सो है-नहीं । अरु शन्यवादी तो " असतः सज्जायते” इस विकल्पकी श्रुति प्रमाण से शन्यसेही सतरूप कार्यहोता है इसप्रकार मानते हैं, अब तिनके प्रति कहते हैं, जैसे सत् विद्यमान, घटादिरूप वस्तु भी असत् हेतुवाला अर्थात् शश शृंगादिकोंका कार्य होतानहीं [अर्थात् अभाव (असत् ) रूप जे शशाके श्रृंग सींग) तिसका कार्य भावरूप, सत्य, धनुप किसीने भी कहीं भी किसी कालविषे भी देखानहीं, ताते अभावरूप शून्य कारणसे भावरूप सत्य कार्यकी उत्पत्ति कहनी माननी असतही है।अब कारण अरु कार्य दोनों के सद्भाव के माननेवाले से सारख्यादि वादी तिनके प्रति कहते हैं में सच्च स तुकं नास्ति सद्धेतुकममकुतः [. सत्, सत् हे. तुवाला नहीं, तब सतरूप हेतुबाला असत् केसे होगा, कदापि होता नहीं, ] अर्थात् । सांस्यवादी कारण-प्रधान अरु तिसका कार्य सूक्ष्म स्थूल प्रपंच, इन दोनोविपे सद्भाव मानते हैं कि सत् कारण से सत् कार्य होताहै। तिनके प्रति कहते हैं, जैसे सत् विद्यमान घटादिक सत् हेतुवाला अर्थात् अन्य सत्वस्तुका कार्य नहीं । अर्थात् सत् उसको कहतेहैं जो उत्पत्त्यादि रहित वाल- प्रयमवाध्य सदा एकरसरहे सो सत्, अम प्रधान कार्यरूप से उत्पन्न होनेवाला ताते सत् नहीं, अरु कार्य अपनी उत्पत्ति से पूर्व . .
. गौडपादीय कोरिका चतुर्थ प्रकरण ४ । २३६ अरु लयके पश्चात् अभावरूप होनेसे उत्पत्ति अभाववालाहुआ कदापि सत् होने के योग्य नहीं, तांते कार्य, कारण उभय विसतः भावनाके करनेवालेका मत सत्: नहीं अब कोई..एकवादी इस मिथ्या प्रपंचरूप सृष्टिका-संवरूप ब्रह्मकारण है, अर्थात.. सतरूप ब्रह्मसे यह मिथ्यासृष्टि उत्पन्न होती है, इसप्रकार वर्णन करते हैं, तिनके प्रतिनिषेधकरते हैं कि, तैसे सतरूप हेतुर्याला (सत्काकार्य) कैसे संभवेगा। किन्तु कदापि नहीं। अर्थात् जो सत होतीहै सो कार्य भावको प्राप्तहोता नहीं क्योंकि एकरंस सतरूपा है ताते, अरु सत्से असत्कार्य, अर्थात् सत्का कार्य : असत् होतानहीं क्योंकि कारण सदप है, अरु कार्यरूपाप्रपंच असत् है, ताते सो सत्का कार्य होने के योग्य नहीं, तातेस रूप ब्रह्म अरुं असत् प्रपंच इनका कार्य कारण भाव युक्तनहीं। अरुं जो कहो कि "सदेवसौम्येदमग्रआसीत" इत्यादि श्रुतियोंने इस सृष्टिका कारण सत्कहा है, तो तिन श्रुतियों का तात्पर्य का- कारण भाव वाहने का नहीं किन्तुएक अद्वैत आत्मतत्व के प्रकाशनार्थ है, क्योंकि वाचारम्भणा विकारो नामधेयं । इत्यादिश्रुतियोंने कार्यको वाचारम्भण (कहने) मात्रही कहाहै पृथक् सत्तावाला नहीं, ताते “ मृत्तिकेत्येवसत्यं । एकमृचिकाः ही सत्यहै, इस दृष्टान्तसे एकसर्वाधिष्ठान संतआत्माही सत् है, ऐसे कहके। एतदात्म्यमिदर्थ सर्व तत्सत्य सआत्मान्तत्वमा सि। इस उपदेश से कार्याकारण भाव भेद रहित एक अद्वैत आस्मतत्त्र प्रकाशित किया है । ताते सतरूपाब्रह्मका असरूप. सृष्टिकार्यहै यह कथन अयुक्तहै।। अरु अन्यप्रकारका कार्यकारणं भाव सम्भवे नहीं, वा कल्पनाकरनेको शक्या नहीं, एतदर्थ विवे. की पुरुषों को किसीभी वस्तुको कार्याकारण भाव सिद्ध नहीं?". इत्यभिप्रायः॥.४०।१६७-31 ४१।१६८॥ हे सौम्य! पुनःभी असरूप जाग्रत् अरु स्वप्नके पदार्थों से कार्य कारण भावकी शङ्काको अन्य हेतुसे दूरकरतेहुये २४० मांडूक्योपनिषद् । विपर्यासाद्यथा जाग्रदचिन्त्यान् भतवत् स्प्टशेत् । तथा स्वप्ने विपर्यासान्दस्तित्रैव पश्यति ४१।१६८॥ 'उपलम्भात् समाचारादस्तिवस्तुत्ववादिनाम् । जाति स्तु देशितात्रुदैरजातेस्त्रसतां सदा ४२ । १६६ ॥ कहते हैं " विपर्यासायथाजाग्रदचिन्त्यान् भूतवत् स्पृशेत् । जैसे जाग्रत्विषे विपOससे अचिन्त्य परमार्थवत् स्पर्शकरता है, अर्थात् जैसे कोईपुरुष जायविपे विपर्यास कहिये अविवेक से अचिन्त्य कहिये चिन्तन करनेको अशक्य, रज्जु सादिक पदार्थोंको परमार्थवत् स्पर्श करता है । अर्थात् स्पर्श करतेहुयेवत् विकल्प करताहै तथा स्वप्ने विपासाद्धम्मास्तत्रैव पश्यति। तैते स्वप्नविपे विपर्याससे धर्मोंको तहांहीं देखता है, अर्थात् जैसे जीयविपे तैसे स्वप्नविषेविपर्यास (अविवेक) से हस्तिअश्वादि पदार्थों को तहांहीं (अपने अन्तरजहां स्वप्न के पदार्थयोग्यस्थान का अभाव है) देखता है, । अर्थात् देवहुयेवत् कल्पना करता है, परन्तु जाग्रत् से उत्पन्नहोनेवालेको देखतानहीं ४१ । १६८॥ ४२।१६६॥ हे सौम्य ! [वास्तव दृष्टि से कार्यकारण भावके अ. प्रसिद्धहुये “जन्माद्यस्य यतः" इस जाग्रत्के जन्मादिक जिस से होते हैं, इत्यादि वेदान्त शास्त्र व्याससूत्रोंकरके ब्रह्मको जगत काकारण कैसे सूचितकिया है, यह शवाकरके कहते हैं, "उपल म्भात् 'समाचारोदस्तिवस्तुवनादिनाम , जातिस्तुदेशिताबुद्वैर जातेस्त्रसता सदा उत्पत्ति उपालम्भसे अरु सम्यक् आचरण से, ऐसे कहने के सभाववाले अरु अनुत्पत्ति से सदा भयके पात्र नेवाले के अर्थ उपदेशकिया है, अर्थात् व्यासादिक अद्वैतवादी पण्डितोंने जो जगदुत्पत्ति कहीं है (उपदेशकियाहे ) सो तो उपा. लम्भदैतको प्रतीति,से।अरु वर्णाश्रमादिकधर्मके सम्यक्आच. रणसे। इनदोनों हेतुओं से “वस्तुभावमस्ति" द्वैतका वस्तुभाव है, इसप्रकार कहने के स्वभाववाले वस्तुवादी, सम जगत् की गौडपादीय कारिका चतुर्थ प्रकरण ४ । अनुस्पत्तिसे सदाभयके पावनेवाले दृढ़ आग्रही कर्मादिकोंविषेश्न- धावान् मन्दविवेकियों केअर्थ[ कार्यकारणभावको अंगीकारकरके जन्मके उपदेश करनेवाले अद्वैतवादियों का उपदेश मन्द विवे- कियों विषे विवेकी दृढ़ता का उपाय होने करके कैसे होगा, यह शब्डा करके तब कहते हैं। वो कर्मवादी मन्द विवेकी। तिस उत्पत्तिको प्रथम ग्रहणकरो,परन्तु पश्चात् वेदान्तके अभ्या- सियों को अजन्मा अद्वय आत्मा को विषय करनेवाला विवेक स्वतःहीहोवेगा" वेदान्ताभ्यासिनान्तुस्वयमेवाजाद्वयात्मविषयो वित्रेको भविष्यतीति' इसप्रकार दृढविवेक का उपाय होनेकरके, उपदेश करते हैं, परन्तु परमार्थ बुद्धि से नहीं । अरु जिसकरके वे कर्मवादी । अविवेकी पण्डित स्थूल वहिर्मुख , बुद्धियाले होने से, अनुत्पन्नहुये वस्तुसे अपने विनाशको मानते हुये सदा भयकोही पावते हैं, एतदर्थ तिनके लिये संत्रकारादिक पण्डितों की.प्रवृत्ति उचितहै। यह अर्थ है अर्थात् कर्मवादी आदिकजे. बहिर्मुखवृत्तिवाले मन्द विवेकी हैं तिनको आत्मसत्ता से पृथक् सत्तावाला जगत् भासताहै,तिसकी निवृत्ति के अर्थ उनपरउपकार करते हुये सूत्रकार व्यासादि वेदान्ती पण्डितों ने ब्रह्म से जगदु- त्पत्ति कहींह तिसकरके वो स्वतःही समझेंगे किं कारणसे कार्य की.पृथक् सत्ताहोती नहीं अ यह सर्वजगत् मंसें उत्पन्न हुआ है ताते इसकी पृयकू सत्ताके अभाव से यह ब्रह्मरूपही हैं, इस प्रकार एक अद्वैत ब्रह्मज्ञान होने के अर्थ सूत्रकार ने ब्रह्म से सृष्टि का जन्म (उत्पत्ति) कही है, परमार्थ दृष्टि से नहीं अरु यहही अर्थ " उपायःतावताराय नास्ति भेदः कथञ्चन" इस तृतीय प्रकरणके १५ वें श्लोक विपे कहा है सिोसृष्टिका प्रकार अद्वैत विषे बुद्धिकी उत्पत्ति के अर्थ है । ४२११६६॥ १३ ॥१७०॥ हे सौम्य ![" उदरमन्तरंकुरुते अथ तस्यभयं भंवतीति" जो थोड़ाभी अन्तर (भेद)करताहे पश्चात् तिसंको . भयहोता है , इत्यादि श्रुतियों के प्रमाण से नमविषे विकार के : ३१ २१२ :: मडिक्योपनिषद ।। आजातेस्त्रसतान्तेषामुपलम्भाद्वियन्तिये । जातिदोपा न सेत्स्यन्ति दोषोऽप्यल्पोभविष्यति४३।१७०॥ देखने वाले को भयका होना सुनते हैं । अरु तैसे हुये श्रुति के अर्ड के जाननेवाले पण्डितों को भी भेदज्ञानसे अनुग्रहकी योग्य- ता न होगी। यहाङ्का.करके तव कहते हैं अजीतनसतान्ते- पामुपलभाद्वियन्तिये, अनुत्पत्तिसे भयको ,पावतेहुये उपलंभ एआत्मा) से विरुद्धं जाते हैं, अर्थात् जो ऐसे उपलम्भ (प्र- तीनि) से अरु सम्यक् आचरणसे अनुत्पत्तिते अर्थात् अनुत्पन्न हुई वस्तुसे । भयको पावते हुये द्वैत वस्तु है, इसप्रकार अद्वैत आत्मासे विरुद्ध जाते हैं | अर्थात् द्वैत को प्राप्तहोते हैं । तिन अनु- त्पत्ति से भयको प्राप्तहोनेवाले श्रद्धा सम्पन्न सन्मार्ग को आश्रय करनेवालेको जातिदोपान सेत्स्यन्ति दोषोऽप्यल्पोभविष्यति । जाति के किये दोष होते नहीं, यद्यपि कोईदोष अल्पही होवेगा', अर्थात् जाति कहिये प्रतीति के किये दोप होतेनहीं अर्थातसिद्धि को पावते,नहीं,क्योंकिसन्मार्ग कहिये विवेकमार्ग तिसविपेप्रवृत्त होतेहैंताते। अरु यद्यपि (जो कदापि) कोईएक दोपहोताहै,सोभी सम्यक् ज्ञानकी अप्राप्तिरूप निमित्तकाकियागर्भवासादिरूप अल्प ही दोष होवेगा यह अर्थहै । अर्थात् यहांजो कहाहै किजो कदापि कोई एक,दोपहोताहै सोभी सम्यक् ज्ञानकी अप्रातिरूप निमित्त का किया गर्भवासादि अल्प दोप होवेगा, सो गर्भवासको अल्प दोप कहा सो आक्षेप प्रतीति होता है, क्योंकि गर्भवासरूप दोष सर्व दोपोंका मल है, ताते.उक्त कथनका यह अभिप्राय प्रतीत होता है कि सम्यक् ज्ञानसे रहित पुरुष को गर्भवास उपलक्षण करके सर्व दोष (अनर्थ) प्राप्त होता है १३ । १७० ॥ १९७१॥ हे सौम्य! । शंका। न्न, दैत की प्रतीति अम वर्णाश्रमके धर्मके आचारकोप्रमाणरूप होनेसे, दैतवस्तु बास्तत्र होहे, सो कथन,पने नहीं क्योकि प्रतीतिकहिये अनुभव अरुआ- 3 । - 4 २४४ मांडूक्योपनिपद् । जात्याभासं चलाभासं वस्त्वाभासं तथैव च । अजा चलमवस्तुत्वं विज्ञान शान्तमद्वयम् ४५ । १७२॥ चलाभासं वस्त्वाभासं तथैव च । [जात्याभास है चलाभास है अरु वस्तुआभास है तैसेही ] अर्थात् जैसे देवदत्त । अर्थात् कोई एक मनुष्य । उत्पन्न होता है। अर्थात् देवदत्त इस नामसे जो शरीर तिस शरीरान्तर जो शरीरी जीव सो, देवदत्त नामका ल. त्यहै सो जीव अनादि होने से उत्पन्न होतानहीं परन्तु शरीरकी उत्पत्ति से तिस शरीरी का उत्पन्न होना है,सो आभासमात्रहै, प- रन्तु कहतेहैं, जैसे देवदत्त उत्पन्न होता है तैसे विज्ञान (विज्ञान घन, विज्ञप्ति ) सो उत्पत्त्यादिकों से रहित हुआ भी स्वमाया करके । उत्पन्नहुयेवत् भासताहै, एतदर्थ वो जात्याभास है । अरु जैसे सोई देवदत्त चलता है, अर्थात् वास्तव करके देवदत्तना- मक देही (जीवात्मा) अचल है, परन्तु शरीरके सम्बन्ध से घ- टाकाशवत् चलता भासता है सो उसमें आभासमात्र तथापि तिसकों देंख के कहते हैं कि, देवदत्त चलताहै। तेसेसो । विज्ञान आप अचलहुआ स्वमायाकरके । चलता भासताहे, अतएव सो चलाभास है । अरु जैसे सोई देवदत्तं गोरहै दीर्घहै पीन (मोटा) हैं, इसप्रकार भासता है तैसे सो विज्ञान (विज्ञप्ति चैतन्य)द्रव्य रुप धर्मीपत् भासता है पिरन्तु "अस्थलमन एवमदीर्घ 'इत्या. दि प्रमाणसे द्रव्य धम्मों से रहित अद्रव्यहे। अरु "रूपंरूपं प्र- तिरूपोपहिश्च द्रव्यों के साथ मिलने से द्रव्य धर्मवान् भास- ताई। एतदर्थ वो वस्वाभासह । ताते,देवदत्त जन्मताहे, चलना है, वस्तुहै, दीर्घ है, गौरहे तैसेही यह विज्ञान भासना है । परन्तु "अजाचलमवस्तुलं विज्ञानंगान्तमध्यम अजन्माहै,अचलहै, अवस्तुभाव है, विज्ञानघन हैं, शान्त है, अव्य है, अर्थात् जो विज्ञप्ति शरीरादि अनहुई उपाधि साथ मिलने से, उपजेवत् चलतेपत् वस्तुवन् भासना है, सो वास्तव करके अजन्मा है , . .
२४६ मांडूक्योपनिषद् ।। ऋजुवकादिकाभास मलांतस्पन्दितं यथा । ग्रहणया हकाभासं विज्ञानस्पन्दितन्तथा ४७। १७४ ॥ ४७॥ १७ ॥ हे सौम्य ! ८ अजन्मा अर्चल अरु जात्याभास है ? इसप्रकार पूर्व ४५ वें श्लोक विपे, कथनफिये परमार्थरूप ज्ञानको दृष्टान्तस' वर्णन' करतेहुये कहते हैं. ऋजुवक्रादिका- भासमलातस्पन्दितंयथा। जैसे सरल अरु वक्रादिक आभास अलातकाचलनाहै, अर्थात् जेसेलोकविपे सरल अरु वक अिर्थात् सीधा अरु टेढ़ा। आदिक प्रकार वा आकारवाला जो आभास कहिये प्रकाश है, सो अलात कहिये वनेठी वा अईदग्ध काष्ठ रूपउल्ला, तिसको चलना है अर्थात् बनेठी वो अर्धदग्धकाष्ठ के मुखपर जो एक अग्निविंदु हैंतिस अग्नि विन्दुवा जो वकादि रूपसे सीधा टेढ़ा आदिक भासनाह सोउस बनेठी वा अर्द्धदग्ध फोटके चलने वा भ्रमणसे है, उस.अंग्नि विन्दुके स्वरूपसे ही नहीं ग्रहण ग्राहकाभासं विज्ञानस्पन्दितन्तया। तेसे ग्रहण अरु ग्राहकका आभास "विज्ञानका चलना अर्थात् जिसे अलातगत अग्निविन्दुका जोसीधाटेढ़ा भीसनाहे सो उसअलात के भ्रमणादिकों सेहैं, तैसेही ग्रहण अरु गाहको जोडा कहियेभासनाह सो विज्ञानका अविद्यासे चलनेवत् [ अपने स्वरूपकोन त्यागकरनेवाले अधिष्ठानका जो नाना आफारसे अवभास प्रितीति अरु तिसकाविपयोति विवर्त कहते हैं। यहां विज्ञानका जो स्फुरण भारत ना' हे सो विवर्त रूपह] जिरीकरके अचल विज्ञानको- चलनानहीं, तिसक्रकेही विज्ञानको अजन्मा अचल है, प्रकार पूर्व कहाहे ४७।१७४॥ ४८.१७॥ हेसोम्याअब निज्ञातशान्तहे,इसप्रकारपूर्व श्लोरधिपे वर्णन कियाहे तिसको अब दृष्टांत करके अस्पन्दमानमलानमनाभाममजन्यथा जन चलनेसे -- . " +M 1 २४७ 7 In गौडपादीय कारिकी चतुर्थ प्रकरण ४ । अस्पन्दमानमलातमनाभासमजंयथा । अस्पन्दमा नविज्ञान मनाभासमजं तथा ४८१ १७५॥ अलातेस्पन्दमानेवै नाभामा अन्यतो भुवः । नततो ऽन्यत्रनिस्पन्दान्नालातम्प्रविशन्तिते १९ । १७६ ॥ अलति अनाभासं अरु अजन्माहै, अर्थात् निस्पन्दमान अलात अिर्थात् भ्रमणे से रहित बनेठी । सरलादिक आकार से जन्म रहित हुआ अनाभीस अरु अजन्मा है । अर्थात् अलात के वा काष्ठके मुखपर लगा जो अग्निबिन्दु सोअलातफेभ्रमणेसे भ्रमण रूपसे उत्पन्न होय भ्रमतेवत् भासताहै अरु उम अलात के स्थित हुये वो अग्निविन्दु जैसा उत्पत्ति अरु भ्रमणसे रहितहै तैसाही अनाभास अरु अजन्मा होताहै, अर्थात् वो अलातपरका अग्नि विन्दु जैसे अलातके भ्रमण से पूर्वहे तेसाही अलातके भ्रमण के शान्तहुये है, अरु मध्यविषे जो भ्रमणरूप से उत्पन्नहुये अरुभ्रम- तेवत् भासताहै सो अलतिके भ्रमणरूप उपाधि करके भासताहै, परन्तु तिस अलात के भ्रमणकाल में भी वो अग्निविन्दु अपने स्वरूपसे अलातके भ्रमणादिकों करके रहित सदा एकरस है।। " अस्पन्दमानं विज्ञानमनाभासस तथा । तैसे निस्पन्दहुआ विज्ञान अनाभास अरु अंजन्माहै, अर्थात् जैसे अलातका अग्नि- विन्दु जैसा अज,अचल है,तेसा अलातके स्थिर हुये भासता है लैही अविद्या करके चलायमान अरु अविद्याकी निवृत्ति के हुये चलनेसे रहित अिर्थात् उत्पत्त्यादि आकारसे अभासमान हुआ जो विज्ञान सो अनाभास कहिये अचल अरु अजन्माही है। वा विज्ञान कहिये बुद्धि तद्विशिष्ट जोविज्ञान(चैतन्य)सो बुद्धिरूप उपाधिसाथ मिलनेसे धुद्धि जन्मादि वा कर्तृत्त्र भोस्तृत्वादि धर्मवान् भासताहै परन्तु स्वरूपसे तैसानही इत्यर्थः४८१७५॥ ४६१७६।। हे सौम्य![अलॉतके दृष्टान्तविपे सरल वक्रादिक आगरोंका असत्पना,कैसेहै,इस शङ्काके हुये निरूपण के असहन ।
, माडूक्योपनिषद् । करने से तिनकाअसत्पनाहै, इसप्रकार समाधान कहते हैं, यहां यह अर्थहै कि अलात वा अर्द्धदग्धकोष्ट जव भ्रमताहै तव तिस विषे अन्य देशान्तर से उसमें आयके प्रकाश होताहै, इसप्रकार कथन करने को शक्यनहीं क्योंकि सरल अरु वकादिक प्रकाशोंके देशान्तर से आगमन की अप्रतीतिहै ताते, अरु जब सोई अलात स्थित वा स्थिर होता है तवतिससे अन्य ठिकाने प्रकाश होताहै यहभी कहने को शक्यनही क्योंकितहांभी तिमकी अप्रतीतिमी तुल्यता है ताते । । अर्थात् जैसे अलातके अग्निविंदु के जे सरल वकादि रूप प्रकाश तिनका अलातके भ्रमणकाल में देशान्तर से आयके अलातमें प्रवेशकी अप्रतीतिहे, तसेही अलातके भ्रमण रहित स्थिर हुये उन प्रकाशों की देशान्तर जानेकीभी अप्रतीति है ताते अलातविन्दुके सरलवकादिकप्रकाशोंकी देशान्तरसे आवा- गमनकी अप्रतीति तुल्यही है । अरु वे आभास, प्रकाश, इसही अलातविषे लीनभी होतेनहीं, क्योंकि उस अलातको उन आ. भासों के उपादानपने का अभाव है ताते । अरु जब भ्रमण का निमित्त अलात उगदानहोगे, तब तिसको प्रतीतिमात्र निमित्त होने से निस निमित्त करके हुयेने प्रकाश तिन के अभावके अदर्श- नसे सरल अरु बकादिक जे आकार हैं, सो भ्रमण के अभाव के हुयेभी अलातविपे होवेंगे। परन्तु ऐलाहनहीं, एतदर्थ सो अला- त सरल वकादि प्रकाशोका उपादाननहीं, ताते किमी प्रकार से भी निरूपणके असहने से तिनका असत्यना)f अलानेसन्द- मानेने नाभासा अन्यतोभुवी अलात के स्पन्दमान हुये आभात अन्य ते होनेवाल नहीं अर्थात . किंवा तिमही अलान के चलते हुयेसीधे अरुबादिक आभास (प्रकाश) अलातसे अन्यकिमीभी देश से आयके अलात विष होते नहीं, एतदर्थ सो प्रकाश अन्य से होनेवालेनहीं। अरु निततोऽन्यत्रनिस्सन्दानालानम्प्रविशतिते अचलहुये तिमसे अन्य ठिकाने निकसतेनहीं, ओ अलातके ताई प्रवेश करते नहीं, अर्थात् अलातके अचल हुये सो सीधे टेडे गौडपादीय कारिका चतुर्थ प्रकरण ४ । २४६ न निर्गता अलातात्ते द्रव्यत्वाभावयोगतः । विज्ञा नेऽपि तथैव स्युराभासरयाविशेषतः ५०।१७७॥ प्रकाश अलात से निकल अन्य ठिकाने (देशान्तर) को जाते नहीं, अरु वे प्रकाश अचल हुये अलान विषे प्रवेशकरते नहीं अिर्थात् अत्तात विपे लगा जो अग्निविन्दु निसके श्रमपर से भासते जे सीधे टेढ़े प्रकाश सो किसी देशान्तर से आयके मा. सते नही अरु उस अग्निविन्दु के स्थिरहुये देशान्तरको जातेनहीं अलातही में लयभी होते नहीं क्योकि अलात से निकसे नही, ताते, अभिप्राय यह है कि अलातके जे सीधे टेढ़े आदिक प्रकाश हैं सो न तो उस अग्निविन्द्र से निकले हैन देशान्तररो आये है, अरु अग्निविन्दुके स्थिरहुये न तो देशान्तर को जातेहैं न उसही मे लयहोते हैं। किन्तु उस काष्टके भ्रमणेसे वह अग्निविन्दु आ- पही सीधाटेदाहोभासता सोभी उपाधि के सम्बन्धसेहेस्वरूप से नहीं ४६ । १७६॥ “५० । १७७॥ हे सौम्य, किंवा नि निर्गता अलातात्ते द्रव्य खाभावयोगतः। अलातसे निकसेहुये नहीं द्रव्यमांच के अ- भावके योग से, अर्थात् वे आभास कहिये सीधे टेढ़े प्रकाश ग्रह से निकसे हुयेवत् अलात | अग्निविन्दु । से निकसे हुये नही, क्योंकि उनको द्रव्यभाव के अभार का योग है । अर्थात् उनको वस्तुपने का अभाव है। ताते । जिस करके वस्तुका प्रवेशादिक सम्भवे है अवस्तुका नहीं, ताते तिन आभासों को निस्तुपने के अभाव से अवस्तुरूपहुये तिनके, निकसनेका अरु प्रवेशहोनेका असम्भव ताते ।अरु विज्ञानेपि तथैवस्युराभासस्याविशेषतः” तैसेही विज्ञानविये भी आभालसे अविशेष (तुल्य) होनेसे, अर्थात् अलातके अग्निविन्दुबत्, विज्ञान (विज्ञप्तिमात्र चैनन्य) विपे भी उत्पत्त्यादिकों के आभास होनेह, निनकी अलातके आ- भासों से अविशेषता है। अर्थात् अग्निविन्दु के सीधे टेढ़े प्रकाशा- ३२ वेशको पावते नहीं एतदर्थ वे जन्मादि आभास निस विज्ञानविय N . !! मांडूक्योपनिषद् । ....: विज्ञाने स्पन्दमानेवै नाभासा अन्यतोभुवः।नेततोऽ न्यत्र निस्पन्दान्न विज्ञानं विशन्तिते ५१ । १७८ ॥ . कारों विषे अरु विज्ञान (चैतन्य ) के जन्मादिक आकारों विषे आभासमानताकी तुल्यता है ५० । १७७॥ ५१ । १७८ ॥ हे सौम्य,। प्रातिन अिलात के सीधे टेढ़े प्रकाशरूप आभारा की अरु विज्ञान के जन्मादिक आभासोंकी। विषे आभासों की एकता कैसेहै, तहां उत्तर कहते हैं "विज्ञाने स्पन्दमाने वै नाभासा अन्यतो भुवः विज्ञान के स्पन्दहुये अन्य से भी आभास होने को योग्य नहीं, अर्थात् विज्ञान | कहिये विज्ञप्तिमात्र चैतन्य आत्मा,जो कि अपने स्वरूपकरके अचल है। तिसके जिस किसंप्रकार से । अर्थात मायादिक उपाधिसे । भी चलतेहुतिस विज्ञान से अन्य प्रिधानादिक । अन्य किसी क- हीं से भी आयके आभास जन्मादिक । तिस 'विज्ञान' विषे होनेको योग्य नहीं, क्योंकि तिसकी प्रतीति का अभाव है ताते। अरुन ततोऽन्यत्र निस्पन्दान्न विज्ञानं विशन्तिते। निस्पन्द हुये तिराके अन्य ठिकाने होने को योग्य नहीं,अरु वे विज्ञानविषे प्रवेश करते नहीं, अर्थात् जो किसी भी प्रकार से चलनको प्राप्तहुये विज्ञानके चलनेसे रहित अचल स्थिरहुये तिस विज्ञान से इतर ठिकाने वे आभास होनेके योग्य नहीं, क्योंकि प्रतीति रूप आभास को सर्वत्र तवही विज्ञानकी अचलपने करके विपे तुल्यता है ताते । अरु सो आभारा तिमही विज्ञानविपे प्र. वेश करते नहीं क्योंकि तिस केवल शुज विज्ञानको तिन आभास के उपादान पने की अप्रनीति हे नाते ॥ अर्थात ज्ञप्तिमात्र चेतन्य विज्ञान से जन्मादि आभास उपजते नहीं तिसहीसे मायाकन भ्रान्तिमात्रहीं हैं, वास्तव से नहीं ५१ | १७ ॥ • ५२।१७६॥हे सौम्य निनिर्गनाविज्ञानातेद्रव्यतामा गौडपादीय कारिका चतुर्थ प्रकरग ४ । २५१ न निर्गताविज्ञानात्तेद्रव्यत्वाभवियोगतः कार्य कारणताभावाद्यतोऽचिन्त्या सदैवते ५। १७९ ॥ गतः सोविज्ञानसेनिकसतेनहीं द्रव्यत्वके अभावकरकेयुक्तहोने से, अर्थात् जैसे वे जन्मादि आभास विज्ञान कहिये चैतन्यविषे प्रवेश करते नहीं, तैसेही वे आभास विज्ञप्तिसे 'निकसतेभी नही, क्योंकि वह द्रव्यभाव कहिये वस्तुभाव के अभाव करके युक्त है. ताते ॥ इसका यह तात्पर्यहै विज्ञानका अन्यसर्व अलातके तुल्य है, परन्तु विज्ञानका जो सदा अचलपना हे सो अलतिसे विशेष है । अर्थात् विज्ञान विये जो जन्मादिक आभास है सो कुछरस्तु न होयके केवल आभास (भ्रान्ति) मात्रहींहै ताते वास्तव करके न तो विज्ञानसे निकसते हैं न विज्ञानमे प्रवेशको प्राप्त होतहैं। अरु अलात के आभासोंका(प्रकार्थीका)जोअलात से निकसना अरु अलातमें प्रवेशका पाना भासता है सो अलातके भ्रमणे करके भासताहै, अरु विज्ञान है सो अलातवत् चल न होयके अचलहे यह उसमें अलातसे विशेषता होनेसे उसविपे जन्मा- दिक आभासके होनेके हेतुको अभाव है । प्रश्न तिव अचल विज्ञान ज्ञप्तिमात्र, विषे जन्मादिको के आभास सिके किये है। तहाँ उत्तर कहते हैं, कार्यकारणताभावायतोऽचिन्त्याः सदैवते जाते वे कार्य कारण भावके अभावसे सदैव अचिन्त्य हैं । अर्थात् जिसकरके वे जन्मादि आभासतिनआभासोंके अरु विज्ञप्तिमात्र विज्ञान के कार्यकारणभावका अभाव होनेसे [अर्थात जन्य जनक भावके असंभवकरके सो आभास अभावरूप है ताते सोसटा अचिन्त्य कहिये अनिर्वचनीय है । अथवा आभासोंको अरु विज्ञानको कार्यकारण भावका अभाव है, अर्थात् आभामों को भ्रान्तिमात्र होनेसेनतो कोई उनका कारण है नरह किसी का कार्य है, अरु विज्ञान को अजन्मा होनेसे न वह किसीका कारण है नकिसीकाकार्यह,अतएव आभास अरु विज्ञान कार्य कारण -- २५२ 1- , '; मांडूक्योपनिपै ।। .. ' द्रव्यद्रव्यस्यहेतुःस्यादन्यदन्यस्य चैवहि । द्रव्यत्व मन्यभावोवाधर्माणांनोपपद्यते ५६ ।,१८०॥ .. भावका अभाव है, परन्तु वे आभास केवल भ्रांतिमान अध्यस्त होनेसे सत् नहीं किन्तु असत् हैं अरु विज्ञान उन आभासों का अधिष्ठान (आश्रय ) होनेसे असत् न होके सतुरूप है क्योंकि । आश्रयविना भ्रान्ति होती, नहीं, अरु ज्ञानकाल विपे भ्रांतिके अभावहुये सवरूप अधिष्ठान पावताहै, अरु जैसे मरुस्थलकाजल अनहुआभी अपने अधिष्ठान 'मरुस्थलको सरूप होनेसे सदैव भालताहे ताते अत्यन्त असतभी नहीं, अरु जो पुरुष जलजानके प्रनत होताहै तिसको जलकी प्राप्तिहोती नहीं ताते सो सभी नहीं फिन्तु अनिर्वचनीय है, तैसेही अनहुये जन्मादि आभास अपने अधिष्ठान नित्य सतविज्ञान विपे संदाही,अनिर्वचनीय है। एतदर्थ सो मिथ्याही होतेहैं । जैसे अलात विन्दुमात्र विपे मिथ्या जो सरलादिक अलातके आभारा तिनविषे विनाविचा- रिती सरलादि आभास बुद्धि होतीहे, तैसेही विज्ञान (विज्ञप्ति) मापविपे मिथ्या जो जन्मादिक तिन विपे विनाविचारितही। जन्मादिक बुद्धिहै सो मिथ्याहै । ताते सो सर्वथा त्याग करने योग्यही है यहसमुदायका तात्पर्यार्थ है ५२ | १७६ ॥ ५३ । १८०॥ हे सौम्य !"कार्यकारणताभागात्” कार्य अरु कारण भावके अभावसे? इसप्रकार जो ५२ ३ श्लोकत्रिपे कहा, तिसको प्रतिपादन करनेका अव आरंभ करतेहैं। यहांयह अर्थ है कि, अवयवरूप जो द्रव्य सोअवयनीरुप द्रव्यका उपा. दानहै । अरु अपयरके जो गणहें सो अपने समान जातिवाले अभयवीके गुणोंचिपे असमवायी कारणदेखहै। इसप्रकार आत्मा फो द्रव्यपनाह नहीं कि जिसकरके उसको उपादानपनाहोवे। अरु तिसरूपवाले गुणों का कहीं भी असमवायी कारणपना है नहीं क्योंकि तिस आत्मा पिपेभेदरूप गुण गुणी भारके कथन का : गौडपादीय कारिका चतुर्थं प्रकरण ४। एवं न चित्तजा धर्माश्चित्तं वाऽपि न धर्माजम् । एवंहेतुफलाजाति प्रविशन्ति मनीषिणः ५४.१६॥ असम्भवहै ताते:] इस प्रकार, अजमकमात्मतत्त्वमिति अज, कहिये अवयव अवयंवी भाव रहित, अरु एक कहिये गुण गुणी भाव रहित आत्मतत्व है ? इस प्रकार सिद्धहुआ।.तिस आत्म तत्त्वविपे जिन वादियों करके जन्मादिकों के आभास अरु विज्ञान का कार्यकारण भाव कल्पितहे, तिनके मतविषे द्रव्यं द्रव्यस्य हेतुः स्यादन्यदन्यस्यचैवहिः। द्रव्य व्यका अरु अन्य अन्य का हेतु .(कारण) होताहै अर्थात जिन चांदियों के मतं विपे जन्मादि आभासोंका अरु विज्ञानका कार्य कारण भावकल्पित है तिनके मतविष द्रव्य द्रव्यका अरु अन्य अन्यका कारण होता है, परन्तु तिलाही का । अर्थात् अपना कारण आप सो होता नहीं। अरु जिसकरके लोकवि जो अद्रव्य कहिये रूपादि गुण है, सो स्वतन्त्र किसी का भी कारण देखा नहीं। अरुद्रिव्यत्व मन्यभावो वा धर्माणां नोपपद्यते । धर्मका द्रव्यभाव वा अन्य भाव उपपद्यनहीं, अर्थात् जिसकरके आत्माको अन्य का कारणपना वा कार्यपना प्राप्तहोवे ऐसा आत्मरूप धौंकाद्रव्य भाव वा किसी से भी अन्य भावं, वनता नहीं अिर्थात् द्रव्यभाव करके रहित निराकार निर्विशेष आत्माका द्रव्यभाव न होनेसे वो किसी का भी कारण नहीं अरुएक अद्वैतहोने से उसका किसीसे अन्यभाव भी नहीं । एतदर्थ अद्रव्यरूपहोनेसेंअरुं सबसे अभिन्न अनन्य होने से आत्मा न किसी का कार्य है न किसीका कारण है। यह अर्थ है ५३ । १८०॥. ५४ । १८१॥ हे सौम्य ![ रचने को इच्छित जो घटतिस घटके ज्ञान के अनन्तर घट उत्पन्न होता है, अंरु उपजाहुआ इदं घट, इस प्रकार विषय रूप होनेसे अपने ज्ञानका उत्पादकहे, इस प्रकार का व्यवहारभी संभवतानहीं, क्योंकि किसी भी वस्तुको , : मांडूक्योपनिपद् । यावहेतुफलावैशस्तविहेतुफलोद्भवः । क्षीणेहेतु फ- लावेशे नास्तिहेतुफलोद्भवः ५५ । १८२॥ विद्वान्की दृष्ट्यनुसार भिन्नरूपता नहीं इसप्रकार कहते हैं। एवं न चित्तजाधमांश्चित्तं वाऽपि न धर्मजम्इसप्रकार धर्म , चित्त से जन्यनहीं, वा चित्त भी , बाह्य , धर्मसे जन्य नहीं , अर्थात् ऐसे उक्तप्रकार के हेतुओं करके आत्मरूप विज्ञान *स्वरूपही चित्त कहिये चैतन्य ब्रह्म है, एतदर्थ घटादि रूप चाय धर्म चित्तजो तैतन्य तिम करके जन्य नहीं । वा चित्तभीवाद्य धर्म सेजन्य नहीं । अरु जीवरूप धम्मोंका परमात्मस्वरूपचित्त से जन्म युक्तनहीं, क्योकि सर्वजीवास्य धम्मोको विज्ञानस्वरूप के आभास कहिये प्रतिविम्ब भाव है ताने अर्थात् यावत् जीव हैं सो सर्व विज्ञानरूप चैतन्य के जलगत सर्य के प्रतिविम्बात्, प्रतिविम्वरूपहे ताते उनका परमात्मा से जन्म युक्त नहीं, " एवं हेतु फलाजाति प्रविशन्ति मनीषिणः” इसप्रकार बुद्धिमान् पुरुप हेतु अरु फलकी अनुत्पत्ति को निश्चय करते हैं । अर्थात् चैतन्य करके वाह्य घटादिक जन्य नही, तैसेही चैतन्य भी बाह्य घटादिक करके जन्यनहीं, अरु अन्तरसर्वजीव भी चेतन्यसे जन्य नहीं, प्रतिविम्वरूपहोने से, ताते अन्तर वाह्य के सर्वधर्म चैतन्य करके जन्य नहीं केवल भ्रांतिमात्र हैं। इसप्रकार धुद्धिमान् पुरुप कहते हे वा निश्चय करते हैं। तात्पर्य यह है कि जो व्रारूप हुये ब्रह्मवेत्ता हैं सो वह ब्रह्मवेत्ता कहिये यथार्थ वेदवेत्ता हे सो आत्माविपे हेतु अरु फलको । अर्थात् प्रारब्ध अरु देह जो पर- स्पर हेतु अरु फलरूपहें तिन्होंको अभावरूपही निश्चयकर के जानते हैं ५४ । १८१॥ ५५ । १८२॥हे सौम्य! [फल जो देहाटिक तिनसे हेतु जे धादिक सो होते नहीं,अरु तैसेहीउक्तहेतु से उक्तफलादिकमी होते नहीं। इसप्रकार वास्तविक दृष्टि से उपदेश किया।अवनिम २५५ गौडपादीय कारिका चतुर्थ प्रकरण ४ याबढेतुफलावेशःसंसारस्तावदायतः । - क्षीणेहेतुरु लावेशे संसारं न प्रपद्यते ५६।१८३॥ विषयक मुमुक्षुओंके आग्रहकी निवृत्ति के अर्थ तिस विषे आग्रहके अभावाभावके हुये तिनकी उत्पत्ति अरु अनुत्पत्ति को देखावे ] प्रश्न । जो पुनः हेतु अरु फल विपे आग्रहको प्राप्तहुये हैं तिनको क्या फलहोता है। उत्तर। " यावद्धेतुफलादेशस्ताव तुफलोद्भः वः यावत् हेतु अरु फलविषे आग्रहहै तावत् हेतु अरु फलका उद्भव होता है, अर्थात् धर्म अरुं अधर्मनामवाले जे हेतु शरीरो- त्पत्ति के कारण है तिनकी कर्ता मैं हो, धर्मअधर्म मेरे हैं तिन धर्म अधर्मों का फल कालान्तरविषकोई एक स्विर्गनरकादि देश विपे प्राणधारियों के समूह विपे अिर्थात् कोईककयोनिविपे उत्प- नहुआ मैं भोगूंगा। इसप्रकारका यावत् हेतु अरु फलविपे । कर्तृ- व भोक्तृत्वको । आग्रह है । अर्थात् तिनविषे तत्पर चित्तवाले पुरुषकरके अपने आपचिपे हेतु अरु फलका आरोप करते हैं तावत् धर्म अधर्मरूप हेतुका अरु तिनके फलका उद्भव कहिये . उच्छेदरहित प्रवृत्ति, होती है। तथाच धर्मेंतरोतत्रपुनःशरीरकं पुनःक्रियाश्चात्रउदीयतेभवः" अरु क्षीणेहेतु फलादेशे नास्ति हेतुफलोद्भवः हेतु अरु फलविपे आग्रहके क्षीण हुये हेतु अरु फलका उद्भव होता नहीं? अर्थात्, जब पुनः जैसेमन्त्रअरु ओष- धिकरके प्रेतादिक के आवेशके अभावहोनेवत्, उक्तनकारकेअद्वैत तत्वके . श्रवण मनन, दर्शनसे अविद्याकरके उद्भुत जोहेतु अरु फल तिनका आवेश सम्यक् प्रकार दूर होताहै, । तब तिन उक्त हेतु अरु फलविपेआग्रहके क्षीणां नाशी हुये हेतु अरु फलकापुनः उद्भव होता नहीं। इति सिद्धम् ५५ । १८२॥ ५६।१८३ हे सौम्य ! प्रश्नाजो कदापि हेतु अरु फकाउन- बहोते तो क्या दोपहै । उत्तर। कहते हैं । यिावद्धेतुफैलावेश: संसारस्तावदायतः । अर्थात् चावत् सम्पर ज्ञानकरके हेतु अरु - - २५६ ६.. मांडूक्योपनिषद् । संत्याजायत्तेसर्व शाश्वतंनास्ति तेनवै । सद्भावेन ह्यजंसर्वमुच्छेदस्तेननास्तिवै ५७.६१८४॥.. फलका आग्रह सिम्यक्प्रकार अशेष । निवृत्त होता नहीं, किन्तु अज्ञान करके होताहै तावत् अक्षीणहुआ संसार दीर्घहोता हे । अर्थात् यावत् सम्यक् आत्मज्ञान करके उक्त हेतु अरुफल इन विषयक आयह अशेप निवृत्त होतानहीं तावत् अज्ञानकरके हेतु अरु फलरूप संसार विस्तारको ही पावता है । अरु क्षिीणे हेतु फलोवेशे संसारं न प्रपद्यते। हेतु अरु फलविषयक आग्रह के क्षीणहुये संसारको पायता नहीं, अर्थात् पुनः जब । सम्यक् आत्मज्ञानकरके । उक्तहेतु अरुं फल विषयक । समूल अज्ञान' के आग्रह अशेप क्षीण (नाश) होताहै तबकारण के अभाव हुये संसारको पावतानहीं ॥ इति सिद्धम् ५६ । १८३ ॥ ५७ ॥ १८४ ॥ हे सौम्य!। शका। ननु, “ अजादात्मनोऽन्य नास्ति" ८ अजन्मा आत्मा से अन्य है नहीं इसप्रकार कूटस्थ अद्वितीय आत्मतत्त्वको इच्छनेवाले तुम करके . हेतु अरु फल, अरु संसारकी, उत्पत्ति अरु विनाश कैसे कहा हे, हे वादी! अ. पनी इस शंका का समाधान श्रवण कर " संघृत्या जायते राज्य शाश्वतं नास्ति तेन वेढापने से सर्व उपजता है तिसकरके नित्य नहीं है । अर्थात् अविद्या के आधीन लौकिक व्यवहाररूप हापने से सर्व उपजता है तिसहेतु करके उत्पन्न हुये अविद्या के आधीन वस्तुविपे नित्य नित्यता । है नहीं, एनदर्थ उत्पत्ति अरु विनाशरूप संसार उपजता है, इसप्रकार कहते हैं । अरु सिद्भायेनजसर्वमुच्छेदस्तेन नास्ति सद्भावसे जन्मरहित सर्वहे तिसकरके उच्छेद है नहीं । अर्थात् जिस करके परमार्थ सद्भाय , परमार्थमत्ता , से तो जन्म रहित सर्व आत्माही हे "आत्मवेदं सर्व " इत्यादि श्रुति । एतदर्थ तिस जन्म के अभावरुप कारणकरके हेतु अरु फलादिक किसी का भी उन्हेद्र .
गौडपादीय कारिका चतुर्थ प्रकरण ।। धर्मा य इति जायन्ते जायन्ते तेनातत्त्वतः जन्म मायोपमन्तेषां सा च माया न विद्यते १८॥१०॥ कहिये विनाश है नहीं। यहां यह भाव है कि, जैसे सम्मुखयति रज्जु विपे सर्प के अभावका अनुभवका विवेकी पुरुप सर्पनहीं यह रंजुहे वृयाही भयकों क्यों प्रासहोता है, इसप्रकार भ्रान्त पुरुषको कहता है अरुं वह भ्रान्त पुरुषातो अपर्ने अपराधासेही (शुद्ध रज्जु बि संर्पकी,कल्पनाकर भयको पावतसन्ते भागता है। तहां विवेकी को वचन मई की दृष्टि से विरोधको पावतानहीं, तैसे परमार्थरूप कूटस्थ आत्माको दर्शन व्यावहारिक जन्मादि- कों के वचन से विरोध को न पायके अविरुद्धही है, ५८।१२५॥ हे सौम्या संवृत्त्या जीयते सत्रमा लोकि- कव्यवहार से सर्व होताहै, इसप्रकार ५७वें श्लोक के विषकही, तिसको अब पुनः वर्णन करते हैं। धर्मा पाइति जायन्ते जायन्ते तेन तत्वतः। जो भी धर्म जन्मते हैं ऐसे तत्वं से सो जन्मते नहीं है अर्थात् जो भी आत्मा अरु अन्य अनात्म- रूप धर्म कहिये पदार्थ उपजते हैं इसप्रकार कहते हैं। अर्थात् कल्पना करते हैं। सो धर्म इसप्रकार के हैं, इसप्रकार पूर्वोक्त लौकिक व्यवहाररूप ढक्कन (पडदा) कहते हैं, कि ढांपनीक हिये गुप्तपनेसेही वे धर्म जन्मतेहैं, परन्ता तत्त्व कहिये परमार्थ से,जन्मते नहीं। अरु जन्म मोयोपमन्तेषां सा च मायान विद्यते। तिनका जन्म मायाकी उपमावाला है अरु सो माया विद्यमान है नहीं ? अर्थात् जो पुनः ढपने से तिन उक्तप्रकार के भ्राँका जो जन्म है ,सो जैसे मायाका जन्महोता है तैमे है। एतदर्थ सो तिनको जन्म मायाकी उपमांवाली प्रतीतकरने के योग्यहै। प्रश्न । तब मायानामक कुछ वस्तु होवेगी । उसो माया कुछ विद्यमान नहीं, अभिप्राय यह है कि अविद्यमान पस्तुका नाम मायाहै।.५1१८५ : A -- २५६ {s Foमांडूक्योपनिषद् यथामायामयाहीजाज्जायतेतन्मयोऽङ्कुरमाना ऽसौ नित्यो नःचोच्छेदीतहदम्र्मेषुयोजनांसा नाजेषु सर्वधर्मेषु शाश्वताशाश्वताभिधा। यत्र वर्णा न वर्तन्ते विवेकस्तत्र नोच्यते । ८७ MEMESTES ५६।१८६वा हे सौम्य प्रश्न - तिनधम्मकहिये प्रदार्थों का जन्मामाया की उपमावाला कैसेहै, तहां उत्तर, कहते हैं यथा मायामयादीजाज्जायते तन्मयोऽकुर जैसे मायामय चीजसे मायामया अंकुराहोती है, अर्थात् जैसे आम्रादिकों कि मायामय घीजसे अिर्थात् कोई ये मायावी पुरुषा करके आरोपित आम्रा दिक वृक्षके मायामयवीजसे मायामय अंकुर उपजताहै।अनिा- ऽसौ.नित्योन चोच्छेदी तद्वद्धर्मेष योजना। यह नित्य नहीं वा विनाशी नहीं तैसेधम्मविषयोजनाहै अर्थात् यह मायामय, अंकुर नित्य नहींवा विनाशी नहीं, क्योंकि मिथ्याहै ताते, तसेही धर्म कहिये पदार्थो विषे जन्म असे नाशादिकोंकी योजना है। अर्थ यहहै कि परमार्थसेधम्मोकाजन्मानाश घटतीनहींहाए८६॥ ६०१६ हे सौम्य तासिद्भाव से सर्वअजन्मा है, इस प्रकार जो,५७ वें श्लोक प्रिपेकहा, तिसको विर्णन करते हैं। जनाजे सर्वधर्मेपुशिाश्वताशाश्वताभिधा अजन्मा सत्र धर्मों विपेनित्यहोवाअनित्य है.ऐसानीम कहना नहीं अधातू परमार्थ से तो नित्य एकरस विज्ञप्तिमात्र सत्तारूप अजन्मा सर्व धर्म कहिये अस्मिाविपे नित्य है वा अनित्यहै, ऐसानामा कहना प्रवर्त होता नहीं क्योंकि यत्रवर्णानः वर्तन्ते विवेकस्तत्र नोंच्यते । जिन विपेवर्ण प्रवत्तहोते नहीं तिन विपे विवेक कहते नहीं, अर्थात् जिन्हों करके अर्थों का वर्णन करिये ऐसे जे शब्द तिनको वर्ण कहते हैं, सो जिस आत्मा विपे वर्ण यह ऐसा है" इस प्रकार कहने को प्रेवत होते नहीं, तिस आत्मा · विषे नित्य है या अनित्य है, ऐसा विवेक कहते नहीं क्योंकि 1 . " गौडपादीय कारिका चतुर्थ,प्रकरण ४ । २५६ यथा स्वप्ने द्वयाभासं चित्तःचलति माययाः। तथा जाग्रहियाभासं चित्त चलति मायया ६३ 1145॥ अद्वयञ्च द्वयाभासं चित्तं स्वप्ने न संशयः। अद्यञ्च हयाभासं तथा जाग्रन्नोसंशयः ६२.१८९- "यतोवांची निवर्तन्ते इत्यादि श्रुति प्रमाण है ६०१७॥ 78 ११माहे सौम्य आत्माको शब्दकी अगोचरताकअः र्थात् अविषयताके । हुये, यह आत्मा व्याख्याकारोंकरके शब्दों सेही प्रतिपादनकरने की योग्यताको कैसे प्राप्तहोताहै। यहशंका करके-वित्तका स्फुरणमात्र अविचारित सुन्दर प्रतिपाद्य अरुमा तिदकरूप दैतहै, इसप्रकार दृष्टान्त सहित कहते हैं । यथास्व. भेदयाभासं चित्तं चलति मायया तथा जाप्रयाभासं चित्तः चा लति मायया । जैसे स्वमाविषे द्वैताभासरूप-चित्त(मन) मायासे चलताहै, तैसे जागविषे द्वैताभासरूप-चित्त मायांकरके चलित होताहै । ६.१-१-१55 MIT PRETE: T६२-१ १.६८-11 हे सौम्याशंका । ननु स्वमविषे प्रतिपाद्य अरुं प्रतिपादकरूप-द्वैतको मनके चलन कहिये स्फुरणमात्ररूप के हुये भी जाप्रतविपे तिसप्रकार -मनका-स्फुरणमात्र । कैसे होवेगा, यह शंकाकरके उत्तर कहतेहैं:-अद्वयञ्च दयाभासं चित्तं स्वमेन संशयः। अद्वयश्चद्धयाभास तथा-जाग्रन्न संशयः । स्व- भविषे अद्वैतरूपेहुआ चित्त-द्वेताभासरूप होता है, या संशय नहीं, तैसे जाग्रत् विपे अद्वैतरूपहुआ चित्त द्वैताभासंरूप होताहे इसमें संशय नहींअर्थात् स्वप्नविषे वास्तव-करके अद्वैतरूप हुआही मन अपनी स्फुरणतासे द्वैतरूप होताहै तिसमें संशयनहीं, तैसे-जामत् विपे भी अद्वैतरूप हुआही मन अपनी स्फुरणतासे, द्वैतरूप होता है इसमें भी संशय-नहीं-॥ अरु जो-पुनः परमार्थ से अद्वैतरूप विज्ञानमात्र वस्तुको वाणीका विषयपनाहै सो म- नका सफरणमात्र है,परमार्थ से नहीं, यहःपूर्व अद्वेतनामक तृतीय .. - । २६० मांडूक्योपनिषत् ।। }} .स्वप्नहक्। प्रचरन् स्वप्ने दिक्षं च दशसु स्थितान्। अण्डजान्। स्वेदजान् वाऽपि जीवान् पश्यति यान् सदा ६३॥ १६ ॥ स्वप्नहक्.चित्तदृश्यास्ते में विद्यन्ते ततः टथक् । तथा तदृश्यमेवेदं स्वप्नदृक् चित्तमिप्यते ६४।१९१ ॥ प्रकरणविपे व्यायीन किये इन .६१,६२, दो श्लोकोंका तात्प- यह ६२।१८६॥ ६३।१६ हे सौम्य! स्वामह प्रचरन् स्वप्ने दिक्षुवैदशसु स्थितान्! अण्डजान् स्वेदजान् वाऽपि जीवान् पश्यति यान् स. दा१ स्वप्नको नेटा स्वप्नविपे विचरता हुआ दशहों दिशाविषे स्थित, अण्डन वा स्वेदजरूप भी जीवों को सदा देखताहै अ- र्थात् इस कथनके हेतु से भी वाणी का विषय जो द्वैत तिसका अभाव है, जैसे सनरूप स्थानविपे स्वप्न जगत् का देखने वाला ऐसा जो स्वप्नका द्रष्टा सो सप्नविपे विचरताहुआ दशहों दिशा विपे स्थित कहिये वर्तमान अण्डज वा स्वेदजम्प भी जिरायुज अरु उभिज्जरूप । जिन प्राणियोंको सदा देखनाहे । सो तिससे भिन्न नहीं इसप्रकार अग्रिम श्लोकसे सम्बन्धहे ६३।१६०॥ ६४।१६१॥हे सौम्य।प्र।जब ऐसे हे तन तिसकर के मुआफ्या, । तहां उत्तर कहतेहैं । स्वप्नदृन चित्तदृश्यास्ते न दि. यन्ते ततः पृथका सनद्रष्टा के चित्तकरके देग्यनेयोग्य तिससे पृथस्नहीं अर्थात स्वप्नद्रशके चित्ताहिये मनकरके देयनेयोग्य वे जीव सो स्वप्नद्रष्टा के चित्त से भिन्ननहींअरु जो ऐमारहे कि ता चित्तही जीवादिक भेदके द्रिष्टा अरु चित्तके। आशर से विषयको पावनाहे, सो कथन घनेनहीं तहां कहनेनिथान- दृश्यमेवेदं स्वप्नदृक् चित्तमिप्यतेनमेयहम्पप्नके द्रष्टाका वित्त निसकरके देयनेके योग्यही अङ्गीकार करत अर्थात तमे यहस्वप्न के द्रष्टायाचित्तनिमस्वप्नद्रष्टाकरके देखनेके योग्यही गौडपादीय कारिका चतुर्थ प्रकरण ४ । चरन जागरिते जाग्रदिक्षुवै. दश सुस्थितान् । अ- एडजान् स्वेदजान् वाऽपि जीवान् पश्यतिः यान् 'स- दा ६५। १९.२.।। - जाग्रचितेक्षणीयास्ते न विद्यन्ते ततः पृथक् । तथा तदृश्यमेवेदं जाग्रतश्चित्तमिष्यते ६६। १९३ ।।।। अंगीकार करतेहैं । अर्थात् जैसे स्वप्नके द्रष्टाकरके स्वामके पदार्थ देखने योग्य हैं, तैसे चित्तभी है। एतदर्थ स्वमके द्रष्टासे भिन्न चित्तनाम कोई वस्तु नहीं, इत्यर्थः ६४।१६१ ॥ ६५।१९२॥ हेसौम्य! अव दृष्टान्त विपे स्थित अर्थको दार्टान्त बिषे योजना करतेहैं। चिरनजागरिते जायद्दिक्षुवै दशसुस्थिता- न्, अण्डजान स्वेदजान्वाऽपिजीवान् पश्यति यान्सदा। जाग्र- विषे जाग्रत्के दशहोदिशा विषे विचरता तहां स्थित अंडज वा स्वेदज भी जिना जीवोंको सदा देखता है, अर्थात् जाग्रत् विषे जाग्रत् अवस्थावाला पुरुप दशहो दिशा विपे स्थित जे अंडज वा स्वेदज, जरायुज अरु उद्भिज्जरूप, चारिखानिके जिन जीवोंको। अिर्थात् कार्य कारणात्मक संघातको सदा देखताहै ६५।१६२॥ ६६।१६॥ हे सौम्य! जाग्रचित्तेक्षणीयास्ते न विद्यन्ते ततः पृथको जाग्रत्केचित्तसे देखने के योग्य तिससे पृथक् विद्यमान नहीं अर्थात् जाग्रदेवस्थावाले पुरुष के चित्तकरके देखने के योग्य वे[ उक्त चारखानि के । जीव तिस जाग्रदवस्थावाले पुरुपके चित्तसे भिन्न नहीं । तथा तदृश्यमेवेदं जाग्रतश्चित्तमिप्यते । तैसे यह जाग्रत्का चित्त तिस द्रष्टाकरके देखने के योग्यही अंगी-- कार करते हैं। अर्थात् जैसे जाग्रत् के द्रष्टाकरके जागत् के जीवादि पदार्थ देखने के योग्यहें, तैसे इस जायदवस्थावाले पुरुषका,चित्त तिस जामत्के द्रष्टा पुरुषकरके देखने के योग्य है ऐसा अंगीकार ' करतेहें । अरु इन ६५, ६६'-दो श्लोकोंके भावार्थरूप यह दो अनुमानहें । जायदवस्थावाले पुरुपकेदृश्य जो जीवादि सोतिस " .
२६२ 2 ,मांडूक्योपनिषद् । उभे,ह्यन्योन्यदृश्येते किन्तदस्तीति चोच्यते । ल- क्षणाशून्य भयं तन्मतेनैव गृह्यते ६७११९४॥ के चित्तसे अभिन्नहै, क्योंकि चित्तकरके देखनेयोग्यहै ताते, जैसे स्वम के द्रष्टाके चित्तकरके देखने के योग्य स्वप्नके जीवादिक (चित्तसे अभिन्न हैं । तैसे अस सो जीवोंके देखनेरूप चित्तहसो द्रष्टा सें अभिन्न है। क्योंकि, द्रष्टाका दृश्य है ताते, स्वप्न के चित्तवत् ६६ ।।१६३॥:- SIT ६७ । १६४॥ हेसौम्य[दृश्यअरुदर्शनकेभेदग्राहक प्रमाण करके घाधितहुये यह दोनों हेतुहँ, ।,यह शंका करके तव कहतेहै । यहां यह अर्थहै कि दृश्य अस दर्शन, यहदोनों परस्परकी अपेक्षा से सिद्ध होनेवाले हैं। दृश्यको सिद्धहुये तिसकरके अविच्छिन्न कहिये विशिष्ट, दर्शन (ज्ञान) सिद्धाहोता है, अरु,तिस दर्शन के सिद्धहुये तिसकरके अविच्छिन्न दृश्य (विषय) सिद्ध होते हैं। इस प्रकार अन्योन्याश्रय रूप दोप करके दृश्य वा दर्शन सिद्ध होते नहीं । एतदर्थ, तिनके भेदके ग्राहक प्रमाणके अभावसे उन दोनों हेतुओंका बाध है नहीं ] जीव अरु चित्त,यह दोनों परस्परके दृश्य.कहिये विषय होते हैं । अरु जिसकरके जीवादिक विपयोंकी अपेक्षापाला चित्त प्रसिद्ध होता, असें जिसकरके चित्तकी अपे. क्षावाला जीवादिक दृश्यहै, एतदर्थ उभेद्यन्योन्यदृश्येते कि- न्तदस्तीतिनोच्यते । दोनों अन्योन्यकरके दृश्यहें सो क्या है ऐसे (प्रश्नकर्ताप्रति ) कहते हैं, अर्थात् वे जीव अरु चित्त दोनों परस्परके दृश्य हैं । अर्थात् परस्पर करके देखने (विपयकरने) योग्य है, शिरु जिसकरके वे दोनों परस्पर के दृश्य हैं, पना । अन्योन्याश्रय दोषके सद्भावसे चित्त अथवा चित्तकरकेदे रखनेके योग्य जो दृश्य पदार्थह सो क्याहै, इसप्रकार प्रश्न किये ये, निमकी कुरुपकरके यह कुछभी नहीं, इसप्रकार कराहे वा कहतेहैं। जैसे स्वप्नविपतित्ररथानरथयोगा। इत्यादि प्रमाण .
गौडपादीयांकारिका चतुर्थं अकरण । ३६६ यथास्वप्नमयोजीतो जायतेमयतेऽपिच मन्यथाजी- वाअमीसर्वे भवन्ति न भवन्ति । Rames से. हस्ती वा हस्तीका चित्त विद्यमान हैनहीं तैसें यहां जायत विषे. भी विवेकीपुरुषको कुछभी वस्तु विद्यमानकरके प्रतीतहोतानहीं। यह अभिप्राय हैं। प्रश्नमा जाग्रवि चित्त चाचित्तको दृश्य यह दोनों विद्यमान कैसे नहीं, तिहां उत्तर कहतेहैं। लक्षणांशन्य मुभयातन्मतेनैव गृह्यते। यह दोनों लक्षणाशून्य है तिनके मतः सेही ग्रहण करते हैं। अर्थात जिस करकेलिखा (देखा)जाय सों कहिये लक्षणा ऐसा.जोप्रमाण तिसकोयही लक्षणीकहतेहीअरु जिस करके चित्त अचित्तका दृश्य चेत्या, यह दोनों लक्षणा कहिये प्रमाण तिससे रहित हैं, ताते तिनके भेदकाप्रमाणीकर पनामप्रमाण करने योग्यपनागाहै नहीं अिरु वादियों ने तो तिन- के मत करके तिस दृश्य अरु-ज्ञानविप्रेत्तत्पर चित्तवान्तारूप दोष करके सो दृश्य अरुदर्शन ग्रहणाकियेहेंन्तितिघिटकी बुद्धि कोदूरकरके यहां यह अर्थ है कि घटविये क्या प्रमाण इस प्रकार प्रश्न किये ड्डयेशज्ञान प्रमाण है। ऐसा उत्तर विने नहीं, 'क्योंकि अन्य वस्तुओं के ज्ञानवि अतिप्रसङ्गअितिव्याप्ति हो वेंगी ताते । अरु घटका ज्ञान प्रमाणहै, ऐसा उत्तर भी बनें नहीं क्योंकि अन्योन्याश्रय दोषका प्रसंगात होता है।तात। अतएवं घट अरु तिसक्के ज्ञानकाप्रमाण:अरु प्रमेयभाव सम्भवे नहीं घट ग्रहण करते नहीं, अरुघटको दूरकरके घटकी बुद्धि (ज्ञान) भी ग्रहण करतेनहीं। ऐतदर्थ तिस ज्ञानेअरु ज्ञेयरुप चित्त असें चित्त के दृश्यविपे प्रमाण अरु प्रमेय का भेद कल्पना करने को शक्य नहीं ॥ इत्यभिप्रायः ॥ ६७ १६४ ६.८।१६५॥ हे सौम्य दर्शन क्राहियेज्ञान से भिन्न अपड- जादि दृश्य पदार्थोंके असद्भावके अनुमानके ग्राहक प्रमाणकरके वाधको निवारण करके, अव दर्शन से भिन्न तिन अंडजादिकन के मांडूक्योपनिषद् is - यथामायामयोजीवो जायतेवियतेऽपिच । तथाजी- वाश्रमीसर्वे भवन्तिनभवन्तिच ६६।१४ाहिक यथानिर्मितकोजीवो जायतेघियतेऽपिवा । तथा जीवाश्रमीसवें भवन्तिनभवन्तिंच ७० । १९७॥ असद्भाव के हुये जन्मादिकोंकी प्रतीतिका वाधहोवेगा, इसशङ्का को दूर करते हैं,1:यथास्वप्नमयोजीवो जायतेत्रियतेऽपिच तथाजीवाअमीसर्वे भवन्तिनभवन्तिच जैसे स्वप्नमय जीव जन्मताहै अरु मरताभी है, तैसेही यह सर्वजीव होते भी हैं अरु नहीं भी होते ॥अर्थात् जैसे स्वप्न विषे अनहुयेही जीव जन्मते अरु मरते हैं, तैसे यह जाग्रत् के जीव भी नहुये हुये जन्मतै अरु मरते हैं ६८ १६५ ॥ ...६६१६६॥हे सौम्य ! अव मायामय जीव के अरु निर्मि- तक जीवके भेदके जानने की इच्छावाले के प्रति कहतेहें] यिर्था मायामयोजीबों,जायतेनियतेऽपिच । तथाजीवाअमीसवें भव- न्तिनभवन्ति। जैसे.मायामय जीव उपजता है अरु मरता भी है, तैसे यह सर्व जीव होते भी हैं अरु नहीं भी होते अर्थात् जिसे इन्द्रजालिक मायावियों की माया से मायामय जीव जन्मताहै अरु मरता भी है, तैसेही प्रज्ञप्तिमात्र चैतन्यकी मायासे जो कि वास्तवमें हैं नहीं । यह अण्डजादि । सर्व जीव उत्प- त्यादि होते भी हैं अरु नहीं भी होते.६६।१६६ ।। ७०।१६७n हे सौम्य यथानिर्मितकोजीबो जायतेमिय- तेपिया । तथाजीवाअमीसवें भवन्तिनभवन्तिच.जैसे नि: र्माण किया जीव जन्मता भी है वा मरता.भी है, तेसे यह सर्व जीव होते भी हैं अरु नहींभी होते॥अर्थात जैसे मन्त्र ओषधि आदिक सामग्री से इन्द्रजाली आदिक मायायियों करके निर्माण किया,जीव जन्मताभी है अरु मरताभी है, तेसही यह अण्डजा- दि-सर्वजीव होते हैं नहीं भी होते। अर्थात् .६८,६९,७०,इनतीन 2 गौडपादीय कारिका चतुर्थ प्रकरण ४ । २६५ न कैश्चिज्जायते जीवःसम्भवोऽस्य न विद्यते । एत त्तदुत्तमं सत्यं यत्र किंञ्चिन्न जायते .७१ । १६८ ॥ श्लोकोंका तात्पर्यार्थ यह है कि, जैसे सिंवित् कहिये चैतन्य रूप ज्ञान तिससे भिन्न अण्डआदिकों का परमार्थकरके सद्भावके अ. भावके अनुमान का जन्मादिकको प्रतीति से,वाधहोता नहीं, क्योंकि सद्भावके अभावहुये भी स्वप्नादिकों विपे जन्मादि विक- ल्पके वाहुल्यता की प्रतीति है ताते । इसप्रकार , ६८,६६, ७०, इनतीन श्लोकों के तात्पर्यको कहते हैं ] स्वप्नमय मायामय अरु औषधि आदिकरके रचित अण्डजादि जीव जन्मते हैं अरु मरते हैं, तैसेही यह मनुष्यादिरूप जीवभी अविद्यमानहुयेही चित्तकी कल्पनामात्रहीं हैं ७०। १६७॥ ७१।१६८ ॥ हे सौम्य ! नि कश्चिज्जायतेजीवः सम्भवोऽस्य न विद्यते। इसका कारण नहीं ताते कोई भी जीव जन्मता नहीं, अर्थात् जिसकरके [जो वादी : जन्मादिक सत्यहै , इस प्रकार मानता है तिसके प्रति पूर्व तृतीय प्रकरणके अन्तके श्लो. कविषे “ न कश्चिज्जायते जीवः" इत्यादि कहा है तिस अर्थको पुनःस्मरण करावंते हैं ] इस (जगत् ) का कारण नहीं, तिसही करके,कोई भी जीव जन्मता (उपजता) नहीं। अरु एतत्तदु- त्तमं सत्यं यत्र किञ्चिन्न जायते। जिसविणे कुछ भी जन्मता नहीं,यह तिनके मध्य उत्तम सत्यहै, अर्थात् जिस सत्यरूप एक अद्वितीय । ब्रह्मविषे कुछ किश्चिन्मात्र भी उपजता नहीं, यह उन पर्वके ग्रन्थों विये उपायपने करके उक्त सत्योंके मध्य उत्तम सत्य है। इसका भावार्थ यह है कि व्यवहारविषे सत्य विषयका अरु जीवोंका जन्म मरणादिक स्वप्नादिकों के जीवॉवत् है । अ. र्थात जैसे स्वप्नविपे जीवादिक अनेक पदार्थ उपजते विनशते हैं तैसेही यह जाग्रत् के जीवादि को कल्पना इसप्रकार पूर्वके तीन श्लोकोंविषे कहा, परन्तु " न कश्चिजायने. त्रही जानना।
२६६ .. मांडूक्योपनिषदः । '; चित्तस्पन्दितमेवेदं ग्राह्यग्राहकवद्वयम् । चित्तंनि विषयं नित्यमसंगन्तेनकीर्तितम् ७२ जीवः" कदापि कोई भी जीव जन्मता नहीं यह परमार्थ से जो सत्य हे ॥ इस श्लोकका अर्थ पूर्व तृतीय-प्रकरणके अन्त के श्लोकविषे कहा है ७१ । १६८ ७२१६६ ॥ हे सौम्य चित्तस्पंन्दितमेवेदं ग्राह्यग्राहकव- वयम्, चित्तं निविषयं नित्यमसंगन्तेन कीर्तितम् । चित्तका स्फुरेण रूपही यह ग्राह्य अरु ग्राहकवाला द्वैत, विपयरहित चित्त है तिसकरके नित्य असंग कहा है, अर्थात् [ज्ञानको, कल्पित दृश्यंकरके उपहित कहिये उपाधिवाले रूपैकरके पृश्यपना होने से, तिसका देखेहुये पदार्थों से भिन्न सद्भाव है नहीं, इसप्रकार स्वभके दृष्टान्त से कहा, अब वास्तवसे ज्ञानको विषयसे सम्बन्ध के अभावसे आत्माही ज्ञान है, इसप्रकार कहते हैं.] चित्त जो मन तिसका स्फुरणरूपही यह ग्राह्य कहिये विषय अरु ग्राहक कहिये इन्द्रिय, इनवाला द्वैत है, अरु विषयरहित चित्त कहिये चैतन्य आत्मा है। तिस हेतुकरके सो चित्त कहिये आत्म चैतन्य' को नित्य असंग कहा है। इसका तात्पर्य यह है कि सर्व ग्राह्य अरु ग्राहकवाला चित्तका स्फुरणरूपही द्वैत परमार्थ से आत्माही है "आत्मैवेदं सर्व" एतदर्थ सो चित्त संज्ञक चैतन्य आत्मा निर्विपय है । अरु तिस निर्षिपयहोने रूप हेतुकरके तिसको नि त्य अंसंग कहाहे." असंगोह्ययं पुरुषः” । असंगही यह पुरुपहे, यह वृहदारण्य उपनिपद के प्रमाणसे | विषय सहित वस्तुका विषयविपे संग कहिये आसक्ति होवे है अरु चित्त संज्ञक आत्मा जिसकरके अविषय है एतदर्थही असंग है, इस युक्तिसे आत्मा का असंगपना सर्वदा सिद्धही है जैसे औकाश निराकार निर वयव अतिसूक्ष्नहोने से जल घृत तैलादिक सर्व में व्यातही जलार्दिक किसीपदार्थ अरु तिनके धम्तसाथ कदापि पर A , गौडपादीय क़ारिकी चतुर्थ प्रकरण ४।. योऽस्तिकल्पितसंरत्या परमार्थेननास्त्यसौ परत- न्त्राभिसंशत्या स्यान्नास्तिपुरमार्थतः:५३१२०० भी करतानहीं, तेसे आकाशसभी महासक्षम निराकार निर्वि. कार आत्मा आकाशादि-सर्व में व्याप्तहुआ-हुआ भी सदा असं- गहीहै:। ७२ - १६६ : harshitairs .७३।२० हेसौम्य शंकानिनु, जवानिविषय होनेकरके चित्त जो चैतन्य ब्रह्म तिसका असंगपना है, तब सो असंगपना सिद्धहोता नहीं, क्योंकि शास्ता कहिये शिक्षाका करनेवालागुरु, शास्त्रअरु शिष्या अर्थात् शीस्ता, शास्त्र अरु शिष्य, इत्यादि। प्रमाताप्रमाणादिकविषय विद्यमान हैं ताते, समाधान यह दोप बने नहीं, क्योंकि योस्तिकल्पितसंवृत्या परमार्थेननास्त्यऽसौली: जोकल्पित तिसकरके हैं यह परमार्थसे है नहीं, अर्थात् जोः शास्त्र शास्तादि पदार्थ विद्यमान है, सो परमार्थकी प्राप्तिकोसा धन उपाय होने करके कल्पितःजो व्यवहार तिसकरके है। परन्तु यह शास्त्रादि पदार्थ परमार्थ से है नहीं। इसमें ज्ञातेद्वती नविद्यते” (जोनेहुये द्वैत है नहीं यह प्रथम प्रकरणके २५.३ श्लोक करके, उक्त वाक्य अनुकूल हैं। अरु [नेनु, वैशेषिक वादी. जो हैं सो द्रव्यले आंदिलेके समवाय पर्यन्त पट्पदार्थों को परमार्थ से मानते हैं, अरु जव तैसे है तव चैतन्यको असंगपना कैसेहैं। तहा:समाधान, कहते हैं, यहाँ यह अर्थ है कि वैशेषिक मतवा दियोंकी परिभाषासे कल्पित व्यवहारके अनुसारसे:लो द्रव्य से. आदिलेकै समवाय पर्यन्तपिदार्थ हैं सो:परमार्थसे हैं नहीं, किन्तु व्यवहार सत्ताकरके भारताहै, अतएव चैतन्यआत्माकाअसंगपना सर्वदा अविरुद्धहीहै।]परतन्त्राभिसंवृत्या स्यान्नास्तिपरमार्थतः अन्य शास्त्रके, व्यवहार में होय तोपरमार्थ से नहीं, अर्थात् जो अन्य वैशेपिकांदि मतवादियों के शावके व्यवहार से होने सो परमार्थ से निरूपण कियाहुआ नहीं। अतएव : तिसकरक .
मांडूक्योपनिषद्। . अजःकल्पितसंवत्या परमार्थेननाप्यजः। परतन्त्रो ऽभिनिष्पत्त्या संवत्या जायतेतु सः ७४।२०१॥ असंगकहाहै,इसप्रकारकाजोहमाराकथनसोयुक्तहीहै७३।२००॥ ७४।२०१॥हेसौम्य!शिंकानिनु,शास्त्रादिकनको व्यवहाररूप ताके होनेसे "अजइति" ८अजन्माहै ? यह शिास्त्रोक्त कल्पनाभी व्यवहाररूपही होगी, । समाधान । तहां ऐसेही सत्यहै,यहकहते हैं । अजःकल्पितसंवृत्या परमार्थेननाप्यजः कल्पितव्यवहार सेही अजन्मा है परमार्थसे अजन्माभी नहीं, अर्थात् शास्त्रादिकों के कल्पित व्यवहारसेही अजन्माहै, ऐसा कहते हैं, अरु परमार्थ सेतो अजन्माभी नहीं। अरु" परतन्त्रोऽभिनिष्पत्त्या संघृत्याना. यते तु सः। अन्य शास्त्रकी प्रसिद्धिसे सोतो व्यावहारिक है,अरु जन्मताहै। अर्थात् जिसकरके यहां यह अर्थहे कि, द्रव्यका अरु गुणादि पांचका जो लक्षण है, सो तिससे व्यावर्तक अपने लक्षण के संभवविना कल्पते नहीं। अरु तेसेहुये तिन तिनके लक्षण से तिनकी प्रतीतिके हुये तिससे भिन्नकी प्रतीति होवे है, अरु तिस भिन्न पदार्थ के ओलक्षणसे तिसकी प्रतीतिकेहुये तिससे व्यायन पृिथकिये । पदार्थकी प्रतीतिहोने हैं। इसप्रकार परस्परकेआश्र. यरूप दोपसे कुछभी वस्तु वास्तवसे सिहोती नहीं] अन्य परि णामवादियोंके शास्त्रकी प्रसिद्धिसे । अर्थात् अन्योंके शाम्रापिष जो परिणामरूप जन्मकी प्रसिद्धिहे तिसके निपेधसे ।जो "आ. स्मा अजन्मा है ऐसे कहाहे सोतोव्यवहारसे हे। अरु जिसकरके अजन्मा है तातेजन्मरूप प्रतियोगीको व्यवहारकरके सिद्धहोने से तिसका निषेधरूप अजन्मापनाभी तेसाही है। यह अर्थ है। एतदर्थ "अजइति" अजन्मा है, इसप्रकारकी यह कल्पना परमार्थरूप विषयले प्रवृत्त होनीनहीं। [अजन्मापने आदिकव्यतः हारकरके उपलनित जोस्वम्प निसका आल्पिनपनाह, क्योंकि तिसको कल्पनाका अधिष्ठानपना हे नाते । अरु कल्पित भी -- "1 गौडपादीय कारिका चतुर्थ प्रकरण ४ । २६६ अभूताभिनिवेशोऽस्ति इयं तत्र न विद्यते। हयाभावं स बुद्धयैव निर्निमित्तो न जायते ७५ । २०२॥ यदा न लभते हेतूंनुत्तमाधममध्यमान् । तदा न जायते चित्तं हेत्वाभावे.फलं कुतः७६ । २०३॥ दिकोंको अकल्पित वस्तुके प्रेमाज्ञान प्रिमाणे जन्यज्ञान । की अहेतुता नहीं, क्योंकि प्रतिविम्बादिकों को विम्बादिकों के प्रमा की हेतुता सिद्ध है ताते, ऐसा जानना ] इत्यर्थः ७४ । २०१॥ ७५ । २०२ ॥ हे सौम्य! शड्डा । ननु, [ज्ञानकों, केल्पित शास्त्रादिकोंसे अन्यता (पृथक्ता) के हुये तिसको मिथ्याहोनेसे अपुनरावृत्ति कहिये आवागमनसे रहित मोक्षरूप फलकी सा- धनता होगीनहीं, ] | समाधान । तहां कहते हैं । अभताभिनि- वेशोस्ति द्वयं तत्र न विद्यते, द्वयाभावं स वुद्ध्यैव निनिमित्तो न जायते। असत्विषे अभिनिवेशहै तिसविषे द्वैत विद्यमान नहीं, द्वैतके अभावको जानके ही निमित्तसे रहित होता है सो नहीं, अर्थात् जिसकरके असत् कहिये मिथ्या ज्ञानका विषय संसार है, एतदर्थ असत्यरूप द्वैतविपे केवल अभिनिवेश , कहिये आ- ग्रह, है । अरु जिस करके तिस आत्माविपे मिथ्या आग्रहमात्र अरु जन्मका कारण द्वैत विद्यमान है नहीं, एतदर्थ जो पुरुप द्वैत के अभावको जानकेही मिथ्या द्वैत के आग्रहरूप निमित्तसे रहित होता है सो जन्मता नहीं अिर्थात् मिथ्या ज्ञानरूपद्वैत प्रपञ्चके आग्रह रूप अभिनिवेशके सम्यक् अभाव हुयेही मोक्षहै | "ऋने ज्ञानानमुक्तिः"।७५ ॥ २०२॥ ७६ । २०३॥ हे सौम्य!r“निनिमित्तो न जायते" नि- मित्त से रहित हुआ जन्मता नहीं ? इसप्रकार जो पूर्व ७५ वें श्लोक विपे कहा तिस इस अर्थको वर्णन करते हैं] जाति क. हिये वर्ण अरु आश्रमको (अर्थात् ब्राह्मणादि वर्ण अरु ब्रह्मच. Oदि आश्रम, इनकरके युक्त पुरुपके अर्थ विधान किये जे शिम + २७० Somमांडूक्योपनिषद् : 2015 दम अग्निहोत्रादि विहित कर्म रूपी हेतु, सो फलाभिलाषा से रहित निष्काम अधिकारी पुरुषों करके अनुष्ठान किये धर्म (अ. र्थात् धर्म अरु कर्मका इसप्रकार विचार है कि कर्म जो शब्द है सो नित्य , नैमित्तिक, प्रायश्चित्त, अरु कामुक, अरु निपिद्ध इन पांचोप्रकारके कम्मों विषे समान, वर्तता है, परन्तु सर्व कर्म धर्म नहीं क्योंकि निषिद्ध झादि कर्मोको धर्मपना नहीं, ताते जिन सन्ध्या गायत्री अग्निहोत्रादिक कम्मोंके न करने से प्रत्यवाय (पातक) होताहै सो कर्म मुख्य (उत्तम) धर्म है, अरू जिन अश्वमेधादिक यज्ञ रूप कर्म के न करने में प्रत्यवाय नहीं अरु करे तो फलकी प्राप्तिहोय ताते सो कामनावाले के अर्थ होने से गौण (मध्यम) धर्म है, अरु अश्वमेधादि यज्ञ, जो पूर्वराजर्पियोंने किये हैं सो बहुधा स्वर्ग प्राप्तिकी कामनासे, वा महत् प्रायश्चित्त की कामना से किये हैं, अतएव यज्ञादिक कामुक कर्म गौण धर्म है, ताते निष्काम अधिकारी करके अनुष्ठान किये अग्निहोत्रादि कर्मा:रूप मुख्य धर्मी, सो देव भावादिक उत्तम जन्मकी प्राप्ति के प्रयोजनार्थहोनेसे केवल उत्तमहै । अरु धर्म अधर्म मिश्रित रूप कर्म-अिर्थात् यहां धर्म-अधर्म को मिश्रित कहा है तिस करके कुछ अश्वमेधादि धर्म-अरु ब्रह्महत्यादि अधर्मका समु- चय नहीं कहा, किन्तु कामनासे रहित जो केवल उत्तम अग्निः होत्रादि धर्म, अरु तिनको अपेक्षा कामुक कर्म रूप अधर्म तिनका समुच्चय धमाधर्म अरु मिश्रित,शब्दका अर्थ जानना । सो मनुष्यादिक मध्यम जन्म भावकी प्राप्तिके अर्थ होनेसे, म. ध्यमहै । अरु जिो निपिन्द्धाचरणहे.सो तिर्यगादि अधम योनिकी प्राप्तिका निमित्त होनेसे अधम्न रूप-प्रवृत्ति विशेष अधर्म है। अतएव यिदान लभते हे तनुत्तमाधम मध्यमान्, तदा न जायते चित्तं हेत्वाभाचे फलं कुतः। जब चेतन्य उत्तम मध्यम अरु अधम हेतुओं को देखता नहीं, तवजन्मतानहीं अरुहेतुके अभाव हुये फल कहांसे होगा' अर्थात् । उक्त प्रकार के उत्तम मध्यम - गौडपादीय कारिका चतुर्थ प्रकरण ४ । अनिमित्तस्य चित्तस्य याऽनुत्पत्तिःसाध्वया । अ. जातस्यैव सर्चस्य चित्तदृश्यं हितद्यत: ७७।२०४ ॥ अधम हेतुओं को जव चित्त कहिये चैतन्याउन अविद्या करके कल्पित उत्तम मध्यम अरु अधम हेतुओं को, सर्व कल्पना से रहित एक ही अद्वितीय आत्मतत्त्व को जानता हुआ, देखता नहीं। जैसे अविवेकी वालकों करके आकाश विषे दृश्यमान जो मल (मलिनता)तिसको विवेकी पुरुप देखता नहीं, तद्वत् तव देवादिक आकारों करके उत्तम मध्यम अरु अधम, कौके फलरूप से जन्मता नहीं । अरु चीजादिक के अभाव हुये धान्य के वृक्षादिकोंवत् हेतु के अविद्यमान हुये फल उपजता नहीं; एतदर्थ हेतु के अभाव हुये फल कहां से होवेगा किन्तु कहीं से भी नही ७६।। २०३।।: 2:57 ७७। २०४॥ हे सौम्य तदा न जायते चित्ती तब चित्त जन्मता नहीं इसप्रकार अभी७६ वें श्लोक विषे कहा,सो कालपरिच्छेदकी प्रतीतिसे आगंतुकताकी शंका करके निवारण करते हैं ] “हेत्वभावे चित्तं नोत्पद्यत इति" ८ हेतु के अभाव हुये चित्त उपजता नहीं ? इसप्रकार पूर्व श्लोकविप कहा । पुनः तिस चित्तकी अनुत्पत्ति किस प्रकारकीहै सो अव कहतेहै अिनि- मित्तस्य चित्तस्य याऽनुत्पत्तिः समाऽद्वया। अनिमित्त चित्त की जो अनुत्पत्तिहै सो सम अद्वैतरूप है । अर्थात् परमार्थ ज्ञान दर्शन से निवृत्त हुआहै. धर्म अधर्म नामवाला जो उत्पत्तिका निमित्त है सो, जिसका ऐसा जो चित्त सो अनिमित्तचित्त कहते हैं। तिस अनिमित्त चैतन्यकी जो मोक्षनामवाली अनुत्पत्ति है सो सर्वदा [जैसे रूपेकी कल्पना कालविप भी सीपीका अरूपा- पना स्वाभाविक है अिर्थात अविवेकी पुरुष को लोभ के वासे जिसकालमें सीपीविषे स्पेकी भ्रांतिहोती है, तिस कालविपे भी सीपी जो अरूपापनाहे सो स्वाभाविक सिद्धही हे तसे ही . -२७२ मांडूक्योपनिपद् ।।.. बुद्धानिमित्ततां सत्यां हेतुं प्रथगनाप्नुवन् । वीतशो- कं तथा काममभयं पदमश्नुते ७८ । २०५॥ जन्मकी कल्पना कालविषेभी चैतन्यरूप ज्ञानकी निष्प्रपंच अद्वि- तीय ब्रह्मरूपता स्वाभाविकही है। अरु जन्मके भ्रमकी निवृत्तिकी अपेक्षा से तो“तदान जायते" तव जन्मता नहीं इसप्रकारकहा। अरु यह , सर्वदा, इसपद करके सूचित करते हैं। केवलमोक्षा- वस्थावाले चैतन्यकाही अजन्मापना होय ऐसा नहीं, किन्तु घटा- दिक उपहित चैतन्यको भी अजन्मापनाहै, इस अभिप्रायसे यहां सर्व अवस्था विपे, इसप्रकार कहा । अरु चैतन्य के सही प्रतिविम्बको अपने विम्बके तुल्य ब्रह्मरूपता है ताते । इसहेतुके अभिप्राय से यह अनुत्पत्ति अद्वैतरूप कहींहै ] सर्वावस्था विषे समकहिये विशेष रहित अरु अद्वितीय है। सर्व द्वैतको चैतन्यका दृश्य होने करके मिथ्यात्व होनेसे, अरु नित्य सिद्ध परिपूर्ण चैतन्य नामक स्फूर्तिको जन्मका असंभवहै ताते, तिसकी जो अनुत्पत्ति है सो उक्त लक्षणवाली युक्त ही है ] अरु अजातस्यैव सर्वस्य चित्तदृश्यं हि तद्यतः। जन्मरहित चित्तका सर्व दृश्यही है, अर्थात् जिसकरके सम्यक् ज्ञानसे पूर्व भी सो द्वैत अरु जन्मचित्त (चैतन्य) का दृश्यहीहै। एतदर्थ निमित्त रहित अद्वेतरूप चेतन्य की जो अनुपपत्ति सो सम अरु अद्वेतही है । अरु सो अनुत्पत्ति पुनः कदाचित् होताहै, इसप्रकार नहीं, वा कदाचित होता नहीं, इसप्रकार नहीं, किन्तु चैतन्य आत्मा सर्वदा एकरूप एक रसही है “ पर प्रत्यक् एकरसः" इत्यर्थः ७७ । २०४ ।। ७८ । २०५ ॥ हे सौम्य !"द्वयाभावं सयुयन निनिमित्तोन जायते” ८ सो द्वेतके अभाव को जान के निमित्त से रहित हुआ जन्मता नहीं? इसप्रकार पूर्व ७५ वें उलोकपिपे कहा, तिसको अव पुनः वर्णन करते हैं ] बुट्वानिमित्ततां सत्यां हेतुं पृथगना मुगन् । निमित्तरहित सत्ताकोजानके हेतुको पृथक् ग्रहणकरता -- गौडपादीय कारिका चतुर्थ प्रकरण ४ । अभूताभिनिवेशान्दि सदृशे तत्प्रवर्तते । बस्लामा- वं सबुद्वैव निःसङ्गं विनिवर्त्तते ७६।२०६॥ हुआ अर्थात् उक्त प्रकारकी युक्ति करके जन्मका निमित्त जो द्वैत तिसके अभानहुये, निमित्तरहित परमार्थरूप सत्ताको जान के धार्मिक कारणरूप हेतु को देवादिक योनिकी प्राप्तिके अर्थ भिन्न ग्रहण करता हुआ अिर्थात् वाघ विषयोंकी इच्छासे रहित हुआ वीतशोक तथाफाममभयं पदमश्नुते। विगतशोक काम सरहित अभयपदको प्राप्तहोता है, अर्थात् देवादि योनिकै प्रापक जे उक्तधर्मादिक तिनको अग्रहणकरता हुआ, अरु कामसेरहित विगत शोक हुआ । अर्थात् अविद्यादि कारण कार्य से रहित हुआ। अभय पदको प्राप्तहोता है। पुनः जन्मको पानता नहीं अर्थात् यहां जो कहा कि पुनर्जन्मको पावता नहीं सो जिन अ. विवेकियों की दृष्टिसे आत्मा जन्मता हे तिनकी दृष्टिकी अपेक्षा से कहाहै, नतु आत्मा तो सदा अजन्मा एकहीं है । २०५ ॥ छ । २०६ ॥ हे सौम्यजिव ऐसे है ता उक्तप्रकारके पदकी प्राप्ति सदाही है, यह शंका करके कहते है अिभूताभि- निवेशादि सदृशेतत्प्रवर्तते । अभत अभिनिवेश से सदृशविषे सो प्रवत होता है । अर्थात् जिसकरके मिथ्या द्वैतविपे द्वैतके सद्भावका निश्चयरूप जो मिथ्या आग्रह है, तिस अविद्यात्मक व्यामोहरूप मिथ्या अभिनिवेश कहिये आग्रह से सदृश कहिये तिसके अनुसारी, वस्तुविषे सो चित्त प्रवत होता है। एतदर्थ विस्वभारंसवुद्ध व नि.संहं विनिवर्तते । सो वस्तुके अभावको जानकही नि.संगहुआ निवृत्तहोताहै, अर्थात् सो पुरुप तिस द्वैत रूप वस्तुके अभावको सम्यक्प्रकार जानके ही अर्थात् जबजा- नता है तय । अपना चित्त जैसे तिस मिथ्या अभिनिवेश के विपयले नि संग कहिये निरपेक्ष, हुआ निवृत्तहोता है, तेने निसकी निवृत्ति के अनुसारी होता हे ७६ । २०६॥ -- ३५ २७४ मांडूक्योपनिषद् । निटत्तस्याप्रवृत्तस्य निश्चला हि तदा स्थितिः । विषयःसहिवुद्धानांतत्स्वाम्यमजमद्वयम् ८०।२०७॥ अजमनिद्रमस्वप्नं प्रभातम्भवति स्वयम् । सकृति- भातो ह्येवैष धर्मों धातुः स्वभावतः ८११२०८ ॥ ८०। २०७ ॥ हे सौम्य ! निवृत्तस्याप्रवृत्तस्य निश्चला हि तदा स्थितिः, विषयः स हि बुद्धानां तत्स्वाम्यमजमद्वयम् । निवृत्त हुये अप्रवर्त्त भये की अचल ब्रह्मरूप स्थिति होती है, जाते वह बुद्धिमानों का विषय है सो समभाव अज अद्वैत है, अर्थात् यदि ऐसे (उक्तप्रकार) होय तदा द्वैतरूपविषयोंसे निवृत्त हुये, अरु अन्य विषय विपे अभावके ज्ञानसे अप्रवर्त्त हुये चित्त (आत्मा) की चलन से रहित (अचल)स्वरूपही अद्वैत एक रस विज्ञान घन ब्रह्मरूप.स्थिति होती है । अर्थात् भेदवादियों करके कल्पित शास्त्रोंका जो द्वैत भावरूप विषय तिस द्वैतभावादि रूप विषयों से निवृत्त हुये, अरु अन्य शब्दादि विषयों विपे तिनको भ्रान्ति रूप होनेसे तिनके अभावदर्शक यथार्थ ज्ञान से तिनविपे अप्रवर्त्त हुये चित्त, कहिये आत्मा, की यह निश्चल स्वरूपही । अर्थात् स्वरूपसेही, जैसी है तेसी । निश्चल अद्वैत एकरस विज्ञानघन ब्रह्मरुप स्थितिहोती है । अरु जिस करके सो. मोक्षरूप आत्मा "दृश्यते त्वगयावुझ्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः, प्रज्ञानेननमाप्नुयात्इत्यादि श्रुतिप्रमाण से, परमार्थदशी बुद्धिमानों का विषय हैं, एतदर्थ सो समभाव कहिये परम निशेिप वस्तु अजन्मा मरु अद्वेत रूप है ८० । २०७॥ ८१।२०६॥हेसौम्यप्रउन । पुनःभी यहसूक्ष्मदर्शी पद्धिमान in पण्डितोंकाविपय ब्रह्मस्वरूपसे स्थितिरूप मोक्षकैमाह, तहांउत्तर : कहते हैं । अजमनिद्रमस्वप्नं प्रभातम्भवति स्वयम् । अज है, निद्रासे रहितहे, स्वप्न रहित, अरु आपही प्रकाशरूप होताहर अर्थात् सो समभाव अजन्माहे, अरु निन्द्रा अरु स्वप्नसे रहिन, - -- गौडपादीय कारिका चतुर्थ प्रकरण ४। २७५ सुखमात्रियतेनित्यंदुःखंवित्रियतेसदा । यस्यकस्यच धर्मस्यग्रहेणभगवानसौ ८२॥२० असे आपही प्रकाशरूप होता है, अन्य सूर्यादिकप्रकाशवानोंकी अपेक्षावालों नहीं, अर्थात्तु ज्ञानरूप स्वप्रकाश स्वभाववाला है “तस्यभासा सर्वमिदं विभाति" अरु । सकृद्विभातो वैप धर्मों धातुःस्वभावतः सर्वदा प्रकाशरूपही यह धर्म स्वभावसे धातु है । अर्थात् सर्वदा प्रकाशरूपही यह इस लक्षणवाला आत्मना- मक धर्म स्वभावलेही धातु कहिये सर्वका धारण करनेवालाहै 'चा धातु कहिये वस्तुके स्वभाव से युक्त प्रकार काहै ८११२०८।। २। २०६॥ हे सौम्य ! प्रश्न इसप्रकार कथन कियाभी पर- मार्थतत्व लौकिक पुरुषों करके क्यों नहीं ग्रहण होता । तहां उ- त्तरं कहते हैं। सुखमात्रियतेतित्यंदुःखंवित्रियतेसदी, यस्यकस्यच धर्मस्य ग्रहणेभगवानसौ। जिस किस भी धर्म के ग्रहणसे सुख सदा आच्छादित करते हैं, 'दुःख सदा प्रकट करिये है यह भग- वान् । अर्थात् तिसकरके जिस किस भी द्वैतवस्तुरूप धर्म कहि- ये पदार्थ, के ग्रहणके आग्रहसे अर्थात् द्वैतरूप वस्तु कुछहै इस प्रकारके आग्रहसे । सुख जोहे सो सदा श्रमविनाही आच्छादन करते हैं । अर्थात् उक्त प्रकारके असत् द्वैतरूप वस्तुके आग्रहरुप आवरण करके सुख स्वरूप जो आत्माहै तितको निरन्तर विना हीश्रमके आच्छादन करते हैं। अरुतिससखविपे उक्त प्रकारका आवरण जो है, सो अपनी निवृत्ति के अर्थ अद्वैतके ज्ञान के निमित्त सिधिन । कोही इच्छताहै, अन्य प्रयत्नकी अपेक्षा करतानहीं। अरु दुःख जोहै सो सदा प्रकट करते हैं, क्योंकि परमार्थका ज्ञान अतिदुर्लभहै ताते । अर्थात् यावत् यह पुरुष अपने दुःखोंको आ. 'चार्य के समीप जाय प्रकट कहता नहीं अरु आचार्य उसको दुःखी देखता नहीं तावत् उसको दुःखकी समूल निवृत्तिके अर्थ तत्व ज्ञान उपदेश करता नहीं, अतएव तत्व ज्ञानको अति दुर्लभ जान T २७६ 12- मांडूक्योपनिषद् । .. अस्तिनास्त्यस्तिनास्तीति नास्तीतिनास्तिवापुनः । चलस्थिरोभयाभावैराटणोत्येवबालिशः ८३ । २१० ॥ के दुःखको सदा प्रकट करतेहैं। तिस हेतुसे यह भगवान् कहिये सर्व करके पूजनेयोग्य' अद्वैतरूप आत्मदेव, वेदान्त शास्त्र अरुआ- चार्यों करके अनेक प्रकारसे कथन कियाहुवा भी जाननेको शक्य नहीं। क्योंकि "आश्चर्योयस्यवक्ताकुशलोस्यलब्धा' इसआरमा का कहनेवाला आश्चर्यरूपहै, अरु प्राप्त होनेवाला कुशल है यह श्रुतिकेप्रमाणसे आत्मदेवकावक्ताश्रोताआश्चर्यवत् १२१२०६॥ ८३ । २१०॥ हे सौम्य !" अस्तिवानास्ति' हे वा नहीं है। इत्यादिक सूक्ष्मविषयवाले बुद्धिमान् पंडितोंके भी आग्रहसे जब भगवान् परमात्माके आवरणहीहै तव मूढजनोंकी बुद्धिको आव. ग्णहै तिसमें क्या कथन है, इस प्रकार के अर्थको देखावतेहुये कहते हैं। अस्ति नास्त्यस्ति नास्तीति नास्तीति नास्तिवा पुनः, चलस्थिरोभयाभावैराणोत्येक्वालिश है, नहीं है, हे नहीं है, नहीं है पुनःनहींहै,ऐसे। अरु सत् असत्भावजोहे सोस्थिर अस्थिर रूप है ताते इन चल, स्थिर उभयरूप अरु अभावों करके चालक आवरण करतेही हैं। अर्थात् “आत्मा देहाडिकों से भिन्न है, इस प्रकार कोई एक वैशेषिकादिमतवादी जानते हैं। अरुआत्मादेहा- दिकों से तो भिन्न है परन्तु पुद्धिसे भिन्ननहीं। इसप्रकार अन्य क्षणिकवादी जानताह। अरु आत्मा है भी अरु नहीं भी है, इस प्रकार अन्य जोअर्द्धक्षणिकवादी सत्यअरु असत्यसा कहनेवाला दिगम्बर जानता मानता कहना है । अरु आत्मा नहीं है पुनःनहीं है, इसप्रकार हठपूर्वक अत्यन्तशून्यवादी मानता [ यहां यह अर्थ है कि अनित्य घटादिकों से सुखादिआकार परिणामाला होने करके, विलक्षण होने से अस्ति भाव रूप-जो यह प्रमाना कहा सो चल अासोपाधिक हुआ परिणामी है ] तिनमें अस्ति मोहे जो चल कहिये अस्थिर है. क्योंकि घटादि अनिल , - .
२७७ - . गौडपादीय कारिका चतुर्थ प्रकरण ४ । कोट्यश्चतस्रएनास्तु ग्रहासां सदा वृतः। भग वानाभिरस्टष्टो,येन दृष्टः स सर्वदक ८४२११॥ वस्तुवों करके विलक्षणहै ताते । अरु नास्तिभाव जो है, सो स्थिर, है क्योंकि सदा निर्विशेष निरुपाधि है ताते अरु सदसद्भावजो है सो स्थिर अरु अस्थिर, उभयरूप है । अरु स्थिर, अस्थिर विषय हैं, सो अभाव है । तिन इन चल, अरु स्थिर उभय रूप, अरु अभाव करके सर्व भी सत् अरु असत् वादियोंका वादीरूप, चालक कहिये अविवेकी भगवान् (प्रत्यगात्मा) को आच्छादन करताही है । अरु यद्यपि..वो वादी पण्डितहे, तथापि परमार्थ तत्वके अवोधले उक्त प्रकार के , वालकही हैं। तर जो सभा- वही से मृढ पुरुष हैं सो चालक कहिये परमार्थ तत्त्व विवेक से शून्य होय इसमें क्या आश्चर्य है । इत्यभिप्रायः ॥ तथाच " नायमात्माप्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यो वैष वृणते तेन लभ्यस्तस्यैप आत्मा वृणुतेतस्वाम् ८३।२ १० ॥ ८४२११॥ हे सौम्प! । प्रश्न । पुनः जिसके सम्यग्ज्ञान क- रके पुरुष, अबालक , कहिये विवेकी बुद्धिमान् पंडित, होते हैं ऐसा जो परमार्थ तत्व प्रित्यगात्मा सो कैसाहै, तहां . उत्तर, कहते हैं। कोट्यश्चतस्त्र एतास्तु ग्रहैय्यांसां सदावृतः। जिन, के आग्रह से सदा आवृत है, चारकोटियां हैं तिनकरके । अर्थात् जिनकोटियों के प्राप्ति के निश्चयरूप ग्रहणों से अिर्थान् आग्रह हठ , विशेपसे । आत्मा सटाआवृत कहियेढकाहुआ, है। अरु वे प्रसिद्ध “ अस्तिनास्ति, इति" है अरु नहीं है, इत्यादिक प्रकारसे कथनकरीहुई वादियों,करके कल्पित्तशास्त्रों के निर्णय से निरूपण करने योग्य चार कोटिया, कहिये पक्ष, हैं। अरु भिग. वानाभिरस्पृष्टो येने दृष्टः स सर्वर भगवान् स्पर्श रहित जिसने देखा है सो सर्गदृक् (द्रष्टा) होताहै । अर्थात् निन ना- दियों की इन “अस्तिनास्ति' इत्यादि चार कोटियोंसे अर्थात् .
- . २७८ मांडूक्योपनिषद् । प्राप्य सर्वज्ञतांकृत्स्नां ब्राह्मण्यंपदमयम् । अनाप नादिमध्यान्तं किमतःपरंमीहते ८५२१२॥ अस्ति , नास्ति, निर्विशेप, विशेप,इन चार कोटियोंसे जोभग- वान (प्रत्यगात्मा) स्पर्शरहित अर्थात् , अस्नि, नास्ति, भा वादिकोंसे रहित है जिस मुनि कहिये वेदान्तशास्त्र के मनन विषे कुशल पुरुष ने देखा (साक्षात् यथार्थ अनुभव किया ) है सो उपनिषदों का वेत्ता पुरुष अर्थात् मुख्यतारके उपनिष- ही वेदान्तहै । सर्वदृक् , कहियेसर्वज्ञ, परमार्थदर्शी बुद्धिमान पंडित होताहै ॥ क्योंकि "मैत्रेय्यात्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुतेमते वि- ज्ञाते इद ७ सर्व विदितम्" इत्यादिश्रुतियों के प्रमाण से जो सर्वाधिष्ठान प्रत्यगात्माको सम्यक्प्रकार जानता है सो पण्डित सर्वज्ञ होता हे तिससे इतर सर्व मायिक सर्वज्ञता है, इसप्र- कार जानना ८४२११ ॥ ८५ ॥ २१२॥ हे सौम्य !" प्राप्य सर्वज्ञतां कृत्स्नांवालण्यं पदमद्वयम्, अनापन्नादिमध्यान्तं किमतः परमीहते। सम्पूर्ण सर्वज्ञताको पायके अद्वैत अरु आदि मध्य अन्तको प्राप्तहुये अरु ब्रह्म भावरूप पदको पायके इसके पश्चात क्या चेष्टाकरता है , कुछभी नहीं, अर्थात् सो ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण,इस उक्तप्र कार की समस्त सर्वज्ञताको पायके अद्वैत, अरु 'आदि मध्य अन्त क- हिये उत्पत्तिस्थिति अरु लय' इनको अप्राप्तहोयके,अरु"एपनित्यो महिमा ब्राह्मणस्य" यह नित्य महिमा ब्राह्मणकाहै । इसबृह- दारपयकी श्रुतिप्रतिरादित ब्रह्मभावरूपपदको पायके इस सर्वो- कृष्ट आत्मलाभके [ कि " आत्मलाभानपरंविद्यते " इत्यादि प्रमाणसे जिसलाम से पर (श्रेष्ठ) अन्यलाभ विद्यमान नहीं। पश्चात क्या निष्प्रयोजन चेयाकरता है, अर्थात् साक्षात् आत्म- ज्ञान होने के पश्चात् सो विद्वान क्या निष्प्रयोजन कर्मादिकों में प्रवत होता है । किन्तु कदापि वृथा चेष्टा करता नहीं क्योंकि २७६ गौडपादीया कारिका चतुर्थ प्रकरण ४ । विप्राणां विनयो ह्येष शमःप्राकृतउच्यते ॥ दमः प्र कृतिदान्तत्वादेवं विद्वाञ्च्छमं ब्रजेत् ८६ । २१३॥ "नैवतस्य कृतेनार्थ तस्यकार्य न विद्यते” इत्यादि गीतास्मृति के प्रमाण से उसको कम्मो से कुछ भी अर्थ नहीं, ताते उसको कुछभी कर्तव्यता विद्यमान है नहीं । अर्थात् उक्त प्रकार के आत्मलाभी को कुछ भी कर्तव्य नहीं ८५।२१२॥ ८६॥ २१३॥ हे सौम्य ! “यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहोति ६ यावत् जीवतारहे तावत् अग्निहोत्र को करे ? इत्याति श्रुतिको अविद्वान् को विषय करनेवाली होने से, विद्वान् ('आत्मज्ञानी) को अग्निहोत्रादि कर्म कर्तव्य नहीं, इसप्रकार कहा ] अव तिस विद्वान्को भी शमदमादिककी विधिसे कर्तव्य है, यह शङ्काकरके कहते हैं,। यहाँ यह अर्थ है कि ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण को यह विनय स्वाभाविक है, ताते सो श्रुतिकी आज्ञाके अधीन कर्तव्यताको सम्पादन करता नहीं अरु शमभी स्वाभाविक है ताते श्रुतिकी आज्ञासे करता नहीं । अरु दम भी,स्वाभाविक होने से श्रुतिकी आज्ञाको इच्छता नहीं । अर्थात् शमदमादिक जो साधन है सो सम्यक् आत्मज्ञानकी प्राप्ति-से पूर्व जिज्ञासावस्था में "शान्तो दान्त उपरतितितिक्षुसमाहितो भूत्वा " इत्यादि श्रुति आज्ञा प्रमाण कर्तव्य है अरु जैव उन साधनों करके अन्तःकरण की शुद्धिद्वारासम्यक् ज्ञान होताहै,तब वह पूर्वकिये शमादिक साधन स्वभाव भूत होने से वह विद्वान् साधनप्रवर्तक श्रुति आज्ञाको इच्छता नहीं। इसप्रकार कूटस्थरूप आत्मस्वरूप का जानने वाला विद्वान् पुरुष सर्व विकार से रहित ब्रह्मस्वरूपसे स्थित होता है "ब्रह्मविद्वमेवभवति"] विप्राणांविनयोोपशमःप्राकृत उच्यते, दमःप्रकृतिदान्तत्वादेवं विद्वाञ्च्छमंत्रजेत् ब्राह्मणों का विनयहै सोई स्वाभाविक शम कहतेहैं, अरु दमभी यही है स्वाभा- विक दम होने से ऐसे विद्वान् शमको पावता है अर्थात् ब्राह्मणों 4 ग मांडूक्योपनिषद् । रावस्तु सोपलम्भञ्च इयं लौकिकमिष्यते । अवस्तु सोपलम्भच शुद्धलौकिकमिष्यते ८।२१४॥ वंजवेत्तौ)काजो यह स्वाभाविक आत्मरवरूपसे स्थितिरूप विनय है, यह विनयहै । अरु'यहही विनय स्वाभाविक शम कहते हैं। अरु दमभी वही है, क्योंकि स्वभावसे शान्तरूप होनेसे स्वाभा विक दमकरके युक्त है ताते। ऐसे उक्तंप्रकारका स्वभावसे शान्त ब्रह्माका जाननेवाला विद्वान् ब्रह्मस्वरूप स्वाभाविक शान्तिरूप शमको पानताहै अिर्थात् सम्यक् आत्मवेत्ता विद्वान्की जो स्वरू- पस्थिति है सोई शमदमादि हैं, क्योंकि आत्मास्वभावसेही शम दमादिरूपहे ताते, सो विद्वान् भी तैसाही है ८६ ॥ २१३ ॥ * ८७१२१४ ॥ हे सौम्य! [ इसप्रकारपरमत के निराकरण द्वारा आत्मतत्त्व निर्धार किया। अब अपनी प्रक्रियासे तीन अवस्थाके कथन द्वारा भी तिस आत्मतत्त्वका निर्धार करने को प्रथम दोनों अवस्थाका कथन करते हैं ] ऐसे (उक्तप्रकार) पर- स्पर विरुद्धहोनेसे संसारके कारण अरु रागद्वेपरूंप दोपोंकआश्रय वादियों के सिद्धान्तहै, एतदर्थ सोमिथ्याज्ञातरूपही है, इसप्रकार तिनकी युक्तियोंसेही देखायके,अरु उक्त चारकोटियोंसे रहित राग द्देषादिकदोषोंका अनाश्रय स्वभावसेही शान्त अद्वैत सिद्धान्तहीं सम्यज्ञानहै,यह निर्णय यहांपर्यन्त समातकियाशिवायहायह अर्थहै कि शिष्यकरके साधनेयोग्य जे आरोपष्टितिसको आश्रय करकेजाग्रंदादि पदार्थके शोधनपूर्वक जोवोधकाप्रकार सो अपनी प्रक्रियाहै। ताते तिसही आत्मतत्वके लसानेके अर्थ (परायण) शेपग्रन्थहै अपनी प्रक्रियासे आत्मतत्व लसानेकअर्थअनशेपरहे गूंथका प्रारम्भहै, [जो प्रातिभासिक अव्यावहारिक रूप रथल पदार्थोंका समूह, सूर्यादि. देवताके अनुग्रहकरके युक्त इन्द्रियों करके जानाजार व जानते हैं सो जायदवस्था हें ] सत् कहिये स्थल, घस्तु करके सहित जो वर्तमान हो ऐसा जो व्यवहार, गौडपादीय कारिका चतुर्थ प्रकरण । श्रवस्त्वनुपलममञ्च लोकोत्तरमिति स्मृतम् ज्ञान यञ्च विज्ञेयं सदा बुद्धैः प्रकीर्तितमः । २३५॥ निसको सवस्तु कहते हैं। सवस्तु सोपलम्भश्च द्वयं लौकिक मिष्यते वस्तु,अरु सोपलम्भ रूप शास्त्र द्वैत लौकिक प्र- सिद्धहै अर्थात स्थूल वस्तुकरके वर्तमान होय ऐसांजो व्यवहार तिसको सबस्तु, कहते हैं. अरुतैसेही उपलम्भ कहिये प्रतीति तिसकरके सहित जो वर्तमानहोवे तितको, सोपलम्भ, कहतेहैं। ऐसा,जो,सवस्तु अरु,सोलम्मरूप शास्त्रादिक सर्व व्यवहारका विषय ग्राह्य अरु ग्राहकरूप द्वैत लौकिक अर्थात् लोक विपे प्र सिद्ध जायदवस्था। ऐसे लक्षणवाला जाग्रत् वेदान्तविषे अङ्गी- कार किया है, वाह्य इन्द्रियनका किया जो व्यवहार, सो संवृत्ति, शब्दका अर्थ है । सो भी स्थूले पदार्थोवत् स्वप्नविषे,होते.नहीं। तैसे होने से बाह्य-इन्द्रियों के विलयहुये जाग्रतकी वासना से मनका तिन तिन, पदार्थोंके,आभास रूप आकार से भासना सो स्त्रम, शब्दका अर्थ है । अरु अवस्तुसोपलम्भञ्च शुद्ध लो- किक मिष्यते। अवस्तु अरु सोपलम्भ.रूपं शुद्ध; लौकिक अं- गीकार करते हैं । अर्थात् स्थूल व्यवहार के,भी अभावसे अवस्तु रूप, अप्रतीति सहित वस्तुवत् असत् वस्तु पिपे भी. प्रतीति होने तिस प्रतीति करके सहित वर्तमानह, एतदर्थ सोप- लम्भ हैं। ऐसा अवस्तु:अरु सोपलम्भारूप शुद्ध अिर्थात् स्थूलं जामत्से केवल सूक्ष्म लौकिक अर्थात् सर्व प्राणियों को सास -धारण (सम) होने से लोक बिषे प्रसिद्ध स्कन है इसप्रकार अंगीकार करते हैं ७.२४॥
२८२ 1 hr मांडूक्योपनिषद् ।ffe - ज्ञानेचत्रिविधेजये मेल विदितें स्वयम् सर्वज्ञ- ताहि सर्वत्र भिवतीहामहधियः ८९.२१ FF प्राय अरुं ग्रहणसे जो रहित सो लोकोत्तर हैं। अर्थात उक्त जी- अत् अरु स्वम रूपालोकसे पीछे होनेवाली जो पुति अवस्था तिलको लोकोकिहते हैं । इसप्रकार जान्या हैं, अतएव तिर्स सुषुप्तिको लोकातीत कहते हैं । अरु जिस करके यहि अरु ग्रहण काविषयही लोकहै, तिसके अभावसे सर्व प्रवृत्तिका बीज सुपुति अवस्था है। इसप्रकार शास्त्रवेत्ता पुरुपोंको प्रसिद्ध है । अज्ञानं शेयश्च विज्ञेयं सदा बुद्धिःप्रकीर्तितम् ज्ञान अरु ज्ञेय, अवि. ज्ञेय सदीधुद्धिमानोंने कहा है अर्थात् उपाय सहित परमार्थ तत्त्व लौकिक, शुन्छ लौकिक, अल्लोकोत्तर, इस क्रमकरके जिस ज्ञानसे जानिये है, सो ज्ञान उक्त इन तीन ज्ञेय रूपहै, क्योंकि इस ज्ञानसे भिन्न ज्ञेयका असम्भव है ताते। अरूं सर्ववादियोंकरके कल्पित वस्तुके इन्ही तीनोचिये अन्तरभाव होनेसे, विशेषकरके जाननेयोग्य परमार्थ रूप सत्य एक 'तुरीयनॉमवाला अद्वेत अ- जन्मा आत्मतत्वही सदा परमार्थदर्शी ब्रह्मनेत्ता पण्डितों ने कहा है "ययत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ञात्वामृतमश्नुते' इत्यादि गीतोक्त भगवद्वाक्य ' प्रमाणसे सर्व ब्रह्मवेत्ता पण्डितों ने अपने शिप्य मुमुक्षुओप्रति विशेषकरके जानने योग्य वस्तु एक तुरीय नाम वाला आत्मतत्वही कहा है । अतए, सर्य जिज्ञासुओ को आत्म- ज्ञानार्थ पुरुषार्थ कर्तव्यायोग्य है रा १५ ॥ ८६।२१६॥हे सौम्या ["आत्मनिविज्ञाते सर्वमिदविजातंभ- वतीति" आत्माकेजानतेमंते सर्वयह जाना नाता है। इसथति की जो प्रतिज्ञा हे सोउक्तवरतु (आत्मा) के ज्ञानहयेही मिहोती है, इसप्रकार कहतेह ज्ञानेचत्रिविजेये क्रमेणविदितेम्वयम्, स जतातिसर्वत्र भवतीहमहाधियः ज्ञानविपे अम तीनप्रका- मामा आरमाको)जानेहये, महाबुद्धिमान - २८३ गौडपादीय कारिका चतुर्थीप्रकरण ।। यज्ञेयाप्यपाक्यानि विज्ञेयात्यग्रयाणतः तेषाम- न्यत्रविज्ञेयादुपलम्भस्त्रिषुस्मृत पुरुषको इसलोक विष सर्वत्र सर्वज्ञताही होती है। अर्थात् लौकिकादिकं विषयवाले ज्ञानविर्षे अरु लौकिकादिक्र तीनप्रकारे के लेयविषे, तहां प्रथमालौकिकाजामंतास्थूिल है, तिसके अभाव हुये पश्चात् शुद्ध लौकिकस्विताहातिसके अंभावहुये पश्चात् लोकोत्तर सुपुत्ति है। इसप्रकारही कमकरके तीनों स्थानके अभावसे, परमार्थःसत्य तुरीय अज़ी अद्वैत अभय आत्मतत्व के जानेहुये सर्वलोकसे अतिशय अलौकिक वस्तुको विषय करने वाली सूक्ष्म बुद्धिकरके युक्तहोने से इसप्रकार जाननेवाला जो आत्मवेत्ता महावुद्धिमान-पुरुषहै तिसको इस संसारविसर्वदा आत्मस्वरूपभतही सर्वज्ञता कहियोसर्वरूप ज्ञानभाव, होती है, क्योंकि एकवारके जानेहुयेही स्वरूप विषे व्यभिचारका अभावं होताते । अर्थात जैसे एकत्रारही लम्यप्रकार रज्जुके जानेहुये पुनः उसत्रिपे सर्प जलधारादिभ्रान्तिरूप व्यभिचार होता नहीं तैसे अंरु जिसकरके अन्यवादियोंवत् परमार्थके ज्ञाता पुरुषको ., ज्ञान केउद्भव अरु तिरस्कारहोतानहीं, एतदर्थ आत्मवेत्ता,विद्वान नको परिपूर्ण ज्ञानरूपता होवे हा २१६EMA ६०२१७॥ हेसौम्य![तीन अवस्थाके ज्ञेयुपनेके कथनसे तिनं का परमार्थसे.सद्भाव होवेगा, यह शंकाकरके तितका निध करते हैं] लौकिकादिकनके कमकरकैज्ञेयंपने के कथन से,परमार्थसें अस्तिः भावकी शंका होती है। सोन्युक्तनहीं इसप्रकार कहते हैं। त्यागने योग्य लौकिकादि, जाग्रत, स्वप्नः सपप्ति, यह तीन आत्मा विषे असत्पने-करके रज्जुधिषे सर्पवत त्यागकरने योग्य (यो । अरु यहाँ उक्त चार कोटियोंसे रहित जो परमार्थतत्व सोज्ञेय कहते हैं अरु बाह्य-तीनं एपणासे संन्यासीकरके प्राप्त होने योग्य पिांडित्य, पाल्य, अरु-मौन, इन नामवाले कमसे जे 'श्रवण, मनन, निदि-- * - '' माडूक्योपनिषद् । प्रकृत्याकाशवज्ज्ञेयाः सर्व धर्मा' अनादयः। विद्यते नहि नानात्वं तेषां वचन किञ्चन ९१२१८॥ ध्यासन, रूप सधिन सो प्राप्त करने योग्य है । अरु राग द्वेपे काम क्रोध मोहादि जो कपायनामवाले दोप हैं सो पावने को योग्य होनेसे पाक्य हैं। अर्थात् जैसे पाककिया अन्नादिक उदर विपे विकारकेहेतु वा अंकुरके उत्पादक होतेनहीं, तैसेही शमदम क्षमा आर्जवता आदिरूप अग्निकरके सम्यक् प्रकार से पार्क किये उक्त कपायादि दोपसो विद्वान्केविपे आभासमान रहे हुये अपने अन- थरूप अंकुर वा फलके उत्पादक होतेनहीं । ताते हेयज्ञेयाप्य पाक्यानि विज्ञेयान्यग्रयाणतः । तेपामन्यन विज्ञेयादुपलम्भत्रिपु स्मृतः। हेयज्ञेय आप्य पाक्य उपायोंकरके जाननेयोग्य है । तिन काज्ञेयसे अन्यत्र उपलंभ तीनठिकाने जान्या है । अर्थात् उक्तसर्व हेय (त्याज्य) ज्ञेय (जाननेयोग्य)आप्य (पावनेयोग्य) पाक्य (प- कावनेयोग्य)जो हैं सोसंन्यासियोंकरके उपायनसे जानने के योग्य हैं। अरु प्रथमसे तिन हेयादिकोंका ज्ञेयते। अर्थात् परमार्थसत्य एक ब्रह्मरूप ज्ञेयको छोड़िके अन्य ठिकाने जो अविद्याकी कल्प- नामात्र उपलंभ कहिये ज्ञान,है,सो, हेय, आप्य, अरु पोक्य, इन तीनविपे भी ब्रह्मवेत्ता पुरुषोंने जान्या है । तिनके परमार्थ सत्य से नहीं ॥ इत्यर्थः ।।१०।२१७ ॥ ६१ । २१८ हे सौम्य [[जो पूर्व कहा अस्तिआदि चार कोटियों से रहित जो ज्ञेय (जानने योग्य) हे सो परमार्थ तत्वहे, तिसको भव स्पष्ट करते हैं प्रकृत्याकाशवज्ञेयाः सर्वे धर्मा अनादयः। विद्यते नहि नानात्वं तेषां कचन किञ्चन सर्व धर्म खभावसे आकाशवत् हे अरु अनादि हैं अरु जानने योग्य हैं। तिनका नानाल कहीं भी कुछ भी विद्यमान नहीं, अर्थात परमार्य से तो सर्व धर्म ‘कहिये आत्मा' स्वभानसे सूक्ष्मनिरं- जन अरु सर्वगतपने विपे आकाशरत् है "याकाशयत्सर्वगतः A - r २८५ गौडपादीय कारिका चतुर्थ प्रकरण ४ । आदिबुद्धाः प्रकृत्यैव सर्वे धर्माः सुनिश्चिताः। यस्यैवम्भवतिक्षान्तिः सोऽमृतत्वार्यकल्पते ।२१९॥ सं नित्यः। अरु अनादि 'कहिये व्यवधान से रहित नित्य हैं, इसप्रकार मुमुक्षुओं करके जानने योग्यहैं। अरु तिनका नानात्व कहीं भी । अर्थात् देशकाल अवस्थादिक किसीविपे भी। कुछ भी अर्थात् अणुमात्र भी विद्यमान नहीं, अर्थात् एक अद्वैत परिपूर्ण आत्माविषे एक अणुमात्र भी: नानात्व नहीं ॥ यह अर्थ है.९.१।२१८ NE२ | २१६॥ हे सौम्य ! अब आत्माख्यधम्मकी ज्ञेयताकहिये. जाननेकी योग्यता, भी व्यावहारिकही है, पारमार्थिक नहीं, इसे प्रकार कहते हैं। आदिवुद्धाःप्रकृत्यैवसवें धाःसुनिश्चिताः सर्व-धर्म स्वभावसेही आदिविषे बुद्ध निश्चित स्वरूपवालेहें अर्थात सर्व धर्म कहिये आत्मा, स्वभावसे ही आदिविपे वुद्ध हैं, अर्थात् जैसे नित्यप्रकाश स्वरूप है तैसेही नित्य चोध स्वरूप है अर्थात् नित्य निरन्तर बोधरूपही प्रकाशवाला है। अरुं तिसका निश्चय अव करनेका है ऐसा नहीं, अरु ऐसा हैं, ऐसे भी नहीं इस प्रकारके संशय युक्त.स्वरूपवाले नहीं, किन्तु नित्य निश्चित स्वरूप वालेहैं यस्यैवम्भवति क्षान्तिः सोऽमृतत्वायकल्पते। जिस को ऐसे शान्ति होती है सो अमृत भावके अर्थ समर्थ होता है, अर्थात् जिस करके सर्व धम्मख्यि आत्मा चौध रूप निश्चित स्वरूपवाले हैं, ताते जिस मुमुक्षको ऐसे उक्त प्रकार करके अपने अर्थ वा परके अर्थ सर्वदा चोधरूप निश्चय विपे निरपेक्षतारूप शान्ति होती है अर्थात जैसे सूर्य अपने अर्थ अरु परके अर्थ अन्य प्रकाशकी अपेक्षा से रहित होता है, तैसे जिसको आत्मा विषे सर्वदा वोध के कर्तव्यता की निरपेक्षारूप शान्ति होती है सो अमृतभाव कहिये मोक्ष के अर्थ समर्थ होता है । इत्यर्थः ६२: २१६॥ .
} : मांडूक्योपनिषद-- आदिशान्ताह्यनुत्पन्नाः प्रकृत्यैव सुनिताः । सबै- धर्माः समाभिन्ना-अनं साम्यं विशारदम् ६३-६२२० ।। वैशारिद्यन्तु चै-नास्ति भेदे विचरतां सदा । भेदनि- म्नाः टथरवादास्तस्मात्ते कृपणाः स्मृताः,६४।२२१-॥ ६२२० । हे साम्य! [अव विद्वान् मुमुक्षुकी रुचिवदावने के अर्थ अविद्वान् की निन्दाको दिखावते है तैसें (उक्त प्रकार के) आत्मा विपेशान्ति की कर्तव्यता भी है 'नहीं, इस प्रकार कहते हैं " आदिशान्ताह्यनुत्पन्नाः प्रकृत्यैव सुनिर्वताः । सबै धर्माः समाभिन्ना अजं सान्यं विशारदम् सर्व धर्म आदिविषे शान्त अनुत्पन्न हैं अरु स्भावसे ही सम्यक् मुखरूप हैं अरु समान हैं अभिन्न हैं,अरु जन्मरहित समभाव,विशारद हैं। अर्थात् जिसकरके सर्च धर्म कहिये आत्मिा आदिविपे , कहिये नित्य ही शान्त हैं, अरु अनुत्पन्न, कहिये अजन्मा, हैं अरु समान है अरु-अभिन्न हैं। इसप्रकार जिसकरके जन्म रहित समभाव र कहिये आत्मतत्व, विशारद कहिये विशुद्ध है। ताते शान्ति वा मोक्ष कर्तव्य नहीं । अरु जिस करके नित्य एक रवभाववाले आत्मा का कुछ भी किया हुआ,होता है नहीं एतदर्थ आत्माको संसार दुःख की निवृत्ति वा सुख की, उत्पत्ति क्रिया जन्य नहीं, किन्तु नित्यही सिद्ध है-इत्यर्थः ६३।२२०॥ 5, NE२२१॥हेसौम्य!ऐसे उक्तप्रकार, अविद्वान्नानात्वदर्शी की निन्दाको दिखायके,अवविद्वान्की प्रशंसाको प्रसारितफरतेहैं] जोपुरुष उक्तप्रकारफे परमार्थतत्व के ज्ञाताहें सोई लोकविपे अकृ. पण (ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण).हे "एतदक्षरं गार्गि विदित्वा अस्मा- लोकात्मेति स ब्राह्मणः। अरु निना अकृपण से अन्य तो सर्व कृपण है, इसप्रकार कहते हैं लेगारग्रन्तु वेनास्ति भेदे विचरतां सदा, भेदेनिम्नाः पृथग्वादास्तस्माते कृपणीः स्मृताःद्वित- यादी भेदके अनुयायी हैं ताने तिनको कृपण जानते हैं, भेदविपे # Shr: मांडूक्योपनिषद् । ::अजेष्वजमसंक्रान्तं धर्मेषुः ज्ञानमिष्यते। यतो न क्रमते ज्ञानमसंग तेन कीर्तितम् ६६ । २२३:।। आत्मारूप अरु सर्वभूतों के हितरूप.विद्वानके मार्गविषे पद पद चिह्नों को खोजतेहुये देवता भी मोहको पावते हैं । जैसे आकाश विपे पक्षियोंकी वा जलविषे मीनादिकोंकी गति खिोज वा पाद चिह। देखते-(पावते) नहीं तैसेही पावनेयोग्य पद से रहित पुरुषः परिपूर्ण ज्ञानवान महात्मा की गति जाननेको शक्यनहीं क्यिोंकि वो ज्ञानवान आवागमन से रहित होनेसे गति (मार्ग) से रहितहै। ताते "गतिरत्रनास्तिः" इत्यादिक श्रुतियों के प्रमा.. णसे ६५। २२२॥ १६।२२३॥ हे सौम्य! अजे साम्ये अजन्मा सम- भावहै ? इसप्रकार जो पूर्व ६५वें श्लोक विपे कहा, सो,प्रमेय है, तिसको विषय करनेवाले निश्चयवाला प्रमाता है, अरु. तिस प्रकारका निश्चयरूप ज्ञान प्रमाण है । इसप्रकार वस्तुके परि। च्छेद: कहिये भेद, के, हुये तिन ज्ञानीपुरुपका महाज्ञानवान्पना कैसे है। यह शङ्काकरके कहते हैं । शङ्का । कैसे उनका महाज्ञा नीपना है। तहां समाधान , कहते हैं: अजेष्वजमसंक्रान्त ध. ममेषु ज्ञानमिप्यते । यतोनक्रमतेज्ञानमसंगतेनकीर्तितम् अ. जन्माधाविपे अजन्मा ज्ञान है न जाननेवाला अङ्गीकार करते हैं। जाते ज्ञान गमन करता नहीं ताते असंग कहा है, अर्थात् जिस- करके सूर्य विपे उष्णता अरु प्रकाशवत् , अजन्मा 'कहिये अचरन, धर्म कहिये आत्मा विपे अजन्मा कहिये अचल ज्ञान अंगी कार करते हैं, क्योंकि आत्मा ज्ञानस्वरूप है. ताते । एतदर्थ अजन्मा ज्ञान अन्य अर्थविपे न जाननेवाला अंगीकार करते हैं। अरु जिस करके ज्ञान अन्य अर्थ धिपे गमन करता नहीं, तिसही कारण करके सो आकाश के तुल्य असंग हे ६६:१२२३॥ - ६७२२४॥ हे सौम्य ![कूटस्थरूप ब्रह्मही तत्व है, इस । ...
- गौडपादीय कारिका चतुर्थ प्रकरण ४ । २८६ अणुमात्रेऽपिवैधयेंजायमानोऽविपश्चितः । अस ङ्गता सदानास्तिकिमुतावरणच्युतिः,६७ । २२४॥ अलब्धावरणाःसर्वेधर्माःप्रकृतिनिर्मलाः । आदोबु हास्तथामुक्ताबुद्दयन्तइतिनायकाः ६८।२२५॥ कार अपने सिद्धान्ती के मतविषे ज्ञान असंग सिद्ध होताहै, इसप्रकार कहीं। अरु मतान्तरबिषे पुनः अपने को विषय करने वालाहोने से ज्ञानका असंगपना असंगत होता है, इसप्रकार क- हते हैं ] अणुंमात्रेऽपिवैधय॑जायमानोऽविपश्चितः । असङ्गता सदा नास्ति विमुतावरणच्युतिः अणुमात्र भी विरुद्ध धर्म: वाले अरु उत्पन्न होनेवाले विषे अविवेकी को सदा असंगभाव नहीं तब आवरण को नाश क्या कहना है, अर्थात् याते अन्य वादियों के मतविष अणुमात्र कहिये अल्प रंचकमात्र, भी वि- रुद्ध 'धर्मवाले, अरु बाह्य वा अन्तर उत्पन्न होनेवाले वस्तु (प. दार्थ) विषे अविवेकी पुरुषको जब संदा (निरन्तर) असंगभाव नहीं है तब उनको बन्धरूप आवरणका नाश न होवे इसमें क्या कहना है, किन्तु कुछ भी नहीं ६७१ २२४ ॥ १६८२२५॥ हे सौस्य!जो कोई ऐसाकहे कितिन वादियोंको आवरणकानाशनहीं ऐसेकहनेवालेजो तुम सिद्धान्ती अनावरण वादी तिन, तुमने अपने सिद्धान्तविषे आत्मारूप धर्मोंको आव. रण अंगीकार किया, सो कथन: चने नहीं, इसप्रकार कहते हैं "अलब्धावरणाःसर्वेध.प्रकृतिनिर्मलाः सर्व धर्म आ- वरणको अप्राप्त हैं अरु स्वभाव से निर्मल हैं । अर्थात् सर्भध- र्म कहिये आत्मा' अर्थात् यहां आत्माको सर्व शब्दकरके जो बहुवचन है सो वुद्धयादिरूप उपाधिको लेको 'घटाफाशनत् , ऐसे जानना, अरु निरुपाधि आत्मा तो एकही है महदाकाशवत्' ऐसे जानना अविद्यादिक बन्धनरूप आवरणको अप्राप्त 'क- हिंये बन्धन रहित, हैं। अरु स्वभावसे निर्मल 'कहिये सदा शुद्ध, ।
bar w २६ | मांडूक्योपनिषद् ।' :.. । क्रमतेनहि बुद्धस्य ज्ञान धर्मेषु तापिनःसर्वे धर्मास्तथा ज्ञानं नैतहुद्देन भाषितम् ९९ । २२६॥ हैं."शुद्धमपापविद्धम् । अरुआदोबुद्धास्तथामुक्तावुद्धयन्त इतिनायकाः आदिविर्षे बुद्धहै तैसे मुक्त है, ऐसे नायक जा- नते हैं ऐसे कहते हैं अर्थात जैसे धख्यि आत्मा आवरण रहित शुद्ध है तैसे, आदिविषे कहिये नित्य, वुद्ध कहिये वोधस्त्र- रूप,-है। अरु तैसेही नित्य मुक्त है । जिसकरके नित्य शुद्ध युद्ध मुक्त स्वभाववाले आत्मा है तातेही पन्धन रहित हैं। इसप्रकार पूर्वके "अलब्धावरणाः” इस पदसे सम्बन्ध है । अरु प्रश्न जव ऐसे हैं तब कैसे जानते हैं, तहां उत्तर कहते हैं, जैसे नित्य प्रकाशरूप हुआ भी सूर्य प्रकाशता है, इसप्रकार कहते हैं, अ. थवा जैसे नित्य अचलहुये भी पर्वत नित्यही स्थित होतेहैं, इस प्रकार कहते हैं । तैसेही ये आत्मा नायक अर्थात् जाननेको स- मर्थ होनेकरके स्वामी । हुये भी अर्थात्-वोधशक्ति युक्त स्वभाव वाले हुये भी जानते हैं, इसप्रकार कहते हैं ६८ । २२५ ॥ ६६।२२६॥हे सौम्य! कृमतेनहिबुद्धंस्यज्ञानधर्मेपुतापिनः। सधस्तियाज्ञानंनतबुद्धनभापितम्। संतापवाले पंडित नका ज्ञान धम्माधिपेजाता नहीं,अरुसर्वधर्म भी अरुज्ञान भी तैसे हैं। अर्थात्, जिसकरके सन्तापवाले 'कहिये सूर्य के तापवाले, आकाशकेतुल्य भेदसेरहित, वा पूजाकरनेयोग्य बुद्धिमान परमा- थदर्शी पण्डितकाज्ञान अन्यविपयरूपधम्माविषे जातानहीं,किन्तु असे सर्याधिपे प्रकाश अभिन्नरूपसे स्थितहै, तैसे आत्मरूपधर्म विही स्थित है, इसप्रकार अंगीकार करतेहैं। ताते आत्मा विये मुख्यपना होने के योग्य है । अरु सर्व धर्म, कहिये आत्मा, भी तैसेही है अर्थात् ज्ञानवतही आकाशकेतुल्य होनेकरके अन्य अर्थ विपे कोई भी जाते नहीं। अरु जो इस चतुर्थ प्रकरण के प्रथम ३लोकवि "ज्ञानेनाकाशकल्पेन" आवाशके आवाशके तुल्य ज्ञान से -- .
3 गौडपादीयाकारिका चितुर्य प्रकरण ४ । २६.१ इत्यादिक कथनकरनेका आरंभ कियाथा, सो यह आकाश के तुल्य सन्तापवाले परमार्थदर्शी पण्डितोंका, ज्ञानआत्मासे । अभिन्न होनेकरके, आकाशके तुल्य ज्ञान अन्य किसीभी अर्थ विषे जाता नहीं । अर्थात् जैसे आकाशकी अवकाशता आकाश से अभिन्न होने करके अन्य किसी विषेभी जाता नहीं, तैसे परमार्थदर्शी विद्वानका ज्ञान आत्मा अभिन्न होनेकरके अन्य किसीभी अर्थ विषेजातानहीं. तसेधमाख्य आत्मा है ।इसरीति से आकाश- वत् . अचलं, अकिय, निरवयवे, नित्य, अद्वितीय, असंग,अदृश्य, अग्राह्य, क्षुधादिकों से रहित ब्रह्मरूप आत्मतत्वहै । क्योंकि "न- द्रष्टुष्टि विपरिलोपोविद्यते"। द्रष्टाकी रष्टिका लोप विद्य: मान है नहीं ? इस श्रुति के प्रमाणसे । अरु ज्ञान, ज्ञेय', अरु ज्ञाता, इनके भेद से रहित परमार्थ तत्व अद्वैत है |अर्थात् अद्वैत रूप आत्मतत्व से इतर ज्ञेय (जाननेयोग्य.) वस्तुको अभावहै ताते जाननेरूप ज्ञानकोभी अभावहै अरु 'जव जेय, ज्ञानका अभाव है ताते आत्माविषे ज्ञाताविशेषणका भी अभाव है, इस प्रकार विशेष विशयण, अरु विशेष्यत्वके अभावसे एक अद्वैत निवाव्य परमार्थ तत्वही है।यह बुद्धने कहा नहीं । अरु यद्यपि चाह्यार्थका निपे अरु ज्ञानमात्रकी कल्पनारूप अद्वैतवस्तु समीपता कही है तथापि यह तो परमार्थ तत्त्वरूप अद्वैत वेशन्त 'विषही जानने के योग्य है ॥ इत्यथः ।। | २२६ । । ११००।२२७ ॥ हे सौम्य ! [चार प्रकरणांकरके युंक्तइस कारि- काम्प शास्त्रकी आदिवत अन्तविप भी परदे वतारूप तत्व को स्मरणकरते हुये तिसके नमस्काररूप मंगलारणको सम्पादन करते हैं ] शास्त्रकी समाप्ति-विषे परमार्थ तत्त्वकी स्तुत्यर्थ नम- स्कार कहते हैं "दुर्दर्शमतिगम्भीरमजंसाम्य विशारदम् । बुवा पदमनानावं नमस्कुर्मोयथाधलम् दुःखसे देखने योग्य अति गंभीर अजन्मा समभावरूप विशुद्ध नानाभाव से रहित पदको जानके यथावल तथा नमस्कार करते हैं । अर्थात् दुःखसे दशन । .
२६२ . मांडूक्योपनिषद् । ..... दुर्देर्शमतिगम्भीरमजंसाम्यविशारदम् । बुद्धापद मनानात्वनमस्कुर्मोयथावलम् १००१२२७ ॥ । इति गौडपादीयकारिकायामलातशान्ताख्यं 'चतुर्थप्रकरणम्॥ . . 4 " 1- १ . इति श्रीगौडपादाचार्य कृत'कारिका सहित मांडूक्योपनिषद् समाप्तम् ॥ T 1 के योग्य , कहिये “ अस्ति नास्ति' है, नहीं है , इत्यादि,चार कोटियोंसे जो वादियों करके कल्पित सापेक्षक हैं। रहित होने से अतिश्रमसूिक्ष्मवुद्धिकरने से जानने योग्यहै, अरु एतदर्थही अति गंभीर, कहिये -अल्पबुद्धिवाले पुरुषोंकरके महासमुद्र- चत् दुःखसे प्रवेश करने के योग्य, अरु अजन्मा, समभावरूप विशुद्ध नानाभावसे रहित, ऐसे पदको जानके तिसरूपहुये हम तिसपदके अर्थ , परमार्थ से व्यवहार करने के, अयोग्यको भी, मायासे व्यवहारका विषय सम्पादनकरके । अर्थात् जो वास्तव करके सर्व व्यवहारातीत-एक अद्वैत निर्वाच्य परमार्थ तत्व है, तिस विपे नमस्कार करनेयोग्य अरु नमस्कार करनेवाला अरु नमस्काररुप किया इनकी कल्पना करके। जैसी सामर्थ्य हे तैसे नमस्कार , विधान , करते हैं १००।२२७ ॥ इति श्री गोडपादाचार्य कृत कारिकाचतुर्थ प्रकरण , भाषाभाष्य, समाप्तम् ॥ .
२६३ गौडपादीय कारिका चतुर्थ प्रकरण । भाष्यकार श्रीशंकराचार्यकृत मंगलाचरणम् ॥ '- 17 ve + 'अजमपिजनियोगप्रापदैश्वर्ययोगादेगतिचगतिम त्ताम्प्रापदेकंह्यनेकम् । विविधविषयधर्मग्राहिमुग्धेक्षणा नांप्रणतर्भयविहन्तब्रह्मयत्तन्नतोस्मि ॥ १॥हे सौम्य अवभाष्यकार श्रीशंकराचार्य भीभाष्यकी समा- तिविर्षे शास्त्रकरके प्रतिपादन किये पर देवताके स्वरूपको स्म- रण करके तितके नमस्काररूप मंगलाचरणको आचरण करते हैं। अजमपि जनियोग प्रापदैश्वर्ययोगादगतिच गतिमत्ता म्प्रापदेकंह्यनेकम् । विविधविषयवर्मग्राहिमुग्धेक्षणानां प्रणतभ यविहन्तृब्रह्मयत्तन्नतोस्मि । जो जन्मसे रहितहुआ भी ऐश्वर्य के योगसे प्राप्तहोता हुआ, गतिसे रहित हुआ गतिमान् पने को प्राप्त होताहुआ अरु एकहुआ, विविध प्रकारके विपयरूप धर्मों के ग्रहणकरनेवाले, विवेकहीन दृष्टिवाले को अनेकवत् भासता है, अरु जो ब्रह्म प्रणतके भयको नाश करता है तिसके अर्थ में नमस्कार करता हों, अर्थात् जो ब्रह्म जन्मादिक सर्व पिड्भाव । विकार रहितहुआं भी ८ अर्थात् वास्तव से कूटस्थ सिद्ध है तथापि सो अनिर्वचनीय अज्ञानके शक्तिरूप ऐश्वर्यके योगसे आकाशादि कार्यरूप करके जन्मके वन्धन को प्राप्त हो- ताहुआ। अर्थात् प्राप्त होयके जगत्का उपादान कारण है, ऐसे व्यवहार का भागी होता है, इसप्रकार श्रुति अरु ,ब्रह्मसूत्र विष ब्रह्मको जगत् का कारणपना प्रसिद्ध है । अरु जो ब्रह्म, यद्यपि कूटस्थपने अरु व्यापकपने करके गमन से रहित हुआ स्थित होताहै, तथापिउक्तप्रकारके अज्ञानकेमाहात्म्यसे कार्य ब्रह्मरू- पनाको पायके गमनमानपने को प्राप्त होताहुआ । अरु जो ब्रह्म एक हुआ , अर्थात् वास्तव से सर्व नानाभावसे रहित एक २६४ १.i: माडूक्योपनिपद् । प्रज्ञावशाखवेवाभितजलनिवेदनाम्नोऽन्तरस्थंभू तान्यालोक्यमग्नान्यविरतजननग्राहघोरेसमुद्रे । कारु यादुद्दधारामृतमिदममरैर्दुर्लभं भूतहेतोर्यस्तंपूज्याभिपू ज्यं परमगुरुममुं पादपातैनतोऽस्मि २॥ रस अद्वैत है, इसप्रकार उपनिषदों करके जानाजाता है, तथापि अनादि अनिर्वचनीय अविद्या के वशते विविधषकार के वि. पयरूप धर्मों के ग्रहण करनेवाले होने करके विवेकरूप रष्टि से रहित पुस्पों को जीव, जगत् अरु ईश्वर, इन भेदों करके अनेकवत् भासताहे । अरु जो ब्रह्म आचार्यके उपदेशमे जनित बुद्धिवृत्तिविपे फलरूपसे आरूढ़हुआ प्रणते कहिये ब्रह्मनिष्ठा- वान् पुरुषों के , अविद्या अरु तिसके कार्यरूप भयका नशिकर- ताहै, तिस सर्व उपनिषदों विषे प्रसिद्ध सर्व परिच्छेद भिद से रहित प्रत्यगात्मारूप ब्रह्मके अर्थ में नमस्कार करताहों, अर्थात् तिसको विषयकरनेगले भाव को प्रकट करताही,१ ॥1 "२॥ हे सौम्य ! अब ग्रन्थरचनाके प्रयोजनके देखावनेपूर्वक इस व्याख्यान किये आगमरूप शास्त्रके कर्ता होनेरूपसे स्थित हुये परमगुरु को प्रणाम करते हैं । प्रज्ञावैशाखवेधक्षुभित जलनि धेवेदनाम्नोऽन्तरस्थं भतान्यालोक्यमग्नान्यविरत जननग्राहयो न रेसमुद्रे । कारुण्यादुद्दधारीमृतमिदममरैर्दुर्लभंभूतहेतोर्यस्त पूज्याभिपूज्यपरमगुरुममुपार्दपाते तोऽस्मि जो निरन्तर जन्मरूप प्राहोंकरके भयंकर समुद्रबिपे परवश हुये भुतोको देखके करुणाभावसे बुद्धिरूप मंयनकाप्ठके डालने से विदोलन को प्राप्त हुये वेदनामक समुद्र के अन्तरस्थित अरु देवताओं को भी दुःखसे प्राप्तहोने योग्य इस अमृत को भूतनके हेतुसे उद्धार करता हुआ, तिस इस पूज्योंकरके भी पूजने को योग्य परम गुरुको पादनविये पतनसे में नम्रहुंआहों । अर्थात् जो जन्मादि रुपमाहादि जलचरोंकरके भयंकर.जो संसाररूप समुद्र तिस गौडपादीय कारिका चतुर्थ प्रकरण ४ । २६५ यत्प्रज्ञालोकभाषा प्रतिहतिमगमत् । स्वान्तमोहा न्धकारो मज्जोन्मज्जचंघोरेह्यसकृदुर्पजनोंदन्वतित्रास नेमें ।' यत्पादावाश्रितातो 'श्रुतिशमविनयप्राप्तिरग्राह्य मोघा तत्पादौ पावनीयो भवभयविनुदी सर्वभावैर्न मस्थे ३॥ इति ॥ विषे पर (कर्म)वशेहुये प्राणियोंको देखकें प्रकटहुई जो करुणा तिसकरके बुद्धरूपी मथनकाष्ठ (रयि) के डालने से मंथनको प्राप्तहुये वेदनामक समुद्र के अन्तर स्थित अदेवारत्रापि- विचिकित्सितंपुरानहि सुविज्ञेयमपुरेषधर्मः । इत्यादि प्रमाण से देवताओं करकेभी दुःप्राप्य, इसज्ञानरूप अमृतको प्राणि- योंके हितार्थ उद्धारकरता निकासैतामहुआँ, तिस इस पूज्योंकरके भी पूजनेयोग्य अर्थात् श्रीशंकराचार्य करके पू- जनेयोग्य उनके गुरु श्रीगोविन्दाचार्य, अरु तिनकरके पूजनेयोग्य उनकेगुरु श्रीगौडपादाचार्य, अंतएवयहाभाष्यकार श्रीशंकराचार्य ने परमगुरु गौडपादाचार्यके अर्थः पूज्यों करके भी पूजने योग्य यह विशेषणं दिया। परमगुरुको उनके चरणोंबिवे अपनेमस्तक के वारंवार नमनभावरूप पतन से अर्थात उनके चरणों में वारंवार अपने मस्तकको स्पर्श करावनेसे । मैं नमहुआही २॥ ३ ॥ हे सौम्य! पुनः अब अपने गुरुकी भक्तिके विद्याकी प्राप्त बिषे अन्तरंगपनेको अंगीकारकरके तिन गुरुकेपादपद्म युगलको प्रणाम करते हैं यित्प्रज्ञालोकभाषाप्रतिहतिमगमत् स्वान्तमोहाँ न्धकारो मज्जोन्मज्जच्चघोरेसकृदुपजनोदन्वतित्रासनेमे । यत्पादावाश्रितानां श्रुतिशमविनयप्रातिरंग्राह्यमोघा तत्पादोपा वनीयोभवभयविनुदौसर्वभावैनमस्ये १ : जिनकी बुद्धिरूप प्रकाशकी प्रभासे मेरा अनेक-जन्ममय घोर भयेकर समुद्रविष अनुद्भुत अरु उद्भूत अन्तःकरणविपे मोहरूप अन्धकार नाशको प्राप्तहोताहुआ, तिनके उभय पादपद्मके अर्थ आश्रितहुये श्रव- . ..
. २६६ मांडूक्योपनिषद् । शाज्ञान शान्ति अरु विनयकी प्राप्ति होती है, अरुंजाते.सफल है तातेश्रेष्ठ है, अरु पवित्र करनेवाले, संसार के किये भय को नाश करने वाले ,तिनके उभयः पादपद्मोंके अर्थ सर्वके भा: वसे नमस्कार करताहों , अर्थात् जिनकी बुद्धिरूप. प्रकाशकी प्रभासे मेरा अनेकदेव तिर्यक्आदिक योनियोंविषे नानाप्रकारके देहभेदके ग्रहणरूप जन्ममयघोर कहिये कर, अरु भयंकर समुद्र विपे कदाचित कार्यरूपसे अनुभूतअरु कदाचित् कार्यरूपसेउद्भूत कहिये अनर्थकारी अन्तःकरणविषे व्याकुलताके हेतु अविवेकका कारण अनादि अज्ञानमय मोहरूप: अन्धकार नाशहोताहुआ, अरु जिन गुरुके उभय चरणोंकेताई आश्रितहुये अन्य शिष्योंको भी मनन अरु निदिध्यासनः सहित श्रवणज्ञान अरु इन्द्रियोंकी • उपरतिरूप शान्ति अरु नमतारूप विनय (निरहंकारता) की प्राप्तिहोतीहै । अरु जिसकरके उन श्रवणादिकोंकी प्राप्ति सफल हैताते श्रेष्ठहै सो होती है । अरुसर्व जगत केभी पवित्रकरनेवाले अरु अपने सम्बन्धी सर्वजनो के संसार के फिये भयको कारण सहित नाशकरनेवाले, तिन हमारेगुरुके युगलपादं पद्योंकेअर्थ कायिक, वाचिक, मानसिक, इनसर्व के प्रकटभावसे नमस्कार करताहों। नमस्कार करताहों, नमस्कार करताही ३॥ इति मंगलम॥ ; इति श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य ब्रह्मानन्दसरस्वति पूज्यपाद अति, अल्पज्ञ, शिप्य यमुनाशंकर नागरबा मणकृत मोडूक्योपनिषद् संहितगोडपादीयकारिका, श्रीभगवत्पाद भा- प्यानुसार कचित् स्वकल्पित,भापाभाप्य समाप्तम् ॥ हरिॐ तत्सद्ब्रह्मार्पणमस्तु ॥", . - संग्रह प्रकरण । २६७ ॐ अथ अब इस भाषाभाष्यकार कृतं सर्व उपनिषद् आदिकों का प्रणवोपासन विचार देखावने के अर्थ संग्रहनाम प्रकरण प्रारम्भकरतहै। सचता। हे.सौम्य ! यह मांडूक्यनाम उपनिषद् केवल प्रणवकी व्या- ख्या अरु ब्रह्म आत्माकी अभेद एकताका- वोधक अरु संन्या- सियोंका उपास्याइष्ट होनेसे सर्व उपनिषदोंका सारहै, अतएव कर्मादिकों से अरु तिनके फलादिकों से..उपराम चित्त घेराग्य शील मुमुक्षुओं को उसकी उपासना अरु अर्थविचार अवश्य कर्तव्य है, क्योंकि ब्रह्मपाप्ति के अर्थ यह सर्वोत्तम आलम्बन .(आश्रय) है एतदालम्बनश्रेष्ठमेतदालम्बनंपरम, एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते । इत्यादि श्रुतिप्रमाणसे। एतदर्थ यहा इस उपनिषद्की अरु तदुपरि श्रीगौडपादाचार्यकृत कारिकाकी व्याख्याकी समाप्तिके पश्चात् अवसर पायके अन्य उपनिपदोंमें जो प्रणवोपासना अरु तिसका फल अरु-प्रणवकी महिमा कही है, अरु जिसप्रकार हिरण्यगर्भादिक सातो सिद्धान्तकारोंने अपने अपने सिद्धान्तानुसार प्रणवोपासना कही, अरु -जिसप्रकार •अन्य ऋषियोंने मात्राके विचार कहे हैं अरु प्रणवके जो १० नाम हैं सो अरु तिनकी व्याख्या :अरु जिसप्रकार अकारादि मात्रा- ओंके लय चिंतन से सर्वाधिष्टान निर्विशेष शुद्ध प्रणवके लक्ष्य तुरीय आत्माका लक्ष्य कराया है सो इत्यादि सर्व अरु अन्य भी कल्पित विचार, जो प्रणव-विषयक है, तुम्हारे प्रति संक्षेप- मात्र कहताहों क्योंकि यहां प्रणव विषयक विचार कहने का अवसर अवकाश है, तिसको भी सावधान होय श्रवण करो।
मांडूक्योपनिषद् । ईशावास्योपनिपद्गतङ्कारोपासना अंक्रतोरमरकृतधरमर क्रतोस्मरकृतथंस्मरं ॥ हे सौम्य! अब प्रथम ईशावास्य नामक शुक्लयजुर्वेदीय संहि- तोपनिपके सप्तदशवें १७ । मन्त्रके उत्तरार्द्धविपे प्रणवोपास. ना पूर्वक निष्काम कर्मकर्ता पुरुपके अर्थ वा वर्णत्रयी के मनुष्य जो वेदाध्ययन के अधिकारी, है तिनके अर्थ उनके अन्तकाल . कहिये देहावसानसमय,ॐकार के स्मरणकरनेके अर्थ वेदकी 'वा वेद द्वारा ईश्वरकी आज्ञाहे । अरु तिस आज्ञाके अनुसार "उक्त प्रकारके उत्तम विद्वान पुरप अपने देहावसान समय अपने मनको जो शिक्षा करते हैं तिसको श्रवण करो । तथाच श्रुतिः "अंकतोस्मरकृतस्मर” ऋतोस्मरकृतस्मर ' चे विद्वान् अपने मनसे कहते हैं, हे निरन्तर संकल्प विकल्प के करनेहारे महाचंचल संकल्परूप मन ! तू इतनेकालपर्यन्त असंख्य संक- ल्पाको करताही रहा, अरु उभयलोकके विपयोंको अरु शास्त्रा- 'नुसार फम्र्मों के होनहार फलको स्मरण करनाही रहाहे सो अस्तु, परन्तु अब जो तुझको स्मरण करने योग्यह तिसही के 'स्मरण करनेगा समय आय उपस्थित आहे, अरु जिमकी तेने सम्यप्रकार उपासना , कहिये जप अम अर्थकी भावना, किया है। तिस ॐकारका जो ब्रह्मका प्रतीको, स्मरण कर, क्योंकि जिन समय के साधने के अर्थ पाल्यावस्थासेवी उपासनादिक फियेहैं, सो समय अब प्राप्त है । अतएवाचत अपनेपरम कल्याणार्थअंका- रकारमरणकर । अम हे मनावाल्यावस्था ( यज्ञोपीनसम्कार) मे अरु अद्यावधि पर्यन्त जो तने कर्मानुष्ठान कियाद, अथात् जिनसंध्या गायत्री अग्निहोत्रादि निष्काम कर्मोके करनेमे अशुभ चामुक. मर्मस्पर्श करने नहीं"एवं त्वयि नान्यथेनोऽस्तिनकर्म लिप्यतेनरे" इसमन्त्रप्रमाणसे । निन कोकोम्मरणकर अर्थात् रेफार्म उपासनाऐमनहीं कि देहत्यागोत्तर अवगनि प्रातहोंने . + २६६ 1 संग्रह प्रकरण :- कठवल्लीउपनिषद्गतप्रणवोपासना ॥ सधैवेदा यत्पदमामनन्ति तपार्षसि सर्वाणिचय द्वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यञ्चरन्ति -तत्तेपदर्थ सं ग्रहेणबधीम्योमित्येतत् ॥ एतव्येवाक्षरम्ब्रह्म एतदेवा क्षरम्परम् । एतद्ध्येवाक्षरंज्ञात्वा योयदिच्छति तस्य तत् ॥ एतदालम्बनर्थश्रेष्ठमेतदालम्बनम्परम् । एत दालम्बनंज्ञात्वा ब्रह्मलोकेमहीयते ।। काभय होय, अतएवतू अपनेकिये सर्वोत्तम कर्म उपासना को इस उपस्थित समय स्मरणकर-समयको साध निर्भयहो ॥ हे सौम्य ! इसप्रकार मनुष्यवर्णत्रयी को सर्वकाल परमोत्तम वेदोक्त कर्म उपासना करके अन्तसमय तिनके स्मरण से अवगति से निर्भयहोय परमोत्तम गतिको प्राप्तहोना योग्य है यह शुक्लयजुमा- ध्यन्दिनि संहिताकी अन्तिम आज्ञा है। अरु इस मन्त्रार्थ में जो स्मरण करनेको दोबार कहाहै सो स्मरणके, आदरार्थ है,अतएव अपने कल्याणार्थकारका स्मरण विचार अवश्यही कर्तव्यहे। इति सिद्धम् ।। 1. अथ कठवल्लीउपनिषत्सम्बन्धिप्रणवधिचार ।। हे सौम्य ! अब कठवल्ली-उपनिपग्रिपे जो ॐकारोपासनाकी प्रशंसा महिमा-कहीं है तितको भी श्रवण करो। हे प्रियदर्शन ! कोई एक उहालक नाम ऋषिके-नचिता नामवालक पुत्र स. बर्बोचमाधिकारी ने आत्मदेव के जानने की इच्छा धारके तीसरे परदान करके अपने आचार्य भगवान वैवस्वत (यमराज,वा मृत्यु) महाराजसे प्रार्थना किया कि हे भगवन् ! अन्यत्र यादन्यत्रा- -धर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् । अन्यत्र भूताच भव्याञ्च यत्तत्प- "श्यसि तद्वद जो शाम्रोक्त धर्म अरु तिसके, स्वर्गादिक फल .
, मांडूक्योपनिषद् । से, अरु तिनके कारक साधनों से पृथक्है,अरु तेसेही शास्त्रकरके कहे अधर्म अरु तिनके नरकादिफल अरु कारक साधनों से पृ. थक्क है। अरु तैसेही इन कार्य अरु कारणों से भी अन्य है, अरु सही भूत भविष्यत् अरु वर्तमान कालत्रयसे भी जो पृथक् है, अर्थात् भूत भविष्यत् वर्तमान यह तीनकाल, अरु कार्य कारण देश, अरु धर्म अधर्म अरु तिनके फल अरु साधन, यह वस्तु । इसप्रकार उक्त देश काल वस्तुसे पृथक् हुश्रा, इन करके परि- च्छेद (भेद) को प्राप्त होतानहीं, ऐसा जो सर्व व्यवहारके विषय से रहितहे, अर्थात् जोप्रमाणादिक अरु बुद्धयादिक किसीका भी विषय नहीं, तिस वस्तुको आप देखतेहो अर्थात् साक्षात् यथार्थ अनुभव करतेही अतएव सो वस्तु मेरेप्रति कहो॥ हे सौम्य ! इस प्रकार जब नचिकेता ने आत्मजिज्ञासापूर्वक मृत्यु भगवान् से विनय किया तव तिसको श्रवणकर प्रथम निर्विशेप आत्मतत्त्व न कहके तिसकी प्राप्तिमें मुख्य आलम्बन जो आत्माका प्रतीक कार तिसकी उपासनाकी अफ तिसके ज्ञानकी महिमा कहते हुये ॥ मृत्युरुराच f सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपार्थसि स- याणि च यदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्याश्चरन्ति नवेपदधंसं. प्रदेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ एतद्धयेवाक्षरंबल एतदेवाक्षरम्परम् । एतगाक्षरं ज्ञात्वा यो चदिच्छनि तस्यतत् ॥ एतदालम्चना श्रेष्टमेतदालम्बनम्परम् । एतदालम्बनं ज्ञात्वा बलोके महीय. ते १५, १६, १७, ॥ हे नचिकेतः! ऋगादिस येद, अर्थात् गादि येदके एक देश.नह्मविद्या कप उपनिषद, जिस पावने योग्य पदको अविभाग से एकही निश्चयमे, प्रतिपादन करने हैं॥हे सौम्य! यहां वेट शब्दके अर्थ से वेदक एक देशम्प उप- निपद का ग्रहण है, तिसका यह नात्य है कि उपनिषद जी सो ज्ञानके साधन होनेकरके निम प्रिणा के लक्ष्य पर मारम पदमे साक्षात् सम्बन्धवाले हैं। अर्थात् उपनिषदों के महा- पायार्थ ज्ञानसे परमात्मा की अपरोक्ष माक्षान अनन्यप्रालि . संग्रह प्रकरण। होतीहै, अतएव उपनिषद् परमात्मपद से साक्षात् सम्बन्धवाले हैं। अरु जिसकी प्राप्तिकेअर्थ सर्वविद्वान् तपको (स्वधर्मानुष्ठा- नको) कहते हैं । अथवा सर्वतपआचरण करनेवाले तपस्वी जिसको कहते हैं। अरु जिसकी इच्छाधारके गुरुकुलवासादि ब्रह्मचर्यको आचरतेहैं । अर्थात् जिस प्रणवकेलक्ष्य परमात्मपदकी प्राप्तिकी इच्छावाले श्रद्धासम्पन्नहुये गुरुकुल में वासकर उपनिषदों का अध्ययनादि रूप ब्रह्मचर्य करते हैं। अरु जिस पद के जानने की इच्छा तभी करताहै। हेनचिकेतः तिसपदको तेरेअर्थ संक्षेपमात्र कहताही सोयह ॐकारही है । अर्थात् हे नचिकेतः!जिस पदको जाननेकोतू इच्छताहै तिसका प्रतीक (प्रापक) ॐकारहै, क्योंकि वह ॐकारकालक्ष्य अरु अंकाररूप प्रतीकवाला। ताते यह ॐ अक्षर सगुण वा त्रिमात्रिक होने से अपर (अश्रेष्ठ )ब्रज है, अरु यही अक्षर अपने लक्ष्यरूपसे गुण वा मात्रासे रहित अविनाशी अमात्रिक निर्गुण पर (श्रेष्ठ) ब्रह्महै। एतदर्थ इस उक्त अक्षरको सम्य नकार जानके जोउपासनाकरता है सो पर वा अपर जिस ब्रह्मको प्राप्त होनेको इच्छताहै तिसको सोई होता है। अर्थात् जो ब्रह्मलोककी इच्छाधारके त्रिमात्रिक प्रणवकी समाहित चित्त ब्रह्मचर्यादि साधनपूर्वक जपादिरूपसे उपासना करता है तित को सोई ब्रह्मलोक होता है । अरु जो मुमुक्षु मोक्षकी इच्छाधार के त्रिमात्रिक प्रणवके विचारपूर्वक तिसके अधिष्ठान अमात्रिक आत्माका ब्रह्मकेमाथ अभेद अभ्यास वा निदिध्यासन करता है तिसको प्राप्तहोताहै। अतएव हेनचिकेत.! ब्रह्मलोक प्राप्तिवाले को अन्य अज्ञादि आलम्बनों से इस त्रिमात्रिक प्रणवोपासना रूप आलम्बन श्रेष्ठ है, क्योंकि प्रणवोपासना के आलम्बन से ब्रह्मलोक को प्राप्तहआ विद्वान् ब्रह्मा से प्रणव के लक्ष्य का ज्ञान पाय पुनरावृत्ति से रहित मोक्ष होताहै । अरु परब्रह्मप्राप्ति की इ- च्छावाले को इस ॐकारकी विचाररूप उपासना अन्यसर्व सा- धनों के मध्य प्रशंसाकरनेयोग्य परमोत्तम आलम्बन (आश्रय) 4 माडूक्योपनिषद् । - अथ प्रश्नोपनिषद्गतप्रणवोपासना ३ ॥ स योहवैतद्भगवन्मनुष्येषु प्रायणान्तमोङ्कारमभिध्या यीत कतमंवावसतेन लोकं जयतीति ॥ है, मुमुक्षुको परमात्म प्राप्तिके अर्थ इस ॐकारकी उपासना से अधिकश्रेष्ठ आलम्बन कोईनहीं, एतदर्थ इस आलम्बनको सम्य- प्रकार जानके उपासनाकरनेवाला ब्रह्मलोकपिपे महिमा को पावताहै, अर्थात् जो ब्रह्मलोक की प्राप्ति की इच्छासे निमात्रिक ॐकारकी उपासना करताहे सो तिसके आश्रय ब्रह्मलोकमें जाय ब्रह्मावत् पूजनीय होता है । अरु जो साक्षात् ब्रह्मवाप्ति के अर्थ इस ॐकाररूप प्रतीकद्वारा तिसके लक्ष्य परनमकी उपासना करता है सो ब्रह्मरूप लोकथिपे अनन्यहुआ तितकी महिमाको प्राप्तहोताहै "ब्रह्मविद्ववभवति"हे सौम्य ! उक्तपूकार मुमुक्षु के अर्थ अमृतत्व प्राप्तिमें अंगारकी उपासनारूप आलम्बन से इतर सर्वोत्तम आलम्बन कोई नहीं। ऐसा कठरली उपनिषद् की श्रुतिवाक्य प्रमाणसे सिहदी है। अतएर मुमुक्षु करके अपने मोक्षार्थ सर्वोत्तम परमश्रेष्ठ मारोपासनामाही आश्रयकरना उचितहे॥इति ॥ २॥ अथ प्रश्नोपनिपद्गत अझारोपासना ३ ॥ हे सौम्य ! अब अर्थविदीय प्रश्नोपनिपट में जिस प्रकार प्रश्नपूर्वक ॐकारके पर अफ अपर दो भेद अक्रममे माताओं के उपासकोंकी गति कही है, निमको भी संक्षेपमान कहनाहों सावधानहोय धरणकरो॥हे प्रियदर्शन ! प्रश्नोपनिपद् के पश्चम पूरनरिपे सत्यकाम नामक गपि ने अपने आचार्य पिप्पलाद नाम पिसे पटनफ्यिा हे किनियो ६ घेतगयन्मनुष्य प्रा. यणान्तमोवारमाभन्यायीन फनमं वावमतेन लोकं जयनानि ant TO 4 संग्रह प्रकरणाम ३०३ तस्मैसहोवाच । एतद्वै सत्यकामे परञ्चारिश्च ब्रह्म यदोङ्कारस्तस्माद्विद्वानेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति ॥ हे भगवन् ( पूजनेयोग्य ) मनुष्यों के मध्य सो आश्चर्यवत् है जो कोई एक मनुष्य अपने मरण पर्यन्त सम्यक्प्रकार सर्व धर्मा- चरण अरु इन्द्रियों के अरु मनके निप्रहवाला हुआ समाहित चित्ततासे कारके अभिध्यान से 'कम्मों के फल जे.सर्गादि अनेक लोक हैं तिनमें से कौन से लोक का जयकरता है अर्थात् वह प्रणवोपासक कौनसे लोक को प्राप्त होता है, सो आप कृपा करके कहिये ।। हे सौम्यो इस प्रकार जव सत्यकामनामवाले ऋषि ने अपने आचार्य पिप्पलाद ऋषि से प्रश्न किया तब सो उत्तर कहतेहुये तस्मेसहोवाच । एतद्वै सत्यकाम परञ्चांपरञ्च ब्रम यदोद्वारस्तस्माद्विद्वानेतेनेवायतनेनैकतरमन्वेति- पिप्पलाद मुनि.तिस प्रश्नकर्ता सत्यकाम प्रति कहतेहुये हे सत्यकाम ! यह जो सत्य अक्षर पुरुपनामवाला परब्रह्म है अरु जो प्रथम उत्पन्न हुआ प्राणनामक अपर ब्रह्महैन्सो उभेय प्रकारका ब्रह्मा अंकार ही है । अथवा ॐकारका लक्ष्य सर्वाधिष्टान, अमात्रिक परब्रह्म है, क्योंकि मात्रारूप उपाधि से पर (पृथक् ) है तात्ते वा मात्रा ।घाले सोपाधि ब्रह्म से श्रेष्ठ है ताते । अरु तिसका प्रतीक होनेसे त्रिमात्रिक अक्षर वर्णात्मक-ॐकारअपर (अश्रेष्ठ) ब्रह्म है। अरु इस ॐकार अक्षर (वर्ण) को जोब्रह्मत्व है सो 'जैसे शालि- पाम नामक पापाण को विष्णु (हिरण्यगर्भ) का प्रतीक होनेसे उसको भी विष्णुपना है, तैसे हैं। ताते इस ॐकार को निरु- पाधि निर्विशेष साधिष्टान परब्रह्म काप्रतीक होने से यह अपर ब्रह्म है, तिसकी अकारादि मात्रा की जायदादि अवस्थादि रूप पादों के साथ एकताकर प्रथममात्रा को दूसरी में अरु दूसरी को तीसरी में, अरु तीसरी को, तीनोंशी अपेक्षा से जो सर्वाधि- छान चतुर्थ शिव है तिसमें लयकर तदाकार अनन्य स्थिति से ए.
मांडूक्योपनिपद् । स यद्येकमात्रमभिध्यायीतं तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्यामभिसम्पद्यते । तमचो मनुष्यलोकमुपनयन्ते स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्नो महिमान मनुभवति ३॥ कात्म्य ध्यानकरके उस बार का लक्ष्य जानने में आवता। इसप्रकार जानके जो परब्रह्महै सो ॐकारही है । अर्थात् “ॐ इस ॐकार अक्षरका जो लक्ष्य अविनाशी अक्षर परवल है ताते अंकारही परब्रह्म है, अरु परब्रह्म का वाचक 'प्रतीक' होने से यह अपरब्रह्म है । इसप्रकार कार को पर अरु अपर उभय ब्रह्मरुप जाननेवालो पुरुप कारकी उपासना के आश्रय दोनों में से एकको पावता है । अर्थात् जो ॐकारकी उपासना ( मा- प्राओंकी लयता) के विचाररूप आलम्बन से सर्ववृत्ति आदि- कोंके अभावसे निर्विकल्प समाधिमें निर्विशेप आत्मस्थिति दृढ़- तासे पावता है सो अभेदतासे परब्रह्म को पावता हे। अरु जो उक्तप्रकार की आत्मस्थिति को न पायके निसकी प्राप्तिके अर्थ 'ॐ' इस अक्षरकी जप विचारात्मक उपासनाको सम्यक्प्रकार यथाशास्त्र विधि आश्रयकरताहै, सो तिसका फल ब्रह्मलोकको प्राप्तहोय वहां ब्रह्मद्दारा लक्ष्यको पावना॥हे सोम्य! उक्त प्रकार कहके पुनः पिप्पलाद मुनि कहताहुआ कि हे सत्यकाम! अब कारकी मात्राके ज्ञान उपासनाकआश्रय अधिकारी उपासकों को जो जो फल, कहिये गति, प्राप्तहोता है तिमकोभी क्रमशः श्रवण करो जो पुरुप अंकारको ब्रह्मका प्रतीक होनेसे समीपरी अरु आलम्चनों में श्रेष्ठ आलम्बन परम उपकारक साधन जानता, अरु निमात्रिक प्रणाकी उपासना करने योग्य है, इस प्रकार जानताहै। परन्तु ॐकारकी सरै मात्राओं को यथार्थ विभाग पूर्वक जानता नहीं, किन्तु अपारकी एफ अकार मात्रा ही उपासना करने योग्य है, इसप्रकार जानके ॐकार की पूर्णरूप , -1 संग्रह प्रकरण से उपासनान करके खण्डरूप से एक मात्री कीही उपासना करताहै सो खण्डोपासक भी अवगतिको पावता नहीं, अब उस- को जो गति प्राप्त होतीहै सो श्रवण करो से यथेकमांत्रामभि- ध्यायीत तेनैव संवेदितस्तूर्णमव जगत्यामभिसम्पद्यते । तमची मनुष्यलोकमुपनयन्ते स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्नो महिमानमनभवति । अर्थ यह जो, सो उक्तप्रकार का उपासक जब केवल एकमात्राके विभागका जाननेवाला हुआ सर्वदा एक, मात्रा रूपसे ही अकारको ध्यावता (ध्यान विचार करता है, सो, पुरुष तिस ॐकारकी एकमात्राके धानके प्रभावसे ही निस मात्राका साक्षात्कारवान हुआ. देहत्यागके अनन्तर तत्काल ही पृथिवी,(मनुष्यलोक) विषे जन्म ,पावताहै, तहां पृथिवी विषे अवेक योनियों के जन्म हैं तिनमें तिस उपासक को सबों- त्तम, वर्णत्रयी में से, कोई एक मनुष्यलोक (शरीर) को ss कारकी ऋग्वेदरूप प्रथममात्रा-प्राप्त करती है, तब सो उपासक मनुष्यलोकमें द्विजोत्तमहुआ तपकरके, ब्रह्मचर्य करके, श्रद्धा करके, सम्पन्न हुआ महिमाको अनुभव करताहै । हे सौम्य ! महि: माका स्वरूप सामवेदीय छान्दोग्य उपनिषद्विषे " गो अश्य मिहमाहिमेत्याचक्षते हस्ति हिरण्यं दासभार्य क्षेत्राण्यायतना- नीति " गो अश्व हस्ति आदिक पशु अरु सेवकादिक भृत्य । अरु भार्या उपलक्षण करके भार्या पुत्र पौत्रादि कुटुम्ब, अरू सुवर्ण उपलक्षण करके सुवर्ण रजत रत्नादिक,धन, अरु रोगा दिकों से रहित अरु दीर्घायु सहित सुन्दर शरीर,अरु क्षेत्र पृथिवी (राज्य) अरु आयतन कहिये सुन्दर निवासस्थान । इत्यादिको को महिमा करके प्रतिपादन कियाहै,तिस महिमाको वो ऊंकार की एक मात्राका उपासक पावता है। परन्तु श्रद्धादिकोंसे रहित हुआ यथेष्टाचरण करता नहीं किन्तु शास्त्रानुसार ही चेष्टा अरु पूर्वाभ्यास वश प्रणवोपासना । ही,करताहै । अतएव उक्तप्रकार का प्रणवोपासक दुर्गतिको कदापि प्राप्तहोतानहीं।। ॥ हे सौम्य! - उ . मांडूक्योपनिषद् अथ यदि द्विमात्रेण मनसि सम्पद्यते सोऽन्तरिक्ष यजभिरुनीयते । स सोमलोकं.स. सोमलोके विभतिम नुभूयपुनरावर्तते ४: FIR ENTEE उक्त प्रकारके उपासकसे अन्य पुरुष म अर्थयदि द्विमात्रेण मनसि सम्पद्यते सोऽन्तरिक्ष यजमिन्नीयते । स सोमलोक स सोम- लोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते । अर्थ, यदि कारकी दो मात्रा के जाननेवाला अंकारको अकार, उकार; इन दो मात्रारूप जानके मात्राओं के विभागपूर्वक ॐकारको ध्यावताहै । अर्थात् कारका जप अरु दोमात्राके विभागके विचारसें अर्थ भावनों रूप ध्यान करताहै, सो यजुर्वेदमय चन्द्रमारूप देवतवाले अं. र्थात् चन्द्रमा है देवता जिसका ऐसे मनधिपे एकाग्रता से आत्म भावको प्राप्त होता है, सो । देहत्यागान्तर यजुर्वेद सम्बन्धी ॐकारकी दोमात्राके प्रभाव से अन्तरिक्षरूप'आधारवाले चन्द्र- लोक' को प्राप्त होता है, अर्थात तिस ॐकारकी दोमात्राके उपा- सके साधकको यजुर्वेद जो है सो चन्द्रलोक सम्बन्धी जन्म प्राप्त करता है । अर्थात् जो पुरुष यजुर्वेद सम्बन्धी कारकी दो मा. प्रारूपसे उपासना करते हैं तो उस उपासना के प्रभाव से यही देहत्यागान्तर चन्द्रलोक में जो इस लोक की अपेक्षा उत्तम अरु द्वितीय है । जन्म पविता है, तब सोतिसं चन्द्रलोक सम्ब- न्धी महिमा ( विभूति) को अनुभव करके (भोगके) पुनः इस मनुष्यलोंक में आये जन्म पावती हे। यह ॐकार को दो मात्रारूप जानकें उपासना करनेवाले की गति कही । अरु धूमादि दक्षिणायन मार्गवालोंकी भी यही गति है हे सोम्य ! अब ॐकार के तीनों माना की पूर्ण उपासक की जो गति हे तिसको भी श्रवण करों" या पुनरेतन्त्रिमाणेवोमित्ये. तेनेवाक्षरेण परं पुरुष मभिघ्यायीत स तेजसि सूर्य सम्पन्नः । अर्थ पुनः जो पुरुप तीनमात्रा का ज्ञाताहुआ, अरु इस कार घ मांडूक्योपनिषद् ३०७ यापुनरेतन्त्रिमात्रेणैवोमित्येतेनैवीक्षरेणपरं पुरुषः मभिध्यायीत स तेजसि सधै सम्पन्नः यथा पादो- दरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं ह वै सपाप्मना विनिर्मुक्त स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकम। सएतस्मान्जीवधनाप रात्परं पुरिशयं पुरुषमीनंते तदेतौइलोको भवतः ५ ।। को ब्रह्मका प्रतीक होनेसे ब्रह्म प्राप्ति में उसको परम आलम्बन जानके, त्रिमात्रिक ॐकार रूप सूर्य के अन्तरगत पुरुषको ॐकारके लक्ष्यको ध्यानकरता है । अर्थात्-जिस अधिष्ठान रूपांपरम पुरुष के आश्रय तीनों पादरूप मात्रा अध्यस्त, अरु सर्प में रज्जुके अन्वयवत् जिसका तीनों मात्राओं में अन्वय है। अरु :सत्यरूप, रज्जु में अध्यस्त- असत्य सर्प के व्यतिरेक्वत् व्यतिरेक है; तिस,सर्वाधिष्ठान निरुपाधि परम पुरुषको, त्रिमा. त्रिकाकार जो ब्रह्मका प्रतीक है तिसरूप सविणे उक्त पर- मपुरुषको ध्यानकरता है, वा, आकाशगत सूर्य-मंडलविषे, अरु त्रिमात्रिकी इस अक्षररूप सूर्य विपे.जो सूर्य्यादि सर्वका प्रकाशक सर्वाधिष्ठान सर्वका आश्रय परमपुरुषहे तिसको उभय सूर्य विषे एक जानके अरु.तिलके साथ आत्माकी एकताजान को अर्थातं जो चैतन्यपुरुषः प्रकाशरूप से सूर्य चिपे स्थित हैं, अरु सर्वका साक्षीरूपसे शरीरादि-संघातविपे स्थित है, अरु ल- क्ष्यार्थरूपाहोयके त्रिमात्रिक इस अक्षरविषे:स्थितहे, सो एकही है।इसप्रकार, इस अक्षरविषे, अरु सूर्यमंडलविषे, अरु शरीरादि संघातविषे, अरु इन तीनोंको उपलक्षणकरके अधिदेवत, अधिभूत, अध्यात्म, इन तीनोंप्रकारके जगविणे, एक अखंडं अविनाशी, चैतन्ययुरुषको कोरेवेदं सर्वम् । इत्यादि श्रुति अरु स्वानुभव प्रमाणसे जो मात्राओं के ज्ञान पूर्वक ध्यानकरता है । सो तिस..ध्यान उपासना के प्रभाव से मरणोत्तर तेजोमयहुआ। तेजोमय सूर्य विपे प्राप्त होताहे ।
मांडूक्योपनिषद् । अरु सो उपासक जैसे कारकी दौसात्रा का उपासक चन्द्र- लोकमें विभूतिको अनुभवकर पुनरावृत्तिको प्राप्त होताहै, तेसे त्रिमात्राका उपासक, सूर्यमंडलविपे-प्राप्तहुआ पुनरावृत्तिको प्राप्त होता नहीं, किन्तु सूर्यविपे प्राप्तहुआ ही होताहै । अर्थात् सूर्यलोकमें जाय वहाँ की विभूति महिमाको भोक्ताहुआ वहीं ही रहता है । यथा पादोदरस्त्वां विमुच्यत एवं हवैस पाप्म- ना विनिर्मुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं । अरु सो पुरुष जैसे सर्प अपनी जीर्ण त्वचाको त्यागके पश्चात् नवीनहुओं पुनः उस परित्याग कीहुई जीर्ण स्वचाको देखता (पावत्ता वा ग्रहणकरता) नहीं । तैसेही प्रसिद्ध सोप्रणवोपासक सर्प की स्वचास्थानीय अशुचितारूपापापों से मुक्त होताहै । अथवा जैसे सर्प अपनी जीर्ण त्वचाको त्याग नवीन हुआ पुनः उस त्यागी हुई त्वचाको ग्रहण करता नहीं, तैसे वो तीनमात्रा का उपासक इस मनुष्य लोक सम्बन्धी शरीर रूप पापो से मुक्त हुआ सूर्य लोक विपे देव शरीरको माय एन.इसलोक सम्बन्धी शरीर को न ग्रहण करके देवरूपही रहता है। अग इस लोक सम्बन्धी शरीररूप पापोंसे मुक्तहुआ सूर्य्यलोकवि देवशरीरको पाय वहां भी उपासनाके प्रभावसे, तीसरी मात्रारूप सामवेद करके, सूर्यलोकसे भी ऊंचे हिरण्यगर्भ नामक ब्रह्माकेसत्यलोक नामकलौरको प्राप्तहोताह ।। अरु सएतस्माजजीवधनारपरात्परं पुरिशयंपुरुपमीक्षने तदेतो इलोको भवत." सो तीसरीमाना या तीनोमात्रा का उपासक विद्वान् पुस्प सत्यलोक में स्थितहुआ इस सर्वोत्कृष्ट जीवधनरूप हिरण्यगर्भ से । अर्थात् सर्व सक्षम शरीरों की समष्टतारूप हिरण्यगर्भ के अनएव उमको जीवन कहतेहैं। पर कहिये श्रेष्ठ, परमात्म नामवाले पुस्पको 'जोसन भरीररूप पुरियों में स्थितह वा सर्व गरीरगन पुरीतति नाडीत्रिपे स्थित' देखता है अर्थात् जोगारमा लक्ष्य हिरण्यगर्भादि सअध्यस्थोंका अधिष्टान जो एक सारमा परम यह तिसको - सिंग्रह प्रकरण ३०६ तिस्रोमात्रामृत्युमत्या प्रियुक्ता अन्योन्यसक्ता अन विप्रयुक्तामा क्रियांसाबाह्याभ्यन्तरमध्यमासुसिम्यकुं प्रयुक्तासुनकरपतेः साक्षात् सोहमस्मिभावसे अनुभवका पुरुष.पुनरावृत्तिसे रहित हुआ ब्रह्माकेसाविा ब्रह्मसे महावाक्यार्थका ज्ञानोपदेश पायको मोक्षहोताहै तिहां ईस अर्थ के प्रकाशक अप्रिम दोगमन्त्र प्र- माण, तिस्रोमात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ताअन्योन्यसंक्ता अनेविप्रयु- क्त क्रियासुवाह्याभ्यन्तरमध्यमासुसम्यक्प्रयुक्तासुनकम्पतेजः। 'अर्थतीनसंख्याहें जिनकीऐसीजोकारकी अकारउकार मकार, यह तीनमात्रा हैं, सो मृत्युकी विषयही हैं अरु परस्पर सम्बन्ध वाली है; अरुवो तीनों मात्रा विशेष करके एकएक विषय विषेही योजनाकरीगईहो। ऐसानहीं,किन्तुविशेषकरकेएकहीध्यानकालें विषे त्यागकोहु जायत्, स्वप्म,सुषुप्ति, यह तीन स्थान, अरु तिन के अभिमानी, जे. स्थूल, सूक्ष्मताकारण के अतिमानी देवी- नर हिरण्यगर्भ, अरु अव्याकृत,तिनसेअपृथक् : विश्व, तेजस, प्राज्ञ पुरुषतिनकी अकार,उकार,मकार इनतीनमात्राप्तादात्म्य 'करके अर्थात् जामदेवस्थाविश्वाभिमानी स्थूला भोगाइस व्यष्टि प्रथम पादकी, विराट् स्थान त्रैश्वानर अभिमानी स्थूल भाग, इस समष्टि, पादसे एकताकर तिसका अकार रूप प्रथम मात्रांसे तादात्म्य करके अरु तैसेंहीस्वप्नावस्था तेजसाभिमा- नी विरलभोग, इस व्यष्टि द्वितीय प्रादकी सक्ष्मस्थांनाहिरण्य- गर्माभिमानी विरलभोग इस समष्टि द्वितीय पादसे एकताकर "पुनः तिसका उकाररूपं.द्वितीय मात्रा सेन्तादत्म्यि करके, पुन: 'सुपुर्ति अवस्था प्राज्ञाभिमानी आनन्द भोग, इस व्यष्टि तृतीय पादको कारणास्था-रुद्रवाईश्वराभिमानी आनन्द वा अज्ञान "भोगइससमष्टि तृतीय पादविपे एकता करके, पुनः उस पादकी मकार मात्रासे तादात्म्य करके अर्थात् उक्त प्रकारजामंदादि मांडूक्योपनिषद् । Frऋम्भिरतं यजुर्भिरन्तरिक्षः स सामभिर्यत्तत्तवयो वेदयन्ते । तमोंकारेणैवायतनेनान्योतिविद्वान् यत्तच्छी न्तमजरममृतमभयं परञ्चेति ॥ ७ इति॥ तीनों प्रादी को अकारादितोनोंमात्रासे तादात्म्य (एकता) करके ध्यानरूपजीवाह्याभीतर अरु मध्यकी योगकिया है तिसको सम्यक् ध्यानके कालविषयोजनाकिये हुये जब वे तीनोमात्रायो- जना किया होय, अर्थात् समष्टि उक्त पाहोंविषे व्येष्टि। उक्त प्रादोंकी योजनाकरके पुनः क्रमशःप्रथम अकार मात्राको द्विती. याउकारमात्राविपे लय करे, अरु उसे अकारयुक्त द्वितीय उकार मात्राको मकाररूप तृतीय मात्राविषे लयकरे, पुनः उस तृतीय मात्रको उसॐकारके वाच्य अधिष्ठान विपनामनामी के अभेद से लयकरे, वा अध्यस्तरूपातीनों मात्राको उसको अधिष्ठान से अपृथक् जानके लयकरे ।। इसप्रकार सम्यक् ध्यानके कालविपे तीनोमात्रा उक्तप्रकार जव योजना करीहोय, तबउसाकारका ज्ञोता. योगी चलायमान होतानहीं। अर्थात् विक्षेपको पात्रता नहीं,किन्तु अचलही होताहै। अरु जिसकरके उत्तप्रकारका प्रण- घोपासक विद्वान् ॐकारएवेदं सर्वम् । इत्यादि प्रमाण अनु- भवसे सर्वात्माकारल्यहुआहे एतदर्थ उसका चलना (दि.* क्षेप) किसकारणसे होवेगा किसीसे भी नहीं, क्योंकि विक्षेप का कारण देतभेद भारहे, सो उसको न होय सर्वन कार आत्मभानही है, तातेनिक्षेप के कारण देतभारके अभावले एक ॐकारदशी विद्वान् चलायमान होतानहीं। हे सौम्य सम्भि- रेतंयजुर्भिरन्तरिक्षससामभिर्यत्तत्कवयोवेदयन्ते । अर्थ, ऋग्वेद सेॐकारको एक मात्रारूप जानके भजन उपासन करनेवाला पुनप इस मनुष्य लोक्को प्रासहोनाह, अरु पद से अकार को दोमानारूप जानके उपासना करनेवाला विद्वान् देहत्यागो- तर पितृलोक (चन्द्रलोक) को प्राप्त होनाह । अरु जिसको मांडूक्योपनिषद्। अथमुण्डकोपनिषद्गत प्रणवोपासनाप्रारभ्यते। प्रणवोधनुशिरोह्यात्माब्रह्मतल्लक्ष्यमुच्यते। अप्रमत्ते EVENTIPE नवेदव्य शरबत्तन्मयोभवेत् ॥ अध मुण्डकोपनिषद्गतप्रणवोपासनाप्रारभ्यते ॥ matta an हे सौम्य ! मुंडकउपनिषद् के द्वितीय मुंडकगत द्वितीयखण्डं के चतुर्थ मन्त्र विपे कहा है, प्रणवोधनुःशरोह्यात्मा ब्रह्मतल्ल- यमुच्यते । अप्रमत्तेनवेद्धव्यंशरखत्तन्मयोभवेत् । अर्थ। ॐकार रूप-धनुप है, अर्थात् वाणके लक्ष्य: निशाने) विपे प्राप्त होनेको धनुष कारण है, धनुप विना-चाण लक्ष्य विपे प्राप्त होता नहीं। तैसेही आत्मा (बुद्धिविशिष्ट चैतन्य) रूप वाणको अपने लक्ष्य अक्षर ब्रह्मविणे प्राप्त होनेको कारण कारोपासन है, अतएव अंकारको धनुपरूपकरके कहा है. अरु जैसे-वाण चलावने को अभ्यासकिये, अरु संस्कारयुक्त शिलीमुख) हुआ पाणधनुपके आश्रयहुआ लक्ष्यविपे स्थित होता है, तैसेही कारकी. उपा- सना के विचाररूप-से-सक्षम-शिलीमुख अरु शमदमादि साधनों करके संस्कारयुक्त हुआ, प्रणवोपासना- रूप-धनुप के आश्रय उक्त आत्मारूप घाण सो अपने आभास-(प्रतिविम्बः) भावको जिोकि अपस्थावयात्मक बुद्धिरूपा उपाधि के सम्बन्धसे प्राप्त हुआ है। त्यांगके अपने अक्षररूपविम्बंधिपे जैसे प्रतिविम्ब निम्न में से अमेहता से स्थित होता है। एतदर्थ, आत्मरूप चाणको अपने अक्षररूपलक्ष्य विपे प्राप्तहोने को प्रणव जोह.सोधनपवत् धनुष है । अरु उक्त आत्मारूप वाण है अिर्थात् उपाधि करके लक्षित परमात्मा, अक्षरकाही. जलादिकांगत सादिकों के प्रतिविम्बवत, इस देहादिक संघात विपे सर्व चुद्धियोंकी वृत्तियों का साक्षीहुआ प्रवेशको पाया है सो वार्णवत्घाणहै । अन आत्मा के अर्थ जो विषयों की तृष्णा सोई प्रमादहै, तिस प्रमादसे रहित संग्रह प्रकरण अप्रमत्त अरु सर्व से वैराग्यवान् जितेन्द्रियः समाहितचिर्तता इत्यादि साधनरूप संस्कारसम्पन्नता तिसकरके सहित से वेधन (प्रवेश) के योग्य जो ब्रह्म सो लक्ष्य है। ताते प्रणवरूप धनुप के आश्रय आत्मरूप,वाणी जर्व ब्रह्मरूप लक्ष्यविषे प्रवेशरूपसे उक्तं लक्ष्यका वेधन होता है, तिसके पश्चात् आत्मा बाणवत् लक्ष्य विषे तन्मयतारूप होता है ।।. अर्थात् जैसे घाणको लक्ष्य के साथ एकरूपतामयफल होताहै, तैसेही देहादि अनात्माकार, वृत्तियों के तिरस्कार से अक्षर के साथ तन्मयतारूप फलकोप्राप्त, होना, यह सर्व बुद्धिमान् मुमुक्षुओं करके योग्य है । है सौम्य ! अव इसका और प्रकार से कल्पित विचारको श्रवण करो हे प्रियदर्शन ! धनुष से जो घणि चैलंती है सो अपने मार्गगत वस्तु- ओंको उल्लंघनकरता अपने लक्ष्यको प्राप्तहो तन्मय होताहै, तैसे ही यह चिदाभासरूप वाण निमात्रिक प्रणवरूप धनुष से अपने. विम्ब ब्रह्मरूप लक्ष्य की ओर चलता है, तब अपने जायदादि अवस्थारूप व्यष्टिपादों को, विण्डादि समष्टिपादों के साथ, अरु तिनको अकारादि मांत्राओं के साथ अभेद विचार के तिनको अभ्यस्त होने से पीछे अविद्यात्मकता की ओर डाल आप अपने अमात्रिक ब्रह्मरूप लक्ष्य विर्षे प्राप्तहोय पश्चात् विचाररूप वेग से रहित हुआ लक्ष्यमय होताहै । अरु यहांजोकहा किशिरव- तन्मयो भवेत् । तिसका विचार इसप्रकार जानना कि, घाण जो है सो अपने लक्ष्यमें प्रवेशको पाय अदृश्य होनेसे तन्मयहये वत् भासता है, परन्तु लक्ष्यरूपतासें अभेद तन्मय होता नहीं अर्थात् वाण लक्ष्य में प्रवेश पायाहुआभी लक्ष्यके साथ अभेद एकताको पावता नहीं लक्ष्य से विजाति हैं ताते, एतदर्थ इसका अर्थ अग्रिम कल्पित कहे प्रकार भी जानने योग्य है। पूणवरूप धनुषके आश्रय चिदाभासरूप बाणकरके 'ब्रह्मरूप लक्ष्यको प्रमाद (आलस्य वाविषयासक्तता) से रहितहोंय वेधन करना योग्य है । यहां पर्यंत चाणके दृष्टान्त प्रमाण यथार्थ हे . मांडूक्योपनिषद् । आगे जो तिसका फल शिरबत्तन्मयो भवेत् । तारूप होना कहा है। तिसको जल अरु हिमका दृष्टान्त विचार युक्त है, क्योकि जलको भी शर, कहते हैं, अरु जल हिमकी अभेद एकता भी युक्त है । अर्थात् जैसे गुलेल, वा धनुप, कि जिनका आकार एकरूप है, नामक यन्त्रके आश्रय हिम (वरफ) का खंड रूप गिल्ला व वाण जलकी ओर चलाया हुआ अपने लक्ष्य जल को पात होय अभेद तन्मयताको प्राप्त होताहै, ताते शर शब्दका अर्थ जल अंगीकार करके उक्त दृष्टान्त प्रमाण विचारनेसे अभेद तन्मयता होने में शंका रहेनहीं, अरु अर्थभी युक्त है । अर्थात् जैसे जल अपनी शीतलता स्वभाव करके हिमभावको प्राप्त होता है, अरु जलकी कोमलतादि धर्मसे विपरीत काठिन्यतादि धर्मवाला भासता है, परन्तु सो तिस हिम अवस्थामें भी जलसे इतर कहने मात्रहीं है, अरु पुनः जलमें गया अपने काठिन्यतादि बाह्य धर्म को त्याग अभेदता से जलके साथ तन्मयताको पावताहे " यथा नद्यास्यन्दमानाः समुद्रेस्तंगच्छन्ति नामरूपे रिहाय, तथाविद्वा. नामरूपाद्विमुक्तःपरात्परंपुरुपमुपैतिदिव्यम् तैसेही ब्रह्मकी इच्छा वा स्वभाव रूपा माया करके ब्रह्मही अल्पज्ञतादि धर्मशाला जीव भावको प्राप्तहुआसा भासता है, परन्तु वास्तन करके तत्त्व- मस्यादि प्रमाणोंकरके ब्रह्मरूपही है, सोजीर (चिदाभास)प्रणा रूप धनुपको आश्रयकर आप चाणपत् हुआ बहारूपजल लक्ष्यमें प्रवेशकर तन्मयताको प्राप्तहोताहे । तात इसचिदाभासरूप आ- त्मा जीपको ब्रह्मरूप लक्ष्य के साथ अभेद तन्मयता होने के अर्थ प्रणोपासनारुपमुरयआलम्बन ॥ अमित्यांच्यापथ"ॐ" इस उक्तप्रकारसे काररूप आश्रयाले हुये शास्त्रोक्त कल्पना से ॐकारकाध्यानकरो,इसप्रकारज्ञान यान आचार्य्यने ममक्षुकोब्रह्म आत्माकी अभेदतारूपमोक्षकी प्राप्तिकेअर्थ ॐबारकी उपासना रुपसर्वोत्तमआलम्बनम्हा,तिमहीकोआश्रयकरनायोग्य है ।। "प्रणवोपासनविचारसम्पूर्णम ॥ स्म ।
V संग्रह प्रकरण ३१५ अथं कृष्णयजुर्वेदीयतैत्तिरीयोपनिषद्गतः । प्रणवविचार.॥ अम्। अमितिब्रह्मा अमितीदथं सर्वम्। अमित्ये तदनुकृतिहरमवा अप्योश्रावयेत्याश्रावयन्ति । अमि तिसामानि,गायन्तिा छंशोमिति शास्त्राणिशयंसन्ति। अमित्यध्वर्युःप्रतिगरंप्रतिगाति । अमितिब्रह्मांत्र सौति । मितिअग्निहोत्रमनुजानाति । अमितिबा मणः प्रवक्षन्नाह । ब्रह्मोप्राप्नुवानिति ब्रह्मैवोपाप्नोति ॐ दश इति । हे सौम्य अव तैत्तिरीयोपनियविषेजिप्तपकारप्रणवकी श्रेष्ठ ता वर्णन कियाहै.तिसकोभी श्रवणकरो अमितिब्रह्म । अमिती- दर्थसर्वमा अमित्येतदनुकृतिहरूमवा अप्योश्रावयेत्याश्रावयन्ति । अमिति सामानिगायन्ति । ॐ शोमिति शास्त्राणिशसन्ति। अमित्यध्वर्युः प्रतिगरंप्रतिगृणाति । अर्थ अव सर्व उपासनाके अंगभूत,ॐकारोपासन कहते हैं । ॐ इसप्रकारका यह शब्दरूप ब्रह्महे, इसप्रकार मनकरके ॐकारकी मात्रादिकोंका स्मरण वि. चाररूप उपासनाकरे । अरु जिसकरके 'ॐ' इसप्रकारका शब्द यहसर्व है। अर्थात् शब्दरूप यहसर्वपञ्चएक कारसेही व्याप्त है, अरुजो वाच्य (नामी) है सोवाचक (नाम) के अधीन है, एत- दर्थ यह सर्व ॐकारही है, इसप्रकार कहतेहैं ।अवस्कारकोसर्व से ज्येष्ठ श्रेष्ठ होनेसें तिसकी स्तुति, कहते हैं। अकारको उपास्य होनेसे, ॐकारका यह अनुकरणहै। अर्थात् जाते अन्यकरके कहीं ताहाँ वा पावताहों, ऐसेकहे वचनको श्रवणकरके, ॐ, ऐसे,अनुः करण करताहै, एतदर्थ कार अनुकरणहै, यह ॐकारका अनु; करणपना अंसिद्धहै । अरुः ॐइसप्रकार श्रवणकरावो इस क्रथ- नको प्राप्तहुये पुरुप उसकारके उच्चारणपूर्वक श्रवणकरात हे .
मांडूक्योपनिषद् । तैसेही जो सामवेद के गायन करनेवाले पुरुषहें लो इसप्रकार सामोंको गायनकरते हैं अर्थात् सामवेदके गानकरके सर्वसामग ॐकारही को गायन करते हैं। अंरु जो ऋचाके पाठक हैं सो 'ॐशो' ऐसे शास्त्र कहिये गानरहित केवल ऋचाको कथन करते हैं । अरु तैसेही जो अध्वर्यु अिर्थात् यज्ञघिपे यजुर्वेदीय ऋविज विशेषां है सो'ॐ' इसप्रकार प्रतिगर (वेदके शब्द - विशेष) को हयन करनेवाले के कथन कथनप्रति उच्चारण कर- ताहै । अर्थात् यज्ञ में ऋग्वेदीय प्रात्विज हवन करनेवाला होता है सो जव मन्त्रों को उच्चार करता है तब अध्वर्यु उसके प्रतिमन्त्र के साथ मारपूर्वक प्रतिगर का उच्चार करता है । अरु जो ब्रह्मा (यज्ञकर्मका कर्ता विा यज्ञमें दक्षिण दिशामें स्थित होय यज्ञका रक्षण करनेवाला। ऋत्विज् विशेष) है सो'ॐ' इस प्रकार अनुमोदन करता है अरु 'ॐ' इस प्रकार अग्निहोत्र, को अनुमोदन करता है। अर्थात् होता करके होम करताहों, इसप्रकारके कथन कियेहुये को 'ॐ' ऐसे कहके अनुमोदन करता है । अरु जो ब्राह्मण है सो 'ॐ' इसप्रकार कहने को इच्छताहुआ, अध्ययन करता हुआ 'ॐ' ऐसेही कहता है अ र्थात् अध्ययन करने को काररुपसे ग्रहण करताह । अरु बम 'कहिये वेद' को प्राप्त होगा इसप्रकार इच्छा करता हुआ 'ॐकारद्वारा वेदकोही प्राप्त होताहे' वाब्रह्म'कहिये परमा. स्मा' को प्राप्त होऊंगा इसप्रकार-आत्माको प्राप्त होने की इच्या को करता हुआ 'ॐ' ऐसेही कहता है । अर्थात् आत्मकामा पुरुष अंकारकी उपासना द्वारा आत्मपद को प्राप्नहोता है इन सर्वका अभिप्राय यहहे कि ॐकारके उयारण पूर्वक करीहुई सर्व क्रियाको फलवानपनाहे, एनदर्थ काररुप ब्रह्मकी उपासना करनी योग्य है यह इसका तात्पर्य हे ॥ इति तैत्तिरीय उपनिद सम्बन्धी प्रणोपासनविचार ॥ " P . ? --- . A संग्रह प्रकरण। ३१७ अथ सामवेदीयवान्दोग्यउपनिषद्सम्बन्धीप्रण- वोपासनविचार ।। अमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत.॥ अमित्युद्गायति तस्योपव्याख्यानम् १ ॥ हे सौम्य अब सामवेदीय छान्दोग्य उपनिषद्सम्बन्धी प्रणवो- पासन विचार संक्षेपमात्र श्रवणकरो। इस उपनिपटें 'प्राण' आदित्यादि, अनेक दृष्टि से प्रणवोपासना कही है सो सर्व यहां न कहके ॐकारकी रसतमत्वादि श्रेष्ठता अस्ब्रमप्राप्तिमें मुख्या- लम्बन अरु मोक्षसाधनतासंक्षेपमान कहताहौ । अरु इसकास- विस्तर विचार इस उपनिपद्की व्यायाम होगा। अमित्येतद- क्षरमुद्गीथमुपासीता। यह जो एकवर्णात्मक अक्षरहेसोपर- ब्रह्मका प्रतीक, मुख्यनाम होनेसे इराकी अपरब्रह्म रूपसे उपा- सना कर्तव्य है, क्योकि यह परब्रह्मका प्रतीक अरु नामहोने कर- के इसकी.उपासनासे परब्रह्म प्रसन्नहोताहै, जैसे लोकविये जि- सका प्रियनामले के बोलावने से वहनामी प्रसन्नहोताहै तैले। अरु -यह परब्रह्मका प्रतीक (प्रतिमा)अरुनामहे ताते इसबिषे ब्रह्मवद्धि । कर इसकी मात्राओ के विचारपूर्वक इसके लक्ष्यफी ध्यानादि रुपसे उपासना कर्तव्य है । अर्थात इसॐकार अक्षरको ध्यानादि रूपसे उपासना कर्तव्यहै अर्थात् इस अंकार अक्षरकी जपरूपसे बा ध्वनिरूपसे अरु मात्राओंके भेद विचाररूपसे उपासनाकरे। अरु मात्राओंके क्रमशः लय चिंतनपूर्वक मात्रादिकों के अधिष्टा. नअक्षर परब्रह्मसे अपनेको अभेद्र अनुभवकर तादात्म्य स्थिति (निर्विकल्प समाधिरूपसे ध्यानरूप उपासनाकरे। जैसे शालि- पाम नामक शिलाचिपे विष्णवुद्वि करके तिसका पूजनादिरूप उपासन, अरु तिस शालिग्रामरूप आलम्बन करके तिसकरके लक्षित लक्ष्य सर्वव्यापी हिरण्यगर्भवाश्यामसुन्दर चतुर्भुजादि ३१६ . मांडूक्योपनि पद्ः। एषां भूतानां टर्थिवीरसः टथिव्या आपोरसः अपा- मोषधयोरसः ओषधीनां पुरुषोरसः पुरुषस्य वायसो चाच ऋग्रसऋचःसाम, साम्नः उद्गीथोरसः ॥सएष रसानाथं रसतमः परमः परायोऽष्टमो यदुद्गीथः१ । २।।। इति ॥ RAN नामरूप अवयववान् वैकुंठाधीश विष्णुका, ध्यान लोक विपे प्र- सिद्ध है तैसे । अरु, परमात्माकी मुख्य उपासना विपे मुख्य आलम्बन अरु परमात्मा का प्रतीक (स्मारकप्रतिमा) होनेसे, इस ॐकारको. सर्व वेदान्त. उपनिपदों विपे संर्वसे. श्रेष्ठ करके कहाहै, अतएव यह श्रेष्ठ है, अरु जप, कर्म, स्वाध्यायादिकों में सर्व से प्रथम ॐकारका स्मरण करते हैं, अरुजित जपादिकर्म में प्रथम इसके उच्चारण स्मरणपूर्वक जपं कर्मादिकोंको करते हैं सोई फलवान् होताहै, एतदर्थ भी यह सर्वसे श्रेष्ठ है। अत एव इसवर्णात्मक ॐकार अक्षर उद्गीथकी उपासना सर्वोत्तमहे । ताते श्रद्धा भक्ति जितेन्द्रिय समाहित चित्त होय इस प्रकार . की उपासना कर्त्तव्य योग्य है । अरु सामवेदीय उद्गाता (सा- मवेद का गायन करनेवाला) ऋत्विज् विशेष. यज्ञादिकों में अं. कारका गायन करता है अतएव इसको उद्गीथ कहते हैं । अर्था- त उद्गाता जो सामका गायन करता है सो " इस अक्षर के स्मरणपूर्वक करता है ताते ॐकार को उद्गीथ विशेपण से कहते हैं । अरु यह जो ॐकारकी उपासना, श्रेष्टता, विभूति, फलादिक है सो इस अंकार.का उपव्याख्यान हे., अब इस कारकी सर्वोत्तमता को. श्रवणःकरो, हे सोम्य एपा भता- नां पृथिवी रसः। इन सर्व. चराचर भूतोंका पृथिवीरस (गति, परायण, अवष्टंभ) है। अर्थात् गति कहिये उत्पत्ति का कारण है, अरु परायण कहिये सर्व चराचर भूतोंकी स्थिति का हेतुहे, असे अवष्टंभा कहिये प्रलय में निदान है । यह , गति, परायण, संग्रह प्रकरण अरु अवष्टंभ, इनतीनों पदोंका भेदहै। ऐसी जो सर्वचराचिरभूतों 'का रस, पृथिवी तिसका जल रस है । अप्सु होताच प्रोताच । यह वृहदारण्य के पञ्चमाध्यायकी श्रुतिहै । इस रस, शब्दका अर्थ कारणता अरु ,सारभूतता विये जानना । तिस जल का ओषधि रस है। शंका, आपधि को जलके कारणत्व का अभाव होनेसे उसको जलका रसव कैसे है। तहां समाधान कहते हैं, ओषधि जलका परिणाम सार है, एतदर्थ उसको जलका रस कहते हैं । अरु ओषधी का रस (सारं) पुरुप कहिये शरीर, है . क्योंकि यह शरीर अन्नरूप ओपधि का परिणाम (सार) है ता. ते अर्थात् ॥ एषां भूतानां" यहां से लेके "आपोरसः". यहां पर्यन्त रस शब्द का अर्थ कारण (आश्रय) परवजानना,- इससे आगे रसशब्द का अर्थ.सारपरत्व है ऐसे जानना॥ अरु शरीररूप पुरुपका रस वाणी है, क्योंकि.शरीर के अवयवों में वाणी श्रेष्ठ है ताते ,अरु वाणीकोही लोक विपे सरस रस- ना रसवती, इत्यादि विशेषणों से कहते हैं। अरु तिस वाणीको रस, कहिये सार, ऋचाहै। अतिसं ऋचाओं का सामरसतर है अर्थात् सारहै । अरु तिस ऋचाओं के सारतर सामं का उनीथ अंकार, सारतर है। इस प्रकार यह उद्गीताख्य.कारचराचर भूतोंका उत्तरोत्तर रसों का अतिशय करके रसतर.है । अर्थात् जैसे इक्षु: रसको सार गुड़ वा राव है, तिसका सारं शकर है, तिसका सार खांड है, तिसको सार.धूरा है, तिसका सारतर कन्द वा मिसरी है, तेसे।। अरु, परमात्मा का प्रतीक होने से इस अंकारको परार्य कहते, हे अर्थात् परमात्माकी उपासना का स्थान होने से. यह वर्णात्मक कार अक्षर-परमात्मांवत् मुमुक्षुओं करके उपास्य है. इत्यभिप्रायः ॥ अरु पृथिव्यादिरसों की संख्या से यह अष्टम है, अतएव इसको अष्टम.कहा है, अर्थात् भूतांकारस पृथिवी १, पृथिवीका जल २, जेलका ओप- धिओपधिका शरीराई, शरीरका वीणीपू वाणीका ऋचा ' क मांडूक्योपनिषद् । एप भूतानां एथिवीरसः टंथिव्या आपोरसः अपा- मोषधयोरसः ओषधीनां पुरुषोरसः पुरुषस्य वायसो वाच ऋग्रसऋचःसाम साम्नः उद्गीथोरसः ॥ सएष रसानाथं रसंतमः परमः परायोऽष्टमो यदुद्गीथः१ । २।३॥ इति॥ नामरूप अवयववान् वैकुंठाधीश विष्णुका घ्यान लोक विपे प्र- सिद्ध है तैसे ॥ अरु, परमात्माकी मुख्य उपासना विषे मुख्य आलम्बन अरु परमात्मा का प्रतीक (स्मारकप्रतिमा) होनेसे, इस अंकारको सर्व वेदान्त उपनिपदों विषे सर्वसे श्रेष्ट करके कहाहै, अतएव यह श्रेष्ठ है, अरु, जप, कर्म, स्वाध्यायादिकों में सर्व से प्रथम ॐकारका स्मरण करते हैं, अरुजिस जपादिकर्म में प्रथम इसके उच्चारण स्मरणपूर्वक जप कर्मादिकोंको करते हैं सोई फलवान् होताहै, एतदर्थ भी यह सर्वसे श्रेष्ठ है। अत एव इसवर्णात्मक ॐकार अक्षर उद्गीथकी उपासना सर्वोत्तमहे । ताते श्रद्धा भक्ति जितेन्द्रिय समाहित चित्त होय इस अंकार की उपासना कर्तव्य योग्य है । अरु सामवेदीय उदाता (सा- मवेद का गायन करनेवाला) ऋतिज विशेष यज्ञादिकों में . कारका गायन करता है अतएव इसको उद्गीथ कहते है । अर्था- त् उन्नाता जो सामका गायन करता है सो ' इस अक्षर के स्मरणपूर्वक करता है। ताते कार को उद्गीय निशेपण से कहतेहै ।। अरु यह जो अंकारकी उपासना, श्रेष्टता, विभूति, फलादिक है सो इस अंकार का उपव्याख्यान है | अब इस अंकारकी सर्वोत्तमता को श्रवण करो, हे सोम्य ' एप भूता- नां पृथिवी रसः। इन सर्व चराचर भूतोंका पृथिवीरस (गति, परायण, अवष्टंभ) है। अर्थात् गति कहिये उत्पत्ति का कारण है, अरु परायण कहिये सर्व चराचर भूतोंकी स्थिति का हेतुहे, अरु अयभकहिये प्रलय में निदान है। यह गति, परायण, , संग्रह प्रकरण ३१६ अरु अवष्टंभ, इनतीनों पदोंका भेदहे॥ ऐसी जो सर्वचराचिरभूतों का रस, पृथिवी तिसका जल रस है। अप्सु ह्योताच प्रोताच यह वृहदारण्य के पञ्चमाध्यायकी श्रुतिहै । इस , रस , शब्दका अर्थ कारणता अरु सारभूतता विषे जानना । तिस जल का ओषधि रस है। शंका, औषधि को जलके कारणव का अभाव होनेसे उसको जलका रसत्व कैसे है। तहां समाधान कहते हैं, ओषधि जलका परिणाम सार है, एतदर्थ उसको जलका रस कहते है । अरु ओपधी का रस (सार) पुरुष 'कहिये शरीर, है . क्योंकि यह शरीर अन्नरूपं ओपधि का परिणाम (सार) है ता. ते अर्थात् "एषां भूतानां" यहां से लेके “ आपोरसः" यहां पर्यन्त रस शब्द का अर्थ कारण (आश्रय) परत्वजानना, अरु इससे आगे रसशब्द का अर्थ सारपरत है ऐसे. जानना।। अरु शरीररूप पुरुषका रस वाणी है, क्योंकि.शरीर के अवयवों में वाणी श्रेष्ठ है ताते .अरु वाणीकोही लोक विपे सरस रस- नौ रसवती, इत्यादि विशेषणों से कहते हैं । अरु तिस वाणीका रस, कहिये सार, ऋचाहै । अरु निस ऋचाओंका सामरसतर है 'अर्थात् सारहै । अरु तिस ऋचाओं के सारतर साम का उद्गीथ ॐकार, सारतर है । इस प्रकार यह उद्गीतारस्य ॐकारचराचर भतोंका उत्तरोत्तर रसों का अतिशय करके रसतर है (अर्थात् जैसे इक्षु रसका सार गुड वा राया है, तिसका सारं शकर है, तिसका सार खाड़ है, तिसका सार पूरा है, तिसका सारतर कन्द वा मिसरी है, तैसे।। अरु परमात्मा का प्रतीक होने से इस ॐकारको पराऱ्या कहते हैं अर्थात् परमात्माकी उपासना का स्थान होने से यह वर्णात्मक अंकार अक्षर-परमात्मापत् मुमुक्षुओं करके उपास्य है । इत्यभित्रायः॥ अरु पृथिव्याविरसों की संख्या से यह अष्टम है, अतएव इसको अष्टम कहा है, अर्थात् भूतोका रस पृथिवी १, पृथिवीका जल २, जलका ओप- धि, ओषधिका शरीर, शरीरको वीणी ५, वाणीका चाह -- M .. • ३२ मांडूक्योपनिषद् । त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोध्ययन दानमिति प्रथम स्तपएवं द्वितीयों ब्रह्मचा-चार्यकुलवासी । तृतीयों अत्यन्तमात्मानमाचार्यकुले ऽवसादन्सर्व एतेपुण्यलो का भवन्ति ब्रह्मसर्थस्थोऽमृतत्वमेति इति ॥ ऋचाका साम, सामका उद्गीथ आकार: इसप्रकार : थिव्यादि उत्तरोत्तर रसोंका अष्टम रस होने से ॐकारको रस तमः"सर्वोत्कृष्ट रसतर कहाहैः।। हे सौम्या अब इल छान्दोग्य उपनिषद् के द्वितीय प्रपाठकके पटाखण्ड त्रिपे प्रणवको अमृतत्व (मोक्ष) प्राप्ति का साधन कहा है, तह तिसंकी विधि के अर्थ प्रथमानत्रयोधर्मस्कन्धाः धर्म के तीनस्कन्ध (भेद) कहे हैं, तहां यज्ञोऽध्ययन दानमिति, प्रथम: अग्निहोत्रादि कर्म करना, अरु नियम से ऋगादि वेदों का अध्ययन करना, 'अरु भिक्षुक यांचक को दानदेना, यह धनर्मका प्रथम स्कन्ध हैं, सो मुख्यकरके गृहस्थका धर्महै यहां जो प्रथमाश्रमी ब्रह्मचारी के धर्मको त्यागके गृहस्थ के धर्मकोयथम कहा सो वानप्रस्थ की अपेक्षा से आपछान्दर्स प्रयोग से क्रमव्यत्ययसेवा, गृहस्थ को अन्य तीनोंका रक्षक पोपक होने से कहा जानना अरुतिप .. एवं द्वितीयः । कृच्छुचान्द्रायणादि व्रतरूपं तप, धर्मका द्वितीय स्कंध है, सो वानप्रस्थका धर्म जानना:यहां जो बानप्रस्थ के धर्मकों जो तृतीय है; द्वितीयकरके कहाँहै सो गृहस्थ के प्रथमकी अपेक्षासे जानना अप्राचार्याचार्य कुलबासी तृतीयो. ऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादन । आचार्य कुल में बास करनेका शील कहिये संभाव,हे जिसका, ऐसा: आचार्य कुल- वासीबह्मचारी, अर्थात् केवल वेदाध्ययन करने मात्रही को आचार्य कुलमें वासन करके आजन्मपर्यन्त ब्रह्मचर्यपूर्वक गुरुकुल में वास करके वहांही देहत्यागकरना, इस नेटिक ब्रह्मचर्य केलखारने के अर्थ "अत्यन्त" यहपदे दियाहे । अर्थात् विधिपूर्वक जो नैतिक .
.. संग्रह प्रकरण। ३२१ ब्रह्मचर्यहै सो धर्मका तृयीय स्कंधहै । इस उत्तप्रकारके धर्म- वान् , ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, यहतीनोंअपने अपने धर्मा- चरणके प्रभावसे स्वर्गादि पुण्यलोकको प्राप्तहोतेहैं, अतएव इन तीनोंको "पुण्यलोका' इस विशेषणसे कहा, ।। अरु इनतीनों की अपेक्षासे जो चतुर्थ संन्यासीहै सो ब्रिह्मसर्थस्थोऽमृतत्व मेति । वनजो कार तिसकी उपासनामें स्थित होने से तिस उपासनाके प्रभावकरके अमृतत्त्व(मोक्ष) को प्राप्तहोताहै। अर्थात्, यहां जो केवल संन्यासीको ही प्रणवोपासना कहा है तितका हेतु यह जानना कि सामान्य रीतिसेतो चारोही आश्रमके पुरुष प्रणवोपासनाके अधिकारी हैं परन्तु संन्यासीको अन्य अग्निहो. त्रादि कम्मोके त्यागपूर्वक शमदमादि करतसन्ते केवल प्रणवो. पासनाका अधिकारहै, ताते उसको प्रणवोपासनाका अधिकार विशेष होनेसे उसको ब्रह्मसर्थस्थो। यह विशेषण दियाहे । अरु पूर्वोक्तप्रकार क्षारकेलक्ष्य परमात्माकी अंकाररूप आलम्बन से उपासना करनेवाला अमरणभाव (मोक्ष) को प्राप्तहोताहे, अतएव कहाहै कि । ब्रह्मसधस्थोऽमृतत्वमेति । प्रणवोपासक मोक्षको प्राप्तहोता है ।। इति । इति सामवेदीय छान्दोग्य उपनिषद्नम्वन्धी प्रणवोपासनविचार समाप्तम् ।।
३२२ मांडूक्योपनिषद। अथ यजुर्वेदीय वृहदारण्यक उपनिषद् सम्बन्धी प्रणवोपासन विचार प्रारभ्यते ॥ अं३ खं ब्रह्म। खं पुराणं वायुर खमिति ह स्मा ह कौरव्यायणी पुत्रो वेदोऽयं ब्राह्मणा विदुइँदैनेन यद्वेदितव्यम् ॥ इति ॥ हे सौम्य ! अव यजुर्वेदीय वृहदारण्यक उपनिषद् के सप्तमा- ध्याय -सम्बन्धी प्रणवोपासनविचार संक्षेपमात्र कहताहों' सो श्रवणकरो यहां सो ॐ३ खं ब्रह्म । यह ब्राह्मणभागका मन्त्र है। तिसमें अंकारका वाच्य जो ब्रह्म तिसका खं विशेषण है (अर्थात निराकार सर्वव्यापी परिपूर्ण एकरस वा सो विशेष्य है, अरु तेसा होनेसे , खं, उसका विशेषण है । अरु विशेष्य नि: शेषणका समानाधिकरण होनेसे इसका नीलकमलवत्, " खं ब्रम" ऐसा निर्देश (उपदेश) है अरु ब्रह्मशब्द विशेषकरके वृहत (व.) का बोधक है, अतएव उसको आकाशका विशेषण देके खं ब्रह्म, कहा है । जो सोखं विशेषणवाला ब्रह्म हे सो ॐ, शब्दका वाच्य होनेहे 'अ यह शब्दरूप है, अरु उक्त प्रकार के विशेष्य विशेषणकरके अरु वाच्य वाचकता करके उभयथा भी उसका सामानाधिकरण अविरुद्ध है, अतएव नझोपासन साधनेके अर्थ, ॐ, यहशब्द युक्तही । अरु श्रुत्यन्तरमै भी कहा है तथाच । एतदालम्बनंश्रेष्ठमेतदालम्बनम्परम् । परमोमि- त्यात्मानं युजीत "" अमित्येवं ध्यायय आरमानमित्यादि। अरु ॐकारका अन्या असंभवहे, जैसे अन्यत्र अमिति शस- त्योमित्युदायतीति । कहाहै सो, स्वाध्यायके आरम्भ अपवर्ग के विकारका प्रयोग शिनयोग होने कहा ननु तहां अर्था- न्तरकेहेतु एतदर्य ध्यान साधनत्वकरके अंकारका उपदेश है। अरु यद्यपि ब्रह्म, अरमा, इत्यादिक जो शब्दह सो बमानस्तु के . संग्रह प्रकरण ३३३ वाचकनामहै, तथापि श्रुतियों के प्रमाणसे ब्रह्मका उपदेश अंकार करकेही है, अतएव ब्रह्मपाप्तिकी इच्छाबालेकोब्रह्मप्राप्तिके अर्थ अंकार सर्वोत्तम साधन है । अरु यहां जो ॐकार ब्रह्मका, खं, आकाश विशेषण है तिसकरके भूताकाशको न ग्रहणकरके - कारके लक्ष्य चिदाकाश (चैतन्याकाश) का ग्रहण है, सो कैसा है पुराण कहिये चिरन्तन है । अर्थात् उत्पत्त्य दि रहित अनादि है । अरु उसको । सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं नित्यम् । " सूक्ष्माञ्चतत्सू क्ष्मतरं विभाति । इत्यादि प्रमाणकरके पृथिव्यादि भूतों से आ- काश सूक्ष्म, अरु आकाशसे सर्वशक्तिकी समष्टतारूप अव्या- कृतनाम आकाश ,जो चिदाकाठारूप अक्षरविपे ओतप्रोत है, सूक्ष्महै । अरु तिससे सूक्ष्म ॐकारका लक्ष्य चैतन्याकाश परम सूक्ष्महे, अतएव उसको सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म कहते हैं । ताते उस महासूक्ष्म अक्षर आत्मा ब्रह्मको आलम्बन बिना जाननेको कोई भी शक्यनहीं, अतएव जैसे लोक विष्णुभादिक देवताके आकार से अंकित पापाणादिकोंविषे विष्णु आदिकोंकी भावना करते हैं, तेसेही श्रद्धाभक्ति भाव विशेपकरके परब्रह्मका प्रतीक जो - कार अपरब्रह्म तिमविपे परब्रह्माकी भावनाकर उपामना करनी। अरु वायुरं खमिति । . वायुरं, कहिये जिस आकाशविषे वायु 1 विद्यमानहोय तिस आकाशको , वायुरं, कहते हैं । अर्थात् वायु कहिये सूत्रआत्मा समस्त जगत्को,जैसे सूत्रमें मालाके मणिके तैसे, अपने विपे धारके जिस परमाकाशचिपस्थितहै तिस चेत- न्याकाश प्रणरके लक्ष्यको , वायुरै, कहतेहैं, . सो कौन जानता है, कौरव्यायणीका पुत्र जानता है, अतएव . खं, इस शब्दका अर्थ यहां चैतन्याकाशही यक्त है, ऐसा मानते हैं। तात्पर्य यह है कि , खं, शब्दकरके निरुपाधि ब्रह्म, अरु , वायुरं, इसकरके सोपाधिब्रह्म,मो उभयप्रकारके ब्रह्मका बोधक ॐकारही है क्योंकि परब्रमका प्रतीकहोनेसे, प्रतिमावत् सायनरूप से प्रतिपाद्य है । तथाच ॥ एतदेतत्यकामपरञ्चापरस्चनहायदों. १ मांडूक्योपनिषद् । कारइति । अरु यह ॐकार वेद है, जो जानने योग्य वस्तु है सो जिसकरके जानीजाय तिसका नाम वेद है,सो मुमुक्षुओंकर- के अज्ञानावस्था में जानने योग्य ज्ञेयरूप जो परब्रह्म आत्मा सो दुर्विज्ञेय होनेसे अंकाररूप आलम्बनद्वाराही जानाजाताहे, अरु ऋगादि वेदोंका वीज (कारण) होनेसे ॐकारही वेद है जैसे नामकरके नामी जानाजाता है तैसे, ताते ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण 'यह अंकारही वेदहै इसप्रकार जानते मानते हैं ।। इति यजुर्वेदीयवृहदारण्यउपनिषद्सम्बन्धीप्रणवो- पासन विचारसमाप्तम् ।। . हे सौम्य! इन ईशादि सर्व उपनिषद् करके प्रतिपाद्य ॐका- रोपासन कहने का अभिप्राय यह है कि मुमुक्षुको ब्रह्मभावरूप मोक्षकी प्राप्तिके अर्थ त्रिमात्रिक प्रणवोपासनारूप आलम्बन सर्वोत्तमहे नातःपरमस्ति। इससे उत्तम ओर आलम्बन कोई नहीं । अरु विष्णुआदिकोंकी प्रतिमावत् यह अंकार परमात्मा की प्रतिमास्मारक (स्मृतिकरावनेवाला)है। अरुयही उसअना- मी परमात्माका मुख्य नामहै, अतएव इसको परमात्मप्राप्ति में मुस्य आलम्बन जानके मुमुक्षुओंकरके इस अंकारकी उपासना अवश्य कर्तव्य है। इतिश्रीईशादिसर्वउपनिषद्सम्बन्धीप्रणवोपासन विचारसंक्षेपतःसमाप्तम्॥ अथ हिरण्यगर्भादिसप्तसिद्धान्तसम्बधीप्रणोपासनविचार ॥ हेसौम्यासमस्त शान्नोंके सात सिन्ान्न हैं, तहांप्रथम हिरण्य संग्रह प्रकरण। गर्भ (ब्रह्माजी) का सिद्धान्त १ । द्वितीय सांख्यशास्त्र के कर्ता कपि- लदेवका सिद्धान्त २।तृतीय कर्मवादी अपान्तरतम मुनिकासि- द्वान्त ३। चतुर्थ सनत्कुमारों का सिद्धान्त ४। पञ्चम ब्रह्मनिष्ठों का सिद्धान्त ५। पाठ पशुपति शिवजीका सिद्धान्त ६ । सप्तमपञ्च- रात्र विष्णुजीका सिद्धान्त ७॥इसप्रकार सात सिद्धान्त हैं तहाँ सातोंसिद्धान्तकारोंने तीनमात्राके तीनतीन भेदसे एक अंकार के नवनव भेदसे उपासना किया अरु कहाहै, अतएव सातों सि- द्वान्तकरके एक कारकी मात्राके६३ भेदहुयेहैं। अब इन प्रत्येक सिद्धान्तकारों करके कहे जे कारकी मात्राकेभेदं सोभी तुम्हारे प्रति कहताहाँ तिसको भीश्रवणकरो॥ १प्रथम हिरण्यगर्भ का सिद्धान्त ॥ हे सौम्य ! हिरण्यगर्भ सिद्धान्तके मतवादी पुरुष ऐसा कहतेहैं कि जिस जिज्ञासुको परमात्मयोग (परमात्मा जीवात्माकाअभेद) पावनेकी इच्छाहोय सो कारकी इसप्रकार उपासनाकरे कि जो परमात्माकावाच्य ॐकार निमात्रिकरूपहै सो 'तीनमात्राका रूप है, तीन ब्रह्मरूपहै, तीनअक्षररूप है, ऐसा जानके जो ॐकारकी उपासना करताहै सो परमपदको प्राप्तहोताहै, अब इसका विस्तार श्रवणकरो। अग्नि, वायु, सूर्य, यह तीन ॐकारकी मात्राह।अरू १.ऋग, यजु, साम, यह तीन वेद ॐकार के बृह्म हैं । अरु 'अकार' 'उकार,मकार,यह तीन ॐकारके वर्णात्मक अक्षरहैं । इसप्रकारका है स्वरूप जिसका ऐसाजोकारहै सोपरमपदहै । अर्थात् उक्त प्रकार का अंकार ,परब्रह्मका प्रतीक होने से इसको परमपद कहते हैं क्योंकि इसकी उपासना से मुमुक्षुओं को परमपद (व्रह्मपद) की प्राप्ति होती है, ताते इसको परमपद कहते हैं। अरु यही कार परब्रह्म प्राप्तिका मुख्य आलम्बन होनेसे मु- मुक्षुकी परमगति, "गतिरत्रनास्तिों यहां इस मोक्षमार्ग विषे इस ॐकारोपासनसे इतर गति (आय) अन्य कोई नहीं। इसपूकार शास्त्रतः वा गुरुत्तः सम्यक्प्रकार जानके जो कार . ३२६ मांडूक्योपनिषद् । की उपासना करते हैं सो मोक्षको प्राप्त होते हैं वो पुनः जन्म मरणको प्राप्त होते नहीं। पूथम जो अग्नि, वायु, सूर्य, यह तीन मात्रा कही है तिनका व्याप्टमें इसप्रकार पिचारहै केि.जी. व, ईश्वर, आत्मा, यह तीन मात्राम्प जानने, तहां सर्व अन्न का भोक्ता वै वानररूप से सर्व देहोमें स्थित है सो जीवहै, . भो. का होनेसे, अरु प्राणरूप सत्रात्मा हिरण्यगर्भ सर्व देह में व्याप्त ईश्वर है, सर्व संघातको धारणकर्ता सर्व में ज्येष्ठ श्रेष्ठहोने से। अरु सूर्य, साक्षी आत्माहै, सर्व का प्रकाशक सौ से अर्सग सर्व का द्रष्टाहोने से । अरु ऋग, यज, साम इन तीनो के कहने से शब्द ब्रह्मको जानना, क्योकि सर्व शब्दोंका वीजरूप ॐकार है । अरु , अकार , उकार, मकार, यह तीन वर्णात्मक अक्षर कहे हैं, तिनकरके जाग्रत् स्वप्न, सुपुप्ति, यह तीन अवस्था रूप कार्य कारणात्मक प्रपञ्च जानना, क्योंकि मांडक्योपनिषद् विषे जाग्रदादि अवस्थारूप पादोंकी अकारादि मात्रा के साथ एकता कही है। अतएव प्रथम रही जो मात्रा तिसको जाग्रत् स्थानादिरूप प्रथमपाद अकारमात्र रूप जानना, अरु शब्दवम को सूक्ष्महोने से सूक्ष्म स्वप्नावस्थादि स्थानरूप को उकारमात्रा रूप जानना, अरु सब के साक्षी आत्मा को सर्व का कारण होनेसे उसको सर्व का कारण सुपुप्तिअवस्था प्राज्ञाभिमानीरूप मकार मात्रारूप जानना। इसपूकार व्यष्टि समष्टिकी एकताकर पुनः तिसकी मकारादि मानासाथ एक्ता विचारके इन सर्व को अंकाररूप जानके जो मुमुक्षु परब्रह्म के प्रतीक त्रिमात्रिक अंकारकी उपासना करता है सो पुस्प अंकार के लक्ष्यरूप पर- व्रह्मरूप परमपद को प्राप्त होताहै पुनः वो संसार विपे आपते नहीं । इसप्रकार हिरण्यगर्भ सिद्धान्त के मतवादी प्रणयोपासन मानते करते कहते हैं। इति प्रथम हिरण्यगर्भ सिद्धान्त १ ॥ अथ द्वितीय कपिलदेव सिद्वान्त २॥ हे सौम्य ! सारयशास्त्र के कर्त्ता कपिलदेवजी के मिसान्त संग्रह प्रकरण ३२७ विषे इसप्रकार कहाहे कि, जब मुमुक्ष पुरुप , तीन ज्ञान, तीन गुण, तीन कारण इन नौ भेदवाले एक अंकारको जाने तव मोक्षको प्राप्त होवे। अब इनका भेदार्थ श्रवणकरो, तीनप्रकार का जो ज्ञान कहाहै सोइसप्रकार है कि एक व्यक्त ज्ञान है दूसरा अव्यक्त ज्ञानहै, तीसरा ज्ञेय ज्ञानहै। तहां , आकाश, वायु, अ. ग्नि, जल, पृथ्वी, पंचमहाभूत, अरु इनका कार्य घट पट देहा; दि प्रपंच है सो सर्व व्यक्तरूप आगमापायिअनित्यहै कधी इनका भावहोता है कधी अभाव होता है । ताते यह सत्य न होयके अ- सत्यही है। इनका जो यथार्थज्ञान है सो प्रथम व्यक्त ज्ञानहै। अरु इनका जो कारण , शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, यह पांच तन्मात्रा, अहंकार, महत्तत्व, अरु प्रकृति, यह आठों अव्यक्तरूप हैं, ताते जो इनका यथार्थ ज्ञानहै सो अव्यक्त ज्ञान है । अरु शेयक- हिये जाननेयोग्यअिर्थात् मुमुक्षुको अज्ञानपर्यन्त जानने योग्य अरु ज्ञानहुये अपना आप ज्ञानरूप ( ऐसा जो चैतन्य आत्मा पुरुष तिसका जो यथार्थ ज्ञान सो ज्ञेयज्ञानहै । इसप्रकार व्यक्त अव्यक्त अरु ज्ञेय, इन तीनोंका जो जानना है सोई तीनप्रकारका ज्ञान है। हे सौम्य अब इन सर्वको जिसप्रकार जाननाहे सो भी श्रवण करो, जो मूल प्रकृति है सो अव्यक्तरूप है अरु सूक्ष्म स्थूल सर्वका कारणहै, यो कार्य किसीका भी नहीं । अरु महत्तत्व अहंकार अरु पंचतन्मात्रा, यह सात वारणरूप भी हैं अम कार्यरूप भी हैं, तहां कार्यतो प्रकृतिके, अरु कारण , पंच महाभूत दश इन्द्रिय अरु एक मन इन, पोडश पदार्थों के हैं, अतएव इनको प्रति विकृति भी कहते हैं, अरु उक्त पोडश पदार्थ केवल कार्यरूपही हैं वो कारण किसीके भी नहीं ताते उनको केवल विकृति रूपही कहते हैं । अरु पुरुष जो चैतन्यहै सो न तो फिसीका कारणहेन किसीका कार्यह केवल स्वयंज्योति सर्वका साक्षी निराकार निर्विकार कूटस्थ है । अर्थात् व्यक्तजो स्थल प्रपंच सो केवल कार्यरूप है, अरु महत्तत्व अहंकार अरु पंचतन्मात्रा यह सान ३२६ मांडूक्योपनिपद् । उक्त प्रकार कारणरूप भी हैं अरु कार्यरूप भी हैं, अरु अव्यक्त प्रकृति जिसको प्रधानभी कहतेहैं तो केवल कारणरूपहीहै अरु पुरुष ज्ञानरूपहै । इन सबको यथार्थ जानना तिसका नाम ती- नप्रकारका ज्ञान है । अरु. सत्त्व, रज, तम, यह तीनगुणहें, तहां सत्त्वगुणसे ज्ञान अरु दैवी संम्पदा होते हैं, रजोगुणसे काम रागा- दि होते हैं, तमोगुणसे प्रमाद आलस्य निद्रा क्रोध हिंसादि आ. सुरी सम्पदा होतेहैं । अरु पुनः सत्वगुणसे देवतादिक होते हैं, रजोगुणसे मनुष्यादि होतेहैं, तमोगुणसे पशु वृतादि होते हैं, पु. नः सत्त्वगुणसे स्वर्गादि उत्तमलोक होतेहैं, रजोगुणसे मनुष्य लोकादि मध्यम लोकहोतें हैं, अरु तमोगुणसे नरकादि अधम लोक होतेहैं, इसप्रकार त्रिगुणात्मक सर्व कार्य जानना । यह तीन ॐकारके गुण हैं ॥ अरु तीन कारणहैं तहां एक, मन, द्वि- तीयबुद्धि, तृतीय अहंकार, इसही तीनकरके सर्व प्रवृत्तिहोती है अतएव यह तीनों कारणहैं ॥ हे सौम्य!यह सर्व कथनसे यह जा. नना, जो अकारका लक्ष्य परब्रह्महे सोई अव्यक्तरूपहै अरु सोई व्यक्तरूप है अरु सोई पुरुष ज्ञेयरूपहे । ताते कारणरूप भी वो हीहे अरु कार्यरूप भी वोहीहे अरु साक्षीरूप भी वोहीहै, ताते सर्व अंकाररूपही है। अरु अंकार विपे जो दो मात्रा अकार अरु उकार तिसको कार्य कारणात्मक प्रकृतिरुप जानना अरु यह व्यंजन जो मकारहे जिसको अनुस्वार कहतेह सो धैतन्य पुरुपरूप है । अरु ॐकार तीनमात्राकरके त्रिगुणरूप हे एतदर्थ समस्त प्रपंच निगुणात्मक कारही है, अरु व्यंजनरूप नि- गुण परम पुरुपहे ताते सर्व ॐकारही हे । अरु इरा ॐकारका वाच्य प्रकृत्यात्मक प्रपंचहै । अरु इसका लक्ष्य सर्वका साक्षी प्रकाशक अधिष्ठान सच्चिदानन्द आत्माहे । ताते जो पुरुप उक्त प्रकार जानके परब्रह्मके वाचक प्रतीक ॐकारकी उपासना कर ताहे सो तिस उपासनरूप आलम्बन करके परमपदको प्राप्न होताहे ॥ हे सौम्यापूर्व जो,त्यनज्ञान,अव्यक्तज्ञान अम ज्ञेयज्ञान .
. संग्रह प्रकरण। ३२६ यह तीन प्रकारका ज्ञान, अरु सत्व रज तम, यह तीनगुण, अरु मन बुद्धि अहंकार, यह तीन कारण कहे हैं। तहां स्थूलव्यक्त प्रपंचसहित व्यक्तज्ञान, अरु सत्त्वगुण अरु मन कारण, इस सर्व का समुच्चय जायदवस्थारूप प्रथम पांदको अकाररूप प्रथम मात्रा साथ एककरे, पुनः अव्यक्त प्रपंचसहित अव्यक्तज्ञान अरु बुद्धिकारण अरु रजोगुण इन सर्वका समुच्चयरूप स्वमावस्था को, क्योंकि स्वप्नका प्रपंच सूक्ष्महोनेसे अव्यक्तहै, अरु तिसकार- जोगुणहै वुद्धि तिसका कर्ता है, तातेअव्यक्त प्रपंचसहित अव्य- क्तज्ञान रजोगुण अरु बुद्धिकारण, इन तीनोंके संघातरूप स्वनाव- स्था द्वितीय पादको दूसरी उकारमात्रा साथएककरे, अर्थात् स. क्ष्मप्रपंचको उकार मात्रारूप जाने, अरु ज्ञेयज्ञान, तमोगुण, अरु अहंकार कारण, इनतीनोंका संघातरूप पुसुप्त्यवस्थारूपपादको सीसरी मकारमात्रा साथ एककरे । इसकारण तीनों पादोंको विभागसे विचारके मात्राओंकेसाथ एककरके एक परब्रह्म सर्वा- धिष्ठान अतर परमात्मा का प्रतीक जो अंकार तिसकी उपासना करे तब तिसउगसन विचाररूप आलम्बनके प्रभावसे उपासक मुमुक्षु ॐकारके लक्ष्य सर्वके अधिष्ठान आश्रयअक्षर परमात्मरूप परमपदको प्राप्तहोताहै ॥ इति द्वितीय कपिलदेव सिद्धान्त २॥ अर्थ तृतीय अपान्तरतममुनि सिद्धान्त ३॥ हे सौम्य ! अपान्तरतम मुनि कहते हैं कि जो जिज्ञासु पुरुप ॐकार ब्रह्मको निमुख, तीन देवता, तीन प्रयोजन, इन नव नाम- रूपकरके सुशोभितहै,यथार्थ जानके, तिसकी सम्यक्प्रकार उपा- सना करता है सो परमपदको प्राप्तहोता है । अब इसका अर्थ सुनो। तीन जो अग्नि हैं सोई तीन मुख हैं, तहां एक गाह्मपत्य नाम अग्निहै, दूसरा दक्षिणाग्निहै, अरु तीसरा आहवनीय नाम अग्निहै। तहां गृहस्थाश्रमका जोमहानस (रसोईके स्थान)विये जोअग्निहे कि जिसफरके पाक सिद्ध होताहै, तिस अग्निको गाह्म- ४२ मांडूक्योपनिषद् । पत्य नामसे कहते हैं , अरु जिस अग्निविषे अग्निहोत्र होता है तिसको दक्षिणाऽग्नि कहते हैं । अवइसका भेदसुनो जिसदिनइन ब्राह्मणादि वर्णजयीके पुरुषोंका यज्ञोपवीत संस्कार होताहै उस दिवा जो वेदोक्त मंत्रोंसे अग्निस्थापित होताहै तिसका नाम दक्षिणाऽग्निहै, तिसविषे प्रातःकाल अरु सायंकाल दोनों कालों धिषे वेदोक मनोरो नित्य आहुति देना,इसप्रकार अग्निहोत्रहोता हे तिससोवा जिसत्रिपे वशीकरणादिप्रयोगार्थ हवन होताहै ति- सैको दक्षिणाऽग्नि नामसे कहते हैं, अरु जिस अग्निविषे यज्ञादि होतेहैं अरु जिसकी आराधनासे सर्व मनोरथ सिद्ध होते हैं तिस अग्निको आहवनीय नामसे कहते हैं । इसप्रकार जो उक्त तीन अग्निहें तिसको त्रिमुख कहते हैं । अरु , बान्मा, विष्णु, रुद्र, यह तीन देवताहें । अरु धर्म अर्थ काम, यह तीन प्रयोजनहें ॥ अव पुनः श्रवणकरो तीनजो अग्नि कही हैं सो जगत्के उत्पत्ति पाल- नसंहारका हेतु (कारण)हे, तहां यज्ञाद्भवतिपर्जन्यो।इत्यादि प्रमाणले आहवनीय अग्निगें यज्ञाहुतिद्वारा मेघ होतेहैं मेघौद्वारा घहोती है वढारा अन्नहोताद अन्नद्वारा प्रजाहोती हे,तातेआ- हवनीय नामवाला अग्नि जगदुत्पत्तिका कारण है । अरु गायप. स्थाग्निजो (पाकशाला)का अग्निहे सो अन्तरबाराका अन्न परि- पाक करताहे, ताते सो जगत्फे पालन (स्थिति)या हेनु: । अरु जो अग्निहोत्रशा अग्नि हे तिस विपे अग्निहोत्रकर्ता यजमानके शरीरपातोत्तर उसके शरीरकादाहहोताहे,नात दक्षिणाऽग्नि जग- तुको संहारका कारणहै, अतएव उत्तप्रकारके तीनों अग्नि उक्त प्रकार जगत्के उत्पत्ति पालन संहारका कारणहें । अम या सर्व जगत्व निर्वाहक ईसरहें, एतदर्थ उनसे त्रिमुग्नकरके कहते हैं। अरु ब्रह्मा विष्णु म्द्र, यह जो तीन देवताह सोभी जगतकी उत्प- तिपालन संहारका हेतु है, तहां ब्रह्मा जगत्को उत्पन्न करता है, अरु विपण जगत्का पालनकरताह, अरु रुद्र जगतका संहारकर- ताहे, ताते उक्त तीनों देवताभी जगत्की उत्पत्ति स्थिति संहार - . , - संग्रह प्रकरण। ३३१ का कारण होने से जगत्के निर्वाहक ईश्वरहें । अरुधर्म अर्थ काम यह जो तीन प्रयोजनहें सोभी जगत् के प्रवर्तक हेतु हैं, तातेसर्व जगत् ॐकारका वाच्यहोने से ॐकाररूपहै अरु जगतका वाचक अंकारही नामनामी की एक्ता से जगतरूप से लुशोभित है अरु ॐकारहीजीवईश्वर ब्रह्मरूप है,अर्थात् कारकालच्य प्रत्यगात्मा अकारमात्रा स्थूल प्रपञ्च जादवस्थारूप उपाधिका अभिमानी हुआ विश्व जीवरूपहै, अरु उकारमात्रा सूक्ष्मणपश्च स्वभावस्था रूप उपाधि साथ मिल तिसका अभिमानी हुआ तेजस स्वसका कल्पक ईश्वरहै, अरु सकारमात्रा जाग्रत् स्वम स्थूल सूक्ष्म, का कारण सुपुप्त्यवस्थाका अभिमानी मायाविशिष्ट सर्वका कारण होने से ब्रह्म है अतएव जीव ईश्वर ब्रह्म, यह तीनों रूपसे सो- पाधि हुआ अंकार का लक्ष्य प्रत्यगारमाही सुशोभित है । इस प्रकार यथार्थ जानके जो ॐकारोपासना करते हैं तो मोक्ष को प्राप्त होते हैं। इसप्रकार अपान्तर मुनि कहते हैं ॥ हे सौम्य ! अब इसका विचार श्रवण करो, यहां जो,तीन अग्नि,तीन देवता, तीन प्रयोजन, कहे हैं तहां जगदुत्पत्तिका कारण जे आहवनीय अग्नि अरु ब्रह्मादेवता अरु धर्म; इन तीनों को जाग्रदवस्था स्थूलभोग विश्वाभिमानी, इसस्थूल प्रथम पाद साथ अभेदकर पश्चात् उस प्रथमपादको अकार मात्रासाथ एक विचार उस को अकार मात्रारूप जाने । अरु दूसरा जो जगत् की स्थितिका हेतु जो, गाद्यपत्य अग्नि, विष्णदेवता, अरु अर्थ, इनतीनों को स्वप्ना- वस्था सूक्ष्मभोग तेजसाभिमानी, इस सूक्ष्म द्वितीय पाद साथ एक कर पश्चात् उस द्वितीय पादको द्वितीय उकार मात्रासाथ अभेदकर उसको उकारमात्रा रूप जाने अरु तृतीय जो दक्षिणा- ऽग्नि, रुद्रदेवता, अरु काम, इनतीनों को सुपुप्त्यवस्था आनन्द भोग अरु प्राज्ञाभिमानी, इसकारण तृतीयपाद साथ अभेद विचार पुनः तिस तृतीयपाद को तृतीय मकार मानासाथ एक फर तिसको मकार मात्रारुप जाने।इसप्रकार उक्त तीनों अग्नि H , मांडूक्योपनिषद् । देवता प्रयोजन को विभाग से अकारादि तीनों मात्रा साथ एक कर प्रपञ्च रूपनामी अरु अंकार नाम इनको अभेद जानके जो ॐकारकी उपासना करताहै, अर्थात् ॐकार के जप अरु पादों के भेद विचार उपासनरूप आलम्बनकरके जो तिसके अधिष्ठान अक्षर चैतन्य आत्मा को सम्यक् प्रकार जानताहै सो उपासक परमपदको प्राप्तहोताहै ॥ इति अपान्तरतम मुनिका सिद्धान्त३॥ अथ चतुर्थ सनत्कुमार सिद्धान्त ४॥ हे सौम्य! सनकुमार सिद्धान्तवाले पुरुप अंकारकी उपासना इस प्रकार करते कहते हैं कि जो जिज्ञासु पुरुप . तीनकाल, तीनलिंग, तीनसंज्ञा, यह नवनाम रूपवाला जानके कारकी उपासना करताहै, सोमोक्षको प्राप्तहोताहै। अब इसकाअर्थ भेद श्रवणकरो तीनकाल उसको कहते हैं .जो भूत, भविष्यत, वर्त्त- मानरूप कालहै । तहां भतकल उसको कहते हैं जो पूर्व व्यती- तहुआ, अरु वर्तमानकाल उसको कहते हैं जो वर्तमान है, अरु भविष्यत्काल उसको कहते हैं जो आगे आवना है, अय इसको पुनः श्रवण करो । हे सौम्य ! यह जो युग वर्तता हे तिसके पूर्व जो युग व्यतीत हुआ सो अरु जो युग अब वर्तमान है सो वर्तमानकाल है अरु जो युग आगे आवना है सो भविष्यत्काल हे । इसही प्रकार इस वर्तमान युगके आवान्तर जो वर्ष व्यतीत हुये सो भूतकाल हे, अरु जो वर्प वर्तता है सो वर्तमानकाल है, अरु जो वर्ष अग्रिम आवना हे सो भविष्यत्काल है, तेसेही एक वर्ष के आवान्तर जो मास व्यतीत हुये तिनको भूतकाल कहते है, अरु जो मास वर्तता है तिसको वर्तमानकाल कहते हैं, अरु जो मास अग्रिम आवने हैं तिनको भविष्यत्काल कहते हैं ऐसेही एक मासके आपान्तर जो दिवस व्यतीतहुये तिनकी भूतकाल संज्ञा है, अरु जो दिवस वर्तता हे तिसकीवर्त; भूतकाल कहिये है, . 'संग्रह प्रकरण। ३३३ मान संज्ञा है, अरु जो दिवस अग्रिम आबने हैं तिनकी भविष्य- त्काल संज्ञा है. इसही प्रकार एक वर्तमान दिवसमें जो प्रहर व्यतीतहुआ तिसकी भूतकाल संज्ञा है, अरु जो प्रहर वर्त्तताहे तिसकी वर्तमान संज्ञा है, अरु जो प्रहर आगे आवना हे तिस- की भविष्यत् संज्ञाहै । अरु तैसेही एकप्रहरके आवान्तर जो घड़ी व्यतीत हुई सो भूतकाल हुआ अरु जो घड़ी वर्त्तती है सोवत- मान है अरु जो घड़ी आगे आगन्तुक (आवनेवाली) है तिस- को भविष्यत् जानो। इसप्रकार परार्द्ध से लेके घड़ी निमेषकला काठा परमाणु पर्यन्त यावत् कालावयवहैं सो सर्व पूर्वपूर्व के आ- वान्तर होतसन्ते भूत वर्तमान अरु भविष्यत् भावकरके युक्तही हैं। अरु सर्वनाम रूपात्मक पदार्थों को अपने स्वभावसे अन्य- था करना यह कालका लक्षण है जैसे आम्रका फल प्रथम- अतिलघु अरु कसाइला होताहै पश्चात् कुछ वड़ा अरु खट्टाहोने लगताहै पुनः वड़ाहोके पूर्णखट्टाहोताहै पुनःशनैःशनैः मधुरहोता हे पुनः उत्तर सड़के नष्ट होजाता है सो यह सर्वकाल का किया होता है, ताते यावत् नामरूप क्रियावान् वस्तु हे तिनको एक रस न रहनेदेना यह कालका स्वरूप स्वभाव है, अरु जो वि- भाग रहित एकरस एककाल है सो किसी उपाधि की विशे- पता सेही भूत वर्तमान अरु भविष्यत् संज्ञाको पाय परार्द्ध से परमाणु पर्यन्त अति दीर्य अरु अतिअल्प संज्ञाको पावता है। हे सौम्य ! इस कहने करके यह सिद्धहुआ कि एकही काल की उपाधिके संबंधसे तीन संज्ञाहुई हैं, तैसेही एकही ॐकार (पर. मात्मा) की मायारूप उपाधि करके अनेक नामरूप संज्ञाहुई हैं, परन्तु वास्तवकरके निरुपाधि अक्षर ॐकार एकही है। इस प्रकार त्रिकालको जानना । अरु , स्त्री , पुरुष., नपुंसक यह तीन ॐकार के लिंगहें, अर्थात् एक अंकार अक्षर का वि- स्तार यावत् शब्दब्रह्म है सो अरु शब्दों के अर्थ पदार्थ ये सर्व उक्त तीनों लिंगों त्रिपेही वर्तते हैं। अरु तीन जो संधी कही हैं , ३३४ मांडूक्योपनिषद् । तहां एक पहिस्सन्धी है, दूसरी'सन्धसन्धी है,तीसरी क्रान्त स- न्धी है, सो यह तीन सन्धी हैं, सो यह : विश्व, तेजस, प्राज्ञ, रूपहें । हे सौम्य ! इस कहने से यह जानना कि एक कारही उक्तप्रकार तीन कालरूप,,तीन लिंगरूप, अरु तीन सन्धीरूप से सुशोभित है ताते सर्व कार रूपही है, तिससे इतर रंचकमात्र भी नहीं। इसप्रकार कार को जानके जो मुमुक्षपुरुष तिसकी उपासना करता है सो मोक्ष को प्राप्त होता है । हे सोग्य ! अब इसकी मात्राओं का क्षेपक विचार भी श्रवणकरो। भूतका. ल,स्त्रीलिंग, अरु पहिस्सन्धी,इन तीनोंकोजाग्रवस्था स्थूलभोग, विश्वाभिमानी, इस प्रथम पादसाथ एककर पुनः उस प्रथम पाद को प्रथम अकारमात्रा साथ एक विचारे। पश्चात् वर्तमानकाल पुरुषलिंग, अरु सन्धसन्धी, इनतीनोंको स्वप्नावस्था,घिरलभोग, तेजस अभिमानी, इस द्वितीयपाद साथ एककर पुनः उसद्धि- तीयपाद को द्वितीय उकारमात्रा साथ एकता विचारे । पुनः भविष्यत्काल नपुंसकलिंग, कान्तसन्धी , इनतीनों को सु- पुप्त्यवस्था, आनन्द भोग, प्राज्ञाभिमानी, इस तृतीयपाद साथ एककर पुनः उस तृतीयपादको मकार मात्रा साथ अभेद विचारे, अरु पुनः विचारे कि यह उक्तसर्व ॐकारही है अरु इस ॐकारका आश्रयअधिष्ठान अक्षर परमात्मा है, अरुतिसअक्षर परमात्माया प्रतीक अरु वाचक यह वर्णात्मक ॐकार है ताते इस परनमके प्रतीक कारकी उपासनारूप आलम्बन से उस सर्वाधिष्ठान परमात्म पदकी प्राप्तिहोती है, अरु यह प्रणवोपासना परमपद की प्रातिमें सर्वोत्तम मुख्य आलम्बन है । इसप्रकार विचार के नो समाहित चित्त शमदमवान् हुआ इस ॐकारकी उपासना फरता है, सो मुमुक्षुपुरुष को प्राप्त होताहे ॥ इति चतुर्थ सनत्कु- मार सिद्धान्तः ४॥ + ३३५ संग्रह प्रकरण । अथ पंचम ब्रह्मनिष्ठ सिद्धान्तः ५॥ 3 हे सौम्य ! ब्रह्मनिष्ठ सिद्धान्तवाले कहते है कि हम कारको तीनस्थान रूप, तीन पदरूप तीन प्रज्ञारूप, जानके उपासना करते हैं तहां, हृदय, कंठ, मूर्द्धा, यह तीन स्थान हैं, क्योकि अंकारउच्चारकरने से इन तीनों स्थानोविषे प्रकट होता है ताते यहतीन उसके स्थान है । अरु , जाग्रत्, स्वप्न, सुपुप्ति, यह तीन इसके पाद हैं । अर्थात् इस संघान विशिष्ट आत्मारूप ॐकार के उक्त तीनोंपाद उक्त तीनों स्थानों विपे क्रमशःवर्तते हैं, तहां मस्तक (नेत्र)विषे जायदवस्था, अरु कंठरूपस्थानविपे स्वप्नावस्था, अरु हृदयरूप स्थानविषे सुपुप्त्यवस्था, इस प्रकार उक्त तीनों स्थानोंविषे कमशःतीनोंपाद वर्तते है, अरु वहिःप्रज्ञा, अन्तःप्रज्ञा अरु धनप्रज्ञा, यह तीन इसकी प्रज्ञा है । अर्थात् नेत्रस्थान जायदवस्था विपे वाडके घटपटादि पदार्थों को विषय करनेवाली जो पूज्ञा (बुद्धि) तिराको वाह्यपूज्ञा कहते है । अरु कण्ठस्थान स्वमावस्था विपे स्थानके पदार्थों को विषय करनेवाली जो पूज्ञा तिसको अन्तःपज्ञा कहते हैं । अरु हृदयस्थान सुपुप्त्य- वस्थाविषे सर्व विशेष प्रपंच के अभाव से कारण अविद्या विषे रालय हुई जो प्रज्ञा तिसको घनशज्ञा कहते है, अरु इन तीनों प्रकारकी प्रज्ञाके सम्बन्धले तद्विशिष्ट चिदाभास को बाह्यनज्ञ, अन्तःप्रज्ञ धनप्रज्ञ इसमकार तीनों प्रज्ञावाला कहते हैं। अरु "यद्भूतं भवद्भविष्यदिति सर्व कारएव ? इत्यादिश्रुति प्रमाण से .जो कुछ होगया, अरु जो कुछहे, अरु जो कुछ होगा, सो सर्व अकारही है । अतएर तीनस्थान रूप भी अरु तीन पद रूप भी अरु तीन प्रज्ञारूप भी, एक ऊंकारही है, अरु इसही करके इस ॐकारको सर्वव्यापी भी कहते है । अथवा बहिःप्रज्ञ जो विभुहे सो विश्वरूप हे, अरु अन्तःप्रज्ञ तैजसरूप है, अरु धनप्रज्ञ प्राज्ञ- रूप है, ताते विस तैजस प्राज्ञ, इन तीन प्रकारहोय के सर्व ३३६ मांडूक्योपनिषद् । देहोविपे एक कारही स्थितहै । तहाँ बाह्य जो स्थूल वैश्वानर नाम प्रपंच है तिस वाह्यका भोका विश्व है । अरु अन्तर सूक्ष्म प्रकृति (स्वप्नके पदार्थ)का भोक्ता तैजसहै । अरु कारण आनन्द का भोक्ता प्राक्ष है । ताते जो इन तीन प्रकार के भोग्य भोक्ताको जो जानता है सो जाननेवाला सर्यका साक्षी मुक्तरूप है । अरु जव सात्त्विकी प्ररुतिहोती है तब यह जीव (चेतन्यपुरुप)ब्रह्माहोके स्थूल प्रपंचको रचता है अर्थात् जाग्रत् जगत् (जैसे के तेसे पदार्थ) दृष्ट आवते हैं । अरु जब रजोगुणात्मक प्रकृतिहोती हे तय यह जीव तेजसभार को प्राप्तहुआ अन्तर प्रकृत्ति स्वरूप सूक्ष्म जग- दको रचता है । अरु जय तमोगुणात्मक प्रकृति होती है तब स्थल सूक्ष्मअन्तरघाह्य सर्पराअभाचार सुषुप्तिम्धानविपे प्रारुपटुआ आनन्दको भोक्ता है। अतएर गोउत्प्रकार के भोग्य भोताम्यान इनका जाननेवाला चनुर्ध सर्पका साक्षी आत्मामो सौ से असंग हुआ शुर पुन मुक्तम्बमा । अरसा सर्व संघात साप मिलाहुआ भी निमके अम तिनके धर्म धर्म भागारिकों मे लिपायमान होता नीताने गदा शुर, नाते जो, नीनस्थान, तीनपद, तीनप्रज्ञा, इन ननामग्प करके मनोमिता मो एकअक्षर अंबारदी है। अग मो अक्षर अंगार से जमर्पया तैसे, सर्व जगत्का पारण सन्तजनों ने वर्णनरिया, अमर चिपे भी कहा कि अगर अक्षाहीमाया परके गांपो उपर करताहे असे मसम्पल या अपरामि अपने उपरताप समार करके नागदि मंगानदीवो उनका उपE से, अर सो अक्षा नाममायने मे मांगाशाना सोई धार का लक्ष्य सामान परप परमार पारा परम पुग्प परमात्मा आदि नामों से कहा जाता है। मानो पर. मात्मा समाया विशिष्ट मामा मरो उत्पन्न वा अरु मोईजीर (चिदाभार) रुपमा मामा मात्र विषेप्रोगार नाहना गांश मामप्रसार जी संग्रह प्रकरण। ३३७ एकही अक्षर(अविनाशी अजन्माॐकारकर्ता भोका अरु साक्षी रूप से सुशोभित हैं, परन्तु सो महासूक्ष्म अविषय होने से अति दुर्विज्ञेय है, ताते जो जिज्ञासु पुरुप तिसपरम अक्षर पर- मात्माकी तिसके प्रतीक, वाचक त्रिमात्रिक वर्गात्मक कार रूप आलम्बन द्वारा यथोक्तरीत्या उपासना करताहै सो मोक्षको प्राप्तहोताहे॥ हे सौम्य ! अब इसका क्षेपक विचारभी श्रवणकरो। प्रथम कहा जो, तीनस्थान, तीनपद, तीनप्रज्ञा, तिनमें से प्रथम मूर्द्धास्थान, जायदवस्थासाभिमानी पाद, अरु पहिःप्रज्ञा इन तीनों को प्रथम अकारमात्रा साथ एककरे। पश्चात् कंठ स्थान, स्वप्नावस्था साभिमानी रूप पाद, अरु अन्तःप्रज्ञा, इन तीनों को द्वितीय उकारमात्रा साथएफकरे । तिसके पश्चात् हृदय स्थान, सुषुप्तिअवस्था साभिमानी रूपपाद, अरु धनप्रज्ञा, इनती- नोंको तृतीय मकारमात्रा साथ एककरे । इसप्रकार तीन स्थान, तीनपद, तीनप्रज्ञा, इनकोक्रमशः अकार उकार मकार, इनतीनों मात्रासाथ एककरके पश्चात् इनसर्व वाच्यको लक्षरूप परमात्मा विषे अध्यस्थ जानइनका असद्भावसेबाधकर एक सस्यरूप सर्वा- धिष्ठान चैतन्य आत्माकी अहम उपासना करनेवाला मोक्षको प्राप्तहोताहै। परन्तु तिसको निर्विशेष महासूक्ष्म होनेसे "विना आलम्बनके तिसकी उपासना करने को कोई समर्थ नहीं। ताते तिसअक्षरपरमात्माके प्रतकिवाचक वर्णात्मक त्रिमात्रिक ॐकार अक्षरके जप अरु अर्थकी भावना विचाररूप उपासनाके आलम्बनसे तिसके लक्ष अक्षर परमात्माकी उपासना करता है सो मुमुक्षु मोक्षको प्राप्तहोताहै ॥ इति ब्रह्मनिष्ठ सिद्धान्त ५॥ अथ षष्ठपशुपतिसिद्धान्त ६॥ हे सौम्य ! पशुपति (शिवजी) के शिद्धान्तके मतावलम्बीपुरुष ऐसा कहते हैं कि जो विभु कार नवनाम रूपसे स्थितहे तिसकी इम उपासना करते हैं। तहां तीन अवस्थारूप, तीन भोग्यरूप, 1 मांडूक्योपनिषद् । तीन भोलारूप, इसप्रकार नवनामरूपकरकेएक ॐकारहीमुशो- भितहे । तहां प्रथम तीन अवस्थाको श्रवणकरो. प्रथम शान्त, द्वितीय घोर, तृतीय मूढ़, यहतीन अवस्था है। सो.जागून , सन, सुपुप्ति, कोभी , शान्त, घोर, मूढ़,इन नामों से कहतेहैं। अरु इन जायदादि प्रत्येक अवस्थाविषे यहशान्त घोर अरु मढ़, यह तीनों अवस्था वर्तनी हैं। तहां जाग्रत् अवस्था जो सत्वगुणात्मक है तिमविये चित्त शान्तरूप होताहै, अरु स्वप्नावस्था जो रजोगुणा- त्माहे तिसबिपे चित्त घोररूप होता है, अरु सुपुप्तिअवस्था जो तमोगुणात्मकहे तिसविपे चित्त मूदरूप होताहै। अब इस प्रत्येक अवस्थाके अवान्तर भेदको भी श्रवणकरो । जाग्रधिपे जोकुछ पदार्थहे सो ज्योंकायों (जैसेकातैसा)भासताहै तहांजो चित्तकी अवस्थाहे सो शान्तावस्थाहै, अरु जाग्रत् विपे जो विपर्यय भास. ताहे जैसेहे तोरज्जु अरु भासताहे सर्प, तहांजो चित्तकी अवस्था हे तिनको घोर अवस्था कहते हैं, अरु जाग्रत् विपे सुपुप्तिवत् कुछ भी नहीं भासता तहांजो चित्तकी अवस्था हे तिसका नाम मुद्र अवस्था हे । तेमही समापस्थानिपे जो पदार्थ म्फुरण आहे सो जमा हुआहे तेसाही भामना है तहां चित्तावस्थाका नाम शान्त अवस्थाह,अरु समविपेजो औरणाऔरही भासताहे,जसे स्फुरण हुआ हाथी मो भासनेलगा पक्षी, ऐसी जो मन में चितापस्था) है तिमका नारा घोर अवस्थाह, अर समरिषे जो पदार्थ स्फुरण सुशाद. सो भासता नहीं (जायन्ट्टये म्मरणमें आपनानहीं) नहीं जो चित्तको अवस्थाह निमका नाम मढ़ अयम्धा कहते हैं । अरु मुपुतिननस्थानिपे वित्त लीनहुआहे, निमसेलायतट्टये कहना है में बड़े नग्गने सोगाथा,वो जो मुपत्ति में चित्तकी नपाम्या सो शान्न अवम्धाहै । अग जो मपत्तिने जाग्रतये कहना कि मुकको अस्थाम्न निद्राआई मो मधुमिमें विनरी घोर अपम्या है, जो मपनिमे जायन् दृा कहना है कि में ऐमा मेनुप मोगा किमोमीनानंन रही. ऐनी मो मतिम चिनारस्या है {संग्रह प्रकरण । ३३६ तिसका नाम सुषुप्ति मूढावस्थाहै । हे सौम्य ! अब इन तीनोंको औरप्रकारभी श्रवणकरो । जाग्रविषे जो चित्तको सुख विश्राम होता है तहां चित्तावस्था का नाम शान्तावस्था है, अरु जागत् विषे जो चित्तको दुःख से विश्रामहोता है तिस चित्तावस्थाका नाम घोर अवस्था है, अरु जाग्रत् विषे जो मूछोदि अवस्था है तिसका नाम मूढ़ अवस्थाहै, अरु जागत् विषे जो दैवी सम्पदा शास्त्र प्रमाण यज्ञ दान अध्ययन जप पाठ पूजासेलेके जो सात्विक कर्म व्यवहार, तिनविषेचित्तकी प्रवृत्ति जिस अवस्थाविपे होती हे तिसकानामशान्ताअवस्थाहै,अरुजाप्रविषेजोव्यवहारादिक राजसी कर्म है तिप्त विषे जब चित्तप्रवृत्त होता है तिस चित्ता. वस्थाका नाम घोर अवस्थाहै, अरु जाग्रत् विषे जो हिंसादि त- मोगुणात्मक कर्म हे तिसबिषे प्रवृत्त होने में जो चित्तावस्थाहै तिज का नाम मूढ़ अवस्था कहते हैं ॥ हे प्रियदर्शन! तिमही पूफार स्वप्नमें जो सुखानुभव होता है चित्तको जिस अवस्था में तिस अ- वस्थाका नाम स्वप्न शान्त अवस्थाहै, अरु स्वभाविये जो चित्तको दु.खानुभव होता है जिस अवस्थामे तिस चित्तावस्था का नाम स्वप्न घोरावस्था है, अरु स्वप्न विषे जो चित्तकी मूर्छादि अचेत अवस्थाहै तिसका नाम स्वप्न मद्रावस्थाहै। इसही प्रकार सुपुति अवस्थाविपे सोयाहुआ पुरुप उठके कहताहै कि मैं सुखसे सोया मुझको शन्ति प्राप्त हुई ऐसी जो सुपुति चित्तावस्था तिसका नाम सुपुप्ति शान्तावस्थाहै, अरु सुपुप्तिसे उठके कहताहै कि आज मुझको दु.खले निद्राआई मुझको कुछ सुख भान न हुआ परन्तु निद्रा आगई ऐसे जे सुषुप्ति में दुःखके संस्कारयुक्त चित्तावस्था तिसका नाम सुषुप्ति घोर अवस्थाहै, अरु सुपातसे उठके कहता है कि में ऐसा सोया जो मुझको सुखदुःखमा कुछ भी भान न रहा ऐसी जोसुषुप्तिमें चित्तकी बेसुध अपस्थातिसकानाम सुप्ति मढ़ अवस्था कहते हैं । हे सौम्य ! अव एकप्रकार और भी श्रवण करो, इस जामवस्थामें यथार्थ अनुभवसे अपनेआप चिदानन्द मांडूक्योपनिषद् । आत्माविषे जोचित्तकी स्थिति तिप्त चित्तावस्थाकी अरु तिसकी प्राप्तिके अर्थ जो श्रवणादि साधनों विपे चित्तके प्रवृत्तवा स्थित होनेकी जो चित्तावस्था तिसकानाम क्रमसे उत्तम मध्यम शान्त अवस्थाहै,अरु विषयोंविषेजो चित्तकी स्थितिहोनी जिस अवस्था करके निस चित्तावस्था का नाम घोर अवस्था है, अरु देहादि अनात्म अभिमान करके रागद्देषादि आसुरीसम्पदाविपे जोचित्त की स्थिति तिस चित्तावस्थाका नाम मढ़ अवस्था कहते हैं, इस ही प्रकार स्वप्नविपे धर्मादिक सत्वगुणीसम्पदाविपे जो चित्तकी प्रवृत्तिहोनी जिसकरके तिस चित्तावस्था का नाम स्वम शान्ता- वस्था है, अरु स्वप्नमें जो विपयोंधिपे चित्तकी प्रवृत्तिहोनी जिस करके तिस अवस्था का नाम स्वप्न घोर अवस्थाहै, अरु स्वप्नविषे हिंसादिक आसुरी सम्पदा में चित्तका प्रवृत्त होनाहै जिस करके तिस चित्तावस्थाका नाम स्वप्न घोर अवस्थाहै, ॥अरु इसही प्र. कार सुपुति विपे जो ब्रह्मविचार के संस्कारलेके चित्तलय होताहे तिस चित्तावस्थाका नाम सुपुति शान्तावस्था है, अरु सुषुप्ति विपे जो विपयोंके संस्कार स्मृतिको लेके चित्तलय होताहै तिस चि. प्तावस्थाकानाम सुपुति घोरअवस्थाहे,अरु सुषुप्तिविपे जो देहादि अनात्माभिमान संस्कारको लेके चित्त लय होताहै तिस चित्ता- वस्थाका नाम सुपुप्ति मूढ़ अवस्थाहै ॥ ॥ हे सौम्य ! उक्तप्रकार कहा जो अवस्थाओं का स्वरूप भेदसो यह तीनों सूक्ष्म अवस्था ॐकारकीह। अब तीनप्रकारके जे भोग्य, निनोभी श्रवणकरो, अन्न, जल, अरु सोम (चन्द्रमा) यह तीनों भोग्य है, भोग्य कहिये भोगनेयोग्य वस्तुहे, अर्थात् जिसकरके ,तुष्टि, पुष्टि, अरु आनन्द होय तिसको भोग्य कहते हैं, तहां प्रत्यक्ष सर्व जीवोंको अन्न अ जलकरके पुष्टि, तुष्टि, अरु आनन्द होताहै ॥ हे सौम्य ! अद, धातुसे अन्न शब्द वनताहै अरु अद, धानु भक्षण विपेवर्तता हे तात जो भक्षण कियाजाय तिसको अन्न कहते हैं, अतएव जो जीव जिसको भक्षण करना है सो निसका अन्न है अम नि. .
: संग्रह प्रकरणं। सही से उसकी तुष्टि पुष्टि अरु आनन्द होता है, अरु जल सर्व जीवों को समान है। अरु चन्द्रमा करके ओषधी वनस्पति तुष्ट पुष्ट अरु आनन्दित होती हैं, ताते .अन्न, जल, अरु चन्द्रमा यह तीनोंकरके स्थावर जंगम सर्व तुष्ट, पुष्ट, अरु आनन्दित हो. तेहैं, एतदर्थ अन्न, जल, चन्द्रमा, यह तीनों भोग्यहैं ।। अरु अग्नि, वायु (प्राण) अरु सूर्य, यह तीन भोक्तारूप हैं। सो यह अनु. भत्र सर्वको प्रत्यक्षहै, देखोक्षुधापिपासा प्राणका धर्म है क्योंकि जहां प्राणहोता है तहांहीं क्षुधा पिपासाअरु भोगनेकी शक्तिहो. तीहै, ताते देहभोक्तान होयके प्राण भोक्ताहै। अरु अग्नि देवता भी प्रत्यक्ष भोक्ताहै, काष्ठादिकोंके सम्बन्धसे बाह्य हुतभुक्है,अरु प्राणरूप समिधके समन्धसे अन्तर हुतभुक् , अर्थात् भोजन किये अन्नका भोक्ताहै, ताते अग्निभीप्रत्यक्ष भोक्ताहै । अरु सूर्य भगवान्भी अपनी किरणों द्वारा सर्व रसजातिको प्रत्यक्ष भोक्ता है, ताते .प्राण, अग्नि, सूर्य, यह तीनोंहीं भोक्तारूपहें ॥अर्थात अग्निवास समष्टि वैश्वानररूपसे हविषादिकों को भोक्ता अरु अन्तर व्यष्टि वैश्वानररूपसे भोजन किये अन्नादिकों का भोक्ता है, अरु वायु बाह्य समष्टि सूत्रआत्मा रूपसे सर्वको अपने विष धारण करनेद्वारा भोक्ताहै, अरु व्यष्टि प्राणरूपसे देहादिकोंका धारण करनेरूपसे भोक्ताहै, अरु सूर्य वाह्य सूर्यरूपसे सर्वका प्रकाशक होनेसे समष्टिको भोक्ताहै, अरु अन्तर चक्षुरूपसे व्यष्टि का प्रकाशक भोक्ताहै, इसप्रकार समष्टिव्यष्टिविणे. अग्नि, वायु, सूर्य, यह तीनों भोक्ताहैं । इसप्रकार जो तीन अवस्था, तीन भोग्य, अरु तीनभोक्ता, इननव : नामरूप होके एक कारही सुशोभित है, तिप्तको यथार्थ जानके जो मुमुक्षु पुरुप उपासना करताहै सोमोक्षको प्राप्त होताहै।-हेसोभ्याअब उक्त तीनोंकी अकारादितीनोमात्राके साथ एकताका क्षेपक विचारभी श्रवण करो यहां जो तीनअवस्था, तीनभोग्य, तीनभोक्ता, कहे हें तहां शान्त अवस्था, अन्न भोग्य, अरु अग्नि भोक्ता, इन तीनोंको .
૨૪૨ मांडूक्योपनिषद् । प्रथम जाग्रत् अवस्था स्थूलभोग्य अरु वैश्वानरभोक्ता इसंप्रथम पादके साथ एकता विचारकरे । पश्चात् घोर अवस्था जल भो. ग्य, अरु प्राणभोक्ता, इन । तीनोंको . स्वप्नावस्था, विरलभोग्य तैजसभोक्तारूप द्वितीयपादके साथ एकंविचारकरे तिसकेपश्चात् मूढ़ अवस्था चन्द्रमा भोग्य, अरु सूर्य भोक्ता, इन तीनों को, सुषुप्ति अवस्था, आनन्द भोग्याप्राज्ञभोक्ता, इस तृतीयपाद साथ एक विचारकरे । तिसके पश्चात् उक्त तीनों पादोंको क्रमशः अकारादि'तीनों मात्रा ॐकेसाथ एकविचार सर्वको ॐकाररूप जानके एक कारकी उपासनाकरे तहाँ विचारे किं यह अंकार रूप अपरब्रह्मका जोलक्ष्य अक्षर परब्रह्महे तिसका यह वर्णात्मक अक्षर ॐकार प्रतीक अरु वाचक (नाम) है ताते इस त्रिमात्रिक ॐकाररुप श्रेष्ठ आलम्पनद्वार इसके अधिष्ठान अक्षर परब्रह्म कि जिसविये यह तीनों मात्रारूप जगत् रज्जम सर्पवत् अभ्यस्त है तिस परमात्मा परब्रह्मकी हम उपासना करते हैं । इसप्रकार जानकेजो मुमक्ष पारकी उपासना करता हे सो परमपदरूप मोक्षको प्राप्तहोताहै ।। इति पशुपतिसिद्धान्तः ६ ॥ अथ सप्तम विष्णुपञ्चरात्र सिद्धान्तः ७॥ हे ओम्य! अब सप्तम विष्णुपञ्चरात्र सिद्धान्तको श्रवणकरो, विष्णुपञ्चरात्रके सिद्धान्तबादी कहते हैं कि जो भार . नीन श्रात्मरूप हे , तीनस्वभावरूप है, तीन व्यूहरूप है, इसप्रकार ना : नामरूपसे सुशोभित हुआ हे निमकी हम उपासनाक- रते हैं, अरु और भी जो इम ॐकार की उपासना करता है तो मुमुक्षु मोक्षको प्राप्त होता है । अब इसका भेद अरणकरो, तही पल, वीर्य, तेज, यह तीन आत्मा हे , तहां जो देहविर्य सा. मर्थ्य है तिसका नाम यल है, अ जो इन्द्रियों की गफिनि सका नाम वीर्य कहते हैं, मग मन विपे जो उसमाह या उदार. तादि धर्म है तिसका नाम तेज कहते हैं, अधान देह से जो चेष्ठ . .
संग्रह प्रकरण। होती है सो सर्ववल कीहै,अरु चक्षुरादि ज्ञानेन्द्रियोंसे जो देखना सुनना सूंघना रसलेना मिलना आदिक क्रिया पञ्च विषयों का सेवन आदिक होता है सो सर्व वीर्य रूप है, अरु मन विषे जो उत्साह उदारतादिक हैं सो तेज है । सो यह बल वीर्य तेज तीन आत्मा हैं ॥ अरु ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, यहतीन स्वभाव हैं,तहां यह जो देह इन्द्रिय प्राण मन बुद्धि चित्त अहङ्कार मह; तत्त्व प्रकृतिआदिक अनात्मरूप हैं सो सर्व असत्य भ्रान्तिमात्र हैं, अरु इनका जो साक्षी आत्मा प्रत्यक् चैतन्य कूटस्थ अन्त- र्यामी है सोई सत्य सर्वका प्रकाशक परमात्मा में हों, माया से आदिलेकै जो प्रपञ्च हैं सो मेरी सत्ता के विष उपजते हैं स्थित होते हैं अभाव होते हैं जैसे समुद्र विपे तरंग उपजते हैं वर्तते हैं लयहोते हैं, तैसेही मेरे विपे जगत् है, मैं चैतन्यरूप समुद्रहीं मेरा एक अद्वैत अखण्ड सच्चिदानन्दरूप है, ऐसा.जो निश्चय सो ज्ञान है ॥ अरु अणिमासे आदिलेके जो अष्ट सिद्धि आदिक हैं सो ऐश्वर्य रूप हैं ॥ अरु जो अन्य किसी से न वनिआवे तिसको बनावना तिसका नाम शक्तिहे । सो यह ज्ञान ऐश्वर्य शक्ति, तीन स्वभावह ॥ अरु संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध यह तीन व्यूहहें।। अतएव तीनआत्मा, तीनस्वभाव,तीनव्यूह, यह नवनाम रूप करके एक अव्यय पुस्प ईश्वर ॐकारही है । ॐकार से इतर कुछभी वस्तु नहीं । ॐकारएत्रेदसर्वम् । अरुं ॐकार जो नाम है सो प्रकृतिका वाचक है ताते भी सर्व काररूपही है। अर्थात् जो कुछ स्थूल सूक्ष्ममूर्त अमूर्त कार्य कारणात्मक जगत है, अरु उत्पत्ति स्थिति संहार है सो सर्व ॐकार का लक्ष्य एक वासुदेवही है। तथाच वासदेवः सर्वमिति गीता अ०७ के श्लोकप्रमाण से, ताने एक अद्वैत वासुदेवसे इतर कुछ भी नहीं सर्वमिदमहंच वासुदेवः इसप्रकारकारकाल क्ष्य जोतर्यात्मा ब्रह्महे तिसकी जो ममुक्षु उपासना करते हैं सो मोक्ष को प्राप्त होतेहैं।-॥हे सौम्य! अब इसका क्षेपक विचार श्रवणकरो।प्रथम . मांडूक्योपनिषद् । कहे जे , तीन आत्मा, तीन स्वभाव, तीन व्यूह, तहां तिनमें से खल आत्मा, अरु ज्ञान स्वभाव, अरु संकर्षणव्यूह, इन तीनो को जाग्रत् स्थानादि रूप प्रथम पाद से एकताकरे, पश्चात वीय आत्मा , ऐश्वर्य स्वभाव, प्रद्युम्न व्यूह, इन तीनों की स्वप्नस्थानादि रूप द्वितीय पाद से एकताकरे, तिसके पश्चात् तेज आत्मा , शक्ति स्वभाव, अरु अनिरुद्ध व्यूह, इन तीनोंकी सुषुप्ति स्थानादि रूप तृतीय पाद से एकता करे। पुनः उनपादों की क्रमशः अकारादि तीनों मात्राओं के साथ अभेदता करके विचारे कि इन उक्त प्रकार की मात्रा जिस अधिष्ठान परमात्मा विषे कल्पित, अरु जो इन मात्रारूप प्रपञ्चका साक्षी प्रकाशक चैतन्य हे तिस भगवान् वासुदेव की हम इस वर्णात्मक त्रिमा. त्रिक काररूप तिसके प्रतीक वावकके आलम्बन से उपासना करते हैं इस प्रकार जानके जो ॐकारकी उपासना करता है सो वासुदेव पद को प्राप्त होताहै ॥ इति विष्णुपञ्चरात्रसप्तम सिद्धान्तः ७॥ हे सौम्य ! यह जो सातो सिद्धान्तियों के मतमे सर्व का उपास्य एक कार अक्षर कहा है सो परब मका वाचक नाम, होने से अरु नाम नामी की एकतामे ब्रह्मरूप है, अरु इसअक्षर वन की उपासना करके विगत रागादि दोप हुये योगी यती जो आस्म ज्ञानी हैं सो ॐकार प्रतीकके लक्ष्य सवाधिष्टान चैतन्य विपे समुद्र में नदीवत् अभेदता से प्रवेश करते हैं। हे प्रियदर्शन! यह जो ॐकार अक्षर है तिसका स्मरण अरु अर्थ विचार करत सन्ते इसके लक्ष्य श्रखण्ड सच्चिदानन्दचैतन्य आत्मा हे सोमें हो, क्योंकि इन जाग्रदादि अवस्थाओं का साक्षित्व मेरे विष पाया जाताहै अरु यहजाग्रदादिअवस्था मेरेआश्रयवर्तनीहेंतातइ- सका अधिष्ठानभी मेंही हों, अरु यहअवस्था परस्पर अरु अपने प्रकाशक साक्षीसे व्यभिचारको पावती है ताते असत्यहें अरु इन पायाजाताह ताते अव्यभिचारी N संग्रह प्रकरण। मैं एक सत्यरूपही अरु चैतन्य आनन्द स्वरूपएकहाँ तोते अब स्थादि सर्व 'उपाधि से रहित निरुपाधि सच्चिदानन्द लक्षणवान् आत्मा ब्रह्म मैंहीं। इसप्रकार परमात्मा के साथ आपको अभेद जानके एकहुये ज्ञानवान् परमात्म.पदरूप परमगति प्रसिहोते है। तहाँ जो त्रिमात्रिक प्रणव का जापिक उपासक अपने मरणसम अंकारका स्मरण करताहुआ, देहको त्यागता है.सो "अमित्येकाक्षरं वा यहिरनमामनुस्मरन, यः प्रयाति त्यज- न्देहं सयाति परमागतिम् । इत्यादि प्रमाणों से पर्रमगति को प्राप्तहोताहै । अरु जो अकारको एकमात्रारूपं जानके उपासना करता है सो देह त्यागके इस मनुष्य लोकको प्राप्तहोय धर्मा- चरण पूर्वक यहाँके भोगोंको भोगता है । अरु जो अकारको दी मात्रारूप जनि उपसिना करता है सो पितृलोक को प्रातहोय वहाँक भोगोंको भोग पुनः इसलोक विये आता है। अरु जो ॐकारको निमात्रारूप जानके उपासना करता है 'सो पुरुष देह त्यागानन्तर ब्रह्मलोक को प्राप्तहोता है वहाँ ब्रहाद्वारा . कारके लक्ष्यका उपदेशं पार्य ब्रह्मसाथ एकहुआ मोक्षहोता है। अरु जो वाचरूप त्रिमात्रि प्रणवोपासनाकर पुनः आचा- य॑के मुखसे तिसके लक्ष्य सच्चिदानन्द लक्षणवान् आत्माकों अपना आप आमवसे साक्षात् अनुभव करती है सो देहादि अनात्म अहंकारसे रहितहुआ ब्रह्मही होता है। ब्रह्मविद्रौव भवति । हे सौम्य यह जो सातो सिद्धान्तकारी के मतसे : कारकी मात्राके तिरसठ ६२भेदकहे है सो सर्व वाचकरूप त्रिमात्रिक ॐकारके सगण स्थल रूप हैं। अरु जो इनसेरहित ॐकार का लक्ष्य'चौसठवां रूप है 'सो केवल निर्गुणरूप है। केवलो निर्गणश्चा असे शास्त्रकारोंनेभी कहा कि जो विष्ण अक्षर है सो निरञ्जन, अर्थात विद्यारूपा श्यामतासे रहित परम शुद्ध, है परमशान्त आनन्द धन है। तथाच "निरञ्जन शान्तमुपेति दिव्यमा सो न स्थूल है सूक्ष्म है, न हूस है न ३४६ मांडूक्योपनिषद् । दीर्घ है , न प्लुतहै, न रक्तहै न पीतहै न श्वेत है न श्यामहे न. हरितहैं। इत्यादि सर्ववर्णरूपसे रहितहै सो न इन्द्रिया है न प्राण हैन मनहै, न चुद्धिहै न इनकाविषयहै , ताते सर्वविशेषतासेरहित निर्विशेषहै निरन्तरहै अवाहहै सर्वाधिष्ठान परमशान्तसत्तामात्र है, तिसविपे एक दो संज्ञा कोई नहीं सर्व संख्यासेरहित निरक्षर है अरु सम विषम भावसे रहित सदा अच्युतहै ज्योंका त्यों एक रस है ताते परम अक्षर है सो कैसा परम अक्षर-है जो अधोक्षत्र है अर्थात् शब्द ननिसे रहित है, अरु जो अक्षर परापश्यन्ति मध्यमा अरु बैखरी इनचारो बाचाके आश्रय होठ कंठ ताल नासिका, इत्यादि स्थानोंद्वारा प्रकटहोतेहें सो क्षररूप हैं वोहोतेही भूतसंज्ञा को प्राप्त होते हैं वा भविष्यत् में रहते हैं वर्तमान में उनका अभाव है ताते सो क्षररूपहैं, अरु जो होठ ताल कंठादि स्थानों से प्रकटहोतानहीं अरु सर्व का प्रकाशक साक्षी अधिष्ठान है सो सदा वर्तमानरूप अक्षर है स्वयंभू है . अर्थात् अपनेआप करके आपही सिद्ध है, ऐसा जो परम ॐकारहै सो अचिन्त्य सर्व प्रमाणों का अविषय होने से अप्रमेय नित्य है अचल है पूर्ण है परम शिवरूप है सनातन पुरुप है अरु सोई विष्णु का परम पद कहिये पावनेयोग्य, है तिसकी,प्राप्ति से पुनः संसार भ्रम होता नहीं, ताते सोई परमधामहै, सोई क्षराक्षरसे रहित उत्तम पुरुप परम अक्षरहै अर्थात् सर्व कार्य कारणसे रहित निराकार सर्वाधिष्टान परमात्मा सर्वका अपना आपप्रत्यक् आत्मा हे ति- सही के सम्यक् ज्ञानसे मोक्ष होताहे तिससे इतर मोक्षका मार्ग कोई भी विद्यमान नहीं तयाच नान्यः पथा विमुक्तये" नान्यः पन्याविद्यते अयनाया इत्यादि श्रुति प्रमाणसे। इति सप्तसिद्धान्तकारोंकेमतानुसारधारोपासन विचार समाप्तम् ॥
*- . संग्रह प्रकरण। ३४७ अथ अंकारस्य एकादिमांत्रोपासन विचार प्रारभ्यते।। हे सौम्य अब ॐकारके अन्य विद्वान उपासकों ने जिस २ प्रकार मात्राओंके भेदसे उपासना किया सोमी तुम्हारे प्रति संक्षेपमात्र कहताही तिसको भी श्रवणकरों हे प्रियदर्शनी वाक- ल्यऋषि के मतावलम्बी पुरुष अकार को एकमात्रा रूप जान के भजते हैं। अरु साल अरु काइत्थ, इन आचार्यों के मता- वलम्वी पुरुष ॐकार को 'दोमात्रा रूप जान के भजते हैं। अरूं. नारदऋषिके मतविषे अकारको ढाई २॥ मात्रारूप जानकैभजतें अरु मोडल किंवा मांडक्य ऋषिके मतविषे ॐकारको तीन मात्रारूप जानके भजतेहैं, अरु सप्त सिद्धान्ती आदि अन्यपि योंने भी ॐकारको तीनमात्रारूप जानकही भजन किया है. अरु पराशरादिकं जे अध्यात्म चिन्तक मुनि तिनके मतविपे अकार को चारमांत्रारूपं जानके उपासना करतेहैं। अरु भगान् वशिष्ठ ऋषिके मतविषेॐकार को साढ़ेचार मात्रारूप जानके उपा सना करतेहैं । अरु अन्य ऋषियोंने अन्य अन्य मात्रारूप से अकारका भजन कियाहै | अरु भगवान् याज्ञवल्क्यजीने ॐकार । अक्षर को अमात्रारूप भजन कियाहै। अतएव वेद शास्त्रद्वारा किंवा आचार्य वा अपने अनुभवद्वारा जैसा जिसने ॐकारका स्वरूपमात्रा जाना तसेही उसने उपासना किया है। अरु सर्व काही भजना सफलं है क्योंकि ॐकार ब्रह्मकी अनन्तमात्रा हैं तोते जिसने जैसा जान भजन किया है तिसने एक ॐकारही का भजनकियाहै एतदर्थ सर्वका भजन सफल है सो यह विशेष वाच्यरूप ॐकारका भजन, अरु जो लक्ष्यरूप निनिशेष कार ब्रह्महे सों वास्तवकरके सर्वमात्रांसे रहित अमांत्रिक हे उत्सबि मात्रारूपविशेषतानहीं। हेसौम्याइसॐकारके पर अरु अपर,वा समात्रिक अरु अमात्रिक, वा वान्यरूप अरु लक्ष्यरूप, इत्यादि (.
मा ३४८ मांडूक्योपनिषद् प्रकार दोरूपहें सो. प्रश्नोपनिषद्सम्बन्धी कारकी व्याख्या में कहआयेहैं । तहाँ एक सगुणरूप. है दूसरा निर्गुण रूप है, तहां सगुणतो समात्रिक शब्दमय वाच्यरूप ॐकार अक्षर ब्रह्महै'अरु दूसरा निर्गुण शब्दसे रहित अमात्रिक-लक्ष्यरूप परब्रह्महै। तहां अब सगुण-कार ब्रह्मकी मात्राओं के भेदसे ऋपियों ने जिस जिस प्रकार उपासना-किया-अरु कहा है तिसको भी संक्षेपमात्र श्रवणकरो -हे. सौम्य ! जो वाकल्यऋषि-हैं-कि जिनके मतविष ॐकार को एकमात्रारूप जानके उपासना करते हैं सो: इसप्रकार कहते हैं कि जितनाकुछ स्थल सूक्ष्म विराट-वपुहे सो, सर्व प्रकारका ही स्वरूप है तिससे इतर कुछ भी नहीं । अर्थात् अंकार- जो ईश्वर है सो दो प्रकारका है, तहां-एक सगुणरूप दूसरा निर्गुण: रूप, तिनके भजन करनेवाले अपने २ अधिकारानुसार भजन: करते हैं, तह-सगुण ॐकारके उपासक-जानते हैं कि इससगुण, रूपका अधिष्ठान (आश्रय) निर्गुणहै ताते यह अपने अधिष्टानसे; अष्टधक होनेसे यही अंकार बहा है इससे इतर निर्गुण नहीं, अरू. निगुण ब्रह्मके उपासक जानते हैं कि अंकार निर्गुण ब्रह्महै सो अ- पनी इच्छा शक्ति करके सगुणरूप हुआहे,ताते निर्गुणसे-इतरस. . गुण नहीं वोहीरूप हैं। इसप्रकार सगुण निर्गुणकी एकता होनेसे. एक आकार ब्रह्मही उभयप्रकारसे सुशोभितह, ताते उभयप्रकार के उपासक कल्याणको-प्राप्त होतेहै, अरु उस एकही अंकारनाम. का यह स्थूल सूक्ष्म कार्यकारणात्मक विराट्रात्मा उसका वपुहै: ताते ॐकार एकमात्रा रूपही हे, अतएव हम इस एकमात्रारूप: ॐकार की उपासना करते हैं। यह कार को एक मात्रारूपसे • जानके भजन करनेवाले ऋपियों का मत है १ ॥ हे सौम्य ! अध, साल अरु कइस्त आदिक जे कार की दो मात्रारूप जानके उपासना करनेवाले उपासक हैं तो इसप्रकार कहतेहैं कि अंकार- दो मात्रारूप है, तहां एक स्थलरूप कार्य, संग्रह प्रकरण- मात्राहै, अरु दूसरी सूक्ष्मरूप अव्याकृत कारण मात्राहै,इसप्रकार कार्य कारणरूप स्थूल सूक्ष्म दो मात्रा जिसकी:तिस ॐकार ब्रह्मकी-हम उपासना करते हैं। अथवा जो कार चैतन्य ब्रह्मः है,तिसकी दो मात्रा है, तहां एक: यह स्थूलरूप जागत् जगत्। अरु दूसरी सूक्ष्मरूप स्वप्न जगत, इन दोनों मानाओंकालक्ष्यरू प.साक्षी चैतन्य है कि जिसके आश्रय उक्त दोनों, मात्रा, अरुः वा आप मात्राओं से रहित अमात्रिकहै तिसकी हम इस समा, त्रिक कार के आलम्बनते उपासना करते हैं। यहाँ कार की दो मात्रारूपसे उपासना करनेवाले ऋपियों का मत है सार हे सौम्य! नारदऋषि आदिक जे-कारको दाई, २ ॥ मात्रा रूप जानके उपासना करते हैं सो इसप्रकार कहते हैं कि जोः अकार जाग्रतरूप जगत् है, अरु, उकार-स्वप्नरूप जगत् है: अरु मकार-सुपुतिरूप अर्धमात्रा है कि जिस विषेः जातः स्वम दोनों लीन होते है तातेही इसका नाम सुषुति-अर्द्धमात्रा, इसप्रकार: ढाई:२॥ मानारूप जगत् है वपु जिसका तिस अंकार ब्रह्मकी हम उपासना करते हैं । अथवाअकार स्थूलदेहाजायजगतसमेत प्रथम मात्रा, अरु उकार सूक्ष्म देह स्वरूप जगत् समेत द्वितीय: मात्रा-अरु अर्धमात्रा चैतन्य तत्त्व है सो सर्व का ज्ञाताहै तिसका ज्ञाता-कोई नहीं, अतएव उसका नाम अर्धमात्रा है। इसीप्रकार ढाई.२ ॥ मात्रारूप वपुःहै जिसका तिलकार-परवाकी हमः इस-ढाई मात्रावाले वान्यरूप अपरब्रह्म कार के आलस्बन से: उपासना करते हैं। यह ॐकारको दाई..२॥ मात्रारूप जानके, भजन करनेवाले उपासकोंका मत है २-11-4 हे सौम्य मोडलऋपि आदिक जे कारको तीन मात्रारूप: जानके उपासना करनेवाले उपासक हैं सो इसत्रकार कहते हैं? जो जाग्रत्, स्वप्ना सुपुति, यह तीनः अवस्था:अरू अकार उकार: मझार, यह तीन मात्रा, अरु ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र यह तीन देवता इनका-संघातरूप हे वपु जिसका, अरु जो. है इस स्थूल सूक्ष्म . in ३५० मांडूक्योपनिपद् । कारणरूप सर्व जगत् का आश्रय आधिष्ठान, अरु जिसविपे स्वरूपकरके मात्रादि उपाधि अध्यस्त (कल्पित) होने से कोई नहीं, तिस सर्वाधिष्ठान निर्विशेष लक्ष्यरूप ॐकार की हम उ.. पासना करते हैं। अरु ॐकार की तीन मात्रारूप से उपासना अनेक प्रकार से कही है, अरु सप्तसिद्धान्तकारोंने भी तीनमात्रा रूपसे कही है, यह ॐकार को तीन मात्रारूपं जानके भजनक- रनेवाले उपासकों का मत है ३॥ । हे सौम्य ! अव ॐकार को साढ़ेतीन ३ ॥ मात्रारूप जानके उपासना करनेवाले ऋषि इसप्रकार कहते हैं कि अकार, उकार, मकार, रूप,जायत्, स्वप्न, सुपुप्ति यह तीन मात्रा हैं अरु अर्ध मात्रारूप चैतन्य ब्रह्म है । अथवा कोई एक ऐसा कहते हैं कि प्रथम मात्रा अकार स्थूल जगत्, अरु दूसरी मात्रा उकार सूक्ष्म जगत् अरु तीसरी मात्रा जीव कला, अरु अर्धमात्रा सर्वाधि. छान चैतन्य परमपद रूप है कि जिसविपे जीनकला संयुक्त स्थूल सूक्ष्म सर्व मात्रा लीन होती हैं, अरु जिसविप मात्रा कोई नहीं ऐसा जो लक्ष्यरूप ॐकार है तिसकी हम समात्रिक ॐ. कारके आलम्पनसे उपासनाफरतेहैं। यह ॐकारको साढ़ेतीन ३॥ मात्रारूप जानके उपासना करनेवाले उपासकों का मत है ३ ॥ हे सौम्य! अव पराशरआदिक ऋपि जो कारको चारमात्रा रूपजानके उपासना करनेवाले, सो इसप्रकार कहते हैं कि प्रथम मात्रा अकाररूप स्थूलचिराट् पुरुप, अरु द्वितीयमात्रा उकाररूप सूक्ष्म हिरण्यगर्भ, अरु तृतीयमात्रा मकाररूप कारण अव्याकृत, अरु चतुर्थ विन्दुरूप चैतन्य पुरुप, कि जिस अधिष्ठानके आश्रय अध्यस्तरूपसे स्थूल सूक्ष्म कारण व्यष्टि समष्टि तीनों शरीररूप प्रपंचहै, सो साधार चैतन्य परमपदहे, अतएव अध्यस्तकीपृथ- कृसत्ताके अभावसे सर्व चैतन्यही, तातेहम ॐकारके लक्ष्यनि- बिशेप साविष्टान अमात्रिक ॐकारकी इस चारमात्रारूप स. मात्रिक कारके आलम्पनमे उपामना करते हैं । यह कारको .
. . संग्रह प्रकरण; चारमात्रारूपसे जानके उपासना करनेवालों का मत है : ४ ॥ हे सौम्य । वशिष्ठादिक ऋपि जो ॐकारको साढ़े चार ४॥ मात्रारूप जानके उपासना करते हैं सो इसप्रकार कहते हैं कि अक्रार प्रथममात्रा यहस्थूल जगत् है, अरु उकार दूसरीमात्रायह सूक्ष्म जगत् है, अरु मकार तृतीयमात्रा सुषुप्तिहै; अरु चतुर्थमात्रा. नादरूप परमशक्ति है, अरु अर्धमात्रा; चैतन्यपुरुपहै, कि जिसके आश्रय चारोमात्रा सिद्धहैं अरुवो आपमानासे रहितः अमात्रिक है, तिस लक्ष्यरूप ॐकारकी हम इस साढ़ेचार-मात्रात्मक वाच्य रूप ॐकारके आलम्बनसे.उपासना करते हैं। यह ॐकारकोसाढ़े, चारमात्रांरूपं जानके उपासनाकरनेवाले-उपासकोंका मत है.४॥ हे सौम्य ! कोई एक ऋषि इस कारको पाँचमात्रारूप वि. चारके भजनकरते हैं, सो ऐसा कहते हैं कि अकार अन्नमयकोश अरुं उकार प्राणमयकोश, अरु मकार-मनोमय कोश, अरु अर्ध मात्रा विज्ञानमयकोश, अरु विन्दुरूप आनन्दमय कोश है। यहउक्त पांचोमात्रा जिस चैतन्य अधिष्ठानके आश्रय अध्यस्तहैं, अरु जो.. इनमात्राओं से रहित पंचकोशातीत है, तिस लक्ष्यरूप कारकी उक्त समांत्रिक कारके आलम्वनसे -उपासना करते हैं। यह ॐकारको पाँचमात्रारूप.जानके उपासना करनेवाले उपासकों का मत है. ५/६॥ हे सौम्य- कोई एक ऋपि ॐकार को पटमात्रारूप जानके भजते हैं, सो ऐसा कहते हैं कि जो अकाररूप जासत् जगत है उकाररूप स्वप्न जगत् है, अरु मकाररूप सुषुप्तिहै, अरु अनहद शब्दसें आदिलेके जो वाचा, सो शब्दरूपा, चतुर्थमात्रा है, अरु विन्दुरूप. कारणप्रकृति पञ्चममात्राहै, अरु पाठरूप:साक्षी चैतन्य आत्मा है। ऐसाहै विशेप स्वरूप जिसका अरुआप अपने स्वरूप. से निर्विशेष हे तिस लक्ष्यरूप'अंकारकी हम सविशेषरूप वाचक ॐकार के आलम्बन से उपासना करते हैं । यह ॐकारको पाठ- मानारूप जानके उपासना करनेवालोंका मत है ६ ॥६
३५२.
मांडूक्योपनिषद् ।
हे सौम्य ! कोई एक आचार्य ॐकारको सप्तमात्रारूप जानः
के भजते होस ऐसा कहते हैं कि पृथिवी, अप, तेज, वायु
आकाश, यह भूतोंकी: शब्दादिरूप पश्चमात्री पञ्चतत्व अरु आहे-
कार अरु महत्तत्त्व यह सात मात्रा अरु अष्टम आप चैतन्यपुरुष
हैमतिसकी हम सप्तमात्रात्मक कारके आलंम्बन (आश्रय)
से उपासना करते हैं।यह ॐकारकों सप्तमात्रारूप जानके भजन
करनेवाले उपासकोंका मत है ७।१०।-
हे सौम्य इसप्रकार ३८, ४९,५२.६३, ६४, मात्रापर्यन्त
ॐकारकी उपासना करते हैं सो आचार्य ऐसाकहते हैं कि चावत्,
स्वर व्यअनादिक वर्णअक्षरहसोसर्व ॐकारकीमात्रा क्यों किसी
सवैकारण अकारसे फुरी है अरु स्फुरण होती है अतएवं सर्वमात्रा
अकारकाही है, इसही से सर्व जगत् ॐकार रूप है जिस किसी
पंदार्थ का नाम है सो सर्व उक्त मात्राओं के अन्तरगत है, अरु जे-
तने कुछ वर्णाक्षर हैं सो सर्व ॐकारकी मात्रा, ताते वात्मक
जो ॐकार अक्षर है सो सर्व नामोंके विप ओतप्रोतहै, एतदर्थ भी
ॐकार रूपही सर्व जगत् है, 'कारही. वाच्यरूप होयके इस
प्रकार सर्व नामों के मध्य आदि अन्त मध्य ओत प्रोत है अरूं
लक्ष्यरूप जो चैतन्य आत्मा है सो अस्ति भांति प्रियरूप करके
व्याप्त है ताते भी वाच्य वाचक सर्व ॐकारही है।
इति ॐकार की एक आदिमात्राओंकी उपासनविचार.
अथ अकारके अकारादिः दश नामोंका अर्थ
विचार प्रारभ्यते॥
ॐकार प्रणवं चैव सर्वव्यापिनमेवच । अनन्तञ्च
तथा तारं शुलं वैद्युत्तमेव च ॥ तूर्य हंस परब्रह्म इति
नामानि ,जानते। यह साई श्लोक है।
हे सौम्य!इसे ॐकार ईश्वरके दश नाम मुग्य है सो सर्व
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संग्रहप्रकरण सार्थ कहियोअर्थ संहिता, अरुजिज्ञासु करके जानने योग्य है, अतएवाअवइसके नामों के अर्थको भी संक्षेपमात्र श्रवणकरो ।। रथ प्रथम नाम अकार ANTIIK 12 SITE SHI सौम्या! प्रथम नाम ॐकारहै तिसकायहीअर्थ है कि जव शरीर-ग्रीवा अरु शिर, इनको सम.सीधेकर पद्मासन वैठ इन्द्रि- योंको विषयों से अरु:मतको संकल्लों से रोक हस्त्र दीर्घ प्लुत ध्वनिपूर्वक अंकारका यथास्थानसे उच्चारण करते हैं तव चरणा से लेके मस्तक पर्यन्त सव शरीरगत नाड़ियों को ऊँचाकरता है, अथवा प्राणायामकी रीति से इसका उच्चार करता है तब प्राण ब्रह्मरंध्र ऊंचे स्थानको प्राप्त होताहै, एतदर्थ इसका नाम प्रकार है। माअथवा जो योग क्रियाकी रीतिसे प्राणायाम द्वारा स्थान विशेप में ध्वनिको सांधके ॐकार को आन्तर्य उच्चारण करता है निसकेप्राण ब्रह्मरंध्रको प्राप्त होते हैं, अरु देहान्त समय उसके प्राण । तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति । इत्यादि प्रमाण से सुपुम्ना नाड़ी द्वारा मरेधसे निकल ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है, अतएवं इसका नाम अंकार है ॥ २॥ अथवा अंकारके दो अक्षर कहिये मात्रा, हैं तिनका अर्थ योग क्षेम (पालन अरु रक्षा) है अर्थात् जो पुरुष इस अंकार की उपासना करते हैं तिनकी रक्षा अरु पालनाकार करताहैअर्थ यह जो उपासक को वांचित पदार्थ को प्राप्तिकरदेता है.अरु प्राप्तकी रक्षा करता है, इसप्रकार अपने उपसिककायोग तैमकार करताहै । अर्थात् सकाम उपासकको संसारके भोग्यपदार्थ प्राप्तकरके पालन, अरु रक्षाकरताहै, अरु जो उसके निष्कामाजिज्ञासु उपांसकहें तिनकोप्राप्तहुई जो ज्ञान भू. मिकातिसक्रापालन(वृद्धि) अरुरक्षाकरताहै। अथवाअपनेउपा. संकजिज्ञासुकोजोकदापि ज्ञानभूमिकाअप्राप्य तोतिसकीप्राप्ति करदेताहेअरुजाज्ञानभूमिकाप्राप्त हैतोकानक्रोधादिआसुरीसम्प- दासे तिसकी रक्षकिरताहअतएवाईसकानीम ॐकारही अथवा 10 . ३५४ मांडूक्योपनिषद्। अंकारका अर्थ अंगीकारभीहैं, अर्थात् जो कोई ॐकारको सम्यक् प्रकार: भजन करनेवाला उपासकहै तिसके कहेहुये वर शापादिक वाक्य देवता आदिक सर्वही अंगीकार करते हैं., एतदर्थ इसका नाम ॐकार है॥१॥अथवा ॐकार का अर्थ ब्रह्म भी है क्योंकि जो इसकी समाहितचित्तसे सम्यक् प्रकार उपासना करते हैं तिनको अपने आप आत्मा ब्रह्म की अभेदता प्राप्त करता है, अर्थात उस उपासकको ब्रह्म आत्मा का अभेद ज्ञान होता है एतदर्थ भी इसको ॐकार कहते हैं । यह सर्वकार नामके अर्थ हैं। अथ द्वितीयनाम प्रणव २॥ हे सौम्य ! अव ॐकार के प्रणव नामका अर्थ श्रवण करों। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वणवेद, अरु ब्रह्मा आदिकं सर्व देवता ऋपि मुनि मनुष्य दैत्य आदिक जो हैं सो, सर्व तीन अ. क्षररूप हैं जो कार तिसको मन वाणी शरीरकरके प्रणाम करते हैं, ताते ॐकार का नाम प्रणव है। सवें वेदा यत्पद मामनन्ति " ॥२॥.... Patतृतीयनाम सर्वव्यापि ३ ॥ हे सौम्य ! अव ॐकार के तृतीय सर्वव्यापि नामका अर्थ श्रवणकरो। यह जो स्थूल सूक्ष्म स्थावर जंगम कार्य प्रारंणात्मक शरीर है, यावत् वेद स्मृति पुराण इतिहास-शास्त्रादिक विद्याहै; तिन,सर्व विपे,व्यापरहा है। अर्थात् उस सर्व यि नाना भेद भावकरके एक विष्णु ॐकारही को वर्णन किया है, ताते इस अंकार को सर्वव्यापि वर्णन किया है या कहते हैं। अथवा एक ॐकारही अनेक मात्रा होयके वेदादि सर्व विद्याविषे ओतप्रोत हैं, क्योंकि पावन आदि. यावत् स्वर व्यंजनात्मक मावा सो सर्व कारकाही विस्तारहे, ताते ॐकार सर्वव्यापि,हे॥२॥ अथवा जो अक्षर आरमा अस्ति भातिः प्रियरूपहोके स्थित, अ6 सोई ."
- F संग्रह प्रकरणी ३५५ ॐकारका वाच्यलक्ष्य है ताते भी ॐकार को सर्वव्यापि कहते हैं। शायह कारके तृतीय सर्वव्यापिनीमका अर्थह।। इति शा अथ चतुर्थनाम अनन्त । हेसौम्य! अब ॐकारके,चतुर्थ अनन्तनामका अर्थ श्रवणकरो जब जिज्ञासु इस अकारका सम्यक् प्रकार यथाविधि भजन कर रताहै तब.तिस अपने उपासकको अपने अनन्त ब्रह्मपदविणे, प्राप्तकरताहे, ताते ॐकारकानाम अनन्तहै ॥ १ ॥ अथवाइस कार ब्रह्मका देशकाल. वस्तुकरके अन्तपाया जाता नहीं, वायु अग्नि जल पृथिवी आदिकोंकी अपेक्षा आकाशका अन्तनहीं वाते सो अनन्तहै.उसहीके अन्तरगत वायु आदि तत्वोंका अन्त, होताहै, अतएव चारों तत्वों की भन्तताकी अपेक्षा आफाशकी. अनन्तता है, सो आकांशकी अनन्तता-अंकारके लक्ष सर्वाधि- छान आत्माके भरपूर अस्तित्वके ज्ञानहुये एक परमाणमात्र भी न रहके अपने अन्तको प्राप्तिहोती है, ताते अंकारका नाम अ- नन्तहै ॥२॥अथवा ॐकारके वांच्यनाम.रूपात्मक,जगत्काअंत, विना सर्वाधिष्ठान चैतन्यआत्मा साक्षात् ज्ञानके अन्य किसी. देवता दैत्य ऋषि मुनि आदिकों करके पायाजाता नहीं, एतदर्थ, भी ॐकारका नाम अनन्तहै ॥३॥ यह ॐकारके चतुर्थ अनन्त नाम का अर्थ है॥४॥ "; 7 अथ पंचम नाम तारकांअर्थ ५॥ हे सौम्य ! अव ॐकारका पंचमनाम जो तार है।तसकामा अर्थ श्रवणकरों सिर्व आध्यात्मिक,आधिभौतिकाआधिदैनि- क, दुःखहे, तहाँ काम क्रोध तृष्णा चिन्ता आदिकों के क्षोभसे जो अन्तःकरण बिषे दुःख होताहै तिसकानाम आध्यात्मिक दुःखहै, अरु ज्वरादिक रोग जन्य, अथवा सर्प सिंहादिकों के भय जन्य जे दुःख हैं तिनकानाम आधिभौतिक दुःख हैं। अरु ग्रहादि देव- ताओंके कोपजन्य जे दुःखहे तिनकानाम आधिदैविक दुिःखहे।
मांडूक्योपनिषद् । इत्यादि सर्व दुःखोंसे अपने उपासकको तारदेताहै एतदर्थ कारका नाम तारहै॥१॥अथवा यहजो नामरूप क्रियात्मकमहा, दुःखमय अपार संसार सागरहै ,तिसविपे जन्म-जरा मरण काम क्रोध लोभ मोहादिरूप चड़ेबड़े ग्राह मंकरादि, सर्वकोग्रासकरने वाले हैं, अरु तृष्णा कामना अभिलाषी इच्छा आदिक बड़ी २ शेषलोक से ब्रह्मलोक पर्यन्त उछलती सर्वको अपनेविपे आक- पणकर तृणवत अधो ऊर्ध्वको प्राप्तकरती तरंगें है,तिसविज्ञान संपा.तारूविद्यास रहित जे अज्ञानी जीवह सो पड़े मग्न होते हैं अरु दुःखपावते है पुकारते रोवते हाडूवे हाडूवै शब्दकरते हैं, अरु इस संसारसागरमें मग्नहोत जीव सो देवता आदिक बड़े श्रेष्ठ पूजनीय भजनीयहें तिनको अपनात्राण (रक्षा) समझके उनकी आश्रय लेते हैं, परन्तु उनको भी उक्त सागरमें मग्नहोते सुनते अरु जानते हैं तब उनकी ओर से भी निराश निराधारहुये जन्म जन्मान्तरपर्यंत दुःखही पावते हैं। ऐसा जो परमदुखमय असार अपार संसार महादुस्तर सागर, तिससागरसे अपने उपासकको यह कारतार देताहै, अतएव ॐकारकानाम तार है।।२।।अर्थात् गादि सर्व वेदोंकरके यहकारही तारक प्रख्यातप्रतिपायह, ताते जिन वर्णत्रयों के मनुष्यों को संस्कारपूर्वक वेदाध्ययनका अधिकारहै तिनको संसारदुःखकी सकारण निवृत्ति के अर्थ सा. त्तम तारक अंगारकी यथाशास्त्रविधि उपासनाकरना योग्य हैं। अरु जे वर्णत्रयीसे इतर वेदाध्ययनादिके अनधिकारी पुरुष हैं तिनको अपनेकल्याणार्थयथाविधि पुराणोक रामनामादि तारक • की उपासना कर्तव्ययोग्य है क्योंकि उनका कल्याण:उमीसे हे स्विधर्म विगुणश्रेयोयह ॐकारके पंचमनारनामकाअर्थ है ॥५॥ अथ पष्ठः नाम शुक्ल का अर्थ ६ ॥ हे सोन्य! अव अंकारके शुक्ल नामका अर्थश्रवण करो।वर्ण करके जो शुक्लहोय कहिये शुच होय,सो कहिये शुका अर्थात जो - r संग्रह प्रकरण सर्व मलसे रहित निर्मल शुद्ध होवे तिसका नाम शुक्ल कहते हैं तहां सर्वमलोंका कारण अविद्या है: तिसअविद्यारूप महामलसे रहित सदाशुद्धएक कारही है एतदर्थ कारकानाम शुक्ल है। शुद्धमपापविद्धम् । तदेवशुक्रत,मतदेवामृतमुच्यते इत्यादि अनेक श्रुतियों के प्रमाणसे॥१॥अथवा अंकार अपने उपासकको शुद्ध अपने लक्ष्य आत्मपद विषे प्राप्तकरता है ताते ॐकार का नामशुक्लहै॥२॥अथवा तीनप्रकारकेजें कायिकवाचिक मानसिक, पापहे तिनको नाशकरके अपने उपासकको शुद्ध करता है एते. र्थ:कारकानामशुक्ल है।॥३॥अथवा तीन प्रकारके जे कर्मरूपापाप हे तिन पापोंसे अपने भक्तों को शुद्ध करता है ताते ॐकार का नाम शुक्लहै॥सौम्यं ! अब इनतीनप्रकारके कर्मरूप पापोंको श्रवणकरोन प्रथम एफ.क्रियमाण कर्महै। दूसरा संचित कर्म है, तीसरा-प्रारब्धकर्म है। सो यह तीनप्रकारके कर्मरूप पाप तर्क समें वाणवत, अन्तःकरणरूप तर्कसविपे रहते हैं। सो कैसा है अन्तःकरणरूप, तर्कस जो साक्षी आत्माके आभास वा प्रति. बिम्ब करके युक्त है। अरू अविद्याका कार्य होने से अज्ञान अंश करकेभीयुक्त है,तिसअन्तःकरणरूप-तर्कसविषेतीनोंप्रकारकेकर्म रूप-बाणरहते हैं, अरु स्वतःअन्तःकरणजड़है.ताते विनाचैतन्या- भात अरु अज्ञानके कर्मधारने में समर्थनहीं, जब अन्तःकरण चै- तत्याभास अरु अज्ञानकरकेयुक्तहोताहे तवहीं कम्ौकोधारनेविषे समर्थ होता है। हे सौम्य अवअन्तःकरणका स्वरूप श्रवणकरोजो क्याहै।अरु अज्ञात क्या है, अरु चैतन्यक्याहै, अरु सो कम्मों को धारता कैसे है, सो सर्वश्रवणकरो जैसे मृत्तिका, अरु जल अरु आकाश, यहतीनों मिलते हैं तबघट उत्पन्न होय पदार्थों को धा. रता है तहां न तो केवल मृत्तिकाही पदार्थ को धारसक्ती है न केवल जलही पदार्थ को धारसक्ता है, अरु न केवल आकाशही पदार्थ को धारसक्ता है, जब मृत्तिका जल अरु आकाश तीनों मिलतेहँ तब घटरूपहोय पदार्थको धारते हैं, तसेही सत्वगुणरूप , मांडूक्योपनिषद् । मृत्तिका अरु अज्ञानरूप जल-अरु चैतन्यरूपं आकाशे यह तीनों मिलते हैं तंव अविद्याके सत्त्वगुण भागको परिणाम अन्तःकरणे होय तीनों प्रकारके कम्मौको धारता है सोभी प्राणरूप सत्रके आश्रय धारता है। ऐसा जोः अन्तःकरणरूप तर्कस है तिसविप कर्मरूपबाण रहते हैं, अथवा अन्तःकरणरूप मन्दिरहे तिसविषे तीन प्रकारके कर्मरूप अन्नकेदाने भरेहुये हैं, तहाँ व्यतीतहुये जे . अनेकजन्म तिनके कम्मों के सूक्ष्म संस्कार जे अन्तःकरण विर्षे संचित हैं तिनका नाम संचित कर्म है तिन कम्मों में से जो क-: मौंको अपना फल सुख दुःखादि भोगावना है अरु जिन को ने यह शरीर रचाहे तिनकानाम प्रारब्धकर्म है। अरुजो वर्तमान शरीरकरके अहंकारपूर्वककर्म कियेजाते हैं निनकानाम क्रियमाण कर्म है । अरु सो क्रियमाण कर्मही तीनसंज्ञाको प्राप्तहुआ है। तहों कर्मकरने के समय उसको क्रियमाण कहते हैं, असें करने । केपश्चात् उसही कर्मकी संचितसंज्ञा होतीहै । अरु जब उसके फलभोगतासमय आवताहे तव उस कर्मकी प्रारब्धसंज्ञा होती है। जैसे एकहीकालभूतभविष्यत् अरु वर्तमान तीनसंज्ञाकोप्राप्त हुआहे, तैसेही एक नियमाण कर्म क्रियमाण संचित अपार- ब्ध, इन तीनसंज्ञाको प्रातहुआ है । तिसविपे जे प्रारब्धम्म है तिसकाफल ,जाति, आयुप्य, अरुभोग, इन तीनरुपसे प्राप्त होता, है। तहां जाति कहिये. देर दैत्य मनुष्य पशु पक्षी वृक्षआदिक तिनधिपेभी. उत्तम, मध्यम, कनिष्ट, अरु अधमा सो सर्पजीवों को अपने अपने प्रारब्धका फलहे । अम आयुप्य जोह मो लव निमेपादियों से लेके पराग्य ब्रह्माके आयपर्यन्न न्यूनाधिक्य सो सर्व प्रारब्ध कर्मफे फल हैं। अझ भोग जाह नानाप्रकारके स्वर्ग नरकादिकों के उत्तम मध्यम निकृष्टरुप सुख दुःय मो सर्व प्रा. रब्धका फलहें सोअवश्यमेव देहधारियोंरोभोक्तव्यही है माम्य! यह प्रारब्ध भोग , साधारण, अम असाधारण, उभय प्रकार के भी चिन्तनीय हैं, तहां असं नवरादिक गेग मोभी प्रारब्धार्म संग्रह प्रकरण ३५.६ का फलहै परन्तु तिनकी ओषधी आदिक यत्न करनेसे निवृत्ति होती है सो साधारण है, अरु जिन रोगादिकोंकी प्रयत्न करनेसे. भी निवृत्ति होती नहीं सो असाधारण कहिये असाध्य जानना। अरु यह तीनोंप्रकारकै प्रारब्ध कर्म के फल भोग भोगनेहीसे नि- वृत्तहोतेहैं अन्य किसीप्रकारसे भी इनकी निवृत्ति होतीनहीं। अरु संचित क्रियमाण, येहदोनों कर्म ज्ञानवान्के ज्ञानाग्निकरके नष्ट होजातेहैं। अरुप्रारब्धकर्म देहकेआश्रयरहताहै सोअपनाफलेदेः के नष्टहोताहै मध्यमें मिटतानहीं जैसेकिसी शस्त्रधारीके तर्कस, विषेजोबाण होताहै तिसको अरुं जो वाण चलावनेकेलिये हाथमें धारणकियाहै तिसकोनाशकरनेको वोशस्त्रधारीसमर्थहोताहै,अरु जोबाण उसकेधनुषसे चलचुकाहे तिसको नाशकरनेमें वो समर्थ होता नहीं वोवाण जो धनुषसे चलचुका है सोजब अपने वेगसे रहितहोताहै तब गिरपड़ताहै पुनः आगे चलतानहीं, तेसेहीत. कसके बाणोंवत् संचित कर्म हैं, अरुहाथके वाणवत् क्रियमाण कर्महें, सो यह संचित अरु कियमाणे दोनों कर्म आत्मज्ञानकी प्राप्तिहुये नाशहोजातेहैं।अरु जो तीसरा प्रारब्धकर्म है सोधनुप से चलेहुये बाणवत है, सो ज्ञानप्राप्तहुयेभी रहताहै वोजवे अपने भोगदातव्यरूप वेग से रहित होता है तब अपनेआश्रय शरीरस- हितगिरपड़ताहै पुनः आगेको चलता नहीं। अर्थात् ज्ञानवानकाः प्रारब्ध जब अपना भोग.देचकता है तब सशरीर के लिष्ट होजा- ता है तब उस विद्वान् को पुन: जन्मके आरंभक कोई भी कर्म अवशेष रहतेनहीं, क्योंकि जब वो आचार्य से तत्वमस्यादिम- हावाक्यों को श्रवण करता है तव अपने आप जो जानती है कि मैं अविद्यात्मक स्थूल सूक्ष्म कारण इन तीनों शरीरों से रहित अशरीरी आरमाहौताते अजन्मा अक्रिय हौं, अतएव मेरे साथ? शरीर अरु तदाधित कर्म कोई नहीं, में इतने काल से अपने अज्ञानरूपापिशाचाके वश हुआ अपने को कता, भोक्ता सुखी दुःखी मानता रहा, परन्तु अव श्रुति अरु आचार्य की कृपा ब . ३६० मांडूक्योपनिषद से मेराो उक्त पिशाच निवृत्त हुआ तवा जानी जो में तो सर्व शरीरादि उपाधिसे रहित निर्विकार निराकार:निःकिय असंग आत्मा हाँ मैं कर्ता भोक्तानहीं, अतएवं न में पर्व कत्तरहीन मुझको आगे को कुछ कर्तव्य है, मैंतोासर्वदा अकर्ता अभोक्ता एकरस चैतन्य आत्मा हों। इसप्रकार विद्वान् को अपने आप आत्मस्वरूप का साक्षात् सम्यक ज्ञान होनेसे तिसही ज्ञानरुप, अग्निद्वारा संचितकर्म जो तर्कसके बाणात हैं सर्व भस्म होते हैं। तथाच "क्षीयन्तेचास्यकर्माणि ज्ञानाऽग्निदग्धकर्माणि इत्यादि श्रुतिस्मृतियों के प्रमाणसे । अरु सम्यक् आत्मज्ञानहोते के उत्तर कुछभी कर्तव्य अवशेप रहतानहीं, क्योंकि फर्मके हेतु कामना का उसविपे अत्यन्ताभार है । अरु अपशेप रहा जोप्रा- रब्धकर्म सो अपना भोग देके नष्ट होता है, अरुतिस प्रारब्धके भोगकालमें भी वो विधान प्रारब्ध का भोक्ता नहीं क्योंकि आत्मा अभोक्ता है । ताते प्रारब्ध के मुख दुःग्यादि भोगों का भोक्ता सा. भास लिंगशरीर जीवात्मा है, अरु स्थलगरीर भोगालय है, अरु इन दोनों का कारण अविद्या । अस मेंतो इन सर्व से पृथक इन सब का प्रकानक साक्षी हों तोम्य! इसप्रकार अपनेआप अकर्ता अभोका सत्यस्वरुप आत्माको यथार्य अनुभव फारके ज्ञानवान संचितादि सब कर्म से अरु निनक फल सुख दुःया- दिकों से रहितसर्वदा अफा अभोकायाका क्या है।अर यापत लोक दृष्टया ज्ञानी का देश भासता है नारत् प्रारब्ध भी मानना हवा यावत प्रारयभासतानाच नद्राचिन शरीर मी भागता है, तथापि ज्ञानी के न्यरूप में देर अरु प्रारब्ध अरु नटाश्रित सुस दुःसादि भोग इत्यादि भी नहीं । मनएन बानगान या प्रारब्ध कर्म अपना फल देके समाप्त हुआ पुनः गरीराम या वारण होता नहीं क्योंकि उसया नचिनामजी प्रारम्भ फलकी प्रवृत्तिका हेतु हे मोज्ञानाग्नि पर नागलो प्राप्त होना । ताने।अरु जानीका एक गरीरका मामला उन गरीरकर संग्रह प्रकरणी अपने फंल सुख दुःखादिकों का भोगांवनेवाला प्रारब्धं कम अं. पना फैल देके समाप्त होनेपर पिता है तबहीं उसके संचित कौने से जो कर्म अपना फल देनेको सम्मुखे होते हैं तब वो प्रारब्धरूप से पुनः शरीरके आरंभक अरु सुख दुःखके भोगावने वाले अरु अपने अनुसार कर्मों के करावनेवाले होते हैं, ताते अज्ञानी को क्रियमाण अरु क्रियमाणा से संचित अरु संचित से पुन प्रारब्ध, प्रारब्ध से पुनः क्रियमाण, इसप्रकार घटी यन्त्रवत् कर्मचक्र भ्रमावताही रहतान्हे उसके कर्मविना सम्यक् ज्ञान के हुये अन्य किसी प्रकार से भी अभाव होते नहीं ॥ हे प्रियदर्शन ! शरंब्ध भोग जो ज्ञानी अरु अज्ञानी के विषे तुल्य हैं सोभी तीन प्रकारके हैं,तही एक इच्छितरूप है, दूसरी अनिच्छितरूप है, तीसरा पारेच्छितरूपहै । सो यह तीनप्रकारके प्रारब्धके अनुसार :तिनके फलकिया भोग सर्वजीवोंको प्राप्तहोतेहैं। सोतीनोंप्रकार की प्रारब्ध किया भोग श्रीकृष्ण परमात्माने गीताविष निरूपण कियाहै सो ज्ञानी अज्ञानी दोनोंकोतुल्यहे, परन्तु अज्ञानीको सा- भिमानहै ताते बन्धनका कारणहे, अरु ज्ञानवान् निरभिमान है ताते उसको बन्धन का कारण है नहीं। अब तीनों, प्रकार की प्रारब्ध क्रिया-भोग, देखावतेहें। तथाचा भगवानुवाच । सदृश चिटते स्वस्याः प्रकृते, ज्ञानवानपि, प्रकृति यान्ति भूतानि नि- ‘ग्रहः किं करिष्यति, अर्थ भगवान कहते हैं कि हे अर्जुन! अ. पने प्राररुप, कर्मके अनुसार सर्व प्राणी चेष्टा करते हैं, अर्थात् ज्ञानवान् भी अरु अज्ञानी भी सर्व अपने पूर्व कर्म संस्कारों के आश्रय चेष्टा करते हैं, अरू उसहीस्वभाव (प्रकृति) को प्राप्त होते हैं तवं पुनः निग्रह किसका करिये । अर्थात् पूर्व शरीरों से किये जे कर्म सो संस्कार रूपसे अन्तःकरणवि स्थित हैं, तिन संस्कारो का जो प्रबुद्ध होना (जागना) है, तिसही के आश्रय ज्ञानी अरु अज्ञाती सर्व चेष्टा करते हैं तब उनका निग्रह क्यों करिये । यह तो इच्छापूर्वक किया भोग हैं, क्योंकि पूर्व जन्मों - . . ३६२ मांडूक्योपनिपद् । के किये जे इच्छापूर्वक शुभाशुभ कर्म सो संस्काररूपसे अन्तः करण में स्थित होय इन शरीरोंको अपने आश्रय व वे हैं, एत. दर्थ, इस स्वाभाविकचेष्टाका नाम इच्छापूर्वक चेष्टा है, अर्थात् इंच्छित प्रारब्धाकिया मोग है । हे सौम्य ! अब अनिच्छित को भीश्रवणकरो पूर्व अर्जुन ने श्रीकृष्ण परमात्माप्रति प्रश्न किया है कि अथ केनं प्रयुक्तोयं पापंचरति पूरुषः, अनिच्छन्नपि वार्णेय वैलादपिनियोजितः। हे भगवन् ! उत्तम पुपयरूप किया करने की इच्छा सर्वको होतीहै. सुखप्राप्तिवास्ते, पापकर्म की इच्छा कोई भी करता. नहीं. दुःख की अप्राप्तिबास्ने, तथापि जिस पापकर्मा की इसको इच्छा नहीं तिसही. पापं कर्मों में प्रवृत्त होते हैं .सो किसकी प्रेरणासे होते हैं, जैसे राजाकी प्रेरणा से, विनाही अपनी इच्छाके भृत्य युद्धरूप कर्म करताहै कि जिस 'किया में मरण पर्यन्त का भयो, तैसेही यह पुरुप जो विना ठापनी इच्छांके पापरूप कर्म, कि जिसमें परिणाम नरकादिको •का भय है, करताहे सो किसकी प्रेरणासे करता है, यह आप कृपाकर मुझसे कहिये ॥ हे सौम्य! इसप्रकार जब अर्जुन ने प्रश्नकिया तब श्रीकृष्ण भगवान ने उत्तर कहा कि कामएपः कोधएपः। रजोगुण समुद्भवः, महाशनोमहापाप्मा वि नमिह वैरिणम्। अर्जुन ! यह जो काम अरु कोध है सो रजोगुण से उपजे हैं अरु बड़े भोजन के करनेवाले पापात्माह, अरु जिज्ञासु के नित्यही वेरी हैं। तिनकी प्रेरणासे यह जीव अनिच्छित भी पापका प्रवृत्त होते हैं।अर्थात् यह जो कामना हैं सोई अपनी अपूर्णतासे कोधरूप परिणाम को पावती है, क्योंकि जब कोई किसी पदार्थ की कामना से किसी किया प्रवर्त होना, तिस नियामें जब कोई वेपी पुरुप विनकरता है नव वोही कामना जो पूर्व रजोगुणात्मकरही सो कोधरूप से तमोगुणात्मक परि- णामको प्राप्तहोती है, सो विवेक शून्य पापात्मा है, अम कामना भोगोंकरके तृप्तहोती नहीं आहुनिसे अग्निवत, अतएव सो में { संग्रह प्रकरण। महाशना है अरु जिज्ञासुकी तो यह नित्यही वैरी है। हे,सौम्य,! इसही कारणसे श्रीकृष्णपरमात्मा,ते कहा है कि जहि शत्रुम- हावाहो कामरूपंदुरासदम् । हे अर्जुन इस कामरूप बलवान शत्रुको जयकरो तित विना कल्याण नहीं अरु पूर्व जन्मों के जे रजोगुणात्मक कामों के समूह सो सूक्ष्म संस्कार रूपसे अन्तः करण विषे स्थित हैं, सो जब अपना फल देने को सम्मुख होते हैं तव प्रारब्धांप-भावको प्राप्तहोय, कामना रूप से प्रबुद्ध होते (जागते.) हैं, तब तिसके वशहुआ जीव अनिच्छित भी पाप कम्मों में प्रवृत्त होता है, सो क्रिया अरु तिसका फल भोग, सो सर्व अनिच्छित क्रिया भोग है । ताते इस को अनिच्छित क्रिया भोगकहते हैं । अब, परइच्छित प्रारब्धको श्रवणकरो। हे सौम्य! श्रीकृष्ण भगवान्ने कहा है कि, हे अर्जुन ! अपने पूर्वकामों के संस्कारजन्य प्रकृति कहिये स्वभाव तिसके वश हुआ जो तू.सो अपने अज्ञानभ्रम करके भ्रमाहुआ अपना धर्मरूपत्जे युद्ध-कर्म सो नहीं भी करता, तथापि परवश हुमा युद्ध फर्म करेहीगा इसबिषे संशय कुछ नहीं, ताते यह जो तेरी युद्धरुप क्रिया है अरु तिसका जो परिणाम फलभोग है सो दोनो पर इच्छित है। अरु कामना अरु क्रिया यह परस्पर ओत प्रोत है, क्योंकि कामनाविना क्रिया होवे नहीं, अरु क्रियाहै सो कामना को लखावती है, अरु यह-दोनों अविद्या के आश्रय है, अरु सो अविद्या अनादि होनेसे तदाश्रित काम क्रिया भी अनादि है, त- थापि सर्वाधिष्ठान आत्मसत्ता के साक्षात् ज्ञानसे अविद्या अरु तदाश्रित सर्व काम कादिकों का अभाव होता है ताते अवि- द्या अरुतिसका कार्य समस्त नामरूप क्रियात्मक जगत् असत्य है। अरु अज्ञानावस्था पर्यंत जे अनादि कालमे अनेक लन्मों के काम कर्मादिकों के संस्कार सो जब अपना फल भोगदेने के अर्थ सम्मुख होते हैं। तब वोही संचित से प्रारब्ध संज्ञाको प्राप्तहोय ‘इच्छित' अनिच्छित, अरु-परेच्छित, इन-तीन प्रकार मांडूक्योपनिषद् । से प्रवृत्त होते हैं। तातै प्रारब्धा क्रिया भोग तीन प्रकार के हैं। हे सौम्य ! तुम्हारी दृढ़ता के अर्थ पुनः कहते हैं तिसको भी श्रवण करो, तहां प्रथम इच्छारूप क्रियाभोगे श्रवण करो जैसे कोई एकरोगी पुरुपहै तिसको औषधकर्ता वैद्यने आज्ञाकिया कि तू कुपथ्य भोजन मतकरियो जो करेगा तो दुःख भोगेगा, सो यह आज्ञा वैद्यकी श्रवण करके भी वो रोगी पुरुष कुपथ्य की इच्छाकर पुनः सोई भोजनकरके दुःख भोगता है । सो कुपथ्य भोजनरूप क्रियाको वैद्यहारा क्लेशदायक जानके भी पुनः सोई कुपथ्य भोजन करना अरुं दुःखें भोगना, सो यहकिया अरु भोग दोनों स्वइच्छित प्रारब्ध है। तैसे चौर्यादि निपिद्ध कम्मों के ता- नादि दुःखरूप फलको जानके भी तिस चौर्यादि कर्ममें प्रवृत्त होना अरु तिसके फल ताड़नादि दुःखोंको भोगना, सो यह सर्व क्रिया भोग स्वइच्छित प्रारब्धहै । अब अनिच्छित कोभी श्रवण करो, हे सौम्य !जैसे कोई एक पुरुप किसी ग्रामको जाता है सो उसप्रामके मार्गपर चलते २ उसमार्ग को भलके अन्यग्राम के मार्गपर चलने लगा तब उसमाधिपे उसको कंटकादि चुभने से अति दुःखहुआ वा किसी उत्तम पदार्थ की प्राप्तिसे उनको हर्पहुआ 'सो उस पुरुपकी उसमार्ग में' कि जिसपर भूल के चलता है, गमनकिया, अरु दुःस सुखकाभोग सो उस पुरुपको अनिच्छित क्रिया भोग है, क्योंकि उस पुरुषको उस मार्ग पर चलने की वा तिस मार्गजन्य सुख दुःख भोगनेकी पूर्व से इच्छा नहीं। सौम्य अब परेच्छितकोभीश्रवणकरो हे प्रियदर्शनीमोई एक निर्धनपुरुप अपने किसी प्रयोजनार्थ कहींको जातारदा किंवा कहीं पैठारहा तिसको अकस्मात किसीरीजकीय बलवान् परुपने अपने वन्धनमेंकरअपना जो कुछ सामान(मार)धा सो चलात्कार से उसके मस्तकपर धरके उसको ताड़नासहिन अपने अन फल मार्गपर चलावनेलगा। सो उसनिर्धन 'मनुष्यका उस राजकीय मनुप्यके वशहोय उसकेभारको उठायना उसके अनुकूल मार्गपर - संग्रह प्रकरण ३६५ चलना,अरुउसकी की हुई ताड़नाके क्लेशको भोगना,सो सर्वकिया "भोग उसकी परेच्छित है ।। हे सौम्य अब इसपर वृद्धौकी साक्ष्य श्रवणकरो जैसे अपनी सत्यवती माता के वश हुये व्यासदेवजीने राजापांडु, धृतराष्ट्र अरु विदुर इनकी माताकसाथ उनके संता- नार्थ विषय भोग किया सो व्यासदेवजी ने अपनी इच्छा पूर्वक निहीं कियाकिन्तु केवल अपनीमाताकीआज्ञाकेवश होय के किया सो उनकापरेच्छितप्रारब्धाकिया भोगहै । है सौम्य एकप्रारब्ध के तीन प्रकारके कियाभोग भेदातुमसेकहा, सो सर्वको समान भोक्तव्यहँ क्योंकि प्रारव्यकर्म विना:भोगे अन्य किसीप्रकार से भी अभाव होतेनहीं।तिन तीनोंमेसें आत्मज्ञानीको इच्छित अरु अनिच्छित दोप्रकारकी प्रारब्धकिया भोग अभाव होजातेहैं। "क्योंकि उस ज्ञानवान्को सात्म भाव उदयहुआ है, तब वो इच्छा अनिच्छा कौनकीकरे, क्योंकि यत्रद्वैतमिवभवति तदितर इतरम्पश्यति इत्यादि प्रमाणंसे इच्छा अनिच्छा द्वैतभाव.प्रिय अप्रिय वस्तुविषे होतीहै, अद्वैतभाव अविद्याके आश्रयहोता है, सो द्वैतभावका आश्रय अविद्या ज्ञानवान्की-अभाव होतीहै ताते ज्ञानीविषे इच्छा अनिच्छाका भी अभावहे । अरु एकलोक दृ- "ष्टया शरीरयात्रामात्र जो ज्ञान विषे भोजनादि क्रियाभासती है “सोपरेच्छित है क्योंकि जो किसीने कुछ भोजन करायदिया तो किरलिया वा किसीने वस्त्र ओढ़ाया तो ओढ़लिया, अरु जोकोई -तर्ककरे कि उस ज्ञानीके मुखमें ग्रास किसी अन्यने देदिया पर- -न्तु उसको चवायके कंठके नीचे उदरमें उतारना, यहंजो क्रिया है सोतो ज्ञानवान्-विषे स्वइच्छित होनेमे उसको वन्धनकाहेतु "होगी सी कहनाबने नहीं क्योंकि ज्ञानवान्के विपे जो शरीरकी स्थितिमात्रके अर्थ भोजन शौचादिक क्रियाहै सोनिरभिमानता से होनेकरके बंधनका कारण होनहीं। तथाच शारीरकेचलं 'कर्मकुर्वन्नाप्नोतिकिल्बिषम, लिप्यतेनसपापेभ्योपद्मपत्रमिवी- भासनिलिप्यते कर्मणा पापकेनेति । इत्यादि प्रंमाणों से - -- ३६६ मांडूक्योपनिषद् । अरुवास्तवं करके ज्ञानीके स्वरूपमें सो परेच्छितभी नहीं क्यों- कि उसकी दाष्टिमें सव्वात्मभाव होनेसे स्वपरका भेदनहीं; उस को तो सर्व भेदं भावसे रहित एक अपना आप आत्माही,भास. -ताहै सिध्वं खल्विदं ब्रह्म ब्रह्मेवेदं सर्वआत्मैवेदंसर्वम्। पुरुपएवेदसर्वम्। निह नानास्ति किञ्चन इत्यादि श्रुतियों के प्रमाणसे एक अद्वितीय, आत्माही है, इतर रंचकमात्रभी नहीं। ताते ज्ञान के विपे संचित, किग्रमाण, अरु प्रारब्य, तीनों प्रकारके कर्मोंका अभावहै । अरु जोलोकदृष्ट्या ज्ञानीविपकिया भोगप्रत्यक्षदेखते हैं सोदेहकेआश्रय इच्छा अनिच्छासेरहित सा- धारण आभासमात्र है क्योंकि देहकाहोना प्रारब्धकर्म संस्कारके श्राश्रयहै ताते ज्ञानीका धावत्देहहै तावत्प्रारब्धहे यावत्प्रारब्ध तावत् देहहे, इसप्रकार देह अरु प्रारब्धकाच्यापार अन्योन्याश्रय है, एतदर्थ यावत् ज्ञानी का देहद तावत् देह सम्बन्धं से ज्ञानीके चिपे प्रारब्ध, किया भोगभासतेहें सो ज्ञानी के स्वरूप विपे उपा. धिकृत आभासमात्र मिध्या हे ज्ञानी के स्वरूप में प्रारव्य क्रिया भोग नहीं। ताते प्रणवोपासक ज्ञानवान् के संचित, आगामी, प्रारब्ध तीनों कर्मोंका अभाव होता हे अर्थात कारके उपासक मुमुक्षु को तीनों प्रकारके धर्मरुप पापों से अगवार शुजकरता है ताते ॐकार का नाम शुक्ल है॥हे सोम्य!अब और श्रमण करो, यह संचितादि तीनप्रकारके जे कर्म हैं सो देहाभिमानी -अज्ञानी को सत्य है, अरु ज्ञानरानके तीनों कर्म अभाव होजा. तेह, तहां संचितकर्म तो ज्ञान होनेही ज्ञानाग्नि करके गप्टहो. जाते हैं, ताते उमको आगे पुनर्जन्म का अभाव होता है .असे पोई पुरुष अपने अन्न करके भरेदृये मन्दिर को भस्म करदे तय पो अग्नि करके दधदये अनके दाने अपने अंकुर उपजाने को समर्थ होतेनहीं तेनेही ज्ञानवान्मा अन्न करणरूप मान्दर मं. वितकर्मरुप अक्षके दानेसहित ज्ञानाग्निकरके दग्धहोजानाहेमो एनः शरीरकप अंकुर उपानापनको समय हानानहीं। मोमन्तः - संग्रह प्रकरणी ३६७ करणका अभाव इसप्रकारहोताहै, जो ज्ञानवान्का चित्तसत्पदको. प्रातहोताहै। हे लोम्य! जिसकरके असम्यक्ज्ञान दर्शनहोय अ- र्थात् सत्यरूप आत्माविषे असत्य बुद्धिहोय,अरु असत्य देहादिकों विषे सत्यारम बुद्धिहोयं तिसका नामं असम्यक् ज्ञानदर्शन मन है, अरु अज्ञान, जीव है। अरु जंव आचार्य्यके उपदेशद्वारा सत्य आत्मानुभव विज्ञान होता है तव अज्ञानरूप जीव मन; भावं नष्टहोजाताहै, तब केवल शुद्ध आत्मपद ज्योंकात्यों शेषरहताहै, तिसको चित्सत् कहते हैं। इसप्रकार जब चित्सत पदको प्राप्त होताहै, तब अन्तःकरण जो है मनभाव सौ सञ्चित कर्मोसहित अन्नके मन्दिरबत्, नष्टहोजाता है तब पुनः सो देह उपजावने को समर्थ होतानहीं॥अंरु जो क्रियमाण कर्म, सोज्ञानीकेविष उपजतेही नहीं, क्योंकि क्रियमाण कर्म जो उपजते हैं सो अ- ज्ञानकें आश्रय अन्तःकरण विषे उपजतेहैं, सो अन्तःकरण ज्ञान, वान्का सहिते अज्ञान के नष्ट होता है, ताते वा ज्ञानवान् सदा अक्रिय आत्मपदवि प्राप्तहुआहै ताते, उसवि क्रियमाणे (आद गामी कर्म उपजतेनहीं अरु ज्ञानीकी जीवन्मुक्त अवस्था विषे जो देह किया दिखती है,सो,देहके प्रारब्धसे है सो सर्वको समान होती है, परन्तु सोई किया जब अनात्म अहंकार पूर्वक होती है तब क्रियमाणभावको प्राप्तहोय पुनः सञ्चित संज्ञाकोपाय अपना फल जे सुख दुःखादिक सो प्रारब्धरूपसे भोगावे है, अरुनाना- प्रकारके देव मनुष्य पशु तिर्यगादि उत्तम मध्यम निकृष्ट अप्रमादि देहोंको उपजावेह।ताते देहाभिमानी अज्ञानीको उसकी साभि- मानक्रिया जन्मदायक होतीहै । अरु वोहीक्रिया जो पूर्वसंस्कार से प्रारब्धवशात् देहविपे दीखती है सो जब अहंकार पूर्वक नहीं होती तब वो क्रियमाण संज्ञाकोन प्राप्तहोनेसे संचित अप्रा. रब्ध इ भावको भी प्राप्तहोती नहीं क्योंकि क्रियावन्धनका मूल अनात्म अभिमानही है, सो जिसका अज्ञान कारण सहित अ. भावहुआहे, तिसकी जो वर्तमान शरीरविपे किया है सो, क्रिय, मांडूक्योपनिषद्। माण, संचित, अरु प्रारब्ध, इंन संज्ञाको प्राप्तहोयापुनःजन्मका कारण होतीनहीं। अरु देहकरके जो क्रिया होती है सो पूर्वजन्म के केवल प्रारब्ध संस्कारसे होती है । पूर्वसंस्कारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत् । सो प्रारब्ध देहके साथहै सो देहके साथही नाशन वान् होनहारहै। क्योंकि प्रारब्धके अभावसे देहका अभाव अरु देहके अभावसे प्रारब्धका अभाव यह अन्योन्य अनुमान सिद्धहै अरु प्रारब्ध अरु शरीर अन्योन्याश्रय दोपयुक्त होने से दोनोंही असत्य हैं । अतएव हे सौम्य ! ज्ञानवान् को क्रियमाण कर्मनहीं, क्योंजो ज्ञानवान् सर्व अनात्म अभिमानसे रहित अक्रिय आ. त्मपदको प्राप्तहुआ है, एतदर्थ ज्ञानवान्के शरीरकी क्रिया क्रियः माणभावको प्राप्तहोती नहीं । जैसे भोजनरूप जो क्रिया हे सो मानो पूर्व संस्कारजन्यप्रारब्ध जन्य किया है, सो किया जब होती है तब वो नीरोगीपुरुपके देहविषे पुष्टिरूप क्रियमाण संज्ञाको प्राप्त होती है। अरु वोही प्रारब्धजन्य भोजन किया सरोगी पुरुपके देह विषे पुष्टिरूप क्रियमाण संज्ञाको प्रासहोती नहीं। तैसेही जिज्ञा- सुपुरुप जव साक्षात् आत्मज्ञानरूप रोगकरके युक्तहोता हे तय उसके शरीरविसे प्रारब्ध जन्य किया भोगप्ट आवते, तथापि वो किया क्रियमाणतारूप पुष्टताको प्राप्तहोती नहीं अरुं जिस पुरुपको साक्षात् आत्मज्ञानरूप रोगनहीं ऐसा जो नीरोगी अज्ञा. नी हे तिसको प्रारम्वरूप कियासे क्रियमाण क्रिया उपजती हे नीरोगीके भोजेनवत् यह वैयर्मीहप्टान्त जानना, । अतएव हे सौम्य! उक्तप्रकार ज्ञानीपुरुप रिपे संचित अरु क्रियमाण ये दोनों कियानहीं, अरु जो पूर्वक कर्मसंस्कारों से प्राग्धजन्य किया है सो कियमाणनत् भासती हे परन्तु वास्तश्करके ज्ञानवान के स. रूपविपे सोभी नहीं देह के आश्रय प्रतीत होती हे सो ज्ञानवान् अरु अज्ञानी दोनों को तुल्य है, परन्तु अज्ञानी तो तिसविपे अ. हंकारपूर्वक रागद्वेप सहित अपनेआप को अज्ञानवश हुआकर्ता भोक्ता माने है,ताते उसकी क्रिया क्रियमाण,संचित,अरु प्रारब्ध, संग्रह प्रकरण ३६६ इन तीनों संज्ञा को प्राप्त होय पुनः शरीरोत्पत्ति अरु सुख दुःख रूप भोगका कारण होती है । अरु ज्ञानवान् की शरीरक्रिया पूर्व के प्रारब्धवशात् होती है, परन्तु तिसविषे ज्ञानवान को अहंकार रागद्वेष कर्ता भोक्ताबुद्धि नहीं, ताते ज्ञानवान् की क्रिया पुनर्जन्म अरु सुखदुःखरूप भोगोंका कारण होती नहीं। ताते हे प्रियद- र्शन | ॐकार के उपासक ज्ञानवान् के संचित, क्रियमाण, अरु प्रारब्ध, सनिों कर्म-नाशकरके उसको उसका उपास्य संकार. अपने लक्ष्य सदा शुद्ध युद्ध मुक्त स्वभाव अकिय आत्मपदविषे प्राप्तकरता है, अतएव कार का नाम शुक्ल है ॥ अथवा स्थूल सूक्ष्म कारण, तीनों शरीरों का अभिमानरूप पाप हे तिसको भी नाशकरके अपने उपासकको शुद्धकरताहै एतदर्थ भी अंकारका नाम शुक्लहै ॥ अथवा तीन जे त्रिपुटियां ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय,ध्याता ध्यान ध्येय, कती कर्म किया, इत्यादिक है,-तिन अज्ञान जन्य त्रिपुटियों को नाशकरके अपने उपासकको ॐकार शुद्ध करताहे- ताते ॐकारका नाम शुक्ल, है-॥ अथग अज्ञान अनात्मा देहा- दिकोंके आश्रय जे बंधनका हेतु वर्णाश्रमका अभिमान अरुतिस के आश्रय कर्तृत्व भोक्तृत्व का अभिनिवेश, तिन रूपसर्व पापोंसें अपने उपासक को मुक्त शुद्धकरके ॐकार अपने लक्ष्य परब्रह्म परमात्मपद को प्राप्त करता है ताते ॐकारका नाम शुक्ल है यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं हवेस पाप्मना विनिर्मुक्त: इत्यादि । हे सौम्य ! यह तुम्हारे पनि ॐकार के षष्ठ शुलनामका अर्थ संक्षेपमात्र कहा तिसका विचारकर शुद्ध होनो ६ ॥ अथ सप्तमनाम वैद्युत ७॥ हे सौम्य ! अब ॐकार के सप्तम वैद्युतनाम का अर्थ संक्षेप मात्र श्रवणकरो । विद्युत नाम है प्रकाश का सो ॐकार अपने ज्ञानरूप प्रकाश करके अपने उपासक के अज्ञानरूप अंधकारको कि जिसके आश्रय पारम्बार जन्ममरणके महाभयका देनेवाला . । ५.
३७० मांडूक्योपनिषद् । संसाररूप अंसत्य सर्प अपनेआप शुद्ध अद्वैत जन्म मरण से रहित अज अविनाशी आत्माविपे, सत्य प्रतीत होता है, अभाव करके, अपनाआप रज्जुस्थानीय आत्मरूप पदार्थ ज्यों का त्यों प्रत्यक्षकर देखावता है ज्ञिानदीपेन भास्वतः" इत्यादि प्रमाणसे ताते अंकार का नाम विद्युत है ॥ अथवा ॐकार अपने उपा- सक को विद्युतवत् विशेष प्रकट दर्शनदे पुनः अपने सामान्यरूप को प्राप्तहोता है यिदेतद्विदुतोव्यातदा" इत्यादि केनोपनिषद्के प्रमाणसे। एतदर्थ भी अंकार का नाम विद्युत है ७ ।। अथ अष्टमनाम हंस ८॥ । हे सौम्य !अब ॐकारके अष्टम हंसनाम का अर्थ श्रवणकरो। हंसनाम सूर्यका है, जैसे सूर्यरात्रिको अरुतज्जन्य अंधकार को अरु तज्जन्य अभास को नाशकरता है । तैसेही अंकाररूप सूर्य है तिसकी जो पुरुष , विचार ध्यान उच्चार जप आदि, क्रमसे उपासना करता है, तिस उपासक के अन्तःकरण में सूर्यवत ज्ञानरूपसे उदयहोय मलाविद्या रूपारात्रि, अरु तदानित तमो- गुणरूप अन्धकार,अरु तदाश्रित स्वरूप का अनाभास, तिनको अभापकर के अपने लक्ष्य शुद्ध तुरीयरूप आत्माको प्रकाशना है। ताते ॐकार का नाम हंस है। तथाच आदित्य उदीय एप प्रणतः, इत्यादि श्रुति के प्रमाणसे ॥अथवा हंस उस पक्षीविशे- पको भी कहते हैं कि जो मिश्रित हुये दुग्ध अरु जल को पृथक् २ करता है, तैसेही ॐकाररूप हंस अपने उपासक के हृदय की विजजड़ग्रंथी जो दुग्ध अरु जलपत् मिश्रित, हे तिस चिज्जड़ ग्रंथी को खोल चैतन्यरूप दुग्ध अरु जड़रूप जल को पृथक् २ करके अपने आसफ को आत्मरूप दुग्धकी प्राप्तिकराय अजर अमर अभयपद को प्राप्त करता है, अतएर प्रकार का नामहस है। तथाच हिथंस शुचि." इत्यादि श्रुतिप्रमाणसे। अर्थात् ॐ. कार अपने उपासक की अविद्यारूपारात्रि अरु अनात्म जरूप संग्रह प्रकरण। जलको नाशकरके स्त्रयंज्योतिःसर्व का परमसार नित्य निरंजन निर्विकार अपने आप आत्मपद विषे प्राप्त करता है, अतएव ॐकार का नाम हस है ८॥ अथ नवमनाम तुरीय ॥ हे सौम्य! अब ॐकारके नवमनाम तुरीयका भी अर्थ श्रवण करो। हे प्रियदर्शन! तुरीय उसको कहते हैं,जो सूक्ष्म स्थूलकारण, यह तीन शरीर, अरु जाग्रत् स्वप्न सुपुप्ति, यहतीन अवस्था,अरु विश्व तैजस प्राज्ञ, यह तीन अभिमानी, अरु स्थूल विरल अरु आनन्द, यहतीन भोग्य, इत्यादिकोंका जो साक्षी प्रकाशक अधि. धान अरु उक्त सर्व से पृथक् है तिस निर्विशेष चैतन्य आत्माका नाम तुरीयहै । अरु सोई त्रिमात्रिक वाचक ॐकारका लक्ष्य है अरु त्रिमात्रिक ॐकारके आलम्बनसे यही मुमुक्षुओं करके उपा- स्यदेव है,अरु यही एक अद्वितीय सर्वका अपनाआप प्रत्यगात्मा है इसही के साक्षात् सम्यक् ज्ञान से मोक्ष होती है । तिस अपने लक्ष्यरूप तुरीय आत्माकी प्राप्ति, अपने उपासक को कराय तीनों अवस्था रूप नामरूप क्रियात्मक असत्य संसार सागर से तार देता है, ताते ॐकारका नाम तुरीय कहते हैं ६ ॥ अथ दशम नाम परब्रह्म १०॥ हे सौम्य ! अब ॐकार के दशम ब्रह्मनामकाअर्थश्रवणकरो। परा पश्यन्ति मध्यमा अरु वैखरी, इनचारों वाचाकरके जो प्रकट होताहै सो आकारका वाच्य शब्दमय ब्रह्म है । तहां परा उसको कहते हैं, पश्यन्ति मध्यमा अरु वैखरी,इनतीनोंकी समा- वस्था है वा सामान्य शब्दके उत्थान से रहित केवल ध्वनिमात्र है। वा जहाँसे पश्यन्ती का उत्थान होताहै, सो परावाचा है। अरु पश्यन्ति स्फुरणरूप तिसविपे यह स्फुरण होताहै जो कुछ कहो, इसस्फुरणका नाम पश्यन्ती बाचा है । अरु जब यो स्फु. रण निश्चयात्मक होता है कि अब यह कहोंही, तिसका नाम ३७३ मांडूक्योपनिषद् । मध्यमात्राया है। अरु उसंही निश्चय से करके होठजीभहिलायं के प्रकटकहां तवं तिसको वैखरीवाचा कहते हैं। तिति खरी यि चारोवेद पद आदिशास्त्र अष्टादशादिस्मृति अष्टादशपुराण इति हासादि जो विद्या हैं अरु नानाप्रकार की नानादेश की भाषा, ... अरु नानाप्रकार के पशु पक्षी आदिकोंकी नानाभापा है.सो.सर्व स्थूलरूप बैखरी विपे स्थित है। तथाच सर्वेषां चेदानां वागेक- । वाग्वैनामनो भआति.. इत्यादि श्रुतिः । तहां से स्वर वर्णात्मक शब्दरूप से प्रकट होय है, सो सर्व ॐकारका यांच्य शब्दब्रह्म है तहां वेदरूप.शब्दमय ब्रह्मकार तिसकी उपासना अिध्ययन विचार रूप से, करने करके शव्दमय ब्रह्मकरके प्रति पायजे. कारका लक्ष्य निर्विशेष परब्रह्म परमात्मा तिसकी अपने आप आत्मत्त से प्राप्तिहोती हैं। तथाच शब्दब्रह्मणि नि: पतिःपरनमाधिगच्छति । इति ॥ ताते इस कार को परनाम कहते हैं.१०॥ इति ॐकारस्यदशनामअर्थविचारसमाप्तम् ॥
३७४ मांडूक्योपनिषद् । अथ अन्य प्रकार से प्रकार की मात्रादि विचार ॥ श्रकार अकार मार । यह तीन माग यह तीन ऋषि २ श्रग्नि सूर्य वृहती ३ गायु विष्ट विष्णु गायत्री यह तीन छद ४ ब्रह्मा पह तीन दवता ५ रोत रत कृष्ण यह तान वर्ण ६ जाग्रत् पप्न भू 'भूलों भुर 'पिहनाक' मुक्ति गहती अस्था घर 'गलोर । यह सीन प्याति याला स्वरित यह तान पर उदात्त यन यह तीन प्राग १.गापत्य ११. मात दिरिणाग्नि धाननीय यह मीन अग्नि यह सान सहि मध्याद साय भविष्या यसमा यह सीनारा रम पाखा सहार १५J उपणि १६ पम्म १६ पिराए या तीन गुण पातीन मिया | यह मान कायर यह तीसरी उपासन दिग्पयगर्भ भशा नपुराक पर तीन सिम १० होता प्र यामIT मामय उद्गाना मति यीभाव (१५ जान २. परि पन पन्द्रमा पमान माग गप्य पगान मामा ২যবধাসময়ে বা ধরনী খো मकार इन सान यात्राओं का विस्तारमा ममम्न जगन् हम प्रसाद ताने पार पद ममम इनि। Mirmire संग्रह प्रकरण। अथरामगीताकेंअनुसारमात्राओं कालयचितवन ।। पूर्वसमाधेरखिलं विचिन्तयेदोंकारमानंसचराचरंजग त् । तदेववाच्यप्रणवोहिवाचकोविभाष्यतेऽज्ञानवशान्न वोधतः१॥४८॥ हे.सौम्य ! अब.परब्रह्म की प्राप्ति में सर्वोत्तम जे प्रणवोपास- न तिसकी मात्राओं के क्रमशःलय चिन्तयन द्वारा तिसके लक्ष्य परब्रह्मकी आत्मत्वभावसे जिसप्रकार साक्षात् प्राप्ति होती है सो प्रकार तुम्हारे प्रति संक्षेपसे कहता) तिसको सावधान होयके श्रवण करो ॥ तहां प्रथम, श्लोकका अक्षरार्थ सिमाधि से पूर्व सम्पूर्ण जे चराचर जगत् तिसको.] ॐकार मात्रहीं चिन्तवन करे निश्चय करके प्रणव ॐकार) नामहै [अरु]सो (जगत) ही नामी है [सो नाम नामीका भेद ] अज्ञानवशात् ज्ञान से नहीं । हे प्रियदर्शन! जो विवेकी. साधन सम्पन्न आत्मजिज्ञासु पुरुष है. सो निर्विकल्प समाधि के प्राप्त होनेके पूर्व सम्पूर्ण चराचर जगत्को एक स्कारमात्रही चिन्तवनकरे। क्योंकि ॐकारए- वेदंसर्बम् । यिह सर्व अकारही है। ऐसी श्रुतिकी आज्ञा है, ताते निश्चय करके प्रणव जो अंबार सो नाम है अरुं जगतही उसका वाच्यकहिये नामीहै । क्योंकि तस्योपव्याख्यानं भूतंभ- चद्भविष्यदिति सर्व कारएवं ? इस मांडूक्यउपनिपद की श्रृं ति प्रमाणसे । अर्थात् ॐकार नामहै अरु जगत् नामीहै ताते निर्विकल्पः समाधिके पूर्व (सविकल्प समाधि त्रिपे) जगत्को ॐकार रूपही चिन्तवन करे, सो नाम नामीभी मुमुक्षुके सम. भावनेके अर्थ आचार्यों ने कहलिया है वास्तव करके तो नाम नामीका भी भेदनहीं जो भेद भासताहे सोअज्ञान वशसे भास. ताहै, सम्यक् ज्ञान होनेसे नाम नामीका भेदनहीं.। अर्थात् जय , ३७६ मांडूक्योपनिपद। अकारसंजः-पुरुषोहिविश्वकोाकारकस्तैजसईयतेक मात् । प्राज्ञोमकारःपरिपठ्यतेऽखिलेःसमाधिपूर्वनतुत स्वतोभवेत् २।४९॥ वाच्यरूप त्रिमात्रिक प्रणवोपासक को उस उपासना के प्रभाव से लक्ष्यरूप अमात्रिक निर्विशेष निरुपाधि आत्मतत्वका साक्षा- स्काररुप अपरोक्ष सम्यज्ञान होताहै तब वृत्ति के अभावसे,नाम, नामी, यहभी संज्ञा रहतीनहीं, केवल एक अद्वैत परमशांत शिर विज्ञानधन आत्मतत्त्वही प्रकाशता है " शिवं शान्तमद्वेतं चतुर्थ मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेय" इत्यादि प्रमाणसे १ । ४८ ॥ हे सौम्य ! यह जो वर्णात्मक ॐकारहै तिमके तीन अक्षर (मात्रा) है, तहां प्रथम असार, द्वितीय उकार, तृतीय मकार, अरु इसका वाच्य जो जगत् है तिसके तीनपाद हैं.प्रथम स्थूल विराट् ,द्वितीय सूक्ष्म हिरण्यगर्भ, तृतीय कारण अव्याकृत, अरु कूमशः ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, यह तीन अभिमानी देवता हैं । अरु ॐकारका लक्ष्य जो प्रत्यगात्माहै तिमकी तीनमात्रा है जाग्रत्, स्वम, सुषुप्ति, अरु इनके अभिमानी आत्मा को कूमसे , विश्व, तेजस, प्राज्ञ, कहते हैं अतएव ,अक्षर, पद, मात्रा, इन तीनोंका एकही पर्यायहै ताते वाचक जे वात्मक ॐकार तिसका जो वाच्य समष्टि व्यष्टि जगत् सो परस्पर अभेदहे एतदर्थही जामद- भिमानी विश्व पुरुष अभार संज्ञकहे, तिसकी स्थूल विराडभि. मानी ब्रह्मा देवताके साथ एकताहै। अरु क्रमश स्वप्नाभिमानी तैजसको उकार ऐसाकहतेहैं,तिसकी सूक्ष्माभिमानी हिरण्यगर्भ विष्णदेवता के साथ एकता है । अरु सम्पूर्ण ज्ञानवान प्राज्ञको मकार कहते हैं, अर्थात् सुपुप्त्यभिमानी प्राज्ञकी अरु अव्याकृता- भिमानी रुद्रकी मकार मात्राके साथ एकता है । सो यह सर्व निर्विकल्प समाधि के पूर्व है । अर्थात् मुमुक्षुस्पको यावत अ. मात्रिक सर्वाधिष्ठान निर्विशेष आत्मस्थिति को प्राप्तहोने रुप ।
संग्रह प्रकरण ३७७ विश्वस्वकारं पुरुष विलापयेदुकारमध्ये बहुधाव्य- स्थितम् । ततोमकारे प्रविलाप्यतैजसं द्वितीयवर्ण प्रण- वस्यंचान्तिमे ३॥५०॥ निर्विकल्पसमाधि न प्राप्तहोय तावत् उक्तप्रकारचिन्तवनकर्तव्य है,असे जय तिसविचारसे निर्विकल्प आरमस्थितिकी प्रॉप्तहीवे तब नहीं, क्योंकि स्थूल सूक्ष्म कारणं, ब्रह्मा विणा रुद्र, जाग्रत् स्वप्न सुपुप्ति, विश्व तैजस प्राज्ञ, अकार उकार भकार, इत्यादि वि. शेषता का भेद भाव रंचकमात्र भी रहता है नहीं किन्तु संचव लवणयत् एक विज्ञानघन आत्मतत्वही प्रकाशता है || है सौम्य! इस श्लोक की उत्तरं श्लोक से अन्वयह ताते इन दोनों श्लोकों को मिश्रित अक्षरार्थ कहते हैं । बहुत प्रकार से स्थित विश्वसंज्ञके अफार पुरुषोता उकारमें लयकरे तदनन्तर प्रणवका द्वितीयवर्ण तेजस संज्ञक र उकारको) पिछले अक्षर मकार बिपे लयर। तदनन्तर पुनः प्राज्ञसंज्ञक कारण मकार को भी इसपर चैतन्यवन प्रात्माविष विलीनकरे | तदनन्तर ] सोमैं सर्वकाल नित्य मुक्त विज्ञान दृष्टि उपाधिसे रहित निर्मल परब्रह्म हौं [ ऐसी निश्चय भावनाकरे ] ॥ हे प्रियदर्शन! जो बुद्धिमान् साधन सम्पन्न मुमुक्षु पुरुप है सौ आत्मदेवकी प्राप्ति के अर्थ यह बिचारकरे कि अनेकप्रकार"नानारूपसे स्थित विश्व संज्ञक अकार पुरुष को उकार विलीन करे। तदनन्तर अंकार का द्वितीय-अक्षर जो संक्ष्म तैस' संज्ञक उकार तिसको भी कि जिसविपे प्रथम विश्व अकार पुरुषको लीनकिया है । प्रणव के अन्तिम अक्षर मकार विप लीनर । पुनः तिसके अनन्तर प्राज्ञसंज्ञक कारण मकार कोभी इस सबसेपर चैतन्य घनशात्मा विषे लीनकर इस प्रकार मात्राओं के लय चितवनकै अनन्तर, सो सर्वाधिष्ठान कि जिसंवि उक्त समष्टि व्यष्टिस्यूल सक्षपसर्व प्रपंचमात्रा अभ्यस्त (अविद्या कर हे कल्पित), सो मैं सर्वकाल' मांडूक्योपनिषद् । नित्यमुक्त सर्वज्ञ विज्ञान दृष्टि सर्व उपाधिसे रहित शुद्धनिर्मल प्रकृतिम पर साक्षात् निर्विशेष ब्रह्महो । तथाच ॥ अयमात्मा ब्रह्मा शुद्धमपापविद्धम् । " शिवमद्वैतं चतुर्थ मन्यते सआत्मा सविज्ञेय । सआत्मा तत्वमसि ।। अहंब्रह्मास्मीति । इ. त्यादि श्रुतियों के प्रमाणसे अहंब्रह्म भावनाविपे,प्रत्यादृढ़करके सर्व उपाधिके अभावसे निर्विकार निराकार अपने आप आत्मा को प्राप्तहोवे।-॥हे सोम्य! यह कही जोमात्राओं की लीनता तिसको व्यष्टि समष्टि की एकतासे पुनः सविस्तर करते हैं, हे प्रियदर्शन प्रथम कहा कि अकार जो प्रथम मात्रा तिसको उकार रूप द्वितीय मात्राविपे लयकरे, निसका अर्थ यह है जो अकार जागतरूप जगत् हे अम विश्न तिसका अभिमानी है, तिसको श्वानर भी कहते हैं, अरु वा उसका देवता है, अरु सत्त्वगुणहे । ऐसी जो प्रथम अफार मात्रा तिमको उकारसक्षम तेजसरुपजानो । अर्थात् जाग्रत् जगत्को सूक्ष्मस्वप्नरूपजानो, क्योंकि स्वमही अपने तीन संवेगकरके जामतपहो भासताहे जैसेसनसोयाहुआ पुम्प स्सनकोदेग्वता तिसके तीनसंगसे- ही विनाजायन्के प्रातहुये उठके चल देता है, अम् भून संज्ञाको प्राप्तहुये जानत अरु म्यमयी स्मृतिमात्र नुल्यो ताते जाग्रत जगत को सप्तरुप जानो । अरु स्थल जाप्रदभिमानीतो लक्ष्मस्त्रमामिल मानीनजस का स्वरूपजाना क्योंकि जैसम्बनतीन संग करके जाग्रतरूपहो भासताह तेने तिसस्थानका अभिमानी जाप्रतका अ- भिमानीही भाप्तताहे ताते । अरु ब्रह्मा जो स्थल जाप्रत जगनका देवताहे तिनको सक्ष्सनम जगतमा देवता जो विनितही काम्प जानो ययौषि सूक्ष्मसेस्थूल अरु विष्णुमे ममापुगे । र्थात् यह जोरथम जान जगह मोमुत्सम्बनाप । अरुजामद- भिमानी विश्वको प्रमाभिमानी जमरूपत्रानो अरु प्रामाको विगारुप जानो। इस प्रसारक चिन्नमनने प्रथम अपारमा दिनीय उतार मात्रा पिप लयारो । म यह जो सार सन्म संग्रह प्रकरण। ३७६ मात्रा कि जिसविषे स्थूल अकार मात्रा लीनहुई है उस उकार मात्राको मकार मात्रा विषे लीनकरो अर्थात् सूक्ष्म, स्वप्न जगत् को सुषुप्तिरूपजांनो, अरु स्वभाभिमानी तैजसको सुपुप्त्यभिमा- नी प्राज्ञरूप जानो, अरु विष्णु 'जो सक्षमका देवता है तिसको कारणका देवता रुद्ररूप जानो । अर्थात् . स्वप्न सुपुतिरूपही है, अरु तैजस प्राज्ञरूप है, अरु विष्णरुद्र रूप है। इस प्रकारके चिन्तवनर्से सूक्ष्म उकार को कारण मकार विपे लीनकरे। अब कारण मकार जो तृतीय मात्रा है तिसको भी अमात्रिक रूप परमात्मा विषे लयंकरो। अर्थात् सर्व 'परमात्म रूपही जानो तथाच सर्व खल्विदंब्रह्म । ॐकार एवंदसर्व नौवेद सर्व पुरुपएंवेदंसर्वम् । आत्मैवेदं सर्वम् ।। अहमेवेदं सर्वम् ।। वासुदेवः सर्वमिति । मत्तः, परतरन्नान्यत् किंचि- दस्तिा इत्यादि श्रुतिस्मृतियोंके प्रमाणसे यह सर्व अध्यस्तप्रपंच अपना अधिष्ठान परमार्म वरूपही है क्योंकि अंध्यस्तकी अधि- छानसे पृथक्सत्ताका अभावहै । अर्थात् यह जानरूप स्थल जगत् संयुक्त स्थूल शरीर असें विश्व इसका अभिमानी अरु ब्रह्मादेवता, इन सर्वको सक्ष्मउकारविसे लीनकरो तहां इसप्रकार जानो जो उकार रूप सूक्ष्म स्वग्न सम्पूर्ण लिंगशरीरोंका अभिमानी तेजस विष्णुदेव हिरण्यगर्भ है तिससे सम्पूर्ण स्थलशरीर विरोट् पुरुष ब्रह्मादेवता जामदवस्थाफुरी है ताते यह सर्वयोहीरूप है । इसप्रकार के विचारसे अकारमात्रा स्थलजगतको सूक्ष्म उकाररूप जानो। अरु जो सूक्ष्म उकार मात्रा है, तिसको कारण मकार मात्रारूप जानो । अर्थात् सर्व कारण शरीर सपुप्ति अवस्था अरुं तिसका अभिमानी प्रासं,अरु रुद्र देवता सर्वका कारण अव्याकृत तिसते सुक्ष्म शरीर स्वप्नावस्था तिसका अभिमानी तेजस तिनं सर्वकी समष्टिताका अभिमानी जो हिरण्यगर्भ सो फुरा है। तथाच । "अव्याकृत वा इदमनासीत् ।" हिरण्यगर्भो जायमानः इन श्रुति वाक्योंकी ऐक्यतासे । ताते स्थूल सूक्ष्म सर्व कार्य, कारण . ३८० मांडूक्योपनिषद्। अव्यक्त रूपहै । तथाच." अव्यक्तादीनि भूतानि गीतोक्तिप्रमा- णरो। ऐसी जे सर्वका कारण मकारमात्रा । अर्थात् समस्तव्यष्टि कारण शरीरों की समष्टिता अव्याकृत,अरु समस्त सुपुप्ति अव- स्थाकी समष्टिना अविद्या अरु.सम्पूर्ण सुपुप्त्यभिमानी-प्राज्ञ की, समष्टिता रुद्रदेवता, यह सर्व कारणरूप मकार मात्रा, सो अर्द्ध मात्रारूप, अर्थात् अमात्रिक परमात्मा चैतन्यधन निर्विशेष सर्वा- विष्टान आत्मासेही फुरेहैं, ताते आदिकारण प्रकृति अरु तिसका कार्य स्थूल सूक्ष्म सम्पूर्ण जगतरूपसे एक परमात्माही प्रका- शित है अर्थात् अस्ति भाति प्रियरूपसे एक परमात्माही सुशो- भित है, तिससे इत्तर द्वैत कुछभीनहीं। तथाच सिद्धिदं सर्वम्।। "चिद्धिदंसर्वम् । " पुरुपएवेदं सर्वम् ? " ब्रह्मैवेद-विश्वमिदं वरिष्ठम् । । मायामात्रमिदद्वैत । नेहनानास्ति किंचन " इत्यादि श्रुतिके प्रमाणसे सर्व ब्रह्मरूपही है । हे प्रियदर्शन! इस प्रकारके विचारसे ,अकार, उकार, मकार, यह तीनमात्रा, रूप स्थूल सूक्ष्म कारणरूप प्रपंच है अकारका लक्ष्य परमात्म, रुप ही है, अरु सो परमात्मा अज है एतदर्थ यो कार्यरूपसे जन्मभाव को प्राप्तहोता नहीं किन्तु सर्वाधिष्ठान होनेसे सर्व रूपसे सुशो- मितहै, जैसे सीपि रजतरूप कार्य भावको प्राप्तहुये विनाही अपने स्वभावकरके रजतरूप से सुशोभित है सोभी शुक्ति के अज्ञान पर्यन्तही है, ज्ञान हुये रजत कहनेमात्र को भी नहीं तैसेही एक परमात्माही कार्यभाव को न प्राप्तहोयके जगतरूपसे सुशोमित है हुआ कुछनहीं. एक अद्वेत चिन्मात्र सत्ताही हे निससे इतर एक परमाणुमात्र भी नहीं जैसे जलसे इतर समुद्र अम तहत लहर झाग वुधुढादि कुछभी नहीं,जैसे अग्निसे भिन्न दाहकता उष्णता प्रकाशक्तादि कुछ नहीं, था जैसे घायुसे भिन्न स्पंदना निस्पंदता नहीं, जैसे आकाशसे इतर शून्यता नीलिमादि कुछ नहीं, सही ॐकार के लक्ष्य परमात्मा से इतर चाच्यरूप-ज- गत कुछ नहीं, अरु.इतरवत्-भामता है सोई भ्रान्ति वा उसकी - .
1 संग्रह प्रकरण स्वभावभूत माया है। हे प्रियदर्शत ! यहाँ जो परमात्मा के विषे स्तभाव वा माया कही है तिसकरके सांख्यवत् गृथक् प्रकृति का ग्रहण नहीं क्योकि " अव्यक्तात्पुरुषः परः। अव्याकृत कहिये प्रतिसे-पर कहिये श्रेष्ठ है कार्यभाव को न: प्राप्त होने से ताते सांख्यमत कल्पित, प्रकृतिवत् स्वभाव को न ग्रहण करके पर- मात्माका-जो सर्व से विलक्षण भावहै सोई उसका स्वभाव जा. नना,जैसे मरुस्थल वा अपर पृथ्वीको जो पृथ्वीके अन्यदेश भाव से, विलक्षणपना है-सोई उसका स्वभाव (अपनेआप होनी) है तिप्त अपने स्वभावाकरके वो पृथ्वी तरंगादिकों सहित जलरूप हो भासती है परन्तु जलरूप होती नहीं,तैसेही चैतन्यतत्व पर- मामाका-जो सर्व से विलक्षण अपनेआप चैतन्य भावरूप स्व- भाव है,सोई-उसकी-अभिन्न माया.है, तिस अपना, स्वभावाव मायाकरके वो,परमात्मा कार्यकारणात्मक स्थूल सूक्ष्म चराचर जगतरूपहो भासता है हुआ कुछनही,असें बिनाही हुये जो नाना प्रपंच हुयेपत् भासता है सोई उसकी अघटघटनापटीयसी, उक्त माया है, अतएव-एक अद्वैत चिन्मात्र तत्व जो ॐकार का लक्ष्य है तिससे इतरवाच्य नहीं, वाच्य अरु वाचक सर्व परमात्मतत्व ही है। ताते हे प्रियदर्शन ! सम्पूर्ण जगत् को उक्तप्रकारसे एक ॐकार का लक्ष्य परमात्मरूप जानके मुमुक्षुपुरुष अपने मोक्षार्थ निर्विकल्प-समाधि (निर्विशेष आत्मस्वरूपस्थिति) के अर्थ उक्त प्रकार ॐकारोपासना को शमादि साधन पूर्वक शास्त्रप्रमाण से आलम्बन (आश्रय)करे।हे सौम्य इस फारोपासनासे इतरया: वत्-उपासना सोसर्व ॐकारफी अंगभूत उपासना,अरु ॐका- रकी-जो उपासनाहै-सो अंगीउपासना है। अर्थात् ब्रह्मकी उपासना में ॐकारमे इतरजो उपासना है तो सर्वगौणउपासनाहै, अरु कारकी जो उपासना है सो मुख्य उपासना है, अरु परमात्मा के नामों मे जो अंकारनामह सोमुख्यनामहे अरु और जे नामहसों, गौणनामहैं, क्योंकि गुणों के सम्बन्प्रसे हैं जिसे सूर्यकेकर्ता ई- - मांडूक्योपनिषद् । श्वर आदिक जे नाम हैं सों गुणों के सम्बन्ध करके गौणहै। अरु भानु जो नाम है सो मुख्य स्वाभाविकनाम है । अथवा देवदत्त विषे ,जे, पिता पुत्र भ्राता आदिक नाम हैं सो गौण हैं, अर्थात् गुण सम्बन्धसे कल्पित है, अरु पुरुष जो नाम है सो स्वाभाविक मुख्य नामहै । तैसेही परमात्माका जो ॐकारनाम है 'सो मुख्य नाम है, ताते ॐकारकी जो उपासना है सो प्रतीकोपासना की रीतिसे त्रिमात्रिक वाच्य की अरु अहम उपासना की रीतिसे अमात्रिक लक्ष्य परमात्मा की मुख्योपासना है, अतएव सर्व उपासनाओं में श्रेष्ठ एक प्रणवोपासना है अन्य नहीं । सो ॐ. कार ब्रह्मरूप है, तहाँ एक अपर त्रिमात्रिक शब्द ब्रह्म है एकपर- ब्रह्म है। तहां जो मन बुद्धि इन्द्रियादिकों करके जानने "विपे आवता है अर्थात् जो मन इन्द्रियादिकों का विषय है सो सर्व अर्थरूप होनेसे शब्द ब्रह्मके अन्तर्गत है क्योंकि किसी शब्दका अर्थरूपही है अरु सोई ॐकारका वाच्य है । अरु जो मन बुद्धि इन्द्रियादिकों का विपयन होत सन्ते सर्वका प्रकाशक साक्षी विज्ञानधन चैतन्य आत्माहे सोई ॐकारकालक्ष्य परब्रह्महे, तिस लक्ष्य रूपकी जो उपासनाहै सो निरालम्वन होनेसे वाच्यरूप ॐकारके आलम्बनसे होती है | जैसे मनकी चा जीवात्मा की जो सन्तुष्टता प्रसन्नता होती है सो गरीरके लालन पालनरूप आलम्बनद्वाराही होती है तैसे । अतएव जिज्ञास ममक्ष पुरुप अपने आप सत्यस्वरूप आत्मदेव की प्राप्तिके अर्थ कार की उपासनाकरे, यही उपासना सर्ववेदोंने कही है । तथाच सिमें वेदा यत्पदमामनन्ति तपामि सर्वाणि च यद्वदन्ति यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यञ्चरन्ति तत्तेपदं संग्रहेण बनीम्योम् । ओमित्येनद- क्षरमुद्गीथमुपासीत । इत्यादिक अनेक श्रुतियों ने मुमक्षके मोक्षार्थ एक प्रणवोपामनाही मुग्न्य करके कहा है, अतएव मोक्षार्थी को अपने मोक्षार्थ एक ॐकारोपासना को आलम्बन करना श्रेय है । तथाच पनदालम्बनंश्रेष्टमेनदालम्वनंपरम -- संग्रह प्रकरण ३-३ एतदालम्बनंज्ञात्वाब्रह्मलोकेमहीयते । इत्यादिश्रुतिप्रमाणसे। अरु मुमुक्षुके प्रयोजनार्थ यह प्रणवोपासनाही सर्वसे मुख्य है और नहीं, एतदर्थहे प्रियदर्शन! जो तुमकोमोक्षहोने की इच्छाहैं तो उक्तं प्रकार प्रणवोपासनाकरो, अंरु'यह जो रामगीता के ४८,४६, ५०, ५१, इनचारश्लोक करके प्रणवीपासना तुम्हारे प्रतिकहाहै सो श्रीभगवान् रामचन्द्रजीने अपने प्रियभ्राता जि- ज्ञासुलक्ष्मणजी प्रतिकहाहै, अंरु यह मांडूक्योपनिषद् के अनुसार ही कहा है, 'ताते श्रुति स्मृति पुराणादिकों के प्रमाणसे मुमु- क्षुको परमश्रेय (मोक्ष) प्राप्तिके अर्थ एकप्रणवोपासना को ही यथाशास्त्र आलम्बन करना योग्यहै, आगे, यथेच्छसितथाकुरु। शिष्यउवाच॥ हे कृपासागर ! हे गुरो! आपने जो मुमुक्ष को मोक्ष प्राप्तिके अर्थ सर्वोत्तम आलम्बनरूपाप्रणवोपासना कही सो निर्विकल्प समाधि ( आत्मरूपस्थिति) से पूर्व मुमुक्षु करके अवश्यही कर्तव्य है अतएव अबाआप कृपाकरके इस प्रणवोन पासना का क्रम कृपाकरके कहिये । । श्रीगुरुरुवाच ।। हे प्रियदर्शन ! ॐकार जो एक अक्षर है तिस का जपंकरना अरु इसके अर्थकी भावना करनातथाच ति- उजतदर्थभावनम् । यह पातंजल शास्त्रके प्रथम पाद का २८ वां सूत्र है तिसके प्रमाणसे, ॐइस अक्षर का जप अंरु इसके अर्थ की भावना करनी तिसका नामउिपासना है। अब तिसका प्रकार सावधान होय के श्रवण करोॐकार नाम है परमेश्वर का तिसका जपंकरना तहां कोई पुरुष तो ओम, ओम्, ओम्, इसप्रकार सहित स्वरके उच्चार करते हैं, अरु कोही एकपुरुषहोठ अरुजिह्वा को न हिलायके इसकान्मनोमय जप करते हैं, अरु कोई एक पुरुष प्राणायामद्वारा जपकरते हैं, सो प्राणायाम इस प्रकारते हैं कि प्रथम पूरक, अर्थात् मुख बन्दकरके नासिका के घामछिद्र को दक्षिणहाथ की मध्यमा अरु अनामिकायेदोनों अंगु- लीसों , दयाय नासिका के छिद्रके मार्ग चाह्यसे अन्तर को - मांडूक्योपनिषद् । खींचना इसका नाम पूरक हैं। पश्चात् उस छिद्र कोभी अंगूठी सों दवाय वन्दकर प्राण को अन्तर रोकना तिसका नीम कुंभक हैं, अरु जेवाप्राण न रुके तव नासिका का. बामछिद्र खोल उस मार्ग से धीरेधीरे प्राण.को बाहर छोड़ना इसका नाम रेचक है तहां प्राण का जो पूरक है तिसविपे कार का ३२ घार मनो- मर्य उच्चार करना, अरु कुंभकविषे अकार को ६ वार उच्चार करना, अरु रेचकविषे १६ वार अंकार का उच्चार करना। इस प्रकार एकबार पूरैक कुंभक रेचक करने से एक प्राणायाम हो- ता है । सो इसप्रकारके प्राणायाम जितने होयसकें तेतने करना इनके अभ्यास करने से प्राणवायु वंश अरु पापों का नाश होता है एतदर्थ कोई एक पुरुष उक्तप्रकार के प्राणायामोद्दारा ॐकार को जपकरते हैं । अरु कोई एक पुरुष इसप्रकार भी करते हैं कि ॐकारकी जो अकार, उकार, मकार, यह तीनमाना तिनको क्रमशः इस्त्र, दीर्घ, प्लुत, रुप स्वरसहित ॐकारकाउच्चारकरते हैं, सो मूलाधारसे मस्तकके ब्रह्मरंध्र पर्यन्त ध्वनिको प्राप्तहोतेहैं। इत्यादि अनेकप्रकारं प्रणवके 'जपके हैं, तिनमें से जिसप्रेकार अपनेसे श्रद्धासहित होताजाने तिसप्रकार करे।यह तो कारके जपकरनेका कूम संक्षेपमान तुमसेकहा।।अबइस कारकेअर्थकी भावना भीश्रवणकरो। हे प्रियदर्शनकारके अर्थकी जोभावना करनी है सो दो प्रकार की हे तहां एक सगुणा धान्यरूप अरु द्वितीय निर्गण लक्ष्यरूप, तहां जो सप्त सिद्धान्तकारोंके मतमे१३ तिरसठि नामरूप भेद करके कही है ,सो अरु कारके मात्रा ऋपि,छन्द देवता आदि ६६ छियासट भेदसे कही है सो। अ. थवा जो एक मात्रासेलेके,३८, १६, ५२, ६३, ६४,मात्रापर्यन्त कही है सो, इन तीनों प्रकार से जो कारन के अर्थनी भावना कही है सो कारके वाच्य सगुण नमकी भावना है। अरु ॐकारके लक्ष्य निर्गुण ब्रह्म की भावना प्रणवोपासक इम प्रकार करते हैं कि जिस कार बमकी हम उपासना करते हैं -- - संग्रह प्रकरण ३८५ तिस त्रिमात्रिक अपरब्रह्म रूप प्रणव शब्दका वीच्य तिसका जो ज्ञाता प्रकाशक साक्षी सर्वाधिष्ठान सच्चिदानन्द स्वरूपलक्षणवान् परमं आत्माहे, सोई सर्वत्र, सर्व, अस्ति, भाति, प्रियरूप होके व्याप्त होरहाहै, तहां अस्ति कहिये यह है, यह है , यहहै, इसप्र- कार से है है है यह अस्तिं सत्तारूप जोव्याप्त होरही है, असें जोकि यह नहीं, यह नहीं, यह नहीं, इसप्रकार सर्व निषेध के अन्त में निषेध के भावका प्रकाशेक कि जिस करके अस्ति नास्ति सिद्ध होते.हैं, अरु अस्ति नास्ति शब्दके अर्थ के अनुभवका आश्रय कि जिसविषे अनुभव होता है । अरु जो अस्ति नास्ति भावनारूप कल्पना का आश्रय आदि अन्त अवशेष है अरु अस्ति नास्ति आदिक कल्पना का अधिष्ठान परम,अस्ति रूप सत्ता हे, सोई अपने पूर्वोक्त स्वभाव करके अस्ति नास्ति' भावाभाव रूप का आश्य हुआ सुशोभितहै ताते वोही सर्वाधिष्ठान सत्ता सर्वरूप से सुशोभित है।। अरु भाति कहिये जो प्रकाशताहै अर्थात जो पदार्थ भासता.है सो भातिरूपरु है, क्योंकि एक दूसरेको प्रका- शता है, जैसे अन्धकार के अभावको प्रकाश प्रकाशता है, अथवा रात्रिके अभावको दिवस प्रकाशता है जो इसरामय रात्रिका अ. न्धकार का अभाव है। अरु दिवस किंवा प्रकाश में रात्रि किंवा अन्धकार का अभाव है, सो दिवस किंवा प्रकाश में जो अपने अभावरूप से रात्रि किंवा प्रकाश सो अपने अभावरूप से दिवस किंवा प्रकाशके भावको प्रकाशे है, क्योंकि जो कदापि उस दिवस किंवा प्रकाशक भावकालमें रात्रि किंवा अन्धकारका अभावरूप अस्तित्व न होता तो इसकाल में दिवस किंवा, प्रकाश है, इस प्रकार दिवस किंवा प्रकाश के अस्तित्वको प्रकशता कौन । ताते अभाव रूप हुये रात्रि किंवा प्रकाश, सो दिवस किंवा प्रकाशके भावको प्रकाशते हैं। अथवा दीपकजोप्रकाशरूप है सोअप्रका- शरूप घटपटादि पदायोंको प्रकाशता है, तैसेही अप्रकाशरूप घ- टपटादि पदार्थ सो आप अप्रकाश रुपहोतसन्ते भी प्रकाश प , ३८६ मांडूक्योपनिषद् । दीपकको वा दीपक्की प्रकाशरूपताको सिद्धकरे हैं, क्योंकि जो कदापि अप्रकाश रूप घटपटादि पदार्थ न होता तो दीपकप्रका- शारूप है इसप्रकार दीपककी प्रकाशरूपता कैसे सिद्ध होती वा किस आधारसे सिद्ध होती अतएव अप्रकाश रूप घटपटादि प- दार्थ दीपककी प्रकाशरूपताको प्रकाशे है । हे प्रियदर्शन ! उक्त प्रकार भाव अभाव प्रकाश अप्रकाश आदिक यावत् भूत भौतिक कार्य कारणात्मक पदार्थ हैं सो सर्व भातिरूप हैं, अतएव अस्ति- मात्र स्वयं प्रकाश निर्विशेष सर्वाधिष्ठान आत्मसत्ता है सोई उ. प्रकार अस्ति भातिरूपसे सुशोभित है । तथाच तस्य भासा सर्वमिदं विभाति । अरु प्रिय कहते हैं आनन्दको क्योकि सब को आनन्दही प्रिय हे, सो आनन्दरूप ब्रह्म है सोई सर्वत्र सर्व- रूप से व्याप्त है अतएव सनही आनन्द रूपहै।ताते जो कछुक- तिव्य अकर्तव्य गुण दोष पाप पुण्य राग द्वेप ग्रहण त्याग, इ- त्यादिहै सो सर्व आनन्द रूपही है क्योंकि जिसमें जिसको आन- न्द भासता है सोई वो करता है, अरु जो कोई शुभाशुभ करता है सोसर्व आनन्दके अर्थही करताहै। अरु जो कोई जो कुछकरता हे उसको उसही में आनन्द होता है क्योंकि जोउसको उसमेंआ- नन्द न होय तो कोई कुछ भी न करे। अरु जो जिम आनन्दके अर्थ प्रहण त्याग शुभ अशुभ आदिक करतेहें सो आपहीपरमा- . गन्द रूप है, अरु सोई सानन्द हुआ है । तथाच । आनन्दा घेवखलियमानिभूतानि जायन्ते। इत्यादि भृगुगल्लीकी श्रुतिप्रमा- णसे। अतएव जहां है जो सोसर्वआगन्दरीह।इसप्रकार केवल अद्वितीय निराकार निर्विकार सर्वाधिष्ठान सच्चिदानन्द नाही इसप्रकार अस्ति भातिप्रियरूप होरर मुशोभित होरहाताने ॐकार पदसर्वम्। सर्व खल्विदंत्रम नेहनानाम्नि कि- चन मी ॐकार नही है निमसे इतर रंचकमात्र भी नहीं। इसप्रकार अधार के लक्ष्य निर्गुण ब्रामकी भावनारुप उपासना करते हैं, भाग्ना कहिये मोहभाव से निदिध्यासन करते हैं।
-- । . संग्रह प्रकरण। ३८७ प्रियदर्शन ! उक्तप्रकार ॐकारका जप अरु तिसके अर्थकी भावना करनी, जोप्रत्यक् चैतन्य सर्वका अन्तर्यामि सर्वअवस्थाका साक्षी अखंड अज अविनाश चेतन्य ब्रह्म सो मेंहीं, इसप्रकार जब अपना आप साक्षात् अनुभव अभ्यास करता है तब तिसके जे अन्तराय विघ्न हैं सोसर्व अभाव होजाते हैं। तथाच तितःप्रत्यक् चैतन्या- धिगमोप्यंतराया भावश्च । यह पातञ्जल शास्त्र के प्रथमपाद का २६ सूत्र प्रमाण है। ; शिष्यउवाच ॥ वो निर्विकल्प समाधि में विघ्नकरनेवाले अ. न्तराय कौन कौन हैं सोभी आप कृपाकर कहिये ।। श्रीगुरुरुवाच ॥ हे प्रियदर्शन ! अन्तराय विघ्नों के नाम अरु स्वरूप पातञ्जलशास्त्र के ३०,३१, दो सूत्रों करके कहे हैं तिनको भी अब सावधान होय श्रवणकरो "व्याधिस्थान संशय प्रमादा- लस्याविरतिभ्रान्ति दर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्त विक्षेपास्तेऽन्तरायाः। ३० । दुःखदौमनस्यांगमेजयत्वश्वासप्र- श्वासा विक्षेप सह भुवः। ३९ व्याधि, स्यान , संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति,भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभमिकत्व, अनवस्थि. तत्व । दुःख, दौमनस्य, अंगमेजयत, श्वास प्रयास, ॥ यह च. तुर्दश१४ आवान्तरविघ्न समाधिमें चित्त को विक्षेप करनेवाले हैं। अव इनके स्वरूप श्रवणकरो ,व्याधि उसको कहते हैं कि जो उदरस्थ अन्नरस धातु है सो कफ, वात, पित्त, इनके क्षोभ से बिगड़ता है तब उस धातु के विषम होने से जरादि व्याधि होती है तिसका नाम व्याधि है १ अरु ,स्यान, उसको कहते है जो चित्तको अकर्मण्यता है, अर्थात् शुभकर्म प्राणायामादि, विपे चित्तका न प्रवर्तहोना तिसका नाम , स्यान, है २१अरु. संशय, उसको कहते हैं जो ईश्वर है या नहीं अरु जो है तो ज्ञानयोग से साध्य है वानहीं,अर्थात् ज्ञानयोगाभ्यास से सो प्राप्तहोना वा नहीं, इसप्रकार की जो भावना तिसका नाम संशय है ३ अरु, प्रमाद, उसको कहते हैं कि समाधि के यम नियमादि सा .
३८६ 'मांडूक्योपनिषद् । दीपकको वा दीपक्की प्रकाशरूपता को सिद्धकरे हैं, क्योंकि जो कदापि अप्रकाश रूप घटपटादि पदार्थ न होता तो दीपकप्रका. शरूप है इसप्रकार दीपककी प्रकाशरूपता कैसे सिद्ध होती वा किस आधारसे सिद्ध होती अतएव अप्रकाश रूप घटपटादि प- दार्थ दीपककी प्रकाशरूपताको प्रकाशे है । हे प्रियदर्शन ! उक्त प्रकार भाव अभाव प्रकाश अप्रकाश आदिक यावत् भूत भौतिक कार्य कारणात्मक पदार्थ हैं सो सर्व भातिरूप हैं, अतएव अस्ति- मात्र स्वयं प्रकाश निर्विशेष सर्वाधिष्ठान आत्मसत्ता है सोई उ- तप्रकार अस्ति भातिरूप से सुशोभित है । तथाच तस्य भासा सर्वमिदं विभाति । अरु प्रिय कहते हैं आनन्दको क्योंकि सव को आनन्दही प्रिय है, सो आनन्दरूप ब्रह्म है सोई सर्वत्र सर्व- रूप से व्याप्त है अतएव सर्वही आनन्द रूपहै। ताते जो कछु क- तिव्य अकर्तव्य गुण दोप पाप पुण्य राग द्वेप ग्रहण त्याग, इ- त्यादिहै सो सर्व आनन्द रूपही है क्योंकि जिसमें जिसको आन- न्द भासता है सोई वो करता है, अरु जो कोई शुभाशुभ करता है सो सर्व आनन्दके अर्थही करताहे । अरु जो कोई जो कुछकरता है उसको उसही में आनन्द होता है क्योंकि जोउसको उसमेंआ- नन्द न होय तो कोई कुछ भी न करे । अरु जो जिस आनन्दके अर्थ ग्रहण त्याग शुभ अशुभ आदिक करतेहैं सो आपही परमा. नन्द रूप है, अरु सोई सानन्द हुआ है । तथाच । आनन्दा येवखल्विमानिभूतानि जायन्ते। इत्यादि भृगुवल्लीकीश्रुतिप्रमा- णसे। अतएव जहां है जोहैसोसर्वआगन्दहीहै।इसप्रकार केवल अद्वितीय निराकार निर्विकार सर्वाधिष्ठान सच्चिदानन्द ब्रह्मही इसप्रकार अस्ति भातिप्रियरूप होकर सुशोभित होरहाहै । ताते कार एवेदसर्वम् सव्वं खल्विदंब्रह्म । नेहनानास्ति कि- चन सर्व ॐकार ब्रह्मही है तिससे इतर रंचकमान भी नहीं। इसप्रकार कार के लक्ष्य निर्गुण ब्रह्मकी भावनारूप उपासना करते हैं; भावना कहिये सोहंभाव से निदिध्यासन करते हैं। हे । * संग्रह प्रकरण। ३८७ प्रियदर्शन ! उक्तप्रकार ॐकारका जप अरु तिसके अर्थकी भावना करनी, जोप्रत्यक् चैतन्य सर्वका अन्तर्यामि सर्वअवस्थाका साक्षी अखंड अज अविनाश चैतन्य ब्रह्म सो मेंहीं, इसप्रकार जब अपना आप साक्षात् अनुभव अभ्यास करता है तब तिसके जे अन्तराय विघ्न हैं सोसर्व अभाव होजाते हैं। तथाच तितःप्रत्यक् चैतन्या- धिगमोप्यंतराया भावश्च । यह पातञ्जल शास्त्र के प्रथमपाद का २६ सूत्र प्रमाण है। शिष्यउवाच ॥ वो निर्विकल्प समाधि में विघ्नकरनेवाले अ- न्तराय कौन कौन हैं सोभी आप कृपाकर कहिये ।। श्रीगुरुरुवाच ॥ हे प्रियदर्शन ! अन्तरायविघ्नों के नाम अरु स्वरूप पातञ्जलशास्त्रे के ३०,३१, दो सूत्रों करके कहे हैं तिनको भी अब सावधान होय श्रवणकरो व्याधिस्यान संशय प्रमादा- लस्याविरति भ्रान्ति दर्शनालव्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्त विक्षेपास्तेऽन्तरायाः। ३० । दुःखदौमनस्यांगमेजयत्वश्वासप्र- श्वासा विक्षेप सह भुवः। ३१ व्याधि,स्यान , संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति ,भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभर्मिकत्व, अनवस्थि. तव ।दुःख, दौमनस्य, अंगमेजयत्त्र, श्वास प्रश्वास, ॥ यह च. तुर्दश १४ आवान्तरविघ्न समाधिमें चित्त को विक्षेप करनेवाले हैं। अब उनके स्वरूप श्रवणकरो .व्याधि उसको कहते हैं कि लो उदरस्थ अन्नरस धातु है सो , कफ, वात, पित्त, इनके क्षोभ से विगड़ता है तब उस धातु के विषम होने से परदि व्याधि होती है तिसका नाम व्याधि है १ ।
. मांडूक्योपनिषद् । धनोंविषेचित्तको उदासीनता होनी,तिसका नाम प्रमाद, है ४i अरु , आलस्य , उसको कहते हैं कि जो देह अरु चित्त का गु- स्वभाव होना, अर्थात् देह अरु चित्तका जो जड़वत् होरहना है सो ज्ञान में प्रवृत्ति के अभावका कारण है अतएव तिसको आ- लस्य कहते हैं, ५ अरू अविरति उसको कहते हैं जो विपयों के संयोगसे भोगकी इच्छाका होना, तिसका नाम, अविरति है ६ । अरु भ्रान्तिदर्शन, उसको कहते हैं कि जो विपर्यय ज्ञानदर्शन है अर्थात् जैसे सीपी विपेरूपे का भासना, तैसेही शुद्ध निस्क्रियादि लक्षणवान् आत्माविषे कर्तृत्व भोक्तृत्वादि अनात्म धर्मकाभा- सना, तिसका नाम भ्रान्तिदर्शन है ७। अरु, अलव्धभूमिकल, उसको कहते हैं कि जो ज्ञानकी शुभेच्छा,सुविचारणा, तनुमांसा, सत्यापत्ति, असंशक्ति, पदार्थाभावनि, अरु तुरीया, यह सप्तभू- मिका कही तिनमें से कोई भी भूमिका, अरु योगकी जो चित्त जो निरोधतारुपी एकाग्रता सो विसी विक्षेप के निमित्त से न प्राप्तहोनी तिसकानाम अलब्धभूमिकत्वहै ।अरु अनस्थि- तत्व, उसको कहते हैं जो ज्ञानकी उक्त भूमिका में से कोई एक प्राप्तहुई भूमिकाविपेभी चित्तकी स्थिरता न होनी तिसका नाम अनवस्थितत्वहै, ६। सौम्य! इसकहे प्रकार नवअन्तरायविघ्नहें अरु इनकेहोने से पांच ओर होते हैं तिनकोभी श्रवणकरो। दुश्म, उसको कहते हैं कि जो,आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिद- विक, यह जो तीनप्रकारके दुःस तिनकानाम दुःय हे १०1 अरु दौमनस्य, उसको कहते हैं कि जो अन्तर चाय कोई भी कारणों करके चित्तकी रिक्षेपता, अर्थात् चित्तकी असमानता, निमका नाम दोमनम्य हे ११अ अनमे जयरन, उमको कहने हें किजो गेगादिसे शरीरकापना १२ अ.सास, उमयों पहने हैं जो प्राणकाजी शीम चलना या मुग्पनासिकाके मार्ग यायका जाना, तिसमानानवासह १३अम.प्रधान, उनसे कहते जोप्रागसपायजन्तर आरना है, निमरा नाम प्रधान ६ ।। .
संग्रह प्रकरणी "हे सौम्य ! यह जो १४ चतुर्दश विघ्न कहे हैं सोचित्तको वि. क्षेप करके आत्मलाभार्थ जे समाधि तिस बिषे विघ्नके कर्ता हैं तित्प्रतिषेधार्थमेतत्वाभ्यासः । तिसकी निवृत्ति के अर्थ ए- कत्वेका अभ्यासकरे, अर्थात् उक्त विघ्नों के अभावकरने के अर्थ अरु आत्मदेवकी साक्षात् प्राप्तिके अर्थ कार ब्रह्मके अर्थ भा. वना अरु जप निर्जन एकान्त पवित्र देशविषे स्थितहोय यम नि- यमादि योगांग साधन पर्वक करे । जे कोई कारके वाच्य की उगसना करते हैं अर्थात त्रिमात्रिक प्रणवोपासना करते हैं, तिन केजे निर्विकल्प समाधि में विक्षेपकर्ता विघ्न हैं तो सर्व अभाव होजाते हैं, अरु वो उपासक समाधि विचारद्वारा सर्व वन्धनों से रहितहुआ अपनेआप चैतन्य स्वरूप आत्मा ब्रह्ममेंअभेद स्थिति पाय मोक्ष होता है। • हे सौम्य ! यह जो निमात्रिक ॐकारका लक्ष्य आत्माहै तिस को सर्व उपनिषद चिन्मात्र ब्रह्मकरके कहते हैं । अयमात्माब्रह्म। जो मन बुद्धि इन्द्रियादिकों का अविषय है तिसको नेति नेति, इत्यादि श्रुतिके निषेध मुख वाक्यों करके सर्व विशेषताके अभा- वसे निर्विशेष सर्वका अपना आप लक्ष्य करावे हैं, अतएव यही चैतन्य आत्मा अक्षर ब्रहाहै । अरु इसही को बृहदारण्यक उप- निषद्विपे भगवान् याज्ञवल्स्यजीने गार्गिके प्रति निर्विशेष अक्षर- ब्रह्म कहा है। तथाच। सहोवाचैतदक्षरं गार्गिवाह्मणा अभिवद- न्स्यस्थूलमनएव स्वमदीर्घमलोहितमस्नेहमच्छायमतमोऽत्राव नाकाशमसमरसमगन्धमचक्षुमश्रोत्रमवागमनोऽतेजस्कमप्राण ममुखममात्रमनन्तरमबाह्य न तदनाति 'किञ्चन न तदनाति कश्चन । अर्थ याज्ञवल्क्य. कहते हैं कि हे गार्गी ! जिसके विपेतू प्रश्न करती हतिसको ब्राह्मण (ब्रह्मवेत्ता) अक्षर कहते हैं। प्रश्न । हे याज्ञवल्क्य ! उस वचनातीतको ब्राह्मण अक्षर कैसे कहते हैं वो तो वाणीआदिक किसीका भी विषय नहीं। उत्तरी हे गार्गी! उसको ब्राह्मण ऐसा कहते हैं कि वो स्थूल नहीं अस्थूल ।
- , मुखा- मांडूक्योपनिषद् । है, तो सूक्ष्म होगा, वो असूक्ष्म है, तो छोटाहोगा, वा अहस्व है, तो दीघहोगा,.वो अंदीर्घ है इसप्रकार वो द्रव्योंके धर्मसे रहितं अद्रव्य है । 'तो वो लोहित गुणवान्दोगा, वो अग्नि आदिकों के लोहितादि गुण रहित है. ताते. अलोहित है तो वो स्नेहादिक जल केधर्मवाला होगा, वो जलंके, स्नेहादि धर्म रहित अस्नेह है.'तो.वो छायाहोगा, वो अछाया है तो वो तमहोगा, वो अतम हैं 'तो वो वायुहोगा, वो अवायुहै तो वो आकाशहोगा, वोअना- काश है 'तो वो सर्वका.सद्धातहोगा, वो असंग है तो वो रस होगा, यो,अरंसहै तो वो गन्धहोगी 'तो वो अगंधहे 'तो वो चक्षु. प्मानहोगा, वो अचक्षुहे 'तो वो श्रोत्रहोगा,वो अश्रोत्र है तो वो वागहोगा, वो अवाग्रह 'तो वो मनहोगा, वो अमन है तो वोतेज होगा, वो अतेजह 'तो वोप्राणहोगा, वो अप्राण है 'तो वो दिद्वार होगा, वो द्वाररहित अमुखहै तोवो मात्राहोगा,वो अमात्र है, तो वो अन्तरहोगा, वो अनन्तर है, तो वो बाह्य होगा, वो अवाह्य है, अर्थात् वो न भोग्य है न भोक्ता है, सर्व विशेषणों से रहित निर्विशेपहे। हे गार्गी! इसप्रकार ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणों ने उस को निषेध मुख करके कहा है क्योंकि वो सर्व के निपेधकी अवधिहे ताते “ साकाष्टासापरागतिम् । सो इन विशेष सत्ता पराकाष्टा अरु मुमुक्षुओं की परागति हैं । हे सौम्य ! ऐसाजो परम अक्षरहे सोईवर्णात्मक अंकाररुप अक्षरका लक्ष्य परब्रह्म है, अरु सोई अक्षर सर्वका अन्तरात्मा होयके सर्वफाप्रेरकहे, उसहीकी आज्ञा से सूर्य चन्द्र पृथिवी आदिक अपनेअपने व्यापार में नियमपूर्वक प्रवर्त होरहे हैं उसअक्षर की जेसी जिसको आज्ञाह सोतसेही करता है, अरु सोई सर्व का नियामक स्वामी हे अतएव उसके किये नियमसे पाह्य वर्तने को कोई भी समर्थ नहीं। नमात्र "एतस्यना अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमस विधृतो निष्टतएतस्यया अक्षरस्य प्रशामने गार्गिद्यापाथिव्यांविधृतति प्ठतः ॥ एतस्य वा अक्षरस्सप्रशामने गार्गि निमेपा मुहनी अहो- - संग्रह प्रकरण- रात्राण्यर्द्धमाता मासा ऋतवः संवत्सराइति विधृतास्तिधन्त्ये तस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गिप्राच्योऽन्या नद्यः स्पन्दन्ते श्वे तेभ्यः पर्वतेभ्यः प्रतीच्योऽन्यायां याञ्चदिश मन्वति॥ एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि ददतो मनुष्याः प्रशंसन्तियजमानंदे, वा दीपितरोऽन्वायत्ताः ॥ इत्यादि ।। हे सौम्य ! उक्त प्रकार जो सूर्यादि सर्वका नियामक प्रेरक स्वामी सर्वाधिष्ठान परम अक्षर ॐकारक लक्ष्यहै तिसकात्रिमात्रिक ॐकार प्रतीक अरु वाचकहै अतएव त्रिमात्रिक प्रणवके आलस्बन से'जो उस लक्ष्यरूपं परम अक्षरकी अभेद अहमये उपासना करताहै सोई ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण हे अरु सोई मोक्षको प्राप्त होता है। शिष्यउवाच ॥ हे गुरो ! हे भगवन् ! जिसअक्षरका आप ऐसा प्रभाव अरु प्रताप कहतेहौ। तिसको हम प्रत्यक्ष कैसे जाने सो , आप कृपाकर आज्ञा करिये ॥ गुरुरुवाच ॥ हे प्रियदर्शन ! ऐसा प्रश्न क्यों करतेहौं वो तो स. वका अपना आप प्रत्यगात्मा-है-अरु यही सर्वका अनुभवक- र्चा अनुभव रूप अक्षरहै, अरु यही सर्वका द्रष्टा श्रोता मन्ता वोद्धाहै इससे इतर न कोई द्रष्टाहै न श्रोताहै न मन्ता है न बों- द्धाहै, हे सौम्य ! ऐसा जो सर्वका ज्ञाता अनुभवी,अक्षरं आत्माहै सो तत्त्वमसि सो त है तेरा क्षय कदापि नहीं ताते सर्वका ज्ञाता तूही है तेराज्ञातो अन्य कोई नहीं, तूही चक्षुरादि सर्वका द्रष्टाहै तेरा द्रष्टा कोई नहीं, तूही सर्व का श्रोता है तेरा श्रोता अन्य कोई नहीं, तूही सर्वका मनन करता है तेरा मन्ता कोई नहीं, अरु तूही सर्वका विज्ञाता है तेरा विज्ञाता कोई नहीं, एवं सर्व क्षरोक्षर का ज्ञाता प्रकाशक अधिष्ठान परम अक्षर तूही है तू अपने आपको अनुभवकर ।। हे सौम्य ! यह जो सर्व वेद शास्रोद्वारा निर्णय करके निर्वि- शेष प्रत्यगात्मा अक्षर कहा है सोई वर्णात्मक त्रिमात्रिक . कार अक्षर का लक्ष्य निर्गुण ब्रह्म परम अक्षर है, अरु सोई अत "
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मांडक्योपनिषद् ।
सर्व का अपना आप प्रत्यगात्मा है इसही के सम्यक् ज्ञान से
मोक्ष होता है, ताते ॐकारके लक्ष्य प्रत्यगात्मा के जानने के
अर्थ त्रिमात्रिक ॐकार की जप-अरु अर्थ की भावना रूप उ.
पासना कर्तव्यःयोग्य है क्योंकि यह परब्रह्मकी आत्मत्वसे प्राप्ति
में परमोत्तम आलम्बन हैं। अतएव इसः त्रिमात्रिक ॐकारकी
यथा शास्त्र उपासनारूप आलम्बनसे अपने आप सत्यस्वरूप
आत्माको यथार्थ अनुभवं कर पराशान्तिको प्राप्तहोवो, आगे जो
तुम्हारी इच्छा ॥ ॥ इति ॥ RATE
इति श्रीमाण्डूक्योपनिषद्गौडपादीर्यकारिकाअरुक्षेपक
भाषा भाष्यकारकृतसंग्रहप्रकरणसंहिता समाप्ता.॥
अहरिः अंतत्सब्रह्मार्पणम् ॥
ॐशान्तिः शान्तिः शान्तिः ॐ ॥
४
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