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Amart Manthan

Dr. Nangal Shasttri · 2011/01

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विद्याभवन-संस्कृत-ग्रन्थमाला
२५
ज्यालय
अमृत-मन्थन
अथवा
जीवन का दिव्य पक्ष
प्रन्यकार
विद्यामार्तण्ड ( का० वि०)
डॉक्टर मङ्गलदेव शास्त्री
एम० ए०, डी.फिल. (ऑक्सन)
पूर्व प्रिंसिपल, गवर्नमेंट संस्कृत कालेज, बनारस
(भारतीय संस्कृति सम्मेलन के तत्त्वावधान में प्रकाशित)
चौखम्वा विद्याभवन. बनारस-१

प्रकाशक
चौखम्बाविद्या भवन,
चौक, बनारस-१
The Chombambs Vidya Bhairan
Chomb, Banaras
| INDIA)
प्रथम सस्करण
सन् १९५६ ई०
मूल्प xn)
मुद्रा--विद्यापिलास प्रेस, बनारस-१
"

FOREIVORD Fuman life, with its infinite complexities and contradictions, presents a veritable riddle which seems to baffle all solution. If it 38 sorrow and misery looked at from one side, it 18 the basis of blissful perfection and eternal progre9sion viewed from another. The polarities of lıfe are facts of experience and cannot be explained away by reasoning. Sobe attempt to bring them round to a higher synthesis where sorrow and joy lose their known earthly values and appear to assume a Divine meaning. Others however recognise the reality of both and emphasise the brighter side of life seeking to draw out the best that it contains. They do not look upon sorrow as a necessary eya 1 but as a chastening principle intended for discipline and purification, The following pages represent such an attempt. The author, in elegant and easily intelligible Sanskrit verges with a luminous rendering into Hindi prose, tries to analyse 11fe as it is found and places his views in three parts before the readers for their appreciation. PAGT I deals with the aim of life and tho basis on which lıfe with this arm deserves to be founded. This basis 18 held to be Brahmg.- charya or Restraint, on which every scheme of education, to be worth the name, must be based. PART II dwells on the noble and ethical qualities which form the backbone of a progre- 881ve lıfe aspiring after spiritual perfect These qualities include among others int [ 2 ] of character, truthfulness, purity of heart, fortitude, mental poise, vigilance and golfintrospection. These constitute the Path which leads to the Goal. It is a diffcult path, but it has to be trodden by one in quest of Perfection and Bliss. PART III describes the highest stage of life,' where passions have been conquered and tranquility achieved. This stage marks the fulfilment of life, being the realisation of its unity with the Highest Being Whose infinite love, compassion and power are responsible for the upkeep of creation. The first emergence of life out of primitive matter, its passage through different grades of matter and its transcendence into Puro Spirit in the end, with the possibility of infinite progression in future, have been beautifully described. The three stages of the learned author remind one of the well-Inown three stages of the Mystic Way, víz, furgation, Illumination and Unitive Lifo. the work 28 throughout inspired by lofty Vcdic Idoalism and is a beautiful handbook which ought to be in the hands of every earnest youth, at least of every Sanskrit student. Belng free from sectarian idcologies and abs. truse expressions of a technical naturo it is calculated to be intolligible to all readers and helpful to those in pursuit of Truth, Good and Beauty Varanasi Gopinath Kaviraj 11-8-1856 ( Mahamahopadhyaya, M. A., D. Litt.)

-- महामहोपाध्याय डाक्टर गोपीनाथ कविराज M. A,D Litt द्वारा लिखित प्राक्थन का अनुवाद प्राक्कथन अनेकानेक प्रकार के वैपम्यों और विरोधों से समन्वित मानव-जीवन वस्तुत एक ऐसी समस्या है जिसका समाधान अत्यन्त कठिन है। यदि एक दृष्टि से वह केवल शोक रूप और दुःस रूप है, तो दूसरी दृष्टि से यह आनन्दमय पूर्णता और अनन्त समुत्कर्प का आधार भी है। जीवन के स्वरूप की ये परस्पर विरुद्ध दिशाएँ आनुभविक तथ्य है और किसी ताकि व्यारया द्वारा उनका अपलाप नहीं किया जा सकता। कुछ लोग उनको एकत्र कर ऐसे उत्कृष्टतर समन्वय की स्थिति में लाने का प्रयत्न करते हैं, जिसमे शोक और हर्प अपने लोक प्रसिद्ध मूल्यों को छोड पर एक दिव्य अभिप्राय को ग्रहण करते हुए प्रतीत होने लगते है । दूसरे लोग शोक और हर्प दोनों की पास्नविकता को स्वीकार करते हुए भी, जीवन में जो घुछ अच्छाई है उसी को लेने की दृष्टि से, जीवन के प्रकाशमय पक्ष पर ही बल देते है। वे शोक और दुःख को एक अपरिहार्य बुराई के रूप में न देसकर पिनयन और आत्मशुद्धि को लानेवाले एक पवित्रता- धायक तत्त्व के रूप में ही देखते है । प्रकृत ग्रन्थ में इसी प्रकार का प्रयत्न किया गया है । अपने अभिप्राय को स्पष्ट करनेवाले विशद हिन्दी गद्यानुवाद से युक्त ललित तथा सरल- सुबोध सस्कृत पद्यों द्वारा प्रन्या ने जीवन के वास्तविक स्वरूप का विवेचन करते हुए अपने विचारों को तीन भागों में बड़े रोचक ढग से पाठकों के सामने रसने का प्रयत्न क्यिा है। प्रथम भाग में जीवन के प्रधान लक्ष्य और उसकी ओर प्रवृत्त जीवन के लिए आवश्यक मौलिक आधार का वर्णन किया गया है। ब्रह्मचर्य या सयम ही वह आधार है । वास्तविक शिक्षा की कोई भी योजना उसी पर सडी की जा सकती है। द्वितीय भाग में उन उदात्त और नैतिक गुणों की चर्चा है जिनको आध्यात्मिक पूर्णता के लिए सचेष्ट प्रगतिशील जीवन का मेरुदण्ड कहा जा सकता है। उनमे अन्य गुणों के साथ-साथ, चरिन की पवित्रतास--- [२] भावना, हृदय की स्वच्छता, धैर्य, चित्त की शान्ति, सतत-जागरूपता तथा अन्तः-समीक्षण-ये सम्मिलित है। ये ही गुण जीवन के प्रधान लक्ष्य को ओर ले जाने वाले मार्ग को बनाते हैं। वह मार्ग दुर्गम है : "दुर्ग पथ- स्तत् कवयो बदन्ति" पर आध्यात्मिक पूर्ण विकास और वास्तविक आनन्द की सोज में प्रवृत्त मनुष्य को उसी मार्ग से यात्रा करनी पड़ती है। सृतीय भाग में जीवन की उस उत्कृष्तम अवस्था का वर्णन है जब कि मनोविकारों को आक्रान्त कर मनुष्य स्थिर शान्ति को प्राप्त कर लेता है। इसी अवस्था में मनुष्य जीवन की वास्तविक चरितार्थता और कृतकरयता फा अनुभव करता है। जिसके अनन्त प्रेम, पारुण्य और शक्ति से समस्त विश्व का संचालन हो रहा है उस परमतत्त्व के साथ अपनी एकात्मता के अनुमय में ही जीवन की वास्तविक चरितार्थता निहित है। इसी भाग में पोरतमा स्वरूपिणी जडात्मक प्रकृति से चैतन्य का प्रारम्भिक विकास, प्रकृति की विभिन्न अवस्थाओं में से उसकी प्रगति, और अन्त में उत्तरोत्तर अनन्त उत्कर्प की संभावना से युक्त विशुद्ध चैतन्य के रूप की प्राप्ति का सुन्दर ढंग से वर्णन किया गया है। (दे० पृष्ठ ६५-६६) विद्वान् पंथकार द्वारा प्रतिपादित उफ तीनों अवस्थाओं से रहस्य- यादीय जीवन-श्रम की पिशुद्धो-करण, प्रकाश और अन-भावना इन तीन सुप्रसिद्ध अस्थाओं का स्मरण हो आता है। स्पष्टतः दोनों में साम्य है। आदि से अन्त तक खदाच घेदिक थादशी और मायनामों से मायित यह सुन्दर इस्त-पुस्तक प्रत्येक कर्तव्य-परायण नय-युपक के, कम से कम संस्कृत पढ़ने वाले प्रत्येक छात्र के, हायों में होनी चाहिए। संकीर्ण साम्प्रदायिक विवारचाप और दुर्योध पारिभाषिक शायली से नितरां रहित होने के कारण पुस्तक सय पाठकों के लिए सुबोध होने के साथ-साथ 'सत्यं शिवं सुन्दरम्' के थादर्श का अनुसरण करने वालों के लिए सहायक और उपयोगी सिद्ध होगी। याराणसी, ११-६.५६ गोपीनाथ कविराज विशेप सम्मतियाँ डाक्टर बाबूराम सक्सेना, एम० ए०, डी. लिट. अध्यक्ष, संस्कृत-प्राकृतमापा-विभाग, प्रयाग विश्वविद्यालय। डा. मंगलदेव शास्त्री का नया अन्य 'अमृतमन्यन' देखकर चित्त बहुत प्रसन्न हुआ। भारत के दर्शन पंडित अधिकाश में निराशावादी है, यद्यपि दर्शन या भूलतत्व आशा और श्रद्धा है । शास्त्रीजी ने अपने पूर्व-प्रकाशित रश्मिमाला नामक अन्य में अपनी श्राशावादी दृष्टि स्पष्ट की थी और उत्साही, क्रियाशील होने की प्रेरणा दी थी। प्रस्तुत अन्य में जीवन का वही दिव्यपक्ष और भी स्पष्ट हो गया है। भारतीय संस्कृति का दिव्य स्वरूप जो छिपा हुआ था श्रव वह निसर कर प्रकाश में आया है । इस दिव्य रूप का दर्शन करने में प्रन्यकार को स्वयं प्रेरणा वर्तमान युग के भारत के दिव्य रन तीन महापुरुषों से मिली है । लेखक का परिश्रम लापनीय है और हमें विश्वास है कि भारतीय समाज इस ग्रन्थरम का समुचित पादर करेगा और इससे लाभ उठायेगा। प्रराशक ने भी बाह्य रूप को सर्वया दिव्य बनाने में कोई बात उठा नहीं रक्खी। उनरा परिश्रम भी अभिनन्दनीय है। प्रोफेसर धर्मेन्द्रनाथ शास्त्री, एम० ए० अध्यक्ष, संस्कृत-विभाग, मेरठ कालेज, तथा संयोजक, संस्कृत बोर्ड, आगरा विश्वविद्यालय। मैं यह कहे बिना नहीं रह सकता कि 'अमृतमन्यन' के पाठ से मुझे स्क्य स्फूर्ति और प्रेरणा प्राप्त हुई है । आधुनिक युग के उन गिने चुने संस्कृत लेखकों में जिन्होंने नवीन भावों की अभिव्यञ्जना के लिये संस्कृत की व्यञ्जन-क्षमता का विकास किया है, डाक्टर मगलदेव शास्त्री का बहुत ही श्रादरणीय स्थान है । उन्होंने प्रबन्धप्रकाश के दोनों भागों द्वारा एक ऐसे उत्कृष्ट संस्कृत गद्य का नमूना प्रस्तुत किया है जिसमें प्राचीन लेख-पद्धति को अपनाते हुये नवीन भावों का प्रकाश है । प्रस्तुत प्रन्थ "अमृतमन्यन' में पद्यों द्वारा जीवन यात्रा के लिये उदात्त भावनाओं का पाथेय प्रस्तुत किया गया है। आधुनिक युग में स्फूति देने वाले अमृत के चूंट पीते हुये अमरवाणी संस्कृत का अभ्यास करने के लिये सरस्वती के एक वरद पुत्र ने हमारे लिये एक नवीन सामग्री प्रस्तुत कर दी

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ग्रन्थ-समर्पण
वन्दनीय गुरुजनों
के
चरणों मे

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:-
प्रस्तावना
ग्रन्थ-रचना का उद्देश्य
तत्वदर्शी मनीषियों को दृष्टि में मनुष्य-जीवन सदा से एक गम्भीर समस्या का
विषय रहा है । वैदिक वामय के सुप्रसिद्ध अन्य शतपथ ब्राह्मण (१३५२१ ) में
एक प्रसर में ठीक ही कहा है :-
को हि मनुष्यस्य वेद ?
अर्थात्, मानव की, मानव-जीवन की, समस्या का समाधान बड़ा कठिन है।
ऐतरेय आरण्यक (२॥३) में इसी तथ्य को अधिक स्पष्ट शब्दी में इस
प्रकार कहा है।
स एप पुरुपः समुद्रः।
अर्थात्, मनुष्य को एक प्रकार से 'समुद' ही समझना चाहिए। संसार को भी
कई दृष्टियों से 'समुद्र' कहा जाता रहा है। एक प्रकार से जीवन और संसार दोनों
समानार्थक है । क्रमश व्यष्टिगत और समष्टिगत दृष्टि-भेद से दोनों एक ही बात
की ओर संकेत करते हैं-
दोनों में अनन्त गाम्भीर्य है।
दोनों में विप और अमृत का स्थान है।
साथ ही, यह हमारे हाय में है कि उनमें से हम विष का उपभोग करें, या
अमृत रस का पान करें।
जीवन के सम्बन्ध में दो परस्पर-विरुद्ध दृष्टियों का वर्णन हम अन्यत्र विस्तार
से कर चुके हैं।
एक दृष्टि के अनुसार संसार और जीवन दुःखमय हैं। अतएव सर्वया हेय है।
जीवन घन्ध या कारागार के समान है। इसीलिए जीवन और संसार मिथ्या और
असार हैं । उनसे छुटकारा (या मोक्ष) पाना ही हमारा परम ध्येय होना चाहिए।
१. देखिए 'रश्मिमाला' पृ. ९-२९ तथा भूमिका पृ० १६) 'भारतीयसंस्कृति
का विकास प्रथमखण्ड, वैदिक घार' ० १.-..
tate-2५.
ANP

इस दुर्गम पर पर सफल यात्रा के लिए दात चरित्र, प्रशान्त मन, भाव-संशुद्धि अमोह तया धैर्य आदि की परम आवश्यकता होती है। तभी तो भुति ने -- नाविरतो दुखरितानाशान्तो नासमाहितः । नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ।। ( कठोपनिषद् १।२।२४) अर्थात, दुचरित्र, असंयत, अस्थिर-युद्धि और प्रशान्त मन वाला व्यक्ति सत्य को नहीं पा सकता। ऐसे हो पियारों के आधार पर इस जीवन पाथेयनामक द्वितीय भाग में माध्यामिक जीवन विकास के लिए परमोपयोगी आदर्श चिन्तन, चारिश्य-संपत्ति, भाव-संशुद्धि, सत्यावरण, इन्द्रिय-संगम, धैर्य, मत्सर माह में रिपयों का प्रतिपादन किया गया है। हत्तीय भाग ( प्रज्ञा प्रसाद) में श्राध्यामिक विकास की म Trazतर अवस्या का वर्णन है जय कि पलोन्मुस जीवन यात्रा का यानी, विपयासति और वामनायों से पर उठ कर, अपने परम लक्ष्य के प्रधाश में, समस्त विश्व का संचालन करने वाली, उसमें ओत-प्रोत (तु. "स प्रोत: प्रोवध विभू प्रभामु", यजुक ३८) और उससे थाहर भी अवस्थित, मौलिक महान् सत्ता के साथ अपने व्यक्तित्य के पनि सम्मन्य को देसता हुआ, अपने जीवन की वास्तविक चरितार्यता और कृतकृत्यता का अनुभव करता है। उस उत्तर श्रवस्या का मूल्यांकन किसी भी भौतिक संपत्ति अादि से नहीं किया जा सकता। यह तो स्वयं ही अपना मूल्य है। यही 'प्रमा-प्रसाद' को यवस्था है। इसी को शस्तव में 'सौम्या मनस्थितिः' कह सकते है। उच्च अवस्था का हो विशद वर्णन इस भाग में मूलतत्यानुभूति, आत्म तत्व. निवचन, मन-भावन, तत्वमाशातार इन थकान्तर सण्डों में अनेक रचनायों द्वारा किया गया है। उक्त तीनों भागों के अधिदेवता মন লস্যগণ ৪, গুম খ্রীষ্টে ৯৪ শ্যাম मानव-ओवन को प्रकाश और प्रेरणा के देने में, निर्विवाद रूप से प्रमुख स्थान स्वामी दयानन्द सरस्वती, महात्मा गांधी और परमहंम रामकृष्ण इन तीन महापुरुषों का है। उनके अपने अपने प्रभाव क्षेत्र के अनुसार अन्य के सोनों भागों थे दम भमरा, अधिदेवता केस में, उस महापुरुषों की सेवा में विनीत भाव से समरित रते हैं।

प्रक्रिया और शली पुस्तक को रचना शलो के विषय में हमें विशेष कहने की आवश्यकता नहीं है। हमारा सदा से यह सिद्धात रहा है कि किसी भी रचना के लिए उसमें प्रसाद गुण का होना अत्यावश्यक है । वही मिष्टान सर्वोत्तम समझा जाता है जिसके माधुर्य का रसास्वादन मुख में रखते ही होने लगता है। इसी तरह उसी रचना का विशेष महत्त्व होता है जिसको सुनने के साथ ही अविबोध होता जाता है और विचार की प्रगति में किञ्चिन्मान भी वाघा नहीं आती। भगवद्गीता, मनुस्मृति, वाल्मीकि रामायण जैसे प्रामाणिक प्रयों की लोकप्रियता और महत्ता का मुख्य रहस्य उनकी सरल, मुवोध और हृदयाकर्षक शैली में निहित है। दूसरे, हमारा विश्वास है कि सस्कृतभापा के प्रति जनता में अनुराग और आकर्षण उत्पस करने के लिए आधुनिक सस्कृत में उक्त प्रसाद गुण-वहुल स्वाभाविक शैली को ही अधिकाधिक अपनाना चाहिए। उपर्युक्त कारणों से ही प्रकृत प्रन्य की रचना शैली प्रारम्भ से अत तक स्वाभाविक प्रसाद गुण से विशिष्ट है । पढनेवाला अधिकारी व्यक्ति उसको पढ़ते पडते तन्मय हुए बिना नहीं रह सकता । पाठकवृन्द इसी प्रकार ग्रन्थ की रचनाओं का रसास्वादन कर सकें, यही प्रत्यकार का प्रथम ध्यय है । J - अमृतमन्यन की रचनाओं की दूसरी विशेषता उनकी श्रपारिभाषिकता है यथासभव इसी लक्ष्य को सामने रखा गया है कि विभिन्न विषयों का प्रतिपादन ऐसे शब्दों में और ऐसे ढग से किया जाय जिससे उनके अन्तर्हदय को, वास्तविक अभिप्राय को, किसी भी सप्रदाय, धर्म, सस्कृति या देश से सम्बन्ध रखनेवाला मनुष्य सरलता से हृदयगम कर सके । श्रन्न की भूख की तरह विचारों की भूख भी मनुष्य मात्र में स्वभावत पायी जाती है। यह सर्वया साध्य है कि उत्तम भोज्य पदार्थों के समान उत्कृष्ट विचारों को भी ऐसे रूप में रखा जावे कि वे सबको प्रिय हो। इसीलिए ऐसे विषयों के प्रतिपादन में जिनका सम्बन्ध मानव मान की समस्याओं से है अपारिभाषिकता का होना अत्यावश्यक है । विश्वविरयात उपनिषदों को हृदय प्राहिणी प्रतिपादनशैली प्राय इसी प्रकार की है। हमें पूर्ण आशा है कि किसी भी सप्रदाय, सस्कृति अथवा धर्म से सम्बन्ध रखने वाला व्यक्ति 'अमृत मन्यन' के भावों का रसास्वादन कर सकेगा। साथ ही हम यह भी समझते हैं कि सस्कृतभापा का विशेष ज्ञान न रखने वाले लोग भी 'अमृत मन्यन' को सरलता से समझ सकेंगे और उसके द्वारा अपने सस्कृत-झान को बढ़ा सकेंगे। [७] पुस्तक की पृष्ठभूमि जीवन और जीवन यात्रा के सम्बन्ध में प्रन्यकार के अपने कुछ ऐसे विचार हैं जिनको पृष्ठभूमि को समझे बिना प्रकृत अन्य की विशेषता को हृदयंगम करना कठिन है। वास्तय में अन्य को जो कुछ विशेषता है उसका बहुत बड़ा कारण उक्त पृष्ठ भूमि में ही निहित है । उन विचारों का दिग्दर्शन हम निम्नरूप में कर सकते हैं:- (१) जीवन में आशावाद, दूसरे शब्दों में, निराशायाः सम पापं मानवस्य न विद्यते । माननस्योन्नतिः सर्वा साफल्यं जीवनस्य च । चारिताध्यं तथा सृष्टेराशावादे प्रतिष्ठितम् ॥ आशा सर्वोत्तम ज्योतिर्निराशा परम तमः। (रश्मिमाला ११-३) अर्यात, मनुष्य के लिए निराशा के समान दूसरा पाप नहीं है। मनुष्य को सारी उमति, जीवन की सफलता और सृष्टि को चरितार्यता प्राशाशाद में ही प्रतिष्ठित है । श्राशा सर्वोत्कृष्ट प्रकाश है। निराशा घोर अन्धकार है। (२) प्रेम और करुणा के धाम भगवान की सधि में दुस को प्राप्ति निष्प्रयोजन नहीं हो सकती । उसको हमें अपने उत्तरोत्तर उत्कर्ष की प्राप्ति के लिए सीदी हो समझना चाहिए। इसीलिए उत्तरोत्तरमुत्कृष्टप्रगतायुत्सुक्स्तु य । दुसानां स्वागतं पुस्तत्त्वज्ञो नारसीदति ।। (रश्मिमाला ९९) अर्थात, तत्वज्ञानी मनुष्य जो अपने जीवन में उत्तरोत्तर उत्कृष्ट उन्नति के लिए उरमुक रहता है दुःखों का स्वागत करता हुआ उनमे रिपाद को नहीं प्राप्त होता । (३) उत्तरोत्तर समुरकर्ष की प्राप्ति ही हमारे जीवन का लक्ष्य है। क्योंकि, उत्तरोत्तरमुत्कर्पि जीवन शाश्वत हि न । (रश्मिमाला रा.) हमारा जीवन उत्तरोत्तर समुन्नति शोल और वास्तव में मदा रहने वाला है। (४) मूल तत्व के विषय में, परम सत्य के अन्येपण में, असाम्प्रदायिक भावना । क्योंकि मापासीमामतिरम्य ज्ञानगम्यं यथचन । स्वयम्, वस्तुनो नाम्ना रहितं तद्धि वर्तते ।। (रश्मिमाला ६०२)

अर्थात, मूलतत्त्व भाषा की सीमा को अतिक्रमण करके रहता है, अर्थात्
भाषा द्वारा उसके स्वरूप का वर्णन कठिन है । वह स्वयम्भू है, स्वयं सिद्ध है।
वास्तव में उसका कोई श्राना नाम नहीं है।
प्रस्तुत प्राय की विचारधारा को, उसकी विशेपता को, ययावत् हृदयंगम करने
के लिए उस पृष्टभूमि को समझ लेना आवश्यक है ।
इसीलिए प्रन्य के परिशिष्ट-भाग में इस विषय को और अधिक स्पष्ट करने का
हमने यन किया है।
उपसंहार
पूर्व-प्रकाशित अपनी पुस्तक रश्मिमाला (अथवा 'जीवनसंदेश-गीताजलि' ) की
रचनाओं के समान अमृतमन्यन की रचनायें भी समय समय पर आत्म-संतोष के
लिए ही लिखी जाती रही है । प्रात सायं के भ्रमण में, रेल आदि की याना में, और
कभी कमी साधारण से अवसर पर हो, उत्पन्न समस्याओं या विचार-तरनों से ही
इनके लिखने में प्रेरणा प्राप्त होती रही है। इनको क्यों प्रकाशित किया जा रहा है,
इसका उत्तर हम ऊपर दे चुके हैं।
'रश्मिमाला' के समान ही यह 'अमृतमन्थन' भी श्रद्धेय राजर्षि श्री पुरुषोत्तम-
दास टंडनजी की प्रेरणा और प्रस्ताव के कारण भारतीय संस्कृति-सम्मेलन' के
तत्त्वावधान में प्रकाशित किया जा रहा है। निस्सन्देह पुस्तक के लिए. यह विशेष
गौरव की बात है।
वड़ी प्रसन्नता का विषय है कि पुस्तक का प्रकाशन वाराणसी की सुप्रतिष्ठित
विद्याभवन संस्कृत ग्रन्थमाला में हो रहा है। इसके लिए हम प्रन्थमाला के उत्साही
और विद्याप्रेमी अध्यक्ष श्रीजयकृष्णदास गुप्तजी के विशेष कृतज्ञ हैं। कहने की आवश्यकता
नहीं है कि उन्होंने पुस्तक को शुद्ध और सुन्दर मुदित कराने में यथाशश्य प्रयत्न
किया है।
अन्त में हमारी यही हार्दिक कामना है कि
भद्रा भवतु नो वाणी तेभ्यो ये तामधीयते ।
भद्रा उत प्रशस्तयो जागृयाम पुरोहिताः ॥ १॥
यह वाणी पदने वालों के लिए कल्याणकारिणी हो । इस प्रन्य में दी हुई विभिन्न
विषयों को प्रशस्तियाँ (= वर्णन ) हृदयगम और कल्याण करने वाली हो । राष्ट्र-
निर्माण में मार्गप्रदर्शन करने वाले हम लोग अपने कर्तव्य पारन में सदा सावधान
और तत्पर रहें।
भद्राः सन्तु प्रशस्तयो भद्रा वाचो वचोविदः ।
जागृयाम पुरोहिताः ॥२॥

अन्धकार को प्रशस्तियों सुन्दर चौर मुसद सिद्ध हों। शब्दावली भी सब के हित-साधन में समर्म हो । जनता का मार्गप्रदर्शन करने वाले हम अन्यकार लोग अपने कर्तव्य पालन में सजग रहें। तमसस्परि पश्यन्तो नित्यं स्वर्ययमुत्तरम् । अभुवीमहि तज्ज्योतिरुत्तमं यदनामयम् ॥ ३॥ उत्कृष्टतर प्रकाश को आदर्शरूप में देखते हुए हम लोग, अशानान्धकार की वर्तमान अवस्था से झमश उपर उठकर, उस उत्तम प्रकाश को प्रार हो को सब प्रकार के अन्धकार से, महान से, और अपूर्णता से रहित है। वैदिक स्वाध्याय-मन्दिर, ज्योतिराधम, वाराणसी छावनी ज्ये कृष्ण ५, २०१३ (२९४५११९५६) मङ्गलदेव शासी विषय-सूची r अन्यसमर्पण प्रस्तावना शुद्धाशुद्धसूची मातृ भूमि का अभिनन्दन ( सस्कृत में वैदिक पद्धति से ऊपर के अभिनन्दन का हिन्दी में अनुवाद भारत्या सुप्रभातम् देववाणी का नव जागरण पृष्ठ [१] [३] [१५] १ २ सन्तो मधुग्रता ७ अमृत-मन्थनम् मगलावरणम् ९ प्रथम प्रवाह लक्ष्यानुसन्धान १ ब्रह्मचर्य सदेश ( = ब्रह्मचर्य का सदेश) १३ २ मतमात्मविशुद्धये - प्रत से यात्म-शुद्धि) ३ श्रात्मवत्तागुणोपेता ( ब्रह्मचारी को शिक्षा का स्वरूप) २८ ४ ब्रह्मचर्य तदिष्यताम् ( = ब्रह्मचर्य की महिमा) - ब्रह्मचारिण परेशस्तोत्रम् = प्रमचारी की ईश्वर प्रार्थना ) २९ द्वितीय प्रवाह जीवन-पाथेय ( : आदर्श-चिन्तन) ६ आदर्श चिन्तनम् ३७ चारित्र्य-सपत्ति चारित्र्य-सपत्ति ७ चारित्यमारमन स्वास्थ्यम् चारित्र्यं नरवक्षस्य सुगन्धि मुम शुभम् ( = चारित्र्य और आत्मा का स्वास्थ्य)३९ = चारित्र्य चर्चा) ८ । ११ ।

१९ ४७ (प्रसन्नता का मूल-खोत) (-अभिमान का आवरण) मत्वा धीरोच शोवति ४८ आरमानमभिमानोऽयं नूनमात्त्य तिष्ठति ४९ विहगोऽनन्त आकाणे ५० काठपुतलिका इच ५१ दिम्यजीवनमार्गस्थी मवेयमिति भावये -अनन्त की यात्रा) (3 = विश्व का सूत्रधार) (दिव्य शैशवी अवस्था) तत्त्वसाक्षात्कार परम-तत्व का साक्षात्कार ५२ यस्मात्परतरं नास्ति (%D समस्त शक्तियों का मूल स्रोत) तदहं नित्यमाश्रये ५३ तदहं नित्यमाश्रये (= मूल तत्व में आस्था) १०७ ५४ कृष्णेत्याकर्षक तत्त्वम् (- कृष्ण-तत्त्वमीमांसा) ११० ५५ आनन्दानुभूति (श्रानन्द की अनुभूति ) ११४ ५६ अनन्ते प्रगतेर्मामें (3 प्रगति का अनन्त मार्ग) ११४ ५७ सदानन्दो वसाम्यहम् ( = आनन्द निर भगवान् ) ११५ ५८ श्रयि विश्व-भावन 1 - भगवान की महिमा) विश्वमृद् । ११६ परिशिष्ट-भाग परिशिष्ट १-- (क) श्राशा सर्वोत्तमं ज्योतिः (= आशा सर्वोत्कृष्ट प्रकाश १२३ (ख) जीवनस्य रहस्यम् (=जीवन का रहस्य) १२४ (ग) संयतस्व जीवनाय (जीवन के लिएयरावर यन करी) १२६ (घ) दुःख-मीमांसा (-दुःख के स्वरूप पर विचार) १२७ (6) जीवने नाव्यसादृश्यम् (3 जीवन-नाट्य) १३४ (च) उत्तरोत्तरमुन्नतिः (3 उत्तरोत्तर उन्नति) १३५ परिशिष्ट २- तत्त्वमीमांसा (Dमूल-तत्त्व का विचार) परिशिष्ट ३- ओंकार-माहात्म्यम् (= ओंकार की महिमा) Gawo- [ १४ ] शुद्धाशुद्ध-सूची . पंक्ति अशुद्ध १० द्वितीय तृतीय २ तनो तमः श्लोक की संख्या ११॥ चाहिए cocramso-

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मातृभूमेरभिनन्दनम्
सा नो माता भारती भूबिभासताम्
येय देवी मधुना तर्पयन्ती
तिस्रो भूमीरुद्धृता द्योगपस्थात् |
कामान् दुग्धे विप्रकर्पत्यलक्ष्मी
मेधां श्रेष्ट मा सदास्मासु दध्यात् ॥ १ ॥
सर्वे वेदा उपनिषदश्च सर्या
धर्मग्रन्थाश्चापरे निधयो यस्याः ।
मृत्योर्मल्नमृतं ये दिशन्ति चै
सा नो माता भारती भृम्भिासताम् ॥ २ ॥
यां प्रच्युतामनु यज्ञा' प्रच्यवन्ते
उत्तिष्टन्ते ते भूय उत्तिष्ठमानाम् ।
यस्या व्रते प्रसवे धर्म एजते
सा नो माता भारती भूविभासताम् ।। ३ ।।
यां रक्षन्त्यनिशं प्रतियुध्यमाना
देवा ऋपयो मुनयो एप्रमादम् ।
राजर्षयोऽपि घनघाः साधुवर्याः
सा नो माता भारती भूर्षिभासताम् ॥ ४ ॥
महान्तोऽस्यां महिमानो निविष्टा
देवा गातुं यां क्षमन्ते न सद्य ।
सा नो वन्द्या भ्राजसा भ्राजमाना
माता भूमि प्रणुदतां सपनान् ॥ ५ ॥
अभिनन्दनमिदं पुण्य दिव्यभावैः समर्हितम् ।
मातृभूमेः पठनित्यमात्मकल्याणमरनुते ॥ ६ ॥

भारतीय संस्कृति की दृष्टि से
मातृभूमि का अभिनन्दन
विश्वप्रसिद्ध हमारी मातृभूमि भारत देदीप्यमान हो !
१. धुलोक से मानो अवतीर्ण,
तीनों लोकों को दिव्य माधुर्य से आपूर्ण करनेवाली,
अमिलषित कामनाओं को देनेवाली
तथा दुःख दारिद्रय ( अलक्ष्मी ) को हटानेवाली,
देवीस्वरूपिणी मारत-माता
सद्विचारों की साधना में हमारी सहायक हो !
२. मनुष्यों को मृत्यु से हटाकर
अमृतत्व की प्राप्ति का उपदेश देनेवाले
समस्त वेद, उपनिषद् तथा अन्य (बौद्ध, जैन आदि ) धर्म-ग्रन्थ
जिस के निधि स्वरूप हैं,
वह विश्वप्रसिद्ध हमारी मातृभूमि मारत देदीप्यमान हो !
३. जिसका अपकर्ष संसार में
घमाचरण के अपकर्ष का कारण होता है,
जिसके उत्कर्ष में धर्माचरण का उत्कर्ष निहित है,
जिससे धर्म को प्रेरणा प्राप्त होती है,
वह विश्वप्रसिद्ध हमारी मातृभूमि मारत देदीप्यमान हो!
[२]

४ देवगण, ऋषि, मुनि, राजर्षि
और पवित्रात्मा सन्त महात्मागण
सावधानता तथा तत्परता से
जिसके कल्याणमय स्वरूप को निरन्तर रक्षा करते आये हैं,
वह विश्वप्रसिद्ध हमारी मातृभूमि भारत देदीप्यमान हो!
५. जिसकी महिमा महान है,
देवगण भी जिसके स्वरूप का गान नहीं कर पाते,
समुज्ज्वल तेज से देदीप्यमान
वह सर्व लोक-चन्दनीय हमारी मातृभूमि
विरोधी शत्रुओं को शमन (निराकरण ) परमेवाली हा !
माहात्म्य
६ मातृभूमि भारत के दिव्य भावों से युक्त इस पवित्र अभिनन्दन का नित्य
पाठ करने वाला मनुष्य आत्मकल्याण को प्राप्त होगा।

भारत्याः खलु सुप्रभातमभितः संवर्धतां भारतम् ।
भारत्या भुवनेऽसिले पृथु यशस्तन्यद् बुधाना मन
साशावल्लरिकासुमानि विकचीकुत्तमो धारयत ।
नूनज्ञानरवे प्रकाशकिरणविस्तीर्यमाण पुरो
हृद्य तत्सलु सुप्रभातमभित सवर्धता भारतम् ।।
( काव्यपद्धति)
सुप्रभात विजयता धियो य पुष्टिवर्धनम् ।
पथ सत्यस्य सातये॥
(मन्नपद्धति)
देवाश्च वा असुराश्चोभये प्राजापत्या परपधिरे। ते दण्डैधनुभिर्न
व्यजयन्त । ते हाविजयमाना प्रजापतिं पितरमुपतस्थुरस्माकमय भविष्य
त्यस्माकमय भविष्यतीति । प्रजापति ज्योतिर्देवेभ्य भददा एतद्वो विजित्यै
भविष्यति, तमोऽसुरेभ्य प्रददा एतद्वो विजित्यै भविष्यतीति । तस्मादेवा
ज्योतिपा विजयन्ते, असुरास्तमसा । तस्मादाहुज्योति पो मैं देवा , असुरा-
स्तमोजुप । अथ प्रभात एव प्रथम देवा ज्योतिरपश्यन् । प्रभात एवोर
बुंधोऽमिस्तायते । अनिमुखा चै देवा । तस्मात्प्रभातमेव ज्योतिया ज्योति ।
सुप्रभातमु ह तस्य भवति, तमस पार याति य एर विद्वान् ज्योतिर्जुपो
देवान्वेद । ज्योतिर्ने सत्यम् । ज्योतिरमृतम् ।।
(प्राणपद्धति)
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देववाणी का नवजागरण भारत में सर्वत्र भारती ( देववाणी ) का सुप्रभात होवे । समस्त संसार में भारती के विपुल यश को फैलाता हुआ, विद्वानों के हृदयों में श्राशा-वल्ली के कुसुमों को विकसित करता हुआ, अज्ञानान्धकार को हटाता हुआ, नवीन ज्ञान के सूर्य के प्रकाश की किरणों के साथ सामने फैलता हुआ, मुन्दर सुप्रभात (= नवजागरण ) भारत में सर्वत्र वृद्धि को प्राप्त हो । सच्चे मार्ग की प्राप्ति के लिए, बुद्धि को पुष्टि-प्रदान करने वाले, सुप्रभात ( नवजागरण) की जय हो ! प्रजापति से उत्पन्न देवता और असुर दोनों परस्पर में स्पर्धा करने लगे। दण्डों और धनुषों की सहायता से उनमें से किसी की विजय नहीं हुई। तब यह सोचते हुए कि प्रजापति हमारा पक्ष लेगा, दोनों पक्ष प्रजापति के पास पहुँचे। प्रजापति ने 'इससे तुम्हारी विजय होगी' यह कहते हुए ज्योति अर्थात् प्रकाश देवताओं को दिया और अन्धकार असुरों को दिया। इसी से प्रकाश में देवताओं का और अन्धकार में असुरों का उत्कर्ष होता है। इसीलिए कहते हैं कि देवता प्रकाश से और असुर अन्धकार से प्रेम करते है। तय देवताओं ने प्रकाश को प्रथमतः प्रभात के समय ही देसा। उपःकाल में जागनेवाली अग्नि का विस्तार प्रभात में ही होता है। अमि हो देवताओं का मुख है। इसलिए प्रभात ही ज्योतियों की ज्योति है। जो विद्वान् यह जानता है कि देवता प्रकाश से ही प्रेम करते हैं, उसी का सुप्रभात (= नवाभ्युत्थान ) होता है, यही श्रज्ञानान्धकार को पार कर जाता है। प्रकाश ही सत्य है। प्रकाश ही अमृत है। G030

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सन्तो मधुप्रताः सान्द्रं पोत्या शास्त्ररसामृतम्। लोकोत्तरं तथातय्य- मानन्दमुपभुअते ॥१॥ सत्पुरुषों का स्वभाव मधु-पान-रसिक भ्रमर के समान होता है। वे शानों के रस रूपी अमृत को तन्मयता के साथ पीकर अक्षय्य लोकोत्तर आनन्द का उपभोग करते हैं। ७

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अमृतमन्थनम् घराचरमभिव्याप्य तदतीत्य च संस्थितम् । अनन्तमनवच्छिन्नं यत्तत्त्वं तदुपास्महे ॥ १ ॥ चराचर जगत् को व्याप्त करके और उसको भी प्रतिवान्त करके जो स्थित है की अनन्त अनवच्छिन्न परम-तत्त्व की हम उपासना करते हैं। नानाविधैरतिबलै रिपुभिः समन्ताद रुद्धोऽपि जीवनमृधे विजयाभिलापी । याचे भवन्तमिह धैर्यवलं प्रभूतं लोकैकनाथ ! भगवन् ! भव मे सहाय: ॥ २ ॥ विभिन्न प्रकार के बलशाली शत्रुओं से सव ओर से घिरा हुआ होने पर भी वन-संग्राम में विजय की अभिलाषा से हे लोकों के एकमात्र स्वामिन् ! भगवन् ! श्राप से महान् धैर्य चल की प्रार्थना करता हूँ । श्राप मेरी सहायता कीजिए। लोकत्रयेऽप्यतितरामभिनन्दनीय मानुष्यक निखिलरत्नललामभूतम् । लब्ध्यापि तत्परमभाग्यवशात्कथञ्चिदू बद्धादरो न यदि तत्प्रति, हा । हतोऽसि ॥ ३ ॥ तीनों लोकों में विशेषरूपसे अभिनन्दनीय और समस्त रनों में श्रेष्ठ मनुष्यता को केसी प्रकार परम सौभाग्य से पाकर भी यदि तुम को उसके प्रति आदर नहीं है, तो म्हारा परम दुर्भाग्य है। []

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महर्षि व मी त्यानन्द सरस्वती
अमृतस्य
निधेकेण मुम समजीवयत्।
मन्ये यो भारत भूयो महषि तं नतोऽस्म्यहम् ॥

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प्रथमः पारस्वः
लक्ष्यानुसन्धानम्
इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति । न चेदिहावेदीन् महती विनष्टिः ।
( केनोपनिषद् २।५)
मा प्र गाम पथो वयम् ।
(ऋ० १०५७।१ )
प्रथम प्रवाह
लक्ष्यानुसन्धान
इसी जन्म में यदि जीवन के लक्ष्य को जान लिया, तो ठीक है । यदि नहीं जाना,
तो बड़ी हानि है।
(केन उपनिषद् २।५)
हम जीवन में पय-भ्रष्ट न हों।
( १०५१)

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ब्रह्मचर्य-संदेशः ब्रह्मचर्य का संदेश कदाचिदेवान्तगतो विचार- परम्परान्दोलितमानसोऽहम् । हीनां दशां भारतमातृभूमे- विचिन्त्य चिन्ताकुलतामगच्छम् ॥ १ ॥ कभी एकान्त में बैठे हुए, जय कि विचारों के प्रवाह से चित्त अान्दोलित हो रहा था, मातृ-भूमि भारत को हीन दशा को सोचते-सोचते में चिन्ता से व्याकुल गया। शोकामिना दग्धमिवातिदीन मनस्तदा मे गतधैर्यमासीत् । धूमेन वहेर्नु समुत्थितेन व्याप्तं शिरश्चेतनतामहासीत् ।। २ ॥ उस समय शोक-रूपी वह्नि से मानो जले हुए मेरे अतिदीन मन ने धैर्य को खो दिया। उस वहि से मानो उठे हुए धुंए से मेरा मस्तिष्क व्याप्त हो गया और उसकी चेतनता जाती रही। ज्वालाद्रिविस्फोटनतो नु जातं भयावहं वेपथुमन्वभूवम् । विदीर्णमस्माद् धृदय मदीयं मनस्तथासीत्तमसीन लोकः ॥ ३ ॥ उस समय ज्वालामुखी पर्वत के विस्फोट से उत्पन जैसे कम्पन को मैंने अनुभव किया। इससे मेरा हृदय विदीर्ण हो गया और ऐसा प्रतीत हुआ कि सारा संसार अन्धकार में इव गया है।

समय आवर्तमध्ये पतितेच नौका शोकान्धिमम हृदयं ममासीत् । राहुर्यथा पीडयतीन्दुबिम्वं प्रस्तो हेर्दुष्टतरैस्तथासम् ॥ ४ ॥ उस समय भँवर के बीच में पड़ी हुई नौका के समान मेरा हृदय शोक-सागर में इय रहा था। जैसे राहु चन्द्रमा के विम्य को पीडित करता है, उसी प्रकार दुष्ट ग्रहों से मैं प्रस्त हो रहा था। आसीदवस्था मम या तदानी वाणी न वक्तुं सलु तां समर्था । आपादचूडं सुतरां निमग्न- स्तदाभयं दुःखपयोधिमध्ये ॥ ५ ॥ उस समय मेरी जो अवस्था हो रही थी वाणी उसको नहीं कह सकती। उस में पैर से लेकर सिर तक दुस-सागर में बिल्कुल हूबा हुआ था। समासीनस्यैवं मम मनसि चिन्तापरवशे शुचा दग्थे, लीने नयनयुगले घोरतमसि । तदा चित्रे कस्मिंश्चिदपि मम दृष्टिहिं सहसा गता, येनगाह झटिति गतशोकः समभयम् ॥ ६ ॥ इस दशा में बैठे हुए, जब कि चिन्ता से व्याकुल मेरा मन शोक से जल रहा था और नयन-युगल घोर अन्धकार में पडे थे, सहसा मेरी दृष्टि एक चित्र पर जा पड़ी। उससे मेरा सारा शोक तत्काल जाता रहा । तस्मिश्च चित्रे मृदुरम्यगात्रं कौपीनमानं वसनं वसानम् । वेदेषु श्रद्धातिशयं दधानं धर्मस्य पोतस्य च कर्णधारम् ।। ७ ।। विस्मृत्य सर्व स्वपरत्वभावं दीनेपु हीनेषु दयास्वभावम् । पद्मासनेन स्थितमासनेऽहं समाधिनिष्ठं यमिना वरिष्ठम् ॥ ८ ॥ [ १४ ] . सव्ये च वेदैरथ दक्षिणाङ्गे कुण्ड्या यतीनामनिशोभमानम् । आस्यप्रभातोऽमृतमालवन्तं तपोधनं ज्ञानवतां गरिष्ठम् ।।६।। अभ्यन्तरे प्रचलतीन यस्य निरन्तरं धर्ममयः कशानुः । तं श्रीदयानन्दमुनि महर्षि मपश्यमानन्दपयोधिममम् ॥ १० ॥ उस चित्र में मृदु और सुन्दर शरीर वाले, कौपील-मात्र पत्र को पहने हुए, वेदों में अत्यन्त श्रद्धा को रखने वाले, धर्म के पोत के कर्णधार; अपने और पराये के भेद-भाव को भूल कर दरिद्र और दीन-दुखियों पर दया-स्वभाव वाले, आसन पर पद्मासन से बैठे हुए, समाधिनिष्ठ, यमियों में श्रेष्ठ, वामभाग में वेद की पुस्तकों से और दक्षिण भाग में संन्यासियों के कमण्डलु से अत्यन्त शोभायमान, मुख को प्रमा से अमृत को वरसाते हुए, तपोधन, ज्ञानियों में गरिष्ठ, जिनके अन्दर निरन्तर मानो धर्म की ज्वाला प्रज्वलित हो रही है, आनन्द-सागर में मम उन महर्षि श्री स्वामी दयानन्द मुनि को मैंने देखा ॥ यदीयमालोकनमप्यधानि निहन्ति पुंसां चिरसश्चितानि । दृष्ट्वा मुनि तं कमनीयकान्ति- मयं विचारो हृदि प्रादुरासीत् ॥ ११ ॥ जिनके दर्शन-मान से मनुष्यों के चिर-संचित पाप नष्ट हो जाते हैं उन कमनीय-कान्ति मुनि को देख कर ये फुन्दद्युतयः समस्तभुवनैः कर्णावतंसीकृताः यः सर्वत्र शलाकयेव लिखितैर्दिग्भित्तयश्चित्रिताः । वक्तुं हृदि कल्पितैरपि वयं हर्षेण रोमाश्चिता. स्तेषां धर्मनिधियं नु महतामेको गुणानां निधिः ।। १२ ॥ जिन कुन्दावदात महान् गुणों को सुनने के लिए समस्त लोक लालायित रहते हैं, शलाका से मानो लिखे हुए जिनगुणोंसे दिगरूपी भित्तियाँ चित्रित हो रही हैं, जिनके विषय में कहने के लिए हृदय में संकल्प मात्र से हम सब हर्प से रोमाञ्चित हो जाते हैं, ये धर्मनिधि महात्मा उन महान् गुणों के एकमात्र निधि हैं । समालोक्यवाहं प्रभुरशमदं शान्तिनिलयं महस्तचित्रं निखिलभवतापापहरणम् । समाश्वासं लच्या समरहितचित्तः कथमपि पुरस्तात्तस्यै निजहृदयगाथामकथयम् ॥ १३ ॥ प्रचुर शान्ति को देने वाले, स्वयं शान्ति के स्थान, और संसार के समस्त तापों को हरने वाले महर्षि के उस चित्र को देखते ही सान्त्वना को पाकर किमी प्रकार चित्त को सावधान करके उसके सामने मैंने अपने हृदय की गाथा को इस प्रकार कहा- लब्धप्रसारं परितो जगत्या- मज्ञानजं पापमपास्य घोरम् । ज्ञानोपदेशेन जनेषु धर्म संस्थापयंस्त्वं जयसीह लोके ॥ १४ ॥ संसार में चारों ओर फैले हुए अज्ञान से उत्पन्न घोर पाप को हटाकर ज्ञानोपदेश द्वारा मनुष्यों में धर्म की स्थापना करने वाले श्राप की लोक में जय हो ! सत्योपदेशैननु गर्जयित्वा प्रावृप्य धर्मामृतमा समन्तात् । पापानिकीलावलिदग्धचित्तान् सञ्जीवयंस्त्वं जयसीह लोके ॥ १५ ॥ सत्य के उपदेशों से मानो गरज कर सब ओर धर्मरूपी अमृत की चर्पा द्वारा पाप-रूपी अग्नि की ज्वालाओं से दरघ-चित्त लोगों जीवन-प्रदान करने वाले आप की लोक में जय हो ! १ "वहेयोलिकीलावचिहतिः शिखा नियाम्' (अमरकोप १।११६०)। [ १६ ] , सत्यप्रियोऽसत्यनिवारणोत्कः समस्तलोकस्य हिते सनिष्टः । शाखा गोष्ठीपु धुरन्धरस्त्वं विद्वद्वरेण्यो जयसीह लोके ॥ १६ ॥ सत्य को प्यार करने वाले, असत्य के निवारण मैं उत्सुक, सब लोगों के हित के सपादन में प्रास्या रखने वाले, शास्त्रार्य सभाओं में धुरघर और विद्वानों में श्रेष्ठ थाप की लोक में जय हो । गोब्राह्मणानामतिदुर्दशां ताम् अनाथदीनानथ होनसत्त्वान् । दृष्ट्यातिमात्रेण दयाचित्तो यथार्थनामा जयसीह लोके ॥ १७ ॥ गौ और ब्राह्मणों की अत्यन्त दुर्दशा को तया अनाथ दीन और दुर्वलों को देख कर दया से अत्यन्त आई चित्त तथा यथार्थ नाम वाले आपकी लोक में जय हो। भवन्तं सस्तुत्य प्रगतविधिनाह गुरुवर ! समासाद्योच्छ्वासं तव वदनचन्द्रादविरलम् । विनीतो यथान्यद् विवदिपुरिदानी, करुणया प्रहीतव्यं, सन्तः परहितपराः सन्ति सततम् ॥ १८ ॥ गुरुवर ! नम्रता पुर सर आप की स्तुति कर के श्राप के मुखवन्द्र से मैंने पर्याप्त सान्त्वना प्राप्त की है। मैं विनीत भाव से और जो कुछ निवेदन करना चाहता हूँ उस को कृपया सुनिए, सत्पुरुष सदा दूमरों का हित करने में तत्पर रहते हैं। सर्वव्यास्थास्यतिरेकभावात् स्वार्थप्रवृत्तेलियोन्मुसासु । स्वच्छन्दमार्गेषु विजृम्भितेपु सर्वत्र हा-हा-कृतमाविरासीत् ॥ १६ ॥ स्वार्थ की प्रवृत्ति के अत्यन्त घट जाने से सारी व्यवस्थाओं के नष्टप्राय हो जाने पर और स्वच्छन्द मागों के प्रवल हो जाने पर देश में सर्वन हाहाकार मच गया। मोहान्धकारे प्रसृते समन्ताद् अस्तंगते शाश्वतधर्ममानी । .

मतान्यसंख्यानि समस्तदेशे
तारा रजन्पामित्र प्रादुरासन् ॥ २० }}
शाश्वत या सनातन धर्मपी सूर्य के अस्त हो जाने पर सब ओर अान का
अन्धकार फैल गया। ऐसी दशा में रात्रि में ताराओं के समान समस्त देश में
असंख्य मत मतान्तर चल पड़े।
देशे वचो दुर्बलता प्रयाते
विनष्टसत्त्वे हतगौरवे ।
प्रजासु न्याय्येत्तरमार्गगातु
वैदेशिकैः शासनमत्र लब्धम् ॥ २१ ॥
उस कारण से देश के दुर्वल, निस्सत्व और गौरवविहीन हो जाने पर तथा
जनता के नैतिकता से विपरीत मार्ग में चलने पर विदेशियों ने देश में अपना शासन
स्थापित कर लिया।
चिराय तच्छासनतो विशीर्णा
परम्परा भारतसंस्कृतेः सा।
विलुप्तधैर्या अथ भारतीयाः
परेश्वरं भार्थयितुं प्रवृत्ता:-} २२ ॥
चिरकाल तक रहने वाले विदेशी शासन से भारतीय संस्कृति की विश्व प्रसिद्ध
प्राचीन परम्परा नष्ट हो गयी। तब भारतवर्ष वासी अधीर होकर परमेश्वर से
प्रार्थना करने लगे-
आयस्य लोकेश ! दयासमुद्र !
दिने दिने वर्धत एव पापम् ।
सर्वस्वहीना हतभागधेया
विचारमूढा चयमद्य सर्वे ॥ २३ ॥
हे लोकों के स्वामिन् , दया के समुद भगवन् ! हमारी रक्षा कीजिए । दिनों दिन
साप बढ़ रहा है। सब कुछ सोकर आज हम सब अभागे किंकर्तव्यविमूढ हो रहे हैं।
विस्मृत्य कर्तव्यपथं सकीयो
परम्परां तो जगतोऽभिवन्याम् ।
असत्यमार्गपु रताः समन्ताद
दूयामहेऽनर्थपरम्पराभिः ॥ २४ ॥

कर्तव्य-पथ को और जगद्वन्दनीय अपनी उस प्रसिद्ध परम्परा को भूलकर हम उलटे मार्गों पर चलने से अनेकानेक प्रारत्तियों द्वारा सब श्रीर से सताये जा रहे हैं। आसीत्पुरा यद् बहुमानपानं विद्यागुरुत्वेन च यत्प्रसिद्धम् । सद्भारतं हीनदशां प्रपन्न- मनादरस्यास्पद्मद्य जातम् ॥ २५ ॥ जो भारत प्राचीन काल में अत्यन्त संमानित था, जो विद्या गुरु के रूप में प्रसिद्ध था, वह आज हीन दशा को पाकर अनादर का पान बन गया है। धनेन धान्येन सुपुष्कलेन स्वास्थ्येन वृत्तेन च सूपपन्नम् । आसीत्तदेवाद्य ततो विहीनं दृष्ट्या प्रभो ! त्वां शरणं व्रजामः ॥ २६ ॥ जो भारत देश प्राचीन काल में पुष्कल धन और घान्य, तथा स्वास्थ्य और चारिश्य से संपन था, उसी को थान उन सब से विहीन देखकर हे प्रभो! हम आप की ही शरण में आते हैं। रामः क रावणकुलस्य स धूमकेतुर् यानचतुर्दश समाः पितुराज्ञया यः । सत्यवतो गहनकाननमध्यवर्ती रक्षांसि मृत्युपथमाशुतरामनैपीत् ॥ २७ ॥ जिन्हों ने पिता की आज्ञा से चौदह वर्ष तक गहन कानन में निवास किया और अतीव शीघ्रता से राक्षसों का सहार कर डाला, रावण के कुल को नाश करने वाले वे सत्य-व्रती राम कहाँ है? काजातशत्रुरिह यः कुरुवंशदीप: कालं निनाय विपिने स्वपणेन बद्धः । आजन्म येन वितथा नहि वागभाणि ख्यातिं गतोऽसिलभुवि स्वगुणरुदारैः ॥२८॥ जिन्होंने अपने वचन से बद्ध हो कर जंगल में समय को व्यतीत किया, जन्म-पर्यन्त मिथ्या भाषण नहीं किया, और अपने उदार गुणों से समस्तं पृथ्वी पर यश को प्राप्त किया, कौरव वंश को प्रकाशित करने वाले वे अजातशत्रु युधिष्ठिर कहाँ है?

भीमोऽपि फुत्र भुवने बलिना पलिष्ठः संप्रीणनाय पितुरात्मबलि विधाय । मत्या तृणाय निखिलामपि राज्यलक्ष्मी- भाजीपनं स्म चरति प्रतिनां व्रतं यः ॥२६॥ जिन्होंने पिता की प्रसरता के लिए अपने को बलि देकर, और समस्त राज्य लक्ष्मी को तृण-समान मान कर जीवन पर्यन्त ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन किया था अलियों में चलिए वे भीष्म पितामह श्राज संसार में कहाँ है ? स्नेहानुरागपरमोऽमजपादपद्म- द्वन्द्वे, विहाय विविधानि सुखान्यरस्यम् । यातः समुज्जलयशा ननु लक्ष्मणो यः कास्तेऽधुना स पुनरिन्द्रजिनो विजेता ॥ ३० ॥ जिन्होंने अपने ज्येष्ठ भ्राता के पाद-पनों में स्नेह और अनुराग के कारण नान प्रकार के सुखों को छोड़ कर बनवाय स्वीकार किया था, वे समुज्ज्वल यशवाते और इन्द्रजित ( मेघनाद ) पर विजय पानेवाले लक्ष्मण आज कहाँ है ? प्राप्तं घ राज्यमखिलं तृणवद्विदाय धीरं जटाश्च परिधाय पुरादहियः । भ्रातुर्वनं गतवत: प्रतिपालनेन काल निनाय भरत: क गतोऽधुना सः ॥ ३१ ॥ हाय में आये हुए समस्त राज्य को सूग के समान छोड़ कर तथा चौर और अटाओं को धारण कर जिन्हों ने वन-वास में गये हुए अपने भाई को प्रतीक्षा में नगर से बाहर रहकर समय को व्यतीत किया था ये भरत अव कहाँ है ? हा क्रूर ! काल ! भवता किमिदं व्यधायि हीनां दशां यत इमां गत एप देशः । एवं स्थितेऽपि दयसे न समीक्षमाणः को वेद का नु गतिरस्य भविष्यतीति ॥३०॥ हे सूर काल ! तुम ने यह क्या कर डाला जिस से यह देश इस होन दशा के पहुँच गया ! ऐसी स्थिति में सब कुछ देखते हुए भी यदि तुम दया नहीं करते. तो कौन जानता है कि इस देश को क्या दशा होगा ! । २० ।

तस्मात्यमेव भावनिममार्तनादं श्रुत्वा विधेहि करुगामयि दीनबन्धो !। लोकत्रयस्य परिपालयितारमीशं त्यामेव भो अशरणकशरण्यमाहुः ॥ ३३ ॥ ऐसी दशा में हे दोनयन्धो । भगवन् ! इस आर्तनाद को सुनकर आप ही कृपा करें। आप तीनों लोकों की रक्षा करनेवाले ईश्वर है; आप ही 'अशरणों के एकमात्र श्राश्रय' कहे जाते हैं। त्वं वायसे हि बलिन, न तदा महत्त्वं दीनान् समुद्धरसि, तर्हि तु ते महत्वम् । धाराधरस्य किमु वर्पणमब्धिमध्ये. तश्चेन्मरौ भवति तस्य महत्त्वमाहुः ॥ ३४ ।। श्राप यदि बलवान् की रक्षा करते हैं तो इसमें आप का कोई महत्त्व नहीं; यदि आप दोनों का उद्धार करते हैं, तभी आप का महत्त्व है। समुद्र में मेघ के बरसने से क्या लाभ ! मरुस्थली में घरसने पर ही उस का महत्त्व माना जाता हैं । इत्थं प्रजाभिबहु प्रार्थितः सन् लोकैकनाथोऽपि दयां चकार । संप्रेपितो यद्यमिनां परिधः स्वामी दयानन्दसरस्वती त्वम् ।। ३५ ।। इस प्रकार जनता के बहुत प्रार्थना करने पर लोकों के एकमात्र स्वामी भगवान् दया की और यमियों (मुनियों) में श्रेष्ठ श्राप स्वामी दयानन्द सरस्वती को भारत में जन्म दिया। दयापरस्त्वं जगदुदिधीर्ष: शास्त्राणि वेदांश्च समध्यगीष्ठाः । सत्यप्रकाशेन ततः समन्तात् प्रजागरोऽदृश्यत नून एव ।। ३६ ।। दयालुस्वभाव वाले आपने जगत् के उद्धार की इच्छा से शास्त्रों और पेदों को पदा । तदनन्तर सत्य के प्रकाश से एक नवीन जागरण सब और दिखाई देने लगा।

चिराय मोहोऽपगत: प्रजानां जातोऽपि भूयः स्वपरायबोधः । विदेशिनामाक्रमणस्य रोध- चिन्ता पदं लब्धपती समन्तात् }} ३७ ॥ जनता में चिरकाल से फैला हुआ अज्ञान दूर हो गया। फिर से अपने और पराये का ज्ञान उत्सम हुधा । विदेशियों के आकमण को रोकने की चिन्ता देश में सर्वत्र फैलने लगी। गीर्वाणयाण्याः पठनप्रवृत्ति भूयोऽभितो भारतमापिरासीत् । स्वसंस्कृतेश्योद्धरणस्य वार्ता पुनः श्रुतेगोचरतामयासीत् ॥ ३८ ॥ भारतवर्ष में चारों और देववाणी (संस्कृत माया) के पढ़ने की प्रवृत्ति फिर से घटिगोचर होने लगी। अपनी संस्कृति के उद्धार की वार्ता पुनः सुनाई देने लगी। तथापि वैदेशिकराज्यशक्ति- स्तथा तदाचारविचाररीतिः । विजृम्भमाण परितोऽत्र देशेऽ- स्मदीययनान् विफलीकरोति ॥ ३९ ॥ इस पर भी हमारे भारतवर्ष में सब ओर से बढ़ती हुई विदेशियों के राज्य की शफि तथा उनके आधार-विचार की रीति हमारे प्रयमों को विफल कर रही है। वयं तदस्मिन् विपये विमूढा उत्साहचारित्र्यविवेकहीनाः। आत्मन्यविश्वासहता निराशा- पात्राणि नः शाधि विधेयमत्र ॥१०॥ सो इस विषय में हम किंकर्तव्य विमूढ हो कर टरसाह, भारिमा और विवेक को खो चुके हैं । श्रात्म-विश्वास के न होने से निराशा ने हम को घेर रखा है। हम को यतलाइए, यहाँ हम क्या करें। समाकरयता में विनतिपरिपाटी करुणया स्मितं कुर्वन्मन्येऽमृतमिव समाश्यासमहुलम् । [ २२ ] अगादीत्तचित्रं मितममितसारं ननु वचो यधोनिर्दिष्टं यत्पुनरपि समाधि नु समधात् ॥ ४१ ॥ मेरी उक्त विनति को सुन कर, मुझे ऐसा लगा कि, काणा-पुरस्सर अमृत के समान सान्त्वना देनेवाले स्मित को करते हुए उस चित्र ने संक्षिप्त, पर सारगर्भित, निम्न निर्दिष्ट वचन को कहा और फिर समाधि को धारण कर लिया। "ब्रह्मचर्य महान् यज्ञो ब्रह्मचर्य महत्तपः । ब्रह्मचर्येण सर्वोऽर्थः सिद्धो भवति भूतले ॥ ४२ ॥ मनीपितानामर्थानां सिद्धथै तद्भूतये तथा । भारते ब्रह्मचर्यस्य पुनः स्थापनमिष्यताम्" ।। ४३ ।। "ब्रह्मचर्य एक महान् यज्ञ है । ब्रह्मचर्य महान् तप है । प्रत्येक लक्ष्य की प्राप्ति संसार ब्रह्मचर्य से हो सकती इसलिए अभीष्ट अथों की सिद्धि और उनके उत्कर्ष के लिए भारतवर्ष में फिर से ब्रह्मचर्य की स्थापना करनी चाहिए।" वदेवदतिसद्धिप्तं चित्रेण ननु घोपितम् । प्रकृतापेक्षिणी तस्य काचिद् व्याख्या विधीयते ॥ ४४ ॥ अति संक्षेप में मानो चित्र ने यही घोषित किया । प्रकृत विषय की दृष्टि से उसकी थोड़ी सी व्याख्या यहाँ की जाती है। सर्वेपामपि भूतानां यत्सत्कारणमव्ययम् । कूटस्थं शाश्वतं दिव्यं, वेदो वा, ज्ञानमेव यत् ॥ ४५ ॥ तदेतदुभयं ब्रह्म ब्रह्मशब्देन कथ्यते । तदुद्दिश्य व्रतं यस्य ब्रह्मचारी स उच्यते ॥ ४६॥ सृष्टि के समस्त पदार्थों का जो अक्षय्य, कूटस्थ, शाश्वत, दिव्य भूलकारण है उसको, तथा ज्ञानरूप वेद को भी, ब्रह्म शब्द से कहते हैं। उस ब्रह्म की प्राप्ति के उद्देश्य से जो मत प्रहण करता है उसी को ब्रह्मचारी कहते हैं। समष्टिरूपं यद् प्रम तद्रूपं ज्ञानमेव यत् । ताभ्यां सायुज्यसंपत्त्यै ब्रह्मचारी सदेप्सति ।। ४७ ॥ समस्त पदार्थों की समष्टि-रूप जो ब्रह्म है, तया समथ्यात्मक (अयवा व्यापक) जो शान है, उन दोनों के साथ सायुज्य अथवा तादात्म्य की प्राप्ति के लिए ब्रह्मचारी सदा उत्सुक रहता है। t - , एतस्यां भूमिकायां तु तिष्ठतो ब्रह्मचारिणः । उत्तरोत्तरमुत्कृष्ट जीवन लक्ष्यमुच्यते ॥ ४ ॥ "भद्रादभि श्रेय: प्रेहि", "भद्र भद्रं न इत्येवं बहुशो मन्नै रेप एवार्थ उच्यते ॥ ४ ॥ उक्त मानसिक परिस्थिति में वर्तमान ब्रह्मचारी के लिए उत्तरोत्तर उत्कृष्ट जीवन हो लक्ष्य होता है। "तुम भद्र से भद्रतर जीवन को प्राप्त करों", "भावन ! हमारे लिए परामर कल्याण को ही लाइये" इस प्रकार अनेकानेक वेद मन्त्र इसी बात को कहते हैं। तदर्थ स्वीयशक्तीनां विकास: सश्त्रयस्तथा । श्रमेण तपसा वृत्तिः संयमेन पुरस्कृता ।। ५० ॥ चारित्र्याय विनिर्माण विधाया अर्जन तथा ! प्रथमं तस्य कर्तव्य जायते प्रथमाश्रमे ।। ५१ ।। उक्त लक्ष्य की सिद्धि के लिए प्रथम श्राश्रम (ब्रह्मचर्याधम ) में उसक (= प्रमवारी का ) मुख्य कर्तव्य होता है : अपनी शक्तियों का विकास और संचम, म पाणी और शरीर के संयम के साय श्रम और तप का प्रावरण, चरित्र का निर्मा और विद्या का उपार्जन तपसा पारमानोति तपसा हन्ति किल्लिपम् । तपसा वर्तमानः स उन्नतेमुनि तिष्ठति ॥ ५२ ।। तप द्वारा यह (माचारो) अपने श्रमीट ५८ को प्राप्त करता है और पाप य গারা। दूर कर अपने चरित्र को बज्ज्वल और पवित्र बनाता है। तप ५ आचरण करता हुआ यह उन्नति के शिखर पर श्रासीन होता है। तपसा निर्मलो भूत्या परिपाकेण शुद्धधीः । द्वितीयमाश्रमं गत्या सर्वस्येष्टे न संशयः ।। ५३ ।। तप से चरित्र को दुर्वलताओं को दूर कर और मनोविकास द्वारा तत्वावगाहिन विशुद्ध युद्धि को प्राप्त कर वह द्वितीय गृहस्थ आश्रम में प्रष्ट होने पर समस्त परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाने में समर्थ होता है। ब्रह्मचारी मह्म भ्राद्विमचि तस्मिन्देवा अधि विश्व समोता। "ब्रह्मचारी समिधा मेखलया प्रमेण लोकांस्तपसा पिपत्ति ॥ ५४ }} १. ऐतरेयमाह्मण १।१३. २. सामवेद पू० २१८९४ ३. अपर्व ११५२४ ४. अपर्व ११:५१४१ [२४ ]

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"ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्र वि रतति ।
भाचार्यों ब्रह्मचर्येण ब्रह्मचारिणमिच्छते"" ॥ ५५ ।।
ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपानत ।
इन्द्रो ह ब्रह्मचर्येण देवेभ्यः स्वरामरत् ॥ ५६ ॥
इत्यादिवेदमन्त्रैश्च वैदिकोदात्तभापया ।
ब्रह्मचर्यस्य माहात्म्यं रहस्यं चोपवर्ण्यते ॥ ५७ ।।
"ब्रह्मचर्य-प्रत को धारण करने वाला ही प्रकाशमान् ब्रह्म (-समष्टिरूप
ब्रह्म अथवा ज्ञान) को धारण करता है और उसमें समस्त देवता श्रोत-प्रोत होते हैं
(अर्थात् , वह समस्त देवी शक्तियों से प्रकाश और प्रेरणा को प्राप्त कर सकता है )"
"समिधा और मेखला द्वारा अपने व्रतों को पालन करता हुश्रा ब्रह्मचारी श्रम
और तप के प्रभाव से लोकों को आपूरित करता है (अर्थात् , समस्त राष्ट्र के उत्थान
में सहायक होता है।"
"ब्रह्मचर्य के तप से ही राजा अपने राष्ट्र की रक्षा में समर्थ होता है। ब्रह्मचर्य
द्वारा ही आचार्य ब्रह्मचारियों को अपने शिक्षण और निरीक्षण में लेने की योग्यता
और क्षमता को संपादन करता है।"
"ब्रह्मचर्य के तप से ही देवताओं ने मृत्यु को दूर भगा दिया है । ब्रह्मचर्य द्वारा
ही इन्द्र ने देवताओं को दिव्य प्रकाश लाकर दिया है (अर्थात् , संयत जीवन से
रहने वाला मनुष्य ब्रह्मचर्य द्वारा ही अपनी इन्द्रियों को पुष्ट और कल्याणोन्मुख
बनाने में समर्थ होता है।"
इत्यादि वैदिक मन्त्र अपनी उदात्त माषा में ब्रह्मचर्य की महिमा और रहस्य का
वर्णन करते हैं।
प्रासादस्य विनिर्माणे मूलभित्तिरपेक्ष्यते ।
तथैव जीवनस्यादौ ब्रह्मचर्यमपेक्ष्यते ॥ ५८ ॥
जैसे किसी महल के वनाने में नींव को अपेक्षा होती है, उसी प्रकार जीवन के
प्रारम्भ में ब्रह्मचर्य की अपेक्षा होती है।
ब्रह्मचर्यनतं चीण यस्तैरेव तपस्विभिः ।
उत्तरोत्तरमुत्को जीवने लभ्यते ध्रुवम् ।। ५६ ॥
तप के रूप में ब्रह्मचर्य के व्रत को पूर्ण करने वाले मनुष्य ही निस्सन्देह जीवन में
उत्तरोत्तर उत्कर्ष को प्राप्त करते हैं।
१. अपर्व ११३॥१७ ।
२. अय० ११॥५॥१९॥

इत्येवमाश्चर्यमयं महर्षे श्चित्रस्य श्रुत्वा नु पचो गभीरम् । अपास्तशङ्कः सुतरां प्रसन्न- स्तत्कार्यसिद्धये व्रतमाहीपम् ।। ६० ॥ इस प्रकार मानो महर्षि के चित्र के गम्भीर वचनों को सुनकर मेरी शंकाए दूर हो गयी, और मैं ने अत्यन्त प्रसन्नता के साथ उस लक्ष्य की सिद्धि के लि, व्रत ले लिया। (२) व्रतमात्मविशुद्धये व्रत से आत्मशुद्धि ऊपर की रचना में ब्रह्मचर्य व्रत के वर्णन के अन्त में प्रत ग्रहण को यात भा कही गयी है। इसीलिए मताचरण के महत्त्व को दिखाने वाली निम्नस्य रचना को यहाँ देना उचित प्रतीत होता है। जीवन के उत्थान और विकास के लिए श्रात्म-विश्वास और आत्मिक शक्ति को आवश्यकता है। यात्मिक शक्ति और श्रात्म-विश्वास अनुशासन, प्रताचरण और नियम पालन से ही प्राप्त हो सकते हैं। जीवन में प्रतों के प्रहण और पालन का यहो रहस्य है। इसी सिद्धान्त का विशदी-करण किसी प्रती के मुख से नीचे के पयों में , कराया गया है:- उत्तरोत्तरमुत्कर्ष जीवने लब्धुमुत्सुकः । प्रतिजाने परिप्यामि व्रतमात्मविशुद्धये ॥ १ ॥ अपने जीवन में उत्तरोत्तर उत्कर्ष प्राप्त करने के लिए में उत्सुक हूँ। श्रात्मवि. शुद्धि या पवित्राचरण से ही यह हो सकता है। उस आत्म-विशुद्धि के लिए प्रताचरण की में प्रतिक्षा करता हूँ। [ २६ ] - .

बनानां पालनेनैव तद् गूढमात्मदर्शनम् । जायते यमिनां नूनमात्मविश्वासकारणम् ॥ २ ॥ नतों के पालन से ही संयमी मनुष्यों को अपने उस गूढ स्वरूप का दर्शन होता है । कि आत्म-विश्वास का कारण होता है। अभिप्राय यह है कि मतों के आचरण से ही मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप और शक्ति को पहचानता है, और इसी प्रकार उसमें श्रात्म-विश्वास की भावना का दय होता है। ऋषिभिर्मुनिभिश्चैव लोकानां मार्गदर्शकैः । सेवितो विततः पन्था एप नैनात्र संशयः ॥ ३ ॥ संसार को सन्मार्ग दिखाने वाले ऋषियों और मुनियों ने वास्तव में इसी प्रशस्त मार्ग का सेवन किया था। अभिप्राय यह है कि प्रताचरण द्वारा मनुष्य ऋषि और मुनि की पदवी को भी गाप्त कर सकता है। विश्वस्य विविघं कार्य फुर्वन्तोऽन निरन्तरम् । प्रतानां पालनेनैव देवा अमृतभोजिनः ॥ ४ ॥ विश्व के विभिन्न कार्यों को निरन्तर नियमपूर्वक करने वाले अग्नि, वायु, सूर्य श्रादि देवताओं को बतों के पालने के कारण ही अमृत-भोजी (= अमृत अथवा अमृतत्व का सेवन करने वाले ) कहा गया है। दूसरे शब्दों में, अग्नि, वायु, सूर्य आदि देवता विश्व के संचालनार्थ अपने अपने महान् प्रत अथवा कर्तव्य का अविचल. भाव से पालन करते हैं । इसी आधार पर उनको 'अमृत-भोजी' कहा गया है । अभिप्राय यह है कि प्रताचरण द्वारा ही मनुष्य को अपने अमृतत्व या शाश्वत जीवन का योघ हो सकता है। व्रतेन प्राप्यते दीक्षा दक्षिणा दीक्षयाप्यते । तया च प्राप्यते श्रद्धा श्रद्धया सत्यमाप्यते ॥५॥ प्रताचरण से ही मनुष्य को दीक्षा अथवा उन्नत जीवन की योग्यता प्राप्त होती दीक्षा से दक्षिणा अथवा प्रयत्ल की चालता प्राप्त होती है । दक्षिणा से अपने जीवन के लक्ष्य अयवा आदशों में श्रद्धा, और श्रद्धा से सत्य अथवा वास्तविक लक्ष्य की प्राप्ति होती है। अभिप्राय यह है कि प्रतों के पालने से ही मनुष्य अपने जीवन के परम लक्ष्य तक पहुँच सकता है। स आत्मवत्तागुणोपेता सा शिक्षा ब्रह्मचारिणः ब्रह्मचारी की शिक्षा का स्वरूप शिक्षा का प्रश्न यहा गहन है। वर्तमान भारत की यह एक महत्तो समस्या है। नीचे के पदों से इस समस्या के संबन्ध में कुछ प्रकाश अवश्य मिलेगा, ऐसी हमें आशा है:- चारित्र्येण समं शिक्षा अमेण तपसा तथा । अनुशासनसंजुष्टा सा लक्ष्यं ब्रह्मचारिणः ॥१॥ चारिश्य, श्रम और तप के साय तथा अनुशासन से युक्त शिक्षा ही ब्रह्मचर्य- आध्रम में रहने वाले का लक्ष्य होती है। सर्वेषामपि भूतानां मूर्धन्यं पदमास्थितम् । साधनं सर्वसिद्धीनां यत्तन्मानुप्यकं मतम् ॥ २ ॥ आसुरी वृत्तिमुत्सृज्य देवं भावमुपाश्रितम् । यया संपद्यते शिक्षा सा लक्ष्य ब्रह्मचारिणः ॥ ३॥ समस्त प्राणियों में सर्वोत्कृष्ट पद में स्थित और सब सिद्धियों की एकमान साधन मनुष्यता आसुरी प्रवृत्तियों को छोड़ कर जिस शिक्षा द्वारा देवी प्रतियों को धारण करती है वही ब्रह्मचर्य-श्राश्रम में रहने वाले का लक्ष्य होती है। शिक्षा या फेवलं स्वार्थ-बुद्धिं पुष्णाति सर्वथा । विषयेष्विन्द्रियारामप्रवृत्तिर्वर्धते यया ॥ ४ ॥ तां समूलं समुत्सार्य लोककल्याणकाम्यया । आत्मवत्तागुणोपेता सा शिक्षा ब्रह्मचारिणः ॥ ५॥ [२८] . जो शिक्षा सब तरह से केवल स्वार्थ-बुद्धि को पुष्ट करती है और जिससे विपयों में इन्द्रियों की आसक्ति बढ़ती है लोक कल्याण की कामना द्वारा उसका समूल उन्मूलन कर के आत्मसंयम की भावना से युक्त शिक्षा ही ब्रह्मचारी का लक्ष्य होती है। उत्तरोत्तरमुत्को जीवनस्य यया भवेत् । सदाचारसमृद्धेश्य सौरभ सुमनोहरम् ॥ ६ ॥ सर्वलोकसमाकर्पि देशव्यापि यया भवेत् । आशाप्रकाशसंयुक्ता सा शिक्षा ब्रह्मचारिणः ॥ ७॥ जिस से जीवन का उत्तरोत्तर उत्कर्ष हो और जिससे सारे जगत् को आकृष्ट करने वाला सदाचार की समृद्धि का सुमनोहर सौरभ देशभर में फैल जाए, जीवन में श्राशावाद के प्रकाश को देनेवाली ऐसी शिक्षा ही ब्रह्मचारी का लक्ष्य होती है । AGRONO (४) ब्रह्मचर्य तदिष्यताम् ब्रह्मचर्य की महिमा उह्यमानस्य विवशं भावानां तीवधारया । आत्मविश्वासमाधत्ते ब्रह्मचर्य तदिप्यताम् ॥ १॥ भावों की तीव्र धारा में बेबस हो कर बहते हुए मनुष्य में जो अात्म विश्वाय को उत्पन करता है उस ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए । शारीरं मानसं यापि स्वास्थ्यमाध्यात्मिकं तथा । अभीष्टं चेत्तदा साधयं तदिध्यताम् ॥ २॥ यदि शारीरिक मानसिक तथा आध्यात्मिक स्वास्थ्य की इच्छा है तो शवको ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।

चारित्र्यं मानवस्येह जन्मनः सारमुत्तमम् । तस्य रक्षाकृते भ्रातर ब्रह्मचर्य तदिष्यताम् ॥ ३ ॥ मनुष्य के जीवन का चारित्र्य ही उत्तम सार है । उसको रक्षा के लिए भाई। ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। नानाधिव्याधिखिलाना मानामौपधं परम् । निराशाया: समाधानं ब्रह्मचर्य तदिप्यताम् ॥ ४ ॥ ब्रह्मचर्य नाना प्रकार की प्राधियों और व्याधियों से सिम मनुष्यों की परम औषध है। वह निराशा का समाधान है । उसका पालन करना चाहिए। जीवने यः समुत्कर्षो लोकोत्तरमहात्मनाम् । सस्य मूलं रहस्यं च ब्रह्मचर्य तदिप्यताम् ॥ ५ ॥ लोकोत्तर महापुरुषों के जीवन में जो समुत्कर्ष होता है उसका मूल और रहस्य प्राचर्य है। इसलिए उसका पालन करना चाहिए। जीपने रिकता येयं या चोद्देश्यस्य हीनता । लेशहेतुस्तदुच्छित्त्यै ब्रह्मचर्य तदिप्यताम् ॥ ६ ॥ जीवन में केश को देनेवालो जो रिकता अथवा पद्देश्यहीनता देखी जाती है उसको दूर करने के लिए ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। वासनानां तमोराशी मनानामन्यचेतसाम् । प्रकाशरूपं यत्त ब्रह्मचर्य तदिप्यताम् ॥ ७ ॥ वासनाओं के घोर अन्धकार में इये हुए तया सदमद् को विवेक-युद्धि से रहित लोगों को प्रकाश देनेवाला तत्त्व ब्रह्मचर्य ही है । उसका पालन करना चाहिए। मृत्युप्राहेण विभ्रान्तास्त्रस्ताश्चैवानिशं ततः । प्राणं यहफेवलं तेषां ब्रह्मचर्य तदिप्यताम् ॥ ८॥ मृत्युरूपी माह से पड़ाये हुए और सदा उससे त्रस्त लोगों को रक्षा का एकमात्र साधन मनचर्य है । उसका पालन करना चाहिए। जीवनस्य महान् पन्थाः पाथेयं तस्य यमहत् । तत्ववेदिभिरादिष्टं ब्रह्मचर्य तदिप्यताम् ।। जोवन का पय अति लम्बा है। वायवेत्ताओं ने प्रार्य को उसका महान पाथेय घतलाया है । उसका पालन करना चाहिए। [३०]

(५)
ब्रह्मचारिणः परेशस्तोत्रम्
ब्रह्मचारी की ईश्वर से प्रार्थना
शम्भो ! परेश ! मम वाचमिमां जुषस्व
संयोज्य पाणियुगलं विनयान्नवस्य ।
पापं विधूय शुभमार्गरतो भवेयं
चारित्र्यरक्षणपरो व्रतमाचरेयम् ॥ १ ॥
हे शम्भो । हे परेश।
दोनों हाय जोड़कर मैं विनय पूर्वक नमस्कार करता हूँ।
मेरी इस वाणी पर कृपा पूर्वक ध्यान दीजिए।
मैं चाहता हूँ कि पाप को दूर करके मैं सदा शुभ मार्ग में रत रहूँ, और
चारित्र्य की रक्षा करते हुए अपने मत का पालन करता रहूँ!
शारीरमानसविकारकरालबाधा.
विध्वंसनाय परनिर्वतिसाधनाय ।
लोकद्वयेऽमिलपितार्थविवर्धनाय
प्रार्थीभवामि भगवन् ! प्रतिनां व्रताय ॥ २ ॥
हे भगवन्!
शारीरिक और मानसिक विकारों की
भयंकर बाधाओं को विध्वंस करनेवाले,
परम संतोष के साधनीभूत, और
लोक तथा परलोक में अभीष्ट श्रयों की वृद्धि करने वाले
ब्रह्मचर्य-प्रत के लिए
मैं श्राप से प्रार्थना करता हूँ।
चेदापदा नु निवहः पतितोऽमितः स्यात्
चेत्कष्टजातमभितोऽभिगतं ततं स्यात् ।
प्राणप्रयाभयमप्युदितं भवेद्
याचे तथापि मम चित्तमनाकुलं स्यात् ॥ ३ ॥

चारिश्यं मानवस्येह जन्मनः सारमुत्तमम् । तस्य रक्षाकृते भ्रातर् मह्मचर्य तदिष्यताम् ।। ३ ।। मनुष्य के जीवन का चारिश्य ही उत्तम सार है। उसकी रक्षा के लिए भाई। ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। नानाधिव्याधिखिलानां मयानामोपधं परम् । निराशायाः समाधानं ब्रह्मचर्य तदिप्यताम् ॥ ४ ॥ प्राचर्य नाना प्रकार की श्राधियों और व्याधियों से खिल मनुष्यों की परम शौषध है। वह निराशा का समाधान है। उसका पालन करना चाहिए। जीवने यः समुत्को लोकोत्तरमहात्मनाम् । तस्य मूलं रहस्यं च मह्मचर्य तदिप्यताम् ॥ ५ ॥ लोकोत्तर महापुरुषों के जीवन में जो समुत्कर्ष होता है उसका मूल और रहस्य अलवर्य है । इसलिए उसका पालन करना चाहिए। जीयने रिकता येयं या चोद्देश्यस्य हीनता । लेशहेतुस्तदुच्छित्त्यै ब्रह्मचर्य तदिप्यताम् ।। ६ ।। जीवन में केश को देनेवाली जो रिकता अथवा उद्देश्यहोनता देखी जाती है বাক্ট ফলষ্ট কিছু সপ্ল কা দালন না খায়। वासनानां तमोराशी ममानामन्धचेतसाम् । प्रकाशरूपं यत्तत्वं ब्रह्मचर्य वदिष्यताम् ॥ ७ ॥ वासनाओं के पोर अन्धकार में डूबे हुए तथा सदसद की विवेक-युद्धि से रहित लोगों को प्रकाश देनेवाला तत्व ब्रह्मचर्य हो है । उसका पालन करना चाहिए। मृत्युमाहेण विभ्रान्ताखस्तावैवानिशं ततः । प्राणं यत्केवल पां ब्रह्मचर्य वदिष्यताम् ॥ ८॥ मृत्युरूपी प्राह से घबड़ाये हुए और सदा उससे प्रस्त लोगों की रक्षा का एकमात्र साधन प्रापर्य है। उसका पालन करना चाहिए। जीवनस्य महान् पन्या: पाथेयं तस्य यन्महत् । तत्त्ववेदिभिरादिष्टं ब्रह्मचर्य सदिप्यताम् ॥ ६ ॥ जोवन का पय अति लम्बा है। तत्त्ववेत्ताओं ने प्राचर्य को उसका महान पापिय बतलाया है। उसका पालन करना चाहिए। REAGPoo [३०] अङ्गानि यानि मुनिभिः प्रतिपादितानि कारुण्यपारिधिभिरात्महितोचितानि । बोगस्य, वैरमुदिन मनसो रिशुद्धचा प्रज्ञाप्रसादमधिगन्तुमह लपामि ॥ ७ ॥ करुणा के सागर मुनियों ने आत्म-हित सपादन में उचित योग के जिन भागों का प्रतिपादन किया है, उनसे मन की विशुद्धि द्वारा प्रज्ञा-प्रसाद की प्राप्ति के लिए मैं उत्सुक हूँ। 'प्रज्ञा प्रसाद' का वस्तुत क्या अभिप्राय है, इसका समाधान नीचे के पद्य में दिया गया है। योऽय परेश ! मम चेतसि संप्ररूढो दुर्यासनाप्रचयपाकरशान्मलौघः । तन्नाशनाय करुणां कुरु शकर । त्वं तत्वस्वरूपमनघं मम येन भाति ॥ ८ ॥ हे परेश। यह जो मेरे चित्त में दुर्वासनाओं के परिपाक से मल का ढेर एकत्रित हो गया है, उसके नाश के लिए हे शकर ! आप कृपा करें, जिससे परमतत्त्व के निष्पाप (= पिशुद्ध) स्वरूप को मैं देख सकें। पापान्निपारय, पिधेहि शमे मति मे, सत्ये रता समधिका मयि धेहि मेधाम् । विश्वासमात्मनि जगद्धितसाधनोत्का नि स्वार्थबुद्धिमथ मे भगवन् । प्रयच्छ ॥ ६ ॥ १ देखिए-"यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाच्यानसमाधयोऽष्टावसानि" (योगसून २।२९)। अर्थात् , यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, भ्यान और समाधि,-योग के ये आठ अग माने जाते हैं । २. तु० "निर्विचारवेशारोऽध्यात्मप्रसाद । ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा ।" (योगसूत्र १। ४७,४८ । तया (निर्विचारवेशारये सति) समाहितचित्तस्य या प्रज्ञा जायते स्या ऋतम्भरेति सज्ञा भवति । अन्वर्या च सा, सत्यमेव विभक्ति, न तत्र विपर्यास गन्धोऽप्यस्ति ।" ( योगसूत्र १९४८ पर व्यासमाय)।

है भगवन् 1. पाप से हटाकर मेरी मति को शान्ति प्रदान कीजिए, सत्य में रत तीक्ष्य मेघा को मुम में स्थापित कीजिए। धारम-विश्वास के साथ साथ जगत् के हित साधन में उत्सुक निस्वार्थ युद्धि को भी मुझे दीजिए। हे लोकेश ! शं सदा सफरुणां मय्यर्पयारामदा हेलोन्मूलितपाप ! देहि भरतो भक्ति सदा शर्मदाम् । येनाह गुणिनां गणे तब गुणान् गायेयमत्यादराद् ये नाहकृतचेतसां श्रुतिपथं यान्तीय शान्ता दरात् ॥ १० ॥ ।। इत्यमृतमन्थने लक्ष्यानुसन्धानं नाम प्रथमः परिस्रवः ।। हे लोकेश ! मुझ पर सदा करुणामय तथा आनन्दप्रद दृष्टि आलिए, सरलता से पाप को नष्ट करने वाले। सदा कल्याणकारिणी अपनी भकि दीजिए। जिससे में अत्यादर के साथ गुणियों के मध्य में आपके इन गुणों का गान कर जो मानो डर से शान्त हुए भकारी लोगों के प्रवण में नहीं पाते हैं।

MAA...
M
• .IN
विश्ववन्य महात्मा गान्धी
सत्याहिंसावतारी पश्चिरदारयादमीचयत् ।
चारियरम बलेनैव मारत, महदद्भुतम् ॥
विश्ववन्धो महात्मासो दोनोद्वारपरायणः ।
सर्वोदयमहामन्त्र-ऋषिदिनमतेतराम ॥

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द्वितीयः परिस्रवः जीवन-पाथेयम् अग्ने ! नय सुपथा राये। (यजु. ४०१६) स्वस्ति पन्थामनुचरेम सूर्याचन्द्रमसाविव । (ऋग्० १५१।१५) परि माने ! दुश्चरिताद् बाधस्वा मा सुचरिते मज । ( यज० ४।२८) Ragno- द्वितीय प्रवाह जीवन-पाथेय प्रकाशस्वरूप देव ! अभीष्ट अर्य की प्राप्ति के लिए हमें कल्याणमार्ग से ले चलिए । ( यजु० ४०१६) सूर्य और चन्द्रमा के समान हम अपने जीवन मार्ग पर सकुशल चलने रहें। (ऋग्० ॥५१।१५) अमिस्वरूप देव ! मुझे दुवरित से बचाकर मुचरित में स्थापित कीजिए। (यजु० ४३८)

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(६) आदर्शचिन्तनम आदर्श-चिन्तन सफल जीवन याना के लिए आदर्श-चिन्तन, सदसद्विवेचन में समर्थ बुद्धि, स्वकर्तव्य परिज्ञान, श्रात्म-विश्वास, श्राशावाद और साथ ही विश्व को नियन्त्रण में रखने वाली श्राद्या महाशक्ति के सानिध्य की भावना की महती आवश्यकता है। इसी सिद्धान्त का विशदीकरण नीचे के पद्यों में किया गया है। सौभाग्यमेतदतुल मम येन लब्धं मानुष्यकं प्रभुप्रसादललामभूतम् । याचे तमीशमधुना सदसद्विचारो- द्युक्तां धियं सफलताधिगमाय तस्य ॥ १ ॥ मेरा यह अद्वितीय सौभाग्य है जिससे मुझे भगवान के उत्कृष्ट प्रसाद के रूप में मनुष्यता प्राप्त हुई है। में अब उसकी सफलता के लिए ईश्वर से सदसद् के विचार (विवेक ) में तत्पर बुद्धि की प्रार्थना करता हूँ। याचे मुहुर्मुहुरहं तमजं परेशं सत्ये दृढामथ विवेकरतां सुबुद्धिम् । मार्गे ययातिविपमे निजजीवनस्य कर्तव्यपालनपर कुशली प्रजेयम् ॥ २ ॥ उस अनादि परमेश्वर से मैं पार-बार सत्य में हद और विवेकोन्मुख सद्-बुद्धि को याचना करता है, जिसकी सहायता से मैं कर्तव्यों का पालन करते हुए अपने जीवन के अत्यन्त कठिन मार्ग पर सउशल यात्रा कर सकूँ !

जन्माप्य लोक इह बुद्धिमता जनेन मार्गः स एव सुतरामवलम्बनीयः । कर्तव्यपालनपुर:सरमेव येन कल्याणमेप लभतेऽत्र परत्र चापि ॥ ३ ॥ इस लोक में जन्म पाकर बुद्धिमान मनुष्य को दृढता से उसो मार्ग का अवलम्बन करना चाहिए जिससे उसे अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए इस लोक और परलोक दोनों में कल्याण की प्राप्ति हो। रेरे मतो ! विसृज दैन्यमिदं दुरन्तं नैराश्यमारिह सर्वविनाशहेतुम् । आशावता धृतिमतां मत एप लोको विश्वालमात्मनि च ये नियतं भजन्ते ॥४॥ श्रयि मन ! इस दुःखदायिनो दीनता को छोड़ दे। निराशावाद की भावना सर्व-विनाश का कारण होती है। यह लोक उन्हीं के लिए है जो प्राशावादी तथा धृति वाले है और जिनको निश्चय रूप से अपने में विश्वास है । रक्षां चकार जननीजठरे स्थितस्य स्तन्यं य एर तदनु स्तनयोः ससर्ज संवर्य मां बहुविधैरितरैः प्रकारैः देवेन तेन न हि संप्रति विस्मृतोऽहम् ।। ५ ।। माता के गर्भ में रहते हुए जिन्होंने मेरी रक्षा की थी, तत्पश्चात् माता के स्तनों में जिन्होंने दुग्ध उत्पन्न कर दिया था, अन्य अनेक प्रकारों से भी मेरा संवर्धन करके, उन विश्वम्भर भगवान् ने अब मुझे भुला नहीं दिया है। - AROO चारित्र्य-संपत्तिः चारित्र्य-संपत्ति (७) चारित्र्यमात्मनः स्वास्थ्यम् चारित्र्य और आत्मा का स्वास्थ्य जीवन में चारित्र्य ही मनुष्य का सर्वस्व है । प्रत्येक मनुष्य को मुख्य पूषी उसका चरित्र होता है । उसी के स्वरूप का कई दृष्टियों से प्रतिपादन नीचे के पदों में किया गया है:- सुरम्यं कुसुमं दृध्या यथा सर्वः प्रसीदति । प्रसन्नानपरान् दृष्ट्या तथा त्वं सुसमाप्नुयाः ॥ १॥ सुन्दर फूल को देखकर जैसे सब कोई प्रसन्न होते हैं, ऐसे ही दूसरों को प्रसन्न देखकर तुमको प्रसनता होनी चाहिए । प्रसन्नानपरान् दृष्ट्या थस्यान्तर्न प्रसीदति । अप्रसन्नांस्तथा दृष्ट्वा यस्यान्तन विषीदति ॥ २॥ नूनं तस्यात्मनोऽस्वास्थ्य कारणं तत्र विद्यते । अस्वस्थस्य जनस्येह द्राक्षापि विरसायते ॥ ३ ॥ दूसरों को प्रसन्म देखकर जिसका मन प्रसन्न नहीं होता और अप्रसन देखकर जिसके मन में पीडा नहीं होती, निश्चय ही उसको प्रात्मा को अस्पत्यता इसका कारण है । अस्वस्थ मनुष्य को दास भी स्वाद में युरी लगती है। ततः सदात्मन: स्वारथ्यकते यदपरो भव । तदर्थमात्मनो हीनभावनाया विवर्जनम् ॥ ४ ॥ [३६] विमुखा हन्त मानवाः ! चारित्र्य की उपेक्षा जीवन में चारित्र्य का अत्यन्त महत्त्व होने पर भी मनुष्य उसकी उपेक्षा करते हैं। वास्तव में यह अात्मघात के समान है। इसी बात को नीचे के पयों में दिखलाया गया है :- शरीरमिदमस्थायि जानन्तोऽपि जना ध्रुवम् । तत्स्वास्थ्यस्य कृते यनान् विविधानाचरन्ति वै ॥ १॥ अन्तःशरीरं यत्त्वेतजन्मजन्मान्तरेष्वपि । स्थास्नु तत्स्वास्थ्यसम्बन्धे विमुखा हन्त ! मानवाः ।। २ ॥ मनुष्य यह जानते हैं कि यह शरीर सदा रहने वाला नहीं है। तो भी, शारीरिक स्वास्थ्य के लिए वे तरह-तरह के यत्न किया करते हैं। पर यह खेद की बात है कि यद्यपि मनुष्य का चारित्र्यरूपी अन्तःशरीर जन्म-जन्मान्तर में स्थायी रहने वाला है तो भी उसके स्वास्थ्य की मनुष्य परवा नहीं करते ! उत्पद्यन्ते शरीरेऽस्मिन्विकारा ये निरन्तरम् । प्रायेणोपशमं यान्ति किश्चित्कालादनन्तरम ॥ ३ ॥ परमन्तःशरीरेऽस्मिन् चारित्र्याख्येऽतिरोहितम् । विकाराः सकृदुत्पन्नाः प्रायस्तिष्ठन्ति सर्वदा ॥ ४ ॥ इस शरीर में जो रोगादि विकार बराबर होते रहते हैं, वे कुछ काल के अनन्तर प्रायेण शान्त हो जाते हैं। पर यह कौन नहीं जानता कि इस चारित्र्य रूपी प्राभ्यन्तर शरीर में जो विकार एक बार उत्पन्न हो जाते हैं वे प्रायः सदा रहते हैं। अर्यात् , उनको हटाना बड़ा कठिन होता है । इसलिए मनुष्य को चरित्र शुद्धता का पूरा पूरा ध्यान रखना चाहिए। [ ४२ ) (१०) गृहरूपं मनोऽस्माकम् भाव-संशुद्धि भाव संशुद्धि चारित्र्य का मुख्य अंग है। भाव-संशुद्धि को क्यों आवश्यकता है ? इसी का उत्तर नीचे के पद्यों में दिया गया है :- गृहरूप मनोऽस्माकं स्वच्छं शान्तं भवेद्यथा । तत्परेण मनुष्येण प्रयत्न. क्रियतां तथा ॥ १ ॥ हमारा मन एक प्रकार से हमारा घर है। वह हमारा गृह रूपी मन जैसे मी स्वच्छ और शान्त रह सके, उसके लिए हमें तत्पर होकर प्रयत्न करना चाहिए । सोपद्रयं तथास्वच्छं दुर्गन्धेन समाचितम् । अभद्रदर्शनं वेश्माष्युपितः कः सुखं व्रजेत् ॥ २॥ भावसंशुद्धिमेतस्मात्सीमनस्यं तथैव च । सद्विचारसमृद्धिं च समीहन्ते मनीषिणः ॥ ३ ॥ उपद्रव या कोलाहल से युक्त, अस्वच्छ, दुर्गन्ध से भरे हुए और दखने में अभद्र या भद्दे घर में रह कर कौन सुखी हो सकता है ? इसीसे मनीपी लोग भाव-संशुद्धि, सौमनस्य और सद्विचारों की समृद्धि को चाहते हैं। अभिप्राय यह है कि स्वास्थ्य और प्रसन्नता के लिए जैसे शान्त, स्वच्छ और सुन्दर घर की आवश्यकता होती है, उसी तरह आध्यात्मिक शान्ति और प्रसन्नता के लिए भाव संशुद्धि आदि मानसिक गुणों की आवश्यकता है । स एप परमः स्वार्थो दोपसस्पर्शवर्जितः । परार्थजीवनस्यापि पात्रता तत्र जायते ॥ ४ ॥ भाव सशुद्धि आदि उपर्युक्त मानसिक गुणों की प्राप्ति ऐसा उत्कृष्ट 'स्वार्थ' है जिस के साय दोष का संस्पर्श भी नहीं है। इस 'स्वार्थ'-सिद्धि के हो जाने पर ही [४३ ] मनुष्य में परार्थ-जीवन की पात्रता आती है । अर्थात्, उक्त उदात गुणों से युक्त मनुष्य में ही वास्तव में दूसरों के हित के लिए कार्य करने की योग्यता होती है । वस्तुतस्तत्पदं पुण्यं यत्र स्मार्थपरार्थयो:। एकत्वं जायतेऽद्वैतं तदेवाहुर्विचक्षणाः ॥ ५ ॥ वास्तव में मनुष्य के चरित्र को वही स्थिति पवित्र और उत्कृष्ट होती है जिसमें स्वार्थ और परार्य की एकता या अभिन्नता हो जाती है। विद्वान् लोग उसी अवस्था को 'अद्वैत' की स्थिति कहते हैं । :- (११) सद्विचाराः प्ररोहन्ति शुभसंकल्पवारिणा सद्विचारों का विकास सद्विचारों को चारित्र्य का शरीर कहना चाहिए । उनका विकास से हो सकता है, इसी बात को नीचे के पद्यों में समझाने का यत्न किया गया है। क्षेत्रे विना प्रयत्नेन यन्यतृणसमुद्भवः । भूयो भूयः कृपे: पक्ष महानाय जायते ॥ १॥ सव कोई जानते हैं कि प्रत्येक खेत में जंगली घास-पात विना प्रयत्न के ही बारबार उगती रहती हैं और इससे खेती की बड़ी हानि होती है। कृपकस्य प्रयत्नेन सावधानस्य नित्यशः । वारणं क्रियते तेषां कृपे रक्षा च जायने ।। २ ॥ सावधान किसान वरावर प्रयत्न पूर्वक उस जंगली घास पात को निकालता रहता है और इसी प्रकार खेती की रक्षा की जाती है । [४४ ] , एवं चित्ते स्वभावेन नानादुर्वासनोदयः । जायमानो मनुष्यस्य लोशसन्ततिकारणम् ।। ३ ॥ इसी प्रकार मनुष्य के चित्त में स्वभाव से ही अनेकानेक दुर्वासनाएँ पैदा होती रहती है और उनके कारण उसको वरावर क्लेशों का अनुभव करना पड़ता है । केवलं तत्र यत्नेन भूयोभूयः कृतेन वै ! निरोधः शक्यते कर्तुं तासामुन्मूलनं तथा ॥ ४ ॥ इस स्थिति में केवल बार-बार किये गये यल से ही उनका निरोध और उन्मूलन किया जा सकता है। धीरैरुत्साहसम्पन्नैः श्रद्धाविश्वासधारिभिः । कर्तुं सत्पार्यते, नैव संशयापिष्टमानसैः ।। ५ ।। यह कार्य (दुर्वासनाओं का निरोध और उन्मूलन ) श्रद्धा और विश्वास को धारण करनेवाले उत्साही धोर-वीरों द्वारा ही किया जा सकता है। जिनके मन में संशय चैटा हुआ है वे इस कार्य को नहीं कर सकते । वासना याः शुभोदो विचारा ये च साधवः। कुशलं तत्र रोहन्ति स्वच्छे चित्ते न संशयः ॥६॥ शुभ परिणाम को उत्पन्न करनेवाली वासनाएँ और अच्छे विचार स्वच्छ चित्त में हो अच्छी तरह पनपते हैं, इसमें कोई संशय नहीं हो सकता । तस्य देवस्य सवितुः प्रसवाना य ईशिता । प्रकाशप्रेरणां लब्ध्या वस्तुतो जीवनप्रदाम् ।। ७ ।। नष्टा ये दुष्टसंस्कारास्तेषां खायेन नित्यशः । सद्विचाराः प्ररोहन्ति शुभसंकल्पयारिणा ॥ ८ ॥ समस्त उत्सत्तियों के स्वामी उन सवितृ देव से घस्तुत' जीवन को देनेवाली प्रकाश को प्रेरणा को पाकर, जो दुष्ट संस्कार बराबर नष्ट होते जाते हैं उनके खाद्य ( = खाद) से, और शुभ संकल्पों के जल से मनुष्य के चित्त में सद्विचार उगते और बदते हैं। १. तु. "अविद्यास्मितारागद्वेषामिनिवेशा पञ्च क्लेशाते प्रतिप्रसवहेया सूक्ष्मा। ध्यानहेयास्तवृत्तयः ।" ( योगसूत्र २३, १०, ११) प अभिप्राय यह है कि अच्छी खेती के लिए जैसे सूर्य-प्राश, खाद और पानी के भावश्यकता होती है, ऐसे ही मनुष्य के चित्त में सरिचारों की उत्पत्ति श्रौर युष्टि लिए भगवान की प्रेरणा (या कृपा), दुष्ट संस्कारों का नाश और शुभ-सहर (क्रमश सूर्य-प्राश खाद और पानी के स्थानीय ), इनकी श्रावश्यकता होती है। उच्छेद्या याश्च संरक्ष्या वासनास्तत्र संस्थिताः । तासां विवेकः प्रथमं बुद्धिमनिरपेक्ष्यते ॥ ६ ॥ इस कार्य में सबसे पहले चित्त में रहनेवाली उच्छेदनीय ( जिन का . करना है ) और संरक्षणीय ( - जिन की रक्षा करना अपेक्षित है ) वासनाओं में स्पर विवेक करने की आवश्यस्ता बुद्धिमानों को होती है। चित्तभूमौ प्रयत्नेन पोपितवं निरन्तरम् । सद्विचारकृपिः कृष्टिः संस्कृति; मता बुधैः ।। १० ॥ इस प्रकार चित्तपो भूमि में वरावर प्रयत्न-पूर्वक पोपित की गयी सद्विवारी कृषि को विद्वान लोग 'कृष्टि' थयथा 'सस्कृति' समझते हैं। अभिप्राय यह है कि मनुष्यों के सद्विचारों की समष्टि को ही संस्कृति' 'कृष्टि' इन शब्दों द्वारा कहा जाता है। अय्यममृतं पुण्यं दिव्यानन्देन सयुतम् । तत्फलं तेन धनिमस्ते धन्यास्ते मनीषिणः ॥ ११ ॥ उपर्युक्त सद्विचारों को कृषि का पल अक्षय, अत, पवित्र और दिव्य भानना युक्त होता है । उस फल से जो धनी हैं पे धन्य है, वे मनीपी है। अभिप्राय यह है कि लोक प्रसिद्ध कृषि से मनुष्यों को साधारण अन्नादि का लाभ होता है, परन्तु उपर्युक सद्विचारों की कृषि से जो फल प्राप्त होता है वह अशा आदि गुणों से युक्त होने के कारण अनादि से कहीं बढ-चढ़ कर होता है।

(१२) कृपया परयाविष्टो दर्श दर्श भवाम्यहम् मद-मोह से ग्रस्त मनुप्य मद और मोह चारित्र्य के वाधक हैं। अत एव मद मोह से प्रस्त मनुष्यों की यनीय दशा को नीचे के पद्यों में दिखलाया है :- आवासस्थानभूता ये प्रायेण मदमोहयोः । तृणाय मन्यमाना वा अन्याननतिवैभयान् ॥ १ ॥ तत्तल्लौकिककार्येषु लिप्तांस्तान क्षिप्तचेतसः । उच्चावचपदस्थान्या नानोपायैर्धनार्थिनः ॥ २॥ अवशानवसन्नांश्च विवेकविधुरानरान् । कृपया परयाविष्टो दर्श दर्श भवाम्यहम् ॥ ३ ॥ प्रायेण मद और मोह से जो वैभव हीन दूसरे लोगों को तृणतुल्य समझते हैं, उन लौकिक कार्यों में इवे हुए, व्यप्रचित्त, अच्छे-बुरे उपायों से धन-संग्रह में संलम, कामनाओं से परवश, अत एव खिन्न, विवेक हीन, ऊँचे-नीचे पदों पर आसीन लोगों को देख-देख कर मुझे बड़ी कृपा पाती हैं । रोगेण महताकान्त: पीडया वा प्रपीडितः । नष्टसंज्ञोऽथवास्वस्थो यथा, तद्वद्धि ते मताः ॥ ४ ॥ पड़े रोग से अामान्त, अथवा पीडा से पीडित, अथवा नष्टचेतन, अथवा अस्वस्थ मनुष्य के समान ही वे मुझे प्रतीत होते हैं। युक्त होकर OGRom [१७] (१३) जीवने ऽस्मिन् महाँल्लामः स्वान्तस्तोपो निगद्यते अन्तरात्मा का अविरोध चारित्र्य के लिए मनुष्य के श्राचरण और अन्तरात्मा में परस्पर विरोध आवश्यकता है। हमारे प्राचीन शास्त्रों में इसी को 'प्रारमनस्तुष्टिः' या 'आत्मतुष्टि महा है। इसी का वर्णन नीचे के पद्यों में किया गया है। जीवनेऽस्मिन् महाँलाभः स्वान्तस्तोयो निगद्यते । सस्यान्तरात्मना सार्धमनिरोधे तदिष्यते ॥ १॥ इस जीवन में सब से बड़ा लाभ अपनी अन्तरात्मा का संतोष ही है। अन्तरात्मा के साथ मनुष्य के अविरोध से ही यह प्राप्त होता है। यतस्तरपरमं सत्यं भास्वरं च निरञ्जनम् । अन्तः सनस्य सत्त्यस्य साक्षिरूपेण तिष्ठति ॥ २॥ क्योंकि वह प्रकाशमान विशुद्ध परम सत्य प्रत्येक प्राणों के अभ्यन्तर में साहिए से विराजमान है। सालोक्यमय सारूप्ये सायुज्यमथवा पुनः । अन्तस्तत्त्वेन तेनैव कल्याणेप्सुभिरिष्यताम् ॥ ३ ॥ जो अपना कल्याण चाहते है उनको असो आभ्यन्तर परम तत्व के साथ सलोक्ता, सरूपता अथवा एकीभाव प्राप्त करने का मन करना चाहिए। तत्वस्यानुभवस्तस्य मानवस्यैव जायते । ततः सर्वेषु भूतेषु श्रेष्ठं मानुष्यकं मतम् ॥ ४ ॥ अपने अन्दर रहनेवाले उस परम Trt की अनुभूति केवल मनुष्य को ही होता । है। इसी लिए मनुष्यता का पद सर प्राणियों में श्रेष्ठ माना गया है। १.तु. "आत्मनस्तुष्टिरेवं " ( मनुस्मृति २३६)। २.तु. "एकोऽहमस्मीत्यारमान यावं कल्याण मन्यसे । नित्यं स्थितस्ते होग पुण्यपापेक्षिता मुनि ॥” ( मनुस्मृति ८९१)। तया "मनमस्थाः स्वमात्मानं मुर्ग साक्षिणमुत्तमम् ।" (मनुस्मृति ८१४४)। १. तु. "यशा विश्वस्य भूतस्याहमस्मि सशस्तम' (अर्व ६३५८३) (१४) सत्यं जयति सर्वत्र सत्य की जय सत्य ही चारित्र्य का श्रात्मा है । सत्य के बिना चारित्र्य रह ही नहीं सकता। उसी सत्य के स्वरूप का वर्णन निम्नस्य पद्यों में किया गया है :- सत्यं जयति सर्वत्र नैयासत्यं कदाचन । तस्मात्सत्यपरो भूत्वा निर्द्वन्द्वो विचरेन्नरः॥१॥ सत्य की सर्वत्र जय होती है, असत्य की कभी नहीं। इसलिए, मनुष्य को सत्य-परायण होकर निर्द्वन्द्व ( = निर्भय अथवा निर्विरोध) भावना से जीवन-यात्रा करनी चाहिए। सत्ये स्वरूपसंरक्षानपलापी हि तिष्ठतः । तत्र स्वात्मविरोधोत्थदीर्मनस्यं न जायते ॥ २ ॥ सत्य में अपने वास्तविक स्वरूप की रक्षा और अनपलाप ( न छिपाना), दोनों रहते हैं । सत्य के रहने पर अपनी अन्तरात्मा के विरोध से उत्पन्न होनेवाली खिन्नता भी नहीं होती। अतस्तन्त्रात्मसंतोपो मनःस्वास्थ्यमकृत्रिमम् । सर्वैरप्यनुभूयेते निर्भयावस्थितिस्तथा ॥ ३ ॥ इसीलिए सत्य की स्थिति में आत्मसंतोष, मन की स्वाभाविक स्वस्थता और निर्मयता को अवस्था को सब अनुभव करते हैं। सत्याधारण तिष्ठन्ति मनःस्वास्थ्योद्भवा गुणाः । मनःप्रसादः सौम्यत्वमार्जवं शान्तिरेव च ।। ४ ।। मन को स्वस्थता से उत्पन्न होनेवाले गुण, जैसे मन प्रसाद, सौम्यता, आर्जव और शान्ति, ये सत्य के आधार पर ही ठहरते हैं। यथा प्रकाशो लोकानां हितमातनुते सदा । सत्यशीलास्तथा सन्तः परसन्तापहारिणः ।। ५ ।। जैसे प्रकाश से सदा लोकों का हित होता है। इसी तरह सत्य-शील सापुरुष दूसरों के सन्तापों को हरनेवाले होते हैं। त (१५) सत्यस्य हि प्रतिष्ठायां चारित्र्यं सत्य और चारित्र्य चारित्र्य की दृष्टि से ही सत्य का वर्णन नीचे के पयों में भी किया गया है स्वरूपे सस्थिति सत्यमसत्ये तद्विरुद्धता। मृत्युरूप ततोऽसत्य सत्येऽमृतनिधि स्थित ॥ १ ॥ अपने स्वरूप में रहना ही सत्य है। असत्य में यह बात नहीं होती। इसीलिए अमत्य मृत्यु के समान है और सत्य में अमृत की निधि रहती है।' सत्येन हि सहायेन ततो देवा निरन्तरम् । तज्ञा अमृता विश्वभार बिभ्रत्यवन्द्रिता ॥२॥ इस लिए सत्य की सहायता से ही अग्नि, वायु सूर्य प्रादि देवतागण (प्रकृति के अटल नियमों के अनुवर्ती) और अमृत (भमरणशील) कहे जाते। और अतन्द्रित होकर ( तत्परता से ) निरन्तर विश्व के भार को वहन करते हैं। सत्यरक्षाकते तस्मात् सन्त मापनरपि । तत्परा नियत लोके दृश्यन्ते देवसनिभा ॥३॥ দুষীবি । * ইয়ঞ্জা ঈ হাগু মানব ন যার যুব } গদ্য से सत्य की रक्षा में सदा तत्पर दिखायी देते हैं। सत्यस्य हि प्रतिष्ठाया चारित्र्य स्थितिमनुते । सर्व धर्मा क्षय यान्ति यदि सत्य न विद्यते ॥ ४॥ सत्य के रहने पर ही चारिय की स्थिति हो सकती है । सत्य के न रहनेपर सब धर्म नष्ट हो जाते हैं। सत्याग्नयेण लोकस्य व्यवहार प्रसिध्यति । सत्ये सत्येव विश्वासो व्यवहारस्तदुद्भव ॥ ५ ॥ सत्य के सहारे पर हो लोक का व्यवहार चलता है। क्योंकि लोक व्यवहार लिए परस्पर विश्वास की आवश्यकता होती है और विश्वास प्रत्य के रहने पर ही हो सकता है। १ इसीलिए 'असतो मा सद्गमय और 'मृत्योर्मामृत गमय' (वृहदारण्यकोष निषद् ॥३२८ )य दोनों श्रुतिया वास्तव में समानार्थक है। २ ० "देवा अमृता ऋतज्ञा' (११६५१४)। [५] यथाऽभावस्य भावेन विरोधः शाश्वतो मतः । प्रकाशसंनिधाने हि तमः सद्यो निलीयते ॥ ६॥ यथा मनःप्रसादेन शोकोद्वेगी विनश्यतः । तथासत्यस्य सत्येन सहभावो न सिद्धयति ॥ ७॥ जैसे अभाव का भाव के साथ शाश्वत विरोध है, जैसे प्रकाश के होते ही अन्धकार तत्काल हट जाता है, जैसे मन प्रसाद से शोक और उद्वेग नष्ट हो जाते हैं, ऐसे ही सत्य और असत्य एक साथ नहीं रह सकते हैं। -ocGMD9o ......। शरीर-स्वास्थ्यम् इन्द्रिय-संयमश्च शारीरिक स्वास्थ्य तथा इन्द्रिय-संयम तनूपा अमेऽसि तन्वं मे पाहि । आयुर्दा अमेऽरयायुर्मे देहि । "यन्मे तन्या ऊनं तन्म आ पृण ॥ (यजु० ३।१७) अमिदेव ! तुम शरीर की रक्षा करने वाले हो, मेरे शरीर को पुष्ट कीजिए । तुम आयु को देने वाले हो, मुझे पूर्ण आयु दीजिए। मेरे शारीरिक स्वास्थ्य में जो भी कमी हो उसे पूरा कर दीजिए। वाङ् म आसन्नसोः प्राणश्चक्षुरक्ष्णोः श्रोनं कर्णयोः । अपलिताः केशा अशोणा दन्ता बहु बाह्रोबलम् । ऊोरोजो जहूयोर्जव: पादयोः प्रतिष्ठा ॥ (अथर्व० १९६६०१३) मेरे समस्त अंग पूर्ण स्वस्थता से अपना अपना कार्य करें, यही मैं चाहता हूँ। मेरी वाणी, प्राण, अख और कान अपना-अपना काम कर सकें। मेरे याल काले [ ५१ ]

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रहें। दांतों में कोई रोग न हो। बाहुओं में बहुत बल हो। मेरी ऊओं में और
जाँघों में वेग और पैरों में रहता हो।
अश्मा भवतु नस्तनूः।
( यजु० २९॥४९)
हमारी प्रार्थना है कि हमारे शरीर पत्थर के समान सुदृढ हो।
भद्रं जीवन्तो जरणामशीमहि ।
(भाग १०३७५६)
हम कल्याण मार्ग पर चलते हुए वृद्धावस्था को प्राप्त हों!.
अहं सर्वमायुर्जीव्यासम् ।
(अथर्च १९/७०19)
में अपने जीवन में पूर्ण श्रायु को प्राप्त करूँ।
तचक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुकमुच्चरत्
पश्येम शरदः शतम् । जीवेम शरदः शतम् ।
शृणुयाम शरदः शतम् । प्रनयाम शरदः शतम् ।
अदीनाः स्याम शरदः शतम् । भूयश्च शरदः शतात् ।।
वह देखो। इन्द्रियों के स्वास्थ्य के निर्वाहक, सबके चक्षु'स्थानीय प्रकाशमय
सूर्य भगवान् सामने उदित हो रहे हैं। उनसे स्वास्थ्य को प्राप्त करते हुए, हम सौ वर्ष
तक देखें, सौ वर्ष तक जीवे, सौ वर्ष तक मुन सके, सौ वर्ष तक बोल सके, सौ वर्ष
तक किसी के श्रानित न हो और सौ वर्ष के अनन्तर भी।
ऊपर दिये हुए वचनों से स्पष्ट है कि हमारे वैदिक वामय में शारीरिक स्वास्थ्य
और दीर्घायुष्य के प्रति कितनी गम्भीर आस्था है। वास्तव में लौकिक या पारमार्थिक
किसी भी दृष्टि से जीवन में शारीरिक स्वास्थ्य का अनिवार्य महत्व है। जोन की
सफलता, चारित्र्य को दृढता, अदात्त श्रादों की भावना, इन सबका शारीरिक
स्वास्थ्य मूलाधार है । शारीरिक स्वास्थ्य का घनिष्ठ संवन्ध इन्द्रिय संयम से है । नीचे
की संख्या १६ से २१ तक की रचनाओं का संयन्घ इन्हीं दोनों विषयों से हैं:-
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(१६) स्वस्थोऽहं नात्र संशयः स्वास्थ्य का मन्त्र मनुष्य के जीवन में शुभ सकल्पों और भावनाओं का बढा भारी स्थान है। हमारी शक्ति का स्रोत उन्हीं में निहित रहता है। निम्नस्य दोनों पद्यों को इसी प्राशय से हम मन्त्र कह सकते हैं। दोनों की रचना अन्त प्रेरणा से ऐसे समय हुई यो जव हम स्वयं एक भयानक रोग से आक्रान्त ये और डाक्टरों को चिकित्सा से भी कोई लाभ नहीं हो रहा था। हमारा विश्वाम है कि उस समय हमारे पूर्णतया स्वास्थ्य लाभ में निम्नस्थ विचारों ने प्राचर्यजनक सहायता की थी.- ( ओम् ) स्वस्थोऽहं सर्वथा स्वस्थः स्वस्थो नैनात्र संशय.। स्थस्थः सदा भविष्यामि सत्यमेतद् प्रत मम ॥ १ ॥ (ओम् ) सूर्येण वायुना चैव देवैरन्यैश्च सर्वदा । रक्षितः सखिभावन स्वस्थोऽहं नान संशयः ॥२॥ मैं स्वस्य हूँ, सर्वथा स्वस्थ हूँ। मेरे स्वस्थ होने में सशय के लिए कोई स्थान नहीं है। सदा स्वस्थ रहूँगा' यह मेरा सच्चा व्रत है। सूर्य, वायु तथा अन्य देवतागण भी सदा सखा रूप में मेरी रक्षा करते हैं । इसलिए मैं स्वस्य हूँ, इसमें कोई सशय नहीं है। "अप्रघन्तरमृतमप्सु मेषजम्" (P० ११२३।१९), अर्थात् , जलों में अमृत का वास है, वे औपध स्वरूप हैं । 'सविता "अपामीयों यायते' (ऋग्. ११३५९), अर्थात्, सूर्य बीमारी को भगाता है। इत्यादि वैदमन्त्रों से स्पष्ट है कि सूर्य आदि देवी शक्तियों इमें स्वास्थ्य का प्रसाद देने के लिए सदैव सबद्ध रहती हैं। ८.५३ ] न शरीरकृते वयम् हम शरीर के लिए नहीं है स्वास्थ्य के मौलिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन नीचे के पयों में किया गया है:- ब्रह्मचर्य महान् धर्मो ब्रह्मचर्य परं तपः । ब्रह्मचर्यप्रसादेन तमस्तरति दुस्तरम् ॥ १ ॥ शरीरमिदमस्मभ्यं न शरीरकृते वयम् । तदेतत्तत्त्वतो ज्ञात्वा नरः कल्याणमनुते ॥ २ ॥ प्रापर्य महान धर्म है। ब्रह्मचर्य परम तप है । ब्रह्मचर्य के प्रसाद से मनुष्य दुस्तर मोहाधिकार को तर जाता है। यह शरीर हमारे लिए है, हम शरीर के लिए इसको ठीक-ठीक समझ लेने से मनुष्य कल्याण को पाता है। (१८) अतिक्रामन्नहो मोहादायुर्माणि कृन्तति स्वास्थ्य के नियम यातायां जीवनस्यात्य शरीरं रथमुच्यते । इन्द्रियाणि हयानाहू रथस्यास्य मनीषिणः ॥ १॥ स्वस्थेनातः शरीरेण संयतैरिन्द्रियैर्धजन् । लक्ष्यं यजीवनस्यात्र सुसं प्राप्नोति मानवः ॥२॥ इस जीवन की यात्रा में मनीषी लोग शरीर को स्य और इन्द्रियों को घोड़े कहते हैं। इसलिए स्सस्य शरीर तथा संयत इन्द्रियों से जीवन-यात्रा करता हुआ मनुष्य सुख-पूर्वक अपने जीवन के लक्ष्य को पा सकता है। [ 8 ] तनाहारविहारेषु तथा स्वप्नावबोधयो । व्यापारेषु तथान्येपु युक्तबुद्धिरपेक्ष्यते ॥ ३ ॥ उस के लिए श्राहार विहार में, सोने जागने में तथा अन्य कामों में भी युज धुद्धि की अपेक्षा होती है। थाथातथ्येन सपन्न सर्व कार्य प्रशस्यते । चर्याया जीवनेऽप्यस्माद् याथातथ्यमपेक्ष्यते ॥४॥ गीतायामेप एवार्थो युक्तशब्देन कथ्यते ।' युक्ततैयोच्यते योगो योगः कर्मसु कौशलम् ॥ ५॥ यायातम्य या औचित्य से जो कार्य किया जाता है वह प्रशसनीय होता है। इसलिए जीवनचर्या में भी यायातथ्य की अपेक्षा है। भगवद्गीता में इसी भाव को 'युक्त' शब्द से कहा गया है। युक्तता अथवा औचित्य को ही योग कहा जाता है। क्योंकि, काम करने में फुशलता का ही नाम 'योग' है । जानन्नप्यतिमूढोऽय स्वास्थ्यस्य नियमानिमान् । अतिक्रामन्नहो मोहादायुमर्माणि कृन्तति ॥ ६॥ स्वास्थ्य के इन नियमों को जानता हुआ भी अतिमूढ मनुष्य इनका उल्लवन करता है और इस प्रकार यह प्राधर्य की बात है कि स्वयं अपनी आयु के मर्म-स्थलों को काटता है। -oG09o १ तु. "युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युकस्वमावबोधस्य योगो भवति दु सहा ॥" (भगवद्गीता ६।१७)। २ तु "योग कर्मसु कौशलम्" (भगवद्गीता २।५०)। [ ५५ ] शारीरं स्वास्थ्यमाश्रित्य सर्वमन्यत्प्रवर्तते स्वास्थ्य-रक्षा के लिए यन शारीर रसास्थ्यमानित्य सर्वमन्य भरतते । सत स्वास्थ्यस्य योन परिरक्षा विधीयताम् ॥ १॥ चारिभ्य ब्रह्मचर्य च सयम श्रम एव च । साधन प्रथम तस्य पौष्टिकाहार एव च ॥ २॥ जीवन में सब कुछ स्वास्थ्य पर निर्भर है। इसलिए यम से स्वास्थ्य कर रहा करनी चाहिए। स्वास्थ्य रक्षा के मुख्य साधन हैं ~~वारिश्य ब्रह्मचर्य, सयत भवन श्रम और पौष्टिक भोजन। (२०) यथोच्चैगंगने गच्छन् इन्द्रिय-संयम यथोथैर्गगने गच्छन् पक्षी दृश्यैरनेकश । अनाकृष्ट प्रयात्येव स्वाभीष्ट स्थानमग्रत ॥ १ ॥ तथैव जीरने दृश्ये करादर्शमात्मन । अविस्मरन् निरातको विचरेद्विजितेन्द्रिय ॥ २॥ जसे गगन में ऊँचाई पर उपता हुआ पक्षी, विभिन प्रकार के दृश्यों से श्राकृष्ट न होकर अपने अभी स्थान की ओर आगे बढ़ता ही जाता है इसी प्रकार मनुष्य को विभिन्न दृश्यों के कारण अपने आदर्श को न भुलाते हुए और इन्द्रियों को वश में रखते हुए नियमि भाव से जीवन यात्रा करनी चाहिए (२१) इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन दोषमृच्छत्यसंशयम् इन्द्रियों में प्रसक्ति नुन दृश्यस्य कस्यापि केनचित्परमार्थत । कर्तुं न शक्यते सद्य स्वरूपस्यावधारणम् ॥ १॥ किसी भी दृश्य के वास्तविक स्वरूप का अवधारण कोई भी तत्काल नहीं कर सकता। हर्म्यमेक गत साय रानौ वा तत्र सस्थित । वस्तुतस्तन्न जानीते दिया यापन्न पश्यति ॥ २ ॥ किसी बड मकान में सायकाल के समय पहुँच कर या रात्रि में वहाँ ठहर कर भी कोई उसके वास्तविक स्वरूप को तव तक नहीं समझ पाता है जब तक कि उससे दिन में नहीं देख लेता। सगते मनुजे सद्यो वस्त्रभूषाविभूपिते । मनोज्ञे मधुरालापे विश्वास तनुतेऽन क ? ॥ ३ ॥ अच्छे बलों और आभूषणों से विभूपित, सुदर और मधुर भाषी मनुष्य से मिलते ही तत्काल उसका विश्वास कौन कर लेता है ? अर्थात् काई नहीं । इन्द्रियाणा तत सादय सत्य नेकान्ततो मतम् । परीक्षायास्तत श्रेष्ठ्य गीयते तत्त्ववेदिमि ॥ ४ ॥ इसोनिए इद्रियों का साक्ष्य एका तत सत्य नहीं माना जाता है । इसीलिए तत्त्ववेत्ता लोग परीक्षा की श्रेष्ठता का गान करते हैं । अत एवाभियुक्ताना मतमेतन्मनापिणाम् । इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन दोपमृन्छत्यसशयम् ॥ ५ ॥ इसीलिए विचारशील मनीषियों का यह मत है कि इन्द्रियों में प्रसक्ति से मनुष्य निस्सन्देह दोष को प्राप्त हाता है । 'द्विपन्ति देवाः प्रत्यक्ष परोक्षमियतां गताः ।' सिद्धान्त श्रुतियाक्येषु श्रूयते यत्र तत्र वै ।। ६ ।। देवता प्रत्यम से देष करते हैं और परोक्ष ही उनको प्रिय होता है। यह सिद्धात अनेकन श्रुतिवाक्यों में सुनाई देता है । १ तु. परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति, प्रत्यक्षद्विप ।' (गोपथनाग १।११) [७] तत आपाततो रूप दृष्ट्वा कस्यापि वस्तुनः । नारशस्तद्वशं गच्छेद् यापत्तन्नामधारयेत् ॥ ७ ॥ इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह किसी भी वस्तु के रूप को आपातत देखकर तब तक उसमें प्रासक्त या अनुरक्त न हो जाए जबतक उसके सहा को टोक ठीक न समझ ले। (२२) विचरोद्विजितेन्द्रियः न जीरन-यात्रा सुदीर्घस्याध्धनः पारं गन्तुकामोऽन जीवने । स्वलक्ष्यैकमना नित्यं विचरेविजितेन्द्रियः ॥ १॥ स्पर्धाया. शत्रुताया या रागस्याप्यथ कुत्रचित् । प्रसङ्गोऽवसरोऽप्येवमुपयोगो विद्यते ॥२॥ निरुद्देश्य निरादर्श कर्तव्येन विवर्जितम् । जीवनं यस्य, काम स व्यथं तदतियापयेत् ।। ३ ।। जो मनुष्य इस जीवन के मुदीर्घ मार्ग को सफलतया पार करना चाहता है, उसे इन्द्रियों को वश में रखते हुए सदा एकमात्र अपने लक्ष्य में मन लगाकर जीवन यात्रा में अप्रसर होना चाहिए। इस जीवन याना में किसी विषय के संवन्ध में स्पर्धा अथवा राग अथवा द्वेष का न तो प्रसङ्ग ही है, न अवसर (= अवकाश), और कोई उपयोग भी नहीं है। अभिप्राय यह है कि इस जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करना इतना कठिन है कि वास्तव में मनुष्य को किसी के साथ स्पर्धा अथवा राग द्वेष करने का न तो अवकाश हो मिल सकता है, न उनका कोई प्रसङ्ग उपस्थित होना चाहिए, और न उनसे उसको कोई लाभ ही होता है हो, जिसका जीवन उद्देश्य हीन, आदर्श-हीन और वर्तव्यता की भावना से रहित है, वह भले ही उसको व्यर्य की बातों में नष्ट करे ! [ ५८ ] कर्ममार्गः कर्म का मार्ग केवल शुष्क ज्ञान या निरीह शुभ संकल्पों से ही मनुष्य अपने जीवन को सफल नहीं बना सक्ता। उनकी वास्तविक्ता की परीक्षा कर्म की कसौटी पर ही हो सकती है। साथ ही यह भी आवश्यक है कि किसी भी संकट या आपत्ति से न पचड़ाकर अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मनुष्य बराबर धैर्य और उत्साह से कार्य करता रहे। इसी सिद्धान्त का प्रतिपादन नीचे की रचनाओं (संख्या २३-२६) में किया गया है। (२३) चतुरस्रष्टसंसिद्धिः ज्ञान-पुरस्सर कर्म का महत्व कर्मणा रहितं ज्ञानं पङ्गुना सदृशं भवेत् । न तेन प्राप्यते किंचित् न च किंचित्प्रसाध्यते ॥ १॥ कर्म से रहित ज्ञान एक पड्ड के समान होता है। उससे न तो कोई वस्तु प्राप्त की जा सकती है; न कोई कार्य सिद्ध किया जा सकता है। एवं ज्ञानेन हीनं यत् कर्मान्धेन समं स्मृतम् । मार्गों या मार्गलक्ष्यं या नै तस्य प्रनीयते ॥ २ ॥ इसी तरह ज्ञान से रहित कर्म को एक अन्धे के सदृश समझना चाहिए । उससे मार्ग अथवा मार्ग का लक्ष्य कुछ मी प्रतीत नहीं होता । कर्मणा मनसा याचा कर्तव्यं कर्म कुर्वतः । तस्मादेवेष्टसंसिद्धिश्चतुरस्रा प्रजायते ॥ ३ ॥ इसीलिए ठीक ठीक इष्ट को प्राप्ति उसी मनुष्य को होती है जो मन वाणी और कर्म से अपने कर्तव्य कर्म को करता है। अर्थात् , ज्ञान-पुरस्सर कर्म से ही इष्ट की सिद्धि होती है। eGD- १. तु० "ते य एवमेतद्विदुः, ये वैसत्कर्म कुर्वते, मृत्वा पुनः संभवन्ति। ते संभवन्त एवामृतत्वमभिसंभवन्ति । श्रथ य एवन विदुर्थे चैतत्कर्म न कुर्वते, मृत्वा पुनः संभवन्ति । त एतस्यैवानं पुन' पुनर्भवन्ति । (शतपथब्राह्मण १०४।३।१. ' [ ५१ ] - प्रायेण कल्पनालोके विचरन्तीह मानवाः वर्तमान की उपेक्षा वस्तुतो वर्तमानं यज जगत्तत्परिहाय हा!। प्रायेण कल्पनालोक विचरन्तीह मानवाः ॥ १ ॥ यह रोद का विषय है कि मनुष्य वस्तुत वर्तमान या उपस्थित कर्तव्य के जगत् को छोड़कर प्रायेण कल्पना के लोक में ही घूमा करते हैं। उपस्थितं परित्यज्यानुसरन्तोऽनुपस्थितम् । मन्दप्रज्ञा हि वर्तन्ते बुधरतानाभिनन्दवेत् ॥ २ ॥ भन्दबुद्धि लोग ही उपस्थित को छोड़कर अनुपस्थित के पीछे दौड़ा करते हैं । समझदार मनुष्य को चाहिए कि उन लोगों को बढ़ारा न दे। वर्तमान समालम्ब्य वर्तते यदनागतम् । उपेक्षा वर्तमानस्य तस्मानयोपयुज्यते ॥ ३ ॥ भविष्य का आधार धर्तमान ही होता है। इस लिए वर्तमान की उपेक्षा करना किसी प्रकार भी युक्त नहीं है। (२५) धैर्यमालम्बनं श्रेष्ठम् धैर्य का आलम्बन आशाकुलितैः कष्टं गिना प्रायेण कारणम् । सहते, तस्थले तस्माद् विद्वान् धैर्य समाश्रयेत् ॥ १॥ धैर्यमालम्मन श्रेष्ठम्, धैर्यमालम्बनं परम् । धैर्येण हि सहायेन तमस्तरति दुस्तरम् ॥ २ ॥ श्राशहा मात्र से व्याकुल होने वाले लोग प्राय बिना कारण के ही कष्ट को मा करते हैं । इसलिए आशा के अवसर पर विद्वान् को धैर्य से काम लेना चाहिए। पर्य सबसे श्रेष्ठ बालम्पन है। घर्य परम पालम्बन है। धैर्य की सहायता मनुष्य घोर अन्धकार को पार करता है। [६] (२६) धीरा धैर्यधुरन्धराः दुःखागम से कल्याण पवादुत्पद्यते पद्म- महो रात्र्याः प्रजायते । ग्रीष्मादनन्तरं वर्पा विद्युन्मेधात्मजायते ॥ १॥ शुरूपक्षसमारम्मः कृष्णपक्षादनन्तरम् । कण्टकाचितवृक्षेभ्यो भनोज्ञकुसुमोद्गमः ॥ २ ॥ दास्यात्स्वतन्त्रतावाप्ति: स्वास्थ्य रोगादनन्तरम् । दारिद्रय संपदो भूमिस्तपसः सिद्धिरेव च ॥ ३ ।। कन्यागर्भात्समुत्पन्तिासादीनां महात्मनाम् । शूद्रेभ्योऽपि सतां जन्म ज्ञानमज्ञानिनां तथा ॥ ४ ॥ वृत्तेऽस्मिन् दृश्यमाने तु सृष्टावस्यां समन्ततः । कस्यांचिद् दुःस्थितौ नैव नैराश्यमुपयुज्यते ॥ ५॥ लोकेशस्य जगद्भर्तुर् विश्वकल्याणकारिणी। प्रवृत्ति(मतां शश्वच् छ्रद्धाविश्वासदायिनी ॥६॥ सर्वापि दुःस्थितिस्तस्मात् सुस्थितेरेव कारणम् । एवं दुःखागमो नूनं कल्याणायैव जायते ॥ ७ ॥ सिद्धान्तमिममाश्रित्य धीरा धैर्यधुरंधराः । निरातङ्का: समुन्नत्यै प्रयतन्ते निरन्तरम् ॥ ८ ॥ १. पर से पद्म उत्पन्न होता है, रात्रि से दिन का जन्म होता है, प्रीम के पश्चात् वर्षा थाती है, विद्युत् मेघ से जन्म लेती है। [६१ ।

२. शुकृपक्ष का प्रारम्भ कृष्णपक्ष के अनन्तर ोता है,
कॉटों से व्याप्त पौधों से सुन्दर पुष्यों का उतम होता है।
३ दास्य से स्वतन्त्रता की प्राप्ति होती है,
रोग के पचात् स्वास्थ्य लाभ होता है,
जहाँ दारिद्रय है यही सम्पत्ति आती है,
काष्टमय तप से हो सिद्धि प्राप्त होती है ।
४. कन्या के गर्भ से व्यासादि महात्माओं का जन्म होता है,
शो मी सन्तों का जन्म होता है,
प्रज्ञानियों को ज्ञान की प्राप्ति होती है।
५ इस सृष्टि में जब सब ओर यह बात दिखाई दे रही है,
तब किसी भी दुरवस्या में निराश होना उपयुक्त नहीं है।
६ जगत् का पोषण करने वाले, लोकों के स्वामी भगवान को
विश्वका कल्याण करने वाली प्रति
बुद्धिमानों में सदा पद्धा और विश्वास को उत्पन करती है।
७ इसलिए 'सारी दुरवस्था अच्छी स्थिति का पूर्वरूप हुश्रा करती है,
एच दु ख का भागमन भी कन्याण के लिए ही हुआ करता है।'
८ इसी सिद्धान्त का श्राश्रय लेकर
पर्य धुरन्धर धीर लोग निर्भयता के साथ
सदा उन्नति के लिए प्रयाशील रहते हैं।
[ ६२

लोकनीतिः व्यावहारिक नीति जीवन में श्रादर्श वाद के साथ-साथ लौकिक वस्तु स्थिति और व्यावहारिक जगत के परिचय की भी आवश्यकता होती है। इसी दृष्टि से निम्नस्थ रचनाओं ( सख्या २७-३२ ) में संक्षिप्तरूप से श्रावश्यक लोक-नोति का वर्णन किया गया है:-- (२७) विद्या समुन्नतिपथं विशदीकरोति विद्या-वंदना विद्या समुन्नतिपथं विशदीकरोति बुद्धि विचारविपये प्रखरीकरोति । वर्तव्यपालनपरां धियमादधाति विद्या सखा परमवन्धुरथेह लोके ॥ १ ॥ विद्या उन्नति के मार्ग को स्पष्टतया दिखाती है। विद्या विचारणीय विषयों में बुद्धि को तीक्ष्ण करती है। विद्या बुद्धि को कर्तव्य पालन में तत्पर वनाती है। विद्या इस लोक में सखा और परम-बन्धु के समान है। रूपं प्रसिद्धं न बुधास्तदाहुः विद्या मता वस्तुत एच रूपम् । अपेक्षया रूपयतां हि विज्ञा मानं लभन्तेऽतितरां जगत्याम् ॥ २॥ संसार में जिस को रूप कहा जाता है विद्वान् लोग उस को रूप नहीं मानते। वे तो विद्या को ही वास्तविक रूप समझते हैं। क्योंकि, रूपवानों की अपेक्षा संसार में विद्वान् लोग ही अधिक मान सत्कार को पाते हैं। [ ६३ ।

धनं धनं नैव मतं बुधानां विद्यैव वित्तं मतमस्ति तेषाम ! चौरो न यां चोरयितुं समर्थों भूपोऽपहत्तुं न च यां समर्थः ॥ ३ ॥ विद्वान् लोग धन को धन नहीं समझते। उनके मत में तो विद्या ही मास्तर में धन है, क्योंकि विधा को न तो चोर चुरा सकता है, न राजा ही उस को घोल सकता है। विद्या सकाशादपि प्राकृतस्या- देया सदा स्यायदि सा चरिष्ठा । स्थानेऽप्यपूते पक्तिं सुवर्ण के नाम लोकेऽन्न परित्यजन्ति १॥ ४ ॥ उत्तम विधा को साधारण व्यक्ति से भी ले लेना चाहिए । अपवित्र स्थल में भी पडे हुए सुवर्ण को संसार में कोई नहीं छोड़ता। अवाप्य विद्यां विनयेन शून्या अहयो दुर्जनतां प्रजन्ति । दुग्धस्य पानेन भुजगमानां विषस्य वृद्धिर्भुवनप्रसिद्धा ॥ ५ ॥ विनय भाव से शून्य अभिमानी लोग विधा को पाकर दुर्जनता को धारण कर लेते हैं। संसार में यह बात प्रसिद्ध है कि दूध के पीने से सो के विप की हद होती है। ईदियो जामति यावदन्त- रात्मस्वरूपागमो न यावत् । यारमरो नापि विवेकशाली भेदः क मूरों विदुपीह तावत् ॥ ६॥ বা স উ ঋণ কী সহ আবি সখ , সংরক ও ই आत्म स्वरूप का ज्ञान नहीं है, अपतक मनुष्य विवेक शाली नहीं है, तबतक विज्ञान कई भाने वाले व्यक्ति में और मूर्स में कोई भेद नहीं है।

अभ्यासशीला: सुतरां जना ये भवन्ति ते मन्दधियोऽपि विताः । केनेह रज्ज्या हि गमागमाभ्यां शिलापि घृष्टा भुवने न दृष्या ? ॥ ७ ॥ विशेषतया अभ्यास शील लोग, मन्द बुद्धि होने पर भी, विद्वान हो जाते हैं । कए की मन में लगी हुई शिला भी रस्सी के जाने-माने से घिसजाती है, यह किस ने नहीं देखा है। odGH90- (२८) सङ्गः सतां शर्मशतानि सूते सत्सङ्ग-माहात्म्य सङ्गः सतां शर्मशतानि सूते सङ्गोऽसतां तद्विपरीतवृत्तिः । यस्तेजसां यस्तमसां स्वभागो भेदस्तयोः सर्वजगत्प्रसिद्धः ॥ १ ॥ सत्पुरुषों का सङ्ग अनेक कल्याणों को जन्म देता है। असज्जनों का सा उस से उलटा ही होता है। तेज के स्वभाव और अन्धकार के स्वभाव में जो अन्तर है उसे सव कोई जानते हैं। सत्सङ्गमे तिष्ठति यन्महत्त्वं तज्ज्ञायते दुर्जनसंगमेन । सुखं हि दुःखानुभवेन भाति दीपप्रकाशोऽपि घनान्धकार ॥ २ ॥ सत्सन का जो महत्व है वह दुर्जन के सा से हो जाना जाता है । मुख का स्वरूप दुख के अनुभव से ही स्पष्ट होता है, एवं घोर अन्धकार में ही दोप प्रकाश का महत्त्व स्पष्ट होता है। [ ६५ ] नीचोऽपि सङ्गेन सतां जनानां महत्त्वमासादयति प्रकामम् । समुद्रशुक्ती गतमम्बुदानां प्राप्नोति मुत्ताफलतां जलं तत ॥ ३ ॥ सजना के सबसे नीच मनुष्य भी विशेष महत्व को प्राप्त कर लेता है। यह प्रसिद्ध है कि समुद्र की शुति में पड़ा हुआ यादलों का जल मोतियों के रूप में परिवर्तित हो समुज्ज्वलं प्रेम हि सजनानां दिने दिने पोपमुपैति नूनम् । स्थिरस्वमा सुतरामुदारं हासोन्मुसत्वं भजते न जातु ॥ ४ ॥ सजनों का समुज्ज्वल अर्थात् विशुद्ध प्रेम दिन-प्रतिदिन पुष्ट होता जाता है। स्थिर स्वभाव और स्वार्य की भावना से रहित होने के कारण वह कभी हासोन्मुख नहीं होता। आपनिममा अपि साधुयर्या हरन्ति दुःसानि सदा परेपाम् । भाच्छादितोऽहतिरासमन्ता- दभ्रेस्तमो धारयतीह नूनम् ।। ५ ॥ विशेषतया साधुस्वभाव वाले सजन स्वयं यापत्तियों में पड़े हुए भी सदा दूसरों के दुखों को दूर करते हैं। सब ओर से यादलों से ढका हुआ भी सूर्य अन्धकार अवश्य दूर कर देता है। न दुर्जनानामपत्यमन्तः सतां कदाचित्पदमादधाति । पादाहतोऽप्येप तर्विशालश् छायाश्रितानामपन्ति तापम् ।। ६ ।। दुर्जनों का थपकार सत्पुरुषों के हृदय में कभी स्थान नहीं पाता। यह सामने का विशाल वृक्ष, पैरों से ताडित होने पर भी, अपनी छाया में श्राश्रितों के ताप ग्रे दूर कर देता है। [६६ ] कर्थितोऽपीह खलेन साघुर् हितं परेषां नियतं करोति । मुहुर्मुहुश्चन्दनमङ्ग ! घृष्टं मनोरमं सौरभमातनोति ॥ ७ ॥ दुष्ट मनुष्य द्वारा पीडित होने पर भी साधु मनुष्य सदा दूसरों की भलाई करता है । देखिए, वारवार घिसने पर चन्दन मनोज्ञ सुगन्ध को फैलाता है । द्राक्षेव केचिदहिरन्तरा चा- न्ये नारिकेलेन समं मनोज्ञाः । सौवीरंतुल्या बहिरेव केचि- देवं मनुष्यास्त्रिविधा हि लोके ।। ८ ।। संसार में मनुष्य तीन प्रकार के होते हैं। कोई तो द्राशा (= दाख ) के समान वाहर और भीतर से मनोरम होते हैं, कोई नारियल के समान केवल भीतर से मनोरम होते हैं; और कोई पके-मीठे घडे बेर के समान केवल बाहर से अच्छे होते हैं। प्राप्त प्रसङ्गे मनुजम्वरूपं विज्ञायते, नेतरथा कथंचित् । विद्रावणेनैर यथा जगत्या- माभूपणानां क्रियते परीक्षा ॥ ६ ॥ अवसर के उपस्थित होने पर ही मनुष्य का स्वरूप जाना जाता है। अन्यया कभी नहीं । जैसे संसार में आग में पिघलने से ही आभूषणों को परीक्षा की जाती है। इक्षोः प्रवृत्तेरनुगामिनस्ते सन्तो महान्तो विचरन्ति लोके । प्रपीडितोऽपीक्षुरमन्दमोदं रसप्रदानेन सदा तनोति ॥ १० ॥ संसार में महान् सत्पुरुष इक्षु के स्वभाव का अनुसरण करने वाले होते है। इस पेरे जाने पर भी रस देकर सदा विशेष आनन्द का प्रसार करता है। १. तु. "सौवीरं बदरं घोप्टा" (अमरकोषे २।४।३७)। तथा "पच्यमानं सुमधुर सौवीरं बदरं महत्" (भावप्रकाशे)। [ ६७ ] पदं वरेण्यं समुशान्ति सन्तोऽ- सन्तः पुनस्तविपरीतमा गृधः श्मशाने रमते स्वभावाद हंस: पुनर्मानसमेव मुझे ॥ ११ ॥ सत्पुरुष वरणीय उत्तम पद को याहा करते है। असजनों का स्वभाव उनके विपरीत हुआ करता है । गृध्र स्वभाव से श्मशान में प्रसार होता है, पर हंस प्रसक्षता के लिए मानस सरोवर का ही सेवन करता है। चाग्भिः सतां सुन्तशीतलामिः शुन्धं मनः शान्तिमुपैति नूनम् । उरिसक्तमद्धि: पतनोन्मुसं तद् वही पयः स्वस्थितिमेति सद्यः ॥ १२ ॥ सत्पुरुषों के प्रिय सत्य और शीतल वचनों से शुन्ध मन को निश्चय ही शान्ति प्राप्त होती है । यहि में गिरने के लिए तैयार दुग्ध, पानी के हिडाने पर, तत्काल अपनी पूर्व स्थिति में श्रा जाता है। क्षोभ प्रयाता अपि नैव सन्तो दुष्टामशिधां गिरमुद्गृणन्ति । दुधाः प्रसन्ना अपि शीलयुक्ती पहुं न जातु प्रभवन्ति वाचम् ।। १३ ॥ सनन क्षुब्ध होने पर भी अशिष्ट और दुष्ट वाशी का व्यवहार नहीं करते । दुध लोग प्रससता में भी शोलयुक वाणी को कभी नहीं बोल सस्ते ।

(२९) असञ्जनः पापनिवद्धबुद्धिः असजनों का स्त्रमार असजन: पापनिषद्धबुद्धि- स्तस्मै न कोपायसरः प्रदेयः । क्षेपेण पद्धे विदिवं शिलाया वस्त्राणि नूनं मलिनीभवन्ति ॥ १ ॥ श्रसज्जन की बुद्धि पाप में लगी रहती है। उसको कोप का अवसर न देना चाहिए । यह सब जानते हैं कि कीचड़ में पत्थर के फोने से काहे मैले हो जाते हैं । बहूपमाररुपसेवितोऽपि कृतज्ञतां नैव सलो विमति । सुवर्णकुम्भेन पयोनिपेकान् माधुर्यमामोति न निम्बवृक्षः ॥२॥ अनेक उपकारों से उपकृत होने पर भी दुष्ट मनुष्य कृतज्ञ नहीं होता। सुवर्ण : घड़े से पानी सींचने से नीम के वृक्ष में मिठास नहीं पाता है। श्रुत्वैव चागीरुपदेशयुक्ता दुष्टा बुधानां सहसा त्यजन्ति | मालाहता संग्रथितं सुपुष्पै- भृगन्ति माल्यं कपयो मनोजम् ॥ ३ ॥ दुष्ट लोग विद्वानों के उपदेश भरे वचनों को सुनते ही तत्काल छोड़ देते हैं। माली द्वारा अच्छे फूलों से चनायी हुई सुन्दर माला को बन्दर मसल धुधाः खलानां मृदुमनुवाचा यचः कदाचिन्नहि विश्वसन्ति । माधुर्ययुक्ता अपि ता मयूरः केका बदन्नत्ति भुजङ्गजातम् ।। ४ ।।

विद्वान् लोग मृदु-मधुर-भाषी दुष्टों के वचन में कमी विश्वास नहीं करते। अत्यन्त मौठो बोली को बोलता हुआ भी मोर सपों को खा जाता है । दुष्टाशयानामसतां प्रसङ्गः फलं प्रसूते नितरामवद्यम् । भुजगमानां पतितं मुसान्तः स्वातेर्जलं याति विपत्वमेव ॥ ५ ॥ दुष्ट अभिप्राय वाले असज्जनों का सा अत्यन्त निकृष्ट फल पैदा करता है। सपा के सुख के अन्दर गिरा हुआ स्वाति नक्षत्र का जल विष बन जाता है । दुष्टप्रसङ्गेन सतामपीह मानस्य हानिर्भवतीति दृष्टम् । यक्रस्य लोहस्य निपेवणेन धनस्य घात सहते कृशानुः ॥ ६ ॥ दुष्ट के सम से सज्जनों के भी मान को हानि देखो जाती है। रेदे लोहे के सेवन से अमि को हयोडे की चोट सहनी पड़ती है। मलीमसा मत्सरिण: सहन्ते नेयापरेप सलु भाग्यवृद्धिम् । संवीक्ष्य चन्द्रस्य रुचि रजन्या न जातु मोद भजते हि चौरः ॥ ७ ॥ ईष्यालु स्वभाव के दुष्ट लोग दूसरों की भाग्य-द्धि को नही सह सकते । रात्रि में चन्द्रमा के प्रकाश को देख कर चोर को कभी प्रसन्नता नहीं होती। सह समासाद्य सता जनाना न दुर्जनो विस्मरति स्वभावम् । वृक्षे निवासी रालु चन्दनस्य विप न सर्परत्यजतीह जातु ।। || सम्जनों के संग को पार दुर्जन अपने स्वभाव को नहीं भूलता है। चन्दन के वृक्ष पर रहने वाला सर्प विष को कभी नहीं छोड़ता। [ ७० ।

(३०) निरादरस्यास्पदमास्ति याच्या याचना से अपमान निरादरस्यास्पदमस्ति याच्या स्थानं हि मानो लभते न तत्र । विश्वाधिपो वामनरूपधारी जातो बलेर याचनतत्परः सन् ॥ १ ॥ याचना में निरादर रहता है । उसमें सम्मान के लिए कोई स्थान नहीं होता। विश्व के स्वामी भगवान् को भी बलि से याचना करते समय वामनरूप को धारण करना पड़ा था। श्रेष्ठः कदाचित्कृपणं कदर्य न याचते कष्टशताकुलोऽपि । किं चातको जातु पिपासयापि घटं जलं प्रार्थयते विषएण: १ ॥२॥ श्रेष्ठ मनुष्य सैकड़ों कष्टों से व्याकुल होने पर भी कभी कृपण नीच व्यक्ति से याचना नहीं करता। प्यास से व्याकुल होने पर भी क्या कभी चातक घड़े से जल की प्रार्थना करता है? wenomyor सन्तोपहीना अपि वित्तवन्तः सुखेन निद्रां बत ! नो लमन्ते ॥ ४॥ विद्वान लोग धन को धन नही मानते, उनके लिए सन्तोष हो श्रेष्ठ धन है। सन्तोष से होन धनवान् भी मुस की नींद नहीं सोते हैं। स्वल्पोऽपि दोपः समुपेक्षितश्चे- दनर्थसन्तानमसी प्रसूते। यहः कणोऽरण्यपरस्परास्ता भरमत्वमापादयितु समर्थः ॥ ५ ॥ उपेक्षित किया हुआ थोड़ा-सा भी दोष अनर्थ परम्परा को पैदा कर देता है यहि का कण बड़ी-बड़ी अरण्य परम्पराओं को भस्म करने में समर्थ होता है। प्राप्तिर्यदीया सुखमातनोति तस्यैव दुःखाय भवेद्वियोगः। सूर्योदयेन प्रविकासि पनं तस्माद्वियुक्तं लभते प्रमीलाम् ॥ ६ ॥ जिसकी प्राप्ति सुख देती है, उसो का वियोग दुःख देने वाला हो जाता है । के उदय से खिलने वाला कमल उससे वियुफ होकर संकुचित हो जाता है । न भुज्यते नापि वितीर्यते चेद् अन्ते तदन्येऽपहरन्ति नूनम् । एवं पवितं कृपणस्य लोके तथा समानं मधु मक्षिकाणाम् ॥ ७ ॥ - यदि उपभोग नहीं किया जाता और दान भी नहीं दिया जाता तो अन्त निषय हो दूसरे लोग उसका अपहरण कर लेते हैं। इस प्रकार संसार में धन और मधु-मक्षिकाओं का मधु दोनों समान हैं। कार्य प्रवर्चत फलं समीक्ष्य व्यथा न जायेत यथानुतापात् । [४] तुल्यं तिलैः कः सिफताः प्रपीड्य तैलं समासादयितुं समर्थः ॥ ८ ॥ परिणाम का विचार करके ही कार्य में प्रवृत्त होना चाहिए, जिससे पश्चात्ताप की व्यथा न होने पाए । तिलों की तरह चालू को कोस्हू में पेल कर कौन तेल को पा सकता है? कार्यस्वरूपावगमस्य कालः कार्यप्रवृत्तेः प्रथमं प्रदिष्टः । जाते विवाहे कुलशीलपृच्छां जामातृपतात्कुरुते नु कश्चित् ? ॥६॥ - जो काम करना है उस के स्वरूप को समझने के लिए उसके प्रारम्भ करने से पहले का ही समय ठीक कहा गया है । विवाह हो जाने पर क्या कोई जामाता के पक्ष से उस के फुल और शील के विषय में पूछ ताछ करता है ! कालानुकूल्येन विधीयमानं कार्य हि साफल्यमुपैति नूनम् । उप्तेषु बीजेष्वयथव॑वश्य धनश्रमी निष्फलतां प्रयातः ॥ १०॥ काल की अनुकूलता को देख कर जो कार्य किया जाता है यह अवश्य सफलता को पाता है। प्रतिकूल ऋतु में बीजों के बोने से धन और श्रम दोनों अवश्य व्यर्थ जाते हैं। अनागतार्थ प्रसमीक्ष्यकारी संसिद्धिमासादयितुं समर्थः । पह्निप्रदीप्ते भवने तु कूपं सनन् हि मूखों लभते न किञ्चित् ॥ ११ ॥ अनागत (आनेवाले ) विषय का सम्यक् विचार कर के जो कार्य करता है वही सफलता को पा सकता है। घर में आग के लग जाने पर एँ को खोदने वाले मूर्ख जन को कोई फल नहीं मिलता।

उपायगुप्तस्य नरस्य कशित शत्रुर्न शक्तोऽपर्व विधातुम् । उपानही येन धृते न तस्य तापाय शता: सिकताः प्रता॥ १२॥ ।। इत्यस्तमन्थने जीवनपाथेयं नाम द्वितीया परिसवः ।। जो यथासमय उपाय से अपनी रक्षा कर लेता है, कोई भी शत्रु उसका कुछ नहीं धिगाद सकता। जिसने जूते पहिन रखे हैं गरम बालू उसके पैरों को नहीं जला सकता।

leoSIRONM जमा SECT Pra- ---- - परमदस श्रीरामकृष्ण नेव अध्यात्मजातो भानुज्ञानतिमिावृतान लोकानुद्वोधय योऽमो दशिक द्रो नमामि TTI

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तृतीयः परिस्रवः प्रज्ञाप्रसादः ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस् ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः । (मुण्डकोपनिषद् २०१८) स तस्मिन्नेवाकाशे खियमाजगाम पहुशोभमानामुमां हैमरती ताई होवाच किमेतद् यक्षमिति । सा ब्रह्मेति होवाच. "ततो हैव विदाञ्चकार ब्रह्मेति । ( केनोपनिषद् २५-२६) OCAURUSO- . द्वितीय प्रवाह प्रज्ञा-प्रसाद साधक ज्ञान द्वारा प्रज्ञा प्रसाद को पाकर ही विशुद्ध परमतत्त्व के साक्षात्कार में समर्थ होता है। (मुण्डकोपनिषद् ३।११८) इन्द्र (= जीवात्मा ) ने यक्ष (= यजनीय देव ) के स्वरूप को जानना चाहा । सब ओर से निराश होकर वह अत्यन्त शोभामयी उमा (= विशुद्ध प्रका) के पास पहुँचा । उसके द्वारा ही इन्द्र ने ब्रह्मरूप में उस 'यक्ष' के स्वरूप को जाना । ( केनोपनिषद् २५-२६) watc0000

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प्रज्ञा-प्रसादः प्रज्ञा-प्रसाद जीवन क्या है क्यों है ? उसका परमलक्ष्य क्या है । इस महान् प्रश्न का उत्तर यही हो सकता है कि- उत्तरोत्तरमुत्कृष्टमगति वनं मतम् ।' अर्थात् , उत्तरोत्तर उत्कृष्ट प्रगति, उत्तरोत्तर समुत्थान ही जीवन है, यही जीवन का वास्तविक लक्ष्य है। इस उत्तरोत्तर प्रगति में जीवन को क्रमश तामस, राजस और सात्विक अवस्थाओं में से होकर जाना पड़ता है। वास्तविक आदर्श का अपरिज्ञान, मोह, प्रमाद और आलस्य का ही नाम तामस अवस्था है । लक्ष्य की अस्थिरता, अनिक्षय, अशान्ति, अवसाद और मिथ्या अभिमान का ही नाम राजस अवस्था है। परम- लक्ष्य को स्पष्ट प्रतीति, निश्चय, तत्परता, अध्यवसाय, शान्ति और प्रसन्नता को ही सात्विक अवस्था कहते हैं । इन अवस्याओं के क्रमिक विकास का विशेष प्रतिपादन नीचे संख्या ४५ की रचना में किया गया है। उक्त सात्त्विक अवस्था के परम उत्कर्ष को ही प्रज्ञा प्रसाद' समझना चाहिए । 'तमसो मा ज्योतिर्गमय" (वृहदारण्यकोपनिषद् ॥३२८), "जीचा ज्योति रशीमद्वि" (ऋग० ७॥३२॥२६ ) इत्यादि वैदिक प्रार्थनाओं का वास्तव में अभिप्राय उक्त 'प्रज्ञा प्रसाद' से ही है। "प्रज्ञा प्रसाद के स्वरूप और स्थिति का विभिन्न दृष्टियों से सुन्दर वर्णन शात्रों में यत्र तत्र मिलता है । उदाहरणार्थ, निम्नस्थ प्रमाणों को देखिए ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस् ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः । (मुण्डकोपनिषद् ३।११८) अर्थात्, साधक ज्ञान द्वारा प्रज्ञा प्रमाद को पाकर हो विशुद्ध परमतत्त्व के साक्षात्कार में समर्थ होता है। १ तु. "प्रतार्यायु प्रतर नवीय" (ग्० १०५९१)। "कृधी न अाम् चरथाय जीवसे" (ऋग् ११३६१४)। भद्रादमि धेय प्रेहि" (ऐतरेय ब्राह्मण १।१३)। re 1 - "समाहितचित्तस्य या प्रज्ञा जायते तस्या ऋतम्भरेति संज्ञा भवति । अन्वर्था च सा, सत्यमेव विमति । न तत्र विपर्यास- गन्धोऽप्यस्ति । ( योगसूत्र ११४८ पर म्यास-भाष्य ) अर्थात् , विशुद्ध सात्त्विक अवस्था में जिसका वित्त समाहित (समाधान या समाधि को प्राप्त हो चुका है उसकी प्रज्ञा को ही ऋतम्भरा कहा जाता है। क्योंकि वह सत्य को ही धारण करती है और उसमें विपर्यास या मोह का गन्ध भी नहीं रहता। प्रसन्नचेतसो बाशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते । (भगवदगीता २६६५) विशुद्ध और प्रसन्न चित्तवाले मनुष्य को ही युद्धि प्रतिष्ठित होती है। प्रज्ञा प्रसाद की स्थिति' का ही वर्णन हमारी 'रश्मिमाला' पुस्तक में निम्नस्य शब्दों में किया गया है- सौम्या मनःस्थितिः अभिमानेन दम्भेन दर्पण परिवर्जिता । शान्ता न मायया स्पृष्टा संयमेन पुरस्कृता ॥१॥ श्रद्धया च विवेकेन सत्पमार्गानुसारिणी। लोककल्याणयुद्ध चैव ज्ञानोपार्जनकारिणी ॥२॥ हितबुद्धया समस्तानां प्राणिनां या समन्विता । उत्तरोत्तरमुत्कृष्टचारित्र्यपरिपोपिणी ॥ नैराश्येन विनिर्मुक्ता यासौ सौम्या मनास्थितिः । सन्तुष्टा च प्रसन्ना च सोऽयं मे निधिरव्ययः॥ ( रश्मिमाला ५८) 1. इसी स्थिति से सम्बन्ध रखने वाली अन्य पद्यात्मक रचनाओं के लिए 'रश्मिमाला' को अन्तिम तीन रश्मियों को देखिए । [८०

सौम्य मनःस्थिति
अभिमान से, दम्भ से और दर्द से रहित,
शान्त, छल कपट से अस्पृष्ट और संयम से युक्त,
श्रद्धा और विवेक के साथ सत्यमार्ग का अनुसरण करने वाली,
संसार के कल्याण को धुद्धि से ही ज्ञान का उपार्जन करने वाली,
समस्त प्राणियों के हित की बुद्धि से समन्वित,
उत्तरोत्तर उत्कृष्ट चारिन्य को पुष्ट करने वाली,
नैराश्य से रहित, सन्तुष्ट और प्रसन्न
जो सौम्य मन स्थिति है-
वही मेरी अक्षय निधि है
उक्त प्रज्ञा-प्रसाद की पृष्ठ भूमि के आधार पर ही 'अमृत मन्थन' के इस तृतीय
'परिसव' या प्रवाह को रचना हुई है।
नैराश्य, आदर्शहीनता, लक्ष्यहीनता, रिकता, लघुता, अवसाद, अशान्ति और
वैषम्य से परिपूर्ण मानव-जीवन में उससे श्राशा, विश्वास, प्रकाश, पूर्णता, औदार्य,
मन' प्रसाद और स्थिर शान्ति की भावनाओं को पुष्टि और नवीन प्रेरणा प्राप्त होगी,
ऐसी हमें आशा है।

(३३) अनन्तमनवच्छिन्नं यत्तत्त्वं तदुपास्महे मूल-तत्व को अनुभूति इस समस्त विश्व प्रपञ्च के मूल में अवस्थित परम सत्व की अनुभूति का पक्ष दिग्दर्शन नीचे के पदों में मङ्गलाचरण के रूप में किया गया है-~- निर्मलं शाश्वतं शान्तमवाङ्मनसगोचरम् । विद्यते यन्महत्तेजस्तन्मे नित्यं प्रकाशताम् ॥ १॥ ओलिमल, शावत, शान्त, मन और वाणी का गोचर, महान् तेज स्वयम्भूम से विद्यमान है, वह मेरे लिए सहा प्रकाशित रहे। व्यापि सर्वत्र लोयु त्रिपु कालेपु, सर्वथा । अन्तर्यामि च यत्ततं तन्मे नित्यं प्रसीदतात् ॥ २॥ मूल तत्व तीनों लोको और तीनो कालों में व्याप्त है, जो सारे विश्वका अन्तर्यामी रूप से नियमन कर रहा है, वह सदा मुम से प्रसा रहे। निधान द्धि शक्तीनां सर्वासामन्ततो मतम् । आत्मरूपेण सर्वेषां भाति यनदुपास्महे ॥ ३ ॥ अन्ततोगत्वा जो समस्त शक्तियों का एकमात्र निधान है और जो आत्मरूप से सबको प्रतीत हो रहा है, उसी मूलतत्व को हम उपासना मरते हैं । चराचरमभिव्याप्य तदतीत्य च संस्थितम् । अनन्तमनच्छिन्न यत्तत्तं तदुपास्महे ॥ ४ ॥ चराचर जगत् को म्यान कर के और 31 को भी अतिधान्त कर के जो स्थित है उसी अनन्त अनवास परम तत्व की हम उपासना करते है।

(३४) परमतत्त्वमहं नतोऽस्मि परम-तत्व को नमस्कार व्याप्य स्थितं त्रिभुवनं परितोऽप्रमेयं पुण्यं परं परमनिर्वृतिधाम सत्यम् । पापापहं निविधतापहरं वरेण्यं शान्त शिवं परमतत्त्वमहं नतोऽस्मि ॥१॥ तीनों लोकों में पूर्णत व्याप्त, अप्रमेय, अत्यन्त पविन, परम आनन्द के स्थान, सत्य स्वरूप, पापों को दूर करनेवाले, वरणीय, शान्त, शिवस्वरूप परम-तत्त्व को मैं नमस्कार करता हूँ। यस्यास्ति वाङ्मनसयोर्महिमा न गम्यो लोकानतीत्य निखिलानपि संस्थितं यत् । भूत्वा यतो विलयमेति च यत्र विश्व तच्छाश्वतं किमपि तत्वमहं नतोऽस्मि ॥ २ ॥ जिसकी महिमा का पार वाणी और मन नहीं पा सकते, जो समस्त लोकों को भी अतिकान्त कर के स्थित है, जिस से उत्पन्न होकर विश्व उसमें ही विलीन होता है, उस अनिर्वचनीय शावत तत्त्व को मैं नमस्कार करता हूँ। यच्छाश्वतं परमतत्त्वमतीन्द्रिय सल- लोकत्रयस्य परिचालनमातनोति । आनन्दधाम सततं जगतां प्रतिष्ठां भक्त्या नतोऽस्मि करुणावरुणालयं तत् ।। ३ ।। जो शाश्वत परम तत्त्व अतीन्द्रिय होता हुआ तीनों लोकों का परिचालन कर रहा है। सतत आनन्द के स्थान और लोकों के आधार उस करुणा सागर को मैं भलिपूर्वक नमस्कार करता हूँ। wwcomso- (३५) तन्नो शिवं वितनुतां परमं हि धाम शिवस्वरूप परम धाम सृष्ट्वा जगन्ति निखिलानि पितामहो यो विष्णुस्तथैव भुवनानि च पालयित्वा । मृत्युञ्जयस्तदुपसंहृतिकारणत्याद् थोऽसौ स नोऽवतु सदा त्रिगुणः समन्तात् ॥ १ ॥ समस्त लोकों की सृष्टि के करने से जोनमा है, लोकों का पालन करने से जो विष्णु है, उनका संहार करने से जो शिव है, वह विगुण भगवान् सदा सर्वतः हमारी रक्षा करे। विश्वं यदस्ति सचराचरमेव विष्ट फालत्रयेऽपि परिणामदशानभिज्ञम् । भास्वन्ति येन निखिलानि जगन्त्यमूनि तन्नः शियं वितनुतां परमं हि धाय ॥२॥ जो समस्त चराचर जगत् में व्याप्त हो रहा है, जो तीनों कालों में सदा एक ही रूप में रहता है, जिससे ये सारे जगत् प्रकाशमान हैं, वह परम धाम हमारे लिए कल्याण का विस्तार करे। भानुः शशी समुदितो नियमेन, पान्ये लोका यदीयमनुशासनमाचरन्ति । ब्रह्माण्डमाण्डरचनाकुशलैकदेयः पायारस नोऽनवरत दुरितादयद्यात् ॥ ३॥ जिनके अनुशासन में सूर्य और चन्दमा नियम से रहित होते है और अन्य लोक भी जिनके अनुशासन का अनुसरण करते हैं, प्रद्माण्डरूपी भाग:- पात्र) को रचना में एकमात्र अशल वे सर्वलोककर्ता सर्वान्तर्यामी परमेश्वर चमित पार हे सदा हमारी रक्षा करें। [४] सृष्ट्या जगन्निखिलमेव निगसगेहं यो निर्ममेऽम्बरमदः पटलेन तुल्यम् । तत्रापि सूर्यमथ चन्द्रमसं च दीप्यै शश्वच्छिवं वितनुतां स जगन्निवासः ॥ ४ ॥ जिन्होंने समस्त जगत् को एक निवास गृह के रूप में निर्माण करके पाटन के सदृश उस उच्च गनन को बनाया और उसमें प्रकाश के लिए सूर्य और चन्द्रमा का निर्माण किया वे जगन्निवास परमात्मा हमारे लिए सदा कल्याण का विस्तार करें। तत्तं यदेतदतिशुद्धमचिन्त्यरूपं शान्तं शिवं सकलरिश्वविकासकेन्द्रम् । यन्नेति नेति श्रुतिसारवचोभिरेयं व्याख्यायते किमपि, तत्समुपाग्नयेऽहम् ।। ५ ॥ जो अत्यन्त शुद्ध, अचिन्त्यरूप, शान्त, शिवस्वरूप और सकल विश्व के विकास या केन्द्र है, जिसकी चेद के विशिष्ट चचन 'नेतिनेति' (= यह भी नहीं) कहकर व्याख्या करते हैं, उस अनिर्वचनीय परम तत्त्व का मैं आश्रय लेता हूँ। artiger नूनं मरुं हितधिया समुपाश्रयन्ते पूर्ण पुराण-पुरुष सेवस्व भोः सततमातिहरं समन्तात् पूर्ण पुराणपुरुषं परिपूर्णतायै । सर्वस्य कारणमरसएडमनन्तरूप- मानन्दधाम करुगावरुणालय तम् ॥ १ ॥ अयि मनुष्य ! परिपूर्णता के लिए तू सदा कष्टों को आमूल हरने वाले उस पूर्ण पुराण पुरुष का सेवन कर, जो सय का कारण, अखण्ड, अनन्तरूप, आनन्द- घाम और करुणा का समुद्र है।

आत्मतत्त्वविवेचनम् आत्मतत्त्व का विवेचन- हमारे वास्तविक अत्यान का मूल श्रात्म परीक्षण में निहित है। इसीलिए, हमारा अपना वास्तविक स्वरूप क्या है? इसी प्रश्न का उत्तर नीचे की ३८ से ४४ तक की रचनाओं में दिया गया है। (३८) सर्वदानन्दरूपं तदात्मतत्त्वं विवेकिनाम् अपना स्वरूप श्रात्म तत्व के स्वरूप के विषय में विवेकी और अविवेरी मनुष्यों को हटियों का वर्णन नीचे के पद्यों में किया गया है शक्तेर्धाम स्वयंज्योतिः कूटस्थ सर्वसानि च । सर्वदानन्दरूपं तद् आत्मतत्त्वं विवेफिनाम् ॥ १॥ जो विवेकी हैं उनके लिए यह यात्म तत्व शक्ति का घाम, स्वयं प्रकाशमान, सर्वदा एकरूप में रहने वाला, सब का साक्षी और सदा भानन्द स्वरूप है। संमूढ सर्वदा मम समुद्वेगविषादयोः । अस्थिर स्थितिवात्याभिस्तत्त्वं तदविकिनाम् ।। २ ॥ पर सो अविवेकी है उनके लिए वही आत्म तत्व मोह में पड़ा हुआ, सदा उद्वेष और विवाद में डूबा हुधा और परिवर्तनशील परिस्थितियों की आँधियों से अस्थिर अथवा चचल रहता है। दल (३९) ज्योतिषामपि तज्ज्योतिरात्मतत्त्वं मनीषिणाम् प्रकाशस्वरूप आत्यतच्च आत्मनो यस्य कामाय सर्वे कामा अवस्थिता. । यस्यार्थे तत्तदर्थानामर्थना सप्रवर्तते ॥ १॥ घोरैः परिश्रमैः कृत्वा नानायनान् दिवानिशम् । यच्चाप्यतेऽपि तद् यस्य भोक्तृत्ये पर्यवस्यति ।। २ ॥ आत्मनस्तस्य विस्मृत्य स्वरूपं गौरवं तथा । क्रोडीकृत्यात्मनो हीनभावनां विचरन्ति तथ्यातथ्यविवेकेन हीनाः कृपणयुद्धयः । अन्धे तमसि मनास्ते श्रुतावात्महनो मताः ॥ ४ ॥ ज्योतिपामपि यज्ज्योतिरात्मतत्वं मनीपिणाम् । तदेवाज्ञानमूर्हा ! प्रत्यक्षं सन्न दृश्यते ! ॥ ५ ॥ चैतन्यं यद्धि ते रूप भास्यतोऽपि प्रभास्वरम् । विद्यते तत्र मोहस्य स्थितेरेय न समवः ॥ ६ ॥ मोहचैतन्ययोनित्यं भेदः स्वाभाविको मतः । तेजस्तिमिरयोर्भागभावयोरथवा यथा ॥ ७ ॥ १. जिस श्रात्मा की कामना के लिए सारी कामनाएँ हुआ करती हैं, जिस थात्मा के लिए विभिन्न पदार्थों की माँग हुआ करती है, [१] २. दिन-रात घोर परिश्रमों के साथ अनेक प्रकार के यनों को करके प्राप्त हुई प्रत्येक वस्तु का सार्यस्य जिस आत्मा के भोक्तृत्व में रहता है, ३. उस श्रारमा के स्वरूप और गौरव को भुलाकर तथा अपनी हीन भावना को हृदय से पड़कर जो विचरते हैं, ४. सत्यासत्य के विवेक से होन, अनुदार धुद्धि रखने वाले, तथा घोर अन्धकार में निमम, उन लोगों को श्रुति में श्रात्मघाती कहा गया है । ५ जोधात्मतत्व मनोपियों के लिए ज्योतियों का भी ज्योति है, खेद है ! यही श्रज्ञान से मूढ व्यक्तियों को प्रत्यक्ष होता हुआ भी नहीं दिखायी देता! ६. तेरा यह चैतन्य रूप सूर्य से भी अधिक प्रकाश वाला है। उसके विषय में मोह की स्थिति हो ही नहीं सकती। ७. मोह और चैतन्य में परस्पर जो भेद है यह सदा स्वाभाविक माना गया है। यह भेद ऐसा ही है जैसा प्रकाश और अन्धकार में अपवा भाव और प्रभाव में। ?" Apape- (४०) चञ्चले तु जगत्यस्मिन्नेक आत्मैव निश्चलः आत्मतच्च की स्थिरता चञ्चले तु जगत्यस्मिन्नेक आत्मैव निश्चलः । तत्र चञ्चलभावानां कृते ते विभ्रमः कुतः ? ॥ १ ॥ जीवनेऽस्मिन्ननस्थानां भेदः स्वाभाविकस्तथा । बाहुल्येनानिवार्योऽपि दृश्यते, नात्र संशयः ॥ २ ॥ कृते तासामवस्थानां हर्षः शोकोऽथ खिन्नता । अभिमानोऽथवा गर्यो युज्यते नैव नैव च ॥ ३ ॥ १. इस अस्थिर स्वभाव वाले जगत् में केवल एक श्रात्मा हो निक्षल है। ऐसी अवस्था में अस्थिर पदार्थों के सम्बन्ध में तुझे विभ्रम क्यों है? २. इस जीवन में अवस्थानों में परिवर्तन का होना स्वाभाविक है और प्रायेण वह अनिवार्य भी होता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। ३ इसलिए उन अवस्याओं के सम्बन्ध में हर्ष, शोक, खेद, अभिमान अथवा गर्च का करना किसी भी प्रकार युक्त नहीं । cocumoo- (४१) शिलासंघातसंकाशाः सुस्थिरा दृढनिश्चयाः महात्माओं का स्वभाव आत्म तत्त्व को समझने वाले महात्मा अपने निश्चयों पर पत्यरों की चट्टानों के समान दृढ रहते हैं, इसी सिद्धान्त का प्रतिपादन नीचे के पद्यों में किया गया है:- जीवनेऽस्मिन्नवस्थानामागमोऽपाय एव च । स्वभावतः समायाति सर्वस्यापीति निश्चयः ॥ १॥ तत्त्वमेकं पर तत्र कूटस्थत्वेन वर्तते । तदेव शरण गत्या शान्तिमृन्छति मानवः ॥ २॥ इस जीवन में निश्चय ही सब किसी के साथ सुख दु खादि की अवस्याओं का आना- जाना स्वभाव से ही होता रहता है । पर उन अवस्याओं में भी एक प्रारम-तत्त्व [१] अविचल रूप में (कूटस्थभाव में) परावर वर्तमान रहता है। उधौ की शरण में जाकर, उसी के साप अपने तादात्म्य को समझकर, मनुष्य शान्ति को पाता है । हर्षेण वा विषादेन स्वरूपाद्विच्युतो नरः । चात्यावेगेन संक्षुब्धवृक्षायलिसमो मतः ॥ ३ ॥ शिलासंघात्तसंकाशाः सुस्थिरा दृढनिम्वयाः । सत्त्ववन्तो महात्मानः शोभन्ते सोमवर्जिताः ॥ ४ ॥ हर्ष अथवा विषाद के कारण जो मनुष्य अपने स्वरूप से विच्युत हो जाता है यह आँधी के वेग से अत्यन्त चचल क्षावली के समान है। परन्तु सत्त्वशील महात्मा लोग पत्थरों की चट्टानों के समान सुस्थिर, द. निश्चय और सदा क्षोभ से रहित होते हैं। poto- (४२) मदर्थे ननु दृश्यानि न तदर्थं ममास्तिता दृश्य हमारे लिए है इश्य और द्रष्टा के बीच में अष्टा का ही प्राधान्य होता है, इसी सिद्धान्त को नीचे के पचों में समझाया गया है:- गतागतत्वाद् दृश्यानामस्थिराणां स्वभावतः । एकोऽहं निश्चला द्रष्टा पर्ने, नैवान संशयः ॥ १॥ अतो मदर्थ दृश्यानि न तदर्थ ममास्तिता । ततस्वकारणातोमः सर्वथा न ममोचितः ..हरय आने-जाने वाले होने से स्वभाव से ही अस्थिर होते हैं। में अकेला उनको देखने वाला निश्चल रहता हूँ इसमें सन्देह नहीं है। २. शतः दृश्य मेरे लिए है। मेरा अस्तित्व दृश्यों के लिए नहीं है। इसीलिए एश्यों के कारण मुझे क्षोभ हो, यह किसी प्रकार उचित नहीं है । [१२] (४३) तत् त्वं तत्ते महद्धनम् श्रात्म-स्वरूप में संस्थिति अहंकारेण निर्मुक्त तत्वं यच्छुद्धमव्ययम् । तव त्वं भ्रातर्न जानोपे तत् त्वं तत्ते महद्धनम् ॥ १॥ यस्याभीप्साजिहासाभ्यां व्याप्तमेतजगत्त्रयम् । सार्थक्यं लभते नूनं यस्यैवेक्षणमात्रतः ।। २ ॥ महत्त्वममहत्त्वं या सर्वस्यापीह यस्तुनः । यस्यापेक्षामुपेक्षा या समाश्नित्यैव तिष्ठति ॥ ३॥ संस्मृतिस्तस्य तत्त्वस्य नियत घनपायिनी । स्वरूपे संस्थिति: सत्यमात्मसंमानना मता ॥ ४ ॥ १. अहंकार से निर्मुक्त जो शुद्ध ध्रुव तत्त्व है, भाई तुम उसको नहीं जान रहे हो । वास्तव में तुम वही हो, वही तुम्हारा बड़ा धन है । २. जिसकी अपनी अभीप्सा (= प्राप्त करने की इच्छा) और जिहासा (= छोड़ने की इच्छा) से व्याप्त इस निलोको की सार्थक्ता उसके ईक्षुण मात्र से सम्पन्न होती है, ३. प्रत्येक पदार्थ की महत्ता अथवा लघुता का रहस्य जिसकी अपेक्षा अयवा उपेक्षा में ही निहित है, ४, उसी तत्त्व की निधय रूप से अविचल संस्मृति को 'स्वरूपास्थिति' कहना चाहिए। वास्तव में 'श्रात्म-समान की भावना' यही है । [३] ventatiya (४४) सोऽहं न संशयः सारषत्त्वमसारत्वं मूल्यवत्त्वमथान्यथा । वस्तूनां निर्णयापेक्षि यस्य सोऽहं न संशयः ॥ १ ॥ आहरन्ति बलिं यस्मै दृश्यानीमानि नित्यशः । विश्वभुग विश्वसाती च सोऽहं नैवात्र संशयः ॥ २ ॥ मांसमजादिभिः पूर्णो देहोऽयं पूतिपूरितः । मनोज्ञो रुचिरश्चापि येन, सोऽहं न संशयः ॥ ३ ॥ १. कोई भी पदार्थ सारवान् है अथवा सारहीन, मूल्यवान् है अथवा मूल्यहीन-इस बात में जिसके निर्णय को अपेक्षा की जाती है, निस्सन्देह में वही हूँ। २. ये सारे दृश्य पदार्थ पूजारूप में जिसके लिए अपने अनुभवों की बलि देते हैं वह विश्व का भोक्ता और साक्षी मैं ही हूँ, इसमें सन्देह नहीं है। ३. मांस मन्या श्रादि से पूर्ण और दुर्गन्ध से पूरित यह शरीर जिसके कारण सुन्दर और आकर्षक प्रतीत होता है, निस्सन्देह में वही हूँ। odoo | ६४ ] ब्रह्मभावनम् ब्रह्म का चिन्तन ऊपर आत्म-तत्त्व का विचार किया गया है । उस विचार का पर्यवसान विश्व- प्रपञ्च के समष्टि रूप ब्रह्म के चिन्तन में ही होता है। व्यष्टियों का जीवन समष्टि में ही रहता है, उसी तरह जैसे मछलियाँ पानी में ही जीवित रहती हैं। नीचे की रचनाओं ( ४५-५१) का इसी विचार से संवन्ध है- (४५) शेते सुप्त इवोरगः ब्रह्म-सायुज्य-प्राप्ति का क्रम आत्मनो ब्रह्मसायुज्य- क्रमव्याख्या विधीयते। प्रथमं जडात्मकं सर्व तमोऽवस्थानमेव तत् ॥ १॥ प्रकृत्या बलशालिन्या तमोभूयिष्ठया तदा । आच्छादितो य एवामिः शेते सुप्त इवोरगः ॥ २ ॥ सधूमो रागयोगेण रजोऽयस्थानमेव तत् । स एय निर्मल: शान्तः सत्त्वभूयिष्ठ उच्यते तस्यैवोपरमोऽनन्ते शान्ते ब्रह्मण्यसंशयम् । निर्वाणमथ सायुज्यममृतत्वं च गीयते ॥ ४ ॥ एवं तमोरजासत्त्वा- वस्था: क्रान्त्वा तदमृतम् । चैतन्यमश्नुतेऽद्वतं ब्रह्मणा प्रणवेन वै ॥५॥ १. तु• "श्रोमित्येतदक्षरमिद सर्व तस्योपभ्याख्यानम् ।...""इति सर्वमोहार एव । "सर्वर ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म। अमात्रचतुर्थोऽव्यवहार्य प्रपञ्चोपशमः शिवोऽवैत एवमोझर श्रात्मैव संविशत्यात्मनारमानं य एवं वेद ।" (माण्डूक्योपनिषद् १।२।१२) [१५] १. यटि-रूप आत्मा विश्व के समष्टि-रूपमा के साथ किस सम से सायुज्य अपवा अद्वैत को प्राप्त करता है या कर सकता है, इसी को व्याख्या यहाँ की जा रही है। जीव के क्रमिक विकास में जो सब से नीचे की या प्राथमिक अवस्पा होती है वह जहावस्या से अभिन्न होती है, उसे घोर तामसिक स्थिति हो समझना चाहिए। २. उस अवस्था में अत्यधिक तमस्वरूपिणी तथा बलशालिनी प्रकृति से आच्छा- दित चैतन्य रूप अग्नि, सोये हुए सर्प के समान, मानो सुप्तावस्था में रहती है। ३. वही चैतन्यरूप अग्नि जब राग (नासक्तिरूप रकता) के योग से मानो सधूम अवस्था को प्राप्त हो जाती है उसी को रजो गुण की स्थिति समाना चाहिए। अभिप्राय यह है कि घोर तामसिक अवस्था से ऊपर उठते हुए जीव में जो रागात्मक प्रवृत्ति का विकास होता है उसको राजस स्थिति ही समझना चाहिए। रास से ढकी हुई कण्डे को श्राग वायु के लगने से मुलगने और धुओं देने लगती है। वही स्मिति उक्त द्वितीय अवस्था में आत्मा को होती है। वही चैतन्यरूप अनि जब निर्मल और शान्त होकर प्रकाशित हो उठती है तब उसमें सात्विक अवस्था का अत्यधिक विकास हुआ समझना चाहिए। अभिप्राय यह है कि जैसे प्रति अपने प्रकाश को उत्कृष्ट अवस्था में शुभ, निर्मल और शान्त दिखलायी देती है, ऐसे ही उत्कृष्ट सात्विकता के विकसित होने पर आत्मा निर्मल और शान्त अवस्था को प्राप्त हो जाता है। ४. उसी व्याख्यात्मक चैतन्य की जब अनन्त तथा शान्त ब्रह्म में उपरति हो जाती है उसी अवस्था का शात्रों में निर्वाण' अथवा 'सायुज्य' अथवा 'अमृतत्व' इन शब्दों से वर्णन किया गया है। अभिप्राय यह है कि यदि जैसे अपनी अन्तिम स्थिति में समष्यात्मक अमि में लीन हो जाती है, आत्मा को निर्वाग' अवस्या को भी वैसा हो समझना चाहिए। ५. इस प्रकार व्यष्टि रूप शात्मा प्रमश तामस, राजस और सात्विक अवस्थामा को पार करता हुश्रा अन्त में विश्व के समष्टि-हप ब्रह्म के साथ अमृतम अतावस्या को प्राप्त कर लेता है। शाबों में उसी प्रक्ष का वर्णन प्रणय या ओंकार प से भी किया [६ } (४६) भमा वै सुखमानातं सुखमल्पे न विद्यते विशाल-चिन्तन का महत्त्व यो वै भूमा तत्सुखम् । नाल्पे सुखमस्ति । भूमैव मुखम् । भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्यः । (छान्दोग्य उपनिषद् ७४२३१) अर्थात् , जो विशाल है, महान् है, वही सुख-रूप है। अल्प में, लधु में, सुख नहीं रहता। निस्सन्देह महान् ही सुख है। इसलिए महान् को ही विशेष रूप से जानना चाहिए। लघु स्वार्यों का सतत चिन्तन ही मनुष्य की अशान्ति का मूल कारण है और विशाल-चिन्तन में ही उसकी सच्ची शान्ति का रहस्य निहित है, इसी तथ्य का प्रतिपादन नीचे के पद्यों में किया गया है: शरीरात्मा लघुस्तस्य नैय कार्या विचारणा । चिन्तन हि लघोर्यस्माल्लघुतापादकं मतम् ॥ १ ॥ भूमा वै मुसमानावं सुखमल्पे न विद्यते । अनन्तरता तस्मान्मता भूमपरात्मनोः ॥ २ ॥ ब्रह्मविज्ञायते ब्रह्म ह्याम्नातमसकृच्छ्रुतौ । तस्माद् ब्रह्मविचारेऽन्धौ निममः शान्तिमामुहि ॥ ३ ॥ तस्वमानन्दरूपं तदादिमं नात्र संशयः । तथापि महदाश्चर्य दृश्यन्ते दुःखिनो जनाः ! ॥ ४ ॥ एकमेवाद्वितीयं तन्मूलं सर्वस्य वस्तुनः । तद्विकासाः समे भावा नियतं मत्स्यरूपिणः ॥ ५॥ इत्येवं सततं ध्याय-मुनिब्रह्मपरायणः । लघुतापादकान्भावान् भित्त्वा भूमानमस्तुते ॥ ६॥ ।

१. शरीर धारी तत्तद् व्यक्ति का ब्यचिव लधु है। केवल उसी के स्वार्थ के विचार मनुष्य को नहीं लगा रहना चाहिए। क्योंकि लघु का चिन्तन लघुता को लाने वाला होता है। २. विशालता में अपश महत्ता में ही सुख रहता है, ऐसा ( उपरि-निर्दिष्ट ) श्रुति में कहा गया है। अल्प में, लघु में, सुख नहीं रहता। इसीलिए भूमन् (-महत् ) और 'परमारमन्' दोनों शब्द वास्तव में समानार्थक है, ऐसा शास्त्रीय सिद्धान्त है। ३. वह जो भूमा है उसको जानने वाला मा हो जाता है, ऐसा श्रुति में बार-बार कहा गया है। इसलिए ब्रह्म-विचार रूपी सागर में निमम होकर तुम शान्ति को अभिप्राय यह है कि मनुष्य का चिन्तन जितना ही विशाल होगा अथवा लघु स्वार्थों से ऊपर रहेगा उतना ही अधिक सच्चे सुख और शान्ति का अनुमा उसको होगा। ४. जो श्रादिम अथवा मूल तत्त्व है वह अपने में पूर्ण होने से पानन्द स्वरूप है, इसमें सन्देह नहीं हो सकता। तय भी मनुष्य दुखी दिखायी देते हैं, यह थडे अाधर्य की बात है । परन्तु ५. "एक ही अद्वितीय परमतत्त्व सय वस्तुओं के मूल में है। इसलिए उसी से विकसित होने वाले समस्त पदार्थ निष्धय रूप से मेरे ही स्वरूप हैं, मुझसे अभिल है।" ६. ब्रह्मपरायण मुनि इस प्रकार सतत चिन्तन करता हुआ चित्त में लघुता को लाने वाले विचारों को दूर भगाकर भूमा को, परमात्मा को थयरा सच्चे मुख और शान्ति को प्राप्त करता है । १. इस सम्बन्ध में प्रभासून शार-भाष्य' या भूमाधिकरण (३१) देखिए। [८] (४७) ६ मत्वा धीरो न शोचति प्रसन्नता का मूल-स्रोत यथा कस्यापि तस्य फले तद्वतिनो गुणाः । आविर्भावाय कल्पन्ते साकल्येन विशेषतः ॥ १ ॥ तथैव ब्रह्मणो धाग्नि ब्रह्माण्डे सन्ति ये गुणाः । आविर्भवन्ति ते सर्वे पिण्डे तत्कार्यरूपिणि ॥ २ ॥ अत एव शरीरेऽस्मिन् चैतन्यं यद्धि दृश्यते । नूनं तद् ब्रह्मणो रूपं मूलतो नात्र संशयः ॥ ३ ॥ आत्मनो ब्रह्मगश्चैयाद्वैतं तस्माच्छुतिर्जगो । तदेतत्तत्त्वतो नूनं मला धीरो न शोचति ॥ ४ ॥ १. जैसे किसी वृक्ष में जितने भी गुण होते हैं वे सव के सव पूर्णरूप से उसके फल में विशेषत' प्रकट हो जाते हैं; २. वैसे ही ब्रह्म के धाम स्वरूप ब्रह्माण्ड में जो भी गुण विद्यमान है ये सब ब्रह्माण्ड के कार्यरूप इस शरीर पिण्ड में विशेषत आविर्भाव को प्राप्त हो जाते हैं । अभिप्राय यह है कि जैसे अाम्रादि वृक्षों के विशिष्ट माधुर्य आदि गुण उनके कार्य रूप फलों में ही देखने में आते हैं, ऐसे ही प्रमाण्ड में ब्रह्म के श्रोत-प्रोत होने पर भी उसके चैतन्यादि गुणों को साक्षात् प्रतीति ब्रह्माण्ड वृक्ष के फल स्थानीय शरीर में ही होती है । ३. इसलिए यह मानना पड़ता है कि इस शरीर में जो चैतन्य दिखायी देता है यह मूल में ब्रह्म का ही रूप है। इसमें संदेह नहीं हो सकता । ४, इसीलिए श्रुतियाँ आरमा और प्रद्म के अद्वैत का गान करती है उपर्युक तथ्य को तात्विक दृष्टि से जानकर तत्त्व-दर्शी विद्वान् कभी शोक को नहीं प्राप्त होते।

(४८) आत्मानमभिमानोऽयं नूनमावृत्य तिष्ठति अभिमान का आवरण आनन्दं विभुमात्मानं ब्रह्म प्राहुर्मनीषिणः । सर्वत्रगमतोऽस्माभिः सान्निध्यं तस्य विद्यते ॥ १ ॥ सान्निध्यं कथमति जिज्ञासा न प्रयोजिका । सत्यस्मिन् नित्यसान्निध्ये कुतोऽस्माकं विपएणता ? ॥२॥ प्रश्न एप महांस्तावन ममोद्वेगाय जायते । तस्यैतस्य समाधानं किश्चिदत्र प्रपञ्च्यते ॥ ३ ॥ अभिमानो दुरन्तोऽयं तम आवरकं यथा । व्याघातकारणं तत्र सान्निध्ये नः प्रतीयते ॥४॥ आवृत्य परितः पृथ्वीं वर्तते वायुमण्डलम् । आत्मानमभिमानोऽयं तथैवावृत्य तिष्ठति ॥५॥ अभिमानेन मूढोऽयं सन्निधावपि संस्थितम् । आनन्दधाम सर्वत्र व्याप्तं तत्त्वं न पश्यति ॥ ६ ॥ ततो ज्ञानासिना धैर्यचर्म संगृह्य बुद्धिमान् । छित्वाहंकारमानन्दी ब्रह्मणा संगतो भवेत् ॥ ७ ॥ १. तत्त्वदर्शियों का कहना है कि ब्रह्म स्वभावत' आनन्द-स्वरूप, सर्वत्र फैला हुआ, सव का थारमा और सर्व-व्यापक है । ऐसी दशा में हमारे साथ उस का सानिध्य है, यह स्वत सिद्ध है। २. पर यहाँ 'यह सानिध्य क्यों कर है ' इस जिज्ञासा से हमारा कोई प्रयोजन नहीं है। श्रानन्दस्वरूप ब्रह्म के साथ नित्य रहने वाले इस सानिध्य के होने पर हमारी यह विषष्णता क्यों है ? उसका क्या कारण है। ३. यही महान् प्रश्न हमारे सामने है। इसी से हम उद्विम हो रहे हैं। इसी के समाधान की कुछ चर्चा हम यहाँ करना चाहते हैं । ४. हमें तो ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे अन्धकार सब पदार्थों को ढक लेता है, इसी प्रकार हमारा यह दुखदायी अभिमान ही ब्रह्म के साथ हमारे सानिध्य में व्याघात का कारण हो रहा है। [१०] ५ जैसे पृथ्वी को चारों ओर से घायु मण्डल श्रावृत किये हुए है, इसी प्रकार यह अभिमान हमारी आत्मा को श्राकृत किये हुए रहता है। ६ अभिमान से मदावस्या को प्राप्त मनुष्य अपनी सनिधि में भी रहनेवाले श्रानन्द के घाम तया सर्वत्र व्याप्त ब्रह्म रूप परम तत्त्व का अनुभव नहीं कर पाता। ७ इसलिए युद्धिमान् मनुष्य को चाहिए कि वह धैर्यरूपी दाल को लेकर ज्ञान रूपी खडग से अहकार शत्रु का सहार कर के ब्रह्म के सानिध्य को पाकर सदा आनन्द का अनुभव करे। (४६) विहगोऽनन्त आकाशे अनन्त की यात्रा विहगोऽनन्त आकाशे विचरन्नपि यदा कदा । धृताम पर्वताप या यथैवानित्य तिष्ठति ॥ १ ॥ तथैर पथिकोऽनन्ते विचरन् ब्रह्मणोऽध्धनि । तास्तानाश्रयते देवान् तत्तदादर्शरूपिण ॥ २ ॥ उच्चादुश्चप्रदेशास्तान लब्ध्या सोऽध्यात्मपर्मनि असक्तो निर्ममो गच्छन् ब्रह्मसाभुज्यमभुते ॥ ३ ॥ १ जैसे अन त आकाश में जव तर विचरता हुआ एक पक्षी वृक्षों को चोटियों पर या पर्वत के शिखर पर प्राध्रय पाकर घेठ जाता है २ इसी प्रकार ब्रह्म प्राप्ति की अनन्त यात्रा का पथिक भी विचरता हुआ तत्ता उदात्त आदर्शों के रूप में तद् देवताओं का आश्रय लेता हुआ आगे भागे बढ़ता जाता है। ३ इस प्रकार वह अध्यात्म मार्ग में उच से उच्च स्थितियों ( भूमियों) को पाकर असक्त और निर्ममभाव से ऊपर उठता हुआ अत में मम सायुज्य को पा लेता है। १ तु. "संस्कृतस्तारतम्य में श्रादर्शा दर्शयन्ति ने । त एव देवतामा हरयन्ते भावमूलका ॥'(प्रयकार की पुस्तक रश्मिमाला' २४)। [.१०१ ] (५०) काष्ठयुत्तलिका इव विश्व का सूत्रधार यदन्तः शाश्वतं तत्त्वं तेजोरूपमकल्मषम् । तन्मनास्तत्परो भूत्वा विचरेन्ना गतस्पृहः ॥ १॥ कार्यकारणसूत्रेण जगदेतत् परात्मना। चाल्यतेऽचलभावेन काठपुत्तलिका इव ॥ २॥ कार्यकारणसूत्रेण सूत्रधारेण केनचित् । चाल्यमाने जगत्यस्मिन् नैव किंचिदहेतुकम् ॥ ३ ॥ तेजोरूप अकल्मष (= मल या पाप से रहित ) जो शाश्वत सर्वान्तर्यामी मूल. तत्त्व है, मनुष्य को उसका चिन्तन करते हुए और उसमें विश्वास रखते हुए तृष्णा या लिप्सा से रहित होकर विचरना चाहिए। २. तथ्य तो यह है कि सर्वान्तर्यामी परमात्मा ही इस जगत् को कठ-पुतली के समान अचल भाव से कार्य कारण के सूत्र (डोर ) द्वारा चला रहे हैं। ३. जब कि कोई सूत्रधार कार्य कारण के सूत्र द्वारा इस जगत् को चला रहा है तब यह निश्चित मानो कि इस जगत् में कोई भी बात निर्हेतुक नहीं हो सकती। -OGHDA3o- [१०२] १.तु. "मुताभिधानं सज्योतिः सद्यःशोकतमोहम्। (रघुवंरामदायव्ये १३) दिव्यजीवनमार्गस्थो भवेयमिति भावये दिव्य शैशवी अवस्था अध्यात्म मार्ग के पथिक के लिए, दूसरे शब्दों में, अपने जीवन में विश्व के समष्टि- स्प ब्रह्म के साथ तादात्म्य का अनुभव चाहने वाले के लिए एक सुन्दर आदर्श के प में दिव्य शेशवी अवस्या का हृदयस्पर्शी चित्रण नीचे के पद्यों में किया गया है:- अवस्थां शैशवीं दिव्या- मामनन्ति मनोषिणः। गुणानां कोर्तनं तस्याः क्रियते शान्ति-वर्धनम् ॥ १॥ चिन्ता यापरिमेयान्ता लोकान् संव्याप्य तिष्ठति । तस्या नानापि सद्भावस्तस्यां किश्चिन्न दृश्यते ॥ २ ॥ सन्दिहानमनोवृत्तिः संशयावसरस्तथा । अंशेनापि न विद्यते यतः शान्तिमयी हि सा ॥ ३ ।। किञ्चिल्लोकोत्तरं ज्योतिःपसंस्पर्शवर्जितम् ।' शान्तेः प्रसारक मन्ये शिशुभावेन तिष्ठति ॥ ४ ॥ १. मनीषी लोग शैशवी अवस्था को दिव्य अवस्था बतलाते हैं । गान्ति को बढ़ाने घाला उसी के गुणों का कीर्तन यहाँ हम करेंगे । २. कभी समाप्त न होने वाली जो चिन्ता सब लोगों को व्याप्त किये नाममात्र को भी सत्ता उस अवस्था में नहीं पायी जाती। ३. सब कामों में सन्देह करने वाली मनोवृत्ति तथा संशय का अवपर दोनों विधि- मात्र भी उसमें नहीं पाये जाते, क्योंकि वह अवस्था केवल शान्तिमयी होती है। ४. ऐसा प्रतीत होता है कि दोषों के संस्पर्श से रहित और शान्ति प्रसार करने पाली कोई लोकोत्तर ज्योति शिशुमाव से स्थित हो रही है। [१०३ ] हुए है उसकी प्राणरक्षाकृते लोकाश्चिन्तासन्तानफर्पिता । दृश्यन्ते भयविधाता धावन्त इच सर्वत ॥५॥ तेषु तेषु प्रयत्नेषु साधक बाधक प्रति । रागद्वेषी प्रजायते सर्वस्यापि न सशय ॥ ६ ॥ परेशस्य जगहूर्तुर्मायया माररूपया ! रक्षिताना शिशूना सा चिन्ता योपपद्यते ॥ ७॥ रागद्वेषभय शून्या निश्चिन्ता प्रेममूर्तय । सपा शिशवस्तस्मानमोदमादधते सदा ॥5॥ निर्माया निरहङ्काराः स्पर्धयास्पृष्टमानसाः। प्रसनचेतसो नून शिशयो चशिभिः समाः ॥६॥ ५ सांसारिक लोग अपने प्राणों की रक्षा के लिए नानाप्रकार की चिन्तामा सै सन्तार तया एक न एक भय में विधात मानो सब तरफ दौड़ते हुए दिखायी पड़ते हैं। ६ प्रत्येक मनुष्य में अपने विभिन्न प्रयनों में साधक और बाधक वस्तुओं या व्यक्तियों के प्रति स्मश राग और ६५ के भाव उत्पन हुआ करते हैं। ७ परतु जगदीवर भगवान की माह रूपिणी माया से सुरभित शिशुओं में वह दुसदायिनी चिन्ता नहीं पायी जाता। ८ राग, द्वेप और भय के भावों से शून्य, चिता से रहित प्रेम के मूर्ति स्वरूप शिशु सब के लिए प्रसरता को देनेवाले होते हैं। ९ छल-कपट और अहसार से रहित जिनके मन में स्पर्धा ने स्पर्श भी नहीं किया है, अत एव सदा प्रसस वित्त शिशुओं को समतेन्द्रिम महारमानों के समान समझना चाहिए। नानाधिल्याधिखिन्नाना सन्तास्तप्तचेतसाम् । दुर्भावनापरीताना मपलोराधिवासिनाम् ॥ १० ॥ [१०४ ] -- शान्तिमसादमाधुर्य- दिव्यसंदेशवाहिनः । देवदूतान शिशून्मन्ये देवलोकादुपागतान् ॥११॥ १०. नाना प्रकार की प्राधियों और व्याधियों से खिन, सन्तापों से सन्तप्त और अनेकानेक दुर्भावनाओं से प्रस्त मर्यलोकाधिवासी लोगों के लिए ११. शान्ति, प्रसाद और माधुर्य के दिव्य सन्देशों को देने पाले शिशुओं को देवलोक से थाये हुए देवदूत मानना चाहिए। अवस्थां शैशवीं तस्माद् आहुरादर्श मुत्तयम् । मनीषिणो मनुष्याणां कृते लोकहितैषिणः॥१२॥ धालभावेन तिष्ठासेद् विद्वार शान्तिपरायणः । श्रुतिरेतजगौ तम्माल्लोककल्याणकाम्यया ।। १३ ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितम् । आरुरुक्षोर्मुनेर/ शैशवाश्रयण हितम् ॥ १४ ॥ एतस्मात्कारणादेव शिशुभावेन कल्पिता । लोफैस्तस्य जगद् हृद्या मूर्तिरुपास्यते ।। १५ ।। १२. इसीलिए लोकहितैषी मनीषियों ने मनुष्यों के लिए शैशची अवस्था को उत्तम आदर्श कहा है। १३ इसीलिए-शान्तिपरायण विद्वान् को वालभाव से रहने की इच्छा करनी चाहिए --- ऐसा लोक कल्याण की कामना से श्रुति (= वेद) ने गान किया है। १४. वेदान्तसूत्रों ने भी हेतु और उपपत्ति के साथ ऐसा सिद्धान्त निषित किया है कि आध्यात्मिक जगत में ऊपर उदने की इच्छा रखने वाले मुनि के लिए शेशव-भाव को धारण करना श्रेयस्कर है। १ तु. "तस्माद् माझणः पाण्डित्यं निर्विद्य यास्येन तिष्टासेत् ।" (बृहदारण्यकोपनिषद् ३३१) २. तु. "अनाविष्फुर्वान्वयातू" (वेशन्तसून ३५०) ३॥

११, उपर्युक कारण से ही सांसारिक लोग जगदीश्वर भगवान् को शिशु-भाव से कल्पित सुन्दर मूर्ति की उपासना करते हैं। तमेव शैशवादर्श- मनुगच्छनिरन्तरम् । प्रसन्नी दोपनिर्मुक्त- स्तिष्ठेयमिति भावये ॥१६॥ १६. उसी शैशवी अवस्था के आदर्श का निरन्तर अनुसरण करते हुए दोषों में रहित होकर मैं प्रसनता से रहूं. यही मेरी कामना है। तत्त्व-साक्षात्कारः परम-तत्त्व का साक्षात्कार मूल तत्त्व के चिन्तन और विश्वास को अपने जीवन का आधार और चरम ला समझने वाले तत्वदर्शी विवेचक को रष्टि से परम-तत्व के स्वरूप के वर्णन के साथ साथ उसके चिन्तन से जनित अपनी अनुभूति का दिग्दर्शन भी नीचे की ( ५२ से ५८ तक को) रचनाओं में किया गया है। (५२) यस्मात्परतरं नास्ति तदहं नित्यमाश्रये समस्त शक्तियों का मूलस्रोत आश्रयः सर्वशक्तीनां द्वन्द्वातीतं निरञ्जनम् । यत्तत्कारणमन्यमंशाश्वतं पदमव्ययम् ॥ १॥ समष्टिभूतं सर्वासा व्यष्टीनामन्ततो मतम् । यस्मात्परतरं नास्ति तदहं नित्यमाध्ये जो मूल तत्त्व समस्त शकियों का श्राश्रय, द्वन्द्वों से परे, अर्थात् सर्वदा एक रस, रिशुद्ध और सृष्टि का अध्यक्क कारण है; को ध्रुव अविनाशी पद है। अन्ततोगत्वा समस्त व्यष्टियों का जो समष्टि रूप है। और जिससे परे कुछ नहीं है, सदा उसी का श्राश्रय लेता हूं ।। (५३) तदहं नित्यमाश्रये मूल-तत्व में आस्था प्रेमकारुण्ययोर्धाम तवं विश्वनियन्त यत् । जीवनस्य परं मूलं तदहं नित्यमाश्रये ॥१॥ विस्मृतेनापि बहुधा मया मोहवशेन हा ! विस्मयें न क्षणं येन तदहं नित्यमानये ।। २ ।। प्राणानामपि मे प्राणः परमं यत्परायणम् । घरेण्यं शरणं पुण्यं तदहं नित्यमाश्रये ॥ ३ ॥ १. जो मूलतत्व प्रेम और कारुण्य का स्थान है, जो समस्त विधको नियन्त्रण में रखता है, जो जीवन का परममूल है। मैं सदा उसी का आश्रय लेता हूँ। [ १०७ ] २. हा1 में मोहवश प्राय. उसे भूले रहता हूँ! पर जो क्षण भर के लिए भी मुझे नहीं भुलाता, मैं सदा उसी का प्राश्रय लेता हूँ। ३. जो मेरे प्राणों का भी प्राण है, जो जीवन का परम उघ श्रादर्श है, जो वरणीय पवित्र शरण स्थान है, मैं सदा उमो का श्राश्य लेता हूँ। ध्यायते योगिभिनित्यं ज्ञानिभिश्चिन्त्यते तथा । भत्ता गानरता यस्य तदहं नित्यमाश्रये ॥ ४ ॥ सन्तोऽपि यस्य सत्ताया विश्वासेन निरन्तरम् । जीवन्मुक्का बसन्तीह तदहं नित्यमाश्रये ॥ ५॥ . योगी सदा जिसका ध्यान करते हैं, নী সিবা নিৰ ফুট भक्त जन जिसके गान में रत रहते है, में सदा उसी का श्राश्रय लेता हूँ। ५. सन्त-महात्मा जिसको सत्ता के विश्वास से, संसार में निरन्तर जीवन्मुखों का जीरन व्यतीत करते है, मैं सदा उमी का अनय लेता हूँ। गीयते कीर्तिसंगीत सुगन्धिसुमनोहरः। निशब्दं कुसुमैर्यस्य तदहं नित्यमाश्रये ॥६॥ सौन्दर्य विश्वविस्तीर्ण कवयः क्रान्तदर्शिनः। पश्यन्त्यलौकिक यस्य तदहं नित्यमाश्रये ॥ ७॥ [१०] शुद्धोदाचविचारेषु परार्थे जीवने तथा। मन्ये मे दर्शनं यस्य तदहं नित्यमाश्रये ॥८॥ व्यष्टेरस्या मदीयाया: सर्वस्वं निलयरतथा । समष्टिरूपं यत्तत्त्वं तदहं नित्यमाश्रये ॥६॥ अपूर्णतासु सर्वासु तथाकाङ्क्षास्थसंशयम् । संकेतो यस्य पूर्णस्य तदहं नित्यमाश्रये ॥ १०॥ यन्नूनं परमं सत्यं नै किश्चिदहिर्यतः । सन्निधाग्य दूरे यत् तदह नित्यमाश्रये ॥ ६. सुगन्धित सुमनोहर पुष्प जिसकी कीर्ति के संगीत का निशब्द भाव से गान करते हैं, मैं सदा उसी का आश्रय लेता हूँ। ७. जिसके समस्त विश्व में फैले हुए अलौकिक सौन्दर्य को कान्त दर्शी कविगण देखते हैं, में सदा उसी का श्राश्रय लेता हूँ। ८ पविन उदात्त विचारों में तथा परार्थ जीवन में मुझे जिसकी माँको मिलती है, मैं सदा उसी का प्राध्य लेता हूँ। ९. जो विश्व का समटि रूप तत्त्व मेरी इस व्यष्टि (= व्यक्ति) का सर्वस्व और एकमात्र निकेतन है, मैं सदा उसी का श्राश्रय लेता हूँ। १. समस्त अपूर्णताओं में तथा समस्त श्राकारक्षाओं में [ १०६ ] जिस पूर्ण तत्व का निवित संकेत मिलता है, मैं सदा उसी का श्राश्रय लेता हूँ। ११. निक्षम हो जो परम सत्य है, जिससे बाहर कुछ भी नहीं है, जो पास भी है और दर भी है, मैं सदा उसी का आभय लेता हूँ। ACAGDow (५४) कृष्णेत्याकर्षकं तत्त्वम् कृष्ण-तत्त्व-मीमांसा ऊपर परम तत्व के साक्षात्कार का उल्लेख किया गया है। प्रश्न यह है कि वह साक्षात्कार कैसे हो सकता है। और उसका स्वरूप क्या है। ऐसी परम्परागत धारणा है कि इन्द्रियों को अहाँ तक गति है उससे ऊपर उठकर, इन्द्रियों का सर्वथा निरोध करके, योग शास्त्रोक्त धारणा यान और समाधि के द्वारा ही भगवान का परमतत्व का, साक्षात्कार किया जा सकता है। यदि ऐसा ही है तब देखना यह है कि वह साक्षात्कार किस रूप में होता है। वष्टि में इन्द्रियों के सर्वथा निरोप के कारण यह स्पष्ट है कि यह साक्षात्कार ऐन्द्रियक प्रकार का नहीं हो सकता । अपूर्ण भाषा के सहारे उसे किसी प्रकार युद्धिगम्य ससे भी ऊपर उठकर स्वरूपास्थिति के रूप में ही कहा जा सकता है। एक प्रकार से यह ठीक है। पर म उठता है कि अप इन्द्रियों उस साक्षात्कार में बाधक ही है, तब क्या आध्यात्मिक दृष्टि से सृष्टि की योजना में इन्द्रिमा व्यर्थ ही है। क्या वे वाधक होने के स्थान में अध्यात्म दर्शन में सहायक नही हो सकती। एक दिन प्रात मंत्यिक प्रमण के लिए जाते हुए यही समस्या विकट कम में मन में उठी । निक्षय किया कि इसका समाधान मान ही होना चाहिए। नगर के बाहर को प्राकृतिक सौन्दर्यावली में विचाते हुए अनुमा किया--- प्रकृतेर्मानुभूताया: कोडे फ्रीडन्ननारतम् । लालित. पालितश्चापि सदानन्दो यसाम्यहम् ॥ १॥ [१०] स्नेहाई नित्यसंस्थायि तस्या माधुर्यमद्रुतम् । दृष्ट्वा पीत्वेव पीयूषं सदानन्दो घसाम्यहम् ॥ २ ॥ ( रश्मिमाला ३६) अर्थात्- प्रकृति माता की गोद में सदा कोड़ा करता हुआ, तया लालित और पालित, मैं सदा आनन्द से रहता हूँ। उसके स्नेह से आई, नित्य रहने वाले, अद्भुत माधुर्य को देखकर, मानों अमृत को पीकर, मैं सदा आनन्द से रहता हूँ। अथवा लोकोत्तरेण दिव्येन माधुर्येण समन्विता । येयं प्रसादनी शक्तिोंके सर्वत्र संस्थिता ॥ सूर्ये चन्द्रे जले पायावुत्फुल्लकुसुमावली । सेयमाविर्भवेत् शश्वत् तिष्ठतान्मम मानसे ॥ (रश्मिमाला ३४|१-३) अर्थात् लोकोत्तर दिव्य माधुर्य से समन्वित, जो प्रसादनी शक्ति सृष्टि में सर्वन- सूर्य में, चन्द्रमा में, जल में, वायु में, प्रफुल्न कुसुमावलि में- सस्थित है, वह आविर्भूत होकर सर्वदा मेरे मन में वास करे। इसी मानसिक पृष्ठभूमि में भगवद्गीता के निम्न वचन रमरण हो आये- रसोऽहमप्सु कौन्तेय ! प्रभास्मि शशिसूर्ययोः । पुण्यो गन्यः पृथिव्यां च तेजश्थास्मि विभावसौ ॥ (गीता ७IE-) [१११ ] अर्थात् , जलों में रस, चन्द्र-सूर्य में प्रभा, पृथिवी में पवित्र सुगन्ध और अप्ति में प्रकाश-यै सब भगवान् के ही रूप है। उस समय यही प्रतीत होने लगा कि विश्व का यावत् सौन्दर्य भगवान् का ही सौन्दर्य है ! जैसे मांस-मना श्रादि से पूर्ण और दुर्गन्ध से पूरित इस शरीर में जो मनोहता और भाकर्षण है उसके मूल में चेतन प्रारमा की सत्ता है। इसी प्रकार इस विश्व में तत्तत् पदार्यों द्वारा जो दिव्य शान्ति, जीवन प्रेरणा, अनन्तानन्त ऐवर्य और सौन्दर्य को प्रतीति इन्द्रियों द्वारा हो रही है, उस के मूल में मूलतत्त्व स्वरूप भूत-भावन भगवान् की सत्ता है। उक्त दृष्टि से भगवान के स्वरूप के साक्षातार में, अनुभव में, स्पष्टतः इन्द्रियों साधक ही हैं, बाधक नहीं। उक्त भ्रमण में उगत विचार उसी समय जिन पद्यों में प्रपित कर लिये गये ये उन्हीं को संक्षिप्त व्याख्या के साथ हम नीचे देते हैं- आनन्द शाश्वतं तेजो लोकादुद्विप्रचेतसः । रुद्धाक्षाः प्रयतन्ते यत् स्वान्ते द्रष्टुं मनीषिणः ॥ १ ॥ तदेतदिन्द्रियैः साक्षात् परितः परमेष्ठिनम् । दृष्ट्वा भक्ताः प्रसीदन्तः कीर्तयन्ति दिवानिशम् ॥ २॥ कृष्पोत्याकर्षकं तत्वम् इन्द्रियाणामतो मतम् । गोप्यस्तवृत्तयस्तस्माद् भक्तानां परिभापया ॥३॥ मनीपो लोग संसार से उदिन चित्त हो कर जिस श्रानन्द स्वरूप शाश्वत तेज को, इन्द्रियों का निरोध करके, अपने मानस या अन्त करण में देखने का प्रयन करते है, १ गवाम् इन्द्रियाणां पालने पुष्टिा तत्तिभिरेव क्रियते । पुष्येषु भ्रमय इव विषयेषु प्राता इन्द्रियवृत्तयस्तसं गृहीत्वा तैनवेन्द्रियाणां तृप्ति पुष्टिं च कुर्वन्ति । अन्यया तेषां वैयपित्ते क्षोणत्वसभावनोत्पद्यते । श्रतो वृत्तय एक गोप्य । [ ११२ ] सर्वत्र परमेष्टी (परमे = ऊँची स्थिति में स्थित, अर्थात् , आपाततः उद्भूत अनुभवों की अपेक्षा उत्कृष्टतर अनुभव से गम्य) उसी मूल तत्व को भऊ जन साक्षात् इन्द्रियों द्वारा देखकर (= अनुभव करके ) दिनरात उस का कीर्तन करते हैं । इसलिए इन्द्रियों के लिए आकर्षक होने से वह मूल तत्व, भक्त जनों की 'रिभाषा में, 'कृष्ण' इस नाम से कहा जाता है और इन्द्रियों की वृत्तियों को 'गोपी' गो = इन्द्रियों को पालने या पुष्ट करने वाली ) कहा जाता है । अभिप्राय यह है कि उपर्युक्त दृष्टि से इस अनन्तानन्त परम विशाल धि के द्वारा जिसका सुन्दर रूप हमें सदैव इन्द्रिय-गोचर हो रहा है और जो मावत' इन्द्रियों के लिए 'आकर्षक' है उसी परम तत्त्व को 'कृष्ण' इस नाम से हा जाता है। अपनी पत्तियों द्वारा ही इन्द्रियों को बाह्य दश्यों का बोध होता है। दूसरे शब्दों , इन्द्रियों के इन्द्रियत्व को सार्थक करने वाली या उनको पुष्ट करने वाली (- उनके ग्य अनुभवों को देनेवाली ) इन्द्रिय प्रत्तियाँ ही हैं। इन्द्रियों का नाम 'गो' है। इसलिए उनकी वृत्तियों को 'गोपी' कहा जाता है । वृत्तियों (= गोपियों) का स्वाभाविक 'आकर्षण' प्रवृत्ति वाह्य जगत् की और है। जैसे मधु मक्खियाँ नाना प्रकार के पुष्पों से मधु को, या सूर्य-रश्मियाँ नाना कार के जल स्थानों से विशुद्ध जलको खींच लेती हैं, ऐसे ही आध्यात्मिक उत्कर्ष । अवस्था में इन्द्रियों में बाह्य जगत् के द्वारा ही परम तत्त्व स्वरूप भगवान् के क्षात्कार की योग्यता आ जाती है। इन्द्रियों द्वारा परम तत्त्व के साक्षात्कार का बाह्य जगत् में भगवान् की स्थिति श्रापातत' नहीं दिखायी देती, आध्यात्मिक स्कर्ष की अवस्था में ही उसका भान होता है । इसीलिए परम-तत्त्व को 'परमेष्टो' हा गया है। यह आध्यात्मिक दृष्टि जिन की हो जाती है सचा 'भक्त' उन को ही बहना हिए । वास्तव में 'कृष्ण' और 'गोपी' ये शब्द भी उन्ही को परिभाषा के हैं। ऐसे ही भक्तों की आध्यात्मिक भावना का वर्णन इस प्रन्य को अन्तिम रचना संख्या ५८ ) में किया गया है। wocomson १. तु० "पराधि खानि व्यतृणत् स्वयम्भू" (कठोपनिषद् २।११) तया "प्रकृति न्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ।" (भगवद्गीता ३१३३)। २. तु. "अदृश्यमपि यसत्त्व लौकिशनामगोचरम् । तदेव परितः पर बुधानों प्रतीयते ॥" (रश्मिमाला ६१२)। [ ११३] (५५) आनन्दानुभूतिः आनन्द की अनुभूति नित्यं तस्य जगद्भर्तुः प्रतिवेशे वसन्नपि । दारिद्रयेणाभिभूतोऽहमिति मिथ्यामतिर्मम ॥ १ ॥ सदा उस विश्वभर भगवान् के पड़ोस में रहते हुए भी मेरा 'मैं दारिद्रय से अभिभूत हूँ' ऐसा सोचना मेरी मिथ्यामति ही है । पेयस्यामृतफल्पस्य जीवनस्यान्तिके सतः । पिपासाकुलितस्येव महामूर्खस्य सास्थितिः ॥२॥ मेरी यह स्थिति पीने के योग्य और अमृत के समान जल के पास में होते हुए भी प्यास ब्याकुल महामूर्ख के समान ही है ! (५६) अनन्ते प्रगतेमार्गे प्रगति का अनन्त मार्ग अनन्ते प्रगतेार्गे गच्छन्सोल्लासमानसः । नानाविधानि दृश्यानि पश्यन्नानन्दनिर्भरः ॥ १॥ अनासक्तः कचित् , स्वीयं यात्रोद्देश्यं च संस्मरन् । सर्वदा सर्वथा स्वस्थ: सदानन्दो यसाम्यहम् ॥ २ ॥ प्रगति के अनन्त मार्ग पर मन में उन्मास के साथ चलते हुए, नाना प्रकार के दृश्यों को श्रानन्दातिशय से देखते हुए, कहीं भी आसफ न हो कर अपनी यात्रा के उद्देश्य को स्मरण में रखते हुए, सर्वदा सब प्रकार से शान्त-वित्त, में सदा आनन्द से रहता हूँ ! १. “पयः कीलालममृतं जीवनं भुवनं चनम्" इत्यमरः । । ११४ ] (५७) सदानन्दो वसाम्यहम् आनन्द-निर भगवान् विश्वात्मा भगवान् नूनम्, साक्षादानन्दनिर्झरः। तस्यान्तः संस्थितः स्वस्थ: सदानन्दो वसाम्पम् ॥१॥ योऽसी सर्वजगद्रक्षामारं यति सर्वदा । तस्मिन्यस्याखिलाश्चिन्ताः सदानन्दो वसाम्यहम् ॥ २ ॥ योऽसौ सर्वजगत्साक्षी भगवान् पुरुषोत्तमः । तदानयेण निश्चिन्तः सदानन्दो घसाम्यहम् ॥ ३ ॥ चिन्तासन्तानसंतापैः खिन्नानां परमौषधम् । आत्मविश्वासमाश्रित्य सदानन्दो वसाम्यहम् ॥ ४॥ १. विश्वात्मा भगवान् निश्चय ही साक्षात् श्रानन्द के निर्मर हैं। उन के अन्दर स्थित, शान्तचित्त, में सदा भानन्द से रहता हूँ! १. श्रानन्दानुभूति की तीम लालसा से वैदिक साहित्य श्रोत-प्रोत है। उदाहरणार्य नीचे के प्रमाणों को देखिए:- स्वरभिविख्येषम् । ( यजु० १११) या ज्योतिरणसं यस्मिन् लोके स्वहितम् । तस्मिन् मो धेहि पक्ष्मानामृते लोके अक्षिते । (ऋग्० ९११३५) लोका यत्र ज्योतिष्मान्तस्तत्र माममृतं कृषि""""(ऋग् १११११७) यत्रानन्दाच मोदाय मुदः प्रमुद भासते। कामस्य यत्राप्ता कामास्तत्र माममृतं कृप । (ऋग् ११३119) । ११५ २. जो सदा संपूर्ण जगत् की रक्षा के भार को उठाये हुए हैं, उन्हीं पर सारी चिन्ताओं को छोड़ कर मैं सदा आनन्द से रहता हूँ। ३. वे जो सारे जगत् के साक्षी भगवान् पुरुषोत्तम है,. उन्हीं के आश्रय से निश्चिन्त हो कर, मैं सदा आनन्द से रहता हूँ! ४. चिन्ता की परम्परा के संताप से खिशों के लिए परम श्रौषधरूप आत्म विश्वास के आश्रय को पाकर, मैं सदा आनन्द से रहता हूँ ! KPCAGIta- Poran (५८) अयि विश्व-भावन ! विश्वभृद् भगवान् की महिमा अयि ! विश्वभावन विश्वभृत् करुणानिधान नमोऽस्तु ते । महिमा महान् मम मानसे महनीय देव ! विभाति ते ॥१॥ गिरिमूर्ध्नि निर्जनकानने रमणीयतैकनिकेतने । तडिता गगैरतिशोमने, परिभाति ते महिमा धने ॥ २ ॥ - -- [ ११६ ] तपनातपेन विभासिते गगनाङ्गणे विधु-भा-सिते। उडुवृन्ददीप्तिविचित्रिते तव रोचिरेव विरोचते ॥ ३ ॥ १. अयि विश्व भावन । विश्वम्भर । करुणा-निधान ! श्रापको मेरा नमस्कार है। हे पूजनीय देव । आपकी बड़ी महिमा मेरे मन में भासित हो रही है। २. पर्वत के शिखर पर, अथवा रमणीयता के एकमात्र निकेतन निर्जन कानन में, अथवा घराबर दमकती हुई दामिनी से शोभित वादल में आपकी महिमा भासित हो रही है। ३. सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित, अथवा चन्द्रमा को चाँदनी से शोभायमान, अयवा तारा समूह की दीप्ति से विचित्रित गगन के अंगण में आपकी हो छवि चमकती है । द्विजन्दशब्दनिकूजिते कुसुमावलीपरिशोभिते । मलयानिलेन सुगन्धिते मृगसंचयेन निपेविते ॥४॥ शुभशोतनिझरवारिणा सरसीतटे परिपूरिते। मुनियोगिन्दसमचिते महिमा विभो ! तव भासते ॥ ५॥ ४. पक्षि समूहों के शब्दों से शन्दायमान, पुष्पों की पंक्तियों से शोभायमान, मलयानिल से सुगन्धित मृगों के समूहों से निषेवित, [ ११७ ] ५. मरनों के स्वच्छ शीतल जलों से परिपूरित झीलों के तटपर जहाँ मुनियों और योगियों के दर्शन होते हैं, हे प्रभो ! आपकी महिमा दृष्टिगोचर होती है। विजितान्तरारिचमूचयाः शुभशान्तवृत्तिसदाशयाः । विहिताधिदेवसमाश्रया: प्रणिधानजातविनिश्चयाः ॥ ६ ॥ परदुःखतापकदर्थना मथितुं समाहितभावनाः । तव तन्मनःसु विरोचना द्युतिरस्ति येऽन तपोधनाः ॥ ७ ॥ 9 ६. जिन्होंने श्राभ्यन्तर शत्रुओं की सेनाओं को जीत लिया है, जिनको चित्त वृत्तियों पवित्र और शान्त हैं और जो सदाशय हैं, जिन्हे एकमात्र भगवान् का सहारा है, जिन्होंने चित्त की एकाग्रता से तात्विक ज्ञान को पा लिया है, ७. दूसरों के दुख के तापों की पीडामों को दूर करने के लिए जिन्होंने अपनी भावनाओं को पवित्र बनाया है, उन तपोधनों के हृदयों में आपकी शोभायमान युति विराजमान है। मुनिभिर्भवानिह चिन्त्यते प्रतिभिर्भवान् परिचीयते । निगमस्तथा जगदीश ! ते ह्युपवर्णनेत्ययसीयते ॥६॥ निजनीडसंश्रितपतिभि- रुपसीह सायमु राविभिः । गुणकीर्तनं वव योगिमिः क्रियते समाहितबुद्धिभिः ॥६॥ [ ११८ ] ८. मुनिजन आपकी चिन्तना करते हैं। प्रती लोग आपका परिचय प्राक्ष करते हैं। हे जगदीश ! वेद भी निश्चय ही श्रापके गुणों का वर्णन करते हैं। ९. अपने घोंसलों में बैठकर प्रातः और सायं शब्द करने वाले पक्षियों द्वारा तथा समाहित बुद्धिवाले योगियों द्वारा श्रापके गुणों का कीर्तन किया जाता है । सगुणो भवानिह कर्मठे- रपि निर्गुणः कथितः कः। तव चित्रमत्र चरित्रमा- स्मरतैरवेक्ष्यमसंशयः ॥१०॥ विपिनेऽथवा गिरिगहरे परितो दरेऽपि मनोहरे । समुपहरे त्वयि सुन्दरे मुनयो हरे । निरताः परे ॥११॥ १०. आप कर्मकाण्डियों द्वारा सगुण और पदों द्वारा निर्गुण कहे गये हैं। आपके विचित्र चरित्र को संशय से रहित आत्म-रत लोग ही देख सकते हैं। ११. हे भगवन् । चारों और भय के होने पर भी मनोहर विपिन में, अयवा पर्वत को गुफा में, अथवा एकान्तस्थान में मुनिजन सौन्दर्य से युक्त तथा परमधाम स्वरूप आपके ध्यान में ही निरत रहते हैं। [ ११)

यदर्ज धुर्व परितस्तत
निगमागमैरपि संस्तुतम् ।
तव तत्स्वरूपमहं भजे
शिव ! शान्तिधाम निरन्तरम् ।। १२ ॥
॥ इत्यमृतमन्थने प्रज्ञाप्रसादो नाम हत्तीयः परिस्रवः ॥
१२. हे शिव । हे शान्तिधाम ! भगवन् ।
मैं आपके उस स्वरूप को निरन्तर भजता हूँ,
जो अजन्मा, कूटस्थ, सर्वत्र व्यापक
और निगम तया आगम द्वारा संस्तुत है।
[ १२० ]

परिशिष्ट-भाग
जीवन और जीवन के अनुभवों के सम्बन्ध में 'अमृत-मन्थन' की रचनाओं में
प्रन्यकर्ता को एक विशेष रष्टि रही है। उसी दृष्टि के स्पष्टीकरणार्थ अपनी पुस्तक
'रश्मि-माला' (अथवा 'जीवनसंदेश-गीताञ्जलि' ) से कुछ उपयोगी उद्धरण
आगे दिये जाते हैं।
परिशिष्ट रूप

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परिशिष्ट १ (क) आशा सर्वोत्तमं ज्योतिः आशा सर्वोत्कृष्ट प्रकाश है "अस्माकं सन्त्वाशिषः । सत्या नः सन्त्वाशिपः ॥” [यजु० २०१० ] अर्थात् , हम आशावादी पर्ने । हमारी प्राशाएँ सफल हों। भारतीय विचार धारा में इधर चिरकाल से 'संसार असार है', 'जीवन क्षणभंगुर और मिथ्या है' इस प्रकार की निराशावाद की भावनाओं का साम्राज्य रहा है । हमारी जाति के जीवन को शफिहीन, उत्साहहीन और श्रादर्शहीन बनाने में निराशावाद का बहुत बडा हाय रहा है, यह कौन नहीं जानता पर भारतीय संस्कृति की सूत्रात्मा में श्राशावाद सदा से श्रोत-प्रोत रहा है। उसी प्राशावाद के स्वरूप और महिमा फा वर्णन नीचे किया जाता है - निराशायाः समं पापं मानयस्य न विद्यते । तां समूलं समुत्सार्य ह्याशावादपरो भव ॥ १ ॥ मनुष्य के लिए निराशा के समान दूसरा पाप नहीं है। इसलिए तुम्हें उस पाप- रूपिणी निराशा को समूल हटाकर आशावादी बनना चाहिए। मानवस्योन्नतिः सर्वा साफल्य जीवनस्य च । चारिताय तथा सृष्टेराशावादे प्रतिष्ठितम् ॥ २ ॥ मनुष्य की सारी उपति, जीवन को सफलता और सृष्टि को चरितार्यता आशावाद में ही प्रतिष्ठित हैं। आशा सर्वोत्तम ज्योतिर्निराशा परम तमः । तस्माद् गमय तज्योतिस्तमसो मामिति श्रुतिः ॥ ३ ॥ १ तु. 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' (भृहदारण्यकोपनिषत 210,1, , आशा सर्वोस्कृष्ट प्रकाश है। निराशा घोर अन्धकार है। इसलिए "भगवन् । मुझको अन्धकार में प्रकाश की ओर ले चलिए" ऐसा श्रुति का वचन है । आस्तिक्यमात्मविश्वास: कारुण्यं सत्यनिहता। उत्तरोत्तरमुत्कों नूनमाशावतामिह ॥ ४ ॥ आस्तिकता (जीवन में आदर्श भावना ), आत्मविश्वास, कारुण्य, सत्यपरायणता और उत्तरोत्तर समुभति-संसार में इनका सनाव आशावादियों में ही हो सकता है । निराशावादिनो मन्दा निष्ठुराः संशयालय: 1 अन्धे तमसि ममारते श्रुतावात्मनो मताः ॥ ५ ॥ निराशावादी लोग स्वभाव से ही मन्द ( उदात्त भावनाओं से विहीन), निष्ठर (असंवेदनशील ) और संशयालु होते हैं । वेद' में ऐसे ही लोगों को उदात्त श्रादर्शी की प्रेरणा से विदीन अज्ञानान्धकार में निमम तया श्रामविस्मृति-रूप भात्महत्या करने वाला कहा गया है। ( रश्मिमाला) DoGOyo- (ख) जीवनस्य रहस्यम् जीवन का रहस्य "लोका यत्र ज्योतिष्मन्त- स्तन माममृतं कृधि ।" [ ऋग० ६.११३।६ ] अर्यात् , भगवन् ! मुझे ज्योतिर्मय लोकों में अमृत पद (= शाश्वत जीवन) प्राप्त कराइये। १. तु० "असुर्या नरम ते लोका अन्धेन तमसाताः । तांस्ते प्रेत्यापि गच्छन्ति ये के चात्मनो जनाः ॥" (यजु० ४०३) अर्यात्, थामस या श्रारम चेतना की विस्मृति-रूप आत्महत्या (अर्थाद, ओवन में आदर्शभावना का अभाव ) न केवल व्यफियों के लिए, किन्तु जातियों और राष्ट्र के लिए भी, किसी भी प्रकार की प्रेरणा से विहीन अज्ञानान्धकार में गिराकर सर्वनाश का हेतु होती है। [१२४ ] 'जीवन निसार और मिथ्या है, 'जीवन वन्धन या कारागार के समान है और उससे छुटकारा (मोक्ष) पाना ही हमारा परम कर्तव्य है' ऐसी मिथ्या भावनाओं ने हमारे जातीय जीवन को चिरकाल से नष्ट भ्रष्ट कर रखा है। इनके कारण हो, जेल के कैदी के समान, हम स्वभावत , न केवल अपने ही, किन्तु जाति, राष्ट्र या मानव के भी विकास और समुत्यान से प्राय उदासीन रहे हैं। परन्तु नीचे जीवन के विषय में एक नयी दृष्टि का प्रतिपादन किया गया है। उसके अनुसार जीवन मिथ्या होने के स्थान में परमात्मा का एक महान् प्रसाद है। इस अनन्तानन्त ब्रह्माण्ड में अनन्त विकास और समुन्नति का साधन जीवन ही है। वास्तव में तो हमारा जीवन शाश्वत है। हमारा यह जीवन उसी शावत अनन्त जीवन की प्राप्ति का एक अनिवार्य और अमूल्य साधन है। इसी लिए उसमें आस्था की अनिवार्य रूप से आवश्यकता है - जीवनं परमोत्कृष्टः प्रसादो जगतीपनेः । तस्य तत्त्वं रहस्यं च ये विदुस्ते मनीषिणः ॥ १ ॥ जीवन जगदीधर का सर्वोत्कृष्ट प्रसाद है । मनीषी लोग ही उसके वास्तविक स्वरूप और रहस्य को समझते हैं। जीवनस्य भय मृत्योर्मरणान्त च जीवितम् । आ जन्मनः क्रमेणायुहांसो मृत्युपथानुगः ॥ २ ॥ इत्येव नेकधानर्थमूल मिथ्यामतिर्नृणाम् । जीवनास्थाविहीनांस्तान् विदधाति भयार्दितान् ॥ ३ ॥ 'जीवन को मृत्यु का भय है', 'मृत्यु पर्यन्त ही जीवन है', तया 'जन्म से ही आयु घटने लगती है और वरावर मृत्यु के पास पहुंचती जाती है। इस प्रकार के अनेकानेक अनर्थों के मूल परम्परागत मिथ्या विचार मनुष्यों को जीवन में आस्था से रहित और भय से व्याकुल बनाते हैं। निराशावादिनो मन्दा मोहावर्तेऽन दुस्तरे । निममा अवसीदन्ति पङ्के गानो यथावशा ॥ ५ ॥ १ तु. "मरण प्रकृति शरीरिणां विकृति वनमुच्यते बुधै" (रघुवंश १८७) तया "संसार स्वप्नमात्रय चला प्राणा धन तया। सुख तत्र न पश्यामि दुख तत्र दिने दिने ।" अर्थात, मनुष्य के लिए मृत्यु स्वाभाविक और जीवन अस्वाभाविक है । एव ससार स्वप्नमात्र है, प्राण और धन चलायमान है । ससार में सुख के स्थान में चरावर दुःख ही दुख दीख पडता है । [ १२५-३ प्रगति की भावना से विहीन निराशावादी लोग मोह के दुस्तर भंवर में पड़े हुए दलदल में फंसी वेबस गौओं के समान दुःख को पाते हैं। तेपामेवानुकम्पार्थमभिधत्तेऽसकृच्छुतिः । "कुर्वन्नेवेह कर्माणि", "जीवा ज्योतिरशीमहि ॥ ५॥ उनके प्रति अनुकम्पा के भाव से हो वेद में "मनुष्य को सौ वर्ष तक कर्म करते हुए ही जीने की इच्छा करनी चाहिए", "हम वरावर प्रकाशमय प्राशामय जीवन को प्राप्त करें" इस प्रकार बार-बार कहा गया है। कमैंव जीवनं तस्माद्, विकासस्तस्य भास्वरः । उत्तरोत्तरलोकेषु कर्तव्यत्वेन मन्यताम् ॥ ६ ॥ इसलिए कर्म का ही नाम जीवन है। उत्तरोत्तर लोकों या अवस्थाओं में उसके प्रकाशमान विकास को ही हमें अपना ध्येय समझना चाहिए। उत्तरोत्तरमुत्कर्पि जीवनं शाश्वतं हि नः । अस्पृष्टं तमसा चापि मोहरूपेण सर्वथा ।। ७ ।। वास्तव में हमारा जीवन उत्तरोत्तर समुभतिशील और शाश्वत (= सदा रहने , वाला ) है । उसका स्वरूप अज्ञान रूपी अन्धकार से सर्वथा अस्पृष्ट है। ( रश्मिमाला २) . OGumao- (ग) संयतस्व जीवनाय जीवन के लिये बरावर यान करो "उदायुपा स्वायुपोदरयाम् ।।" [यजु० ॥२८] अर्थात् , हम दीर्घ और शुम जीवन के लिए सदा उद्योगशील रहें। १. तु. "उर्वक्षेवेह धर्माणि जिजीविषेच्छतरसमा." ( यजु. ४०" २.तु० "जीवा ज्योतिरशीमहि" (ऋग्० ७३२।२६)। । १२६ ] प्राप्य मानवीयजन्म पुण्यकर्मसंचयेन दीनदुःखिरक्षणेन संयतस्त्र जीवनाय ॥ १ ॥ मनुष्य जन्म को पाकर, पवित्र कर्मों का संचय और दीन दुखियों की रक्षा से । करते हुए जीने का यत्न करो! सत्पथानुवर्तनेन भव्यभावभावनेन । लोकशंप्रसारणेन संयतस्य जीवनाय ॥ २॥ सदाचार के मार्ग पर चलते हुए, सुन्दर समुन्नत विचारों को रखते हुए और लोक कल्याण का प्रसार करते हुए जीने का यन्न करो। दैन्यभावभञ्जनेन धैर्यधर्मधारणेन । वीरतासमाश्रयेण संयतस्व जीवनाय ॥ ३ ॥ दीनता के भाव का भजन करते हुए, धैर्य रूपी धर्म को धारण करते हुए, वीरता- पूर्वक जीने का यत्न करो। जीवनं त्विदं मुघेति पामरा जना वदन्ति । नैव तत्तथा, ततोऽन्न संयतस्त्र जीवनाय ॥ ४ ॥ यह जीवन मिथ्या है, ऐसा मूर्ख पामर लोग कहते हैं। पर जीवन मिथ्या नहीं है । इसलिए इस संसार में जीने का यन्न करो। (रश्मिमाला ३) -oGOD (घ) दुःख-मीमांसा दु:ख के स्वरूप पर विचार हमारे देश की विचारधारा में इधर चिरकाल से दुख विषयक विचारों और तन्मूलक विभीषिका ने एक ऐसा वातावरण बना रखा है जो वैयक्तिक तया जातीय दोनों घटियों से हमारे लिए प्रायेण घातक सिद्ध हुआ है । 'सशर दुखमय है, अतएव असार और हेय है', 'जीवन दुःख रूप है, अतएव पंघ (= कारागार) है, उससे किसी प्रकार छुटकारा ( मोक्ष ) पाना ही हमारे जीवन का परम ध्येय है, १ तु. "अय त्रिविधदु खात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्तपुरुषार्थ " (सांस्यस्त्र ) 'दुख सवको ही प्रतिकूल और बाधा के रूप में प्रतीत होता है',' 'विवेकी मनुष्य को सब कुछ दु खप में ही देखना चाहिए। इस प्रकार के विषाक्त अनार्य विचारों ने जहाँ एक और हमारे जीवन को नीरस, मन्द, उत्साह होन, नराश्यपूर्ण और अकर्मण्य बनाने में बड़ा भाग लिया है, वहीं दूसरी और हमारे करोडों भाइयों में जीवन सपर्ष से मुंह छिपाकर, प्राय अपरिपक दशा में ही, संन्यास की मिथ्या प्रवृत्ति को वरापर प्रोत्साहित किया है। दुख के विषय में उपर्युक्त विचारों से यदि कोई आगे बढ़े है तो उहोंने केवल इतना ही कहा है कि कर्मयोगी को सुख दु स को समान समझकर ही जीवन के युद्ध में प्रवृत्त होना चाहिए। परन्तु प्रस्तुत प्रकरण में दुख के स्वरूप के विषय में हम एक नितरी नवीन दार्शनिक दृष्टिकोण उपस्थित कर रहे हैं। हमारे परिधान में ये विचार भारतीय वाध्यय में कही देखने में नहीं आये हैं। दुःखों से उद्विम मानव को उनसे एक नया ही प्रकाश मिलेगा, ऐसी हमारी धारणा है। नीचे के पद्यों में दुख के विषय में युक्ति और उपपत्ति के साथ जो सिद्धांत हमने उपस्थित किये है वे सक्षेप में मुख्यत इस प्रकार हैं- (१) दुख की प्राप्ति आकस्मिक या अहेतुक नहीं होती। (२)सटि की योजना में दुख की प्राप्ति निष्प्रयोजन नहीं हो सकती। (३) दुख से लगनेवाले भय के मूल में हमारा अज्ञान हो कारण होता है । महान पुरुष तो दुख और कष्टों का स्वागत ही करते हैं। (४) दुःखों को कार्यसिद्धि की श्रावश्यक भूमिका समझना चाहिए। (५) स्वेच्छा से स्वीकृत दुख तप के रूप में परिवर्तित किया जा सकता है। तप से ही समस्त सिद्धियाँ प्राप्त होती है। (६) मनुष्य की समुभति में दुख केवल सीढ़ियों के समान होते हैं। यहाँ इस लेख को बढ़ाने की आवश्यकता नहीं है। नीचे इम पणे का केवल पार्थ देते हैं- १० भाधनालक्षण दुसम्", "तपत्यन्तविमोशोऽपप" (न्यायवन ॥१२१-२२)। २ तु. "दुःखमेव सर्व विवेकिन" ( योगसूत्र २०१५)। ३ तु. "सुखदुखे समे कृत्वा "तसो युद्धाय युज्यस्व" (भगवदगीता २०३८)। * इस विषय के विशेष दिवार के लिए हमारी नवीन पुस्तक 'मारतीय सस्कृति कर विकास (प्रयम खन्ड, वैदिक धारा) का "वैदिक धारा को दार्शनिक भूमिका" शोषक छटा परिच्छद देखिए। १२६ } उद्वेगजनक दुख सर्वेपामेव प्राणिनाम् । सेयमापाततो बुद्धिस तत्वद्दया विविच्यते ॥ १ ॥ इस ससार में दुख से सब कोई घवडात हैं, दुख को उद्वेग जनक समझते हैं। दुख के विषय में यह जो थापातत विचार है उसका यहाँ हम तात्त्विक दृष्टि से विवेचन करेंगे। न चैवाकस्मिक दुस न चाप्यस्त्यप्रयोजनम् । न वैवावश्यक, दुस दु खमित्येव मन्यताम् ॥ २ ॥ दुख के विषय में विचार करने पर न तो हम उसको थाकस्मिक अथवा अहेतुक वह सकते हैं, न निष्प्रयोजन । दुख को दुख के रुप में ही अनुभव किया जाय, यह भी थावश्यक नहीं है। दुख आकस्मिक नहीं हो सकता, इसका समर्थन नीचे करते है-- कार्यकारणसूत्रेण सूत्रधारेण केनचित् । चाल्यमाने जगत्यस्मिन् कथ दुखमहेतुकम् ? ॥ ३ ॥ इस जगत् मा विश्व के सूत्रधार या नियामक परमात्मा कार्य और कारण के सून अर्थात् नियम द्वारा सारे जगत् का संचालन कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में किसी के ऊपर थानेवाला दुख अहेतुक है, अर्थात् उसका कोई हेतु नहीं है, ऐसा कैसे हो सकता है। दुख निष्प्रयोजन भी नहीं हो सकता इसका समर्थन नीचे करते है-- गर्भावस्था समारभ्य या यावस्थानुभूयते । प्राणिना, उद्धिनायव स्पष्ट तस्या प्रयोजनम् ॥ ४ ॥ जा से प्राणी गर्भावस्था में आता है, उसे घरावर नई नई दशाओं का अनुभव करना पड़ता है। शास्त्रों में उनका प्राय भयानक दुखमय अवस्याओं के रूप में वर्णन मिलता है। उन दशाओं को हम दु समय माने या न मार्ने इतना तो स्पष्ट है कि उनका प्रभाव पाणी के लिए हितकर ही होता है। अभिप्राय यह है कि गर्भावस्था के समान प्रत्यक दु खावस्था मनुष्य के हित के लिए ही होती है। गर्भावस्था के अनुभव के पचात् ही राम, कृष्ण, बुद्ध और गाघी जैसे अवतारी पुरुष बनते हैं। एव स्थावरलोकेऽपि वृक्षादीना समुद्भवे । नानावस्थास्तु मीजस्य जायन्ते सप्रयोजना ॥ ५॥ १२६ इसी प्रकार स्थावर जगत् में भी वृक्ष श्रादि की उत्पत्ति में बोने के पश्चात् चीज की जो सहने गलने आदि की अनेक अवस्थाएँ होती हैं वे सब सप्रयोजन होती हैं। बीज बोए जाने के पीछे पहले गलता है, फिर सड़ता है। तव कहीं वह अकुर के रूप में उगता है और अंत में प्राम, अनार, अगूर जैसे उपयोगी और सुदर वृक्षों के रूप में आता है। इस प्रकार श्रापातत. दुख की अवस्था को भी जानना चाहिए। दुखावस्था से हमारा अंत में हित ही होगा, यही समझना चाहिए। तत्रैवं सति लोकेऽस्मिन् दुःसावस्थेति या मता । सप्रयोजनता तस्या नून नैवात्र संशयः ॥ ६ ॥ इसलिए संसार में जिसको दुख की अवस्था माना जाता है उसका ईश्वर की दृष्टि में कोई न कोई प्रयोजन अवश्य होता है, यही मानना चाहिए। सहेतुकत्वमित्येवं सप्रयोजना तथा । दु खस्यावेक्ष्य तत्त्वज्ञो न ततो विजुगुप्सते ॥ ७ ॥ इस प्रकार दुख की सहेतुकता और सप्रयोजनता को समझकर, अर्थात् यह मन में बैठाकर कि ईश्वर की सृष्टि में जो कोई दुख पाता है उसका कोई कारण और प्रयोजन भी अवश्य होता है, तत्त्वज्ञानी मनुष्य दुखों से कभी नहीं घबराता। अन्धकारगतः कश्चिद् यथाकस्माद् भयातुरः । भवेत्तथैव दु खेभ्यो मन्दानां जायते भयम् ॥ ८ ॥ जैसे अँधेरे में खड़ा हुआ मनुष्य वास्तविक स्थिति को नहीं समझता और 'न जाने कहाँ से क्या आपत्ति पा जाय' यह सोचकर भय से व्याकुल हो जाता है, उसी प्रकार अज्ञानी लोग दु ख के कारण और प्रयोजन को न समझते हुए उससे मरते रहते हैं । उत्तरोत्तरमुत्कृष्टप्रगतावुत्सुकस्तु यः । दुःसनां स्वागतं कुस् तत्वज्ञो नावसीदति ॥ ६ ॥ पर तत्वज्ञानी मनुष्य, जो अपने जीवन में उत्तरोत्तर उत्कृष्ट उमति के लिए उत्सुक रहता है, दुखों का स्वागत करता हुआ उनसे विषाद को नहीं प्राप्त होता। यथा छात्रस्य कस्यापि तापसस्य धनार्थिनः । षष्टानां महतामनीकारो दृष्टः फलार्थिनः ॥ १० ॥ जैसे अपने अपने अमीष्ट लक्ष्य (म से विद्या, आध्यात्मिक सिद्धि और संपति) की प्राप्ति के लिए प्रयास करने वाला एक विद्यार्थी, तपस्वी या धनार्थी प्रसन्नता से बडे बडे कष्टों को सहता है, उसी प्रकार तत्त्वज्ञानी मनुष्य अपने जीवन के लक्ष्य को और पढता हुआ दुखों और कयों को सहर्ष स्वीकार करता है। [ १३० ] विधातुः सर्वलोकस्याभिप्रायोऽप्येष दृश्यते । यत्कार्यसिद्धित: पूर्व कष्टस्वीकरणं मतम् ॥ ११ ॥ समस्त संसार की सृष्टि करनेवाले प्रजापति का अभिप्राय भी यही दीखता है कि किसी भी कार्य की सिद्धि से पहले कष्ट या दु ख को उठाना ही चाहिए। दूसरे शब्दों में, भगवान् की रची हुई इस सृष्टि में सब के लिए यह स्वाभाविक है कि अपनी अभीष्ट सिद्धि के लिए कर या दुस को उठाया जाय । अत एर सिसक्षुः सन् लोकानेतान् प्रजापतिः । 'तपोऽतप्यत', नेका श्रूयते ब्राह्मणादिपु ॥ १२ ॥ इसीलिये शतपथ ब्राह्मण आदि प्रयों में जहाँ वहीं 'प्रजापति ने इन लोकों की सृष्टि करने की इच्छा की, इस बात का प्रसग आया है वहाँ 'प्रजापति ने तप किया' ऐसा कहा गया है । अभिप्राय यह है कि चोरों की तो दात ही क्या, प्रजापति या ब्रह्मा को भी सृष्टि को रचना से पहले तप करना पडता है । स्वेच्छा से स्वीकार किए गए दुख या क्ट को ही तप.कहते हैं, यह नीचे कहा गया है- शिवस्य नीलकण्ठस्य विषपानं यदुच्यने । व्याख्यानमस्य तेनापि सिद्धान्तस्य विधीयते ॥ १३ ॥ पुराणों में भगवान् नीलकठ शिव की विप पान को कया प्रसिद्ध है। वास्तव में उस कया से उस सिद्धांत को हो व्याख्या की गई है । ससार में कौन स्वेच्छया विषपान करने को तैयार होगा। फिर भी लोक कल्याण की इच्छा से शिव जी ने प्रसन्नतापूर्वक भयकर विष का पान किया। इसलिए अभीष्ट अर्थ की सिद्धि के लिए प्रसमतापूर्वक कष्ट को स्वीकार करना चाहिए । रामस्य तस्य भीष्मस्य बुद्धस्यापि महात्मन । क्राइस्टम्य जिनस्यापि गान्धिनश्च महात्मनः ॥ १४ ॥ जीवनेषु तथान्येषां लोकोत्तरयशस्विनाम् । स्वेच्छयैव सुस त्यक्त्या पटस्वीकरण मतम् ॥ १५॥ उक्त कारण से ही भगवान् राम, सुप्रसिद्ध भीष्म पितामह, महात्मा बुद्ध, महात्मा बाइस्ट, भगवान महावीर, महात्मा गाधी तथा अन्य लोकात्तर यरावाले महापुरुषों के १ तु. "सोऽय पुरुष प्रजापतिरकामयत । भूयान् स्यां प्रजायेयेति । सोऽधाम्यत् । स तपोऽतप्यत ।"."" (शतपयवाभण ६11118) [ १३१ ] जीवन में देखा जाता है कि उन्होंने महान् यादों के पालन के लिए स्वेच्छा से सुखी को छोडकर कष्टों को स्वीकार किया । आपेक्षिकी मता तस्माद् भावना सुखदुःसयोः । नैकान्तिक तयो रूपमित्येवमवधार्यताम् ॥ १६ ॥ इसलिए सुख और दुख की भावना को श्रापेक्षिक ही मानना चाहिए। उनमें से किसी या अपना कोई निश्चित या ऐकातिक रूप नहीं है । दुःखं वै दुःसरूपेण तावदेव प्रतीयते । यावत्परिग्रहस्तस्यानिच्छयैव विधीयते ॥ १७ ॥ दुख दुखरूप से तभी तक प्रतीत होता है जब तक कि उसका प्रहण अनिच्छा से ही किया जाता है। दुःखं चेत्स्वेच्छया प्राश. प्रसन्नेनान्तरात्मना । भादत्ते, तत्तपोरूपमाधत्ते, नात्र संशयः ॥ १८ ॥ यदि बुद्धिमान् मनुष्य श्राए हुए दुस को स्वेच्छा पूर्वक प्रसन्न मन से स्वीकार कर लेता है तो वही दुःख उसके लिए नि सन्देह तप का रूप धारण कर लेता है। श्राशय यह है कि मनुष्य को चाहिए कि वह सहसा पाए हुए दुख को अपनी उमति की प्राप्ति में सहायक तप मानकर प्रसन्नता से सहे। इस प्रकार वह दुःख उसके , लिए कल्याण का हो साधक हो सकता है । नून तपासि कृच्छाणि शास्त्रोकानि विधानतः । आचरन्त्यात्मनः शुद्धथै श्रद्धया ये मनीषिणः ॥ १६ ॥ यह कौन नहीं जानता कि शास्त्रों में अनेकानेक कृच्छातिकृच्छ्र प्रत आदि तपों का विधान किया गया है । जो बुद्धिमान् हैं वे श्रारम शुद्धि के लिए उन तपों का श्रद्धा से विधि पूर्वक पालन करते हैं। तपसा पारमामोति तपसा हन्ति किल्लिपम् । लोकेऽत्र तपसा धीर जन्नतेमनि तिष्ठति ॥ २० ॥ तप की महिमा महान् है । तप द्वारा ही मनुष्य अपने प्रमोट पद को प्राप्त करता है और पाप या अपूर्णता को दूर कर अपने वरिन को उज्ज्वल और पवित्र यनाता है। धीर पुरुष संसार में तप द्वारा ही उन्नति के शिखर पर विराजमान होता है। ततोऽनिवार्यदुःख यत प्राप्त भरति जीपने । तप इत्येव तद्विद्याद् य इच्छेच्छ्रेय आत्मनः ॥ २१ ॥ [ १३२ ] इसलिए जो अपना कल्याण चाहता है उसे चाहिए कि जीवन में जो कोई अनिवार्य दुख प्राप्त हो उसे वह अपनी अभीष्ट सिद्धि का साधक तप हो समझे और माने । हिरण्यस्य यथा शुद्विरग्नितापेन जायते । तथे दुःसतप्तानां जायते कल्मषक्षयः ॥ २२ ॥ से अमि मैं तपाने से सुवर्ण की शुद्धि हो जाती है, उसी प्रकार दुख रूपी तप से तपे हुओं के कल्मष या पाप का नाश हो जाता है । रम्यं प्रासादमारोहन्नत्युचशिरसरस्थितम् । कष्टानि सहते धीरः प्रसन्नो लक्ष्यसिद्धये ॥ २३ ॥ किसी पर्वत के प्रति ऊंचे शिखर पर बने हुए रमणीय प्रासाद तक पहुँचने के निमित ऊपर चढ्नेवाला धीर मनुष्य अपने लक्ष्य की सिद्धि के लिए प्रसलता पूर्वक पटों को सहता है। उत्तरोत्तरमुत्कृष्टप्रगतावुत्सकरतु यः । एवं वेदोक्तमार्गेण दुसादुद्विजते न सः ॥ २४ ॥ इसी प्रकार 'तुम उत्तरोत्तर समुन्नति को प्राप्त करो" इस वैदिक उपदेश के श्रनुसार जो मनुष्य अपनी उत्तरोत्तर उत्कृष्ट समुन्नति के लिए उत्सुक है वह दुख से कभी नहीं घबराता। देवाधिदेवतत्त्वेन करुणाप्लुतचेतसा । नूनं सृष्टं जगत्कृत्स्नं भूतानामुद्दिधीर्षया ॥ २५ ॥ इसमें सदेह नही कि उस परमतत्त्व परमात्मा ने, जो देवताओं का भी अधिष्ठातृ. देवता है, करुणा वश होरर प्राणियों के क्षार की इच्छा से ही समस्त जगत की सृष्टि की है। तय सति लोकेऽस्मिन् दुःखावस्थेति योच्यते । नून सास्मद्धितायैव नोद्वेगाय मनीषिणः ॥ २६ ॥ ९९० "श्रात्मानं नियमस्तस्तै कर्पयित्वा प्रयत्नात । प्राप्यते निपुणधर्मो न मुखाल्लभते सुखम् ॥" (वाल्मीकिरामायण ३।९।३१ )। २. तु. "भवादभि श्रेय हि" ( ऐतरेयब्राह्मण १।१३) (अर्थात, तुम भद्र से भदतर जीवन को प्राप्त करो)। २. तु. “भदा इन्द्रस्य रातय " ( साम० उ० ॥२॥१४) (अर्थात्, भगवान् के प्रदान कल्याणमय है)।

सृष्टि के विषय में उपर्युक वस्तुस्थिति के होने से, लोक में जिसको दुःखावस्या कहा जाता है वह निश्चय ही हमारे कल्याण के लिए ही होती है, ऐसा मानना चाहिए। समझदार लोग उससे उद्विम नहीं होते। कदाचिदेतदेवात्र कारणं येन, विस्मयः ! । कुत्रापि वेदमन्त्रेषु दुःखशब्दो न दृश्यते ॥ २७ ॥ दुःख के विषय में जो कुछ ऊपर कहा गया है कदाचित् उम्रो कारण से, यह आश्चर्य की बात है कि, वैदिक संहिताओं के मंत्रों में कहीं भी 'दुख' शब्द नहीं पाया जाता। ( रश्मिमाला) PAGRo- (ङ) जीवने नाव्यसादृश्यम् जीवन-नाव्य "साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च" ( श्वेताश्वतरोपनिपद् ६।११)। अर्थात्, वह परमात्मा सबका साक्षी, ज्ञानस्वरूप, निर्द्वन्द्व और सत्त्व रजसू-तमस न तीनों गुणों से रहित है। धनव्ययेन दृश्यानि नाश्यादीनि समुत्सुकाः । पश्यन्ति लौकिकास्तद्वद् वर्तथा जीवनं प्रति ॥१॥ सांसारिक लोग धन का व्यय करके बहो उत्सुकता के साथ नाट्य आदि के दृश्यों (तमाशों ) को देखते हैं । जोवन के विषय में भी तुम ऐमा हो वर्ताव रखो। अभिप्राय यह है कि जीवन मानो एक नाटक है । उसको सुख दुखात्मक घटनाओं में लिप्त न होते हुए हो मनुष्य को अपने अनुभव की वृद्धि और विकास के मार्ग पर आगे बढते रहना चाहिए। (रश्मिमाला ५.) । १३४ ] उत्तरोत्तरमुन्नतिः उत्तरोत्तर उन्नति " तार्यायु प्रतर नवीय" (ऋग० १०५६।१)। अर्थात्, भगवन् ! हमें उत्तरोत्तर समुन्नति शील नवीनतर जीवन में अग्रसर कीजिए। जन्मजन्मान्तरस्यैतद् विज्ञा पाहुः प्रयोजनम् । अनुभूतिविशेषैर्यदुत्तरोत्तरमुन्नति ॥१॥ विज्ञों का कहना है कि विभिन्न अनुभवों द्वारा उत्तरोत्तर उन्नति अथवा विकास ही जन्म जन्मान्तर का प्रयोजन है। तस्माद् यानुभयस्याप्तिानवम्येह जायते । दुखरूपापि सानून मन्तव्या सप्रयोजना ॥२॥ इसलिए मनुष्य को इस जीवन में दुख रूप में भी जो अनुभव प्राप्त होता है उसको सप्रयोजन ही समझना चाहिए । अभिप्राय यह है कि मनुष्य को अपने जीवन की दुखात्मक घटनाओं से न घवडाकर उनको, उनसे प्राप्त शिक्षा या अनुभव द्वारा, अपने उत्तरोत्तर विकास का साधन ही बनाना चाहिए। क्योंकि- यथाय॑ते धन लोके दुखे कटेश्च भूरिश. । तथा तैरज्यंते ज्ञान जनैरनुभवात्मकम् ॥३॥ जैसे ससार में अनेक प्रकार के दुखों और कष्टों से धन का सचय किया जाता है, वैसे ही अनुभवात्मक ज्ञान भी अनेक दुःखों और कष्टों से सचित किया जाता है । (रश्मिमाला ५१) [ १३५ ] परिशिष्ट २ तत्त्व-मीमांसा मूलतत्व का विचार "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" ( ऋग्० १११६४१४६) अर्थात् , एक ही मूलतत्त्व को विद्वान् अनेक नामों से कहते हैं। प्राय प्रत्येक धर्म और संप्रदाय के लोग इस दृश्य जगत् के मूल में रहने वाले एक परम तत्त्व को स्वीकार करते हैं। उसके लिए वे थपनी-अपनी परम्परा या दार्शनिक दृष्टि के अनुसार भिन्न-भिन्न नाम भी दते हैं। इस नाम भेद के ही कारण वे प्राय यह सोच नहीं सकते कि नाम भेद और दृष्टि-भेद से वह मूलतत्त्व वास्तव में असंपृक्त है, और इसीलिए उनसे स्वीकृत मूल तत्त्व, नाम भेद और दृष्टि भेद के होने पर भी, वास्तव में एक ही है । मूल-तत्त्व स्वयं सिद्ध है । उनको किसी ने बनाया नहीं है। उसके सम्बन्ध में नाम भेद और दृष्टि भेद का यही अर्थ हो सकता है कि हम सब उसके स्वरूप को समझना चाहते हैं। ऐसी दशा में नाम भेद और दृष्टि भेद को लेकर मगहने का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता । पर धर्मो और संप्रदायों के इतिहास इस झगडे से भरे पडे हैं। इसीलिए मूलतत्व मीमांसा की विशेष आवश्यकता है। इसी मीमांसा को लेकर नीचे के पद्य लिखे गये हैं- यतो भूतानि जायन्ते यत्र तेषां लयो मतः । यदाश्रयेण तिष्ठन्ति तत्त्वं तन्नित्यमव्ययम् ॥१॥ समस्त सत्पदार्थ जिस मूलतत्त्व से उत्पन्न होते हैं, जिसमें उनका लय होता है और जिसके श्राश्रय से वे वर्तमान रहते हैं, यह स्वय नित्य और अध्यय अर्थात क्षय रहित है। भापासीमामतिक्रम्य ज्ञानगम्यं पथंचन । स्वयम्भु, वस्तुतो नाना रहिवं तद्धि वर्तते ॥ २ ॥ [ १३६ ] । वह मूलतत्त्व भापा की सीमा को अतिक्रमण करके रहता है, अर्थात भाषा द्वारा उसके स्वरूप का वर्णन कठिन है । किसी प्रकार केरल ज्ञान की गति उस तक हो सकती है । यह स्वयभू है, प्रर्यात् उसको किसी दूसरे ने उत्पन्न नहीं किया है। वास्तव में उसका कोई अपना नाम नहीं है । तन्नामविषये मन्दास्ततद्रूढिवशान्मुधा । निवदन्ते, तदाश्चर्यमुपहासकर महत ॥ ३॥ ਵਧੀ मूलतत्त्व के नाम के विषय में मन्द बुद्धि लोग, विमिन शाब्दिक रूदियों के कारण, व्यर्थ में विवाद करते है । यह वडे श्राधर्य और उपहास की बात है । नियतो विषयो वाचोऽनियतो मनसस्ततः । हसीयसी हि वागुक्ता मनसोऽपेक्षया श्रुतौ ॥ ४ ॥ वाणी का विषय परिमित है और मन का अपरिमित । इसीलिए श्रुति (वेद) में मन की अपेक्षा वाणी,को छोटा कहा गया है। अभिप्राय यह है कि हमारे मन के भावों को वाणी प्राय. पूर्णतया प्रकट नहीं कर पाती। इससे स्पष्ट है कि वाणी के क्षेत्र की अपेक्षा मन का न कहीं अधिक विस्तृत है। तत्त्व स्वभावत: सिद्ध गुणग्रामनिकेतनम् । गुणमेक समानित्य पुनर्नाम प्रवर्तते ॥ ५॥ वह मूलतत्त्व स्वभाव से ही अनेकानेक गुणों का स्थान है। परन्तु (अन्वर्थ ) नाम किसी एक गुण को लेकर ही प्रवृत्त होता है । अभिप्राय यह है कि जितने भी अन्वर्य नाम होते हैं वे राय किसी न किसी एक गुण को लेकर रखे जाते है। मूलतत्त्व में तो अनेकानेक गुण रहते हैं। इसलिए कोई अन्वर्थ नाम मूलतत्त्व का ठीक ठीक वर्णन नहीं कर सकता। इसी बात को नीचे स्पष्ट किया गया है। न विद्यते ततो नाम निपु लोकेषु तादृशम् । तत्त्वोपवर्णने शक्तं साकल्येन भवेत्तु यत् ॥ ६ ॥ अन्वर्थवाचक सर्व नाम तत्त्वस्य विद्यते । नैव रुढ, ततस्तेन विशेषगुण उच्यते ॥ ७ ॥ १. तुः-वाग्वै मनसो हसीयसी । अपरिमिततरमिव हि मन । परिमिततरेव हि पाक् ।” (शतपथ ब्राह्मण १।४।४७ ) । अर्थात्, मन की अपेक्षा वाणा होटी है, क्योंकि मन का क्षेत्र अपरिमिततर जैसा है और वाणी का परिमिततर जैसा। [:१३७ .

इसलिए तीनों लोकों में कोई ऐसा नाम नहीं है जो पूर्णतया मूलतत्त्व के स्वरूप के वर्णन में समर्थ हो । क्योंकि उस मूलतत्त्व के जो भी नाम संसार में प्रसिद्ध है चे सब अन्वर्थ-वाचक ही है। अर्थात् किसी अर्थ को लेकर ही वे प्रवृत्त हुए हैं। इसीलिए उन नामों से मूलतत्त्व के किसी न किसी विशेष गुण का ही अभिप्राय होता है । उनमें से कोई भी पूर्णरूप से मूलतत्त्व के सब गुणों को नहीं पतला सकता। उसका कोई रूढ़ (= जिसमें अर्थ की अपेक्षा न हो ) नाम तो है ही नहीं । रुचिभेदाद्धियो भेदादथवा संप्रदायतः । तत्त्वस्य विपये दृष्टे:दः समुपजायते ।। ८॥ दर्शनानि विभिन्नानि संप्रदायास्ततोऽपरे । समुत्पन्नानि लोकेऽस्मिन् दृश्यन्ते यत्र तत्र वै ॥ ६ ॥ मूलतत्त्व के विषय में जो अनेक दृष्टियाँ पायी जाती हैं, उनका कारण रुचि भेद, बुद्धिभेद, अथवा संप्रदाय-भेद ही है । संसार में जहाँ-तहाँ पाये जाने वाले विभिन्न दर्शनों और संपदायों की उत्पत्ति इन्ही कारणों से हुई है। परिधानीयवस्राणां भोज्यानां चैव निश्चितम् । प्रकारेषु महान् भेदो देशभेदेन दृश्यते ॥१०॥ तत्तत्कारणसत्त्वेऽपि तत्र भेदे, न मौलिकः । अभिप्रायो मनुष्याणां भेदमापद्यते फचित्॥११॥ विभिन देशों के पहनने के पत्रों और भोज्य पदार्थों के प्रकारों में महान भेद पाया जाता है उक्त भेदों में विभिन्न देशों के जल-वायु आदि का भेद ही कारण होता है । तो भी, पहनने के पत्रों और भोज्य पदार्थों के संबंध में मनुष्यों के मौलिक अभिप्राय में कोई भेद नहीं होता। अर्थात्, ससार में सर्वन वन्न शीत आदि से बचाव के लिए ही पहने जाते हैं और भोजन शरीर-पुष्टि के लिए ही किया जाता है। रुचकादिप्रकारेण भिन्नाकारानुपेयुधः । सुवर्णस्य सुवर्णत्वं हीयते न कदाचन ॥ १२ ॥ सुवर्ण के गले आदि के श्राभूषणों में सोना भिन्न-भिन्न भागरों को धारण कर लेता है । तो भो, उनमें सुवर्णका सुवर्णत्व ज्यों का त्यों रहता है, उसमें कोई अन्तर नहीं पड़ता । १३८ ] एवं सत्यपि दृष्टीनां विभेदे दर्शनादिपु । तत्वं स्वरूपतः स्थायि कूटस्थ चैव यत्तते ।। १३ ।। इसी प्रकार विभिन्न दर्शनों आदि में मूल तत्व के विषय में विभिन्न दृष्टियों के पाये जाने पर भी, वह स्वरूप में स्थायी और कूटस्थ हो रहता है । अभिप्राय यही है कि मूलतत्त्व के विषय में अनेक दृष्टियाँ भले ही हो, वह अपने रूप में सदा अविचल और अस्थायी भाव से ही रहता है। उन दृष्टियों का उसके अपने रूप पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। एकस्यैव प्रमेयस्य परिभाषान्तरं यथा । क्रियते शाखभेदेन तथा सत्त्वेऽपिट श्यताम् ।। १४ ।। सत्यं ब्रह्म परं धाम कर्म 'धम्म प्रजापति. । शक्तिर्माता शिवो विष्णू राम ओंकार एव च ॥ १५॥ प्रेमेत्यादि पदं मूलतत्त्वयाचि न संशयः । तदेव तत्त्वं गीतायामहशब्देन कथ्यते ।। १६ ।। एक ही पदार्य के लिए विभिन्न शास्त्रों में विभिन्न पारिभाषिक शब्द नियत कर लिये जाते हैं । मूलतत्त्व के विषय में भी ऐसा ही समझना चाहिए। सत्य, ब्रह्म, परमधाम, कर्म, धम्म (धर्म), प्रजापति, शकि, माता, शिव, विष्णु, राम, ओम्, प्रेम इत्यादि सारे शब्द मूलतत्त्व के हो वाचक हैं; इसमें कोई य नहीं है। उसी मूलतत्व के लिए भगवद्गीता में 'अहम्' शब्द का प्रयोग किया गया । (रश्मिमाला ६०) 0000- r 31 परिशिष्ट ३ आध्यात्मिक साधना या प्रगति में कारोपासवा का बड़ा महत्त्व है। इसी लिए साधकों के हित को दृष्टि से निम्नस्थ उद्धरण यहाँ दिया जा रहा है. ओंकार-माहात्म्यम् ओंकार की महिमा वेदादि-शास्त्रों में ओंकार के अद्भुत माहात्म्य का वर्णन किया गया है। उस माहारम्य को अतिशयोक्कि न समझना चाहिये। उसका श्राधार, निधय ही, ऋषि मुनियों का अपना अनुभव था । उस माहात्म्य को पढकर यही मानना पडेगा कि एक सच्चे श्रद्धालु के लिए ओंकार ऐसा चिन्तामणि है जिसके द्वारा मनग्य सब कुछ प्राप्त कर सकता है-"एतद् ध्येवाक्षर ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत्" ( कठोपनिषद् १।२।१६ ) अर्थात, श्रीकार को जानकर कोई भी जिस पदार्थ को चाहता है उसको पा सकता है। धान्दोग्य उपनिषद, माण्डूक्य-उपनिषद्, कठ-उपनिषद्, श्वेताश्वतर उपनिषद्, भगवद्गीता, मनुस्मृति आदि में अनेकानेक स्थलों में ओंकार का वर्णन है। उससे स्पष्ट है कि ओंकार ब्रह्म-प्राप्ति का एक अद्वितीय साधन है । पाताल योगसूत्रों में कहा है कि परमेश्वर का मुख्य वाचक शब्द ओंकार ही है और ओंकार के जप और अर्थ दिन से अध्यात्म मार्ग पर चलने वाला सरलता से 'एकाग्रता तथा अन्तमुखता को प्राप्त कर सकता है और उसके मार्ग में श्राने वाले सब प्रकार के विघ्न स्वयं नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार का एक आकर्षक, साथ ही वास्तविक वर्णन, माहात्म्य के रूप में, हम नीचे देते हैं । निश्चय ही, जिज्ञासु लोगों को वह अत्यन्त प्रिय लगेगा। साय हो हम श्राशा करते है कि पाठक इसको, कविता के रूप में नहीं, किन्तु आध्यात्मिक भावना के रूप में ही पढेंगे और प्रत्येक विचारधारा को अपने मन में सजीव देखने कायन करेंगे। । १४० ।

(ओंकार का दोला या झूले के संगीत के रूप में वर्णन )
प्रेमकारुण्ययोर्धाम तत्त्वं विश्वनियामकम् ।
यत्, तेन निर्मितामेतां तेनैवान्दोलितां तथा ॥ १ ॥
श्वासप्रश्वासयोर्दोलामारूढो मोदनिर्भरम् ।
गायाम्योंकारसंगीतं मधुरं मधुरातरम् ।। २ ॥
अर्थात्, प्रेम और कारुण्य के स्थान तथा सारे विश्व के नियन्ता भगवान् ने-
श्वास और प्रश्वास की दो डोरियों वाली एक दोला (झूला) मेरे लिये बनायी है
और स्वयं ही उस दोला को आन्दोलित कर रहे हैं । उन्हीं के द्वारा में उस दोला
में बैठा हुआ श्रानन्द विभोर होकर मोठे स्वर में मधुराक्षर ओंकार रूपी संगीत को
गा रहा हूँ। ठीक उसी तरह, जैसे कोई वालक अपने पिता द्वारा झूले में बिठाया
और मुलाया जाकर अानन्द में मान होकर गीत गाता है।
(२)
( माता को बुलाने के लिए बच्चे के आहान के रूप में वर्णन)
यासी सर्वजगन्माता सर्वदेग्नमस्कृता ।
ऋषिभिमुनिमिर्गीता
सशास्त्रोपवर्णिता ॥ ३ ॥
नानासंतापसंत्रस्तस् तस्या आह्वानमुत्तमम् ।
ओंकारमाश्रये नित्यं भक्तिप्रयणमानसः ||४||
अर्थात् , समस्त देवताओं से नमस्कृत, ऋषियों और मुनियों से गायी गयी, तथा
सब शास्त्रों से वर्णन की हुई जो सारे जगत् की माता है, ओंकार उसके आह्वान का,
अपनी ओर श्राकृट करने का, उत्कृष्ट साधन है । अनेकानेक सन्तापों से त्रस्त होकर
मैं भक्तिःप्रवण होता हुआ सर्वदा उसी प्रकार का श्राधय लेता हूँ।
अभिप्राय यह है कि हरे हुए बच्चे को तरह मैं मो नाना संतापों से डरा हुआ
ओंकार द्वारा ही विश्व को माता को बुलाना चाहता हूँ। उनके बुलाने के लिए यही
सर्वोत्तम आह्वान है।
(३)
(भगवत्पद की प्राप्ति के लिए सोपान के रूप में वर्णन)
योगिनामपि दुर्गम्यं भक्तानामपि दुर्लभम् ।
ज्ञानिनामपि दुश्चिात्य जगतः प्रभवाप्ययम् ॥ ५ ॥

कूटस्थ शाश्वत दिव्य विष्णोर्यत परम पदम् । ओमित्युद्गीथिन प्राहुस्तस्य सोपानमद्भुतम् ।। ६ ॥ अर्थात्, श्रोम् का गान करने वाले श्राचार्यों का कहना है कि ओंकार ही उस कूरस्थ शाश्वत और दिव्य भगवत्पद की प्राप्ति के लिए एक अद्भुत सोढ़ी है, जो योगियों के लिए भी दुर्गम्य है, भच्चों के लिए भी दुर्लभ है, ज्ञानियों के लिए भी दुश्चिन्त्य है और जहाँ से जगत् की उत्पत्ति होती है और जिसमें प्रलय होता है । (४) (आत्मरक्षार्थ कवच के रूप में वर्णन ) आन्तराणामरातीना विजयरतधारिणाम् । भवबन्धविनाशार्थ मुनीना धर्मचारिणम् ॥ ७ ॥ ओंकार परम प्राहुराशय तद्विदो बुधा । तमेन सुदृढं मन्ये "ब्रह्म वर्म ममान्तरम्" ।।८।। अर्थात्, काम, क्रोध, मद मत्सर आदि आभ्य तर शत्रुओं को विजय करने का व्रत लेने बाले, और भव व घ अर्थात् सासारिक जीवन की त्रुटियों और अपूर्णताओं की निवृत्ति के लिए धर्माचरण में रत मुनियों का ओंकार ही एकमात्र उत्कृष्ट सहारा होता है, ओंकार के तत्त्व को जानने वालों का ऐसा मत है। उसी प्रकार को में ब्रह्म रूप में अपना सुद्ध आध्यात्मिक कवच समझता हूँ। ब्रह्म धर्म ममान्तरम्" यह अथर्ववेद ( 31१९) का मन है। उसी की ओंकार परक व्याख्या यहाँ की गयी है । अभिप्राय यह है कि ईश्वर भक्त के लिए ओंकार ही एक सुदृढ कवच का काम करता है। (५.६) ( सुगन्धित पुष्प, परम ज्योतिः, अमृत, परमीपध तथा ब्रह्मास्त्र के रूप में वर्णन) ज्ञानविज्ञानवृत्तस्य सुगन्धि कुसुम शुभम् । ज्योतिपामपि यज्योतिरमृत भोज्यमात्मन ॥ ॥ नानासन्तापतताना यश्चाप्योषधमुत्तमम् । पापीघ भरमसात् पतुं महाख ब्रह्मादिनाम् ।। १० ॥ अर्थात, श्रीकार ज्ञान विज्ञान रूपी वृक्ष का सुदर मुगन्धित पुष्प है। अर्यात, । १४२ ]

जैसे किसी फूलने पाले पौदे का उत्कृष्ट सौन्दर्यमय सारांश पुष्प-रूप में विकसित
होता है, इसी तरह समस्त ज्ञान और विज्ञान का अन्तिम निचोड़ या परम ध्येय या
'पर्यवसान ओंकार है।
ओंकार समस्त प्रकाशमय पदार्थों का भी प्रकाश है।
ओंकार ही वास्तव में श्रात्मा का अमृतमय भोज्य है। अभिप्राय यह है कि
मनुष्यमात्र में अपने को पूर्ण की ओर ले जाने की जो भूख है उसकी सदा के लिए
तृप्ति श्रोम् से ही हो सकती है ।
नानाविध सन्तापों से संतप्त प्राणियों के लिए ओंकार ही सर्वोत्तम अचूक
औषध है।
मनुष्य के अन्दर जो पापों को राशि घर किये हुए है उसको आमूल भस्मसात्
करने के लिए बोकार को ही ब्रह्मज्ञानी लोग अत्यन्त शक्तिशाली ब्रह्मास्त्र समझते हैं।
( सर्व-देवात्मक, सर्वत्र व्यापक मूल-तत्त्व के रूप में वर्णन )
सर्वदेवात्मक शान्तं तत्समेकरसायनम् ।
अथवा बहुनोक्केन कोऽर्थ, एवं विचिन्त्यताम् ॥ ११ ॥
त्रिलोक्यामपि यत्किञ्चित् तदादाय समन्ततः।
तिष्ठन्तं प्रणयं ध्यायन् ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ १२ ॥
अर्थात्, समस्त देव जिसके अग हैं ऐसा, सदा एक स्वरूप में रहने वाला (अथवा
अद्वितीय रसायन भूत ), शान्त तत्त्व ओंकार ही है।
अथवा अधिक कहने से क्या लाभ है, यही समझना चाहिए कि तीनों लोकों में
जो कुछ भी विद्यमान है उस सबको अपने में लेकर जो स्थित है, उसी ओंकार का
ध्यान करता हुआ मनुष्य ब्रह्मभाव को प्राप्त कर सकता है।
( उपर्युक्त ओंकार-माहात्म्य के माहात्म्य का वर्णन)
एतदोंकारमाहात्म्यं प्रातः प्रात: पठन्नरः ।
सावधानेन मनसा शान्त एकान्तसस्थितः ॥ १३ ॥
गुरूपदिष्टमार्गेण प्रनजन् ब्रह्मणोऽध्धनि ।
प्रणवस्य जपेनार्थभावनेन च नित्यशः ॥ १४ ॥
उत्तरोत्तरमुत्कृष्टं स्थानं प्राप्य, परं पदम् ।
अक्षय्यममृतं दिव्य लब्ध्या विष्ठत्यनामयम् ॥ १५ ॥

अर्थात् , उपर्युक्त ओंकार-माहात्म्य का एकान्त में बैठकर प्रत्येक दिन प्रात काल शान्तचित्त और सावधान होकर जो मनुष्य पाठ करता है वह गुरु द्वारा घतलाये हुए मार्ग से ब्रह्मप्राप्ति की ओर चलना हुआ नित्य अर्थविचार के साथ प्रोकार के जप से कमश आध्यात्मिक उन्नति करता हुआ निधय हो अन्त में अक्षय, अमृत, अनामय (सब पीड़ाओं से रहित ) आनन्दमय परमपद को प्राप्त कर लेता है । (उपसंहार) स एप सरलो मार्गः सर्वक्ण्टकार्जितः । अत एव सदा सद्भिः सम्प्रदायैः समर्हितः ॥ १६ ॥ अर्थात् , ओंकार-उपासना का उपरि-निर्दिष्ट मार्ग सीधा सादा है। इसमें किसी प्रकार के कण्टको या विघ्न बाधाओं या जटिलताओं का डर नहीं है । इसी लिए समस्त सत् सम्प्रदाय इस मार्ग का आदर करते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं है कि वैदिक मार्ग की तरह जैन बौद्ध आदि सम्प्रदाय भी ओंकार के माहात्म्य को मानते हैं। (रश्मिमाला ९.) -eesxelam. [ १५४ ]

डाक्टर मङ्गलदेव शास्त्री द्वारा प्रणीत अथवा
संपादित ग्रन्धों का परिचय'
(संस्कृत भाषा में)
(१) ऋग्वेदप्रातिशाख्यम्, उवटाचार्यकृतमाग्येण सहितम् । En)
(२)प्रबन्धप्रकाशः । (संस्कृतनिबन्धात्मक ) प्रथमो भाग । नवम
संस्करणम्
(३) प्रवन्धप्रकाशः। द्वितीयो भाग, ऐतरेयब्राह्मणपर्यालोचनेन सहित । ३)
(४)न्यायसिद्धान्तमाला। (द्वौ भागो)।
(५) उपनिदानसूत्रम् ( सामवेदीयम् )।
(६) उपेन्द्रषिशानसूत्रम् ( वेदान्त )।
३)
(७) श्राश्वलायनचौतसूत्रम् ( सिद्धान्तिभाष्यसहितम् ) (द्वी भागो)
() आर्यविद्यासुधाकरः।
१०)
(६) भारतीयसंविधानस्य (उत्तरार्धस्य ) संस्कृतानुघादः ।
(१०) ऐतरेयारण्यक-पर्यालोचनम्
-
(इङ्गलिश भाषा में)
(११) माग्वेदमातिशास्यम् English Translation, Critical
Notes, Appendices, etc.
(१२) ऋग्वेदप्रातिशास्यम् ( Critical Introduction, Tirs in
Sanskrit Stanzas, Appendices, etc.) Inths Prime
१. गवर्नमेंट सस्कृत कालेज, बनारस, के प्रिंसिपल के पद
सपादित 'सरस्वती भवन प्रन्यमाला' की पुस्तकों का उल्लेख इस में है
[ १४५ ?

(हिन्दी भाषा में)
(१३) भाषाविज्ञान (अथवा तुलनात्मक भाषाशास्त्र ), पंचम संस्करण
(१४) भारतीय आर्यधर्म की प्रगतिशीलता (भारतीय संस्कृति के
विकास का विवेचनात्मक अध्ययम)
(१५) मिना (= प्रेम और प्रतिष्ठा का संघर्ष) ('मिना फन बाधल्म' नामक
जर्मन नाटक का अनुवाद)।
२)
(१६) वेदों का पास्तविक स्वरूप अथवा -वेदों के महान् श्रादर्श ।)
(१७) रश्मिमाला (अथवा 'जीधनसंदेश गोतामलि')। मूल संस्कृत
पद्य तया हिन्दी अनुवाद । उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा पुरस्कृत ॥)
(१८) भारतीयसंस्कृति का विकास । प्रथम खण्ड, पैदिक धारा
(प्रकाशनार्थ प्रस्तुत ग्रन्थ )
(१) शतपथब्राह्मणपोलोवनम्
(२) कोपोतकिब्राह्मणपोलोचनम्
(३) सांख्ययोगपारिभाषिकशब्दकोषः
copeppen
प्राप्तिस्थानम्-
चौखम्बा विद्या भवन
बनारस
[१४६ ॥

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Amart Manthan

Author
Dr. Nangal Shasttri
Title
Amart Manthan
File name
Amart Manthan
Text
OCR done
Citation
1956
Published
2011/01
Publisher
Banaras Press
Language
Sanskrit
Pages
168
Library
Dr. Robert Heiling Library, S.m.s.medical College, Jaipur
Classification
History
DLI number
446140
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Amart Manthan