Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Pradushan Bhayank Samsya Nivaran Avam Upaya
Front matter
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प्रदूषण : भयानक समस्या
निवारण एवं उपाय
[छात्र छात्रायें क्या कर सकते हैं ?]
श्रीकृष्ण दत्त शर्मा
(मस्काउटिंग के प्रवर्तक) )
यूनिक ट्रेडर्स, चौड़ा रास्ता, जयपुर
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समर्पण
मेरे प्रेरक !
मेरे गुरुवर....!
श्रीयुत दीनानाथ अबरोल
सेवा निवृत्त-प्रधानाध्यापक
विश्वम्भरलाल माध्यमिक विद्यालय, बगड़ (शेखावाटी)
के
कर कमलों में सादर समर्पित
जिन्होंने मुझे 'मरुस्काउटिंग' तथा 'संरक्षण कार्यक्रम' को प्रोर
प्रेरणा दी पौर इस योग्य बनाया।
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दो शब्द पर्यावरण कहिये या वातावरण, इसके प्रदूषण की समस्या को लेकर विश्व स्वास्थ्य संघ (W.H.O.) ने गम्भीर चिन्ता व्यक्त की है। इसके उपाय के रूप में वैज्ञानिकों ने संरक्षण के अनेक कार्यक्रम सुझाए हैं । 'विश्व वन्य निधि' ने इस ओर सक्रिय कदम उठाये और विश्वव्यापी स्काउट आन्दोलन को अपने साथ "संरक्षण कार्यक्रम" के प्रचार व प्रसार हेतु आमन्त्रित किया। परिणामस्वरूप एक चार सूत्री कार्यक्रम सन् 1973 में विश्व स्काउट सम्मेलन द्वारा स्वीकार किया गया- (1) संरक्षण पुस्तक माला का प्रकाशन (2) विश्व सरक्षण (दक्षता) बैज की स्थापना, (3) बाघ को बचायो - युवा अभियान और (4) प्रशिक्षण केन्द्रों पर आदर्श संरक्षण परियोजनायें प्रारम्भ करना। इस प्रकार विश्व के नागरिकों को इस कार्यक्रम के प्रति सजग करने के लिए युवा स्काउटों की मदद मांगी गई। परन्तु इससे कई वर्ष पहले 1956 में मैंने 'मरु स्काउटिंग' की योजना व सरक्षण' कार्यक्रम को स्काउटिंग में सम्मिलित करने का विचार दिया था, जो 'विश्व स्काउट ब्यूरो' तक 1961 में पहुंच पाया और इसकी सर्वत्र प्रशंसा हुई। इसी बीच कनाडा, अमेरिका तथा आस्ट्रेलिया में भी संरक्षण कार्यक्रम को स्काउटिंग में सम्मिलित कर लिया गया। हमारे अनुभव एवं अभ्यासों की सफलता पर विश्व-स्काउट ब्यूरो ने 'सरक्षण कार्यक्रम' की नीव रक्खी है। विश्व ब्यूरो द्वारा-'संरक्षण पुस्तक माला' के प्रकाशित होने पर उसका हिन्दी अनुवाद मैंने तैयार किया। 1974 को नवीन ए.पी.पार. प्रो. में 'विश्व संरक्षण बैज' को सम्मिलित करने के बाद अनेक मित्रों ने इस बैज पर हिन्दी में कोई पुस्तक लिखने का आग्रह किया। मेरे सहयोगी श्री कृष्णकुमार 'सुमन' (दिल्ली) ने इस योजना को साकार बनाने का बीड़ा उठाया। फलस्वरूप मरुस्काउटिंग विश्व मैत्री संघ के तत्वावधान में 'डेजर्ट स्काउटिंग' (मासिक पत्रिका) के अगस्त एवं सितम्बर 1975 प्रकों में वह सामग्री प्रस्तुत की गई, जो पुस्तकाकार में आपके हाथो हाथों में है। । -
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तालिका
अध्याय 1 प्रदूपण बनाम संरक्षण
प्रदूषण क्या है 5. संरक्षण क्या है 7, संरक्षण और हम
8, संरक्षण एवं स्काउटिंग 9, मरुस्काउटिंग एवं
संरक्षण कार्यक्रम 11
विश्व संरक्षण बैज
-
अध्याय 2 कब/बुलबुल के लिए"
14 से 19
अध्याय 3 स्काउट/गाईड के लिए
20 से 48
प्रकृति में जलचक्र 20, प्रदूषण के भेद 21, जल प्रदूपण
21, जल शुद्धिकरण योजना 23, वायुप्रदूषण 28,
गन्दगी विरोधी अभियान 30, वन्य पशुओं के
संरक्षरण 32, बाहर जीवन की संहिता 33, बाघ को
बचाओ 34, भूक्षरण 35, प्रोपजनीय विश्लेपण 37,
गंदलापानी 38, मौसम का लेखा 38, संरक्षण
परियोजनायें 43, प्रकृति की खोज 45, चारादानी 45,
पक्षीस्नान कुण्ड 46,
पौष प्रदर्शन पेटिका 47,
प्लास्टर सांचे 481
अध्याय 4 रोवर स्काउट/रेंजर गाइड के लिए".
49160
पर्यावरण विज्ञान 49, प्राकृतिक संतुलन 49, जीवनचक्र
50, पोषजन चक्र 52, अन्तनिर्भरता 53, वन्य जीवन
पर प्रभाव 54. सरक्षण सम्बन्धी संस्थायें 55, प्राकृतिक
सुरक्षित वन 56,
परियोजनायें 581
कानून और
संरक्षण 57,
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अध्याय (1) प्रदूषण एवम् संरक्षण (Pollution Vs. Conservation) प्रदूपण क्या है ? -एक भयानक समस्या - आजकल “प्रदूपण" शब्द बार-बार समाचार पत्रो, रेडियो और टेलिविजिन पर पा रहा है। प्रकृति का मानव के जीवन में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है। मानव का जीवन प्रकृति पर निर्भर है, परन्तु प्रकृति में सन्तुलन है। प्रकृति हमें अनेक साधन प्रदान करता है । उस प्रकृति को मानव धीरे-धीरे असन्तुलित करता जा रहा है। मानव की प्रगति-(वैज्ञानिक आविष्कार और औद्योगीकरण)-प्रकृति के नियमित क्रम और संतुलन में बाधा उत्पन्न कर रही है, जो स्वयं मानव के लिये भयानक है। मानव द्वारा प्रकृति के साथ किया गया यह खिलवाड़ ही "प्रदूषण" है । हम प्रकृति को बिगाड़ रहे हैं, दूषित कर रहे हैं। प्रकृति के प्रावरण को "पर्यावरण" कहते हैं और इसमें प्राकृतिक साधनों (वायु, जल, भूमि, वनस्पति, पशु) और स्वयं मानव के बीच जो आपसी सम्बन्ध है, उसका अध्ययन पर्यावरण-विज्ञान (Ecology) है। जब पर्यावरण मानव के प्रयासों या कुप्रयासों से असन्तुलित हो जाता है, तो हम इसे “प्रदूपण" कहते हैं । प्रदूषण के दो पहलू है-- 1. जो प्राकृतिक साधन (वायु, जल, भूमि, वनस्पति और पशु), प्रकृति ने हमें प्रदान किये हैं, उनका दूषित यानी विपैला हो जाना उपयोग के लिये बेकार हो जाना, और 6] 2. उन साधनों को मानव द्वारा नष्ट करना, अपव्यय या दुरुपयोग करना। इस प्रकार पर्यावरण (वातावरण Environment) का दुरपयोग एक स्थान या देश तक सीमित नहीं है. यह सम्पूर्ण विश्व (Global) व्यापी है । वायु की धारायें विपली गैस को पृथ्वी के चारों ओर पहुंचा देती है। समुद्र की लहरें गन्दगी और तेल के प्रदूपण को सुदूर समुद्रतटों तक ले जाती है। अतः मानव के पर्यावरण की रक्षा करना एक विश्व. व्यापी समस्या है। यदि इस समस्या का शीघ्र कोई कारगर उपाय नहीं किया गया, तो मानव और उसकी सभ्यता सभी का पाने वाले कुछ समय में नाश हो जायेगा । यह वैज्ञानिकों के सामने एक भयंकर चुनौती है, जिसका सामना करने के लिये "संरक्षण कार्यक्रम बनाया गया है । प्रदूषण पर एक दृष्टि- प्रदूपण हमारी वैज्ञानिक और प्रोद्योगिक प्रगति का एक दुप्परिणाम है। दैनिक जीवन में निम्न प्रदूषणकारी तत्त्वों का हमे सामना करना पड़ता है। (क) वायु-प्रदूषण-कार्वनडाई प्राक्साइड, कार्बन मोनोआक्साइड, सल्फर डाइ प्राक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड आदि धातक गैसें हमारे कारखानों, मोटर-गाडियों और रसायनिक उद्योगों से उत्पन्न होकर वायु को प्रदूपित करती हैं। (ख) जल प्रदूषण-फास्फेट्स, पारा, सोसी, तेल और कीटनाशक हमारे जल को अनुपयोगी बनाते है । (ग) विकिरण द्वारा प्रदूषण-~यह परमाणु संयत्रों, परमाणु बम परीक्षणों और विस्फोटों से उत्पन्न प्रदूषण है, जो जीवधारियों और प्रकृति के लिये घातक है। जंगलों को निरन्तर कटाई, पृथ्वी पर ताप का वढना, ओजोन परत का क्षीण होना, वायु का विपैला होना, अम्लीय वर्षा होना, शोरगुल का बढते जाना, जल का दूषित होना (जैसे-गंगा का प्रदूषण)- ये सब प्रदूपण के अनेक पहलू है। समस्या समाधान चाहती है- साधारण शब्दों में प्राकृतिक साधनों की कमी और दुरुपयोग से उत्पन्न समस्यायें "प्रदूपण" हैं और उनका निवारण करने का उपाय या कार्यक्रम है-संरक्षण । .
-- "संरक्षण" इस समस्या का सामना करने के उपायों को शिक्षा का एक अंग बनाना आवश्यक है और इसी पथ पर चल कर हम इस शैक्षणिक । कार्यक्रम और अभ्यासों का आगे आपको परिचय दे रहे है। संरक्षण क्या है ? एक विचार........ एक कार्यक्रम एक उपाय 'सरक्षण' का अर्थ है, प्राकृतिक साधनों (भूमि, जल, वन, जीव आदि) का ज्ञान प्राप्त कर उनका सही उपयोग करते हुए उनको बचाना । संरक्षण का अर्थ यह है कि हम प्राकृतिक साधनों का इस प्रकार उपयोग करें जिससे इनका कम से कम अपव्यय हो, उनको हम नाश से बचा सकें और अपने तात्कालिक स्वार्थो के दृष्टि से ही नहीं किन्तु भविष्य में आने वाली अनेक पीढियों के हितों की दृष्टि से उनका योजनाबद्ध उपयोग करें। सरक्षण का वास्तविक एवं व्यावहारिक अर्थ है--जो कुछ हमारे पास है, उनका चतुरता से उपयोग और व्यवस्था करना तथा आगामी वर्षों में हमें जो चाहिये उसके लिये सावधानी से योजना बनाना। हमारे सव साधनों का अधिक से अधिक लोगों के लिये अधिक से अधिक समय के लिये सर्वश्रेष्ठ उपयोग करने की योजना की जाय.... 1: इस प्रकार संरक्षण के तीन पहलू है- (1) प्राकृतिक साधनों का ज्ञान (Know Your resources); (2) साधनों का व्यवस्थित उपयोग (Use Your resources); और (3) साथ ही साथ उन्हें सुरक्षित रखना (Save Your resources); कि उनका दुरुपयोग न हो और अब तक हुई हानि को वापस पूरा किया जा सके । इस प्रकार "संरक्षण एक समस्या है, चिन्ता है, सधपं है, एक विज्ञान है, योजना है, विशाल कार्यक्रम है, जिसका कोई और या छोर नहीं।"5 संरक्षण एक विशाल विपय है, जिसका अर्थ भिन्न-भिन्न लोगों के लिये सब प्रकार की भिन्न-भिन्न बातें हैं जो हमारे युग की महान् पर्यावरगीय समस्याओं से लेकर वन्य प्रकृति के भविष्य तथा प्रापद्ग्रस्त प्रजातियों की जीवन-रक्षा तक विस्तृत है ।" 1. Desert Scouting in Action : Dutt: Page (vi) 2 सामान्य विज्ञान : श्रीमाती एव जोशी (1964) पृष्ठ 186. 3. The Scouter: (Jan. 1970) 4. Canadian Scout Hanp Bood (30-550) Page 290 5. मरूस्काउटिंग : दत्त (संशोधित-प्रकाशनाधीन) 6. श्री सर पीटर स्टाफ, प्रधान, विश्व वन्यजीवन निधि द्वारा नैरोवी विश्व स्काउटिंग कान्फ्रेंस में दिये मापण से उपत । .
Ce suis 8 ] संरक्षण और हम "हम" का अर्थ है - मानव मात्र । एक मानव के रूप में हम स्वय अपनी तथा अपनी पाने वालो पोढ़ियों को प्रदूषण के बुरे परिणामों से बचाना चाहते हैं । हम प्रति वर्ष 5 जून को "विश्व पर्यावरण दिवस" (वल्डं एनवाइरनमेन्ट डे मनाते है और हमारे पर्यावरण को दूपित होने से बचाने के अपने संकल्प को दोहराते है। स्काउट समत्रा ROMOTION (योरोप) (इंग्लैण्ड) (भारतीय) [संरक्षण के प्रतीक चिन्ह] संरक्षण के नौ उपदेश (Nine Precepts of Conservation) (विश्व वन्य जीवन निधि द्वारा प्रसारित) Puskhynessed YOOVY WOULUH shariLMLALI 1. संरक्षण में धरती के सीमित प्राकृतिक साधनों-वायु, जल भूमि, वनस्पति एवं पशुओं और मानव के प्राकृतिक वातावरण की समृद्धि और वृद्धि सम्मिलित है। 2. संरक्षण मानव मात्र के लिये अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यह जीवन को परिपूरित उच्चकोटि तथा जीवन रक्षा के परमोद्देश्य के लिये एक पहली शर्त है। समस्त मानवीय प्रयासों एवं क्रिया कलापों में यह मार्गदर्शक सिद्धान्त होना आवश्यक है। 3. संरक्षण के लिये विस्तृत विनियोग को मांग है, जिसके बिना परिणाम स्वरूप भयकर भौतिक हानियां होंगी। संरक्षण समस्त सरकारों,,निजी संगठनों, कारखानों और व्यक्तियों का सामूहिक दायित्व है।
[१
5. संरक्षण में समन्वित अन्तर्राष्ट्रीय कार्यक्रम को आवश्यकता है,
क्योंकि ये पर्यावरणीय वाधायें किसो सोमा से प्राबद्ध नहीं है।
6. संरक्षण विकास का एक प्रावश्यक तत्व है, अतः प्रौद्योगिक
देशों द्वारा दी गई सहायता में भी प्रावश्यक है।
7. संरक्षण मानव जनसंख्या को संतुलन में लाये बिना लम्बे समय
के लिये प्रगति नहीं कर सकता ।
8. संरक्षण में प्राकृतिक संसार में सव जगह भिन्नता और भविष्य
में चयन के लिये विकल्प रखना सम्मिलित है।
9. संरक्षण मानव और प्राकृतिक साधनों के बीच परिवर्तनशील
संतुलन रखता है, और यह असीमित माथिक विकास को ओर
अग्रसर होने के विपरीत है, जो इन साधनों का नाश करता है ।
प्रकृति के मित्रों के दस नियम : (वैल्जियम)
1. प्रकृति को उसके पूर्ण रूप में रक्षा कीजिए।
2. समस्त जीवों का समादर कीजिए।
3. विष (जहर) और फन्दों का प्रयोग मत कोजिये ।
4. पशुप्रो और पक्षियों को रक्षा कीजिये।
5. फसलों व बगीचों की रक्षा कीजिए।
6. · कचरा (कूड़ा करकट) न छोड़िये ।
7. ' जल के वितरण की चौकसी रखिये।
8. ' वन्य जीवों और पेड़ पौधों की रक्षा कीजिये।
9. वाही मार्गों पर सावधानी से चलिए।
10. . बाहरी क्षेत्र के जीवों का सम्मान कीजिये।
-
संरक्षण एवम् स्काटिंग
(CONSERVATION & SCOUTING)
-विश्व संरक्षण वंज की स्थापना
"प्रकृति स्काउटिंग का अपरिहार्य अंग है। बेडन-पावल के
विवार 'स्काउट पशु पक्षियों का मित्र होता है'. को प्राज की भाषा में
इस प्रकार अनूदित किया जा सकता है कि-'स्काउट प्राकृतिक वाता.
10] वरण में रुचि लेता है और इसको रक्षा करने तथा विकसित करने को कोशिश करता है।" स्काउट आन्दोलन के एक सदस्य के रूप में संग्क्षण हमें प्रभावित करता है और हमें इसके बारे में चिन्तित होना चाहिये। स्काउटिंग और संरक्षण वास्तव में साथ-साथ चलते है। यह एक बाहरी जीवन का संगठन है और शायद बाहरी जीवन का अधिकतम उपयोग करने वालों में से एक ! एक वार संरक्षणभावी बनने के बाद आप अपने ट्रप और टोली द्वारा आयोजित सरक्षण की गतिविधियो में भाग लेना चाहेंगे । तब आप एक हजार वृक्ष लगाने, नालो को साफ करने, नदी तट को कटाव से बचाने, खरगोशों व छोटे जन्तुग्रो के लिये घोसले या आश्रय बनाने का एक अवसर पा सकेंगे। इस प्रकार के अभ्यासो में महत्वपूर्ण बात यह है कि-याने वाले महीनों और वर्षों तक इनको निरन्तर (चालू) रखना पड़ेगा और इस प्रकार को संभाल स्काउट आन्दोलन प्रकृति के सरक्षण तथा अन्य क्षेत्रों में भी प्रदान कर सकेगा। इस कार्यक्रम को कनाड़ा, अमेरिका व आस्ट्रेलिया ने पहले अपनाया। 1956 में बनी 'मरुस्काउटिंग' की योजना मे "संरक्षण व मरुकल्याण" का कार्यक्रम भारत में राजस्थान ने प्रस्तावित किया, जो 1967 में लागू किया गया और भारत में पहला संरक्षण बैज "भू- संरक्षण" प्रारम्भ किया गया। 'विश्व स्काउट ब्यूरो ने' विश्व वन्यजीवन निधि' के सहयोग से एक चार सूत्री सरक्षण कार्यक्रम अपनाया है, जिसके अन्तर्गत प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय दक्षता का बैज "विश्व संरक्षण बंज" प्रारम्भ किया गया है। इसे भारत स्काउट व गाइड ने नवीन ए.पी.पार.प्रो. के भाग (2) व (3) में अपनाकर कब। बुलबुल, स्काउट/गाइड तथा रोवर/रेजर्स के लिये पाठ्यक्रम निर्धारित किये हैं, जिन पर विस्तृत सामग्री अगले पृष्ठों में दी गई है। First Scouting Seminar on Conservation : By Carl Lindstea. 2. Tbe scOUTER (Jan. 1970) 3. The Scouter (April 1970) + Boy Scout Hand Dook (USA) 1965 Page 87 3. World S:outing : Vol. 7, No. 1 (Page 11) [ 11 मरु स्काटिंग एवं . -- संरक्षण कार्यक्रम मरुस्काउटिंग का स्वरूप एवं सरक्षण कार्य : 'मरुस्थल प्रकृति की देन है, जिसके प्राकृतिक वातावरण-रेत, वन- स्पति, जीव. भू-रचना, जलवायु व ऋतुओं प्रादि ने मानव को बहुत प्रभावित किया है। इससे मानव के सामने अनेक समस्यायें उत्पन्न हुई, जैसे जल कष्ट, अकाल (सूखा), मरुस्थल का विस्तार, भू-सरक्षण; भूमि का खारीपन, टिड्डियों का प्रकोप आदि; इन समस्याओं के प्रति जागरूक रह कर प्रकृति से जूझ कर जीवित व सुखी रहने के लिए वालक-बालिकाओं को योग्यतम बनाने की तैयारी करना ही 'मरु स्काउटिंग' है। मरुस्थल 'हरा भरा हो जाय' हमारा नारा है । मरु- वासियों का.कल्याण और सेवा हमारा उद्देश्य है, यही मरु-कल्याण' है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए, एक मरु स्काउट उन कलाओं और तकनीकों में प्रशिक्षित किया जायेगा, जिनके द्वारा वह मरुभूमि को हरे भरे चरागाहों में बदलने को विभिन्न योजनाओं में सहायता कर सके। "मरुस्थल में कैसे सुखो रहें और उसके वातावरण में स्काउट कला का कैसे उपयोग करें" --यह मरुकला है, जिसके छः अग है- (a) प्रकृति तथा उससे उत्पन्न समस्याओं का अध्ययन, (2) इसके लिए मानवीय प्रयासों, लोककला व संस्कृति तथा · जनजीवन का अध्ययन, (3) भूसंरक्षण (4) वनसंरक्षण, (5) जीव संरक्षण और (6) जल सरक्षण। इस प्रकार "मरुकला" हमारा साधन है और 'मरुकल्यारण' उसका साध्य । श्री दत्त के शब्दों में "मरु कल्याण का अर्थ है, मरुस्थल हो हरा भरा (Green), सम्पन्न (कीर्तिवान् Glorious) और सुखी (Gay) बनाना मरु स्काउटिंग स्काउट कला मरुकला और मरुकल्याण का एक समन्वित व प्रायोजित कार्यक्रम है"; जिसको मूल योजना 1956 में श्रीकृपय दत्त शर्मा (राजस्थान) द्वारा बनाई गई थी, जिसे श्री जगन्नाथसिंह मेहता ने 1971 में जापान में21वी विश्व स्काउट कांफ्रेंस में प्रस्तुत किया और इसकी मुक्त कंठ से सभी ने सराहना की। • कृपया विस्तृत विवरण के लियै "परिशिष्ट" में देखिये । ।
12 ] मरु-स्काउटिंग साधारण स्काउटिंग से भिन्न नहीं हो सकती, वरन् यह मरुस्थलीय गतिविधियों के विशेष दृष्टिकोण से युक्त स्काउ- टिग है। समुद्री स्काउटिंग की तरह मरु स्काउटिंग भी एक विशेष शाखा है, जो मरुस्थल की विशेष परिस्थितियों से सम्बद्ध है। मरु स्काउटिंग का कार्यक्षेत्र और संभावनाएं: मरु स्काउट शाखा के लिये संसार के अनेक देशों में कार्यक्षेत्र मिल सकेगा। मरुस्थलीय देशों-भारत, पाक, ईरान, ईराक, संयुक्त अरव गणराज्य, सऊदी अरव, फिलिस्तीनी, इजराइल, जाईन. मेक्सिको, केलिफोनिया, चिली, घाना व मध्य-प्रास्ट्रेलिया के देशों में इसको अनन्त संभावनाएं है । मरुस्थल के विस्तार को रोकने के लिये भू संरक्षण के कार्यक्रम की ओर आज सारी दुनियां प्रयत्नशील है और मास्थलीय देशों में अपने पिछड़ेपन को मिटा कर प्रगतिशील बनने की लगन है । अतः जब तक मरु कल्याण के आदर्श को पूर्ति नहीं होती, तब तक मरुस्काउटिंग के लिये सेवा के अभ्यासों की कमी नहीं रहेगी। इस प्रकार मरु स्काउटिंग का क्षेत्र विस्तृत और इसकी सम्भावनाएं अनंत हैं। मर स्काउटिंग के क्रिया-कलाप व प्रशिक्षण: किशोरावस्था के चालक बालिकाएं मरुस्थलीय जीवन से प्रोतप्रेत लोक गीतों को धुन के साथ नृत्य करते हुए जब मरु कल्याण के सेवा कायों की ओर प्रागे बढ़ते हैं, तो एक नई उमंग, नया जीवन और नया उत्माह उमड़ पड़ता है, ग्रामीण जीवन में । फिर तो बालक ही नहीं, प्रौद भी उन्हें अपना महयोग देने लगते हैं। सड़कों के किनारे वालू के टोलों पर पाम लगाना या यणायन्धी करना, मरस्पल को हरा-भरा बनाने के लिये वृक्षारोपण करना, कटाव को रोकने के लिये सांइयां पाटना, टिट्टी मालमण का मामना करना, रोतो में कंदर पंधी में मदद करना मादि यह मय फार्ग योजनाबद्ध तरीके से गे मर स्काउट सपा गाइः फरते हैं। वृक्षारोपण केवल एक प्रौपचारिकता नही. हर टोनी अपना एक पेट और दस मूजे सगायेगी भोर तीन माह तक उनसी देगमान करेगी। यह उनके "भूसंरक्षण" बिल्ला की एक मापयर परीक्षा है। देखते हैं. भय से वृक्ष य मूजे विना संभाल के पारए मर जामग?" - I g"(माहिक) परपरी, 1968 में प्रगति मामडी रोमामार।
[ 13 अपने पानी के कुण्ड को साफ करना, ग्रामीण जलाशय की सफाई, पानी को शुद्ध करना, स्थानीय पालतू पशुओं को देखभाल, लोकगीत व लोक नृत्यों का शौक, कुएँ से पानी खींचना, स्थानीय रोगों (जैसे नहरुपा, पीनासाप का सांस पी जाना, भवरी में फंसना, रात को पाला मारना, घो-पीनियां आदि) से बचने के पूर्वोपाय सीखना, नयी-नयी गांठे (वेलचा मोहरा, छीका, अनंत)सोखना, ऊंट को पीठ पर दस कि.मि. की यात्रा करना, यह सव मरु स्काउटिंग के प्रशिक्षण के अंग हैं। मरुस्थल के जन जीवन, प्रकृति, जल व सिंचाई, कला-कौशल व भ्रमण का अध्ययन करने वाले मरु स्काउट को 'मरुवासी' का बिल्ला मिलेगा। इस प्रकार ऊंट की देखभाल, मरुस्थल में भ्रमण व लाक जीवन का अध्ययन करने वाले स्काउट को ऊंट चालक' का बिल्ला मिलेगा। भूसंरक्षण के कार्य में योजनावद्ध सेवा करने वाले स्काउटों को 'भूरारक्षरण' का बिल्ला दिया जायेगा ।। मागे क्या? इस प्रकार स्काउटिंग के कार्यक्रम में 'संरक्षण' सम्बन्धी अनेक अभ्यास सम्मिलित किये गये है, जिनको संसार भर में बालक-बालिकायें और युवा-युवतियों द्वारा अपनाया जा रहा है। प्रदूपण-निवारण या सरक्षण के ये अभ्यास वैज्ञानिक एवं शैक्षणिक खोज पर आधारित हैं । इनका उपयोग शिक्षा के क्षत्र में हर स्तर पर किया जाना चाहिये, ताकि आने वाली पीढी प्रदूषण से टक्कर ले सके और मानवता की रक्षा कर सके। आइये, अगले अध्यायों में हम इस महान् कार्यक्रम के सक्रिय स्वरूप की एक झलक प्राप्त करें। 1. कृपया दक्षता के बैज के पाठयक्रम के लिये परिशिष्ट (2) में देखिये ।
अध्याय (2) कब-बुलबुल के लिए विश्व संरक्षण बैज [World Conservation Badge for Cub/ Bulbuls] जांच (1) निम्न (नौ) कार्यों में से कोई तीन करें:- 1. एक पशुशाला (200), वनस्पति उद्यान, प्रकृति इतिहास संग्रहालय का भ्रमण करें-या-जंगली पशुओं के बारे में कोई फिल्म देखें और अपने अवलोकन के बारे में परीक्षक का बतावें। इस कार्य के लिए जंगली पशुओं की आदतों, रूप-रंग, बोली या आवाज और भोजन आदि के बारे में ज्ञान प्राप्त करना है। इसके दो साधन बताये गये है-(1) पशु शाला या चिड़िया घर आदि की सैर करना। पाप पशु को देखिये और उसके बारे में ज्ञान प्राप्त कीजिये। इसके बाद अपने परीक्षक को बताइये कि आपने वहां कौन- कौन से पशु देखे और वे कैसे थे? (2) फिल्म देखकर भी इसी प्रकार ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है । पशुओं को देखिये और ज्ञान प्राप्त कीजिये सिंह (चित्र सं.) हिरण (चित्र सं. 8) गजराज (चित्र सं.) 2. कम से कम तीन महीनों के लिये एक पालतू (Pet) रखें और उसको सावधानी से देखभाल करें। पालतू पशु या पक्षी कोई भी हो सकता है। पशुओं में गाय, भैस, भेड़, बकरी, ऊंट, गधा, घोड़ा, कुत्ता, बिल्ली, खरगोश, नेवला, 1, 7 से 11 वर्ष के भाप समूह के बालकों के लिए।
[ 15 हिरण प्रादि पाले जाते हैं और पक्षियों में ताता, मुर्गा, तीतर, कबूतर चिड़िया आदि को लोग पालते हैं। आप कोई एक चुन लीजिये और उसे पालनू बनाइये और उसकी देखभाल कीजिये, बड़ा आनन्द प्रायेगा। कुत्ता (चित्र सं. 10) तोता (चित्र सं. 11) खरगोश (चित्र सं. 12) पालतू पशु-पक्षी रखिये, प्रानन्द प्राप्त कीजिये। 3. किसी सार्वजनिक उद्यान या बगीचे. विद्यालय के क्षेत्र या अन्य किसी सार्वजनिक स्थान पर "गन्दगो हटानो अभियान" में (कुल) तीन घण्टों के लिये एक बार में एक घण्टे का उपयोग करते हुए भाग लें। "गन्दगी हटायो" या सफाई अभियान शुभ कार्य को घर से प्रारम्भ कीजिये । पहले कव-स्काउट अपने घरों की सफाई करें, फिर यह सामूहिक अभियान (कार्यक्रम) मनावें- इसके लिए प्रतिदिन एक-एक घण्टा करके तीन दिन तक कार्य करना है। सफाई कहां करें, इसका निर्णय पैक मीटिंग में कीजिये। यह महान् सेवा कार्य है। इस अभियान का एक नमूने का कार्यक्रम आगे दिया गया है। 4. प्रकृति अध्ययन के लिये प्रायोजित 'पैक अभियान' (बाहरी पैक मीटिंग) में भाग लें और अपने संग्रह का लेखा (लॉग) रखें। वाहरी पैक मीटिंग या पैक अभियान में प्रकृति का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये-फूलों व पत्तों के संग्रह, पखों के संग्रह पत्थरों व चट्टानों के संग्रह बड़े सुन्दर ढंग से तैयार किये जा सकते हैं। आपको 'संग्रहकर्ता' (Collector) बैज प्राप्त करना चाहिये । यह एक सरल जांच है। पक्षी-पालन 5. एक 'पक्षी स्नान" एवं "चुग्गा स्थल" बना- कर इसे संभालें। 6. पक्षियों के लिये "घौसला पेटिका" बनाकर उसे लगाइये।
16 ]
पक्षियों के लिये 'चुग्गा-स्थल बनाइये
Sta
(चित्र स. 13)
चित्र सं. 13 में (1) व (2) में A एक ट्रे है, जिसे B डण्डे पर
जमा कर वांधा है या कीलें लगादी है, C पर संतुलन के लिये पत्थर या
फल लटका दें। D पर काटेदार तार लगे है । (3) में डाली से पानी का
वर्तन लटका कर छोका' बनाया है, (4) में मक्का व वाजरी के मुद्दे
लकड़ी में छेदों में खड़े कर दिये है; (5) में हैगर से पाउडर का कटा
हुआ डिब्बा लटका कर चुग्गादानी बनाई गई है।
ये है-"घोंसला-पेटिका" के दो नमूने
(चित्र सं. 14)
(चित्र सं. 15)
IASid आप भी वनाइये और पक्षियों के सच्चे, मिन नियः ।। 'पक्षी स्नान' के लिये छीका चित्र से 1320 में (3Yएक अच्छा साधन है । प्रागे हम 'पक्षी स्नान कुण्ड' (चि संबनाना भी बतायेगे। पक्षी स्नान का एक नमूना लीजिये- r-MI. DH D लकड़ी के स्टैड के सहारे एक वोतल B भरकर प्लेट E में उलटी लटका कर A व C पर बांध दोजिये। पक्षियों को पौने व स्नान के लिये पानी मिलता रहेगा। प्राप भी इनमें से कोई धनाइये (चित्र सं. 16) वन संरक्षण : झाड़ियां व घास लगाना 7. ऐसे क्षेत्र में जहां बनस्पति का आवरण नहीं है, झाड़ियां या घास लगाइये और उसकी कम से कम तीन माह तक देखभाल कीजिये। जहां धास, झाड़ियां या पेड़ पौधे नही होते, वहां मिट्टी (मृदा) का कटाव अधिक होता है ।देखिए चित्र सं. 35, 36, 54)। इस कटाव को रोकने के लिये झाड़िया या घास लगाते है। अपने क्षेत्र में कौन-सा घास झाड़ी उगती है और लगायी जा सकती है इसका पता कीजिये। फिर सड़क के दोनो ओर की पट्टी में, स्कूल की बाड़ पर, खेतो को मेड़ पर, ग्राम के चारागाह में घर के सामने लॉन मे पास लगाइये, झाड़ियां लगाइये। सब मिलकर इसकी तीन माह तक देखभाल कोजिये, पशुओं-विशेप कर बकरियों से इनकी रक्षा कीजिये। 8. पिछवाड़े या बगीचे में "खाद को ढेरो" प्रारम्म कोजिये । घर पर बाड़े (पिछवाड़े) में या बगीचे के कोने में एक स्थान चुनिये और वहां एक छोटा गड्ढा बनाकर उसमें गोवर, हरे पत्ते आदि को दबाकर खाद बनाइये। खाद की ढेरी चित्र सं. 65 के (2) में दिखायी गई है। खाद का गड्ढा या खाई चित्र (1) में है. जिसके A, B, C तीन भाग हैं। पहले भाग A में, फिर C में कचरा व खाद डालते हैं । अन्त में भाग B को भरते है । खाद की तह पर मिट्टी की पतली परत व चूना डालकर थोड़ा पानी छिड़क देते हैं । यह खाद "कम्पोस्ट" 18 ] : सर्वश्रेष्ठ खाद होती है। आप भी ऐसी 'खाद की खाई बनाइये आपके क्षेत्र में कोई "गोबर गैस यन्त्र" लगा हो तो उसका भी अव- लोकन कीजिये 9. भूक्षरण (मिट्टी के फटाय- अपरदन) के भय तया उसको रोकने के प्रारम्भिक उपायों का प्रदर्शन करें। आगे अध्याय (5) "भूसंरक्षण वैज" में इस बारे में पूरी बातें बताई गई हैं । कवावुल वुल को जानना चाहिये कि- कैसे वायु और पानी कटाव करते हैं ? इसका प्रारम्भिक उपाय--पेड़, पौधे व घास उगाना है या मेड़वन्दी करना है। जांच (2) : खुले मैदान में, बालकनी में बक्स (खोके) में या घर के भीतर गमलो में अपने पर्यावरण को विकसित करने के लिए कोई वृक्ष या छोटी घास पट्टी (लॉन) या कोई पौधा लगाइये। (पौधा लगाना अध्याय (5) में चित्र सं. 61 व 62 में बताया गया है। परिशिष्ट' में अभ्यास सं. 2 से 6 तक पढ़िये] जाँच (3): निम्न (तीन) में से कोई एक परियोजना (प्रोजेक्ट) चलाइये--- प्रोजेक्ट (1)---एक चित्र-पुस्तिका (स्क्रेप बुक) बनावें और अपने परीक्षक को पशु शाला के पांच पशुओं के बारे में (निम्न) विवरण बतावे--उनकी उत्पत्ति का देश, खाने की आदतें तथा पशुपालन में उनकी विशेष सभाल की आवश्यकता । एक एलवम या मोटे कागज की कापी में पशुओं के चित्र काटकर चिपकाइये। या पत्रिकाओं में आपको ऐसे चित्र मिल जायेगे। बाजार में पशुप्रो के चित्रों का चार्ट भी मिलता है, खरीद कर काट कर चिपकाइये। प्रत्येक चित्र के नीचे पशु के बारे में ऊपर बताई बातें नोट कीजिये। प्रोजेक्ट (2) अपने एक मित्र की मदद से अपने पैक के लिए प्राकृतिक चिन्ह पक्ति (Natural Trail) को व्यवस्था करें (बनावें) कव या बुलबुल के लिये प्राकृतिक चिन्ह सरल होते हैं। आप जगल मे जाइये, पेड़ो की कुछ टहनियां या पत्ते लीजिये और रास्ते में रखते जाइये । तीर-या क्रासxके चिन्ह भी कहीं-कही लगाइये। पत्थर पर पत्थर रखकर चिन्ह बनाइये। आपको बनाई हुई इन चिन्हों प्रखवार -
[ 19
की पंक्ति का सव पैक/प्लाक अनुसरण करें। रास्ते में प्रकृति का
अध्ययन करें । "खजाने को खोज" का खेल इसी प्रकार का अभ्यास है।
प्रोजेक्ट (3) :-एक जंगली-पशु या वृक्ष, महली या पक्षी का
चयन कर उसके बारे में जितनी खोज कर सकें करें और परोक्षक को
अपनी खोजों का विवरण बतावें ।
जंगली पशु-सिंह, चीता, बाघ, बघेरा, हिरण,
चीतल, साभर, भेड़िया, लोमड़ी, बन्दर, खरगोश,
आदि ।
वृक्ष (पेड़)-आम, नीम, बरगद (बड़), पीपल, शीशम
खेजड़ा, बबूल, अरेड, अडू, रोहिड़ा, खजूर आदि ।
पक्षी-मोर, तीतर, कबूतर, तोता, गीध, नीलकण्ठ,
गोरैया, कोयल, कठफोड़वा आदि ।
मछली कई तरह की मछलियाँ 'मछली पेटिका (एक्यूरियम
में) पालते है।
--आप कोई एक चुन लीजिये और उसके बारे में कोई पुस्तक
पढ़िये, पूछताछ कीजिये व ज्ञान प्राप्त कीजिये।
(2) यह बैज कमीज की जेब के ऊपर दांई ओर सीने पर या जरसी
पर समान स्थान पर धारण किया जावेगा।
अध्याय (3) स्काउट/गाइड के लिये विश्व संरक्षण बैज (World Conservation Badge) इस बंज के लिये स्काउटों को सात जाचें पास करनी है, जव कि गाइड्स को केवल छः जांचें। जांच सं. 3 गाइड्स के पाठ्यक्रम में नहीं बादल रादा प्रादि का प्रकृति और जल सेंटर जांच (1) - निम्नलिखित परिभाषिक शब्दों का वर्णन करते हुए संपूर्ण ‘जलचक' (Water Cycle) को चित्रित करते हुए रेखाचित्र बनाइये:-1. वर्षा (Precipitation), 2. निकास या बहाव (Run-ofr), 3. भूगतजल (Ground Water), 4. जलतल (Water table), 5. वाप्पीकरण(Evaporation), और 6. जलभाप का उठना(Transpiration)| प्रकृति में जलचक्र समुद्र, नदी, तालाव पानी वाष्पीकरण से जल भाप बनकर उठता है. जो वायु द्वारा उड़ कर जाते हैं । और धूल करणों से (चित्र सं. 21) मिलकर ठंडे होकर (Precipitation) वर्षा करते है । वर्षा का पानी भूमि पर गिरकर बहता है, कटाव करता है, यह निकास या बहाव नदी, वहकर वापस समुद्र में चला जाता है। इस प्रकार प्रकृति में 'जलचक्र' चलता रहता है । भूमि में जो पानी नीचे रिस जाता है, वह "भगत जल" कहलाता है, जो कुओं व स्रोतों से हमें प्राप्त होता है । 1. 11 से 18 वर्ष के मायु समूह के बालकों के लिये। .
[ 21 कुओं में पानी के तल को 'जलतल' कहते हैं। आगे चित्र सं. 22 में जलतल दिखाया गया है। आप इन चित्रों को बनाइयों। प्रदूषण के भेद जांच (2) प्रदर्शित करें कि वह निम्न प्रकार के प्रदूषण के प्रमुख कारणों और इनको रोकने के उपायो से परिचित हः- 1. जल, 2. वायु (मय कोलाहल के), 3. मृदा या मिट्टी और 4. कचरा या कूड़ा। (क) जल प्रदूषण (Water Pollution) महत्त्व :--"जल ही जीवन है ।" इसके बिना कोई जीव या वनस्पति जीवित नही रह सकती । इराकी सभी को अनिवार्य आवश्यकता रहती है । यह मानव के पीने के लिये, धोने के लिये तथा कल- कारखानों के लिये आवश्यक है । हमारी पृथ्वी का तीन-चौथाई भाग जल से घिरा हुआ है, परन्तु उसमें से मोठा पानी केवल 3 प्रतिशत ही है, दाकी सब खारा पानी है; जो बेकार है। कारण :- यह पानी हमारे कल-कारखानों, घरेलू उपयोग तथा ! कृषि आदि के कारण दूपित हो जाता है । चित्र सं. 22 में बताया गया है कि कुएं का पानी प्रास-पास को गन्दगी से जलतल में किस प्रकार गन्दा या दूपित हो जाता है। (वित्र स. 22) जब समुद्र में जहाज तेल छोड़ देते हैं, तो जल दूषित हो जाने से मछलियां व जल-जीव मर जाते हैं । शहरों की गन्दगी के नदियों में डालने से उनका पानो दूपित हो जाता है।
22 ] स्काउट-गाइड क्या करें? कुछ उपाय, कुछ सुझाव : पानी को दूपित करना और वेकार करना दोनों सामाजिक अपराध है। हमें स्काउट-गाइड के रूप में इसके लिये निम्नांकित संरक्षण-कार्यत्रम अपनाकर तथा इनका प्रचार कर मानवता की सेवा करनी है 1. अपने ग्राम या शहर के आस-पास उन स्थानों का पता लगा कर सूची बनाइये, जहां पानी दूपित हो रहा है या बेकार किया जा रहा है। . 2. जहां पानी दूपित हो गया है, उसे पीने के लिए लोगों को मना कीजिये। एक बार्ड लटकाइये -'यह पानी पीने योग्य नहीं है।" 3. अपनी पचायत/नगर पालिका/विकास समिति आदि को सूचना देकर उस पानी को साफ करवाने में मदद कीजिये। 4. किसी एक कुए, टांके, नदी, या तालाव का नाप चयन कर उसे अपनाइये, गोद-लोजिये। यह एक सुन्दर व अद्भुत विचार है । समय-समय पर उस कुए प्रादि को सफाई कोजिये उसमें कोटाणुनाशक दवा डालिये। कुएं पर टोली या ट्रप के नाम का बोर्ड लगाइये, इससे हमारे संगठन का प्रचार भी होगा । 5. पानी में कछुए व मेंढक उसे साफ करने का काम करते है। इनको मारना पाप है। कृपया 'पाचवां नियम' याद रखिये "स्काउट पशु पक्षियों का मित्र और प्रकृति प्रेमी होता है।" 6. घरो का कूड़ा-करकट गाड़ दीजिये, इसे तालाब या नदी में मत डालिय। 7. ग्राम के तालाब के टूटे किनारे, टूटे बांध, भटकते पशु-ये सब पानी को गन्दा व दूपित करते है। पेय जल को इनसे बचाने का अभियान कोजिय, श्रमदान कीजिये। 8. बार-बार शौचालय के फ्लश को चलाकर हम एक बार में लगभग दो गैलन पानी बेकार खर्च कर देते है। 9. बाजार के सुले नलों को बन्द कीजिगे, पानी बचाइये, "स्काउट मितव्ययी होता है।" 10. कार या ट्रेक्टर का निकला तेल तालाव या कुएं के पानी को दूपित कर देता है।
[ 23 Frow d- 11. "मरु स्काउटिंग" शाखा के अन्तर्गत मरु क्षेत्रों (Arid Zone or Desert) के लिये कुछ विशेष कार्यक्रम एव गतिविधियां 'जल संरक्षण' के अधीन रखो गई है। कृपया इनके लिये देखिय-परिशिष्ट (2) । पठनीय पुस्तकें 1. मरु-स्काउटिंग (दत्त) (1967) धोरां री लहर (6) पृष्ठ 23 2. मरु-स्काउटिंग के 21 अभ्यास (दत्त) पृष्ठ 5 3. स्काउट-कलो के अभ्यास (दत्त) पृष्ठ 107 4x Deseri-scouting in Action (Dutt) page 28. tra जल शुद्धिकरण योजना Clean Water) D दूषित जल पाने से अनेक रोग (दस्त, पेचिश, नहरुग्रा, टायफाइड आदि) होने का भय रहता है। पानी को साफ करके पीना चाहिये । पानी को साफ करने के कई तरीके हैं, जिनका हम यहां वर्णन करेंगे। चित्र 23 जल शुद्धिकरण की विधियां (तरीके)। जल में तीन प्रकार की अशुद्धियां होती है-1. तैरते हुए ठोस पदार्थ (अघुलनशील) 2. जल को कठोर (भारी) बनाने वाले खनिज व लवण और 3. रोगों के जीवाणु.। प्रकृति स्वयं जल को शुद्ध करती है, पर मानव भी इसे साफ करने के लिये कई तरीके अपनाता है । ये तीन प्रकार के होते है 1. प्राथमिक उपचार (Primary Treatment):- जो सबसे पहले करने के होते हैं : 1. जल का मासवन (भाप बनाकर उसे वापस पानी में बद- लना)- यह तरीका केवल दवाइयों के लिए काम का है, इससे बड़ी मात्रा में पानी साफ नहीं किया जा सकता। इसके लिए आप एक प्रयोग कीजिये-(चित्र संख्या 24) चाय की केतली में पानी उबालिये और चौड़े मुंह की बोतल (जार) में बड़ा 24 ] लगाकर उसमें एक रबड की नली केतली के मुंह से लगाकर काग के छेद में से जार में डाल दें और एक रवड़ या कांच की नली हवा निकलने के लिए लगा दें। (चित्र में देखिये) इस जार को ठण्डे पानी या वर्फ के पानी के बर्तन में रस दें। इससे जार में मासुत (डिस्टिल्ड) जल प्राप्त होगा। इस क्रिया को 'पासवन' कहते है। इसे प्राप करके देखिये। (पासवन को सरल प्रिया चित्र 24 का प्रयोग) 2. उबालना-सबसे सरल व उत्तम तरीका है-जल को उबालकर छानकर व निथारकर व ठण्डाकर काम में लीजिये। II. रासायनिक उपचार (Chemical Treatment)- कई रसायनों से गन्दे जल को शुद्ध करते है, इनमें दो प्रकार की क्रियाएं होती है- (क) अवक्षेपन (नियारना)-चूना, फिटकरी, निर्मली का फल निथारने वाले पदार्थ है। एक गलन जल में 6 ग्रेन फिटकरी मिलाई जाती है। फिटकरी का बड़ा ढेला पानी में कुछ देर रखकर बाहर निकाल लेते है। इससे कुछ देर बाद जल की सारी गन्दगी नीचे बैठ जावेगी। फिर पानी को दूसरे बर्तन में निथार कर छान लेते हैं । (ख) जीवाणुनाशक का प्रयोग करना-- (1) पोटेशियम परमैगनेट-इसे 'पिंकी या लाल दवा' कहते है। एक कुएं के लिये आधी छंटाक लाल दवा को बाल्टी में घोलकर कुए मे पानी में उतार कर हिला देते हैं। इससे पानी का रंग गुलाबी हो जाता है। कुंए का पानो 24 घण्टे बाद ही पीने के काम आवेगा। (i) नोलायोथा या तूतिया (कापर सल्फेट) भी पानी साफ करता है । इसका घोल भी कुए के पानी में डाल देते है । पर 2-3 दिन तक उस कुंए का पानी पीने के काम नही पायेगा । (iii) ब्लीचिग पाउडर पानी में मिलाने से क्लोरोन गैस निकलकर जीवाणुओं को नष्ट कर देती है। इसको क्रिया चार घण्टे तक चलती ।
[ 25
है। एक गैलन (वाल्टो) पानो में चाय का आधा चम्मच ब्लीचिंग पाउडर
घोल देने से चार घण्टे बाद पानी साफ हो जाता है।
(iv) टिंचर आयोडिन (2 प्रतिशत) को चार बूंदों से एक किलो
पानी साफ हो जाता है।
(v) बड़ौदा की "Reckon Remedies" सस्थान ने PURIT-POT
नामक एक टिकिया जल शुद्ध करने के लिये बनाई है। दवाइयों की
दुकान पर पूछिये ।
III यान्त्रिक उपचार (Mechanical Treatment)
(क) छानना या निस्पंदक (फिल्टर)-पानी को साधारणतया मोटे
कपड़े खादी से छानना चाहिये (देखिये चित्र स. 23)। अधिक मात्रा में
पानी साफ करने के लिए निष्यन्दक (फिल्टर) काम में लिये जाते है ।
हम यहां कई प्रकार के फिल्टर-तरीके बता रहे है :
1. साधारण फिल्टर--(चित्र सं. 25) : एक गमला (A) में पेंदी
में छंद C में रूई लगी है और मोटी वालू मिट्टी की परत (B) है, जिसे
1
84-2
AN
(चित्र सं. 25) (चित्र सं. 26) (चित्र सं. 27)
(साधारण फिटर) (प्रायोगिक फिल्टर)
घरेलू निस्पंदक
(डोमेस्टिक फिल्टर)
तिपाई D पर रखकर नोचे वर्तन रख दें नोर गमले में पानी भर दे। इसी
प्रकार की बालू की टकियों के फिल्टर से जलकर-योजना में पानी छाना"
जाता है।
26 ]
2 प्रायोगिक फिल्टर-(चित्र सं. 26) : एक पेंदा कटी बोतल के
। मुह पर. छेददार काग लगाकर उसमें छोटी कांच
नलिका लगाइये।
1 पर धुनी रूई, 2 पर साफ
रोड़ियां [ककड], 3 पर मोटी बालू, 4 पर महीन
बालू, 5 पर कोयले को पीसकर पानी में मिलाकर
लेप-सा बनाकर डालिये । अब 6 पर गंदला पानी भर
दीजिये । नीचे गिलास में साफ पानी इकट्ठा कीजिये ।
3. घरेल-निष्यंदक (डोमेस्टिक फिल्टर) (चित्र
सं. 27) . घरी में टंकीनुमा फिल्टर काम में लिया
जाता है।
4: घटविधि का फिल्टर-यह सबसे पुराना
तरीका है, जिसके आधार पर आधुनिक फिल्टर विधि
विकसित हुई है। 1 में गन्दा पानी है, नोचे छेद में
साफ रूई या कपड़े का टुकड़ा लगा देते है, II में नीचे
(चित्र स 28) 'घट विधि'
महीन बालू और उस पर कोयले रखते हैं, III में नीचे कंकड़ व ऊपर
मोटी वाल रहती है, 1V में छना हुआ साफ पानी है। इसे पीने के
काम में लिया जा सकता है ।
जल शुद्धिकरण संयत्र (जलकल) की कार्यप्रणाली
बड़ी मात्रा में जल साफ करने के लिए, "जलकल संयन्त्र" में
B
A
HEENA
SES
FREE NIRAIL
URL:
al
चित्र 29 सं.
[ 27 जल शुद्ध करने को जो विधि प्रानाई जाती है, वह चित्र सं. 29 में स्पष्ट दिखाई गई है। झील, तालाब, नदी, नहर या कुए के पानी को जलकल (फिल्टर हाऊस) में लाते हैं, जो पहले A टकी में आता है उसमें a द्वारा फिटकरी मिलाते है, पानी B टको में जाता है, जहां गन्दगी नीचे बैठ जाती है और C टंको में बालू मिट्टी के फिल्टर से इनकर D टंकी "मुख्य फिल्टर" में जाता है, (1) महीन बालू (2) मोटी बालू (3) छोटे ककड़ (4) और मोटे ककड़ (चूना के) (5) में से छनंता या पानी टकी F में जाता है, जहा E टको से b से क्लोरीन गैस मिलाई जाती है और फिर संग्रह-टको के द्वारा जल वितरण किया जादा है। आइये, इस 'जलकल' का एक माडल बनावे जल शुद्धिकरण संयन्त्र (एक माइल)
28 ]
सूक्ष्मदर्शी कांच से उसमें
कार्यक्रम
1. अपने पीने के पानी के स्रोतों का पता लगाइए।
2. फिर उसके पानी की जांच कीजिए। एक गिलास में पानी
लेकर उसमें रख दे। फिर ध्यान से देखे या
जीवाण या कीड़े देखिये । इसमें लाल दवा के 3-4 दाने डालिये, यदि
5-10 मिनट में ही पानी का गुलाबी रंग उड़ जावे, तो समझिये कि
पानी को शुद्ध करने की आवश्यकता है।
3 अव कुए, तालाव आदि मे कोई रासायनिक-लाल दवा या
ब्लीचिंग पाउडर डालने की व्यवस्था कीजिये।
4. स्थानीय 'जलकल संयन्त्र' को देखने जाइये और उसकी प्रणाली
को समझिये।
5. अनेक छानने की विधियों का जन-प्रदर्शन कीजिये । जनता को
जगाइये।
6. सोख्ता गड्डा हर घर, स्कूल, प्याऊ आदि पर बनाइये, ताकि
पानी फैलकर गन्दगी न करे।
7. वेकार व काम में लिये हुए पानो को किसी पेड़ में देने के
लिये नाली बनाइये
8. 'प्रादर्श नलकूप' (हैण्ड पम्प लगा हुआ) बनाने के लिये
प्रयास कीजिये।
(चित्र सं. 31)
(प्रादर्श नलकूप)
(ख) वायु प्रदूषण
एवं कोलाहल
महत्त्व-वायु प्रत्येक जीव के
श्वांस लेने के लिए आवश्यक है; परंतु
वायु वायुमण्डल में केवल पहले 5 या 6
किलोमीटर तक ही है। दिन प्रतिदिन वायु में आक्सीजन कम होती जा
रही है, यह एक समस्या है।
[ 29 मुख्य कारण कल कारखानों का विपैला धुआ, मोटरों व कारों का धुपा-एक कार 900 लीटर विपला पदार्थ एक किलोमीटर में छोड़ती है; एक जेट विमान 24000 कारों के बराबर धुआ व विष छोड़ता है। तेल से चलने वाले भट्ट, कोयला जलाने की धु प्रां-ये सब वायु को प्रदूपित करते हैं। दिन भर का शोरगुल, रेडियो या ट्रांजिस्टरों की तेज आवाज, टनटनाती घटियां-ये सब वातावरण को प्रदूपित करते हैं, कानों के लिये खतरनाक हैं। इन्हें कानून में "न्यूसेंस" (अपदूषण) सहते हैं। उपाय : क्या करें - क्या न करें? 1. एक शानदार प्रदर्शन (Demonstration) कीजिये। जिसमें पर्दो, बोर्डी, झण्डों, पचों आदि से प्रचार कीजिये । समाचार पत्रों में प्रचार कीजिये और नारों एवं सिंहनादों से जनता को वायु-प्रदूपण के बारे में जागरूक कीजिये । अन्त मे एक सभा या कैम्पफायर कीजिये और किसी प्रतिष्ठित सज्जन का भाषण करवाइये। 2. घरों में विशेष प्रकार की "सरक्षण-भट्टी' बनाइये । यह कम इंधन में अधिक ताप देतो है, धुपा कम देती है । घास, मिट्टी सब का बचाव करती है, चिनगारियां भी कम। एक प्रकार से अग्नि रक्षित (Fire proof) है। C एक डिब्बा (ड्रम) है, जिसमें B लोहे की छड़ें है, H आग के लिये स्थान, F दो ईटों पर ड्रम टिका है, नीचे 5 लोहे की चद्दर के नीचे D कंकड़ है। A बर्तन में भोजन बनाइये। चित्र सं 32) "संरक्षण भट्टो" 3. पेड़, झाड़ियां व घास लगाइये-यह वनस्पति कार्वन-डाइ. ऑक्साइड को लेकर ऑक्सीजन देती है, धूल को साफ करती है, तापक्रम को सतुलित करती है, शोरगुल को कम करती है, सम्पत्ति का मूल्य बढ़ाती है, और पास-पड़ोस को एक आकर्षक व रहने योग्य स्थल Mone (auteAIIMa बनाती है। -- 30 ] । 4. कार व मोटर वाहनो का उपयोग कम कीजिये, वैकार में इंजन मत चलाइये । साइकिल चलाइये । 5. बिजली को वचाइये। रेडियो प्रादि को बाजार में, खुले में बेकार में मत वजाइये । 6. धूम्रपान छोड़िये । 7. घर का कूड़ा-करकट गाड़ दीजिये, जलाइये नहीं । 8. विशाल "कैम्प फायर" मत कीजिये-यानी उनमें आग मत जलाइये या कम जलाइये। 9. हानिकारक रासायनिको का कम से कम प्रयोग कीजिये । 10. प्लास्टिक, सैल्यूलाइड आदि को कम जलाइये। 11. निर्धूम (धुआ रहित) चूल्हा बनाना सीखिये । (ग) मृदा ( मिट्टी) प्रदूषण या भूक्षरण (POLLUTION OF SOIL OR SOIL EROSION) [कृपया इस समस्या के लिये आगे अध्याय (5) में "भूसंरक्षण बैज" में पूरा विवरण पढ़िये । (घ) कचरा या कूड़ से प्रदूषण (POLLUTION BY WASTE & LITTER) कचरा वातावरण और स्थान दोनों को भद्दः व घृणित बनाता है। इससे कई रोगों के कीटाणु पनपते है । कवरा या कूड़ा दो प्रकार का होता है--(1) जो काम से आ जाता है-जैसे-टट्टो, गोबर आदि से खाद बनाते है, और (2) ठोस कचरा-- -जो कोई काम नहीं आता ढेर और लगता रहता है। इसे निपटाने की भयानक समस्या है। गन्दगी फैलाना मानव की आदतों पर निर्भर है। क्या करें-क्या न करें? गन्दगी विरोधी अभियान-सफाई-अभियान 1. अपने पास-पड़ोस मे गन्दगी के ढेरों की सूची बनाइये । 2. गन्दगो के डिब्बे (Dust-Bins) कहां-कहां लगे है ? 3. नगरपालिका, ग्राम पंचायत या अन्य स्थानीय प्राधिकारी को गन्दगी के ढेरो को सूचना देकर हटवाने के लिये प्रार्थना कीजिये। 4. गन्दगी के थैले (Litter Bags)-अपने ग्रुप में घरों के लिये गन्दगी डालने के थले या डिव्वे तैयार कर उनका उपयोग कीजिये। 5. कार में से चीजें बाहर न फेंकिगे। कार के साथ एक गन्दगी का डिव्या या थैला लगाइये।
[31 6. 'क्या आप गन्दगी फैलाते हैं ?' इस पर विचार कीजिये। निम्न प्रश्नों का उत्तर दीजिये-- (i) क्या आप वस का टिकिट उतरते ही सड़क पर फेंक देते हैं ? (ii) क्या प्राप मिठाई की खाली थैली या दौना सड़क पर फेंक देते है ? (i) क्या आप अपने मकान पर से कचरा सीधा नीचे सड़क पर गिराते है ? (iv) क्या आपके भाई बहिन (बच्चे) सड़क पर नाली में टट्टी करते है ? (५) क्या आप कचरा हर कही डाल देते हैं या निश्चित स्थान या वरतन में डालते हैं ? (vi) क्या गन्दगी को देखना आप पसन्द करते हैं या उसकी परवाह नहीं करते? (vii) क्या प्राप गन्दगी को हटाने के सामूहिक कार्यक्रम में भाग लेना पसन्द करते हैं ? (viii) क्या आप किसी स्थान को पहले से अधिक साफ छोड़ना पसन्द करते है ? 7. तीन भार (R) प्रोजेक्ट-Recover (इकट्ठ करो), Recycle (वापस करो) और Reuse (वापस काम में लो)- इसमें कागज, अखवार, कांच की शीशी, एल्युमिनियम या टिन के डिब्बे इकट्ठे करके वापस करो (वेचो) या किसी अन्य काम में लो,। इसका प्रचार कीजिये। 8. कनाड़ा का कचरा उठानो अभियान"-टोलियां बना कर स्थान-स्थान पर से कचरा उठाने के लिये नगरपालिका की मदद से अभियान चलाइये । जनता का सहयोग भा लीजिये। रोटरी क्लब, लायन्स क्लब आदि से सहयोग लीजिए। 9. कुछ करने योग्य बातें-बगीचे व सब्जी का कचरा खाद बनाने के काम में ले, कुत्ते या पशु को सड़क पर न वाधे, दीवारों या पेड़ों पर खरांच कर कुछ लिखना या पोस्टर चिपकाना भी गन्दगी है। 'पोस्टर हटानो' अभियान चलाइये। 10. विश्व भर स्काउट-गाइड की मर्यादा है कि-"सदा किसी स्थान को जैसा था उससे अधिक साफ व स्वच्छ छोड़िये।" ।
32 21. वेडनपावल ने कहा है-"जब तुम अपना शिविर समाप्त करो, तो पीछे दो चीजें छोड़ो- (1) धन्यवाद और (2) कुछ नहीं।" वन्य-पशु संरक्षण जांच (3) प्रदर्शित करे कि--वह उन करणों से परिचित है, जिनसे बहुत सो पशु-प्रजातियां प्राक्रान्त (भयभीत) है और उन पशुप्रो की जीवन रक्षा के लिए क्या किया जा सकता है । [गाइड्स के लिए यह जांच नही है वन्य पशुओं को अनेक भय है, जिनसे उनकी रक्षा प्रावश्यक है- प्रकृति को नष्ट करने के प्रयत्नों से पशु-पक्षियों का जीवन खतरे में पड़ जाता है। अन्धाधुन्ध शिकार करने से कई पशु इतने कम हो गए कि प्रकृति का सन्तुलन बिगड़ रहा है। आधुनिक सभ्यता ने इन वन्य जीवों को दूर जाने को बाध्य कर दिया है। प्रदूषण तथा कीटनाशक रसायनो से काफी संख्या में पशु-पक्षी (व मनुष्य भी) नष्ट हो रहे है । यातायात के साधनो ने इनको मारा है, बचाया नही। अतः इनकी रक्षा आवश्यक है... क्योंकि मानव की तरह इनको भी जीने का अधिकार है, ये प्रकृति सन्तुलन के अनिवार्य अंग है, कुछ जीवों को अधिक मारने से दूसरे जीव बढ़ जाते है । अधिकतर लोग वन्य जीवन का आनन्द लेना चाहते है, अतः उनके बिना यह धरती सूनी-सूनी सी लगती है । वन्य जीवन हमें कई लाभ देता है और इनकी बढोतरो स्वस्थ वातावरण के लिए शुभ है। प्रकृति और वन्य जीवों का संरक्षण हमारे स्वयं के अच्छे भविष्य के लिये भी आवश्यक है। वन्य जीव उस समय आक्रान्त (भयभीत) होते है , जब उनके जीवन के कार्यक्रम में बाधा पहुंचाई जाती है-यानी-उनके आश्रय (मांद या घोसले), भोजन, पानी और जीवन-यापन के लिये खुले स्था- को हम नष्ट करते है । जमीन का गलत उपयोग; जल, वायु और भूमि का प्रदूपण और मानव की कुछ आदतों ने इनका जीवन कठिन व भयावह बना दिया है । अनेक प्रकार के कीटनाशक विपों (Biocides) के प्रयोग से ये जीव विपले हो जाते है, जिन्हें खाकर दूसरे जीव और - .
[ 33 मनुष्य भी मर जाते हैं। कीटनाशक विप से भरे फल मानव के लिये घातक हैं। किसी कारखाने का छोड़ा हुआ पारामय पदार्थ पहले पानी के पौधों, के कीटों के द्वारा छोटी मछली और बड़ी मछली के पेट में होकर मछली-भक्षी मनुष्य को रोगी बना देता है। क्या करें-क्या न करें? 1. पक्षियों के धौंसलों से अण्डे इकट्ठ न करें, न छुएं। 2. सांपों को न मारें, वे कोड़ों को खाते है । 3. जंगली पशुओं का पीछा न करें, न उनको पालतू बनावें । 4. नष्ट प्राकृतिक वातावरण को पुनः स्थापित करें, ताकि वन- जीव उसमें बिना भय के रह सके। 5. प्लास्टिक की थैलियां और नाइलोन के फंदे जंगल में न छोड़ें। 6. याद रखिगे, डो. डी. टी. आदि कीटनाशक विष मनुष्य एवं पशु सभी के लिये खतरनाक है । 7. पशुओं के छोटे बच्चों को न छूए, न पकड़ें; क्योंकि फिर उनकी माता उन्हें नहीं पालती। 8 किसी “पशु संरक्षण समिति" या "विश्व वन्यजीवन निधि" के सदस्य बनिये। 9. पशुमित्र, पक्षीपालक आदि के दक्षता के बैज प्राप्त कीजिए। 10. पक्षियों के लिए चुग्गाघर, चुग्गादानो, स्नानताल, जलकुण्ड, धौसला-पेटिका प्रादि की व्यवस्था कीजिये । पक्षी पालिए। 11. जंगल में पशुओं के लिये मांद या छायादार स्थान तथा घास खाने के स्थान (घास दानी) बनाइये। .. बाहरी जीवन की संहिता (OUT-DOOR/COUNTRY CODE) इसका पालन कीजिए- जांच (4. : जब भ्रमण या शिविर में हो, तो प्रकृति को नष्ट नही कर उसे विकसित करने के लिए "क्या करें" और "क्या न करें" की तालिका बनावें। र स्वच्छता अपनाइए : रास्ते में, जलाशय पर, पर, खाने-पीने में गन्दगी न फैले। पानी स्वच्छ कर पा में लें।
34] 0 सावधानी रखें : सड़क पर, पहाड़ पर, जंगल में सुरक्षा के नियमों के पालन की सावधानी रखे। बोझा (भार) उतना ही लें, जो स्वयं पीठ पर ले जा सके। - प्राग से बचाव : जगल में आग न लग जावे, सुरक्षित स्थान पर आग जलावे। पेड़ों पर मधुमक्खी या बरं का छाता न हो । प्राग को पूरा बुझाये । 'सरक्षण भट्टी" (चित्र सं. 32) का प्रयोग करें। 0 सबके प्रति उदार रहें : किसी को भी (वन्य पशु-पक्षी वृक्ष, घास को भी) हानि न पहुंचावे, फाटकों को खुला न छोड़ें, खेत में पग- डण्डी पर चलें, दीवार या वाड़ न फांदे, विना अनुमति ईधन, पानी, सब्जी कुछ भी न ले। रात को भी किसी को शोरगुल से कष्ट न हो। 0 संरक्षण की भावना रखे : प्रकृति के साधनों-भूमि, जल, वन, चरागाह, वन्य पशु-पक्षी तथा राष्ट्रीय सम्पत्ति की रक्षा करें, दुरु- पयोग नहीं। संरक्षण के कार्यक्रम अपनाइये (जो इस पुस्तक में स्थान- स्थान पर दिये गये है)। - फल, बाध (शेर) को बचायो वनस्पति को रक्षा तुर्मुता जांच (5) : देश में ऐसे पौधों एवं पशुओं की एक सूची तैयार करें, (यथासम्भव चित्रों सहित) जिनके नष्ट होने का भय है। भारत एक विशाल देश ही नहीं, एक उप महाद्वीप है । अत: इसमें अनेक प्रकार के पेड़-पौधे (वनस्पति) तथा पशु (वन्य पशु-पक्षी) है । इनमें कुछ ऐसे हैं, जो दिन-प्रतिदिन नष्ट होने से कम होते जा रहे है। समाचार-पत्रों एव पत्रिकाओं में इनके बारे समाचार प्रकाशित होते रहते है। हमारा राष्ट्रीय पशु "शेर" है और राष्ट्रीय पक्षी "मयूर" (मोर) - इनकी संख्या कम हो रही है । सुन्दर वन (बंगाल) में गजराज (हाथी) तथा प्रासाम का गेण्डा, जैसलमेर (राजस्थान) में सोहन पक्षी, छापर (राजस्थान) मे काला हिरण और भारतीय बाघ (शेर) की संख्या घट रही है, जो चिन्ता का विषय है। इनको बचाने के लिये "अभया. रण्य" बनाये गए हैं-राजस्थान का 'घना पक्षी अभयारण्य विश्व . पौधों में कई प्रजातियां गायब हैं। विपकर और [ 35 प्रसिद्ध है। मिरिका (अलवर) ताल धापर, जैसलमेर, सवाई माधो- पुर, घोलपुर, जयमंमद, दर्रा (कोटा), आबू पर्वत (ट्रेवरताल) में राजस्थान में अभयारण्य बनाये गये हैं । कुछ प्रमुख अभयारण्यों की सूची आगे अध्याय 4 में, जांच (7) में दी जा रही है। "बाघ को बचायो" कार्यक्रम-1972 में विश्व वन्य-जीवन पद तथा "अन्तर्राष्ट्रीय व प्रकृति और प्राकृतिक साधन संरक्षण संप" सहायता व प्रेरणा से प्रारम्भ किया गया। 1972 में भारत में न 1827 बाघ बचे थे। राजस्थान में केवल 74 व महाग 160 वाघ थे। बाघ परिरक्षण व परिपालन योजनायें पार if Im हैं और वाघ के शिकार पर प्रतिवन्ध लगा दिया गया। में मानस, विहार में पालामऊ, उड़ीसा में सुरगीगाल, ना कार्वेट पार्क, राजस्थान में रणथम्भोर, मध्य प्रदेश का HERE में भैरू घाट तथा मैसूर में वान्दीपुर में "वाघ-शिक्षण मागासी" का आप अपने राज्य के अभ्यारण्यों की सभी ना हो कौन- कोन से पशुओं की रक्षा की जा रही है, मना पा र उनकी दुई पौधे। अपने क्षेत्र में पाये जान बाण दिनदन ही रहे हैं। सूची बनाइये । किसी वैद्य या पागल प्रा कार्य चालू है। बनाइये। लीजिये।
36 3
आगे चिनों में A में वनस्पति की रुकावट से कटाव कम होगा और
B में अधिक । अाप इनमें से कोई एक प्रयोग कीजिये।
बहते जल से भूक्षरण:-
(चित्र सं.35)
वायु से भूक्षरणः
(चित्र सं. 36)
प्रयोग 2 प्रदर्शित करें कि किस प्रकार मृदा (Soil) का निर्माण
होता है।
दो कच्चे पत्थर (Saad Stone) के टुकड़ों को लेकर आपस में
रगड़िये । इससे नीचे मिट्टी बनती है, इसमे जीवन तत्त्व (Humus)--
[37 खाद मिलाने से 'मृदा' का निर्माण होता है। एक चाय की चम्मच जितनी मिट्टी बनाने में कितना श्रम व समय लगता है। प्राकृतिक शक्तियां (वहता पानी, पाला या बर्फ, तेज वायु, हिमनद, कीड़े व पशु, भूकम्प व ज्वालामुखी) को उथल-पुथल से मृदा का निर्माण होता है । प्रयोग (3) प्रर्दाशत करें कि किस प्रकार पौधे प्रोपजन ऑक्सीजन उत्पन्न करते हैं : पौध सूर्य से शक्ति, धरती से पानी और वायु में से कार्बनडाई ऑक्साइड लेकर अपने पत्तों में पाये जाने वाले 'क्लोरोफिल' की मदद से अपना भोजन प्राप्त करते है और अोषजन उत्पन्न करते है। इस क्रिया को विज्ञान में प्रापजनीय विश्लेषण (Photo synthesis) कहते है । एक प्रयोग कीजिये- एक जार या बरणी में पानी लेकर एक कीप उलटा रखकर उसके नीचे जल में उगने वाले कुछ पौधे (सेवा प्रादि) रखकर ऊपर उल्टी परख नली लगाइये । (चित्र 37 देखिये) इसे कुछ देर धूप में रख दीजिये। पौधा मोषजन छोड़ेगा और परखनलो का पानी कम होता जावेगा।परखनली को हटाकर उसमें दियास- लाई की जलती सींक ले जाइये, यह तेजी से जलेगी। यह प्रोपजन कहां से आई ? (पौधे से)। (चित्र सं. 37) प्रयोग (4) एक गमले में दो मटर के बीज शीर्षमृदा में बोइये और दूसरे गमले में दो मटर के बीज अधोमृदा में बोइये । एक माह तक अवलोकन एवं सम्माल के बाद (क) दोनों गमलों में वृद्धि की दर का अन्तर और (ख) पौधों को प्राकृति में या अन्य प्रकार का कोई अन्तर जो ध्यान में प्रावे, उनका विवरण दीजिये। शीर्षमृदा भूमि को ऊपरी सतह की उपजाऊ मिट्टी है और अधोमृदा 34 फीट गहराई की नीचली सतह की मिट्टी । आप स्वयं प्रयोग कीजिये व परिवर्तन देखिये । शीर्षमृदा उपजाऊ होने से उसमें पोधा शीघ्र पनपेगा और बढ़ेगा, पर अधोमृदा में यह वृद्धि कम ---- होगी।
38 ] प्रयोग (5)-एक कांच के जार (बरणी या अमृत बाण) में नाले या नदी में से (तालाब, पोखर में से) गन्दा पानी इकट्ठा कीजिये और उसे कम से कम छ घण्टे पड़ा रहने दीजिये । इसको पेंदी में जमने वाली मृदा की मात्रा का अवलोकन कर यह बताइये कि आपके विचार से यह मृदा (मिट्टी) कहां से प्राई और क्यों ? गन्दा पानी : एक दुखद घटना इस प्रयोग में एक लीटर की वरणी लीजिये । मिट्टी पैदे में जम जाने के बाद पानी निथार कर निकाल दीजिये, नोचे की मिट्टी को नापिये या तोलिये प्रति लीटर या गैलन या किलो पानी मे कितनी मिट्टी है ? खेती के लिये उपयोगी शीर्षमृदा कट कर पानी के साथ बहकर उसे गदला बना देती है और हमारे खेत धुल जाते है। उनकी उपज कम हो जाती है । यह पानी के द्वारा 'भूक्षरण' (अपरदन) हो रहा है। प्रकृति तेरे विविध रूप प्रयोग (6) : अपने पास-पड़ोस की ऋतुओं (मौसम) का एक माह तक दैनिक-विवरण रखें, जिसमें वर्षा, धूप, कोहरा, तापमान, पवन वेग (गति), पवन दिशा, प्रार्द्रता सम्मिलित हो। मौसम का दैनिक विवरण (लेना) मौसम का अध्ययन करने के लिये आप अपने घर पर या विद्यालय में एक छोटी ऋतु-शाला' (Weather Station) बनाइये । अपने विज्ञान या भूगोल शिक्षक से मदद लीजिये । यंत्रों की सहायता से दैनिक-विवरण (लेखा) नीचे दी हुई तालिका में तैयार कीजिये । आपको एक माह तक ऐसा विवरण रखना है- दिनांक | प्राईता वायुदाब | वर्षा वायुवेग समय तापक्रम 2 3 4 5 6 7 विशेष विवरण यामुदिशा प्राकाश (बादल) 10 इसके लिये कुछ यन्त्र स्वय भो बनाइये । हम पागे इन यन्त्रों का सचित्र परिचय दे रहे हैं। मोसम के लिये अन्तर्राष्ट्रीम सकेत भी
[ 39
-
हैं, पर उनका प्रयोग करना आपके लिये अनिवार्य नहीं है। प्रतिदिन
निश्चित समय पर इन यन्त्रों को पढ़िये । 'ऋतुज्ञ' (वेदरमैनामीटरियो-
लोजिस्ट) का दक्षता का बैज प्राप्त कीजिये ।
1. तापमापी यर्मामीटर-ये तीन तरह के होते हैं-0 डाक्टरी
थर्मामीटर, (ii) साधारण तापमापी और (ii) न्यूनतम-अधिकतम
तापमापी। आप कोई साधारण तापमापी काम में लीजिये । चित्र सं.
38 में 'न्यूनतम-अधिकतम तापमापी' है. जिससे 24 घण्टे का कम से
कम और अधिक से अधिक तापमान मापा जाता है। इसका प्रयोग
मीखिये।
m
चितव
MAUTAM
तापमापी
(चित्र सं. 38)
भाद्रंतापमापी
(चित्र सं. 39)
वृष्टिमापी
(चित्र सं 40)
..
2. आतापमापी (Hygrometer) : चित्र सं 39) एक कार्ड बोर्ड
या कागज के डिब्बे पर श्राप दो साधारण तापमापी (A-B) रबड़ के
छल्लों से स्थिर कर दें। एक तापमापी को घुण्डी (B) पर जूतों का
फोता या कपड़े की थैली (C) चढ़ाकर बर्तन D में पानी में डाल दीजिये
अब दिन में एक बार दानों तापमापो यन्त्रो को पढ़कर गीले व सूखे
तापमापी के तापमान का अन्तर निकालिये और आगे दी गई सारणी
मोर मागे दी गई सारिणी को देखकर "ग्रार्द्रता का प्रतिशत" निकाल
कर लेखा में नोट कीजिए।
40 ] प्रापेक्षित आर्द्रता निकालने की सारणी [शतांश तापमापी (सेन्टीग्रेड) के लिए। सूखे तापमापी पर तापमान गीले व ठण्डे तापमापी का अन्तर 00 50 100 150 200 250 300 94 88 90 81 64 49 36 25 14 05 1,0 20 3,0 4,0 5,0 6,0 7,0 92 85 71 59 48 39 94 89 80 71 96 93 86 80 95 91 82 75 68 61 55 50 95 92 184 79 71 65 60 55 59 49 41 35 56 49 43 68 63 59 23 3. वृष्टिमापी (रेन गाज, चित्र सं. 40) वर्षा मापक यन्त्र-एक कोप (A) उठे हुए किनारों का लीजिये और उसके मुख (फनल) की गोलाई के बराबर गोलाई के किसी गोलाकार टिन या बर्तन (D) पर उसे रखिए । वर्तन में एक इंच सेमी. सतह तक पानी भर लीजिये । अब इसे एक कांच को वोतल (B) में डालिए और एक इ च या सेमी. वर्षा का चिन्ह (C) पट्टी पर लगाइए। इसे नाप कर छोटे चिन्ह बना- इए। इने नाप कर छोटे चिन्ह बनाइए। अब चित्र मे वताए प्रकार से खुले में जमीन में गड्ढा बनाकर रखिये और बोतल में भरे वर्षा के पानी को इचों में या सेंटीमीटरों/मिली मीटरों में मापिए। आप ऐसा यन्त्र स्वयं बनाइए। 4 वायु दाब मापी-बैरोमीटर) : चित्र सं. 41): A कांच की 90 सेमी. लम्बी नलिका है, जिसमें पारा भरकर मांद या प्लेट में उल्टा करने पर पारा निकलता है और नली में जितने मिलीमीटर पारा रह जाता है, उसे मापिए। 1 मिमी पारा-1.33 मिली वार वायु दाब होगा। 760 मिमी पारा-1.013 मिली वार वायु दाव होगा। पारा खतरनाक पदार्थ होता है, इसे हाथ न लगाकर प्लास्टिक या कागज के टुकड़े से छुइये । आपके स्कूल में शुष्क वायुदाबमापी (फोटिन्स बैरोमीटर) हो, तो उसे काम में लेना सीखिये ।
- बीती A A Tी वायुदाब मापी पवनवेगदर्शी (वित्र सं.41) (चित्र स. 42) 5. पवन वेगदर्शी (एनीमोमीटर)-चित्र सं. 42 में 1 से 4 रबड़ की आधी कटी गेंद या प्लास्टिक की कटोरियां हैं, जिन्हें A दो लकड़ियों को+पर एक और देखते लगाया गया है। एक डण्डे 7 पर 5 कोल हैं व 6 पर 2-3 वाशर हैं और 8 एक 6"x4' के तख्ते पर इंडे 7 को स्थिर कर दिया है। इसमें से एक कटोरी को रंग दीजिये. ताकि आप इसके चक्कर गिन सकें। तीस सैकेण्ड में यह जितनी बार घूमे, उसमें पांच का भाग देने पर पवनगति (वायु की चाल) प्रति घण्टा कितने मोल या पाठ का भाग देने पर प्रति घण्टा कितने मोटर आ जायेगी। प्राप स्वय बनाकर अवलोकन कीजिये ब्यूफोर्ट पवनमापक सारिणी इससे वायु का अनुमान लगाया जाता है। इसमें "क्रमांक" द्वारा पवन की गति बताई गई है:- गति मोल प. घंटा धुग्रा सीधा उठेगा। 1-3 मी.प्र.पं. धुआ मुड़ेगा, पर वात- दर्शक नही हिलेगा। 2 हलका पवन (प्रोज) 47 पत्तियां हिलेगो, वात दर्शक घूमेगा। क्रमांक नाम 0 शान्त वाय (Air) प्रभाव 1मी. कम 1 हल्की वायु " 40 ] आपेक्षित आर्द्रता निकालने की सारणी [शतांश तापमापी (सेन्टीग्रेड) के लिए] सूखे तापमापी पर तापमान गीले व ठण्डे तापमापी का अन्तर 00 50 100 150 200 250 300 0.5 1,0 20 3,0 4,0 5,0 6,0 70 90 81 64 49 36 25 14 92 85 71 59 48 39 30 23 94 88 76 66 94 89 80 71 63 56 49 43 95 91 82 75 68 61 55 50 95 92 | 84 79 71 65 96 93 86 80 74 68 63 59 49 41 35 55 3. वृष्टिमापी (रेन गाज, चित्र सं. 40) वर्षा मापक यन्त्र--एक कीप (A) उठे हुए किनारों का लीजिये और उसके मुख (फनल) की गोलाई के बराबर गोलाई के किसो गोलाकार टिन या वर्तन (D) पर उसे रखिए । बर्तन में एक इंच सेमी. सतह तक पानी भर लीजिये। अब इसे एक कांच की बोतल (B) में डालिए और एक इच या सेमी. वर्षा का चिन्ह (C) पट्टी पर लगाइए। इसे नाप कर छोटे चिन्ह बना- इए। इने नाप कर छोटे चिन्ह बनाइए । अब चित्र में बताए प्रकार से खुले में जमीन में गड्ढा बनाकर रखिये और वोतल में भरे वर्षा के पानी को ईचों में या सेंटीमीटरों/मिली मीटरों में मापिए। आप ऐसा यन्त्र स्वयं बनाइए। 4 वायु दाब मापी-(बैरोमीटर) : चित्र सं. 41): A कांच की 90 सेमी. लम्बी नलिका है, जिसमें पारा भरकर मांद या प्लेट में उल्टा करने पर पारा निकलता है और नली में जितने मिलीमीटर पारा रह जाता है, उसे मापिए। 1 मिमी पारा-1.33 मिली कार वायु दाव होगा। 760 मिमी पारा-1.013 मिली चार वायु दाव होगा। पारा सतरनाक पदार्थ होता है, इसे हाथ न लगाकर प्लास्टिक या कागज के टुकड़े से छुइये । मापके स्कूल में शुष्क वायुदाबमापी (फोटिन्स बैरोमीटर) हो, तो उसे काम में लेना सीखिये।
[41 मांची वत वायुदाब मापी पवनवेगदर्शी (चित्र सं. 41) (चित्र स. 42) 5. पवन वेगदर्शी (एनीमोमीटर)-चित्र सं. 42 में 1 से 4 रबड़ की आधी कटी गेंद या प्लास्टिक की कटोरियां है, जिन्हें A दो लकड़ियों की+पर एक ओर देखते लगाया गया है । एक डण्डे 7पर 5 कील है व 6 पर 2-3 वाशर हैं और 8 एक 6"x4' के तख्ते पर डंडे 7 को स्थिर कर दिया है। इसमें से एक कटोरी को रंग दीजिये, ताकि आप इसके चक्कर गिन सकें। तीस सैकेण्ड में यह जितनी बार घूमे, उसमे पांच का भाग देने पर पवनगति (वायु की चाल) प्रति घण्टा कितने मोल या पाठ का भाग देने पर प्रति घण्टा कितने मोटर आ जायेगी। प्राप स्वय बनाकर अवलोकन कीजिये ब्यूफोर्ट पवनमापक सारिणी इससे.वायु का अनुमान लगाया जाता है। इसमें "क्रमांक" द्वारा पवन की गति बताई गई है : गति मील प. घंटा 0 शान्त वायु (Air) 1 मी. कम धुपा सीधा उठेगा। 1-3 मी.प्र. पं. धुपा मुड़ेगा, पर वात- दर्शक नहीं हिलेगा। 2 हलका पवन (नीज) 4-7 पत्तियां हिलेगी, वात दर्शक घूमेगा। क्रमांक नाम: प्रभाव 1 हल्की वायु " 42 ] 3 सज्जन पवन - 8.12 " 4 मध्यम पवन 13-18 " पत्तियां व छोटी टहनियां हिलेगी, हल्का छोटा झण्डा उड़ेगी। हवा के साथ धूल व कागज उड़ेगा, छोटी शाखायें हिलेंगी। छोटे वृक्ष हिलेंगे, पानी पर हल्की लहरें चलेंगी। बड़ी शाखायें हिलेंगी, खंभों पर तार गूजेगे, छाता नहीं 5 ताजा पवन 19-24 " 6 तेज पवन 25-31 " टिकेगा। " " 7 मध्यम अांधी (गेल) 32-38 पूरा पेड़ हिलेगा, चलना कठिन, 8 ताजा अांधी 39-46 डालियां टूटेंगी। 9 तेज अांधी 47-54 मील प्र.पं. साधारण छप्पर, टिन आदि आदि उड़ सकते है। 10 पूर्ण प्रांधी 55-63 पेड़ जड़ से गिरेंगे-टूटेंगे छप्पर, टिन व छतें उड़ेंगी। 11 अन्धड़ (स्टोम) पर्याप्त हानि क्षति 12 तूफान (हरोकन) 75 से अधिक अत्यधिक विनाश 6. पवन दिशासूचक या वातदर्शी- 64-75, Akhree (चित्र सं. 43) चित्र स.44) वातदर्शी A-वायुपसी B-मण्डी यातदर्शी (चित्र सं. 43) में लकड़ी की चोर पर तीन ओर पूछ लगाकर एक ठण्डे पर फोल व वाशर लगाकर घूमने वाला यन्त्र बनाने । नीचे कमास को दिशायें लगी है। यह तीर वायु की दिशा [43 वतायेगा। चित्र सं.44 में A वायु थैली द्वारा या B झण्डी द्वारा पवन की दिशा का पता लगाया जा सकता है। 7. बादलों का घिराव (cloudiness)- इसे अष्टमांश (1/8th) में मापा जाता है। पूरा आकाश बादलों से ढका होने पर 'पूर्ण' 8/8 कहलाता है। इसके अनुपात में पाप बादलों का घिराव का अनुमान लगाइये। कोहरा, धुन्ध आदि नोट कीजिये । इस ऋतु विवरण के आधार पर आप मौसम की भविष्यवाणी करना भी सीख सकते हैं। सात परियोजनायें जांच (7) निम्न (सात प्रोजेक्ट्स) में से कोई एक कीजिये-- प्रोजेक्ट (1) : गन्दगी विरोधी अभियान--- अपनी टोली या ग्रप के साथ किसी सार्वजनिक उद्यान या वगीचे. विद्यालय-क्षेत्र या अन्य किसी सार्वजनिक स्थान पर "गन्दगी विरोधी (सफाई) अभियान" की योजना बनाकर उसे एक बार में एक एक घण्टे का उपयोग करते हुए (कुल) छः घण्टे के लिए सचालित कीजिये। इस अभियान के बारे में पिछले पृष्ठों में हम कई सुझाव दे चुके उनको ध्यान में रखकर योजना "मानसभा" में वनाइये । यह सामूहिक (टोली या दल का) कार्यक्रम होगा, सार्वजनिक स्थान का चयन करना होगा, कार्यों का बटवारा करना होगा और एक वार में कम से कम एक घण्टा श्रमदान से सफाई करनी होगी या प्रचार व प्रदर्शन । इस प्रकार के आयोजन छः बार करने पर आप इस जांच को पूरा कर सकेंगे। आप “सफाई सप्ताह" या "सफाई दिवस" के रूप में भी इसे मना सकते है। प्रोजेक्ट (2) : संरक्षण परियोजना- कम से कम एक दिन की अवधि के लिये एक संरक्षण परियोजना - में भाग लीजिए। पोछे जांच (2) में "क्या करें क्या न करें" शीर्षक के नीचे हम संरक्षण के कई कार्यक्रम बता चुके हैं, जिनसे परिचित होना जांच (2) का विषय है। परन्तु इनमें से चुने हुए कार्यों को व्यवहार में लाना इस प्रोजेक्ट का विषय है । अतः आप उन कार्यमों को चनिए, जिनको आप चलाना चाहते है। फिर मानसभा में परियोजना बना 44] सब मिलकर काम कीजिये ! आप व्यक्तिगत, दो-दो के युगलों में, टोली में या दो टोली मिलकर या पूरा दल मिलकर इस परियोजना पर कार्य कर सकते हैं। कुछ परियाजनायो की एक तालिका हम यहां दे रहे है, जो मरु- स्काउटों के लिए विशेष रूप से तैयार की गई है, यह सभी के लिये उपयोगी है- Lama (क) भू-संरक्षण के लिये -1. टीबाबन्दी 2. करुणाबन्दी, 3. वाड़ बन्दी, 4. मेड़ वन्दी, 5, खाई पाटना, 6. कण्ट्रर बन्दी 7. रक्षा पेटियां। 8. 'भू-सरक्षण बैज' प्राप्त करना। (ख) वन संरक्षण के लिए - 1. वन महोत्सव (पेड़ लगाना), 2. नर्सरी लगाना, 3. वृक्षों की सभाल, 4. हरित पट्टी (घास) लगाना, 5. चारागाह विकास, मूज या झाड़िया उगाना । ग) जल संरक्षण के लिए--1. सोख्ता गड्ढा बनाना, 2. नालियां बनाना, 3 जलागमन (पायतन) की सफाई, 4. स्नानगृह, 5. शौचालय, 6. प्याज चलाना, 7. खेतों मे गड्डे (ditching) 8. कच्चे टाके बनाना 9. जल शुद्धि. करण अभियान, 10. 'जल बचायो' अभियान। (घ) जोय स रक्षण के लिए-पक्षी प्याऊ, पक्षोस्नान, जलकुण्ड, पशु प्याऊ, घास- दानी, टिड्डी विरोधी अभियान, ऊंट चालक बंज' प्राप्त करना ।
[ 45 (ड.) मानव प्रयास व संस्कृति का संरक्षण- ग्राम का आर्थिक, सामाजिक सर्वेक्षण, लोक जीवन (लोक नृत्य, गीत, संगीत) का उत्थान, लोक कला (रस्सी बुनना, छप्पर बांधना, माचा-चारपाई बुनना, घूम रहित चूल्हे, संरक्षण भट्टी, शीतक, खिलोने आदि बनाना) का विकास, "मरुवासी और ग्राम्य कार्य कर्ता" बैज प्राप्त करना। परिशिष्ट में वार्षिक "संरक्षण परियोजना" का एक नमूने का कार्यक्रम दिया गया है। आप भी इन्हें अपनाइये-संर- क्षण-भावी बनिये! प्रोजेक्ट' (3) : प्रकृति की खोज (Natural Trial) अपनी टोली या दल के लिए 'प्राकृतिक चिन्ह पंक्ति' बनाइए (सौर उसके सहारे भ्रमण कोजिए)। प्रकृति का अध्ययन करने व आनन्द लूटने के लिए चिन्हों (संकेत) का प्रयोग रास्ता दिखाने के लिये करते है, इन्हें प्राकृतिक चिन्ह पंक्ति या वनविद्या के चिन्ह कहते हैं। आप कोमलपद की जांच संख्या (vi) में इन चिन्हों का अभ्यास कर चुके है। यह प्रोजेक्ट उनका उपयोग करने के लिए है। प्रोजेक्ट (4) पशुओं के लिए चारादानी पशुओं के लिए चारा रखने का स्थान (Forage Rack) बनाइए, उसे हटाइए और संभाल कीजिए। घरेलू पालतू पशुओं के लिए स्थायी चारादानी बनी होती है। अस्थायी चारादानी के लिए लोहे या लकड़ी की बक्सनुमा चारादानी भी काम में लेते हैं। इनको प्रतिदिन हटाना या साफ करना व संभाल करना आवश्यक है। जहां घास खिलाया जाता है, वहां घासदानी (Forage Rack) भी बना लेते हैं (देखिए चित्र सं. 45)। आप भी ऐसी पासदानी बनाइये। जंगलों में जहां वनरक्षक सरकार की ओर से 46 ] है, ऐसी घासदानी जंगल में बनाकर उसमें पौष्टिक घास व नमक के ढेले रख जाते हैं, जिसको जंगली पशु खाते हैं। SMIn Muut damad. (चित्र स. 45) प्रोजेक्ट (5) : पक्षी स्नान कुण्ड पक्षियों के लिये (सौन्दर्य के लिए) एक जलकुण्ड पोखर (pond- बनाइए। पक्षियों के लिये पानी पीने व स्नान करते का कुण्ड बनाकर प्राप पक्षियों की जल क्रीड़ा का ग्रानन्द लीजिये तथा उस स्थान का सौन्दर्य भी बढ़ा इये। यह एक मनोरंजक- अभ्यास है। जमीन को खोदकर एक गोलाकार कुण्ड बना. इये (B) अब उसमें एक (चित्र सं. 46) पोलीथीन (प्लास्टिक) की चद्दर (A) सफाई से बिछा दीजिए, ताकि पानी जमीन में नहीं समाए। इसे चारों ओर पत्थरों (C) व गीली मिट्टी से दवा दीजिये। अब इसमें पानी भर दीजिये। पास में एक चुग्गादानी (चित्र सं. 13) भी लगा दीजिए। वस !... फिरपक्षी?
[47
प्रोजेक्ट (6) : पौध प्रदर्शन पेटिका (Tarraium)
एक पौध प्रदर्शन पेटिका' बनाइये और उसकी देखभाल कीजिए।
पौध प्रदर्शन पेटिका पौधों के विकास का अध्ययन करने के साथ
सुन्दरता बढाने वाला साधन भी है । घर पर इसे ड्राइंग रूम या बाहरी
बरामदे में या चौक में रखिये। यह मछली-पेटिका की तरह है।
हम यहां तीन नमूने दे रहे हैं, (चित्र 47, 48, 49) आप कोई एक
बनाइये।
(i) यह कांच का वक्स है, पिछले कांच पर कोई प्राकृतिक दृश्य
बनाइए या चिपकाइए। भीतर प्राकृतिक पत्थर, मिट्टी में घास व पौधे
लगाइये।
(चित्र सं.47)
(चित्र सं. 47)
(चित्र सं.48)
(ii) यह छोका है, कोट के हेंगरों की मदद से बनाया गया है
और चारों ओर प्लास्टिक की थैली लगा दीजिए, हवा के लिये नीचे
व हुक के पास खुला रखिये। (चित्र सं. 48)
(iii) कांच के अमृतवान (वरणी) में भी आप इसे बना सकते हैं।
आप मत्स्यकुण्ड बनाइये--
इस पेटिका में कछुआ, मेंढक, छिपकली
आदि मत रखिये-ये जीव कैद करने पर
चुपचाप मर जाते हैं। आप इनमें पौधे,
केक्टस; फूल आदि लगाइए । पाप गमलों में
या खोकों में भी पौधे लगा सकते हैं । ये
नमूने शहरी जीवन के हैं।
(चित
48 ] पक्षी या पशु, . प्रोजेक्ट (7) : प्लास्टर-सांचे बनाना (PLASTER CASTS) कम से कम 6 पक्षियों के पद चिन्हों के प्लास्टर के सांचों का एक संग्रह तैयार कीजिए। के साफ पद चिन्ह से "प्लास्टर-सांचे" तैयार किये जाते है। सामग्री प्लास्टर आफ पेरिस--एक डिब्बा या कप [घोल के लिये], पेपर क्लिप, मोटे कागज या कार्ड को 2 ईच चौड़ी और 12 से 24 ईच लम्बी पट्टियां, पानी और एक पुराना दातुन का ब्रश । विधि-कार्ड की पट्टी को चित्र I में बताये अनुसार a और b पर काट कर चित्र II को तरह जोड़ ले । फिर चित्र III के अनुसार दो I क्लिप-पिनें लगाकर पद चिन्ह के चारो ओर रखिए । अव प्लास्टर ग्राफ पेरिस को कप या डिब्बे में घोलकर पिघली हुई आइसक्रीम या रबड़ी जैसा घोल बनाकर कार्ड पट्टी के कोने के पास धीरे से डाल दीजिए, पूरा एक इच तक भर दीजिए। जब प्लास्टर कडा हो जावे तो धीरे से उठाकर कागज हटा दीजिए और पानी में घोलकर ब्रश से ऊचे नीचे किनारे साफ कर (चिन सं. 50) दीजिए। इसके पीछे दिनांक, पशु/ पक्षी का नाम व पता, स्यान कुरेद कर लिख सकते है । बस प्लास्टर सांचा तैयार है। टिप्पणी :-[1] इस बैज के साथ स्टेट चीफ कमिश्नर द्वारा हस्ताक्षरित विशेष प्रमाण-पत्र प्रदान किया जाता है। [2] यह बैज बांई भुजा पर फर्स्ट क्लास बैज या राष्ट्रपति स्काउट /गाइड वैज के नीचे धारण किया जावेगा। यह अन्तर्राष्ट्रीय दक्षता बंज है ""इसे प्राप्त कर गौरव प्राप्त कीजिए ! जय संरक्षण! शुम स्काउटिंग!!
अध्याय (4) रोवर स्काउट/रेंजर गाइड के लिए- विश्व संरक्षण बैज इस अन्तर्राष्ट्रीय दक्षता-बैज के लिए 11 जांचे पूरी करनी होंगी। रोवर-स्काउट एव रेंजर-गाइड के लिए यह जांव-क्रम ममान है। यहां इन जांचों के लिए कुछ सुझाव एवं अभ्यास दे रहे है । प्रकृति के विविध रूप जांच [1] : निम्नलिखित परिमाषित शब्दों का अर्थ समझा :- 1. पर्यावरण विज्ञान-(Ecalogy) सर पीटर स्कॉट के शब्दों में "Ecology is the study of inter-relationships between air, water soil, plants, animals and man him-self"--अर्थात् "पर्यावरण विज्ञान वायु, जल, भूमि, पौधे, पशु और स्वयं मानव के बीच पारस्परिक (आपसी) सम्बन्धों का अध्ययन है।" दूसरे शब्दों में “पौधों व पशुओं (वनस्पति एवं जोवों) का उनके पर्यावरण (Environment) से सम्ब- न्धित अध्ययन है।" पर्यावरण विज्ञान के दो प्रमुख सिद्धान्त है :- (1) प्रकृति संतुलन या जीवन चक्र ओर (2) प्राकृतिक साधनों की अन्तनिर्भरता । पर्यावरण से उत्पन्न समस्याओं को 'प्रदूपण' कहते है और उनके निवारण के उपाय का कार्यक्रम 'संरक्षण' है। इस प्रकार 'प्रदूपग वनाम संरक्षण' का अध्ययन इसको विषय-सामग्री है। 2. संरक्षण (Conservation) (कृपया अध्याय 1 पढ़िए) । 3. प्राकृतिक संतुलन (Balance of Nature) : प्रकृति में विभिन्न सावनों के वोच संतुलन हाता है । 'जोवन चक्र' (प्रागे देखिये] इसका आधारभूत उदाहरण है। इस संतुलन के लिए निम्नाकित पर्यवेक्षणों पर विचार कीजिए- (1) जल के बिना पौधे उत्पन्न नहीं होते; किन्तु जब किसो स्थान पर बराबर जल भरा रहता है तो भी पौधों का उत्पन्न होना 1. 18 वर्ष से कार की आयु के युवा छात्रों के लिए।
50 ] कठिन हो जाता है। जल और पृथ्वी के बीच का समुचित संतुलन पौधों की उत्पत्ति के लिए आवश्यक है। (2) पौधे और पशु परस्पर एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं। पौधे पशु के लिए भोजन उत्पन्न करते हैं और पशु पौधों के लिए खाद । किसी स्थान पर रहने वाले पशु और पौधों के बीच संतुलन होता है। अगर पशुओं को विशेष संरक्षण देकर उनकी संख्या बढ़ाई जाय तो उनके लिए संकट उत्पन्न हो सकता है। पौधों को वे शीघ्र ही समाप्त कर देते है। पौधों की उत्पत्ति कम हो जाती है और पशुओं के लिए भोजन का अभाव हो जाता है। (3) कौए फसल के शत्रु होते हैं, किन्तु वे प्रकृति में गन्दगी साफ करने वाले पक्षी भी होते है। यदि फसल के संरक्षण हेतु कौनों को समाप्त कर दिया जाय, तो गन्दगी बढ़ सकती है और उससे फसल को भी हानि हो सकती है। इन पर्यवेक्षणों के आधार पर हम संरक्षण सम्बन्धी निम्नांकित वैज्ञानिक सिद्धान्त प्रतिपादित कर सकते है- सिद्धान्त-प्रकृति में विभिन्न साधनों के बीच संतुलन होता है । संरक्षण की योजना प्राकृतिक सौन्दर्य को दृष्टि में रखकर निर्मित होनी चाहिए, अन्यथा सरक्षण योजना हानिकारक हो सकती है। 4. जीवन-शृंखला (Life Chain) और 5. जीवन-चक (Life Cycle) जीव-जगत एक दूसरे पर निर्भर है और वह एक दूसरे से एक "शृखला" में बन्धे हैं, एक "चक्र" मे चलते है । इस प्रक्रिया को "जीवन-शृखला" या "जीवन-चक्र" या 'भोजन शृखला' (Food Chain) आदि नामो से पुकारा जाता है । प्रसिद्ध भारतीय कहावत "जीवो जीवस्य भोजनम्" (जीव का भोजन जीव है) इसी सिद्धान्त को स्पष्ट करती है। जीवन चक्र प्रकृति में निरन्तर चलता रहता है और इसमें आपसी 'संतुलन' है--"प्राकृतिक संतुलन"। यदि इस चक्र या शृखला में किसी एक को नष्ट कर दिया जाय, तो संतुलन बिगड़ जाने "ई समस्याये उत्पन्न होती है ।
[51 जीवन-चक्र (LIFE-CYCLE) पौधे शाकाहारी जीवों का भोजन है- शाकाहारी जोय मांसाहारी जीवों का भोजन है- 1 + --पौधे और जीय नष्ट होकर मिट्टी में मिलकर साद बनाते हैं- नये पौधे भोजन पाकर पनपते हैं- उस खाद से + +- यह 'चक्र' चलता रहता है। 6. जीवनाशक विप (Biocides) आजकल अनेक प्रकार के कीटाण एवं जीवनाशक विपों का प्रयोग बढ़ रहा है । कृषि को कोड़ों से बचाने इनका अधिक प्रयोग होता है। फिर कारखाने कई प्रकार के विपले पदार्थ छोड़ते है, जो हानिकारक हैं। प्रकृति में पशु, पक्षी और पौधों के द्वारा ये विष "जीवन चक्र" में आकर भयानक परिणाम देते है। एक उदाहरण पीछे के पृष्ठों में देखिये । दूसरा उदाहरण लीजिये--डी. डी. टी. मक्खी, मच्छर पर छिड़की गई, जिसे एक छिपकली खाती है, छिपकली को बिल्ली खा गई और बिल्ली को एक बाज खा गया और वह मर गया, जो एक दुर्लभ-पक्षी था । अतः कोटनाशकों का 'सीमित 7. पुनः वितरण (Re-cycling) : बेकार पड़े सामान, शीशी, डिब्बे, कागज आदि को दुवारा काम में लेने को पुनः वितरण 8. नोपजनीय विश्लेषण (Photo-Synthesis) : पीछे देखिये-- प्रयोग जांच 6 में (चित्र सं. 37) तथा तथा जांच आगे (2) में प्रोपजन- प्रयोग कीजिये। कहते है। -- चक्र।
52 ] 9. जैविक एवं अजैविक पदार्थ (Organic & inorganic material): जीवों से प्राप्त होने वाले पदार्थ "जैविक' कहलाते हैं तथा जीवों के अलावा अन्य पदार्थ अजविक' । जैसे पत्त, घास, लकड़ी, मलमूत्र, गोवर, हड्डो, रक्त मांस, ये जैविक पदार्थ हैं: इनके विपरीत पत्थर, लोहा मिट्टी, धातु प्लास्टिक आदि अजैविक पदार्थ है। 10. जैविक प्रवशिष्ट (Humus) : मृत पशुओं के अवशेप तथा पौधों के अवशेष मिलकर "जैविक अवशेप" कहलाते हैं। शीर्ष मृदा में इस तत्त्व को प्रधानता से उपजाऊ शक्ति अधिक होती है। यह खाद के रूप में मिट्टी में मिलाया जाता है । जाँच (2) एक रेखाचित्र बनावें, जिसमें किस प्रकार अोषजन एक चक्र बनाती है, प्रदर्शित कीजिए। प्रोषजन-चक्र (OXYGEN-CYCLE) सूर्य सबका प्राणदाता है उसके प्रकाश से पेड़-पौधे मानव, जीव 1 (वनस्पति जगत) (जन्तु जगत) +- देते है-भोजन पदार्थ, सब्जी, प्रोपजन लेते हैं ( व सास लेते हैं) 1 वापस देते हैं *कार्बन डाइऑक्साइड (सांस से) “मलमूत्र व साद (शौचादि से) *जीव पवशेष (खाद) (मरने पर) । जांच (3) पर्यावरण की अन्तर-निर्भरता को चित्रित करते हुए एक उदाहरण दीजिये कि किस प्रकार मानव, पशु वनस्पति तथा अन्य या एक दूसरे पर निर्भर करते हैं।
153 - साधनों की अन्तभिन्नता का सिद्धान्त साधनों की अन्तनिर्भरता-प्राकृतिक साधनों का अध्ययन करते समय निम्न विन्दुओं की ओर आपका ध्यान आकर्षित होगा। (1) शीप मृदा के निर्माण में वनस्पति का महत्वपूर्ण धींग होता है। बनस्पति चट्टानों को तोड़ कर छोटे-छोटे कणों में विभाजित करती है और सड़ी हुई वनस्पति टूटे हुए कणों के साथ मिल कर भूमि का निर्माण करती है। (2) कोड़े सड़ी हुई वनस्पति को मिट्टी के साथ मिलाने में सहायक होते हैं। (3) शीपं मृदा वनस्पति और कीड़ों के लिए भोजन उपलब्ध करती है। (4) घास और वृक्ष शीर्ष मृदा को नष्ट होने से बचाते हैं। घास और वनों के होने से वर्षा या वर्फ का जल भूमि के अन्दर उतरने लगता है और इस प्रकार वाढ़ का पाना रुक जाता है। वन और घास के अभाव में, जल वाढ़ के रूप में बहकर शीर्ष मृदा को बहा ले जाता है और भूमि के अन्दर कम रिसता है । (5) वन और घास के भूगर्भीय जल के संग्रह में सहायक होते है । वन और घास के कारण जो जल भूमि उतरता है वह भूगर्भ में जाकर समुचित स्थान पर एकत्रित होता है । भूगर्भीय जल हमारे जीवन का महत्वपूर्ण आधार होता है। (देखिये चित्र सं 21 एव 22) (6) वन पशु-पक्षियों के लिए निवास स्थल होता है । पशु-पक्षी वन विकास में सहायक होते हैं। (7) भूमि, जल, वनस्पति, पशु-पक्षी में से किसी एक का भी अप- व्यय या नाश होता है तो दूसरों पर प्रभाव पड़ता है । उपर्युक्त पर्यवेक्षणों के आधार पर प्राकृतिक साधनों के संरक्षण के सम्बन्ध में हम निम्नलिखित सामान्य सिद्धांतों का निर्माण कर सकते हैं- प्रकृति में 'जीवन चक्र' (पृष्ठ 63 पर देखिए) इस सिद्धान्त का एक आधारभूत उदाहरण है। जांच (4) वन्य जीवन पर जंगल को प्राग, भू क्षेत्र की सफाई, भूक्षरण, जल प्रदूषण और मानव के क्रियाकलापों के प्रभावों के प्रदर्शन कीजिए।
54 ] वन्य जीवन पर प्रभाव (क) जंगल की आग : इससे वनस्पति व वन्य पशु-पक्षी तथा उनके निवास स्थान सब नष्ट हो जाते है । वे सब वेघरवार होकर नष्ट हो जाते हैं । जगल की आग भयानक होती है । (ख) भू-क्षेत्र की सफाई : मनुष्य खेती के लिए नयी भूमि खोजता है, तो जगल उसका पहला शिकार होते है और फिर वनस्पति नष्ट हो जाती है व वन्य पशु पक्षी बेघरबार होकर भटक कर नष्ट हो जाते है। (ग) भूक्षरण-(कृपया "भूसंरक्षण बैज" अध्याय (5) में पढ़िये ।) (घ) जल-प्रदूषण [कृपया अध्याय (3) में पढ़िये] । (ड.) मानव के क्रिया-कलाप मानव प्रकृति का मित्र तो है ही, पर वह गुप्त-शत्रु अधिक है । अपने लाभ और लोभ में वह वन्य जीवों का शिकार करता है और उन्हें नष्ट करता है, उनको जाल में फंसाता है, पिंजड़ों में बन्द करता है, उनको जाल में फसाता है. पिंजड़ों में बन्द करता है, उनके जीवन को भयानक बनाता है। उनके बच्चों को पकड़ कर पालतू बनाता है। उनके अण्डों का संग्रह करता है । इस प्रकार के मानव के क्रिया-कलाप वन्य जीवों के लिये हानिकारक रहे हैं। परन्तु जागरूक मानव वन्य जीवन का आदर भी करते है और उनके सरक्षण के लिए उपाय भी करते है. जिनका वर्णन हम पाछे कर चुके है। जांच (5) बाढ़ (Flood) के कुछ कारणों के नाम गिनाइए और बाढ़ नियन्त्रण को कुछ विधियां बताइये। बाढ़ के कुछ कारण- 1. अत्यधिक वर्षा 2. वर्षा वाले क्षेत्र में वनस्पति प्रावरण का अभाव। 3. नदियों पर बांध आदि रुकावटों का अभाव । 4. जल के वहाव पर मेड़बन्दी आदि रुकावटों का प्रभाव । कुछ उपाय- 1.बन व घास का आवरण उगाना। 2. नदियों पर रुकावट के लिए बांध बनाना व पानी की दिशा बदल कर सिंचाई की व्यवस्था करना । 3. मेड़बन्दी करना (चित्र सं. 58) मागे चित्र सं. 54 में दिखाया गया है कि--वनस्पति के प्राव.
[55 रण के प्रभाव से 62% पानी बह जाता है, अधिक कटाव करता है और बाढ़ आती है। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में विश्व स्वास्थ्य संगठन (W. H. 0.) अन्तर्राष्ट्रीय प्रकृति और प्राकृतिक साधन संरक्षण संघ (The Inter- - national Union for Conservation of Nature & Nature Rescources), fara gru 1197 fafe (World Wild Life Fund) aan fasa स्काउट ब्यूरो संरक्षण कार्यक्रमों का प्रचार एवं प्रसार कर रहे हैं । हमारे देश भारत में (1) "विश्य वन्यजीवन निधि" की शाखा "भारतीय राष्ट्रीय अपील" है । इसका वार्षिक सदस्यता शुल्क रु. 10/- है । इस अपील द्वारा भारत सरकार को सहायता से वन्यजीवों के संरक्षण के कार्यक्रम संचालित किये जा रहे हैं । "बाघ परियोजना" का परिचय हम पिछले पृष्ठों में देख चुके हैं। (2) बम्बई नेचुलर हिस्ट्री सोसायटी-पुस्तकें, लेख, प्रचार प्रादि कार्य कर रही है। (3) भारतीय वन्य प्राणी मण्डल (1952) इण्डियन बाइल्ड लाइफ बोर्ड की स्थापना भारत सरकार ने 1952 में की थी। यह मण्डल सरकार को शिकार निषेध, सुरक्षित वन जीवों की घोषणा, राष्ट्रीय उपवन (पार्क), अभयारण्य, प्राणिकीय उद्यान आदि को स्थापना के लिये सलाह देता है। हर राज्य में सरकारों ने "राज्य वन्यप्राणी मण्डल' भी बनाये हैं। (4) पर्यावरणीय प्रायोजन तथा समन्वय को राष्ट्रीय समिति (1972) यह भारत में संरक्षण कार्यक्रम का संचालन करने वाली राष्ट्रीय समिति है। राज्यों में भी इसी नमूने पर समितियां बनाई गई हैं। इनके अतिरिक्त सरकार के वन विभाग, कृषि विभाग, कृपि अनुसंधान परिषद्, मरुस्थल विकास मण्डल, आदि अनेक संगठन इस कार्यक्रम में रुचि ले रहे हैं । (5) मरु स्काउट विश्वमैत्री संघ World Fellowship of Desert Scouts)-मरु स्काउटिंग योजना के अन्तर्गत मरुक्षेत्रों के लिये विश्व भर में "मरु कल्याण" के रूप में स्काउटों के लिये संरक्षण कार्यक्रम अपनाने का प्रचार कर रहा है। (6) भारत स्काउट व गाइड-संरक्षण कार्यक्रम को स्काउट! गाइड कार्यक्रम में सम्मिलित कर विश्व स्काउट ब्यूरो । सं कार्यक्रम को अपना रहा है। भारत में कब/बुलबुल, स्का 56 ] तथा रोवर/रेंजर सभी के लिए "विश्व संरक्षण बंज" प्रारम्भ किया गया है। (7) केन्द्रीय जल प्रदूषण नियंत्रण मण्डल --1974 के जल प्रदूषण निवारण अधिनियम के अधीन यह मण्डल गठित किया गया है, जो भारत की प्रमुख नदियों और जल स्रोतों का सर्वेक्षण कर पेय जल सुविधा का कार्यक्रम बना रहा है। (8) राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नागपुर)-दूषित जल के उपचार, गन्दगी से खाद बनाना आदि पर खोज कर रहा है। (9) केन्द्रीय जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नागपुर) - इस संस्थान को देश भर में आठ क्षेत्रीय प्रयोगशालाये है, जिनमें वाहित मलमूत्र का उपयोग, औद्योगिक-व्यर्थ (गन्दगी व बचे सामान) का निपटान, जल प्रदूषण को रोकथाम, वायु प्रदूषण, प्रौद्यो- गिक सफाई, ग्रामीण स्वच्छता, ठोस-व्यर्थ पदार्थ निपटान, खाद्य स्वच्छता और विकिरण से स्वास्थ्य की रक्षा आदि कार्यों की देखरेख और अनुसंधान किया जा रहा है। प्राकृतिक सुरक्षित वन और अभयारण्य जांच (7) : देश प्रमुख प्राकृतिक सुरक्षित भण्डारों" (Nature (Reserves) की स्थिति जानना और उनको क्यों रखा गया है ? भारत मे विभिन्न राज्यों में अनेक वनों को "सुरक्षित वन" घोपित किया गया है तथा अनेक "अभयारण्यों" (Sancturies) की स्थापना की गई है । पीछे इनमे से कुछ की सूची देखिये । यहां अभ्यारण्यों की एक सूची दी जा रही है: 'असम में--(1) मानस-जगती भैसे, गेडे व बाघ के लिए, (2) काजीरंगा-गेडे के लिए। 'बंगाल में जलदापाड़ा जलपाईगुड़ी]-- गड़े के लिए; 'विहार में-हजारी वाग प्राणी उद्यान, गुजगत में-गीर वन भारतीय सिंह के लिए; कश्मीर में दचीगम अभयारण्य; 'केरल में- पेरियार हाथी और गौर के लिए]; मद्रास मे'-मुडुमलाई ; 'मध्य मे'-शिवपुरी राष्ट्रीय प्राणी उद्यान [चिकारा के लिये], कान्हा राष्ट्रीय प्राणी उद्यान-छोटे बारहसिंगे, गौर और वाघ के लिए[; 'महाराष्ट्र में'-ताडोबा राष्ट्रीय प्राणी उद्यान (बाघ और भालू के लिए]; मैसूर में'-बांदीपुर हाथी और गौर के लिये तथा उत्तर प्रदेश में'-[1] “वन और वानिकी" (पृष्ठ 61) के अनुसार 1. नेशनल बुक ट्रस्ट पुस्तक {57 राजाजी पशु बिहार सहारनपुर], [2] चन्द्रप्रभा [3] कार्बेट राष्ट्रीय प्राणी उद्यान ये प्राकृतिक सुरक्षित वन (भंडार) वन्य जीवों के संरक्षण, वन संरक्षण तथा पर्यटक आकर्षण हेतु बनाये गये हैं । विधि (कानून) और संरक्षण जांच (8) प्रदर्शित करें कि-वह देश में संरक्षण सम्बन्धी मुख्य विधियों (कानूनों) को जानता है । विधि का क्षेत्र व्यापक है । भारत वन्य जीवन का भण्डार रहा है अतः अग्रेजी शासन काल में हो यहां अनेक ऐसे कानून बने, जो 'संरक्षण कार्यक्रम" के अन्तर्गत पाते है । यहां हम प्रमुख कानूनों की एक सूची दे I. भारतीय गज परिरक्षण अधिनियम (Indian Elephant Preservation Act, 1879) 2 भारतीय मत्स्यपालन अधिनियम (Indian Fisheries Act, 1897) 3. भारतीय वन अधिनियम (Indian Forest Act, 1927) 4. भारतीय वन्य पक्षी एवं पशु परिरक्षण अधिनियम (Indian Wild Birds & Animals Protection Act, 1912) स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भारतीय संसद् ने निम्नलिखित मुख्य विधियां निर्मित कर प्रभावशील को है 1. 'राष्ट्रीय पशु (शेर, बाघ Tiger) तथा राष्ट्रीय पक्षी (मयूर-मोर) की रक्षा के लिए कानून बनाये गये हैं, जिनके अन्तर्गत इनको मारना दण्डनीय अपराध है। 2. वन्यजीवन परिरक्षण अधिनियम (Wildlife Protection Act,1972 (Act 53 of 1972) 3. जल प्रदूपण तथा वायु प्रदूषण पर 1974 में ऐक्ट बनाये गये हैं। इनके अतिरिक्त अनेक राज्यों की विधान सभाओं ने भी इस सम्बन्ध में कई विधियां, कानून बनाये है । हम यहां उदाहरण के लिए राजस्थान राज्य के ऐसे कानूनों की एक सूची दे रहे है :- 1. राजस्थान भूमि एवं जल संरक्षण अधिनियम 1964 तथा नियम . :- 19661 2. राजस्थान वन्य पशु एवं पक्षी परिरक्षण अधिनियम 1951 तथा 58 ] 6. 3. शिकारगाहों में प्रवेश के नियम 1956. 4. राजस्थान सार्वजनिक उपवन (पब्लिक पार्क) अधिनियम, 1956. 5. राजस्थान कोलाहल नियन्त्रण (Noise Control) अधिनियम 1963. राजस्थान मत्स्य पालन अधिनियम 1953. 7. राजस्थान वन अधिनियम 1953 तथा शिकार, गोली चलाना, मछली पालन, जल को विपैला बनाना सम्बन्धी नियम 1957. इन कानूनों के द्वारा संरक्षण को महत्व देते हुए प्रदूषण के कार्य पर रोक लगाकर उन्हे 'अपराध' घोपित कर उचित दण्ड की व्यवस्था की गई है। जांच (9) निम्न (तीन) में से कोई दो (परियोजनानों) में कार्य करें- परियोजना [1] :विश्व वन्य जीवन निधि (World Wild Life Fund) या अन्तर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (International Union for Conservation of Nature and Natural Resources) द्वारा प्रायोजित किसी परियोजना में कम से कम 24 घण्टों के लिए योगदान किया हो, एक बार में 8 घण्टे से अधिक नहीं। आजकल “बाघ को बचायो" परियोजनाये भारत में आठ स्थानों पर चल रही हैं । पीछे इनकी सूची दी गई है। आप इनमें भाग लेने के लिए सम्बन्धित अधिकारी से मिलकर कार्य कीजिये । भारत में "विश्व वन्य जीवन निधि" के कार्यालय का पता इस प्रकार है :- World Wildlife Fuad. Indian National Appeal, Hornbill House, S. Bhagat Singh Road, Bomby-400001 परियोजना [2] : कम से कम 40 घण्टों के लिए किसी प्रमुख सरक्षण परियोजना में सक्रिय भाग लीजिये। इसके लिए पीछे अध्याय 3 मे जांच 171 तथा अन्त में 'परिशिष्ट' देखिये परियोजना [3] : निम्नलिखित सरक्षण परियोजनाओं में से किसी एक को स्वयं संचालित करने में उत्साह लीजिये- (क) गंदगी विरोधी प्रमियान- देखिये पृष्ठ 54 पर] ..
19 (ख) एक भूभाग का पुनद्धार या सौंदर्याकरण--आप किसी पार्क, सड़क के पास के विश्राम स्थल, कार पार्किंग के स्थान, किसी सर्विजनिक स्थान, मन्दिर, स्कूल, कुएं या तालाव आदि का चयन कर स्थानीय अधिकारी से अनुमति लेकर उसकी सफाई व सजावट के लिये अपने ऋ या टीम की परियोजना बनाकर सेवा व श्रमदान कर सकते हैं। (ग) सूचना (प्रचार) अभियान द्वारा जनमत को प्रभावित करना। (घ) दीवार-चित्र (पोस्टर) बनाना । (3) प्रदर्शनों का आयोजन करना। (च) एक प्रदर्शनी का प्रायोजन । (छ) हस्तपत्र (Hondouts) तैयार करना। -ये सब प्रचार की परियोजनायें हैं । इन पर खर्च करना पड़ता है। यदि सम्भव हो, तो आप इनका प्रायोजन कीजिये । जनता के प्रतिष्ठित लोगों व नगरपालिका या पंचायत की मदद से ये सब सम्भव है । जांच [10] निम्न में से कोई एक (कार्य) करें- 1. कम से कम चार घण्टे के दो कालांशों का समय वन संरक्षक (फोरेस्टोर रेंजर) या किसी संरक्षण अधिकारी (फन्जरवेशन आफिसर के साथ व्यतीत करें और उस समय के अवलोकन का विवरण तैयार करें। प्रापको दो बार में 4.4 घण्टे का समय किसी वन संरक्षक या किसी सरक्षण अधिकारी के साथ बिताकर उनके विभाग को गति- विधियों एवं कार्यक्रम का अनुभव प्राप्त करना व अवलोकन करना है। इसके लिये माप पशुपालन अधिकारी, कृपि अधिकारी भूस रक्षण अधिकारी, जलकल अभियन्ता प्रादि किसी भी अधिकारी से पहले सम्पर्क कर समय निश्चित कीजिये तथा टोली के साथ इस कार्यक्रम को पूरा कोजिये। 2. कम से कम तीन दिवस के एक शिविर में भाग लीजिए, जिसमें संरक्षण तथा प्रति अध्ययन कार्यक्रम का मुख्य भाग हो । इस प्रकार के शिविर आप अपने दल स्तर पर या जिला स्तर पर पायोजित कर सकते है । "मरु स्काउटिंग" में ऐसे शिविरों का योजना- वद्ध कार्यक्रम रखा गया है। जांच (11) अपने परोक्षक तया स्वयं द्वारा निर्धारित व विकसित किए गए एक विशेष कार्य (Special Conservation Task) को पूरा सोगिता
60]
इसके लिए कार्यक्रम की रूपरेखा आपको अध्याय 3 में जांच ?
मिलेगी तथा "परिशिष्ट' में एक “वार्षिक संरक्षण परियोजना" प्रागे
दी गई है।
टिप्पणी-1. इस बैज के साथ स्टेट चीफ कमिश्नर द्वारा हस्ता.
क्षरित विशेष प्रमाण-पत्र प्रदान किया जाता है।
2. यह बैज वांई भुजा पर "राष्ट्रपति रोबर/रेंजर अलंकार" के
नीचे धारण किया जाता है।
शुभ संरक्षण !
शुभ स्काउटिंग !!
अध्याय (5) 1 भू संरक्षण बैज (SOIL CONSERVATION BADGE) (स्काउट एवं रोवर स्काउट्स के लिए) धरती हमारी माता-(The Soil - Our Mother) प्रानो बच्चों ! तुम्हें दिखायें झांकी हिन्दुस्तान की। इस मिट्टी से तिलक करो यह मिट्टी है बलिदान की ।। धरती हमारी माता है और इसकी मिट्टी पवित्र-यह युग-युगों से चलती आ रही मान्यता है। परन्तु हमारी भूमि, मिट्टी कट-कट कर वह रही है, उड़ रही है और मानव के सामने मिट्टी के कटाव या भूक्षरण (अपरदन) की एक भयानक समस्या उत्पन्न हो गई है। इसी समस्या से जूझने के लिये मरुस्काउटिंग की योजना में "भू-संरक्षण वैज" की व्यवस्था की गई है. जिसे मरुस्थल के बाहर के सभी स्काउट प्राप्त कर सकते हैं। रोवर स्काउट्स के लिये भी इसका परिवर्तित पाठ्यक्रम है। हम यहां इस वैज के विषयों का संक्षेप में परिचय दे पाठ्यक्रम : भू-संरक्षण बंज (स्काउटों के लिए) 1. भूपटल पर होने वाले परिवर्तनों-नग्नीकरण, परिवहन और एकत्रण को समझे और उनके कारण जानें । (2) भू-क्षरण (सोइल इरोजन) की समस्या इसकी भयानकता, भेद, कारण, बचाव के उपाय इनका सामान्य ज्ञान हो। (3) भू-क्षरण की समस्या का अध्ययन करें और उसका विवरण प्रस्तुत करें जिसमें भू-संरक्षण, वृक्षारोपण और जलकष्ट निवारण के लिए देश में हो रहे कार्यो की सूचनाए' एकत्रित करे। अपने स्वयं के निरीक्षण और अनुभव के आधार पर भू-संरक्षण की स्थानीय समस्याओं का विवरण तैयार करें। इस कार्य में तीन माह व्यतीत किए जावें। 1. 11 से 18 तथा ऊपर की प्रायु के युवा छात्रों के लिए।
62 ] -- (4) भूसंरक्षण के लिये आयोजित-मेढ़बन्दी, वृक्षारोपण, साई पाटना आदि का महत्त्व समझे और इन कार्यों में कम से कम 24 धेरै श्रमदान किया हो। इसका विवरण प्रस्तुत करें। (5) अपनो टोली की सहायता से कम से कम 10 मूज के कूचे लगाकर तीन माह तक उनकी देखभाल की हो। (6) भू-संरक्षण बोर्ड (सोइल कन्जरवेशन बोर्ड) के संगठन, कार्य व प्रयोगों का साधारण ज्ञान हो । भू-संरक्षण बैज : रोबर स्काउटों के लिए देिखिये ए. पी. आर. ओ. भाग (2)] राउटों के लिए इस बैज के पाठ्यक्रम में निम्न और जोड़ें :- (7) मरुस्थलवासियों के जन-जीवन, रीति रिवाज व परम्परा प्रादि को समझता हो। (8) उनकी दो लोक कथायें जानता हो या दो लोक गीत गा सके. जिनमें मरुस्थली जीवन का चित्रण हो। (9) ऊंट के बारे में साधारण ज्ञान हो और मोहरा गांठ व वैलवा गांठ लगा सके। (10) मरुभूमि के कल्याण या भू संरक्षण के लिए लिये कम से कम 40 घन्टे सेवा कार्य किये हों। (11) प्रकृति सन्तुलन (Balance of Nature) के सिद्धान्त को समझे और पशु और वनस्पति के सम्बन्ध को दो उदाहरणों द्वारा समझा सकें । पशु और वनस्पति को रक्षा के लिये उपायों और उनके कारणो को समझता हो और उनसे सम्बन्धित किसी योजना में भाग लिया हो। (पीछे अध्याय 4 जांच (1) में देखिये) 'भू सरक्षरण' का प्रयंभू संरक्षण का अर्थ है-भूमि (मुदा) उपयोग करना' (Using) और उसे बवाना, रक्षा करना (Saving) | वर्तमान की आवश्यकता के लिये काम में लेना और भविष्य के लिए बचाना। इसका पहला उद्देश्य है, भूमि के कटाव (अपरदन) को रोश्ना और उसे रोकने के उपाय करना। यह एक विश्न ब्यापी चिन्ता प्रश्न है और इसका उत्तरदायित्व समस्त देशवासियों परह.जिनमें I. Conserving Soil : By M. D. Gutler. 2, A Manual on Conservation of Soil & Water (U.S. Deptt. of Agriculture) .
[63 स्काउट/गाइड भी सम्मिलित है। इसके लिए हमें कई अभ्यास करने होंगे।" इस प्रकार के अभ्यासों की महत्वपूर्ण बात यह है कि पाने वाले महीनों व वर्षों तक इनकी संभाल करनी पड़ेगी। मेरे विचार में, एक स्काउट-गाइड के दृष्टिकोण से "भूसंरक्षण" युवा वर्ग के लिए ऐसी समुचित गतिविधियों का एक कार्यक्रम है, जिसमें भूमि के कटाव व बचाव की समस्या का अध्ययन कर सरकार एवं जनता द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम को भ्रमदान व सेवा (गुडटन) द्वारा सफल बनाने का प्रयास किया जावे और जनमानस में भू संक्षण व मरु कल्याण की भावना को लोकप्रिय बनाया जावे। इसी उद्देश्य से यह कार्यक्रम व इस बैज फा पाठ्यक्रम तैयार किया गया है। जांच (1) भूपटल, उसको रचना मोर परिवर्तन हमारी धरती का ऊपरी तल 'भूमि' (मृदा Soil) कहलाता है, जिसकी दो तहे हैं .(1) ऊपरी सतह (शीपं मृदा) व (2) भीतरी मतह (अधो मुदा । शीर्ष मृदा । उपजाऊ पोर खेती के लिए बहुमूल्य होती है। प्रकृति और मानव दोनों इस भूमि के कटाव में भाग लेते है । प्राकृतिक शक्तियों में वायु, बहता पानी, बर्फ, मौसम का प्रभाव (ऋतु क्रिया) प्रधान है, जो बाहरी है। परन्तु भीतरी शक्तियां भी इस पर प्रभाव डालती हैं, जैसे- भूकम्प, ज्वालामुखी का फटना, भू-स्खलन आदि। मानव ने वनों व चरागाहों को काटा व दुरुपयोग किया और गलत तरीकों से खेती कर धरातल को रौंदता-काटता रहा पर मानव अब इस भूल का प्रायश्चित कर रहा है। इस प्रकार होने वाले परिवर्तन को तीन क्रियायें होती हैं- (1) नग्नीकरण (Erosion)-अपरदन, अपक्षरण, क्षय, भू-क्षरण अर्थात्-मिट्टी के कटांव का कार्य; (2) परिवहन (Transportation)-कटी हुई मिट्टी को ढोने या ले जाने का कार्य; '(3) एकतरण (Deposition)-जमाव या फैलाव का कार्य । ये तीनों क्रियायें साथ-साथ चलती रहती हैं । भूक्षरण की समस्या के वैज्ञानिकों ने दो मुख्य कारण माने हैं- (1) तेज वायु बा पवन (Wind) और (2) बहता पानी (Water) 1. World Scouting : Vol. 7, No. 1, Page 11 64 ] इन दो कारणों के आधार पर भू-क्षरण (अपरदन) के भी दो रूप है--(1) वायु से भू-क्षरण और (2) जल से भू-क्षरण । शुष्क प्रदेश और मरुस्थलों में वायु से भू-क्षरण अधिक होता है, जबकि अन्य क्षेत्रो मे पानी से। ***** ** FIND * W * नी ATER* बनत (चित्र सं. 52) जंच (2) : भू-क्षरण एक भयानक समस्या। (क) वायु से भू-क्षरण (Wind Erosion)-भारत में लगभग दो करोड़ हैक्टर मरुभूमि रेगिस्तान है। वायु से शुष्क व अर्द्ध शुष्क भागो मे भूक्षरण होता है। इन भागों में पश्चिमी व उत्तरी पश्चिमी राज- स्थान (थार मरुस्थल), हरियाणा में गुड़गावां, रोहतक और हिसार, पजाब में फिरोजपुर और कपूरथला, उत्तर प्रदेश मे आगरा, मथुरा, इटावा और जौनपुर, बंगाल में मिदनापुर, उड़ीसा में पुरी, गुजरात में कच्छ, मैसूर मे हागरी व तालकद, मद्रास मे रामेश्वरम् द्वीप. तिनवली, मदुराई, रामनद, मालेक व कोयम्बटूर का कुछ भाग और आन्ध्र मे नैलोर, गन्टूर, कृष्णा व विशाखापत्तनम के क्षेत्र वायु द्वारा भू-रक्षण बुरी तरह ग्रस्त हैं ।1 इस भयानक कार्य का समय फरवरी से जुलाई तक होता है, जबकि भूमि पर खेती कम होती है या नही होती और तेज हवायें चलती है। वायु के तेज झोकों से मिट्टी के कण उड जाते है और पोछे ककड़ व माटे कणों वाली अनुपजाऊ सतह-सतह रह जाती है। उड़ी हुई मिट्टो इकट्ठी होकर रेत के ढेर (टीले) बन जाती है। यार के मरुस्थल में तो वालू के टीले एक स्थान से उड़कर दूसरे स्थान को चले जाते है और "मरुस्थल की बाढ़" उपजाऊ क्षेत्रों को पोर 0.8 किलोमोटर प्रति वर्ष की गति से बढ़ रही है, उपजाऊ क्षेत्रों को मरुस्थल बना रही है। यह तथ्य वैज्ञानिकों के विचार का विषय Bulletin (Agri.) 1. Wind Erosion Control ; 1. C. A. R. Tech. No. 20: By Ganguly & Kaul (1969) Page 1.
[65 +- फिर भी यह सत्य है कि-मरुस्थल के टीले इधर-उधर चलते रहते हैं । वैज्ञानिक इस भू-क्षरण के निम्न कारण बताते है- 1. सूखा मौसम, वर्षा को कमी, अकाल । 2. भूमि पर प्रावरण या रुकावट का अभाव यानी पेड़-पौधे व घास का न होना। 3. विस्तृत समतल व खुला क्षेत्र, जहां वायु स्वच्छन्द मपनी विक- राल लीला करती रहती है। रकयाम--इन कारणों को दूर या कम करने के लिए दो उपाय वैज्ञानिकों ने बताये है :- (1) रुकावट डालना जिससें वायु की गति कम हो जाय-कनाडा में एक प्रयोग द्वारा पता चला है कि वायु को गति धरातल से 1 फोट ऊपर तक तेज होती है, इस भाग में 92% धूलिकरण उड़ते पाये गये हैं। इस प्रकार 1 से 2 फीट तक की ऊंचाई की रुकावट पैदा करने से वायु की तेज गति को काफी हद तक रोका जा सकता है, जिसके दो साधन हैं-(अ) वन संरक्षण यानी वनस्पति का प्रावरण लगाना- पेड़, घास, छाया,- पट्टियां आदि लगाना । (व) यांत्रिक तरीके-जैसे बाड़बन्दी रिजिंग), कणावन्दी या प्रावरण (मल्चिग), मेड़बन्दी, कण्ट्ररवन्दी ग्रादि। (2) उन्नत तरीकों से कृषि करना-ताकि मिट्टी को बचाया जा सके. जैसे-पट्टीदार खेती, बदलती खेती, सूखी खेती, कण्टूर खेती आदि किस प्रकार प्रावरण या रुकावट से भू क्षरण कम होता है, इसके लिए दो प्रयोग पीछे चित्र स. 35 व 36 में दिये गए हैं। (स) पानी से भूक्षरण (Water Erosion)-प्रकृति में पानी के कार्य-कलापों को वैज्ञानिक भाषा में 'जल चक्र' (Water Cycle) कहते हैं। चित्र स. 53 में यह चक्र समझाना गया है कि- समुद्र का पानी बाइल वाष्पीकरण बनम्पति (चित्र सं. 53-प्रकृति में जल-चक) 66 ] भाप बन कर वाष्पीकरण से वादल बन कर वर्षा करता है और वहकर नदी के द्वारा वापस समुद्र में चला जाता है । वर्या मे गिरने वाला पानी मिट्टी के कणों को बिखेरता है (Splash erosion) और साथ वहा कर ले जाता है, काटता है एक अोर जमा कर देता है, फिर नाला या नदी बन जाता है। बलो मेवादिन ...जमबह 1जाता बनविहीन २६२'जर Wi MUNIA अपक्षरण महा “ माण (चित्र सं. 54) परन्तु वनों से आच्छादित क्षेत्र में अपक्षरण (केटाव) बहुत कम होता है और वन-विहीन क्षेत्र में बहुत अधिकं । चित्र सं. 54 में इस अन्तर को स्पष्ट किया गया है। पानी से भूमि का कटाग-पानी से भूमि का कटाव तीन प्रकार का होता है-(1) ऊपरी सतह का कटाव (Sheet Erosion), (2) नाली का कटाव (Rill Erosion) और (3) गहरी खाइयों या वेहड़ों का कटाव (Gully Erosion) 1 नदियों के किनारों के क्षेत्र कट-कट कर (चित्र स० 55) बेहड़ (खड्ड) बन जाते हैं । चम्बल व यमुना अपनी भयानकता के लिए प्रसिद्ध हैं। कटाव से ग्रस्त क्षेत्रों को पुनः खेती योग्य बनाने के लिए सरकार ने कई योजनाये हाथ में ली हैं। इनमें मेडबन्दी, खाई पाटना वेहड़ों में चरागाह व वन उगाना, पक्के बन्ध बनाना व रोकने के बन्ध बनाना आदि प्रमुख है।
[67
भू-क्षरण के कुछ उपाय-भू-संरक्षरण के तरीके
1. नियन्त्रित चराई के लिए चारागाह में पट्टियां बनाकर चराई
का प्रवन्ध करना (चित्र सं. 56) और पशु शाला में चराई का प्रबन्ध
करना । (चित्र सं.57)
(चित्र सं. 57)
2. मेढबन्दी व कण्ट्ररबन्दी -खेतों व बजर जमीन में भी मे.
(डोले) लगाकर मिट्टी के कटाव को रोका जा सकता है (चित्र सं. 58)
ऊंचे टीलों या पहाड़ो व पठारी भागों में
में खेती के लिए कन्टूर तरीके की मेढ़बन्दो
को जाती है। चित्र संख्या 59 में एक
प्रयोग दिया है-(1) में सीधी रेखा में
खेती करने या वन्ध लगाने का प्रयोग है
और (2) में कण्ट्रर तरीके से। आप भी
इस प्रयोग को कीजिये और परिणाम
देखिये-
।
(चित्र सं. 58) ढालू जमीन
पर मेढबन्दी व कण्ट्रर बन्दी
(चित्र स. 59) कण्ट्रवन्दी से मूमि का कटाव कम
68 ] . 3. वनों की नियन्त्रित कटाई- (चित्र सं. 60) पेड़ों को काटना ही पड़े, तो इस प्रकार का कि उनसे वायु की रुकावट पर कोई असर न पड़े और नीचे का जड वाला भाग मिट्टी को कटने से रोके। (चित्र सं. 60) 4. पौधशाला (नर्सरी) लगाना-'वन महोत्सव' के लिए नर्स लगाइये। पौधों को पास में खाई खोदकर जड़ समेत मिट्टी के सा उठाकर पौध को गमले में लगाइये । (चित्र सं 61)। (चित्र सं. 61) पौध को उखाडना पौधे को गमले या बाल्टी में फुट पानी में सुरक्षित रखें और थांदला या गमला तैयार कर उस रोप दे। (चित्र सं.62 पौध की सुरक्षा) (5) गन महोत्सन या पेड़ लगाना-पेड़ों को कतारों में इस प्रकार लगाइये कि वे एक सुरक्षित बाड़ या रुकावट का काम दें। इसके लिए पेड़ तिरछी कतारों में (चित्र सं. 63) तिरछी कतारों लगाइये। में वायुरोधक बाढ़ के रूप में पेड़ लगाना [69 (6) टीबों या पहाड़ी पर पेड़ लगाना--इससे - कटाव में रुकावट पाएगी। (चित्र सं. 64) ढाल पर वृक्षारोपण जांच (3) स्थानीय भूक्षरण को समस्या का अध्ययन व विव- रए यह अध्ययन प्रापको लगातार तीन महीने तक करना होगा और उसका विवरण एक डायरी में दो भागों में इस प्रकार रखिए- (क) भू-क्षरण के विरुद्ध चल रहे भू-संरक्षण के कार्यक्रमों, वृक्षा- रोपण, जल कष्ट को दूर करने के कार्यक्रमों आदि से सम्बन्धित समाचारों का संग्रह कोजिये । समाचार पत्रों की कतरनें भी आप इस डायरी में चिपका सकते हैं । (ख) आपके नगर या नाम में भू-क्षरण की समस्या का अध्ययन कीजिये-- 1. क्या आपके ग्राम में वायु से या जल से भू-क्षरण होता है ? 2. क्या आपके क्षेत्र के तालाब या नदी के पास पड़ोस में जल से कटाव के कारण खड्डे पड़ गए हैं ? 3. आपके क्षेत्र में भू-संरक्षण के क्या-क्या कार्य हो रहे हैं ? उनसे क्या लाभ हो रहा है ? 4. अपने गांव के पास पड़ोस में जमीन का ढाल, पानी से कटाच सड़क के किनारे बालू का जमाव या मिट्टी का कटाव, खेत खेत के मैदान में मिट्टी का जमाव आदि का भी अध्यवन कीजिये। 5. क्या आपके ग्रामवासी भू-संरक्षण के प्रति जागरूक हैं ? आप उनकी क्या मदद कर सकते हैं ? इन प्रश्नों के उत्तर प्राप्त कर डायरी में लिखिए।
70 ] - कुल योग 1 بیا 5 . जांच (4) भू संरक्षण के लिए 24 घण्टे "का श्रमदान भू-संरक्षण के कार्यों को मरुस्थल में मरुकल्याण का एक साधन-मरुकला का अग माना गया है। हम कुछेक कार्यकम पहले बता चुके हैं, आप योजना बनाकर इनके लिये सामूहिक श्रमदान या व्यक्तिगत श्रमदान कीजिये और विवरण इस प्रकार रखिये समय कार्य के घण्टे काय दिनांक से तक विवरण 2 4 परन्तु इस जांच के लिए अगली जांच संख्या (5) में किया गया कार्य सम्मिलित नहीं माना जावेगा । यह अतिरिक्त कार्य होना चाहिये। जांच (5) एक टोली परियोजना (A Patrol Project for deséri afforestation) यह आपकी टोली का अभ्यास है। इसमें टोर्ली विधि का सक्रिय स्वरूप प्रापको मिलेगा। टोली की सहायता में 10 मूज के कूचे लगाकर आपको उनकी देखभाल करनी है, पर यह पूरी टोली का उत्तरदायित्व है। आपको तीन माह बाद 10 कूचे जीवित परीक्षक को दिखाने होंगे। अत: अधिक संख्या में कूचे, लगाइये । यदि एक टोली के सभी स्काउट ,इस जांच को पास करने के इच्छुक हों, तो आठ स्काउटों की टोली का अस्सी कूचे जीवित रखने होगे। योजना बनाइये, सफलता आपके चरण चूमेगी।. जींच (6) भू संरक्षण बोर्ड का परिचय-राजस्थान राज्य में भू- संरक्षण कार्यक्रम को कानूनी रूप देने के लिए "राजस्थान भूमि एवं जल संरक्षण अधिनियम 1964" बनाया गया है, जिसके अधीन राज्य स्तर तथा जिला स्तर पर बोई और समितियों का गठन किया गया है । आप अपने जिले के भू-संरक्षण अधिकारी (कृषि या वन) से मिलिए व उनकी मदद लीजिए। उनको भू-सरक्षण की योजनाओं पर बातचीत करने के लिए निमन्त्रित कीजिये। उपसंहार: भू-संरक्षण एक महान कार्य है। देश की सामयिक सेवा का एक महान् अवसर है। इसमें प्रत्येक स्काउट/गाइड को भाग लेना चाहिये । यह दक्षता वैज मरुस्काउटों के साथ-साथ सभी अन्य क्षेत्रों के स्काउटों द्वारा भी प्राप्त किया जा सकता है। जय मरुधरा! जय वसुन्धरा !! 냐 अभ्यास र्थ 1 7 (क) स्काउट/गाइड क्या करें? 1. वर्षा के समय वौछार से घरों को नीवों के पास कटाव (Splash erosion) होता है। आप चारों ओर मिट्टी डालकर या पौधे व बेलें लगाकर अपने घर की रक्षा व सुन्दरता दोनों कार्य कर सकते हैं । यदि आप दूसरों के घरों पर यह कार्य करें, तो राष्ट्रपति-काउट/गाइड वैज के लिए एक आकर्षक सेवा कार्य हो सकेगा। 2. एक घरेलू-बगिया (Kitchen Garden) विकसित कीजिये कि- आप के घर के चारों ओर एक इन्च भी जमीन नंगी व खाली न रहे। इससे भू-क्षरण रुकेगा, पास पड़ोस सुन्दर बनेगा. और भापको फल, व सब्जी भी मिलेगी। 3 पाप बागवान (गार्डनर), पुष्पज्ञ (फ्लोरिस्ट), प्रकृतिज्ञ (नेचुरे- लिस्ट, जड़ीबूटीज्ञ. (हर्बलिस्ट) आदि बैज प्राप्त कीजिये। 4. आप एक खाद की ढेरी.या गड्ढा बनाइए, जिसमें घास पत्ते आदि डालकर कूड़ा करकट डालकर खाद बनाइये,, । इसमें गाय के ग.बर, चूने को थोड़ी सी मात्रा डालकर बहुमूल्य खाद, बनाइये। यह मृदा (Soil) बनाने का कारखाना है। (चित्र सं. 65) 72 ] 5. पार्क, खेल के मैदान व खेतों के प्रारपार लोग रास्ते बनाकर उनकी हरियाली को नष्ट करते हैं। ऐसे रास्तों को रोकने के लिए बाड़ (Fence) या रिज बनाइये, ताकि लोग कम से कम सचेत हो जाये कि यह रास्ता नहीं है। 6. आपके अगले ग्रीष्मावकाश शिविर के लिए एक विचार लीजिये-तालाब के वान्ध, नहरों के किनारे, शिविर केन्द्र में ढालू स्थानों आदि पर पाप कटाव रोकने के लिए लट्ठों, पत्थरों या अन्य चीजो से बान्ध या वाड़ (dams or rides) बनाइये । आप किसान के खेत पर भी ऐसा कार्य सेवा के रूप में कीजिये। 7. अपना वृक्ष उगाइए-अपनी पसन्द की जगह अपनी पसन्द का कोई पेड़ लगाइये। फल या फूल का वृक्ष उपयोगी होगा। 8. वन महोत्सव में भाग लीजिये। (ख) अभ्यासक्रम 1. मेढ़बन्धी, टीबावन्धी, खाई पाटना, कण्टूरबन्धी प्रादि को योजनाओं के लिए श्रमदान कीजिये। 2. कणावन्धी का अभियान व प्रचार कीजिए। 3. अपनी शाला या खेत में कणावधी (Mulching) का प्रदर्शन कीजिए। 4. सूखी खेती या पट्टीदार खेती का प्रचार कीजिये । 5. भू-क्षरण का अपने पास पड़ोस में अध्ययन व अवलोकन कीजिये। 6. भू-संरक्षण के कार्य सम्बन्धी समाचारों की कटिंग एक डायरी में 3 माह तक चिपकाकर एकत्रित कीजिये। 7. भू-संरक्षण सम्बन्धी क्या-क्या कार्य आपके क्षेत्र या गांव में हो रहे है ? 3 माह तक रिपोर्ट लिखिए । 8. आपके यहां भू-सरक्षण-कार्यकर्ता (अधिकारी या फोल्डमैन) कौन है ? उनसे मिलिये। 9. भू-संरक्षण के लिये सरकार क्या मदद करती है ? लगाइये। 10. एक खेत में टोबावन्दी या कण्टूरबन्दी कैसे की जा सकती है । फोल्डमैन की मदद से खेतों में जाकर योजना बनाइये। पता S 11. अपने क्षेत्र को मिट्टी के नमूने लेकर उनकी रासायनिक जांच करवाइये । कृषि प्रसार अधिकारी (A ED.) यो "ग्राम सेवक की मदद से सीखिए। 12. खेतों में से 12"x12" तथा 18' गहरा मिट्टी का भात लेकर उन्हें लकड़ी के बाक्स या खोखों में रखकर उनमे अलग-अलग घास या झाडो लगाकर पता लगाइये, कौन-सो जगह कौन-पी • घास या झाड़ी अच्छी डगनी है। 13. "भू-संरक्षण" क्या है ? इस पर वाद विवाद कीजिये। ..14. "स्काउट भू-संरक्षण के लिए क्या मदद कर सकते हैं"-इस विषय पर टोली या दल में विचार कीजिए। नई बातें हमें भी लिखकर भेजिये 15. वर्षा के बाद किसी खेत या खुले मैदान में जाइये और जमीन में छेद कर पता लगाइये कि --(क) खुलो जमीन, (ख) खेत, (ग) घास से ढके खेत, (घ) कणाबन्दी वाले खेत, (ङ) पेड़ों के नीचे जमीन में कितने इंच गहराई तक पानी पहुंचा है ? 'अन्तर के कारणों का पता लगाइये । 16. भू-संरक्षण कार्यों को देखने के लिये एक भ्रमण कोजिए। 17. ग्राम कार्यकर्ता (रूरल वर्कर), ग्राम इंजीनियर, भ्रमणकर्ता) (हाउकर), प्रकृतिज्ञ (नेचुरलिस्ट), वनविज्ञ (वैकबुड्समैन) और वागवान (गार्डनर) और इकोलोजिस्ट के दक्षता बैज प्राप्त कीजिए। (ग) भू संरक्षण : अभ्यासासार्य : कुछ और सुझाव : 1. स्थानीय भू संरक्षक विभाग की किसो योजना में मदद करो। 2. स्कूल ग्राउण्ड, पार्क, कैम्प या अन्य अनुपयोगी स्थान पर 100 वृक्ष या वेलें, हेजनुमा झाड़ियों को लगाइए जिससे अधिो से सुरक्षा हो सके। 3. भूमि का परीक्षण करो कि उममें कितनी उर्वरा है। लॉन लगाइये, चाहे स्कूल में या अन्य खाली पड़ी जमीन में। 4. भूसंरक्षण सर्वेक्षण की का स्यानोय मानचित्र प्राप्त करो। उसमें कितने प्रकार की मिट्टी दिखाई गई है। उसे क्षेत्र के लिए भू- संरक्षण को दष्टि से किन साधनों को जरूरत है पता करो।
74 ]
.
5. तालाब या सड़क के किनारे पर सिरस, मेंहदी, शीशम के
वृक्ष लगवाने में मदद कीजिए।
6. एक खेत में सिंचाई की नालियां बनवाने में मदद करो।
7. एक तालाब में मछली/पशु/पौधे का अध्ययन करके उनकी
वृद्धि होने के विषय में जानकारी प्राप्त करो।
8. 'कण्टूर खेती' 'पट्टीदार बुवाई' 'फसलों में हेर फेर', 'ढकी हुई
फसलें' (Cover Crops), टैरेसिंग' (Tracing), 'सोयल डिप्लेशन' का अर्थ
समझे।
9. भू-संरक्षण विभाग के अधिकारी को बुलाकर अपने ग्रुप में-
प्रकृति के सरक्षण की अनिवार्यता पर वार्ता करायें।
10. गली, खड्ड या खाली स्थान पर फूल उगाइये बीज इस
क्रम से उगाइये जिससे 'स्वागत', हर्प', 'कोशिश करो' 'तयार' 'सेवा',
प्रादि शब्द पढ़ा जा सके।
11. कटाव वाली सड़कों, रेल पटरियों के पास की जमीन या
नदी के बांधों पर नं0 10 की तरह के शब्द पत्थरों से लिखो।
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परिशिष्ट एक मरू-स्काउटिंग DESERT - SCOUTING वार्षिक संरक्षण-परियोजना [मरुस्काउटिंग योजना पर आधारित] साधारण स्काउट-ग्रप के कार्यक्रम में निम्न गतिविधियां सम्मि- लित कीजिये । चिन्हांकित (O) कार्य मरुकव पैक में भी अपनाने चाहिये। 01 ग्राम के जलस्थान (टांके, कुयें या तालाब)की सफाई, सोखते गड्ढे बनाना, पानी इकट्ठा करने के प्रयास । एक रविवार को सार्वजनिक जलस्थानों पर कार्य कोजिये, फिर टोलियों में घर के टांकों को संभाल कीजिये । पानी को साफ रखने के लिये टांकों या कुप्रों में लाल दवा या ब्लीचिग पाउडर डालिये । 2. अपने ग्रप के स्काउट व कन्स मिलकर 'नर्सरी' (पौधशाला) लगाइये । नर्सरी में बीच बोइये, ताकि महिने भर बाद पौध को बाहर लगाया जा सके. -या-अन्य साधनो से पौध प्राप्त कर लगाने के लिये तैयार रखिये। 3. वृक्षारोपण के लिये योजना बनाइये [1] सड़क के किनारों पर वृक्ष-पंक्तियां लगाइये। [2] स्कूल की चहार दीवारी के साथ वृक्ष पक्ति लगाइये, [3] ग्राम के चौक, बस स्टैण्ड प्रादि पर छायादार वृक्ष लगाइये । वृक्षों में नीम, सहजना, शीशम, गुलमोहर, बेर, विलायती बलूल, बबूल आदि चुनिये । लक्ष्य : प्रत्येक दो स्काउट या चार कम्ज की जोड़ी एक वृक्ष लगाकर उसकी देखभाल करें-तीन माह तक पूरा ध्यान दें। इस प्रकार एक अप में 16+6=22 वृक्ष लगाये जावे मोर उन्हें जीवित रखा.जावे । सख्या नही, जीवित वृक्ष हमारा लक्ष्य हो । दूप और पैक मीटिंग के साथ वृक्षों को संभाल व रिपोर्ट एक कार्य हो । . ।
76 1 " 5 मूजा (कूचा) लगाना-यह एक नया कार्य होगा। मूजा की जड लगती है। वर्षा के साथ जड़ें खोदकर निकाल लाइये और एक- एक सीक को जड़ सहित पंक्तियों में लगाइये। सड़क के दोनों किनारे के टीबों या खेत की वाड पर 6-6 इन्च की दूरी पर इन्हें वर्षा के बाद गोली मिट्टी में रोपिये। प्रत्येक स्काउट या कव 10 मजे लगावे । इनमे से 50 तो लग ही जावेंगे । आप मूजा के स्थान पर ग्वार पाठा. थोहर, नागफनी, प्राका, केवड़ा, झाड़ी (वेर की) को भी लगा सकते हैं। 5, घास पट्टियां उगाना--पाप सेणा, फोग, सेवन, धामण, ग्रेमना घासों के वीज अपने ग्राम सेवक या कृषि अधिकारी की मदद से प्राप्त कर किसी बाड़े में या स्कूल के पिछवाड़े में बोइयं । उग जाने पर ग्राम वासियों को दिखाइये । इसका प्रचार पंचायत की मदद से ग्राम-चारागाह में कीजिये । बीज पचायत दे, बाड़ पचायत लगवाने, श्रमदान मरू-स्काउट करें। यह स्काउटों के लिये सभव है । आपकी साप्ताहिक मीटिंग या हाइक चारागाह के पास कीजिये। 6. घर पर-[1] प्रत्योक स्काउट/कन्स अपने घर पर कोई तीन पौधे (तुलसी अजवाइन, सुदर्शन, ग्वार पाठा) लगावे और उसकी पूरी देख भाल करे व उसका प्रोपधि के रूप में उपयोग करे। [2] घर पर बाड़े मे या अपने खेत पर परिवार की मदद कम से कम एक वृक्ष लगाकर उसकी सभाल करे। 7. बैज-अप के 25 प्रतिशत स्काउट नेचुरलिस्ट, फ्लोरिस्ट, हर्बलिस्ट, गार्डनर, भू-सरक्षण बैजो में से कम से कम इस वर्ष के अन्त तक पास करें। 8. भू-संरक्षण के लिये इस वर्ष वृक्षारोपण के साथ दो सेवा कार्य अपनाइये--(1) टोबावन्दी-ग्राम की सड़क या स्कूल के पास बढ़ते किसी टोबे को रोकने के लिए योजना बनाइये । टीवे को जिधर । बढ़ना है. नोचे बाढ़ लगाइये(रिजिंग)-कांटों को दवाकर दाड़ बनाइए। वाड़ के साथ मूजों की दो कतारें लगाइए। पीछे 4-5 वृक्ष या झाड़ी लगाइए । बीच के स्थान में किरणसरियां, लगरिया, पाक, धतूरा लगाइए । इसके बाद हवा के रूख को रोकते हुए कार्ट या झाड़ियों को बाड़े (रिजिंग) लगाइए । इस सेवा कार्य मे सब मिलकर काम वांटकर श्रमदान करे। इस योजना पर लगातार 3-4 वर्ष कार्य करना होगा, तभी सफलता मिलेगी। आवारा पशुओं से पेड़ों व झाड़ियों को बचाने की व्यवस्था [77 . । (चित्र सं. 67 टीबाबन्दी का एक दृश्य) कीजिये । प्रतिदिन इसे संभालने के लिये दो स्काउट या चार कस की ड्यूटो लगाइये। (2) कणाबन्दी (मल्चिग) के दो रूप अपनाइये। (क) खेतों में कटाई से पहले किसानों से मिलिये । बाजरा की फसल को काटते समय यदि 3" से 6" तक की जड़ें छोड़कर कटाई को जावे, तो खेत में कटाव कम होगा और खाद भी मिलेगी। (ख) कटाई के बाद वेकार काटी हुई झाड़ियां आ द छड़ियो आदि को खेत में बिखेर देने से कटाव कम होगा। ये दोनों कार्य प्रचार के हैं। . 09. पानी साफ करने के तरीके सीखिये और घर में उनका प्रयोग कीजिए। “शुभ कार्य घर से शुरू होता है।" इसे न भूलिए। 10. अकाल के समय राहत कार्यो में मदद करना, सड़क पर आई मिट्टी को हटाना, टिड्डी विरोधी अभियान में सेवा कार्य कीजिए। 11. ग्रामीण कला की वस्तुएं बनाना सीखिए। 12. ग्राम के प्रासपास, स्कूल में या घर पर दो स्काउट एक 'पक्षी घोंसला' बनावें और उसमें दाने व पानी की व्यवस्था करें। 13. बर्डवार्डन, डेरोमैन, शीपफारमर, पशुमित्र के बैजों में से से कम दो बैज 25 प्रतिशत स्काउट प्राप्त करें 14. त्रैमासिक कम्पफायर का विशेष आयोजन किया जावे, जिसमें लोक नृत्य, लोकगीत, मरूभूमि के वातावरण च मरु कल्याण कामों के प्रचार के साथ ग्रामीण युवकों के आइटम भी शामिल किये जावें , 15 मरुभूमि के खेलों को खेलिए-गिल्लीडंडा, झुरीडंका, (जलझूलनी डका), पालको-पालको, लूनक्यार, मारदड़ी, ठियादड़ी प्रादि नप मोटिंग में खेलिए।
78 ]
16. स्काउट प्रशिक्षण केन्द्र से संलग्न "स्काउटवन" (Nature
Reserve or Woodlands) पर, आयोजित संरक्षण कार्यक्रम में भाग
लीजिए । सूचना केन्द्रों पर मदद कीजिये ।
संरक्षण सम्बन्धी दक्षता के बैजों की तालिका
बैकवुड्समैन वास्केट वर्कर वी मास्टर
बर्ड वार्डन कैम्पर
क्लाइम्बर
डेरीमैन
एक्सप्लोरर फार्मर
फायरमैन
फ्लोरिस्ट
फोकडान्सर
फोरेस्टर
फण्ड टू एनीमल गार्डनर
हैण्डीमैन हरबलिस्ट
होइकर
माइनर
नेचुरेलिस्ट
पायनीयर
पोल्ट्री फारमर रूरलवर्कर
सी-फिशरमैन
शीप फारमर
स्टाकर
ट्रेकर
वेदरमैन
रूरल इंजीनियर डेजर्टफोक
कमलमन
सोइल कन्जरवेटर इकोलोजिस्ट
हमारा संकल्प... हम, मरुस्काउट्स ‘मकल्याण" अर्थात्- 1. मरभूमि की मरुकला (जैसे--प्राकृतिक साधनों का संरक्षण) की गतिविधियों द्वारा हराभरा (GREEN) बनाने 2. मरुभूमि को सांस्कृतिक व ऐतिहासिक धरोहर, लोककला व कला कोशल का पुनरुद्धार करते हुए इसे समृद्ध (GLORIOUS) बनाने, 3. मरुवासियो को 'संरक्षण' के प्रति जागरुक बनाकर अच्छे जीवन स्तर को प्राप्त करके कठोर जीवन में भी सुखी (GAY) बनाने के लिए- --सेवा करते हुए "तयार" रहने का भरसक प्रयत्न करेंगे। [] 'हरा भरा मरुस्थल हो जाय - पठनीय पुस्तकें 1. विश्व स्काउट ब्यूरो द्वारा प्रकाशित संरक्षण पुस्तकमाला; अग्रेजी में :- 1. Clean Water, 2. No litter, 3. Precious Soil, 4. Pure Air, 5. Free Wildife, 2. Unesco Source Book of Science Teaching. (सरल साज सामान से वैज्ञानिक प्रयोग) भारत सरकार (पब्लिकेशन्स डिवीजन)द्वारा हिन्दी में प्रकाशित 3. Desert Scouting in Action-Dutt. 4. स्काउट कला के अभ्यास : दत्त As स्काउट विमसि विश्व स्तर पर मरु-स्काउटिंठा "xours "स्काउटिंग गाइडिंग" निःस्वार्थ भाव से सेवा करने वाला एक आन्दोलन है। 'तत्पर रहना" इसका मूलमंत्र है है । युद्ध के समय तो यह आन्दोलन विशेष क्रियाशील होता ही है, किन्तु शाति-काल में भी इसकी क्रियायें समाज के हर क्षेत्र-आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास के लिये, परिस्थितियो और तेजी से बदलते हुए मूल्यों को दृष्टिगत रखते हुए कम महत्व को नहीं होती। यही कारण है कि यह आन्दोलन एक सर्वकालिक व गतिशील आन्दोलन बन गया है । समय और परिस्थितियों की मांग के फलस्वरूप इसमें विकास होता रहा है। नये क्षितिज इसकी परिधि में आते रहे है और जो तात्कालिक किशोरो और युवकों को मंजूर नहीं, वे कार्य-कलाप इसकी दिनचर्या से हटते गये हैं । एयर-स्काउटिंग और सो-स्काउटिग जैसी विशेष शाखाप्रो का प्रादुर्भाव समय को मांग के फलस्वरूप बहुत पहले ही हो गया था। राजस्थान के थार रेगिस्तान की विशेष परिस्थितियों से ही श्री कृष्ण- दत्त शर्मा को मरु-स्काउटिंग की योजना बनाने की प्रेरणा मिली, जिसके फलस्वरूप भारत स्काउट्स व गाइड्स आन्दोलन में मरु- स्काउटिंग की विशेष शाखा का प्रादुर्भाव हुआ है । यार के रेगिस्तान की अपनी कई समस्यायें है। पीने का पानी, अकाल, रेत के टीले, भूमि और नमकीन पानी, टिड्डियों का आक्रमण आवागमन के साधनों का अभाव आदि अनेकानेक समस्याएं हैं। इन समस्याओं का बहादुरी से समाधान करने व रेगिस्तान को हरा "नया गिक्षक" सितम्बर मक्टूबर 1971 से सामार उन त । [श्रीयुत जगन्नाथ सिंह मेहता, स्टेट चीफ कमिश्नर, राजस्थान द्वारा 14 अगस्त 1971 को जापान में प्रायोजित '21वी विश्व स्काउट कान्फ्रेंस मे मरु-स्काउटिंग' पर एक पेपर प्रस्तुत किया गया था जिसका 'सार-सक्षेप'.] 17 1.
[1 भरा व प्रफुल्लित करने के लिये मरुस्काउटिंग की योजना तैयार की गई है जो वास्तव साधारण स्काउटिंग के साथ मरु-स्थलीय गतिविधियों के विशेष दृष्टिकोण से युक्त है । समस्याओं के साथ रेतीले भू-भाग को अपनी आह लादपूर्ण घटाये और अपना विशिष्ट सौन्दर्य भी है। घोरों पर की चांदनी रातें और ठंडी रातों में गोरबन्ध ऊंटों पर सफर नैसर्गिक सुख प्रदान करता है। योद्धाओं, प्रेमियो और घुमक्कड़ों की वीर प्रणय गाथाओं से इसका इतिहास भरा पड़ा है। इसके लोक गीत, लोक नृत्य अपना सानी नहीं रखते । मरुस्काउट्स और गाइड्स यहां के लोक जीवन में घुलमिलकर इसके साथ गाकर और नाचकर इनकी सस्कृति को पहचान कर, वर्तमान में जो अज्ञान और अन्धविश्वास इन अनपढ़ ग्रामीणों में घर किए हुए हैं उन्हें दूर कर स्वथ मनोवैज्ञानिक दृष्टि में बहुत योग दे सकते हैं। भारत-स्काउट्स व गाइड्स की नेशनल कौसिल ने इसे स्वीकृति प्रदान कर दी है। ए.पी. प्रार. मो. में इस सम्बन्ध में आवश्यक संशो- धत कर दिये गये हैं। राजस्थान मरु स्काउट्स व मरु गाइड्स के लिए सेवा का एक बहुत बड़ा क्षेत्र खुल गया है और थार के विशाल मरु भू भाग को हरा भरा और खुशहाल (Green, Glorious & Gay) बनाने का वृहद भार इन्हीं मरु स्काउच्स व मरु गाइड्स को ही वहन करना है। विश्व के अन्य मरुस्थलीय देशों के लिये भी मरु-स्काउटिंग वहुत लाभप्रद सिद्ध हो सकती है और राजस्थान के मरु स्काउट्स व गाइड्स दलों को इस दिशा में रोशनी दिखानी है और पथप्रदर्शन करना है। 00 मरुस्काउटिंग के दक्षता के बैज मरवासी ऊंट चालक भू-संरक्षण (Desertfolk) (Camelman) (Soil Conservation) (A) मरवासी (डेजर्ट फोक) निम्न का सामान्य ज्ञान हो- 1. जनजीवन - अपने अध्ययन और अवलोकन के सहारे मरु- स्थलीय जीवन का साधारण ज्ञान प्राप्त करें- (1) भौगोलिक परिस्थितियां-भूमि, नदी, जलवायु आदि । (2) निवास व्यवस्था । (3) रहन-सहन, जीवन स्तर, भेषभूपा, खान-पान । (4) जनमन का स्वभाव, रीतिरिवाज, परम्परायें, धर्म, अन्ध- विश्वास, कुटेव । (5) व्यवसाय व धन्धा । (6) जन जीवन की प्राकृतिक समस्याओं व उनका निवारण करने के उपाय, इनके अध्ययन के लिए की गई 3 यात्रामों का विवरण प्रस्तुत किया जावे। विवरण अपने गांव या नगर के चारों ओर 15 मील क्षेत्र का हो और इसमें स्थित ग्राम, बस्तियां, रास्तों, जल स्थानों, नखलिस्तानों व शिविर योग्य स्थानों को सम्मिलित करें। 2. प्रफुति-ज्ञान-मौसम की भविष्यवाणी के लिये स्थानीय कहावतो को जानें, एकभित करें और उपयोग करें और अपने निरीक्षण मे उसका लेखा तैयार करे । हवा की गति मालुम कर सकें। 3. जल और सिंचाई-(क) सिंचाई के साधन, जल शुद्ध (साफ) [ 83 करने के तरीके और गन्दे जल के प्रयोग से हानियां जानें । जलकष्ट (पानी की कमी) को मिटाने के लिये उपलब्ध सरकारी सहायता जानता हो। (ख) क्षेत्र को मुख्य फसलें और अनाज का साधारण ज्ञान हो। किसी बांध या नहर के बारे में ज्ञान हो और खेतों के लिए पानी इकट्ठा करने के तरीके जानता हो। 4. कला-कौशल-उस क्षेत्र में उपलब्ध विभिन्न प्राकृतिक रस्सी बनाने की वस्तुओं में से किसी एक के प्रयोग से रस्सी बना सके या माचा (चारपाई) बुनना जानता हो या स्थानीय रूप से प्राप्त होने वाले से प्राकृतिक सामान से कोई कलात्मक वस्तु तैयार करें-या-घास-फूस छप्पर बना सकें व उसका प्रयोग करके वतावें। 5. यात्रायें-(प्र) भ्रमण के द्वारा मरुस्थल की विशेष प्राकृतिक घटनाओं का ज्ञान प्राप्त करें-जैसे मृगतृष्णा, भवरी आदि । (ब) टिड्डी विरोधी अभियान में या अन्य प्रकार की स्वीकृति समाज सेवायें 5 घण्टे की हों। (S) ऊंट चालक (कमलमन) 1. मरुस्थल के पावागमन के साधनों का सामान्य ज्ञान हो। 2. "रेगिस्तान के जहाज" ऊंट के विषय में साधारण ज्ञान हो । किस्में, अच्छे ऊंट के लक्षण, उसकी आदतें और स्वभाव, भाजन व पानी, चाल व गति, सर्दी में मस्ती व उससे बचाव । काठी ढांचा और डोल में अन्तर और उसके प्राथमिक अचार जानता हो। ऊंट को सजाना जाने (गोरबन्द, झूला प्रादि से) । 3. यात्रायें (1) ऊंट पर दिन में व रात को यात्रा करने के रीति-रिवाज जानता हो और तारों की सहायता से दिशा तथा समय का पता लगा सके (2) रेगिस्तान में पैदल यात्रा के नियम जाने व धूप लगने तथा प्यास से बचने के उपाय जाने। '(3) ऊंट पर एक साथी के साथ कम से कम 30 मील की यात्राएं कर चुका हो । प्रत्येक यात्रा को कम से कम दूरी 10 मील हो। इसके दौरान में जन-जीवन और ऊंट की पादतों का अध्ययन कर अपने अवलोकन का विवरण लाभ प्रस्तुत किया जावे। इसी बीच 84 ] कुल मिलाकर दो रातें किसी नखलिस्तान या वस्ती में विता चुका हो। 4. लोक-जीवन- ऊंट चालकों का कोई प्रचलित लोकगीत गा सके या अलगोजा बजाना जानता हो-या-मर जीवन के किसा लोक नृत्य में भाग लिया हो। (C) भू-संरक्षण (सोइल कन्जरवेशन) [पोछे देखिये-अध्याय (5) में] - मरु-स्काउटिंग केअन्तर्गत संरक्षण के 121 अभ्यास (121 Conservation Activities of Desert Scouting) । [1] जल संरक्षण 1:1 जलस्थान (कुए', टांके या तालाब) और उसके जलक्षेत्र (पायतन) की सफाई कीजिए । टोलीबार वर्षा से पहले अपने साथियों के घरों जलस्थानों की सफाई की योजना बनाइए। फिर पंचायत की मदद से सार्वजनिक जलस्थान की सफाई कीजिए। 1:2 जलस्थान के पास सोख्तागड्ढां (Soakage Pit) बनाइए। 1:3 पानी के पाने के मार्गों या नालियो की सफाई व मरम्मत पीजिए। 1:4 पहली वर्षा के बाद उसी घास को पानी के आने से मार्गो या 1:5 बेकार व गन्दे पानी का निकास का रास्ता बनाकर पेड़ों में पहुचाइए। . नालों से हटाइए।
उबालना 2.1 प्रत्येक स्काउट कम से कम एक गुस 1:6 जल वितरण की कोई सार्वजनिक योजना हो तो उसमें मदद कीजिए। 1:7 शाला के जलस्थान या प्याऊ को देखभाल कीजिए। 1:8 वर्षा के पानी को घड़ों, जमीन में गड़े हुए मूगों (बड़े घड़ों), घर की छत या छप्पर से आने वाले पानी को लोहे के पतरे की नालियों से घरेलू टांके या कच्चे कुण्ड आदि में इकट्ठा करने का अभियान कीजिए। 1:9 खेतों में पानी को रोककर जमीन में समाने के लिए कोतों में मेड़बन्दी, गड्ढे या खाई खोदने के लिए अभियान कीजिए। 1:10 गन्दे व दूषित जल को साफ करने के तरीके सीखिए, इनका प्रदर्शन कीजिए, जैसे-पानी छानना, लालदवा या ब्लीचिंग पाउडर का प्रयोग करना, घट-विधि (चार घड़ों से), निथारना। 1:11 गन्दे पानी के पीने से पथरी, नहरुपा (वाला) आदि रोग हो जाते है। इनका प्राथमिक उपचार कीजिए। 1:12 कुए या तालाब से पानी सोंचना सीखिए। बाल्टी बांधने के लिए क्लोवहिच का प्रयोग कीजिये । 1:13 कुएं से पानी निकालने के लिए छोटे-घड़े या पीतल की चरी को रस्से से वांघिए (लोटा गांठ, मछुआ गांठ, सरक फांस का प्रयोग सीखिये) 1:14 पानी खेचने के सरल तरीके अपनाइये-(क) सीधा खोंचना, (ख) दूसरे की मदद से रस्सी सोंचकर ले जाना, (जैसे-वैस) (ग) चरखी, पहिया या गिड़गिड़ी का प्रयोग करना, (घ) कुए पर गिड़गिड़ी बांधना. (ङ) घूमने वाला पहिया animal बनाना, जिस पर रस्सा लिपटा रहेगा । (च) चांच (news प्रयोग, (छ) डंडे के डिब्बा वांधकर तालाब या 1:15 "बोल प्यारी मछली कित्ता पानी"-खेल सेलि। वाले से पानी के बारे में प्रश्न. पूछिये। [2] वन संरक्षण 1 लेना। लगाकर उसे जीवित रखे ।
86 ] 2 : 2 प्रत्येक स्काउट प्रतिवर्ष कम से कम 20 मूजे (कू'चे) लगावें। 2:3 वर्ष में कम से कम एक टीबावन्दी की योजना में सम्मि लित हो। 2:4 गमले या वाक्स में पौधा कैसे लगावें? 2 : 5 वृक्षों की पौध कैसे तैयार करें? 2 : 6 शाला में एक पौधशाला (नर्सरी) लगाइये। 2:7 घास के बीज उगाइये और हरी पट्टियां (Greenbelts) लगा- इये। 2:8 ग्रामीण-चरागाह पर श्रमदान कीजिए। 2:9 भ्रमण के समय अपने लगाए पेड़ों या घासों की संभाल कीजिए। 2 : 10 आपके क्षेत्र से कौन-कौन से नए वृक्ष या घास उगाए जा सकते है ? उनकी नर्सरी लगाइए। [3] भू-संरक्षण 3 : 1 ' मेढबन्धी, टोवाबन्धी, खाई पाटना, कण्ट्रवन्धी प्रादि की योजनाओं के लिए श्रमदान कीजिए। 3:2 कणाबन्धी का अभियान व प्रचार कीजिए। 3 : 3 अपनी शाला या खेत में करणाबन्धी (Mulching) का प्रदर्शन कीजिए। 3 : 4 सूखी खेती या पट्टीदार खेती का प्रचार कीजिए। 3:5 भू-क्षरण का अपने पास पड़ोस में अध्ययन व अवलोकन कीजिये। 3:6 भू-संरक्षण के कार्य सम्बन्धी समाचारों की कटिंग एक डायरी में 3 माह तक चिपकाकर एकत्रित कीजिए। 3:7 भू-संरक्षण सम्बन्धी क्या-क्या कार्य प्रापके क्षेत्र या गांव में हो रहे हैं ? 3 माह तक उसकी रिपोर्ट लिखिये। 3:8 आपके यहां भू सरक्षण-कार्यकर्ता (अधिकारी या फील्डमैन) कौन हैं ? उससे मिलिए। 3:9 भू-संरक्षण के लिये सरकार क्या मदद करती है ?-~पता लगाइए। 7 . 3 : 10 एक खेत में टोवाबन्दी या कण्टूबरबन्दी कैसे-कोजी फोल्डमैन की मदद से खेतों में जाकर योजना बनाई 3 : 11 अपने क्षेत्र की मिट्टी के नमूने लेकर उनको रासायनिक जाच करवाइये । कृषि प्रसार अधिकारी (A. E. 0.) या ग्राम सेवक की मदद से सीखिये। 3 : 12 खेतों में से 12"x12" तथा 18" गहरा मिट्टी का भाग लेकर उन्हें लकड़ी के बाक्स या खोखों में रखकर उनमें अलग-अलग घास या झाड़ी लगाकर पता लगाइये, कौन-सी जगह कौन सां घास या झाड़ी अच्छी उगती है। 3 : 13 “भू संरक्षण" क्या है ? इस पर वाद-विवाद कीजिये । 3 : 14 "स्काउंट भू-संरक्षण के लिये क्या मदद कर सकते हैं"-इस विषय पर टोली या दल में विचार कीजिये । नई बातें हमें भी लिखकर भेजिये। H 3 : 15 वर्षा के बाद किसी खेत या खुले मैदान में जाइये और जमीन में छेद कर पता लगाइये कि:-(क) खुली जमीन, (ख) खेत में, (ग) घास से ढके खेत, (घ) कणांवन्दी वाले खेत, (ङ) पेड़ों के नोचे को जमीन में कितने ईच गहराई तक पानी पहुंचा है ? अन्तर के कारणों का पता लगाइये। 3:16 भू-संरक्षण कार्यों को देखने के लिये एक भ्रमण कीजिये । 3 : 17 ग्राम कार्यकर्ता (रूरल-वर्कर), ग्राम इजीनियर, भ्रमणकर्ता (हाउकर) प्रकृतिज्ञ (नेचुरलिस्ट), वनविज्ञ (वैकवूड्समैन) और बागवान (गार्डनर) के दक्षता के बैज प्राप्त कीजिये। -(4) जीव संरक्षण 4:1 अपने क्षेत्र में पाये जाने वाले जंगली. पशु-पक्षी, पालतू पशु-पक्षी और हानिकारक लाभदायक व जीवों की सूचियां बनाइये। 4:2 अपने चुने हुए कोई पशु, पक्षी या जीवों की आदतों व बोलो का अध्ययन कीजिये। 4:3 मरुभूमि का पशुधन क्या है ? एक पालतू पशु को उपयोगिता व आदतों का पता लगाइये। 4:4 कंटे का साधारण ज्ञान प्राप्त कीजिये 4:5 ऊंट पर यात्रा के अनुभवों को लिखिये। 17 .. - 88 ] 4:6 ऊंट पर काठी जमाना सीखिये, तंग कसने की गांठ भी सीखिये । .. .. 4:7 ऊंट का मोहरा बनाना सीखिये । 4:8 ऊट की मोहरी पर तोरण गांठ या वेलचा बनाना सीखिये । 4:9 ॐट को सजाने का वर्णन लिखिये। 4 : 10 ॐटों के साधारण रोगों की सूची और उनके ग्रामीण उप- चारो का सकलन कीजिये। 4 : 11 ऊंट को नकेल बांधना सीखिये। 4 : 12 भेड़ पालने का प्रार्थिक पहलू क्या है ?–एक लेख लिखिये । 4 : 13 अपनी शाखा शाला में मुर्गीपालन केन्द्र' चलाइये । 4 : 14 मुर्गीपालक (पोल्ट्रीफारमर), दोग्धा (डेरी मैन), पशुमित्र, पक्षीरक्षक, खोजी (कर), भेड़-पालक दक्षता के औजों को प्राप्त कीजिये। 4 : 15 पक्षियों की प्याऊ अपने घर, शाला या खेत में लगाइये। 4 : 16 पक्षियों को दाना चुगाने का स्थान बनाइये । 4 : 17 टिड्डी विरोधी अभियान में भाग लीजिये । 4 : 18 चूहा विरोधी अभियान में भाग लीजिये। 4 : 19 किसी पालतू पशु के मुंह पर लगाने के लिये छींकी (जाली) बनाइय। 4 : 20 रेगिस्तानी पशु, पक्षियों व जीवों को आवाजों की नकल 4:21 "पीना साप" के बारे में एक निबन्ध लिखिये। (5) प्रकृति तथा उससे उत्पन्न समस्यायें 5 : 1 मरुभूमि में प्रकृति ने मानव के जोवन में क्या-क्या समस्यायें पैदा कर दी है ?--टोली या दल में विचार विमर्श कीजिये । 5:2 "मानव प्रकृति का दास है या उसका विजेता"-इस विषय पर निबन्ध या वाद-विवाद प्रतियोगिता कीजिये। 5 : 3 मरुस्थल की मौसम सम्बन्धी कहावतें - इकट्ठी कीजिये । जीव परीक्षा, आकाश परीक्षा, वायु परीक्षा और दिवस परीक्षा के परीक्षा के तरीकों पर 5-5 कहावतें इकट्ठी कर उनकी सत्यता की जांच का विवरण रखिये। 5:4 हवा की गति का अनुमान लगाना सीखिये। 5:5 हवा की दिशा जानने का यन्त्र (Wind Cock) बनाइये। कीजिये। - [ 89 5:6 मरुस्थल में प्रकति की आश्चर्यजनक बातों का पता लगाइये- जैसे भंवरी (मिट्टी में धंस जाने वाले स्थान), मृगतृष्णा (Mirage), मंगरा आदि । 5:7 तारों को दिशा ज्ञान के लिये सप्तपि, ध्रुव, भरत, शर्मिष्ठा (या पाण्डव) तारागरणों को पहचानना सीखिये। 5:8 तारों से समय का अनुमान लगाना सोखिये। 5:9 रात्रि को खुले में सोने से पाला मारना या ठंड लग जाने से बचने के क्या उपाय हैं ? -पता लगाइये। 5 : 10 रात्रि में खुले में सोने पर कैसा 'शेल्टर' बनायेंगे ? ~अभ्यास कीजिये। 7 (6) मानव और उसके प्रयासों का अध्ययन - 36:1 किसी वस्ती या ग्राम का सामाजिक व आर्थिक सर्वेक्षण कीजिए। 6:2 लोगों को प्रादतों, कुटेवों व अन्ध विश्वासों का अध्ययन कीजिए। 6:3 मानव ने सिंचाई के क्या-क्या साधन जुटाए है ? पता लगा- 6:4 पास की किसी नहर या बाध का भ्रमण कर उसके बारे में ज्ञान प्राप्त कीजिए। 6:5 कौन-कौन से मौसम में क्या क्या फसलें आपके क्षेत्र में उगाई जाती हैं ? सूची बनाइए। T06 : 6 मरुस्थल में भ्रमण के समय धूप व प्यास से कैसे बचें ? 6:7 पैदल यात्रा व ऊंट पर यात्रा के क्या नियम या रीति- रिवाज हैं ? 6:8 ऊंट चालकों का एक लोकगीत सीखिये। 6:9 मादर्शगोत-"ऊंटों का काफिला" सीखिये। 6 : 10 प्रतिमाह एक नया लोकगीत सोखिये । 6:11 किसी स्थानीय लोकनृत्य में भाग लीजिये।
90 ] .. । 1 6 : 12 अलगोजा (दो बांसुरी) बजाना सीखिये। अपने दल में 'अल. गोजाबाद्य वृन्द' (बैण्ड) बनाइये । यह बहुत आनन्ददायक अभ्यास है। 6 : 13 कोई स्थानीय वाद्ययंत्र (वाजा-जैसे-ढप, ढपली, तुरही, झांझ, इकतारा, सारगी, रावणहत्या आदि) 'बजाना सीखिये। 6 : 14 अपने क्षेत्र के साधारण रोगों-विशेषतया नहरुमा, धी पीणियां (छिपकली का दर्द) पीलिया, पिस्तो या पित्तो निकलना, पीना सांप का सांस पी जाना) से बचने के उपायों का पता लगाईये । 6 : 15 चकमक पत्थर या अन्य प्राकृतिक साधनों से प्राग जलाना सीखिये। 6 • 16 मोहरा गांठ लगाकर कोई उपयोगी वस्तु बनाइये । 6 : 17 मोहरा बनाना सीखिये। 6 : 18 छींका बनाना सीखिये। 6 : 19 बेलचा बनाना या वेलचा गांठ सीखिये । 6 : 20 बेलचा गांठ, अनन्तगांठ, मोहरागांठ- इनकी मदद से कोई कलात्मक वस्तु (रस्सी की डोरी, रस्सी का वागल आदि) बनाइये। 6 : 21 प्राकृतिक वस्तुओं से रस्सी बनाना सीखिये । 6 : 22 खाट या चारपाई (माचा) बुनना सीखिये। 6 : 23 छप्पर बांधने का अभ्यास कीजिये। 6 : 24 मूज तैयार करना और उससे रस्सी बनाना सीखिये। 6 : 25 सरकण्डो, मूज व तीलियों की मदद से मुड्डा (कुर्सी), या पर्दा (चिक) बनाना सीखिये। 6:26 प्राकृतिक वस्तुओं से खिलौने बनाइये । 6 : 27 चिथड़ों से गेन्द बनाइये। 6: 28 प्राकृतिक लकड़ी से खेलने का डंडा (Bat) बनाइये । 6 : 29 गोरबन्द गूंथना सीखिये। 6: 30 ग्रामीण खेलों को खेलिये। 6 : 31 ग्रामोण शौचालय (खाई की तहारत) बनाना सीखिये । 6 : 32 धुपा रहितं चूल्हा (मगन चूल्हा) बनाइये। 6:33 ग्रामीण शीतक (रेफ्रिजरेटर) बनाइये।'' 6 : 34 मरुभूमि के बोरों, वीरांगनाओं, सन्तों, महापुरुषों की कहानियां सुनाइये। - .
[91 -- 6; 35 विना बर्तन भोजन पकाने के तरीके सीखिये। 6 : 36 गीली बालू मिट्टी के घर, ग्राम ग्रादि के माडल बनाइये । 6 : 37 नई गांठों को खोज कीजिए और सीखिये । 6:38 मरुंकल्याण सम्बन्धी बातों का प्रचार करने के लिये "शिविर ज्वाला" के द्वारा जन-जागरण,कीजिये। 6 : 39 दक्षता के बंज-मरुवासी, ऊंट चालक और भू-संरक्षण प्राप्त कीजिए। 6 : 40 तिकोनी या चोकोर मोहरागांठ, मोटी रस्सी के बीच में लगाकर तिकोनी या चोकोर रस्सा कशी का खेल खेलिए। :41 तिकोनी या चौकोर मोहरा गांठ से, 3 या 4 रस्सों को बांधकर या तम्बू के पोल की कील में फंसा दीजिए। नोचे.धेरे में 6 या 8 पत्थर रख दीजिए। अव 6 या 8 वालक लोकगीत गाते - हुए इन पत्थरों का चक्कर इस तरह एक छोड़कर एक काटते हुए घेरे में घूमें कि रस्सियां गुथकर एक मोटा रस्सा वन जावे । इसको उल्टा घुमाकर वापस खोलें। एक मनोरजक अभ्यास है। 6:42 मोहरा गांठ लगाकर एक पोल पर शेल्टर बनाने के लिए रस्सियों का ताना बनाइए:।। 6 : 43 मोहरा गांठों कों "कुर्सीगांठ" की तरह जीवरक्षा के काम में लीजिए। 6 : 44 अनन्तगांठ सीखिए, और लेनयार्ड (सीटों की डोरी) बनाइए। 6 : 45 खेतों पर कटाई के समय जाकर किसान की मदद कीजिए। 6:46 पेड़ों पर मचान वनाइए। 6 : 47 झूला बांधकर उस पर झूलिए । 6:48 आपको मरुस्काउटिंग" के कौन-से 10 अभ्यास सबसे अच्छे लगे, हमें लिखकर भेजिए। . 7 :
विद्यार्थियों, युवावर्ग तथा जनता के लिए सेवा योजनाओं का कार्यकम (मरु कल्याण के अभ्यास) पीछे जो 121 नए अभ्यास दिए गए हैं इनमें कई ऐसे हैं, जिन्हें "सेवा योजना" (Service Project) के रूप में लिए जाने का सुझाव है । पहले प्रत्येक कार्य को घर, पास पड़ोस, स्कूल या कालेज के स्तर पर क्रमशः प्रारम्भ कीजिए; फिर पूरा गांव, फिर पड़ोस की बस्तियों को चुनकर लगातार कार्य कीजिए । प्रति सप्ताह एक टोली बारी-बारी से कार्य करे व सभाल करे, इससे कार्य अनवरत (Continue) रहेगा। एक माह में एक टोली को एक दिन कार्य करना पड़ेगा। यदि व्यक्तिगत या युगलों में (दो-दो) भी योजनायें चलाई जावे, तो अधिक लाभ होगा। हमारा उद्देश्य मरु कल्याण' में पूर्णत्व की प्राप्ति न होकर इसके प्रति जागरूकता और सेवा भावना को जागृत करना है । विचार विमर्श, सेवा योजना, प्रदर्शन, प्रचार के लिए शिविर ज्वाल ये हमारे तरीके होंगे। सेवा-योजनायें सामूहिक प्रयास से प्रदूषण की समस्या को हल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगी। आइए, हम इनको अपनाकर अपने देश और मानवता को अद्भुत सेवा करें। ।
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