Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur

Shri Anantnathcharitadudhant Poojashtkam

Suri, Vijayshamabhadra · 2011/02

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श्रीश्रुतज्ञानअमीधारा सीरीज नंबर ५ विश्वहितबोधिदायक श्रीअमीविजयगुरुभ्यो नमः (सुगृहीतनामधेय श्रीमन्नेमिचंद्रसूरीश्वरगुम्फितं श्रीअनन्तनाथचरित्रादुद्धृतं पूजाष्टकम् HO- सपादक 'आचार्य विजयक्षमाभद्रसूरिः प्रकाशक शाह रायचंद गुलाबचंद मु० अच्छारी, पोष्ट मिलाड (गुजरात) विक्रम मवत् १९९७ वीरस २४६६ इसवी सन १९४० OCT DAUR Published by Shah Raychand Gulabchand, Acchari Station Bhilad, B. B. &. C. I. Ry. Printed by Ramchandra Yesu Shedge, at the Nirnaya Sagar Press, 26-28, Kolbhat Street, Bombay. प्राप्तिस्थानम्-आचार्य श्रीविजयदानसूरीश्वर जैनग्रन्थमाला गोपीपुरा-मु० सुरत. पोष्टेज पेकिंग खर्च चार आना Deven an20221 श्रीश्रुतज्ञानअमीधारा ग्रन्थाङ्क नं. ५ श्रीमन्नेमिचन्द्रसूरीन्द्रगुम्फितं पूजायां श्रीअनन्तनाथचरित्रादुद्धृतं पूजाष्टकम् । कुसुम- शेखरकथा विश्वहितबोधिदायकश्रीअमीविजयगुरुभ्यो नमः । जयइ जुगाइजिणिंदो परिविलसिरसमवसरणचउरूवो। वागरिउं पिव सुहृदाणसीलतवभावणाधम्मे ॥ १॥ सो जयइ जिणोणतो देसणसणसुणो सया जस्स । केवलरविकिरणा इव तममवर्णिता वियंभति ।। २॥ सिरिवद्धमाण- सामि नमामि कणयाभदेहदित्तीए । कुणमाण पिव भुवण सबपिय अत्तणो तुल्ल ॥३॥ सम्मत्तनिश्चलत्त किरियाए जीए होइ त कहह । जह निश्चपि हु पहु सिद्धिसायं तं करेमि अहं ॥४॥ तो आह तिजयनाहो नरिंद निसुणेसु तस्स निचलया। जायइ जिणपूयाए भत्तीए तिसज्झविहियाए ॥ ५॥ जिणपूया पावहरी जिणपूया जायए भवतकरी । जिण- पूया सवाणवि कलाणमणीण भडारो ॥६॥ अवहरइ दरिदत्त पणामए तिजयलच्छिविच्छडूं। जिणपूया कीरती पणा- सए सघदुरियाई ॥७॥ कुसुमक्खयफलजलधूवदीवनेवजवासनिम्माया। पूया जिणेसराणं सा अट्ठविहा विणिदिवा ॥ ८॥ वरपरिमलेहिं कुसुमेहिं पूयए जो जिणे सवहुमाण । पूयापत्तं जायइ जिणप्पसाया गुरूणवि सो ॥ ९ ॥ जो जिणपयपउमपुरो पूयत्थं खिवइ अक्खए खिप्पं । सासयसोक्खे मोक्खम्मि अक्खओ होइ सो पत्तो ॥ १०॥ एके- गावि फलेणं जिणरन्नो जो उवायणं फुणइ । ता तप्पसायओ लहइ सो धुवं सबसिद्धिसिरिं ॥ ११॥ पत्तगएण जिर्णिद Ja अनन्त मा श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्धृत. पूजाष्टकम् पूजायां शेखरकथा ॥१॥ जो सच्छस्साउसीयलजलेण । पूयइ सो तेणेवय पक्खालइ नियमलं नियमा ॥ १२ ॥ जो घणसारं अगरुं च दहइ जिणअंगधूवणनिमित्तं । सो घणसारो जायइ अगुरू धणओ वि जस्स पुरो ॥ १३ ॥ जो मंगलप्पईवेण पूयए सामिसा- लजिणचंदं । सो दीवसिहा उज्जलमुत्ती सग्गसिरिं रमइ ॥ १४ ॥ जे निरवज्जं भोजं नेवजे जिणवरस्स जच्छंति । भोत्तूण ते अ(s)णवजाईल(भ)वसुहाई सिवं जंति ॥१५॥ जो सुहवासेहिं जिणेसरस्स पूएइ पायसयवत्तं । सो सुहवासं मि सया सिवालए सासओ वसइ॥ १६ ॥ एयाओ अट्ठवि कुणइ जो सया भत्तिनि भरो भयो । सो अट्ठकम्ममुको संपज्जइ सासओ सिद्धो ॥ १७ ॥ सबाहिंवि असमत्थो एक्काएवि पूयए जइ जिणं जो । ता सोवि भावसुद्धीए पावए सिद्धिसंबंधं ॥ १८ ॥ एयाउ राय कहियाउ तुभ पूयाउ इय जिणुत्तम्मि । भणइ निवो पणयपहू सीमंतयरइय- करकोसो ॥ १९॥ जयनाह साहसु महं महंतकोऊहलाउलमणस्स । दिटुंते अट्ठाणवि पूयाणिहि कयपसाया ॥ २०॥ जंपइ जिणेसरो सुणसु राय कयअप्पमत्तमणवित्ती । संपइ साहिजते दिढते अट्ठ पूयासु ॥ २१॥ इह दुग्गदेव दुग्गयपडाय वानरय चंदैतेयक्खा । साहससार अकिंचण रणसूर धणावहा पुरिसा ॥ २२ ॥ होउं कमेण एके- कपूयकरणेण गरुयरायाणो । सिरिकुसुमसेहरक्खयकित्तिप्फैलसारजलसारा ॥ २३ ॥ सिरिघूवसुंदरो तह मुँवणपई- वो पईवसिहवत्तो । मुँवणप्पमोयगो गंधबंधुरो सिवपुरि पत्ता ॥ २४ ॥ कुलयं । कुसुमेहिं जेण पूइय जिणेसरं पाविया महारिद्धी । तं कुसुमसेहरकहं कहिजमाणं निसामेह ॥ २५ ॥ पुरमत्थि स्फुरियमहापहाविरायंतरयणपायारं । रयणप्पायारं नाम गुरुविमाणं सुरपुरं व ॥ २६॥ रयणीसु जत्थ ससिरयणचंदसालागलंतसलिलेण । भवणाई नीरयाई भवंति मुणिमाणसाई व ॥२७॥ तत्थस्थि हथिहयरहजोहोहपसाहियाहियसमूहो । विलसिररयणाभरणो रयणाभरणोत्ति नरनाहो ॥ २८॥ आयड्डियासिपडिफलियतरणिकिरणावलीकलियकाओ। पयडपयावप्पसरोव जो ए) जम DEN מתבלבן בולבול CUCURUZULU CL ananemeneral पूजायां कुसुम- शेखरकथा रणे रीण दुनिरिक्खो ॥ २९॥ सधतेउरतरुणीपहुत्तपयवीपइडिया जाया। तस्सस्थि हत्थिमंथरगइगमणा रयण- मालति ॥ ३०॥ चित्तव चित्तवासा अमुकपासा सकीयछायब । निययप्पयइव सया जा दुम्मोया मणायंपि ।। ३१ ॥ ताणस्थि तारतारुनललियलायन्नपुनसधगी। अगीकयसयलकला कन्ना रयणावली नामा ॥ ३२ ॥ पीयाए सुराए| श्व विहाएवि जीए होइ उम्माओ । तरुणाण विवेईणवि अविवेईणं तु का गणणा ॥ ३३ ॥ सा जत्थ जत्थ कीला- करणकए जाइ रूवविजियरई ॥ गच्छति तत्य तत्थय परघसा सेवयव नरा ॥ ३४ ॥ कइयावि मयंकमुही सहीजुया सा सुहासणासीणा । सियछत्तचलिरचमरालंकरिया निग्गया नयरा ।। ३५ ॥ पत्ता य मत्तमहुयरनामे सिसिर- हुमम्मि आरामे । दगुण मयणभवण उत्तिन्ना जा विसइ तत्थ ॥ ३६॥ ता नियइ रगमडवगवक्खभद्दासणट्टियं एक । रायकुमार मयणं व निग्गय भवणगभाओ॥ ३७॥ करकलियफेलिकमल नियख्वनियविणीजणियमयणं । सुसि- गिद्धमुद्धदीहच्छिजोण्हधवलीकयग्गनह ॥ ३८ ॥ त पेच्छिउ मयच्छी चिंतइ को एस दीसइ महप्पा । अयम्भुयरूप धरो सिंगारी चारुतारुनो ॥ ३९ ॥ नूर्ण पञ्चक्सोचिय एसो यम्मो इमाउ सजाय । जं मज्झ अणिमिसत्त सहसत्ति निरतरायसुह ॥ ४० ॥ पुधभवुप्पन्नमहापुन्ना रायेण तीए फलियब । तूलिध अगसग इमरस जा पाविही वाला ॥४१॥ सनिय जयपवित्ता विलसन्तसुवन्नरयणरमणीया । जा मुहियध लहिही करगहणमिमस्स सुहयस्त ॥ ४२ ॥ सचिय- उत्तमगमणा विन्भमरहिए सुपत्तरसजाए। रमिही इमस्स जा माणसे सया रायहसिव ॥४३॥ इय चितती जाया- समसज्झससेयकपकलियगी । पक्खलियपया पविसइ अविइण्ह तं पलोयती ॥४४॥ बरदाणपरपि मम मुत्तुमिमा नियइ अन्नमइनेहा । इय चिंतिय कुविएणव कामेण सरेहिं पहया सा ॥ ४५ ॥ मयणेण नडिजंती थिर- सरलसिणिद्धवधुरच्छीहिं । सगविया असरिसरुवहरियहियएण कुमरेण ॥ ४६॥ एयाए अहो रूव मोहइ मणमवि :תכולתבובתבותכתבת Enाटाटाटाटा दreen Fa श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्धृत पूजाष्टकम् कुसुम- पूजायां कुसुम- शेखरकथा ॥ २॥ पसंतमोहाण । गुरु रायायत्ताणं मह सरिसाणं तु का वत्ता ॥४७॥ सोच्चिय गुरुरायधरो सोच्चिय सरसो इमाए बालाए । सवंगसंगमं जो लिहिही घुसिणगरागोब ॥ ४८ ॥ सो चेव चारुवन्नो पवित्तगुरुमुत्तसियगुणमहग्यो । एयाए मयच्छीए हियए हारोब जो वसिही ॥ ४९ ॥ इए चिंततो संतो मयणायत्तो ठिओ कुमारोवि । सूरचरिओवि कायरनरनियर- निदरिसणं जाओ ॥ ५० ॥ धवलइ कुमरं बाला नियच्छिजोण्हाए सोवि रायसुयं । पञ्चुवयरंति सिग्धं गरुया रइओव- यारम्मि ॥ ५१ ॥ तं पेच्छरी कुमारी पत्ता पासंचि कामपडिमाए । सविणयपणामपुवं पूर्व काउं समारद्धा ॥ ५२ ॥ परिपूयंती मयणं पुणो पुणो पेच्छिरी कुमरवयणं । दसइ मयणस्सव तं दइयमिमं देहि मज्झत्ति ॥ ५३॥ पूयाए जाइ मयणे तद्दिट्ठी निवसुएणुरायेण । रूवंतरंव दट्ठ पइक्खणं कामकुमराण ॥ ५४ ॥ पुच्छइय मयणियं नाम नियसहिं को वयंसि एस जुवा । तीए कुमारथइयावहाउ नाऊण कहियं से ॥ ५५ ॥ सहि सुणसु कुसुमसुंदरनयरे निययप्पयावजिय- तरणी । कुसुमावयंसयनिवो भजा कुसुमस्सिरी तस्स ॥ ५६ ॥ पउरगुणपउरनयरं ताण सुओ कुसुमसेहरो नाम । सयलकलाकलियतणू नियज़ोवणरमणिमणहरणो ॥ ५७ ॥ भत्तस्स विणीयस्सवि नीइपरस्सावि तस्स नरवइणा । केणावि कारणेणं पराभवो विरइओ दूरं ॥ ५८॥ तं अवमाणं काऊण माणसे अद्धरत्तसमयम्मि । परिमियपरिवार- जुओ चलिओ देसंतरे कुमरो ॥ ५९ ॥ इह पत्तो विन्नातो तुह जणएणं अणिच्छमाणोवि । गंतुं पच्चोणीए रिद्धीए पवेसिओ एत्थ ॥ ६०॥ संमाणिऊण भणितो मा गच्छसु वच्छ अच्छसु इहेव । जं मज्झ तुज्झ जणओ मित्तो अच्चंतगोरबो ॥६१॥ ठाउमणिच्छंतोवि हु निवोवरोहा इहडिओ स इमो । अणभिमयं पि न गरुया दक्खिन्नपरा परिहरंति ॥६२॥ सोउं रायसुया चिंतइ जुत्तो इमंमि अणुराओ। नवरं एसो रत्तो नो वा संपइ न याणामि ॥६३॥ कुमरेणुत्तो थइयावहो अरे मंतियं किमेयाए । तेणुत्तं निवकन्नासहीए तुह पुच्छियं चरियं ॥ ६४ ॥ कुमरनिरिक्खणलुद्धा निवत्तियकामपडिम- ॥२॥ ) .

पूजायां ગી शेखरकथा कालापट पूयावि । तम्भवणपेच्छणछला महई चेलं ठिया बाला ॥६५॥ वार वारं चलसुत्ति सोविदल्लीहिं विनविज्जती । पक्स- लियकम तं पेच्छिरी गया जाणमारुहिउ ॥ ६६ ॥ गच्छंती कुमरेणं पलोइया सोवि तीए सञ्चविओ । अणुरत्ते जताइ धरिउ को तरइ नेताइ ॥ ६७ ॥ नयणपङ्मइकताए तीए अरई कुमारमणुपत्ता । लहइचिय अवयास कइयावि अणिह- भजावि ।। ६८ ॥ रमंपि तविओए उज्जाण पिइवणव दुक्खकर । कलयतो कुमरो तुरिय तुरयमारुहिय सचलिओ ।। ६९ ॥ नयरपउलिं पविट्ठो सुणइ समाउलियलोयहलवोल । नियइ य गुरुवरुधरपुरसालारुढं सभयलोय ॥ ७० ॥ किमिमंति कयवियको पेच्छइ सुन्नासणं गयाहिवइ । पाडत पासाए मारत तुरय-नर-करहे ।। ७१ ॥ चरणागरिसिय- सकलसरेण नियडयखडक्सडाए य । गलगजिएण य जण जो जाणावन्तो व धावेइ ॥ ७२ ॥ मा महभारकता भूमी मुच्छिजउत्ति कलिर्ड व । सिंचतो गुरुफुकारसिकरासारसलिलेण ॥ ७३ ॥ चलकन्नतालचालियससहरसिय- चारचमरजुयलेण । जो वीयइ दतसुहासणद्वियं रायलच्छि च ॥ ७४ ॥ दद्दु सुहासणट्ठियनिवतणयं धाविओ करि तो । सा झपाए समुत्तिन्ना नियडेणत्थे थिरो को वा ॥ ७५ ॥ पीणपओहरगुरुतरनियवभरमंथरकमगईए । नासिउमतरती सा गहिया करिणा कुरगच्छी ॥ ७६ ॥ दूरुक्खित्ताए पवणप्पसारिओ तीए कुतलकलायो । समयगय- कडतडुडीणभमरनियरोध रेहेइ ॥ ७७ ॥ वियसियसिरीसकुसुमोहसमहियफासलालसेण व । गाढ गएण निय- करडेणालिंगिया वाला ॥ ७८ ॥ करिणा हरिणकमुही सुमुही विहिया विहाइ गयणयले । नियकुंभतत्थणाण व पीणत्त दृटुकामेण ॥ ७९ ॥ मा मह भएण एसा मुच्छिज्जउ इय विभाविऊण करी । त वीयइच चलकन्नतालजुयताल- घदेहिं ॥ ८० ॥ तं दटुं रायसुओ झडित्ति मुत्तुं तुरगम वेगा । उद्धाइओ गय पइ हफ्तो कफससरेण ॥ ८१ ॥रे रे दुह गयाहम मोतु नारिं वलेसु मह समुह । जइ सत्तमस्थि इय सुयकुमरालावा भणइ कुमरी ॥ ८२ ॥ मह कीडिय- CURUCU Penon Tuenाapane दिलाटाटात eaten श्रीअनन्त- नाथचरि- बादुद्धृतं पूजाष्टकम् पूजायां कुसुम- शेखरकथा ॥३॥ कप्पाए कजे भुवणोवयारकरणखमं । नररयण मा विणाससु अत्ताणं करिकयंताओ ॥ ८३ ॥ सुयकुमरीविन्नवणो सो जंपइ तंपि भुवणगब्भम्मि । वससि तओ रक्खिस्सं चइउं पाणेवि तं नियमा ॥ ८४॥ मह करगयावि चाटूणि करेइ कुमरस्स इय विभावेउं । कुविएण व करिणा सा खित्ता दूरं गयणमग्गे ॥८५॥ विजाहरिं व गयणे गच्छंतिं तं पलोइरो कुमरो । जाओ पमत्तचित्तो तो संगहियो गइंदेण ॥ ८६ ।। मिलसु नियवल्लहाए तुमंपि इय चिंति व कुविएण । करिणा कुमरो वि नहे खित्तो तीए पडतीए ॥८७॥ मरिही एसा एदहदरा रयनिवडियत्ति कलिऊण । परिसत्ता करुणाए नेहेण व तेण सा गाढं ॥८८॥ आलिंगियाए तीए पडइ अहो निवसुओ निराहारो । थीफासलालसाणं अहोगईए न संदेहो ॥८९॥ एत्थंतरंमि वेगागएण नहयरनरेण एक्केण । तढुगमवि अवरुंडिय नरनयणागोयरे नीयं ॥९०॥ तो पलवंतो लोगो अतरंतो लग्गिउं खयरमग्गे । गंतूण कहइ रन्नो कुमारकुमरीणमवहरणं ॥ ९१ ॥ तं सोउ आउलितो चलितो राया निरिक्खणे ताणं । पेरियतरलतुरंगो परियडइ पुरस्स चउपासं ॥ ९२ ।। अप्पत्ततप्पउत्ती दुरयरमहिं पलोइउं वलिओ । रुयइ रुयावि- यलोगो सहमागंतु गुरुसरेण ॥९३॥ हा वच्छे हा वच्छे हहा अतुच्छे हहा विणयदच्छे (क्खे)। हा सुकुमाले बाले अवहरिया केण तं कहसु ॥९४॥ हे देव निदतो तं बालं पुत्तं तया हरेऊण । कंन्नपि अवहरंतो खयंमि खारं खिवसि खुद ॥९५॥ हा मह सहा वि सुन्ना तुह विरहे कुसुमसेहरकुमार। परिसदुह(द)सणत्थं पवसंतोतं मए धरिओ॥९६॥ अंतेउरपउरजणेणं राइणा तह तया तहिं रुन्नं । जह नयणजलासारो वित्थरितो वरिसयालोव ॥९७॥ एवं पलवंताणं ताणं तइए दिणे तरणिउदये। खयरविमाणगणेणं पत्तो कुमरीजुतो कुमरो ॥ ९८ ॥ पणतो य महीवइणो सखेयरो निवसुयाचि तं नमइ । आपुच्छिय कुसलाई ताई निविट्ठाई निवपुरतो॥९९ ।। रायाह कुमर साहसु हरणागमणाण निययवुत्तंतं । तो तं कुमराणाए कहिउँ लग्गो खयरचक्की ॥१००॥ देवस्थि दियवरम्मि व वेयड्ढे गुरुगिरिम्मि मणिभवणं । नयरं रहनेउरचक्कवाल नामं मणभि- CU पूजायां शेखरकथा राम ॥ १॥ त परिपालइ विजाहराहिवो नयणवेग अभिहाणो । गहियवयभरसिरिकिरिणवेगखयरिदअगरहो ॥२॥ दाहिणनंदीसरगरुयवेगवलिएण तेण सञ्चवियं । अन्नोन्न परिसत्त पडन्तमित्थीपुरिसजुयल ॥३॥ अञ्चतरूवरमणीरमण पइ रइयबुद्धिणा तेण । तदुगमवि अवहरिउं नीय सेले विसालग्गे ॥ ४॥ तो थभणीए विजाए भिउ पुरिसमाह रमणिं सो। म अणुरत्तं भत्तं भत्तार सुन्भु मन्नेसु ॥५॥ तीउत्त त सुपुरिस भाया मह नियसहोयरसरिच्छो । ता उभयभवविरुद्ध तुमए नो किपि वत्तव ॥ ६॥ अवर च न सायत्ता अह जतो जणायदिनिया कना । वीवाहिज्जइ सेच्छा जुत्ता न भवारि- साणपि ॥ ७ ॥ तुम्हारिसावि उत्तमकुलुन्भवा जइ मुयति मज्जाय । ता बंधव अकुलीणाण पावकारीण का वत्ता ॥ ८ ॥ कि नियपियासरीराउ मह सरीरम्मि समहियं किपि । दिट्ठ ज भाय तुम सपइ जंपसि अवत्तव ॥ ९॥ वित्थरइ जरा परिगलइ जोषणं जाइ जीवियधपि । कि नाम सासयं तुह देहे जमकजसज्जोसि ॥ ११० ॥ मुत्ततपुरीसवसावासे दुग्गधमलविलीणमि । मह देहे कि सार जं रायरसे तुहुफरिसो ॥ ११॥ एत्थतरमि चउनाणनायनियपुत्तपाववुत्ततो। तघोहत्थ सिरिकिरणवेगसूरी तहि पत्तो ॥ १२ ॥ तेणुत्तं भो सावय कि तुझ कुलकमो इमो जमिम । पारद्धं तुमए निंदणिजमुत्तमनराण जतो ॥ १३ ॥ लजिजइ जेण जणे मइलिज्जइ नियकुलफमो जेण । कठहिएवि जीए कुणति न कयाइ त सुयणा ॥ १४ ॥ कि पुत्त पिइपियामहपमुहेहि वय कयं हवइ जेसि । ते इव निम्मज्जाया तुम व पावप्पिया हुति ॥१५॥ अवर च इमा भइणी सहोयरा तुह मुणेमि नाणेण । ज रयणप्पायाराहिवरयणाभरणभूवइणो ॥ १६ ॥ तं अगरुहो जेहो एसावि सुया कणिट्ठिया तस्स । वच्छ मए तं हरिओ निवभवणा मासमेत्तवओ ॥ १७ ॥ कुमरीवयणविरते चित्ते पिइसिक्खणेण सवेगो। लग्गो खेयरवइणो पासियवत्थम्मि रगोत्र ॥ १८॥ तो तेण पाय- जुयले लग्गेऊण खमाविया भइणी । उत्यंभिउ कुमार पणमिय सूरीण विनत्त ॥ १९ ॥ पहु मोहमहाकूवे अविवेयजले ६ vananाटाnanana PN2222222LPEN ST i Enener श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्धृत पूजाष्टकम् पूजायां कुसुम- शेखरकथा ॥४॥ निमज्जिरो तुमए । नियवयणवरत्ताए उद्धरिओ हं दयानिहिणा ॥ १२० ॥ परिभोगो इयराएवि पररमणीए पयच्छए नरयं । किं पुण नियभइणीए आजम्मं पूणिज्जाए ॥ २१ ॥ ता पहु कंनाए समं नियरजं अप्पिऊण जणयस्स । संगहि- यसबविरई तुह चरणाराहओ होहं ॥ २२ ॥ ठायचं तुम्भेहि रहनेउरचक्कवालनयरम्मि । इय जंपिय गुरु कुमरी कुमरजुओ सो गओ सपुरे ॥ २३ ॥ दुगमवि सम्माणेउं वत्थाहरणेहिं खयरबलकलिओ । इह पत्तो तुम्ह सुतो सो हं इय साहियं तुम्ह ।। २४ ॥ ता ताय अहं जाओ दुप्पुत्तो तुम्ह जं मए दिन्नं । नियविरहेणं कुमरीहरणेण य दारुणं दुक्खं ॥ २५ ॥ इय जंपतो भणितो निवेण मा पुत्त खेयमुबहसु । दोसो न अम्ह दोण्हवि किं तु इमं दुकयकम्मफलं ।। २६ ॥ पुवभवे तवचरणं कयं मए किं तु संतरायं तं । जं तुह सरिसो पुत्तो जातो हरिओ य मिलिओ य ॥ २७ ॥ जायं कन्नाहरणं कन्नाहरणंव परमकल्लाणं । जस्सप्पभावतो मे सुचिरेणवि पुत्त मिलिओ तं ॥ २८ ॥ इय जंपिऊण गाढं जणएणालिंगितो सुतो तयणु । जणणीए नओ तीयवि अवरुंडिय चुंविओ भाले ॥२९॥ खेयरवइणा वुत्तो जणतो तं गिह ताय मह रज । परिवजियसावज पबज पुण अहं काहं ॥ १३० ॥ तं भणइ पिया परिणयवयस्स मज्झवि य जुज्जए दिक्खा । काहं नाहं विरहं इण्हिपि तए समं जाय ॥ ३१ ॥ दोण्हंपि सम्मएणं कुमरिं परिणाविण कुमरस्स । दिन्नं तं रज्जं तो पत्ता सवेवि वेयड्ढे ॥ ३२ ॥ तत्थवि अहिसिंचिय कुसुमसेहरं खयररायरजम्मि । खेयरनरनाहेहिं गहिया दिक्खा गुरुसयासे ॥ ३३ ॥ पणमित्तु कुसुमसेहराया पुच्छइ गुरुं कहह भयवं । मह पुत्वजम्मसुकयं जं जाओ हं खयरचक्की ॥ ३४ ॥ आह पहू आयन्नसु रयणवईए पुरीए तं राय । कम्मयरो आसि अईवदुग्गओ दुग्गदेवोत्ति॥३५॥ कइयावि नाणनिउणाभिहाणसूरीहिं भवपरिसाए । साहिप्पंतं निसुर्य जिणिंदपूयहगं तेण ॥३६॥ तहाहि ॥ फलकुसुमक्ख- यजलधूवदीवनेवजवासनिम्माया । कीरइ एसा अट्ठप्पयारपूया जिणिंदाण ॥३७॥ सबाओवि असत्तो काउं सयवत्तपमु- aan TeTEL कुसुम पूजाया शेखरकथा हमुमणेटिं। पूय जो जिणचदे सो सामी हवइ सुमणाण ॥ ३८ ॥ माणुसभवेवि नूणं जिणपूया पुन्नपगरिसपभावा । अगपि कुमुमपरिमलमुग्गिरइ सयावि सत्ताण ॥ ३९ ।। किं बहुणा भोत्तूण असुरनरामरपहुत्तरिद्धीतो। सिद्धि पि धुव पावर पाणी निणनाहपूयाए ॥१४०॥ इय आयन्निय वावन्नदेवउलियाजुयम्मि पत्तो सो। कीरविहाराभिहजिणहरम्मि मणिफणयपडियम्मि ॥ ४१ ।। जाईसरेण जं कीरपक्खिणा भणिय पुत्वजयसेणं । कारविय नायजियधणेण बहुमाण- सारेण ॥ ४२ ॥ जं पउदिसिपडिविवियपाडलकलियाहिं भमिरभमराहिं । नियइच भावरिउणो कोवारुणनयणनिय- रेण ॥ ४३ ॥ आभाइ निरन्भनिसिप्पडिविवियतारतारयप्पयर । ज भचिनिन्भरामरविरइयसियकुसुमवरिस व ॥४४॥ | तम्मि पविसिय नायजिएण दघेण गहिय कुसुमाइ । आणंदपुलइयतणू पूयइ सो रिसहजिणनाहं ॥ ४५ ॥ तप्पुन्नप- भावेण रिजि भोत्तुं भवम्मि तम्मि ततो। जातो त खयरवई इय कहिय राय तुह चरियं ।। ४६ ॥ त सोउ जाईसरणनाणचिन्नायपुधभवचरिओ । रायाह जह पाहि कहियं दिह मएवि तहा ॥४७॥ तो रयणाभरणमुणी भणइ मुर्णिदं कहेह मह भयव । किं सुयसुयाण विरहो बहुथोवदिणाणि जाओ मे ॥४८॥ आह पहू आरामियपुत्तो कणकिन्न- नामगामम्मि । आसी अंड(ब?)यनामो कीरसुओ गोविओ तेण ॥४९॥ तो तं अनियत कीरजुयलमचंतदुक्खियं जाय । करुणं कूयइ असूणि मुयइ मुच्छियएणुफल ।। १५०॥ जणएणुत्त पुत्तय मुंचसु तणय सुयाणमिहिपि । मा पुत्तविउत्ताण इमाणमचाहिय होही ।। ५१ ॥ तो तेणमइफ्तेसु नवमुहुत्तेसु सुयसुओ मुफो । तो सजातो तोसो कीरीकलियरस कीरस्स ॥ ५२ ॥ समयतरमि कम्मिपि अवहरिया सारसीसुया तेण । तो तजणणिं दुहिय दडु सहसत्ति सा मुफा ।। ५३ ॥ कश्यापि मासखमणे आरामे तमि सतियं साहु । नियपि पजुवासइ भत्तिन्भरनिभरो सतो॥५४॥ भोयणकरणनिविटेण पडिलाहितो मुणी सो सद्धासहियेण परमन्न ॥ ५५ ॥ तप्पुनपभावा सो अमरो होउं तुम לבת תלתלתלתלהבתי तेण तत्थेय मासपारणए -4 पूजाया श्रीअनन्त- नाथचरि- बादुद्धृत पूजाष्टकम् शेखरकथा ॥५॥ निवो जातो। कीरजुएण वि भमिउं भवम्मि समुवजिउं(अं) सुकयं ॥५६॥ कीरो जाओ हं किरणवेगखयराहिवो सुई विहु मे। किरणावलित्ति कन्ना जाया नवरं अपुत्तोहं ॥१७॥ जा अंब(ड)एण हरिया सारसिया तीए सरतडे जणणी । वाण लोइएणं विद्धा खवगेण सच्चविया ॥५८॥ पंचपरमेट्ठिमंतो दिन्नो से तेण तयणु सा सग्गे । अमरत्तसिरिं भोत्तु संजातो तुह इमो पुत्तो॥ ५९॥ नहयलचलिएण मए दिह्रो सपिएण मासमेत्तवओ। कीरहरणुत्थपाचोदएण तुह सो मए हरिओ ॥१६०॥ पडिवन्नो पुत्तत्तेण नयणवेगोत्ति तयणु कयनामो । समयंमि तस्स रजं दाउं दिक्खा मए गहिया ॥६१।। नंदी- सरवलिएणं हरिया तुह् कन्नया तओ तेण । अंबयभवसमुवज्जियसारसियाहरणपाववसा ।। ६२ ॥ अट्ठारसघडियाहिं अट्ठारसवच्छराणि सुयविरहो । जाओ तह दिवसतिगं सुयाए सह अप्पपावेण ॥ ६३ ॥ ता सुमुणि कोउउप्पाइयं पि इय दुक्खदायगं पावं । रागदोसवसकयं तं पुण वियरइ भवोहदुहं ॥६४॥ इय कहियं तुह चरियं तो रायरिसीवि जाइसर- गेण । तं नाउमाह एवं जह पहु तुब्भेहिं कहियंति ।। ६५ ॥ नवदिक्खियमुणिजुत्तं नमिऊण गुरुं निवो कइवि दिवसे । भोत्तुं खेयररज्जं रयणप्पायारमणुपत्तो ॥६६॥ नीईए तत्थ पालइ रजं भुंजइ पियाए सह भोए । निबंपि कुणइ तित्थप्पभावणं पूयइ जिणिंदे ॥६७॥ दंडिप्पवेसिएणं कइयावि हु जणयमंतिणा राया। नमिउं विन्नत्तो देव तुह पिया गिहिही दिक्खं ॥६८॥ रज्जारिहोत्ति केणइ हणिज्जिही एस इय विभावेउं । पिउणावमाणिओ तं न चेव पहुरागदोसेहिं ॥६९॥ ता तुम्हे पिउरजस्सि- रिमागंतुं अलंकरह पहुणो । कारणकयावमाणणविसए खेओ न जुत्तो जं ॥ १७०॥ तं निसुणिऊण सम्माणिऊण तं तेण संजुओ राया। तत्थ गओ पयपणओ पिउणा आलिंगिओ गाढं ॥ ७१ ॥ संभासिय ससिणेहं निवेसिओ नियपए तओ रन्ना । गीयत्थगुरुसयासे रिद्धीए कयं वयग्गणं ॥७२॥ पालई सो रज्जतिगं नरखेयररायरइयपयसेवो। नंदीसराइठाणेसु १ 'संजाओ तुह नरवर अट्ठारसवच्छराणि सुअविरहो' इति पाठान्तरम् । FFES E UENCE रा अक्षत- पूजायां अक्षतः कीर्तिकथा जाइ सासयजिणे नमिउ ॥ ७३ ॥ उवभुंजिऊण रज्जेसु तिसुवि लच्छि पभूयकाल सो । रयणावलीसुर्य कुसुमपरिमलं नाग ठविय पए ॥७४|| गुरुनयणवेगपासे घेत्तु दिक्सं कलत्तकलिएण। उत्पन्नकेवलेण पत्त मोक्खम्मि नरवइणा ॥७५॥ फुसुमेहिं जहा रइया पूया एएण भूमिनाहेण । परमाणदसुहृत्य कज्जा अन्नेण वि तहेव ॥ ७६ ॥ -** कुसुमपूजा- ज एसो हु उसुमपूयाफलम्मि सिरिकुसुमसेहरो कहिओ। अक्सयपूयाए कह अक्रायकित्तिस्स निमुणेह ॥ ७७ ॥5 मसिणियघुसिणरसेणव अरुणारुणरयणभवणकिरणेहिं । रजती दिसिवयणाई कित्तिकलिया पुरी अस्थि ॥७८॥ मणि- कुट्टिमसकंताहिं जीए निसि गिहिणीउ मुद्धातो। विलयाओ वेलविनंति मोतियाई ति ताराहि ॥ ७९ ॥ ससहरजो- पहाभरसरिसकित्तिपन्भारभरियभुवणययलो । निम्मलकित्ती नामेण नरवई विलसए तत्थ ॥१८०॥ वामकरेणेकेणं इय- रेणुब्भामियासिजणिएण । फरएणव विइएण धरिएण रणमि जो सहइ ॥ ८१॥ पट्टमहादेवीपयपहुत्तमुखहइ तस्स सिय- सीला । लीलायमाणदेहा कित्तिसिरीनामिया दइया ।।८२॥ अचम्भुयस्सरूव जीए रूवं पलोइउ दूरं । अरईए परिग्गहिया रई वि सह वरुणलोएण ॥८॥ तीए समत्थि गुरुअस्थिसत्थपविइनअत्थवित्थारो । पुत्तो अक्खयकित्ती नामेण कम्म- [णापि सया ॥८४ ॥ तेयस्सी दित्तिपहुष ईसरसिरसेहरो ससहरोब । पसमरसियमई सबया सुसाहुध जो सहइ ॥८५॥ निम्मलफलाफलायं परिकलयवस्स तस्स पुणरुत्त । जति दिणाई निरतरपिउपयसेवापसत्तस्स ।। ८६ ॥ सहितो कयाइ समवयसिंगारियरायउत्तमिचेहिं । आरुहिय तुरग तुरयवाहियालीए सपत्तो ।।८७॥ पुलभमिवारिकाहिं (?) वाहिय तुरयं | निवारि मित्ते । दाऊण कसाघायं सो मुफो तेण वेगेण ॥ ८८ ॥ विरइयगुरुतरवेओ हओ गतो जाव दुरदेसम्मि । मित्तेहिं ततो तुरया कुमरपहे पेरिया तुरियं ।।८९॥ महमग्गम्मि महीए इंति इमे नो नहत्ति कलिउव । सहसत्ति समुप्प- इवो कुमरतुरंगो नहयलेण ॥ १९०॥ गुरुपवणनयणमणजवजइणा वेगेण जाइ गयणयले । कुमरतुरओ रयेण जेउं पिव CVPURI בתשובתכתלכוכתכתבתכם T CLCLCULCU श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्धृत पूजाष्टकम् अक्षत- पूजायां अक्षत- कीतिकथा ॥६॥ रविरहतुरंगें ॥९१॥ उग्गीवाणं मं प्रेच्छिराण पीडा भडाण भवहित्ति । परिभाविउ व तुरओ तन्नयणागोयरे पत्तो ॥१२॥ रायंगरहे हरिए हियहियतो इव समग्गपरिवारो । कायद्यविमूढमई पत्तो रायंतियं झत्ति ॥ ९३ ॥ साहइ कुमारहरणं तं सोउं मुच्छिओ महीनाहो । तवेलमेव जाओ निचेट्टो चत्तपाणोच ।। ९४॥ चंदण रसछडासेयवससमुवलद्धचेयण सहावो । रुयइ सकरुणं पागयनरोब अंतेउरेण जुतो ॥ ९५ ॥ हा हा कुमार हा भुवणसार हा रइयरम्मसिंगार । हा विहलिय- अब्भुद्धार हा हहा समरदुबार ।।.९६ ॥ हा जाय जाय हा विहियनाय हा धरियरायमज्जाय । हा हा पररमणीभाय हा हहा भुवणविक्खाय ॥ ९७ ॥ को उच्छंगे धरिऊण मह काम कुमर कोमलकरहिं । संवाहतो काही आणंदमहूसवुकरिसं ॥ ९८ ॥ कुंडलसरलुत्तरियाकंकणकेऊरमणिमयाभरणे । रंजिज्जतो दाही दाणे को वंदिविंदाणं ॥ ९९ ॥ इय पलवंते संतेउरे निवेमंतिणा विमलमइणा । कुमरनिरिक्षणकज्जे तुरयाणीयं समाइडं ॥ २०० ॥ तंपि दुवालसजोयणमाणम्मि महियले परिन्भमिउं । नवरं कुमारवत्तामेतंपि न तेण संपत्तं ॥१॥ तइयम्मि दिणे पसरंतसोयसंभारनिव्भरे नयरे । कुमरो खयरविमाणाऊरिय गयणंगणो पत्तो ॥ २ ॥ नयणेहिं समं हरिसं-वियासयंतो नरिंदलोयाण । पणओ जणणीजणयाण तेहिं आलिंगिओ गाढं ॥ ३ ॥ तो चेडीचक्कजुया कुमरगुरूणं नया कुमरवहुया । आसिहिं ताण तुट्ठा सुद्धते. संठिया गंतुं ॥ ४॥ जंपइ जणओ तुमए दिन्नो कि अम्ह पुत्त दुःखभरो। सो भणइ सुहदुहाणं दाया देवो न चेव अहं ॥ ५ ॥ रायाह सुहदुहाणं जं अणुभूयं तएवहरिएण । तं साहसुत्ति तो कुमरसुमरिओ आगओ अमरो ॥६॥ तं द8 मणिकुंडलकिरीडकेयूरकंकणाहरणं । विम्हियमणो नि( वो )पूई ऊण तस्सासणं देइ ।। ७ ॥ तत्थुव- विसिउं सो कुमरपेरिओ कहइ हरिणवुत्तंतं । पायालंमि पुरी अस्थि चमरचंचत्ति मणिभवणा ॥ ८॥ जीए सामारुण- सियमणिभवणपहाहिं संवलिज्जन्ता । अमरा भमन्ति मयणाहिघुसिणचंदणविलित्तव ॥ ९॥ वथावट्ठियजोबणसुरंगणा- FASFISTS DrKorreRUEnel अक्षत- पूजायां अक्षत- कीर्तिकथा गणविलासदुहलिओ। घुघतचारुचमरो चमरो नामेण अमरवई ॥२१०॥ निक्सति तत्थ रवितेयचंदतेयाभिहा अमर- उमरा । रविचंदा इव भमिग हरति तेएण तिमिराइ ॥ ११ ॥ निहालस्साइसरीरलिंगनिच्छइयचवणसम्भावो। जपइ रवितेओ मित्त चवणसमओ इमो मज्झ ॥१२॥ ता म पत्तनरत्त पडियोहेजसु तुम अवसरम्मि । इय जपिउ चुओ सो सुमरियजिणगुरुचरणकमलो ॥ १३॥ नयरम्मि धरासारे मणिमदिररइयधरणिसिंगारे । जाओ राया सिरिरयणसुंदरो नाम रम्मगो ॥ १४ ॥ विलसतरूवजोधणअभग्गसोहग्गसगयगीहिं । दइयाहिं समं विसए उवभुजतो गमइ काल ॥ १५ ॥ कइयावि चंदतेएण मित्तदेवेण तस्स रयणीए । कहिओ सुरभवरइओ नरत्तपडिबोहवुत्ततो ॥१६॥ त सोउ जाईसरणनाणनयणेण दिद्वपुधभवो। जंपइ राया तुमए पडिवन्न पालियं कितु ॥ १७ ॥ पहु जोषण नव मणहरा सिरी असमसुयरा वि सया। रचाओ कताओ भत्ता मित्ता अपुत्तो ह ॥ १८ ॥ ता अन्ज वि असमत्थो अप्पहिय फाउमाह अमरो वि । परमत्यविमूढमईण राय इय उत्तराइ जओ ॥ १९ ॥ रोयजराजोयविणस्सिरस्स तरुणियण- मणहरस्सापि । का राय सारया जोषणस्स मोत्तु तवचरणं ।। २२० ॥ चोरानलजलरायग्गहाइवहुविहअवायसज्झाए । धम्मवाणघयमतरेण न सिरीए अत्थि गुणो ॥ २१ ॥ सरिसवसमसोक्खकरा सुरगिरिगुरुदुक्खदाइणो दूर । अचा- सत्तीए तणुक्सय न कि दिति निव विसया ॥ २२ ॥ अतो निन्नेहाणं पवचरयणाहिं रजियजणाण । कि सार कताण मरणताणत्यहेऊण ॥ २३ ॥ परदइयादवग्गहविरइयमेत्ती कुसुद्धहिययाण । कि वन्नेसि नरेसर सकजसज्जाण मित्ताण ॥२४॥ परिपालिया वि परिपाढिया वि अप्पियधणावि निव नूणं । पुत्ता न परित्ताणं कुणति नरए पडताण ॥ २५ ॥ भयवासलालसाण हवति आलवणाइ एयाइ । अणुसरियसीहवित्तीण न उण आसन्नसिद्धीण ॥ २६ ॥ थिरजोधणाहिं अणुराइणीहिं पयईए सुरहिगंधाहिं । विसए देवीहिं सम भोत्तूण चिर न जइ तित्तो ॥ २७ ॥ ता गलिरजोधणाओ an m PEPPI अनन्त श्रीअनन्त- नाथचरि- बादुद्धृतं पूजाष्टकम् पूजायत अक्षत. कीर्तिकथा ॥७॥ कित्तिमरायाओ दुरहिगंधाओ । नारीओ असुइभरियाओ विलसिरो किमिह तिप्पिहिसि ॥ २८ ॥ वसिउं समग्गसुह- वत्थुपरिमलुग्गारसुरहिसुरलोए। वसियस्स असुइगम्भे न विराओ तुह हहा मोहो ॥ २९ ॥ नियपडिवण्णे निरिणो जाओहं राय तुह हियं कहिउँ । ता कुणसु जमप्पहियं मा मजसु मूढ भवकूवे ॥२३०॥ इय सुयउवसमरसअमयवरिससम- अमरदेसणो राया। सिरंविरइयकरकोसो संविग्गमणो भणइ अमरं ॥ ३१ ॥ पहु तुमए अमएणव महमोहमहाविसं हरेऊण । उप्पाइओ पबोहो उवयारपराऽहवा गुरुणो (पाठांतर भवे गुरुणो) ॥३२॥ ता इहि गिहिस्सं दिक्खं परिणावि- उंदुहियमेगं । दाउं रज्जपि वरस्स मित्त ता आणसु तयंति ॥ ३३ ॥ एवंति भणिय अमरो पत्तो नयरीए चमरचंचाए। अमरविणोयपमत्तो रायवरं सरइ दसमदिणे ॥ ३४ ॥ अक्खयकित्तिकुमारं हरिऊर्ण रयणसुंदरनिवस्स । अप्पसु झडत्ति इय भणिय पेसिएणुचरममरं सो ॥ ३५ ॥ इय पडिवज्जिय नयरीए कित्तिकलियाए झत्ति संपत्तो। कुमरे तुरंगनिचयं आवाहंतं पुरीए बहिं ॥३६॥ विहियममरेण निवसुयहयरूवं तंमि निवसुओ चडिओ। तो गंतुं दुरपहे गयणेण गओ हओ सहसा ।। ३७ ।। गरुयगिरिसरियनयराई गयणमग्गेण इक्कमंतेण । अमरतुरएण वेरी सञ्चविओ उज्जओ इतो ॥३८॥ तं दटुं सो नट्ठो मोत्तुमणवलंबणं नरिंदसुयं । अप्पमि विणस्संते परोवयारी हवइ विरलो ॥३९॥ निवडइ रायंगरुहो रएण गयणंगणा निराहारो। सहाणभट्ठाणं गरुयाणवि होइ वा पडणं ॥२४०॥अवरुंडिऊण धरिओ निवपुत्तो वानरीए निवडतो। सुहपुन्नपरिणईए जंतो जीवो व नरयम्मि ।। ४१ ॥ कोमलकिसलयनिचये निवेसिउ तं जलासया सलिलं । घेत्तूण पत्तपुडए धोयइ दासिब तच्चरणे ॥ ४२ ॥ खजरकयलिफलदाडिमाइ भोयविय पाइओ सलिलं । तीए मिउदलरइए सथ्थरए सोविओ तयणु ॥४३॥ उल्लयपूगप्फलनागवेल्लिदलदावद्धगिरिचुन्नं । आणित्तु तीए दिन्नं तंबोलं भुंजइ कुमारो॥४४॥ उवविसिय सम्मुही सा करकयकयलीदलेण कुमरतणु । वीयंती अवलोयइ रायसुर्य -- eneuru म अक्षत- पूजायां अक्षत- कीर्तिकथा पत्ताणि । वेयवृत्तरसेटीए गयणवल्लहपुरे ताणि ॥८शा उववेसिउं सहाए कुमर खयराहिवेण रज्जसिरी। उवणीया भणिरेणं त सामी सेवगो ह ते ॥ ८२॥ कुमरेणुत्त विलससु नियलच्छि जं मएवि तुह दिन्ना । नवर मए समाण अणुहवमाणो सिणेहभर ॥८३॥ त सोउ खयरिंदेण हिदियएण पूइउ अमर । कुमरकुमरीण रइओ सम्माणो नियसिरिसरिसो॥८४॥ तो अमरो कुमरीकुमरखेयराहिववलेहिं सजुत्तो । चलिओ पत्तो य धरासारे नयरे गुरुरएण ॥८५॥ कुमरी अवहरण- ससोयलोयपिहियावण तमिस्सतो। पत्तो विसन्नसिंगारहीणनिवलोयमत्थाण ॥ ८६ ॥ दद्दु अमर कुमरीए सगय नट्ठसोयसतायो। राया पूइय अमर आलिंगइ कन्नयं हिट्ठो ॥ ८७ ॥ काउ कुमारखयरेसराण सम्माणममरमुल्लवइ । मित्त सुयावुत्तत हरणागमणाण मह कहसु ।। ८८ ॥ तो अमरेण समग्ग कन्नाकुमराण हरणवुत्तंत । कहिउ भणिओ राया परिणावसु कन्नय कुमर ॥८९॥ ठविउ रजम्मि इम अपहिय कुणसु गहियपधजो । इय भणिए जा चिंतइ विवाह- सामग्गिय राया ।। २९० ॥ ता अमरेण ससचीए झत्ति मणिथभयावलीकलिओ । वीवाहमडवो पचवन्नधयमालिओ विदिओ ।। ९१ ॥ रइया य हट्टसोहा समतओ देवदूसविसरेण । किवहुणा निवचिंतियममरेण कयं समग्गपि ॥ ९२ ॥ गुरुरिद्धीए कुमरी दिन्ना कुमरस्स तेण परिणीया । करमोयणम्मि दिन्न रज सत्तगमवि तस्स ॥ ९३ ॥ एथ्थतरमि उजाण- पालओ दडिसूइओ पत्तो । पल्लवओ नामेण नमिउ विन्नवइ नरनाह ॥ ९४॥ देवुजाणे कलकोइलाभिहे केवली समो- सरिओ । सोऊण तइ वियरइ राया पीइप्पयाण से ॥ ९५ ॥ गुरुरिद्धीए सुरखेयरिंदनवनिवइपरिगओ तुरिय । पत्तो उजाणे नमिय केवलि तत्थ उपविट्ठो ॥ ९६ ॥ दद्दूण केवलिं नवनिवई मुच्छाए महियले पडिओ । सिसिरकिरिया- समुवलद्धचेयणो पुच्छिओ रन्ना ॥ ९७ ॥ कि राय मुच्छिओ तं सो जंपइ केवलिं पलोएउ । मह जाइसरणससूयगा इमा आगया मुच्छा ।।९८॥ दिट्ठो नियपुवभवो हुतो कासीभिहाण देसे ह। दुग्गयपडागनामो आजम्मदरिदिओ विष्पो॥१९॥ בהתכתבתלתלתכתברכתככתבת हालालालालाटाहाहाहानाTen Rushal

My
श्रीअनन्त-
नाथचरि-
त्रादुद्धृत
पूजाष्टकम्
अक्षत-
पूजाया
अक्षत-
कीर्तिकथा
॥९॥
देसेसु परियडतो कयाइ उववासतिगसुसियदेहो । पत्तो मज्झण्हे कणयसालपुर-तिलयउज्जाणे ॥ ३०० ॥ दळूण तत्थ
नवसालितंदुले विकिर्णतए वणिए । आह अहं पहसंतो तिलंघणो देह ता किं पि ॥ १॥ तो तेहिं सालितंदुलपसइदुर्ग
गुरुदयाए दिन्नं से । तं घेत्तूण पविट्ठो उजाणभंतरे जाव ॥ २ ॥ ता नियइ केवलिमुणिं जिणपूयफलं जणाण
साहतं । जो कुणइ जिणस्सट्ठवि पूया तो लहइ सो सिद्धिं ॥ ३ ॥ ताओ फलजलनेवजदीवधूवक्खएहिं परमेहिं । वासे हिं
कुसुमेहि य भणियाओ समयसन्थेसु ॥ ४ ॥ सवाओ वि असत्तो तं कुणइ जिणस्स अक्खएहिंवि जो। भोत्तुं सयल-
सिरीओ सो अक्खयसोक्खमवि लहइ ॥ ५ ॥ तं सोउ सो चिंतइ न पुबजम्मे मए कओ धम्मो । तेण न संपज्जइ मे
भमिरस्स वि भेक्खमेत्तंपि ॥ ६ ॥ ता जिण पूयं सालीए काउमज्जेमि सुकयसंभारं । जं भिक्खाभमणेणवि भविही
मह छुहपरित्ताणं ॥ ७ ॥ इय चिंतिय भत्तीए नमिय मुणिं भणइ कहह कत्थ जिणो । पूएमि जहा तो सावएण सो
जिणहरे नीओ ॥ ८ ॥ जं कणयमयं मणि किरणकिन्नवणराइविलसिरउवंतं । कंचणगिरिब कप्पडुमावलीवेढियं सहइ
॥ ९ ॥ तंमि पविट्ठो पेच्छइ पसंतरूवं जिणेसरं रिसहं । आणंदअंसुजलकलियलोयणो भत्तिकंटइओ ।। ३१० ॥ मणि-
मयकुट्टिममिलमाणभालमभिनमिय सामिणो तेण । अक्खयढोयणपूया विहिया बहुमाणसारेण ॥ ११ ॥ दळूण तस्स
भत्तिं नियगेहे सावएण से दिन्नं । निद्भुण्हभोयणं तद्दिगाउ सो सुस्थिओ जातो ॥ १२ ॥ तो कालगतो समभावसंगतो
निवसुतो हमुप्पन्नो । दलूण केवलिमिमं जाईसरणं समुप्पन्नं ॥ १३ ॥ निव्भग्गस्सवि मज्झं रिद्धी सुगुरूवएसनायाए ।
जिणपूयाए कयाए जाया इय साहियं तुम्ह ॥ १४ ॥ तं सोउं संजाओ जणस्स जिणपूयणम्मि बहुमाणो। रायावि
सावरोहो दिक्खं गिण्हइ गुरुसयासे ॥ १५ ॥ पणमिय गुरुणो नवदिक्खिए य संभासिऊण नवनिवई । खेयरवई च
अमरो गओ सठाणम्मि कयकिचो ॥१६॥ नवदिक्खियमुणिजुयकेवलिको नमिय नहरिंदजुतो। पत्तो पासाए तत्थ सुत्थय
॥ ९॥

फलपूजायां फलसार- कथा रइय रजस्स ॥ १७ ॥ खेयरविमाणसेणाए तुम्ह चरणतिय समणुपत्तो । नमिय निविट्ठो पुट्ठो नियहरणं कहसु वच्छत्ति ॥ १८ ।। तो एय सुमरिओ चंदतेयअमरो समागतो सो ह । कहितो य हरणहेऊ जुत्त तुम्हपि हियकरण ॥ १९ ॥ त सोउ नरनाहो पइ भो अमर सुयणसिररयण । निफित्तमोवयारी तमेव जो एवमुवइससि ॥३२०॥ नियमेण वयं फाह रज दाउ सुयरस इण्हिपि । इय जपिरे नरिंदे सहसत्ति तिरोहितो अमरो ॥ २१॥ तो रन्ना नवनिवई अणिच्छ- माणोवि ठाविओ रजे । गीयत्थगुरुसयासे सय तु अगीकया दिक्सा ॥ २२ ॥ कइयावि हु सम्माणिय विसजिओ राणा सयरचफो । कजेसु ममाएसो देउत्ति पयपिय गओ सो ॥ २३ ॥ पइदियहंपि पवुड्डप्पयावपव्भारदुस्सहो दूर । रिउमडलाइ राया परितावइ गिम्हतरणिध ॥ २४ ॥ कइयावि हु वेयड्डे विलसइ विज्जाहरिंदवाहरिओ । कइयावि धरा- सारे रजसिरिं चिंतए गतु ॥२५॥ पयडइ नीइ पालइ पयाउ पूयइ जिणे गुरु नमइ । साहइ देसे एवं वचंति निवस्स दिवसाइ ॥ २६ ॥ कालेण कित्तिमालादेवीए उदारकित्तिनाम सुओ। जातो सगहियकलो विवाहितो रायकन्नाओ ॥ २७ ॥ त रजे अहिसिंचिय गिण्हइ सपिओ वय जणयपासे । कयतवचरणो उत्पन्न केवलो सिद्धिमणुपत्तो ॥२८॥ जह |अक्सयहिं विहिया जिणिंदपूया इमेण नरवइणा। सिद्धिसुहकखिणा तह कज्जा अण्णेणवि नरेण ॥२९॥ अक्षतपूजा ममममणिओ अक्खयकित्ती अक्सयपूयाए सपय तुन्मे । फलपूयाए निसामह फलसारं वागरिजत ॥ ३३० ॥55555 विफुरिय-भूरिकरदुरवलोयमणिमदिरावलिकलियं । सूरोहकयावास अस्थि सूरप्पहं नयर ॥ ३१ ॥ अन्नोन्न- मिलियमणिगिहकर किन्ननहम्मि पक्खिणो नूण । विस्थारियजालमिव न जमि पविसति बधभया ॥ ३२॥ सारयर- विकरपसरियपयावसतावियाहिओ तत्थ । अस्थि प्पयावसारो नामेण निवो रणवसणी ॥ ३३ ॥ सबगचग- नियरूवगधनिजिणियअच्छराविसरा । तरसस्थि हस्थिकुभत्थलथणी जयसिरी जाया ॥ ३४ ॥ तन्नयणन्भमरगण nana បប फलपूजायां श्रीअनन्त- नाथचरि- फलसार- कथा त्रादुद्धृतं पूजाष्टकम् ॥१०॥ E आणंदइ सुमणपत्तभरपरमो। फलसारो नामेणं दुमोब दूरुन्नतो कुमरो ॥ ३५ ॥ कइयावि सहासीणे निवंमि कुमराइरायमंतिजुए। झणणिरकिंकणिगणं विमाणमेग समणुपत्तं ॥ ३६ ॥ तम्मज्झाउ पसरंतमणिमयाभरणकिरण- दुनिरिक्खो । रविरहरयणाओ रविव खेयरो झत्ति नीहरिओ ॥ ३७ ॥ पडिहारकयपवेसस्स तस्स संमाणपुवमवणिवई । खयराहिराय साहसु आगमणत्थंति जंपेइ ॥३८॥ सो आह ससहरसिओ वेयड्डो नाम वामदेवोव । गंगासिंधुपरिगतो अस्थि गिरी गरुयनयरसिओ ॥ ३९ ॥ नयनायरगुणनिजियसमग्गपुरपत्तवेजयंतिव । तत्थत्थि वेजयंती नयरी मणीभवणकमणीया ॥ ३४० ॥ गोरीपन्नत्तीपमुसिद्धविजापभावदुजेओ। विजाहरराया तत्थ अस्थि सिंगारसारोत्ति ॥ ४१ ॥ निम्मलनहकयसोहा पवित्तसम्भावभासियदिसोहा । तारावलिब जाया जाया तारावली तस्स ॥ ४२ ॥ तीसे असेसभुवणेकभूसणं रूवरेहविजियरई । जाया मणुन्नकन्ना सिंगारतरंगिणी नाम ॥४३॥ सद्धिं सुहवण्णेणं कलाकलावण तारतारुण्णं । जायं तीसे सिंगारगारबुग्गारपरिकलियं ॥ ४४ ॥ कइयावि सा सहीयणसहिया मणिमत्तवारणासीणा । गयणे जंतं चारणमुर्णिदमिक्खिय गया मुच्छं ॥ ४५ ॥ चंदणरसच्छडासेयसिसिरकिरिओवलद्धचेयन्ना । संसुसही- हिं सा पुच्छिया तुमं मुच्छिया किमिह ॥ ४६ ॥ आयन्नहत्ति जंपिय सा मुच्छाकारणं कहइ तासिं । संसारसरूवंपिव अत्थि अरन्नं अदिटुंतं ॥ ४७ ॥ गुरुभूरिसाहिसाहासहस्सअंतरियअंतरिक्खंमि । सावयभीउब जहिं पक्खिवइ करे न सूरोवि ।। ४८ ॥ पेच्छिज्जतकुरंगं दरिदगामीण देवहरयं व । जं विगयरायचित्तं विरायए केवलिकुलं व ॥४९॥ तरुणो व विलसिरवओ विसालतो सरसकमलनियरो छ । तत्थप्पसरियसालो अस्थि वडो पुरनिवेसोब ॥ ३५० ॥ बालायवदलनिम्मावियं व सबंगपिंगपहरोमं । अचंतचंचलं जं तरुणीअणुरायरइयं व ॥ ५१ ॥ धरमाण- मरुणवयणं मसिणियघणघुसिणरसविम्मिसं व । वानरजुयलं परिवसइ पायवे तम्मि घणनेहं ॥ ५२ ॥ जुयलं ॥ ॥१०॥ पत फलपूजायां फलसार- कथा कश्यावि फरहसरवसहसगडसेरहसहस्स-सजुत्तो। सपत्तो सत्थाहो नामेण धणावहो तत्थ ॥ ५३॥ आवासिओ य वडविडवितडकए गहरे गहीरम्मि । गुणिणीविमाणयाइसु जहजोग्ग सेसलोगोवि ॥ ५४॥ एत्थंतरमि तवतेयभासुरो रइयउत्तरासगो। गिम्हतरणिध चारणसमणमुणिंदो हयतमोहो ॥ ५५॥ अगीकयविरइरतो अनिरुद्धसुओ अविग्गहो सयय । जयजणमणकयवासो सोहतो कामदेवोध ॥ ५६ ॥ गयणगणेण पत्तो तत्तो सत्थाहिवो सबहुमाण । त नमिय निसीयायइ पट्टम्मि निसीयइ सयपि ॥ ५७॥ दद्दु त नवजोधणमन्मुयरूव भणेइ सत्याहो । कि पहु तुह वेरग्गं ज लहुएणवि वय गहिय ॥ ५८ ॥ आह पहू सत्थाहिव आयन्नसु अस्थि उड्डलोगम्मि । बहुपुन्नपावणिजो सोहम्मो नाम सुरलोओ ॥ ५९॥ जम्मिं बहुरविकरदुरवलोयमणिमयविमाणहयतिमिरे । लज्जतोष न पविसइ कायरपुरिसोब सूरोपि ॥ ३६० ॥ पुन्नप्पयरिसवसही निरुवमरूवो असीमइस्सरिओ। त परिपालइ सको कयरिउगणमाणसधसफो ।। ६१ ॥ तस्सत्थि परममित्तो समस्सिरीओ समाणासिंगारो। नामेण सरीरेणय विक्खाओ अमियतेओत्ति ।। ६२॥ विलसिरतणुफतिमई कंतिमई नाम सहयरी तस्स । दइयवियोग सा विसयलालसा न सहइ सणपि ।। ६३॥ भणइय म मोत्तु त मा गच्छसु सामि सफपासम्मि । ज तुह विरहुकरिसो दूर विहुरइ सरीर मे ॥६४॥ पत्तमहाणदा इव अमयदह- सगसुहियदेहध । तुहसगसगया सामिसाल ह होमि नियमेण ॥६५॥ इय तवयणस्सवणा नियदेहाओ वि नियधणाओ वि। अन्भहिय त मन्नइ दुइय सो जीवियाओवि ॥ ६६ ॥ सुरलोयसभवासमविसयस्सासगसत्तचित्तस्स । अन्नाओचिय गच्छइ कालो से चत्तधम्मस्स ॥६५॥ समयतरमि महइ वेल ठाउ सुरिदपासम्मि । जा गच्छह ता पेच्छइ न भारिय निय- विमाणमि ॥६८॥ कत्थ गया मे कता कंतिमई इय विभाविउ जाव । तबिरहविहुरिओ त नाणेण पलोइउ लग्गो ॥६९॥ ता अवरसिहरगिरिंदसवणदक्समडवतलम्मि । विसयासत्त अवरामरेण सद्धि तमिक्खेइ ॥ ३७० ॥ गुरुरोसावेगा To माया- N2NCNZUZUCULL Care श्रीअनन्त- फलपूजायाँ फलसार- कथा नाथनरि- त्रादुद्धृत पूजाष्टकम् ॥११॥ रत्तनेत्तपहभरपिसंगियग्गनहो। तहुगदहणनिमित्तं निसद्वगुरुतेउलेसोब ॥.७१ ॥ तो ताण मारणत्थं काउं वेगं गतो गिरिसिरे सो । नट्ठाई दुयं दोन्निवि को ठाइ पुरो दुजयरिउणो ॥ ७२ ॥ नढे दुगेवि वेरग्गवासणावासिओ विचिंतेइ ॥ पेच्छ अहं वेलवितो विवेयकलिओवि पावाए ॥ ७३ ॥ तुहविरहविहुरियाहं ठाउं चेट्ठामि नो निमेसंपि । ताण भणियाण जायं अवसाणं एरिसमिमीए ॥ ७४ ॥ धिद्धी धिरत्थु इत्थीण ताण जाहिं विमोहिया संता । मइरामत्तव विवेइणोवि मुढत्तणं जंति ॥ ७५ ॥ जिणचवणजम्मदिक्खाकेवलनिवाणपत्वपूयणओ । सुकयं समज्जियं नो मए पियामोहमूढेण ॥ ७६ ॥ जाण कए पाणावि हु तणगणणाए सया गणिज्जति । तासिं इमं सरूवं ता धिद्धी धी सिणेहस्स ॥ ७७ ॥ घेप्पति रूवजोबणविज्जाविन्नाणनाणदविणेहिं । नो पावप्पयईतो ता धिद्धी थीसिणेहस्स ॥ ७८ ॥ विस्सासिऊण वाहंति दासवित्तीए मह समं मूढं । अप्पति पुण न अप्पं ता धिद्धी थीसिणेहस्स ॥ ७९ ॥ वच्चंतु खयं विसया पज्जत्तं मज्झ सबभजाहिं। जो हं अणप्पवसओ विंडंबणं एवमणुपत्तो ॥३८०॥ वेरग्गसंगओवि हुन सबविरइचयस्स जोग्गो हं। ता इह लोयसुहस्सव चुक्को परलोयसोक्खस्स ॥ ८१ ॥ ता इह भज्जादुच्चरियसुमरणत्थं करेमि किंपि अहं । जं दद्दु परलोए उप्पज्जइ मज्ज्ञ पडिबोहो ॥ ८२ ॥ इय चिंतिऊण तेणामरेण विप्फुरियकिरणरयणेहिं । रोहणगिरिसिहरंपिव रुंद जिणमंदिरं रइयं ॥८३॥ गीयत्थसूरिमज्झ(हत्थ?)प्पइट्ठियं तत्थ कारियं तेण । सिरिरिसहनाहबिंब जाणंव भवन्नवुत्तरणे ॥ ८४ ॥ ता सक्केण सयं तत्थ अट्ठदिवसाइं ऊसवो विहिओ । इय अणुदिण जिणपूयणसज्जियसुकओ चुओ अमरो॥ ८५ ॥ उप्पन्नो वेयड्ढे दाहिणसेणीए अयलनामाए । नयरीए विजयप्पहरायपियाए जयाए सुतो ।। ८६ ।। विजुप्पहोत्ति विज्जावियक्खणो मित्तमंडलीकलिओ । चलिओ नहेण कइयावि कीलिउं तं गिरि पत्तो ।। ८७ ॥ दह्ण जिणहरं जायजाइसरणो पयासइ सु(स?)हीण । कुमरो अमरत्ते नियपियाकुसीलत्तवेरग्गं ॥ ८८ ॥ निदइ दुस्सीलाओ फलपूजायां फलसार कथा Jeeeeen महिलाओ कहइ धम्मसधस्स । भणइय भव जाय जमज्जमिह कीलिउ पत्ता ॥ ८९ ॥ भज्जा दुचारियस्सरणकारण- विरश्य जिणाययण । जायइ जेण विराया भवतरे सधविरई मे ॥ ३९० ॥ ता गिण्हिय सामन्न निस्सामन्नं तव चरि- स्सामि । ता मित्ता खमियचं ज तुम्ह मए कयमजुत्त ॥ ९१ ॥ तो सविग्गा ते विति तुम्ह मगं वयंपि अणुसरिमो। तो सवे मा(मो)यावियजणया दिक्सं पञ्चज्जति ॥९२|| कयवालकालबभवयावि सजायवहुसुया सधे । ता गुरुणा विपज्जुहो ठवितो जोगोत्ति सूरिपए ॥ ९३ ॥ सो सघत्थवि भवे पडिवोहतो विहारमायरइ । अज्ज पुण नंदीसरजिणविंचे वदिउ चलिओ ॥ ९४ ॥ इह पत्तो सत्थाहिव तुमए वेरग्गकारणं जमह । पुट्ठो त तुह कहिय त सोउ भणइ सत्थाहो ॥ ९५ ॥ पेच्छति मयच्छीण पहु सधेवि हु पभूयविलियाई । नवर करसवि जायइ न पडिवोहो जहा तुम्ह ॥ ९६ ॥ एयाउथिय भवसभवसुहसघस्समेव मूढाण । रायरहियाण दूर दुक्खपय न उणमन्नयर ॥ ९७ ॥ नूण पहु| बहुकहाणठाणमत्ताणमेत्थ मन्नामि । रन्नेवि जेण पत्ता तुम्भे ता कहह सुहहेउ ॥ ९ ॥ आह पहु भववासो आवासो तिक्खदुक्खलक्खाण । ता पत्त मणुयत्त मा हारह करह अप्पहियं ॥ ९९ ॥ तं पुण K-देवगुरुधम्मतत्तजोएण जायए नियमा । ता रागहोसअदूसियंमि देवे मइ कुणह ॥ ४०० ॥ आराहह निग्गंथं अणीय धम्मियं सुसीलगुरुं । जम्मि चराचरजीवाण रक्खण कुणह त धम्म ॥१॥ जं वीयरायदोसेहि दंसियं मुणह त सया तत्तं । जं चत्तारि वि पउगइहराइ एयाइ भवाण ॥२॥ जइ वि हु गुरुप्पमाया गिहिणो न कुणति सबगिहिधम्म । तहवि हु जिणपूया तेहिं अट्टहा भवहरी कुज्जा ॥३॥ तहाहि । जलधूवदीवनेवजकुसुमफलवासअक्खयसहावा । पूया अट्ठपयाराकीरइ भधेहिं अरिहाण ॥ ४ ॥ इय जइवि बहुविहा सा तहवि हु सुमहुररसुत्तमफलेहिं । अवयविजउराईहि विरइया, वियरइ सुहाइ ॥ ५ ॥ सुनरामरत्तसिवसुहफलाई भत्तीए विरइया नूगं ॥ फलपूयकराण वियरए जेणिमं भणियं ॥ ६॥ הכתכתללוכתבתלתל תכתבתכתבת תכולת תפתלתלו

CUE
फलपूजायां
फलसार-
श्रीअनन्त-
नाथचरि-
त्रादुद्धृतं
पूजाष्टकम्
कथा
॥१२॥
एकंपि फलं पुरओ जो ठवइ जिणस्स परमभत्तीए । तस्स - फलंति अवस्सं नरस्स सयलाउ विदिसाउ ॥ ७ ॥
तं सोउं सत्थवई भत्तिभरप्पणयगुरुकमंबुरुहो । अंगीकरइ सयावि हु जिणपूयाभिग्गहं विणई ॥८॥ साहागयेण साहा-
मएण इय देसणं सुणेऊण । भणिया भज्जा दइए सुकरो धम्मो इमो अम्ह ॥ ९ ॥ जेणेह फलाहारो विहिणा. अम्हाण
निम्मिओ पायं । संतिच्चय सुरसफला इह रन्ने भूरितरुणोवि ॥४१०॥ नूणं न किंपि सुकयं कयमम्हेहिं भवंतरम्मि पिए।
जायाई तेण दोन्नि वि निंदियतेरिच्छजाईए ॥११॥ एत्तो वि हु नियचावल्लदोससंजायपाय(व)पोसाण । अम्हाणं उप्पत्ती
कत्थइ भविही न याणामो ॥ १२॥ ता सुलहफलेहिं वयं पूइत्तु जिणं भवन्नवं तरिमो। साहामई पर्यपइ कुणह
इमं चलह पउणम्हि ॥ १३ ॥ एत्थंतरम्मि भणिओ गुरुणा सत्थाहिवो वयं जामो । अंवरसिहरगिरिम्मि जिणिंद-
पयवंदणनिमित्तं ॥ १४ ॥ तो आह सत्थवाहो पहु सो केत्तियपहे गिरी कहह । भणइ गुरू एसोच्चिय आसण्णो
गयणगयसिंगो ॥ १५ ॥ सत्थाहिवो पयंपइ अहंपि पहु तत्थ आगमिस्सामि । तो संचलिया गुरुणो सपरियणो
सत्थवाहोवि ॥ १६ ॥ उत्तरिय दुमाओ दुयं कइदुगमवि सूरिणोणुमग्गेण । गच्छइ तरच्छकरिहरिणसवरसंचरजुए
रन्ने ॥ १७ ॥ तंमज्झे तरणिभया पिंडीहूओब तमभरो तेहिं । अंबरसिहरो नामेण सामलो सो गिरी दिट्ठो ॥१८॥
सामलसिहरानिलचलतमालदल अंतरुल्लसिरधाऊ । जो नवघणोब ईसिप्फुरंततडिसजुतो सहइ ॥ १९ ॥ तम्मि सीयर-
निवडिरनिझरणनीरसिक्करसमूहवि(व)हवाए(?) । आरूढा गुरुसत्थाहि (य)वानरा(र)म्मआरामे ॥ ४२०॥ तस्सग्गे
पिंगमणिप्पहापिसंगियसमग्गदिसियकं । रविरहरयणंव नियंति उदयसेलम्मि जिणभवणं ॥ २१॥ रयणीसु जं विरायइ
पडिबिंबिय भूरितारयप्पयरं । केवलमुत्ताजालयविरइयसिंगारचंगंव ॥ २२ ॥ पेच्छंति तत्थ उवसंतकंतमुत्तिं जिणेसरं
रिसह । जहजोग्गं ण्हवणचणथवणे काउं निवट्टा(विट्ठा ?)ते ॥२३॥ दखूण जिणवरं वानराई बहुमाणजायपुलयाई । आण-
॥१२॥

फलपूजायां फलसार- कथा दयमपपत्तसुपननवणाई पणमन्ति ॥ २४ ॥ तो तेहिं पकगंवरअवयनारगवीजपूरेहिं । कयलीफलदक्खादाडिमेहि गतु जिणिदपुरो ।। २५ ॥ पसरियभत्तिभरुभिजमाणरोमंचअचियगेहिं । रइय बलि मुकं. वीजपूरय सामिकर- कमले ॥ २६ ।। जुयलं ॥ तत्तो अन्तो उल्हसियअसमआणदमदिरच्छीणि । भूपुट्ठभालपट्ट नमंति तिहुयणपहु ताइ ।। २७ ।। तो भत्तीए गुरूण नमिउ जपति निययभासाए । पहु तुम्ह पसाएण अम्हेहि समजिओ धम्मो ॥२८॥ भणइ गुरू धम्माओ नन्न भुवणे वि अस्थि सारतर । ता तिरियावि हु तुम्भे धन्नाइ जेसिमिय बुद्धी ॥ २९ ॥ इय अणुसासिय वानरजुयलं आपुच्छिण सत्थाह । नमिय जिण अन्नत्तो गयणेणं विहरिया गुरुणो ॥ ४३०॥ उत्तरिउ सस्थाहो गओ जहाभिमयदेसमसढमई । पावित्तु आउयत वानरजुयलपि कइयावि ॥ ३१ ॥ मज्झिम- परिणामजियनरत्तभावाहमेत्य वेयड्डे । उप्पन्ना सो कत्थइ मज्झ पिओ त न याणामि ।। ३२ ।। जह् पुषजम्मसद्धम्म- दायगो एस चारणमुर्णिदो। जं दह सजायमह जाइसरणनाणमिण ॥ ३३ ॥ मोत्तुं परभवदइयं सद्धम्मुच्छाहय पयग मे । न नरतरपरिणयणे मणो मोरहमवि करेइ ॥ ३४ ॥ त सोऊण सहीहि सबपि हु साहियं खयरपहुणो । तेणवि वाहरिय सुय चुत्त जुत्त इमं पुत्ति ॥ ३५ ॥ कितु न नजइ चउगइभवगहणे सो कहिंपि उप्पन्नो । ता मोत्तुमसग्गाहं अवरवर (वर) सु तं वच्छे ॥३६॥ सा आह मज्झ अगे लग्गइ सो सुहयरो अहव अग्गी । त सोऊण जणओ जाओ चिंताउरो दूर ॥ ३७ ॥ एत्थतरमि सुयदुदुहिस्सरो दारवालमचणिवई । किमिमंति पुच्छिओ सोवि तस्स | त मुणिय विनवइ ॥ ३८ ॥ पहु इहिचिय पत्चस्स सूरिणोणतनाणमुप्पन्न । तो केवलिमहिममिणं कुणति अमरा सबहु- माणं ॥ ३९ ॥ त सोउ भत्तीए सयरवई कनयाजुओ सवलो। केवलिपासे पत्तो पणमिय तं देसण सुणइ ॥ ४४०॥ आए पहू ससारो धुव असारो विणस्सरा रिद्धी । खणरायिणीउ रमणीउ गंतुर जीवियत्तपि ॥४१॥ इय देसणावसाणे בכתבבתבכתב Devannadani BUCULULZEUCLEUCUCUZTENLELUEPUPUPUZCUZCEL בכתבתצהבהבהב नन्त०३

त
श्रीअनन्त-
नाथचरि-
त्रादुद्धृत
पूजाष्टकम्
फलपूजायां
फलसार-
कथा
॥१३॥
खयरिंदो नमिय केवलिं भणइ । पहु महं सुयाभवंतरपई कई कत्थ उप्पन्नो ॥४२॥ तो कहइ विमलनाणी फलपूया-
करणपत्तपुन्नभरो। मरि सो सूरप्पहपुररायपयावसारस्स ॥ ४३ ॥ पुत्तो जाओ फलसारनामओ अत्थि चारुता-
रुन्नो । तं सोउं खयरवई पणयपहू मंदिरे पत्तो ॥४४॥ तो हं आलोचेउं सह भज्जासबमंडलीएहिं । तुब्भ सयासे पत्तो
नियतणयाए वरनिमित्तं ॥४५॥ ता राय भणसु नियपुत्तयं जहा मह सुयं विवाहेइ । तं सोउं नरनाहो जंपइ खेयरवई
एवं ॥ ४६॥ पाविजइ खयराहिव अणप्पपुन्नेहिं तुह समो सयणो । चिंतामणिसंजोगो जायइ किं मंदभग्गाण ॥४७॥
इयरंपि खयरकुमरि कल्लाणसिरिंव को न ईहेइ । किं पुण भवंतरस्सरणजायनेहं तुहंगरुहं ॥४८॥ एत्थंतरे कुमारो
जाइसरणेण नायपुत्वभवो । जंपइ तह ताय तयं जह कहियमिमेण तुम्ह पुरो ॥ ४९ ॥ तं सोउं गुरुपरिओसपूरितो
कुमरमाह नरनाहो । गंतुं खेयरकन्नं विवाहिउं वच्छ आगच्छ ॥ ४५० ॥ इय जंपिय सम्माणियखयरवई वत्थभूसण-
गणेण। पेसइ सह तेण सुयं राया चउरंगबलकलियं ॥ ५१ ॥ विजाहरिंदविजाबलेण पत्तो नहेण वेयड्डे । विहितो
तस्स पवेसे महूसवो खेयरजणेण ॥ ५२ ।। सबुत्तुमम्मि लग्गे घणाणुराया महाणुरायेण । परिणीया कुमरेणं सिंगारतरं-
गिणी कुमरी ॥५३॥ गुरुगोरवप्पहिट्ठो दिणदसगं तत्थ संठिओ कुमरो। पच्छा ससुरमणुन्नविय आगओ नियपुरे सपिओ
॥ ५४॥ पिउणा पुरप्पवेसे सुयस्स असमो महूसवो विहिओ । अत्थाणठियं जणयं नमिय निविट्ठो तयाणाए ॥ ५५ ॥
नवरंगयनीरंगीअवगुंठियवयणपंकया वहुया । नयससुरा तस्सासीतुट्ठा अंतेउरे पत्ता ॥ ५६ ॥ अत्थाणट्ठियं जणयं
सेवइ गोसप्पओससमएसु । न मुयइ कयाइ कुमरो कलाण पुणरुत्तमव्भासं ॥ ५७ ॥ काउं कयाइ रजाहिसेयपरमूसवं
कुमारस्स । गहियवउ निवो पत्तकेवलो मोक्खमणुपत्तो ॥ ५८ ॥ नवनिवईवि नएणं पालेइ पयाओ दंडए दुढे । मन्नइ
महायणीए पूयइ पुज्जे खले चयइ ।। ५९ ॥ पुत्वभवोवज्जियसुकयकम्मसंभारभावतो सबे । खोणीवइणो तं देवयंव
॥१३॥

17 जलपूजाया जलसार- कथा आरायति सया ॥ ४६० ॥ एगायवत्तधरणीवइत्तसपत्तउत्तमजसरस । तस्सुप्पन्नो कइयावि पुत्तओ पट्टदेवीए ॥६॥ विहिउ वद्धावणय नाम कुमररस कित्तिसारोत्ति । दिन्न रन्ना सम्माणिऊण निस्सेसपुरलोय ॥ ६२ ॥ परिवटिउमारद्धो फमेणमज्दावयाणमुवणीओ। समहीयफलो जातो समलंकियजोधणो कुमरो ॥ ६३ ॥ परिणाविओ य उधणजोवणकम- णीयरायकुमरीओ। समयमि तमभिर्सिचिय रजे राया गुरुविराया ॥ ६४ ॥ नाणधरसूरिपासे गहिउ दिक्ख तव तविय तिक्स । उप्पन्नणतनाणो पत्तो सो सिद्धिसबध ॥६५॥ जह विहिया फलपूया फलसारेणं महामहीवइणा । अन्नेणवि सिवमुहमिच्छुणा तहशेव कायद्या ।। ६६ ॥ फलपूजा - 5555फ्लपूय अणुसरिउ फलसारो भूवई इमो भणिओ। इण्हि जलपूयाइ जलसारकह निसामेह ॥ ६७ ॥15 भूरिहिमनिम्मिओ इव पुजियकप्पूरदलसमूहोव । रुप्पयमओ विसालो वेयड्डो नाम अत्थि गिरी ।। ६८ ॥ रुप्पयमयम्मि तम्मि तमालककेल्लिकयलिसडाइ । दिद्वारुणमरगयमणिसिहराइ पिव विरायति ॥ ६९ ॥ तम्मि य रहनेउरचकवालनाम समत्थि गुरुनयर । जम्मि तिमिराणभिन्नो लोओ मणिमहपहालोए ॥४७०॥ जत्थ गुरुमुत्तियाओ हरिसहिययाओ सुपयचफातो। सउणासियसयवत्ता सईउ सरसी उवहसति ॥ ७१ ॥ पणमतसयरनिवइसिरपिंग- मणिप्पहापिसगपओ । जलहरसारो नामेण तत्थ खेयरवई अस्थि ॥ ७२ ॥ नियदाणबुद्धिजियजलहरावली जलहरा- वलीनाम। तस्सस्थि हथिमथरसचारा सहयरी सारा ॥ ७३ ॥ तीए समस्थि जलरासिसिविणसूइयगहीरयावासो। |जल्सच्छप्पयईचिय कुमरो नामेण जलसारो ॥ ७४ ॥ मयणोध अतणुरूवो समग्गजणविहियहिययवासो जो। कमलायरोष गुरुमित्तदसणुल्लसियसुवियासो ॥ ७५ ॥ उत्तमकुलावयसो वयसजणसगतोवि रायसुतो। कीलाकए कया- इवि पत्तो सायरगयगिरम्मि ।। ७६ ।। वेलजलचलणविघुटफुट्टगुरुसुत्तिमोत्तियप्पयरो। सामे जम्मि दिणम्मिवि विभाइ UPlanNE LEVEL2u2n श्रीअनन्त- नाथचरि- बादुद्धृतं पूजाष्टकम् जलपूजायां जलसार- कथा ॥१४॥ . UEn तारयसमूहोच ॥ ७७ ॥ तम्मि समित्तो कुमरो आरामपरंपरं परिव्भमिरो। आयन्नइ पक्काओ हकाओ मिडंतसुहडाण ॥ ७८ ॥ के नाम इमे जुझंति किंवि (वा?) वेरस्स कारणमिमेसि । पेच्छामो पुच्छामोत्ति जंपिरो सो गतो तत्थ ॥ ७९ ॥ तो तेण ज्झत्ति दिट्ठा दोन्नि भडा दंतदट्ठनियउट्ठा । कयभीमभिउडिभाला रोसारुणलोयणकराला ॥ ४८० ॥ समरारंभ- स्समवसगलंतपस्सेयविंदुजालेण । रेणुप्पसमणकज्जे रणरंगं सिंचयंतब ॥ ८१॥ जुयलं ॥ मा जुज्झह मा जुज्झह ता मह नियवेरकारणं कहह । इय कुमरवारियावि हु जुझंति समच्छरा दोवि ॥ ८२॥ परारंति (पेरंति ?) अवसरंति य घडंति विहडन्ति दिति करणाइं । उम्मुक्कसीहनाया वग्गंतिय खग्गवग्गकरा ॥ ८३ ॥ अन्नोन्नछलप्पहरप्पवंचअन्नायखग्ग- घाएहिं । दोण्हवि पडियाई महीयलम्मि सहसत्ति सीसाई ।। ८४ ॥ ता तेसिं सीसाइं पमुकहुंकारपेकहकाहिं । अन्नोन्नं उच्छलिउं दंतेहिं डसंति अणुवेलं ॥ ८५ ॥ अवरोप्परासिदंडप्पहारजजरियअंगुवंगाई। जुझंति कबंधाइंवि अच्छरिय- कराई कुमरस्स ।। ८६ ॥ कुमरेणु मित्ता सीसकवंधाण रणरसुक्करिसं । पेच्छह अतुच्छअच्छरियकारयं रोसवसयाण ॥८७॥ ते विंति देव सिविणेवि नेव जं तंपि एत्थ सञ्चवियं । इय जंपिराण पडियं धडढुगमवि पहरजजरियं ॥८८॥ सियदंतकोडितोडियअवरोप्परवयणगंडखंडाई। निचेट्ठाई होउं तस्सीसाइपि पडियाई ॥ ८९ ॥ तो ज्झत्ति पिंगकेसर- सडाकडारियसमग्गदिसियकं । तडिपुंजपिंजरीकयजयंव जायं सरहजुयलं ॥ ४९० ॥ उक्खित्तकरप्पमुक्कफारफुत्कारसि- करोसारो। वित्थारिज्जइ जेहिं दिणेवि तारयभरोब नहे ॥ ९१ ॥ अइयोरगजियारवरोदत्तं पेच्छिउँ नरिंदसुओ। विम्हियहियओ जाओ भएण नट्ठा पुण वयस्सा ।। ९२ ।। तो भेरवभयजणयं सरहदुगंपि हु तिरोहियं सहसा । पेच्छइ य पुरो बहुसूरकिरणभरसमहियं तेयं ॥ ९३ ॥ तं पेच्छिय विम्यतो चिंतइ कुमरो किर्मिदयालमिमं । मइमोहधाउ- खोहाणमहव मह किंपि अन्नयरं ॥ ९४ ॥ इय चिंतंतो कुमरो जा थिरकयलोयणो तयं नियइ । ता तेयअंतरहियनर- । ॥१४॥ fee eanieuF भ 21 जलपूजायां जलसार- कथा सरिस पेच्छए किपि ॥ ९५ । नयणाणिमिसत्तप्पगुहालिंगविनायअमरसभावं । रइयकरकमलकोसो तं नमिय पयंपइ कुमारो ॥ ९६ ॥ को पहु तुम फिमेवं भीसणरूमो ठिओ महसु मज्झ । इय तेणुत्तो अमरो कुमर पइ भणइ सुणसुत्ति ॥ ९७ ॥ अत्थि असमत्थसुड्ड समस्थसुद्दडोहपत्तविजयपि । जयसार नाम पुर विजयावहरायलकरियं ॥ ९८॥ तत्यत्थि वित्तसियकरवियरणसजणियजणमणपमोओ। सम्मयसहितो चदोब चंदतेउत्ति अत्यवई॥ ९९ ।। चंदप्पहा- भिहाणा मणोहरा तस्स पिययमा अस्थि । चप्पहमइरा इव सरूवकयजणमणुम्माया ॥ ५०० ॥ बहुधणवईवि दब- जगाय सो कुणइ भूरियवहारे । कयकिचेहिं वि महिओ जलही रयणत्यि अमरेहिं ॥ ५०१ । काउ कयाणयाई कयाई पउणाइ पवहणे चडिओ। चलियो य मलयसिंघलकडाहकेसाइदीवेसु ॥ २॥ गच्छइ पोओ दूरा नीरभर मच्छए तरगे य। फाडतो तासतो भजतो भूरिवेगेण ॥ ३ ॥ अणुकूलवायविहिमणवियभणप्पेरियर जलजाण । थेवेहिवि दिवसेहि वछियदीवेसु सपत्त ॥ ४ ॥ तत्थ मणवछियत्तहियजायबहुलाहपत्तपरिओसो । गहिउ सदेसजोग्गे कयाणए तयणु वाहुडिओ ॥५॥ पवणप्पसराऊरिजमाणसियवडपयडवेएण। योवदिणेहिंवि पत्तो पोओ जलरासिमज्झम्मि ॥६॥ एत्थतरे अकालियघणपडलेहि समग्गनमग्गो। जीवोध अफजब्भवपावेहिं कलुसिओ दूर ॥७॥ नहदप्पणे समुद्दो सकतो अह घणो जलहिसालिले । जणयति विभम दोवि सामला पेच्छिरनराण ॥ ८॥ झपाए समुल्लसिरो सिंधुजले निवडिऊण तडिपुजो। वडवानलोब रेहइ नहमडलजतजालोहो ॥ ९॥ अञ्चतथूलामलजलधारासारसलिलसभार । मुचइ मेहो मोयाविउव जलहिं समजाय ॥ ५१० ।। सामघणाली गयणे सामुफलियावली समुद्दम्मि । गजतीओ पसरति दोवि गुरुगयघडाओध ॥ ११ ॥ नीतो होइ घणो जलभरेण उहसइ तेण य समुद्दो । दोन्निवि मिलिणनिमित्ता परोप्पर सचर- तिध ॥ १२ ॥ एव अकालभवमेहमडलाडवर पलोएउ । सबोवि पवहणजणो जातो कायबमूढमणो ॥ १३ ॥ रोरसमी- כתכוכתכתבתכתבתכתבותכתבהבהבהבתלבובובובהבוכתבתלתכתבת PIRIPIP20 PAPRRRRPPPPPPIPIPIRIP הכתבכתבה जलपूजाया जलसार- कथा श्रीअनन्त- नाथचरि- जादुद्धृत पूजाष्टकम् ॥१५॥ रुकलियातोडि यतणियागणो सियवडोवि । पवहणवइहिययंपिव पडितो सह कूवखंभेण ॥ १४ ॥ गुरुकल्लोलारोहावरोह- आवत्तगत्तभमणाई। अणुभविऊणं अभिडिय गिरितडे विहडिओ पोओ ॥ १५ ॥ अंगीकयगुरुकट्ठा तरिया केवि हु भवं व नीरनिहिं । अवरे उ अगुरुकट्ठा भवेच मग्गा समुद्दम्मि ॥१६॥ पवणवईवि वहुधणविणासदसणविसायविव- संगो । मग्गो अगाहसलिले भववासे को सया सुहिओ ॥ १७ ॥ तयणु जलमाणुसीए मयणायत्ताए निययदइओत्ति । आलिंगितो जहट्ठियवत्थु न नियंति रायंधा ॥ १८ ॥ आयड्डिय सलिलाओ भोगत्थं तीए गिरितडे नीओ । सुहपरिणईए जीवोब कड्डिओ नरयमझातो ॥ १९॥ सा तं दटुं न इमो पिउत्ति भीया गया जले झत्ति । सावायपरट्ठाणे को चिट्ठइ नायपरमत्थो ॥ ५२० ॥ सेलतडसिलासीणो चिंतेई मज्झ चेव पडिकूलो । एस हयविहिविलासो पुवजियदुकयवसयस्स ॥ २१ ॥ जं अञ्चव्भुयधणकणभरियपि पवहणं विहडियं मे । मरणंतबसणं सिंधुमजणाहमवि संपत्तो ।। २२ ॥ जं जस्स जया जायइ सुहमसुहं वा तयं तया तेण । धेजमवलंविऊणं सहियवं जेणिमं भणियं ॥ २३ ॥ जंचिय विहिणा लिहियं तं चिय परिणमइ किं वियप्पेण । इय जाणिऊण धीरा विहुरेवि न कायरा हुंति ॥ २४ ॥ एवं विभावणागय- विसायवसजायमणअवटुंभो। अवलोइउं पवत्तो रमणीए पचयपएसे ॥ २५ ॥ गुरुसिहरगुहाकंदरनियंवनिज्झरसयाई पेच्छन्तो । भक्खंतो य फलाई कइवयदिवसाई तत्थ ठिओ॥२६॥ किच्छेणमवरदिवसे तम्गिरिसिहरंमि दुग्गमे चडिओ। अवलोयइ अइबहलं वणसंड मेहखंडंव ॥ २७ ॥ अनिलतरलाओ जत्तो निवडतो नजए कुसुमनियरो। सुफोदयऽत्थ- भवघणपडलाउ व करयनिउरुबो ॥२८॥ जं मज्झट्ठियकंचणमणिमयजिणभवण किरणकबुरियं । कप्पहुमसंडपिच सोहइ आभरणगणजुत्तं ॥ २९ ॥ तंमज्झे गवणंगणगयसिंगं जिणहरं सुबन्नमयं । मेरुपिय अवलोयइ तलसंठियभद्दसालवणं ॥ ५३० ॥ आभाइ जस्स सिहरे संकतानिलचला सियधयाली । सुरगिरिजिणण्हाणपवत्तदुद्धजलपवहपंतिध ॥ ३१ ॥ ॥ १५॥ ।

CUCUZUCUCULU endenceỮ Leenan जलपूजायां जलसार- कथा तम्मि पविठ्ठो सो नियइ निरुवम रिसहसामिणो विव । उम्मीलियभत्तिवसुल्लसतरोमंचकंचुइतो ॥ ३२ ॥ नमइ य त भालतलग्गमिलियमहिमडलो पहरिसेण । रइयकरजुयलकोसो नियइ य नाह अणिमिसच्छो ॥ ३३ ॥ एत्थतरम्मि एगो चारणसमणो नहेण सपत्तो । कयतिप्पयाहिणो रिसहसामियं थोउमाढत्तो ॥३४॥ तिहुयणगुरुणो सिरिरिसहसामिणो नमियपायसयवत्त । कयकरकोमो आणदअचिओ सथव काह ॥३५॥ कणयच्छविणो असावलविणो कसिणकुतला तुम्भ । मदरगिरिणो पडगतमालतरुणोध रेहति ।। ३६ ॥ जे सामिसाल तुह पयलीणा दीणावि ते नरा दूर । भवताववजियगा विलसिरपउमालया हुति ।। ३७ ॥ मइसुयओहीमणपज्जवाणि तुह केवलम्मि मग्गाणि । तारयनक्खत्तग्गहससिणोध सहस्स- करतेए ।। ३८ ॥ त सामि समवसरणमि सोहसे रइयरम्मचउरूवो । नारयतिरियनरामरचउगइजणवोहणस्थ व ॥ ३९॥ रायाण रकाण य धम्मुवएस तुम सम दिससि । कि जयमुजोयतो मेच्छकुलाइ चयइ सूरो ।। ५४०॥ तुह मिलणे मह जाओ बहुमाणवसेण रम्मरोमचो । घणसमय मि कयंवस्स सबओ कुसुमनियरोव ॥ ४१ ॥ इय नीइचफसिरिनेमिचदमुणि- नाहनमियपयपउम । जह जाया तुह सिद्धी त तह मज्झवि पहु पयच्छ ॥ ४२ ॥ इय थोउ रिसहजिण उवविठ्ठो तयणु चंदतेओ से। पणमिय कयजलिउडो उपविसिओ भणइ मुणिमेव ।। ४३ ।। भयव नरत्तनियजम्मजीवियवाण वसणठाणाण। देवगुरुसणेण मन्ने अजेय सहलत्त ॥ ४४ ॥ ता पहु मह कहसु अवत्थसमुचियं धम्ममह कहइ साहू । पूइज्जइ एस पहू अट्ठपगाराहिं पूयाहि ॥ ४५ ॥ तहाहि । नेवजगधअक्सयदीवयफलसलिलकुसुमधूवेहि । जिणपूया भत्तीए रइया वियरइ सिनसुहाइ ॥ ४६ ॥ दूरे धणफयुभववासप्पमुहाउ सत्तपूयाओ। एकावि मुहा लव्भा जलपूया हरइ ससार ।। ४७ ॥ जओ । जलभरियपत्तमेत्तो ससारमहोयही फुड तस्स । जो ठवइ जिणस्स पुरो सीयलजलपूरिय पत्त ॥ ४८॥ फलिहेण व सच्छेण अमएणय साउणा जिणवरिंद। सीएण सिसिरेण व जलेण अञ्चति कयपुन्ना ॥४९॥ जेण जिणाउ न תפתלהבתכתבתבך הברכהבת3 जलपूजायां जलसार- श्रीअनन्त- नाधचरि- त्रादुद्धृतं यूजाटकम् कथा ॥ १६॥ m अन्नं पूयापत्तं समत्थि तिजएवि । ता पूइऊणमेयं सहलं मणुयत्तणं कुणसु ।। ५५० ॥ तं सोउं सो जंपइ नमिऊण मुणिं निवद्धकरकोसो। भयवमणुग्गहिओ हं समयोचियधम्मकहणेण ॥ १॥ इय जंपिउं गओ गिरिनिझरणनिवायरुंद- कुंडम्मि । कयकमलपत्तपुडए गहिय जलं जिणहरं पत्तो ।। ५२ ॥ दणं भुवणगुरुं सुमरियपुबिल्लनियसिरिष्फुरणो। चिंतइ तझ्या नाहो जिणनाहो मज्झ जइ हुँतो ॥५३।। ता हं नियसिरिवित्थरसमवत्थगणेण (?) नूणमचंतो। इहि एयावत्थो करेमि एयपि जलपूयं ॥ ५४ ॥ इय चिंतिय असमुल्लसियभत्तिपब्भारपुलइयसरीरो। पसरन्तभूरिआणंदअंसुदंतुरियपम्हच्छो ॥ ५५ ॥ मुंचइ पहुणो पुरतो जलपुडयं अत्तणो परिकलंतो । नरजम्मजीवियबाण सहलयं भुवणपणयस्स ।। ५६ ॥ भणइ मुणी धन्नो तं पयडइ पुलओ तुहंतरं भत्तिं । इंति न दुद्धे पीए उग्गारा आरनालस्म ॥ ५७ ॥ सिवलच्छि- पेच्छियाणं उच्छाहो होइ एरिसोवम्मं । नहि सुकयसंगयाणं धम्मम्मि अणायरो होइ ॥ ५८ ॥ तेणुत्तं भयवं मे भवंतरे वि हु भवेज तं चेव । देवगुरुधम्मतत्ताण देसओ विरइयपसाओ ॥ ५९॥ इय जंपिय तेण नओ गओ मुणी नह्यलं अलं- करिउं । सोवि गुरुविरहविहुरो खणमेत्तमचेयणोब ठिओ ॥ ५६० ॥ नमिउं बहुमाणपुरस्सरं जिणं निग्गतो जिणाययणा । नियपुरगमणोवायं चिंतंतो गमइ दिणसेसं ॥ ६१ ॥ एत्थन्तरम्मि नहमग्गसंगिनग्गोहसाहिसिहरम्मि । अल्लीणा आगं- तूण पक्खिणो झत्ति भारंडा ।। ६२ ।। ते माणुसभासाए नियबुतते कहिंति पुत्ताणं । एकेण जंपियमहं जयसारपुराउ संपत्तो ॥ ६३ ॥ तप्पुरसमग्गवणिवग्गअग्गणीचंदतेयनामो जो । संभिन्नपवणो सो मओ अपुत्तोत्ति जणवाओ ॥६॥ निसुओ निवेण तो से गहितो निलूडिऊण घरसारो । जे जोयंति असंतपि ते न किं संतमिह छिदं ।। ६५ ।। गुत्तपि धणं कहियं कयत्थणाकंपिराए कंताए । अप्पंमि व णस्संते कजं किं सयपदविणेहिं ॥ ६६ ॥ पर्व आरामियजणक- हिज्जमाणं मए सुयं वच्छा। इय भारुडपयंपियसवणा सो चिंतइ ससोओ ।। ६७ ।। पेच्छ जहा मह लच्छी पसरंत ATES IrMarcान जलपूजायां जलसार- कथा मुवन्नतारसारावि । सिंग्यपि सयं पत्ता गिम्हसमुन्भूयरयणिव ।। ६८ ॥ अथजणदुबुद्धी दिना दिवेण मज्झ रुटेण । कि देइ करचवेडं कयाइ कुविओ विहिविलासो ॥६९ ॥ किविणाण चकवट्टी जाओह सबहा जओ न मए । दवधओ विरइओ सुपत्ततित्येसु धणिणावि ॥ ५७० ॥ कि सायरतरणधणजण विणा मज्झमासि न वहतं । ज मे गया सिरी |जीवियपि सदेहमणुपत्त ॥ ७१ ॥ पत्तावि पलरचिय अपुन्नवताण निच्छिय लच्छी । किमभग्गगिहल्लीणा होइ थिरा कामदुहघेणू ॥ ७२ ॥ सुकुमालतणू पेम्मेकमदिर विमलसीलकलियगी । कह सहिही मह कन्ता कयत्थण रायभडज- णिय ॥ ७३ ।। नूण न मए रम्मो धम्मो विहिओ भवंमि पुरिल्ले । जमह विडवणाडवर इम इह भवे पत्तो।। ७४ ॥ तत्थ गमणुस्सुतोचि हु गच्छामि कह उवायहीणोह । कहमकमचकमणो पगू वछियपुर जाइ ॥ ७५ ॥ जइ जामि तत्थ लच्छि ता निवघथपि नूण वालेमि । गुरुविसवेगविलुत्तपि चेयण मतवाइव ॥ ७६ ॥ इय तस्स वणविणासासुहि- यस्स निसा ठिया पहरसेसा । पुत्ताण गमणठाणाणि कहिय गच्छति भारुडा ॥ ७७ ॥ जो चलिओ तनयरे पाए सो तस्स दढयर लग्गो। उड्डीणो भारुडो मणनयणजवेण जाइ नहे ॥ ७८ ॥ नवर सो विहिविलसियवसेण विच्छुट्टि- ऊण तप्पाया । पडिओ समुद्दसलिले विमुहविही कुणइ नो कि वा ॥ ७९ ॥ मजतेण तेण जिणगुरुचरणाण सुमरियं सहसा। तस्साणुभावओ मरिउमथुए सो सुरो जाओ ॥ ५८० ॥ कालेण चारणस्समणतग्गुरू तमि चेव कप्पम्मि । जातो सुरो तहा पुवभवभवो ताण नेहोवि ॥ ८१ ॥ नाऊण नियचवण तेणुत्तो गुरुसुरो सुही एव । पत्ते मणुयत्ते में पडिवोहेजसु तुम मित्त ॥ ८२ ।। पडिकन्न तेण तय तो सो चविऊणमेत्थ वेयड्ढे । सयरिंदसुओ जाओ चलिओ य पीलिउ एत्य ॥ ८३ ॥ एत्थतरे मए सुरसुहसगविमोहओ बहुदिणेहि । सरिया पुवभवहुगपडिवोहन्भत्थणा तुज्झ ॥ ८४ ॥ तो भडवडसिररणसरहरूवप(पभईय)विरइय पच्छा । नियसाहावियरूव तुह विन्भमकारणे कुमर ॥ ८५ ॥ ZEILLELZCUCUZEU2u2U2luZUZUCU2 aurunanan

श्रीअनन्त-
नाथचरि-
जादुद्धृतं
पूजाष्टकम्
जलपूजायां
जलसार-
कथा
॥१७॥
ता वच्छ अपत्थंपिव नराण रजपि होइ असुहाय । गिम्हनईनीरंपिव झिजइ अणुदिवसमवि आउं ॥८६॥ नरनय-
णाणिमिसत्तंव जोवणं नो कयाइ ठाइ थिरं । कलुससहावाउ सया बहुलनिसाओव मयच्छीओ ॥ ८७ ॥ किं बहुणा
सबंपि हु विणस्सरं भवसमुद्भवं वत्थु । सारयघणोव सोयामणिव जलबुबुतोहोब ॥ ८८ ॥ ता वीयरायदेवं पडि-
वजसु तं सरायमुज्झित्ता । पाविय वंछियफलयं कप्पतरूं सरइ को निंब ॥ ८९ ॥ निग्गंथंमि गुरुमि गुरुबुद्धिं कुणसु मा
पुण सगंथे । पत्तम्मि सुयणसंगे मग्गइ किं कोइ खलगोहिं ।। ५९० ॥ मुत्तुमतत्ते अंगीकरेसु जीवाइयाई तत्ताई।
को गुंजाओ गिण्हइ चइऊण महग्घरयणनिहिं ॥ ९१ ॥ पडिवोहिउं तुममहं जाओ निरिणो नियम्मि पडिवन्ने । तं
सुणिय जाइसरणेण नियभवे पेच्छिय कुमारो ॥ ९२ ॥ जंपइ पणामपुवं पडिवनं पालियं तए साभि । तं मोत्तुं नन्नो
तिहुयणेवि परमोववयारी मे ॥ ९३ ॥ इण्डिं गिहधम्ममहं काहमसत्तोम्हि सबविरईए । किं मयमुहगयसझं कर्ज
काउं तरइ कलहो ॥ ९४ ॥ इय तेणुत्ते तियसे सहसत्ति तिरोहिए गतो तेओ। अभंतरिए तरणिमि दुरवलोओ
पयावोव ॥ ९५ ॥ संपत्तमित्तजुत्तो पत्तो नयरे गुरुकमे नमिउं । गिण्हइ गिहत्थधम्म कल्लाणे को पमायपरो ॥९६॥
रंकेण व रयणनिही वरविज्जो वाहिणव संपत्तो। सद्धंमो तेणं सो कयकिचं कलइ अप्पाणं ॥ ९७ ॥ उम्मत्तजोवणुदाम-
कामकमणीयकायकंतीओ । नयरनियंविणीओ पुत्तो परिणाविओ पिउणा ॥ ९८ ॥ तं अहिसिंचिय रज्जे पवन गिण्हए
खयरराया । इहलोइयपारलोइयसुहकजे उज्जया गरुया ॥९९॥ जलसारखयरचक्की परचककमणकयमणुकरिसो । पालइ
पसरंतपहो नियरजसिरिं सुरिंदोब ॥ ६०० ॥ लीलाए परिचलिरम्मि जम्मि माणिकमयविमाणेहिं । गयणयलमलंकिजइ
सयावि किंकिणिकलरवेहिं ॥ १॥ वंदइ गुरुणो पूयइ जिणेसरे कुणइ संघवहुमाणं । जिणजत्ताउ पवत्तइ मंदरनंदी-
ज
॥१७॥

22P21PNEMEN धूपपूजायां धूपसुंदर- कथा सराईसु ॥ २ ॥ इय सद्धम्म रज्जस्सिरिं च परिपालिऊण बहुकाल । नामेण रयणसारं कुमर रजे ठवेऊण ॥ ३ ॥ नियजणयचरणमूले दिक्स गहिऊण कयतवचरणो। पावियकेवलनाणो पिउणा सह सिद्धिमणुपत्तो ॥ ४ ॥ विहिया जह जलपूया सिवसुहहेऊ इमस्स सजाया। तह जायइ खन्नस्सवि भत्तीए तीए ता जयह ॥ ५ ॥ जलपूजा 卐भणिओ जलपूयाए जलसारो संपय पयपेमि । शिव धूवसुंदरकह आयन्नह धूवपूयाए ॥ ६ ॥ मजक अस्थि फुरियमहानीलमणिसिलासालफलिहकविसीस । सिरकुसुमियवणपरिवेढियंव नयर महासालं ॥७॥ पडिमदिरमणिभित्तिप्पडिविवियतरणिभासुरत्तेण । ज पेच्छिउपि तीरइ न तस्स कत्तोरिपरिभूई ॥ ८॥ थिरमइपया- पजियगुरुमहिमयरो जलनिहिय गभीरो । चदोध पवित्तकरो राया नयसुंदरोत्थि तहि ॥ ९ ॥ बहुससमडलग्गप्पहार- परजयपवित्तयाकलिओ । जो एफमडलग्गप्पहारपरजयपवित्तोवि ॥ ६१०॥ तस्सतेउरतरुणीपहुत्तपयमस्सिया पिया अस्थि । नामेण कम्मणावि हु विजयवई सीलकुलभवण ॥ ११ ॥ डज्झतागुरुनवधूवसुदरो धूवसुंदरो नाम । तीगस्थि हत्यिमथरगई रईसोवमसरीरो ॥ १२ ॥ समराइओ सुसाहुछ समणधम्मोध जो सुहयमुत्ती । सफमलच्छि- विलासो गयकरवाहो महुमहोत्र ॥ १३ ॥ कुमरो कयाइ आरुहिय खधरं गुरुकरेणुरायस्स । छत्ततिरोहियतरणी तरुणी- करचलिरसियचमरो ॥१४॥ पुरओ पयट्टयघट्टचडियनियमित्तपत्ति(पंति')सजुत्तो । पविसिय सहाए पणमिय पिउणो पुरओ समुवविट्ठो ॥ १५॥ एत्थतरम्मि रणवीरराइणो दारवालविन्नत्तो । दूतो दुयं नरिंदं नमिउ विन्नविउमारद्धो ॥ १६ ॥ पहु पिटुपयावपावयपुलट्ठपरिपथिसत्थसलहेण । गयनयरपहुरणवीरेण पेसिओ तुह सयासे हं ॥ १७ ॥ मह पहुणा तुह आणा पट्ठविया जह पयच्छ पइवरिस । मह करमह न पयच्छसि धरियधणू होसु ता समुहो ॥१८॥ असरिससामत्थेणवि तेण तुमं नीइपुग्धय भणिओ। को महुरोसहसज्झे रोए कडुओसहं देइ ॥१९॥ ता हरिही रजपि हु הכתבהפתלתלדתלהבתבח दादाaneleven धूपपूजायां धूपसुंदर- श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्धृतं पूजाष्टकम् कथा ॥१८॥ जइ न धरसि तस्स सासणं सीसे । हरिणाहिवम्मि हरिणावमाणणा नणु अणत्थाय ॥ ६२० ॥ कहियं हियं तुह मए तं कुणसु नरिंद जं मणोभिमयं । सप्पुरिसपयडियंपिहु गिण्हंति हियं न देवहया ॥ २१॥ छन्नोवि रायरोसो दूउत्तस्स- वणओ ठिओ पयडो । किं उट्ठहिओ अग्गी जालिज्जतो न पजलई ॥ २२ ॥ भिउडिघडणा निवइणो समपि विसमत्त- मुवगयं भालं । धिजाइयेस्स वत्थंवमंदपवमाणतरलणओ ॥ २३ ॥ भणियं निवेण रे दूय तुह पहू मह कर गहितु- कामो। अहयं तु नियकरेणं रणे गहिस्सं सिरं तस्स ॥ २४ ॥ तं पेसिय तुह पिहुणा विरोहिओ हं धुवं सनासाय । निदायत्तमइंदप्पडिवोहो किं सुहं देइ ॥ २५ ॥ आणसु तं नियनाहं नाहं जं से सहिस्समवराहं । साहूणं सिंगारो अविणयसहणे न निवईणं ॥ २६ ॥ दूएणुत्तं निव नियघरहिओ जह वहेसि भडवायं । तह जइ समरुच्छंगेवि ता तुमं चेव वीरवई ॥ २७ ॥ रायाह जाहि आणेहि नियनिवं दूय देससीमाए । जह रणनिहसो दंसइ पोरुसकणयुत्भवं वन्नं ॥ २८ ॥ इयं जंपिय सम्माणिय विसजितो राइणा गतो दूतो । अचंत्तं कुवियावि हु उझंति नरेसरा न नयं ॥ २९ ॥ ताडाविया निवइणा रणभेरी भीरुभूरिभयजणणी । तो नयनिवेण कुमरेण पत्थिया समरगमणाणा ॥ ६३०॥ नाऊण निबंधममञ्चमंडलीजंपिएण दिन्ना से । रणगमणाणा तो सो चलिओ चउरंगवलकलिओ ॥ ३१ ।। गुरुगयघडासु तुरयावलीसु रणझणिरकिंकिणिरहेसु । रायाणो सामंता मंडलिया चडिय संचलिया ॥ ३२ ॥ परिकलयंता बहुआउहाई आओहणाय जोहोहा । कुमरं परिचारता जति पहे समरनिवडिया ॥ ३३ ॥ विरइयवहुप्पयाणयसयलंघियनिययदे- ससीमाए। पत्तो कुमरो रिउनरवईवि सवलो सदेसंते ॥ ३४ ॥ उवभुत्तसपहुगल्यप्पसायनिकयकयुज्जमा सुहडा । अभिडिया असमुच्छलियमच्छरुच्छाहसंजुत्ता ॥ ३५ ॥ हरिकरिरहचडिएहिं हयगयसंदणठिया पडिक्खलिया । पय- ज मा ॥१८॥ . FY TS माया धूपपूजाया धूपसुंदर कथा चारिणो वि रद्धा समच्छर पायचारीहिं ॥ ३६॥ बावल्लसेल्लभल्लयमल्लीनारायसरपहारेहिं । मिजंता गुरुगयघडभड- तुरया जन्ति जमगेह ॥ ३७ ॥ अन्नोन दतेहिं तोडति सिराइ मुक्कइकाइ। निप्पसरअसिप्पहरे वियरति य वग्गिर- घढाइ ॥ ३८॥ नवरगमेहडवरसियछत्तेहिं मही जहिं सहइ । रत्तुप्पलइदीवरपुंडरियकयोवहारव ॥ ३९ ॥ खग्गाय- गयफुभगानिग्गयाउ पढन्तमुत्ताओ। रेहन्ति खग्गपाणीयगलिरगुरुपिंदुणोच जहिं ॥६४०॥ असिघायुच्छलियठिय गयस्स जरसन्तिगे मुई फरिणो । सो सहइ तेण दुकरोध सचउकुभोध दुमुहोष ।। ४१ ॥ एयारिसे रउद्दे रणम्मि रणवीरराय- कुमरेहिं । पारद्ध पहरेउं परोप्पर करखिचडिएहिं ॥ ४२ ॥ लल्लकमुफहकाछलप्पहारेहिं दोवि पहरति । भिंदति य अन्नोन दंतप्पहरेहिं फरिणोवि ॥ ४३ ॥ रिउकरिणा कुमरकरी निवाडितो दसणपहरजजरिओ। पडिओ कुमरो गहिओ य वेरिफरिणा करग्गेण ॥४४॥ उच्छालिओ य गयणे निवडन्ते निवसुए रिउनिवेण । धरिओ खग्गो, उद्ध (हे) जह भिजइ निवडिरो कुमरो ॥ ४५ ॥ निवडतेणं तेण रिउखग्ग वंचिउ तओ झत्ति । पयघाएणं पट्ठीए पणिउं पाडि- ओ पेरी ॥ ४६॥ पडिओ सो करिपुरओ कोवमयघेण तयणु तेणावि । दिन्नो पाओ सीसे दलियकवालो मओ राया ॥ ४७ ॥ दह वेरिविणास असुरामरखेयरेहिं परिमुका । कुमरसिरम्मि निवडिया अलिउलमुहला कुसुमवुट्ठी ।। ४८॥ अहियमि हए गहिया कुमरेणमनायगा सिरी सयला । "को वा कुणइ पमाय लाहे अञ्चन्भुयत्थरस" ॥४९॥ मोतु निय- पहुपुत्त रिउसामता कुमारमणुसरिया । "लज्जति जियंताणवि सवे विरलचिय मयाणं" ॥६५०॥ तो झत्ति समरवीरो रिजपुत्तो कुमरमस्सिओ सरण । “समयाणुवत्तण सइ नीई कि पुण इय अवाए" ॥५१।। कुमरेणावि विइन्नो तप्पिट्टीए निओ अभयहत्यो। "इयरम्मि वि निरणुसया कि पुण सरणागए गरुया" ॥ ५२॥ काराविय नियआणं दिन्न तस्सेव तवणयरज । "असमाणधिय निच कोवपसाया महताण" ।। ५३ ॥ तेणवि सिंगारसिरिभइणि परिणाविओ नरिंद- כתבתבחבתכתב תבר १ त०४

धूपपूजायां
धूपसुदर-
श्रीअनन्त-
नाथचरि-
जादुद्धृत
पूजाष्टकम्
॥१९॥
सुओ। "पचुवयरियवे नो कालविलंब कुणइ गरुओ" ॥ ५४ ॥ चलिओ सदेससमुहो रायंगरुहो जयज्जियजसोहो ।
"सिद्धे कज्जे को वा वसइ सयन्नो विएसम्मि" ॥५५॥ कुमरेण समं नवनरवईवि चलिओ सकीयबलकलिओ। "नियप-
हुपयसेवचिय मूलं लच्छीए न पमाओ" ॥५६॥ आगच्छंतो कुमरो पत्तो वियडाडईए एकाए । हिंतालतालतालीतमाल-
वडसालकलियाए ॥ ५७ ॥ जा उत्तमसोहंजणविसालअक्खा मणोहरपवाला। पाडलअहरा पचयपओहरा सहइ रमणिव
॥ ५८ ॥ विलसंतसरलचित्ता गुरुहयमाराय साहुसेणिव । भवावलिब संजायपत्तबोही असोया जा ॥ ५९ ॥ मझमि
तीए वणसंडवेढियं गयणलग्गगुरुसिहरं । सप्पायारंपि' भयावहारयं नियइ जिणभवणं ॥ ६०॥ रेहन्तरूवदारं नरिंद-
मिव पत्तमूलरेहं जं । संपूरियसुयणासं लसिरामलसारसहियं च ॥ ६१ ॥ सवत्तो अनिलचला कंकेल्लितमालसाहिणो
जस्स । जिणरायभयुब्भन्ता रागदोसब कंपंति ॥ ६२ ॥ दद्दूण देवमंदिरमावासइ तत्थ निवसुओ सबलो। तम्मि
पविट्ठोच्चिय झत्ति मुच्छिओ पेच्छिऊण जिणं ।। ६३॥ सिसिरकिरियाविरयणा संपावियचेयणो ठिओ सत्थो । आपुच्छिओ
य मुच्छाए कारणं मंतिवग्गेण ॥ ६४ ॥ जंपइ कुमरो मह देवदंसणा जाइसरणमुप्पन्नं । सञ्चवियं तेण भवदुगमाय-
नह तयं तुम्भे ॥ ६५ ॥ पत्तरहराइयंमि सरेव आरामरम्मगामंमि । साहससारो नामेण आसि एगो तुरयचोरो
॥६६॥ गंतूण दूरदेसे अत्थत्थी हरइ गुरुरयतुरंगे । विकिणइ य दूरतरे "का वा लुद्धाण मज्जाया" ॥ ६७ । नियभो-
गंमि निमुंजइ दविणं वियरइ य दीणवंदीणं । “मोत्तूण चागभोगे नन्नं लच्छिफलं अहवा" ॥ ६८॥ कइयावि कडीतड-
बद्धखग्गघेणू तुरंगहरणत्थं । पत्तो सुवासनामे गामे दिणपच्छिमे जामे ॥ ६९ ।। मणपवणजवे विलसन्तलक्खणे
तेयतरलयाकलिए । पेच्छइ अतुच्छदुवादलाई चरमाणए तुरए ॥ ६७० ॥ तो सो चिन्तइ एयाण मज्झओ जइ हरामि
एकंपि । दालिदस्साजमं ता देमि जलंजलिं नूणं ।।७१॥ इय चिंतियप्पओसे लग्गो मग्गंमि सो तुरंगाण | "जो जकज्जे
॥१९॥

धूपपूजायाँ धूपसुंदर कथा पत्तो स पमायं कुणइ किं तम्मि" ॥७२॥ गामाहिवस्स गेहे गया हया सूरतेयनामस्स । दारेशिय सो रहिओ "परघर- माविसइ को सहसा ॥७॥ पविसन्तगोउलुच्छलियरयभरादिस्सदेहजट्ठी सो।तम्मि पविट्ठो "अप्पन चोरजारा पया- सन्ति" ||७४|| म पेच्छिही महीए कोवित्ति विचिन्तिउं वडे चडिओ। "जह होइ अप्परक्खा दक्खा तह सपयदृति" ॥ ७५ ॥ वडसठिएण दिट्ठी पक्खित्ता तेण गेहमज्झम्मि । दिट्ठा य दीवउज्जोयपयडिया अंगणा एगा ॥ ७६ ॥ हरि- शिंदखाममज्झा हरिणकमुहीय हरिणसमनयणी । विहुमअहरा पीवरपओहरा कणयवनधरा ॥७७॥ तं पेच्छिऊणमस्साव- हारओ चिंतए कयत्थो सो । नियरूवसिरी अहरीकयस्सिरी जस्सिमा भज्जा ॥ ७८ ॥ एत्थतरम्मि दुद्धासु सयलसुरहीसु सेरहीसु च । बढेसु तुरगेसु जणप्पयारे ठिए विरले ॥ ७९ ॥ परिपालन्ते अस्सावहारिपुरिसम्मि हयहरणसमयं । मंद मद गेहाओ निग्गया सा मयकमुही ॥६८०॥ तं दद् सचरिओसो झत्ति वरडओवरिमसाहं । आगच्छंति तो नियइ वडतले दारमग्गेण ॥८१॥ सपत्ता वडतलवियडअयडतडनियडविडभडसयासे । तीए अवलोइओसो नववयदिढदेहसठाणो॥८२॥ मयणाहिमासलामोयमणहरो रइयरम्मसिंगारो। परिपीडियतूणीरो करकलियपयंडकोदंडो॥ ८३ ॥ दट्टण तय उप- ठियाए तफठठवियवाहाए । आलिंगिऊण भणियं किं सुहय तुहेत्तिया वेला ।। ८४ ॥ सो जंपइ सुयणु जणप्पयारपसम ठिओम्हि पालन्तो । “अहवेरिसकजरओ पयडइ कि कोवि अचाणं" ।।८५॥ तुह मोहमोहियमई मयच्छि अहमागतो गुरुरएण | "लीलावईविलासावहियमणाण कुओ थिरया" ॥८६॥ गयगमणि तुह कब्जे मुत्तुं क सिरिं च इह पत्तो "अहवा त सबस्स जमि मणो निवुइ वहई" ॥ ८७ ॥ सा आह कहं तुमए नाओ अपयासिओ वि सकेओ। तेणुत्तं विवाहरि आयनसु तुज्झ साहेमि ॥ ८८ ॥ गुरुरयतुरयं आरुहिय आगतोहमिह अप्पकनेण । सञ्चविओ तुमएवि हु वियसियकुवलयदलच्छीए ॥८९॥ यकीलणच्छलेण मयच्छि त पेच्छिया मए सुइर। "तुह रुवस्स न तित्ती पत्ता जरि nevan UCUCn श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्धृत पूजाष्टकम् धूपपूजार्या धूपसुंदर- कथा। ॥२०॥ एणव जलस्स" ॥६९०॥ असमस्सिणेहसवस्सरसवसुप्फुल्लनयणकमलेहिं । अवलोइओ तए वि हु अहमणिमिसविन्भम- धराए ॥ ९१ ।। नाओ तुहाणुराओ मए तए वि हु ममाणुराओवि । "नयणेहिंचिय नन्नइ अहवा हिययहिओ भावो" ॥ ९२ ॥ एत्थंतरम्मि तुमए धम्मिल्ला छोडिऊण कुसुमाई। खित्ताई इह पएसे अमिलाणाई पि तवेलं ॥ ९३ ॥ मं पेच्छिरीए उवेल्लिऊण केसेहि विरइया वेणी । आमीलिय नयणाई मं पेच्छिय तं गया सगिह ॥ ९४ ॥ नाओ मएवि भावो जह मह दिन्नो इमाए संकेओ। कहमन्नह अमिलाणाई एत्थ कुसुमाई खित्ताई ॥ ९५ ॥ केसेहिं निसितमंमि तह नयणनिमीलणेण सुत्तजणे । अहमाहूओत्ति वियड्डयाए नायं मए जेण ॥ ९६ ॥ “वंकभणियाई कत्तो कत्तो अद्धच्छि- पेच्छियाई च । ऊससियपि मुणिज्जइ छइल्लजणसंकुले गामे" ॥९७॥ ता रंभोरु तुहत्थे एत्थ अहं आगओ तुह विओगा। पन्जलियजलणजालाजलिरंगो इव दिणं गमिउं ।। ९८॥ सा जंपइ चउजामोवि सामि मह वासरो सहसजामो । तुह विरहविहुरयुम्मायजायतावाय संजाओ ॥९९॥ अमयमओ पिय तं जं तुह मिलणे मे गओ विरहतावो। "किंसिसिर- किरणजोण्हाजोगो धम्मं न पसमेइ" || ७०० ॥ इय रम्मपेम्मसबस्समुबहंतेहिं तेहिं तत्थेव । रइया रयकीला उल्लसंत- मयमयणमत्तेहिं ॥ १ ॥ तविरइयरयविनाणविरयणा हरियहिययवावारा । सा आह कुणसु तह नाह जह सया होइ णे जोगो ॥२॥ फुटइ हिययं दज्झइ सरीरयं जाइ जीवियपि । मह तुह विरहे ताहमवि सहं तए आगमिस्सामि ॥३॥ तन्नेहमोहिओ सो जंपइ ता चलसु तयणु तीउत्तं । गहिचं निययाभरणं इहिपि समागमिस्सामि ॥ ४ ॥ ता अप्पसु नियच्छुरियं जह पेडं दारिउं तमाणेमि । जायइ खडक्खडा तालयस्स उग्घाडणे जेण ॥५॥ तेणावि खग्गघेणू समप्पिया गहिय तं गया सावि । नवरं महईवेलाए आगया तस्स पासंमि ॥ ६॥ कूवयकंठनिविट्ठस्स ज्झत्ति तीए समप्पिया छुरिया । "सिद्धे कन्जे को वा परवत्थु धरइ सकरम्मि" ॥७॥ सह अप्पणा इमपि हु पहु दिनं तुह समग्गमाभरणं । इय . ॥ २०॥ EURU UPURI Len CUCUCUCL धूपपूजायां धूपसुंदर- कथा जपिरी तमप्पइ "किमदेयं वा सिणेहस्स" ॥८॥सगोविय' समग्ग तेणवि त वधिऊण परिहाणे। "इयरपि सुग्गहीयं कुणति दक्खा किमु न दध" ॥ ९॥ भणिय प तीए पिययम तुह कज्जे मारिऊण दइयंपि । इह पत्तत्ति पयासइ पयईतुच्छत्त- मित्पीण ॥ ७१० ॥ त सोउं सो सुद्दडो जपइ एय तए कयमजुत्तं । जं सो हओ "न गरुया पावपवत्तावि निकरुणा"] ॥ ११ ॥ पररमणीपरिभोगो एक वीय तु तीए अवहरण । तइयं धणावहारो तुरियमविणासिनरहणण ॥ १२ ॥ जइह नागच्छंतो ता हुत एकमवि न पाव मे । आगंतु पत्तारिवि पावाइ मए कयाई पिए ॥ १३ ॥ एफेकंपि समत्थं दाणे नेरइयदारुणदुहस्स । चउपायभरफतो कहिं हयासो गमिस्समदं ॥ १४ ॥ नंदतु नरा तेञ्चिय चिर न चिंतावि जाण सजाया । पररमणिविसयविसया सीलालकारकलियाण ॥ १५ ॥ हा हा हयविहिविहिओहमिह महापावमदिर तुमए । कहमन्नह म पत्ता एवंविहपावरिंछोली ॥ १६ ॥ गन्भाउ किं न गलिओ बालो मिलिओ न कि विडालीए । जमहम- फज्जपरपरपत्त जाओ अणजमई ॥ १७ ॥ एव वेरग्गवसा वागरमाणं निसामिय तय सा। चिंतइ नूण विरत्तो एसो परिससमुल्लावा ॥ १८ ॥ ता मह सवत्तिपुत्ताण गोससमयमि साहिही नूर्ण । ते म कयस्थिऊण दुम्मरणेण हणिस्सति ॥१९॥ ता किं इमिणा मह रक्खिएण नियवेरिणत्ति चिंतेइ । “खणरायविरायन्तं पायं पयई महिलियाण" ॥ ७२०॥ पहु मह खमसुत्ति पयपिऊण खामणमिसेण तप्पाए । उप्पाडिऊण अयडे झडत्ति सुहहं खिवइ पावा ॥ २१ ॥ तिवाणु- राय(इ)णीविय सज्झष विराइणी दुयं जाया। "खणरायविरायत्ते महिलाणवा किमच्छरिय" ॥२२॥ दण भडं अयडे पक्खित्त हयहरो विचिंतेइ । "धिद्धी धिरत्यु इत्थीण णत्थसत्येकालाण" ॥२३॥ उम्मीलिओ वि दूर इमंमि सुहडे इमाए अणुरातो। सहसचिय पणट्ठो पवणाहयसरयजलओध ॥ २४ ॥ जस्सग अप्पिजिइ दिजइ दुद्देयसवर्वपि । सो वि हु एवं हम्मइ "अहो मइलाण मूढत्त" ॥ २५ ॥ पचविहं विसयसुह उवभुत्तं जेण सह सिणेहेण । तघेलं चिय सोवि हु NEPLPneu वाटायटाटा endnet vasnाnenue VUCLEUCLEUCUELEUCLEU Everbaueu 222 e शा श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्धृत पूजाष्टकम् धूपपूजायां धूपसुंदर- कथा ॥ २१॥ खित्तो पावाए कूमि ॥२६॥ दखूण कूडकवडाई नूण महिलाण पुवरायाणो। मुत्तुं तणंव ताओ झत्ति तवचरणमकरिंसु ॥२७॥ पवगिव चलसहावा महिला लूयत्व जणियसंतावा । उप्पाइयवसणसया कुविंदसालव पडिहाइ ॥२८॥ सुंदरवन्ना आमोयमणहरा सुहरसाय भुजंती। महिला किंपागफलावलिब उप्पायइ अणत्थं ॥ २९ ॥ सूरोवि कयत्थिज्जइ खंडिजइ सबयावि रायावि । राहुसिरीए इव महिलयाए कलुसस्सहावाए ॥ ७३०॥ अंतोहुँतुम्मीलियपकामरसपूरिया परिव्भमरी । गयणं व कुलं मइलइ महिला नवमेहमालब ॥ ३१ ॥ दुदन्ता कुडिलगई परमपियविवज्जिया सुइविहूणा । कस्स न भय- मुप्पायइ नियंविणी सप्पिणीव सया ॥ ३२ ॥ कजम्मि जाण कीरइ धणज्जणं चोरियाइ काऊण । ताणेरिसं सरूवं ता "पज्जत्तं ममित्थीहि" ॥ ३३ ॥ असरिसवेरग्गविभावणावसुल्लसियगुरुतरविवेए । अस्सावहारपुरिसे एवं परिभावयंतम्मि ॥३४॥ पविसिय गिहमि गहिऊण हलकुसिं पइगिहे खणइ खत्तं । "किमकजं वा वज्जियमज्जायाणं महिलियाण" ॥३५॥ गंतुं मज्झे धाहावए जह धाह धाह धाहत्ति । पविसिय चोरेणं ठकुरो हओ नीयमाभरणं ।। ३६ ॥ तं सोऊणं सहसा ससंभमा साउहा सपाइक्का । ठकुरपुत्ता परिवेढयन्ति गिहमुग्गहक्करवा ॥ ३७॥ तुरयकुडिप्पमुहाई ठाणाई नियंति केवि दीवकरा । अन्ने उ अंनिसंति य चोरपयं पयइनिउणनरा ॥३८॥ दद्दूण गिहावेडं हयावहारी विचिंतए एवं । मह संक- डमावडियं छुट्टिस्सं ता कहं इण्हि ॥ ३९ ॥ न तरेमि विणिग्गंतुं भडपडलावेढियाओ भवणाओ। दुकम्मभरावरिओ नरयट्ठाणाउ जीवोव ॥७४०॥ जइ देमि गिहा वाहिं निग्गयसाहाए झत्ति झंपमहं । ता वियडे अयडम्मि पडामि सुहडो- ब निन्भन्तं ॥ ४१ ।। नूणं मह हयहरणप्पवेसभवपावपडलविडविस्स । इह मरणेणं कुसुमं फलं तु होही नरयपडणं ॥ ४२ ॥ मं दडुमिमे गोसे चोरोत्ति विचिन्तिउं हणिस्सन्ति । ता तमतिरोहिओ वडठिओवि अप्पं पयासेमि ॥ ४३ ॥ इय चिन्तिय तेणुत्ता ते तुम्हाणं कहेमि सबंपि । वुत्तंतं मं पच्छा मुंचेजहवा हणेजाह ॥ ४४ ॥ तं सोउं तेहुत्तं इहहि- म ॥ २१॥ בתנור בכתבתכתבתו 272022 धूपपूजायां धूपसुंदर- कथा ओपि हु कहेसु तो तेण । कहिओ आमूलाओ नियओ तीए य वुत्ततो ॥ ४५ ॥ भणिय च जइ न पत्तियह मज्झ ता नियह कूवयस्सतो । सुहड धणुतूणीराभरणजुय सपय चेव ॥ ४६ ॥ त सोउ पक्खित्तो तेहिं वरत्ताए दीवओ कूवे । सगविओ य तरतो जहकहियगुणो मओ सुहडो ॥४७॥ कुवाओ तमायड्डिय गहिऊणाभरणमुज्झिय मडय । “निजीवेण वि कज जेण वय घिप्पए नन्न" ॥ ४८ ॥ एयविरह न सत्ता सहिउति विचिंतिउव पुत्तेहिं । लहुमायावि हु बद्धा सद्धि मडपण कुविएहिं ॥ ४९ ॥ तपि विणिग्गहणिज्जो चोरोत्ति पयपिओ ह्यहरो वि । “पावन्ति चोरजारा जइ वा किं कत्थई पूय ॥ ७५० ॥ नवर तुमए सघपि साहिय तेण त विमुकोसि । "उवयारओ सदोसोवि मुथए जेणिमा नीई" ॥५१॥ मडय चडाविय सूलियाए निद्धाडिया य लहुजणणी। "रोसो न मयरिउम्मिवि गच्छइ कि पुण जियतमि" ॥५२॥ धरिऊण सबहुमाणं दिणत्तिग अस्सहरयपुरिसपि । पिउमयकिञ्च काउं सम्माणेउ विसज्जन्ति ।। ५३ ॥ अप्प सपइ जायव जममुहा निग्गयव मन्नतो। वचतो नियगामे पत्तो सो इह अरनंमि ॥ ५४॥ पेच्छइ उस्सग्गठिय मुणिमेग मुत्तिमतमिव धम्म । पञ्चसं पसमपिव सकेयपिव मुणिगुणाण ॥ ५५ ॥ पुबुप्पन्नविराओ अवलोइय सो मुर्णि ठिओ हेट्ठो(हिहो?)। दारिदभरफंतो नरोव सपत्तरयणनिही॥५६॥ तो त पणमइ तच्चलणकमलमिलमाणभालफलओ सो।सहलत्तं कलयतो सजम्मजीवियनरत्ताण ॥ ५७ ॥ आवद्धपाणिपउमो पुरओ उवविसिय जपए एव । रन्ने अमाणुसे पहु कि तवह तवति मह कहह ।। ५८ ॥ पारियकाउस्सग्गो उवविसिउ तस्स साहए साहु । खेयरमुणी महायस अहमिह आयाविउं पत्तो ॥ ५९॥ जेणमिह तिरियविरइयकयत्थणा हणइ मज्झ दुफम्म । वेजोवइहपरमोसह व रोयं समग्गंपि ॥७६०॥ तेणुत्त पहु मह कहह कपि धम्म गिहत्थजणजोगं । "तीरइ निबाहेउ जो सो उक्खिप्पए भारो" ॥६१॥ आह मुणी गिहिणोवि हु जायइ धम्मो जिणिंदपूयाए । सा होइ अट्ठभेया अट्ठमयट्ठाणनिम्महणी ॥ ६२ ॥ नेवजधूवदीवयअक्खय- תלתלתלתכתבתכתכתבתכרבובתכתבה ELEEUELLUCLEUCLLLCLLUEVE Rue धूपपूजायाँ धूपसुंदर- श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्भुतं पूजाष्टकम् कथा ॥ २२॥ म फलसलिलवासकुसुमेहिं । पूर्यति जे जिणं ते पुज्जा तिजयस्स वि हवन्ति ॥ ६३ ॥ कीरंति एक्कावि हरइ गुरुरोगसो- गदोगचे । किं पुण सबाओ वि हु विरइज्जतीउ भत्तीए । ६४ ॥ सवाओवि असत्तो काउं जइ कुणइ धूवपूर्यपि । ता धूवेण समं सो धुवं नियं दहइ दुकम्मं ॥ ६५ ॥ डझंतधूवभवधूमधूविओ इव सुबंधसवंगो । जायइ भवंतरेवि हु जीवो उक्खिवियजिणधूवो ॥६६॥ तं सोउं सो जंपइ पहु नूणमहं कयत्थजणपढमो। मरणंतवसणविणिग्गएण तं जेण संपत्तो ॥ ६७ ॥ इय भणिय पणमिय मुणी लग्गो सो निययगाममग्गमि । गच्छंतो संपत्तो गामे सिरिसारनामंमि ॥ ६८ ॥ तंमि तवणीयकलसं नहग्गलग्गं जिणालय नियइ । सिंगग्गसंगिनवतरणिमंडलं उदयसेलंव ॥ ६९ ॥ तं दर्दु सो चिंतइ दिणदुगसंबलयदविणकीएण । धूवेण जिणं पूइय पुन्नप्पसरं समजेमि ॥ ७७० ॥ इय परिभाविय गहिउं कप्पूरागरुवि- मिस्सियं धूवं । पत्तो जिणालए पेच्छिउं जिणं हरिसिओ दूरं ॥ ७१ ॥ उल्लसिरमणो संदंतलोयणो वित्थरन्तरोमंचो। पसरतभत्तिभावो धूवं उक्खिवइ जगगुरुणो ॥ ७२ ॥ तयणु मणुयत्तनियजम्मजीवियत्वाण सहलयं कलिउं । वारं वारं भूमिलियभालमभिनमइ जिणनाहं ॥ ७३ ॥ संचलिओ नियगामे पत्तो य तहिं पमुकअन्नाओ। तम्मि वि भवम्मि रिद्धी जाया से धम्ममाहप्पा ॥ ७४ ॥ संपत्तआउअंतो जातो अमरो सणंकुमारे से । नायं च धूवपूयाए अत्तणो तेणममरत्तं ॥ ७५ ॥ परिभावइ य जहाहं करेमि जिणमंदिरं जमिक्खेउं । जायइ भवंतरे मे बोहित्ति विचिंतिउं तेण ॥ ७६ ॥ रइयं जुगाइजिणजुयमुत्तुंगं जिणहरं कणयकलसं । दुइदमयाभिहसुरो आइट्ठो तस्स रक्खत्थं ॥ ७७ ॥ जिणचवण- जम्मदिक्खाकेवलनिवाणगमणदिवसेसु । समगममरेसरेणं भत्तीए महूसवे कुणइ ॥ ७८ ॥ इय समुवज्जियसुकओ भुत्तुं सुरलोयसंभवसुहाई। चविय तओ इह जाओ एसो हं तुम्ह पच्चक्खो ॥ ७९ ॥ ता एयं जिणमंदिरमवलोइय सुमरिया मए जाई । जह जिणधूवुक्खेवो जाओ कल्लाणहेऊ मे ॥ ७८०॥ तं सोऊणं मंडलियमंतिणो बिति जयइ जिण- ॥२२॥ 2ueren म חבר בתבבבב TEZI धूपपूजार्या धूपसुंदर- कथा धम्मो । अप्पस्स वि जस्स कयरस हुति महईओ रिद्धीओ ॥८१॥ तयणु कुमारेण रिसहस्स सामिणो भत्तिपुलय- कलिएण । पणमिय विहिओ अट्ठाहियामहो गरुयरिद्धीए ॥८२॥ तो चउरगचमूचयसचाराकरियक्खमावीढो । अब्भलिह- धवलहरे सपत्तो नियपुरे फुमरो॥ ८३ ॥ ऊसियसियद्धयोहे निम्मियमंचाइमंचकयसोहे । पविसइ पुरम्मि कुमरो विल- सिरसिंगारजियअमरो ॥ ८४ ॥ गतु सहाए पणओ पिउणो पयसयदलं तओ तेण । आलिंगिऊण कुसलप्पउत्तिमापु- पिछओ पुत्तो ।। ८५ ॥ सो आह ताय मह तुह् पसायसुहियस्स सधया कुसल । इय जपिय उवणीया पिउपुरओ तेण सत्तुसिरी ॥ ८६ ॥ पणओ सत्तुसुओवि हु तस्स को राइणावि सम्माणो । 'पणयम्मि वच्छलचिय पहुणो सत्तुम्मिवि निएध" ॥८७॥ पणयाए वहुयाए भव पुत्तवइत्ति जंपियं रत्ना । "भणइ परे वि हिय चिय गरओ कि माणुसे न निए" ॥ ८८ ॥ कइवयदिणावसाणे रज्जम्मि निवेसिओ सुओ रना । पुत्त मुत्तुं नन्नस्स होइ सवस्ससामित्त ॥ ८९ ॥ सुवि- हियसूरिसयासे गहिया दिक्खा निवेण रिद्धीए। "इहलोइयं जहा तह परभवकजपि कुणइ गुरू" ॥७९०॥ चरिय तवं 'उप्पाडिय केवलनाण निवो सिवं पत्तो । “किमसज्झ वा दुफरतवस्स भावेण विहियस्स" ॥९१॥ नवनिवईवि नयपरो पयाउ पालइ अभिद्दवइ दुठे। वदुइ गुरुणो पूयइ जिणेसरे मन्नए मित्ते ॥ ९२ ॥ साहम्मियवच्छल्ल कुणइ पयट्टावए अमारीओ। किं बहुणा तित्यसमुन्नईकर कुणइ सबपि ॥ ९३ ॥ तप्पुन्नपगरिसागरिसियच आगतुमवणिवइणो तं । सेवति सधदेसुन्भवावि गुरुभचिराएण ।। ९४ ॥ तेणावलोइओ जो मन्नइ सो अप्पगममयसि व । आभासिओ पुणो तिहुयणेफरजाहिसित्तव ॥ ९५ ॥ एव बहुकालं पालिऊणमकलंकरजमवणिवई । कुमर पयावसारामिहं ठवेऊण रजमि ॥ ९६ ॥ निग्गंधगुरुसमीचे दिक्ख घेत्तु कयुग्गतवचरणो । उप्पन्न विमलनाणो सपत्तो मोक्खमक्खेवा ॥ ९७ ॥ जह nanायादाne नाASES श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्धृतं पूजाष्टकम् दीपक- पूजाया भुवन- प्रदीपकथा ॥२३॥ धूवुभवपूया जाया एयस्स मोक्खसोक्खकए । तह अन्नस्सवि जायइ ता भवा तीएं उज्जमह ॥९८॥ धूपपूजा 5555 एसो हु धूवपूयाए साहिओ धूवसुंदरो इहिं । भुवणप्पईवनिवइं दीवयपूयाए निसुणेह ॥ ९९ ॥ उल्लसियरायसिरिकरणसुंदरं ललियविलयपरिकलियं । अस्थि सरग्गामजुयं गीयंपिव भुवणविजयपुरं ॥ ८००॥ कलहसियरायभवणं कलहसियविरायमाणसुयणं जं। कलहरियरहियसलिलं कलहरियउत्तप्पहीणजणं ॥ १ ॥ पूरिय पउरपयासो सबुत्तमनिद्धपत्तआहारो। दीवोव महीनाहो कुलप्पईवोत्ति तत्थत्थि ॥ २ ॥ सरहोवि विउलवच्छो विदीहवाहोवि विलसिरगओवि । सारंगोवि न तिरिओ उत्तमपुरिसोचिय सया जो ॥३॥ गोरीवि अभीमपिया सायरतणयावि अजडसयणसिया । तस्सत्थि धारिणिपिया सईवि जाणिंदपियभोया ॥४॥ तीए समत्थि परिपंथि- हत्थिकुलदलणकेसरिकिसोरो । भुवणप्पईवनामो कुमरो गिरिसोब गुरुकित्ती ॥५॥ अप्पबउदयजुत्तो अन्भ- सिअकलोय बीयचंदोब । जो नवरति(वि)व पुवाभासी जयजणसुहंकरो य ॥ ६॥ समवयवेसालंकारसारसामंतमंति- पुत्तेहि । सद्धिं बंधुरकीलं कुवंतो गमइ कालं सो ॥ ७ ॥ कइयावि कसिणअट्ठमिनिसीहसमयंमि जग्गए जाव । तो आयन्नइ आउज्जतालगीयस्सरं कुमरो ॥ ८॥ तस्सरमणुसरमाणो दिहिं पक्खिवइ मुकपल्लंको । नियइ दुवालसभुयं पेच्छणयपरं नरं तिसिरं ॥ ९ ॥ दोहिं करेहिं पडहं दोहिं मुइंगं च दोहि तालाओ । वीणं दोहिं वंसं च दोहिं हत्थेहिं वायंतं ॥ ८१० ॥ नट्टवसुबेल्लिरभुयकरजुयविन्नाससंचरं तत्थ । घणमणिकुंडलमंडियमहिलाएकाणणसणाहं ॥ ११॥ बीएण मणोमयरायवासणावसविमुक्काफुक्केण । रमणीमुहेण . वंसं वायंतेणं विलसमाणं ॥ १२ ॥ तइएण महुरसरगाममुच्छणाजणियसवणजुयसोक्खं । उग्गायतं गीयं मज्झट्ठियपुरिसवयणेण ॥ १३॥ 'कुलंयं' ॥ इय अच्च- ब्भुयअद्दिडपुवपेच्छणयपेच्छणुत्तालो । वंचित्तु पमत्ते अंगरक्खभडचेडपमुहनरे ॥ १४ ॥ नवमेहडंबरवरपावरणालक्खि- ॥ २३॥ D CUeLeur दीपक- पूजा भुवनः प्रदीपकथा यगसठाणो । करयलकयकरवालो वासहरा निग्गओ कुमरो ॥ १५॥ 'जुयल' । त पेच्छतो गच्छइ उच्छलियअतुच्छको- उउफरिसो। चिन्तइ य अहो एवं भुवणतवहिभव किंपि ।। १६॥ ज कुचकलियमेगं नरस्स मुहमित्थियाण पुण दोन्नि । गेवेजयमणिकुडलभालट्ठियतिलयकलियाइ ॥ १७ ॥ सुवति इह भविस्सासत्येसु दुसाणणत्तिमुंडादो । नवर ते पुरिसधिय एसो नरनारिरूवो उ॥ १८॥ इय चिंततो पत्तो रायगरुहो वि तस्समीवमि । सोवि हु पच्छाहुत्त गच्छइ करणफमच्छउमा ॥ १९ ॥ थोवप्पसरप्पउरावसरणकरणकमे कुणंवेण । तेणाहियहियहियओ दूर नीओ नरिंदसुओ ॥ ८२० ।। तद्दसिय अवरावरविन्नाणालोयवियलियविवेओ। न मुणइ नयर दूरे न गणइ मग्गस्समलवंपि ॥ २१ ॥ एत्थतरम्मि सहसा सो नट्टवरो सरूवमुज्झेउ । उक्खायनिसायअसी जमोध जाओ भडो कुद्धो ॥ २२ ॥ जंपइ रे दुहाहम कुमार त सरसु देवयं इछ । मा भणसु पमत्तो ह विणासिओ केणइ छलेण ॥ २३ ॥ त निसुणिउ कुमारो चिन्तइ सुरअसुरनयरनयरो। कोवि इमो मह वेरी छलेण जेणाणिओहमिह ॥ २४ ॥ वीसासिऊणमेवं जो जायइ घायगो न मोत्तवो । हतचोथिय भन्नइ सो नूणं नीइसत्थेसु ॥ २५ ॥ इय चिन्तिय आयड्डियखग्गो त हकए निवसु- ओवि । “निफरिओ इयरोवि हु रूसइ कि खत्तिओ नेव" ॥ २६ ॥ दोनिवि वग्गणकरणकमभमणुब्भामियासिदुद्वरिसा। निप्पसरप्पहरपरा जुज्झति समच्छरुफरिसा ॥ २७ ॥ दंसे सिरपाय मोत्तु पाएसु दिति मुनईओ (१) । निविसिय उच्छ- लियावसरिउ च दोन्नि वियवति ॥ २८ ॥ नेगोवि जयं पावइ दोण्हवि सत्थस्समप्पवीणत्ता । न समिज्जति य ज ते निध चिय विजयसत्यसमा ॥ २९ ॥ अन्नोन्नसग्गसघट्टभग्गवारगखुडियअसिफलया । करकयतिक्खग्गखग्गघेणुणो ते पुणो मिडिया ॥ ८३० ॥ मुफासिघेणुघाय वचइ करणकमेण कुमरो से। रोसेण कुमरछुरियापहारलक्ख हरइ सोवि ॥ ३१ ॥ अवरोप्परवामकरप्पहारपडियासिघेणुणो दोवि । जुज्झति निजुझेण केसग्गबाहुबंधेहिं ॥ ३२ ॥ निद्दयकेस- בובתכותבתכתבתכתבתתלהב לרכת PNEVLEZZ2U2V2v2V22 me Jan श्रीअनन्त- नाथचरि- जादुद्धृत पूजाष्टकम् दीपक- पूजायां भुवन- प्रदीपकथा ॥ २४॥ गहबाहुबंधकरघायजजरियदेहा । निवडंत्ति दडत्ति झडत्ति उहिउँ पुणरवि भिडन्ति ॥ ३३ ॥ निगुरकुमारपायप्पहारव- च्छय(त्थ)लताडिओ सुहडो। पडिओ धसत्ति घुम्मन्तनेत्तओ भूमिवट्ठम्मि ॥ ३४॥ तो तब्भुयजुय उवरिं दाउं नियपयदुगं धरियकेसो । घेत्तुं धराए छुरियं जा तस्स सिरं लुणइ कुमरो॥ ३५ ॥ ता तेण नमो अरिहंताणं इच्चाई पंचपरमेट्ठी । सरिया असारसंसारसायरुत्तारणतरिब ॥ ३६ ॥ तं सोउं हा हा हा साहम्मियमारणे महापावं । काऊण नूण नरए उप्पयंतो दुहोहेहं ॥३७॥ इय जंपिरेण खामिय मुक्को संहसत्ति निवसुएण भडो । “अइकुवियाणवि करुणा जायइ जइ वा कुलीणाण" ॥३८॥ सो चिंतइ नररयणं एसो जमणेण मारणपरोवि । मुको वेरीवि अहं "गुरूण गणणा न रिउकीडे॥३९॥ होइ न सिरम्मि सिंगं अहमाणं उत्तमाण य नराण । किंतु अकजे कजे य ते मुणिज्जति वटुंता" ॥८४०॥ एएण जीवियचं दाउं दिन्नं समग्गमवि मग्गं । जायइ रज्जाईणं जं जीवंताणमुवओगो ॥४१॥ भुवणम्मिवि उवयारो न पाणदाणाओ सम- हिओ अस्थि । पचुवयरिउमसत्तेहिं निण्हविज्जइ न सो जेण ॥ ४२ ॥ थेवंपि हु उवयारं मंनइ पुरिसो गिरिंदगरुययरं । निण्हवइ खलप्पयई पुरिसो उवयारलक्खंपि ।। ४३ ॥ ता आराहेयन्बो एस मए देवयब सुगुरुव । जणउच्च जाव जीवं परोवयारप्पसत्तमणो ॥ ४४ ॥ इय चिन्तिय उढेउं पणमिय तं पायपउमजुयलग्गो । जंपइ मह अवराह खमसु महा- यस कयपसाओ ॥ ४५ ॥ जइ न तुम मुंचंतो संपइ मं पुरिसरयण हुतो हं । ता मंसगिद्धगिद्धाइयाण भक्खं छुहंताण ॥४६॥ इण्हि तं चिय सरणं आमरणं तंपि मज्झ वज्झोवि । जमहं न हओ तुमए करुणारसपूरियमणेण ॥ ४७ ॥ दुर्ल्ड तं खामंतं जंपइ कुमरो अहो महासत्त । तुमए विवेइणावि हु किमिममवेरेवि पारद्धं ॥ ४८ ॥ जो जिणमए थिरमणो सुमरइ मरणंमि पंचपरमिटिं । तस्सेयारिसनिग्घिणकम्मं जायइ अहो चोजं ॥४९॥ जइ मह कहणिज्जमिणं सुपुरिस उवविसिय कहसु ता एत्थ । अहव अकहणिज्जं ता अच्छउ हियइच्छियं कुणसु ॥ ८५०॥ सो भणइ जस्स तणया पाणावि e UEUENCE ॥२४॥ Uzuena JCUCI दीपक- पूजायां भुवन- प्रदीपकथा AFTEISISTE हु तस्स किं न कहणिज । इय जपिय उवविसिउ सो कहइ निविद्रुकुमररस ।। ५१ ॥ गुरुनयपत्तछाओ घणकसिणसुतार- सारसरलक्सो। सुरणोच भरहखेत्ते वेयड्डो नाम अस्थि गिरी ॥ ५२ ॥ तम्मि फुरतमणिगणरहनेउरचकवालरमणि- यण । रयणगय अस्थि पुर रहनेउरचकनालंति ॥ ५३ ॥ दरियरिवारवारणगणकुभवियारणेकखरनहरो। त परि- पालइ सिरिरयणसेहरो नहयराहिवई ॥ ५४ ॥ तस्सत्थि सधसुद्धतकतकताहिवत्तअहिसित्ता । हारस्सिरिव हारस्सिरी पिया वित्तमुत्तगुणा ॥ ५५ ॥ अन्नोन्नरमापेम्माणुवधवद्धतमणपमोयाण । पचविह विसयसत्ताण ताण कालो अइफमइ ॥ ५६ ॥ कश्यावि हु रयणविमाणसेणिसिंगारियवरो चलिओ । नंदीसरमि सिद्धप्पडिमानमणाय सयरिंदो ॥ ५७॥ दाहिणिदिसिगयणेण गच्छंतो नियइ सम्मुहमहीए । मणिमंदिरपुरबाहिं निगच्छत जणसमूह ॥ ५८॥ तस्सतोनिल- तरलशयालिझणहणिरकिकिणिगणाए । सिपियाए समारूढ अवलोयइ तरुणनररयण ॥ ५९॥ दित किवणवणीमग- जायगदीणधदुत्थलोयाण । वठाविच्छेयकर दाणे मणिकणयरित्थाइ ॥ ८६० ॥ अवलोयत पुरतो लउडारसरासए सपेच्छणए । उक्यूहिजत जय जीव त चिर इय जणासीहि ।। ६१ ॥ दाहिणपासमहासणनिविट्ठजणएण ससुचयणेण । समलक्रियमप्पतेण दाणयानम्मि कणयाई ।। ६२ ॥ वामद्वाणपरिट्ठियगरिढविट्ठरनिविट्ठजणणीए । कयलवणुत्तारणय सोयसुयवपिरच्छीए ॥ ६३ ॥ वजतढकढुफाभेरीभकारभरियभुवणयल । रम्मारामुज्जाणमि गुरुयरिद्धीए सपत्त ॥ ६४ ॥ ।। कुलय ।। को एस कि करिस्सइ इह इय बुद्धीए नयरवईवि । तत्थुत्तिन्नो कंचणकमलगय केवलिं नियइ ॥ ६५ ॥ पालियसमग्गसत्त विरइयछज्जीवकायरक्सपि । सोमपि मित्तरूव सुरयपुर वभयारिपि ॥ ६६ ॥ दट्टण केवलि नहयरे- सरो भत्तिनिव्भरो नमइ । “धम्मत्थ पवित्तीओ जइ वा धम्मीण होन्ति सया" ॥६७॥ सिवियाए समुत्तिन्नो पणयपहू माइपिइअणुन्नातो । परिहरियालकारो सवेगुल्लसियरोमंचो ॥ ६८ ॥ सो विजाहरवइणो अवलोयंतस्स भत्तिभरिय- Ete DITISIST - अनन्त०५ מחלחלחלחלת 222Lei EARN दीपक- पूजायां श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्धृत पूजाष्टकम् भुवन- प्रदीपकथा ॥ २५॥ मणो । समयविहिणा मुणिंदेण दिक्खिओ विहिय सिरलोयं ॥ ६९ ॥ गणासेवणसिक्खाकहणंते नहयरेसरो नमिउं । किं वेरग्गं जमिमो मुणिनाह' पबइओ ॥ ८७० ॥ आह पहू आयन्नसु खयराहिव अस्थि एत्थ नयरम्मि । अस- पुच्छ मप्पयावसारो पयावसारोत्ति नरनाहो ॥ ७१ ॥ अवरं च एत्थ निवसंति दोन्नि दुन्नयपराओ महिलाओ । एकाए पर्व- चमई नामं वीयाए पुण कुमई ॥ ७२ ॥ भज्जावईण विहडियपेम्माण कुणंति पेम्मसंधाणं । अचंतसुघडियाणवि तं विहडावंति अन्नेसिं ।। ७३ ॥ उच्चाडणविद्वेसणथंभयवसियरणमारणाईसु । पावकिरियासु सययं वटुंति पमोयपुंनाउ ॥ ७४ ॥ कइयावि दोवि दुन्नयजायत्थारूढगरुयगबाओ । रिउसेणाओव सज्जियसराओ विवणीए मिलियाओ ।। ७५ ॥ अन्नोन्ननिण्हवुप्पंनमंतुवसविहियगुरुविवायाणं । ताण सयासे मिलिओ बहुओ लोगो कुतूहलओ ॥ ७६ ॥ महफाडियं न सको विं संद्धेउं तरइ इइ कुमइभणिये । इयराह तहा सीवेमि जह न से होइ संधीवि ॥ ७७ ॥ इय विवयंतीओ जणेण ताओ नीयातो मंतिसंनिज्झे । विनायवइयरेणं तेणवि नरवइसमीमि ॥ ७८ ॥ नाऊण तप्पइन्नं राया विम्हिअमणो पयंपेइ । कुणह इममिकवार एयत्थे तुम्हमभउत्ति ॥ ७९ ॥ कुमई जंपइ दिणपंचगस्स मज्झमि फोडिइस्सामि । सीवि- स्सामि तमियराह पहु अहोरत्तमज्झवि ॥८८०॥ इय विरइयप्पइन्नाओ ताओ नमिउं निवं दुयं दोवि । कयजणअच्छरि- याओ पत्ताओ नियनियगिहेसु ॥८१॥ कुमईए चिंति एत्थ अस्थि सुप(व)सुरित्थवित्थारो। नामेण अत्थसारो गरिट्ठ- सिट्ठी सरलदिही ॥ ८२ ॥ नाययरो बहुलाहो वि कित्तिसारोत्ति अस्थि तस्स सुओ। उज्जलमाणसमुत्तिअपत्तसंतावले- सोवि ॥ ८३ ॥ नवजुवणुल्लणाए अभग्गसोहग्गसंगयंगीए । कंतिमइए पियाए सह विलसइ सो सया सुहिओ ॥८४॥ नवरं कंतिमईए सरूवसिंगारगरुयगवाए। आलवियाए वि अहं न नया संभासियाविय नो ॥ ८५ ॥ ता तप्पइणो कीएवि कुरंगनयणीए सह विहिय घडणं । साहेमि निवस्स जहा तीए महंतं दुहं होइ॥ ८६ ॥ तप्पइणो पुण अयसो ॥ २५॥ Mod CUCLC दीपक- पूजायां भुवन- प्रदीपकथा नया सतोसो म झ निवइणो दविण । "अह्व कयावन्नाणं अणत्थउप्पायणं सस्स" ॥ ८७ ॥ ता एत्थ धणिधणेसरतणया तरुणी धणावली नामा । असई सयपि ता तग्घडण सह तेण काहामि ॥ ८८ ॥ इय चिंतिय तबेल पत्ता सा कित्ति- सारसन्ने हो । काऊण तमेगते जपए महुरक्खरगिराए ॥ ८९ ॥ सुहय तुम पइ जपेमि किपि मा कुणसु पत्थणं विहलं । सो उपइ ता सपइ साहसु सा भणइ निसुणेसु ॥ ८९० ॥ इह अस्थि धणेसरसेटिणो सुया कमलकोमलोरुजुया। नियरूवनिजियरई नामेण धणावली वाला ॥ ५१ ॥ नियभवणमत्तवारणगयाए तीए कयाइ सच्चविओ। आगछन्तो त रम्मरूपजियरइवइविलासो ॥ ९२ ॥ सिंगारसस्ससमवयवयस्ससदोहसोहियउवतो। उत्तमउत्तुगतुरगवग्गणक्खणिय- मणवित्ती ॥ ९३ ।। अनिलदोलणविलसिरसिहिपिच्छच्छत्तजायछायसुहो । हेलाए कीलयतो जपाउंपाहिं हयरयणं ॥१४॥ चलसरलधवललीलालसलोयणजुयलवलजोण्हाए । परमामयबुढिपिव विकिरतो सेमहर तुरए ॥ ९५ ॥ सियसोणसाम- मणिमयभूसणसयभूरिकिरणनियरेहिं । रयणाभरणेहिं पिव अलकरतो तुरंगपि ॥ ९६ ॥ दद्दूण तुम उम्मीलमाणनव- नेहनिद्धनयणेहिं । आदिहिपह अवलोइओ बहु तीए अवियण्ह ।। ९७ ॥ सोहग्गरयणरोहण समोहणमयणवाणसम तुमए । दिद्विपदाइफते वियमिओ तीए विरहभरो ॥ ९८॥ चिंतंमि तुमं चित्ते तुहागिई तुज्झ नाममालवणे । सिविणे समागमो ते सा वाला तम्मई जाया ॥ ९९ ॥ विरहानलजालावलिजलिरसरीराए तीए पारद्धो। ससुवयंसीहिं सयं सयय सिसिरोवयारभरो।। ९०० ॥ सतडकार हारे वणुतावेणं फुडति मुत्ताओ। सिमिसिमिय सुसन्तिच्चिय नवकुव- लयनालमालाओ ॥ १॥ घणचदणागुरुरसछडाउ छकारपुश्वगं तीसे । तचंगसगमेण लग्गतीओ वि परिसुसति ॥ २॥ गोसावयस्सायस्सदिसाहिसेणिव मुयइ असूणि । भजइ देह जिंभाउओ भयइ परिभमइ एमेव ॥ ३ ॥ एवमवत्था सा सहयरयण रपझपाहि पाठातर २ स मणहरतुरए पाठातर यादा PIPI PAPI22 श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्धृतं यूजाष्टकम् दीपक- पूजायां भुवन- प्रदीपकथा ॥ २६॥ तस्सहीहिं मह दंसिया तओ तीए । तं साहियं समग्गपि तो अहं एत्थ संपत्ता ॥४॥ ता सुहय तुझ संगम- आसच्चिय धरइ जीवियं तीए । अवहीरियाए तुमए मरणंचिय जेणिमं भणियं ॥ ५ ॥ “दूरयरदेसपरिसंठियस्स पिय- संगमं वहंतस्स । आसाबंधोचिय माणुसस्स परिरक्खए जीयं" ॥ ६ ॥ ता मह उवरोहेणं अहवा तज्जीवियबकरुणाए । तं सरसु एकवारं दक्खिन्नदयाओ जं गरुए ॥७॥ इय जंपती दंतग्गधरियपचंगुलं नमिय तस्स । तचरणमिलिय- भाला ठिया चिरं चिंतइ तओ सो ॥ ८ ॥ अकलंक मज्झ कुलं सावि पुणो पोढराइणी बाला । एसा वि विणयपणया किं काउं जुज्जए ता मे ॥ ९॥ एगत्थ अकजभयं अन्नत्तो मरइ सा मए मुक्का। पासद्गेवि वलग्गइ डमरुयगंठिब मज्झ मणं ।। ९१० ॥ ज होयवं तं होउ ताणुरत्ताए विरहविहुराए । काहं समीहियमहं इय चिंतेउं तओ तेण ॥११॥ वजेउं मज्जायं मयलेउं निम्मलं जसप्पसरं । मोत्तुं कुलाहिमाणं अणुसरिऊणं कुसीलत्तं ॥ १२ ॥ चइऊणं सचरियं अंगीकाऊण नरयगइगमणं । उज्झेउं सद्धम्म भणियं जं भणसि तं काहं ॥ १३ ॥ तं सोउं तीउत्तं एसो विहिओ महा- पसाओ मे । इय जंपिऊण पत्ता पासंमि धणावलीए सा ॥ १४ ॥ तं पइरिके काउं पयंपए सुयणु सुणसु वयणं मे । सा आह अंब जं किंपि जंपियवं तयं भणसु ॥ १५ ॥ तीयुत्तमत्थि इह अस्थिसत्थपविइन्नअस्थिवित्थारो। नामेण कित्तिसारो पुत्तो वणिअत्थसारस्स ॥ १६ ॥ रूवेण मयणमुत्तिं कंतीए कलावई मईए गुरुं । सकं सिंगारेणं जो जिणइ धणेण धणयंपि ॥ १७ ॥ तेण तुमं सञ्चविया नियमंदिरमत्तवारणासीणा । लीलालोयणलोयणजोण्हाभरपूरिय- दियंता ।। १८॥ दिवाएवि सुयणु तए मयणसरप्पयरपहरजजरिओ। भवणम्मि कहकहमवि संपत्तो सो अणुप्पहसो ॥ १९ ॥ तं विरहज्जरविहुरं दहइ जलदावि जलणजालब । संताविति ससिकरा खयरंगारब तस्स तणुं ॥ ९२० ॥ एमेव हसइ वालोब नियइ सुन्नं पिसायगहिउछ । नचइ गायइ पलवइ मइरामयमत्तमुत्तिव ॥ २१ ॥ सबप्पणा पराय- ॥ २६॥ जध Fa दा כתבהבהבה दीपक- पूजायाँ भुवन प्रदीपकथा Pion तमाणसो दंसिओ वयस्सेण । मह कहिऊण तुह दसणाणुरायाओ वियलत्त ॥ २२ ॥ तो तं सठावेउ तुह पासे हं समा- गया सुन्भु। ता नररयणस्स तुम समीहिय कुणसु पसिऊण ॥ २३ ॥ त सोउ सा असई नियमणऊम्मीलमाणउ- म्माया । जपइ तुहोवरोहा अब अफज्जपि हु करिस्स ॥ २४ ॥ तो तीए जपिय पुषगोउरहारदेसदेवउले । आगतुं मिलियध निसाए पहरस्स तस्स तए ॥ २५ ॥ एव निसुय तदुत्तीए तीए गतूण कित्तिसारते । नीओ देवउले सो धणा- वलीविय समणुपत्ता ॥ २६ ॥ कुमईए जपिय इह पविसिय मज्झम्मि रमह सच्छदः । लोयागमणालोयणपरा दुवारे- हमच्छिस्स ॥ २७ ॥ तो मज्झपविढेसु तेसुकठाविसठुलगेसु । तीए कहिय आरक्सियस्स गंतूण त ज्झत्ति ॥ २८॥ तो सनधणुद्धरअसिखेडयकरभडेहिं चउपास । परिवेढिय देवउलं स आह गोसे धरिस्समिमे ॥ २९ ॥ नो निग्ग- मप्पसा कस्सइ देया इहत्ति भणिय भडे। गतूण मंतिनिवईण कहिय तवइयर सुत्तो ॥ ९३० ॥ दणं सेहिसुओ देवउल पडियभडढावेद । उन्भूयभूरिभयवेविरगजट्ठी विचिंतेइ ॥ ३१ ॥ पेच्छ जहा मज्झ महावसणमिणं दुस्सह समणुपत्त । जीवियमरणसरूवे सदेहे जेण पडिओह ॥ ३२ ॥ "पुघिल्लभवसमुव्भवपावप्पन्भारभावओ- घरस । सुनयाणपि अवाया इति न कि कयअनीईणं" ॥ ३३ ॥ गोसे बधे में नेही आरक्खिओ विवणिवीहिं । जणयाइजणसमक्स विडविही विविहवियणाहिं ॥ ३४ ॥ तुच्छतरविसयलालसमणरस मह केत्तियं इम दुक्ख । पररमणिरमणपावा गरए तमणतसो होही ॥ ३५ ॥ न कयाइ को अनओ मए न अनईहिं सह पसगोवि । एयं चिय गोत्तक्सयहेज पढमं कयमकज ॥ ३६ ।। अप्पविणासाय महापावुल्लासाय अयसपसराय । खलओकरिसाय मए एय दुधिलसिय विहिय ॥ ३७॥ मरणं दारिद्द वा विएसवासो व सयणविरहो वा । हुतु वर एयाइ मा पुण एसो कुलफलको ।। ३८ ॥ न कुणति जे परिक्खिय फज ते दुक्खमदिर हुति । पहसिन्जति जणेण मइलिजतिय अकित्तीए Wala evenuee1 22222 QUEBU בתברך श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्धृत पूजाष्टकम् दीपक- पूजायां भुवन- प्रदीपकथा ॥२७॥ ॥ ३९ ॥ पंचिंदियत्तमणुयत्तआरियक्खेत्तेसु सुकुलजम्माई। सर्वपि मे निरत्थयमकज्जकरणुज्जमा जायं ॥ ९४०॥ न कओ धम्मो न गुणा समज्जिया सज्जिया न सियकित्ती। चित्तालिहियनरस्स व मणुयत्तं मह मुहा जायं ॥ ४१ ।। आबालकालओ बंभयारिणो जे कयवया जाया। ते पुन्नपयं न वयं विसएहिं विडंबिया इय जे ॥ ४२ ॥ जइ देवगुरु- पसाया एयबसणाउ कहवि छुट्टिस्सं । गिहिस्सं ता नियमेण सबविरइवयं सुहयं ॥ ४३ ॥ एयं महाणुभावो चिंतइ सद्धम्ममग्गमणुपत्तो। दूरं धणावलीवि य पकंपए भडभयुभंता ॥ ४४ ॥ एत्तोय पवंचमई परिसउकरिसिया कहइ कुमई । इय फाडियं मएयं संधसु जइ संधिउं तरसि ॥ ४५ ॥ इय भणिय गयाए तीए सेट्ठिणो कहइ सा तमागंतुं । तो सो सुयतबसणो खणं भया निचलो जाओ ॥ ४६॥ तियसोच निनिमेसो निव्भरनिदोब नट्ठमणवित्ती। कयमोणो सज्झाणो जायमुच्छोब निच्चेट्ठो ॥ ४७ ॥ किं कायद्यविमूढं तं दर्दु जंपए पवंचमई । किं सेट्टि गरिट्ठमई विनबुद्धिव लक्खियसि ॥ ४८ ॥ किं कायरोब कंपसि रणरसियभडोब धीरिमं धरसु। केत्तियमेत्तं कर्ज इमं कुसग्गीयबुद्धीण ॥ ४९ ॥ जइ वि कुमईए कहिए विहिओ रायेण भडढावेढो । तुह तणओ मरणंतबसणं पत्तो जइवि इहि ।। ९५०॥ तहवि हु तहा जइस्सं न जहा दबक्खओ ल्हसइ न जसो । न विणस्सइ तुह तणओ जणाणुराओ न जह जाइ ॥ ५१ ।। नवरं नियवहुयं मह अप्पसु तं देवमंदिरे खिविउं । जह वंचिय समईए सुहडे कड्डेमि तं असई ॥ ५२ ॥ गोसे वाह- रिय निवो जंपइ जइ किंपि ता भणेज तुमं । सपिओवि मह सुओ पहु निसाए रुसिउं कहिंपि गओ ॥ ५३॥ एवंति भणिय बहुयं सिंगारिय से समप्पए सेट्ठी । नियसम्मयमहिलाओं मेलइ गंतुं सगेहे सा ॥५४॥ वजिरवद्धावणयच्छंद- पणचंततरुणपरियरिया । अयसंकलसंदाणियकमकंतिमईए संजुत्ता ॥ ५५ ॥ सह मियमंजुस्सरतूरिणहिं गायंतकामिणी- कलिया । चलिया मंद मंदं पत्ता य कमेण देवउले ॥५६।। सवणासन्ने ठाउं कित्ती(कंति)मई जंपए पवंचमई । अन्तो गंतुं SURESS ॥ २७॥ तान दीपक- पूजाया भुवन- प्रदीपकथा तुमए असईवेसो नियसियद्यो । ५७ ॥ ठायधं पइपासे होइ अणत्यो जहा न से गोसे । अप्पियनियनेवत्थं मह पासे पेसियधा सा ॥ ५८ ॥ इज जपिऊण चलिया खलिया य भडेहिं इय भणतेहिं । लभइन इह पचेसो रायाएसो जतो सो ॥ ५९॥ एत्य पचिट्ठो चिट्ठइ रुद्धो असईजुतो नरो कोई । ता पूइजह गोसे देवयमिहि पुणो वलह ॥ ९६० ॥ तो तेसि पवचई वियरर सोसि कुसुमतंयोले । “दूरे इयरे थड्डा वि हुति दाणेणमणुकूला" ॥ ६१ ॥ पुन्न मह दुहियाए उपजाइयमेत्य तो इमा पत्ता । "अवराचि पूयणिज्जा देवी सप्पचया किन्नो" ॥६२॥ अज्ज इमाए तइज्जो उववासो आसि जइम वणिय । ता तुम्भे करुणाए एफमिमं चिय पवेसेह ॥६३॥ जइ अज्ज इमा अञ्चइ न देवयं ता न भुजए नूणं । ता मुत्तुमिम ण्याए जीवियद्य पयच्छेह ॥ ६४॥ एत्थ ठिआ वि अम्हे भत्तिं देवीए गीयनदे॒हिं । पयडिस्सामो पसिउ ता कुणह इमति तीउत्त ॥६५॥ तो ते दक्खिन्नदयाहिं पेरिया विति भइणि त चेव । एका गंतु पूइत्तु देवयं झत्ति निग्गच्छ ॥६६॥ त सोउ कंतिमई पूयापडल करे कलेऊण । देवउलम्मि पविट्ठा ठिया अणुट्ठिय जहुदिडं ॥६७॥ नशणगाणघग्गाण ताण रमणीण पासमणुपत्ता । कंतिमईनेवत्थप्पच्छाइयतणुलया असई ॥६८॥ वजिरवद्धावणया वलिंउ पत्ता पोलिदे सम्मि। रूवग-अद्ध दाउ विसजिया तूरिया तुरियं ॥६९॥ पहसतीउ पविट्ठा पुढाओ पउलिरक्खयभडेहि । कि नो वनइ तूर पढइ इम तो पवंचमई ।।९७०॥ अट्ठह तेत्तउ वजइ जेत्तउ पोलिहि वारु । अंइरुद्वो वि न रुभइ सहु परिणिए भत्तारु ॥७१ ॥ रायसमीवगीकयपुन्नपइन्ना अईव सा तुट्ठा । "थोवावि कजसिद्धी तोसकए कि पुण न बहुया" ॥७२॥ पुरम- ज्झमागयाओ पिसज्जए सा सहीओ सघाओ। "सिद्बप्पओयणाण कि कज जणसमूहेण" ॥७३॥ बद्धाविऊण सेहि गंतूण लिए गिहमि सुत्ता सा । "निचिंताणं निदा जायइ जइवा किमच्छरियं" ॥७४॥ सूरुग्गुमसमयम्मि वि संनझंतम्मि तम्मि १ (पाठांतर--अब इविन लगभइ सहुपरणिए भत्तार ॥) EMENT दादा प दीपक- पूजायां भुवन- प्रदीपकथा त्रादुद्धृतं भडविंदे । सपिओवि कित्तिसारो निग्गंतुं ते पयंपेइ ।। ७५ ॥ किं तुन्भे सन्नज्झह पिउणा अवमाणिओ गहिय भजं । इह श्रीअनन्त- नाथचरि- वसिय निसिविरामे जाव विएसम्मि वचिस्सं ॥७६॥ ता इह पविट्ठमेत्तोवि वेढिओ कहह को विणासो मे । ते ३ति निवा- मचे पुच्छसु जे तं धरावेंति ॥७७॥ तेणुत्तं मह ताणवि तणओ न भओ जओ विसुद्धोहं । "किं काहि भवो वि हु विजो नीरोयदेहाए(ण)" ॥७८॥ इय भणिरे सेट्ठिसुए आरक्खियमंतिणो समणुपत्ता । दटूण सेट्टिपुत्तं सकलत्तं विम्हिया दोवि पूजाष्टकम् ॥ ७९ ॥ सुहडाण व तेसि पि हु कहियं सबंपि कित्तिसारेण । रायसयासे नीओ भज्जाजुत्तो वि सो तेहिं ॥ ९८० ॥ ॥ २८॥ रायउले निजंतं तणयं नाउं समागओ सेट्ठी । "इयरेवि सायरचिय सुयणा किं पुण न नियपुत्ते" ॥८१॥ सुयसेहिसुय- निवंतियनयणा पत्ता दुर्य पवंचमई । “का संका सक्खं रायवयणपत्ताभयाणहवा" ॥८२॥ असमाणपवंचमइमईए विजि- यत्ति नागया कुमई । “तत्थ न जन्ति सयन्ना पराजओ जायए जत्थ" ॥ ८३ ॥ गंतूणत्थाणत्थं सबेवि निवं नमित्तु उवविट्ठा । "विणयप्पणई सस्सा सवत्थवि किं न नमणिज्जे" ॥८४॥ मंतिसयासा सोउं भणइ निवो कित्तिसार किं एयं । सो आह जह पहू मुणइ तह इमं किं अलीएण ॥ ८५ ॥ "सयमेव देव विसयाहिलासिणो पाणिणो सया तम्मि । जो पुण परोवएसो घयाहुई सा हुयासम्मि" ॥ ८६ ॥ इय जंपिय कुमइविप्पयारणुप्पन्नरायरसपमुह । कहियं रन्नो "भन्नइ पमाणभूमीए नो अलियं" ॥८७॥ जेण सरीरेण कयं सहउ तयं देव निग्गहदुहाई । "देए पच्छावि रिणे सइ दवे दिजइ न किं तं" ।। ८८ ।। आह निवो मा वीहसु जमेकवारं इमाण महिलाणं । अभओ मए विइन्नो फाडणसंधाणकोउयओ ॥ ८९ ॥ नामाणुसारिणिच्चिय कुमईए मई महा अणत्थयरी। "अहवा परिपज्जलिरो दहणो दहणोच्चिय जहत्थो" ॥९९०॥ पेच्छ पवंचमईए भजं पक्खिबिय कडिया असई । नो विन्नायं केणइ "बुद्धीए अगोयरो नत्थि" ॥९॥ सेहिसुय नो कयाइवि विस्ससियचं तए कुमहिलाण । जं संपइ विस्ससियस्स आगओ आसि तुह मच ॥ ९२ ॥ विन्नवइ कित्ति- ॥ २८॥ १ ज दीपक- पूजायां भुवन- प्रदीपकथा सारो देवपसाएण जीवियबस्स । पत्तस्स चरिय चरण भवहरण सहलय काहं ।। ९३ ॥ जइ नो देवो देतो पाणे मह नूण ता अह इहि । उभयभवसभवाणवि चुकतो चेव सोक्खाण ॥ ९४ ॥ रायाह वच्छ कस्सइ कयाइ भववासमहि- वसतस्स । दुफम्मेण अवाया हववि ता मा समुधियसु ॥ ९५ ॥ मा कुणसु वयकिलेस धम्मो सतस्स होइ गिहिणोवि । "को नाम कुणइ कह सइ फजे सोक्ससज्झम्मि" ॥ ९६ ॥ सो भणइ सामि एव विडवणा होइ जाण कजम्मि । मह होउ तेहि विसएहिं वयमहं सपइ गहिस्स ॥ ९७ ॥ जपइ सेट्ठी वुझवह देव एसेव जं सुओ मज्झ । करहपडियं व भडयमिम विणा फुडइ हियय मे ॥९८॥ पुत्तेणुत्त जइ अन्ज पहु तए ह विणासिओ हुन्तो । हुता केत्तियमेत्ता ता पुत्ता मज्झ जणयस्स ॥ ९९ ॥ जणया जणणीउ पियाउ पुत्तया वधुणो य ससारे । मुफा भूरिभवेसु ता मोहो कहह को तेसु ॥१०००। "परमत्येण न कयावि वल्लहो अत्थि कोइ कस्सावि । सोयइ सबोवि जणो नियकज चेव सीयत" ॥१॥ ता अहमवि नियकजप्पसाणे उज्जओ इयाणिपि । ता मा भवह भवतो सधे धम्मतरायपरा ।। २॥ गहिऊण वय अज भुजिरस अन्नहा महाणसण । तो नायनिवघेण निवेण मोयाविओं सेट्ठी ॥ ३ ॥ जणणीवि तत्थ पत्ता पुत्तेण कमे नमित्तु विणयपर । पाएसु लग्गिऊणं वलावि मोयाविया अप्प ॥ ४॥ सम्माणिउ विसज्जइ वत्थाईहिं सपिय सुय सेहि । राया पवचमइयपि भणिय नायुजया होज ॥ ५॥ कुमइपि भणइ वाहरिय मा पुणो इय करेज अन्नायं । पुणरुत्त न खम्मिस्सं वि भणिय त पि हु विसज्जेइ ॥ ६ ॥ बहाणाइसबसिंगारसुंदरो सिवियमारुहिय पत्तो । इह एसो सेहिसुओ पवइओ तुज्झ पचक्स ॥ ७॥ खयराहिराय वेरग्गकारण पुच्छिय जमेयस्स । त कहिय "ता मोत्तु कुसगमायरह गुणि- सग ॥ ८॥ पाय विणस्सइच्चिय पत्तकुसगो जणो सुवित्तोवि । उयरगओ असुइत्ते जुज्जइ परमोवि आहारो॥९॥ सगुणगि गुणाहाणं पावइ पत्तो जणो अजन्तोवि । रमणिनयणे कलुसपि कजलं सोहमुबहइ ॥ १०१०॥ कायद्यो בכתבתבות 122122en 12

श्रीअनन्त-
नाथचारि-
बादुद्धृतं
पूजाष्टकम्
दीपक-
पूजायां
भुवन-
प्रदीपकथा
॥ २९॥
गुणिसंगो तम्हा पुरिसेण उज्झिय कुसंगं । पत्ते सिणिद्धदुद्धे मुद्धोंवि किमंबिलं पियइ" ॥ ११ ॥ खेयरवई पयंपइ पहु
सिद्धिवहूवरो इमो होही। जो एकम्मिवि एवं पडिबुद्धो आवयाए भवे ॥ १२ ॥ पहु अम्हेवि हु पुन्नेकमंदिरं जेहिं
थावरे तित्थे। चलिएहिं जंगमं तित्थमुत्तमं तमिह संपत्तो ॥ १३ ॥ एत्थंतरे करेणुक्खंधगओ छत्तअन्तरियतरणी ।
राया चउरंगवलो पत्तो केवलिकमे नमई ॥ १४ ॥ वंदिय सेसे मुणिणों सलाहिउं पणमिउं च नवसाहुं । उवविट्ठो
तो वंदइ तस्संतेउरमवि समग्गं ॥ १५ ॥ तम्मज्झे निवकन्ना नियरूवजियामरी कणयवन्ना । पत्ता मत्तामरहत्थिमंथ-
रकमकयागमणा ॥ १६ ॥ लीलाचलच्छिविच्छोहखोहियासेसतरुणनरनियरा । दीवपहानामेणं सारसुहासारसियहासा
॥ १७ ॥ दट्टण केवलिं सा हच्छं मुच्छं गया मयंकमुही। सीओवयारसंपत्तचेयणा पुच्छिया पिउणा ॥ १८ ॥ किं
वच्छे मुच्छागमणकारणं तुह पयंपए सावि । पुच्छसु गुरुणो इय भणिय केवलिं नमिय उवविट्ठा ॥ १९ ॥ कयकर-
कोसो नमिऊण केवलिं पुच्छए निवो भयवं । किमु मुच्छिया मह सुया भणइ पहू निसुणसु नरिंद ॥ १०२० ॥
सरसाहिट्ठियपहियं सरसाहियसत्तुसुहडसंदोहं । सरसाहिलसियवासं पुरमत्थि विसालसालंति ॥ २१ ॥ रविउद्या-
रद्धदिणंतमुकधणिभवणकयकुकम्मेण । पत्तारसआहारो अकिंचणो तत्थ अस्थि नरो ॥ २२ ॥ निम्मंसमुही नित्तेय-
कालदुबलकरालकाया से । मुत्तिमइचामुंडव भारिया आसि विगयासा ॥ २३ ॥ खंडणरंधणपीसणजलवहणगिह-
प्पमज्जणाईहिं । परघरपत्तकुभोयणकयट्टिई गमइ दियहे सा ॥ २४ ॥ सिसिरे सहति सीयाई गेम्हसमयंमि तिवर-
वितावं । मलकलयकुचेलाई दोनिवि मुणिमंडलाइं व ॥ २५ ॥ जुन्नकुडीरयछायणकजे कइयावि दोवि दुभत्थं ।
भमिराइं गुरुअरन्ने नियंति आयावयंतं मं ॥ २६ ॥ भणिया अकिंचणेणं भज्जा नमिमो इमस्स पयपउमं । जेणज्जेमो
अम्हे अब्भुत्तम-पुन्नपब्भारं ।। २७ ।। तो दोन्नि वि भत्तिवसप्पसरियरोमंचअंचियंगाणि । भूमियलमिलियभालयलमणहरं
॥ २९॥

दीपक पूजायां भुवन प्रदीपकथा । महा पणमन्ति ॥ २८ ॥ दुदु विसुद्धभावं तेसि मए तयणु उपविसेऊण । उवविट्ठाण दिन्नो दोण्हवि सद्धम्मउवएसो ॥ २९॥ आयसह भो तुन्भे पत्रिंदियजाइपमुहसामग्गिं । पावेउ नायचार देवगुरुधम्मवत्ताइ ॥ १०३० ॥ रागदो- माईहि दोसेहि अदूसिय मुणह देव । निग्गय गीयत्थ तत्तरय जाणह गुरुपि ॥ ३१ ॥ जइगिहिभेएहि दुहा युज्झह धम्म जिणेहिं पन्नत । पढम दसप्पयार वारसभेय पुणो वीय ॥ ३२ ॥ जीवाजीवा पुन्न पावासवसवरो य निजरणा धधो मोक्सो य इम आयन्नह तत्तनवगंपि ॥ ३३ ॥ देवगुरुधम्मतत्तत्थसहहाणेण होइ सम्मत्त । मूल सधुत्तममो- करकापसासरस इममेव ॥ ३४ ॥ फलसलिलधूवदीवयअक्खयनेवजगधकुसुमेहिं । पूयइ सम्मदिट्टी इय जिणमट्ठहिंवि पूयाहिं ॥३५।। सधाउ वि अतरन्तो पईवपूय करेइ जइ भयो । ता सा एकावि हरेइ तस्स पावाइ भणियं च ॥ ३६॥ "जो देइ दीवय जिणवरत्स पुरओ पराए भत्तीए । तेणेव तस्स डज्झइ पावपयगो न सदेहो" ॥३७॥ मणुयत्त सपत्त मा नेह मुहा करेह सद्धम्म । तुम्हाण हिय कहिय जुत्तमिम चिय गुरूणहया ॥ ३८ ॥ जंपति दोवि नियजोग्गयाणुमाणेण तुम्हमाएस । काहामो भयव ज सुकएणम्हेहिं त पत्तो ॥ ३९ ॥ इय जंपिय भत्तीए म नमिउं दमभारए गहिउ । दोनिवि गयाइ गेहे भगभावेण वदृत्ति ।। १०४० ॥ नगरप्पहाणजिणदत्तसेट्ठिणो मंदिरम्मि कमाइ । कुछताणं ताण दोण्हवि दीवूसवो पत्तो ॥४१॥ दाऊण सेटिणा सालिपूयघयपमुहमेवमुत्ताइ । सगिहे भुजह जह जाइ तुम्ह परिसोनि सोक्सेण ॥ ४२ ॥ ते पिंति अम्ह दससु जिणेसर सेहि जेण तस्स पुरो। काऊण घएण दीवयं वय सुकय- मजेमो ॥ ४३ ॥ दळूण धम्मबुद्धिं जातो तेसिं कयायरो सेट्ठी । “गरुयाइ परमिवि पक्खवाइणो किन्न धम्मपरे" ॥४४॥ इण्ािपि चलह इय भणिय तेहि सह जिणहरम्मि सचलितो। "अवरपि पत्थिय कुणइ सज्जणो कि न पुण धम्म" ॥ ४५ ॥ तिन्निवि पत्ताई नियति रुजिणमंदिर गयणलग्गं । भूयतरुपत्तपतित्तियतोरणसियदुवारग ॥ ४६ ॥ 4141 दीenMAP Enavane POPPI LEn 1 श्रीअनन्त- नाथचरि- बादुद्धृत पूजाष्टकम् दीपक- पूजायां भुवन- प्रदीपकथा ॥३०॥ अनिलचलिरद्धयावलिकिंकिणिगणघणरणज्झणाराबो। घग्घरयखलहलस्सरमिस्सो मुहरइ नहं जत्थ ॥४७॥ मणि- जणियदेवउलियामंडलविप्फुरियकिरणनिउरुवो । रोहिणगिरिव रेहइ जणपुन्नागरिसिओब जहिं ॥ ४८॥ केवलनाणा- लोओब जत्थ लंबतमोत्तिओजोओ। फलिहमऊहसमूहो भवविवेओ विव विहाई ॥ ४९ ॥ डझिरकप्पूरागरुपरिमल- मांसलियसुमणसामोओ। वित्थरइ जत्थ दूरं धम्मियजणपुन्नपसरोव ॥ १०५० ॥ सेट्ठी तेहिं समेओ पविसंतो तम्मि नियइ अजियजिणं । जय जय जयत्ति भणइ य सीमंतयसंगिकरकोसो ॥ ५१॥ उवसंतकंतरूवं तेसिं तं दसए अजियदेवं । वहिरंगअंतरंगारिवग्गनिग्गहणपत्तजसं ।। ५२ ॥ एसो समग्गसग्गापवग्गसुहसंगदायगो दूरं । ता एयं पूएउं अप्पहियं कुणह इय भणइ ॥ ५३ ॥ तं सोउं ताई मणप्फुरंतगुरुभत्तिभरधरंगाई। पसरियपरिओसवसुलसंतरो- मंचनिचियाई ॥ ५४ ॥ उल्लसियअमंदाणंदजायथोरंसुपूरियच्छीणि । परिकलयंताई सजम्मजीवियबाण सहलत्तं ।। ५५॥ सुरहिघएणं काऊण दीवए ताइं दोन्नि वि मुयंति । जिणपुरओ पणमन्ति य पहुं महीमिलियभालाई ॥ ५६ ।। कुलयं ।। तयणन्तरं पयाहिणपुरस्सरं नमिय रइयकरकोसो । सेहि अजियजिणिंदं भत्तिभरो थोउमारद्वो ॥ ५७ ॥ "जस्सानमंति सिरिसोणमणिपहापयडभत्तिरायश्च । अमरेसरा थुणिस्सामि तं पहुं अजियनाहमहं ॥ ५८ ॥ मणवयणनयणहत्था ते धन्नाणं सुहा अजिय तुज्झ । सुमरणथवणालोयणपूयणकज्जेसु जे सज्जा ॥ ५९ ॥ वइसाहसेयतेरसितिहीप तं चत्तविजय- वासोवि । पहु विजयोयरवासं अलंकरंतो कुणसि चोजं ॥ १०६० ॥ जायं तिजगुज्जोयं तं माहसियद्यमीनिसीहन्मि । दहृण ससंको लजिओब तबेलमत्थमिओ ॥ ६१ ॥ चइय तए चललच्छि वयं कयं माहसेयनवमीए । इयरोवि अस्थिराए न रज्जए किं पुण तिनाणी ॥ ६२ ॥ पोसे सियाएफारसीए जेउं चलहपहचंद(?) । लोयालोयपयासं संजाय- मणंतनाणं ते ॥ ६३ ॥ चेत्तसियपंचमीए तं सिद्धिवहूए संगमल्लीणो । इयरंपि मोहिउमलं रमणी किं केवल विरायं ॥३०॥ Jansh दीपक- पूजायां भुवन- प्रदीपकथा ॥ ६४ ॥ इय जायपचकल्लाणमवि पहु थुणिय चत्तकल्लाण । मन्नेमिचदपहुनय भवसायरतिन्नमत्ताण ।। ६५॥ सेहिस्स पक्सवाओ जिणिंदभत्तीए तेसु सजाओ। "अहवायरो गुरूणं सगुणे विगुणे पुण उवेहा" ॥६६॥ पुणरुत्तं पणयजिणो अकिंचणो सेविणा समनोवि । नेउ नियभवणे दिन्नबहुधओ पेसिओ सगिहे ॥ ६७ ।। तम्मिवि भवम्मि जिणभत्ति- भावोऽकिंधणो धणी जाओ। "अहव न त कल्लाण जिणपूयाए न ज होई" ॥६८॥ कइयावि आउअते मज्झिमपरि- | गामओ मरिय जावो । भुवणप्पईवनामो पुत्तो निवकुलपईवस्स ॥ ६९ ॥ तेणेवय भावेण तब्भजा मरिउमेत्य उत्पन्ना। एसेवय तुइ तणया जिणदीवयपूयपुन्नेण ॥ १०७० ॥ इह पत्ता में पेच्छिय जाईसरणेण मुच्छिया एसा । निव पुच्छियं तए ज त मुच्छाकारण कहिय ॥ ७१॥ नमिय गुरु भणइ सुया रिद्धी पहु तुह पसायओ एसा। मह सपियस्सवि जाया "किंवा न हवइ गुरुपसाया" ॥७२॥ सोऊण कुमरिचरिय जिणपूयाकयमई जणो सद्यो । रायाइओ गुरूण नमिय नियवाणमणुपत्तो ॥७३॥ नयकेपलिकमो नहयरेसरो मणिविमाणविदेण । नदीसरमि पत्तो वलिओयऽमिवदिय जिणदे ॥ ७४ । नवर रायसुयादसणाइअणुरायभरपरायत्तो । निवपासे सपत्तो पणयपरो पत्थए कंनं ॥ ७५ ॥ रायाह नहयरेसर जुत्तमिण किंतु पुच्छिमो कन्न । “जावजीवियकजे काउ जुत्तो न उवरोहो" ॥७६॥ तो वाहरिया पत्ता निव- तिय रइयरम्मसिंगारा । याला लीलालससरललोयणुलासलसिरमुही ॥ ५७ ॥ काउं पसायमाइसह ताय इय भणइ पिउफमे नमिउ । तो से सायरखयरिंदपत्थण साहए राया ॥ ७८ ॥ सा आह ताय लग्गइ अगे सोहग्गसगओ सो मे । पुषभन्भवभत्ता अग्गी वा इह भवे नन्नो ॥ ७९ ॥ नायसुयाअणुबंधो सम्माणिय नयर विसज्जेइ । सोवि गतो वेयड्ढे “निफज किं विएसेण" ॥१०८०॥ चिंतइ नयरनाहो हिययगया दूमए मयच्छी मा। विरहजरजलणजालाजलि- रग न(त)ढभल्लिच ।। ८१॥ सा म न मन्नइघिय ठाउमसत्तो न तं विणाहमवि । ता हरणमेव जुत्तं महनिवतणयाए TEDAV2N222222E12 - חלחבחרת הלהבהלתבר नन्त०६

श्रीअनन्त-
नाथचरि-
त्रादुद्भुतं
पूजाष्टकम्
दीपक-
पूजायां
भुवन-
प्रदीपकथा
इंहिपि ॥ ८२ ॥ अहवा किं हरणेणं सइ कुमरे संमि मह न सा होही । ता तं पर्छनं चिय हणैमि इय चिंतिउं ज्झत्ति
॥८३ ॥ एगोच्चिय निसि निग्गंतुमुवगओ कुमरवासभवणंते । मारणमईएं अहवा "इत्थीलुद्धाण किमकजं" ॥ ८४ ॥
तिसिरदुवालसभुयएकतणुलयारद्धपेच्छणयच्छउमा । तमिहाणीओ तेणं मंतेणुग्धाडिय पओलिं ॥ ८५ ॥ तो सहसा
संजातो सुहडो आयड्डियासिदुद्धरिसो। साहिखेवं रइयम्मि रणभरे सो जितो तुमए ॥ ८६ ॥ “जे सत्थप्पडिकूला
जे वा बीसत्थघाइणो कुडिला । नियमेण पडतिच्चिय ते पुरिसा-पावपहरया". ॥ ८७ ॥ ता कुमर सो अहं नियदयाए
हणणारिहोवि जो तुमए । मुक्कोत्ति मए कहिओ तुह पुरओ निययवुत्तंतो ॥८८ ॥ इय जह खयराओ सुर्य तह कुम-
रेणावि जाइसरणेण । सबंचिय सञ्चवियं सिविणयदिटुंब तबेलं ।।.८९ ॥ भणियं च खयर तुमए जह कहिओ तह
मएवि पुत्वभवो। दिट्ठो जाइस्सरणेण तयणु तं खेयरो भणइ ॥ १०९० ॥ ता चलसु तुम मुत्तूण मंदिरेहमवि जामि
सट्ठाणे । इय जंपिय तमणुट्ठियः नहयरनाहो गओ सपुरे ॥ ९१ ॥ परिभावियपुरभवप्पियाणुरायप्पइन्नकरणस्स ।
उम्मीलिओ महंतो अणुराओ रायतणयस्स ॥ ९२ ॥ चिंतइ तेच्चिय धन्ना जेसिं नियवल्लहेहिं जुत्ताण । विविह विलासेहिं
मुहुत्तमेत्तमिव जंति दिवसाइं ॥ ९३ ॥ जह जाइ वल्लहजणे मणो तहा जइ तणूवि वच्चन्ती । ता नूण न हुंतं चिय
कस्सइ तबिरहविहुरन्तं ॥ ९४ ॥ नूणं जागरणाओ विरहीण वरं समेइ जइ निदा । जा दूइयव वल्लहसंजोगं कुणइ
सहसत्ति ॥ ९५॥ कामुक्कलियाउ मणे नयणेसु अलद्धलक्खया जाया । दाहो देहे वल्लहअलाहओ तस्स चिन्ताए
॥ ९६ ॥ वल्लहविरहविणोयप्पारद्धयाइकीलकिरियरस । गच्छन्ति, वासरा विरहियस्स कुमरस्स किच्छेण ॥ ९७ ॥
एत्थंतरंमि पत्तो कुमरिपिउपेसिओ महामंती। अत्थाणत्थं निवइं नमिउं विन्नवइ विणएण ॥ ९८॥ पहु मणिमंदिर-
नयरे पयावसारोत्ति नरवई अस्थि । दीवपहामलदेहा दीवपहाभिहसुया तस्स ॥ ९९ ॥ पत्ता केवलिपासं जाईसरणेण
.
*.
॥३१॥

दीपक पूजायां भुवन- प्रदीपकथा . मुच्छिया बाला । निवपुच्छिएण कहिओ केवलिणा तीए पुधभवो ॥ ११०० ॥ इय भणिय तेण सघ सवित्थरं साहियं नरिंदस्स । ता जा पुधभवुन्भवपिए कुमारेणुरत्ता सा ॥१॥ भणिय च खयरवइणा विवाहिउ पत्थियावि न तीए । पडियन तबयण कुमर पइ जायरायाए ॥२॥ तुह तणयअलाहविओयदाहदझतगणवणा वाला । लहइ न सुहलवमवि जलिरजलणजालोलिकलियव ॥ ३ ॥ धाईए इव अरईए असुहत्थीए वयसियाएछ । दासीहिं व सगहिया कामुक्कालि- याहिं सा दूर ॥ ४॥ ता पहु पेससु कुमर परिणयणकए कुरगनयणीए । जह होइ जीवियं से "गुरूण दुहिए न जमुवेहा" ॥५॥ रायाह सा सइचिय जा पुषभवप्पियम्मि अणुरत्ता । सिविणेवि ज सईण रमइ मणो नन्नरमणम्मि ॥ ६॥ इय भणिय समाइट्ठो कुमरो वीवाहिउ नरिदसुय । वच्छागच्छसु तो सो नमिय निवाणं सिरे धरइ ॥ ७ ॥ सम्माणिझण मंतिं सवाहिय नियसुओ समतेण । चउरगचमूचको पट्ठविओ हिहियएण ॥८॥ अणवरयकयपयाणो सो मणिमंदिरपुरमि सपत्तो। "ठाण चलिरो मदोवि पावए कि न सिग्घगई" ॥९॥ पट्टओय(पत्तोय)वत्थकयहट्टसोहगुरुमंचतो- रणधयम्मि । रायगरुहो रन्ना रिद्धीए पवेसिओ नयरे ॥ १११० ॥ आवासिओ समप्पियपासाए कणयकलसकमणीए । नरवश्कारावियभोयणाइगुरुगोरवमहग्यो ॥ ११ ॥ लग्गदिणे हयगयठियसामतावेदिओ गयारूढो । छत्तद्धयचामरचय- रायालकारकमणीओ ॥ १२ ॥ वजिरजयआउज्जो पत्तो वीवाहमदिरदुवारे । रइयायारो पविसिय उवविट्ठो कनयापासे ॥ १३ ॥ इह से तीए कर करेण गहिउ पयाहिणियजलणो । उवविसिय रायकुमरेहिं तयणु सम्माणिओ लोओ ॥१४॥ तो नियकलत्तकलिओ चलिओ चड्रिउ करेणुरायम्मि । रिद्धीए नियावासे पत्तो कीलइ सह पियाए ॥ १५ ॥ ससुरय- सम्मागुम्मीलमाणतोसो दिणाण दसग सो। तत्थच्छिय नमिय निव सकलत्तो नियपुरे पत्तो ॥ १६ ॥ रन्ना रिद्धीए पुरे सहट्टसोहे पवेसितो कुमरो । नवपरिणीय पुत्त मोत्तु को गोरवठ्ठाण ॥ १७ ॥ पणओ पिउणो पयसयदलम्मि :תכתבכתבתכולן venा Jenuel , श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्धृतं पूजाष्टकम् दीपक- पूजायां भुवन- प्रदीपकथा ॥३२॥ सपिओवि पत्तआसीसो । नमिउं जणणि चलिओ सुद्धतेच्चिय ठिया वहुया ॥ १८ ॥ पियुपयसेवासत्तस्स तस्स कुमरस्स जंति दिवसाइं । तं अहिसिंचइ राया रजे रिद्धीए कइयावि ॥ १९ ॥ गीयत्थगुरुसयासे पत्तवओ कयतवो पहयपावो उप्पन्नविमलनाणो रायरिसी सिवपुरं पत्तो ॥११२०॥ नवराया निरवजं पालइ रजं पयासए नीइं। ताडइ चरडे मन्नइ महायणं अज्जइ जसं सो ॥ २१ ॥ वंदइ गुरुणो पूयइ जिणेसरे संघमच्चए निच्चं । कारवइ विभूईए रहजत्तात्तो जिर्णि- दाणं ॥ २२ ॥ इय वच्चंते काले कयाइ दीवयपहाए उप्पन्नो। पुत्तो उत्तमलक्खणगणलंछियहत्थपायतलो ॥ २३ ॥ विरइयवद्धावणओ रयणपईवोत्ति कुणइ पुत्तस्स । नाम संमाणेउं सव्वजणं नरवई हिट्ठो ॥ २४ ॥ वरिसाई पंच पालित्तु पाढिओ तयणु जोवणं पत्तो । वीवाहिओ य उम्मत्तजोवणाओ निवसुयाओ ॥ २५ ॥ समयंतरम्मि कम्मिवि राया रयणीए तुरियपहरम्मि । जागरमाणो सद्धम्ममग्गमणुचिंतिउं लग्गो ॥२६॥ दीवयमेत्ताएवि मे पूयाए असरिसा सिरी जाया । सुहुमाउ वि वडवीयातो जायए नहलिहो साही ॥ २७ ॥ थोवावि धम्मकिरिया भावेण कया महाफला होई । लहुयावि दीवयसिहा उज्जोयइ मरुयमवि गेहं ॥२८॥ जे पुण कुवंति वयं ते सिद्धिवहूवरा धुवं हुन्ति । "अञ्च- भुयकल्लाणे अप्पायत्ते पमाओ को" ॥ २९ ॥ ता दाउं रजसिरिं पभायसमए वयं गहिस्सामि । इय चिंतिय सुहलग्गे रज्जे अहिसिंचइ कुमारं ॥११३०॥ आरुहिय रयणसिवियं दितो दाणाई वजिराउज्जो । सूरीण चरणसाराभिहाण पासे समणुपत्तो ॥ ३१ ॥ सकलत्तो कइवयरायसंगतो तेहिं दिक्खितो राया। जातो य साहुसिक्खावियक्खणो तक्खणे दक्खो ॥ ३२ ॥ उकिट्ठअट्टमासंततवविसेस ट्ठियढिसंहाणो । पडिबोहियभवो जायकेवलो मोक्खमणुपत्तो ॥ ३३ ॥ दीवयपूया भुवणप्पईवरन्नो जहा महाफलया । जाया तह अन्नस्सवि संपज्जइ तीए ता जयह ॥ ३४ ॥ दीपपूजा- 55555भुवणप्पईवराया दीवयपूयाए, साहिओ तुम्ह । भुवणप्पमोयगनिवं निसुणह नेवजपूयाए ॥ ३५ ॥5 ॥ ३२॥ या मनट नैवेद्य- पूजायां भुवन- प्रमोदक- कथा सधुत्तमेफराय समत्थि बहुलसिररायरयणपि । भुवणतिलयाभिहपुर कुरगसमनयणरमणियणं ॥ ३६ ॥ जम्मि मणिभवणपरपरापहापड्यरयणितिमिरम्मि । वासहरडझिरागरुधूमो उप्पायइ निस व ॥ ३७ ॥ परमहिओ सुहयगतो सचदहासो दुहावि सघत्थ । भुवणाणंदो नामेण नरवई अस्थि तत्थ थिरो॥३८॥ तस्सत्थि सबसुद्धतसारपयसट्ठिया सलीलगई । फमलमुही भुवणसिरित्ति रायहसिव पियभजा ॥ ३९ ॥ तीए मण आणदइ पुत्तो भुवणप्पमोयओ दूर । भुवणप्पमोयो नाम कामसमरूवरम्मतणू ॥ ११४० ॥ सद्धम्मसरुच्छेइयकुकम्मपरपत्तकेवलसिरीओ। अणुसरि- असासयसुहो जइब जो सहइ समरसिओ ॥ ४१ ॥ कइया वि सो करेणुक्खधगतो छत्तअतरिअतरणी । तरुणीकरस- चालिअसिअचामरविअन्जमाणतणु ॥ ४२ ॥ नाणाजाणढ़ियामत्तमडलामडलीयफयवेढो। चलिओ कुमरो आराममुत्तम पेच्छिउ सवलो ॥ ४३ ॥ भूरिकर्विजलकलिअ दुहावि ज ठि(वि)उसपामरकुलध । सहइ सुवन्नासणसगय सया राय- भवणं च ॥४४॥ पत्तो य तम्मि पविसइ तालीहिं तालसालतलकलिउ । कुवलीकयलीलवलीलवगनारगचगम्मि ॥ ४५ ॥ अवरावररमणीयारामपरपरपरिन्भमणखिन्ने। मुत्तु गयमल्लीणो अवयवणदक्खमडवए ॥ ४६ ॥ अवयसा- हागयवजकिरणभरफिन्नकणयदडमि । दोलापल्लके तूलियाए आरुहिय उवविट्ठो ॥ ४७ ॥ पारफधणुद्धरकुतफरनरा कुमरपिट्ठिमणुसरिया । पुरओ उयविट्ठा मडलीयसामतमतिसुया ॥४८॥ पडुपडहमजुमद्दलआलवणीवेणुसहसमिस्स । पारद्ध गाएउ चरिय फुमरस्स रमणीहि ॥४९॥ कुमरो वि मणोगयरायवासणावसअलद्धलक्सत्थो। ईसिप्पक- पिरसिरो वीण वायइ नियकरेहि ॥ ११५० ॥ एत्थतरंमि गयणाओ मणिमयाभरणभूसियसरीरो । अवयरिउं सपत्तो कुमरपुरो किंनरीनियरो ॥५१॥ तम्मज्झाओ उत्तमरुवाए किंनरीए एफाए । नमिय सविणयं पेच्छण- यपेच्छमन्मथिओ कुमरो ॥ ५२ ॥ सपत्ताएसाए महापसाओत्ति जपिउ तीए । पारद्धं पेच्छणयं कुमरपुरो परियण- הכוכבתכתבו ככה ברכתככתכתבת CUVELLECULLENCUCUEeveuCUCU Y श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्धृत यूजाष्टकम् METALLERY नैवेद्य- पूजायां भुवन- प्रमोदक- कथा - ॥३३॥ team जुयाए ॥ ५३॥ वजंतवेणुवीणासराणुविद्धेण दिवराएण। हुफियकंपियकुरलियमुदियकागलियरूवेण ॥ ५४ ॥ गुंजं- तमद्दलुद्दामपडहुडुक्काणुसरियतालरवं । गाएउं पारद्धं कुमारचरियं मिउसरेण ॥ ५५ ॥ तबेउमुवकंतं तम्मज्झा किंनरीए पवराए । मणिमयरसणारणझणिरकणयकिंकिणिकलावाए ।। ५६ ॥ पसरावसरणभमिभमुहभंगकरणकमंगहारेहिं । नचइ सा करविन्नासवसपसप्पंतनयणेहिं ॥ ५७ ॥ निभच्छियमिउकलकंठकूइयं रायमालवेऊण । नचंती सा गायइ कुमरगुणे चंदकरधवले ॥ ५८ ॥ तन्नट्टगीयदिन्नावहाणिया कुमरपमुहसबसहा । जाया तदेकदिही अचलंगी चित्तलिहियध ॥५९॥ पसरंतीए पसरंति उच्छलंतीए उच्छलंति समं । तीए जणनयणाई सययं सेवयकुलाई व ॥ ११६० ॥ अवयि हिय ओ जाओ रायसुओ तीए गीयनदे॒हिं । दाउमणो नियहारं तमच्छिसन्नाए वाहरइ ।। ६१ ॥ तो सा चलिया रणझणिर- किंकिणी किंवि कंपमाणथणी । नवनेहरसभरालसनयणेहिं पलोइरी कुमरं ॥ ६२ ॥ सो वि हु नियहत्थेहि धणयले जाव ठावए हारं । ता तीए झत्ति आलिंगिऊण नीओ नहयलेण ॥ ६३ ॥ सहसचिय सेसोवि हु तिरोहितो किनरीजणो सयलो । कुमरंगरक्खसंरंभभवभयुभंतनयणोध ॥६४॥ जाबारोवियधणुहा धणुद्धरा तमणुपक्सिति सरे । जाबुच्छति तं पइ फारका खग्गवग्गकरा ॥ ६५ ॥ तीए ता रायसुओ नरनयणअगोयरे नहे नीओ। जाओ य गयच्छाओ परिवारो कुमरहरणम्मि ॥ ६६ ॥ गंतुं सहाए कहियं रन्नो मित्तेहिं कुमरअवहरणं । तं सोउं सो जातो मुच्छाए अचेयणो सपिओ ॥ ६७ ॥ सिसिरकिरियासमुवलद्धचेयणो रुयइ दुभरकांतो । पागयनरोब सह पिययमाए सुयविरह विहुराए ॥ ६८॥ हा सूरकुमर हा धवलचमरवीइयसरीर हा धीर । वुड्डावत्थं मुत्तूण मं गओ कत्थ तं कहसु ।। ६९ ।। हा कुंददसण हा विगयवसण. हा ईसिहसणपरिलसण। हा कोमलकेस हहा सुवेस हा रंजिगसदेस ।। ११७० ।। हा जणवमत्त हा सारसत्त हा नायदेवगुरुतत्त । हा पुरिसरयण हा गरिमगयण हा अमियसमवयण ॥ ७१ ।। को जाय तुमं मुत्तुं पहाय- भ ॥ ३३ ॥ CUCU20 ela TEP नैवेद्य- पूजायां भुवन- प्रमोदक- कथा समएवि मे कमे नमिही। को वा रयणाभरणे दाही बंदीण परितुह्रो ॥ ७२ ॥ सिगारसुदरगो अप्फालितो करेण को कुम । आणदिस्सइ पउरे करेणुकीलारस पत्तो॥ ७३ ॥ मडलियमंतिसामतमित्तदासगरक्खपडिहारा । कुमरावहार- गुरुसोयसल्लिया तत्थ कंदति ॥७४ ॥ एत्थतरमि अत्याणकणयथभाउ रयणपुत्तलिया। उत्तरिया मणिमंजीरमजुझकार- रमणीया ॥७५॥ लीलाए चकमती पत्ता रायतिय भणइ एव । आयनसु निव सुयहरणकारणं चयसु सोयभर ॥७६॥ दद्रूण सालिहजियपुत्तलिय विम्हिओ सपरिवारो । भणइ निवो भद्दासणमलकिउ कहसु मह देवि ॥ ७७ ।। तो सालिह- जिया सा उवविठ्ठा तम्मि आसणे अहवा । "फीरइ अन्नस्स वि विणयपत्थिय किं न नरवइणो" ॥७८॥ अञ्चतविम्हिय- मणो सपरियणो सो निसामिउ लग्गो। कलकठविलसिरसरा रनो सा साहिउ लग्गा ॥ ७९ ॥ बहुसामो वि सुतारो सुपत्तनयसुंदरोवि नयरहिओ। अचलो विसघयावि हु वेयड्डो अस्थि गिरिराया ॥ ११८० ॥ तत्थत्थिभूरिभूमिगभ- |वणेहिं एफभूमिगविमाण । सग्गपि निजिणत रहनेउरचकवालपुर ॥८१॥ नियतणुतेयविणिज्जियकणयपहो तत्थ अस्थि कणयपहो। खयरवई बहुविजावलदुल्ललिओ ललियदेहो ॥ ८२ ॥ चाईकयकणयसिरि कणयसिरीनाम अस्थि से कता । देवगुरूण पणया पणयावजियसयलसयणा ॥ ८३ ॥ सोहग्गेण गोरिं रूवेण रइ सई पहुत्तेण । अणुकुवती कन्ना समस्थि से भुवणलच्छित्ति ॥ ८४ ॥ उधणजोवणजुत्ता विलसिरलायनपुनगत्तावि । असईदासीसहियावि च्छेय- निस्सेससहियावि ॥ ८५ ॥ कयउभडगभोगा विनट्ठनिस्सेसरोगसोगावि । विनाणगुणवियड्डावि थीकलाविसयपोढावि ॥ ८६ ॥ जणयजणणीवयंसीदासीहिं सया भणिजमाणावि । ण कुणइ मणयपि मणो पुरिस पइ वीयमोहर ॥ ८७ ॥ कुलयं । सिंगारियपि पुरिस दणं कुट्ठियंव नियदिदि । मउलिज्जत वालइ उवेयवसेण सहसत्ति ॥ ८८ ॥ चित्तट्ठियं पि रुट्ठध नर परमुही होई । सिविणयसञ्चवियपि हुन नियइ पुरिस ससुरयव ॥ ८९ ॥ पावकह व निवारइ कहिज- התכתבותכתבתברכתכתבותכתבה TENNzV2u22VZUCCN2 REnenreae URUCU 5 श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्धृत पूजाष्टकम् नैवेद्य- पूजाया भुवन- प्रमोदक- कथा ॥३४॥ माणिं पि पुरिसचरियकहं । कजेवि नरं नालवइ विहियगोवज्झमिव वाला ॥ ११९० ॥ एवंरूवं दुहियं दद्रूण विचिंतए खयररांया। कस्सेसा दायबा मए नरबेसिणी कन्ना ॥ ९१ ॥ दंसिज्जए इमाए जो जो सो सो वरो न पडिहाइ । आहारोब अरोयगरोगकंतस्स सबस्स ॥ ९२ ॥ देववसा जइ जायइ सीलभंसो इमाए ता होइ । गोत्तम्मि गुरुकलंको पावमिमाए अकित्ती मे ॥ ९३ ॥ इय चिन्तासंतत्तो वुत्तो कन्ताए नरवई एवं । मा तम्मसु पिय पुच्छसु वरमइसय- नाणिणमिमीए ॥ ९४ ॥ बहुमन्नियपियवयणो तणयं गहिउं गओ विदेहं सो। माणिकपुरारामे दणं केवलिं नमइ ॥ ९५ ॥ उवविसिऊणं सोऊण देसणं पत्तअन्तरो नमिउं । पुच्छइ किं मह दुहिया पहु पुरिसबेसिणी जाया ।। ९६ ॥ तो भणइ विमलनाणी आयन्नसु राय कारणमिमीए । जेणेसा संजाया विदेसपरा पुरिसविसए ॥ ९७ ॥ सालीणजणा- वासे रइरूवकुलंगणे जणियसोहो । हसियसरोवसरोहे सालिपुरामिहपुरे रम्मे ॥ ९८ ॥ अस्थि नयजियवहुधणदाण- कयत्थी कयत्थिसंघाओ। सालिप्पियामिहाणो धणिप्पहाणो धणी विणई ॥ ९९ ।। जुयलं ।। अवरोवि खत्तिओ तत्थ अस्थि रणसूरनामओ चाई । नवरं तणुविहवो “नो पायं चाइम्मि वसइ सिरी" || १२०० ॥ जओ-चाइयणकरपरं- परंपरियत्तणजायगरुयखेयव । अत्था किविणघरत्था सत्थावत्था सुयंतिव ॥ १॥ तस्सोभयहावि पिया विणयवई नय- परा सुसीला य । ईसीसि साहिमाणा "अह्व न दोसं विणा कोई" ।। २ ।। भत्ता पियमणुवत्तइ पियावि पइणोणुवत्तए चित्तं । वद्धइ दोण्हवि पणओ "जइवा नेहो नयड्डाण" ।। ३ ॥ सालिप्पियस्स कजाइं साहए सो वि देइ दवणं से । "न निओ वि कुणइ कजं मुहियाए किं पुनन्नजणो"॥४॥ जं किंपि लहइ कत्थइ समप्पए आणिउं पियाए सो। "पाणावि जम्मि देया तत्थ अदेयं किमवि नत्थि" ॥५॥ सालिप्पिएण कइयावि पेसिओ सो वहूए आणयणे । चलिओ संदण- पुरनयरम्मग्गमणुसरिय संनद्धो॥६॥ पत्तो अडईए वहुमयसत्ताए वि अमयसत्ताए। जीए सचित्तकाया अमाणसंगावि ॥ ३४॥ -- नैवेद्य. पूजायां भुवन- प्रमोदक- कथा तिरियोहा ।। ७ ॥ तीए सो नियइ वडाइवियडविडवीहिसकडिल्लाए । खरतरणिनिहियनयणं आयावंतं मुर्णि एग ॥८॥ दिहो य तेण उप्पाडियासिरोदो भडो तमभिणिउ । जंतो भित्तीए इव खलिओ मुणिओग्गहमहीए ॥ ९॥ उग्गहमइफ- मेउ अतरतो चउदिसिं परिन्भमिरो । दिवोध भत्तिजुत्तो पयाहिणाओ सुसाहुस्स ॥ १२१० ॥रे मुड तुंडभंग काउं त निच्छरण मारिस्स । इय जपिरो मुणिं पणमिउ च पडिओ अहोवयणो ॥ ११ ॥ पडियं झडत्ति खग्गं मुफंव करेण दूरवरयम्मि । मुणिमारणअज्झवसायजायगुरुपावमीएण ॥ १२ ॥ पच्छाहुत्तं वलिय बाहुजुयं साहुवहनिवित्तंव । गतु- मणीहता इव पत्ता पाया सिरे तस्स ॥ १३ ॥ जातो गीवाभंगो रुहिर नीहरइ तस्स वयणातो। अहवा जं चिंतिजइ परस्स वं अचणो एइ ॥ १४ ॥ उद्धट्ठियंमि खग्गे उच्छलिओ सो तयग्गमारूढो। परिभमइ गुरुरएण वंसारूढो नड- नरोध ॥ १५ ॥ एत्थतरे अणब्भा विजुध नहाओ झत्ति अवईना । एका अमरी पिंजरियदिसिमुहा देहदित्तीए ॥ १६ ॥ फुडलकिरीडकेऊरकडयहारोहसोहधरदेहा । तिपयाहिणिउ नमिउ च सा ठिया साहुणो पुरओ ॥१७॥ दटूण तमच्छरिय रणसूरो मुणिसमीवमल्लीणो। पणमिय कयजलिउडो उवविट्ठो समुचियट्ठाणे ।। १८॥ एत्थतरे निसनो उस्संग पारिऊण साहूवि । भणिय च देवयाए पुणरुत्त पणमिऊणमिम ॥ १९ ॥ पहु अहमिमाए अडईए सामिणी इह समागयेण तए । नूण कया पवित्चा असमप्पसमेफरसिएण ॥ १२२० ॥ एसो हु पचणीओ पावप्पा कोइ तुम्ह हणणत्थं । इतो एवं- विहिओ मए अदिस्साए खलिऊण ॥ २१ ॥ भणइ मुणी कयकरुणा देवि इमं मुयसु जाव नो मरई । उक्सग्गगहण- कज्जे आगच्छामो वय जमिह ॥ २२ ॥ साहूणमलकारो खतिथिय देवि नो पुणो कोवो । उक्सग्गपरे नूण तीए विसओ जओ भणियं ॥ २३ ॥ ज खमसि दोसवते सो तुह खतीए होइ अवयासो। अह न खमसि को तुह अविसयाए खतीए वावारो ॥ २४ ॥ मुत्तु मुणिमज्जायं कोव थोवंपि जइ जई कुणइ । ता सुयतवाइ सर्व निरत्थयं तस्स जेणुत्त ॥ २५ ॥ Tele2u ULUCA dar na श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्धृतं यूजाष्टकम् ELCurn UEuen नैवेद्य- पूजायां सुवन- प्रमोदक- कथा पढउ सुयं धरउ वयं कुणउ तवं चरउ बंभचेराइ । तहवि तयं सबंपिहु निरत्थयं कोववसयस्स ॥ २६ ॥ अम्हाण देवि एयं वयसबस्सं रिउंमि कुविएवि । अक्कोसाइ कुणंते लाहोत्ति विभावणं जेण ॥ २७ ॥ अकोसहणणमारणधम्मभंसाण- वालसुलभाण । लाभं मन्नइ धीरो जहोत्तराणं अभावम्मि ॥ २८ ॥ अम्हाण मोक्खपुरपस्थियाणमेएण काउमारद्धं । साहेजमओ एसो उवयारी मुंच ता एयं ॥ २९ ॥ सोऊण साहुदेसणमसमप्पसमामयप्पवहसरिसं । रंजियहियया देवी पयंपिउं एवमारद्धा ॥ १२३० ॥ धन्नोसि तुमं मुणिरयण तिवतवतेयलद्धिजुत्तोवि । काउं खममिममवयारयपि मित्तं व मोइंतो ॥ ३१ ॥ एवं पसंसिय मुणिं अदिट्ठवंधाउ तं भडं मुत्तुं । धम्ममइ संजाया देवी सहसत्ति मुणिवयणा ॥ ३२ ॥ सोवि भडो पयलग्गो अवराह खामए नियं मुणिणो । “दूरंपि पाणदाया पुज्जो अवरोवि उवयारी" ॥३३॥ भणइ य तइ सोमेवि हु सञ्चविए कलुसियं मणो मज्झ । अमरकरे वि हु दिहे कमलं संकुयइ जमजोरगं ।। ३४ ।। मारणपरे रिउ- म्मिवि तुह पहु हियए पवडिओ पसमो । दाहकरेवि निदाहे सीयं चिय होइ हिमसेले ॥ ३५ ॥ ता मज्झ देहि दिक्खं पावाओ इमाओ नन्नहा मोक्खो। "वेरग्गे जं न कयं नृणं तं दुकर पच्छा" ॥३६॥ तो से दिना दिक्खा मुणिणा देवीए अप्पिओ वेसो । धम्मुज्जयम्मि जइवा मूलं मोक्खस्स साहेजं ॥ ३७ ।। नवदिक्खियं पसंसिय सहाणे देवया गया झत्ति । दट्ठण तमच्छरियं भणइ मुणिं नमिय रणसूरो ॥ ३८ ॥ दुकरदिक्खाए ते मज्झमसत्तस्स कहसु गिहिधम्म "दिजइ न जओ दुद्धं रोइंमि रसाहिए अहवा" ॥ ३९ ॥ भणइ मुणी गयरायं देवं आयरसु उज्झिय सरावं । मुत्तूण कामधेणुं किं गिण्हइ गदहिं कोवि ॥ १२४०॥ नाणालोए गुरुणो गिण्हसु रविणोध जयपवित्तकरे । परिहरिऊण कुगुरुणो बहलनिसीहेब तमवहुले ॥ ४१ ॥ अंगीकरेसु धम्म सोक्खकर दुहयरं चइय पावं । मुत्तुमजरमरममयं को मभुकरं गरं गिलइ ॥ ४२ ॥ कप्पदुमंव वंछियफलयं आयरसु उत्तमं तत्तं । किंपागं पिव संमोहकारयं मा पुण अतत्तं ।। ४३ ॥ HARY ॥ ३५॥ ELEEN UCUCUCLICK नैवेद्य- पूजायां भुवन- प्रमोदक- कथा पत्तारिवि एयाइ सुदेवगुरुधम्मतत्तरूवाइ । नारयतिरियनरामरगईउ चउरो अवहरन्ति ॥४४॥ एय पवयणसार काउ- मसत्तो समग्गमवि भयो । एकचिय जिणपूय कुणति भवा जिणिंदाण ॥ ४५ ॥ सवाओ वि य सत्तो कार्ड नेवज्जपूयमे- फापि । कुधतो दुकम्म पाणी पडिहणइ सद्यपि ॥ ४६॥ भुजइ जंवा तवा रविउदयत्थमणमझयारम्मि । दिज्जइ जिणस्स ता भो कयाइ योवपि पुनकए ॥४७॥ पाविजइ परलोए अणतमप्पपि इहभवे दिन्न । धन्न ववियं थोवपि फलइ त नूण पहुगुणियं ॥४८॥ नियविद्दवसमुचिएहिं महुराहारेहिं मोयगाईहिं । जिणमचन्ता सासयतित्ति पावन्ति भणिय च ॥४९॥ "सणतित्तिएण लब्भइ नेवजेण जमक्खया तित्ती । त सासयसिवसुहतिर्ति तित्थनाहस्स माहप्प" ॥ १२५०॥ ता जइ सासयसिवसुहतित्तिं वछसि अहो महासत्त । ता कुणसु देवपूय दाउ भत्तीए नेवज ॥५१॥ सो आह अज पत्ता चिंता- मणिकामघेणुकप्पदुमा । रनम्मिवि ज' जाय मह पहु तुह्दसणममोहं ॥५२॥ ता इहपरलोयहियं कहियं तुन्भेहिं ज तय काह । को नाम सिरिमुर्षिति पहणइ पायप्पहारेण ॥५३॥ इय जपिय नमिय मुर्णि चलिओ सदणपुरम्मि सपत्तो । मोया- विय सालिप्पियवहुय गहिउ तय वलिओ ॥ ५४ ॥ गुरुवेयवाहणेहिं थेवदिणेहिं पि नियपुरे पत्तो। पणमित्तु मोयगा सासुयाए पहुयाए उवणीया ॥५५॥ तीए वि सयणभवणेसु पेसिया समुचियफमेण ते। अहवा उचियायरण कुलगणाणं कुलायारो ॥५६ ॥ बहुदुक्खेलानालियरक्सडकप्पूरमिस्सिओ एगो । दिन्नो रणसूरस्सावि मोयगो माणयपमाणो ॥५७॥ वधुरगध तं गिहिऊण लग्गो सगेहमग्गे सो। अतो रमंतसद्धम्मपरिणई चिंतए एव ॥ ५८ ॥ एएण भक्खिएणं जाव- जीव न होहिही तित्ती । जाव मुहे ता सुरसो एसो पोट्टंगतो असुई ॥ ५९ ॥ ता इमिणो सुरसेणं भक्खेण करेमि देवनेयज । ज मह पच्छा दुलहो एवविह उत्तमाहारो॥१२६०॥ इय चितिऊण वलिउ चलिओ मग्गे जिर्णिदभवणस्स। "अहव पमातो काउ कि जुज्जइ धम्मकम्मम्मि" ॥६१ ॥ गच्छंतो सपत्तो जिणालयं नियई सुरविमाणंव। अनिलचलद्धय- כתבותכתבתכתבתברכתכתבו

लाल
श्रीअनन्त-
नाथचरि-
त्रादुद्धृतं
पूजाष्टकम्
नैवेद्य-
पूजायां
भुवन-
प्रमोदक-
॥३६॥
रणझणिरकिंकिणीनियररमणीयं ॥ ६२.॥ जम्मि जिणसम्मुहानिलचालियवलिनिहियसेयकुसुमाई । पूएउंव जिणिंदं जंताई
जवेण सोहंति ॥ ६३ ॥ पुप्फोवहारचुंबणपराइं बहुचंचरीयचक्काई। जम्मि जिणवंदयतुट्टकम्मनियलाइंव सहन्तिं
॥ ६४ ॥ तम्मि पविट्ठो पेच्छइ पसंतकंतं जिणेसरं रिसह। जय जय जय तिजयपहुत्ति जंपिरो नमइ भत्तीए
॥ ६५ ॥ चित्तभंतरअसमुल्लसंतबहुमाणजायरोमंचो। आणंदवसपवित्तं सुविसरजलधोयगंडयलो ॥६६ ॥ तं पाव-
मोयगं मोयगंसयं मुयइ सामिकरकमले । सहलत्तं कलयंतो सजम्मजीवियनरत्ताणं ॥ ६७ ॥ पुणरवि पणमित्तु पहुं
खोणीमंडलमिलन्तभालयलं । पत्तो निययावासे सो उकंठियपियापासे ॥ ६८ ॥ अन्नोन्नं मिलियाणं ताणुप्पन्नो महासु-
हुक्करिसो। "अवरे वि निए मिलिए होइ सुहं किं न कंताए" ॥ ६९ ॥ कइया वि तस्स कंता वुत्ता सालिप्पियप्पिय-
यमाए। किं स्वरसो सो तुह पियस्स जो मोयगो दिन्नो ॥ १२७० ॥ तं सोउं सा चिंतइ किं मह न पिएण दिन-
मद्धपि । “जइवा न वल्लहेवि हु लोहपराणं हवइ नेहो" ॥ ७१ ॥ नियघरजुत्ताजुत्ता वत्ता नन्नस्स साहिउँ जुत्ता । इय
चिंतिय तीउत्तं अचंतं तम्मि रसवत्ता ॥७२॥ धणरहियाणवि गेहे लोओ पेसइ जमुत्तमं वत्थु । किं पुण ससुरकु-
लम्मि वि सेसओ तम्मिवि धणड्ढे ॥ ७३ ॥ इय जंपिय नियगेहे पत्ता पियविसयजायअवमाणा । विष्फुरियफारअरई
उवविट्ठा दूरमुबिग्गा ॥ ७४ ॥ वामकरक्खित्तमुही सरलस्सासा अलद्धलक्खत्थी। पियगयअणप्पकुवियप्पकप्पणुप्पन्न-
संतावा ॥७५॥ चिंतइ पिएणमविभइय मज्झ न कयाइ अत्तणा भुत्तं । अजं तु सुयमिमं "नो दीसइ किं जीवमाणेहिं"
॥ ७६ ॥ तं चिय निवससि महमाणसंमि न तरामि तं विणा ठाउं । इय मायावयणेहिं अहमप्पवसा कया तेण ||७७॥
धुत्तपउत्तीहिं नरा एवं रमणीओ वेलवेऊण । निम्मल्लमालियाउव कयकज्जा ज्झत्ति उज्झंति ।। ७८ ॥ मंदमईओ अविवेइ-
णीओ तुच्छाओ अपढियसुयाओ । वरईओ विप्पयारिय विडा विडंबंति विलयाओ ॥ ७९ ॥ जेत्तियमेत्ता विजा हुंति
॥ ३६॥

नैवेद्य- पूजायां भुवन- प्रमोदक- कथा पवधावि तेत्तिया नूण | तो पुरिसेहिं सवसयाओ सुद्धमहिलाओ कीरति ॥ १२८० ॥ दुधिलसियाइ काउ कुवियपियाए तमुत्तर दिति । नियसच्छयाए सद्या(सथा) इमेत्ति मनति तो ताओ ।। ८१ ॥ इय चितावसअञ्चंतजायवरविसयविस- यविदेसा । त चेव गरुयवेरग्गकारण धरइ हिययमि ।। ८२ ।। पइविदेसवसाएवि तीए मुफ न विनयकरणिज । "लपति न रहाओवि फुलवहुयाओ कुलायार" ॥ ८३॥ तेणेवय वेरग्गेण भत्तुणो मोइऊणमत्ताण । पडिवन्ना बालतव नयर न मुयइ पिएणुसय ॥ ८४ ॥ रणसूरो पुण सरलस्सहावओ सरइ नियगुरुकमणे । दीणाइयाण दाणाइ देइ न करेइ अन्नाय ॥ ८५ ॥ एव मज्झिमपरिणामवससमजियनराउ निवरिद्धी । मरिऊण भुवणतिलयाभिहपुरनिवनदणो जाओ ८६ ॥ तन्भज्जावि तवज्जियविजाहररिद्धिभोयसभारा। मरिय सुया तुह जाया रहनेउरचफवालपुरे ॥ ८७ ।।। पुधिल(ल)भवम्मि मया पुरिसबसेण सजुया जमिमा । इह जम्मेवि तमुबहइ तुह सुया निव नरबेस ॥ ८८ ॥ भणिय केवलिणा नहयरिंद तुह कनयाए पुरिसम्मि । विदेसकारणमिमं पयासिय पुच्छमाणस्स ॥ ८९ ॥ त सोउं जाईस- रणनाणविनायनियभवा भणइ । पहु त तहेव सचं तुम्भेहिं जहा समक्खाय ॥ १२९० ॥ तो सो ससुओ नयकेवली गओ नियपुरे खयरराया। जाया य निहियप्पा नियामिमाणे भुवणलच्छी ॥ ९१ ॥ चिंतइ महाणुभावेण तेण वइया न विरइयमजुत्त । जं मोयगेण विहिया पूया देवाहिदेवस्स ॥ ९२॥ तइया दइए सरले वि दुखियप्प पकप्पमाणीए । महिलाण मए पयडीकयं धुव तुच्छपयइत्त ।। ९३ ॥ जइ ह त पुच्छती ता सो तइयावि मह पयासतो। जं पुच्छिएण तेण कयाइ वट्ठोत्तर न कयं ॥ ९४ ॥ इय चिंतंती जाया पियम्मि पोढाणुराइणी वाला। नियदुधिलसियसुमरणउविं- विरफुरियरणरणया ।। ९५ ॥ चत्तो रत्तोवि पिओ भवम्मि पुचे इमाए कुवियप्पा । इय चिंतिय कुविएणव कामेण सरेहिं पइया सा॥ ९६ ॥ दाहो वाहो कंपो हियए नयणेसु देहजबीए । तलंचिय तीए सजाया सत्तिया भावा ॥ ९७ ॥ टाटाना תבכוכתכתבת בכתבתכנת 15Pार अनन्त०७ साen श्रीअनन्त- नाथचरि- TES नैवेद्य- पूजायाँ पूजाष्टकम् सुचन- प्रमोदक- कथा ॥३७॥ अरईसूयगसिकारवसविणिक्खंतरत्तदंतपहं । हिययंमि अमायन्तं उवमइ पियाणुरायं व ॥ ९८॥ असुहपसरप्पकंपिर- करजुचनहसुत्तिकतिपसरेण । धवलंती चंदणरसपंकेणव ताविलं देहं ।। ९९ ॥ इयं पसरियनियपियविरहतावदावग्गि- दज्झमाणतणू । उक्वेयावेयवसा बाला कडं दुसं पत्ता ॥ १३०० ॥ गरुयाणुणयपुरस्सरपुच्छंतसहीणं साहिओ तीए । पुवप्पियम्मि भुवणप्पमोयगे निवसुए नेहो ॥ १॥ भणई य जइ तमहं पुबभवपियं हे सहीओ न लहेमि । देमि धुवं ता जलणस्स आहुई नियसरीरेण ॥२॥ नहयरनाहस्स सहीहि साहिओ तीए निवसुए राओ। तो से तोसो जाओ सुयाए कुमराणुरत्ताए ॥ ३ ॥ जंपइ पन्नत्तिं देवयं निवो देवि आणसु कुमारं । अचाहियं न जायइ जा महजीवियस- मसुयाए ॥ ४ ॥ तो इह देवी पत्ता पत्ते कुमरम्मि रम्ममुजाणं । काऊण किंनरीपेच्छणच्छलं तीए हरिओ सो ॥ ५ ॥ नेउं रहनेउरचकवालनयरम्मि नहयरिंदस्स । सो उवणीओ तीए सह कुमरीए पमोएण ॥ ६॥ कयगोरवेण कुमरस्स राइणा कहिय कंनयाचरियं । भणियं पुत्वभवपियं परिणसु तं वच्छ मह दुहियं ॥ ७ ॥ तं सोउं जाईसरणनायनियपुव- जम्मवुत्तंतो । जंपइ तए जमुत्तं काहं सबंपि तं किंतु ॥ ८॥ हरिए मए ममंबापिऊण जायं भविस्सइ दुहंतं । जेण न होहिंति पहूणि ताणि नियपाणधरणस्स ॥ ९॥ तयणु नहयरनिवेणं कुमारकुसलप्पउत्तिकहणकए। तुम्हंतियम्मि पंन- त्तिदेवया पेसिया एत्थ ॥ १३१० ॥ एवं समहिट्ठिय सालिभंजियं कणयथंभयग्गाओ। अवयरिय मए कहिओ तुह सुयअवहरणवुत्तंतो ॥ ११ ॥ इय भणिऊणुच्छलिउं सट्ठाणे सालिहंजिया पत्ता । अत्थाणजणो सबोवि विम्हिओ नरव- इप्पमुहो ॥ १२॥ जंपति सवसामंतमंतिणो देव पेच्छ अच्छरियं । जं जंपति सजीवारमणीओव रयणपडिमाओ ॥ १३ ॥ देवोचिय पुन्नपयं जस्स सयं खेयरी ठिया वहुया । किं कामदुहा घेणू अभदनरगेहमल्लियइ ॥ १४ ॥ एवं जंपंताणं ताणं सो वासरो वइकंतो। माणियसुहनिदाणं झडित्ति रयणिवि अवसरिया ॥ १५॥ काऊण दिणयरोदय- ॥३७॥ UE नैवेद्य- पूजायां भुवन- प्रमोदक- कथा करणिन रइयरम्मसिंगारो। उवविसइ सहाए निवो नमंतसामतमन्तियणो ॥१६॥ एत्थंतरे निलचलइयावलीरण- झणन्तर्फिकिणिय । मणिकिरणभरियभुवणं विमाणविंदं समणुपत्तं ॥ १७ ॥ गयणंगणमुफविमाणचका नीहारिय नहरय- निवेदि । अणुगम्मतो सालयभुयलग्गो आगओ कुमरो ॥१८॥ अत्थाणसन्निविट्ठ जणयं पणमइ महिमिलियमउली । तेणावि गाढमालिंगिऊणमापुच्छिओ कुसल ॥ १९ ॥ पुणरुत्त पणमिय भणइ ताय कुसलं तुहप्पसाएण । कयजणणिपय- प्पणई उवविठ्ठो पिउपयासन्ने ।। १३२० ॥ सह नहयराहिवइणा रना काऊणमुचियपडिवत्ति । उववेसिओ निए सो मणिमयसीहासणद्धम्मि ॥२१॥ सेसावि खयरपहुणो पणमिय दिन्नासणेसु उवविट्ठा । पणयाए वहुआए भव पुत्तवइत्ति भणइ निवो ॥ २२ ॥ तो सा पणमित्तु कुमारमायर वामपासमुवविठ्ठा । सुयहरणाविणय समसु राय इय भणइ खय- रवई ॥ २३ ॥ जइ न हरावेतो ह तणय ता सुया मरती मे । विहिओ मए अनाओ इमो सुयाजीवणनिमित्तं ॥ २४ ॥ रायाह एस अनओ न होइ खयरिंद नणु इमा नीई । "समयाणुवत्तणं बहुगुण च ज सो नरिंदनओ" ॥२५॥ खयरा- हिय बदुसुइमिच्छिरेहिं कट्ठ सहिज्जए थोव । किमणतसिवसुहत्थे कट्ठ न कुणंति मुणिवसहा ॥ २६ ॥ विणओचिय एसो अविणओवि अहिय नारद तुह मन्ने । कन्ना तए विइन्ना जं मह भूगोयरसुयस्स ॥ २७ ॥ इय जंपिय सम्माणो तस्स कतो राइणा खयरपहुणो । परिवारजुयरस जहा सविम्हओ सो हिओ दूर ॥ २८॥ एवं नरवरसम्माणकरणसंजा- यसमहियसिणेहा । ठाऊण दिवसदुग सट्टाणे खेयरा पत्ता ॥ २९ ॥ नवकतासजुत्तो विविहविणोएहिं कीलइ कुमारो। उवविसइ य अत्याणे पिउपासे उभयसझपि ॥ १३३० ॥ कइयावि परभवोचियसुकन्जकरणुजएण नरवइणा ।गुरुरिद्धि- वित्यरेण कुमरो अहिसिंचिओ रज्जे ॥ ३१॥ तो मोहमल्लनामस्स सूरिणो पायपउममणुसरि । गहिया दिक्खा रना तविय तव सो सिव पत्तो ॥ ३२॥ नवनिवई वि नएण पालेइ पयं विणिग्गहइ दुढे । समुवज्जइ विमलजसं कुणइ य । ENanाया गावात E वासपूजायां श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुन्द्धृतं पूजाष्टकम् गन्धबन्धुर कथा ॥३८॥ ))) सद्धम्मकिरियाओ ॥ ३३ ॥ कइयावि रणज्झणमाणकिंकिणीगणविमाणमारुहिउं । गंतुं मंदरनंदीसरेसु सासयजिणे थुणइ ॥ ३४ ॥ सुहृसिविणसूइयसुर्य कइयावि प्पसविया भुवणलच्छी। भुवणाभरणोत्ति कयं नामं सम्माणिय जणं से ॥ ३५ ॥ बालत्तमइकतो गाहियबावत्तरीकलो कुमरो । अञ्चब्भुयरूवातो विवाहितो रायकन्नातो ॥ ३६ ।। समय- तरम्मि रजे भुवणाभरणं निवेसिउं राया। विहियवओ वरनाणी होउं पत्तो महाणंदं ॥३७॥ नेवजेणं पूया जहा कया राइणा इमेण तहा । सासयसिवसुहकज्जे कज्जा अवरेणवि जणेण ।। ३८॥ 8 ॥ नैवेद्यपूजा ॥8- ++ ++ भुवणप्पमोयगनिवो कहिओ नेवाजपूयमभिसरिउं । इहि तु वासपूयाए गंधबंधुरकहं भणिमो ॥ ३९ ॥ ५॥ ॥ ॥ ॥ रम्मारामसरोवरपुक्खरिणिविरायमाणचउपासं । वसुहासारं नयरं समत्थि वित्थिन्नपायारं ॥ १३४० ॥ नहस- निहफालिहगयणलग्गजिणहरसिरगमग्गठिओ। खणमेचं लक्खिज्जइ जम्मि रवी रयणकलसोब ॥४१॥ रयणियर- किरणसियकित्तिबंधुरो कित्तिवंधुरो नाम । फुरियप्पयावपसरो पयावइ अस्थि तत्थ पुरे ॥ ४२॥ धरणिधररइयसेवो जो विजयाणंदकारओ दूरं । अहिजाइकयविणासो चिरायए गरुडपक्खिध ॥ ४३॥ सबुत्तमपत्ताहियच्छायापरमालिया सुहप्पसवा । लइयत्व कित्तिलइया समत्थि रन्नो महादेवी ॥ ४४ ॥ तीएत्थि तणुत्थसुगंधबंधुरो गंधबंधुरो नाम । कुमरो अमरोवमरूवरम्मयारमणिमणहरणो ॥ ४५ ॥ सुकया सियवन्नधरं सिरंव उवहइ जो नियसरीरं । परमहसिय- गुणजुत्तः मुहमिव रयणाभरणजाय ॥ ४६॥ नरनाहमंडलेसरसामंतमहन्तमंतिपुत्तेहिं । सययं सेविनंतो कालं अइवाहइ कुमारो ॥ ४७ ॥ कइयावि नियप्पासायचंदसालागवक्खमल्लीणो। विविहविणोयक्खित्तो जा चिट्ठइ सह वयस्सेहिं ।। ४८।। ताव सहसत्ति एगो फीरो नियपक्खनीलकन्तीए। हरियालीकलियंपिव नहं कुणतो समणुपत्तो ॥४९॥ ॥३८॥ +- अच्छरिय जणयन्तो जणरस कुमरफमे नभेउ सो। मदुरगिर पयडक्खरमेवं विनविउमारद्धो॥१३५०॥ आरामाहिय वासपूजायां वासो रायसुओ रत्तवयणविन्नासो। तुममिव कुमर अहपि हु तेणाह त समल्लीणो ॥५१॥ ता आयन्नसु कजेणमागतो| गन्धबन्धुर- जेण विन्नवेमि तय । निफजाओ पवित्तीओ हुति जइवा न सपणाण ॥ ५२ ॥ त सोऊण पर्यपइ कुमरो कीराहिराय कथा उवविसिउ । रयणासणम्मि साहसु तो सो उवविसिय साहेइ ॥ ५३ ॥ अस्थिरयाहियतुरय अत्थिरयाहियसुवन्न-: । परदाण । अस्थिरयाहियजणं उदयाणदाभिह नयर ॥ ५४॥ तम्मि नमिरनरेसरसिरसोणमणिप्पहापिसगपओ । उदि- यप्पयावराया समस्थि वित्थरियजसपसरो ॥ ५५ ॥ सच्छप्पयई कालुस्सहारिणी सारसोहसजुत्ता । उदयावलिब . उदयावली पिया अत्यि नरवइणो ॥५६॥ विलसंतविमलससाकयसयवत्तालिचफसखोहा । उदयस्सिरित्ति उदय- स्सिरिघ तीए समत्थि सुया ॥५७ ॥ सरलसहावा नियनासियब सिहणस्सिरिब सुपवित्ता । दूर रत्त अहर व धरइ जा वयणविन्नास ॥ ५८॥ निरुवमरूव कमणीयजोषण तं समग्गसोग्ग । अवलोइउ जुवाणा वहति दूर मणुम्माय ! ॥५९॥ दखूण तहहरिणच्छिपेच्छिय तीए नीइनिउणा वि । मुणिणोवि अणप्पवसा हवन्ति कि निधिवेयातो ॥ १३६०॥ कइयावि सा सहीयणसहिया सिंगारगारवग्यविया । आरुहिय कणयमणिमयसुहासणं चलिरसियचमरा ॥ ६१ ॥ मुत्तावचूलविलसतछत्तअतरियतरणिकरपसरा । सहयारसारमुजाणमागया कीलिउ वाला ॥ ६२॥ परि- पषफुट्टदाडिमवीयावलिनिद्धदन्तपतीहिं । हसइब ज नरेसरसुयासमागमणतोसेण ॥ ६३॥ विलसतकुसुमलइयासिय- कलियाचकयालकलिय जं। कुमरीसगवसुल्लसियपुलयपन्भारभरियव ॥ ६४ ॥ अवयवणकयलीहरदक्खामडवमणोमि- राममि । संमि पविठ्ठा बहुकुसुमपरिमलब्भमिरभमरमि ॥ ६५ ॥ पेच्छइ अतुच्छअच्छरियकारयं नरमुई मगर सा । विलसिरसुतारचदयविरायमाणं नहयलंध ॥ ६६ ॥ मुत्तावलइयमरगयकुडलकरच्छुरियनिम्मलकवोल । चदणमयणा- onaneLnlaenial_ UZUCUZZI LCE ध वासपूजायां गन्धवन्धुर- कथा श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रावृत्त पूजाष्टकम् ॥ ३९॥ हीरेहरइयबहुभंगिपत्तव ॥ ६७ ॥ भमरउलकालकुंतलधम्मिल्लुल्लसियसियकुसुममालं । सामचउद्दसिनिसिदिस्सविमलरय- णीयरकलंव ॥ ६८ ॥ दर्दु कुमरिं नियचरणचारसंचाररणिरघग्घरिओ । गंतूण संमुहो भणइ कुमरि तुह सागयं एत्थ ॥ ६९ ॥ एहि इहं च वणंतो कयलीहरए सदक्खमंडवए । उवविसि आयन्नसु जं किंपि' अहं तुह कहेमि ॥१३७०॥ तं अवलोइय अच्चन्मएकहेउं सहीउ सा भणइ । कोऊलमवलोयह जमिमो दीसइ नरमऊरो ॥ ७१ ॥ तह वाहरइ सविणयं मं किंपि हु मज्झ कहिउमिच्छन्तो। ता तं आयन्नेमो उववसिउं साहए जमिमो ॥७२॥ जंपति ताउ सामिणि तुम्हाऽऽणचिय पमाणमम्हाण । कजेसु समग्गेसु वि किं पुण एवंविहच्छरिए ।। ७३ ॥ तं सोउं मुक्कसुहासणावि कुमरी सुहासणे ठाइ । उवविद्वासु सहीसुं कहिउं लग्गो नरमऊरो ॥ ७४ ॥ अस्थि गरिडसुरट्ठाविसिवसुहावयंससंकासं । वसुहावयंसयं नाम नयरमइरम्मरमणियणं ॥ ७५ ॥ रयणावयंसयनिवो तं पालइ जो रणागयंपि रिउ । अस्सत्थ- मुभयहाविहु मुंचइ अस्सत्थमवि सदओ ॥७६॥ तत्थ निवमाणणिजो पुज्जो पउराण पउरगुणभवणं । दीहरदिट्ठी सेट्ठी निवसइ नयवद्धणो नाम ॥ ७७ ॥ तस्सत्थि भाइपुत्तो सुरूववंतो धणावहो नाम । उवरयजणउत्ति करेइ तस्स गुरुगोरवं सेट्ठी ।। ७८ ॥ मुत्तूण नियंगरुहे वियरइ वत्थाइ तस्स परमं से । अहव "गुरुयासयाणं अप्पपरवियारणा नस्थि" ॥ ७९ ॥ परिणाविओ य उम्मीलमाणनवजोबणाभिरामतणुं । धणसेडिसुयं नामेण धणवई सीलकुलभवणं ॥ १३८० ॥ कइयावि हु असुहोदयवसओ सो सेहिमाह मह ताय । वियरसु घरस्सिरीए अद्धं भिन्नो भविस्समहं ॥ ८१ ॥ तं सोऊण 'पयंपइ सेट्ठी किं वच्छ एवमुल्लवसि । तं मोतुं को अंनो घरस्सिरीसामिओ कहसु ॥ ८२ ॥ अच्चभुयभोयअमाणदाणकन्जे धणवयं कुणसु । अणुकूलंमि मए वच्छ तुज्झ को नाम पडिकूलो ॥ ८३ ॥ अवरं च तमेगागी पडिवालसु जाव पुत्तउप्पत्तिं । नूणं जं न मुणेमो वियंभियं विहिविलासस्स ॥ ८४ ॥ इय जंपिओवि न मुयइ ॥ ३९॥ LCU ae לתבכתבתכתבתי Tencu22 वासपूजायां गन्धबन्धुर. कथा कुरगाह तयणु ससुरयस्सावि । न कुणइ भणियमजोग्गाणहवा कत्तो गुणाहाण ।। ८५ ॥ तो एगते कंताए जपिओ नाह एव फि भणसि । मा पेच्छसु अच्छीहिं हियएण सुदीहमिक्खेसु ॥८६॥ निश्चित सपज्जइ सबंपि ठियाण गुरुसमीवमि। लवणंपि सचिंताए भविही भिन्नट्ठियाण पुणो ॥ ८७ ।। कस्सइ पुन्नेण इमा लच्छी उल्लसइ नजइ न एय । ता का नाम कुबुद्धी तुम्हाणं भवह ज भिन्ना ॥ ८८ ॥ इय तीउत्तो जपइ तुच्छमई त न पेच्छसि किमेय । अहमेगागी एय गरुयफुडुन सिरी जाइ ।। ८९ ॥ इय जपिय सेहिसयासओ सिरिं विभइउ ठिओ भिन्नो। काराविय च गरुय तिभूमिय तेण धवलहर ॥ १३९० ॥ पारद्धो ववहरिउ जलथलमग्गेसु भूरिदविणे स । वुड्डिनिमित्तं दितो दव पहुयाइवी न लेइ ॥ ९१ ॥ तुरयारूढो माऊरछत्तअतरियतरणिसतावो। हिंडइ वणिउत्तचूहावेढिओ रम्मासिंगारो ॥ ९२ ॥ नो सयणाण न मित्ताण नेव लिंगीण जायगाणवि नो। वियरइ कस्सइ किंपि हु दिति दइयपि वारेइ ॥ ९३ ॥ कूडध- वहारेहि हत्थ चिय वच्छ गच्छिही लच्छी। इय सेहिपउत्तो भणइ ताय सगिह विचिंतेसु ॥ ९४ ॥ गहियधणाओ लोगोवि किंपि से देइ सेट्ठिलज्जाए । “दूरे गुरुण आणा तेसिं लज्जावि सिरिजणणी" ॥ ९५॥ देव(ब)वसेण कालकमेण पचत्तमुवगओ सेट्ठी । पच्छा सो निस्सको अहियअरे कुणइ ववहारे ॥९६।। अह तस्स असुहवसओ सिरी समग्गावि नासिउ लग्गा । मग्गिजतो लोगो दुवयणे देइ नो दध ॥९७॥ देसतरेसु वि ठिया वणिउत्ता जायभूरिधणलाहा । दिहावि लोहिउमल लच्छी किं नो सहत्थगया ॥ ९८॥ सो निक्खिणिही नूण दाहइ न कयाइ म सुपत्ताण । इय भीयव सिरी भिन्नपवहणा सायरे मग्गा ॥ ९९ ॥ देइ न कणपि कस्सइ एसो बहुधनसगहपरोधि । इय भाविअ कुविएणव दडा जलणेण कोद्वारा ॥ १४०० ॥ नवि जाओ नयभोगो किमस्स ता निरुवयारिदविणेण । इय चितिऊणव तय नीय सत्तेण चोरेहि ॥१॥ इगालचिय जाया धणे निहाणीकए कुकम्मवसा । अवरदविणजणासा कुओ करत्थे विण- להבהבהבהבהבהבהבהבהבהבהבהבהבהבהבת श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्धृतं जाष्टकम् वासपूजायां गन्धबन्धुर कथा ॥४०॥ स्सन्ते ॥२॥ सयमवि दिन्नं न लहइ जणाओ कत्तो कलंतरधणं सो। "उयरहियतणयासा का अंगुलिलग्गसुयमरणे" ॥ ३॥ मग्गियजणनीयाई न मग्गमाणोवि लहइ रित्थाई । नियवत्थुपि न लब्भइ जत्थ कहिं तत्थ परवत्थु ॥ ४ ॥ ससुरेणावि विइन्नं बहुवाराओ धणं तयपि गयं । “पत्तावि सिरी झिज्जइ नूणमकल्लाणकलियाण" ॥ ५॥ किं बहुणा संजायं दत्वं सबंपि से कहासेसं । तो दुटुं सीयंत कंतं कंता विहियविणया ॥ ६ ॥ उल्लवइ दइय तइया न कयं कस्सावि जंपियं तुमए । जइवा दुइवाभिहयाण होइ एवंविहकुबुद्धी ॥ ७ ॥ इय जंपिऊण तीए ववहारकए समप्पियं पइणो । निययाभरणं अहवा "पइभत्ता होइ कुलकंता" ॥८॥ तंपि हु कइवि हु दिवसेहिं पेसियं तेण पुबधणमग्गे। अहवा जं जं खिप्पइ हुयासणो दहइ तं तंपि ॥ ९ ॥ पच्छारच्छाइंवि विकिऊण भुत्ताई तेण सवाई। आयविहूणे वित्ते वइज्जमाणे कुओ रिद्धी ॥ १४१० ॥ घरहट्टोवरि गहिऊण कंचणे भक्खियंमि तेसिपि । मुक्को अहव अभग्गाण जाइ पिउदिन्न- मवि रज ॥ ११ ॥ जर्सि देयं दुखं न तेसि पासाउ लहइ अवरत्थ । गंतुं तो तत्थेवय निवसइ अच्चंतदोगचो ॥ १२ ॥ जो वसिओ धवलहरे विचित्तचित्ते तिभूमिए सययं । सो वसइ ताव जलसीयधूमिओ जलकुडीरम्मि ॥ १३ ॥ जो मंदपवणपरितरलसिक्किरिच्छायमस्सिओ भमिओ। विक्यकजे सो भमइ कट्ठहारकयच्छाओ ॥ १४ ॥ जो संसुत्तो दोलाचलंतपल्लंकतूलियासु सया । सो सुयइ दुब्भसत्थरयमुवगओ बाहुउवहाणो ॥ १५॥ पडिजद्दरंबरेहिं सिंगारो जेण सबया विहिओ । बहुछिदडंडियाई परिहइ सो मलिणवत्थाई ॥ १६ ॥ जो गरुयतुरंगसुहासणेसु आरुहिय सबया भमिओ। परियडइ फुडणखंजंतपयजुत्तो सोणुवाहणओ ॥ १७ ॥ नवरं इस्सरियम्भिव दारिदेवि हु पिया न तं मुयइ । "उदयक्खएसु दइए समचित्ताओ सईउ सया" ॥१८॥ अइसुहिओ होउं सो अचंतं दुहभरं समणुहवइ । पाविय संपुन्न- सिरी किं खंडिज्जइ नय मयंको ॥ १९॥ समयंतरम्मि कम्मिवि वीवाहे सेट्ठिपुत्तकन्नाए। पारद्धे नयरजणो निमंतिओ । ॥४०॥ 4 वासपूजाया गन्धवन्धुर कथा भोयणनिमित्त ॥ १४२० ॥ सो चिंतइ अज निमतण इहागच्छिही अओ मज्झ। बत्तणकन्ने जुन्जइ सडाइआहे- रणगमण नो ॥ २१॥ गेहेचिय अच्छिस्स जमिह निमंतयनरो खडप्फुडिही। इय चितंतो तत्थ हिओ दिणप्पहर- जुयल जा ॥ २२ ॥ मज्झंदिणेवि जाए जा को विन से निमंतओ पत्तो। ता परिभावइ एव नाह नाओ गिहठि- ओत्ति ॥ २३ ॥ वा जामि तत्थ सयमवि नियघरगमणम्मि मज्झ का लज्जा। अगयरस पुणो सयणा लहु रुसिरसति जा जीव ॥ २४ ॥ इय कहियं कन्ताए सा जपइ नाह मोहमूढोसि । धणिणो सहोयरेणवि दरिदिणा किं न लजन्ति ॥ २५ ॥ नाह कुचेलोत्ति दरिदिओत्ति ववहारकरणअखमोत्ति । न निमतिओ धुवं फुणसु नियमणे मा तुम भंति ॥ २६ ॥ न कयाइ मज्झ भणियं तए कय कुणसु सपयपि तुम । ज पडिहाइ मणे तं जइ जपिय सा ठिया मोणे ॥ २७ ॥ इय सगयपि भणिरि अवगंनिय त गओ स वीवाहे । “अहव हियाहियविसये कुओ विवेओ जडमईण" ॥ २८ ॥ अभुक्षणभदासणउववेसणपायसोहणप्पमुहं । विरइज्जतिं पेच्छइ पडिवत्ति ईसरजणस्स ।। २९ ॥ तबो- लकरे विरइयविलेवणे पत्तपट्टउयवत्थे । भुत्तुत्तरे पलोयइ निग्गच्छन्ते धणड्डनरे ॥३०॥ अब्भुक्खणपि न लहइ आस- णपयसोयणाइ कत्तो सो। तो तयफडाहिजलेणन्मुक्खिय धोयए पाए ॥ ३१॥ उवविट्ठो पडिवालइ आमतणमत्तणो निरिक्खइ य। वाहरिय गोरवेणं भोइजतं परजणपि ॥ ३२ ॥ विहिय अदिस्सीकरणेब तम्मि दिदिपि न खिवए कोवि । दूरे चिट्ठउ पफ न वजणप्पमुहभोज से ॥ ३३ ॥ तस्स तह सठियस्सवि दिणमद्धप्पहरसेसय जाय । भोजत्थे निवसन्ति पेच्छइ पज्जतपतिं सो ॥ ३४ ॥ चिंतइ य कि अवन्ना इमाणमहवाउलत्तमश्चत । ज मह नियडा भोयणकज्जे नीया न चेव अहं ॥ ३५ ॥ ता जामि सममिमेहिं भुजामि निए गिहमि का लज्जा । एवं परिभावन्तो पत्तो नर- पंतिमझमि ॥ ३६ ॥ दोपासरुंदभदासणोवविट्ठाण ईसरनराण । मज्झे उवविठ्ठो गहियभायणो विट्ठरे नीए ॥ ३७॥ Pene ) जा श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्धृत पूजाष्टकम् वासपूजायाँ गन्धबन्धुर कथा ॥४१॥ Manus nen पित्तलपडिग्गहट्ठियगुरुपरियलजुयलमिलणअंतरियं । भूमिगयभायणं से नयणाणमगोयरं जायं ॥ ३८॥ खजूरद- क्खदाडिमअंबयखारकसकराईयं । दिन्नं अन्नाण न दायगेण से भायणं दिढ ॥ ३९ ॥ तह सालिसूवसालणयसप्पि- पक्कन्नपेयपमुहाण । किंपि न क्खित्तं अदिस्सभूमितलमुक्कथाले से ॥ १४४० ॥ दण दहिविमिस्सं भुंजतो फुरियगरुय- अवमाणो । सिररइयभायणो तेसिमग्गओ नच्चिरो पढइ ॥४१॥ "हे दारिद्र्य नमस्तुभ्यं सिद्धोऽहं त्वत्प्रसादतः । जग- स्पश्यामि येनाहं न मां पश्यति कश्चन" ॥ ४२ ॥ एए मह जणयसहोयरस्स पुत्तत्ति भायरो मज्झ ।भाउज्जायाउ इमाउ भाइणिज्जा इमे सत्वे ॥ ४३ ॥ जह मंततंतविज्जाइएहिं सिद्धा हवन्ति अदिस्सा । जाणह तहा ममंपि हु नूणं दारिद- सिद्धोत्ति ॥ ४४ ॥ जइ होमि न सिद्धोहं ता दिट्ठो किं निएहिं वि इमेहिं । सयणेहिं सवेहिंवि भोयणकरणोवविठ्ठोवि ॥ ४५ ॥ सोजनं सुहिभावं सयणत्तं परिचयं च दक्खिन्नं । कुणइ धणड्डेण समं दरिदिणा नेव सबजणो ॥ ४६ ।। जे भोयणवत्थाइबवहारे काउमक्खमा नूणं । जह मह तह अन्नाणवि न कीरए कावि पडिवत्ती ॥४७॥ सुद्धा जाई सवुत्तमं कुलं निम्मला कलाओवि । धणरहियाण न किंचिवि सयावि जेणेरिसं भणियं ॥ ४८ ॥ "जाई कुलं कलाओ तिन्निवि पविसंतु कंदरे विवरे । अत्थोच्चिय परिवड्डउ जेण गुणा पायडा हुंति" ॥ ४९ ॥ केणावि कारणेणं न इमेहिं पलोइतो इय भणंतो । नीहरि सो अवमाणदूमिओ नियगिहं पत्तो॥१४५०॥ पिय मइ वारंतीएवि न ढिओ ता एत्ति- यस्स जोग्गो तं । इय जपिरीए भज्जाए भोइओ सीयरबाइ ॥ ५१ ॥ दारिदेणं दूर दूमिजं तस्स तस्स वचन्ति । दिवसा विसायवसयस्स अन्नया सो गओ रने ॥५२॥ पेच्छइ य तरुछायाए संनिविढे मुणीसरे संते। सिद्धंतसुंदरक्खे दक्खे सिक्खाए साहूण ॥ ५३ ॥ जे समयग्गंथा इव सहति आयारवाणसमवाया। विन्नाया धम्मकहापण्हवायरण- परमाया ॥ ५४॥ धणनाससयणपरिहवदुस्सहदोगच्चदूमियगणो सो। ते दळूण सुहोदयवसओ तेसिं गतो पासं ॥५५॥ ॥४१॥ १ वासपूजायां गन्धबन्धुर कथा भत्तिभरनिन्भरगो पणमिय पयकमलमिलियभालयलो। उवविठ्ठो जपइ पहु गिहिजोग्गं कहह मह धम्मं ॥५६॥ आह पहू आयन्नसु नारयतेरिच्छनरसुरविभेया। भवइ भवो चउभेओ दुहमेवय चउसुवि गईसु ॥ ५७ ॥ पाणि- वहप्पमुहमहापावा निवडति पाणिणोणेगे। नरएसु तेसु वि सहति वेयणं विरसमारसिरा ॥ ५८॥ तिरियनरभवंतरिया पुणरुत्तणुभूयसपनरयदुहा । वहुसो वि तिरिच्छते सहन्ति समुवजिऊण दुह ॥ ५९॥ सासयविरोहवहवाहदो- हमसासिमारणाईणि । असुहाई समणुहविऊण केवि अज्जति मणुयत्तं ॥१४६०॥ तम्मि वि धम्मविरहिया दीणा दारिद्द- दुइभरफता । विहलीहूयमणोरहमाला परिभवपर्य हुँति ॥ ६१ ॥ देवावि परप्पेसत्तदुसहईसाविसायवियलगा। अत्ता- णामकयसुकय निंदता दुहमणुवति ॥ ६२ ॥ एव पावंति सुह न गइचउकेवि धम्मपरिहीणा । धणवज्जियप विवणीए नियमणोभिमयवरवत्यु ॥ ६३ ॥ ता धम्मोचिय कज्जो दुविहो सो साहुगिहिविभेएहिं । पढमे दसेव भेया भेया वीयम्मि वारस उ ॥ ६४ ॥ समत्तजुया दोन्निवि दिति सिव तपि मुणसु समत्त । गयरायदेव-निग्गथसुगुरु-नवतत्तस- हहणा ॥ ६५ ॥ एगयरपि असत्तो धम काउं करेइ भावेणं । अट्ठप्पयारपूय जिणाण ज सा वि सिवजणणी ॥६६॥ नेवजकुसुमअक्खयदीवयफलसालिधूववासेहिं । इय अट्ठविहा पूया कया जिणिंदाण भवहरणी ॥ ६७ ॥ अट्ठवि काउ- मसत्तो सत्तो जइ कुणइ वासपूर्यपि । तित्थेसरस्स ता जाइ तस्स पावं जओ भणियं ॥ ६८॥ घणसारहरिणनाही- सुयंधवरवासखेयपूयमिसा । जिणपवणसगमेणव पावरयं दूरमुडेइ ॥ ६९ ॥ ता धम्मसील पत्तं मणुयत्तं मा मुहा तुम नेसु । समुवजसु वासेहिंवि पूइत्तु जिणं परमपुन्नं ॥ १४७० ॥ इय सो सो सद्धम्मदेसणं सूरिणो नमिय भणइ । पहु मह महापसाओ कओ इम साहिउ धम्मं ॥ ७१॥ नूण निरीहा तुम्भे परोक्यारेकबद्धवावारा । जं मह दरिदियस्सवि एव धम्म समाइसह ॥ ७२ ॥ इय जंपिय पणयगुरु गहियतणाई गओ गिहे नियए । कहिओ य भारियाए पूयाफल- בולובוביכולתכתבותכתכוכתכוכתכהלכה 212NPP2121 nanenaleel 21212121212 तY y श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्धृतं पूजाष्टकम् वासपूजायाँ गन्धवन्धुरस कथा ॥४२॥ सवणवुत्तंतो ॥ ७३ ॥ तीउत्तमहम्मफलं पिय तुह सबंपि कुणसु ता धम्मं । जेण न भवंतरेवि हु विडंबणा एरिसी होइ ।। ७४ ॥ तेणुत्तमिमं काहं जंपेऊ. गंधियावणम्मि गओ। तेण भारयमुल्लेणं गहिया सवुत्तमा वासा ॥ ७५ ॥ तत्तो हिययन्भन्तरवियंभिओदामभत्तिपत्भारो । जिणमंदिरंमि चलिओ रयणमए तम्मि पत्तो य ॥७६॥ सच्छपफालिहदी- हरदंडेनिलपसरिया सियवडाया । जम्मि सुरेहिंवि नज़इ सविम्हयं गयणगंगव ॥ ७७ ॥ कंकेल्लितमालवणेसु जस्स पविसंति रयणकरदंडा। रागहोसवणारयणमुक्कजिणरायवाणव ॥ ७८ ॥ तो सो पहिठ्ठचित्तो तम्मि पविट्ठो विसिट्ठ- जिणभवणे । उवसन्तकन्तरूवं अवलोयइ उसहजिणनाहं ।। ७९ ।। तो विप्फुरंतबहुमाणपसरवसपुलयकलियतणुजडी । आणंदअंसुजलभरपक्खालियवयणवच्छयलो ॥१४८०॥ उल्लसियमणो वियसन्तलोयणो कुणइ सुरहिवासेहिं । पूर्व पहुणो नियजस्मसहलयं मन्नमाणो सो ॥ ८१ ॥ असरिसबहुमाणवसो पुणरुत्तं भूमितलमिलियभालो । पणमिय पलोइय चिरं जिणेसरं आगतो सगिहे ॥ ८२ ॥ कहियं पियाए वासेहि जिणवरो पूइओत्ति तो सावि । बंधइ अणुवमपुन्नं पसंस- माणी इमं अटुं ॥ ८३ ॥ कइयावि दोवि निययाउअंतमणुसरिय मरिय जायाई । अमरत्तेणं आरणकप्पे सुररायसरि- साई॥ ८४ ॥ एगवीससागराइं भुत्तुं सुरलोयलच्छिविच्छई । सिद्धाययणजिणचणकरणजियसुकयसंभारा ॥ ८५ ॥ चविय तओ वसुहासारपट्टणे कित्तिवंधुरनिवस्स । जाओ धणावहसुरो पुत्तो असमाणगुणजुत्तो ।। ८६ ॥ धणवइ- अमरोवि पुणो उदयाशंदे पुरम्मि उप्पन्ना । उदियप्पयावरनो कन्ना उदयस्सिरी नाम ॥ ८७ ॥ हुँतो हं पुषभवे तुह जणओ मरिय बारसमकप्पे । वावीससायराऊ संजाओ भासुरो अमरो ॥ ८८ ॥ तं जोवणमणुपत्ता पत्ता कीलाकए इहुज्जाणे । पुत्रविदेहा वलिओ वंदिय जंगमजिणिंदे ह ॥ ८९॥ मह दिद्विपहे पत्ता उल्लसिओ पुचभवभयो नेहो । नाया य ओहिणा पुवभवसुया तं तओ ज्झत्ति ॥१४९०॥ कयनरमऊररूवेण एत्य उववेसि मप कुमरि । तुह पुषभवा MARA 4 ॥ ४२ ॥ 卐 पासपूजायां गन्धवन्धुर- कथा 212EELBRUS HENEUerleucle दोनिवि कहिया नियभवद्गेण सम ॥ ९१ ॥ त सोउ कुमरी जाइसरणसञ्चवियपुधभवचरिया। सिरिगंधवधुरम्मि अणुरत्ता पुधभवदइए ॥ ९२ ॥ तो इत्ति नरमऊरो चलकुडलहारकठकयसोहो । जाओ अमरो बहुरविपयावप- मारदुरिक्खो ॥ ९३ ॥ तो सा कयप्पणामा पूयइ त सुरहिपरमवत्थूहिं । "इयरम्मि वि कुलवाला विणयवई किन्न जणयमि" ॥ ९४ ॥ जपइ य ताय तुमए जह कहिय तह मएवि सचविय । पुषभवहुगचरियं सिविणे दिवसाणुभूयं व ॥९५॥ ता तुमए मह कहिओ जो पुधभवुभवो पिओ कुमरो । इण्हिपि तं वरिस्स "सईओ न नरतरमईओ" ॥९६॥ आह सुरो रिद्धीकरी पूया अणुमोइयावि तुह जाया। फलइ वहु येवपिहु वीय वविय सुभूमीए ॥ ९७ ॥ तो विट्ठपञ्चया त करेज धम्मुज्जम सया वच्छे । "निच्छइए कल्लाणे न पमाओ जुज्जए जइवा" ॥ ९८ ॥ एव धम्मुवएस दाउ सहसा तिरोहिओ तियसो । कुमरी वि गधबधुरकुमरे रत्ता गया सगिहे ॥ ९९ ॥ न मुणइ छुई न पावइ निद न वियाणए तिस बाला । जलणज्जालाजलियव विरहविहुरा वहइ देह ।।१५००॥ मन्नइ वीयव सा चित्तसालियं मुम्मुरंपिव मुणालं । आभरण दुम्मरणव पावपूर व कप्पूर ॥ १॥ एवमवत्थ कुमरि दलूण सहीओ तीए नरवइणो । साहिति पुषभवभवद- इए रत्ता तुह सुयत्ति ॥ २ ॥ नाऊण निवेणवि सहिमुहेण दुहियाए पुषभवदइय । फन्नपि जाणिउ पियविओयसहणा- सह दूर ॥ ३ ॥ तघेलञ्चिय मडलियमतिसामतधाइसजुत्ता । वलकलिया पट्टविया सयंवरा कन्नया तुज्झ ॥४॥ तीए अह सत्थकहाकविणोएसु सधया सचिवो। तो त मोयावेउ त वद्धाविउमिह पत्तो ॥५॥ चउपचदिवसमज्झे सावि हु तुह पुधभवपिया एही। इय विन्नविउ कुमर कीरो मोण समल्लीणो ॥ ६ ॥ त सोउ जाईसरणनायनियपुषभवदुगो कुमरो। फुमरिं पइ जायढाणुरायवसपरवसो जाओ ॥ ७॥ चिंतइ तइया दइया निश्चपि हिय पयपमाणीवि । न मए विणव गणिया अहो अहकारमूढेण ॥ ८ ॥ दुद्दत्तोवि दरिदोवि दुम्मुहोवि हु सईए तीए अहं । ईसरसेहिसुयाएवि Rien כותבתכתבותכרביבו EMAN ia नाकात

श्रीअनन्त-
नाथचरि-
त्रादुद्धृतं
पूजाष्टकम्
वासपूजायां
गन्धवन्धुर-
कथा
॥४३॥
पुवभवे नेव परिहरिओ ॥९॥ ताहमवि पुवभवभवकंतं मोत्तुं न काहमन्नर्पियं । रंजिजइ इहभविएवि किं न परभवभवे-
रत्ते ॥ १५१० ॥ इय परिभाविय विज्जावणट्ठ नियमुद्दियाउ कीरस्सा । निक्खिवइ चरणजुयले कंठमि पुणो रयणकडयं
॥ ११ ॥ भणइय कीर तुमं उभयहावि सउणो कहेसि कल्लाणं । नहि निग्गुणाण एवंरूवपवित्ती हवइ नियमा ॥ १२ ॥
ता तं गंतुं कुमरीए कहसु कीरेस इय मह पइन्नं । तीए जहा संपन्जइ मह विसए मणसमाहाणं ॥ १३ ॥ आएसोत्ति
भणित्ता. तयणु सुओ उड्डिऊण संपत्तो । कुमरीपासे सोऊण तं ठिया सावि संतुट्ठा ॥१४|| कुमरवयंसेहिं इमं सबंपि हु
साहियं नरिंदरस । तं सोउं तेणुत्तं किमजुत्तमिमम्मि कल्लाणे ॥ १५॥ जं गुरुयरायकुमरी सयंवरा एइ गुरुनिवसुयस्स ।
इहभवभवावि किं पुण भवन्तरुप्पत्तअणुराया ॥१६॥ इय जंपिय कारविया पुरसोहा राइणा पहिढेण । मोत्तुं वीवाहमहं
गिहीण परमूसवो नन्नो॥१७|| पञ्चोणीए तीए पेसइ सामन्तमंतिमंडलिए। “गोरवमियरेवि गुरू विरयइ किं नोणुरायपरे"
॥ १८ ॥ आवासदाणसम्माणकरणसमुहपसागयं तीसे । विहियमियरोवि अतिहि पुज्जो किं पुण नरिंदसुया ॥ १९ ॥
उत्तमलग्गे कुमरो कुमरिं वीवाहिओ नरिंदेण । कुलवुड्डिकरे कजे किं कोइ पमायमायरइ ।। १५२० ॥ तीए सह विसय
सोक्खं माणइ कुणइ य सुधम्मकम्मं सो । इहलोइयपरलोइयकजेसु समुज्जया गरुया ॥ २१ ॥ समयंतरम्मि कम्मिवि
कुमरं रज्जंमि ठविय नरनाहो । कयपचजो संजायकेवलो मोक्खमणुपत्तो ॥ २२ ॥ नवनिवई नीईए पालइ रजं अभि-
हवइ दुहे। सिढे पूयइ मन्नइ महायणं गुणिगुणे थुणइ ॥ २३ ॥. एवं निरवजसरजकजकरणुज्जयस्स नरवइयो ।
जंति दिणाई दिणमणिकरभरसरिसप्पयावस्स ॥ २४ ॥ जाओ कयाइ देवीए तीए सुहलक्खगो सुओ तस्त । काउं
वद्धावणयं नामं गुणवंधुरोत्ति कयं ॥ २५ ।। लालिज्जतो धाईहिं वद्धिओ जाव पंचवरिसाइं । परिपाढिओ य अज्झा-
वएहिं सबाउ वि कलाओ ॥२६।। पत्तो य जोवणं तरुणकामिणी नयणमणहरं रंना । परिणाविओ नरिंदाण रम्मरूवाओ
॥४३॥

पासपूजायां गन्धवन्धुर- कथा 21211 कलाओ ॥ २७ ॥ दहु त रजमहाभरधरणसमत्थमुत्तमे लगे । अहिसिंचइ तियरजे राया रिद्धिप्पवघेण ॥ २८ ॥ कागविऊण जिणइदमदिराई गिरिंदरुदाइ । सूरीहिं पइटाविय मणिमयतित्थेसरे तेसु ।। २९ ।। सिद्धंतपोत्थयाइ लिहा- विउ पूइउ च सिरिसघ । घोसाविउ अमारिं मोयाविय सबगुत्तिनरे ॥ १५३०॥ आरुहिय रयगसिविय दितो दाणाइ दीणदुत्थाण । गुरुरिद्धीए गतूण सुगुरुपासमि पवइओ ॥ ३१ ॥ अहिगयसुयसन्भावा पाउन्भूयप्पभूयसवेगो। निम्मू- तुम्मूलियघाइकम्मयसपत्तनवनाणो ॥ ३२ ॥ महुरस्सरसद्देसणपडिवोहियभूरिसबसघाओ। सपत्तो सो सासयसोक्ख- समिसीए सिद्धीर ॥ ३३ ।। ण्यस्स वासपूया जह जाया सिद्धिसोक्खसजणणी । तह अन्नस्सवि जायइ जइयब ता सया तीए॥३४॥ प्रयासपूजा ॥ ॥ इय तिहुयणसामिअणन्तनाहकहियम्मि अट्ठपूयफले। बहुमाणपसअकलिओ कयंवपरिमल मदीनाहो ॥ ३५ ॥ ॥ इति श्रीअनतनावचरित्रगतपूजाप्टककथानकानि । समाप्तोय अन्यः ॥ श्रीरस्तु ।। शुभ भवतु ॥ ॥भीः ॥ यादृश पुस्तक वीक्ष्य तादृश लिखित मया ॥ हीनाधिक्यैः स्वरैर्वगैरस्माक दूपण नहि ॥ १ ॥ -r-dir ॥ धम्मधरुद्धरणमहावराहजिणचदसुरिसिरसाण । सिरिअम्मएवसूरीण पायपक्रयपरेणेह ॥ १॥ सिरिविजयसेणगणहर- कणिट्ठजसदेवसूरिजेडेहि । सिरिनेमिचंदसूरीहि भवलोभओवएसट्टा ॥ २ ॥ सयमेव कयाउ अणतसामिजिणरायचारु- चरियाउ । पूयट्ठगमुद्धरिय त नउ तिहुयण जा उ ॥ ३ ॥ पचक्सरगणणाए सिलोगमाणेणमेत्थ जायाइ । पूयहगम्मि सयरीसमहियअट्ठारससयाइ ॥ ४ ॥ छ । प्रथान १८७० ।। छ । श्रीः ।। श्रीः॥ * ॥ * ॥ * ॥ * ॥ Urail- IN Tuestil כתבתכחכחכתכתבות ena2P2121 .

निवेदनम्. श्रीअनन्त- नाथचरि- संपादकीय निवेदन अनंत कल्याणकारी श्री अनंतनाथप्रभु प्रसादित अतिसुन्दर कथाओंसे युक्त श्री पूजाष्टक वाचकोंके करकमलोंमें समर्पण करते अति आनंद होता है, इस चरित्रकी प्रेसकापी संवत् १९९४ में सूरत में ही तैयार हो चुकी थी, परंतु प्रकाशित करनेका सौभाग्य इस वर्ष पंन्यासप्रवर श्री सुमति विजयजी गणिवर्यादिकी प्रेरणा द्वारा इन गृहस्थोने प्राप्त किया है, पूजाष्टकम् सहायक नाम नकल नकल ॥४४॥ मुकाम अच्छारी कोपरली वापी शाह रायचंद गुलाबचंद दलाजी जेताजी धनराज खीमचंद , रायचंद हरखचंद छगनलाल प्रेमचंद कस्तुरचंद धनाजी मगनीराम रामसुख हरखचंद वालाजी चुनीलाल जसरूपजी ज्वेरचंद प्रेमचंद शाह केसरीचंद परागजी २०० १२५ १२० १०० ५१ ५१ 卐 सहायक नाम मुकाम शाह धनजी ज्वेरभाइ वापी नगीनचंद धूलाजी २५ , रायचंद प्रागजी २५ , पूनमचंद वीरचंद २५ विद्वान् वाचक और व्याख्याता इस ग्रंथरत्नसे अनंतलाभ उठावें इति शम् आ. विजयक्षमाभद्रसूरि मोरी बेडा (मारवाड) अक्षयतृतीया सं. १९९७ अच्छारी वापी ५० ५० ५० ५० ॥४४॥ देगाम कोपरली ५० ज'

Shri Anantnathcharitadudhant Poojashtkam

Author
Suri, Vijayshamabhadra
Title
Shri Anantnathcharitadudhant Poojashtkam
File name
Shri Anantnathcharitadudhant Poojashtkam
Text
OCR done
Citation
1940
Published
2011/02
Publisher
Bhilad, (gujarat)shah Raichand Gulabchand
Language
Sanskrit
Pages
89
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
549944
Barcode
99999990030782.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
IT4obzFUjK5
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