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होसिल रहा तीन अनुवादक : योगेन्द्र चौधरी
हासिल
रहा
तीन
विमल मित्र
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गणित का पहाड़ । आंखों के आसू का पहाड़ हो सकता है तो गणित का • पहाड नहीं हो सकता क्या ? कम से कम रणवीर को तो यही प्रतीत होता है । इतने-इतने रुपयों का हिसाव करते-करते .पहाड़ के किस कोने मे वह पछाड़ खाकर गिर पडता है कि उसे कोई होश ही नहीं रहता । तब लाखो रुपये उस पर छलांग लगाकर कूद पड़ते हैं । रुपयों की लहरो में तब वह डूबने-उतराने लगता है। एक हिसाव ज्यो ही खत्म होता है कि दूसरा हिसाय उसके सर पर आकर सपार हो जाता है । तब उसकी सासें घुटने लगती हैं। उस दिन उसी तरह कुछेक वाउचर आकर उसके सर पर सवार हो गए। रणवीर उस वक्त नाश्ता करने जा रहा था। मैनेजर ने कहा, "नहीं ; इसकी जरूरत भाज ही है..." रुपयों की राशि पर दृष्टि पडते ही रणवीर चौंक पड़ा। सयको खत्म करने में कम से कम पांच-छह घण्टे लगेंगे । किनी दिन हिमाव करते-करते ही उसके पिता ने आखिरी सांस ली थी। आदमी के जीवन मे हिसाव का कोई अंत है ! दण्ड, पल, दिन, क्षण, मुहूर्त । हर दण्ड, हर पल रणवीर का पिता हिसाव किया करता था.: पाप का हिमाय, पुण्य का हिसाब, लेन और देन का हिसाव । हर रोज वह हिसाब से खर्च किया करता था। पिता को हमेशा यही भय बना रहता था कि आय की वनिश्वत कही व्यय को राशि ज्यादा न हो जाए। लेकिन यह जितना ही हिसाब करता हिसार के तल-प्रदेश में उतना ही खो जाया करता था। याद है, यहत बार आधी रात में रणवीर को नीद जब टूट जाती तो वह अपने बाप को फर्श पर बंटा, लालटेन की रोशनी में हिसाव के बारे में पोस हआ पाता।
मां को गुस्सा हो आता। वोलती, 'इतना तुम क्या हिसाव करते हो ?' बाबूजी कहते, 'हिसाव बगैर किए कहीं काम चल सकता है ! तुम लोग इतने- इतने प्राणी हो, खाभोगे क्या?' इस पर मां कुछ नहीं कहती थी। वह मन ही मन हंसती थी। बाबूजी समझ जाते थे और कहते थे, 'अभी वात तुम्हारी समझ में नहीं आ रही है। जब मैं मर जाऊंगा तब समझोगी. दुनिया के दूसरे-दूसरे आदमी जब आराम के साथ मौज से जीवन जीते थे तव बाबूजी हिसाव में तल्लीन रहते थे : एक के बाद दो, दो के बाद तीन, तीन के बाद चार । मगर रणवीर ने कभी ऐसा नहीं पाया कि बाबूजी का हिसाव मिल गया हो। वावूजी का हिसाब हालांकि कभी मिलता नहीं था लेकिन मिलाने के लिए वह प्राणपण से कितनी ही कोशिशें करते थे ! वाबूजी बीच-बीच में ऊबकर मां से कहते थे, 'जानती हो, कल हिसाब नहीं मिला.... जिस तरह बाबूजी का हिसाव नहीं मिलता था, मां का हिसाब भी कभी मिलता था ? मां का भी अपना एक हिसाव था । छुटपन से बड़े होने तक मां को भी बहुत सारा हिसाब-किताब करना पड़ा है। मां ने हिसाव करके किसी दिन इसकी चाह की थी कि बड़े घर में उसकी शादी होगी, एक बड़े परिवार की वह गृहिणी होगी, विख्यात सन्तान की मां बनेगी। लेकिन मां का सारा हिसाब कब गड्डमड हो गया, क्यों गड्डमड हो गया, इसकी जानकारी खुद मां को भी नहीं है। फिर भी वह मन ही मन ज़िन्दगी भर हिसाब-किताव में ही डूवी रही। एकाएक मैनेजर आकर उपस्थित हुआ। "कहो बोस, कितना कर चुके ? हरीअप, हरीअप क्या सोच रहे हो ?" फर्श पर मोटा गलीचा विछा है। मैनेजर के परों की माहट कानों में पहुंच नहीं पाई थी। अगर पहुंचती तो वह सावधान हो जाता। फिर भी जल्दवाजी करने से ही क्या हिसाब मिल जायेगा ? मैनेजर का अपना हिसाब क्या मिल चुका है ? रणवीर के बाप का हिसाब नहीं मिला, मां के साथ भी यही वात रही। हो सकता है रणवीर को स्वयं का हिसाव भी न मिले। रणवीर जिस मुहल्ले में रहता है उस, नीलमणि हालदार लेन, के वाशिन्दों में से किसी - ६ का हिसाब मिला है। रणवीर फिर से हिसाब करने बैठ गया । गणित का पहाड़ । पांघों के आंसू का जवकि पहाड़ हो सकता है तो गणित का पहाड़ नहीं हो सकता? इतने रुपयों का हिसाब-किताब करते-करते रणवीर के सर पर लाखों रुपये छलांग लगाने लगे। तब वह रुपयो को लहरों में डूबने-उतराने लगा। पांच सात पैतीस, पैतीस का पांच, हासिल रहा तोन" सचमुच नीलमणि हालदार लेन के तमाम वाशिन्दै हिसावी हैं, खास तौर से उनतीस वटै तीन रटे छह नीलमगि हालदार लेन के तीनमंजिले के वाशिन्दे। पहली मंजिल पर भवदुलाल अपने बाल-बच्चे, पत्नी और सास के साथ रहता है। दूसरी मजिल पर हिमाशु मरकार अपनी पत्नी, पुत्र और पुत्रवधू के साथ और तीसरी मजिल पर हरिपद चक्रवर्ती । हर कोई हिसाव के साप चलता है । जन्म से मृत्यु तक जीवन को हिसार के बाड़े के अन्दर चारों तरफ से बांधकर रखना चाहता है। और यह क्या सिर्फ उनतीस वटै तीन वटै छह नीलमणि हालदार लेन के वाशिन्दे ही चाहते हैं ? इस मकान का मालिक भी तो हिमावी ही है । मकान-मालिक भी हिसाब करता है : पांच साते पंतोस, पतोस का पांच, हासिल रहा तीन... दरअसल ईश्वरप्रसाद ढनडनियां इस मकान का मालिक है। मादिकाल से लेकर अनन्तकाल तक वह इस मकान का मालिक बना रहेगा । उममें कोई उलट-फेर नहीं होने जा रहा है । कम से कम इन तीनो किरायेदारों का यही मत है । कब ईश्वरप्रसाद दनानिया ने यह मकान बनवाया था, उसका हिसाब किसी को भी मानूम नहीं है। जब कलकत्ता कॉरपोरेशन नहीं बना था, शायद उससे भी पहले का यह मकान है । हो सकता है उसके बाद का हो। लेकिन उस हिसाय के खाते को कौन देखने जाता है, कौन सरे-जमीन तहकीकात करने जाता है । इतना वस्त किसके पास है ? इमसे तो बेहतर है कि बीते दिनों के पापों को दूर करो, जिससे अधिक लाभ हो बीते दिनों के पापो को दूर करने के लिए ही राधा दुआ मकान ७ मंजिले से बाहर निकली थी । सुवह नल पर 'गंगा स्नान करने के बाद रास्ते पर ज्यों ही पांव रखने जा रही थी कि सामने सर्वनाश आकर खड़ा हो गया । घोड़ा और आगे बढ़ते ही दुवारा नहाना पड़ता। विलकुल दरवाजे के ऊपर ही कई जूठे केले के पत्ते और मिट्टी के टूटे प्याले पड़े थे। यह दृश्य देखते ही राधा वुमा चिहुंक उठी, "ओ नेडी, नेडी..." भवदुलाल उस समय सोकर जगा था और अखबार पर आंखें दौड़ा रहा था। किस सिनेमाघर में कौन-सी तस्वीर चल रही है, उसकी सूची मन-ही- मन स्थिर कर रहा था । अचानक सास की पुकार सुनते ही चंचल हो उठा 1. राधा चुआ की बेटी उस वक्त विस्तर से उठने-उठने को थी। मां की पुकार सुनते ही उठने जा रही थी। भवदुलाल ने कहा, "उफ, सुबह-सुबह तुम्हारी मां का शोर-शराबा शुरू हो गया।" उसके बाद अपनी पत्नी की ओर देखता हुआ वोला, "तुम्हें उटने की ज़रूरत नहीं, मैं देखने जा रहा हूं..." इतना कहकर तहमद संभालकर गांठ कसता हुआ कमरे से बाहर निकल पड़ा। सोने को कमरे के सामने छोटा-सा आंगन है। बांगन का तीन-चौथाई हिस्सा कोयले उपलों से भरा है। उसी के बीच ईंट से घिरे एक स्थान में थोड़ी- सी मिट्टी डालकर तुलसी का विरवा रोपा गया है । असल में उस स्थान को सास ने तुलसी के विरवे के लिए ही तैयार किया था। मगर धीरे-धीरे कई मिर्च को पौधे रोप दिए थे। उसके बाद भी जब जगह बच गई तो उसमें लोकी की चेल लगा दी थी। लौकी की वह वैल बढ़ते-बढ़ते खंडहरनुमा दीवार पर चढ़ गई थी। वोहरी आदमी जिससे लौकी की फुनगी तोड़ न ले इसके लिए राधा युजा ने मांगन के बीच एक मचान बनाया था। उस वेल में लौकी नहीं फलनी थी परन्तु पते उगते थे। पत्तों की भरमार की वजह से आंगन की रोशनी और हवा रुस गई थी और आंगन में गन्दगी रात-दिन जमती जा रही ची ।बुआ की से आंगन में कोई जम जाने के कारण चलना-फिरना मुचिल हो गया था। एक बार पांव फिसल जाने के कारण नेड़ी को तीन महीने तक जाट पर पड़ा रहना पड़ा था। विधाता को जितना भोध है वह राधा चुना की लड़की पर ही है। लड़की शरीर से हट्टी-कट्टी है। हर साल वच्चा पैदा ।
करती है, देडकर यह कोई कह नहीं सकता है। यह तो एक परेशानी हुई। उस पर सास की वा । सास की बातें बात के बजाय जैसे तीर हो । भोर होते न होते तीर छोड़ना शुरू कर देती है। "क्या हुआ मां ? क्या हुना?" राधा बुआ ने दामाद को आते देगार अपनी जवान में तीखापन लाकर कहा, "अमागों को अक्ल तो देखो, अपनी ही आंखों से देख लो । अमागों को और दूसरी जगह नहीं मिली, मेरे मकान के मामने ही जूठन, मछली का कांटा और चोइयां फेंक दी है। अब मैं क्या करूं, बेटा?" भवदुलाल ने भी देखा । सवा चार पुट की गली है। उममें अगर जठन और कांटे पड़े हो तो आदमी जाए तो कैसे ! "आपने छु लिया क्या ?" भवदुलाल ने कहा । राधा युआ बोली, "मातूम नहीं, बेटा, छुआ है या नहीं, याद नहीं है। फिर भी मन में जबकि खटका पैदा हो गया तो कपड़ा फोच लेना ही बेहतर रहेगा..." भवदुलाल ने कहा, "एक वार तो आप नहा नुकी हैं..." "सो क्या अभी नहायी हूं? वह तो सवेरे चार बजे हो । चार बजे नहा- धोकर, पूजा-पाठ करके निकल रही थी। अय बताओ तो सही, शिम ग्रह के चाकर में फंम गई!" "किसने फेंका है ?" भवदुलाल ने पूछा। राधा युआ बोली, "और कौन फैकेगा.? यह मरानर पारिस्तानियो की करतूत है।" भवदुलाल ममा गया, 'पाकिस्तानी' का अर्थ हुआ तोमरी मंजिल का किरायेदार हरिपद वाबू । हरिसद चक्रवर्ती । "सारा दोप मकान-मालिक का है, वह हरामी कहाँ कहा से गंवारों को लाकर इस मकान में घुमाता है और परेशानी ढोनी पडती है हम लोगों को। मैं तो तुम्हें संरडों वार कह चुकी भव, कि मकान-मालिक से एक बार जाकर 'कहो कि भले आदमी के मुहल्ले में पाकिस्तानियों को क्यों क्साये हुए हो ! जिन लोगो को शुद्ध-अशुद्ध का ज्ञान नही, उन लोगो के साथ रहने से किसी का जात- धर्म कही टिक सकता है ?"
। मंजिद ने बाहर निकाली थी। नुवह नल पर 'गंगा-स्नान' करने के बाद रास्ते पर ज्यों ही पांव रखने जा रही थी कि सामने सर्वनाश आकर खड़ा हो गया। थोड़ा और आगे बढ़ते ही दुबारा नहाना पड़ता। बिलकुल दरवाजे के ऊपर ही कई जूठे केले के पत्ते और मिट्टी के टूटे प्याले पड़े थे। यह दृश्य देयते ही राधा बुमा चिहुंक उठी, "मो नेड़ी, नेड़ी..." भवदुलाल उस समय सोकर जगा था और अखबार पर आंखें दौड़ा रहा था । मिस सिनेमाघर में कौन-सी तस्वीर चल रही है, उसकी सूची मन-ही- मन स्थिर कर रहा था । अचानक सास की पुकार सुनते ही चंचल हो उठा । राधा बुआ की बेटी उस वक्त विस्तर से उठने-उठने को थी । मां की पुगार गुनते ही उठने जा रही थी। भवदुलाल ने कहा, "उफ, सुबह-सुबह तुम्हारी मां का जोर-पाराया शुरू हो गया।" उगफे बाद अपनी पत्नी की ओर देखता हुमा वोला, "तुम्हें उठने की चारूरत नहीं, मैं देगने जा रहा हूं..." इतना गहकर तहमद संभालकर गांठ पासता हुआ कमरे से बाहर निकल । सोने के कमरे के सामने छोटा-सा मांगन है। मांगन का तीन-चौथाई सहरमा पोयले उपलों से भरा है। उसी के बीच इंट से घिरे एक स्थान में थोड़ी- सी गिट्टी डालपर तुलसी का विरवा रोपा गया है । असल में उस स्थान को गाग ने तुलसी के विरवे के लिए ही तैयार किया था। मगर धीरे-धीरे काई मिर्च के पौधे रोष दिए थे। उसके बाद भी जब जगह बच गई तो उसमें लौकी गी घेल लगा दी थी। लौकी की वह वेल बढ़ते-बढ़ते खंडहरनुमा दीवार पर पर गई थी। बाहरी आदमी जिसमे लौषी की फुनगी तोड़ न ले इसके लिए राधा बुआ ने मांगन के बीच एक मचान बनाया था। उस बेल में लोकी नहीं पारती पी परन्तु पत्ते उगते थे। पत्तों की भरमार की वजह से मांगन की रोपनी भौर हवा रुक गई थी और आंगन में गन्दगी रात-दिन जमती जा रही थी। बुआ की करतूत से मांगन में पाई जग जाने के कारण चलना-फिरना गुपिकल हो गया था। एक बार पांव फिसल जाने के कारण नेड़ी को तीन महीने राक गाट पर पड़ा रहना पड़ा था। विधाता को जितना क्रोध है वह राधा बुआ की लकीपरही है। लड़की शरीर से हट्टी-कट्टी है। हर साल बच्चा पैदा करती है, देखकर यह कोई कह नहीं सस्ता है । यह तो एक परेशानी हुई। उस पर सास की बातें । मास की बातें यात के बनाय जैसे तीर हो । भोर होते न होते तीर छोडना शुरू कर देती है। "क्या हुआ मा ? क्या हुआ ?" राघा बुआ ने दामाद को आते देषकर अपनी जवान में तीखापन लाकर कहा, "अभागों की अक्ल तो देखो, अपनी ही आंखों से देख लो । अमागों को और दूसरी जगह नहीं मिली, मेरे मकान के मामने ही जूठन, मछली का काटा और चोइयां फेंक दी है। अब मैं यया करूं, वेटा ?" भवदुलाल ने भी देखा । सवा चार फुट की गली है। उममें भगर जठन और कांटे पहें हो तो आदमी जाए तो कैसे ! "आपने लिया क्या ?" भवदुलाल ने कहा। राधा बुआ बोली, "माइम नही, बेटा, छुआ है या नहीं, याद नहीं है। फिर भी मन मे जबकि यटका पैदा हो गया तो कपड़ा फीच लेना ही बेहतर रहेगा..." भवदुलाल ने कहा, "एक बार तो आप नहा चुकी हैं..." "सो वया अभी नहायी हू? वह तो सवेरे चार बजे ही । चार बजे नहा- धोकर, पूजा-पाठ करके निकल रही थी। अब बताओ तो सही, किम ग्रह चक्कर में फंस गई!" "किसने फेंका है ?" भवदुलाल ने पूछा। राधा बुआ बोली, "और कौन फेंकेगा ? यहू मरामर पाकिस्तानियो की करतूत है।" भवदुलाल समा गया, 'पाकिस्तानी' का अर्थ हुआ तोमरी मंजिल का किरायेदार हरिपद बाबू । हरिपद चक्रवर्ती । "सारा दोप मकान-मालिक का है, वह हरामी कहा-कहा से गंवारी को लाकर इस मकान में घुमाना है और परेशानी टोनी पड़ती है हम लोगों को। मैं तो तुम्हें संकड़ों बार कह चुकी हूं, भय, कि मकान-मालिक से एक बार जाकर कहो कि भले यादमी के मुहल्ले में पाकिस्तानियों को क्यो वसाये हुए हो ! जिन... लोगों को शुद्ध-अशुद्ध का ज्ञान नहीं, उन लोगो के साय रहने से रिरीका धर्म कहीं टिक सकता है ?" ३ भवदुलाल ने कोई जवाब न दिया । क्यादा बोलने से तीसरी मंजिल में रहने लों के कान में बातों की भनक पहुंचेगी और फिर झगड़े की शुरुआत हो जायेगी। और जैसे ही झगड़े की शुरुआत होगी, हो-हल्ला, शोरगुल के चलते कोए और चील तक पास नहीं फटकेंगे। भवदुलाल जल्दी-जल्दी घर के अन्दर चला आया। उसके वाल-बच्चे उस वक्त भी फर्श पर विछे विस्तर पर वेतरतीब ढंग से लेटे थे। इसके वाद झोली लेकर बाजार जाना है। उसकी पत्नी उस वक्त लेटी हुई देह मरोड़ रही थी। भवदुलाल ने कहा, "बाज़ार जा रहा हूं, वहां से क्या-क्या लाना है ?" नीरजा ने कोई उत्तर नहीं दिया । "क्यों जी, तुमने तो कुछ बताया ही नहीं । आज तुम्हारी तबीयत कैसी है ?" इस पर भी नीरजा चुपचाप पड़ी रही। "अगर तुम बताओगी नहीं तो मैं समझू कैसे ? मुझे डाक्टर से सब कुछ चताना जो पड़ेगा।" फिर भी नीरजा चुप की चुप पड़ी रही, अपने बदन को एक बार मरोड़कर चोली, "बाप रे, अव सहा नहीं जाता..." इसके बाद वह फिर से करवट बदलकर लेट गई। भवदुलाल तब तक कमीज़ पहन सुका था। इसके बाद मेज़ की दराज़ खोलकर उसने मनीवैग को अपनी जेब के हवाले किया । अचानक ऊपर से शंखध्वनि आने लगी। हरि वायू के घर में शंख बज रहा था। उसकी लड़की की शादी हो रही है । तो उस लड़की की भी आखिर शादी हो ही गई ! "ओह, तुम यहां आ चुके हो ! ए भव, जाकर देखो तो कौन आया है !" सिर झुकाए ज्योंही आंगन के पार पहुंचा, दरवाजे पर वगल में छाता दबाए मृप्टिधर को पाया। "क्यों सृष्टिधर, तुम इस वक्त ?" मृष्टिधर एक अजीब प्राणी है। उसके चेहरे पर हर क्षण हंसी तैरती रहर है। माज के जमाने में जिनमें क्रोध नाम की चीज़ का अस्तित्व नहीं । गृष्टिघर से ही विरल प्राणियों में से एक है। वड़ा ही विनयी, बड़ा ही मृ भापी। सीधा-सादा और परोपकारी। ! । १० . "जी, एक काम से आया हूं।" "मालूम है, तुम काम के आदमी हो, काम रहे विना तुम नहीं आते हो।" भवदुलाल ने कहा, "किराया-किराया लेने आए हो? मगर अबकी मैं किराया नहीं चुकाऊंगा, भाई जान, यह तुम्हें कहे देता हूं। पहले तुम्हारे मालिक को इस बात का फैसला करना पड़ेगा नब मैं किराया चुकाऊंगा...' उंगली से जूठे केले के पतों के ढेर की ओर इशारा करती हुई राधा बुमा बोली, "यह देखो, जो प्रत्यक्ष ई उसे प्रमाण की क्या जरूरत, तुम अव नकार नहीं सकते हो। देखो, संपनी आंख से देख लो, लोग-बाग ऐसे में कैसे आना-जाना करें...?" सब जैसे मृष्टिधर की नजर उधर गई हो। उसने कहा, "ओह राम-राम, यह तो केले के जूठे पत्ते पड़े हैं !" "हा-हां, ठीक से देख लो, सपए का पता नहीं है, न बांस का और न ही भरबी का केले के जूठे पते हैं, हो केले के । और अगर तुम्हारी आंखों में चर्वी छा गई हो तो अपने मालिक को बुलाकर दिखा दो..." भवदुलाल अब तक धुप पड़ा था । बोला, "हां, अमागे मकान-मालिक को लाकर दिखा दो।" मृष्टिधर ने कहा, "इतना विगड पयों रही हैं, बुआजी ! मालिक ने तो कहा ही है कि वे किसी दिन आएंगे। हो सकता है कि आज ही आएं।" भवदुलाल बोला, "आयेगा ? तुम्हारा मालिक आ रहा है ?" पुशी में भवदुलाल यया करे, उमकी समझ में नही आया । बोला, "मप. मुच मृष्टिघर, रहा है ?" "हाँ; यही बात तो कहने के लिए मैं आया हूं, मेहमान जी ! बुधवार को मालिक की चिट्ठी मिली है । लिया है : आज तीसरे पहर कलकत्ता आ रहा फिर भी भवदुलाल को जैसे उसकी बातों पर विश्वास न हुआ हो। खुशी के मारे भवदुलाल की आंखें अधमुंदी-यो हो गयीं। चालीस सालों मे पत्राचार कर रहा है, लेकिन आज तक इस मकान के मालिक वरप्रसाद दनदनियां का घेहरा किसी ने देखा नहीं है। रापा दुआ लेकिन दुनियादारी में पटु है-~अपने दामाद भवदुलाल से भी अधिक पटु । इतने दिनों से दामाद की गृहस्थी में आकर वास कर रही है । कितनी ही बार रसोईघर की मरम्मत कराने को कहा है, कितनी ही वार आंगन की काई से फिसलकर मरते-मरते बची है, कितनी ही बार दोमंजिले के बरामदे को दरकी छत से विस्तर पर गंदा पानी गिर चुका है, कितनी ही बार पाखाने की सीढ़ी पर फिसल जाने के कारण टांग मुरक नुकी है, कितनी ही बार सृष्टिधर को भला-बुरा सुना चुकी है । मृप्टिघर से जव-जव कहा है, उसने बताया है कि अबकी मालिक आ रहे हैं। लेकिन मालिक कभी नहीं आया। यहां तक कि इस मकान के किरायेदारों ने ईश्वरप्रसाद ढनडनियां का चेहरा तक नहीं देखा है, हालांकि वे ठीक वक्त पर किराया देते आए हैं। सृष्टिधर वक्त पर ही रसीद लेकर हाजिर हो जाता है' 1 रसीद पर दस्तखत वना रहता है। किरायेदार पूउते, "क्यों जी सृष्टिधर, तुम्हारे मालिक तो खूब आए ?" गृष्टिघर हमेशा यही कहता, "मालिक आयेंगे । मालिक बहुत सारे कामों में फंसे रहते हैं । मालिक कितना काम करें, बाबूजी ! अकेले आदमी ठहरे। अबकी मालिक बहुत इंज्ञट में फंस गए हैं, कभी मद्रास जा रहे हैं तो कभी दिल्ली और कमी वंबई..." ये बातें कोई नयी नहीं हैं। इस मकान के तीनों मंजिल के किरायेदार ये यातें हमेशा से सुनते आ रहे हैं । इन बातों से राधा बुआ को भुलाया नहीं जा सकता है। राधा बुआ बोली, "मानती हूं, मकान-मालिक जहन्नुम चला गया, मगर तुम, किसलिए हो? तुम अपनी मांखों से यह सब अनयं नहीं देख रहे हो ? मैं भीगे कपड़े से दुबारा नहाऊं और मरूं ? बेशक यह पाकिस्तानियों को ही करतूत है- तीनमंजिले के पाकिस्तानियों की..." गृप्टिधर ने कहा, "आहिस्ता से वोलिए, बुआजी, उन लोगों के कान में भनक पहुंचेगी। उनके घर में आज शादी है।" "क्या कहा ? माहिस्ता से बोलू? क्यों ? तुम्हारे घर में किरायेदार हूं तो इसका मतलब यह नहीं कि मैंने चोरी की है । मैं क्या तुम्हारे मालिक का दिया खाती हूं ? मैं तो अपने दामाद की बात तक नहीं मानती हूं। दामाद . - १२ सामने ही खड़ा है, पूछकर देख लो न! मैं अगर उचित बात कहूं तो इसमें किमी से डरने की क्या बात है ? दूसरों के घर में लड़की की शादी नहीं होती है ? वह शादी है या निकाह-~यह क्या मुझे मालूम नही ?" मृष्टिधर भारी मुसीबत में फंम गया। "मजी ओ मृप्टियर, मृप्टिधर !" कार से पता नही, किसने पुकारा । मृष्टिधर को मालूम है कि किस मंजिल से कौन उसे पुकार रहा है । सृष्टिधर जल्दी-जल्दी जाने की कोगिग कर रहा था। "बलू, युआजी !" उसने कहा, "ऊपर से कोई भुला रहा है चा..." "जाने का मतलब ? तुम जा नही सकते। पहले इसका फैसला कर दो, फिर जाना । पहले यता जाओ कि इन जूठे पत्तों को कौन फेफेगा? यह तो कोई अच्छी बात नहीं है। हम लोग भी.तो किराया देते हैं ! कोई मुफ्त में नही . "अब किराया मत देना, भय," राधा बुआ बोली, "देखना है कि हरामजादा मकान-मालिक हमारा क्या कर लेता है !" गृष्टिधर ने कहा, "भाजी, मैं तो कह ही रहा हूं कि आज मालिका रहे हैं । वे आकर हरेक की बात सुनेंगे । आपकी छन से पानी गिरता है, यह देखेंग; आगन मे एक नाली बनया देंगे, जो-जो करने का है, सब करा देंगे।" "मालिक की बातें बाद में होंगी। पहले यह तो बताओ, इन जूठ पत्तों पा क्या होगा?" गृष्टिधर ने कहा, "यही बात बहले वो पर जा रहा हूं. बुवाजी!" "तुम पर यकीन नहीं किया जा सकता है, मंदा," राधा दुआ वोली, "तुन जाओगे तो लौटकर नही माओगे । में तुम्हारी नर-ना पहचानती हूं। उन्हें सभी फैसला करके ही जाना है..." अचानया एक छोटी-सी लड़की दौड़ती हुई रहीं आई। "ए मृष्टिधर, जरा पर बटो, बारी गुन्हें दुटा रहे हैं।" "चलता हूं, दिटिया !" इवना कहकर नृष्टिर व पुराना नेता आधा धुआ ने आगे बढ़कर रास्ता रोग निको दाली, "ना जवाब देते जाओ।" मृष्टिधर को जब कोई जवाब न झा दो छोटी लड़ . ni - पूछा, "मुन्नी, तुम लोगों ने जूठे पत्ते नीचे क्यों फेंक दिए हैं ? सामने सड़क पर कूड़ादान का टीन है, वहां नहीं फेंक सकती हो?" उस छोटी लड़की के छोटे होने से क्या होगा! वोली, "हम लोगों ने फेंका है, यह तुमसे किसने कहा?" राधा बुआ तैयार थी ही। वोली, "तुम लोगों ने नहीं फेंका है तो क्या भूत-प्रेत फेंकने आए ? अब हम लोग भी तुम्हारे घर में पाखाना फेंकेगे, तब पता चलेगा।" "ए सृप्टिधर, सृष्टिधर'.." छोटी लड़की ने अब ऊपर की ओर मुंह किए चिल्लाते हुए कहा, "देखिए न बाबूजी, सृष्टिधर आना नहीं चाहता है।" भवदुलाल ने कहा, "आप चली आयें, मां! मैं मेहतर बुलाकर साफ करा लूंगा । उन लोगों से कार में झगड़ा करने से कोई फायदा नहीं है । आइए, चली माइए अचानक अन्दर से नीरजा की कराह सुनाई पड़ी, "मां, मो मां..." "वाप रे, यह तो नेड़ी की आवाज़ है !" इतना कहकर ज्योंही वह अन्दर गयी, अवाक रह गई। फिर चिल्लाकर पुकारा, "ए भव, सर्वनाश हो गया ! जल्दी लामो, जल्दी.."ए भव..." भवदुलाल अब नहीं रुका । एक ही दौड़ में आंगन के अन्दर आया और वहां का दृश्य देखते ही हतप्रभ हो उठा। देखा, नीरजा काई-भरे आंगन में गिर. कर कराह रही है। उसका एक पर नल की ओर है और सिर बरामदे की ओर जूड़ा खुलकर छितर गया है। तभी राधा बुआ ने नेड़ी के चेहरे की ओर झुककर पूछा, "ओ नेडी, न.. क्या हुआ बिटिया ? कैसे गिर पड़ी? मैंने उस दिन भव से कहा था, ": . औरत है, किसी भी दिन लहू-लुहान हो सकती है । अब हो गई न ! नेड़ी, मेड़ी..." उसके बाद भवदुलाल की और ताकती हुई बोली, "खड़े-बड़े क्या देख र हो, वेटा ? अंबिका डाक्टर को बुला लाओ! पता नहीं, कौन-सा सर्वनाश गया।" भवदुलाल अब खड़ा नहीं रहा, तहमर पहने ही डाक्टर के घर की १४ दौड़ पड़ा। पर से निकलकर रास्ते पर आते ही देखा, एक ठेले पर भरपूर बांस लदा है । साथ में साज-सज्जा करने वाले आदमी हैं। देखकर भवदुलाल बगल से जा रहा था, मगर जा नहीं सका। तीसरी मंजिल का हरिपद चक्रवर्ती हंसता हुआ भवदुलाल की तरफ आया । हरिपद चक्रवर्ती सबके सामने हंसने वाला व्यक्ति नहीं है। जो हंसता नहीं है, उसे देखकर हरने को बात ही है ! हरिपद चक्रवर्ती को हंसते हुए देखकर भवदुलाल सहम गया। "आज जया की शादी है। आज शाम ।" और उमने भवदुलाल की तरफ एक निमंत्रण पत्र बढ़ा दिया। "जरूर आइएगा । मेरा सगा-संबंधी कोई नहीं है आप ही लोगों पर मुझे भरोसा है।" भवदुलाल को समझ में न आया कि क्या कहे । हरिपद धार्ती ने फिर कहना शुरू किया, "बहुत ही जल्दी शादी तय हो गई, साहव, यही वजह है कि पहले सूचना नहीं दे सका । दामाद मन के लायक मिल गया है, इसके अलावा लड़की तो अभी-अभी सत्रह साल की हुई है । आप लोग खड़े होकर शादी करा दें। आपको मालूम ही है कि मैं अकेला मादमी ठहरा, मेरा अपना कोई नहीं है।" बात सुनते-सुनते भवदुलाल के मन में हुआ कि हरिपद चक्रवर्ती के गाल पर तड़ा से एक थप्पड़ जमा दे। यह कोई शादी है मला । न तो किसीने ऐसी दुलहन देखी है और न ऐसा दुलहा हो । भयकर साजिश है | उस लड़के की बात ही भवदुलाल को बार-चार याद आने लगी। लड़के में रोते-रोते कहा था, 'मेरी कोई गलती नहीं है, सर । मैं गरीब आदमी है, पिताजी कैसर के मरीज हैं, मेरी बहन पोलियो को शिकार है । आप लोग छोड़ दें। मुझे क्षमा कर दें। मैं इस मुहल्ले मे फिर कभी पर नहीं रखा "अच्छा, तो फिर चलं, भवदुलाल बाबू । हरिपद पक्रवर्ती चला गया। भवदुलाल की आंखें एक बार गई। इस आदमी को तकदीर अच्छी है । वनी लहली को भी इन्ट माँ हो गई । चाहे शादी से भी हो, लेकिन उमरी मांग में वह द्विारा हो सकता है, बनारसी साड़ी भी पहनाए, हो नाता है ।
विनिमय होगा, कोहवर सजाया जाएगा। हो सकता है सब कुछ वैसे ही हो, जैस कि हर विवाह-शादी के मौके पर होता है। किसी चीज़ को छोड़ा नहीं जाएगा: 17 - ईश्वरप्रसाद ढनढनियां की कुल संपत्ति यह मकान ही नहीं है । इस मकान के किरायेदारों के लिए ईश्वरप्रसाद ढनढनियां को चिन्ता नहीं है । ईश्वरप्रसाद के और भी बहुत-से मकान हैं, और भी जायदाद है । कोई कहता है, ईश्वर- प्रसाद करोड़पति है और कोई कहता है अरवपति-मल्टी-मिलिनावर । दरं- असल ईश्वरप्रसाद कौन है, किसी किरायेदार ने उसे नहीं देखा है। वह कभी दिल्ली में रहता है, कभी मद्रास में और कभी बंबई में । फिर कभी लंदन, पेरिस और न्यूयार्क में । समूची दुनिया में उसका कारोवार फैला है अकेले तमाम कारवार की देखभाल नहीं कर पाता है इसलिए उसने आदमी और दलाल रते हैं । सृष्टिधर उसी कोटि का एक व्यक्ति है । कालीघाट के इस मकान की देखरेख और किराये की वसूली के लिए ही सृष्टिधर उस किस्म का एक दलाल है। सृष्टिधर कहता, "मुझसे क्यों कह रही हैं, बुआजी, मैं तो नौकर ठहरा, मालिक आयेंगे तो उन्हीं से कहिएगा राधा बुआ भी उसी किस्म की है। वह कहती, "तुम्हारे मालिक के चेहरे पर झाड़ मारूं ! तुम्हारे मालिक के हाथों में वेशुमार काम हैं तो इससे हमें क्या? हम लोग कितने सुख से रह रहे हैं, यह क्या तुम्हारा.मालिक एक वार वाकर देख नहीं सकता?" भवदुलाल कहता, "अरे भैया, हम आज हैं, कल नहीं रहेंगे, तुम्हारे मालिक का मकान उसी का रहेगा, हम लोग उसकी जायदाद में हिस्सा बंटाने तो नहीं जा रहे हैं !" परन्तु मृष्टिधर किसी की बात से गुस्से में नहीं आता है। वह निरासक्त की तरह हंस देता है। कहां किसके रसोईघर की चाल से अन्दर पानी टपकता है, किसके आंगन में काई जम गई है, किसकी दीवार से रेत झड़ गई है, किसके नल में पानी नहीं आ रहा है, किसकी नाली में कूड़ा-कचरा जम गया है- १६ हा-१ - दौड़ पड़ा। घर से निकलकर रास्ते पर आते ही देखा, एक ठेले पर भरपूर बांस लदा है । साथ में साज-सज्जा करने वाले आदमी है। देसकर भवदुलाल बगल जा रहा था, मगर जा नहीं सका। सीसरी मंजिल का हरिपद चक्रवर्ती हंसता हुआ भयदुलाल की तरफ आया। हरिपद चक्रवर्ती सबके सामने हसने वाला व्यक्ति नहीं है । जो हंसता नहीं है, उसे देखकर डरने की बात ही है ! हरिपद चक्रवर्ती को हंसते हुए देखकर भवदुलाल सहम गया। "आज जया की शादी है। आज शाम ।" और उमने भवदुलाल की तरफ एक निमंत्रण पन बढ़ा दिया । "जरूर आइएगा । मेरा सगा-संबंधी कोई नही है आप ही लोगो पर मुझे भरोसा है।" भवदुलाल को समझ मे न आया कि क्या कहे। हरिपद कार्ती ने फिर कहना शुरू किया, "बहुत ही जल्दी शादी तय हो गई, साहब, यही वजह है कि पहले सूचना नहीं दे सका । दामाद मन के लायक मिल गया है, इसके अलावा लड़की तो अभी-अभी सत्रह साल की हुई है। आप लोग खड़े होकर शादी करा दें। आपको मालूम ही है कि मैं अकेला आदमी ठहरा, मेरा अपना कोई नहीं है।" बान मुनते-सुनते भवदुलाल के मन में हुआ कि हरिपद चक्रवर्ती के गाल पर तड़ाह से एक थपड़ जमा दे। यह कोई शादी है भला! न तो किसीने ऐमो दुलहन देखी है और न ऐसा दुलहा हो । भयंकर साजिग है ! उस सड़के की बात ही भवदुलाल को बार-बार याद आने लगी। लड़के ने रोते-रोते कहा था, 'मेरी कोई गलती नहीं हैं, सर ! में गरीब आदमी हूं, मेरे पिताजी कैसर के मरीज हैं. मेरी बहन पोलियो को शिकार है । आप लोग मुझं छोड़ दें। मुझे पमा कर दें। मैं इस मुहल्ले में फिर कभी पर नहीं रखमा...' "अच्छा, तो फिर चलू, भवदुलाल वाबू.." हरिपद यवतों चला गया। भवदुलाल की मां एक बार उस तरफ गई। इस आदमी की तकदीर अच्छी है । देसी लड़की को भी अन्तत: शादी हो गई । चाहे शादी से भी हो, लेकिन उसकी मांग में वह सिंदूर भरेगा तो। - - हो सकता है, बनारसी साड़ी भी पहनाए, हो सकता है शंख भी बजाए; इष्टि- विनिमय होगा, कोहबर सजाया जाएगा। हो सकता है सब कुछ वैसे ही हो, जैसा कि हर विवाह-शादी के मौके पर होता है। किसी चीज़ को छोड़ा नहीं जाएगा: -- ईश्वरप्रसाद ढनढनियां की कुल संपत्ति यह मकान ही नहीं है । इस मकान के किरायेदारों के लिए ईश्वरप्रसाद ढनढनियां को चिन्ता नहीं है । ईश्वरप्रसाद के और भी बहुत-से मकान हैं, और भी जायदाद है। कोई कहता है, ईश्वर- प्रसाद करोड़पति है और कोई कहता है अरवपति-मल्टी-मिलिनायर । दर- 'असल ईश्वरप्रसाद कौन है, किसी किरायेदार ने उसे नहीं देखा है। वह कभी दिल्ली में रहता है, कभी मद्रास में और कमी बंबई में। फिर कमी लंदन, पेरिस और न्यूयार्क में । समूत्री दुनिया में उसका कारोवार फैला है। अकेले तमाम कारवार की देखभाल नहीं कर पाता है इसलिए उसने आदमी और दलाल रखे हैं। सृष्टिधर उसी कोटि का एक व्यक्ति है । कालीघाट के इस मकान की देखरेख और किराये की वसूली के लिए ही सृप्टिधर उस किस्म का एक दलाल है। मृप्टिधर कहता, "मुझसे क्यों कह रही हैं, बुआजी, मैं तो नौकर ठहरा, मालिक आयेंगे तो उन्हीं से कहिएगा..." राधा वुआ भी उसी किस्म की है। वह कहती, "तुम्हारे मालिक के चेहरे पर झाडू मारू ! तुम्हारे मालिक के हाथों में वेशुमार काम हैं तो इससे हमें क्या ? हम लोग कितने मुख से रह रहे हैं, यह क्या तुम्हारा मालिक एक वार वाकर देख नहीं सकता ?" भवदुलाल कहता, "अरे भैया, हम आज हैं, कल नहीं रहेंगे, तुम्हारे मालिक का मकान उसी का रहेगा, हम लोग उसकी जायदाद में हिस्सा बंटाने तो नहीं जा रहे हैं !" परन्तु मृप्टिधर किसी की वात से गुस्से में नहीं आता है। वह निरासक्त की तरह हंस देता है। कहां किसके रसोईघर की चाल से अन्दर पानी टपकता है, किसके आंगन में काई जम गई है, किसकी दीवार से रेत झड़ गई है, किसके नल में पानी नहीं पा रहा है, किसकी नाली में कूड़ा-कचरा जम गया है- . . १६ हा-१ सब कुछ सृष्टिघर ध्यान से देखता है। सभी को सांत्वना देता रहता है । कहता है, "अहा हा ! सचमुच आप लोगो को बड़ी ही तकलीफ होती है..." हरिपद पत्रवर्ती तीमरी मंजिल का किरायेदार है। पाकिस्तान बनने के बहुत पहले से ही इस मकान में है । लगभग तीन पुरखो से इस मकान में रहता भाया है । लेकिन पाकिस्तान बन जाने के बाद से ही राधा युमा वगैरह ने | उसके साथ एक विशेषण लगा दिया है। दोप में दोप इतना ही है कि वे लोग धारिपाल के आदि-वाशिन्दे हैं। सृष्टिधर कहतापा, "टहरिए, अबकी मालिक आ जायें तो उन्हें एक बार यहा ले आऊंगा । आप लोगों में से जिनको जो कुछ कहना है, कहिएगा।" हरिपद चक्रवर्ती कहता था, "तुम्हारे मालिक यहां क्यों आयेंगे, सृष्टियर? वे ठहरे यह आदमी-करोडपति ! वे भला गरीवों का दुय क्यो समझेंगे?" "नहीं नहीं; क्या कह रहे हैं आप ! मेरे मालिक बडे ही सोधे-सादे हैं । दया का अवतार समझिए । कितना ही दान-वान करते रहते हैं।" हरिपद चक्रवर्ती कहता था, "सो दया के अवतार रहे ! हम लोगों का दुःख कोई नहीं समझेगा, मृष्टिधर ! हमे सिर्फ तुम्ही पर भरोसा है।" मृप्टिधर कहता था, "नहीं-नहीं; अवको देखिएगा, मालिक को जबरन यहाँ ले आऊंगा।" इसी तरह गृष्टियर हर बार सभी को भरोसा दिया करता था। परंतु मालिक कभी नहीं आया। आने का उसे वक्त नहीं मिला । अंतत: पहली मंजिल के भयदुलाल ने एक बार खुद कारीगर बुलाकर रसोईघर की चाल की मरम्मत करा ली थी, आंगन में जमी काई ब्लीचिंग पाउहर से साफ करा ली थी और पर से गिराये हुए केले के पत्तों को मेहतर चुलाकर राखदान मे डलवा दिया था। अन्ततः तीसरी मंजिल के हरिपद चक्रवर्ती ने भी राज मिस्त्री की खुशामद बरामद कर दीवार मे बानू का पलस्तर करा लिया था, नल के कारीगर को बुलाकर नल ठीक करा लिया था और मेहतर बुलाकर नाली के कूडे-कचरे को कूड़ेदान में फेंकवाने का इन्तजाम किया था। "मां, सृष्टिधर को बुला लाई हूं।" "अजो ओ गृष्टिधर, तुम्हारे कारनामे भी अजीव हैं !" यह मकान रास्ते पर सिर ऊंचा किये पड़ा है । मकान की बाहरी दीवार .
में हो सकता है किसी ज़माने में पलस्तर हो, मगर अब उसका निशान तक नहीं है। छत के कंगूरे पर पीपल के कई पौधों की जड़ें अड्डा जमाए हुए हैं । सीढ़ी की रेलिंग टूटी हुई है । संमल-संभलकर ऊपर जाना पड़ता है । जरा-सा भी असाव- धान रहे तो आदमी एकबारगी पहली मंजिल के पाखाने की छत पर जा गिरे। हरिपद बाबू बहुत दिनों से मृप्टिधर को कह रहे हैं। दूसरी मंजिल के हिमांशु बाबू ने भी कहा है । हिमांगु बाबू बूढ़े बादमी हैं। वह कहते, 'मैं ब्लड-प्रेपार का गरीज़ हूं, गृप्टिघर, किसी दिन हड्डियां टूट जायेंगी और पाखाने की छत पर मरी हुई हालत में पाया जाऊंगा । अपने मालिक से कहकर कोई रास्ता निकालो, मृप्टिधर!' मृप्टिधर कहता, 'और कुछ दिनों के लिए धीरज रखें, मौसाजी, मालिक सब ठीक-ठाक करा देंगे।' हिमांशु बाबू कहते, 'अब कब ठीक कराएगा, गृष्टिधर ? मेरे मरने के बाद ठीक कराएगा?' गृप्टिधर आश्चर्य में लाकर कहता, 'छि:छि:, थाप क्या कह रहे हैं, मौसाजी ! इस तरह की मनहस बातें कान से सुनने से भी पाप होता है।' इतना कहकर वह उंगलियों से अपने कानों के सूराखों को बंद कर लेता था। उसके बाद इंगलियों को हटाकर कहता, 'आप जैसे बादमी जव तक धरती पर हैं, भी तक हम लोगों की भलाई है, मौसाजी ! आप लोगों के जाते ही सब कुछ धेरे में बदल जाएगा, तब हम लोगों के लिए जीना एक समस्या हो जाएगा।' मृष्टिधर की बातें बड़ी मीठी हुआ करती हैं । दुनिया में जो भी गृष्टिधर से बातचीत करेगा, उसकी बात सुनकर मुन्ध हुए विना नहीं रह सकता । लेकिन बस इतना ही ! बात बनाने में मृष्टिधर को कोई पछाड़ नहीं सकता। ईश्वर- प्रसाद ढननियां इतने दिनों से इस मकान का जो मालिक बनकर बैठा हुआ है, इसका श्रेय गृष्टिधर को ही है । जीना चनृत-चढ़ते बीच रास्ते में ही गृष्टिधर ने कहा, "मौसीजी, मैं आपकी सेवा में हाजिर हूं।" हिमांशु यावू ने कहा था, 'मैं बूढ़ा मादमी हूं, ज्यादा दिनों तक नहीं टिकूँगा। मकान के हमादार तुम्हीं लोग रहोगे । सम्ता मकान मिल जायेगा तो मैं चला जाऊंगा। फिर तुम मकान की मरम्मत पयों नहीं करा रहे हो ?' मृप्टिधर ने कहा था, 'मरम्मत कराऊंगा, मौसाजी! अबकी मरम्मत - १८ . . कराऊंगा । मालिक ज्यों ही आयेंगे, उन्हें यहां ले आऊंगा। मालिक को अपनी आंखों से सब दिखाऊंगा।' 'तुम दिखाने लगे और तुम्हारे मालिक ही यहा आने लगे...' मौसीजी रसोईघर से बाहर निकली और अपने सामने सृष्टिधर को पाते ही मोघ से भमक उठी। बोली, "कब से तुम्हें पुकार रही हूं! अब तक तुम नीचे क्या कर रहे थे ? किस-किस से बातचीत कर रहे थे? लगता है जैसे वे लोग हमसे ज्यादा किराया देते हैं । उन लोगों को तुम निकालकर बाहर क्यों नहीं करते ? तीस रुपया किराया देंगे और आप दिखाएंगे ! तुम लोग इसी के लायक हो । हम लोग क्योंकि हर महीने पहली तारीख को ही किराया चुका देते हैं, इसलिए तुम यहां धूक तक फेंकने नही नाते हो..." गृष्टिधर विनम्रता से झुककर गद्गद स्वर में बोला, "बेटे पर इतना गुस्सा क्यों कर रही हैं, मौसीजी । मैं तो मौसाजी को देखने ही आ रहा था। सुनने में माया है कि उन्हें फिर से दिल का दौरा पड़ गया है।" मौसीजी बोली, "अपनी चिकनी-चुपडी बातें छोडो, मृप्टिधर। मैं तुम्हें राई-रती पहचानती हूं । राधा युआ से मिलकर अभी तुम किसे कोस रहे थे ? किसकी धज्जियां उड़ा रहे पे ? सोचते हो, मैं ऊपर से कुछ सुन ही नहीं पाती हूं? मैं बहरी हूं? फिर से कहे देती हूं, अगर किसी दिन हमारे नाम से भुगली करेगी तो कूड़ेदान का कचरा फेंकवा दूगी।" गृप्टिधर ने कहा, "आप लोगों के बारे में कहा कोई बातचीत हो रही थी !" "झूठी बात मत बोलो, मृष्टिधर," मौसीजी ने कहा, "तुम्हारी जीभ ग़ल जाएगी।" "सच कह रहा हूं, मौसीजी, आपके बारे में कोई बात नहीं हो रही थी।" "फिर झूठ बोलते हो? तो क्या मैंने 'कान' के बदले 'घान' सुना?" उसके बाद कमरे के सामने जाकर पुकारा, "अनी ओ, सुनते हो, सृष्टिघर यया कहता है, सुनो ! मैंने अपने कानों से सुना कि राधा बुझा हमारी निंदा कर ' रही है और सृष्टिधर कहता है कि नहीं..." हिमाशु वायू बोले, "गृष्टिधर कहां है ? उसे यहां बुलाओ, बुलाओ तो..." मौसीजी ने बाहर आकर पुकारा, "कहां हो जी. सष्टिार. माजाओ, १३ मालिक तुम्हें बुला रहे हैं।" सृष्टिधर ने कहा, "मौसाजी को आप तंग करने क्यों गई ? अभी के वीमार हैं।" अन्दर से बुलाहट आई, "कहां हो भाई, सृष्टिधर?" "आया मौसाजी, आज आप कैसे हैं ?" हिमांशु वावू लेटे हुए थे । जल्दी-जल्दी उठकर बैठ गये। बोले, "तुम्हारे मालिक के अत्याचार से मैं कहीं चंगा रह सकता हूं? आलतू-फालतू बातें छोड़ो। नीचे का किरायेदार अव तक हमारे खिलाफ क्या-क्या कह रहा था ? हम लोगों ने उनके सिर पर गंदगी फेंकी है ? हमें कोई दूसरा आदमी नहीं मिला कि चुन- चुनकर उनके सिर पर गंदगी फैकी ? गंदगी फेंकने के लिए हमने पांच रुपये तनख्वाह पर मेहतर रखा है, मालुम है ?" मौसीजी सामने ही खड़ी थीं। बोली, "मैं तो तुमसे कहती ही आई हूं कि गृष्टिधर को जैसा तुम सोचते हो, वैसा नहीं है । नंवरी शंतान है । तुम्हों कहा करते थे, 'ऐसी बात नहीं है, सृप्टिधर भला आदमी है, उसका मालिक ही बुरा है । मृष्टिधर करे तो क्या करे !' अब लो, समझो।" सृष्टिधर ने कहा, "नहीं मौसीजी, काली माता की सौगन्ध खाकर कहता हूं, मैंने पुछ भी नहीं कहा है।" "फिर तुम्हारी मौसीजी वना-बनाकर कह रही हैं ?" बगल के कमरे में उस समय विजय विस्तर पर नींद की वांहों में खोया था। नयी शादी करने के बाद से विजय देर से सोकर उठता है । पत्नी नलघर में थी। अचानक वगल के कमरे में वहस-मुवाहिसा होते देखकर दौड़ता हुआ वह इस कमरे के अन्दर आया। बोला, "बाबूजी, आप फिर चिल्ला रहे हैं ?" हिमांशु बाबू ने कहा, "चिल्लाऊंगा नहीं तो क्या मुंह सीकर रहूं? मुहल्ले के भादमी आकर गाली दे जायें नौर में बूढ़ा नादमी खामोश पड़ा रहूं ? तुम लोगों का ध्यान तो कहीं है नहीं, सिर्फ अड्डेबाजी करते हो और खेल देखते रहते हो.. विजय ने सृष्टिधर की बोर देखते हुए कहा, "देख रहे हो न, वावूजी बीमार हैं । ऐसे वक्त में कोई किराया मांगने आता है ?" सृष्टिधर ने कहा, "हुजूर, मैं किराया मांगने नहीं आया हूं। मौसीजी ने - २० - बुला भेगा, इसीलिए..." "पहले तुम कमरे से बाहर जाओ। बाहर.." मां बोली, "तुम उसे बाहर क्यों निकाल रहे हो ? मैं उसे फैसला करने के लिए बुला लाई और तुम तब विजय ने मृष्टिधर को ठेलना शुरू कर दिया था। "तुम पहले कमरे के बाहर जाओ, कमरे के बाहर से बात करो।" "उसे बाहर निकाल देने से क्या फायदा होगा?" हिमांशु वाबू बोले, "तुम लोगों के अत्याचार से, लगता है, शाति से मरना भी मुश्किल है। अजी ओ, जरा पानी दोतो.... हिमांशु पादू बिस्तर पर बैठे-बैठे हांफने लगे। परंतु उम क्षण हिमाशु वाबू की बातचीत किमी के कान में नहीं पहुंची। उघर विजय जितनी तीखी आवाज में चिल्ला रहा था, मौसीजी भी उतनी ही तीखी आवाज में चिल्ला रही थीं। विजय ने कहा, "इतने दिनो से हम कुछ नहीं कहते हैं, इसीलिए न ! उन लोगों के घर की बिल्ली हमारे रसोईघर में घुसकर मछली खा जाती है। हमने इसके लिए कुछ कहा है ? और तुम यह जो कहते हो कि हमने उनके सिर पर गंदगी फैकी है, सो गंदगी पर क्या हमारा नाम लिया है, जो कहेगी कि हमने ही फैकी है ? इम मकान में सिर्फ हमी लोग रहते हैं ? तीसरी मंजिल पर आदमी नहीं रहते ? ये गंदगी फेकना नहीं जानते हैं या उनके मकान में गंदगी जमा नहीं होती है..." मां ने भी लड़के की बात पर हामी भरी। बोली, "हमने फिर भी पांच रुपये सनस्याह पर मेहतर रखा है। तीसरी मंजिल के बांगालो ने हम लोगों की तरह मेहतर रखा है? हिमांशु बापू फिर मे चिल्ला पड़े, "अजी ओ, मुनती हो मेरी छाती कैसी. कैसी तो कर रही है. नयो बहू का नहाना-धोना खत्म हो चुका पा । नलपर के दरवाजे टूटे हुए है। पानी बेआबरू हैं। महत दिन पहले के बने हैं । पता नही, फौन-सी लकड़ी है ! हो सकता है कि ईश्वरप्रसाद ढनहनियां को भी मालूम न हो। दोमर लग नयी बहू जाने के कारण बहुत दिनों से नाकाम हो गए हैं। उसी हालत में हमेशा आवरू बचायी जा रही है। परंतु विजय की शादी के बाद कुछ इन्तजाम किया गया। नलघर में जाने के बाद नयी वहू के ध्यान में एकाएक आया कि अन्दर जाने से किसी की भी इज्जत सुरक्षित नहीं रह सकती है। ने कहा था, "तुम लोगों का वाथरूम कैसा है जी! मैं वहां नहाने. नहीं जाऊंगी।" "अब ज्यादा दिन इस मकान में रहना नहीं है । वालीगंज मुहल्ले में एक नया फ्लेट लूंगा।" विजय ने कहा था । सो जव होगा, तब होगा। इसके पहले तो काम चलना चाहिए । मगर दरवाजों की कौन मरम्मत करायेगा? वढ़ई कहां मिलेगा ? विजय ने एक दिन सृष्टिधर को पकड़ा था, "हमारे बाथरूम के दरवाजे टूट गए हैं, मरम्मत नहीं करा दोगे?" सृष्टिधर ने कहा था, "करा दूंगा भैया, किसी दिन बढ़ई वुलाकर ठीक करा दूंगा। तीसरी मंजिल का आंगन टूट गया है, सीमेंट मंगाकर उसे ठीक करा दूंगा। उन लोगों के रसोईघर की टाली टूट गई है और पानी चूता है, उसे भी ठीक करा दूंगा । फिर आपके बाथरूम के दरवाजे और ऊपर की रेलिंग..." सृप्टिधर की मरम्मत कराने वाली चीज़ों की सूची खासी लंबी है : दीवार का पलस्तर, कमरे का फर्श, आंगन की सीढ़ी, रसोईघर की छत, रेलिंग तथा और भी बहुत कुछ । उसका हिसाव उसे जवानी याद है। लेकिनं मरम्मत कौन कराएगा ?----किरायेदार या मकान-मालिक ? सृष्टिधर कहता, "मेरे मालिक ही सब करा देंगे, हुजूर! आप लोग नुप- चाप वैठकर देखें कि मालिक क्या-क्या कराते हैं । अवकी मालिक माएंगे तो सब ठीक करा देंगे।" फिर भी चालीस-पचास साल से सिर्फ नाम का ही उल्लेख होता रहा है और मरम्मत नहीं हो रही है। दीवार का पलस्तर, रसोईघर की छत, कमरे का फर्श, आंगन की सीड़ी, जीने की रेलिंग, वाथरूम के दरवाजे-सभी चीजें जैसी पहले थीं अब भी वैसी ही हैं। चालीस-पचास सालों से मरम्मत न होने की वजह से भोर भी पुरानी होती जा रही हैं, और भी टूट-फूट रही हैं, और भी अधिक जर्जर होती जा रही हैं। - - २२
अंत में अल्लाकर विजय एक दिन बाजार से टीन का एक टुकड़ा सरीदकर
ले आया, साथ-साय कोटिया भी।
उस क्षण उसका चेहरा बिलकुल उतरा हुआ था।
"इस पछे मकान-मालिक से कुछ भी नही होगा । खुद अपना हाथ लगाना
होगा।"
और वह हपोड़े से टीन के टुकडे को सपाट करने लगा। हपोडे की घोट से
दन-जन आवाज होने लगी। पहली मंजिल के भवदुलाल से लेकर तीसरी मंजिल
केहरिपद चक्रवर्ती तक दौडे-दौड़े आये ।
"क्या हो रहा है? इतनी आवाज किस चीज़ को हो रही है, सरकार
साहब ?"
विजय तव भी हयोडे से चोट किए जा रहा था।
रसोईघर के अन्दर से मां दौडो-दोडी आई मोर बोली, "अरे विजय, तीसरी
मंजिल का वांगाल धमकियां दे रहा है।"
विजय बोला, "धमकियां देने दो। अपने घर में मैं दरवाजे की मरम्मत
कर रहा हूं, इसमें किसी को दखल देने की क्या जरूरत?"
"वे लोग दरवाजे के सामने बाकर खड़े हैं और तुम्हें बुला रहे हैं ।" मां ने
'कहा।
"बुलाने दो।" विजय ने कहा, "मैं क्या उन लोगो का नौकर हूं?"
तव भवदुलाल बाहर से पुकार रहा था, "अरे भाई, अन्दर कौन है ? कौन
आवाज कर रहा है ?"
विजय अब खुद को रोक नहीं सका। हाय मै हयोड़ा पामे सीधे सदर
दरवाजे के पास चला आया।
"कौन?"
"मैं पहली मंजिल में रहता हूं, पर इतनी आवाज क्यों कर रहे हैं ? मेरे
घर में मेरी पत्नी का एडवांस स्टेज चल रहा है..."
तीसरी मंजिल के हरिपदचाबू बोले,"धड़ाम-धड़ाम आवाज करने से लोगों को,
पया असुविधा नहीं हो रही है ? बंद कीजिए, अब आवाज करना बंद कीजिए।"
"आवाज नहीं करूं, इसके मानी? आपके हुक्म से ?"
हरिषद पक्रवती जवानी के दिनों मे भयंकर दु.सा. किसी जमाने में
.
वारिशाल में लाठी-छुरा चलाया करते थे। उनका शरीर भी गटा हुआ है। उन्होंने कहा, "आपके बाबूजी कहां हैं-हिमांशु बाबू ?" "बाबूजी चाहे कहीं रहें । मैं आवाज करूंगा, मेरी मर्जी, आप लोग रोकने वाले कौन होते हैं ?" एक युवक के मुंह से ऐसी बातें सुनते ही भवदुलाल का तेवर चढ़ गया। यही कुछ दिन पहले उसने इस युवक को हाफपैंट पहनकर स्कूल जाते देखा है और इसी बीच अब यह 'योग्य' हो गया ! "तुम हिमांशु वाबू के लड़के हो न ? तुम्हारा नाम विजय है न ?" विजय ने कहा, "देखिए, 'विजय-विजय' मत कीजिए। आप लोगों को आगाह किये देता हूं। जो कहना है झटपट कहिए और रास्ता नापिए।" हरिपद चक्रवर्ती ने भवदुलाल के चेहरे की ओर देखा। उसके बाद वोले, "देखा न जनाव, आजकल के लड़के कितने इंपर्टिनेंट हो गए हैं । मेरा लड़का होता तो मैं दिखा देता..." वात समाप्त होने के पहले ही विजय बरस पड़ा, "चुप रहिए, 'इंपटिनेंट' शब्द जवान पर मत लाइए । हम भी अंग्रेजी जानते हैं । इस मकान में सबके सव हैगर्ड 'किरायेदार आकर जम गए हैं । जाइए, अपनी लड़की को जाकर भालिए..." भवदुलाल ने शान्त स्वर में कहा, "उन्होंने कोई अनुचित तो नहीं कहा है, भया ?" मगर विजय के बोलने के पहले ही हरिपद बाबू ने कहा, "क्या कहा ?.... मेरी लड़की के बारे में क्या कहा ?" विजय के हाथ में उस वक्त भी हथौड़ा था। सीना तानकर वोला, "हां, आपकी लड़की की ही वावत कह रहा था। इतनी बड़ी बेह्या लड़की आपने अपने घर में रख छोड़ी है । शादी करा नहीं पाते हैं तो घर से क्यों निकलने देते हैं ? घर में रोककर रख नहीं पाते ?" क्रोध से कांपने लगे। "अरे छोकरे, तुम्हारी यह हिम्मत कि तुम मेरी जयन्ती पर कलंक लगामो?" विजय बोला, "जो देखा है, कह दिया। हम लोग कोई अंधे नहीं हैं।" "खवरदार ! हमारी जयन्ती के बारे में अब अगर कुछ बोले कि..." हरिपद वाबू - २४ बातचीत के दौरान ही विजय हपौड़ा लिए एक पग आगे बढ़ पाया। . "मैं कहूं तो दोप," उसने कहा, "मुहल्ले के लोगो की जवान आप बन्द कर सरते हैं ? वे लोग तो हिढोरा पीट रहे है।" "फिर जवान बोल रहे हो? फिर?" "महूंगा तो क्या कर लीजिएगा?" विजय ने कहा, "मारिएगा? मारकर देखिए न । देखू, आपके बदन में कितनी ताकत है !" इतना कहकर विजय ने हयोड़े को ऊपर की ओर उठाया और सामने की ओर बढ़ आया। लेकिन तभी मां सिर पर घूघट डाले आगे बढ बाई । लड़के को कसकर पकड़ा और बोली, "वेटा, तुम नीच आदमी से पगड़ा क्यों करते हो?" विजय तव मां के हाप से छुटकारा पाने की कोशिश कर रहा था। उसने कहा, "छोड़ो, मुझे छोड़ दो, मेरे घर पर आकर ये लोग मुझे वेइज्जत करेंगे और मैं मुह सोकर पड़ा रहूं? छोड़ो..." मा ने बेटे को नहीं छोड़ा। बोली, "किसकी लड़की, किसके लडके के साथ सैर-सपाटा करती है, किसके साथ रात गुजारती है-इसके लिए तुम्हें फिक क्यों ? तुम उसके कौन होते हो ? समझेगी लड़की और समझेगा उसका बाप । सुम नाहक ही सरददं मोल क्यों लेते हो?" विजय ने कहा, "फिर मुहल्ले के लडके मुझसे कहने क्यों आते हैं ? चूकि हम एक ही मकान के किरायेदार हैं इसीलिए कहते हैं न ! यही वजह है कि मैं तुमसे कहा करता हूं कि इस मकान को छोड़ दो और चलकर मले आदमियों के मुहल्ले में मकान किराये पर लेकर रहो।" "सो चलो," मां बोली, "मैं जाने से तुम्हें मना करती हूं? या कि यह कहती हूं कि इस घर में बड़ा ही सुख मिल रहा है ? चलो, नाहक दिमाग मत खराव करो। चलो..." इतना कहकर मा अपने लड़के को खीचती हुई अन्दर ले गई, फिर भव- दुलाल और हरिपद चक्रवर्ती के सामने ही घडाम से दरवाजे बन्द कर सिटकनी चदा दो। "देखी न हिमांशु वायू के लड़के की करतूत !" हरिपद परवर्ती ने भी भवदुलाल बाबू के चेहरे पर बांखें टिका दी। भव- २५ दुलाल ने कहा, "आप लोग क्योंकि प्रोटेस्ट नहीं करते हैं इसीलिए इन लोगों का दिमाग सातवें आसमान पर चढ़ गया है।" हरिपद चक्रवर्ती ने कहा, "यह सब असल में मकान-मालिक की ड्यूटी है, साहब ! मकान-मालिक अगर वैसा होता तो हमारे लिए चिन्ता की क्या बात थी ! आप सृष्टिधर से क्यों नहीं कहते हैं ? सृष्टिधर आता है तो हम सभी उससे सलीके से पेश आते हैं । हमारी यही गलती है । हम लोग जेंटलमैन का भाव दिखाते हैं..." भवदुलाल अब खड़ा नहीं रहा। पीछे से हरिपद चक्रवर्ती ने कहा, "सुनिए भवदुलाल बाबू, और एक बात सुनते जाइए।" भवदुलाल टूटी सीढ़ियां उतरते-उतरते ठिठककर खड़ा हो गया। "क्या ?" उसने पूछा। हरिपद चक्रवर्ती ने कहा, "आपसे एक बात कहना भूल गया । अपनी नौकरानी से जरा कह दें कि जूठे बरतन मली राख दरवाजे के सामने न फेंका करे।" "क्या कहते हैं, साहव ? मेरी नौकरानी जूठी राख दरवाजे के सामने फेंकती है ? हगिज़ नहीं, ऐसा हो ही नहीं सकता। मेरी सास इन सबों के बारे में बड़ी पर्टिकुलर रहा करती है । वह ज़रूर ही किसी दूसरे मकान की नौकरानी 1 । "आप यह कहिएगा तो मैं कैसे मान लूं ?" हरिपद चक्रवर्ती ने कहा, अपनी आंखों से देखा है।" "हो नहीं सकता ! आपने गलत देखा है । यह हो ही नहीं सकता है हरिपद चक्रवर्ती भी कम न थे। उन्होंने कहा, "फिर भी आप कहते हो ही नहीं सकता । फिर तो मुझे अपनी आंखों पर ही अविश्वास करना मैं क्या आपकी नौकरानी को पहचानता नहीं ?" भवदुलाल को गुस्सा हो माया, "देखिए, जो-सो मत बक पाकिस्तानियों की तरह गन्दे नहीं रहते हैं। मेरी सास इन सब चतु पर्टिकुलर रहती है।" हरिपद चक्रवर्ती बोले, "हम घटिया लोगों की तरह अपनी बड़ाई ૨૬ २ से नहीं करते।" "जवान संभालकर बातचीत कीजिए, जनाव," भवदुलाल ने कहा, "कहे देता "यकीन न हो तो अभी चलिए, घर के सामने चलकर दिखा देता हूं। अभी तक वहाँ झींगा मछली की चोइयां गिरी हुई हैं, अभी तक साफ नहीं किया गया है।" हरिपद परवर्ती ने वहा । "मोगा मछली!" "हां," हरिपद चक्रवर्ती ने कहा, "झीगा मछली को चोइयां ! सड़ी झींगा मछली की बदबू फैल रही है, मक्खिया भिनमना रही हैं।" "देखिए, झूठ मत बोलिए। आज मेरे घर पर झीगा मछली मामी ही नहीं है। पता लगाइए, हो सकता है कि आपको नौकरानी ही ने फेंका हो।" हरिपद चक्रवर्ती ने कहा, "जनाब, हम लोग आप जैसे घटिया लोगों की तरह सही होगा मछली के भक्त नहीं है । हमारे यहां आज हिलसा मछली आयी है। खुद मैंने बारह रुपये किलो की दर से हिलसा मछली खरीदी है।" भवदुलाल ने कहा, "आप किसको पैसे की गरमी दिखा रहे हैं ? पैसे की गरमी दिखानी ही है तो किसी दूसरे को दिखाइए। यहा कोई फायदा नही होगा।" "पैसे को गरमी में दिखा रहा हूं या आप ?" हरिपद चक्रवर्ती ने कहा। "आप जबरदस्ती झगड़ा करना चाहे तो मैं लाचार हू । मैंने आपकी तरह फर कहा कि किस दर की कितनी मछली खरीदी है ?" "फिर आपने क्यों कहा कि आपकी नौकरानी ने रास्ते के सामने मछली नहीं फैकी है ?" भवदुलाल को देर हो रही थी। बोला, "जाइए-जाइए, मैं माप से तर्क करना नहीं चाहता। मेरे पास इतना वक्त नहीं है। अगर बड़प्पन ही दिखाना है तो बालीगंज में किराये का मकान लेकर रहिए। यहां साठ रुपये किराये के मकान में मरने के लिए क्यों पड़े हैं ?" इतना कह चुकने के बाद भवदुलाल वहा रुका नहीं, जल्दी-जल्दी कमजोर जीने को तय करता हुआ नीचे उतरा और घर के अन्दर घुस गया। - २७ । ईश्वरप्रसाद ढनढनियां संभवतः ईश्वर की तरह ही अदृश्य रहता है। अन्यथा इतने-इतने लोगों से जव भेट-मुलाकात होती है तो उससे क्यों नहीं होती ? भवदुलाल दिख पड़ता है, हिमांशु बाबू दिख पड़ते हैं, हरिपद चक्रवर्ती भी दिख पड़ते हैं । राधा बुआ जो मुहल्ले-मुहल्ले में अपनी नौर पराई बातों का बखान . किये चलती है वह तो दिख ही जाती है, मगर उसकी लड़की नेड़ी, जो हर साल बच्चे जनती है और हांफती रहती है, वह भी यदा-कदा दिख जाती है। कभी- कभी वह बच्चे को गोद में लिए गली के नुक्कड़ पर आकर खड़ी होती है। घर में रहते-रहते जव ऊबने लगती है, तव कपड़ा पहने बाहरी दुनिया को देखने लगती है। अब तीसरी मंजिल के हरिपद बाबू या हरिपद चक्रवर्ती की बात लीजिए। बाप जी तोड़ मेहनत करने पर एक बहुत बड़े कुनबे का खर्च चलाता है । सुबह उठते ही लड़कों को पढ़ाने किसी मुहल्ले की ओर निकल जाता है। वहां से लौटते ही दो कौर जल्दी-जल्दी निगलकर दफ्तर की ओर दौड़ लगाता है। फिर दफ्तर से सीधे अपने छात्रों के मकान की तरफ चल देता है । एक के बाद दूसरे छान के मकान में जाता है । कैसे सूर्य अस्त हो जाता है, इसका पता उसे नहीं चलता। घर आते ही हड़बड़ाता हुआ कमरे में घुस जाता है। वहां उसे अपने पलंग पर सिनेमा की ढेर सारी पत्र-पत्रिकाएं मिलती। पूछता, "ये सब क्या हैं जी ?" पत्नी कहती, "आंख से तो देख ही रहे हो कि यह सब क्या है, फिर बक- वक क्या करते हो?" इतनी देर के बाद हरिपद को होश आया। वह गौर से अपनी पत्नी की ओर ताकने लगा । आज तेवर चढ़ा हुआ लगता है । "क्या बात है ? क्या हुआ है आज ?" पुष्प बोली, "क्या हुआ है, यह दूसरी मंज़िल के किरायेदार से पूछकर देखो।" "दूसरी मंजिल के किरायेदारने क्या किया ?फिर गाली-गलौज किया है ?" पुष्प बोली, "कहे देती हूं, कल ही तुम्हें दूसरा मकान ठीक करना है, वरना मैं खुदकुशी कर लूंगी।" २८.
पुष्प की ये बातें कोई नयी नहीं हैं । मकान को वायत ही उसने तीस साल के दरमियान तीस हजार बार खुदकुशी करने की इच्छा जाहिर की है । हर बार उसने हरिपद से घर बदलने को कहा है और हर बार आत्महत्या की धमकी दी है। हरिपद के लिए यह आम तौर से कोई नयापन नहीं रखता । इसके लिए हरिपद कभी घबराहट महसूस नहीं करता है । इसके अलावा जिसे सुबह से शाम - तक जी तोड़ परिश्रम करके जीवन जीना पड़ता है, उसके लिए इन तुन्छ बातों से परेशान होना कोई मानी नहीं रखता। इन बातों पर बिना ध्यान दिए हरिपद पत्र-पत्रिकाओं को उलट-पुलटकर देखने लगा। हर पन्ने पर नंगी तस्वीरें थी। "यह सब घर मे कौन ले आया ? कौन खरीदता है ?" पुष्प बोली, "कोन परीदता है, यह जानने से तुम्हें कौन-सा पायदा होगा? कोई तुम्हारे पैसे से तो खरीद नहीं रहा है ?" हरिपद को गुस्सा हो आया, "मैं घर का मालिक है। मैं यह नहीं जान सकता हूं कि लड़के बच्चे क्या करते हैं ?" पुष्प बोली, "जानकर तुम बडा ही उपकार करोगे ! दूसरे मकान का आदमी आकर तुम्हारी औरत का जब अपमान कर जाता है, उम समय तुम्हारा ध्यान खिचता है ? कहां कौन सिनेमा की पत्र-पत्रिकाएं खरीदकर पैसा वरवाद करता है, उसी तरफ तुम्हारा ध्यान है? पढ़ा है तो अच्छा किया है, खरीदा है तो ठीक किया है..." "किसने तुम्हारा अपमान किया है, बताओ। बगर बताये मैं कैसे जानूंगा? पुष्प बोली, "तुमसे कहकर क्या होगा? तुम्हें कहना या पेड़-पौधों से बहना एक जैसा है। मुझ पर जैसा जोर-जुल्म करते हो, उन लोगों पर करो तो समझू ।" "किसने क्या कहा ?-राधा बुआ ने ? या हिमाशु बाबू की औरत ने ?" पुष्प बोली, "चुप रहो । मुझसे बात मत करो। खाना ढंककर रख दिया धाकर सो रहो । तुमसे मैं वक-यक नहीं कर सकूगो।" इसके बाद बात करना व्यर्य था। हरिपद ने नल के पास जाकर मुह-हाथ धोया और खाने के लिए रसोईघर में पहुंचा। !" हरिपद वायू ने तय तक थाली में हाय नहीं डाला था। वहीं से चिल्लाकर "हरिपद या पुछा, "कौन ?" हरिपद को आवाज़ पहचानी जैसी लगी। जल्दी-जल्दी भोजन को फिर से ढंक दिया। दरवाजे की सिटकनी खोलते ही देखा-सामने हिमांशु वाबू खड़े हैं । वगल में उनका लड़का है। "आपकी लड़की कहां है ? अपनी लड़की को एक बार बुलाइए ।" हरिपद आश्चर्यचकित हो गया। "मेरी लड़की? जयन्ती ?" उसने पूछा। "हां-हां; एक बार उसको पुकारिए न । विजय को आपकी लड़की ने क्या कहा है, इसका मुकावला आमने-सामने हो जाये ।" "मेरी लड़की ने ? आपके लड़के से कहा है ? क्या कहा है ?" हिमांशु वाबू वोले, "सो सव अपनी लड़की के मुंह से ही सुन लीजिएगा।" "मगर बात क्या है ? मेरी समझ में तो कुछ भी नहीं आ रहा है । मैं अभी-अभी घर आया हूं। अब तक खाना नहीं खाया है । खाने बैठा ही था कि उठकर चला आया ।" "सो आप खाना खाने जाइए । अपनी लड़की को वुलवा दें । बस, इसी से हो जायेगा।" "अपनी लड़की को ? खैरं, देखता हूं...' इतना कहकर हरिपद अन्दर आया। पुष्प उस वक्त विस्तर पर पीठ के बल लेटी हुई थी। हरिपद बोला, "अजी ओ, सुनती हो, जया कहां है ? जयन्ती ?" पुष्प जैसी की तैसी लेटी रही । वात का कोई उत्तर नहीं दिया । हरिपद ने सोचा, उसकी पत्नी शायद सो गयी है । देह झकझोरकर पुकारा, "अजी ओ, सुनती हो, दूसरी मंजिल के हिमांशु बावू आये हैं । उनके साथ उनका लड़का है । जयन्ती को बुलाने को कहते हैं । वह कहां है ?" "उफ, तंग मत करो । जयन्ती कहां है, इसका मुझे क्या पता ? क्यों बुला , रहे हैं ?" हरिपद बोला, "इतनी रात तक वह कहां रहती है ? अव तक घर क्यों नहीं वापस आयी?" पुष्प ने एक भी बात का उत्तर न दिया । उसी तरह नींद का स्वांग रच- कर लेटी रही। ३ ० "भारी विपत्ति है !" हरिषद बोला, "अभी मैं हिमांशु वा से जाकर पा कहूं, बताओ तो सही ! भारी परेशानी है। रात का साढे नौ बज गया। अब तक क्यों नहीं लौटी है ? वह कहां जाती है ? सिनेमा देखने गयो है ?" पुष्प बोली, "कान के मामने भन भन भन भन मत करो। अच्छा नहीं लग रहा है। तुम्हारी लडकी कहा गया है, यह वात वही जानती है !" "फिर अगर मैं जाकर यही बात कहूं तो उचित जंचता है ? चतामो तो, वे लोग क्या मोचेंगे । रात दस बजने जा रहा है । इतनी बड़ी लड़की अब तक घर वापस नहीं आयी है।" तमी जयन्ती जीने मे तीमरी मंजिल की ओर भा रही थी । आते ही अपने सामने दूसरी मंजिल के किरायेदारों को देखकर चकित हो गयी। हिमांगु बाबू को शुरू में घबराहट महसूस हुई। एक तो दो सौ साठ ब्लड प्रेशर है, उसपर डायवेटी ! इतनी रात तक वहम करने से चीनी की माला में वृद्धि हो जायेगी। शुरू में जयन्ती ने ही बात छेडी, "किमे बोल रहे हैं ?" हिमाशु वायू ने कहा, "लो, आ ही गई । मुम्हे ही छोउने आमा पा । तुम्हें 'तुम' कहकर संबोधित कर रहा हू, कुछ अन्यथा न लेना। तुम्हें मैंने जनमते देवा है।" जयन्ती ने उसी तरह जवाब दिया, "इतनी बहानेबाजी की क्या जरूरत ? यया कहना चाहते हैं, कहिए!" हिमांशु बाबू ने ऐसी आशा न की थी। कुछ भी हो, है तो उनकी लड़की की हमउम्र ! इतनी पान ! वोले, "मेरे लडके मे नुमने क्या कहा है, वेटी ? लड़के को मैं साथ लिए माया हूं। तुम्हारे सामने ही मुकाबला हो जाए।" जयन्ती को घांप विजय पर गयी। उसके बाद बोली, "आपके सारके ने क्या कहा है, यही कहिए न !" हिमांशु बाबू ने कहा, "अरे, तुम चुप क्यों हो? उसने तुम्हें क्या कहा है, पहो न !" विजय बोला, "मैंने तो आपको बताया ही है, बाबूजी ! मुझे गाली-गसोम किया है।" हिमांशु बाबू संतुष्ट नहीं हुए। बोले, "क्या गाली-गलौज किया है ?'
'सूमर का बच्चा कहा है।" विजय ने बताया। हिमांशु वावू ने जयन्ती की ओर देखते हुए कहा, "छिः छिः बिटिया, तुमने यह बात कही है ?" जयन्ती बोली, "आपके लड़के ने मेरे फ्रेंड का इनसल्ट क्यों किया?" "तुम्हारे फ्रेंड का इनसल्ट किया है ? तुम्हारा फ्रैंड कौन है ?" जयन्ती बोली, "अपने लड़के से ही पूछ लीजिए न ! नापका लड़का कोई अंधा नहीं है, उसे सब मालूम है।" हिमांशु बाबू ने विजय की ओर मुड़कर कहा, "तुमने इसके फ्रेंड को वेइज्जत किया था ? मुझसे यह क्यों नहीं बताया ?" विजय वोला, "इसी ने अपने फ्रेंड के सामने पहले मेरा इनसल्ट किया था।" जयन्ती बोली, "मैंने पहले वेइज्जत किया है ? झूा कहीं का !" विजय चिल्ला उठा, "खबरदार, झूठ मत बोलो ! फिर मैं सब कुछ कह दूंगा। यह मत सोचना कि मुझे कुछ भी मालूम नहीं है । मानन्द राय के साथ तुम रात कहां गुजारती हो, यह भी बता दूंगा..." जयन्ती क्रोध से तिलमिला उठी।"शटअप...!" उसने कहा । हिमांशु बाबू ने देखा, मामला पेचीदा होता जा रहा है । वोले, "तुम लोग चुप रहो । वेकार गुस्से में आ रहे हो ! ठंडे दिमाग से बातचीत करो। आनन्द राय कौन है ?" "आनन्द राय मेरा फ्रैंड है।" जयन्ती ने कहा, "विजय उसके पास मेरे खिलाफ शिकायत क्यों करता है ! मैं चाहे जहां और जिस किसी के साथ सैर-सपाटा करूं, इससे आपके लड़के को ईर्ष्या क्यों होती है ?" तव तक हरिपद मा चुका था । अपनी लड़की के गले की आवाज़ सुनते ही अन्दर से दौड़ा-दौड़ा आया । आते ही वहां की स्थिति देखकर ठिठक गया। लड़की की ओर ताकता हुआ वोला, "तुम्हें लौटने में इतनी देर क्यों हुई ?" हिमांशु वाबू ने कहा, "यही वात मैं कह रहा था, हरिपद वाबू । अपने लड़के से मुकाबला करा रहा था। नापकी लड़की ने मेरे लड़के को सूअर का बच्चा कहफर गाली दी है।" जयन्ती फुफकार उठी, "कहा है तो ठीक किया है ! पहले तो सिर्फ सूअर का - - - बच्चा ही कहा है, अब अगर मेरे फ्रेंड का इनसल्ट करेगा तो हरामी का बच्चा कहकर गाली दूगी।" हिमांशु यावू बोले, "देवा न हरिपद बाबू, आपने देशा न ! आपने अपने कान से ही सब सुना हरिपद बोला, "ए जयन्ती, तुम क्या यक रही हो?' जयन्ती ने अपने बाप की तरफ मुडकर कहा, "याप नृप रहिए बाबूजी, मन जो अच्छा सोचा, सो कहा है। गली-रास्ते में यह मेरा पीछा करता रहता है, मालूम है !" "तुम्हारा पीछा करता है ?" "हा, मेरा पीछा करता है । मैं बस पर चढ़ती हूं तो यह भी मेरे पीट-पौधे वस पर चढता है । ट्राम पर चढ़ती हूं तो मेरे पीछे-पीछे ट्राम पर चढता है।" हिमांशु बाबू ने कहा, "मेरा लड़का तुम्हारा पीछा करते हुए ट्राम पर चढता है ? उसको क्या कोई काम नहीं है कि तुम्हारा पीछा करता चले ? मेरा लहरा सवेरे भात पाकर कॉलेज जाता है और रात मे घर वापम याता है।" "सचमुच कॉलेज जाता है या कॉलेज का नाम बताकर सिनेमा देशने जाता है, इसकी खोज-गवर थापने ली है ?" "उनका लड़का कॉलेज जाए या जहन्नुम में जाए, इसके लिए तुमको चिन्ता पयों है ? तुम अपना काम देखो।" हरिपद ने कहा। अब हिमांशु बाबू अपने लड़के की ओर मुड़कर बोले, "क्यों, तुम र क्यों हो ? वताओ, तुम कॉलेज जाते हो या मिनेमा ?" विजय बोला, "मैं कॉलेज जाता हूं या नहीं जाता हूं-इसको कैफियत में इसे नहीं देने जा रहा हूं। पहले यह वताए कि मुझे गाली-गलौज क्यों किया !" हरिपद बोला, "नहीं, यह कहने से नहीं चलेगा। मेरी राष्ट्रको योही गाली. गलोग नहीं कर सकती है । तुमने कुछ किया है, जरूर ही उसका पीछा रिया विजय ने कहा, "यापकी करेक्टरलेस लड़की का पीछा करूं, में ऐगा फुलिश नहीं है।" "क्या कहा ?" गुम्म में हरिपद मीना तानकर आगे घर पाया। "वादृत्री, याप र रहिए, मैं इमे मा चपाती हूं..."
" इतना कहकर जयन्ती आगे बढ़ी और अपने पैर का चप्पल उतारकर विजय के मुंह की ओर जोर से फेंका । पर वह चप्पल जाकर हिमांशु वाबू के मुंह पर लेंगा। हिमांशु वावू वगल में ही खड़े थे। इस तरह की घटना घटित होगी, हिमांशु वाबू ने यह सोचा तक न था। "क्या कर रही हो, जया ? क्या कर रही हो ? हरिपद वावू का कलेजा थरथराने लगा। लेकिन इसके पहले ही विजय ने एक कांड कर डाला । वह शेर की तरह जयन्ती की गरदन पर कूद पड़ा। उसके वाद वाल पकड़कर घसीटते हुए जमीन पर विठा दिया और बोला, "मेरे वावूजी. को जूते से मारोगी? मेरे बाबूजी का इनसल्ट करोगी?" हिमांशु वावू तव घटना की आकस्मिकता से आश्चर्य में खोये हुए थे। लेकिन हरिपद बाबू इस कांड को देखकर खामोश नहीं रह पाए । सामने छलांग लगाकर विजय को खींच-खांचकर छुड़ा लेना चाहा । "इतनी हिम्मत ! मेरी लड़की पर हाथ उठानोगे ?" उस तंग सीढ़ी पर एक भयंकर कांड घटित होने लगा। वाहर शोरगुल सुनकर हरिपद बाबू की पत्नी अपने को रोक नहीं सकी । पुष्प के कानों में सब कुछ पहुंच रहा था । जव वेहद शोरगुल होने लगा, वह सबके सामने आकर.. उपस्थित हुई । आकर लड़की का हाथ पकड़ा और बोली, "हरामजादी लड़की, नीच मादमियों से नीच की तरह झगड़ रही हो ! तुम्हें शर्म नहीं आती? वे लोग तो नीच हैं ही, इसके चलते हम भी नीचता पर उतर आएं ? चलो..." और वह लड़की को खींचती हुई घर के अन्दर ले आई। उसके बाद हरिपद बाबू को भी पुकारा, "तुम मुंह वाये क्यों खड़े हो ? कमीतों का चेहरा देख रहे हो ? चले आओ..." इतना कहकर उसने हरिपद वावू के एक हाथ को पकड़कर ज़ोर से खींचा और भीतर ले गई। उसके बाद सदर दरवाजे को धड़ाम से बन्दकर सिटकनी लगा दी। ! इस किस्म की घटना इस मकान के लिए कोई नई बात नहीं है। पचास-साठ ३४ सालो से इस उनतीस बटे तीन घटे छह मेयर के नीलमणि दातार लिन में यही होता मा रहा है। नीलमणि हालदार लेन कब बनी है, पता नहीं। न मानकर देयने से पता चलता है कि यह उसके पहले ही बन गुका है। उनतीस बटे तीन वटे छह नीलमणि हासदार मन । गो. : प्रसाद ढनढनिया ने कव खरीदा था, जिस तरह उगता बार- है, उसी तरह नीलमणि हालदार लेन के यागिन्दी फी भी मान र नहीं है । कहने का मकसद है कि एक हाथ गे गोहाय माग, समाधि किसी ने कभी देखा तक नहीं है । मकान पहले अंग था, भारी रहा । आगे कोई दूसरा आदमी महीने के पहले हाते में थानाmar मे मृष्टिधर भाने लगा। एक दिन मवेरे-सवेरे याकर गृष्टिधर हरेक के नाम ग नागिन । एफमंजिले के भवदुलाल ने दरवाजा मांगने ही पूछा, "कौन ?" वाहर से जवाव बाया, "मैं है।" "अरे, तुम कौन हो, यही बताओ न ' पाको माRRIAL ?" "मैं मृष्टिधर हूं।" भवदुलाल ने ज्वाँही दरवारा मोला, धिया न पा ही मुसकराहट लाकर नोटिम भागे बढ़ा दिया-मामात में apraan दीजिए, हजुर !"
- सृष्टिधर हूं-ईश्वरप्रसाद ढनढनियां का कर्मचारी।" यह नोटिस लेकर सृष्टिधर ज़माना पहले आया था । कब, किस तारीख में माया था, किसी को भी याद नहीं है । शास्त्र में ईश्वर के दूत के शुभागमन की वातों का उल्लेख है। यह भी ठीक वैसा ही है । सृष्टिधर ईश्वरप्रसाद ढनढनियां का दूत है । वह दूत आदिकाल से नोटिस लेकर इस मुहल्ले में आ रहा है- उनतीस बटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन के वाशिन्दों को नोटिस देने आता है और रुपया लेकर चला जाता है । महीने के बाद महीने, साल के बाद साल गुज़र जाते हैं और जन्म, मृत्यु और विवाह का साक्षी यह सृष्टिधर रह जाता है। एकमंज़िले के भवदुलाल के मंकाने में कभी सन्तान जन्म लेती है, दोमंज़िले के हिमांशु वाबू के मकान में बीमारी का ऐसा आक्रमण होता है कि अब मरे तब मरे और तीनमंज़िले के हरिपद चक्रवर्ती के मकान में विवाह की शंखध्वनि गूंज उठती है । हरेक का साक्षी है यह सृप्टिधर-ईश्वर का जीवन्त दूत उस दिन सड़क पर एकाएक जयन्ती से मुलाकात हो गई। शुरू में हिमांशु वावू का लड़का पहचान नहीं सका। उसे ठीक सड़क नहीं कहा जा सकता है । सड़क होती तो विजय पहचान ही लेता। गैस की रोशनी या बिजली के खंभे के नीचे चेहरा पहचानने में कठिनाई नहीं होती है। इधर चौरंगी से शुरू करके उधर एलगिन रोड के मोड़ तक-पूरब की तरफ के फुट- पाथ तक–जितनी दूर जाया जाए, किसी-न-किसी से मुलाकात होगी ही। कोई किसी लैंपपोस्ट के नीचे खड़ा है। कोई सड़क के बस-ट्राम की ओर चुपचाप ताकता हुआ खड़ा है । मुद्रा ऐसी होती है जैसे किसी के इन्तजार में खड़ा हो। शुरू में तुम उससे कुछ भी बात न करो। तुम भी दसेक हाथ फासले पर खड़े हो जाओ। फिर बीच-बीच में लड़की की ओर ताको । देखोगे, वह भी तुम्हारी ओर ताक रही है। इस तरह बहुत देर तक ताक-झांक के वाद तुम फासले को कम कर दो। लगभग पांच गज के फासले तक बढ़कर चले आओ। तब वह लड़की या तो उत्तर की तरफ या दक्षिण की तरफ चलना शुरू कर देगी। तब तुम पीछे-पीछे चलो।. विजय ने जेव से सिगरेट निकालकर जलाई। ६
देखा, वह लडकी भवानीपुर की तरफ जाने लगी।
विजय भी चलने लगा।
बिलकुल निकट आ जाने पर उस लड़की ने मुह पुमाकर देवा । किन्तु
देयते ही चौंक पड़ी।
"तुम ?"
और कुछ देर होती तो दोनों व्यक्ति दो दिशाओं में गायब हो जाते। मगर
ऐसा नहीं हुआ।
जयन्ती ने उछलकर विजय की कमीज के कॉलर को पकड लिया।
"मागकर कहां जागोगे ?"
विजय उस क्षण हतप्रम-सा हो गया था। क्या कहे, समझ में नही आया ।
"क्यों, चुप क्यों हो ? लड़की का पीछा करते हो ? मालूम है, अभी तुम्हें
पुलिस से पकड़वा सकती हूं।"
पुलिस का नाम गुनते ही विजय और चादा घबरा गया। तब तक उधर
सहा में लोग तमाशा देखने के लिए इकट्ठे हो गए थे
"क्या हुआ, विटिया ? इसने क्या किया?"
जयन्ती बोली, "देखिए न, में सड़क से जा रही हूं और यह मेरा पीछा
किए पल रहा है । पीछे से आकर मुझे पुकार रहा था।"
एक आदमी भीड़ को ठेलकर आगे बढ़ माया और बोला, "हटिए, में देयता
-
और उसने विजय के बालों को पकड़कर धीचा, "यताओ, तुम कौन हो?
यताओ, तुम क्यों इसके पीछे-पीछे चल रहे थे और पयो इमे पुकार रहे थे ? कही,
तुम्हारा मतलब क्या है ?"
विजय अपराधी की तरह इतने-इतने आदमियों के बीच सिर झुकाए यहा
रहा।
"आप इसका गला छोड़ दें, हम लोग इसकी खातिर करते हैं।"
इतना कहकर एक व्यक्ति ने जयन्ती को हट जाने के लिए कहा । जयन्ती ने
पहा, "रोज-रोज यह मेरा पीछा करता है।"
उस भादमी ने विजय के गाल पर तडार से एक तमाचा जमाकर उसे
जमीन पर पटक देना चाहा । लेकिन बगल के आदमी की देह से टकरा जाने के
- । कारण विजय ने अपने-आपको थोड़ा संभाल लिया। "बतायो साले, जवाब दो, खामोश रहोगे तो मारते-मारते खत्म कर दूंगा। षयों पीछा किया था?" विजय ने किसी तरह जवाब दिया, "मैंने पीछा नहीं किया था।". "स्साले, फिर झूठ बोलता है ?" इतना कहकर फिर से एक सापड़ लगाया। उस वक्त जयन्ती की मांखों से आंसू टपक रहे थे। ये आंसू विजय के अप- मान से नहीं, बल्कि इतने-इतने आदमियों के धिक्कार और अजनबियों की सहृदयता के कारण टपक रहे थे। "देखिए, मैं भले घर की लड़की हूं। इन लोगों की शैतानी से सड़क पर चलना तक मुश्किल हो गया है।' "रोइए मत, बहनजी! हम इसे सही रास्ते पर ला देते हैं। स्साले, तेरे घर में मां-बहन नहीं है ? स्साले, तेरे घर में बहू-बेटी नहीं है ? भले घर की . लड़कियों का पीछा करता है ?" तब सरदर्द से विजय की हालत बदतर थी। "मेरे बाल छोड़ दें। बड़ा दर्द हो रहा है । छोड़िए..." "स्साले तेरे बाल छोड़ दूंगा ? तेरा सर मुंडाकर उसपर मट्ठा डालूंगा, तब छोडगा । अभी गया हुमा है ! एक भले आदमी ने कहा, "छोड़ दीजिए साहब, इतना हंगामा करने के बजाय इसे पुलिस के सिपुर्द कर दीजिए, संझट खत्म हो जायेगी।" "पुलिस के सिपुर्द क्यों कर दूं, साहब ? पुलिस के सिपुर्द कर देने से पुलिस इसे सजा देगी ? भाज की पुलिस क्या पहले की जैसी पुलिस है ?' जयन्ती बोली, "अब इसको मत मारिए । छोड़ दीजिए, मुझे डर लग रहा ।" एक नेता किस्म का आदमी आगे बढ़ आया और बोला, "आप बेवजह क्यों. उर रही हैं ? हम लोग हैं, आपके लिए डरने की क्या बात है ?" "सड़क पर अगर मुझे फिर से अपमानित करे ?" "इसका मतलब ? पढ़े को ऐसा सबक सिखाऊंगा कि जिन्दगी में फिर किसी का पीछा करने की हिम्मत नहीं करेगा । आप बेफिक रहिए, मैं खुद आपको घर " - पहुंचा दूंगा।" "नहीं, नहीं; मणको तकलीफ करने की कोई जरूरत नहीं।" आदमी बोला, "तकलीफ की क्या वात ? यह तो हमारा कर्तव्य है।" एक दूसरा आदमी बोला, "नहीं-नही; आप ऐसा मत कहें । मैं आपको टैक्मी से घर पहुंचा दूगा। चलिए..." एक तीसरे आदमी ने आगे बढकर कहा, "आप यहां पड़ी क्यों हैं ? घर ये लोग संभालेंगे । चलिए, इन कमोनों की बात में मत रहें। चलिए""" उस आदमी ने जयन्ती का हाथ पकडकर खोचा। उधर से एक आदमी ने कहा, "आप कौन है, साहब ? आपको इतनी गरज पयों ? हम लोगों को बात मे पाप क्यों दखलन्दाजी कर रहे हैं ?" "चुप रहिएं, आपका मतलब मैं समझता हूं। एक हेल्पलेम लेडी के लिए आप लोग ही क्यों सरदर्द मोल ले रहे हैं ?" जसके बाद जयन्ती को ओर मुड़कर बोला, "चलिए, मैं खुद आपको आपके मकान में पहुंचा दूं लेकिन अचानक एक कांड घटित हो गया। एकाएक एक प्राइवेट कार आकर फुटपाय के पास खड़ी हुई। एक साफ- सुपरे युवक ने गाड़ी के अन्दर से उझककर कहा, "कोन, जयन्ती ! यहा क्या हुआ है ? किस चीज की भीड़ है ?" अब सबकी दृष्टि गाड़ी की तरफ गई। "आनन्द दा, तुम ? जान बचा दो तुमने ! भानन्द ने पूछा, "यहां हो-हल्ला क्यो मचा है ?" जयन्ती बोली, "बाद मे कहूंगी। अभी तुम किसी तरह मुझे घर पहुंचा दो।" युवक ने जयन्ती को गाड़ी में बिठाया। उसके बाद इंजन स्टार्ट कर घुओं उड़ाता हुआ सामने की ओर निकल गया। जो लोग अब तक उस लड़की के गिदं जमा होकर वीरता का प्रदर्शन र रहे थे, ये वेवकूफ की तरह उस ओर ताकते हुए खड़े रह गए । उनले दारा गाड़ी आँखों से ओझल हो गई, वे एक-दूसरे के मुंह की बोर ताने । आश्चर्य है ! आजकल किसी पर विस्वान नहीं किया जा सकता, हर: "यह सड़की गृहस्य पर की है ?" - इस बात का कोई उत्तर न दे सका। अब सबके मन में सन्देह पैदा होने लगा--अब तक जिसकी सुरक्षा के लिए वें आगे बढ़कर आए थे, दरअसल वह कौन है ? विजय तव लोगों के हाथों से मुक्त हो चुका था। तब उस पर किसी का आक्रोश नहीं था। इस बीच वह अपनी कमीज़ को ठीक करके अपने-आपको थोड़ा-बहुत संयत कर चुका था। "मेरी बात पर तब आप लोगों ने यकीन नहीं किया ।" उसने कहा । भीड़ तब छंट चुकी थी । जो दो-एक व्यक्ति तव जाने-जाने को प्रस्तुत थे उनकी समझ में भी यह बात आ गई कि असल में इस युवक की कोई गलती नहीं है । हो सकता है कि यह लड़की ही आधी गृहस्थ हो ! एक आदमी ने कहा, "कैसे समझें कि किसके मन में क्या है ! आजकल चेहरा देखकर समझना मुश्किल है.' सभी के चले जाने के बाद उनतीस बटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन के दोमंज़िले के किरायेदार हिमांशु सरकार का पुन विजय सरकार जैसे मासमान से गिरा । वह लड़की तीनमंज़िले के हरिपद चक्रवर्ती की लड़की है, यह बात उसकी कल्पना में कैसे आ सकती थी ! छिः छिः ! आदमी इस तरह की गलती भी कर सकता है ! उस दिन सृष्टिधर ने आते ही अचानक कहा, "मेहमान साहब, मेरे मालिक आए -- भवदुलाल ने कुल मिलाकर तव चाय को होंठों से लगाया था। राधा बुआ सृष्टिधर के गले की आवाज़ सुनते ही बाहर निकल आई। "ओ सृष्टिधर, सृष्टिधर..." उसने पुकारा। सृष्टिधर तव जल्दबाजी में था । यह समाचार हिमांशु वावू को भी सुनाना है । लेकिन बुआजी की पुकार सुनकर लौट आया । "मुझे पुकार रही हैं, वुआजी ?" राधा बुआ वोली, "अचानक तुम क्या कह गए और तुरन्त दौड़कर भागे . ४० जा रहे हो, अच्छी तरह तुम्हारी बात सुन नही सकी । क्या कह गए ?" मुष्टिधर ने अपने चेहरे पर भरपूर मुसकराहट विखेरकर कहा, "यह बात दोमंजिले के चाचाजी से भी कहनी है न ! चाचाजी बहुत दिनो से कहते मर रहे हैं कि उनके जीने की रेलिंग कमजोर हालत मे है । इमीलिए..." "तो तुम्हारे लिए दोमंजिले के किरायेदार ही बडे है, सृष्टिधर ? हम लोग एकमचिले में रहते हैं तो कुछ भी नहीं हैं ? हम लोग क्योकि तीस रुपया किराया देते हैं इसलिए हम किरायेदार की गिनती में नहीं हैं ? हम लोग भेड-बकरी है ?" सृष्टिधर ने दातों से जीभ काट कर कहा, "छि. छि:, बुआजी, आप क्या कहती हैं ! मैंने आपसे यह कब कहा ? मैंने यही कहा कि मेरे मालिक कल आ रहे हैं । यह कहकर ही मैं चला जा रहा था।" इस बात को सुनते ही जैसे आग लग गई हो। राधा बुआ ने पूछा, "सच कह रहे हो?" "सच नही तो झूठ कह रहा हूं, बुआजी ?" सृष्टिधर ने कहा, "मैंने मालिक को लिया था कि मकान की मरम्मत कराए बगैर अब नहीं चलेगा। सभी को बहुत परेशानी हो रही है—एकामंजिले के मेहमान साहब के आंगन में गड्ढा हो गया है और रसोईघर की चाल से बरसात मे पानी टपकता है।" राधा दुआ बोली, "तुमने सचमुच लिखा है ?" "लियूंगा क्यों नहीं ? आप लोगों को तकलीफ हो रही है, इसे क्या अपनी बांखों से नहीं देख रहा हूं!" "फिर बेटा सृष्टिधर, तुम जब इतना कर ही रहे हो तो हमारे पाखाने की सीढ़ी भी ठीक करने को कह दो। सीढी की इंटें उखड गई हैं, कभी भी हाथ- पांव टूट सकते हैं, लंगड़ी होकर मौत के मुंह में पड़ सकती हूं। वेटा, इसे ठीक करा दो।" सृष्टिघर ने कहा, "मालिक के आते ही ठीक करा दूगा। मालिक को लाकर सब कुछ दिखाऊंगा, वह बठे ही भले आदमी हैं, बुआजी! मालिक एक बार आ पाएं, फिर तो यह मकान बिलकुल नया हो जायेगा। इस मकान को खरीदने के दिन से बाज तक उन्होंने इसे देखा तक नहीं है ।" राधा बुआ मुष्टिधर की बात सुनकर बेहद खुश हुई, "तुम्हारे मालिक काय मा रहे है ?" - । सृष्टिधर ने कहा, "वारह बजे के अन्दर ही ले आऊंगा, ज्यादा देर न. गेगी।" "फिर तुम्हारे मालिक अगर रसोईघर में घुसना चाहें तो?" "अच्छी तरह दिखाने के लिए रसोईघर के अन्दर ले ही जाना होगा, आजी । मालिक को अपनी आंखों से देखना है, वरना उन्हें कैसे पता चलेगा कहां-कहां टूटा हुआ है।" शुरू-शुरू में इस तरह की बातों पर सभी किरायेदार विश्वास करते थे। प्टिधर को भी विश्वास की दृष्टि से देखते थे। सोचते थे, मकान-मालिक श्वरप्रसाद ढनढनियां किसी दिन आएगा। आकर सभी के सुख-दुःख को मझेगा। उसके बाद राज-मिस्त्री लगाकर तमाम असुविधाएं दूर कर देगा। लेकिन कहां कुछ हुआ? न मकान-मालिक आया और न ही राज-मिस्त्री उगाया गया । किरायेदारों का तमाम दुख-दर्द, शिकवा-शिकायत, महीने के बाद महीने, साल के बाद साल जमा हो-होकर पहाड़ के रूप में बदल गई। न किसी अन्याय या अभियोग का कोई प्रतिकार हुआ और न कोई हल ही निकाला गया। फिर भी उनतीस बटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन की जीवन-यात्रा में कोई व्यतिक्रम घटित नहीं हुआ। एकमंजिले के भवदुलाल के घर में उसकी पत्नी साल-दर-साल बच्चे जनती रही, दोमंज़िले के हिमांशु सरकार का लड़का विजयं सरकार मुहल्ले में गुंडागर्दी करता रहा और तीनमंजिले के हरिपद चक्रवर्ती की लड़की रात गहराने पर घर वापस आती रही। लेकिन उस दिन एक कांड घटित हो गया । विजय ने मुहल्ले के अड्डे में यार-दोस्तों से इस प्रसंग को छेड़ा। "इसका रिवेंज लेना है, पटला,” उसने कहा, "वरना हम लोगों की इज्जत धूल में मिल जायेगी।" सड़क के नुक्कड़ पर यार-दोस्तों की जमात एक बार सुवह और एक बार शाम के वक्त अड्डवाज़ी करती है । पटला ने कहा, “तूने पहले क्यों नहीं बताया ? साली को ससुराल की सैर करा लाता ! जानते हो, मुचिपाड़ा थाने का ओ० सी० मेरे मौसाजी का फ्रैंड है विजय ने कहा, "तुम्हारी कसम, पहले इतनी बात मेरी समझ में नहीं आई। मैंने सोचा, यों ही कोई बाजारू औरत है, परने के लिए बाहर भाई है, जमा कि अमूमन उस मुहल्ले में होता रहता है।" "उसके बाद तूने क्या किया?" "मैं पीछे-पौधे फॉलो करने लगा। मैं जिनना ही आगे बटता जा रहा था, लड़की भी उतना ही आगे बढ़ रही थी । सोचा, दे, यह लड़की वहां जानी है। माविर सर्कुलर रोड के पास ज्योही पहचा, लड़की मुहकर खड़ी हो गई । सोचा, श्योर गॉट है ! मगर कसम तुम्हारी, ज्योही चेहरे पर आंग गई, दिमाग गरम हो गया।" "क्यों?" विजय ने कहा, "देवा, हमारे तीनमंजिले के किरायेदार यो लडकी है..." पटला, केतो, चांदा-ममी बिहुँक उठे। "एँ, तेरे मकान के तीनमंजिले के किरायेदार की लड़की ? सड़क पर गाहक की टोह में निकली थी ?" विजय बोला, "फिर क्या दूसरी बात कह रहा हूं, यार । मैं जानता था, संगीत सीखने के लिए शायद किसी संगीत-विद्यालय में जाती है । इसी से सौटने में देर होती है । मगर उमने सड़क पर कारोबार विछाया है, इसकी जानकारी मुझे कैसे हो सकती है !" "उसके बाद?" विजय बोला, "सोचा कि कई : क्यो जी, तुमने कब से यह कारोबार शुरू किया ? लेकिन कुछ कहने के पहले ही ससुरी ने चिल्लाना शुरू किया। बोली : देखिए, यह लड़का तप में मेरा पीछा कर रहा है । "उसके बाद ?--उमके बाद क्या हुआ?" विजय अपनी लग्ना की कहानी गौरव के माय कहने लगा, "समरे वाद भैया, चारों तरफ से लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गई। उन लोगो ने मेरे गले को दबोच लिया।" "यह क्या? और तूने क्या किया?" "मैं क्या कर सकता था, भाई," विजय ने कहा, "अकेला था, इमति योल नहीं सका । सालों ने सोचा कि सती-साध्वी युवती है और
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पटला ने अपनी तलहपी आगे बढ़ा दो। केतो ने अपनी तरहयी पटला की तलहपी पर पटक दी। बस, शतं लग गई। एक पैकेट गिगरेट से एक लड़की का मापदंड निश्चित कर लिया जाए । इस मुहल्ले के लड़कों के लिए इमसे वढकर हार-जीत नहीं हो सकती है । दुनिया को दुःस-नकलीफ, रागन में मिलने वाला घटिया चावल और अर्याभाव उन्हें विचलित नहीं करता है। एक पैकेट सिगरेट मिल जाने से ही वे एक लड़की के सर्वनाश की कल्पना को साकार कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त इस मुहल्ले के आज के युवक फुछ भी नहीं चाहते हैं। अचानक उत्तर की ओर से एक लडकी तितली की तरह अपनी पापो को पसारे इसी रास्ते की ओर आती हुई दिय पड़ी। रास्ते के दूसरे मोड़ से केतो राकेतमूचक सिसकारी देने लगा : स-ग-स्-स्- सन्म इस मोड़ पर खडा विजय इस सिसकारी का पयं समझता है । वह भी अपने होंठों से जोर से सिसकारी देने लगा । यानी देख लिया है । उसके बाद जव तक इस मुहल्ले के लडके उस ओर आय टिकाए रहे सब तक वे अपलक सिर्फ एक ही बात कहने की चाह करने लगे : पनिया भरन को जाने न दे जाये तो वापस आने न दे दइमा रे दइया... एक ही साय गीत की शुरुआत कर सभी लड़की पर आये टिकाए तल्लीन पे कि एकाएक पीछे से जाल लगी पुलिस को बैन आकर यड़ी हो गई। "यहां तुम लोग क्या कर रहे हो?" विजय डर गया। केतो ने परथराती आवाज में कहा, "गीत गा रहे हैं।" "सड़क के मोड़ पर गीत गाए बगैर नहीं चल सकता? गीत गाने को और कोई जगह नहीं मिली ? जाओ, अपने-अपने घर चले जाओ।" पाने का ओ० सी० वेत की मोटी छड़ी घुमाकर फिर से गाड़ी में ड्राइवर में जाकर बैठ गया । केटो, विजय, पदला तीनो जल्दी-जल्दी गली में दुवक गए और उन्होंने राहत की सांस ली। लेकिन उस दिन पुलिस को वन अकस्मात् उनतीस बटे सीन पटे छह नी की धगल - मणि हालदार लेन के मकान के बिलकुल करीव लेक लगाकर खड़ी हो गई। राधा बुआ तव तांबे की एक तश्तरी में फूल-वेलपात लेकर शीतला मंदिर में पूजा करने जा रही थी। पुलिस देखते ही ठिठककर खड़ी हो गई। "भो नेड़ी, नेड़ी, अरी घर के सामने पुलिस आकर क्यों खड़ी हुई ? ए भव, आओ, देख जाओ..." भवदुलाल हर रोज़ की तरह फर्श पर बैठकर पत्नी की देख-भाल कर रहा. था । सास की बात सुनते ही बाहर निकल आया। पुलिस ! जैसे इस शब्द पर उसे विश्वास ही नहीं हुआ। पत्नी बोली, "अजी, पुलिस क्यों आई है, जाकर देखो न ।" जाने की इच्छा नहीं थी । लेकिन बिना गए रहा भी नहीं गया । "जयन्ती चक्रवर्ती माम की कोई लड़की इस मकान में रहती है ?" थाने का ओ० सी० खुद आया था। वर्दी में लैस पुलिस अफसर । यमदूत की तरह चेहरा। राधा बुआ सहमती हुई बोली, "मुझे कोई जानकारी नहीं है, भैया, मेरा दामाद घर में है, वुला देती हूं।" उसके बाद हड़बड़ाती हुई घर के अन्दर घुसकर बोली, "ए भव, तुम्हें पुकार रही हूं और तुम सुन ही नहीं रहे हो ! उधर पुलिस आई है, क्या-क्या तो पूछताछ कर रही है । मैं क्या से क्या कह डालूंगी, तुम एक बार बाहर जाओ।" भवदुलाल ने काछ संभालते हुए कहा, "चल रहा हूं मां, आप जाइए।" ओ० सी० खड़ा का खड़ा था। भवदुलाल के आते ही पूछा, "जयन्ती चक्रवर्ती किस मंजिले में रहती है ?" "हुजूर, हरिपद चक्रवर्ती की लड़की है। तीनमंजिले में । उधर से सीधे जीने से तीनमंजिले पर चले जाइए।" कोतवाल अब रुका नहीं । दल-बल के साथ एकबारगी जीने की ओर चला गया । तव पुलिस की गाड़ी देखकर सड़क पर कुछ आदमी इकट्ठे हो गए थे। "क्या हुआ साहब ? पुलिस क्यों आई है ? चोरी का मामला है ?" एक आदमी बोला, "चले आइए साहब, इन झमेलों में न रहना ही अच्छा है। अंत में गवाही देने को कहेगा, तब कोर्ट-कचहरी करते-करते परेशान होइएगा।" लेकिन उत्सुकता बड़ी कठिन चीज़ होती है-एकदम कछुए की तरह । एकड़ - ४६ लेगी तो तब तक नहीं छोड़ेगी जब तक कि मेघ न गह गड़ाए । "क्यो साहब, इतना मजमा क्यों लगा रहे हैं ? तमाशा देखने आए हैं ? भागिए, भागिए यहां से..." पुलिस के पहरेदारो ने सभी को हटाना पाहा । लेकिन लोग जाएं ही क्यों ? तुम्हारे घर में कौन-सी कलंकजनित घटना घटी है, अगर यह जान ही नहीं पाए तो जीवन जीना क्या ! जीवित रहने में कौन-सा सुख है ? दोमंपिले के हिमाशु दाद यह खबर मुनते ही चिहुंक उठे। "पुलिस ? पुलिस किसके मकान में आई है ?" उनकी पत्नी ने कहा, "जाकर देखो न कि किसके मकान में आई है। तुम्हें दिख नहीं रहा है ?" "ओह, मैंने क्या यह बात कही थी? पूछ रहा हूं, किस पलट में आई है- हम लोगो के पलट में या तीनमजिले मे या एकमंजिले में ?" लेकिन और देर करना उचित न समझकर दुर्वल छाती का मार लिए उठ पड़े हुए और चोले, "विजय कहाँ है ?" जवाब दे तो कौन ? मगर तभी सदर दरवाजे की जंजीर झनझना उठी। ज्योंही दरवाजा खोला, थाने के ओ० सी० ने पूछा, "जयन्ती चयर्ती माम की कोई लड़की इस मकान में रहती है ?" हिमांशु बाबू ने उत्तर दिया, "नही, साहय । तीसरी मंजिल में देखिए, ऊपर रहने वाले हरिपद चक्रवर्ती की लड़की है।" 'यो० सी० ऊपर चढ़ रहा था। हिमांशु वायू अपनी उत्सुकता को दवाकर रख नहीं सके, "क्या हुआ है ? चोरी वगैरह का मामला है क्या?" लेकिन पाने के ओ० सी० के पास उस बात का उत्तर देने का वक्त नहीं था। तब वह पुलिस के साथ टूटी सीढी तय करता हुआ सावधानी से तीनमंजिले की ओर जाने लगा। तोनमंजिले के सदर दरवाजे के पास पहुंचकर मो० सी० ने जंजीर घट- पाई। "अन्दर कौन है ? दरवाजा खोलिए।" ४७ उनतीस वटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन का वह मकान वास्तव में बड़ा ही अजीब है। नीचे के एकमंज़िले में भवदुलाल के घर में जब नये लड़के के जन्म लेने की शुभ घोषणा के स्वरूप शंख बजता है, हो सकता है कि तब दोमंजिले में हिमांशु वावू दिल के दौरे की यंत्रणा से उद्विग्न होने लगें और ठीक उसी तरह हो सकता है, कि तभी तीनमंज़िले के हरिपद चक्रवर्ती के सदर दरवाजे पर पुलिस आकर उपस्थित हो । एकमंज़िले में शंख, दोमंज़िले में डाक्टर और तीनमंज़िले में पुलिस । और उसके बीच सृष्टिधर का आविर्भाव वैसा ही लगता है जैसे हरमोनियम वजाते-बजाते वेसुरे पर्दे पर उंगली पड़ गई हो । कानों में चोट पहुंचती है । कलेजे में धक्का-सा लगता है। सभी ऊब का अहसास करने लगते हैं, लेकिन कोई उसे भगा नहीं पाता है । "तुम्हें और वक्त नहीं मिला, मृष्टिधर ? ठीक ऐसे ही वक्त में आए।" किन्तु मालिक ईश्वरप्रसाद ढनढनियां...? आनन्द राय ने एक दिन जयन्ती से कहा था, "तुम अपने मकान को पहले बदलो । वहां मैं गाड़ी लेकर जा ही नहीं पाता । उस वस्ती के आवारे इस तरह कीड़े की तरह घेर लेते हैं कि..." शुरू में आनन्द एक या दो दिन जयन्ती की तलाश में आया था। मुहल्ले के रास्ते के मोड़ पर खड़ा होकर पटला ने कहा, "क्यों जी विजय, तेरे घर के सामने किसकी गाड़ी खड़ी है ?" विजय ने भी देखा। केतो ने भी। भोलादत्त भी देखकर अवाक रह गया। देखा, एक युवक गाड़ी से उतरकर उंगली में गाड़ी की चावी नचाता हुआ घर के अन्दर घुसा । उनतीस बटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन के मकान के सामने गाड़ी का आकर रुकना एक नई ही बात है ! बल्कि अपवाद ही कहना चाहिए। वह गाड़ी वालीगंज में दिखती है, न्यू अलीपुर में दिखती है, जोधपुर पार्क में दिखती है यहां तक कि कभी-कभी भवानीपुर में भी दिखती है । लेकिन नीलमणि हालदार लेन मैं ? ४८ हा-३ "मौसीजी!" उस आवाज को नुनते ही जयन्ती बाहर निकल गई। जयन्ती को देखकर आनन्द ने कहा, "मौमीरो कहां है?" "अरे, तुम बेटा ! एकाएक ? क्या हालचाल...?" "बोचे के तालाब मे मछली आई है, इसलिए एक बदनाम गया, मौसीजी!" सचमुच हैरान होने की बात है ! दस मेर को एर म अनन्द के हर में लटक रही थी। मुंह में रस्सी यांधकर और उसे हाय में लटकार यह बौन- मंजिल पर ले आया था। "सोचा, बाजार में मछली की जो कीमत है, कलकत्ते के बादमी बिना मछली खाये ही जी रहे हैं । इसीलिए मैं मौसाजी के लिए ले आया..." मछली को देखकर जयन्ती भी हैरत में आ गई। मानो मछली के बदले कोई पानी देख रही हो । विवाह की कन्या को और भी आदमी इस तरह गौर से नहीं देखता है। "मछली कितनी चमक रही है, देख रही हो न, मा!" मौसी घोली, "तालाब को ताजा मछली है न, इसीलिए अब तक चमक है।" इतना कहकर आनन्द के हाथ से जल्दी-जल्दी मछली लेकर रसोईघर सामने चौखट पर रखी। "तुम्हारे अपने तालाब की है ?" आनन्द ने कहा, "यपने कहने का मकसद है खानदानी । मेरे पास पैसा कहां है मोमोजो, कि इतना बड़ा चौदह बीघे का तालाब और बगीचा सरी ? पिताजी बड़े आदमी थे, वनवा गए थे, इसी से दो कौर नसीब होता है।'' "बगीचा भी है ?" "बगीचा भी कह सकती हैं। बगीचा बड़ा नहीं है, सतह बोधे का है। तलाशने पर एक सौ हिमसागर आम और पचास कटहल के पेड मिल जायेंगे। मैं निहायत कपूत हूं कि सय बर्याद कर रहा हूं। मेरे यहां कोई और पानेवाला आदमी नहीं है।" "वयों, तुम्हारे भाई वगैरह ?" आनन्द ने एक कहकहा लगाया। - . ४६ "फिर क्या बात थी, भाई-बहन रहते तो अब तक मामले-मुकदमे के मारे जिर हो जाता और तमाम पैतृक संपत्ति वकील-एटर्नी के पेट में समा जाती। ठे कुछ भी क्या रहने देते ?" और आनन्द ने फिर से कहकहा लगाया। उसके बाद हंसना बंद करके वोला, "बाबूजी मेरी यही एक भलाई कर गए हैं मौसीजी, कि भाई-बहनों की झंझट नहीं सौंप गए हैं। अपने लोग ही सबसे अधिक ईर्ष्यालु होते हैं।" "और तुम्हारी मां ?" "ऐं, जयन्ती ने आपको कुछ भी नहीं बताया है ?" आनन्द मानो मासमान से नीचे गिर पड़ा हो। "वह क्या वताएगी ?" आनन्द ने जैसे जयन्ती को ही दोषी ठहराया, "तुमने मौसीजी से 'कुछ भी नहीं बताया ?" जयन्ती तब चुपचाप खड़ी एकाग्र होकर मछली पर आंख फैलाए थी ! "नहीं मां, इसकी मां जिन्दा नहीं है ।" वह वोली । "महा-हा..." अनजाने ही मां के मुंह से शोकसूचक 'च्य-च्य' शब्द निकल गया। मौसीजी की समवेदना पाकर आनन्द ने कहा, "आप 'अहा-हा' मत कहें, मौसीजी ! ज़िन्दगी-भर आदमी से 'महा-हा' शब्द सुनते-सुनते मेरी जान निकल गई है। क्यों, कोई क्या हमेशा रहता है ? फिर माप लोग क्यों हैं ? आप लोगों के रहते मुझे किस बात की तकलीफ है ? आप लोग क्या मुझे पराया समझते हैं ?" "तू खड़ी क्यों है ? तुझसे कोई काम नहीं हो सकता है ? आनन्द के लिए एक प्याली चाय तो बना सकती हो..." मौसीजी ने जयन्ती को डांट सुनाई। "नहीं मौसीजी, अभी किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है।" मौसीजी बोली, "यह हो नहीं सकता, तुम खाली पेट नहीं जा सकते । तुम चाय पीनी ही है।" आनन्द हाथ जोड़कर दो कदम पीछे हट गया । "मुझे क्षमा करें, मौसीजी! अभी-अभी पार्क स्ट्रीट में एक मित्र ने दो का .५ लेट जबरदस्ती खिला दिए । अभी मेरे पैट में तिल रयने की भी जगह नहीं है। सच कह रहा हूं..." उमफे वाद वोला, "मौसाजी कहां हैं, मोमोजी? उन्हें देय नही रहा हूं।" मौसी बोली, "उनकी बात मत पूछो, वेटा! वह यहां रहते हैं, जिस धन्ये में मशगूल रहते हैं"इस मकान के चलते तो भारी परेशानी है । इम मकान की शक्ल देख रहे हो न ! जाने कय धराशाई हो जाए." "तो इस मकान को छोड़ दीजिए न! मैं जयन्ती से यही यात कह रहा था..." "मकान छोड़ने पर मकान मिलेगा कहां?" मोगी ने पूछा। "यह मकान किमका है. बताइए तो? क्या नाम है ? पता क्या है ?" मौमी बोली, "मकान-मालिक का पता मानूम रहता तो जी जाती।" "उमका पता एक बार बताती तो मैं उससे निवट लेता। मेरे मित्र के बाबूजी हाईकोर्ट के जज हैं। मैं ही मकान मालिक के नाम गे मुकदमा दायर कर देता। यह भी कोई बात मे बात है कि मकान की मरम्मत नहीं कराएगा । सीटी टूटी हुई है, पलस्तर घट गया है "और छत से बारिश का पानी टपकता है। सर पर हाता डाले भीगते हुए रमोई बनानी पड़ती है। मकान-मालिक को क्या मोही कोसती हू !" "आप एक वार नाम बता दें, फिर मैं क्या करता हूं, देख लीजिएगा।" थानन्द ने कहा। मोमी ने कहा, "सृष्टिघर से सुनने में आया है कि ईश्वरप्रसाद ढन- . ढनियां.... "ईश्वरप्रसाद ढननियां ? मारवाडी है क्या ? चश्मयोर कही का! पता बताइए तो । मैं नोटबुक में लिय रपू । कल ही ढनदनिया के नाम से मुकदमा दायर कर दूगा।" योर पैट की जेब से नोटबुक और सामने फी जव से कलम निकालकर लियने के लिए तैयार हुआ। मौसी बोली, "उसके पते का इन्तग्राम करके ए दूगी । तुम पहले चाय पी लो, बेटा !" पाय की प्याली हाथ में लेकर आनन्द बोला, "मोमीजी, लेकिन मेरी एक बात है। माप नाही मत कहे । कहिए, मेरी यात रखिएगान !'
- "कहो, क्या बात है बेटा !" "जयन्ती को अभी मैं न्यू मार्केट ले जाकर उसके लिए एक साड़ी खरीदन हता हूं।" "क्यों भैया ? साड़ी क्यों? उसके पास वहुत-सी साड़ियां हैं। तुम्हारे मौसाज [ उसे बहुत-सी साड़ियां खरीद दी हैं । उसे क्या साड़ी का कोई अभाव है ?" आनन्द ने कहा, "सो ठीक है, मैं आज उसे एक साड़ी दूंगा ही "मगर एकाएक नाज ही क्यों देना चाहते हो ? उसकी माज सालगिरह भं नहीं है।" आनन्द ने एक बार तिरछी निगाहों से जयन्ती की ओर देखकर कहा, "फिर आपसे खुलासा ही कहूं, मौसीजी! मार्केट में मैंने वीस हजार के शेयर खरीदे थे, जयन्ती ने शर्त बदी थी कि मैं हार जाऊंगा। उसने शेयर का फाटका खेलने से मना किया था। सो क्या बताऊं, मौसीजी, शेयर की वजह से मुझे वीस हजार का फायदा हुआ" मौसीजी को जैसे विश्वास ही नहीं हुआ। "कितना रुपया बताया ?" "ज्यादा नहीं, बीस हजार ।" आनन्द ने कहा । "बीस हजार रुपया ! कितने रुपयों का शेयर खरीदा था ?" आनन्द ने कहा, "पांच हजार का । मैं गरीब आदमी हूं, ज्यादा रुपया कहां से लाऊं, मौसोजी ! सो पांच हजार में पंद्रह हजार प्रॉफिट हुआ । कम तो नहीं है, इसीलिए उसको एक साड़ी::." मौसी हंस दी, "लगता है, तुम उसे विना खुश किए नहीं छोड़ोगे । अच्छा, तो फिर जायो।" आनन्द ने जल्दी-जल्दी मौसी के चरणों की धूल अपने मस्तक से लगाई। बोला, "आशीर्वाद दीजिए, मौसीजी, जिससे कि गुरुजनों के.प्रति मुझमें भक्ति- भावना बनी रहे।" एकमंजिले की वाशिन्दा होने से क्या होगा, राधा बुआ की पेठ मुहल्ले के हर मकान में है । सभी घरों के महिला-समाज की खबरों का संग्रह करने या खवरों को फैलाने की जिम्मेदारी जैसे एकमात्र उसी पर हो। जब वह पूजा के '५२ फूल लेकर शीतला-मंडप जाती है तो लौटने के पक्त मी पर लोटार नही माती है। एफवारणी शंकरी लेन को फूल भाभी के घर में उपस्थित होती है। वहाँ हर घर की होती की यवर लेने के लिए फूल मामी छटपटाती रहती है। कभी पुस- फुमाकर, कभी चुड्युडाकर और भी जोर-जोर में दोनों बातचीत करती है। "कल तुम लोगो में मछली कसे खाई, राधा युआ?" राधा युआ शुरू में हैरत में आ गई। "महलो?" वह बोली, "दामाद महती यहां से लायेगा? मछली के बाजार में अकाल पड गया है । अव घर में मछली यहां आती है ! कल मेरा दामाद छोटी झींगा मछली ले आया था, उसे ही बैंगन के साप बनाया था।" फूल यह योली, "वाप रे, क्या कहती हो, राधा वुमा । मुहल्ले के सभी आदमियों ने देखा है कि तुम लोगों के घर में चीस सेर वजन की कतला मछली थाई है..." भव राधा बुआ की समझ में बात आई। "ओह, यही पहो न !" राधा युआ चोली . "तुम लोगों के नीलमणि हालदार लेन में मछली तली गई. हम लोगों को इस रानी शंकरी लेन में बैठे-बैठे उसकी गन्ध महगूम हुई। तुम लोगों को एक- मंजिले में रहने के बावजूद कोई अता-पता नही चला ? यह क्या मुमकिन है ?" राधा बुआ बोली, "देगा, लडको उस लडके के साथ ही फिर से बाहर निकली।" "कर वापस आई?" "पता नहीं भाभी, मेरे दामाद ने बताया कि रात करीब एक बजे गाड़ी की आवाज सुनाई पड़ी थी । नन लोगों का कारोवार कुछ समझ में नहीं आता। मेरा कहना है कि लड़की पर जयान हो गई है, अब अगर उसका हाय पीला नहीं करती हो तो पैदा हो क्यों किया? जच्यापर में ही नमा पटाकर मार सालती, लज्जा-शमं का झमेला ही धरम हो जाता।' फूल भाभी बोली, "तुम्हारे भैया ने यताया है कि उम लड़की को उन्होंने पौरंगी में बहया की तरह पूमते देया है।" "वह मकान ही वेश्यापर है, बहू ! नेट्टी से मैंने यही बात कही थी कि तेरे कारण मेरे जीवन का अन्तिम पहर पापों से भरता जा रहा है। पता नही, पिछले .
जन्म में कितना पाप किया है कि उस मकान में टिकना पड़ रहा है।" "अपने मकान-मालिक से कहकर उसे भगवा नहीं सकती हो?" "हरामजादे मकान-मालिक की बात मत करो, बहू ! उसके मुनीम से कब से कहती आ रही हूं कि मकान-मालिक को बुलाओ, मगर वह पाजी कभी आया ही नहीं।" फूल भाभी बोली, “मगर तुम्हारे मुहल्ले के लोग भी अजीव हैं, बुआ ! हर कोई बाल-बच्चा औरत लेकर गृहस्थी चला रहा है । यह बात किसी की आंखों में चुभती नहीं ?" "किसको कहूं और कौन सुनेगा ही, बहू ! हमारे दोमंजिले के सरकार को पहचानती हो ?" "वही न, जो छोकरा गांजे का दम लगाता है ?" राधा बुआ बोली, "गांजे का दम लगाता है या चरस-भांग का, पता नहीं बहू ! उस लड़के की शक्ल देखी है ? उस दिन नेडी नलघर में स्नान कर रह थी। नलघर के ऊपर छत नहीं है । एकाएक खयाल आया तो देखा सिर झुकाका ऊपर से वह छोकरा नेड़ी की ओर ताक रहा है।" "बाप रे, यह बात ! तुम्हारी लड़की की ओर ? वह तो सात बच्चों व मां है !" राधा बुआ बोली, "यह सुनते ही मेरे बदन में आग लग गई। मैं अप आपको रोक नहीं पाई, बहू ! दोमंजिले पर पहुंची। जाकर लड़के की मां वो फजीहत की, वो फजीहत की, कि क्या कहूं ! कहा : ऐसा लड़का पैदा कि है कि गले के लिए फन्दा नहीं जुटता है ? .. 'सुनोगी उस छिनाल का. कांड चोइयां लगा हंसिया लेकर मुझे मारने दौड़ी..." "वाप रे! उस छोकरे का बाप उस वक्त कहां था? बुढ़वा मरद क्या -- रहा था ?" • राधा बुना बोली, "जैसा वह मरद है वैसी ही वह मौगी--दोनों के द शंतान की औलाद ! शतान की औलाद न होते तो ऐसा वेटा जनते ?" "उसके बाद?" राधा बुआ बोली, "उसके बाद मैंने वो जहर उगला. "उस छोकरे ने क्या कहा ?" ५४ गों मही "छोकरे ने कहा हमारा मकान है, जहां मर्जी होगी यह होंगे गिधर मरी होगी, देयेंगे । ताकत है तो मकान-मालिग को पुरणकर नलपर की त यनया लो..." फूल बहू बोली, "छोरे याजिव पात हो रही है, यहन ! गलसी तो तुम्हारे पाजी मकान मालिक को ही है। उम गरदूद के मुंह में माद, लगाती हो? अपने मकान के नलघर में नहाने का भी उपाय ग रहे, यह कैसा अन्याय है !" देर हो रही थी, इसलिए राधा युमा को उठना पहा। सिर्फ रानी गंकती लेन को फूल भाभी के पास बैटने में काम नहीं पलेगा। दूगरे-दूसरे परों में भी प्रयर पहुंचानी है, और-और लोगों को भी तो यह निन्दामनका घटना गुनानी है। तव नमुप हासिल होगा! रानी शंकरी लेन से निकलने के बाद पास भट्टाचार्य न मिली। यहां भी राधा चुभा की संगी-गायी हैं। किसी पर में नातिन यह है, यिागी में पहली मोर किसी में बढी वहन । हर घर में राधा बुआ की हरजन की जाती है । राधा गुमा ज्योंही मिलती है, सभी को लगता है कि माश फा पादरी हाय में आ गया हो। "कहो राधा युआ, गुनने में वाया है कि गुम्हारी फूल पर ये सामी औरण को तीन सौ रपये फी नौकरी मिल गई है।" राधा बुआ कहती, "वाह, मया कहना ! 'क' हिपने में ही निगमा हाप टेढ़ा हो जाता है, उगे कौन नौकरी देगा, गुन् ? नग उल्लू जैसे पेहरे की गुय- मूरती देखकर? "फिर मुनने में क्यों आया कि फूल बह के बेटे की मोरम गन प्रजकर नो बजे दफ्तर जाती है ?" "चप कर, वह नौकरी भी कोई नौकरी है ! दूध की दुकान में दयनी बोनसें बेचा करती है और कीमत लेने के ममय मुगकरा देती है । उमे तू नोपरी कहना पाहती है तो यह माली है !" जो लोग गुनते हैं वे मृग होते हैं । पई निन्दा गुनने में गिनकी तबीयत प्रसन्न होती है, वैसे लोगों के घर में राधा वुमा को भरपूर मम्मान प्राय होता है। राधा त्या एक वार मिल जाए सो दे न जाने देना नहीं पानी मिमी ।
•hct हैं, "थोड़ी देर और बैठो, राधा बुआ, तुम्हारे घर में लड़की है, नाती हैं, इतनी जल्दवाजी किस बात की ?" राधा दुआ कहती, "नहीं-नहीं, अब चलूं, नेड़ी की तबीयत फिर खराव हो गई है।" वे कहतीं, "क्यों राधा बुआ, तुम्हारी लड़की को फिर लड़का होनेवाला है ?" राधा बुआ कहती, "मालूम नहीं, विटिया, मैं तो दामाद से कहा करती कि तुम दूसरे कमरे में अलग विस्तर पर सोया करो, भैया, मैं अपनी लड़की के पास सोया करूंगी..." कुछ देर रुकने के बाद फिर कहती, “यही वजह है कि एक मकान की तलाश में हूं, वेटी ! उस मकान को छोड़ दूंगी । तुम लोगों के मुहल्ले में कोई मकान खाली होनेवाला है.?" मकान कहीं भी खाली नहीं होता है। होता भी है तो चुपचाप खाली होता है और चुपचाप ही भर भी जाता है। दुनिया में खाना मिले या न मिले, सिर घुसेड़ने के लिए सिर के ऊपर एक छत की जरूरत तो है ही । उसी छत के नीचे जन्म-मृत्यु और विवाह का रास रचाने के लिए अनादिकाल से गृहस्थ-धर्म का निर्माण हुमा है । इसी गार्ह स्थिक धर्म के लिए ही इस उनतीस बटे तीन बटे छह नीलमणि हालदार लेन के इस मकान का निर्माण हुआ है । इस मकान के निर्माण की शुरुआत से ही यहां परंपरागत वंशों में कलह और कलंक का शोर- शरावा मचा रहता है। मृत्यु यहां निश्चित पथ से. ही आती है किन्तु जन्म आकर उसकी - रिक्तता को अचानक पूर्ण कर जाता है । ये लोग कलह -विवाद करते हैं लेकिन उस कलह-विवाद को लांघकर किसी दिन फिर से विवाह के गीत मुखर होने लगते हैं, मंगल शंख बजने लगते हैं । ऊपर के लड़के नीचे की मंजिल के नलघर में झांकते हैं, दोमंज़िले का लड़का तीनमंज़िले की लड़की का सड़क पर पीछा करता है, मारपीट होती है, लोगों की भीड़ जमती है और उसके बाद किसी दिन एक खुशनुमा गाड़ी आकर खड़ी होती है और गाड़ीवाला लड़की को अपनी वगल में लिए मुहल्ले के लड़कों के सामने से ही दूसरे मुहल्ले में गायव हो जाता है । और इसके बाद हो सकता है कि कभी पुलिस आकर सदर दरवाजे फी जंजीर खटखटाए और कहे, "घर में कौन है ? दरवाजा खोलिए' - यही नियम है। यही दुनिया है ! उनतीस वटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन में यही हुआ। • सदर दरवाजा खोलते ही हरिपद चक्रवर्ती अवाक हो गए । हरिपद चक्रवर्ती ने कभी कल्पना तक न की थी कि इस तरह साक्षात् पुलिस आकर हाजिर होगी। उमने पूछा, "किसको खोज रहे है ?" "हरिपद चक्रवर्ती किसका नाम है ?" "क्यों, कहिए, क्या हुआ है ? मैं ही हूं हरिपद चक्रवर्ती..." "जयन्ती चक्रवर्ती आपको ही लड़की है ?" हरिपद ने कहा, "हां..." "आप हम लोगों के साथ थाने मे चलिए।" हरिपद चक्रवर्ती का कलेजा धडकने लगा। पूछा, "जयन्ती को क्या हुआ "नियम नहीं है कि पुलिमवाले इन बातो का जवाब दें। उन्हें ढेरों काम रहते हैं, बहुत सारी कम्पलेट रहती हैं । तमाम दुनिया में तमाम लोगो को लड़ाई चल रही है। आपकी मामूली-सी बात के लिए माथापच्ची करने का वक्त हमारे पास नहीं है । चलना है तो चलिए, वरना वारण्ट इश्यू कराकर कॉन्मटेबुल भेजकर आपको एरेस्ट कराऊंगा और ले जाऊंगा।" हरिसद चक्रवती बोला, "उरा रुक जाइए, मैं कमीज पहनकर आता हूं..." उघर गाड़ी में बैठी जयन्ती का जूड़ा गाड़ी के हिचकोले से खुल गया । हापों से उसे संभालती हुई जयन्ती बोली, "इतने जोर से गाड़ी क्यों चला रहे हो?" "जोर से न चलाऊं तो गाड़ी चलाने से लाभ हो क्या है ?" आनन्द ने कहा । "मगर मेरा जूड़ा जो सुल-खुल जाता है। यही कोई दुर्घटना न हो जाए." ने कहा, "लाइफ इज एक्सिडेंट, यह जो तुम पैदा हुई हो या मैंने मानन्द " " ही जो जन्म लिया है, यह भी तो एक एक्सिडेंट है...' जयन्ती की समझ में यह सव बात नहीं आई। चुप्पी साधे समझने का वहाना करती रही। आनन्द ने अपना कथन जारी रखा, "तुमसे अचानक एक दिन मेरी मुला- कात होना भी तो एक एक्सिडेंट ही है । वरना कलकत्ते में साठ लाख आदमी हैं, मगर कब किससे किसकी मुलाकात होती है ! हर रोज़ हम लोग हज़ारों आद- मियों के आमने-सामने आते हैं लेकिन किसी से किसी की मुलाकात नहीं होती है। फिर भी तुम्हें देखते ही क्यों लगा कि तुमसे ही मिलना जैसे सबसे जरूरी है ? तुम्हें भी क्या ऐसा नहीं लगा था ? जयन्ती ने कहा, "मालूम नहीं; इतनी बातें मेरी समझ में नहीं आती हैं..." आनन्द ने कहा, "तुम सोचती हो कि मैंने मौसीजी से इतनी झूठी बातें क्यों कहीं ? दरअसल वे सब झूठी बातें नहीं हैं । झूठी बात उसी को कहते हैं जिसके पीछे कुरा उद्देश्य हो । असल में मेरा कोई मतलब नहीं है." जयन्ती बोली, “सो तो मालूम है ही।" मानन्द ने कहा, "तुम सोचती हो, मेरे बारे में तुम्हें पूरी जानकारी नहीं है। फिर तुम मुझसे शादी करोगी ही क्यों ? मगर शादी करनी ही होगी-ऐसी कौन-सी बात है ?" जयन्ती ने इस बात का कोई उत्तर नहीं दिया। "सच-सच बताओ, तुम किस मकसद से सड़क पर निकली थीं ?" आनन्द ने पूछा। जयन्ती बोली, "घर में रहना अच्छा नहीं लग रहा था, इसी से सड़क पर निकल आई थी।" "उसके बाद ?" "उसके बाद देखा कि सड़क पर निकलने के लिए अच्छी-अच्छी साड़ियों की जरूरत पड़ती है, गहनों की जरूरत पड़ती है और पैसा कमाने के लिए मैं सड़क पर निकलने लगी।' "आखिर वही करने के कारण गुण्डों के हाथ में पड़ गई थी। और मैंने आकर तुम्हारी रक्षा की । लेकिन असल में चाहे जो कहो, तुम-मैं, हम लोग सभी गुण्डे हैं—कोई साफ-सुथरे कपड़े पहने है और कोई मैले-कुचले ।" ५८ आनन्द कुछ क्षणों तक चुप रहने के बाद बोला, "तुम्हारे मुहल्ले के लड़के भलेमानस नहीं हैं।" "क्यों ?" "तुम पूछ रही हो ; क्यो ? देखा नही, जब गाडी लेकर पा रहा था, उन लोगों ने सड़क के नुक्कड पर खडे होकर किस तरह सिसकारी देना शुरू किया ? वे लोग कौन है ? जयन्ती बोली, "उनमें से एक आदमी हमों लोगो के मकान के दोमंजिले का किरायेदार है।" "सबके सब बदमाश है, लोफर!" जयन्ती बोली, "उन लोगों के पास रुपया-पैसा जायदाद वगैरह नहीं है.' वातचीत के दरमियान ही गाड़ी एक मकान के सामने रुको । जयन्ती ने कहा, "यह कहा ले आए ? तुम लोगो का मकान है ?" आनन्द ने कहा, "नही; चलो, सन्दर जाने पर ही समझोगी।" वाहर से देखने पर कुछ भी समझना मुश्किल है। चारो तरफ भले लोगों का मुहल्ला है । गाडी ज्योही सामने जाकर खडी हुई, एक दरवान ने आकर सलाम किया और दरवाजा खोल दिया । आनन्द जयन्ती के साथ उतरा। उसके बाद सीधे अन्दर जाकर जीने से ऊपर की ओर जाने लगा। सगमरमर की सीढ़ियां थी। जयन्ती ने पूछा, "मुझे कहा ले आए हो ? यह तुम्हारा मकान है ?" आनन्द ने कहा, "मान लो, यह एक तरह से मेरा मकान है । यहा तुम्हारे लिए डरने की कोई बात नही है।" दोमंजिले पर पहुंचते ही जयन्ती ने अपने इर्द-गिदं दृष्टि दौड़ाई और वाश्चर्य में डूबने-उतराने लगी। मानो, सजा-सजाया सिनेमा का कोई सेट हो। सिनेमा में उसने इसी तरह का सजा-सजाया कमरा देखा था। जयन्ती बोली, "तुम्हारा कारोबार अजीव है। पहले ही बताना चाहिए था। मैं एक अच्छी-सी साड़ी पहनकर आती।" "तुम्हारे साय में जो हूं, डरने की कौन सी बात है ?" वातचीत के दरमियान ही सामने एक अपारदर्शी कांच का दरवाजा खुला और वहां एक सूटधारी सज्जन बैठा हुआ दिख पड़ा। उसने हंसकर अग्रेजी में कुछ कहा और आनन्द ने भी हंसकर उसकी बात का उत्तर दिया। भले आदमी ने जयन्ती की ओर हाथ बढ़ाया और जयन्ती के हाथ को लेकर हैंडशेक किया। "हाउ डू यू डू, मैडम ?" उसने कहा। जयन्ती अचकचाकर आनन्द की ओर ताकती रही। आनन्द फर्राटे के साथ अविराम अंग्रेजी बोलता रहा । इसके बाद अन्दर से कांच के दरवाजे को ठेलकर एक नर्स बाहर नाई। जयन्ती को लगा, नर्स मेम साहव है। विलकुल मेम साहब की चेहरा-मोहरा । दोनों गाल सेब की तरह लाल । सिर पर नसों की तरह ही रूमाल बंधा हुआ। नर्स ने जयन्ती से कुछ कहा । जयन्ती उसकी बात समझ नहीं सकी। यानन्द ने कहा, "तुम्हें अपने साथ अन्दर जाने को कह रही है । जाओ।" "तुम नहीं पाओगे?" जयन्ती का चेहरा भय से वुझ गया । आनन्द ने कहा. "तुम उसके साथ अन्दर जाओ। डरने की कौन-सी बात तरह ही उसका इसके वाद वातचीत का क्रम रुक गया। मेम साहब होने से क्या होगा, है तो असल में औरत ही । औरत को औरत के निकट जाने में डर की कौन-सी वात है ? मर्द रहता तो अलग बात थी।. जयन्ती कुरसी से उठकर नर्स के पीछे-पीछे अन्दर की ओर जाने लगी और उसके बाद दरवाजे की ओट में अदृश्य हो गई। .- उस दिन भी सृष्टिधर माया । वही निश्छल मुसकराहट । हायं में छाता लिए एकबारगी भवदुलाल की चौखट के सामने जाकर हाज़िर हुआ ! अन्दर से दरवाजा बन्द था। पहले दरवाजे पर दो कड़ियां लगी थी, किन्तु हिलाने-डुलाने. के कारण बहुत दिन पहले ही खुलकर निकल चुकी थीं। सृप्टिघर बाहिस्ता-आहिस्ता खटखटाने लगा। "कोन ?" "मैं सृष्टिधर हूं, वुबाजी !"
. यह बात हरेक के कान में पहुंची। भवदुलाल तव दफ्तर जाने की जल्द- वाजी मे था । आवाज सुनते ही दौड़ता हुआ पा रहा था । उद्देश्य यही या कि सृष्टिधर को खूब जली-कटी मुनाए । मगर सास ने कहा, "तुम छोड़ दो, भव, मैं देखती हूं।" उसके बाद दरवाजा खोलते ही राधा बुआ वरस पडी, " किराया मांगने में शर्म नहीं लगती है, सृष्टिधर ? तुम मुझे क्या सोचते हो ? हम लोग क्या बल- वकरी हैं ? या आदमी ?" "छिः छि', आप क्या कह रही हैं, बुआजी! मुझे अव शर्मिन्दा मत करें। कल मेरे मालिक आ रहे है ।' "देखो भैया, तुम हम लोगों के साथ तमाशा क्यों कर रहे हो? हम लोग काम-काज वाले आदमी ठहरे, कल मेरे नाती हुआ है। मैं एक हाथ से जच्चा- घर संभाल रही हूं और दूसरे से गृहस्थी चला रही हूं। तुमसे हंसी-मजाक करने का अभी मेरे पास वक्त नहीं है।" सृष्टिधर ने कहा, "मालिक न आएं तो मैं क्या करूं ! मैं तो हुक्म का वन्दा हूं।" "तुम अगर हुक्म के ही बन्दे हो तो हम लोगो को बुआजी, चाचीजी, मेह- भान साहब कहकर मत पुकारा करो। सिर्फ किराया वसूली का ही रिश्ता रहे। इतनी आत्मीयता की कौन-सी जरूरत है ?" सृष्टिधर ने कहा, "कल मालिक थाएगे या नही, यही कहने के लिए मैं आया "कल आ रहे हैं, कल आ रहे हैं, करते-करते कितने माल गुजर गए, सृष्टि- घर ? तुम्हारे मालिक को क्या काल ने ग्रस लिया ? तुम्हारे मालिक के अत्या- चार से हम लोग क्या इस घर मे टिक नहीं पाएंगे? यही करना है तो तुम्हारा मालिक हमें साफ-साफ कह दे। हमारे पाखाने की सीढ़ी की मरम्मत तो होगी ही नहीं, यह मालूम है.। सो चाहे मरम्मत मत कराओ, मगर यह जो लडकी. . दामाद, नतिनी लेकर गृहस्थी चला रही हूं, यह भी नहीं करने दोगे?" "क्या हुआ, बुआजी ? बात क्या है ?" "तुमसे कहकर फायदा ही क्या होगा, सृष्टिधर ? भले आदमी के मुहल्ले में यह जो लड़की का कारोबार चल रहा है, यह क्या किसी से अनदेखा है ?" ६१ "लड़की का कारोबार ! आप क्या कह रही हैं, बुआजी !" राधा बुआ वोली, "ठीक ही कह रही हूं ! दिन-दोपहर, सुबह-शाम दूसरे मुहल्ले के लड़के गाड़ी लेकर आते हैं, मछली ले आते हैं, और भी न जाने किस- किस चीज़ के पैकेट ले आते हैं। इसके अलावा, कपड़ा उतारकर नहाना मुश्किल है, ऊपर से जवान लड़के झांकते हैं । यह सब हम लोगों ने किसी भी ज़माने में नहीं सुना था । या तो तुम्हारा मालिक हम लोगों का मकान मरम्मत करा दे और उस किरायेदार को हटा दे या इससे बेहतर है कि हम लोग सड़क पर डेरा-डंडी जमाएं । इससे सरकारी सड़क कहीं अच्छी है ! वहां भी आदमी की इज्जत की रक्षा होती है..." कहते-कहते राधा बुआ की आवाज़ भरी गई। सृष्टिधर जैसे अव सचमुच लंकाकांड मचा देगा, छाते की मूठ को उसी तरह ज़मीन पर पटकता हुआ बोला, "ठीक है, बुआजी, मैं अभी जाकर चाचाज़ी से - कहता हूं।" एकमंज़िले की शिकायत जिस तरह दोमंज़िले के खिलाफ है, दोमंज़िले की शिकायत तीनमंजिले के खिलाफ है। एकमंज़िले, दोमंज़िले और तीनमंजिले में जिस तरह किसी भी दिन मेल-मिलाप नहीं होगा, सृष्टिधर का मालिक भी उसी तरह किसी दिन भी नहीं आयेगा। दोमंज़िले की हिमांशु सरकार की पत्नी भी वैसी ही है। वह कहती, "तुम उन लोगों से क्यों नहीं कहते हो, सृष्टिधर, कि हम उन लोगों की तरह नीच नहीं हैं । जो नीच होती हैं वे ही साल-दर-साल बच्चा जनती रहती हैं ।" सृष्टिधर कहता, “सो तो ठीक ही है, चाचीजी, आप बिलकुल ठीक कह रही हैं "तुम भैया, राधा बुआ से कहो कि उसकी बेटी मेरे घर के जवान लड़के को दिखा-दिखाकर नंगे बदन मत नहाए।" सृष्टिधर ने कहा, "अबकी मालिक आएं। उनके आने पर नलघर की छत पर टीन का छाजन डलवा देंगे।" "हमेशा से ही सुनती आ रही हूं, सृष्टिधर, कि तुम्हारे मालिक कल आ रहे हैं ! सचमुच तुम्हारे मालिक को काल ग्रस गया है ।" चाची कहती। "नहीं चाचीजी, अवको सचमुच कल आ रहे हैं। मुझे दिल्ली से चिट्ठी भेजी है।" पाची कहती, "आए तो मेरे जीने की रेलिंग ठीक करा देना, भैया, कहीं किसी दिन तुम्हारे चाचाजी गिरकर मर न जाएं..." किन्तु इसके बाद जब वह तीनमंजिले पर गाता तो सृप्टिधर को कोई और , ही शिकायत सुननी पड़ती थी। हरिपद चक्रवर्ती की पत्नी कहती, "एकमंजिले की किरायेदार राधा युआ से कह देना, हरिपद, कि मेरी लड़की के बारे में अगर मुहल्ले-मुहल्ले मे कहानी कहती फिरेगी तो मैं पुलिस को इत्तला कर दूगी । हां, कहे देती हूं..." सृष्टिधर कहता, "अब कहानी-वहानी कहना नहीं चलेगा, मोमोजी, मालिक कल आ रहे हैं।" "सचमुच आ रहा है, सृष्टिधर?" मौसी सुनकर थोडा आश्वस्त होती। सृष्टिधर कहता, "हां मौसीजी, अब कोई गडबड नहीं होगी, मुझे दिल्ली से विट्ठी आई है । मालिक ने लिखा है : मैं बुधवार को कलकत्ता पहुंच रहा हू, पहुंचते ही अपने किरायेदारो की तमाम गडबडियो को दूर कर दूगा ।" "तुम्हारे मालिक खाक दूर करेंगे । अपने पुराने सभी किरायेदारो को इम मकान से हटाने को कहो । सभी पुराने किरायेदार कम किराया देते हैं, इसके चलते तो तुम्हारे मालिक को ही नुकसान हो रहा है।" "हा, मौसीजी," सृप्टिधर ने कहा, "पुराने किरायेदारो को अब मालिक रहने नहीं देंगे। मुकदमा दायर कर सबको हटा देंगे।" "जानते हो, सृष्टिघर, वे लोग कितने नीच हैं, मेरी लड़की के नाम मे मुहल्ले- मुहल्ले में खबर उड़ा रहे हैं।" मुष्टिधर ने कहा, "आपकी लडकी के बारे में आपकी लडकी तो देवी की अवतार है, मौसीजी ! आपकी लड़की की लोग निन्दा किए चलते हैं ? धिक्कार "अपने मौसाजी को देखे हो न ! किसीके सात-पांच में नहीं रहते हैं । सो तो तुमने अपनी ही आखों देखा है । देखा है न ?" "आपकी लड़की भी तो किसी के सात-पाच मे नही रहती है, मौसीजी।" "मेरी लड़की ! मेरी लड़की अगर किसी के सात-पांच में रहेगी तो उसे काटकर दो टुकड़े कर दूगी !"
. यह दुनिया भी जैसे अजीब ही है ! यह उनतीस वटै तीन वटे छह नील मणि हालदार लेन का मकान ! जैसे हर लमहे कोई न कोई विरोध चलता है रहता है । हर लमहे सभी जैसे झगड़े के बीच वास कर रहे हों। मुहल्ले के नुक्कड़ पर विजय खड़ा होकर दोस्तों से हंसी-मज़ाक करता रहत है। दोस्तों की जमात उसके इर्द-गिर्द इकट्ठी होकर ताल-मेल मिलाती रहती है भोलादत्त कहता, "तेरे घर में रहती है, और तेरे सामने ही वह लड़ उड़ती फिरती रहती है ?" केतो कहता, "उस छोकरे को कहां से जुटा लाई ?' . विजय कहता, "उस खुशनुमा गाड़ी को देखा है न?" पटला कहता, "साला दूसरे के मुहल्ले में आकर गाड़ी का रोव गालिब करत है । मुचिपाड़ा के थाने का ओ० सी० मेरे मौसाजी का फ्रेंड है, सारा रोव किसं दिन खत्म कर देंगे !" विजय ने कहा, "जानते हो, कल तालाव से एक मछली ले आया था।' "कितनी बड़ी मछली थी?" भोलोदत्त ने पूछा । "वीसेक सेर।" "तुझे कैसे पता चला ? तुम लोगों को खाने पर बुलाया था ?" विजय बोला, "साला! मछली की चोइयां देखकर समझा । सामने के कूड़े दान में तीनेक सेर मछली की चोइयां थीं-रुपये-भर साइज़ की चोइयां ! रास्ते के हर आदमी ने देखा है।" शुरू-शुरू में इसी तरह चल रहा था । किसी दिन मछली, किसी दिन रस- गुल्ले की हांड़ी और किसी दिन रवड़ी। युवक गाड़ी लेकर मकान के सामने खड़ा होता था। गाड़ी के खड़े होते ही चारों तरफ के खिड़की-दरवाजे पटापट बन्द हो जाते थे। उसके बाद खिड़की के सूराख से हर कोई झांककर देखता रहता था। जव मकान के अन्दर चला जाता था तव वह युवक दिखाई नहीं पड़ता था । लेकिन कभी न कभी तो बाहर आएगा ही, तब उस पर नज़र पड़ेगी। और सचमुच तब वह दिख जाता था । हरिपद चक्रवर्ती की लड़की को अपने साथ लिए युवक गाड़ी पर बैठता था और धुआं उड़ाता हुआ आंखों से ओझल हो जाया करता था। लेकिन लोटता - ६४ हा- कब था, इसका पता किसी को भी नहीं चलता था। भोलादत्त कहता, "बताओ तो, वे लोग कहां जाते हैं ?" केतो कहता, "साला ! एक दिन फॉलो करूंगा..." विजय कहता, "मैं मौके की तलाश में हूं, एक दिन पता लगाकर छोड़गा। साला जाएगा कहा?" मिस्टर पराशर चतुर व्यक्ति है । उसका यह कारोबार आज का नहीं है। कारोवार की शुरुआत लड़ाई खत्म होने के बाद से ही हुई । वगाल में १६४३ ईस्वी में अकाल पड़ा और मिस्टर पराशर सुदूर पंजाब से गिद्ध की तरह उड- कर आया और कलकत्ते के पार्क स्ट्रीट में जमकर बैठ गया। तव ऐसी हालत थी कि कूड़ेदान में एक रुपया फेंक देने से वह अशरफी होफर हाथ में लौट गाता गा । उसी युग की बात है। मिस्टर पराशर कहता, "तव समय कुछ और ही था, मिस्टर राय ! तब आप आते तो आपको मैं फिफ्टी-सिक्सटी कमीशन दे सकता था। तब अंग्रेजों फा राज्य था। वे लोग हमारी भलाई करेंगे या अपनी ? तव इनकम टैक्स का भी इतना झमेला नही था। दोनो हाथो से रुपया कमाया था और तमाम इंडिया में चोरी-नुपके फैला दिया था। तब आप क्यों नही आए ?" आनन्द राय हंसता और कहता, "तव मेरा जन्म ही कहा हुआ था, सर ! या इन सबो को समझ ही मुझमे कहां थी?" मिस्टर पराशर कहता, "फिर जब कांग्रेस का राज्य माया, उस सन्दको मुनाफे में कोई कमी नहीं आई। मगर अब मुश्किल का सामना करना रहा है।" यानन्द राय कहता, "मगर आजकल मुवक्किल का कोई यमाव होन: माजकल तो और भी वृद्धि हो गई है।" "दुत, कहां वह जमाना और कहां माज का जमाना! चटर में प कहाँ है ? कैपिटलिस्ट तो अब 'शाई हो गए हैं । सारा पैसा बन्न अन्टस गया है। पहले उसमे से कुछ पैसा फिल्म इंडस्ट्री में सलाम जमीन-जायदाद-मकान मे और कुछ इस तरह की मौर मनाः-- "अब भी तो सिनेमा, फ्लैट बनाने और मौज-मस्ती नाम:
है, सर !"
।
मिस्टर पराशर भिज्ञ व्यक्ति की तरह मुसकरा देता था।
सिगरेट का कश लेकर और धुआं उड़ाता हुआ कहता, "कमी आई है। आई
है मिस्टर राय, मैं नब्ज टटोल सकता हूं। अब वैसे कितने कैप्टेन क्लाइंट हैं ?'
"फिर वे कहां चले गए ?"
"सव ठंडे पड़ गए हैं।"
आनन्द राय ने कहा, "मुझे कुछ रुपयों की ज़रूरत है, सर !"
"उसी दिन तो आप तीन सौ रुपये ले गए थे !
आनन्द राय ने कहा, "वह तो खर्च के मद में था । आपके आर्टिस्टों के पीछे
खर्च करने में ही सारे रुपये खत्म हो गए।"
"क्यों, इतने रुपये क्यों खर्च हो गए ?"
"वाह, मैंने तो आपको इसका एकाउंट दिया है।"
"क्या हिसाव दिया है ?"
आनन्द राय ने कहा, "एकाउंट बुक देखिएगा तो आप समझ जाइएगा।"
"कौन-सी आर्टिस्ट है ?"
"आटिस्ट नंबर फिफ्टी सेवेन-सत्तावन !"
मिस्टर पराशर ने खाता वाहर निकाला। मोटी जिल्द मड़ा खाता ! जल्दी-
जल्दी नम्बर मिलाकर पन्ना निकाला और नाम और पते को देखा।
"क्या नाम है ?"
"जयन्ती चक्रवर्ती ! उनतीस वटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन । एक
दिन ड्रेकॉन की एक साड़ी खरीद दी थी। उसी की कीमत तीस रुपया थी। उसके
बाद डेढ़ सौ रुपये की सोने की कान की वाली। होटल में जो खिलाया है उसका
विल हुआ सत्तर रुपया । यह देखिए न, सब कुछ लिखा हुआ है । उसके बाद यह
देखिए, गड़ियाहाट के मार्केट से बीस सेर वज़न की एक कतला मछली खरीदकर
उसकी मां को दे आया हूं। उनसे बताया था : यह मेरे तालाब की मछली है।
मछली की कीमत ही एक सौ चालीस रुपये लिया है।"
"एक सौ चालीस रुपये की मछली ! कौन-सी मछली है, साहब-सोने
की ?"
आनन्द ने कहा, "सोने की मछली क्यों होगी? वैसी ही मछली, जसी
कि हुआ करती है।" मिस्टर पराशर ने "मछली देने से आर्टिस्ट को क्या फायदा हुआ ? इससे तो अच्छा रहता कि सोने का कोई गहना खरीद देते जो उसके काम में कहा, माता।" आनन्द राम मुस्कराकर बोला, "आप क्या कहते हैं, मर ! आप बंगाली होते तो मछली की कद्र आपकी समझ में आती। वंगालियों को मछली खाने को मिल जाए तो आपके पैरो पर मस्तक टेक सकते हैं । साडी गहना देने से जो काम नहीं हो सकता है, वह मछली देने से हो जाता है।" मिस्टर पराशर ने कहा, "अच्छा, मह बात है ! आनन्द राय ने कहा, "माटिस्ट नम्वर फिफ्टी सेवेत का आप मकान देखते तो हैरान हो जाते । वहां हर रोज आपकी यह खुशनुमा गाडी लेकर जाने पर सभी झांक-झांककर देखते हैं..." "झांकने का मतलब?" "झाकेंगे नही ? उस गाड़ी की शक्ल देखकर लोगों के मन में सन्देह होता था। सोचते थे, लडकी फुमलाने वाली गाडी है। अवको कोई दूसरी गाड़ी दीजिए जिससे कि भले मुहल्ले मे आ-जा सकू ।" मिस्टर पराशर ने कहा, "भला आदमी बहुत देख चुका हूँ, मिस्टर राय, पार्क स्ट्रीट में बिजनेस करने के बाद कलकत्ते के भले आदमियों को बखूबी देख चुका हूं! "लेकिन यह कहने से तो नहीं होगा, मिस्टर पराशर | मुझे ही भले आदमी के मुहल्ले में जाना पड़ता है, अगर लोग वेइजत करेंगे तो मुझे ही करेंगे।" उसके बाद अचानक प्रसंग बदलकर कहा, "मुझे इस महीने का कमीशन दीजिए।" मिस्टर पराशर हंस दिया । "अभी तो महीने की पहली तारीख है, और माप कमीशन माग रहे हैं ! । अभी एकाउंट तैयार नही हुमा है।" "सो आप समझिएगा, यह आपका निजी काम है । अभी कम से कम पार्ट- पेमेट तो कीजिएगा । मैंने एक नया सूट बनवाया है, उसके दिल का अभी तक भुगतान नहीं किया है।"
"फिर अभी डेढ़ सौ रुपये ले जाइए।" आनन्द राय को गुस्सा आ गया। वोला, "डेढ़ सौ रुपये ? आप कह क्या रहे हैं ? डेढ़ सौ रुपये में कहीं सूट बनता है ? कम से कम चार सौ रुपये मुझे देना ही पड़ेगा।" मिस्टर पराशर ने दराज़ से चेक की वही निकाली। उसकी मुद्रा इस प्रकार दिख रही थी जैसे निकालने में बड़ी तकलीफ का अहसास हुआ हो।' वोला, "अाज तीन सौ दे रहा हूं, बाकी कल दूंगा।" "नहीं-नहीं, तीन सौ में मेरा काम नहीं चलेगा, मिस्टर पराशर, कम से कम साढ़े तीन सौ दीजिए । कल आपको फिर से तीन सौ देना होगा, वरना मेरी, तो जान ही निकल जाएगी। अभी तो मछली की कीमत वाकी ही है।" अंतत: साढ़े तीन सौ रुपये का चेक जेब में डालकर आनन्द बाहर निकला। तब एक गाड़ी आकर पोटिको में खड़ी हुई । गाड़ी से एक भला आदमी उतरा जिसके साथ जयन्ती जैसी एक लड़की थी। जाना-पहचाना ही आदमी था । आनन्द राय ने हाथ उठाकर शुभकामना व्यक्त की। उसके बाद वह सीधे सड़क पर आया। एक सिगरेट जलाई फिर सड़क पार करके दूसरी तरफ के फुटपाथ पर पहुंचा और विपरीत दिशा की गली के अन्दर चला गया। वहां एक होटल था । उस होटल में कवाव मिलता था । होटल में कई गन्दी मेज़-कुर्सियां थीं और उन पर कई तहमद पहने व्यक्ति वैठे थे। आनन्द एक कुरसी पर जाकर बैठ गया । "गोश्त-रोटी है ?" उसने पूछा । यह पहले दिन की बात है। पहले दिन जयन्ती थोड़ा-बहुत सहम गई थी। सुबह घर से निकली थी, दोपहर हो गई, फिर भी वापस नहीं आई। दोपहर बीतने के बाद तीसरा पहर माया, फिर भी वापस नहीं आई । उनतीस वटे तीन बटे छह नीलमणि हालदार लेन के मकान में हरिपद चक्रवर्ती दफ्तर से वापस आया । ६८ "जयन्ती कहां है ?" उसने पूछा। पत्नी बोली, "उस मुहल्ले में सिनेमा देखने गई है । अव मा चली।" "कब गई थी?" "दोपहर में।" उसके बाद रात हुई। हरिपद दिन-भर दफ्तर में वेहद खट सुका था, उसे • भूख लगी। "खाना दो, खा लू !" उसने कहा । खाने के लिए बैठा तो हरिपद चक्रवर्ती ने अचकचाकर पूछा, "इतनी मछली कहां से आई जी?" "आनन्द आया था, वही दे गया है।" "मानन्द ! आनन्द कौन ?" पत्नी बोली, "आनन्द को तुम पहचानते नही हो । वह जयन्ती का मित्र . "जयन्ती का मित्र ! मित्र का मानी ?" हरिपद चक्रवर्ती मानो आकाश से जमीन पर गिर पडा हो । "पुरुष-मित्र या महिला-मित्र ? कभी उसका नाम सुनने में नहीं आया।" पत्नी बोली, "तुम अपने धधे मे लगे रहते हो, जयन्ती किस-किससे हिलती. मिलती है, यह बात तुम कैसे जानोगे ? तुम्हारे पास उतना वक्त कहा है ? काम के अतिरिक्त तुम्हारे पास सुनने को कुछ भी नहीं है।" हरिपद चक्रवर्ती उस समय भी मछली को प्रचुरता देखकर आश्चर्य में खोया हुआ था। कतला मछली के बड़े-बड़े टुकडे । हरिपद ने बहुत दिनों से ऐमी मछली नहीं खाई थी। बचपन वारिशाल में व्यतीत हुआ। वहा तालाबों में बड़ी-बड़ी मछलियां पाई जाती थीं। वे दिन कब के गुजर चुके हैं । हरिपद को इतने दिनों के बाद जैसे देस की बातें दुबारा याद आने लगी। पत्नी तब वेरोकटोक कहे जा रही थी, "कब से तुम्हे कह रही हू, दूसरे मकान का इन्तजाम करो। इस बात पर तुमने कभी ध्यान दिया है ? सीढी कमजोर है, किसी भी दिन टूट सकती है । लेकिन तुमने किसी दिन मकान- मालिक से यह बात कही ?" "मकान-मालिक से मुलाकात ही कहां होती है ? उस बेटे की शक्ल आज तक नहीं दिख पड़ी है । मैं क्या करूं?" । ६६ पुष्प वोली, "अव तुम्हें कुछ कहना न होगा, आनन्द ने कहा है कि वही सब कर देगा।" "कर देगा का मानी ?" पुष्प वोली, "वह कोई दूसरा मकान ठीक करा देगा।' हरिपद चक्रवर्ती वोला, "वस, तुम भी जैसी हो ! आजकल घर का इन्त- जाम करना क्या आसान है ! अगर कोई भगवान की कामना करे और भगवान को ला दे, ऐसा कौन माहिर लड़का है, सुनूं तो ज़रा !" पुष्प गुस्सा हो गई, "अपने आप तो तुम किसी भी काम के नहीं हो ! जयन्ती ने फिर भी एक मित्र बनाया है, उसी पर भरोसा है । तुमने कभी इतनी बड़ी मछली हमें खिलाई है ?" मछली वास्तव में अच्छी थी। हरिपद चक्रवर्ती ने बहुत दिनों से इतनी वड़ी मछली नहीं खाई थी। क्या ही स्वाद था ! कितना मीठा ! जैसे एक- एक टुकड़ा राजभोग हो। पुष्प बोली, "आनन्द के अपने तालाब की मछली है।" हरिपद वोला, "तालाव की मछली ? उसके अपने तालाव की? कितना वड़ा तालाव है ?" "मैंने देखा थोड़े ही है !" रात में सोने के वक्त हरिपद ने दुवारा पूछा, "जयन्ती तो अब तक लौट- कर नहीं आई। पुष्प भी लेटी हुई थी ! वोली, "अभी आएगी, तुम इतनी फिक्र काहे करते -- हो?" - "वाह जी, लड़की जवान हो गई है ! भला सोचूं क्यों नहीं ?" पुप्प वोली, "नहीं, सोचो मत, आनन्द के साथ निकली है, ज़रा घूम-फिर रही है, सो घूमे । मोटर पर चढ़ाकर सर कराओ, तुम्हारी ऐसी औकात नहीं है।" "लेकिन तुम्हारी लड़की क्या गाड़ी पर चढ़ने से ही रानी हो जाएगी ?" "क्यों नहीं होगी? तुम मुझे कभी मोटर पर लेकर सैर-सपाटा करने निकले हो? तुम्हारे हाथ में पड़ कर मैं सारी जिन्दगी तड़प-तड़पकर मरती रही । तुम्हारी लड़की भी तड़प-तड़पकर मरती रहे, तुम क्या यही चाहते हो ?" ७० हरिपद चक्रवर्ती ने अब एक भी शब्द नहीं कहा । करवट बदलकर सोने की जी-जान से कोशिश करता हुआ आंखें मूदे पड़ा रहा । वह पहला दिन था। आनन्द बाहर काउंटर पर बैठा एक विलायती पत्रिका के पन्नों को उलट-पुलट रहा था। मिस्टर पराशर काम-नाजी आदमी है । काम- काजी कहने का मतलब है ज़िम्मेदार । इतने एजेंटों को संभालने से लेकर इतनी. इतनी लड़कियो की व्यवस्था करनी पड़ती है। उसके बाद आर्थिक व्यवस्था । मायिक व्यवस्था ही मिस्टर पराशर के लिए मबसे कठिन काम है। हर कोई रुपया ऐंठना चाहता है । सभी को मालूम है कि इस कारोबार में पैमा है, इस- लिए सभी रुपया ऐंठना चाहते हैं । विशाल पलंट ! इस फ्लंट में दिन के वक्त वसी कोई घटना घटित नहीं होती है। निस्तब्धता तैरती रहती है । तब सिर्फ अजनबियो का आना-जाना लगा रहता है। जो पहले-पहल इस क्षेत्र में आती हैं, उन्हें शुरू में दोपहर के वक्त लाया जाता है । उस वक्त वे यहा के हाव-भाव से अभ्यस्त होती हैं, उनका संकोच दूर होता है । खाने के लिए उम्दा खाना दिया जाता है, मॉमाज किया जाता है, हाय-पर दवाए जाते हैं। आनन्द पत्रिका पढ रहा था और बार-बार अन्दर ले काच के दरवाजे की ओर ताक रहा था। "मिस्टर पराशर, मेरी आर्टिस्ट तो अब तक लौटकर नहीं आई...?" मिस्टर पराशर ने कहा, "आज पहला दिन है न, अब आ ही चली।" "देखिएगा, मिस्टर पराशर, किसी दिन यह बड़ी ही अच्छी आर्टिस्ट सावित होगी। किसी दिन मैरी आर्टिस्ट बहुत नाम पैदा करेगी। तब मेरा कमीशन आपको बढ़ाना होगा।" तभी जयन्ती आती हुई दिख पड़ी। आनन्द ने उसकी ओर वेधक दृष्टि डाली । नर्स जयन्ती काउंटर तक ले थाई। आनन्द जयन्ती की मुख-मुद्रा को मलीभाति परीक्षा करने लगा : पुश है या नाखुश, क्रोध मे है या ऊब में ? उसका पूरा चेहरा जैसे आग की तरह लाल हो । मानो, देह का तमाम रक्त चेहरे पर आकर ठहर गया हो।
" सीधे आकर आनन्द से सटकर खड़ी हो गई। उस वक्त उसकी देह से मीठी- मीठी इन की खुशबू निकल रही थी। आनन्द ने चाहा कि वह खड़ा होकर जयन्ती के कंधों को झकझोर दे। जैसे हिलाने-डुलाने से उसके मुंह से सारी बातें बाहर निकल आएंगी। "क्या हुआ ? चेहरा इतना लाल क्यों दिख रहा है ? लाज लग रही है ?" जयन्ती के मुंह से कोई शब्द नहीं निकला । उसके बाद आनन्द के साथ जाती हुई बोली, "सचमुचं मुझे बड़ी शर्म लग रही थी।" "शर्म क्यों लग रही थी ?" "शर्म नहीं लगेगी ? मेरी साड़ी-ब्लाउज़ सब उतारकर मेरे पूरे जिस्म के सहलाने लगी।" आनन्द हंस पड़ा, "उससे क्या हुमा, मैंने तो सहलाया नहीं है। वह ते नसं है-औरत ! "औरत होने से क्या होगा? लेकिन वैसा क्यों कर रही थी ?" "तुम्हें अच्छा नहीं लगा ?" "हां, बड़ा ही अच्छा लग रहा था।" "फिर ? उसे मॉसाजिंग कहा जाता है।" तव वे दोनों उतरकर पोटिको में आ चुके थे। गाड़ी वहीं खड़ी थी। दोनों गाड़ी के अन्दर जाकर बैठ गए। आनन्द ने गाड़ी को स्टार्ट किया । गाड़ी सड़क पर तीव्र गति से भागने लगी। जयन्ती ने कहा, "अच्छा, इसके लिए तुम्हें पैसा खर्च करना पड़ा ?" "वाह, पैसा खर्च नहीं होगा ? वेवजह कोई आराम पहुंचाता है ?" "लेकिन, वगल के कमरे में भी मेरी ही जैसी एक लड़की की आवाज़ सुनाई पड़ी । तव समझ में आया कि और भी बहुत-सी लड़कियां यहां आती हैं । क्या करने आती हैं वे ? माँसाज कराने ?" आनन्द एकाएक पूछ बैठा, "तुमने खाना खा लिया है ?" जयन्ती ने कहा, "हां; मगर वह कौन-सी चीज़ दी ? शरबत ?" मानन्द ने पूछा, "कौन-सी चीज़ ?" जयन्ती बोली, "वही जो बड़ी ही मीठी और तीखी जैसी लग रही थी।" आनन्द ने पूछा, "पीने में अच्छी नहीं लगी ?" ७२
जयन्ती ने कहा, "हां, पीने में बड़ी अच्छी लगी।"
"पारवत था। अभी जो तुम इतनी खूबसूरत दिखती हो, इसका कारण
उसका पीना ही है।"
"लेकिन पीने से बडी नीद आती है।"
"नीद तो लगेगी । अच्छी चीज़ पीने से नींद आती ही है। हां, तो अब
घर लौटोगी या कही और जाओगी?"
जयन्ती बोली, "तुम याना नहीं खाओगे ?"
मानन्द ने कहा, "मैंने वही खाना खा लिया है । मेरे लिए चिन्ता करने की
कोई जरूरत नहीं। बताओ, कहां चलोगी ?"
जयन्ती ने कहा, "तुम्हारा पर मैंने अब तक नहीं देखा है, अपने पर पर ले
पलो।"
"गरीब के घर पर चलकर क्या करोगी? वह विस्कुल मरुभूमि है।"
"मरुभूमि का मानी ?"
"यानी वहा कोई नहीं है, कुछ भी नहीं। एक खाट है । जरूरत पड़ने पर
वहां जाकर सो रहता हूं। इसके सिवा मेरा अपना कोई नहीं है।"
"बाप रे, तुम्हारे पास इतने पैसे हैं और परिवार में कोई नहीं ? फिर तुम्हारे
इतने पैसो को कौन भोगेगा?"
आनन्द बोला, "और कौन भोगेगा, भोगेगी मेरी पली..
"तुम्हारी पत्नी ? तुम्हारी पत्नी कहां है ?"
"आज नहीं है, मगर कभी न कभी होगी ही।"
"तो यही कहो न!"
मानन्द को वातें सुनकर जयन्ती को जैसे निश्चिन्तता का बोध हुआ।
"तुमने तो यों बातचीत की जसे तुम्हारी शादी हो चुकी हो । सच-मच
बताओ, तुम कभी न कभी शादी करोगे तो ?"
आनन्द ने कहा, "क्या बात है ? शादी क्यों नहीं करूंगा? हमेशा कुंभारा
ही रहूंगा? फिर बीमार पड़ने पर मेरी देख-भाल कौन करेगा? मेरी सेवा पोन
'करेगी?"
जयन्ती ने कहा, "आदमी सेवा पाने के लिए ही गादी करता है ?"
आनन्द ने कहा, "सेवा नहीं तो और क्या ? पत्नी से कोई प्रेम नहीं करता
4 है । चाहे प्रेम कहो, चाहे मौज-यह सब शादी के पहले ही होता है । जिस तरह अभी मैं तुमसे प्रेम करता हूं..." जयन्ती सिहर उठी। "जानते हो, तुमसे मुलाकात होने से पहले मैं किसी के प्रेम के चक्कर में नहीं फंसी थी ?" आनन्द ने कहा, "प्रेम तुमने नहीं किया है, लेकिन रास्तों में क्या चक्कर नहीं लगाया है ?" "घर में रहना अच्छा नहीं लगता है । तुम मेरा मकान देख ही चुके हो- उनतीस बटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन ! वहां आदमी कहीं वास कर सकता है ? जानते हो, निचले मंज़िले पर एक किरायेदार रहता है, उसकी औरत को साल-दर-साल बच्चा होता रहता है ? मुझे बुरा लगता है. "लगता है, वह आदमी अपनी पत्नी को बहुत प्यार करता है।" "खाक प्यार करता है ! ऐसे प्यार के मुंह में आग लगे। शर्म भी नहीं लगती है। मर्द औरत का पेट कभी खाली नहीं रहने देता है। कभी-कमी जी में होता है कि उस मर्द की हत्या कर डालूं..." आनन्द हंसने लगा। "तुम्हारी भी शादी होगी तो तुम्हें साल-दर-साल बच्चा होगा।" मानन्द ने कहा। •"कभी नहीं ! हमारे दोमंज़िले पर हिमांशु बाबू नाम का एक आदमी रहता है। उसके ज्यादा वाल-वच्चे नहीं हैं। सिर्फ एक ही लड़का है।" "जो लड़का तुम्हारा पीछा करता रहता है, वही न?" "हां; तंग मोहरी की लंबी काली पैंट पहनकर चक्कर काटता रहता है। सड़क के नुक्कड़ पर खड़ा होकर लड़कियों की ओर ताकता है और सिसकारी देता है।" जयन्ती ने कहा। "तुम्हारा मकान एक अजीव चीज़ है ! चाहे जो कहो।" जयन्ती ने एकाएक कहा, "चलो, सिनेमा चलें।" "सिनेमा ? इससे तो अच्छा है कि कहीं दूसरी जगह चलो। गाड़ी है ही। चलो, जहां दो आंखें ले जाएं-चाहे वारासात, या वशीरहाट, या इटिण्डा घाट । और अगर यह अच्छा न लगे तो ग्रैंड ट्रंक रोड पकड़कर नतेरहाट, तोपचांची, । ७४ हज़ारीवाग चलो..." पहला दिन ! पहले दिन ही जयन्ती को वडा अच्छा लगा । पहला दिन सभी को बहुत अच्छा लगता है । उनतीस वटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन से बाहर निकलकर यह जसे स्वर्ग के सिंहद्वार पर पहुंचना है । एकमंजिले के जीने पर जाकर फटी कयरी और मैली तोशक से साक्षात्कार करना नहीं है और न तीनमंजिले पर जाकर अपने घर की लज्जाहीन दरिद्रता से साक्षा- त्कार करना हो । एक पैसा कही अधिक खर्च न हो जाए, मा की यह दुश्चिन्ता पहा नहीं है। यहां है गाड़ी पर चढ़कर सैर-सपाटा करना, बदन मे फरहरी हवा लगाना । मस्तक के ऊपर नीला आकाश और आनन्द की जेब में अपार पसा है। खर्च करना है, करो; चाय पीनी है, पियो; घूमना है, घूमो । जैसे जयन्ती इसी आस्वाद की बहुत दिनो से कामना कर रही थी। चलो, जितनी दूर तक चलने को इच्छा है, चलो; आगे बढ़ते जाओ। हिमांशु वाव का लडका रात दस बजे अड्डेबाजी करने के बाद उनतीस वटे तीन बटे छह नीलमणि हालदार लेन के मकान में वापस भा रहा था । एकमजिले के किरायेदार के मकान से तव गली मे रोशनी आकर तर रही थी। आज मजलिस ठीक से जम नही पाई थी। भोलादत्त की जेब में चार आने से ये। केतो को गुस्सा हो आया था और उसने कहा था, "तुझे शर्म नही आती, है, भोला ! माल भरपूर गटकोगे और जेब में लेकर आते हो चार आने पैसे 'हर रोज तुझे गांठ से पैसा निकालकर माल नही पिला सकूगा, कहे देता है" पटला यो मस्त यादमी है । झगड़े की भनक पाकर बोला, "चुप रह येतो, शाम होते न होते दिमाग गरम मत कर।" पटला इस तरह की बातें बहुत सुन चुका है। शुरू-शुरू मे आपस में चदा करके शराब पीने का नियम था। हर कोई वरावर चदा देता था। कुल तीन रुपये ही में नशा आने लायक माल मिल जाता था। इसका मानी यह कि हर व्यक्ति को बारह-वारह आना पैसा देना पड़ता था। उसके साय थोडा-बहुत चना- चूर और चाट की जरूरत पड़ती थी। बारह माने में ही इस तरह सस्ते में नशा आ जाए, ऐसी चीज़ कलकत्ता शहर में क्या है ? मयूरभंज के अंधे फुटपाथ पर खड़ा होकर गिलास से गटागट पीने के बाद तुम्हें अलादी चिराग का पता चल सकता है । मान ले सकते हो कि तुम बहुत बड़े गए हो। तुम्हारे पास एक अच्छा-सा मकान है, तुम दो हजार रुपये त. नौकरी करते हो, तुम गाड़ी हांकते हुए कलकत्ता पार करके बहुत है. हो-या तो जसोर रोड, या बारासात, या वशीरहाट, या इटिण्डाघार ट्रंक रोड पकड़कर सीधे नेतरहाट, तोपचांची, हजारीबाग दस बजे के बाद नशा अपना रंग दिखाने लगा। विजय उस वटे तीन बटे छह नीलमणि हालदार लेन के मकान की ओर वापस जा "कौन?" एकाएक गाड़ी की आवाज़ सुनकर उसकी हालत ऐसी हो गई ज. हो गया हो । लगा, जैसे गाड़ी उसे अब कि तब धक्का लगा देगी। रास्ते से हटकर फुटपाथ की ओर जाने लगा । लेकिन तब जो घटित घट चुका था। गाड़ी लड़खड़ाती हुई विजय की गरदन पर चढ़ गई। गाड़ी का ब्रेक ठीक वक्त पर ही लगाया गया था, लेकिन संभवत हो चुकी थी। धक्का लगते ही विजय ज़मीन पर लुढ़क पड़ा। जयन्ती के मुंह से 'रोको-रोको' शब्द निकला । मानन्द गाड़ी के दरवाजे को खोलकर ज्योंही विजय को उठाने रने के लिए दौड़ा, “गाड़ी चला रहे हैं और आंख से दिख नहीं जर का बच्चा कहीं का !" उसके बाद जयन्ती पर ज्योंही उसकी दृष्टि गई, उसका पि . भ गया। "लेड़की लेकर मौज मनाने निकले हैं इसलिए सड़क की तरफ देते हैं ? अगर मैं दबकर मर जाता ?" मानन्द ने कहा, "इतना चिल्ला क्यों रहे हैं ? आपको क्या हुन "आप आंखें दिखा रहे हैं ? गाड़ी से दबाकर आंखें दिखा रहे है, मैं आपके नाम से पुलिस केस कर सकता ।" "जाइए, जाइए..." आनन्द भी बदमाशी में उन्नीस नहीं पड़ता था । वोला
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आ जाए, ऐसी चीज़ कलकत्ता शहर में क्या है ? मयूरभंज के अंधेरे रास्ते में फुटपाथ पर खड़ा होकर गिलास से गटागट पीने के बाद तुम्हें अलादीन के अजीब चिराग का पता चल सकता है। मान ले सकते हो कि तुम बहुत बड़े आदमी हो गए हो । तुम्हारे पास एक अच्छा-सा मकान है, तुम दो हजार रुपये तनख्वाह की नौकरी करते हो, तुम गाड़ी हांकते हुए कलकत्ता पार करके बहुत दूर जा रहे हो-या तो जसोर रोड, या वारासात, या वशीरहाट, या इटिण्डाघाट । या ग्रेड ट्रंक रोड पकड़कर सीधे नेतरहाट, तोपचांची, हजारीबाग... दस बजे के बाद नशा अपना रंग दिखाने लगा। विजय उस वक्त उनतीस बटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन के मकान की ओर वापस जा रहा था। "कौन ?" एकाएक गाड़ी की आवाज़ सुनकर उसकी हालत ऐसी हो गई जैसे नशा दूर हो गया हो । लगा, जैसे गाड़ी उसे अब कि तब धक्का लगा देगी । विजय तत्काल रास्ते से हटकर फुटपाथ की ओर जाने लगा । लेकिन तब जो घटित होना था, घट चुका था। गाड़ी लड़खड़ाती हुई विजय की गरदन पर चढ़ गई। गाड़ी का ब्रेक ठीक वक्त पर ही लगाया गया था, लेकिन संभवतः कुछ देर हो चुकी थी। धक्का लगते ही विजय ज़मीन पर लुढ़क पड़ा। जयन्ती के मुंह से 'रोको-रोको' शब्द निकला। मानन्द गाड़ी के दरवाजे को खोलकर ज्योंही विजय को उठाने आया, विजय ने के लिए दौड़ा, "गाड़ी चला रहे हैं और आंख से दिख नहीं रहा है ! अर का बच्चा कहीं का !" उसके बाद जयन्ती पर ज्योंही उसकी दृष्टि गई, उसका दिमाग गरम हो , गया। . . "लड़की लेकर मौज मनाने निकले हैं इसलिए सड़क की तरफ ध्यान नहीं देते हैं ? अगर मैं दवकर मर जाता ?" आनन्द ने कहा, "इतना चिल्ला क्यों रहे हैं ? आपको क्या हुआ ?" "माप मांखें दिखा रहे हैं ? गाड़ी से दवाकर आंखें दिखा रहे हैं ? मालूम है, मैं आपके नाम से पुलिस केस कर सकता हूं। "जाइए, जाइए.." आनन्द भी बदमाशी में उन्नीस नहीं पड़ता था। बोला, "जाइए, नाइए, ज्यादा शान मत दिखाइए । मानन्द राय को पुलिस का भय मत दिखाइए।" विजय तनकर खड़ा हो गया थोर आनन्द के सामने जाकर बोला, "मौज मनाने चले हैं और उस पर पराये मुहल्ले में जाकर आंख दिखाते हैं ? खबर- दार, जवान सभालकर बातचीत कीजिए !" आनन्द राय ने जब देखा कि उसे कोई खास चोट नहीं लगी है तो जयन्ती से कहा, "चली आओ, ठर्रा पीने के कारण साले का दिमाग विगढ़ गया है।" "क्या कहा, मैं पियक्कड है ?" "हां-हां, पियक्कड को पियक्कड नहीं कहूं तो क्या मला आदमी कहूं ? नसे में धुत होकर घर लौटने मे शर्म नहीं आती ? विलायती शराब पीने का पैसा नहीं है तो ठर्रा क्यों पीता है ? चली याओ जयन्ती !" विजय का खून खौल उठा । ठरें के साथ वाईस साल का खून मिलकर दिमाग पर चढ़ गया। बोला, "साले, ठर्रा पिया है, तो ठीक किया है। तेरे बाप के पैसे से हरी पिया है ?" "साले !" मानन्द अब खुद को संपत नही रख सका। बात करते-करते विजय के गाल पर कसकर थप्पड़ जमा दिया और विजय उसी क्षण जमीन पर गिर पड़ा। "साला फिर बाप के नाम से गाली दे रहा है ! ..." तभी नीलमणि हालदार लेन की सड़क पर एक-एक कर लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गई । नीलमणि हालदार लेन की सड़क पर काफी रात तक लोगों का आना-जाना लगा रहता है । कोई तमाम दिन की झंझटों के वाद घर लौटता है और कोई सिनेमा देखकर वापस आता है। इस तरफ के लोगों के लौटने का एकमात्र रास्ता यही है। B शोर-शराबे से आस-पास के मकानो की खिड़किया फटाफट खुल गई और लोग बंधेरे घरों से झाक-झांककर रास्ते की तरफ देखने लगे। राधा धुआ तव जगी हुई थी। नेड़ी को खाना खिलाने और नाती-नतिनियों सुला लेने के बाद ही उसे राहत मिलती थी। उसके बाद यह दूसरे दिन के लिए गोबर लीपकर, दो-चार जो बरतन रहते थे, मल लेती पी। फिर रसोई परको घोकर एक किनारे उपले और कोयला सजाकर रख देती शो। नमी - to18 वक्त रास्ते में शोरगुल मचने लगा। "ओ भव, भव, शोरगुल क्यों हो रहा है ? लगता है, हमीं लोगों की गली के सामने मारपीट हो रही है।" भव तव तहमत उतारकर विछावन के एक कोने में लेटा-लेटा बीड़ी का आखिरी कश खींच रहा था। मारपीट की आवाज़ उसके कानों में भी पहुंची थी। "रास्ते में कौन किसको मार रहा है, इसके लिए आप माथापच्ची मत करें।' उसने कहा। राधा वुमा वोली, "हम लोगों के मकान के सामने हो रहा है, आवाज पहचानी जैसी लगती है।" उसके वाद भव उत्सुकता दवाकर रह नहीं सका और सदर दरवाजे की सिटकनी खोलकर बाहर निकल आया। न केवल उनतीस वटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन के एकमंज़िले से ही मादमी वाहर माया बल्कि दोमंजिले के हिमांशु वाव के मकान में भी तब हलचल मच गई थी। हिमांशु वावू की पत्नी जागकर पुकारने लगी, "अजी ओ, उठो, उठो, लगता है जैसे हमारे विजय की आवाज़ हो..." - हिमांशु बाबू हिमांशु बाबू को दिल की बीमारी है । डॉक्टर ने शाम होने से पहले ही खा लेने को कहा है। डॉक्टर ने बार-बार हिदायत की थी, 'कभी घबराइएगा मत, घवराने से परेशानी उठानी पड़ेगी...' की पत्नी ने कहा था, 'आप इन्हें अच्छी तरह समझा जाएं, मेरी वात पर कान नहीं देंगे।' डॉक्टर ने कहा था, 'वे वयस्क आदमी हैं, वचपना करने से काम नहीं चलेगा । खुद भला-बुरा समझ सकते हैं।' 'सो होने से क्या होगा ! वे हर बात में माथापच्ची करते हैं, जैसे हर चीज़ में उन्हें दखलन्दाजी करनी चाहिए। मैं रसोईघर में क्या बना रही हूं, यह भी. उनसे अनदेखा नहीं रहना चाहिए।' 'क्यों, रसोईघर में जाकर देखने से उन्हें क्या लाभ होता है ? खाने बैठेंगे तो नजर पड़ेगी ही।' पत्नी ने कहा था, 'सो कहने से कौन सुनता है ! रसोईघर में मेरे पीछे-पीछे 1 ७८ चक्कर काटे बिना उन्हें चंन नहीं मिलता है।' डाक्टर ने झिड़कियां सुनाई थी, 'नहीं; वहां उन्हें जाने मत दें। आपका लड़का तो है ही, वह तो काम-काज कर ही सकता है। लड़का जय वडा हो जाता है तो हर काम में वाप की जरूरत नही पड़ती है । अब लडके को हो गहस्यो की देख-भाल करनी चाहिए।' । 'लेकिन उसे भी तो कॉलेज जाना पडता है, काम-काज करना पड़ता है !' 'कॉलेज रहे, काम-काज भी रहे; काम-काज रहने से गृहस्थी को देखरेख नही करनी चाहिए ? उस पर ही सारी जिम्मेदारी थोपकर आप इनको पोडी- बहुत देख-भाल करें। लड़के की शादी हो हो चुकी है, उसकी पत्नी अब रसोई- पानी का इन्तजाम करे।' 'तब तो हो चुका ! बहू सिनेमा देखेगी, साज-सिंगार करेगी या मेरी रसोई की देखभाल करेगी ? हम लोग बूढा-बूढी जब तक हैं, तब तक हमे मुक्ति नहीं मिलने जा रही है। मुहल्ले का डॉक्टर है, इस घर के बारे मे उसे एक-एका जानकारी है। उसने • अधिक वातचीत नहीं की। बैग को हाथ में सभालकर और फीम के पैसे जेब के हवाले कर चला गया था। लेकिन फिर भी पत्नी ने हिमाश बाबू को बड़ी साव- धानी के माय रखा था। दिन-भर जोर-जबर्दस्ती लिटाकर रखती थी। लेकिन उस दिन शोरगुल मुनकर पत्नी को नीद टूट गई । वह फिर से पुकारने लगी, "अजी, उठो, उठो. अजी ओ, सुन रहे हो?" हिमांशु बाबू की इतनी तकलीफ से आई नीद आकस्मिक पुकार से टूट गई। बोले, "कौन ?" "सुन रहे हो! यांख मलो, सुन रहे हो ! बाहर शोरगुल हो रहा है ? लगता है, हम लोगो के विजय के गले की आवाज है !" हिमांशु बाबू ने कहा, "नीचे उतरूं ?" "नीचे उतरने को तुमसे कौन कहता है ? मैं तो सिर्फ यही कह रही हूं कि एक बार खिडकी से झांककर ।" हिमाशु वायू कमजोर आदमी ठहरे, फिर भी कराहते हुए हिलने-डुलने की कोशिश की। बहू तव अपने कमरे में सोई हुई थी । उस कमरे के सामने भी जाकर सास ।
"गोपा, पुकारा, ओ वहू, सोई हुई हो क्या ?" ज़ब उत्तर न मिला, दरवाज़े की जंजीर खटखटाने लगी। "वाप रे, बहू कितनी नींद में है ! विजय के आने के पहले ही वेखवर सो चुकी है .." खट् से सिटकनी खोलने की आवाज़ सुनते ही सास ने मुंह घुमा लिया। बोली, "तुम तो नींद में वेखवर पड़ी हो, उधर नीचे शोरगुल सुन रही हो ? विजय की आवाज़ सुनाई नहीं पड़ रही है ?" इतना कहकर सास वहां रुकी नहीं। फिर से बरामदे को पारकर अपने कमरे में चली आई। हिमांशु वाबू खिड़की से झांक रहे थे। "एक मोटरगाड़ी खड़ी दिख रही है। किस चीज़ की गाड़ी है ?" उन्होंने पूछा। उधर हरिपद चक्रवर्ती तीनमंजिले से ही पुकारने लगा, "ओ जयन्ती... जयन्ती उसमें नीचे उतरने का साहस न था । जयन्ती की मां ने भी कहा, "जयन्ती को पुकारो न, ऊपर चली आए ! वहां भीड़ में मुंहजली क्या कर रही है ?" हरिपद बोला, "वह गाड़ी किसकी है ?" पुष्प बोली, "वह बड़ी-बड़ी कतला मछली जिसने दी थी, उसी की है। आनन्द को सबने घेर लिया है जी, तुम ज़रा उन लोगों को ऊपर बुला लो।" "इतनी रात तक वे दोनों कहां थे?" पुष्प गुस्साकर बोली, “गाड़ी है इसलिए दिन-भर घूमते रहे । वे लोग घूमते-फिरते हैं तो तुम्हें क्रोध क्यों आता है ? बाद में जो कहना होगा, उनसे कहना, अभी ऊपर बुला लो । कहो कि ऊपर चले जाएं।" नीचे रास्ते में अच्छी-खासी भीड़ इकट्ठी हो गई थी। नीलमणि हालदार लेन ने जैसे रातों-रात हाट का रूप ले लिया हो । तभी सिनेमा का आखिरी शो खत्म हुआ। औरतों और मर्दो की जमातें उनतीस वटे तीन बटे छह नंबर मकान के सामने आकर खड़ी होने लगीं। "साला दूसरे मुहल्ले का लड़का मुझे पियक्कड़ कहेगा ?" एकाएक कोई उधर से दौड़ता हुआ आया। भोलादत्त था। पता नहीं कौन उसके घर में जाकर खबर पहुंचा आया कि पराये मुहल्ले के एक लड़के ने विजय सरकार को मार-मारकर धराशायी कर दिया है । वह वहीं से चिल्लाता हा-५ हुआ आया, "कौन साला विजय को मार रहा है, देख लूंगा..." सिर्फ भोलादत्त ही नही, पटला है, केतो है । जो लोग मयूरभंज में एक साय माल पीने जाते हैं, सभी आ गए । तमाशा शुरू हो गया । मुहल्ले में हो. हल्ला मच गया। विजय सरकार को पराये मुहल्ले का लडका मार रहा है, यह हम घरदात नहीं करेंगे।" विजय तब देह की धूल झाडकर खड़ा हो चुका था। "मा साले, तुझे देख लूगा, देख लू तुझमे कितनी हिम्मत है । आ मुझसे लड़... . आगन्द राय कमीज़ की बाह मोडकर मुकाबले के लिए खड़ा हो गया। "अच्छी बात कही और उस पर गाली-गलौज करेगा ?" "गाली-गलोज पहले तुने किया है या मैंने ?" "मैंने कय पहले गाली दी ? जयन्ती, तुम गवाह हो... कोई एक आदमी बोल उठा, "आपने उसे एकाएक धक्का क्यों दिया, साहब? गाड़ी चलाते हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि हमें आदमी मे गिनें ही नहीं। हमें आप गाय-बकरी-भेड समझते हैं ?" जयन्ती ने कहा, "चलो आनन्द दा, यहा से चलो, तुम्हें अकेले में पाकर ये लोग तुम्हें अपमानित करेंगे... आनन्द भी हटने वाला जवान न था । उसने कहा, "अकेले पाकर अपमानित करेगा-इसका मानी ? मैं इन लोगों से डरनेत्राला जीव नहीं हूं। देखना है कि किसके बदन में कितनी ताकत है !" "देख नही रहे हो कि वह ठरें के नशे में है, उसका दिमाग काबू में नही ऊपर से हरिपद चक्रवर्ती के गले की आवाज तैरती हुई आई, "ओ जयन्ती, वहां क्या कर रही है, ऊपरं चली आ..." हिमांशु वाव ने खिड़की से झांककर देखा । लेकिन चिल्लाने की ताकत उनके कलेजे में न थी । डाक्टर ने उन्हें घवराने से मना किया है । फिर भी उन्होंने चिल्लाकर पुकारा, "अरे विजय, वहा क्या हुआ ?" राधा बुआ बाहर निकलकर सब देख-मुन रही थी। सीधे आकर वोली, "तुम लोगों को शोरगुल करने की कोई और जगह नहीं मिली? मेरी गर्भवती लड़की वगल के कमरे में लेटी हुई है, तुम लोग जरा उधर हटकर गाली-गलौज करो... भवदुलाल रास्ते पर खड़ा था। उसने अपनी सास से कहा, "माप चुप रहिए, मां ! बाप चुप रहिए, आप उन लोगों के झगड़े के बीच मत कूदिए ।" तभी भोलादत्त मैदान में कूद पड़ा। माते ही उसने दोनों व्यक्तियों को अलग कर दिया। बोला, "क्या हुआ है ? इतना शोर-शरावा क्यों?" आनन्द राय ने भोलादत्त की ओर ताककर कहा, "लाप कौन हैं ?" भोलादत्त वोला, "मैं चाहे कोई होऊं, नाप किसे गाली-गलौज कर रहे . "मैं आपको कैफियत देना नहीं चाहता।" आनन्द राय ने कहा, "जहां तक गाली-गलौज की बात है, मैंने पहले शुरू नहीं किया है, उसी ने शुरू में मुझे गाल दी है..." जयन्ती आनन्द का पक्षपात करती हुई बोली, "हां, मैं गवाह हूं, जहां तक गाली-गलौज की बात है, हिमांशु बाबू के लड़के ने ही उसकी शुरुआत की है।' केतो ने जयन्ती को फटकारा, "भाप इन दोनों के बीच क्यों टपकती हैं। भोला ने आपसे थोड़े ही पूछताछ की है ? जिससे सवाल किया गया है, वह जबाव देगा।" आनन्द ने कहा, "मैंने तो बताया ही कि पहले उसने गाली-गलौज के शुरुआत की है। मैं गाड़ी चलाते हुए बाया और यहां मैंने अपनी गाड़ी खड़ी की ठर्रा पीकर आया और लड़खड़ाकर गिर पड़ा..." भोलादत्त ने आनन्द की नेकटाई पकड़कर झकझोर दिया, "बवरदार मुंह से गाली मत निकालो ..." "मैंने कव गाली दी ? मैंने तो सिर्फ यही कहा कि शराब के नशे में रहने के कारण लड़खड़ाकर गिर पड़ा..." "फिर?" भोलादत्त ने आनन्द राय को दुवारा बुरी तरह झकझोर दिया। ८२ जयन्ती फूट-फूटकर रोने लगी, "अजी, ये लोग मेरे आनन्द को मार रहे केतो ने कहा, "चुप रहिए, आप क्यो रो रही हैं ? उस्ताद ने आपसे तो कुछ कहा नहीं है।" भोलादत्त तव आनन्द की ओर मुखातिब होकर कह रहा था, "अपनी खुशी से उसने शराब पी है, अपने पैसे से शराब पी है, कोई आपके बाप के पैसे से तो शराब नहीं पी है न ! हम लोगों का देश आजाद है, अपनी इच्छा के अनुसार काम करने के लिए हर कोई स्वतन्त्र है। बापकी गाठ में पंसा है तो आप भी शराब पीजिए, किसी साले को कुछ कहने का अधिकार नहीं है। शराब कौन नहीं पीता है ? जिसके पास पैसा नहीं है, सिर्फ वे ही लोग नहीं पीते हैं।" आनन्द "मैंने तो यह नहीं कहा, मैं तो यही कह रहा था..." "फिर वही बात । आपने उसे पियक्कड़ कहा है न !" "तो शराब पीकर लडखड़ाकर गिर पडे तो पियक्कड कहना भी अपराध है ? आप यहा के सभी से पूछ लें, हर कोई गवाह है, वे ही बतायें कि मैंने अन्याय किया है या इन्होंने ?" जयन्ती रो दी, "आप लोग इसे छोड़ दें, क्यो पकड़े हुए हैं ?" भोलादत्त ने जयन्ती की ओर मुड़कर कहा, "क्यों छोड दू ?" विजय बगल से बोला, "नही उस्ताद; छोड़ना ही होगा तो बेइज्जत करके छोड़ेंगे।" राधा बुआ को मन ही मन वहा मज़ा मिल रहा था। अच्छा हुआ कि छोकरा पिट गया। ऊपर से नलघर में नेड़ी की ओर ताकना अब दूर करती हूं। मौका मिलते ही फिर बोली, "तुम लोग थोडी दूर जाकर चिल्लाओ । कहा इन, कि मेरी गर्भवती लड़की बगल के कमरे में सोई हुई है... "आप फिर क्यों बातें कर रही हैं, मां ?" भवदुलाल ने अपनी सास को खामोश रहने को कहा, "आप उनसे कुछ भी मत कहे," वह फुसफुसाया, "देख नही रही कि वे शराब के नगे मे हैं !" "वाप रे, यह बात है ! छि:छि:, किस तरह के मकान में रह रहे हैं हा तभी न तुमसे कहा था : यह मकान अच्छा नहीं है । सृष्टिघर का कार .." . . ८३ - अजीव है ! हरामजादे मकान-मालिक के मुंह पर झाड़ लगाऊ-एक वा हरामजादे मकान-मालिक पर निगाह पड़ जाए तो उसकी नाक नोच लूं.' एकाएक केतो ने सवाल किया, "आप किस मुहल्ले में रहते हैं ?" "मैं चाहे जहां कहीं रहूं," आनन्द ने कहा, "आपको इसकी जरूरत ?" "साले, तुम दूसरे मुहल्ले से आकर हमारे मुहल्ले की लड़की के साथ मोड मनाओगे ? और कोई दूसरा मुहल्ला नहीं मिला ?." वृद्ध मुखिया किस्म का एक आदमी इस बीच आकर खड़ा हुआ और बोला "क्यों भाई वेकार का झमेला बढ़ा रहे हो ? अपने-अपने घर जाओ, काफी राव हो चुकी है।" पटला मयूरभंज से शराब पीकर आया था। उसने कहा, "अरे साले, गाई में आग लगा दे । यह साला खुशनुमा गाड़ी लेकर कारनामे दिखाने आया है।' अव ऊपर से हिमांशु वावू की पत्नी ने पुकारा, "अरे विजय, तू वहां क्य है ? गुण्डों से बातचीत मत कर'.." पास ही गोपा खड़ी थी । नयी-नयी शादी हुई है । एक साल भी नहीं हुआ है, लेकिन शादी के बाद से ही यह मकान उसे अजीव किस्म का लग रहा है न केवल मकान, बल्कि विजय भी अजीव जैसा लग रहा है। दिन-भर कालेज पढ़कर लोग घर आते हैं, लेकिन उसके साथः यह वात नहीं है। पता नहीं, कह जाता है, क्या करता है और जब रात गहराने पर घर लौटता है तो उसके मुंह से तेज़ शराव की बू निकलती है । गोपा डर से एक किनारे सिकुड़ जाती है वातचीत करने का अपने अन्दर साहस नहीं वटोर पाती है । उसके बाद जब विजय गहरी नींद में डूब जाता है, तब कहीं गोपा का भय दूर होता है। उसके वाद जव सवेरा होता है तो विजय जैसे कोई और ही व्यक्ति होता है। 1 उनतीस वटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन के इस मकान में इस तरह की छोटी-मोटी गड़बड़ी हमेशा मौजूद रहती है। प्रारम्भ से ही यह सिलसिला चल रहा है। यहां के वाशिन्दे जब यहां नहीं रहते थे उस समर भी यही सिलसिला था । वाशिन्दों के बदलाव से आबोहवा में कोई परिवर्तन नहीं आया है । युग बदल जाता है लेकिन मन में किसी तरह का बदलाव नहीं ५४.
आता है । वही ईया-द्वेप, गाली-गलौज, संघटन-विघटन, पारस्परिक सस्तिय. संहार का पड्यंत्र, यातना-दंशित जीवन जीने के निलंग्ज प्रदर्शन का मिलसिला चलता रहता है । फोन किसके घर में झांककर किसका सतीत्व कलंकित कर रहा है, कौन किम चीज़ के साथ भात खा रहा है, कौन अपनी लड़की को फिराये पर रखकर गृहस्थी चलाने के सहज उपाय की तलाश कर रहा है- यह मानसिकता जैसे इस मकान की रक-मज्जा में समाहित हो गई है। कव किस विस्मृत व्यक्ति ने एकात में वास करने के लिए इस मकान का निर्माण कराया था, पता नही। उसका नाम-धाम, उमका जन्मपन्नी बाज इति- हास के सिरिश्तेदार के रेकार्ड से मिट गया है। काल के महफूज़खाने में ढूढने से हो सकता है, उसका फटा हुआ दस्तावेज मिल जाए । लेकिन महफूजखाने के मुहरिर अब उसकी जानकारी रखने की जरूरत महसूम नहीं करते। खोज करने पर हो सकता है, इस मनादि-अनन्त सृष्टि के रहस्यो का कोई मूत्र मिल जाए, लेकिन जरूरत ही क्या है ? इसके बनिस्बत यही अच्छा है ! हां, यही कि साल-दर-साल बच्चा पैदाकर उसकी सेवा-यूपा करना, दिल की बीमारी को पालना, उपहार में दी गई मछली पाना तथा कलह-कुत्सा का उच्छ्वाम व्यक्तकर परम उत्साह से जीवन जीना हो तो जीना है ! यही तो निर्वाण की प्राप्ति है ! सृष्टिपर मौके-बेमौके पहुंच हो जाता है । नियमपूर्वक घंटा-घडियाल बजा जाता है, शंख फूंक जाता है और मंत्र का उच्चारण कर जाता है । और चेहरे पर मुस्कराहट लाकर कहता है, "अवकी मेरे मालिक आ रहे हैं। मौसाजी, हर चीज़ ठीक हो जायेगी..." यानी ठीक हो जायेगी किसी के पायाने की मोटी, किसी के रमोईघर की छत का सूराय, किसी के जीने को रेलिंग और विमी के मकान की दीवार की बालू की यावरू । एक वार ईश्वरप्रसाद ढननियां को किसी तरह इस उनतीस बटे तीन वटै छह नीलमणि हालदार लेन के इस मकान में अगर सगरीर ले आए' लाने से ही सारी समस्याएं हल हो जाएंगी। भवदुलाल के आंगन में नये सिरे से सिमेट लगाया जाएगा, टूटी सीढ़ी को जोड़ दिया जायेगा, गलघर पर टीन को छत लगाई जाएगी; हिमाश बाबू के जीने की टूटी रेलिंग को फिर से मजबूत बना दिया जाएगा, दीवार मे सफेदी की जाएगी और तीन- मंजिल के हरिपद चक्रवर्ती का रसोईघर जहां बारिश की बूंदें टपकती. हैं, उसे ठीक कर दिया जाएगा। इतना ही नहीं। ईश्वरप्रसाद ढनढनियां जैसे उनतीस वटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन के इस मकान का ईश्वर है ! परम मंगलमय, परम सृष्टिकर्ता । एक बार अगर आकाश के अदृश्य लोक से इस यथार्थ धरती पर उसका अवतरण हो. जाए तो जैसे हरेक की तमाम समस्याओं का हल निकल आए। उस नेड़ी को साल-दर-साल वच्चा नहीं होगा, राधा बुआ और भवदुलाल की पालित-पोपित संतानों के वंशधरों का भविष्य अपनी महिमा से निष्कंटक कर देगा। गोपा का पति तब मयूरभंज की भट्ठी में ठर्रा पीकर नशे में नहीं झूमेगा, हिमांशु वाबू की दिल की बीमारी दूर हो जायेगी और वे फिर से स्वस्थ हो जायेंगे; हरिपद चक्र- वर्ती को घटिया काम करके रोजी-रोटी कमानी नहीं पड़ेगी और जयन्ती की शादी हो जाएगी। वह स्वस्थ, बलवान और शिक्षित पान के हाथ में अपनी पुत्री को समर्पित कर सकेगा। एक रेशमी साड़ी या मामूली स्नो, क्रीम, पाउडर के खर्च के लिए तब उसकी लड़की को मिस्टर पराशर के चेम्बर में किराये पर खटना नहीं पड़ेगा। ईश्वरप्रसाद ढनढनियां सारी चीज़ों का एक रास्ता निकाल सकता है---- इस उनतीस बटे तीन बटे छह नीलमणि हालदार लेन का अदृश्य मालिक ईश्वर- प्रसाद ढनहनियां। मालिक अदृश्य है लेकिन उसका दलाल ? दलाल सृष्टिधर ? वह पहुंच के परे नहीं है । यही वजह है कि हर कोई सृष्टिधर को ही पकड़ता है, "एक बार अपने मालिक को ला दो, सृष्टिधर, अपने मालिक को लाकर हमारी हालत दिखा दो..." लेकिन मालिक कहां है ? वह तो अदृश्य है ! विशाल ब्रह्माण्ड के उस मालिक ईश्वर की तरह ही उनतीस वटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन के मकान का मालिक ईश्वरप्रसाद ढनढनियां दृष्टि के परे है, अप्राप्य, अवाङ्मनसोगोचर (वाणी और मन की पहुंच से परे)... वह मालिक कभी नहीं आया। आया नहीं, पर मालिक का दलाल सृष्टिधर हर महीने आकर किराया ले जाता है । विधाता-पुरुप अपना टैक्स नियमपूर्वक वसूल करके ले जाता है। . - और क्योंकि आया नहीं इसीलिए हो सकता है, इस उनतीस घटे सीन बरे छह नीलमणि हालदार लेन के मकान के बाशिन्दों को किसी समस्या का कोई निदान नहीं हुआ। राधा बुआ उसी मकान-मालिक के खिलाफ तय जहर उगलती है, जय उसका दलाल सामने पड जाता है । हिमाशु याबू उमी मकान-मालिक के प्रति तय शिकायत करते हैं जय उनकी छाती का दर्द बढ़ जाता है । भवदुलाल साल. दर-साल वच्चा पैदा होने का बदला गृप्टिधर को परी-गोटी सुनाकर देगा चाहता । और हरिपद चक्रवर्ती के मन में जय अपनी पटिया कमाई के प्रति वैराग्य जन्म लेता है, वह सृष्टिधर को पकड़कर इस सुयोग से अपना मानोश शान्त करना चाहता है । जयन्ती जब चौरगी में एकाकी पक्कर काटती हुई गन की वेचनी दूर नहीं कर पाती है तब उसका सारा सामोश मकान-मालिक दलाल सृष्टिघर पर केन्द्रित हो जाता है। मिस्टर पराशर ने उम दिन कहा, "क्या हुआ मिस्टर राय, भापकी यह आर्टिस्ट कहाँ है ? अब वह दिख ही नहीं रही है मानन्द राय पंमा मागने आया था। पंमा का मतमय उधार । कमीशन वगैरह ले चुका था । पूरा पेशगी की जरूरत है। धोबी की दुकान में पंगे थे अमाव में मूट नहीं ला पा रहा है। उसने कहा, "नहीं सर, वैसे घटिया लोगों के मुहल्ले में अब नहीं जाऊंगा।" "घटिया लोगों का मतलब ?" नीलमणि हालदार लेन।" मिस्टर पराशर ने कहा, "येकिन आटिम तो घटिया लोगों के मुहल्ले में ही रहनी हैं । हम लोगों को वहीं मे तो याटिस्टों को माना है । भने यादमी के मुहल्ले में बाएगी ही कौन और बाए भी तो क्यों ?" वानन्द ने कहा, "हमारी भी पहले यही धारणा पी मर, लैकिन यह वही ही गवरनाक जगह है, दहा टम दिन मार याद-माने दच गया।" "करों ?" मिस्टर परागर को याश्चर्य हा, "सिम की मदद की जरूरत है तो कहिए । पुलिस कमिश्नर में कह दूंगा !" .
. "नहीं; मिस्टर पराशर, पुलिस कमिश्नर के द्वारा नहीं होगा। वह तो एकबारगी पुलिस कमिश्नर का वाप है, सर !" "सो कैसे ?" "मेरी गाड़ी में ही आग लगाना चाहता है । मुहल्ले के छोकरे ठर्रा पीना सीख गए हैं । अपनी आर्टिस्ट को पहुंचाने जा रहा था कि यह कांड हो गया।" "सो हो, आर्टिस्ट तो कहीं बिगड़ नहीं गई ?" आनन्द ने कहा, "विगड़ेगी क्यों सर ? और बिगड़ेगी तो आर्टिस्ट का चलेगा कैसे ? उसको भी तो साड़ी-ब्लाउज़ का खर्च है, सिनेमा-गहना वगैरह की जरूरत है। उसके बाप के पास इतना पैसा भी नहीं है कि जवान लड़की की सारी ज़रूरतों को पूरा करे । मैं चूंकि था इसीलिए अच्छा या बुरा- -जो हो, उन लोगों को खाना नसीब होता था, सर! अच्छी साड़ी दो ब्लाउज़ दिया, फिर नकद कुछ पैसे भी दिए। उधर वीस सेर की एक मछली खरीदकर दी थी। एक दिन हिलसा मछली भी खरीदकर दी थी। हिलसा मछली मिलने से मुझ पर बड़ी ही खुश हुई थी !" "इतना पैसा दे रहे हो, आखिर तक वसूल कर पाओगे या नहीं ?" मानन्द वोला, "वसूली तो हो चुकी है, सर !" "कैसे ?" मिस्टर पराशर को थोड़ा आश्चर्य हुआ। आनन्द बोला, "आपके चेम्बर में लाने के बाद से उसकी प्रतिष्ठा बढ़ ही गई है । आपका चेम्बर बड़ा ही शुभदायक है। जिसको भी यहां लेकर आया हूं, उसकी तकदीर जग गई है। यही तो। उस दिन. हैदरावाद से कांजीभाई देसाई कलकत्ता आए थे। खबर मिलते ही मैं उनसे मिला । मुझसे ज्यों ही कलकत्ते का हालचाल पूछा, मैंने कहा : मिस्टर पराशर के चेम्बर में एक्सक्लुसिव आर्टिस्ट है, चाहिए तो बताइए । " उसके बाद एक दिन एंगेजमेंट हुआ । आर्टिस्ट को देखते ही कांजीभाई देसाई की जीभ से लार टपकने लगी। "कांजीभाई देसाई बोला : रेट क्या है ? " मैंने पूछा : एक्सक्लुसिव या पार्ट टाइम ? एक्सक्लुसिव !-देसाई बोला। : ८८ . " तब मैंने एकान्त में ले जाकर कहा : देसाई जी, मापसे दर-दाम नहीं करूंगा, आप मेरे पुराने क्लाइंट हैं, लेकिन आपको तो मातृम ही होगा कि आजकल बगाल में अकाल का दौर है । पाच रुपया किलो चावल मिल रहा है, इसलिए आर्टिस्टों की दर भी बढ़ गई है " देसाई जी ने कहा : कितना चाहिए, यही बताओ। मैं सस्ती दर के बारे में थोड़े ही कह रहा हूं। 'कुछ क्षणो तक सोचने के बाद मैंने कहा फिर निर्भय होकर कह रहा हूं देसाई जी, आप आर्टिस्ट को अपनी आखो से देख चुके हैं, एक्सक्लुसिव अगर करना चाहते हैं तो घंटे के हिमाय से कुछ कम ही दे दीजिए। 'कितना, यही बताओ न ! मैं तीन दिनो तक कलकाटा मे रहूंगा-सेवेन्टी- टू आवसं... " मैंने कहा : सेवेन्टी-टू आवसं का मतलब हुआ घंटे के हिसाब से तीन हजार रुपया । आप ढाई हजार दे दीजिएगा । आपको पांच सौ कम कर रहा 'बस, यही तप हुआ।" मिस्टर पराशर आश्चर्य में खो गया, "ढाई हजार कैश ?" "हा, कैश डाउन, एडवास "बहुत उम्दा केस है व्यॉय-बहुत ही उम्दा ! आर्टिस्ट को कितना आनन्द ने दिया?" मानन्द ने कहा, "याटिस्ट को कितना देता ! दो सौ ! दो सौ मे ही खुश हो गई।" "ओनली टू हंड्रेड ?" "हां सर, एक केस ही में मुझे नेट प्रोफिट हुआ दो हजार तीन सौ रुपये।" "फिर तो तुम्हें इस महीने मोटा कमीशन मिला, मिस्टर राय," मिस्टर पराशर ने कहा, 'ऐसी हालत में तुम फिर कमीशन मागने क्यो आए हो?" आनन्द राय के चेहरे पर उदास हंसी तिर आई, "आपको मालूम ही है, मेरे पिताजी कसर के मरीज़ हैं । महीने में पांच सौ रुपये वावूजी के पोछे ही खर्च बैठता है । उसके अलावा दहन को पोलियो है । हालाकि वह शादी के योग्य हो चुकी है लेकिन शादी नहीं करा पा रहा हूं। इधर मकान-मालिक से - - वकाया किराये की बावत मुकदमा चल रहा है। पांच सालों से आपसे जो कमीशन मिलता आ रहा है और इधर-उधर से जो ऊपरी आय हो जाती है, सवका सब डाक्टर-दवा, वकील-एटर्नी के पेट में चला जाता है..." इस कारोबार में काम चाहे कम हो या अधिक, परन्तु वात बढ़ा-चढ़ाकर कहनी पड़ती है । एकाध हज़ार शब्दों को व्यय करने के बाद एकाध मुवक्किल पकड़ में आता है। इसके बाद आर्टिस्ट का इन्तजाम करना पड़ता है। आजकल मन के लायक आर्टिस्ट पाना मुश्किल हो गया है । कलकत्ता शहर में जिस रफ्तार से आर्टिस्टों की संख्या में वृद्धि हो रही है उसी अनुपात से इस क्षेत्र में कमीशन-एजेण्टों की भी वृद्धि हो रही है । यह जयन्ती ही क्या आनन्द के हाथ आती ? यह प्राप्ति सौभाग्य ही है जैसे। जयन्ती तव उनतीस वटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन के उस मकान में छटपटाती रहती थी। तब वह युवावस्था में पहुंच चुकी थी। सिनेमा की पत्न-पत्रिकाओं को पढ़ने के कारण सिनेमा में उतरने का जुनून सवार हो चुका था। अकेली सिनेमा देखने जाती थी. और सिनेमा से वापस आने के वक्त सीधे घर की ओर नहीं आती थी। मां पूछती, "सिनेमा देखकर लौटने में इतनी देर क्यों हुई ? सिनेमा ते कब का छूट चुका है !" जयन्ती कहती, "एक सहेली से मुलाकात हो गई, मां, उसने छोड़ा ही नहीं खींचकर अपने घर पर ले गई।" "तेरी वह कौन-सी सहेली है ?' "तुम उसे पहचानती नहीं हो । उसका नाम है वासन्ती । मुझसे एक दर्ज पीछे थी । अब उसकी शादी हो चुकी है। राममय रोड में ससुराल है।" अन्तत: ऐसा हुआ कि विना कहें-सुने जयन्ती वासन्ती की राममय रोड के ससुराल में हर रोज़ आने-जाने लगी। किसी दिन जब वासन्ती के लड़के का अन्नप्राशन मनाया जाता, उस दिन रात ग्यारह बजने पर घर लौटती निमंत्रण में जाने के वाद उठने ही नहीं दिया। किसी दिन वासन्ती की शादी की सालगिरह मनाई जाती और वहां खान-पान चलता। हर रोज़ आने में रार . होने लगी। उसी समय आनन्द राय से एकाएक मुलाकात हुई। आनन्द राय ने देखा कि एक लड़की सिनेमाघर से निकलकर अकेली ही फुटपाय से जा रही है। इस तरह अकेली बहुत-भी लड़कियां जाती हैं। मगर. जो जौहरी होते हैं, पहचान लेते हैं। पहचान लेते हैं कि किस किस्म का जाना निरुद्देश्य हुआ करता है । पीछे-पीछे कदम बढ़ाता हुआ आनन्द ध्यान से देखने लगा । लहकी एक सडक मे घुसी और दूसरी से बाहर निकली। उसके वाद दूसरी सड़क पकड़कर एक साढी की दुकान के सामने पहुंची और शो केस के सामने वेवजह ठिठकहर खड़ी हो गई और बीच-बीच में इधर-उधर आखें दौड़ाने लगी। जैसे सीधे जाकर साड़ी देख रहा हो, मानन्द भी ठीक उसी मुद्रा मे अपलक शो-केस की ओर देखने लगा। उसके बाद ऐसा वक्त आया कि वे आमने-सामने खड़े हो गए। "मेरे लिए एक साड़ी पसन्द कर दीजिएगा ?" जयन्ती शुरू में चौंक पड़ी, फिर पूटा, "किसके लिए ?" 'किसी के लिए भी।" "वाह जी, वाह, जिसके लिए आप साड़ी खरीद रहे हैं उसका नाम नहीं , थानन्द ने कहा, "नाम मालूम रहे तव न बताऊं। नाम नहीं बताया है।" तभी बात जयन्तो की समझ में आ गई । वह मुसकराती हुई वोली, "नाम मालूम नहीं है लेकिन उसके लिए साड़ी खरीद रहे हैं ?" "आपका नाम ?" आनन्द ने पूछा । इच्छा न रहने के बावजूद जयन्ती ने बताया, "जयन्ती चक्रवर्ती।" "मैं जयन्ती चक्रवर्ती के लिए ही माड़ी खरीद रहा हूं।" आनन्द ने कहा । तत्काल दोनों एकसाय हंस पड़े। दुकानदार झांककर देख रहा था। यब बाहर आकर बोला, "आइए न, अन्दर चले याइए, कौन-मी साड़ी लेनी है, देखिए..." उसके बाद आनन्द ने दुकान के अन्दर जाकर साड़ी परीदी । खरीदकर जयन्ती के हाथ में पंकेट थमा दिया और कहा, "लीजिए..."
जयन्ती बोली, "आपकी साड़ी वेमतलब क्यों लूं?" "अगर लेना नहीं चाहती हैं तो साड़ी की कीमत मुझे दे दें।" "अभी मेरे पास उतना पैसा नहीं है।" मानन्द ने कहा, "बाद में दे दीजिएगा, हड़बड़ी नहीं है।" "आपको कैसे दूंगी?" जयन्ती बोली, "आपका पता मुझे मालूम नहीं है । रहता तो मनीआर्डर करके आपको भेज देती।" "नहीं-नहीं, मनीआर्डर करके भेजने की कोई जरूरत नहीं। इससे तो अच्छा यही रहेगा कि आपके घर पर चलकर इसकी कीमत ले लूं...' "यही अच्छा रहेगा।" जयन्ती ने कहा, "मेरा पता है : उनतीस वटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन।" . - . उनतीस वटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन के मकान से मानन्द उसी समय पहले-पहल परिचित हुआ । मिस्टर पराशर के चेम्बर में आकर आनन्द उससे एक गाड़ी मांगकर ले गया । मिस्टर पराशर ने पूछा, "वढ़िया आर्टिस्ट है न, मिस्टर राय ?" भानन्द ने कहा, "हां सर, फर्स्टक्लास आर्टिस्ट!" "उम्र क्या है ?" "अठारह साल एट्टीन ! स्वीट सिक्सटीन नहीं, बल्कि टाइट एट्टीन ।" "एडवांस कितना चाहिए ?" "दो सौ रुपये !" "सो क्यों ? दो सौ एडवांस लोगे और बाद में मगर माल भूसा सावित हो?" आनन्द ने कहा, "मैं तीस रुपये लगाकर एक साड़ी खरीदकर दे चुका हूं। मैं माल का जौहरी हूं, मिस्टर पराशर ! अगर माल भूसा सावित हो जाए तो कीमत वापस कर दूंगा । मैं आपको गारन्टी दे रहा हूं।" वस, वहीं से शुरुआत हुई। उसी दिन से घर के सभी व्यक्तियों को पता चला कि जयन्ती भवानीपुर के राममय रोड में अपनी.सहेली की ससुराल में घूमने-फिरने जाती है। हरिपद चक्रवर्ती पूछता, "जयन्ती कहां है जी ? वह नज़र नहीं आ रही है !"
पुष्प कहती, "वह अपनी राहेली के पर गई है।" "सहेली ! कौन उसकी सहेली है ? मोसी सहेली ?" पुष्प वोली, "स्कूल की सहेली । बचपन में एक साप पड़ती थी।" "मगर हर रोज उसके घर पर क्यों जाती है ?" पुष्प को गुस्सा आ गया, "उसके घर नहीं, बल्कि ससुराल जाती है।" "ससुराल ? क्यो ? सहेलो के घर पर रोज-रोज जाना क्या अच्छा दिखता "इससे तुम्हारा क्या बिगड़ता है ? तुम लडकी की शादी करोगे नहीं, फिर वह क्या चुपचाप घर में नजरबन्द होकर पड़ी रहे ? उसे क्या गपगप करने की इच्छा नही होती ? उसमे इच्छा-आनन्द नाम की चीज नहीं होनी चाहिए ?" इसके बाद हरिपद चुप हो गया। इसके अतिरिक्त हरिपद के पास इतना वक्त भी नहीं है कि इन बातों पर सोचे-विचारे । दफ्तर का मुलाजिम होता तो लडकी की शादी की वावत सोचने का उसे वक्त मिलता । यह तो घटिया किस्म का काम दसियो जगह आर्डर सप्लाई करने का काम । सवेरे से शुरू करके रात नौ बजे तक बहुत-सी फमों में चक्कर काटकर जूते का तल्ला घिसना। इसी को तो घटिया किस्म की जीविका कहा जाता है । ठीक ऐसे ही समय यह काड घटित हुआ। फुटबाल का खेल देखकर हिमाशु वावू का लड़का विजय चौरंगी के रास्ते के अंधेरे से पंदल आ रहा था और वहां जयन्ती को देखकर चौंक पड़ा था। भोलादत्त ने पूछा, "वह लडका कौन है ?" विजय ने कहा, "मालूम नही उस्ताद, कही से एक मुशनुमा गाडी लेकर आया और देखते न देखते उस लड़की को लेकर चंपत हो गया।" केतो ने कहा, "मैंने भी देखा है, चौरंगी की सड़क पर वह लडकी माराती रहती है।" "तव तो श्योर शाट है । ट्राई करूं ?" लेकिन अन्ततः कोशिश नहीं हो पाई। भोलादत्त ने दल-पल के साई दिनों तक चौरंगी मुहल्ले में चक्कर लगाए, लेकिन हरिपद गमावर्ती की ताकी .
मुलाकात नहीं हुई। विजय ने कहा, "लेकिन वह लड़की अब भी घर से ठीक शाम के वक्त वाहन निकलती है।" "कहां जाती है ?" भोलादत्त ने पूछा। "सो मैंने कहां देखा है ? गोपा ने बताया कि शाम होने के कुछ देर पहले ही साज-सिंगार करके निकलती है।" "कहां जाती है, अपनी वेगम से क्यों नहीं पूछा ? फिर हम पीछे-पी जाकर पता लगा लेते..." विजय ने कहा, "पूछा था। तीनमंज़िले की उस लड़की की मां ने बताय है कि उसकी एक सहेली भवानीपुर के राममय रोड पर रहती है । वहीं जातं हैं । वहां छोकरी को एक सहेली की ससुराल है।" "धोखा है, विल्कुल धोखा दिया है।" "फिर कहां जाती है ? कहां जा सकती है ?" "पता लगाना होगा। जैसे ही घर से निकलेगी, पीछा करना पड़ेगा। साल दाई से कोख छिपाने चली है। मजाल है कि कलकत्ता शहर में कोई लड़क भोलादत्त की आंख में धूल झोंककर गायव हो जाए ?" उसी दिन से भोलादत्त की जमात ताक में रहने लगी : लड़की हर रोज उनतीस वटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन के उस मकान से कहां जात । । एक दिन तीनों व्यक्तियों ने पीछे-पीछे चलना शुरू किया । लड़की आगे-आ जा रही थी। इन लगाए, चोटी हिलाती-डुलाती, पीठ और कंधे को उघाड़क जल्दी-जल्दी कदम बढ़ा रही थी। नीलमणि हालदार लेन पार करने के बाद जयन्ती एक रिक्शे पर बैठी। भोलादत्त वगैरह भी दो रिक्शे लेकर पीछे-पीछे चलने लगे। जहां रासविहारी एवेन्यू का मोड़ है, ठीक उसी जगह चमचमाती कार खड़ थी। उसके निकट, वाल पीछे की ओर संवारे हुए, एक युवक खड़ा था । जयन्ती के पहुंचते ही उसने गाड़ी के दरवाजे को खोला और उसे स्टीयरिंग के पार विठाकर धुआं उड़ाता हुआ आंखों से ओझल हो गया । भोलादत्त की जमात वेवकूफ की तरह मुंह वाये उस ओर ताकती रह गई - ६४ लेकिन बात थोड़ी-बहुत समझ में आ गई। गोपा उस दिन बोली, "वह सड़की चाहे जहां जाए, इससे तुम लोगों का क्या आता-जाता है ? उसके बारे मे तुम लोग क्यो इतनी फिक्र करते हो?" विजय तब कुछ क्षण पहले मयूरभंज से लौटा था। उसकी आखें चढी हुई पौं। किसी तरह खा-पीकर सो रहे तो आराम मिले। "सोचूगा नही ?" उसने कहा, "गृहस्थ-घर की औरत जिसके तिसके साथ बाहर निकलेगी?" "गृहरथ-घर की लड़कियां कलकत्ते मे कितनी ही हैं, उन लोगों के लिए कोई माथापच्ची क्यों नहीं करता?" विजय बोला, "तुम भले घर की बहू हो, तुम समझोगी कैसे ? तुम चुप रहो..." "तुम भले घर की औरत के बारे मे माथापच्ची करोगे और मैं चुप रहूं? ..." "अरे, तुम भी तो उजबक हो ! इस घर में पत्नी, मां और वाप के साथ रहता हू । इमी मकान को वेश्यालय बना देगी और हम कुछ भी नही कहे ?" "तुम यह क्यों कह रहे हो? वह लड़की क्या वेश्या है ?" "वेश्या नहीं तो और क्या है ? जिसके-तिसके साथ इधर-उधर जाती है। ऐसियो को ही तो वेश्या कहा जाता है।" "वह वेश्या है या नहीं इसके लिए उसके मां-बाप हैं । समझना होगा तो वे लोग समझेंगे ? तुम्हें इतना सोचने की कौन-सी जरूरत है ?" तव नीद से विजय की पलकें झपक रही थी। वह बोला, "इसीलिए तो 'औरत' कहते हैं । ऐसी अक्ल न होती तो औरत बनकर पैदा होती ? पुरुष- योनि में जन्म लेकर हमारी तरह तुम कॉलेज में पढ़ती..." "और तुम्हारी तरह शराव पीती !" "क्या कहा ? फिर से कहो ?" लेकिन गोपा तब तक कमरे से निकलकर बाहर चली गई । वह ज्योही बाहर निकली उसकी सास उसके निकट आई। "क्या हुआ बहू, फिर झगड़ा हो गया ?" "नहीं-नहीं; झगड़ा नहीं हुआ है ।" "फिर कह रही हो कि झगड़ा नहीं हुआ ? तुमसे कहा है न, कि उससे .
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हजार रुपया । आनन्द राय मामूली कमीशन एजेन्ट है । उसका बाप कैंसर का मरीज है, हर महीने उसके लिए पांच सौ रुपये डाक्टर और दवा में वर्ष करना पड़ता है । सोलह साल की विवाह योग्य बहन को पोलियो है । उसके पीछे भी मोटी रकम पचं करनी पड़ती है। मकान-मालिक से भी बकाया किराये की पावत पिछले चार सालो से मुकदमा चल रहा है। वकील-एटर्नी मोटी रकम हहप जाते हैं। जयन्ती को हिस्से मे दो सौ रुपये मिले। कारोबारी होने से क्या होगा, काजीभाई देसाई मे दया-ममता-प्रेम है। मिस्टर पराशर के चेम्बर में जो लोग आते हैं वे और ही किस्म के होते है । बढ़ई की तरह वे केवल तख्ता पकड़ते हैं और कांटी ठोंकते हैं। लेकिन देसाई जी ने जयन्ती को साड़ी घरोद दो, गहना भी बरीदकर दिया । साथ में लेकर सिनेमा गए । अच्छी बंगला न बोल पाने के बावजूद बंगला में बातचीत करने की कोशिश की। "तुम्हारा नाम क्या है ?" जयन्ती बोली, "जयन्ती चक्रवर्ती।" "तुम इस कारोबार में क्यों उतरीं ? यह लाइन क्या अच्छी है ?" जयन्ती ने इस बात का उतर नहीं दिया। दे तो क्या दे ? तीन दिन मोर तीन रातें एकसाय एक ही होटल में एक ही कमरे में गुजारी। बढ़िया ब्रेक- कास्ट, लंच और डिनर खिलाया। चाहे जो हो, लेकिन खातिर भरपूर की। उम पर दो सौ रुपये दिए। इसको जैसे कल्पना भी नही की जा सकती है । जीवन में इतना सुख है- इसके बारे में अब तक उसे कुछ मालूम ही नहीं था। इतने दिनों तक सड़कों को हो धूल छानती बाई है। किसी ने अगर एक प्याली चाय पिलाई है तो उसे हतार्थता का बोध हुआ है। रुपया तो दूर की बात है । जयन्ती को लगा, काजी- माई.देसाई जसा आदमी होता ही नहीं है । कांजीभाई देसाई उसके लिए जैसे देवतास्वरूप है। हाय मे रुपया पामकर जयन्ती विस्मित हो उठी । बोली, "सब मेरा है ?" देसाई जी ने कहा, "सब तुम्हारे लिए..." जयन्ती की आंखो में पानी भर याया। मानो, वह विश्वास ही नहीं कर .
पा रही है। हाथ से छूकर रुपये का अहसास करने लगी। इतने रुपये ! जिन्दगी में कहीं उसने एक साय इतने रुपये नहीं देखे थे। एकाएक जयन्ती ने कहा, "जानते हैं, इतना रुपया एक साथ मुझे किसी ने नहीं दिया था।" देसाई जी ने कहा, "तुम अच्छी लड़की हो। तुम इस लाइन में क्यों आई...?" जयन्ती ने कहा, "मेरे पिताजी ने मेरी शादी नहीं की। उनके पास शादी कराने के लिए पैसा नहीं है।" पता नहीं क्या हुआ कि देसाई जी ने कहा, "ठीक है, मैं तुम्हारी शादी का पैसा दूंगा । कितने रुपये लगेंगे?" जयन्ती कुछ पलों तक चुप्पी साधे रही, फिर सिर झुकाकर.वोली, "कौन मुझसे शादी करेगा?" "क्यों, शादी क्यों नहीं करेगा ? रुपया मिलने से शादी करने के लिए सभी तैयार हो जायेंगे।" देसाई जी ने कहा। जयन्ती बोली, "मैं किसी की ज़िन्दगी वरवाद करना नहीं चाहती" "उसमें कोई दोष नहीं है," देसाई जी ने कहा, "सभी देशों की औरतें ऐसा करती हैं । मैंने जापान जाकर देखा है, वहां लड़कियां विवाह के पहले इसी तरह पैसा कमाती हैं।" जयन्ती को जैसे उम्मीद की रोशनी दिख पड़ी। "आप ठीक कह रहे हैं उसने पूछा। देसाई जी जयन्ती का हाथ अपने हाथ में लेकर सहलाने लगे। "रो रही हो ?" उन्होंने पूछा। जयन्ती अव अपने-आपको संयतं नहीं रख सकी। देसाई जी के सीने पर अपना सिर टिकाकर अनवरत आंसू बहाने लगी। पहले दिन फिर उसी तरह हुआ। सुबह से शाम तक जी-तोड़ परिश्रम करने के बाद हरिपद चक्रवर्ती जब वापस आया तो पूछा "जयन्ती दिख नहीं रही है। कहां है ?" पुष्प ने शुरू में जाहिर करना नहीं चाहा । बोली, "घूमने निकली है।" ९८ जाए, ." .. "ओह, अपनी उसी स्कूल की सहेली की ससुराल गई है ?" पुष्प ने उस बात का कोई उत्तर नहीं दिया। हरिपद ने इतना ही कहा, "सहेली की ससुराल गई है तो उसके लिए मैं कुछ भी नहीं कह रहा हूं। मगर इतनी रात होने पर क्यों लौटती है ? यह मुहल्ला अच्छा नहीं है.. लेकिन दूसरे दिन हरिपद ने फिर पूछा, "क्यों क्या हुआ, जयन्ती कल लोट- कर नहीं आई ?" पत्नी बोली, "नहीं।" "नहीं कहने का मतलव ? रात में भी वापस नही आई ?" पुष्प ने इस बार भी कहा, "नहीं..." "नहीं का मानी ? लडकी रात में वापस नहीं लौटी और तुम चुपचाप बैठी हो ? गई कहां है ?" "वह परसों आयेगी।" पुष्प ने इतना ही कहा। "परसों आयेगी ? तुमसे कहकर गई है।" "हो !" पत्नी ने कहा। "कहा गई है ? किसके साथ गई है ?" पुष्प बोली, "और रोटी लोगे ?" हरिपद को गुस्सा हो आया । "रोटी की बात रहे," उसने कहा, "खाना मेरे लिए हराम हो गया है । वह कहां गई है, यही बताओ।" पत्नी अब झुंझला उठी । बोली, "अब लड़की के बारे में बहुत पूछताछ कर रहे हो, मगर लड़की जो बड़ी हो गई है इस तरफ ध्यान है ? कभी उसे एक अच्छी साड़ी खरीदकर दी है ? उसे अपने साथ लिए कभी कही धूमने-फिरने निकले हो ? कितनी ही लड़कियों के बाप बाल-बच्चों को लेकर कितनी ही जगहों को भ्रमण करते हैं। बाप के नाते तुमने कभी यह कर्तव्य निभाया है ? कमी इसकी खबर ली है, कि वह क्या सोचती है क्या करती है, क्या चाहती है ? तुम तो जिन्दगी-भर हम लोगों को इस कंदखाने में डालकर कलकत्ता शहर को जोतते रहते हो, रुपये की तलाश मे चक्कर काटते रहते हो। हम जिन्दा हैं या मर गए-यह तुमने कभी जानना चाहा है ?" पत्नी की बातों को सुनकर हरिपद को लगा जैसे वह आकाश से गिर पड़ा हो।
खाना बन्द कर पत्नी के चेहरे पर आंखें टिका दी। पुप्प दोली, "मेरे चेहरे की ओर मुंह वायै क्या देख रहे हो? खाकर उठो, विस्तर विद्या दिया है, सो रहो..." हरिपद ने टूटी आवाज़ में कहा, "मैं जो दिन-भर चक्कर काटता रहता हूं, वह क्या बाराम करने के लिए ?" "हां, माराम के लिए ही । आराम नहीं तो और क्या ? वहां पंखे के नीचे वैठकर तुम रुपये-पैसों की बात सोचते हो । तुम क्या हम लोगों के बारे में सोचते हो ? जितना पैसा तुम गृहस्थी चलाने के लिए देते हो, उससे गृहस्थी चलती है या नहीं, उस पर कभी सोचा है ? यह जो तुम रोटी खा रहे हो; इसे. कितनी तकलीफ से जिसकी-तिसकी खुशामद करके मंगाना पड़ता है, पता है ? जानने की तुमने कभी इच्छा जाहिर की है ? तुम तो होटल में वास करते हो। इससे तो अच्छा यही था कि बिना शादी किए तुम होटल में वास करते !' अचानक पत्नी की बातें सुनकर हरिपद अचकचा गया। पत्नी को कभी ऐसा क्रोध नहीं आया था। कभी अपने स्वर में इतनी तिक्तता लाकर उसने झगड़ा नहीं किया था ! "एकाएक तुम्हें क्या हो गया है ?" उसने कहा। "अब बात मत बढ़ायो। तुम्हारा काम खाना खाना है, खाकर उठो। इसके बाद मुझे खाना है, बरतन मांजना है, रसोईघर धोना है । तुम्हारी तरह शरीर में हवा लगाए घूमती रहूं तो मेरा चलने वाला नहीं है." हरिपद वोला, "क्या हुआ है, यही बताओ न !" 'तुम्हें कहने से खाक होगा! तुमसे कहना या रास्ते के पत्थर से कहना एक जैसा है । उठो, मैं जूठा वरतन ले जाऊं... पत्नी का तेवर तब सचमुच चढ़ा हुआ था । उसके बाद जब खाना-पीना समाप्त हो गया, हरिपद ने पूछा, "अब वतामोगी, जयन्ती कहां गई है ?" पुप्प बोली, "लड़की जवान हो चुकी है, यानन्द के साथ घूमने-फिरने निकली है..." "मानन्द ? कोन है वह ? कभी नाम नहीं सुना..." "नहीं सुना तो सुनने की ज़रूरत भी नहीं है..." . १०० हरिपद योला, "गुस्सा क्यों रही हो? मैं उसका बाप हूं, मुप्ते भी तो सुनने की इच्छा होती है।" पुष्प बोली, "आनन्द तो 'मौसाजी' का उच्चारण करते ही गद्गद् हो । जाता है। पूछता रहता है : मौसाजी कहां हैं ? मौसाजी पर तो एक दिन भी नजर नहीं पड़ी।" "मैं उसका मौसा लगता हूं?" सुनकर हरिपद चक्रवर्ती हैरान हो गया। बोला, "मैं अगर उसका मौसा लगता हूं तो उसको मा तुम्हारी बहन हुई।" "हां बहन है, तुम चुप रहो। ऐसा वह्न-वेटा मिले तो यादमी कृतापं हो जाए ! वह पुरी जा रहा था । मुझसे कहा : मौसीजी, मेरी वही इच्छा है कि जयन्ती, मेरे साथ जाए । ले जाऊं ?" "पुरी गई है ?" "हां; आदमी अपनी तकदीर अपने साथ लिए पैदा होता है । सोचा, खचं- वर्ष तो लग नही रहा है, जरा धूम-फिर आए । जाएगी और लौट आएगी" हरिपद धया कहे, उसको समझ में नहीं आया । "फिर परसों वापस आ रही है ? परसों ज़रूर आ जायेगी न? और 'अगर परसो न आई तो?" "तुम अशुभ वार्ते मत किया करो। परसो नही आयेगी तो तरसों आयेगी। जिस-तिसके साय नहीं गई है, गई है यानन्द के साथ । डरने की कौन-सी बात . - , हरिपद बोला, "मैं इसके लिए चिन्ता नहीं कर रहा हूं। मुहल्ले के लोगों के बारे में सोच रहा हूं। इस मकान के किरायेदार अच्छे आदमी नहीं हैं।" "किरायेदारों से हम क्या हरें ? हम उनका दिया हुआ खाते हैं ?" "नही नहीं, ऐसी बात नहीं है, फिर भी एकमजिले की राधा बुआ है भवदुलाल की सास-वह औरत इस मुहल्ले की गजट है । कही इसके बारे में चर्चा न करती फिरे।" पुष्प बोली, "चर्चा करने दो, मैं किसी की परवाह नहीं करती । जैसा यह मकान है वैसा हो मकान-मालिक ! कितने दिनो से रसोईघर की छत की मरम्मत करने को कह रही हूं। सो तो नही..." "अबकी मकान-मालिक आ रहा है।" हरिपद ने कहा।
"किसने तुमसे कहा कि आ रहा है ?" "सृप्टिधर से उस दिन सड़क पर एकाएक मुलाकात हो गई, उसी ने बताया..." पुष्प . बोली, "हरामजादा मकान-मालिक जाए. तो सही, एक बार उससे निवटना है ! वेटा नम्बरी हरामी है, हर महीने नकद फरफराता नोट किराये में भरती हूं, उसके बारे में कोई हिसाव ही नहीं । सोचता भी नहीं है कि एक वार देख माऊं कि किरायेदार जिन्दा है या मर गए..." और उसके बाद फिर से दैनन्दिन गाली-गलौज़ की शुरुआत हो जाती है। गाली का लक्ष्य होता है वह मकान-मालिक जो हर रोज़ विराजमान रहने के वावजूद अदृश्य है । जो मकान-मालिक हर दिन वायदा करता है कि आयेगा लेकिन वायदे का पालन नहीं करता है। जिस मकान-मालिक को सभी अपनी- अपनी समस्या के निदान के लिए पुकारते हैं, परन्तु पुकारने पर जिसका उत्तर नहीं मिलता है । जो मकान-मालिक आकर समस्त समस्याओं का समाधान ढूंढ़ सकता है, पर जो आता ही नहीं है । जो मकान-मालिक अनादि-अनन्तकाल से अदृश्य है, अलभ्य और अवाङमनसोगोचर... हर पल इन लोगों को मकान-मालिक की याद आती हो, ऐसी बात नहीं है । हर पल मकान-मालिक को गाली-गलौज करें, यही भी नहीं है । इसका भी कोई खास वक्त रहता है। जब इस मकान के लोग आनन्द में तल्लीन रहते हैं तब कोई भी मकान- मालिक की चर्चा नहीं करता । जिस दिन वह आदमी अपने तालाब की बहुत बड़ी एक मछली दे गया, जिस दिन राधा बुआ के नाती का अन्नप्राशन था और दो सौ आदमी घर के सामने मंडप के तले आकंठ भोजन कर गए उस दिन हंसी-मजाक, आनन्द-उत्सव में किसी को भी मकान-मालिक की याद नहीं आई। मछली खाते-खाते हरिपद चक्रवर्ती मकान-मालिक को गाली-गलौज करना भूल गया। राधा वुमा नाती को गोद में लिए ज्यों ही सामने आकर खड़ी हुई, फूल भाभी ने एक अशरफी निकालकर बच्चे को आशीर्वाद दिया। १०२
एक बार अगरफी!
"बड़ा ही प्यारा पाया मुभाली !
मानन्द के मारेग मैं पाधा की लीगकी की सही माय
पर की टूटी परा को भी पार नही भाई । titany time
देना भी भूल गई।
विगप गर ममूरमंग से गले में पूरलो भाता that tim
पड जाता है, उस पास उसे भी गती तीन म गीत RINITY
लेन में मकान की मास मागही मी।
और जयन्ती?
जब तेश श्ययन fore, भोली finitims nurst
आनन्द की पगममासी गाली गरी attitution
छह नीलमणि हालपारग मे मी-1101 MARRIORAI
तय पोछे की बागों पर कोई भी गोषur Oth, alht iffm
प्रतियोगिता ये. सागर | Triliritumk, Hint
मग-गुरा है. गांगा that anttinutte hunt
महमृग होता है जैसे गाम का भार
पिन फाशीदा गाने muft 111
हजार गाये ग किया infrm RITAMATTA
मौ सपथ कारोबांग
मामा पाप
मौर काव्यात्र औरणाम का सामना।।
कमीशन-गट सापा, In tennifer Hit
टीन है।
जीनामा
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है"पार अब उस मकान में रहना मुझं बाटा नहीं लगता है। सभी पोहा करते रहते हैं।" "कौन-कौन पीछा करते हैं ?" जयन्ती बोली, "मुहल्ले के लड़के..." "ये लोग पीडा क्यों करते हैं ? उन लोगों की कौन-सी हानि हो रही रुपन्ती बोली, "क्योकि मिस्टर राम मेरे घर पर जावा है, इसीलिए। पिस्टर राय की गाड़ी में में बढ़ती हूं, यह बात उन्हें बरदासनहीं होती। ये लोग शक करते हैं.."माप हम लोगों के लिए कहीं किसी मकान का इन्तजाम कर दे सकते हैं ?" "मैं ? मैं कलकत्ते में मकान की तलाश कहं ?" जयन्ती बोली, “आप बहुत बड़े व्यवसायी हैं, पहा बहुत बड़े बडे मादमियों से भापकी जान-पहचान है, आप कोगिश करें तो हो जाए..." कांजीभाई देसाई बड़े सजन है । उपन्तो मिटर परागर चेम्बर में जितने व्यक्तियों से हिल-मिल चुकी है, देसाई जी उन लोगो की तरह नहीं हैं । उन लोगों के साथ महल पैसे का रिशा रहा है, लेकिन देसाई को का पवहार काफी अच्छा रहा। इनके मन में दया-ममता नाम की चीज है । तीन दिन और तीन रात तक जयन्ती को कितना प्यार किया है ! सोने दिया है । इसके चलते काफी पैसे हम किए हैं। जपन्ती को यह पता पा ही नहीं कि इस लाइन में भी इतने अच्छे लोग रहा करते हैं । जब पैसा पुकाया है तो कीमत वसूल कर लेना ही इस लाइन का रिवाज है। हर कोई तो अब तक यही करता आया है। लेकिन यह कानीलाल देसाई जैसे बलग ही तरह का व्यक्ति है। देसाई जी ने हंसकर कहा, "वंबई होता तो कोशिश करता, यहां किराये के मकान का बन्दोबस्त नहीं कर पाऊंगा। यहां मेरी किसी से जान-पहचान नहीं है। इमसे.तो बेहतर यही रहेगा कि मिस्टर राम से कहो। यह तो हो- आदमी है।" "आनन्द ? आप आनन्द के बारे में कह रहे हैं। यह तो कोगिन कर रहा है। लेकिन मिल नहीं रहा है। मकान-मालिक जिसको-तिसको के लिए राजी नहीं हैं।"
"सलामी देने से भी नहीं देगा? यानी जिसको बंबई में पगड़ी कहते हैं ?' "सलामी कहां से दूं? मेरे वाबूजी के पास पैसा है ही कहां? मैंने अपन कुछ पैसा इकट्ठा किया है। आपने मुझे जो पैसा दिया है, वह है। इस अलावा थोड़ा-बहुत जमा किया है। मेरे पास सात-आठ सौ रुपये हैं। उसरे क्या सलामी देना हो सकता है। हर कोई दो हज़ार, तीन हजार एडवांस मांगता है।" कांजीभाई देसाई ने एक उपाय सुझाया, "इससे अच्छा है कि तुम एक काम करो। न हो तो उसी पैसे से घर की मरम्मत करा लो। रसोईघर की छत से पानी टपकता है न, उसे मिस्त्री बुलाकर मरम्मत करा लो । रेलिंग टूट गई है उसे भी ठीक करा लो । दीवार में पलस्तर, ह्वाइट हाउसिंग वगैरह करा लो। जयन्ती बोली, "घर मकान-मालिक का है, मैं क्यों मरम्मत कराऊं? "इसलिए कि मकान-मालिक, मरम्मत नहीं कराता है। वह कोई इस मकान में रहने के लिए नहीं आ रहा है। रहोगी तो तुम्हीं लोग। और अगर उन रुपयों से पूरा न हो तो और कुछ रुपये दे रहा हूं। लो..." और उसने वैग से नोटों का एक पूरा बंडल निकालकर उसमें से दस-दर रुपये के वीस नोट बाहर निकाले । उसके बाद नोटों को जयन्ती के हाथ में लूं - दिया। "मैं इस ट्रिप में ज्यादा नहीं दे पा रहा हूं," देसाई वोला, “वाद में जर अगली सरदियों में कलकत्ता आऊंगा तब तुम्हें अलग से ज्यादा पैसा दूंगा लो.. जयन्ती ने नोटों को अच्छी तरह मोड़कर ब्लाउज़ के अन्दर लूंसकर, रख लिया। उसके बाद बोली, “असल में मेरी समस्या क्या है, जानते हैं ? मकान दे दनिस्वत सारे किरायेदार ही बुरे हैं । मैं उन लोगों के आसपास अब रहना नह चाहती हूं। दोमंज़िले पर एक लड़का रहता है, वह शराब पीकर रात में लौटत है...' "वह चाहे शराब पिये, गांजा पिये, इससे तुम्हारा क्या आता-जाता है ? जयन्ती बोली, “एकमंज़िले में एक दूसरा किरायेदार रहता है, उसके घर में एक विधवा बुढ़िया रहती है। वह मुहल्ले की गजट है। मिस्टर राय अपने १. १०६ तालाब से एक मछली लाकर हमें प्रजेंट कर गया था। हमे प्रजेंट किया तो इसमें उन लोगों का क्या विगड़ता है ? मगर उस बुढ़िया के लड़को-दामाद हैं । उसे साल-दर-साल बच्चा पैदा होता है, साल में एक बच्चा होना ही चाहिए..." देसाई हंसता हुआ बोला, "उन लोगों को चाहे साल-दर-साल बच्चा हो, इससे तुम लोगों का क्पा याता-जाता है ?" जयन्ती के चेहरे पर दयनीयता रेंगने लगी-"मुझे यह सब गन्दगी अच्छी नहीं लगती है । इच्छा होती है, चारो तरफ साफ-सुथरा रहे--जिस तरह कि आपका होटल है । चारों तरफ कितना सजा-सवरा है ! सब कुछ चमक रहा है ! और आप अगर मेरे घर जाएं तो आपको अन्दर जाने की इच्छा नहीं होगी । जगह तो गन्दी है ही, लोग भी गन्दे हैं । वहा हरेक का मन गन्दा हो गया है। हम लोगो का मुहल्ला ही गन्दगी का पडाव है..." कांजीभाई देसाई और क्या कहे ! तीन दिनो के लिए कलकत्ता आया था। इस तरह की बहुत सारी जगहों मे काजीभाई को चक्कर लगाना पडता है। इस तरह की कितनी ही अजनबी लड़कियों के साय रात बितानी पड़ती है। हांगकांग, बेरुत, पेरिस, लन्दन, धाना, नाइरोत्री, लेबनान-कारोबार के सिल- सिले में सारी दुनिया का चक्कर काटना पडता है । मगर कलकत्ते की इस लडकी जैसी किसी भी लड़की से उसका साक्षात्कार नहीं हुआ है । तीन दिनों से इस लड़की को देखता आ रहा है । यह किसी चीज़ की मांग नहीं करती है। पैसे के लिए भी इसमे अधिक लोभ नहीं है। और और बार दूसरी-दूसरी लड- कियों ने दुकान चलकर गहना खरीदने को कहा है, साडी खरीदनी चाही है, होटल जाकर बढ़िया खाना खाना चाहा है। लेकिन इस तरह किसी भी लड़की ने घर की मांग नहीं की। तब अच्छी तरह सुवह भी नही हुई थी। नीद टूट चुकी थी और दोनों नरम विछावन पर गपशप कर रहे थे । और कुछ घटे बीतते ही काजीभाई देसाई हवाई जहाज से अपने देस के लिए रवाना हो जाएगा। इस बात को याद आते ही जयन्ती की आंखों में पानी भर आया । अब फिर वही उनतीस वटै तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन लौटना है। अब वही, वही तीनमंजिला मकान । अब फिर वही टूटे जीने की रेलिंग । बाबूजी हर रोज़ टाट की एक चली थामे घटिया किस्म की जीविका के लिए बाहर .
1 निकलेंगे । उसके बाद दोमंजिलें का वुड्ढा खांसना शुरू कर देगा, एकमंजिले की राधा बुआ अपना दैनिक शोर-चीत्कार शुरू कर देगी । अब न उसके बारे में सोचने में ही जयन्ती को अच्छा लगता है और न उस परिवेश को ही वह देखना चाहती है। "तुम फिक्र मत करो, मैं फिर सदियों में आऊंगा।" याहिस्ता-आहिस्ता नींद की जड़ता को परे ठेल कांजीभाई देसाई बगल से उठकर बैठ गया। जयन्ती को बड़ा ही माश्चर्यजनक लगा । मानो, वर-कन्या हों । बड़े आदमी सुबह के वक्त जिस तरह सोकर उठते हैं, ठीक वैसे ही । बड़े आदमी हूबहू इसी तरह के विस्तर पर, इसी तरह के कमरे में नींद की वांहों में खोये रहते हैं । इसके बाद कांजीभाई देसाई ने रूम-सविस में टेलीफोन किया । तुरन्त चाय मा जायेगी, टोस्ट और अंडे, कॉर्नफ्लेक्स मामलेड-जो भी मरजी हो, ऑर्डर दो। सब कुछ माकर तुम्हारे विस्तर के सामने हाज़िर हो जाएगा, विलकुल तुम्हारे होंठों के पास । कहां से आ रहा है, कौन ला रहा है, चूल्हे में आग है या नहीं, बाजार में मछली की दर क्या है-यह सब, कुछ तुम्हें जानने की आवश्यकता नहीं है । इन कई दिनों के दरमियान सब कुछ उसके हाथों की पहुंच के दायरे में आ गया है। "सलाम साव !" बड़े-बड़े तमगे जड़ी युनिफॉर्म में दो खानसामे हर रोज़ की तरह आकर खड़े हो गए। दोनों के हाथ में ब्रेकफास्ट था । गन्ध फैल रही थी, मीठी गन्ध । और वहां उस उनतीस वटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार.लेन में अभी कोनों का उपद्रव शुरू हो गया होगा। बाबूजी थैली लेकर बाजार की ओर निकल गए होंगे, मां चूल्हे में आग जलाने में व्यस्त होगी। तीनों मंज़िलों के धुएं के बगूले से सारा मकान भर गया होगा । सांस घुट रही होगी। ठीक इसी समय जयन्ती को उठकर रसोईघर में घुसना पड़ता है । एकमंज़िले से बाल्टी में पानी भर-भरकर रसोई के लिए लाना पड़ता है, क्योंकि तीनमंजिले में पानी नहीं आता है। थोड़ी देर के वाद पानी ढोने वाला आता है। एक खेप पानी लाने का पचीस पैसा लेता है। उसी पानी से वावूजी और मां नहाते हैं, जयन्ती भी उसी पानी से नहाती है । - १०८ . उसके बाद कपड़े फीचने के लिए पानी की जरूरत पड़ती है। उस मकान में हर रोज पांच रुपये के पानी का पचं है । उससे भी मन के लायक नहीं हो पाता है । जय दिन का दस बजता है तो जीना पानी से तर-बतर हो जाता है । वाचूजो एक बार उसी पानी से फिसलकर गिर पड़े थे और दो महीने तक खाट पर पड़े रहे थे । डाक्टर आया था, दवा मंगाई गई थी और अस्पताल में एक्स-रे कराया गया था। उसके बाद चार महीने तक घर में पड़े रहने के बाद काम-काज करने लायक हुए थे। सृष्टिघर देखने के लिए आया था । 'कसे हैं चाचा जो ?' उसने पूछा था। मां ने गुस्से में आकर कहा था, 'तुम अब बात मत करो सृष्टिघर, तुम्हारे घरते ही यह कोड हुआ। तुम्हारे मालिक नल नहीं बनवा दे सकते हैं ? तुम लोगो के चलते किसी दिन जान गंवानी पड़ेगी।' उम बार भी सृष्टिधर ने कहा था, 'मैंने मालिक को चिट्ठी लिख दी है मौसीजी, अबको बाबू आ जाएं तो नल अवश्य बनवा दूगा।' 'तुम बनवा चुके नल ! एक दिन हम लोग सभी जान से हाप धो बैठेंगे। । देखना है...'मा ने कहा था। यहां यह सब नहीं है । तीन दिनों से कहा से वापरूम में पानी आ रहा है, कौन आकर साना परोस गया है, इसे जानने की किसी को जरूरत नहीं पड़ी है। सिर्फ हुक्म करता है, सब हुक्म पर ही निर्भर करता है। काजीभाई देसाई को क्या चाहिए, रूम-सविस को इसका सिर्फ आदेश दिया है और तत्काल वह चीज़ आकर आंखो के सामने उपस्थित हो गई है। एकाएक बाहर खट-पट आवाज हुई। चिस्तर पर लेटे-लेटे ही जयन्ती ने रानी की तरह कहा, "कोन ?" "मैं !" मानन्द ने निरीह स्वर में बाहर से उत्तर दिया । मानन्द राय इसी तरह सुबह-शाम कमरे में आता है और हाल-चाल पूछ लाता है। "आओ, अन्दर चले आओ।" इस कई दिनों के दरमियान पढ़िया भोजन खाकर और लाइ-प्यार पाकर जयन्ती आलसी धन गई है। विस्तर पर उसी तरह लेटी हुई बोली, "आओ, अन्दर चले आओ..." .
" आनन्द ने कहा, "कैसी हो?" "अच्छी तरह ।" जयन्ती बोली। "रात में नींद आई थी नं?" जयन्ती बोली, "उसने सोने नहीं दिया..." "बहुत अच्छा, वेरी गुड जयन्ती परितृप्ति की हंसी हंस दी । हंसकर पहले की तरह ही लेटी रही "देसाई जी कहां हैं ?" आनन्द ने पूछा । "वहां।" जयन्ती ने उंगली से बाथरूम की ओर इशारा किया। आनन्द यह सुनकर मजे से. सोफे पर बैठ गया। उसके बाद बोला, "आज साढ़े ग्यारह बजे देसाई जी का प्लेन..." "हां।" उसके बाद आनन्द ने आंख मटकाते हुए धीमी आवाज़ में कहा, "क्या हाल. वाल है ?" "अच्छा !" जयन्ती ने छोटा-सा जवाव दिया । आनन्द ने कहा, "सिर्फ अच्छा ही क्यों, कहो बहुत अच्छा ।" "हां, बहुत अच्छा ।" "फिर यह तो बताओ, मेरा मुवक्किल कैसा है..." आनन्द ने फुसफुसाते हुए कहा। जयन्ती बोली, "हां, सचमुच बड़ा ही अच्छा मुवक्किल दिया है ।" कुछ देर तक खामोश रहने के बाद फिर बोली, “सदियों में देसाई जी फिर कलकत्ता आयेंगे।" "सच ? फिर यह क्यों नहीं कहती हो कि खूब पटा लिया है । और कुछ माल-पानी दिया ?" जयन्ती बोली, "मैंने और कुछ मांगा ही नहीं। मैंने सिर्फ इतना ही कहा कि एक मकान का इन्तजाम कर दें।" "मकान ? पूरे मान का?" जयन्ती बोली, "नहीं-नहीं; मकान नहीं बल्कि किराये का मकान । मैंने कहा : 'हम लोगों का मकान अच्छा नहीं है, रसोईघर की छत से पानी टपकता है, नल नहीं है।' इसीलिए किसी अच्छे मुहल्ले में मकान का वन्दोवस्त करने के लिए कहा।" आनन्द अफसोस प्रकट करने लगा, "अरे, इससे तो मा पाप नाद ही हथिया लेती ॥ नकद रुपये से तो मकान ही अच्छा होगा।" जपन्ती ने उतार दिया। मानन्द बोला, "दुत्त, मकान क्या उसके हाथ में है ? मोज करने के लिए काफी लेकमनी पाकेट में लेकर आया है । काला धन उडाने हो तो ये लोग कलकत्ता माया करते हैं । ऐसा मौका भी कोई हाथ से जाने देता है ?" उसके बाद कुछ क्षणो तक नुप रहने के बाद वोला, "घर, जो होगा फा हो गया है । अभी काफी वक्त है । साढ़े ग्यारह बजे प्लेन है. पट्ठा दग यजे तक रहेगा, इसके पहले ही कुछ माल पानी सहेज लो। मैं पला...मेरे रहने से सहूलियत नहीं होगी..." और वह दरवाजे की तरफ 4 1 दरवाजे के पाग पहनने के बाद पीप की ओर मुडा और बोला, "मैं यहा आया था, यह बात मत कहना । एकाध घंटे में मैं फिर भा रहा हूं।" इतना कहकर बाहर निकला, निकलकर तिरछी निगाहों से देखा और फिर घरचाप दरवाजे को भेड़ दिया। सैकिन उनतीस वटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन का निहारा मने पाराम के रास्ते से चलना नहीं जानता है। उत्त इतिहाग का पय वहाही घुमावदार है । पृथ्वी के राजाओ की उन्नति-अवनति की तरह ही देहा-मैदा है। इतिहास की सुआरानी जिस तरह एक दिन पटरानी के मामन पर गई, फिर गिस तरह किसी अदृश्य प्राक्ति के निर्देश से दुआरानी के साग्नि हो गई. इस मकान का इतिहास भी वैसा ही है-इम उनमोग बटेनोन रे छह नौलमणि हालदार लेन के मकान का इविहाग। अचानक किलो दिन एकमंजिले के भवदुलाल री पटली एक बार जन्म देती है। एक झुण्ड बाल-बच्चों की भीड़ में फिर से एक प्रनिति मबार शिश का आगमन होता है। उम दिन एकजिले के गन्दे गिन को दी मी की महफिल में राधा बुआ शंख बजाकर नवजात शिशु का स्वागत-सत्कार करती है। तब उस उनतीस वटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन के उस मकान की आकृति कुछ और ही हो जाती हैं। जो आता है वह जान भी नहीं पाता वह कहां किस नरक में आया है । शंख बजता है, षष्ठीपूजा होती है और नेड़ी के चेहरे पर हंसी उभर आती है.। भवदुलाल उस दिन तहमत पहने जल्दी जल्दी वाज़ार जाता है। अच्छी मछली ले आता है, उस दिन गलती से भव दुलाल दो-चार अधिक पान खा लेता है । उस दिन उनतीस बटे तीन बटे छह नीलमणि हालदार लेन का वह मकान कुछ देर के लिए खुशियों से झूमने लगता है। उधर दोमंजिले पर संभवत: ठीक उसी वक्त हिमांशु बाबू का दिल का दर्द बद जाता है। खबर मिलते ही पत्नी रसोईघर से दौड़ती हुई आती है । विजय पिछली रात मयूरभंज से ठर्रा पीकर आया है और गहरी नींद के कारण उसकी नाक से आवाज हो रही है। एकाएक उसका नशा दूर हो जाता है । तब वह जैसे-तैसे मुहल्ले के डाक्टर के पास दौड़ा-दौड़ा जाता है। एक ही पल में उनतीस वरे तीन बटे छह नीलमणि हालदार लेन के उस मकान का वातावरण खंडित हो जाता है। एक ओर शंख की आवाज़ और दूसरी ओर हिमांशु बाबू के कलेजे की धड़कन में तीव्रता। उसी के बीच उनतीस बटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन के मकान के परिप्रेक्ष्य में जन्म और मृत्यु का द्वन्द्व छिड़ जाता है। और तीनमंज़िले पर? तीनमंजिले पर शायद तब हरिपद चक्रवर्ती के रसोईघर में उत्सव की शुरु- आत हो चुकी है । तीन दिन और तीन रात कहीं गुजारकर लड़को उनतीस बटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन के उस मकान में लौट आई है। लड़की के चेहरे पर हंसी तैर रही है। देह में चिकनाई आ गई है। मां कहती है, "ये कई दिन किस तरह गुजरे ?" जयन्ती कहती है, "बड़े मजे में मां, आनन्द दा के देस के मकान में खूब मछली खाने को मिली।" "मछली?" जयन्ती कहती है, "हां मां, इतनी बड़ी-बड़ी मछलियां थीं कि क्या कहूं! मछली का नाम सुनते ही. मां के मुंह में पानी भर आता है । "कौन-सी ११२ १ -- हा-
मछली थी ?"
जयन्ती कहती है, "बड़ी-बड़ी रोहू और सिंधी मछलियां..."
मां उसे और बोलने नही देती है । "खैर, कही अब तक तुम जा नही पाई
थीं, मानन्द के कारण कम से कम उसके घर तो हो आई । मैंने तो उसी दिन
कहा था कि वह अच्छा आदमी है।"
उसके बाद कुछ क्षणो तक चुप रहने के बाद चोली, "कितना बड़ा मकान
--
जयन्ती बोली, "मकान बहुत बड़ा है मां, विशाल मकान ! कितने ही कमरे,
घरामदे ! इस मकान से दस गुना बड़ा !"
"कौन-कौन आदमी रहता है ?"
"कोई नहीं।"
"क्या कहा, कोई नहीं? चाचा, मामा, ताऊ, भाई, बहन कोई नही ?"
जयन्ती बोली, "इतने रुपये की जायदाद है, इतने-इतने बगीचे तालाब हैं,
लेकिन खानेवाला कोई आदमी नहीं है । है तो सिर्फ नौकर-चाकर और दरबान ।
वे ही लोग लूट-खसोटकर खा रहे हैं।"
मां बोली, "आनन्द ने बताया था कि उसका एक बगीचा और मकान
बेहाला में है।"
जयन्ती बोली, "वेहाला में भी है और देस में भी । असल मे कहां कितनी
संपत्ति है उसे खुद भी पता नहीं। बहुत बड़े खानदान का लड़का है, खाने-पीने
की कमी नहीं है, सिर्फ खर्च कर रहा है और दोनो हाथो से रुपया उडा रहा
"बाप रे, ऐसा ? रुपया उडा रहा है
है ?"
"क्या करेगा, देखनेवाला तो कोई है नहीं । जो भी आकर हाथ फैलाता है,
भरपूर दे देता है।"
"चाप रे, इतना पंसा ?"
: जयन्ती बोली, "इतना पैसा है मा,
कि तुम उसके बारे में कल्पना भी नहीं
कर सकती हो।"
उसके बाद वोली, "यह देखो मा, आनन्द दा ने मुझे यह साड़ी दी है।"
और उसने नये सूटकेस से कांजीभाई देसाई की दी हुई साड़ी वाहर
. निकालकर दिखाई। हाथ में साड़ी लेकर मां ने उसे उलट-पुलटकर देखा । "कितनी अच्छी साड़ी है ! कितनी कीमत लगी?" "सत्तर रुपये !" "वाप रे, सत्तर रुपये की साड़ी तुझे यों ही दे दी । तूने मांगी थी?" "वाह, मैं क्यों मांगने लगी ? ज़ोर-ज़बर्दस्ती मेरे हाथ में थमा दी। मैंने कहा : मुझे साड़ी मत दो, मां बिगड़ेगी। फिर भी वह नहीं माना। कहा : मौसीजी विगड़ेंगी तो मैं भी उनपर बिगड़गा." "बड़ा अच्छा लड़का है !" जयन्ती बोली, "और क्या दिया है, देखो..." "क्या दिया है ?" जयन्ती ने बैग के अन्दर हाथ डालकर कान की बालियां वाहर निकाली। जिन्हें जयन्ती ने कांजीभाई देसाई पर दवाव डालकर खरीदवाया था । लाचार होकर कांजीभाई देसाई ने नामी ज्वेलर की दुकान से खरीद दी थीं। कालेधन के मालिक ने कुछ रुपये मौज-मस्ती में खर्च कर मन के बोझ को थोड़ा हलका करना चाहा था। सो उतनी ही छोटी चीज़ की कीमत डेढ़ सौ रुपये. दी थी। "वाप रे! हीरे की है क्या ? बड़ी ही चमक रही है !" जयन्ती उतना बतियाकर ही चुप न हुई बल्कि उसके बाद कहा, "और ये रुपये लो मां, अपने पास रख लो..." "रुपया!" मां नोटों के बंडल की ओर एक क्षण लोलुप दृष्टि से ताकती रही। उसके वाद वंडल को हाथ बढ़ाकर ले लिया और बोली, "कितने रुपये हैं ?" जयन्ती बोली, "मालूम नहीं मां, न मैंने गिने है और न आनन्द दा ने ही गिनकर दिए हैं !" "क्या कहती है ! तुझे रुपया क्यों दिया? या तूने रुपया लिया ही क्यों ?" और मां मनोयोगपूर्वक रुपया गिनने लगी । जयन्ती कितनी ही बातें कहे जा रही थी। कितनी ही सुख, खुशियों और आराम की बातें, स्वागत-सत्कार के संदर्भ में ढेर सारी बातें... लेकिन मां के कानों में एक भी शब्द नहीं पहुंच रहा था। मां तव तल्लीन होकर रुपया गिन रही थी। इतने रुपये एक साथ जयन्ती -- ११४ की मां ने नहीं देखे थे । अहा, जयन्ती को आयु लंबी हो, मानन्द दीर्घजीवी हो! कहाँ किम मां-बाप का लड़का है और कहा किस घटनाचक्र के कारण किसके घर मे आया है ! इसे भाग्यदेवता की शुभाशंसा ही कहना चाहिए । "मां, उसमे कितने रुपये हैं ?" "ठहर बेटा, पहले गिन लेने दे..." एक सो दस, एक सौ बीस, एक सौ तीस... एकाएक हरिपद चक्रवर्ती ने आकर कुंडी घटखटाई ! "बाबूजी आ गए मां!" जयन्ती ने कहा । जयन्ती हड़बड़ाकर दरवाजा खोलने जा रही थी, मां ने गिनना रोककरमहा, "उनसे रुपये की बात मत कहना और न माही-गहने की बात ही..." "क्यो मा, कहने में क्या दोष है ?" मां, बोली "नहीं रहे, बाद में बतायेंगे।" और वह रुपया, गहना, साडी सब कुछ लेकर बगल के कमरे में जाकर छिप गई । कहा छिपाये, कोई ठीक नहीं। वह हर चीज मे हाथ लगाते हैं । अगर आलमारी उलटते-पलटते नजर पड़ जायेगी तो स्पया ले लेंगे। बाहर फिर जंजीर खटखटाने की आवाज हुई। जयन्ती ने अन्दर से पूछा, "कौन "बाबूजी ?" मनुष्य के जीवन मे ऐमा-ऐसा नाटक मंचित होता है कि असली नाटक में भी वैसा देखने को नहीं मिलता। अन्यथा किसी को कमे मालूम होता कि होटल के बन्द दरवाजे के पीछे जो रहस्य छिपा हुआ है, एक दिन बाहर निकल- कर लोगों के सामने प्रत्यक्ष हो जाएगा? लेकिन जो घटित होना ही है, उसे रोकने की सामर्थ्य शायद किसी में नहीं सचमुच, ठीक वक्त पर हो पुलिस आई यो । पुलिस की क्षमता सचमुच प्रशंसा करने लायक है। शुरू मे खबर मिलने में घोड़ी देर हो गई थी । जब । होटल में पहुंची तो चिड़िया उड़ चुकी थी। होटल के लाउंज मे इनफारमर बैठा हुआ था। वह बोला, "आप लोग देर करके आए सर, वह भाग गया ?"
, - "कहां गया?" इनफारमर ने बताया, "सीधे एयरपोर्ट... सोना बड़ी कीमती वस्तु है। हांगकांग से आया था। कस्टम-आफिस की यांखों में धूल झोंककर किस तरह इतना सोना हिन्दुस्तान माता है, यह बात देवताओं तक को मालूम नहीं। पुलिस का स्पेशल डिपार्टमेंट है, खास-खास इन- फारमर हैं, उसकी वावत लाखों रुपये खर्च होते हैं। लेकिन कांजीभाई देसाई अलग-अलग नामों से विभिन्न बन्दरगाहों में बिना किसी वाधा-विघ्न के सर करता रहता है। उसके जैसे लोगों को पकड़ ले, ऐसा एक भी जाल किसी कार- खाने में तैयार नहीं हुमा है। इसलिए अब हवाई अड्डे पर चलो। लेकिन पुलिस का दल जब तक पहुंचा, हवाई जहाज़ हवाई अड्डे से जा चुका था। केवल पीछे की लाल बत्ती टिमटिमा रही थी। पुलिस फिर से होटल लौट आई । कलकत्ते का वड़ा होटल है । यहां रात- दिन अलग-अलग किस्म के लोगों का आना-जाना लगा रहता है। यहां पौंड, डॉलर, येन, फ्रैंक, स्बल सव आकर एक ही क्षण में एकाकार हो जाते हैं। दुनिया की अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा यहां आकर औरतों की टकसाल में छपती है और सोना- अशरफी वनकर निकल जाती है । यह कलकत्ता है ! एकाएक खाता उलटते-उलटते नाम पर नजर पड़ी। "यह कौन है-यह लड़की ?" मैनेजर बोला, "इस लड़की ने मिस्टर देसाई के साथ इस होटल में तीन दिनों तक रातें गुजारी हैं।" "चेहरा कैसा है ?" "गोरा, भरा हुआ, स्लिम एंड सॉफ्ट..." "एंड स्वीट आलसो! उम्र कितनी है ?" "एट्टीन ।" इनफारमर ने कहा, "मैं इस लड़की को पहचानता हूं सर ! मिस्टर पराशर के चेम्बर में आया करती थी। जहां तक याद है, उसका नाम है जयन्ती। जयन्ती चक्रवर्ती !" "कहां रहती है ? घर कहां है, मालूम है ?"
इनफारमर ने कहा "मुझे मालूम है सर! नीलमणि हालदार लेन में रहती है-उनतीस बटे तीन बटे छह नीलमणि हालदार लेन में..." "ठीक है, वहीं चलो।" पुलिस वाले दल-बल के साथ उनतीस वटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन की ओर रवाना हुए । गाडी तीर की गति से आगे बढ़ने लगी। उसके बाद सीधे यही आकर खड़ी हुई। एकमजिले की राधा बुआ देख रही थी। उस वक्त वह मुहल्ले की परिक्रमा कर पापस आ रही थी। पुलिस पर दृष्टि पड़ते ही अचकचा गई। 'माताजी, इस मकान में जयन्ती चक्रवर्ती नाम की कोई लड़की रहती है ?" राधा बुआ बोली, "हम लोगों के ऊपर रहती है।" "दोमंजिले पर?" राधा बुआ बोली, "दोमंजिले पर हिमांशु वावू सपरिवार रहते हैं और तीन- मंजिले के हरिपद चक्रवर्ती की लडकी का नाम है जयन्ती। वो पूरव की तरफ सीढ़ी है । एकदम सीधे तीनमंज़िले पर चले जाइए।" पुलिस जब ऊपर चली गई, राधा बुआ वहा पडी नही रही । सीधे अपने मकान के अन्दर चली गई। बोली, "ओ नेडी, पुलिस आई है." नेड़ी तव लेटी-लेटी हाफ रही थी। बात सुनकर एक वार आँख उठाकर देखा । उसके बाद पूछा, "क्या हुआ है ?" "पता नही बेटा, क्या हुआ है, इतना देखने का मेरे पास वक्त कहा है ! मेरी गृहस्थी तो देखनेवाला कोई है ही नही, और मैं उन लोगो को देखने जाऊं!" लेकिन तब तक पूरे मुहल्ले को इसका पता चल चुका था । उनतीस वटे तीन बटे छह नीलमणि हालदार लेन में पुलिस आई है, इसकी जानकारी प्राप्त करने में एक मिनट का भी विलंब न हुआ। आसपास के आदमी, इम-उस मुहल्ले के आदमी सभी यहा दौड़े-दौड़े आए । "यहां क्या हुआ है, साहव ?" पुलिस को जाल लगी वन उस वक्त भी मकान के सामने खड़ी थी। एक यादमी बोला, "सुनने में आया है कि चोरी का मामला है।" ११७ "किस चीज़ की चोरी हुई है ?" "सोने की।" "सोने की चोरी ? अयं, क्या कह रहे हैं ! किसने सोने की चोरी की है ? कहां से सोने की चोरी की है ?" आहिस्ता-आहिस्ता नीचे जमघट बढ़ने लगा। सभी मुंह वाये ऊपर की ओर ताकते लगे। दोमंज़िले के हिमांशु वाबू ने कहा, "अजी, सुनती हो ? वहां क्या हुआ है ?" पत्नी रसोईघर में थी। वोली, "तुम चुप रहो, हर चीज़ में दखल देना क्यों चाहते हो?" हिमांशु वावू वोले, "इतने लोगों का जमघट क्यों है ? शोरगुल क्यों मचा है ?" गोपा बोली, "आप चुप रहिए वावूजी, डॉक्टर ने .आपको चुप रहने को कहा है।" पत्नी बोली, "बूढ़े आदमी का स्वभाव यही होता है ! वाहर कौन शोरगुल कर रहा है, इससे इनका क्या माता-जाता है ? हम लोगों के घर में तो कुछ हुमा नहीं है..." "इस मकान के सामने पुलिस की गाड़ी क्यों खड़ी है ?" हिमांशु बाबू पूछा। पत्नी बोली, "इससे तुम्हारा क्या बिगड़ता है ? पुलिस तुम्हारे मकान में नहीं आई है। तुम हर बात में झांव-झांव क्यों करते हो ? डॉक्टर ने तुम्हें चिल्लाने से बार-बार मना किया है. । बूढ़े आदमी के चलते कहीं मैं ही न पागल हो जाऊं..." परन्तु यह सब कहने से ही आदमी कहीं चुप रह सकता है ? तव नीचे की भीड़ का आकार बढ़ चुका था, शोरगुल भी उसी अनुपात में बढ़ रहा था । पुलिस कव तीनमंज़िले से उतरे और सारी बातों की जानकारी प्राप्त हो, इसी इन्तजार में लोग मुंह वाये ऊपर की ओर ताक रहे थे । दरवाजा खोलते ही जयन्ती चक्रवर्ती आवाक् हो गई। "आपका ही नाम जयन्ती चक्रवर्ती है ?". पुलिस पर दृष्टि पड़ते ही जयन्ती का चेहरा वुझ गया । प्रश्न सुनते ही ११८
कात पी..."
मां रोती-रोती बोली, "सोना हमें कहां से मिलंगा बेटा, तर
और भी अधिक घबरा गई।
"हां..."
"आप पिछले तीन दिन, तीन रात कहा थी ?"
अव तक उसने जो बातें अपनी मां मे कही थीं, वे बातें भी अटकी पड़ी रह
गई।
"बताइए, आप स्ट्रेड होटल में थीं या नहीं ? होटल के माते में यापका
नाम लिम्रा हुआ है । मिस्टर काजीमाई दैमाई के साप आपने यहाँ कितने दिन
गुजारे है ?"
जयन्ती गूगे की तरह खड़ी रही
"मिस्टर कांजीभाई देसाई को आप कितने दिनों से पहचानती हैं ?"
जयन्ती बोली, "इसके पहले कोई जान-पहचान नहीं थी, यह पहली मुला•
"आप उनके साथ क्यों थीं? यह आपका कौन होता है ?"
"कोई नहीं..." जयन्ती ने कहा ।
"फिर क्या आप गत में उसके साथ सोया करती थी ?"
जयन्ती क्या कहै, यह समझ न पाने के कारण उसके मुह से 'हा' निकरा
गया।
"इसके लिए आपने पंसा लिया था ?"
"कितना?"
"मैने गिनकर नहीं देखा है।"
"अभी आपके घर में कौन-कौन है ?"
जयन्ती बोली, "सिर्फ मां, और कोई नहीं..."
"वलिए, आपको मो से हमें बतियाना है।"
मां वय पोछे ओट में खड़ी सब सुन रही थी। पुलिस ज्यों ही अन्दर वाले
लगी, उसने वहां से हटना चाहा, लेकिन पुलिस को आये उस पर पड़ सोते
"माताजी, सुनिए, आपके घर में सोना है या नहीं, हम यही देश
हैं । इस मकान को हमे तलाशी लेनी है।"
. नहीं हैं, वह आ जाएं। पुलिस वाले हंसने लगे। "ऐसा नहीं होता है माताजी, हमें आपके मकान की तलाशी लेनी ही है, हम लोगों के पास वारंट है। आप चाहे राजी हों या नहीं, मगर हम तलाशी लेंगे ही।" मा फूट-फूटकर रोने लगी, "हम लोग औरतें हैं, घर में गृहस्वामी नहीं हैं, आप लोग बाद में नहीं आ सकते हैं ?" पुलिस के आदमियों ने कहा, "'औरत' कहने से काम नहीं चलेगा माताजी । आपकी लड़की इतने दिनों तक एक मर्द के साथ रात गुजार माई है, यह आपको पता है ?" "होटल में क्यों कह रहे हो वेटा ? मेरी लड़की होटल में पराये मर्द के साथ रात गुजारेगी ? आप लोग क्या कह रहे हैं !" "हां माताजी, होटल के खाते में आपकी लड़की का नाम लिखा हुआ है। हम लोगों की बात पर यकीन न हो तो आप जाकर होटल के खाते में देख सकती हैं।" मां चिहुंक उठी, "पराये मर्द के साथ क्यों कह रहे हैं ? वह आनन्द के साथ उसके देस पर थी। मानन्द मेरे लिए क्या पराया है ? आनन्द मेरे लिए लड़के की तरह है..." "ठीक है, आपके घर की तलाशी लेकर हम देखना चाहते हैं कि सोना है या नहीं।" अंततः उन लोगों ने तलाशी लेना शुरू किया। एक गवाह की ज़रूरत -थर्ड पार्टी का होना चाहिए। गवाह कौन बनेगा? पुलिस का आदमी ही बाहर से गवाह लाने गया। मां ने थोड़ी आपत्ति की, "हम लोगों के घर में वाहर का कोई आदमी क्यों घुसेगा? हम उसे घुसने ही क्यों देंगे ?" "सो तो करना ही होगा माताजी । अगर कोई चीज़ खो जाए तो गवाह कौन रहेगा ?" गवाह कौन होगा ? सड़क पर तव लोगों की भीड़ उमड़ी हुई थी। ज्यादा- तर आदमी झमेला-झंझट में फंसना नहीं चाहते थे। . १२०.
"माने की?" "हां माय, मोने की। मोना यानी गोड । मारल गोल्ड-स्मगलर तो हर जगह हैं । सन्देह में पुलिम आरके घर पर आई दो।" हरिपद चक्रवतीं बोला, "मेरे पर तीनमंडिले पर? मैंने देखा है कि दो मंजिले के हिमांग बाबू का लड़का शराब पीकर पर लौटता है..." "नहीं साहब, मुनने में आया है कि तीनमजले पर आपने मकान में आई पी।" हरिपद चक्रवर्ती तेज बदमों से अपने मान की ओर बडा । यह कैसे हुआ! जयन्ती तो घर में नहीं है । फिर वही क्या कुछ मांड कर बैठी ? कौन जाने ! घटिया किस्म की जीविका जीते-जीले आज जीवन के इस भोलादत्त वोला, "नहीं भाई, साले बेवाफ बन गए । कुछ भी हाथ नहीं आया।" "फिर साले खेल खेलने आए थे?" भोलादत्त बोला, "लड़की उस साले के साथ तीन रात होटल में रह चुकी है। वहीं साला सोने की तस्करी करता है । सोना है या नहीं, यही जानने के लिए पुलिस मकान की तलाशी करने आई थी।" "वही साला न, जो चमचमाती गाड़ी में आया करता था ?" "हां; इतने दिनों तक साले के पीछे-पीछे चक्कर काटी, मगर एक दिन भी पकड़ में नहीं आया। अवकी साला उस छोकरी को लेकर होटल में ठहरा था।" बात यहीं समाप्त न हुई। पुलिस जिस तरह आई थी, उसी तरह वापस चली गई । लेकिन उसकी चर्चा बहुत दिनों तक चलती रही। उनतीस वटे तीन बटे छह नीलमणि हालदार लेन की घटना को केंद्र बनाकर मुहल्ले-मुहल्ले में मजलिस जमने लगी। घर, रसोईघर, सड़क, मोड़, बाज़ार हर जगह एक ही । चर्चा। दफ्तर से लौटने के वक्त ही हरिपद को सूचना मिली। सब कुछ जानने के बावजूद वृद्ध पड़ोसियों ने पूछा, "चक्रवर्ती साहब आपके मकान में क्या हुआ था ?" "मेरे मकान में ?" "हां साहब आपके मकान में ! उनतीस वटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन के उस मकान के तीनमंजिले पर पुलिस पहुंची थी। आपको अब तक खवर नहीं मिली ?" "नहीं तो।" इतना कहकर उसने जल्दी-जल्दी अपने मकान की ओर कदम बढ़ाए। पुलिस ! पुलिस तो उसके घर में कई बार आ चुकी है। मुहल्ले के लड़कों के अत्याचार के कारण कहीं भी पुलिस की अनुपस्थिति नहीं रहती है । "देखिए जाकर क्या हुआ था।" "आपको कुछ सुनने में आया है ?" उस आदमी ने कहा, ' मैं उस वक्त घर पर नहीं था । सुनने में आया कि पुलिस सोने की तलाश कर रही थी।" - १२२ - "सोने की?" "हां साहब, सोने की। सोना यानी गोल्ड । आजकल गोल्ड-स्मगलर तो हर जगह हैं ! सन्देह में पुलिस आपके घर पर आई थी।" हरिपद चक्रवर्ती चोला, "मेरे घर तीनमंजिले पर? मैंने देखा है कि दो मंजिले के हिमाशु बाबू का लड़का शराब पीकर घर लौटता है..." "नही साहब, सुनने में आया है कि तीनमंज़िले पर आपके मकान में आई पी।" हरिपद चक्रवर्ती तेज कदमों से अपने मकान की ओर बढा । यह कैसे हुआ! जयन्ती तो घर में नहीं है । फिर वही क्या कुछ कांड कर बैठी ? कौन जाने ! घटिया किस्म की जीविका जीते-जीते आज जीवन के इस अन्तिम पड़ाव मे हरिपद चक्रवर्ती को इस स्थिति में पहुंचना पड़ा। कभी इस तरह की कलंकजनित वदनामी उसे ओढनी नहीं पड़ी थी। फिर यह उसके साथ क्या घटित हो गया? रास्ता चलते-चलते उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे बहुत-से लोग उसकी ओर उंगली से इशारा कर रहे हैं। उसकी ओर उंगली से इशारा करके कुछ दिखा रहे हैं, कुछ कह रहे हैं। जब उसने नीलमणि हालदार लेन में पैर रखा, सड़क के मोड़ पर वे ही भावारा लड़के खडे थे-वहीं भोलादत्त, पटला, केतो और दोमंजिले का वह हिमांशु बाबू का बदमाश लड़का। हरिमद चक्रवर्ती मुह घुमाकर जा रहा था लेकिन मोलादत्त उसके सामने बढ आया। "चाचाजी..." चाचाजी ! क्या कह रहा है यह ! हरिपद चक्रवर्ती ने कहा, "क्या?" भोलादत्त बोला, "देखिए हम लोग मुहल्ले के लड़के हैं, आप भी हमारे मुहल्ले के आदमी हैं । हम लोगों में आपके प्रति वैसी ही भक्ति है, जैसी गुरजनों के प्रति होनी चाहिए-1 कुछ अन्यथा मत लें, हम आपकी भलाई के लिए ही कह रहे हैं।" हरिपद चक्रवर्ती को गुस्मा हो माया, "इतनी बहानेवाजी की क्या जहरत है, जो कहना है खुलासा कहो।" .
"आपकी लड़की के बारे में कह रहा हूं। आज पुलिस आपके घर पर भाई । मुहल्ले के हर आदमी ने देखा है । आपकी लड़की उस लंपट लड़के के साथ सर सैर-सपाटा करती है, अब तक हम सब देखते आए हैं, हालांकि कहा कुछ नहीं है, लेकिन अव हम वरदाश्त नहीं करेंगे । अवकी जब भी उसे आपकी ड़की के साथ देखेंगे उसकी खाल उधेड़ देंगे। कहे देता "तुम आनन्द के बारे में कह रहे हो?" "जी हां, चाचाजी ! मुहल्ले की इज्जत हर व्यक्ति की इज्जत है । उस वारा लड़के के साथ हमारे मुहल्ले की लड़की तीन रात होटल में विताए और उसके कारण भले आदमियों के मुहल्ले में पुलिस आए, यह अच्छी बात नहीं है । आपकी लड़की की जिस तरह कोई इज्जत है, उसी तरह मुहल्ले की मी कोई इज्जत है । कहिए ठीक कह रहा हूं न ?" आक्रोश के कारण हरिपद चक्रवर्ती के पूरे शरीर में एक सिरे से दूसरे सिरे तक झुरझुरी रेंगने लगी। भोलादत्त बोला, "जाइए, अभी आप दफ्तर से आ रहे हैं, अभी आप थके- मांदे हैं । घर जाइए, अधिक गुस्से में मत आइए. इससे खून-खराबा हो सकता है..." हरिपद अब वहां रुका नहीं । जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाता हुआ नीलमणि हालदार लेन के अपने उनतीस वटे तीन वटे छह मकान की तरफ चल दिया। हमेशा यही सिलसिला चालू था । उनतीस वटे तीन वटे छह नीलमणि हाल- दार लेन का जीवन इसी प्रकार के उत्थान-पतन के जटिल पथ से. मागे बढ़ रहा था । अब तक वे आपसी झगड़ा-झंझट, गन्दगी और कलंक में जीवन जी रहे थे। लेकिन अब लगता है कि पुराना सिलसिला चलने वाला नहीं है । उस बार जब सृष्टिधर आया तो सभी ने उसे धर दवाया। राधा वुआ ने एकबारगी सीधे बढ़कर सृष्टिधर का गला जैसे दबोच लिया। "तुमने क्या सोचा है सृष्टिधर-सोचा क्या है ? तुम क्या हमें घर से निकालना चाहते हो ? तुम्हारा मालिक यहां आयेगा या वह मर चुका है ?" १२४ .
दो मंजिले की हिमांशु बाबू की पत्नी भी झंडला उठी, "क्या चाहते हो? बताओ, तुम क्या चाहते हो? सुनू तो सही, तुम फिर किस वास्ते आए हो? यह गृहस्यों का घर है या वस्ती का कोई मकान ? यस्ती में भी आदमी इसके बनिस्बत आराम से रहते हैं । तुम्हारा मालिक क्या हमे गाय-भेड़ समझता है ? इस तरह रोज-रोज पुलिस आयेगी और लोग-बाग चोर समझकर हम पर शक- शुवहा करेंगे? हम लोग क्या दागी आसामी हैं ?" तीनमंजिले में भी वही स्वागत-सत्कार हुआ। सृष्टिधर पर आंखें जाते ही हरिपद चक्रवर्ती ने परी-खोटी सुनाई- "भागो, मागो, सामने से हटो अवकी तुम्हारा मालिक अगर खुद नहीं आयेगा तो मैं भी किराया नही दूंगा।" मानी, गरदन पर हाथ रखकर मृप्टिधर को बाहर निकाल दिया। लेकिन सृष्टिधर करे तो क्या करे ? वह तो कोई मालिक है नही । मालिक है वही अदृश्य, अलभ्य, अवाड्मनसोगोचर ईश्वरप्रसाद दनढनिया । न उसका क्षय होता है, न वह लय होता है । वह है अव्यय, अक्षय, निराकार, निरवयव विधाता पुरुप । उसे न तो वाखों से देखा जा सकता है, न हाथ से पकहा जा सकता है । वह किसी नियम के अधीन नही है और न किसी शृंखला से आवद्ध है। वह है सच्चिदानन्द सोहं । उससे डरा जा सकता है क्योंकि वह भयंकर है; उसफी भक्ति की जा सकती है क्योकि यह आनन्दस्वरूप है। वह हम लोगों का एकमान आश्रयदाता है, वहीं पतितपावन है । हम मन-प्राणो से उसी ईश्वर- प्रसाद ढनढनियां की कामना करते हैं, हम प्रार्थनारत हैं कि वह अपना मंगल- हस्त विस्तारित कर हमारा सारा दुख, सारा अभाव दूर कर दे । समस्त अमि- योगों का प्रतिकार करे। लेकिन नहीं, वह पायेंगा नहीं। जब उनतीस बटे तीन बटे छह नीलमणि हालदार लेन के मकान में सारी चीजें रवाभाविक गति से चलती हैं, तब ईश्वरप्रसाद ढनढनियां को लोग याद नहीं करते । तव वहां बच्चे पैदा होते हैं, अन्नप्राशन मनाया जाता है, शंख बजता है, मास पकने की गन्ध माती है, घर की औरतें सिनेमा जाती हैं, गापा नलघर में जाकर सिनेमा के गीत गुनगुनाती है, राधा बुआ पूजाघर में घुसकर संध्या-आह्निक करती है, विजय सरकार अपने दोस्त-मित्रों के साथ मयूरभंज रोड की देशी शराब की दुकान में पेग पर पेग ढालता है और ईश्वरप्रसाद ढनदनियां तद अपने अदृश्य स्वर्ग में अदृश्य ही रहता है। उसके बारे में कोई आदमी मायापच्ची नहीं करता है । सृष्टिधर झंझट-झमेले के विना माहवारी किराया वसूलकर रसीद दे जाता है। लेकिन उनतीस वटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन में नियम से अधिक अनियम का ही बोलबाला रहता है। अपवाद की वजह से ही अधिक संकट पैदा होता है । तब कहीं कोई समाधान नजर न आने पर ईश्वरप्रसाद ढनढनियां को ही कोसा जाता है। उस दिन भी लोग उसी तरह कोसने लगे। वह एक कांड ही था। बड़ा ही वीभत्स कांड ! पता नहीं, कैसे तो अचानक जानकारी प्राप्त हो गई। दुनिया में बहुत-सी गोपनीय वस्तुओं की कैसे तो एकाएक जानकारी प्राप्त हो जाती है ! शुरू में किसी को भी मालूम नहीं हुआ, लेकिन स्त्री से सम्बन्धित रहस्य हो तो फिर दवा का दवा कैसे रह सकता है ? हरिपद चक्रवर्ती की लड़की को देखने के लिए डाक्टर आया था। और कोई बात होती. तो हरिपद चक्रवर्ती की पत्नी डाक्टर को नहीं बुलाती। लेकिन उसके बाद से ही वह वात जाहिर हो गई। विजय दौड़ता हुआ भोलादत्त के अड्डे पर पहुंचा । भोलादत्त, पटला, केती वगैरह तव वेकार वैठे थे। सड़क की ओर उड़ती निगाहों से ताक रहे थे और जोरों से सिगरेट का कश ले-लेकर धुएं के छल्ले उड़ा रहे थे। विजय दौड़ता हुआ वहीं पहुंचा, “गुरू सर्वनाश हो गया ! साला सर्वनाश करके चलता वना।" "कौन ? किसके वारे में कह रहा है ?" "वही साला । वही जो खुशनुमा गाड़ी पर चढ़कर यहां आता था और छोकरी को लेकर सैर-सपाटा किया करता था। वहीं साला..." "क्या किया?" विजय बोला, "छोकरी का पांव भारी करके चलता बना''अब आ ही नहीं रहा है। १२६ "ऐं, क्या कह रहा है तू!" भोलादत्त जैसा व्यक्ति भी जैसे आकाश से गिर पडा हो। कहां किम व्यक्ति की लड़की का सर्वनाश कर गया? परन्तु मोलादत्त को लगा जैसे उन लोगों की ही सर्वनाश हो गया हो। यह जैसे हरिपद चक्रवर्ती की लडकी का अपमान न हो बल्कि उन लोगों का अपमान हो । पराये मुहल्ले का लड़का इम मुहल्ले में 'पाकर उन लोगों की आंखों के सामने जो अत्याचार कर गया, यह बरदाश्त करने लायक नहीं है । उत्तेजना के मारे हर किसी ने एक-एक सिगरेट जलाई। केतो बोला, "तुममें किमने कहा ?" "हाक्टर ने।" "डास्टर ने किससे कहा है ?" "फिर पूछ रहे हो किसमे कहा ! हरिपद चक्रवर्ती से पहा-लड़की के बाप से । अब बाप इस-उसके पास दौड़-धूप कर रहा है।" "क्तिने महीने ?" वोला, "सुनने में माया है सात महीने का। मात महीने से खीचतान घस रही है । इतने दिनों से किसी से बताया नहीं, अब नष्ट कर देना चाहती . पटला बोला, "नष्ट नहीं करने दूगा। मेरे मामाजी का फैड मुचिपाहा थाने का ओ० सी० है, उसके बाप को पाडवा दूण । और उस साले को भी पकड़वा दूंगा । बगर नष्ट कर दिया तो सभी पट्ठों को जेल की हवा खिलागा..." बेकार आवारा युपको की जमात को जैसे योई महाने का मिल गया हो । उस दिन गोचते-सोचते उन्होंने दम पैकेट मिगरेट फूल डाली। इसके बाद मयूरमज रोड जाकर चारों व्यक्तियों ने ठरी को चार बोतलें गटक डाली। फिर भी सोच-सोचकर हैरान होने के बावजूद उन्हें कोई रास्ता नहीं रहा। और एक बौनल जब हलफ के नीचे उतरी, भोलादत्त के दिमाग में अक्ल आई । बोला, "यरा उपाय निकल आया।" सभी पिहुंक उठे, “पया ? कौन-सा उपाय निकला गुरू?" भोलादत्त बोला, 'उस साले को खोज निकालगा। वही उस आवारा काले को। साले, तुम्हें ये परत करने ल ने.लापक और कोई नही मिली, हम लोगों के मुहल्ले में माफर कप्तान बनने चले हो।"- ढनढनियां तद अपने अदृश्य स्वर्ग में अदृश्य ही रहता है। उसके बारे में को आदमी माथापच्ची नहीं करता है । सृप्टिधर झंझट-झमेले 'के विना माहवार किराया वसूलकर रसीद दे जाता है। लेकिन उनतीस बटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन में नियम । अधिक अनियम का ही बोलबाला रहता है । अपवाद की वजह से ही अधिव संकट पैदा होता है । तब कहीं कोई समाधान नज़र न आने पर ईश्वरप्रसार ढनढनियां को ही कोसा जाता है। उस दिन भी लोग उसी तरह कोसने लगे। वह एक कांड ही था। वड़ा ही वीभत्स कांड ! पता नहीं, कैसे तो अचानक जानकारी प्राप्त हो गई। दुनिया में बहुत-सं गोपनीय वस्तुओं की कैसे तो एकाएक जानकारी प्राप्त हो जाती है ! शुरू में किसी को भी मालूम नहीं हुआ, लेकिन स्त्री से सम्बन्धित रहस्य हो तो फिर दवा का दवा कैसे रह सकता है ? हरिपद चक्रवर्ती की लड़की को देखने के लिए डाक्टर आया था। और कोई बात होती. तो हरिपद चक्रवर्ती की पत्नी डाक्टर को नहीं बुलाती । लेकिन उसके बाद से ही वह वात जाहिर हो गई। विजय दौड़ता हुआ भोलादत्त के अड्डे पर पहुंचा । भोलादत्त, पटला, केतं तब बेकार बैठे थे । सड़क की ओर उड़ती निगाहों से ताक रहे थे और सिगरेट का कश ले-लेकर धुएं के छल्ले उड़ा रहे थे। विजय दौड़ता हुआ वहीं पहुंचा, “गुरू सर्वनाश हो गया ! साला सर्वनाश के चलता वना।" "कौन ? किसके बारे में कह रहा है ?" "वही साला । वही जो खुशनुमा गाड़ी पर चढ़कर यहां आता था और छोकरी को लेकर सैर-सपाटा किया करता था। वही साला "क्या किया?" विजय वोला, "छोकरी का पांव भारी करके चलता बना":"अव ा है नहीं रहा है." १२६ । पा, कर चुकी थी। लेकिन गुम्मा अब तक दूर नहीं हुआ था। "सर्वनाशी, मृहजली, तूने अपने पर तो कलंक लगाया ही, साप-माप हम पर भी लगाया 1 तुममें अक्ल का नामोनिसान नहीं है । बब मुहल्ले वाली के सामने कैसे मुंह दिवाएं ? ?" जयन्ती एक बात का भी उनर नहीं देती थी । वेवल गुमसुम पही रहती थी। जमे वह बड़ी मान्त हो गई हो। जमे उमका ममस्त ज्ञान, समान विवेक सुप्त हो गया हो । मानन्द ने मे अभयदान दिया था। कहा था, 'तुम्हारे लिए हरने की कोई बात नहीं है, मैं हूं ही। "वता, वह हरामजादा कहां गया?" जयन्ती फिर भी मुणी साधे रही। "वता, वह हरामजादा कहां गया ? उमको या तो पयर भेज पा उमा पला दे दे, यह उसके घर पर जायेंगे । जापर बुला लायेंगे।" इस पर भी जयन्ती ने कोई जवाब न दिया। "पता यता न ! कई दिनों तक उसके देन में जाकर रही और पता तुम माम ही नहीं है ? तेरे लिए इतना गरमाने की क्या बात है ? शिम वाम का हर है ? हम न तो उसे मारेगे-पोटेंगे, न वृष्ट रहेंगे ही।" जयन्ती विफ रोती रहती थी । तकिये में मह छिपाकर मिर्फ रोती रहती थी। वह मे कहे कि आनन्द वा पता उसे मालूम नहीं है । उसे सिर्फ मिस्टर परामर के चेम्बर का पता मालूम है । यहां भी जाकर जयन्ती ने पूछताछ की पी। मिस्टर परामर ने बनाया था कि उसके यार की कमर की बीमारी बट गई है और यही वजह है कि वह ना नहीं पा रहा है । इसके बाद यव वह कहा जाए? किसके पास जाकर आनन्द का पदा पूछ ? मानन्द का घर कहा है, यह भी उसे मालूम नहीं है । यानन्द ने उनसे बहुत बार पहा था कि वह जयन्ती को याने पर पर ले चलेगा, परन्नु ले नहीं गया ! अर वह कहां मिलेगा? और एक व्यक्ति है जिसने पाम जाया जा सकता है चोर वह है पांजीमाई देमाई ! कांजीभाई देसाई में तीन ही रातों में वह तीन युगों को पनिष्टता में यावद हो गई थी। लेपिन उमका असली नाम क्या यही है ? १२ पुलिस ने माकर बताया था कि कांजीभाई देसाई सोने की तस्करी करता । असली नाम होटल के खाते में लिखा हुआ है। हरिपद चक्रवर्ती सुबह से ही घटिया किस्म की जीविका कमाने निकल जाता है और रात में वापस आता है । लेकिन इन दिनों के दरम्यान उसका जाना न हो पाया। इस डाक्टर, उस डाक्टर की तलाश में दौड़-धूप करता रहा । सभी के सामने हर वात खोलकर भी नहीं कही जा सकती है । डाक्टर कहते, "देखिए, यह सब रिस्क हम नहीं ले सकते । सात महीने निकल चुके हैं..." जो लोग इस तरह का काम किया करते हैं, उनका पता हरिपद चक्रावता को मालूम नहीं था। सुबह से शाम तक घूमते-घूमते जब वह वापस आता था तो रात काफी गहरा चुकी होती थी। पुप्प इन्तज़ार में बैठी रहती थी। हरिपद के वापस आते ही पूछती, "क्या हुआ ?" "कुछ भी नहीं..." हरिपद कहता। पुष्प गुस्से में आकर कहती, "कोई भी किसी तरह की दवा न देता है ?" हरिपद कहता, "मैंने सो तो कहा था, लेकिन डाक्टर ने बताया कि मुसीवत है । इतनी देर हो चुकी है कि उससे नहीं होगा..." "फिर अब क्या होगा ?" 'अब क्या होगा,' हर कोई यही प्रश्न उछालता है । अव क्या होगा जिन्दा रख सकता है ? पुष्प कहती, "और तुम्हारा यह मकान ऐसा है कि किसी से कुछ कहा जा सकता, किसी से सलाह-मश्वरा तक नहीं किया जा सकता करूं! इच्छा होती है कि सिर पीट-पीटकर जान दे दू..." इस तरह वात फैल जाएगी, यह वात इन लोगों ने नहीं सोची। पर निकलते ही हर कोई हरिपद चक्रवर्ती की ओर वेधक दृष्टि से त राधा बुआ हर जगह इस बात का प्रचार किए चल रही थी। क सख्त नफरत हो गई है वहन, पाप के राज्य में अब रहा नहीं जाता १३० । दूसरा मकान खोजने को कहा है." फूल मामी के मन में बड़ा ही आग्रह बना रहता था। सोद-सोदकर एक- एक बात पूछती थी। कहती, "लडकी को उलटी वगैरह होती है, वहन ?" राधा युआ कहती, "मानूम नही बहन, नफरत के मारे मेरी जान निकलने लगती है । नेडी से कहती हूं : तेरे कारण मेरा जात-धर्म सब वरवाद हो गया ! वहाँ मैं पूजा-पाठ में व्यस्त रहती और कहा तुम मुझे इस पाप के राज्य में ले आई उनतीस बटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन के उस मकान में सचमुच संकट घिर माया है । सकट यहां पहले भी बहुत बार भा चुका है, लेकिन कभी उमका रूप इतना प्रवल नहीं था। हिमाशु वाबू को दिल की बीमारी रहने से क्या होगा? डाक्टर ने उन्हें उद्विग्न रहने से मना किया है । लेकिन बिना उद्विग्न हुए आदमी इस युग कहीं जीवन जी सकता है ? आज का युग क्या निरुद्विग्न होने का युग है । हिमांशु बाबू की पत्नी कहती, "मकान बदल डालो, मैं अब इस पाप नगरी में नहीं रह पाऊंगी । इमसे तो अच्छा है कि झोंपड़े में किसी तरह पही रहूं, मुझे दोमजिले की इस पक्की इमारत के मुख की जरूरत नहीं है । एक तो ऐमा गया-गुजरा मकान और उस पर यह पाप विजय की वाणी मे प्रखरता आ गई है। वह कहता, "तब मैंने कहा था न, कि इस लड़की का स्वभाव-चरित्न ठीक नहीं है । यव हुआ न !" मां कहती, "तो क्या करूं, बेटा, तू तो किसी मकान की तलाश कर सकता है !" "अब की सृष्टिघर आया तो मैं उसकी जान ले लूगा सारा दोष साले मकान मालिक का है, जिसको-तिसको किराये पर लगाता है उसके बाद पुलिस से जाकर कहूंगा कि मैंने एक आदमी की हत्या की है...' उस दिन पाम के अंधकार में अचानक एक कांड घटित हो गया। येतो, भोलादत्त, पटला और विजय नुक्कड़ पर अड्डेबाजी कर रहे थे। एकाएक लगा, उनतीस बटे तीन घटे छह नीलमणि हालदार लेन के मकान के सामने एक टैक्मी खड़ी हुई। लादत्त बोला, "अरे, लगता है, वह साला आया है। वही "यह आवारा . केतो के मन में संदेह पैदा हुआ : "टैक्सी से क्यों आयेगा ! उसके पास "लोगों की आंख में धूल झोंकने के लिए । गाड़ी लेकर आने से कहीं पता वल जाए, इसीलिए..." अव बातचीत वन्द रहे । साले को पकड़ना है । सभी एक ही दौड़ में आएँ र आकर गाड़ी का घेराव किया। उन्होंने देखा, वह बात नहीं थी. न्होंने सोचा था । हरिपद चक्रवर्ती, उसकी पत्नी और लड़की गाड़ी में बैठे थे साथ में गठरी-पेटी वगैरह थी। सबके सव सजग हो.गए । "आप लोग कहां जा रहे हैं ?" हरिपद चक्रवर्ती झुंझला उठा, "चाहे हम कहीं जाएं, तुम्हें . मतानों जरूरी है कि हम लोग घर जा रहे हैं !" "चले जा रहे हैं. इसका मतलव ? नया मकान मिल गया है ?" "तुम्हें इसकी कैफियत देनी पड़ेगी ?" "हां, देनी है । बताइए, आप अपनी लड़की को कहां ले जा रहे हैं ? "खबरदार ! जवान संभालकर वातचीत करो।" "हम लोग पुलिस बुला सकते हैं, मालूम है ? पुलिस का नाम सुनकर हरिपद चक्रवर्ती की पत्नी बोली, "क्यों, हम लो ने क्या किया है जो पुलिस बुलाओगे ?" भोलादत्त बोला, "पुलिस को बताएंगे कि आप अपनी लड़की को। लेकर जा रही हैं । हम आप लोगों को जाने नहीं देंगे । देखें, आप हम लोगों क्या कर लेते हैं ?" अव हरिपद की पत्नी चीख-चीखकर रोने लगी, "मुहल्ले के लोग जि शैतान हैं ! हम लोग अपनी मरजी से बाहर भी नहीं जा सकते::: भोलादत्त वोला, "हम लोगों को सारी बातें मालूम हैं। हम लोगों छिपाने की कोशिश मत करें। किसने यह कांड किया है। हम यह भी " १३२ - । " सकते हैं।" "फिर तुम लोग हमें जाने नही दोगे ?" टेवगी ड्राइवर बंगाली या । वह बोला, "नाहक शमेलो बढ़ा रहे हैं। उनकी लड़की है, उनकी जो मरजी होगी, करेंगे। इससे माप लोगों का क्या विगडता है ?" विजय तनकर पडा हो गया, "हम लोगों के मुहल्ले की लड़की पर पराये मुहल्ले का लडका अत्याचार कर जायेगा और हम हर मे भाग जाएं? हम लोगों के बदन मे ताकत नहीं है ? हम उसे सरक नहीं मिखाएगे ?" "आप उन्हे पक. तो सबक सिखाएं। हम लोगों को छोड़ दें । मैं कब तक खड़ा रहूं?" भीड़-भाड़ देखकर और भी लोग इकट्ठे हो गए । कलकत्ता शहर घेराव के लिए प्रस्यात है । यहा हर काम के लिए घेराव किया जाता है । "यहां क्या हुआ है, सार "देखिए न, भले आदमी लड़की को लेकर नवद्वीप भागे जा रहे वहाँ जाकर लडकी का एवारशन करायेंगे।" किसी एक उत्साही व्यक्ति ने झांककर लड़को को भली-भांति देखना चाहा। जयन्ती में तय घूघट खीचकर अपना मुह ढक लिया था। यह जितना ही अपना मुख ढक रही थी, लोगो का आग्रह भी उतना ही तीव्र होता जा रहा था। "देखें, लडकी का चेहरा कमा है ! शादी न होने के बावजूद गर्भवती हो गई है ! इस तरह की लड़कियां आमनौर ने दिख नहीं पड़ती हैं। देखें-देखें, जरा और मुंह से धूंघट हटाओ, अच्छी तरह देखें।" टैक्मीवाला डर गया । आजकल कलकते की जो हालत है, सब कुछ हो सकता है । हो सकता है, मुहरले के लड़के कही टैक्मी में भाग न लगा दें। "हमारे मुहल्ले की लड़की का सतीत्व नष्ट करेगा और हम तुर रहें !" मब कुछ सुनने के बाद एक बूढा-जैसा आदमी बोला, "आप लोगो में नाम मान को भी हिम्मत नहीं है साहब ? उस लड़के को पकडकर ले आइए न। वह लइका कौन है ? कैसे खानदान का है ?" टैक्मीवाला बोला, "मुझे पैसेंजर की जरूरत नहीं है साहब ! माप लोग उतर जाइए, दूसरी टैक्सी ठीक कर लीजिए।"
हरिपद चक्रवर्ती टैक्सी.से उतरने जा रहा था। अपनी सफाई देते हुए
कहा, "मैं अल्पवेतनभोगी बादमी हूं, भाई ! मुसीबत में फंसकर जा रहा
लड़की को यहां रखने से बात फैल जाएगी और इसका शादी-व्याह नहीं है
पाएगा
एक आदमी ने कहा, "जानने को वाकी ही क्या रहा साहब ?"
बूढ़े आदमी ने कहा, "वह आसामी कहां है ? 'वही जो आपकी लड़की क
सर्वनाश कर गया?"
भोलादत्त बोला, "अब वह क्यों रहने लगा ? चूस-चूसकर शहद पिया और
उड़ गया।"
बूढ़े ने कहा, "वात सीरियस है और आपको मज़ाक सूझा है ? आप लोगों
की लड़की रहती तो समझते !" फिर कहा, "अब यहां से भागकर ही क्या
करेंगे ?"
हरिपद चक्रवर्ती ने कहा, "आप चतुर मादमी हैं, आप ही उपाय
बताइए।"
हरिपद चक्रवर्ती की पत्नी अन्दर से वोली, "तुम्हारे चलते ही यह सब
हुआ। मैंने तद कहा था : यह मकान छोड़ दो, यह मुहल्ला छोड़ दो, सो तो उस
वक्त सुना ही नहीं।"
"तुम खामोश रहो।"
हरिपद चक्रवर्ती ने कहा, "देख रहे हैं न, इस औरत की बात सुन ली न !
हने से ही क्या मकान मिल जाता है ? आजकल पैसा देने से ही मकान मिल
जाता है ?"
भोलादत्त ने कहा, "आप लोग घर छोड़कर क्यों जा रहे हैं ? इसी मकान
की मरम्मत कराकर रहिए । उस साले मकान-मालिक का हम घेराव करेंगे।
बताइए, मकान-मालिक कहां रहता है ?"
बूढ़े ने कहा, "सो सब बाद में होगा, अभी आप लोग कहां जा रहे हैं, यही
"
वताइए !"
हरिपद चक्रवर्ती मे कहा, "देस ?"
"फालतू बात है !" विजय ने कहा ।
"सोचते हैं कि हमें मालूम ही नहीं है ?"
"मेरे साले नवद्वीप माए हुए हैं, वहीं जा रहा हूं ?" हरिसद चक्रवती ने बताया। "सारी फालतू बातें हैं । हम लोग जाने नहीं देंगे । तर जाइए । साप लोग गमी उतर जाइए। आप लोगो को इसी मकान में रहना पड़ेगा।" भीड़ तब खासी तगड़ी हो गई थी। सभी तब जानने को बाग्रहगील थे, "क्या हुआ है साहब ? यहा क्या हुआ है..?" भोलादत्त ने बिगड़कर कहा, "यहा से हटिए"हट जाइए । क्या देख रहे है ? तमाशा है !" हरिपदं चक्रवर्ती ने कहा, "अब क्या करूं साहय ? उफ, में बड़ी मुमीवन में फैम गया। मैं अल्पवेतनभोगी आदमी हूं... मोलादत्त ने कहा, "उतर पाइए और क्या कीजिएगा! हम लोग आपको मुमीयत से उवारेंगे। हम लोग इन मुहल्ले के लडके हैं। हम लोगो के रहते आपने पराये मुहल्ले के लड़के को घर में घुसने दिया ..." "लेकिन मेरी लड़की ? मेरी लड़को का क्या इन्तजाम होगा?" भोलादत ने कहा, "होगा; इन्तजाम किया जायेगा । म लोग जब हैं तो कोई न कोई इन्तजाम कर ही देंगे।" "क्या इन्तजाम कीजिएगा? भोलादत्त ने कहा, "हम लोग इतने आदमी है और कोई इन्तजाम नहीं होगा ? आप क्या कह रहे हैं ? याप किसके डर से भागे जा रहे हैं ? आदमी के हर से ? वहां भी तो लोग आपकी हानि कर सकते हैं। लोगो से आपको छुटकारा कैसे मिलेगा?" हिमाशु बाबू दिल के दौरे के बावजूद खिडकी से झाककर सब सुन रहे थे। विजय की पत्नी गोपा भी दोमजिले की एक खिडकी के किनारे खड़ी होकर सब सुन रही थी। राधा बुआ सुन रही थी । भवदुलाल सुन रहा था । हर कोई सुन रहा था। एक-एक कर समो फिर से टैक्सी से नीचे उतर आए । पहले हरित चक्रवर्ती उसके बाद उसकी पत्नी । मबसे आखिर मे हरिपद चक्रवर्ती की नहीं संपूर्ण चेहरे को घूघट से ढके नीचे उतरी ! सभी एक-दूसरे को धकाः . - देखने के लिए भागे बढ़ आए । बड़े आदमी ने जयन्ती की ओर देखते हुए कहा, "जाजो बेटी, अन्दर चली जालो। डरने की कौन-सी बात है ! भोलादत्त ने सभी को जोरों से शिडका, "साले, तुम लोगों को मार डालूंगा। साले, अपनी मां-बहन की ओर लाख गड़ाकर नहीं देख सकते हो?" उसके वाद भोलादत्त वगैरह ने खुद गठरी-पेटी आदि चीजों को अपने- अपने हाथों में उठाया और तीन मंजिल पर ले आए। टैक्सीवाले ने कहा, "मेरा किराया ? इतनी देर का वेटिंग चा?" "किराया-विराया नहीं मिलेगा। चले जाइए।" टैक्सी-ड्राइवर को और कुछ कहने का साहन न हुआ। इतने आदमी हैं। गनीमत है कि टैक्सी में नाग नहीं लगाई। इसके बाद किराये की मांग करके उत्तने झमेला बढ़ाना नहीं चाहा । इंजिन स्टार्ट कर धुआं उगलता हुआ आंखों से ओझल हो गया । . । उनतीस वटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन में संभवतः एक ऐसा आकर्षण है जिसे अलगाया नहीं जा सकता । पुण्य का आकर्षण है, पाप का बाकर्षण है । विरह का आकर्षण है, मिलन का आकर्षण है। यहां रहने में जित तरह सभी अनिच्छुक हैं उसी तरह से इसे त्यागने में भी अनिच्छुक । यह ठीक वैसे ही लगता है जैसे रहना और त्यागना दोनों तकलीफदेह है। हरिपक्ष चक्रवर्ती और उसके परिवार के लोग बहुत सोचने-विचारने के बाद इस निर्णय पर पहुंचे थे वे यहां से निकलकर उस जगह चले जाएंगे जहां दोनों आंखें ले जाएं । लेकिन यह संभव नहीं हो पाया। उन्हें रुकना पड़ा। भोलादत्त बोला, "साला भागकर कहां जाएगा ! मैं देख लूंगा । साले की उस खुशनमा गाड़ी को पकड़कर चूर-चूर कर डालूंगा। तभी मेरा भोलादत्त नाम सार्थक होगा।' लेकिन कलकत्ता शहर में किसको किसका पता चलता है ? यहां जितने मनुप्य हैं उससे ज्यादा नमनुप्य । यहां जितने बमनुष्य हैं उससे ज्यादा हराम- . जादे । यहां वैसे ही हरामजादों की भीड़ मे वह आदमी पो गया है जिसकी हड्डियों में शैतानी भरी हुई है । किसकी तलाश करे ? कहां तगरा करे? कौन बताएगा कि आटिस्ट-मप्लाइग के कमीशन-एजेंट आनन्द राय का मकान कहा है ? एक आदमी पास आकर धो गया तो खो जाने दो। जयन्ती बहुत सस्ते में मिल गई थी, हालाकि उमे कुछ ज्यादा ही रुपये मिल गए थे। लेकिन एकाएक एक सहूलियत हामिल हो गई। सहूलियत हासिल न हो तो आनन्द राय का चले फैसे ? उमें भी तो खाना-पहनना है। काजीमाई देसाई दो महीने के बाद फिर कलकत्ता पहुंचा । कमीशन- एजेंट को पुकार हुई। आनन्द फिर स्ट्रैड होटल में आकर उपस्थित हुआ। सबकी कांजीभाई देसाई नही बल्कि दूमरा ही नाम है । अवको दो सौ चारह नबर रूम को मिस्टर रमणलाल पाटिल ने बुक कराया है। "मैं आपकी ही तलाश था। उन लोगो ने बताया कि काजीभाई देसाई - नाम का कोई भी व्यक्ति नहीं आया है । मैं वापस जा रहा था सर, फिर भी सोचा दो सौ बारह नवर रूम एक बार देख जाऊं।" देमाई जी ने कहा, "अपने पार्टनर के नाम से रूम बुक कराया है, इसीलिए खाते में मैंने यही नाम लिखा है। हां, तो मेरी आर्टिस्ट कहां है ? मेरी वही आटिस्ट !" थानन्द ने कहा, "अबको आपको एक दूसरी आर्टिन्ट दूंगा, सर!" "क्यों उस आर्टिस्ट को क्या हुआ?" देसाई ने पूछा। "उसकी बात मत करै, सर । उस बार वह टाइट एट्टीन यो, अबकी बारको फाइन नाइन्टीन दे रहा हूँ-बिलकुल मुपरफाइन..' "नही नहीं; मुझे मुपरफाइन नहीं चाहिए वही टाइट एट्टीन अच्छी है।" "मगर, सर, उसके साथ एक परेशानी है ?" "क्या?" - "वह प्रेगनेंट हो गई है । विलकुल बेवकूफ लड़की है, धिकॉमन नहीं लिया, अब फ्लैट पड़ गई..." "पलट का मतलब ?"
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चलो। मैं खुद जाकर अपने हाथो से पंसा दे माऊंगा।" लन्द बोला, "नही सर, यह नहीं हो सकता । आप ठहरे काम के मादमी, टिस्ट के घर पर क्यों जाइएगा? आपको भी तो कोई प्रेस्टिज है ! गया पड़ी है ! इसके अलावा वे लोग क्या आदमी है सर? आदमी नहीं साई बोला, "कहने का मतलब यही है कि मैं उसे कुछ रुपया दूगा ही, रट गिव हर समयिंग एज कपेन्सेशन । मेरे विवेक को चोट पहुंची है... ग्या मिलेगा, राप, यह मत सोचना कि मैं तुम्हे कुछ भी नहीं दूंगा।" में जितना मिलेगा, सर?" पछली बार मैंने कितना दिया था?" ई हजार नेट । तीन दिनों के लिए...' र है, अवको वन-पर्ड दूगा मन्द ने मन ही मन हिसाव लगाया कि ढाई हजार का वन-पर्ड कितना - ~ वाद बोला, "टीक है सर, मैं आज ही शाम को आर्टिस्ट को लाकर गमने हाजिर करूगा।" ना कहकर आनन्द राय स्ट्रैड होटल के दो सौ बारह नवर कमरे से '-आहिस्ता बाहर आया और बायें हाय से दरवाजे को खोपकर बन्द । , व का याता लिए बैठे हैं। शु वायू ने हिमाय मे जीवन को शुरुआत की थी। और न केवल बू ने बलि हर किसी ने। कामीभाई देसाई ने हिसाब से शुरुआत सी ?. उसने भी हिसाव करके देखा है, किस दर सोना खरीदकर में बेचने का क्या लाभ होगा। हिसाव करके देखा है, कितना रुपया रहेगा और कितना काला धन । हिसाव करके यह भी देखा है कि कितना कमाने से लड़कियो के पीछे रितना पैसा खर्च किया जा सकता है लेकिन एकाएक यहां इस कलकत्ते में उसके हिसाब में भी कोई गड़बड़ी रह गई । अचानक उसे लगा, यह हिसाव क्यों नहीं मिल रहा है ! 'डेविटं- क्रेडिट का बैलेन्सशीट इस तरह क्यों गड़बड़ा गया ? रणवीर के सामने उस वक्त भी वाउचर का पहाड़ खड़ा था। आंखों के आंसू का पहाड़ अगर हो सकता तो गणित का पहाड़ क्यों नहीं होगा? वाउचरों को अपने सामने रखकर रणवीर फिर से हिसाब करने. लगा । । जन्म, मृत्यु और विवाह का हिसाव । रणवीर के पिता, माता सभी ने एक दिन इसी तरह अपने सामने वाउचरों को रखकर हिसाब लगाया था। डेविड-क्रेडिट का वैलेन्सशीट तैयार किया था । जब हिसाव नहीं मिल सका तो दुबारा हिसाब किया, फिर से वाउचरों को सामने रखकर बैठा और गिनना शुरू किया--पांच साते पतीस का पांच, हासिल रहा तीन... लेकिन उनतीस बटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन का विधाता निर्विकार है, निरंकुश, अदृश्य, अलभ्य, अवाङ्मनसोगोचर । वह जितना भयंकर है उतना ही मानन्दस्वरूप 1 उसके सामने जिस प्रकार मनुष्य की निरंतर प्रार्थना स्तुति के गीतों में गूंजती रहती है, उसी प्रकार वह अपनी इच्छा को व्यक्त करने में निरासक्त है-स्वयं के नियम के आनन्द से उदासीन । यही कारण है कि कोई उसे अत्यन्त दयालु कहता है, कोई भोलानाथ । विश्व की सृष्टि की अमोघ नीति के कारण वह सभी स्थानों में विराजमान है, सभी जीवों में निवास करता है लेकिन उसके साथ-साथ वह अव्यक्त भी है। उसे छुआ नहीं जा सकता, फिर भी उसका अस्तित्व है। उसे देखा नहीं जा सकता, फिर भी वह दृश्यमान है। इसीलिए हरिपद चक्रवर्ती जब फिर से तीनमंजिले में लौट आया और दैनंदिन जीवन-यातना के आघातों से वेतरह परेशान हो उठा तब मालिक फिर से याद आया । मालिक यानी ईश्वरप्रसाद ढनढनियां। वह मालिक कहां है ? उस मालिक के आने से ही इसका हल निकलेगा । मालिक के आने से ही उन. लोगों को चन मिलेगा। "साला, हरामजादा मकान-मालिक ! अबकी. सृप्टिघर आया तो उसके मुंह पर झाड़, न मारूं तो मैं ब्राह्मण की बेटी नहीं... लेकिन गुस्सा उतारा जाए तो किस पर ? गुस्सा करने से कौन सुनता है ! . -- १४.
राधा बुआ कहती, "घर में पाप आकर समा गया; यब तकदीर में क्या लिया है, कौन जाने..." हिमाशु वायू के सोने का ददं फिर से बढ़ गया है। फिर भी ददं की हालत मे ही कहते, "मुष्टियर आपा ?" पत्नी कहती, "सृष्टिधर आए, चाहे न आए इसमें तुम्हारा यरा ? तुम रोगी आईमी टहरे, उपचार लेटे रहो।" हिमाशु यावू कहते, "गुपचार कैसे पड़ा रहू ? जरा यातचीत करना भी क्षेप है ?" "मन तो सही. तुम क्या बात करना चाहते हो ? फहने ने कहना इतना ही है कि मकान-मालिस आया पा नही ? मकान-मारिता के आते ही सब दुप र हो जाएगा ? मकान-मालिक के आ जाने से ही सुम्हारी दिल की बीमारी दूर हो जाएगी ?" हिमागु थायू पाहते, "अगर मान पा टीना अदा रहना तो मुझे दिल की यह बीमारी नहीं होगी। यह गाान ही तमाम धनयों का मूल है । मरान- मालिा आता तो उभ सारी वा समसार पक्षा..." यह न केवल हिमांशु यायू पी बायकि हर रिमी यी यही था। विजय भी यही रहता है, राधा युभा और भवदुलार भी यही बात पटा। हरित वशी, उगी पानी, जपानी नही गय यही गए पायो दुहराते रहते है। जिग दिन में हरिपद पर वह मो में असर हिर रो मोन- पति पर लौट भार है. उसी दिन गे उनसीम परे तीन मटे एनीमान हालदार नैन को मानकर न मिरे में पर्या-चरिणां पहपाने गुरु जयन्ती गरे पं. याममंदिर पर आर पानी जाया गरनी पी। उम दिन में उमने आना याद गर यिा है। उस दिन रित गाणी की पानी नीचे अ.नी है और पारे में नन में पानी में जानी हरित पर पोवान में पाले जो तेरी थी, यह सम हो गई है। राधा बुधारतो, " हे तो मंगेरी रहने रे सापक मार गया है ? यदी दिशाएमा नौ लोग हासन गराय पर देंगे।" हिमावा भी पानी बहती, "माय बापर या पा। हरी मधुसूदन आदमी का घमंड चूर कर देते हैं।" फूल भाभी कहती, "राधा दी, अब वह छोकरी क्या करती है ?" "करेगी क्या बहू, सारा दिन मुंह लटकाए पड़ी रहती है।" "अव सड़क पर निकलती है ?" राधा वुआ कहती, "वैसा पेट लेकर कैसे निकलेगी। निकलने में शर्म नहीं मालूम होती है ?" "तो या-शर्म अभी तक है ? इधर उस शर्म के कारण हम अधमरी हो गई हैं राधा दी..." रपता-रफ्ता लोगों को और भी मज़ा आने लगा। मानो, उनतीस वटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन के उस मकान के कारण मुहल्ले के लोगों को नींद ही नहीं आती है । छोकरी क्या कर रही है, क्या सोच रही है, क्या खाती है-इसकी मजेदार चर्चा मुहल्ले के लोगों के हर अड्डे में चलने लगी। बच्चा होने पर कहां होगा, किस होटल में ?--यह चर्चा भी चली। भोलादत्त वगैरह छिप-छिपकर दिन-रात पहरा दे रहे थे। कोई डाक्टर जाता हुआ दिखता तो ध्यान से देखते कि किस मकान में जा रहा है । कोई टैक्सी जाती तो गौर से देखते कि किस मकान के सामने जाकर खड़ी होती है। वे बारी-बारी से पहरा देते थे। रात में मयूरभंज रोड न जाकर उस नुक्कड़ पर ही वारी-बारी से ठर्रा पीकर लौट आते थे। आकर अड्डेबाजी करते थे और हिसाव लगाते थे : जीवन का हिसाव, जवानी का हिसाब, अन्याय, अत्याचार, अपव्यय का हिसाव, मौज-मस्ती और भावारागर्दी का हिसाव । उन लोगों के हिसाब का फारमूला ही कुछ और था। तेज़ी ज़रा कम हो जाए, लहू थोड़ा ठंडा हो जाए, तब देखने में आएगा कि वे ही हिसाव कर रहे हैं : पांचसाते पैंतीस, हासिल रहा..." उस दिन सवेरे-सवेरे सृष्टिधर पकड़ में आ गया। सृष्टिधर और ही दिनों की तरह उनतीस बटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन के मकान में आ रहा था। रास्ते में भोलादत्त ने पकड़ा- "कहां जा रहे हो वेटे सृष्टिधर ?" "हुजूर, मालिक के घर में..." "क्यों?" १४२ "और करने ही क्या जाऊंगा, किराये के लिए तकाजा करने जा रहा हूं।" "देखना, होशियार रहना, हम लोग यहां बैठे-बैठे पहरा दे रहे हैं, तीन- मंजिल से अगर कोई निकलकर भागना पाहेगा तो उसे घर दबाएंगे।" सृष्टिधर मय कुछ जानता है, सब कुछ देख चुका है, सुन चुका है। वह चोला, "आप लोगों के लिए हरने की कोई बात नहीं है हुजूर, किराया यमूल कर मालिक को भेज देने के बाद में निश्चिन्त हो जाऊंगा।" "तुम्हारा मालिक कव आ रहा है ? तुम्हारा मालिक बिलकुल भगवान हो गया है क्या ?" सृष्टिधर के चेहरे पर मुमकराहट फैल गई, "अब की सचमुच आ रहे हैं हजूर, यही वात पहने आया हूं। देखिए, यह उनकी चिट्ठी है।" और मुष्टिधर ने एक चिट्ठी निकालकर दियाई । चिट्ठी में क्या लिखा है, यह किसी ने नहीं देखना चाहा । इसलिए उसने चिट्टी को फिर से जेय के अन्दर डालकर रख लिया। "मालिक ने कहा है कि अवको मकान को नये सिरे से मरम्मत करा देंगे। जीना मरम्मत करायग, दीवार में पलस्तर लगवायेंगे, खिडसी, दरवाजे और पलस्तर को रंगया देंगे, मय कुछ मरम्मत करा देंगे । अवकी किसी को कोई शिकायत नहीं रहेगी, हुजूर!" भोलादत्तू ने पूछा, "तुम्हारे मालिक कब आ रहे हैं ?'
काजी आदमी है। सिर्फ उनतीस वटे तीन बटे छह नीलमणि हालदार लेन के मकान की देखरेख करने से उसका काम नहीं चल सकता। दुनिया में उसके और भी बहुत सारे मकान हैं । दुनिया के आदमी उत्सुकता के साथ ईश्वरप्रसाद ढनढनियां के इन्तजार में बैठे हैं। उससे मुलाकात होना क्या. इतना मासान है ! जप-तप-साधना करने से भी उसकी प्राप्ति नहीं हो सकती है। सभी ने राहत की सांस ली थी और सोचा था कि मकान-मालिंक आएगा। भोलादत्त, केतो, पटला सभी प्रतीक्षा कर रहे थे। विजय भी तत्पर था । - दूसरे दिन अचानक एक टैक्सी उनतीस वटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन के मकान के सामने आकर रुकी। टैक्सी का किराया चुकाकर बानन्द चुपके से नीचे उतरा । एकाएक भोलादत्त ने पीछे से उसके गले को धर दबाया। "क्यों साले, फिर आए हो ?" मानन्द राय इसके लिए कतई तैयार न था। पीछे मुड़ने पर इतने गुंडों पर दृष्टि पड़ते ही वह चिहुंक उठा । "मुझे क्यों मार रहे हैं ? मैंने क्या किया है ?"
सतीस बटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन का यह मकान एक मजीव ही दुनिया है । यहा कोई न कोई हलचल हर रोज लगी ही रहती है। "क्या हुआ साहब, इस मकान में फिर क्या हुआ?" भवदुलाल कुल मिलाकर सब दपतर से वापस आया था। उसकी पली को दिर में बच्चा होने वाला है । डाक्टर के पास आना-जाना लगा रहता है। सासव के बाद यह आठवां है । आठवी पार भी पहली बार की तरह ही पोर चिन्ता लगी हुई है ? "पया हमा है वहा ? शोर-शरावा क्यों मचा है ?" "उसी लड़के को वे लोग पकड कर ले आए हैं और तीनमजिले की तरफ ले जा रहे हैं।" "मार-पीट रहे हैं ?" "मानूम नही । गुड़े हैं गडे । इस मान को छोड़ने पर ही जान बचेगी।" हिमाशु यावू के सोने का दंशान्त था। वरवट लेकर पूछा, "वहां मोर. गुल क्यों हो रहा है? उधर जीने पर धक्का-मुक्का लगाता हुआ भोलादत आनन्द को तीनमजिले की तरफ ले जा रहा था, "चलो साले, मजा चखाता हूँ, पराये मुहल्ले का होकर हमारे मुहल्ले को लकी से .." पोप-पीछे बहुत से बादमी तमाशा देगने के लिए कार की ओर गए । लोग भी देगेंगे कि मोलादत्त यया करता है, पर क्या चारया होता है । अलिम सौदी पर पहुंचकर भोलारत दरवाजे को कडी पटापटाने लगा, "मोगीजी, मोगीजी..." मुद्रा ऐसी पी जैसे मिो राज्य को जीनकर लोटा हो । जगे हर कोई जपन्ती मी गुमाशंसा का अधिकारी हो । जैसे जयन्ती की भलाई किए बिना उन लोगों का याना हजम नहीं हो रहा है. हिसाब नहीं मिल रहा है। हासिल कुछ भी नहीं बच रहा है। --- रणवीर पाहे लाय कोशिश करें, हिसाब किसी भी हाल में नहीं मिलेगा। हिसाय किसी का मिलना भी नहीं है । हिमाव मिलनेवाली घोउ है ही मही। Yv रणवीर के बाप का हिसाब नहीं मिला था, फिर रणवीर का ही हिसाव क्यो मिलेगा? डेविट-क्रेडिट अगर मिल ही जाता तो नीलमणि हालदार लेन के उनतीस बटे तीन बटे छह मकान की शक्ल कुछ और ही होती। उनतीस बटे तीन वटे छह मकान का डेबिट-क्रेडिट और ही तरह का होता । उसके हिसाव के खाते में लिखा हुआ होता-पांच साते पैंतीस, पैंतीस का पांच हासिल रहा... मगर वह बात अभी रहे। इधर दूसरे ही दिन उनतीस बटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन की शक्ल देखकर रास्ते के लोग विस्मय में डूबने-उतराने लगे । शाम होते ही मकान की छत पर रोशनियां जल उठी। मंडप तैयार किया गया। भोलादत्त वगैरह ने विराट् आयोजन किया । वे कहीं से पुरोहित बुला लाए । मसालेदार फचौरियां छन रही हैं, झींगा मछली का फ्राइ हो रहा है । बैंगन का भुजिया, कोहड़े की सब्जी, मिठाई। कुछ भी छोड़ा नहीं गया है। हरिपद चक्रवर्ती अल्पवेतनभोगी आदमी है। शुरू में ज्यादा खर्च करने की उसे इच्छा नहीं थी। लेकिन अंतत: उसे कर्ज लेना ही पड़ा और कर्ज के पैसे से ही सारा आयोजन किया गया है । विवाह-मंडप में एक ओर जयन्ती वैठी हुई है, दूसरी ओर आनन्द । भोलादत्त ने चिल्लाकर कहा, "वोलो साले, मंत्र का उच्चारण करो। यदिदं हृदयं तव, तदिदं हृदयं मम..." सारी रात वर को अटकाए रखा तव शादी हो रही है। मानन्द ने कहा था, "मैं गरीब आदमी हूं, शादी कर मैं खर्च नहीं चला पाऊंगा, पत्नी को खाना- कपड़ा नहीं दे पाऊंगा। मेरे पिताजी कैंसर के मरीज हैं, मेरी बहन को पोलियो है..." तब छत पर मंडप के तले विजय गरम-गरम मसालेदार कचौरियां परोस रहा था, "आपको और मसालेदार कचौरी +, भैया ?" दोमंजिले के हिमांशु बाबू के सीने का दर्द फिर से बढ़ गया। वोला, "अजी, सुनती हो, डाक्टर को ज़रा खवर भेजो, मेरी छाती धड़क रही है।" नीचे एकमजिले पर नेडी चिल्लाई, "मां, ओ मां..." राधा बुमा बोली, "क्यों री, दर्द उठा है क्या ? दाई बुलाऊं ?" । १४६ ऊपर मंडप बनी छत पर सन्यादान की रस्म पूरी हो गई। हरिपद चक्रवर्ती ने यन्यासन की रस्म की । उसके दाद है कोहवर, उमरे वाद... "वहां है ! अरे, मृष्टिधर यहां है ? सृष्टिधर ?" रणवीर तब भी वाउचर लेकर हिसाबलिए जा रहा है । गणित का पहाड़। आंघों के आंमू का पहाड हो मरता है तो गणित का पहाड़ क्यों नहीं होगा ? रणवीर आज जिम तरह हिमाव कर रहा है, रणयीर का बाप भी एक दिन उसी तरह हिमाव करता था। रणवीर की मां ने भी हिसाव पिया या । लेस्नि फही. किमी का हिमाव कहां मिला? फिर रणवीर फा हो हिमाव पयो मिलेगा? फिर भी दुनिया में हिमाय का मिलगिला बन्द नहीं होगा। रणयोर, रण- योर का वार, उमरी मां, हरिपद परी, भवदुलाल, राधा युमा, विजय, भोला- दत्त, पटला, पानीमाई देमाई, मभी हिमाय मरते ही रहेंगे । पाहे हिमाय मिले, चाहे न मिले। हर कोई रहेगा : पांव मासे पतीग, पेनीग या पाच हामिल रहा मुष्टियर तव एक कोने में बंटा हुआ बंगन के भूनिया के माय ममालेद्वार कचौरी पा रहा था । "मैं यहाँ हूँ..." उमने पहा । "तुम्हारा मालिककहाँ है ?" . - 'यदि हृदयं नत्र, तदिदं हृदयं मम...' "देगिए, मैं गरीब आदमी हूँ, मादी कर गचं पलाना मेरे लिए मुशित है, पत्नी को पाना-कपटा नहीं दे पाऊंगा। मेरे पिताजी कंगर के मरीज है, मेरी बहन को पोलियो है..." "साले, तुम परारे मुहल्ले का होरर मौन करके गले नामोंगे भौर हम लोग पुरा रहें ? बोल मासे, मंत्र का उचारण कर" यहि हदयं तय, तरिद हृदयं मन... "पापको और एक पोरदूभया?' 'माले, मेरे मोमाजी ना दोस्त मुचीपारा पाने का प्रो. मी. है ! हम लोगों में पालानी करने परा है।" "दही, दही पाहिए ?" "देधिए, मैं शादी कर गचं नहीं पता पाऊंगा । मेरे पिताजी कमर के मरीज है, मेरी बहन को पोलियो है." १४.
हालदा "बरे सृप्टिधर, तुम तो भाई कुछ खा ही नहीं रहे हो, लो, और ए रसगुल्ला लो।" 'यदिदं हृदयं तव, तदिदं हृदयं मम...' 'पांच सात पैतीस, पैंतीस का पांच, हासिल रहा तीन.' 'बोल साले, मंत्र का उच्चारण कर उनतीस बटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन के मकान का मालि उस दिन भी नहीं लाया । जन्म, मृत्यु, विवाह की जटिलता के बीच जब दुनिर संकटग्रस्त वी, सभी उसके जाने की प्रतीक्षा करते-करते थक गए, तब भी व नहीं पाया। हो सकता है, वह कमी आए ही नहीं। सृप्टिधर ने खाते-खाते कह "अचानक वह हांगकांग चले गए हुजूर, मेरे पास तार बाया है." मालिक भले ही न आए, परन्तु उनतीस वटे तीन वटे नीलमणि लेन के मकान की दैनंदिन जीवन-यात्रा में कभी कोई अवरोध पैदा नहीं हुआ है। ऊपर जव मंडप बनाकर हरिपद चक्रवर्ती की लड़की की शादी हो रही है शंख बज रहा है, सभी खान-पान कर रहे हैं, दोमंजिले पर तब हिमांशु वार के सीने का दर्द बढ़ रहा है । डाक्टर आ चुका है, कोरामिन और आक्सिजन दिया जा चुका है और नीचे के एकमंजिले में भवदुलाल के लड़क हुना है। यह आठवीं सन्तान है। किसी के किसी काम में अवरोध पैदा नही होता। ईश्वरप्रसाद ढनडनियां चाहे कलकत्ते में रहे, चाहे हांगकांग में, उसके चलते जीवन-याना के क्रम में कोई व्यतिक्रम नहीं आता। इसी तरह जव यह गड़बड़ी टल जाएगी, जिस दिन तमाम मनहूसियत को छाया हट जाएगी, उस दिन हो सकता है ईश्वरप्रसाद ढनवनियां की फिर से खोज-पड़ताल हो, लेकिन उनतीस वटे तीन वटे छह नीलमणि हालदार लेन के मालिक के पास इतन वक्त नहीं है कि वह यहां आये । आकर पाखाने की सीढ़ी की मरम्मत कराए रसोईघर की छत का भूराख ठीक कराए, दीवार में सफेदी कराए और तमाम शिकवा-शिकायत और अभावों को दूर कर दे ताकि सभी राहत की सांस ले सकें और रणवीर तव भी हिसाव करता रहेगा : पांच साते पैतीस, पैंतीस का पांत्र हासिल रहा एक और
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