Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Lokprakash Granth Bhag-3-4

Vinayvijayji · 2012/08

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लोकप्रकार
KWAYAN
(विभाग ३-४
LOKA PRAKASA
(Vols III-IV)
(Treating "Kala 'Loha and "Bhaya "Loka)
by
Upadhyaya Sri Vinayavijayaji
Sanskrit Text with Gujarati Troslation.
ST
Published by
S'ri Jaina Dharma Prasāraka Sabha
Bharnagar ( Kathaus-lwin)
Viru Samyat 2460 ]
\,D 1931,
Vikrama Samiat 1990.
Price Rs. 3/8 ( Inland )
Foreign: Sb. 71-
excluding Postage.
Jacluling Postago chargos etc.
Noto-To Public Librarica at half tho Price

Printed at The Anand Printing Press-BHAVNAGAR. (India. )

।
En
स्व शेठ अमृतलाल पुरुषोत्तमदास
म वि म १९०३ मागल्य ९ रवि मृत्यु विस १९७३ मार्ग• शु० १३ गुरु
Late Seth Amritlal Purushottamdas
Born 30th Dec. 1866 D ed 7th Dec. 1916

अर्पण पत्रिका. शेठ अमृतलाल पुरुषोत्तमदास. स्व० शेठ अमृतलाल पुरुषोत्तमदासनु कुटुंब मूळ राधणपुर (जैनपुरी) निवासी सानदान गणातुं छे. ते फुटुंब केटलाक वर्षोथी भावनगरमा श्रावीने वसेतुं छे भने तेमणे पोतानी खानदानी अने धर्मचुस्तपणुं जाळवी राख्युं थे. स्व० शेठ पुरुषोत्तमदास हेमजीए (जेमना ची. भाई अमृतलाल सुपुत्र छे) पोतानी जीदगीमां अनेक धर्मकार्यों को छे तेमां सास कार्य भाषनगर नजीक मान प्रण गाठ दूर परतेज प्रामे सुंदर जिनमंदिर जातमहेनत लइ बंधावी श्रीसंभवनाथजी महाराजनी संपत १९२८ ना माहा शुदि १३ से प्रतिष्ठा करावी ते छे. पा प्राम ते दिवसथी एक तीर्य जेवू गणावा लाग्युं छे. सर्व यानालु दर्शनार्थे त्यां आवे छे तेम ज तेनी वर्षगांठने दिवसे सेंकडो माणसो भाषनगरपी त्यां जाय छे अने जिनमति निमित्ते उत्सय परी पूजा मणाये थे तेम ज स्वामीवात्सल्य याय छे. स्व० शेठ पुरुषोत्तमदास भावनगरना श्री संघमां एक अमणी गणाता हता. तेमने त्यां माइश्री अमृतलालनो जन्म सं. १९२३ ना मागशर पदि ९-१० मे भयो हतो. ( फोटो आ साये आप्यो छे ) मागशर दि १० मे ( पोपदशमे ) तेनी षधामणी मळी हती. एमणे याल्यावस्यायी उदयना सारा चिन्हो यताव्या हता. एमनामां धर्मश्रद्धा पूर्ण हत्ती. धार्मिक कार्योमा एमणे सारो द्रव्यव्यय को 2. तेत्रो गरीय अवस्यामांची स्वाय ने पोवानी पुद्धिथी भागळ यधी व्यापारमा निपुण थया, अने गुंघइ जइ फापहना व्यापारमा निष्णात यह स्वतंत्र दुफान पोताना पुत्र हीरालाल अमृतलालना नामधी सं. १९५७ मां शर करी तेयो अनेक धर्मकार्यों फरी एक पुत्र, एक पुत्री भने धर्मपत्नीने सजी दइने सं. १९७३ ना मागरार गुदि १३ से ५० वर्पनी वये पंपत्य पाम्या. जैनममुदायमा एमना अमाययी एक योग्य मनुष्यनी सामी पटी. सेमना पुत्र हीरालाले एक गाम कार्य तो पोवाना उपकारी पितानी दादानुमार तेमना कायमना नामस्मरणमाटे भावनगर स्टेशन उपर एक मुंदर धर्मशाळा पात्रालुमो विगेरे जैनपंधुभोने उतरवानी मगर मापनारी पंधापी, तमा मुमारे रु. ६००००) लगमा वर्ष कयों भने तदुपरांत पिताभीनी इण्यानुमार नेमना निमित्त विविध प्रकारे पपासक हजारको बीजो रापं गुम कार्यों पाएन फों ऐ. भाइ भी दोगलाल देरी पर प्रीतिशाळा होवाची सवपीना भंगना बीजा पर रेटलाफ कापा मगे पपीदने रे. मा पुम पावामा पर नेमणे पूरता सपंनी महापा पने ते पोताना पूरप पिना. भीने अपंप करीने लिपित भणी यपानी पारणा गती दे. पमर्नु पूर्व रागनी पने पापना भाररने पात्र परोपी भारा . मं. १९९० सिटा. प्रकारक.

अनुक्रम. " " ८ " " १ प्रस्तावना. (शास्त्री जेठालाल हरिभाई ) २ ग्रंथकर्तानी गुरुपरंपरा १३ ३ ग्रन्थकारनी कृतिश्रोनुं लीस्ट ४ सर्ग २८ पर उपोद्घात-"प्राचीन ज्योतिप्' (हीरालाल) ५ पत्रक-१. नक्षत्र विभाग ने जुगरचना ६ पत्रक-२. नक्षत्रो-मास-ऋतु-अयन-संपात-राशि-(प्राचीन) २४ ।" ७ प्राचीन ज्योतिप् विषयक उतारा " मेघदूत "माथी २६ " कौटिल्य अर्थशास्त्र माथी ९ प्राचीन अर्थशास्त्रना उतारा परनी नोंध ३२ १. वर्तमान " वेदांग ज्योतिप्" ना श्लोको ११ सर्ग २८ नुं शुद्धिपत्रक १२ लोकप्रकाश आखा ग्रंथमां आपेल सहादतोनु लीस्ट १३ आ ग्रंथनी विषयानुक्रमणिका १४ काललोकप्रकाश सर्ग २८ थी ३५ सार्थ १५ भावलोकप्रकाश सर्ग ३६ मो ६७८ थी ७२० १६ प्रशस्ति सर्ग ३७ मो ७२१ थी ७२८ " " १ थी ६७७ . " प्रस्तावना. श्रा जगतमा जीव अने अजीव ए वे ज पदार्थों छे. तेमा संसारी अने मुक्त ए ये प्रकारे जीव छे. रूपी अने अरूपी ए बे प्रकारे अजीव 2. जीवने एकांत "लोक" दुःखमय संसारमा अटन करवू अथवा एकांत सुखमय मोक्षमां स्थित थर्बु श्रा बन्ने मार्गनो सहायक अमुक अपेक्षाए अजीव पदार्थ छे. तेना मुख्य पांच भेद छ-धर्मास्तिकाय १, अधर्मास्तिकाय २, अाकाशास्तिकाय ३, पुद्गलास्तिकाय ४ अने काळ ५. पानी साथे जीवद्रव्यने भेळवतां कुल छ द्रव्य याय छे. श्रा छए द्रव्यो जेमा रहेला छे ते लोक कहेवाय छे. ( तेनाथी अन्य अलोक कहेवाय छे.) " लोक्यन्ते द्रव्याणि अस्मिन्निति लोका"-जेमां सर्व द्रव्यो जोवामां आवे छे ते लोक फहेवाय छे. (अलोकमां श्राकाश सिवाय अन्य द्रव्य छ ज नहीं.) पुद्गल द्रव्य एक ज रूपी छ, बाकीना पांच अरूपी छे, तेमां जीव पुद्गलसंगे रूपी छे. भा छ द्रव्यरूप लोकनो जे प्रकाश ते लोकप्रकाश नामनो या ग्रंथ छे. पाना मुख्य चार विभाग पाड्या छे-द्रव्य, क्षेत्र, काळ अने भाव. जो के एक द्रव्य शब्दमा ज क्षेत्रादिक त्रणेनो समास थइ शके छे तो पण क्षेत्र अने काळनी पावतमां वधारे विस्तार करवानो होवाथी तथा भावनुं स्वरूप अति संक्षिप्त छतां ते आत्माना अध्यवसायरूप होवाथी कर्ताए सेमर्नु भिन्न निरूपण करवा इच्छयुं छे. पद द्रव्योनुं विस्तृत स्वरूप कहेनार या ग्रंथ समान अन्य प्रन्थ प्राये जोवामां आव्यो नथी. आ अपूर्व मन्थना कर्ता पण महाप्रसिद्ध विद्वान् उपाध्याय श्री विनयविजयजी महाराज धे के जेओ श्री कल्पसूत्र उपर सुयोधिका नामनी टीका, ग्रन्थकर्ता" श्रीपालाम. विगेरे, अनेक संम्झत. ने गुजगती. प्रत्योता. कर्ता तरिके सुप्रसिद्ध छ, जेनुं लीस्ट पाछळ भापवामा साव्युं छे. प्रा महात्मानो जन्मसमय, निवासस्थान, दीक्षासमय विगेरे केटलोक उपयुक्त वृत्तात जाणवामा आव्यो नयी, परन्तु भा ज ग्रन्थना दरेक सर्गना अंतिम श्लोकमा राजधी (राजपाइ) माता अने तेजपाल पितानुं नाम भावे छे. आवा नामो वणिक ज्ञातिमा ज प्राये होइ शके थे तेथी,तेश्रो सांसारिक दशामा वणिक जातिना हता एम सिद्ध थाय थे, तेमज वाच केंद्र ( उपाध्याय ) श्री कीतिविजयजीना पोते शिष्य हता एम पण से ज मंतिम १क्षेत्र ते प्राधाशास्तिाय थे मे सेमा रहेला पी पदापोंनो एमा समाग चाय , मामा मारनी समास पाय रे.

३ श्लोकमा जणाव्युं छे. आ कीर्तिविजय उपाध्याय अकबरबादशाहमा प्रतिबोधक जगद्गुरुबिरुद- धारक श्री हीरविजयसूरीश्वरना शिष्य हता एम आ ग्रन्थनी प्रशस्तिना ३२-३३ श्लोकमा स्पष्ट जणाव्युं छे ते या प्रमाणे- " श्रीहरिविजयसरी-श्वरशिष्यो सोदरावभूतां द्वौ । श्रीसोमविजयवाचक-वाचकवरकीर्तिविजयाख्यौ ॥ ३२ ॥ तत्र कीर्तिविजयस्य किं स्तुमा, सुप्रभावममृतातेरिव । यत्करातिशयतोऽजनिष्ट म-त्प्रस्तरादपि सुधारसोऽसकौ ॥ ३३ ॥ अर्थ-"श्रीधीरविजयसूरीश्वरना वे शिष्यो श्री सोमविजय वाचक (उपाध्याय) अने वाचकवर श्री कीतिविजय नामना सहोदर भाइयो हता, (३२) तेमां चंद्रना जेवा श्री कीर्तिविजयना सुप्रभावनी अमे शी रीते स्तुति करी शकीए ? के जेना हाथना (चंद्र पक्षे किरणना ) अति- शयथी मारा जेवा पत्थरथकी पण भावो अमृतरस झर्यों छे. (३३)" श्रा ग्रंथ संवत् १७०८ वैशाख शुदि ५ ने दिवसे (सने १६५२ मां ) जुनागढमां पूर्ण कों के एम प्रशास्तिना शोक ३९ मां कहे छे. ते वखते श्रीउत्तराध्ययनसूत्रनी वृत्तिकारक सर्वशास्त्र- निपुण उपाध्याय श्री भावविजयजीए यलपूर्वक ा ग्रंथने सुधार्यों छे तथा शोधन, लिखन विगेरे कार्यमां कुशळ श्री जिनविजयगणिए श्रा अंथनी पहेली प्रत लखी छे, एम प्रशस्तिमा १७-३८ श्लोकमा जणावेल छे. उपरांत ग्रंथकारे प्रशस्तिना प्रारंभमां ज गुरुपरंपरा देखापा माटे श्री सुधर्मास्वामीने आरंभीने पट्टपरंपरा प्रस्तावनानी पछी देखाडी छे. . या ग्रंथकर्ता उपाध्यायजी श्रीयशोविजयजीना समकालीन छे, एक समुदायमा ज थयेला छ, परस्पर पहु प्रेम संबंधवाळा छे तेथी ज श्रीपाळ महाराजानो रास रचतां रचतां अधुरो रह्यो भने अकस्मात् सं. १७३८ मा संदेरमा स्वर्गवासी थया त्यारपछी ते रास तेमनी फरी गयेल सूचनार्थी उपाध्याय श्रीयशोविजयजीए पूर्ण करेल थे. ते आखो रास अर्थ साथे छपा- येल थे अने दरेक वर्षमां घे वखत चैत्र भने मासो मासमा नवपद धाराधन फरवानी मोळीना शुदि ७ थी शुदि १५ सुधीना ना दिवसोमां अनेक शहेरो भने गामोमा समा समक्ष तेमज कुटुंयवर्ग समक्ष पांचधामां आवे छे. " आ ग्रंयकर्तानी ज करेली श्रीकल्पसूत्र उपरनी सुबोधिफा नामनी टीका जेनुं प्रमाण ६००० श्लोकगें थे, रो ज टीका प्राये हालमा पर्युपणपर्वमा तपगच्छना समुदायमा सर्वप्न पंचायथे. पा लोकप्रकाश पंथ मूड श्लोक १७६६१ प्रमाण ऐ. से पंच प्रासो मूळ श्री सामनगर- ३ पाळा पंडित हीरालाल हंसराजे छपावेल छे अने वेना वे विभाग (द्रव्यलोक ने क्षेत्रलोक) अर्थ साथे पण तेणे छपावेला छ. शेठ देवचंद लालभाई पुस्तकोद्धार या ग्रंथनो छपायेल फंड तरफथी ते छपाववानो प्रयत्न थतां तेनुं मूळ त्रण विभागमा माग. छपायेल छे, (द्रव्यलोक १, क्षेत्रलोक २, काळलोक सर्ग २८ थी ३३) अने भाषांतर साथे वे विभाग छपायेल छे. (द्रव्यलोक १, क्षेत्रलोक सर्ग १२ थी २० ) बाकी मूळना ४ सर्ग अने भाषांतर साथे क्षेत्रलोकना ७ सर्ग (२१ थी २५) पण छपाववा बाकी रहेला छे. एमर्नु बाकी काम छपाववामां मंदता विशेष लागवाथी अमे काळ तथा भाव लोकप्रकाश भाषांतर साथे छपाववानुं काम हाथ धयुं छे. पनी अंदर ए लोकप्रकारा ग्रंथ पूर्ण कर्यो छे. तेमां शुं शुं श्रावेल छे ते नीचे आपवामां श्रावेल छे वेथी नेम ज पानी अनुक्रम- णिका विशेष विस्तार साथे श्रा लगत प्रापवामां आवेल छे तेथी पण समजी शकाय तेमथे. मंथकर्ता श्रीयशोविजयजी उपाध्यायना समकालीन हता अने तेओ बने दीक्षा लीधा पछी गुरुमहाराजनी आज्ञायी काशी अभ्यास करवा गयेला छे. ते हकीकत देम ज वेमना जीयनने लगती वीजी हकीकत नयफर्णिकानी युक्रमां, वेम ज जैन गूर्जर कवित्रो भाग पीजामा अने जैनसाहित्यनो संक्षिप्त इतिहाम भाग पहेलामां जेटली मळी शकी छे तेटली सेना लेखक मोहनलाल दुलीचंद देशाइए विस्तारथी आपेली छे ते वाचवानी भलामण करीने विरमद् योग्य लागे थे. वे धधी हकीकत अहीं लखतां पहु विस्तार थइ जाय तेम होवाथी लखेल नथी. आ ग्रंथकर्ताए प्रा प्रथनी अंदर जुदा जुदा ७०० शास्रोनी साक्षीश्रो श्रापेली थे एवी सामान्य उक्तिने अंगे आसा ग्रंथमा प्रापेली सातीमोनी तारवणी सूत्रमंथोना नामो साये फरता जे जे सूनो, वृत्तिमो अने ग्रंथो तथा प्रकरणोनी सहादतो छ आ ग्रंथमा आपेल तेना नामो तथा तेनी सहादत एकंदर केटले केटले स्थळे छे देनी साक्षीमो. संख्यानो अंफ के जे १०२५ नो कुल थाय थे ते या साये आपवामां आवेल छे. तेमा केटलीक सहादत प्रथ के मूत्रना नामवाळी जथे अने पणी सहादतो सो वे सूत्रादिना पाठवाली के एसी सहादतो ७०० होवा संभव छे. ते उपरथी एमनो योघ फेटलो विशाळ हदोगे ममजी शकाय म छे. भाफाळ तया भावलोक मातर साये धपावधानो उत्साह भाईश्री हीरालाल अमृतलालनो पो. साना पूज्य पिताश्रीना स्मरणार्थे तेमज श्रेयाथै आर्थिक मदद मापया पूर्व आर्थिक सहायक. फनो ययायी श्रमे मा प्रप भापांवर माये जैन वर्गनी ममश रजु फरी शश्या बीए. मार्षिक सहायफ भाई दोरालाले प्योतिपने बगे सपर शाम्रोनो केटलोक अभ्यास करलो होवाथी ज्योतिपने लगता २८ मा सर्गनो उपोद्घात तेमणे जुदो लख्यो छे अने तेमां तेने अनुसरती हकीकत मेघदूतमाथी, पुरातत्व मासिकमां प्रापेला ज्योतिष २८ मा सर्गनो वेदांगना लेखमाथी अने कौटिल्यना "अर्थशास्त्र" माथी जे मळी उपोद्घात. शकेल छे ते पण वाचकवर्गनी सुगमताने अथे दाखल करेल छे ते उपोद्घात ा साथे ज भापवामां श्रावेल छे. सर्ग २८. - . काललोकना प्रथमना २८ मा सर्गमां काळ्नुं स्वरूप बतावतां प्रथम काळ ए द्रव्य ज होई शक नहीं ए पातने मजबूत करी पछी छेवटे विस्तारथी युक्ति- बडे अने आगमवडे काळने द्रव्यपणे सिद्ध करेल छे. पछी वर्तना, परिणाम, क्रिया अने परापर ए काळना चार प्रकारो प्रथन संक्षेपथी आपीने पछी विस्तारथी आप्या छे; तथा अढी द्वीपनी बहार चरज्योतिपी न होवाथी काळ द्रव्य छे नहीं ते विषय पण ऊहापोहथी सिद्ध कर्यो छे. त्यारपछी सन्नामकाळ १, स्थापनाकाळ २, द्रव्यकाळ ३, अद्धाकाळ ४, यथायुष्ककाळ ५. विगेरे अग्यार प्रकारे फालना निक्षेपा कही तेने विस्तारथी प्रतिभेद सहित समजाव्या छे. तेमां छठ्ठा उपक्रमकाळ नाममा निक्षेपामा इच्छाकार, मिच्छाकार विगेरे दश प्रकारनी सामाचारी विस्तारथी पर्णवी छे. नवमो प्रमाणकाळ नामनो काळनो निक्षेपो छे तेनो ज विषय आ काळलोकप्रकाशमा छे केमके से प्रमाणकाळ अतीत, अनागत अने वर्तमान ए त्रण प्रकारनो छे अने ते व्रण प्रकारने आश्रीने जा ग्रंथनो विस्तार छे. पछी था प्रमाणकाळना संख्यात, असंख्यात अने अनंत एवा त्रण विभाग पाड्या थे. वेने अंगे समय-श्रावली-तुल्लकभव-प्राण-स्तोक-लव-मुहूर्त-दिवस- मास-धर्ष अने युग विगैरेथी शरु करीने पल्योपम, सागरोपम, काळचक्र, पुद्गलपरावर्त पर्यंत काळने दासला दलील सहित विस्तारथी समजाव्या छे. सूदममा सूक्ष्म काळने समय कह्योछे. वे कोइरीते लक्ष्यमा श्रावी शके सेम नथी तेथी कमळना पांदडा विगेरेना दृष्टांतथी तेनी समज पाडी के. चालता काळने अनुसरीने दृष्टांत आपीए तो पण आपी शकाय छे. जेमके-भावनगरथी मुंयह सुधी अरजंट वार मूक्यो. तेना अक्षरोना धडाका वारनी दोरी उपर चाल्या ते दोरीना एक पोइंटथी बीजापोइंट उपर जतां केटलो काळ लाग्यो वे न कही शकाय तेम नथी, तो तेथी पण घणणे सूक्ष्म समयरूप काळ छे ते सूक्ष्मज्ञानी ज समजी शके तेम थे. जेम अति सूक्ष्म काळने समयना नामयी कहो , तेम सोयी मोटा काळने सागरोपम, काळचक अने पुद्गलपरावर्तना नामी मोळसाव्यो छे. ते पण पणा दृष्टांतोथी समजाववामां आवेल छे. ते उपरांत कानो वोल अने मापथी पण निर्देश थह शके थे वे युक्तियी स्पष्ट रीते समजाव्यु छे. आ विषय नूतन यापकोने पाश्चर्य उत्पन्न फरे सेयो छे. सारपछी सूर्यसंघरसर १, ऋतुसंवत्सर २, चंद्रमंवत्सर ३, नक्षत्रसंवत्सर ४ भने -- अभिवतिसंवत्सर ५-ए पांच प्रकारमा वर्ष तथा मास अने तेनो उपयोग विगेरे सविस्तर जणवेल छे. त्यारपछी पांच वर्षना युगर्नु स्वरूप, दरेक युगना आरंभनो प्राचीन ज्योतिष मास, पक्ष, तिथि, दिवस विगेरे वतावी त्यारपछी विधूवत्तुं स्वरूप आप्यु छे. त्यारपछी एक युगमां चंद्रना १३४ श्वयनोनुं स्वरूप प्राप्यु छे. (जुभो पृष्ठ ७८) त्यारपछी सूर्य तथा चंद्रने आश्रीने ऋतुोनुं स्वरूप प्राप्युं छे, तेमां चंद्रऋतु अप्रसिद्ध छ भने ते एक युगमा एटले पांय वर्षमा ४०२ आवे छे ऋतु ज्यारे सूर्यतु एक युगमा ३० एटले एक वर्षमा ६ आवे छे. अही भागममां कहेलुं छए ऋतु, काइक स्वरूप कहीए छीए' एम कहीने ज्योविष करंदना अभिप्राये प्रावृष १, वर्षा २, शरद ३, हेमंत ४, वसंत ५, प्रीष्म ६ आ अनुक्रमे छ ऋतु लसी छे. अने प्रथम प्रावृष ऋतु अपाड मासनी पूर्णिमाथी शरु थाय छे एम कडं थे. ए क्रमे थे ये मासनी एकेक ऋतु कहेली छे. आ विषयने अंगे ज्योतिषकरंडनो पाठ प्राप्रमाणे 2. पाउसवासारत्तो, सरश्री हेमंतवसंतगिम्हा य । एए सलु छप्पि उऊ जिणवरदिठा भए सिट्ठा । (पृष्ठ ७९) आ आधार ऋतुओना नाम अने क्रमने माटे ज छे, ऋतुनी शरुआतने माटे वो श्रावणयदि १ कही छे. (जुओ पृष्ठ ६१ श्लोक ६९) पा ऋतुश्चोना आदि तथा अंतनी तिथि जाणवा माटे करण (रीत ) यवावया पूर्वक विस्तारयी उदाहरणो मूकी सारी समजूती पापी छे. मतांतरे भगवती सूत्रनी टीका तथा जंयूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रने प्राधारे प्रावृप ऋतुनी शरुपात भाषण मासयी करी छे. ते ज अनुक्रमे छला प्रीष्म ऋतुनी शरमात जेठ मासथी करी छे. ( जुओ पृष्ठ ८४) आ विपे जंबूद्वीपप्राप्तिनो पाठ जुयो पृष्ठ ६० पीजी तरफ आगममा जोवां निरयावलिका सूनमां षन्हिदसा नामना पांयमा वर्गमा धीर- गदाफुमारना अधिकारमा छ ऋतुना नाम पा प्रमाणे कह्या छे. "पाउसपरिमारत्तसरयहेमंत- गिम्हवस छपि उऊ"! बहीं पेला पे तुना फ्रममा फेरफार छे. देना टमामां प्राप ऋतुना जेठ ने भपाह मास लख्या 2. ए अनुक्रमे यवे मामना ऋतु गणी छेवट प्राप्मना माघ ने फाल्गुन क्या पसंधना पैन ने वैशाख मास गएया छे म ज व्यवहारमा जोइए बीए सो वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर, पसंत अने प्रीम या प्रमाणे नामनो अनुक्रम पालवा पंचांगमा जोषामो पाये थे, वे क्रम मुजय ज प्राचीन प्रन्य ॥ कौटिलीय अर्य- शान" (इ. म.पू. ३५० पाशरे) मां क्रम मे.व्ययहारमा मामनी प्रधानता रावी नदी परंतु दिपस रात्री अमनमो सरसा होय ते. १ पर मारानी पूर्णिमानो दिपए पूर्ण पार २ तरत बीगो दिम ब भरत दि. एम पांच- मरे सालमा .

६ सूर्यसंक्रांति प्रमाणे ऋतुओनी गणतरी करी छे. एटले के-कर्क अने सिंह ए वे संक्रांति : वर्षा ऋतु, ए अनुक्रमे छेक्ट वृप अने मिथुन ए वे संक्रांति छठ्ठा ग्रीष्म ऋतुनी आवे छे. तेमां पहेलो वर्षा ऋतु हाल अपाडमा शेरु थाय छे परंतु ते शुक्लपक्षमां के कृष्णपक्षमां अने कह तिथि शरु थायाछे तेनो को नियम नथी, केमके तेनो आधार सूर्यसंक्रांति उपर छे. (ऋतुओ संबंधी निर्णय स्त्रसमयने आश्रीने पण मतांतरो होवाथी दुष्कर छे तो परमतादिकने पाश्रीने तो घणा मतांवरो थाय ए स्वाभाविक छे) - त्यारपछी मास, पक्ष, निधि, रात्रिदिवस विगेरेना लौकिक अने लोकोत्तर नाम, तिथि- ओना नामो, तेना स्वामी, तेमर्नु काळमान, क्षयतियितुं स्वरूप, बब बालव विगेरे करणनुं स्वरूप हमेशना त्रीश मुहूर्तोना नाम, चंद्र सूर्यना नक्षत्रोतुं स्वरूप अने छेवट पोरसी, सार्धपोरसी विगेरेना काळमान ने छायाना प्रमाणतुं स्वरूप या सर्व विषयो विस्तारथी आप्या छे. (सर्ग २८ पर वधारे विवेचन जुदु करेलुं छे, तेमां बीजी बाबतो विस्तारथी कही छ.) श्रा फाळलोकना चीजा सर्गमा अवसर्पिणीना प्रथमना चार प्रारानुं स्वरूप सामान्य रीते प्राप्यु छ अने पांच वर्षना युगयी मांडीने शीर्षप्रहेलिका सुधीनी संख्या वक्षमी ने माधुरी घेने वाचना प्रमाणे आपवामां आवी छे. पल्योपम ने सागरी- सर्ग २९ मो. पमनु स्वरूप द्वंकामा प्राप्युं छे. पछी अवसर्पिणी, उत्सपिपातुं स्वरूप यतावतां अवसर्पिणीना प्रथमना व्रण आरामां थता युगलिकनुं विस्तृत वरप भाप्यु के अने वीजा आरानी प्रांते थयेला प्रथम तीर्थकर ने प्रथम चक्रोनी हकीकत जरा विस्तारथी पापी छे. पछी ना चौथा पारामां थयेला २३ तीर्थकर ने ११ चकोर्नु स्वरूप संक्षेपयी कडं थे. एकंदर २४ वर्थिकर, १२ चकार्ती, ९ वासुदेव, ९ पळेदेव, ९ प्रतिवासुदेव, ९ नारद ने ११ रुद्र एम ८३ उत्तम पुरुपो संबंधी हकीकत यापीने सर्ग पूरो फों छे. मा सर्गमा सर्व तीर्थकरो संबंधी सामान्य हकीकत आपीछे. 'तेमां प्रथम सीर्थकरनाम- 'फर्म बांधवाना कारणभूत वीश स्यानको होय छे तेना नाम अर्थ सहित आपी तेनी आराध. नानो विधि फह्यो छे. प्रा वीर्यकरनामकर्म साधु, साध्वी, श्रावक मर्ग३० मो. भने प्राधिका ए चारेमांधी कोह पण यांधी शके छे-निकाचित फरे छे. से अरिहंतो पूर्वजन्ममां वैमानिक देव होय छे अथवा वर्थिकरनाम- फर्म यांच्या प्रगाउ आयुष्य घांधी दीधुं होय तो प्रथमनी प्रण नरकमां पण होय छे. देवमयमां होय तो सायंकर पनारा जीयने च्ययाना समय मुभी शरीरनी कांति विगेरे यधतीज रहे थे, मेने तथा परमशरीरीने पण ध्ययनना पिड कपए पता नथी, नारफी होय वो बीजा नारदी करना नेने स्वर पीटा होय . ते ण्यारे त्यांची व्यये के सारे उप गोप्रवाळा उसम सात्रियकुळमां सुशीला एवी राजपत्नीनी कुक्षिमा (त्रण मान सहित अ) अवतरे छे. ते वसते माता चौद स्वप्न देसे . ते ज प्रमाणे चक्रवतींनी माता पण चौद स्वप्न जुए छे, परंतु ते तीर्थकरनी माता करतां काइक हीन कांतिवाळा जुए छे. तेम ज ओ ते एक ज जीव एक मघमा चक्रवर्ती यह वीर्थकर थवानो होय वो वेनी माता चौद स्वमने थे वखत जुए छे. स्वमना अधिकारने प्रसंगे वासुदेवनी माता सात स्वप्न जुए, बळदेवनी माता चार, प्रतिवासुदेवनी माता प्रण अने मांडलिकनी माता एक स्वम जुए के एम कहुं छे. वळी रावण प्रतिवासुदेय गर्भमां आव्या त्यारे तेनी माता कैकसीए रात्रिए स्वप्नमां पोताना मुसमा प्रवेश करता सिंहने जोयो. एम एक स्वप्न जोयानुं हेमचंद्राचार्यकृत रामचरित्रमा कह्यु छे एम लखे छे. तेम अ मेषकुमार विगेरे महामुनि थनारनी माता पण एक स्वप्न जुए छे. एम पण कधू 2. श्रा प्रमाणे तीर्थकरनी माता स्वप्न जोइ तरत जागे छ भने पोताना स्वामी पासे तरत ज जइ ते हकीकत कहे छे. ते पण तेनु घणुं श्रेष्ठ फल प्राप्त यशे एम कहे छे. पछी प्रातःकाले सभामा नैमित्तिकने धोलावी तेनुं फळ पूछतां नैमित्तिक सर्व स्वप्ननी हकीकत जाहेर फरी, आ १४ स्वाना प्रभावथी तीर्थकर थनार जीव गर्ममा पाव्यानुं जणावे छे. त्यारपछी माता कांति, गुण विगेरेमा सर्व प्रकारे वृद्धि पामे छे. उत्तम दोहद उत्पन्न याय छे. तेने तेना स्वामी पूर्ण करे छे. सेमना प्रभावथी देश पण आवाद याय छे. पछी पूर्ण समये शुभ अवसरे तीर्थकरनो जन्म याय 2. ते वसते ५६ दिक्कुमारिकाश्रो श्रावी तेमनुं सूतिकर्म भक्तिपूर्वक करे छे. शकेंद्रादिक ६४ इंद्रो भने देवो मेरुपर्वत उपर तेमनो जन्माभिषेक करे छे. पछी शकेंद्र प्रभुने माता पासे मूकी प्रमुना अंगुष्ठमां अमृत संक्रमावे छे जेयी प्रभुने स्तनपाननी अपेक्षा रहेती नथी. पछी प्रभुना पित्ताने पुत्रजन्मनी वधामणी मळतां ते पोताना पैभव प्रमाणे मोटा विस्तारथी पुत्रजन्मोत्सव, नामकरणोत्सव विगैरे करे छे. अनुक्रमे प्रमुनी याल्यावस्था, युवावस्था, भोगावळी फर्म अनुसार पाणिप्रहण, गज्याभिषेक, राजनीति विगेरे प्राप्त थाय छे. पछी योग्य समये प्रमु वार्षिकवान मापी प्रणम्या ग्रहण करे 2 ते वखते पिनादिक स्वजनो अने इद्रादिक देवो विस्तारथी दीका महोत्सव करे छे. दीक्षा ग्रहण करे के परत ज प्रमुने मनःपर्यप नामर्नु पोथु ज्ञान प्राप्त याय छे. ते दिवसे काइ पण नानो मोटो तप होय छे अथवा कोइने नयी पण होतो. तेनुं पारगुं प्रमुजे भाग्यवंतने घेर करे त्या देवो पंचदिव्य प्रगट करे छे-तेमा सुवर्णनी वृष्टि - टथी साटापार कोड भने जघन्ययो साढापार लासनी थाय 2. पछी भगानना नस्य विहारनो पृचोट फत्ती लसे छे, ते वसवे प्रसंगोपात सुधा, पिपासा विगेरे यावीश परीपहो विस्तारथी वर्णव्या छे. त्यारपटी देव, मनुष्य, वियंच संयंघी बने स्वसंवेद्य ए पार प्रकारना उपसगों मया तेना परेकना चार पार भेदो पताषी हे सर्वने वीर्यकरो सम्यक प्रकारे सहन 'करे हे एम पताम्य छे. तेथे ममये पण प्रमुने तो गुम ध्यान ज होय . भा प्रमंगे भान, गैर, धर्म अने शुक्ल र पार प्रकारना ध्यानचें सूक्ष्म रोवे विस्तृत स्वरूप, सेना भालंघन, अनुप्रेपा, पिहो विगेरे ममजाया तेमा प्रनु प्रथम पूर्वजन्मधीज पर्मभ्यानमा रक होय हे. दीपा प्रहण कर्या पछी उत्कृष्ठ धर्मध्यानमा रही पछी अनुक्रमे शुक्लभ्यानना पहेला तथा बीजा पायामां श्रावी चारे घाती कर्मनो क्षय करी केवळज्ञान पामे छे. ते ज वखते सर्व (६४) इंद्रो देवो सहित त्यां आवे छ भने समवसरण रचे छे. तेमां पारे निकायना देवो पोतपोवाना भाचार प्रमाणे, कार्य करे छे. प्रथम वायुकुमार देवो एक योजन प्रमाण भूमिने साफ करे छे. पछी मेधकुमार देवो सुगंधि जळ छोटे छे. ऋतुना अधिष्ठायक देवो पंचवर्णवाळा सुगंधि पुष्पोवडे पृथ्वीने पूजे छे. पछी व्यतर देवो सवाकोश उंचु रत्न अने मणिमय पीठ रचे छ. ए स्थाने दश हजार पगीषा चडतां प्रथम गढ आवे छे. . तेना अनुक्रमे रूपानो, सुवर्णनो अने रत्ननो एम व्रण गढ, तेना चार चार दरवाजाओ, आरक्षक देवो, वयेना पगथीमाओ, त्रीजा गढनी अंदर मध्यभागे वेदिका, तेना मध्यमां अशोकवृक्ष अने चैत्यवृक्ष, तेनी नीचे प्रभुने देशना देवा माटे चारे दिशामा छत्र-चामरादिक सहित चार सिंहासनो विगेरे पोसपोताना अधिकार प्रमाणे रचे छे. आभ्यंतर गढमां बार पर्षदाश्रोनुं स्थान होय छे. बीजा गढमां तिर्यचो अने त्रीजा गढमां वाहनोने माटे सावडता करवामां आवे छे. आवा मोटी शोभावाळा समवसरणनी रचना चारे निकायना देवो पोतपो- ताना अधिकार प्रमाणे करे छे. अन्यदा कोइ महर्द्धिक देव पोतानी भतिथी एकलो पण रची शके छे. त्यारपछी पण भगवान ज्यां ज्यां विचरे थे त्या त्यां भक्तिवाळा देवो तेज प्रमाणे समवसरणनी रचना करे छे. हवे प्रभु देवोए विकुर्वेला नव सुवर्णकमळो उपर पग मूकता अनुक्रमे समवसरणमा पूर्व द्वारथी प्रवेश करी, तीर्थने नमस्कार करी, पूर्व सिंहासनपर पूर्वाभिमुखे बेसे छे. बाकीना श्रण सिंहासन उपर प्रभुना ज अतिशयथी देवोए विकुर्वेमा प्रभुना त्रण प्रतिषियो विराजे छे. पछी प्रभु सुंदर वाणीवहे एवी देशना आपे के के ते पर्पदामा रहेला देव, देवी, मनुष्य, मनुष्यणी, तिर्यच, तियेची विगेरे सर्व जीवो जाणे भगवान पोताने ज कहे छे एम पोतपातानी भाषामा सारी रोते समजी शके छे. ते उपर भिल्ल अने तेनी त्रण स्त्रीभोनुं दृष्टोत पाप्य छे. भगवाननी घाणीनी मधुरता विपे एक होशीनुं दृष्टांत प्राप्यु छे. जिनेश्वरनी वाणीना ३६ गुणो नाम अने भर्थ सहित आप्या छे. त्यारपछी भगवान देशनामा प्रथम पांच महाप्रत संबंधी भने पछी भणुमत, गुणग्रत, शिक्षाप्रत विगेरे भावकना १२ प्रत संबंधी देशना आपे छे. सेना पेटामां हितशिक्षा, सामायिफना प्रकार, हजार शीलांगनुं स्वरूप, हजार सामाचारी संबंधी रयर्नु स्वरूप, श्रावफातना भनेक प्रकारना भंगो, त्रण योग अने ग्रप फरणधी यता २१ मेयो, पांच प्रयोना संयोगी ३१ मांगा, श्रापक प्रतना मोगाथी बनती देवकुशिका विगरे साधु भने गृहस्थोने उपयोगी पणी हकीकनो सविस्तर यंत्र सहि पापी छे. स्यारपछी घे पर्षमामा गणघरपदने लायक जे मुनिमो होय तेमने प्रमु अढार घढार .

९ उत्पत्ति, विगम अने धौव्य ए त्रण पद (त्रिपदी ) कहे छे. ते, उपरथी बीजबुद्धिवाळा तेश्रो एक मुहूर्तमा ज द्वादशागी रचे छे. त्यारपछी प्रभु गणधर स्थापना करे छे. ते पम्यते इंद्र सुगंधि वासचूर्णनो थाळ प्रभु पासे धरे छे. पछी प्रभु तेमने सूरिमंत्रयुक्त गणधरपदनी श्रनुज्ञा पापी वेमना पर वासचूर्ण नाखे छे. पछी इंद्रादिक देवो पण नासे छे, -वाजिनो वगाडे छ भने मोटो उत्सव करे थे, पूर्व सिंहासन पर रहेला मुख्य प्रभु जे रीते करे ते ज रीते तेमना ज अतिशयथी पीजा प्रणे रूपो पण करे छे. ते रूपो प्रभुनी जेवा ज होय छे, तेनायी रूपमा अनंतगुणहीन गणधरो होय छे, तेनाथी अनंतगुणहीन आहारकशरीरी होय छे, तेनाथी अनंतगुणहीन अनुत्तर विमानना देवोनुं रूप होय छे. ए क्रमे नीचे उतरतां अनंतगुण हनिरूप ध्यंतरदेवोनु, त्यारपछी अनुक्रमे अनंतगुणहीन चक्रवर्तीनु, वासुदेवनु, वलदेवतुं विगेरे सविस्तर बताव्युं छे. त्यारपछी प्रभुना पाठ प्राविहार्यो अने चोत्रीश अतिशयो बताया छे, अढार दोपोनुं वर्णन आप्यु छ अने छेवट प्रभुना निवार्णनुं विस्तारथी वर्णन कर्यु थे विगेरे. - छ श्रा काळलोकना चोथा सर्गमा चक्रवर्तीनु सामान्य स्वरूप कहुं छे के जे दरेक चक्र मां लभ्य थइ शके छे. चक्रवर्तीना दिग्विजय, एटले छ संह साधयानुं सायंत स्वरूप प्राप्युं छे. खंड साधीने राजधानीमां पाव्या पछी चक्रवतीने थतो चक्रीपणानो सर्ग ३१ मो. अभिपेक वर्णव्यो छे. त्यारबाद चौद रत्नो ने नव निधाननुं स्वरूप वर्णव्युं छे. तेमां वार्धकि रत्नना स्वरूपमा वास्तुशास्त्रनो फेटलोक समावेश फर्यो . प्रांते चक्रवर्तीनी ऋद्धिनुं एकंदर वर्णन प्राप्युं छे. पछी यासुदेव, पळदेव ने प्रतिवासुदेष- सामान्य स्वरूप आप्यु छे ते पण सर्व वासुदेवादिकमा लभ्य थाय तेयुं छे. यासु- देवना रनो, स्त्रीयो, शक्तिनी तरतमता विगेरे यताव्युं छे छेवट नारद ने रुद्रनी टुंकी हकीकत आपीने मा सर्ग पूर्ण कर्यों छे. (त्यारपछी आ पुकमा तीर्थकरोना संबंधमां ३२ मा सर्गमा दरेक प्रभुना चरित्रमा आवनारी अने महावीरपरिमांतर्गत बधा प्रभु माटे जणावेली विगतो नोट तरीके आपवामां आवी छे.) आ काळलोकना सर्ग पांचमामां चोवीश तीर्थकरोना चरित्रो श्रापेक्षा थे. तेमां प्रथम श्री ऋषभदेवर्नु परित्र पणुं विस्तारथी प्रापवामा आध्यु छे. तेमा जे हकीकत आपेली छे ते अनुममणिकामा विस्तारयी पतावेली घे. तेनी प्रांते पभदेवनी पड़ी 'मर्ग ३२ मो. ययेली पुन-प्रौपादिकनी परंपरा भने शिष्य-प्रशिष्यादिकनी परंपरा केवी रीते सिद्धस्यानने सेम अनुत्तर विमानने पामेली थे । मेनुं वर्णन भापयां सिद्धदंतिका प्रकरणनो पूरतो समावेश झर्यों थे. चना अर्थमा नगरी यंत्रो पए माप्या थे. २ - त्यारपछी अजितनाथथी पार्श्वनाथ परमात्मा सुधीना चरित्रो पूर्वभव अने पंचकल्याण- कनी तिथिो साथे प्राप्या छे. तेमां शांतिनाथ, मल्लिनाथ, नेमिनाथ ने पार्श्वनाथना चरित्रमा कांइक विस्तार कर्यो छे. महावीरस्वामीना चरित्रमा तो घणो विस्तार कर्यो छे, म ज चोवीशे तीर्थकरोना संबंधनी पण घणी हकीकतो तेमां पापी छे, जेनुं लीस्ट आ बुकमां पृष्ठ ४१० उपर श्रापेलुं छे. पछी चोवीशे तीर्थंकरोना गणधर. केवळज्ञानी विगेरे मुनिओनी एकंदर संख्या यंत्र साथे प्रापेली छे. बाद तीर्थकर, चक्रवर्ती, वासुदेवादिनो क्रम सूचकनार यंत्र आपेल छे. - श्रा काळलोकना छठा सर्गमा प्रथम श्रा अवसर्पिणीमां थयेला भरतादि बार चक्रवर्ती- श्रोनुं वर्णन छे. तेमां आठमा ने घारमा चक्रीनुं चरित्र विस्तारथी सर्ग ३३ मो. आपल छे. त्यारपछी नव वासुदेवादिक जे आ चोवीशीमां थया छे तेनुं वर्णन आपवामां आव्युं छे. तेमां आठमा, नवमा वासुदेवादिक- परित्र विस्तारथी आपेल थे. प्रांते ११ रुद्रोना नामो भापी पा सर्ग समाप्त कर्यो छे. - या काळलोक संबंधी सातमा सर्गमा अवसर्पिणीना पांचमा अने छट्ठा भारानुं अने उत्सर्पिणीना छए श्रारानुं स्वरूप प्रापवामां आव्युं छे. तेमां प्रस्तुत पांचमा ने छठ्ठा आरान स्वरूप विस्तारथी आप्युं छे. पांचमा आरामा थनारा उदयो भने सर्ग ३४ मो. तेमा थनारा युगप्रधानाचार्यों विगेरेनुं स्वरूप प्राप्युं छे. छठा भारानी भीषण विषमता बतावी छे. तेमां शत्रुजयनी रहेनारी स्थितिने अंगे तेना २१ नामो, तेनुं छए श्रारानु प्रमाण विगेरे पाप्यु छे. पछी उत्सर्पिणीनी शरुआत थतां १५ प्रकारना काळ्नी शस्त्रात थाय थे, ते कहीने तेना पहेला ने बीजा भारानुं स्वरूप फहेतां वीजा आराना प्रारंभमां थनारा पांच प्रकारना वरसादन स्वरूप का थे. पछी त्रीजा आरानुं स्वरूप वर्णवतां तेमा थनारा २३ तीर्थफरो ने ११ पक्रयोिनी हकीकत पूर्व अवसर्पिणीमां कही गयेला वर्णनथी उत्क्रमे पापवामां भावी थे. भावी चोवीशीमा थनारा चोवीशे तीर्थकरोना पूर्वभवना नामो अने तीर्थकरपणाना नामो आपवामां आव्या छ. नेमां केटलाक तीर्थकर थनारा जीवोना पूर्वभवन परित्र पण थापेल .धने तेमां ने फांइ विसवाद , ते पण पतावेल छे. पछी पारे पवती थनारना नामो माया छे. पछी उत्सपिपीना चोथा भाराना प्रारममा यनारा २४ मा तीर्थफर ने १२ मा पक्रवर्तीनी हकीकत पापी छे. त्यारयाद ते धारामां मनारा १५ फुलफरो, सेना समयमा प्रण प्रकारनी नीति अने त्यारपत्री युगलिफपणाना प्रारंभनी स्थिति बताववामां आवी छे. ए पछी पाकीना चोथा आरामां, पांचमा पारामां अने छठ्ठा आरामां युगलिको थाय छे तेनी हकीकत आपीने आ सर्ग समाप्त कर्यों छे. । 1 प्रथम एक उत्सर्पिणी अने एक अवसर्पिणी मळीने एक काळचक कहेवामां आवे छेते कहीने तेवा अनंत काळचक्रोनुं एक पुद्गलपरावर्तन थाय छ एम कयुं छे. ते पुद्गलपरावर्तन द्रव्य, क्षेत्र, काळ अने भाव एम चार प्रकारे छे. ते दरेकना सूक्ष्म सर्ग ३५ मो. अने वादर एवा बेबे भेद होवाथी कुल आठ प्रकारे पुद्गलपरावर्त थाय छे, तेतुं स्वरूप कांइक विस्तारथी अहीं बताव्युं छे. आ विषय ढूंकमां समजावी शकाय तेवो नथी तेथी वाचकवर्गे श्रा स्मळ ज वांचवा योग्य छे. अहीं काळलोक पूर्ण थाय छे. आ सर्गमां भावलोकनुं स्वरूप प्राप्युं छे. भाव एटले पोवानी मेळे अथवा वे ते हेतुथी वे ते रूपे आत्मानुं जे होवापणुं अर्थात् : आत्मानो जे अमुक प्रकारनो अध्यवसाय ते भाव कहेवाय छे. ते भाव छ प्रकारे होइ शके थे-ौपशमिक १, क्षायिक संग ३६ मो. २, क्षायोपशमिक (मिश्र ) ३, औदयिक ४, पारिणामिक ५ अने सानिपातिक ६ आमांना पहेला पांच भावोना ५३ उत्तरभेदो थाय छे ते सर्वनुं स्वरूप विस्तारथी बताव्यु थे. छठ्ठा सांनिपातिक भावना संयोगी भांगाओ २६ थाय छ हेर्नु पण स्वरूप बवाव्यु छे. ते २६ माथी मात्र छ ज भांगा उपयोगी छे अने ते छ भांगाना कुल १५ प्रकार थाय छ ए विगेरे वताव्युं छे. पछी अजीव, आठ कर्म, चौद गुण- स्थान विगेरेने आश्रीने मूळ भावो तथा उत्तरभावो विस्तारथी बताव्या के. पा विषय पण दुर्शय तेथी वाचकवर्गे साद्यंत ग्रंथ वाचवा योग्य छे. भावलोक माटे आ एक ज सर्ग छे. त्यारपछी ३७ मा सर्गमां छत्रीशे सर्गमां कहेली हकीकतो, वीजक एटले संक्षिप्त अनुक्रमणिका वतावी के अने त्यारपछी प्रशस्तिमा सुधर्मास्वामीथी सर्ग ३७ मो. ग्रंथकर्ता सुधीनी पूर्वीचार्यनी पट्टपरंपरा धापी छे ते बापत प्रथम कही गया छीए. T पा रीते श्रा प्रथना विपयो घणा उत्तम अने श्रात्माने उपकारी होवाथी शास्त्रना अभ्यासी न होय अने प्राकृत तेम ज संस्कृत मापार्नु पूरतुं ज्ञान न उपसंहार. होय तमने तथा अल्प अभ्यासीओने पण उपकारक थह पडे एवा हेतुथी भानुं एटले काळलोक तथा भावलोकनुं भापांतर था समाना प्रमुख श्रीयुत् शेठ कुंवरजीभाइ आगंदनीए फयु छे. वेमाथी मात्र अठ्ठावीशमो सर्ग, वा/करत्ननुं वर्णन अने खेली प्रशस्ति पाटलानु भाषांतर में कयु छे ते पण कुंवरजीभाइए सावंत जोइ अने . " योग्य सुधारो वधारो कर्यो छे. कुंवरजीभाइए करेलु सर्व मापांतर में पण मारी बुति अनुसार जोयु छ भने तेमां शावेली शंकामोना खुलासा करी धनती काळजीधी शुद्ध फयु छे. आ काळलोकमां काळ संबंधी विषय होवाधी मुख्यत्वे करीने समय, आपलिफा विगेरेयी श्रारंभीने काळचक्र अने पुद्गलपरावर्तन सुधीना काळनी अपेक्षा होवाथी ते विषय ययास्थित विस्तारथी लेवामां श्राव्यो छे. ते साथे २८ मा सर्गमा ज्योतिष संबंधी फेटलीफ स्थूल सूक्ष्म हकीकत संक्षिप्त अने विस्तारथी पण पापी छे तथा चक्रवर्तीना वार्षकि रलने प्रसंगे वास्तुशास्त्र संबंधी केटलीक हकीकत विस्तारथी पापी छे. श्री विषयो गौण छतों पण मार्गदर्शक तरीके ठीक आप्या के परंतु चंदपन्नत्ती, सूरपन्नति अने ज्योतिष्करंड प्रकीर्णक वा खास ज्योतिप संबंधी सूत्रो सुप्रसिद्ध अने सुविस्तृत मोजुद छे. तेवा ग्रंथोना भाषांतरो, लेसो..के उतारामो प्रसिद्ध करवामां आवे तो दुनियाने घणो उपकार थाय तेवू थे, या सिवाय २९ मा सर्गथी काळलोक संपूर्ण थता सुधीमां तीर्थकरो, चक्रवर्तीयो भने वासुदेवादिफनी सामान्य हकीकतो संथा तेमना नामबार विशेष चरित्रो जो के मुख्यत्वे करीने क्षेत्रलोकमां मापवा योग्य गंणाय तो पण अही क्षेत्रलोकनो घणो ज विस्तार धयेलो होवाथी ते विषयो मुख्यत्वे फाळने 'आश्रीने अहीं काळलोकमां लीपा थे, ते पण अस्थाने नथी. आ ग्रंथकाए संस्कृत तथा गुजराती भाषामां कया कया ग्रंथो रच्या छे तेनुं लीस्ट आ प्रस्तावनाने खेडे आपवामां आव्युं छे. ते उपरथी ग्रंथकारनो सत्तासमय तथा विहारस्थान विगेरेनुं अनुमान थइ शके छे. आ आया लोकप्रकाश प्रथमां जे जे हकीकत ग्रंथकारे स्वकृति तरीके लखी छे, ते सर्व अनेक शास्त्रानुसार ज लखी छे. उपरांत वधारे आश्चर्य तो ए थाय छे के-तेमणे आपेली अनेक सूत्रो, वृत्तिश्री, ग्रंथो अने प्रकरणोनी सादीयो उपरथी तेमणे केटला शाबोनो अभ्यास फर्यो हशे? केटला शात्रो तेमने कंठस्थ हशे ? केटला शास्त्रो प्रसंगे स्मृतिमा सानिध्यकारी हशे? विषयोनी प्ररूपणामां कया फया शास्त्रो फया कया स्थळे केवा केवा अभिप्रायथी जुदा पडे छे- मतांतरवाळा थाय छे १ ते घतावेल होगाथी ते संबंधी विचार करतां तेओ एक धुरंधर विद्वान् तरिके मालम पडे छे. आ हकीकत जाणवा माटे श्रा शाखा लोकप्रकाश मंथमा जे जे स्थळे जे जे ग्रंथोनी साक्षी श्रापी थे ते सर्वनुं प्रयत्नपूर्वक लीस्ट बनाव्यु के के जे पानी पाछळना भागमा प्रापयामां शाव्युं छे त्यारपछी आ काळलोक अने मावलोकनी अनुक्रमणिका पण विस्तारथी आपी छे, ते वाचतां पण आमां केटला विषयोनो समावेश कर्यो छे ते समजी शकाय तेम छे. छेवट काइ पण प्रमादादिकना कारणथी रहेली स्खलना माटे क्षमा याची तथा ते सुधारीने सूचना प्रापवानी प्रार्थना करी आ प्रस्तावक विराम पामे छे. जेठालाल हरिभाई श्री जैनधर्म प्रसारक समाना शास्त्री. . . दोष होय 11 ru १३ ग्रंथकर्तानी गुरुपरंपरा. १ श्री सुधर्मास्वामी ३१ श्री यशोदेवसूरि २ श्री जंबूस्वामी ३२ श्री प्रद्युम्नसूरि ३ श्री प्रमवस्वामी ३३ श्री मानदेवसूरि ४ श्री शय्यभवसूरि ३१ श्री विमलचंद्रसूरि ५ श्री यशोभद्रसूरि ३५ श्री उद्योतनसूरि ६ श्री संभूवविजयसूरि तथा श्रीभद्रबाहुस्वामी ३६ श्री सर्वदेवमूरि ७ श्री स्थूलभद्रसूरि ३७ श्री देवसूरि ८ श्री आर्य महागिरि अने प्रार्य सुहस्तीसूरि ३८ श्री सर्वदेवसूरि ( पीजा ) ९ आर्यसुस्थितसूरि तथा आर्यसुप्रतिबद्धसूरि ३९ श्री यशोभद्रसूरि अने श्री नेमिचंद्रसूरि १० श्री इंद्रदिन्नसूरि ४० श्री मुनिचंद्रसूरि ११ श्री दिनरि ४१ श्री अजितदेवसूरि अने श्री वादीदेवसूरि १२ श्री सिंहगिरि १२ श्री विजयसिंहसूरि १३ श्री वसस्वामीसूरि ४३ श्री सोमप्रभसूरि तथा श्री मणिरत्नसूरि १४ श्री वनसेनसूरि ४४ श्री जगचंद्रसूरि १५ श्री चंद्रसूरि ४५ श्री देवेंद्रसूरि अने श्री विजयचंद्रसूरि १६ श्री सामंतमद्रसूरि ४६ श्री विद्यानंदसूरि अने श्री धर्मघोपमूरि १७ श्री देवसूरि ४७ श्री सोमप्रभसूरि १८ श्री प्रद्योतनरि ४८ श्री विमलप्रम, परमानंद, पद्मतिलक, १९ श्री मानदेवसूरि सोमतिलकसूरि २० श्री मानतुंगसूरि ४९ श्री चंद्रशेखर, श्री जयानंद अने श्री २१ श्री धीरसूरि देवसुदंरसूरि २२ श्री जयदेवसूरि ५० श्री ज्ञानसागरसूरि, श्री कुलमंडनरि, २३ श्री देवानंदसूरि श्री गुणरत्नसूरि, श्री सोमसुंदरसूरि २४ श्री विक्रमसूरि अने श्री साधुरत्नहि २५ श्री नरसिंहसूरि ५१ श्री मुनिसुंदर, श्री जयचंद्र, श्री मुवन- २६ श्री समुद्रसूरि सुंदर, श्री जिनसुंदर अने श्री जिन- २७ श्री मानदेवस्ि कीतिसूरि २८ श्री विबुधप्रभसूरि ५२ श्री रत्नशेम्बरसूरि २९ श्री जयानंदसूरि ५३ श्री लक्ष्मीसागरसूरि ३० श्री रविप्रभसूरि ५४ श्री सुमतिसूरि + + १५ श्री हेमविमल मूरि ५९ श्री विजयसेनरि ५६ श्री श्रानंदविमलसूरि ६. श्री विजयदेवरि ५७ श्री विजयदानसूरि ६१ श्री विजयसिंहसूारे ५८ श्री हीरविजयमूरि ६२ श्री विजयप्रभसूरि या ग्रंथकर्तानी संस्कृत कृतियो. (नयर्णिका भाषांतरनी प्रस्तावना तथा जैन गुर्जर कविश्रो भाग यीजा उपरथी.) १ श्री कल्पसूत्र पर सुबोधिका टीका. संवत १६९६ जेठ शुद्ध २ गुरु. श्लोक ६००० २ लोकप्रकाश. संवत १७०८ जेठ (वैशाख ) शुद ५. जुनागढ. श्लोक १७६११ ३ हैमलघुप्रक्रिया, संवत १७१०. मूळ २५०० शोक. ४ हेमलघुप्रक्रिया व्याकरणनी स्वोपज्ञ टीका. श्लोक ३५०००. स्थळ राधनपुर. ५ नयकर्णिका. लोक २३. दिववंदर ( अनुवाद साथे) शांतसुधारसभावना. श्लोक ३५७. जेना उपर पंन्यासजी श्री गंभीरविजयजीए टीका करेली छे. गुजराती कृतिओ. ७ श्री धर्मनाथजी स्तयन-लघुउपमितिभवप्रपंच. सं. १७१६ सुरतना चोमासा वसवे ८ पाच कारण- स्तवन. सं. १७२३ ९ पुण्य प्रकाश (दश प्रकारनी अाराधना) नुं स्तवन. सं. १७२९ विजयादशमी-रांदेर. + १० श्रीपालरास ( अपूर्ण ) सं. १७३८ रांदेर चोमासु. पूर्ण करनार श्रीमद्यशोविजयजी + ११ श्री भगवतीसूत्रनी सज्ज्ञाय. सं. १७३८ रांदेर चोमासुं. + १२ पड् आवश्यकनुं स्तवन १३ जिनपूजार्नु चैत्यवंदन, + १४ श्री आदिजिन विनति. गाथा ६७ (शत्रुजय तीर्थ ) + १५ आंबिलनी सज्झाय. + १६ विनयविलास ( ३७ पदोनो संग्रह ) १७ अध्यात्मगीता. गाथा संख्या २४२. श्लोक ३३० + १८ वर्तमानजिन चोवीशी ( २४ सवनो) + १९ विहरमानजिन वीशी ( २० स्तवनो) + २० सूर्यपुर चैत्यपरिपाटी सं. १६८९ ( सुरराना मंदिरोनुं वर्णन ) २१ श्री नेमिनाथ भ्रमरगीता स्तवन. सं. १७०६ + २२ पट्टावळी सञ्झाय, सं. १७१० पछी + २३ उपधान स्तवन (उपधान वर्णन ) २४ श्री नेमिनाथ बार मास स्तवन. २५ चौदगुणस्थानगर्भित श्री महावीर स्तवन, + २६ पञ्चखाणनी सज्झाय, बे ढाळनी. x आ निशानीवाळा पुस्तको छपायेला छे, काललोकप्रकाश-सर्ग २८-उपोद्घात. "प्राचीन ज्योतिप्" " लोकप्रकाश " प्रन्धमा जे जे वस्तु संगृहीत थइ छे ते संक्षेपथी सर्ग ३७ मां जणावी छे. अहीं अमे मात्र सर्ग २८ ना केटलाक भाग पर विवेचन कयु छे. १. काललोकप्रकाशना अठ्ठावीशमा सर्गर्नु महत्त्व विविध रीते छे. ते सर्गमा पूर्वप्रणीत जैन भागमो अने ज्योतिप् विपयक मन्थोनू सरळ संस्कृत भापामा प्रन्थकर्ताए दोहन करेलुं छे. सूर्य- प्राप्ति, चंद्रप्रज्ञप्ति, जंबूद्वीपप्रज्ञप्ति तथा बीजा आगममन्थोमा ज्योतिष् विषयक हकीकतो छ तेनो विस्तार छोही अने ज्योतिष्करंडक इ० ग्रन्थोमांयी आवश्यक हकीकतो वारपीने ज्योतिप् विपयनो सुगम परिचय थाय तेवी सरळ संस्कृत श्लोकोमा रचना करी छे. इ. स. पूर्व छसोनी सदीमां श्रमण भगवान महावीरस्वामीए जे रचना प्ररूपेली छे तेने स्पष्ट करवानो उपरोक्त सर्व अन्योनो आशय छे. एटले तेने अनुसरनार फाललोकप्रकाशमा जे वस्तु संगृहीत यह छे ते हकीकत स्वाभाविकपणे जुनी तरीके मान्य करी शकाय छे. फेरफार मात्र ऋतुओना विभाग अने तेमा प्रचलित मास परत्वे के अने तेवा फेरफार प्राचीन अने अर्वाचीन जैन तेमज अनेतर प्रन्योमा पण मळी आवे छे, कारण के ऋतु अने मासना परस्परना संबंधां काळक्रमे परिवर्तन यतुं गयु छ भने ते परिवर्तन मुख्यतः दक्षिणायन, उत्तरायण तथा शरत् अने वसंत संपावनो समय एकना एक ज न रहेतां बदलातो गयो छे तेथी थयुं छे. सर्व प्रन्थकारो एकनो एक ज समय ( दक्षिणायन इ० नो ) लइ अर्वाचीन घटना साथे पूर्वनी घटनानो समन्वय जोडी, अर्वाचीन घटनानं प्राचीन वर्गीकरणानुं ज स्वरूप सहेजे प्रयत्लवान थया छे. पा कारणयी प्राचीन ज्योतिपूना शभ्यासमां ऋतु अने मास परत्वेना उल्लेसो समाळयी वांची जवां से सिवायनी ज्योतिप्नी अन्य रचना आ सर्गमा प्राप्त थाय थे. वधारे विस्तारथी समजवा माटे जुदा जुदा प्रन्योनो आधार लेयो पडे वे निर्विवाद छे. २. पा सर्गमां निर्दिष्ट प्राचीन ज्योति बीजी रीते मान्य तथा सप्रमाण सिद्ध थाय छे. इ. स. पूर्वे पोयी सदीनो " कौटिलीय अर्थशास्त्र" नामनो अन्य प्रसिद्ध ययो छे तेमां काल- मान' प्रकरण छे अने कालपरत्वे व्यवहार पूरता विविध उल्लेसो छे. ते अन्य पर पेदिक छाया छे. तेनी रचना जैन ज्योतिपनी रचना साथै मळती आये थे पटलुज नहि पण तेना अशुद्ध लागे वेषा पाठनी शुद्धि जैन ज्योति द्वारा याय छे. अर्थशास्त्रमा व्यवहार पूरतो ज्योतिप्नो निर्देश के अने तेथी ते निर्देश स्थूळ थे. एटले तेमाना (वैदिक )ज्योतिप्नी परिपूर्ति काम- लोकप्रकारा जेषा प्रन्थमां संगृहीत फरेला प्राचीन (जैन)ज्योतिप्थी यायचे. भने जैन ज्योविमा जे उल्लेस अधूरो के सेनी पूर्ति अर्थशामधी याय (नूमो पेरा ४). भर्थशासमाधी प्रस्तुत प्रकरणने उपयोगी उतारा करी मा साथे छाप्या छे एटले अठ्ठावीशमा सर्गना अभ्यासी वर्ग उपरोक्त हकीकतो समजी शकशे. बन्नेनी योजनाने मळती हकीकत महाकवि कालिदासना मेघ- दूतना लोकोमा पण छे एटले तेनो निर्देश पण अर्थशाखनी साये साथे कर्यो छे. काललोफ- प्रकाश पृष्ठ ५९-६० पर मालूम पडशे के जंबूद्वीपप्राप्तिसूत्रमा श्रीगौतमस्वामीना उत्तरमा श्रमण भगवान महावीरस्वामी वर्षनो ( तथा युगनो ) आरंम प्रावण वदि १ थी कहे छे अने ते घखते वर्षाऋतु ( प्रावृष् ) छे. अर्थशास्त्र " आपाढीपर्यवसान वर्ष " अर्थात् पापाद मासनी शुदि १५ ने दिने पूरुं यतुं वर्ष कहे थे अने श्रावणथी दक्षिणायननो श्रारंभ गणे छे. मेघदूत आषाढना छल्ला दिने वर्षाऋतुनो श्रारंभ भूफे छे अने तेनी नजीक श्रावण महिनो कहे छे अने त्यारथी प्रबोधिनी ( का० शु० ११) सुधीमां चार मास जणावे छे. पा वधामाथी एप्रतिपादन थाय छे के मास पूर्णिमान्त हता, वदि एकमयी शरु थता भने श्रावण वदि.१ थी दक्षिणायन ने वर्षाऋतु गणाती अने पांच वर्षना युगनो आरंभ भावा वर्षथी थतो. उपरोक्त सिद्ध थता ज्योतिपना हालना प्रचलित वेदांग ज्योतिपना श्लोको साथे कोइ रीते मेळ नहि खाय. प्रचलित वेदांग ज्योतिप् माघशुक्ल प्रतिपदाथी प्रारंभ करे छे एटले तेमां मूळ ज्योतिप्नो फेटलो विपर्यास समजवो ते नफी करयानुं कार्य विद्वानवर्गने शिरे रहे थे, परन्तु जे प्रमाणभूत प्राचीन ज्योतिप्, अर्थशास्त्र, जैन ज्योतिए नया मेघदूतथी स्थापित थाय छ तेनो वैदिक साहित्य तथा जनसमाजना उत्सवो समजवा माटे अत्यंत उपयोग के तेम स्वीकार पडशे अने तेम कर्याथी वैदिक साहित्य, योग्य संशोधन शम्य थशे. ३. साथे प्रापेला पत्रकमांथी वर्षरचना-नक्षत्ररचना तथा सूर्यचंद्रगति, मास इ. थशे. सेनो धहि उल्लेख नहिं करीए, परन्तु तेनुं स्वरूप स्पष्ट करवानी जरुर रहे छे. पहेली नोंध ए छे के प्राचीन ज्योतिष्मां अयनो अने संपातना बिन्दु, नक्षत्रो (ताराश्रो) परत्वे स्थायी थे-तेमां कशो फेरफार नथी समजवानो. (जुओ काल० पृष्ठ ७४, पृष्ठ ७७- ७८.) अश्विनी नक्षत्रना १३४ भागमांथी ६९ भाग पूरा थाय त्यारे वसंतसंपात हमेश माटे छे भने स्वाति नक्षत्रना ६७ भागमाथी २३ भाग पूरा थतां शरत्संपात छे. पुष्य नक्षत्रना १३४ भागना ४६ भाग पूरा थत्तां दक्षिणायन शरु याय छे अने अभिजित् नक्षनना ४२ भागना प्रारंभे उत्तरायण शर थाय छे. - स्पष्ट पीजी नोध तारात्मक नतन्त्र विभाग परत्वे करवानी थे. श्रा रचनामा २८ नक्षत्रो आव. श्यक छ भने २८ मुं नक्षत्र अभिजित् छे. तेने छोडीने २७ नक्षत्र स्वीकारी पा रचनाना सौर वर्पना ३६६ दिवसमांनी सूर्य-चन्द्रनी गतिने समजी नहि ज शकाय. त्रीजी नोंध नसतोना अने से रीते रविमार्गना भाग परखे छे. ३६० माग (बीपी) के तेवा भाग प्राचीन ज्योतिपमा नथी. प्राचीन ज्योतिपमा रविमार्गना हाल नथी. प्राचीन ज्योतिष्मा स्थूळपणे सौरवर्ष ३६६ सौरदिननुं गण्यु के अने देने अनुरूप रविमानना ३६६० भाग पाडेला छे. ( कोइक ठेकाणे अडधा भाग ले त्यां १८३० भाग भावे ने मुहूर्तना हिसावे पण वधु ले त्यां वधु श्रावे पण तेथी योजनामां फेर नथी पडतो ). एटले प्राचीन ज्योतिप्तुं स्वरूप समजवा माटे उपरनी त्रणे बीना लक्ष्यवहार रासी न शकाय. चोथी नोंधनो उल्लेख चोथा पेरेग्राफमां " मलमास " ( = क्षयमास ) परत्वे छे. प्राचीन ज्योतिपनी रचनामा एक विविधताने अवकाश के जेनो उल्लेख काललोकप्रकाशमा नयी, अने ते पत्रकमां स्पष्ट करी छे. काल० पृ० ४०-४१ पर चार जातना नक्षत्रोना भाग आप्या छे. श्रमिजित् नक्षत्रना ४२ भाग छे. पंदर जुदा जुदा नक्षत्रांना प्रत्येकना १३४ भाग छे. छ नक्षत्रोना प्रत्येकना ६७ भाग छे ज्यारे बाकीना छ नक्षत्रोना प्रत्येकना २०१ भाग छे. सरवाळो ३६६० आवे छे. हवे अभिजित्ना १२ भाग उपरांत वाकीना सतावीश नक्षत्रोना प्रत्येकना एकसरखा १३४ भाग गणतां पण तेज सरवाळो रहे. आशक्य योजनानोपण पत्रकमा उल्लेख कर्यों छे. कदाच वे योजना जैनेतर वर्गमा प्रचलित थयेली होय. उत्सवो इ० विपेना संशो- धन कार्यमा प्रा शक्यतानो अवकाश राखवो पडे. अभिजित् नक्षत्रनो भा के धीजी कोइ पण शक्यतामा त्याग नथी ते स्पष्ट छे. हालनाज्योतिप् विपयक सिद्धान्त प्रन्यो अने तेमनी मान्यताथी जुईं प्राचीन (जैन के जैनेतर-वेदांग ) ज्योतिष् छे ते वस्तु हवे स्वीकारवी पडशे अने संशो. धन कार्यमां तेनो अमल करवो पहशे. काललोकप्रकाशना था सर्गर्नु ते रीते अपूर्व महत्त्व छे. " थी जुदो एक जैन तेमज जैनेतर ( वैदिक ) मन्थोमा प्रत्येक नक्षनना अधिष्ठाता देष एक ज छे एटले जैन अंने वैदिक ज्योतिपनी प्रन्थि एक ज छे अने लगभग एक ज प्रकारना पन्ने प्राचीन ज्योतिप् छे तेवी मान्यता वधु दृढ करे छे. ४. अर्थशास्त्रमा अधिकमास मलमास ५ नो ( = क्षयमासनो) निर्देश करेल थे. जुदी जुदी नए मान्यता देना विषे छे, ते पण संदिग्ध थे, तेथी वधु विगत तेमा नथी. जैन ज्योतिष्मा तेनी कशी विगत हजी जोवामां भावी नथी. एटले तेने लगती हकीकत हाल अनुमाननो विषय बने थे. सूर्य-चन्द्रथी जनित वर्षनो सौरवर्ष साथे पांच सौर. वर्षमां (युगमा ) मेळ मेळववा माटे रीतसरना साठ पान्द्र महिना उपरांत अढी वर्षे अकेक (चांद्र) महिनो वधारे गणी पांच वर्षमा जे ये महिना वधु लेवाय छे ते "अधिकमास" थे भने " मलमास " तेथी मिन छे. गणितमा आपणे सोडें भागळ वधी गया होइए देमा पापळ हठी, साधु सौर नपत्र मळी रहे वे माटे " (पापणा गणितमा त्याग करवानो मास) अनुमानपी समजाय थे. ३६६ दिनना वर्षनो घांकडो गोळ रकम थे स्पळ लागे थे. सूक्ष्म वेधया नही यसो हो वे २६११ दिन पारेनो (कादक वधु के कमी) मलमास - लागे छे एटले यस्तुतः सूर्य ३६५ दिन लगभगमा ३६६० माग पूरा करे छे अर्यात् सूर्य रोजना दश भाग उपरांत पंइक वधु चाले छे. आतफावत चन्द्रनी विधि तथा कलामां पण श्रावे अने खास करीने पूर्णिमा पसते वेध लाइने नफी फरी शकाय; अने तेवा बेधनो एक दाखलो फाल० पृ० ५१ लो० ६३-६४ मा मळे छे जेमा मार्गशीर्ष शुदि ११ ना (पूर्णिमाना) समये चन्द्र श्राद्रा नक्षत्रमा होय तेम निर्देश छे. या निर्देशने ज्योतिप्करंडकनुं सम- र्थन नथी एटले फेटलो वास्तविक गणवो ते शंका छे परन्तु लेने वास्तविक गणी नीनी चर्चा करी छे. भा०प० एकमे प्रमाते चन्द्र अभिजित्थी प्रारंभ करे भने सूर्य पुप्यना ४७ मा भागयी आरंभ करे त्यारे पन्ने बच्चे १८३० भागनुं अंतर होय छ ( अर्थात् आपाठ शुदि पूनमे से अंतर होय छे ). ते समय पछी मार्ग० शु० १५ (प्रान्त) सुधीमां सूर्ये दोढसो तिथिमा १५०x१३१४७३३ सौरदिन कर्या होय अने प्रतिदिनना दश भागनी चाल मुजय १४७५ १६ भाग पूरा कर्या होय अर्थात् अभिजित्थी सूर्य ३३०१५३ भागना मूल नक्षत्रमा होय. चन्द्र तेथी बराबर १८३० भाग दूर एटले १४७९५६ भागमा (अभिजित्थी ) मृगशीर्षमा होय, परन्तु चन्द्र मामा के चलते छे. तेम प्रत्यक्ष दर्शन गाथा अनुसार छे* एटले हे उपरथी अनुमान थाय छे के-चंद्र थोडो वधु चालेलो होय ने तेटला समयना हीसावे (चंद्र १३४ भाग चाले त्यारे सूर्य १० भाग चाले ) सूर्य वधु चालेलो होवो जोइए अर्थात् ३६६० भाग पूरा करवा सूर्यने ३६६ दिन नहि पण श्राशरे पोणो दिन श्रोछो-आशरे ३६५। दिन समय लागवो जोइए. प्रत्येक वर्षे बरोबर पोणा दिन जेटलो फेर पडे वो ४० वर्षे त्रीश दिननो फेर पडे अने तेवो वेध होय ते मतवाला ४० वर्षे एक सूर्यनो मास गणतरीमाथी बाद करी नांखे. पाने मलमास" कहे. , " श्रा अनुमान देखाय छे तेवु सरल नथी. (जुओ फुटनोट) परन्तु जूदी जूदी पूर्णिमा ने वर्षों पाकी गणतरीथी स्थापित याय पछी ज तेनो वधु ऊहापोह करी शकाय. प्राचीन ज्योतिप्ना ३६६ दिनना स्थूल सौरवर्षमा ने पांच सौरवर्पना युगनी रचनामा "मलमास" आवश्यक छ तेटलुं विना संकोचे कही शकाय, मलमास वगर सूर्यनो नक्षत्र साथेनो अने छेवटे पूर्णिमा वखतनो अने नक्षत्रना गणितनो मेळ तूटी जाय ते थोडा काळमा ज प्रत्यक्ष थाय एटले प्राचीन ज्योतिष- ना रचनारा ३६६ दिननी योजना करी त्यांज अटकी जइ मीत भूल्या होय तेवुनथी लागतुं. परन्तु दक्षिणायनना दिने जे छाया होय तेमां अने गणितथी आवता दक्षिणायनमा दिनमा काळांतरे . * . चंद्र आदमां होय सेना भागयी बरोबर १८३. भाग सामे सूर्य ा यखते कइ रीते होय ते समजातुं नयी. एटले भा निर्देश चर्चास्पद ज क्षेत्रलोक प्रकाश ' सर्ग २० लो० १८.१ मां मार्गशीर्ष पूर्णिमा मृगशीर्पना चन्द्र वखते गणी छे. प्राकृत गाथा पर प्रन्यकर्ताए कशी नोंघ करी नवी मृगशीर्षने बदले मार्दा केम छे तेनो खुलासी नयी.

फेर केम पडे तेनो नोंघ केम नहि कर्यो होय ते समजी शकातुं नथी. छायामानमां सूर्यनी विषुववृचथी पक्षियोचर गतिनो ज संबंध रहे छे ने नक्षत्र सायेनो संबंध लुप्त थाय छे. एटले छायामान अने नपत्रमाननो समन्वय ब्यां तूटतो हशे त्यांनी नोंध करी हशे ते जाणवायूँ पापणी पासे आजे साधन नथी. छायामान तेमणे लीधेलुंचे ते अर्थशास्त्र तथा काललोक- प्रकाश परथी मालूम पडे छ; अने तेनो संबंध अयनो साथै जोडेलो छे. ५. हये था ज्योतिषनो लौकिक उत्सघ परत्वेनो संयंघ जोइए.पाजे पण प्रचलित छे तेवो एक वैदिक उत्सव सरस्वतीनुं आहान, पूजन अने विसर्जननो छे. आश्विन शुदिना दिने चन्द्र मूळ नपत्रमा होय त्यारे आहान छ ने आश्विन शुदि ९ ना दिने ( चंद्र श्रवण नक्षत्रमा आवे ) पछी तेनुं विसर्जन छे. अहिं महिनाना नाममा पाछळधी विपर्यास थयो होय तेवू नयी लागतुं. एटले युगर्नु प्रथम वर्ष ( संकेतनी रीते ) लेयानु, श्रावण वदि १ थी तिथि गणतां पाश्विन शुदि ६ तिथि पूर्ण थाय त्यारे भायणनी ३० तिथि, भाद्रपदनी ३० तिथि अने आश्विन यदि एकमयी शुदि ७ सुधी २१ वियि थाय. सरवाळे ८१ तिपिनो समय पूरो थाय पटले तेना सौरदिन ७९-३ पूरा थाय. सूर्यना प्रतिदिन दश भागनी घाल प्रमाणे पुष्यना ४७ मा भागथी ७९६-१६ माग पधु थाय अर्थात् सूर्ये ते पसते अभिजित्यी २६२६- भाग पूरा कर्या होय अर्थात सूर्य से पसते चित्रा नक्षत्रमा [ अने चित्रा (Spica) सारा पासे पायेल होय ]. चन्द्र ७९-४३ दिनमा रोजना १३४ भागनी घाल प्रमाणे ये पसत फरीने अभिजित्थी ३३५८- माग पूरा फर्या होय मर्थात् ( जैमेतर योजना मुजय ) मूल नक्षत्रमा होय. प्रण विधिमा ये रीते श्रयण नपानमा नवमीए होय. उत्सपमा चन्द्रमनन तिथि सायेनुं सूनन रविमार्गमा सूर्य, तारात्मक नसन परत्वे स्थान स्पष्ट फरवा माटे होय म अने समजाय छ फारण के युगना पीजा पर्पोमा वेना तेज चन्द्र नराम्रो तिथिए न होय ते देखीतुं ऐ. मित्रा नाना सूर्य पसते शरस्काळ होषायी सरस्वतानु पीचं ऋतु सूचक नाम तया वर्णन '(शरदि भवा-शारदा) यथार्थ याय . । शारदा ६. पाटला प्रस्तावथी प्राचीन ज्योति पर्नु विविध दिशाएयी नवी यतुं स्वरूप अने मां रही जवी उणपो पापयर्गने प्रतीत परो. नी रपनानी प्रापासप्रतीति माटे अत्रे नीपेन प्रथम परकमां नए-तेना भाग, पीजी योजना-मन देवता तथा यांना पत्रकमां मौरमाम साप नपत्र ने ऋतुमपंप मापेल पे. विगतो माटे पाळलोपप्रकारानो मग २८ डावो. यापक. याने एटलं स्पष्ट मरो के २८ नक्षत्र, रविमार्गना १६६० माग अने वर्षमा १६५ दिन (स्यूतमान), पाप पर्पनो युग भने मसमास भाटला तश्य प्रापीन पोतिएमा म होप वो देनी रचना अशक्य छे. युगनो पारंम दक्षिणायनयी , ते ज्योतिपनी रचनानु पी सत्त्व छ जेधी प्रचलित वेदांग कहेवातुं च्योविप् भिन्न थे. श्रा प्रन्य हिन्दमां सर्वत्र तथा इतरत्र सुगमताथी पंचाय से सारु भाषांतर साये देवना- गरी लिपिमा सात छपान्यो छे. पाचकवर्गने ते प्रावकारपान यशे तेम पाशा रासीए. प्रा मन्थ पाछळ विविध प्रकारे जे श्रम प्रकाशक संस्थाए, श्री. कुंवरजी आणदजीए तथा शास्त्रीजी जेठालाल हरिभाईए लीघो छे ते वाचकवर्गनी थने विद्वद्वर्गनी प्रशंसाने पार थशे तेम आशा प्रदर्शित करी पा ढूंको उपोद्घात पूरो फर्क छु. मुंपइ. ता. १७-७-३१. } हीरालाल अमृतलाल शाह. नोट-उपोद्घातना लेखक महाशये अधिकमासथी जुदो मळमास एटले क्षयमास उपरना लेखमा जणावेल के परतु कोषमा जोता अने वर्तमान ज्योतिष्ना अनुभवीओने पूछता अधिकमासने मळमास कहे छ, जयमासने कहेता नथी.

२१ पत्रक (१) जैन योजना. जैनेतर योजना, जैन अने (सभचित) जैनेतर भाग. विमार्गमा भाग रविमार्गमा भाग भाग.| अधिष्ठाता तारा, वर्ण. सरवाळो. सरवाळो देवता. क्रम. नक्षत्रो (तारात्मक) १ -- २ ७ अभिजित् ४२ ४२॥ ब्रह्मा ३ २ श्रवण |१३४ ४२- १७६ ४२- १७६१३४ | विष्णु घनिष्ठा १७६-- ३१० १७६- ३१०/१३४ वसु (अविष्ठा) शतभिपा ६७ ३१०- ३७७ ३१०-- ४४४१३१ वरुण ६ पू० भाद्रपदा १३४ ३७७- ५११४४४- ५७८१३४ अजैकपाद उ० भाद्रपदा २०१ ५११- ७१२ ९७८- ७१२/१३४ | अहिर्युन्य २ रेवती १३४ । ७१२- ८४६, ७१२- ८४६/१२४ । पूपन् अश्विनी ८४६- ९८०८४६- ९८०१३४ अश्विनी ३ (२१) ९ । भरणी ९८०-१०४७ ९८०-१११४१३४ यम ३ १० कचिका ११३४ १०४७-१९८१९११४-१२४८/१३४ अग्नि ६ (७१) ११ रोहिणी (२०१ ११८१-१३८२/१२४८-१३८२/१३४ | प्रजापति १२ | मृगशिरस् १३४ १३८२-१५१६/१३८२-१९१६/१३४ (मृगशीर्ष) १३ | भाद्री ६७१५१६-१५८३/१५१६-१६५०१३४ १ (रुधिर) १४ पुनर्वसु २०११५८३-१७८४१६५०-१७८४१३४ ४ (२) पुष्य १३४ १७८४-१९१८१७८४-१९१८१३४ | बृहस्पति ३ १६ / बश्लेषा ६७ १९१८-१९८५/१९१८-२०५२१३४ / सर्प ५ (६१७.१०.) मघा १३४ १९८५-२११९२०५२-२१८६१३४ | पिट १८ | पू०फाल्गुणी १३४ २११९-२२५३२१८६-२३२०१३४ १९३०पाल्गुणी २०१२२५३-२४५४२३२०-२४५४१३४ अर्यमा इस्त १३४ २४९४-२५८८२४५४-२५८८१३४ सवित चित्रा १९४२१८८-२७२२२५८८-२७२२,१३४ | त्वष्ट्र १ (मुका) स्वाति ६७ २०२२-२७८९२०२२-२८५६१३४ १ (प्रवाल) मोम अदिति भग २ २ वायु २१ जैनेतर क्रम. जैन योजना. जेनेतर योजना. जैन अने (संभावित) नक्षत्रो भाग. रविमार्गमा भाग रविमामा भाग भाग. अधिष्ठाता | तारा. वर्ण. (तारात्मक). सरवाळो. सरवाळो. देवता. २३ विशाखा R०१ २७८९-२९९०२८५६-२९९०/१३४ | इन्द्रामी ४ (२१) (राघा) अनुराधा १३४ २९९०-३१२४२९९०-३११४/१३४ / मित्र ज्येष्ठा ६७ ३१२४-३१९१३१२४-३२५८१३४ ३ १३४ ३१९१-३३२५/३२५८-३३९२/१३४ राक्षस (निति) २७ । पूर्वाषाढा १३४ ३३२५-३४५९/३३९२-३५२६/१३४ शाप: ४ (२१) उत्तरापाढा २०१ ३४५९-३६६०३५२६-३६६०१३४ | विश्वेदेवाः ४ (३१) पुनःर अभिजित् इ.३६६० ३६६० प्राचीन ज्योतिप्र्नु आवश्यक धोरण. (१) रविमार्ग-फुले ३६६० भाग. अभिजित् साये २८ नक्षत्रो. (२) युगना पांच सौरवर्ष, १८३० ( सौर ) दिन, १८६० तिथि, ६० सौरमास, ६२ चांद्रमास (६. चांद्रमास तथा अढीवर्षे एक अधिक चांद्रमास ), ६७ नक्षत्रमास (चन्द्रना नक्षत्रो परत्वे ). (३) सौरवर्षमा ३६६ ( सौर) दिन, रविमार्गना ३६६० भाग ३६६ दिनमा सूर्य करे. (स्थूळमान छे.) (e) चांद्रवनी ३६० तिथि, ३१४१ ( सौर ) दिन, पार चांद्रमास ( २९ सौरदिनना अथवा ३० तिथिना ). श्रीजा अने पांचमा पाद्रवर्षमा एक अधिक चांद्रमास भने तेवा वर्णानां (सौर ) दिन ३८३ अने तेर मास. (५) युगनो प्रारंभ-युगना प्रथम वर्षथी सौरवर्षनो, चांद्रवर्षनो, श्रावण वदि एकमनी प्रभाते ( आपाढ शुदि पूर्णिमा पूर्ण थाय ते समये ) सूर्य पुष्यनक्षत्रना ४६ भाग पूरा करी ४७ मा भागमा प्रवेश करे त्यारे, चंद्र उत्तराषाढा नक्षत्र पूर्ण फरी अभिजित् नक्षत्रनो प्रारंभ करे सारे, वर्षातुनो (अगर प्रावृऋतुनौ) आरंभ थाय भने दक्षिणायननो आरंभ थाय.

थाय (६) सौरदिन-३० मुहूर्तनो, ६० घडीनो, रविमार्गमा सूर्यना दश मागनो भने चन्द्रगतिना १३४ भागनो. एक सूर्योदयथी बीजा सूर्योदय पर्यन्तनो. (७) तिथि- (सौर ) दिन जेटली जेमां चंद्रगति १३१ भागनी (9xx=१३१४) जेमा सूर्यगति ९४३ भागनी थाय ( स्थूळमान छे.) एक तिथिमा चन्द्रनी एक कळानी हानि-वृद्धि थाय. (८) माग--सूर्य प्रति ( सौर ) दिन (रधिमार्गमां ) दश भाग चाले. तेज समयमां चंद्र १३४ माग चाले. (स्थूलमान छे.) (९) अयन - दक्षिणायननो प्रारंभ सूर्य पुष्यनक्षत्रना ४७ भागथी करे, उत्तरायणनो प्रारंभ सूर्य अभिजित् नक्षत्रना पहेला भागयी करे, अयन स्थायी छे. (१०) संपात-शरत्संपात मूर्य स्वाति नक्षत्रना २३ भाग पूरा करे त्यारे होय, वसन्तसंपात सूर्य अश्विनी नक्षत्रना ६९ भाग पूरा करे त्यारे होय, संपात स्थायी छे. (११) सूर्य-एक अयनथी संपात सुधीमां अने संपातथी अयन सुर्धामा रविमार्गना ९१५ माग पूरा करे, पुनरावृत्ति युगमा पांच वखत थाय. (१२) चन्द्र-एक अयनथी संपात सुधीमा अने संपातथी अयन सुर्धामा रविमार्गनी ब्रण श्रावृत्ति (१०९८० भाग) उपरांत १२८१ भाग (कुले १२२६१ भाग) आरंभे दक्षिणायन वखते अभिजित् नक्षत्रमा चन्द्रनो प्रवेश थतो होय. पछी प्रत्येक अयन अने संपात वखते चन्द्रना नक्षत्रो यदलाता होय. (१३) मलमास-(जूषो " अर्थशास्त्र ") जूदा जूदा वर्षो पछी क्षेप करवानो सौरमास ( कारण ३६६ दिन- सौरवर्ष स्थूळमान छे. सूर्य चन्द्रनी गति स्थूळ लीधी छे.) (१४) चांद्रमास-एक चांद्रमासमा, त्रीश वियिमा, चन्द्रगति ३९५५३७ मागनी थाय अने सूर्यगति २९५१: भागनी थाय. (१५) नक्षत्रमास-चंद्रनी पोतानी रविमार्गमां एक आवृत्ति २७४३ (सौर) दिनमा याय ते. करे. युगना जैन योजना. जैनेतर योजना. जैन अने (समपित) जनेतर कम. नक्षत्रो भाग. रविमार्गमां भाग रविमार्गमा भाग भाग. | अधिष्टाता | तारा. धर्ण. (तारात्मक). सरयाळो. सरवाळो. देवता. २३ | विशाखा २०१२७८९-२९९०२८५६-२९९० १३४ इन्द्रामी ४ (२१) (राधा) अनुराधा १३४ २९९०-३१२४२९९०-३११४१३४ मित्र ४ २९ । ज्येष्ठा ६७ ३१२४-३१९१३२२४-३२५८१३४ १३४ ३१९१-३३२१३२५८-३३९२/१३४ राक्षस (निवि) २७ । पूर्वापाढा १३४ ३३२५-३४५९३३९२-३५२६१३४ ४ (२१) उत्तरापाढा २०१ ३४९९-३६६०३५२६-३६६०१३४ | विश्वेदेवाः ४ (३१) पुनः अभिजित् इ.३६६० ३६६० प्राचीन ज्योतिपर्नु आवश्यक धोरण. (१) रविमार्ग--फुले ३६६० भाग, अभिजित् साथे २८ नक्षत्रो. (२) युगना पांच सारवर्ष, १८१० { सौर ) दिन, १८६० तिथि, ६० सौरमास, ६२ चांद्रमास (६. चांद्रमास तथा अढीवर्षे एक अधिक पांद्रमास ), ६७ नक्षत्रमास (चन्द्रना नक्षत्रो परत्वे ). (३) सौरवर्षमा ३६६ ( सौर ) दिन, रविमार्गना ३६६० माग ३६६ दिनमा सूर्य फरे. (स्थूळमान थे.) (e) चांद्रवर्पनी ३६० तिथि, ३१४३ ( सौर ) दिन, धार चांद्रमास ( २९३३ सौरदिनना अथवा ३० विथिना ) श्रीजा अने पांचमा चांद्रवर्षमा एक अधिक चांद्रमास अने तेवा वर्षांनी ( सौर ) दिन ३८३४ अने तेर मास. (५) युगनो पारम--युगना प्रथम वर्षथी सौरवर्षनो, चांद्रवर्षनो, श्रावण वदि एकमनी प्रमाते (आषाढ शुदि पूर्णिमा पूर्ण थाय ते समये ) सूर्य पुष्यनक्षत्रना ४६ भाग पूरा करी ४७ मा भागमा प्रवेश करे त्यारे, चंद्र उत्तराषाढा नक्षन्न पूर्ण करी अभिजित् नक्षत्रनो प्रारंभ करे त्यारे, वर्षामतुनो (अगर प्रावृट्नातुनो) भारंभ थाय भने दक्षिणायननो धारंभ थाय.

पोप हेमन्त ७ धन माघ मकर शिशिर उत्तरा यणनो श्रारंभ पूर्वापाढा .१०४ उत्तराषाढा २०१ ३०५ 1१८३० अभिजित् १२ श्रवण १३४ धनिष्ठा १२९ ३०५।२१३५ धनिष्ठा शतभिषा पूर्वा भाद्र०१३४ उ० भाद्र० ९९ ३०५२४४० उ० भाद्र०१०२ रेवती अश्विनी ३०६२७४५ फाल्गुन शिशिर मूल पापाढा १३४ उत्तरापाढा १३४ ३०५१८३० अभिजित् ४२ श्रवण धनिष्ठा ३०५/२१३५ धनिष्ठा शतभिपा १३४१ पूर्वा भाद्र०१३४ उ० भाद्र० ३२ ३०५/२४४० उ०भाद्र० १०२/ रेवती अश्विनी ३०५/२७४५ कुंभ चत्र वसन्त मीन वसन्त संपात वसन्त संपात वैशाख वसन्त मेप १० अश्विनी भरपी कृत्तिका १३४] रोहिणी ३९ ३०९३०१० अश्विनी भरणी १३४ कृत्तिका १०६ ३०५/३०५० पत्रक (२) कम सूर्य जैन योजना. सौरमास अर्थ जैनेतर योजना. शास्त्र अयन, संभावित भाग. सरयानो (३०॥ सौर अनुसार संपात सूर्य भाग. सरवाळो, 'शशि नक्षत्रो दिनना. । ऋतु. ० नक्षत्री | तारात्मक) १ पुष्य श्रावण वर्या दक्षिणा- पुष्य अश्लेषा यननो अलेपा १३४) मघा १३४| प्रारंभ मघा ८३ पूर्वा फा ३०५) ३०५ ३०५, ३०५ पूर्वा फा०११८ भाद्रपद वर्षा मधा सिंह (प्रोष्ठपद) पूर्वा फा० १३१ ३०१ ६१० उ० फा०१२० ३०५ ६१० फा० १४ पाश्विन शरत् उ० फा० १४] कन्या (भाश्वयुज) चित्रा १३४ चित्रा स्वाति स्वाति २३ ३०१) ९१५ शरत्सं. फा०१८ पात १ स्वाति कार्तिक शरत् तुला विशाखा २०१॥ अनुराधा स्वाति विशाखा १३४ अनुराया ६० ३०५/१२२० अनुराधा ज्येष्ठा ३०५/१२२० मार्गशीर्ष | हेमन्त भनुराधा ज्येष्ठा वृश्चिक मूल पूर्वापाढा ३०५/१५२१ ३०५१५२५ हेमन्त धत. wow- मकर शिशिर उत्तरा यणनो आरंभ ६ पूर्वापाढा १०४ पॉप उत्तराषाढा २०११ ३०५ १८३० अभिजित् १२ माघ श्रवण धनिष्ठा १२९/ ३०५/२१३५ धनिष्ठा फाल्गुन शवभिपा ६७ पूर्वा भाद्र०१३४ उ० भाद्र० ९९/ ३०५२४४० उ० भाद्र०१०२ चैत्र रेवती १३४| अश्विनी ३०५२७४५ मूल पूर्वापाढा १३४ उत्तरापाढा १३४ ३०५/१८३० अभिजित् ४२ श्रवण धनिष्ठा ३०१/२१३५ धनिष्ठा शतभिपा १३४| पूर्वा भाद्र०१३४| उ० भाद्र० ३२ ३०५/२४४० शिशिर कुंभ वसन्त मीन उ०भाद्र० १०२/ रेवती अश्विनी ३०५/२७४५ वसन्त सपात वसन्त संपात वैशाख वसन्त मेप ६७ १०| अश्विनी भरणी कृत्तिका रोहिणी अश्विनी ६५) भरणी कृत्तिका १०६ ३०५/३०५० १३४| ३०५३०५० ४ sa प्रीम ११ रोहिणी १६२ मृगशीर्ष १३४ গারী (ज्येष्ठा मूलीय) १२ भाद्री पापाढ प्रीम ५८ पुनर्वसु २०१६ पुष्य ३०५/३६६० कृत्तिका यूप रोहिणी १३४ मृगशीर्ष १३४ श्राद्री २०५३३५५ आदी १२५ मिथुन पुनर्वसु १३४ पुष्य ४६ ३०५/२६६० दक्षिणा पुष्य इ. यननो आरंभ ४६ पुष्य इ० श्रावण g इ ० " उतारा ( जुमो काळ लोकप्रकाश सर्ग २८ परनो उपोद्घात् ) " मेघदूत " काव्य ( कवि कालिदास,-पाठवाळी आवृत्ति ) मांधी. पापाढस्य - प्रशमदिवसे मेघमाश्लिष्टसानुम्"। आपाढ मासना छेल्ला दिवसे पर्वसना शिखरने आलिंगन करीने रहेला मेघने जोयो." ४ (पा० 'प्रथमदिवसे ' खोटो छ कारण के श्लोक ४ पथा श्लोक ११५ थी विरुद्ध छे.) श्लोक २. " ~ श्लोक ४. "प्रत्यासन्ने नभसि दीयताजीवितालम्बनार्थी "; श्रावण मास नजीक आवे सते ( वर्षा ऋतु चालु थाय तेथी विरहातुर ) प्रियाना जीवितनो उपाय करवाने इच्छतो यक्ष. "शापान्तो मे भुजगशयनावुत्थिते शाईपाणौ । समासानन्यान् गमय चतुरो लोचने मीलयित्वा" ॥ ११५ ॥ * [ पा. शेपान्मासान् ] विष्णु शेषनागना शयनथी उभा थशे त्यारे ( कार्तिक शुदि ११ ने दिने) मारा शापनो अंत यशे, माटे हवे याकीना चार मास (पापाढ शुदि पूनमथी ) लोचनो मींचीने निर्गमन कर" Un TV ( " २. " कौटिलीय अर्थशास्त्रम् " ( माइसोर युनीवर्सीटीवें. सने १९१९) मांथी. तंत्री डॉ. भार शामशास्त्री. १. कालः शीतोष्णवर्षात्मा, तस्य रात्रिरहः पक्षो मास ऋतुरयनं संवत्सरो युगमिति विशेषाः ।....हैमनं च मुष्टि पहन्तुं मार्गशीपी यात्रा यायात् । ...वासन्तिकं च मुष्टिमुपहन्तुं चैत्री यात्रा यायात् । (अधि. ९, १० १, प्र. १३५-३६) शीयाळो, उनाळो अने वर्षा ( चौमासु) श्रा काळ छे. तेना रात्रि, दिवस, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर अने युग ए सर्व विशेषो छे....हेमंत ऋतुनी मुष्टिने हणवा माटे मार्गशी- पमा स्वारी करवी....वसंत ऋतुनी मुष्टने हणवा माटे चैत्रमा स्वारी करवी. त्रिशतं चतुःपञ्चाशच्चाहोरात्राणां कर्ममंवत्सरः। तमापाढीपर्यवसानमूनं पूर्ण वा दद्यात् । करणाधिष्ठितमधिमासकं कुर्यात्" । (अधि. २, अ. ७. प्र. २५, जुओ काळलोक पृ. ६०. पृ. ३८-४०) घणसो ने चोपन दिवस-रात्रीनो एक कर्मसंवत्सर थाय छे. ते आषाढीने छेडे (अर्थात् श्रापाढ शुदि १५ ने छेडे ) पूरो थाय स्यारे अधूरो के पूरो ( पगार ) देवो. करण ( तेना गणित ) प्रमाणे अधिक मास गणीने वर्त. ३. "राजवर्षे माप्त: पक्षो दिवसश्च च्युष्ट, वर्षाहेमन्तग्रीष्माण वृत्तीयसप्तमा दिवसोना: पक्षा शेषाः पूर्णाः पृथगधिमासक इति कालः । (अधि. २, अ. ६. प्र. २४.) [ जुओ काळ० पृ. १०२-१०३ ] " राजवर्ष ( राजाए मान्य करेलुं वर्ष ), मास, पत अने दिवस ए सर्व व्युष्ट ( जुदा जुदा ?) छे. वर्षी, हेमन्त अने प्राप्मना वीजा अने सातमा पक्षामा एक एक दिवस श्रोछो (गणाय) छ भने बाकीना पक्षोमा पूर्ण दिवसो छे, अधिक मास जुदो गणवो. इति काळ," [अर्थात् भाद्रपद, कार्तिक, पोप, फाल्गुण, वैशाख अने आषाढ मासना वदि पक्षमा एक दिन पोलो गणतां धर्पना ३६० ( पक्षनो मास, ३० दिननो प्रकर्ममास ने धार मासना ३६०) दिन धाय तेमांथी छ दिन थोछा गएाय पटले चांद्र वर्पना ३५४ दिन साये मळी रहे.] ४. 'अधि' २ अध्याय २०, प्रक० ३८ देशकालमानम्"। "मानाध्यक्षो देशकालमानं विद्यात् " मानाध्यक्षे देश आने काळनुं मान जाणवू जोइए. अष्टौ परमाणयो स्थचक्रविप्र पाठ परमाणुए एक रथचकनी रज थाय छे. वा अष्टौ लिक्षा पाठ रज. एक लिक्षा याय छे. यूकामध्यः आठ लीसनो एक यूकामध्य ( मामान्य यूका ) याय के. . ता अष्टो २८ ते अष्टौ यवमध्या आठ यूकामध्यनो एक यवमध्य ( सामान्य यष ) थाय छे. अष्टौ यवमध्या बगुलं, मध्यमस्य पुरुषस्य मध्यमाया अगुल्या मध्यप्रको वाऽगुलम् । पाठ यव (मध्य) मळीने एक अंगुल थाय छे अथवा तो मध्यम पुरुपनी मध्यम प्रांगळीनो मध्यप्रकर्ष जेदलो अंगुल कवाय छे. चतुरदगुलो धनुग्रहः । चार अंगुलनो एक धनुर्मह धाय छे. अष्टाद्गुला धनुर्मुदिः । अाठ आंगळनी एक धनुर्मुष्टि थाय छे. द्वादशाङ्गुलो वितस्तिः छायापौरुषं च । घार प्रांगळनी एक वितस्ति (वेत) तथा छायापौरुष (छाया माटे, पुरुषमाप) पण थाय छे. चतुर्दशाङ्गुलं शमः शला परिरयः पदं च । चौद प्रांगळनो एक शम, शल, परिरय अथवा पद थाय छै. द्विवितस्तिररनिः प्राजापत्यो हस्तः । बे वितस्तिनी एक अरनि एटले प्राजापत्य हस्त ( हाथ ) थाय छे. सधनुग्रहः पौतवविवीतमानम् । धनुर्ग्रह सहित हस्त ( २८ आंगळनो ) ते पौतव ( तुलानी लाकडी ) विवीत ( गौचर) मानमां वपराय छे. सधनुर्मुष्टिः किष्ाः कंमो वा । धनुर्मुष्टि सहित हाथ ( ३२ आंगळनो ) ते किष्कु अथवा कंस कहेवाय छे. द्विचत्वारियादहुलस्तक्ष्णः काकचिककि स्कन्धावारदुर्गराजपरिग्रहमानम् । बेताळीश आंगळनो एक सुतारनी करवत जेवडो किष्कु थाय छे. स्कंधावार (सैन्यनी छावणी ), 'दुर्ग (किल्लो) अने राजमहेलना मान माटे पण भा छे. चतुःपञ्चाशदद्भुल: कुप्यवनहस्तः । चोपन अंगुलनो एक वनहस्त लाकडाना जंगल माटे वपराय छे. चतुरशीत्यङ्गुलो व्यामो रज्जुमानं खातपौरुषं च । चोराशी अंगुलनो एक व्याम (वाम), दोरडाना मान अथवा खोदकामना मानमा पुरुपनी उंचाइ गणाय छे चतुररलिदण्डो धनुर्नाळिकापौरुपं च । चार अरनिनो (९६ आंगळनो) एक दंड, धनुप् अथवा नाळिका माननो पौरुष थाय. गाईपत्यमष्टशताङ्गुलं धनुः पथिप्राकारमानं पौरुषं च अनिचित्यानाम् ।

१०८ आंगळनो गृहपति ( अर्थात् सुतारनो ) धनु छे. तेनो उपयोग सडक तथा किल्लानी रांगना मापमां वपराय तथा यज्ञ संबंधी कार्यमा पुरुपमान गणाय. पदकंसो दण्डो ब्रह्मदेयातिथ्यमानम् । छ कंसनो ( १९२ अंगुलनो ) एक दंड थाय छे ते (ऋत्विक आदि ) ब्राह्मणोने देवानी वस्तु माटे तथा श्चतिथिने देवानी वस्तु माटे गणाय, दशदण्डो रज्जुः। दश दंडनो एक रज्जु (९६० आंगळनो) थाय-(दण्ड-४ अरनीनो-९६ आंगळनो) द्विरज्जुकः परिदेशः वे रज्जुनो एक परिदेश थाय, ( १९२० आंगळनो ) त्रिरज्जुकं निवर्तनम् । त्रण रज्जुनु एक निवर्तन थाय ( २८८० आंगळनो '. एकतो द्विदण्डाधिको बाहुः । एक बाजु (चार बाजुमांनी एक बाजु) एनिवर्तन (३०दण्ड) तथा बे दण्ड वधु थइने बाहु गणाय, धनुस्महस्रं गोरुतम् । ( पाठान्तर-द्विधनु० ) हजार धनुप(दण्ड) नो एक गोरुत (गाउ) थाय. (टीकाकार पण बे हजार धनुष्यनो गाउ कहेछे.) चतुर्गोरुतं योजनम् । चार गोरुव ( गाउ ) नुं एक योजन थाय. इति देशमानं व्याख्यातम् । आ प्रमाणे देशनुं मान कह्यु. कालमानमत ऊर्धम् । हवे पछी काळजें मान कहे छः- अटो लवो निमेष काठा कला नालिका मुहूर्तः पूर्वापरमागौ दिवसो रात्रिः पक्षो मासो ऋतुरयनं संवत्सरो युगमिति काला त्रुटि, लव, निमेप, काष्ठा, कला, नाळिका, मुहूर्त, पूर्वाड, अपराल, दिवस, रात्रि, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर अने युग श्रा सर्व विभाग काळना छे ते श्रा प्रमाणे- द्वौ बुटो लरः । थे त्रुटिनो एक लव कहेवाय. द्वी लवी निमेषः । ये लवनो एक निमेप. पञ्च निमेषाः काष्ठा । पांच निमेपनी एक काष्ठा. त्रिंशत्काष्ठाः कला । त्रीश काष्ठानी एक कळा. चत्वारिंशत्कला नाडिका | चाळीश कळानी एक नानिका. सुवर्णमापकायस्वारश्वतुरझुलायामाः कुम्माच्छिद्रमाढकमम्मसो वा नालिका । अथवा चार मासा सुवर्णनी चार पांगळ लांबी (शलाका जेदला छिद्रमा समाय तेटलु)* * काललेक पृ. ३३ ओ. ५२-५॥ यद्वा चतुःस्वर्णमाप...तौल्यमेयप्रमाणत: १.० पल प्रमाण त पृ. ३६ उपर देल ऐ ते योग्य लगे छे. ज्योतिष्परंडक पण तेम ज कहे . । “ " ये - ३० . . घडामा छिद्र होय तेमाथी श्रादक माप जेटलुं पाणी जाय ते ममय नालिका. ( श्रादक माप अर्थशाखना श्रागळना प्रकरणमा छे.) द्विनाळिका मुहूर्तः। ये नाळिकानो एक मुहूर्त. पञ्चदशमुहूर्तो दिवसो रात्रिश्च चैत्रे मास्याश्वयुजे च मासि भवतः । पंदर मुहूर्त्तनो एक दिवम थाय छे. तेटली ज एक रात्रि थाय छे. श्रावो दिवस अने रात्रि चैत्र मासमां अने आश्विन मासमां होय छे. ततः परं त्रिभिर्मुहून्यतरष्यण्मामं वर्धते हासते चेति । त्यारपछी छ मास सुधी दिवस के रात्रि ये मांथी एक व्रण मुहूर्त वधे छे अने घटे छे. छायायामष्टपौरुष्यामष्टादशभागश्छेदः, पपौरुष्या चतुर्दशमागा, चतुप्पौरुष्यामष्ट- मागा, द्विपौरुष्या पड्भागः. पौरुध्यां चतुर्भागः, अष्टाङ्गुलायां त्रयोदश भागाः, अच्छायो मध्याह इति । पाठ पौरुषप्रमाण (आठ वेत प्रमाण-९६ अंगुल प्रमाण ) छाया होय त्यारे अढारमा भागनो छेद जाणवो ( एटले के अढारमा भाग जेटलो दिवस चड्यो छे अर्थात् त्रीश नालिकानो १८ मा भागनो दिन थयो छ एम जाणवू. ) ए ज रीते छ पौरुप प्रमाण (७२ अंगुल ) छाया होय त्यारे चौदमा भागनो छेद जाणवो. चार पौरुप प्रमाण (४८ अंगुल ) छाया होय त्यारे आठमा भागनो छेद जाणवो. घे पौरुप प्रमाण (२४ अंगुल ) छाया होय त्यारे छठा भागनो छेद जाणवो. एक पौरुप प्रमाण ( १२ अंगुल ) छाया होय सारे दिवसना चोथा भागनो छेद जाणवो. आठ अंगुल प्रमाण छाया होय त्यारे दिवसना दश भाग गणतां त्रण भागनो छेद जाणवो. चार अंगुल प्रमाण छाया होय त्यारे दिनना पाठ भाग गणतां त्रण भागनो छेद जाणवो भने बिलकुल छाया न होय त्यारे बरोबर मध्याह्न थयो छे एम जाणवू. परावृत्ते दिवसे शेपमेवं विद्यात् । दिवसना मध्याह्न पछीना भागमा उपर कह्या प्रमाणे छाया होय त्यारे तेटलो दिवस शेष रह्यो छे एम जाणवू. आपाढे मासि नष्टच्छायो मध्याह्रो भवति । अपाड मासमां मध्याह्न समये बिलकुल छाया होती नथी. अतः परं श्रावणादीनां पण्मासान द्वयॉलोत्तरा माघादीनां व्यङ्गुलाबरा छाया इति । त्यारपछी श्रावणादिक छ मासमां बबे अंगुल प्रमाण छाया उत्तर दिशा तरफ पधती होय छे. अने माघादिक मासमां बबे अंगुल प्रमाण छाया दक्षिण दिशा तरफ होय छे.

, . ( उत्तर दिशा तरफ छाया होय त्यारे सूर्य दक्षिणायन होय छे अने दक्षिण तरफ छाया होय त्यारे सूर्य उत्तरायण क्हेवाय छे.) पञ्चदशाहोरात्राः पक्षः । पंदर दिवस अने रात्रिनो एक पक्ष ( पखवाडीयु) थाय छे. सोमाप्यायनः शुक्ल । सोमावच्छेदनो बहुलः । जेमां चंद्र वृद्धि पामतो होय ते शुक्लपक्ष, जेमां चंद्र क्षीण यतो होय ते बहुल (कृष्ण) पक्ष कहेवाय थे. द्विपक्षो मासः । त्रिंशदहोरात्रः प्रकर्ममासः । सार्धः सौरः । अर्धन्यूनश्चान्द्रमासः । सप्तविंशतिनक्षत्रमासः । द्वात्रिंशत् मलमासः । बे पक्षनो एक मास, त्रीश दिवस-रात्रिनो एक प्रकर्ममास, साडीत्रीश दिवसरात्रिनो एक सौर (सूर्य) मास, साडीओगणनीश दिवस-रात्रिनो एक चान्द्रमास, सत्तावाश दिवस-रात्रिनो एक नक्षत्रमास, बत्रीश दिवस-रात्रिनो (1) एक मलमास छे. ( 'वत्रीशमा वर्षे मलमास आवे' ते पधारे युक्त लागे छे.) पञ्चत्रिंशदश्ववाहाया: । चत्वारिंशद्धस्तिवाहायाः | पत्रिीश दिवसरात्रिनो एक अश्ववाह मास थाय के एटले के अश्व संबंधी नोकरी करनारने पांत्रीश दिवसनो मास गणीने ते प्रमाणे पगार अपाय छे. चाळीश दिवसरात्रिनो एक हस्तिवाह मास थाय छे एटले के हाथी संबंधी नोकरी करनारने चाळीश दिवसनो मास गणीने ते प्रमाणे पगार अपाय छे. द्वो मासातुः । श्रावणः प्रोष्ठपदश्च वर्षाः । पाश्वयुजः कार्तिकश्च शरद् । मार्गशीर्षः पौपच हेमन्तः । माधः फाल्गुनश्च शिशिरः । चैत्रो वैशाखश्च वसन्तः । ज्येष्ठामूलीय भाषाढश्व ग्रीष्मः । बे मासनी एक ऋतु थाय छे. तेमां श्रावण अने भाद्रपद ए ये मासनी वर्षाऋतु थे, आश्विन अने कार्तिक मासनी शरदऋतु छे, मार्गशीर्ष अने पोप मासनी हेमन्त ऋतु हे, माघ भने फाल्गुन मासनी शिशिरऋतु छे, चैत्र अने वैशाख मासनी वसंतऋतु छ भने ज्येष्ठ तथा अपाढ मासनी ग्रीष्मऋतु के. .. १ जुमो विवेचन-सर्ग २८ उपरना उपोद्घातमा पेरा ४. २ मधि, २, ६, प्र० २४ मा वर्षा, हेमन्त, ग्रीष्म एम वर्षना प्रण माग पाया है एटले वर्षाना चार भासमा उपरोफ वर्षा ने शरद् ऋतु भावी जती हरी ! हेमन्तमा हेमन्त ने शिशिर ऋतु आदी जती हशे वसन्त अने प्रीप्म ऋतु प्रीष्ममा अन्तर्गत पती हशे ? जो तेम होय तो जैन अन्योमा वर्षा शरदने बदले प्राट् ने वर्षा छे ते परोवर छे.

પર शिशिरायुत्तरायण । वर्षादि दक्षिणायनम् । द्वययनः संवत्मस । पञ्चसंवत्सरो युगमिति । शिशिरादि (शिशिर, वसंत अने प्रीष्म ए प्रण) ऋतु उत्तरायण थे अने वर्षादि (वर्षा, शरद् अने हेमन्त एवण , मातु दक्षिणायन थे. आ ये अयन मळीने एक संवत्मर ( वर्ष) थाय छे. पांच संवत्सर मळीने एक युग थाय छे. दिवसस्य हरत्यर्कः पष्टिभागमृतौ ततः। करोत्येकमहरछेदं तथैवेक च चन्द्रमाः ॥१॥ एवमर्धतृतीयानामद्वानामधिमासकम् । ग्रीष्मे जनयत: पूर्व पञ्चाद्वान्ते च पथिमम् ॥ २॥ ३ " शिशिराधुत्तरायणम् शिशिर भने वर्षा बगेरे ऋतुने अयन साथे जोडवायी ऋतुश्रोनो संबंध सूर्यनी विषुव परत्वेनी दक्षिणोत्तर गति साथै जोचाय के हाल दक्षिणायन जूननी २१ मीए थाय छे प्रने ते घसते सामान्यतः वर्षानो खरो समय समस्त देशपरत्वे थाय छे ४ । तथैवेक च चन्द्रमाः" २५॥ दिननो चान्द्रमास ते स्थूल मान लागे छ. ६२ चांदमासना १८२९ दिन एक युगमा पाय, वस्तुतः १८३० दिन ओइए एटले अहि स्थूळ मान गण ? काललोकप्रकाशमा मान २९४३ दिन छ नक्षत्रमास २७ दिननो गभ्यो छे ते पण स्थूळमान लागे छ. लोक २५४१ दिननो नामास गणे के जो २७ दिनमा चन्दनी भावृत्ति पूरी थाय तो पछीना २॥ दिननी चन्द्रनी चालना भाग १३४ लेखे ३३५ भाग याय अने तेटला भाग सूर्यना २९॥ दिननी गतिना गणाय. (कारण के एक समास सूर्यचन्द्रे साये प्रस्थान कर्यु होय ते बीजी अमासे पुनः भेगा थाय) जो आ ज गति सूर्यनी यारतविक थाय तो सूर्यनी- रविमार्गनी प्राप्ति ३१०/३१९ दिनमा थह जाय जे खोटुं छे सूर्यनी आवृत्ति ३६५/३६६ दिन श्राशरेनी छ अर्थात् अर्थशास्त्रमा आपेला मानमा अपूर्णांक छोडी दीधेला छे एटले स्थूलमान जेवा ज गणाय. रचना काललोकप्रकाशने मळ्ती छे एटले काल्लोक्प्रकाशनी रचनाना मान स्वीकारवामा काइ वाधो नयी लागतो. शुओ पधु चर्चा मलमास ५ मा श्लोक अशुद्ध छे. अधि. २, ५०५, प्र० २५ मा " आपाढी पर्यवमान वर्ष गण्यु छ अर्थात् आषाढ शुदि पूनमे वर्षनो अन्त एटले थावण वदि प्रतिपदायी नवा वर्षनो भारंभ छे सारथी अढी वर्षे पौष मास अधिक याय जे शीतकाल गणाय श्र• ९ अ. १ प्र० १३५/१३६ मा काल. शीतोष्ण वर्षात्मा " गणाब्यो छ ते जोता लोकमा ग्रीष्मे " शब्दने बदले पाठ योग्य गाय अने तेनो संबंध पूर्व ' शब्द साये वेसे जो पाठ रहे तो पछी पाछळनो अधिक मास (बीजो भाषाढ ) प्रीष्ममा श्रावे त्या पूर्व ' पाठने बदले । पाठ जोइए जो युगमो प्रारंभ माघ मासथी उत्तरायणथी होय तो ज अर्यशास्त्र नो भोक यथार्थ गणाय, परन्तु अर्थशास्त्रना अन्य उल्लेखोयो माघ मासथी वर्षनो प्रारंभ समजातो नथी काललोक० पृ. ४७ श्लो ६४/६५ स्पष्टपणे कहे छ के- * मासोऽधिकोऽयं स्यात्रिंश-सूर्यमासव्यतिक्रमे || ६४ ॥ युगस्य मध्ये पोपोऽय-गन्ते त्वाषाढ एव च । एटले अर्थशाननो अशूट लोक काललोकप्रकाशना छोक अनुसार शूद वाचवो जोइए. L उपर. " " शीते " . . ग्रीमे ३ अधिकमासन निरूपण करे छे—सूर्य एक दिवसना साठमा भागने एटले एक घडीने हरे छे. एटले वृद्धि करे छे। तेथी एफ ऋतुमा एटले बे मासमा थइने एक दिवसनी ( रात्रि- दिवसनी) पृद्धि करे छे, तेथी छ ऋतुमा थइने पटले एक वर्षे ६ दिवस वधवाथी अढी वर्षे १५ दिवस वधे छे. ते ज प्रभाणे, चंद्रमा एक दिवसे साठमा भागनो एटले एक घडीनो छेद करे छे तेथी एक ऋतुमा एटले बे मासमा थइने एक दिवसनी हानि थाय छे. ते रीते गणतां छ ऋतु एटले एक वर्षमा ६ दिवस घटवार्थी अढी वर्षे १५ दिवस घटे छे. आ रीते अढी वर्षे सूर्य-चद्र बन्ने मळीने मीमऋतुमा पहेला अधिक मासने उत्पन्न करे छे अने पांच वर्पने छेले हेमंतचतुमा बीजा अधिक मासने उत्पन्न करे छे. (आ रीते एक युगमा थे अधिक मास भावे छे.) १२. "इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे देशकालमानं विंशोऽध्यायः॥ श्रादित एकचत्वारिंशः"। अध्यक्षप्रचार नामना बीजा अधिकरणमा : देशकालमान' नामनो वीशमो अध्याय समाप्त थयो. पहलेथी ११ मो अध्याय सपूर्ण." । 2 “ " पृ० २८९ " " वेदांगज्योतिष [ यजुर्वेदाग जुभो " पुरातत्त्व ", वर्ष १, अंक ३, पृ० २८९....३२३ ] । " पञ्चसंवत्सरमय-युगाध्यक्ष प्रजापतिम् । दिनवयनमासाङ्गं, प्रणम्य शिरसा शुचिः " दिवस, प्रातु, अयन अने मासरूपी अंगवाळा अने पाचवर्षमय युगना अध्यक्ष एवा प्रजापतिने मस्तकवडे प्रणाम करीने पवित्र थयेलो हुं" (१). " चेदा हि यज्ञार्थममिप्रवृत्ताः कालानुपूर्ध्या विहिताश्य यज्ञाः । तस्मादिदं कालविज्ञानशास्त्रं यो ज्योतिष वेद स वेद यज्ञम् " ॥ ३ ॥ "वेदो यज्ञने माटे प्रवर्तेला छे, अने यज्ञो काळनी आनुपूर्वीए कहेला छे तेथी पा काळविज्ञानना साखरूप ज्योतिपने जे पुरुष जाणे थे, ते पुरुष यज्ञने जाणे छे माघशुक्लप्रपन्नस्य पोपकृष्णसमापिनः । युगस्य पञ्चवर्षस्य कालज्ञानं प्रचवते ॥ ५ ॥ स्वराक्रमेते सोमाौं यदा साकं सवासवौ । स्याचदादि युग माघस्तपः शुक्लोऽयनं गुदर ॥ ६ ॥ ३. " पू० २९० 1- प्रपोते अविष्ठादौ पूर्याचन्द्रमसावुदक् । साधैि दक्षिणार्कस्तु माघश्रावणयोः सदा ॥ ७ ॥ धर्मवृद्धिरपा प्रस्थः पाहास उदग्गती। दक्षिणे तो विपर्यासः पाहूय॑यनेन तु" ॥८॥ "माघ शुक्लथी शरु थनार अने पोप कृष्णमां समाप्त थनार पांच वर्षना युगनू काळझान कहेवाय थे. (५). ज्यारे धनिष्ठा नक्षत्र सहित सूर्य अने चन्द्र एकी साथे आकाशने ओळगे छे, त्यारे युगनी शरुआत थाय छे. ते वखते माघ मास शुक्लपक्ष भने उत्तरायण होय छे. ( ६ ). धनिष्ठानी आदिमा माघ मासमां सूर्य अने चंद्र सदाकाळ उत्तरायणने पामे, के अने श्रावण मासमा अश्लेषा अर्ध जाय त्यारे सदाकाळ दक्षिणाय ने पामे छे. (७). उत्तरायणमा जळना एक प्रस्थप्रमाण दिषसनी वृद्धि अने तेटली ज रात्रिनी हानि होय छे. अने दक्षिणायनमा तेनाथी विपरीत' (एफ प्रस्थ जळ जेटली रात्रिनी वृद्धि अने दिवसनी हानि ) होय छे. एक अयनमा छ मुहर्जनी वृद्धि हानि थाय छे. (८). [नोंध-'अर्थशास्त्र' ना अधि, २, ५० ७, प्र. २५ मां पापाढी पर्यवसान वर्ष अर्थात् अषाढ शुदि पुनमे पूरुं यतुं वर्ष फयु छ तेनी साथ आ रचना मळती नथी. ] "त्रिशत्यहाँ सपष्टिरन्दे पर चर्ववोऽयने । मासा द्वादश सूर्याः स्युरेतत्पञ्चगुणं पुगम् ॥ २८ ॥ एक वर्षमा त्रण सो ने छासठ दिवस, छ ऋतु, बे अयन भने पार सूर्यमास होय के तेनाथी पांच गणो युग होय छे." (२८). . पृ७३२३ शुद्धिपत्र सर्ग २८ मा. पार्नु. लीटी भाषान्तर ७ ५ (मूळ) १२ भशुद्ध. कामुक कामी सूर्यनो पार सूर्यनो संचार सप्तविंशत्या अष्टाविंशत्या सवावीश अठ्ठावीश ज्येष्ठा धनिष्ठा वरात्र वर्षाचतु पूर्णिमा (अथवा धमावास्या)नो. पूर्णिमानो १० २५ (खान) ५-६ प्रस्तावना. "वसन्तसंपात" एक ज वखत यांच. अपाय थे. अपाय छे. [पांत्रीशमा वर्षे अश्ववा- हना मत प्रमाणे अने पालीशमा वर्षे इस्तिवाहना मत प्रमाणे मल- मास पाये. हे भर्य वधारे युक भने प्रकरणमा संगठ लागे .] देशी ५६ श्री लोकप्रकाश-आखा ग्रंथमा आपेल सहादतोतुं लीस्ट. प्रयम ४५ आगमो संबंधी आगमना क्रमवार आपल छे ते पछी प्रथो विगेरे संबंधी अक्षरानुक्रमे आपेल छे. आमां जे अंक नीचे एक ने ये करेला छे ते दे+ला, पु. फंस तरफथी छापेली प्रतना पृष्ठांक समजवा, अने जे एकला अंको छे ते अमारा छपावेला फाळलोकप्रकाश सार्थना पृष्ठाक समजवा. सूत्रो-१-२ श्रीयाचारांगसून अने वृत्ति-१९-३९-३९ ३६ ३६ ३७१ ४९ ५२ . है. - - १ १ ८१ ८४ ८ ९. १९५-२३८-४३२ (१५) ३ श्रीलोकसार अध्ययन निर्मुक्ति पृषि-१५१ (१) ४ श्री प्राचारांग नियुक्ति-१३४ (१) ५-६ श्री सूत्रकृतागसूत्र थने पत्ति-८६.१०० १०४ ७-श्रीस्वकृतांग पूर्णि--२१ (१) ८-९ श्री स्थानांगसूत्र अने वृत्ति- ९१० ३५ ४२ ४९] १३३ १४० १५२ १५४ २ १ २ २ २ २ १५४ १८५ २०७ २७२ २७६ २७६ २९२ २९४ २९४ २९५ २९८ ३५३ २ १ १ २ १ २ १ १४० १४१ १५२१६४ २०७ २१३ २७६ २९३ २ २ २ २ २९३ २९५ २९५ २९७ ३०० ३२६ ३३१ ३३२ ३४२ ३६३ २ २ २०१-२५३- १ २ २ ३०१-३६५-३९४-४१३-४४०-४४०-६२५-६३२-६३९-६४०-६४८. (५६) २०८ १०-११ श्री समवायांग सूत्र ने वृत्ति-१४४ १६९ १७० १७८ २ २ २ २१० २२४ २४५ २८३ २९४ ३३२ ३६६ २ २१४-२६२-४८-४९१ २ २ २ ५००-११८-९१९-५२३-१६६-६४१-६४३-६४४-६४४-६४८ (२७) २१॥ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ ? V २ १ १ २ १ - २ १ २७ १ - -१३ श्री भगवतीस्त्र भने वृत्ति- १० १० ११ ११ २१ २६ ३३ ३५ ४८ २ ७० ७७ ७७ ८४ ८६ ८९ ९१ ९२ ९३ ९३ २ २ २ २ २ १ २ १०२ १०५ १०६ १.६ ११६ १११ ११९ १२६ १२६, १२० १२८ २ २ २ १२९ १३६ १३२ १३३ १३४ १३५ १३५ १३८ १४४,१४७ १९२ २ २ २ २ २ १९५ ११५ ११६ २२६ २३, २४३ २४३ २४३ २४५ २४९ २१८ २ २ २७६ २८७ २९९ २९९ ३१२ ३१६ ३२३ १२४ ३२७ ३२५ १२८ २ १ २ २।२-२२ १ ३३० ३३० ३३१ ३३१ ५३१ ३३२ ३३२ ३३२ ३३३ ३३३ १३५ २ २ २ २ २ १ २ ३३५ ३३५ ३३६ ३३६ ३३६ ३३७ ३३७ ३४० ३४३ ३१३ १४१ २ २ २ २ ८१ २ २ २१४ १५० ३९१ ३९३ ३५६ ३५७ ३६७ ३६७३६८ २ ६१-१३- १४५-१६८-२६७-६३२-८४-१४६-६०७-६१६-६७३-६७९-६०६- ६७७-६७९ (११३) १४-१५-श्री शाताधर्मकथा सूत्र अने वृत्ति-३९० ३४२ १९१-१९३-२२४- २२६-४०२-४०७-४९७-५०० (१०) १६ ज्ञानसागरपरिकृत पष्ठांग भवचूरि-२२४ (१) १७ श्री अंतगडदशांग पत्र-४०२-६४२ (२) १८ श्री प्रश्नण्याकरण पत्र-चि-१९०-४०१-४०१-४०२-४०७ (५) १९ श्री विपाकसुर-२७९ (१) २०-२१ श्री औषपातिकसूत्र भने वृचि- १४ १५ १७ ५. १७८ ३२१ ३२३ २ २ २ २२-२३ श्री राजप्रश्नीय सूत्र भने वृषि- ३९ ६७ २८६ ३१६३१९ १२२ ६१- E २ १ १ -- १ - २ २ २ - २४-२५ श्री जीवामिगमत्र भने वृत्ति- १८ २१ २४ २९ ३३ ५९ ८८ ८८ १ १ १ -- -- - - १ १ १ ८९ १३२ १४२ १४९ १५० १५३ १६३ १६४.१६४ १६९ १७० २ २ २ १ २ २ १ १७२ १७२ १७२ १८७ २०३ २०३ २०४ २०५१ ३५३ २५७ २५७ २ २ २ १ २ २१८ २१८ २६१ २६४ २७६ २७७ २८२ २८७१२८८ २८८ २८८ २ २ १' २ २ २९१ २९३ २९४ २९४ २९९ २९५ २९६ ३०२ ३०६३०६ ३०० १ २ २ २ २ २ ३०८ ३०९ ३१४, ३१९ ३४९ ३६३ ३६४ ३६७ १९४-६७२-१६८(६१) १ २ १ . २९९ ३०७ २६ श्री जीवाभिगमचूर्णि- (२) 1 १ . २ । १ - ६ - a १ . १ १ S NM १ २७-२८ श्री प्रज्ञापनासूत्र भने वृत्ति- २ .१ १२ २ ३५.२६ २७ ४१४१ ४२ ६२ ६२ ७७ ७८ ८१ २ २ २ २ २ ८७ ९० ९० ९९ ११३ ११३ १२३ १२६ १३१ ११ १४ १९२० २ २ १ २ २ २ २ २४ ३० ३० ३४ ३४ ४२ ८०८६८८८९ ९५१०० १०५ २ २ २ २ ११४ ११४ १४१ १४२ ११४ ३०२ ३०६ ३२३३२४ ३६९ ३६१ ८२ ३६६ ३६५ ८४-६८-६९१ (६५) २ २९ श्री प्रज्ञापना विशेषपदवृत्ति---१७० (१) ३० श्री जंबूद्वीपप्रज्ञप्ति मूळ- १६६ १७९ १८१ १८३ १८३ १८४ -१८४ १८५ २ २ १ १८७ १८ १८८ १९८ २०२ २०३.२०४ २०४.२०५ २०५ २.६ २ १ २ २०८२१० २१२ २१३ २१३:२१४ २१५ २१९ २२०, २२० २२४ २ २ २ २२७ २३३ २४१ २४६ २८३ २८७ २९७ ३०५ ३०५ ३१.६ ३१४ २ १ १ २ (४१) २ " १ १ १ १ १ - १ २ १ . १ (१):-- १ १ २ १ १ २ १ ३१ श्री जंबूद्वीपप्राप्तिचूर्णि- ३४९-३५० (२) ३२ श्री जंयूद्वीपप्रज्ञप्ति प्रतिक सूचि (पाहीटीका)- ३९ ३३ श्री जंयूद्वीपप्रज्ञप्ति पृत्ति शांतिचंद्रगणिकत- ४। ४ १६८ १८५ १९९ १ १ २०३ २०३ २०३ २०६ २१४ २१६ २१९ २३३ २३६ २४६ २४१ २ १ २ २४० २४४ २४६ २८५ ३०० ३.१ ३०२ ३०७ २६-४८-५२-६२ २ १४५-११५-१६२-१६८-१६९-१७०-१७३-१७६-३२०-२२१-३३२ ३४९-३६२-३६५-६१०-६१७-६२०-६२४-६४७-६०-६२-~-८५- १४३-१४५-१४८-१६३-१७७-२१९-३४८-३६०-३६६-१८७-३९६ ३९८-९२४-६१६-६१७-६१७-६१९-६४८ (६८) ३. श्री सूर्यप्राप्ति सूत्र अने पृत्ति- २६३ २६३ २६३ २८८ ५३-९४-(६) ३५ श्री चन्द्रप्रचप्ति पत्र- २४१ २८७ २८ २८८ (४) २ २ ३६ श्री दीपसागरप्रज्ञप्ति संग्रहणी-२०६ २९२ २९९ (1) १ २७ श्री उपराध्ययन पत्र- १४.३० २०९ २१९ १९१-५१२- . २ २ २ -- १८ भी उपराम्पयन निर्पति- १२९ (1) १९ श्री उघराध्ययन दीपिका-११२-११७ (२) ४. भी उपराष्पयन लघुपचि-१८९ (१) ५१ थी उपराज्यपन प्राकवादि-१९७-११ (२) ४२ थी उपराम्पपन भवर्णि- १२९-१४-१५१-१९०६८) - - ५ श्री उपराभ्ययन रवि-३१ ८२ ९९ ॥ ४५ भी भाषरपक पत्र १९३-१९३-२१-१४०-१५६-१०-१९.. १ ४९१-५१२-१८ (१) १ १ ४५ श्रा आवश्यक सूत्र हारिमद्री पत्ति-१६ ७३ १८० ३००३), ३१-१९१- ३१८-१९२-१९७ (१०) २४६ श्री श्रावश्यकत्ति मलयगिरि-१७ (१) १० श्री मावश्यक नियुक्ति-१९ ७२ १३२ १९२-१९५-२२९-२७२- २ ३११-३२४-४३१-५५४-६३५ (१२) ४८ श्री आवश्यकचूर्णि- १३२ २९६ २६३-४३० (४) २ २ ४९ श्री भावश्यक अवचूर्णि- ५७-४१ (२) १ १ - १ १ १ १ - ५. श्री पावश्यक वृहद्पत्ति टिप्पनक ३४० (२) २०३ ৭। পাকু মবিক্ষ যুগ পূর্ব- ४० ४१ १२ ३६६ ५२ श्री विशेषावश्यक सूत्र- १ ४३ ४४ ५१ ५७ ६८ ३६८ ५३ श्री विशेषावश्यक वृत्ति- ७१०-७११ (८) २ १ ८१०६ ५४ श्री दशवकालिक सूत्र वृत्ति- ६२, (२) २, १५ भी मनुयोगद्वार स्त्र भने पचि-- १४३-१४५-३६६-६८१-१७४- २६१ (७) ५६ भी अनुयोगद्वार पूर्णि-, २९९ ( २ ) १७ श्री नंदिस्त्र भने चि-४९ ५५ ५७ ५८ ५८ ५८ ५९ १५०-५३३-- १ ५३५-६२८ (११) १८ श्री नंदिस्त्र चूर्णि- १२६ (३) ५९ श्री पृहत्कल्प चूर्णि- (१) ६. भीमहानिशीथ पत्र २९९ (१) १ - । २ -- १ ६१ फन्पसूत्र भने पृति-३१३ ३३४ ३३५, १ १ '२२१-२३२-४२६-५१२-११२- २ ५२३-५२१ (१.) ६२ कन्यांवरयाच्य टीका-२१३ १ १ ९६२ ६३ ६८ ३९ ४३ ४५ ६० . ५९ ८३ ८४ ६३ सामान्य सिद्धांत- २ ८५ १.१ २२९ २१० २३७ ३०८ ३२८ ३३९ २-८-१५ (२२) १ ६४ ज्योति करंड मूळ-१-६१-६३-७४-७९-८४-८४-१०२-१३० (९) ६५ ज्योतिकरंडपत्ति-३३-६३-७३-१०३-१४४-१४८-१६२-- २६० (९) ६६ गन्यापारपृत्ति-१२१-५३३-५३५ (३) ६७ मरणसमाधि प्रकीर्णक-१४७ (१) ६८ हलवैचालिफ पपनो-५९९ (१) . १ ग्रंथो, प्रकरणो विगेरे. १ मंगुलमप्ततिका- (१) २ ममिधानपितामणि-७४ (२) ३ मतंकारपूसमापि-१६१ (१) ४ पारंममिदिवाठिक-११ (1) ५ उपदेशमाला पर्णिकाधि- ६ अपिमरत-५४७ (१) ७ रुपापमापुप नाटक-१८९(1) (-१३ कर्मप- ८ संपाधि- ९५९-११-६९१-९८५-100-१९९-१९१ (१) - १ ९ कर्मस्तववृत्ति (१) १० कर्मग्रंथ अवचूर्णि- ११ कर्मग्रंथ लघुवृत्ति- ६८ ६८ १२१ -६७ १२१ (३) १ १२ कर्मप्रकृत्ति वृचि- ३१-६५५ (४ २ १३ पंचम कर्मग्रंथ- ३६७ १९२-६५५ (३) १४ काव्यानुशासन मूळ अने वृत्ति-१६३-१६३ (२) १५ काळसप्ततिका-१७२-६१०-६२१-६४३-६४४-६४७ (६) १६ शुल्लकभव प्रकरण-३०(१) १७-२१ क्षेत्रसमास. १७ वीरंजयतेहर क्षेत्रसमास (विचार) स्वोपज्ञवृत्ति- ४ २०६ २२० २३४ २५४ २५७ २७० २७६ २७७ (९) २ २ २ ४ १६८ १७२ १७२ १७२ १७३ .१८ बृहत्क्षेत्रसमास बृहवृत्ति- १ २ १७९ १८० १८३ १८४ १८८ १८९ १९७ १९८ १९९ २ १ २०२ २०३ २०४ २०५ २०५ २०६ २०८ २१३ २१३ २१४ २ २ २ २१५ २१६ २१९ २२० २२४ २२८ २४१ २१७ २७१ २ २ २ १ २ १ १ १ २ १ १ १ . १ १ २ १ २ २ १ (३१) २ १९ सिरिनिलयक्षेत्रसमासपृत्ति- १८३ २०५ २१३ २ २ २ २०२ २० नव्य( बृहत् )क्षेत्रसमास- २१ रत्नशेखरमरिकृत स्वोपज्ञक्षेत्रसमास-२१२ २१४ (२) or ४३ - (२) २२ गुणस्थानक्रमारोहवृत्ति- २३ छेदग्रंथसामाचारी-१७ (१) २४ जंबूद्वीपसमास-१७९ १८४ १९८ २०२ २५ जीवविचार-८५ (१) (४) १ १ १ १ २ १ १ 4 २ २६ जीवसमासवृत्ति (२) . २७ ज्योतिपशास्त्र (लौकिक)-३७ (१) २८ तत्वार्थ टीका-१९ २० २१ २२ ४४ ४७ ४८ ४९ ५० ५३ ५५ ५८ २ २ २ ५८ ६२ ६२ ६७ ११५ २२४ ३२७ ३३१ ३५३ ३६४ ३६७ १ २ ૨ २३२-५२१-६८५-६८७-६८९ (२९) २९ तत्वार्थ भाष्य- १३ २२ ४४ ४८ ५१ १३ १४ १४२ ३०३ ३०३ ३०६ २ २ १ १२-२७९-६८१-६८८ (१५) ३० तत्त्वार्थ महाभाष्य वृत्ति-२५-६८९-८-६८१-१९-७०८-१३ १५ ६५ २ १७८ १५ ४४ ४८ ५१ ५५ ६८ ६९ १७७ १७८ १८४ १९५ २ २ २५४ ३१२ (१५) २ .३१ दिक्पट्ट-२२४(१) १२ दीवाळीकाप-६०६-६०७-६०८-६४३-६४८ (५) ३३ दीवाळीकल्प प्राकत गद्य-६४०-६४३-६४४-६४४ (४) ३४ दीवाळीकल्प प्राकृत पद्य-६४०-६४३-६४४ (३) ३५ दुःपमारकर्मपस्तोत्र-६०६ (१) (३) ३७ धनपाळपञ्चाशिका-३०६-४२१ (२) २ २ २ १ २ १ १ ३६ देवेंद्रस्तव-१४० २३६ ३६३ २ २ ५४ ३८ धर्मसंग्रहणीवृत्ति-९ (१) ३९ नवतच्य अवचूरि-३१ (१) १२ ४० नवतच मूळ- (१) ४१ नवपद प्रकरण पृत्ति १०६ (१) २९३ २९३ २९६ २९८ ४२ नंदीधरकन्प- २ २ १ २ (४ १ ४३ नंदीश्वरस्तोत्र-२९३ २९३ २९८ २ १ २ १ ४४ पंचनिग्रंथी-६०० (१) ४५ पंचवस्तुक (१) ४६-४७ पंचसंग्रह मूळ अने चि-२९ ४२ ८९ १०७ ३२८ ३२८ ६५५- १ ६५९-६१९-६६३-६७१-६७३ (१२) ४८ पद्मानंद महाकाव्य (ऋपमचरित्र )-४३० (१) २४ ५ १८३१ ३५ ४९-५० प्रवचनसारोद्धार मूल अने वृत्ति- १८० १८० २८३ २९४ ३५३ ४३२-६४२-६४५-६५९-६७३ (१८) २ ५१ भक्तामरवृत्ति-४३०-१३१ (२) ५२ भाषप्रकरण-६८१ (१) ५३ योगशास्त्रवृत्ति- १४ १३२ १४१ २९० २९८ ३०३ ३६७ २७-४३२- ५२१-५४६ (११) १ २ १ ५४ रत्नमाळा- ५५ रत्नमाळा माध्य-३७३ (१) ५६ रत्नाकरावतारिका-३९ ४६ ५८ (३) ५७ रसवतीशास्त्र--१५२ (१) ?

(४) १ ५८ लीलावती-३४ (१) ५९ लोकनालिकास्तव-१३२ (१) ६. लोके तु- २३० २३० २१२ २५८ ६१ लौकिकशाने-९३-९६-११२-३९६ (४) ६२ घनस्पतिसप्ततिका-६ (१) ६३ वराहसंहिता-३६०-३५३-३७४ (३) ६४ वसुदेवहिंडी-१९५-६३५ (२) ६५ वासुपूज्यचरित्र-१९८ (१) ६६ वास्तुशास्त्र-३७२ (१) ६७ वास्तुसार (स्त्रधारमंडनकव)-३८२ (१) ६८ विचारसप्ततिका- --४०३ (२) ६९ विचारसप्ततिकाभवचूर्गि-३१६ (१) ७० विद्याप्रामृत-६१५ (१) ७१ विवेकविलास-३७२ (१) ७२ विशेषणवती-६२ ७८ २१० २२६ २५५ २६३ ३०२ (0) ७३ व्यवहारप्रकाश-३७६ (१) ७४ शतकचूर्णि-३ (१) ७५ शत्रुजयकल्प-६१३ (१) ७६ शझुंजय माहात्म्य (वृद्ध)-१९९-१३१ (२) ७७ शांतिनाथचरित्र (मुनिदेवमूरिकृत )-१९७-१९९-२१४ (३) ७८ शांतिनाथ स्तोत्र-३९८ (१) ७९ शाश्वतजिनस्तोत्र-२०३ २ २ १ १ १ २ ८० शृंगारतिलक-३९ १ (२) <१ श्राद्ध विधिवृत्ति-१७३ ३११ ८२ श्रेणिकचरित्र-३३ १ ८३-८७ संग्रहणी १ १ २ १ १ ८३ वृहत्संग्रहणी बृहवृत्ति मलयगिरि- २ २२७ २९० १७३-२-६५- १ २ २४३ २४९ ३०५ ३०५ ३११ ३२३ १ २ १ १ २ २ ३२८ ३२९ २ ३४९ १ १ २ २ २ २ (२७) ८४ संग्रहणी अवचूर्णि-१०३ ( १ ) ८५ संग्रहणी वृत्ति (हरिभद्रसूरिकृत) २८८ २८८ ३०१ ३५९ (४) १ ८६ संग्रहणी सूत्र १९५-३२४-३६० (३) ८७ लघुसंग्रणीवृत्ति (जंबूद्वीप सं.) ११२ १६८ २२४ ३६० (४) ८८ सप्ततिशतस्थानप्रकरणवृत्ति-१९९-१९९-४९१-४९७-४९९-५१२-५२४- ५२७ (८) ८९ समवसरणस्तोत्र-२५६-२५७-२६० (३) ९० समवसरणस्तोत्र अवधूरि-२६२-२६४ (२) ९१ सम्मतितर्क-१९ ९२ सामान्यजिनस्तोत्र--(१) १३ सिचदंडिका-४४१ (१) ९४ सिद्धप्राभृत-१४ १५ (२) १ १ २ ९५ सिद्धप्रामृत टीका-१४ १५ २ ९६ सिद्धांतशिरोमणि-३६९ (१)

९७ हीरप्रश्नोत्तर-१८५-१९९ (२)
९८ हैमअजितचरित्र-१९ (१)
९९ हेमऋपमचरित्र-१७२-३४१-३६९-३९५-४३० (५)
१०. हैमनेमिनाथचरित्र-६३५ (१)
१०१ हेमरामचरित्र ( ७ मुं पर्व )-१९९-४०२-४०३-४१५-६५७–१६१८६)
१०२ हैमवीरचरित्र-१०६
२
६१७ ६३३ (३)
१०३ हेमशांतिचरित्र-३२९ (१)
नोट-तथाहुः, तथोक्तं, इति वचनात् , वृद्धसंप्रदायः, इति आम्नाय:, इत्युक्तं पूर्वसूरिभिः,
पुरातना त्रुटितपत्रे, त्रुटिसगाथायां, इति जनप्रवादः-धावा शब्दोथी सूचवेला आधारो उपर
जणावेल नयी. एवा आधारो पण घणा छे. तेनी संख्या करवामां आवी नथी.
३४ मा सर्गमा सुधारो
पृष्ट ६३१ श्लोक २८ मा भने ३० माना अर्थमां काले पौषध करवान लत्यु छ. ते
पदल रात्री पौपध करवानुं समजवु.
श्लोक २८ माना अर्थमां पाक्षिक पर्व करीए एम लसेल छे. तेने बदले पाक्षिक पर्वनो
पौपध फरीए एम समजवू.
पृष्ट ६३२ श्लोक ३५ माना अर्थमा जम्या विना पौषध फरवार्नु लख्युं छे ते उपवास
करवानुं ममजयु.
श्लोक ३६ माना अर्थमां पीजा आवको पण श्राव्या एम कर्यु छे त्यां ते तेवी ज रीते
(पौषध पार्या विना ) आध्या एम समजg.

काळलोक अनुक्रमणिका ( भावलोक सहित) सर्ग २८ मो. (युगस्वरूप) विषय. पृष्ठ. १ .... .... .... ८ .... .... .... .... ... .... .... २९ .... .... .... .... .... ३८ .... .... ४० ... ४८ १ काळर्नु स्वरूप २ काळ द्रव्य छे एवी सिद्धि थवाना कारणो ३ काळनी वर्तना, परिणाम, क्रिया ने परत्वापरत्वनुं स्वरूप, ४ काळद्रव्यना ११ निक्षेपा अने तेनुं विवरण. ५ छठा उपक्रमकाळमां दशविध सामाचारीनुं स्वरूप ६ सोपक्रम निरुपक्रम घायुस्वरूप. ७ नवमा प्रमाणकाळनुं सविस्तर स्वरूप. ( समयावळी विगेरे ) ८ शुल्लक भवनुं स्वरूप. ९ काळना तोल अने मापनुं स्वरूप. १० पांच प्रकारना संवत्सर. ११ पांच प्रकारना मासर्नु प्रमाण. १२ पांचे प्रकारना मास, प्रयोजन. १३ सूर्यवर्पना दिवसो जाणवानी रीत. १४ सूर्यादि पांचे प्रकारना वर्षको तोलनी अपेक्षाए विचार. १५ पांच वर्षना युगनुं विशेप स्वरूप. १६ सूर्यना मुहूर्त्तनुं प्रमाण लावयानो उपाय ... १७ श्रावण कृष्ण प्रतिपदाए युग विगेरेनो आरंभ, १८ भागममा कह्या प्रमाणे युग विगेरेनुं स्वरूप. १९ सूर्यना भयनने जाणवानी रीत, २० चंद्रना १३४ भयनोनु स्वरूप २१ सूर्य चंद्रना अयनोनो मुकाबलो. २२ अयनना आरंभरूप सूर्यनी प्रावृत्तिो. २३ विषुवतनुं स्वरूप २४ विषुवत्न करण. २५ छए ऋतुनुं स्वरूप. २६ एक युगमा भावता ३० ऋतुभो क्यारे पूर्ण थाय ? २७ चंद्रने भाश्रीने ऋतुप्रोनु स्वरूप. .... .... ... ... .... ... .... ran ... .... ... .... ६८ .... .... .... .... .... ....

४१ ४. .... .. ... .... .... ... .... .... .... .... .... .... २८ सूर्य ऋतुनी ममानि सम्पने चंद्र सूर्यन फयु नपत्र होय ? २९ पार मामना लौकिक ने लोकोचर नाम. २. पंदर दिवमना ने पंदर राधिना नाम. ३१ पंदर विधिोना पांच प्रकारवियित्रोना स्वामी. ३२ अहोरात्र ने निधिोनी उत्सचिमां फेरकार, १३ वियियोना फारर्नु मान (प्रमाण) ३४ पदमरात्र (अयतिपि) स्वरूप २५ युगपूधि ने युगपश्चिमाधन यंत्र ... ३६ नष्प्रतिथि जाएवा माटे फरए (युछि) ३७ पर, पासवादि फरपोनी प्ररूपणा २८ हमेशां फरता श्रीरा मुर्गा १९ चंद्र मंबंधी नमोना फेरफार, विवरण.... सूर्य मंधी नमोने लगतुं विवरण ११ सूर्य नमत्री मंबंधी यंत्र १२ पोरिमीतुं प्रमान जाएवानुं करण ४५ पादानपौरपी, मापौरपी, पूर्वाधन करण १४ पृष्ठ १० ने ७९ पर भाषेली हकीकतना पंयो १५ काळना मार ने नाम मंधी यंत्र (मर्ग २९ मा प्रारमनु) १०८ ..- .... .... .... .... ११४ .... .... .... ... .... .... .... .... .... M.. ... .... ... ... .... सर्ग २९ मो. (चार भारानु मामान्य वर्णन ) १६ बाटना पूर्वाग, पूांदि नामो ने नेनुं प्रमाण १. हमी ने मापुरी वामनानो मेह ४८ सपोरम, मागरोपमारिनु कमल ৮২ এ তথনা বা মানা নাম ন মম ५० परेमा पार्नु पर ५१ रा रना साप सार १२ पुमपनी पुराना गर्नु पर्यन ५१ डामपानीमोना रोनु पर्पन ५. पुलिस मौना सामानिरापरना पसंपर १५ पुपतिनामिति .... .... .... -- ५० .... .... .... .... .... १७० १७२ १७४ १७७ १७९ १७९ .... .... .... .... ५६ युगलिकना आहारनुं स्वरूप, अन्य विशिष्टता ५७ युगलिकोना छ प्रकार ५८ आयुष्यबंध, युगळजन्म, ४९ दिवसानी प्रतिपालना ५९ ४९ दिवसमा सात अवस्था ६० युगलि रुना मृतदेहनी व्यवस्था ६१ अनंतगुणहानिनी भावना-प्रभोत्तरवडे खुलासो ६२ बीजा आरानुं स्वरूप ६३ बीजा आराना मनुध्योना ४ प्रकार ६४ बीजा पारामां भूमि स्वरूप विगेरे ६५ त्रीज़ा आरानुं स्वरूप ६६ त्रीजा आराना त्रण विभाग ६७ श्रीजा विभागनुं स्वरूप ६८ श्रीजा विभागमा छल्ला पल्योपमना विभागनुं स्वरूप ६९ पहेला तीर्थकरनी उत्पत्ति अमितुं प्रगट थर्बु, प्रथम तीर्थकरे सो शिल्पा, पुरुषोनी ७२ कळा, स्त्रीनी ६४ कळानुं बताव, प्रभुनो प्राणिमहण-महोत्सव, राज्याभिषेक, नगरीतुं बसावg, राजनीतितुं प्रवर्ताव. ७१ प्रथम चक्रवर्तीनी उत्पत्ति, छ खंडने साधवा. ७२ प्रभुनी दीक्षा, केवळज्ञान, संघ स्थापन, निर्वाण, ७३ चोथा आरानी शरुभात, तेनुं निरूपण. ७४ चार प्रकारना वरसादनुं वरस, ७५ चोथा पारामा २३ तीर्थकर, ११ चक्रवर्ती विगेरेनुं थ. .... .... .... १८२ १८२ .... ... ७० . .... .... . ... ... १८६ .... १८७ .... सर्ग ३० मो. (तीर्थकरोतुं सर्वसामान्य वर्णन ) ७६ तीर्थयारनामकर्म बांधवाना हेतुभूत २० स्थानको ७८ वीशस्थानकनी पाराधनानो विधि ७८ तर्यिकर थनार जीवना पूर्वभवतुं स्थान ७९ तीर्थकरनुं माताना गर्भमा आवद्यु, १४ स्वप्ननु देख ८. स्वप्नने लगतुं केटलंक विवेचन .... .... १९३ १९५ १९७ .... ....

२०१ .... २०२ .... .... .... - २१२ .... ८३ सर्व ग्रहो उच्च स्थानमा होय तेवे शुभ समये प्रभुनो जन्म ८४ प्रसूति कार्य माटे ५६ दिशाकुमारीओनु आगमन, तेमनुं कर्त्तव्य ८५ इंद्रनो आसनकंप, तेमणे करेलुं वंदन, घंटानादपूर्वक देवीने सावधान करी विमान रचावी सौधर्मेंद्रनुं मातृगृहे आगमन ८६ मावानी श्राज्ञा मागी, अवस्वापिनी निद्रा प्रापी, प्रतिबिंब मूकी, प्रभुने पांच रूपे प्रहण करी मेरुपर्वत उपर आवq.... ८७ वैमानिक इंद्रोनी घंटा, सिमान, विमान रचनार, श्राववानो मार्ग ८८ भवनपति, व्यंतर, ज्योतिपीना इंद्रोनुं पण आगमन ८९ अच्युतेंद्रनी श्राशायी प्राभियोगिक देवोनुं जळादिक लेवा माटे गमन, लाइने आवq ९० प्रथम अच्युतेंद्रनो ८०६४ फळशवडे अभिषेक, जिनपूजन विगेरे ९१ सर्व इंद्रोना अभिषेक थइ रह्या पछी ईशानेंद्रे ५ रूप करवा. ९२ सौधर्मेद्रे चार वृषभना रूपबहे फरेल अभिषेक विगेरे... ९३ प्रभुने पांच रूपे ग्रहण करी प्रभुनी माता पासे मूफवा, ते पखतने योग्य फरणी, अंगुष्ठमां अमृतश्राव विगेरे ९४ दासीए प्रशुना पिताने आपेल पुत्रजन्मनी वधामणी-तेमणे करेल जन्मोत्सव, २१२ ... .... २१६ २१७ २१९ २१९ .... २२० .... नामस्थापन २२१ ... .... .... २२३ २२४ २२६ २३२ २३३ २३४ .... ९५ प्रभुनी थाल्यायस्या, यौवनावस्था, भोगावळी फर्म होवाथी पाणिग्रहण, राज्याभिषेक विगेरे... ९६ योग्य समये पार्पिफ दान, अनन्या प्रहण माटे अनुशा ९७ प्रमुना पितादिके अने इंद्रोए फरेल दीक्षा महोत्सव .. ९८ तीर्थफरे ग्रहण करेल पारिन-मनःपर्यवसाननी उत्पत्ति ९९ पीर्थकरनो पद्मस्य विहार-तपर्नु पारगुं .... .... १०० यावीश परिपह-तेनी पृथक् पृथरु फर्मजन्य उत्पत्ति १०१ चार प्रकारना उपसर्ग १०२ ध्यान, स्वरूप १.३ प्राध्यान ने रौद्रध्यान १०४ धर्मध्यानमुं सरूप.... १०९ धर्मध्यानना पार मालंपन-पार पनुप्रेक्षा.. १०६ मयाननु स्वरूप १०७ गुष्ठापानमा पार पिन्हो, पार पापनो... १.८ तीरने माननी पति .... .... .... .... .... ... ... .... २५१ .... .... .... .... .... .... .... २५४ २६२ २६७ २६७ २७३ २७५ २८० २८१ २८३ २८७ .... .... .... .... .... .... .... .... .... .... ..." .... १०९ समवसरणनी रचना-(गोळ ने चोरस ).... ११० अशोकवृक्ष संबंधी विचार १११ तीर्थ शब्दनी व्याख्या ११२ तीर्थकरनी वाणीनो महिमा-(एक होशीन दृष्टांत) ११३ जिनवाणीना ३६ गुण-(विस्तरार्थ साथे ) ११४ श्रावकना वार व्रतोतुं स्वरूप ११५ सामायिकना चार प्रकार ११६ सर्वविरतिना इच्छकने हितशिक्षा ११७ १८००० शीलांगनुं स्वरूप ११८ सामाचारीना १८००० अंगवाळा रथनुं स्वरूप ११९ बंने प्रकारना रथना चित्र १२० श्रावकतना मंग.... १२१ त्रण भोग ने त्रण करणवडे थता २१ भेद १२२ पांच व्रतना संयोगी ३१ भांगा १२३ व्रतमंगोथी बनती देवकुलिका १२४ श्रावकब्रतमंगनी समाप्ति १२५ गणधरोनी स्थापना १२६ तीर्थकरादिना रूपनी तरतमता १२७ बार पर्षदान स्वरूप (मुनिओमां बेसवानी व्यवस्था) १२८ समवसरणमा बलि विधान १२९ माठ प्रातिहार्योनु स्वरूप १३. चोत्रीश अतिशयोतुं स्वरूप १३१ नाश पामेला मुख्य १८ दोषोर्नु स्वरूप.... १३२ प्रभुनुं निर्वाण-तेनो महोत्सव विगेरे २८७ २८९ २९५ .... ... .... २०१ ३०१ .... .... .... .... .... .... .... ... .... सर्ग ३१ मो. ( चक्रवर्तीनु, वासुदेवर्नु भने बलदेवर्नु सामान्य स्वरूप) १३३ चक्रवर्ती थवाना निमित्त कारण १३४ चक्रवर्तीनी उत्पत्ति-प्राथमिक स्वरूप १३५ राजाना ३६ गुण (श्रा गुण उत्तम राजामा होवा जोइए) १३६ चक्रीनी यौवनावस्था, प्रायुधशाळामा चक्रनुं प्रगट थवं, १३७ चक्ररत्न संबंधी अष्टादिका महोत्सव-१८ श्रणिना नाम .... ३२७ ३२३ ३२४ ३२६ ....

५३ ... .... .... .... ... ... .... ३४० .... .... ... .... .... ... .... ... .... १३८ पक्रवार्नु छ खंड साधवा माटे प्रयाण.... ३२८ १३९ मागध तीर्थता अधिष्ठायफ देवने साधवो.... ३२९ १४. घरदाम तीर्थ, प्रभास वीर्थ ने सिंधुदेवीनी साधना १४१ वैताध्यकुमारदेवने साधी समिसागुफा पासे आवq ११२ समिना गुफाना अधिष्ठायक कृतमालदेवतुं श्रावी ज_-चौद अलंकारनु अर्पण करवू३३६ १४३ सिंधुदक्षिणनिष्कुट साधवा सेनानीने मोफलयो .... १४४ तमिस्रा गुफाना द्वार उघाहवानी सेनापतिने आशा.... १४५ धमिस्रा गुफा उघाड्यानुं चक्री पासे सेनानीए करेल निवेदन ३४० १४६ चक्रवर्तीनो गुफामां प्रवेश, मंडलो फरवा, पाज संघाववी १४७ चक्रवर्तीनी सेना साये म्लेच्छ राजाशोनुं युद्ध ३४१ १४८ म्लेच्छ राजाओ सामे मेनानीनुं गमन न-म्लेच्छोनुं नाशी जq १४९ म्लेच्छोए करेलु पोताना इष्टदेवतुं पाराधन-तेणे आपेल हितशिक्षा ३४४ १५० म्लेच्छो, घश थयु, तेमणे करेल आज्ञा प्रमाण ३४५ १५१ सेनानीने सिंधुनोउत्तरनिष्कुट माधया मोकलयो ३४६ १५२ हिमवंतकुमारदेवने साधयो, पभकूट पासे प्रयाण ३१७ १५३ पमफूट उपर घमीए लखेल नाम १५४ पैताट्यपर रहेला विद्याधरोए फरेन आझानो स्वीकार १५५ गंगादेवीने घश फरवी, सेना संबंधी महोत्सव ३५० १५६ गंगाना उत्तरनिप्फुटने साधया सेनानीने मोकलयो ३५० १५७ संखप्रपादा गुफा उपासवानी सेनानीने फरेली प्रामा १५८ गुफामा प्रवेश, मांडलानुं फरां, पाज यांधवी ३५२ १५९ गुफामांची नीकळीने फरेल नव निधाननी धाराधना.... २५२ १६. गंगाना पशिण निष्कृटने साप सेनानीने मोकल यो १६१ प संड माघीने राजधानी तरफ प्रयाण १६२ पकरीनो अट्टम फरीने राजधानीमा प्रवेश २५३ १६१ मेपक देयाने राजाप्रोने, मेनारसि रत्न विगेरेने प्रापेल रजा १६५ पीपणाना पभिपनी मागणी-पारी १६५ अमिषेक संबंधी १२ वर्ष मुधी महोत्सव करवानी HINI १६६ परपतीने परवा पक्षमा भट्टमी १६. पोर रनो मपंधी वन, ( मात पद्रिय रान) (मान पंद्रिय रन) १६९ पारि गलना वन प्रमंगे १६ मारना प्रागार विरे .... .... ३४७ .... .... .... ... .... .... .... .... .... .... .... .... .... ...

.... ... ... ३८८ ३९१ ३९२ .... ... ३९८ ३९९ .... ४०० १७. वास्तुशास्त्र. तेने लगता यंत्रो .... .... १७१ वार्धकि रत्नना वर्णननी समाप्ति १७२ बाकीना पुरोहितादि रत्नो १७३ चौद रत्नना स्वरूपनी समाप्ति १७४ नव निधाननुं स्वरूप १७५ चक्रवर्तीनी ऋदिनुं वर्णन १७६ वासुदेव ने बलदेवतुं स्वरूप १७७ बलदेव वासुदेवनी उत्पत्ति, देह, वर्ण विगेरे १७८ वासुदेवना सात रत्नो १७९ बलदेवना देह, वर्ण, वस्त्र, त्रण रत्नो विगेरे १८० पासुदेव बलदेवने स्त्रीश्री १८१ कोटिशिलानुं स्थान ने स्वरूप-दरेक वासुदेव केटली उंची करे ? १८२ कोटिशिला पर सिद्ध थएल मुनिमोनी मंख्या, तेनुं बीजु नाम मिशिला १८३ प्रतिवासुदेवनुं हुंकुं स्वरूप १८४ नव नारदोर्नु स्वरूप १८५ ११ रुद्रनुं ढूंकू स्वरूप १८६ ३२ मा सर्गमा दरेक तीर्थकरना वर्णनमा विगतो श्रावनार छे तेनुं लीष्ट १८७ महावीर चरित्रांतर्गत पधा प्रभु माटे कहेल विगत छे तेनुं लीष्ट (श्रा बने हकीकत नोटरूप लखेली छे) ४०१ ४०२ ४०३ .... .... ४०४ .... ४०४ ... .... ... ४०८ .... ४१० .... 444 .... सर्ग ३२ मो. (तीर्थकरोना चरित्रो) १८८ श्रीपभदेव चरित्र प्रारंभ-सात कुळकरतुं वर्णन १८९ साले कुलकरोतुं प्रायु, देहमान, दंडनीति, गति विगरे १९० प्रथम तीर्थ करनुं गर्भमां आवq, पूर्वभव वर्णन १९१ तेर भवमाधी पहेला भवे मुनिराजने आपेल घृतर्नु दान १९२ नवमा भवमां वैद्य थइने करेल मुनिराजना व्याधिनुं निवारण १९३ ११ मा भवमां बांधेल तीर्थकरनामकर्म १९४ प्रभुनो जन्म, युवावस्था, पाणिग्रहण १९५ प्रभुने थयेल १०० पुत्र ने बे पुत्री १९६ इंद्रे फरेल राज्याभिषेक, विनीता नगरीनुं वसाव_ १९७ विनीता नगरीनुं वर्णन १९८ प्रमुए बतावेल शिल्पो, कळामो विगेरे अनेक बाबतो .... ... ४१७ ४२० ४२१ ... ४२५ .

.... ४२८ .... .... ४३२ .... .... .... ... .... .... .... ... ४४१ ४११ ४१३ .... १९९ प्रमुए लीघेल दीक्षा, चारमुष्टिलोच २०० श्रेयांसकुमारे करावेल इक्षुरसथी पार[, प्रथम दान २०१ अपभप्रभुने केवलज्ञान, भरतने वधामणी... २७२ मरुदेवा माताने लइने जतां माता- मोक्षगमन २०३ भरते करेली प्रावकोनी भक्तिनी शरुअात २०४ श्रावकनी ओळखाण माटे करेली त्रण रेखाओ २०१ ऋपभदेवनो परिवार २०६ ऋपमप्रभुना यक्ष ने यक्षणी २०७ ऋषभदेवतुं निर्वाण-निर्वाण महोत्सव २०८ अपमदेवयी चालेली पुत्रपौत्रादि परंपरा ने शिष्य-प्रशिष्यादिनी परंपरा- शिष्यप्रशिघ्यादिनी सिद्धदंडिका .... २०९ सिद्धदंडिका प्रकरण- भाषांतर यंत्रो युक्त .... २१० श्री अजिवनाथ प्रभुनुं चरित्र. २११ अजितनाथनो परिवार-यक्षयक्षणी २१२ श्री ममवनाथर्नु चरित्र-कल्याणक तिथिो सहित २१३ मी अभिनंदनस्वामी चरित्र २१४ श्री सुमतिनाय चरित्र २१५ श्री पपप्रम प्रभु चरित्र २१६ श्री सुपार्श्वनाथ चरित्र २१७ श्री चंद्रप्रभ प्रभु चरित्र २१८ भी मुविधिनाय चरित्र २१९ श्री शीवलनाथ चरित्र १२. भी श्रेयांमनाथ चरित्र २२१ मी वासुपूज्यस्वामी चरित्र २२२ भी विमलनाथ प्रमु चरित्र २१३ श्री अनंतनाय परिन २२५ भी धर्मनाथ परित्र २२९ भी शांतिनाथ परित्र-पूर्षमष वर्णन २२६ मेपरयना भवमा पारेवानो फरेलो बचाय... २२७ श्री शांविनायना पाप कल्याणकनी वियित्रो-परिवार विगेरे २२८ बीकुंथुनाथ परित्र-फरमाएक तिथिमो सहित २२९ भी मरनाप परिम. ४५६ " " ४६२ ४६४ ४६७ ... .... " ... ... " १७५ ४७५ ४७६ ४७९ ४८१ १८४ ४८६ १७ ४९० ४९२ ४९१ .... .... .... ....

५६ ४९७ १०० - ५०३ - ५०९ ५१४ ... २३० श्री मल्लिनाथ चरित्र २३१ श्री मुनिसुव्रतस्वामी चरित्र २३२ श्री नमिनाथ चरिन २३३ श्री नेमिनाथ चरित्र-पूर्वभव वर्णन २३५ श्री पार्श्वनाथ चरित्र-पूर्वमव वर्णन २३५ श्री महावीरस्वामी चरित्र-पूर्षभव वर्णन २३६ मरीचिना भवमा करेल फुलाभिमान २३७ २५ मा नदनमुनिना भवमा बाधेल तीर्थकरनामकर्म २१८ भवग्रहण सषधी विकल्प २३९ वीरप्रभुनो जन्म-नामस्थापन-कल्याणक तिथिओ २४० वीरप्रभुनी दीक्षा-अभिग्रहो-उपसर्ग-केवळज्ञान २५१ चोपीशे प्रमुने लगती अनेक पावतो २४२ पीरप्रभुना गणधरनुं वर्णन २४३ वीरप्रभुनो परिवार २४४ चोवीशे प्रभुना परिवारनी एकदर सख्या २४५ चोवीशे प्रभुने लगती फेटली हकीकतो २४६ वीरप्रभुना यक्षयतणी (३२ मा सर्गनी समाप्ति) २४७ वीरप्रभुना ११ गएधरी सबधी यत्र २४८ चोवीशे तीर्थकरना मुनियो सपधी यत्र २४९ तीर्थकर, चक्रवर्ती, वासुदेवादिनु क्रमसूचक यन्त्र १२० ५२२ ५२९ ५३२ ५३७-८ ५४० ५४२ " १४४ ६४७ सर्ग ३३ मो. (चक्रवर्ती, वासुदेव विगेरेनु वर्णन ) २५० पहेला, बीजा, जीजा पक्रवर्तीनु सक्षिप्त चरित्र २११ चोथा सनत्कुमार चक्री चरित्र- (पाचमा, छठ्ठा, सातमा चक्रीनो तीर्थकर चरिनमा समावेश छे) २५२ भाठमा सुभूम चक्रवर्तीनु चरित्र २५३ नवमा महापद्म चक्रवर्तीनु चरित्र. २५४ हरिषेण ( १० मा) ने जय ( ११ मा) चक्रीना परिन ( सक्षिप्त ) २९५ बारमा प्रादत्त चक्रीनु चरित्र २५६ बारे चक्रवर्तीनी सामान्य हकीकतो २१७ नव वासुदेव, बळदेव ने प्रतिवासुदेवना नामो २५८ पहेना त्रिपष्ट वासुदेवन चरित्र. ५५८ ११९ ५६६ ५६८ ५७० ९७३ .... .... .... २५९ वीजा, बीजा, चोथा, पांचमा, छठा ने सातमा वासुदेवादिना संक्षिप्त चरित्रो..... २६. पाठमा वासुदेष लक्ष्मण, रामचंद्र ने रावणर्नु चरित्र २६१ नवमा वासुदेव कृष्ण विगेरेना चरित्र..... २६१ वासुदेव बलदेवादिनी सामान्य हकीकत..... २६५ वेशठ शलाका पुरुषोनो क्रम. २६४ भग्यार रुद्रना नामो विगेरे ... .... .... .... .... .... १८९ ६९० .... .... .... .... .... .... ... ... सर्ग ३४ मो. (अवसर्पिणीना पांचमा-छठ्ठा आरार्नु अने उत्सर्पिणीना छए प्रारानुं वर्णन ) २६५ अवसर्पिणीना पांचमा आरानुं वर्णन. १९२ २६६ पांचमा भारामां शुं शुं होतुं नथी १ २६७ पांचमा पारामां मनुष्यो केवा होय ? ५९४ २६८ पांचमा पारामा साधुओ ये प्रकारना होय तेनुं वर्णन २६९ पांचमा पारामां थनारा २३ उदय ते दरेकमां यनारा युगप्रधानोनी संख्या. ६०३ २७. प्रेवीश उदयमा यनारा पहेला ने छल्ला भाचार्यना नाम .... २७१ पहेला ने वीजा उदयमा थनारा युगप्रधानोना नाम. ६०५ २७२ युगप्रधान शिवाय थनारा बीजा उत्तम आचार्यो. २०६ २७३ पांचमा आराना प्रांतमागनी हकीकत २७४ छठ्ठा आरानो पेश-प्रारंभनी स्थिति. .... ६०९ २७५ प्रारंममा थनारा पाप प्रकारना अशुभ वरसाद. .... .... ६१० २७६ शगुंजय पर्यवनी स्थिति-प्रमाण-महिमा विगैरे. ६१२ २७७ शगुंजय तीर्थमा २१ नामो, २०८ छठ्ठा पारामां यनारा मनुष्योनी परिस्थिति. २७९ ए मनुष्योना बाहार-गति विगेरे. २८० छट्ठा पाराना मनुष्यने रहेबाना स्थान ( ७२ विल ) २८१ षट्ठो पारो पूर्ण यये अषसर्पिणीनी पूर्णता ६२० २८२ परसपिणीनी शरुमाव सगये पनारी १५ प्रकारना काळनी शरुमात, ६२. २८५ सत्सर्पिणीनो पहेलो पारो (दुपमदुपमा ) .... २८५ उत्मर्पिणीनो पीजो मारो (दुपमा) २८५पीमा भाराना रंमा यनारा पांप प्रकारना सारा वरसाद ... me. RN DAAD .... .... .... ६१७ .... .... .... .... .... .... .

६२३ .... .... .... .... .... ६२५ .... .. .... ६२६ ६२७ ६२७ ६२७ ६३० ६३१ .... ... .... .... .... .... .... २८६ ए वरसादोथी बदलावानी पृथ्वीनी स्थिति २८७ मनुष्योर्नु विल यहार नीकळवू-तेमनाथी फराती केटलीक व्यवस्था २८८ पीजा पारामां थनारा सात कुलकरो २८९ उत्सर्पिणीना बीजा भाराने प्रवेश २९० ते बारामा थनारा २३ तीर्थकरो ने ११ चक्रवर्ती २९१ उह पिणीना चोथा भारानो प्रवेश २९२ चोथा पारामां थनारा छेला तीर्थफर ने छेल्ला चक्रवर्ती २९३ श्रावती चोवीशीमा थनारा प्रथम तीर्थकर पद्मनाभ २९४ घीजा, श्रीजा, चोथा ने पांचमा तीर्थकर-पूर्वभवना नाम २९१ शंख श्रावकनुं ढूंकुं चरित्र-भावी छठ्ठा तीर्थकर २९६ सातमा, आठमा, नवमा ने दशमा तीर्थकर २९७ सत्यकी विद्याधरर्नु चरित्र-अपारमा तीर्थकर २९८ बारमा अमम नामे तर्थिकर-कृष्णना जीव २९९ तेरमा तीर्थकर कृष्णना बन्धु पळभद्रथी जुदा बळदेव ३०० चौदमा तीर्थकर, पंदरमा तीर्थकर सुलसानो जीव ३०१ सोळमर तीर्थकर रेवतीनो जीव-तेनुं पूर्वभवतुं चरित्र... ३०२ १७-१८-१९-२०-२१ मा तीर्थकर.... ३०३ बावीशमा तीर्थकर थनार अंबडनु चरित्र.... ३०४ २३ मा ने २४ मा तीर्थकर ३०५ भावी तीर्थकरोना नामोमां ने पूर्वभवना नामोमा फेरफार ३०६ भावी बार चक्रवर्तीना नामो ३०७ वासुदेव, बळदेव ने प्रतिवासुदेवना नामो.... ३०८ चोवीशमा तीर्थकर निर्वाण पाम्या पछी युगळिकपणानी शरमात, पंदर कुळकरो ने प्रण प्रकारनी नीति ३०९ उत्सर्पिणीना चोथा, पोचमा ने छठ्ठा पारानी हकीकत.... .... .... ६३५ ६३६ ... .... .. .... .... .... .... .... ६३८ ६४० .... .... ... .... .... .... .... .... .... .... ६४८ .... सर्ग ३५ मो. ३१. पाठ प्रकारना पुद्गळपरावर्तोना स्वरूपना प्रारंभमां आठ प्रकारनी वर्गणाश्रोनुं स्वरूप.... ३११ पुद्गळपरावानी विशेष समजुती ३१२ अनुभागबंधना स्थान- स्वरूप -वर्गणी, स्पर्धको विगेरे.... .... .... .... .... ६५६ .... ... ३१३ अवांतर कर्मद्रव्योनी पाँचण ... ३१४ स्थितिबंधना मध्यवसाय स्थान ३१९ पुद्गलपरावर्तना स्वरूपनी समाप्ति-काळलोकनी समाप्ति. ६६० ६६९ .... .... ६७७ .... .... .... .... ६ ६८२ ६८२ .... .... ६९२ सर्ग ३६ मो. (.मावलोकप्रकाश) ३१६ पांच प्रकारना मावो-तेनुं स्वरूप. ३१७ मावोना क्रमकथनना कारणो. ३१८ पांच मावोना उत्तरभेद १३, सेतुं स्वरूप. ३१९ साग्निपातिक मावोना संयोगी मांगाओ २६ ३२. सोयोगिक २६ भांगामांधी ६ मांगानु उपयोगीपणुं..... ३२१ सान्निपातिक ६ उपयोगी मांगाना फुल १६ प्रकार..... ३२२ अजीयने विपे संमवता ये भावो. ३२३ आठ फोंने पाश्रयीने भावोनुं निरूपण ३२४ धौद गुणस्थानोने विपे मूळभावोनु निरूपण ३२५ पौद गुणस्याने पांच भायोना उत्तरभेदोनुं निरूपण १२६ पौद गुणस्थाने उत्तर भावोनुं यंत्र ३२७ औदयिकादिक भावोना सादिसांतादि ४ मंगर्नु स्वरूप २२८ मावलोकनी समाप्ति. .... ६९३ .... .... .... .... .... ६९ ६९७ ६९९ .. .... .... ... .... .... .... ७.१ ७०३ .... .... ... .... सर्ग ३७ मो. १२९ स्त्रीरो मर्गमां कहेल हकीकतोनू पीजफ (अनुक्रमणिका ) .... प्रशस्ति. २३. मुधर्मासामीयी प्रयकर्ता सुधीनी पूर्वापार्यपरंपरा. ७२१ पी २८ pacARSANSADESH श्रीकाललोकप्रकाश अनुक्रमणिका समाप्त.

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श्रीकात लोकप्रकाश
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॥ श्री जिनाय नमः ॥ ॥ श्री विनयविजयजीगणिना विरचितः ॥ ॥अथ श्रीकानलोकप्रकाशः॥ ॥ अथ अष्टाविंशतितमः सर्गः प्रारभ्यते ॥ केवलालोकवका-लिकीमुल्लासयन् धियं । श्रीमान् शंखेश्वरः पार्थो वितनोतु सतां श्रियं ॥ १॥ स्वरूपं दिष्टलोकस्य जिनोदिष्टमथ ब्रुवे । गुरुश्रीकीर्तिविजय-फमसेवाप्तधीधनः ॥२॥ लोकानुभावतो ज्योति-श्चक्र भ्रमति सर्वदा । नृक्षेत्रे तद्गतिभवः कालो नानाविधः स्मृतः॥३॥ तथोक्तं ज्योतिष्करंडे-लोगाणुभागज- जिथं जोइसच भणंति अरिहंता। सव्वे कालविसंसा जस्स गइविसे- अथ श्रीकाललोकप्रकाश सर्ग २८ मार्नु भापान्तर. -- केवलशाननी जेम प्रण लोकना माननो विकास करनार नानादिक लक्ष्मीगळा श्रीशंपेश्वर पार्थनाथ सत्पुरुषोनी ज्ञानादिक लक्ष्मीने विस्तारो. (१). गुरु महाराज श्रीकीर्तिगिजपजीमहाराजना चरणनी मेवा करसाधी मने दिरूप धन प्राप्त पहे, तेधी ई श्रीजिनेवरोए कहेलुं दिष्टलोक (फाललोक) नुं स्वरूप कहुं हुं. (२) मा मनुष्य क्षेत्र (मदीदीप) ने विपे निरंतर भाकाशमा सूर्यचंद्रादिक ज्योतिषपक लोकना भनुभावधी (स्वमारपी) ज फर्या करे थे. वेनी गतिथी फाळनी उत्पति पाप 2. ते काळ विषिष प्रकारनो कमोथे. (३). ते विपे ज्योतिप्करंड नाममा प्रथमा कपुं १ (२) श्रीकाललोकप्रकाश। सनिष्फन्ना ॥ ४ ॥ अत्राहुः केऽपि जीवादि-पर्याया वर्तनादयः। काल इत्युच्यते तज्ज्ञः पृथग् द्रव्यं तु नास्त्यसौ ॥ ५॥ तथाहि-जीवादीनां वर्तना च परिणामोऽप्यनेकधा । क्रिया परापरत्वं च स्यात्कालव्यपदेश- भाक् ॥ ६ ॥ तत्र च-द्रव्याणां सादिसांतादि-भेदैः स्थित्यां चतु- भिदि। यत्केनचित्प्रकारेण वर्तनं वर्तना हि सा ॥७॥ द्रव्याणां या परिणतिः प्रयोगविस्त्रसादिजा । नवत्वजीर्णताद्या च परिणामः स कीर्तितः ॥ ८॥ भूतत्ववर्तमानत्व-भविष्यत्वविशेषणा । यानस्थानादि- कार्थानां या चेष्टा सा क्रियोदिता ॥ ९॥ पूर्वभावि परं पश्चा-दावि चापरमिष्यते। द्रव्यं यदाश्रयादुक्ते ते परत्वापरत्वके ॥ १०॥ एवं च द्रव्यपर्याया एवामी वर्तनादयः। संपन्नाः कालशब्देन व्यपदेश्या भवंति ये ॥ ११ ॥ पर्यायाश्च कथंचित्स्यु-द्रव्याभिन्नास्ततश्च ते । द्रव्यनाम्नापि कथ्यते जातु प्रोक्तं यदागमे ॥ १२ ॥ तद्यथा- .. छ के-लोकना अनुभावथी भा ज्योतिपचक्र उत्पन्न थयेलुं छे, अने वेनी ज गति- विशेषथी विविध प्रकारनो काळ उत्पन्न थयो छ एम जिनेवरो कहे थे. (४). ही काळनी पावतमा कोइ प्राचार्यों कहे छ के-जीवादिकना पर्यायो ज वर्तमान आदिक काळ के एम विद्वानो कहे छ, तेथी काळ नामनुं जूदुं द्रव्य नथी. (५). तेश्रो आ प्रमाणे कहे छ- जीव, अजीव विगैरेनी वर्तना होवापणुं १, तेमनो अनेक प्रकारनो परिणाम २, तेमनी क्रिया ३ तथा तेमनुं परापरत्व ४ (पर एटले प्रथम थनार अने अपर एटले पछी थनार तेप[.) ए सर्व काळना व्यपदेशने भजनार के एटले के ए सर्व काळशन्दवडे कही शकाय छे. (६). तेमां सादिसांत विगेरे भेदोवडे चार प्रकारनी स्थितिने विषे कोइपण प्रकारवडे द्रव्योनुं जे होवापणुं ते वर्तना कहेवाय छे. १. (७) प्रयोगथी के विस्रसादिकथी द्रव्योनी जे परिणति थाय छे तथा नवापणुं के जूनापणुं जे थाय छे ते परिणाम कहेवाय छ. २. (८). भूतकाळपणुं, वर्तमानकाळपणुं के भविष्यकाळपणुं एवा विशेषवाळी जे पदार्थोनी गति के स्थिति विगेरे चेष्टा थाय के ते क्रिया कहेवाय छे. ३. (९). कोइपण द्रव्य ( पदार्थ)जेना आश्रयथी पहेलो थाय ते पर अने पछी थाय ते अपर कहेवाय छे. ४. (१०) आ प्रमाणे या वर्तनादिक चार पदार्थो कहा, ते द्रव्यना पर्यायो ज सिद्ध थाय छ भने तेमने काळशब्दवहे कही शकाय छे. (११). तथा पर्यायो कोइक प्रकारे द्रव्यथी अमिन्न पण होई शके छे, तेथी ते पर्यायोने कोइक वखत द्रव्यना नामथी एटले द्रव्यरूपे सर्ग २८ मो। 'किमिदं भंते कालेत्ति पवुच्चति ? गो० ! जीवा चेव अजीवा चेव त्ति' अत्र द्रव्याभेदवति-वर्तनादिविवक्षया। कालोऽपि वर्तनाद्यात्मा जीवाजीवतयोदितः ॥१३॥ वर्तनाद्याश्च पर्याया एवेति प्राग् विनिश्चितं। तद्वर्त्तनादिसंपन्नः कालो द्रव्यं भवेत्कथम् ? ॥ १४ ॥ पर्यायाणां हि द्रव्यत्वे-ऽनवस्थापि प्रसज्यते । पर्यायरूपस्तत्कालः पृथग् द्रव्यं न संभवेत् ॥ १५ ॥ इत्थं चैतदुरीकार्य वर्तनाद्यात्मकोऽन्यथा । कालास्ति- कायः स्वीकार्यो भवेयोमेव सर्वगः ॥ १६ ॥ न चाहदिष्टादिष्टं तत् सिद्धांते यत्पुनः पुनः। पंवास्तिकाया एवोक्ताः कालो द्रव्यं पृथग् न तत् ॥१७॥ परे स्वाहुः समद्रव्य-प्रवर्ती वर्तनादिकः । पर्यायः कालनामा मा पृथग् द्रव्यं भवत्वहो ॥ १८॥ किंतु योऽर्कादिचाराभि-व्यंग्यो नृक्षेत्र. मध्यगः । कालो न स्यात्कथं कार्या-नुमेयः परमाणुवत् ॥ १६ ॥ यच्छु- पण कही शकाय छे. ते विपे आगममा कपुंछ के (१२).-" हे भगवान् ! काळ ए शुं कहेवाय छे । हे गौतम ! जीव अने अजीव ए काळ ज काय छे. या सूत्रमा द्रव्यथी भमेदपणे रहेला वर्तनादिकने ज मुख्यपणे विक्षाए करीने एटले कहेवानी इच्छाए करीने पर्वनादिक पर्यायरूप काळने पण जीव भने अनीवपणे ज करो छे. (१३). वळी पा वर्त- नादिक चारे पर्यायो ज छ एम प्रथम (उपर ) सिद्ध करी गया छोए, तेथी वर्तनादिकाडे प्राप्त थयेलो काळ चूदं द्रव्य शी रीते थइ शके ? (१४). जो कदाच पर्यायोने जूदा द्रव्य तरीके मानयामा भावे तो अनवस्था नामनो दोप प्राप्त थाय छे. (एटले के दरेक द्रव्यना अनंत पर्यायो होवाची द्रव्पनुं नियतपणुं यह शकरो नहीं ए अनवस्था दोष कहेवाय छे.) तेधी करीने पर्यायरूप काळने जूई द्रव्य कहे ते मममपित थे. (१५). मा रीते जमा घात स्वीकारवी योग्य छे. नहीं तो सर्वत्र व्यापीने रहेला धाकाशने जेम अस्तिकाय फहेवामा मावे के म सर्वत्र व्यापीने रहेला वर्वनादिक स्वरूपमाळा काळने पर मस्तिकायपणे स्वीकारयो जोरशे. (१६) भने ते रीते तो तीर्थकरोने इट पण नथी भने तेमणे कयु पण नधी, कारण के मिदानमा वारंवार पांच ज मस्तिकाय करेला थे। वेधी काळ ए जयं द्रव्य नयी. (एम सिद पाय छ.) (१७). मा पापत उपर पीजा भाचार्यों को मा प्रमाणे कई ऐ-महो! सर्व द्रव्योमा रहेला पर्वनादिक पर्यापने मले फाळ नामनाजूदा द्रव्य सरोकेन कहो. (१८). परंतु पूर्यादिकनी गविषरे स्पष्ट जावी काय यो मनुप्त्यमा (भदी द्वीपमा) रहेलो-पर्ववो कार (४) श्रीकाललोकप्रकाश। द्धपदवाच्यं तत् सदित्यनुमितेरपि । षष्ठं द्रव्यं दधत् सिद्धिं कालाख्यं को निवारयेत् ॥ २० ॥ कालद्रव्ये चासति त-द्विशेषाः समयादयः । कथं गें स्युर्विशेषा हि सामान्यानुचराः खलु ॥ २१ ॥ समयायाश्च कालस्य विशेषाः सर्वसंमताः। जगत्प्रसिद्धाः संसिद्धाः सिद्धांतादिप्रमाणतः ॥ २२ ॥ किंच-सहैव स्यात्किसलय-कलिकाफलसंभवः । एषां निया- मके काल-रूपे द्रव्येऽसति क्षितौ ।। २३ । कालो मृदुतनुर्दीप्र-देहश्च तरुणः पुमान् । जीर्णागः स्थविरश्चेति विना कालं दशाः कथम् ॥ २४ ॥ ऋतूनामपि पल्लां यः परिणामोऽस्त्यनेकधा । न संभवेत्सोऽपि कालं विना- तिविदितः क्षितौ ॥ २५ ॥ तथाहि-हिमातिपाताद्धेमंते प्रत्यग्नि शलभा इव । कंप्रकाया रणदंता पतंति मुदिता जनाः ॥ २६ ॥ जनयंति जने जाड्यं तुपाराश्लेषिणोऽनिलाः। परिष्वजति नीरंधं युवानः कामिनीनिशि परमाणुनी जेम कार्यवडे अनुमान प्रमाणथी केम सिद्ध न थाय ? (१६). वळी जे द्रव्य शुद्ध (एक ज) पदथी (शब्दथी ) कहेवातुं होय, ते सत् एटले विद्यमान ज छे, एवा अनुमान प्रमाणथी पण काळ नामर्नु छठे द्रव्य सिद्ध थाय छे. तेने कोण निवारी शके तेम छे ? (२०) छतां पण जो काळ नामर्नु जूदं द्रव्य न होय तो ते काळना समयादिक जे विशेपो ( भेदो) ले ते शी रीते थइ शकशे-कही शकाशे ? केमके सामान्यने अनु- सरनारा ज विशेपो होय छे. एटले के सामान्य (काळ) विना विशेषो (समयादिक) होइ शके ज नहीं. (२१). अने समयादिक ए काळनाज विशेषो छ ए वात सर्वने मान्य छ, जगतमा प्रसिद्ध छे अने सिद्धांत विगेरेना प्रमाणथी पण सिद्ध छे. (२२). वळी जो पृथ्वी उपर (पत्रादिकर्नु ) नियामक काळरूप जूदुं द्रव्य न होय तो वृक्षोने एकी साथेज पत्र, पुष्प अने फळनी उत्पत्ति थवी जोइए. (२३). वळी बाळकनुं शरीर कोमळ होय छे, युवान पुरुपर्नु शरीर देदीप्यमान होय छे अने वृद्धनुं शरीर जीर्ण होय छे, तो आवी वान्यादिक अवस्थायी काळ विना शी रीते घटी शकशे ? २४). छए ऋतुश्रोनो अनेक प्रकारको परिणाम के जे पृथ्वी पर अत्यंत प्रसिद्ध छे ते पण काळ पिना संभवतो नथी. (२५). ते या प्रमाणे- हेमंत ऋतुमा घणुं हिम पडवाथी कंपता शरीरवाळा अने कडकडता दांतवाळा लोको हर्पथी ज पतंगीयानी जेम अग्नि तरफ दोडे छ. (२६). जळकणने स्पर्श करनारा वायुओ मनुष्योने विपे जडत्ता उत्पन्न करे थे, तेथी युवान पुरुषो रात्रीए स्त्रीमोनु गाढ आलिंगन १ शीतल वायुधी मनुष्यो ठरी जाय छे.

सर्ग २८ मो। (५) ॥ २७ ॥ महासरांसि स्त्यायंति दह्यतेऽभोजिनीवनं । उज्जृभते नवो- द्भिन्न-यवादिषु च यौवनं ॥ २८ ॥ अवहिश्चारिणां रात्रौ शिशिरे संत्र- तात्मनां । असंयम इवीणां विशां स्यादप्रियः शशी ॥ २९ ॥ पूर्णो- रसंगाः फलैः पक्वै-वृताः शिशुकदंवकैः। बदर्यो मातर इव दधति द्युति- मद्भुतां ॥ ३० ॥ कुंदवल्लयः शुभ्रदीप्र-प्रसूनदशनश्रियः। हसंतीव हिम- म्लाना-ननं कमलकाननं ॥ ३१ ॥ उत्फुल्लनानाकुसुमा-सवपानमदो- दुराः। भ्राम्यंति भ्रमरा भूरि-रजोधूसरभूघनाः ॥ ३२ ॥ दत्ताश्रया दत्तभोज्या माकंदैरुपकारिभिः। अभ्यस्यंतीव कामोप-निपदं कोकिन- द्विजाः ॥ ३३ ।। ग्रीष्मे दिनकरः क्रूरैः करैः शोषयति क्षितिं । कलौ नृप इवोदेति तृष्णा लोकेऽधिकाधिका ॥ ३४ ॥ भाग्याढ्यानां धनमिव करे छे. (२७). मोटा सरोवरो ठरी जाय छे, कमळनां वन पळी जाय छे भने नवा उगेला यवादिक धान्योने विपे युवावस्था विकास पामे छे (धान्यो बहु सारा पाके छे.) (२८). मुनियोनी जेम माणसो शिशिर ऋतुमा रात्रे यहार नीकळता नथी अने प्रात्मानो संवैर करे छ, तथा मुनियोने अमंयमनी जेम तेमने (मनुष्यने) चंद्र उपर प्रीति थती नथी. (२६). पाकेला फळो ( पोर ) बडे जैमना उत्संग ( मध्यभाग) पूर्ण थया छे एवी पोरडीओ मातानी जेम पाळकोना समूहथी परिवरेली (चींटायेली) होय छे तेथी ते भवसुत कांतिने धारण करे थे. (३०). हिमधी करमाइ गयेला मुखवाळा कमळना पनने श्वेत भने विकस्वर पुष्परूपी दांववढे शोमती कुंदलतामो हमे छे. अर्थात् शिशिर ऋतुमा पोरडीने चोर भावे छ, कुंदलता सीले छ भने कमळो करमाइ जाय छे. (३१). वसंत ऋतुमा सीलेला विविध प्रकारना पुप्पोना रसर्नु पान करवायी मदोन्मच थयेला ममराभो चोत- रफ ममे छ भने तेमना शरीर घणी रजधी धूमरवर्णपाळा ( भुखरां) थयेला होय छे. (३२). थानचोरूपी उपकारी ( दातार ) पुरुषोए कोयलरूपी ब्राह्मणोने रहेबानो माश्रय प्राप्यो होय छे भने भोजन पण पाप्यु होय छे, तेथी तेश्रो जाणे कामरूपी उपनिषद (वेद) नो अभ्यास करता होय तेम शोमे छे. ३. (३३). ग्रीष्म ऋतुमा कलियुगना राजानी जेम सूर्य पोताना उग्र करो (किरणो) बडे पृध्वीने चुसी ले थे मने लोको अधिक भधिक हप्णायाळा पाय छे. (३४). माग्यशाळी पुरुषोना घननी जेम दिन दिन १ माणसो शरीरने पसपी दाकी देथे भने मुनिमी पाप मापनोथी मारमाने दांहीरे देतेपी पेमा शीतलता जेवा कर्मनी प्रदेश यह रास्तो नयी. - (६) श्रीकाललोकप्रकाश । वर्द्धतेऽनुदिनं दिनं । निरुद्यमानां विद्येव क्षीयते चानिशं निशा ॥३५॥ चंद्रचंदननिर्यास-वासितांगा विलासिनः । नयंत्यहान्युपवने-बंधुक्रीडा- परायणाः ॥ ३६ ॥ वर्षासु जलमुग्धारा-धोरणीधौतधूलयः। कृतस्नाना धराधीशा इवाभांति धराधराः ॥ ३७॥ मही भाति महीयोभिः सर्वतो हरितांकुरैः। रोमांचितेवांवुवाह-प्राणप्रियसमागमात् ॥ ३८ ॥ रुंधति सरितो लोकं मार्गगं कुलटा इव । प्रिया इव प्रियान् गाढ-मालिंगति लतास्तरून् ॥ ३९ ॥ द्योतते विद्युतो मेघा वर्पत्यूजितगर्जिताः । उचैन- दतोमायति शिखिचातकदर्दुराः ॥४०॥ उपैति वृद्धिं शरदि प्रतापः पुष्प- दंतयोः ॥ नृपांतिकेऽन्यायिवक्त्र-मिव शुष्यति कर्दमः ॥ ४१ ॥ शालि- प्रभृतयो धान्य-श्रेणयो नम्रमौलयः। फलोद्रेकेऽपि विनया-व्यंजयंति सतां स्थिति ॥ ४२ ॥ क्रीडंति फुल्लांभोजेपु सरस्सु स्वच्छवारिषु । राज. हंसा राजहंसा इव दर्पणवेश्मसु ॥४३॥ शनैः शनैः संचरंति शालि- प्रत्ये दिवस घृद्धि पामे थे अने उद्यम रहित (आळसु) पुरुषोनी विद्यानी जेम रात्रि निरंतर चय पामे के (ओछी ओछी थती जाय छे). (३५) विलासी पुरुषो वागमा जइने पोताना शरीरने चंद्र जेवा शीतळ चंदनना रसवडे वासित करी तथा बळक्रीडामा तत्पर थइ दिवसोने निर्गमन करे छ. ४ (३६). वर्षा ऋतुमा मेघनी धाराना समूहवडे पर्वतोनी धूळ घोचाइ जाय छे तेथी ते पर्वतो स्नान करेला राजानी जेवा शोभे छे. (३७). मेघरूपी प्राणप्रिय (पति) नो समागम थवाथी पृथ्वीरूपी स्त्री चोवरफ उगेला मोटा लीला घासूना अंकुरावडे जाणे रोमांचित थइ होय तेम् शोभे छे. (३८) कुलटा स्वीमोनी जेम नदीमो मार्गमा चालनारा (वटेमार्गु) लोकोने रुंधे छे-अटकावे छे, जेम प्रियायो पतिने श्रालिंगन करे छे तेम लतामो वृक्षोने गाढ आलिंगन करे छे. (३६) वीजळीयो झबके छे, मेघो मोटी गर्जनापूर्वक वृष्टि करे छे, तथा मोर, चातक भने देडका मो मोटा शब्द- पूर्वक हर्प पामे छे-नृत्यादिक करे छे. ५ (४०) शरद ऋतुमा सूर्य चंद्रनो प्रताप वृद्धि पामे छे, राजानी पासे अन्यायी माणसना मुखनी जेम कादव सुकाइ जाय छे. (४१) फळनुं अधिक- पणुं छतो पण डांगर विगेरे धान्यसमूहना मस्तको नीचा नमी जाय छ, तेथी तेभो एम जणावे छे के नम्रता विगेरे विनयथीज सत्पुरुपनी स्थिति होय छे. (४२).जेम अरिसाभवनने विपे चक्रवर्ती राजाभो क्रीडा करे छ, तेम विकस्वर कमळवाळा भने स्वच्छ पाणीवाळा सरोवरने विपे राजहंस पक्षीमो क्रीडा करे छे. (४३). शालिना क्षेत्रनी प्रांत भूमिने विषे .

सर्ग २८ मो। । क्षेत्रांतभूमिपु । प्रसरगोपिकागीत-दत्तकः प्रवासिनः ॥४४॥ उच्चै- रुपदिशंतीव मंचस्थाः क्षेत्ररक्षकाः। परोपकारं धान्येपु धुतमौलिषु विस्म- यात् ॥ ४५ ॥ रक्षितेवपि जाग्रद्भि-दृपक्ष्यग्रकरैनरैः । परक्षेत्रेवापतंति पक्षिणः कामुका इव ॥ ४६ ॥ एवं नानाविधो लोके ऋतुभेदोऽपि विश्रुतः । निर्हेतुको भवन् कालं स्वमाक्षिपति कारणं ॥४७॥ तथाहि-चूताद्याः शेषहेतूनां सत्त्वेऽपि फलवंचिताः । कालद्रव्यमपेचंते नानाशक्तिसमन्वितम् ॥ १८ ॥ किंच- वर्तमानातीनभावि-व्यपदेशोऽपि दुर्घटः । विना कालं मिथोऽर्थानां सांकीण्यं चापि संभवेत् ॥ ४९ ॥ तथाहि-वर्तमानव्यपदेश-मतीतोऽना- गतोऽपि वा। भजेन्नियामकाभावे तत्कालोऽस्ति नियामकः ॥५०॥ तत्रातीतो द्विधाऽभाव-विषयप्रतिभेदतः। विनष्टो घट इत्याद्यो- द्राक्षं तमिति चापरः ॥५१॥ भाव्यप्येवं द्विधा तत्रा-दिम उत्पत्स्यमानकः । (छेडे ) गवाता गोपिकामोना गीत सौमळवामा पथिकजनोए पोताना कान मांड्या होय थे, तेथी तेमो धीमे धीमे चाले छे. (४४). मांचा उपर रहेला क्षेत्रना रक्षको मस्तकने धुणावता एवा धान्योने विपे विस्मय पामीने जाणे परोपकारनो उपदेश देता होय तेम जणाय छे. (४५). जागता ( सावधान ) भने हापमा पत्थरवाळी गोफण राखीने रहेला पुरुषो धेनुं चोतरफथी रक्षण करे थे, तोपण तेमा परघरमा कामुक पुरुषोनी जेम पधियो माये ज छे. (भटकता नथी) ६. (४६). भा रीते विविध प्रकारनो तुनो मेद पण जगतमा प्रमिद्ध छे, ते हेतु विना होर शके नहीं, तेथी काळ ज शेर्नु कारण छे एम ते आक्षेप करे थे. (४७). ते पा प्रमाणे -मान विगेरे पृषो पीजा सर्व कारणो बता पण (तरतमा ) फळ रहित होय थे, तेथी ते विविध शक्तिवाला काळद्रव्यनी अपेक्षा राखे छे. (४). वळी काळद्रष्ग न मानीए तो पर्वमान, भूत भने भविष्य कयन पण पटी शकतुं नथी, तथा पदार्पोनी परस्पर मित्रता था जवानो संभव छ. (४९). कारण के जो पदार्यनो नियामक काळ न होप तो प्रतीत भपया मनागत पदार्थ पण वर्तमानना व्यपदेशने पामी शके छे, तेपी वेनो नियामक फाळ जछे एम मानपुं योग्य छे. (५०). तेमा मतीत काळ पे प्रकारनो ई-ममात्र भने विषप. तेमा 'पट विनाश पाम्यो'एभमाष भतीत छ, भने ' 'तेने में जोयो हवा.' १ पट विगेरे पदार्थने. " . (८) श्रीकाललोकप्रकाश ! घटाद्यों द्वितीयस्तु गमिष्यन्नक्षगोचरं ।। ५२ ।। किंच-क्षिप्रं चिरं च युगप-मासवर्षयुगादयः। परुत्पराउँपमोद्य-ह्याश्वःकदाचिदादयः॥५३॥ लोके ख्याताः संति शब्दाः कालद्रव्याभिधायिनः। तेऽपि शुद्धपदत्वा- स्वा-भिधेयमनुमांति वै ॥ ५४ ॥ कालः षष्ठं पृथग् द्रव्य-मागमेऽपि निरूपितं । कालाभावे च तानि स्युः सिद्धांतोक्तानि पद् कथं ॥ ५५ ॥ तथा चागम:-'कइ णं भंते ! दवाए ? गो० छ दव्या ५० त० धम्मत्थि- काए, अधम्मस्थिकाए, आगासस्थिकाए, पुग्गलस्थिकाए, जीवत्थिकाए, अद्धासमए य ' एवं कालः पृथग्द्रव्यं सिद्धो युक्त्यागमेन च । उपकारश्च तस्य स्युः पूर्वोक्ता वर्तनादयः ॥ ५६ ॥ वर्तनादिस्वरूपं च सामान्येनो- दितं पुरा। अथ किंचिद्विशेषेणो-च्यते शास्त्रानुसारतः ॥ ५७ ॥ तत्र च-द्रव्यस्य परमाण्वादे-र्या तद्रूपतया स्थितिः। नवजीर्णतया वा सा वर्तना परिकीर्तिता ॥५८॥ इतिमहाभाष्यवृत्त्यभिप्रायः, तथाच तत्पाठः ए बीजो विषय अतीत के. (५१) भविष्यकाळना पण ते ज वे प्रकार के तेमा 'घटादिक पदार्थ काले उत्पन्न थशे. ' ए अभाव भविष्य छ, भने 'तेने हुँ काले जोइश.' ए चीजो विषय भविष्य कहेवाय छे. (५२). तेमज बळी जलदी, चिरकाळ, एकी साथे, मास, युग विगेरे, पोर, परार, ओण, आज, गइ काल, श्रावती काल अने कदाचित् विगैरे जे कालद्रव्यने कहेनारा शब्दो लोकमां प्रसिद्ध छे, ते पण शुद्धपद ( एक ज शब्द ) होवाथी पोताना अर्थने अनुमानथी सिद्ध करे छे. (५४). वळी काल नामर्नु छर्छ जूढं द्रव्य आगममा पण कहेलुं छे. केमके कालद्रव्य न होय तो सिद्धांतमा कहेला ते छ द्रव्यो शी रीते थइ शके १ (५५). ते विपे आगममा कयुं छे के-" हे भगवान् ! द्रव्य केटलांछे ? हे गौतम ! छ द्रव्यो कहेला छे, ते आ प्रमाणे.--धर्मास्तिकाय १, अधर्मास्तिकाय २, आकाशास्ति- काय ३, पुद्गलास्तिकाय ४, जीवास्तिकाय ५ अने श्रद्धासमय (काल) ६." या प्रमाणे युक्तिवडे अने भागमवडे काळ भिन्नद्रव्य छे एम सिद्ध थयु. ते काळनो उपकार (उपयोगिता) पूर्वे कहेला वर्तनादिक ज छे. (५६). आ वर्तनादिकनुं स्वरूप प्रथम सामान्यपणे कही गया छीए. हवे नहीं शास्त्रने अनुसारे काइक विशेष प्रकारे कहीए छीए. (५७)- तेमा परमाणु विगेरे द्रव्यनी जे ते रूपे स्थिति, अथवा ते परमावादिकनी जे नवापणाए के जुनापणाए स्थिति, ते वर्तना कहेली छ. (५८). ा प्रमाणे महा- १ द्रव्यरूपे होवापणाने. २ परमाण्वादिकरूपे. .

" सर्ग २८ मो (९) -अत्रैव तत्परमाण्वादिरूपेण (द्वयणुकत्र्यणुकादिरूपेण ) परमावा- दिद्रव्याणां (वर्तन) वर्त्तना इति ४३५ तमपत्रे, तथा तत्र “विवक्षितेन नवपुराणादिना तेन तेन रूपेण यत्पदार्थानां वर्णनं शश्वद्भवनं सा वर्तना" इत्याद्यपि तत्रैव ८३६ पत्रे. तधा तेस्तै वैः स्वतो ह्यर्था वर्त्तते, तत्प्रयो- जिका वृत्तिः-कालाश्रया या सा वर्त्तनेत्यभिधीयते इति तत्वार्थवृत्त्या- शयः, तथा च तद्वचः-वर्तना कालाश्रया वृत्तिरिति वर्ततेऽर्थाः स्वयमेव तेषां वर्तमानानां (प्रयोजिका) कालाश्रया वृत्तिर्वर्त्यते यया सा वर्तना इति २४५ तमपत्रे. धर्मसंग्रहणीवृत्तेरप्ययमेवाशयः । नानाविधा परिणति-द्रव्यस्य सत एव या। परिणामः स कुंभादि- म॒व्यादेरिवोदितः ॥ ५९॥ यथांकुराद्यवस्थस्य परिणामो वनस्पतेः । मू- लकांडादिभावेन स्वजात्यपरिहारतः॥ ६०॥ यथा वयःपरीणामो देह- भाष्यनी धृत्तिनो अभिप्राय छे. तेमा ४३५ मा पानामा कयुं छे फे-परमाण्यादिक द्रव्योर्नु जे परमायादिकरूपे रहे ते वर्तना कहेवाय थे, तथा ते परमावादिकने विषे कहेवाने इच्छेला नवीन, पुराण विगेरे ते ते रूपे पदार्थोनुं जे वर्तमापणुं एटले निरंतर होनापणुं ते पण वर्तना कहेवाय छे. इत्यादि पण ते ज महामायनी वृत्तिमा ८३६ मा पानामां कडं छे. तथा पदार्थों से ते मावे करीने (ते ते रूपे) पोतानी मेळे ज व छ, ते वर्तवामा जे प्रयोजन (कारण) रूपे होय, ते काळना श्राश्रयवाळी वर्तना कहेवाय छे." एम चार्थनी टीकानो भभिप्राय छे. ते विपे तेमा कयु छ के-" वर्तना एटले काळना आश्रयवालं होवापपुं, एटले के पदार्थो पोतानी मेळे ज वर्ते छ, भने वर्तता एवा ते पदार्थोनी काळना प्राश्रयवाळी जे पृत्ति (एटले जेनावडे वर्तवानु थाय ) ते वर्तना कहेवाय छे. मा प्रमाणे २४५ मा पानामा कयुं छे. धर्मसंग्रहणीनी टीकानो पण मा ज अभिप्राय छे. इति वर्वना. १. छता पदार्थनी जे विविध प्रकारनी परिणति ते परिणाम कहेवाय छे. जेमके माटी विगैरे पदार्थनी जे कुंभादिकरूपे परिणति ते (कुंभादिक) परिणाम कवाय छे. (५६). जेम भकुरादिक अवस्थाबाळा यनस्पति (पधादिक) ना मूळ, पड विगेरे पोतानी जातिने मनुसरता परिणाम पाय थे. (६०). जेम प्राणीमोना शरीररूपी १ विशेपावश्यक भाष्य यापेक्ष माग ५. २ छत्वायं सटीक झापेज. " (१०) श्रीकाललोकप्रकाश। द्रव्यस्य चांगिनां । दध्यादिपरिणामो वा द्रव्यस्य पयसो यथा ॥ ११ ॥ हेम्नो वा मौलिमुद्रादि-भावैः परिणतिर्यथा। परिणामो विफणत्वो- कणवादिरहेर्यथा ॥६२॥ द्विधा सादिरनादिश्च स चायोऽभ्रादिगोचरः। धर्माधर्मास्तिकायादि-गोचरः स्यात्ततोऽपरः ॥६॥ त्रिधा यद्वा परीणाम- स्तत्राद्यः स्यात्प्रयोगजः। द्वितीयस्तु वैनसिक-स्तृतीयो मिश्रकः स्मृतः ॥ ६४ ॥ तत्र जीवप्रयत्नोत्थः परिणामः प्रयोगजः । शरीराहारसंस्थान- वर्णगंधरसादिकः ॥ ६५ ॥ केवलोऽजीवद्रव्यस्य यः स वैनसिको भवेत्। परमाण्वश्रंद्रधनु:-परिवेपादिरूपकः ।। ६६ ॥ प्रयोगसहचरिता-चेतन- द्रव्यगोचरः। परिणामः स्तंभकुंभा-दिकः स मिश्रको भवेत् ॥ ६७ ॥ अशक्ताः स्वयमुत्पत्तुं परिणामेन तादृशाः । कुंभादयः कुलालादि-साचि- व्येन भवंति हि ॥ ६८॥ इति परिणामः ॥ पदार्थनो बाल्यावस्थादिक वयरूपे परिणाम थाय छे. जेम धरूप द्रव्यनो दहीरूपे परि- णाम थाय छे. (६१). जेम सुवर्णरूप द्रव्यनो मुगट अने मुद्रा ( वीटी) विगेरे रूपे परिणाम थाय छ, तथा जेम सर्परूप द्रव्यनो फणा रहितपणुं अने फणा सहितपणुं विगेरे परिणाम थाय छे. (६२), श्रा परिणाम सादि अने अनादि एवा वे प्रकारनो छ, तेमा वादळां विगेरे परिणाम सादि कहेवाय के अने धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय विगैरे परिणाम अनादि कहेवाय छे. (६३). अथवा पा परिणाम त्रण प्रकारको कयो छे. तेमा पहेलो प्रयोगथी थयेलो, बीजो विलसा (स्वभाव ) थी उत्पन्न थयेलो अने त्रीजो मिश्र (बनेथी उत्पन्न थयेलो) कह्यो छे. (६४) तेमा जीवना प्रयत्नथी जे परिणाम थाय छे ते प्रयोगज कहेवाय छे. शरीर, आहार, संस्थान, वर्ण, गंध, रस विगैरे परि- णाम प्रयोगज कहेवाय छे. (६५). परमाणु, वादळां, इंद्रधनुप अने परिवेप विगेरे जे केवळ अजीव द्रव्यनो परिणाम थाय छे, ते वैससिक कडेवाय छे. (६६ ). जीवना प्रयोग सहित अचेतन द्रव्यना विषययाळो जे स्तंभ, कुंभ विगेरे परिणाम थाय छे ते मिश्र परिणाम कहेवाय छे. (६७). कारणके पोतानी मेळे परिणामयडे उत्पन्न न थइ शके तेवा कुंमादिक पदार्थों कुंभार विगैरेनी सहायथी ज थाय छे. (६८). इति. परिणाम. २. . १ चंद्रनी फरतुं कुंडाळु थाय के ते.

सर्ग २८ मो। (११) क्रिया देशांतरप्राप्ति--रूपातीतादिका तथा ।प्रोक्ता भाष्यस्य टीकायां तत्वार्थविवृतौ पुनः ॥६९॥ करणं स्याक्रिया द्रव्य--परिणामारिमका च सा। कालोऽनुग्राहकस्तस्याःप्रयोगादेस्त्रिधा च सा ॥ ७० ॥ तत्र च-प्रयोग- जात्मयोगोत्था विलसाजा त्वजीवजा। मिश्रा पुनस्तदुभय--संयोगज- निता मता ॥ ७१ ॥ इति क्रिया ।। प्रशंसाक्षेत्रकालाख्य-भेदतस्त्रिविधं मतं । परत्वमपरत्वं च तत्राद्य गुणसंभवं ॥७२॥ परः सर्वोत्तमत्वेन जैनो धर्मः परोऽपरः । क्षेत्र तत्तु दूरस्थः परोऽभ्यर्णगतोऽपरः ॥ ७३ ॥ तथा-अभ्यर्णदेशसंस्थोऽपि पर एव वयोऽधिकः । वयोलघुर्विप्रकृष्ट-देशस्थोऽप्युच्यतेऽपरः ॥७४ ॥ दिशः परापरत्वाभ्यां वैपरीत्यात् स्फुटे तु ये । इमे परापरत्वे स्तः कालोऽनुग्राह- कस्तयोः ॥ ७५ ॥ वर्तनाद्यास्त्रयः पूर्वो-दितास्पुि तांतिमं । परापरत्वं देशांवरनी प्राप्तिरूप क्रिया कहेवाय छे. ते अतीतादिक (एटले अतीत, वर्तमान भने भविष्य ) एम प्रण प्रकारे भाप्यनी टीकामा कहेली छ, तथा तत्त्वार्थनी टीकाने विपे तो करणने क्रिया कही छे. ते द्रव्यना परिणामरूप छे. ते क्रियानो भनुग्रह (उपकार ) करनार काळ थे तथा ते क्रियाना प्रयोगादिक व्रण प्रकार कह्या थे. (७०) वेमा जे जीवना व्यापारधी उत्पन्न थाय ते प्रयोगजा, केवळ अजीव द्रव्यथी उत्पन्न थाय ते विस्रसाजा भने जीव तथा अजीव वनेना संयोगथी जे उत्पम थाय ते मिश्रा क्रिया कहेवाय छे. (७१). इति क्रिया. ३. प्रशंसा, क्षेत्र अने काळ नाम्ना भेदथी परत्व भने अपरत्व प्रण प्रकारचें कहुं छे. तेमा पहेलुं परत्वापरत्व गुणथी उत्पन थाय छे. (७२). जेमके जैनधर्म सर्व धर्ममा उत्तम हामी र के भने अन्य धर्म पर थे. हवे वीजु क्षेत्रको उत्पन्न यतुं परत्व भने अपरत्व प्राप्रमाणे छे.जे जीवादिक पदार्थ दूर स्थानमा रहेला होय ते पर कहेवाय छ मने पासेना स्थानमा रहेला होय ते अपर कहेवाय छे. (७३). तथा ( काळयी परा- परत्व मा प्रमाणे छे- पासेना स्थानमा रहेलो पण जो ते वयची अधिक (मोटो ) होय तो ते पर कहेवाय छ भने दूर स्थानमा रहेलो पण जो ते लघु वयवाळी होय तो ते अपर फहेवाय छे. (७४).दिशाना (प्रना) परापरत्ययी थने तेथी विपरीवपणाधी एटले मोटी नानी चयन प्राचीन जे या चीजा भने ग्रीमा प्रकारना परापरत्व क्या वेनो अनुग्रह कर• नार काळ 2. (७५). इति परापरत्व. ४. १ एक स्थानयी वीजा स्याने जवानी. २ करते.

(१२) भीकाललोकप्रकाश। कालस्य चत्वारोऽनुग्रहा श्रमी ॥७६॥ तथोक्तं तत्वार्थभाष्ये-पथ काल- स्योपकारः क इत्यत्रोच्यते--वर्त्तना परिणामः क्रिया परापरत्वे च कालस्येति. सार्द्ध द्वीपद्वयं वाद्धि-युगं च व्याप्य स स्थितः। त्रि:पंचदशभिर्लक्ष- योजनानि मतस्ततः ॥ ७७॥ नन्वेवं वर्तनादीनां लिंगानां भावतो यथा। नृक्षेत्रमध्ये कालोऽगी-क्रियतें श्रुतकोविदः ॥ ७८ ॥ वृक्षेत्रा. त्परतोऽप्येप ऊ धोलोकयोरपि । वर्तनादिलिंगसत्वा-कुतो नाभ्युप- गम्यते ॥ ७९ ॥ वर्तना किल भावानां वृत्तिः सा तत्र वर्तते । श्रायुः प्राणापानमानं परापरस्थिती अपि ॥५०॥ अत्रोच्यते-वर्त्तते तत्र भावानां वृत्तिः सा किंतु नेष्यते। काललिंगं तदीयाया अपेक्षाया अभा- वतः॥ ८१॥ उत्पयंते विलीयंते तिष्ठति स्वयमेव हि। संतः पदा- स्तेिषां चा-स्तित्वं नान्यव्यपेक्षया ॥ ८२ ॥ प्राणादयोऽपि जायते पूर्वे कहेला वर्तनादिक त्रण भने छेन्टु कहेलुं जे परापरत्व, ते चारे काळना ज अनु- ग्रहो छ। एटले के ते चारेनो उपयोग काळथी ज थाय छे. (७६). ते चिपे तत्वार्थ- भाष्यमा कयु छ के-"काळनो उपकार शुं छे' ( काळ शुं उपकार करे छ ?) उत्तर-वर्तना, परिणाम, क्रिया अने परापरत्व ए चारे काळना उपकार छ (सिद्ध कर- नारा छे)." ते काळ मात्र अढी द्वीप अने वे समुद्रमा व्यापीने (पाश्रीने ) रहेलो छ, तेथी ते पीस्तालीश लाख योजन प्रमाण क्षेत्रमा ज मानेलो छ. (७७). अहीं कोई शंका करे के-जेम वर्तनादिक लिंगना होवापणाथी पंडितो मनुष्यक्षेत्रमा काळने अंगीकार करे छे. (७८). तेम मनुष्यक्षेत्रनी बहार तथा ऊर्बलोकमां अने अधोलोकमां पण वर्तनादिक लिंग होवाथी केम काळने अंगीकार करता नथी ? (७६). कारणके अढी द्वीपनी बहार पण सर्वत्र पदार्थोनी धृत्तिरूप वर्तना तथा आयुष्य, प्राणापान- (श्वासोच्छ्वासk) प्रमाण अने परापरत्वनी स्थिति पण रद्देली छै. (८०). या शंकानो उत्तर प्रापे के-अढी द्वीपनी बहार सर्वत्र पदार्थोनी वृत्तिरूप वर्तना छे खरी, परंतु ते वर्तना काळजें लिंग के एम इच्छातुं नथी; केमके त्या पदार्थनी वर्तनाने काळलिंगनी अपेक्षा ज होती नथी. (८१). त्यां रहेला पदार्थो पोतानी मेळे ज उत्पन्न थाय बे, नाश पामे के अने स्थिर रहे छे. मना होवापणामा वीजानी अपेक्षा ज नथी. (८२) तथा त्या प्राणादिक पण काळनी अपेक्षाए १ होवापणारूप.

सर्ग २८ मो। (१३) तत्र नाद्धाव्यपेक्षया । सजातीयेषु सर्वेषु युगपत्तदनुद्भवात् ॥८३ ॥ कालापेक्षाः पदार्था हि युगपत्तुल्यजातिषु । संभवंतीह माकंदा-दिषु मंजरिकादिवत् ॥४॥ भवंति युगपन्नैव ताः प्राणादिप्रवृत्तयः । तत्रत्यानां तदेताः स्युः कालापेक्षा न कहिचित् ॥ ८५ ॥ परापरत्वे ये तत्र कालापेक्षे न ते अपि । स्थित्यपेचे किंतु षष्टि-वर्षाद्वर्षशतः परः ।। ८६ ॥ जातवर्षशताच्चापि पष्टिवर्पो नरोऽपरः । वत्सराणां शतं पष्टि- रित्येपा च स्थितिः खलु ॥ ८७ ॥ स्थितिश्च सर्वभावानां भवेत्सत्वव्यपे- क्षया । सत्त्वं चास्तित्वमेव स्या-त्तच्च नान्यमपेक्षते ॥ ८८ ॥ एवं च कालापेक्षाया अभावादेव नोच्यते। तत्रत्यवर्त्तनादीनां काललिंगत्वमुत्तमैः ॥८९ ॥ अत्रेदं तत्त्वं प्रतिभासते-भूपसत्त्वाद्यथेह स्या-सौस्थ्यादि तदपेक्षितं । भूपाभावात्सदपि त-चदपेक्षं न युग्मिषु ॥ ९०॥ तथेह एटले काळने आधीने थता नथी; केमके सगान जातिवाळा ते सर्वने विष एकसाथे ते प्राणादिकनी उत्पत्ति के नहीं. (८३). कारणके समान जातिवाळा पदार्थोने विषे काळनी अपेक्षावाला पदार्थो एकी साथे ज उत्पन्न थाय छे. जेमके भाम्र विगैरे वृक्षो उपर तेनी मांजर विगेरे एकीसाथे ज उत्पम थाय छे (तेवू अढी द्वीपनी यहार क्योइ पण नधी) (त्या छ तुमओ नथी मने तजन्य वर्तना नथी). (८४). त्या रहेला पदार्थोनी ते उपर कहेली प्राणादिकनी प्रवृत्ति पण एकीसाथे थती ज नथी, सेथी प्राणादिकनी प्रवृचिने कदापि काळनी अपेक्षा छ ज नहीं. (८५). तेम ज त्यांना पदार्थोमा जे परत्व भने अप- रत्व थे ते पण काळनी अपेक्षाघाळा नथी; परंतु स्थितिनी अपेक्षागाळा 2. एटले के साठ वर्षना नरथी सो वर्पनो नर पर छे धने सो घर्पना नरथी साठ वर्षनो नर अपर छे. सो वर्ष भने साठ वर्ष एवी ज ते स्थिति छे. (८७). सर्व पदार्थोनी भावा प्रकारनी स्थिति सचंनी अपेक्षाकडे ज होय छे. सच एटले अस्तित्व भने अस्तित्व बीजानी अपेक्षा करतुं ज नथी. (८). पा रीते काळनी अपेक्षा नहीं होवाथी ज उत्तम पुरुषो त्यो रहेला पदार्थोना वर्तनादिकने कानुं लिंग कहेता नधी. (८६). महीं आ सध जग्गाय 2.-जेम हालना घरातमा मा देशमा राजा होपाधी लोकोने ते राजानी अपेक्षावाल्लु मुगादिक धाय थे अने युगलिपाना पसतमा राजा नहोता अने लोकोने मुख इतुं तो पप ते मुख राजानी १ सत्ता-होवापj.

१४) श्रीकाललोकप्रकाश कालसत्त्वात्त-रसापेक्षं वर्तनादिकं । कालाभावात्तदपेक्षं नरक्षेत्राइहिर्न सत् ॥ ९१ ॥ तद्वदिऋतुद्रुम-सुमादिनयत्यकारणं कालः । तपनादि- गतिव्यंग्यः समयादिर्ननु नृलोक एव स्यात् ॥ ९२ ॥ कालशब्दस्य निक्षेपा-श्चैकादश निरूपिताः । सन्नाम १ स्थापना २ कालौ द्रव्या ३ द्धा ४ संज्ञकौ च तौ ॥९३ ॥ यथायुप्को ५ पक्रमाख्यौ ६ देश ७ काला ८ भिधौ च तौ । प्रमाण 8 वर्ण १० नामानौ भाव ११ कालश्च ते स्मृताः॥४॥ सचेतनाचेतनयो-द्रव्ययोर्यद्विधीयते । कालेत्याख्या स्थापना वा तौ नामस्थापनाभिधौ ॥६५॥ द्रव्यमेव द्रव्यकालः सचेतनमचेतनं ! कालोत्थानां वर्तनादि-पर्यायाणामभेदतः ॥६६॥ सचित्ताचित्तद्रव्याणां सादिसांतादिभेदजा। स्थितिश्चतुर्विधा यद्वा द्रव्यकालः प्रकीर्त्यते ॥ ७॥ सचेतनस्य द्रव्यस्य सादिः सांता स्थितिर्भवेत् । सुरनारकमादि-पर्यायाणामपेक्षया ॥ ६८ ॥ सिद्धाः अपेक्षावालं होतुं नथी. (९०). ते ज प्रमाणे महीं अढी द्वीपमा काल छे. तेथी तेनी अपेक्षावाळा वर्तनादिक कहेवाय छ, अने मनुष्य क्षेत्रनी बहार काळनो अभाव छ तेथी तेनी अपेक्षावाळा वर्तनादिक कहेवाता नी. (६१). तेथी करीने वर्षादिक छए ऋतुमो धने घृतना पुष्पादिकने नियमित उत्पन्न करवानुं कारण काळ ज छे अने तेवो सूर्यादिकनी गतिथी जाणी शकाय एवो काळ आ मनुष्यक्षेत्रमा ज छे. (६२). हवे काळ शब्दना अग्यार निक्षेपा कहेला छे. ते आ प्रमाणे.-सम्मामकाळ १, स्थापनाकाळ २, द्रव्यकाळ ३, श्रद्धाकाळ ४, यथायुष्ककाळ ५, उपक्रमकाळ ६, देश- काळ ७, काळकाळ ८, प्रमाणकाळ ६, वर्णकाळ १० अने मावकाळ ११. (६४). तेमा सचेतन के अचेतन कोइ पण पदार्थ- काळ एवं नाम पाउधुं होय ते सन्नामकाळ कहेवाय छे. १. कोइ पण पदार्थनी काळरूपे स्थापना करी होय ते स्थापनाकाळ कहेवाय छे. २. (६५). सचेतन के अचेतन द्रव्य ज द्रव्यकाळ कहेवाय छ, केमके ते द्रव्य अने काळने पाश्रीने उत्पन्न थता तेना वर्तनादिक पर्यायो ए चनेनो परस्पर अभेद छे माटे. (६६). अथवा सचित्त भने अचित्त द्रव्योनी जे सादिसांत विगेरे चार प्रकारनी स्थिति छे, ते द्रव्य काळ कहेवाय छे. (९७). सचेतन (जीव) द्रव्यनी देव, नारक, मनुष्य विगेरे पर्यायोनी अपेक्षाए सादिसांत (१) स्थिति छे. (९८). सिद्धना जीवो सिद्धपणाने . सर्ग २८ मो। (१५) सिद्धत्वमाश्रित्य साधनंता स्थितिं श्रिताः। भव्या भव्यत्वमाश्रित्या- नादिसांतां गताः स्थिति ॥ ६ ॥ जीवो मोक्षस्य योग्यो हि भव्य इत्युच्यते श्रुते । मोक्ष प्राप्तस्तु नो भव्यो नाप्यभव्य इतीर्यते ॥१०॥ यदुक्तं- सिद्धे नो भव्चे नो अभव्वे ' इति. अभव्याश्चाभव्यतया- ऽनाधनंतस्थितौ स्थिताः। द्रव्यस्येति सचित्तस्य स्थितिरुक्ता चतुर्विधा ॥१॥ द्विप्रदेशादयः स्कंधाः स्युः सांताः सादयोऽपि च । उत्कर्पतोऽप्य- संख्येय-कालस्थितिजुपो हि ते ॥२॥ साद्यनंताऽनागताद्धा--तीता सांता निरादिका । अनाद्यनंताश्चाकाश-धर्माधर्मादयो मताः ॥३॥ अचेतनस्य द्रव्यस्य चतुर्द्धति स्मृता स्थितिः । एवमुक्त्वा द्रव्यकाल-मद्धाकालमथ ब्रुवे ॥ ४ ॥ सूर्यादिक्रियया व्यक्ती-कृतो नृक्षेत्रगोचरः। गोदोहादि- क्रियानिळ-पेक्षोऽद्धाकाल उच्यते ॥५॥ तथाहि-यावत्क्षेत्रं खकिरण- माश्रीने सादिअनंत (२) स्थितिने पामेला छे, भव्य जीवो भव्यत्वने भाथीने अनादि- सांत (३) स्थितिने पामेला छ. (88). कैमक जे जीव मोक्षने योग्य होय ते भन्प थे एम सिद्धांतमा कयुं छे, ते जीव ज्यारे मोक्ष पामे छे त्यारे ते मन्य पण नधी थने अगव्य पण नथी एम कयुं छे. (१००). ते विपे सिद्धांतमा कयु छ के--" सिद्धनो जीव भव्य पण नधी भने ममध्य पण नथी." तथा अमन्य जीवो अभव्य पणाने थाश्रीने अनादि अनंत (४) स्थितिमा रहेला छे. (केमके ते कदापि मोलने पामताज नथी, एटले तेनो अंत नथी भने तेनुं अमन्यपणु मनादि काळर्नु छ, तेथी तेनुं अभध्यपणुं अनादिमनंत छे.) भा प्रमाणे मचित्त द्रव्यनी चार प्रकारनी स्थिति कही. (१०१). अचेतन द्रव्यमा द्विप्रदेशादिक स्कंधो सादिसांत (१) छे, केमके ते स्कंघो उत्कांधी पण असंख्य काळनी स्थितियाळा ज छे. (२). भविष्यकाळ सादिअनंत (२) छे, भूतकाळ प्रनादिमौत (३) थे, तपा माकाशास्तिकाय, धर्मास्तिकाय. भधर्मास्तिकाय विगैरे अनादि अनंत (४) कला 2. (३). मा प्रमाणे अचेतन द्रव्यनी चार प्रसारनी स्थिति कही. ए रीते श्रीजी ट्रष्यकाळ को. ३. इथे चोथा भदाकाळने कई हूं.-(१). सूर्यादिकनी क्रियाए प्रगट फोलो भने गोदाहादिक क्रियानी अपेक्षा रहिस जे मनुप्यषेत्रमा वर्तयो काळ से भदाकाळ कहेवाय थे. (५). ते भा प्रमाणे-चालवानी क्रिया करवा सर्प १ गायोने रोदा विरेनी किया.

. .. (१६) श्रीकाललोकप्रकाश। श्चरन्नुद्योतयेद्रविः । दिवसस्तावति क्षेत्रे परतो रजनी भनेत् ॥ ६ ॥ एवं सदा प्रवृत्तोऽद्धा-कालोऽर्कादिगतिस्फुटः । गोदोहान्नपाचनाचा-मन्यां नापेक्षते क्रियां ॥७॥ अद्धाकालस्यैव भेदाः समयावलिकादयः । यथो यथायुप्ककाल-स्वरूपं किंचिदुच्यते ॥ ८॥ यश्चाद्धाकाल एवासु-मता. मायुर्विशेषितः । वर्तनादिमयः ख्यातः स यथायुप्कसंज्ञया ॥ ९ ॥ अयं भावः--ययेन तिर्यग्मनुजा-दिकजीवितमर्जितं । तस्यानुभवकालो यः स यथायुष्क उच्यते ॥ १०॥ येनोपक्रम्यते दूर-स्थं वस्त्वानीयतेऽतिकं । तैस्तैः क्रियाविशेषैः स उपक्रम इति स्मृतः ॥ १९ ॥ उपक्रमणमभ्यर्णा- नयनं वा दवीयसः। उपक्रमस्तरकालोऽपि ह्युपचारादुपक्रमः ॥ १२ ॥ सामाचारीयथायुष्क-भेदाचोपक्रमो द्विधा । सामाचारी तत्र साधु-जना. चीर्णा शुभक्रिया ॥१३॥ तस्या आनयनं प्रौढ-शास्त्रादुद्धत्य यत्क्वचित् । आसन्नतायै लघुनि शास्त्रे स स्यादुपक्रमः ॥ १४ ॥ अयं भावः -ज्ञान पोताना किरणोबडे जेटना क्षेनने प्रकाशित करे छे तेटला क्षेत्रमा दियम होय छे भने तेथी पीजा क्षेत्रमा रात्रि होय छे. (६). या प्रमाणे सूर्यादिकनी गतिथी स्पष्ट जणातो अने निरंतर प्रवर्ततो श्रद्धाकाळ गोदोह अने अन्नने पकावयु ए विगेरे अन्य क्रियानी अपेक्षा राखतो नथी. (७), समय अने प्रावलिका ( तथा मिनिट, कलाक) विगेरे सर्व श्रा श्रद्धाकाळना ज भेदो छे. ४. हचे पांचमा यथायुष्ककाळy काइक स्वरूप कहेवाय छे. ( ८).-उपर कहेलो जे श्रद्धाकाळ प्राणीओना आयुष्यना विशेषणपणे कहेवामां आवे छे, ते ज वर्तनादिक स्वरूपवाळो काळ यथायुष्क नामथी प्रसिद्ध छे. (8). भावार्थ ए छे के-जे जीये नियंच, मनुष्य विगेरेनुं जे जीवित (आयु) उपार्जन कर्यु होय ते जीवितना अनुभवनो जे काळ छे, ते काळ यथायुष्क कहेवाय छे. (१०). हवे छठो उपक्रमकाळ कहे छे-जेनावडे उपक्रम कराय एटले दूर रहेली वस्तुने ते ते प्रकारनी क्रियाओए करीने पासे ( नजीक ) लाववामां आवे ते उपक्रम कहेवाय छे. (११). श्रथवा तो उपक्रमण एटले जे दूरने नजीक लावq ते उपक्रम फहेचाय छे, ते उपक्रमनो काळ पण उपचारथी उपक्रमकाळ कहेवाय छे. (१२). या उपक्रम सामाचारी अने यथायुष्क एम चे प्रकारनो करो छ, तेर्मा सामाचारी एटले साधुओए आचरेली शुम क्रिया. (१३). ते शुभ क्रियाने दूररूप मोटा शास्त्रमाथी उद्धरीने समीपताने माटे नाना शास्त्रमा जे लाववी, ते उपक्रम कहेवाय छे. (१४). भावार्थ ए छे के-मोटा शास्त्रनो अभ्यास करवाथी श्रा . - सर्ग २८ मो। (१७) स्यास्याः प्रौढशास्त्रा-ध्ययनाचिरभाविनः। अल्पग्रंथादाशुकारी स्यात्सा. माचार्युपक्रमः ॥ १५ ॥ ओघः पदविभागश्च दशधा चेति स विधा सामाचारी त्रिधात्वेनो-पक्रमोऽप्युदितो बुधैः ॥ १६ ॥ तत्र च-योघा- सामान्यतः साधु-सामाचार्या यदीरणं । श्रोघसामाचार्यसौ स्या- दोघनियुक्तिरूपिका ॥१७॥ भवेत्पदविभागाख्या सामाचारी महात्मनां । छेदग्रंथसूत्ररूपा दशधेच्छादिका त्वियं ॥ १८ ॥ इच्छामिच्छातहकारो आवस्तिया य निसीहिया । आपुच्छणा य पडिपुच्छा छंदणा य निमंतणा ॥ १६ ॥ उवसंपया य काले सामायारी भवे दसहा । इच्छया कुर्विदमिति रात्निकाद्या दिशंति यत् । इच्छा- कारेण तत्कुर्या-दितीच्छाकार उच्यते ॥ २०॥ अनाभोगाजिनायाज्ञा- विरुद्ध कथिते कृते। मिथ्याकारं यदाहुर्ताः स मिथ्याकार उच्यते ॥ २१॥ गुर्वायुक्तेपु सूत्रार्था-दिपु कार्येषु वा बुधाः । तथैवमिति यद्व्यु-स्तथा- . साधुक्रियानुं ज्ञान घणे काळे थाय छे, ते नानो ग्रंथ भणवाधी थोडा काळमां थाय के, तेथी ते सामाचारी उपक्रम कहेवाय छे. (१५). ओघ सामाचारी, पदविभाग सामाचारी अने दश प्रकारनी (चक्रवाळ ) सामाचारी एम सामाचारी त्रण प्रकारनी होवाथी पंडितोए उपक्रमना पण ए ज ऋण प्रकार कहा 2. (१६). तेमां श्रोषधी एटले सामान्यथी सामाचारीनुं जे कहे, ते मोघ सामाचारी प्रोपनियुक्तिमा कहेली छे. (१७). वीजी पदविमाग नामनी साधुनी सामाचारी छेदग्रंथना सूत्ररूप छे, (छेद सूत्रमा कहेली छे) तथा श्रीजी दश प्रकारनी सामाचाही प्रमाणे छे.--(१८). इच्छाकार १, मिच्छाकार २, वहफार ३, भावस्मिया ४, निसीहिया ५, मापुच्छणा ६, पडिपुच्छणा ७, छंदणा ८, निमंत्रणा ६ अने उपमंपदा १०. मा दश प्रकारनी सामाचारी काळने भात्रीने कहेली छे. (१६). तुं तारी इच्छा प्रमाणे कर' एम गुर्वादिक मोटा जे आदेश मापे, ते पोवानी इच्छाए कर. आ इच्छाकार कहेवाय छे. १. (५०). अनामोगने लीधे तीर्थकरादि- कनी भाशाविरुद् कार पोला' होय अथवा करा' होय, वेने माटे पंडितो जे मिथ्याकार (मिध्यादुप्फत) मापे, ते मिथ्याकार कहेवायचे. २. (२१). गुळदिक सूत्र भने मर्थ विगेरे कहे सते अथवा पीर्जु कार कार्य पतावे सते डामा साघुभो तथा (नहति-तेज अमुक कार्य (१८) श्रीकाललोकप्रकाश | कारः स उच्यते ॥ २२ ॥ योगैरवश्यकर्तव्य-निप्पन्नावश्यकी भवेत् । वसत्यादेनिर्गमे सा मुनिधुर्यः प्रयुज्यते ॥ २३ ॥ अप्रस्तुतनिपेधेन वृत्ता नैपेधिकीति तां । कृतकार्या वसत्यादौ प्रविशंतः प्रयुंजते ॥ २४ ॥ श्राप- च्छनं स्यादापृच्छा गुरोः कार्ये चिकीर्पिते । प्रतिपृच्छा कार्यकाले भूयो यस्पृच्छनं गुरोः ॥ २५ ॥ स्वयं पूर्व गृहीतेन गुर्वादेरशनादिना । याभ्य- र्थना छंदनाख्या सामाचारी स्मृतागमे ॥ २६ ॥ पानयामि युष्मदर्थ- मशनाद्यादिशंतु मां। गुर्वादीनां तदादाना-त्याग विज्ञप्तिर्निमंत्रणा ॥ २७ ॥ उपसंपत् पुनर्गच्छां-तराचार्याद्युपासनं । ज्ञानाद्यर्थं किय- स्कालं सामाचार्यो दशेत्यमूः । २८ ॥ तृतीयं नवमे पूर्वे यस्त्वाचार- नामकं । तस्य यदिशतितम-मोघाख्यं प्राभृतं महत् ॥ २९ ॥ तत उ- दृत्य कारुण्य-धनः स्थविरधीधनैः । ओपनियुक्तिरुपाल्प-ग्रंथन्यस्ता महार्थभृत् ॥ ३० ॥ पूर्वादिपाठानर्हाणां हीनवुद्धिवलायुपां। ऐदंयुगीन- प्रमाणे) भने एवं (यहु सारु) एम जे बोले ते तथाकार कहेवाय छे. ३. (२२). अवश्य करवा लायक योगवडे जे नीपजे छे-परवामां आवे छे ते आवश्यकी कवाय छे. ते आवश्यकीनो श्रेष्ठ मुनिश्री उपाश्रयादिकथी बहार नीकळे त्यारे (तेम बोलवापणे ) उप- योग करे छे. ४. (२३). अप्रस्तुत कार्यनो निषेध करवाथी जे उत्पन्न थाय छे ते नैपेधिकी (निसीहि ) कहेवाय छे. ते नैपेधिकीनो कार्य करीने उपाश्रयादिकमा प्रवेश करती वखते मुनियो उपयोग करे छे. ५. (२४). काइ पण कार्य करवानी इच्छा थाय त्यारे तेने माटे गुरुने जे पूछवं ते पापुच्छणा कहेवाय छे. ६. कार्य करती वखते फरीथी गुरुने जे पूछबुं ते प्रतिपृच्छना कहेवाय छे. ७. (२५). साधुए पोते प्रथम जे आहारादिक ग्रहण कयु होय (भाण्यु होय) ते लेवा माटे गुरुनी पासे प्रथम जे प्रार्थना करवी ते छंदना नामनी सामाचारी भागममा कहेली छे. ८. (२६). " हुँ आपने माटे भशनादिक लावू, मने आप प्राज्ञा आपो. " ए प्रमाणे अशनादिक ग्रहण कर्या पहेला गुर्वादिकने विज्ञप्ति करवी ते निमंत्रणा कहेवाय छे. ह. (२७). ज्ञानादिक शीखवा माटे केटलोक बखत अन्य गच्छना प्राचार्य विगैरेनी जे सेवा करवी ते उपसंपत् कहेवाय छे. १०. ा प्रमाणे दश प्रकारनी सामाचारी छे. (२८). नवमा पूर्वमा जे आचार नामनी त्रीजी वस्तु छे, तेनुं जे वीशहुँ ओघ नामर्नु मोटुं प्राभूत छे. (२६). तेमाथी उद्धरीने करुणारूप धनवाळा स्थविर मुनिश्रोए प्रोपनियुक्तिरूप नाना ग्रंथमा मोटा अर्थवाळी सामाचारीने स्थापन करी .

सर्ग २८ मो। (१९) जीवाना-मुपकाराय सत्वरं ॥३१॥ तदर्थज्ञानतत्सम्य-गनुष्ठानार्थमुत्तमा। आसन्नीकृत्य दत्तौघ-सामाचारी भवत्यसौ ॥ ३२ ॥ त्रिभिर्विशेषकं ॥ एवं पविभागाख्या-प्याता नवमपूर्वतः । उत्तराध्ययनादंत्या पड्- विंशाच्च समुद्धृता ॥३३॥ ज्ञानमासां हि पूर्वादि-पाठसाध्यं चिराद्भवेत्॥ तदुद्धारात्तु तूर्णं स्या-दित्यसौ तदुपक्रमः ॥ ३४ ॥ श्रनल्पकालवेद्यस्या-युपः संवर्त्तनेन यत् । अल्पकालोपभोग्यत्वं भवेत्सोपक्रमायुपां ॥ ३५ ॥ यथायुष्कोपक्रमाख्यः स कालः परिकी- तितः : । दूरस्थस्यायुरंतस्य समीपानयनात्मकः ॥ ३६ ॥ उपक्रमो भवत्येवं सर्वेषामपि कर्मणा । स्थित्यादिखंडनद्वारा प्राप्तानामनिका. चनां ॥ ३७॥ प्रायोऽनिकाचितानां यत् किविपेतरकर्मणां । शुभा. शुभपरीणाम-वशात्स्यादपवर्तना ॥ ३८॥ निकाचितानामध्येवं तीनेण तपसा भवेत् । स्फूर्जत्शुभपरीणामा-कर्मणामपर्वत्तना ॥ ३९ ॥ तथा- हुर्महाभाष्ये-सव्यपगईणमेवं । परिणामवसा उबक्कमो होजा। पायम- पूर्वादिकनी अभ्याम करवामां अयोग्य अने हीन पुद्धि, पळ तथा आपुष्यवाळा आ युगना जीवोनो उपकार करवा माटे तत्काळ ते (सामाचारी ) ना अर्थ- ज्ञान थाय भने सम्यक् प्रकारे तेनुं अनुष्ठान थइ शके तेटला माटे भा उत्तम मामाचारी समीपे करीने पापी थे, तेथी ते पोषसामाचारी कहेवाय छे (३२). एज प्रमाणे पदविभाग नामनी सामाचारी पण नयमा पूर्वमाधी ग्रहण करी थे तथा चेली (दश प्रकारनी चक्राल समाचारी) यीशमा उत्तराध्ययनमाधी उद्धरेली छ, (३३). मा सामाचारीनुं ज्ञान पूर्वादिकनो भगाम करवाथी पणे कार पर शके छ भने चेनो उद्धार करपापी शीघ्रपणे पद के के तेथी मा तेनो उपक्रम कवाय छे. (३४). सोपक्रम आयुष्यवाला जीयो घणा काळ सुधी दवा ( अनुभववा) लायक पोताना पायुप्पने संवर्तन (संप) करवायडे जे भन्पकाळमां मोगवना लायक फेरे, वे यथा. पुष्क उपक्रम नामनो काळ कहेलो छ; केमके दूर रहेला भायुप्पना मंतने समीप लावया- पणं माटे. (३६), एज प्रमाणे कोनी स्थित्यादिक भोधी करवाची सर्वे मनिकाषित कोनो पग उपक्रम या शके थे. (३७). कारण के प्राय करीने शुम भने माम परि. गामना पराधी भनिफानित एका पार भने पुष्प कर्मनी मपर्तना या शके ई. (२८). ए ज प्रमाणे तीय सुपरडे उस्कट शुम परिणामधी निकापित कर्मनी पण भपपर्तना पर राके. (३९). शेने मारे महामाप्पमा कामुक-" एज प्रमाणे प्राये फरीने भनिफा.

(२०) भीकाललोकप्रकारा। निकाइयाणं तवसाओ निकाइयाणंपि ॥ ४० ॥ नन्वप्राप्तकालमपि यद्येवं कर्म भुज्यते । प्रसज्यते तदा नूनं कृतनाशाकृतागमौ ॥ ४१ ॥ यत्प्रागनल्पस्थितिकं वर्ष भुक्तं न कर्म तत् । यच्चाल्पस्थितिकं भुक्तं तद्वद्धं तेन नात्मना ॥ ४२ ॥ यत्रोच्यते-नोपक्रमण क्रियते दीर्घ- स्थितिककर्मणः । नाशः किंत्वध्यवसाय-विशेषाद्भुज्यते द्रुतं ॥ ४३ ॥ यथा भूयःकालभोग्यान् प्रभूतान् धान्यमूढकान् । रुग्णा भस्मकवातेन नचिरादेव भुंजते ॥४४॥ न चात्र वर्तमानानां धान्यानां विगमो भवेत् । तद्भोगः स्याकिंतु तूर्ण न्यायोऽयं कर्मणामपि॥ १५॥ चिरेण दह्यते रज्जु-बहिना वितता यथा। सैव संक्षिप्य निक्षिप्ता क्षिप्रं भवति भस्मसात् ।। ४६ ॥ चिरेण पच्यते वृक्ष-स्थितमानादिकं फलं । ग क्षे. पपलालादि-मुक्त्या तु क्षिप्रमप्यहो ॥ ४७ ॥ विपाकः कर्मणोऽप्येवं -द्विधा प्रोक्तो जिनागमे । यथास्थित्योपक्रमाद्वा बद्धं कर्मेह भुज्यते चित एचा सर्व कर्मोनी प्रकृतिश्रोनो परिणामना वशथी उपक्रम थाय छे, अने तपवडे करीने निकाचित कर्मोनो पण उपक्रम थाय छे." (४०). वहीं कोई शंका करे के-जो या प्रमाणे काळ प्राप्त थया विना पण कर्म भोगवातुं होग तो कृर्तनाश अने अकृतागम ए नामना चे दोषनी प्राप्ति थाय छे. (४१). केमके जे प्रथम मोटी स्थितिवालं कर्म बांध्यु हतुं, ते भोगववामा थान्युं नहीं (तेथी कृतनाश नामनो दोष आव्यो) अने जे अल्प स्थितिवाछं कर्म भोगवयामां आव्युं ते जीवे वांधेलु ज नहोतुं (तेथी अकृतागम नामनो दोप पान्यो.) (४२), आ शंकानो उत्तर श्रापे छ के-दीर्घ स्थितिवाळा कर्मनो उपक्रम बड़े नाश थतो नथी, परंतु विशेष प्रकारना अध्यवसाय (परिणाम) ने लीधे ते कर्म जलदी थोडा काळमां भोगवी लेवाय छे. (४३). जेम घणा काळे खाइ शकाय तेचा घणा धान्यना मूढाने भस्मक नामना वायुना रोगवाळा मनुष्यो थोडा काळमां खाइ जाय . (४४). तेमा कोइ वर्तता धान्यनो नाश थतो नथी, परंतु ते शीघ्र खाइ जवाय छे. ए ज न्याय कर्मनो पण समजवो. (४५). जेम लांबी करेली दोरीने अनिवडे सळगावीए तो ते चिरकाळे वळे छ भने ते ज दोरीनो दडो करी अग्निमां नांखीए तो ते शीघ्र भस्मसात थाय छे (४६). तथा जेम वृक्ष पर रहेला पाम्रफळ (केरी विगेरे फळ) चिरकाळे पाके के अने तेज फळने जो खाडामा नांखी तेने घासवडे ढांक्या १ करेलानो नाश. २ नहीं करेलानी प्राप्ति, .

सर्ग २८ मो। (२१) ॥४८॥ नन्वेवं कर्म यद्वद्धं तत्सर्व वेद्यमेव चेत् । उपक्रमेणाल्पकाला- द्यथास्थित्यथवा चिरात् ।। ४९ ॥ तदा प्रसन्नचंद्रादे-ौगो बद्धस्य कर्मणः । सप्तमावनियोग्यस्य प्राप्तो दुःखविपाकिनः ॥ ५० ॥ न चास्य श्रूयते दुःख-विपाकः सप्तमक्षितेः। अचिरादेव कैवल्यं प्राप्तस्य शुभ- भावतः ॥५१॥ अत्रोच्यते-यद्वद्धं कर्म तत्सर्व प्रदेशपरिभोगतः । अवश्यं भुज्यते जीवै रसानुभवतः पुनः ॥ ५२ ॥ कर्मानुभूयते किंचित् किंचित्तु नानुभूयते । तथाविधपरीणामा-त्तद्रसस्यापवर्तनात् ॥ ५३ ॥ ततः प्रसन्नचंद्रायैः सप्तमावनिकर्मणां । प्रदेशा नीरसा भुक्ता नानु- भागस्तदुद्भवः ॥ ५४॥ ननु प्रसन्नचंद्राद्यै—र्बद्धं कर्म रसांचितं । यद्भुक्तं तन्नीरसं त-स्कृतनाशाकृतागमौ ॥ ५५॥ भत्रोच्यते-परिणामविशेपेण यद्येषां क्षीयते रसः । किमनिष्टं तदा कौ वा कृतनाशाकृतागमौ ॥५६॥ तीव्रातपोपतप्तस्य यदीक्षोः क्षीयते रसः । अपूर्वस्यागमः कोऽत्र होय तो ते शीघ्र पाके छे. (४७). ए ज प्रमाणे कर्मनो विपाक पण जिनागमने विप वे प्रकारनो को छे, ते श्रा प्रमाणे-वांधेलुं कर्म यथास्थितिए भोगवे अथवा उपक्रमथी भोगये. (४८). वळी शंका करे छे के-बो श्रा प्रमाणे (तमे कयुं ते प्रमाणे ) जे कर्म जीये याप्पु होय ते मर्व कर्म उपक्रमवडे अन्प फाळमां अथवा यथास्थितिघडे चिरकाळे भोगवयानुं ज होय. (४६). तो प्रमामचंद्र ऋषि विगेरेए सातमी नरकपृथ्वीने योग्य दुःखना विपाकचाळं फर्म यांध्यु हतुं, तेनो भोग वेने प्राप्त थवो जोइए, (५०) छता ते तो शुभ परिणामथी तत्काळ फेवळजान पाम्या हता. तेने सातमी नरक पृथ्वीना दुःखनो विपाक मामळयामा पावतो नधी ते कम ? (५१), उत्तर-जीबोए जे कर्म यांच्युं होय ते मर्व प्रदेशमा अनुभवथी अवश्य भोगवाय छे, परंतु रसना अनुभवथी तो कोइक कर्म अनु- मवाय छ भने कोइक कर्म तथाप्रकारना परिणामी तेना रमनी अपवर्तना थवायी भनुमवातुं नथी. (५३). तेपी प्रमचंद्रादिक मातमी पृथ्वीना कर्मना प्रदेशो नीरम (रस विनाना ) मोगव्या हता, परंतु तेनाथी उत्पन्न धपेलो रम मोगयो नधी. (५४). शंका-प्रसन्नचंद्रादिके रमवालं कर्म म्युं भने नीरम कर्म भोगव्यं, तेथी कतनाश भने अवागम नामना ये दोप प्राप्त थया. (५५). उत्तर-जो कदाप विशेष प्रकारना शुम परिणाम करीने तेषां कर्मोनो रम वीण पाय, ना ना सु भनिष्ट छ ? तथा कननाश भने मरुतागम दोप शी रीते प्राप्त पाय ? (५६). जो कदाच मीय सहकापी तपेली (२२) श्रीकाललोकप्रकाश। जायते वद सन्मते ॥ ५७ ॥ रसनाशात्कृतनाशो य: स्यात्स विष्ट एव च। तदर्थमेव यतयो यतते यत्तपोविधौ ॥ ५८ ॥ अवश्यं भुज्यते कर्म यथा वद्धं तथैव चेत् । तदा तपोविधिः सर्वो व्यर्थः स्यादुरिताक्षयात् ॥ ५९ ॥ मोक्षप्राप्तिश्च कस्यापि न स्यादेव यतोगिनां । ध्रुवं तद्भव- सिद्धीना-मपि कर्मावशिष्यते ॥ ६०॥ सत्तायामंतरंभोधि-कोटाकोटि- स्थिति स्फुटं । प्रदेशैवेद्यते तच्च ततस्तन्नीरसं मतं ॥ ६१॥ किंचासं- ख्यभवोपातं नानागतिनिबंधनं । स्यादेव कर्म सत्तायां तद्भवेऽप्यंग सियतः ॥ ६२ ॥ विपाकरूपेणैवास्य भवत्यनुभवो यदि । तदा तत्र भवे नाना-भवानुभवसंभवः ॥ ६३ ॥ भवांस्तांस्तान् विपाकेना-नुभवे- यद्यनुक्रमात् । तदा पुनः पुनः कर्म तत्र तत्रार्जयत्यसौ ॥६४ ॥ एवं च कर्मसंताना-विच्छेदान्न भवेच्छिवं । ततः प्रदेशानुभवः कर्मणोऽस्तीति युक्तिमत् ॥ ६५ ॥ श्राह-चेत्कृत्वोपक्रमरल्प--स्थितिक कर्म वेद्यते । शेरडीनो रस क्षीण थइ जाय, तो तेमा कया अपूर्व पदार्थ- आगमन थाय? ते हे बुद्धिमान ! तुं कहे. (५७). तथा रसनो नाश थवाथी जे कृतनाश थाय छे ते तो इष्ट ज छे. कारणके तेटला माटे ज मुनिश्रो तपविधिमा यत्न कर छे. (५८). जे कर्म जे प्रकारे बाध्यु होय ते कर्म तेज प्रकारे अवश्य भोगवाय छे, एम जो तुं कहती हो तो सर्व करेलो सप पापकर्मनो आप न करवाथी व्यर्थ ज थशे (५९). अने कोइ पण जीपने मोतनी प्राप्ति थशे ज नहीं, केमके तेज भवे सिद्ध थनारा प्राणीमोनुं पण कर्म वाकी रहेवार्नु ज छे. (६०). तेथी करीने सत्तामा रहेखें अंत:कोटाकोटि सागरोपमनी स्थितिवाळं ते कर्म प्रदेशे करीने वेदाय छे, तेथी ते कर्मने नीरस मानेलुं छे. (६१). तथा वळी हे अंग (माइ)! तेज भवमा सिद्ध थनारा प्राणीने पण असंख्य भवोमा उपार्जन करेलुं भिन्न भिन्न गतिर्नु कारणभूत कर्म सत्तामा तो होय ज छे. (६२). तेनो अनुभव जो विपाकरूपे ज थतो होय तो ते चरम भवमा विविध प्रकारना भवोनो अनुभव संमवे छ (६३). अने तेथी करीने जो ते ते मनोने विपाकवडे अनुक्रमे अनुभवे तो से जीप ते ते मवोने विष फरी फरीने कर्म उपार्जन करे ज. (६४). ते प्रमाणे थवाथी कर्मनी परंपरानो विच्छेद नहीं थवाथी कोई पण जीवनो मोक्ष थशे नहीं, तेथी करीने कर्मनी प्रदेश अनुभव थे, एम कहेवू युक्तियुक्त छ. (६५). प्रश्न-जो उपक्रमवडे अन्प स्थिविषालु कर्म करीने वेदातुं होय तो भवांतरमा सर्ग २८ मो। (२३) भवांतरकृतस्यासौ न भोगस्तहि कर्मणः ॥६६॥ यद्वद्धं बंधसमये भोग्यं वर्षशतादिभिः । भुक्तं त्वंतर्मुहूर्तेन तदेवैतत्कथं नु तत् ॥ ६७ ॥ किंच-अस्तु सोपक्रम सर्व सर्व वा निरुपक्रम । भेदः कुतः कथं नो वा परावर्तोऽनयोमिथः ॥ ६८ ॥ अत्रोच्यते-बद्धं यद्धसमये परि- णामेन तादृशा । तत्स्यादुपक्रमैः साध्यं साध्यो रोग इवौपधैः ॥ ६९ ॥ असाध्यरोगवद्यत्तु परिणामेन तादृशा । वद्धं तदुचितात्काल-विपाकादेव नश्यति ॥ ७० ॥रोगे ह्यसाध्ये शक्तिों-पधादेविद्यते यथा। कर्मण्यु- पक्रमाभाव-स्तथा स्यान्निरुपक्रमे ॥ ७१॥ विचित्राणि कर्मबंधा-ध्यवसा- यास्पदानि यत् । वर्त्ततेऽसंख्यलोकाभ्र-प्रदेशप्रमितानि वै ॥ ७२ ॥ तेपु सोपक्रमकर्म-जनकान्येव कानिचित् । कानिचिद्धजनका न्यनुपक्रमक- मणां ॥ ७३ ॥ यादृशाध्यवसायेन बद्धं यत्कर्म यादृशं । नद्भोक्तव्यं तथा नैवं कृतनाशाकृतागमौ ॥ ७४ ॥ क्षेत्रे तुल्येऽपि गंतव्ये फरेला ( पांघेला) कर्मनो ते भोग नहीं कहेवाय (६६). केमके बंधने ममये मो भादिक वर्षोपडे भोगनी शकाय तेवू जे कर्म चाप्यु होय, तेज कर्म एक अंतर्मुहूर्नमा ज भोगनाइ जाय एम शी रीते बने ? (६७). वळी वीजो प्रश्न करे छे के-सर्व कर्म उपक्रम सहित ज हो अथया सर्व कर्म उपक्रम रहित ज हो. शा माटे भेद होवो जोहए (ये प्रकार शामाटे मानवा जोइए १) अथवा तो ते पन्नेनो परस्पर परावर्त केम न मानयो ? (६८) उत्तर-जे कर्म बंधने समये तेवा प्रकारना (मंद ) परिणामरडे यांध्यु होय, ते कर्म औषधाहे माध्य एया रोगनी जेम उपक्रमवडे साध्य यह शके छ (६६). अने जे कर्म थमाण रोगनी जेम या प्रकारना तीम) परिणामघडे यांच्यु होय, ते कर्म योग्य काळे उदयमा पारवायी ज नष्ट थाय थे (वीण थाय थे ). (७०). जेम भमाध्य रोगमा मौपधादिकनी शक्ति पालती नधी, म निरुपक्रम कर्ममा उपक्रम यह शकतो नथी. (७१). कारण के कर्म- पंधना मध्यवमापनों स्थानो विनिय प्रकारना छ भने से अमंख्य लोकाकाशना प्रदेश जेटला छे. (७२). तेमा फेटलाफ मध्ययमापना स्थानो मोपक्रम कर्मनेज उत्तम करनारा भने फेटलाक स्थानी निस्पक्रम कर्मना पंधने ज करनारा 2. (७३) जे कर्म अंपा मध्यवमाययडे जेया प्रकारनु पाप्यं होय, ते कर्म से ज प्रकारे मोगवा, होप थे, लेधी छसनाश भने मरुतागम दोप मारता जनपी. (७४). जेम पपा मापसाने महक योज.

(२४) श्रीकाललोकप्रकाश । बहूनां योजनादिके । गतिपाटवभेदेन कालभेदो यथेच्यते ॥ ७५ ॥ तुल्येऽपि शास्त्रेऽध्येतव्ये वहूनां ग्रंथमानतः । वुद्धिपाटवभेदेन काल- भेदो यथेच्यते ॥ ७६ ॥ तुल्येऽपि रोगे भैपज्य-पश्यादितारतम्यतः । निवृत्तिकालो रोगस्य बहूना बहुधा यथा ॥ ७७ ॥ समानस्थितिके- ऽनेकै-4द्धे कर्मणि देहिभिः । परिणामविशेपेण भोगकालस्तथा पृथक् ॥ ७८ ॥ पिंडीभूतः पटः क्लिन्न-श्चिरकालेन शुप्यति । प्रसारितः स एवाशु तथा कर्माप्युपक्रमैः ॥ ७९ ॥ विनापवर्तनां लक्षा-दिको राशि- विभज्यते । चिरेणापतितस्तु चित्रं कर्मापि तत्तथा ॥ ८ ॥ द्वधोप- क्रमकालोऽयं सप्रसंगः प्ररूपितः । देशकालाभिधं काल-मथ बमो यथागमं ॥१॥ कार्यस्यार्यस्थ वान्यस्य यो यस्यावतरः स्फुटः। स तस्य देशकालः स्याद् द्विधाप्येष निरूप्यते ॥ २ ॥ अन्नपाककियो- नादिक दूर एक सरखा क्षेत्रमा जg छे, तेमां गतिनी स्वरादिकना भेदधी काळनो भेद जोवामां आवे छे ( उतावळो माणस पहेलो पहोंचे छे विगेरे ). (७५). जेम घणा विद्या- र्थीओने ग्रंथना माने करीने एक सरखं शास्त्र भणवार्नु होय छे, तेमा घुद्धिनी पटुता विगेरेना भेदी काळनो भेद जोवामां आवे छे. (७६). जेम घणा माणसोने एक सरखो व्याधि थयो होय, तेमा औषध अने पथ्य विगैरेनी तरतमताए करीने रोगनी निवृत्तिनो काळ घणा प्रकारको जोवामां आवे छे, (७७). तेज प्रमाणे घणा प्राणीओए एक सरखी स्थिति- वालं कर्म पां' होय, तोपण परिणामना विशेपे करीने भोगनो काळ जूदो जूदो होइ शके छे. (७८). जेम भी, वस्त्र पिंडरूप होय तो ते चिरकाळे सुकाय छ, अने तेज भीनुं वस्त्र पहोलं कयु होय तो शीघ्र सुकाय छे. तेज प्रमाणे कर्म पण उपक्रमवडे शीघ्र भोग- चाय छे. (७६). जेम लाख विगेरे संख्यावाळो पदार्थनो राशि अपवर्तना न करी होय तो ते चिरकाळे विभाग करी शकाय छे अने अपवर्तना करी होय तो अल्पकाळे विभाग करी शकाय छे. एज प्रमाणे कमे पण अपवर्वना करवाथी शीघ्र भोगवाइ जाय छे. या प्रमाणे छटो के प्रकारको उपक्रमकाळ विस्तारथी कयो. ६. हवे सातमो देशकाळ नामनो काळ पागमा कह्या प्रमाणे कहीए छीए. (८१). जे शुभ के अशुम कार्यनो जे अवसर स्फुट रीते जोवामा आवतो होय ते वे प्रकारनो तेनो देशकाळकवाय छे. ते बन्ने प्रकारने विस्तारथी कहे छे. (८२).-गाममां अन्नपाकनी सर्ग २८ मो। (२५) द्भूत-धूमानां प्रशमं पुरे । पानीयहारिणीशून्यं दृष्ट्वा वाप्यवटादिक ॥८३॥ काकांश्चापततो दृष्ट्वा गृहेपु गृहमेधिनां। साधुना लक्ष्यते भिक्षा- वसरोंऽतिसमीपगः ॥ ८४ ॥ तथाहुर्भाष्यकाराः-निमगं च गामं महिलासुन्नं च सुग्मयं (कूवयं ) दटुं । नीयं च काया ओलेंति जाया भिकस्स हरहरा ॥ ८५॥ आमोदिमोदकाकीणं शून्यं कांदविकापणं ।' मत्तां गृहांगणे सुप्ता तथा प्रोपितभर्तृकां ॥ ८६ ॥ निर्मक्षिकं मधु स्वच्छं पश्यतां प्रकटं निधिं । तत्तत्पदार्थग्रहण देशकालस्तदर्थिनां ॥७॥ एवं शुभाशुभे कार्ये । यः प्रस्तावस्तदर्थिनां ॥ स सर्वो देशकालः स्या- द्वक्तुं शक्यः स्फुटं कियान् ॥ ८८॥ यो यस्य मृत्युकालः स्यात् कालकालः स तस्य यत् । कालं गतो मृत इति गम्यते लोकरूढितः ॥ ८९ ॥ कृष्णवर्णे च मरणे स्यात्कालग्रहणेऽपि च । कालशब्दो देशकालः प्रस्तावे परिभापितः क्रियाथी उत्पन्न थयेल धूमाडो बंध थयेलो जोवामां आवे, अथवा कुवा विगेरे बळाशयो पाणी भरनारी स्त्रीभोथी रहित जोवामां आवे. (८३). तथा गृह- स्थोनों घरो उपर उडता कागडा जोवामा भावे, त्यारे मिक्षानो काळ समीपे आव्यो के एम साधुश्री जाणे छे. (८४). ते पायत भाष्यकार कहे छ के- धूमाडा रहित गामने जोइने, स्त्रीमो रहित कुवाने जोइने तथा नीचा (घर उपर) कागडाने उडता जोइने मिक्षानो अवसर थयो के एम साधु जाणे. (८५). सुगंधि मोदफवडे मरेली कंदोइनी दुकानने शून्य जोइने, जेनो पति परदेश गयो होय एवी मदोन्मत्त स्त्रीने धरना प्रांगणामां सुतेली जोइने, स्वच्छ मधपोई मक्षिका रहित जोइने वधा प्रगट थयेला निधानने जोइने वेना अर्थीजनोने ते ते पदार्थ ग्रहण करवानो देश- काळ जाणवो. (८६-८७). मा प्रमाणे शुभाशुम कार्यने विपे तेना अर्थीजनोनो जे अवमरते सर्व देशकाळ कहेवाय छे. ते स्फुट रीते केटलोक कही शकाय? ७. (८८). हवे पाठमो फाळकाळ कहे थे-जे जेनो मृत्युममय होय ते तेनो कामकाळ कहेयाय 2. फाळने पाम्यो एटले मरण पाम्पो एम लोकरूढियी कहेवाय छे. (८६). श्याम वर्णने विपे, मरणने पिपे भने काळग्रहणने विपे पण काळ शन्द कहेवामा भावे के अने देशकाळ शन्द प्रस्तारने श्रीकाललोकप्रकाश। । ॥९०॥ तथोक्तं-कालेण को कालो अम्हं सज्झायदेसकालंमि । तो तेण हो कालो अकालिकाले करतेणं ॥४१॥ भद्धाकालस्यैव भेदः प्रमाणकाल उच्यते । अहोरानादिको वक्ष्य-माणविस्तारवैभवः ॥२॥ पंचानामथ वर्णानां मध्ये यः श्यामलद्युतिः । स वर्णकालो विज्ञेयः -सचित्ताचित्तरूपकः ॥ १३ ॥ भवत्यौदयिकादीनां या भावानामव- स्थितिः । सादिसांतादिभिर्भ गै- वकालः स उच्यते ॥ १४ ॥ अत्र प्रमाणकालोऽस्ति प्रकृतः स प्रतन्यते । अतीतोऽनागतो वर्त-मानश्चेति त्रिधा स च ॥६५॥ अवधीकृत्य समयं वर्तमान विवचितं ॥ भूतः समयराशियः कालोऽतीतः स उच्यते ॥ ६६ ॥ अ. वधीकृत्य समयं वर्तमान विवक्षितं । भावी समयराशियः कालः स स्यादनागतः ॥६७॥ वर्तमानः पुनर्वर्त्त-मानैकसमयात्मकः । असौ नैश्च- यिकः सर्वो-ऽप्यन्यस्तु व्यावहारिकः ॥ ९८ ॥ इति जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिवृत्त्या- विपे कहेवामां आवे छे. (६०). ते विषे कह्यु छ के-" अमारा सज्झाय ( काळग्रहण) रूप देशकाळने विपे काळवडे काळ कर्यो छे, तेथी अवसर विना सज्झाय करनारा तेणे (साधुए ) काळने हण्यो के एम जाणवू."८. (६१). हवे नवमो प्रमाणकाळ ते अधा- काळनो ज भेद छ, तेनो अहोरात्रादिक विस्तारनो वैभव आगळ कहेवामां आवशे.. (९२). हवे पांच वर्णोना मध्यमा जे श्याम कांतिवाळो वर्ण छे ते दशमो वर्णकाळ जा- णवो. ते सचित्त अने अचित्त एम चे प्रकारनो छे. १०. (६३). तथा औदयिकादिक मावोनी सादिसांत विगेरे मांगावडे जे स्थिति छे ते अग्यारमो (छेनो) भावकाळ कहेवाय छे. ११. (६४). श्रा अग्यार प्रकारना काळशब्दना निक्षेपामाथी अहीं नवमा प्रमाणकाळनो प्रस्ताव कहेवामां आवनार छे. ते प्रमाणकाळ प्रतीत, अनागत अने वर्तमान एम त्रण प्रकारनोछे. (६५). तेमां कहेवाने इच्छेला एक समयना वर्तमानकाळने आश्रीने गयेलो जे समयोनो राशि ( समूह ) ते अतीतकाळ कहेवाय छे. (६६). कहेवाने इच्छेला एक समयरूप वर्त- मानने आश्रीने जे समयराशि थवानो छे ते अनागतकाळ कवाय छे. (६७). तथा चालु काळमां वर्ततो एक समयरूप वर्तमानकाळ कहेवाय छे. आ वर्तमानकाळ निधयवालो के भने बीजो सर्व काळ व्यावहारिक छे. (९८). मा प्रमाणे जंबूद्वीपप्रतिनी टीका विगे- .. सर्ग २८ मो। (२७) द्यभिप्रायः, योगशास्त्राद्यप्रकाशवृत्तौ तु-लोकाकाशप्रदेशस्था भिन्नाः कालाणवस्तु ये । भावानां परिवर्ताय मुख्यः कालः स उच्यते ॥ ६ ॥ ज्योतिःशास्त्रे यस्य मान-मुच्यते समयादिकं । स व्यावहारिकः काल: कालवेदिभिरामतः ॥ २००॥ इत्युक्तमिति ज्ञेयं. एतदनुसारेण च समय- क्षेत्रादहिरपि कालस्वीकारो मुख्यतया संपन्नः, तत्त्वं पुनः सर्वज्ञवेद्य- मिति. संख्येयश्चाप्यसंख्येयो-ऽनंतश्चेत्यथवा त्रिधा । शीर्षप्रहेलिकांत: स्या-त्तत्रायः समयादिकः ॥ १ ॥ असंख्येयः पुनः कालः ख्यातः पल्योपमादिकः । सनंतः पुद्गलपरा-वर्तादिः परिकीर्तितः ।। २ ।। तत्र कालविशेपो यः सूक्ष्मवाद्योगिनापि नो । विभक्तुं शक्यते सेप समयः समये श्रुतः॥३॥ जीणे पटे भिद्यमाने तरुणेन चली- यसा । कालेन यावता तंतु-खुट्यत्येको जरातुरः ।। ४ ।। असंख्येयतमो भागो यः स्यात्कालस्य तावतः । समये समयः सैप । कथितस्तत्त्ववे- दिभिः ॥ ५॥ तस्मिस्ततौ यदेकस्मिन् पक्ष्माणि स्युरनेकशः। प्रति- रेनो ममिप्राय छे, परंतु योगशास्त्रना पहेला प्रकाशनी टीकामा वो आ प्रमाणे कयुं छ- " पदार्थोनो फेरफार करवा माटे लोकाकाश प्रदेशमा जे जूदा काळना अणुप्रो रहेला छे ते मुख्य काळ कवाय छे. (88). ज्योतिष शास्त्रमा जेनुं समयादिक मान कहेलुं के ते व्यावहारिक काळ थे, एम काळने जाणनारायो कहे छ." (२००) मा योगशास्त्रने भनु- सारे जोहए तो समयक्षेत्र (भडीद्वीप )नी पहार पण मुख्य काळनो स्वीकार थाय थे, तेनुं तच तो सर्व जाणे. था काळ संख्यात, असंग्च्यात भने अनंत एम प्रण प्रकारे पण काय थे, तेमा एक ममयथी भारंभीने शीर्षप्रहेलिका सुधीनी काळ पहेलो मरुपात काळ कवाय थे. (९०१). पन्योपम विगैरे प्रसंरुपात काळ कहेवाय छे, अने पुद्गलपरावादिक अनंत काळ कदेवाय छे. (२). मा रापमपणाने लीधे योगी पण जे काळनो विमाग करी शके नहीं, ते समय फवाय थे एम सिद्धांता कएं 2. (३). कोइ जुबान पळवान पुरुष एक जीर्ण पन जोरथी फाडे, ते परावे तेना मडेला एक तंतुने तूटवा जेटलो काळ लागे, पेटला काळनो जे भरपाठमो माग होप ते समय कहनाप एम समवेदीमार मिदा- समा कपुंथे. (५). फारपके ते एक महेला तंतुमा पगा पदमी होप दे, भने रेक (२८) श्रीकाललोकप्रकाश पक्ष्म च संघाताः क्षणच्छेद्या असंख्यशः ॥ ६॥ तेपां क्रमाच्छेदनेषु भवंति समयाः पृथक् । असंख्यैः समयैस्तत्स्या-तंतोरेकस्य भेदनं ॥७॥ एवं पत्रशतोद्वेधे चक्षुरुन्मेप एव च । भाव्याश्चप्पुट्टिकायां चा-संख्येयाः समया बुधैः ॥ ८॥ तं स्वरूपेण जानंतो-ऽप्यस्तोऽत्यंतसौक्ष्म्यतः। शृंगग्राहिकयान्येभ्यो निर्देष्टुं शक्नुवंति न ॥ ९॥ निर्देशो हि भवेत्तत्त- द्वचोव्यापारपूर्वकः ।। व्यापारों वचसां चैपो--ऽसंख्येयैः समयैर्भवेत् ॥१०॥ यावत्समय इत्येपो-चार्यतेऽक्षरसंततिः । असंख्याः समयास्ताव-दति- क्रामत्यनेकशः ॥ ११ ॥ जघन्ययुक्तासंख्यात-मितैः स्यादावली क्षणैः। संख्येयाभिश्चावलीभिः प्राणो भवति निश्चितं ॥ १२ ॥ नीरोगस्यानुप- हत-करणस्य बलीयसः । प्रशस्ते यौवने वर्च-मानस्याऽव्याकुलस्य च ॥ १३ ॥ अप्राप्तस्याध्वनः खेद-माश्रितस्य सुखासनं । स्याद्यदुच्छ्- वासनिःश्वास-मानं प्राणः स कीर्तितः ॥ १४॥ तत्र च-उच्छ्वास ऊर्ध्वगमन-स्वभावः परिकीर्तितः। अधोगमनशीलश्च निःश्वास इति पचमे क्षणवडे छेदवा लायक असंख्य संघातो ( परमाणुना स्कंधो) होय छे. ते संघातोने अनुक्रमे छेदता जूदा जूदा समयो लागे छे, तेथी एक तंतुने छेदतां असंख्यात समयो जाय 2. (७). ए ज प्रमाणे कमळनी सो पांखडीओ ( उपराउपर मूकेला पत्रो)ने जो- स्थी वांधा, नेत्रनो उन्मेप करता भने चपटी गाडतां असंख्य समयो लागे छ एम बुद्धिमान माणसोए जाण. (८). आवा एक समयनुं स्वरूप अरिहंतो जाणे छे, तोपण तेलो ते समयने अत्यंत सूक्ष्मपणुं होवाथी शृंगग्राहीपणाए (प्रत्यक्षपणे) बीजाभोने वतावी शकता नथी. (९). कारणके जेनो निर्देश करवो होय ते तेवा तेवा वचनना व्यापारपूर्वक थइ शके छ, अने भा वचननो व्यापार तो असंख्य समयोबडे थइ शके छे. (१०). जेटलामा समय ' एवा अक्षरोनो उच्चार कराय तेटलामा तो घणा असंख्य समयो बीती जाय छे. (११). भावा जघन्ययुक्त असंख्य (चोथु भसंख्यातु उत्प्रमाण) समयोनी एक श्रावली थाय छे. संख्याती प्रावलिकानो एक प्राण थाय छे. (१२). कोइ पुरुष नीरोगी, परिपूर्ण इंद्रियोवाळो, चळवान, भरजुवानीमा वर्ततो, व्याकुलता रहित, मार्गमा चालवाना खेदने नहीं पामेलो अने सुखासन उपर बैठेलो होय, तेवा पुरुषनो जे एक उच्छ्वास निश्वास ते प्राण कहेवाय छे. (१४). तेमां उंची गति करवाना स्वभाववाळा प्राणने उच्छ्वास कहेवामा . " सर्ग २८ मो। (२९) कीर्तितः ॥ १५ ॥ संख्येयावलिकामानौ प्रत्येकं तावुभावपि । द्वाभ्यां समुदिताभ्यां स्या-कालः प्राण इति श्रुतः॥१६॥ रोगा+देश्च निःश्वासो- च्छ्वासावनियताविति ॥ उक्तं पुंसोऽरोगतादि-विशेपेण कदंबकं ॥१७॥ भवंति क्षुल्लकभवा एकप्राणे यथोदिते । सातिरेकाः सप्तदश श्रूयतां तत्र भावना ॥ १८ ॥ मुहूर्ते क्षुल्लकभवा एकस्मिन् परिकीर्तिताः । पंच- पष्टिः सहस्राणि पट्त्रिंशा पंचशत्यपि ॥ १९ ॥ अत्र कः प्रत्यय इति यदि शुश्रूपति भवान् ॥ तदा तदपि निश्चित्य श्रूयतां प्रतिपाद्यते ॥२०॥ एका कोटी सप्तपष्टि-लक्षापयथ सहस्रकाः। स्युः सप्तसप्ततिर्युक्ता द्विशत्या पोडशाढ्यया ॥ २१ ॥ १६७७७२१६ एता मुहूर्त एकस्मि-नुक्ता श्रावलिका जिनैः। एकतुल्लभवे चैताः पट्पंचाशा शतद्वयी ॥ २२ ॥ क्षुल्लभवावलिकाभि-मुहूर्तावलिका यदि। विभज्यंते तदा लभ्या मौ- हूर्ताः क्षुल्लका भवाः ॥ २३ ॥ अथ प्रकृतं-प्राणाश्चैकमुहूर्ते स्युः सप्त- त्रिंशच्छतानि वै । त्रिसप्तत्या संयुतानि ३७७३ राशिरेप विभाजकः ॥२४॥ मौहूर्त्तक्षुल्लकभव-६५५३६ राशिरेतेन भज्यते ॥ तदाप्यंते सप्तदश प्राण- भावे के अने नीचे गति करवाना स्वभाववाळाने निवास कहेवामां आवे छे. (१५). मा पमेमांना दरेक संख्याती प्रावलिकाना प्रमाणवाळा छे, अने ते चमे मळीने एक प्राण शाय के एम कर्दा छे. (१६). रोगी विगैरे पुरुपना निःश्वास भने उनकास नियमित होता नथी, तेथी ते पुरुपने नीरोगता विगेरे विशेषणोनो समूह भाप्यो छे. (१७), मावा उपर कहेला एक प्राणने विपे सतरथी कांइक अधिक क्षुल्लक भयो थाय छे तेनी गावना (रीत) सामळो.-(१८). एक मुहूर्तमी पोसठ हजर पोच सो ने छत्रीश (६५५३६) जुनक भवो कहेला छे. (१६). ते संख्यानी शी रीते प्रतीति करवी ' एम कहीने जो तुं ते सामळवा इच्छतो हो तो ते पण तुं निये समिळ. अमे कहीए छीए. (२०)-जिनेश्वरोए एक मुहू. मा एक करोड सडसठ लास सीतोतेर हजार यसो ने सौळ (१६७७७२१६) मावलि- कामो कही थे, मने एक चुम्नक मवमा यसो ने छप्पन (२५६) पावलिका कही छ वेपी एक महर्तनी भावलिकामोने शुनक भवनी भावलिकापडे मांगाकार करीए त्यारे एक महर्सना सुनक भवो (६५५३६ भावे 2. (२३). हवे प्रकृत कहे थे.-एक मुहर्समा साह- श्रीश सो ने तोतेर (३७७३) प्राणो याय छे. भा राशि (संख्या) चिमाजक (मांगनार) थे. (२४). भा (३७७३) विमाजक राशिवडे एक महर्जना (६५५३६) तुखक भवना राशिनो भीमाललोकप्रकाश । स्य क्षुल्लका भवाः ॥ २५॥ त्रयोदशशताः पंच-नवरया च समन्विताः। अंशा उपरि शिष्यंते भवस्याटादशस्य वै ॥ २६ ॥ अष्टसप्ततिसंयुक्ता- श्चेषयोविंशतिः शताः । दिप्यंतेशा एपु पूर्णः स्यात्तदाष्टादशो भवः ॥ २७ ॥ अथो कियत्य पावल्यः स्युस्त्रयोदशभिः शतैः । भागेः पंच- नवत्याढ्यैः शेपैस्तदपि कथ्यते ॥ २८ ॥ शतास्त्रयोदशांशानां ये पंचनव- तिस्पृशः। पट्पंचाशद् द्विशत्या ते हंतव्याः कर्तृमावलीः ॥ २९ ॥ शेषांकाः क्षुल्लकभव-सस्का एते हि संत्यतः । क्षुल्लभवावलिकाभि-र्भवं. त्यावलयो हताः ॥ ३०॥ जाताश्चावलिकास्तेषां घाते लक्षत्रयं तथा । सप्तपंचाशत्सहस्राः शतं विंशतिसंयुतं ३५७१२० ।। ३१ ।। त्रिसप्ततिसमा- युक्त-सप्तत्रिंशच्छतात्मना ३७७३ । प्रागुक्तभाजकेनास्य राशेविभजने सति ॥ ३२ ॥ चतुर्नवतिरावल्यो लभ्यंतेंशाः पुनः स्थिताः। चतुर्विश- तिरेवाप्ट-पंचाशदधिकाः शताः ॥ ३३ ॥ एवं च तुल्लकभवाः प्राणे सप्त- दशैकके। चतुर्नवतिरावल्य अावल्या अंशकाः पुनः ॥ ३४ ॥ त्रिसप्तत्या युतैः सप्त-त्रिंशता विकलैः शतैः । छिन्नाया अष्टपंचाशाः स्युश्चतुर्विंशतिः शताः ।। ३५ ॥ इति तुल्लकभवप्रकरणम् ।। भागाकार करवो. तेम करवाथी एक प्राणना सत्तर (१७) क्षुल्लक भव प्राप्त थाय छे. (२५). तथा अढारमा भवना तेर सो ने पंचाएं (१३९५) अंशो शेष रहे छे. (२६). ते अंशोमां त्रेवीश सो ने अठोतेर (२३७८) नांखीए त्यारे श्रढारमो क्षुल्लक भव पूर्ण थाय. (२७). हवे जे तेर सो ने पंचा' (१३६५) भंशो शेष रहेला छे तेवढे केटली पावलिका थाय ? ते पण कहेवाय छे. (२८).-जे तेर सो ने पंचाएं (१३६५) अंशो चाकी रहेला छे, तेनी पावलिका करवा माटे ते अंकने यसो ने छप्पने (२५६) गुणवा. (२६). कारणके या शेष अंक शुल्लक भवनो छे, तेथी तेने नुल्लक भवनी (२५६) श्रावलिकावडे गुणीए त्यारे तेनी श्रावलिका श्रावे छे. (३०). तेथी १३६५ ने २५६ वडे गुणवाथी प्रण लाख सतावन हजार एक सो ने वीश (३५७१२०) थाय छे. (३१). पछी पा राशिने (अंकने) पूर्व कहेला साड- श्रीश सो ने तोतेरे (३७७३) मांगीए त्यारे चौराऍ (६४) श्रावलिका भागमा मावे छ, भने चोवीश सो ने अठावन (२४५८) पाकी शेष रहे छे. (३३). या प्रमाणे एक प्राणमा सत्तर (१७) क्षुल्लक भयो, चौराणुं (९४) पावलिका तथा साडत्रीश सो ने तोतेरवडे (३७७३) भांगेली पावलिकाना चोवीश सो ने अठावन (२४५८) अंशो थाय छे. (३५). इति क्षुल्लक भव प्रकरण.

सर्ग २८ मो। (३१) क्षुल्लकभवप्रयोजनं चैवं-श्रायुक्षुल्लभवमित-मौदारिकवपुर्भृतां । जघन्यतो विनिर्दिष्टं पंचमांगे जिनेश्वरैः ।। ३६ ॥ कर्मप्रकृत्यादिप्वपि औदारिकशरीराणां तिर्यग्मनुष्याणामायुपो जघन्यस्थितिः क्षुल्लकभव- ग्रहणरूपा प्रतिपादिता, यत्पुनरावश्यकटीकायां क्षुल्लकभवग्रहणं वनस्प- तिधेव प्राप्यते इत्युक्तं तन्मतांतरमित्यवसीयते, इति कर्मग्रंथवृत्तौ. एकप्राणे चावलीनां पट्चत्वारिंशदन्विताः । शताः प्रोक्ताश्चतुश्चत्वा- रिंशदंशाश्च पूर्ववत् ॥ ३७ ॥ तच्चैवं-एकनुल्लभवसत्का-बलीभिः परि- ताडयेत् । प्राणक्षुल्लभवांस्तेषु शेषा प्रावलिकाः क्षिपेत् ॥ ३८ ॥ एवं चासंख्यसमये-रावली ताभिरत्र यत् । संख्येयाभिः प्राण उक्त-स्तत्सर्व विशदीकृतं ॥ ३९ ॥ नन्वावलिकादीनां यदसंख्यक्षणरूपता ॥ प्रोक्का तत्प्रोच्छल क-!कलिंजस्य प्रणं ॥ ४० ॥ यतः पूर्वस्य सद्भावे-नोद्भ- वेदुत्तरः क्षणः । नश्यत्यवश्यमायश्च द्वितीये जनिमीयुपि ॥ ११ ॥ समु. तुनक भवतुं प्रयोजन ा प्रमाणे छे.-पांचमा मंगमा जिनेश्वरोए औदारिक शरीर. पाळानुं जपन्य प्रायुष्य जुल्लक भव जेटलुं कयुं छे. (३६). कर्मप्रकृति विगेरे ग्रंथोने विष पण औदारिक शरीरवाळा तिर्यच भने मनुष्यना भायुष्यनी जघन्य स्थिति हुनक मव ग्रहणरूप कहेली थे, परंतु आवश्यकनी टीकामा "शुधक मपनुं ग्रहण (साधारण) यनस्पतिने विपे ज प्राप्त थाय छे." एम कयुं छे. ए मतांतर के एम जणाय थे. ए प्रमाणे कर्मग्रंपनी टीकामा कयुं छे. एक प्राणने विपे भावलिका चुमाळीश सो ने बैतालीश (४४४६) भने ते उपर मंशो पूर्वनी जेम (६४) थाय छे. (३७). ते पा प्रमाणे-एक क्षुनक भवनी मावलिका (२५६) वडे एक प्रायना धुनक मवा (१७) ने गुणवा. पछी वेर्मा शेप भावलिका (६४) नासपी. (३८), श्रा रीते जे असंख्य ममयोनी एक मावलिका थाय के पने संख्याति भावलिकानो एक प्राण को छे, ते सर्व सिद्ध धाय छे. (३६). भहीं कोर शंका करे के-मावलिकाना जे असंख्य ममयो कसा ते तो उडता देडका- मोए फरीने गोकलिंजने (गायना वाराने) मरी देवा जेधुं छे. (४०). कारण पूर्वनो (पहलो) समय पर्सतो होय सारे उत्तर (पीना) समयनी उत्पति पर शकती नपी. बीजो समय उत्पम याप त्यारे पदलो समय अपरप नाश पामे थे. (४१). कारण विमान १ सरगी संस्थाना प्रदेश विनाना परा.

(३२) श्रीकाललोकप्रकाश। चयादिको धर्मः पुद्गलानां हि संभवेत् ।। विमात्रस्निग्धरूक्षाणां कालस्य तु न जातुचित् ॥ ४२ ॥ अत्रोच्यते-प्ररूपयितुकामेन कालमावलिका- दिकं । प्रज्ञापकेन यावंतः क्षणा धीगोचरीकृताः ॥ ४३ ॥ विनष्टा अपि तावंतः समुच्चिततयाखिलाः । उपचर्यंत इत्येव-मावल्यादिनिरूपणा ॥४४॥ श्रत एवोपचरितः सर्वोऽप्यावलिकादिकः ॥ कालो न वास्तव किंतु समयः खलु वास्तवः ॥१५॥ प्राणैः स्यात्सप्तभिः स्तोकः स्तोकैश्च सप्तभिर्लवः । सान्रष्टात्रिंशता च लवैर्भवति नालिका ॥ १६ ।। भंग्यंतरेणाथ मानं नाडिकाया निरूप्यते । श्रूयतां तत्सावधान-- रुक्तं ज्योतिष्करंडके ॥ १७ ॥ नालिका नाम घटिका कार्या लोहमयी च सा । दाडिमीकुसुमाकारा सत्तला वर्चुलाकृतिः ॥ १८ ॥ केशास्त्रिवर्ष- जातायाः करिण्याः पुच्छमूलजाः । ऋजूकृताः पाणवति-र्मीलिताश्च परस्परं ॥ ४९ ॥ विशंति यादृशे छिद्रे तिष्ठति च निरंतराः। छिद्रं कार्य तागस्या नालिकाया अधस्तले ॥ ५०॥ यद्वा द्विवर्षजातायाः करिण्याः एवा स्निग्ध अने रुक्ष पुद्गलोनो ज सम्हादिक धर्म संभवे थे, परंतु काळनो समुच्चय कदापि संभवतो नथी. (४२). पा शंकानो उत्तर श्रापे छे के-प्रावलिका विगेरे काळने कहेवानी इच्छावाळा प्रज्ञापके (आचार्ये ) जेटला क्षणो ( समयो ) पोतानी घुद्धिना विषयमा कर्या होय तेटला क्षणो जो के नाश पाम्या छे, तोपण ते सर्वे समूहपणे उपचारथी ज कहेला छ। तेथी पावलिका विगेरेनी प्ररूपणा थइ शके छे. (४३-४४). एटला माटे ज श्रावलिका विगेरे उपचारथी कहेलो सर्व काळ वास्तविक नथी, परंतु मात्र समय ज वास्तविक काळ छे. (४५). हवे सात प्राणोबडे एक स्तोक थाय छे, सात स्तोकनो एक लव थाय छ, साडी पाडत्रीश लवबडे एक नालिका थाय छे. (४६). श्रा नालिकानुं मान बीजी रीते बतावे छे. ते वाचत ज्योतिषकरंडक नामना ग्रंथमा कां छे, ते तमे सामळो. (४७).- नालिका नाम घडीनुं छे. ते दाडमना पुष्पना आकारवाळी, सारा तळियाचाळी, गोळ प्राकृतिवाळी लोढानी करवी. (४८). पछी त्रण वर्षनी थयेली हाथणीना पुच्छना मूळमा उगेला केशोमाथी छन्नु केशरे लह तेने सरल करी परस्पर मेळववा-मेगा करवा. (४६). ते केशो जेटला छिद्रमा पेसे अने प्रांतरा रहित गाढरीते रही शके वेटलुं ते नालिकानी नीचे छिद्र कर. (५०). अथवा चे वर्षनी हाथणीना पुच्छना मूळमां उगेला छन्नु वाळ .. सर्ग २८ मो। (३३) पुच्छमूलजाः। वालाःपण्णवतिःप्राप्ता द्वैगुण्यं मांति यादृशे ॥५१॥ यद्वा- चतुःस्वर्णमापजाता शलाका चतुरंगुला । यादृशे विशति छिद्रे कर्त्तव्यं तादृशं तकत् ॥ ५२ ॥ अथैतस्यां जलं धार्य तौल्यमेयप्रमाणतः ॥ ततः प्रसंगतो भ्रूमः स्वरूपं तौल्यमेययोः ॥ ५३ ॥ तृणस्य मधुराख्यस्य चतु- भिस्तंडुलैर्भवेत् । तौल्यतः सर्पपः श्वेत-स्तैश्च पोडशभिः समं ॥ ५४ ॥ धान्यमाषफलं ताभ्यां द्वाभ्यां गुंजाफलं भवेत् । द्वाभ्यां गुंजाभ्यां च कर्म(प)-मापः पोडशभिश्च तैः ॥ ५५ ॥ धरणापरपर्यायं मानं गद्याण- काभिधं । गद्याणकाभ्यां सार्धाभ्यां कपः सुवर्णसंज्ञकः ।। ५६ ॥ चतु:- कर्ष पलं सार्द्धः प्रस्थो द्वादशभिश्च तैः । तुला पलशतेनासां विंशत्या भार ईरितः ।। ५७ ।। इति ज्योतिष्करंडवृत्त्यभिप्रायः, लोके तु-तुल्या यवाभ्यां कथितात्र गुंजा, वल्लस्त्रिगुंजो धरणं च तेऽष्टौ। गद्याणकस्तद्वय- मिंदतुल्यै-वस्तथैको घटकः प्रदिष्टः ॥ १॥ दशार्द्धगुंज प्रवदंति मापं, मापायैः पोडशभिश्च कर्ष । कर्पश्चतुर्भिश्च पलं तुलाज्ञाः, कप सुवर्णस्य लइ तेने द्विगुण करवा. ते जेटला छिद्रमा माय तेटलुं छिद्र कर. (५१). अथवा चार मासा सुवर्णनी चार मांगळ लांची बनावेली शलाका जेटला छिद्रमा माय तेलु छिद्र कर. (५२). पछी ते घडीमा तोलना अथवा मापना प्रमाणथी जळ नासवानुं छे, तेथी वेना प्रसंगने लीधे ते तोल अने मापनुं स्वरूप कहीए छोए. (५३).-मधुर नामना दणना चार पोसा जोखबाथी एक श्वेत सर्पप थाय छ, ते सोळ श्वेत सर्पप जेटलो एक धान्यमाप (महद) थाय थे, तेवा ये मापनी एक गुंजा थाय थे, ये गुंजावडे एक कर्म(क)माप (पाल ) पाय थे, सोळ कर्म(प)मापबहे गवाणक नामर्नु, मान (अर्ध तोलं) थाय छ, सेनें चीजें नाम धरण कडेवाय छ, ये गदाणकनो एक सुवर्ण नामनो कप ( तोलुं) थाय छ, चार कर्पनो एक पल थाय छे, साडा पार पलनो एक प्रस्थ (५० तोला-११ शेर) पाय थे, सो पलवडे एक तुला (४०० तोला-१० शेर ) थाय छ; अने वीश तुलारडे एक मार ( २०० शेर-५ मय) कहलो छे. (५७) मा प्रमाणे ज्योविपकरंडकनी टीकानो भभिप्राय छे. मा पारत लौकिक शास्त्रमा मा प्रमाणे कयुं छे-"भहीं ये पवनी एक गुंजा कहेली थे, अप गुंजानो एक बाल कहेलो छे, भाठ बालर्नु एक धरण कएं थे, ये घरानो एक गपाणक (०॥ वोलुं) कमोथे, भने ईद एटले घोसठ वालनो एक पटक सर्ग २८ मो। (३३) पुच्छमूलजाः। वालाः पण्णवतिः प्राप्ता द्वैगुण्यं मांति यादृशे ॥५१॥ यहा- चतुःस्वर्णमापजाता शलाका चतुरंगुला । यादृशे विशति च्छिद्रे कर्त्तव्यं तादृशं तकत् ॥ ५२ ॥ अथैतस्यां जलं धार्य तौल्यमेयप्रमाणतः ॥ ततः प्रसंगतो धूमः स्वरूपं तौल्यमेययोः । ५३ ॥ तृणस्य मधुराख्यस्य चतु- भिस्तंडुलैर्भवेत् । तौल्यतः सर्षपः श्वेत-स्तैश्च पोडशभिः समं ॥ ५४ ॥ धान्यमापफलं ताभ्यां द्वाभ्यां गुंजाफलं भवेत् । द्वाभ्यां गुंजाभ्यां च कर्म(प)-मापः पोडशभिश्च तैः ॥ ५५ ॥ धरणापरपर्यायं मानं गद्याण- काभिधं । गद्याणकाभ्यां सार्द्धाभ्यां कपः सुवर्णसंज्ञकः ॥ ५६ ॥ चतु:- कर्प पलं सार्द्धः प्रस्थो द्वादशभिश्च तैः । तुला पलशतेनासां विंशत्या भार ईरितः ॥ ५७ ॥ इति ज्योतिष्करंडवृत्त्यभिप्रायः, लोके तु-तुल्या यवाभ्यां कथितात्र गुंजा, वल्लस्त्रिगुंजो धरणं च तेऽष्टौ। गद्याणकस्तवय- मिंद्रतुल्यै-वल्लेस्तथैको घटकः प्रदिष्टः ॥ १॥ दशार्द्धगुंजं प्रवदंति मापं, मापायैः पोडशभिश्च कर्ष । कर्पश्चतुर्भिश्च पलं तुलाज्ञाः, कर्प सुवर्णस्य लइ तेने द्विगुण करवा. ते जेटला छिद्रमा माय वेटलुं छिद्र कर. (५१), अथवा चार मासा सुवर्णनी चार मांगळ लांबी बनावेली शलाका जेटला चिद्रमा माय तेटलुं छिद्र कर. (५२). पछी ते घडीमा तोलना अथवा मापना प्रमाणधी जळ नासवान छे, तेथी वेना प्रसंगने लीधे ते तोल भने मापर्नु स्वरूप कहीए छीए. (५३).-मधुर नामना हणना चार धोखा जोखवाधी एक श्वेत सर्पप थाय छे, ते सोळ श्वेत सर्पप जेटलो एक घान्यमाप ( भडद ) थाय छे, तेया ये मापनी एक गुंजा थाय छ, ये गुंजावडे एक कर्म(१)माप (वाल ) थाय छे, सोळ कर्म(प)मापवडे गवाणक नामर्नु, मान (अर्ध तोलं) थाय छ, तेनुं बीजं नाम घरण कडेवाय छ, ये गद्याणकनो एक सुवर्ण नामनो कर्प ( तोलुं) थाय थे, चार कर्पनो एक पल थाय थे, साडा बार पलनो एक प्रस्थ (५० तोला-१॥ शेर) पाय थे, सो पलवडे एक तुला (४०० तोला-१० शेर) थाय के भने नीश तुलावडे एक मार ( २०० शेर-५ मण) कहेलो थे. (५७) या प्रमाणे ज्योतिप्फरंडकनी टीकानो अभिप्राय छे. मा पारत लौकिक शाखमा पा प्रमाणे कडुं छे--" भहीं ये यवनी एक गुंजा कहेली , प्रण गुंजानो एक बाल कहेलो छ, माठ वाल- एक धरण कयं दे, ये घरगनो एक गवाणक (०॥ वोलुं) कपो छ, भने र एटले चोसठ वालनो एक घटक . ५ .. (३४) श्रीकाललोकप्रकाश। सुवर्णसंज्ञं ॥२॥ पादोनगयाणकतुल्यटकै-बिसप्तसंख्यैः कथितोऽत्र सेरः । मणाभिधानः खयुगैश्च सरै-न्यिादितौल्येषु तुरुष्कसंज्ञा ॥३॥ इति लीलावत्यां ॥ तौल्यप्रमाणमित्युक्तं पूर्वाचार्यप्रदर्शितम् । अथ स्वरूपं मानं च तुलायाः किंचिदुच्यते ॥ ५८ ॥ पंचत्रिंशल्लोहपल-मयी वृत्ता घना भृशं । द्वासप्ततिं चांगुलानि दीर्घा लोहतुला भवेत् ॥ ५९॥ तस्याः पंचपलमितं धरणं रचयेवुधः । येन धृत्वा तौल्यते त-द्धरणं परिकीर्तितं ॥ ६० ।। तस्यां चाथ धरणके योजिते सति सा तुला ।. ध्रियमाणा यत्र देशे समा स्यात्पार्श्वयोईयोः॥६१॥ तत्र प्रदेश समता-ज्ञानाय परिकल्पयेत् । रेखामेकां ततश्चान्यां रेखाणां पंचविंशति ॥ ६२॥ तत्र स्यात्प्रथमा रेखा कार्द्धस्यैव सूचिका । द्वितीयकस्य कर्षस्य तृतीया कर्पयोर्द्वयोः ॥६३ ॥ त्रिकर्षसूचिका तुर्या स्याच्चतुःकर्पसूचिका । पंचम्यथ नव रेखाः स्युरे- (ये तोला) कयो छे तथा पांच गुंजानो एक माप, सोळ मापनो एक कर्ष (तोलु) भने चार कर्षनो एक पल थाय थे, एम तोलने जाणनारा पंडितो सुवर्ण नामनो सुवर्ण कर्प कहे छे. पोया गयाणक जेटलो एटले पोतेर टंकनो एक शेर ( २७ तोला) कह्यो छ, अने चाळीश शेरनो एक मण को छे. धान्यादिक तोळवामा तेनु तुरुक नाम थे." श्रा प्रमाणे लीलावती नामना ग्रंथमा कयुं छे. उपर प्रमाणे पूर्वना प्राचार्योए देखाडेलु तोलाचं प्रमाण कमु. हवे तुला (बाजवा) नुं काइक मान कहीए बीए.-(५८). पांत्रीश पल लोढानी गोळ अने अत्यंत गाढ पत्रीश आंगळ लावी तुला करवी. (५६). ते तुलानुं डाह्या पुरुष पांच पलनु (लोढार्नु) घरण करवं, जेनावडे पकडीने तोळवामा श्रावे ते धरण कहेवाय छे. (६०). ते तुलानी बच्चे धरणकने लगाडवू, ते एवा स्थानमा लगाडवू के तेवडे धारण कराती तुला बन्ने पडसे सरखी (सीधी) रहे. (६१). तेनुं सरखापणुं जाणवा माटे वे मध्य प्रदेशमा एक रेखा करवी अने त्यारपछी चीजी पचीश रेखाओ करवी. (६३). तेमा पहेली रेखा अर्घ कर्पने कहेनारी छे, बीजी रेखा एक कर्पने सूचवे छ, त्रीजी रेखा घे कर्षने सूचवे छे. (६३), चोथी रेखा त्रण कर्षने सूचवे थे, अने पांचमी १ डांडी.

सर्ग २८ मो। (३५) कैकपलाधिकाः ॥ ६४॥ यथा तत्र भवेद्रेखा पष्ठी द्विपलसूचिका । एवं यावद्दशपल-सूचिका स्याच्चतुर्दशी ॥ ६५ ॥ ततश्च द्वादशपल-सू. चिका पंचदश्यसौ । पोडशी च पंचदश-पलाभिव्यंजिका स्मृता ।। ६६ ।। ततः सप्तदशी रेखा पलविंशतिसूचिका । अत ऊर्ध्व च दशक-वृद्धा श्रष्टाप्यमूः स्मृताः ॥६७॥ अष्टादशी यथा रेखा स्यात्रिंशत्पलसूचिका । क्रमादेवं शतपल-सूचिका कीर्तितांतिमा ॥ ६८॥ पंचपंचदशत्रिंश- पंचाशत्पलसूचिका । नवमी पोडशी चाटा-दशी च पंचविंशिका ॥६६॥ एताश्चतस्रो रेखाः स्युः फुल्लफुल्लडिकायुताः। स्युः शेपा ऋजवः सर्वा एक- विशतिसंमिताः ॥ ७० ॥ तुलास्वरूपमित्येवं यथागममुदीरितं । प्रमाणमथ मेयस्य यथागम- मुदीर्यते ॥ ७१ ॥ देशेषु मगधाख्येपु प्रसिद्धं कुडवाभिधं । मानं स्यात्तौ- ल्यचिंतायां सकाद्धं पलत्रयं ॥ ७२ ॥ चतुर्भिः कुडवैरेकः प्रस्थो माग- रेखा चार कपने सूचवे छे. त्यारपछीनी नव रेखा एक एक पल अधिक सूच- चनारी कहेवी. (६४). ते श्रा प्रमाणे-छछी रेसा ये पलने सूचये थे. एज प्रमाणे एक एक पल वधारतां चौदमी रेखा दश पलने सूनवे छे. (६५). त्यारपछी पंदरमी रेखा पार पलने सूचवे थे, सोळमी रेसा पंदर पलने सूचवनारी कही छे. (६६), त्यारपछी सतरमी रेसा वीश पलने सूचवनारी छे, त्यारपछीनी पानी पाठेरेखा दश दश पलनी पृद्धिवाळी फहेली छे. (६७), ते भा प्रमाणे-अढारमी रेखा श्रीश पलने सूचवनारी थे, एज भनु- क्रम रेती पचीशमी रेखा सो पलने सूचवे छे. (६८). पांच पलने सूचवनारी नवमी रेखा, पंदर पलने एपानारी सोळभी रेसा, त्रीश पलने वचकनारी अदारमी रेसा भने पचास पलने सूनवनारी पचीशमी रेखा, प्रा चार रेखामो स्पष्ट फुलवाळी होय छ भने था. कीनी एकवीश रेखामो सरळ (सीधी-लीटा लेवी ) होय छे. (७०). मा प्रमाणे तुलानुं स्वरूप भागमा पमा प्रमाणे भहीं कj 2. हये मेयर्नु (मापर्नु ) प्रमाण भागमा क्या प्रमाणे कडेवामा भावे थे. (७१). मगध देशमा कुडर नामर्नु माप प्रमिद छे, ते वोलने माश्रीने कहीए तो प्रण पल भने म फोनु होप 2. (७२) पार पडवनो एक मगध देशनो प्रस्थ थाप थे.तेने । पार कर्ष एटसे एक पल. २ पेली रेया वो मो पसने मूष से. वहीं माम रेम प्यं ? ते सममातुं नपी.

(३६) श्रीकाललोकप्रकाश। धिको भवेत् । सानि द्वादश पला-न्येष तौल्यप्रमाणतः ॥ ७३ ॥ प्रस्थैश्चतुभिरेकः स्या-दाढकः प्रथितो जने । पंचाशत्पलमानोऽयं । ज्ञेय- स्तौल्यविवक्षया ॥७४ ॥ चतुर्भिराढोणो जने सोऽप्यतिविश्रुतः। पलानां द्वे शते ख्यातः स च तौल्यप्रमाणतः ॥ ७५॥ खारी पोडश- भिद्रोणैः सा स्यात्तौल्यप्रमाणतः । द्वात्रिंशता पलशतैः समिता लोक- संमता ।। ७६ ॥ चाहः स्याविंशतिः खार्यः स भवेत्तौल्यमानतः । चतु:- पष्टिः सहस्राणि पलानां तुलया धृतः ॥ ७७ ॥ अथ प्रकृतं-कालेन यावता तस्यां नालिकायां विशेज्जलं । श्राढको द्वौ सुरंध्रेण तावान् कालो हि नालिका । ७८ ॥ भवे- त्पलशतं चैत-तुलया तुलितं जलं । तच्च स्वभावतः स्वच्छ-मेष्टव्यं शारदादिकं ॥ ७९ ।। देवः श्रीसर्वज्ञो विश्वश्रीशः सिद्धिस्त्रीकांतः, काम- द्रुद्रोहाग्निर्मायादोपाभास्वान्नीरागः । चंद्रश्वेतश्लोकः स्याद्वादारामाब्दो लोकार्यो, वातापायः शांतो लोकेभ्योऽसंख्यं सौख्यं देयात् ।। ८० ॥ तोलना प्रमाणथी कहीए तो साडा वार पल थाय छे. (७३). चार प्रस्थनो एक आढक लोकने विषे प्रसिद्ध छे, तेने तोलनी अपेक्षाए कहीए वो पचास पलना प्रमाण वाळो जाणवो. (७४), चार आढकनो एक द्रोण थाय छे, ते पण लोकने विषे अति प्रसिद्ध छे, तेने तोलना प्रमाणथी कहीए तो ते बसो पलनो प्रसिद्ध छे. (७५). सोळ द्रोणनी एक खारी थाय छे, तेने तोलना प्रमाणथी कहीए तो ते बत्रीश सो पलना प्रमाणवाळी लोकमा मानेली छे. (७६). पीश खारीनो एक वाह थाय छ, तेने तोलना मानथी कहीए तो बाजवामां नांखीने जोखवाथी चोसठ हजार पल थाय छे. (७७). हवे प्रस्तुत वातने कहे छे.-जेटला काळे ते नालिका (घडी) मा तेना सारा चिद्रद्वारा वे श्राढक प्रमाण जळ पेसे, तेटला काळने नालिका (घडी) कहेवामां आवे छे. (७). ते जळने तुलावडे तोळीए तो सो पल (४०० तोला ) प्रमाण थाय के, आ जळ शरदऋतु विगेरे संबंधी स्वभावथी ज स्वच्छ होय तेवू इच्छवा लायक छे. (७९). विश्वनी लक्ष्मीना स्वामी, सिद्धिरूप स्वीना पति, कामदेवरूप वृक्षनो द्रोह करवामां अग्नि समान, मायारूपी रात्रिनो नाश करवामां सूर्य समान, राग रहित, चंद्र जेवी उज्वळ कीर्तिवाळा, स्याद्वादरूपी उद्यानने विकस्वर करवामां मेघ समान, सर्व लोकने पूज्य, कष्टनो नाश करनार अने शांत , सर्ग २८ मो। (३७) श्रद्रुतमंथरमध्यम-गत्या पठनेऽस्य भवति वृत्तस्य । कामक्रीडाछंदसि षष्ट्या गुर्वक्षरैः पलं लोके ॥८१॥ सूक्ष्मेक्षिकार्थिनां चैवं वाच्यं- संगीतज्ञास्त्रप्रसिद्धस्स पंचमात्रिकतालस्याविच्छेदेन चतुर्विशतिवारान् हस्तमुखाभ्यामुघटने सर्वथाप्यविसंवादि जलपलमेकं स्यादिति लौ. किकज्योतिःशास्त्रानुसारेण पलमानं, एभिश्च पष्ट्या पलैर्घटिकापर- पर्याया नाडिकेति. नाडिकाभ्यां भवेद् द्वाभ्यां मुहूर्त्तस्तौल्यतः स च । पलानां द्वे शते माना-चत्वारो नूनमाढकाः ॥ ८२ ॥ अहोरात्रो मुहूर्तेः स्या-त्रिंशता पष्टिनालिकः । स तौल्यतस्त्रयो भाराः षट्सहस्त्राः पलानि वा ॥८३ ॥ मेयप्रमाणचिंतायां सविंशं शतमाढकाः। पक्षः पुनरहोरात्रैः स्यात्पंच- दशभिर्धवं ॥५४॥ स तौल्यतः पंचचत्वारिंशद्भारात्मको भवेत् । पाढकानां शतान्यष्टा-दश मेयप्रमाणतः ॥ ८५॥ तौल्यतो नवतिर्भारा मासः पक्षद्वयात्मकः । पत्रिंशदाढकशता-न्येप मेयप्रमाणतः ॥८६॥ स्वभाववाळा श्री सर्वज्ञ देव लोकोने असंख्य सुख आपो. (८०). आ कामक्रीडा नामना श्लोकमा साठ गुरु अवरो छे. भा घृत्त (श्लोक) बहु जलदीधी के बहु धीमेथी नहीं पोलतो मध्यम रीते बोलीए तो एक पल प्रमाण जळ नालिकामा पेसे छे (वेटलो वखत लागे छे ). (८१). सूक्ष्म जोवानी इच्छायाळाने या प्रमाणे कहेचु.-संगीत शास्त्रमा प्रसिद्ध पांच मात्रावाळा तालने निरंतर (विश्राम विना) चोवीश वार हाथ अने मुखवढे उद्- पहन करवामां सर्वथा प्रकारे विसंवाद रहितपणे एक पल प्रमाण जळ नालिकामा पेसे छ. ए प्रमाणे लौकिक ज्योतिप् शास्त्रने अनुसारे पलनुं मान जाणवू अने भावा साठ पले फरीने एक नालिका याय छे तेनुं पीजु नाम घटिका (घडी) कहेवाय थे. हवे चे नाडि- फार्नु एक महर्च थाय छे. तोलनी अपेचाए यसो पल भने मापनी अपेचाए चार माढक (जळनुं प्रमाण ) पाय थे. (८२). त्रीश मुहूर्तनो एटने साठ नाडिका (घडी) नो एक रामि दिवस थाय थे, वे तोलनी अपेक्षाए प्रण भार अथवा छ हजार पल थाय छे. (८३). भने मापनी अपेचाए एक सो ने वीश माढक याय छे. हवे पंधर रात्रि-दिवसनो एक पत्र (पखवाडीपुं) पाय छे. (८४). ते सोलनी अपेषाए पीस्वालीश मारवाळो भने मापनी मपेपाए भदार सो माढकालो थाय छे. (५). ये पसवाडीयानो एक मास थाय थे, ये बोलनी भधार ने मार भने मापनी अपेषाए छत्रीश सो मादक थाप के.

(३६) श्रीकाललोकप्रकाश। मासैदशभिश्चैकः कर्मसंवत्सरो भवेत् । शतानि त्रीणि पट्याढ्या- न्यत्र रात्रिंदिवानि च ।। ८७॥ तौल्ये सहस्रं साशीनि भाराणां स्यात्स मानतः। त्रिचत्वारिंशत्सहस्रा-ण्यादकानां द्विशत्यपि ॥ ८८ ॥ ऋतु- संवत्सरोऽप्येष ऋतुषद्कात्मको भवेत् । ऋतवो हि वसंतायाः पृथग्मा- सद्वयात्मकाः ॥ ८६ || किं च संवत्सराः पंच-विधाः प्रोक्ता जिनेश्वरैः । सूर्यर्तुचंद्रनक्षत्रा-वयास्तथाभिवतिः॥ ९० ॥ तत्र च-द्विमंडलाली- चारेण माडेनायनद्वये । परिपूर्णे कृते पूर्णः सूर्यसंवत्सरो भवेत् ॥९१॥ सत्यशीतौ मंडलानां शते चारो भवेद्रवेः । एकस्मिन्नयने तस्मा-सत्य- शीतिशतं दिनाः ॥ ९२ ॥ षट्पष्ट्याभ्यधिका चैव-महोरात्रशतत्रयी। सूर्यसंवत्सरे दृष्टा विशिष्टज्ञानदर्शनैः ॥ ९३ ॥ सर्वे कालविशेषा ये। ख्याता वर्षशतादयः। पूर्वांगपूर्वप्रमुखाः पल्यवादियोऽपि च ॥९४ ॥ कर्मणां स्थितयः सर्वा मायूष्यखिलदेहिनां । सूर्यवर्यप्रमाणेन ज्ञेयान्ये- तानि धीधनैः ॥ ९५॥ नन्वत्र वक्ष्यते वर्ष-युगं चंद्राभिवद्धितः । युगा- (८६). वार मासनो एक कर्मसंवत्सर (वर्ष) थाय छे, तेमां त्रण सो ने साठ रात्रि दिवस थाय छे. (८७). ते नोलनी अपेक्षाए एक हजार ने अंशी मार अने मापनी अपेक्षाए तेंतालीश हजार ने बसो बाढक थाय छे. (८८). छ ऋतुना स्वरूपवाळा श्रा कर्मसंवत्सरने मातुसंवत्सर पण कहेवामां आवे छे. ते ऋतुश्री वसंतादिक बबे मासनी होय छे. (८६), वळी जिनेश्वरोए पांच प्रकारना संवत्सर कया छे-सूर्यसंवत्सर १, ऋतुसंवत्सर २, चंद्रसंवत्सर ३, नक्षत्रसंवत्सर ४ अने अभिवर्धिवसंवत्सर ५. (९०). तेमा बे पार मंडळनी ( मांडलानी) श्रेणिमा चालवायडे ज्यारे सूर्य घे अयन (उत्तरायन अने दक्षिणायन ) ने परिपूर्ण करे थे त्यारे सूर्यसंवत्सर संपूर्ण थाय छे. (६१). एक सो ने त्राशी मांडलामा सूर्यनो चार (गति) थाय छे, तेथी एक अयनमा एक सो ने त्राशी दिवस होय छे. (१२). वे अयनना मळीने सूर्यसंवत्सरने विषे विशेष ज्ञानदर्शन- वाळा (जिनेश्वरो)ए त्रण सो ने छासठ रात्रि दिवस जोया छे. (९३ ). काळना विशेषो में सो वर्ष विगेरे, पूर्वांग अने पूर्व विगेरे तथा पन्योपम अने सागरोपम विगेरे प्रसिद्ध के तथा कर्मनी सर्व स्थितिओ अने समग्र प्राणीयोनां आयुष्य ए सर्व बुद्धिमान पुरुषोए पर्यवर्षना प्रमाणे करीने जाणवा. (६५). अहीं कोई शंका करे के-पही चांद्रवर्ष भने सर्ग २८ मो। धीनं चान्यकाल-मानं वर्षशतादिकं ॥ ९६ ॥ कथं तदिह निर्दिष्टाः सर्वे वर्षशतादयः । कालाः सूर्याब्दमानेन तत्राकर्णयतोत्तरं ॥ ९७ ॥ युगं यदुच्यते तत्स्या-चांद्रेस्संवत्सरैस्त्रिभिः। द्वाभ्यांचाभिवद्धिताभ्या-मिति तत्पंचवार्षिकं ॥ ९८ ॥ सूर्यवर्षप्रमाणेन तदेव यदि चिंत्यते । तदापि तुल्यमेव स्या-पंचवर्षात्मकं युगं ॥ ९९ ॥ तथाहि-सूर्याब्दस्य सपद्- पष्टि-रहोरात्रशतत्रयी। पंचनाष्टादशशता-स्त्रिंशाः स्युर्युगवासराः ॥३०॥ इयंत एव द्वापष्टिचंद्रमासात्मके युगे । वासराः स्युस्ततो नार्थ-भेदः कोऽप्यत्र वास्तवः ॥१॥ ततो युगैर्मीयते य-संवत्सरशतादिकं । तत्सूर्य- वर्षमानेने-त्यादि युक्तं यथोदितं ॥ २ ॥ स्यात्पूर्णिमापरावत-रव्दं द्वादशभिर्विधोः । चतुःपंचाशदधिक- महोरात्रशतत्रयं ॥ ३ ॥ अहोरात्रस्य चैकस्य द्वादशांशा द्विपष्टिजाः। चंद्रसंवत्सरे मान-मित्युक्तं सर्वदर्शिभिः ॥ ४॥ नक्षत्रैः सप्तविंशत्या यः साकल्येन शीतगोः। योगः स द्वादशगुण ऋक्षाव्दं मानमस्य च ॥५॥ अमिवर्धित वर्षे करीने युग कहेवामा प्रावशे, अने सो वर्ष विगेरे अन्य कार्नु मान युगने आधीन छे, तो नहीं सो वर्ष विगैरे सर्व काळविशेषो सूर्यवर्पना मानवडे केम कहा? मा प्रश्नको उत्तर सामळो. (६७).-भहीं जे युग कहेवामां आवे छे ते त्रण चंद्रवर्ष अने घे ममिवर्धित वर्षे करीने कहेवामां आवे छे, तेथी पांच वर्षनो एक युग थाय छे. (६८). वेज युग सूर्यवर्पना प्रमाणवडे विचारीए ( कहीए) तो पण पांच वर्पना स्वरूपवाळो युग परावर ज थाय छे. (88). ते पा प्रमाणे-एक सूर्यवर्पना त्रण सो ने छासठ रात्रिदिवस छ, रेने पांच गुणपाथी प्रहार सो ने श्रीश सत्रिदिवस एक पुगमा पाप थे. (३०० ). तथा एक युगमां चंद्रवर्पना वासठ मास (त्रण चांद्रना ३६ पे अभिवर्धितना २६) पाने छे, वेना पण दिवसो तेटला ज थाय छ; तेथी वास्तविक रीते ते पनी अपेचाए मर्थनो मेद काइ पण नथी. (१). तेथी करीने युगवडे जे सो वर्ष विगैरेनुं मान करवामां आवे छे, ते सूर्यवर्षनी अपेक्षाए करवामां आवे छे. इत्यादि जे कयुं छे ते युक्त ज छे. (२). पार वखत पूर्णिमानुं परावर्तन थाप (पार पूर्णिमामो जाय) त्यारे एक चंद्रवर्ष थाय छे. तेमां प्रण सो ने चोपन रात्रिदिवस तथा एक रात्रिदिवसना पासठीया पार अंश (8) अधिक, एटलुं चंद्रसंवत्सरनुं प्रमाण सर्वदीए (जिनेश्वरे ) कहुं छे. (४). सवावीश नपत्रोनी साथे चंद्रनो ने समग्रपणे संयोग थाय ते पार गुणो करवाची एक .

श्रीकाक्षसोकप्रकाश। सप्तविंशतिसंयुक्त-महोरात्रशतत्रयं । अहोरात्रस्यैकपंचा-शच्चांशाः सप्त- पष्टिजाः॥६॥ अभिवद्धितमन्दं च त्रयोदशभिरदयः। मासैर्भवेदस्य मान-मेवमुक्तं महर्षिभिः॥७॥ युक्तं व्यशीत्याहोरात्रै-रहोरात्रशतत्रयं । चतुश्चत्वारिंशदहो-रात्रांशाश्च द्विपष्टिजाः ॥ ८॥ अथ क्रमेण पंचानां मासानां मानमुच्यते । सूर्यर्तुचंद्रनक्षत्रा- भिवद्धित संज्ञिनाम् ॥९॥ स्वस्वसंवत्सराणां हि भागे द्वादशभिर्हते । स्वी- यस्त्रीयमासमानं जायते तदिदं यथा ॥१०॥सा स्त्रिंशदहोरात्रा मासमानं भवेद्रवेः । ऋतुमासः पुनस्त्रिंश-दहोरात्रात्मकः स्फुटः ॥ ११ ॥ एकोन- त्रिंशता चाहो-रात्रैर्मासोऽमृतातेः । द्विपष्टिजैरहोरात्र-भागैत्रिंशता- धिकैः ॥१२॥ नक्षत्रमासोऽहोरात्राः सप्तविंशतिरन्विताः। अहोरात्रलवैरेक- विंशत्या सप्तषष्टिः॥१३॥ एकत्रिंशदहोरात्रा-श्चैकविंशं शतं लवाः। चतु- विशतिविच्छिन्ना-होरात्रस्याभिवद्धिते ॥१॥ एषामुपपत्तिस्त्वेवं-भरणी- शततारा -श्लेपास्वातिमहेंद्रभं । एतान्यपार्द्धक्षेत्राणि नक्षत्राणि जगु- नक्षत्रसंवत्सर थाय छे. तेनुं प्रमाण त्रण सो ने सतावीश रात्रिदिवस अने एक रात्रि- दिवसना सड़सठीया एकावन अंश (४) भधिक थाय छे. (६). हवे चंद्रना तेर मासे करीने एक अभिवर्धित संवत्सर थाय छे. तेनुं प्रमाण महर्पिोए पा प्रमाणे कर्तुं छे.-त्रण सो ने व्याशी रात्रिदिवस अने एक रात्रिदिवसना वासठीया चुमाळीश अंश (1) भषिक थाय छे. (८). हवे सूर्य, ऋतु, चंद्र, नक्षत्र अने अभिवर्धित नामना पांचे मासर्नु अनुक्रमे प्रमाण कहे छे. (8). पोतपोताना वर्षY जेटलुं ( रात्रिदिवसk) प्रमाण को छे, तेने बारे भागवाथी पोतपोताना मास, प्रमाण थाय छे, ते भा प्रमाणे (१०).-सूर्यना मासन प्रमाण साडी त्रीश रात्रिदिवसर्नु छे, प्रातुमासद् प्रमाण त्रीश रात्रिदिवसतुं प्रगट ज. (११). चंद्रमासतुं प्रमाण ओगणत्रीश रात्रिदिवस भने उपर एक रात्रिदिवसना बासठीया पत्रीश भाग (३३) अधिक थाय छे. (१२). नक्षत्रमासनुं प्रमाण सतावीश रात्रिदिवस .भबे उपर सडसठीया एकवीश अंश (8) अधिक थाय छे. (१३). अमिवर्धित मासा एकत्रीश रात्रिदिवस अने उपर एक सो ने चोषीशीया एक सो एकवीश अंश (1) भाचे छे. (१४). पापांचे मासनी उत्पत्ति भा प्रमाणे थाय छे.-भरणी, शवतारका, मागो, भश्लेषा, स्वाति अने ज्येष्ठा ए छ नक्षत्री अपार्धक्षेत्र (अर्धक्षेत्र) वाळा के एम सर्ग २८ मो। (४१) जिनाः ॥ १५ ॥ पुनर्वसू विशाखा च रोहिणी चोत्तरात्रयं । सार्द्धक्षे- त्राण्यमून्याहु-नक्षत्राणि जिनेश्वराः ॥ १६ ॥ भानि पंचदशान्यानि तुल्यक्षेत्राण्यथाभिजित् । एभ्यो विसदृशं भागा-स्त्रिंशदाढ्यास्य षट्- शती ॥१७॥ अर्द्धक्षेत्राणां च भानां क्षेत्रविष्कंभ ईरितः। अंशाः सहस्त्रं पंचाढ्यं प्रत्येकं तत्ववेदिभिः॥१८॥ सार्द्धक्षेत्राणां सहस्रा-स्त्रयः पंच- दशाधिकाः। तुल्यक्षेत्राणां च भागा द्वे सहस्रे दशाधिके ॥ १६ ॥ क्षेत्रविष्कंभ इत्येषां भानां संकलितोऽखितः । चतुष्पंचाशदंशानां सह- त्राश्च शता नव ॥ २० ॥ सप्तपष्टिं चैपु भागान् मुहूर्तेन शशी व्रजेत् । अहोरात्रेण चैकेन द्वे सहस्र दशाधिके ॥ २१ ।। सप्तपष्ट्या ततः स्वस्व- भागराशौ हृते भवेत् । मुहूर्त्तमानमृक्षाणां तच्चैवं स्पष्टमुच्यते ॥ २२ ॥ चंद्रस्याभिजिता योगे मुहूर्ता नव कीर्तिताः । सप्तपष्टिभुवोंशाश्च जिनेश्वरे कयुं छे. (१५). पुनर्वसु, विशाखा, रोहिणी अने त्रण उत्तरा (उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढा अने उत्तराभाद्रपद) मा छ नक्षत्रो सार्ध ( दोढ) क्षेत्रवाळा छ एम जिनेश्वरो कहे छे. (१६). पाकीना बीजा पंदर नक्षत्रो तुल्य क्षेत्रवाळा छ, तथा अभिजित् नक्षत्र ए सर्व नक्षत्रोथी विलक्षण छ. श्रा अभिजित् नक्षत्रना भाग (अंश ) छ सो ने त्रीश छे. ( एटलो तेना क्षेत्रनो विष्कम छे.) (१७). अर्ध क्षेत्रवाळा छ नक्षत्रोना क्षेत्रनो विष्कम दरेकनो तत्ववेत्ताओए एक हजार ने पांच अंशो कया छे. (छ नक्षत्रना मळीने ६०३० अंशो थाय छे) (१८). दोढ क्षेत्रवाळा दरेक नक्षत्रना त्रण हजार ने पंदर अंशो छ, (छ नक्षत्रनामळीने १८०६० अंशो थाय छे.) अने तुल्य क्षेत्रवाळा दरेक नक्षत्रनो क्षेत्रविष्कम चे हजार ने दश अंशो छे. (पंदरना मळीने ३०१५० अंशो थाय छे). (१४). या प्रमाणे सर्व नक्षत्रोनो समय क्षेत्रविष्कम एकत्र करीए त्यारे चोपन हजार ने नव सो मंशो थाय थे. (६३०-६०३०-१८०६०-३०१५० मळीने) (२०). तेमा एक मुहूर्त (बे घडी) वडे करीने चंद्रमा सडमठ अंशो चाले छे, तेथी एक रात्रिदिवसे करीने ये हजार ने दश भंशो चाले छे. ( सडसठने त्रीशे गुणवाथी २०१० थाय छे.) (२१). तेथी करीने नक्षत्रोना बेजे अंशो कया छे ते से अंशोने सडसठे मांगवाधी एक मुहूर्त्तनुं प्रमाण थाय थे, ते स्पष्टपणे कहीए छीए. (२२):-प्रमिजित्नी साथे चंद्रनो योग थाय त्यारे नव मुहर्स भने उपर एक मुहूर्तना सउसठीया सचावीश (३) अंशो थाय छे. (६३० ने ६७ वडे (४२) भीकाललोकप्रकाश। मौहर्ताः सप्तविंशतिः॥२३॥ तुल्यक्षेत्रेषु च त्रिंश-न्मुहूर्ता भेषु कीर्तिताः। पंचचत्वारिंशदेते सार्थक्षेत्रेषु भेषु च ॥ २४ ॥ एकाहोरात्रभोक्तव्य- ऋक्षक्षेत्रांशराशिना । सर्वांशराशिभागो मासः पूर्येत शीतगोः ॥२५॥ तथाहि-चतुःपंचाशत्सहस्राः शतैर्नवभिरन्विताः । भागहारेण भक्त- व्या। द्विसहरुया दशाढ्यया ॥ २६ ॥ सप्तविंशतिराप्यते-होरात्रा- स्त्रिंशता पुनः ॥ शेषभाज्यभाजकयो राश्योः कार्यापवर्तना ॥२७॥ सप्त- पष्टिभवा भागा-स्ततोऽमी एकविंशतिः। अहोरात्रस्य संपन्ना-स्तेऽधि- काः सप्तविंशतौ ॥२८॥ एवं नक्षत्रमासस्यो-पपत्तिरिह वर्णिता। चंद्रमासस्योपपत्ति-मथ वक्ष्ये यथागमं ॥ २६ ॥ त्रिंशता तिथिभिः प्रोक्त-श्चंद्रमासो जिनेश्वरैः । भवंति तिथयश्चेदोः कलावृद्धिक्षयोद्भवाः ॥ ३० ॥ कलाः कुर्यात् षोड- मांगवाथी तेटला थाय छे.) (२३). तुल्य क्षेत्रवाळा नक्षत्र साथे चंद्रनो योग थाय स्यारे त्रीश मुहूर्त थाय छे (२०१० ने ६७ वडे भांगवाथी तेटला थाय छे.) तथा दोढ क्षेत्रवाळा नक्षत्र साथे चंद्रनो योग थाय त्यारे पीस्ताळीश मुहूर्त थाय छे (३०१५ ने ६७ घडे भांगवाथी तेटला पाय छे.). (२४). एक नक्षत्र एक रात्रिदिवसवडे क्षेत्रविष्कमना जेटला अंशो भोगवे छे (२०१०), ते अंशनी राशिवडे सर्व नक्षत्रोना अंशना राशिने (५४६०० ) भाग देवाथी एक चंद्रमास पूर्ण थाय छे. ( २५ ). ते या प्रमाणे-चोपन हजार अने नव सोने बे हजार ने दशे मांगवा. (२६), तेथी सत्तावीश रात्रिदिवस भागमा आवे छे. शेष रहेला भाज्य (६३० ) अने भाजक (२०१०) मा ये राशिनी अपवर्तना करवी ( एटले त्रीशवडे छेद उडाडयो) (२७), तेम करवाथी सरसठीया एकवीश भाग (अंश ३) श्रावे छे. ते सतावीश रात्रिदिवसनी उपर अधिक ( २७३१) जाणवा. (२८). या प्रमाणे नक्षत्रमासनी उत्पत्ति कही. हवे भागममा कया प्रमाणे चंद्रमासनी उत्पचि कहुं छं. (२६). जिनेवरोए त्रीश तिथिनो एक चंद्रमास कयो छे, अने तिथिमो तो चंद्रनी कळानी वृदि-हानिधी उत्पन्न थाय छे. (३०). ते पा प्रमाणे-प्रथम चंद्रनी सोळ कळा करवी, १ अर्ध क्षेत्रवाळा नक्षत्र साथे चंद्रनो योग यतां पंदर मुहूर्त थाय छे फेमके १००५ ने ६७ वटे भांगतां १५ थाय छे. मा हकिकत मूळमां लखी नथी. २ भाखा चंद्रबिना स्रोळ माग करवा वे.

सर्ग २८ मो। शेंदो-स्तत्र चैका कला भवेत् । द्वापष्टिभागीकृतेंदु-विभागद्वितयात्मिका ॥ ३१ ॥ अन्याः पुनस्ता द्वापष्टि-भागीकृतसितत्विषः । भागचतुष्टय- रूपाः स्युः पंचदशसंमिताः ॥ ३२ ॥ तत्रायांशद्वयरूपा सदैव स्याद- नावृता । अात्रियंते च मुच्यते राहुणान्याः कला मुहुः ॥ ३३॥ काल- श्चैककलायाः स्या-पिधाने वा प्रकाशने । एकपष्टिरहोरात्र-स्यांशा द्वा- पष्टिकल्पिताः ॥३४॥ पिधीयमानचंद्रांशा-स्तिथयः कृष्णपक्षजाः। प्रका- शमानचंद्रांशा-स्तिथयः शुक्लपक्षजाः ॥३५॥ यथोक्तस्तिथिकालोऽसौ त्रिंशता गुणितो भवेत् । अष्टादशशतास्त्रिंशा द्वापष्टिप्रभवा लवाः ॥३६॥ द्वाषष्ट्यैषां हृते भागे विधुमासो यथोदितः । एकन्यूनत्रिंशदहो-रात्रा द्वात्रिंशदंशकाः ॥ ३७॥ कृष्णपक्षप्रतिपदः प्रारभ्य पूर्णिमावधि । ऋतुमासो भवेत्रिंश-दहोरात्रात्मकः स्फुटं ॥ ३८ ॥ सूर्यमासस्योपपत्ति-रथ किंचिनिगद्यते । भान्यष्टाविंशतिर्मेपा-दयो तेमांनी एक फळा चंद्रना बासठीया चे माग जेटली रहे थे. (३१). बाकीनी पंदर कलायो चंद्रना वासठीया चार चार भाग जेटली थाय छे. (तेथी आखा चंद्रपिंवनी सोळे कळाना मळीने पासठ भाग संपूर्ण थया). (३२) तेमा जे पहेली ये अंशरूप कळा छे ते हमेशा अनावृत (खुली)ज रहे छे, अने पाकीनी.जे पंदर कळाओ के ते राहुए वारंवार आवरण कराय छ (ढंकाय छे ) अने पाछी मूकाय छे. (३३). एक रात्रिदिवसना पासठ भाग करीए, तेमाथी एकसठ भाग जेटलो काळ एक कळाना आवरणमा अथवा प्रकाश करवामा लागे छे. (३४). जेमां चंद्रनी कळायो ढंकाती जाय ते तिथियो कृष्णपक्षनी कहेवाय थे, अने जेमा चंद्रनी कळानो प्रकाश थतो जाय ते तिथिमो शुक्ल. पधनी कवाय छे. (३५). जे पा तिथिनो काळ (चासठीया एकसठ मागरूप) करो, तेने जीशे गुणपाथी पासठीया अढार सो ने त्रीश अंश (१८३०) थाय छे. (३६). तेने पासठे मांगता एक चंद्रमासना रात्रिदिवसो भोगणत्रीश अने पासठीया पत्रीश अंशो (२६१३) थाय छे. (३७), हवे ऋतुमास कहे छ-कृष्णपक्षनी एकमथी पारंमीने पूर्णिमा सुधी त्रीश रात्रि- दिवसनो एक ऋतुमास थाय छे. (३८). हवे सूर्यमासनी उत्पत्तिने माटे काइक कहे थे- १ भाखा चंद्रबिंपना बासठ माग फरवा ते.

(४४) श्रीकामलोकप्रकाश । द्वादश राशयः ॥ ३९॥ चतुष्पंचाशत्सहस्रांन् शतेन्वभिरन्वितान् । प्राग्निरूपितनक्षत्र-भागान् द्वादशभिर्भजेत् ॥ ४० ॥ सपंचसप्ततिपंच-च- स्वारिंशच्छती ततः। प्राप्ता नक्षत्रभागानां राशिमानं तदेव हि ॥ ११ ॥ सात्रिंशदहोरात्र-भोग्योऽयं राशिरिष्यते । अयमेवार्कमासः स्यान्द्यः संक्रांतिरितीर्यते॥४२॥ पंच पंचैव ऋक्षांशान् मुहूर्तेन पुरोदितान् । अहो. रात्रेण चाध्यद्धं शतं भुक्ते दिनेश्वरः॥४३॥ एवं च त्रिंशता सार्द्ध-रहो- रात्रैर्भुनक्त्यसौ। पंचचत्वारिंशदंश-शतान् सपंचसप्ततीन् ॥४४॥ प्रत्य- यश्चात्र-एकाहोरात्रभोग्येन सार्द्धनांशशतेन चेत् । पंचसप्ततियुपंच- चत्वारिंशच्छतात्मकः॥४५॥राशिविभज्यते त्रिंश-दहोरात्री तदाप्यते। पंचसप्तत्याथ भाज्य-भाजकावपवर्तयेत् ॥४६॥ ततो लब्धमहोरात्र-स्या- चमेवं च दर्शिता। भावना सूर्यमासे सा प्रोच्यतेऽथाधिमासके ॥४७॥ यस्मिन्नद्वे विधोर्मासा-त्रयोदश भवंति तत् । अभिवर्द्धितवर्ष स्या- । महावीश नक्षत्रो छ भने मेष विगेरे चार राशियो छे. (३६). तेथी पूर्वे कहेला सर्व नक्षत्रोना चोपन हजार भने नव सो अंशोने (५४६००) बारे भागवा. (४०). तेम करवाची नक्षत्रना अंशो पीस्तालीश सो अने पंचोतेर ( ४५७५ ) आवे छे, तेटलु एक राशिनुं प्रमाण थयु. (४१). प्रावो एक राशि साडीत्रीश रात्रिदिवसने भोगवे छे. मा सूर्यमास कहेवाय छे के जे संक्रांति नामे ओळखाय छे. (४२). एक मुहूर्त्तमा पहेला कहेला नक्षत्रना पांच पांच अंशोने सूर्य भोगवे छे, तेथी एक रात्रिदिवसमां (एटले त्रीश मुहूर्तमां) दोढ सो ( १५०) अंशोने भोगवे छे. (४३). ए ज प्रमाणे साडीत्रीश रात्रि- दिवसमां थइने सूर्य पीस्तालीश सो ने पंचोतेर (४५७५ ) अंशोने भोगवे छे. (४४). तेनी सात्री आ प्रमाणे छे-एक रात्रिदिवसमा दोढ सो अंश भोगवाय थे, तेथी पीस्तालीश सो ने पंचोतेर (४५७५) ने दोढ सो (१५०) ए भांगवाथी भागमा त्रीश रात्रिदिवस आवे छे, अने बाकी पंचोतेर (७५) वधे छे. पछी शेष भाज्य (७५) अने भाजक (१५०) ए वनेनी अपवर्तना फरवी (एटले छेद उडाडवो). तेथी रात्रिदिषसनो अर्ध माग (३) भाषे छे. (मा रीते साडीतीश अहोरात्रनो एक सूर्यमास थाय छे.) मा प्रमाणे सूर्यमासनी भावना करी. हवे अधिक मासनी उत्पत्ति कहे . (४७). जे वर्षमा चंद्रना र मास थाय छे, ते ममिवार्षित वर्ष कहेवाय थे. तेना दिवसोने सर्ग २८ मो। त्तस्मिन् द्वादशभिर्हते ॥ १८ ॥ एकत्रिंशदहोरात्रा लभ्या मासेऽभिव- र्द्धिते । चतुर्विशशतं छिन्ना-श्चैकविंशं शतं लवाः ॥४६॥ अ. ३१xi. १२१४१२४ तथाहि-त्रयोदशसु शीतांशु-मासेप्वहां शतत्रयं । व्यशीति- युक्चतुश्चत्वारिंशच्चांशा द्विषष्टिजाः ३८३४४४४६२ ॥ ५० ॥ वैसाश्या- दहोरात्रां-केष्वंशांको न संमिलेत् । अंशच्छेदेन तदहो-रात्रान् हत्वा स- वर्णयेत् ॥ ५१ ॥ ततश्च-द्वापष्टयाहोरात्रराशा-वंशच्छेदेन ताडिते । च. तुश्चत्वारिंशदंश-युक्ते चांशा भवत्यमी ॥ ५२ ॥ त्रयोविंशतिरंशानां स. हस्राः सप्तशत्यपि । नवतिश्चाहोरात्रस्य द्विषष्टिच्छेदशालिनः ॥ २३७९० +६२ ॥ ५३॥ एपां द्वादशभिर्भागे मासः स्यादभिवधितः॥ विधिभि- -नभागहारे लीलावत्यामिति श्रुतः ॥ ५४॥ छेदं लत्रं च परिवर्त्य हर- स्य शेपः कार्योऽथ भागहरणे गुणनाविधिश्च । भाज्यभाजकस्थापना २३७९०+६२-१२४१ छेदं लवं च परिवर्त्य स्थापना २३७९०४६२-१४१२ भिन्नगुणनविधिश्चायं-अंशाहतिश्छेदवधेन भक्ता । लब्धं विभिन्ने गुणने पारे भांगवाथी एकत्रीश रात्रिदिवस भने उपर एक सो चोवीशीया एक सो एकवीश अंशो रहे छे ( ३१११). मा अभिवर्धित (अधिक ) मास कहेवाय छे. ते या प्रमाणे - (वे) चंद्रवर्षमा अधिक मास आवे छे तेथी ते दरेकना र मासना दिवसो करवा. ते ग्रण सो त्राशी (३८३) रात्रिदिवस भने उपर वासठीया चुमालीश अंशो (३) अधिक थाय छे. (५०). हवे जो विसदृशपणाने लीधे रात्रिदिवसना अंकने विषे अंशनो अंक (मळतो भायतो न होय तो अंशछेदवडे रात्रिदिवसनो गुणाकार करी सघशपणुं कर. (५१) तेथी करीने अहीं पण (३८३) रात्रिदिवसनी संख्याने बासठ (६२) अंशछेद (माजक) वडे गुणी तेमा चुमालीश अंशो मेळवायी एक रात्रिदिवसना बामठीया त्रेवीश हजार सात सो ने नेवू मंशो ( २३१ ) थाय छे. (५२-५३ ). ा अंशोने पारे भांगता एक प्रमिवर्धित मास थाय छे. जो भांगाकार भिन (विषम) शतो होय तो तेनो विधि एलीलावती ग्रंथमा मा प्रमाणे करो छे. (५४), छेदने भने लवने परावर्तन (उलटपालट) करीने मांगाकारनो शेष करवो. पछी मागहरणनो गुणाकार करवो. (तेमा माज्य भने माजकनी स्थापना १-१३) महीं छेद अने लवर्नु परावर्तन भा प्रमाणे- ६२ १नावरे भाग्या होय ते.

(४६) श्रीकाखमोकप्रकारा। फलं स्यात् ॥ इत्यादि. द्वापष्टिादशनाः स्यु-रेवं सप्तशतास्तथा । चतुश्चत्वारिंशदाढ्या अर्थतौ भाज्यभाजको २३७६०४७४४ ॥ ५५ ॥ पद्भिरेवापवयेते पंचपष्टियुतास्ततः । शता एकोनचत्वारिं-शदंशानां भवंति वै ॥ ५६ ॥ चतुश्चत्वारिंशदाढ्य-सप्तशत्यात्मकस्तथा । छेदोऽपव- चितः पड्भि-श्चतुर्विशं शतं भवेत् ॥ ५७ ॥ अपवचितभाज्यभाजकस्था- पना ३६६५४१२४ राशौ विभक्तेऽस्मिन् छेदे-नामुना स्याद्यथोदितः । मासोऽभिवद्धिताब्दस्य द्वादशांशात्मकः खलु ॥ ५८ ॥ वर्षे द्वादश मासाः स्यु-रित्यस्येयं मितिर्मता। वर्द्धते तु विधोर्मास एव वर्षेऽभि- वद्धिते ॥ ५६ ॥ एतन्निष्पत्तिश्चैवं-परस्परं यो विश्लेपो भवेत्सूर्येदुमा- सयोः । स त्रिशद्गुणितः ख्यातो-ऽधिमासस्तत्ववेदिभिः ॥६०॥ सार्द्ध- त्रिंशदहोरात्रो भवेन्मासो विवस्वतः । एकोनत्रिंशदिदोस्ते द्वापष्टयंशा रदैमिताः ॥ ६१॥ विश्लेषश्चानयोरेको-होरात्रः परिकीर्तितः । द्वाप- प्टिभागेनैकेन । न्यूनस्तत्रेति भावना ॥ ६२ ॥ इह चंद्रमासे दिनराशेरु- भागहरणना गुणाकारनो विधि भा प्रमाणे-छेदना अंकवडे अंशनो गुणाकार करवो, जे लाधे ते मागहरणना गुणाकारनुं फळ थाय छे. तेथी करीने बासठने बारे गुणवाथी सात सो ने चुमाळीश थाय छे. हवे ते भाज्य अने भाजक थया ( 38 ) (५५) आबे अंकनो छेद उडाडवो के, तेथी छवडे तेनो छेद उडी शके छे. तेम करवाथी प्रोगणचा ळीश सो ने पांसठ (३६६५) अंशो उपरना अंकमा आवे छे, (५६) अने नीचेनो अंक जे सात सो ने चुमाळीश (७४४) छे तेने छवडे छेद उडाडवाथी एक सो ने चोवीश (१२४) थाय छे. (५७). छेद उडाडेला माज्य अने भाजकनी स्थापना ३९५, प्रा ३९६५ ने १२४ वडे भांगतां उपर कहेला अभिवर्धित वर्पना पारमा भागरूप मासर्नु प्रमाण उपर कहा प्रमाणे रात्रिदिवस ३१-३३१ थाय छे. (५८). या अभिवर्धित वर्षमा बार ज मास होय छ तेथी तेर्नु भाटलुं प्रमाण थाय छे, परंतु वधवामां तो चंद्रनो ज मास वधे छे. (५९). तेनी सिद्धि प्रा प्रमाणे-सूर्यमास अने चंद्रमासनो परस्पर विश्लेप करवो (बादवाकी करवी) पाकी रहेलाने त्रीश गुणो करवो, ते तत्त्वज्ञानीओए भधिकमास को छे. (६०). एटले के साडीत्रीश रात्रिदिवसनो एक सूर्यमास थाय छ, भने चंद्रमासना रात्रिदिवस ओगण- त्रीश भने उपर बासठीया पत्रीश भाग छे. (६१). आ पनेनो विश्लेष करवाथी एटले सूर्यमासना रात्रिदिवसमाथी चंद्रमासना रात्रिदिवस बाद करवाथी बासठीया एक अंश सर्ग २८ मो। (४७) परि ये द्वात्रिंशधापष्टिभागाः संति, तत्र एकत्रिंशता द्वापष्टिभागैर्दिनार्ध जातं, तेन च सूर्यमासे यदिनराशेरुपरितनं दिनाधं तच्छुद्धं, अथैको द्वापष्टि- भाग एकोनत्रिंशच दिनानि सूर्यमाससंबंधिभ्यस्त्रिंशतो दिनेभ्यः शोध्यंते, • तदा एकद्वापष्टिभागन्यून एकोऽहोरात्रः स्थित इत्येप विश्लेपो ज्ञेयः, त्रिंशद्भवत्यहोरात्रा एकस्मिस्त्रिंशता हते । द्वापष्टिभागश्चैकोऽस्मा-त्रिंश- गुणोऽपसार्यते ॥ ६३ ॥ एकोनत्रिंशदित्येवं दिनान्यंशा रदैर्मिताः । मासोऽधिकोऽयं स्यात्रिंश-रसूर्यमासव्यतिक्रमे ॥ ६४ ॥ युगस्य मध्ये पौषोऽय-मंते त्वापाढ एव च । तृतीयपंचमे वर्षे तत एवाभिवद्धि(ध)ते ॥६५॥ एते पंचापि मासानां भेदा द्वादशभिहताः । भवंति स्वस्वव- पाणि । तन्मानं प्राग्निरूपितं ।। ६६ ।। एतेषां पंचानां मासानां प्रयोजनं त्वेवं-जीवे सिंहस्थे धन्वमीनस्थितेऽर्के । विष्णौ निद्राणे चाधिमाले न न्यून एक दिवस रहे छे. तेनी रीत मा प्रमाणे.-(६२). चंद्रमासना दिवसना राशि उपर जे पासठीया पत्रीश माग थे, तैमाथी पासठीया एकत्रीश मागनी अर्ध दिवस थाय, ते सूर्यमासना दिवसनी राशि उपरना अर्ध दिवसमाथी याद कर्यो. पछी प्रोगणत्रीश दिवस मने बासठीयो एक माग सूर्यमास संबंधी श्रीश दिवसमाधी वाद करीए त्यार यासठीया एक भाग न्यून एक रात्रिदिवस बाकी रह्यो. प्रा विश्लेप जाणवो (पादचाकी जाणवी). हवे एक रात्रिदिवसने त्रीशे गुणता तीश रात्रि दिवम थाय छे. तेमाथी पासठीयो एक भाग त्रीश गुणो करी पाद करीए त्यारे भोगणत्रीश दिवस भने वासठीया पतीश माग (२६१३) पाटला प्रमाणवाळो अधिक मास सूर्यना त्रीश मास जाय त्यारे आरे. (६३-६४) तेथी करीने ज पांच वर्ष प्रमाण एक युगनी मध्ये त्रीजा वर्षमा पोप मास अने पांचमा वर्षमा मपाढ मास ज वृद्धि पामे छै. (६५). भा पांचे प्रकारना मामाने पार गुणवाची पोतपोवाना (चंद्र, सूर्य, नक्षत्र, ऋतु ने भमिवर्षित ) नामना वर्षों याप थे. वेनुं प्रमाण प्रथम पतारी गया छीए.(६६). मा पांचे प्रकारना मासर्नु प्रयोजन मा प्रमाणे छे -सिंहराशिमा पृहस्पति होय, पन मने मीन राशिमा सूर्य होय, विष्णुना शयनना माम होय भने अधिक मास होय, ते १ अन रोली प्रमाणे मापे मास न मधिक भाषया जोइए पए हास भन्यदर्शनीमा ज्योतिष प्रमाणे प्रवृति यवाची बीघा मासो पण अधिक माये दे. २ मार दिपीकार्षिक गदी ११ पी.

(४६) श्रीकाललोकप्रकाश फलं स्यात् ॥ इत्यादि. द्वापष्टिादशनाः स्यु-रेवं सप्तशतास्तथा । चतुश्चत्वारिंशदाढ्या अर्थतौ भाज्यभाजको २३७६०४७४४ ॥ ५५ ॥ पद्भिरेवापवत्येते पंचपष्टियुतास्ततः । शता एकोनचत्वारिं-शदंशानां भवंति वै ॥ ५६ ॥ चतुश्चत्वारिंशदाढ्य-सप्तशत्यात्मकस्तथा । छेदोऽपव- तितः पड्भि-श्चतुर्विशं शतं भवेत् ॥ ५७ ॥ अपवर्तितभाज्यभाजकस्था- पना ३६६५४१२४ राशौ विभक्तेऽस्मिन् छेदे-नामुना स्यायथोदितः । मासोऽभिवद्धिताब्दस्य द्वादशांशात्मकः खलु ॥ ५८ ॥ वर्षे द्वादश मासाः स्यु-रित्यस्येयं मितिर्मता । वर्द्धते तु विधोर्मास एव वर्षेऽभि- वद्धिते ॥ ५६ ॥ एतन्निष्पत्तिश्चैवं-परस्परं यो विश्लेपो भवेत्सूर्येदुमा- सयोः। स त्रिंशद्गुणितः ख्यातो-ऽधिमासस्तत्ववेदिभिः ॥६०॥ सार्द्ध- त्रिंशदहोरात्रो भवेन्मासो विवस्वतः । एकोनत्रिंशदिदोस्ते द्वापष्टयंशा रदैमिताः ॥ ११॥ विश्लेपश्चानयोरेको-होरात्रः परिकीर्तितः। द्वाप- प्टिभागेनैकेन । न्यूनस्तत्रेति भावना ॥ ६२ ॥ इह चंद्रमासे दिनराशेरु- भागहरणना गुणाकारनो विधि भा प्रमाणे-छेदना अंकवडे अंशनो गुणाकार करवो, लाधे ते भागहरणना गुणाकारनुं फळ थाय छे. तेथी करीने बासठने पारे गुणवाथी सात सो ने चुमाळीश थाय छे. हवे ते भाज्य अने भाजक थया ( २३४४ ) (५५) आबे अंकनो छेद उडाउषो छ, तेथी छवडे तेनो छेद उडी शके छे. तेम करवाथी भोगणचा ळीश सो ने पासठ (३९६५) अंशो उपरना अंकमा आवे छे, (५६) अने नीचेनो अंक जे सात सो ने चुमाळीश (७४४) छे तेने छवडे छेद उडाडवाथी एक सो ने चोवीश (१२४) थाय छे. (५७). छेद उडाडेला माज्य अने भाजकनी स्थापना १९६५, प्रा ३९६५ ने १२४ वडे मांगतां उपर कहेला अभिवर्धित वर्पना वारमा भागरूप मासचं प्रमाण उपर कशा प्रमाणे रात्रिदिवस ३१-१२ थाय छे. (५८), प्रा अमिवर्धित वर्षमा चार ज मास होय छ तेथी तेनुं आटलुं प्रमाण थाय छे, परंतु वधवामां वो चंद्रनो ज मास वधे छे. (५९). तेनी सिद्धि प्राप्रमाणे-सूर्यमास अने चंद्रमासनो परस्पर विश्लेप करवा (बादवाकी करवी) बाकी रहेलाने त्रीश गुणो करवो, ते तत्वज्ञानीओए अधिकमास कह्यो छे. (६०). एटले के साडीतीश रात्रिदिवसनो एक सूर्यमास थाय छे, अने चंद्रमासना रात्रिदिवस भोगण- त्रीश भने उपर बासठीया वत्रीश भाग छे. (६१). आ वमेनो विश्लेष करवाी एटले सूर्यमासना रात्रिदिवसमांथी चंद्रमासना रात्रिदिवस वाद करवाथी बासठीया एक अंश सर्ग २८ मो। (४७) ज परि ये द्वात्रिंशद्वापष्टिभागाः संति, तत्र एकत्रिंशता द्वापष्टिभागैर्दिनार्ध जातं, तेन च सूर्यमास यदिनराशेरुपरितनं दिनाधं तच्छुद्धं, अथैको द्वापष्टि- भाग एकोनत्रिंशच दिनानि सूर्यमाससंबंधिभ्यस्त्रिंशतो दिनेभ्यः शोध्यंते, • तदा एकद्वापष्टिभागन्यून एकोहोरात्रः स्थित इत्येष विश्लेपो ज्ञेयः, त्रिंशद्भवत्यहोरात्रा एकस्मिस्त्रिंशता हते । द्वापष्टिभागश्चैकोऽस्मा-त्रिंश- द्गुणोऽपसार्यते ॥ ६३ ॥ एकोनत्रिंशदित्येवं दिनान्यंशा रदैर्मिताः । मासोऽधिकोऽयं स्यात्रिंश-सूर्यमासव्यतिक्रमे ॥ ६४ ॥ युगस्य मध्ये पौषोऽय-मते त्वाषाढ एव च । तृतीयपंचमे वर्षे तत एवाभिवद्धि(ध)ते ॥६५॥ एते पंचापि मासानां भेदा द्वादशभिहताः । भवंति स्वस्वव- पाणि । तन्मानं प्राग्निरूपितं ॥ ६६ ॥ एतेषां पंचानां मासानां प्रयोजनं त्वेवं-जीवे सिंहस्थे धन्वमीनस्थितेऽर्के । विष्णौ निद्राणे चाधिमासे न न्यून एक दिवस रहे छे. तेनी रीत भा प्रमाणे. (६२). चंद्रमासना दिवसना राशि उपर जे पासठीया यत्रीश भाग छे, तेमाथी पासठीया एकत्रीश भागनो अर्ध दिवस थाय, ते सूर्यमासना दिवसनी राशि उपरना अर्ध दिवसमाथी बाद कर्यो. पछी भोगणत्रीश दिवस भने बासठीयो एक भाग सूर्यमास संबंधी त्रीश दिवसमाथी बाद करीए त्यार बासठीयां एक भाग न्यून एक रात्रिदिवस बाकी रह्यो. प्रा विश्लेप जाणवो (वादयाकी जाणवी). हवे एक रात्रिदिवसने त्रीशे गुणतां त्रीश रात्रि दिवस थाय छे. तेमाथी बासठीयो एक भाग प्रीश गुणो करी बाद करीए त्यारे प्रोगणत्रीश दिवस अने बासठीया वत्रीश माग ( २६३३) पाटला प्रमाणवाळो अधिक मास सूर्यना त्रीश मास जाय त्यारे श्रावे. (६३-६४) तेथी करीने ज पांच वर्ष प्रमाण एक युगनी मध्ये श्रीजा वर्षमा पोप मास अने पांचमा वर्षमा पाढ मास ज वृद्धि पामे छ. (६५). मा पांचे प्रकारना मासोने चारे गुणवाथी पोतपोताना (चंद्र, सूर्य, नक्षत्र, मातु ने भमियर्षित ) नामना वर्षों थाय थे. तेनुं प्रमाण प्रथम बतायी गया छीए.(६६). श्रा पांचे प्रकारना मासर्नु प्रयोजन मा प्रमाणे छ.-सिंहराशिमा वृहस्पति होय, धन भने मीन राशिमा सूर्य होय, विष्णुना शयनना मास होय अने अधिक मास होय, ते १ जैन शैली प्रमाणे भा घे मास ज अधिक प्रावका जोइए पण हाल भन्यदर्शनीना म्योविप प्रमाणे प्रवृत्ति पवायी वीजा मासो पण अधिक भावे थे. २ पगार यदि ११ थी कार्तिक यी ११ मधी.

(४८) श्रीकानलोकप्रकारा। लग्न।। इत्यादि सूर्यमासाधिमासयोः प्रयोजनं. ऋतुमासश्च पूर्णत्रिंशदहो- रात्रात्मक इति निरंशतया लोकव्यवहारकारक इति, शेपास्तु सूर्यादयो मासाः सांशतया प्रायो न व्यवहारपथमवतरतीति. अत एवायमृतुमासः कर्ममास इत्यपि शास्त्रांतरेऽभिधीयत इति ऋतुमासप्रयोजनं. वैशाखे . श्रावणे मार्गे पौपे फाल्गुन एव च । कुर्वीत वास्तुप्रारंभं न तु शेपेषु सप्तसु ॥ ६७ ॥ इति चंद्रमासप्रयोजनं. नक्षत्रमासप्रयोजनं तु संप्रदाय- गम्यं, इत्याद्यर्थतो जबूद्वीपप्रज्ञप्तिवृत्तौ. सपट्पष्टिव्यहोरात्र-शतात्मकमुदीरितं । यदर्काब्दं तत्र काचि- दुपपत्तिनिरूप्यते ॥ ६८ ॥ नक्षत्रक्षेत्रभागा ये प्रागत्र प्रतिपादिताः । तेषां साद्धं शतं भानु-रहोरात्रेण गच्छति ॥ ६६ ॥ ततः शतेन सार्द्धन भागहारे कृते सति । नक्षत्रक्षेत्रभागानां सूर्यभोगार्हनिर्णयः ॥ ७० ॥ दिनपंचमभागाट्य-महोरात्रचतुष्टयं । मुहूर्तस्य च पष्ठोऽशोऽभिजिद्भोगो वखत लग्न थाय नहीं. इत्यादि सूर्यमास अने अधिकमास विगेरेनुं प्रयोजन छ, तथा ऋतुमास संपूर्ण तीश रात्रिदिवसनो होवाथी अंश रहितपणाने लीधे लोक व्यवहारमा उपयोगी छे. बाकीना सूर्यादिक मासो अंश सहित होवाथी प्राये व्यवहारमार्गमा आवता नथी. ए ज कारणथी या ऋतुमास कर्ममास पण कहेवाय छे एम शास्त्रांतरमा कयुं छे. भा ऋतुमासतुं प्रयोजन कयु. वैशाख, श्रावण, मार्गशीर्ष, पोप भने फागण मासमा ज वास्तुनो (मकाननो) प्रारंभ करयो. बाकीना सात मासमा करवो नहीं. (६७). आ चंद्रमासनुं प्रयोजन कहां, तथा नक्षत्रमासनुं प्रयोजन संप्रदायथी जाणवू. इत्यादि जंबुद्धीप- प्रज्ञाप्तिनी टीकामों अर्थथी कटु छे. हवे सूर्यवर्षना जे त्रण सो ने छासठ रात्रिदिवस कह्या, तेनी काइक रीत बतावे छे. (६८).-मही प्रथम नक्षत्रना क्षेत्रना जे विभागो देखाड्या छे, तेमाथी सूर्य एक रात्रि- दिवसे करीने दोढसो विभाग जेटलुं क्षेत्र ओळंगे छे; तेथी करीने ते ते नक्षत्रना क्षेत्रना अंशोने दोढसोए ( १५० ) मांगाकार करवाथी सूर्यना भोगवेला दिवसनो निर्णय थाय छे. (६६-७०). ते आ प्रमाणे-प्रमिजिद नक्षत्रनो क्षेत्रविष्कंभ ६३० अंश छे, तेने १५० बडे मांगाकार करता चार दिवस अने बाकी शेष रहेला त्रीशनो अने १५० नो पंदरे छेद उडाडतो एक दिवसनो पांचमी भाग एटले ४३ दिवस अने एक मुहूर्त्तनो छटो भाग भाटलो वखत सूर्य भमिजिन् नक्षत्रने मागवे छे. (७१). भपा क्षेत्रना दरेक नवनो सर्ग २८ मो। (४९) विवस्वतः ॥ ७१ ॥ अपार्द्धक्षेत्रभानां च भोगमानं पृथक् पृथक् । महो- रात्राः पट् दशांशा अहोरात्रस्य सप्त च ॥ ७२ ॥ समक्षेत्राणां च भाना- महोरात्रास्त्रयोदश। भक्तस्य पंचभिरहो-रात्रस्यांशद्वयं तथा ॥७३॥ सार्द्ध- क्षेत्राणां च भानां भोगः प्रत्येकमुष्णगोः । स्यादिशतिरहोरात्रा-स्तद- शांशस्तथैककः ॥७४॥ अहोरात्रात्मको भागा-मकश्च निखिलोऽप्ययं । कालः संकलितो भानो-हायनं स्याद्यथोदितं ॥ ७५ ॥ सहस्राणि दश नव शताः साशीतयः किल १०९८० । एतन्मुहूर्तगणितं सूर्यवर्षे जिनः : स्मृतं ।। ७६ ॥ शतैरष्टाभिराढ्यानि सहस्राणि दश स्फुटं १०८००। एतन्मुहर्तगणितं । कर्मसंवत्सरे भवेत् ॥ ७७ ॥ सहस्रा दश पट्शत्या पंचविंशत्युपेतया । युक्ताः पंचाशदंशाश्च मुहूर्तस्य द्विषष्टिजाः १०६२५४ क्षेत्रविष्कम १००५ छ तेने १५० घडे मांगता छ रात्रिदिवस अने शेष रहेला १०५ तथा १५० नो १५ वडे छेद उडाडता एक रात्रिदिवसना सात दशांश आवे छे (६). भाटलो वखत सूर्य एक अपार्ध नक्षत्रने भोगवे छे. (७२). समक्षेत्रना दरेक नक्षत्रनो क्षेत्र- विष्कम २०१० छ तेने १५० वडे भाग देतां देर रात्रिदिवस भने शेष रहेला ६० तथा १५० नो ३० बडे छेद उडाडता एक रात्रिदिवसना पांचीया चे अंश भावे छ (१३३). भाटलो बखत सूर्य एक समक्षेत्र नक्षत्रने भोगवे छे. (७३). तथा सार्धक्षेत्रना दरेक नक्षत्रनो क्षेत्रविष्कम ३०१५ थे, तेने १५० वडे भाग देता चीश रात्रिदिवस भने शेप रहेला पंदर तथा १५० नो पंदरवडे छेद उठाडता एक दशांश भावे छे (२०११). माटलो वखत सूर्य एक साधनचत्रने मोगये थे (७४), मा प्रमाणे सर्व नक्षत्रोना भोग. घटाना रात्रिदिवसो तथा अंशोने एकठा करवायी प्रण सो ने छासठ (३६६) रात्रिदिवसर्नु एक सूर्यवर्प प्रथम कमा प्रमाणे सिद्ध धाय छे. (७५). वेना मपूर्त करया माटे त्रीशे गुणयाथी एक सूर्यवर्षना महर्को दश हजार नव सो ने भंशी (१०९८०) थाय थे एम जिनेश्वरोए कयु 2. (७६) एज प्रमाणे एक कर्म (ऋतु) पर्पना (३६०) रात्रिदिवसने श्रीशे गुणता दश हजार ने भाठ सो (१०८००) मह थाय छे. (७७). दश हजार छ सो ने पधीश तथा उपर बासठीया पचास मश (१०६२५५७) भाटला सहर्च-गणित एक १ अभिजिव १६ प म नपत्रमा १०६, १५ समनपना २०११ सापनपत्रमा १२.३ ए प्रमाणे १६६ ७ (५०) श्रीज्ञानलोकप्रकाश ५०४६२ ॥ ७८ ॥ एतन्मुहूर्तगणितं चंद्रसंवत्सरे मतं । अथ नक्षत्र- वर्षस्य मुहूर्तमानमुच्यते ॥७९॥ सहस्रनवसंयुक्ता द्वात्रिंशैरष्टभिः शतैः। पट्पंचाशन्मुहूर्तस्य भागाश्च सप्तपष्टिजाः ९८३२४५६४६७ ॥ ८॥ एकादश सहस्राणि पंच चैकादशाः शताः । श्रष्टादशमुहर्तस्य भागा द्वा- पष्टिनिर्मिताः ११५११x१८४६२ ॥ ८१॥ मुहूर्त्तसंख्येत्युद्दिष्टा बुधैर्वर्ये- ऽभिवर्धिते ॥ त्रिंशद्गुणे स्वस्ववर्षे त्वेषां स्यादुपपादनं ॥ ८२ ॥ सूर्यसंवत्सरस्तौल्य-रूपेण यदि चिंत्यते । तदा सहस्रं भाराणा- मष्टानवतिसंयुतं १०९८ ॥ ८३॥ श्राढकानां त्रिचत्वारिं-शत्सहस्राः शता नव । विंशत्युपेताः ४३६२० सूर्याब्दं मेयरूपतया मतं ॥८४ ॥ द्वापष्ट्याभ्यधिक भार-सहस्र चंद्रवत्सरे। द्वापष्टिभागा भारस्य षट्त्रिं- शत्तौल्यमानतः १०६२४३६४६२ ॥ ८५॥ द्विचत्वारिंशत्सहस्राः पंच च व्युत्तराः शताः। श्राढकानामाढकस्य द्विषष्ट्यंशाश्चतुर्दश ४२५०३-१४४६२ ॥८६॥ एतन्मयतया मानं चंद्रसंवत्सरे भवेत् । मो नक्षत्रवर्षस्य तौल्य- माने यथाक्रमे॥८७॥ शतानि नव भाराणां त्र्यशीत्याभ्यधिकानि च । चंद्रवर्षयूँ कहेलु छ ( ३५४ ३३ ने बीशे गुणतां थाय छे). हवे नक्षत्रवर्षना मुर्त्तनुं प्रमाण फहे थे. (७६).-(३२७५७ ने त्रीशे गुणतां नव हजार आठ सो ने पत्रीश तथा एक मुहूर्त्तना सडसठीया छप्पन भाग ( ९८३२ ६४) थाय छे. (८०). अग्यार हजार पांच सो ने अग्यार अने उपर एक मुहूर्त्तना वासठीया श्रढार भाग (११५११३५) आटला मुहू- र्तनी संख्या (३८३) दिवसना प्रमाणवाळा अभिवर्धित वर्षनी थाय छे एम पंडितोए कहां छे. पोन पोताना वर्पना दिवसोने त्रीशे गुणतां आ मुहूर्तनी संख्या सिद्ध थाय छे. (८२) हचे सूर्यवर्पने तोलनी अपेक्षाए विचारीए तो एक हजार ने अठाणुं भार (१०६८) थाय छे. (८३). अने माननी अपेक्षाए कहीए तो तेंतालीश हजार नब मो ने चीश ४३६२० ) एटला प्रमाण सूर्यवर्ष थाय छे. (८४), चंद्रवर्पने तोलनी अपक्षाए विचारीए तो एक हजार अने पासठ (१०६२) मार तथा एक मारना बासठीया छत्रीश भाग (अंश) (२६) थाय छे. (८५). तथा तालीश हजार पांच सो ने त्रण आढक अने एक ढकना पासठीया चौद भाग ( ४२५०३१६) आटलं चंद्रवर्षनुं मान थाय छे. हवे नक्षत्रवर्षना अनुक्रमे तोल भने मान कहे छ. (८७). नव सो ने त्राशी भार भने एक मारना सडसठीया सर्ग २८ मो। (५१) एकोनविंशतिर्भागा भारस्य सप्तषष्टिजाः ९८३-१९-६७ ॥ ८८ इति नक्षत्रवर्षे तौल्यमानं. त्रयोदशसहस्रास्त्रि-रेकत्रिंशं शतत्रयं । त्रयोविं. शतिरंशाश्चा-ढकानां सप्तपष्टिजाः ३९३३१-२३४६७ ॥ ८६ ॥ इति नक्षत्रवर्षे मेयमानं. एकपंचाशानि भार-शतान्येकादशाष्ट च । द्वापष्टि- भागा भारस्य तौल्यं वर्षेऽभिवद्धिते ११५१-८४६२ ॥ ९०॥ पंचचत्वा- रिंशदाढया श्राढकानां सहस्रकाः। पट्चत्वारिंशदंशाश्च मान द्वापष्टिजा दश ४६०४५-१०४६२॥ ९१ ॥ पंचलक्षणभेदेना-प्युक्ताः संवत्सरा युगे । नक्षत्रचंद्रकर्मोष्ण-करा- भिवद्धिताह्वयाः ॥ ९२ ।। तथाहि-नक्षत्राणि यथायोगं स्वस्वमासानु- सारतः । भवंति यत्र राकायां कार्तिके कृत्तिका यथा ॥ ६३ ॥ तथोक्तं-'जेहो वञ्चइ मूलेण सावणो धणिठाहिं । श्रद्दासु अ मगसिरो, सेसा नक्खत्तनामिया मासा' ॥ ऋतवोऽपि यथायोगं प्रवर्तते महीतले। स्थिति वध्नाति हेमंतः कात्तिक्याः परतो यथा ॥ १४॥ भवेत्संवत्सरो - भोगणीश माग (६८३४) थाय छे. या नक्षत्रवर्पना तोलनुं प्रमाण छ. (८८). पण पार तेर हजार एटले ३६ हजार प्रण सो ने एकत्रीश पाढक भने एक पाढकना सडम. ठीया प्रेवीश अंशो ( ३६३३१३३ ) पाटलुं नक्षत्रवर्षनुं मेयमान जाण. (48). अमि- पदितवर्पना तोलनुं मान भग्यार सो ने एकापन भार भने एक मारना पासठीया पाठ माग धाय थे (११५१६) (80). ते ज श्रमियतिवर्पनें मेयमान छतालीश हजार ने पीरतालीश भाटक तथा एक आढकना पासठीया दश अंश (४६०४५३) याय छ.(६१). नक्षत्र, चंद्र, कर्म, सूर्य भने भमिवर्धित नामना पाने वर्ष एक युगने विप लतणना मैदे करीने पण पपा २ (१२). ते भा प्रमाणे-नक्षत्रो यथायोग्य पोतपोताना मामने अनुपार जे पूर्णिमाने दिचसे होय ते नवन नामनो ने मास कडेवायचे. जेमके कार्तिक मासनी पूर्णिमाए कृत्तिका नक्षत्र होय छे, तेथी से कार्तिक मास कहेगाय थे. (६३). (पोजा मासो माट फेर थे वे माटे) रघु के के-मूळ नपाना योगयी बेठ माम फहवाय थे, धनिष्ठाना योगपी भाग माम, माना योगयी मार्गगीर्ष माम फहराय छ, पाकीना मामो त से नक्षयना नामवाया होप छ (मा चंद्र नपत्रो एटने प्रतिदिवसना नपयो जायका). तुमो १ पापमा तुरुपर्ने खोल दया मैप सरन्यु नपी.

(५२) श्रीकाललोकप्रकाश। यश्च नात्युष्णो नातिशीतलः।बहूदकश्च नक्षत्र-संवत्सरमुशंति तं ॥६५॥ मासासदृशनामानि यत्र ऋक्षाणि पूर्णिमाः । समापयंति यः शीता-तप- रोगादिदारुणः ॥ ६६ ॥ वहूदकश्च तं प्राहु-चंद्रसंवत्सरं बुधाः । कर्म- संवत्सरस्येदं विज्ञेयमथ लक्षणं ॥ १७ ॥ दधत्यकाले तरव-स्तत्र पुष्पफलादिकं । सम्यग् यच्छति नांभोदो मितंपच इवोदकं ॥ १८ ॥ इति कर्मवर्षफलं ।। यत्रातिसरसा पृथ्वी पाथोऽतिसरसं हितं । रसो महान्मधूकाम्रा--दीनां पुष्पफलादिषु ॥ ६ ॥ यत्राल्पेनापि वर्षण धान्यं सम्यक् प्रजायते । सूर्यसंवत्सरं प्राहु-स्तमतिप्रौढबुद्धयः ॥४०॥ यत्रार्कतेजःसंतप्ता भवंति दिवसर्तवः । स्थलं निम्नायंबुपूर्ण तमाहुरभि- वद्धितं ॥ १॥ इत्यर्थतो जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिवृत्यादिषु. पंचभिः खलु वर्षेश्च युगं भवति तत्र च । प्रायं चंद्राभिधं वर्ष द्वितीयमपि तादृशं ॥२॥ अभिवद्धितसंशं च तृतीयं वर्षमीरितं । चतुर्थ पण पृथ्वीतळ उपर योग प्रमाणे प्रवर्ते छे. जेमके कार्तिकी पछी हेमंत ऋतु स्थितिने पामे 2. (६४). जे वर्ष अति उष्ण के प्रति शीतळ न होय अने पणा पाणीवालं होय ते नक्षत्र- वर्ष कहेवाय छे. (६५). जे वर्षमा पूर्णिमामोने ते ते मासना असमान नामवाळा नक्षत्रो समाप्त करता होय अने जे वर्ष शीत, ताप अने रोगादिकवडे भयंकर होय (६६), तथा घणा पाणीवालं होय ते वर्षने पंडितो चंद्रधर्प कहे छे. हवे कर्म (ऋतु) वर्षतुं लक्षण आ प्रमाणे जाण. (६७). कर्मवर्षमा प्रकाळे पृक्षो पुष्प फलादिकने धारण करे छ, भने मेघ कृपणनी जेम सारी रीते जळ आपतो नथी. (६८). (भा कर्मवर्षतुं फळ जाणवू.) जे वर्षमा पृथ्वी घणा रसवाळी होय, पाणी अति सरस अने हितकारक होय, मधूकना पुष्प अने आम्रादिकना फळादिकमा घणो रस होय, (68), अने जे वर्षमा अन्प घरसादवडे पण धान्य सारं पाके, तेने अति मोटी बुद्धिवाळा पंडितो सूर्यवर्प कहे छे. (४००). जे वर्षमा दिवस अने ऋतुओ सूर्यना तेजथी तप्त थता होय अने नीचा स्थळ पाणीथी पूर्ण होय, तेने अभिवर्धित वर्ष कहे छे. (१). श्रा हकिकत जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिनी टीका विगेरेमा कही छे. पांच वर्षेनो एक युग थाय थे, तेमा पहेलुं चंद्र नामनुं वर्ष छे, बीजें वर्ष पण ते ज नामर्नु एटले चंद्र नामर्नु छ. (२). अमिवर्षित नामर्नु श्रीजें वर्ष कटु, चौथु चंद्र नामर्नु -- सर्ग १८ मो। (५३) चंद्रसंशं च पंचमं चाभिवद्धितं ॥ ३ ॥ स्युर्मासाश्चंद्रवर्षेषु द्वादश द्वादश त्रिपु । अभिवद्धितवर्षे च द्वे त्रयोदशमासके ॥ ४॥ द्वितीयस्येंदुवर्पस्य प्रथमः समयो हि यः। तदनंतरपाश्चात्यः स्यादायस्य क्षणोंऽतिमः॥५॥ पापाढाभिरुत्तराभि-स्तदा योगो हिमातेः । तासां तदानीं स्यु ग्याः पड्विंशतिर्मुहूर्त्तकाः ॥ ६ ॥ षड्विंशतिर्मुहूर्त्तस्य भागा द्वापष्टिजास्तथा । द्वापष्टयंशस्य चैकस्य सप्तपष्टयंशशालिनः ॥७॥ चतुष्पंचाशद्विभागा इह द्वापष्टिजो लवः । सप्तपष्टिप्रविभक्त-श्चूर्णिकाभाग उच्यते ॥ ८ ॥ पुनर्वसुभ्यां साकं च तदा योगो रवेर्भवेत् । मुहर्ताः पोडश तदा तयो- भॊग्या भवंति हि ॥ ९ ॥ अष्टौ द्वापष्टिजा भागा मुहूर्त्तस्य तथोपरि । एकस्य द्वापष्टयंशस्य विंशतिचूर्णिका लवाः ॥ १०॥ तथोक्तं सूर्यप्र- ज्ञप्तौ-'जे णं दोच्चस्स संवच्छरस्स प्राई सेणं पढमस्स चंदसंवच्छरस्स पज्जवसाणे अणंतरपच्छाकडे समए, तं समयं च णं चंदे केणं नस्कत्तेणं पर्प छ भने पांचमं अमिवर्धित नामनुं वर्ष छे. (३). एक युगमा प्रण चंद्रवर्ष के ते दरे- फमा पार पार मास होय छे; तथा वे अभिवर्धित वर्ष छे, तेमां तेर तेर मास आवे छे. (४). वीजा चंद्रवर्पनो जे प्रथम समय छ, तेनी पहेलानो जे समय के ते पहेला चंद्र वर्पनो छेनो समय होय छे. (५). ते समये चंद्रने उत्तरापाढा नक्षत्रनो योग होय छे. ते वखते ते उत्तरापाढाना छवीश महूर्त भोग्य होय छे, तथा ते उपर एक मुहर्चना पासठीया छवीश भाग (अंश) तथा एक पासठीया अंशना सडसठीया चोपन अंश (२६ ३११४) होय छे. महीं वासठीया भंशना जे सडसठ माग थाय छे, तेनुं वीजें नाम पूर्णिकामाग कहेवाय छे. (८). ते वसते सूर्यने पुनर्वसु नक्षत्रनी साये योग होय छे, ते यसते ते पुनर्वसु नक्षमना सोळ मुहूर्त सूर्यने मोग्य होय छे, तथा उपर एक मुहर्तना बास- ठीया माठ भाग अने एक पासठीया भागना वीश चूर्णिका अंश (१६ १३७) होय छे (१०). ते विपे सूर्यप्रज्ञप्तिमा कयुं छे के-"जे पीजा चंद्रवर्पनो पहेलो समय छे, वेनी पहेलानो जे समय ते पहेला चंद्रवपनो हेलो समय छे. ते समये चंद्रनो योग कया नक्षत्र साये होय छ? (उचर)-उत्तराषाढा नक्षत्र साये होय छे. उपरापाहा नवना छवीश मुहर्त, उपर पासठीया छवीश माग, तथा ते उपर मुहूर्त्तना एक पासठीया भागना सहसा ठीया चोपन चूर्णिका भाग शेप (२६ २११४) भाटखें चंद्रने मोग्य होय छे. आ समये १ हषे पछी भोगवा मायक.

श्रीकाललोकप्रकाश । ब्दस्यादिमक्षणात् । अनंतरो यः पाश्चात्यः पंचमान्दस्य सोंतिमः ॥ २६ ॥ श्रापाढाभिरुत्तराभि-स्तदा योगः सितद्युतेः । चरमे समये तासां वर्तमानो भवेत्स हि ॥ २७ ॥ सूर्यस्य च तदा योगः पुष्येण परिकीर्तितः । भुक्तशेपास्तदा तस्य मुहूर्ता एकविंशतिः॥ २८ ॥ द्वाप- ष्टिजास्त्रयश्चत्वारिंशदंशास्तथोपरि । तस्यांशस्य त्रयस्त्रिंश-द्विभागाः सप्तषष्टिजाः ॥ २९ ॥ अत्र येऽर्कस्य नक्षत्र-योगे प्रोक्ता मुहूर्त्तकाः। ते भानुसत्का बोद्धव्या विधोस्तु व्यावहारिकाः ॥ ३०॥ श्राह च-अहोरात्रस्य हि त्रिंश-तमोशो व्यावहारिका । मुहूर्त इति जानीमः किंरूपोऽसौ रवेः पुनः ॥ ३१ ॥ अत्रोच्यते यत्संपूर्णमहोरात्रं युज्यते भं हिमांशुना। तस्य योगोऽभवद्याव-कालमुष्णांशुना सह ॥३२॥ तस्य त्रिंशत्तमो भागो यावान् जायेत निश्चितः । तावन्मानो मुहूर्तोऽत्र ज्ञेयो विज्ञैर्विवस्वतः ॥ ३३ ॥ स चायं-त्रयोदशमुहूर्त्तानि मुहूर्तस्यैककस्य च । कृतद्वाषष्टिभागस्य चतुर्विंशतिरंशकाः ॥ ३४ ॥ द्वाषष्ट्यंशस्य चैकस्य आदिमा वर्तता पहेला चंद्र वर्षना पहेला समयनी पहेलानो जे समय होय ते पांचमा अ. भिवर्षितवर्षनो छल्लो समय होय छे. (२६). ते वखते उत्तरापाढा नक्षत्रनी साथे चंद्रनो योग होय छे. ते योग ते तरापादाना छल्ला समये होय छे. (२७). आ समये सूर्यनो योग पुष्प नचनी साथे कहेलो छे. ते वखते ते पुष्य नक्षत्रना भुक्तशेप ( भोग्य ) मुहूर्त एकवीश, वेना उपर वासठीया तेंतालीश अंश अने एक बासठीया अंशना सडसठीया तेत्रीश भाग (२१ ६३ ४)) होय छे. (२६). अहीं सूर्यनो नक्षत्र साथै योग थतां जे मुहूर्तो कहां छे, ते सूर्य संबंधी जाणवा, अने चंद्रना योगमा जे मुहूर्तो कहां ते व्यावहारिक जाणवा. (३०). अहीं कोई शंका करे के-एक रात्रि दिवसनो जे त्रीशमो माग ते व्यवहारथी मुहूर्त कहेवाय छ एम अमे जाणीए छीए. परंतु ते मुहूर्त्तने सूर्य साथे शो संबंध के ? (३१). मानो उत्तर ए के जे-जे नक्षत्रनो चंद्र साथे संपूर्ण रात्रि दिवस योग थाय छे, ते नक्ष- प्रनो योग जेटलो काळ सूर्य साथे निश्चित थाय, तेनो त्रीशमो भाग जेटलो थाय तेटला प्रमाणवालं सूर्य, मुहूर्त कहेवाय छे एम पंडितोए जाण. (३३), ते आ प्रमाणे--तेर भार्च, उपर एक महर्चना पासठीया चोवीश अंश सथा पासठीया एक अंशना सदसठ सर्ग २८ मो। (५७) छिन्नस्य सप्तपष्टिधा । किंचित्समधिकाः सार्ध-स्त्रिपंचाशद्विभागकाः ॥ ३५ ॥ तथाहि-स्युादशमुहूर्त्ताढ्या अहोरात्रास्त्रयोदश। समक्षेत्रा- णामुड़नां योगकालो विवस्वतः ।। ३६ ।। त्रयोदशाहोरात्रा ये मुहूर्त्तकर- रणाय ते । त्रिंशद्गुणीकृता जाता नवत्याढ्या शतत्रयी.॥ ३७॥ द्वादशानां मुहूर्तानां शेषाणामन योजने। चतुःशती द्वथुत्तरा स्या-त्रिंशता सा विभज्यते ॥ ३८ ॥ पूर्णास्त्रयोदश प्राप्ताः शिष्यंते द्वादशाथ ते । द्वाप- टिनाश्चतुश्चत्वारिंशा सप्तशती भवेत् ॥ ३९ ॥ एतस्यास्त्रिंशता भागे चतुर्विंशतिराप्यते । शेषा चतुर्विंशतिः सा सप्तषष्ट्या हता भवेत् ॥ ४०॥ अष्टाढ्या पोडशशती त्रिंशतासौ विभज्यते । प्राप्ताः सार्धास्त्रिपंचाश- स्किचित्समधिका इति ॥ ४१ ॥ इति सूर्यमुहूर्तप्रमाणानयनोपायः । तुल्यार्द्धसार्द्धक्षेत्रोडु-पूक्तमाना मुहूर्त्तकाः । त्रिंशत्पंचदश पंच-च- त्वारिंशत्स्युरुष्णगाः ॥ ४२ ॥ तैश्च त्रयोदश दिनाः सद्वादशमुहूर्त्तकाः । . तथा स्युः पडहोरात्रा मुहर्त्ताश्चैकविंशतिः ॥ ४३ ॥ अहोरात्रा विंशतिश्च , मुहूर्त्तत्रितयाधिकाः । क्रमावैधेषु भेष्वर्क-भोगः स्याद्वयावहारिकः ॥४॥ भाग फरीए तेमाथी साडीपांत्रीशथी काइ अधिक अंश आवे छे. (३५). ते श्रा प्रमाणे-समवेत्रवाळा नक्षत्रनी साथे सूर्यनो योग तेर रात्रिदिवस भने उपर वार मुहूर्त्तनो छे. (३६). तेथी जे तेर रात्रिदिवम छ तेना मुहूर्त फरवा माटे तेने त्रीशे गुणतां प्रण सो ने नेवू (३६०) थाय छे. तेमा उपरना धार मुहूर्त मेळवीए त्यारे चार सो ने ये (४०२) थाय थे, तेने त्रीशे मांगता मागमा तेर भाव्या. बाकी शेप बार वध्या, तेने पासठे गुण- पाथी सात सो नै चुमाळीश (७४४) थया. (३६). तेने त्रीशे भांगतां मागर्मा चोवीश मावे के, शेष पण चोवीश रहे छे. तेने सडसठे गुणतां सोळ सो ने पाठ (१६०८) थाय छे. तेने त्रीशे मांगवाधी साडीतेपन (५३॥) प्रने काइक (त्रीशीया प्रण माग) अधिक थाय थे. (४१). भा प्रमाणे सूर्यना मुहर्नु प्रमाण लाववानो उपाय करो. तुम्य (सम) क्षेत्रवाळा नक्षत्रोने विपे सूर्यना त्रीश मुर्च, भर्धक्षेत्रना नघनोने विपे पंदर पूर्व भने सार्ध (दोढ) क्षेत्रपाळा नक्षत्रोने विपे सूर्पना पीतालीश मुर्च पाने . (४२). ते प्रणे प्रकारना नवनो साथै सूर्यनो भोग मा प्रमाणे छे.-सम नपत्र साये तेर रात्रिदिवस ने चार सपूर्ण, भर्ध नपत्र सापे छ रात्रिदिवस ने एकवीश सर्च वया सार्ष (५४) भीकाललोकप्रकाश। जोएइ ता उत्तराहिं श्रासादाहिं उत्तराणं प्रासाढाणं छवीसं मुहुत्ता कव्वीसं च वावट्ठिभागा मुहुत्तस्स वावष्ठिभागं च सत्तठिहाछेत्ता चउ. पपणं चुणिया भागा सेसा, तं समयं च णं सूरे केणं णकत्तेणं जोएइ ता पुणव्वसुणा पुणव्वसुस्स सोलस मुहुत्ता अ य वावष्टि भागा मुहु- त्तस्स बावठिभागं च सत्तट्टिहाछेत्ता वीसं चुणिया भागा सेसा इति, एवं शेपेष्वपि सूत्रेषु सूत्रालापकपद्धतिर्वोद्धव्या' योऽभिवद्धितवर्षस्य तृतीयस्यादिमः क्षणः। तदनंतरपाश्चात्यो द्वितीयस्यांतिमः क्षणः ॥११॥ तदा च पूर्वाषाढाभि-स्सह योगो हिमातेः। मुहूर्त्ताः सप्त भागाश्च त्रिपंचाशद् द्विषष्टिजाः ॥ १२ ॥ द्वापष्टचंशस्य चैकस्य विभागाः सप्तप- ष्टिजाः । एकोनचत्वारिंशत्स्यु-स्तासां भोग्याः सितविपः ॥ १३ ॥ पुनर्वसुभ्यां संयोग-स्तदा स्यादुष्णरोचिषः । तन्मुहूतांशप्रत्यंशान् भानुभोग्यानथ हुवे ॥ १४ ॥ द्विचत्वारिंशन्मुहूर्ताः पुनर्वस्वोस्तदा रवेः। पंचत्रिंशद्विषष्ट्यंशा भोग्याः सप्त च चूर्णिकाः ॥ १५ ॥ तुर्यस्य चंद्र- वर्षस्य य इह प्रथमः क्षणः । क्षणस्तृतीयस्यांत्यः स्या-त्तदनंतरपश्चिमः इति." सूर्यनो योग कया नक्षत्र साथे होय छे ? ( उत्तर )-ते समये पुनर्वसु साथे सूर्यनो योग होय छे. ते पुनर्वसु नक्षत्रना सोळ मुहूर्त, ते उपर एक मुहूर्चना बासठीया पाठ भाग, तथा उपर एक बासठीया भागना सडसठ भाग करी तेमाथी चीश चूर्णिका भाग शेष (१६६६३०) एटलुं सूर्यने भोग्य होय छे. आ प्रमाणे पाकीना सूत्रोमां सूत्रना आलावानी पद्धति जाणवी. हवे त्रीजा अमिवर्धितवर्पनो जे पहेलो समय छे, तेनी पहे- लानो जे समय ते वीजा चंद्रवर्पनो छेलो ममय छे. (११). ते समये पूर्वापाढा नक्षत्रनी साथे चंद्रनो योग सात मुहूर्त, ते उपर एक मुहूर्त्तना बासठीया त्रेपन अंश, अने ते उपर एक पासठीया भागना सउसठीया श्रीगणचाळीश भाग (७ ६३३७) होय छे एटले पाटलो काळ चंद्रनो भोग्य होय छे. (१३). या वखते पुनर्वसु नक्षत्रनी साथे सूर्यनो संयोग होय छ, ते वखते सूर्यना भोग्य मुहूर्च, अंश भने प्रत्यंश केटला होय ? ते कई छ. (१४). ते वखते सूर्यने पुनर्वसुना ताळीश मुहूर्त, ते उपर एक मुहूर्त्तना पासठीया पांत्रीश अंश, 'मने ते उपर एक बासठीया अंशनासडसठीया सात अंश एटले चूर्णिका भाग (४२३३४५) भोग्य होय छे. (१५). चोथा चंद्रवपनो जे पहेलो समय छे, तेनी पहेलानो जे समय ते सर्ग २८ मो। (५५) ॥१६॥ श्रापाढाभिश्चोत्तराभि-स्तदा योगो हिमद्युतेः । भुक्तशेषास्तदानीं स्यु-स्तन्मुहूर्तास्त्रयोदश ॥ १७ ॥ एकस्य च मुहूर्तस्य द्वाषष्ट्यंशास्त्रयो- दश । अंशस्य तादृशः सप्त-विंशतिचूर्णिका लवाः ॥ १८॥ पुनर्वसुभ्यां सूर्यस्य तदा योगो निरूपितः । मुहूर्तों द्वौ च तद्भुक्त-शेषौ भागास्त- थोपरि ॥ १९ ॥ पटपंचाशद् द्विषष्ट्युत्था भागस्यैकस्य तस्य च । सप्तपष्टिविभक्तस्य षष्टि गाः प्रकीर्तिताः ॥ २० ॥ अभिवद्धितवर्षस्य पंचमस्यादिमक्षणात् । स्याद्योऽनंतरपाश्चात्यः स तुर्यस्यांतिमः क्षणः ॥ २१ ॥ श्रापाढाभिरुत्तराभि-स्तदा योगोऽमृतयुतेः । तद्भुक्तशेषा एकोन-चत्वारिंशन्मुहूर्त्तकाः ॥ २२ ॥ द्वापष्टिभागाश्चत्वारिं-शदेकस्याध तस्य च । सप्तपष्टिभवाः सप्त-चत्वारिंशस्किलांशकाः ॥ २३ ॥ पुनर्व- सुभ्यां सूर्यस्य तदा योगः प्रकीर्तितः । तद्भुक्तशेषा एकोन-त्रिंशदेव मुहूर्त्तकाः ॥ २४ ॥ एकविंशतिरंशाश्च मुहूर्त्तस्य द्विपष्टिजाः । तस्यैकस्य सप्तचत्वा-रिंशञ्च चूर्णिकांशकाः ॥ २५ ॥ युगस्यादेरादिमस्य चंद्रा- श्रीजा अमिवर्धित वर्पनो छेल्लो समय होय छे. (१६). ते वखते उत्तरापाढा नक्षत्रनी साथे चंद्रनो योग होय छे. ते वखते उत्तरापाढाना तेर मुहूर्त चंद्रने भाग्य होय छ, ते उपर एक मुहूर्त्तना बासठीया तेर अंश अने बासठीया एक अंशना सतावीश चूर्णिका अंश शेष होय छे (१३ ३३३७) (१८). भा चखते पुनर्वसु नक्षत्रनी साथे सर्यनो योग कहेलो छे ते वखते ते पुनर्वसुना वे मुहूर्त ते उपर एक मुहूर्जना यासठीयां छप्पन अंश भने एक बासठीया अंशना सडसठीया साठ भाग (२७) मुक्त शेष एटले भोग्य कहेला छे. (२०), पांचमा अभिवर्धित वर्पना पहेला समयनी पहेलानो ने समय होय ते चोथा चंद्रवर्पनो छल्लो समय होय छे. (२१). ते वखते उत्तरापाढा नव- अनी साये चंद्रनो योग होय छे. ते वखते ते उत्तरापाढाना श्रीगणचाळीश मुहूर्त, ते उपर एक मुहर्चना पासठीया चाळीश मंश भने एक बासठीया अंशना सडसठीया सुडवाळीश मंश (३६१७) भुक्तशेप एटले मोग्य होय छे. (२३). आ वखते पुनर्वसु नक्षत्रनी साथे सूर्यनो योग कहेलो थे. ते वसते ते पुनर्वसु नक्षत्रना भोगणत्रीश मुहूर्च, ते उपर एक महर्चना पामठीया एकवीश भंश भने एक पासठीया अंशना सहसठीया सुडतालीश पूर्णिका अंश (२६३४) सूर्यने भोगववाना बाकी (भोग्य ) होय छे. (२५). गुगनी (५८) श्रीकाललोकप्रकारा। अष्टादश शतास्त्रिंशा अहोरात्रा युगे स्मृताः। पंचानामपि वर्षाणां तत्त- संख्यासमुच्चयात् ॥ ४५ ॥ तथाहि- संवत्सरास्त्रयश्चांद्रा युगे द्वौ चाभिवद्धितौ । तत्र चंद्राब्दस्य मान- मित्येतत्प्राग्निरूपितं ॥ ४६ ॥ चतुःपंचाशदधिक-महोरात्रशतत्रयं । द्वादश द्वापष्टिभागा अहोरात्रस्य चोपरि ॥४७॥ अस्मिस्त्रिगुणिते जात- महोरात्रसहस्रकं । द्वाषष्ट्याभ्यधिकं पत्रिं-शच्च द्वापष्टिजा लवाः ॥४८॥ अभिवद्धितमानं चा-होरात्राणां शतत्रयं । सभ्यशीति चतुश्चत्वारिंश- द्वापष्टिजा लवाः ॥ ४६ ॥ अस्मिन् द्विगुणिते सप्त शताः पदषष्टिसं. युताः । अहोरात्राः स्युस्तथाष्टा-शीतिषष्टिजा लवाः॥ ५० ॥ श्रष्टाशी- तिरमी भागाः प्राच्यट्त्रिंशता युताः। जाताश्चतुर्विशमेव शतं द्वापष्टिजा लवाः ।। ५१ ।। अहोरात्रद्वयं लब्धं द्वापष्ट्यास्मिन् हृत सति । अष्टादश- शतास्त्रिंशाः सर्वे संकलितास्ततः॥ ५२ ॥ सप्तपष्टिक्षमासा द्वापष्टिस्ते .- नक्षत्र साथै चीश रात्रिदिवस भने त्रण मुहूर्तः श्रा सूर्यनो भोग व्यावहारिक कहेवाय छे. (४४ ), एक युगना पांच वर्षनी ते ते संख्याने एकठी करीए त्यारे अढार सो ने त्रीश रात्रिदिवस थाय छे. (४५) ते था प्रमाणे- एक युगमा त्रण चंद्र वर्ष अने वे अमिवर्धित वर्ष आवे छे. तेमां चंद्र वर्षतुं मान त्रण सो ने चोपन रात्रिदिवस अने उपर एक रात्रिदिवसना बासठीया चार भाग (३५४६३) शाय छे. (४७). तेने त्रण गुणा करता एक हजार ने बासठ रात्रिदिवस अने उपर एक रात्रिदिवसना पामठीया छत्रीश भाग (१०६२६३ ) थाय छे. (४८) तथा अभिवार्षित वर्पन मान त्रण सो ने घाशी रात्रिदिवस तथा उपर एक रात्रिदिवसना चासठीया चुमा- ळीश भाग ( ३८३६३) छे. (४६) तेने बमणा करवाथी साठ सो ने छासठ रात्रिदिवस अने उपर एक रात्रिदिवसना पासठीया अख्याशी भाग (७६६६६) थाय छे. मा भव्याशी मागमा उपरना छत्रीश भाग नाखवाथी बासठीया भाग एक सो ने चोवीश (१२४) थया, तेने वासठे माग देतां बे रात्रिदिवस थाय. तेनी साथे उपरना (१०६२ तथा ७६६ ) मेळवतां कुल भढार सो ने त्रीश (१८३०) रात्रिदिवस एक युगना थाय छे. (५२). .

सर्ग २८ मो! (५९) तथंदवाः । ऋतुमासाश्चैकषष्टिः पष्टिर्मामा विवस्वतः ॥ ५३॥ अभिवद्धि- तमासाश्च सप्तपंचाशदाहिताः । शिष्येत सलाहोरात्री सैकादशमुहूर्तिका ॥ ५४ ॥ त्रयोविंशतिरंशाश्च मुहूर्त्तस्य द्विपष्टिजाः । मासानां मानमित्येवं युगे प्रोक्तं पृथक् पृथक् ।। ५५ ॥ युगाहोरात्रवृदस्य हृते भागे यथोदितः। स्वीयस्वीयमासमान-युगे मासास्तथाऽत्र च ॥ ५६ ॥ अयनानि दश प्राहु-प्रतवस्त्रिंशदाहिताः । पष्टिर्मासाः शतं विशं पक्षाः सौरप्रमाणतः ॥ ५७ ॥ चतुप्पंचाशत्सहस्राः शतेनैवभिरन्विताः ५४९०० । युगे मुहूर्ता निर्दिष्टाः शिष्टैर्विष्टपपृजितैः ॥ ५८ ॥ एकोनविंशतिसह-स्राधिकं लक्ष- योर्द्वयं । श्राढकानां पट्शतानि तौल्यमानं युगे जगुः २१६६०० ॥ ५९॥ चतुप्पंचाशच्छतानि भाराणां नवतिस्तथा ५४९० । मेयरूपतया मानं युगस्याहुर्मनीषिणः ॥६०॥ चांद्रं वर्ष युगस्यादि-स्तस्यादिर्मास इष्यते। मासादिरसितः पक्ष-स्तस्यादिदिवसो भवेत् ॥ ६१ ॥ तत्रापि भरतक्षेत्रे क्षेत्रे चैरवताभिधे । युगस्यादिर्दिनस्यादौ विदेहेषु निशामुखे ॥ ६२ ॥ एक युगमा सडसठ नपत्रमास होय छ, यासठ चंद्रमास होय छे, एकमठ मतुमास होय छे, साठ सूर्यमास होय छे भने सत्तावन अमिवर्धितमास कहेला छे तथा उपर सात रात्रिदिवस, भग्यार मुहूर्त भने एक मुहूर्तना पासठीया वीश अंश.मा प्रमाणे एक युगा जूदं जूद मासतुं प्रमाण कोलुं छे. (५५). एक युगना जेटला रात्रिदिवस (१८३०) उपर कहा थे, तेने पोतपोताना मासना (अहोरात्ररूप) प्रमाणवढे मांगीए त्यारे वे युगना मासनी संख्या भावे छे. (५६). तथा एक युगमा दश अपन आवे छ, त्रीश ऋतुभो कहेली छे, माठ मास मने एक मो ने वीश पसाडीया भाये थे. पा सूर्यवर्पना प्रमाणथी कहेलुं छे. (५७). जगतने पूज्य तीर्थकरोए एक युगमा (१८३० अहोरामने ३०वडे गुणता ) चोपन हजार ने नव सो मुहूों कहेला छे (५४६००) (५८). एक युगमा तोलन प्रमाण ये लाख भोगणीश हजार ने छ मो भादक कडं थे (२१९६००). (५६) एक युगर्नु मेयपणाए करीने प्रमाण फरीए ती चोपन सो ने ने मार (५४६०) पाय के एम पंरितो कहे थे. (६०). युगनो पारंम चंद्रवर्षपी पाय छ, वपनो प्रारंभ मामयी थाप छ, मासना मारमा हप्पच होप छ भने कृष्णपक्षमा प्रथम दिवम भार थे (दिवमयी व शरु पाप थे). (११). वेमा पप भरत भने भैरवत ए पे चयमा दिवसनी यादिमा पुगनो प्रारंम थया (६.) भीकाललोकप्रकाश। यदापाढपौर्णमासी-रजन्याः समनतरं । प्रवर्तते युगस्यादि-भरतैरवता- ख्ययोः॥६३॥ पूर्वापरविदेहेषु तदा च रजनीमुखं । ततो निशामुखादेव युगादिस्तत्र कीर्तितः ॥ ६४ ॥ किंच-रुद्रादयो मुहूर्ताः स्यु-रहोरात्रा दिनादयः । उक्ता जिनेंद्रेर्भरते-रावताह्वयवर्पयोः ॥ ६५ ॥ महाविदेहेषु पुन-रहोरात्रा निशादयः । यतस्तत्र युगस्यादि-निशारंभात्प्रवर्तते ॥६६॥ तथोक्तं जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे-'किमाई णं भंते संवच्छरा किमाइया श्रयणा किमाइया उऊ किमाइया मासा किमाइया परका किमाइया अहोरत्ता किमाइया मुहत्ता किमाइया करणा किमाइयानकत्ता ? गोत्रमा! चंदाइया संवच्छरा, दकिणाइया अयणा, पाउसाइया उऊ, सावणाइया मासा, बहुलाइया परका, दिवसाइया अहोरत्ता, रुदाइया मुहूत्ता, बा. लवाइया करणा, अभियाइया नरकत्ता पन्नत्ता समणाउसो' . छ, भने महाविदेह क्षेत्रमा रात्रिना प्रारममा युगनी शरुपात थाय छे. (६२). ज्यारे अषाढ मासनी पूर्णिमानी रात्रि पूर्ण थाय त्यारे (श्रावण पदि १ आपणा अशाड वदि १). भरत अने ऐवत क्षेत्रने विषे युगनी शरुआत थाय छे. (६३). या वखते पूर्व अने पश्चिम बन्ने महाविदेह क्षेत्रने विषे रात्रिनो प्रारंभ होय छे, तेथी बने क्षेत्रमा रात्रिना भारमथी ज युगनी शरुआत कहेली छ. (६४). वळी रुद्र विगेरे मुहूर्तों श्रने अहोरावनी गणतरी भरत भने ऐरवत क्षेत्रमा दिवसना प्रारंभथी थाय छे, एम जिनेश्वरोए कहुं छे. (६५). परंतु महाविदेह क्षेन्नमां रात्रिना प्रारंभी अहोरात्रनी गणतरी थाय छे, केमके ते क्षेत्रमा रात्रिना प्रारंभथी युगनी शरुपात थाय छे. (६६). ते विपे जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिमा का, के के-"हे भगवान् ! वर्षनो प्रारंभ क्याथी थाय छ ? अयननो आरंभ शेनाथी थाय छे ? ऋतनो भारंभ क्यारथी थाय छे! मासनो प्रारंभ क्यारथी थाय छे? पखवाडीयानो आरंभ क्यारथी थाय छे ? अहोरात्रनो प्रारंभ क्यारथी थाय के ? मुहूर्त्तनो आरंभ क्यारथी थाय के ? करणनो प्रारंभ क्यारथी थाय छे? अने नक्षत्रनो प्रारंभ क्यारथी थाय छ ? ' (उत्तर) हे गौतम! वर्षनो आरंभ चंद्रथी (चांद्रवर्पथी) थाय छ, अयननो आरंभ दक्षिणायनधी थाय छे, अतुनो आरंभ वर्षाऋतुथी थाय छे, मासनो आरंम श्रावणथी थाय छे, पखवाडीयानो प्रारंभ कृष्णपक्षथी थाय छे, अहोरात्रनो प्रारंभ दिवसथी थाय छे, मुहर्तनो भारंभ रुद्रथी थाय छे, करणनो आरंभ पालवथी थाय छ, तथा हे आयुष्मन् श्रमण ! नक्षत्रनो आरंम अमिजितथी थाप के."

, सर्ग २८ मो। (६१) श्रावणाऽसितपक्षस्य तिथेः प्रतिपदोऽपि च । बालवस्य करणस्य ऋक्षस्याभिजितस्तथा ॥६७ ॥ प्रथमे समये प्रोक्तो युगारंभश्चिदुत्तरैः । भरतैरावतमहा-विदेहेषु समं जिनैः ॥ ६ ॥ तथोक्तं ज्योतिष्करंडे-साव- णबहुलपडिवए बालवकरणे अभीइनकत्ते । सव्वस्थ पढमसमए जुगस्स श्राई वियाणाहि ॥ ६९ ॥ इदं तु वाल्लभ्यवाचनानुगतं ज्ञेयं, ज्योतिष्क- रंडक र्वाल्लभ्यत्वात् , माथुरवाचनानुगनभगवत्यादिसूत्रेषु तु यस्मिन् समये मेरोदक्षिणोत्तरयोर्युगस्य प्रतिपत्तिस्ततोऽनंतरे द्वितीये समये मेरोः पूर्वापरयोर्युगस्य प्रतिपत्तिरित्यभिप्रायो दृश्यते, तथा च तद्ग्रंथः-जया णं भंते ! जंबूद्दीवे दीव दाहिणद्वे वासाणं पढमे समए पडिवज्जइ, तया णं उत्तरड़े वि वासाणं पढमे समए पडिवज्जइ ? जयाणं उत्तरड्डे वासाणं पढमे समए पडिवज्जइ तया णं जंबूदीवे दीवे मंदरस्स पव्वयस्स पुरच्छिम. पञ्चत्थिमेणं अणंतरपुरस्कडसमयंसि वासाणं पढमे समए पडिवज्जइ ? हता गोयमा ! जया णं जंबूद्दीवे दीवे दाहिगड्ढेवासाणं पढमे समए पडिवनइ श्रावण मासना कृष्णपक्षनी प्रतिपदा ( एकम) ने दिवमे बालर नामना करणना भने भभिजित नक्षत्रना पहेले समये भरत, ऐवत भने महाविदेह क्षेत्रमा एकीसाथे (घखते ) उत्तम ( केवळ ) ज्ञानवाळा जिनेश्वरोए युगनो आरंम कह्यो छे. (६७-६८). ते विपे ज्योतिकरंडका कह्यु छ के-" श्रावण मासना कृष्णपक्षनी प्रति- पदाने दिवसे पालव करण भने अभिजित नक्षत्रना प्रथम समयने विपे सर्व क्षेत्रोमा युगनो प्रारंभ थाय के एम जाणयु. (६९). मा पनमीयाचनाने अनुसार कमु छ एम जाणवं, केमके ज्योति करंडना कर्ता बनमी संप्रदायना इता; परंतु माधुरी वाचनाने अनुसरता भगवती विगैरे सूत्रोमा तो-"जे समये मेरुपर्वतनी उत्तर भने दक्षिणमा युगनो भारंम याय थे, तेनी पछीना चीजे समये मेरुनी पूर्व भने पश्चिममा युगनो प्रारम थाय छे. एवो भभिप्राय जोवामा आये थे." ते विषे ते ग्रंथमा कछु के के हे भगवान् ! ज्यारे बंदीप नामना द्वीपमा दक्षिणार्धने विप वर्षनी प्रथम समय अंगीकार कराय छे, तेज वखते उत्तरार्पने विपे पण वर्पनो प्रथम समय अंगीकार कराय छ ? भने ज्यारे उत्तरार्धन पिपे वर्पनो प्रथम समय अंगीकार कराय छे, त्यारपटीना पीजा समये बंदीप नामना दीपमा मेरुपर्वतनी पूर्व भने पश्चिमने विप (महाविदेह पत्रने दिपे) वर्षनी प्रथम समय भंगीकार फराय छ । उचर--हे गौतमाहा. ज्यारे जंयुद्धीप नामना द्वीपमा रषिणार्धने विषे पर्पनो पोलो समय अंगीकार कराय छ, विगेरे व प्रमाये " " . . (६२) भीकामलोकप्रकारा । तह वेव जाव पडिवजइ,एवं चावलिकादिसूत्रगर्भितं ऋतुत्रयसूत्रं अयनसूत्रं चाधीत्य जहा श्रयणेणं अभिलावो तहा संवच्छरेण विभाणियव्वो, जुएण वि वाससएण वि इत्यादि भूयान् सूत्रसंदर्भो भगवतीसूत्रादर्शादोध्यः. जंवूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रेऽपि इदमेव सूत्रं "जहा पंचमसए पढमुद्देसए इत्यतिदेशेन संगृहीतं बोद्धव्यं. अत्र च जंबूद्वीपप्रज्ञतिवृत्तौ उ० श्रीशांति- चंद्रगणिभिरिहैवमुक्तं, युक्त्यानुकूल्यं तु युगपत्प्रतिपत्तिसमये संभावयामः, तथाहि- सव्वे कालविसेसा सूरपमाणेण हुंति नायव्वा' इति वच. नायदि सूर्यचारविशेपेण कालविशेषप्रतिपत्तिदक्षिणोत्तरयोराद्यसमये तर्हि दक्षिणोत्तरप्रतिपत्तिसमये पूर्वापरयोः पूर्वकालस्यापर्यवसानं वाच्यं, पूर्वा- परविदेहापेक्षयास्त्येव तदिति चेत्सूर्ययोश्चीर्णचरणं अपरं वा सूर्यद्वयं वा- च्यं, ययोश्चारविशेषादक्षिणोत्तरप्रतिपत्तिसमयापेक्षयोत्तरसमये पूर्वापरयोः कहे. यावत् अंगीकार कराय छे." ज प्रमाणे प्रावलिका विगेरेना नथी गर्भित (सहित) त्रण ऋतुनुं सूत्र अने अयन- सूत्र कहीने-"जेम अयननो भालावो के तेम ज वर्षनो पण मालावो कहेवो. ते ज प्रमाणे युगनो तथा सो वर्षनो पण पालावो कहेवो." इत्यादिक पणां सूत्रोनो समूह भगवतीसूत्रना ग्रंथथी जाणवो. जंबूद्वीपप्रज्ञप्ति सूत्रमा पण "जेम पांचमा अंगना पांचमा शतकना पहेला उद्देशामा ए प्रमाणे भलामण करीने भा ज सूत्र ग्रहण कर्यु छे एम जाणवं अहीं जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिनी टीकामा उपाध्याय श्री शांतिचंद्रगणिए कह्यु छ के-"भहीं भा प्रमाणे कयुं छे, परंतु युक्तिनुं अनुकूळपणुं तो समकाळे प्रतिपचि (शरुपात ) नो समय होय तेमा छे. एम अमे संभावना करीए छीए. कह्यु छ के-' सर्वे काळना विशेपो सूर्यना प्रमाणथी थाय छ एम जाणवू.' आq वचन होवाथी. जो सूर्यना चार विशेपे करीने दक्षिण अने उत्तरमा काळ विशेषनो स्थीकार पहेले समये थतो होय तो दक्षिण अने उत्तरमा काळ विशेषना स्वीकारने समये पूर्व अने पश्चिममा पूर्वना काळनी असमाप्ति कहेवी जोइए. कदाच कोइ कहे के-'पूर्व-पश्चिम महाविदेहनी अपेक्षाए तेम (पूर्व काळनी असमाप्ति) के ज. तेनो उत्तर ए छे के-जो एम होय तो वे सूर्यन चीर्णचरण कहेवू जोइशे भथवा बीजाचे सूर्य कहेवा जोइशे, के तेमना जूदा प्रकारना चार (गति) थी दचिण भने उत्तरमा स्वीकारेला समयनी अपेक्षाए तेनी पछीना समये पूर्व-पश्चिममा काळ १ अमुक प्रकारनी गतिए करीने. २ पूर्वना वर्पनो के युगनो छल्लो समय कहेवो जोइए. ३ चारनी समाप्ति भने चारनी शरमाव. कह्यु छ तेम" .

सर्ग २८ मो। (६३) कालविशेषप्रतिपत्तिरित्यादिको भूयान् परवचनावकाश इत्यलं प्रसंगेनेति । वक्ष्यंते ये च कालांशाः सुषमसुषमादयः । प्रारंभं प्रतिपद्यते सर्वे तेऽपि युगादितः ॥ ७० ॥ युगपर्यवसाने च ते यांति परिपूर्णतां । तस्मात्कालविशेपेषु युगं प्रागुदितं जिनैः॥ ७१॥ तदुक्तं ज्योतिष्करंडके एए कालविभागा पडिवज्जते जुगंमि खलु सब्बे । पत्तेयं पत्तेयं जुगस्स अंते समप्पिति ॥ ७२ ॥ ज्योनिष्करंडटीकाकाराः पादलिप्तसूरयोऽप्याहुः- पए उ सुसमसुसमादयो अद्धाविसेसा जुगाइणा सह पवत्तंते जुगंतेण सह समाप्पिति । अथ वक्ष्ये प्रतियुग-मयनानि यथागमं । श्रावृत्तीः सूर्यशशिनो- स्तत्तिथीनुडुभिस्सह ।। ७३ ।। स्वरूपमृतुमासाना तिथीनां चावमस्य च। नक्षत्राणि यथायोग-मेतेषां करणान्यपि ॥ ७४ ॥ युगे युगेऽयनानि स्यु- नोर्दश दश ध्रुवं । तदेकैकमहोरात्र-सत्र्यशीतिशतात्मकं ।। ७५ ॥ प्रत्ययः क इहात्रेति यदि शुश्रूष्यते त्वया । त्रैराशिकं तदात्रेदं श्रूयतां विशेपनो (वर्पना प्रारंमनो) स्वीकार पर शके." इत्यादिक घणा प्रकारे अन्य भन्प विद्वानोना वचन (प्रश्नोचर ) नो अवकाश रहे छ; माटे भा प्रसंगे करीने सयु." भागळ उपर सुपमसुपम विगेरे जे काळना अंशो कहेवामा भावशे, ते सर्वेनो युगनी शरमावधी ज प्रारंम याय छे. भने युगने भंते तेस्रो पूर्णताने पामे थे, तेथी सर्व काळ विशेपोने विपे सोधी पहेला जिनेवरोए युगर्नु प्रमाण पताब्युं थे. (७०-७१). ते मारत ज्योतिकरंडकमा कई छ फे-या सर्व काळना विमागो प्रत्येक प्रत्येक युगना प्रा. रंमने भाथीने ज भंगीकार फराय छ (प्रारंम थाय थे ) भने युगने भंते ज समाप्त थाय 2. (७२), ज्योतिकरंडकना टीकाकार श्री पादलियमूरिमहाराज पण कहे के के- भा मुषममुपम विगेरे काळ विशेपो युगना मारमनी साधे व प्रवर्ने छ भने युगना अंदनी सापेज समाप्त पाय छे. से भागममा कया प्रमाणे दरेक युगना अपनो, सूर्य मने चंद्रनी भावधि, नपानी सापे सेनी सिपिभो, तमामर्नु स्वरूप, विपिनुं स्वरूप, पय विपिनुं स्वरूप, नमो मने ना संयोगधी पता करगोने ९ कोश. (७३-७४ ). दरेक युगमा पर्पना दश-दश अपनो होय . से दरेक भवनमा एक सोने माघी महोराम होप थे. (७५). मा पापानी ची यात्री ? एम सीने मित्र बो सारे सामरपानी यादोपवीमा - (६४) श्रीकाललोकप्रकाश । मित्र दर्श्यते ॥ ७६ ॥ अष्टादशशतास्त्रिंशा अयनैर्दशभिर्यदि । अहोरात्रा- स्तदैकेना-यनेन किं लभामहे ॥ ७७॥ अत्रांत्येनेकरूपेण राशिना गुणितः स्थितः । तथैव मध्यमो राशि-रेकेन गुणितं हि तत् ॥ ७८ ॥ ततो दशकरूपेण हृतेऽस्मिन्नाद्यराशिना। अहोरात्रशतं लब्धं सत्र्यशीति यथोदितं ॥ ७९ ॥ मंडलानामपि शतं सत्यशीति चरेद्रविः । एकैकं प्रत्यहोरानं पूरयन्नयनेऽयने ॥ ८०॥ सर्वांतरानंतरे य-मंडले दक्षिणा- यनं । श्रारभ्यते पूर्यते त-सर्वबाह्ये च मंडले ॥ ८१ ॥ सर्ववाह्यानंतरे च मंडलेऽथोत्तरायणं । श्रारभ्यते पूर्यते त-त्सर्वाभ्यंतरमंडले ॥ ८२ ॥ अथ सूर्यायनज्ञान-विषये करणं ब्रुवे । यतोऽतीतवर्तमाना-यनज्ञानं सुखं भवेत् ॥८३ ॥ राकामावास्यारूपाणि प्राग्विवक्षितवासरात् । तानि पंचदशनानि कर्त्तव्यानि ततोऽत्र च ॥ ८४ ॥ अतीतास्तिथयः क्षेप्या वर्तमानस्य पर्वणः। पात्यतेऽवमरात्राश्च युगादारभ्य ये गताः ॥ ८५ ॥ त्रिराशिने तुं सांभळ. ई कहुँ छु. (७६) जो दश अयनना अढार सो ने श्रीश अहोरात्र छे तो एक अयनना केटला अहोरात्र पामीए ( थाय) १ (७७). उत्तर-अहीं छेना एकरूप- राशिवडे मध्यम राशिने ( १८३० ने ) गुण वाथी तेटलो ज राशि रहे थे, केमके एकवडे जेने गुणवामां आवे ते तेटलुं ज रहे छे. (७८). त्यारपछी ( १८३० ने) दशरूप पहेला राशिवडे भागाकार करवाथी उपर कह्या प्रमाणे एक सो ने व्याशी ( १८३ ) अहोरात्र आवे छे. (७६), सूर्यनी गतिना एक सो ने त्र्याशी मांडला होय छे. तेमां दरेक अय- नमा सूर्य गतिवडे हमेशा एक एक मोडखें पूरु करे छ (८०) सर्व आभ्यंतर (अंदरना) मांडलानी पछीना मांडलामां ज्यारे सूर्य चाले छे त्यारे दक्षिणायननो श्रारंभ थाय ले, भने सर्वथी बहारना (छेला) मांडलामा ज्यारे सूर्य चाले छे त्यारे ते दक्षिणायन पूर्ण थाय छ (८१). ए ज रीते सर्व घाझ मांडलानी पछीना मांडलामा सूर्य चालतो होय त्यारे उत्तरायणनो आरंभ थाय छ, अने सर्व आभ्यंतर मांडलामा ज्यारे गति करतो होय त्यारे ते उत्तरायण पूर्ण थाय छे. (८२). हवे सूर्यना अयनने जाणवानी रीत कहुं छु, के जेथी बीती गयेला अने वर्तता भयननुं धान सुखे करीने थह शके छे. (८३). ते पा प्रमाणे.-कहेवाने इच्छेला दिवसनी पहेला जेटली पूर्णिमा भने अमावास्या व्यतीत थइ होय, तेने पंदरे गुणवा. पछी तेमा चालता पर्वनी जेटलामी तिथिए पूछy होय तेटली तिथिमो नाखवी. पछी युगनी शरुआतथी • प्रत्यार सुधीमा जेटली क्षय तिथिमो गइ होय तेटली तेमाथी बाद करवी. (८५).

सर्ग २८ मो। राशौ तस्मिस्ततो भक्ते-सव्यशीतिशतेन यत् । लब्धमेकद्वयादिरूपं तत्संस्थाप्य विचिंत्यते ॥८६॥ लब्धः समोंको यदि त-द्वयतीत- सुत्तरायणं । विषमोकोऽथ लब्धश्चे-त्तद्गतं दक्षिणायनं ।। ८७ ॥ अंशास्तु ये पूर्वराशौ भागशेषा अवस्थिताः। ते तत्कालं प्रवृत्तस्या-यनस्य दिवसाः किल ॥ ८८।। युगमध्ये यथा कश्चि-नवमासव्यतिक्रमे । जनः पृच्छति पंचम्यां किमद्यायनमस्ति भोः ॥ ८६ ॥ अनंतरं च कतर-यतीतमिति तत्र च । पूर्वोक्तविधिना प्राज्ञो दद्यादित्येवमुत्तरं ॥ ९० ॥ नवानां ननु मासानां पर्वाण्यष्टादशागमन् । तानि पंचदशनानि द्वौ शतौ स्तः ससप्तती ॥ ६१ ॥ पंचम्यां पृष्टमिति च क्षिप्यते तत्र पंचकं । पंचसप्ततिसंयुक्ते संजाते द्वे शते ततः ॥९२॥ नवमास्यां च, चत्वारो-ऽत्रमराना भवंति ये। ते त्यज्यते ततो जातौ द्वौ शतौ सैकसप्तती॥६३॥ अस्य राशेः सव्यशी. ति-शतेन भजने सति । लब्धमेकं रूपमष्टा-शीतिः शेषावतिष्ठते ॥१४॥ पछी ते राशिने एक सो ने व्याशीए मांगतां जे एक चे विगैरे लाघे (मागा आवे) ने स्थापीने आ प्रमाणे विचारवं.-जो मागमा सम (घेकी ) अंक आव्यो होय तो उत्तरायन पीती गयुं थे, अने जो विषम (एकी ) अंक प्राध्यो होय तो दक्षिणायन वीती गयुं छे एम जाणवू. (८७). पूर्वनी राशिमा जे शेष भंशो रहा होय, तेटला ते काळे चालता अपनना दिवसो जाणवा. (८८). जेमके युगने मध्ये नव मास वीवी गया पछी पांचमने दिवसे कोई प्रश्न करे के-'मरे! माजे क्युं अपनछे ? अने क्युं व्यतीत थयु छ ?' आ प्रश्न उपर विद्वाने पूर्वे कहेला विधि प्रमाणे भा रीते उचर भापको. (९०). नव मासमा अढार पर्यो चीती गया छे तेथी अढारने पंदेरे गुणवां बसो ने सीतेर थाय छे. (२७०). (६१). पांचमने दिवसे प्रश्न फर्यों के तेथी तेमा पांच उमेरता पसो ने पंचोतेर ( २७५) थाय छे. (६१). पछी नव मासमा चार क्ष्य तिथिमो मावे के तेथी माथी चार वाद करता बाकी पसो ने एकोर (२७१) रहे थे. (६३), पछी भा राशिने एक सो ने ध्याशीए मागत भागा एक भाव छ, भने प्रत्याशी शेष रहे थे. (६४). १ पूर्णिमा भने अमावास्या, (६६) भीकाललोकप्रकारा। ततश्चातीतमयन-मेकं तदपि दक्षिणं । सांप्रतं वर्तमानं च गण्यतामुत्त- रायणं ॥६५॥ तस्याप्यष्टाशीतितमं सांप्रतं वर्तते दिनं । द्विती- योऽप्यत्र दृष्टांतो दर्श्यते गुरुदर्शितः ॥ ६६ ॥ पंचविंशतिमासाति-क्रमे केनापि पृच्छयते। दशम्यामयनं किं भो वर्ततेऽय गतं च किं ॥१७॥ पंचाशद्यानि पर्वाणि मासेषु पंचविंशतौ । तानि पंचदशघ्नानि पंचाशा सप्तशत्यभूत् ॥ ६८ ॥ दशम्यां पृष्टमिति च क्षिप्यते दश तेन च । शतानि सप्त जातानि पट्याढथानि ततः परं ॥ १६ ॥ द्वादशावमरात्राः स्यु-र्मासेपु पंचविंशतौ । तेषु त्यक्तेष्वष्टचत्वारिंशा सप्तशती भवेत् ॥ ५००॥ सत्यशीतिशतेनास्य राशेविभजने सति । चत्वार एव लभ्यते शेषास्तिष्ठति पोडश ॥१॥ गतानि चत्वार्ययनान्यतीतं यदनंतरं । तदुत्तरायणं दक्षिणायनं त्वस्ति सांप्रतं ॥२॥ पोडशो दिवसस्तस्या- -प्यधुना खलु वर्त्तते । एवमन्यत्रापि भाव्यं करणं ज्ञैर्यथोचितं ॥ ३ ॥ युगे युगे चतुस्त्रिंश-मयनानां शतं विधोः। तच्चैकैकं भचक्रार्द्धभोग- तेथी एक अयन व्यतीत थयुं, ते पण दक्षिणायन व्यतीत थयु, अने, हमणां चीजें एटले उत्तरायण वर्ते छ एम जाणवू. (९५). ते उत्तरायणनो पण प्राजे भख्या- शीमो दिवस वर्ते छे एम सिद्ध थयु. हवे गुरुर्नु देखाडेलुं बीजं पण उदाहरण देखाडे छे. (६६).-पचीश मास गया पछी दशमने दिवसे कोइए प्रश्न कर्यों के-भरे ! श्राजे क्यु अयन वर्ते छ ? भने क्यु अयन वीती गयु छ ? (६७). उत्तर-पचीश मासमा जे पचास पर्वो वीती गया, तेने पंदरे गुणनां सात सो ने पचास ( ७५०) थया. (६८). तेमा दशमने दिवसे पूछथु ले माटे दश नाखवाथी सात सो ने साठ (७६ ) थया. (88). त्यारपछी पचीश मासमां बार क्षय तिथिो आवे छे, तेथी तेमाथी बार वाद करता सात सो ने अडताळीश (७४८) वाकी रहे छे. (५००) पछी मा राशिने एक सो ने च्याशीए मांगत भागमा चार पाये छे, अने सोळ बाकी वधे छे. (१). तेथी चार अयन वीती गयां, तेमा. पण जे हमणां छेन्लु ( चोधु ) व्यतीत थयुं ते उत्तरायण भने प्रत्यारे जे वर्ते ले ते दक्षिणायन. (२). ते दक्षिणायननो पण भाजे सोळमो दिवस चर्ते छे. आ रीते बीजे स्थळे पण पंडितोए उचितता प्रमाणे जाणवू. (३). हवे एक एक युगमा एक सोने चोत्रीश (१३४) चंद्रमा अयनो भावे छे. ते अयन- सर्ग २८ मो। (६७) मानमिहोदितं ॥४॥ सर्वश्भोगकालो हि विधोः संकलितो भवेत् । सप्तविंशतिरेवाहो-रात्राः पूर्णास्तथोपरि ॥ ५॥ सप्तपष्टिविभक्ताहो- रात्रांशाश्चैकविंशतिः। भमासोऽप्ययमेवेंदो-रुदग्याम्यायनात्मकः ॥६॥ सप्तपष्टिविभक्ताहो-रात्रांशानां भवेदिह । भमासस्त्रिंशदधिकै-रष्टादश- मितेः शतैः ॥ ७ ॥ ईदृशाश्च भमासाः स्युः सप्तपष्टियुगे युगे । एकैक- स्मिन् भमासे च स्यादिदोरयनद्वयं ॥ ८ ॥ युक्तं ततश्चतुस्त्रिंश-मयनानां शतं युगे । एकैकस्यायनस्याथ मानं व्यक्त्या निशम्यतां ॥ ९ ॥ चरेत्प्रत्ययनं चंद्रो मंडलानि त्रयोदश । चतुश्चत्वारिंशदंशां-श्चै- कस्य सप्तपष्टिजान् ॥ १०॥ ततश्च-त्रयोदशैवाहोरात्रा भागाश्च सप्त. पष्टिजाः । चतुश्चत्वारिंशदहो-रात्रस्यायनमैंदवं ॥११॥ यद्वा--सत- पष्टिभवैः पंच-दशाढ्यैनवभिः शतैः। अहोरात्रस्य,भागैः स्या-द्भमासाई सुनिश्चितं ॥ १२॥ चंद्रस्यैकैकमयन-मेतन्मानं निरूपितं । त्रैराशिकवले- नात्र प्रत्ययोऽपि निरूप्यते ॥ १३ ॥ चतुस्त्रिंशेनायनानां शतेन तुहिन- एक एक नक्षत्रचक्रना अर्ध भागने भोगववा जेटलुं प्रमाण नहीं कह्यु . ( ४ ). कारण के चंद्र सर्व नचत्रचक्रने भोगवे त्यारे कुल सताधीश अहोरात्र पूर्ण भने उपर एक अहो- रावना सडसठीया एकवीश अंश ( २७३३) आटलो वखत लागे के. चंद्रना उत्तरायण अने दक्षिणायन स्वरूपवाळो भाटलोज नक्षत्रमास पण छे. (६). भाखा नक्षत्रमामना सर्व भहोरापना अंशो करवा होय तो सताचीशने सडसठे गुणी वेमा एकवीरा अंश उमे. रखा तेथी सड़सठीया अढार सो ने त्रीश (१८३०) अंशो थाय छे. (७), भावा नाना मास एक एक युगमा सडसड थाय छ, भने एक एक नक्षत्र माममां चंद्रना ये प्रयन होय छे. (८). तेथी करीने एक युगमा कुल एक मो चोत्रीश अयन होय छे, वे योग्य ज के हवे एक एक अपनतुं प्रमाण स्पष्ट रीते कहुँ छु ते सामळो-(९). चंद्र एक एक अपना तेर मांडला भने उपर एक मांडलाना सडमठीया चुमाळीश अंश (१३४४) मा- टलं क्षेत्र चाले छ (भोळंगे छे).(१०) तेथी करीने नंदना एक भयनमा तेर महोरात्र . अने उपर एक भहोरात्रना सडसठीया चुमाळीश अंश (१३ ) भाटलो वखत लागे थे. (११). अथवा तो अर्ध नक्षत्रमासनुं प्रमाण एक अहोरापना सडसठ भाग करीए तेवा नव सो ने पंदर (६१५) मागज आवे छे. (१२). तेटलुंज एक एक चंद्र भयननुं प्रमाण कहेलु छे. भा पापतनी खात्रीने माटे त्रिराशिनी रीत पण पवावे छे-(१३).

(६८) भीकालकोकप्रकारा। द्युतेः। प्राप्तान्यष्टादश त्रिंशान्यहोरात्रशतानि चेत् ॥ १४ ॥ तदैकेनायने. मेंदो-लभ्यते किमिति त्रिषु । अंत्येनैकेन गुणितो मध्यराशिस्तथा स्थितः ॥ १५ ॥ श्राद्येन च चतुस्त्रिंश-शतरूपेण राशिना । मध्यराशौ हते लब्धा अहोरात्रास्त्रयोदश ॥ १६ ॥ श्रष्टाशीतिः शिष्यते सा सप्त- पष्ट्या निहन्यते । अष्टापंचाशच्छतानि स्युः परणवतिमंत्यथ ॥१७॥ चतुर्वि- शशतेनैषां हृते भागे यथोदिताः। चतुश्चत्वारिंशदंशाः संप्राप्ताः सप्त- पष्टिजाः ॥ १८॥ अन्न चंद्रायणज्ञानविषये करणादिनिरूपणं तु क्षेत्र- लोके विंशतितमे सर्गे कृतमस्तीति ततो ज्ञेयं. अयनानि दशार्कस्य चतुस्त्रिंशं शतं विधोः। युगे युगे स्युर्यत्तत्र त्रैराशिकमथोच्यते ॥ १९॥ सत्यशीतिशतेनाहो-रात्राणामयनं रवेः । स्थाद्ययेकं तदा त्रिशैः किमष्टादशभिः शतैः ॥ २० ॥ त्रैराशिक स्थापना १८३-१-१८३० अंत्येन राशिना राशा-वेकरूपेऽत्र मध्यमे । गुणिते स्युः शतान्यष्टा-दश त्रिंशद्युतान्यथ ॥ २१ ॥ श्रायेन राशिना भागे सत्यशीतिशतात्मना । लब्धा दशैतावत्येवा-पनानि स्युर्युगे चंद्रना एक सो चोत्रीश भयनना अढार सो ने त्रीश अहोरात्र थाय छे, तो चंद्रना एक भयनना केटला अहोरात्र थाय ? उत्तर-श्रा त्रण राशिमांना बेला एक राशिवडे मध्यना (१८३०) राशिनो गुणाकार करीए त्यारे ते मध्य राशि वेटलो ने तेटलो ज रहे छे. पछी पहेलो राशि जे एक सो ने चोत्रीश छ तेणे करीने मध्य राशि (१८३०) ने भाग- पाथी भागमा तेर अहोरात्र पाव्या. बाकी शेप ने अठ्याशी रक्षा तेने सडसठे गुणवायी महावन सो ने छन्नु ( ५८६६) थाय छे. तेने एक सो ने चोत्रीशे (१३४ ) भांगवाथी उपर कडा प्रमाणे सडसठीया चुमाळीश भंश भावे छे. (१८). श्री चंद्रायणना ज्ञान माटे रीत विगेरेनु कथन क्षेत्रलोकना वीशमा सर्गमा कयु छे, त्यांची ज जाणी लेवू. हवे दरेक युगमा सूर्यना दश प्रपनो आवे छे अने चंद्रना एक सो ने चोत्रीश अयनो श्रावे छे, तेनी स्पष्टता माटे त्रिराशि बवावे छे. (१६). एक सोने ज्याशी अहोरात्रवडे सूर्यनुं एक अयन थाय छे, तो अढार सो ने त्रीश महोराप्रबडे केटला अयन थाय ? (२०). निराशिनी स्थापना-१८३-१-१८३०. उत्तर-अहीं छेल्ला राशिने मध्यना एक राशिवडे गुणतां वेटला ज अढार सो ने त्रीश (१८३०) थाय छ, सेने एक सो ने ज्याशी (१८३) रूप पहेला राशिवडे मांगाकार करवाथी भागमा दश प्राप्त थया; तेथी एक युगमा सूर्यना दश " सर्ग १८ मो। रवेः॥२२ ।। सप्तपष्टयुद्भवचतु-श्चत्वारिंशल्लवाधिकैः। त्रयोदशभिरेकं चे- दहोरात्रैः किलायनं ॥२३॥ त्रिंशैस्तदाष्टादशभि-रहोरात्रशतैर्विधोः। श्रय- नानि कियंति स्यु-रिति राशिवयं लिखेत् ॥ २४॥ राशित्रयस्थापना–१३६४ -१-१८३० सावर्ष्यार्थमाद्यराशा-वहोरात्रास्त्रयोदश । सप्तषष्ट्या निह- त्यांशाः चिप्यते संति येऽधिकाः॥२५॥ जाता नवशती पंच-दशोपेताथ संति ये । अष्टादश शतास्त्रिंशाः सप्तपष्ट्यैव तेऽपि च ॥ २६ ॥ सवर्णनार्थ ताच्यते लक्षमेकं भवेत्ततः । द्वाविंशतिः सहस्राणि पट्शती च दशो- त्तरा ॥ २७ ॥ अंत्येन राशिनाथैवं-रूपेण मध्यमो हतः। नूनमेकात्मको राशि-र्गुणकेन समोऽभवत् ॥ २८ ॥ ततोऽस्मिन्नवभिः पंच-दशोपेतेः शतैईते । चतुर्विंशं शतं लब्ध-मयनानां युगे विधोः ॥ २९ ॥ अथायनारंभरूपा भवंत्यावृत्तयो दश। तत्र स्युःश्रावणे पंच पंच माघे विवस्वतः ॥३०॥ याम्यायनारंभरूपाः पंच ताः श्रावणे स्मृताः। तथोत्तरा. यणारंभ-रूपा माघे च पंच ताः॥३१॥ आद्यावृत्तिः श्रावणाद्य-प्रतिपद्य- अपनो भावे छ एम सिद ययु. (२१-२२). हवे जो तेर अहोरात्र भने उपर एक अहोरात्रना सडसठीया सुमाळीश भंशो (१३ १४) वडे चंद्रनुं एक अयन थाय छे. तो अढार सो ने ग्रीश (१८३०) महोरात्रवडे चंद्रना केटला अयनो थाय ? तेनी त्रिराशि लखवी. (२४). त्रिराशिनी स्थापना-१३४-१-१८३०. महीं समान अंक लाचवा माटे पहेली राशिमा जे तेर छे, तेने सडसठे गुणीने तेमा जे चुमाळीश अंश अधिक ले, ते नाखवा. तेथी नव सो ने पंदर (६१५) थाय. हवे जे अढार सो ने त्रीशनी राशि छे, तेने पण सवर्ण फरवा माटे सडसठे गुणया, तेथी एक लाख चावीश हजार छ सो ने दश (१२२६१०) थाय छे. पछी मा भंत्य राशिनो मध्यना एक राशिवडे गुणाकार करवो, तेषी एकवडे गुणवाथी ते जराशि भावे छे. पछी ते (१२२६१०) राशिने नव सो ने पंदरे (९१५) भाग देवो; तेथी एक युगा चंद्रना भयनो एक सोने चोत्रीश (१३४)माचे छे. (२६). हवे अपनना भारंभरूप सूर्यनी भापति एक युगमा दश वसत थाय थे (केम के एक युगमा दश अयन भावे छ भने एक भयनमा सर्व मांडलाने विपे सूर्य एक वार फरी वळे एटले एक भाषधि करे छ; तेथी एक युगमा मर्यनी दश भापति याय छे. ) सेमा श्रावण मासमा सूर्यनी पांच माइति भने माघ मासमा पाँच भावधि पाय थे (मारीते दश माधि पर). (३०). तेमां श्रावण मासमा दक्षिणायनना पारंमवाळी पांच भारतिमो कही छ, भने माप माममा उपरायगना मारंमाळी पांच मावति कही थे. (३१). पोली भावादि (७०) श्रीकाललोकप्रकाश। भिंजिद्युती। माघस्य श्यामसप्तम्यां द्वितीया हस्तसंयुता ॥३२॥ तृतीया स्यान्नभाकृष्ण-त्रयोदश्यां मृगान्विता । चतुर्थी शुक्लतुर्यायां माघे शतभि- पग्युता ॥३३॥ विशाखायुग्नभःश्वेत-दशम्यां पंचमी भवेत् । षष्ठी माघे प्रतिपदिश्यामायां पुष्यशालिनी॥३४॥ सप्तमी कृष्णसप्तम्यां श्रावणे रेवती- युता।माघे कृष्णत्रयोदश्या-मष्टमी मूलसंयुता ॥३५॥ नभश्चतुर्थी शुक्लायां नवमी योनिदेवयुग् । माघकृष्णत्रयोदश्यां दशमी कृत्तिकांचिता ।। ३६॥ अथात्र करणं-विशिष्टतिथियुक्ता या ह्यावृत्तिआतुमिष्यते । गु- प्यते तत्संख्ययैको-नया व्यशीतियुक् शतं ॥ ३७ ॥ अंकस्थानेन गुणितं येन त्र्यशीतियुक्शतं । त्रिनं रूपेणाधिकं त-द्राशौ जाते नियोजयेत् ॥ ३८ ॥ ततश्च पंचदेशभि-हृते भागे यदाप्यते । गतेष्वेतावत्सु पर्व- स्वावृत्तिः सा विवक्षिता ॥ ३९ ॥ पश्चादुद्धरिता येंका-स्तावत्सु दिवसे- श्रावण मासनी शरुपातमा प्रतिपदाने दिवसे अभिजित नक्षत्रना योगमा थाय छे, वीजी आवृत्ति हस्त नक्षत्रना योगे माघ वद सातमे थाय छे. (३२). श्रीजी आवृत्ति श्रावण वद तेरशने दिवसे मृगशिर नक्षत्रना योगे थाय छे, चोथी श्रावृत्ति माघ शुदी त्रीजने दिवसे शतभिषा नक्षत्रना योगे थाय छे. (३३). पांचमी प्रावृत्ति श्रावण शुदी देशमे विशाखा नक्षत्रना योगे थाय छे, छठी भावृत्ति माघ वद प्रतिपदाए पुष्य नक्षत्रना योगे थाय छे. (३४). सातमी आपत्ति श्रावण वद सातमे रेवती नक्षत्रना योगे थाय छ, आठमी श्रा- वृत्ति माघ वद तेरशे मूल नक्षत्रना योगे थाय छे. (३५). नवंमी आवृत्ति श्रावण शुद चौथने दिवसे योनिदेव ( पूर्वाफाल्गुनी) नक्षत्रना योगे थाय छे, अने दशमी श्रावृत्ति माघ वद नौशे कृतिका नक्षत्रमा योगे थाय छे. (३६). आ जाणवानी रीख बताये छ.- कोइपण आवृत्ति का तिथिए आवे छे ? ते जाणवानी इच्छा थाय, त्यारे ते प्रावृ- त्तिनी संख्यामांथी एक बाद करवो. जे अंक शेष रह्यो होय तेनावडे एक सो ने व्याशीनो गुणाकार करवो. पछी ते थयेला राशिमा जे अंकवडे एक सो ने व्याशीने गुण्या होय ते अंकने प्रण गुणो करी तेमा एक उमेरवो. पछी तेने पंदरे भांगवा. भागमा जे संख्या आवे तेटला पर्व गये सते ते कहेवाने इच्छेली भावृत्ति थाय छे, अने नीचे जे संख्या वधी होय-शेष रही होय तेटला दिवसोमांना छेने दिवसे कहेवाने इच्छेली ते १ चोय केम नहीं १ बताव्या प्रमाणे गणनी गणता पण चोथ आवे छे. २ उपर चोय भावे तो अहीं दशमनो वांधो पावे नहीं. ३ माघ शुनी दशम भाववी जोइए, केमके १८६ दिवसनो भातगे थे. बताच्या प्रमाणे गणत्री करतो पण दशम आवे छे.

सर्ग २८ मो। वथ । चरमे दिवसे विद्या-दावृत्तिं तां विवक्षितां ॥४०॥ श्राद्यावृत्ति- टुंगे कस्यां तिथावित्यूह्यते यदि । तत्प्रस्तुतेयं प्रथमावृत्तिरित्येकको धृतः ॥४१॥ अस्मिश्चैकोनिते शेषः कश्चिदंको न तिष्ठति । तत्पश्चात्ययुगा- वृत्ति-दशमी ध्रियतेतिमा ॥ ४२ ॥ ततस्व्यशीत्याभ्यधिकं दशभिर्गुण्यते शतं । त्रिंशान्येवं शतान्यष्टा-दश १८३० जातान्यतः परं ॥ ४३॥ दश. भिर्गुणितं यस्मा सभ्यशीतिशतं ततः। दश त्रिता: सैकरूपाश्चैकत्रिंश- द्भवंति ये ॥ १४ ॥ ते पूर्वराशौ क्षिप्यते एकषष्ट्यधिका ततः । अष्टादश- शती जाता १८६१ तां पंचदशभिर्भजेत् ॥ ४५ ॥ चतुर्विशं शतं लंब्ध- मेकं रूपं च शिप्यते । जिज्ञासिताया श्रावृत्ते-स्ततोऽभूदिति निर्णयः ॥ ४६ ॥ चतुर्विंशपर्वशता-त्मके प्राच्ययुगे गते । प्रवर्त्तमानेऽभिनवे यु- गऽस्य प्रथमे तिथौ ।। ४७ ॥ श्राद्यावृत्तिः प्रतिपदि भवतीत्यथ कथ्यते । द्वितीयोऽप्यत्र दृष्टांतो बोधदाढाय धीमतां ॥४८॥ कस्यां तिथौ द्वितीया स्या-दावृत्तिर्माधभाविनी । इति प्रश्ने कृते धार्य श्रावृत्त्यको द्वि- श्रावृत्ति जाणवी. (४०). उदाहरण-युगने विषे पहेली प्रावृत्ति का तिथिए थाय ? एम जाणवाने कोइ इच्छे, तो पहेली प्रावृत्ति जाणवानी इच्छा होवाथी एकनो अंक धारण कर्यो (१). तेमाथी एक बाद करीए त्यारे शेप काइपण अंक रहेतो नथी, तेथी पूर्वना युगनी छेनी दशमी श्रावृत्ति धारण करवी ( लखवी). त्यारपछी एक सो ने व्याशीने दशे गुणवा, तेथी अढार सो ने ग्रीश (१८३०) थाय छे. पछी एक सो ने व्याशीने दशे गुण्या हवा तेथी दशने प्रण गुणा करी (३०) तेमा एक नोखीए, त्यारे एकत्रीश (३१) थाय, तेने पूर्वनी ( १८३० ) राशिमा नांखीए, त्यारे भढार सो ने एकसठ (१८६१ ) थाय छे. तेने पंदरे । १५) भागतां एक सो ने चोवीश (१२४) आवे छे, अने एक शेष रहे थे तेथी जाणवाने इच्छेली प्राचिनो मा प्रमाणे निर्णय थाय छे के- एक सो ने चोवीश (१९४) पर्ववाळो पूर्व युग गया पछी प्रत्यारे वर्चता नवा युगा ते युगनी पहेली तिथिए एटले प्रतिपदाने दिवसे पहेली भाचि थाय छे. हवे पुद्धिमान पुरुषोना वोधने रद करवा माटे चीजें उदाहरण मापे छे. (४८).-माघ मासमा थती पीजी श्रावृत्ति का विथिए थाय थे ? एम कोइ प्रश्न करे, स्पारे पीजी भाचिनो प्रश्न १ चंद्र संबंधी.

.. (७२) भीकाललोकप्रकाश। कस्तदा ॥ १६ ॥ अस्मिन्नंके चैककोने एक एवावशिष्यते । सन्यशीति- शतं तेन गुण्यते स्यात्तथा स्थितं ॥५०॥ एकोऽत्र गुणकत्रिन्नः सैको जातश्चतुष्टयं । एतयुक्तोऽभवद्राशिः सप्ताशीतियुतं शतं ॥५१॥ भागेऽस्य पंचदशभि-र्लभ्यते द्वादशोपरि। शिष्यते सप्त तेनैप पूर्वोक्तप्रश्ननिर्णयः ॥ ५२ ॥ स्याद् द्वितीया द्वादशानां विगमे युगपर्वणां । माघस्य श्याम- सप्तम्या-मावृत्तिस्तिग्मरोचिषः ॥ ५३॥ कस्यां तिथौ स्यादावृत्ति-स्तृ- तीयेतीप्यते यदि । तदा धृतस्त्रिको रूपो-नितेऽस्मिन् शिष्यते द्विका ॥ ५४॥ सत्यशीतिशतं तेन गुणितं जायते किल । शतत्रयं सपट्पष्टि द्विकेऽथ त्रिगुणीकृते ॥ ५५ ॥ सैके जाताः सप्त ते च पूर्वराशौ नियो. जिताः। त्रिसप्तत्या समधिक-मेवं जातं शतत्रयं ॥५६॥ हृतेऽस्मिन् पंचदशभि-श्चतुर्विशतिराप्यते। त्रयोदशावशिष्यते तदेष प्रश्ननिर्णयः॥५७॥ चतुर्विशतिपक्षाति-क्रमे तीर्थेश्वरैर्युगे। नभःकृष्णत्रयोदश्यां तृतीयावृत्ति- रीरिता । ५८॥ एवमन्यास्वपि तिथिषु करणभावना कार्या. आवृत्ति - , होवाथी बेनो अंक (२) धारण करवो, तेमाथी एक बाद करता बाकी एक ज रहे छे, ते एकवडे एक सो ने व्याशीने गुणवाथी तेटलो ज (१८३) अंक थाय छे. हवे एकनो गुणाकार हतो तेथी ते एकने त्रण गुणो करी तेमां एक नांख्यो, तेथी चार थया. ते चारने उपरना ( १८३) राशिमा नाखवाथी एक सो ने सत्याशी (१८७) थया. तेने पंदरे मांगता मागमा चार आवे छे, वाकी सात शेष रहे थे. तेथी पूर्वे पूछेला प्रश्ननो आ प्रमाणे निर्णय थयो के-बार पर्व (0 मास ) गया पछी माघ वद सातमने रोज सूर्यनी बीजी मावृत्ति थाय छे. (५३). प्रश्न-त्रीजी श्रावृचि कइ तिथिए थाय ? एम जाणवानी इच्छा होय तो त्रणनो अंक धारण करी तेमांधी एक बाद करवो, एटले बाकी दे रहे थे. ते घेवडे एक सो ने त्र्याशीने गुणवाथी त्रण सो ने छासठ (३६६) थाय छे. पछी देने प्रण गुणा करी मां एक नाखवाथी सात (७) थाय. ते सातने पूर्वनी (३६६ ) राशिमा मेळववाथी त्रण सो ने तोतेर (३७३) थाय. तेने पंदरे भागता भागमा चोवीश (२४) भावे के भने तेर (१३) शेष रहे छ तेथी प्रश्ननो निर्णय मा प्रमाणे जाणवो के-चुगने विषे चोवीश पखवाडीया (पार मास ) गया पछी श्रावण वद तेरशने रोज श्रीजी भापति थाय के एम जिनेवरोए कयुं छे. (५८). एज प्रमाणे बीजी तिथि भोने विषे पक्ष करणनी मापना करवी. भावृत्तिना नपत्र जाणवा माटे जे रीत कही के वे सर्ग २८ मो। (७३) नक्षत्रज्ञानमुद्दिश्य करणं त्वतिविस्तरमिति नात्र.प्रपंचितं, तज्ज्योतिष्क रंडवृत्त्यादिभ्योऽवसेयं. अत्र वासना चैवं-श्रावृत्तिघस्रादेकस्मा-दावृत्तिरः परा भवेत् । दिने चतुरशीत्याढ्य-शततमे यथाक्रमं ॥५६॥ सध्यशीति- दिनशत-मानमेकं यतोऽयनं । समाप्यारभ्यते नव्या-यनं घने ततोऽ, ग्रिमे ॥ ६० ॥ नभाकृष्णप्रतिपदो माघस्य श्यामसप्तमी । भवेच्चतुरशी; त्याढ्य-शततम्येव तद्यथा ॥ ६१ ॥ पमा मासामहोरात्राः स्युरशी- तियुतं शतं । माघस्य सप्ताहानीति सप्ताशीतियुतं शतं ॥ ६२ ।। एभ्यस्त्रयोऽवमरानाः पात्यंते मासपटकजाः । ततश्चतुरशीत्याढ्यं शत- मेव व्यवस्थितं ॥ ६३ ॥ तत्र च-सत्यशीतिदिनशत-मानमेकं कि- लायनं । पाठ्यां पूर्ण पुनश्चान्य-सप्तम्यां प्रत्यपद्यत ॥६॥ एवं च-माघस्य श्यामसप्तम्या द्वादशी नभसोऽसिता। सत्यशीतिशततमी पूर्ण तंत्र ततोऽयनं ॥ ६५ ॥ त्रयोदश्यां च संप्राप्तं भूयोऽपि दक्षिणायनं । एव: मावृत्तितिथिपु कार्यान्यास्वपि भावना ॥ ६६ ।। प्रति विस्तारवाळी होवाथी महीं कही नथी, ते ज्योतिष्करंडनी टीका विगेरेमाची जाणी" लेपी. भहीं तात्पर्य का प्रमाणे जाण-सूर्यनी एक मावृचिना दिवसथी चीजी श्रावृत्ति भनुक्रमे एक सो ने चौराशी (१८४) दिवसे आवे छे. (५६). कारणके एक अयन, प्रमाण एक सो ने ज्याशी ( १८३ ) दिवस, छे, वेथी १८३ दिवसे अपनने समाप्त करी त्यार. पछीना १८४ मे दिवसे नवा प्रयननो भारंम थाय छे. (६०). श्रावण वद प्रतिपदामी माघ वद सावमनो दिवस एक सो ने चोराशीमे दिवसे आवे छे. ते मा प्रमाणे.-(६१). छ मासना अहोरात्र एक सो ने एंशी (१८०) थाय थे, ते उपर माघ मासना सात दिवस होवाथी एक सो ने सरपाशी ( १८७) अहोरात्र थाय थे. (६२). तेमापी छ मासमा प्रण अवमरात्री (तिथिनो चय) भावे के माटे प्रण वाद करता बाकी एक सो चोराशी (१८४) रहे थे. (६३) तेमा एक सो ने त्र्याशी दिवमना प्रमाणवालं एक मपन माघ यद पहने दिवसे पूर्ण थाय छ, भने सानमे बीजं शरु थाय 2. (६४); एज प्रमाणे माघ वद सातमधी धावण वद पारश एक सो ने ज्याशीमे दिवसे पाये छ, वेधी ते दिवमे ते भपन पूर्ण पाय छे. (६५). भने तेने पीजे दिवमे एटले श्रावण यदि वेरशने दिवसे फरीपी दक्षिणायन शरु पाय छे. ए प्रमाणे बीजी पण भाचिनी विधि- मोने विपे भावना करवी. (६६).

(७४) श्रीकाललोकप्रकाशा इंदुभोग्योडुसंयोगः प्रायुक्तस्तिथिभिः सह । वक्ष्येऽर्कभोग्यनक्षत्रा- ण्यावृत्तिषु दशस्वथ ॥ ६७ ॥ श्रावृत्तीः श्रावणे पंचा-प्यादित्यः कुरुते युगे । पुष्पयुक्तो बहिर्गच्छन् सर्वाभ्यंतरमंडलात् ॥ ६८ ॥ अष्टादश- मुहूर्ताट्य-महोरात्रचतुष्टयं । पुप्यस्य भुक्त्वार्कः सर्वा श्रावृत्तीः श्रावणे सृजेत् ॥ ६९ ॥ अभ्यंतरं विशन् वाह्य-मंडलात् कुरुते रविः । पंचापि माघस्यावृत्ती-रभिजित्प्रथमक्षणे ॥७॥ तथोक्तं ज्योतिपकरंडके-अम्भि- तराहि नितो श्राइचो पुस्सजोगमुवगम्म। सव्वा प्राउट्टीयो करेइ सो सावणे मासे ॥७१॥ वाहिरओ पविसंतो श्राइच्चो अभिइजोगमुवगम्म । सव्वा पाउद्दीयो करेइ सो माघमासंमि ॥७२॥ एवं च मकर राशी यद्धानोरुत्तरायणं । कर्के याम्यायनं लोके ख्यातं तदपि संगतं ॥ ७३ ॥ अथ विपुवत्प्रकरणं निरूप्यते-पंचदशमुहर्तात्मा रजनी दिवसोऽपि च। यत्र तुल्यावुभौ स्यातां स कालो विपुर्व स्मृतं ॥ ७४ ॥ तथोक्तम- भिधानचिंतामणौ-" तुल्यनक्तदिने काले विषुवद् विपुवं च तत् । " तच्च. चंद्रे भोगवया लायक तिथिनी साथे नक्षत्रनो संयोग प्रथम कह्यो छे. हवे दशे मावृत्तिने विषे सूर्यभोग्य नक्षत्रोने हुं कहीश. (६७) सर्व आभ्यंतर मांडलाथी बहार नीकळतो सूर्य एक युगमा पुष्यनक्षत्रवडे युक्त थइने पांच आवृत्ति श्रावण मासमा शरु करे छे. (६८). सूर्य श्रावण मासमा पुष्य नक्षत्रना चार रात्रिदिवस अने अढार मुहूर्त्तने भोगवीने सर्व आधुचित्रो शरु करे छे. (६६). पाय मंडळथी आभ्यंतर मंडळमा प्रवेश करतो सूर्य माघमासमा अभिजित नक्षत्रना पहेले समये पांचे आवृत्तिो शरु करे छे. (७०). ते विपे ज्योतिष्कर- डकमा कमु के के-"आभ्यंतर मंडळथी बहार नोकळतो सूर्य पुष्य नक्षत्रना योगने पामीने श्रावण मासमा सर्वे (पांच) आवृत्ति प्रोने करे छे. (७१). अने बहारना मंडळथी आभ्यंतर मंडळमा प्रवेश करतो सूर्य अभिजित नक्षत्रना योगने पामीने माघ मासने विषे सर्वे (पांचे ) आवृत्तियो करे . (७२). श्रा प्रमाणे मकर राशिमा सूर्य- उत्तरायण भने कर्क राशिमा दक्षिणायन लोकमा प्रसिद्ध छे ते पण संगत थाय छे. (७३). हवे विषुववतुं प्रकरण कहेवामा - मावे .जे काळे पंदर मुहर्जनी रात्रि अने पंदर मुहर्त्तनो दिवस एम बन्ने तुल्य होय ते काळ विपुवत् कहेवाय छे. (७४). ते विषे अभिधानचितामणिमा का छे के-" रात्रि अने दिवस तुल्य होय एवो काळ विषुषत् १ सूर्य भोगवया लायक. - सर्ग २८ मो।- (७५) श्यामादिवसयोः पंचदशमुहूर्त्तयोः । प्रदोषकाले विज्ञेयं निश्चयापेक्षया बुधैः ॥ ७५ ॥ यतः-सा?कनवतौ बाह्या-दाभ्यंतराच मंडलात् । समाक्रांतेषु सूर्येण मंडलेपु भवेदिदं ॥७६॥ तत्प्रत्ययनमेकैकं ततस्तानि युगे दश । याम्यायनस्य पंचौजा-न्येषु स्युर्मासि कात्तिके ॥ ७७॥ समानि माधवे मासि पंच सौम्यायनस्य च । तिथिचंद्राकनक्षत्र-योगो- ज्येषां निरूप्यते ॥ ७८ ॥ तृतीयायां तिथौ पट्सु व्यतिक्रांतेपु पर्वसु । रोहिणीचंद्रनक्षत्रे विपुर्व प्रथम भवेत् ॥ ७९ ॥ पर्वाण्यष्टादशातीत्य नव. म्यां वासवोडुनि । द्वितीयं विपुर्व प्रोक्तं युगे तीर्थंकरादिभिः ॥ ८० ॥ त्रिंशत्पर्वातिकमे च पंचदश्यां तृतीयकं । प्रज्ञप्तं स्वातिनक्षत्रे विषुवं पुरुपोत्तमैः ॥१॥ त्रिचत्वारिंशतं पर्वा-पयतिक्रम्य युगादितः । स्पारपुर नर्वसुनक्षत्रे तुर्य पष्ठीतिथौ ध्रुवं ॥ ८२ ॥ पंचपंचाशतं पर्या-ज्यतिक्रम्य च पंचमं । उत्तरासु भद्रपदा-स्वाख्यातं द्वादशीतिथौ ॥ ८३ ॥ अष्टप- बाझ भने अने विषुव कहेवाय छे. ते पंदर महर्जनी रात्रि अने पंदर मुहूर्त्तनो दिवस होय ते दिवसे प्रदोषकाळे पंडितोए निश्चयनी अपेक्षाए जाणवो. (७५ ). " कयुं छे के-" माम्यंतर मंडळधी ज्यारे सूर्य साडीएकाएं मांडलाने ओळंगे छे त्यारे भा विपुत्र होय छे. (७६). ते विषुव एक अयनमा एक ज आवे छे, तेथी एक युगमा ते दश वार आवे छे, तेमा दक्षिणायनना पांच एकी (१-३-५-७-९) विपुवो कार्तिक मासमा आवे छ (७७) भने उत्तरायणना पांच की (२-४-६---१०) विपुत्रो वैशाख मासमा भावे छे. हवे मा विषुवोनी माथे तिथि, सूर्य, चंद्र भने नक्षत्रनो योग कहे छ.- (७). प्रथमथी छ पर्व व्यतीत थाय त्यारे त्रीजने दिवसे रोहिणी नामना चंद्रनक्षत्रने विषे पहेलु विपुत्र भावे छ (७६). युगना प्रारंभथी अढार पर्व व्यतीन थाय स्यारे नवीने दिवसे वासव एटले ज्येष्ठा नामना चंद्र नक्षत्रने विप वीजु विपुत्र आवे छ एम तीर्थकरादिए कहुं छे. (८०). त्रीश पर्व जाय त्यारे पूर्णिमाने दिवसे स्वाति नक्षत्रने विषेत्रीजु विपुत्र भावे छ एम उत्तम पुरुषोए कड्युं छे. (८१) युगना मारमधी वाळीश पर्व जाय त्यारे छठने दिवमे पुनर्वसु नक्षत्रमा चोधु विषुव भावे छे. (०२). पंचावन पर्व जाय त्यारे पारशनी तिथिए उत्तरामाद्रपद नक्षत्रने विष पांच रिपुत्र कथु छे. १ पूर्णिमा भने अमावास्या, (७६) मीकाललोकप्रकाश। टिमतिक्रम्य पर्वाणि विषुवं भवेत् । षष्ठं तिथौ तृतीयायां मैत्रनक्षत्र एव च॥८॥ पर्वाण्यशीतिमुल्लंघ्य नवम्यां सप्तमं पुनः। मघासु मघव- पूज्यै-विषुवं कथितं जिनः ॥ ८५ ॥ अतिक्रम्य द्विनवतिं पर्वाण्यष्टम- मीरितं । अश्विनीनाम्नि नक्षत्रे पंचदश्यां तथा तिथौ ॥८६॥ पंचाधिक पर्वशतं व्यतीत्य नवमं जिनैः । स्यादापाढासूत्तरासु तिथौ षष्ठ्यामिती- रितं ॥ ८७ ॥ अतिकम्य तथा पर्व-शतं सप्तदशाधिकं । उत्तरासु फाल्गु- नीषु द्वादश्यां दशमं भवेत् ।।८८॥ अत्रेयं वासना-विषुवं स्यात्तृतीयायां षट्पतिक्रमेऽग्रिमे । ततो यथोत्तरं योज्याः षट् तिथ्यंके विचक्षणः ॥ ८९॥ द्वितीयादिविपुक्ता-मित्येवं लभ्यते तिथिः । षट्सु क्षिप्तेषु चेत्संख्याः भवेत्पंचदशाधिका ॥१०॥ तदैकं पर्व परीके चिप्त्वा पंचदशात्मकं । शेषांकप्रमिता विज्ञ-विज्ञेया विपुवत्तिथिः ॥ ९१ ॥ अथात्र करणं निरूप्यते-द्विगुणेष्टविषुवसंख्या रूपोना पड्गुणा च पर्वमितिम् । वक्ति तथा पर्वको दलीकृतस्त्वाह विषुवतिथि ॥ १२ ॥ (८३). अडसठ पर्व जाय त्यारे श्रीजने दिवसे अनुराधा नक्षत्रमा छुटुं विषुव आवे छे. (८४ ) एंशी पर्व जाय त्यारे नवमीने दिवसे मघा नचत्रमा सात विपुव आवे छे एम इंद्रोने पूज्य एवा जिनेश्वरोए कहुं छे. (८५). वाणुं पर्व श्रोळंगीने पंदरमी तिथि (भमा- वास्या ) ने विषे अश्विनी नामना नक्षत्रमा पाठलं विषुव का छे. (८६). एक सो ने पांच पर्व जाप स्पारे छहनी तिधिए उत्तराषाढा नक्षत्रमा नहुं विषुच कयुं छे. (८७). तथा एक सो ने सतर पर्व जाय त्यारे बारशनी तिथिए उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रा दशमुं विषुव श्रावे छे. (८८). नहीं पा प्रमाणे भावार्थ जाणवो.-प्रथम छ पर्व जाय त्यारे त्रीजनी तिथिए प्रथम विषुष आवे छे. त्यारपछी आगळ आगळ पंडितोए तिथिना अंकमा छ-छ मेळववा. (EE). एम करवाथी चीजा, त्रीजा विगेरे विपुवोनी तिथिनो अंक आवे , तेमा पण-जो छ- नाखवाथी पंदर करता वघारे अंक श्रावे तो पर्वना अंकमा पंदर तिथिवालं एक पर्व वधारी शेष अंकवाळी विपुवनी तिथि पंडितोए जाणवी. (६१). हवे श्रा बापतर्नु फरण (रीत ) यतावे छे.-जेटला, विपुव जाणयानी इच्छा होय वेटला अंकने बमणा करी तेमाथी एक वाद करी तेने छगुणा करवा.जे अंक पावे तेटला पर जाणवा. पछी ते पर्वना अंकने अर्ध करवाथी जे आवे ते विपुर तिथिनो अंक जाणवो. (६२). + सर्ग २८ मो। (७७) पर्वोकाद्धं पंचदशा-धिकं तु तिथिभिर्भजेत् । पाकेष्वागतं दद्या-च्छेषां- कान्निर्णयत्तिथिं ॥९३।। तथाहि -युगे विषुवमायं स्या-कतिपर्वव्यति. क्रमे । कस्यां तिथाविति प्रश्ने करणं भावयेदिति ।। ६४ ॥ श्राद्यं विषु- वदित्येको द्विघ्नो रूपोनितः पुनः। एकः स षड्गुणः पट्कः पर्वोकः सोऽद्धितस्तिथिः ॥ ९५ ॥ एवं च-पट्सु पर्वस्वतीतेपु युगे विषुवमा- दिमं । तृतीयायां तिथावेवं चतुर्थमथ भाव्यते ॥ ९६ ।। तद्यथा-द्विघ्न- श्चतुष्को रूपोनः सप्त स्युस्ते च पड्गुणाः। द्वाचत्वारिंशद्भवंति तेऽद्धि- तास्त्वेकविंशतिः ॥ १७॥ अधिका पंचदंशांका-दियं त २१ झज्यतेऽथ तैः १५ ॥ पर्वस्वकं क्षिपेल्लब्धं शेषाः पट् तिथिसूचकाः ॥ ६८॥ ततश्च- स्यात्पर्वसु त्रिचत्वारि-शत्यतीतेप्वथो युगे। पठ्या तिथौ तद्विपुव-मेवं सर्वत्र भाव्यतां ॥१९॥ पंचापि विपुवंत्यर्कः कुर्याद्याम्यायनस्थितः । स्वातेर्नक्ष- त्रस्य भुक्त्वा त्रयोविंशतिमंशकान् ।।६००॥ अंशाश्चात्र चतुस्त्रिंशदधिक- पर्वना भंकने अर्ध करता जो पंदरथी वधारे मावे वो तेने पंदरे मागरा. भागमा जे भंक आवे तेने पर्वना मंकमा उमेरवा भने जे अंक शेष रह्यो होय ते तिथिनो अंक जायवो. (६३). उदाहरण.--युगने विष पहेलुं विपुत्र केटला पर्व गया पछी कह तिथिने विपे भारे एम कोई प्रश्न करे तो तेनी पारीत करवी.-(९४). पहेला विषुवनो प्रश्न छ तेथी एकने यमणो करता ये थाय, वेमाथी एक पाद करता एक रहे, तेने छगुणो कर. घायी छ थाप ते पर्वनो अंक जाणवो. तेने भर्ध करवा तिथिनो अंक प्रावे छे. (६५). तेषी करीने युगने विषे पहेला छ पर्व गया पछी श्रीजनी विधिने विप पहेलुं विषुव भावे. हये चौघु विषुव लावधानी रीत बताव 2.-(९६). चौधु विपूर्व लाव माटे चारने में- ए गुणता माठ पया, तेमाची एक पाद करता सात पया, सेने छगुणा करता येताळीश पया. ते पनो अंक जाणको, वेने प्रर्ध करता एकरीश भावे. (६७). ते एकरीशनो अंक पंदर करतो मधिक छ तेथी से एकवीराने पंदर मागता मागमा एक भावे थे पेने पर्वना कम उमेरको भने शेप रहे थे ते विपिना भंकने पवनार 2. (६८). ठेथी फरीने युगने विपे वालीश पर्व गपा बाद पानी निपिए पोपं विपुत्र मावे . ए प्रमाणे सर्वध जाम्बी ले. (६). दक्षिणायनमा रहेलो मर्प स्वाति नपाना प्रेयीश मंश मोगरे स्पारे टना पनि पिपुरन् भाव (६००). महीं एक सी ने घोषीगना बंद रूप मंगो (७५) श्रीकाबलोकप्रकारा। शतच्छिन्नरूपस्य ज्ञेयाः. पंचापि विपुवंत्यर्कः कुर्यात्सौम्यायनस्थितः। एको. नसप्ततिं भागा-नश्विन्या अवगाह्य च ॥ १ ॥ इति विपुवत्प्रकरणं. अयनानां चतुस्त्रिंशं शतं शीतयुतेयुगे। तत्रोत्तगयणानि स्युः सप्तषष्टियुगे युगे ॥२॥ सप्तपष्टिरेव याम्या-यनान्येकांतगण्यथ । प्रागु- त्तरायणं पश्चा-याम्यायनमिति क्रमः ॥३॥ ततश्च-या नक्षत्रार्द्धमा- सेन-वोत्तराभिमुखा विधोः। श्रावृत्तवस्ताः सर्वाः स्यु-रभिजित्प्रथम क्षणे ॥४॥भमासार्द्धनाथ पुन-दक्षिणाभिमुखा विधुः। श्रावृत्तीः कुरुते पुष्य-योगं प्राप्याखिला अपि ॥ ५॥ तत्रापि-मुहूर्त्तदशकं भुक्त्वा विधुर्भागांश्च विंशति । पुष्यस्य सप्तषष्ट्युत्थान् याम्यावृत्तीः प्रपद्यते ॥६॥ इत्ययनप्रकरणं. बूमः पलामथते॒नां स्वरूपं किंचिदागमात् । सूर्यसंबंधिनस्ते स्यु- चंद्रसंबंधिनोऽपि च ॥७॥ सा स्त्रिंशदहोरात्रा एको मासो विवस्वतः। ताभ्यां द्वाभ्यामहोरात्रा । एकपष्टिक्रतू रवेः॥८॥ ऋतुः प्रावृड् भवेदायो वर्षारात्रो द्वितीयकः । शरदाख्यस्तृतीयः स्या-तुर्यो हेमंतसंज्ञकः ॥९॥ जाणवा ( ३३ ). उत्तरायणमा रहेलो सूर्य अश्विनी नक्षत्रना भोगणोतेर अशोने भोगवे त्यारे सेना पाचे विपुव भाषे छे. (१). इति विपुवत्प्रकरण एक युगमा चंद्रना एक सो ने चोत्रीश (१३४ ) अयन आवे छे, तेमा दरेक युगमा सडसठ (६७) उत्तरायण श्रावे के ( २ ) अने एकांतरे सडसठ (६७) दक्षिणायन आवे छे. तेमा प्रथम उत्तरायण भने पछी दक्षिणायन एवो क्रम छे. (३). तेथी करीने अर्ध नक्षत्रमासे करीने उत्तर दिशा तरफ चंद्रनी जे प्रावृचि थाय छे ते सर्व आवृत्तिो अभिजित् नक्षत्रना प्रथम समये थाय छे. (४). तथा अर्ध नक्षत्रमासे करीने दक्षिण दिशा तरफ चंद्र जे आवृत्ति को छे ते सर्वे पुष्य नक्षत्रना योगने पामीने करे छे. (५). तेमां पण चद्र पुष्य नक्षत्रना दश मुहूर्त अने सडसठीया वीश माग (अंश) ने भोगव्या पछी दक्षिणनी आवृत्ति शरु करे छे. (६) इति अयन प्रकरण. हवे अागममा कहेलुं छए ऋतुनुं काइक स्वरूप कहीए छीए. ते ऋतुओ सूर्यने तथा चंद्रने भाथीने प्रवर्ते ले. (७). साडीत्रीश रात्रिदिवसनो एक सूर्यमाम थाय ले. तेवा मे मासनो एटले एकसठ रात्रीदिवसनो एक सूर्य भतु कहेवाय छे. (८). मां पहेलो प्रावृष् ऋतु छे, बीजो चर्पा ऋतु छ, त्रीजो शरद नामनो ऋतु छे, चोथो हेमंत नामनो छ, " सर्ग २८ मो। (७९) ॥ वसंतः पंचमः ख्यातः पष्ठो ग्रीप्मः प्रकीर्तितः । पड़ेते ऋनवः ख्याता युगे त्रिंशद्भवंति ते ॥ १०॥ उक्तं च ज्योतिष्करंडके-पाउस वासारत्तो सरपो हेमंतवसंतगिम्हा य। एए खलु छप्पि उऊ जिणवरदिट्ठा मए सिट्टा ॥ ११ ॥ प्रथमापाढराकायाः प्रारभ्यपामुपक्रमः । भवंति त्रिंशतैभिश्च यथोक्ता युगवासराः १८३० ॥ १२ ॥ द्वावापाढौ युगाते स्त-स्तत्राद्यस्य सितस्विपि । चतुर्दश्यां प्राग्युग ः पूर्णस्त्रिंशत्तमो भवेत् ॥ १३ ॥ ततस्तस्यैव राकायां युगस्याभिनवस्य तु । ऋतुरीयो लगेद्भाद्र- स्यायेऽसौ पूर्यते तिथौ॥१४॥ आद्यापाढस्यैकदिनं त्रिंशत्रिंशद्दिनात्मकौ। द्वितीयापाढनभसौ भाद्रस्यैकं दिनं ततः ॥ १५ ॥ स्युर्दापष्टिरेभ्यं एकोऽवमरात्रो निपात्यते । एकपष्टिदिनात्मेति सूर्यर्तुः प्रथमो युगे ॥ १६ ॥ एकपष्टिस्त्रिंशता च गुण्या सर्व संख्यया । अष्टादशशतास्त्रिंशा एवं स्युर्युगवासराः ॥१७॥ एवमन्यत्रापि भाव्यं, यंत्रकं वा विलोकनीयं. सूर्य ज्ञानविषये करणं प्रतिपाद्यते। येन विज्ञातमात्रेण सुखेन तुरूह्यते . . (६). पांचमो वसंत ऋतु कहेलो छ, तथा छठो ग्रीष्म ऋतु कझो छे. भा छ ऋतुओ कह्या थे. एक युगमा प्रीश ऋतुओ आवे छे. (१०). ते विपे ज्योतिष्करंडकर्मा कर्जा के के-"प्रावृप्, वर्षा रात्र, शरद, हेमंत, वसंत भने ग्रीष्म भा छ ऋतुओ जिनेश्वरोए जोयेला छे, ते में कसा छे. (११). प्रथम आपाढ मामनी पूर्णिमाथी प्रारमीने श्रा ऋतुओनी शरुपात थाय छ भने तेवा त्रीश ऋतुए करीने प्रथम कहेला एक युगना (१८३०) दिवसो थाय छे. (१२). युगने छेडे ये पापाढ माम होय छे, तेमा पहेला पापाढ मासनी शुक्ल चतुर्दशीने दिवमे पहेला युगनो त्रीशमो (छेनो) ऋतु पूर्ण थाय छे. (१३). त्यारपछी ते ज पहेला भाषाढ मासनी पूर्णिमाने दिवसे नवा (वीजा) युगनो पहेलो ऋतु शरु थाय छ, भने भाद्रपद मासनी एकमनी तिथिए ते पूर्ण थाय छे. (१४). केमके पहेला भाषाढ मासनो एक दिवस भने प्रीश-श्रीश रात्रीदिवसनो पीजो मापाढ भने श्रावण मास तथा त्यारपछी माद्रपद मासनो एक दिवस (१५) सर्व मळीने पासठं रात्रीदिवस थया, सेमापी एक धपतियिनो दिवस बाद करवो. ए रीते युगनी शरुआवमा एकसठ दिवसनो पहेलो सूर्य ऋतु थयो. (१६). हवे एक युगमा श्रीश ऋतु होवाची ते एकसठने त्रीशे गुणना एक युगना भढार सो ने धीश दिवसो थया. (१७), एज प्रमाणे भन्यत्र पर जाणवू, अथवा यंत्र जोधू. हवे मा सूर्य मातुने वायवा माटे करण (रीव) -- (८० भीकासलोकप्रकारा। ॥ १८ ॥ युगेऽतीतपर्वसंख्या कार्या पंचदशाहता । पर्वणो वर्तमानस्य विवक्षितदिनावधि ॥ १६ ॥ क्षिप्यते तत्र तिथयः पात्यंतऽवमरानकाः। ततस्ता द्विगुणीकृत्य सैकपष्टिविधीयते ॥ २०॥ द्वाविंशेन शतेनास्या हृते भागे यदाप्यते। तस्मिन् पड्भिहते शेष-मतिक्रांत ऋतुर्भवेत् ॥२१॥ द्वाविंशशतभक्तस्य राशेर्यच्छेपमास्थितं । तस्मिन् द्वाभ्यां हृते लभ्या वर्तमान वासराः ॥ २२ ॥ युगे प्रथमदीपाल्यां यदि कश्चन पृच्छति । सूर्य ः कतमोऽतीतः कतमो वर्त्ततेऽधुना ॥ २३ ॥ सप्त पर्वाण्यतीतानि तदा तत्र युगादितः । तानि पंचदशनानि स्युः पंचाभ्यधिकं शतं ॥२४॥ द्वाभ्यामवमरात्राभ्यां हीनं तत् व्युत्तरं शतं । तद् द्वाभ्यां गुण्यते जाते द्वे शते पभिरुत्तरे ।। २५॥ तत्रैकपष्टिक्षेपे द्वे शते ससप्तपष्टिके ॥ एत- योड़ियते भागो द्वाविंशेन शतेन च ॥२६॥ द्वौ लभ्येते न तो भागं सहेते पड्भिरित्यतः॥स्थितौ द्वावेव शेषा ये त्रयोविंशतिरंशकाः ॥२७॥ तेषामर्षे कृते सार्धा एकादश स्थिता इति ॥ आगतं द्वावृतू यातौ तृतीयो वर्त- कहे छ, के जे रीत जाणवामात्रथी ज सहेलाइथी ऋतु जाणी गाय छे. (१८). युगने विषे जेटला पर्व व्यतीत थया होय तेने पंदरे गुणवा. तेमा इष्ट दिवस सुधीना चालता पर्वना दिवसो उमेरवा, तेमाथी क्षयतिथिो बाद करवी. पछी तेने बमणा करी तेमा एक- सठ उमेरवा. (२०) तेने एक सो ने वावीशे (१२२) भाग लेता जे लाधे (भागमा प्रावे) तेने छए भागतां जे शेष रहे ते वीती गयेलो ऋतु जाणवो. (२१). एक सो ने चावीशे मागतां जे शेप रघु होय तेने पे वडे भागतां जे लाधे ते चालता ऋतुना दिवस जाणवा. (२२). उदाहरण.-कोइ प्रश्न करे के युगनी पहेली दीवाळीने दिवसे क्यो सूर्यऋतु व्यतीत थयो भने हमणां क्यो वर्ते छे ? ( २३). उत्तर-तेमा युगनी शरुआतथी सात पर्व पीती गया छे तेथी ते सातने पंदरे गुणवा एक सो ने पांच थाय छे. (२४). ते- माथी ये क्षयतिथिमो याद करतां एक सो ने प्रण रहे छे. तेने बेए गुणतां बसो ने छ थया. (२५) तेमा एकसठ (६१) उमेरसां षसो ने सडसठ ( २६७) थया. तेने एक सो ने पावीशे (१२२) मागतां (२६). मागा वे भावे छे, तेनो छए भाग चाली शकतो नथी तेथी वे ज शेष रया. पछी यसो ने सडसठने एक सो पापीशे भागतों से प्राध्या ने जे त्रेवीश शेष रह्या के (२७) तेने अर्ध करतां एटले बे ए भांगतो साडा भग्यार लाधे छे, तेथी जवाब ए भाव्यो के वे प्रातु बीती गया छ भने त्रीजो ऋतु चाले छे.

सर्ग २८ मो। (१) तेऽधुना ॥ २८ ॥ वर्तमानस्य तस्यैका-दश जग्मुर्दिना इति । द्वादशोऽ. स्त्यधुना घस्र इति प्रश्नस्य निर्णयः॥२६॥ यद्वाक्षयतृतीयाया-माद्याय यदि पृच्छति। तदा पंचदशनानि पर्वापयेकोनविंशतिः॥३०॥ पंचाशीत्या समधिकं ततो जातं शतद्वयं २८५ । तृतीयायां पृष्टमिति क्षिप्यंते तिथ- यस्त्रयः ॥ ३१ ॥ साटाशीति शतद्वंद्व २८८ जज्ञेऽथावमरात्रकैः । पंच. भिस्त्यक्तमेतत् स्यात् सध्यशीतिशतद्वयं २८३ ॥३॥ अस्मिन् द्विगुणिते पंच-शती पट्पष्टियुग्भवेत् । सैकषष्टिरियं सप्त-विंशा भवति पट्शती ६२७ ।। ३३ ॥ द्वाविंशेन शतेनास्या १२२ भागे पंचकमाप्यते । उद्धरंति सप्तदश स्युःसार्दा श्रष्ट तेऽद्धिताः ॥३४॥ पंचर्तवस्ततोऽतीताः पष्ठोऽसौ वर्त्ततेऽधुना । अष्टौ जग्मुदिनान्यस्या-धुना नवममस्ति च ॥ ३५॥ त्रिंशतोऽपि युगनां पूर्तेर्मासांस्तिथीनपि। पक्षांश्च कृष्णशुक्लाख्यान् मोऽथ समयोदितान् ॥ ३६ ॥ श्राद्यो भाद्रपदश्याम-प्रतिपातमश्नुते । (२८). वे चालता मातुना पण मग्यार दिवसो वीती गया छ भने पारमो. दिवस भाजे पर्ने छ. ए रीते प्रश्ननो निर्णय थयो. (२६). अथवा युगनी पहेली अक्षयतृतीया (असात्रीज) ने दिवसे कोई प्रश्न करे के हालमा केटला ऋतु गया अने क्यो प्रातु चाले थे ? उत्तर-पोगणीश पर्व बीती गया छे तेने पंदरे गुणतां वसो ने पंचाशी (२८५) पया. तेमा श्रीजने दिवसे पलेलं होवाथी प्रण उमेर्या त्यारे यसो ने महाशी (२८) थया. माथी पांच घयतिथिमो पाद करवा सो ने व्याशी (२८३) रहे थे. वेने चमणा करवाथी पांच सो ने बासठ (५६६) थाय छे. तेमा एकसठ (६१) उमेरवाथी छ सो ने सचावीश (६२७) थाय छे. वेने एक सो ने यावीश मागतां मागा पांच माये छ भने सतर पाकी शेष रहे थे. सेने मर्ष करवायी साडामाठ पाय छे. तेथी करीने पांच प्रातुमो व्यतीत यया भने छठो ऋतु हालमा यतें थे, वेना पण माठ दिवस व्यतीत यया भने माजे नवमो दिवस पर्ने छे. (३०-३५). स्खे पुगना प्रीशे ऋतुमो फ्पारे पूर्ण थाप थे, वेना मास, तिथि तपा शुक्ल भने छप्पपप सिदातमा कमा प्रमाणे कहीए बीए. (३६ ):-पहेलो ऋतु माद्रपद मामनी हप्ण प्रतिपदाने दियसे पूर्ण पाय थे, पीजी ऋतु कार्तिक मासना छप्पपषमा श्रीजने (२) श्रीकाललोकप्रकाश। कार्तिकस्य तृतीयायां कृष्णपक्षे द्वितीयकः ॥३७॥ पौपस्य कृष्णपंचम्यो तृतीयः पूर्तिमश्नुते । फाल्गुनश्यामसप्तम्यां पूर्यते च तुरीयकः ॥ ३८ ॥ राधश्यामनवम्यां च पंचमः परिपूर्यते । शुचेरशुभ्रकादश्यां पष्ठः पूर्णो भवेहतुः ॥३९॥ पूर्णो भाद्रपदश्याम-त्रयोदश्यां च सप्तमः। अमावास्यां कार्तिकस्य पूर्णो भवति चाष्टमः ॥ ४०॥ एते यथोक्तमासेपु कृष्णपा- ऽतमाप्नुयुः । ऋनवोऽष्टापि तीर्थेशै-रित्युक्तं सर्वदर्शिभिः ॥ ४१ ॥ पौप- शुक्लद्वितीयायां नवमर्नुः समाप्यते । फाल्गुनश्वेततुर्यायां दशमोऽतं प्रप. द्यते ॥४२॥ एकादशोऽतं वैशाख-शुक्लषष्ठ्या विभय॑थ। पापाढशुक्लाष्टम्यां च द्वादशः परिपूर्यते ॥ ४३ ॥ त्रयोदशो भाद्रपद-दशम्यां विशदत्विपि । चतुर्दशः, कार्तिकीक-द्वादश्यां धवलद्युतौ ॥ ४४ ॥ पौषश्वेतचतुर्दश्यां पूर्ति पंचदशोऽश्नुते । वलक्षपक्षप्राप्तांताः सप्तामी ऋतकः स्मृताः ॥ ४५ ॥ ऋतवोऽमी पंचदश-युगपूर्वार्द्धभाविनः । इतः पंचदशोच्यते युगपश्चाई- भाविनः ॥ ४६ ॥ फाल्गुनस्य प्रतिपदि श्यामायामथ पोडश। राधकृष्ण- दिवसे पूर्ण थाय छे. (३७). पोप मासनी कृष्ण पांचमने दिवसे त्रीजो ऋतु पूर्ण थाय छ, फागण वद सातमने दिवसे चोथो ऋतु पूर्ण थाय छे. (३८). वैशाख वद नवमीने दिवसे पांचमो ऋतु पूर्ण थाय छ, अपाढ वद अग्यारशने दिवसे छठो ऋतु पूर्ण थाय छे. ( ३६). भाद्रपद मासनी कृष्ण त्रयोदशीने दिवसे सातमो ऋतु पूर्ण थाय छे, कार्तिक मासनी श्रमावास्याए माठमो ऋतु पूर्ण थाय छे. (४०). आ आठ ऋतुओ उपर कहेला मासमा कहेली कृष्णपक्षनी तिथिोमा पूर्ण थाय छे, एम सर्वदर्शी तीर्थकरोए कयुं छे. (४१). हवे पोप मासना शुक्लपक्षनी द्वितीयाने दिवसे नवमो ऋतु समाप्त थाय छे. फान्गुन मासना शुक्लपक्षनी चतुर्थीने दिवमे दशमो ऋतु पूर्ण थाय छे. (४२). वैशाख शुदि छठने दिवो अग्यारमो ऋतु पूर्ण थाय छे, अपाढ शुदि आठमने दिवसे चारमो मातु समाप्त थाय छे. (४३). भाद्रपद मासना शुक्लपक्षमा दशमने दिवसे तेरमो ऋतु समाप्त थाय छ, कार्तिक मासना शुक्लपक्षमा पारशने दिवसे चौदमो ऋतु पूर्ण थाय छे. (४४). पोप शुदि चौदशने दिवसे पंदरमो ऋतु पूर्ण थाय छ, भा सात ऋतुमो शुक्लपक्षने विपे संपूर्णताने पामे छे. (४५.). प्रापंदरे ऋतुओ युगना प्रथम अर्ध भागमा श्रावे छे. हवे युगना पाछला अर्ध भागमा थनारा पंदर प्रातुनो कहे थे. (४६)- फागण वद एकमने दिवसे सोळमो ऋतु समाप्त थाय छे, वैशाख पद त्रीजने दिवसे वर्ग २१ मो। (३) तृतीयाया-मंतं सप्तदशोचति ॥४७॥ श्रापाढासितपंचम्या-मंतमष्टादशो भजेत् । भाद्रानुज्ज्वलसप्तम्यां पूर्यतेऽष्टादशानिमः १६ ॥ १८ ॥ कार्तिके विंशतितमो नवम्यां मेचकद्युतौ । पौपस्य कृष्णैकादश्या-मेकविंशति- संख्यकः ।। ४९ ।। फाल्गुनस्य त्रयोदश्यां द्वाविंशः श्यामलविषि । स प्रयोविंशतितमो राधामायां प्रपूर्यते ॥ ५० ॥ श्रष्टाप्यमी कृष्णपक्ष- प्राप्तांताः पूर्यतेऽथ च । शुचिशुक्लद्वितीयायां चतुर्विंशतिपूरगाः ॥ ११ ॥ भाद्रस्य श्वेततुर्यायां पंचविंशस्तु पूर्यते । पड्विंशतितमः पट्यां शुभ्रायां कार्तिकस्य तु ॥ ५२ ॥ स सप्तविंशतितमः पौपाष्टम्यां सितद्युतौ । दशम्यां फाल्गुने श्वेत-विष्यष्टाविंशतिप्रमः ॥ ५३ ॥ द्वादश्यां राध एकोन-त्रिंशत्तमः सितत्रिपौ । शुचिशुक्लचतुर्दश्यां पूर्ति त्रिंशत्तमोऽनुते ॥ ५४॥ त्रिंशदप्येवमृतवः प्रोक्ताः प्राप्तसमाप्तयः । एकांतरेषु मासेषु तिथिप्वेकांतरास्विति ॥ ५५ ॥ किंच-कर्ममासात्सूर्यमासे-होराबाई यदेधते । भृतौ द्विभानुमासोत्थे-होरात्रो वर्द्धते ततः ॥ ५६ ॥ ततश्च- सघरमो मातु समास थाय छे. (४७). अपाढ बंद पांचमने दिवसे अढारमो म पूर्ण थाय थे, मादरवा पद सातमने दिवमे प्रोगणीशमो प्रतु पूर्ण थाय छे. (४०). कार्तिक घद नवमीने दिवमे वीशमो ऋतु पूर्ण थाय छ, पोप वद अग्यारशने दिवसे एकीशमो सात पूर्ण थाय छे. (४९). फागण वद तेरशने दिवसे यावीशमो मत पूर्ण थाय छे, बैशाख मासनी अमावास्याने दियमे ग्रेवीशमो ऋतु पूर्ण पाय छे. (५०). मा भाठ ऋतुभो कम्पपक्षमा अंतने पामे छे. हवे अपाद शुदि पीजने दियसे चौवीशमो मत पूर्ण थाप थे. (५१). मादरचा शुदि चौधने दिवमे पीशमो तु पूर्ण थाप छ, कार्तिक शुदि पहने दिषसे छवीशमोतु ममात थाय छे. (५२). पोप शुदि भाठमने दिवमे सताचीशमो भात पूर्ण थाय छ, फागण शुदि दशमने दिवमे महापीशमो फतु समाप्त पाय थे. (५३). पैशाख शुदि पारशने दिवसे योगगनीशमो ऋतु पूर्ण थाप थे भने मपाट मामना शुक्लपपनी चौदशने दियमे श्रीशमो ऋतु समाप्त थाप थे. (५४). मा प्रमाणे प्रीरो मोनी समाप्ति एकातर मामा भने एकावर तिपिए पाप येते फ'. (५५). पी पी कहीए बीए के-कर्ममास करना पूर्यमाममा भर्ध महारानी प्रदिदे, वेधी फरीने पे एपमामना एक प्रातमा एक मोगप्र पदि पामे थे (पधारे थे). (५६). तेथी करीने जपे कर्ममामा साठ महोरात्र रोप छ भने से पूर्वमामना एक (४) भीकाललोकप्रकारा । कर्ममासद्वये पष्टि-रहोरात्रा भवंति वै । सूर्यमासद्वयात्म -स्त्वेकपष्टि- दिनात्मकः ॥ ५७ ॥ द्विकर्ममासापेक्षस्त-द्भवेतुमृतुं प्रति । अहोरात्रः समधिक-श्चतुर्मास्यां तु तवयं ॥ ५८ ॥ वर्षाशीतोष्णकालेषु चतुर्मास. मितेषु यत् । अधिरात्रं भवेत्पर्व तृतीयमथ सप्तमं ॥ ५९ ।। तथोक्तं ज्योतिष्करंडे-तइयंमि य कायव्वं यइरत्तं सत्तमे य पव्र्वमि । वासहि- मगिम्हकाले चउचउमासे वि हीयते ॥ ६०॥ श्रावणो मार्गशीर्षश्च चैत्रश्चेति यथाक्रमं । वर्षाशीतोष्णकालाना-मादिमासाः प्रकीर्तिताः ॥६॥ सूर्य पूर्तिसमये कर्ममासव्यपेक्षया । अहोरात्रः समधिकः स्यादेकैक इति स्फुटं ॥ ६२ ।। श्रापाढे च भाद्रपदे कार्तिके पौप एव च। फाल्गुने माधवे चाति-रात्रं नान्येषु कहिचित् ॥ ६३ ॥ ऋतुप्रारंभका मासा अप्येत एव कीर्तिताः । ज्योतिष्करंडप्रज्ञप्ति-वृत्त्यादेर्मतमेतकत् ॥६४॥ भगवती. वृत्तौ तु-प्राकृट् श्रावणादिः, वर्षारात्रोऽश्वयुजादिः, शरन्मार्गशीर्षादिः, हेमंतो माधादिः, वसंतश्चैत्रादिः, ग्रीष्मो ज्येष्ठादिरिति पक्षांतरं दृश्यते. प्रातुमा एकसठ अहोरात्र होय छे. (५७), तेथी करीने ये कर्ममासनी अपेचाए ऋतु मात प्रत्ये एक एक अहोरात्र अधिक होय छे भने चार मासमा थइने वे अहोरात्र अधिक होय छे. (५८). वर्षाकाळ (चोमासुं), शीतकाळ (शीयाळो) भने उष्णकाळ (उनाळो) ए चार चार मासना काळने विषे त्रीज भने सातमनी तिथि अधिक होय छे (धृद्धि पामे छे). (५६). ते विषे ज्योतिष्करंडकने विषे कयुं छे के-" चार चार मासना प्रमाण- वाळा वकाळ, शीतकाल भने उपकालने रिपत्रीज अन्न सस्तमनी विधि वृद्धि एमे के (६०)" वर्षाकाळनो प्रथम मास श्रावण छ, शीतकाळनो पहेलो मास मार्गशीर्ष के अने उष्णकाळनो पहेलो मास चैत्र कहो ले. (६१). सूर्य ऋतुनी पूर्तिने समये कर्म- मासनी अपेक्षाए एक एक अहोरात्र अधिक होय छे ए वात प्रगट ज छ. (६२). अषाढ, माद्रपद, कार्तिक, पोप, फाल्गुन अने वैशाख ए छ मासमा ज अधिक तिथि होय छे वीजा मासोमां होती नथी. (६३). तेम ज ऋतुना प्रारंभना मास पण ए छ ज कशा छे. ज्योतिष्करंडक अने प्रज्ञप्तिनी टीका विगैरेनो मा मत छे. (६४). परंतु भगवतीनी टीकामां तो " प्रावृप् ऋतु श्रायणथी शरु थाय छे, वरात्र आश्विनथी, शरद ऋतु मार्गशीर्षथी, हेमंत ऋतु माघ मासथी, वसंत ऋतु चैत्रथी अने ग्रीष्म ऋतु ज्येष्ठ मासथी शरु थाय छे. एम पावर देखाय छे. आवो पद जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रमा सर्ग २८ मो। (८५) इदं च पक्षांतरं जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रेऽपि उत्सर्पिणीनिरूपणे 'चउद्दस पढ- मसमए ' इत्यस्मिन् सूत्रे संगृहीतमस्ति. यतस्तत्र श्रावणे मासि उत्सर्पिणी लगति, तत्प्रथमसमय एव चतुर्दश काला युगपल्लगंति, तन्मध्ये ऋतुरप्यस्ति, तत ऋतोरप्यारंभः श्रावणे मासि भवतीति पक्षांतरमिति ज्ञेयं.किंच दक्षिणायनारंभकोऽपि श्रावण एव, चातुर्मासकारंभकोऽप्ययमेव, तेन वारंभकोऽप्यसाविति पक्षोऽपि युज्यत एवेति. यदि वा सूर्यवर्ष- माश्रित्य युगे ऋतवः प्रथमाषाढपूर्णिमादयः स्युः, कर्मवर्षस्य तु तवः श्रावणासितप्रतिपदाद्याः स्युरित्यतो वा पक्षांतरमिदं भावीति संभाव्यते, तत्त्वं विह तद्विद्वेद्यमिति. ऋतूनामित्यमी मासा यथाशास्त्रं निरूपिताः। श्रथञपूरकतिथि- ज्ञानाय करणं ब्रुवे ॥ ६५ ॥ जिज्ञासितौर्या संख्या दिगुणा . सा विधीयते । रूपोना क्रियते द्वाभ्यां गुण्यते च ततः पुनः ॥ ६६ ॥ दिः स्थाप्यतेऽथ चैकस्याः कृतेऽर्दै ज्ञायते सुखं । युगातीतपर्वयुक्ता- पण उत्सर्पिणीनुं स्वरूप कहेवी वखते 'चउद्दम पढमसमए' (पहेले समये चौद ) श्रा सूत्रमा कहेलो छे, कारण के तेमा श्रावण मासमा उत्सर्पिणीनी शरुआत कहेली छे. तेना पहेला समये ज चौद प्रकारना काळ एकीमाथे शरु थाय छे. ते चौदने मध्ये मत पण गणेलो छे. तेथी ऋतुनो पण पारंम श्रावण मासथी ज थाय छे, एम पीजो पथ समजवो. वळी दक्षिणायननो प्रारंभ पण श्रावणधी ज थाय छ, चातुर्मासनो पारंम पण श्रावणाची व थाय , लेथी करीने प्रहलो प्रारंप पण सावरणपी न पाप थे, एको पद पण योग्य ज के प्रथया तो सूर्यवर्पने पाश्रीने युगने विपे ऋतुमो पहेला अपाढनी पूर्णिमाथी शरु धाय छे भने कर्मवर्पने भाश्रीने अतुओ श्रावण पद एकमधी शरु थाय छे. मा कारणथी पण मा पावर हशे एम संमये थे. तब तो ते विषपना विद्वानोज जाणे. आ प्रमाणे ऋतुना मासो शास्त्रमा कया प्रमाणे नहीं पताध्या 2. हवे कातुने समाप्त फरनारी तिथिने जापवा माटे करण (रीत ) कहुं हुं. (६५).-जाणवाने इच्छता भनी ने संख्या होय तेने पमणी करवी. सेमाची एक पाद करचो. वेने फरीपीए गुणपा. (६६). से अपने पे ठेकाणे दो दो स्थापवो. सेमाची एक तरफना मंकने मर्ष करतो. म करवाची युगना बीती गला पर्व सहित इति तनी बेत्री विपि .

(८६) भीकालमाभकारा भीष्टरंतिमा तिथिः ॥ ६७ ॥ यथा युगे तिथौ कस्यां प्रथम ः समाप्यते । इति प्रश्ने ऋतुसंख्यै-ककः स द्विगुणीकृतः ॥ ६८॥ द्वौ स्यातां तौ च रूपोना-वेकः स द्विगुणः पुनः। द्वावेव तौ द्विः स्थाप्येते एकत्रा॰ कृते पुनः ॥ ६९ ॥ एकोऽवशिष्ट एवं च द्विपातिकमे युगे । ऋतुरायः प्रतिपदि संपूर्णः प्रथमे तिथौ ॥ ७० ॥ जिज्ञासिते द्वितीय द्वावेव द्विगुणीकृतौ । जाताश्चचार एकोना-स्त्रयस्ते द्विगुणीकृताः ॥७१।। जाताः षट् ते स्थापिता द्वि-रेकत्र चार्द्धितास्त्रयः । अन्यत्र तु पडेव स्यु- स्तदेवं प्रश्ननिर्णयः ॥७२॥ युगादितः षट् पर्वाणि व्यतीत्यर्तुर्द्विती- यकः । तृतीयायां तिथौ पूर्ण एवं सर्वत्र भावना ॥ ७३ ।। त्रिंशत्तमे प्रातौ जिज्ञा-सिते त्रिंशद द्विताडिता । पष्टिः स्यादथ सैकोन-पष्टी रूपो. ज्झिता भवेत् ॥७४ ॥ भूयः सा द्विगुणा जात-मष्टादशोत्तरं शतं । द्विः संस्थाप्य च तस्याः कृत एकत्र शिष्यते ॥ ७५ ॥ एकोनपष्टिरि. त्येवं विवक्षितविनिश्चयः । अष्टादशोत्तरे पर्व-शतेऽतीते युगादितः . सुखेथी जाणी शकाय छे. (६७). जेमके युगने विपे पहेलो ऋतु कई तिथिए समाप्त थाय ? एम कोह प्रश्न करे तो ऋतुनी संख्या एक होयाथी तेने घमणी करवाथी वे थया. तेमांथी एक याद करता बाकी एक रह्यो. तेने फरीथी येए गुणतां षे थया. तेने जूदा जूदा बे ठेकाणे स्थापन कर्या. तेमाथी एक ठेकाणे स्थापेला चैने अर्ध कर्या, तो एक मान्यो तेथी ये पर्व बीती गया पछी एकमने दिवसे पहेलो ऋतु पूर्ण थयो एम सिद्ध थयु. (७०). वीजा ऋतुनी खेली तिथि जाणवानी इच्छा थाय तो वेने पमणा करवाथी चार थाय. तेमाथी एक बाद करता त्रण रह्या. तेने फरीथी बमणा करता छ थया. तेने के ठेकाणे स्थापन कर्या. तेमाथी एक ठेकाणे स्थापेला छने अर्धा कर्या त्यारे त्रण रया भने 'चीजे ठेकाणे तो छ ज छे; तेथी प्रश्ननो जवाब ए श्राव्यो के युगनी शरुभातथी छ पर्व बीती गया पछी त्रीजने दिवसे चीजो ऋतु पूर्ण थयो, एम सर्वत्र जाणवू. (५३). त्रीशमो ऋतु कह तिथिए समाप्त थयो ? एम जाणवानी इच्छा होय तो त्रीशने बेए गुणवाथी साठ थया. तेमाथी एक वाद करता ओगणसाठ रह्या. (७४). तेने फरीथी ए गुणतां एक सो ने अढार थया. तेने ये ठेकाणे स्थापी एकने अर्धा कर्या त्यारे भोगण साठ थया; तेथी कहेवाने इच्छेली तिथिनो निर्णय थयो के युगनी शरुआतथी एक सर्ग २८ मो। (८७) ॥७६ ॥ एकोनषष्टितमायां तिथौ संपूर्णतां दधौ । ऋतुस्त्रिंशत्तम इति ज्ञेयं तत्वमिदं विह ॥ ७७ ॥ नैकोनपष्टिस्तिथयः स्युरित्येकोन- पष्टिका । द्वियते पंचदशभिः स्याच्छेपांकसमा तिथिः ॥ ७८ ॥ ततश्च-- युगस्य पंचमे वर्षे पापाढे प्रथमेऽस्य च । पूर्णः शुक्लचतुर्दश्या- मृतस्त्रिंशत्तमोंतिमः ॥ ७६ ॥ अथ चंद्र स्वरूपमुच्यते-सर्वर्शभोगो नक्षत्र-पर्याय इति कथ्यते । ते च भानोर्युगे पंच सतपष्टिनिशापतेः ॥ ८॥ एकैकस्मिंश्च नक्षत्र- पर्याये ऋतवो हि षट् । ततोऽर्कस्य युगे त्रिंशत् द्वयुत्तरेंदोश्चतुःशती ॥ ८१॥ एकैकश्च मृगांक -रहोरात्रचतुष्टयी । सप्तत्रिंशदहोरात्र- भागाश्च सप्तपष्टिजाः ॥ २॥ विधोर्यदेकनक्षत्र-पर्याये सप्तविंशतिः । अहोरात्राः सप्तपष्टि-भागास्तथैकविंशतिः ॥८३ ॥ तेषां भागे हृते पड्भि-लब्धा दिनचतुष्टयी । शेषं दिनत्रयं तच्च सप्तपष्ट्या हतं भवेत् ॥ द्विशत्येकोचराऽत्रैक-विंशत्यंशविमिश्रणे । द्वाविंशे द्वे शते सप्त- सो ने प्रहार पर्व बीती गया पछी भोगणमाठमी तिथिने रोज त्रीशमो मत समाप्त थयो. मही भा तच्च जाणघु के ओगणसाठ तिथिो होती नथी, तेथी भोगणसाठने पंदरे मांगता जे शेष रहे ते तिथि (अने जे मागमा आवे ते पर्वमा उमेरवा); तेथी सिद्ध थयु के-युगना पांचमा वर्षमा पहेला भपाढ मासमां शुक्लपवनी चौदशने दिवसे छेत्रो नीशमो मातु समाप्त थाय छे. (७९). हवे चद्रने भाथी ऋतुभोनुं स्वरूप यताये थे. सर्व नक्षत्रोनो भोगवटो थाय ते नघतपर्याय कहेषाय छे (सूर्य के चंद्र सर्व नक्षत्रोने मोगवी रहे वेटलो काळ एक नघत्र- पर्याय कहेवाय छे). एक युगमा सूर्यना नपत्रपर्यायो पांच थाय छ भने चंद्रना नक्षत्रपर्यायो सडसठ थाय छे. ( ८०). एक एक नक्षत्रपर्यायमा छ ऋतुमो भावे छ। तेथी एक युगमा सूर्यने भात्रीने त्रीश ऋतुमो भने चंद्रने भाश्रीने चार सो ने मे ऋतुम्रो भाषे थे. (८१). एक चंद्रऋतुनो काळ चार महोरात्र भने एक महोरापना सहसठीया सास्त्रीश अंशो होय छे. (८२). कारणके चंद्रना एक नक्षत्रपर्यायमा मवावीश अहोरात्र भने एक महोरापना सडसठीया एकांश भाग (२७१) होय छे. (८३). वेने छए मागवायी मागमा चार दिवस मावे के मने शेष प्रण दिवस रहे थे. वेने सडसठे गुखता सोने एक पाप के सेमा एकषीश भंश मेव्ववादी सहसठीया पसो ने पावीश (३३) अंश (८८ ८) भीकाललोकप्रकारा। षष्ट्यंशानामिमे पुनः ॥ ८५॥ पड्भक्के सप्तपष्टयंशाः, सप्तत्रिंशद्यथोदिताः। इदं चंद्र मानं च चंद्रसर्व संख्यया ॥ ८६ ॥ चतुःशत्या द्वथुत्तरया गुण्यते चेद्भवति तत् । अष्टादश शतास्त्रिंशा यथोक्ता युगवासराः ।।८७॥ अथ चंद्र ज्ञानाय करणमुच्यते--युगातीतपर्वसंख्या कार्या पंचदशा- हता । विवक्षितदिनात्याच्या वर्तमानस्य पर्वणः ॥ ८८॥ तिथयस्तत्र योज्यंते--ऽवमरानोज्झिताथ सा। चतुस्त्रिंशशतहता पंचाट्यत्रिंशतांचिता ॥८६॥ शतैर्दशोत्तरैः पड्भि--विभाज्यैवं कृते सति । लभ्यतेऽतीतऋतवः शेषांशाश्वोद्धरति ये ॥ ९० ॥ तेषां भागे चतुस्त्रिंश-शतेनात्र यदाप्यते । ते दिना वर्चमानोंः शेषा अंशा दिनस्य च ॥ १॥ चतुर्भिः कलापकं ॥ द्वितीयपर्वैकादश्यां चंद्र ः कतमो युगे । इति प्रश्नेऽतीतमेकं पर्व पंच- दशाहतं ॥ १२॥ जाता पंचदशैतेषु क्षिप्यते दश वासराः । एकादश्याः प्रागतीता जातैवं पंचविंशतिः ॥९३ ॥ अवमरात्रस्य त्वत्र संभवो नास्ती- ति ज्ञेयं, चतुस्त्रिंशशतनाऽसौ त्रयस्त्रिंशच्छनी भवेत् । पंचाशदधिकास्यां च थाय छे. (८५). तेने छए भागता उपर कह्या प्रमाणे सडसठीया साडत्रीश (19) अंश भावे छे. भा चंद्रऋतुना प्रमाणने (एटले ४७ ने) चंद्रना सर्व ऋतुमोनी संख्यावडे एटले चार सो ने वेवडे गुणीए त्यारे पूर्वे कह्या प्रमाणे एक युगना अढार सो ने त्रीश (१८३०) अहोरात्र थाय छे. (८७). हवे चंद्रऋतु जाणवानुं करण (रीत ) बतावे छे.--युगने विषे कहेवाने इच्छेला दिवसली पहेला चेटला पर्व नीली सपा होय दैले पंदरे गुणत्या. देगा माला ली गयेही तिथिमो भेळववी. तेमांधी क्षयतिथि पाद करवी. जे अंक रहे तेने एक सो ने चोत्रीशे (१३४) गुणी मां प्रण सो ने पांच भेळववा. (८९). पछी ते अंकने छ सो ने दशे मांगतो, भागमा जे आवे वेटला वीती गयेला ऋतु जाणवा. बाकी जे अंश वध्या होय तेने एक सो ने चोत्रीशे भागवां जे भागमा आवे तेटला वर्तता ऋतुना व्यतीत दिवसो जाणवा भने जे शेष रक्षा होय तेटला धर्तता दिवसना अंशो जाणवा. (९१). उदाहरण-युगना प्रारंभथी बीजा पर्वनी अग्यारशने दिवसे कैटलामो चंद्रात चाले छे १ एम कोह प्रश्न करे त्यारे एक पर्व वीती गयेलुं के तेने पंदरे गुणता पंदर (१५) भया. तेमां भग्यारशनी पहेलो दश तिथिो व्यतीत थयेली होवाथी दश (१०) दिवस मेठच्या, त्यारे पचीश (२५) थया. भहीं चयतिथिनो संभव नथी तेथी कार पण बाद . " सर्ग २८ मो। (८९) पंचाढ्यां त्रिशतीं क्षिपेत् ॥ ९४ ॥ शतानि पंचपंचाशा-न्येवं पत्रिंशदेपु च । शतैर्दशोत्तरैः पड्भि-भक्तप्वाप्येत पंचकं ॥ ९५ ॥ अंशाश्च शेपास्ति- टंति पंचाढ्यानि शतानि पट् । चतुस्त्रिंशशतेनैषां भागे लब्धं चतुष्टयं ॥ ९६ ॥ एकोनसप्ततिश्चांशाः शेषास्ते द्वयपवर्तिताः । लब्धाः सार्दाश्च- तुस्त्रिंश-सप्तपष्टिलवा इति ॥ ९७ ॥ अतीताः पंच ऋतवः पष्ठतॊश्च गता दिनाः। चत्वारः पंचमस्याह्नः सप्तपष्टिभवा लवाः ॥ ९८ ॥ गताः सार्द्धाश्चतुस्त्रिंशत् सार्दो द्वौ सप्तपष्टिजौ । चंद्रों स्तस्तदा पष्टे भागौ न्यूनतयांचितौ ॥ ९९ ॥ एवमन्यत्रापि भाव्यं. अथ चंद्र संपूर्ति-तिथेः करणमुच्यते । तत्र वोध्यो ध्रुवराशिः पंचोपेतं शतत्रयं ॥७००॥ चतुस्त्रिंशशतच्छिन्ना-होरात्रस्य लवा श्रमी । ज्ञेया ज्ञेयो ध्रुवराशि-नक्षत्रकरणेऽप्यसौ ॥ १ ॥ श्रयं द्वयुत्तरवृद्धेन ध्रुवराशिनिहन्यते । राशिनकादिना द्वथाढ्य-चतुःशततमावधि ॥ २ ॥ करवानुं नथी एम जाण. पछी या पचीशने एक सो चोत्रीशे (१३४ ) गुणतां तेत्रीश सो ने पचास ( ३३५० ) थाय छे. तेमांत्रण सो ने पांच (३०५) भेळवया. (९४) त्यारे छत्रीश सो ने पंचावन (३६५५) थया. तेने छ सो दशे (६१०) भांगतां मागा पांच पाये छ भने पाकी छ सो ने पांच (६०५) शेष रहे छे. ते (६०५) ने एक मो चोत्रीशे (१३४ ) मागतां भागा चार भावे के अने पाकी भोगणोतेर (६९) अंशो शेप रहे थे. ते (६९) ने चेए भांगता सडसठीया साडीचोत्रीश अंशो आये थे; तेथी करीने जबाप ए मान्यो के पांच ऋतुमो वीती गया थे, छठा ऋतुना चार दिवस गया के अने पांचमा दिवसना सडसठीया साडीचोत्रीश अंशो गया छे. ते वसते बहा चंद्रकातुना सहसठीया भढी माग बाकी छे एम जाणवू. (९९). पा रीते अन्य स्थळे पण जागg. हवे चंद्रऋतु कर तिथिए पूर्ण पाय ? ते जाणवा माटे करण कहे छ.-मा करणने विषे प्रथम प्रण सो ने पांव (३०५) ध्रुवराशि जाणवो. (७००). कारण के एक महोराने एक सोने घात्रीशे भागता भावेला मा लयो के मा ध्रुवराशि नवना फरणमा पण समजयो. (१). मा (३०५) ध्रुवराशिने एकथी भारंभीने मागळ भागळ पये वधता अंकवडे धार सो ने येमा (४०२) चंद्रमात सुधी गुरुयो. (२). जेमके पहलो + (९०) श्रीकासलोकप्रकाश एकेनाये मृगांकों ध्रुवराशिनिहन्यते । जिज्ञासिते द्वितीये तु ध्रुवांक- स्ताडयते त्रिभिः ॥ ३ ॥ एवं च-द्वयाढ्यचतुःशततम-जिज्ञासायां तु ताड्यते । ध्रुवराशियुत्तराष्ट-शतमानेन राशिना ॥ ४॥ राशिद्वर्युत्तरया वृद्धथा वर्द्धमानो हि जायते । रूपोनो द्विगुणः स्वस्वा-भीष्टचंद्रर्तुमा- नतः ॥५॥ यथा तृतीये चंद्रों वृद्धथा द्वयुत्तरया भवेत् । गुणकः पंचमः सोऽस्मा-दूपोनो द्विघ्न एव हि ॥ ६॥ ततस्तथा ताडितोऽसौ ध्रुवराशि- विभज्यते । चतुस्त्रिंशशतेनायं तिथिश्चंद्र पूर्तिभाग् ॥७॥ यथा द्वितीयचंद्र -पृच्छायां त्रिगुणीकृता । पंचाट्या त्रिशती पंच-दशाढ्याः स्युः शता नव ॥ ८ ॥ चतुस्त्रिंशशतेनैषां भागे पट् करमागताः। शेपमे- कादशशतं तद्विकेनापवर्त्यते ॥ ६ ॥ अध्यछुः पंचपंचाशत् लवाः स्युः सप्तपष्टिजाः। तदेवमिष्टचंद्र -निश्चयोऽयमुपस्थितः ॥ १० ॥ युगादेः पस्वतीतेपु दिनेषु सप्तमस्य च । अध्य?ः पंचपंचाश-तांशकैः सप्त- चंद्रऋतु जाणवानी इच्छा होय तो ध्रुवराशिने एके गुणवो अने बीजो चंद्रमतु जाणवानी इच्छा होय तो ध्रुवराशिने त्रणवडे गुणवो. (३). ए प्रमाणे छेवट चार सो ने बेमो चंद्रऋतु जाणवानी इच्छा होय तो ध्रुवराशिने भाठ सो ने त्रणवडे गुणवो. (४). अर्थात् महीं जेटलामो चंद्रमत जाणवानी इच्छा होय ते अंकने यमणो करी तेमाथी एक पाद करीए त्यारे एकथी आगळ आगळ बनी धृद्धिवाळो अंक प्राप्त थाय छे. (५). जेमके बीजो चंद्रमतु जाणवाने इष्ट होय तो धनी वृद्धिवाळो पांचनो अंक आवे छे. ते पांचनो अंक त्रणने पमणा करी एक बाद करीए त्यारे आवे छे. ( ए जरीते चार सो ने चमा चंद्रशतने जाणवानी इच्छा होय तो तेने बमणा करी एक बाद करतां माठ सो ने त्रण आवे छे.) (६). त्यारपछी उपर कह्या प्रमाणे ८०३ ने ३०५ वडे गुणेला आ ध्रुवराशिने एक सो ने चोत्रीशे भागवाथी चंद्रऋतुनी समाप्तिनी तिथि आवे छे. (७). उदाहरण-बीजो चंद्रऋतु कह तिथिए पूर्ण थाय ? एम कोइ प्रश्न करे तो ध्रुवराशि त्रण सो ने पांचने ( ३०५) त्रणे गुणतां नव सो ने पंदर (९१५) थाय छे. तेने एक सो चोत्रीशे (१३४ ) भागता छ हाथना ( भागमां) आवे छे. बाकी एक सो ने अग्यार १.१११) शेष रहे छे. तेने बेवडे भागवा त्यारे सडसठीया साडीपंचावन (५५) अंशो आवे छे तेथी करीने इच्छेला (बीजा) चंद्रऋतुनी समाप्तिनो आ निश्चय थयो के- सर्ग २८ मो। (९१) पष्टिः ॥ ११ ॥ व्यतीतैः स्यान्मृगांक -द्विनीयः पूर्णनां गतः । कार्या विचक्षणैरेवं सर्वत्रान्यत्र भावना ॥ १२ ॥ अथ सूर्य संपूर्ती भोग्यमिदोस्तथा रवेः। यन्नक्षत्रं भवेत्तस्य ज्ञानाय करणं चुवे ॥ १३ ॥ ध्रुवांकराशिज्ञेयोऽत्र पंचोपेतं शतं त्रयं । चतुस्त्रिंश- शतच्छिन्ना-होरात्रांशात्मकोऽस्त्ययं ॥ १४ ॥ एकादिद्वयुत्तरेणामुं त्रिंश- दंतेन राशिना । हत्वा शोधनकान्यस्मा-द्वक्ष्यमाणानि शोधयेत् ॥१५॥ तेषु यच्छोध्यमानेषु सर्वाग्रेण न शुध्यति । सूर्य पूर्ती नक्षत्रं स्याचंद्रस्य रवेरपि ॥१६॥ राशेदर्युत्तरवृद्धस्य ज्ञेया प्राग्वत्प्ररूपणा। वोध्या शोधनकानां तु प्राज्ञेः प्रज्ञापनासकौ ॥ १७॥ अर्द्धक्षेत्रे सप्तपष्टि-प्रक्षे शोधनक स्मृतं । समक्षेत्रे चतुस्त्रिंशं शतं शोधनकं भवेत् ॥ १८ ॥ सार्द्धक्षेत्रे च नक्षत्रे स्यादेकाढयं शतद्वयं । इंदोरभिजितो भानि शोध्यान्यर्कस्य पुण्यतः ।। १९ ॥ ऋक्षस्याभिजितः पूर्व द्विचत्वारिंशदंशकान् । राशेविंशोधये- युगनी शरुआतथी छ दिवमो गया पछी सातमा दिवसना सडसठीया साडीपंचावन अंशो जाय ते वखते बीजो चंद्रऋतु पूर्ण थयो. ए प्रमाणे चीज सर्व ठेकाणे जाणवं. (८-१२). हवे सूर्यऋतुनी समाप्ति वखते चंद्र तथा सूर्यनुं जे भोग्य नक्षत्र होय ते जाणवा माटे करण (रीत )ने हुं कहुं छु. (१३)-नहीं त्रण मो ने पांच (३०५) ध्रुवांक राशि जाणवो. अहोराबना एक सो चोत्रीश भागरूप त्रिराशि . (१४). एकथी प्रारंमीने श्रागळ भागळ पयेनी पृद्धिवडे (१-३-५ विगेरेरडे ) त्रीश सुधी ते ध्रुनांकनी राशिने गुणवो. पछी तेमांधी थागळ कहेवाशे ते प्रमाणे वादबाकी करवी. (११). चादयाकी करता करता ज्यारे सर्व प्रकारे याद न धइ शके त्यारे सूर्यमतुनी ममाप्ति करना चंद्र अने पर्यतुं नक्षत्र आवे छे. (१६). प्रागळ भागळ वनी दिवाळा राशिनी प्ररूपणा पूर्वे कमा प्रमाणे जाणवी अने बादपाकी करवानी प्ररूपणा पंडितो भा प्रमाणे जाणवी. (१७):- भर्धक्षेत्रवाळा नक्षत्र होय तो सडसठ वाद करवा एम काथु छ, समचत्र नक्षत्र होय तो तेमाथी एक सो ने घोघीश पाद करवा (१०) अने सार्धक्षेत्र नचत्र होग तो तेमांधी पसो ने एक पाद करवा. तेमा चंद्रनु भोग्य नक्षत्र लावधू होय तो ममिजित् नवप्रथी पादचाकी फरवी अने सूर्य, मोग्य नक्षत्र लापहोय तो पुष्य नवप्रथी पादयाकी फरपी. (१६). तेमज चंदना मोग्य नक्षत्रनो विनार करवो होय तो ते धसक राशिमाधी प्रथम मभिजित् नधाना ताळीश (४२) अशोपाद फरवा, अने सूर्य नवना योगनो पिचार - (९२) श्रीकाललोकप्रकाश। त्तस्मा-चंद्रयुक्तःचिंतने ॥ २०॥ सूर्यर्तयोगचिंतायां चादौ पुष्यस्य शोधयेत् । श्रष्टाशीतिं ततः शोध्या-न्युडूनि प्रोक्तवत्क्रमात् ॥ २१ ॥ यथा प्रथमसूर्यर्तुः कस्मिन्नुडुपशालिनि । नक्षत्रे पूर्णतामेति युगे तो- दमादिशेत् ॥ २२॥ प्रागुक्तो ध्रुवराशियः पंचोपेतं शतत्रयं। एकेन गुणितः सोऽयं तावानेव व्यवस्थितः ॥ २३ ॥ तस्मादभिजितः शुद्धा द्वाचत्वारिं- शदादितः। सत्रिपष्टि शतद्वंद्व शेपं तस्माच्च शोध्यते ॥ २४ ॥ श्रुतेः शतं चतुस्त्रिंश-मथ शेषं शतं स्थितं । एकोनत्रिंशमस्माच्च धनिष्ठा तु न शुध्यति ॥ २५ ॥ ततश्च-एतावत्सु १२९ धनिष्ठाया भुक्तेष्वंशेष्विहेंदुना। सूर्यर्तुः प्रथमः पूर्ण इति पूर्वोक्तनिर्णयः ॥ २६ ॥ अथ प्रथमसृर्यर्तु-पूर्ती सूर्यक्षमुच्यतां । ध्रुवांकोऽत्रापि पूर्वोक्तः पंचोपेतं शतत्रयं ॥ २७ ॥ एत- चैकेन गुणितं ताहगेव व्यवस्थित। अष्टाशीतिःशोध्यतेऽस्मात् । पुष्यस्य प्रथमं ततः ॥ २८ ॥ शेपे च द्वे शते सप्त-दशाढ्ये शोध्यते ततः। - करपो होय त्यारे ते ध्रुवांक राशिमाथी प्रथम पुष्य नक्षत्रना अठाशी (८८) अंशो वाद करवा अने त्यारपछी कहेला क्रम प्रमाणे पछीना नक्षत्रना अंशो पाद करवा. (२१). उदाहरण-युगने विषे पहेलो सूर्य ऋतु कया चंद्रनक्षत्रमा संपूर्ण थाय छ ? एम कोई प्रश्न करे तो तेना जबाबमां ा प्रमाणे कहे. ( २२).--प्रथम जे त्रण सो ने पांचनो ध्रुवगशि कयो छे, तेने एके गुणतां वेटला ज ( ३०५) आवे छे. तेमाथी प्रथम अभि- जितना वेताळीश अंशो बाद करता बाकी यमो ने वेसठ ( २६३ ) रहे छे. तेमाथी श्रवण नक्षत्रना एक सो ने चोत्रीश (१३४ ) अंशो याद करता एक सो ने भोगणत्रीश ( १२६ ) शेष रहे छ भने तेमाथी धनिष्ठाना अंशो बाद थइ शकता नथी. ( २५ ). तेथी करीने चंद्रवडे धनिष्ठाना पाटला (१२१) अंशो मोगवाह जाय त्यारे पहेलो सूर्यऋतु पूर्ण थाय छे, एम सिद्ध थाय छे. (२६). चीजें उदाहरण-युगने विष पहेलो सूर्यऋतु कया सूर्यनक्षत्रमा पूर्ण थाय छे ? ते कहो, एम कोइए प्रश्न पूछयो, सेना जवाधर्मा पा प्रमाणे कहेवू.-ग्रही पण पूर्वे कहेलो ध्रुवांक त्रण सो ने पांच (३०५) छ. तेने एके गुणतां तेटला ज (३०५) थाय छे. तेमाथी प्रथम पुष्य नक्षत्रना महाशी (८८) अंश बाद करवा. बाद करता बाकी बसो ने सतर (२१७) रहे छे. तेमांधी अश्लेषा नक्षत्रना सडसठ (६७) अंशो याद करतां याकी एक सो ने । सर्ग २८ मो। (९३) अश्लेषायाः सप्तपष्टिः। शेष साई शतं स्थितं ॥२९॥ शतमस्माञ्चतुस्त्रिंश मघासंबंधि शोध्यते । पोडशावस्थिताः शेषा-स्तदेष प्रश्ननिर्णयः ॥३०॥ सूर्येण पूर्वफाल्गुन्या भागेपु षोडशस्विह । भुक्तेपु प्रथमोऽकर्तुः संपूर्ण इति बुध्यतां ॥ ३१ ॥ लोके तु-मासौ मार्गादिको द्वौ द्वा-वृतुहेमंत एव च । शिशिरश्च वसंतश्च ग्रीष्मो वर्षास्तथा शरत् ॥ ३२ ॥ ऋतुभि- श्चायने भानोः शिशिराद्यैस्त्रिभिस्त्रिभिः । उदग्याम्याभिधे ताभ्यां द्वाभ्या- मर्कस्य वत्सरः ॥ ३३ ॥ इति श्रूयते ॥ इति ऋतुप्रकरणं ॥ तौ ऋतौ द्वौ द्वौ मासा-वित्यद्वे द्वादशैव ते। नामान्येषां द्विधा लौकि-कानि लोकोत्तराणि च ॥ ३४॥ तत्र लौकिकान्येवं-स्याच्छ्रावणो भाद्रपद श्राश्विनः कार्तिकोऽपि च । मार्गशीर्षश्च पौपश्च माघः फाल्गुन एव च ॥३५॥ चैत्रस्तथा च वैशाखो ज्येष्ठापाढाविति क्रमात् । लोको- चराण्यथोच्यन्ते नामान्येषां यथाक्रमं ॥ ३६ ॥ अभिनंदित इत्यायो द्वितीयः स्यात्प्रतिष्ठितः । तृतीयो विजयाख्यः स्या-चतुर्थः प्रीतिवर्द्धनः पचास (१५० ) रहे थे. तेमाथी मघा नक्षत्रना एक सो ने चोत्रीश (१३४) बाद करतां चाकी सोळ (१६ ) रहे छ तेथी प्रश्ननो निर्णय ा प्रमाणे थयो फे-सूर्य पूर्वफाल्गुनी नक्षत्रना सोळ (१६ ) अंश भोगवे त्यारे पहेलो सूर्यऋतु पूर्ण थाय थे एम जाण. ( २५-३१). लौकिक शास्त्रमा तो पा प्रमाणे आहेतुं छे-मार्गशीर्ष मासथी पये मासनो एक एक ऋतु थाय छे, ते या प्रमाणे.- हेमंत, शिशिर, वसंत, ग्रीष्म, वर्षा अने शारद, (३२), शिशिरादिक ऋण ऋण ऋतुए करीने सूर्यना उत्तर अने दक्षिण नामना पे भयन थाय छे भने ते चे अयनवडे सूर्यनुं एक वर्ष थाय छे. (३३) ए प्रमाणे संमळाय छे. इति ऋतुप्रकरण. एक एक तुना पये मास होय छे तेथी एक वर्षमा पार मास होय छे. ते मासना नाम लौकिक भने लोकोत्तर एम पे प्रकारे थे. (३४). तेमा लौकिक मासनां नाम मा प्रमाणे अनुक्रमे छ-श्रावण, भाद्रपद, भाधिन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पोप, माघ, फाल्गुन, चैत्र, पैशाख, ज्येष्ठ भने अपाढ. हवे लोकोचर मासनां नाम अनुक्रमे कहीए छीए. (३६).-पहेलो माम अमिनंदित, पीजो प्रतिष्ठित, श्रीजो विजय, चोयो प्रीतिवर्धन, (३७). पांचमो श्रेयान, छहो शिव कसो छ, सातमो शिशिर कमोथे, ' , (९४) भीकाममोकप्रकारा। ॥ ३७॥ पंचमो भवति श्रेयान् पष्ठः शिव इति स्मृतः। सप्तमः शिशिरः ख्यातो हिमवानिति चाष्टमः ॥ ३८ ॥ वसंतमासो नवम-स्ततः कुसुम- संभवः । एकादशो निदाघो द्वा-दशो बनविरोहकः ॥ ३९ ॥ अत्र सूर्य- प्रज्ञप्तिवृत्तौ अभिनंदितस्थानेऽभिनंद इति, वनविरोहस्थाने वनविरोधीति दृश्यते. प्रतिमासं च पक्षौ द्वौ बहुलः शुक्ल एव च। श्राद्यः पिधीयमानेंदु- मुच्यमानविधुः परः ॥ ४० ॥ प्रतिपक्षं पंचदश दिवसा रात्रयोऽपि च । प्रतिपदिवसो याव-दंते पंचदशीदिनः ॥ ४१ ॥ पूर्वांगनामा प्रथमः परः सिद्धमनोरमः । मनोहरस्तृतीयः स्या-द्यशोभद्रस्तुरीयकः ॥ ४२ ॥ परो यशोधरः षष्ठः सर्वकामसमृद्धकः । सप्तमस्विद्रमूर्द्धाभि-पिक्तः सौमन- सोऽष्टमः ॥४३॥ धनंजयस्तु नवमोऽर्थसिद्धो दशमः स्मृतः । एकाद- शश्चाभिजातो द्वादशोऽत्पशनाभिधः ॥ ४४ ॥ शतंजयस्तदग्र्यः स्या- दग्निवेश्मा चतुर्दशः। पंचदशस्तूपशम-संज्ञको दिवसो मतः ।। ४५॥ श्रां पंचदशानाम-प्येताः संज्ञाः श्रुते स्मृताः। अथाह्वयक्रमः पंच-दशा- नामुच्यते निशां ॥ ४६ ॥ उत्तमा १ च सुनक्षत्रा २ एलापत्या ३ यशो- - पाठमो हिमवान छे. (३८). नवमी वसंत मास छे, त्यारपछी (दशमो) कुसुमसंभव छे, भग्यारमो निदाघ अने पारमो बनविरोहक छ. ( ३६). नहीं सूर्यप्रज्ञप्तिनी टीकामा भभिनंदितने ठेकाणे अभिनंद अने वनविरोहने ठेकाणे वनविरोधी एवा नाम देखाय छे. दरेक मासमा कृष्णपक्ष ने शुक्लपद एम ये पखवाडीयां होय छे. लेमा पहेला कृष्ण- पक्षमा चंद्र ढंकातो जाय के (क्षीण थाय छे ) अने बीजा शुक्लपक्षमा मूकातो जाय छे (धुद्धि पामे छे). (४०). दरेक पक्षमा पंदर दिवसो भने पंदर रात्रिभो होय छे. तेमा पहेलो प्रतिपदानो दिवस अने छेनो पूर्णिमा ( अथवा अमावास्या )नो दिवस . होय छे. (४१). तेमा पहेला दिवसर्नु नाम पूर्वाग छ, बीजो दिवस सिद्धमनोरम, श्रीजो मनोहर, चोथो यशोभद्र, पांचमो यशोधर, छटो सर्वकामसमृद्धक, सातमो इंद्रमूर्धामिपिक्त, आठमो सौमनस, नवमो धनंजय, दशमो अर्थसिद्ध करो छे, अग्यारमो अभिजात, बारमो अत्यशन नामनो, त्यारपछीनो (तेरमो):शतंजय, चौदमो अमिवेश्मा अने पंदरमो दिवस उपशम नामनो कह्यो छे. (४२-४५). याप्रमाणे पंदरे दिवसोना नाम श्रुतमा कहेला छे. हवे पंदरे रात्रिभोना नाम अनुक्रमे कहीए छीए. (४६).-उचमा १, सर्ग २८ मो। धरा ४ । सौमनसा ५ श्रीसंभूता ६ विजया ७ वैजयंत्यपि ॥ १७ ॥ जयंती ९ नवमी ज्ञेया दशमी चापराजिता १० । इच्छा ११ तथा समा- हारा १२ भवेत्तेजा १३ स्त्रयोदशी ॥४८॥ अतितेजा १४ स्ततो देवा-नंदा १५ पंचदशी भवेत् । नामांतरं भवत्यस्या नूनं निरतिरित्यपि ॥ ४९ ॥ इत्यहोरात्राणं दिनरात्रिनामानि ॥ तिथयोऽपि स्मृताः पंच-दश द्वेधा भवंति ताः। दिनरात्रिविभेदेन तासां नामान्यथ ब्रुवे ॥ ५० ॥ नंदा १ भद्रा २ जया ३ तुच्छा ४ पूर्णे ५ त्यावर्त्यते त्रिशः। पंचैवं त्रिगुणाः पंच-दशोक्तास्तिथयो जिनैः ॥५१॥ नंदाख्या प्रतिपत् पष्ठी भवेदेकादशी तथा। द्वितीया सप्तमी द्वाद-श्येता भद्राभिधा मताः ॥५२॥ जयास्तृतीयाप्टम्यौ च त्रयोदशी च कीर्तिताः। चतुर्थी नवमी भूते-प्टा च तुच्छाह्वयाः स्मृताः ॥ ५३ ॥ पंचमी दशमी पंच-दशी पूर्णाभिधा इमाः । अहस्तिथीनां नामानि ज्ञेयान्येवं यथाक्रम ॥ ५४॥ उग्रवती भोगवती तृतीया च यशोमती । सर्वसिद्धा शुभनामा पंचतास्तिथयस्त्रिशः॥ ५५ ॥ श्रयं भावः-उग्रवत्यभिधानेन नंदातिथि- सुनचत्रा २, एलापत्या ३, यशोधरा ४, सौमनसा ५, श्रीसंभूता ६, विजया ७, वैजयंती ८, जयंती नवमी जाणवी ९, दशमी अपराजिता १०, इच्छा ११, समाहारा १२, तेरमी तेजा १३, प्रतिवेजा १४ अने पंदरमी देवानंदा १५ के. मा देवानंदानुं बीजु नाम निरति पण छे. (४९), भा प्रमाणे दिवस भने रामिना नाम कमां छे. तिथिमो पण पंदर छे. ते पण दिवस भने रात्रिना मेदवडे ये प्रकारनी के. सेना नाम हूं कई छ. (५०),-नंदा १, मद्रा २, जया ३, तुच्छा ४ भने पूर्ण ५. भा पांच नामने प्रण बार भावर्तन करा. पांचने प्रणगुणा करवायी पंदर तिधिमो थाप छे एम जिनेवरोए कयुं थे. (५१). तेमा प्रतिपदा, छह मने भग्यारश ए प्रण तिथिमी नंदा नामनी छे. बीज, सातम भने पारश ए प्रण तिथिमो मद्रा नामनी मानेली थे. (५२). श्रीज, भाठम भने तेरश ए प्रण विधिमो जया नामनी कहेली छे. चोप, नोम भने चौदश ए प्रण विधिमो तुच्छा (रिक्ता ) नामनी कही थे. (५३). पांचम, दशम भने पुनम ए प्रण विधिमो पूर्णा नामनी कहेवाय छे. मा प्रमाण दिवसनी विपिना नामो अनुक्रमे जायया (५४). उप्रवती, मोगवती, श्रीजी यशोमती, सर्वसिदा भने उभा नामनी मा पांच विपिनोन प्रचार भावर्तन परपी. (५). ही मावार्य एनंदा विधि (९६) श्रीकाललोकप्रकाश। निशातिथिः भद्रातिथीनां रजनी-तिथिर्भोगवतीति च ॥ ५६॥ यशो. मतीति च ज्ञेया जयानां यामिनीतिथिः । तुच्छा सत्रितिथि या सर्वसिद्धेति नामतः ।। ५७ ।। शुभनामा भवेत्पूर्णा तिथी रात्रितिथिः स्फुटं । एवं पंचदश ज्ञेया रजनीतिथयो बुधैः ॥ ५८ ॥ एषां पंचदशानां तिथीनां स्वामिनश्चैवं लौकिकशास्त्रेषु निरूपिताः-तिथिपाश्चतुर्मुख १ विधातृ २ विष्णवो ३ यम ४ शीतदीधिति ५ विशाख ६ वञिणः ७ । वसु ८ नाग ९ धर्म १० शिव ११ तिग्मरश्मयो १२ मदनः १३ कलि १४- स्तदनु विश्व १५ इत्यपि ॥ ५६ ॥ तिथौ हि दर्शसंज्ञके पितृनुशत्यधी- श्वरान् । त्रयोदशीतृतीययोः स्मृतस्तु वित्तपोऽपरैः ।। ६० ॥ मतांतरे च- वह्नि १ विरञ्चो २ गिरिजा ३ गणेशः४ फणी ५ विशाखो ६ दिनकृत् ७ महेशः ८ । दुर्गा ६ तको १० विश्व ११ हरि १२ स्मराश्च १३ शर्वः १४ शशी १५ चेति पुराणदृष्टाः ॥ ६१॥ एषां देवानां प्रतिष्ठादौ च तत्तत्ति- . (१-६-११)नी रात्रिनी तिथि उग्रवती नामनी जाणवी, भद्रा तिथि ( :-s-१२)नी रात्रिनी तिथि भोगवती नामनी जाणवी. ( ५६ ). जया तिथि (३-८-१३)नी रात्रिनी तिथि यशोमती जाणवी, तुच्छा तिथि (४-९--१४ )नी रात्रिनी तिथि सर्वसिद्धा नामनी जाणवी. (५७) अने पूर्णा तिथि ( ५-१०-१५)नी रात्रिनी तिथि शुभा नामनी जाणवी. या प्रमाणे पंडितोए पंदर रात्रिनी तिथिो जाणवी. (५८). भा पंदर तिथिोना स्वामी लौकिक शास्त्रमा प्राप्रमाणे कह्या छे.-चतुर्मुख (ब्रह्मा) १, विधाता २, विष्णु ३, यम ४, शीतदीधिति (चंद्र), विशाख ६, पनि ७, वसु ८, नाग ६, धर्म १०, शिव ११, तिम्मरश्मि (सूर्य) १२, मदन १३, कलि १४ अने विश्व १५. श्रा अनुक्रमे पंदर तिथिोना पंदर स्वामीओ के. (५९). अमावास्यानी तिथिना स्वामी पित् नामना छे. तेरश अने त्रीजनो स्वामी वित्तप (कुबेर) के एम केटलाक कहे छे (६.). वळी बीजो मत प्राप्रमाणे छे.-अमि १, विरंच २, गिरिजा (पार्वती) ३, गणेश ४, फणी ५, विशाख ६, दिनकर ७, महेश ८, दुर्गा ९, अंतक १०, विश्व ११, हरि १२, स्मर १३, शर्व १४ अने शशी १५. श्रा प्रमाणे पंदर तिथिोना पंदर स्वामी पुराणमा कया छे. (६१). या उपर कहेला देवोनी प्रतिष्ठा विगेरे कार्यमा ते ते देवनी तिथिनो उपयोग करवामां आवे छ। परंतु जिनेश्वरनी प्रतिष्ठा- सर्ग २८ मो। (९७) थीनामुपयोगः, जिनस्य तु प्रतिष्ठादौ सर्वेऽपि तिथिनक्षत्रकरणक्षणाः शुद्धत्वे सत्युपयोगिन एव,तस्य सर्वदेवाधिदेवस्वादित्याद्यारंभसिद्धिवार्तिके. अहोरात्रतिथीनां च विशेषोऽयमुदीरितः । भानूत्पन्ना अहोरात्रा- स्तिथयः पुनरिंदुजाः ॥६२ ॥ उक्तं च-सूरस्स गगणमंडल-विभागनि- प्फाइया अहोरत्ता। चंदस्स हाणिवुढी-करण निप्फज्जए उ तिही ॥१॥ किं च-अहोरात्रो भवेदऊदयादऊदयावधि । द्वापष्टितमभागोना-होरा- प्रप्रमिता तिथिः ॥६३॥ इत्यादिभिर्विशेषैः स्या-दहोरात्रात्पृथक् तिथिः। द्विधात्वं च भवेत्तस्या दिनरात्र्यंशकल्पनात् ।। ६४ ॥ यद्वदेकोऽप्यहोरात्रः सूर्यजातो द्विधाकृतः। दिनरात्रिविभेदेन संज्ञाभेदप्ररूपणात् ॥ ६५ ॥ तथैव तिथिरेकापि शशिजाता द्विधा कृता । दिनरात्रिविभेदेन संज्ञाभेद. प्ररूपणात् ॥ ६६ ॥ एकैकस्यास्तिथेः काल-मानमेवं प्रकीचितं । मुहु- र्चानां त्रिंशदेक-न्यूनभागास्तथोपरि ॥६७॥ स्युत्रिंशन्मुहूर्तस्यै-कस्य दिका तो सर्वे तिथिमो, नक्षत्रो, करणो भने घणो शुम होय तो उपयोगमा भावे थे। केमके जिनेश्वर सर्व देवना अधिदेव छे. इत्यादि भारंमसिद्धिनी टीकामा लख्यु छे. अहोरात्र भने तिथिमोनो एज विशेष कयो के के-अहोरामनी उत्पत्ति सूर्यथी थाप छ भने विथिनी उत्पचि चंद्रथी थाय छे. (६२). ते विपे कयु छ के-" सूर्य गगनमंडळना विभागने मोळंगे छ तेने भाथीने अहोरात्र थाय छ भने चंद्रनी हानि- दिवडे तिथि उत्पन्न थाय छे. (१)," बळी सूर्यना उदयपी प्रारंभी फरीथी सूर्योदय पाय त्या सुधीनो महोरात्र पाय छ भने एक महोरावना पासठमा मागे ऊणी तिथि थाय . (६३). भावा मावा विशेपने लइने अहोरात्रयी तिथि मिम (ज्दी ) छ, भने दिवमराग्रिरूप विमागनी कल्पना करवायी ज ते तिथि ये प्रकारनी कहेवाय छे. (६४). बेम पर्यथी उत्पम ययेलो अहोरात्र एक जछे छवां संशा (नाम )ना मेदनी प्ररूपणा करयापी दिवस मने रात्रिना मेदय हे ये प्रकारनो कर्यों छे. (६५). तेज प्रमाणे चंद्रयी उत्पम थपेली एक ज तिथि संझाना मेदनी प्ररूपणा करवाथी दिवम भने रात्रिना मेदवडे पे प्रकारनी करायचे. (६६). एक एक तिथिना काळर्नु प्रमाण मा प्रमाणे क{छे- एक न्यून श्रीश (२९) मार्च तथा उपर एक मार्चना पामठ माग करीए तेरा पत्रीश - (६८) श्रीकाललोकप्रकाश द्वापष्टिकल्पिताः। अस्योत्पत्तिः कथमिति श्रद्धा चेत् श्रूयतां तदा ॥६८ ॥ श्रहोरात्रस्य भागा द्वा-पष्टिभागीकृतस्य हि। एकपष्टिस्तिथर्मान-मेकैकस्य यदीरितं ॥ ६९॥ द्वापष्टिजांशरूपैक-पष्टिस्तत्रिंशता हता। अहोरात्रमुहूर्तेः स्या-त्रिंशाप्टादशशत्यहो १८३० ॥ ७० ॥ एते चांशा द्वाप-प्ट्यंशीकृत- सकलतिथिमुहूर्तानां । संतीति द्वाषष्ट्या मुहूर्तकरणाय भजनीयाः ॥७१॥ ततो मुहूर्ता एकोन-त्रिंशद् द्वात्रिंशदंशकाः । द्वापष्टिजा मुहूर्तस्या- गतास्तैश्च तिथेमितिः ॥ ७२ ॥ कालेन चेयता पंच-दशांशश्चतुरंशकः । द्वाषष्ट्यंशीकृतस्येंदो-हीयते वर्द्धते तथा ।।७३ ।। ततश्च-यत्तिथिश्चंद्रजे- त्युक्तं तदप्येवं विनिश्चितं । इंदोःपंचदशांशस्य हानिवृद्ध्यनुवर्त्तनात् ॥७॥ इति तिथिमाननिरूपणं. सांप्रतं चेप्सितदिने कियन्मानेप्सिता तिथिः । इति ज्ञानाय करणं यथाशास्त्रं निरूप्यते ॥ ७५ ॥ अभीष्टतिथिपर्यंत-स्तिथिराशियुगादितः। द्वाषष्ट्या दियते लब्धं त्याज्यं शेषं तु यस्थितं ॥ ७६ ॥ तदेकषष्ट्या भाग (एटले के भोगणत्रीश महर्स अने एक मुहूर्चना बासठीया पत्रीश भाग एक तिथिना काळर्नु मान जाणवू.) आटला काळनी उत्पत्ति शी रीते थाय ? ते जो श्रद्धा होय तो सामळ. (६८).-एक अहोरात्रना बासठ भाग करीए तेमाथी एकसठ भाग जेटलं एक एक तिथिर्नु काळमान जे कहुं छे, ते बासठीया एकसठ अंशोने एक अहो. रावना त्रीश मुहूर्त्तवडे गुणवाथी अढार सो ने त्रीश ( १८३० ) थाय छे (६९-७०). श्रा (१८३०) अंशो बासठीया करैला पाखी तिथिना मुहूतौना छे, तेथी तेना मुहूर्त करवा माटे बासठवडे भागवा. (७१). तेम करवाथी ओगणत्रीश (२६) मुहूर्तों अने एक मुहर्तना वासठीया वत्रीश अंश पाटलं तिथिर्नु काठमान थयुं. (७२). पाटला काळे पंदरीश्रो एक भाग एटले बासठीया भाग करेला चंद्रना चार अश (8) हानि पामे के अने वृद्धि पामे छे. ( ७३ ). तेथी करीने तिथि चंद्रथी उत्पन्न थाय के एम जे कयुं ते पण मा प्रमाणे पंदर अंशवाळा चंद्रनी हानि-वृद्धिने अनुसरीने निश्चित थाय छे. (७४). इति तिथिमानप्ररूपणा. इथे इच्छेला दिवसे इच्छली तिथि केटला काळना प्रमाणवाळी होय छे ? ते जाणवा माटे शास्त्रमा वह्या प्रमाणे करण पतावीए छीए. (७५).-युगना प्रारंभी इच्छेली तिथि सुधीना तिथिराशिने बासठे भागवो. मागमा जे भावे तेनो त्याग करवो. शेष जे . सर्ग २८ मो। (९९) गुणितं द्वाषष्ट्या प्रविभज्यते । लब्धमत्रापि च त्याज्यं शेषास्तिष्ठति ये लवाः ॥ ७७ ॥ तावन्मानाभीष्टतिथि-विवक्षितदिने भवेत् । उदाहरण- मस्याथ करणस्य निशम्यतां ॥ ७८॥ युगस्य प्रथमे चंद्र-वर्षे मासे तथाश्विने । कियन्माना भवेच्छुक्ल-पंचमीत्यत्र कथ्यते ॥ ७९ ॥ तिथि- राशिर्भवत्येत-पंचम्यंतो युगादितः। श्रशीतिसंख्यो द्वाषष्ट्या भक्तेऽस्मि- नेक प्राप्यते ॥ ८ ॥ स च त्याज्यः शेष्टमष्टा-दश तान् परिताडयेत् । एक्पष्ट्या स्यात्ततोऽटा--नवत्याढ्यं सहस्रकं ॥ ८१॥ द्वापक्ष्यास्मिन् हृते लब्धं त्यक्तं शेपमिह स्थितं । द्वाषष्ट्यंशाश्चतुश्चत्वारिंशदित्येष निर्णयः 1८२॥ युगस्याये चंद्रवर्षे धवलाश्चिनपंचमी । चतुश्चत्वारिंशदंश-माना- स्तीत्यत्र भावना ॥३॥ अत्र चेयं वासना द्वापट्या हि तिथिभिः परिपूर्णा एकपष्टिरहोरात्रा भवंति, ततः परिपूर्गाहोरात्रपातनार्थ द्वापष्ट्या ईप्सिततिधिराशेविभागः क्रियते, विभागे च कृते यच्छेपमुपलभ्यते, तदेकपष्टिगुणं क्रियते तदेकैकस्यास्तिधेपष्टिभागीकृताहोरात्रसत्कैक- पष्टिभागप्रमाणत्वादिति ज्ञेयं. अंक रमो होय तेने एकसठे गुणी यासठे माग देवो. मागमा जे भारे सेनी पी पण त्याग फरवो. शेप जे भंश रहा होय तेटला प्रमाण गळी इष्ट दिवमनी इष्ट तिशि नागपी. मा करण- उदाहरण समिळो. (७६-७०).-युगना पहेला नंद्रवर्षमा प्राधिन माममा शुक्लपपनी पांचम केटला प्रमाणवाळी होय ? या प्रश्ननो यार कहीए छीए (७२) - युगना भारंमपी भा भाधिन शुक्ल पंचमी सुधीनो विधिराशि ऐशीनी संध्याकाळो छ, वेधी ते (८०)ने पासठे मागतां मागमा एक भाव के तेनो त्याग करवो. बाकी अढार (१८) रक्षा तेने एपमठे गुणवा; तेधी एक हजार ने महागुं (१०९ ) थाय छ. (८१). तेने पामठे मागतां मागा भावला (१७)नो त्याग क्यों. पाकी पामठीपा सुमाळीश मंश ग्या; सेथी मा प्रमाणे बार भाष्यो. (८२) के-युगना पहला पंद्रवर्षमा प्राधिन शुक्लपचनी पांचम मामठीया धुमाळीरा मंशना प्रमाग्यवाळी एम मही जाप. (८३). ही भाषा मा प्रमाणे के-पामठ तिपिए करीने परिपूर्ण एकमठ मरोराय पाय थे, संधी परिपूर्ण महोगन करवा माटे इष्ट विपिना राशिने पामठे मोगा जोइए. मांगाकार करवाची शेप रहे मेंने एकमठे गुणका बोइए. कारणफे दरेक विपिनुं प्रमाण एफ मोरावना पामठीया एस्मठ मागर्नु छ यी एम बाया.

(१००) भीकानलोकप्रकारा। युगेऽथावमरात्राणां स्वरूपं किंचिदुच्यते । भवंति ते च पड् वर्षे तथा त्रिंशद्युगेऽखिले ॥८४॥ एकैकस्मिन्नहोरात्र एको द्वापष्टिकल्पितः । लभ्यतेऽवमरात्रांश एकवृद्ध्या यथोत्तरं ॥ ८५ ॥ कर्ममासे ततः पूर्णे त्रिंशद द्वापष्टिजा लवाः। लभ्यतेऽवमरात्रस्य तत एवोच्यते वुधैः ॥८६॥ विश्लेपे विहिते येशाः शेषाः कमैंदुमासयोः । त्रिंशद् द्वापष्टिजाः कर्म- मासस्यैतेऽवमांशकाः ॥ ८७॥ उक्तं च-चंदउडुमासाणं अंसा जे दिस्सए विसेसंमि । ते अोमरत्तभागा भवंति मासस्स नायव्वा ॥ ८८॥ कर्ममा- सद्वये पूणे ततः पष्टिदिनात्मके। संपूर्णोऽवमरात्रः स्या-देकषष्टितमे दिने ॥ ८९ ॥ श्रयं भावः-द्वापष्टिरंशा: कल्प्यंते-होरात्रस्यादिमेऽथ च । तत्रैकषष्टिभागात्मा संपूर्णा प्रथमा तिथिः॥ ९० ॥ एको द्वाषष्टि- भागो यो-होरात्रस्यावशिष्यते । एकांशेन द्वितीयापि तिथिस्तत्र समा- विशत् ॥ ९१ ॥. एको द्वापष्टिभागोऽस्या अतीतः प्रथमे दिने । ततः हवे एक युगमा केटला भवरात्र भावे ? तेनुं कांडक स्वरूप कहीए छीए. ते अवमरात्रो एक वर्षमा छ श्रावे छे तेथी आखा एक युगमा त्रीश आवे छे. (८४). एक एक अहोरात्रमा एक अहोरात्रनो बासठीयो एक अंश अवमरावनो आवे छे. ए जरीते उत्तरोत्तर एक एक श्रवमरावना अंशनी वृद्धि करवी. (८५) तेथी करीने एक कर्ममास पूर्ण थाय त्यारे अवमरावना बासठीया त्रीश अंश प्राप्त थाय छे तेथी करीने ज पंडितो कहे छे के (८६)-कर्ममास भने चंद्रमासनो विश्लेप करीए त्यारे कर्ममासना जे बासठीया श्रीश अंश पाकी रहे थे से अवमानना भंशो के. (८७). कयु छ के-" चंद्रमास भने कर्ममासनो विश्लेप करता जे कर्ममासना शेष अंशो जोवामां आवे छेते अवमरावना अंशो जाणवा. (८८)" त्यारपछी साठ दिवसना प्रमाणवाळा ये फर्ममास पूर्ण थाय त्यारे एकसठमे दिवसे एक अवमरात्र (चयतिथि) पूर्ण थाय छे. (८९), श्रही भावार्थ आ प्रमाणे छे-एक अहोरात्रना बासठ अंश कल्पवा (करवा), तेमा पहेला एकसठ भागमा 'पहेली तिथि संपूर्ण थाय छे. (९०). ते अहोरात्रनो जे वासठीयो (छेन्लो) एक भाग बाकी रह्यो छे त्यां ते एक अंशे करीने वीजी तिथि प्रवेश करे छे. (बीजी तिथिनो एक अंश तेमा समाय ले ). (९१). या पीजी तिथिनो बासठीयो एक अंश पहेला १ क्षयविधि, सर्ग २८ मो। (१०१) पष्टयंशात्मिकेय-महोराने द्वितीयके ॥ ९२॥ द्वाषष्ट्यंशद्वये तस्य शेपेऽसौ पूर्णतां गता। द्वाभ्यो भागाभ्यां प्रविष्टा तृतीयास्मिस्ततस्तिथिः ॥९३ ॥ अहोरात्रे तृतीयेऽथ भागास्तुर्यतिथेस्त्रयः। प्रविशंत्यथ पंचम्या-श्चत्वारों- शास्तुरीयके ॥ ९४ ॥ एवमेकैकभागेन हीयते प्राकना तिथिः । वर्द्धते प्रत्यहोरात्रं तिथिरागामिनी पुनः ॥ ९५ ॥ एकत्रिंशत्तमतिथे-रेवं त्रिंश- त्तमे दिने । त्रिंशदंशाः प्रविष्टाः स्यु-स्ततस्तस्मिन् दिने खलु ॥ ९६ ॥ द्वात्रिंशदंशप्रमिता तिथिस्त्रिंशत्तमी भवेत् । त्रिंशवापष्टयंशमाना चैक त्रिंशत्तमी तिथिः ॥ ९७ ॥ क्रमाच-द्वावंशौ स्तः पष्टितम-तिथेः पष्टितमे दिने । एकपष्टितमतिथे-स्तत्र पष्टिः स्युरंशकाः ॥ ९८ ॥ एक पष्टितमतिथे-श्चैकपष्टितमे दिने।एकोशःस्यात्ततोद्वाष-ष्टितमी चाखिला तिथिः ॥ ९९ ॥ एवं च द्वापष्टितमी प्रविष्टा निखिला तिथिः ।' एक- पष्टिभागरूपा-त्रैकपष्टितमे दिने ॥८००॥ एकपष्टितमदिन-स्यायो महोरात्रमा व्यतीत थयो, तेथी बीजा अहोरात्रमा मा बीजी तिथि साठ-अंशवाळी रही. (९२). ते वीजा अहोरात्रना बासठीया चे अंश बाकी रमा त्यारे आ वीजी तिथि पूर्ण थाय छ; तेथी करीने ते वीजा अहोरावना छेल्ला चे अंशमा श्रीजी तिथिनो प्रवेश थाय छे. (९३). पछी त्रीजा महोरात्रने छेडे चोथी तिथिना बासठीया त्रण अंश प्रवेश करे के, अने चोथा अहोरात्रने छेडे पांचमी तिथिना चार अंशो प्रवेश करे थे. (९४). एज प्रमाणे उत्तरोत्तर अहोरात्रमा पूर्वनी तिथिनो एक एक अंश हानि पामे छे भने एक एक अहोरात्रमा आवती (पछीनी) विधिनो एक एक अंश वृद्धि पामे छे. (९५). आ प्रमाणे गणवां त्रीशमा अहोरात्रने विषे एकत्रीशमी तिथिना त्रीश अंश प्रवेश करे छे, तेथी ते अहोरात्रे त्रीशमी तिथिना पत्रीश अंशो भोगवाय छ भने बासठीया त्रीश भंश एकत्रीशमी तिथिना होय छे. (९६-९७). एब अनुक्रमे करीने साठमा अहोरात्रे साठमी तिथिना वे अंशोज होय छे, अने एकसठमी तिथिना साठ अंशो होय छे. (९०) तथा एकसठमा अहोराने एकसठमी तिथिनो एक अंश होय छे तेथी बासठमी आखी तिथि तेमा समाइ जाय छे. (९९). या प्रमाणे श्रा एकसठमा अहोरात्रमा एकसठ अंशना प्रमाणवाळी बासठमी तिथि पाखी समाइ जायचे. (८००). तेथी एकसठमा अहोरात्रनो जे पहेलो बासठीयो अंश छे, ते एकसठमी तिथिनो (१०२) भीलोकप्रकारा | द्वापष्टिजो लवः। एकषष्टितमतिथे-श्चरमोऽसौ विभाव्यतां ॥१॥ ततश्च द्वापष्टितमो-ऽप्यत्रैवांतं गतस्तिथिः । एवमस्मिन्नहोरात्रे द्वे तिथी पूर्णता गते ॥ २॥ द्वापष्टितमघस्रस्य ततः सूर्योदयक्षणे । उपस्थिता पूर्वरीत्या द्राक् त्रिपष्टितमी तिथिः ॥ ३ ॥ एवं च द्वापष्टितमी नाता सूर्योदयं तिथिः । पतितेति ततो लोके शुभकार्येष्वनादृता ॥४॥ तथाहुः-एकमि अहोरत्ते दोवि तिही जत्थ निहणमेजासु । सोत्थ तिही परिहायइ सुहुमेण हविज सो चरिमो ॥ ५॥ ' सुहुमेणत्ति' सूक्ष्मेण-प्रतिश्ल. क्ष्णेन द्वाषष्टितमरूपतया एकैकेन भागेन हीनेन परिहीयमानाया द्वाप- प्टितमायास्तिथेः स एकषष्टितमो दिवसश्चरम इति, तथाहि-युगस्याद्य- प्रतिपद-श्चतुःपर्वव्यतिक्रमे । लभतेऽवमरात्रत्व-मेकपष्टितमा तिथिः ।। ६ ।। आश्विनप्रतिपत् कृष्णा सा ज्ञेयास्यां यतोऽविशत् । तिथिद्वितीया सर्वांश-रेकषष्टिलवात्मिका ॥ ७ ॥ ज्योतिष्करंडके तु-तइयंमि ओमरतं कायव्वं सत्तमंमि परकंमि । वासहिमगिम्हकाले चउचउमासे विधीयंते. एकज छल्लो अंश होय छ एम जाणवू. (१). तेथी करीने बासठमी तिथि पण आ एकसठमा अहोरात्रमा ज पूर्ण थाय छे, तेथी पा एकसठमा अहोरात्रमा वे (एकसठमी भने बासठमी) तिथि पूर्णताने पामे छे. (२). तेथी पासठमा अहोरात्रना सूर्योदय वखते पूर्वनी रीते गणतां ग्रेसठमी तिथि प्राप्त थाय छ (शरु थाय छे). (३) एम थवाथी वामठमी तिथि सूर्योदयने पामी नहीं, तेथी ते लोकमां पतित (आय) तिथि कहेवाय छे. ते चयतिथिनो शुभ कार्यमा श्रादर करातो नथी. (४). कह्यु के जे अहोरात्रमा वे तिथि पूर्ण थाय छे, ते दिवस शुभ कार्यमा तजवा लायक छ; केमके सूक्ष्मताने लीधे ते दिवस छेलो कहेवाय छे. (५). ही सूक्ष्म एटले वामठीया एक एक अशे करीने हीन थती पासठमी तिथिनो ते एकसठमो दिवस चरम एटले छेल्लो छे. ते आ प्रमाणे-युगनी पहेली प्रतिपदाथी चार पर्व व्यतीत थाय त्यारे एकसठमी तिथि अवमरात्रपणाने पामे छे. (६). ते पाश्विन मासनी कृष्णपक्षनी प्रतिपदा जाणवी, केमके तेमा (प्रतिपदामा) एकसठ अशवाळी चीजनी तिथि पाखी समाय जाय छे. (७). ज्योतिष्करंडकमां तो आ प्रमाणे का छे.-" वर्षा, हिम अने ग्रीष्मकाळना चार चार मासने विषेत्रीजा भने सावमा पखवाडीयामां अनमरात्र आवे छे. (८). " सर्ग २८ भो। ॥८॥ इत्युक्तं. एतदनुसारेण च थापाढप्रतिपद धारभ्य यथोत्तरमेकय. ष्टितमासु भाद्रपदकृष्णप्रतिपदादिष्ववमरात्राः स्युः, परं ज्योतिष्करंडटी- कायां श्रीमलयगिरिपादैरेवमुक्तं-इहापाढाद्या लोके ऋतवः प्रसिद्धिमैय- रुस्ततो लौकिकव्यवहारमपेक्ष्याषाढादारभ्य प्रतिदिवसमेकैकद्वापष्टि- भागहान्या वर्षाकालादिगतेषु तृतीयादिपर्वसु यथोक्ता अवमरात्राः प्रतिपाद्यते, परमार्थतः पुनः श्रावणबहुलप्रतिपल्लक्षणाद्युगादित प्रारभ्य चतुश्चतुःपतिक्रमे वेदितव्या इति ज्ञेयं. पाश्विनस्य तृतीयाया-असि- तायाः प्रभृत्यथ । कृष्णा तृतीया मार्गस्या-मस्तुर्यान्विता भवेत् ॥ ९॥ प्रभृत्यस्याश्च पंचम्याः कृष्णा माघस्य पंचमी । युक्ता पतितया पठ्या प्राप्नोत्यवमरात्रतां ॥ १० ॥ एवं च -आश्विनो मार्गशीर्षश्च माघ- चैत्रस्तथा परः । ज्येष्ठस्ततः श्रावणश्च पुनरप्येत एव पद् ॥ ११ ॥ पुनरप्याश्विनो मार्गो द्वितीयः पौप एव च। युगाद्यढे पंचदश मासाः साव- मरात्रकाः ।।१२।। आश्विनायेपु मार्गाते-वष्टस्वाद्येष्वनुक्रमात् । विषमाः श्रा वचनने अनुसारे अषाढ मासनी प्रतिपदाने श्रारंभी उत्तरोचर एकसठमी तिथिमोने विपे एटले भाद्रपद कृष्णपक्षनी प्रतिपदा विगेरे विथिने विषे अवमरात्रो होय छे; परंतु ज्योतिष्करंडकनी टीकामा श्रीमलयगिरिमहाराजे मा प्रमाणे कयु छ के-"मही लोकमा अपाढ मासने प्रारंभीने ऋतुनी प्रवृति प्रसिद्ध छे, तेथी लौकिक व्यवहारनी अपेक्षाए अषाढ मासथी प्रारंभीने हमेशा एक एक यासठीया अंशनी हानिवडे वर्षाकालादिकमां रहेला तृतीयादिक पर्वने विपे उपर कशा प्रमाणे अवमरावो कहा छ परंतु परमार्थथी तो श्रावण वद एकमरूप युगना आदिथी भारंमीने चार चार पर्व गया पछी अवमरात्री भावे छ एम बाण." प्राधिन मासना कृष्णपचनी तृतीयाधी भारंमीने मार्गशीर्ष मासना कृष्णपचनी चौथनी साथै रहेली बीज अवमरात्र थाय छे. (९), मार्गशीर्ष कृष्ण पंचमीथी पारंमीने माधनी पतित पष्ठी सहित कृष्ण पंचमी अवमरात्रपणाने पामे छे. (१०). प्रारीते होपाथी आश्विन, मार्गशीर्ष, माघ, चैत्र, ज्येष्ठ अने श्रावण तथा फरीथी पण ते ज छ मास भने त्यारपछी भाश्विन, मार्गशीर्ष मने बीजो पोष प्रापंदर मास युगना प्रथम अर्धमा अवमरात्रवाळा आवे छे. (११-१२). प्राधिनधी प्रारंमी मार्गशीर्ष .

(१०४) भीकाललोकप्रकाश। प्रतिपन्मुख्याः स्युः कृष्णास्तिथयोऽवमाः ॥१३॥ माघादिषु स्युद्वितीय- पौषांतेषु च सप्तसु । समसंख्या द्वितीयाद्या उज्ज्वलास्तिथयोऽवमाः ॥१४॥ विषमेभ्योऽवमेभ्यश्चा-नंतरास्तिथयः समाः। पतिताः स्युद्विती- याद्या-स्तेऽष्ट प्रतिपदन्विताः ॥ १५॥ अवमेभ्यः समेभ्यस्तु विषमा- स्तिथयः खलु । भवंति पतिताः सप्त तृतीयाद्या यथोदिताः॥ १६ ॥ चैत्रो ज्येष्ठः श्रावणोऽश्व-युग्मार्गो माघ एव च । पुनः पडेते चैत्रोऽथ ज्येष्ठोत्याषाढ एव च ॥१७॥ युगांत्या? पंचदश मासाः सावमरात्रकाः। तिथयस्त्ववमाः कृष्ण-शुक्लाः पूर्वार्द्धवत्स्मृताः ॥१८॥ प्रतिपद्यवमरात्री-भूतायां कुत्र पर्वणि । द्वितीयांतः समा- विश्य जायते पतिता तिथिः ॥ १९ ॥ ॥ १९ ॥ अवमत्वं अवमत्वं द्वितीयायां प्राप्तायां क च पर्वणि । तृतीया पततीत्येवं पृच्छेत्कोऽप्यखिलाः -क्रमात् ॥ २० ॥ ततोऽत्र करणाम्नायः कश्चित्ताग्निरूप्यते । पर्यत पहेला माठ मासमां अनुक्रमे कृष्णपक्षनी एकम विगेरे एकी तिथिमो अवमरात्रो होय छे. (-१३). अने माघी प्रारंभी वीजा पोष सुधीना सात मासा शुक्लपक्षनी बीज विगैरे की तिथिो अवमरात्रो होय छे. (१४). एकी अवमरात्रोनी पछीनी बीज विगेरे चेकी पतित (चय ) तिथिो जे श्रावे छे ते प्रतिपदा सहित करवाथी पाठ थाय छ. (१५), भने बेकी अवमरात्रोनी पछीनी त्रीज विगेरे सात एकी तिथिमो पतित थाय छे. (१६). चैत्र, ज्येष्ठ, श्रावण, माश्विन, मार्गशीर्ष भने माघ तथा फरीथी पण तेज छ मास, त्यारपछी पायो चैत्र, ज्येष्ठ भने बीजो अषाढ श्रा युगना पाछला अर्ध- भागना पंदर मास अवमरात्रवाळा होय छे. तेनी अवम तिथिो कृष्ण ने शुक्लपक्षमा पहेला अर्धमा कशा प्रमाणे कही छे. (१८). प्रश्न-प्रतिपदा अवमरान होय तेमां द्वितीया तिथि पेसीने पतित थाय थे, ते कया पर्वमा ? (तथा ते अवमरात्र पण केटलामो होय!) (१९). प्रश्न-प्रवमरात्र द्वितीया होय तेमां तृतीया पतित थाय ते कया पर्वमा ? (तथा ते केटलामो भवमरात्र होय !) मा प्रमाणे अनुक्रमे सर्व अवमरान संबंधी कोइ प्रश्नो करे. (२०) तो भा बावतमा एक एवं करण कहेवामां आवे छे के जेथी या सर्व प्रश्नोना उचर १ भाभिनयी भावण सुधीना छ भने फरीथी माश्विन तथा मार्गशीर्ष मळी माठ, । सर्ग २८ मो। (१०५) यस्माद्यथोक्तपृच्छासु कुर्यात्प्रतिविधीन् सुखं ॥ २१ ॥ पृच्छास्वेतासु विषमा-स्तिथयोऽत्र भवंति याः । रूपाधिकासु द्विनासु तासु स्यात्पर्वनिर्णयः ॥ २२ ॥ समास्तु तिथयो रूपा-भ्यधिको द्विगुणीकृताः । एकत्रिंशद्युताः सत्यो-ऽनीतपर्वप्रकाशिकाः॥२३॥ पर्वसंख्या सां च पंच- दशना सपतत्तिथिः। विभज्यमाना द्वाषष्ट्या--बमसंख्यां प्रकाशयेत् ॥२४॥ श्राद्ये प्रश्ने यथोद्दिष्टा प्रतिपत्तिथिरित्यतः। एकको विषमः सैको द्विघ्नो जातं चतुष्टयं ॥ २५ ॥ युगादितो व्यतिक्रांते ततः पर्वचतुष्टये । अवमायाँ प्रतिपदि द्वितीया न्यपतत्तिथिः ॥ २६ ॥ चतूरूपा पर्वसंख्या पष्टिः पंच- दशाहता । पतत्तिथिद्वितीयेति द्वाभ्यां युक्ता विधीयते ॥ २७ ॥ जाता द्वापष्टिरेपा च द्वाषष्ट्या प्रविभज्यते । लब्ध एकस्ततो जातो-विमरात्रोऽ- यमादिमः ॥ २८ ॥ कदा पुनद्वितीयायां तृतीया पततीनि च । प्रश्ने द्वितीयोद्दिष्टेति द्विको रूपाधिकस्त्रयः ॥ २९ ॥ ते च द्विगुणिताः पद् स्यु-द्वितीया यत्समा तिथिः । एकत्रिंशद्युताः पट् ते सप्तत्रिंशद्भवंति सुखेथी कही शकाय. (२१). आ प्रश्नोने विषे जे विपम (एकी) तिथिो होय नेमा एक उमेरी ए गुणवाथी पर्वनो निर्णय थाय छे. (२२). अने जे सम (येकी) तिथिो होय तेमां एक उमेरी पेए गुणी तेमा एकत्रीश उमेरवाथी व्यतीत पर्वनी संख्या स्पष्ट थाय छे. (२३). हवे जे पर्वनी संख्या भावी होय तेने पंदरे गुणी पतित विधिनी संख्या तेमा उमेरवी. पछी तेने यासठे भागवाथी अवमतिथिनी संख्या स्पष्ट थाप छे. (२४). जेमके पहेला प्रश्नमा एकमनी तिथि कही छे, ते एकनो अंक विपम (एकी) छे, तेथी तेमा एक उमेरता घे थया, तेने ए गुणतां चार यया. ( २५). तेथी युगना प्रारंभथी चार पर्व जाय त्यारे अवमरात्र प्रतिपदाने विपे द्वितीया तिथि पडे छे (समाय छे) ए जवाव प्राव्यो. (२६). हवे पर्वनी संख्या चार के तेने पंदरे गुणतां साठ थाय तेमा पडती तिथि द्वितीया होवाथी पे उमेरता यामठ थाय. प्रा बासठने वासठवडे मागतो मागमा एक पाये छे, तेथीमा प्रतिपदा अवमरात्र पहेलो के एमजवाब आव्यो. (२७-२८). प्रश्न-क्या पर्वमां द्वितीया तिथिमा तृतीया पडे छ ? आबीजा प्रश्नमा वीज कही छे तेथी घेर्मा एक उमेरता त्रण थाय. (२९). तेने बेए गुणवाथी छ थाय. ते बीजनी तिथि सम (बेकी) के तेथी छमा एकत्रीश उमेरवायी साडत्रीश याय. (३०), तेवी युगनी (१०६) श्रीकाललोकप्रकाश | तत् ॥३०॥ ततश्च-सप्तत्रिंशत्तमे पर्व-पयतिक्रांते युगादितः । द्वितीयायां निपतिता तृतीयेत्येष निर्णयः ॥ ३१॥ पर्वसंख्या चात्र सप्त-त्रिंशत्पंच- दशाहता । पंचपंचाशदधिका शताः पंच भवंत्यतः ॥ ३२॥ पतत्तिथि- स्तृतीयेति त्रीणि तेषु विनिक्षिपेत् । अष्टपंचाशदधिका जाता पंचशती ततः ॥ ३३ ॥ विभज्यतेऽसौ द्वाषष्ट्या नव प्राप्तास्ततः खलु । नवमोऽ- वमरात्रोऽयं जात इत्येष निर्णयः ॥ ३४॥ सर्वास्वपि तिथिष्वेवं कार्या करणभावना । पर्वनिर्देशमात्रं तु क्रियते नाममात्रतः ॥३५॥ तृतीयायां पतेत्तुर्या गते पर्वण्यथाष्टमे । चतुर्थ्यां पंचमी चैक-चत्वारिंशत्तमे गते ॥३६॥ षष्ठी पतति पंचस्यां पर्वणि द्वादशे गते । पठ्यां च सप्तमी पंच- चत्वारिंशत्तमे गते ॥ ३७॥ सप्तम्यामष्टमी याया--द्याते पर्वणि षोडशे । श्रष्टम्यां नवमी चैको-नपंचाशत्तमे गते ॥ ३८॥ नवम्यां माति दशमी द्राग्विशतितमे गते । एकादशी दशम्यां च त्रिपंचाशत्तमे गते ॥ ३९ ॥ एकादश्यां द्वादशी च चतुर्विशतिसंख्यके । तस्यां त्रयोदशी सप्त- पंचाशत्संख्यके गते ॥ ४०॥ गतेऽष्टाविंशतितमे त्रयोदश्यां चतुर्दशी। शरुपातथी साडत्रीशसु पर्व वीची गये सते द्वितीयामा वृतीया पडे छे एम निर्णय थयो. (३१). तथा अहीं पर्वनी संख्या साडत्रीश छे तेने पंदरे गुणवाथी पांच सो ने पंचावन थाय छे. (३२). तेमां पडती तिथि तृतीया छे माटे त्रण उमेरतां पांच सो ने भावन थाय छे. (३३). तेने पासठे भागता भागमा नव आवे छे, तेथी युगनी शरुआतथी या नवमो अवमरात्र के एम निर्णय थयो. (३४). भा प्रमाणे सर्व तिथिओने विषे करणनी भावना करवी, तो पण अहीं मात्र पर्वनी संख्यानो निर्देश नाममात्र करीए बीए. (३५) -युगनी आदिथी आठमुं पर्व जाय त्यारे त्रीजने विषे चोथ पडे छे. एकताळीश पर्व जाय स्यारे चोथने विषे पांचम पडे छे. (३६). चारमुं पर्व जाय त्यारे पांचमने विषे छठ पडे छ, पीस्ताळीश{ पर्व जाय त्यारे छठने विषे सातम पडे छे, (३७), सोळ९ पर्व जाय त्यारे सातमने विषे आठम पडे छे, भोगणपचासमुं पर्व जाय त्यारे भाठमने विषे नोम पडे थे, (३८), वीश पर्व गये सते नोमने विपे दशम पडे थे, पनाएं पर्व बाय सारे दशमने रिपे भग्यारश पडे , (३६), चोवीशस पर्व जाय त्यारे अग्यारशमा बारश पडे छ, सत्तावन पर्व जाय त्यारे बारशमा तेरश पडे छ, (४०), अहावीश पर्व जाय सर्ग १८ मो। (१०७) चतुर्दश्यां विशेद्राका चैकपष्टितमे गते ॥४१॥ गते द्वात्रिंशत्तमेऽमा- वास्यायां प्रतिपदिशेत् । एता युगस्य पूर्वार्दै पराःऽप्येवमेव ताः ॥४२॥ राकायां च प्रतिपदो भूतेष्टायाममातिथेः। संपातसंभवो नास्ती-त्येतद् ज्ञेयं मनस्विभिः॥४३॥ एतस्य यंत्रके दृष्टे भवता प्रत्ययो दृढः । भविष्यतीति तत्सम्यग् वीक्षणीयं विचक्षणाः ॥४४॥ त्यारे तेरशमा चौदश पडे छे, एकसठ पर्व जाय त्यारे चौदशमां पूर्णिमा पडे थे, (४१) भने यत्रीशमं पर्व जाय त्यारे श्रमावास्याने विष प्रतिपदा पडे छे. आ तिथिो युगना पहेला अर्धमां पडे थे, युगना वीजा अर्धमां पण एज प्रमाणे जाणवू. (४२). पूर्णिमाने विष प्रतिपदानुं पडवू अने चौदशने विपे अमावास्यानुं पडघु संभवतुं नथी एम पंडितोए जाणवू. (४३) या पायतनो यंत्र जोवाथी तमोने दृढ प्रतीति थशे, तेथी हे विचषण पुरुषो! ते यंत्र सारी रीते जुमओ. (४४). यंत्र. प्रथम चंद्रवर्ष युगपूर्वार्ध. वर्ष द्वितीय चंद्रवर्ष अर्घअभिवधित मास पासोमागीमाष चैत्र ज्येष्ठ श्रा.आ.मार्गौमाघचैत्र ज्येष्ठ श्रा.मामागीबीजोपोप पक्ष कृष्ण क.क.क.क.कृ.कृ.क. शुक्न शु शु. शु. शु. शु. भवमतिथि १३ ७/९/११/१३० | पाततिथि २ ४६८१०,१२,१४|१३५७ ९/१११३) १५ ५ युगपश्चिमा. वर्ष अर्धमिवर्धित चंद्रवर्ष अमिवर्धितवर्ष मास (चैत्र ज्येष्ठ था. आ./मार्गमाघ चैत्रज्येष्ठ श्रा.प्रा.मार्गमाघ,चैत्राज्ये बी.भपाढ. पक्ष कृष्ण कक.क.के.क.क.क. शुक्र शु. शु.शु. शु.शु. अवमतिथि १३ ७/१/११/१३ ० | २/४/६/८/१०/१२, १४ पाततिथि २ ४ ६ ५ (१०८) भीकासलोकप्रकाश। ननु कालः सदाऽनादि-प्रवाहः परिवर्तते । जगत्स्वभावानियत- स्वरूपेण दिवानिशं ॥ ४५ ॥ न हानिः कापि कालस्य न च वृद्धिः स्वरूपतः। ततोऽत्रावमरात्राधि-मासादीनां कथा वृथा ॥ ४६॥ सत्य किविह मासानां विरूपाणां परस्परं । अंशादिभिर्विशेपो यो वर्तते तदपेक्षया ॥४७॥ विरक्ष्येते हानिवृद्धी कालस्य न तु वास्तवी । वस्तुतस्त्वेप नियत-स्वरूपः परिवर्तते ॥ ४ ॥ तथाहि-चंद्रमासविवक्षायां कर्म- मासव्यपेक्षया । कालस्य हानिर्वृद्धिश्च सूर्यमासविवक्षणे ।। ४९ ॥ पृथग् पृथग विवर्त्तते वस्तुतस्तुं त्रयोऽप्यमी। मासा अनादिनियत-स्वरूपेण सदा भुवि ॥ ५॥ अथ नष्टतिथिं ज्ञातुं करणं प्रतिपाद्यते । विज्ञायते सुखं येना- नुक्तापि पर्वयुक् तिथिः ॥५१॥ समुद्गच्छति मार्तडे यद्यकाभिजितः कला । भुक्ता चंद्रमसा तहि कतमत्पर्व का तिथिः ॥ ५२ ॥ पत्र सर्ग २८ मो। (१०९) कला एकत्र मेलयेत् ॥ ५३ ॥ कला चात्राहोरात्रस्य सप्तपष्टितमो भागो योद्धव्यः, इष्टभेष्टकला ताभ्यो-ऽपनीयेत स्थितं च यत् । त्रिनवत्यधिकै- स्ताड्यं तत्रयोदशभिः शतैः ॥ ५४ ॥ विभज्यते च तत्रिंशै-स्ततोऽष्टा- दशभिः शतैः । लब्धं संत्यज्यते शेषं यत्स्यात्तत्स्थाप्यते द्विशः ॥ ५५॥ एकत्रास्मिन्नेकषष्ट्या विभक्के यदवाप्यते । अन्यराशौ क्षिप्यते तत् सोऽकराशिः पुनस्ततः ।। ५६ ॥ इियते पंचदशभि-हते च यदवाप्यते । तानि पर्वाणि शेषांशा-स्तिथिसंख्या भवेदिह ॥ ५७॥ किंच-भमत्रा- भिजिदेवायं तत्कलाप्यादिमोदिता । तदेककात्तत्कलांका-न्न किंचिद- पनीयते ॥ ५८ ॥ यदस्मादेककादेक-कलापनयने भवेत् । शून्यं शेष ततो न स्या-गुणमाद्या क्रियोत्तरा ॥ ५९॥ यथा पूर्वोक्तपृच्छाया-मेका याभिजितः कला । गुण्यते त्रिनवत्याढ्यैः सा त्रयोदशभिः शतैः ।।६।। तावदंका भवेत्रिशै-नेपाष्टादशभिः शनैः । विभक्तुं शक्यते तेन विधिः शेषो विधीयते ॥ ६१ ॥ त्रयोदशशती सत्रि-नवतिदिनिधीयते । एको नक्षत्रनी इष्ट कळा सुधी अनुक्रमे एकठी मेळवी ( सर्वनो सरवाळो करयो ). (५३). अही कळा एटले एक अहोरात्रनो सडमठमो भाग जाणवो. ते कळायोमाथी इष्ट नक्षत्रनी इष्ट कळाने याद करवी. जे वाकी रहे तेने तेर सो ने त्राणुए गुणवा. (५४). पछी तेने अढार सो ने त्रीशे मांगवा. मागमा जे आवे तेनो त्याग करवो भने जे शेष रहे तेने वे चार स्थापवा. (५५). तेमाथी एक तरफना स्थापेला अंकने एकमठे मांगता जे भागमा आवे तेने चीजी राशिमा (बीजी तरफना स्थापेला अंकमां ) भेळववा, ते अंकराशि कहवाय छे. (५६). ते अंकराशिने पदरे मागता जे मागमा आवे ते पर्व जाणवा अने जे शेष रहे ते तिथिनी संख्या जाणवी. (५७). पा रीत प्रमाणे मही प्रश्नमा अभिजित् नक्षत्र कर्वा ते पहेलु ज छे, वेनी कळा पण पहेली ज कही छे तेथी एकनी संख्यावाळा तेनी कळाना अंकथी काइ पण बाद थह शकतुं नथी. (५८). कारणके प्रा एकनी संख्यामाथी एक कळा याद करतां शेष शून्य रहे छ तेथी करीने पागळ करवानी कहेली गुणाकार विगैरेनी क्रिया थइ शकती नथी. (५९). पूर्वे पूछेला प्रश्नमा जे श्रमिजित्नी एक कळा कही थे, तेने तेर सो ने त्राणुए गुणतां तेटलो ज ( १३९३ ) अंक प्रावे छे. तेने भढार सो ने त्रीशवडे भांगी शकाता नथी, तेथी बाकीनो विधि करवो. (६१). एटले के तेर सो ने त्राणुना अंकने ये ठेकाणे स्थापन करखो. तेमांयी एक तरफना मंकने (११.) भीकाललोकप्रकारा। राशिश्चैकषष्ट्या दियते तत्र चाप्यते ॥ ३२॥ द्वाविंशतिः क्षिप्यते सा परराशौ ततो भवेत् । चतुर्दशशती पंच-दशभिस्सहिताथ सा ॥ ६३ ।। हियते पंचदशभि-श्चतुर्नवतिराप्यते । शेषास्तिष्ठति पंचांशा-स्ततः पूर्वोक्तनिर्णयः ।। ६४ ॥ चतुर्नवतिसंख्यस्य पर्वणः पंचमीतिथौ। सूर्योदये चंद्रमसा भुक्तकाभिजितः कला ॥ ६५ ॥ करणानि निरूप्यन्ते तिथ्यर्द्धप्रमितान्यथ । भवंति तानि द्वैधानि च. राणि च स्थिराणि च ॥६६॥ ववंच बालवं चैव कौलवं स्त्रीविलोचन गरादि वणिज विष्टिः सप्तैतानि चराणि यत् ॥६७।। अन्यत्र स्त्रीविलोचनस्थाने तैतिलमिति, गेरादिस्थाने च गरमिति संज्ञा श्रूयते इति ज्ञेयं. तिथिष्वनि- यतास्वेता-न्यावर्तते यथाक्रमं । शुक्लपक्ष प्रतिपदः पश्चिमाढ़े चवं भवेत् ॥६॥ द्वितीयायाश्चादिमेऽढे बालवं कौलवं परे । तृतीयायाश्चादिमेऽढ़ें भवति स्त्रीविलोचनं ॥१९॥ अपराढ़े तृतीयाया गरादिकरणं भवेत् । चतु- Oः प्रथमेऽद्वै स्या-द्वणिज विष्टिरंतिमे॥७०॥ पुनर्वर्व वालवं च पंचम्या एकसठे मांगयोतेथी भागमा बावीश आवे छे. तेने पीजी स्थापेली राशिमा नाखवाथी चौद सो ने पंदर (१४१५) थाय छे. (६३). तेने पंदरे मांगता भागमा चोराणुं आवे छे भने चाकी पांच शेष रहे छ; तेथी पूर्वे कहेला प्रश्ननो निर्णय र थयो के (६४)-चोराणुमा पर्वनी पाचमनी तिथिए सूर्योदयने समये चंद्रमाए भमिजित्नी एक कळा भोगवी. (६५). हये करणोनी प्ररूपणा करे छे. ते दरेक करणो अर्ध तिथिना प्रमाणवाळा होय छे. ते घर भने स्थिर एम से प्रकारना होय छे. (६६). पब, पालव, कौलव, स्त्रीविलोचन, गरादि, वणिज भने विष्टि प्रा सात करणो पर छे. (६७). कोइक ठेकाणे स्त्रीचिलोचनने ठेकाणे तिल भने गरादिने ठेकाणे गर एवा नाम संमळाय के एम जाणघु. भा करतो अनियमित विधिमोने विपे अनुक्रमे फर्या करे छे. तेमा शुक्लपक्षने विपे प्रतिपदाना पाबला भर्थ मागमा पव नामर्नु करण होय छे, (६८), द्वितीया विधिना पहेला भर्ध भागा घालव नामर्नु करण होय छे, पाइला भर्ध भागमा कौलव नामर्नु करण होय छे, श्रीजना भादि अर्ध भागमां स्त्रीविलोचन नामर्नु करण होय के (६९), श्रीजना पाछला मर्ध भागमा गरादि नामर्नु करण होय थे, चोथना पहेला अर्ध भागमा वणिज नामर्नु करण होय छे भने चौथना पाठला भर्घ मागमा विष्टि नामर्नु करण होय छे. (७०).

सर्ग २८ मो। (.१११) अर्द्धयोर्द्वयोः । क्रमादर्द्धद्वये पष्ठ्याः कौलवस्त्रीविलोचने ॥७१॥ अर्द्धद्वये च सप्तम्या गरादिवणिजे स्मृते। अष्टम्याः प्रथमेऽर्दै स्याद्विष्टिरंत्ये पुनर्वयं ॥ ७२ ॥ वालवं कौलवं चेति नवम्या अर्द्धयोर्द्वयोः अर्द्धद्वये दशम्याः स्त्री-विलोचनगराभिधे ॥७३॥ एकादश्याः प्राक्तनेऽर्द्धं वणिजे विष्टिरंतिमे ! पुनर्बवं वालवं च द्वादश्या अर्द्धयोर्द्वयोः ।। ७४ ॥ अर्द्धद्वये त्रयोदश्याः कौलवस्त्रीविलोचने। अर्द्धद्वये चतुर्दश्या गरादिवणिजे क्रमात् ॥७५ ॥ पूर्णिमायाः प्राक्तनेऽढ़े विष्टिरंत्ये पुनर्ववं । कृष्णपक्ष प्रतिपदा पूर्वार्द्ध बालवं स्मृतं ॥ ७६ ॥ अत एव युगस्यादिलवकरणे पूर्व निरू- पितेति ज्ञेयं. अंतिमेऽर्द्ध प्रतिपदः कौलवं करणं भवेत् । द्वितीयाहनिशोश्च स्त्री-विलोचनगरादिके ॥ ७७ ॥ तृतीयायां च वणिज-विष्टी स्यातामह- निशोः । चतुर्थ्याश्चाहि रात्रौ च क्रमेण पचवालवे ॥ ७८ ॥ दिने रात्रौ च पंचम्याः कौलवस्त्रीविलोचने । गरादिवणिजे षष्ठ्याः सप्तम्या विष्टि- फरीथी बव अने बालव ए ये करणो अनुक्रमे पांचमना बन्ने अर्धमागमा होय छे, कौलव अने स्त्रीविलोचन ए वे करणो अनुक्रमे छटना पन्ने अर्धभागमा होय छे, (७१), गरादि अने वणिज ए ये करणो सातमना बने अर्धमागमा अनुक्रमे होय छे; तथा भाठमना पहेला अर्धने विषे विष्टि करण होय छे भने आठमना पाछला अर्धने विषे वय करण होय छे (७२) बालव अने कौलव ए वे करणो नोमना बन्ने अर्धने विषे होय छे, स्त्रीविलोचन भने गर एचे करणो दशमना पन्ने अर्धभागमां होय छे (७३). अग्यारशना पहेला अर्धमां वणिज अने बीजा अर्धमा विष्टि होय छे. फरीथी वव भने पालव ए चे करणो बारशना बन्ने अर्धमां होय छे (७४), तेरशना बन्ने अर्धमा कौलव भने स्त्रीविलोचन होय छ, चौदशना पने अर्धमा अनुक्रमे गरादि अने वणिज होय छे (७५) तथा पूर्णिमाना पहेला अर्धमागमा विष्टि अने बीजा अर्धमागमा फरीथी बव भाषे छे. पछी कृष्ण पचनी प्रतिपदाना पूर्वार्धमां बालव कहेलुं छे. (७६). मा कारणथी ज युगनी शरुपात बालव करणमा थाय छे एम प्रथम कही गया बीए. पछी कम्मापक्षनी एकमना पश्चार्धमां कौलव करण आवे छे, बीजना दिवस भने रात्रिरूप चमे अर्ध भागा स्त्रीविलोचन भने गरादि आवे छ (७७), श्रीजना दिवसे (पूर्वार्षमा ) वणिज अने रात्रे (पश्चार्घमां) विष्टि होय छे, चौथने दिवसे पव भने रात्रे बालव भावे थे (७८), पांचमने दिवसे कौलव अने रात्रे स्त्रीविलोचन (११२) श्रीकाललोकप्रकाश । सद्ववे ॥ ७९ ॥ अष्टम्यास्त्वह्नि रात्रौ च क्रमाहालक्कौलवे । अर्द्धद्वये नवम्याः स्त्री-विलोचनगरादिके ॥८०॥ दशभ्यां वणिजं विष्टिः क्रमा- दर्द्धद्वये भवेत् । एकादश्यां दिवारात्रौ क्रमेण वववालवे ॥८१॥ द्वादश्याश्च दिने रात्रौ कौलवस्त्रीविलोचने । गरादिवणिजे ज्ञेये त्रयोदश्यामहर्निशोः ॥ ८२ ॥ चतुर्दश्यां दिवा विष्टि-रष्टावावृत्तयः स्मृताः । चराणामिति सप्तानां मासे मासे पुनः पुनः ॥ ८३ ॥ तथाहुः-"मासेऽष्टशश्चराणि स्थुरुज्ज्वलप्रतिपदंत्या.त्.” रात्रौ कृष्णचतुर्दश्याः शकुनिः करणं भवेत् । चतुष्पदं च नागं चा-मावास्यामर्द्धयोयोः ।। ८४ ।। किंस्तुघ्नं स्यात्प्रति- पदः शुक्लायाः प्रथमेऽर्द्धके । एतानि स्युस्तिथिष्वेते- ष्वेव प्राहुः स्थिरा- ण्यतः ॥ ८५ ॥ अत्र सर्वत्र दिनरात्रिशब्देनापि तिथीनां पूर्वार्धापराः एव लक्षणीये करणानां तिथ्यर्द्धप्रमितत्वादिति. एतेषां स्वामिनः प्रयोजनं चैवं लौकिकशास्त्रेपु-इंद्रो १ विधि २ भावे छे, छटने विपे गरादि अने वणिज होय छ, सातमे विष्टि अने वव होय छे (७९), श्राठमने दिवसे अने रात्रिए अनुक्रमे पालव अने कौलव आवे थे, नोमना बन्ने अर्धमा श्रीविलोचन अने गरादि आवे छे (८०), दशमना बने अर्धमा अनुक्रमे वणिज अने विष्टि होय छे, अग्यारशने दिवसे अने रात्रे अनुक्रमे चव अने पालव होय छे, (८१), पारशने दिवसे अने रात्रे कौलव भने स्त्रीविलोचन होय छे, गरादि अने वणिज तेरशने दिवसे भने रात्रे जाणवा (८२), चौदशने दिवसे विष्टि होय छे. श्रा प्रमाणे दरेक मासमां श्रा सात चर करणोनी वारंवार श्रावृत्तियो कहेली छे. (८३). कह्यु छ के-" दरेक मासमा शुनपचनी प्रतिपदाना वीजा अर्धमागधी प्रारंभीने चर करणो आठ वार आवृत्ति करे छे. वद चौदशनी रात्रिए शकुनि नामनुं करण होय छे, तथा अमावास्याना पने अर्ध- भागमा अनुक्रमे चतुष्पद अने नाग नामनां करणो श्रावे छे (५४), तथा शुक्ल प्रतिपदाना पहेला अर्धमागां किंस्तुध्न नामर्नु करण होय . श्रा करणो मा तिथिनोमा ज भावे के तेथी ते स्थिर कहेवाय छे. (८५). ही सर्व ठेकाणे दिवस भने रात्रि शन्दे फरीने तिथिनो प्रथम अर्धमाग अने पाछळनो अर्धमाग जाणवो; केमके भ तिथिना प्रमाण- पाळ करणो होय छे. श्रा करणोना स्वामी तथा प्रयोजन लौकिक शास्त्रमा प्रा प्रमाणे कहे थे.- "इंद्र १, विधि २, मित्र ३, अर्यमा ४, भू ५, श्री ६ भने शमन ७ मा सात " सर्ग २८ मो। (११३) मित्रा ३ र्यम ४ भू ५ श्री ६ शमना ७ श्चलेषु करणेषु । कलि १ वृष २ फणि ३ मरुतः ४ पुन-रीशाः क्रमशः स्थिरेपु स्युः ॥१॥ अत्र शमनो यमः स भद्रायाः स्वामी. दशामूनि विविष्टीनि दिष्टान्यखिलकर्मसु । राज्यहर्व्यत्ययाद्भद्रा-प्यदुष्टैवेति तद्विदः ॥२॥ विविष्टीनीति कोऽर्थः ? एकादशसु करणेपु भद्रा दुष्टेति. शेषकरणप्रयोजनं त्वे-शकुनिचतु- प्पदनागे किंस्तुध्ने कौलवे च वणिजे च । ऊवं संक्रमणं गर-तैतिल- विष्टिषु पुनः सुप्तं ॥ ३ ॥ बवालवे निविष्टं सुभिक्षं चोर्ध्वसंक्रमे । उपविष्टो रोगकरः सुप्तो दुर्भिक्षकारकः ॥ ४ ॥ तथा शीतोष्णवर्ष षु सूर्यसंक्रमाः क्रमेण सुप्तोर्ध्वनिवेशिनः शुभाः. तथा पूर्वोत्तरकरणद्वय- संधिगा संक्रांतिस्तु सुप्तोत्थितेत्याख्या सर्वदाप्यशुभेति पूर्णभद्र इत्या- द्यारंभसिद्धिवात्तिके. इति करणप्रकरणम् । . . सामी सात चर करणना छ, तथा कलि १, वृप २, फणी ३ अने मरुत ४ मा चार स्वामी चार स्थिर करणना छे. (१)." भहीं शमन एटले यम, ते भद्रा (विष्टि ) नो स्वामी के. एक विष्टिने छोडीने बाकीनां दश करणो सर्व शुभ कार्यमा सारा के तथा रात्रि भने दिवसना व्यत्ययथी (एटले दिवसनी विष्टि रात्रे श्रावती होय अने राषिनी विष्टि दिवसे श्रावती होय तो) ते भद्रा पण दोष रहित ज छ, एम तेना विद्वानो कहे छे. (२). अहीं मूळमां 'विविष्टीनि' शन्द लख्यो के तेनो अर्थ प्राप्रमाणे छे के–अग्यारे करणाने विपे एक भद्रा दुष्ट थे. बाकीना करणोनुं प्रयोजन प्राप्रमाणे छे.-शकुनि, चतुष्पद, नाग, किंस्तुघ्न, कौलव अने वणिज ए छ करणो ऊर्ध्व गति करनारा छ. गर, तैतिल अने विष्टि ए त्रण करणो सुता कहेवाय थे, (३) तथा यव अने बालव ए ये करण बेठा कहेवाय छे. तेमां ऊर्ध्व गतिवाळा होय तो सुकाळ थाय छे, पेठा होय तो रोग थाय छे भने सुता होय तो दुकाळ थाय के. (४). तथा सूर्यनी संक्रांति शीतऋतुमा सुतेला करणमा धाय, उष्णऋतुमा ऊर्च गतिवाळा करणमा थाय भने वर्षाऋतुमा पेठा करणमां थाय तो ते शुभ छे; तथा पहेला भने पछीना ए ने करणोनी सधिमा सूर्यसंक्रांति थती होय तो ते सुप्लोस्थिता नामनी कहेवाय थे. ते सर्वदा अशुभ छ एम पूर्णमद्र कहे छे. इत्यादिक भारंमसिद्धिनी टीकामा लखेलुं छे." इति करणप्रकरण.

(११४) भीकाललोकप्रकाश । मुहूर्ताः परिवर्त्तते ये त्रिंशत्प्रतिवासरं । तेषां नामक्रमं वक्ष्ये सर्वज्ञा- गमदर्शितं ॥८६॥ श्राद्यो रुद्रो दिनस्यादौ श्रेयानिति द्वितीयकः । मित्रवायुसुपीताख्या-स्तृतीयतुर्यपंचमाः॥८७ ॥ षष्ठोऽभिचंद्रो माहेंद्रः सप्तमः स्यादथाष्टमः । बलवान्नवमः पक्ष्मो दशमो वहुसत्यकः ॥ ८८ ॥ एकादशः स्यादेशानो द्वादशस्तस्थसंज्ञकः । भावितात्मवैश्रवणौ त्रयोदश- चतुर्दशौ ॥ ८९ ॥ वारुणः स्यात्पंचदश अानंदः षोडशः स्मृतः । विजयः स्यात्सप्तदशो-अष्टादशो विश्वसेनकः ॥ ९० ॥ एकोनविंशतितमः प्राजा- पत्यायो भवेत् । मुहूर्तो विंशतितमो भवत्युपशमाभिधः ॥ ९१ ॥ स्यादेकविंशतितमो गंधर्वोऽथाग्निवैश्यकः । द्वाविंशः स्यात्रयोविंशः शतादिवृषभाभिधः ॥ ९२॥ चतुर्विशस्त्वातपवान् पंचविंशोऽममो भवेत् । षड्विंशोऽरुणवान् सप्त-विंशो भौमाभिधः स्मृतः ॥ ९३ ॥ अष्टाविंशस्तु ऋषभः सर्वार्थः स्यात्ततः परः। त्रिंशत्तमो राक्षसाख्यो मुहूर्तो यो निशोऽतिमः ॥ ९४ ॥ इति मुहूर्त्तप्रकरणम् । नक्षत्राणां परावर्त्त चंद्रसंबंधिनामथ । बमहे प्रत्यहोरात्रं सूर्य- संबंधिनामपि ॥ ९५॥ भवत्यभिजिदारंभो युगस्य प्रथमक्षणे । अस्य हवे हमेशा जे त्रीश मुहूर्तों फर्या करे छे, तेमनां नाम अनुक्रमे सर्वज्ञना भागममा कह्यां छे ते हुं कहुँ छु. (८६).-दिवसना भारंभमा पहेलु मुहूर्त रुद्र नामर्नु छ, बीजुं श्रेपान नामर्नु छ, त्रीजु मित्र, चोधु वायु, पांचमुं सुपीत नामर्नु, छटुं अभिचंद्र, सातमुं माहेंद्र, आठमुं बलवान, नवमुं पक्षम, दशभु बहुसत्यक, अग्यारसुं ऐशान, बारमुं तस्थ नामर्नु, तेरसुं भावितात्मा, चौदसुं वैश्रवण, पंदरमुं वारुण, सोळ{ आनंद, सतरमुं विजय, अढारमु विश्वसेन, श्रोगणीशमुं प्राजापत्य नामनु, वीशर्मु उपशम नामर्नु, एकवीशमुं गंधर्व, चावीशमं अनिवैश्यक, त्रेवीशमुं शतवृषभ, चोवीशएं आतपवान, पचीशम अमम, छवीश अरुणवान, सत्तावीशहूं मौम नामर्नु कयुं छे, अहावीशमुं ऋषभ, भोगणत्रीशमुं सर्वार्थ अने त्रीश राक्षस नामनुं मुहर्च छे. ते रात्रिने छेडे आवे के. (८७ थी ९४ ). इति मुहूर्तप्रकरण. हवे दरेक अहोरात्रिए चंद्र संबंधी नक्षत्रो फर्या करे के तेने अमे कहीए छीए, तथा सूर्य संबंधी नपत्रो पण कहीए बीए. (९५).-युगना पहेला घणमा भभिजित् नवानो मर्ग २८ मो। (११५) पूर्वोक्तशीतांशु-भोगकालादनंतरं ॥ ९६ ॥ श्रवणं स्यात्तस्य चेंदु-भोग- कालव्यतिक्रमे । धनिष्ठत्येवमादीनि ज्ञेयानि निखिलान्यपि ॥ ९७ ॥ अथेंदुना भुज्यमान-महोरात्रे विवक्षिते । इष्टे तिथौ च नक्षत्रं ज्ञातुं करणमुच्यते ॥९८॥ यस्मिन् दिने चंद्रयुक्तं नक्षत्रं ज्ञातुमिष्यते । तस्मादिनात्प्रागतीत-पर्वसंख्या युगादितः ॥ ९९ ॥ गुण्यते पंचदशभि- स्ततः प्रागीप्सितात्तिथेः । तिथीनतीतान् सत्पर्व-सत्कांस्तत्र नियोजयेत् ॥ ९०० ॥ अतीतावमरात्रोना द्वयशीत्या दियतेऽथ सा। लब्धमंशाश्च ये शेपा-स्तानू/धो न्यसेत्क्रमात् ॥ १ ॥ लब्धमूर्ध्व स्थापितं य- त्तद्राशिरिति कथ्यते । अंशा प्रधःस्थिताः शेप-राशिरित्यभिधीयते ॥२॥ राशिं चतुर्गुणीकृत्य शोधयेदेकविंशति । शेषराशेरधःस्थाच्च शोधयेत्सप्त- विंशतिं ॥ ३ ॥ श्रासंभवं लब्धराशेः शेषराशेश्च शोधयेत् । तामेकविंशति सप्त-विंशतिं च क्रमान्मुहुः ॥४॥ अथोपरितनो राशि-रेकविंशतिशोधन । यद्यल्पत्वान्न क्षमेत तदा राशेरधस्तनात् ॥ ५॥ एकं रूपं समादाय श्रारंम होय छे. तेनो पूर्वे कया प्रमाणे चंद्रनो भोग थया पछी तरत ज श्रवण नक्षत्र भाये छ, तेने पण चंद्र भोगवीने मूकी दे छे त्यारे धनिष्ठा नक्षत्र मावे के ए विगेरे अनुक्रमे सर्य नक्षत्रोने चंद्र मोगवे हे. (९६-९७). हवे कद्देवाने इच्छेला अहोरात्रिए अने इच्छेली तिथिने विपे चंद्रवडे जे नक्षत्र भोगवातुं होय ते जाणवा माटे करण कहे छे. (९८).- जे दिवसे चंद्रयुक्त (चंद्रवडे मोगवातुं) नक्षत्र जाणवानी इच्छा होय ते दिवसनी पहेला युगनी शरुआतथी जेटला पर्व वीती गया होय तेटला अंकने पंदरे गुणवा. पछी तेमा इच्छित तिथिनी पहेलानी जेटली तिथिो व्यतीत थइ होय तेटली संख्या मेळवली. (९९-९००). तेमाथी जेटला अधमरात्रो गया हता तेटला बाद फरवा. पछी देने वाशीए मांगवा. जे भागमा आवे तेने तथा जे शेष रह्या होय तेने अनुक्रमे उपर अने नीचे स्थापन करवा. (१). मागमा मावेला अंकने जे उपर स्थाप्यो छे तेने राशि कहेवो, भने शेप बधेला अंशो जे नीचे स्थाप्या छ तेने शेषराशि कहेवो. (२). हवे ते राशिने चारे गुणी तेमाथी एकवीश बाद करवा, तथा नीचेनी शेषराशिमांधी सतावीश पाद करवा. (३). एज रीते शेष रहेला उपरना राशिमाथी तथा रोष राशिमा यी अनुक्रमे एकवीश अने सताधीश ज्या सुधी पादयाकी संभवे त्या सुधी वारंवार याद करा. (४). ए रीते बाद करतां जो उपरनो राशि नानो होवाथी माथी एकवीश बाद करी शकाय - (११६) श्रीकानलोकप्रकाश। सप्तषष्ट्या निहत्य च । राशौ क्षिप्योर्ध्वगे कुर्या-देकविंशतिशोधनं ॥६॥ यात्रकविंशती राशेः शोध्यतेऽभिजितो हि सा । भावनैवं शेषराशेः सप्तविंशतिशोधने ॥ ७॥ प्रारभ्य श्रवणादत्रो-त्तराषाढावसानकं । सप्तविंशतिसंख्याक-मवधायं भमंडलं ॥८॥ शेषराशेस्ततः सप्त-विंशति- यदि शुध्यति । शुद्धं तदाखिलमपि ज्ञेयमस्माद्धमंडलं ॥९॥ नाल्पत्वा- चेदितः सप्त-विंशतिः शो मर्हति । तदा द्वाविंशतिः शोध्या शुद्ध्येन्नैषापि चेत्तदा ॥१०॥ शोध्या अष्टादशामीपां शोधनासंभवे सति। त्रयोदशदशैषा चा-संभवे पंच शोधयेत् ॥ ११ ॥ द्वाविंशतौ विशुद्धाया-मत्र शुद्धानि भावयेत् । सर्वाणि श्रवणादीनि विशाखांतानि भान्यथ ॥ १२ ॥ अष्टा- दशसु शुद्धेपु शुद्धानीह विचिंतयेत् । श्रुत्यादीन्युत्तराफाल्गु-न्यतान्यष्टा- दशाप्यथ ।। १३ ॥ त्रयोदशसु शुद्धेषु शुद्धानि परिभावयेत् । श्रुत्यादीनि पुनर्वस्वं-तानि भानि त्रयोदश ॥ १४ ॥ एवं दशसु शुद्धेपु रोहिण्यंतानि चिंतयेत् । उदग्भद्रपदांतानि तथा शुद्धेषु पंचसु ॥१५॥ पर्यंतसूचकान्यत्र तेवो न होय तो नीचेना राशिमाथी एक लइ तेने सडसठे गुणी उपरना राशिमा मेळवी तेमाथी एकवीश बाद करवा. (५-६). भहीं जे राशिमाथी एकवीश वाद करवामां मावे के ते अभिजित् संबंधी छे, भने शेष राशिमाथी सतावीश बाद करवामां भावे छे त्यां श्रा प्रमाणे जाणवू. (७).-मही श्रवण नक्षत्रथी प्रारंभीने उत्तरापाढा नवत्र सुधीना नक्षत्रमंडळमां सतावीश नक्षत्रो आवे छे; तेथी जो शेष राशिमाथी सतावीश बाद करी शकाय तो ते शेष राशिमाथी समग्र नक्षत्रमंडळने बाद कर्य एम जाणवू. (८-९). जो ते शेष राशिनी अन्प संख्या होबाथी सतावीश बाद करी शकाय तेम न होय तो तेमाथी चावीश पाद करवा. जो चावीश पण पाद न करी शकाय तो अढार बाद करवा. अढार पण बाद करवानो असंभव होय तो तेर बाद करवा. ते पण न संभवे तो दश वाद करवाः ते पण न संमवे तो पांच बाद करवा. (१०-११). तेमा जो बावीश बाद थया होय तो श्रवणथी भारंभीने विशाखापर्यंत सर्व नक्षत्रो शोधायां एम जाणवू. (१२). अढार बाद थया होय तो श्रवणथी भारंभीने उत्तराफाल्गुनी पर्यंत भढारे नक्षत्रो शोधायां एम विचारवं. (१३). तेर याद थया होय तो श्रवणथी आरंभीने पुनर्वसु पर्यंत तेर नक्षत्रो शोधायो एम जागा. (१४). एज प्रमाणे दश पाद थया होय तो श्रवणधी रोहिणी पर्यत दश नपत्र शोधायां जाणवां, भने पांच बाद थया होय तो अवणथी उचरामाद्रपद- । संग १८ मो। यानि प्रोक्तानि भानि पट् । सार्द्धक्षेत्राण्येव तानि ज्ञेयानि निखिलान्यपि ॥ १६ ॥ तथाहि-श्रवणापंचमी सार्द्ध-क्षेत्रा भाद्रपदोत्तरा । दशमं ब्राह्ममादित्यं त्रयोदशं च तादृशं ॥ १७ ॥ उत्तराफाल्गुनी चाष्टा-दशी भवति तादृशी । सार्द्धक्षेत्रं विशाखाख्यं द्वाविंशतितमं श्रुतेः ॥ १८ ॥ स्यात्सप्तविंशा तत्राथो-त्तरापाढापि तादृशी। एतानि स्युः पंचचत्वारिंश- न्मुहर्त्तकानि यत् ॥ १९ ॥ तथाहुः-पंच १ दस २ तेरस ३-हारसेव ४ बावीस ५ सत्तवीसा य ६ । सोझा दिवट्ठखित्तंत भदवाई असाढंता ॥ २० ॥ एवं चाधस्तने शेप-राशौ संशोधिते सति । एकादिचतुरंतं य- च्छेपं तचंद्रभं गतं ॥ २१॥ अत्र च एकादिचतुरंतं यच्छेपं तत्रिंशद्गुण- नेन मुहूर्चीकृत्य तस्मात्क्रमप्राप्तं यन्नक्षत्रं तद्यदि समक्षेत्रं तदा त्रिंशच्छो- ध्यते, श्रीक्षेत्रं चेत्पंचदश शोध्यंते, एवं शोधने यच्छेपं तच्चंद्राक्रांतस्य नक्षत्रस्यातीतं मुह दिकं भवतीनि ज्ञेयं. यच्चोपरितने राशा-वेकविंशति- शोधने । शेष तचिंशताहत्य सप्तपष्ट्या विभज्यते ॥ २२ ॥ लब्धा मुहूर्त्ता पर्यत पांच नक्षत्र शोधायां छे एम जाणg. (१५). श्रहीं पर्यतने सूचवनाराजे छ नषत्रो कयां छे, ते सर्वे ( छए) सार्धक्षेत्रवाळो न छे. (१६). ते धा प्रमाणे- श्रवणथी पांचमं नक्षत्र उचराभाद्रपद कछु ते सार्धक्षेत्री थे, ए ज प्रमाणे दश रोहिणी भने तेरई पुनर्वसु पण ते, ज एटले सार्धक्षेत्री छे. (१७). अढारसु उत्तराफाल्गुनी पण तेवू ज (सार्घषेत्री) छे, विशाखा नामर्नु पावीशमुं पण सार्यक्षेत्री थे (१८), भने सतावीश उचरापाढा पण सार्धक्षेत्री थे. भा छए नक्षत्रो पीस्ताळीश महूचीयां छे. (१९) कहुं छे के-"च, दश तर, प्रहार गाधीश भने सवारीश एटला अंकरडे श्रवणथी उत्तरापादापर्यत सार्घ नघनोने पाद करवा. (२०). मा प्रमाणे करवायी नीचेना शेषराशिने शोधतो एकथी चार सुधीनो जे अंक शेष रहे तेटला चंद्रनधन गर्यु एम जाणवू. (२१). भहीं एकची पारंमीने चार सुधीनो जे अंक शेप पो होय वेने श्रीशे गुणी महर्ज करवा. त्यारपछी मापी क्रमे प्राप्त ययेलं नषत्र जो समक्षेत्री होय तो धीश शोधया एटले के ते सहर्चना मंकमांधी नीश पाद करवा, अने मधेत्री नवन होय तो पंदर पाद करवा. ए प्रमाणे पाद करता जे शेष रहे ते चंद्रे मोगवाता नपाना पीती गयेला बर्ष विगैरे भाये छ एम जाग. जे उपरना राशिमाथी एकवीश पाद करता शेष रमा होय ने श्रीश गुणी सहसठे मागवा. (२२). मागा व माई के मार्च भीकामलोकप्रकाश ज्ञातव्या यत्तु तत्रापि शिष्यते । ते विज्ञेया मुहूर्तस्य विभागाः सप्तपष्टिजा: ॥ २३ ॥ यथा युगस्य प्रथमे वर्षे दशसु पर्वसु । अतिक्रांतपु पंचम्यां कि नक्षत्रं निशापतेः ॥ २४ ॥ यात्रातीतपर्वसंख्या वर्तते दशलक्षणा । तस्यां पंचदशनायां पंचाशं जायते शतं ॥ २५ ॥ पंचम्यां पृष्टमिति च चत्वा- रस्तिथयो गताः। ततश्चतुष्टयं तत्र योजनीयं मनस्विभिः ॥ २६ ॥ चतुः- पंचाशदधिकं शतं स्याद्राशिरेष च । हीनो द्वाभ्यामवमाभ्यां द्विपंचाशं भवेच्छतं ॥ २७ ॥ तस्य यशीत्या भागे य-द्रूपमेकमवाप्यते । तदूर्व न्यस्यते शेषां सप्ततिं च न्यसदेधः ॥ २८ ॥ कृतश्चतुर्गुणो लब्ध-राशि- रत्रैकलवणः । चत्वारः सप्ततिश्चोर्धा-धोभावेन स्थिता इह । ॥ २९ ॥ अथोपरितनाद्राशेः स्तोकत्वादेकविंशतिः । शोढुं न शक्यते तेना-धःस्थात्सप्ततिलक्षणात् ॥ ३० ॥ एक रूपं समादाय सप्तपष्टिगुणी- कृतं । निक्षिपेदूर्ध्वगे राशौ तजाता सैकसप्ततिः ॥ ३१ ॥ एकोनस- ततिश्चाध-स्तिष्ठेद्राशेरथोर्ध्वगात् । शोधितायामभिजितः सत्काया- मेकविंशतौ ॥ ३२॥ पंचाशच्छिप्यतेऽधःस्था-द्राशश्च सप्तविंशतौ । जाणवा अने जे शेष रह्या होय तेटला एक मुहर्त्तना सडसठीया भाग जाणवा. ( २३ ). उदाहरण-युगना पहेला वर्षमा दश पर्व गया पछी पांचमने दिवसे चंद्रनुं क्युं नक्षत्र छ ? (२४). उत्तर-अहीं जे गयेला पर्वनी संख्या दश छे तेने पंदरे गुणता एक सो ने पचास थाय छे. (२५). पाचमनी तिथिनो प्रश्न के तेथी चार तिथियो ध्यतीत थयेली होवाची पंडितोए तेमा ( १५० मा ) चार मेळवया. (२६). एटले एक सो ने चोपन (१५४ ) थया. पाटला काळे ये अवमतिथि गयेली होवाथी तेमाथी वे चाद करतां शेष एक सो ने पावन (१५२) रहे छे. (२७). तेने वाशीए (८२) भांगतां मागमा एक आवे छे तेने उपर स्थापवो. शेष रहेला सीतेरने नीचे स्थापवा. (6) पछी भागमा आवेला एकने चारे गुणतां चार थया, तेने उपर स्थापवा अने नीचे सीतेर स्थापना (3). (२८-२९). हवे उपरनो राशि अल्प होवाथी तेमाथी एकवीश बाद थइ शकशे नहीं; तेथी नीचेना राशि सीतेरमाथी एक लइ तेने सडसठे गुणी उपरना राशिमा भेळच्या त्यारे एकोतेर (७१) थया. (३०-३१). अने नीचेनो राशि ओगणोतेर रह्यो (६). पछी उपरना राशि एकोतेरमाथी अभिजित् संबंधी एकवीश बाद करीए त्यारे पचास (५०) शेष रह्या, भने नीचेना (६९) राशिमाथी सतावीश वाद करीए त्यारे ..

। सर्ग २८ मो। (११९) शोधितायां भचक्रस्य द्विचत्वारिंशदास्थिता ॥ ३३ ॥ शोध्यते चौर्ध्वगाद्राशेः पुनरप्येकविंशतिः। राशेरधस्तनात्सप्त-विंशतिर्भगणस्य च ॥ ३४ ॥ एकोनत्रिंशदूर्व स्या-दधः पंचदश स्थिताः ३१ । एक- विंशतिरूलस्था-द्राशे योऽपि शोध्यते ॥ ३५ ॥ अष्टौ ततोऽवशिष्यते राशावूर्व व्यवस्थिते । तेषां च पुरतो वक्ष्ये-ऽवशिष्टां परिकर्मणां ॥३६॥ राशेरधस्ताच्छक्यंते शोर्बु पंचदशात्मकात् । न सप्तविंशतिर्वि- शतिर्नाष्टादशापि न ॥ ३७ ॥ त्रयोदश तु शक्यते शोर्बु तेषां च शोधने। श्रुत्याद्यादित्यांतभानि शुद्धानि स्युस्त्रयोदश ॥ ३८ ॥ शेषाच्च द्वितया- त्रिंश-गुणात्पुष्यो विशोध्यते । मुहूत्तस्त्रिंशता पंच-दशभिस्सार्द्धमेव च ॥३९॥ ये पंचदश शिष्यंते मघानां ते मुहर्तकाः । अथोर्ध्वराशौ संत्यष्टौ तेपु त्रिंशद्गुणेषु च ॥ ४० ॥ चत्वारिंशा द्विशतीस्यात् ससपाट्या हरेच्च तां । लब्धास्त्रयो मुहूर्तास्तान् क्षिपेद्राशावधस्तने ॥४१॥ अष्टादश मुहूर्ताः स्यु-स्तद्भागाः सप्तपष्टिजाः। एकोनचत्वारिंशच्च तदेव प्रश्ननिर्णयः ॥ ४२ ॥ अष्टादशसु भुक्तेपु मुहर्तेप्वमृतांशुना। मघानामधिकैकोन- चत्वारिंशल्लवे पिवह ।। ४३ ।। युगस्य प्रथमे वर्षे दशपर्वव्यतिक्रमे । उदेति पैताळीश शेप रक्षा (2). (३२-३३). फरीथी उपरना राशि (५०)माथी एकवीश बाद कर भोगणनीश शेष रहे थे, प्रने नीचेनी राशि (४२)मांथी मतावीश याद करता पंदर शेष रहे थे (६). पछी उपरना (३४ ) राशिमाथी फरीथी एकवीश पाद करीए त्यारे भाठ शेप रवा. ते उपर स्थापना (६), हवे भागळ बाकी रहेली रीत पतावे छे. (३५).-नीचेनो राशि जे पंदर छ तेमापी सतावीश, पापीश के भदार बाद करी शफाय सेम नबी; परंतु तेर पाद करी काय छ, तेथी पदरमाथी तेर पाद करता श्रवणधी पुनर्वा पठना र नत्रो पाद कर्या कहेवाय. बाकी रहेला पेने त्रीशे गुणवा माठ थपा, सेमाची पुष्पना पंदर महित श्रीश महर्ष एटले पीस्ताळीश पाद फरवा, त्यारे पंदर शेष रहे है. से मपाना महत्तों जाणवा. हवे उपरना राशिमा जे माठ चे सेने श्रीशे गुणवापी मसो ने पाळीरा ( २४० ) पाय. तेने महमठे (६७) मागतां मागमा अय सहर्ष माया, रोने नीचेना राशिमा ( १५ मा ) भेळाया; तेथी मदार (१८) मार्य चपा. नीष शेप गला भाग पानी के सदसठीया माग. (8), पी प्रभनी जवान ए माम्मो के-पंद्र मपा नपना मार मणे मने सरसठीपा मोगसणारीय मंत्री (१२०) भीकासलोकप्रकाशा सूर्यः पंचम्या-महोरात्रेऽपि तावति ॥ ४४ ॥ अहोरात्रे युगस्याये प्रति- पत्संज्ञके तिथौ। चंद्रसंबंधि नक्षत्रं किमत्र प्रतिपाद्यते ॥४५॥ चतुर्विशं शतं संख्या पाश्चात्ययुगपर्वणां । अष्टादशशती पष्टि-युक् स्यात्पंचदशाहता ॥४६॥ त्रिंशतोऽवमरात्राणा-मेतस्याः पातने भवेत् । अष्टादशशती त्रिंशा सा यशीत्या विभज्यते ॥ १७॥ लब्धां द्वाविंशति न्यस्यो-परि कुर्याच्चतुर्गणां । श्रष्टाशीतिर्भवेच्छेपा-मधः पड्विंशति न्यसेत् ॥४८॥ राशेरष्टाशीतिरूपा-देकविंशतिशोधने । संजाताभिजितः शुद्धिः सप्तपष्टिस्तु शिष्यते ॥४९॥ कल्पितैतावदंशत्वा-त्तया चैकं भवेदुडु । तस्मिंश्च भेऽध. स्त्यराशौक्षिप्ते स्यात्सप्तविंशतिः॥५०॥स्यात्सप्तविंशतेर्भानां शुद्धिरादत. स्ततः। श्रुत्यादीन्युत्तरापाढा-न्तानि शुद्धानि भान्यतः॥५१॥ पूर्वोक्तनिर्ण- योऽयं त-द्ययुगस्यादिमे दिने। सूर्योदये शशी योगं प्राप्नोत्यभिजिता सह ॥५२॥ युगस्याह्नि द्वितीयस्मिन् द्वितीयायां तिथावथ । चंद्रेण युक्तं नक्षत्रं किं स्यादित्यत्र कथ्यते ॥५३॥ प्रतिपल्लक्षणैकैवा-तिक्रांता तिथिरत्र या । भोगवे त्यारे युगना पहेला वर्षमा दश पर्व बीती गया बाद पांचमने दिवसे भने तेटला अहोरात्रे सूर्यनो उदय थाय छे. (३६-४४). प्रश्न--युगना पहेला अहोरात्रे एटले एकमनी तिथिए चंद्रनुं क्युं नक्षत्र भावे ? श्रा प्रश्ननो जवाब कहे छे.-(४५). पहेलाना युगना एक सो ने चोवीश पर्वने पंदरे गुणतां अढार सो ने साठ ( १८६० ) थाय छे. (४६). तेमाथी त्रीश अवमरात्रो बाद करता अढार सो ने त्रीश (१८३० ) रहे थे. तेने बाशीए (८२) भागवा. (४७), भागमा बावीश आव्या, तेने उपर स्थापन करी चारे गुणतां अद्वाशी थाय. शेष रहेला छवीशने नीचे स्थापन करवा (६). (४८). पछी अठाशीना राशिमाथी एकवीश बाद करता अभिजित्नी शुद्धि थइ (बादबाकी थइ ); बाकी सडसठ रह्या, (४९). केमके तेना तेटला अंशोनी ज कल्पना करेली छे अने ते चाकीना सडसठ अंशनुं एक नक्षत्र थाय छे; तेथी ते नक्षत्रने एटले एकनी संख्याने नीचेना राशि (२६ )मा मेळवता सत्तावीश (२७) थाय छे. (५०). आ अंकी सवावीश नपत्रोनी शुद्धि थाय छे, तेथी करीने श्रवणथी उत्तरापाढा सुधीनां नक्षत्रोनी शुद्धि थाय छे. (५१). तेथी पूर्वे करेला प्रश्ननो निर्णय ए थयो के-युगना पहेले दिवसे सूर्योदय समये अभिजित्नी साथे चंद्रनो योग थाय छे. (५२). प्रश्न-युगथी शरुभातथी बीजे दिवसे एटले पीजनी तिथिए क्युं नक्षत्र चंद्रयुक्त होय ? मानो उत्तर कहे थे. (५३).-अहीं व्यतीत थयेली तिथि एक पडवानी ज छ, सर्ग १८ मो। (१२) यशीत्या भजनं सा न क्षमते यत्तनीयसी ॥ ५४ ॥ तदेतस्याः सप्तपष्टिः कर्त्तव्याः शकलास्ततः। ऋक्षस्याभिजितः प्राज्ञैः शोधनीयैकविंशतिः ॥ ५५ ॥ शेषा तिष्ठति षट्चत्वा-रिंशत्सा त्रिंशता हता । कर्तुं मुहूर्तान् साशीति-स्त्रयोदशशती भवेत् ॥ ५६ ॥ सप्तषष्ट्या विभागेऽस्या लब्धा मुहूर्तविंशतिः । चत्वारिंशन्मुहूर्तीशाः शिष्यते सप्तपष्टिजाः ॥ ५७ ॥ ततश्च-सचत्वारिंशदशायां श्रुतेर्मुहूर्तविंशतौ । भुक्तायामिंदुनोदेति द्वितीयेऽह्नि युगे रविः ॥ ५८ ॥ एवं सर्वत्राप्यन्यत्र करणभावना कार्या. इति चंद्रनक्षत्रप्रकरणं ॥ अष्टादशमुहूर्ताढ्य-महोरात्रचतुष्टयं । भुक्त्वा पुष्यस्य पंचापि स्वादान्यारभते रविः ॥ ५९॥ चतुर्विशत्या मुहूर्त-रधिका भुक्तशेषकाः। भवत्यष्टाहोरात्रा-स्तदा पुष्यस्य भास्वतः ॥ ६ ॥ ततश्च-स्युर्दादशमुहू ढिया अहोरात्रास्त्रयोदश । तथा स्युः पडहोरात्रा मुहूर्ताश्चैकविंशतिः ॥ ६१ ॥ अहोरात्रा विंशतिश्च मुहूर्त्तत्रितयाधिकाः । समा सार्द्धक्षेत्राणां ते अन्प होवाथी तेने पाशीए भागी शकाय नहीं. (५४). तेथी तेना सडसठ अंशो करवा. पछी तेमांची अमिजिवना एकवीश अंश पाद करवा. (५५). बाकी छेताळीश रद्या, तेने मुहूर्च करवा माटे त्रीशे गुणवा त्यारे तेर सो ने ऐंशी ( १३८० ) थाय. (५६). तेने सडमठे मागता यागा वीश महर्स प्राध्या भने एक मुहूर्चना सडसठीया' पाळीश भंश शेष रया. (५७). तेथी करीने प्रश्ननो निर्णय ए थयो के-श्रवणना वीश महर्च भने उपर सठसठीया चाळीश अंश चंद्र मोगवी रहे त्यारे युगने बीजे दिवसे पर्यनो उदय थाय छे. (५८). या प्रमाणे बीजे सर्व ठेकाणे करणनी भावना करवी. इति चंद्रनपत्रप्रकरण. सूर्य पुष्य नक्षत्रना चार महोरात्र भने भदार महर्च मोगवीने पोताना पाच वर्षांनो प्रारंम करे थे (५९). ते वसते पुष्य नक्षत्रमा आठ अहोरात्र अने चौघीश महों सूर्य मोगव्या विनाना पाकी रह्या छ एम जाण. (६०). तेथी करीने सूर्पने समनव- अनो मोग तेर महोरात्र भने वार महर्चनो छे, अर्धनघवनो भोग छ अहोराम मने एकवीश मानो छ तथा सार्धनषानो भोग वीश महोरात्र भने प्रण सहर्षनो के. (६१-६२).

(१२२) श्रीकाक्षलोकप्रकारा। भानां भोगः क्रमाद्रवेः ॥ ६२ ॥ एवं भैः सप्तविंशत्या पष्टियुक्तशतत्रये । श्रद्वामतीतेऽर्काब्दं स्या-देकषष्टितमे दिने ॥ ६३ ॥ द्वादशानां मुहूर्तानां पूर्ती पूर्णो पुनर्वसू । पुष्यस्याष्टादश ततो मुहूर्तास्तदिने गताः ॥ ६४ ॥ ततः परं च पुष्यस्या-तीते दिनचतुष्टये । पूर्णाब्दिस्य पट्पष्टि-युक्ता दिनशतत्रयी ॥ ६५ ॥ सुखावबोधाय चात्र यन्त्रकम्- मा प्रमाणे सतावीशे नक्षत्रो सूर्यवडे मोगवाइ जाय त्यारे त्रण सो ने एकसठ अहोरात्र पूरा थाय छे. त्यारपछीना बासठमे दिवसे बार मुहूर्त जाय त्यारे पुनर्वसु नक्षत्र पूर्ण थाय छे, तेथी ते दिवसे बाकीना अढार मुहूर्त पुष्यना गया एम जाणवू. (६४). त्यारपछी पुष्पना चार अहोरात्र व्यतीत थाय त्यारे सूर्यवर्पना प्रण सो ने छासठ अहोरात्र पूर्ण थाय के. (६५). पा पावत-सुखेथी जाणवा माटे नीचेनुं यंत्र जोवू. नक्षत्रना सम भई सम सम | सार्थ सम सम भर्घ साध सम अर्ध सम सम | सार्ध महत ३० १५/३०/३०.४५/३०३० | १५.४५ | ३०.१५ ३०|३०|४५ नक्षत्र नाम पुष्यामश्ले- मघा पू. उ. हस्त चित्रा स्वा-विशा अनु-ज्येष्ठा मूळ पू.षा. उ. ति | खा राधा पा. अहोरात्र शेष ६ १३.१३ २० | १३ | १३ ६ २०१३ ६ /१३, १३ २० महर्च २४ | २१ १२|१२| ३ | १२ १२ २१ ३ १२ २१ | १२ १२३ अहो.सकळ . १५ २८४२६२ ७५८९९५ ११६/१२९/१३६/१४९१६२/१८३ महर्त सकळ . १५|२७| ९ | १२|२४ ६।२७ १२/ ३ |१५|२७. शो. शो. षा फा.फा. . शो. . सम सम अर्थ सम सार्थ सम सम भई सम साध सम अर्थ साध सम ३० ३०१५ ३०/४५|३०|३०|१५|३०|४५|३०|१५|४५/३० भमि श्रवण धनि- शत- पूर्वा उ. रेयसी अश्वि भर- कृत्ति रोहि-मृग-आपुन- पुष्य जित् ठा मिपा मा.भा. नीणी काणी शिर सु प्रा. १३ |१३| ६ |१३|२०|१३|१३| ६ | १३/२०१३/६/२० ६ | १२ |१२|२१|१२|३|१२|१२|२१|१२ ३ ११२|२१| ३ | १०| १८७२००२१४२२०२३४२५४२६७/२८१२८७३०१/३२१३३४३४१३६१३६६ |२१| ३/६१८९/१२ शो. शो. शो. ४ . .

सर्ग २८ मो। (१२) यथार्कोडुव्यवस्थैव-मेकस्याब्दस्य दर्शिता । पंचानामपि वर्षाणां तथा ज्ञेया युगे बुधैः ॥ ६६ ॥ ज्ञातुं सूर्यस्य नक्षत्रं विवक्षिततियावथ । करणं प्रोच्यते पूर्वा-चार्यदर्शितया दिशा ॥ ६७ ॥ युगेऽतीतपर्वसंख्या प्राग्वत्पंचदशाहता । विवक्षितदिनारपूर्व-मंतीस्तिथिभिर्युता ॥ ६८ ॥ गतैरवमरात्रैश्च वर्जिताथ त्रिभिः शतैः। विभज्यते सा पट्यष्ट्या-धिकैलब्धं च वत्सरः ॥६९॥ शेषं भवति यत्तस्मा यथार्ह वक्ष्यमाणकं । संशोध्यते शोधनकं गेतनक्षत्रसूचकं ।। ७० ॥ सपट्यष्ट्या त्रिशत्याऽल्पा भागं चेन्न क्षमेत सातदा शोध्यं शोधनक-मादावेवात्र संभवेत् ॥७॥ चतुर्विशत्या मुहूर्त-रधिकं दिवसाप्टकं । पुष्यस्य स्थाच्छोधनक-मथान्येषां तदुच्यते ॥ ७२ ।। रात्रिंदिवानि द्वापष्टि-र्मुहूर्त्ता द्वादशोपरि। उडूनामुत्तराफाल्गु- न्यतानां शोधनं भवेत् ॥ ७३ ।। भानां विशाखांतानां च षोडशाभ्यधिक जेम मा प्रमाणे सूर्यना नक्षत्रोनी व्यवस्था एक वर्षने माटे रतावी, तेज रीते पंडितोए एक युगना पाच वर्षांनी जाणवी. (६६). हवे इष्ट तिथिने दिवसे सूर्यन- क्युं नचत्र हशे ? ते जाणवा माटे पूर्वाचार्योए यतावेली दिशा प्रमाणे करण कहीए छीए. (६७).--युगना प्रारंभथी जेटला पर्व गया होय तेने पूर्वनी जेम पंदरे गुणवा. पछी तेमा इष्ट दिवसनी पूर्वे जेटली तिथियो गइ होय तेटला भेळवा. (६८). माधी अवमरात्र जेटला गया होय वेटला बाद करवा. पछी तेने प्रण सो ने छामठे भागवा. भागमा जे आवे ते वर्ष जाणवा. (६९). जे शेप रझा होय वेमाथी संभव प्रमाणे पागळ कहीए ते रीते शोधनक करवू (वादवाकी करवी). तेम करवायी गयेला नवनी सूचना थाय छे. (७०). जो कदाच ते संख्या अन्प होवाथी त्रण सो ने छासठे भांगी न शकाय तो प्रथम जे जे संभवतुं होय ते शोधनक करवू (बादपाकी करवी). (७१). हवे पादयाकीनी रीत बतावे छे.-पुष्य नक्षत्र बाद करवू होय तो पाठ दिवस भने चोवीश महर्च पाद करवा. हवे वीजा नक्षत्रोनी दयाकीनी रीत कहे . ( ७२ ).-भश्लेषाथी उत्तराफाल्गुनी सुधीना बीजां चार नपत्रो वाद करवा होय तो बासठ रात्रिदिवस भने पार पहूर्त बाद करा. हस्तथी विशाखा पर्यत बीजां चार नपत्रो माद करवा होप तो एक सो ने सोळ रात्रिदिवस वाद करवा.

(१२४) श्रीकालोकप्रकाश। शर्त । भानी तथोत्तराषाढां-तानां व्यशीतियुक् शतं ॥ ७४ ॥ चतुःपंचा- शदधिक-महोरात्रशतद्वयं । पण्मुहूर्त्ताधिकं प्रौष्ठ-पदांतानां विशोधनं ॥७५ ॥ एकविंशतिसंयुक्त-महोरात्रशतत्रयं । षण्मुहूर्तयुतं रोहि- यंतानां शोधनं मतं ॥ ७६ ॥ एकषष्ट्यासमधिक-महोरात्रशतत्रयं । स्याद् द्वादशमुहूर्ताढ्यं पुनर्वस्वंतशोधनं ॥७७॥ विना पुष्यं शोधनका- न्यमूनि निखिलान्यपि। अध्यर्द्धक्षेत्रनक्षत्रा-वधिकानि भवंति वै ॥७८॥ यथाहं च शोधनके शोधिते शिष्यतेऽत्र यत् । एकादीनि ततो भानि शोध्यानि स्वस्वमानतः ॥ ७९ ॥ स्वस्त्रमानं चार्द्धक्षेत्रादीनां नक्षत्राणां प्रायुक्तमेव. एवं क्रमाच्छोध्यमानं यन्नक्षत्रं न शुध्यति। तद्वर्त्तमानं नक्षत्रं ज्ञेयं तस्यां तिथौ रवेः ॥५०॥ उदाहरणं चात्र-युगस्य प्रथमे वर्षे दशपर्वव्यतिक्रमे । पंचम्यां सूर्यनक्षत्रं किमित्यत्र निरूप्यते ॥ ८१ ॥ अतीतपर्वणां संख्या यास्त्यत्र दशलक्षणा। सा पंचदशनिम्ना स्या-पंचा. शदधिकं शतं ॥ ८२ ॥ चतुःपंचाशं शतं स्या-त्तद्गतैस्तिथिभिर्युतं । अनुराधाथी उत्तराषाढा, सुधीना वीजा पांच नक्षत्रो याद करवा होय तो एक सो ने त्राशी रात्रिदिवस बाद करवा. श्रवणथी उत्तराभाद्रपद सुधीना बीजां पांच नक्षत्र (अभिजिद सहित ) पाद करवा होय तो बसो ने चोपन अहोरात्र अने छ मुहूर्च वाद करवा. रेवतीथी रोहिणी सुधीना बीजा पांच नचत्रो चाद करवा होय तोत्रण सो ने एकवीश अहोरात्र अने व मुहूर्त याद करवा, अने पुनर्वसु सुधीना नक्षत्रो वाद करवा होय तो त्रण सो ने एकसठ अहोरात्र अने पार महर्त बाद करवा. (७३-७७). पुष्य सिवाय बाकीनां सर्व नक्षत्रो संबंधी सर्व वादवाकीमो सार्धक्षेत्री नवत्रपर्यंत थाय छे. (७%). हवे संभव प्रमाणे वादवाकी करतां जे शेष रहे, तेमांधी पोतपोताना मान प्रमाणे एकादिक नक्षत्रो बाद करवा. ९७९). अर्थक्षेत्र विगेरे नक्षत्रोर्नु पोतपोतार्नु मान प्रथम कर्तुं छे ते जाणवू. मा प्रमाणे अनुक्रमे नादवाकी करता जे नक्षत्र पाद न थह शकतुं होय ते नक्षत्र ते तिथिए सूर्य, वर्ने छ एम जाणवू. (८०). उदाहरण-युगना पहेला वर्षमा दश पर्व गया पछी पांचमनी विथिए कयुं सूर्यनक्षत्र भावे ? मा प्रश्ननो जवाब भापे के. (८१).-अहीं जे वीती गयेला दश पर्व के वेने पंदरे गुणवा एक सो ने पचास (१५० ) थाय छे. (२). तेमां पांचमनी तिथि होवायी सर्ग २८ मो। (१२५) शतं च स्याद् द्विपंचाश-मवमद्वितयोज्झितं ।। ८३॥ सपट्यष्ट्या त्रिशत्या त-द्भागं न सहते कृशं । तत श्रादित एवात्र शोधनोपक्रमोऽर्हति ॥८॥ संभवेच्छोधनं चात्र पोडशाभ्यधिकं शतं । विशाखांतानि शुद्धानि भानि ज्ञेयानि तेन च ॥ ८५ ॥ शेपं तिष्ठति पत्रिंशत् ततः शुद्ध्यति राधिका । या द्वादशमुहूर्ताट्य-त्रयोदशदिनात्मिका ॥८६॥ द्वाविंशतिर्दिनाः शेषाः साष्टादशमुहूर्त्तकाः। पड्दिन्याऽथैकविंशत्या मुहूर्तः शुद्धमिंद्रभं ॥ ८७ ॥ शेषा दिनाः पंचदश मुहूर्ताः सप्तविंशतिः। तेभ्यः शुद्धं मूलभं त-न्मानतो राधिकोपमं ॥ ८८ ॥ शेषौ द्वौ पंचदशभि-मुहूर्तरधिको दिनौ । एतौ च पूर्वाषाढाया-स्तदा भुक्तौ विवस्वता ॥ ८९॥ युगेऽर्कोडुनिर्णयोऽयं दशपर्वव्यतिक्रमे । ज्ञेयस्तिथौ च पंचम्या-मेवं सर्वत्र भावना ।। ९० ॥ युगेऽथ पौरुपीमानं ज्ञातुं करणमुच्यते । वर्द्धमानं हीयमानं याम्ये सौम्येऽयने क्रमात् ॥ ९१ ॥ शंकुः पुरुषशब्देन स्याद्देहः पुरुषस्य वा । बीती गयेली चार तिथिमो उमेरी, त्यारे एक सो ने चोपन (१५४ ) थया. तेमांथी ये अवमतिथिमो गयेली होवाथी वे वाद करतां बाकी एक सो ने बावन (१५) रहा. (८३). मा संख्या अन्प होवाथी तेने त्रण सो ने बासठे (३६६ ) मांगी शकाय तेम नथी, तेथी प्रथमथी ज वादबाकीनो क्रम करवो अहीं योग्य छे. (८४). अहीं आ (१५२ )माथी एक सो ने सोळ (११६ ) वाद थइ शके तेम छे, तेथी विशाखापर्यवनां नक्षत्रो पाद को एम जाणवू. (८५). ते प्रमाणे बाद करतां शेष छत्रीश ( ३६ ) रहे छे, तेमाथी तेर दिवस अने बार मुहर्त्तना प्रमाणवालं राधिका (अनुराधा) नचत्र बाद करता शेप बावीश दिवस भने अढार मुहूर्त रहे छे. तेमाथी इंद्र नवत्र (ज्येष्ठा )ना छ दिवस भने एकवीश मुहूर्व बाद करता वाकी पंदर दिवस अने सतावीश मुहर्च शेप रहे छे. तेमाथी अनुराधाना प्रमाणवाळा मूळनक्षत्रना र दिवस अने पार मुहूर्च चाद करवा वाकी वे दिवस अने पंदर मुहूर्त शेष रहे छे. पाटलुं प्रमाण (वे दिवस अने पंदर महर्च) सूर्ये पूर्वापाढाना भोगव्या. (८६-८९). तेथी करीने युगने विषे दश पर्व गया पछी पांचमने दिवसे मा उपर कहेला सूर्यनक्षत्रनो निर्णय जाणवो. ए ज प्रमाणे सर्वत्र जाणवं. (९०). हवे युगने विपे पोरसीनुं प्रमाण जाणवा माटे करण बतावे छे. ते पोरसीनुं प्रमाण दचिणायनमा अनुक्रमे वृद्धि पामे छ भने उत्तरायणमा हानि पामतुं जाय छे. (९१).

(१२६) श्रीकाल लोकप्रकाश। निष्पन्ना पुरुषात्तस्मा-त्पौरुषीत्यपि सिद्ध्यति ॥९२॥ तथोक्तं नंदीचूर्णी- 'पुरिसोत्ति संकू पुरिससरीरं वा, तत्र पुरिसाओ निप्फन्ना पोरिसी इति' अयं भावः-स्वप्रमाणा भवेच्छाया यदा सर्वस्य वस्तुनः। तदा स्यात्पौरुषी याम्या-यनस्य प्रथमे दिने ॥ ९३ ॥ ततश्च तस्य पौरुष्यां तथा छाया विवर्द्धते । यथा सौम्यायनस्यादौ स्वमानाद् द्विगुणा भवेत् ॥ ९४ ॥ ततः पुनस्तथा छाया हीयते सर्ववस्तुनः। यथा याम्यायनादौ सा स्वस्ववस्तुमिता भवेत् ॥९५॥ सत्र्यशीतिशततमः स्वस्वमानस्य योशकः । प्रत्यहं तावती वृद्धि-र्याम्ये सौम्येऽयने क्षयः ॥ ९६ ॥ तथाहि-चतु- विशत्यंगुलस्य शंकोर्भवति तावती । छाया याम्यायनस्यादौ वर्द्धते प्रत्यहं ततः ॥ ९७ ॥ एकषष्टिविभक्तस्यांगुलस्याष्टौ लवा अयं । भागः शंकोर्य- थोक्तस्य सत्र्यशीतिशतोद्भवः ॥ ९८ ॥ तथाहि-एकैकमंगुलं कर्तु-मेक- षष्टिलवात्मकं । संख्या शंकोरंगुलाना-मेकपष्ट्यानिहन्यते ॥९९ ॥ नहीं पुरुषशन्दे करीने शंक (खीलो) कहेवाय छ, अथवा पुरुपर्नु शरीर कहेवाय छे. ते पुरुषने पाश्रीने जे थइ ते पौरुषी ( पोरसी) कहेवाय छे एम सिद्ध थाय छे. (९२). ते विषे नंदीसूत्रनी चूर्णिमा कयुं छे के-" पुरुष एटले शंकु अथवा पुरुषतुं शरीर. ते पुरुपी जे उत्पन्न थइ ते पौरुपी कहेवाय छे." आनो भावार्थ ए के जे-ज्यारे सर्व कोर पण वस्तुनी छाया पोताना ज प्रमाण जेटली थाय त्यारे दक्षिणायनने पहेले दिवसे ते पौरुषी थाय छ (पोरसीनुं प्रमाण थाय छे ). (९३). त्यारपछी ते दक्षिणायननी पौरुषीनी छाया अनुक्रमे एवी रीते वधे छे के जेथी उत्तरायणने पहेले दिवसे पोताना प्रमाणथी पमणी थाय. (९४). त्यारपछी सर्व वस्तुनी छाया भनुक्रमे एवी रीते हानि पामती जाय के जेथी दक्षिणायनने पहेले दिवसे पाली ते छाया पोतपोतानी जेटली अथवा यस्तुना प्रमाण जेटलीज थाय. (९५). दरेक वस्तुना पोतपोताना प्रमाणनो जे एक सो ने वाशीमो माग (भंश) थाय सेटली पृद्धि दररोज दक्षिणायनमा थाय छ भने उत्तरायणर्मा तेटली ज हानि थाय छे. (९६). ते मा प्रसाणे-चौवीश भांगळना प्रमाणवाळो शंक करीए तो दक्षियायनने पहेले दिवसे पोरसी वखते वेटली ज (चोवीश आंगळे ज) छाया होय छे. त्यारपछी प्रतिदिन एक भंगुलना एकमठीया भाउ अंश वृद्धि पामे छे. चोवीश अंगु- लना मा अंश एक सो ने त्राशी (छ मासना दिवसो)माथी उत्पन थाय छे. (९७-९८). से भा प्रमाणे-एक एक अंगुलना एकसठीया भाग करवा माटे शंकुना भांगळनी । मर्ग २८ मो। (१२७) चतुर्दश शतानि स्यु-श्चतुप्पष्टियुतान्यथ। सत्र्यशीतिशतेनैपां विभागेऽष्टक माप्यते ॥१०००॥ प्राप्यं त्रैराशिकादप्ये-पष्टिजलवाष्टकं । वृद्धिहान्यो- रंगुलस्य तदपि श्रूयतामिह ॥१॥ सन्यशीतिशतेनाहां चतुर्विंशतिराप्यते। यद्यंगुलानामेकेन किमहा लभ्यते तदा ॥२॥ त्रैराशिकस्थापना- १८३-२४-१ एकेनांत्येन गुणित-श्चतुर्विंशतिलक्षणः । मध्यराशिस्तथै- वास्था-देकेन गुणितं हि तत् ॥ ३॥ सत्र्यशीतिशतेनैष न भक्तुं शक्यते ततः २४४१८३ । छेद्यछेदकयो राश्यो-स्त्रिभिः कार्यापवर्त्तना ॥ ४ ॥ राशिश्छेद्योऽष्टात्मकोऽभू-देकषष्ट्यात्मकः परः ८४६१ । एवं त्रैराशिकाल्ल- ब्ध-मेकपष्टिलवाष्टकं ॥५॥ सार्द्धत्रिंशदहोरात्रा-मके मासे विवस्वतः। चतुश्चत्वारिंशमेव स्यादंशानां शतद्वयं ॥ ६॥ यतस्त्रिंशद्गुणा अष्टौ चत्वारिंशं शतद्वयं । अहोरात्रार्द्धस्य चांश-चतुष्कमत्र मील्यते ॥ ७ ॥ चतुश्चत्वारिंशमेत-धकिलांशशतद्वयं। एकपष्ट्याऽस्य भागे स्या-दंगुलानां चतुष्टयं ।। ८ ॥ तथा चाहुः-'बड्डए हायए वावि मासेणं चउरंगुलं ।' संख्याने (२४ ने ) एकसठे गुणवी. (९९). तेम गुणतां चौद सो ने चोसठ (१४६४ ) थाय छे. तेने एक सो ने त्राशीए ( १८३ ) मागतो मागमा आठ भावे छे. (१०००). प्रतिदिन वृद्धि भने हानिना आ अंगुलना एकसठीया आठ माग त्रैराशिकनी रीते पण प्राप्त थाय छे, ते पण सामळो. (१).-एक सो ने प्राशी दिवसवडे चोवीश भंगुलनी वृद्धि प्राप्त थाय छे तो एक दिवमयडे केटला अंगुल प्राप्त थाय ? (२) निराशिनी स्थापना-१३-२४-१. श्रही छेना एकवडे मध्यराशि चोवीशने गुणवाधी चोवीश ज श्रावे छे; केमके एके गुणवाथी ते ज संख्या भाचे. (३). हवे आ चोवीशने एक सो ने नाशीए मांगी शकाय तेम नथी (२४-१८३ ) तेथी खेच अने छेदक ए चन्ने राशिनी त्रण वडे अपवर्तन। करवी (त्रणे छेद उडाडवो). (४). तेम करवाथी छेद्य (२४) राशि भाठ थयो भने छेदक (१८३ ) राशि एकसठ थयो (6) मा प्रमाणे राशिक करवायी पण एकसठीया भाठ माग प्राप्त थया, (५). एक सूर्यमासना साडीत्रीश दिवस होय छे, तेना मंशो यसो ने चुमाळीश ( २४४ ) थाय छे. (६). केमके त्रीशने माठे गुणतां बसो ने चाळीश थाप के तेमा मर्ध अहोरात्रना चार अंशो मेळावा. (७). तेथी सो ने जुमाळीश थाय छे, तेने अंगुन करवा माटे एकसठे भाग देवो; तेथी चार भंगुल भावे छे. (८). कामु छ के-" एक मासे ( पोरसीनी माया) चार मांगळ वधे.

, (१२८) भीकाबलोकप्रकाश। 'मालेणं ति' सूर्यमासेनेत्यर्थः. त्रिभिर्मासैरंगुलानि वर्द्धते द्वादश क्रमात्। षड्भिर्मासैश्च वर्द्धते चतुर्विशतिरंगुलाः ॥९॥ चतुर्विशत्यंगुलस्य शंको श्छाया भवेदिति । दिने सौम्यायनस्याये-ऽष्टचत्वारिंशदंगुलाः ॥१०॥ चतुर्विशत्यंगुलस्य शंकोश्छाया यथोदिता । चतुर्विशत्यंगुलस्य जानोरपि तथा भवेत् ॥ ११ ॥ अत एव च-दिने याम्यायनस्याये द्विपदा पौरुषी भवेत् । जानुच्छायाप्रमाणा सा मीयमाना खजानुना ॥१२॥ पादद्वितय- मानश्च जानुः स्यात्पादमूलतः । द्वादशांगुलमानोऽत्र पादो न तु षडंगुलः ॥ १३ ॥ वितस्तिमाना स्याच्छाया मीयमाना वितस्तिना। याम्यायनादौ पौरुष्यां पादोऽत्र स्यात् षडंगुलः ॥ १४ ॥ ततश्च जानुच्छायाया-मंगुलं वर्द्धते यदा। तदा वितस्तिच्छायाया-मंगुलाई विवर्द्धते ॥१५॥ लघीयसो वस्तुनोऽपि स्वस्वमानानुसारतः । एवं छायावृद्धिहानी भावनीये स्वयं बुधैः ॥ १६ ॥ अयने दक्षिणे वृद्धौ ध्रुवका स्यात्पदद्वयं । हानौ च ध्रुवकः सौम्या-पने पदचतुष्टयं ॥ १७ ॥ छ भने चार पांगळ घटे थे.” अहीं मास एटले सूर्यमास जाणवो. अनुक्रमे त्रण मासे पार पांगळ वधे के अने छ मासे चोवीश बोगळ वधे छे. (९), पा रीते उत्तरायणने पहेले दिवसे चोवीश अंगुलप्रमाण शंकुनी छाया हती ते अडताळीश आंगळनी थाय छे. (१०). जे प्रमाणे चौधीश अंगुलप्रमाण शंकुनी छाया कही, तेज प्रमाणे चोषीश आंगळना प्रमाणवाळा जानु ( ढींचण )नी पण तेटली.ज छाया थाय छे. (११). तेथी करीने ज दक्षिणायनने पहेले दिवसे ये पगला जेटली बायाए पोरसी थाय ले. ते छाया पोताना जानुवडे मापीए तो जानुप्रमाण ज थाय छे. (१२). केमके पगना मूळथी भरीए तो जानुनुं मान बे पाद ज थाय छे. अहीं एक पादना पार भंगुल जाणवा, पण छ भंगुल जाणवा नहीं. (१३). दक्षिणायनना पहेला दिवसनी पोरसीए छायाने जो वेतथी मापीए वो ते छाया एक वेतप्रमाण थाय छे. श्रही छ मंगुलनो एक पाद जाणवो. (१४). तेथी करीने ज्यारे जानुनी छायामां. एक मांगळ वषे छे त्यारे वेतनी छायामा अर्घ भांगळ वधे छ. (१५). भा ज प्रमाणे पंडितोए पोतपोताना प्रमायने अनुसारे नानी पस्तुनी छायामां पण पदि भने हानि पोतानी मेळे जाणी लेवी.(१६). दक्षिणायनमा छायानी प्रदिपाय त्यारे प्रारंममा पे.पादनो ध्रुवक होय छे अने उचरापणमा हानि पाय , सारे प्रारंममा पार पादनो वाक होय छे. (१७), वर्ग १८ मो। (१२९) नमकृष्णप्रतिपदि द्विपादा पौरुषी भवेत् । युगस्य प्रथमेऽकाब्दे वर्द्धते च ततः क्रमात् ॥ १८॥ एवं च- माघस्य कृष्णसप्तम्यां पौरुषी स्याच्चतुष्पदा । प्रांगुक्तरीत्या क्रमत-स्तत प्रारभ्य च क्षयः ॥ १९ ॥ द्वितीयेऽब्दे नभःकृष्ण त्रयोदश्याः प्रभृत्यथ । वृद्धिर्माघ- श्वेततुर्यां चार्दिकृत्वा भवेत्क्षयः ॥२०॥ तृतीयेऽन्दे नभःशुक्ल- दशम्यां वृध्ध्युपक्रमः । माघकृष्णप्रतिपदि क्षयस्यादिः प्रकीर्तितः ॥ २१ ॥ वृद्ध्यारंभश्चतुर्थेऽब्दे सप्तम्यां नभसः शितौ । माघकृष्ण- त्रयोदश्या प्रारभ्य च ततः क्षयः ॥ २२ ॥ नभःशुक्लचतुर्थ्यां च वृद्ध्यादिः पंचमेऽन्दके। माघशुभ्रदशम्याश्च प्रारभ्य भवति चयः ॥२३॥ वृद्धौ क्षये च सतत-मंगुलस्यैकपष्टिजाः । अष्टांशाः पंचभागोन-मंगुलं सप्तभिर्दिनः ॥ २४ ॥ सविंशतिशतं भागाः स्युः पंचदशभिर्दिनैः। एक- षष्ट्यंशयुग्मोनं तैश्च स्यादंगुलद्वयं ॥ २५ ॥ यत्तु — अंगुलं सत्तरत्तेण पकेणं तु दुअंगुलं ।' इत्युच्यते तद्व्यवहार इति ज्ञेयं. श्रीउत्तराध्ययन युगना पहेला सूर्यवर्षमा श्रावण वद प्रतिपदाए वे पादनी छायाप्रमाण पोरसी थाय छ, भने त्यारपछी भनुक्रमे छाया वृद्धि पामे छे. (१८). तथा माघ मासनी कृष्ण सातमने दिवसे चार पादनी पोरसी थाय के अने त्यारपछी प्रथम कह्या प्रमाणे अनुक्रमे हानि पामे छे. (१९). युगना वीजा वर्षमा श्रावण वद तेरशथी प्रारंभीने वृद्धि थाय छ भने माघ शुदी धोथथी आरंभीने हानि थाय छे. (२०). श्रीजे वर्षे श्रावण शुदी दशमने दिवसे पृद्धिनी शरमात थाय के अने माघ वद प्रतिपदाने दिवसे हानिनी शरुआत कहेली छे. (२१). चोथे वर्षे श्रावण वद सातमे वृद्धिको प्रारम थाय के अने माघ वद रशी आरंभीने हानि थाय छे. (२२). तथा युगना पांचमे वर्षे श्रावण शुदी चोथने दिवसे वृद्धि शरु थाय छ भने माघ शुदी दशमथी प्रारंभीने हानि थती जाय छे. (२३). श्रा पृद्धि भने हानि प्रतिदिन एक अंगुलना एकसठीया आठ अंश जेटली थाय छे, तेथी सात दिवसे एक भंगुलमा पांच अंश ओछा जेटली वृद्धि-हानि थाय छे. (२४). पंदर दिवसे एक अंगुलना एकसठीया एक सो ने वीश भंश जेटली पृद्धि-हानि थाय ले, तेथी ये अंगुलमा ने भंश ओछा जेटली वृद्धि हानि थाय छे. (२५). वळी अन्य स्थळे जे कडं थे के-"सात रात्रिवडे एक अंगुल अने एक पखवाडीए वे भंगुल वृद्धि अने हानि थाय छे."

(१३०) भीकाललोकप्रकाश। सूत्रवृत्तौ च 'अंगुलं सत्तरत्तेणं ' इत्यस्य व्याख्याने अंगुलं सप्तरात्रेण सार्द्धनेति शेषो दृष्टव्यः इत्युक्तमस्ति, तथा चांगुलमेकैकयष्ट्यंशन्यूनमेव स्यादिति ध्येयं. त्रिंशता च दिनेश्चत्वारिंशमंशशतद्वयं । चतुर्भिरेकप- ट्यशै-स्तेनोना चतुरंगुली ॥ २६ ॥ अहोरात्रार्द्रस्य भाग-चतुष्कस्यात्र योजने । सार्द्धया त्रिंशताहां स्या-त्पूर्णागुलचतुष्टयी ॥ २७ ॥ एकः पादस्त्रिभिर्मासै-वृद्धिहान्योर्भवेदिति । श्रयनेन च पूर्णेन भवत्येवं पदद्वयं ॥ २८ ॥ इदमर्थलेशतो नंदीवृत्त्यादी. यत्तु ज्योतिष्करंडादौ वृद्धिहान्यो- निरूपिताः । चत्वारोऽत्रांगुलस्यांशा एकत्रिंशत्समुद्भवाः ॥ २९ ॥ तात्प- र्यभेदस्तत्रापि न कश्चिदिति भाव्यतां । यतस्तिथीन् पुरस्कृत्य तत्रेयं पद्धतिः कृता ॥ ३० ॥ अहोरात्रान् पुरस्कृत्य पूर्वमुक्ता च पद्धतिः । हानिवृद्धिफलं त्वत्र न किंचिदपि भिद्यते ॥ ३१ ॥ तथा ह्येकत्रिंशता स्यु-स्तिथिभिः परिपूर्णकाः । सार्धास्त्रिंशदहोरात्रा-स्तच्च प्राक् सुष्ठु भावितं ॥३२॥ तत्साईत्रिंशताहां स्या-ग्रंथांगुलचतुष्टयं । तथैकत्रिंशतापि ते व्यवहारथी का छे एम जाणवू श्रीउत्तराध्ययनसूत्रनी टीकामां-" सात रात्रिवडे एक अंगुल. या शन्दोना व्याख्यानमा-" सार्ध एटले अर्घ सहित सात रात्र एम (अर्धशेषनो) अभ्याहार जाणवो." एम कयुं छे. आथी करीने दरेक आंगळ एक एक अंश श्रोछु जाणवू, तथा त्रीश दिवसे एकमठीया बसो ने चाळीश अंश वृद्धि भने हानि थाय छ तेथी करीने चार पांगळमां एकसठीया चार अंश ओछा जेटली पृद्धि-हानि थाय छे. (२६). बाकीना अर्ध अहोरात्रना एकसठीया चार अंश तेमा नाखवाथी साडीत्रीश दिवसे चार अंगुल परिपूर्ण वृद्धि-हानि थाय छे. (२७). ए रीते गणतो पण मासे एक पाद छायानी पृद्धि-हानि थाय छे भने एक संपूर्ण अयने (छ मासे) वे पाद छायानी दि-हानि थाप छ. (२८). या प्रमाणे नंदीसूत्रनी टीकादिकमा था अर्थ लेशथी देखाड्यो छ. वळी जे ज्योतिष्करंडादिकमां मा द्धि भने हानिनी चावतमा एक अंगुलना एकत्रीशीया चार अंरा कहेला छे. (२९), नेमां पण तातार्यथी काइ पण भेद नी एम जाणy; कारणके त्यो तिथिने भाश्रीने एवी रीत तापी छे. (३०). भने उपर पतावेली रीत महोरात्रने भाश्रीने कही छे, तेथी नहीं पृद्धि भने हानिना कार्यमा कोइ पण भेद (नायत) पडतो नथी. (३१). ते पा प्रमाणे एकत्रीश विथिए करीने साडीतीश महाराध परिपूर्ण थाय थे, एम भागळ सारी रीवे विस्तारथी) सिद्ध कर्य छे. (३२). वेधी सर्ग १८ मो। (१३१) स्या-त्तिथिभिस्तच्चतुष्टयं ॥ ३३ ॥ तथाहि-चत्वार एकत्रिंशता-श्चतु- विशं शतं भवेत् । एकत्रिंशद्विभक्तेऽस्मिन् स्यादंगुलचतुष्टयं ॥३४॥ मासे मासे रवेरेवं तिथ्य‘धिक्यमूह्यतां । अहोरात्रैकपष्टौ स्यु-पष्टिस्तिथयो यथा ॥३५॥ त्र्यशीत्याढ्यमहोरात्र-शतं यदयनेऽयने । भवेत्तत्र तिथीनां त-पडशीत्यधिकं शतं ॥३६॥ एकत्रिंशद्विभक्तस्यां-गुलस्यांशचतुष्टयं । वृद्धिहान्योर्यदुक्तं त-लुभ्यं त्रैगशिकादपि ॥ ३७॥ पडशीत्यातिरिक्तन तिथीनां शतकेन चेत् । हानिवृद्ध्योरंगुलानां चतुर्विंशतिराप्यते ॥ ३८ ॥ तदैकतिथ्या किं प्राप्य-मिति ज्ञातुमिदं लिखेत् १८६-२४-१ । अंत्येनकेन मध्यस्थो राशिरत्र निहन्यते ॥ ३९ ॥ चतुर्विशतिरेव स्या-देकेन गुणिनं हि तत् । पडशीतिशतेनाल्पो भक्तुं नाहत्ययं ततः॥४०॥ छेद्यछेदकयो राश्योः पड्भिः कार्यापवर्तना। छेद्यश्चतुष्कात्मान्यस्तु स्यादेकत्रिंशदात्मक ।। ४१ ॥ इत्येकत्रिंशदुद्भूत-मंगुलांशचतुष्टयं । त्रैराशिकवलेनापि वृद्धि- हान्योः समर्थितं ॥ ४२ ॥ करीने जेम साडीत्रीश अहोरात्रवडे चार अंगुल वृद्धि-हानि थाय छे तेम अहीं एकत्रीश तिधि- वडे चार अंगुल वृद्धि-हानि धाय छे. (३३). ते आ प्रमाणे-चारने एकत्रीशे गुणतां एक सो ने चोवीश (१२४ ) थाय, भने तेने एकत्रीशे भागता मागमा चार अंगुल आवे छे. (३४). या प्रमाणे सूर्यना महिने महिने अर्घतिथि पधारे कहेची, तेथी करीने एकसठ अहोरात्रनी पासठ तिथिमो थाय छे. (३५). दरेक अयनमां एक सो ने त्राशी महोरात्र आवे छे त्यां तिथियो एक सो ने छाशी आवे छे. (३६), तिथिने भाश्रीने सृद्धि- हानिमा अंगुलना एकत्रीशीया चार अंश ने कह्या ते त्रैराशिकनी रीते पण आवी शके छे. (३७). ते भा प्रमाणे-जो एक सो ने छाशी तिथिोए करीने चोचीश आंगळनी वृद्धि-हानि थाय छे, तो एक तिथिए केटली पृद्धि-हानि थाय ? था जाणवा माटे श्रा प्रमाणे लखवू-१८६-२४-१. भहीं छेना एकवडे मध्यनो राशि (२४) गुणत्रो, तेथी चोवीश ज थाय; केमके एके गुणवाथी तेज अंक श्रावे छ, पछी आ (२४ नो) अंक नानो होवाधी तेने एक सो ने छाशीए मांगी शकाता नथी, तेथी छेद्य अने छेदक एथे राशिनी बडे अपवर्चना करवी (छए छेद उडाडवो); तेथी छेद्य राशि चार अने छेदक राशि एकत्रीश (3) आवे छे. (४१). मा प्रमाणे एक अंगुलना एकत्रीशीया चार माग पृद्धि-हानिने विषे त्रैराशिकना पळथी पण सिद्ध थाय छे. (४२).

(१३२) भीकाललोकप्रकाश । अथान करणं-यत्पर्वणोऽभीष्टतिथौ पौरुषी ज्ञातुमिष्यते । ततः पूर्वमतीतानि पर्वाणीह युगादितः ॥ ४३ ॥ स्युर्यानि पंचदशभि-गुण- येत्तानि तत्र च । अभीष्टतिथिपर्यंतान् पर्वणोऽस्य तिथीन् क्षिपेत् ॥४४॥ दियते पडशीत्याढ्य-शतेन राशिरेप च । लब्धेके विषमे ज्ञेय-मतीतं दक्षिणायनं ॥ ४५ ॥ ज्ञेयं लब्धे समे चांके-ऽतिक्रांतमुत्तरायणं । एवं चात्रायनज्ञानो-पाय एष प्रदर्शितः ॥ ४६ ॥ षडशीतिशतेनाथ । तिथि- राशौ हृतेऽत्र यत् । शेषं स्यादथवा भागा-लाभे यत्स्याद्यथास्थित ॥४७॥ तच्चतन विधायैक-त्रिंशता प्रविभज्यते । यल्लब्धं तान्यंगुलानि यच्छेषं तेंगुलांशकाः ॥८॥ याम्यायने ध्रुवांकोऽस्ति यः पादद्वयलक्षणः। स्यात्तत्रैतावतो वृद्धौ पौरुष्यहि विवक्षिते ॥४९॥ सौम्यायने ध्रुवांकोऽस्ति यश्चतुष्पादलक्षणः। ततश्चैतावतो हानौ पौरुष्यहि विवचिते ॥५०॥ युगस्य पर्वणि प्राज्ञ पंचाशीतितमे ननु । पंचम्यां स्यात्कतिपदा पौरुषीति वद द्रुतं ॥ ५१ ॥ अतीतानामिह चतु-रशीतिर्यास्ति पर्वणां । षष्ट्याढ्या द्वादशशती सा स्यात्पंचदशाहता ॥ ५२ ॥ पंचम्यां पृष्टमिति हवे पोरसी जाणवानुं करण कहे थे. जे पर्वनी इष्ट तिथिएँ पोरसी जाणवानी इन्चा होय ते तिथिनी पहेला युगनी शरुपातथी जेटला पर्च चीती गया होय तेने पंदरे गुणवा, सेमा इष्ट तिथि सुधीनी चालता पर्वनी तिथिमो नाखवी. (४४). ते राशिने एक सो ने छाशीए भाग देवो. भागमा विषम (एकी ) भंक भावे तो दक्षिणायन वीती गयुं छे एम जाणवू.(४५),भने भागमा सम (बेकी) भंक आवे तो उत्तरायण पीती गयं के एम जाणवू. मा प्रमाणे भयन जाणवानो उपाय बतान्यो. (४६). तिथिना राशिने एक सो ने छाशीए मांगतो जे शेष रहा होय अथवा भाग नहीं चालवाथी जे मूळ अंक रह्यो होय, ने चारे गुणी एकत्रीशे मांगवा. मागमा जे भाषे ते अंगुल भने जे शेष रहे ते अंगुलना अंश जाणवा. (४८). दक्षिणायनमा जे वे पादनो ध्रुवोंक के तेमा तेटला अंगुल मने अंशनी वृद्धि करवाथी इष्ट दिवसे पोरसी भावे छे. (४९). तथा उचरायणमा जे चार पादनो ध्रुवौक थे, तेमाथी वेटला अंगुल भने भंश बाद करवाथी इष्ट दिवसे पोरसी आवे छे. (५०). उदाहरण के पंडित ! युगना पंचाशीमा पर्वमा पचिमनी तिथिए केटला पगलानी छायाए पोरसी याय ? एनो उत्तर जलदी कहो. (५१). उचर-मही जे पोराशी पर्व व्यतीत थयां थे, वेने पंदरे गुणपापी पार सो ने साठ (१२६० ) थाय छे. (५२). .

मर्ग २८ मो। (१३) व क्षिप्यते तत्र पंचकं । पंचषष्टियुतानीति शतानि द्वादशाभवन् ॥५३॥ पडशीतिशतेनैषां भागे लब्धाश्च पट् ततः। पडू गतान्ययनान्यस्ति सांप्रतं दक्षिणायनं ॥५४॥ शेषमेकोनपंचाश-दधिकं शतमस्ति यत् । तस्मिश्चतुर्गुणे पंच शताः षण्णवतिस्पृशः ॥ ५५ ॥ हृताश्चैकत्रिंशतामी प्राप्ता चैकोनविंशतिः । शेषाः सप्तांगलास्ते च स्युर्यवा अष्टभिर्हताः ॥५६॥ पट्पंचाशद्यवा जाता-स्ते चैकत्रिंशता हृताः।लब्ध एको यवः शेषाः पंच- विंशतिरंशकाः ॥५७॥ पाद एकोनविंशत्यां-गुलैः सप्तांगुलाधिकः । याम्या- यनत्वादेतच्च वर्द्धनीयं पदद्वये ॥५८॥ ततः पादत्रयं सप्ता-गुलान्येकस्तथा यवः।एकत्रिंशद्भवाः पंच-विंशतिश्च यवांशकाः॥५९॥ पंचाशीतितमे पर्व- ण्येतन्माना युगे भवेत् । पंचम्यां पौरुषीत्येवं कार्यान्यत्रापि भावना ॥६॥ युगे वा सप्तनवतेः पर्वणां समतिक्रमे। पंचम्यां स्यात्कतिपदा पौरुषीत्यत्र कथ्यते ॥६१॥ अत्र पण्णवतिः पंच-दशघ्ना गतपर्वा । .. तेमा पांचमनी तिथिर्नु पूछेनु होवाधी पांच उमेरवा; तेथी पार सो ने पांमठ ( १२६५) थाय छे. (५३). तेने एक सो ने छाशीए (१८६) भाग देतो भागमा छ आवे छे, तेथी छ भयन बीती गया छ भने हमणो दक्षिणायन पर्ने छ एम जाणवू. (५४). मागाफार फरतां जे शेष एक सो ने भोगणपचास (१४९ ) रह्या छ तेने चारे गुणतां पांच सो ने छन्नु (५९६) थाय छे. (५५). तेने एकत्रीशे (३१) माग देता मागमा भोगणीश (१९) भावे छ भने याकी सात अंगुल शेष रहे थे, तेने भाठे गुणवाथी यव थाय छे. (५६). तेथी सातने आठे गुणतां छप्पन यव थया, तेने एकत्रीशे मांगता मागमा एक यव माग्यो भने शेप पचीश अंश रसा. (५७). हवे मागमा जे भोगपीश (१९) अंगुल प्राध्या छ तेनो एक पाद अने उपर सात अंगुल एटलुं प्रमाण दक्षिणायन होवाथी पे पादमां पधार. (५८). तेथी प्रण पाद, सात भंगुल, एक यव भने एक यवना एकत्रीशीया पचीश भंश, भाटला प्रमाणवाळी छाया थाय त्यारे युगना पंचाशीमा पर्वमा पांचमनी तिथिए पोरसी याय छे. या प्रमाणे चीजे ठेकाणे पण जाणवू. (६०). प्रश्न-युगना सेवाणुं पर्व जाय त्यारे पांचमनी तिथिए केटला पगलानी पोरसी पाय! ए प्रश्ननो उपर भापे छे. (६१).-भहीं छन्नु पर्व बीती गया छ माटे बन्नुने १ ससाणुमं पर्व पालतुं होय स्यारे एम समझj.

(१३४) श्रीकामकोकप्रकाश। पंचाढ्या स्याच्छताः पंच-चत्वारिंशाश्चतुर्दश ॥ ६२ ॥ पडशीतिशतेनेषां भागे सप्त करं गताः । सप्तायनी गता तस्मा-संप्रत्यस्त्युत्तरायणं ॥ ६३ ॥ त्रिचत्वारिंशदधिकं शेषं यद्वर्द्धते शतं । तस्मिश्चतुर्गुणे पंच- शती स्यात्सद्विसप्ततिः ॥६४॥ विभक्तकत्रिंशतेयं प्राप्ता चाष्टादशांगुली। तया चैकं पदं लब्ध-मधिकान्यंगुलानि पट् ॥ ६५ ॥ शेषाश्चतुर्दशांशा ये स्युर्यवास्तेऽष्टताडिताः। शतमेकं भवत्येवं यवा- द्वादशोत्तरं ॥ ६६ ॥ तस्यैकत्रिंशता भागे हृते लब्धास्त्रयो यवाः । शेषाश्चैकत्रिंशदंशा यवस्यैकोनविंशतिः ॥ ६७ ॥ सौम्यायनवादेतच्च शोध्यं पदचतुष्टयात् । ततः स्यात्पौरुषी मान-मेवे पूर्वोदिते दिने ॥ ६८ ॥ पंचांगुलानि द्वौ पादौ तथा यवचतुष्टयं । एकत्रिंशद्विभक्तस्य यवस्य द्वादशांशकाः ॥६९॥ किंच-अतीततिथिविज्ञानं पौरुषीमानतोऽयने । यत्स्यात्रैराशिकायत्तं तदप्यत्र निशम्यतां ॥ ७० ॥ चतुर्भिरंगुलस्यैक-त्रिंशद्भागैर्यदाप्यते । पंदरे गुणी तेमां पांच उमेरवाथी चौद सो ने पीस्ताळीश (१४४५) थाय छे. (६२). तेने एक सो ने छाशीए ( १८६) भांगता भागमा सात हाथमा लागे छे (आवे छे); तेथी सात अयन गयेला होवाथी हमणां उत्तरायण चाले के एम सिद्ध थयु. (६३). जे पाकी एक सो ने तेताळीश शेष रह्या छे तेने चारे गुणतां पांच सो ने बोंतेर (५७२) थाय छे. (६४). तेने एकत्रीशे (३१) मांगता भागमा अढार (१८) अंगुल श्रावे छे, तेमाथी बार अंगुलनो एक पाद लेतां चाकी छ भंगुल वधे छे. (६५). मांगाकार करता जे शेप चौद (१४ ) अंश वध्या छे, तेने भाठे (८) गुणी यव कराय छे तेथी एक सो ने पार (११२) यव थाय छे. (६६). तेने एकत्रीशे भांगतां त्रण यव भागमा श्रावे के अने वाकी एक यवना एकत्रीशा श्रोगणीश (१९) अंश शेष रहे छे. (६७). हवे आ उत्तरायण होवाथी चार पादमाथी (एक पाद, ६ भांगळ, ३ यव अने १९ अंश) बाद करवा; तेथी इष्ट तिथिए पोरसीनुं मान पाटलुं थाय छे. (६८).- पाद, पांच प्रांगळ, चार यव भने एक यवना एकत्रीशा पार मंश (२-५-४-१२) भाटली छायाए पोरसी थाय छे. (६९). वळी भयनने विषे पोरसीना प्रमाणधी पत्तीत तिथिन जे ज्ञान राशिकथी थाय छ ते पण प्रही सामळो. (७०).--प्रश्न-जो अंगुलना एकत्रीशा चार अंशे करीने एक सर्ग २८ मो। (१३५) एका तिथिस्तत्तिथय-श्चतुर्भिरंगुलैः कति ४४३१-१-४ ॥ ७१ ।। अंगुलामांतिमो राशिः सावपर्यायाधराशिना । भवेच्छतं चतुर्विश-मेक- त्रिंशद्गुणीकृतः ॥ ७२ ॥ एतेन गुणितो मध्य-राशिर्जात इयन्मितः । श्राद्येन राशिना भागे चैकत्रिंशदवाप्यते ॥७३॥ चतुरंगुलवृद्धायां पौरुष्यां ध्रुवकोपरि । गता याम्यायनस्यैक-त्रिंशत्तिथय एव तत् ।। ७४ ॥ ध्रुवाच्चतुष्पादरूपा-दथ क्षीणेप्विहाष्टसु । अंगुलेषु कियत्सौम्या-य नस्य गतमुच्यताम् ।।७५॥ अत्रोच्यते--चतुर्भिरंगुलस्यैक-त्रिंशद्भागैः क्षयं गतैः । तिथिरकाप्यते चेत्त-त्ताः कत्यष्टभिरंगुलैः ॥ ७६ ॥ ४४३१-१-८ सावर्यायांतिमो राशि-रेकत्रिंशद्गुणीकृतः । जायेते द्वे शते अष्ट- चत्वारिंशत्समन्विते ॥ ७७ ॥ ४४३१-१-२४८४३१ अंत्येन राशिनानेन राशिमध्यो हतोऽभवत् । इयन्मानोऽथायमाद्य-राशिना प्रविभज्यते ॥७८॥ द्वापष्टिराप्यते तस्मात् द्वापष्टिस्तिथयो गताः । ज्ञेया सौम्यायन- तिथि थाय छे, तो चार अंगुलबडे केटली तिथिमो प्राप्त थाय ? (४४३१-१-४). (७१). अही अंगुलना स्वरूपवाळा छल्ला ( ४ ) राशिने मवर्ण करवा माटे पहेलाना एकत्रीशना राशिवडे गुणतां एक सो ने चोचीश (१२४) थाय छे. (७२). भा राशिवडे मध्यनो (१) राशि गुणीए त्यारे पण तेटलो ज (१२४) राशि थाय छे. तेने पहेला (४) राशिवडे भांगता भागमा एकत्रीश आवे छे. (७३). तेथी पोरमीना प्रमाणमा ध्रुवोकनी उपर चार अंगुल वधे त्यारे दक्षिणायननी एकत्रीश (३१) तिधिभो गइ एम सिद्ध थयु. (७४). प्रश्न-चार पादवाळा ध्रुवांकमाथी पाठ अंगुलनी छाया हानि पामे त्यारे उत्तरा- यणना केटला दिवस गया कहेवाय १ (७५). उत्तर-अंगुलना एकत्रीशा चार माग (जेटली छाया) क्षय पामे पारे जो एक तिथि प्राप्त थाय छे तो भाठ भंगुलनी छाया हानि पामे त्यारे केटली विधिो प्राप्त थाय १ (४४३१-१-८). (७६), उचरमा मार्नु सवर्णपणुं करवा माटे बेला (८) राशिने एकत्रीशे गुणवायी बसो ने अडवाळीश (२४८) थाय छे. (४४३१-१-२४८४३१). (७७). मा ( २४८) छेना राशिवडे मध्य (१)नो राशि गुणता एटलो ज (२४८) अंक आवे छे. तेने पहेला (४) राशिवडे माग देवो. (७८). तेम करवाधी भागमा बामठ (६२) भावे । तेथी मा प्रमाणे पोरसीना प्रमाणने भाश्रीने उत्तरायणनी घासठ तिथिमो गइ एम सिद् पयं.

श्रीकालसोकप्रकाश। स्येदृक्-पौरुषी मानदर्शनात् ॥ ७९ ॥ इति पौरुषीप्रकरणं. पादोनपौरुषीरूपा या पात्रप्रतिलेखना । प्रातःस्यात्सांगुलैः पड्भि- ज्येष्ठापाढनभस्त्रिके ॥८॥ भाद्रादित्रितयेऽष्टाभि-सर्गादित्रितये पुनः । अंगुर्दशभिः शेषत्रये त्वष्टाभिरंगुलैः ॥ ८१ ॥ अत्रेदं तत्त्वं यत्र यत्र हि मासादौ या योक्ता पौरुषीमितिः। तत्र तत्रोक्तांगुलाना क्षेपे पादोनपौरुषी ।।८२॥ इति पादोनपौरुषी । पौषमाले तनुच्छाया नवपादमिता यदि । तदा स्यात्पौरुपी सार्धा मासे मासे ततः क्रमात् ।।८३॥ एकैको हीयते पाद-स्तदापाढे पदत्रयं । यथा हानिस्ततोवृद्धि-स्ततः पौपे यथोदितं ॥ ८४ ॥ इति सार्द्धपौरुषी। पौपे वितस्तिच्छायाथ यदि स्याद् द्वादशांगुला । तदा दिनस्य पूर्वाद्धं मासे मासे ततः पुनः ॥ ८५ ॥ द्वयोर्द्वयोरंगुलयो-हानिर्भाव्या ततः शुचौ। मध्याह्ने स्यान्न तच्छाया खलमैत्रीव मूलतः ॥८६॥ यद्वा- (७९). इति पौरुषीप्रकरण. हवे पादौनपौरुषीरूप जे पात्रप्रतिलेखनानो काळ कयो छे, ते ज्येष्ठ, अषाढ अने श्रावण ए प्रण मासमां प्रात:काळे छ आंगळप्रमाण छायावडे थाय छे. (८०). मादरवो, माशो ने कार्तिक ए त्रण मासमा आठ अगिळवडे, मार्गशीर्ष पोष अने माघ ए त्रण मासमा दश आंगळवडे अने बाकीना एटले फाल्गुन, चैत्र भने वैशाख ए त्रण मासमा माठ मांगळप्रमाण छायावडे पादोनपोरसी थाय छे. (८१). अहीं तात्पर्य ए के के- जे जे मासनी अादिमां पोरसीनुं जे जे प्रमाण कयुं ते ते प्रमाणमा अहीं कहेला भंगुलो नाखवाथी पादोनपोरसी थाय छे. (८२). इति पादोनपौरुषी. पोष मासमा जे वखते शरीरनी छाया नव पगलांनी थाय त्यारे सार्थपौरुषी थाय छे. त्यारपछी मासे मासे अनुक्रमे एक एक पाद (पगलु) घटाडवो; तेथी अपाढ मासमा प्रय पादनी छायाए साढपोरसी थाय छे. अहीं जे प्रमाणे पादनी हानि करवानी के तेम श्रावणधी पृद्धि करवी, तेथी पोप मासे प्रथम कामा प्रमाणे नव पाद भावशे. (८४). इति सार्धपौरुषी. पोष मासमा जे वखते वितस्ति (वैत)नी बाया पार पांगळनी चाय त्यारे दिवमनो पूर्वार्ध (पुरिमट्ट) पूर्ण थाय छे. त्यारपछी मासे मासे पवे अंगुलनी हानि करवी; तेथी अषाढ मासमा मध्याद समये खळ पुरुपनी मित्राइनी जेम बिलकुल बाया रहेवी नधी.

सर्ग २८ मो। (१३७) पौपे दिनार्द्धगच्छाया पट्पादा हीयते ततः। एकैकोंदिर्मासि मासि चापाढे निष्ठिताखिला ॥८७॥ एतत्पादोनपौरुष्या-दिकं मानं यदीरितं । तत्सर्व स्वस्वराकायां विज्ञेयं व्यवहारतः ॥ ८८ ॥ इति पूर्वाई ॥ इत्थं युगस्याभिहितं स्वरूपं, मयाप्तवाक्यानुगमेन किंचित् । विशेषबोधस्पृहयालुभिस्तु, ज्योतिष्करंडाद्यवलोकनीयं ॥ ८९ ॥ विश्वाश्चर्यदकीर्तिकीचिविजयश्रीवाचकेंद्रांतिष- द्राजश्रीतनयोऽतनिष्ट विनयः श्रीतेजपालात्मजः । काव्यं यकिल तत्र निश्चितजगत्तत्वप्रदीपोपमे- ऽष्टाविंशः परिपूर्णतामकलयत्सर्गो निसर्गोज्ज्वलः ॥ ९० ॥ ॥ इति श्रीलोकप्रकाशेऽष्टाविंशतितमः सर्गः समाप्तः ॥ श्रीरस्तु । । ग्रंथान, १२२२ म. २१ । (८६). अथवा पोप मासमा मध्याह समये शरीरनी छाया छ पाद होय छे. त्यारपछी मासे मासे एक एक पाद हानि थता अपाढ मासमा पिलकुल छाया रहेती नथी. (८७). मा पादोनपौरुषी विगेरेनुं जे मान नहीं कर्तुं छे, ते सर्व व्यवहारथी पोतपोतानी पूर्णिमाए बाण. (८८). इति पूर्वाध. मा प्रमाणे में भासवचनने अनुसारे युगर्नु कारक स्वरूप कडु छे. विशेष जाणवानी खाए ज्योतिकरंडादिक यो जोपा. (८९). विश्चने भायर्य उत्पन्न करे एवी कीर्थिवाला श्रीकीर्तिधिजयवाचकेंद्रना शिप्प, राजश्री( माता )ना भात्मज भने श्रीतेजपाळना पुत्र पिनये जे काव्य रच्युं छे, ते जगतना तापनो निधय रयामा दीपक समान था प्रथमां स्वामाविक उज्यक एवो भा महावीशमो सर्ग पूर्ण थयो. (९०). इति श्रीलोफमफाशे अष्टापिंशतितमः सर्गः ॥ पं. १२२२ थ. २१.

माग छदाका पृष्ठ ४० श्लोक १४ पछीनी स्थापना. संवत्सर नाम सूर्यसंवत्सर | ऋतु सं० दिन ३६० चन्द्र सं० | नक्षत्र सं० अभिवर्धित सं० ३५४ ३२७ ३८३ ५१ ४४ ६२ ६७ . भाग छेदांक . o ऋतु मास चन्द्र मास नक्षत्र मास | अमिवर्धित मास मास नाम | सूर्य मास दिन . ३२ ६२ २१ ६७ १२१ १२४ ० पृष्ठ ७९ श्लोक १७ पछीन यंत्रकम. ऋत नाम मास दिन मास दिन मास दिन ऋतु समा- ऋतु समा- मि तिथि प्ति पक्ष प्रावृप १ १ कृष्ण पक्ष वर्षा २ ३ शरद् ३ - क. प्रथम श्र. दि.१ श्रावण दिन ३० | भाद्रपद दिन १ द्वि.अ.दि.३० भाद्रपद दिन २९ श्राश्चिन दिन ३० कार्तिक दिन ३ कार्तिक दिन २७ मार्गशीर्ष दि.३० पोप दिन ५ हेमन्त ४ पोप दिन २५ माघ दिन ३० फाल्गुन दिन ७ वसंत ५ फान्गुन दिन २६ चैत्र दिन ३० | वैशाख दिन ९ शिशिर ६ वैशाख दिन २१ | ज्येष्ठ दिन ३० अपाढ दिन ११ प्रावृष ७ अपाढ दिन १९ था. दि. ३० माद्र. दिन १३ भाद्र. दि. १७ आश्विन दि.३० कार्ति. दिन १५ शरद् ९ का. दि. १५ | मार्ग. दि. ३० पोप दिन १७ पोप दि. १३ माघ दि. ३० फा. दि. १९ वसंत ११ फा. दि. ११ | चैत्र. दि.३० 4. दि. २१ क.प्र.वर्ष। MM कृ. घर्षा ८ . क. २ शुक्लपष हेमन्त १० ६ (१३९) शु.द्वि.वर्ष ८ वर्षा १४ १२ १४ १ ३ . अ. दि. कृ. तु. वर्ष सर्ग २८ मो. | शिशिर १२ वै. दि. ९ ज्ये. दि. ३० अ. दि. २३ प्रावृष १३ अ. दि. ७ श्रा. दि. ३० मा. दि. २५ मा. दि. ५ आ. दि. ३० का. दि. २७ का. दि. ३ मार्ग दि ३० पो. दि. २९ हेमन्त १६ प्रथम पोप दि. १ माघ दि. ३० फा. दि.१ द्वि. पो. दि.३० वसंत १७ फा. दि. २९ चै, दि. ३० वै. दि. ३ शिशिर १८ वै. दि. २७ ज्ये. दि. ३० प्रावृप १९ प्र. दि. २५ श्रा. दि. ३० भा. दि. ७ भा. दि. २३ प्रा. दि ३० का. दि. ९ शरद् २१ का. दि. २१ | मार्ग दि. ३० पो. दि. ११ माघ दि.३० फा. दि. १३ वसंत २३ फा. दि. १७ | चैत्र. दि. ३० वै. दि. १५ शिशिर २४ | वै. दि. १५ ज्ये. दि. ३० दि.१७ प्रावृष २५ श्र. दि. १३ श्रा. दि. ३० भा. दि. १९ मा. दि. ११ प्रा. दि. ३० का. दि. २१ शरद् २७ का. दि.९ मार्ग दि. ३० पो. दि. २३ हेमन्त २८ पो. दि.७ माघ दि.३० फा. दि. २५ वसंत २९ फा, दि. ५ चै. दि. ३० शिशिर ३० वै. दि. ३ ज्ये. दि. ३० प्र. अ. दि. २९ वर्षा २० . कृ. क. २ शु. च. वर्ष ४ ६ . चर्पा २६ ८ चै. दि. २७ १२ १४ शु. पं. वर्ष काळना माप ने नाम संबंधी यंत्र. (गुजराती भाषामा ) १ सर्वथी सूक्ष्म समय. २० त्रुटित ४९७८७१३६ अंक ८, विंदु२० २ असंख्य समयनी एक प्रावलिका. २१ अडडांग ४१८२११९४२४ अंक १०, ३ संख्याती भावलिकानो १ उच्छ्वास ने बिंदु २५ १ निःश्वास वे मळीने एक प्राण. २२ अडड ३५१२९८०३१६१६ अंक १२, ४ सात प्राणनो एक स्तोक. पिंदु ३० ५ सात स्तोकनो एक लक. २३ भवांग २९५०९०३४६५५७४४ ६ सत्योतेर लवर्नु एक महत (वे घडी). अंक १४, बिंदु ३५ ७ श्रीश मुहूर्त्तनुं एक अहोरात्र. २४ अवव २४७८७५८९११०८२४९६ ८ पंदर अहोरात्रे एक पक्ष. अंक १६, पिंदु ४० ९ चे पक्षनो एक मास. २५ हहकांग २०४२१५७४८५३०९२९.६६४ १० चे मासनो एक ऋतु. अंक १८, बिंदु ४५ ११ प्रण ऋतुनो एक भयन. २६ हूहूक १७४९०१२२८७६५९८०९१. १२ वे भयननु एक वर्ष. ७७६ अंक २०, विंदु ५० १३ पांच वर्षनो एक युग. २७ उत्पलांग १४६९१७०३२१६३४२३. १४ चीश पुगे सो वर्ष. ९७०९१८४ अंक २२, बिंदु ५५ १५ दश सोए एक हजार वर्ष. २८ उत्पल १२३४१०३०७०१७२७६१३. १६ सो हजारे एक लाख वर्षे. ५५७१४५६ अंक २४, बिंदु ६० १७ चोराशी लाख वर्षे एक पूर्वाग. २९ पद्मांग १०३६६४६५७८९४५११९५- ८१००००० अंक २, शून्य पांच. ३८८००२३०४ अंक २६, बिंदु ६५ हवे पछीना अंको प्रथमना अंकने ८४ लाखवडे गुणवाथी आवे छे तेथी ते । ३० पद्म ८७०७८३१२६३१३९००४१२- ५९२१९३५३६ अंक २७, बिंदु ७० १८ ८४ लाख पूर्वागे एक पूर्व. अंक ४, | ३१ नलिनांग ७३१४५७८२६१०३६७६- बिंदु १०, ७०५६०००००००००० ३४६५७७४४२५७०२४ अंक २९, १९ त्रुटितांग ५९२७०४ अंक ६, निंदु १५ पिंदु ७५ प्रमाणे गुणवा. .

वर्ग १८ मो। (१४१) ३२ नलिन ६१४४२४५७३९२७०८८१३. ३९ नयुतांग १८१३१०७६०४५३५५१८- ११२५०५१७५९००१६ अंक ३१, ४९८७६१००९००६४६०३९६११०. बिंदु ८० ९१४५१९०४ अंक ४५, बिंदु ११५ ३३ अर्थनिप्ररांग ५१६११६६५२०९८७- | ४० नयुत १५२३०१०३८७८०९८३५५३. ५४०३०१४५०४३४७७५६१३४४ ८९५९२४७५६५४२६७३२७३३१६- अंक ३३, बिंदु ८५ ८१९५९९३६ अंक ४७, विंदु १२० ३४ अर्थनिपूर ४३३५३७९७९३६२९५३-४१ चूलिकांग १२७९३२८७२५७६०२६- ३८५३२१८३६५२११५१५२८९६ १८५२७२५७६७९५४९५८४५५४९. अंक ३५, बिंदु ९० ५८६१२८४६३४६२४ अंक ४९, बिंदु १२५ ३५ अयुतांग ३६४१७१९०२६६४८८०८- ४३६७०३४२६७७७६७२८४३२६४ ४२ चूलिका १०७४३३६१२९६३८६१९- अंक ३७, विंदु ९५ ९५६२८९६४५०८२१६५१०२६१६- ५२३४७९०९३०८४१६ अंक ५१, ३६ अयुत ३०५९०४३९८२३८४९९९०- बिंदु १३० ८६८३०८७८४९३२४५१८८३४१७६ ४३ शीर्षप्रहेलिकांग ९०२२९४३४८८९- भंक ३९, विंदु १०० ६४४०७६३२८३३०१८६९०१८६८. ३७ प्रयुतांग २५६९५९६९४५२०३३९९. ६१९७८७९७२२४३८१९०६९४४ २३२९३७९३७९३४३२५९५८२०७० अंक ५२, विंदु १३५ ०७८४ अंक ४१, बिंदु १०५ ४४ शीर्षप्रहेलिका ७५८२६३२५३०७३०- ३८ प्रयुत २१५८४६१४३३९७०८५५३. १०२४११५७९७३५६९९७५६९६४०. ५५६६७८६७८६४८३३८०४८९३९ ६२१८९६६८४८०८०१८३२९६ अंक ४५८५६ अंक ४३, बिंदु ११० ५४, बिंदु १४० जुमो प्रत पृष्ठ ३९-४० ॥ अथैकोनत्रिंशत्तमः सर्गः प्रारभ्यते ॥ - युगैरित्युक्तरूपैः स्या-चतुभिर्वविंशतिः। पंच विंशतयोऽब्दानां वर्षाणां शतमीरितं ॥१॥ दशवर्षशतान्यव्द-सहस्रं परिकीर्तितं ॥ शतं वर्षसहस्राणां वर्षलक्षं भवेदिह ॥ २ ॥ अतः परं च सत्रोंका शीर्वप्रहेलि- कावधिः । भाव्यः क्रमेण चतुर-शीतिलक्षगुणो बुधैः ॥३॥ तथाहि- वर्षलक्षाणि चतुर-शीतिः पूर्वांगमुच्यते । पूर्वांगलक्षेश्चतुर-शीत्या पूर्व प्रकीर्तितं ॥४॥ पूर्वे च वर्षकोटीनां लक्षाणि किल सप्ततिः । पटपंचा- शत्सहस्राणि निर्दिष्टानि जिनेश्वरैः ॥ ५॥ पूर्वलक्षाणि चतुर-शीतिश्च त्रुटितांगकं । प्रायुर्मानं भवत्येत-न्नाभेयस्य जिनेशितुः ॥६॥ त्रुटितांगैश्च चतुर-शीतिलक्षमितैर्मतं । त्रुटितं स्यात्क्रमादेव-मडडांगं ततः परं ॥७॥ अडडं चावांगं चा-ववं च हुहुकांगकं । हुहुकं चोत्पलांगं चो-त्पलं पांगमेव च ॥८॥ पद्मं च नलिनांगं च नलिनं स्यात्ततः परं । भवत्यर्थ- सर्ग २९ मार्नु भाषांतर. पूर्वना सर्गमा कह्या प्रमाणे स्वरूपवाळा चार युग (पांच पांच वर्ष) थी धीश वर्ष थाय छे अने पांच वीशथी सो वर्ष थाय छे. (१). दश सोथी एक हजार वर्ष थाय छ, सो हजारथी लाख वर्ष थाय छे. (२). भा संख्या पछी शीर्पप्रहेलिका सुधी जे अंकोनी संज्ञा भावे छे ते अनुक्रमे ८४ लाख ८४ लाखे गुणवाथी आवे छे. एम डाह्या पुरुषोए जाणवू. (३). ते या प्रमाणे-८४ लाख वर्षने पूर्वांग कहे छ, ८४ लाख पूर्वागवडे एक पूर्व थाय छे. (४). एक पूर्वना वर्ष ७० लाख ने ५६ हजार क्रोड थाय छे एम जिनेश्वरोए कहुं छे. (५). ८४ लाख पूर्व एक त्रुटितांग थाय छे. एटलं आयुष्य श्रीऋपमदेवप्रहलु हतुं. (६). ८४ लाख त्रुटितांगवडे एक त्रुटित थाय छे. ए प्रमाणे क्रमसर ८४ लाखगुग्गा करवाथी भडडांग, अडड, अवांग, अयव, हूहूकांग, हहूक, उत्पलांग, उत्पल, पांग, पद्म, नलिनांग, नलिन, अर्थनिपूरांग, अर्थनिपूर, अयुतांग, अयुत, नयुतांग, नयुत, प्रयुतांग, प्रयुत, चूलिकांग, चूलिका, शीर्षप्रहेलिकांग, शीर्षप्रहे. लिका. गणितगोचर संख्या अहीं पूर्ण थाय छे. शीर्षप्रहेलिकाना अंको १९४ थाय छे. या सर्ग २९ मो। (१४३) निपूरांगं ततश्वार्थनिपूरकं ॥९॥ अयुतांगं चायुतं च नयुतांगं भवेत्ततः। नयुतं प्रयुतांगं च प्रयुतं चूलिकांगकं ॥ १० ॥ चूलिका स्यात्ततश्चाने शीर्षप्रहेलिकांगकं । शीर्षप्रहेलिका चेति पूर्णा गणितगोचरः ॥ ११ ॥ शिर्षप्रहेलिकांकाः स्यु-श्चतुर्णवनियुक्ज्ञातं । अंकस्थानाभिधाश्चेमाः श्रित्या माथुरवाचनां ॥ १२ ॥ भगवतीसूत्रानुयोगद्वारसूत्रजंबूद्वीपप्रज्ञप्त्यादि- प्वयमकक्रमो ज्ञेय इति भावः. वालभ्यवाचना चेयं-संख्याह्वयाश्च संत्यक-स्थानराशेरितोऽन्यथा । स्यादंकोऽत्रापि चतुर-शीनिलक्षगुणो मुहुः ॥ १३ ॥ तथाहि-स्यात्पूर्व- लक्षश्चतुर-शीत्याकं लतांगकं । लतांगानां च चतुर-शीत्या लक्ष- र्भवेल्लता ॥ १४ ॥ लताभिस्तावतीभिश्च भवेन्महालतांगकं । महालता तेस्तावद्भिरित्याशीपप्रहेलिकां ॥ १५ ॥ नलिनांगं च नलिनं स्यान्महा- नलिनांगकं । महानलिनमवं स्या-स्पद्मांगं पद्ममेव च ॥१६॥ महापद्मांग च महा-पद्मं स्यात्कमलांगकं । कमलं महाकमलांग महाकमलं तथा ॥ १७ ॥ कुमुदांगं च कुमुदं स्यान्महाकुमुदांगकं । महाकुमुदमेवं स्यात् त्रुटितांगं ततः परं ॥ १८ ॥ त्रुटितं महात्रुटिता-गं महात्रुटितं तथा । घडडांग चाडडं च महाडडांगमेव च ॥ १९ ॥ महाडडमयोहांग-मूह प्रोक्तं ततः परं । महोहांग महोहं च शीर्षप्रहेलिकांगकं ॥ २० ॥ शीर्ष- अंकस्थाननी नामावली माथुरयाचनाने भनुमरी ने कहेली छे. (७ धी १२.) श्री भगवती- स्त्र, अनुयोगद्वारसूत्र, जंयुद्धीपप्रज्ञप्ति विगेरेने विप पण या प्रमाणे मंकनो क्रम कहेलो थे. बालभ्य वाचनामा मा प्रमाणे छे-तमा मख्याना नामोमा फेरफार छे. पाकी ते अंको तो ८४ लासगुणा करवाधी ज भा छे. मां कोला अंकसंख्याना नामो पताये थे-४ लाख पूर्वे एफ लतांग,८४ लाप लतांगे एफ लता,८४ लारा लताए एक महालतांग, सेने ८४ लाखपटे गुणवाथी महालता, एज प्रमाणे शीर्षप्रहेलिका सुधी गुणवा. तेना नाम-मलिनांग, नलिन, महानलिनांग, महानलिन, १यांग, पप, महापांग, महापप, कमलांग, पमल, महाफमलांग, महाकमल, पृमुदांग, मद, महासदांग, मरासद, टिग, टिक, महासरितांग, महाटिल, बरग, म, महामांग, महाभारत, . " .

(१४४) श्रीकाललोकप्रकारा। . प्रहेलिका च स्या-संख्या पर्यंतवर्तिनी । अस्यां पंचाशदधिकं स्यादकानां शतद्वयं ॥ २१ ॥ १८७९५ ५१७९५ ५०११२५९५४९ ९००९६ ९९८१३ ४३०७७०७९७४६५४९४ २६ १९७७७४७६ ५७२५७३४५७१ ८६८१६ इति सप्ततिरंकाः, अग्रे चाशीत्यधिक विंदुशतं. यत्र ज्योतिष्करंडवृत्तौ श्री मलयगिरिपूज्या इति स्माहुः-इह स्कंदिलाचार्यप्रवृत्तौ (प्रतिपत्तौ) दुःष. मानुभावतो दुर्भिक्षप्रवृत्त्या साधूनां पठनगणनादिकं सर्वमप्यनेशत्, ततो दुर्भिक्षातिकमे सुभिक्षप्रवृत्तौ द्वयोः स्थानयोः संघमेलकोऽभवत्तद्यथा- एको वलभ्यामेको मथुगयां, तत्र च सूत्रार्थसंघटने परस्परं वाचनाभेदो जातो, विस्मृतयोहि सूत्रार्थयोः स्मृत्वा संघटने भवत्यवश्य वाचनाभेद इति न काचिदनुपपत्तिः, तत्रानुयोगद्वारादिकमिदानी वर्चमानं माथुर- वाचनानुगतं, ज्योतिष्करंडसूत्रकर्त्ता चाचार्यों वालभ्यस्तत इदं संख्यान- प्रतिपादनं वालभ्यवाचनानुगतमिति नास्यानुयोगद्वारादिप्रतिपादित. संख्यास्थानः सह विसशत्वमुपलभ्य विचिकित्सितव्यमिति. पा प्रमाणे ऊहाग, ऊह, महाऊहांग, महाऊह, शीर्षप्रहेलिकांग, शीर्षप्रहेलिका. या प्रमाणे संख्या करता तेमा अंकसंख्या २५० नी थाय छे, (२१). तेमा ७० अंक भने १८० शुन्य आवे छे. ते अंको आ प्रमाणे-१८७९५५१७९५५०११२५९५४१९००९६९९८१३४३०७७० ७९७४६५४९४२६१९७७७४७६५७२५७३४५७१८६८१६ पछी एक सो एंशी शून्य. श्रीज्योतिष्करंडनी वृत्तिमां श्री मलयगिरिमहाराज कहे छे के स्कंदिलाचार्यनी प्रतिपत्तिमा छ. दुःपमकाळना अनुभाषथी दुर्भिक्षनी प्रवृत्तिए करीने साधुनु पठनगुणनादिक सर्व आळसी गपुं-सर्व भूलाइ गयु. पछी दुर्भिक्ष दूर थयो अने सुभिक्ष प्रवर्यो एटले वे स्थानके संघ एकत्र मल्यो. एक वल्लभिमां अने बीजो मथुरामा तेथी सूत्रार्थना संघट्टनमा परस्पर वाचनाभेद थयो. भूली गयेल सूत्रार्थने संभारीने संघटन करवामां अवश्य वाचनाभेद थवा संभव छ, एमां काइ असंभवितपणं नथी. ते बने स्थानमाथी प्रही जे अनुयोगद्वारादि वर्चे के ते माथुरवाचना प्रमाणे छे. ज्योतिष्करंडसूत्रना का प्राचार्य चल्लभिवाचनावाळा छे, तेथी बीजी रीतनुं कहेल संख्यार्नु प्रतिपादन वालभ्यवाचना प्रमाणे छे. तेथी पा संख्यानुं अनुयोगद्वारादि प्रतिपादित संख्यास्थाननी साथे विसदृशपणुं जोइने शंका (विचिकित्सा) करवानुं कारण नथी."

सर्ग २९ मो। (१४५) प्रारभ्य समयादेवं शीर्षप्रहेलिकावधि । कालस्य गणितं ज्ञेय-मुपमेयं ततः परं ॥ २२ ॥ तथोक्तं भगवत्यनुयोगद्वारजंबूद्वीपप्रज्ञप्त्यादिसूत्रेषु- 'एतावतावगणिए एतावतावणियस्स विसए, ते ण परं उवमिए। अनेन कालमानेन धर्मायां नारकांगिनां । यथासंभवमायूपि मीयते तत्ववेदिभिः ॥ २३ ॥ भवनेशव्यंतराणां केषांचिन्नाकिनामपि । केपांचिन्नृतिरश्वां चा. तृतीयारकवतिनां ॥ २४ ॥ यद्यप्यस्मात्परोऽप्यस्ति संख्याया विषयो महान् । पूर्वोदितचतुःपल्य-प्ररूपणनिरूपितः ॥ २५॥ किंवसंव्यवहार्यो- ऽसौ भवति स्थूलदर्शिनां । ततः संव्यवहार्येऽस्मिन् संख्यानेन निरूपितः ॥ २६ ॥ तथोक्तं जंबदीपप्रज्ञप्तिवृत्तौ-एतस्माच्च परतोऽपि सर्पपचतु:- पल्यप्ररूपणागम्यः संख्येयः कालोऽस्ति, किंत्वनतिशायिनामसंव्यवहार्य- त्वान्नेहोक्त इति. स्थित्यधिकारे तु सर्वत्रापि सिद्धांते पूर्वकोटेः परतोऽधिकां स्थिति विभ्राणौ नरतियंची संख्येयायुप्कतया न व्यवदियेते, तथोक्तं- इहासंख्यातवर्षायुर्जघन्यस्थितिकः प्रक्रांतः, स च सातिरेकपूर्वकोव्यायु- समयथी मांडीने शीर्षप्रहेलिका सुधी काळनुं गणित उपर प्रमाणे जाण भने स्यारपछी उपमावडे (पन्योपमादि) गणित समजवू. (२२). ते पाचव श्रीभगवती, अनु. योगदार, जंगृहीप प्रप्ति विगेरे सूत्रोमा कपुंछ के-"एटले जी गणित कहेलु थे, एटले सुधी गणितनो विषय छे. त्यापकी उपमाथी समजवान छे." मा प्रमाणे (पन्योपमादि) फाळ मानवहे फरीने धर्मा विगेरे नारकीना जीपोना यथासमय भायुप्प तापयेतामो मापे थे. (२३). भवनपति ने ध्यंतरदेवो, तेमज पेटलाक देवलोकना देयोनु तथा श्रीना माराना प्रातमागना मनुष्यो भने तिर्यचोनुं आयुष्य पण एज प्रमाणे मापेलु के. (२४). जो के एनी पड़ी पण संख्यानो विषय पणो मोटो छे के जे प्रथम चार प्रकारना पालानी प्ररूपगाधी प्ररूपित करेलो थे परंतु ते स्थळदशी मनुष्योने माटे भमव्यवहार्य थे, वेथी भा संध्यवहार्य विषयमा संख्यात शम्दवडे ते विपपर्नु ज निरूपण करेलुं थे. (२५-२६). हे विष श्री अंदीपप्रमतिनी पनिमा कयूं थे के-"एनी भागळ पण सरमबवडे मरेला पार पालानी प्ररूपयाप संरुपासकाळ थे, परंतु ते मनतिशापी मानवालाने मध्यवहार्य होपाधी मही रस नयी." परंतु स्थिति (भापु ना भधिकारमा ती मिदिमा मर्वत्र संकोरिथी भाग अधिक स्थिति भरावनारा मनुष्य सियंचोने संख्यामा मायुवामा तरीके . ११ (१४८) श्रीकालहोकप्रकारा। अशुभाश्च प्रवद्धते सा भवत्यवसर्पिणी ॥ ४४ ॥ इति ज्योतिष्करंडवृत्त्य- भिप्रायः जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे तु-'श्रणंतेहिं वामपज्जवेहिं गंधपजवेहिं यावत्परिहायमाणेहिं २ ओसप्पिणी पडिवजइ ' इत्येवं दृश्यते इति शेयं. शुभा भावा विवर्द्धते क्रमाद्यस्यां प्रतिक्षणं । हीयते चाशुभा भावा भव- त्युत्सर्पिणीति सा॥४५॥ तथाहि-प्राप्तप्रकर्षे सुपम-सुपमाख्येऽरके भवेत्। भरतैरवताख्येषु मही करतलोपमा ॥४६॥ सा पंचवर्णमणिभिः स्याद्रम्या ताहशैस्तृगौः । तत्रासते शेरते च रमते च जनाः सुखं ॥४७॥ भात्य- त्रोद्दालकोदाला-दयो वृक्षाः पदे पदे । स्थूलमूलाश्चारुशाखा दलपुष्प- फलांचिताः ॥४८॥ ते चामी-उद्दालाः कोदाला मोद्दाला नृत्तमाल- कृतमालाः । स्युदंतशृंगशंख-श्वेतान्मालास्तरुविशेषाः ॥ १९ ॥ भेरुमेरु- हेरुतालाः सालः सरल एव च । सप्तपर्णनागपूगाः खजूरी नालिकेरिका ॥५०॥ एषां वनानि भूयांसि विराजते पदे पदे । मल्लिका यूथिका जाति-वाणमुद्गरबीकाः ॥५१॥ सिंदुवारमनोवेद्य-सरिकानवमालिकाः। अनुक्रमे प्रत्येक क्षणे चोण थता जाय छ भने अशुभ भावो द्धि पामे छे तेने श्रयसर्पिणी समजवी. (४४). मा प्रमाणे ज्योति करंडनी वृत्तिनो अभिप्राय के. जंबूदीपप्रज्ञप्ति स्त्रमा तो " अनंता वर्णना पर्यायवडे, अनंता गंधना पर्यायवडे यावत् रस-स्पर्शादिवडे पण प्रतिषणे जेमा हानि थती जाय के तेने अवसर्पिणी काळ समजवो. एम कहेटु के. जे काळमा प्रतिक्षणे शुभ भावो घृद्धि पामे के अने भशुम भावो धीण थता जाय के तेने उत्सर्पिणी जाणवो. (४५). प्रकर्य पामेला (भवसर्पिणीना) सुषमसुषमा नामना पहेला भाराना प्रारंममा भरत ऐरवन क्षेत्रमा भूमि हस्ततळ जेवी सपाट होय छे भने ते पांच वर्णना मणि जेवा तणबडे रमणिक होय छे. ते जमीन उपर ते काळना मनुष्यो (युगलिको) सुखे से छे, सुवे थे, अने रमै छे. (४६-४७). वळी उहाल कोदालादि वृचो स्थूळ मूळवाळा, मनोहर शाखावाळा, पत्र, पुष्प तथा फळपी भरपूर स्थानके स्थानके होय छे. (४८). ए वृक्षोना नामो-उदाल, कोदाल, मोहाल, नृत्तमाल, छतमाल, दंतमाल, शृंगमाल, शंखमाल भने वेतमाल; तेमज भेरु, मेरु, हेरु, ताल, साल, सरल, सप्तवर्ण, नाग, पग, खरी, नालिकेरी विगेरे अपना पया वनो पगले पगले होय छे. मनिका, पिका, जाति, वाण, सद्गर, + सर्ग २९ मो। (१४९) बंधुजीवककोरिंट-वासंतीकुंदचंपकाः ॥५२॥ एषां गुल्मा मृदुमरु-त्कंपिताः कुर्वते तदा । सुगंधिभिः पंचवर्णैः कुसुमेरास्तृतां महीं ॥ ५३ ॥ वनरा- ज्यस्तदा हंसः सारसैश्च कपिजलैः । जीवंजीवः कोकिलायै-भौति कांतांचितैरिह (तैः खगैः)॥ ५४ ॥ मत्तांगाख्यास्तदा कल्पद्रुमाः स्युर्भासुरश्रियः। मत्तं मदस्तस्य चांगं कारणं येपु ते तथा ॥५५॥ चंद्रप्रभाद्याः स्युर्मद्य-विशेषा यादृशा इह । उत्कृष्टद्रव्यनिष्पन्ना वर्णगंधरसोचराः ॥ ५६ ॥ श्रारोग्यपुष्टिसौभाग्य- मदतृष्ट्यादिकारकान् । तेषां फलानि पुष्पाणि स्रवंति तादृशान् रसान् ॥५७॥ भृतांगाख्यास्तथा कल्प-तरवो विभ्रति श्रियं । फलादि (नि) येपां रानादि-नानापात्रत्वमियूति ॥ ५८॥ तुर्यांगाख्यास्तदा कल्प-तरवः सुखयंति च । चतुर्विधानां वाद्यानां ततादीनां वरारवैः । ५९ ॥ अयं भावः-पत्रपुष्पफलादीनां भवेत्तेषां मरुज्जुपां । दक्षशिल्पिप्रयुक्ताना- पीमक, सिंदुवार, मनोवेद्य, सरिका, नवमालिका, बंधु, जीवक, कोरिट, वासंती, कुंद ने पंपरुना गुम्मो स्थाने स्थाने होय छे. ते गुल्मो ज्यारे मृदु पवनवडे कंपायमान थाय छे त्यारे पांच वर्णना सुगंधी पुष्पोपडे पृथ्वीने व्याप्त करी दे थे. (४९-५३ ). ते वखते पनराजिमो हंस, सारस, कपिंजल, जीवजीव, कोकिल विगेरे स्त्रीसहित पेठेला पक्षीभोवटे शोभी रहे थे. (५४). १९ काळे मत्तांग नामना कन्चो घणी सुंदर शोमावाळा होय छे. तेमा मच एटले मद तेने उत्पम थवानुं भंग एटले कारण जेमा होय ते मत्तांग कहेवाय थे. उत्कृष्ट द्रव्योथी बनेली, उत्तम वर्ण, गंध ने रसवाळी चंद्रप्रभा विगरे मदिरानी जेवा भने भारोग्य, पुष्टि, सौभाग्य, मद ने तुष्टि विगेरेना करनारा एवा रसोने ते जातिना अपना फळो ने पुप्पो स्रवे 2. (५५-५७). २ बीजा भृतांग जातिना कन्पषो शोमावाळा होय हे, जेना फळादि रत्न विगेरेना नाना प्रकारना पायोनी जेवा देखाववाळा होय छे. (५८). ३ श्रीजा तूर्याग नामना कन्पषो चार प्रकारना तन, विवस विगेरे वाजियोनी जेया श्रेष्ठ शन्दोपी सुखने पापे के ए पवना पर पुष्प ने फळादिक न्यारे पवनना संयोगपी हाले पाले के सारे माथी विचषण एवा शिम्पीए पनायेला पाजियोनी बेबो मनि . .

(१४६) श्रीवासोपारा। र्भवति, तथैवागमे व्यवहृतत्वात् इति भग० चतुर्विशे शते द्वितीयोदेशकवृत्ती अत एव पूर्वकोव्यधिकायुपश्चारित्रप्राप्तिमुक्तिगमनादिकमपि निपिध्यत इति ज्ञेयं. अथ द्विधोपमेयं स्या-त्पल्यसागरभेदतः। तत्स्वरूपं चात्रशास्त्रे संज्ञासर्गे निरूपितं ॥ २७ ॥ पल्योपमानां सूक्ष्माद्धा-हयानां कोटिको टिभिः । दशभिर्जायतेऽत्रैक सूक्ष्माद्धासागरोपमं ॥ २८॥ एतेषां सागराणां च चत्तलः कोटिकोटयः । याद्यः कालोऽवसर्पिण्यां सुपमसु. पमाभिधः॥ २९ ॥ तिस्रोऽब्धिकोटिकोव्योऽथ द्वितीयः सुपमाभिधः । तृतीयोऽब्धिकोटिकोटि-द्वयं सुपमदुःपमा ॥३०॥ न्यूनः कालो द्विचत्वारिं- शता वर्षसहस्रकैः । तुर्योऽधिकोटाकोव्येका दुःपमसुपमाभिधः ॥३१॥ पंचमोऽब्दसहस्राणि स्याहुःषमैकविंशतिः । तावत्यव्दसहस्राणि षष्ठो दुःपमदुःषमा ॥३२॥ एवं दशभिरब्धीनां कोटाकोटिभिरीरिता । एकावस- पिणी कालचकाई पडरात्मिका ॥३३॥ विपरीता व्यवस्थेय-मुत्सर्पिण्यां व्यवहार करेलो ज नथी. तेने माटे भा प्रमाणे कयु छ के-"अही असंख्यात वर्षना आयुवाळामा जे जघन्यस्थितिवाळो कहेल छे ते सातिरेक क्रोडपूर्वनी आयुवाळी समजवो. केमके तेज प्रमाणे भागममा व्यवहार करेलो छे." ए प्रमाणे श्रीभगवतीमत्रना चोवीशमा शतकना वीजा उद्देशामों कयुं छे. या कारणथी ज क्रोडपूर्वथी अधिक पायवाळाने चारित्रनी प्राप्ति ने मुक्तिगमनादिकनो निषेध कहेलो के एम समजवू. हवे आ उपमा पन्योपम ने सागरोपमना मेदथी के प्रकारनी छे, तेनुं स्वरूप आज शास्त्रमा संज्ञासर्गमा प्रथम निरूपण कोल छे. (२७), दश कोटाकोटि सूक्ष्म भद्धापन्योपमर्नु एक सूक्ष्म अद्धासागरोपम थाय छे. (२८). एवा चार कोटाकोटि सागरोपमनो अवसर्पिणीनो पहेलो सुपमसुपमा काल नामनो पारो' छे, चीजो सुषमा नामनो मारो त्रण कोटाकोटि सागरोपमनो छ, त्रीजो सुपमदुःपमा नामनो पारो चे कोटाकोटि सागरोपम प्रमाण छे, चोथो दुम्पमसुषमा नामनो मारो वेताळीश इजार वर्षे न्यून एक कोटाकोटि सागरोपमनो छ, पाचमो दुम्पमा नामनो पारो २१००० वर्षनी छ भने छटो दुःपमदुःपमा नामनो मारो पण २१००० वर्षप्रमाण होय छे. (२९-३२), ए प्रमाणे दश कोटाकोटि सागरोपमवडे छ आरारूप एक असणी एटले मर्म काळचक थाय छ भने तेथी विपरीत व्यवस्थावाळी उत्सर्पिणी कही छे. ते भा प्रमाणे- तेमा पहेलो दुषमदुापमा नामनो पारो २१००० वर्षप्रमाण अने बीजो दुषमा 1 भाचे माटे मूळमां काळ शब्द थे, तेनो मर्य भागळ मारो करेल छे.

पग २९ मो। कीर्तिता। तथाहि तत्र प्रथमः कालो दुःपमदुःपमा ॥३४॥ प्राग्वन्मानं वस्य वर्ष-सहस्राण्येकविंशतिः । द्वितीयो दुःपमाप्यब्द-सहला- पयेकविंशतिः ॥ ३५॥ तृतीयोऽब्धिकोटिकोटी दुःषमसुषमाभिधः । न्यूना सा च द्विचत्वारिं-शता वर्पसहस्रकैः ॥३६॥ वाचिकोटाकोटियुग्म तुर्यः सुपमदुःपमा । पंचमः सुपमाकाल-स्तिस्रोऽन्धिकोटिकोटयः ॥ ३७ ॥ चतस्रोऽब्धिकोटिकोट्यः सुपमसुषमाऽतिमः। उत्सर्पिणीति वार्डीनां दशभिः कोटिकोटिभिः ॥ ३८॥ एवं द्वादशकालाव-सर्पि- प्रयुत्सर्पिणी भवेत् । पुनः कालविभागास्ते सुषमसुपमादयः ॥ ३९ ॥ सदा विवर्तमानत्व-साधादेतदुच्यते । कालचक्रं कालभागाः पूर्वोक्ता- स्त्वरका इह ॥ १०॥ चक्रस्य भ्रमतो यद्व-पूर्वाद्धे योंतिमोऽरकः पराढ़े प्रथमःस स्या-धस्तत्रायोऽत्र सोंतिमः ॥४१॥ एवमत्राप्युक्तनीत्या कालचकेऽर्द्धयोयोः । वपरीत्याद्विवर्तते द्वादशाप्यरकाः क्रमात् ॥ ४२ ॥ भरतैरावताख्येपु क्षेत्रेषु स्याद्दशस्वयं । कालः परावर्त्तमानः सदा शेपे- प्ववस्थितः ॥ १३ ॥ यस्यां सर्वे शुभा भावाः क्षीयतेऽनुक्षणं क्रमात् । नामनो भारो पण २१००० वर्षप्रमाण ममजयो. बीजो दुःपमसुषमा नामनो मारो ४२००० वर्षे न्यून एक कोटाकोटी सागरोपमनो, चौथो सुषमदुःपमा नामनो मारो ये कोटाकोटी सागरोपमनो भने पांचमो सुपमा नामनो पारो प्रण कोटाकोटी सागरो- पमनो तथा छठो सुपमसुपमा नामनो भारो चार कोटाकोटी सागरोपमनो होय छे. ए प्रमाणे उत्सर्पिणी पण दश कोटाकोटी सागरोपमप्रमाण होय छे. (३३-३८ ). मा प्रमाणे पार काळ(मारा)वडे भवसर्पिणी उत्सर्पिणी-मर्यात् एक काळपक याप वे. त्यारपछी पाची पूर्व प्रमाणे ज भवसर्पिणीना पहेला काळ(मारा)धी शरुपात समजवी. रम कायम परिवर्चमानपणे सरणार होवाथी काळचक्रना काळना जे माग पूर्वे कया तेने पार मारा समजवा. पक ममता जेम पूर्वार्षमा जे छन्नी भारोभावे ते अपराधमा पहेलो मा भने पूर्वार्धमा पोलो भाव ते अपराधमा छेनी भावे, सेम नहीं पण उक्त नीति अनुसार काळ. पझना पेभ भ विभागा एकरीनापी विपरीतपणे पार मारा फर्या करे खे. (३९-४२). पाप भरत ने पांच ऐरवतरूप दश पेत्रोमा भा प्रमाणे कानुं परावर्षमानपणं होय छे. बीजा पेयोमा भवस्थितकाल होप छ. (४३). काळमा सर्ने राम मारो .. (१५.) श्रीमानलोकप्रकारा। मातोद्यानामिव ध्वनिः॥१०॥ प्रातोद्यचातुर्विध्यं चैवं-ततं वीणाप्रभृतिकं तालप्रभृतिकं घनं । वंशादिकं तु शुपिर-मानदं मुरजादिकं ॥ ६१ ।। तदा दीपशिखा नाम कल्पवृक्षाः स्फुरद्रुचः। दीपा इव स्नेहसिक्ता दीप्यते तिमिरच्छिदः ॥ ६२ ॥ श्रयं भावः-यथा दीपशिखा रात्रौ गृहांतोतते भृशं । दिवसे वा गृहायंत-स्तद्वदेते द्रुमा अपि ॥ ६३ ॥ एवं च नक्ष्य- माणकल्पद्रुमेभ्य एषां विशेषो भावितो भवतीति ज्ञेयं. अथ ज्योतिपिका नाम शोभते कल्पपादपाः । ज्योतिर्वह्निर्दिनेशो वा तत्तुल्यत्वात्तथाभिधाः ॥ ६४ ॥ ज्योतिर्वहिदिनेशयोरिति वचनात्. अयं भावः तेषां रवभावा- स्यात्काति-रचिरोद्गतसूर्यवत् । विद्युदुल्कावलयव-निर्धूमानलपुंजवत् ॥६५॥ अत एवं प्रभा तेषां दृष्ट्टणां सुखदायिनी । दुःखदाऽधिप्राति- कूल्या- तु मध्यंदिनार्कवत् ॥ ६६ ॥ नरक्षेत्रावहिर्वति-चंद्रसूर्यग्रहादि- वत् । परस्परावगाढाभि-श्याभिांति ते स्थिराः ॥ ६७॥ चित्रांगा नीकळे छे. वाजितना चार प्रकार भा प्रमाणे छे-वीणा विगेरे तत कहेवाय छे, ताळ (कांशी) विगेरे धन कहेवाय छे, वासळी विगेरे शुषिर कहेवाय के अने मुरज- मृदंगादिक आनद्ध कहेवाय छे. (५९-६१). चोथा दीपशिखांग नामना वृक्षो स्फुरायमान कांतिवाळा होवाथी तेलथी मरेला दीपकनी जेम अंधकारने छेदता सता शोमे छे. जेम दीपशिखा रात्रे घरमा भत्यंत प्रकाश करे के भने दिवसे भोयरा विगेरेमा प्रकाश आपे छे तेम ा वृचो पण प्रकाश श्रापे बे. (६२-६३). वीजा आगळ कहेवाशे ते कल्पवृक्षो करता भामा भाटलुं विशेष के. ५ ज्योतिषिकांग नामना पांचमी जातिना कल्पवो अमि अने सूर्यनी जेवो प्रकाश मापनारा होवाथी ते नामयी मोळखाय छ भने शोमी रहेला छे. "अग्नि भने सूर्यनी ज्योति जेवा छे" एवं अन्यत्र कर्वा छे. महीं एम समजवू के ए वृचनी कांति स्वभावथी ज तरतना उगेला सूर्य जेवी, विद्युत जेवी, उन्काना वलय जेवी तेमज निधूम अग्निना पुंज जेवी होय छे. तेथी ते वृचनी प्रभा जोनारनी दृष्टिने मुख मापनारी होय छे, पण मध्याहना सूर्य जेवी माखने प्रतिकूळ भने दुःख मापनारी होती नथी. वळी नरक्षेत्रनी बहार रहेला चंद्र, सूर्य ने ग्रहादिकनी जेम ते वृधो परस्पर अवगाट एवी लेश्या ( कांति )वडे स्थिर-कायम एकसरखा होप के. (६४-६७).

सर्ग २९ मो। - नाम ये कल्प-वृक्षास्ते माल्यदायिनः । चित्रं विवक्षया माल्यं तद्धेतुस्वा. तथाभिधाः ॥ ६८॥ यथा प्रेक्षागृहं नाना-चित्रोपेतं मनोरमं । सर्वतो लंवमानाभिः पुष्पस्रग्भिरलंकृतं ॥ ६९ ॥ ग्रथितैर्वेष्टिमैः संघा-तिमश्च पूरिमैरिति । माल्यैः पूर्ण द्वारदेशो-ल्लसद्वंदनमालिकं ॥ ७० ॥ पंचवर्ण- पुष्पपुंजो-पचारचारुभूतलं । सुखदायि भवेल्लोके तथा ते स्वर्द्धमा अपि ॥७१॥ त्रिभिर्विशेषकं ॥ भोज्यसंपादकाः कल्पवृक्षाश्चित्ररसाह्वयाः । चित्रो नानाश्चर्यदो वा रसो ह्येषां ततस्तथा ॥७२॥ सुगंधिस्वच्छकलम- शालितंडुलगर्भितं । तादृग्गोदुग्धसंराद्धं परमान्नं सुसंस्कृतं ॥ ७३ ॥ सद्यस्कशारदघृत-शर्कराक्षोदमिश्रितं । तुष्टिपुष्ट्यादिजनक-मतिस्वादु भवेद्यथा ॥ ७४ ॥ संस्कृतो वा सूपकारै-रोदनश्चक्रवर्तिनः । चतुष्कल्प- सेकसिक्को-ऽखंडः कमलशालिजः ॥ ७५॥ सुपक्वो वाष्पमुन्मुंच-मृदु- स्तुपमलोज्झितः । विविक्तसिक्थो विविध-शाकशाली भवेद्यथा ॥७६ ॥ ६ छठा चित्रांग नामना कन्पवृक्षो पुष्पमाळाने मापनारा होय छे. ते माळा आश्चर्य मापनारी होवाची भहीं चित्र शन्द माळावाचक समजवो. जेम नाना प्रकारना चित्रोवालं प्रेक्षागृह मनोरम भने सर्वत्र लटकावेली लांची लांची पुष्पोनी माळामोवढे भलंकत होय छ. प्रथित, वेष्टिम, संघातिमै ने परिम, एवी चार प्रकारनी माळादिकबडे शोमती वंदन- मालिका (तोरण )वडे शोमित द्वारदेशवालं होय छे अने पाच वर्णना पुप्पोना पुंजोवडे माच्छादित भूतळवालं होय छे. ते लोकोने सुखदायी लागे के तेवी ज शोमावाला पा कम्पश्तो पण सुखदायी होय छे. (६८ थी ७१.) ७ चित्ररस नामना सातमी जातिना कम्पवृषो नाना प्रकारनामाचर्यकारी रसवाळा भोजनने मापनारा होय छे. (७२). सुगंधी, स्वच्छ, कलम शालिना तंदुळपी गर्मित अने सेवा प्रकारना गायना दुधा लि होवाथी सुसंस्कृत ऐवी जे पीर ते पण वरतनुं शरद चतुर्नु घी तथा शर्कराना पूर्णयी मिश्रित करी सती प्रति स्वादु भने तुष्टि-पुष्टि विगैरे मापनार होय छे, मथवा ससंस्कृत एटले चक्रवतींना रसोयाए रांपेल अखंर फलमशालि के जे चतुष्कन्पना सेकपी सील होय, तेमज सारी रीते पत्र ययेल होय, जेमापी पराळ छूटती होय तेवी, मृदु भने फोवरा तथा मेल विनानी, छूटा छूटा दाणावाळी मने १ गुंपेक्षा. २ पम्ही साये बीटेला. ३ पकठा करेला के भागमा परेका. - (१५२) भीकाललोकप्रकारा। चतुष्कल्पसेकसिक्त इति. विज्ञा रसवतीशास्त्रे कोमलं कर्तुमोदनं । कुर्वति चतुरः कल्पांस्ते सेकविषयानिह ॥ ७७ ॥ वस्त्रपूतस्वग्निपक्व-प्राज्या- ज्यसमितोद्भवः । यथा वा मोदको भृरि-शर्कराक्षोदमेदुरः ॥ ७८ ॥ द्राक्षाचारुकुलीनाली-केरखंडादिवंधुरः । कर्पूरैलालवंगादि-राजद्रव्यपरि- कृतः ॥७९॥ सुरभिः कोमलः स्वच्छो बलपुष्ट्यादिकृद्भवेत् । क्षुत्पिपासा. प्रशमनः सर्वांगीणप्रमोदकृत् ॥ ८० ॥ अष्टभिः कुलकं ॥ तथा नानारसो- पेत-सद्भोज्यविधिशालिभिः । फलपुष्पैविराजते वृक्षाश्चित्ररसा अपि ॥ ८१ ॥ मण्यंगा नाम ये कल्प-द्रुमास्ते भूपणप्रदाः। मणीर्मणिमयी- भूषा-स्तदायित्वाञ्च ते तथा ॥ ८२ ॥ हारोऽर्द्धहारो मुकुटः कुंडलं कर्ण- वालिका । कर्णवेष्टनकं प्रैवे-यकं कंकणमुद्रिका ॥ ८३ ॥ हेमजालं रत्नजालं कटकं वलयांगदे । वाहुबंधो वाहुरक्षा पुष्पकं तिलकोऽपि च ॥८४ ॥ दीनारमालिका चंद्र-मालिका सूर्यमालिका । शिरोमणिझुवनक कांची च कटिसूत्रकं ॥ ८५ ॥ नूपुरः पादकटको घर्घरी क्षुद्रघंटिका । विविध प्रकारना शाकथी शोभती होय, चतुष्बन्पसेकसिक्त-टले रसवती शास्त्रना विज्ञ. पुरुषो मोदन (भात)ने कोमळ करवा माटे चार प्रकारे सींचे छे. ते भा प्रमाणे-जेम मोदक वस्वी चाळेला, अनिथी सारी रीते पकवेला, पुष्कळ घी भेळवेला घउंना शाटाधी उत्पन्न थयेलो मने पुष्कळ शर्कराना चूर्णथी व्याप्त, वळी द्राक्ष, चारोळी, श्रीफळनी शेपो ( ककडाओ )बडे शोभायेल अने कर्पूर, एलची, लविंग विगेरे राजद्रव्यथी सुगंधी करेल, कोमळ, स्वच्छ अने वळनी पुष्टिने करनार होय छे तेमज चुषा-वृपाने शमावनार भने सर्व जीवोने प्रमोद पापनार होय छे तेम पूर्वोक्त प्रोदन चार प्रकारना सेकथी सींचेला समजवा. (७३-८०) ए ज प्रमाणे चित्ररसजातिना कल्पवृक्षो नाना प्रकारना रसयुक्त विविध प्रकारना सारा भोजनरूप फल पुष्पोवडे चिराजित होय छे. (८१) ८ मण्यंग नामना आठमा प्रकारना कम्पवृक्षो अनेक प्रकारना भूपणोने आपनारा होय छे. खासकरीने मणि तथा मणिमय भूषणो श्रापनार होबाथी ते मण्यंगजातिना कहेवाय छे. तेहार, अर्धहार, मुकुट, कुंडळ, काननी वालिका एटले कडीयो कानने वीटवानुं सुमणूं, अवेयक (कंठो), कंकण (बंगडी विगेरे) मुद्रिका (वींटीओ), हेमजाल, रत्नजाल, कटक (कडi), चलय, अंगद, पाजुपंध, वाहुरक्षक (येरखा), पुष्पक, तिलक, सोनामहोरनी माळा, चंद्रमाळा, सूर्यमाला, मस्तकनो मणि, झुमणा, कांची, कटिसूत्र, नपुर, पादकटक, परी, बुद्रघंटिका , सर्ग २९ भो। (१५३) भूषाभिदो या इत्याद्याः स्वर्णमुक्तामणीभवाः ॥८६॥ स्वभावतस्तथारूपैः फलपुष्पैरलंकृताः। तदर्थिनां द्रुमास्ते द्राक् पूरयंति मनोरथान् ॥ ८७ ॥ पंचभिः कुलकं ॥ गेहाकाराः कल्पवृक्षा नानागेहाकृतिस्पृशः । निवास- सौख्यं विपुलं वितरंति तदर्थिनां ॥८८॥ कपिशीर्षस्फुरद्वप्र-चरिकाहाल- कांचिताः । मनोज्ञमंडपास्तुंग-तोरणांचितगोपुराः ॥ ८९ ॥ एकद्वित्रि- चतुःपंच-पट्सप्तायुरुभूमयः । गवाक्षालीपरिचिताः सन्निर्गृहविटं- किकाः ॥ ९० ॥ अभ्रंलिहशिरश्चंद्र-शालाशालितमौलयः। सद्भारपट्टव- लभी-स्तंभसंबंधबंधुराः ॥ ९१ ॥ वृत्ताव्यस्त्राश्चतुःकोणा श्रादर्शोपमा कुटिमा। चंचचंद्रोदयाश्चारु-चित्रचित्रितभित्चयः ॥ ९२ ॥ एकद्वित्रिचतु- रादि-शाला गर्भगृहांचिताः । श्रीवत्ससर्वतोभद्र-नन्दावादिसंज्ञिनः ॥ ९३ ॥ शैलार्द्धशैलसंस्थाना गिरिकूटाकृतिस्पृशः । श्रास्थानप्रेक्षण- गृह-चित्रशालाद्यलंकृताः ॥ ९४ ॥ मज्जनादर्शशृंगार-मोहनागारमंडि- ताः। श्रापणाद्यैर्विशेषैश्च विविधैरुपलक्षिताः ॥ ९५ ॥ सर्व सुखदा इत्यादि जे सुवर्ण, मोति भने मणिना पनावेला भाभूपणोना प्रकारो के तेने आपनारा तथा स्वभावे ज तेवा प्रकारना एटले तेवी भाकृतिवाळा फळ अने पुष्पोवडे शोभता ते घो तेया अलंकारोना अर्थी युगलिकोना मनोरथोने शीघ्र पूर्ण करे छे. (८२-८७). ९ नवमा गेहाकार नामना कन्पषो नाना प्रकारना घरनी मारुतिवाळा ज होय छे. तेना (निवासना) भर्थी युगलिकोने ते विपुळ एवं निवास संबंधी सुख प्रापे छे. ते गेहाकार कल्पवृषो केवा होय छे ? कांगरावडे स्फुरायमान गढ, अने तेना उपर चोवरफ रहेली पाल भने गोख विगेरेधी शोमता, मनोज्ञमंडपबाळा ने तुंग तोरणवाळा दरवाजामोथी शोमता, एक, के, अण, चार पांच छ भने मान मोटी भूमि (माळ वाळा, चोवाफ पारीमो भने गोखबाळा, उत्तम खींटीमो भने परीमो से तेवा शुलता भागवाळा भाकाश मुधी पहोंचे तेवी उंची चंद्रशाळा (भगाशी)वडे शोभता शिखरवाळा, सुंदर भारपद्ध, भने मनमी तथा स्तंमोपी व्याप्त, गोळ, त्रिकोण ने चोरस पाकारवाळा, भादर्श जेवी सपाट भूमि- पाळा, शोभायमान चंदुभाषाळा, चिवडे विचित्र भीवोवाळा, एक, पे, प्रण, चार विगैरे शाळा-मोरहामोवाळा, गर्भगृहवाळा, श्रीवत्स, सर्वतोभद्र ने नंदावर्चादि नामवाळा, शैल ने भर्घशैलना संस्थानवाला, पर्वतपरना फटनी माकतिकाळा, मास्थान, प्रेक्षागृह ने चित्रशाळादिकथी पुक्त, मजनगृह, भादर्शगृह, शृंगारगृह भने मोहनागारपी मंडित, विविध प्रकारनी हाट विगैरेनी श्रेषियी भोळसाता, सर्व ऋतुमा मुख मापनारा, रम्प, (१५४) भीकालमोफप्रकारा। रम्या लसत्सोपानदर्दराः । सुखारोहावताराश्च सुखप्रवेशनिर्गमाः ॥ ९६ ॥ लिता गुप्ता घृष्टमृष्टा मार्जिताः सुधयोज्ज्वलाः । प्रासादाः स्युर्यथा लोके स्वभावात्ते तथा द्रुमाः ॥ ९७ ॥ नवभिः कुलकं ॥ अनानाख्याः कल्पवृक्षाः स्युर्नानावस्त्रदायिनः । जना अनग्नास्तेभ्यः स्यु-स्ततस्ते तादृशाभिधाः ॥९८॥ चीनांशुकं दुकूलं च कौशेयमतसीमयं। कार्यासिकं चाजिनकं तार्णरल्लककंबलाः ॥ ९९ ॥ इत्यादयोवस्त्रभेदा देशे देशे भवंति ये । नानावर्णा मृदीयांसो मनश्च वपुःसुखाः ॥१०० ।। द्रुमास्ते तादृशैर्वस्त्रैः कनैः स्त्रीपुरुषोचितः । स्वभावतः समुद्भूतैः प्रीण- यंति तदथिनः ॥१॥ त्रिभिर्विशेषकं । एवमेते दशविधाः कल्पवृक्षाः स्वभावतः यथोक्तरूपा जायंते तादृकालानुभावतः ॥ २ ॥ तथोकं जीवाभिगमसूत्रे- 'तहेव ते मत्तंगावि दुमगणा प्रणेगवहुवीससापरिणयाए मज्जविहीए उववेया फलेहिं पुण्णा वीसंदतीत्यादि । एतन्नामसंग्रहश्चैवं-मत्त १ शोभिता पगथीमायुक्त दादरावाळा, सुखे चडी-उतरी शकाय तेवा भने सुखे पेसी नीकळी शकाय तेवा, लीपेला-गुंपेला, घठारेला-मठारेला, मार्जित करेला, चुना (खडी) बडे घोळेला-भावा मकानो जेम लोकमां होय छे तेवा श्राकारना स्वभावे ज ते वृक्षो होय छे. (८८-९७) १० दशमा अनग्न जातिना-ते नामना कल्पवृक्षो विविध वस्त्रोने भापनारा होय के. तेथी युगलिको अनग्नपणाने पामे के, एटले ते वृक्षो पण ते ज नामथी ओळखाय छे. ते वृक्षो चीनांशुक, दुकूळ, कौशेय तेम ज अतसीमय अने कार्पासिक (सुतरना) वस्त्रो मापे छे. चर्मनां वस्त्रो पण आपे छे. तार्ण (तृणना), रल्लक भने कंवळ ( उनना वस्त्रो) पण श्रापे छे. श्रेप्रमाणे वस्त्रना भेदो जुदा जुदा देशमा जूदा जूदा होय छे. तेवा बधी जातनी वस्त्रो पापे छे. ते वस्त्रो अनेक प्रकारना वर्णवाळा, सुकोमळ, मन चचु भने शरीरने सुख प्रापनारा होय छे. तेवा स्त्रीपुरुषने उचित सुंदर अने स्वभावे ज उत्पन थयेला वस्रो श्रापीने तेना अर्थी युगलिकोने प्रसन्न करे थे. ६८-१०१. ए प्रमाणे दशे नकारना कल्पवृक्षो तेवा प्रकारना काळना भनुभावी यथोक्त स्वरूप- वाळा स्वभावथी होय छे. १०२ श्रीजीवाभिगमसूत्रमा कयुं छे के 'तेज प्रमाणे ते मत्तांगादि- ६.६.२ण अनेक प्रकारका विलसा परिणामे परिण मेला मयादिक वस्तुमोथी भरेला उप- . . .

- सर्ग २९ मो। (१५५) भृत २ त्रुटिनांगा ३ दीपशिखं ४ ज्योतिरंग ५ चित्रांगाः ६ । चित्ररसा मण्यंगा ८गेहाकारा ९ अनग्नाश्च १० ॥३॥ एते च वनस्पतय इति ज्ञायते, तथोक्तं जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिवृत्तौ-" अथात्र वृक्षाधिकारात्कल्पगुमस्वरू- पमाहे"ति। आचारांगलोकसाराध्ययननियुक्तिवृत्तावप्युक्तं-सचित्तो द्विपद- श्चतुष्पदोऽपदश्चेति, द्विपदेषु जिनः, चतुष्पदेपु सिंहादिः, श्रपदेषु कल्पवृक्ष इति. तस्मिन्नवसरे च स्यु-मनुष्या युग्मर्मिणः । सुरूपाः सुभगा दक्षा न्यक्षलक्षणलचिताः ॥४॥ स्वर्णकच्छपसंस्थान-मृदुरक्ततलक्रमाः । पुराद्रिमकराब्धींदु-मुख्यरेखांकितांघ्रयः ॥ ५॥ संहतर्जुक्रमवृद्ध-चरणां- गुलिमंजुलाः । ताम्रोन्नततनुस्निग्ध-सन्नखा गुप्तगुल्फकाः॥६॥ मृदु- तक्रमस्थूल-जंघा निगूडजानवः । हस्तिहस्तोरवो जात्य-तुरंगगुप्तगु- ह्यकाः ।। ७ ।। जात्याश्ववद्बहिर्मूत्रा-ग्रुपलेपविवर्जिताः । कंठीरवकटीराः स-द्वनमध्या झपोदराः ॥ ८॥ स्फुरत्तरंगसुभग-त्रिवलीललितोदराः । युक्त एवा फळादिकथी पूर्ण प्रवर्ते छे-होय छे. एना नाम पा प्रमाणे-मांग, भृतांग, घंटितांग, दीपशिखांग, ज्योतिरंग, चित्रांग, चित्ररसांग, मण्यंग, गेहाकार अने अनग्न- आ या वनस्पतिकाय ममजवा. श्रीजंयूद्वीपप्रज्ञप्तिनी वृत्तिमा कयु छ के-अहीं वृक्षनो अधिकार चालतो होपाधी कन्पवृक्षोनुं स्वरूप पण कहुं छु.' आचारांगसूत्रना लोकमार अध्ययननी नियुक्तिनी वृत्तिा पण कयु छ के-'सचित्त त्रण प्रकारना-द्विपद, चतुष्पद ने अपद-द्विपदमा जिनेश्वरो, चतुष्पदमा सिंहादि तिर्यचो भने अपदमा कल्पवृक्षो समजा. हवे ते अवसरे-पहेला भारामा मनुष्यो युग्मधर्मी होय छे. तेमा पुरुपो सुरूप. सुभग, दघ, समग्र लक्षणोवडे लक्षित, सोनाना काचवाना संस्थानवाळा, मृदु तेम ज रक्त पगना पंजावाला; नगर, पर्वत, मकर, समुद्र अने चंद्रमा विगैरे मुख्य रेसामोथी अंकित घरण (पग) वाला; मळेली, सरल भने अनुक्रमे वधती पगनी प्रांगळीअोधी शोमवा; लाल, उन्नत, पावळा ने स्निग्ध एवा सुंदर नखवाळा, गुल्फ (धुंटी ) जेनी गुप्त छ एवा, कोमळ, गोल भने क्रमपी स्थळ एवी जांधवाळा, निग्रह जानु (ढींचण)बाळा, हस्तिनी संद समान ऊरुपाळा, जात्य तुरंगमनी जेवा गुप्त गुसस्थानबाळा, जातिवंत अश्वनी जेम यहार भूमादिना लेप चिनाना, सिंहनी जेनी कटीवाळा, बजना जेवा मध्यमागबाळा भने मत्स्यनी जेवा उदरवाळा, तेम ज झायमान वरंग जेवी मुंदर त्रिवलीथी शोमठा उदरवाळा, (१५६) प्रोगप्रकारा। निम्नप्रदक्षिणावर्त-गंगावनीभनाभयः ॥ ९॥ मृदुस्निग्धतनुश्याम-रोम- राजीविराजिताः । मंजुमानोपेतपार्धा अनालक्ष्यकरंडकाः ॥१०॥ पृथु- स्वर्णशिलाकल्प-श्रीवत्सांकितवक्षसः । पुष्टप्रकोष्ठकदंग-परिघोपमवाहवः ॥ ११ ॥ रक्ताव्जमंजुलतल-मणिवधाढ्यपागायः। स्वस्तिकाकॆन्दुचक्रादि- रेखाराजिकरांवुजाः ॥ १२॥ वृषस्कंधोन्नतस्कंधा दधानाः कंठकंदलं । त्रिरेखं कंबुसदृशं चतुरंगुलमात्रकं ॥ १३ ॥ व्याघ्रविस्तीर्णहनवो-57- स्थितश्मश्रुराजयः। पक्वबिंवाभाधरोष्ठा-स्तद्विश्रांतसितस्मिताः ॥१४॥ कुंदपुष्पोपमाखंड-स्थिराच्छिद्ररदालयः। सुरक्तरसनाः कोक-नदकोमल- तालवः ॥ १५ ॥ शुकचंचूपमोर्चुग-सरलायतनासिकाः । स्मेराजस्त- हरिण-नेत्रत्रोरुलोचनाः ॥ १६ ॥ आरोपितधनुर्वक्र-सलीलश्यामल- भ्रवः । प्रमाणोपेतसुभगा-व्याहतश्रवणेंद्रियाः ॥ १७ ॥ पीनादर्शतला- कार-कपोलललिताननाः । चंद्रार्द्धभाला निर्लक्ष्म- कार्तिकींदुसमाननाः ॥१८॥ उष्णीषशिखरोदार-सच्छत्राकारमौलयः । दाडिमीपुष्परक्ताच्छ- । . , उंडी ने प्रदक्षिणावर्त तेम ज गंगाना मावर्त जेवी नामि (इंटी )वाळा; कोमळ, स्निग्ध, पातळी अने श्याम रोमराजीथी विराजित, मनोहर भने प्रमाणोपेत पार्थ ( पडखा )वाळा, पोसळीओ न देखाय तेवी पीठवाळा, विस्तीर्ण, सुवर्णनी शिला जेवा भने श्रीवत्सना लंघनयुक्त पदस्थळवाळा; पुष्ट प्रकोष्टक (पोचावाळा) भने किनानी परिघ (मोगळ) जेवा बाहुवाळा तेम ज रक्तकमळ जेवा मंजुल तळ अने मणिबंध वडे युक्त हाथवाळा स्वस्तिक, सूर्य, चंद्र ने चक्रादि रेखावडे शोभिता करकमळवाळा वृषमना स्कंध जेवा उन्नतस्कंधवाला; पण रेखाबाळा, शंखसदृश भने चार अगुल प्रमाण कंठने धारण करनारा; व्याघ्र जेवी विस्तीर्ण हनु (हडपची)वाळा, अवस्थित (पृद्धिहानिविना) दाढीमुलवाळा, पाकेल विना फळ जेवा लाल होठवाळा अने तेमा रहेला उज्वळ स्मितवाळा, कुंदना पुष्पनी उपमावाळा, प्रखंड, स्थिर भने अछिद्र एवा दावोवाळा, लाल जिव्हावाला; कोकनद जेवा कोमळ तालवाळा शुकनी चंचु जेवी उत्तुंग, सरल भने भायत नासिकावाळा, विकस्वर कमळ भने त्रास पामेला हरणना नेत्रने पण जीते एवा लोचनवाळा; पणछ चडावेला धनुष्यनी जेवी वक्र भने लीलाकारी श्याम भमरवाळा, प्रमाणोपेत, सुमग अने अव्याहत श्रवणेंद्रि- पवाळा, पुष्ट भने भादर्श ( काच )ना वळा जेवा कपोळबड़े शोभित मुखवाळा अर्धचंद्र- समान माळ (कपाळ )वाळा, कलंक रहित कात्तिकमासनी पूर्णिमाना चंद्र समान एख- . .

सर्ग २९ मो। (१५७) मृदुकेशांतभूमयः ॥ १९ ॥ स्निग्धश्यामसुगंधीष-दुक्रस्वावर्तमूर्द्धजाः । मत्तद्विपेंद्रगतयो द्वात्रिंशल्लक्षणान्विताः ॥ २० ॥ तानि चैवं-यूप १ स्तूप २ ध्वज ३ च्छन ४-कमंडलु ५ यवां ६ कुशाः ७ । पताका ८ कूर्म ९ मकर १० मयूर ११ सुप्रतिष्ठकाः १२ ॥ २१ ॥ मेदिनी १३ तोरणां १४ भोधि १५-मंदिरा १६ दर्श १७ पर्वताः १८ । गजो १९-क्ष २० सिंह २१ कलश २२ रथ २३ मत्स्य २४ शुका २५ स्तथा ॥ २२ ॥ वरस्थाला २६ प्टापद २७ श्री-दामा २८ भिषेक २९ चामराः ३० । वापी ३१ सौव- स्तिक ३२ श्चेति द्वात्रिंशत्पुण्यशालिनां ॥ २३ ॥ तदा सर्वांगसुंदर्यः प्रशस्तस्त्रीगुणांचिताः । पुण्यनैपुण्यलावण्या भवंति महिला अपि ॥ २४ ॥ सुवर्णकूर्मसंस्थान-मृदुरक्ततलांद्वयः । सुश्लिष्टवृत्तसरल-क्रमदी|गुलिवजाः ॥ २५ ॥ तलिनानुन्नतान् रक्तान् दधत्यः पादयोर्नखान् । दशदिक्पतिदेवीना-मात्तान् मौलिमणीनिव वाला; उम्णीपना शिखर जेवा भने उदार छत्राकार मस्तकवाळा, दाडिमना पुष्पजेवी काइक रक्त, स्वच्छ ने मृदु केशांतनी भूमिवाळा; स्निग्ध, श्याम, सुगंधी भने कांहक वक्र भावयुक्त केशवाळा; मदोन्मच हस्ति जेवी गतिवाळा भने यत्रीश लक्षणवाळा होय छ. १०४ थी १२० पत्रीश लवणो मा प्रमाणे-१ यूप, २ स्तूप. ३ बज, छत्र, ५ कमंडळ, ६ यव, ७ अंकुश, ८ पताका, ९ फर्म, १० मकर, ११ मयूर, १२ सुप्रतिष्ठक, १३ पृथ्वी, १४ तोरण, १५ समुद्र, १६ मंदिर, १७ आदर्श, १८ पर्वत, १९ गज, २० वृषम, २१ सिंह, २२ कळश, २३ रथ, २४ मत्स्य, २५ शुक, २६ श्रेष्ठधाळ, २७ अष्टापद२८ श्रीदाम, २९ भमिके, ३० चामर, ३१ वाव ने ३२ स्वस्तिक-पुण्यशाळीना शरीर उपर पा ३२ लघणो-चिन्हो होय छे. १२१-१२३ वे काळे स्त्रीमो पण सर्वांग सुंदर, प्रशस्त. एवा स्त्रीजामिना गुणोवडे युक्त अने पवित्र एवी निपुणवा भने लावण्यवाळी होय छे, १२४. तेना शरीरनुं फर्चा वर्णन करे छ-सुवर्णना काचपानी पीठ सरखा, मृदु भने रक्तवर्णना पगना पंजावाली, सारी रीते मळेली, सरल, गोल भने क्रमथी वधती अंगुळीभोवाली सच्छ, उन्नत भने रक्त पादांगुळी. मोना नखने धारण करती तेमज दशदिगपाळनी देवी मोना मस्तकपर रासेल मणिनी १ पुसमान्य. १ भभिषेक करावी लक्ष्मी.

(१५८) मीशनलोकप्रकारा। ॥ २६ ॥ या वृत्तकमस्थूल-मृदुजंघापराजिताः । वसंति विपिनेऽद्यापि हरिण्यो लज्जिता इव ॥ २७॥ जिता वृत्ताऽरोमपीन-मृदुगौरैर्यदूरुभिः । कदल्यातर्दधुः शून्य-भावं ब्रीडातुरा इव ॥ २८ ॥ समुद्गसंपुट इत्र श्लिष्टसंधिर्न दृश्यते । यामा जानुभृशं गूढः कृपणस्येव सेवधिः ॥ २९ ॥ नितंबविंबं पृथु या दधते पीनवर्तुलं । जंगमः त्रिजगजिष्णोः स्मरस्येव सुदर्शनं ॥ ३० ॥ वदनद्विगुणायामं मृदुलं मामलं घनं । विभाति जघनं यासां स्वासरित्पुलिनोपमं ॥ ३१ ॥ यतो लक्षणोपेतस्त्रीणां जघनं मु. खायामाद् द्विगुणविस्तारं भवतीति. कटी पटीयसी यासां कंठीरववि- जित्वरी । नाभिः सौंदर्यसर्वस्व-भूमभूमिगृहोपमा ॥ ३२ ॥ प्रक्षीणमुदरं यासां न स्पष्टमुपलक्ष्यते । किंतु त्रिवल्याद्याधेया-नुपपत्त्या प्रतीयते ॥३३॥ यासामतिकृशो मध्य-देशोभंगभयादिव । त्रिवलीदभतः स्वर्ण- सूत्रत्रयदृढीकृतः ॥ ३४ ॥ यद्वा—पुरो रोमावली चारु-र्यासां पश्चात्तु वेणियुक् । शंके भंगभिया मध्यो दचायापट्टिकाद्वयः ॥ ३५॥ रोमा- जेवा नखवाळी; जेमनी गोळ, क्रमयी स्थूळ थती अने सुकोमळ एवी जंघा (पीडी)धी परा- जित थयेली मृगलीओ जाणे लज्जा पामी होय तेम अद्यापि पण जंगलमा वसे छे; तेम ज जेना गोळ, रोम विनाना, पुष्ट, कोमळ भने उज्वळ एवा ऊरुवडे जीतायेली केळो लजातर थइने हृद- यमा शून्य भावने धारण करे छे एवी. डाबडाना संपुटनी जेवा मळेला सांधावाळा जेना भति- गुप्त जानु (हीचण) कृपणनी लक्ष्मीनी जेम जोवामा आवता नथी एवी; वळी विस्तारवाळा, पृष्ट अने गोळ एवा नितंबना चिंचने धारण करनारी के जे नितंर जाणे त्रण जगतने जीतनार कामदेवर्नु जंगम सुदर्शनचक्र होय तेवु देखाय छ; बदनथी बमणा विस्तारवाळा, सुंबाळा, मांसल अने घन एता जघनने धारण करनारी के जे जघन देवनदी (गंगाना) पुलिन जेवू देखाय के (लक्षणोपेत स्त्रीनु जघन वदन करतां यमणा विस्तारवालं होय छे.) चळी जेनी कटी सिंहनी कटीने जीते एवी सुंदर होय छे नामि सौंदर्यसर्वस्वने छुपाच- वा माटे करेला भूमिगृह जेवी होय छे तेनुं उदर एटलुं कृश होय छे के जे स्पष्ट देखातुं पण नथी, परंतु त्रिवली विगेरेना आधेयनी अन्यत्र अनुपपत्ति होवाथी ते छे एची प्रतीति थाय छे तेनो शरीरनो मध्यभाग एटलो कुश होय छे के जेना मांगी ज- थाना भयथी तेने त्रिवलिरूपी सोना बडे दृढ करेलो के, (पाधी लेवामां आवेल छे.) अथवा तो भगना भयथी भागळना मागमा रोमावळीथी त्रण दोरा सर्ग २९ मो। वली कुंडलिनी यासां नाभिविलोद्गता । रागोरुगरलग्रस्तं न केपां कुरुते मनः ॥ ३६ ॥ तनुस्निग्धश्यामरोम-तरंगाच्चैः प्रसर्पति । यासां नाभिइ- दोद्भूता रोमराजीतरंगिणी ॥ ३७ ।। यासामुरोजौ राजेते पीनवृत्तदृढो- न्नतौ । मनःस्थयो रत्यनंग-वेश्मनोः कलशाविव ॥ ३८ ॥ कुचौ सचू- चुकौ यासां नीलाब्जपिहिताननौ । मनःस्मरगृहद्वार-मांगल्यकलशाविव ॥ ३९ ॥ स्थातुं यत्कुचयोरंत-रचमा चारुवृत्तयोः । गुणान्वितापि सच्छि- द्रा मुक्तास्रग लंबते वहिः ॥ ४० ॥ मृणालिकामृदू वाहू करौ याला कजोपमौ । मृदुरक्ततलौ सूर्य-चंद्रचक्रादिचिह्नितौ ॥ ४१ ॥ सरला- भिः सुवृत्ताभिः स्निग्धारुणनखांशुभिः । अंगुलीभिः करौ यासां राजतः स्मरतूगवत् ॥४२॥ त्रिलोकोत्तरसौभाग्य-व्यंजिरेखात्रयांकितः । कंठो यासां विभाति स्म चतुरंगुलसंमितः॥४३॥ यासां हनुरनूनश्रीः शोभते भासुरद्युतिः । स्वैरं विलसतो रत्य-नंगयोरिव दर्पणः ॥ १४ ॥ श्रध- पने पाछला मागा लांची वेणीची जाणे लोढानी चे पाटीना पंधवडे गांधी लीघल होय तेवो जणाय छ वळी मामिरूपी पिलमाथी नीकळेली रोमावली रूपी सापण एवी के के तेणे रागरूपी नीव विषधी कोना मनने व्याप्त करेल नधी ? वळी नामिरूपी दहाथी नीफळेली रोमराजीरूपी नदी पातळा, स्निग्ध भने श्याम एवा उंचा उछळता रोमरूपी रंगोक्डे विस्तार पामेली छे; वळी जेना उरोज ( स्तन ) पुष्ट, गोळ, मजयुत भने उंचा, मनमा रहेला अनंग ने रतिना मंदिर उपरना ये कळश होय तेवा शोमे छे; बळी डीटडी. पाळा से बने स्तनो नील कमळ बडे रंकापेला मुखवाळा भने कामदेवना धरना द्वारपासे स्थापला ये मंगळ कळश जेवा शोमे छे; ते सुंदर ने गोळ एवा ये स्तनना मध्यमा रहेका माटे मसमर्थ थापा दोरावाली मने छिद्रवासी एवी मोतीनी माळा पण बहार लटक्या करे छे. मलिनी सरसा कोमळ ये पाहु छे अने हाथ (पंजा ) कमळनी उपमावाला छे तया सेना हाथना तळीया कोमळ, राता भने पूर्य, चंद्र तथा पक्रादिना चिनो परे मुशोमिव के यळी सरल, गोळाकार, स्निग्ध भने लाल नसनी कांति यह शोमती एवी भोगळीभोषडे कामदेवना माधानी बेचा ये हाय शोभी ग्मा छः प्रण लोकमा अपूर्व सौमाम्यने पतासी एपी प्रण रेखावह विद्धित मने चार भागना प्रमाणवालो नो कंठ शोमी पो छ। जेनी हडपची पूर्ण शोभावाली मने असहळनी कांतिपाली समाज सेछाए विपरवा एका ति बनेपामदेवना दर्षक समान शोमे थे; देना अपरोठपुट (१६०) भीकाललोकप्रकाश। रौष्ठपुटं यासां क्लृप्तं रागरसैरिव । विरक्तानपि यद्रक्तान् कुरुते चिंतनादपि ॥४५॥ ईषद्क्तं सुरक्तेन नीरसं सरसेन च । स्याद्यदोष्ठेन सस्पद्धं प्रवालं सार्थकाभिधं ॥ ४६ ॥ रक्तस्वं नीरसे रत्ने माधुर्य पांडुरेऽमृते । स्थाने द्वयोस्तयोर्योगा-द्यदोष्ठस्तद्वयाधिकः॥ १७ ॥ अंतर्मुख दंतपंक्ति- र्यासामविरला समा । माणिक्यसंपुटन्यस्ता मुक्तालिरिव राजते ॥४८॥ यासां रक्तोऽधरो राग जनयत्युचितं हि तत् । रागं मुक्तोपमा देता- वली सूते तदद्भुतं ।। ४९ ॥ शोभते रसना यांसां कमलच्छदकोमला । सुखशय्येव भारत्या जाग्रत्या मुखमंदिरे ॥५०॥ दीर्घोन्नतातिसरला यासां नासा विराजते । कलिका दीपकस्येव श्रिया क्रीडागृहे मुखे ॥ ५१ ॥ तीक्ष्णाने विपुले श्याम-तारके च यदीक्षणे ।' अंतनिविष्टभ्र. मरे भातः पद्म इव स्मिते ॥ ५२ ।। अचिभिः सुभगैर्यासां हनसौंदर्यसंपदः । उद्घाटपक्ष्माररय-स्तस्थुः स्वःसुदृशां दृशः ॥ ५३ ॥ विलासचटुले यासां कर्णोपतिप्रसर्पिणी। नेत्रे सांजनलक्ष्मीके भातः प्रास्तांजने अपि (वे होठ ) एवा रंगवडे रंगायेला छे के जे चितववा माथी पण विरक्तजनोने राग- वाळा बनावे छे, अत्यंत रक्त अने रस सहित एवा तेना भोष्ठनी साथे काइक रातुं भने नीरस स्पर्धा करनारा प्रवाळy नाम सार्थक छे; नीरस एवा रत्नमा रक्तत्वमात्र छ भने पांडर ( उज्वळ ) एवा अमृतमा मधुरता मात्र छे, श्रोष्ठमां ते बनेनो संयोग-रक्तता ने मधुरतारूपे होवाथी ते बनेथी प्रोष्ठ अधिक छे; जेना मुखमा अविरल (बच्चे मार्ग विनानी) अने सम (सरली) एची दादनी श्रेणि माणिकपना संपुटमा सलेली मोतिनी श्रेणि जेसी शोभे छ; जेना रक्त एषा भवर रागने (रंगने ) उत्पन्न करे छे ते तो उचित छे पण राग मोतीनी उपमावाळी श्वेत दांतोनी श्रेणि उत्पन करे चे ते भाचर्यकारी छे तेना मुखरूपी मंदिरमा जाणे जागती भारतिनी सुखशय्या होय तेवी तेम ज कमळपत्र जेवी कोमळ रसना (जीम ) शोभे छे. दीर्घ, उन्नत भने प्रति सरल एची नासिका दीपनी कलिका जेवी लक्ष्मीना क्रीडागृह जेवा मुखनी उपर शोमे छे तीक्ष्ण अप्रमाग (छेडा) पाळा भने विपळ (विस्तृत) एवा तेना नेत्रमा रहेली ये काळी कोकीयो कमळमा रहेला भ्रमर जेपी शोमे छे. तेनी अति सुभग (सौभाग्यशाळी) एवी भांखो पडे जेनी सौदर्य संपदा हयाइ गइ छ एषी देवांगनामोनी दृष्टि उघारी ज रही गइ थे. (वनाती जनधी) मटकं पण मारी शक्ती नथी. वळी विलासवाला अनेक पर्यत पहोंचेला (नया).

सर्ग २९ मो। (१६१) ॥ ५४॥ यासु कामास्त्रशालासु लंविते धनुपी इव ।भ्रुवौ सदा सहस्थायि -चक्षुर्वाणे विराजतः ॥ ५५ ॥ चतुःकासारयोर्यासां शृंगाररसपूर्णयोः । कटाक्षा वीचय इवा-भांति कामानिलोस्थिताः॥ ५६ ॥ भूषणालंकृते यासां श्रवणे दीर्घवर्तुले । दोलाविलासं बिभृतः क्रीडतो रत्यनंगयोः ॥ ५७ ॥ सुवर्णशालिनोर्मुक्ता-मययोश्चारुवृत्तयोः । तुल्ययोः शोभते संगो यत्कुंडलकपोलयोः ॥ ५८ ॥ यगौरगल्लयो ति कुटिलालकवल्लयः। प्रसूनेपोरिव जय-प्रशस्त्यक्षरपक्तयः ॥ ५९ ॥ मलिनांशव्यपोहाय योऽ- यमर्कीकृतो विधुः । यासां भालस्थलं तेन निर्मलेनेव निर्मितं ॥६॥ यदास्यसुपमाकांक्षी ममजांभोनिधौ विधुः । तथापि योनिजातस्य तस्य तातस्य सा कुतः ॥ ६१ ॥ किंचिदाकुंचिताः स्निग्धा मृदुलाः श्यामला- शवः । यासामत्यंततनवः केशा लेशा इव श्रियां ॥ १२ ॥ मानवा मौलितो वा यद्यप्यरुस्तु नाकिनः। तथाप्येतेऽतिपुण्यत्वा- देवत्वेन विवक्षिताः ।। ६३ ।। सिद्धांतेऽप्यत एवैपा-मनेनैव क्रमेण हि । अंजननी शोमावाळा तेना नेत्रो अंजन कर्या विना पण शोमे छे. कामदेवनी शस्त्रशाळारूप जेमनी धनुष्यना जेवी लांची ये भूमो (पमरो) निरंतर साथै रहेला चतुरूप यागोथी शोमी रहल छे. शृंगाररसपी पूर्ण एवा चक्षुरूप सरोवरमा कामरूप पवनथी उछळता जाणे वरंगो होय होय तेम तेणीना फटाको शोमे छे. भूपणोधी अलंकृत भने दीर्घ तेम ज चतुर्ल (गोळ) एवा तेना कणों क्रीडा करता रति अने अनंगना हीडोळा का शोभे छे. सुवर्णना, सक्तामय, चारु भने गोळ एवा कुंडल्युगलनो तनी समान स्थितियाळा कपोळ ( गाल) सानो मंयोग शोमे थे. जेना गार एवा गल (कंठना पाछला भाग) उपर लोटती कुटिल एवी फेशनी बनीमा कामदेवने प्रसिद्धि मापनारी जयप्रशस्तिनी अक्षर पंक्तिमो जेवी शोमे थे. मलिन मागने दर करवा माटे भर्घ करेला चंद्रमानी निर्म- बतायडे ज निर्माण करेलु होयनी तेवू तेनुं माळस्थळ शोभे थे. जेना मुखनी शोमाने प्राप्त करवा माटे तेषी इच्छाधी चंद्रमा समुद्रमा हुपी जाय , वोपण योनिजात एका तेना तात पासे से पायी होय! कांडक यांका, स्निग्ध, मृदुल, श्याम कांदिवाळा भने प्रत्येन पातळा एका तेना केश लक्ष्मीना लेश (विमाग) जेवा शोम थे. (१२५-६२) मनुप्पोन वर्णन मस्तकयी करवं भने देवोर्नु परणधी करवू एवो नियम के ता भरिपुण्यशाली होपाधी युगलि कोर्नु वर्णन देवोनी रीते घरपथी करयामा भाष्यं थे. सिद्धातमी पण मा करीने ज तेनुं पर्णन पूपपुरुषोए कोलुंछ, सेपी भमे पयरो (१६२) श्रीकालोकप्रकाश। श्रादिष्टं वर्णनं पूज्यै-रियं तद्दिक् प्रदर्शिता ॥ ६४ ॥ एवं च ताः सुव- दनाः सुकेश्यः स्युः सुलोचनाः । चारुवाजजघनाः सदावस्थितयौवनाः ॥६५॥ सद्राजहंसगतयः कलकंठीकलस्वराः । स्वर्णचंपकचार्वग्यो द्वा. त्रिंशल्लक्षणांचिताः ॥ ६६ ॥ द्वात्रिंशल्लक्षणानि च ज्योतिष्करंडवृत्तौ श्री. मलयगिरिभिर्दर्शितानि पूर्वोक्तान्येव, किं त्वत्र जंबूदीपप्रज्ञप्तिवृत्तौ मकर. स्थाने मकरध्वज इति दृश्यते, तथा च तद्ग्रंथः-मकरध्वजः कामदेव. स्तत्संसूचकं सूचनीये सूचकोपचाराल्लक्षणमिति, तच्च सर्वकालमविध- वत्वादिसूचकमिति. स्वभर्तुः किंचिदूनोच्चा भाग्यसौभाग्यभूमयः । सर्वे. पामप्यनुमता दक्षालापाः प्रियंवदाः ॥ ६७ ॥ सुस्था भाविकशृंगाराः सीमंतायुज्झिता अपि । मदमंथरगामिन्यो निर्विकाराशया अपि ॥६॥ स्वाभाविकैरलंकारै-दशभिः स्त्रीजनोचितः। सुशिक्षिता इव सदा लीला- दिभिरलंकृताः॥ ६९ ॥ ते चामी-लीला १ विलासो २ विच्छित्ति ३ बिब्बोकः ४ किलकिंचितं ५। मोहायितं ६ कुट्टमितं ७ ललितं ८ दिशा बतावेल छे. पा प्रमाणे ते स्त्री मो सारा मुखवाळी, सारा केशवाळी, सारा लोचन- वाळी, सारा वक्षोज ने जघनवाळी, सदा अवस्थित यौवनवाळी, राजहंस समान गतिवाळी, कोयल जेवा मधुर स्वरवाळी, स्वर्ण ने चंपक सरखा मनोहर शरीरवाळी तथा पत्रीश लक्षणवाळी होय छे. (१६३ थी १६६) तेना वत्रीश लक्षणो ज्योतिष्करंउत्तिर्मा श्रीमलयगिरि महाराजे पूर्व कह्या प्रमाणे ज कहेला छे, परंतु जंयुद्धीपप्रज्ञप्तिनी पुत्तिमा मकरने स्थाने मकरध्वज देखाय छे. ते श्रा प्रमाणे-मकरध्वज एटले कामदेव तेना सूचक एटले सूचनीयने विषे सूचकनो उपचार करवाथी तेने भोळखावनार लक्षण. ते सर्वकाळ अविधवापणुं विगेरेना सूचक थे. युगलिक स्त्रीरो पोताना स्वामीथी काइक पोछी उंची, भाग्य ने सौभाग्यनी भूमि जेवी, सर्वने गमे तेवी, दक्ष पालापवाळी, प्रिय बोलनारी, सुस्थ, सीमंतादि-केशनी व्यवस्था रहित छत्ता पण शृंगारथी शोभित होय देवी, निर्वि- कार श्राशयवाळी छतां पण जाणे मदवडे मंदगतिवाळी होय तेवी स्त्रीजनने उचित एवा स्वाभाविक लीला विगेरे दश अलंकारवडे जाणे सारी रीते शीपेली होय तेम सर्वदा अलंकृत होय छे. (१६७-६९.) ते दश प्रकारना स्वाभाविक अलंकार पा प्रमाणे- १ लीला, २ विलाम, ३ विच्छित्ति, ४ पिचोक, ५ किलकिंचित, ६ मोट्टापित, ७ छुट्ट- मित, ८ ललित, ६ विकृत तथा १० विभ्रम मा दश खीमोना स्वाभाविक मलंकारो समजवा. एना लक्षण काव्यानुशासनस्त्रमा मा प्रमाणे काहेला छे-वाणी, षेप भने . .

सर्ग २९ मो। (१६३) विहृतं ९ तथा ॥ ७० ॥ विभ्रम १० श्चेत्यलंकाराः स्त्रीणां स्वाभाविका दश । एतल्लक्षणानि चैवं काव्यानुशासनसूत्रे-वाग्वेपचेष्टितैः प्रियस्यानु- कृतिीला १ स्थानादीनां वैशिष्ट्यं विलासः २ ग्रंथांतरेऽप्युक्तं-स्थानास- नगमनानां हस्तभ्रूनेत्रकर्मणां चैव । उत्पद्यते विशेषो यः श्लिष्टः स तु विलासः स्यात् ॥१॥ गर्वादल्पाकल्पन्यासः शोभाकृद्विच्छित्तिः ३ इष्टेऽवज्ञा विबोकः ४ वागंगभूपणानां व्यत्यासो विभ्रमः ५ स्मितहसितरुदितभयरोपगर्वदुःख-श्रमाभिलापसंकरः किलकिंचितं ६ प्रियकथादौ तद्भावभावनोत्था चेष्टा मोहायितं श्रधरा- दिग्रहाद्दुःखेऽपि हर्पः कुदृमितं ८ मसृणोंऽगन्यासो ललितं ९ व्याजादेः प्रातकालस्याप्यवचनं विहृतं १० एतेषां दशानां सूत्राणां सोदाहरणा वृत्तयस्तु काव्यानुशासनटीकाया अलंकारचूडामणेरवसे- याः, एनच्च जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रेऽपि सूचितं. तथाहि-संगयहगयसि भणिचिट्ठिविलाससंलावणिउणजुत्तोवयारकुसला इति, चेष्टितबहे भरिनुं अनुकरण कर ते लीला. १, स्थानादिनुं विशिष्टपणुं ते पिलाम २, ग्रंथानरमा पण कगुंथे के-'स्थान, श्रासन ने गमननी तथा हस्त, भू ने नेवनी जे श्लिष्ट एवी चेष्टा विशेष थाय ले ते विलाम कहवाय छे.'गर्वधी मन्प भने प्रकल्प एवो जे न्यास शोमा मापे छे ते विच्छित्ति. ३, इष्ट छतां अवज्ञा करवी ते रिन्चोक ४, पाणीनो ने मंग- भूषणोनो जे व्यत्याम करवो ते विभ्रम. ५, स्मित, हमित, रुदित, भय, रोप, गर्व, दाप, अम ने ममिलाप अनो जे संकरमाव एकबीजामा मळी जबारूप थयो ते किलकिंनित ६, प्रियनी कथा विगरेमा ते भाव भाववाथी उत्पन्न यती चेष्टा ते मोट्टायित. ७, भधरा- दिना ग्रहणमा-चुंपनादिमा महा दुःस धना पण हर्प धारण करवो वे वृट्टमित. ८, कोमळ एवो जे अंगन्याम ते ललित ९, कार मिप फरीने-कपटयी प्राप्त काळे पण न पोल' ते विहत. १०, ए दश स्पोना उदाहरण साधनी प्रति-विस्तार काम्पानुशामनटीकामांधी तेमज भलंकारपूडामणिमाधी जाणी लेयो. भा हकीकन श्रीजंयूद्वीपमप्तिस्यमा पण सूनयेल 2. ते मा प्रमाणे-'मंगत, गत, दमित, मणित, विष्टिन, चरित, स्लिाम, मंनार, लिपुप भने पुतोपचार करयामा हुशल होप घे.' इनि.

(१६४) भीकानलोकप्रकाश । न तूद्दिश्यान्यमस्तिा विकारं विभ्रते मनाक्। कालस्वभावादेवाल्प- विकारान्यायमार्गगाः॥७॥ श्रनभ्यस्तनीतिकाम-शास्त्रा अपि स्वभावतः। युक्तकामोपचारेपु चतुराश्चतुराशयाः ॥ ७१ ॥ नयनोत्सवकारिण्य-श्चित्र. कृत्प्रियदर्शनाः । साक्षादप्सरसः स्वर्गा-दवतीर्णा इव क्षितिं ॥ ७२ ॥ तत्पतिप्राम्भवाचीर्ण-दानादिसुकृतोद्भवैः । पचेलिमैरिव फलै-र्जातेदृग्रूप. संपदः ॥ ७३ ॥ तास्तादृश्यस्तदानीं स्युः स्त्रियः कालस्वभावतः । युग्मिन्यः परिभोगार्हा युग्मिनां पुण्यशालिनां ॥ ७४ ॥ सर्वे. ऽपि पुंस्त्रीरूपास्ते मनुष्याः शुभलक्षणाः । नांदीसिंहक्रौंचहंस- गंभीरमधुरस्वराः ॥७५ ॥ श्राद्यसंहनना श्राद्य-संस्थानाः कांतिशालिनः। दद्रुकुष्ठकिलासादि-वग्दोपरहितांगकाः ॥ ७६ ॥ कपोतवत्परिणता- हाराः कंकवयोगुदाः । अलग्नमलमूत्रादि-लेपापानास्तुरंगवत् ॥ ७७ ।। पृष्ठकरंडकवाच्यानि पृष्ठवंशोन्नतास्थिशकलानि । पट्पंचाशां द्विशतीं दधतः कोशत्रयोन्नतयः॥ ७८ ॥ आर्या । पद्मोत्पलादिवच्चारु-गंधश्वास- ते युगलिक स्वीयो अन्य पुरुषोने जोइने किंचित् पण विकारने पामती नथी, कारण के काळस्त्रमावथी ज ते काळनी स्त्रीओ अल्पविकारवाळी अने न्याय- मार्गे गमन करनारी होय छे. (१७०) नीतिशास्त्र के काम नो अभ्यास कर्या विना पण स्वभावे ज योग्य एवा कामोपचारमा चतुर अने चतुर (शुभ) श्राशयवाळी ते काळनी स्त्रीश्रो होय छे. वळी नेत्रने उत्सव करनार, माश्चर्यपमाडनार, प्रियदर्शनवाळी अने साक्षात् अप्सरामोज देवलोकमाथी पृथ्वीपर भावी होय तेवी ते देखाय छे. तेना पतिना पूर्वभवे आचरेला दानादि सुकृतोथी उद्भवेला अतिपक्व फळोथी एवा प्रकारनी रूपसंपदाने पामेली होय छे. ते स्त्रीरो पूर्वे कह्या प्रमाणेना स्वरूपवाळी काळस्वभावधी ज ते काळे पुण्यशाळी एवा युग्मीओना भोगने योग्य होप छे. (१७१-१७४) स्त्री भने पुरुषो सर्वे मनुष्यो शुभ लक्षण वाळा, नांदी, सिंह, कौंच अने हंसनी जेवा गंभीर अने मधुर स्वर- वाळा होय छे. वळी प्रथम संहननवाळा, प्रथम संस्थानवाळा, कातिशाळी, घाघर, कुष्ठ ने किलासादि त्वचाना दोषथी रहित, कपोतनी जेवा परिणत माहारवाळा, कंकपतीनी जेवी संकुचित गुदावाळा, अश्वनी जैम मळमूत्रादिना लेप विनानी गुदावाळा, जेना पृष्ठकरंडक तरीके मोळसाता पृष्ठवंशना उन्नत एया अस्थिना विभागो २५६नी संख्यामां होय छे भने प्रण गाउना शरीरवाळा होय छे.(१७२-१७८).पद्म भने उत्पल (कमळ) नी जेवा सुगंधी वासवाळा -- सर्ग २९ मो। (१६५) मुखांवुजाः । तनुक्रोधमानमाया-लोभदोषाः स्वभावतः ॥ ७९ ॥ विनीता भद्रकास्त्यक्त-भक्ष्यभोज्यादिसंचयाः। संतोषिणो निरौत्सुक्या माईवा- जवशालिनः ॥ ८०॥ सत्यपि स्वर्णरत्नादौ ममत्वावेशनजिताः। परस्परं त्यक्तवैर-कलहद्रोहमत्सराः ॥ ८१ ॥ अश्वमातंगकरभ-वृषभादिषु सरस्वपि । तद्भोगविमुखाः पाद-विहाराः स्वैरचारिणः ।। ८२ ॥ गोमहि. ष्येडकाजासु सुव्रतासु सतीष्वपि । तदंगीकारतदोह-तदुग्धास्वादव- जिताः ॥ ३ ॥ यक्षभूतपिशाचादि-ग्रहमारिविवर्जिताः । कासश्वास- ज्वराद्यति-व्याधिव्यसनवंचिताः॥ ८४ ॥ कृषिसेवावणिज्यादिवृत्तिक्लेश- परिच्युताः । वांछामात्रप्राप्तकामा निश्चिताः सुखमासते ॥ ८५ ॥ भूपालयुवराजेभ्य-श्रेष्ठिसेन्याधिपादिभिः । नायकै रहितास्तुल्याः स्युः सर्वेऽप्यहमिंद्रकाः ॥ ८६ ॥ एकादशभिः कुलकं ॥ तदा न कोऽपि कस्यापि दासः प्रेष्यश्च कर्मकृत् । भागिको भृतका शिष्य पाभियोग्योज्झिता हि ते ॥ ८७॥ प्रसूपितृस्वसभ्रातृ-भार्यापुत्र. मुखो छ जेना एवा, स्वभावधी न पातळा क्रोध, मान, माया, लोमरूा कपायोवाळा, विनीत, भद्रक, मक्ष्य अने भोग्य पदार्थोना संचय विनाना, संतोपी, निरौत्सुक्य ( उत्सुकता विनाना), मृदुता भने सरलतावाळा होय छे. ( १७९-१८० ) सुवर्ण रत्नादिक छतां पण तेनी उपर ममताना भाग्रह विनाना होय छ, भने परस्पर वैर, कलह, द्रोह अने मत्सर रहित होय छे. (१८१) ते काळे अन्ध, गज, उंट भने कृपमादिक होय छे छतां ते युगळिको तेनो उपभोग करता नथी. तेमो पगे ज चालनारा अने स्वेच्छा. विहारी होय छे. (१८२) गाय, मेंश, पकरी ने घेटी विगैरे धाळ जनावर सारा होता छता तेने अंगीकार करता नथी अने तेने दोहता नयी वेमच तेना धनो स्वाद पण लेता नथी. (१८३) यक्ष, भूत, पिशाच विगैरेना उपद्रवी तेमन प्रहपीडा अने मारी (मरकी थी वर्जित होय छे. कास, श्वास, वर विगैरे व्याधिधी भने तेनी पीडाथी विरहित होय छे. (१८४)खेती, सेवा, व्यापार विगेरे करीने भाजीविका चलायवाना क्लेशधी रहिव होय छे. पाँच्छा करवामाथी ज इच्छिचने मेळवनारा होवाथी निश्चितपणे सुखमा रहे थे. (१८५) राजा, युपराज, शेठ, धनवान, सेनापति विगेरेना व्यवहारबर्जित होप छे, तेम ज नायक रहित, सर्प समानमावाला ने सर्व महमिंद्र होय छे. (१८६) ते काळे कोइ कोइनो दास, प्रेप्य के कर्मकर होतो नपी, तेमज भागीदार, भृतक, शिष्य के भाभियोगिकपणुं पण होत नथी. (१८७ ) माता, पिता, .. (१६) भीकाबलोकप्रकाश । स्नुषादिषु । स्वजनेष्वपि ते मां न तीव्रप्रेमबंधनाः ॥ ८८॥ तदा गोधूमशाल्याद्या भवत्यौषधयः स्वयं । सरसत्वाद्भुवो भूम्ना सांप्रतीन- तृणादिवत् ॥ ८९ ॥ आहारायोपयुज्यंते न तास्तेषां नृणां परं । पृथ्वी- कल्पद्रुमफल-पुष्पाहारा हि ते जनाः॥९॥ शर्करामोदकादिभ्यो-ऽप्य. नंतगुणमाधुरी । भूभिर्भवेत्तदा स्निग्धा परिणामे हितावहा ॥९१ ॥ नीरोगाणां सुजातीनां पालितानां प्रयत्नतः। पुंड्रेक्षुचारिणीनां च गर्न लक्षस्य यत्पयः ॥ ९२॥ एकगव्यां संक्रमित-मर्दा दिव्यवस्थया । निष्पादितं तेन लक्ष-द्रव्यव्ययसमुद्भवं ॥ ९३ ॥ दीपनीयं बृहणीयं सर्वो- गीणप्रमोदकृत् । सुरभि स्वादु कल्याण-भोज्यं यच्चक्रवर्तिनः ॥ ९४ ।। ततोऽप्यधिकमाधुर्य-स्तुष्टिपुष्ट्यादिकृद्रसः । कल्पद्रुमाणां तेषां स्या-पु. प्पेषु च फलेषु च ॥ ९५ ॥ चतुर्भिः कलापकं । तुवरीकणमात्रेण तेना- हारेण ते जनाः । अहोरात्रत्रयं याव-सुहिताः सुखमासते ॥ ९६ ॥ अ. थाहृत्य तमाहारं प्रासादाकारशालिपु । प्रायुक्तकल्पवृक्षेपु ते रमते चहेन, भाइ, भार्या, पुत्र, पुत्रवधू विगेरे स्वजनोने विषे पण ते युगलिको तीव्र प्रेमबंधनवाळा होता नथी. (१८८) ते काळे गोधूम, शाळि विगैरे औषधियो (धान्यो ) स्वभावे ज जमीन प्राये रसवाळी होवाथी सांप्रतकाळे तणादिक थाय छे तेम पोतानी मेळे ज उगे थे, पण ते धान्यो ते काळना मनुष्योने पाहारना उप- योगा आवता नथी. तेभो तो पृथ्वी अने कल्पवृक्षना फळ ने पुष्पादिनो श्राहार करनारा होय छे. (१८९-९०). साकरना मोदक करतो पण अनंतगुणी मधुर, स्निग्ध अने परि- णामे हितकारक एवी ते काळे भूमि ( मृत्तिका ) होय छे. निरोगी, जातिवंत, प्रयत्नपूर्वक पाळेली, पुंडू ने शरडीनो ज चारो चरावेली लाख गायोनुं दूध तेथी अर्ध संख्यानी गायने पाता, एम क्रमे क्रमे अर्घ अर्धने पाता, छेवटनी एक गायना धथी पनावेल लक्ष द्रव्यना व्ययथी थयेल, दीपनीय, धृहणीय, सर्व अंगमा प्रमोद उत्पन्न कर- नार, सुगंधी, स्वादु एबुं चक्रवतीनुं जे कन्याण मोजन (तीर) होय छे ते करतां पण अधिक मधुरतापाळो, तुष्टिपुष्टि विगैरेने करनारो एवो कल्पवृक्षोना फळमां ने पुष्पमा रस (स्वाद) होय छे. (१९१-९५) तुरना दाणा जेटला तेना भाहारथी ते काळना पुगलिको प्रण दिवस सुधी पाहारनी इच्छा पिनाना सुखे भने स्वस्थताए रहे थे. (१९६) वेवो ने तेटलो माहार करीने वेभो प्रासादना आकारवाळा पूर्व कहेला कम्पवृक्षोमा जेम सुख उपजे सेम मान- सर्ग २९ मो। (१६७) यथासुखं ॥ ९७ ॥ यदा चतुर्विधातोद्य-हृद्यनादरसार्थिनः । तदा ते त्रुटितांगाख्या-नुपयांति सुरद्रुमान् ॥ ९८ ॥ एवं च-चत्रमाल्यविभृ- पाये-यंदा ययः प्रयोजनं । उपसर्पति ते लोका-स्तदा तांस्तान् सुर- दुमान् ॥ ९९ ।। तदास्ति न पुरग्राम-दुर्गापणग्रहादिकं । ततस्ते स्यु. जना वृक्ष-वासिनः स्वैरचारिणः ॥ २०० ॥ वीवाहयजनप्रेत-कार्यादी- नामभावतः । न तेषां कार्यवैयग्यूं तेऽव्यग्रमनसः सदा ॥ १ ॥ तदा प्रमार्जनी नास्ति न च कश्चित्प्रमार्जकः । स्वभावाद्भूः कचवर-पत्रस्था- तृणोज्झिता ॥ २ ॥ भवंति दंशमशक-यूकाचंचटमत्कुणाः । मक्षिका- द्याश्च न तदा जंतवो देहिदुःखदाः ॥३॥ ये सिंहचित्रकव्याघ्र-भुजगाज- गरादयः । कालस्वभावतस्तेऽपि न रौद्रा नापि हिंसकाः ॥ ४ ॥ एवं मृगा वृकाः श्वानः पक्षिमार्जारम्पकाः। मिथो वैरोज्झिताः सर्वे भद्रकाः स्युरहिंसकाः ॥ ५॥ न खदादीनि शस्त्राणि नागवाणादयोऽपि न । न तत्प्रयोगी संग्रामः कोऽपि कस्यापि नाशकृत् ॥६॥नागवाणादयश्चैवं- दथी रहे छे. (१९७) तेश्रो ज्यारे चार प्रकारना वाजित्रोने सांमळवाना अधी थाय छे त्यारे श्रुटितांग जातिना कल्पवृक्षो ते इच्छाने पूर्ण करे छे. (१९८) तेमज तेमने ज्यारे ज्यारे वस्त्र, मान्य, अलंकार विगैरेनी इच्छा थाय छे त्यारे ते ते वस्तुने आपनारा कल्पवृक्षो तेनी ते ते इच्छा पूर्ण करे छे. (१९९) ते काळे नगर, गाम, कील्लो, हाट, घर विगेरे होता नथी तेथी ते काळना मनुष्यो स्वेच्छाचारी भने वृषवामी ज होय छे. (२००) विवाह, पूजन, प्रेतकार्य विगेरेनो प्रभाव होवाधी तेमने कोइपण कार्यनी व्यग्रता होती नथी एटले तेस्रो निरंतर मध्यममनवाळा ज होय छे. (२०१) ते काळे प्रमार्जनी (सावरणी) होती नथी भने कोर प्रमार्जक (वाळनार) पण होतो नथी. स्वभावे ज जमीन कचरो, पत्र, तण के स्थाणु रहित ज होय छे. (२०२) बळी डोस, मच्छर, जु, चाचड, मांकण, माखी विगैरे शरीरने दुःस पापनारा जीयोनी ते काळे उत्पत्ति होती नयी. (२०३) जे सिंह, चिया, व्याघ, मुजंगम, मजगर विगैरे जीयो होय छे, ते पण काळ स्वभावधी जरौद्र परिणामी के हिंसक होता नयी, सेमज हरण, घरगहा, कुतरा, पपीमो, पीलाहा, उंदर विगेरे बीचो बातिर दिनाना, मद्रक भने मासिक होय छे. (२०४-५) वळी सरगादि शखो ने नागात्रादि पायो पण होता नधी तेमज एकसीजानो नाश करनारा मंग्राम पप होता नपी के प्रमा सेनो उपयोग पर शके. (२०६) नागपाप विगरे मा प्रमाणे-नागपाय, चमोवाय, परिवाय, पापुराण, (१६८) श्रीकाललोकप्रकाश। नागवाणस्तमोवाणो वहिवाणो मरुच्छरः । एवमन्येऽपि ते स्वस्व-नाम- कार्यप्रसाधकाः ॥ ७॥ नेतयः सप्त नो मारि-ज्वरा नैकांतरादयः । तदा नाकालमरणं न दुर्भिक्षं न विड्वरः ॥ ८॥ एवं च ते निरातका निर्बाधा निरुपद्रवाः । सुखानि भुंजते याव-जीवं प्राचीन- पुण्यतः ते च पोढा पद्मगंधा १ मृगगंधा २ स्तथाऽममाः ३ । सहाश्च ४ तेज- स्तलिनः ५ शनैश्चारिण ६ इत्यपि ॥१०॥ इमे जातिवाचकाः शब्दाः संज्ञाशब्देन रूढाः, यथा पूर्वमेकाकारापि मनुष्यजातिस्तृतीयारकप्रांते श्री. ऋषभदेवेन उग्रभोगराजन्यक्षत्रियभेदैश्चतुर्धा कृता, तथात्राप्येवे पविधा सा स्वभावत एवास्तीति जीवाभिगमवृत्तौ जंबूप्र०वृच. पंचांगषष्ठ- शतकसप्तमोद्देशके तु पद्मसमगंधयः, मृगमदगंधयः ममकाररहिताः, तेजश्च तलं च रूपं येषामस्तीति तेजस्तलिनः, सहिष्णवः समर्थाः, शनैर्मदमुत्सुकत्वाभावाचरंतीत्येवंशीला इत्यन्वर्थता व्याख्यातास्तीति. ए प्रमाणे पोतपोताना नाम प्रमाणे कार्य करनारा अनेक प्रकारना पाणो समजवा. (२०७) चळी सात प्रकारनी ईतियो, मारि (मरकी), एकातरा विगेरे ज्वरो होता नथी, अकाळ मरण थतुं नथी भने दुर्भिक्ष के वीजा कोई प्रकारनो विवर (उपद्रव) थतो नथी. एटले तेश्रो आतंक विनाना, बाधा विनाना, उपद्रव विनाना होय छे भने पूर्वभवना पुण्यधी यावज्जीव सुखने ज भोगवे छे. ( २०८-९.) ते युगलिको छ प्रकारना होय छे, ते आ प्रमाणे. १ पद्मगंधी, २ मृगगंधी, ३ श्रममा, ४ सहा, ५ तेजस्तलिन अने ६ शनवारी (धीमे धीमे चालनारा).(२१०)श्रा बधा जातिवाचक शन्दो संज्ञाशन्दे करीने रूढ छे. जेम पूर्वे मनुष्यपणे एकाकारवाला छता पण श्रीजा आराना प्रोते श्री ऋपभदेवे उग्र, मोग, राजन्य अने क्षत्रिय-मेदवडे चार प्रकार पाड्या तेम प्रही पण छ प्रकारना तेभो स्वभावधी ज छे, एy श्री जीवामिग- मनी वृत्तिमा भने बबूद्वीपप्रज्ञप्तिनी वृत्तिमा कहेल छे. पंचांग ( भगवती ) ना बहा शवकना सावमा उद्देशामा तो पम समान गंधवाळा, मृगमद (कस्तुरी) समान गंधवाळा, ममकार विनाना, वेजवाळ तळ सेमज रूप होचाधी सेजस्तलिन, सहिष्णु एटले समर्थ, भने शनैः एटले मंदपणे-उत्सुकता रहित पणे चालनारा भा प्रमाणे पूर्व कहेला शन्दोना यथार्थ अर्थ कहेला छे. - .

१९मा। (१६९, श्रायुपःशेषषण्मास्यां बद्धाग्रिमभवायुपः । ते युग्ममेकं स्त्रीपुंस-रूपं प्रसुवते जनाः ।। ११ ।। अहोरात्रांस्तदैकोन-पंचाशतममी जनाः। रक्षति तावता तौ च स्यातां संप्राप्तयौवनौ ॥ १२ ॥ एपामेकोनपंचाश-दि- नावधि च पालने । केचिदेवं पूर्वशास्ने व्यवस्था कोविदा विदुः ॥ १३ ॥ तथाहि-सुप्तोत्तानशया लिहंति दिवसान् स्वांगुष्ठमार्यास्ततः को रिखंति पदैस्ततः कलगिरो यांति स्खलद्भिस्ततः । स्थेयोभिश्च ततः कलागण- भृतस्तारुण्यभोगोद्गताः सप्ताहेन ततो भवंति सुहगादानेऽपि योग्यास्ततः ॥ १४ ॥ अयं भानः-सप्ताहे प्रथमेंगुष्ठं लिहंत्युत्तानशायिनः । द्वितीये भुवि रिखंति व्यक्तवाचस्तृतीयके ॥ १५॥ पदैः स्खलद्भिर्गच्छंति चतुर्थे पंचमे पुनः । स्थिरैः पदेस्ते गच्छंति पठे सर्वकलाविदः ॥ १६ ॥ सप्ताहे सप्तमे प्राप्त-यौवनाः प्रभविष्णवः । स्युः स्त्रीभोगेऽपि केचिच सम्यक्त्वन- हणोचिताः ॥ १७॥ तथोक्तं जंवू०प्र० ० "केचिच्च सुदृगादानेऽपि सम्य. ए युगलिको ज्यारे छ मास आयुष्य वाकी रहे त्यारे भागला मानुं आयुष्प बांध छ भने एक युग्म (स्त्री-पुरुष) ने जन्म आपे छे. (२११) ते तखते ते युगलिको प्रमवेला युग्मने ४९ दिवस प्रतिपालना करे के एटला दिवसमा ते यौवन प्राप्त थयेला यह जाय छे. (२१२) श्रा प्रमाणे ४९ दियसनी प्रतिपालनामा केटलाफ युद्धिमानो पूर्पना शास्त्रमा पाप्रमाणे व्यवस्था पवावे छे.-अपम सात दिवस चत्ता सुता सता पोताना अंगुठाने चुस्पा करे छे, पछी पीजा सात दिवस पृथ्वीपर जरा जरा पग मांडे थे, श्रीजा सात दिवस काहक मधुरवाणीवडे पोले थे, पोथा सात दिवस काइक स्खलना पामता चाले छे, पांचमा सात दिवसमा सारी रीते स्थिर- साथी चालपा मांडे छे, छहा सात दिवसमा समस्त कळाना जाणनार पाय छ भने सातमा सात दिवसमा यौवनावस्था पामीने मोगसमर्थ यह जाप छ भने पछी केटला तो मम- कित प्रहणने योग्य थाय छे. मा प्रमाणे ४९ दिवसो पमार थाय छे. ( २१३.) मानी पछीना प्रण लोकमा पण मा व हकीकत कही छे (२१४ थी २१६. ) ते विपे श्री जंयू- द्वीपप्रशसिनी प्रतिमा क के के-केटलाक युगलिको सुक्ना मादानमा प्रवीत सम्यस्त्वना ग्रहणमा पण योग्यतावाळा चाप थे. मी सात मतक बीत्या पाद सम. कितनी योग्यता कही, परंतु प्रतापनाना विशेष परनी चिमा तो उत्कट स्थिति- पाळा मनुष्यो संषी पत्रमा 'दे धान भने पे प्रमानवाला कमा थे. ' तेमा (१७०) श्रीकालसोकप्रकाश। त्वग्रहणेऽपि योग्या भवतीति." एवं चात्र सप्तसप्तकव्यतिक्रमे सम्य- क्त्वयोग्यतोक्ता. प्रज्ञापनाविशेषपदवृत्तौ च उत्कृष्टस्थितिमनुष्यसूत्रे ' दो- नाणा दो अन्नाणा' इति उत्कृष्टस्थितिका मनुष्यास्निपल्योपमायुषस्तेषां तावद् अज्ञाने नियमेन, यदा पुनः पण्मासावशेषायुषो वैमानिकेषु बद्धा. युपस्तदा सम्यक्त्वलाभावे ज्ञाने लभ्येते, अवधिविभंगौ चासंख्येयवर्षायुषां न स्त इति. तत्रोत्सर्पिण्यामवतपिण्यां च प्रत्येकं पविधेऽपि कालविभागे सम्यक्त्वस्य श्रुतस्य च द्वयोरप्यनयोः प्रतिपत्तिः संभवतीति प्रतिपद्य- मानकस्संभवति, स च प्रतिपद्यमानकस्सुषमदुःपमादिषु देशन्यूनकोट्या- युश्शेष एव प्रतिपद्यते, नाधिकायुश्शेष इत्यावश्यकमलयगिरिवृत्तौ. तदत्र मतत्रये तत्त्वं सर्वविद्वेद्यमिति ज्ञेयं. असंख्यायुस्तिर्यतुतु जन्मतोऽपि सम्य- परवं संभवति, तथोक्तं षष्ठकर्मग्रंथवृत्तौ क्षायिकसम्यग्दृष्टिस्तिर्यक्षु न सं- ख्येयवर्षायुष्केषु मध्ये समुत्पद्यते. किं त्वसंख्येयवर्षायुष्केषु. सप्तावस्थाकालमान-मित्यादौ प्रथमारके । ततः कालक्रमात्किचि- संभवत्यधिकाधिकं ॥ १८ ॥ इदमर्थतो जंबूप्रज्ञप्तिवृत्ती. ततस्ते पितर- उत्कृष्ट स्थितिवाळा एटले त्रण पन्योपमना आयुष्यवाळा. तेमने ये अज्ञान अवश्य होय छे. परंतु ज्यारे छ मासतुं आयुष्य चाकी रहे अने वैमानिकर्नु भायुज्य बांधे त्यारे सम्यक्त्वनो लाम थयेलो होवाथी वे ज्ञान लभ्य थाय छे. अवधि के विमंग असंख्य वर्षना आयुष्यवाळा ( मनुष्य तिथंच ) ने होतुं नथी. तेमा अवसर्पिणी ने उत्सर्पिणीमा प्रत्येके छए पारामां सम्यक्त्व ने श्रुत ने सामायिकनी प्रतिपत्ति समवे छे एटले तेना प्रतिपद्यमान जीवो संमषे छे. ते प्रतिपद्यमानपणुं सुपमदुःपमादिमां वधारेमां वधारे देशेन्यून पूर्व कोटी आयु शेष रहे सते ज लम्प थाय छे. ते करतां पधारे आयुष्य बाकी रघु होय त्यारे संभवतु नथी, एम आवश्यकनी मलयगिरिकत वृचिमां को छे. श्रा प्रमाणे त्रण मत छे, वेनुं तव (सार) सर्वज्ञ जाणे. असंख्य वर्पना आयुवाळा तिर्यचौमा तो जन्मधी पण सम्यक्त्वनो संभव छे. ते संबंधी बहा कर्मथनी पृत्तिमा कडु के के क्षायि- कसमकिव दृष्टि संख्याता वर्षना प्रायुवाळा नियंचोमा उपजता नथी; परंतु असंख्याता वर्पना आयुवाळामा ज उपजे छे. सात अवस्थानुं काळमान सात सात दिवसर्नु उपर जे कधु थे ते पहेला भाराना 'प्रारममा समजबुं. त्यारपछी काळना क्रमथी ( प्रतिपालना वधे त्यारे ) काइक कहिक वषतुं वधतुं समज. ( २१७) मा प्रमाणे श्री जंबूद्वीपनी शचिमां कधुं छे. त्यार । मर्ग २९ मो। (१७१) स्तेषां युग्मिना पूरितायुषः । कासगँभादिभिर्मृत्वो-द्भवंति त्रिदशालये ॥ १९ ॥ एतद्भवायुपा तुल्या-युषो न्यूनायुषोऽथवा । ते देवाः स्युर्यु- ग्मिभवा-युष्कान्न त्वधिकायुषः ॥ २०॥ तियंचोऽपि तदा ताह-गुणा: कालानुभावतः । समापितायुपो यांति युग्मिनस्त्रिदशालयं ॥ २१ ॥ तिर्यतु युग्मिनश्च स्युः संज्ञिपक्षिचतुष्पदाः । तेषामेव ह्यसंख्यायु-टया स्वर्गतिनिश्चयात् ॥ २२ ॥ तथोक्तं-नरतिरि असंखजीवी सव्वे नियमेण जति देवेसु । इति. अन्येषां तु न युग्मित्वं नापि स्वर्गतिनिश्चयः । पूर्वकोटिप्रांतमायु-स्तेषामुत्कर्षतोऽपि यत् ॥ २३ ॥ गम्भभुअजलयरोभय- गम्भोरगपुवकोडि उक्कोसा । तथा-समुच्छिपणिदिथलखयरो-रंगभुभ- ग जिट्ठष्ठिइ कमसो । वाससहस्सा चुलसी विसत्तरि तिपन्न चायाला ॥१॥ इति वचनात् , पूर्वकोट्यायुप्काश्च न युग्मिनः संख्यातायुष्कत्वा- दिति · संभावयामः, किंच-संख्येयायुःपंचेंद्रियाणां नपुंसकत्वेनैव युगलित्वं दुःश्रद्धानं, नपुंसकत्वमप्येषां दुर्वारं 'गब्भनरतिरिआ. पछी युग्मीमोना मातापिता भायुष्य पूर्ण धये उघरस के पगासादिवडे मरण पामीने देव गतिमा उत्पम थाय छे. ते युगळिकपणाना आयुष्य समान अथवा तेथी भोछा आयुषे उत्पन्न पाय , तेथी पधारे आयुषे उत्पन थवा नथी. (२१८-१९) ते काळे तियेचो पण तेवा गुणवाळा (युगलिक) काळ स्वमावधी ज थाय छ भने तेसो पण मरण पामीने देवगविर्मा जाय छे. विर्यचोमा संझी एवा पक्षीमो अने चतुष्पदो युगलिक थाय थे. सेमो ज अमरूपात वर्षना मायुष्यवाळा होवाथी देवगतिमा जनारा निषपे होय छे. फयु के के-'मनुष्य ने विपंच सर्वे असंख्य वर्पना मायुवाळा अवश्य देवगतिमा ज जाप छे. ते मिवापना पीजा नियंचो युगलिक होता नपी अने तेमनी स्वर्गे जवानो निश्य पण होनो नपी केमके तेमनुं उत्कृष्टथी पण पूर्व कोटीनु ज मापुष्य होय छे. (२०-२२) गर्मज मुजपरिसर्प, गर्मज उरपरिसर्प ने बने प्रकारमा जळचरो (समूमि ने गर्मज) पूर्वकोटीना उलए मायन्यवाळा होय छे. तथा संमहिम नियंच पंचाद्रप पचर, खेचर, उरपरि नै अन्नप- रिली वत्कृष्ट स्पिति अनुक्रमे ८४००७-७२०००-५३० ००० ने ४२००० वर्पनी होय छे. भावपनधी पूर्व कोटी सुधीना मायुप्पामा युगलिक होता नधी कारण के मनुं मापुष्प संख्या के माप्रमाणे भी गमावना करीए छाए. पळी मरूपावामापुष्पवाळा पंद्वियोमा नपुंमकपणुं पप संमये थे. तेथी तेमनामा युगलिकपणुं पटीशकतुं नी भने मानपुंसक . (१७२) भीकाललोकप्रकाश। संखाउया तिवेवा' इति वचनात्. कालसप्ततिकायां तु-अवि सम्वजीव- जुअला निअसमहीणा सुरगई तह य । थोक्कसाया नवरं सवारयथ- लयराउमिणं॥ १॥ मणुयाउसमगयाई चउरंसहयादजाय अठंसा ।गोम- हिसुट्टखराइ पणंस साणाइ दसमंसा ॥२॥ उरभुअग पुवकोडि- पलियासखंस खयरपढमारे । इत्युक्तं, तदत्र तत्वं बहुश्रुतगम्यं. भूतानां नास्ति संस्कारो युग्मिनामन्यभावतः । ततस्तेषां शरी- राणि तदासन्नवनस्थिताः ॥ २४ ॥ भारंडायाः पक्षिणो द्राग् जगत्स्वा- भाव्यतस्तथा । नीडकाष्ठवदादाय प्रक्षिपत्यर्णवादिषु ॥ २५ ॥ तदुक्तं श्रीहैमऋषभचरित्रे-पुरा हि मृतमिथुन-शरीराणि महाखगाः । नीड- काष्ठमिवोत्पाव्य सद्यश्चितिपुरम्बुधौ ॥ २६ ॥ अत्रांबुधेरुपलक्षणत्वायथा- योगं गंगाप्रभृतिनदीष्वपीति ज्ञेयं. ननूरकर्षादपि धनुःपृथक्त्वांगैः पत: त्रिभिः । तेषां त्रिकोशमानानां वहनं संभवेत्कथं ॥ २७ ॥ अत्रोच्यते- खगांगमाने यत्प्रोक्तं पृथक्त्वं धनुषां श्रुते । तत्रैकवचनं जातौ यथा वीहिः पणुं दुरि छे. कयु छ के- गर्मज मनुष्य ने तिर्यचो संख्याता आयुवाळा त्रणे वेदवाळा होय छे.' काळसप्ततिकामां कहुं छे के- सर्व युगलिक जीवो पोतानी सरखा अथवा ओछा मायुष्यवाळा देव थाय थे. ते अल्पकषायी होय छे. सर्व आरामा थळचरोनुं आयुष्य या प्रमाणे होय थे. मनुयना श्रायु समान (सर) आयुष्य हाथी होय छे. घोडा चोथा भागना, पकरा पाठमा भागना, गाय, मेश, उंट ने गधेडा पांचमा अंशना भने श्वान दशमा भागना आयुवाळा होय छे. उरपरि ने भुजपरिनुं क्रोड पूर्वनुं भने खेचरनुं पन्योपमना असंख्याता भागर्नु भायु पहेले भारे होय छे. भा पावतमा खरो खुलासो बहुश्रुतगम्य छे. मरण पामेल युगलिकना शरीरनो अग्निनो अभाव होबाथी संस्कार करवामां भा- चतो नथी; तेमना शरीरो तेनी नजीक वनमा रहेला मारंड विगेरे पक्षीनो तरत ज जगत् स्वभावे माळाना काठनी जेम उपाडीने समुद्रादिकमा नांखी दे छे. श्रीहेमचंद्राचार्यकृत अपमचरित्रमा कमु छ के-'पूर्वे मृतमिधुनना शरीरोने महान् शरीरवाळा पक्षीमो माळाना काष्ठनी जेम उपाडीने तत्काळ समुद्रमा नांखी देवा हवा.' ही समुद्रना उप- लक्षणथी गंगा विगेरे महा नदीमोमा पण नाखे छ एम समज. अहीं शिष्य प्रश्न करे उत्कृष्ट पण धनुष्य पृथक्त्वना शरीरवाळा पक्षीमो प्रण गाउना प्रमाण वाळा पुगलिक शरीरने शीरीते उपाडी शके ?' तैनो उत्तर प्रापे छ के-खेपर (पक्षी) ना शरीरना मानमा जे धनुष्य पृथक्त्व शास्त्रमा कहेल के ते जाविमा एकवचन छ के- सर्ग २९ मो। (१७३) सुभिक्षकृत् ॥ २८ ॥ ततो धनुःपृथक्त्वानां बहुत्वमपि संभवेत् । विहं- गाना देहमानं तादृक्कालाद्यपेक्षया ॥ २६ ॥ ततश्च-भूयोधनुःपृथक्त्वांगै- नरहस्त्याद्यपेक्षया । सुवहानि तदंगानि खगराधारकादिषु ॥ ३०॥ एवं च सूत्रे एकवचननिर्देशेऽपि बहुवचनव्याख्यानं श्रीमलयगिरिपादैरपि श्रीबृहत्संग्रहणीवृत्तौ-दसवाससहस्साई समयाइ जाव सागरं जणं । दिव- समुहुत्तपुहुत्ता श्राहारुस्सास सेसाणं ॥१॥ इत्यस्या गाथाया व्याख्याने कृतमस्तीति सर्वं सुस्थमित्याद्यधिकमुपाध्यायश्रीशांतिचंद्रीयजंबू० प्र० वृ० यद्वा-भारंडपक्षिणां लोक-ख्यातेभोद्वहनादिवत् । तेषां खगानां तद्युग्मि-देहोद्वहनसंभवः ॥ ३१ ॥ एवं स्वरूपमुक्तं य-प्रथमं प्रथमारके । क्रमात्ततो हीयमान-मवसेयं समज. जेम शाळ सुमित ( सुकाळ ) करे छेएम कहेल छे तेनी जेम एटले धनुष्य पृथक्त्व कद्देवाधी घणा धनुष्य पृथक्त्व पण ते काळना पदीयोना शरीरना मानने माटे सम- जवा, तेथी घणा धनुष्यवाळा शरीरथी पहेला धारा विगैरेमा मनुष्य ने हस्तिविगेरेना शरीर सारी रीते उपाडी शकाय एम समजवू. आ रीते सूत्रमा एकवचनना निर्देशमा बहुवचननुं व्याख्यान श्रीमलयगिरि महाराजे पण श्रीवृहत्संग्रहणीनी पत्तिमां कहेल छे. ते गाथा या प्रमाणे- दसवाससहस्साई, समयाइ जाप सागरं ऊणं । दिवसमुहुत्तपुहुत्ता, आहारुस्साससेसाणं ॥ मा गाथानी व्याख्यामा उपर जणाच्या प्रमाणे घणा पृथकत्व एवो अर्थ करेल छे. एटले शाहकी जनुं समरपाल परापर १३ शके छे इत्यादि जसप्रतिनी उपापाय श्रीशांतिचंद्रगणि कृत वृत्तिमा पण कयुं छे. अथवा- भारंपक्षिणां लोक-ख्यातेमोहनादिवत् । तेषां ग्वगानां तयुग्मि-देहोद्वहनसंभयः ।। भारंड पधीओ पोतानी पखि विगेरेपी सात हाथीमोने उपाडे छे ए यात ओम लोक- प्रसिद्ध थे तेनी जेम प्रथम भाराना पचीमोनुं ते पुग्मिना देहने उपाडीने वहन करवान पण संमये थे. (२३१) पहेला माराना प्रारममा जे स्वरूप होय छे से ममे उपर पनावलं थे, त्यापली कमे क्रमे प्रतिषण हीयमान (परतुं घटतुं) ममजयं. पर्य, गंध, रस. सर्श. संस्थान. उच्चत्व, .

(१७४) भीकालसोकप्रकाश प्रतिक्षणं ॥ ३२ ॥ वर्णगंधरसस्पर्श-संस्थानोच्चत्वपर्यवैः । तथा संहनना- युष्क-बलवीर्यादिपर्यवैः ॥३३॥ अनंतगुणहान्यानुसमयं हीयमानकैः । संपूर्णाः स्युः सागराणां चतस्र: कोटिकोटयः ।। ३४ ॥ गुणशब्दश्चात्र भाग-पर्यायस्तेन हीयते । अंनतभागहान्यैव वर्णादिः पर्यवव्रजः॥ ३५॥ इस्थमेवानुयोगद्वारवृत्तौ एकगुणकालकविचारे स्पष्टमाख्यातं. अनंतगुणा- नां हानि-रेवं तत्पुरुषोऽत्र सः। न त्वनंतगुणा हानि-रित्येवं कर्मधा- रयः ॥ ३६ ॥ अन स इति समासो वैयाकरणरूढेः, पदैकदेशे पद. समुदायोपचाराद्वेति. अनंतगुणज्ञानिभावना चैवं-आद्यारकाद्यसमये वर्तते यो द्रुमादिषु । सर्वोत्कृष्टः शुक्लवर्णः केवलिप्रज्ञयास्य च ॥ ३७ ॥ छिद्यमानस्य भागाः स्यु-निविभागा अनंतशः । एते सर्वजीवराशेः स्युरनंतगुणाधिकाः ॥३८॥ तेषां मध्याद्राशिरेको-ऽनंतभागात्मक- टेत् । द्वितीये समये चैवं तृतीयादिक्षणेष्वपि ॥ ३९ ॥ इत्येवम- वसर्पिण्याः सर्वोत्यसमयावधि । तत्र चायं निकृष्टः स्या-त्ताह- कालानुभावतः ॥ ४० ॥ उत्सर्पिण्यायसमये-ऽप्येवरूपो भवत्ययं । ततो संहनन, आयु तथा वळ वीर्य विगेरे पर्यवो वडे करीने अनंतगुण हानिए समये समये हीयमान थां चार कोटाकोटी सागरोपमनो पहेलो पारो पूर्ण थाय छे. अहीं श्लोकर्मा अनंतगुण शन्द कहेल छे तेमां गुण शन्दे मागपर्याय समजतो. एटले वर्णादि पर्यवोनो समूह अनंतमागहानिए घटतो जाय छे. (२३२ थी २३५) आज हकीकत श्री अनुयोगद्वार सूत्रनी वृत्तिमा एक गुण काळा विगेरेना विचारमा स्पष्टपणे कहेल . अनंतगुणोनी हानि एवो तत्पुरुष समास नहीं करवो; अनंतगुणी हानि एवो कर्मधारय समास न करवो. भहीं स एटले समास वैयाकरणनी रूढिथी अथवा 'पदैकदेशे पदसमुदायोपचारात्' अर्थात् पदना एक देशी पदना समुदायनो उपचार करवो एम समजबु. अनंतगुणहानिनी भावना या प्रमाणे-पहेला पाराना पहेला समये पक्षादिकने विषे जे सर्वोत्कृष्ट शुक्लवर्ण होय छे के जेना केवळीनी प्रज्ञाथी विद्यमान कर्या सता अनंता निर्वि- भाग एवा मागो थाय छ के जे सर्व जीवराशिथी अनंतगुणा होय छे. तेमाथी एक राशि अनंत- मागरूप चीजे समये त्रुटे (घटे-श्रोछी थाय), त्रीजा विगेरे समयोमा पण ए प्रमाणे समजपुं. ए प्रमाणे अवसर्पिणीना सर्वात्य समय सुघी समजवू एटले नेया प्रकारना काळना अनु- मावथी छेन्ने समये तद्दन निकष्ट होय छे. उत्सविणीना आद्य समये एवा ज रूपना निकट सर्ग १९ मो। (१७५) द्वितीयसमये यथाहानि विवर्द्धते ॥४१॥ अनंतगुणवृद्ध्यैवं वर्द्धमानः क्षणे क्षणे । उत्सपिण्यंत्यसमये सर्वोत्कृष्टः स जायते ॥ १२ ॥ नन्वेवं शुक्लवर्णस्य मूलोच्छेदःप्रसज्यते। प्रत्यक्षवाधितं तच्च जात्यादौ शौक्ल्य दर्शनात् ॥ ४३ ॥ अत्रोच्यतेऽनंतकस्या-नंतभेदाः स्मृतास्ततः । प्रक्षीयमाणपर्यायां-शानामल्पमनंतकं ॥४४॥ मूलपर्यायांशराशे-स्त्वनंतकं महत्तमं । ततोऽनुसमयेऽनंत-हान्याप्युच्छिद्यते न नत् ॥४५॥ यदि भव्येषु सिध्यत्सु संसारेऽस्मिन् प्रतिक्षणं । अनंतेनापि कालेन भव्योच्छेदो न जायते ॥ ४६॥ तदैयां सर्वजीवेभ्यो-ऽनंतघ्नानां कथं भवेत् । उत्कृष्टव- णभागाना-मुच्छेदोऽसंख्यकालतः ॥ ४७ ।। ननु भव्यास्तु संख्येया एवं सिद्धयंत्यनुक्षणं । एते स्वनंता हीयते तत्साम्यमनयोः कथं ॥ १८ ॥ सत्यं यद्यपि संख्येया भव्याः सिध्यंत्यनुक्षणं । तथापि तसिद्धिकालो- ऽनंतकालात्मको भवेत् ॥ १९॥ हीयतेऽनुचणं वर्णी-शास्तु यद्यप्य- भाव होय छे. त्यारपछी गांजे समये-प्रथम जेम हानि थइ हती तेम क्षणे घणे अनंतगुण- वृद्धिवडे वधे छे, एटले उमर्पिणीना अंत्य समये सर्वोत्कृष्ट माव उत्पन थाय के ( २३४ धी २४०) (अहीं पण अनंतमागधद्धि समजवी.) अही शिष्य शंका करे छे के-" ए प्रमाणे समये समये हानि थवाथी सो शुक्रवर्णनो भूळथी उच्छेद थइ नशे, भने नेम कहेवाथी जाति विगेरेमा शुक्रपणुं जोवामां भावतुं होगाथी प्रत्यक्ष पाधा भावशे" तेने उत्तर मापे के के-"शास्त्रमा अनंतना भ- नंत भेद कहेला छे तेथी चीयमान पर्यायना अशो- अनंतक नानु छ भने मूळ पर्यायमा रहेल अंशराशीनुं अनंतक मोटुं छे; तेथी प्रत्येक समये मनताशनी हानि थता छता पण तेनो सर्वथा उच्छेद थतो नथी । तेनी उपर दृष्टांत कहे छ के-'आ संसा. रमाधी प्रत्येक क्षणे भन्यजीवो सिद्धावस्था पामे छे छतां अनंतकाळे पण भन्यजीवोनो उच्छेद ( समाप्ति ) यतो नयी चो मा पर्यवांश तो सर्म जीवो करता अनंतगुणा छ तेनो पटले उत्तर वर्णविमागोनो उच्छेद असंख्य काळे केम थाय ? न ज थाप. (४७) पळी शिष्य बीजो प्रश्न करे के के-'भन्यो तो प्रत्येक पणे संख्यावा सिद्धावस्था पामे के भने मामाथी तो ममये समये अनंता पर्यवोनी हानि यार थे वो तमे कयु ठे रात केम पटी शके १ 'एने उधर मापे छ के-'तारं कहे, साचं थे जो के मम्पो । (१७६) श्रीकालोकप्रकाश। नंतशः । तथापि कालोऽत्रैकाव-सर्पिण्यात्मक एव हि ॥ ५० ॥ तदाष्टा- तिकदृष्टांत-वैषम्यं चिंत्यमत्र ना एवं पीतादिवर्णेषु गंधादिष्वपि भावना ॥ ५१ ॥ एवं च द्रव्याणामानंत्यात्प्रतिद्रव्यमेकैकांशहानिरिति यत्केवि- दनंतगुणहानि समर्थयति तदपास्तं द्रष्टव्यं. ननूक्ता क्षीयमाणा ये देहोच्चत्वस्य पर्यवाः । एकद्वयादिखतरा- वगाहन्यूनतात्मकाः ॥ ५२ ॥ असंख्या एव ते यस्मा-विक्रोशवपुपापि हि । वगाह्यते खप्रतरा असंख्या एव नाधिकाः ॥ ५३ ॥ अनं. तगुणहानिस्त-त्कथमेतेषु संभवेत् । अत्र ब्रूमः समाधानं यदि शुश्रू- प्यते त्वया ॥ ५४॥ देहस्थानां खप्रतरा-वगाहकारिणामिह । पुद्गला- नामनंतानां हानि यात्र धीधनैः ॥ ५५ ॥ तथोक्तं जंवृद्वीपप्रज्ञ. तिवृत्तौ-प्रथमारके प्रथमसमयोत्पन्नानामुत्कृष्टं शरीरोच्चत्वं भवति, ततो द्वितीयादिसमयोत्पन्नानां यावतामेकनभःप्रतरावगाहित्वलक्षणपर्यवाणां प्रत्येक क्षणे संख्याता ज सिद्धिपदने पामे थे परंतु तेनो सिद्धिगमनकाळ अनंतो को छे. प्रने प्रत्येक क्षणे वर्णविभागो अनंता घटे छ तथापि भहीं एक अवसर्पिणीरूप काळ कयो छे ते असंख्य समयात्मक ज छे, तेथी तारे दृष्टांत ने दष्टांतिकनी विषमता छ एम न समजवु' शुक्लवर्ण प्रमाणे पीतादिवर्ण माटे तेम ज गंधादि माटे पण भावना करवी ( २४८ थी ५१) प्रा प्रमाणे कहेवावडे द्रव्योर्नु अनंतपणुं होवाथी प्रत्येक द्रव्यमा एकेक अंशनी हानि थाय छे एम मानीने केटलाक अनंतगुणहानिनी समर्थना करे के वेना मतने अपास्त कर्यो के एम समजवू. शिष्य प्रश्न करे छे के-देह उच्चत्वना पर्यवो एक ये विगेरे पाकाश प्रतररूप अव- गाहनामा न्यून थवापणुं समये समये कहेल के वो ते न्यून थनारा प्रतरो असंख्य ज के कारण के प्रण गाउना शरीरमा पण आकाश प्रतरो भसंख्य ज होय छे वधारे होता नयी. तो तेमा अनंतगुणहानि शीरीते समवे ? एना समाधानमा कहे छ के-( दरेक ) भाकाश प्रतरमा भवगाहना करीने रहेला देहमा भनेता पुद्गळो होय , तेथी पुद्धि- मानीए सेमांना अनंता पुद्गळोनी हानि समजवी (भाखा प्रतरनी समवी नहीं. ते विपे श्री नंदीपप्रज्ञप्सिनी चिमा कडूं के के-पहेला भारामा प्रथम समय उत्पन्न युगलिकना शरीरk ज उत्कृष्ट उद्यत्व होय छे. त्यार पछी पीजे समये उत्पम थयेलाना शरीरनी सर्ग २९ मो। (१७७) हानिस्तावत्पुद्गलानंतकं हीयमानं द्रष्टव्यं. अाधारहानावाधेयहानेरावश्य- कत्वादिति, तेनोच्चत्वपर्यायाणामनंतत्वं सिद्धं, नभःप्रतरावगाहस्य पुद्गलो- पचयसाध्यत्वादिति. पर्याया आयुपोऽप्येक-यादिक्षणोनतात्मकाः। असंख्येया एव तेऽपि स्युखिपल्यायुपोऽपि हि ॥५४॥ किं त्वेकादिक्षणोनेपु स्थितिस्थानेषु तेनि. ह। प्रत्येकं तद्धेतुकर्म-प्रदेशाः स्युरनंतशः ॥ ५५ ॥ तेप्यायुःपर्यवा एव हेतौ कार्योपचारतः। एवं भाव्यायुषोऽनंतगुणहानिः प्रतिक्षणं ।। ५६ ॥ श्रत एवं श्रीजंबूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रेऽभिहितं-' अणंतेहिं उच्चत्तपज्जवेहिं श्रण- तेहिं पाउअपज्जवेहि अणंतगुणपरिहाणीए परिहायमाणे २ ' इति. एवं चाद्यारकस्यादौ त्रिकोशप्रमितं वपुः । त्रिपल्यप्रमितं चायु-युग्मिनां प्राग् यदीरितं ॥ ५७ ॥ तद्वीयमानं क्रमेणा-द्यारकांते तु युग्मिनां । स्याद् द्विकोशोच्चमंग द्वि-पल्यमानं च जीवितं ॥ ५८ ॥ एवं दशस्वपि क्षेत्रे-वरके प्रथमे गते । द्वैतीयीकोऽरकस्तेषु सुष- उचाइमां एक आकाशप्रदेशावगाही प्रतरमा अनंता पर्यवो छे. तेमाथी अनंना मागरूप अनंता पर्यवोनी हानि समजवी. एम प्रत्येक समय माटे समज. साधारनी हानिमा श्राधेयनी हानि आवश्यक ज छे, तेथी उच्चत्व पर्यायर्नु अनंतत्व सिद्ध थाय के कारण के ते भाकाशप्रवररूप अवगाहना पुद्गळोना उपचयथी साध्य छे. इति' आयुष्यमा पण एक ये समयऊणा असंख्य पर्यायो त्रण पन्योपमना आयुष्यमा होय के एटले ते पण पणे क्षणे ऊन थाय छे, एटलुंज नहीं पण एकादिक्षण ऊन स्थिति- स्थानने विप पण तेना हेतुरूप कर्मप्रदेशो अनंता होय छे तेने पण कारणमा कार्यनो उपचार करीने मायुना पर्यवो ममजवा. ए रीते आयुष्यमा पण प्रतिक्षणे अनंतगुणहानि समजी लेवी. (२५६) या कारणने अनुमरीने ज श्री जंयूद्वीपप्रज्ञप्ति सूत्रमा कह्यु के के अनंता उचत्व पर्यायो बडे अने अनंता आयु संबंधी पर्यायो वडे अनंतगुणहानिए हीन थतो जाय छे.' या प्रमाणे पदेला पाराना प्रारंभमा त्रण गाउनुं शरीर अने प्रण पन्योपमर्नु मायुष्य जे पूर्व कहेल छे ते अनुक्रमे ममय समय हानि यतां पहेला पाराना अंते युग्मि- मोनू शरीर चे गाउ उंचुं अने भायु पे पत्योपमर्नु होय छ एम समजबूं. ( २५% ) मा प्रमाणे पांच मरत ने पांच भैरवतरूप दशे क्षेत्रोमा पहेलो भारो पूरो यये बीजो (१७८) श्रीकाललोकप्रकाश माख्यः प्रवर्त्तते ॥ ५९॥ तस्मिन् कालेऽपि मनुजाः पूर्ववद्युग्मिनोऽथ ते। अनंतगुणहीनाः स्युः पूर्वेभ्यो गुणलक्षणैः ॥ ६० ॥ पृथ्वीपुष्पफलाहारा- स्तेऽहोरात्रद्वयांतरे । कांक्षति पुनराहारं बदरीफलमात्रकं ॥ ६१ ॥ चतु- प्पष्टिं दिनान्यते कुर्वतेऽपत्यपालनं । अवस्थाः प्राग्वदत्रापि भाव्याः सप्त यथाक्रमं ॥ ६२ ॥ चतुष्पष्टिरहोरात्रा हियंते यदि सप्तभिः । एकै- कस्या अवस्थाया-स्तदा कालो भवत्ययं ॥ ६३ ॥ दिनानि नव घट्योऽष्टौ चतुस्त्रिंशत्पलानि च । अक्षराणि सप्तदश किंचित्लमधिकानि च ॥ ६४॥ यत्पूर्वेभ्योऽधिकोऽपत्य-पालने काल ईरितः । तदुत्थानवलादीना-मनंत- गुणहानितः ॥६५॥ पूर्वकालापेक्षयात्र भूयसाऽनेहसा भवेत् । बालानां व्यक्तता भाव्य-मेवमग्रेऽपि धीधनैः ॥ ६६ ॥ पूर्वोक्तषट्प्रकारास्तु भवंत्यत्र न मानवाः । ताहकालानुभावेन वक्ष्यमाणा भवंति च ॥ ६७॥ एकोः प्रचुरजंघाश्चै कुसुमाख्यास्तदा भुवि । तथा सुशमनों एव मनुष्याः स्युश्चतुर्विधाः ॥ ६८ ॥ रूढाः शब्दा अमी प्राग्वत् जनानां जातिवा. सुषमा नामे आरोप्रवर्ते छे. (२५९) ते काळे पण पहेला भारानी जेम मनुष्यो युग्मिज होय छ, परंतु प्रथम पाराना युग्मियो करता गुणलक्षणादिवडे अनंतगुणहीन होय छे. (२६०) पृथ्वीना ने कल्पवृक्षनां पुष्पफळना श्राहारनी इच्छा ते युग्मिमोने ये दिवसने भोवरे थाय छ भने बोरडीना फळ जेटलो आहार होय छे. तेभो अपत्यपालन ६४ दिवस पर्यत करे छे. तेमां पण पूर्व प्रमाणे ज सात अवस्था अनुक्रमे समजवी. ६४ दिवसोने सातवडे मांगीए तो एकेक अवस्था माटे नव दिवस, आठ घडी, ३४ पळ ने १७ अक्षर साझेरा भावे. प्रथम भारा करता ही जे अपत्यपालना १५ दिवसनी वधारे कही ते उत्थानना चळादिकनी अनंतगुण हानि थती होवाथी समजवी. पूर्वकाळनी अपेक्षाए नहीं घणा काळे पाळकोनी व्यक्तता थाय छे. ते प्रमाणे बुद्धिमानीए भागळ पण पाळकोनी व्यक्तवा समजवी. (२६१-२६६) भा पारामां मनुष्यो प्रथम कद्या प्रमाणे छ प्रकारना न समजवा, परंतु काळानुभावथी आ प्रमाणे चार प्रकारना समजवा. एका १, प्रचुरजंघा २, कुसुमा अने सुशमना ४-प्रा शन्दो पण पूर्वनी जेम रूढ के अने मनुष्योना जातिवाचक छे. तेना अन्वर्थना जिज्ञासुए वे शन्दोना अर्थ अनुक्रमे मा प्रमाणे समजवा. एका सर्ग १९ मो। (१७९) चकाः । अन्वर्थजिज्ञासायां तु सोऽपि भाव्यः क्रमादिति ॥ ६९॥ एकाः श्रेष्ठाः पुष्टजंघ-तया प्रचुरजंघकाः । कुसुमाः पुष्पमृदवः सम्यक् शांतियु- जोतिमाः॥ ७० ॥ भूमेः स्वरूपं यत्प्रोक्तं वनवृक्षाद्यलंकृतं । दशानां स्वर्द्वमाणां च प्रथमं प्रथमारके ॥ ७१ ॥ अविच्छिन्नं तदत्रापि निःशेष- मनुवर्तते । किंचानंतगुणन्यूनं वर्णगंधादिपर्यवैः ॥ ७२ ॥ अनंतगुण- हानिः स्या-दारभ्य प्रथमक्षणात् । वर्णायुरुच्चतादीनां प्राग्वदत्राप्यनु. क्षणं ॥ ७३ ॥ अत्रादौ युग्मिनां देहो भवेत्कोशद्वयोच्छूिनः । पल्योपम- द्वयं चायुः प्रहीयेते च ते क्रमात् ।। ७४ ॥ ततोते क्रोशमानं स्या-द्वपुः पल्यं च जीवितं । एतावदेव प्रथमं तृतीयेऽप्यरके भवेत् ।। ७५ ॥ द्वि- तीयस्यारकस्यादौ विभ्रते भृशमुच्छ्रिताः। श्रष्टाविंशतियुक्पृष्ठकरंडकशतं जनाः ॥ ७६ ॥ देहदासक्रमेणेषां क्रमात् हानिर्भवेचतः। स्युर्यावंत्यरक स्यादौ पर्यते स्यात्तदर्द्धकं ॥ ७७ ॥ एवं द्वितीयेऽप्यरके क्रमासंपूर्णतां गते । अरस्तृतीयः सुपम-दुःप. माख्यः प्रवर्तते ॥ ७८ ॥ अब्धिकोटाकोटियुग्मं तस्य मानं यदीरितं । एटले श्रेष्ठ, प्रचुरजंघा एटले पुष्ट जंघावाळा, कुसुमा एटले पुष्पनी जेवा कोमळ भने सुशमना एटले सम्पप्रकारनी शांतियुक्त. (२६७-२७० ) भूमिर्नु स्वरूप जे पूर्व गाद धादियी अलंकृत कडुं छे ते, तेम ज दश प्रकारना कल्पवृक्षोनुं स्वरूप जे कडं थे ते अविच्छिमपणे आ पारामां पण समजबू; परंतु वर्णगंधादि पर्यवोपडे अनंतगुणन्यून जाण. या बीजा पाराना प्रथम समयथी प्रथमनी जेम प्रतिममये वर्ण, थायु, उचना विगैरेमा अनंतगुणहानि समजबी. आ पाराना प्रारंममा युग्मिन वायु पन्योपमनु ने शरीरनी उंचाइ ये गाउनी होय छे, ते अनुक्रमे घटती घटती पीजा भाराने अंते एक पल्योपमनी स्थिति (मायु) भने एक गाउनी शरीरानी उंचाइ रहेछ भने तेज प्रमाये जा पाराना प्रारममा प्रथम तणे होय छे. चीना भाराना प्रारंभमा देहनी उंचाइ घणी होवाथी पृष्ठकरंडक (पासळीमी) १२८ होय छ, ते देहना हामनी साधे घटती घटनी पीना भाराने अंते ने ग्रीना भारसना प्रारंममा यी मधी (६४) रहे थे. (२७१-२७७) मा प्रमाणे पीजो मारो प्रण कोटाकोटी गरोपमनो व्यनीत थपे मत प्रीमो मारो सुपमदुःपमा नामनो प्रवते थे. तेनुं प्रमाण पे कोटाकोटी सागरोपमर्नु कहे थे. सेना (१८०) भीकाललोकप्रकारा। क्रियतेंशास्त्रयस्तस्य प्रथमो मध्यमोंतिमः ॥ ७९ ॥ एकैकस्य विभा. गस्य मानमेवं भवेदिह । षट्यष्टिकोटिलक्षाणि तावत्कोटिसहस्रकाः॥८॥ षट् शतानि च कोटीनां पट्पष्टिः कोटयोऽपि च । लक्षाः षट्पष्टिरब्धीनां पट्यष्टिश्च सहस्रकाः ॥ ८१॥ षट्शती च सपट्पष्टि-ौ तृतीयलवौ तथा । एकस्य वाढेरित्येवं भाव्यं गणितकोविदैः ॥ ८२ ॥ ६६६६६६६६६६६६६६६६-३ इत्यंकस्थापना. तृतीयभागयोरस्या-रकस्या- यद्वितीययोः । कल्पवृक्षादिकं सर्व पूर्वोक्तमनुवर्तते ॥ ८३ ॥ एकक्रोशो- च्छ्रिता श्रादा-वेकपल्योपमायुषः। जनाश्चतुःपष्टिपृष्ठ-करंडकयुतांगकाः ॥ ८४ ।। अहोरात्रानिहैकोना-शीति रक्षंति तेंगजान् । अवस्थाः प्राग्व- दत्रापि सप्त तन्मानमुच्यते ॥ ८५॥ युग्मं ॥ एकादश दिनाः सप्त- दश घट्यः पलाष्टकं । चतुस्त्रिंशदक्षराणि किंचित्समधिकानि च ॥ ८६ ॥ श्राद्यसंहननाः प्राग्व-दाद्यसंस्थानशालिनः । कासजृभादिभिर्मृत्वै- तेऽपि यांति ध्रुवं दिवं ॥ ८७॥ तृतीयेऽस्य त्रिभागे तु समतिकामति क्रमात् । पोढा संहननानि स्युः संस्थानान्यपि देहिनां ॥ ८८ ॥ धनुःशतानि भूयांसि प्रथमं तूच्छ्रिता त्रण भाग करवा. १ प्रथम २ मध्यम ने ३ अंतिम. ते एकेक विभागनुं प्रमाण ६६ क्रोड, ६६ लाख, ६६ हजार ने ६६६ एटला क्रोड, ६६ लाख, ६६ हजार बसो ने छासठ शने ३ माग एटलं थाय छे. एम गणितशास्त्रना जाणनारामो कहे छे. तेनी थंक स्थापना आ प्रमाणे ६६६६६६६६६६६६६६६६३ समजवी. या वाराना प्रथमना चे भागमा कल्प- शादि सर्व पूर्वे कह्या प्रमाणे होय छे. ( २७८-२८३) श्रा श्रीजा पाराना प्रारममा एक गाउना शरीरवाळा ने एक पन्योपमना आयुष्य. चाळा युग्मियो होय छे अने (६४) पृष्ठकरंडकबाळा होय छे. बाळकोर्नु ७९ दिवस प्रतिपालन कर छे. तेनी अवस्था नहीं पण पूर्वे कशा प्रमाणे सात प्रकारनी होय छे. ७९ विवसना सात भाग करीए तो एकके अवस्था प्रमाण ११ दिवस, १७ घडी, ८ पळ, ने ३४ अक्षरथी कांइक अधिक आवे छे. ते युग्मियो प्रथमनी जेम पहेला संघयणवाळा, पहेला संस्थानचाळा भने कास के पगासावडे मृत्यु पामनारा तेम ज स्वर्गे जनारा होय छे. (२८४-८७) साभारानो छेलो त्रीजी भाग शरु पाय त्यारयी अनुक्रमे ते पधी पापतोमा पणो पटाडो थाय छे. संहननो छए प्रकारना होय छे भने संस्थानो पण छए प्रभारना होय छे. ते श्रीजा सर्ग २९ मो। (१८१) जनाः । असंख्याब्दसहस्रायु-भृतः स्वर्गतिगामिनः ॥ ८९॥ कालक्रमेण पर्यंते हीयमानोच्छ्यायुषः । अल्पांतराशनाः प्रेम-रागद्वेषस्मयाधिकाः ॥९० ॥ प्राक्तनापेक्षया भूरि-कालपालितबालकाः । यथाई यांति गतिषु चतसृष्वपि ते मृताः ॥९१ ॥ संख्येयाव्दसहस्राणि जघन्य चायुरंगिनां । उत्कृष्टमत्रासंख्याब्द-सहस्रप्रमितं मतं ।। ९२॥ आयुर्वेहो- च्छ्रयाहारां-तरस्य प्राग यथाभवत् । नियता हानिरत्रांशे चैपा न निय- ता तथा ॥ ९३ ॥ यथात्रारकयोराद्य-द्वितीययोः क्रमात् इसेत् । कोशो दिनं च पल्यं चोच्छ्रयाहारांतरायुषां ॥ ९४ ॥ द्वयोस्त्रिभागयोस्तद्व-द्धी- यते तच्छनैः शनेः । तृतीये तु त्रिभागेस्मि-न्न नेयत्येन हीयते ॥ ९५ ॥ इदमेवारकस्यास्य व्यंशकृप्तौ प्रयोजनं । पूर्वैः संभावितं भाग-श्चायमस्य पृथक् ततः ॥ ९६ ॥ कल्पवृक्षा अपि तदा स्युः क्रमाद् दृढमुष्टयः । लोभार्ता इव मूर्खाणां वाव विरसा क्षितिः ॥९७॥ ततस्ते सततं वृक्ष- फलौषध्यादिभोजिनः। तत्संग्रहममत्वाभि-निविष्टा विविदंत्यपि ॥९८॥ भागना प्रारंभमा घणा सेंकडो धनुष्यप्रमाण शरीर ने असंख्य हजार वर्षोनुं आयुष्य होय छ, तेमज मरण पामीने स्वर्गे जाय छ काळक्रमे घटती घटती शरीरनी उंचाइ ने आयुवाळा होय छ, अन्प अंतरे अशननी इच्छावाळा होय छे अने प्रेम, राग, द्वेष तथा गर्व पधारे थता जाय छे. प्राक्तननी अपेक्षाए घणा बखत सुधी पाळकोने पाळनारा होय छे भने मरण पामीने यथायोग्य चारे गतिमा जाय छे. जघन्य आयुष्प संख्याता हजार वर्षतुं अने उत्कृष्टुं असंख्याता हजार वर्षनुं होय छे. या ग्रीजा भागमा आयु, देहनी उंचाइ, माहा- रनुं अंतर प्रथम करतो अवश्य हीयमान होय छे पण ते नियत होतुं नी. जेम पहेला- चीजा आरामा शरीरप्रमाण-एक कोश, आयु एक पन्योपम अने पाहारांतर एक दिवम क्रमशः घटतुं घटतुं होय छे. तेम पा श्राराना पण प्रथमना बे भागमा तेज प्रमाणे क्रमशः घटतुं घटत होय छे. वीजा त्रिभागमा तेवो क्रम परावर होतो नथी, अनियतपणुं होय छे. आ याराना त्रण विभाग पाडवा, कारण ते ज छे, एम पूर्वाचार्योए मान्युं छे अने तेथी करीने जश्रा जीजा धारानो या बीजो विभाग पृथक् कर्यों छे. कल्पवृक्षो पण दृद्ध मुष्टिवाळा एटले लोमानी जेम अोछु आफ्नारा होय छे अने मूर्खनी वार्तानी जेम पृथ्वी पण पोछा रसवाळी (विरस ) थती जाय छ, वेथी ते वखतना युग्मियो निरंतर वृक्षना फळ, फुल अने औषधि (धान्य) विगैरे खानारा अने ते ते वस्तुनो संग्रह करवामा भने ममता करवामां अभिनिविष्ट ( घेराएला ) होता सता परस्पर विवाद पण करे छे. (२८४-२९८) (१८१) भीकासालोकप्रकारा । पल्याष्टमांशे शेपे स्यु-रस्मिन् कुलकरा वराः । प्रकाशांशा इवासन्नो -दयाद्यजिनभास्वतः ॥९९॥ रागद्वेषाभिवृद्ध्यात्र नीतिमार्गातिपातिनां । शिक्षणाय कुलकर-कृताः स्युदंडनीतयः॥३००॥सैकोननवतिपक्षे शेपेड- स्य त्रुटितांगके । उदेत्यादिमतीर्थेशो जगच्चक्षुरिवोत्तमः ॥ १॥ लोका- नामुपकाराय व्यवहारं दिशत्यसौ। अज्ञानतिमिरच्छेदी सदसन्मार्गदर्शकः ॥२॥ क्रमाच्च मध्यमरस-वेन कालस्य भूरुहां। मिथः संघर्षणादग्निः प्रादुर्भवति भूतले ॥ ३ ॥ तदा मंदोदराग्नीनों नैरस्याद्भरिभोजिनां । रुजत्यजीर्णे जठर-मामौषध्यादिभोजने ॥ ४ ॥ तेषामनुग्रहायाहन् मृदमत्राणि शिक्षयेत् । अन्नपाकजलाधाना-शुचितानि यथायथं ॥५॥ शिक्षितं प्रथमं येषां शिल्पमेतयुगादिना । तेषां वंशः कुंभकार इति नाम्ना प्रवर्तते ॥६॥ एवं वक्ष्यमाणशिल्प-कर्मणामनुसारतः । ते ते वंशाः प्रवर्तेर-चित्रकृन्नापितादयः ॥ ७॥ अधुनापि वदंत्येवं कुंभकारादयो जनाः । वयमस्मिन्नियुक्ताः स्मो जगदीशेन कर्मणि ॥८॥ लोहशिल्पं बीजो पारो पन्योपमना आठमा अंश जेटलो बाकी रहे त्यारे श्रेष्ठ एवा कुलकरो प्रथम तीर्थंकररूप सूर्य नजीकमा उगनार होवाची जाणे तेना प्रकाशना अंशो होय तेवा थाय छ. ए वखते रागद्वेपनी वृद्धि थवाथी नीतिमार्गने उल्लंघन करनारा युगलिकने शिक्षण प्राप वा सारु ते कुलकरो दंडनीतिनी योजना करे छे. वीजा आराना एक त्रुटिनांग ने अप वर्ष साडामाठ मास (८९ पक्ष ) वाकी रहे त्यारे जगचक्षु जेवा उत्तम प्रथम तीर्थकर उदय पामै छ ( माताना गर्ममा आवे छे.) (२९९-३०१) लोकोना उपकारने माटै प्रज्ञा सदसत् मार्गने पतावनार ते तीर्थ कर व्यवहार शिखवे छे. अनुक्रमे काळना प्रभावे जमीनना मध्यम रसपणार्थी वृक्षोना अंदरअंदर घमावावडे पृथ्वी उपर अग्नि प्रगट थाय छे. ते वखते उदराग्निी मंदताथी, नीरसपणाने लीधे घणुं भोजन करवू पडवाथी अने काचुं भोजन करवाथी ते न पचवाने लीधे जठरमा व्याधि थवा मांडे के. एटले तेमना अनुग्रहने माटे अरिहंत भन्न पकाया योग्य तेम ज जळ भरी राखवा योग्य माटीना पात्र बनायवानुं शिखये छे. युगादि जिने ए पहेलुं शिल्प जेने शिसव्पु तेगा वंश. चाळा कुंमकार तरीके भोळसाय छे. ए प्रमाणे आगळ कहेवाशे एका शिन्यो भने फर्मोने अनुसारे चित्रकार, नापित विगेरेना वंशो पण प्रवर्वे थे. प्रत्यारे पण कुंमकार विगेरे जनो एम पोले के के भमने जगदीश्वरे ज मा काममा नियुक्त कर्या छे. हो लोह- नरूप तिमिरने दूर करनार अने सर्ग २९ मो । (१८३) विना वेश्म-वाहनास्त्राद्यसंभवः । ततः प्रभुर्लाहकार-शिल्पं लोके प्रव- तयेत् ॥ ९॥ विना चित्रं न शोभेत वेश्मशय्यासनादिकं । ततः प्रभु- श्चित्रकार-शिल्पं लोके प्रदर्शयेत् ॥ १०॥ कल्पद्रुदत्तवस्त्राणा-मभावेन गतांवराः । जनाः स्युर्दुःखिनस्तंतु-बायशिल्पं ततो दिशेत् ॥ ११॥ असं. स्कृतश्मश्रुनखाः स्युर्भीष्माकृतयो जनाः। ततो नापितशिल्पं त-कृप- या दर्शयेत्प्रभुः ॥ १२ ॥ पंचैवं मूलशिल्पानि शंसति त्रिजगत्प्रभुः। एकै कस्य ततो भेदाः प्रवर्तते च विंशतिः ॥ १३ ॥ एवं प्रवर्तते शिल्प-शतं गुरूपदेशजं । कर्माणि तु प्रवर्तते कृष्यादीनि स्वयं ततः ॥ १४ ॥ एवं च-द्वासप्तर्ति कलाः पुंसां चतुप्पष्टिं च योषितां । तथा शिल्पशतं लोक- हितायाईन् समादिशेत् ॥ १५ ॥ शस्त्रे शास्त्रे वणिज्यायां जनानां भोज- नादिषु । चातुर्य दर्शयत्येप पितेव तनुजन्मनां ॥ १६ ॥ ताहकालानुभा. वाच क्रमेण स्वधिकाधिकं । कलाशिल्पेषु लोकानां चातुर्य परिवर्द्धते ॥१७॥ ततो भगवतस्तस्य पाणिग्रहमहोत्सवं । कुर्याद्राज्याभिपेकं च स्वयमा- शिल्प विना घर, वाहन, अस्रो विगैरेनो असंभव होवाथी प्रभु लोहकारनुं शिल्प लोकमा प्रवर्ती छे. चित्र विना घर, शय्या, आसनादिक शोभे नहीं तेथी प्रभु चित्रकारनुं शिल्प प्रवर्ताये छे. कल्पवृक्षोथी मळता पखोनो अमाव थवाथी वस्त्र विना मनुष्यो दुखी थता होवाथी प्रभु तंतुचाय (वणकर)नुं शिम्प प्रवर्ताये छे. दाढी मुछ विगेरेना वाळ तेम ज नख वधवाथी लोको भयंकर आकृतिवाळा देखावा लाग्या तेथी तेनी कपावडे प्रभु नापितनुं शिल्प प्रवावे . प्रा प्रमाणे पांच मूळ शिन्पोने प्रस पता है, त्यारपछी ते एक एक शिल्पना वीश चीश भेदो प्रवर्ते छे. ए प्रमाणे गुरुना उपदेशथी सो नकारना शिल्पो प्रवर्ने छ भने त्यारपछी खेती विगेरे जे कर्मों कहेवाय छे ते पोतानी मेळे प्रवर्ते छे. (३०२-३१६) एज प्रमाणे पुरुषनी ७२ कळा अने स्त्रीनी ६४ कळा म ज १०० शिन्पो लोकना हित माटे प्रभु उपदेशे छे. वळी शस्त्रमा, शास्त्रमा, वेपारमा, तेमज भोजनादिकने विपे मनुष्योना हितने माटे प्रसुपुत्रोने पितानी जेम चातुर्य शीखवे छे. पल्ली तेवा प्रकारना काळानु- भावी अनुक्रमे कळाशिम्पादिका लोकोनुं चातुर्य दिनपरदिन भधिक अधिक पधत जाय थे. त्यारपछी इंद्र पोते भावीने ते भगवंतनो पाणिग्रहण महोत्सव भने राज्याभिषेक " (१८४) भीकाममोकप्रकारा। । गत्य वासवः ॥ १८॥ नवयोजनविस्तिों द्वादशयोजनायतां । शक्रः सुवर्णप्राकारां माणिक्यकपिशिर्षकां ॥ १९ ।। धनधान्यसमाकी-तुंग- प्रासादबंधुरां ॥ निर्माय राजधानी द्राक् जगन्नाथाय ढोकयेत् ॥ २० ॥ ॥युग्मं॥ ततोऽसौ प्रथमो राजा राजनीति समर्थयेत्। तथा वर्णविभागांश्च चतुरश्चतुराशयः ॥ २१ ॥ गौतुरंगगजादीनां ग्रहं दमनशिक्षणे । युद्ध- शस्त्रप्रयोगादीन् नीतीः सामादिका अपि ॥२२॥युग्मं॥ काश्चिरपुनः समु- त्पन्ने प्रथमे चक्रवर्तिनि । निर्माणवकाइंड-नीतयः स्युः परिस्फुटाः ॥ २३ ॥ भगिनीपरिभोगादीन् व्यवहारांश्च युग्मिनां । निवर्तयन्सोऽन्य. गोत्र-जातोद्वाहादि दर्शयेत् ॥ २४ ॥ दशानामपि वर्षाणां याम्यस्यार्द्धस्य मध्यमे । खंडे प्रथमतीर्थेशो व्यवस्थामिति दर्शयेत् ॥ २५ ॥ पंचस्वन्येषु खंडेषु तां जातिस्मरणादिभाक् । क्षेत्राधिष्ठाता देवो वा लोकनीति प्रवर्तयेत् ॥ २६ ॥ काश्चित्तु कालमाहात्म्या-त्प्रवर्त्तते स्वयं ततः । संप्रत्यपि युवा वेत्ति यथा बह्वप्यशिक्षितं ॥ २७ ॥ करे छे. ( ३१५-३१८) पछी नव योजन विस्तृत, पार योजन लांबी, सोनाना गढ अने माणिक्यना कांगरावाळी, धनधान्यथी परिपूर्ण, उंचा उंचा प्रासादोथी व्याप्त एवी राजधानी ( अयोध्या) नीपजावीने इंद्र प्रभुने अर्पण करे छे (३१९-२०) एटले ऋषभदेव प्रथम राजा थाय छे. राजनीति प्रवर्ताचे छ भने चतुर आशयवाळा तेश्रो चार वर्णोना विभाग पाडे छ. गाय, घोडा, हाथी विगैरेनो संग्रह करवामां आवे छे. तेमन दमन ने शिक्षण तथा युद्ध, शस्त्रना प्रयोग विगेरे अने मामादिक चार प्रकारनी नीति शीखवे छे. (३२१-२२) पदेला चक्रवर्ती प्रगट था माणवक नामना निधानमाथी चीजी पण केटलीक दंडनीतिमो परिस्फुट थाय छे. (३२३ ) पछी युगलिकनो जे पोतानी साथे जन्मेली बहेननी साधे परिमोगरूप व्यवहार हतो तेने अळसावीने अन्य गोत्रमा उत्पन्न ययेली कन्यासाथे विवाह करवानुं बतावे छे. पाच भरत ने पांच अरवतरूप दशे क्षेत्रमा दक्षिणपाजुना अर्धमागना मध्यसंडमां पा प्रमाणे प्रथम तीर्थकर यधी व्यवस्था यतावे छे. वाकीना ते दशे क्षेत्रना पांच संडोमी जाति. स्मरणादिकथी मनुष्यो अथवा ते क्षेत्रना भधिष्ठाता देवो लोकनीति प्रवीवे छे. त्यारपछी फेटलीक नीति तो काळना माहात्म्यथी पोतानी मेळे ज प्रवर्ने छे, जेम भत्यारे पण फेटलाफ युवानो घणी पावतो वगर शिखम्ये पण समजी जाय छे सेम ( ३२४-२७) सर्ग २९ मो। (१८५) तथाहुरस्मद्गुरुपादसमुच्चिते श्रीहीरप्रश्नोत्तरे श्रीजगद्गुरवः-प्रत्रोत्तर- भरताद्धेऽपि जातिस्मरणादिभाक् क्षेत्राधिष्ठायकदेवो वा कश्चित्तत्र नीति- प्रणेता, कालानुभावतः स्वतो वा कियन्नैपुण्यं जायते इति. जायतेऽस्मिन्नवसरे प्रथमश्चक्रवर्त्यपि । न्यायमार्ग दृढीकुर्या-रस च पखंडसाधकः ॥ २८ ॥ एवं कृत्वा स भगवान् व्यवस्थासुस्थितं जगत् । वितीर्य वार्षिक दानं चारित्रं प्रतिपद्यते ॥ २९ ॥ स प्राप्य केवलज्ञानं देवमानवपर्यदि। दिशति द्विविधं धर्म यतिश्राद्धजनोचितं ॥ ३०॥ ततो गणधरान् गच्छां-स्तथा संघं चतुर्विधं । संस्थाप्य द्वादशांगी चा- र्थाप्य तीर्थ प्रवर्तयेत् ॥ ३१ ॥ एवं कृत्वा मोक्षमार्ग वहमानं स सिद्ध्य. ति । एकोननवतिपक्षा-वशेपेऽरे तृतीयके ॥ ३२ ॥ एकोननवतिपक्षैः समातेऽरे तृतीयके । दुष्पमसुषमाभिख्यो-ऽरक- स्तुर्यः प्रवर्त्तते ॥ ३३ ॥ एतस्मिंश्चारके भूमि-- नावृक्षाद्यलंकृता । स्यात्कृत्रिमतृणाढ्यापि कृष्यादीनां प्रवृत्तितः ॥ ३४ ॥ कल्पवृक्षादिरहितं स्वरूपं पूर्ववर्णितं । अत्रापि स्यादनंतन-हीनवर्णादिपर्यवं ॥ ३५॥ अमारा गुरुमहाराजना कहेला हीरप्रश्नोत्तरमा ते जगद्गुरू कहे छ के-"अहीं उत्तर भरतार्षमा पण जातिस्मरणादिवाळो मनुष्य अथवा क्षेत्रनो अधिष्ठायक देव नीतिनो प्रणेता थाय छे. काळानुभावथी पोतानी मेळे पण केटलीक निपुणता प्राप्त थाय छे." ते अक्सरे प्रथम चक्रवती पण उत्पन्न थाय छे. छ संडना माधनार एवा ते न्याय मार्गने दृढ करे छे. (३२८) मा प्रमाणे भगवान् जगतने व्यवस्थामा सुस्थित बनावीने पछी वार्षिकदान प्रापी चारित्र अंगीकार करें छे. ते प्रभु केवळज्ञान पामीने देव अने मनुष्योनी पर्षदामा यति भने श्राद्धजनोने उचित एवो ये प्रकारनो धर्म उपदेशे छे. पछी गणधरोनी, गच्छनी तथा चतुर्विध संपनी स्थापना करीने द्वादशांगी अर्धयी प्ररूपी तीर्थ प्रवर्ताये के. ए प्रमाणे मोचमार्गने चहेतो करीने पछी प्रभु पोठे सिद्धिपदने पामे छे. ते वखवे त्रीजा पाराना ८९ पक्ष वाकी रहेला होय छे. (३२९-३२) पाकी रहेला ८९ पच व्यतीत थये श्रीजो भारो पुरो थाय छ भने चोधो दुःपमसुषमा नामनो भारो प्रवर्ने छे. ए पारामा भूमि नाना प्रकारना तोथी अलंकन होय , तथा खेती विगैरेनी प्रकृति श्वायी कृत्रिम तृण (वनस्पति)यी पण व्याप्त होय छे. पूर्वे वर्णवेलुं स्वरूप कन्पवृक्षादि विनानु भा काळे पण होय छे, परंतु ते अनंत.

(१८६) भीकाललोषप्रकाश अत्र चादौ मनुष्याः स्यु-र्धनुःपंचशतोच्छ्रिताः । पूर्वकोट्यंतर्मुहूर्तो- स्कृष्टाल्पिष्ठायुषस्तथा ॥ ३६ ॥ अग्निसंपक्कनानान्न-घृतदुग्धादिभोजिनः । नित्यमाहारार्थिनः स्यु-रेकत्राप्यहि चासकृत् ॥ ३७ ॥ पुत्रपौत्रदुहित्रादि --परिवारा महर्द्धयः । प्रमदापत्यमित्रादि-स्नेहाक्ता जितशत्रवः ॥३८॥ स्तन्यपानादिभिर्भूयः-कालपालितवालकाः। वर्पक्रमाझ्यक्तवाक्य-गति- चातुर्ययौवनाः ॥ ३९ ॥ राजानो मंत्रिसामंत-श्रेष्ठिसेनापतीश्वराः । केचित्केचिच्चाल्पधनाः प्रेष्याः कर्मकृतोऽपि च ॥४०॥ एवं प्राकृत- कर्मानु -सारेण प्राप्तवैभवाः । कचिन्मिथ्यादृशः केचि-द्भद्रका मिश्र- प्टयः॥ ११ ॥ केचित्प्रपन्नसम्यक्त्वा देशचारित्रिणः परे । केचिच्चारि. त्रिणो यांति पंचस्वपि गतिवमी ॥ ४२ ॥ मेघाश्चतुर्विधास्ते च पुष्करावर्त्तसंज्ञकः । तथा प्रद्युम्नजीमूतौ झिमि- काख्यस्तुरीयकः ॥ ४३॥ तत्राद्यस्यैकया दृष्ट्या सुस्निग्धा रसभाविता । . गुणहीनवर्णादि पर्यववालं होय छे. या पाराना प्रारंभमां मनुष्यो पांचशे धनुष्य उंचा शरीरयाला अने जघन्य अंतर्मुहूर्त्तना ने उत्कृष्ट क्रोडपूर्वना प्रायुवाळा होय छे. तेओ अग्निथी पकावेलुं नाना प्रकारचें अन्न, घृत अने दुध विगेरेनुं भोजन करनारा होय छे. तेश्रो दररोज आहार करनारा होय छे एटलुं ज नहीं पण एक दिवसमा वारंवार सानारा होय छे. पुत्र, पौत्र, दुहित्रादि मोटा परिवारवाळा, मोटी ऋद्धिवाला, स्त्री-पुरुष ने मित्रा- दिना स्नेहमा पासक्त भने शत्रुने जीतनारा होय छे. स्तन्यपानादिवडे पणा काळ सुधी अपत्यनुं पालन करे छे भने वर्पना क्रमथी चाळको व्यक्त बोलनारा, चालनारा, यौवना- वस्थावाळा तेमज चतुराइवाळा थाय छे. केटलाक राजामो, मंत्रि, सामंत, श्रेष्ठि, सेना पति भने धनवान होय छे. केटलाक अल्पधनवाळा, केटलाक सेवा करनारा मने केटलाक अनेक प्रकारना काम करनारा होय छे. या प्रमाणे पूर्वकृत कर्मने अनुसारे केटलाक वैभववाळा होय छ, केटलाक मिथ्याष्टि, केटलाक भद्रक, केटलाक मिश्रदृष्टि, केटलाक समकित पामेला, केटलाक देशविरति ने केटलाक सर्वविरति होय छे. मा सर्व पांचे गतिमा जनारा होय छे (३३३-३४२) वरसाद चार प्रकारना बरसे छ. १ पुष्करावर्त, २ प्रद्युम्न, ३ जीमूत्र भने ४ मि. मिक-मा पहेला प्रकारना वरसादनी एक दृष्टिथी जमीन स्निग्ध, रसमावित भने संग १९ मो। (१८७) भवत्यब्दायुतं भूमि-(न्यायुत्पादनक्षमा ॥४४॥ द्वितीयस्यैकवृष्ट्या भू-र्भाव्यतेऽन्दसहस्रकं । वृष्टेः स्नेहस्तृतीयस्य दशाव्दानि भवेद्भुवि ॥ ४५ ॥ निरंतरं प्रवृत्ताभि-स्तुरीयस्य च वृष्टिभिः। भूयसीभिर्वपमेक स्नेहस्तिष्ठति वा न वा ॥ ४६॥ तत्र तुर्यारकांभोदा उत्तमाः कालव. पिणः । स्युः स्निग्धा सरसा भूभि-स्ततो भूरिफलप्रदा ॥ १७ ॥ प्रायो विड्वरदुर्भिक्षे नेतयो न न तस्कराः । रोगशोकवियोगाधि-दुःखदौर- स्थादि चाल्पकं ॥ ४८ ॥ न्यायाऽनुलंघिनो लोकाः पुरुषायुपजीविनः। राजानः श्रावकाः प्रायो धार्मिका न्यायतत्पराः ॥ १९ ॥ तस्मिन् कालेऽ- नुक्रमेण स्युस्त्रयोविंशतिर्जिनाः । एकादश चक्रभृतः शाहिणः सीरि- यो नव ।। ५० ।। एवं च- एकस्यामवसर्पिण्यां स्युश्चतुर्विशतिर्जिनाः। चक्रभृतो (चक्रिणो) द्वा- दश नव केशवा नव सीरिणः ॥५१॥ चतुष्पंचाशदित्येवं भवंति पुरुषोत्तमा। स्युस्त्रिपष्टिरमी युक्ता नवभिःप्रतिविष्णुभिः॥५२॥ नवभिर्नारदेर्युक्ता-स्ते भवंति द्विसप्ततिः । तथैकादशरुद्राढ्याः स्युस्त्यशीतिः समुच्चिताः॥ ५३॥ . १०००० वर्षो सुधी धान्य उपजावयाने योग्य थाय छे, वीजा प्रकारना वरसादनी एक पृष्टिथी एक हजार वर्ष सुधी तेवी रहे थे, त्रीजा प्रकारना बरसादनी एक पृष्टिथी दश वर्ष सुधी पृथ्वी तेयी रसवाळी रहे छ भने चोथा प्रकारना वरमादनी घणी पृष्टि निरंतर थया छतां पण एक वर्ष सुधी ज जमीन रसवाळी रहे छ अथवा नथी पण रहेती. तेमा चोथा पारामां वरसाद उत्तम प्रकारना अने योग्यकाळे वरसनारा होय छ, तेथी जमीन स्निग्ध, सरस अने घणा फळने मापनारी होय छे. प्राय: ते बारामा विध्वर, दुर्भिक्ष, ईतिनो होती नथी, चोर होता नथी अने रोग, शोक, वियोग, आधि, दुःख ने दौःस्थ्य विगेरे अन्प होय छे. ( ३४३-३४८) ते काळे लोको न्यायर्नु उल्लंघन नहीं करनारा, पूर्ण श्रापु सुधी जीवनारा होय छे. राजामो प्रायः पाचक (जैन धर्म पाळ- नारा), धार्मिक अने न्यायमा तत्पर होय छे, ते चोथा भारामां अनुक्रमे २३ तीर्थकरो थाय छे. ११ चक्रवर्ती यो थाय छे अने नव पळदेव-वासुदेव थाय छे. (३४९-५०) एक अपसर्पिणीमा एकंदर २४ तीर्थकरो, १२ चक्रवर्तीओ अने नत्र वासुदेव तथा नव यळदेव थाय छे. या प्रमाणे ५४ उत्तम पुरुषो थाय छे तेमा नव प्रतिवासुदेवने भेळ- क्वाथी ६३ थाय छे. नव नारदने भेळववाथी ७२ थाय छे. तेमज ११ रुद्रने भेळपवाथी + . + (१८८) मीठासमोकप्रकारा। चतुर्थेति वा पंचधा वाथ पोढा-थवा सप्तधा विश्रुताः स्युः पुमांसः । जिनाश्चक्रिणः केशवाः सीरिणस्त-द्विपक्षास्तथा नारदाः किंच रुद्राः ॥ ५४॥ विश्वाश्चर्यदकीर्तिकीर्तिविजयश्रीवाचकेंद्रांतिप- द्राजश्रीतनयोऽतनिष्ट विनयः श्रीतेजपालात्मजः । काव्यं यत्किल तत्र निश्चितजगत्तत्वाद्भुते त्रिंशतै- कोनेन प्रमितः समाप्तिमगमत्सर्गो निसर्गोज्ज्वलः ।। ५५ ॥ ॥ इति श्रीलोकप्रकाशे एफोनत्रिंशत्तमः सर्गः समाप्तः ॥ श्रीरस्तु ॥ ८३ थाय थे. ए प्रमाणे उत्तम पुरूषोना चार, पांच, छ भने सात प्रकारो प्रसिद्ध छे. ते तीर्थकर, चक्री, वासुदेव अने पळदेव एम चार प्रकारे, प्रतिवासुदेव युक्त पांच प्रकारे, नारद युक्त छ प्रकारे अने रुद्र युक्त सात प्रकारे समजवा. (३५१-३५४ ) विश्वने आश्चर्य पमाडे तेवी कीर्तिवाला श्री कीर्तिविजय वाचकेंद्रना शिष्य, तेजपाळ ने राजश्रीना पुत्र एवा श्रीविनयविजय उपाध्याये जे काव्य रच्युं छे, ते निश्चित करेला जगतना तत्ववडे अद्भुत एवा मा लोकप्रकाश नामना ग्रंथमा स्वभावे ज उज्वळ एवो २९ मो सर्ग संपूर्ण थयो. ( ३५५) इति श्रीलोकप्रकाशे २९ मो सर्ग मंपूर्ण.

सर्ग ३० मो। (१८९) ॥ अथ त्रिंशत्तमः सर्गः प्रारभ्यते ॥ - **- तत्र तीर्थंकरास्तु स्यु-रितस्तृतीयजन्मनि। विंशत्या सेवितैः स्थान- स्तीर्थकृन्नामहेतुभिः ॥ १ ॥ तानि चैवं—अर्हत् १ सिद्ध २ प्रवचन ३. गुरवः ४ स्थविरा ५ स्तथा । बहुश्रुत ६ स्तपस्वी ७ च वात्सल्यान्येपु सप्तसु ॥ २ ॥ अर्हश्चतुर्धा नामादिः १ सिद्धाः कर्ममलोज्झिताः २ । श्रुतं प्रवचनं संघ-स्तदाधारतयाथवा ३ ॥३॥ गुरुर्धर्मस्योपदेष्टा ४ स्थविरो वृद्ध उच्यते । वयश्चारित्रपर्याय-श्रुतैरेप त्रिधा भवेत् ॥ ४॥ पष्टिं वर्षाण्यतिक्रांतो क्यास्थविर उच्यते । पर्यायस्थविरो जात-विंश- त्यब्दव्रतस्थितिः ॥ ५॥ सूत्रार्थज्ञश्चतुर्थीगं यावद्योऽसौ श्रुतेन च । स्थविरः स्याद्यदुत्सर्गा-पवादादीनि वेत्त्यसौ ५॥६॥ तत्कालापेक्षया भूरि-श्रुतोऽत्र स्याद्बहुश्रुतः ६। तपस्वी चानशनादि-विचित्रोग्रतपः- स्थितः ७ ॥ ७ ॥ भक्तिरागो यथाभूत-गुणप्रख्यापनं जने । यथोचि- तोपचारश्च तेषां वात्सल्यमीरितं ॥८॥ सदा ज्ञानोपयोगश्च भवति सर्ग ३० मार्नु भाषांतर. । प्रथमना ( २९ मा ) सर्गना प्रांतभागमा वतावेला शलाका पुरुषो पैकी जे २४ तीर्थकरो छे ते मा जन्मथी पाचला त्रीजे भवे तीर्थकरनामकर्मना हेतुरूप वीश स्थान- कना आराधनवडे थाय छे. (१) ते वीश स्थानको पा प्रमाणे-अरिहंत १, सिद्ध २, प्रवचन ३, प्राचार्य ४, स्थविर ५, बहुश्चत ( उपाध्याय ) ६ भने तपस्वी (मुनि) ७- श्रा सात वात्सल्य. (२) तेमा प्रथम अरिहंत कह्या छे ते नामादि चार प्रकारे, सिद्ध- सर्वकर्ममळथी रहित, प्रवचन ते श्रुत अथवा वेना आधारभूत संघ, गुरु ते धर्मना उप- देशा (श्राचार्य), स्थविर ते पृद्ध-ना त्रण प्रकार-वयवडे वृद्ध, चारित्रपर्याये वृद्ध अने श्रुतवडे वृद्ध-साठ वर्षथी वधारे उमरना ते वयस्थविर, वीश वर्ष उपरांवना चारित्र. पर्यायवाळा ते पर्यायस्थविर, चोधा समवायांगत्र सुधीना स्त्रार्थना जाणरावाळा श्रुतस्थविर के जे उत्सर्ग अपवादादिना जाण होय. ते ते काळनी अपेदाए वधारे ध्रुवना भम्यासी ते बहुश्रुत अने अनशनादि विचित्र प्रकारना उग्र तप करनारा ते तपस्वी. ए साते उपरनो भक्तिराग, लोकमां तेना यथाभूत (सत्य) गुणतुं ख्यापन (१९०) भीकाललोकप्रकारा। स्थानमष्टमंदा सम्यत्त्वे ९विनये १० चाव-श्यके ११ ऽतीचारवर्जनं ॥९॥ एतानि नवमदशमैकादशानि स्थानानीति शेषः, शीलवतेषु निरती- चारत्वं द्वादशं पदं । व्रतान्यत्रोत्तरगुणाः शीलं मूलगुग्णाः स्मृताः १२ ॥ १०॥ त्रयोदशं क्षणलवा-भिधानं स्थानमीरितं । तच्च प्रतिक्षणलवं सदा वैराग्यभावनं १३ ॥ ११ ॥ तपश्चतुर्दशं स्थानं नानाविधतपःक्रिया १४ । त्यागः पंचदशं साध्वा-द्यान्नादिसमर्पणं १५ ॥ १२॥ बालादि. वैयावृत्यं स्या-त्योडशं स्थानकं च तत् ॥ शुद्धोपध्यन्नादिदान-मंगसंवा- हनादि च ॥ १३ ॥ तथोक्तं प्रश्नव्याकरणांगे- केरिसए पुण धाराहए वयमिणं ? जे से उवहिभत्तपाणसंगहदाण- कुसले, श्रञ्चंतबालदुब्बलवुडखवगपवत्तिश्रायरियउवज्झायसाहम्मियत- वस्सीकुलगणसंघवेइयठे य निजरठी वेयावच्चं अणिस्सियं दसविहं बहुविहं करेइ. अत्र श्रीजिनप्रतिमाया अन्नोपधिदानांगसंवाहनाद्यसंभवा- - अने तेमनो यथोचित उपचार ते तेमनुं वात्सल्य फयु . ( ३-८ ) सर्वदा ज्ञानोपयोग ते आठमुं स्थान, मम्यक्त्वमां अतिचारनु वर्जयूं ते नवमुं, विन- या अतिचारनुं वर्जq ते दशमुं, छ अावश्यकमा अतिचारनुं वर्जन ते भग्यारमुं (९) शीलव्रतमा निरतिचारपणुं ते पारमुं. अहीं शील ते मूळगुण अने व्रतो ते उत्तरगुण कह्या छे. ( १०) क्षणलव नामर्नु तेरमुं स्थान के तेमा प्रतिक्षण के प्रतिलव सदा वैराग्य भाववापणुं (११) तप ए चौदमुं स्थान छे, तेमां नाना प्रकारनी तपक्रियानो समावेश छे. दान पंदरमुं स्थान, तेमां साधु विगेरेने योग्य अन्नादिनुं प्रापवापणुं छे. (१२) बाळादि मुनिनी चयापच परवी ते सोळमुं स्थान छे. ते वैयावचमा शुद्ध उपधि, अन्नपानादि लावी श्रापq तेम ज अंगनुं संवाहन करवू ए विगेरेनो समावेश छे. (१३) ते विप श्रीप्रश्नभ्याकरण नामना दशमा अंगमा कह्यु छ के-'आ वतनुं पाराधन केवी रीते करवू ?' तेने उत्तर आपे छ के-' उपधि अने भातपाणी लाववामां ने मापवामा कुशळ, अत्यंत चाळ, दुर्बळ, वृद्ध, क्षपक, प्रवर्तक, प्राचार्य, उपाध्याय, माधर्मिक ( साधु ), तप स्वी, कुळ, गण, संघ अने चैत्य-एमने माटे निर्जराथी मुनि अनिश्रितपणे दशविध तेमज पहुविध वैयावञ्च करे. अहीं जिनप्रतिमाने अंगे अन्न अने उपधिनुं आपq अने अंगसं- वाहना करवी विगेरेनो अमाव होवाथी चैत्यनी वैयावच्च शी रीते करे ? एम चैत्यने ओ- सर्ग ३० मो। चैत्यस्य किं वैयावृत्त्यमिति यत्कश्चिञ्चैत्यापलापी गुरुकर्मा शंकते तत्र जक्खा ह वेयावडियं करेंति तम्हा उ एए निहया कुमारा' इत्युत्तरा- ध्ययनोक्तहरिकेशिमहर्पिवचनात् अवज्ञानिवारणादेरपि वैयावृत्त्यत्वमि- त्यादि युक्त्या समाधेयं १६ ॥ समाधिः स्यात्सप्तदशं स्थानं दुर्ध्यान वर्जनं । चित्तस्वास्थ्योत्पादनं वा गुर्वादविनयादिभिः ॥ १४ ॥ अत्रा- द्यः पक्ष अावश्यकवृत्तौ, द्वितीयस्तु ज्ञाताधर्मकथांगमयध्ययनवृत्तौ १७. अष्टादशमपूर्वस्य ज्ञानस्य ग्रहणादरः १८ । एकोनविंशतितमं श्रुतस्य बहुमाननं १९ ॥ १५ ॥ स्थानमंत्यं प्रवचन-प्रभावनमिहोदितं । तत्कु- र्यात् श्रुतवान् धर्म-कथादिगुणवांस्तथा ॥ १६ ॥ तथाहुः-सम्मई- सणजुत्तो सइ सामस्थे पभावगो होइ । सो पुण इत्थ विसिहो निदिठो अट्टहा सुत्ते ॥ १७ ॥ पावयणी १ धम्मकही २ वाई ३ नेमित्तिओ ४ तबस्सी य ५ । विज्जा ६ सिद्धो ७ य कई ८ अठेव पभावगा भणिया ॥१॥ एषु द्वित्रादिभिः स्थानः सर्वैर्वा सेवितै शं । जिननामार्जयेन्म- ळवनारो कोइक मारेकर्मी शंका करे, तो पा संबंधां श्री उत्तराध्यनसूत्रमा कहेला हरि- केशी महर्पिना वचन प्रमाणे जे कोइ चैत्य (जिनप्रतिमा )नो अपलाप करे, गुरुकर्मी होवाधी तेना पूजनिकपणामा शंका करे तेने अटकावीने यक्ष वैयावच्च करे. ते कारणथी ए जिन- प्रतिमार्नु अपमान करनार यक्षे ए कुमारोने हण्या 2. एटला उपरथी समजवू के-जिनप्रति. मानी अवज्ञा करनारनुं निवारण करवू ते तेमनी बैयावच्च छे. श्राप्रमाणे युक्तिथी समा- धान करवू. हवे सचरमु समाधिस्थान छ, तेमां दुर्यानवें वर्जन अने गुर्वादिकनो विनय करवा रडे तेमने चित्तस्वास्थ्य उपजाय ते (१४) अहीं पहेलो पक्ष प्रावश्यकथति अनुसार भने चीजो पच श्री ज्ञाताधर्मकथांगमा मल्ल्यध्यननी वृत्ति अनुसार समजयो. अढारवं स्थान अपूर्व ज्ञानना ग्रहणमा आदररूप, भोगणीशमं श्रुतना बहुमानरूप (१५) अने वीशमुं प्रवचननी प्रभावनारूप कहेलुं छे. ते प्रभावना श्रुतवान् भने धर्मकथादिकना गुण- वाळो करी शके छ (१६) कह्यु छ के-सम्यगदर्शन युक्त मनुष्य छते सामर्थे शासननो प्रभावक होय छे. (बे प्रभावनाने विशेष प्रकारे जाणवाना इच्छक होप) वेने माटे सूत्रमा पाठ प्रकारना प्रमावक का छे. (१७) प्रावचनी १, धर्मकथी २, बादी ३, नैमित्तिक ४, तपस्वी ५, विद्यावान् ६, सिद्ध ७, अने कवि ८-ए पाठ प्रभावक छे. (१) उपर पवारेला वीश स्थानको पैकी वेत्रण विगेरे अथवा वधा स्थानोना सेवनको मीकालोकप्रकारा। . @ः पुमान् स्त्री वा नपुंसकं ॥ १८ ॥ तथाहुः श्रीभद्रबाहुस्वामिपादाः- नियमा मणुयगईए इत्थीपुरिसेयरो व सुहलेसो । श्रासेवियवहुलेहि वीसाए अन्नयरएहि ॥ १९ ॥ नियमान्मनुष्यगतौ वद्ध्यते, कस्तस्यां वध्ना- तीत्याशंक्याह-स्त्री पुरुप इतरो वेति नपुंसक इत्यावश्यकहारिभयां. तृतीयकर्मग्रंथे तु बंधस्वामित्वनिरूपणे प्रथमनरकत्रयनारको वैमानिक- देवो गर्भजमनुष्यश्च सम्यक्त्वादिगुणस्थानवर्तिनस्तीर्थकृन्नामकर्म वन- तीत्युक्तमिति ज्ञेयं. अत्र चैवमुपपत्तिः-बद्धतीर्थकरनामा मनुष्यो मृत्वा नरकदेवगत्योरुत्पन्नस्तत्रापि तीर्थंकरनामकर्म 'बध्नाति, जिननामक- मणः सततबंधकालस्योत्कृष्टतस्त्रयस्त्रिंशत्सागरोपममानस्यानुत्तरसुराना- श्रित्य शतके प्रोक्तत्वात् , इति कार्मग्रंथिकैर्गतित्रये जिननामबंध उक्तः, प्रथमतस्तु मनुष्य एव तहंधमारभत इत्यावश्यके 'नियमा मणुप्रग. ईए ' इति निरूपितमिति. यद्वा नरकस्वर्गत्योः सामान्येन जिननाम्नो बंधः स्यात्. निकाचितबंधस्तु तस्य मनुजगतावेवेत्यावश्यके नियमा . मनुष्य तीर्थकरनामकर्म पुरुष, स्त्री नपुंसक त्रणे वेदमा वर्तता उपार्जन करे छे. (१८) ते विषे श्री भद्रबाहुस्वामीए कर्यु के के-" निश्चये मनुष्यगतिमा, स्त्री, पुरुष के नपुंसक, शुभलेश्यावाळो वीशमाथी अन्यतर एक अथवा घणा स्थानोना सेवनवडे तीर्थ- करनामकर्म बांधे छे" (१९) "निश्चये ते मनुष्यगतिमा जबंधाय छे. ते मनुष्यगतिमा कोण पांधे एवी माशंकाना उत्तरमा स्त्री, पुरुष के इतर एटल नपुंसक" एम आवश्यक हारिमद्रीमा कयुं छे, परन्तु त्रीजा कर्मग्रंथमा तो बंधस्वामित्वनी निरूपणामां " पहेली त्रण नरकनो नारकी, वैमानिक देव भने गर्भज मनुष्य सम्यक्त्वादि गुणस्थाने वर्ततो होय ते तीर्थ- करनामकर्म बांधे एम कयु के. मा हकीकतनी उपपत्ति-समन्वय पा रीते करवी के तीर्थकरनामकर्म जेणे बांध्युं छे एवो मनुष्य मरण पामीने प्रथमनीत्रण नरकमा प्रथया वैमानिक देवा उपजे छ, भने त्यां पण तीर्थकरनामकर्म बांध के एटले तेना दळीयां मेळवे छे. जिननामकर्मनो सतत बंधकाळ उत्कृष्ट तेत्रीश सागरोपम प्रमाण अनुत्तर विमा- नना देवीने श्राश्रीने पांचमा शतककर्मग्रंथमा कहेल छे. 'एटले क र्मयाथिकोए प्रण गतिमा जिननामनो बंध कयो भने प्रथम तो मनुष्य ज तेना बंधनो प्रारंभ करेछे, एवा विचारथी श्री श्रावश्यकमा नियमामणुअगईए एम कहेलुं छे. तेनुं समाधान करी लेवु अथवा नरकमां ने देवगतिमा सामान्यपणे वेनो बंध थाय . निकाचित बंध तो मनुष्यगतिमा ज थाय ३० मो। सर्ग (१९३) मणुए ' इत्यायुक्तं भावीति संभाव्यते. एतत्संग्रहश्चैवमावश्यकपष्ठांगा. दिषु-अरिहंत १ सिद्ध २ पवयण ३ गुरु ४ थेर ५ बहुस्सुए ६ तव- स्सीसु ७ । वच्छल्लया य तेर्सि अभिकनाणोवयोगे य ८॥ १॥ दसण ९ विणए १० श्राव-स्सए ११ य सीलबए १२ निरइयारो । खणलव १३ तव १४ चियाए १५ वेयावच्चे १६ समाही य १७ ॥२॥ अपुव्वना- गगहणे १८ सुप्रभत्ती १९ पक्ष्यणे पभावणया २० । एएहिं कारणेहि तित्थयरत्तं लहइ जीवो ॥३॥ एतत्तपोविधिसंप्रदायश्चैवं- चेत्करोत्युपवस्त्रेण विंशतिस्थानकं तपः। तदा विंशत्योपवास-रेका पंक्तिः समाप्यते ॥ २०॥ निरंतर कृत्यशक्तौ सांतरां तां करोति चेत् । पंक्तिरेका पूरणीया तत्पण्मासांतरे ध्रुवं ॥ २१ ॥ विंशत्या पंक्तिभिश्चैत- त्तपोभवति पूरितं । उपवासानां चत्वारि शतानीह भवंति तत् ॥ २२ ॥ एवं शक्त्यनुसारेण प्राज्ञैः षष्ठाप्टमादिभिः । मासक्षपणपर्यंतै-स्तप एतद्वि- धीयते ॥ २३ ॥ पंचशक्रस्तवपाठो-कृष्टा या चैत्यवंदना। सावश्यं वि. छ एवो श्री आवश्यकना 'नियमा मषुए ' कथननो आशय होय एम पण संभवे छे. श्रा वीश स्थानकनो संग्रह श्रीभावश्यकमा अने पटांग विगेरेमां आ प्रमाणे छे-परि- हंत १सिद्ध २, प्रवचन ३, गुरु ४, स्थविर ५, यहुश्रुत ६, तपस्वी ७, श्रा सातनुं वात्सल्य. वारंवार ज्ञानोपयोग ८, (१) दर्शन ९, विनय १०, आवश्यक ११, शीलवत (निर- विचार ) १२, क्षणलव १३, तप १४, दान १५, वैयावच्च १६, समाधि १७, (२) अपूर्वज्ञानग्रहण १८, श्रुतमक्ति १९, प्रवचनप्रमावना २०. या कारणोबडे जी तीर्थ · फरवने मेळवे थे. (३) ए तपनो विधि आप्रमाणे- जो उपवासवडे वीशस्थानकने श्राराधे तो वीश उपवासरडे एक पंक्ति (एक पदनी भाराधना) पूर्ण थाय के (२०) आ प्रमाणे सतत वीश उपवास (भातरे पारणं करीने पण) करी न शके तो श्रांतरे आंतरे उपवास करे, पण छ मासमा तो एक पंक्ति (वीश उपवास ) जरुर पूर्ण करे. (२१) ए प्रमाणे वीश पंक्ति करवायी प्रा तप पूर्ण थाय छे. एटले तेमा कुल १०० उपवास थाय छे. (२२) मा प्रमाणे शकिा. अनुसार बुद्धिमानोए छठप्रहमादि यावत् मासक्षपणादिकाडे मा तप करवो. ( एटले ४०० उपवासने बदले यावत् ४०० मासक्षपण करवा, प्रा प्रमाणे नंदनमुनिए करेल छे.) (२३) तपने दिवसे पांच शकस्तत्रवडे उत्कृष्ट चैत्यवंदना अवश्य विधि .

(१९४) श्रीज्ञाललोफाफाश। धिना कार्या तपस्यत्रोपवैणवं ॥ २४ ॥ एकैकस्यामत्र पंक्ता-वेकैकेन दिनेन च । क्रमेणाराधयेद्भक्या स्थानकानीति विशति ॥ २५ ॥ श्राये नमोऽर्हद्भ्य इति द्विसहस्री जपेदिने । अर्हद्भक्ति विशेपेण कुति स्तवनादिभिः ॥ २६ ॥ यन्येष्वपि दिनेष्वेव-माराध्यास्ते पुरोदिताः । ज्ञा- नक्रियाद्यास्तु शुद्ध-पाठाभ्यासादरादिभिः ॥ २७ ॥ रागद्वेषादयो दोषा वर्जनीया विशेषतः । तपोदिने जपेन्मौनी वक्ष्यमाणपदानि च ॥२८॥ सांप्रतीनानि जापपदानि चैवं-अरिहंत १ सिद्ध २ पचयण ३ आय- रिया ४ थेर ५ वायगा ६ साहू ७ । नाणं ८ दसण ९ विणया १० चारित्तं ११ बंभवयधारी १२॥ १॥ किरियाणं च १३ नमो तह तव- स्स १४ सिरिगोयमस्त १५ य जिणाणं १६ । चारित्तं १७ नाम १८ सुश्रा १९ तित्थं २० इथ वीस जावपया ॥२॥ अत्र सर्वत्रापि नमो अरिहंताण, नमो सिद्धाणं, नमो पवयणस्स, इत्यादिपाठक्रमो ज्ञेयः. केचिच्चैककया पंक्त्या स्थानमेकैकमेव हि । श्राराधयंति विंशत्या पंक्तिभिस्तानि विंशति ॥ २९ ॥ उद्यापनादिविधिस्तु संप्रदायादवसेयः. प्रमाणे जिनप्रतिमानी सन्मुख करवी. (२४) दरेक पंक्तिमा भने दरेक दिवसे अनुक्रमे भक्तिवडे वीश पदोनुं आराधन कर. (२५) पहेले दिवसे नमोऽहंदुभ्यः ए पदनो ये हजार जाप करवो भने अरिहंतनी भक्ति सविशेषपणे स्तवनादिवडे करवी. (२३) वीजा दिवसोमा पण ए ज प्रमाणे पूर्वे कहेला अरिहंतादिकने पाराधवा, अने ज्ञानक्रिया विगेरेने शुद्ध पाठ, अभ्यास अने सादर-बहुमानादिकवडे श्राराधबा. (२७) तपने दिवसे रागद्वेषादि दोपने विशेषपणे वर्जया अने मौनपणे आगळ कहेवाशे ते पदोनो जाप करचो. (२८ ) सांप्रतीन जापपदो आ प्रमाणे-१ अरिहंत, २ सिद्ध, ३ प्रवचन, ४ प्राचार्य, ५ स्थविर, ६ वाचक, ७ साधु, ८ ज्ञान, ६ दर्शन, १० विनय, ११ चारित्र, १२ ब्रह्म- व्रतधारी, (१) १३ क्रिया, १४ तप, १५ श्रीगौतम, १६ जिन, १७ चारित्र, १८ अपूर्वज्ञान, १९ श्रुत अने २० तीर्थ, या वीश पदनो जाप करवो. (२) तेमा सर्वत्र नमो अरिहंताणं, नमो सिद्धाणं, नमो पवयणस्स इत्यादि पाठनो क्रम जाणवो. केरलाक एकेक पंक्ति (वीश उपवास ) वडे एकेक स्थानने भाराधे थे, वीश पंक्ति- यडे वीश स्थानने भाराधे छे. (२९) तेना उद्यापननो विधि संप्रदायथी जाणी लेवो. , .

सर्ग ३० मो। (१९५) तपोऽशक्तः पुनः स्थान मेकं द्वे सकलानि वा। यथाशक्ति स्फुरद्भक्तिः सेवेत श्रेणिकादिवत् ।। ३० ।। एवं साधुः श्रावको वा साध्वी वा आवि. कापि वा । अमून्याराधयन् स्थाना-न्याप्नोति जिनसंपदं ॥३१॥ तीर्थ- कृन्नामकमैत-द्वेद्यते जिनपुंगवैः । विश्वोपकारैरग्लान्या धर्मार्थकथना- दिभिः ॥ ३२ ॥ तथाहुरावश्यकनियुक्तिकृतः- तं च कहं वेइज्जइ ? अगिलाए धम्मदेसणाईहिं । वज्झइ तं तु भयवनो तइयभवोसकइत्ताणं ॥ ३३ ॥ अथार्जिताहत्पदाः स्यु-स्ते वैमानिकनाकिनः । प्राग्निवद्धायुपश्चाधः शैलावध्येव नारकाः ॥ ३४ ॥ तथोक्तं संग्रहण्यां-सुरनेरइएहिं चिन हवंति हरिशरिहचकिवलदेवा । चउविहसुरचकिवला वैमाणिश्र हुँति हरिपरिहा ॥ १॥ वसुदेवचरिते तु नागकुमारेभ्योऽप्युद्धृतोऽनंतरमैरवतक्षेत्रेऽस्यामवसर्पिण्यां जिन उक्त इति ज्ञेयं. तेजोऽभिवर्द्धते तेषां देवानां च्यवनावधि । न प्रादुप्यंति चिह्नानि च्यवनस्यान्यदेववत् ॥ ३५॥ अन्येषामपि विज्ञेय-मेतदंत्य- तपनी अशक्तिवाळा एक ये अथवा बधा स्थान यथाशक्ति आराधे छ अने श्रेणिमादिनी जेम स्फुरायमान भक्तिथी तेनी सेवना करे छे. (३०) मा प्रमाणे साधु, श्रावक, साधी अथवा श्राविका आ स्थानोने अाराधयाथी तीर्थकरपदने प्राप्त करे छ. (३१) अने ए तीर्थकरनामकर्मने जिनपुंगव (तीर्थकरपणाना भवमा केवळज्ञान पाम्या पछी) अग्लानपणे विश्वनो उपकार करनार धर्मदेशना आपवादिकाडे वेदे छे (३२) श्री आवश्यकनियुक्तिमा कहुं छ-"ते केवी रीते वेदे ? उ० अग्लानपणे धर्मदेशनादिवडे. भने ते कर्म भगवंत पाछले तीजे भवे एक ज चार बधि (निकाचित करे)" (३३) हवे जेमणे तीर्थकरनामकर्म बांध्यु थे ते वैमानिक देव थाय, पण जो प्रथम माथु. व्य बांध्यु होय वो नीचे त्रीजी नरक सुधी नारकी थाय छे. (३४) श्रीमंग्रहणीमा कयु छ के-" देव ने नारकी त्यांची नीकळोने वासुदेव, अरिहंत, चक्रवर्ती ने बळदेव थाय छे. तेमा चार प्रकारना देवमाथी चक्रवर्ती ने बळदेव थाय छ, बासुदेव ने अरिहंत वैमानिक- माधीज थाय छे. पण वसुदेवचरित्रमा तो नागकुमारथी नोकळोने अनंतरभने असा क्षेत्रमा या अवसर्पिणीमा एक तीर्थकर थयार्नु कयुं छे, ते प्रसंगोपात जणाव्युं छे. तीर्थकर थनार देव देना च्यानकाळ सुधी वेजमा वृद्धि पामतो ज रहे थे यो तेने अन्य देवोनी जेम व्यानना चिन्हो यता नथी. (३५) पीना चरमशरीरी दलो माटे (१९६) भीकाललोफप्रकाश। शरीरिणां । तेऽन्यव्यपेक्षया स्वल्प-पीडाः स्युर्नारका अपि ॥ ३६॥ ततश्च्युत्वा कर्मभूमौ सज्जातिकुलशालिनः। क्षत्रियस्योच्चगोत्रस्य प्राज्यरायद्धिराजिनः ॥३७॥ उत्कृष्टभागधेयस्य गुणाढ्यस्य महीपतेः। पत्न्याः कुक्षौ सुशीलाया गर्भवेनोद्भवंति ते ॥ ३८॥ स्वर्गादा नरका- हा ये यस्मादायांति तीर्थपाः । ज्ञानत्रयं ते तत्रत्यं विभ्रते गर्भगा अपि ॥ ३९ ॥ जानंत्येष्यदतीतं च च्यवनं तत्क्षणे तु न। गर्भोत्पत्तिक्षणेऽ- प्येषां स्यादेवं महिमोदयः ॥४०॥ अशिवोपद्रवादीनां भवत्युपशम: क्षितौ । नारका अपि मोदंते क्षणं प्राप्तसुखोदयाः॥४१॥ उदयाभि- मुखस्तीर्थ-कराकः समभूदिति । ज्ञात्वासनप्रकंपेन मुदिता नाकिना- यकाः ॥ ४२ ॥ सिंहासनात्समुत्थाय विनयात्यक्तपादुकाः। पदान्यागत्य सप्ताप्टौ श्रीजिनाभिमुखं रयात् ॥ १३ ॥ पंचांगप्रणिपातेन प्रणम्य जग- दीश्वरान् । घटितांजलयः कुर्युः स्तुतिं शकस्तवेन ते ॥ ४४ ॥ अत्र- सकस्स ग्रासणं चलिरं सिग्घं आगमणं भणइ, यावत्तव पुत्तो पढ- पण ते प्रमाणे सगजबुं. नारकीपणामां पण वीजा नारकीओ करता तेमने स्वन्प पीडा होय छे. (३६) हवे त्यांथी च्यवीने कर्मभूमिमा उत्तम जातिकुळवाळा, उच्च गोत्रवाळा भने प्राज्य राज्य ऋद्धिवाळा क्षत्रियने त्यां पुत्रपणे उपजे. उत्कृष्ट भाग्यशाळी अने गुणाढ्य महीप- तिनी सुशीला एवी पत्नीनी कुतिमा गर्भपणे अवतरे. (३८) स्वर्गमाथी के नरकमाथी ज्यांची तीर्थकर आपेला होय त्वां जटला होय तेटला प्रमाणवाळा त्रण ज्ञान गर्मा पण ते जीवने होय. (३९) तेमो अतीव ने अनागतकाळनी हकीकत च्यवीश अथवा च्यन्यो एम जाणे, पण च्यवन समय अल्प होबाथी न जाणे, गर्मोत्पत्तिना समये पण या प्रमाणे तेमनो महिमा होय. (४०) सर्व पृथ्वीपर शिव-उपद्रव शांत थाय अने नारकी पण क्षणवार सुखोदयनी प्राप्तिथी हर्ष पामे. (४१) तीर्थकररूप सूर्य उदयने अभिमुख थयेल छ, एम आसनप्रकंपथी जाणीने देवनायको (इंद्रो) हर्ष पामे. (४२) पछी सिंहासनथी उठीने, पादुका तजी दइने, विनयथकी सात आठ पगला उतावळे प्रभु सन्मुख श्रावीने श्री जगदीश्वरने पंचांग प्रणिपातवडे नमस्कार करीने अजळी जोडी शक्रस्तववडे प्रभुनी स्तुति करे. (४४) श्रहीं शक्रतुं श्रासन चलायमान थाय अने ते शीघ्रपणे माता पासे श्रावीने कहे के-तमारो पुत्र प्रथम धर्मचक्रवर्ती थशे. एम कहेल छ , सर्ग ३० मो। (१९७) मधम्मचक्कवट्टी भविस्सति, केइ भणंति-बत्तीसंपि इंदा आगंतूणे वाग- रिति, इत्यावश्यकहारिभद्यां श्रीऋपभगर्भावताराधिकारे, सकस्स य पासणकंपो यावत् वाणारसीमागंतूण भयवतो जणणिं अहिनंदइ, इति केशीगौतमीयोत्तराध्ययनप्राकृतवृत्तौ. इदं हि घटते यस्मा-गर्भवास- दिने मुदा । वंदितोऽयं समागत्य सहावाभ्यां सुरेश्वरैः ॥ १॥ इति श्री- शांतिचरित्रे श्रीशांतिनाथमातापितृवचनमित्यादि दृश्यते, ततो विस्तरतः प्रथमकल्याणकोत्सवपद्धतिर्वहुश्रुतेभ्योऽवसेया. तस्मिन्नवसरे वास-भवने स्वहोपमे । स्वःशय्योपमशय्यायां श- यिता सा मृगेक्षणा ॥ ४५ ॥ समधातुः सुप्रसन्न-चित्ता स्वप्नांश्चतुर्दश। निशीथे गर्भमायाति जिने साक्षादिवेक्षते ॥४६॥ गजं तत्र चतुर्दतं शुभ्रमैरावणोपमं । शुभ्रं दांत दीप्रदंत धूपं पिंडमिव विषां ॥४७॥ तीक्ष्णदंष्ट्र लोलनेनं हर्यक्षं शूरमुज्ज्वलं । देव्याः श्रियोऽभिपेकं च क्रियमाणं दिशां गजैः ॥ ४८॥ सौरभाकृष्टमधुपां नानापुष्पमयीं नजं । कोइ कहे छ के पत्रीश इंद्रो माता पासे श्रावीने कहे छे. या प्रमाणे श्रावश्यकहारिमद्रीमा श्रीपमदेवन गर्मावतारना अधिकारमा कड्युं छे. वळी 'शक्रनुं श्रासन कंप्युं अने यावत् तेणे वाणारसीमा भावी भगवंतनी माताने अभिनंदन कयु. 'श्रा प्रमाणे श्री उत्तराध्यय- नना केशी-गौतमीय अध्ययननी प्राकृत वृत्तिमा का छे.श्री शांतिनाथ चरित्रमा-गर्माचासने दिवसे हर्षपूर्वक इंद्रे श्रावीने अमने तथा प्रभुने वंदना करी तेथी आ पात घटेज छे' एयु श्री शांतिनाथना मातापितार्नु वचन देखाय छ या प्रमाणे होवाथी प्रथम कल्या- पकना उत्सवनी पद्धति बहुधुतोथी जाणी लेवी. हो प्रभु व्यच्या ते अवसरे देवगृह जेवा वासगृहमा देवशय्या जेवी शय्यामा सुतेला एपा मृगसमान नेत्रवाळा, समधातुवाळा, सुप्रसन्न चित्तवाळा माता जे रात्रिए जिनेश्वर गर्भमा श्रावे ते रात्रिए मध्यरात्रिने वसते साक्षात्नी जेम चौद स्वप्न देखे (४५-४६ ) ते चौद स्वप्न था प्रमाणे-चार दांतवाळो. उज्वळ, भैरावण जेवो हस्ती १, उज्वळ, शांत, देदीप्यमान दांतयाळो, जाणे कांतिनो पिंड होय तेयो घृषम २, तीक्ष्ण दाढवाळो, चपळ नेत्रवाळो, शूरवीर अने उज्वळ सिंह ३, दिग्गजोबडे अभिषेक करावी लक्ष्मीदेवी ४, मुगंधबडे भाकर्पित थयेला भ्रमरोवाळी अने नाना प्रकास्ना पुष्पवडे गुंथेली माळा ५, क्षीरसागरमाथी नीकळेलो जाणे मापणनो पिंड होय तेवो पूर्णचंद्र ६, लोकोना नेत्रोने (१९८) भीकामकोकप्रकारा। पूर्ण चंद्रं नवनीत-मिवोन्नीतं सुधांवुधेः ॥ १९ ॥ सहस्रकिरणं लोक- लोचनालोचनौपधं । शुभ्रमनंलिहं कंप्रं हर्यक्षांकं महाध्वजं ॥ ५० ॥ कलशं जलसंपूर्ण रौप्यं पद्मप्रतिष्ठितं । पूर्ण पद्मसरः पद्म-प्रकरालं- कृतोदकं ॥ ५१ ॥ वियच्चुंविचलल्लोल-कल्लोलं क्षीरसागरं । दीप्यमानं विमानं च दिव्यतूर्यत्रिकांचितं ॥ ५२ ॥ अनय॑नानारत्नानां निकर मंदरोच्छूितं । निर्दूममुज्ज्वलज्वालं घृतसिक्तं महानलं ॥ ५३ ॥ श्रेय. स्करान् महास्वप्नान् सुखदान् कीर्चनादपि। निरीक्ष्यैतान् मृगाक्षी सा भृशं प्रमुदिताभवत् ॥५४॥ निर्गत्य नरकाद्यस्याः कुक्षावेति जगत्पतिः । स्वभावात्सा विमानस्य स्थाने भवनमीक्षते ॥ ५५ ॥ सार्वभौमस्य मातापि स्वप्नानेतान्निरीक्षते । किंतु किंचिन्न्यूनकांती-नहन्मातुरपेक्षया ॥ ५६ ॥ तथा चोक्तं-चतुर्दशाप्यमून् स्वप्नान् या पश्येत् किंचिदस्फु. टान् । सा प्रभो प्रमदा सूते नंदनं चक्रवत्तिनं ॥ १॥ इयं पुनर्जया देवी स्फुटानेतानलोकत । तन्नाथ त्रिजगन्नाथं जिनं सा जनयिष्यति ॥२॥ इति श्रीवासुपूज्यचरित्रे. यस्याः पुत्रो भवेत्सार्व-भौमोऽहंश्चेह जोवा माटे अपूर्व औषधि जेवो सूर्य ७, उजळो, भाकाशपर्यत लायो, कंपतो अने सिंहना चिन्हवाळो महाध्वज ८, जळथी भरेलो, रुपानो, पद्मवडे ढांकेलो कळश ९, पद्मना समूहथी अलंकृत पाणीवालं पूर्ण पद्मसरोवर १०, आकाशने चुंबन करता उछ. ळता चपळ तरंगोवाळो क्षीरसमुद्र ११, दिव्य एवा त्रण प्रकारना वागता वाजिनो युक्त दीपतुं एई देयविमान १२, अमूल्य एवा नाना प्रकारना रनोनो मेरुपर्वत जेवडो ढगलो १३, निधूम, उज्वळ ज्वाळावाळो अने पीए सींचलो एवो अग्नि १४, (४७-५३) श्रा प्रमाणे श्रेयस्कर अने कीर्तनथी (नाम लेवाथी) पण सुख प्रापनार एवा महा स्वप्नो जोइने मृगाची एवी ते राणी घणी हर्पित थाय. (५४) तीर्थकर नरकमांची नीकळीने जे मातानी कुक्षिमा श्राव्या होय ते माता स्वभावथीज विमानने स्थाने भुवन देखे छे. (५५) चक्रवर्तीनी माता पण श्राज चौद स्वप्नो देखे थे, पण ते अरिहंतनी माताए जोवाता स्वप्नो करता काइक हीन कातिवाळा होय छे. (५६) कयुं छे के " हे स्वामी ! आज चौद स्वप्नो काइक अस्फुट एवा जे माता जुए छे ते चक्रवर्ती एवा पुत्रने प्रसवे छ (१) श्रा जयादेवीए वो ए चौद स्वप्नो बहु स्फुट जोया के तेथी हे नाथ ! ते त्रण जगतना नाथ एवा जिनने जन्म प्रापशे. (२) "या प्रमाणे श्री वासुपूज्यचरित्रमा कां छे. जे मावानो पुत्र एक जन्ममा अरिहंत ने चक्रवर्ती बे पदवीधर थवानो होय तेनी माता सर्ग ३० मो। (१९९) जन्मनि । सा द्विः स्वप्नानिमान् पश्ये-त्तथोक्तं पूर्वसूरिभिः ॥ ५७ ॥ अचिरा नाम तत्पत्नी शीललीलासमुज्ज्वला । सा द्विश्चर्तुदश स्वप्ना- निशाशेपे व्यलोकयत् ॥ ५८ ॥ इति वृद्धशनुंजयमाहात्म्ये. एषामन्यतरान् स्वप्नान् लोकयेद्वासुदेवसूः । चतुरो बलदेवांवा- थैकं मांडलिकप्रसूः॥५९॥ प्रतिकेशवमाता तु त्रीन् स्वप्नानवलोकयेत् । मातेकं पश्यति स्वप्नं मुनेरपि महात्मनः ॥६०॥ तथाचोक्तं सप्ततिश. तस्थानके-जिणचक्कीणय जणणी नियंति चउदस गयाइवर सुविणे । सग चउ तिणि इगाई हरिवलपडिहरिमंडलियमाया ॥१॥श्रीहीरप्रश्नोत्तरे- ऽप्युक्तं-प्रतिवासुदेवे गर्भावतीणे तन्माता कियतः स्वप्नान् पश्यतीत्यत्र त्रीन् स्वप्नान् पश्यतीति ज्ञायते सप्ततिशतस्थानकशांतिचरित्राद्यनुसारे- णेति. श्रीहेमरामचरित्रे तु रावणप्रतिवासुदेवे गर्भावतीर्णे तन्मात्रा कैकस्या एक एव स्वप्नो दृष्ट इत्युक्तमस्ति. तथा च तद्ग्रंथः-यन्यदा कैकसी स्वप्ने विशंतं स्वमुखे निशि । कुंभिकुंभस्थलीभेद-प्रसक्तं सिंह- चे वखत आ चौद स्वप्नो जुए छे. ते विषे पूर्वाचार्योए कहुं छे (५७) के-" शीलनी लीलावडे समुज्वळ एवी अचिरा नामे विश्वसेन राजानी पत्नी शेप रात्रीए पूर्वोक्त चौद स्वप्नोने ये वार जोती हवी." (५८)मा प्रमाणे श्री घृद्धशत्रुजयमाहात्म्यमा कयुं छे. या चौदमाथी कोइ पण सात स्वप्नो वासुदेवनी माता जुए थे. बळदेवनी माता चार स्वप्नो जुए छ भने मांडलिक राजानी माता एक स्वप्न जुए छे. (५९) प्रति- चासुदेवनी माता प्रण स्वप्नो जुए छे अने महामुनिनी माता पण एक स्वप्न जुए छे. (६०) श्रीसप्ततिशतस्थान ग्रंथमा कयु छ के- तीर्थकर भने चक्रवानी माता हाथी विगैरे श्रेष्ठ चौद स्वप्नो जुए छ, भने सात, चार, प्रण अने एक स्वप्न वासुदेव, बलदेव, प्रति- वासुदेव ने मांडलिकनी माता मनुक्रमे जुए थे' (१) श्री हीरप्रश्नोत्तरमा पण कटु छ के-'प्रतिवासुदेष गर्भमां भाव्ये सते तेनी माता केटला स्वप्नो देसे? तेना उत्तरमा कहे- वानुं के प्रण स्वप्न देखे एम सप्ततिशतस्थान अने शांतिचरित्र विगेरेने अनुसारे जणाय छे' श्री हेमचंद्राचार्यकृत रामचरित्रमा तो रावण मतिवासुदेव गर्भमा भाये सते तेनी माता कैफसीए एक स्वप्न दीई एम फहेल छे. ते संबंधी श्लोक भा प्रमाणे 2-" एकदा फैकसीए स्वप्नमा रात्रिए हाथीना कुंभस्थळने भेदवामा तत्पर थयेला सिंहने पोताना मुखमा प्रवेश करतोजोयो" (१) महामुनि यनारनी माता पण एक स्वप्न देखे एम फयु के (२००) श्रीकाललोकप्रकाश। मैक्षत ॥ १॥ मुनिमातुरेकस्वप्ननिरीक्षणं च मेघकुमारादिमातृवत. सोपेत्य कांतं विनया-प्रबोध्येतान्निवेदयेत् । सोऽपि स्वप्नफलं ब्रूते विश्वोत्कृष्टांगजोद्भवं ॥ ६१ ॥ श्राकार्य स्वप्नशास्त्रज्ञान प्रातरंतःसभं ततः। नृपः स्वप्नफलं पृच्छे-त्तेऽपि शास्त्रानुसारतः ॥ ६२ ॥ वंदंत्येवं महाराज सुतो भावी भवत्कुले । तीर्थंकरो वा चक्री वा महास्वप्नानुभा वतः॥ १३ ॥ स्वप्नशास्त्रे यतः प्रोक्ताः सर्वे स्वप्ना द्विसप्ततिः । तत्र त्रिंशन्महास्वप्ना-स्तेषु चैते चतुर्दश ॥ ६४ ॥ इत्याकर्ण्य प्रमुदिता पुत्रजन्ममनोरथान् । दधाना विविधान् राज्ञी सा कुर्याद्गर्भपोपणं ॥६५॥ गर्भानुभावोत्पन्नानां दोहदानां शुभात्मनां । सा सेवनात्प्रपूर्णेच्छा स. श्रीका शोभतेऽधिकं ॥ ६६ ॥ अथानुकूले मरुति प्रसर्पति सुखावहे । भूमौ निष्पन्नशस्यायां फलपूर्णेषु च द्रुषु ॥६७॥ ग्रहेषु सर्वेपूच्चेपु निमित्तेषु शुभेषु च । छत्रादिजन्मयोगेषु शुभे लग्ननवांशके॥ ६८ ॥ जने प्रमुदिते श्रेष्ठे निमित्ते शकुनादिके । अर्द्धरात्रे प्रसूते सा जिनं पोताने स्वप्न ते मेघकुमारादिकनी माताए जोयेल छे ते प्रमाणे समजवू. पछी माता ज्यां पोताना स्वामी सुता होय त्यां प्रावीने विनयपूर्वक तेमने जगाडीने ध्यानी हकीकत निवेदन करे. पण 'विश्वमा उत्कृष्ट एवो तने पुत्र थशे' एवं स्वप्नफळ कहे (६१) प्रभाते स्वप्नशास्त्रना जाणनार स्वप्नपाठकोने राजा समामा बोलाये अने राजा तेने स्वप्न फळ पूछे. तेश्रो पण शास्त्रानुसारे कहे छ के-हे महाराज ! पा महा स्वप्नना अनुभावधी तमारा कुळमा तीर्थकर अथवा चक्रवर्ती पुत्र थशे. (६३) कारण के स्वप्नशास्त्रमा कुल ७२ स्वप्नो कया छे. तेमा त्रीश महा स्वप्नो कथा छ, तेमाथी आ १४ स्वप्नो छे. (६४) स्वप्नपाठक पासेथी या प्रमाणे सांभळीने हर्षित थयेली राणी पुत्रजन्मने लगता अनेक प्रकारना मनोरथो करती सती सारी रीते गर्भन पोपण करे (६५) गर्भना अनुभावी उत्पन्न थता शुभ दोहलाने राजा पूर्ण करे एटले पूर्णेच्छावाळी माता अधिक शोमाने धारण करे. (६६) पछी अनुकूळ अने सुखावह पवन चातो होय त्यारे, सर्वभूमि धान्य निष्पन्न थयेली होय त्यारे अने वृक्षो फळथी पूर्ण थयेल होय त्यारे तेमज सर्व ग्रहो उच्च स्थाने आवेला होय, शुभ निमित्तो मळ्या होय भने छत्रादि शुभ जन्म योग भाव्या होय, शुभ एवा लग्ननो नवांश होय त्यारे भने लोको सर्व प्रमदित होय, शकुनादिक शुमनिमिच वर्तता होय ते वखते सर्ग ३० मो। (२०१) निधिमिव क्षितिः । ।। ६९ ॥ उच्चग्रहास्त्वेवं-अर्कााच्चान्य जवृष- मृगकन्याककमीनवणिजोशैः । दिग्दहनाष्टाविंशति-तिधीषु नक्षत्रवि- शतिभिः ॥७॥ छत्रादियोगास्त्वेवं-द्वितीये द्वादशे मूर्ती सप्तमे भवने ग्रहाः । छत्रयोगस्तदा ज्ञेयः पुत्रो जातो नृपो भवेत् ॥७१ ॥ धने व्यये रिपुस्थाने मृत्युस्थाने यदा ग्रह । योगः सिंहासनी नाम देवानामपि दुर्लभः ।। ७२ ॥ तृतीये पंचमे स्थाने नवमैकादशे ग्रहाः । वनयोगस्तदाख्यातः सर्वसौख्यकरस्सदा ॥ ७३ ॥ चंद्रात्त- समगो जीवो-ऽथवा स्याञ्चंद्रसंयुतः । जीवयोगं तमित्याहु-श्चिरायुः सुखवान् भवेत् ॥७४ ॥ केंद्रस्थानेषु सर्वेपु यदि सौम्यग्रहस्तदा । चतुःसागरयोगोऽयं देवानामपि दुर्लभः ॥ ७५ ॥ इत्यादि. तदा दिशः प्रसीदति सर्वाः प्रमुदिता इव । भवेन्नित्यांधकारेषु प्रकाशो नरकेस्वपि ॥ ७६ ॥ तथोक्तं स्थानांगेऽर्थतः-चतुर्भिः स्थान- अर्धरात्रे पृथ्वी जेम निधानने प्रसवे तैम माता पुत्रने जन्म आपे (प्रसवे ) (६९) उच्च ग्रहो आ प्रमाणे-मेष राशिनो सूर्य दश अंश, वृष राशिनो चन्द्र पण अंश, मकर राशिनो मगळ अहावीश अंश, कन्या राशिनो बुध पंदर अंश, कर्क राशिनो गुरु पांच अंश, मीन राशिनो शुक्र सतावीश अश अने तुला राशिनो शनि वीश अंश सुधी उच कहेवाय छे. (७०) वळी छत्रादि योग या प्रमाणे-बीजे, चारमे, पहेले अने सातमे मवने उच्च ग्रहो श्राव्या होय त्यारे छत्रयोग थाय छे. ते वखते जन्मेल पुन राजा थाय के. (७१) घने (२) व्यये (१२) रिपू (६ ) स्थाने अने मृत्यु (८) स्थाने ज्यारे अहो भाग्या होय त्यारे सिंहासन नामनो योग धाय छे ते देवोने पण दुर्लभ ले (७२) त्रीजे, पांचमे, नवमे अने अग्यारमे स्थाने ग्रहो पाव्या होय त्यारे पळ नामनो योग थाय छ, ते सर्व प्रकारना सुखनो करनार छे. (७३ ) चन्द्रधी सातमे स्थाने बृहस्पति भावेल होय अथवा चन्द्र संयुत होय स्यारे जीवयोग थाय छे, ते चिरायु करनार नेमज सुस भापनार छे. (७४) सर्व केंद्रस्थान (१-४-७-१०) मा ज्यारे सौम्य ग्रहो मान्या होय त्यारे चतु:सागरयोग थाय छे, ते देवोने पण दुर्लभ छे. इत्यादि (७५) प्रमुना जन्म बखते सर्व दिशाभो पण जाणे प्रमुदित थइ होय तेम प्रसन देखाय के भने नित्यधिकारवाळा नरकमां पण प्रकाश थाय छ, (७६) श्री स्थानांगसूत्रमा आ १ (२०२) श्रीकाबलोकप्रकाश कैरेभि-लोकोद्योतः प्रसर्पति । अहज्जन्मज्ञानदीक्षा-स्तेषां मोक्षोत्सवेऽपि- च ॥ १॥ तत्रायांति तदा द्राक् पट्-पंचाशदिक्कुमारिकाः । कंपा- सनाः प्रभोर्जन्म विज्ञायावधिचक्षुषा ॥ ७७ ॥ तथाहि- भोगंकरा १ भोगवती २ सुभोगा ३ भोगमालिनी ४ । तोयधारा ५ विचित्रा च ६ पुष्पमाला ७ त्वनिदिता ८ ॥७८॥ श्रष्टाधोलोकवा- सिन्यः किलेता दिक्कुमारिकाः । वदंत्यन्योन्यमाकार्य जातो भो जगदी. श्वरः ॥ ७९ ॥ जीतं नो दिक्कुमारीणा-मित्यधोलोकवेश्मनां । त्रैका- लिकीनां यज्जन्मो-सवः कार्यो जिनेशितुः ॥ ८० ॥ यामस्ततो वयमपि कृत्वा श्रीजगदीशितुः । सूतिकर्मादिकां सेवां कुर्महे सफलं जनुः॥ ८१ ॥ निश्चित्यान्योन्यमित्येताः प्रत्येकं स्वाभियोगिकान् । श्राज्ञापयंति निर्मातुं विमानं गमनोत्सुकाः ॥ ८२ ॥ तेऽपि योजनविस्तीर्ण रत्नस्तंभशतांचितं । विचित्रचित्रं निर्माय ढोकयति तदद्भुतं ॥ ८३ ॥ सामानिकानां देवानां ताश्चतुर्भिः सहस्रकैः। महत्तराचतुष्केण प्रत्येकं समुपासिताः ॥ ८४ ॥ अनीकैः सप्तभिः सेना-धिपैर्देवश्च सप्तभिः। सहस्रश्च पोडशभि-देवाना- प्रमाणे अर्थयी कह्यु के के-" श्ररिहंतना जन्म, दीक्षा, ज्ञान अने मोच कन्यायक वखते- ए प्रमाणे चार कल्याणके सर्व लोकमां उद्योत प्रसरे छ. " ते वखते तरत ज ५६ दिशा- कुमारिका श्रासनप्रकंपथी अवधिज्ञानवहे प्रभुनो जन्म भयले जाणीने त्या भावे बे. (७७) ते पा प्रमाणे-भोगकरा १, भोगवती, सुमोगा ३, मोगमालिनी ४, तोयधारा ५, विचित्रा ६, पुष्पमाळा ७ ने श्रीनदिता ८-नामनी माठ अधोलोकवासी दिग्कुमा- रिका भन्योअन्य एक पीजीने पोलावीने कहे छ के-"प्रानो जन्म थयो छे. (७९) श्रा प्रमंगे श्रापणो अधोलोकवासी दिवकुमारिकानो त्रणे काळमां यनारीनो ए जीत (श्राचार ) के के भापणे जिनेश्वरनो जन्मोत्सव करवो. (८०) माटे चालो आपणे त्यां जइए अने श्रीजगदीश्वरनी सूतिकर्मादि सेवा करीने आपणो जन्म सफळ करीए मा प्रमाणे निश्चय करीने गमनोत्सुक एवी ते पोतपोतना भाभियोगिक देवने त्यां जवा माटे विमान रचवानो हुकम करे (८२) ते देव पण वरत ज एक योजन विस्तीर्ण, सो रत्नना स्तमोवाल अने चित्रविचित्र रचनावालुं विमान तैयार करीने तेमनी पासे रजु करे. (८३) एटले ते दरेक देवी पोताना चार हजार सामानिक देवो भने चार महत्तरा देवीमोथी, सेवाती सात सेना, सात सेनाधिपति देवो, सोळ हजार आत्मरचक देवो प्रर्ग ३० मो। (२०३) मात्मरक्षिणां ॥ ८५॥ देवदेवीसमुदाय-रन्यैरप्यमितताः । प्रपन्नदि- व्यवादिन-गीतनाट्या महद्धिकाः ॥ ८६ ॥ तद्विमानं समारुह्य गत्या सत्वरया रयात् । श्रागत्याहज्जन्मवेश्म-न्युत्तरंति विमानतः ॥ ८७ ॥ तिस्रः प्रदक्षिणाः कृत्वा जिनं च जिनमातरं । स्तुति मधुरैर्वात्यै- विनयावनता इति ॥८॥ नमोस्तु ते कुक्षिरत्न-धारिके विश्वदीपिके । लोकनाथस्य जननि स्वयंबुद्धस्य भास्वतः ॥ ८९ ॥ अधोलोकनिवा- सिन्यो वयं स्मो दिक्कुमारिकाः । अर्हज्जन्मोत्सवं कुर्मो भेतव्यं न त्वया ततः ॥ ९०॥ इत्युदीर्य समुद्घातं कृत्वा वैक्रियमंजसा । संवर्तकं विकुर्वति वायुं भूमिविशोधकं ॥ ९१ ॥ चतुर्दिशं ततो जन्म-गेहाद्यो- जनमात्रकं । क्षेत्रं तेन प्रसरता मारुतेन सुगंधिना ॥ ९२ ॥ रजाका. तृणादीनां दुष्टानां दूरमुज्झनात् । क्रियते निर्मलं राज्ञो भृत्येनेव गृहां- गणं ॥ ९३ ॥ युग्मं ॥ प्रशमय्याथ तं वायुं समागत्य जिनांतिके । कृतस्वकार्या गायंत्य-स्तिष्ठति मधुरस्वरं ॥ ९४ ॥ श्रन्यासां दिक्कुमारीणा -मप्यागमनपद्धतिः । इयमेव विशेष. अने बीजा अपरिमित देवदेवीमोथी परिवारित थइने दिव्य एवं वाजित्र, गीत भने नृत्य जेमा थह रहेल छे एवा ते विमानमां महद्धि संयुक्त आरोहण करे, अने उतावळी गति वडे भरिइतना जन्मगृह पासे भावीने विमानमाथी उतरे. (८४-८७) पछी जिनेश्वरने तैम ज जिनमाताने त्रण प्रदक्षिणा दइ विनयवडे नमस्कार करी मधुर वाक्योवडे मा प्रमाणे स्तवना करे (८८) " हे कृषिरत्नधारिके ! विश्वदीपिके ! स्वयंयुद्ध अने सूर्य समान तेजस्वी लोकनाथना हे माता ! तमने नमस्कार छ (८९) अमे अधोलोकवासी दिग्- कुमारिकामो छीए. अमे अरिहंतनो जन्मोत्सव करवा पापी छीए. तमे अमाराथी पीशो नहीं." (९०) भाम कहीने तरत ज वैक्रिय समुद्घात करीने भूमिने शाधनार एवो संवर्वक वायु वि. (९१) पछी प्रभुना जन्मगृहथी चार दिशाए एकेक योजन प्रमाण घेत्रने प्रसरता एवा सुगंधी वायुवडे रज, काठ, तृणादि दुष्ट पदार्थोंने दूर फेंकी देवावडे राजाना सेवकनी जेम राजाना परतुं प्रांगणुं शुद्ध करे. (९२-९३) पछी ते वायुने समावी दइने पोवानुं कार्य समाप्त करी प्रस पासे भागी मधुर स्वरे गाती गाती उमी रहे. (९४) पीजी पण दिक्कुमारिकामोनी भागमन परति मा प्रमाणे ज समजवी. तेमना .

(२०४) भीकाललोकप्रकाश। स्तु कर्तव्यः सोऽत्र वक्ष्यते ॥ ९५ ॥ मेघंकरा १ मेघवती २ सुमेघा ३ मेघमालिनी ४ । सुवत्सा ५ वत्समित्रा च ६ वारिपेणा ७ घलाहका ८ ॥ ९६ ॥ अष्टो लोकवासिन्य इत्येता दिक्कुमारिकाः । विकृत्य गगने मेघान् सुगंधिजलवर्षणैः ।। ९७ ॥ पूर्व प्रमार्जितं क्षेत्रं भृत्या इव नृपां- गणं । अपंकिलं रजोमुक्तं कुर्युः सुरभि शीतलं ॥ ९८॥ युग्मं ॥ ततो विसृज्य तान् मेघान् पुप्पमेघान् विकृत्य च । तयोजनमितं क्षेत्रं शक्रस्येव सभांगणं ॥ ९९ ॥ पंचवर्णप्रसूनानां प्रकरण सुगंधिना । जानुमात्रोच्चन घृत-स्थायिना परिमंडितं ॥ १०० ॥ कृष्णागुरुतुरुष्कादि- सुगंधिद्रव्यजन्मना ॥ धूपेन धूपितं कुर्युः क्रीडाहं घुसदामपि ॥१॥ त्रिभिर्विशेषकं ।। नंदोत्तरा १ तथा नंदा २ श्रानंदा ३ नंदिवर्द्धना वि. जया ५ वैजयंती ६ च जयंती ७ चापराजिता ८ ॥२॥ पूर्वरुचक- वास्तव्या इत्येता दियकुमारिकाः । एत्य नत्वा जिनं सांवं गायंत्यादर्श पाणयः ॥ ३॥ समाहारा १ सुप्रदत्ता २ सुप्रबुद्धा ३ यशोधरा ४ । लक्ष्मीवती ५ शेषवती ६ चित्रगुप्ता ७ वसुंधरा ८ ॥४॥ याम्यदिग्- कर्चव्यमा जे विशेषपणुं छे ते कहे छे. ( ९५ ) मेघंकरा, ‘मेघवती, सुमेघा, मेघमालिनी, सुवत्सा, वत्समिना, वारिपेणा अने पलाहका-मा नामनी पाठ ऊर्ध्वलोकवासी दिक्कुमारिका प्रभुना गृहपासे आधी ( प्रभु तथा माताने नमी) भाकाशमा मेघ विकुर्वी सुगंधी जळ वरसावीने पूर्व प्रमार्जित करेला क्षेत्रने सेव- कोनी जेम राजाना प्रांगणाने रज रहित, पंक रहित, सुगंधी अने शीतळ करे. (९६-९८) त्यारपछी जळना मेघने विसर्जीने पुष्पना मेघने विकुर्वी ते योजनप्रमाण क्षेत्रने शक्रनी सभाना प्रांगणानी जेम पांच वर्णना सुगंधी एवा पुप्पोनो समूह वरसावीने नीचा डीटवाळा पुष्पोथी जानुप्रमाण व्याप्त करे. (९९-१००) पछी कृष्णागुरु ने तुरुष्कादि सुगंधी द्रव्योथी बनावेला धूपबडे ते जमीनने धूपित करी देवोने पण क्रीडा करवा योग्य ते क्षेत्रने बनावे. (१०१) (पछी गाती सती प्रभुपासे उभी रहे.) त्यारपछी नंदोत्तरा, नंदा, आनंदा, नंदिवर्धना, विजया, वैजयंती, जयंती ने अपरा- जिता-नामनी पूर्वरुचकपर रहेनारी पाठ दिक्कुमारिका त्या भावी प्रभने अने प्रभुनी माताने नमी मा दर्श लइने उभी रहे. (१०२-३) पछी समाहारा, सुप्रदचा, सुप्रबुद्धा, यशोधरा, लक्ष्मीचती, शेषवती, चित्रगुप्ता ने वसुंधरा नामनी दक्षिण रुचक- 4 - सर्ग ३० मो। (२०५) रुचकादेता एत्याप्टौ दिक्कुमारिकाः । गायंति पूर्णकलशकरा दक्षिणतः प्रभोः ॥ ५॥ इलादेवी १ सुरादेवी २ पृथ्वी ३ पद्मावतीति ४ च । एकनासा ५ नवमिका ६ भद्रा ७ शीतेति ८ नामतः ॥ ६॥ पा- श्चात्यरुचकादेताः समेता दिक्कुमारिका: । गायंत्यात्ततालवताः प्रभोः- पश्चिमतः स्थिताः ॥७॥ अलंबुसा १ मिश्रकेशी २ पुंडरीका ३ च वारुणी ४ । हासा ५ सर्वप्रभा ६ श्री ७ ही ८-रित्यष्टौ दिक्कुमारिकाः ॥८॥ उदीच्यरुचकादेत्य प्रभोरुत्तरतः स्थिताः। वीजयंत्यश्चामराणि मुदा गायति तद्गुणान् ॥ ९॥ चित्रा १ च चित्रकनका २ शतेरा ३ च ततः परा । सौदामिनी ४ चतस्रोऽमू-विदिगुरुचकमंदिराः ॥ १० ॥ दिक्कुमार्योऽभ्येत्य नत्वा विदिक्षु चतसृष्वपि । सुष्टु तिष्ठति गायंत्यो दीपिकाव्यग्रपाणयः॥ ११ ॥ रूपा १ रूपासिका २ चापि सुरूपा ३ रूपकावती ४। एता मध्यम- रुचक-वासिन्यो दिक्कुमारिकाः ॥ १२ ॥ वर्द्धयित्वा प्रभोलिं चतुरंगु- लवर्जितं । भूमौ निधाय सद्रत्न-स्तरखातं पूरयंति च ॥ १३ ॥ पीठं . बासी दिक्कुमारिका त्यां आधी ( प्रभु अने माताने नमी) पूर्ण कळरा हाथमां लइने दक्षिण पाजुए गाती सती उभी रहे. (१०४-५) पछी इलादेवी, सुरादेवी, पृथ्वी, पद्मा- वती, एकनासा, नवमिका, भद्रा ने शीवा-ए आठ दिक्कुमारिका पश्चिम रुचकथी श्रावीने (प्रभु तथा माताने नमी ) हाथमा पंखा लइ गाती सती प्रभुनी पश्चिम वाजुए उभी रहे. (१०७ ) पछी अलंघुसा, मिश्रकेशी, पुंडरीका, वारुणी, हासा, सर्वप्रमा, श्री ने ही-ए आठ दिक्कुमारिका उत्तर रुचकथी भावीने (प्रभु तथा माताने नमी) चामर वीजती अने हर्पथी प्रभुना गुण गाती सती प्रभुनी उत्तर पाजुए उमी रहे. (१०९) पछी चित्रा, चित्रकनका, शतेरा ने सौदामिनी-ए चार दिक्कुमारिका विदिशाना रुचक पर्वतोथी श्रावी, प्रभुने तथा माताने नमीने हाथमा दीपक लइ प्रमुना गुण गाती सती चारे विदिशामा उभी रहे. (१११) पछी रूपा, रूपासिका, सरूपा ने रूपकावती-मा चार दिक्कुमारिका मध्य रुचकर्मा रहेनारी प्रभुना गृहे भावी (प्रभुने तथा माताने नमी) प्रभुतुं नाळ चार भंगुळ उपरांतनुं थेदीने भूमिमां नाखी ते खाडो उत्तम रत्नोपडे पूरी देनी उपर पीठ बांधे (२०६) श्रीकामोकप्रकारा। वध्वा तदुपरि दूर्वोकुरान् वपंति च । अहंदंगेप्रतीकस्य मा भूदाशातनेति ताः ॥ १४ ॥ दिक्त्रये पश्चिमावर्जे कुर्वति कदलीयहान् । तेप्वेकैकं चतु:- शालं वेश्म सिंहासनान्वितं ॥ १५ ॥ ततो गृहीत्वा तास्तीर्थ-करं स्व- करसंपुटे । दत्तालंबा जिनांबां च पुरस्कृत्येश्वरीमिव ॥ १६ ॥ स्वामि- नीत इत इति नीत्वा दक्षिणदिग्गृहे । सिंहासने चोपवेश्य मृदुवि- ज्ञप्तिपूर्वकं ॥ १७ ॥ शतपाकादिभिस्तैलै-रभ्यंति सुगंधिभिः । उद्वर्त्तयन्ति सुरभि-द्रव्योद्वर्तनकैस्ततः ॥ १८ ॥ त्रिभिर्विशेषकं ॥ ततः प्राग्वत्समानीय पौरस्त्यकदलीरहे । सिंहासने स्थापयंति स- प्रभु प्रभुमातरं ॥ १९॥ गंधोदकैस्तथा पुष्पो-दकैः शुद्धोदकैरपि । मज्जयित्वा प्रकुर्वति सर्वालंकारभूषितां ॥ २०॥ समानीय ततः प्राग्व. दुदीच्यकदलीरहे । अध्यासयंति तां सिंहासनेकन्यस्तनंदना ॥ २१ ॥ गोशीपचंदनधास्या-नाययंत्याभियोगिकैः। शरकारणिमाथेनो-पादयं- त्यनलं नवं ॥ २२ ॥ संधुक्ष्योद्दीपयंत्यग्निं शकलैश्चांदनैः कृशैः। चंदनानि भने ते पीठ उपर दुर्वाकुरने वावे. मा क्रिया प्रभुना अंगभूत विभागनी पण कोइ. पाशातना न करे ते माटे करे. (११४) पछी पश्चिम सिवायनी त्रण दिशामांत्रण उना घर करे भने ते दरेकमा सिंहासन सहित एकएक चतुःशाले करे. (११५) पछी प्राने पोताना करसंपुटमा लइने अने माताने स्वामिनीनी जेम हाथर्नु भालंबन दइने 'हे स्वामिनी ! आम चालो, श्राम चालो,' एम कहेती दक्षिणदिशाना कदळीगृहमा लावे भने माताने कोमळ विज्ञप्तिपूर्वक सिंहासन उपर बेसारे. (११७ ) पछी सुगंधी एवा शतपाकादि तेलवडे प्रभुनी माताने अभ्यंगन करे अने सुगंधी द्रव्यवाळा उद्वर्तनवडे उद्वर्तना करे. (११८) पछी प्रथमनी जेम पूर्व बाजुना कदळीगृहमा लावीने सिंहासनपर बेसारी प्रभु सहित माताने गंधोदक, पुष्पोदक ने शुद्धोदकपडे न्हवरावे, अने ( शरीर कोरं करी) सर्व वस्त्रालंकारथी विभूषित करे. (१२०) पछी प्रथमनी जेम उत्तर वाजुना कदळीगृहमा लावी खोळामां बेसाडेला पुत्र सहित माताने सिंहासनपर वेसारे. (१२१) पछी भाभियोगिक देव पासे गोशीर्षचंदनना लाकडां मंगावी शरक ने अरणिना मंथन- बडे नयो अाग्न प्रगटावे. ( १२२) चंदनना काप्टोवडे तेने प्रदिप्त करे. पछी तेमा १ दिका मथवा बाजोठ.

सर्ग ३० मो। (२०७) ततो हुत्वा रक्षां कुर्वति पावनां ॥ २३ ॥ प्रभोश्च प्रभुमातुश्च रक्षापोट्ट- लिकां तया । वनंति ता दुष्टशाकि-न्यादिदृग्दोषघातिनीं ॥ २४ ॥ श्रा. स्फाल्य रत्नरचना-चित्रौ वृत्ताश्मगोलकौ । भूयाः शैलायुरित्याशी-गिरं संगिरते प्रभोः ॥ २५ ॥ प्रभु करतले धृता गृहीत्वांवां च वाहयोः । जन्मवेश्मनि शय्यायां नीत्वा गायति भक्तितः॥ २६ ॥ एवं च दिक्कुमारीभिः कृते जन्मोत्सवे प्रभोः । सिंहा- सनं सुरेंद्रस्य कंपते युधि भीरुवत् ॥ २७ ॥ सोऽप्यर्हजन्म विज्ञाय प्रयुक्तावधिचक्षुपा । उत्थाय विनयं प्राग्य-स्कुर्याच्छकस्तवावधि ॥२८॥ ततः पूर्वामुखः शक्रः शक्रसिंहासने स्थितः । चतुरश्चिंतयत्येवं जातोऽयं जगदीश्वरः ॥ २९ ॥ तज्जीतमेतदस्माकं त्रैकालिकमरुत्वतां । कार्यो यदहतां स्फीतो जन्मकल्याणकोत्सवः ॥३०॥ इति निश्चित्य पादा- त्य-नायकं नैगमेपिणं । श्राकार्य ज्ञापयत्येवं स्व-पतिर्विनयानतं ॥३१॥ स्वर्गेऽस्मिन् सर्वदेवानां घंटावादनपूर्वकं । प्रस्थानं ज्ञापयास्माकं जिन- गोशीर्षचंदन होमी तेनी पवित्र रक्षा करे. ( १२३ ) भने ते रवानी घे पोटली करीने माताने भने प्रसने हाथे दुष्ट शाकिन्यादिनो टिदोप न लागवा माटे पांघ. (१२४ ) पछी रत्ननी रचनावडे विचित्र एवा पत्थरना ये गोळा परस्पर भफळाचीने 'हे प्रभु ! समे पर्वत समान दीर्घ आयुपवाळा यामो.' एम माशीप भापे. (१२५) पछी प्रसने करसंपुटमां लइ माताना हायने टेको आपी मने जन्मगृहमा लावी तेमनी शय्यापर सारे अने घी दिक्कुमारिकामो भक्तिधी गायन करीने पोतपोवाने स्थाने जाय. (१२६) इति दिक्कुमारिकाकृत जन्मोत्सव. आ प्रमाणे प्रभुनो जन्मोत्सव करीने दिपकुमारिका जाप एटले युद्धमा पीकणनी नेम सरेंद्रनुं भासन कंपायमान पाय. (१२७) एटले भवधिज्ञानवडे उपयोग देता ममनो जन्म पएल जाणीने शासनधी उठी शस्तव कहेवा सुधी सर्व प्रकारनी विनय पूर्ववत् करे. (१२८ ) पछी शक पूर्वाभिमुसे पोवाना सिंहासनपर पेसी चतुर एवो पोवे एम पिचारे के-'जगदीधर (वीकर )नो जन्म थयो 2. (१२९ ) तो प्रणे काळमा पनारा इंद्रोनो ए आधार के के वेणे मरिहवना जन्मकल्याणकनो उरसव पर सारी रीठे करवो. ( १३०) मा प्रमाणे निथप करीने पोतानी पदाति सेनाना नायक नेगमेपी देखने बोला भने नमस्कार करता एवा ते देवने स्वर्गनो पति मा प्रमाणे के-(११) मा स्वर्गना सर्प देबोने पटापादनपूर्वक भमाहं जिनमन्मोत्सबमाटे (२०८) भीकामकोकमकाश। जन्मोत्सवाय भोः ॥ ३२ ॥ शिरस्यारोप्य तामाज्ञां स सुधर्मसभागतां । घंटां सुघोषां त्रि(रो वादयत्यन्विताभिधां ॥ ३३ ॥ एतस्यां वादितायां द्राग् घंटाः सर्वविमानगाः । युगपन्मुखरायंते ताग्दिव्यानुभावतः ॥३४॥ शब्दाद्वैतमयः सर्वः स्वर्गः स्यान्नाकिनोऽपि च । त्यक्तान्यकृत्याः शक्राज्ञां शुश्रूपंत्यखिला अपि ॥ ३५ ॥ ततः शांते ध्वनौ तासा-मय- मुद्घोषयत्यदः । देवाः शृण्वंतु शक्राज्ञा-मत्रामुत्र हितप्रदां ॥३६ । जिन- जन्मोत्सवायेंद्रो मर्त्यलोके प्रतिष्ठते । ततस्तत्र भवंतोऽपि सजीभवत सत्वरं ॥ ३७ ॥ मोदंते च तदाकर्ण्य जिनभक्त्युत्सुकाः सुराः। इष्टं वैद्योपदिष्टं च न स्यात्कस्य मन:प्रियं ॥ ३८ ॥ ततो यानविमानाधि-कारिणं पालकामरं । सज्जीकत्तुं विमानं द्रा- गाज्ञापयति वासवः ॥ ३९ ॥ जंबूद्वीपसमायाम-व्यासं पंचशतोच्छ्रितं । पालकाख्यं विमानं साक् सोऽपि निर्माय ढोकयेत् ॥ ४० ॥ तत्रैकैकं त्रिसोपानं प्रागुदग्याम्यदिनये । रत्नस्तंभशतो मध्ये स्यात्प्रेक्षागृहमंडपः जवान जणावो. (१३२) ते देव इद्रनी भाज्ञा मस्तकपर धारण करीने सुधर्मासभामां रहेली सार्थक नामवाळी सुघोपा घंटाने त्रण वार वगाड. ( १३३) ए घंटा चागते सते तेवा प्रकारना दिव्यानुभावथी ए स्वर्गमा रहेला सर्व विमानोनी घंटामो समकाळे वागे. (१३४ ) एटले पाखं स्वर्ग शब्दाद्वैत थह रहे अने सर्व देवो पण वीजा सर्व कार्य तजी दइने इंद्रनी आज्ञा शुं छे ते सामळवाने धान थइ जाय. (१३५ ) घंटानो पनि शांत थये सते नैगमेपी देव आ प्रमाणे उद्घोष । करे--" हे देवो ! तमे आ मवमा ने परमवमां हितकारी एवा शक्रनी आज्ञा सामळो-(१३६) जिनेश्वरनो जन्मोत्सव करवा माटे इंद्र मृत्युलोकमां जाय छे, माटे तमे पण तेनी साथै जवा माटे सत्वर सज्ज थइ जाओ." ( १३७) या प्रमाणे शक्राज्ञा सांभळीने जिनभक्तिमा उत्सुक एषा देवो घणो हर्प पामे । वैये कहेलं अने इष्ट एवं वचन सांभळीने कोना मनमां प्रीति न उपजे ?' (१३८) पछी इंद्र यानविमानना अधिकारी पालक देवने पालक विमान सज्ज करवानी प्राज्ञा करे. ( १३९) ते पण तरत ज जंबूद्वीप समान (लाख योजन) लंबाइ-पहोळाह- वालं अने ५०० योजन उंचं पालक विमान तैयार करीने लावे. (१४०) ते विमानमा घडवा माटे पूर्व, उत्तर ने दक्षिण बाजु प्रण त्रण पगर्थीमा होय छे. ते विमानना मध्यमा सर्ग ३० मो। (२०९) ॥४१॥ तस्मिन् रत्नपीठिकाया मध्ये सिंहासनं हरेः । सन्मौक्तिकेन विजय-दूप्येणालंकृतं भवेत् ॥ ४२ ॥ वायुश्रीदेशदिनु स्यु-स्तस्माद्भद्रा- सनानि च । सामानिकानां चतुर-शीतिः सहस्रका इह ॥४३॥ पूर्व- स्यां मुख्यपत्नीना-मष्टौ भद्रासनानि च । प्राग्नेय्यां द्वादश सह-स्रा. ण्यभ्यंतरपर्पदां ॥ ४४ ॥ चतुर्दश सहस्त्राणि याम्यां मध्यमपर्पदा । नैर्ऋत्यां पोडश सह-त्राणि स्युर्वाह्यपर्षदां ॥४५॥ वारुण्यां सप्त सप्तानां सैन्येशानां सुधाभुजां । द्वितीये च परिक्षेपे आत्मरक्षकनाकिनां ॥ ४६॥ स्युः सहस्त्राणि चतुर-शीतिः प्रत्याशमासनाः । सर्वे त्वेषां सपत्रिंश-- सहस्र लक्षकत्रयं ॥४७॥ एपामात्मरक्षकाणामिति. ततस्तुष्टमनाः शको रूपमुत्तरवैक्रियं । अर्हत्सेवाहमुत्कृष्टं कृत्वा सर्वांगभूपितं ॥४८॥ गंधर्वनाव्यानीकाभ्यां गीतसंगीतमोदितः । शच्यादिभिः प्रेयसीभि-रष्टाभिः परिपेवितः ।। ४९ ॥ प्रदक्षिणीकृत्य पूर्व दिक्विसोपानकाध्वना । प्रविश्य पूर्वाभिमुखो निपीदति महासने सेंकडो रत्नना स्तमवाळो प्रेक्षागृहमंडप होय छे. (१४१) तेनी मध्यमा रत्नमय पीठिका थे, तेनी उपर मध्यमा उत्तम मोतीमोथी तेम ज विजयध्य (वस्त्र )थी अलं- कृत इंद्रने पेसवार्नु सिंहासन छे. (१४२ ) ते सिंहासननी वायव्य, उत्तर अने ईशान दिशामा ८४००० सामानिक देवोना ८४००० सिंहासनो के. (१४३) पूर्व दिशाए मुख्य इंद्राणीयोना पाठ मद्रासनो थे. अग्निकोणे १२००० अभ्यतर पर्पदाना देवोना (१४४) दक्षिणे मध्यम पदाना १४००० देवोना भने नेत्रत्य कोणे पाह्य पदाना १६००० देयोना तत्प्रमाण भद्रासनो छे. (१४५) पश्चिम दिशाए सात सेनाधिप- विथोना सात मद्रासनो छ. बीजा परिषेपमा चारे दिशाए चोराशी चोराशी हजार मात्मरक्षक देवोना मळीने कुल ३३६००० भद्रासनो थे. (१४७) पक्षी संतुष्ट मनपालो इंद्र भरिहंसनी सेवा करवाने योग्य उत्कृष्ट एवं सांगभूषित उपरपेक्रिय शरीर करे (१४८) भने गंधर्व तथा नाट्यसेनाए गीत ने संगीतवर्ष पमाडेला तपा पाठ शची विगेरे इंद्राणीप्रोधी सेवावा इंद्र विमानने प्रदक्षिणा दइने पूर्य दिशाना प्रण सोपानपडे उपर पड़ी से मार्ग प्रवेश करी पूर्वामिमुरा सिंहामनपर से. (१५०) (२१०) श्रीकालमोकप्रकाशा ॥५०॥ त्रिभिर्विशेपकं ॥ उदीच्येन त्रिसोपाना-ध्वना सामानिकाः सुराः । प्रविश्यान्ये च याम्येन यथास्थानकमासते ॥ ५१ ॥ जंगमस्वर्गवत्तस्मिन् विमाने प्रस्थिते पुरः। चलंति मंगलान्यष्टौ संपूर्णः कलशस्ततः ।। ५२ ॥ छत्रं पताकाश्चमरा महेंद्राख्यो ध्वजस्ततः । सहस्र. योजनोत्तुंगो लघुध्वजसहस्रयुक् ॥ ५३ ॥ ततः सेनाः पंच सेना-पतयो- ऽथाभियोगिकाः । यथाशक्तिप्रकटित-वपुर्वस्त्रविभूषणाः ॥ ५४॥ पश्चात्के- चित्पुरः केचि-रकेचिच्चोभयपार्श्वतः । परिवृत्य विमानंत-प्रतिष्ठते सुधा- भुजः॥ ५५ ॥ देवेंद्रशासनारकेचि-रकेचिन्मित्रानुवृत्तितः । पत्नीप्रेरणया केचि-स्केचिच्छ्रीजिनभक्तितः ॥ ५६ ॥ केचिद्धर्मधिया केचि-जीतबुद्ध्या सुराः परे । कुतूहलार्थिनो नाना-भूषणांवरवाहनाः ॥ ५७ ॥ प्राच्यपु- ण्यानुसारेण संप्राप्तैश्वर्यशालिनः । देवेंद्रमनुगच्छति सर्वे सौधर्मवासिनः ॥ ५८ ॥ त्रिभिर्विशेषकं ।। सौधर्मस्वर्गमध्येन समृद्ध्यैवं सुरेश्वरः । वीक्षितो देवदेवीभि- पछी उत्तर वाजुना त्रण सोपानवडे उपर चडी सामानिक देवो पोताना भासन पर से भने वीजा देवो दक्षिण बाजुना त्रण सोपानवडे उपर चडी पोतपोताना आसन पर पेसे. (१५१) जंगम स्वर्ग तुल्य ते विमान चालवाने तैयार थये सते पागळ अष्ट मंगलिक चाले. पछी संपूर्ण कळश, छत्र, पताका, चामर अने गहेन्द्रध्वज के जे एक हजार योजन उंची अने नानी नानी हजार वजाओवाळो होय छे ते चाले. (१५३ ) स्यारपछी पांच सेना, पांच सेनापतियो भने यथाशक्ति प्रगट करेल छ शरीर, वस्त्र अने आभूषणो जेणे एवा आमियोगिक देवो पाले. (१५४ ) केटलाक ते विमाननी आगळ, केटलाक पाछळ, केटलाक ये याजुए अने केटलाक देवताओ ते विमानना फरता फरी बळीने चाले. ( १५५ ) केटलाक देवो इंद्रनी आज्ञाथी, केटलाक मित्रनी अनुवृत्तिथी, केटलाक देवांगनानी प्रेरणाथी, केटलाक प्रभुपरनी भक्तिथी, केटलाक धर्मयुद्धिथी, केटलाक पोतानो प्राचार छे एवी बुद्धिथी अने केटलाक कुतूहळ जोवा माटे एम असं- ख्य देवो अनेक प्रकारना वस्त्राभूपण धारण करी जूदा जूदा वाहनपर बेसीने पूर्व- पुण्यना अनुसारे जेमने अश्चर्यनी ओबीवत्ती प्राप्ति थयेल छे एवा सर्व सौधर्म देवलोक- निवासी देवो देवेंद्रनी साथै प्राकाशमार्गे चाले. (१५८) सौधर्म देवलोकना मध्यमां थाने सर्व समृद्धि साथे नोकळता एचा सुरेश्वरने सर्व सर्ग ३० मो। (२११) राश्चर्यस्मेरदृष्टिभिः ॥ ५९ ॥ पंचानीकपरिक्षिप्त-महेंद्रध्वजभाक् पुरः। उदंडशुंडद्विपवद् द्विषां चेतांसि कंपयन् ॥ ६० ॥ दिव्यदुंदुभिनिः- स्वान-ध्वानव्यासनभोंतरः । उत्तराहेण निर्याण-मार्गेणोत्तरति द्रुतं ॥ ६१ । त्रिभिर्विशेषकं ॥ यथा वरपिता लोके राजमार्गेण गच्छति । स्वसमृद्धिं दर्शयितुं जनानां स्वं प्रशंसतां ॥ ६२ ॥ तथेंद्रोऽपि पथानेन जिनजन्मोत्सवादिषु । निर्याति भूयसां वोधि-लब्धये तत्प्रशंसिनां ।।६३।। अथासंख्यद्वीपवाद्धि-मध्येन द्रुतमापतन् । नंदीश्वरे रतिकर-पर्व- तेऽग्निविदिग्गते ॥ ६४ ॥ कृत्वा विमानसंक्षेपं जिनजन्मपवित्रिते। नगरे शीघ्रमागत्य मंदिरं जिनजन्मनः ॥६५॥ द्राक् त्रिप्रदक्षिणीकृत्य विमा- नेन सुरेश्वरः। विमुंचति तदेशान्यां चतुर्भिरगुलैर्भुवः॥ ६६ ॥ विशेत्ततो गृहं स्वाम्या-लोकने घटितांजलिः । पुलकै लदासिक्त-कदंवकुसुमा यितः ॥ ६७ ॥ जिनं समातृकं नत्वा दत्त्वा च त्रिःप्रदक्षिणां । सुरेश्वरो देवदेवीचो श्राश्चर्ययुक्त दृष्टिवडे जोवे. (१५९) पांच प्रकारना सैन्पी वीटायेला, आगळ चालता महेंद्रध्वजयी उंचा करेला शुंडादंडवाळा हस्तीनी जेम शत्रुमोना दिलने कंपावता अने दिव्य दुंदुमिना नादथी आकाशना अंतरने भरी देता सौधर्मेंद्र उत्तर दिशाना मार्गे उतावळा नीचे उतरे. (१६१) जेम श्रेष्ठ जनो लोकमां पोताने प्रशंसता जनोने पोतानी समृद्धि देखाडवाने माटे राजमार्गे चाले छ तेम इंद्र पण जिनजन्मो. त्मवादि प्रसंगे पोतानी प्रशंसा करनारा अनेक जनोने बोधियोजनो लाम थवाने माटे आ मार्गजनीकळे छे.(१६३ ) एवी रीते नीचे उतर्या पछी असंख्य द्वीप समुद्रोनी उपर थइने उतावळा प्रयाण करता नंदीधाद्वीपमा अग्निकोणमा प्रावेला रतिकर पर्वत उपर आवे. (१६४ ) त्यां विमान संक्षेपीने एटले पीजु नानु विमान विने जिनेश्वरना जन्मथी पवित्र थयेला नगरमा जिनेश्वरना जन्मवाळा मंदिर पासे उतावळा श्रावे. (१६५) पछी विमान सहित इंद्र वे मंदिरने प्रण प्रदक्षिणा दहने भूमिथी चार अंगुळ उंचुं ईशानकोणमा ते विमान स्थापन करे. (१६६ ) पछी ते मंदिरमा प्रवेश करे भने स्वामीने देखता ज अंजली जोडी, वरसादथी सींचागेल कदंपवृक्षना पुष्पनी जेम रोमांचित थइने माता सहित प्रसने नमस्कार करे. पछी तेमने प्रण प्रदक्षिणा दइने इंद्र कहे के-" हे जगदपूज्य माता!

। (२१२) भीकाजलोकप्रकारा। वदत्येवं जगत्पूज्ये नमोऽस्तु ते ॥ ६८ ॥ धन्यासि कृतपुण्यासि सफलं तव जीवितं । जगचिंतामणियत्ते कुक्षौ जातो जिनेश्वरः ॥ ६९ ॥ विभा- सि मातस्त्वं विश्व-चक्षुषा शिशुनामुना । लोकंपृणेन शुचिना प्रात:- संध्येव भानुना ॥ ७० ॥ जनयंत्या जगन्नाथं मुक्तिमार्गोपदेशकं । सर्वे पामप्युपकृतं जनानां जननि त्वया ॥ ७१ ॥ विमोहतिमिरोद्रेक-लुप्त- विज्ञानचक्षुषां । प्रददत्यामुमगदं किं नो नोपकृतं त्वया ॥ ७२ ॥ अहं शकोऽस्मि देवेंद्रः सौधर्मस्वर्गनायकः । त्वन्नंदनगुणाकृष्ट इहायातोऽस्मि पावने ॥ ७३ ॥ मातस्ततोऽनुजानीहि न भेतव्यं मनागपि । स्वत्सुतस्य करिष्यामो जन्मकल्याणकोत्सवं ॥ ७४ ।। इत्युदित्वा प्रभोर्मातु-दत्तेऽवस्वापिनीं हरिः। पार्श्वे च स्थापयत्य- स्याः कृत्वा प्रतिकृतिं प्रभोः ॥ ७५ ॥ केनचिद्दुष्टदेवेन हतनिद्रेह मा स्म भूत् । इयं पुत्रमनालोक्य पिंजलेत्ययमुद्यमः ॥ ७६ ॥ यद्वा परि- जनस्तस्या जातमात्रं तदंगजं । अनालोक्य विषादं मा यासीदित्य- यमुद्यमः ॥ ७७॥ तमने नमस्कार थामओ. (१६८) तमे धन्य छो, कृतपुण्य छो, तमारं जीवित सफळ छे; कारणके तमारी कुक्षिथी जगचिंतामणि एवा जिनेश्वर जन्म्या छे. (१६९) हे माता! तमे विश्वना चक्षुरूप ा पुत्रवडे जेम पवित्र भने लोकने प्रीतिकारक सूर्यवडे प्रातासंध्या शोभे तेवा शोभो छो. (१७०) श्रा मुक्तिमार्गना उपदेशक एवा जगनाथने जन्म पापीने तमे हे माता ! सर्व जनो उपर उपकार को छे. ( १७१) मोहरूप तिमिरना उद्रेकथी जेना विज्ञानरूपी चक्षुमो लुप्त थया के तेवा जीवोने औषधरूप प्रा परमात्माने आपता तमे शु उपकार कर्यो नथी ? ( १७२) हुं शक्र नामनो देवेंद्र छ. सौधर्म स्व- गैनो स्वामी छु. तमारा पुत्रना गुणथी भाकर्पित थइने हे पवित्र माता ! हुं अहीं पायो छु. ( १७३ ) हे मावा ! हुं तमारी आज्ञा मागुं छं. तमारे माराथी जरा पण बी नहीं. तमारा पुत्रना जन्मकल्याणक संबंधी उत्सव करीशुं." (१७४) आ प्रमाणे कहीने प्रभुनी माताने अवस्वापिनी निद्रा दइने मातानी पासे प्रमुर्नु प्रति विच करीने मूके. ( १७५ ) कोइ दुष्ट देव निद्रा हरी ले भने माता पोतानी पासे पुत्रने न जोवाधी थाकुळव्याकुळ न थाय ते माटे या उद्यम छे. (१७६ ) अथवा तेना परिजन- मांधी कोइ त्यां श्रावे अने वरतना जन्मेला पाळकने त्यां न जुए तेथी विपाद पामी जाय म न बने वेटला माटे पा उद्यम छे. (१७७) सर्ग ३० मो। (२१३) ततश्चाहतमादत्ते पंचमूर्तिः सुरेश्वरः । मूत्यैकया धौतपूत-धूपिते करसंपुटे ।। ७८ ॥ एकया छत्रमाधत्ते धत्ते द्वाभ्यां च चामरौ । पंच- म्या वजमादाय पुरो गच्छति भृत्यवत् ॥ ७९ ॥ तत्पालकविमानं च रिक्तमेवानुगच्छति । स्वामिनः पादचारित्वा-नृपानुगगजादिवत् ।। ८०॥ तुष्टैः परिवृतो देवैः सानंदः स पुरंदरः । ययौ मंदरमौलिस्थे कानने पांडुकाये ॥ ८१ ॥ एवं च- ज्ञाताहजन्मनेशान-स्वामिना शूलपाणिना । श्रादिष्टः पूर्ववत्पत्ति- प्रष्ठोऽलघुपराक्रमः ॥ ८२ ॥ सोऽपि घंटा महाघोषां वादयत्यन्विताह्वयां । उद्घोषणां च कुरुते जिनजन्मोत्सवोचितां ।। ८३॥ विमानं पुष्पकं नाम पुष्पकामरसजितं । पारुह्योत्तरलोकार्द्ध-पतिर्गच्छति शक्रवत् ॥ ८४ ॥ दाक्षिणात्येन निर्याण-मार्गेणोत्तीर्य सत्वरं । नंदीश्वरे रतिकर-गि- रावीशान दिग्गते ॥ ८५॥ संक्षिप्य पुष्पकं स्वर्ण-महीधरमुपागतः । शकवत्प्रणिपत्यानु-शीलति त्रिजगद्गुरुं ॥ ८६॥ त्यारपछी इंद्र पांच रूप करीने एक रूप क्डे जळवडे घोहने पवित्र करेला म ज धूपित करेला करसंपुटमा प्रभुने ग्रहण करे. ( १७८ ) एक रूपपडे पायळ छत्र धारण करे, रूपयडे ये बाजु रही चामर वीजे अने पांचमा रूपवडे हाथमा वज्र धारण करीने सेवकनी जैम भागळ चाले. ( १७९ ) स्वामी एटले इंद्र पगे चालता होवाथी तेनुं पालक विमान खाली ज तेनी पाछळ चाले. ते पगे चालता राजानी पाछळ तेना गजादिक साली चालता होय तेवू लागे. (१८० ) तुष्टमान एका देवोथी परिघृत एवा इंद्र आनंद सहित मेरुपर्व- तपर रहेला पांडुक नामना वनमा अावे. (१८१) एज प्रमाणे प्रासनकपथी प्रभुना जन्मने जाणीने शूलपाणि एवा ईशानेंद्र पण सौधर्मेद्रनी जेम पोताना पायदळ सेनाना नायक अलघुपराक्रम नामना सेनापतिने आज्ञा करे ( १८२ ) ते पण सार्थक नामवाळी महाघोपा घंटा वगाडे अने जिनजन्मो. सपने उचित उद्घोपणा करे. ( १८३) पछी पुष्पक नामनो देव पुष्पक नामर्नु विमान सज्ज करे. एटले तेमा वेसीने उत्तराधना अधिपति ईशानेंद्र परिवार साथै शकेंद्रनी जेम चाले. (१८४) ते दक्षिण बाजुना नीकळवाना मार्गे नोकळी, नीचे उतरी सत्वर नंदीश्वर द्वीपे भावी, ईशान कोणना रतिकर पर्वत उपर पोताना पुष्पक विमानने संक्षेपे भने तरत ज मेरुपर्वत उपर भाची शकेंद्रनी जेम त्रिजगद्गुरुने नमस्कार करी सेवा करवा लागे. (१८६) (२१४) श्रीगललोकप्रकाश। एवं शेषा अपि समे देवराजा जिनेश्वरं । सभक्ति मंदरमुपा- गम्य सम्यगुपासते ॥ ८७॥ दश वैमानिका इंद्रा भवनेशाच विं. शतिः। द्वात्रिंशयंतरेंद्रा द्वौ सूर्यचंद्रमसाविति ॥ ८८ ॥ संख्यातीताः समायांति यद्यप्यहिमांशवः । विवक्ष्येते तथापि द्वा-वत्र जातिव्यपे- क्षया ।। ८९ ॥ तथोक्तं श्रीमुनिदेवसूरिकृते श्रीशांतिचरित्रे-ज्योतिष्क- नायकौ पुष्प-दंतौ संख्यातिगाविति । हेमाद्रिमाद्रियंते स्म चतुःषष्टिः सुरेश्वराः ॥ ९० ॥ उत्तराध्ययनप्राकृतवृत्तौ केशीगौतमीयाध्ययने श्राव- श्यकहारिभद्यां च श्रीपभदेवजन्मोत्सवाधिकारे श्रीसमवायांगे द्वात्रिंशे समवाये च व्यंतराणामिंद्रत्वाविवक्षया द्वात्रिंशदेवेंद्रा उक्ताः संतीति. सर्वेऽप्यागच्छंति मेरु-पर्वतं सपरिच्छदाः । विशेषो योऽत्र घंटादि-नाम्नां सोऽथ निरूप्यते ॥ ९१ ॥ तृतीये पंचमे स्वर्गे सप्तमे दशमेऽपि च । घंटा सुघोषाथ हरि-नैगमेषी पदातिराट् ॥ ९२ ॥ निर्याणमार्गश्चोदीच्यो गिरी रतिकरोऽपि च । भवे- द्विमानसंक्षेप-स्थानं सौधर्मराजवत् ॥ ९३ ॥ तुर्ये पप्ठेऽष्टमेऽथ द्वा- ए प्रमाणे वीजा सर्व इंद्रो पण समकाळे मेरुपर्वत उपर आवे अने भक्तिपूर्वक जिनेश्व- रने प्रणाम करी सम्यग् प्रकारे सेवा करवा लागे (१८७) दश वैमानिकना इंद्र, धीश भवनपतिना इंद्र, वत्रीश व्यंतरोना इंद्र धने सूर्य तथा चंद्र (चे ज्योतिपिना इंद्र) मा प्रमाणे कुल ६४ इंद्रो आवे. ( १८८) जोके चंद्र-सूर्य तो असंख्याता मात्रै परन्तु अहीं जातिनी अपेचाए ज चे कया छे. (१८९) ते विषे श्री मुनिसुन्दरमरिकृत श्री शांतिचरित्रमा कमु छ के- ज्योतिष्कना नायक सूर्य-चंद्र असंख्याता मंदरगिरिपर आवे छ, छता ६४ इंद्रो आवे छे एम कहेवाय छे. (१९० ) श्री उत्तराध्ययनसूत्रनी प्राकृतवृत्तिमा केशी. गौतमीय अध्ययनमा भने आवश्यकहारिभद्रीमा श्री ऋषभदेवना जन्मोत्सवना अधि- कारमा तथा श्री समवायांगना चत्रीशमा समवायमां व्यंतरोना इंद्रपणानी अविवक्षा करीने पत्रीश ज इंद्रो आवे एम कयुं . श्रा बधा इंद्रो परिवार सहित मेरुपर्वत पर आवे छे, एमां घंटानां नामो विगेरेमा फेरफार छे ते कहीए छीए (१९१) त्रीजे, पांचमे, सातमे ने दशमे देवलोके सुघोपा घंटा अने पत्तिनो सेनापति हरिनैगमेपी छे. ( १९२) नीकळवानो मार्ग उत्तर दिशाए के अने रतिकर पर्वत ज सौधर्मेंद्रनी जेम विमानने संक्षेपवान स्थान छे. (१९३) चौथे, बड़े, सर्ग ३० मो। (२१५) दशे स्वर्गे विडोजसा । घंटापत्तीशनामादि पूर्वोक्तं शूलपाणिवत् ॥१४॥ पालकः १ पुष्पकः २ सौम-नसः ३ श्रीवत्ससंज्ञकः ४ । नंद्यावर्तः ५ कामगम ६-स्तथा प्रीतिगमोऽपि ७ च ॥ ९५॥ मनोरमश्च ८ विमल: ९ सर्वतोभद्र १० इत्यमी । क्रमाद्दशानामिंद्राणां प्रोक्ता यानविमानकाः ॥ ९६ ॥ तत्तन्नाम्ना तदध्यक्षाः प्रोक्ता देवा अपि श्रुते । सामानिकादय- स्त्वेषां विज्ञेयाः क्षेत्रलोकतः ॥ ९७ ॥ भवत्योघस्वरा घंटा द्रुमः पादात्यनायकः । विमानं चमरेंद्रस्य पालकार्द्धप्रमाणयुक् ।। ९८ ॥ योजनानां शतान् पंचो-तुंग इंद्रध्वजोऽ- स्य च । शेषमुक्तस्वरूपं तु शक्रवत्परिभाव्यतां ॥ ९९ ॥ वलींद्रस्यापि विज्ञयं सर्व चमरवत्परं । घंटा महौघस्वरा स्यात् पादाप्येशो महा- द्रुमः ॥ २०० ॥ न स्युर्यानविमानोप-कल्पिनोऽधिकृताः सुराः । भवनव्यंतरज्योति-काण कित्वाभियोगिकाः ॥ १॥ शेषाणां दाक्षि- णात्यानां भद्रसेनः पदातिराट् । उदीच्यानां च विज्ञेयः पत्तीशो दक्षसंज्ञकः ॥२॥ विमानं चार्द्धमानं स्या-च्चमरेंद्रविमानतः । इंद्र- आठमे ने बारमे स्वर्गे इंद्रोनी घंटानुं ने पचीशनु नाम विगैरे प्रथम कहेला ईशानेंद्र प्रमाणे छ. ( १९४ ) पालक, पुष्पक, सौमनस, श्रीवत्स, नंद्यावर्न, कामगम, प्रीतिगम, मनोरम, विमळ ने सर्वतोभद्र ए दश अनुक्रमे दश इंद्रोना यान-विमानना नामो छ. ( १९६) तेमज ते ते नामना तेना अध्यक्ष देवो पण शास्त्रमा कया छ. तेना सामानिक विगैरे देवोनी संख्या क्षेत्रलोकथी जाणवी. (१९७) हवे मयनपति माटे कहे -चमरेंद्रनी घंटा ओघस्वरा नामनी छे. पदातिनायक द्रुम नामनो छ भने तेनुं विमान पालक विमानथी अर्ध प्रमाणवाल्लं छे. ( १९८) तेनो इंद्रध्वज पांचशें योजन उंचो होय छे, चाकीनुं स्वरूप शकेंद्र प्रमाणे जाणg. ( १९९) बळींद्रनुं पण बघु चमरेंद्र प्रमाणे जाणवू, परंतु घंटा महौघस्वरा नामनी अने पदाति- नायक महाद्रुम नामे जाणवो. ( २०० ) बाकीना भवनपति, व्यंतर अने ज्योतिष्कोने पान-विमानना रचनारा खास देयो नथी, पण तेना भाभियोगिक देवो ज ते कार्य करे थे. ( २०१) वाफीना दक्षिण बाजुना नव इंद्रोनो पदातिस्वामी भद्रसेन नामनो छ भने उचर पाजुना नव इंद्रोनो पदातिस्वामी दक्ष नामनो छे. ( २०२) विमान चमेरे द्रना विमानयी भर्ष प्रमाणवाई होय छ, भने सर्वनो इंद्रधन पण तेमनी घजापी . " (२१६) भीकाललोकप्रकारा। ध्वजश्च सर्वेषां तध्वजामितो मतः ॥ ३॥ तथा मेघस्वरा १ हंस-स्वरा २ क्रौंचस्वरापि ३ च । मंजुस्वरा ४ मंजुघोषा ५ सुस्वरा ६ मधुर- स्वरा ७॥ ४ ॥ नंदिस्वरा ८ नंदिघोपा ९ घंटासंज्ञाः क्रमादिमाः । नागादिपु निकायेषु देवेंद्राणां निरूपिताः॥ ५॥ याम्यानां व्यंतरेंद्राणां घंटा मंजुस्वराभिधा । उदीच्यानां च सर्वेषां मंजुघोषाभिधा भवेत् ॥ ६ ॥ सहस्रयोजनव्यासा-यामं यानविमानकं । तेषां शतं सपादं च योजनान्युच्छ्रितो ध्वजः ॥ ७॥ज्योतिप्केषु च चंद्राणां घंटा स्या- सुस्वराभिधा । तथा सुस्वरनिर्घोपा भास्वतां शेषमुक्तवत् ॥ ८॥ घंटावादनमेतेषां प्राग्वदुद्घोषणादि च । प्राप्तानुशिष्टयस्तुष्टा विदध- त्याभियोगिकाः॥९॥ वज्रपाणिः परिवृतो देवैरेवं चतुर्विधैः । मंदराचलमौलिस्थे कानने पांडकाये ॥ १०॥ अभिपेकशिलायां च तस्मिन् सिंहा- सनात्तमे । निधायाहँतमुत्संगे तुष्टचित्तो निपीदति ॥ ११ ॥ ततश्चाच्युतदेवेंद्रो वदति स्वाभियोगिकान् । अर्हजन्माभिपेकाहीँ सामग्री अर्ध प्रमाणवाळो होय छे. (२०३) घंटानां नाम अनुक्रमे मेघस्वरा १, हंसस्वरा २, कौंचस्वरा ३, मंजुस्वरा ४, मंजुघोपा ५, सुस्वरा ६, मधुस्वरा ७, नंदिस्वरा ८ अने नंदिधोषा ९, ए प्रमाणे नागकुमारादि नव निकायना देवेंद्रोनी समजवी. (२०५) दक्षिण बाजुना व्यंतरेंद्रोनी घंटा मंजुस्वरा नामनी अने उत्तर बाजुना इंद्रोनी मंजुघोपा नामनी कहेली छे. ( २०६) एक हजार योजन लावू पहोळु अने सवासो योजन उंचुं तेमनुं यानविमान होय छे ने इंद्रध्वज पण १२५ योजन उंचो होय छे. (२०७) ज्योतिष्कमां चंद्रनी घंटा सुस्वरा नामनी अने सूर्यनी सुस्वरनिर्घोषा नामनी होय छे. चीजें प्रथम प्रमाणे जाण. ( २०८) घंटा वगाढवाचं अने उद्घोपणादि करवानुं तेमनुं कार्य इंद्र पासेथी आज्ञा पामीने तुष्टमान थयेला तेमना अाभियोगिक देवो करे छे. (२०९) या प्रमाणे चारे प्रकारना देवोथी परिवृत वज्रपाणि ( सौधर्मेंद्र) मंदराचलना शिखर पर रहेला पांडुक नामना वनमा श्राची, त्यां रहेली अभिषेक शिलानी उपर रहेला उत्तम सिंहासन उपर खोळामा प्रभुने लइने तुष्टचित्तवाळा थया सता से. (२१०-११) ते वखते अच्युतेद्र पोताना भाभियोगिक देवोने आज्ञा करे के-'हे देवो' अरिहंतना जन्मा- सर्ग ३० मो। (२१७) सजयंतु भोः ॥ १२ ॥ सौवर्णान् राजतान् रानान् स्वर्णरत्नमयानपि । रूप्यरत्नमयान् रूप्य-रैजान् रैरूप्यरत्नजान् ॥ १३॥ मृत्स्नामयांश्च प्रत्येकं सहस्रमष्टकाधिकं । एवं चंगेर्यात्मदर्श-स्थालपानीकरंडकान् ॥ १४ ॥ सिंहासनच्छत्रताल-ततैलसमुद्गकान् । चामरादीन् विकु- ति तेऽष्टाधिकसहस्रकान् ॥ १५ ॥ त्रिभिर्विशेषकं । कृत्रिमाकृत्रिमान् कुंभा-दीनादायाभियोगिकाः। क्षीरोदादिपयोधीनां गंगादिसरितामपि ॥ १६ ॥ तीर्थानां मागधादीनां इदानामपि भूयसां । पवित्रमुदकं मृत्स्ना विविधान्यंबुजानि च ॥ १७ ॥ तथा हिमदादिभ्यो गिरिभ्यः सकल- तुजान् । नंदनादिवनेभ्यश्च पुष्पौघान् विविधान् शुभान् ॥ १८॥ गोशी. पंचंदनागुर्वा-दिकान् गंधाननेकशः । कपायांश्चामलकादीन् सिद्धार्थान् विविधौषधीः ।। १९ ॥ गृहीत्वागत्य संभूय ढोकयंत्यखिलं च तत् । स्व. स्वामिनेऽच्युतेंद्राय विनयेन प्रणम्य ते ॥ २० ॥ पंचभिः कुलकं ॥ ततोऽच्युतसुरेन्द्रस्तैः कलशैश्चंदनाचितैः । पुष्पस्रक्शोभित- मिपेकने योग्य सर्प सामग्री तैयार फरो. (२१२) एटले ते देवो सोनाना, रुपाना, रत्नना, स्वर्थना ने रत्नना,रुपाने रत्नना, सोनाना भने रुपाना, सोना रुपाने रत्नना क्या मृत्तिकाना एम माठ जातिना प्रत्येक एक हजार ने भाठ कळशो, ते ज प्रमाणे चंगरी, भादर्श, थाळ, पात्री (रकेपी ) करंडीया, सिंहासन, छत्र, पंखा, तेलना डापडा तथा चामरादि पण १००८-१००८ विकु]. ( २१३-१५) पछी कृत्रिम ने महत्रिम एवा कळशी विगेरेने सइने भामियोगिक देवो धीरोदपि विगेरे समुद्रोना, गंगादि नदीमोना, मागधादि वार्थाना पर्ने पपादि भनेक होना पाणी तेमा प्रहण करे, तेम ज तीर्थोनी मृत्तिका, विविध प्रकारना कमळो, हिमवतादि पर्वतोपरपी भने नंदनादि वनोमाची सर्व मतमोना विविध प्रकारना शुभ पुप्पोनो समूह ग्रहण करे. सेम ज गौशीर्षचंदन, भगरु विगैरे भनेक प्रकारमा सुगंधी पदार्पो, मामला विगेरे कपायला पदार्थों, सिद्धार्य (सरभव ) सपा सर्व प्रकारनी भोपधिमो ग्रहण करे अने से पy लाने मेपर्यतपर भारी भन्याद्र पासे ते मधुरन करे, सेम जपोतानास्वामी मन्द्रने विनयपूर्वक प्रणाम करे. (२१६-२२०) पछी मपुतेंद्र पंदनापित, पुष्पमाल्यपरे शोमित फंठाळा भने पपरिपलपी टफिला एका ८.६४ सम्यो मनोदपिनो पार पाममा माटे व होपनी टम प्राय फरीने .

. *(२१८.) भीकाललोकप्रकारा। गलैः पद्मोत्पलपिधानकैः ॥ २१ ॥ सर्वाग्रेण चतुःषष्ट्या-धिकैः किल सहस्रकैः । अष्टभिर्भवपाथोधि-पाराय स्वीकृतैरिव ॥ २२ ॥ सामानि- कादिनिःशेष-परिवारसमन्वितः । प्रायुक्तोदकपुष्पायै-रहतमभिषिचति ॥ २३ ॥ त्रिभिर्विशेषकं । अच्युतेंद्राभिषेकेऽस्मि-नीशानेंद्रादयः परे । ऊर्ध्वदमा निपेवंते विविधायुधपाणयः ॥ २४ ॥ चामरांश्चालयंत्येके केचिच्छत्राणि विभ्रति । केचिद्रूपानुरिक्षपंति परे नृत्यानि कुर्वते ॥२५॥ वादयंतेऽथ वाद्यानि केचिद्गायंति केचन । केचिद्गर्जति वर्षति केचित्त- न्वति विद्युतः ॥ २६ ॥ पुष्पाभरणवस्त्राणां वृष्टिं कुर्वति केचन । बाल- विस्मयदाश्चेष्टाः केचित्कुर्युः प्रभोः पुरः ॥ २७ ॥ अभिपिच्यैवमहंतं नत्वा कृतजयध्वनिः । गंधकापायिकेंणांगं.रूक्ष- यत्यच्युतेश्वरः ॥ २८ ॥ ततोऽलंकारसंभार-भासुरं स्वर्द्धमोपमं । प्रभु विधाय पुरतो दर्शयेन्नृत्यकौशलं ॥ २९ ॥ आलिख्य मंगलान्यष्टौ ढौकयेत्पुरतः प्रभोः । वितस्य पुप्पप्रकर-मुत्क्षिपेपमुत्तमं ॥ ३० ॥ ततो वृत्तशतेनाष्टा-धिकेनार्थगुणस्पृशा । स्तुत्वा कृतांजलिबूते भूयः। " सामानिकादि सर्व देवोना परिवार साथे उपर कहेला जळ अने पुष्पादिकवडें प्रभुने अभिषेक करे ( २२१-२३) अच्युतेंद्रना अभिषेक बखते ईशानेंद्रादि. वीजा देवो विविध प्रकारना आयुधो हाथमा लइने प्रभुनी सेवामा उभा रहे.. ( २२४.) केटलाक चामर वीजे, केटलाक छत्र धरावे, केटलाक धूप करे, केटलाक नृत्य परे, केटलाक वाजिन वगाडे, केटलाक गायन करे, केटलाक गाजे, केटलाक वरसे, केटलाक विद्युतने करे, केट- लाक पुष्प, पाभरण अने चस्रोनी वृष्टि करे, अने केटलाक प्रभु पासे बाळकोने विस्मय. पमाडे एवी चेयाओ करे. (२२५-२२७) अच्युतेंद्र उपर कह्या प्रमाणे प्रभुने अभिषिचन करी,, जयध्वनिपूर्वक नमस्कार करी गंधकापायी वस्त्रवडे प्रभुना अंगने रूच करेः (२९८ ) पछी अलंकारना- समूहथी भा- स्वर एवा कल्पवृक्ष सरखा प्रभुने करीने प्रभुनी पासे पोवानुं नृत्यकौशल बताये. (२२९) प्रभुनी पासे श्रष्ट मंगळिक पाळेखे, पुष्पना प्रकर क्षेपवे (पगर भरे), अनेधूप उखेवे। (२३०). सारपछी एक सो पाठ विशिष्ट अर्थ भने गुणवाळा घृत्तोवडे प्रभुनी स्तुति करीने हाथ सिर्ग३० मो'। (२१९) स्तुतिपदावली ॥ ३१ ॥सा चैवं जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे- णमोत्थु ते सिद्ध बुद्ध णीरय समण समाहिअसमत्त समजोगि सल्लगत्तण णिन्भय णीरागः दोस णिम्मम णिस्संग णीसल्ल माणमूरण गुणरयण सीलसागरमणंतम- प्पमेय भवियधम्मवरचाउरंतचकवही णमोत्थु ते' इत्यादि. एवं समा. पिताशेपजन्मस्नानविधिः प्रभोः । नातिदूरांतिकस्थोऽसौ विनयेन निपेवते ॥ ३२ ॥ त्रिषष्टिरपि देवेंद्राः सौधर्मेद्रविवर्जिताः। अभिपिचंत्यनेनैव विधि- नानुक्रमेण च ॥ ३३॥ ततश्चेशानदेवेंद्रः पंच मूर्तीविकुर्वति । जिनं धृत्वैकयोत्संगे शक- स्थाने निपीदति ॥ ३४॥ एकया छत्रमाधत्ते धत्ते द्वाभ्यां च चामरौ । एकया पुरतः शूलं धृत्वा तिष्ठति भृत्यवत् ॥ ३५ ॥ अथ सौधर्मराजोऽपि -सामग्रीमखिलामपि । प्राग्वद्विधाय कुरुते विशेष चैकमद्भुतं ॥३६॥ कृ. स्वा चत्वारि शुक्लोक्ष-स्वरूपाणि चतुर्दिशं । तेषां शृंगाटकानीर-धारा- जोडी फरीने स्तुति पदोनी श्रेणि कहे. (३१) ते संबंधी जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रमा श्रा प्रमाणे -को छ.-नमोत्थु ते सिद्ध युद्ध पीरय समण समाहिम समत्त समजोगि सल्लगत्तण णिब्भय पीरागदोस णिम्मम णिस्संग पीसल्ल माणमूरण गुणरय- •ण सीलसागरमणंतमप्पमेय भवियधम्मवरचाउरंतचफवहीणमोत्थु ते। इत्यादि. भच्युतेंद्र मा प्रमाणे जन्मस्नात्र विधि वधो समाप्त करीने प्रमुथी प्रतिदूर नहीं तेम अति नजीका नहीं ए रीते उभा रही विनयपूर्वक सेवा करे. (२३२) ए रीते सौधर्मेद्र सिवाय ६३ इंद्रो अच्युतेंद्रे करेल विधि प्रमाणे जन्माभिषेकने लगतो सर्व विधि करे. (२३३ ) पछी ईशानेंद्र पांच रूप विकर्ये, तेमांना एक रूपे प्रभुने खोळामा लइने शकेंद्रने ठेकाणे सिंहासनपर से, एक रूपे छत्र धारण करे, चे रूपे घे पाजु चामर वीजे, एफ-रूपे ममनी भागळ शूल हाथा धारण करीने सेवकनी चम उभा रहे. ( २३४-३५) पछी सौधर्मराज पण सर्व सामग्री पूर्वनी पेठे एकत्र करीने एक अद्भुत विशेषकार्य करे. (२३६ ) चार उज्वळ घृपभना रूप करी प्रभुनी फरता चारे दिशाए रही तेना पाठ १ हे सिद्ध, बुद्ध, कर्मरज रहित, श्रमण, समाधिमान, कार्यने समाप्त करनार, सर्वयोग- नो नाश करनार, भय रहित, राग-द्वेष रहित, ममता रहित, संग रहित, शस्य रहिव, माननो नाश करनार, गुणोमा रत्न समान, शीलना सागर, अंत रहित, प्रमेय रहित, सुंदर एषा धर्ममा श्रेष्ठ चातुरंत चक्रवर्ती एवा तमने नमस्कार थापो. .

(२१.) मौकामलोप्रकारा। भिर्गगनावधि ॥ ३७॥ ऊर्ध्वमुत्पत्य संभूय पतंतीभिः प्रभूपरि। छत्राकार विभ्रतीभि-जिनं शक्रोऽभिषिचति ॥ ३८॥ स एवं विहिताशेप-जन्मस्नानविधिस्ततः । प्राग्वदहतमादाय पंचमूर्तिनिवर्त्तते ॥ ३९ ॥ युक्तश्चतुर्विधैर्देवैः कृतप्रौढमहोत्सवैः । जिनं जन्मगृहे नीत्वा स्थापयेन्मातुरंतिके ॥ ४० ॥ हृत्वावस्थापिनी मातुः प्रतिबिंब प्रभोश्च तत् । न्यस्यत्युच्छीर्षके क्षौम-युग्मं कुंडल- युग्मयुक् ॥ ४१ ।। विचित्ररत्नमालाभिः कृतं श्रीदामकुंडलं (गंडकं)। लंबयत्यहदुल्लोचे स्फुरज्झुंबनकाकृति ॥ ४२ ॥ उत्तानशायिनस्तच्च पश्यतः परमेश्वराः । रमंते विकसनेत्रा अनुचरसुरा इव ॥४३ ।। स्वाम्यंगुष्ठे सुधः शांत्यै स्थापयत्यमृतं हरिः । मुखे यत्क्षेपतोऽहंत-स्तु- प्यंत्यस्तन्यपा थपि ॥४४॥ ततः शक्राज्ञया श्रीदा-ज्ञापिता मुंभ- कामराः । कोटी त्रिशतं स्वर्ण-हिरण्याना जिनालये ॥ १५॥ निद- धत्यन्यदप्येवं भूरिभद्रासनादिकं । उद्घोषणां ततः शक्रःकारयत्याभियो- शृंगनी धारा आकाशमा उंचे उडीने भेळी थइ प्रभुनी उपर छत्राकारने धारण करती पडे तेम करे . प्रारीने शकेंद्र प्रमुने अभिषेक करे. (३३७-३८) श्रा प्रमाणे शकेंद्र बधो जन्मस्नाप्रविधि अच्युतेंद्रे कर्यो हतो तेम करीने पछी पांच रूप करीने प्रथमनी पेठे प्रमुने ग्रहण करी पाछा फरे अने चारे प्रकारना देवोथी कराता प्रौढ महोत्सवपूर्वक जिनेश्वरना जन्मगृहे प्रावीने प्रमुने मातानी पासे भूके. (२३९-४०) पछी मातानी अवस्वापिनी निद्रा अने प्रसतुं प्रतिबिंब हरी लइ तेमने मोशीके वस्त्रयुग्म भने कुंडळयुग्म स्थापन करे. (२४१) भने अरिहंतना उपरना भागमा उल्लोचमा विचित्र रत्नमाळावडे बनावेल श्रीदामकुंडळ (गंडक-पुष्पनो दडो) स्फुरायमान झुमणानी प्राकृति- वाळो लटकावे. ( २४२) ते दडाने जोइने उत्तानशायी' एवा प्रभु विकसायमान नेत्र- वाळा थइने अनुत्तर विमानना देवोनी जेम रमे. (२४३ ) पछी शकेंद्र नुघानी शांतिने माटे प्रभुना अंगुठामा अमृतनो संचार करे के जे अंगुठाने मुखमा राखवाथी स्तनपान नहीं करनारा एवा प्रभु पण वृति पामे. (२४४) सारपली शनी आज्ञाथी कृषरे आज्ञा करेला मुंभक देवो पत्रीश क्रोड स्वर्ण ने हिरण्यनी पुष्टि प्रभुना घरमा करे. (२४५) वीजा अनेक भद्रासनो विगेरे पण स्थापन करे. पछी शक पोताना भामियोगिक देवो १ संधु मुख राखीने मुनार.

: सर्ग ३० मो। गिकः ॥ ४६॥ कुर्वति भगवजन्म-नगर्यो तेऽपि हर्षिताः। विष्वत्रि- कचतुष्कादौ वाढमुघोषणामिति ॥ ४७ ॥ भो भोश्चतुर्विधा देवाः शृण्वंतु वचनं हरेः । यः प्रभोः प्रभुमातुर्वा विरूपं चिंतयिष्यति ॥४८॥ श्रार्यकस्य मंजरीवत् मूर्द्धा तस्य स्फुटिष्यति । आराध्येन विरोधो हि नचिरादेव नाशयेत् ॥४९॥ ततश्चतुर्विधा देवा इंद्राः शकादयोऽ- खिलाः । गत्वा नंदीश्वरद्वीपे कुर्युरष्टाहिकोत्सवं ॥ ५० ॥ यदा च युगपज्जन्म यावतामहतां भवेत् । तदा तावंति रूपाणि कृत्वोतं सकलं विधिं ॥ ५१ ॥ कुर्वति दिक्कुमार्याद्याः सर्वेऽहद्भक्ति- निर्भराः । मनःसंकल्पसिद्धीनां किमशक्यं हि नाकिनां ॥ ५२॥ विज्ञातसुतजन्माई-पिताथ नगरं निज। कारयेद्वहिरंतश्च दूरिताशेष- कश्मलं ॥५३॥ सुगंधिजलसंसिक्ता-पणवीथ्यादिभूमिकं । तथा त्रिकचतु- प्कादौ लिप्त पुष्पाद्यलंकृतं ॥ ५४॥ स्थाने स्थाने दह्यमान-काकतुंडा- दिधूपितं । अलंकृताशेषगेहं तोरणस्वस्तिकादिभिः ॥ ५५॥ धर्नानावि- पासे उद्घोषणा करावे. ( २४६ ) ते देवो पण भगवंतनी जन्मनगरीमा चारेबाजु त्रिक चतुष्क विगेरे स्थानकोए हर्षित थहने ा प्रमाणे उद्योषणा करे. (२४७) के-'भो भो चारे प्रकारना देवो! इंद्रनु आ वचन सामळो के–जे कोइ प्रमुन के प्रमुनी मातार्नु विरूप चिंतवशे तेनुं मस्तक भार्यकमंजरीनी जेम फूटी जशे, केमके आराध्य जनो सानो विरोध थोडा काळमां नाश करे ज . ( २३८-४९) त्यारपछी चारे प्रकारना देवो अने शक्रादि बधा इंद्रो नंदीश्वरद्वीपे जइने श्रष्टान्हिकोत्सव करें. ( २५०) ज्यारे जेटला प्रभुनो समकाळे जन्म थाय त्यारे नेटला रूपो करीने उपर कक्षा प्रमाणे सर्व विधि अरिहंतनी भक्तिमा निर्मर एवी दिक्कुमारीमो विगैरे सर्व देवो करे. 'मनना संकल्पवडे ज जेमनी कार्यसिद्धि थाय छे एवा देवोने शुं अशक्य छ ।' (२५१-५२) पुत्रना जन्मनी हकीकत अरिहंतना पिता प्रातःकाळे जाणे के तरत पोतार्नु पाखं नगर अंदर भने चहार समस्त कचरा विनानुं साफ करावे ( २५३ ) दुकाननी श्रेणि- वाला मार्गो जळबडे सिंचावे, तथा त्रिक चतुष्कादि लीपयापूर्वक पुष्पोवडे अलकत करावे ( २५४) स्थाने स्थाने काकतुंडादिनो सुगंधी धूप करावे. पधा घरो तोरण स्व- स्तिकादिवडे अलंकत करावे. यधी दुकानो नाना प्रकारनी वनामो तथा स्रोपडे - (१२२२) मीकाममोकप्रकारा। धैर्वस्त्रै-विराजनिखिलापणं । पदे पदे भवद्गीत-नटनर्तककौतुकं ॥५६॥ क्वचिद्भवन्मल्लयुद्धं क्वचिदारव्धरासकं । क्वचिद्विदूषकव्यास-कला- विस्मितमान ॥ ५७ ॥ वरनाक्रीडिभिः कोणं व्याप्तं वंशानखेलकैः। कथकैश्च कथावीथी-व्याक्षिप्तमनुजनजं ॥५८॥ निरंतरं वाद्यमान-- भभाभेरीमृदंगकं । झल्लरीवेणुवीणादि-वाद्यैः शब्दमयीकृतं ॥ ५९ ।। रिक्तकारागृहं मुक्तै-स्तस्करद्विपादिभिः ॥ ऋणानि दत्त्वा लोकानां निःशेषमनणीकृतं ॥ ६० ॥ विवृद्धमातोन्मानादि-सानंदनिखिलप्रजं । -उगीयमानधवल-मंगलं प्रतिमंदिरं ।। ६१ ॥ प्रतीप्टेप्टानीयमान-रत्नायु- त्सवढौकनं । नानासत्कारसंतुष्ट-ज्ञातिस्वजनांधवं ॥ ६२ ॥ अंनेकैः स्वर्णरजत -रत्नांवरविभूषणैः । अनर्गलं दीयमानः पूरितार्थिमनोरथं ॥ ६३ ॥ श्रादित एकादशभिः कुलकं ॥ अतुच्छोत्सवसच्छाये-प्वहस्स्वेकादशस्विति । 'अतिक्रांतेष्वथामंत्र्य शोभावे. स्थाने स्थाने गीत-वाजित भने नाटको विगेरे कौतुकना साधनो करावे. ( २५५-५६ ) कोई जग्याए मल्लयुद्ध, कोइ जग्याए रामडा लेवानुं अने कोई जग्याए विदूपकोनी भने व्यासनी कळा विगैरे प्रगट करावीने लोको कौतुक तेम ज श्रानंद मेळचे तेवी गोठवण करे. ( २५७ ) स्थाने स्थाने दोरडा उपर नृत्य करनार नटोथी व्यास करे, वासना भामागउपर खेल करनारा नटोवडे सहित करे, कथानोनी श्रेणिथी मनुष्योना समूहने तन्मय करे एवा कथा करनारा व्यासोने बेसाडे. ( २५८) वगर विसामे वागता एवा मंमा, मेरी, मृदंग, झजरी, वेणु, वीणादि वाजित्रोवडे पाखं नगर शब्दमय करे. ( २५९) तस्करादि तेम ज राजद्रोही जनोमात्रने छोडी दइने कारा. गृह ( केदखानुं ) खाली करे. लोकोन ऋण (देवू ) पापी दइने सर्व प्रजाने अनृणी करे. (२६०) मानोन्मानादिमा वधारो करीने सर्व प्रजाने आनंद उपजाचे. दरेक मंदि- रमा धवळमंगळ गावातुं शरु थह जाय. ( २६१ ) उत्तम इष्टजनोना लावेला रत्नादिक प्रभुना पिता पासे ढोकन करवामां आवे. पोतानी ज्ञातिवाळा तेम ज स्वजन पांधवोने नाना प्रकारना सत्कारथी संतुष्ट करे. (२६२) अनेक प्रकारना स्वर्ण, रजत अने रत्नोना अनर्गल प्राभूषणो देवावडे अर्थीजनोना मनोरथोने पूर्ण करे. (२६३) श्रा प्रमाणे अतुच्छ एवा उत्सवयुक्त अग्यार दिवस व्यतिक्रम्ये सते बारमे दिवसे सर्ग ३० मो। (२२), स्वजनान् भोजनादिभिः ॥ ६४ ॥ संतोप्याथो तत्समक्षं गुणस्वप्नाद्य- पेक्षया । अहंतां स्थापयेन्नाम पिता भद्रंकराक्षरं ॥ ६५ ॥ पाल्यमानाश्च वर्द्धते धात्रीभिस्तेऽथ पंचभिः । अंकादक संच- रंतः सह पित्रोमनोरथैः ॥ ६६ ॥ कलाहेतोरनारब्ध कलाचार्या- न्तिका अपि । स्वत एवात्तसकल-कलाः संपूर्णचंद्रवत् ॥ ६७ ॥ विद्यानां पारदृश्वानो विनाभ्यासं वचस्विनः । वाल्येऽपि दक्षस्थविरा इव प्रोबुद्धवुद्धयः ॥ ६८ ॥ प्राच्याद्भवादनुगतैः स्नेहवश्यैरिवोत्तमैः । मतिश्रु- तावधिज्ञान-रमात्यैरिव सेविताः ॥ ६९ ॥ क्रीडापराङ्मुखाः प्रायो बाल- चेष्टाविवर्जिताः । जगदुत्कृष्टसौंदर्य-भाग्यसौभाग्यशोभनाः ॥ ७० ॥ स्वजनानां जनानां च नयनानंददायिनः । प्रियंकराः प्रियालापाः प्रियाश्च द्विषतामपि ॥७१ ॥ जितेंद्रियाः स्थिरात्मानो यौवनोद्योतिता अपिः।। अचला अचला एव महावाताहता अपि ॥७२॥ स्त्रीपरिग्रहजय्यानि चेत्याकर्माणि जानते । तदा वीवाहमप्यंगी-कुर्वते ते यथाविधि॥७३ ।। सह पाणिग्रहीतीभि-विषयानपि मुंजते । क्षेप्तुं कर्माणि यन्नीचो-पाये- पोताना स्वजनोने भामंत्रण करी, भोजनादिवढे संतुष्ट करी तेमनी समक्ष गुणस्वप्ना- दिनी अपेक्षाए भद्रकारी अक्षरवाळ प्रमुर्नु नामस्थापन तेमना पिता करे. ( २६४-६५) एकपोजाना खोलामा संचरता एवा प्रसु पांच धाव्योवडे पालन कराता सता माता- पिताना मनोरथ साथे पृद्धि पामे. ( २६६ ) पछी कळाग्रहण करया माटे कळाचार्य पासे मुक्या विना ज स्वयमेव संपूर्ण चंद्रनी जेम समन कळाना धारक थाय. (२६७) कामु छ के- 'अम्पास विनाज विद्याना पारगामी, वचरची (वाचाळ) भने चान्यावस्था छतां पण दत्त एवा युद्धनी लेवा प्रौढ चुद्धिवाळा प्रशु होय. ' ( २६८) स्नेहथी वश करेला उत्तम जनोनी जेम पूर्वमवथी साथै प्रावेला मति श्रुत ने अवधिज्ञानरूप अमात्योवडे सेवित होय. (२६९)प्राये क्रीडाथी पराङ्मुख होय, पाळचेष्टा रहित होय अने जगतमा उत्कृष्ट एवा सौंदर्य, भाग्य अने सौभाग्यवहे शोमित होय. (२७०) सजन परिवारने नेत्रानंदना आफ्नार, प्रियंकर, प्रियालापी, द्वेषीजनोने पण प्रिय लागे तेवा, यौवनवडे घोतित धया छतो पण जितेंद्रिय अने स्थिर मारमावाळा होय केमके महापवने हणा. पेला छतां पण पर्वतो अचळ ज होय छे. ( २७२ ) सी परगवावडे ज पूर्वनुं मोगावळी कर्म पर थशे-तेनो जय थशे एम जो तेत्रो जाणे तो यथाविधि विधाहने पण स्वीका- रनारा होय. ( २७३) पाणिग्रहण करेली स्त्रीसाय फर्म खपावया माटे सांसारिक विष- (२२४) भीकाललोकप्रकाश । नापि रिपुं जयेत् ॥ ७९ ॥ वही रागं दर्शयंतो-ऽप्यंतः शुद्धाः प्रबालवत् प्राप्तेऽपि चक्रभृद्राज्ये न व्यासक्ता भवंति ते ॥ ७५ ॥ प्रवज्यावसरं स्वस्य ते ज्ञानेन विदंत्यथ । तस्मिश्च समयेऽभ्येत्य देवा लोकांतिका थपि ॥ ७६ ॥ नवा विज्ञपयंत्येवं जयनंद जगदगुरो। त्रैलो- क्यस्योपकाराय धर्मतीर्थ प्रवर्त्तय ॥ ७७ ॥ लोकांतिकस्वरूपं तु क्षेत्रलो- कतो ज्ञेयं. अत्र कल्पसूत्रे श्रीवीरजिनाधिकारे प्रथमं लौकांतिकदेवागननं, ततो वार्षिकदानमिति क्रमो दृश्यते, पष्ठांगे तु श्रीमल्लिजिनाधिकारे पूर्व सांवत्सरिकदानं, ततो लोकांतिकदेवागमनमिति क्रमो दृश्यते, श्रीश्राव- श्यके तु श्रीऋषभजिनाधिकारे कल्पसूत्रवत्, श्रीमहावीराधिकारे तु षष्ठांगवत्तथा चोक्तं श्रीज्ञानसागरसूरिभिः स्वकृतावचूर्णों, ग्राह-ऋषभा- धिकारे संवोधनोत्तरकालं परित्यागद्वारमुक्तमिह तु कस्माद्विपर्ययः ? उच्यते-न सर्वार्हतामयं नियमः, यदुत संवोधनोत्तरकालभाविनी महादानप्रवृत्तिरिति. , . , योने पण सेवे, कारण के नीच उपायवडे पण कोइ वखते शत्रुने जीतवा पडे छे. (२७४) प्रभु पहारथी राग दर्शावे छे छतां पण अंतरथी प्रवाळनी जेम शुद्ध होय छे. चक्रवर्ती- पशुं प्राप्त थाय तो पण तेमा आसक्त थता नथी. (२७५) पछी योग्यकाळे पोताना ज्ञानथी पोते प्रव्रज्यानो अवसर जाणे, ते समये लोका- तिक देवो पण आवीने नमस्कार करी विज्ञप्ति करे के-" हे जगद्गुरु ! तमे जय पामो ! आनंद पामोत्रण लोकना उपकारने माटे धर्मतीर्थ प्रवर्वायो. " (२७६-७७) लोकां- तिकोनुं स्वरूप क्षेत्रलोकधी जाणवू. श्रीकल्पसूत्रमा श्रीवीरजिनना अधिकारमा प्रथम लोकांतिक देवोर्नु आगमन थाय भने पछी वार्षिकदान आपे एवो ‘क्रम देखाय छे, पण छहा श्रीज्ञाताधर्मकथांगमा श्रीमद्धिजिनना अधिकारमा प्रथम वार्षिकदान अने पछी लोकांतिकनुं प्रागमन-एवो क्रम देखाय छ, तथा श्रीआवश्यकमा श्रीपमजिनाधिकारे कल्पसूत्रनी जेम न कहेल छे भने श्रीमहावीराधिकारे छठा अंग प्रमाणे कहेल छे. ते विपे श्रीज्ञानसागरसूरिए पोतानी करेली अवचूर्णिमा कयु छ के-शंका-'अपमाधिकारे लोकांति. कना संबोधन पछी परित्यागद्वार (वार्षिकदान ) कहेल के अने अहीं तेथी विपर्यय कहेल छ तेनुं शुं कारण १ उत्तर-सर्व अरिहंतमा उचरकाळेज महादाननी प्रवृश्चि होय एवो नियम नथी.'

सर्ग ३० मो। (२२५) ततो दीक्षादिनादर्वाग् वर्षे शेपे जिनेश्वराः । दानस्य धर्मेष्वग्यूत्वा- दानं ददति वार्षिकं ॥ ७८ ॥ कोटिमेकां सुवर्णानां लभैरष्टभिरन्वितां । पाप्रातराशसमया-नित्यं ददति तीर्थपाः ॥ ७९ ॥ पुरे त्रिकचतुष्कादौ कारयेद्धोषणामिति । ईप्सितं यस्य यद्वस्त्र-विभूपावाहनादिकं ॥ ८॥ तद्यथेच्छमिहागत्य स गृह्णात्वविशंकितः । सर्वाशाः पूरयत्येवं दानैः कीर्त्या च तीर्थकृत् ।।८।। धर्मप्रभावनाबुद्ध्या लोकानां चानुकंपया। जिना ददति तदानं न तु कीर्त्यादिकांक्षिणः ॥८२॥ दानं यथा यथा दयुः स्वापतेयं तथा तथा । शक्रवैश्रमणादिष्टा देवाः पिप्रति जुंभकाः ॥ ८३ ॥ त्रीणि कोटि- शतान्यष्टा-शीतिश्चोपरि कोटयः । लक्षाण्यशीतिः स्वर्णानां दद्युर्वर्पण तीर्थपाः ॥ ८४ ॥ एतावद्वापिके दाने ज़ुभकामरढौकितं । जिनेश्वराणां सर्वेपी नियतं परिकीर्तितं ॥ ८५॥ तच्चैवं-दातुं यदादिकं दान-मध्य- वस्यति तीर्थपाः । तदासनप्रकंपेन जानात्यवधिना हरिः॥८६॥ जीतमे- । दीचादिवसनी अगाउ एक वर्ष वाकी रहे त्यारे जिनेश्वरो चार प्रकारना धर्ममा दानधर्म प्रथम होवाथी यार्षिकदान प्रापे छे. (२७८) सूर्योदयथी आरंभीने प्रातःकाळना भोजन समय सुधी (ये प्रहर ) दररोज एक क्रोड ने आठ लाख लोनेयानुं दान तीर्थकर आपे थे. ( २७९ ) नगरना त्रिक चतुष्क विगैरे स्थानोमा या प्रमाणे उद्घोषणा करा- घवामां आवे छे के-'जेने जे यन्त्र, आभूपण, वाहनादिकनी इच्छा होय ते यथेच्छपणे प्रभु पासे आवीने निःशंकपणे ग्रहण करो. ए प्रमाणे प्रभु दानवडे सर्वनी भाशा (इच्छा) पूर्ण करे छे अने कीर्तिबहे सर्व आशा( दिशाओ )ने पूर्ण करे छे. ( २८०-८१ ) धर्मनी प्रभावना थवानी बुद्धिथी तेमज लोकोपरनी अनुकंपाधी जिनेश्वरो दान मापे छे, कीर्यादिनी साकादायी भापता नथी. (२८२ ) प्रभु जेम जेम दान आप ले तेम तेम शक्रना लोकपाळ चैश्रमणनी आज्ञाथी जॅमको ते द्रव्य पूर्ण करे थे. ( २८३ ) एक वर्षमा ३८८ कोड ने ऐशी लाख सोनयानुं दान तीर्थकरो आपे छे. (२८४) ए पy वार्षिकदान संबंधी द्रव्य जृमकामरोए प्रभु पासे रजु करेलुं होय छ, भने सर्व जिनेश्वरी मारे एटलुं दान नियतपणे कहेलुं छे. ( २८५ ) ते या प्रमाणे-" ज्यारे वीर्थकरो पार्षिकदान भापवानी इच्छा करे थे त्यारे भासनकंपवडे अवधिज्ञानी ते हकीकत नाणीने इंद्र विचारे छे. (२८६) के 'प्रण काळमा पएला एवा अमारो ए प्राचार .. (२२६) श्रीकाललोकप्रकाश । वेदमस्माकं त्रिकालोद्भववज्रिणा । यद्वार्पिकाय दानाय प्रवज्याक्सरेऽर्हता ॥ ८७ ।। ढोकनीयं स्वापतेयं स्वर्णकोटीशतास्त्रयः । अष्टाशीतिःकोट- यश्चा-शीतिलक्षसमन्विताः ॥ ८८ ॥ एवं निश्चित्य धनद-माज्ञापयति वनभृत् । स जुंभकामरांस्ते स्वं निक्षिपंति गृहेऽर्हतां ॥ ८९ ॥ अन्यद- प्यश्वहस्त्यादि-भूषावस्त्रादि मंदिरात् । यच्छंत्यभीष्टं लोकानां दानवीरा जिनेश्वराः ॥ ९० ॥ महानसान्यनेकानि कारयित्वा स्वसेवकः । दापयं- त्यन्नपानादि दीनादीनामनर्गलं ॥ ९१ ॥ तथोक्तं षष्ठांगे-'तए णं कुंभए मिहिलाए रायहाणीए तत्थ तस्थ तहिं तहिं देसे वहुईश्रो महाणससा- लाओ कारेइ ' इत्यादि मल्ल्यध्ययने. पित्रादेः स्वजनस्याथ प्राप्यानुज्ञां कथंचन । यस्मिन् दिने यतते ते चारित्राय महाशयाः ॥१२॥ तस्मिन् दिने तन्नगरं ध्वजश्रेण्याचलंकृतं । स्वजनाः कारयंत्येषां विष्वक् पूर्वोक्तया दिशा ॥ ९३ ॥ तस्मिन्नवसरे प्राग्व-चतुःषष्टिः सुरेश्वराः । पायांत्यासनकंपेन ज्ञात्वा दीक्षाक्षणं प्रभोः ॥ ९४ ॥ देवानां समुदायेना-गच्छता त्रिदिवात्तदा । द्यावाभू- के के प्रव्रज्यावसरे अरिहंतोने वार्षिकदान माटे ३८८ कोड ने ऐंशी लाख सोनैया जेटलुं द्रव्य अमारे पूरुं पाडवु. ( २८७-८८)' आ प्रमाणे निश्चय करीने सौधर्मेंद्र धनदने आज्ञा करे अने ते मुंभक देवतामोने आज्ञा करे भने तेश्रो आटलुं द्रव्य जिने- श्वरना घरमा नाखे छे. ( २८९ ) एटला द्रव्य उपरांत चीजुं पण हाथी, घोडा, प्राभू- एसरे, खो रिमेरे पोलानर मंदिरमाथी दानवीर एक जिनधरो लोकोने देनी इच्छा प्रमाणे आपे छे. (२९० ) वळी पोताना सेवको पासे अनेक रसोडा शरु करावीने दीनज- नोने अन्नपानादि पण अनर्गळ आपे छे. (२९१) " श्रीज्ञाताधर्मकांगमा कमु छ के- 'त्यारपछी कुंभराजा मिथिला राजधानीमा त्या त्यां-ते ते प्रदेशमा घणी महानसशाळा ( रसोडा) करावे.' इत्यादि श्रीमल्ल्यध्ययने. पछी मातापिता विगेरे स्वजनोनी कोइपण रीते अनुज्ञा मेळवीने ए महाशयो जे दिवसे चारित्र लेवा माटे तत्पर थाय ते दिवसे ते नगर पूर्व जन्मोत्सवमां कही गया प्रमाणे स्वजनो ध्वजण्यादिवडे अलंकृत करे. ( २९२-९३) ते अवसरे आसनकंप- घडे प्रभुनो दीक्षा अवसर जाणीने चोसेठे इंद्रो प्रथमनी जेम त्यां प्रावे. (२९४) ते रूते देव-देवीना समुदाय सहित स्वर्गमाथी प्रावतां पृथ्वी ने भाकाशनो मध्यभाग

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(२२८) भीकाललोकप्रकाश। विदा ॥ ४ ॥ षष्ठादिना विशिष्टेन तपसालंकृतस्ततः । उत्तरोत्तर- मुत्कृष्ट-वर्द्धमानशुभाशयः ॥ ५ ॥ तत्र सिंहासने पूर्वा-मुखः स्वामी निषीदति । प्रभोर्दक्षिणतश्चोप-विशेत्कुलमहत्तरा ॥ ६॥ पटशाटकमेक सा विभृते हंसलक्षणं । अंबधात्री वामतश्च चारुवेपा निपीदति ॥७॥ पृष्ठेऽवतिष्ठते चैका तरुणी चारुभूपणा । प्रभूपरि सितच्छत्रं दधाना स्व- वधूपमा ॥ ८॥ एका च कृतशृंगारा चकोराक्षी निषीदति । ऐशान्यां दधती हस्ते कलशं जलसंभृतं ॥ ९॥ एका निपीदत्याग्नेय्यां रम्यालंका- रबंधुरा । हस्ते धृत्वा मणिमयं तालतं मृगेक्षणा ॥ १० ॥ ततश्च स्वजनादिष्टाः सहस्रं पुरुषर्षभाः । समोच्छ्रायोत्साहरूप-वेषभूपणशा- लिनः ॥ ११ ॥ वहति शिविकां याव-त्तावत्सौधर्मनायकः । तस्य वाहां दाक्षिणात्या-मूर्ध्वगां वहति स्वयं ॥ १२ ॥ उदीच्यामूर्ध्वगां बाहां वहतीशाननायकः । अधस्तनां दाक्षिणात्यां चमरेंद्रः स्वयं वहेत् ॥१३।। अधस्तनीमौत्तराहां वलींद्रस्तासुदस्यति । चत्वार उद्वहंत्येव-मिंद्राबाहा. चतुष्टयं ॥ १४ ॥ शेषाः सुराः सुरेंद्राश्च चलकुंडलभूषणाः । प्रौढप्रेमप्र- मळी जवाथी ते जेम शास्त्रना ज्ञानवडे घुद्धि शोभे तेम शोमी नीकळे. (३०४ ) पछी छह विगेरे विशिष्ट तपवडे शोभना अने उत्तरोत्तर उत्कृष्ट तेम ज वर्धमान शुभाशयवाळा प्रभु ते शिपिकाना मध्यमा पूर्वसन्मुख सिंहासनपर से अने प्रभुनी दक्षिण बाजुए तेमनी कुळमहत्तरा पेसे. (३०५-६) ते हंसना लक्षण ( चित्र )वालं एक पटशाटक ( वस्त्र) हाथमा राखे. डावी याजुए सुंदर वेशवाळी धावमाता वेसे. ( ३०७) पाछळ एक सुंदर श्राभूषणवाळी तरुणी देवांगना जेवी प्रभुनी उपर श्वेत छत्र धारण करीने से. (३०८) एक शृंगार करेली चकोराची (स्त्री) ईशानकूणमा हाथमा जळथी भरेलो कळश लइने से. ( ३०२) एक रमणिक अलंकार धारण करेली मृगाक्षी (स्त्री) अग्निकोणे हाथमा मणिमय पंखो लइने बेसे. (३१०) पछी स्वजनोए आदेश करेला सरखी उंचाइ, उत्साह, रूप, वेप भने भूपणवाळा पुरुषश्रेष्ठो ते शिपिकाने उपाडे. ते वखत सौधर्मेंद्र तेनी जमणी पाजुनी उपरली बाहाने धारण करे ( उपाडे ) (३११-१२) उत्तर पाजुनी उपली बाहाने ईशानेंद्र उपाडे, जमणी चाजुनी नीचेनी पाहाने चरेंद्र पाडे. ( ३१३ ) अने उत्तर बाजुनी नीचली बाहाने चलींद्र उपाडे. या प्रमाणे चार पाहा चार इंद्रो उपाडे. (३१४ ) वाकीना चलायमान कुंडळ तथा भूपणवाळा भने । सर्ग ३० मो। (२२९) कटित-पुलकांकुरदंतुराः ॥ १५ ॥ पंचवर्णानि पुष्पाणि वर्पतो देवदुंदु: भीन् । वादयंतः स्वमात्मानं धन्यमन्याः स्फुरन्मुदः ॥ १६ ॥ अहंपूर्व- महंपूर्व-मिति सत्वरचेतसः। शेपेष्वशेषदेशेषु वहति शिविकां प्रभोः ॥१७॥ त्रिभिर्विशेषकं ॥ तथाहुः श्रीभद्रबाहुस्वामिनः-' पुव्वं उकित्ता माणुसेहिं साहड रोमकूवेहिं । पच्छा वहति सी असुरिंदसुरिंदनागिंदा ॥१८॥' ईदृग्निय- मश्चात्र चतुर्थांगे-पुरतो वहंति देवा नागा पुण दाहिणंमि पासंमि । पञ्चच्छिमेण असुरा गरुला पुण उत्तरे पासे ॥ १९ ॥ शक्रेशानौ ततस्तां तां त्यक्त्वा वाहां सुरेश्वरौ । चामराणि वीजयतः प्रभोरुभयतः स्थि- तौ ॥ २० ॥ तदा नभोंगणं देवैः स्फुरद्वसनभूपणैः । भूमंडलं च मनुजै- र्भवेद्विष्वगलंकृतं ॥ २१॥ निरंतरं वाद्यमान-रानोधैर्विविधैस्तदा । जया- रवैश्च लोकानां भवेच्छब्दमयं जगत् ॥ २२ ॥ नागराणां नागरीणां समुदायैः पदे पदे । वीक्ष्यमाणः स्तूयमानः प्रार्थ्यमानो मनोरथैः ॥ २३ ॥ पुष्पोने वरसावता, प्रभुउपरना प्रौढ प्रेमी प्रगटित थएल पुलकांकुरवाळा देवो अने देवेंद्रो पांचवर्णना देवदुंदुमी वगाडता, पोताना आत्माने धन्य मानता, स्फुरायमान हवाळा थइने हुँ पहेलो हुँ पहेलो एम सत्वर चित्तवाळा समस्त भागोथी प्रभुनी शिपि- काने उपाडता घाले. (३१५-३१७) श्रीभद्रबाहुस्वामी कहे छ के "प्रभुनी शिविका प्रथम विकस्वर रोमराजीवाळा मनुष्यो उपाडे; पछी असुरेंद्र, सुरेंद्र ने नागेंद्रो ते शिपिकाने उपाडे.' ( ३१८) चोथा अंग समवायोगमा प्रावो नियम पताव्यो के के-'पूर्व दिशाए वैमानिक देवो उपाडे, दक्षिण बाजुए नागकुमारो उपाडे, पश्चिम वाजुए असुरकुमारो उपाडे अने उत्तर याजुए सुवर्णकुमारो उपाडे. (३१९) थोडेक चाया पछी शक ने ईशानेंद्र ते पाहा वजी प्रभुनी चे पाजु रहीने चामर वीजता चाले. (३२०) ते वखते स्फुरायमान वस्त्राभूषणवाळा देवोवडे भाकाश अने मनुष्योवडे भूमंडळ चोतरथी अलंकृत थइ रहे. (३२१ ) तेमज अविच्छिन्न वागता विविध प्रकारना चाजीतोपडे अने लोकोना जयजयारववडे या जगत शन्दमय यह रहे. (३२२ ) नगरजनो भने नगरस्त्रीमोना समुदायी पगले पगले जोवाता, स्तवावा भने मनोरथोबडे प्रार्थना कराता एवा जगद्गुरु हजारो घरो ने हाटोनं अतिक्रमण करता, (२३०) श्रीकाललोकप्रकाश । भवनासहस्राणि व्यतिक्रामन् जगद्गुरुः । जनांजलिसहस्राणि गृह्णन् शृण्वंश्च तत्स्तुतीः ॥ २४ ॥ वनाय पुर्या निर्याति राजमार्गेण मार्गवित् । सौधर्मेंद्र इव स्वर्गा-पूर्वोक्ताभिः समृद्धिभिः ॥ २५ ॥ प्रथमं मंगालान्यष्टौ संपूर्णः कलशस्ततः। गारचामरच्छत्र-वैजयं- त्यस्ततः क्रमात् ॥ २६ ॥ पादपीठान्वितं रत्न-स्वर्णसिंहासनं ततः । ततः पृथक् साष्टशत-मनारोहेभवाजिनां ॥ २७ ॥ रथानामस्त्रपूर्णानां ध्वजघंटावलीस्पृशां । प्रधानपुरुषाणां च प्रत्येकं शतमष्टयुक् ॥ २८ ॥ गजाश्वरथपादात्य-सैन्यानि च ततस्ततः । सहस्रयोजनोत्तुंगो ध्वजो ध्वजसहस्रयुक् ॥ २९ ॥ खड्गमाहा: कुंतपीठ-फलकग्राहिणस्ततः हास्या- दिकारकाः कांद-पिकाश्च सजयारवाः ॥ ३० ॥ उमा भोगाश्च राजन्याः क्षत्रियाद्यास्ततः क्रमात् । संचरंति ततो देवा देव्यश्च स्वामिनः पुरः ॥३१॥ वदंति सर्वे तत्रैवं जय जीव जगद्गुरो । ज्ञानाद्यैर्निरतीचारै-जहि कर्मरिपून द्रुतं ॥ ३२ ॥ जयाजितानींद्रियाणि जीतं धर्म च पालय। लोकोनी हजारो अंजळी (प्रणामो) ने ग्रहण करता, तेमनी कोली स्तुतिमोने सांभ. ळता मोक्षमार्गना जाणकार एया प्रसु पनमा जवा माटे राजमार्गे थइने पूर्वोक्त समृद्धि वडे जेम सौधर्मेंद्र स्वर्गमाथी नीकळे तेम नगरमाथी नीकळे. ( ३२३-३२५) दीक्षा महोत्सवना वरघोडामा प्रथम पाठ मंगळ चाले. त्यारपछी संपूर्ण कळश, शृंगार, चामर, छत्र, ध्वजाश्रो, पादपीठ सहित रत्न स्वर्णमय सिंहासन, त्यारपछी एक सो आठ हाथी अने एक सो पाठ घोडा (अनारोहवाळी ) अस्त्रपूर्ण अने ध्वजा घंटावळीवाळा १०८ रथो, त्यारपछी १०८ प्रधान पुरुषो, त्यारपछी हाथी, घोडा, रथ अने पादातिरूप चार प्रकारनी सेना, पछी हजार योजन उंचो हजार ध्वजावाळो इंद्रध्वज, त्यारपछी खड्ग माला भने पीठफलकने ग्रहण करीने चालनारा, तेम ज हास्य उत्पन्न करनारा भने जयजय शब्द करनारा कांदर्पिको चाले. (३२६-३० ) त्यारपछी उग्र, भोग, राजन्य अने क्षत्रियो अनुक्रमे चाले. त्यारपछी देवदेवीश्री स्वामीनी आगळ चाले. (३३१) ते सर्वे या प्रमाणे बोले के-" हे जगद्गुरु ! जयवंता वों, पणुं जीवो. निरातिचार एवा ज्ञानादिवडे कर्म- शत्रुने शीघ्र तजी द्यो (नाश करो), (३३२ ) अजित एवी इंद्रियोने जीवो. श्राचार भने धर्मनुं पालन करो. सर्व विघ्नोने जीती त्रिभुवननुं मैश्वर्य उतावळे मेळयो (३३३ ) १ जेना पर कोइ वखत कोइपण बेठेल नहीं तेषा.

सर्ग ३० मो। (२३१) विप्नान् जित्वा त्रिभुवन-श्वर्यमासादय द्रुतं ॥ ३३ ॥ रागद्वेषमहामल्लौ हत्वा मल्ल इवोद्भटः । पाराधनापताकां द्राग् जगद्रंगे समाहर ॥ ३४ ॥ विशुद्धं केवलज्ञानं प्रभो शीघ्रमवाप्नुहि । सन्मार्ग दर्शयास्माकं धर्मे निर्विः नमस्तु ते ॥ ३५ ॥ एवं महःप्राप्य वन-मशोकादितरोस्तले। संस्थाप्य शिविकां तस्याः समुत्तरति तीर्थकृत् ॥ ३६ ॥ यथोचितं भूपणानि विमुंचति ततः प्रभुः । तान्यादाय हितं शास्ती-त्येवं कुलमहत्तरा ॥३७॥ उच्चोच्चगोत्रस्त्वं वत्स त्वमसि क्षत्रियोत्तमः । प्रसिद्धमातापितृको व्याप्तीतिर्जगत्रये ॥ ३८ ॥ दुराराधं दुश्चरं च व्रतमंगीकृतं त्वया । यद्वालुकानां कवल इवास्वादलवोज्झितं ॥३९॥ दुर्वहं मरुवत्खड्ग-धाराममिव दुश्चरं । दुस्तरं वार्द्धिवद्भीम क्लीवानां श्रवणादपि ॥४०॥ ततः प्रमादं मा कार्की-वत्सो- ऽसि त्वं सुखोचितः । तथा यतेथास्त्वं धर्मे यथा सिद्ध्येत्तवप्सितं ॥४१॥ इत्युदित्वा नमस्कृत्य शाटकं हंसलक्षणं । श्रादाय भूपणैः पूर्ण-मे- रागदेपरूप महामानने उद्मट मन्वनी जेवा तमे हणीने जगरूपी रणभूमिर्मा भारा- धना पताका मेळवो. ( ३३४ हे प्रभु ! तमे विशुद्ध एवा केवळज्ञानने शीघ्र प्राप्त करो. भमने सन्मार्ग देसाहो, तमने धर्ममा निर्षिमपणुं हो." ( ३३५ ) भा प्रमाणे महोत्सवपूर्वक उद्यानमा भावीने प्रशोकादि पृक्षनी नीचे शिपिका स्था. पन करे, एटले प्रमु तेमांधी उतरे ( ३३६) यथोचितपणे भाभपणो प्रभु उतारे एटले ते लइने फुल मह चरा तेमने या प्रमाणे हितवचनो कहे (३३७) " हे वत्स ! तमे घणा उथ गोमचाळा छो, तमो वत्रियोचम बो, प्रसिद्ध माता-पितावाळा छो, जग जगतमा जेमनी कीर्षि पसरेली के एवा छो. (३३८) मे दुराराध्य भने दुश्वर एग्रन अंगीकार करो छो के से भास्वादना अंश पप विनानु बेलना कवळ जैछ. ( ३३९ ) मेरुपर्वतनी अg दुर्घह थे, सद्गनी धारा जे दुघर छ, समुद्रनी बेयु दुस्तर छ, क्लीर जनोने माम- उता पण भीष्म लागे तेघु थे. (३४०) हे वत्म ! उमे मुसोचित छौ रेपी सेना भारापनमा प्रमाद न करशो. तमे ते धर्मना भाराधना से प्रयत्न करजी के जेपी समारं इन्धित सिद्धाय (३४१) मा प्रमाणे फही नमस्कार फरीने ते कुळमाचरा आम्पपोपी पूर्ण एy हमलपणाटक प्राण करी एक पानु उमी रहे. (३४२) एटते प्रस एक सहिरहे दाटी-सपना भने १ मुखमा देखा. (पहरे) (२३२) कतः सापसर्पति ॥ ४२ ॥ ततो मुष्ट्यैकया कूर्चे तच्चतुष्केण मुर्द्धजान् । उद्धरन् कुरुते लोचं भगवान् पंचमौष्टिक ॥ ४३ ॥ तदा च प्राप्तवैराग्य- र्जिनाः केचिन्नृपादिभिः । प्रव्रजति परिवृताः केचिदेकाकिनोऽपि च ॥ ४४ ॥ केशांस्त्वादाय शक्रस्तान् सुरभीन् श्यामलान्मृदून् । अनुज्ञाप्य जगन्नाथ-मुत्सृजेत्क्षीरनीरधौ ॥ ४५ ॥ वस्त्रं च स्थापयत्येकं प्रभोः स्कंधे हरिस्तदा । देवदूप्याभिधं स्वर्ण-लक्षमूल्यमनुत्तरं ॥ ४६ ।। देवमा- नवशब्दोघो नानातूर्यरवोऽपि च । क्षिप्रमेवेंद्रवाक्येन निखिलोऽप्युपशा- म्यति ॥४७॥ नमो सिद्धाणमित्युक्त्वा स्वामी सामायिकं ततः। निपिद्धसर्वसावद्य-योगं संप्रतिपद्यते ॥४८॥ अत्र सामायिकपाठे भंते इति जिना न कथयंतीति कल्पवृत्त्यादिपु करोमि भदंत सामायिकं । सर्वान्सावद्ययोगान् प्रत्याचक्षे । नचास्या- न्यो भदंतोऽन्यत्र सिद्धेभ्यः प्राचारार्थं त्वनेन सिद्धान् चा प्रत्युक्त मिति तु तत्वार्थवृत्तौ. चार मुष्टिवडे मस्तकना केशोनो-एम पांच मुष्टिवडे सर्व केशोनो लोच करे. ( ३४३) ते वखते जेमने वैराग्य उत्पन्न थयो छे एवा राजाश्रो अथवा राजकुमारो साथे केटलाक जिनेश्वरो प्रव्रज्या ग्रहण करे अने केटलाक एकला पण प्रव्रज्या ग्रहण करे. (३४४) प्रभुना सुगंधी, श्याम अने मृदु एषा केशाने ग्रहण करी प्रभुने जणाधीने इंद्र ने क्षीरसमुद्रमाक्षेपवे. (३४५) पछी इंद्र लक्ष सोनैयाना मूल्यवालं ने अनुत्तर एयु एक देवय नामनुं वस्त्र प्रभुना स्कंधपर स्थापन करे. (३४६ ) त्यारपछी इंद्रना एकबार ज कहेवाथी देवमानयोनो शब्दसमूह तेम ज नाना प्रकारना वाजीत्रोना शब्दसमूह तत्काळ शांत थइ जाय. (३४७) एटले प्रभु नमो सिद्धाण एम कहीने सर्व सावधयोगना निषेधरूप सामायिक उच्चरे-अंगीकार को. (३४८) अहीं सामायिकना पाठमा भंते एम जिनेश्वरो न कहे एम कल्पवृत्यादिमां कयुं छे. तत्त्वार्थवृत्तिमांतो-"करोमि भदंत सामायिकं । सर्वान् सावद्ययोगान् प्रत्याचक्षे । न चास्यान्यो भदंतोऽन्यत्र सिद्धेभ्यः श्राचारार्थ त्वनेन सिद्धान् वा प्रत्युक्त- मिति ।" एम कडं छे. एटले के " तेमनी मान्यता प्रमाणे भदंत शब्द प्रभु कहे छे, परंतु प्रभुने सिद्धथकी अन्य कोई भदंत नथी तेथी अन्यत्र सिद्धेभ्यः एम कहेल छे. एवो तेमनी प्राचार छे. अथवा प्रा भदंत शब्दवडे सिद्धने ज उद्देशीने वेमना प्रत्ये भदंत शब्द कहेल होय एम जयाय छे.

सर्ग ३० मो। (२३३) ततस्तस्य च चारित्रप्रतिपत्त्युत्तरक्षणे । उत्पद्यते महाज्ञानं मनःप- र्यायसंज्ञकं ॥ १९ ॥ एवं गृहीतचारित्रा-स्तेऽहंतः परमेश्वराः । श्राप- च्छ्य स्वजनांस्तस्मि-नेवाह्नि विहरंत्यपि ॥ ५०॥ वसंत्येकमहोरात्रं ग्रामे नंगे च पंच तान् । चंदनाभ्यर्चने वास्या तक्षणे च समाशयाः ॥५१॥ मणौ मृदि रिपौ मित्रे समाश्च स्तुतिनिंदयोः। द्रव्यक्षेत्रका- लभाव-प्रतिबंधविवर्जिताः ॥ ५२ ॥ तत्र द्रव्यं सचित्तादि क्षेत्रं ग्रामगृहादिकं । कालः स्यान्मासवर्षादि वो रागादिरुच्यते ॥ ५३ ॥ एकांते च सभायां च पुरेऽरण्ये समक्रियाः । समाहिताः समि- तिभि-ऐप्तिभिश्च निराश्रवाः ॥ ५४ ॥ व्योमवत्ते निरालंवा प्रात्म- वास्खलितास्पदाः । सौम्याः शीतांशुवद्दीप्राः सहस्रकरविंववत् ॥ ५५॥ वायुवच्चाप्रतिबंधाः शरदंभोऽमलाशयाः । पाथोनिधिवदक्षोभ्या अग्र- कंप्याश्च मेरुवत् ॥५६॥ अप्रमत्ताश्च भारंड-खगवद्गजराजवत् । शौंडीराः सिंहवच्छूरा-रमानो भुवि चरंति ते ॥ ५७ ॥ चतुर्भिः स्यारपछी प्रभुने चारित्रप्रतिपत्तिनी उत्तर क्षणे ज मनःपर्याय नामर्नु महा- धान उत्सम थाय. (३४९) ए प्रमाणे जेमणे चारित्र ग्रहण करेलुं छे एवा अरिहंत परमेश्वर स्वजनोने पूछीने ते दिवसे ज त्यांची विहार करे. (३५० ) तेश्रो गामा एक रानि अने शहरमा पांच रात्रि रहे थे. वेओने कोई चंदनवडे चर्चे के कामलारडे छेदे ते अनेपर तेमो समान भाशयवाळा दोय. (३५१ ) मणिमा ने माटीमां, शत्रुमां ने मित्रमा, स्तु- तिमा ने निंदामा समान होय. द्रव्य-क्षेत्र काळ-भावना प्रतिबंधरहित होय. (३५२) तेमा द्रष्य ते सचित्तादि, चेत्र ते ग्राम, घर, विगेरे काळ ते मास, वर्षादि अने भाव ते रागादि कहेवाय थे. (३५३) एकांतमा के समामां, नगरमा के अरण्यमा समक्रियावाळा होय, पांच समिति ने प्रण गुप्तिषी समाहित (सहित) होय, निराश्रय (प्रायवरहित ) होय. (३५४) तेश्रो भाकाशनी म निरालंबी होय, मात्मानी जेम अस्पलित गति गराळा होय, चंद्र जेवा सौम्प होय, मर्यना चि जेवा दीप्तिमान् होय, ( ३५५) वायुनी वा अपनिबंध होय, शरदयातना जळ बेवा निर्मळ प्राशययाळा होय, समुद्रनी जेश अवोभ्य होय, मेरुनी सेवा निष्पकंप होय, (३५६) मारंड पछी जेवा अप्रमत्त होय, गजराज जेबा शाहीर होप भने सिंहनी वा शूरवीर भामाशाळा वेगो भूमिपर रिचरे ( ३५७) शंग नेम (२३४) श्रीकाललोकप्रकाश। कलापकं ॥ शंखो विविधरागेण कांस्यपात्रं यथांभसा । रज्यते लिप्यते नैव तथा तेऽपि जिनेश्वराः ॥ ५८ ।। तपसः पारणां ते च कुर्वते यस्य वेश्मनि । तद्गृहे पंच दिव्यानि स्युर्देवैर्विहितानि वै ॥ ५९ ॥ सुगंधिजलवृष्टिः स्यात् १ पुष्पवृष्टिस्तथा भवेत् २ । स्यात् स्वर्णवृष्टि ३ व॑नति गगने दिव्यदुंदुभिः ४ ॥६० ।। अहो दानमहो दान-मित्युद्घोषणपूर्वकं । नृत्यंति मुदिता देवा नर- जन्मानुमोदिनः ॥ ६१ ॥ स्वर्णवृष्टौ गरिष्ठायां सार्की द्वादश कोटयः । कनिष्ठायां तु तस्यां स्यु-लक्षास्तावत्य एव च॥ ६२ ॥ त्रैलोक्यस्थामवि- क्षोभ-प्रभविष्णुभुजा अपि । परीपहोपसर्गास्ते सहते निर्जरार्थिनः ॥६३॥ क्षुत् १ पिपासा २ च शीतोष्णे ३-४ । दंशा ५ चेला ६ ऽरति ७ स्त्रियः ८। चर्या ९ नैपेधिकी १० शय्या ११-ऽऽक्रोशश्च १२ वध १३ याचने १४ ॥ ६४ ॥ रोगा १५ ऽलाभ १६ तृणस्पर्शाः १७ सत्कारो १८ मलिनांगता १९ । प्रज्ञा २० ऽज्ञानं २१ च सम्यक्त्वं २२ द्वाविंशतिः परीषहाः॥६५॥ अरत्याख्यान्मोहनीया-दरतिः स्यात्परीपहः । जुगु- विविध रंगी रंगातो नथी अथवा कांस्यपात्र जळथी लेपातुं नथी तेम प्रभु पण रंग के लेप विनाना होय छे. (३५८) प्रभु जेने त्यां तपनुं पारणुं करे तेने त्यां देवोना करेला पांच दिव्य प्रगट थाय. ( ३५९ ) ते आ प्रमाणे--सुगंधी जळनी वृष्टि, पुष्पोनी वृष्टि, स्वर्णनी धृष्टि, आकाशमा देवदुंदुभिनो नाद अने अहोदान अहोदान एवी उद्घोषणापूर्वक हर्ष पामेला देवो मनु- प्य जन्मनी अनुमोदना करता सता नाचे. ( ३६०-६१ ) वर्णवृष्टि उत्कृष्टी साडापार ऋोड सोनैयानी थाय छे भने जघन्य थाय तो साडापार लाख सोनयानी थाय. (३६२) त्रण लोकना बळने विक्षोभ पमाडवाने समर्थ एवी भुजावाळा छतां प्रभु निर्जराने माटे अनेक प्रकारना परिपह तथा उपसर्गोने सहन करे. (३६३) परिपहो बावीश के वेना नाम था प्रमाणे-क्षुधा १, पिपासा २, शीत ३, उष्ण ४, दंश ५, अचेल ६, अरति ७, स्त्री ८, चर्या ९, नैपेषिकी १०, शय्या ११, आक्रोश १२, वध १३, याचना १४, रोग १५, अलाम १६, तृणस्पर्श १७, सत्कार १८, मलिनांगता १९, प्रज्ञा २०, अज्ञान २१ अने सम्यक्त्व २२. (३६४-६५) आ परि. पह कइ कइ कर्मप्रकृतिना उदयथी थाय छे ते कहे छे-भरति मोहनीयना उदयथी भरति सर्ग ३० मो। प्सामोहनीयाच्चा-चेलवं स्यात्रपावहं ॥ ६६ ॥ पुंवेदमोहनीयाञ्च स्या- त्पुसां स्त्रीपरीपहः । स्त्रीवेदमोहनीयाच स्त्रीणां स्यात्पुंपरीपहः ॥ ६७ ॥ भयमोहाद्भवेद्भीष्मो नैपेधिक्याः परीपहः । याश्चापरीपहो मान-भंग- कृन्मानमोहतः ।। ६८ ॥ क्रोधहेतुः क्रोधमोह-भूराक्रोशपरीपहः। मान- हेतुर्मानमोह-भूः सत्कारपरीपहः ॥ ६९ ॥ चारित्रमोहमाश्रित्य । स्युः सप्तामी परीषहाः । प्रज्ञाऽज्ञानद्वयं ज्ञाना-वरणीयसमाश्रितं ॥ ७० ॥ सम्यक्त्वं दर्शनमोह-मलाभो विघ्नकर्म च । प्राश्रित्य वेदनीयं तु भवंत्येकादशापरे ॥ ७१ ॥तत्राद्याः क्रमतः पंच चर्या शय्या वधो रुजा । तृणस्पर्शश्च मालिन्य-मित्येते वेदनीयजाः ॥ ७२ ॥ एवं च ज्ञानावरणे मोहनीयांतराययोः । वेदनीये चेति कर्म-चतुकेंतर्भवत्यमी ॥ ७३ ।। स्युविंशतिरप्येते सप्ताष्टकर्मबंधिनां । युगपदिशति चामून् वेद- यंत्यपि जातु ते ॥ ७४ ॥ चर्याने पेधिकीयुग्मं युग्मं शीतोष्णयोरपि । परिषह थाय छ, जुगुप्सा मोहनीयना उदयथी ला श्रापनार अचेल परिपह थाय छे. (३६६ ) पुरुषवेदरूप मोहनीयना उदयथी पुरुपने स्त्री परिपह थाय छ, स्त्रीवेदरूप मोहनीयना उदयधी स्त्रीने पुरुष परिपह थाय छे. (३६७) भय मोहनीयना उदयधी मीम एवो नषेषिकी परिपह थाय छे. मानभंग करनारो याचना परिपह मानमोहनी. यना उदयथी उत्पन्न थाय 2. (३६८ ) क्रोधना हेतुभूत आक्रोश परिपह क्रोधमोहनी- यथी उत्पन्न पाय छे. मानना हेतुभूत सत्कार परिसह मानमोहनीयथी उत्पन्न धाय छे. (३६९) मा प्रमाणे सात परिपहो चारित्रमोहनीयकर्मना उदयथी उत्पन्न थाय छ. प्रज्ञा परिपह ने अज्ञान परिसह ज्ञानावरणीयना, उदयथी उत्पन्न थाय छे. (३७ ) सम्यक्त्य परिपह दर्शनमोहनीयना उदयपी उत्पन्न थाय छे. अलाम परिपह अंतरायकर्मना उदयची थाय छे. याकीना ११ परिपहो घेदनीयकर्मना उदयथी उत्पन पाय छे. ( ३७१) मा प्रयमना पांच तथा चर्या, शय्या, क्य, रोग, मस्पर्श भने मालिन्य ए ११ वेदनीयकर्मना उदयपी पाय थे. (३७२) ए प्रमाणे मानावर- गीय, मोहनीय, अंतराय ने पेदनीय, ए पार कर्ममा पधा परिपही संवर्माव पामे थे. ( ३७३) पापायीशे परिपहो सात माठ कर्म पांधनार जीवने होप थे. कोक घरात सम- फाळे एमांना २० परिपको बेदाप थे, ३७४ ) कारण के नर्या भने पधिकी मज ।

(२३६) भीकाललोकप्रकाश। न भवेयुगपत्तेनानुभवो विंशतेः स्मृतः ॥७५॥ ननु चात्यंतिके शीते पतति ज्वलितेऽनले । मध्यस्थस्यैकतः शीतं तुदत्येवोष्णमन्यतः ॥७६ ॥ अत्रोच्यते-शीतोष्णकालोत्थे शीतोष्णे एवात्र विवक्षिते । व्यभिचारो न तत्पूर्वो-तैः शीतज्वरिभिस्तथा ॥ ७७ ॥ एवंविधो व्यतिकरो न भवेद्वा तपस्विनां । तस्माच्छीतोष्णयोनक-काले संभव इष्यते ॥ ७८ ॥ ननु शय्या च चर्या च न स्यातां युगपत्ततः । एकोनविंशतेरेव कथं नोक्तः सहोद्भवः ॥७९॥ अत्रोच्यते-कंचिद्मामं समुदिश्य गच्छन्नु. सुकमानसः । मार्गे यदीवरी शय्यां तादृशीं प्रतिपद्यते ॥ ८०॥ गम- नेच्छानिवृत्तत्वा-त्तदा चर्यापरीपहः । कंचित्कालं च शय्यापि यौगपथं द्वयोरिति ।। ८१॥ मोहायुर्वर्जपट्कर्म-बंधिनां तु चतुर्दश । छद्मस्थानां स्युरष्टाभि-र्व- जिता मोहनीयजैः ।। ८२ ॥ चर्याशय्ये वोष्णशीते स्यातामेषां समं न शीत अने उष्ण एनो अनुभव समकाळे थतो नथी, तेथी २० नो अनुभव करो छे (३७५) अहीं कोई प्रश्न करे छ-' अत्यंत शीतनो उपद्रव सते ज्वलित एवा अनल ( भग्नि )नो कोइ पाश्रय ले थे, तो ते एक पाजुथी शीतने वेदे छे. अने पीजी बाजुथी उष्णताने वेदे छे। तो तेथी ये समकाळे केम न होय ? ( ३७६) तेने उचर भापे के के-'महीं शीत अने उष्णकाळमां (ऋतुमा ) लागती शीत ने उष्णतानी विवक्षा करी छे, तेथी शीत ज्वरादिवाळो मनुष्य तमारा कहेवा प्रमाणे अनुभव करे तो तेथी अमारा कथना व्यभिचार आवतो नथी. ( ३७७ ) अथवा एवो व्यतिकर तपस्वीओने पनतो नथी, तेथी शीत ने उष्ण परिपह एक काळे संभवता नथी.' (३७८ ) चळी प्रश्न करे के के-तमे शय्या ने नैषेधिकी परिपह एक काळे थता नथी एम कहो छो तेज प्रमाणे शय्या ने चर्या पण एककाळे थता नथी तो १९ परिसह समकाळे वेदाय एम केम न फयु ?' (३७९ ) तेने उत्तर आपे छ के- कोइ ग्रामने उद्देशीने उत्सुक मनधी जतां मार्गमा जो इत्वरी (थोडा काळनी) शय्या मळी आवे, ते वखते गमनेच्छा निवृत्त थयेली होवाथी चर्या परिपह होय छ भने किंचित् काळ शय्यापरिपह पण होय के तेथी ते पंने परिषह सम- काळे विवक्ष्या छे.' ( ३८०-८१) मोहनीय ने आयु सिवायना छ कर्मना बंधक छद्मस्थने मोहनीयकर्मथी उत्पन थता आठ परिषह सिवायना १४ परिषहो होय छे. ( ३८२ ) तेमने चर्या ने शय्या तेम ज सर्ग ३० मो। (२३७) यत् । द्वादशानुभवत्येते सूक्ष्ममोहास्ततः समं ॥ ८३ ॥ ननु पूर्वोक्तया युक्त्या न शय्याचर्ययोः कथं । सहोद्भवो भवत्येषा-मिति चेत् श्रूयता. मिह ॥ ८४ ॥ तद्धेतुमोहानुदया-नैपामौत्सुक्यसंभवः ॥ ततो नेत्वर- शय्यायामेपां चर्यापरीपहः ॥ ८५॥ छद्मस्थवीतरागाणा-मथैकं कर्म वध्नतां । सयोगानां केवलिनां भवस्थायोगिनामपि ॥८६॥ एका- दशोपसर्गाः स्युर्वेदयंति समं नव । न चर्याशय्ययोः शीतो- प्णयोर्यत्सममुद्भवः ॥ ८७॥ मोहकर्मोदयाभावादेषामौत्सुक्यसंभवः । न जातु स्यात्ततश्चर्या-शय्ययोर्न सहोद्भवः ॥ ८८ ॥ अमी च सम्यक् सोते दर्मोक्षाभिकांक्षिभिः । रागद्वेपाकरणत-स्तस्मा- दुक्ताः परीपहाः ॥ ८९ ॥ प्रज्ञाप्रकर्षे नोत्कर्ष न चाल्पज्ञपराभवं । विदधीतेति सोढव्यो वुधैः प्रज्ञापरीपहः ॥ ९० ॥ सत्कारेऽपि कृते भक्कै- भॊज्यवस्त्रोत्सवादिभिः । न माद्यतीति सोढः स्या-त्सत्काराख्यः परीपहः उष्ण ने शीत समकाळे थवा न होवाधी सूक्ष्म मोहवाळाने समकाळे १२ परिपहो होय छ. ( ३८३ ) अहीं शिष्य प्रश्न करे के के-' तमे कहेली पूर्वयुक्तिवडे तेने समकाळे शय्या ने चर्या परिपह केम न होय ?" (३८४ ) तेने उत्तर यापे के के-सामळ ! श्री. सपना हेतुभूत मोहनीयकर्मनो उदय न होवाथी तेमने उत्सुकता होती नथी, सेथी तेमने इत्वरकाळना शय्या ने चर्या परिसह साये होता नथी (३८५) छमस्थ वीतराग एवा एक ज (चेदनीय ) कर्मना बंधकने, सयोगी केवळीने तेम ज भवस्थ भयोगीने पण ११ परिपहो (प्रज्ञा, अज्ञान ने अलाम विना) होय छे अने समकाळे नय परिपहने वेदे दे, केमके तेमने चर्या ने शय्या तेम ज शीत ने उष्ण परि- पह समकाळे उत्पन्न थता नथी. ( ३८६-८७ ) तेमने मोहनीयकर्मनो उदय न होवाची कदापि उत्सुकतानो ममव नथी; तेथी चर्या अने शय्या एकी माथे उत्पन थवा नथी. (३८८) आ परिपहो मोघना अभिकांती एका दक्ष जीवो रागद्वेष कर्या पिना सममारे सहन करे थे सेधी तेने परिपहो कया छे. ( ३८९) प्रक्षानो प्रकर्ष मते भमिमान करयु नहीं भने मन्पचनो परामय पण करवो नहीं एम जाणीने युधजनोए प्रमापरिपह सहन करवो. (३९०) मस्तजनोए मोजन, यत्र तथा उस्मयादिवडे सत्तार कर्या बता पण अमिमान करवं नहीं. ते ते सरकार परिसह महन कर्यो कहेयाय.

(२३८) भीकानलोकप्रकाश। ॥ ९१ ॥ अभ्यासेऽपि श्रुतानाप्तौ ज्ञानद्विष्टो विषण्णधीः । न स्यात्सोढव्य इत्येव-मज्ञानाख्यः परीयहः ।। ९२ ॥ तपश्चारित्रकष्टानां सोढानामिह जन्मनि । फलासंदेहतःसह्यः सम्यक्त्वाख्यः परीपहः॥९॥ शीतोष्णप्रभृ- तीनां तु वपुश्चेतस्तुदो स्वयं । परीपहवं विज्ञेयं स्पष्टत्वान्नेह वर्णितं ॥ ९४ ॥ स्त्रीप्रज्ञालोकसत्कारा अनुकूला अमी त्रयः । प्रतिकूलाश्च विज्ञेयाः शेषा एकोनविंशतिः ॥ ९५ ॥ अत्रानुकूलशीतलयोर्विशेषोऽ- न्वेषणीय इति. परीपही स्त्रीसत्कारौ द्वौ स्यातां भावशीतलौ । उष्णाश्च भावतः शेषा विंशतिः स्युः परीपहाः॥९६॥ तथाहुः-'इत्थीसकारपरीसहो य दो भावसीमला एए' (प्राचा०-२०२ नि०) इत्यादि. इति परीपहाः। उपस्सृज्यत एभिर्यत् धर्मात्प्रच्याव्यतेऽसुमान् । वाधाविशेषास्ते प्रोक्ता उपसर्गा इति श्रुते ॥ ९७ ॥ दिव्य १ मानुष २ तैरश्चाः ३ स्वसंवेद्या ४ स्तथैव च । एकैकश्च चतुर्भेद इति ते षोडश स्मृताः ॥ ९८ । हास्या- स्पद्वेषतो वापि तृतीयः स्यात्परीक्षणात् । तुर्यः पृथग्विमात्राख्यो हास्य- (३९१) अभ्यास करता छतां पण श्रुत न आवडे तो तेथी विषण्ण ( खेदवाळी ) बुद्धि- वाळा थइने ज्ञानना द्वेषी बनवू नहीं पा रीते अज्ञान परिषद सहन करवो. ( ३९२ ) त्प-चारित्रादिनः कष्टो आ भवमा सहन करवाथी तेना फळमां संदेह नहीं राखीने सम्यक्त्वपरिषह सहन करवो. (३९३) शीतोष्ण विगैरे शरीर तेमज चित्तने खेद पापनारा परिषहो पोतानी मेळे ज जाणी लेवा. ए हकीकत स्पष्ट होवाथी वहीं तेनुं वर्णन करेल नथी. ( ३९४) स्त्री, प्रज्ञा ने लोकोनो सत्कार ए त्रण अनुकूळ परिपह छे, बाकीना १९ प्रतिकूळ परिपहो छे. ( ३९५ ) अहीं अनुकूळ ने शीतळमां शुं विशेषपणुं छे ते विचार. स्त्री ने सत्कार ए ये मावशीतळ 2 अने वाकीना वीश परिषह भावी उष्ण छ. (३९६ ) श्रीआचारांगनियुक्तिमा कयु छ के-स्त्री अने सत्कार ए ये परि- पहो भाषथी शीतल छे इत्यादि. इति परिपहा ॥ जेनावडे प्राणी उपसर्ग पामे अने जे धर्मथी प्रच्युत करी दे-ते बाधाविशेपने उपसर्गो समजवा, एम श्रुतमा कयुं छे. (३९७) उपसर्गोना मुख्य चार प्रकार छे. १ देवसंबंधी, २ मनुष्यसंबंधी, ३ तिर्यंचसंबंधी अने ४ स्वसंवेद्य-ए एकेकना चार चार भेद छे. ए प्रमाणे १६ मेद समजवा. ( ३९८) देवसंबंधी हास्यथी, द्वेपथी, परीक्षा माटे भने चोथो पृथक् विमात्राी थाय . ए चोथो भेद हास्य-द्वपादिना संकरपणाथी सर्ग १० मो। (२३९) द्वेपादिसंकरात् ॥ ९९ ॥ स च हास्यात्समारब्धो द्वेपे यद्वा परीक्षणे । निष्ठा यायात्क्रुधारब्धो-ऽप्येवं हास्यपरीक्षयोः॥ ४०॥ यद्वारब्धः परी- क्षायै निष्ठां हास्यक्रुधोजत् । एतेषां त्रिकसंयोगो-ऽप्येवं भाव्यो मनीपिभिः ॥ १॥ मानुपा अप्येत एव भवत्याद्यानयस्ततः । कुशी. लप्रतिसेवाख्य-स्तुर्यो भोगार्थनादिजः ॥ २ ॥ भयाद् द्वेषाद्भक्ष्यहेतो-रप- त्यपालनाय च । इति तिर्यकृता ज्ञेया उपसर्गाश्चतुर्विधाः ॥३॥ प्रद्वेषात्क्रुद्धसर्पाद्या-स्तुदति श्वादयो भयात्। श्राहारहेतााघ्राद्या धेन्वा- यास्त्रातुमात्मजान् ॥ ४ ॥ घटनाञ्च प्रपतनात् स्तंभनात् श्लेपणादिति। श्रात्मसंवेदनीयाः स्यु-रुपसर्गाश्चतुर्विधाः ॥ ५॥ यथाक्षिण पतिते रेणौ तस्मिन् हस्तेन मर्दिते । मांसांकुरैर्वा कंठादौ कष्टं स्याट्टनोद्भवं ॥६॥ गमनादाक्यलेन दुःखं स्यात्पतनोद्भवं । सुप्तस्य चोपविष्टस्य पादादौ प्रसृते चिरं ॥७॥ स्थिते स्तब्धे स्तंभनोत्थ-मेवं संकुचिते चिरं। स्थिते थाय छे. ( ३९९) ते भावी रीते-हास्यथी पारंमेल होय पण जेतुं परिणाम परीक्षणमा के द्वेषमा याय, क्रोधथी पारंमेल होय ५३ ते हास्य के परीक्षामा परिणाम पामे. (४००) तेमज जे परीक्षा माटे प्रारंमेल होय पण ते हास्य के क्रोधमा परिणाम पामे. एवी रीते त्रिकसंयोगी भेद पण पुद्धिमानोए समजी लेवो. (४०१) मनुष्य संबंधी उपसर्गों पण एवा ज प्रण प्रकारे हास्यथी, द्वेपथी अने परीक्षा माटे पाय छ भने चौथो कुशील प्रतिसेवा नामनो प्रकार छ, ते प्रार्थनादिकथी थाय छे. (४०२) मपथी, देपथी, भक्ष्य माटे अने अपत्यपालना माटे एम तिर्यवहत उपस. र्गना पण पार मेद समजवा. (४०३ ) ते भावी रीते-प्रद्वेषधी सोदि उसे थे, भयपी मानादि फरहे थे, भाहार माटे व्याघ्रादि उपसर्ग करे छे भने गाय विगेरे पोताना पाळ- कोने पचावया माटे सामी यह जाय थे. (४०४) घट्टनथी, प्रपतनधी, स्तमनधी अने लेपणपीएम मात्मसंवेदनीय उपसगों चार प्रकारे थाय थे. (४०५) ते आवी रीते-या- समा रज विगेरे पध्ये सने हाथवडे मर्दित करवाथी अथवा कंठादि उपर मामाकुर पायी जे फष्ट उत्पम पाय ते घनोद्भव समज. (४०६) मयत्ने गमन करवायी पडी जपाय ते पत्नोमय जाणवु, वेमज सुतेलाने के पेठेलाने पपा काठसुधी पग विगैरे संपारी रारापापी ने स्तन्यपणे स्थित रहेवाधी दुःख उत्पम पाय ते स्तमनोमय सम- अधू मने एवरीवे पया पसत मुषी संकृषिसपो रहेपायी शरीरको महक भाग पळगी . (२४०) भाकालसोका तस्मिन् विलग्ने च दुःखं स्यात् श्लेषणोद्भवं ॥ ८॥ इदमर्थतः स्थानांग- सूत्रवृत्त्यादी. एतांश्च सहमानानां क्षीयते कर्मसंततिः। तेषामनुत्तरज्ञान-तपाक्षा- त्यादिशालिनां ॥ ९ ॥ त्यक्तातरौद्रध्यानास्ते धर्मध्यानसमाहिताः । ध्यानं ध्यातुं प्रवर्तते शुक्लं कर्मेधनानलं ॥१०॥ ध्यानं नाम मनःस्थैर्य यावदंतर्मुहूर्तकं । बा रौद्रं तथा धयं शुक्लं चेति चतुर्विधं ॥ ११ ॥ तथोक्तं स्थानांगवृत्तौ-अंतोमुहुत्तमत्तं चित्तावस्थाणमेगवत्थुमि । छउम- स्थाणं झाणं जोगनिरोहो जिणाणं तु ॥ १२ ॥ योगास्तत्रौदारिकादि- देहसंयोगसंभवाः । श्रारमवीर्यपरीणाम-विशेषाः कथितास्त्रिधा ॥ १३ ॥ इत्यावश्यकहारिभद्यां ध्यानशतकवृत्तौ, मुहर्तायत्परं चित्ता-वस्थानमेक- वस्तुनि । सा चिंतेत्युच्यते प्राज्ञैर्यद्वा ध्यानांतरं भवेत् ॥ १४॥ तथोक्त- अंतोमुहुत्तपरओ चिंता झाणंतरं व होजाहि । सुचिरंपि. होज्ज बहुवत्थु- संकमे झाणसंताणो ।। १५ ।। तत्रेह न ध्यानादन्यद्ध्यानांतरं गृह्यते, किं रहे-लायो टुंको थइ न शके तेथी उपजतुं दुःख ते श्लेपणोद्भव समजबु. (४०७-८) श्रा हकीकत स्थानांगसूत्रवृपयादिमा अर्थथी कहेली छे. ए परिषह तथा उपसर्गोने सम्यक्प्रकारे सहन करनारा अनुत्तरज्ञान, तप ने क्षौति- घाळा एवा तीर्थकरनी कर्मसंतति ( घातिको) क्षय पामे छे. (४०९) तेत्रो मार्स, रौद्रध्यानने तजीने प्रथम धर्मध्यानमा स्थित रहेला होय छे, पछी कर्मरूप इंधनने बाळ- वामां दावानळ सरखा शुक्रध्यान ध्यावानुं शरु करे छे. (४१०) ध्यान एटले मननी स्थिरता. ते अंतर्मुहूर्त सुधी रहे छे. ते ध्यानना चार भेद छे. १ धार्च, २ रौद्र, ३धर्म्य अने ४ शुक्ल. (४११ ) यीस्थानांगसूत्रनी वृत्तिमा कमु छ के-'एक वस्तुमा अंतर्मु- पूर्व सुधी चित्तनुं श्रवस्थान ते छद्मस्थाने माटे ध्यान कहेवाय छे अने जिनोने (केव- ळीने ) माटे योगनिरोधरूप ध्यान होय छे. (४१२) औदारिकादिक त्रण शरीरथी उत्पन्न थएला पात्मवीर्यना परिणाम विशेषरूप योगो त्रण प्रकारना कह्या . (४१३) एम श्रीमावश्यकहारिभद्रीमा ध्यानशतकनी धृत्तिमा कहेल छे. मुहूर्त उपरांत जे एक वस्तुमा चित्तर्नु अवस्थान तेने प्राज्ञ पुरुषोए चिंता कही छे अथवा ते ध्यानांतर दशा होय छे. (४१४) तथोक्त-अंतर्मुथी पर चिंता अथवा ध्यानांतर होय छे. बहु वस्तुना संक्रमथी जे धयो काळ टकी रहे थे ते ध्यानसंतान जाणवू. (४१५) अहीं एक वस्तुना ध्यानमाथी मो। सर्ग (२४१) तहि ? भावानुप्रेक्षात्मकं चेत इति. बहूनि च तानि वस्तूनि च बहु- वस्तूनि, श्रात्मगतपरगतानि मनःप्रभृतीनि, तेषु संक्रमः संचरणमिति हारिभद्या. गाढमालंबने लग्नं चित्तं ध्यानं निरेजनं । यत्तु चित्तं चलं मूढ-मव्यक्तं तन्मनो मतं ॥ १६ ॥ अव्यक्तानां मूर्छितानां मत्तानां स्वापमीयुषां । सद्योजाताभकाणां चा-ऽव्यक्तं मूढं भवेन्मनः ॥ १७ ॥ एवं ध्यानं ध्रुवं चित्र चित्रं ध्यान न निश्चयात् । खदिरो वृक्ष एव स्यात् स चान्यो वा तरुः पुनः ॥ १८ ॥ यन्मानसः परीणामः केवलो ध्यान मिप्यते । तन्मिथ्या यजिनैस्त्रैधे-वपि योगेषु तत्स्मृतं ॥ १९ ॥ नन्वंग- मनसोः स्थैर्या-पादनासंभवेद् द्विधा । ध्यानं कथं तृतीयं तु वाचिक संभवेदिह ॥ २०॥ अत्रोच्यते-यथा मानसिकं ध्यान-मेकानं निश्चलं मनः । यथा च कायिक ध्यानं स्थिरः कायो निरेजनः ॥ २१ ॥ तथा यतनया भाषां भापमाणस्य शोभनां । दुष्टां वर्जयतो ध्यानं वाचिकं कथितं जिनः ॥ २२ ॥ तथाहुः-एवंविहा गिरा में वत्तव्वा एरिसा न पीजी वस्तुना ज्यानमां-जवू ते रूप ध्यानांतर न समज, त्यारे शुं समज, १ उत्तर- भावानुवारूप चिच समज. बहु एवी वस्तुप्रो ते पहु वस्तुमो-यात्मगत ने परगत मन विगैरे. वेमा संक्रम-संचरण-एवो अर्थ हारिमद्रीमा कयों के ने आलंयनमा गाढपणे लग्न यह जाय एवं निष्कंपध्यान ते चित्त कथे अने जे चळ, मूढ तेम ज भव्यक्त होप ते मन कहेवाय छे. (४१६) भव्यक्त, मूञ्चित, मन, उंघमा पडेल भने वरतना जन्मेला पाळकनुं मन भव्यक्तमूढ कहेलुं छे. (४१७) एम ध्यान ते तो ध्रुवपणे चित्त न छ पण चिच ज्यानरूप होय एवो निधय नथी. जैम 'सेरनुं झाड ते तो पृच छ ज पण वृष ते वो पर होय पण सरो भने न पण होय.'(४१८) जेमो मानसना परिणामने केवळ प्यान इच्छे छ-माने छे ते मिध्या छ, कारण के जिनेश्वरोए पूर्वे कह्या प्रमाणे प्रण प्रकारना योगा ज ध्यान कहेल छे. (४१९) ए ध्यान भंगनी ने मननी स्थि- रता उत्पम करनार वरीके से प्रकारच् समवे थे, परंतु त्रीचें वापिक पान शीरीते समवे ? (४२०) नेनो उचर मापे थे-जैम मानसिक ध्यान एकाग्र निथळ एवं मन मने जेम फायिकम्पान निष्कंप स्थिर एवी काया, (४२१) तेम यतनायडे शोमन मापा गोला भने दुष्ट मापाने पर्वतां पाचिकध्यान जिनपरोए क' थे. (४२२) से - (२४२) मीफाललोकप्रकाश। वत्तव्या । इय वेयालिश्रवक्कस्स भासओ वाइगं झाणं ॥ २३ ॥ मनोवचः- काययोगा-नयन्नेकाग्रता मुनिः । वर्तते त्रिविधे ध्याने गणयन् भंगिक- श्रुतं ॥ २४ ॥ त्रैधेष्वपीति योगेषु ध्यानत्वे किल निश्चिते । मुख्येनैकत- मेनैव व्यपदेशः स्फुटो भवेत् ॥ २५॥ यथा सरस्वपि दोपेषु वातपित्तक- कात्मसु । यदा भवेदुत्कटो यः कुपितः स तदोच्यते ॥ २६ ॥ यथा गच्छन् राजमार्गे नृपतिस्सपरिच्छदः । गच्छत्ययं नृप इति मुख्यत्वाद्वथप- दिश्यते ।। २७ ॥ तथा चित्तस्य मुख्यत्वा-ध्यानं चित्तोत्थमुच्यते । वाकाययोस्त्वमुख्यत्वा-त्तद्ध्यानं नोच्यते पृथक् ॥ २८ ॥ ज्ञातविश्वस्वभावस्य निस्संगस्य महात्मनः। निर्ममस्य विरक्तस्य भवे घ्याने स्थिरं मनः ॥२९॥ नित्यं यतीनां युवती-पशुक्लीवादिवर्जितं। विजनं शस्यते स्थानं ध्यानकाले विशेषतः॥३०॥ महात्मनां हि शमिनां ध्याननिश्च- लंचेतसां । न विशेषो जनाकीर्णे पुरे वा निर्जने वने ॥ ३१ ॥ ततो वा. .विषे कह्यु छ के-'पावा प्रकारनी (शुभ) पाणी मारे पोल वायोग्य छे, अने श्रावी पाणी मारे बोलवा योग्य नथी, या प्रमाणे विचार करीने जे अचक्रमापा बोले तेने चाचिकध्यान जाण. (४२३ ) मन, वचन, कायाना योगने एकाग्र करता मुनि भंगि कश्रुतने गणता सता विविध ध्यानमा वा छे. (४२४) या प्रमाणे त्रणे प्रकारना योगने विषे ध्यानपणुं निश्चित कर्ये सते मुख्यपणे एकतम (योग)घडे ज स्फुट व्यपदेश थाय छ. (४२५) जेम शरीरमा वात, पित्त ने कफ त्रणे दोष छतां ज्यारे जे दोप उत्कट को- पेल होय तेनो ज व्यपदेश कराय छे. (४२६) वळी जेम परिवार सहित राजा राजमार्ग जतो होय त्यारे मुख्यपणुं होवाथी मा राजा जाय छे एम व्यपदेश कराय छे. (४२७) एज प्रमाणे चित्तनी मुख्यता होवाथी ध्यान चित्तथी उत्पन्न थयेल न कहेवाय छे. वचन ने कायानी अमुख्यता (गौणता) होवाथी ते वे प्रकास्ना ध्यान जूदा कहेवाता नथी. (४२८) जेणे विश्वनो स्वभाव जाण्यो होय, जे महात्मा निस्संग, निर्मम अने विरक्त होय तेमनुं मन ज ध्यानमा स्थिर थाय छे. (४२९) मुनियोने निरंतरने माटे युवति, पशु ने नपुंसकना निवास रहित स्थान ज रहेवा योग्य कहेल के अने ध्यान काळे तो विशेपे करीने चिजन-मनुष्य रहित एवं स्थान जोइए. (४३०) जेो ध्यानमा निश्चळ मनवाळा घा गया के एचा महात्मा मुनिने तो जनाकीर्ण नगरमा के विजन एवा चनमा कांह विशेषता नथी. (पने समान छे) (४३१) तेथी वचन, काया ने मननी ज्या स्थिरता । म ३० मो। (२४३) कायमनसां समाधिर्यत्र जायते । भूतोपघातहीनोऽसौ देशः स्याद् ध्यायतो मुनेः ॥ ३२ ॥ यत्र योगसमाधान-मुत्तमं लभते मुनिः । स ध्यानकालो दिवस-निशादिनियमस्तु न ॥ ३३ ॥ ध्यानस्थैर्य प्रजायेता- सनाद्यवस्थया यया । स्थितो निपण्णः सुतो वा ध्यायेत्तस्यामवस्थितः ॥ ३४ ॥ यद्देशकालचेप्टास्व-वस्थासु निखिलासु च । मुनीश्वराः शिवं प्राप्ताः क्षपिताशेषकलमपाः ॥ ३५॥ तदेशकालचेष्टानां ध्याने कोऽपि न निश्चयः । यथा योगसमाधिः स्या-यतितव्यं तथा बुधैः ॥ ३६ ॥ अत्रातरौद्रे दुर्ध्याने स्मृते दुर्गतिदायिनी । शुभध्याने पुनर्धय-शुक्ल स्वःशिवदायिनी ॥ ३७॥ एपां स्वरूपं यथा-तत्रातस्य पीडितस्य रोगा- किंचनतादिभिः । लोभादिभिर्वा यड्यानं तदात्तं स्याच्चतुर्विधं ॥३८॥ शब्दादीनामनिष्टानां संबंधे सति देहिनः । ध्यानं यत्तद्वियोगस्य तदा प्रथमं भवेत् ॥ ३९॥ अभीष्टानां च लब्धानां शब्दादीनां निरंतरं। अविच्छेदस्य या चिंता तद् द्वितीयं प्रकीर्तितं ॥ ४० ॥ श्रातंके सति (समाधि ) थाप तेवू प्राणीमोना उपघात विनानुं स्थान ध्यान करनारा मुनि माटे योग्य गणाप छे. (४३२) इये जे वखते मुनि योगर्नु समाधान उत्तम प्रकारे मेळवी शके ते ध्याननी काळ समजवो, मां दिवस के रात्रिनो नियम नथी. (४३३ ) वळी जे धाम- नादि अवस्थाए ध्याननी स्थिरता थाप ते अवस्थामा एटले उमा, पेठेला के सुता मपस्थित थाने ध्यान करे, (४३४ ) कारण के सर्व देशकाळ, सर्व चेष्टा अथवा सर्व भव. स्थाने विपे रहेला मुनीचरो प्रशेप फर्मकन्मप सपायीन मोचन पामेला 2. (४३५) तेधी कांड पण देशकाळ के चेष्टानो ध्यानने विप निथप नयी; माटे पंडितननाए जे रीत योग समाधि पाय सेम प्रयत्न करवो. (४६६) मही भारी ने रौद्र पे दुर्ध्यान छ भने से दुर्गति पापनारा छ. धर्म ने शुकल ये शुम ध्यान दे भने ते स्वर्ग के मोपने भाषनारा ई. (४३७) ए चार ध्यान- सरूप मा प्रमाणे ममज. रोग भने अकिंचनता (दरिद्रता ) विगरेधी तथा लोभादिकधी पीडाल-दुःखी थपेल मनुष्य जे ध्यान पाय से मात कहेलु छ, रोना नार प्रकारो द्र. (४३८ ) मनिष्ट शम्दादिक विषयोना शरीर मा गंध याची नो पियोग केम थाय? एपान करई से मान ज्यान (मनिष्ट पोग) प्रपम क{ थे. (४३९) ममीष्ट एका शमादि प्राप्त यए मने निरंतर से टकी रतनो पपरदन पाप तो टीक एम पिन (इट वियोग) पीजु पार्व पान क. (४४०) कोर पर प्रकारको पाधि थपे पत नेनी उपादिनी .

". '(२४४) श्रीकाललोकप्रकारा। तस्योप-शान्तेश्चितातृतीयकं । भुक्तानां कामभोगानां स्मरणे स्यात्तुरीयक ॥४१॥ अन्ये त्वाहुश्चक्रिविष्णु-सुरशक्रादिसंपदा । श्राशंसया निदानस्य चिंतने तत्तुरीयकं ॥ ४२ ॥ तथाः-३विंदचकवहि-तणाई गुणरिद्धिप- स्थणामइयं । अहम नियाणचिंतण-मन्नाणाणुगयमबत्तं ति ॥४३॥ क्रंदनं शोचनं चाश्रु-मोचनं परिदेवनं । प्रार्तध्यानस्य चत्वारि लक्षणान्याहु- राहताः ॥ ४४ ॥ तत्र-क्रंदनं स्थाद्विरवणं शोचनं दीनता मता । स्पष्टं तृतीयं तक्लिष्ट-वाक्याढ्यं परिदेवने ॥४५॥ प्रात्मवचित्वादलक्ष्य- मप्येभिर्लक्षणैरदः । लक्ष्यते इत्यमून्याहु-लक्षणान्यस्य धीधनाः ॥ ४६ ॥ हिंसामृपाद्यतिकरा-ध्यवसायात्मकं भवेत् । परप्रदूपज रौद्र-ध्यानं तच्च चतुर्विधं ॥४७॥हिंसा १ मृषा २ स्तैन्य ३ संर-क्षणा ४ नुवंधिभेदतः। तत्रायं प्राणिनां दाह-वधबंधादिचिंतनं ॥ १८ ॥ पैशून्यासभ्यवितथ- वचसा परिचिंतनं । अन्येषां द्रोहबुद्ध्या य-न्मृपावादानुवंधि तत् ॥ ४९॥ चिंता करची ते त्रीजें (रोग चिंता ) आत ध्यान छे. अने भोगवेला कामभोगनुं स्मरण फरवू ते चोथु पात ध्यान छे. (४४१) योजामो एम कहे छ के-चक्री, विष्णु, देव, देवेंद्रादिकनी संपदानी प्राशंसा (इच्छा) बडे जे निया करवानुं चिंतन कर ते (अग्रशोच ) चौथु पात ध्यान छे. (४४२) तथाहा-देवेंद्र के चक्रवर्ती विगैरेनी गुण ऋद्धिनी प्रार्थनारूप अघम नियायानुं अज्ञानने अनुगतवर्तनयी चितव ते चोथु पार्तध्यान छे. (४४३) था भात ध्यानना क्रंदन, शोचन, अश्रुमोचन ने परिदेवन ए चार लक्षणो थहतोए कहेला के. (४४४) तेमा क्रंदन ते विलाप करवो, शोचन ते दीनता धारण करवी, अश्रुमोचन-प्रांसु पाडवा ते तो स्पष्ट छे, अने क्लिष्ट वाक्यो बोलवा ते परिदेवन समजवू. (४४५) ध्यान भात्मवर्ती होवाथी अलक्ष्य छ पण या लक्षणोडे ते लक्ष्यमा भावी शके छे. तेथी बुद्धिमानोए आने लक्षणो क्या के. (४४६) हवे रौद्र ध्यानचें स्वरूप कहे छे. हिंसा, मृपादि अतिक्रूर अध्यवसायरूप परना प्रद्वे- पथी उत्पन्न थयेल रौद्र ध्यान छे. तेना चार प्रकार छे. (४४७) हिंसानुबंधी, मृपानु- बंधी, स्तैन्यानुबंधी भने संरक्षणानुबंधी. तेमा पहेलु हिंसानुबंधी ध्यान प्राणीओने दाह देवो, वध करवो, बंधन कर, इत्यादि चिंतनरूप छे. (४४८)अन्य उपरनी द्रोहयुद्धिवडे पैशून्य, असभ्य भने वितथ (असत्य ) वचन बोलवा संबंधी चिंतन कर, ते चीजें मृपावादानुबंधी छे. (४४९) तथाहुः-मायावीm, अभिसंधान तत्परतुं अने प्रच्छन्न + सर्ग १०मो। (२४५) तथाहुः-पिसुणासभासब्भूष-भूयघायाइवयणपणिहाणं । मायाविणो- भिसंधण-परस्सपच्छन्नपावस्त॥५०॥ परद्रव्यापहरण-चिंतनं तीव्ररोषतः। तन्नायकोपघातायै-र्भवेत्स्तैन्यानुबंधि तत् ॥ ५१ ॥ स्वीयस्वरक्षणार्थ य-च्छंकमानस्य सर्वतः । परोपघाताभिप्रायः संरक्षणानुबंधि तत् ॥ ॥ ५॥ तथोक्तं-सदाइविसयसाहण-धणसंरकणपरायणमणिर्छ । सव्वा- भिसंकणपरो-बघायकलुसाउलं चित्तं ॥ ५३॥ हिंसादिपु चतुप्केषु यदेका- सेऽवनं मुहुः । रौद्रध्यानस्य तद् ज्ञेयं प्रथमं लक्षणं बुधैः ॥ ५४ ॥ चतु- वेषु प्रवृत्तिस्तु द्वितीयं तस्य लक्षणं । तथा कुशास्त्रसंस्कारा-रमकादज्ञान- दोषतः ॥ ५५॥ हिंसादिकेष्वधर्मपु धर्मबुद्ध्या प्रवर्तनं । तृतीयं लक्षणं ज्ञेयं चतुर्थ तु भवेदिदं ॥ ५६ ॥ मरणांतेऽपि संप्राप्ते हिंसादेरनिवर्तनं । नहासंक्लिष्टमनसः कालशौकरिकादिवत् ॥ ५७ ॥ श्रुतचारित्रधर्माभ्या-मनपेतं तु यद्भवेत्। तद्धयं ध्यानमुक्तं त-चतु. भेंदं जिनोत्तमैः॥५८॥ याज्ञाविचयसंज्ञं स्यात् श्रुतार्थचिंतनात्मकं । अपाय- .. पापीनुं पिशून, असभ्य, असद्भूत अने घातकारी वचनो बोलवानुं चितवन ( ते मृपा- नुबंधी छ). (४५०) तीब रोपथी परद्रव्यना अपहरण- तेम ज तेना स्वामीना उपघातादिनु जे चितवन कर ते स्तन्यानुबंधी रौद्र ध्यान छे. (४५१ ) पोताना द्रव्यना रक्षणने माटे चौतरफपी शंकित चिचवाळानु परोपघातन जे चितवन ते संरक्षणानुबंधी रौद्र ध्यान छे. (४५२ ) तथोक्तं-शब्दादि विषयना साधनभूत धनना संरक्षणमा परायणर्नु अनिष्ट प्रने सर्व तरफथी शंकावालं तेमज परना उपघातरूप कलुपताथी भाकुळ जे चित ते (संरक्षणानुबंधी ) छे. (४५३) हिंसादि चतुष्कमांधी जे कोह पम एकनु पारंपार श्रा- सेवन ते पुधजनोए रौद्र ध्याननुं प्रथम स्थान समजघु. (४५४ ) अने ए चारेमा प्रवृत्ति ते रौद्र ध्यान- चीजें लक्षण जाणवू, तेथी कुशास्त्र संस्काररूप अज्ञान दोपधी हिंसादिक अधर्ममा जे धर्मपुद्धिए प्रवर्तन ते श्रीजुं लक्षण जाण, अने मरणांत प्राप्त धये सते पण हिंसादिकथी न निवर्तयु-महासंक्लिए मनबाळा काळ नामना शाकरिक (कसाइ) नी जेम ते चोधु लक्षण जाणवू. (४५५-५७) हवे धर्मध्यान- खरूप कहे थे. जे ध्यान श्रुनधर्म ने चारित्रधर्मपी पुक्त होय से धर्मध्यान जिनेवरोए चार प्रकारचें कई छे. (४५८) प्रथम श्रुतार्थना पितानला (२४६) श्रीकासलोकप्रकाश । विचयं त्वाश्र-बादिभ्योऽपायचिंतनं ॥५९॥ पुण्यपापफलचिता-विपाक- विचयाभिधं । संस्थानविचयं तु स्या-ल्लोकाकृत्यादिचिंतनं ॥६० ॥ तथाहुः-श्राप्तवचनं हि प्रवचन--माज्ञाविचयस्तदर्थनिर्णयनं १ । पाश्रववि- कथागौरव-परीपहाधैरपायस्तु २ ॥६१॥ अशुभशुभकर्मपाका-नुचिंतनार्थों विपाकविचयः स्यात् ३ । द्रव्यक्षेत्राकृत्यनु-गमनं संस्थानविचयस्तु ४ ॥ ६२ ॥ रुवी श्राज्ञानिसर्गाभ्यां सूत्रविस्तारयो रुची । चतुर्दा रुचयो धर्म-ध्यानचिह्नचतुष्टयं ॥ ६३ ॥ सूत्रव्याख्यानमाज्ञा स्या-नियुक्त्यादीह तत्र या । रुचिः श्रद्धानमेपाज्ञा-रुचिरुक्ता महर्षिभिः ॥ ६४ ॥ विनोप- देशं या तत्त्व-श्रद्धा सा स्यान्निसर्गजा । सूत्रे श्रद्धा सूत्ररुचि-स्तद्विस्ता. रोतिमा रुचिः ॥६५॥ तथोक्तं-बागमउवएसाणं निसग्गयो जं जिगप्प- णीयाणं । भावाणं सदहणं धम्मझाणस्स तं लिंगं ॥ ६६ ॥ धर्मध्यानस्य चत्वारि भवंत्यालंबनान्यथ । सौधाद्यारोहणे रज्ज्वा- दिवद्यानि जिना जगुः ॥६७॥ वाचनाच पृच्छना च तथैव परिवर्तना। अनु- प्राज्ञाविचय नामनुं छे. वीजें आश्रवादिकथी प्राप्त थता अपाय-कष्टोनुं चितवन कर ते अपायविचय नामर्नु छे. (४५९ ) त्रीजुं पुण्य-पापना फळनी चिंतारूप विपाक- विचय नामर्नु छ भने चोथु लोकाकृति विगेरेनुं चितवन कर, ते संस्थानविचय नामनुं थे. (४६० ) तथाहु:-"प्राप्तवचन तेज प्रवचन, तेना अर्थनो निर्णय ते आज्ञा. विचय. प्राश्रय, विकथा भने गौरव तथा परिपहादिनु चितवन ते अपायविचय. (४६१) अशुभ ने शुभ कर्मना विपाकनु अनुचिंतन ते विशाकविषय भने प्रद्रव्य युक्त क्षेत्रनी भाकृतिनुं (लोकनालिकार्नु अनुगमन (चितवन) ते संस्थानविचय. (४६२) प्राज्ञारुचि, निसर्गरुचि, सूत्ररुचि ने विस्ताररुचि -श्रा चार प्रकारनी रुचि धर्मध्या- नना चार चिन्हरूप छे. (४६३) सूत्रनुं व्याख्यान ते श्राज्ञा. ते व्याख्यान, नियुक्ति विगेरेने मेळवीने करवानी जे रुचि-श्रद्धान तेने महर्षिोए श्राज्ञारुचि कही छे. (४६४) गुरु उपदेश विना जे श्रद्धा ते निसर्गरुचि, सूत्रमा जे श्रद्धान ते सूत्ररुचि भने तेना विस्तारथी जे श्रद्धान ते विस्ताररुचि जाणवी. (४६५) तथोक्तं-जिनप्रणीत आग- मना उपदेशनु, मां कहेला मावर्नु ( पदार्थोर्नु ) जे स्वभावथी ज सद्दहवू ते धर्मध्याननुं चिन्ह छे. (४६६) धर्मध्यानना चार बालंबन के के जे महेलविगेरे पर चडवा माटे रज्जु (दोरडा) विगैरेनी जेवा जिनेश्वरोए कह्या छे. (४६७) वाचना, पृच्छना, परिवर्तना - सर्ग ३० मो। (२४७) प्रेक्षा चेत्यमूषां स्वरूपमपि कीर्त्यते ॥६८॥ निर्जरार्थं विनेयानां सूत्रदाना- दिवाचना । सूत्रादौ शंकित प्रश्नो गुरूणां पृच्छना मता ॥६९॥ पूर्वाधी- तस्य सूत्रादे-रविस्मरणहेतवे । निर्जरार्थं च योऽभ्यासः स भवेत्परि- वर्तना ॥ ७० ॥ सूत्रार्थानुस्मरणं चा-नुप्रेक्षेत्यभिधीयते । धर्मध्याने चतस्त्रोऽनु-प्रेक्षाः प्रोक्ता इमाः पराः ॥७१ ॥ थन्विति ध्यानतः पश्चात् प्रेक्षा वालोचनं हृदि । अनुप्रेक्षा स्यादसौ चा-श्रयभेदात् चतुर्विधा ॥ ७२ ॥ एकत्वानित्यत्वा-शरणत्वानां भवस्वरूपस्य । चिंता धर्मध्याना-नुप्रेक्षाः स्युः क्रमादेताः ॥ ७३ ॥ एकोहं नास्ति मे कश्चि- नाहमन्यस्य कस्यचित् । न तं पश्यामि यस्याहं नासौ भवति यो मम ।। ७४ ॥ इत्येकत्वानुप्रेक्षा. कायः सन्निहितापायः संपदः पदमापदां। समागमाः स्वप्नसमा सर्वमुत्पादि भंगुरं ॥ ७५ ॥ इत्यनित्यत्वानुप्रेक्षा । जन्मजरामरणभयै-रभिद्रुतेव्याधिवेदनाग्रस्ते । जिनवरवचनादन्य-न चास्ति शरणं कचिल्लोके ॥ ७६ ॥ इत्यशरणानुप्रेक्षा. माता भूत्वा भने अनुप्रेक्षा-श्रा चार भालंचन छ, तेनुं स्वरूप पण कहे छे-(४६८) निर्जराने माटे शिष्योने सूत्रदानादि ते वाचना, सूत्रादिमा शंका पड्ये सते गुरुमहाराजने जे पूछg ते पृच्छना, (४६९) पूर्वे मणेला सूत्रादि न भूली जवा माटे जे वारंवार निर्जरार्थे अभ्यास करवो ते परिवर्तना (४७०) अने सूत्रार्थनुं स्मरण करते अनुप्रेचा कहेल छे. धर्मध्या- नमा पीजी चार अनुप्रेचा कही चे ते श्रा प्रमाणे-(४७१) अनु एटले ध्याननी पछी प्रेक्षा एटले हृदयमा पालोचन ते अनुप्रेक्षा कहेवाय. ते आश्रयना भेदी चार प्रकारनी छे. (४७२) एकत्व, मनित्यत्व, अशरणत्व भने मनस्वरूपनुं जे चितवन ते धर्म- ध्याननी अनुक्रमे चार अनुप्रेक्षा कही छे. (४७३ ) हुं एकलो छु, मारु कोइ नथी, हुं पण अन्य कोइनो नथी, ई एवो कोइने जोतो नथी के हुँ जेनो होउं भने एवो कोई नयी के जे मारो होय. (४७४)श्रा एकत्वानुप्रेक्षा. काया अपायने आपनारी थे, संपचि बधी भापदानुं स्थान थे, समागम या स्वप्न समान छे भने जे उपजे छ ते पधु विनाशी छे मा अनित्यत्वानुप्रेचा. (४७५) जन्म, जरा, मरण भने भयवहे अमिद्रुत (व्याप्त), ध्याधि-वेदनाची प्रस्त एवा मा संसारमा ( लोका) जिनेचरना यचन उपरांत पीजु कोड शरणभूत नधी. (४७६) ए मशरणानुप्रेषा. माता पहने पुत्री, बहेन के नीपणे मा संसा;

(२४८) भीकाललोकप्रकाश। दुहिता भगिनी भार्या च भवति संसारे । व्रजति सुतः पितृतां भ्रा-तृतां पुनः शत्रुतां चैव ॥ ७७ ॥ गर्भोत्पत्तौ महादुःखं महादुःखं च जन्मनि । मरणे च महादुःखमिति दुःखमयो भवः ।। ७८ ॥ इति संसारानुप्रेक्षा ॥ शोधयत्यष्टधा कर्म-मलं शुक्लमिति स्म तत् । शुचं वा लमयतीति शुक्लं तच्च चतुर्विधं ॥७९॥ सविचारं स्यात्पृथक्त्व-वितर्काख्यमिहा- दिमं । तथैकत्ववितर्काख्य-मविचारं द्वितीयकं ॥ ८० ॥ सूक्ष्मक्रियं चानिवृत्ति शुक्लध्यानं तृतीयकं । समुच्छिन्नक्रियं चैवा-प्रतिपाति चतु- र्थकं ।।८।। उत्पादादिपर्यवाणामेकद्रव्यविवर्तिनां । विस्तारेण पृथग्भेदै- वितको यद्विकल्पनं ॥८॥ नाना नयानुसरणा-त्मकात्पूर्वगतश्रुतात् । यत्र ध्याने तत्पृथक्त्व-वितर्कमिति वर्णितं ॥ ८३ ॥ युग्मम् । अत्र च व्यंजना- दर्थे तथार्थाद्वयंजनेऽसकृत् । विचारोऽस्ति विचरणं सविचारं तदीरितं ॥ ८४ ॥ मनःप्रभृतियोगाना-मेकस्मादपरत्र च । विचारोऽस्ति विचरणं सविचारं ततोप्यदः॥ ८५ ॥ एवं च-यत्पृथक्त्ववितर्काढ्यं सविचारं रमा थाय छे अने पुत्र पितापणे, माइपणे तेम ज शत्रुपणे थाय छे. (४७७) गर्भनी उत्पत्तिमा महा दुःख छ, जन्मतां पण महा दुःख छ, मरण पामता पण महा दुःख के. श्रा संसार दुःखमय ज छे. (४७८) इति संसारानुप्रेक्षा. हवे शुक्ल ध्याननुं स्वरूप कहे छे. अष्ट कर्मरूपी मळने जे शोधे छे ते शुक्ल प्रया जे शोकने दूर करे के ते शुक्ल ध्यान कवाय छे. ते पण चार प्रकारचें छे. (४७९) तेमा प्रथम पृथक्त्ववितर्कसविचार नामर्नु छ, पीजुं एकत्ववितर्कअविचार नामनुं छे. (४८० ) सूक्ष्मक्रियानिवृत्ति नामर्नु बीजुं छे अने समुच्छिन्नक्रियप्रतिपाति नामर्नु चोधुं शुक्लध्यान छे. (४८१) एक द्रव्यमा वर्तता उत्पादादि पर्यय तेनो अनेक प्रका- रना नयने अनुसरनारा पूर्वगत अनुसार पृथक् भेदवडे विस्तारथी वितर्क-विकम्पन जे ध्यानमा होय ते पृथक्त्व वितर्क कहेवाय छे. (४८२-८३) अहीं व्यंजनथी अर्थ भने मर्थथी व्यंजनमा जे वारंवार विचार थाय ते विचरणने सविचार कहेल के. (४८४) मन विगैरे योगोनुं एकमाथी बीजामा जे विचर ते विचरण पण सविचार कहेल छे. (४८५) एवी रीते पृथक्त्वना वितर्क सहित श्रने विचार सहित जे उमय धर्मवाळ होय सर्ग ३० मो। (२४९) भवेदिह । तत्स्यादुभयधर्माढ्यं शुक्लध्यानं किलादिमं ॥ ८६ ।। उक्तं च- उप्पायठिइभंगाई पजयाणं जमेगदव्वमि । नाणानयाणुसरणं पुवगय. सुयाणुसारेण ॥ ८७ ॥ सवियारमत्थवंजण-जोगंतरओ तयं पढमसुकं । होइ पुहत्तवियक सवियारमरागभावस्स ॥ ८८॥ अनेकेपां पर्यवाणा-मेकद्रव्यावलंविनां । एकस्यैव वितर्को यः पूर्व- गतश्रुताश्रयः॥ ८९ ॥ स च व्यंजनरूपोऽर्थ-रूपो वैकतमो भवेत् । यत्रैकत्ववितर्काख्यं तद्ध्यानमिह वर्णितं ॥ ९॥ न च स्यायंजनादर्थे तथार्थाद्वयंजनेऽपि च । विचारोऽत्र तदेकत्व-वितर्कमविचारि च ॥ ९१।। मनःप्रभृतियोगाना-मप्येकस्मात्परत्र नो। विचारोऽत्र तदेकत्व-वितर्कम- विचारि च ॥ ९२ ॥ इदं ह्येकत्र पर्याये योगचांचल्यवर्जितं । चिरमुज्जूं. भते दीपं निर्वातगृहदीपवत् ॥ ९३ ॥ तथादुः-जं पुण सुनिप्पकंपं ते प्रथम शुक्लध्यान कहुं छे. (४८६) उक्तं च-उत्पाद, स्थिति ने विनाश जे एक द्रव्यमा रहेला पर्यायो के वेनो पूर्वश्रुवने अनुसारे अनेक नयोने भनुसरीने विचार करतो तेम ज अर्थधी व्यंजनमा ने व्यंजनधी अर्धमा भने एक योगपी योगांवरमा संक्रमण करवू ते प्रथम शुक्लध्यान पृथत्ववितर्कसविचार नाम, परागभावीने' होय छे. (१८७-८८) एक द्रव्यायलंबी भनेक पर्ययोमाथी एक पर्यवनो ज वितर्क पूर्वगत भुतने आश्रयाने करवामां मावे ते विचार पण व्यंजनरूपे के अर्थरूपे एकरूपेज होय ते एकत्ववितर्क नामनुं पीजु शुक्लध्यान कु. ( १८९-९०) मी व्यंजनधी अर्थमा के अर्धपी व्यंजनमा विचारना फेरफार थतो नधी तेथी ते एकत्ववितर्कमविचार नामर्नु कडेवाय थे. (४९१) एमा मन विगेरे योगनो पण एकमाथी पीजामा फेरफाररूप विचार वर्ततो नधी. तेनो पण एकलपितमविचारमा ज समावेश छे. (४९२) प्रही एक पर्यापमा योगनी पंपळता विनानुं होवाथी पपन दिनाना घरमा रहेला स्थिर दीपक जैy दीप शुक्लप्यान चिरकाल सधी पिरवार पामे धे-चते थे. (४९३) तपा:-जे मति १ भम्यारमा भने पारमा गुणस्यानपाळाने दोष मे.

(२५०) श्रीकाललोकप्रकाश। निवायसरणप्पईवमिव चित्तं । उप्पायठिईभंगा-इयाणमेगंमि पज्जाए ॥ ९४ ॥ अवियारमत्यवंजण-जोगंतरयो तयं विइयसुकं । पुव्वगयसुया- लंबण-मेगत्तवियारमवियकं ॥ ९५॥ क्रियोच्छ्वासादिका सूक्ष्मा ध्याने यत्रास्ति कायिकी । निवर्तते न यत्सूक्ष्म-क्रियं चैवानिवति तत् ॥ ९६ ॥ स्याद्वर्द्धमान एवात्र परिणामः क्षणे क्षणे । न हीयमानस्तदिद-मनिवर्ति प्रकीर्तितं ॥ ९७ ॥ तच्च निर्वाणगमन-काले केवलिनो भवेत् । रुद्धवाञ्चित्तयोगस्य वपुर्योगार्द्धरो- धिनः ॥ ९८ ॥ उक्तं च-निव्वाणगमणकाले केवलिणो दरनिरुद्धजो- गस्स। सुहुमकिरियानियट्टी तइयं तणुकायकिरियस्स ॥ ९९ ।। समुच्छिन्नाः क्रियाः कायि-क्याद्या योगनिरोधतः। यस्मिन् यच्चा- प्रतिपाति तच्छुक्लध्यानमंतिमं ॥ ५०० ।। इदं त्ववस्थां शैलेशी प्राप्तस्या- खिलवेदिनः। निरुद्धाशेपयोगस्य शुक्ल परममीरितं ॥ १॥ सिद्धत्वेऽपि हि निष्पकंप निवात मकानमा रहेला दीपकनी जेम उत्पाद, व्यय ने स्थितिमाथी कोई एक पर्यायमा पूर्वगत श्रुतने अनुसारे स्थिर चित्त रहुं होय तेमांधी एक पर्यवनो ज विचार होय. वळी व्यंजन ने अर्थनी के योगान्तरनो फेरफार थवापणुं जेमा न होय ते एकत्ववितर्क- अविचार नामर्नु शुक्लध्यान छे. (४९४-९५) जे ध्यानमा काया संबंधी उच्छ्वासादि सूक्ष्म क्रिया वर्ते के अने जे निवर्तती नथी ते सूक्ष्मक्रियाअनिवर्ति नामनुं श्रीजु शुक्लध्यान छे. (४९६) आ ध्यानमा क्षणे क्षये चर्द्धमान परिणाम होय छे. हीयमान होता नथी, तेथी आने अनिवर्ति कहेल छे. (४९७) श्रा ध्यान निर्वाणगमन काळे केवळीयोने होय छे, के जेमणे वाग्योग ने गनयोग पूरा रोक्या होय छ भने काययोग अर्ध रोकेलो ( रुंधेलो) होय छे. (बादरकाययोग रुध्यो होय छे, सूक्ष्म काययोगमा वर्तता होय छे) (४९८) उक्तं च-निर्वाणगमन- काळे अर्धकाययोग जेणे रंध्यो होय छे एवा सूक्ष्मकायनी क्रियावाळा केवळीने सूक्ष्म- क्रियाअनिवर्ति नामनुं त्रीशुं शुक्लध्यान होय छे. (४९९) जे ध्यानमा योगनिरोधवडे कायिकी विगैरे क्रिया जेमनी समुच्छिन्न थइ होय छे अने जे अप्रतिपाती होय छे ते चोधुं समुच्छिनक्रियाअप्रतिपाति नामर्नु शुक्लध्यान कहीए. (५०० ) मा ध्यान शैलेशी अवस्था प्राप्त थयेला अखिलवेदी ( केवळी) ने- समस्त योग रुंघेला होय तेने होय छे. ते श्रेष्ठ शुक्लध्यान कहेवाय छे, (५०१) .. सर्ग ३० मो। (२५१) संप्राप्ते भवत्येतदवस्थितं । न तु न्यूनाधिकं तेना-प्रतिपातीदमुच्यते ॥ २॥ इयं हि परमा कोटिः शुक्लध्यानस्य निश्चिता । अतः परं तन्ना- स्तीति परमं शुक्लमुच्यते ॥३॥ तथोक्तं-तस्सेव य सेलेसी गयस्त से- लव्व निप्पकंपस्स । वोच्छिन्नकिरियमप्पडि-वाइ झाणं परमसुकं ॥४॥ योगनिरोधपद्धतिस्तु द्रव्यलोकतो ज्ञेयेति. अव्यथं चाप्यसमोहो विवेकः स्यात्तथा परः। व्युत्सर्गश्च भवेच्छुक्ल- ध्यानचिह्नचतुष्टयं ॥५॥ यदेवाद्युपसर्गेभ्यो भयं तत्कथ्यते व्यथा । तद- भावोऽव्यथं शुक्ल-ध्यानलक्षणमादिमं ॥ ६ ॥ देवादिमायाक्लुप्तस्य सूक्ष्मार्थजनितस्य वा। संमोहस्येह मौढ्यस्या-ऽभावोऽसंमोह इप्यते ॥७॥ जीवस्य देहात्सर्वेभ्यः संयोगेभ्यश्च शुद्धया। भिन्नत्वभावनं बुद्धया स विवेको विवेचनात् ॥८॥ यन्निःसंगतयांगस्य परित्यागस्तथोपधेः । स व्युत्सर्गश्चतुर्थ स्या-च्छुक्लध्यानस्य लक्षणं ॥९॥ यदाहुः-चालि- ज्जइ बीहेइ व धीरों न परीसहोवसग्गेहिं १ । सुहुमेसु न संमुज्झइ सिद्धपणुं प्राप्त थये सते पण प्रा ध्यान अवस्थित ज रहे छ-न्यूनाधिक थतुं नथी तेथी श्रा ध्यानने भप्रतिपाति कहेल छे. (५०२) प्रा शुक्लध्याननी निश्चित परम (उत्कृष्ट) कोटि छ, प्राधी अधिक काइ पण नथी तेथी आने परम शुक्ल कहे छे. (५०३) तथोक्त-मेरु पर्वतनी जेवा निष्पकप शैलेशीगत एवाने पुच्छिन्नक्रिय प्रतिपाति नामर्नु परम शुक्लध्यान होय छे. (५०४) योगनिरोधनी पद्धति द्रव्यलोकधी जाणी लेवी. भा शुक्लध्यानना मव्यथ, असंमोह, विवेक तथा व्युत्सर्ग-ए चार चिन्हो कया छे. (५०५)जे देवादिकना उपसौथी थतो भय ते व्यथा कहेवाय थे, तेनो अमाय ते अध्यष नामर्नु शुक्लध्याननुं प्रथम चिन्ह छे. (५०६) देवादिमायाए करेलो अथवा सूक्ष्माथी थयेलो जे संमोह-मौल्य तेनो प्रभाव ते असंमोह नामर्नु बीजु चिन्ह थे. (५०७ ) देहथी जीवनुं तेम ज सर्व संयोगथी श्रात्मानुं शुद्ध युद्धिवडे जे भिन्नत्व भाव_ ते विवेचनाथी विवेक नामर्नु श्रीजु चिन्ह थे. ( ५०८) जे निःसंगपणे अंगनो वेमज उपधिमाप्रनो परित्याग ते व्युत्सर्ग नामर्नु शुक्लभ्याननुं चोथु चिन्ह हे. (५०९) यदाहा-पीकपनी जेम जे धीर पुरुष परिपह-उपमर्गथी चळे नहीं, सूक्ष्मभावमा के देव.

(२५२) मीकाललोकप्रकाश । भावेसु न देवमायासु २॥ १०॥ देहविवित्तं पिच्छइ अप्पाणं तह य सम्ब. संजोगा ३ । देहोवहिवुस्सग्गं निस्संगो सव्वहा कुणइ ४ ॥ ११ ॥ चत्वार्यालंवनानि स्युः शुक्लथ्यानस्य च क्रमात् । कपायाणां क्षयात् क्षांति-माईवार्जवमुक्तयः ॥ १२ ॥ श्रात्मनोऽनतवर्तित्वा- नुप्रेक्षा प्रथमा भवेत् १ । तथा विपरिणामानु-प्रेक्षा प्रोक्ता द्विती. यिका २ ॥ १३ ॥ अनुप्रेक्षाऽशुभत्वस्या ३-पायानां ४ चेति नामतः । शुक्लध्याने चतस्त्रोऽनु-प्रेक्षाः प्रेक्षाश्रयैः स्मृताः ॥ १४ ॥ अनंतकालं भ्रमतो जीवस्य भवसागरे । भावनानंतवर्तित्वा-नुप्रेक्षा परिकीर्तिता ॥ १५ ॥ सा चैवं-एसो श्रणाइनिहणे संसारे सागर व्व दुत्तारे । नारयतिरिअनरामर-भवेसु परिहिंडए जीवो ॥ १६ ॥ विविधा ये परीणामा वस्तूनां तद्विभावना । भवेद्विपरिणामानु-प्रेक्षा प्रेक्षावता प्रिया ॥ १७॥ तथाहि-सव्वठाणाई असासयाइं इह चेव देवलोगे य । सुरअसुरनराईणं रिद्धिविसेसा सुहाई च ॥ १८॥ क्षणभंगुरसंपत्ते-वि- मायामा जे सुंझाय नहीं, देहथी जूदा आत्माने तेम ज सर्वसंयोगने जे जाणे अने देह वेम ज उपधिनो त्याग निःसंगपणे जे सर्वथा करे ते चार चिन्हो कह्या छे. (५१०-११ ) शुक्लध्यानना चार प्रालंबनो श्रा अनुक्रमे कया छे. चार कपायोना क्षयथी उत्पन्न थता शांति, मार्दव, प्रार्जव अने मुक्ति ( निर्लोमता ). ( ५१२ ) आत्माना अनंतवर्तिपणानी अनुप्रेक्षा ते प्रथम, विपरिणामनी अनुप्रेक्षा ते बीजी, अशुभत्वनी अनुप्रेक्षा ते श्रीजी अने अपायनी अनुप्रेक्षा ते चौथी-मा चार प्रकारनी अनु- प्रेक्षा प्रेक्षाश्रयोए (ज्ञानीए) शुक्लध्याननी कही छे. (५१३-१४ ) या भवसागरमा अनंतकाळथी भमता जीवनी जे भावना (विचारणा) ते अनंतवर्तित्व अनुप्रेक्षा कही छे. (५१५) ते भावना आ प्रमाणे-"मा अनादिअनंत अने समुद्रनी जेवा दुस्तर संसारने विप नारक, तिर्यच, नर अने अमरना भवमा आ जीव भम्या करे छे." (५१६ ) वस्तुअोना जे विविध परिणामो तेनी जे विमावना (विचारणा) ते प्रेक्षावंतने प्रिय एवी पीजी विपरिणाम अनुप्रेक्षा कही छे. (५१७) ते श्रा प्रमाणे-"अहीं तेम ज देवलो- कमां सुर असुर अने मनुष्योनी ऋद्धि विशेष ने सुखो विगैरे सर्व स्थानको प्रशाश्वता छ." (५१८) क्षणभंगुर एवी संपत्तिनी तेम ज विरूप एवा संसारनी जे विचारणा ते 4 । सर्ग ३० मो। (२५३) रूपस्य भवस्य यत् । विभावनाऽशुभत्वानु-प्रेक्षा सा परिकीर्तिता ॥ १९ ॥ तथाहि-धि द्धी संसारो जंमि जुषाणो परमरूवगवियो । मरिऊण जायइ किमी तत्थेव कलेवरे नियए ॥ २० ॥ कपायेभ्योऽथा- श्रवेभ्यः प्रमादविपयादितः। अपायभावनापाया-नुप्रेक्षा सा प्रकीर्तिता ॥ २१ ॥ यथा-कोहो य माणो य अणिग्गहीया माया य लोहो य पव. ड्डमाणा । चत्तारि एए कसिणा कसाया सिंचंति मूलाई पुणन्भवस्त ॥ ॥ २२ ॥ इत्यादि इदं चार्थतः प्रायस्तृतीयांगगतं. श्राद्येऽथ शुक्लध्यानस्य ध्याते भेदद्वयेऽर्हतां । घातिकर्मक्षयादावि- र्भवेत्केवलमुज्ज्वलं ॥ २३॥ ततो जानत्यनंतानि द्रव्याणि विविधानि ते। कालिकांश्च पर्यायान् प्रतिद्रव्यमनंतकान् ॥ २४ ॥ सर्वेषामपि जानंति जीवानामागतिं गति। स्थिति चेतश्चितितं च कृतं भुक्तं निषेवितं ॥२५॥ न जानंति न पश्यति यत्तन्नास्ति जगन्नये । भवंत्यतस्तेऽरहसो-ऽहंतश्च जगदर्चिताः ॥ २६ ॥ यत्तृतीयभवे बद्धं तीर्थकृन्नामकर्म तत् । प्राप्तो. दयं विपाकेन जिनानां जायते तदा ॥ २७॥ तस्मिन्नेव क्षणे देवे- पीजी अशुभत्व अनुप्रेक्षा कही छे. (५१९) तथाहि-'या संसारने धिक्कार छ, धिकार थे! के जेमा मरूपगर्षित युवान मरण पामीने पोताना ज कलेवरमा कृमिपणे उत्पम थाय छे. (५२० ) कपायोथी, पाश्रवोथी, प्रमाद ने विपयादिथी जे अपायपणानी भाषना ते अपायानुप्रेक्षा चौथी कही छे. (५२१ ) यथा-निग्रह नहीं करेला अने प्रवर्वता एवा क्रोध, मान, माया भने लोम-ए चारे कपायो पुनर्भवना मूळने सींचे के. इत्यादि. (५२२) या प्रमाणे अर्थथी प्रायः प्रीजा भंग (ठाणांग )मां कहेल छ. मा चार पैकी प्रथमना शुक्नध्यानना पे भेद ध्याते मते अरिहंतने घातिकर्मनो धय थवाथी उज्वळ केवळज्ञान प्रगट धाप छे. (५२३ ) तेथी अनंता भने विविध प्रकारना द्रव्यो तथा कालिक पर्यायो के जे प्रतिद्रव्ये अनंता छ तेने जाणे 2. (५२४) सर्व जीवोनी गति-श्रागति जाणे के मज तेनी स्पिति, चिचमां चिंतित, करेलु, भोगवेखें ने सेवेलुं सर्व जाणे छे. (५२५) तेभो न जाणे के न जुए एयु प्रण लोकमां कार नथी, वेधी भरहस्य (जैनायी कार पार्नु नधी) एवा महत् जगतपूजित पाय छे. (५२६ ) प्रथम प्रोजे मवे जे तीर्थकर नामकर्म अधेिलु छ मा ममये जिनेवरोने उदयमा माये तेने किंपाकोदयपणे मोगये थे. (५२७) तेज पणे मरी देवेंद्रो मामनकंपपी भरि- (२५४ भीलोकप्रकारा। श्वरा भासनकपतः । केवलज्ञानमुत्पन्नं सर्वे जानीयुरहतां ॥ २८ ॥ ततः पूर्वोक्तया रीत्या चतुप्पष्टिः सुरेश्वराः। श्रागच्छंति प्रमुदिता ज्ञानो. त्पादास्पदेऽहतां ॥ २९ ॥ तत्र वायुकुमारा द्राग योजनप्रमितां महीं । शोधयेयुः कचवर-तृ- णाद्युत्स्मृज्य दूरतः ॥ ३० ॥ ततो मेघकुमारास्तां सिंचंत्यद्भिः सुगंधिभिः। पंचवर्णैः पूजयंति पुष्पैर्ऋत्वधिदेवताः ॥ ३१ ॥ रचयंति ततः पीठं व्यंत. रास्तत्र भूतले । भूमेः सपादकोशोचं स्वर्णरत्नमणीमयं ॥ ३२ ॥ तत्र रूप्यमयं वप्रं कुर्वते भवनाधिपाः । सहस्रैर्दशभिः प्राप्यं सोपानानां भुव- स्तलात् ॥ ३३ ॥ तच्च सोपानमेकैक-मेकहस्तपथूच्छ्रितं । भूमेर्द्धनुःसहस्त्रे द्वे साढ़ें तेषां समुच्छ्रयः ॥ ३४ ॥ तस्य वप्रस्य भित्तिः स्या-पंचचापश- तोच्छ्रिता । द्वात्रिंशदंगुलोपेत-त्रयस्त्रिंशद्धनुः पृथुः ॥ ३५ ॥ शोभते कपिशीर्षाणि तस्या भित्तेपर्यथ । निर्धेतस्वर्णसारेण रचितानि स्फुरदुचा ॥ ३६॥ तस्मिन् वप्रे च चत्वारि द्वाराणि रचयंति ते । नानारत्नमया- न्युच्चै-रशाखादिमंति च ॥ ३७॥ प्रतिद्वारं तोरणानां त्रयं मणिमय हंतने केवळज्ञान उत्पन्न थयुं के एम जाणे छे. (५२८) त्यारपछी पूर्वोक्त रीतिवडे चौसठे इंद्रो हर्पित थया सता अरिहंतना केवळज्ञान उत्पत्तिवाळा स्थळे पाये छे. (५२९) हवे त्यां समवसरणनी रचना करवामां आवे छे तेनुं वर्णन -प्रथम वायुकुमारना देवो शीघ्रपणे एक योजनप्रमाण भूमिने कचरो तृणादि दूर करवानडे शोधे छे. (५३० ) पछी मेधकुमारना देयो वेटली पृथ्वीने सुगंधी जळवडे सींचे के अने ऋतुना अधिष्ठायक देवो पांच वर्णना पुष्पोवडे ते पृथ्वीने पूजे छे. (५३१) त्यारपछी व्यंतर- देवो ते भूतळ उपर जमीनथी सवाकोश उंचं स्वर्ण, रत्न ने मणिमय पीठ रचे छे. (५३२ ) त्यां जमीनथी दश हजार पगथीया चड्या पछी प्रथम रूपानो गढ भवनप. तिना देवो रचे छ. ( ५३३ ) ते दरेक पगथीयानो एकेक हाथ उंचा ने पहोळा होय छे, तेथी मा प्रथम गढ जमीनथी अढी हजार धनुष्य एटले सवागाउ उंचो होय छे. (५३४) ते गढनी भिंतो पांचशें धनुष्य उंची अने ३३ धनुष्य ने ३२ अंगुळ पहोळी होय छे. (५३५) तेना कोसीसा (कांगरा) ते भितनी उपर अत्यंत उज्वळ एवा स्वर्णना सारे करीने पनावेला स्फुरायमान कांतियाळा होय छे. (५३६) ते गढमा चार द्वारो ते देवो रचे छे. ते नाना रत्नमय अने उंचा प्रकारना बे बाजु रहेली द्वारशाखावाळा होय छे. (५३७ ) दरेक द्वारे पांचालिका, मणिमय छत्र भने मकरना चिन्हवाळा ध्वजथी सुंदर 5 सर्ग ३० मो। (२५५) सुराः । पांचालिकामणिच्छत्र-मकरध्वजमंजुलं ॥ ३८॥ ध्वजांश्च मंग- लान्यष्टौ पुष्पदाम्नां तथावलीः । रचयंति प्रतिद्वारं कलशान् वेदिका तथा ॥ ३९ ॥ युग्मं ॥ कृष्णागुरुतुरुप्कादि-धूपान् दिव्यान् समंततः । वितन्वतीधूपघटी-स्तन्वते निर्जरा वहः ॥ ४० ॥ कोणे कोणे च वप्रस्य तस्य स्वादूदकांचिता। एकैका क्रियते वापी मणिसोपानभृत्सुरैः ॥४१॥ प्राच्ये द्वारे द्वारपालः सुरः स्यात्तस्य तुंवरुः । दाक्षिणात्ये च खट्वांगी स्यात्कपाली च पश्चिमे ॥४२॥ जटामुकुटधारी स्या-दुदीच्यद्वारपालकः । तुवुरुर्नाम देवश्च प्रतीहारोऽहतां भवेत् ॥ ४३ ॥ अथ तस्याद्यवप्रस्य भवेन्मध्ये समंततः। प्रतरःसमभूम्यात्मा पंचा- शच्चापविस्तृतः ॥ १४ ॥ तिष्ठत्यत्र च यानानि देवतिर्यग्नरा अपि । स्युः प्रत्येकं विमिश्रास्ते प्रवेशनिर्गमोन्मुखाः ॥ ४५ ॥ ततः प्रतरसंपूर्ती सोपानानामुपक्रमः । भवेद् द्वितीयवप्रस्य हस्तोच्चत्वायतिस्पृशाम् ॥१६॥ पंचानामिति सोपान-सहस्राणामतिक्रमे । प्राकारः सुंदराकारो द्वितीयः प्राप्यते जनः ॥ ४७॥ जात्यवर्णमयं तं च कुर्युयोतिष्कनाकिनः । एवा मणिमय प्रण वोरण रचे छ. (५३८) वळी दरेक द्वारे घजानो, माठ मांगलिको, पुष्पनी माळायोनी श्रेणि, फळशो तशा वेदिका रचे छ. (५३९ ) कृष्णागुरु भने तुरु- कादिना दिव्य धूपने विस्तारती घणी धूपघटीमो देवो चोतरफ विस्तारे छे. (५४०) ते गढने चारे सुणे एकेक वापी (पाप) स्वादु जळवाळी अने मणिमय पगथीयावाळी देवो रघे थे. (५४१) ते गढने पूर्वद्वारे तुंपरु नामनो देव, दविपद्वारे ग्वट्वांगी नामे देव, पश्चिमद्वारे कपाली नामे देव अने उचरद्वारे जटामुकुटधारी नामे देव द्वारपाळ तरीके उमो रहे थे. वेमा तुंपरु नामनो देव प्रसनो प्रतीहार तरीके छे. (केमके ते पाजुधी प्रय उपर पड़े थे.) (५४२-४३) हवे ते पहेला गदनी मंदर पार पाजु सरखी भूमिरूप प्रतर ५० धनुपप्रमाण होय थे. (५४४) मा गढमा पाहनो रहे छ भने देव, विर्यच तथा मनुष्य प्रवेश निर्गमोन्मुख पया सवा एक-बीजा साधे मळीने जप्रयते . (५४५) उपर कमा प्रमाणे ५० धनु- प्पना प्रवर पछी चीजा गढना पगधीमानी शरमात पाय रे. ते एक हाथ उपा भने पहोला एका चि हजार पगधीपा होय , पेटलानु भतिक्रमण करीए-वेटला पापीया पटीए स्पारे जनोने पीजो मुंदर भाकारवाळो गट प्राप्त पाय 2. (५४६-५४७) .

(२५६) भीकाललोकप्रकाश । नानारत्नमयैर्दीप्रैः कपिशीपैरलंकृतं ॥ १८॥ भित्त्युच्चत्वपृथुत्वादि ज्ञेय- मस्यायवप्रवत् । ज्ञेया चतुर्णा द्वाराणां रचनाप्यखिला तथा ॥ १९ ॥ जयाभिधाने देव्यौ द्वे पूर्वस्यां द्वारपालिके । श्वेतवर्णे 'अभयया राजमान- करांबुजे ॥ ५० ॥ मा भैपीरिति हस्तेन प्रसृतेन प्रदर्शनं । अभया नाम मुद्रेयं श्रुता वृद्धानुवादतः ॥ ५१ ॥ याम्यद्वारे विजयाख्यौ देव्यौ रक्त- तनुद्युती । हस्तन्यस्तांकुशे शोभा विभृतो द्वारपालिके ॥५२॥ अजिते पश्चिमायां च पीते पाशोल्लसत्करे । मकराढ्यकरे नीले उदीच्यामपराजिते ।। ५३ ॥ तथोक्तं समवसरणस्तोत्रे-जयविजयाजियनवरा-जियत्तिसिन- अरुणपीअनीलाभा । बीए देवीजुअला अभयंकुसपासमगरकरा ॥ ५४॥ पंचाशतं धपि स्या-प्रतरोऽत्रापि पूर्ववत् । तिष्ठत्यत्र च तिर्यंचः सिंहव्याघ्रमृगादयः॥ ५५ ॥ ऐशान्यां च भवत्यत्र देवच्छंदो मनोरमः। चणोत्तरक्षणेऽध्यास्ते प्रभुयं सुरसेवितः ।। ५६ ॥ अथोध्वं पंचसोपान- . चीजो गढ जात्यस्वर्णमय ज्योतिष्क देवो रचे छे. वेने नाना प्रकारना रत्नमय देदीप्यमान कांगरावडे अलंकृत करे छे. (५४८) ते गढनी भिंतोनी उंचाइ ने पहोळाइ विगेरे प्रथम गढ प्रमाणे जाणवू तेम ज चार द्वारनी रचना पण बधी तेज प्रमाणे जाणवी. (५४९) ते गढना पूर्वद्वारे जया नामनी चे देवीमो द्वारपालिका तरीके श्वेतवर्णवाळी अने अभयामुद्रावडे शोमता करकमळवाळी होय छे. (५५०) 'मा भैषीः' वीशो नहीं एम पोताना प्रसार पामता हाथवडे जे बतावद् ते अभया नामनी मुद्रा छे एम वृद्धानु- चादी सामळेल छे, (५५१) दक्षिणद्वारे, विजया नामनी वे देवी प्रो. रक्तमय शरीरनी कातिवाळी हाथमा राखेला अंकुशवडे शोमती द्वारपालिका होय छे. (५५२) पधिम- द्वारे पीतवर्णवाळी, पाशवडे उन्नसित हाथवाळी अजिता नामनी ये देवीमो अने उत्तर द्वारे मकराव्य करवाळी नीलवर्णनी अपराजिता नामनी वे देवीओ द्वारपालिका होय छे. (५५३ ) श्रीसमवसरणस्तोत्रमा कमु छ के-धीजा गढमां जया, विजया, अजिता भने अपराजिता ए देवीमोना युगलो अनुक्रमे श्वेत, रक्त, पीत अने नीलवर्णवाला अने अभया, अंकुश, पाश भने मकरने हाथमा धारण करनार होय छे. (५५४) मा गढना प्रारममा पण पचास धनुष्यर्नु पूर्ववत् प्रवर होय छे. आ गढमा विर्यचो सिंह, वाघ, मृग विगेरे रहे थे. (५५५) आ गढमां ईशान कोणे मनोहर देवच्छंदो रचे छे, बेमा प्रथम पहोरे देशना बाप्या पछी सुरसेवित एवा प्रक्ष भावीने बेसे छे. (५५६) सर्ग ३० मो। (२५.. सहस्रातिक्रमे ततः । तृतीयः प्राप्यते वप्रो जनै विमहोदयैः ॥ ५७ ॥ एनं रत्नमयं वप्रं कुर्युवैमानिकाः सुराः । नानामणिमयैर्दीपः शालितं कपिशीर्षकैः ॥ ५८ ॥ भित्त्युञ्चत्वपृथुत्वादि द्वाराणां रचनापि च । अत्रापि पूर्ववद् ज्ञेया विशेषस्त्वेष कथ्यते ॥ ५९ ॥ पूर्वस्यां द्वारपालोऽन सोमो वैमानिकः सुरः । जात्यचामीकरज्योति-दधानः पाणिना धनुः ॥ ६० ॥ दंडपाणिर्यमो याम्यां गौरांगो व्यंतरामरः । प्रतीच्या पाश- भृद्रको ज्योतिष्को वरुणः सुरः॥ ६१ ॥ उत्तरस्यां च धनदो भवनाधि- पनिर्जरः । गदाहस्तः श्यामकांति-भवति द्वारपालकः ॥ ६२॥ तथोक्तं- पीअसिमरत्तसामा सुरवणजोइभवणा रयणवप्पे । धणुदंडपासगयहत्य सोमजमवरुणधणयक्खा ॥६३ ॥ तस्य वप्रस्य मध्ये च पीठं स्यात्समभूतलं । धनुःशतानि पट् कोश- मेकं च विस्तृतायतं ॥ १४ ॥ एतावदेव विस्तार-मानमायद्वितीययोः। भा गढथी उंचे पांच हजार पगथीमा चडे त्यारे माविमहोदयवाळा जनो त्रीजो गढ पामे के. (५५७ ) ते गढ रत्नमय अने नाना प्रकारना मणिमय दीप्त कौगरामोथी सुशोभित वैमानिकना देवो करे थे. ( ५५८) एनी भीतोतुं उच्चपणुं ने पहोळापर्यु तेम ज चार द्वारोनी रचना पूर्व प्रमाणे ज जाणवी. तेमा जे विशेष छे ते कहे थे. (५५९) भा गढना पूर्वद्वारे सोम नामनो द्वारपाल वैमानिक देव जात्यवंत सुवर्ण जेवी कांदिवाळो भने हाथमा धनुष्यने धारण करनारो होय छे. (५६०) दक्षिणद्वारे गौर भंगवाळो व्यंवर जातिनो यम नामनो देव हायमा दंड धारण करेलो होय छे. पश्चिमद्वारे परुण नामनो रक्तवर्णवाळो ज्योतिषीनो देव हाथमा पाश लइने उभो रहे थे. (५६१ ) उत्तर पाजुना द्वारे श्यामकांतिवाळो भवन पतिनिकायनो धनद नामनो देव हाथमा गदा घारण करीने उभो रहे थे. (भा प्रमाणे श्रीजा गढना चार द्वारपाळो होय छे.) (५६२ ) तथोक्तं-त्रीजा रत्लना गढे सोम, यम, वरुण भने धनद अनुक्रमे पीत, श्रेत, रस्त भने श्याम वर्णपाळा, वैमानिक, व्यंतर, ज्योविप भने भवनपतिजातिना तथा धनुष, पाश, दंड भने गदाने हाथमा धारण करनारा होय छे. (५६३) हले से त्रीजा गढना मध्यमा समभवल एयु पीठ छे ते एक गाउ ने छसो धनुष्य ला-पहो 2. (५६४) एज प्रमाणे विस्तार, मान पहेला भने पीना गढना भतरतुं (२५८) श्रीकाललोकप्रकाश। वप्रयोरंतरे किंतु तत्पार्श्वद्वयमीलनात् ॥६५॥ तथाहि-स्याप्यवप्रात्प- चाश-द्धपि प्रतरोऽग्रतः । शताश्च द्वादशाध्यर्धाः सोपानधनुषां ततः ॥ ६६ ॥ त्रयोदशशतान्येवं धनुषामेकतोंतरं । रूप्यस्वर्णवप्रयोः स्यात् परतोऽपि तथैव च ॥ ६७ ॥ पार्श्वयोरुभयोश्चैवं स्याद्विस्तारे समुच्चिते। एकः क्रोशः षट् च चापशतमानं यथोदितं ॥ ६८ ॥ मानमेवं स्वर्णरत्न- वप्रांतरेऽपि विस्तृतेः । एकः क्रोशः षट् शतानि धनुपां भाव्यतां स्वयं ॥ ६९॥ एवं त्रयाणां वप्राणां व्यासमाने समुच्चिते । क्रोशत्रयं स्याद्ध- नुपा-मष्टादश शतानि च ॥ ७॥ पट् वप्रभित्तयोऽत्र स्यु-रेकैकस्याश्च विस्तृतौ । स्युर्धनूंपि त्रयस्त्रिंशद् द्वात्रिंशदंगुलानि च ॥ ७१ ॥ धषि पड्गुणानि स्यु-रटानवतियुक् शतं । अंगुलान्यपि पड्नानि स्युनिवति- युक् शतं ॥ ७२ ॥ एषा चापद्वये तस्मि-श्चापराशौ नियोजिते । स्याचा- पद्विशती प्राच्य-चापौघे सा नियोज्यते ॥ ७३ ॥ जातः कोशोऽस्मिंश्च पूर्वो-दितैः क्रोशैस्त्रिभिर्युते। वृत्तं समवसरणं जातं योजनसंमितं ॥७॥ अस्मिश्च वृत्तसमव-सरणे ये चतुर्दिशं । सोपानानां सहस्राः स्यु-र्दश ते योजनादहिः ॥७५ ॥ छे, परंतु ते वे बाजुनुं मळीने ले. (५६५) ते ज बतावे छे-रूपाना गढथी आगळ पचास धनुष्यतुं प्रतर छ भने ५००० पगीमाना १२५० धनुष्यो थाय छे. ५ प्रमाणे एक पाजुनें अंतर १३०० धनुपर्नु रूपासोनाना गढ बचे छे. ते ज प्रमाणे पीजी पाजुनुं मंतर छे. बे बाजुना विस्तारने एकत्र करीए एटले एक गाउने ६०० धनुप उपर कमा ते थाय छे. (५६६-६८) ए ज प्रमाणे सोनाना ने रत्नना गढनी बघेना अंतरना विस्तारर्नु मान पण एक गाउ ने ६०० धनुपर्नु छे ते स्वयमेव समजी लेवू. (५६९) ए प्रमाणे प्रणे गढना अंतरर्नु मान एकत्र करीए त्यारे ३ गाउने १८०० धनुप थाय छे. (५७०) हवे नहीं प्रण गढनी के पाजुनी घइने छ मीतो के ते एकेक भींत विस्तारमा ३३ घनुप ने ३२ अंगुळ छे. ते ३३ अनुपने छगुणा करता १९८ धनुष भने ३२ भंगुळने छगुणी फरता १९२ अंगुळ तेना ये धनुप थाय ते धनुपनी राशिमा मेळवा २०० धनुप थाय. ते पूर्वना प्रण गाउ उपरना १८०० धनुपमा भेळवीए एटले २००० भनुप थाय. तेनो एक गाउ पाय ते प्रथगना प्रण गाउमा मेळवता घार गाउ एटले एक योमन प्रमाण गोळ समय- सरण थाय. (५७१-७४ ) आ गोळ समवसरणनी चारे दिशामा जे दश दश हजार पगधीमा छे ते योजननी पहार समजवा. (५७५) सर्ग ३० मो। (२५९) अयं भावः-अहत्सिंहासनाधःस्थ-भूभागादेकतो भुवि । क्रोशद्वयन स्थाद्वाह्य-वप्रपयंतभूतलं ॥ ७६ ।। चतस्कृष्वपि दिवेवं योगे च पार्थ- योईयोः । श्रायामतो व्यासतश्च पूर्ण स्यादेकयोजनं ॥ ७७ ॥ वाह्यसो. पानपर्यंत-भूतलं तु भवेत्ततः । पादाधिकैस्त्रिभिः क्रोशै-जिनाधास्यम- हीतलात् ॥ ७८ ॥ सोपानानां सहस्र्य-दशभिर्जायते किल । क्रोशः सपादस्तयोगे भवेन्मानं यथोदितं ॥ ७९ ॥ भूमावलग्नं समव-सरणं च भवेदिदं । तयोर्ध्वमूर्ध्व सोपान-रचनाभिस्समंततः ॥ ८॥ रलव- प्रस्य परिधि-रेकं योजनमीरितं । न्यूनत्रयस्त्रिंशदाढ्या चापानां च चतुःशती ॥ ८१॥ द्वे योजने पंचपष्टि-युक् चापाप्टशती तथा। द्विहस्ती व्यंगुलोना रे-वप्रस्य परिधिर्भवेत् ॥ ८२ ॥ त्रियोजनी चापशता-स्त्रयः स्त्रिंशास्त्रयोदश । हस्त एकोगुलान्यष्टौ परिधी रौप्यवप्रगः ॥ ३ ॥ चतुरस्रेऽथ समव-सरणे विस्तृतिर्भवेत् । सर्वासां वप्रभित्तीना-मेकं चापशतं किल ।।८४॥ कोदंडानां शताः पंच-दशात्रांतरमीरितं । रूप्यस्व. र्णवप्रभित्त्योः प्रत्येकं पार्श्वयोर्द्वयोः ॥ ८५ ॥ श्रन पूर्वोक्तसोपान-रुद्धक्षेत्रे रहस्प-परिहंतना सिंहासनना नीचेना भूमागधी एक पानु पृथ्वीने विप ये गाउ बामगढना बहारना भागपर्यंत भूतळ याय. (५७६ ) ए प्रमाणे चार दिशामा घे पे पासानो संयोग करवाथी लंपाइने पहोलाइ एक पूर्ण योजन थाय. (५७७) पास सोपा- नना पर्यंत माग सुधीनुं भूतळ जिनपरना अधस्य महीवळयी सवारण गाउ थाप (५७८ ) ते दश हजार पगयीमाना २५०० धनुप तेनो सवा गाउ ये गाउमा मेळवायी याय. (५७९) मा समवसरण भूमिथी भघर होय छ भने ते पगयीमामोनी रचनावडे धारे तरफथी उंचु उचं होय छे. (५८०) रत्नना गढनी परिधि एक योजन ने ४३३ धनुपमा फाइक न्यून होय छे. (५८१) सुवर्णना गढनी परिधि से योजन ८३५ धनुप भने त्रण भंगुळ ऊणा पे हापनी होय छे. (५८२ ) रूपाना गढनी परिधि प्रण योजन, १३३३ धनुप, एफ हाय ने ८ भंगुळनी होय छ. (५८३ ) (एक योजनना समवसरणनी परिधि ३ योजन १२९८ धनुष्प साझेरी याय छे.) हये पोरम ममवसरणनी हकीकत कहे छ तेमा दरेक गढनी मावोनी पहोळाइ एकसो धनुप्पनी होय छे. (५८४ ) रूपाना ने मोनाना गहनी मीतोर्नु पने पाजुनु जू जू मंतर १५.. धनुपर्नु होप घे. (५८५) एमां पूर्व क्या प्रमाणे ५००० पायीमाना १२५.

(२६०) भीकालनोकप्रकाश। पृथक्कृते । धनुःशतद्वयी सार्द्धा शेपा प्रतर उद्यते ॥८६॥ एवं च-स्यात्सा- चकोशविस्तारां-तरो वप्रोऽत्र राजतः । विस्तारमीलने प्राग्व-दुभयो. रपि पार्श्वयोः ॥ ८७ ॥ स्वर्णवप्रांतरव्यास एकक्रोशमितो मतः । यतः कोशार्द्धमेकैक-पाचे व्यासो भवेदिह ॥ ८८ ॥ यदुक्तं समवसरणस्तोत्रे- चउरंसे इगधणुसय-पिहु वप्पा सड्डकोसअंतरया । पढमविया विश्रतइया कोसंतरपुव्वमिव सेसं ॥ ८९ ॥ यद्यप्यस्यावचूर्णावित्युक्तं दृश्यते-पत्र चांतरं पूर्ववत्प्रतरसोपानापेक्षया न गण्यते, किंतु आयाद द्वितीयस्यै- कतः १५०० धनूंषि, परतोऽप्येवं, द्वितीयात्तृतीयस्यैकतः १००० धनूंपि, द्वितीयपाप्येवं संतीत्येवमेव ज्ञेयं, एवमेव पूर्वाचार्याम्नायादिति. तथाप्यत्र सुवर्णवप्रे एकस्मिन् पार्श्वे एकधनुःसहस्रांतरे सार्द्धद्वादशधनु:- शतक्षेत्रसंमातव्यानि एकैकहस्तपृथुलानां सोपानानां पंचसहस्राणि कथं समांतीति बहुश्रुतेभ्यो भावनीयमिति. रत्नप्राकारविस्तारो भवेत्तत्रापि पूर्ववत् । क्रोशेनैकेन धनुषां शतैः षड्भिश्च संमितः॥ ९० ॥ वप्रत्रयांतर- धनुष्य पाद करतां वाकी रहेल २५० धनुष्यनुं प्रतर होय छे. (५८६ ) ए प्रमाणे वे बाजुनो भंवर भेळो गणतां रुपाना ने सोनाना गढ कच्चे दोढ गाउनुं भंवर थाय छे. (५८७) सोनाना ने रत्नना गढ वच्चे अंतर एक गाउनु छ, केमके ये पाजुना घे भाग -पाडता एकेक बाजुए अर्ध अर्ध कोशनुं अंतर छे. (५८८ ) समवसरणस्तोत्रमा कयुं छे के-घउरंसे हगवणुसयपिहु चप्पा, सङ्घकोसअंतरया । पठमपिया पियतहया, कोसंतरपुब्धमिव सेसं ॥ (श्रानो मावार्थ उपर श्रावी गयो छे.) (५८९) जो के एनी अवचूर्णीमा कयु के के-प्रही अंतर पूर्वनी जेम प्रवर ने सोपाननी अपेघाए न गण पण पहेला ने पीजा गढ बच्चे एक वाजु अंतर १५०० धनुष, पीजी पाजु पण तेज प्रमाणे १५०० धनुष्य, पीजा ने त्रीजा गढ बच्चे अंतर एक वाजु १००० धनुष्य, पीजी पाजु पण तेज प्रमाणे १००० धनुष्य समजबू; केमके था प्रमाणे पूर्वाचार्यनी भाम्नाय छे. एम कल्धु थे, तो पण ही सुवर्णना गढनी अंदर एफ पाजु एक हजार धनुप्पना अंतरमा १२५. धनुष्यमा समाइ शके तेवा एक एक हाथना प्रमाणपाळा ५००० पगीमा शी रीते समायं ! ते पहुश्रुतथी जाणी ले. रत्नना गढनी अंदरनो विस्तार अहीं पण पूर्व प्रमाणे एक गाउ ने ६०० धनुम्य प्रमाण समजवो. (५९०) ए प्रमाणे प्रणे गढर्नु १ पला वीजा पच्चे ६०००ने पीला वीजा पच्चे ४००० कुल १०००० पगधीया संभवे थे. . .

। सगे ३० मो। (२६१) व्यासे पूर्वोक्त इति मीलिते । साई कोशत्रयं स्यात् पट्-शती च धनु- पामिह ॥ ९१ ॥ सुवर्णरत्नप्राकार-भित्तीनां च चतसृणां । चतुर्धनु:- शतव्यास-योगे भवति योजनं ॥ ९२ ॥ रूप्यवप्रस्य भित्तेस्तु विस्तु- तिर्या धनुःशतं । सान गण्या योजनेऽस्मिन् वाह्यसोपानकान्यपि ॥१३॥ त्रयाणामपि वप्राणां परिधिस्तु स्वयं बुधैः । चतुरस्रतया भाव्यो व्यासमानाञ्चतुर्गणः ।। ९४ ॥ कोणे कोणे च भवतो द्वे वे वाप्यावि. होत्तमे । उक्तं च वक्ष्यमाणं च शेषमत्रापि पूर्ववत् ।। ९५ ॥ अथो तृतीयवप्रे यत् प्रागुक्तं समभूतलं । तस्य मध्ये पीठमेकं म- णिरत्नमयं भवेत् ॥ ९६ ॥ तत्स्याजिनतनूच्छ्राय-परिमाणसमोच्छ्रयं । चतुरं त्रिसोपान-रमणीयं चतुर्दिशं ॥ ९७ ॥ विष्कंभायामतस्तच्च कोदंडानां शतद्वयं । क्रोशद्वयेन साढेन भवत्युच्चैर्महीतलात् ॥ ९८ ।। यदेकहस्तोत्तुंगानां सोपानानां सहस्रकैः । विंशत्या क्रोशयोर्युग्मं सार्द्ध- मेवोच्छ्रयो भवेत् ॥ ९९ ॥ तच्च सिंहासनाधःस्थ-धरायाः पीठिका- भंतर एकत्र करीर त्यारे ३॥ कोश ने ६०० धनुष्य पाय (५९१) तेमा रत्न ने सुवर्णना () गढनी चार मीतोनी पहोळाइना ४०० धनुष्य मेळवीए एटले एक योजन थाय. ( ५९२ ) रूपाना ये पाजुना गढनी पहोलाइना २०० धनुष्य तेमज बहारना दश-दश हजार पग मा आ एक योजनमा न गणवा. ( ५९३ ) मा चोरस समवसरणमा प्रण गढ़नो परिधि चोखंडे होवाथी व्यास ( लंबाह-पहो- लाइ) थी पारगणो युध जनोए पोतानी मेळे समजी लेवो. (५९४) या समवसरणमा एकेक कोणमा उत्तम एवी चे चे वावो होय छे. उक्त अने पक्ष्यमाणे पाकीनु पधु पूर्वना गोळ समयसरण प्रमाणे जाणी लेवु. (५९५) हये श्रीजा गढमा जे पूर्व समभूतळ (१ कोस ने ६०० धनुष्य ) कहेल के तेना मध्यमा एक मणिरत्नमय पीठ होय छे. (५९६ ) ते जिनेश्वरना शरीरनी उंचाइ जेटली उंची, पार द्वारवाळी भने चार दिशाए प्रणत्रण पगधीमावाळी होय छे. (५९७) से लंपाइ-पहोळाइमा २०० धनुष्य होय छे भने जीतळपी उंची भढी गाउ होय छे. (५९८) वे एक हाथ उंचा वीश हजार पगधीमा होवाथी तेना ५००० धनुष्य एटले भढी गाउ थाप छे. (५९९ ) से मिहामन नीचेनी पृथ्वीधी पीठबंध सुधी समगिनी १ कहूं. २ कपाशेते.

(२६२) श्रीकासलोकप्रकाश। वधि । उच्छ्रयस्य भवेन्मानं समणिविवक्षया ॥ ६०० ॥ कर्ण- भूमिस्तु भगव-सिंहासनस्य मूलतः । बाह्यसोपानमूलांतं रज्जुर्वि- स्तार्यते यदि ॥ ६०१ ॥ अष्टौ चापसहस्राणि द्विशताभ्यधिकानि तत् । भवंत्येकस्तथा हस्तों-गुलानि च दशोपरि ॥६०२ ॥ जिनासनाहाह्यवप्र- शीर्षावधि तु कर्णभूः । धनुषां षट् सहस्राणि व्यधिका च चतुःशती ॥३॥ एकादायुलान्येवं सर्वतोऽपि विभाव्यतां । लीलावत्युक्तरीत्या च कार्या गणितभावना ॥४॥ मध्यदेशेऽस्य पीठस्य स्यादशोकस्तरूत्तमः । विस्तीर्णशाखो नीरंध्र- च्छायो योजनविस्तृतः ॥५॥ तत्तजिनवपुर्मानात् स द्वादशगुणो. । शश्वत्पुष्पच्छत्रकेतु-पताकातोरणादियुक् ॥ ६ ॥ समवसरणस्तोत्रावचूर्णि:-अस्य च जिनतनुद्वादशगुणोच्चस्य वप्रभि- तितो बहिनिर्गमाभावेन योजनपृथुत्वं दुर्घट, परमेतदुपरिस्थायितुंग तरसालवृक्षेण कृत्वास्य योजनपृथुख संभाव्यते. उक्तं च समवायांगे- विवक्षाए उंचाइनुं मान समजवू. (६०० ) अने कर्णभूमि तो भगवंतना सिंहासनना मूळथी पास सोपानना मूळसुधी जो रज्जु (दोरडी) लॉपी करीए, (६०१) तो ८२०० धनुष्य, १ हाथ ने १० अंगुळ उपर थाय. (६०२) जिनेश्वरना पासनथी पाव- प्रना मस्तक सुधी कर्णभूमि ६४०३ धनुष्य ने ११ अंगुळ थाय. एम चारे बाजुए समजवू. भामा गणिनी भावना लीलावती ग्रंथमां कहेला गणितनी रीतिथी करवी. (६०३-४) या पीठना मध्य भागमा उत्तम एवो अशोकवृत्त होय छे. ते विस्तिर्ण शाखा- वाळो भने गाढ छायावाळो तेम ज एक योजन विस्तारवाळो होय थे. (६०५) वे अशोकक्ष ते ते जिनेश्वरना शरीरना मानथकी पारगुणो उंचो अने चारे पाजु पुष्प, (प्रण) छत्र, केतु, पताका अने तोरण संयुक्त होय थे. (६०६) मा प्रसंगमा समवसरणस्तोपनी भवपूर्णिमा कयु के के-'भा प्रभुना शरीरथी पार. गुणा उंचा अशोकवृक्षतुं गढनी (५०० धनुष्य उंची) भीतनी यहार नीकळवू पनशे नहीं, तेथी वेनुं योजन पृथुत्व घटी शकशे नहीं; पण ए तेनी उपर रहेला भति उंचा शाळधे करीने योजनपृथुत्व संमचे थे.' पीसमवायांगसूत्रमा कयु छ के-चोवीशे सर्ग ३० मो। (२६३) चउवीसाए तित्थयराणं चउवीसं चेझ्यहरका होच्छा, तं जहा-निग्गोह १.सत्तवण्णे २ साले ३ पिए ४ पिअंगु ५ छत्चाहे ६ । सरिसे ७ अना- गरुके ८ मालीय ९ पिलस्कुरुके १० य ॥ ७ ॥ तिंदुग ११ पाडल १२ जंवू १३ पासोत्थे १४ खल तहेव दहिवन्ने १५ । नंदीरुके १६ तिलए य १७ अंबरुरके १८ असोगे १९ य ।।दा चंपय २० बउले य २१ तहा वेडसहरके २२ तहेव धवरुके २३ । साले य २४ वद्धमाणस्स चेइ- यरुका जिणवराणं ॥९॥ वत्तीसं धणुयाइं चेइयरुको य वद्धमाणस्स. । निच्चोउगो यसोओ उच्छन्नो सालरुरकेण ॥१०॥ तिन्नेव गाउाई चेइय- रुको जिणस्स उसभस्स । सेसाण जिणाणं पुण सरीरओ वारसगुणोउ ॥ ११ ॥ सच्छत्ता सपडागा लवेइया तोरणेहिं उववेया । असुरसुरगरुल- महिया चेइयरुरका जिणवराणं ॥१२॥ ' चेइअरुकत्ति' चैत्यवृक्षा ज्ञानो- त्पत्तिवृक्षाः, चतुर्थगाथायां 'वत्तीस धणुश्राइंति ' असोगवरपायवं जिण- उच्चत्ताओ वारसगुणं विउव्वइ' इत्यावश्यकचूर्णिवचनात्सप्तहस्तमानादी- रस्वामिदेहाद् द्वादशगुणीकृतः सन् २१ धनूंपि भवत्यशोकः, तदुपरि ११ धनुर्मानः सालवृक्षश्च स्यात् , उभयोर्मीलने ३२ धपि चैत्यद्रुमो वीर- तीर्थकरना २४ चैत्यक्षो होय . ते भा प्रमाणे-न्यग्रोध, सप्तेपर्ण, सौल, प्रियक, प्रियंगु, छाप, सरिस, नागप, मालीक, पीला, तिढुंग, पौडल, जम्प, अश्वत्थ, दापो, नंदी, तिलक, अपच, अशोक, चंपक, पर्कल, येडस, धेय भने सौल. श्रीवर्धमान स्वामीनु चैत्यपृच ३२ धनुष्यतुं , तेमां नीचे ( २१ धनुष्य ) सर्व ऋतुमा फळवालो अशोकवृक्ष ने उपर ( १८ घनुष्य ) सालक्ष समजवो. (६०७-९) प्रथम अपभजिनेंद्र, चैत्यक्ष प्रण गाउनु अने पाकीना जिनेश्वरोनुं तेमना शरीरथी पारगणुं समज. (६११) मा जिनेवरोना पैत्यवृषो छत्र सहित, पताका सहित, वेदिका सहित, बोरयो सहित भने अमुर, सुर तेमज गरुज्ञ (ध्यंतर बडे पूजित होय छे. (६१२) चैत्यपक्ष एटले शानोत्पति पुन समजवू. उपर कडेली चार गाथामो पैकी पोपी (अंक ९ ) गाथामा पत्रीश धनुष्यर्नु चैत्यश्व फयु के तेमा अशोकराव पीरजि. नेश्वरनी उंचाइची पारगणुं अंतर्गत समज. पा प्रमाणे मावश्यकर्णिमां कडेल छे एटसे सावहाचप्रमाण पीरप्रसना देहमी पारगणुं फरवा २१ धनुष्य पाप, तेवई भशो- फार ने वेनी उपर ११ धनुप्पप्रमाण सालपूष होय-पटले नेना मळ्यापी ३२ पनुप्य . .

(२६४) श्रीकाललोकप्रकाश स्येति संप्रदायः, तथा 'निच्चोउगो' नित्यं ऋतुरेव पुष्पादिकालोs- स्येति नित्य क इति समवसरणस्तवावचूर्णी. अत्र श्रीवीरचैत्यवृक्षा- शोकवृक्षयोः समुदितयोात्रिंशद्धनुर्मानत्वमुक्तं. शेषाणामप्यर्हतां स्व- स्वशरीरमानाद् द्वादशगुणत्वं चैत्यतरूणामूचे, तथापि पूर्वोक्तानुपपत्ति- स्तदवस्थैव. पंचधनुःशतोच्चाया वप्रभित्तेपरि भूत्वा तच्छाखानां बहिः प्रसरणस्य दुरुपपादत्वात् , जिनांगानि हि उत्सेधांगुलेन पंचधनुःशतादि- मानानि स्युः, वप्रभित्तिस्तु वर्तमानजिनात्मांगुलेन पंचधनुःशतमानेत्यादि सम्यक् चिंतनीयं, तेन यदि दिव्यानुभावाद्वप्रभित्तिमध्यभागेनाशोकचैः त्यवृक्षाणां शाखाः प्रथमवप्राइहिः प्रसयुस्तदा किमनुपपन्नं स्यादित्यव. धार्य । अन्यथा वा यथागमं परिभावनीयमिदमिति. न्यग्रोधाद्या श्रमी ज्ञानो-त्पत्तिवृक्षा यथायथं । सर्वेपामहतां भाव्या अशोकोपरिवर्तिनः॥१३॥ वीरप्रसनु चैत्यवृक्ष के एम संप्रदायथी कहेलुं छे. तथा ते गाथामा निचोउगो पद के एटले नित्य क-छए आतुना पुष्पादिवाळो. या प्रमाणे समवसरणस्तवनी अवार्णिमा का छे. वहीं श्रीवीरपरमात्मानुं चैत्यवृक्ष अने अशोकवृक्ष मळीने ३२ धनुष्यनुं मान कमु. चाकीना प्रमुर्नु स्वस्वशरीरना मानथी पारगणुं चैत्यक्ष कछु; तथापि पूर्वे कहेली अनु- पपत्ति (अशोकवृक्षनी पहेला रत्नना गढथी वहार नीकळपानी अशक्यतारूप) तो कायम रही छे केमके पांचशे धनुष्य उंची गढनी भीतनी उपर थहने तेनी शासानुं पहार प्रसार पाम, न पनी शके वेई छ. जिनेश्वरना शरीर उत्सेधांगुळे पाचशें धनुष्य विगेरे प्रमाणवाळा छ भने गढनी भींत तो वर्तमान जिनना आत्मांगुळथी पांचशें धनुष्य. प्रमाण थे. इस्यादि सम्परप्रकारे चितववा योग्य छे, तेथी जो दिल्यानुभावथी गढनी भीतना मध्य भागमाथी भशोक ने चैत्यक्षोनी शाखा प्रथमना गढनी बहार पसरे तो शुं वांधो भाये ते विचारी जोवू भयवा जेम भागममा कयु के तेम परिमावना करवी'. उपर न्यग्रोधादि जे ज्ञानोत्पचि वृतो कया छे ते यथायोग्यपणे सर्वे मरिहंवना भशोकपचनी उपर समजी लेवा. (६१३). १ समवसरणना गढनी भीतो प्रभुना भात्मांगुळयी ५०० धनुष्यनी न होय पण म. ध्यनी मणिपीठिका जेम प्रमुना शरीरप्रमाण उंची होय छे तेम शरीरप्रमाण उंची होय तो प्रयम प्रमुना समवसरण माटे १०० धनुष्य कहेलमा यांधो भावे नहीं भने भशोकपने एक योजन विस्तार पामपामा पण पटके नहीं, सर्ग ३० मो। (२६५) तस्याशोकस्य मूले च देवच्छंदोऽर्हतां भवेत् । सिंहासनानि चत्वारि तत्र च स्युश्चतुर्दिशं ॥ १४॥ तानि स्वर्णमयान्युद्य-द्रलालीखचि- तानि च । जिनं द्रष्टुं क्लृप्तलक्षा-क्षाणीवानेकहीरकैः ॥ १५ ॥ पुरश्चैकैकमुद्योति-रत्नज्योतिर्भरैलसत् । पादपीठं धृतोल्लास-मिवाई- पदसंगमे ॥ १६ ॥ प्रतिसिंहासनं प्रौढ-च्छत्राणां स्यात्रयं त्रयं । उपर्यु- परिसंस्थायि-मौक्तिकश्रेण्यलंकृतं ॥ १७ ॥ तथाहुः-तवोर्ध्वमूर्ध्व पुण्य- द्धि-कमसब्रह्मचारिणी। छत्रत्रयी त्रिभुवन-प्रभुत्वप्रौढिशंसिनी॥१८॥ प्रतिसिंहासनं चंद्र-चारुचामरधारिणौ । सुरौ द्वौ द्वावुभयतः सर्वालं- कारभासुरौ ॥ १९ ॥ सिंहासनस्य पुरतः सुवर्णकमलस्थितं । चतुर्दिशं धर्मचक्र-मेकैकं भानुजिस्वरं ॥ २०॥ तच्चाहतां त्रिभुवन-धर्मचक्रित्वसू- चकं । स्फुरज्ज्योति: स्मृतमपि प्रतिपक्षमदापहं ॥ २१ ॥ सिंहासनं धर्मचक्र ध्वजश्छत्रं च चामराः । चरंत्याकाशमार्गेण चितौ विहरति प्रभौ ॥२२॥ तथाहुः-भागासगएणं चक्केणं, पागासगएणं छत्तेणं, पागास. ते अशोकवृक्षना मूळमां नीचे भरिहंतनो देवच्छंदो (उपदेश देवानुं स्थान) होय छे. त्यां चारे दिशाए चार सिंहासन होय छे. (६१४) ते सिंहासन स्वर्णमय, उद्योतवाळा रत्नो जडेला भने जिनेश्वरने जोवा माटे करेला लाखो नेत्रो ज जाणे होय एम अनेक हीरावाळा होय छे. (६१५)ते सिंहासननी भागळ एकेक उद्योववाळा रत्नोनी ज्योतिथी उनसायमान पादपीठ होय थे, ते जाणे अरिहंतना पगना समागमथी उल्लासवाला थया होय एम जणाय थे. (६१६ ) दरेक सिंहासननी उपर प्रौढ एवा छत्रना त्रिको होय छे. ते उपराउपर रहेला भने मोतीमोनी श्रेणिमोथी अलंकृत होय छे. (६१७ ) तथा:-'हे प्रम! उपर उपर पुण्यदिना क्रमना सब्रह्मचारी होय तेम मोटा मोटा त्रण छत्रो तमारी उपर निसुवनना प्रमुत्वनी प्रौटीना कहेनारा होय छे.' (६१८) दरेक सिंहामने चंद्र समान उज्वळ चाम- रधारी थे ये देवो यंने पाजु होय छे, ते देवो सबै भलंकारवडे शोमीता होय छे. (६१९) सिंहासननी आगळ सुवर्णकमळ उपर रासेलु, चारे दिशाए एकेक धर्मचक्र सूर्यनी कांतिने जीते ए, होय छे. (६२० ) ते धर्मचक्र तीर्थकरतुं धर्मचक्रीपणुं सूचवनारु, रफरायमान कातिवालं अने जोवामात्री प्रतिपचना मदने दूर करनार होय छे. (६२१) मा सिंहासन, धर्मचक्र, ध्वजा, छत्र भने चामरो ज्यारे प्रस विहार करे त्यारे भाकाश. मार्गे सापे पाले छे. (६२२ ) तपाहु:-माकाशगत धकी, आकाशगत परथी, मा. १४ (२६६) श्रीकाललोकप्रकाश। गएणं सपायपीढेणं सिंहासणेणं श्रागासगयाहिं से श्रवरचामराहिं इत्यादि. चतुर्दिशं च चत्वारः सहस्रयोजनोच्छ्रिताः । घंटालघुपताकादि- मंडिताः स्युर्महाध्वजाः ॥ २३ ॥ तत्र धर्मध्वजः प्राच्यां याम्यां मान- ध्वजो भवेत् । गजध्वजः पश्चिमाया-मुदक् सिंहध्वजो महान् ॥ २४ ॥ यदत्र चापक्रोशादि मानमुक्तं यथास्पदं भवेत्तदत्राधिकृत-जिनात्मांगुल- मानतः ॥२५॥ तदुक्तं-सव्वं माणमिणं नियनियकरणेति' पीठं च चैत्य. वृक्षं चा-सनं च छत्रचामरान् । सद्देवच्छंदकादीनि कुर्वति व्यंतरामराः ॥२६॥ साधारणेऽयं समव-सरणे कथितो विधिः । सर्वमेकोप्यदः कुर्या- कश्चिद्भक्त्या सुरो महान् ॥ २७ ॥ हर्षोत्कर्षानिसहनादं तत्र कुर्वति नाकिनः । समापतंतः स्वर्गेभ्यो वादयंति च दुंदुभिम् ॥ २८ ॥ तत्र सूर्योदये स्वामी द्वयोः कनकपद्मयोः । 'क्रमेण स्थापयन्पादौ सुरसंचार्यमाणयोः ॥ २९ ॥ अन्वीयमानः शेषैश्च सप्तभिः स्वर्णपंकजैः । एवं निजपदन्यास-कृतार्थितनवावुजः ॥ ३० ॥ पूर्वद्वारेण समव-सरणे काशगत पादपीठयुक्त सिंहासनथी भने आकाशगत श्वेतचामरोथी (प्रमु) युक्त होय छे.' इत्यादि. चारे दिशाए मळीने चार महाधजो एक हजार योजन उंचा अने घंटा तथा लघु- पताका विगेरेथी मंडित होय छे. ( ६२३ ) वेमा पूर्वे धर्मध्वज, दक्षिणे मानवज, पश्चिमे जध्वज अने उत्तरे सिंहध्वज होय छे. (६२४) अहीं जे धनुष्य ने क्रोशादि मान कहेल छे ते जेनो अधिकार चालतो होय ते प्रभुना प्रात्मांगुळथी समज. (६२५) तदुक्तं- या सर्व प्रमाण पोतपोताना हाथवडे जाणवू इति. मणिपीठ, चैत्यक्ष, श्रासन, छत्र, चामर अने देवच्छंदो विगेरे व्यंतर देवो करे छे. (६२६ ) था बधो विधि साधारण समवसरण माटे कारो छे. पाकी तो कोइ महान देव भक्तिथी भाचे तो ते एकलो पण यधुं करी शके थे. (६२७ ) हर्पना उत्कर्षथी त्या देवो सिंह. नाद करे छे भने स्वर्गमाथी उतरवां दुंदुमी वगाडे छे. (६२८ ) त्यां पर्योदये स्वामी देवोए संचारेला ये सुवर्णकमळ पर पग देवा देता अने चाकीना सात कमळो पछवाडे चालता अनुक्रमे तेमाथी चे थे श्रागळ श्राववाथी नवे कमळोने पादस्थापनवडे कवार्थ १ पारे निकायना देवो मळीने करे देवा सर्ग ३० मो। (२६७) प्रविशत्यथ । प्रदक्षिणीकृत्य पूर्व-सिंहासने निषीदति ॥३१॥ पादपीठ- न्यस्तपादः कृततीर्थनमस्कृतिः । विधत्ते देशनां स्वामी गंभीरमधुर- ध्वनिः ॥ ३२॥ तीर्थ नाम श्रुतज्ञानं यद्वा संघश्चतुर्विधः । श्राद्यो वा गणभृत्तेन तीर्यते यद्भावुधिः ॥३३॥ तथोक्तं-तित्थं भंते तित्थं तित्थयरे तित्थं ? गो० अरहा ताव नियमा तित्थयरे, तित्यं पुण चाउवण्णो संघो पढम- गणहरो वेति भगवतीसूत्रे. अर्हचैतत्पूर्विका य-तथा पूजितपूजकः । लोकोऽप्यहत्पूजितत्वा-पूजयेत्तीर्थमादरात् ॥ ३४ ॥ ततस्तीथं नमत्यर्हन कृतकृत्योऽपि वा यथा । धर्म कथयति स्वामी तथा तीर्थ नमस्यति॥३५॥ तथाहुः श्रीभद्रवाहुस्वामिपादाः-तप्पुब्विया अरहया पूइयपूआ य विणय. कम्मं च । कयकिच्चोविजह कहं कहए णमए तहा तित्थं ॥१॥ अस्य वृत्तौ-तीर्थं श्रुतज्ञानं तत्पूर्विकाऽहत्ता तदभ्यासप्रातेरिति. वक्ष्यमाणैर्गुणैः पंच-त्रिंशतालंकृता सदा । व्याप्नोत्यायोजनं वाणी सर्वभापानुगा प्रभो। करता पूर्वद्वारपडे समवसरणमा प्रवेश करे छ भने ( मणिपीठने ) प्रदक्षिणा दहने पूर्व सिंहासनपर से छे. (६२९-३१) पादपीठ उपर पग स्थापन करे छ, तीर्थने नमस्कार फरे छे भने गंभीर तेम ज मधुर घनिवडे स्वामी देशना श्रापे थे. (६३२) भहीं तीर्थ शन्दे श्रुतज्ञान अथवा चतुर्विधसंघ अथवा प्रथम गणधर समजवा, तेम ज जेनाधी संसारसमद्र वरीए ते तीर्थ एवी तेनी व्युत्पत्ति समजवी. (६३३) तपोक्तं-'हे भगवंत ! तीर्थने तीर्थ कहीए के वीर्य करने तीर्थ कहीए ? प्रमु उपर भाप छ- गोयम ! अरिहंतने तो नियये तीर्थकर समजवा मने तीर्थ चतुर्विध संप प्रथमा प्रथम गणधरने समजवा.' इति मगवतीस्त्रे. अहसा एतर्विका एटले श्रुतज्ञान- पूर्वक समजली, वया लोक पण पूजितपूजक होय छ। तेथी अहत्पूजित एवा तीर्यने एटले चतुर्विध संपने भादरपूर्वक पूजे 2. (६३४) तेषी करीने ज महन्तीने नमे छे अपना वो रिहंत काकत्य छवां पण जेम धर्म कहे थे तेमज तीने नमस्कार करे थे. (६३५) श्रीमद्रमापुस्वामी कहे थे के-'अहंचा सत्पूर्विका छ,' पूमिवनी पूजा से विनयकर्म के. हरकत्या एका भगवंत जेम कथा कहे थे-उपदेश मापे थे. सेम वीर्यने नमे छे.' भानी प्रतिमा को ले के-'तीर्थ पटले धुतज्ञान. तत्पूर्विका ईसा-ना मम्पासरे प्राप्त थपेली होगपी.' मागळ कडेवारो एवा पानीश गुणे भलंकन एरी प्रसनी वापी निरंतर सर्व भाषामा (२६८) भीकाललोकप्रकाश। ॥ ३६ ॥ तथाहुः श्रीहेमसूरयः काव्यानुशासने-अकृत्रिमस्वादुपदा परमा- र्थाभिधायिनी । सर्वभाषापरिणता जैनी वाचमुपास्महे ॥ ३७॥ तथा- देवा दैवीं नरा नारी शवराश्चापि शावरी । तियचोऽपि च तैरवीं मेनिरे भगवगिरं ॥३८॥ यथा जलधरस्याभ आश्रयाणां विशेषतः । नाना- रसं भवत्येवं वाणी भगवतामपि ॥ ३९ ॥ स्यात्प्रभोर्मूलभाषा च स्व- भावादद्धमागधी । स्याता द्वे लक्षणे ह्यस्यां मागध्याः प्राकृतस्य च ॥ ४० ॥ येनैकेनैव वचसा भूयसामपि संशयाः। छियंते वक्ति तत्सार्वो ज्ञाताशेषवचोविधिः॥४१॥क्रमच्छेदे संशयाना-मसंख्यत्वाद्रपुष्मता असंख्येनापि कालेन भवेत्कथमनुग्रहः ॥ ४२ ॥ शब्दशक्तर्विचित्रत्वा-सं- ॥ ४३ ॥ तीशि वांसि च । प्रयुक्तरुत्तरं यत्स्या-युगपद्भूयसामपि सरःशरस्वरार्थेन भिल्लेन युगपद्यथा । सरो नत्थि त्ति वाक्येन प्रियास्तिस्त्रोऽपि वोधिताः ॥ ४४ ॥ तथोक्तं-भिल्लस्स तिन्नि भज्जा एगा मग्गेइ पाणियं पाहि । पीया मग्गइ हरिणं समजाय तेनी एक गोजनमा विस्तार पामे के. (६३६ ) श्रीहेमचंद्राचार्य काव्यानुशास- नमा कहे छे के–'अकत्रिमस्त्रादुपदवाळी, परमार्थने कहेनारी, सर्व भापामा परिणम नारी एवी जैनी वाणीनी श्रमे उपासना करीए जीएं. (६३७ ) तथा-देवो दैवी, मनु- प्यो मनुष्य संबंधी, शवरो (मिलो) शापरी अने तिर्यचो तिर्यचनी भाषा तरीके भग- वंतनी वाणीने माने छे. (६३८) जेम जळघर (वरसाद )नुं पाणी भाश्रयना विशेष- पणाथी नाना प्रकारना रसपणाने पामे छे तेम भगवंतनी वाणी माटे पण समजयुं. (६३९) प्रमुनी मूळ भापा तो स्वभाव अर्धमागधी छे, एटले तेमा मागधी ने प्राकत ये भाषानो समावेश छे. (६४०) बे एक ज वचनवडे भनेकना संशय नाश पामे तेवू वचन वाणीना समस्त विधिने जाणनारा सर्वज्ञ बोले छै. (६४१) प्राणीपोर्नु असंख्यातपणुं होवाथी जो तेमना संशयनो क्रमधी छेद थाय तो असंख्य काळे पण ते सर्वनो अनुग्रह केम थाय ? (न थाय). (६४२) शब्दशक्तिनी विचित्रता होवाथी एवी वाणीनी प्रयोग करवामां आवे थे के जे पोलवाथी समकाळे घणाओना प्रश्नोना उचरो मळी जाय थे (६४३) सर, शर ने स्वरना अर्थमां मिले सरो नत्थि एवा वाक्यबडे पणे खोनोने एक साथे समजावी दीधी हती. (६४४) तथोक्त- एक मिछने प्रण स्त्री हती, तेमांधी एफ मागे छ के ' मने पाणी पा', सर्ग ३० मो। (२६९) तइया गवरावए गीयं ॥ ४५ ॥ प्रष्टुमाकांचितो योऽर्थः प्राक् सं. दिग्धश्च यो भवेत् । येन वा यस्य वैराग्यं यो वा यस्यावबोधकृत ॥ ४६ ॥ सर्वोऽपि लोकः प्रत्येक तमर्थमववुध्यते । अहंदुच्चारितादेक-वा- क्यादप्यतिशायिनः ॥ ४७ ॥ अविच्छेदेन भगवान् विधत्ते देशनां यदि । तदा नोद्विजते श्रोता यावज्जीवमहर्निशं ॥४८॥ न सुत्तृष्णा न च व्याधिः काचिदाधिश्च न स्पृशेत् । शृण्वतो भगवद्वाणीं सकलानपि देहिनः ॥ ४९ ॥ माधुर्य भगवद्वाण्या वाचां यद्यप्यगोचरं । तथापि सौख्यवन्मुक्त-रौपम्येन निरूप्यते ॥ ५० ॥ यथासीद्वाणिजः कोऽपि मितंपचशिरोमणिः । श्रातृप्ति नात्मनाप्याद योऽन्नं लोभ इवांगभृत् ।। ५१ ॥ श्रन्नं नाजीर्यदन्येषां यस्मिन् पश्यति भक्षितं । यः सिक्थाशंकया पश्यन् स्थालीक्षालनवार्यपि ॥५२॥ लिह- ति स्म स्वयं स्थाली योऽसकृत्पाणिना भृशं । काका वराकाः श्वानो वा पीजी मागे छे के ' मने हरण लावी भाप' ने त्रीजी मागे के के गीत गाओ.' ( ६४५ ) (आना उत्तर माटे उपरनो सरो नत्थि शब्द समजी लेवो.) जे अर्थ पूछवाने इच्छयो होय, जे अर्थ पूर्वनो संदेहवाळो होय अथवा जे भर्थथी बेने वैराग्य थाय तेम होय अथवा जे जेने अवयोष पमाडनार होय, ते दरेक अर्थने अरिहंतना कहेला, अतिशयवाळा एक वाक्पथी ज सर्व लोक समजी जाय छे. (६४६- ४७) जो भगवंत अविश्रांत (अविच्छेद )पणे देशना आप्याज करे तो यावजीव प्रह- निश सांमळतो पण थोवा उद्वेग (खेद ) पामे नहीं, नुधा लागे नहीं, तृपा लागे नहीं अने को प्राधि के व्याधि स्पर्श करे नहीं. मगवंतनी वाणी समिळता सर्व जीवोने ए प्रमाणे स्थिति चर्वे. (६४८-४९) भगवंतनी वाणीनु माधुर्य जो के वापाने भगोचर छ, तथापि मुक्तिना सुखनी जेन उपमावडे करीने तेनुं निरूपण करवामां आव छे. (६५०) एक वणिक जरुर परतुं ज रांधनारमो (लोमीनोमा) शिरोमणि हतो. हे जाणे मंगपारी लोम ज होय तेम पोते पण तृप्ति थाय वेटलुं पूरुं प्रम सातो नहोतो. (६५१) तेना जोता जो पीजो कोइ साप तो तेने पण अन्न पचतुं नहोतुं. वळी पाळी धोयेल पाणी पण रसे वेर्मा अमनो दाणो रही गयो होय वेने माटे जोया करतो भने पोते वारंवार पाळीने हापवढे चाटतो हतो; तेथी रांक एका कागडा के थान पण वेने प्रांगणे , (२७." भाकालसोकप्रकारा। किं लिहेयुस्तदंगणे ॥ ५३ ॥ जना नोच्चारयति स्मा-वश्यकेऽपि- प्रयोजने । यन्नाम जातूक्ते विष्ट-देवान् श्रेयोऽर्थमस्मरन् ॥ ५४ ॥ भार्या तस्यानुरूपासी-या शुनीव वनीपकं । दूरादपि क्षोभयति दुर्वाक् तृष्णेव जंगमा ॥ ५५॥ श्रासीदासी च तस्यैका जरती गरतीवरुक् । क्षुज्जराजर्जरा दीना कृशा मूर्तेव दुर्दशा ॥ ५६ ॥ प्रातः स्माह वणिक्- पत्नी तो रंडे याहि काननं । एधांस्याहर भूयांसि न दास्याम्यन्यथाशनं ॥५७॥ पतिपद्य वचस्तस्याः क्षीणोपायाश्रयागमत् । वनं शनैः शनैर्यष्टि- मवष्टभ्य सुतामिव ॥ ५८॥ तत्रान्यच्छिन्नकाटानां शिलोञ्छं छेदना- चमा । संगृह्य श्रेष्टिनीतुष्टय सामर्थ्याधिकवीवधं ॥ ५९ ॥ कृत्वा शिरसि तृट्ताप-क्षुत्खेदखेदविह्वला । पुरस्तस्या ढौकयित्वा दैन्यादन्नं ययाच तां ॥ ६० ॥ युग्मं । निस्त्रिंशा निस्त्रपा सैवं तामभाषिष्ट दुष्टधीः । अल्पी. यांसि किमेधांसि रे रे रंडे त्वमाहरः ॥ ६१ ॥ काठैः प्रज्वाल्यते तुदै-ने- । चाटे कोई चाटवा पामता नहोता. (६५२-५३ ) लोको अवश्यना प्रयोजने पण तेनुं नाम लेता नहोता. कदापि बोलाइ जाय तो श्रेयने माटे इष्टदेवतुं नाम तरत ज संमा- रवा हता. ( ६५४) स्त्री पण तेने अनुरूप ज मळी हवी के जे दुर्वचनवाळी भने जाणे जंगम तृष्णा होय तेवी हती, तेथी ते मिलुकादिकने दूरथी ज कुतरीनी जेम क्षोभ पमा- डती हवी. (६५५) तेने एक दासी हती.ते वृद्ध अने अति तीव्र व्याधिवाळी हवी, तेम ज सुधा अने जरावडे जर्जर थयेली, दीन, कृश अने मूर्तिमान दुर्दशा जेवी हती. (६५६) एक दिवस प्रात:काळमाज वे पबिकनी स्त्रीय पेली दामीने कयु के- रंडे जलदी वगडामा जा धने पुष्कळ काष्ठो लइ आव, नहीं तो हुँ तने खावानुं आपीश नहीं. (६५७ ) तेनुं वचन अंगीकार करीने ते बीजा उपाय के आश्रय विनानी धीमे धीमे पुत्रीनी जेम लाकडीनुं श्रवलंबन करीने वनमा चाली. (६५८ ) स्यां ते काठो छेदवामां असमर्थ होवाथी वीजाम्रोए कापेला लाकडाना कोइ कोइ ककडा पड्या रहेला ते वीणीने तेनो मारो पांधीने शेठाणीने प्रसन्न करवा माटे शक्ति उपरांत भारने माथे उपाडीने चाली. क्षुधा, कृपा, वाप, खेद ने स्वेदशी विद्वळ थएली ते दासीए शेठाणी पासे ते मारो नाखीने दीनपणे भननी याचना करी. (६५९-६०) निर्दय अने नि- लस एवी ते दुष्ट घुद्धिवाळी शेठाणी सेने कहेवा लागी के-परे रहे ! भाटला थोडा फाटो केम लावी ? (६६१) आटला तुच्छ काठधी तो तुं पण पळी शके एम नधी.

मर्ग ३० मो। (२७१) तावद्भिर्भवत्यपि । गृहं मे भक्षितं सर्व रेऽकिंचित्करया त्वया ॥२॥ जरत्युवाच हे मात-र्दानायां मयि मा कुपः । भक्ष्यमुद्धरितं किंचि- थच्छ सुत्पीडितास्म्यहं ।। ६३ ।। पुनरप्याहरिष्यामि स्वस्थीभूय क्षणां- तरे । शरणं निःशरण्याया-रत्वमेवासि ममाबिके ॥६॥ सा प्रोचे जन- कास्थीनि खाद प्रश्रवणं पिव । मृत्वा स्वस्था भवाद्यापि म्रियसे कि न दुर्मरे ॥६५ ॥ श्रानीतेभ्यश्चतुर्गेषु पुनरप्याहृतेषु रे । काप्ठेषु तुभ्यं दास्यामि भक्ष्यं तद्गच्छ सत्वरं ॥ ६६ ॥ तथैव गत्वा सा- रण्ये काष्ठभारं चतुर्गणं । कप्टेन महतोच्चित्य निदधौ मूर्ध्नि दुर्वहं ।। ६७ ॥ प्रस्फुटबृदया श्वासै-रारोहतीव भूधरं । उत्फुल्लगल्ल. प्रसर-फूटकारा भुजगीव च ॥ ६८ ॥ नातेव लिन्नसाग-चीवरा स्वेद- निहरैः । पीतमयेव निश्चेष्टा प्रपती पदे पदे ॥ ६९ ॥ पतंतमप्यादधती भारं मूभि पुनः पुनः । रुष्टाभीष्टमिवानिष्ट-मपि वेश्येव गर्द्धना ॥ ७० ॥ प्रासपाताप्यवष्टब्धा यष्ट्या जीर्णकुटीव सा । प्रकंपमानसागो-पन्न- भरे अकिंचित्कर एवी तुं मारूं घर पधु खाइ गइ.' (६६२) डोशी बोली के-' हे माता! दीन एवी मारी उपर समे फोपायमान न थानो, काइक खातां वधेलुं होय ते मने भापो, कारण के हुं बुधाथी घणी पीडा पाएं छु. (६६३) हुं जरा स्वस्थ पहने थोडीवार पछी वळी पीजा काट लाची मापीश. मने शरण विनानीने हे मारी माता ! तमे ज एक शरणभूत यो. (६६४)' शेठाणी बोली के तारा पापना हाडका खाने तेनो पेशाब पी-मरी जइने स्वस्थ था. अरे दुासे मरवावाळी ! तुं हजी मरती केम नधी १ (६६५) प्रा लावीलु ते करता चौगणा काट लावीश, त्यारे तने सावानुं मापीश. माटे जलदी काष्ठ लेवा जा.' ( ६६६) शेठाणीवें भावु वचन समिळीने ये तरत ज पाछी भरण्यमा गइ भने प्रथम करतां चोगणा काटो मोटा कष्टपरे एकठा करीने तेनो मोटो मारो पांधीने दुःखे उपाडाय एवो ते मारो माथे मुक्पो. (६६७ ) जाये पर्वतपर चढती होय तेम धासवडे जेनुं हृदय फुटी जतुं हतुं भने फुलेला गालवडे साप. पनी जेम फूकास करती. (६६८) परवाना निझरणावडे जाणे न्हायेती होय सेम सर्व भंग ने पखो जेना भीजाइ गपा के एवी जाणे, मदिरा पीधेली होय एम निवेष्ट थाने पाले पाले पटती. (६६९ ) माथेधी पडी बता माराने वारंवार पाछी उपाहली, Ve एवा ममीट पुरुपनी जेम भनिष्ट एवा पण ते माराने येश्यानी जेम इच्छती. (६७०) जीर्ण मुपदानी जैम पही गया पता पण लाकरीना भाघारवटे उभी रहेवी, टाटीमो (२७२) मीकालोकप्रकारा। शीतज्वरेव च ॥ ७९ ॥ विविक्षुरिव भूम्यंत-यग्भूता भूरिभारतः। मृत्यु संभाषमाणेच हृदि न्यस्तकरा मुहुः ॥७२॥ क्षुरक्षीणजठरास्थित्वक्- शेषाऽशेषाऽसुखाश्रिता । समंताद्विश्लथा शुष्क-शमीवाततकोटरा ॥७३॥ असकृद्रसनालीढ-सृका शुष्कगलाधरा दंतशून्यास्यविगल-लालाक्षिक्ष- रदश्रुका ।। ७४ ॥ क्षणे क्षणे स्मरती तं वणिकपन्याः पराभवं । भक्ष्यं दास्यति सा नो वे-त्येवं चिंताग्निचुंविता ॥ ७५ ॥ अनन्यगतिकस्वेना- गच्छंती मंदिरं प्रति । यावत्साऽऽयाति समव-सरणस्थांतिके प्रभोः । ॥७६ ॥ तावत्कंटकमुद्धा सोच्चिक्षेप निजं क्रमं । न्यास्थत् पाणि च तत्र स्वं तदा तस्कर्णकोटरे ॥ ७७॥ प्रविवेशार्हता वाणी पीयूप- द्रवपेशला । शुश्राव सैकचित्ता तो विस्मृताखिलवेदना ॥ ७८ ॥ एकाद- शभिः कुलकं । दिशत्यन्दसहस्राणि भगवान् देशनां यदि। तस्याश्च ताव- दायुश्चे-तर्हि सावस्थिता तथा ॥७९॥शृणोत्येवादूढभारा पादं न्यस्यति न ताव पावेलानी जेम सर्वागे कंपती (धूनती ), (६७१) घणा मारवडे जाणे पृथ्वीमा पेसवा इच्छवी होय तेम नीची नमी गयेली, मृत्यु साथे वात करती होय तेम वारंवार हृदय उपर हाथ मूकती, (६७२) तुधावडे क्षीण थइ गएल जठरवाळी अने हाड ने चामडी न जेना शरीरमा शेप रहेल के एवी म ज समस्त दुःखना भाश्रयभूत, चारे- पाजुथी विश्लथ, सुकायेला शमीना झाउनी जेम विस्तृत कोटरवाळी, (६७३ ) वारंवार जीमवढे होठने चाटती, जेनुं गळं ने होठ सुकाइ गएल के एवी, दांत विनाना मुखमाथी झरी रहीछ लाळ जेने एवी, (६७४) झरता भांसुवाळी, धणे धणे पोतानी शेठाणीना परामवने संमारती, मने हजी पण खावानुं प्रापशे के नहीं ? एवी चिंतारूपी भग्निथी चुपित. (६७५) शेठना परतरफ अनन्य गतिपणे-पीजे जवानो पाशरो न होवाधी चासती एवी ते डोसी जेवी प्रसना समवसरण नजीकथी नीकळी. (६७६) वेवामा तेना पगर्मा कांटो वागवाथी ते काढवा माटे पोवानो पग उचो करीने पोतानो हाथ त्यां लगाटे छे तेवामा तेना कर्णरूप कोटरमा भमृतना रस जेवी मधुर भरिहंतनी वाणीए प्रवेश कर्यो. ते सामळतां ज समस्त वेदनाने भूली जाने ते एक चित्ते स्थिर था जाने समिळवा लागी. (६७७-७८) जो भगवान हजारो वर्षे पर्यत देशना भाप भने तेनुं सेटलुं मायुप्प होय तो वे भवस्थित थाने माये मार खवा ते पाणी सामळ्या ज करे सर्ग ३० मो। (२७३) क्षितौ।न स्मरेत्तुत्तृडायत्ति नाप्युद्धरति कंटकं ॥४०॥ईनसाया भगव- द्वाण्याः स्वाभाविकानिह ।पंचत्रिंशतमित्याहु-र्गुणान् श्रीहेमसूरयः॥८१।। संस्कारवत्त्व १ मौदात्त्य २ मुपचारपरीतता ३ । मेघगंभीरघोपत्वं ४ प्रतिनादविधायिता ५ ।। ८२ ॥ दक्षिणत्व ६ मुपनीत-रागत्वं च ७ महार्थता ८ । अव्याहतत्वं ९ शिष्टत्वं १० संशयानामसंभवः ११ ॥३॥ निराकृतान्योत्तरत्वं १२ हृदयंगमतापि च १३ । मिथः साकांक्षता १४ प्रस्ता-चौचित्यं १५ तत्त्वनिष्ठता १६ ॥ ८४ ॥ अप्रकीर्णप्रसृतत्व १७ मस्त्रश्लाघान्यनिंदिता १८ । अभिजात्य १९ मतिस्निग्ध-मधुरत्वं २० प्रश- एक पगलं पण पृथ्वीपर भागळ भरे नहीं, तुधातृपादिकनी पीडाने संमारे नहीं भने कांटो काढवानुं पण विसरी जाय. ( ६७९-८०) भावा प्रकारना रसवाळी भगवनी वाणीना स्वाभाविक एवा ३५ गुण श्रीहेमचंद्राचार्य या प्रमाणे कहे थे. (६८१) १ संस्कारवाळी, २ उदाच एटले उंचा स्वरवाळी , ३ उपचारवाळी, ४ मेघसरखा गंमीर नादवाळी, ५ पडखंदाबाळी, ६ दचतावाळी, ७ प्रेम उत्पन्न करनारी, ८ विस्तृता- र्थवाळी, ९ म्याघातविनानी, १० शिष्टतावाळी, ११ शंकाविनानी, १२ भन्पना उत्तरो श्रावी जाय तेवी, १३ हृदयने गमे तेवी, १४ पूर्वापर संबंधवाळी, १५ संगने भनुप्र- सरती, १६ तत्वज्ञानवाळी, १७ छुटाछवाया विना एटले तुटक शन्दो न बोलाय तेवीरीते विस्तार पामे तेवी, १८ स्वश्लाघा ने परनिंदा विनानी, १९ कुलीनतावाळी, २० अत्यंत स्नेहाळ ने माधुर्यवाळी, २१ प्रसंसापात्र, २२ कोइना मर्मने भाषाव न करे तेवी, २३ गंभीर अर्यवाळी, २४ धर्म ने मर्थ साये संबंधवाळी २५ कारकादिना विपर्यास विनानी २६ भ्रातिमादिना ममाववाळी, २७ भाचर्य पमाडनारी, २८ भद्मत, २९ विलंब विनानी, ३. अनेक प्रकारनी विधियतावाली, ३१ विशेषताना भारोपकाली, ३२ सत्वगुपनी प्राधान्यतावाळी, ३३ वर्ण, पद ने वाक्यनी स्पष्टतावाळी, ३४ संरंधना उच्छेद विनानी, ३५ सामळतां खेद न उपजे तेवी-मा ३५ वापीना गुण छे. भा ३५ याबीना गुण मापामां नीचे प्रमाणे कमा छ।-१ जे जम्पाए ने मापानो अपार होय त्या ते मापामिय भर्धमागधी मापा पोले. २ एक योजन प्रमाण समस- रणमा वगर हरकते संमळाप तेम उघस्वरे बोले. ३ गामडीमा मापा के बोधी मापाना पपराश विना बोले. ४ मेपनी गर्जना सरसी गंमीर पायीए बोले. ५ सामनारने पडबंदासह वचनरचनाना एटा छुटा पोलो संमळाप ने सारी पेठे समजामा मावे दी री पोले.६ सोम रने सतोप उपजे सेवी सरल मापामा पोते. ७ मामळनार पोत- .

(२७४) श्रीकालोकप्रकारा! स्यता २१ ॥ ५ ॥ अमर्मवेदितौ २२ दार्य २३ धर्मार्थप्रतिवद्धता २४ । कारकायविपर्यासो २५ विभ्रमादिवियुक्तता २६ ॥ ८६ ॥ चित्रकृत्व २७ मद्भुतत्वं २८ तथानतिविलंबिता २९ । अनेकजातिवैचित्र्य ३० मारोपित. 'विशेषता ३१॥ ८७ ॥ सत्वप्रधानता ३२ वर्ण-पदवाक्यविविक्तता ३३ ॥ अव्युच्छित्ति ३४ रखेदित्वं ३५ पंचत्रिंशञ्च वाग्गुणाः।। ८८ ॥ पोताना हृदयमा एवं समजे के प्रभु मने उद्देशीने ज देशना श्रापे छ एवी छटाथी बोले. ८ विस्तार सहित अर्थनी पुष्टियुक्त बोले. ९ आगळ पाछळना संबंधमां बांधो न श्रावे तेवा मळतेमळता प्रबंधनी रचनायुक्त बोले. १० मोटा पुरुपने छाजे तेवा प्रशंसनीय वाक्यो बोले तेम न अप्रतिहत सिद्धांतो प्रकाशे. ११ समिळनारने शंका न पडे तेवी स्पष्ट वाणी बोले. १२ कोइपण दूपण लागु थइ न शके तेवं निर्दूषण व्याख्यान करे. १३ कठिन अने सूक्ष्म विचारवाळा विषयोने पण सांमळनार तरत समजी शके एवी सरल भाषामा प्रकाशे. १४ जे जग्याए जेवू दृष्टांत के सिद्धांत योग्य ने रुचिकर लागे ते, ज प्ररूपे. १५ पड्द्रव्य ने नवतावनी पुष्टिरूप अपेचा सहित बोले. १६ संबंध, प्रयो- जन ने अधिकारीवालं वाक्य पोले. १७ पदरपनानी अपेक्षायुक्त पोले. १८ पद्न्य ने नववर्नु स्वरूप चातुर्य साथे समजावे. १९ स्निग्ध ने माधुर्यता सहित धी गोळ करतो पण बंधारे स्वादिष्ट लागे तेवी वाणी वापरे. २० परना मर्म न खुले तेवी चतु. राथी बोले. २१ धर्म अर्थ प्रतिबद्ध योले. २२ दीपकना प्रकाशतन्य प्रकाशवंत अर्थ प्रकाशे. २३ परनिंदा ने आत्मप्रशंसा रहित वाणी वदे. २४ उपदेश देनार सर्वगुणसंपन्न छे, एवी प्रतीति थाय तेवा प्रमाणिक वाक्य वाले, २५ कर्म-कर्म-किया-लिंग-कारक- काळ भने विभक्तियुक्त पोले. २६ थोताने भाचर्य उत्पन्न थाय ने हर्ष वधे तेवू बोले. २७ घणी धीरजथी वर्णन करी पवावे. २८ अविच्छिम मेघधारा समान चालु प्रवाह युक्त बोले. २९ प्राति उपजवा ज न पामे तेवू निर्धात वचन वदे. ३० देव, मनुष्य भने पशु-पक्षी विगैरे पोतपोवानी भाषामा समजी शके तेवी मापामा बोले. ३१ शिष्यगणनो बुद्धिगुण वधे तेवी वाणी वदे. ३२ पदना अर्थने अनेकपणे भारोपण करीने बोले. ३३ साहसिकपणे बोले. ३४ पुनरुक्ति रहित पोले भने ३५ कोनुं मन किंचित् पण न दुगाय देवी रीते वोले. इति. (उपर जणावेला ३५ संस्कृत शन्दोमांधी घणानो (प्राये पधानो) भावार्थ श्रामा पापी जाय थे. भा हकीकत श्रीपाळरासना अर्थमाथी प्रहय करी छे. तेषी उपरना मूळ अंथना पदोनो जे मनुक्रम के ते अनुक्रम प्रमाणे मा भर्थनो 'भनुक्रम नथी. भागळ- पाछळ भावेल.)

मंग ३० मो। (२७५) अथार्हनीहशा वाण्या धर्म पंचमहाव्रतं । साधूनां श्रावकाणां च दि. शति द्वादशवतं ॥ ८९ ॥ अहिंसासुनृतास्तेय-ब्रह्मचर्यापरिग्रहाः । नहा- व्रतानि पंचेति निग्रंथानां महात्मनां ॥९० ॥ केचित्कालविशेषेण चत्वा- येवादिशति च । महाव्रतानि स्त्रीस्याग-संग्रहो ह्यपरिग्रहे ॥ ९१ ॥ अणु- व्रतानि पंचादौ त्रीणि गुणवतानि च । शिक्षाक्तानि चत्वारि व्रतानि गृहिणामिति ॥ ९२॥ संकल्प्य त्रसजीवानां निरपेक्षान्निरागसां। प्राणघातान्निवृत्तिर्या प्रथम तदणुवतं ॥ ९३ ॥ कन्यागोभूम्यलीकेभ्यो न्यासापहरणाच्च या । निवृत्तिः कूटसाक्ष्याञ्च द्वितीयं तदणुव्रतं ॥ ९४ ॥ संधिग्रंथ्यादिभेदायै राजनि- ग्रहकारि यत् । चौर्य तस्मान्निवृत्तिर्या तृतीयं तदणुव्रतं ॥९५॥ स्वदारै- रेव संतुष्टिः स्वीकृतैर्जनसाक्षिकं । निवृत्तिर्वान्यदारेभ्य-श्चतुर्थं तदणुवतं' ॥ ९६ ॥ परिग्रहस्य सत्तेच्छा-परिमाणान्नियंत्रणा । परिग्रहपरीमाणं पंचमं तदणुवतं ॥ ९७ ॥ सीमा नोल्लंघ्यते यत्र कृता दिक्षु दशस्वपि । ख्यातं दिपरिमाणाख्यं प्रथमं तद्गुणवतं ॥९८॥ भोगोपभोगद्रव्याणां भरिहंतो उपर जणाची सेवी वाणीवडे साधुनो पांच महाव्रतरूप धर्म अने पाचकोनो पारवतरूप धर्म उपदिशे. ( ६८९ ) भहिंसा, सुनृत, अस्तेय, ब्रह्मचर्य ने अपरिग्रह-मा पांच निग्रंथ महात्माना महायतो छ. (६९०) कोई काळविशेषने लीधे पानीश तीर्थकरो स्त्रीत्यागनो संग्रह अपरिग्रहमा करीने चार महाव्रतोने ज प्ररूपे छे. (६९१) श्रावकना पाच भणुव्रत, प्रण गुणवत ने चार शिवावत-एम पार प्रतो कहे छे. (६९२) निरपराधी एवा प्रस जीवोनी निरपेक्षपणे संकल्पयी हिंमा न करवी ते पापकर्नु पहेलं मणुमत छे. (६९३ ) कन्या, गो ने भूमिसंबंधी असत्य न पोल, थापण न भोळ. पपी ने खोटी साधी न पूरवी ए चीजें अणुवत छे. (६९४ ) संघि, ग्रंथि विगेरेनो भेद फरवो विगेरे राज्यदंड उपजे वेवी चोरी न करवी ते प्री मणुमत 2. (६९५) मन. साधीए स्वीकारेली स्त्रदारावहे ज संतुष्ट रहे मपया परदारानो त्याग करवो ए चो' भशमत 2. ( ६९६) छता परिग्रहनु भयया इच्छानुं परिमाण फरवावडे ने नियंत्रणा करवी से परिप्रहपरिमाणरूप पाम मणुमत छे. (६९७) दशे दिशामा परिमाण पपिनी दिशानी सीमानु उधंधन न करते दिग्परिमाण नामर्नु पहेलं गुणमत थे. (६९८) मोग ने उपभोगमा द्रष्योर्नु जन्मपतने माटे भने रोजने भारे में प्रमाद (२७६) भीमानलोकप्रकाश मानमाजन्म चान्वहं । क्रियते यत्र तद्भोगो-पभोगविरतिव॑तं ॥ ९९ ।। तत्र च-सकृदेव भुज्यते यः स भोगोऽन्नस्रगादिकः । पुनः पुनः पुन- भॊग्य उपभोगोंगनादिकः ॥ ७०० ।। द्वाविंशतेरभक्ष्याणा-मनंतकायि- नामपि । यावज्जीवं परीहारः कीर्त्यतेऽस्मिन् व्रते जिनैः ॥ ७०१ ॥ तथाहुः- पंचुंबरि चउविगई ९ हिम १० विस ११ करगा १२ य सव्वमट्टीय १३ । रयणीभोश्रणगं चिय १४ बहुवीअं १५ अणंत १६ संधाणं १७ ॥२॥ घोलवडां १८ वायंगण १९ अमुणियनामाणि फुलफलयाणि २०।तुच्छफलं २१ चलियरसं२२ वज्जेह अभरकवावीसं॥३॥ उदुंबरवटप्लच-काकोदुंबरशाखिना । पिष्पलस्य चेत्यभक्ष्य-मा- र्याणां फलपंचकं ॥४॥ मयं १ मांसं २ नवनीतं चौद्रं चेति ४ चतुष्टयं । विकृतीनामभक्ष्यं स्या-च्छ्रद्धालूनां शुभात्मनां ॥ ५॥ द्विदलानं पर्युपितं शाकपूपादिकं च यत् । दध्यहतियातीतं क्वथितान्नफलादिकं ॥ ६ ॥ वर्षासु पक्षात्परतः शीतों मासतः परं । पक्वान्नं विंशतिदिना-तिक्रमे कर वे मोगोपमोगविरति नामे चीजें गुणव्रत छे. (६९९) तेमा जे एक वार भोगमा आवे तेवा अभ ने पुष्पमाळा विगेरे ते भोग कहीए भने वारंवार भोगमा आवे तेवा अंगना (स्त्री) विगेरे उपभोग कहीए. (७००) आ ब्रतमा बावीश अमच्योनो भने अनंतकायोनो पण यावजीव परिहार करवार्नु श्रीजिनेश्वरोए कहुं छे. (७०१) बावीश अभक्ष्य प्रा प्रमाणे-पांच उंबरा विगेरेना सजीवाकुळ फळो, चार महाविगय (मध, मदिरा, मांस ने माखण)९. हीम १०, विष ११, करा १२, सर्व जातनी माटी १३, रात्रिभोजन १४, वहुवीज १५, अनंतकाय १६, संधान (पोळ- अथा) १७, घोळवडा १८, अंगण १९, प्रज्ञावफळ ने फूल २०, तुच्छफळ २१ ने चलितरस २२. भा २२ अभक्ष्य वर्जवा. (७०२-३) हवे पावीश भभक्ष्यमाथी केटलाकर्नु वर्णन करे छ। उदुंबर, वड, प्लप, काको- दंपर मने पिपळ-मा पांच वृपना फळो, ते फळपंचक आर्यजनोने खावालायक नथी. (७०४) मध, मांस, नवनीत ने मघ-मा चार विकृति (विगय) 2 से श्रद्धाल एवा शुमात्माने समक्ष्य थे. (७०५) हवे चलिवरस रतावे थे-द्विदळाम (बेमा अंकुरा उगी जाय थे वे), पासी एवा शाक, पुडला विगेरे, ये दिवस व्यतीत यएलुं दहीं, कोही गयेल मम ने फळ विगेरे, पमितुमा १५ दिवस उपरांत, शीवर्तुमा एक महीना उप- - सर्ग ३० मो। (२७७) ग्रीष्म एव च ॥७॥ इत्याद्यभक्ष्यं चलित-रसमुक्तं जिनेश्वरैः। द्वींद्रियत्र- सजीवानां यदुत्पत्तिर्भवेदिह ॥८॥शेषाण्यभक्ष्याणि प्रतीतानि । अनंतका- यनामानि प्रागुक्तान्येक. पापोपदेशो विविधः १ पापोपकरणार्पणं २ । प्रातरौद्राभिधे ध्याने ३ प्रमादाचरणं ४ तथा ॥९॥ चतुर्भेदादित्यनर्थ-दंडायद्विनिवर्तनं श्रावकाणां तदाख्यातं तात्तीयीकं गुणवतं॥१०॥ विषयाश्च कपायाश्च निद्रा च विकथापि च । मद्यं चेति परित्याज्याः प्रमादाः पंच सात्त्विकैः ॥११॥ राज्ञा स्त्रीणां च देशानां भक्तानां विविधाः कथाः । संग्राम १ रूप २ सदः स्तु ३-स्वादा ४ द्या विकथाः स्मृताः॥ १२ ॥ मुहूर्तावधि सावध-व्यापारपरिवर्जनं । आद्यं शिक्षावतं सामा- यिकं स्यारसमताजुपां ॥ १३ ॥ देशावकाशिकं नाम दिक्संक्षेपो दिनं प्रति । चतुर्दशानां संक्षेपो नियमानामुतान्वहं ॥ १४ ॥ ते चामी-स- चित्त १ दव्य २ विगई ३ वाणह ४ तंबोल ५ वत्थकुसुमेसु ७। वाहण रांत अने ग्रीष्मऋतुमा २० दिवस उपरांत-पक्वान्न इत्यादि चलितरस कद्देवाय छे. तेने जिनेश्वरोए भभक्ष्य कहेल छे; कारण के तेमां द्वींद्रियत्रसजीवोनी उत्पत्ति थाय छे. (७०६-८) पाकीना अमत्यो प्रसिद्ध छे. अनंतकायना नामो पूर्वे कहेला छे. इति सप्तममत. विविध पापोपदेश, पापोपकरणनुं अर्पण, प्रार्च-रौद्रध्यान ने प्रमादाचरण-भा चार प्रकारना अनर्थदंडथी विरमद् ते श्रावकनुं त्रीजुं गुणव्रत कह्यु के. (७०९-१०) मद्य, विषय, कपाय, निद्रा भने विकथा ए पांच प्रमादो सात्विक मनुग्योए वजवा. (७११) राजकथा, स्त्रीकथा, देशकथा भने भक्त ( भोजन ) कथा या चार प्रकारनी विविधकथा तेम ज संग्रामकथा, रूपकथा, सद्वस्तुकथा ने स्वादकथा विगेरे पण विकथामो कहेली छे. अथवा तो राजानी संग्रामकथा, स्त्रीनी रूपकथा, देशमा रहेली जूदी जूदी वस्तुओनी कमा अने भोजननी शुमाशुम स्वादुपणानी कया था प्रमाणे समजवू. (७१२) एक महर्च (पे घडी) पर्यंत सावद्य व्यापारनुं वर्जन ते समतायुक्त जीवोने माटे सामायिक नामनुं पहेलुं शिक्षाबत कडं थे. (७१३) देशावगाशिकनामर्नु बीजु शिवा- मत , मां दररोज दिशानो संक्षेप करवामां मावे के तेम ज चौद नियमोनो पण संक्षेप करवामां आवे छे. (७१४) ते चौद नियम पा प्रमाणे-सचिच, द्रव्य, विगह (२७४) श्रीकाललोकप्रकाश। सयण ९ विलेवण १०-बंभ ११ दिसि १२ न्हाण १३ भत्तेसु १४ ॥१५॥ पोषं धर्मस्य धत्ते य-तद्भवेत्पौषधवतं । आहार १ देहसत्कारा २- ब्रह्म ३ व्यापार ४ वर्जनं ॥ १६ ॥ चतुर्विधः स्यादाहारो-ऽशनं तत्रौद- नादिकं । पानं सुराखिलं चांबु सौवीरप्रभृतीन्यपि ॥ १७ ॥ खादिम भृष्टधान्यानि द्राक्षादीनि फलान्यपि । स्वादिमं तु लवंगैला-गजाती- फलादिकं ॥ १८ ॥ कृते चतुर्विधाहार -त्याग आहारपौषधः । सर्वतः स्यान्निर्विकृत्या चामाम्लादौ तु देशतः ॥ १९ ॥ एवमन्येऽपि त्रयः स्यु- देशसर्वत्वयोद्विधा । श्राद्य एव हि भेदे त-इयवहारस्तु सांप्रतं ॥ २० ॥ सदा क्वचिद्वा दिवसे साधूनां दानपूर्वकं । भुज्यते यत्तदतिथि-सं- विभागाभिधं व्रतं ॥ २१ ॥ महावतापेक्षयाद्य-पंचवत्या मतागुता । तद्गु- णाधायकत्वेन गुणता चोत्तरत्रये ॥ २२ ॥ मुहुर्गुर्वादिशिक्षाव-न्निपेव्यानि यथोचितं । शिक्षाक्तत्वमंत्येपु चतुर्विति मतं जिनः ॥ २३ ॥ अन्यत्र , उपानह, तंबोळ, वस्त्र, कुसुम, वाहन, शयन, विलेपन, ग्रह्मचर्य, दिर्शि', स्नान, भात. पाणी (भाहार ) (७१५) धर्मने जे पोपण करे ते पौषध कहीए, ते चार प्रकारे छे-माहारपोसह, देहसत्कार- पोसह, ब्रह्मचर्यपोसह ने प्रध्यापार पोसह. (७१६) माहारना चार प्रकारमा प्रशन ते प्रोदनादिक, पानशब्दे सुरा, सर्व जातना पाणी अने सौवीर विगेरे, (७१७ ) खादिम ते पकवेला घान्यो, पकवानो तथा द्राक्षादिक फळो भने स्वादिम ते लविंग, एलची, सोपारी, जायफळ विगेरे. (७१८) मा पारे प्रकारना माहारनो स्पाम करें सते सर्वपी आहार पौपध भने मायपिल, नीवी विगैरे करवा ते देशधी थाहारपोसह-(७१९) ए प्रमाणे पीजा प्रणे पोसह पण सर्वथी ने देशथी एम चे प्रकारे के परंतु हाल व्यवहार पाहारपोसह ज देशथी ने सर्वथी करवानो छे. वीजा प्रणे पोसह सर्वधी न कराय छे. (भा श्रीजु शिक्षाबत छे.) (७२०) दररोज अथवा कोई दिवसे साधुने दानदेवापूर्वक भोजन कर ते अतिथिसंविभाग नामनुं चोधु शिवावत छे. (७२१) महाप्रतोनी अपेवाए प्राधना पांच व्रतोमा प्रतोनी अणुता छ भने ते प्रतोमा गुणोना प्राधापक (स्थापन करनार) होवायी त्यारपछीना प्रण गुणग्रत कदेवाय छे. ( ७२२) गुरुमहाराजनी शिक्षा (शिखामण)नी जेम यथोचित- पणे पारंपार सेवन करवा योग्य होपाधी छेना चारने जिनेवरोए शिपायत कसा थे.

सर्ग ३० मो। (२७९) तु अंत्यानि सप्तापि शिक्षावतान्युच्यते. तथोक्तं-'पंचाणुवइयं सत्चसिस्का- वइयं दुवालसविहं ' इत्यादि विपाकसूत्रे सुवावधिकारे । तथा-तत्त्वानि सप्त नव वा धर्माद्यर्थीश्चतुर्विधान् । दानादिकं चतुर्दा च धर्ममादिशति प्रभुः ॥ २४ ॥ तथोक्तं-दानशीलतपोभावभेदा. धर्म चतुर्विधं । मन्ये युगपदाख्यातुं चतुर्वक्त्रोऽभवद्भवान् ॥२५॥ यथा- सुमंतो वद्ध्यंते मुच्यतेऽपि च कर्मभिः । यथा च यांति निर्वाणं स्वामी सर्व तथादिशेत् ॥ २६ ॥ यथादिशति पूर्णस्य तुच्छस्यापि तथैव सः । निःस्पृहः समचित्तश्च चक्रवर्तिदरिद्रयोः ॥ २७ ॥ पूर्णतुच्छस्वरूपं चैव- माचारांगवृत्तौ-ज्ञानेश्वर्यधनोपेतो जात्यन्वयवलान्वितः। तेजस्वी मति. मान् ख्यातः पूर्णस्तुच्छो विपर्ययात् ॥ २८ ॥ स्वयं कृतार्थोऽप्यन्येषां हितार्थ धर्ममादिशन् । लोकेपु पविधेष्वेप उत्तमोत्तम उच्यते ॥ २९ ॥ तथाहुः श्रीउमास्वातिवाचकपादाः- कर्माहितमिह चामुत्र चाधमतमो नरः समारभते । इह फलमेव (७२३ ) अन्यत्र पाइला सातेने शिक्षाप्रत कमा छे. तथोक्तं-पांच अणुव्रत अने सात शिक्षाबत एम बार प्रकारना थाय छे इत्यादि विपाकस्त्रमा सुपाहुना अधिकारमा कहुं . भा प्रमाणे भावना पार व्रतोतुं स्वरूप प्रभु कहे छे, उपरांत सात अथवा नव साचो, धर्मादि पार भर्थो भने दानादिक चार प्रकारनो धर्म प्रक्ष उपदिशे छे. (७२४ ) ते विपे कयु छ फे-" हे प्रभु ! दान, शीळ, तप भने माव ए चार प्रकारना धर्म एक साये कहेवाने माटे ज आप चार मुखबाळा थयागो एम हुंमार्नु छु. (७२५) वळी जेवी रीवे प्राणी कर्मथी बंधाय थे, लेवी रीते कर्मोधी काय छ भने जेवी रीते जीव निर्वाण पामे छे ते सर्व ते रीते ज प्रभु कहे थे. (७२६) चक्रवती ने दरिद्रीमा समचिच एवा भने निस्पृह एवा प्रस जेवी रीते पूर्णने कहे थे तेवी रीते तुच्छने-अपूर्णने पण उपदेश मापे छे. (७२७ )" पूर्ण ने तुच्छर्नु स्वरूप श्री आचारांगचिमा पा प्रमाणे क2-पान, मेधर्य अने धनवाळो, जाति कुळ ने पळयुक्त, तेजस्वी मने पुद्धिमान लेने पूर्ण कहेल थे। मने सेपी विपर्य ययाळाने तुच्छ कहेल चे. (७२८) सार्यकर पोते कवार्य होगा पता पण मन्यना हिने माटे धर्मोपदेश मापे थे। कारण के छ प्रकारना मनुप्पोमा प्रस उत्तमोत्तम कहेयाय 2. (७२९ ) पाहुः श्री उमास्वातियापकपादाः मा भषमा भने परमपमा महिसनी प्राप्ति माटे म अधमतर नर कोर पण कार्य (२८०) भीकानलोकप्रकाश। खधमो विमध्यमस्तुभयफलार्थं ॥ ३०॥ परलोकहितायैव प्रवर्चते म- ध्यमः क्रियासु सदा । मोक्षायैव तु घटते विशिष्टमतिरुत्तमः पुरुषः ॥ ३१ ॥ यस्तु कृतार्थोऽप्युत्तम-मवाप्य धर्म परेभ्य उपदिशति । नित्यं स उत्तमेभ्यो-ऽप्युत्तम इति पूज्यतम एव ॥ ३२ ॥ तस्मादर्हति पूजा- महन्नेवोत्तमोत्तमो लोके । देवर्षिनरेंद्रेभ्यः पूज्येभ्योऽप्यन्यसत्वानां ॥ ३३ ॥ कदापि निष्फला नैषां देशना जायतेऽर्हतां । लाभाभावेऽमुढ- लक्ष्याः प्रवर्तेरन्न ते यतः ॥ ३४ ॥ सामायिक स्यात्सम्यक्त्वं श्रुतसामायिकं तथा । सामायिके द्वे विरती देशतः सर्वतोऽपि ये ॥ ३५ ॥ सामायिकस्वरूपं चैवमाहुः- सावज्जजोगविरयो तिगुत्तो छसु संजयो । उवउत्तो जयमाणो पाया सामाइयं होइ ॥ ३६ ॥ जो समो सव्वभूएसु तसेसु थावरेसु य । तस्त सामाइयं होइ इइ केवलिभासियं ॥ ३७॥ सामायिकानि चत्वारि त्रीणि द्वे एकमेव वा । निश्चयात्प्रतिपद्यते नरतियकसुधाशिषु श्रारमे छे. अधम नर आ भवनां सुखने माटे ज आरंभे छे. विमध्यम उभय लोकना फळने माटे प्रारंभे छे, मध्यम परलोकना हितने माटे ज सदा क्रियामा प्रवृत्ति करे छ, विशिष्टमतिवाळो उत्तम पुरुष मोघने माटे ज उद्यम करे के भने जे कृतार्थ थपेल उत्तम पुरुष पोते उचम धर्मने प्राप्त कर्या छतां पण परना हितने माटे धर्मोपदेश करे छ, ते उत्तममा पण उत्तम होवाची पूज्यतम थे. (७३०-३२) या प्रमाणे होवार्थी ज लोकमां उत्तमोत्तम का मरिहंत ज अन्य भाषीमोने पूष्य एषा पण देव, शनि ने द्रोपी पण अत्यंत पूजा करवायोग्य छे-पूजनीय छे. (७३३) ए परमात्मानी देशना क्यारे पण निष्फळ जती नथी; कारण के भमूढलक्ष्य एघा मनुष्य लाभना प्रभावमा प्रवृचि करताज नथी. (७३४) सामायिक चार प्रकारे छे-१ सम्यक्त्वसामायिक, २ श्रुतसामायिक, ३ देशविरति- सामायिक ने ४ सर्वविरतिसामायिक. (७३५) सामायिकर्नु स्वरूप भा प्रमाणे कर्ष थे, सावध योगधी विरत, प्रण गुप्तिए गुप्त, पद् कायमा अथवा पांच इंद्रिय ने मन ए धर्मा संयत भने उपयोगर्षक जयगा साथै प्रवृषि करतो मात्माज सामायिक थाय छे. (७३६) ने त्रस ने स्थावर सर्व जीवोमा समान भाववाला छेतेने सामायिक होय छे, एम केव. लीए म (७३७) उपर फोला चार प्रकारना सामायिकमांधी चार,त्रण, वे ने एक सर्ग ५०मो। (२८१) ॥ ३८॥ चत्वारि प्रतिपयंते नरा एवादितस्त्रयं । तिर्यचस्त्वमराश्च द्वे अंतिमासंभवात्क्रमात् ॥ ३९ ॥ पूर्व प्रपन्नसम्यक्त्वो देशतः सर्वतो- ऽथवा । विरति चेल्लभेत स्या-त्तदा टेकाप्तिसंभवः ॥ ४० ॥ सामायिकस्य कस्यापि प्रतिपत्ता भवेन्न चेत् । नृपु तिर्यक्षु वा कश्चि- त्तदावश्यं सुधाशिपु ॥४१॥ कश्चित्प्रक्षीणसम्यक्वः सम्यक्त्वं प्रति- पद्यते । अर्हगिरामवंध्यत्वा-दसंख्यलाच नाकिनां ॥ ४२ ॥ तत्र ये सर्वविरतिं प्रपद्यते नराः स्त्रियः । प्रव्राजयति तान्नाथ: शिक्षयन् सकलं विधिं ॥ ४३ ॥ गंतव्यमेवं स्थातव्यं भोक्तव्यं विधिनामुना । वक्तव्यं भापयेवं च यथा धर्मों न सीदति ॥४४॥ याश्च चारित्रपुत्रस्य मातरोऽष्टौ भवत्यमूः। सम्यगाराधनीयास्ता मोक्षाका- चिमुमुक्षुभिः ॥४५॥ युगमात्रावलोकिन्या दृष्टया सूर्याशुभासितं । विलो. क्य मार्ग गंतव्य-मितीर्यासमितिर्भवेत् ॥ ४६॥ हितं यत्सर्वजीवानां निधयथी मनुष्य, तिर्यच ने देवगतिमा पामी शकाय छे. (७३८ ) मनुष्य चारे मामायिक प्राप्त करे छे. प्रथमना प्रण सामायिक विर्यचो प्राप्त करे के अने देवो (उपलक्षणथी नारकी जीवो) प्रथमना ये प्राप्त करे छे. अनुक्रमे पाछलानो मां असंभव छे. (७३९) पूर्वमये जेणे सम्यक्त्व प्राप्त कर्यु छ एवो जीव आ भवमा सर्वविरति के देशविरति प्राप्त करे त्यारे एक सामायिक प्राप्त करे एम समज. (७४०) जो कोई पण सामा- पिफनो प्रविपचा मनुष्यमा के तिथेचा (प्रमुनी देशनायडे ) कोड पण न होय तो देव- गतिमा तो जरूर प्रतिपचा होय. (७४१) कारण के-मरिहंतनी वाणी अवंध्य होवाथी भने देवोर्नु भसंख्यपणुं होवाधी ( भगवंतनी वाणीवहे ) कोई प्रवीणमम्यक्त्वी देव फरीने सम्यक्त्व पामे छे. (७४२) तमा जे पुरुषो भने स्त्रीमो सर्वपिरतिने अंगीकार करे थे तेश्रोने भगवान चारित्रना सर्प विधिने शिरावीने प्रमज्या मापे थे. (७४३) ते विधि कहे थे-मा प्रमाणे पालयं, मा प्रमाणे उमा रहे, भा विधिए माहार करवो, मावी भापायडे बोलघु के जेपी धर्म सीदाय नहीं. (७४४ ) तथा वळी चारित्रपुत्रनी जे भाठ मातामोदे ने भोचा- कांधी मनुप्योए सम्यग् प्रकारे माराधवी. (७४५) माठ माता मा प्रमाणे-र्पना किरणोपटे प्रकाशित मार्गने युगमात्र (पार हाय) प्रमाण जोनारी टिपडे से जोड़ने घालव ते सिमिति 2. (७४६) सर्व जीवोने हितकारी, निरषय भने मिन-समायो- (२८२) भीकालोषप्रकाशा निरवा मितं वचः। तद्धर्महेतोर्वक्तव्यं भाषासमितिरित्यसौ ॥ १७ ॥ तदुक्तं-सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूया-न्न ब्रूयात्सत्यमप्रियं । प्रियं च नानृतं ब्रूया- त्सा भापासमितिर्भवेत् (देष धर्मः सनातनः)॥४८॥ सप्तचत्वारिंशता य-दोषैरशनमुज्झितं । भोक्तव्यं धर्मयात्रायै सैपणासमितिर्भवेत् ॥ १९ ॥ ग्राह्य मोच्यं च धर्मोप-करणं प्रत्युपेक्ष्य यत् ।प्रमार्य चेयमादान-निक्षेपस- मितिः स्मृता ॥ ५० ॥ निर्जीवेऽशुषिरे देशे प्रत्युपेक्ष्य प्रमाय च । यत्त्यागो मलमूत्रादेः सोत्सर्गसमितिः स्मृता ॥ ५१ ॥ कल्पनाजालनि. मुक्तं समभावेन पावनं । मुनीनां यन्मनः स्थैर्य मनोरप्तिर्भवत्यसौ ॥५२॥ मौनावलंबनं साधोः संज्ञादिपरिहारतः । वाग्वृत्तेर्वा निरोधो यः सा वाग्गुप्तिरिहोदिता ॥ ५३ ॥ स्थितस्य कायोत्सर्गादा-वुपसर्गजुषोऽपि यत् । स्थैर्य धैर्येण कायस्य कायगुप्तिरिय मता ॥ ५४ ॥ शय्यासनोर्ध्व- स्थानादौ कायचेष्टा नियम्यते । साधुभिर्धर्मबुद्ध्या य-कायगुप्तिस्तु साऽपरा ॥५५॥ एता एव द्वादशांग्याः सारो धर्मस्य साधनं । ततो युष्मा- पेत जे वचन होय ते ज सद्धर्मना हेतुए बोलवू ते मापासमिति के. (७४७) तदुक्तं- सत्य बोलवू, प्रिय बोलवू, अप्रिय ए, सत्य न बोलचं, तेम ज प्रिय एचं असत्य न पोलघु. भा भापासमिति कहेवाय छे. (आ सनातन धर्म के) (७४८) ४७ दोप रहित अन्न जे संय मना निर्वाह माटे ज भोगवई (खा) ते एपणासमिति छे. (५४९) जोइने अने प्रमार्जीने धर्मना उपकरणो लेवा अने मूकवा तेने भादाननिक्षेप- समिति कही छे. (७५०) निजीच अने पोलाण विनानी जमीनपर जोइने अने प्रमा- ीने मळमूत्रादिनो त्याग करवो ते उत्सर्गसमिति कही छे. (७५१) कल्पनाजाळरहित भने समभावी पवित्र एवं मुनिना मननुं जे स्थैर्य ते मनोगुप्ति समजवी. (७५२) मुनिए संज्ञादिकना पण परिहार युक्त मौनपमानुं आलंपन करवू अथवा वाग्वृचिनो निरोध करवो तेने नहीं वचनगुप्ति कहेली छे. (७५३ ) कायोत्सर्गादिमां स्थित रहे- लाने उपसर्गादि थता पण कायानी जे स्थिरता धैर्यवडे रारावी ते फायगुप्ति कवाय थे. (७५४ ) शय्यामा वेसता के उमा रहेता साधुए धर्मपुद्धिवडे जे कायचेष्टाने निय- ममा रापवी ते पीजी रीते कायगुप्ति कहेवाय 2. (७५५) मा भाठ मातामो ज द्वाद- शांगीना सारभूव ने धर्मना साधनभूत छे, माटे तमारे वारंवार एना आराधनमा यत्न . ॥ श्रीशीलांगरथ ॥१॥ जे नोकरंति मगसा, निजियाहारसनासोहदी ॥ पूढवीकायारंभ, खंतिजुमा ते मुणी चंदे ॥१॥ खंतीप्रजयमद्दव, मुत्तीतवसंजमे य योधये ॥ सर्थ सोयं अकिंचणं च, बंभं च जधम्मो ॥२॥ जोए करणे सन्ना, इंदिय भूमाइ समणधम्मो य ॥ सीलंगसहस्साण, अट्ठारससहस्सनिष्फत्ती ॥३॥ फरणाईतिणि जोगा,मणमाइणियोहवन्तिकरणाई। आहाराईसना चउ, सोपाइ इंदिया पंच ॥४॥ मनोतिनोतिनोभामो यति ६.. मणगा पपमा तगुण Inpommmmmll माध्यम निविभय निवियमा निजियपरि बरगमा सजा समा गहराना चरिदिना// पचिदिय นัก सहादमा रंभं १० मजीव गोईदी 'सोयजुभा अकिंचणा चस्मिदी पाणिंदी :- १.. १०० रसणिंदी १०. फासिंदी १०० सचजुमा वेमुणीदे। तेमुणीवदेश पुररोषय भाउप्रया रंमं. उग्रया रंभ 10 पाउकाया रैम १० वणरमहका यारंभ ससजमा सनमा गमरवा (मारितेमुणी गयवदा समुत्तिणे तवजुआ समुपदे | तेमुणीवंदे | तेमुणीवंद।

सर्ग ३० मो। (२८३) भिरेतासु यत्नः कार्यो मुहुर्मुहुः ॥ ५६॥ श्रादिश्यैवं साधुसाध्वी श्रावक- श्राविका इति । प्रभुश्चतुर्विध संघ स्थापयेत्तीर्थमद्भुतं ॥ ५७ ॥ तत्र च-साधवः स्युः पात्रगुच्छ-रजोहरणधारिणः । येऽष्टादशसह- स्राणि शीलांगानां च विभ्रते ॥ ५८ ॥ तानि चैत्रमाहुः-जे नो करिति मणमा निजिअथाहारसन्नसोइंदी । पुढविकायारंभं खंतिजुश्रा ते मुणी वंदे ॥ ५९॥ करणं कारणं चानु-मतियोगत्रयं तथा। आहाराद्याश्चतस्त्रश्च संज्ञाः पंचेंद्रियाणि च ॥ ६०॥ पृथ्व्यंबुवह्निमरुता-मारंभाः स्युर्वनस्पतेः। द्वित्रिचतुःपंचखाना-मजीवस्येत्यमी दश ॥ ६१ ॥ क्षमार्जवं मार्दवं च मुक्तिस्तपश्च संयमः । साधोधर्मा दश ब्रह्म-सत्यशौचापरिग्रहाः ॥ १२ ॥ भवंति दश शीलांगा-न्यधःस्थैर्दशभिः पदैः । क्षमादिभिः साधुधर्म- वाचिभिः परिवत्तितः ॥ ६३ ॥ शतं दशभिरारंभ-पदैः स्युः परिवर्तितैः । प्रत्येकमारंभपदे पूर्वोक्तदशकान्वयात् ॥ ६॥ शतं शतानि पंच स्युः पदै- रिद्रियवाचिभिः । सहस्रद्वितथी तेषां चतुःसंज्ञापदान्वयात् ॥ ६५ ॥ करवो. (७५६ ) भा प्रमाणे कहीने पछी प्रभु साधु, साध्वी, श्रायक ने श्राविकारूप चतुर्विध संघने अद्भुत तीर्थपणे स्थापन करे छ. (७५७) ते (चतुर्विध संघ )मां पात्र, गुच्छ ने रजोहरणादिना धारण करनारा भने अढार हजार शीलांगने धारण करनारा ते साधु कडेवाय छे. (७५८) ते शीलांग या प्रमाणे- 'जे मुनि श्राहारसंशा जीतेला, श्रोत्रंद्रियने वश करेला, खांतीयुक्त मनवडे पृथ्वीका- यनो श्रारंभ न फरे तेने हुं वंदु छु. ' (७५९ ) भा प्रमाणे करण, करावण ने अनुमो. दनरूप प्रण करणवडे, मन, वचन, कायारूप प्रण योगवडे, पाहारादि चार संज्ञा सेम ज थोत्रंद्रियादि पांच इंद्रियोने जीतीने पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति, द्वींद्रिय, त्रींद्रिय, चतुरिंद्रिय, पंचद्रिय भने अजीव ए दशनो प्रारंभ, क्षमा, मार्जव, मार्दव, मुक्ति, तप, संयम, ब्रह्मा, सत्य, शौष भने अपरिग्रह-ए दश प्रकारना यतिधर्मयुक्त यइने न फरे. (७६०-६२) (तेवा मुनिने हुं वादं छु.) हवे उपर जणावेल रीते १८००० शीलांग शी रीते पाय ! ते कहे छे-शीलना भंगने नीचे स्थापन फरेला धमादि दश प्रकारना साधुधर्मवडे गुणवाथी दश थाय. (७६३ ) पछी दश प्रकारना आरंमपदवडे पूर्वोक्त दशने गुणवाधी सो याय. (७६४) पछी पाच इंद्रियोक्डे गुणवाची पांच सो याय. पछी चार संमावडे गुणवाथी में हजार (२८४) श्रीकाबलोकप्रकाश । मनोवाकाययोगेन षट् सहस्रा भवंति ते । अष्टादश सहस्राश्च करणादि- त्रयान्विताः ॥६६॥ नष्टोद्दिष्टविधिं चात्र वक्ष्ये येनाप्यते द्रुतं । अंकाद्वि- वक्षितं रूपं रूपाच्चांको विवक्षितः॥ ६७ ॥ त्रिकं त्रिकं चतुष्कं च पंचकं द्विर्दश न्यसेत् । भाजकानां ध्रुवांकाना-मियं भवति पद्धतिः ॥ ६॥ ३,३,४,५,१०,१० अंकराशि परिपृष्टं प्रथमं दशभिर्भजेत् । लब्धं भूयोऽपि दशभि-लब्धं तत्रापि पंचभिः ॥ ६९ ॥ चतुस्त्रित्रिभिरेवं च लब्धं लब्धं विभज्यते । सर्वत्र भागशेष स्व-भाजकस्य लिखेदधः ॥ ७० ॥ भाजकेन हृते राशौ यदि किंचिन्न शिष्यते । तदा तद्भाजकस्याधः शून्यं स्थाप्य- मिति स्थितिः॥ ७१ ॥ किंच-यदा राशौ भज्यमाने किंचिदप्यवशिष्यते । सैकं कार्य तदा लब्धं निःशेपे तु न तत्तथा ॥ ७२ ॥ यथा-मितं चतुर्भिर्नवकै रूपं भवति कीदृशं । शीलांगानां तत्र राशिं यथोक्तं दशभिर्भजेत् ॥ ७३ ।। थाय. (७६५) पछी मन, पचन, कायरूप त्रण योगवडे गुणवाथी छ हजार थाय. तेने प्रण करणवडे गुणवाथी १८००० थाय. (७६६) नष्टोदिए विधिवडे हवे समजावे छे के जेथी अंकथी विवक्षित रूप अने रूपथी विवक्षित अंक सत्वर श्रावे. (७६७) तेने माटे त्रण, त्रण, चार, पांच अने व वार दश एम छ अंक स्थापया. ध्रुवांकना भाजकनी श्रा पद्धति छे. (३-३-४-५-१०-१०) (७६८) पछी पूछेली १८००० राशिने पहेलो दशे मांगवा, वेथी जे अंक आये तेने फरीने दशवडे मांगीए, तेथी जे अंक मावे तेने पांचवडे मांगीए, (७६९) तेथी जे अंक भावे तेने चारवडे मांगीए, तेथी जे अंक आवे तेने प्रणयडे मांगीए, तेथी जे अंक पावे तेने फरीने त्रण- पडे मांगीए. एवी रीते लाधेला लाधेला अंकने सर्वत्र मांगवा. जे शेष रहे तेने भाजकनी नीचे स्थापयो. (७८० ) मांगाकार करवाथी छेक्टे शेप कांदन श्रावे त्यारे भाजकनी नीचे शून्य मूकीए. (८७१ ) (जेमके-१८००० ने दशवडे भांगता १८००, तेने दश- बडे भांगता १८०, तेने पांचवडे मांगतां ३६, तेने चारवडे मांगता ९, तेने प्रणवडे मांगतो ३ ने तेने प्रणवडे भांगतां शून्य अथवा एक आवे छे.) हवे पीजी रीते भागाकार करवानो प्रकार कहे छे-जो राशिने मांगतां काइपण भशेष रहे तो ते लब्ध अंकमां एक उमेरवो. जो निशेिष थह जाय-काइपण बाकी न रहे तो तेम न कर. (७७२) यथा-जो शीलांगोनी राशि चार नवडा प्रमाण होय -- मर्ग ३० मो। (२८५) लब्धा नवनवत्याढ्याः शता नव नवोपरि । शिष्यंते ते च सर्वोत्य-दश- कस्य लिखेदधः ॥७४ ॥ भागशेषतया राशे-लब्धं सैकं विधीयते । सहस्रं जायते तच्च दशभिः प्रविभज्यते ॥ ७५ ॥ लब्धं शतं भागशेषा- भावाच्छून्यं निवेश्यते । उपांत्यदशकस्याधः सर्वत्रैवं विधीयतां ॥ ७६ ॥ शते च पंचभिभक्ते विंशतिः प्राप्यतेऽथ सा । चतुभिर्भज्यते लब्धाः पंच तांश्च त्रिभिर्भजेत् ॥ ७७ ॥ लब्ध एको द्वयं शिष्टं लिख्यतेऽधस्त्रि- कस्य तत् । लब्ध एकोऽपि सैकस्त-ल्लेख्य श्राद्यत्रिकादधः ॥ ७८ ॥ श्रादौ द्विकद्वयं शून्य-त्रयं नवक एव च । शीलांगरूपमित्यूचं च. तुभिर्नवकैर्मितं ॥ ७९ ॥ पदसंख्योह्यतामकै-यथास्थानं पदानि च । स्वस्वपंक्तेः पदं सी-तिमं शून्यैश्च भाव्यतां ॥८॥ तद्रूपं चैवं-जे कारिति न वयसा निजिअपरिग्गहसन्नसोइंदी । अजियाणं . प्रारंभ अकिंचणा ते मुणी वंदे ॥ ८१ ॥ अथ द्विकद्वयं शून्य-त्रयं नवक एव तो के, रूप श्रावे ? उक्त राशि ९९९९ ने प्रथम दशवडे मांगीए एटले नवरों ने नवाणु भावे ने नव वधे. ते पाक छेवटना दशकनी नीचे मूकवो. (७७३-७४ ) भाग शेप रहेल होवाथी लब्धराशि ९९९ ने एक सहित करीए त्यारे हजार थाय, तेने दशवडे मांगीए. एटले सो आवे. शेप कोइ न बधे, तेथी शून्य उपांत्य दशकनी नीचे मूकीए. सर्वत्र मा प्रमाणे कर. (७७५-७६ ) मोने पांचे मांगता वीश पाये. हये वीशने चारे मांगीए एटले पांच आवे वेने प्रणवडे मांगीए एटले एक श्रावे ने वे बधे. तेने घौजा प्रणनी नीचे लखीए अने लन्ध थएल अंकमा एक उमेरी पहेला प्रणनी नीचे भूकीए. ३३.:: (७७७-७८) पहेला ये पगडा, पची प्रग शून्य, पछी नवडो. या प्रमाणे चार नवडा प्रमाण शीला- गर्नु रूप समजबु. (७७१) पदसंख्या कोवडे जाणवी. तथा पदो यथास्थाने एटले अनुक्रमे जाणवा भने पोतपोतानी पंक्तिनुं चेल्लु पद शून्योबडे जाण. (७८०) तेनुं रूप तेनापी घनती गाथा माप्रमाणे जे कारिति न क्यमा, निजिमपरिगहमनसोइंदी भजिमाणं भारंभ, प्रविणा ने पुणी वंदे "जे परिग्रह संघाने अने श्रोत्रंद्रियने जीतनार वचनवडे अजीयोनो आरंभ न करावे तेवा अकिंचन मुनिने हुं वह डूं." (७८१) हो ये पगडा, पण शून्य ने एक नवक एमु रूप जे कयुं थे ते शीरी भावे ?

। (२८६) मीकाललोकप्रकाश। च । कथितं रूपमित्येवं पृष्टे विधिरिहोच्यते ॥८२॥ पूर्वोक्तभाजकांकाना- मधःपृष्टांकपंक्तिका । क्रमेण लिख्यते सा च स्थापना प्राक् प्रदर्शिता ॥८३॥ द्वितीयोंकोऽथोर्ध्वपंक्ते-रधास्थपंक्तिवर्तिना । गुपयते प्रथमांकन जातं यत्तदधो लिखेत् ॥ ८४ ॥ ऊर्ध्वपंक्तिगतांकस्य गुणितस्यास्य चेदधः । भवत्यंकः कोऽपि तर्हि राशिमेनं निरेकयेत् ॥ ८५॥ अधः- पंक्तौ च शून्यं चे-तस्याकस्य भवेधः । राशिस्तदा तथावस्थः स्थाप्य इत्यग्रतोऽपि च ॥ ८६ ॥ यथा पूर्वस्थापनाया-मूर्ध्वस्थपंक्तिगस्त्रिकः । आद्यं मुक्त्वा द्वितीयो यः स चाध:पंक्तिवर्तिना ।। ८७ ॥ द्विकेनाद्येन गुणितो जाताः षट् ते निरेककाः । पंच जाताश्चतुस्तेि विंशतिस्ते च पंचभिः ॥ ८८ ॥ ताडिताः स्युः शतं ते च सहस्रं दशभिर्हताः। दशघ्ना- स्तेऽप्येकहीना-श्चत्वारो नवकाः स्थिताः ॥ ८९॥ ३३४५१४११, ५, २०, १००, १०००, ९९९९. ततश्चायं भाव:-सहस्राणि नव नव-त्यधिकाश्च शता नव । एषां शीलांगरूपाणा-मंत्यं रूपं यथोदितं ॥९०॥ श्राभिश्च पंक्तिभिः पड्भिः स्थापिताभिरधः क्रमात् । स्याद्रथस्या- एम पूछ थे सते तेनो विधि कहीए छीए. (७८२ ) पूर्वोक्त भाजक भंकनी नीचे पूछेला भंकनी पंक्ति भनुक्रमे लखवी. तेनी स्थापना पूर्षे पतावी छ .. (७८३) हवे ऊर्ध्वपंक्तिगत पीजी (प्रण) अंक नीचेनी पंक्तिमा पहेला अंक ( )वडे गुणीए भने जे आवे ते (६) नीचे लसीए. (७८४ ) गुणेला ऊर्ध्व पंक्तिगत अंकनी नीचे जो कोइपण थक होय तो भा राशिमार्थी एक याद करीए. (७८५ ) भने नीषेनी पंक्तिमा ते अंकनी नीचे जो शून्य होय तो ते राशि तेवी ज रासीए. एम भागळ पण समज!. (७८६ ) जैम पूर्व स्थापनामा उपरनी पंक्तिमा प्रथमनो मूकीने पीजो अंक जे प्रशनो के तेने भषापंक्तियर्षि एवा भाप अंक द्विक (२)पडे गुण छ यया सेमा. थी एक पाद करतां पांच रया, सेने चारवडे गुणता वीश थया-तेने पनि गुग्णता पया १००, वेने दशवडे गुणतां पया इजार, वेने दशबहे गुणीने याद करता धार नपडा ::+५-२०-१००-१०००-९९९९ (७८४-८९) माषार्थ ए थे के नव हजार नयशें नयाणु एटला शीलागार्नु थेन्तुं (एटले ९९९९९) रूप पूर्षे फ वेयं माये. (७९०) मा (३-३-४-५-१०-१०) पस्ति उपर नीचे क्रमसर स्थापनाची रथाकति पाय प्राय.. . .

॥ श्री दशविध चक्रवालसामाचारीरथ ॥२॥ मणगुत्तो सन्नाणी,पसमियकोहो य हरियसमिनो य॥ पुढविजिए रसखतो, दाकारी नमो तस्स ॥१॥ गुत्तिनाणाइतिग, पसमियकोहाइ समिइपणगच ॥ भोमाररखतो. चकसमायारिजुत्तोय ॥२॥ इच्छा मिच्छा तहकारो, प्रायस्सिया य निसीहिया। आपुच्छा पडिपुच्छा, छंदनिमंतोयसपया ॥३॥ मगगुती क्यालो .... तणुगुप्ती L200 ६... শাখী सम्हिी सचरण २००० Immmmmm चरिदि पचिाद पगभिय कोहाय पममिय मागाय पममिय मायोय पसमिय लोहोय (क्खता तेइदि रक्खतो, मनतो निमत भजीय छदणकारी एमणा भासा ममित्रीय समिओय गहणिक्सिव|| परिठवण समिओय || समिओय समिआय पुरविपर|| भाउजिए || तेजिए स्वपती रक्यतो पसतो वाउजिए गएस्सइजिए रक्सतो रक्खतो भापुच्छकारी पडिपुच्छकारी नमोतरस नमोतरस पाहा मिच्छाधार तहतिकारी सादस्सिया निहियाकारी) नमो तस्म|| नमो तस्मघरोनमो. नमो तरस समोरम .. सर्ग ३० मो। (२८७) तिस्तस्मा-च्छीलांगरथ उच्यते ॥ ९१ ॥ अन्येऽपि संति भूयांसः सामाचार्यादयो रथाः। ज्ञेयास्तेऽप्यनया रीत्या नात्रोका विस्तृतेर्भयात् ॥ ९२ ॥ मणगुत्तो सन्नाणी पसमिश्रकोहो श्र इरिश्रसमिओ । पुढ- विजीए रकंतो इच्छाकारी नमो तस्स ॥ ९३ ॥ इच्छा मिच्छा तह- कारो श्रावसिथा श्र निसीहिथा । श्रापुच्छा पडिपुच्छा छंदनिमंतो. • वसंपया ॥१॥ इति दिक्. गुणैरनेकैरित्यायैः प्रथिताः पृथुबुद्धयः । साधुसाव्यो भवेत्तेषां जिनेंद्राणां परिच्छदः ॥ ९४॥ श्रावकाणां तु भेदौ द्वा-बष्टौ द्वात्रिंशदेव च । सप्तत्रिंशाः शताः सप्त स्थूलभेदविवक्षया ॥९५॥ सम्यक्त्वं विभ्रते केचि-त्तयुक्तां विरति परे । द्विधा श्राद्धा अविरता विरताविरता इति ॥ ९६ ॥ अणुव्रतानि पंचापि छे तेथी आने शीलांगरथ कई छ. (७९१ ) वीजा पण घणा सामाचारी विगेरेना रथो छ. ते पण पधा पा रीते जाणवा. विस्तारना भयर्थी अहीं कझा नयी. (७९२) सामाचारीरथनी एक गाथानो भावार्थ-' मनगुप्तिवडे गुप्त, श्रुवज्ञानी, क्रोधनो उपशम फरनार, ईर्यासमितिवान् , पृथ्वीकाय जीवोनी रक्षा करता एवा इच्छाकार सामाचारी- वाळा मुनिने नमस्कार थाम्रो. (७९३ ) सामाचारी-इच्छो, मिच्छो, तथाकार, भाव. श्यकी', नैपेधिकी', पृच्छा, प्रतिपृच्छाँ, छंदर्ना, निमंत्रों ने उपसंपदी-एम दश प्रकारनी कही छे. इति दिक्. (१ध्रुव, ३ गुप्ति-३, ४-कपाय-१२, ५ समिति-६०, ६ काय-३६०, १० सामा. पारी ३६००, बो ज्ञान पांच लेवामां आवे तो भाना पण १८००० भेद थाय.) पीजो सामाचारीरथ, ३ समापी सद्दीही सघरणी, ३ गुप्तिमान, ४ कपायोप- शमी, ५ समितिमान्, १० पृथ्वीकायादिनी रक्षा करतो, १०विध सामाचारीवान. एटले-३४३९x४=३६४५=१८०x१०=१८००x१०-१८००० मा प्रमाणे पगा सामाचारी रथ थाय छे. भा प्रमागे भनेक गुणोवढे प्रथित, विस्तारवंत पुद्धिवाळा साधु ने साम्बीमो से जिनेचरोनो परिवार होय छे. (७९४) भावकना मेद पे, माठ, पत्रीश भने सात सो साडग्रीश स्पूळमेदनी विवधाए पाय थे. (७९५) ते मा प्रमाणे-केटलाक मात्र समकितने धारण करनारा होय छ भने केटलाक उपर कही गया प्रमाणे पार ग्रतरूप विरनिने धारण करनारा होय 2. एम भावक माविरत भने विरवाषिरत एया पे प्रकारना होय छे. (७९६) पाप मणमयोने . .

(२८८) श्रीकाललोकप्रकाश। पभिरुच्चारभंगकैः । पृथक् पृथक् स्वीकृतानि यस्तेषां पड् भिदोऽभवन् ।। ९७ ॥ प्रतिपन्नोत्तरगुण-व्रतः केवलदर्शनः । इति यान्विता एते पडित्यष्टौ भिदोऽभवन् ॥ ९८ ॥ एवं सर्वत्राप्यने भाव्यं. द्विविधत्रिवि- धं प्रोक्तं १ द्विविधद्विविधं २ तथा । द्विविधैकविधं ३ चैक-विधत्रि- विधमेव च ४॥ ९९ ॥ एकविधद्विविधं ५ चै-कविधेकविधं ६ तथा । श्राद्धानां पढमी प्रोक्ता व्रतोच्चारणभंगकाः ॥ ८०० ।। न करोमि स्वयं नान्यः कारयामि च पातकं । स्थूलहिंसादि मनसा वाचांगेनाद्यभंगके ॥१॥ एवमन्येऽपि भंगका भाव्याः ३३३३३३ पट्स्वप्येतेष्वनुमति- गृहस्थैर्न निषिध्यते । एषामनुमतिप्राप्तेः स्त्रीपुत्रादिकृतेष्वपि ॥२॥ अन्यथा हि सर्वदेशविरत्योर्न भिदा भवेत् । त्रिविधं त्रिविधेनेति भंगको गृहिणां न तत् ॥३॥ एषामुत्तरभंगास्तु जायंत एकविंशतिः । ते चैव- मस्याः पडूभंग्याः प्रतिभेदाववोधकाः ॥४॥ स्थाप्या अधस्तादेष्वंकाः क्रमात्कोप्टेषु पट्स्वपि । एकको द्वौ त्रिकावेको द्विकः पट्कद्वयं ततः ॥५॥ अयं भावः-भंगो यथोक्त एवाये कोष्ठे नानान्यसंभवः । द्वितीये छ मंग (त्रण योग ने वे करण )ना उच्चारघडे जूदा जूदा स्वीकार करनार होय तेथी ते रीते श्रावकना छ भेद थाय छे. (७९७ ) उत्तरगुणने अंगीकार करेला तेमज केवळ- दर्शन ( समकित )वाळा एम चे प्रकारना तथा पूर्वोक्त छ भेदवाळा-ए रीवे एकत्र करवाथी पाठ प्रकारना श्रावक थाय छे. (७९८) मा प्रमाणे भागळ चधा मेदर्मा समजी लें. उपर जे श्रापकपणुं उच्चरवाना छ प्रकार कया छे ते या प्रमाणे-द्विविध विविध १, द्विविध द्विविध २, द्विविध एकविध ३, एफविध विविध ४, एकविध विविध ५, एकविध एकविध ६, (७९९-८००). पहेला भगनी समजण पाडे छे के-'ई स्थळ हिंसादि पापने मन, वचन अने कायावडे करूं नहीं अने वीजा पासे करा नहीं.' (८०१) भा प्रमाणे वीजा भगो पण समजवा. माबए भंगने विषे गृहस्थो अनुम- तिनो निषेध न करे, केमके एने स्त्री-पुत्रादि जे करे तेमा अनुमविनी प्राप्ति के. (८०२) जो एम न होय तो सर्वविरीत ने देशपिरतिमां भेद ज न पड़े, तेथी विविध विविघे ए मांगो गृहस्थ माटे कद्देल नपी. (८०३ ) ए छ मूळ मंगना उत्तरमंग २१ थाय थे. से उघरमंग भावी रोते जाणवा. (८०४) छ भेदना छ कोठा करी सेनी नीचे अनुक्रमे १-३-३-२-६-६ मूकबा. ( ८०५) पहेला कोठामा उपर कही गया प्रमाणे एको - सर्ग ३० मो। (२८९) तु मनोवाचौ मनोंगे वाक्तनु त्रयं ॥ ६ ॥ भंगानामिति शेषः, मनो- वाक्तनुभिर्व्यस्तैः स्यात्तृतीयेऽपि तत्रयं । करणेन कारणेन तुर्ये कोठे च भिवयं ॥ ७ ॥ त्रयो द्वितीयकोष्ठोक्ता योगभंगा विशे- पिताः । करणेन कारणेन पडूभंगा इति पंचमे ॥ ८॥ व्यस्ता मनोवचःकायाः पड्विधाः स्युर्विशेषिताः। करणेन कारणेन पठे पड् भंगका इति ॥ ९ ॥ श्रावश्यकाभिप्रायोऽयं प्रज्ञप्त्यादौ तु कीर्तितः। न मूकवो, केमके तेनो मंग एक जथाय छे. मन ने वचन, मन ने काया ने वचन ने काया. एम पे ये वीजा कोठामा मूकवा. बीजामां मन, वचन, काया एम त्रणे व्यस्त (एकला) मूचा चोथा कोठामा करण ने कारवण ए ये भेद मूकवा. वीजा कोठामा भूकेला ये पे योगवाळा प्रण भंगने करण अने करावणवडे विशेपित करता छ मंग थाय. ए पांचमा कोठामा मूकवा. छटा कोठामा पण करण ने करावणवडे थएला छ मंग मूकवा. आम २१ भंग थाय छे. (८०६-९) आनी विशेष समजण माटे श्रानी नीचे २१ मंग लखेला छे. प्रथम ३ योग ने पछी २ करण एम लेतां नीचे प्रमाणे मांगा थाय. प्रथम करण ने पछी योग. १ प्रण योग ने ये करणनो एक १ चे करण ने प्रण योगनो एक ३ ये योग ने पे करणना प्रण ३ ये करण ने पे योगना प्रण ६ ये योग ने एक करणना छ ६ एक करण ने ये योगना छ २ प्रण योग ने एक करणना पे एक करण ने प्रण योगना घे ३ एक योग ने ये करणना प्रण ३ ये करण ने एक योगना प्रण ६ एक योग ने एक करणना छ ६ एक करण ने एक योगना छ २१ मा एकवीश मेद विगतवार नीचे प्रमाणे-पहेली रीते लख्या छे. १ मनवचनकायावहे करुं नहीं-करावु नहीं। ६ मनकायावडे करूं नहीं. २ मनपचनवडे करुं नहीं-करापुं नहीं. ७ वचनकायावडे फळं नहीं. ३ मनकापावडे करुं नहीं-फरावू नहीं. ८ मनवधनवडे करायु नहीं. ४ पचनकापावडे करूं नहीं-कराई नहीं. ९ मनकापावडे फराई नहीं. ५ मनवचनवरेकरं नहीं. १. पचनकापायडे कराई नहीं.

(२९०) গন্ধাবীমায় । त्रिविधं त्रिविधेनेति भेदोऽपि गृहमेधिनां ॥ १०॥ तथाहि-स्वयंभूरमणां- भोधि-मत्स्यमांसाशनादिकं । त्रिविधं त्रिविधेनापि प्रत्याख्यात्येव कोऽपि यत् ॥ ११ ॥ अस्याल्पविषयत्वेन कादाचित्कतयापि च । नैवाब- श्यकनियुक्तौ भंगकोऽयं विवक्षितः ॥१२॥ पोढा पूर्वोक्तषड्भंग्या स्या- देकेकमणुव्रतं । त्रिंशद्भिदोऽथ द्वात्रिंश-ससम्यक्त्वोत्तरवताः ॥ १३ ॥ तथा-त्रिका द्विका एकका ये प्रत्येकं ते त्रयस्त्रयः । स्थाप्यते किल पंक्त्योर्ध्व करणादित्रयांककाः ॥ १४ ॥ एषां नवानामंकाना-मधः पंक्त्या क्रमाल्लिखेत् । मनोवाकायसूचायै त्रिशस्त्रिकद्विकैककान् ॥१५॥ श्राद्यो भंगोऽत्र सावयं न कुर्वे कारयामि न । नानुजानामि मनसा वचसा वपुपापि च ॥१६॥ एवमन्येऽपि भंगका भाव्याः, ३३३, २२२, १११४ ३२१, ३२१, ३२१, प्रज्ञप्त्याद्युदिता मूल-भंगा नव भवंत्यमी । एषा- ११ मनवचनकायावडे करुं नहीं. १७ वचनवडे करूं नहीं. १२ मनवचनकायावडे कराई नहीं. १८ कायावडे करूं नहीं. १३ मनवडे करुं नहीं-करावू नहीं. १९ मनवडे करावू नहीं. १४ वचनवडे करुं नहीं-करावू नहीं. २० वचनवडे करावु नहीं. १५ कायावडे करुं नहीं-करावू नहीं. २१ कायावडे करा, नहीं. १६ मनवडे करुं नहीं. आवश्यकसूत्रनो पा प्रमाणे अभिप्राय छे. प्रज्ञप्ति विगेरेमां तो गृहस्थने माटे त्रिविध त्रिविध एवो भेद पण कह्यो के. (८१०) तथाहि-स्वयंभूरमण समद्रना मत्स्पनुं मांस खावा संबंधी त्रिपिधे त्रिविधे पण कोइ श्रावक प्रत्याख्यान करी शके छ; (८११) परंतु भा अन्प विषयवालं ने कादाचित्क होवाथी आवश्यकनियुक्तिमा मा मंगनी विवक्षा करी नथी. ( ८१२) पूर्वे का प्रमाणे छ मंग एकेक अणुव्रत पाश्री होवाथी पांच अणुव्रतना त्रीश मंग थाय थे, तेमां सम्यक्त्व ने उत्तरगुणरूप में भेद उमेरवाथी ३२ मेद थाय छे. (८१३) तथा एक पंक्तिमा उपर प्रण गडा, प्रण यगडा ने प्रण एकता स्थापन करीए. ए रीतेत्रण करण पाश्री नव अंक थाय, (८१४) ए नव अंफनी नीचे अनुक्रमे मन, पचन, कापाने सूचवनार प्रण गडा, पण पगडा ने प्रण एकडा लखीए. (८१५) एटले पहेलो भंग मन, वचन, कायावडे करूं नहीं, करायं नहीं ने अनुमोदु नहीं एवो थयो. (८१६) मा प्रमाणे वीजा मंगो माटे पण भाषना करवी. ३-३-३१२-२-२।१-१-११४३-२-१३-२-११३-२-११ सर्ग ३० मो। मेकोनपंचाश-द्भवंत्युत्तरभंगकाः ॥ १७ ॥ तथाहि-त्रिभिर्मनो-१-वचः- २ कायै ३-स्त्रयो भेदा भवत्यथ । मनोवाग्भ्यां भवेत्तुर्यो ४ मनोंगाभ्यां च पंचमः ५॥ १८॥ वाकायाभ्यां भवेत् पष्ट ६-स्त्रिभिरेभिश्च सप्तमः७। एते सप्तापि योज्यंते सप्तभिः करणादिभिः ॥ १९ ॥ ते चैवं करणं १ कारणं २ चानु-मति ३ श्चेति भिदा त्रयं । भेदश्चतुर्थः करण-कारणा- भ्यां प्रकीर्तितः ॥ २०॥ करणानुमतिभ्यां च भेदो भवति पंचमः । कारणानुमतिभ्यां च षष्ठस्तैः सप्तमस्त्रिभिः ॥ २१॥ प्रत्येकमेषु भंगेषु पूर्वोक्तसप्तकान्वयात् । उक्ता एकोनपंचाशद्-व्रतोच्चारणभंगकाः ॥२२॥ प्रत्येकं भंगकेष्वेषु कालत्रितययोजनात् । सप्तचत्वारिंशदाढ्यं जायंते भंगकाः शतं ॥२३॥ त्रिकालविषयत्वं च स्यादतीतस्य निंदया । संवरेणा- धुनिकस्य प्रत्याख्यानाद्भविष्यतः ॥ २४ ।। अईयं निंदामि, पडुप्पन्नं संवरेमि, श्रणागयं पच्चरकामि, तथा च- मण १ वयण २ काय ३ मणवय ४-मणतणु ५ वयतणु ६ तिजोगि ७ सगसत्त । कर १ कार २ गुमइ ३ दुतिजुइ तिकालि सीधालभंगसयं ॥२५॥ प्रज्ञप्ति विगैरेमा कहेला त्रण करण, प्रण योगवडे मूळ नव मंगना ४९ उत्तरभंग श्रा रीते थाय छे. (८१७) तथाहि-१ मनवहे, २ वचनवडे, ३ कायावडे, ४ मनवचनवडे, ५ मनकापावडे, ६ वचनकायावडे, ७ मनवचनकायावडे. पा प्रमाणे सात मेद थाय छे. पछी ते दरेकना फरणवडे सात सात मेद करवा ते मा प्रमाणे-१ करण, २ करावण, ३ अनुमति, ४ करण-करावण, ५ करण-अनुमोदन, ६ करावण-अनुमोदन, ७ करण-करावण-मनुमो. दन-मा प्रमाणे प्रथमना सावना सात सात भेद पवाथी कुल ४९ मेद घाय. ( ९१९- २२) मा दरेक मंगो प्रण फाळनी योजना करवाधी १४७ मेद थाय. (८२३) भानुं त्रिकाळ विषयपणुं भतीवनी निंदापी, वर्तमानमा संवरथी मने मविप्पना प्रत्याख्यानपी थाय छे. (८२४) अईयं निंदामि, पटुप्पचं संयरेमि, अणागपं पचरकामि, तथा घमण १ ययण २, काय ३, मषषय ४-मणतणु ५, ययतणु ६, तिजोगि ७ सगसत्त ।। कर १, फार २, एमा ३, युतिमुइ, तिकालि सीमालमंगमयं ॥ २५ ॥ (मानो मायार्थ उपर विस्तारमी भाची गपो हे.)

(२९२) भीकालोकप्रकारा। सम्यग् य एतान् जानाति प्रत्याख्यानस्य भंगकान्। स एव कथितः शास्त्रे प्रत्याख्यानविचक्षणः ॥ २६ ॥ अणुव्रतैः पंचभिश्च गुणिता भंगका श्रमी । पंचत्रिंशाः शताः सप्त तेषु केवलदर्शनैः ॥ २७ ॥ युक्तेषु चोत्तर- गुणा-व्यैस्ते स्युः श्रावका इह । सप्तत्रिंशाः सप्तशता व्रतानां मूलभेदतः ॥२८॥ व्रतानां यादिसंयोगो-दवा भेदा भवंति ये । षड्भंग्यादिवतोच्चार- प्रकाराणां च या भिदः ।। २९ ॥ परस्परं तद्गुणने व्रतानां भूरयो भिदः। भवति ताभिस्तावतः श्रावका इह तद्यथा ॥ ३०॥ अणुव्रतानां पंचानां भंगाः पंचैकयोगजाः । दश च स्युर्दियोगोत्थास्त्रियोगोत्था दशैव च ॥ ३१ ॥ तुर्ययोगोद्भवाः पंच स्यादेकः पंचयोगजः। अथैतद्भगकोत्पत्तौ करणं प्रतिपाद्यते ॥३२॥ क्रमोत्क्रमाभ्यां दे पंक्त्यौ संस्थाप्येते उपर्यधः । विवक्षितम्रतांकाना-मथाध:पंक्तिवतिना ॥ ३३ ॥ उपांत्यांकनोलपंक्ति- गतोयोंको विभज्यते । लब्धेन तस्योपांत्यस्यो-परिस्थोंको निहन्यते भा भगोने जे सम्यक्प्रकारे जाणे के तेने ज शास्त्रमा प्रत्याख्यानमा विचक्षण को छे. (८२६) श्रा १४७ मंगने पांच अणुव्रतवडे गुणवाथी ७३५ भेद थाय थे, तेमा मात्र समकित ने उचरगुणना बे मेद मेळववादी श्रावको व्रतना मूळ भेदथी ७३७ प्रका- रना थाय छे. (८२७-२८) प्रा श्रावकना व्रतोना ये विगेरेना संयोगथी जे मेदो थाय छ, भने पमंग्यादि प्रत उच्चारणना जे प्रकारो थाय छे तेने परस्पर गुणवावडे ए व्रतोना पणा मेदो थाय छे, तेथी ते मेदोवडे अहीं श्रावको तेटला प्रकारना कहेवाय छे. (८२९-३०) तद्यथा -पांच अणुव्रतना एक संयोगी पांच भेद, पे संयोगी दश भेद, त्रिकसंयोगी दश भेद, चतु:- संयोगी पांच भेद भने पंच संयोगी एक भेद-एम ३१ भेद थाय छे. हवे ए भगानी उत्पचिनुं करण कहे छे. ( ८३१-३२ ) विवपित अतोना अंकोनी ने पंक्तिो क्रमउत्क्रमवडे उपर नीचे लखवी. ३३३३५ पछी नीचेनी पंक्तिमा पर्तता उपांत्य अंकवडे ऊर्च पंक्तिना अंत्य अंकने मांगवी. पछी तेनाथी लन्धमंकनो ते उपांत्येनी उपरना अंकनी साथे गुणाकार फरवो. ए रीते जे भावे ते द्विसंयोगी मंग १ लानी भगाउनो.

सर्ग ३० मो। (२९३) ॥ ३४ ॥ यज्जातं ते द्विसंयोगा भंगकास्ते च पूर्ववत् । उपांत्यपाश्चात्यां- केन भज्यंते लभ्यते च यत् ॥ ३५॥ तेन तस्योपरितनो गुण्यतेंको भवेच्च यत् । ते त्रिसंयोगजा भंगा: स्याच्छेपेष्वप्ययं विधिः ॥ ३६ ।। भंगेपु नैकयोगेषु करणस्य प्रयोजनं । विवक्षितव्रतमिता भंगका .ह्येक- योगजाः॥ ३७॥ अत्रोदाहरणं- क्रमोत्क्रमाभ्यां पंचांता लिख्यतेका द्विकेन च । भक्तेऽध:पंक्त्युपा- त्येनो-परिस्थे पंचकेंतिमे ॥ ३८॥ लब्धौ द्वौ सार्द्धको ताभ्या-मुपांत्य- स्योपरि स्थितः। चतुष्को गुण्यते जाता दश तेऽत्र द्वियोगजाः॥ ३९॥ त्रिकोऽथोपांत्यपाश्चात्यो भज्यंते तेन ते दश । लब्धास्त्रयः सत्रिभागाः सांशेस्तैश्च निहन्यते ॥४०॥ त्रिकस्तस्योपरिगतो दश स्युस्ते त्रियोगजाः। तत्पाश्चात्यचतुष्केण तेषु भक्तेषु लभ्यते ॥४१॥ सार्द्ध द्वयं तेन तस्यो- परिस्थो गुण्यते द्विकः । जाताः पंच चतुर्योगा भज्यंते पंचकेन ते ॥४२॥ श्राद्यनाध:पंक्तिगेन प्राप्त एकोऽथ गुण्यते । अनेनैकस्तदूर्ध्वस्थ इत्येकः पंचयोगजः ॥ ४३ ॥ स्थापना- जाणवा. ते मांगा उपर कद्या प्रमाणे १. आवे छे. पछी उपांत्यनी पाछळना अपना अंकपडे उपर आवेला दशना अंकने भांगवो. पछी तेना लष अंकने तेनी उपरना अणना अंकवडे गुणवा जे आवे ते त्रिक संयोगी भंग समजवा. वीजाओने विपे श्राज विधि जाणवो. ( ८३३-३६ ) एकना संयोगवाळाने माटे करणनुं प्रयोजन नथी, केमके तेना विवक्षितव्रत प्रमाण (पांच) एक संयोगी मंग थाय. (८३७) अहीं उदाह- रण आपे थे- क्रमोत्क्रमवडे पांच अंको उपर नीचे लखवा. पछी नीचेनी पंक्तिना उपांत्य पेना अंकवडे उपरनी पंक्तिना बेला पांचना अंगने मांगवो एटले अढी श्रावशे. तेना वडे उपांत्यनी उपरना ४ वडे गुणतां दश द्विसंयोगी भंग पावशे. (८३८-३९) पछी उपांत्यनी पाछळना प्रणना अंकवडे दशने मांगवा, एटले ३३ श्रावशे. तेने तेनी उप- रना त्रणवडे गुण वा दश पावशे, ते त्रिकसंयोगी जाणवा. ते दशने पाश्चात्य धतुम्कवडे मांगता अही भावशे तेने तेनी उपरना घेवडे गुणतां पांच मावशे ते चतुर्मयोगी समजवा. ते पांचने नीचेनी पंक्तिना पहेला पांचना किवडे मांगता एक मावे तेने ऊर्च पंक्तिना एकना अंकवडे गुणा एक ज भावे ते पंचसंयोगी समजवो. स्थापना ३३१३, मा प्रमाणे भावे -१६५ (८४०-४३) (२९४) श्रीकानलोकप्रकारा। यद्वा-जिज्ञासिताः स्युः संयोगा यावतां तावतोंककान् । एकायेकोत्तरा. नूर्व-दमश्रेण्या क्रमान्न्यसेत् ॥ ४४ ॥ यथास्थमंत्यं मुक्त्वा ता-नुपर्यु- परि निक्षिपेत् । एवमेकादियोगोत्थ-भंगसंख्यामितिर्भवेत् ॥ ४५ ॥ तत्र च-सर्वोपरितनांकेन लभ्यंत एकयोगजाः । शेषैरधोऽधःस्थैरकै-लभ्यते शादियोगजाः ॥४६॥ अत्रेकको द्विके क्षिप्तो द्विकस्थाने त्रिकोऽभवत् । त्रिकः स चोपरितन-त्रिके पट्कं भवेत्तदा ॥ १७ ॥ पट्केऽस्मिश्चोप- रितने चतुष्के योजिते दश । पुनरेकस्त्रिके क्षिप्त-श्चतुष्कः स्यात्स चोर्ध्वगे ॥ ४८ ॥ षट्के क्षिप्तो दशाभूवन् पुनरेकश्चतुष्कके ।क्षिप्तः पंचा- भवन्नेक-स्ततोऽधः स्यात्तथा स्थितः ॥ ४९ ॥ अथवा लभ्यते द्वयादिसंयोगा अंकचारणया मिथः। चार्यते पूर्व- पूर्वोको-ऽनुक्रमादुत्तरोत्तरैः ॥ ५० ॥ सा चैवं-१-२ । १-३ । १-४ । १.५ एवं चत्वार एकचारणया. २-३१२-४।२.५। एवं त्रयो द्वितीयचारणया. ३.४।३-५।एवं द्वौ तृतीयचारणया. ४-५ एकश्चतुर्थचारणया. एवं दश । अथवा जिज्ञासित (इच्छित ) एवा संयोगोना अंको एक एक वधता उपरनी श्रेणिमा लखवा. (८४४ ) पछी अंत्यना अंकने मूकीने तेने उपर उपर नाखवा एटले एकादि संयोगथी थता मंगनी संख्या आवशे. (८४५) तेमा सर्व उपरितन अंकवडे नीचेना अंकने गुणतां एक संयोगीनी संख्या भावशे. पछी नीचे नीचना अंकोवडे द्वयादि संयोगीनी संख्या पावशे. (८४६ ) जेम एकनो अंक घेना भंकमां नाख्यो एटले द्विकने स्थाने प्रण थया. तेने उपरना त्रण साथे भेळवत छ धपा. (८४७) तेमा उपरितन चतुष्क मेळवतां दश (द्विसंयोगी) थया. फरीने एक ने त्रण साथे मेळ- वता धया चार. तेने उपरना छमा नाखतां दश (त्रिकसंयोगी) थाय. फरी एकने चारमा नांखतां पांच (चतुःसंयोगी) थाय. पांचनी नीचे उपात्य पांच नावडे भांगी पांचनी नीचे एक के तेनी साथे गुणतां एक ज रहे एटले पंचसंयोगी एक मंग थयो. (८४८-४९) अथवा अंकनी चारणाथी द्वयादिसंयोगी संख्या भावे, तेमा पूर्वपूर्वनो अंक उचर उचरनी संगाते चारववो. ते या प्रमाणे-१-२, १-३, १-४, १-५ मा चार द्विसंयोगी मंग एकडासाथे चारणा करवा पाये. २-३, २-४, २-५ भा प्रण द्विसंयोगी भंग पगडासाथे पारणा करता आये. ३-४, ३-५, आ पे द्विसं.

सर्ग (२९५) द्विकसंयोगजा लब्धाः, एवं त्रिकसंयोगजा अपि दश यथा-१.२-३॥ १-२-४। १-२-५ । १-३-४ । १-३-५ । १-४-५। एवमेकचारणया पट्. २.३-४। २-३-५। २-४-५। इति द्वितीयचारणया त्रयः।३-४-५ एवं तृतीयचारणया त्वेकः, इति. व्रतानां च द्वादशाना-मेवं विज्ञैर्यथारुचि । भंगानां भावना कार्या द्वयादिसंयोगजन्मनां ॥ ५१॥ योगी मंग त्रगडासाथे चारणा करता भावे. ४-५ श्रा एक द्विसंयोगी भंग चोगडासाथे चारणा करवां प्रावे. एम कुल दश द्विसंयोगी थाय. एज प्रमाणे त्रिकसंयोगी पण दश थाय ते था प्रमाणे-१-२-३, १-२-४, १-२-५, १-३-४, १-३-५, १-४-५ एम छ त्रिकसंयोगीमंग एकडासाथे चारणा करतां श्रावे. २-३-४, २-३-५, २-४-५ एम प्रण त्रिकसंयोगीमंग बगडा साथे चारणा करतां आवे. ३-४-५ ा एक त्रिकसं- योगीमंग अगडासाथे चारणा करतां भावे, एम कुल दश त्रिकसंयोगी भंग थाय. (पा अंक व्रतरूपे समजवा) या प्रमाणे पार व्रतोना मंगोनी विज्ञ पुरुपे यथारुचि द्वयादि- संयोगथी थता मंगनी भावना करवी. (८५१) पांच व्रतो उच्चरनारमा भावी रीते ३१ मंग पडे, ते पधारे स्पष्टता थवा माटे बताच्या छे. १ कोइ एक पहेलुं व्रत ज उच्चरे. १७ कोइ पहेलु, चीजु, चोयुं व्रत उच्चरे. २ कोई एक चीजें व्रत ज उच्चरे. १८ कोइ पहेलुं, वीजुं, पांचहुं व्रत उच्चरे. ३ कोइ एक चीजें व्रत ज उच्चरे. १९ कोइ पहेलं, त्रीजुं, चोधुं व्रत उच्चरे. ४ कोइ एक चोथु व्रत ज उच्चरे. २० कोइ पहेलं, त्रीजु, पांच, व्रत उच्चरे. ५ कोइ एक पांच व्रत ज उचरे. २१ कोई पहेल, चोy, पांचU व्रत उच्चरे. २२ कोइ वीजु, त्रीजुं, चोधु व्रत उच्चरे. ६ कोई पहेलुं ने वीजें व्रत उच्चरे. २३ कोई चीजें, श्रीजु, पांच प्रत उच्चरे. ७ कोई पहेलुं ने श्रीजु व्रत उच्चरे. २४ कोई चीजें, चोथु, पांच, ब्रत उच्चरे. ८ कोई पहेलुं ने चो, व्रत उच्चरे. २५ कोई त्रीजुं, चोथु, पांच व्रत उच्चरे. ९ कोइ पहेलुं ने पांचमुं व्रत उचरे. १० कोइ पीजु ने श्रीजुं व्रत उचरे. २६ कोई पहेलुं, चीजें, बीजं, चो' व्रत उचरे. ११ कोह पीजुं ने चोथु व्रत उचरे. २७ कोह पहेलुं, वीजें, श्रीजु, पांच मत उच्चरे, १२ कोई पीजुं ने पांच ग्रत उच्चरे. २८ कोइ पहेलुं, पीजु, चोथु, पांच€ व्रत उच्चरे. १३ कोई त्रीजु ने चोएं व्रत उच्चरे. २९ कोई पहेलं,त्रीजु, चो, पांचसु व्रत उधरे. १४ कोइ त्रीजु ने पांचसं व्रत उच्चरे. ३० कोइ वीजु, श्रीजु, चोथु, पांच व्रत उच्चरे. १५ कोइ चोधु ने पांचमुं प्रत उच्चरे. ३१ कोइ पहेलुं, बीजु, बाजु, चो), ने १६ कोई पहेल, बीजं, त्रीजु मत उपरे. पांचा प्रव उचरे.

.. (२९६) श्रीकालसोकप्रकारा। व्रतोच्चारप्रकाराणा-मप्येवं गुणने मिथः । भवंति भूरयो भेदाः पड्भंग्यां तानथ ब्रुवे ॥५२॥ एकवते षड्भंगा ये द्विविधत्रिविधादिकाः। ते पत्रिंशद्भवत्येवं संयोगे व्रतयोयोः ॥ ५३ ॥ श्रादावाद्यव्रतस्याद्यो भंगकोऽवस्थितोऽश्नुते । द्वितीयत्रतसत्कान् पट् भंगकाननवस्थितान् ॥ ५४॥ एवं भंगो द्वितीयोऽपि पट् प्रत्येकं पडप्यमी । लभंते इति पट्त्रिंश-जाता उच्चारभंगकाः ॥ ५५ ॥ व्रतानां त्रिकयोगे तु द्विशती षोडशोत्तरा । शतानि द्वादश चतु-योगे परमवतिस्तथा ॥५६॥ सह- 'साः सप्त सप्तैव शताः पट्सप्ततिस्तथा। योगे व्रतानां पंचानां भवत्युच्चार- भंगकाः॥ ५७ ॥ उच्चारभंगका एते व्रतानां प्राक् प्रदर्शितैः । हता एक- झ्यादियोगैः स्युः सर्वाग्रेण भंगकाः ॥ ५८॥ यथा बतानां पंचाना-मेक- योगैर्हि पंचभिः । हता उच्चारभंगाः, षट् स्युस्त्रिंशदेकयोगजाः ॥ ५९॥ दशभिकियोगे षट्-त्रिंशदुच्चारभंगकाः । हताः स्युस्त्रिशती पष्ट्या-भ्य- धिका सर्वसंख्यया ॥६० ॥ द्विशती पोडशाढ्या च त्रियोगैर्दशभिर्हताः। या प्रमाणे एकसंयोगी ५, द्विसंयोगी १०, त्रिसंयोगी १०, चतु:संयोगी ५ ने पंचसंयोगी १ कुल ३१ भंगनुं विवरण समजवू. उपर प्रमाणे प्रतोधारना प्रकारोने पण अंदरअंदर गुणवाथी घणा मेदो थाय छे. तेमाथी प_गी संबंधी मेदो कहे छे. (८५२) एक व्रतना उच्चारमा जे छ मंग द्विविध- विविधादि कया छे. तेनाचे व्रतने संयोगे ३६ मंग थाय (८५३) ते भा प्रमाणे- पहेला व्रतनो पहेलो भंग ते अवस्थित मंग, तेनी साथे वीजा व्रतना अनवस्थित छए मंग थाय.(८५४) एम बीजो मंग पण भवस्थित तेनी साथे पण वीजा प्रवना अनव- स्थित छए मंग थाय. या प्रमाणे पहेला व्रतना छए मंग साथे वीजा प्रवना छए मंग थवा होवायी उधारना मंग ३६ थाय ( ८५५) प्रण प्रतना संयोगे एकेक त्रिकसंयोगीना मंग २१६-२१६ थाय छे. चतुःसंयोगी एकेकना १२९६-१२९६ थाय (८५६) पांच संयोगी एक मांगाना उचर भंग ७७७६ घाय. (८५७ ) हवे भा प्रवीना पूर्वप्रदर्शित एक स्पादिक संयोगवटे उचारमंगो सर्व मळीने भा प्रमाणे थाय (८५८) पांच मोना एक संयोगी पांचने छ उपचारमंगवहे गुणवाची ३० थाय-(८५९) दिक- संयोगी दश प्रकारने उपार मंग ३६ वडे गुणता ३६० याय (८६० ) त्रिकसंयोगी दश प्रकारने उचार भंग २१६ वडे गुणता २१६० याय (८६१) चतुासंयोगी पाचप्रकारने सर्ग ३० मो । (२९७) पष्ट्याढ्यानि त्रियोगानां स्युः शतान्येकविंशतिः ॥ ६१ ॥ चतुर्योगैः पंच. भिश्च हता उच्चारभंगकाः । शता द्वादश पूर्वोक्ताः पणवत्यधिकाश्च ये ।। ६२ ॥ स्युः शतानि चतुःपष्टि- रशीत्याभ्यधिकानि ते । चतुर्योगज- भंगानां सर्वसंख्या भवेदियं ॥ ६३ ॥ सहस्राः सप्त सप्तैव पट्सप्तत्यधिकाः शताः । एकेन पंचयोगेन हतास्तावंत एव ते ॥ ६४ ॥ इयं च स्थापना प्राज्ञै-स्ताहगाकारसंभवात् । शास्त्रेषु देवकुलिका-कारेति व्यपदिश्यते । ॥६५॥ पंचस्वणुव्रतेप्वेवं निर्दिष्टानां यथाक्रमं । संयोगजानां भंगानां भवेत् संकलना त्वियं ॥ ६६ ॥ सहस्राः पोडशाष्टौ च शताः पडधिका अथ । उत्तरवतभृत्सम्यग्दृग्योगेऽष्टाधिका अपि १६८०८ ॥ ६७ ॥ द्वादशानां व्रतानां च भंगसंकलना भवेत् । विविच्यमाना पड्भंग्या कोटीशतात्रयोदश ॥ ६८ ॥ कोट्यश्चतुरशीतिश्च लक्षाणि द्वादशोपरि । सप्ताशीतिः सहस्राणि द्वाभ्यां युक्तं शतद्वयं ॥ ६९ ॥ अथ शतोपरितन यद्वयं तदुत्तरगुणधारिकेवलसम्यक्त्वधारिरूपं भेदद्वयं ज्ञेयं. अत्रोत्तरगु. णाश्च विविधतपोऽभिग्रहरूपा इति ध्येयं. अत्रायमाम्नायः- पड्भंगा व्रत एकस्मिन् ये निर्दिष्टा जिनैः श्रुते । द्वितीयव्रतयोगे ते पूर्वे कह्या प्रमाणे उच्चारगंग १२९६ वडे गुणतां चतुःसंयोगीनी सर्व संख्या ६४८० थाय (८६२-८६३) पांच संयोगी एक ज प्रकारने ७७७६ उच्चारमेदवडे गुणवां ७७७६ थाय. (८६४) आ मंगोनी स्थापना करता तेनो देवकुलिका जेवो आकार थतो होवाथी तेने देवकुलिका एम कहे छे. (८६५) उपर बतान्या प्रमाणे पांच श्रणुव्रतना संयोगीमंगना उत्तरमेदनी एकंदर संकलना करतां १६८०६ थाय, तेमा उत्तर- प्रतधारीनो १ भने मात्र समफितदृष्टिनो १ मेळवता कुल १६८०८ थाय (८६६-६७) पार व्रतोना मंगोनी पड्भंगीवडे बाँचण करतां एकंदर संकलना तेरशें चोराशी मोड, पार लाख, सत्याशी हजार, यसो ने ये १३८४१२८७२०२ थाय थे (८६८-६९) श्राम चे उपर छे ते केवळ उत्तरगुणधारी ने केवळ समकितधारी संबंधी समजवा. वहीं उचरगुण ते विविध वप ने अभिप्रहरूप समजपा- उपर जणावेली संख्या लावया माटे था प्रमाणे थाम्नाय समजवो. एक व्रतमा जे छ भंग जिनेश्वरे श्रुतमा कह्या 2 तेने वीजा व्रतना योगे माने गु (२९८) श्रीकासकोकप्रकारा। हन्यते सप्तभिः किल ॥ ७० ॥ षट् क्षिप्यतेऽत्र चैवं स्यु-भंगका व्रतयो- द्वयोः । अष्टचत्वारिंशदेव जातास्ते विधिनामुना ॥ ७१॥ अत्र चैवं प्रकारांतरेण वासना-द्वयोर्वतयोरूर्वपंक्तिस्थापना. अत्र च " यथा स्वमंत्यं मुक्त्वा तानुपर्युपरि निक्षिपेत्, " इति पूर्वोतवचनात् अंकक्षेपसंभवो नास्तीति तथैव स्थिता, तथा च एकयोगे द्वौ भंगौ, द्विकयोगश्चैका, तत्र द्वयोरेकयोगयोः प्रत्येक पटू भंगा इति द्वादश द्वि- कयोगस्य पत्रिंशदिति अष्टचत्वारिंशदिति. विवक्षितव्रतांकेभ्य एकन्यू- नांकसंख्यया । एवं मुहुः कृते शेष-भंगसंकलनाप्यते ॥ ७२ ॥ व्रतेषु च द्वादशसु चरानेकादशे तकि । कृते पूर्वोदिता सर्व-भंगसंकलना स्फुटा ॥ ७३ ॥ त्रिकाल्या गुणने त्वेषां भंगकानां भवत्यमी । कोटीशतान्येक- चत्वारिंशञ्चोपरि कोटयः ॥ ७९ ॥ द्विपंचाशत्तथालक्षा-ण्यष्टात्रिंशदथो- परि । एकपष्टिः सहस्राणि पभिर्युक्ता च षट्शती ॥७॥ एवं च वक्ष्य णवा ने तेमा छ नाखवा. एम करवाथी जे अंक प्रावे ते वे व्रतना भंग समजवा. मा प्रमाणे करवाथी ६४७-४२+६-४८ मंग थया (८७०-७१) ग्रही प्रकारांवर पवावे छे-ए पन्ने ववनी ऊर्ध्व पंक्तिए स्थापना करवी.मही-"यथा योग्य पोतानो अंत्य अंक मूकीने बाकीना उपर उपर नांखया." या प्रमाणे करवाथी अंक- क्षेपनो संभव रहेतो नथी, एटले तेज प्रमाणे अंक रहे छे तथा एक योगे वे मंग, विक- योगे एक. ते एक योगना ये भंग थया छे ते दरेकना छ छ भंग थवाथी १२ ने द्विक- योगना ३६ एटले वे मळीने ४८. विवक्षित व्रतना अंकमाथी एक न्यून अंक संख्यापडे गुणपा. एम वारंवार करवाची शेपमंगनी संकलना आवशे. (८७२) ए प्रमाणे पार बतमा अग्यार पार चरपणुं करवाथी पूर्वे कहेल सर्वे मंगनी संकलना स्फुट थशे. (८७३) श्रावक व्रतभंग प्रकरणनी टीकामा बतावेल छ के-प्रथम प्रतना छ मंगने साते गुणी छ उमेरवा एटले ये व्रतना ४८ श्राध्या. तेने साते गुणी छ उमेरता ३४२ मंग प्रण प्रतना भाव्या. मा प्रमाणे प्रत्यार वखत साते गुणया ने दरेक वखत छ उमेरवा एटले छेवटे पार बना १३८४१२८७२०० भंगनो मांक भाषशे. (गुणाकार करी जोता या संख्या परापर आवे छे.) ते आ नीचे वतावेल के मा उचरगुण ने मात्र समकिवना के प्रकार उमेश्या. पछी मा संख्पाने विकाळ पायी प्रणवडे गुणता ४१५२ कोर, ३८ लाख, ६१ हजार, ६०६ पावशे. (८७४-७५) मा प्रमाणे, मागळ कहेषाशे एवी २१ , सर्ग १० मो। (२९९) माणेकविंशतिभंगीनवभंग्यकोनपंचाशद्भगीभंगकानामपि त्रिकाल्या गुण- नं न्याय्यमेव प्रतीमः, सप्तचत्वारिंशशतभंग्यामेव त्रिकाल्याः प्रविष्ट- त्वादिति ज्ञेयं. एते व्रतानां भंगास्तु पड्भंग्यैव प्रदर्शिताः । एकविंशत्यादिभिस्तु भंगैः स्युरतिभूरयः ॥ ७६ ॥ तथाहि-एकविंशतिरेकस्मिन् ये भंगास्तान् व्रतद्वये । द्वाविंशतिगुणान् कृत्वा क्षिप्यतेऽकविंशतिः ॥ ७७॥ वाराने- कादशैवं च कृते द्रुतमवाप्यते । सर्वसंख्या भंगकानां व्रतेषु द्वादशस्वपि ॥७८॥ सा चेयं-१२८५५००२६३१०४९२१५ अंकाः सप्तदश. एकवतस्य ये भंगा नव ते दशभिर्हताः। नवान्विताश्च सर्वाग्रं वार एकादशे भवेत् ॥ ७९ ॥ तच्चैद-९९९९९९९९९९९९ अंकाः द्वादश. एकवतस्याथैकोन-पंचाशद्भगका हिये। ते पंचाशद्गुणा एकोनपं- चाशद्युता मुहुः ।। ८०॥ एकादशे वारे सर्वाग्रं चै-२४४१४०६२४९९९९- ९९९९९९९९ अंका एकविंशतिः, सप्तचत्वारिंशदाढ्यं शतमेकवतस्य ये। भंगकास्तेऽष्टचत्वारिं-शदा- भंगी, ९ मंगी अने ४९ भंगी संबंधी मंगनी संख्याने पण त्रण काळवडे गुणवा ते न्याय्य के. एम अमे जाणीए छीए, ४९ भगना १४७ मंग ए प्रमाणे प्रणवडे गुणवाथी जावे . श्रा व्रतोना मंगो पड्मंगीचडे ज उपर बताव्या छे. एकवीश विगैरे मंगथी पणा मंगो थाय छे. (८७६ ) ते पा प्रमाणे-एक व्रत संबंधी २१ मंग, तेने ये प्रतना भंग करवा माटे यावीशे गुणीने २१ उमेरवा.(८७७) श्रा प्रमाणे भग्यार वखत करवाथी वरत ज बार प्रतना मंगनी संख्या १२८५५००२६३१०४९२१५ (अंक सत्तर) श्रावशे.(८७८) हवे एक प्रतना जे नव भंग करेला छ सेने दशवडे गुणीने नव उमेरवा. ए प्रमाणे ११ वार करवाथी बार बना ९९९९९९९९९९९९ (अंक वार ) भंग श्रावशे (८७९) एक व्रतना ४९ भंग कर्या के तेने पचासवडे गुणीने तेमा ४९ उमेरवा. एम अग्यार वखत करवाथी बार व्रतना २४४१४०६२४९९९९९९९९९९९९ (अंक एकवीश) मंग भावशे. (८८०) एक बनना १४७ मंग पूर्वे कर्या छ तेने १४८ वहे गुणीने तेमा १४७ उमेरवा. मा (३००) श्रीकाबलोकप्रकाश । व्यशतताडिताः ॥ ८१ ॥ सप्तचत्वारिंशदाढ्य-शतोपेताः कृता मुहुः । भवं- प्रमाणे अग्यार वार करवाथी ११०४४३६०७७१९६११५३३३५६९५७६९५ (अंक स- चावीश ) बार व्रतना मंगो पावशे (८८१-८२) श्रा पड्भंगी विगैरे स्थानोमा अनुक्रमे श्रावती बारे राशी उपर नीचे स्थापन करीए तो अर्ध देवकुलिकाना आकार जेवी भूमिने रोके, तेथी भा पांचे खंड देवकृलिका कडेवाय छ. तेमा प्रथम पद्भगीवाळी देवकुलिकानी स्थापना नीचे प्रमाणे- (अंक ११) २१ भंगनी खंड देवकुलिका नीचे प्रमाणे- १-२१ (अंक १७) २-४८ २-४८३ ३--१०६४७ ४-२४०० ४-२३४२५५ ५-१६८०६ ५-५१५३६३१ ६-११७६४८ ६-११३३७९९०३ ७-८२३५४२ ७-२४९४३५७८८७ ८-५७६४८०० ८-५४८७५८७३५३५ ९-४०३५३६०६ ९-१२०७२६९२१७७९१ १०-२८२४७५२४८ १०-२६५५९९२२७९१४२३ ११-१९७७३२६७४२ ११-५८४३१८३०१४११३२७ १२-१३८४१२८७२०२ १२-१२८५५००२६३१०४९२१५ नव मंगनी देवकुलिका. ४९ मंगनी देवकुलिका. (अंक १२) १-४९ (अंक २१) २-९९ २-२४९९ ३-९९९ ३-१२४९९९ ४-९९९९ ४-६२४९९९९ ५-९९९९९ ५-३१२४९९९९९ ६-९९९९९९ ६-१५६२४९९९९९९ ७-९९९९९९९ ७-७८१२४९९९९९९९ .९९९९९९९९ -३९०६२४९९९९९९९९ -९९९९९९९९९ ९-१९५३१२४९९९९९९९९९ १०-९९९९९९९९९९ १०-९७६५६२४९९९९९९९९९९ २१-९९९९९९९९९९९ ११-४८८२८१२१९९९९९९९९९९९ १२-९९ १९९९९९९९ १२-२४४१४०६२४९९९९९९९९९९९९ सर्ग ३० मो। (३०१) त्येकादशे वारे सर्वेऽपि व्रतभंगकाः ॥ ८॥ ते चैवं-११०४४३६०७७१९. ६११५३३३५६९५७६९५ अंकाः सप्तविंशतिः. एतेषु षड्भंग्यादिपु स्थानेषु यथाक्रममागता द्वादशापि राशय उप- यधोभावेन व्यवस्थाप्यमाना श्रद्धदेवकुलिकाकारां भूमिमास्तृणंतीति. एताः पंचापि खंडदेवकुलिका इति व्यपदिश्यंत इति ज्ञेयं. तत्र षड्भंग्या खंडदेवकुलिकास्थापना. श्रावकपदनिरुक्तं चैवं-अवाप्तदृष्ट्यादिविशुद्धिसंपत्-परं समाचारम- नुप्रभातं । शृणोति यः साधुजनादतंद्र-स्तं श्रावकं प्राहुरमी जिनेंद्राः ॥ ८३ ॥ श्रद्धालुतां श्राति पदार्थचिंतना-द्धनानि पात्रेषु वपत्यनारतं । किरत्यपुण्यानि सुसाधुसेवना-दतोऽपि तं श्रावकमाहुरुत्तमाः ॥ ८४ ॥ श्राति पचति तत्त्वार्थश्रद्धानं निष्टां नयतीति, श्रा पाके इत्यस्य रूपं, इति स्थानांगवृत्तौ. एवं च विविधैर्भगैः स्वीकृतव्रतपालकाः । श्रावकाः श्राविकाश्चैषा- महतां स्यात्परिच्छदः ॥ ८५॥ साधुष्वथो गणधर-पदयोग्या भवंति ये । उत्पत्तिनाशधौव्यार्थी त्रिपदी शिक्षयंति तान् ॥८६॥ अधीत्य त्रिपदी तेऽपि मुहूर्ताद्वीजवुद्धयः । श्रावक पदनो अर्थ या प्रमाणे-प्राप्त करी चे सम्यग्दृष्टि विगेरे विशुद्धरूप संपत्ति जेणे एवो, दररोज प्रमाते सामाचारीने साधुजन पासेधी सामळनारो भने तंद्रा विनानो जे होय तेने जिनेद्रो श्रावक कहे छे. (८८३) पदार्थोना चितवनवडे श्रद्धालुताने 'श्राति'- धारण करे छ, पोतानुं धन पात्रने विषे निरंतर 'वपंति-वावे छे-वावरे के अने सुसाधुना सेवनथी अपुण्य जे पाप तेने 'किरंति'-विसेरी नाखे छे, ते कारणथी पण उत्तम जनो तेने आचक कहे थे (८८४) श्राति एटले पचति. तचार्थ श्रद्धान प्रत्ये निष्ठां नयति-निष्ठा पमाडे थे. ' था पाके ' ए घातुन रूप एम स्थानांगतनी धृत्तिा कहे . मा प्रमाणे विविध प्रकारना मंगोचडे ग्रहण करेला अतोने जे पाळे छे, तेवा श्रावक भने श्राविकामो अरिहंतनी पर्षदा होय छे. (८८५) हवे साधुप्रोमा गणधरपदने योग्य जे होय तेमने उत्पत्ति, नाश अने धौम्य अर्थ- वाळी त्रिपदी भगवंत शिसवे छे-संमळावे के. (८८६) ते त्रिपदीनो अभ्यास करीने भीकानलोकप्रकारा ।' रचयंति द्वादशांगी विचित्ररचनांचितां ॥ ८७॥ ततः सौगंधिकरत्न- चूर्णस्थालं करे धृतं । शक्रः पुरो ढोकयति पदस्थापनहेतवे ॥ ८८ ॥ तिष्ठति चार्भावनताः पदयोग्याः पुरोऽहता । गंधवासांस्तच्छिरस्सु क्षिपंते मुष्टिभिर्जिनाः ॥ ८९ ॥ ददते सूरिमंत्रं च तेभ्यस्तीर्थप्रवर्तकाः। द्रव्यक्षेत्रकालभाव-स्तीर्थानुज्ञां च कुर्वते ॥ ९० ॥ कुर्वति सर्वे शक्राद्या देवाः पदमहोत्सवं । वयैस्तूर्यत्रिकैहर्ष-प्रकर्षोल्लसदाशयाः ॥ ९१ ।। सूत्रं गणधरा एव अनन्त्येते महाधियः । दिशंति केवलानेव प्रायोs. र्थीस्तीर्थपाः पुनः ।। ९२ ॥ यथोच्चैः सहकारादि-तरुमारूढवान्नरः । स्वज- नानामधास्थाना-मुपकाराय शालिनां ॥ ९३ ॥ फलानां कुरुते वृष्टिं द्वित्राः केचन तेषु च । पतंति तानि गृहंति पटेन प्रभविष्णवः ॥ ९४ ॥ श्रथ ते तान्युपादाय संस्कृत्य च यथाविधि। उपयोज्य प्रीणयंति स्वजना- नात्मनोऽपि च ॥ ९५ ॥ तथा तीर्थकरा ज्ञान-कल्पद्रुमशिरःस्थिताः । भव्यानामुपकाराय वर्षत्यर्थाननुत्तरान् ॥९६॥ गृह्णति तान् गणधरा वित- तेमो पण चीजघुद्धिवाळा होवाथी सहूर्त (वे घडी) मां द्वादशांगी विचित्र रचनायुक्त रचे थे. (८८७) त्यारपछी गणधरपदनी स्थापना माटे इंद्र सौगंधिक पदार्थोथी मरेलो रत्ननो थाळ हाथमा लइने प्रमुनी पासे धरे छे. (८८८) ते वखते गणधरपदने योग्य मुनिओ अरिहंतनी सामे अर्धश्रवनतस्थितिए श्रेणिबंध उभा रहे छे. तेमना मस्तक उपर जिनेश्वर भरेली मुष्टिवडे सुगंधी वासक्षेप नाखे छे. (८८९ ) तेमने सरिमंत्र मापे छ भने वीर्यना प्रवर्तक तीर्थकर द्रव्य, क्षेत्र, काळ, भाववडे तेमने तीर्थनी भनुशा आपे छे. (८९०) ते वखते इंद्रादि सर्व देवो ते पदनो महोत्सव श्रेष्ठ एवा प्रणे प्रकारना वामित्रो वगाडता अत्यंत उल्लसायमान प्राशयवाळा थइने करे छे. (८९१) सूत्रो महाबुद्धिवाळा गणघरोज गुंथे छ भने तीर्थकरो प्राये केवळ भर्थनो ज उपदेश फरे छे. (अर्थ कहे थे.) (८९२) जेम कोइ सहकारादि पृच पर भारुढ थएल मनुष्य नीचे रहेला स्वजनोना उपकार माटे सुंदर (पाका ) फळोनी पृष्टि करे छे-तेमाथी काइक पेत्रण स्वजनो ते पडतां फळोने वस्रवडे ग्रहण करवा शक्तिमान् थाय छे. (८९३-९४) पछी ते फळ मेळवनार ते फळ लइने, यथाविधि संस्कार करीने पोताना स्वजनीने एकठा करीने, तेमने खावा पापी प्रेम उत्पन्न करे के पोते पण खाय छे. (८९५) ते ज प्रमाणे ज्ञानरूप कन्पवृष उपर स्थित थयेला तीर्थकरो भव्यजनोना उपकारने माटे मनुत्तर एवा भने बरसाये थे, (८९६) ने गणधरो पुद्धिरूप पर विस्तारीने तेमा ग्रहण करे सर्ग ३० मो। (३०३) त्य धिषणापटं । प्रात्मानं चितेस्तैश्चा-नुगृहत्यपरानपि ॥ ९७ ॥ यथा फलानि व्यस्तानि न सर्वानुपकुर्वते । कृतार्था न तथैवार्थाः स्युः सूत्ररचना विना ॥ ९८ ॥ मुक्ताफलानि व्यस्तानि शतानि कुसुमानि वा । नासूत्राण्युपयुज्यंते तथा अपि देहिनां ॥ ९९ ॥ याक्स्वरूपाः सार्वेद्राः प्राच्यां सिंहासनस्थिताः । तन्वते देशनां दीप्यमाना लोकोत्तरश्रिया ॥ ९०० ॥ तथैव शेपदिक्षवह-प्रतिमाः सुर- निर्मिताः । विदध्युर्देशनां मूल-स्वरूपादविशेषिताः ॥ १॥ जनः कोऽपि न जानाति स्वरूपेषु चतुर्विति । मूलस्वरूपं कतम-कतमद्वात्र कृत्रिमं ॥ २ ॥ तथाहुः-जे ते देवहिं कया तिदिसिं पडिरूवगा जिणवरस्स । तेसि पि तप्पभावा तयाणुरूवं हवइ रूवं ॥३॥ प्रतिरूपेषु यत्तेषु नाकि- भिर्विहितेष्वपि । रूपं स्याद्भगवत्तुल्यं तन्महिम्नैव तध्ध्रुवं ॥४॥ अन्यथा तु सुराः सर्वे यदि संभूय कुर्वते । अंगुष्ठप्रमितं रूपं सर्वशक्तिप्रयत्नतः। ॥५॥ तज्जगज्जेत्ररूपाह-पादांगुष्ठस्य सन्निधौ । निर्वाणांगारविच्छायं छे. पछी तेने ग्रन्थ (द्वादशांगी) रूप रचीने पोवाने तेम ज परने तेनावडे उपकार फरे छे. ( ८९७) जेम छुटा छुटा पडेला फळो सर्वनो उपकार करी शकता नथी तेम सूत्ररचनाविना अर्थी कृतार्थ थता नथी. (८९८) छुटा मुक्ताफळो तेम ज सेंकडो कुसुमो सूत्रवठे गुंथ्या विना माळा तरीके पहेरवाना उपयोगमा प्रावता नयी तेम प्राणी- ओने छुटा अर्थो पण उपयोगी थता नथी. (८९९) जेवी रीते सर्वज्ञ प्रभु पूर्वदिशाना सिंहासन उपर बेसीने लोकोत्तर लक्ष्मीवडे शो- मता सता देशना आपे छे, (९००) तेम पाकीनी त्रण दिशाए पण देवनिर्मित परि- हंतनी प्रतिमा मूळस्वरूपथी अविशेषपणे ( तेना सरखी ज) देशना आपे छे. (९०१) तेथी कोइ पण मनुष्य चार स्वरूपमा मूळ स्वरूप कयुं ने कृत्रिम स्वरूपो कयां ते जाणी शकता नथी. (९०२) कह्यु छ के-देवोना करेला ते त्रणे दिशाना प्रतिरूपमा पण भगवंत सदृश रूप ध्रुवपणे प्रभुना महिमाथी ज थाय छे. ( ९०३) जो के प्रभुना प्रविरूपने देवो पनावे छ तो पण प्रभुना महिमाथी ज ते प्रतिरूप प्रभुतुल्य थाय छे. (९.४) जो ए कारण न होय तो सर्व देवो एकठा थाने सर्व शक्तिना प्रपलथी एक अंगुष्ठ प्रमाणरूप विकुर्वे तो ते जगतना रूपने जीववावाळा प्रमुना पगना अंगुष्ठनी पासे पण दुर्वादीमोना चंदनी जेम (३०४) সীকান্ধীসক্ষায়। भवेदुर्वादिवृंदवत् ॥ ६ ॥ पाहुश्च-यैः शांतरागरुचिभिः परमाणुभिस्त्वं निर्मापितस्त्रिभुवनैकललामभूत । तावंत एव खलु तेऽप्यणवः पृथिव्यां यत्ते समानमपरं न हि रूपमस्ति ॥ ७॥ तादृशाच्चाहतां रूपा-जगदा- चामगोचरात् । अनंतगुणहीनाः स्यू-रूपतो गणधारिणः ॥ ८॥ ते. भ्यश्चाहारका देहा अनंतगुणहीनकाः । तेभ्योऽप्यनुत्तरा देवा-स्ततोऽ- धोऽधः क्रमात्सुराः ॥ ९॥ यावद्वयंतरगीर्वाणा-स्तेभ्यश्च चक्रवर्तिनः । वासुदेवा बलदेवा महामांडलिकाःक्रमात् ॥१०॥ अनंतगुणहीनाः स्युस्तच्छे- पास्तु नृपादयः । लोकाः सर्वेऽपि षट्स्थान-पतिता रूपतो मिथः ॥ ११ ॥ अनंता १ संख्य २ संख्येय ३-भागहीनाः परस्परं । संख्येया ४ संख्येया ५ नंत ६-गुणहीनाः स्वरूपतः ॥ १२ ॥ ताहग्रूपाश्च तेऽहंतो मनोनयनसौख्यदाः । जनानामभिगम्याः स्यु-रुपादेय गिरोऽपि च ॥ १३ ॥ तथा तादृक् प्रभो रूपं निरूप्यानुत्तरं जनाः । त्यक्तरूपाभि- मानाः स्यु-न नीचैर्गोत्रबंधिनः ॥ १४ ॥ धर्मादेवाप्यते रूप-मीगैश्वर्य- धुझी गयेल अनि ( कोयला) जेवो लागे. (९०५-६) श्री भक्तामरस्तोत्रमा कयुं छे के-'हे प्रण भुवनना अद्वितीय ललामभूत प्रभु ! जे शांतरागनी रुचिवाळा परमाणुप्रोवडे . श्रा- पर्नु रूप बनाववामां आव्युं छे तेवा परमाणुलो पा जगतमा वेटला ज हता, जेथी प्रापना रूप सरखं रूप था जगतमा वीजु जणातुं नथी. (९०७) जगतनी वाचाने अगोचर एवा सेवा प्रकारना अरिहंतना रूप करतां गणधरोनुं रूप अनंतगुणहीन होय छ, (९०८) ते करतो थाहारक देह अनेतगुणहीन होय छ, ते करतों अनुत्तर विमानवासी देवोर्नु रूप अनंतगुणहीन होय छे. ए प्रमाणे नीचे नीचे उतरतां यावत् व्यतर देवोनुं रूप अनंतगुण- हीन होय छे. ते करतां चक्रवर्तीनु, वासुदेवर्नु, बळदेवर्नु, महामांडलिकनुं अनुक्रमे अनंत अनंतगुणहीन होय छे. शेप राजादिक सर्वे लोकोनुं रूप अंदर अंदर पट्स्थान पतित होय छ. (९०९-११)-एटले अनंतमागहीन, असंख्यातभागहीन, संख्यातमागहीन, संख्यात- गुणहीन, असंख्यातगुणहीन, अनंतगुणहीन एवा स्वरूपथी होय छे. (९१२) तेवा प्रकारना रूपवाळा अरिहंतो मन तथा नेत्रने सुख प्रापनार तेम ज लोकोने तेमनी पासे जवानी इच्छा थाय तेवा तेम ज तेमनी वाणी अंगीकार्य ज थाय एवा होय छे.(९१३) सेवा प्रकारर्नु अनुत्तर एy प्रमनु रूप जोइने जीवो रूपर्नु अमिमान वजी देथे तेथी नीचगोत्रने पिता नथी. (९१४) वेवा प्रकारचें अरिहंतनुं रूप जोपाधी जनो एम विचारे थे के-- सर्ग ३० मो। (३०५) बंधुरं । इति धर्म प्रवर्तते तेऽहंदूपनिरूपणात् ॥ १५ ॥ यदीग्रूपभाजो, ऽपि राजवंश्या जिनेश्वराः। यतते संयम तर्हि वयं किं न यतामहे ? ॥ १६ ॥ इत्यालोच्याल्पकर्माणो यतते केऽपि संयमे । बहुधेत्यहता रूपं भवेल्लोकोपकारकृत् ॥ १७॥ यथा रूपं तथा संह-ननं संस्थान- मेव च । वर्णो गतिः स्वरस्सत्त्वं स्यादुच्छ्वासाद्यनुत्तरं ॥ १८॥ अन्यासा- मपि सर्वासां प्रकृतीनामनुत्तराः । प्रशस्ताः स्युः परीपाका-स्तादृक्षान्ना, मकर्मतः ॥ १९॥ असातवेदनीयाद्या दुष्टाः प्रकृतयोऽपि याः। दुग्धाब्धौ निवनिर्यास-विंदुवत्ता न दुःखदाः ॥ २० ॥ अर्हता पादमूले च सदा सन्निहितो भवेत् । प्रायो गणधरो ज्येष्ठः कदाचिदपरोऽपि वा ॥२१॥ परं न स्वामिपादाब्ज-मेकेन गणधारिणा । भवेत्कदापि रहितं त्रिदशेनेव नंदनं ॥ २२ ॥ ज्येष्ठो गणी सोऽपरो वा प्रणम्य परमेश्वरान् । पार्श्वे निपीदत्या. ग्नेय्या-मन्येऽप्येवं गणाधिपाः ॥ २३ ॥ मुनयः केवलज्ञान-शालिनोऽय श्रा, अश्वर्यथी व्याप्त रूप धर्मथकी ज प्राप्त थइ शके के एम विचारीने तेत्रो अरिहंतना रूपने जोचाधी धर्ममा प्रवृत्ति करे छे. (९१५) वळी पावा अद्वितीय रूपना भाजन जिनेश्वरो राजवंशवाळा छतो पण संयमा प्रवृत्ति करे के तो अमे तेवो प्रयत्न केम न करीए १ (९१६) या प्रमाणे विचारीने अस्पकर्मवाळा घणा जनो संयममा प्रवृत्ति करे छे. प्रारीते घणे प्रकारे अरिहंतनुं रूप लोकोने उपकार माटे थाय छे. (९१७) जेम रूप तेम ज संहनन, संस्थान, वर्ण, गति, स्वर, सच भने उच्छ्वास पण अनुचर होय छे. (९१८) बीजी पण बघी शुभ प्रकृतिमोनो उदय तेका प्रकारना नामकने लीधे अनुत्तर अने प्रशस्त होय छे. ( ९१९) असातावेदनीय विगेरे अशुम (दुष्ट) प्रकृतिमो पण क्षीरसमुद्रमां लींब- डाना रसना विंदुनी जेम दुःख आपनारी थती नथी-निष्फळ थाय छे. (९२०) अरिहंतनी पासे निरंतर प्रायः ज्येष्ठ गणधर रहे छे. कोइ बखत बीजा गणधर पण रहे छे, (९२१) परंतु कोइ पण वखत एक गणधररहित तो प्रभु होता ज नथी, जेम देवतावडे नंदनवन विरहित होतुं नथी वेम. ( ९२२) हवे चार वर्षदा समवसरणमा केवी रीते बेमे थे ते पतावे छे.. प्रथम ज्येष्ठ गणधर अथवा वीजा गणधर परमेश्वरने प्रणाम करीने अग्निकोणमां प्रमुनी पासे से छे. तेमनी पाछळ बीजा गणधरो से छे. (९२३ ) केवळज्ञानी मुनिमा - (३०६) #ক্ষাবধাসায়। जिनेश्वरान् । त्रिश्च प्रदक्षिणीकृत्य कृत्वा तीर्थनमस्कृति ॥ २४ ॥ यथा- क्रम निविष्टानां पृष्ठतो गणधारिणां । निषीदंति पदस्थानां रक्षतो गौरवं स्थितेः॥२५॥ कृतकृत्यतया ताह-कल्पत्वाच्च जिनेश्वरान् । न नमस्यंति तीर्थ तु नमत्यहन्नमस्कृतं ॥ २६ ॥ उक्तं च धनपालेन महात्मना- होही मोहुच्छेओ, तुह सेवाए धुव त्ति नंदामि । जंपुण नवंदिश्रव्यो, तत्थ तुमं तेण जिज्झामि ॥ २७॥ मनःपर्यायज्ञान्याद्या-स्ततोऽतिशयिसाधवः । नवाहत्तीर्थगणिनः सर्वज्ञाश्चासते ततः ॥ २८ ॥ तेषां च पृष्ठतः शेष- संयता अर्हदादिकान् । प्रणिपत्य निषीदंति विनयेन यथाक्रमं ॥ २९ ॥ तेषां च पृष्ठतो वैमा-निकदेव्योऽहंदादिकान् । प्रणिपत्यासते तासां पृष्ठे साध्व्यस्तथैव च ॥ ३० ॥ इत्येताः पर्षदस्तिस्रो निषीदंत्यग्निकोणके । प्रविश्य पूर्वद्वारेण कृत्वा चाहत्प्रदक्षिणां ॥३१॥ देव्योऽथ भवनज्योति- व्यंतराणामिति त्रयं । याम्यद्वारा प्रविश्यास्ते नैर्ऋत्यां दिशि पर्षदां ॥३२॥ सुरास्त्रयोऽमी पूर्वोक्ताः पुनस्तिष्ठत्यनुक्रमात् । प्रविश्य पश्चिमद्वारा वा- जिनेश्वरने त्रण प्रदक्षिणा दइने तेमने नमस्कार करीने अनुक्रमे पेठेला गणधरोनी पाछळ से छे. पदस्थनी स्थितिनुं गौरव तेश्रो जाळवे छे. (९२४-२५) केवळज्ञानीओ कृतकृत्य थयेला होवाथी भने तेवो कल्प होवाथी तेश्रो जिनेश्वरने नमता परंतु अरिहंते नम- स्कार करेला तीर्थने नमस्कार करे छे. (९२६) धनपाळ महात्माए कह्यु के के-'हे प्रभु ! तमारी सेवाथी ( मारा ) मोहनो उच्छेद जरुर थशे एम धारी हुं आनंद पान छु, परंतु मोहनो क्षय थया पछी आपने बंदाशे नहीं एम धारीने हुँ खेद पामं छु.' (९२७) केवळ- ज्ञानीनी पाछळ मनापर्यवज्ञानी, (अवधिज्ञानी, चौदपूर्वी) विगेरे से छे. तेमनी पारळ. अतिशयवाळा साधुनो से, ते सर्व अरिहंतने, तीर्थने, गणधरने अने केवळीमोने नम- स्कार करीने से छे. (९२८) तेनी पारळ सामान्य मुनिश्रो अरिहंतादिकने विनयपूर्वक नमस्कार करीने अनुक्रमे से, (९२९ ) सेमनी पाछळ पैमानिक देवीमो अरिहंतादिकने नमस्कार करीने उभी रहे, तेमनी पाछळ साध्वीश्रो तेज प्रकारे अरिहंतादिकने नमस्कार करीने उभी रहे. (९३०) मा त्रण पर्पदा पूर्वद्वारवडे समवसरणमा प्रवेश करीने रिहंतने त्रण प्रदक्षिणा दइने अनिकोणमा से (९३१) हवे भवनपति, ध्यवर ने ज्योतिषीनी देवीमो ए प्रण पर्षदा दक्षिणद्वारथी प्रवेश करीने नैत्य- कोणमा से. (९३२ ) एज प्रभाणे भवनपति, व्यर ने ज्योतिपीना देवोरूप प्रण सर्ग ३० मो। (३०७) यव्यां विनयानताः ॥ ३३ ॥ वैमानिकाः सुरास्सेंद्रा मनुजा मनुजस्त्रियः। प्रविशंत्युत्तरद्वारा तिष्ठत्यैशानकोणके ॥३४॥ पर्षदो द्वादशाप्येवं निषी. दंयुक्तदिविमाः । प्रदक्षिणीकृत्य नत्वा-हतो गण्यादिकांस्तथा ॥ ३५ ॥ आयाति यो यज्जातीयः स तत्पर्षदि तिष्ठति । न तत्र मानो द्वेपो वा न भयं न नियंत्रणा ॥ ३६ ॥ महद्धिकं समायांतं नमंत्यल्पद्धिकाः स्थिताः। व्रजंतोऽपि नमंतोऽमी यांति प्रौढद्धिकं स्थितं ॥ ३७ ॥ यो यो यस्य परीवारो यो वा यन्निश्रयाऽऽगतः। त्रिदशो वा मनुष्यो वा स तत्पार्चे निपीदति ॥ ३८॥ देव्यश्चतुर्दा साध्व्यश्च शृण्वंत्यूचंदमाः क्षणं । देवाः सर्वे नरा नार्यो निविष्टाः श्रमणास्तथा ॥ ३९ ॥ वृत्तावावश्यकस्येदं चूर्णौ चोत्कटि- कासनाः । शृण्वंति साधवोऽथोर्ध्वाः साध्व्यो वैमानिकांगनाः ॥ ४० ॥ उपविश्यैव शृण्वंति देशनामाप्तभास्वतां । पर्पदोऽन्या न वेत्युक्तं वेत्ति पर्पदाना देवो पश्चिमद्वारे प्रवेश करी विनयवडे नमता सता वायव्य कोणमा बेसे. (९३३) इंद्रो सहित वैमानिक देवो, मनुष्य अने मनुष्यनी स्त्रीमो (ए त्रण पर्पदा) उत्तरद्वारथी प्रवेश करी ईशानकोणमा पेसे. (९३४ ) मा प्रमाणे वारे पर्पदा प्रभुने प्रदक्षिणा करीने तथा अरिहंत श्रने गणघरादिकने नमस्कार करीने उपर क्या प्रमाणे विदिशाओगा से. ( ९३५) नवो जे श्रावे ते पोतानी जातिनी पर्पदामां से. तेमा मान, द्वेष, भय के नियंत्रणा चीलकुल होता नथी (९३६) कोइ महर्दिक श्रावे तो तेने प्रथम बेठेला अल्पर्दिया- लामो नमे थने अल्पर्द्धिवाला जाय तो बेठेला महर्दिकने नमीने जाय. (९३७) जे जेना परिवारनो होग अथवा जे जेनी निश्राए अाव्यो होय ते मनुष्य के देव तेनी पासे ज से. (९३८) उपर जणावेली १२ पर्षदामाथी चार प्रकारनी देवीमो ने साधीभो उभा उमा देशना सांभळे अने चार प्रकारना देवो, मनुष्य, मनुष्यनी स्त्रीमो अने साधुओ-( ए ७ पर्पदा) पेसीने देशना सामळे. (९३९) आवश्यकवृत्तिमां या प्रमाणे कडं छे, परंतु तेनी चूर्णिमा कमु छ के-साधुप्रो उत्कटिकामने रह्या सता सामळे अने वैमानिकनी देवी तथा साध्वीओ वेपर्पदा ज उभी रहीने सांभळे. (९४०) पाकीनी नव पर्पदा प्राप्तमा सूर्यसमान परमात्मानी देशना वेसीने सांमळे के उभी रहीने सामळे ते विषे काह कहुं नथी'. तच केवळी जाणे. १ बाकीनी नव पर्पदा बेसीने सामळे एम पण कहेल छे. पा गाथाना चोथा पदनो अर्थ पण तेवो करे छे.

(३०८) मीकासबोकप्रकाश। तत्त्वं तु तत्त्ववित् ॥ ४१ ॥ अपूर्व यत्र समव-सरणं नेक्षितं च यः। अपि द्वादशयोजन्या-स्ते तत्रायांति साधवः ॥ ४२ ॥ अथ चेत्साधन- स्तन ते नायाँति श्लथादराः। तत्प्रायश्चित्तमर्हति चतुरुकसंज्ञकं ॥४३॥ आगच्छतां च बालानां ग्लानानां जरतामपि । न कोऽप्युपद्रवो नाति-न त्रासः स्यान्न वा श्रमः ॥ ४४ ॥ तावदुत्तुंगसोपान-सहस्रारोहणे भवेत् । न कस्यापि श्रमश्वास-व्यथाः शंभुप्रभावतः ॥ ४५ ॥ स्त्रीक्षेत्रवित्ता- द्युत्थानि पितृघातोदितान्यपि । तत्रागतानां शाम्यति द्रुतं वैराणि पाप- वत् ॥ १६ ॥ युद्ध्यमाना मिथः क्रूराः क्रोधरक्तेक्षणाननाः। कंपमाना उदस्तास्त्रा उच्छंडाः कुंजरा इव ॥४७॥ भवंति ये तेऽपि तत्रा-गता विस्मृतविग्रहाः । प्रशांतचित्ताः शृण्वंति धर्म स्वामिप्रभावतः ॥४८॥ न कोऽपि विकथां कुर्या-याक्षेपं कोऽपि नापरं । तदेकचित्ताः शृण्वंति जिनानां देशनां जनाः ॥ ४९ ॥ शृण्वंति येऽपि तियचः स्थिता व द्वितीयके । तेऽपि विस्मृतजा- त्यादि-वैराः स्युस्तत्प्रभावतः ॥ ५० ॥ पार्श्वस्थं सिंहमातंगं शार्दूलहरिणं (९४१) ज्या अपूर्व ( नवु ल) समयसरण थयुं होय भने जेमणे समवसरण जोयुं ज न होय या साधु पार योजनयी पण त्यां पावे. (९४२) जो कोइ साधु शिथिल भादरवाळा थइने न भावे तो तेने चतर्गुरु नामर्नु प्रायश्चिच भावे. (९४३) समवसरणमा भावता चाळोने, ग्लानोने, वृद्धोने कोइ पण प्रकारनो उपद्रव न थाय, पीडा न थाय, प्रास न थाय भने थाक न लागे. (९४४) एटला पधा उंचा (वीश हजार ) पगयीमानो चडता कोइने पण प्रभुना प्रमावथी श्रम, चास के व्यथा न थाय. (९४५) स्त्री, क्षेत्र के द्रव्यादिना हरणादिकथी उत्पन्न धयेला तेमज पिघातादिथी थपेला वैरो त्या भावनारना पापनी जेम तत्काळ शमी जाय छे. (९४६) अंदरअंदर युद्ध करनारा, क्रूर, क्रोधवडे लाल- सुरवाळा, कंपता अने शस्रो उंचा करेला होवाची जाणे उंची करेली शुंढवाळा हाथी ज होय तेम तेओ त्यां श्रावतां ज प्रथना प्रभावधी विग्रह (क्लेश)ने भूली जनारा भने प्रशांत वित्तवाला थइ देशना सामळे छे. (९४७-४८) त्यां कोई विकथा फरतुं नथी, कोर पीजाने घ्याक्षेप करतुं नधी, सर्वे जनो एक चिचे प्रमुनी देशना समिळे छ (९४९) घीजा गढमा जे तिर्यचो रहेलाथे, ते पण प्रभुना प्रभावथी जातिवैरने पण भूली जइने देशना सामळे छे. (९५० ) पासे रहेला हाथी ने सिंह, हरिण ने शाल, पारेषा ने मग ३. मो। (३०९) तथा । श्येनपारापतं व्याघ्र-च्छागं मार्जारमूपकं ॥ ५१ ॥ महिपाश्चं च नकुल-सर्प शूकरकुर्कुरं । एकाग्रचित्ताः शृण्वंति प्रभोरत्यमृतं क्षणं ॥ ५२ ॥ विभेति तत्र नो वाध्यो वाधकस्तं न वाधते। स्युः सार्वातिश- याच्छांत-रसतृप्ताः समेऽपि ते ॥ ५३ ।। प्रथमां पौरुषी याव-धर्ममाख्याति पारगाः । अत्रांतरे च यस्तत्र चक्र- वादिको नृपः ॥ ५४॥ श्राद्धोऽमात्यादिको वा य-स्तदभावे च पूर्जनः । जनो जानपदो वापि सज्जयत्यद्भुतं वलिं ॥ ५५ ॥ तण्डुला- स्तत्र कलम-शालीनां स्युः सितत्विषः। उद्दामसौरभाः स्निग्धा-स्तनवः कोमला भृशं ॥ ५६ ॥ दुर्वलाकंडिताः पूता बलवत्याऽतिनिस्तुषाः । अखं. डाग्राश्चतुःप्रस्थ-प्रमिताढकसंमिताः ॥ ५७ ॥ अर्पिताः स्वजनानां ये तुपभग्नादिशुद्धये। पुनस्तेभ्यः समुच्चित्य शोधिताः शुद्धवारिणा ॥ ५८॥ अर्द्धस्विन्नानिमान् रत्नस्थाले निक्षिप्य निर्मले । सजिताखिलशृंगारा मौलौ धत्ते सुवासिनी ॥ ५९ ॥ गंधद्रव्याणि दिव्यानि निक्षिपत्यत्र श्यन (वाज ), बोकडा ने पाप, उंदर ने बिलाडी, अश्व ने महिप (पाडो), सर्प ने नोळीयो, झुंड ने कुतरो-ए सर्व प्रभुनी अमृतथी पण श्रेष्ठ देशना एकाग्र चित्ते सांभळे छे. (९५१-५२) वाध्य एवा पशुओ त्यां बीता नथी भने बाधक तेने बाघ करता नथी. सर्वज्ञना अतिशयथी सर्व जीवो शांतरसमा तृप्त थयेला होय छे. (९५३ ) पहेली पौरुपी पूर्ण थतां सुधी तीर्थकर देशना पापे छे. ते वखते त्यां चक्रवा- दिक जे अग्रणी राजा होय ते अथवा श्रावक के अमात्य विगेरे, तेने अमाचे नगरजनो भने देशना जनो अद्भुत एवो बळि तैयार करे थे. (९५४-५५) ते पळिमा कलमशा. कीना तंदुलो (चोखा) उज्वळ वर्णवाळा, उद्दाम सुगंधवाळा, स्निग्ध, पातला, अत्यंत कोमळ, दुळ स्त्रीए खांडेला, पवित्र, पळवाळी स्त्रीए फोतरारहित करेला, अखंड, प्रणीशुद्ध चार प्रस्थ अथवा एक पाढ प्रमाण होय छे. (९५६-५७) ते चोखा प्रथम फोतरा वेम ज संडित चोखा काढी नाखवा माटे स्वजनोने प्रापेला होय, तेमनी पासेथी पाया पछी पण फरीने शोध्या होय अने शुद्ध पाणीपडे घोपा होय, पछी तेने अर्ध पत्र करी निर्मळ रत्नना थाळमा नांखीने अखिल शृंगारवडे सज्ज थयेली सौभाग्यवंती स्त्री तेने माथापर लेय. (९५८-५९) मां देवताओ दिव्य एवा सुगंधी द्रव्यो नासे तेथी ते बळि भत्यंत १ मध पाकेलो-तदन पाकेलो नहीं.

(३१०) श्रीकाललोकप्रकाश। नाकिनः । तेनासौ भूरिसौरभ्य-सुभगो जायते वलिः ॥ ६० ॥ नीयते गीतवाद्यादि-महोत्सवपुरस्सरं। श्राद्धनासौ प्रभोरग्रे श्लाघ्यमानेन धार्मि- कैः ॥ ६१ ॥ पूर्वद्वारा प्रविशति बलिरेवं महामहैः । तस्मिन्नागतमात्रे च विरमंति क्षणाजिनाः ॥ ६२ ॥ ततः स चक्रवादिः श्रावको बलिना सह । तिस्रः प्रदक्षिणाः कृत्वा प्राच्यां प्रभुपदांतिके ॥६३ ॥ किरत्या- शासु सर्वासु तं बलिं प्रौढमुष्टिभिः । तस्य प्रागेव भूपाता-दर्दू गृह्णति नाकिनः ।। ६४ ॥ अर्द्धं च शेषस्यार्द्धस्य गृह्णात्येतद्विधायकः । अवशिष्टं यथालाभं गृहंत्यन्येऽखिला जनाः ॥ ६५ ।। मूनि न्यस्तेन तस्यैक-क- णेनाप्न भाग्यतः। रोगाः सर्वेऽपि शाम्यति पर्जन्येनेव वह्नयः ॥६६॥ प्रादुर्भवति-पण्मासा-वधि रोगो न नूतनः। तस्मान्मौलिस्थिताद्रत्न- दीपादिव तमोंकुरः ॥ ६७ ॥ इत्थं बलिविधौ पूर्णे जिनाः प्रथमवप्रतः । अवतीर्य द्वितीयस्य वप्र- स्यैशानकोणके ।। ६८ ॥ देवच्छंदकमागत्य सुखं तिष्ठति नाकिभिः । अप्यल्पैः कोटिसंख्याकैः सेविता भृतकैरिव ॥ १९ ॥ ततो द्वितीयपौरु- सुगंधीवालो ने सुभग थाय. (९६० ) पछी ते बलिने गीत वाजिन साथे महोत्सवपुरस्सर धार्मिक जनोए प्रशंसा करातो श्रावक त्यांची लइने चाले. (९६१ ) या प्रमाणे महामहो। त्सव साथे ते बळि पूर्वद्वारे थइने समवसरणमा श्रावे एटले तरत ज जिनेश्वर क्षणमात्र देशना देवाथी विरमे. (९६२) पछी चक्रवर्ती विगेरे श्रावको बलिसहित प्रभुनी प्रण प्रदक्षिणा पापे भने पूर्व सन्मुस प्रशु पासे प्राचीने ते पळि मोटी मुठीमो मरीने सर्प दिशामा उचाळे. तेमाथी पृथ्वीपर पड्या अगाउ अर्ध भाग देवतानो अपरथी ज लइ लेय. (९६३-६४ ) बाकी रहेला अर्ध भागमाथी अर्ध ते घलिना करावनार लेय. पाकी रहेल पळि जेने मळी शके ते सर्व लोको ग्रहण करे. (९६५) माग्यवडे प्राप्त थएल मा पळिनो एक कण पण माथे राखवाथी परसादी जेम अनि शांत थ६ जाय तेम सर्व रोगो शांत थइ जाय. (९६६) अने मस्त के राखेला ते कणधी छमास सुधी नया रोग उत्पन्न न थाय, रत्नमय दीपपडे जेम अंधकारना अंकुरो उत्पन्न न थाय तेम. (९६७) था प्रमाणे पळिनो विधि पूर्ण धाय एटले प्रभु पहेला गढमाथी नीकळे. पगधीमा उतरीने वीजा गढमा ईशान कोणे रहेला देवच्छंदामा भावीने जघन्यथी पण कोड प्रमाण देववडे सेयफनी जेम सेवावा प्रमु मुखे पेसे. (९६८-६९) पछी पीजी पौरुपीए भाष सर्ग ३० मो। (३११) ष्या-मायोऽन्यो वा गणाधिपः । सिंहासने नृपानीते । पादपीठेऽथवा. हतां ॥ ७० ॥ उपविश्यादिशेद्धर्मो-पदेशमतिपेशलं । स च्छद्मस्थोऽपि भव्यानां पृच्छतां सर्ववैदिवत् ॥ ७९ ॥ व्याकुर्वन् 'विविधान् भावान् संख्यातीत-भवादिकान् । छद्मस्थोऽयं जिनो वेति न छद्मस्थैः प्रतीयते ॥७२॥ तथाहुः श्रीभद्रबाहुस्वामिपादाः-रायोवणीअसीहासणे निविट्टो व पायपीढंमि । जेहो अमायरो वा गणहारि कहेइ वीयाए ॥ ७३ ॥ संखाईए वि भवे साहइ जं वा परो उ पुच्छिज्जा । न य णं प्रणाइसेसी विश्राणइ एस छउमत्थो ॥ ७४ ॥ पुनः पाश्चात्यपोरुष्यां स्थित्वा सिंहा- सने जिनाः॥ कुर्वते देशनां सर्वा व्यवस्थात्रापि पूर्ववत् ।। ७५ ॥ प्राकदापि न जातं स्या-द्यत्र तत्र चतुर्विधाः। कुर्वति देवाः समव- सरणं विधिनामुना ॥७६॥ जातेऽप्यस्मिन्मुहुर्यत्र देवः कश्चिन्महर्द्धिकः । नंतुमेति स तत्रैकः कुरुते भक्तिमानिदं ॥ ७७ ॥ यदापि न स्यात्समव. सरणं स्यात्तदापि हि । वक्ष्यमाणं प्रातिहार्या-ष्टकं नियतमहतां ॥७८ ॥ अथवा अन्य गणधर राजाए लावेला सिंहासन उपर अथवा प्रभुना पादपीठ उपर सीने अति सुंदर एवो धर्मोपदेश आपे. तेत्रो छद्मस्थ होय छे छतां पण पूछनारा भव्य जीवोना असंख्याता भव विगेरे विविध भावोने सर्वज्ञनी जेम कहे, ते एवी रीते के बीजा छमस्थो एम न जाणी शके के पा छद्मस्थ छ के केवळी छे ? (९७०-७२ ) ते विषे श्री भद्रबाहुस्वामी कहे के के-" राजाए आणेला सिंहासनपर अथवा प्रभुना पादपीठ उपर बेसीने मोटा अथवा बीजा गणधर पीजी पोरसीए देशना आपे छे. (९७३) ते वखते चीजो कोई प्रश्न पूछे तो तेने असंख्याता भवो पण कहे छे जेथी मा गणधर छमस्थ छे एम कोइ पण जाणी शके नहीं." (९७४) पछी वळी पाचले पहोरे जिनेश्वर सिंहासनपर विराजीने देशना आपे, ते वखतनी पर्पदादिकनी व्यवस्था वधी पूर्ववत् जाणवी. (९७५) पूर्व ज्या समवसरण थयुं न होय त्यां चारे प्रकारना देवो मळीने उपर जणाच्या प्रमाणे समवसरण रचे. ( ९७६ ) ज्यां वारंवार समवसरण थयेल होय त्यां पण कोइ महर्दिक देव नमया भावे तो भक्तिमान् एवो ते एकलो पण समवसरण रचे. (९७७ ) ज्यारे समवसरण न होय त्यारे पण अरिहंतना भाठ प्राविहार्यों जे आगळ कहे- वाशे ते तो जरुर होय. (९७८) ते प्रातिहार्यों मा प्रमाणे- (३१२) श्रीकाललोकप्रकाश । अशोकवृक्षः सश्रीको भवेद्योजनविस्तृतः । चलत्किसलयो भव्यान करात्रैराह्वयन्निव ॥ ७९ ॥ अधोवृन्तानि पुष्पाणि पंचवर्णानि नाकिनः । तन्वते जानुदघ्नानि जिनानां देशनावनौ ॥८० ॥ मालवकैशिकीमुख्य- ग्रामरागांचितोऽहंतां । प्रायोजन ध्वनिर्दिव्य-ध्वनिमिश्रः प्रसर्पति ॥८॥ चामराश्चंद्ररुचिरा नमनोन्नमनैर्मुहुः। उच्चैः प्रभुनमस्कारा-च्छंसंनीव गति सतां ।। ८२ ॥ स्वर्णसिंहासनं पाद-पीठयुग्मणिमंडितं । अध्यासते जिना- स्तच्च मार्गे व्योम्नि पुरश्चरेत् ॥ ८६ ॥ छत्रत्रयं तथैवाने चरत्युज्ज्वल- मौक्तिकं । जगद्वंद्योपरिस्थित्या मुदेवोद्धरकंधरं ।। ८४ ॥ भामंडलं सार्व- पृष्ठे भात्यर्कस्येव मंडलं । प्रपन्नं शरणायेव नियतास्तकदर्थितं ॥ ८५ ॥ सति प्रभौ कुतः कर्म-कृच्छ्रे सासह्यतेंगिभिः। वक्तीतीवांगिनां गर्ज-स्त. त्पुरो देवदुंदुभिः ॥ ८६ ॥ एवं च-अशोकदुः १ पुष्पराशिः २ सध्वनि ३ श्चामरा ४ सने ५। छत्रं ६ भामंडलं ७ भेरी ८ प्रातिहार्याष्टकं ह्यदः॥८॥ १ शोभायमान एवो अने एक योजन विस्तारवाळो अशोक वृक्ष होय के जे चालतो सतो हलता एवा किसलयना मिपथी जाणे भव्यजीवोने बोलावतो होय एम लागे. (९७९) २ प्रभुने देशना आपवानी पृथ्वी उपर देवो नीचे डीटवाळा पांच वर्णना पुष्पोनी जानुप्रमाण घृष्टि करे. (९८०) ३ मालवकैशिकी मुख्य ग्रामरागमा कहेवाती अरिहंतनी देशनानो ध्वनि दिव्य ध्वनिथी मिश्र थइने एक योजन सुधीमा प्रसार पामे. (९८१) ४ चंद्र जेवा उज्वळ चामरो पारंवार नमवावडे ने उंचे जवावडे प्रसने नम- स्कार करनार सजनांनी उच्च गति थाय थे, एम कहेता होय एम जणाय छे. (९८२) ५ मणिमंडित अने पादपीठयुक्त स्वर्णमय सिंहासन उपर प्रभु से छ, भने ज्यारे प्रभु विहार करे छे त्यारे ते आकाशमा रह्यं सतुं साथे चाले छे.( ९८३ ) ६ उज्वळ मौक्तिक संबंधी त्रण छत्र जगद्वंद्य प्रभुनी उपर रहेवाथी हर्षवडे उंची कंधरावाळा थया होप तेम श्राकाशमा चाले छे. (९८४) ७ नियमित मस्त थयाथी कदर्थन। पामेलुं सूर्यन मंडळ जाणे शरण ने माटे आन्युं होय तेम प्रभुनी पाछळ मामंडळ शोमे छे. ( ९८५) ८ प्रभु वर्ववा छतां शामाटे प्राणीनो कर्मजन्य कष्टने सहन करे छ ? एम जीवोने कहेती होय एम देवदुंदुमि प्रसुनी आगळ याग्या करे छे. (९८६) श्रा प्रमाणे अशोकवृत्त, पुष्पराशि, उत्तम ध्वनि, चामर, सिंहासन, छत्र, भामंडळ ने देवदुंदुभि ( मेरी) ए भाठ प्राविहापों जाणवा. (९८७) सर्ग ३० मो (३१३) तथा चतुस्त्रिंशता ते-ऽतिशयैः सहिता जगत् । दीपयंति प्रकृत्योप- कारिणो भास्करादिवत् ॥ ८८ ॥ अतिशयोश्चैवमाहुः- तेषां च देहोऽद्भुतरूपगंधो निरामयः स्वेदमलोज्झितश्च १ । श्वासो- उजगंधो २ रुधिरामिपं च गोक्षीरधाराधवलं ह्यविस्त्रं ३ ॥ ८९॥ पाहा- रनीहारविधिस्त्वदृश्य ४ श्चत्वार एतेऽतिशयाः सहोत्थाः।क्षेत्रे स्थितियों- जनमात्रकेऽपि नृदेवतिर्यग्जनकोटिकोटेः १ ॥ ९० ॥ वाणी नृतिर्यक्सुर- लोकभाषा-संवादिनी योजनगामिनी च । भामंडलं चारु च मौलिपृष्ठे विडं विताहर्पतिमंडलनि ३॥ ९१ ॥ साग्रे च गव्यूतिशतद्वये रुजो ४ वैरे ५ तयो ६ मार्य ७ तिवृष्ट्य ८ वृष्टयः ९ । दुर्भिक्ष १० मन्यस्वकच- कतो भयं ११ स्युनैत एकादश कर्मघातजाः ॥ ९२॥ खे धर्मचक्र १ चमराः २ सपाद-पीठं मृगेंद्रासन ३ मुज्ज्वलं च । छत्रत्रयं ४ रत्नमयध्वजों ५ ह्रि-न्यासे च चामीकरपंकजानि ६ ॥९३॥ वप्रत्रयं ७ चारुचतुर्मुखांगता - चैत्यद्भुमो ९ ऽधोवदनाश्च कंटकाः १० । तथा प्रभु चोत्रीश अतिशयोवडे समावे ज उपकारी एवा सूर्यादिनी जेम जगतमा दीपी रहे थे (९८८) ते अतिशयो या प्रमाणे- १ प्रभुनो देह अद्भुत रूप अने गंधवाळो, व्याधिरहित अने प्रस्वेदादि मळरहित होय छे. २ श्वास कमळ जेवो सुगंधी होय छे. ३ रुधिर ने मांस गायना दूध जेवू उज्वळ भने दुर्गंधरहित होय छे. (९८९ ) ४ माहार ने निहार चर्मचक्षुथी अगोचर होय छे. या ४ अतिशयो जन्म साथे ज उत्पन्न थएला होय छे. १ एक योजन प्रमाण समवसर. णनी भूमिमा मनुष्य, देवो ने तियचो कोटाकोटीनी संख्यामा समाय छे. (९९०) २ प्रभुनी वाणी मनुष्य, तिथंच ने देयोनी भाषाने अनुसरती अने एक योजना संभळाय तेवी होय छे. ३ सूर्यना मंडळनो पण तिरस्कार करे एवं सुंदर मामंडळ प्रभुना मस्तक पाछळ होय छे. (९९१) ४ चारे दिशाए अर्श गाउमा व्याधि, धैर, ईति, मारी, अतिवृष्टि, प्रवृष्टि, दुर्भिच अने स्वचक्र-परचक्रनो भय था आठ वाना होता नथी. आ ११ अतिशयो घातिकर्मोनो चय थवाथी उत्पन्न थाय छे. (९९२) हवे देवकृत १९ अतिशयो कहे छे. १ आकाशमा धर्मचक्र, २ चामर, ३ सपादपीठ सिंहासन, ४ उज्वळ छत्रत्रय, ५ रत्नमय धज, ६ प्रभुना पग नीचे स्वर्णकमळो, ७ प्रण गढ, ८ सुंदर एका चार मुख, ९ चैत्य वृक्ष, १० कांटामोनुं अधोमुस थइ ज, ११ (३१४) श्रीकाललोकप्रकाश । द्रुमानति ११ दुंदुभिनाद १२ उच्चकै-र्वातोऽनुकूलः १३ शकुनाः प्रद- क्षिणाः १४ ॥९४ ॥ गंधांवुवर्ष १५ बहुवर्णपुष्प-वृष्टिः १६ कचश्मश्रुन- खाप्रवृद्धिः १७ । चतुर्विधामहँनिकायकोटि-जघन्यभावादपि पार्श्वदेशे १८ ॥ ९५ ॥ ऋतूनामिद्रियार्थाना-मनुकूलत्व १९ मित्यमी । एकोनविं- शतिदैव्या-श्चतुस्त्रिंशच मीलिताः ॥ ९६ ॥ यत्तु श्रीसमवायांगसूत्रे एतेषु केचिदतिशया अन्यथा दृश्यते तन्म- तांतरं वोद्धव्यं. चत्वारोऽतिशयाश्चान्ये तेषां विश्वोपकारिणां । पूजा १ ज्ञान २ वचो ३ ऽपाया-पगमाख्या ४ महाद्भुताः॥ ९७ ॥ अष्टकं प्राति- हार्याणां चत्वारोऽतिशया इमे । इत्येवं द्वादश गुणा अर्हता परिकी- तिताः ॥ ९८ ॥ गुणैस्ते सकलैः पूर्णा निर्विपक्षस्थितेरिव । नानास्था- नाप्तिगर्वेण त्यक्ता दोषैश्च दूरतः ॥ ९९ ॥ तथाहुः-को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणैरशेष-स्त्वं संश्रितो निरवकाशतया मुनीश ! दोपैरुपातविवि- धाश्रयजातगः स्वप्नांतरेऽपि न कदाचिदपीक्षितोऽसि ॥१००० ॥ घृक्षोनुं नमवं, १२ दुंदुभिनो नाद, १३ पयन- अनुकूळ चावं, १४ पक्षीनो प्रदक्षिणा आपे, १५ सुगंधी जळनी वर्पा, १६ वहुवर्णना पुष्पोनी वृष्टि, १७ दाढी-मुछना ने मस्तकना केश तथा नखनी प्रवृद्धि (न वधq ), १८ जघन्यथी पण प्रभु पासे चारे निकायना मळी क्रोड देवोनुं रहे भने १९ छए ऋतुओर्नु तेम ज इंद्रियार्थोनु अनुकूळ पर्व. श्रा १९ देवकत अतिशयो छ भने सर्व मळीने (४-११-१९) चोत्रीश अतिशयो थाय छे. (९९३-९६) श्री समवायांगसूत्रमा केटलाक अतिशयो वा करता जूदी रीते कहेला देखाय के ते मतांतर समज. ए विश्वोपकारी प्रभुना चार अतिशय बीजा-पूजाविशय, वचनाति- राय, ज्ञानातिशय ने अपायापगमाविशय ए नामना छे. (९९७) आठ प्रातिहार्य भने मा चार अतिशय ए ये मळीने वार अरिहंतना गुणो कहेला छे. (९९८) दोपरूप शनुनी स्थिति नहीं होवार्थी प्रभु सर्व गुणोवडे परिपूर्ण होय छे भने पोताने अनेक स्थानो मी गयेला होवायी दोपोए तो दूरथी ज तेमने तजी दीधा छे. (९९९) श्रीभक्तामरः स्तोत्रमा कए थे के-'हे मुनीश! जो कदाच समस्त गुणोए मारो निरवकाशपणे आश्रय फोलो छ तो मां शुं साधर्य छ ? केमके विविधाश्रयानी प्राप्तिवडे थयो के गर्व जेने एमा दोषोए मापने स्वप्नातरमा कदाचिद् जोया पण नथी. (१०००) सर्ग ३० मो। दोषास्तीर्थकृतां यद्य-प्यनंता विलयं गताः । तथाप्यग्रेसरास्तेषा- ममी ह्यष्टादशोदिताः ॥ १००१ ॥ अंतराया ५ दान १ लाभ २-वीर्य ३ भोगो ४ पभोगगाः ५। हासो ३ रत्य ७ रती ८ भीति ९-र्जुगुप्सा १० शोक एव च ११ ॥ २॥ कामो १२ मिथ्यात्व १३ मज्ञानं १४ निद्रा १५ चाविरति १६ स्तथा । रागो १७ द्वेषश्च १८ नो दोषा-स्तेषामष्टाद- शाप्यमी ॥ ३ ॥ हिंसा १ ऽलीक २ मदत्तं च ३ क्रीडा ४ हास्या ५रती ६ रतिः ७। शोको ८ भयं ९ क्रोध १० मान ११-माया १२ लोभा १३ स्तथा मदः १४॥ ४॥ स्युः प्रेम १५ मत्सरा १६ ज्ञान १७-निद्रा १८ अष्टादशेत्यमी । द्वेधापि सप्ततिशत-स्थानके प्रतिपादिताः॥५॥ जिनाश्च विहरत्येते भूमौ विश्वोपकारिणः।भाविभद्रेपु देशेषु भाग्यवल्लो- कशालिपु॥६॥श्राद्धाश्च चक्रवर्त्याद्या-स्तेषां विहरतां सुखं। उदंतशंसिनां नृणां वृत्ति यच्छंति वार्षिकी ॥७॥ अर्हत्सुखविहारादि प्रत्यहं ते परापराः । पाचक्षते स्वनाथेभ्योऽधिकृतास्तत्र कर्मणि लक्षाणि स्वर्णटंकाना- मद्वय नि त्रयोदश । वृत्तिदानं नियुक्तानां ददते चक्रवर्तिनः ॥९॥ वासु- ए परमात्मामाथी अनंता दोपो जो के नाश पामेला छ तथापि दोपोना अग्रेसर तरीके था अढार दोषो ज गयानुं कहेलुं छे.-१ दानांतराय, २ लामांतराय, ३ भोगांतराय, ४ उपभोगांतराय, ५ वीयांतराय, ६ हास्य, ७ रति, ८ अरति, ९ भय, १० शोक, ११ जुगुप्सा, १२ काम, १३ मिथ्यात्य, १४ अज्ञान, १५ निद्रा, १६ अविरति, १७ राग भने १८ द्वेप. तीर्थकरोमा पा अढारे दोप होता नथी. (१००१-३) पीजी रोते पण १८ दोष कह्या छे ते पा प्रमाणे-१ हिंसा, २ अलीक, ३ अदत्त, ४ क्रीडा, ५ हास्य, ६ रति, ७ अरति, ८ शोक, ९ भय, १० क्रोध, ११ मान, १२ माया, १३ लोम, १४ मद, १५ प्रेम, १६ मत्सर, १७ प्रज्ञान अने १८ निद्रा-या पन्ने प्रकारना श्रढार दोपो सप्तति- शतस्थानक ग्रंथमा प्रतिपादन करेला छे. (४-५) विश्वोपकारी एका ए प्रभु पृथ्वीपर भाविभद्र अने भाग्यवंत लोकोवाळा देशोमा विहार करे छे. (६) सुसेथी विहार करता प्रभुना वृत्तांतने कहेनारा माणसोने चक्रवर्ती विगेरे थारको वार्षिक भाजीविका करी प्रापे ले (७) तेथी अरिहंतना सुखविहारादिना समाचार ते कार्यमा जोडेला अनुचरो दररोज पोताना स्वामीने प्राप्या करे छे. (८) तेमा चक्रवर्ती ते कार्यमा जोडेल अनुचरने साडापार लाख सोनयानी भाजीविका करी आपे .. - (३१६) श्रीकाललोकप्रकाश । देवास्तु रौप्याणां लक्षाः सा स्त्रयोदश । दद्युडिलिकाः सार्धी-स्त्रयो- दश सहस्रकान् ॥१०॥ अहंदागमनोदतं यदा यः कोऽपि शंसति ।प्रीति- दानं तदा तस्मै ददते चक्रवर्तिनः ॥ ११ ॥ कोटीस्त्रयोदशाद्वय ः सौवर्णानां प्रमोदतः । वासुदेवास्तु रौप्याणां कोटीः सार्धास्त्रयोदश ॥१२॥ दद्युर्मांडलिका रौप्य-लक्षाः सा स्त्रयोदश । परेऽपि ददते लोकाः शक्तिभक्त्यनुसारतः॥ १३ ॥ एवं विहृत्य भूपीठं भव्यजीवान् विवोध्य च । निजायुःप्रांतसमये- ऽनशनं कुर्वते जिनाः ॥१४॥ तदा केचिद्गणधराः केचनान्येऽपि साधवः । कुर्वत्यनशनं सार्द्ध स्युः प्राप्तावसरा यदि ॥ १५ ॥ ततोऽधिरुह्य शैलेशी सर्वकर्मक्षयक्षणे । संप्राप्य शाश्वतं स्थानं निर्वाधाः सुखमासते ॥ १६ ॥ क्षणं तदाधकारः स्या-द्यतो लोके भवेत्तमः । विच्छेदे जिनतद्धर्म-पूर्व- श्रुतहविर्भुजाम् ॥ १७ ॥ तत्रैव समये सर्वे देवेंद्राश्चलितासनाः ज्ञावाह- निर्वृतिं ज्ञाना-द्वदंत्येवं विषादिनः ॥ १८ ॥ हा! निवृता जगन्नाथा जग- छे. (९) वासुदेव साडापार लाख रुपैयानी करी पापे छे, अने मांडलिको साडावार हजार रुपैयानी करी श्रापे छे. (१०) हवे अरिहंत पधार्यानी पधरामणी जे कोइ चक्रवर्तीने आपे छ तेने ते प्रीतिदान तरीके साडावार क्रोड सोनया हर्पथी थापे थे. वासुदेव साडाबार क्रोड रुपैया मापे छ (११-१२) अने मांडलिक साडापार लाख रुपैया पापे के तथा वीजा लोको पण पोवानी शक्ति ने भक्ति अनुसार प्रापे छे. (१३) आ प्रमाणे भूपीठ उपर विचरी अनेक भव्यजीवोने प्रतिबोध पमाडी पोताना पायु- व्यना अंत समये जिनेश्वर अनशन करे छे. (१४) ते वसते जो पोताने पण अंत्य अवसर प्राप्त थयो होय तो केटलाक गणधरो म ज केटलाक साधुनो पण प्रभुनी साथे प्राशन करे छे. (१५) पछी सर्व कर्मना क्षयने समये शैलेशीकरणपर श्रारूढ धइने शाश्वत स्थानने पामीने प्रश्न निर्वाध थया सता सुखमा वसे छे.(१६) ते वसवे क्षणमात्र सर्व लोकमा अंधकार पसरे थे, कारण के जिनेश्वर, वेनो धर्म अने पूर्वश्रुतरूप अमिनो विच्छेद थवाधी अंधकार थाय ज. (१७) ते समये सर्व देवेंद्रो आसन चलित थवाथी भरिहंतनो निर्याणममय अवधिज्ञानवडे जाणीने विषाद पाम्या सता या प्रमाणे कहे थे (१८) के-'हा इति रोदे। जगवना नाथ, जगतने प्रकाश पापवामा पूर्व समान एवा प्रमु निर्वाण पाम्या, वो हवे अमारे उतावळे जाने वैमनो निर्वाण महोत्सव करवो जोइए. ( १९) मा प्रमाणे कही पादुका सर्ग ३० मो। (३१७). द्दीपनभास्कराः । तदस्माभिर्दुतं कार्य-स्तन्निर्वाणमहोत्सवः ॥ १९ ॥ इत्युक्त्वा पादुके त्यक्त्वा पूर्ववद्विधिपूर्वकं । तत्रस्था एव वंदंते भावतो जिनभूधनान् ॥ २० ॥ निर्जीवान्यपि वंदंते वपूंपींद्रा यदहतां । तदद्रव्य- निक्षेपो वंद्यः सम्यग्दृशामिति ॥ २१ ॥ सामानिकादिनिःशेष-परि- च्छदसमन्विताः । ततस्ते दिव्यया गत्या निर्वागास्थानमहतां ॥ २२ ॥ उपेत्याश्रुविमिश्राक्षा विपादविधुराननाः । निरानंदा निरुत्साहाः शोच-. तश्च मुहुर्मुहुः ॥ २३ ॥ तिस्रः प्रदक्षिणाः कृत्वा नत्वा च भगवत्तनूः । नात्यासन्ना नातिदूर-देशस्थाः पर्युपासते ॥ २४ ॥ धर्मभृत्यान् कुतो नास्मा-नीक्षसे नाथ पूर्ववत् । अकांडेऽयं किमा- रब्ध-स्त्यागोऽस्माकं निरागसां ॥२५॥ किमारमंभरिता युक्ता विश्वे- शानां भवाशां । अनंतसुखसाम्राज्यं भुज्यतेऽस्मान् विहाय यत् ॥ २६ ॥ वयं क्व यामः किं कुर्मो व्याकुलाश्चिंतयानया । त्यजतैकपदे स्वामिन् ! निरालंवाः कृतास्त्वया ॥ २७ ॥ अद्यारम्यमिदं नाथ जातं क्षेत्रं त्वया तजी पूर्वनी जेम विधिपूर्वक त्यां रह्या सता ज प्रभुना शरीरने भावपूर्वक वंदन करे. (२०) निर्जीव एवा अरिहंतोना शरीरने इंद्रो पण नमस्कार करे छे, ते उपरथी अरिहंतनो द्रव्यनिषेपो सम्यग्दृष्टिने चंदनीय छे, एम सिद्ध थाय छे. (२१) पछी इंद्रो पोताना सामानिक विगेरे सर्वे देवो सहित दिव्यगतिवडे ज्यां अरिहंतनुं निर्वाणस्थान छे त्यां आवीने अश्रुमिन नेत्रवाळा, विपादथी विधुर मुखवाळा, निरानंदी, निरुत्साही भने वारंवार शोक करता सता भगवंतना शरीरने त्रण प्रदक्षिणा दइ नमीने नहीं अति नजीक थने नहीं अतिदूर एम बेठा सता सेवा करे. (२२-२४) अने कहे के- " हे नाथ ! अमे आपना धर्मसेवको छीए, अमारी सामु तमे पूर्ववत् केम जोता नथी ? अकाळे श्रमारा जेवा निरपराधीनो त्याग केम करो छो ? (६५) शुं तमारी जेवा विश्वे- धरने मात्मभरिता युक्त छ जेथी भा अनंतसुखनु साम्राज्य अमारा विना-ममने मूकीने मोगयो छो (२६) हे प्रभु ! अमे तमारा विना क्या जइए ? शुं करीए १ प्रावी चिंता: बडे भ्याकुळ एवा अमने हे स्वामिन् ! एकदम तजी देवाथी तमे निरालंपी बनावी दीधा 2. (२७) भाजधी मांडीने या क्षेत्र हे स्वामिन् ! तमारा विना दीपक विनानी रात्रि जेवू भने सूर्य विनाना आकाश जेधु थइ गयुं थे. (२८) हे स्वामिन् ! समवसरणमा (३१८) श्रीकाललोकप्रकाश। विना । निश्यस्तदीपगृहव-द्गनादित्यांतरिक्षवत् ।। २८ ॥ स्वामिन् भवंतं समव-सरणस्थं महाश्रियं । स्मारं स्मारं मुहुर्वक्षो दीर्यते शतधाद्य नः ॥ २९ ॥ भवान् यद्यपि हे स्वामि-ननंतसुखभागभूत् । विशाचामस्तथा- प्येवं वयं स्वार्थाय केवलं ॥ ३०॥ शकोऽथ विलपन्नेवं निर्जरैराभियोगिकैः । गोशीपचंदनैधांसि बहू- न्याह(हा)रयेद्रयात् ॥३१॥ ततस्तैनंदनानीतै-श्चंदनौधैश्चितात्रयं । अर्हता च गणीनां च कारयेद्यतिनामपि ॥ ३२॥ तत्र प्राच्यां भगवतां चिता भवति वर्तुला । याम्यां गणभृतां व्यस्रा प्रतीच्यां यतीनां पुनः ॥ ३३॥ चतुरस्रा भवेच्चित्या भेदः संस्थानदिग्भवः । श्रीयावश्यकवृत्त्यादौ चिती- नामिति दर्शितः ॥ ३४ ॥ ततः क्षीरार्णवानीतैः क्षीरैर्भगवतां तनूः । स्नपयित्वाथ गाशीर्ष-चंदनेनानुलिप्य च ॥ ३५॥ परिधाप्योत्तमं हंस- लक्षणं पटशाटकं । वज्रभृत्कुरुते भक्त्या सर्वालंकारभूपिता ॥ ३६ ॥ अन्ये च देवा गणभृ-दपि विधिनामुना । परे मुनिशरीराणि स्नपयं- पेठेला भने महाशोभावाळा आपने वारंवार संभारी संभारीने अमारुं वक्षस्थळ सो मागवालं थह जाय छे. (२९) हे भगवन् ! जो के तमे तो अनंत सुखना माजन थया छो परंतु श्रमे अमारा केवळ स्वार्थने माटे आ प्रमाणे शोक करीए छीए. (३०) था प्रमाणे विलाप करता शकेंद्र पोताना आमियोगिक देवनी पासे तत्काळ घणा गोशीर्ष चंदनना काष्ठो मगावे. (३१) पछी नंदनवनमाधी लावेला चंदनना काठघडे प्रण चितामो-एक अरिहंत माटे, एक गणघरो माटे अने एक सामान्य मुनिओ माटे रचावे. (३२) तेमा पूर्व बाजुए भगवंत माटेनी चिता गोळ करावे, दक्षिणे गणधरी माटेनी चिता तिखुणी करावे अने पश्चिमे मुनियो माटेनी चिता चोसुणी रचावे. पा चितानी दिशानो ने श्राकृतिनो भेद श्री आवश्यकत्ति विगेरेने अनुसारे बतावेल छे. (३३-२४) पली धीरसमुद्रमाथी मंगावेला जळरडे प्रभुना शरीरने स्नान करावी गोशीपचंदनवडे विलेपन करे. (३५) पछी हंसना चिरचालं पटशाटक प्रभुने परावीने प्रभुना शरीरने सर्व अलंकारथी विभूपित इंद्र पोवे भक्तिवडे करे. ( ३६ ) वीजा देवो ए ज विधि प्रमाणे रोना शरीरने अने अन्य देवो सामान्य मुनिमोना शरीरोने स्नान कराची विलपेन करे. (३७) पछी इंद्रनी आज्ञाथी देवतायो प्रण शिपिकामो तैयार करे-तमा एक शिवि- . मग ३० मो। त्यर्चयंति च ॥ ३७॥ अथेंद्रवचनात्तिस्त्रः शिविकाः कुर्वते सुराः। तत्रै कस्यां जिनांगानि शक्रः स्थापयति स्वयं ॥ ३८॥ गणीनां च मुनीनां च परस्मिन् शिविकाद्वये। स्थापयंति परे देवा-स्ततः शक्रसुरा अपि ॥३९॥ भक्त्या स्वस्कंधमारोप्य शिविकाः समहोत्सवं । स्थापयत्यहंदादीनां देहां- श्चित्यानये क्रमात् ॥४०॥ ततः शक्राज्ञया वह्नि-कुमाराः साश्रुलोचनाः। विमनस्काः क्षिपत्यग्नि चित्यासु तिसृषु क्रमात् ॥ ११ ॥ तथैव च ततो वायु-कुमाराः स्वःपतेगिरा । द्रुतमुज्ज्वालयंत्यग्नि पवमानैविकुर्वितैः ॥ ४२ ॥ ततश्चतुर्विधा देवा अाजसा वज्रपाणिना। तुरुष्ककाकतुंडादि- भारान् सारान् सहस्रशः ॥ ४३ ॥ कुंभान् मधुघृतानां च जुहुयुर्वनिदी- तये । ततोंगेष्वस्थिशेपेषु संस्कृतेपु हविर्भुजा ॥ ४४ ॥ निर्वापयंति जीमूत-कुमारा वासवाज्ञया । क्षीरोदादाहृतैः क्षीर-कल्पनीरौश्चिताश्च ताः ॥ ४५ ॥ त्रिभिर्विशेषकम् ततश्च-याम्यामूलस्था जिनानां दाढां गृह्णाति वनभूत् । चमरेंद्रो- ऽधस्तनी तां तत्तद्दिश्याधिपत्यतः ॥ १६ ॥ वामामुपरिगां दाढा-मिंद्रो कामा प्रभुना शरीरने इंद्र पोते पधरावे (३८) अने वीजी शिषिकामां गणधरोना अने मुनिओना शरीरोने देवताओ पधरावे. पछी इंद्र अने देवतानो भक्तिथी ते शिविका पोताना स्कंधपर उपाडीने महोत्सवपूर्वक चिता पासे लावे अने त्यां शिविका नीचे मूकी तेमांधी प्रभुना शरीरने इंद्र पोते चितामां पधरावे अने पीजी बे शिपिकामांथी गणधरोना ने मुनिश्रोना शरीरो अन्य देवो उपाडीने चितामा पधरावे (३९-४०) पछी इंद्रनी प्राज्ञाथी श्रासमा सुवाळा अग्निकुमारना देवो विमनस्कपणे त्रणे चितामा अनुक्रमे अग्नि प्रग- टाये (४१) तेवी जरी वायुकुमारना देवो इंद्रनी श्राज्ञाथी वायु विकुर्वे अने ते वायुवडे अग्निने शीघ्र सळगावे (४२) पछी इंद्रे आज्ञा करेला चारे निकायना देवो तुरुष्क, काकतुंड चिगेरे सुगंधी द्रव्यो हजारो भार जेटला ते चितामा क्षेपवे, (४३) म ज मधु अने घृतना घडामो पण श्रग्निने वधारे प्रदीप्त करवा माटे क्षेपवे. पछी ज्यारे अस्थि सिवायर्नु सर्व शरीर अग्निवडे बळी जाय स्यारे इंद्रनी श्राज्ञाथी मेघकुमारना देवो क्षीरसमुद्रमांधी लावेला दीरसदृश जळवडे ते प्रण चिताओने शांत करे (४४-४५) पछी जिनेश्वरनी दक्षिण (जमणी) बाजुनी उपरनी दाढा शकेंद्र ग्रहण करे अने ते पाजुनी नीचेनी दाढा चमरेंद्र ग्रहण करे, ए ने दक्षिण दिशाना स्वामी होवाथी वे (३२०) श्रीकाललोकप्रकाश। गृह्णातिं शूलभृत् । वलींद्रश्चाधस्तनी तां शेषाः सर्वे सुरासुराः॥४७॥ अस्थीन्यथांगोपांगानां सर्वाण्याददते मुदा। अहद्भक्त्यनुरागेण केचि- केचिच्च जीततः॥ १८॥ पूर्व माहात्म्यमेतेषां क्षेत्रलोके निरूपितं । ग्रंथांतरे प्रसिद्धोऽय-मपि हेतुनिशम्यतां ॥ ४९ ॥ पूति सुरा ताओ श्रह कोइ पराभवं जइ करेजा । तो परकालिश्र ताो सलिलेण करंति निअरकं ॥ ५० ॥ यास्तां त्रिजगदाना-मस्थिग्रहणमर्हतां । सुरा प्राददतेऽस्थीनि योगभृच्चक्रिणामपि ॥ ५१ ॥ इत्यर्थतो जंबू प्र० वृ०। चिताभस्मापि गृहंति शेषं विद्याधरादयः। सर्वोपद्रवनिर्नाश-विधौ परममौषधं ॥ ५२ ॥ रजस्यपि गृहीतेऽस्मा-दहपूर्विकया नरैः। गर्ता भवत्यखातैव चितास्थाने ततोऽर्हतां ॥ ५३ ॥ मा भूदपरलोकांति- स्पर्शादाशातनेत्यथ । सातत्येन च तीर्थस्य प्रवृत्तिर्भवतादिति ॥ ५४॥ रत्नैरापूर्य तां गर्ता रचितं रत्नकांचनैः । कारयत्यहतां चैत्यस्तूपं प्रमाणे करे. (४६) डाची बाजुनी उपरनी दाढा ईशान इंद्र ग्रहण करे भने बलीद्र ते बाजुनी नीचेनी दाढा ग्रहण करे, बाकीना वीजा देवताओ प्रभुना अंगोपांगना सर्व अस्थिभो हर्पथी ग्रहण करे. तेमां केटलाक अरिहंतपरनी भक्तिना अनुरागधी अने केट- लाक पोतानो प्राचार छ एम मानीने ग्रहण करे, (४७-४८) एनुं माहात्म्य प्रथम क्षेत्र- लोकमा यतावेलुं छे. ग्रंथांतरमा पण प्रसिद्ध एवो तेनो हेतु श्रा प्रमाणे बतायेलो के वे सामळो (४९) देवतानो तेने पूजे के भने कोइ अन्य देव तेनो पराभव करे तो तेचे प्रसंगे वेर्नु प्रक्षालन करीने ते जळवडे पोतानी रक्षा करे छे.' (५०) श्री जयूद्वीपप्रज्ञ- तिनी वृत्तिमा कयु के के-'त्रण जगतना पूजनिक रिहंतना अस्थिने देवो ग्रहण करे छ ते यात याजुपर रहो; योगधारी चक्रवर्तीना स्थिोने पण देवो ग्रहण करे छे. (५१)' विद्याधरो विगेरे चितानी चाकी रहेली मस्म पण ग्रहण करे छ, कारण के ते सर्व उपद्रवोनो नाश करवामां परम औपधरूप छे. (५२) प्रांत तेनी रज पण पीजा सामा. न्य मनुष्यो 'हुँ पहेलो हुँ पहेलो' एम बोलता ग्रहण करे छे के जेधी अरिहंतनी चिताने ठेकाणे सोचा पिना ज साटोपही जाय छे (५३) पछी 'अन्य जनोना चालवायी या भूमिनी थाशावना न यायो' एम विचारीने तेमज ' सततपणे ही तीर्थनी प्रति थामो' एम पारीने इंद्र सुरासुर पासे रत्नोपटे ते साटो पूरावीने तेनी उपर रन- सर्ग ३० मो। (३२१) शक्रः सुरासुरैः ॥५५॥ गणी(णि)नां च मुनीनां च चित्यास्थानक- योरपि । शक्रः स्तूपौ कारयति रत्नस्वर्णमणीमयौ ॥५६॥ एवं चतुर्विधा देवा निर्वाणस्य महोत्सवं । यथोचितं विदधते भक्तिनिर्भरचेतसः॥५७॥ ततो नंदीश्वरे गत्वा विधायाष्टाहिकोत्सवं । यति स्वस्वविमानेषु यथा- स्वं भवनेषु च ।। ५८ ॥ सुधर्माख्यसभावर्ति-चैत्यस्तंभावलंबिपु । समु- द्गकेषु यान्यास-नस्थीनि प्राक्तनास्तां ॥ ५९ ॥ तान्यर्चयंति संस्थाप्य सिंहासने समुद्गकान् । समुद्गकेषु तेष्वेव सद्यस्कानि क्षिपति च॥६०॥ ततोऽभ्यर्च्य पुनः स्तंभे लंवयंति समुद्गकान् । चैत्यदैवतवत्तानि नित्य- माराधयंति च ॥ ६१ ॥ इदमर्थतः पष्ठांगसूत्रवृत्तौ मल्लिनिर्वाणाधिकारे. सभायां च सुधर्मायां तेषामाशातनाभिया । कामक्रीडां न कुर्वति जिन- भक्ताः सुराधिपाः ॥ २॥ कालेन कियता चैते गतशोकाः सुरेश्वराः । गीतनाट्यादिसौख्यानि कांचनवडे अरिहंतनो चैत्यस्तूप करावे. (५४-५५) ते ज प्रमाणे गणधरो अने मुनियोना चितास्थाने पण इंद्र रत्न स्वर्ण ने मणिमय ये जूदा जूदा स्तूपो देवो पासे करावे. (५६) पा प्रमाणे भतिथी निर्भरचित्तवाळा चारे प्रकारना देवो यथो- चितपणे निर्वाण-महोत्सव करे. (५७) पछी त्यांथी परमार्या ज नंदीश्वरद्वीपे जइने अट्ठाइ- महोत्सव करीने सर्वे इंद्रो ने देवो पोताना विमानमा तेमज भवनमा जाय. (५८) त्यां जइने सुधर्मा नामनी समामा चैत्यस्तंभने अवलंबीने रहेला दाबडामोमा के जेमा पूर्वना थरिहंतोना अस्थिरो छे, तेनी सिंहासनपर दावडा मूकीने पूजा करे. पछी मां श्रा पसत लावेल दाढा विगैरे मुके. (५९-६० ) त्यारपछी तेनी फरी पूजा करीने ते दाबडा स्तंभ साथे लटकावेल शींकामा मूके अने तेनी देवसंबंधी चैत्यनी जेम निरंतर आराधना करे. (६१) या प्रमाणे श्रीज्ञाताधर्मकथासूत्रनी वृत्तिमा श्री मनिनाथना अधिकारमा अर्थवी कहेल छे. ए सुधर्मा समामा ते दाढानी प्राशावनाना भयथी जिनेश्वरना भक्त एवा इंद्रो कामक्रीडा करता नथी. (६२) हवे तीर्थकरना निर्वाण पाम्या पछी केटलेक काळे इंद्रो शोकरहित थाय. पली गीत- नाट्यादि संबंधी सुख भोगवता सता भानंदमा ( सुसगा) रहे (६३) -- (३२२) श्रीकाललोकप्रकाश । भुंजानाः सुखमासते ॥६३ ॥ इत्यनंतगुणरत्नशालिना-महंतामुदितमा- गमोदधेः।वर्णनं तदुरुवर्णवर्णिका-कर्णिकारविपिनप्रसूनवत् ॥ ६४ ॥ विश्वाश्चर्यदकीर्तिकीर्तिविजयश्रीवाचकेंद्रांतिष- द्राजश्रीतनयोऽतनिष्ट विनयः श्रीतेजपालात्मजः । काव्यं यत्किल तत्र वर्णितजगत्तत्वेऽद्भुतस्त्रिंशता संख्यातः परिपूर्णभावमभजत्सर्गो निसर्गोज्ज्वलः ॥६५॥ ।। इति श्रीलोकप्रकाशे त्रिंशत्तमः सर्गः समाप्तः ॥ श्रीरस्तु । या प्रमाणे अनंतगुणशाळी एवा अरिहंतोना पंचकल्याणकोनुं वर्णन भागमोमां कहेलुं छे. ते घणुं विस्तारवालं होचाथी माथी माळी जेम वाडीमाथी फूलो चीणी ले तेम पानकी तरीके ग्रहण करीने में रजु कयु छे. (६४) विश्वने आश्चर्य पमाडनार के कीर्ति जेनी एवा वाचकेंद्र श्री कीर्तिविजयना शिष्य अने राजश्री तथा तेजपाळना पुत्र श्री विनयविजये जे काव्य रच्यूं छे ते जगत्वना वर्णनवाळा या ग्रंथमा स्वभावे उज्वळ अने अद्भुत एवो पा श्रीशमो सर्ग परिपूर्णमावने पामतो हवो. (६५) इति श्रीलोकप्रकाशे सर्ग ३० समास.

(३२३) सर्ग ३१ मो। ॥ अथैकत्रिंशत्तमः सर्गः प्रारभ्यते ॥ स्वरूपमहतामेव-मुक्तं शास्त्रानुसारतः । अथोच्यते यथाशास्त्रं स्व: रूपं चक्रवर्तिनां ॥ १॥ शृंगग्राहिकया कर्म चक्रवर्तित्वसाधनं । पृथग् यद्यपि न प्रोक्तं तीर्थकृन्नामकर्मवत् ॥ २॥ तथापि-तीत्रानुभागं यत्सात- वेदनीयं घनाणुकं । उच्चैर्गोत्रं तथोत्कृष्टं नामकर्मापि तादृशं ॥३॥ लाभ: भोगादिविघ्नानां क्षयोपशमपाटवं । इत्यादिभिस्समुदितैर्जायते चक्रव- तिता ॥४॥ पूर्वोक्तविंशतिस्थानां-तर्गतैरेव कैश्चन । साधुवैयावृत्यदान. सत्तप:संयमादिभिः ॥५॥ विशिष्टाध्यवसायेन सातवेद्यादिकर्मणां । तादृशः स्यात्परीणामः प्राग्जन्मन्यार्पमेरिव ॥६॥ तथोक्तमावश्यकनि- युक्तौ-विइयो वेयावच्चं किइकम्मं तइयओ कासि । भोगफलं बाहुवलं ॥ इति. तीर्थकृन्नामहेतूनां स्थानानां ननु विशतेः । कथं चक्रित्वहेतुत्वं पटहेतुत्ववन्मृदः ? ॥ ७ ॥ अत्रोच्यते-यथैकस्माद्रसादिक्षो- नाखंड- सर्ग ३१ मो. । ए प्रमाणे शास्त्रानुसारे अरिहंतनुं स्वरूप कडं, हवे जेम शास्त्रमा कडं के तेम चक्र- व मोनुं स्वरूप कहीए छीए. (१) तीर्थकर नामकर्मनी जेम शृंगयडे ग्रहण करीने कही शकीए सेवी रीते चक्रवतीपणाना साधनभूत चक्रवर्तीनामकर्म जो के जूदु कडं नथी, (२) तथापि सातावेदनीय कर्मनो घनप्रदेशसंबंधी जे तीव्र अनुभाग म ज उत्कृष्ट एवं उच्च योन भने संधु ज श्रेष्ठ नामकर्म सेमज लाम-मोगादि अंतसय कर्मना क्षयोपशमनुं जे अत्यंत पटुपणुं इत्यादि शुभकर्मोना एकत्रपणावडे चक्रवर्तीपणुं प्राप्त थाय छे. (३-४) पूर्वोक्त पीश स्थानफनी अंदर रहेला ज केटलाक स्थानो जेमके माधुपदनी वैयावच्च तेमने दान भने संयम तथा उपादिकना याराधनवडे विशिष्ट अध्यवसाये करीने साबावेदनीय विगेरे फर्मनो मरतचक्रांना पूर्वजन्मनी जेमतेचा प्रकारनो परिणाम थाय छे. (के जेथी जीव चक्र. पापपुं पामे थे.) (५-६) श्री भावश्यकनियुक्तिमा कयु के के-'पीजा (भरतना) जीचे वैयावच करी भने त्रीजा (पारलिना) जीवे कतिकर्म कयं के जेपी मोगफळकर्म भने पाहुन पळ ते पने जीवे उपार्जन क्यु,' इति. नहीं कोई प्रश्न करे के-'तीर्थकरनाम• कर्मना देतभूत धीश स्थानको थे ते माटी जेम पटन देत (न) धाय तेम चक्रवतीपथाना हेतु शीरीवे पाय !'(७) तेने उचर प्रापे के के-'एक ज प्रकारना शेरटीना रममाधी (३२४) श्रीकाललोकप्रकाश । गुडादयः । स्युः सामग्रीभिदोऽत्रापि तथा सम्यग्विभाव्यतां ॥ ८ ॥ स्युर्यथा वैकजातीय-तंतुभ्यो विविधाः पटाः । तेयामेव वरत्रा स्या-त्सा- मयंतरभेदतः ॥ ९॥ एवं बलत्वविष्णुत्व-नृपत्वादिपदेष्वपि । भाव्यः कर्मपरीणामो-ऽध्यवसायविशेषतः॥१०॥ उद्धृत्य सर्वदेवेभ्यो धर्माया एव च क्षितेः । उत्पद्यतेंगिनश्चक्रि-तया नान्यगतेः पुनः ॥ ११ ॥ तथोक्त-सुरनेरइएहिं चि य हवंति हरिअरि- हचकिचलदेवा । चउविहसुरचकिवला वेमाणिग्र हुँति हरिपरिहा ॥११॥ इति संग्रहण्यायभिप्रायः। श्री आवश्यकनियुक्तौ तु-मनुष्यगतेरागत. स्यापि श्रीवीरस्य प्राग्भवे चक्रित्वमुक्तं, तथाहि-चुलसीइमप्पइठे सीहो नरएसु तिरियमणुएसु । पिअमित्तचक्कवट्टी मूअविदेहाइचुलसीए ॥१३॥ इति ज्ञेयं. तीर्थंकरवदेतेऽपि जातिगोत्रोन्नतिस्पृशां । वंशेषु भूभृतामेवो-त्पद्यते सामग्रीना विविधपणाथी अनेक प्रकारना खांड गोळ विगैरे पदार्थों थाय के तेम नहीं पण सम्यक् प्रकारे विचारी लेवू.' (८) वळी जेम एक ज जातना तंतु-तांतणाओषी विविध प्रकारनां वस्रो थाय छे, तेम ज सामग्रीना भेदथी दोरडामो विगैरे पण थाय छे. (९) ते ज रीते वळदेव, वासुदेव अने राजादिपणाने विषे पण अध्यवसायना विशेषप- रणाथी जूदा जूदा कर्मपरिणाम समजवा. (१०) सर्व जातिना ( चार निकायना ) देवमाथी अने पहेली नरकमाथी उद्धरीने-ज्यवीने ज जीव चक्रवर्ती थाय छे अन्य गतिमाथी थता नथी. (११) कयु छ के-देव भने नरक- रूप पे गतिमाथी ज परिहंत, चक्रवर्ती, पळदेव ने पासुदेव थाय छे. ( देवगति संबंधी विचार करता) चारे प्रकारना देवो चक्रवर्ती ने बळदेव थाय छे भने वासुदेव ने अरिहंत वैमानिकमांथी ज धाय ले. (१२) प्राप्रमाणे संग्रहणी विगैरेनो अभिप्राय थे, परंतु श्रीआव- श्यकनियुक्तिमा नो मनुष्यगतिमाथी पावेला श्री वीरप्रमुना पूर्वभवना जीवनुं चक्रवर्तीपणं कहेलुं छे. ते भा प्रमाणे-'मनुष्यपणामां चोराशी लाख वर्षतुं प्रायु मोगवी, भप्रतिष्ठान नरकवासामा (सातमी नरके ) जह, त्यांथी नीकळीने पछी सिंह, नरकमां गमन, नियंच, मनुष्य अने त्यांथी महाविदेह क्षेत्रमा मूका नगरीमा प्रियमित्र नामे चक्रवती ८४ लाख पूर्वने श्रायुपे उत्पा थया. '(१३) आप्रमाणे कहेल छे. तीर्थकरनी बेम चक्रवती पण उच्च एवा जाति ने गोग्रमा राजाना ज कुळ (वंश)मा मर्ग ३१ भो। (३२५) न त्वनीदृशां ॥ १४ ॥ तच्चतुर्दशस्वप्न-सूचितोत्पत्तयः क्रमात् । जायते जनकोनीत-प्रौढजन्ममहोत्सवाः ॥ १५ ॥ अहंद्वन्नाकनरका-गतयोश्च- क्रिणोः प्रसूः । पश्यति द्वादशे स्वप्ने विमानभवने क्रमात् ॥१६॥धान्ये- काधिकृता स्तन्ये द्वे मजनविभूपयोः। अन्योत्संगार्पणे नित्यं परा च क्रीडनादिषु ॥ १७॥ एवं च-धात्रीभिः पंचभिः पाल्य-मानाः क्लुप्तो- चिताह्वयाः। ते सुखेनैव वर्द्धते नंदनस्वर्द्वमा इव ॥ १८ ॥ साक्षीकृत्य कलाचार्य-मधीताखिलवाङ्मयाः । प्राप्ताशेपकलाश्च स्युः शस्त्रशास्त्र- विशारदाः ॥ १९ ॥ श्राद्यसंहनना श्राद्यसंस्थानाः प्राप्तयौवनाः । लक्ष. णानां सहस्रेणा-टोत्तरेण विराजिताः ॥ २० ॥ लोमभिदक्षिणावर्त रचि- तेनाधिकश्रिया । महापुरुपचिह्न श्रीवत्सेनाप्तवक्षसः ॥ २१॥ तथोक्तं श्रीजंबूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे भरतचक्रिवर्णने-' पसत्यलोमविरइय-सिरिव- च्छलछणविउलवच्छदेसे।' इति. पत्रिंशता नृपगुणे-स्ते प्रशस्तैरलं. कृताः । राज्य क्रमावर्द्धमानं पालयंति क्रमागतं ॥ २२ ॥ उत्पम थाय छे. हलका जाति, कुळ के वंशमा उत्पन्न थता नथी. (१४) अरिहंतनी मातानी जेम ज चक्रवर्तीनी माता पण १४ स्वप्नो जुए छे, अने ते जीव गर्भमा उत्पन्न थाय छे. ते जन्मे छे त्यारे तेना पिता घणो श्रेष्ठ जन्म-महोत्सव करे छे. (१५) भरिहंतनी जेम चक्रवर्तीनी माता पण जो ते पुत्र नरकमांथी पावेल होय तो पारमे स्वप्ने भुवन देखे भने स्वर्गथी भावेल होय तो विमान देश छे. (१६) ते पुत्रने एक धात्री स्तनपान करावे थे, पीजी मज्जन (स्नान) करावे छ, त्रीजी वस्त्राभूपण पहरावे थे, चौथी सोलामा साडे भने पांचमी तेने रमाडवामां तत्पर रहे थे, (१५) या प्रमाणे पांच धावमातावडे पापमान होप छे. तेनु यथोचित नाम पाडवामा पाने के अने नंदनानमा रहेला कल्प. पृषोनी जेम सुसे सुसे वृद्धि पामे छे. (१८) पछी फळाचार्यने साची रूप ज करीने सर्व शानो अभ्यास करे थे, अने समस्त फळामो मेळवीने शस्त्रना शास्त्रमा विशारद थाय . (२९) मो प्रथम संपयणवाळा, प्रथम संस्थानवाला होप 2. अनुक्रमे योयना- यस्या पामे के एटले एक हजार ने आठ लषयोबडे युक्त थाय . (२०) दक्षिणावर्वलोम (रोम)बहे जेनी अधिक शोमा रचायेली होय छे, एवा महापुरुषना चिन्हरूप श्री. पत्सवडे तेमनुं पचास्थळ शोभित होय छे. (२१) भी जंयूद्वीपप्रशप्तिस्त्रमा श्रीमरवच- श्रीना पर्णनमां का{थे के-'प्रशस्त लोमपी विरचित भीयत्मना चिन्हयी विपुळ पघा. प्रदेशपाळा. ' राजाभोना प्रशस्त एवा ३६ गुणोपडे तेभो मलंगत होय छ भने अनुक्रमे पृदि पामता एवा क्रमागत राग्यने मी पाळे छे. (२२) (३२६) श्रीकाललोकप्रकाश । पत्रिंशतं नृपगुणांश्चैवमाहुः–अव्यंगो १ लक्षणैः पूर्णो २ रूपसं. पत्तिभृत्तनुः ३ । श्रमदो ४ जगदोजस्वी ५ यशस्वी च ६ कृपालुहृत् ७ ॥ २३ ॥ कलासु कृतकर्मा च ८ शुद्धराजकुलोद्भवः ९ । वृद्धानुग १० स्त्रिशक्तिश्च ११ प्रजारागी १२ प्रजागुरुः १३ ॥ २४ ॥ समर्थनः पुमर्थानां त्रयाणां सममात्रया १४ । कोशवान् १५ सत्यसंधश्च १६ । चरदृग् १७ दूरमंत्रदृग् १८ ॥ २५ ॥ श्रासिद्धि कर्मोद्योगी च १९ प्रवीणः शस्त्र २० शास्त्रयोः २१ । निग्रहा २२ नुग्रहपरो २३ निलंचं दुष्टशिष्टयोः ॥ २६ ॥ उपायार्जितराज्यश्री २४-नौंडो २५ ध्रुवं जयी २६ । न्यायप्रियो २७ न्यायवेत्ता २८ व्यसनानां व्यपासकः २९ ॥ २७ ॥ अवार्यवीर्यो ३० गांभीर्यो ३१-दार्य ३२ चातुर्य ३३ भूषितः । प्रणामावधिकक्रोधः ३४ तात्त्विकः ३५ सात्त्विको ३६ नृपः ॥ २८ ॥ तथा च सूत्र- छत्तीसाहि य पत्थिवगुणेहिं संजुत्ते' इति. एवं गच्छति कालेऽस्य प्रादुर्भवति कर्हिचित् । चक्रमायुधशालायां राजाना छत्रीश गुणो श्रा प्रमाणे कहा छ.-१ व्यंगताविनाना, २ लक्षणोक्डे पूर्ण, ३ रूपसंपत्तियुक्त शरीरवाळा, ४ मदविनाना, ५ जगतमा पराक्रमी गणाय तेवा, ६ यशस्वी, ७ कृपाल हृदयवाळा, ८ सर्व कळा अने कर्मोने जाणनारा ( कळायोने विपे निपुण), ९ शुद्ध राजकुळमा उत्पन्न थयेला, १० वृद्धना अनुयायी, ११ प्रण प्रकारनी (प्रस, मंत्र अने उत्साह नामनी ) शक्तिवाळा, १२ प्रजापर रागी, १३ प्रजाना गुरु (पितातुन्य), १४ समानपणे त्रणे पुरुषार्थने साधनारा, १५ भंडारथी भरपूर, १६ सत्यप्रतिज्ञावाला, १७ चर पुरुषोरूप दृष्टिवाळा, १८ लांघो विचार करवायाळा, १९ कार्यनी सिद्धि थाय त्यां सुधी उद्यम करनारा, २० शस्त्रमा प्रवीण, २१ शास्त्रमा प्रवीण, २२-२३ दुष्ट भने शिष्ट जनोनो निष्पक्षपातपणे निग्रह-अनुग्रह परवामां तत्पर, २४ साम, दाम, दंड अने भेद- उपायबडे उपार्जन करेल राज्यलक्ष्मीवाळा, २५ दानवीर, २६ नियये जय मेळवनार, २७ न्यायप्रिय, २८ न्यायवेत्ता, २९ व्यसनोने तजी देनार, ३० अवार्य वीर्यवाळा, ३१ गांभीर्य, ३२ औदार्य, ३३ चातुर्यथी भूपित, ३४ प्रणामपर्यंत ज क्रोध रामनारा लेम ज ३५-३६ नापिक ने साचिक. ( २३-२८) या संबंधां कष्टुं छे फे-'छत्रीश राज- गुणोए करीने संयुक्त ' इति. या प्रमाणे (सुखमा ) काळ व्यतीत थते सते अन्यदा तेनी आयुधशाळामा पक- .

सर्ग ३१ मो। (३२७) प्राच्यं पुण्यमिवांगभृत् ॥ २९ ॥ इदं प्रायोऽस्त्रशालायां स्यादन्यत्रापि कस्यचित् । यथाभवत्सुभूमस्य स्थालमेव तदात्मकं ॥३०॥ ततश्चायुध- शालाया अध्यक्षो मुदिताशयः । चक्ररत्नं नमस्कृत्य निवेदयति भूपतेः ॥ ३१ ॥ तदाकर्ण्य प्रमुदित-स्तदाशाभिमुखं नृपः । पदान्युपेत्य सप्ताष्टौ चक्ररत्नं नमस्यति ॥ ३२ ॥ प्रीतिदाने मौलिवर्ज दत्ते सर्वांगभूपणं । वित्तं चास्मै जीविकाह सत्काराहांशुकादि च ॥ ३३ ॥ ततः स्नात्वात- सर्वार्चा-हद्रव्यः सपरिच्छदः । उपेत्यायुधशालायां विधिना चक्रमंचति ॥३४॥ ततः सोऽष्टादश श्रेणी-राहूयेत्यादिशेत्पुरे । महिम्ने चक्ररत्नस्य कुरुताप्ताहिकोत्सवं ॥ ३५॥ अर्हरिपतृकृतो योऽहं-जन्मन्युक्तो महो- सवः । यथार्ह सोऽनुसंधेय इहाप्यष्टाहिकोत्सवे ॥ ३६ ॥ अष्टादश श्रेणीश्चैवमाहुः-कुंभार १ पट्टइल्ला २ सुवण्णकारा य ३ सूव- कारा य ४। गंधव्वा ५ कासवगा ६ मालाकारा य ७ कच्छकरा ८ रत्न पूर्वभवतुं पुण्य अंग धारण करीने जाणे श्राव्युं होय तेम उत्पन्न थाय छे. ( २९) था चक्र प्रायः भस्त्रशाळामा ज प्राप्त थाय थे. कोइने अन्यत्र पण थाय छे. जेम सुभूम- चक्रवतीने थाळने ज आंगळी उपर फेरववाथी ते चक्ररूप थइ गयुं हतुं तेम. (३०) ते वसते आयुधशाळानो अधिकारी हर्पित थइने चक्रवर्ती पासे जइ नमस्कार करीने चक्ररत्न उत्पन्न थयार्नु निवेदन करे छे. (३१) तेनी वात सांभळीने हर्ष पामेल राजा ते दिशानी सन्मुख सात-पाठ पगला जइने चक्ररत्नने नमस्कार करे छे, (३२) पछी प्रीतिदानमा मुकुट विनाना वीजा यधा भाभूपणो राजा ने भाप छ भने जीवितपर्यंतनी भाजीवि- काने योग्य द्रव्य श्रापे छे, तेमज सत्कारने योग्य भन्य वस्त्रादिक आपे छे. (३३) त्यार- पछी राजा स्नान करीने पूजाने योग्य सर्व द्रव्यो लइ परिवारसहित आयुधशाळामा भावे छ भने विधिपूर्वक चक्रनी पूजा करे छे. (३४) पछी अढारं श्रेणियोने पोलादीने हुकम करे ? के-'पाखा नगरमा चक्ररत्ननो महिमा करवा माटे अष्टाहिका महोत्सव करो.' (३५) अरिहंतना जन्म वसते अरिहंतना पिता जेवो महोत्सव करे थे, जेनी हकीकत पूर्वे कहेली छे ते प्रमाणेनो अष्टाहिकोत्सव नहीं पण यथायोग्य रीचे जाणी लेवो. (३६) भदार श्रेणि मा प्रमाणे-कुंमकार १, पटेल २, सुवर्णकार ३, सुपकार ४, गंधर्व ५, काश्यप (वायंद) ६, माळाकार ७, कच्छकार ८, तंबोळी ९-या नव नारुक कया १ घुमार २ फगयी (खेहुत ) ३ सोनी ४ रसोया ५ गानारा ६ पाणंद ७ माळी र कालीया ९ योनी.

(३२८) श्रीकाललोकप्रकाश। ॥ ३७॥ तंबोलिया य ९ एए नवप्पयारा य नारुपा भणिया । ग्रह णं णवप्पयारे कारुश्रवणे पवक्खामि ॥ ३८ ॥ चम्मयर १ जंतपीलग २ गंच्छिय ३ छिपयग ४ कंसकारा य ५। सीवग ६ गुबार ७ भिल्ला ८ धीवर ९ वण्णाइं अट्ठदस ॥ ३९ ॥ चित्रकारादयस्त्वेतेष्वेवांतर्भवंति. मुदापौरजनैः क्लृप्ते समातेऽष्टाहिकोत्सवे । निर्गत्यायुधशालाया-श्व- क्ररत्नं महोज्ज्वलं ॥४०॥व्योम्ना संचरते दिव्य-वायवाचालितांवरं। अधिष्ठितं सहस्रेण यक्षाणां वीक्षितं जनैः॥४१॥ नगर्यास्तच्च निर्गत्य प्रतिपक्षभयंकरं । प्रतिष्ठते मागधाख्य-तीर्थाभिमुखमुद्धतं ॥४२॥ तत- श्वक्रयपि सन्ना चतुरंगचमूवृतः। अनुगच्छति तच्चक्र भेरिमुखरितांवरः ॥४३॥ प्रमाणांगुलजातैक-योजनप्रमिता भुवं । अतिक्रम्य स्थितं तच्च प्रयाणस्यादिमेऽहनि ॥४॥ क्षेत्रमेतावदेवाति-कामति प्रतिवासरं। सुखिनो हि तथैव स्यु-बहुसैन्यचमूचराः ॥१५॥ चक्रिणां भरतादीनां छे. हवे नव प्रकारना कारुकनुं वर्णन कहुं छु. १ चर्मकार, २ यंत्रपीलक, ३ गंठीक, छीपा, ५ कंसारा, ६ सीक्ग, ७ गुभार, ८ भिल्ल ने ९ धीवर- प्रमाणे १८ वर्ण जाणी लेवा. (३७-३९) चित्रकार विगेरेने एनी अंतर्गत समजी लेवा. नगरजनोए हर्षपूर्वक करेलो अष्टाहिकोत्सव पूर्ण थये सते महा उज्वळ ए, चक्र- रत्न आयुधशाळानी यहार नीकळे छे. (४०) अने ते चक्र दिव्य वाजिबोबडे वाचाळ थयेला श्राकाशमा चाले थे. एक हजार यक्षोए अधिष्ठित एवा तेने सर्व लोको जुए छे. (४१) पछी प्रतिपक्षीने भयंकर एवं हे चक्ररत्न नगरीनी बहार नीकळीने मागधनामा तीर्थनी सन्मुख उत्कटपणे (आकाशमार्गे) गमन करे छे. (४२) त्यारपछी चक्रवर्ती पण सारी रीते सन्नद्धयद्ध थइने चार प्रकारनी सेनाथी परिवर्या सता मेरी विगेरे वाजित्रोवडे आकाशने पूरता चक्रनी पछवाडे चाले छे. (४३) प्रयाणने पहेले दिवसे प्रमाणांगुलप्रमित एक योजन पृथ्वीनुं अतिक्रमण करीने चक्र स्थिर थाप छे. (४४) दररोज चक्र एटली पृथ्वीनुं ज अतिक्रमण फरे छे-एटले पुष्कळ सैन्यमा रहेनारा सैनिको पण एटलं चालवाथी ज सुखी रहे थे. (४५) मरतादि पक्रवर्तीना मोटा देहवाळा १ मोची २ पांची ३ गुंथनार (पटवा ) ४ रंगनारा ५ कंसारा ६ सीवनार (रजी) ७ गोवाळ ८ भिन्न ९ माछीमार.

सर्ग ३१ मो। (३२९) महादेहा नरादयः । सुखेन क्षेत्रमेताव-निर्वहंति स्वशक्तिः ॥ १६ ॥ चक्रिणामितरेषां तु हीयमानांगशक्तयः ॥ इयत्क्षेत्र निर्वहंति नित्यं दैवत- शक्तितः ॥ १७ ॥ अनुगंगासरित्कूलं गच्छन् दक्षिणेपार्श्वतः। तत्रत्यान् सेवकीकुर्वन् देशग्रामपुराधिपान् ॥ ४८॥ प्रतीच्छन् प्राभृतान्येपा--मनु- यातश्च तैर्नृपः। श्रारान्मागधतीर्थस्य स्कंधावारं निवेशयेत् ॥ ४९ ॥ नव- योजनविस्तीर्णो द्वादशयोजनायतः । स्कंधावारो भवत्यस्य राजधानी- समस्थितिः ॥ ५० ॥ अथ वार्द्धकिरत्नं स समाहूयेति शंसति । कुरु पौषधशाला न पावा- संच महाद्भुतं ॥ ५१ ॥ ततः पौषधशालायां सोत्तीर्य जयकुंजरात् । प्रविश्य स्त्रस्तरे दार्भे निपीदति कृताष्टमः॥ ५२ ॥ ब्रह्मचारी विमुक्तान्य- व्यापारस्त्यक्तभूषणः । मागधेशं स्मरत्येक-चित्तोऽस्मिन् पौपधत्रये ॥ ५३ ॥ यस्तु चक्री जिनस्तस्य नाष्टमेन प्रयोजनं । स्मृतिमात्रादसौ कंप्रा-सनस्तमुपतिष्ठते ॥ ५४ ॥ यदाहुः श्रीहेमसूरयः श्रीशांतिचरित्रे- मनुष्य विगेरे तो पोतानी शक्तिथी एटली जमीन सुधी चालवानो सुखे सुखे निर्वाह करी शके छे. (४६) परंतु दिनपरदिन घटता भंग श्रने शक्तिवाळा वीजा चक्रीनी सेना एटलुं क्षेत्र देवशक्तिथी निरंतर चाली शके थे. (४७) गंगा नदीनी दक्षिण बाजुना किनारे किनारे चालता अने त्यां रहेला देश, ग्राम अने नगरना अधिपतिओने पोताना सेवक करता, तेम ज तेमना भेटणानो स्वीकार करता भने ते राजानोने पण सैन्य. सहित साथे लेवा अनुक्रमे मागपतीर्थनी समीपे भावी चक्री स्कंधावारनो निवेश करे, अर्थात् बावणी नांखे. (४८-४९) चक्रवर्तीनी छावणी तेमनी राजधानी जेबडी पार योजन लांची अने नव योजन विस्तारमा पडे छे. (५०) हये चक्रवर्ती वार्धकीरत्नने चोलावीने पाज्ञा करे के-' महाअद्भुत आवास अने पोसहशाळाने चनावो.' (५१) ते परत ज पोसहशाळा वनावे एटले चकरी जयकुंजर उप. रथी उतरी पौषधशाळामा प्रवेश करी अष्टम तप करीने डामना संथारा उपर पेसे. (५२) ब्रह्मचारी, अन्य व्यापार तजेला, आभूषणो पण तनी दीधेला एवा चक्री पण पोपघमा ते मागधेश देवर्नु एकचिचे स्मरण करे. (५३) जे वीर्थकर ते मवमा चक्री पण थाय तेने भहम करवातुं प्रयोजन नधी, वेमनी पासे तो स्मरणमात्र करवायी जप्रासन कंपरा- घरे ते हकीकत जाणीने ते ते देवो उरत जमावे छे. (५४) श्री हेमचंद्राचार्य शांतिनाश्च.

(३३०) श्रीकाललोकप्रकाश। " ततो मागधतीर्थाभि-मुखं सिंहासनोत्तमे। जिगीषुरप्यनावद्ध-विकारो न्यपदत्प्रभुः॥ ५५ ॥ ततो द्वादशयोजन्या तस्थुपो मागधेशितुः । सिंहा. सनं तदा सद्यः खंजपादमिवाचलत् ॥ ५६ ॥” इत्यादि. अथ प्रकृतं-ततश्चतुर्विधाहारे संपूर्णे पोपधत्रये। प्रातस्ततः परिहित- चारुनेपथ्यभूषणः ॥ ५७ ॥ रथं सांग्रामिकं सज्जा-युधमध्यास्य चक्रभृत् । दीप्रोऽने चक्ररत्नेन चमूचक्रैश्च पृष्ठतः ॥ ५८ ॥ शब्दाद्वैतं जगत्कुर्वन् प्रवाह इव वारिधेः। तीर्थेन मागधेनांत:-पयोधि प्रविशत्यथ ॥ ५९ ॥ स्थांगनाभिद्वयसे गत्वा जलनिर्जले । रथं संस्थाप्य कोदंड-मादत्तेऽरिम- दापहं ॥ ६० ॥ सटंकारवमारोप्य प्रत्यंचां तत्र योजयेत् । निजनामांकितं चाणं रिपुघ्नं देवताश्रितं ॥६॥ वैशाखमाश्रयेत्स्थानं वेध्यवेधनकोविदः । स्थानानामिह पंचाना-मिदमेव यदर्हति ॥ २ ॥ पंचस्थानानि चैवं-स्थानान्यालीढ १ वैशाख २-प्रत्यालीढानि ३ मंडलं ४ । समपादं ५ चेति. वैशाखस्थानलक्षणं चैवमाहुः पादौ कार्यों रित्रमा कहे छे के-'त्यारपछी मागधतीर्थनी सामे उत्तम सिंहासन उपर तेने जीतवानी इच्छावाळा छतां पण मनापद्धविकारवाळा प्रभु से छे. (५५) एटले त्यांथी बार योजन दूर रहेला मागधेशनुं सिंहासन लुला पगनी जेम तरत ज चलायमान थाय छे.' (५६) इत्यादि. हवे कर्त्ता प्रस्तुत वात करे छे-पछी चौविहारवाला त्रण पौषध पूर्ण थये सते चोथा दिवसनी प्रमावे सुंदर यस्त्राभूषण धारण करीने चक्री श्रायुधोवडे सज्ज एवा संग्राम संबंधी स्थपर वेसे. एटले चक्ररत्न आगळ चाले, तेनावडे देदीप्यमान एवा चक्री पण चाले अने तेनी पाछळ सैन्यसमूह चाले. (५७-५८ ) समुद्रना प्रवाहनी जेम जगतने शन्दाद्वैत करता चक्री मागधाधिपतिना तीर्थने रस्ते समुद्रमा प्रवेश करे. (५९) समुद्रना जळमा रथनी नामि सुधी जइने रथने स्थिर करी चक्री शत्रुना तेजने हरनार धनुष्य ग्रहण करे. (६० ) पछी टंकारव करवापूर्वक लेनापर प्रत्यंचा चढाये भने पोतानुं नामांकित, शत्रुनो विनाश करनारुं अने देवाधिष्ठित पाण तेनी साधे जोडे. (६१) पछी वेध्यवेधनमा पंडित एवा पफ्री पैशास स्थाननो माश्रय करे, कारण के पांच प्रकारमा स्थानो पैकी श्रा कार्यमा ते स्थान ज उपयोगी छे. (६२) पांच स्थानो पा प्रमाणे-१ भालीद, २ पैशाख, ३ प्रत्यालीट, मंडळ भने पाद. पैशावस्थान- लषण कहे थे-हे वत्स 1 फूट (किम्रो, पर्वत शिखर विगेरे ) ! । सर्ग ३१ मो। (३३१) संविस्तारौ समहस्तप्रमाणतः । वैशाखस्थानके वत्स ! कूटलक्ष्यस्य वेधने ॥ ३३ ॥ अंतःस्थांश्च वहिःस्थांश्च बाणाधिष्ठायकान् सुरान् । प्रणमाम्यद्य ते संतु सहाया मे द्विपज्जये ॥ ६४ ॥ वाणाधिष्ठातृदेवानां वश्यानामपि या नतिः । उचिता साऽधुना शस्त्र-भृतां शस्त्रार्चनादिवत् ॥६५॥ इत्यु- क्त्वाकर्णमाकृष्य मुक्तस्तेन शरो द्रुतं । शक्रमुक्तः पविरिव याति द्वादशयोजनीं ॥ ६६ ॥ तत्र मागधदेवस्य गत्वा पतति पर्पदि । भुंजान- स्य सुखं स्वैरं दिव्यनाट्यानि पश्यतः॥ ६७॥ सौत्पातिक तमालोक्य धूमकेतुमिवोदितं । भृकुटीभीषणो वक्ति क्रोधाहंकारदुर्द्धरः ॥ ६८ ॥ मुमूपुरेप को मूर्यो यमातिथ्यमपेक्षते । भुजंगास्ये करमिव यश्चिक्षेप शरं मयि ॥ ६९ ॥ श्रासनाद्रुतमुत्थाय रोपावेशवशंवदः । यावदाणं तमादाय पश्यति क्रूरया दृशा ॥ ७० ॥ तावच्चकभृतो नाम-वर्णाली तस्य पश्यतः । शाम्यति क्रुध् विपमहेः शृण्वतो जांगुलीमिव ॥ ७१॥ विमृशत्येवमुत्पन्नः क्षेत्रेऽस्मिश्चक्रवर्त्यसौ । तज्जीतमेतदस्माभि-मान्यम-. एवा लक्ष्य (निशान) ने वींधती वसते एक हाथप्रमाण पगने पहोळा राखी उमा रहेवू ते वैशासस्थान कहेवाय छे. या प्रमाणे करीने विचारे के-' अंत:स्थ ने पहिःस्थ एवा पाणना अधिष्ठायक देवोने पाजे हुं प्रणाम करुं हुं. तेत्रो मने शत्रुना जयमों सहायकारी थाओ. ' (६४) पोताने वश एवा पण बाणाधिष्ठायक देवने नमस्कार करवा ते शस्त्रधा- रीने शस्त्रपूजानी जेम प्रत्यारे उचित छे. (६५) उपर कसा प्रमाणे पाणाधिष्ठायक देवोने कहीने कान सुधी धनुष्यने खेंची ते पाणने तरत ज छोडे एटले ते शकेंद्रना मूकेला पजनी जेम पार योजन सुधी जाय, (६६) भने ज्यो मागधकुमारदेव क्षेच्छा. पूर्वक सुस भोगवे के अने दिव्य नाटको जोह रहेल छे त्या तेनी समामा जइने पड़े. (६७) धूमकेतुना उदयनी जेम उत्पातकारी एवा ते पाणने जोदने क्रोध ने अहंकारवडे दुर्धर एको ते देव भयंकर भृकुटीवाळो थइने पोले (६८) के-' मरवाने इच्छतो एको मा कोण मूर्स यमनो भतिथि थवाने इच्छे छे के जेणे भुजंगना मुसमा हाथ नासवानी जेम मारा उपर पाण मूरपुं थे?' (६९) श्राम कहीने प्रासनधी एकदम उमा पह रोपावेशने वश धयेल एषो ते जेटलामा पाणने लइ र दृष्टिबडे वेने जुए थे (७०) तेटलामा ते पाण उपर लखेली चक्रवर्तीना नामवाळी वर्णोनी पंक्ति जोइने जांगुली मंत्र सांभळयाथी जेम सपर्नु विप शमी जाय तेम सेनो क्रोध शमी जायचे. (७१) एटले ते विचारे के-'भा घेत्रमा पा चक्रवर्ती उत्पन्न पयेल घे, तेथी मारो आचार छ के-प्रमारे तेनी आमानो स्त्री.

(३३२) श्रीकाललोकप्रकाश । स्थानुशासनं ॥ ७२ ॥ अविमृश्योनपुण्येन कोपोऽकारि वृथा मया । इदं नियतमेवामी स्वामिनः सेवका वयं ॥ ७३ ॥ विलंव्य तदलं स्वामी पूज्योऽयमतिथिर्मम । निश्चित्येत्युपदां हार-कोटीरकटकादिकां ॥ ७४ ॥ चिरसंचितरत्नादि सवस्तून्यपराण्यपि । उपादाय शरं तं च तीर्थ- स्यास्य च मृजले ॥७५॥ उत्पतन् दिव्यया गत्या द्रागुपागत्य चक्रिणं । तत्सर्व प्राभृतीकृत्य नत्वा विज्ञपयत्यदः ॥७६।। स्वामिन् ! मागधतीर्थात- मिदं क्षेत्रं त्वया जितं । अहं त्वकिकरोऽस्मीह प्रदेशस्यास्य रक्षक: ॥ ७७ ॥ अथ चक्री तदादाय प्रा भृतं प्रीतमानसः । सत्कृत्य बहुमानेन मागधेशं विसर्जयेत् ॥ ७८ ॥ सर्वोषामपि तीर्थानां ये चाधिष्ठायकाः सुराः । जात्या नागकुमारास्ते चक्रिवश्या महद्धिकाः ॥ ७९ ॥ तथोक्तं जंबू० प्र० सूत्रवृत्तौ-कुमारपदवाच्यत्वं चास्य नागकुमारजातीयत्वादिति. ततो रथं परावर्त्य स्वमावासमुपेत्यसौ। वाद्यमानजयातोद्य-स्त्रिज- श्राम कार करयो. (७२) हीनपुण्यवाळा में विचार कर्या विना फोगट कोप कर्यो, कारण के ए स्वामी अने श्रमे सेवक ए भाव नियत ज छे. (५३) हवे विलंब करवो कामनो नथी. मारे था स्वामीरूप अतिथिनी पासे शीघ्रपणे जइने तेनी पूजा करवी जोहए. विचारी निश्चय करीने हारो, मुगट, कडा विगैरे पाभूपणो, पणा काळथी भेगा करेला रत्नो अने पीजी वस्तुप्रो मेटणा तरीके ग्रहण करीने तेम ज वे पाणने पण साथे लइने, ते तीर्थनी मृत्तिका तथा जळ पण साथे लइने दिव्यगविवडे एकदम उत्पतीने चक्रव- निी पासे ते देव आये भने नमस्कार करवापूर्वक लावेली वस्तुओ तेमनी पामे भेट तरीके धरीने या प्रमाणे कहे (७४-७६ ) के-'हे स्वामिन् ! मा मागधतीर्थपर्यत क्षेत्र प्रापे जीत्युं छे. हुं तमारा किंकर सरोके या स्थळनो रक्षक छु. (७७ ) पछी चक्री तेनुं मेटणुं स्वीकारीने प्रीतियुक्त मनवाळा यह ते मागधेशनो बहुमानयुक्त सत्कार करी तेने विसर्जन करे. (७८) मागधादि सर्वे तीर्थोना अधिष्ठायक देवो ते चक्रवर्तीने वश थनारा नागकुमारनिकायना ( भवनपति ) महर्दिक होय छे. (७९) श्री जंयूद्वी प्रज्ञप्ति सूचनी प्रतिमा कयु छ -'प्रामर्नु कुमारपदयाच्यपणुं जे छे वे नागकुमारनी जाति- बाळा होवाथी समजवू.' हवे चक्री रथने पायो वाळीने पागता एवा जयवाजिनोवढे प्रण जगता प्रमार सर्ग २१ मो। (३३३) गत्प्रसरयशाः ॥ ८० ॥ ततः स्नात्वा जिनार्चाश्चा-चयित्वा कृतपारणः । प्रकृतीः प्राग्वदाहूया-दिशत्यष्टाहिकोत्सवं ॥ ८१॥ ततो मागधदेवस्य संपूर्णेऽष्टाहिकोत्सवे । जाग्रज्योतिर्जगजैत्रं चक्ररत्नं प्रतिष्ठते ॥ ८२ ॥ वरदामाभिधं तीर्थं शुद्धदक्षिणदिस्थितं । याति साधयितुं चक्र पथा नैर्गतगामिना ॥ ८३ ॥ तथोक्तं-पाउहघरसालाओ पडिनिकमित्ता दा- हिणपञ्चस्थिमं दिसिं वरदामतित्थाभिमुहे पयाए यावि होत्थति. ततश्च- मूपरिवृत-श्चक्रवर्त्यपि पूर्ववत् । अनुगच्छति तच्चक्र-मिवांगी कर्मणां फलं ॥ ८४ ॥ वर्द्धमानचमूर्भूपै-विजित्य स्वीकृतैः पथि । दुर्वारप्रसरः प्रौढ-प्रवाह इव सेंधवः ॥ ८५॥ प्रयाणकानि कतिचि-गत्वा नैर्मतसं- मुखं । ततोऽपाचीमनुसरन् वरदामं प्रयाति सः ।। ८६ ॥ वरदारांतिके प्राग्वत् स्कंधावारं निवेश्य सः । साधयेद्वरदामेश देवं मागधदेववत् ॥ ८७ ॥ वरदामाधिपस्मथ संपूर्णेऽष्टाहिक रसवे । जेतुं प्रभासतीर्थेशं चक्रं चरति पूर्ववत् ॥ ८८ ॥ स्थितं शुद्धप्रतीच्या पामेला यशवाळा थया सता पोताना भावासमा श्रावे. (८०) पछी स्नान करी, जिन- पूजादि करीने पार' करे अने पोताना प्रकृति ( प्रधान ) वर्गने बोलावीने प्रथमनी जेम अष्टाहिकोत्सब करवानी पाझा करे. (८१) मागधदेव संबंधी अष्टाहिकोत्सव पूर्ण थाय एटले जागृत ज्योतिवाळं अने जगतने जीतवानी शक्तिवालुं चक्ररत्न भागळ चाले. (८२) पछी नैत्रत दिशा तरफना मार्गे शुद्ध दक्षिणदिशामा रहेला वरदाम वीर्थने साधवा माटे चक्ररत्न चाले. (८३) फयु छ के-'आयुधशाळामाथी नीकळीने दक्षिण-पश्चिम दिशाए एटले नैर्ऋत खूणा तरफ वरदाम तीर्थनी सन्मुख चक्र प्रयाण करे. ' स्यारपची चक्रवर्ती पण प्रथमनी जेम-प्राणी जेम कर्मना फळ पाछळ गमन करे तेम सेनाधी परिवर्या सता पनी पाछळ चाले. (८४ ) समुद्रना प्रौद प्रवाहनी जेम दुर्वार प्रसारवाळा चकी मार्गमा पावता राजाभोने जीती, तेमनो स्वीकार करी लरकरमा यधारो करवा चाले. (८५) नर्मतदिशा सन्मुस फेटलाक प्रयाणी करीने पछी दविणदिशा तरफ घरदाम तीर्थनी सामे चाले. (८६) पछी प्रथमनी नेम परदाम तीर्थनी पासे लरकरनी पडाव करीने मागधदेवनी बेम परदाम तीर्थना स्वामी परदामदेवने पण जीते. (८७) पादामेश संबंधी अष्टाहिकोत्सव पूर्ण यया पत्री प्रभास तीना स्वामीने जीतया माटे चक्र प्रथमनी जेम ते तरफ प्रयाण करे. (८८) प्रथम वायव्य दिशाने मार्गे चालीने पछी शुद्ध पधिम दिशामा रदेला प्रमास.

(३३४) श्रीकाललोकप्रकाश। त-द्वायव्यविदिगध्वना । चक्र प्रवर्तते गंतु प्रत्यक् च वलते पुरः ॥९॥ वशीकृत्य प्रभासेशं पूर्वोक्तविधिना ततः । तसिंधुदेवीभवनाभिमुखं परिसर्पति ॥ ९०॥ सिंधोदक्षिणकूलेन पूर्वदिग्गामिनाध्वना । गत्वाभ्यर्णे सिंधुदेवी-भवनस्याशु तिष्ठति ॥९१ ॥ ननु च-सिंधुदेव्यास्तु भवनं भरतस्योत्तरार्द्धके । सिंधुकुंडेऽस्ति तद्द्वीपे कथं तस्यात्र संभवः १ ॥१२॥ अत्रोच्यते-महद्धिकानां वेश्मानि स्थाने स्थाने भवंति हि । इंद्राणीनां राजधान्यो यथा नंदीश्वरादिषु ।। ९३ ॥ ततः सिंधुद्वीपति-भवनाद- परं खलुं । इदं भवनमभ्यूह्यं सिंधुदेव्या महाश्रियः ॥ ९४॥ निवेश्य चक्रभृत्तत्र स्कंधावारं यथाविधि । कृताष्टमतपाः सिंधु-देवीं मनसि चिंत. येत् ॥ १५॥ साथ कंप्रासना दत्तो-पयोगा चक्रवतिनं । ज्ञात्वोत्पन्नमु. पादायो-पदा तमुपतिष्ठते ॥ ९६ ॥ एवं च सिंधुदेवीव-द्वैताढ्यादिसुरा अपि । शरमोक्षं विनैव स्यु-रनुकूलाश्चलासनाः ॥ ९७ ॥ कुंभाना रत्न- चित्राणां-मष्टोत्तरसहस्रकं । नानामणिस्वर्णरत्न-चित्रं भद्रासनद्वयं . तीर्थनी.तरफ एटले पश्चिम दिशानी सामे चक्र चाले. (८९) पूर्वोक्त विधिए प्रभासेशने पण वश करीने सिंधुदेवीना भुवननी सन्मुख चक्र गति करे. (९०) सिंधुना दक्षिण किनारे पूर्व दिशा तरफना मार्गे चाली सिंधुदेवीना भवन पासे आवीने त्या चक्र उसु रहे. (९१) मही प्रश्न करे छ के-'सिंधुदेवीनुं भवन तो उत्तर मरतार्घमां सिंधुप्रपातकुंडमा तेना नामना द्वीपमा थे, तो तेना भुवननो अहिं संभव क्याथी ? (९२) तेने उचर थापे के के-'महद्धिक देव-देवीमोना भुवन तो स्थाने स्थाने होय छे जेम इंद्रनी इंद्राणी. भोनी राजधानीभो नंदीश्वरद्वीपादिका होय छे तेम. (९३) एटले सिंधुद्वीपमा जे तेनुं सुपन छे तेथी जूदुं महार्द्धक सिंधुदेवीनुं आ गवन समजवू. (९४) पछी त्यां लरकरनी छावणी नाखीने यथाविधि अष्टम तप करी चक्री सिंधुदेवीनुं मनमा ध्यान करे. (९५) एटले ते आसन कंपवाथी उपयोग दइने चक्रवतीने पावेला जाणी भेटणुं लइने चक्री पासे हाजर घाय. (९६ ) सिंघदेवीनी जेम वैताट्यादिकना अधिष्ठायक देवो पण वाण मुक्या विना श्रासन चलित थवाधीज चक्रवर्ती पासे पाये छे ने अनुकूळ थाय थे. (भाशा माने छे) (९७) सिंधुदेवी विचित्र रत्नोधी भरेला १००८ पडा, नाना प्रकारना मणि, स्वर्य भने रत्नवहे पनावेल पे मद्रासनो, कडा, बाजुबंधो विगैरे पीजा आभूषणों - मर्ग ३१ मो। (३३५) ॥ ९८ ॥ कटकन्त्रुटीतादीनि भूपणान्यपराण्यपि । चक्रीत्यादिकमादत्ते सिंधुदेव्योपदीकृतं ॥ ९९ ॥ अहं त्वद्देशवास्तव्या तवास्म्याज्ञप्तिकिंकरी । इत्युक्त्वा प्रणिपत्यास्यां गतायां सोऽत्ति पूर्ववत् ॥ १० ॥ अष्टाहिकोत्सवातेऽस्यां ऐशानीगामिनाध्वना । वैताढ्यकटकाभ्यर्ण. मेति चक्रानुगोऽथ सः॥१॥ सिंधुदेवीभवनतो जेतुं वैताट्यनिर्जरं । वैता- ट्यकूटगमने ऋजुर्मार्गोऽयमेव हि ॥२॥ कटके दाक्षिणात्येऽस्य कटके स्था- पितेऽमुना । अष्टमे च कृते सिंहा-सनं चलति तद्विभोः ॥३॥ दत्तोपयोगो वैताढ्यकुमाराख्यः सुरोऽथ सः। गृहीत्वा प्राभृतं ताह-गभिगच्छति चक्रिणं ॥ ४ ॥ श्राज्ञां स्वीकृत्य नवाथ सुरेऽस्मिन् गतवत्यथ । अष्टाहिकोत्सवां- ते ऽस्य चक्री चक्रानुगस्ततः ॥ ५॥ गुहां तमिस्त्रामभ्येति प्रतीचीगा- मिनाध्वना । वैवाढ्यकूटोपांताद्धि प्रतीच्यामेव सा गुहा ॥ ६ ॥ गुहा- याश्च तमिस्रायाः स्थापयित्वांतिके चमूं । नाकिनं चिंतयत्येप कृतमालं चक्रवर्तीनी पासे भेट तरीके धरे. चक्री तेनो स्वीकार करे. ( ९८-९९) सिंधुदेवी कहे के-'हुश्रीं तमारा स्वामित्वयाळा प्रदेशमा रही सती तमारी आज्ञा माननारी सेविका एं. पा प्रमाणे फहीने तथा प्रणाम करीने ते जाय एटले चक्री पूर्वनी जेम पार' करे. (१००) सिंधुदेवीना निमिचनो भष्टाहिकोत्सव कर्या पछी ईशानकोणना मार्गे वैवाट्य कटकनी समीपे पानी पादळ गमन करता चक्रवती प्रावे. (१०१) सिंधुदेवीना भव- नथी वैवाट्यदेवने जीतवा माटे येताट्यकटक सन्मुख जवानो सरल मार्ग मान 2. (२) वाट्यना दक्षिण कटरूपास लशकरनी छावणी नाहीने की प्रम को एटले चैता. पना सामीनु भासन कंपापमान याय. (३) दीघो छ अवधिज्ञाननो उपयोग जेणे एवो बतायकुमारदेव चक्रीने भावना जाणी उचम प्रकारचें भेटणुं लइने चक्री पासे माये. (४) देव माझा सीकारी नमस्कार करी पायो जाय एटले ते निमिचनो पहिलोत्सर करीने चक्री चक्रनी पाछळ चाले. (५) पत्रिम तरफने मार्गे घालता चक्री तमिसा गुफापासे आये; कारण के येतायटना उपांत मागपी ते गुफा पश्चिम दे. (६) तमिस्रा गुफापासे सेन्पने स्थापन करीने घफ्री मट्ठम तप करी ते गुफाना स्वामी १ वाटत उपरना पूट पैकी देवाव्य नामना यूटना समपीए रहेला नीपेना मागनी पभिमे. १ श्रीकाललोकप्रकाश। कृताष्टमः ॥ ७॥ जिगीषु सोऽपि विज्ञाय चक्रिणं चलदासनः । ढौक- यत्येत्य विनम-न्नलंकारांश्चतुर्दश ॥ ८॥ ते चैवं-हार १ द्धहार २ इग ३ कणय ४-रयण ५ मुत्तावली ६ उ केऊरे ७ । कडए ८ तुडिए ९ मुद्दा १० कुंडल ११ उरसुत्त १२ चूलमणि १३ तिलयं १४ ॥९॥ अलं- कारानुपादाय स्त्रीरत्नस्योचितानिमान । विसर्जयति सत्कृत्य कृतमालं नरेश्वरः ॥ १०॥ अथोत्सवे समाप्तेऽस्य सार्वभौमः समादिशेत् । सेना- नीरत्नमाहूय सिंधुनिष्कुटसाधनं ॥ ११ ॥ सिंधुः स्यात्तस्य खंडस्य पूर्वद- क्षिणयोर्दिशोः । उत्तरस्यां च वैनाढयः प्रतीच्यां लवणोदधिः ॥ १२ ॥ यद्यप्येभिस्त्रिभिः क्लृप्तं मध्यखंडात्तथाप्यदः। सिंध्वा पृथक्कृतं तस्मा-रिसं- •धुनिष्कुटमुच्यते ॥ १३ ॥ स चर्मरत्नमादाय चतुरंगचमूवृतः । प्रस्थानं कुरुते तत्र द्वितीय इव चक्रभृत् ॥ १४॥ गर्जदूर्जितनिःस्वान-ध्वानध्व- स्तेतरध्वनिः । अनूदितजयारावः क्षुण्णैर्द्विविधभूधरैः ॥ १५ ॥ जयकुंजर- मारूढः सच्छत्रश्चलचामरः । कवचच्छन्नसागो मेघैत इवोडुपः ॥ १६॥ कृतमालदेवतुं चितवन करे-ध्यान करे. (७) ते पण श्रासन चलित थवाथी जीतवाने इच्छता चक्रीने त्यां प्रावेला जाणीने तेमनी पासे भावी नमस्कार करी चौद अलंकारो श्रर्पण करे. (८) ते चौद अलंकारना नाम-१ हार, २ अर्धहार, ३ एकसरो हार, ४ कनकावळी, ५ रत्नावळी, ६ मुक्तावळी, ७ केयूर (बाजुबंध ), ८. कडां, ९ त्रुटित (नोटी), १० मुद्रा (वाटी), ११ कुंडळ, १२ उरसुच (छाती सुधी लटकतो दोरो ), १३ चूडामणि (मुकुट) ने १४ तिलक. (3) स्त्रीरत्नने योग्य आ अलंकारोने स्त्रीका. रीने कतमालदेवनो सत्कार करी चक्री तेने विसर्जन करे. (१०) तेना निमित्तनो उत्सव समाप्त थये सते चक्री सेनानीरत्नने पोलावीने सिंधुनिष्फुट साधी प्रायवानी आज्ञा करे. (११) ते खंडनी पूर्व ने दक्षिणे सिंधु नदी, उत्तरे वैताट्य पर्वत श्रने पधिमे लवणसमुद्र पावलो छे. (१२) जो के ए प्रणवडे वीटायेल मध्यखंड पण छे, परंतु पा सिंधुए जूदो पाडेल खंड होगाथी ते सिंधुनिष्कुट कहेवाय छे. (१३) चक्र. वतीनी प्राज्ञा थता सेनानी जाणे चीजो चक्री होय तेम चर्मरत्न लइने चतुरंगसेनासाथे ते तरफ प्रस्थान करे. (१४) गाजी रहेला अर्जित निास्त्रानोना स्वरयडे रोकी दीधा छे बीना ध्वनि जेणे एपो, खंदी नाखेला चे प्रकारना भूपरो जेनी पाछळ जयजय शम्द बोली रहेल छे एवो, जयकुंजरपर पेठेलो, माथे छत्र तथा चे पाजुपर चामर ढळातो, १ टुंदेला भूघरो-पर्पयो भने वश करेला भूपरो-राजाओ.

सर्ग ३० मो। (३३७) चर्मरत्नेन सद्यान-पात्रीभूतेन तेन सः। सिंधुमुत्तीर्य शैलोच्च-वीचीव- लयदुस्तरां ॥ १७ ॥ तत्रत्यानां प्रतीपानां चिकित्सक इवाद्भुतः। विरेक- रुधिरश्राव-वहिकर्मादिकोविदः॥ १८ ॥ दशांगुल्यौपधीवर्ग-रसपानोप. देशकः । हरत्यस्तैः प्रतापोष्ण-रौद्धत्यं सान्निपातिकं ॥ १९॥ पंचभिः कुलकं ॥ एवं च-सिंहले यवनद्वीपे नानाम्लेच्छाश्रयेप्विति । रोमारवाल- संडादि-देशेषु विविधेपु सः ॥ २० ॥ म्लेच्छाननेकजातीयान् विजित्य रणकर्मठः । श्राज्ञामखंडां सर्वत्र प्रवर्त्तयति चक्रिणः ॥ २१॥ युग्मं ॥ चक्रवर्युचितान्येपा प्राभृतानि सहस्रशः । जितकाशी समादाय सिंधु- मुत्तीर्य पूर्ववत् ॥ २२॥ भूरिभिः किंकरीभूतैः सेवितो म्लेच्छपार्थिवैः । वाचालजयवादिनः स्तूयमानोऽसकृजनैः ॥ २३ ॥ उपेत्य चक्रिणं नवा ढौकयित्वोपदाश्च ताः । विज्ञो विज्ञपयत्येवं विनयेन कृतांजलिः ॥ २४ ॥ ॥ त्रिभिर्विशेषकं । स्वामिन् ! भवत्प्रसादेन सिंधुखंडो जितो मया । भूपाः कवचवडे जेणे पाखं शरीर ढांकी दीघेल छे तेथी मेपोथी आत जाणे चंद्रमा होय तेवो ते सेनानी सारा प्रवहणरूप थयेल चर्मरत्नवडे पर्षत जेटली उंची चीचीोना वलयवडे दुस्तर एवी सिंधुनदी उतरीने, त्यो रहेला अनेक शत्रु राजाश्रोनो जाणे अद्भुत वैद्य होय तेम रेच, रुधिरनो साय, पन्हिकर्म विगेरेमा कुशळ अने दश अंगुलीयोरूप औषधिसमूहना रसपानना उपदेशक एवा तेणे प्रतापवडे उष्ण एवा अनोवडे तेोर्नु सानिपातिक औद्धत्य दूर कर्यु. (१५-१९ ) एवी रीते सिंहल, यवनद्वीप भने नाना प्रकारना म्लेच्छोनामाश्रयभूत रोम, पारवाल, संडादि विविध देशोने विपे अनेक जातिना म्लेच्छोने जीतीने रणसंग्राममा कुशळ सेनानी सर्वत्र चक्रीनी अखंड भाज्ञा प्रवावे. ( २०- २१) पछी मनी पासेथी चक्रवर्तीने उचित एया हजारो भेटणाने ग्रहण करीने सर्वत्र जीत मेळवेल सेनानी प्रथमनी जेम सिंधु नदी उतरीने सेवक थयेला अनेक म्लेच्छ राजामोथी सेवातो, वाचाळ एवा जयवाजिनो बगडावतो, लोकोथी वारंवार स्तुति करातो सेनानी चक्रवती पासे भावी, नमस्कार करी, भेटणामो रजु करीने विज्ञ एपो वे विनय बडे अंजळी जोडीने मा प्रमाणे कहे-(२२-२४)' हे स्वामिन् ! तमारा प्रसादी में सिंधुनो दक्षिणनिपट जीत्यो चे सने त्यांना पधा राजामोने में प्रापना सेवको १दरा भगुळी मुखमा नारसी दासपणु स्वीकारवारूप परम मौरधिना बवायनार. ४॥

(३३८) श्रीकाललोकप्रकाश। सर्वेऽपि तत्रत्या मया त्वरिककरीकृताः॥२५॥ एते नमंति ते केचि- दिदं तेषां च ढौकनं । प्रह्वीभूतेषु चैतेषु कार्यः स्वामिन्ननुग्रहः ॥ २६ ॥ तदाकर्ण्य प्रमुदित-श्चक्रवर्ती चमूपतिं । सत्कृत्य वस्त्रालंकारै-रनुजा- नाति वेश्मने ॥ २७ ॥ ततः स्वावासमागत्य स भुंक्ते कृतमजनः । ततश्च रमते स्वैरं गीतसंगीतकादिभिः ॥ २८॥ अथान्यदा कदाचित्तं चक्रीत्याकार्य शंसति । वत्स गच्छ तमिस्त्राया उद्घाटय कपाटकौ ॥ २९ ॥ प्रमाणमाक्षेत्यानम्य स्वमंदिरमुपेत्य च । कुर्यात्पौषधशालायां साष्टमं पौषधनयं ॥ ३० ॥ श्राराध्य विधिनैवं च कृत्तमालं गुहाधिपं । दिने तुर्ये परिहित-शुद्धनेपथ्यभूषणः ॥ ३१ ॥ श्रात्तपूजोपकरणो-ऽन्वीयमानो नृपादिभिः । दासीदासश्च विविध-पूजो- पस्करपाणिभिः ॥३२॥ एत्य दर्यास्तमिस्रायाः कपाटौ याम्यदिग्गतौ । प्रमृज्य लोमहस्तेना-भ्युक्षति प्रवरोदकैः ॥ ३३॥ चंदनैश्चारुकर्पूर-क- स्तूर्यादिविमिश्रितैः । पूजयत्यंबरै ना-विधैश्च सुमदामभिः ॥ ३४॥ पनाव्या छे. (२५) तेमांना मारी साथे श्रावेला मा केटलाफ राजाओ आपने नमस्कार करे छे, मेट' धरे के भने साधे आववा तैयार छे, तो आप नम्र थयेला तेश्रोनी उपर अनुग्रह करो. ' (२६) ते सांभळीने हर्ष पामेला चक्रवर्ती सेनानीनो वस्त्रालंकारादिवडे सत्कार करीने तेने रथाने जवानी याज्ञा श्रापे. ( २७) पछी सेनानी पोताने स्थाने भाची स्नान करीने भोजन करे भने गीत-संगीतादिवडे स्वेच्छाए क्रीडा करे. (२८) अन्यदा चक्री सेनानीने बोलावीने कहे के-'हे वत्स ! तुं जा अने तमिस्रा गुफाना द्वार उघाड.' (२९) सेनानी माज्ञा प्रमाण करी, नमीने पोताने श्रावारो भावे. पली ते पौषधशाळामा जइ अहमतपसाथै त्रण पौषध करे. (३०) ए रीते विधिपूर्वक तमि- सागुफाधिप कृतमालदेवने पाराधीने चौथे दिवसे शुद्ध वस्त्राभूषण धारण करी, पूजाना उपगरणो लइने भनेक राजामोभे परिवों सतो तथा विविध प्रकारना पूजाना साधनो जेना हाथमा छे एवा अनेक दासदासीनोभे अनुसरातो तमिस्रा गुफापासे भावीने वेना दक्षिण दिशाना ने द्वारो लोमहस्त(पीबी)बडे प्रमा. पछी श्रेष्ठ उदकवडे धुए. (३१- ३३ ) सुंदर एया कपर, कस्तुरी विगेरेथी मिश्रित चंदनपडे भने नाना प्रकारनी पुष्प- माळा तथा यसोवडे तेनी पूजा करे. (३४ ) धूपघानु हाथमा लइने पोते धूप करे । समें ३१ मो। (३३९) धूपाधानमुपादाय धूपमुत्क्षिपति स्वयं । पंचवर्णप्रसूनानां निकरं रचये- त्पुरः ॥ ३५ ॥ मंगलान्यालिखत्यष्टौ पुरो रजततंडुलैः । पंचांगस्पृष्टभू- पीठ-स्तौ कपाटौ नमत्यसौ ॥ ३६ ।। प्रयुज्योपायमित्याचं प्रयुयुक्षुरिवां- तिमं । उदस्यति करेणोच्च-दंडरत्नं चमूपतिः ॥ ३७॥ केवलं मार्दवोपेतो मृधतेऽगी मृदादिवत् । काठिन्यवांश्च दूरेण त्य- ज्यते दृपदादिवत् ॥ ३८ ॥ मृदुत्वकठिनत्वाभ्यां संगताभ्यां तु संगतः । गौरवं लभते लोके जनो हीरांकुरादिवत् ॥ ३९ ॥ सामादिषु ततः श्रेष्ठा-धुपायावादिमांतिमौ । न मध्यमौ तु कातर्या-दित्यादि विमृशनिव ॥४०॥ दृढघाताय सप्ताटा-वपमृत्य पदानि सः। विस्ताडयति दंडेन घाढशब्दमथाररीं ॥४१॥ कृतानंदाविव क्रोचा-रवदंभेन तावथ । विघव्य पृथुवेगेन तस्थतुः स्वस्वतोडके ॥ ४२ ॥ द्वयोः संहतयोः सिद्धि- नं स्यात्कार्यविरोधिनोः । इतीव भेदनीतिज्ञः स कपाटौ व्ययोजयत् भने पांच वर्णना पुप्पोनो तेनी समीपे पगर भरे. (३५) रुपाना तंदुळोवडे तेनी पासे अष्टमंगळिक पाळेखे अने पंचांगवडे जमीननो स्पर्श करीने ते द्वारोने नमस्कार करे. (३६) मा प्रमाणे द्वार उघाडवानो प्रथम (साम ) उपाय करीने पछी अंतिम (दंड) उपाय करवाने इच्छतो होय तेम ते सेनानी दंडरत्न हाथमा ग्रहण करे. (३७) श्रा दुनियामा केवळ पोचापणुं धारण करे थे तो ते माटीनी जेम कचराय के अने केवळ कठिनता धारण करे थे तो ते पथ्थरनी जेम दूरधी ज वजी देवाय छे. (३८) एटने मृदुत्व भने कठिनत्व ने जेमा मळेला होय ते लोकमां हरािना अंकुरानी जेम गौरवने पामेले. (३९) देशी सामादि और उसयोमा एहेलो ने छेखो उपराय श्रेष्ठ जणाय छे; मध्यना ये तो कायरना उपायो जणाय छे." थाम विचारीने ज जाणे होय वेम सेनानी प्रथम पूजादिवडे साम उपाय कर्या पछी दृढपणे प्रहार करवा माटे सात- पाठ पगला पाया भरीने दंडवडे प्रण चार द्वार उपर प्रहार करे के जेपी पारणामो गाढ शद करे (४०-४१) भने कोंच पतीनी जेम जाणे आनंद करवां होय तेको शब्द करता मोटा येगथी ते पंने वारणा उघडी जइने पोतपोवानी पाळना तोडा साये अडीने स्थित थाय. (४२) कार्यना विरोधी एवा ये भेळा मळेला होय तो ते कार्यमिद्धि धवा न देय एम मेदनीविने जाणनारानी जेग सेनानी ए पंने पारणाने छुटा पाडे. (४३) १ साम, दाम, भेद भने दंद.

(३४०) श्रीकालजोकप्रकाश । ॥ ४३ ॥ यश्चात्र द्वादशयोजनानि तुरगारूढः सेनापतिः शीघ्रमपसरती- त्यादिप्रवादः सोऽनागमिक इव लक्ष्यते. इत्यावश्यकटिप्पनके. सोत्साहः कृतकार्योऽथ चक्रभृञ्चरणांतिके। एत्य विज्ञपयत्येवं सेना- नी रचितांजलिः॥४४॥ वच्मि स्वामिन्नभीष्टं ते तमित्रोद्घाटिता गुहा । उदीच्यभरतार्द्धस्य मार्गोऽयं सुखदोऽस्तु वः ॥४५॥ श्रुत्वेति मुदितश्चक्री सत्कृत्य पृतनापति । प्रस्थानं कुरुते सद्यः सन्नद्धाशेषसैनिकः ॥ ४६॥ कुंजरं पर्वतप्रौढ-मारूढो मघवानिव । वज्रोपमा दधद्धेम-सृणिं दिक्प्रसर- घृणि ॥४७॥ याम्येभकुंभन्यस्तेन मणिरत्नेन शोभितः । गुहां विशति चक्रीशः शशी घनघटामिव ॥ १८ ॥ मणिरत्नं च तद्भाति कुंभिकुंभ- स्थले स्थितं । रवेर्विवमिव ध्वांत-ध्वंसि पूर्वाद्रिमूर्द्धनि ॥ ४९ ॥ तेन प्रकाशितावासौ द्वादशयोजनावधि । कुर्याद्भित्योमंडलानि काकिण्या रत्नमुख्यया ॥ ५० ॥ अवस्थितप्रकाशानि स्थिरमार्तडपंक्तिवत् । पांथानां यही 'सेनानी दंडवडे प्रहार करीने अश्व उपर पेठेलो पार योजन पाछो हठी जाय इत्यादि प्रवाद (दंतकथा) छे ते अनागमिक जणाय छे.' एवं श्रावश्यकना टिप्प- नकमां कडं छे. पछी कृतार्थ एवा सेनानी उत्साहपूर्वक चक्रवर्तीना चरण पासे श्रावी पे हाथ जोडीने विज्ञप्ति करे (४४) के- हे स्वामिन् ! तमाएं अभीष्ट वमने निवेदन कर छु के नमिता गुफा में उघाडी छे एटले हवे उत्तर भरतार्धमा जवानो आपनो मार्ग सुखकारी थाओ.'(१५/था प्रमाणे सेनानीना वचनो सामळीने चक्री हर्ष पामी तेनो सस्कार फरे, अने पछी सर्व सैनिकोने तैयार करीने तत्काळ तमिस्रा गुफा तरफ प्रयाण करे.(४६) पर्वत जेवा प्रौढ हस्ती उपर इंद्रनी जेम चक्रवर्ती भारोहण करे अने जेना तेजनो दिशा. मामा प्रसार थइ रह्यो छे एवा बज जेवा सोनाना अंकुशने हाथां धारण करे. (६७) पछी हाथीनी जमणी पाजुना कुंमस्थळ उपर स्थपायेला मणिरत्नबडे शोमित एवा चक्री व दळांनी घटामा चंद्र प्रवेश करे तैम गुफामा प्रवेश करे. (४८) ते वखते हाधीना कुंभस्थळ उपर स्थापन करेल मणिरत्न पूर्वाद्रिपर रहेल अंधकारनो वंस करनार रविना पिंपनी जेई शोमे छे. (४९) ते रत्नवडे चार योजन सुधी प्रकाश पडे छे. तेणे प्रका- शित करेला मार्गे चालता चक्री रत्नमा मुख्य काकिणीरत्नबहे पे पाजुनी मीतो उपर (गोळ ) मंडळो भाळेरो थे (करे 2 ). (५०) ते मंडळी स्थिर सूर्यनी पंक्तिनी जेम सर्ग ११ भो। (३४१) संचरिष्णूना-मुपकुर्वति तानि च ॥५१॥ मंडलानां स्थितिसंख्यादिस्वरूपं चक्षेत्रलोके वैताट्याधिकारे प्रोक्तमस्तीति ततो ज्ञेयं. एकोनपंचाशन्मान- मंडलैस्तैर्मतांतरे । अष्टानवत्या स्यान्नित्य-मध्याह्न तद्नुहोदरं ॥ ५२ ॥ अथ वार्द्धकिरत्नेन सद्यः सजितपद्यया । नद्यावुत्तीर्य निर्मग्न- जलोन्मनजलाभिधे ॥ ५३ ॥ यावर्या औत्तराहं द्वारं गच्छति चक्र भृत् । तावत्कपाटौ तत्रत्यौ स्वयमेवापसर्पतः ॥ ५४ ॥ हयहेपारवाकीर्ण गजगारवोर्जितं । स्फुरद्रथघटत्कारै-रुद्धतैर्धतभूतलं ॥ ५५ ॥ छन्नाशे- पनभोमार्ग पताकाकेतुकोटिभिः । रणवादित्रनिर्घोषा-टोपकंपितकातरं ॥ ५६ ॥ करालकवचास्त्रालि-भीपणं भटकोटिभिः । दर्शनीयं च भूपालैः सुरैरिव महद्धिकः ॥ ५७ ॥ अगण्यं चक्रिणः सैन्यं निर्गच्छत्कंदरोद- रात् । जानंति म्लेच्छभूपाला नष्टैः पर्यंतवासिभिः ॥ ५८ ॥ चतुभिः कलापकं ॥ ततः सन्नह्य ते सर्वे संभूय रणकर्मठाः । युध्यते चक्रिसैन्येन दत्तदैन्येन विद्विषां ॥ ५९ ॥ खड्गाग्रच्छिन्नमत्तेभ-गलद्रुधिरपिच्छिलं । अवस्थित प्रकाशवाळा होय छे, अने तेमा संचार करनारा पंथीयोने उपकारक थाय थे. (५१) ए मंडळोनी स्थिति ने संख्यादिस्वरूप क्षेत्रलोकमा वैताट्य पर्वतना अधिकारने विषे कहेल छे तेथी त्याची जाणवू. कुल मळीने ४९ अने मतांतरे ९८ मंडळोवडे ते गुफानुं उदर निरंतर मध्याह जेधुं प्रकाशित रहे छे. (५२) पछी वार्धकीरत्ने तरवमा ज पांधी दीधेली पाज (पुल)बडे पाखा लरकरसहित निम- ग्नजका ने उन्मग्नजळा पने नदी डवरीने चक्री जेटलामा उत्तर तरफना द्वार पास पहोंचे वेट- लामा ते बाजुना द्वार परत ज स्वयमेव उघडी जाय. (५३-५४) हयना हेपारखथी व्यास, गजना गरिवथी ऊर्जित, स्फुरायमान एवा रथना घटत्कारवडे उखळी रहेल भूतळवाळा, पताका ने केतु क्रोडोगमे फरकती होवाथी तेनावडे श्राकाशना मार्गने ढांकी देता, रण- संबंधी वाजिमोना निर्धोपना पाटोपथी कायरजनोना हृदयने कंपावता, विकराळ एवा कवध भने प्रखोपडे भीपण, कोडोगमे पदातियोथी तेमज महर्दिक देवोनी जेवा हजारो राजापोथी जोपालायक भने अगणित एयु चक्रीन सैन्य गुफामाथी पहार नीकळे एटले नजीक रहेला लोकोने नासता जोइ ग्लेच्छ राजामो तेने जाणे. (५५-५८) लरकरने जोत ज ते पधा राजाम्रो रणकर्मा कुशळ एवा तैयार पर एफठा पहने शग्रुने दीनता पमाडनार पक्राना सैन्पनी साधे युद्ध करवा मंडी जाय. (५९) तेमनी साधेना युद्धयी (३४२) श्रीकाललोकप्रकाश। शिरोभिः स्यान्मिथश्छिन्नैः स्थपुटं तत्र भूतलं ॥६०॥ तत्र शत्रुशरा- श्लेष-परावृत्ताः शरा निजं । यांत्याश्रयं सजातीया-तिथ्यं कर्तुमिवो- द्यताः ॥ ६॥ भटाः केचिच्छरशतै-भात्यापिच्छं वपुर्गतैः । उत्पन्नपक्षाः स्वर्गतु-मिव संख्यमुखे हताः ॥ ६२ ॥ केचिन्निप्पिष्टरदन-च्छदा हस्ता- ग्रवर्तिभिः । भटाः खत विराजते मूर्त्ता वीररसा इव ॥ ६३ ॥ केचिद्घा- तशतोद्भिन्नै-रंत्रकैः कंठवर्तिभिः । विभांति वरणराग्भि-रिव युद्धे जयश्रियाः॥ ६४॥ कुट्टयंति द्विषां केचि-न्मौलीन् कुद्दालपाणयः । निरंकुशाः काननस्थ-सहकारानिवाध्वगाः ॥ ६५ ॥ केचिच्च कंदुक- क्रीडो-कटा इव महाभटाः । निर्लोठयंति भूपीठे खड्गारिमस्तकान् ॥ ६६ ॥ अन्ये च रिपुकुंभींद्रा-नारोहंति हतद्विषः । सोपानीकृततदंत- मुशलाः कुशलाशयाः ॥ ६७ ॥ घनामपि द्विपत्सेनी भिंते केचिदा- युधैः । शृंगैः शंढा मदोन्मत्ता निम्नगायास्तटीमिव ॥ ६८ ॥ महिपा इव गाहंते केचित्संग्रामपल्बलं । पाहत्य द्विण्मुखाजानि पृथ्वी पंकिल- खड्गवडे भेदायेला हाथीोना मस्तकांथी गळता रुधिरवडे जमीन व्याप्त थइ जाय. परस्परना छेदेला मस्तकोथी यधी जमीन ढंकाइ जाय. (६०) शत्रुना पाणनी साथे संघट्ट थवाथी पाछा पायता वाणो जाणे सजातीयनुं मातिथ्य करवाने तत्पर थया होय तेम पोताने स्थाने पाछा आवे. (६१) केटलाफ सुमटो सेंकडो पाणावडे भेदायला पोताना शरीरथी स्वर्गे जवाने माटे जाणे पाखो भावी होय एवा देसावा लागे. (६२) केटलाक सुमटो होठ पीसीने हाधमा रहेला खड्गोवडे मूर्तिमंत वीररम होय एषा शोमवा लागे. (६३) कैटलाक सुमटो सेंकडो प्रहारथी नीकळेला भने कंठमा वींटाइ गयेला प्रांतर- डाओवडे जाणे युद्धमा तेने परवा माटे जयलक्ष्मीए माळा पहेरावी न होय तेवा लागे. (६४) केटलाक कुदाळ जेना हाथमां के एवा सुमटो नगीचामा रहेला भाम्रचने मार्गे जनारा जेम मांगे-तोडे तेम निरंकुशपणे शोना मुकुटोने घोडी नासे. (६५) केटलाक महासुभटो सद्गना अप्रमागवडे वैरीना मस्तकोने कंदुकनी क्रीडा करवानी जेम उंचे उडाडीने जमीनपर पहाडे. (६६ ) केटलाक कुशल युद्धिवाला सुमटो शनुमोना हस्ती उपर लेना दांवरूप मुशळने पगथीमारूप करी तेनापर घडीजइने शत्रुओने प्राणरहित करे. (६७) फेटलाक सुमटो मदोन्मच साढो नदीना किनाराने घोडी पाडे तेम यायुधोपडे घणी शत्रुसेनानो मेद करे. (६८) केटलाक सुमटो पाहायोनी जेम मंप्रामरूप पसल सर्ग ३१ मो। (३४३) यति च ॥ ६९ ॥ जातायां तत्र रुधिरा-पगायां भटमौलयः । पद्मायते तटायंते मृतमत्तेभपंक्तयः॥ ७० ॥ चलन्मत्स्यकुलायंते तरंतः पतिताः शराः । खगायंते नभःस्थाश्च भटमुक्ताः शरोत्कराः ॥ ७१ ॥ दंतादंति- प्रवृत्तेभ-युद्धोद्यद्भुतभुक्कणाः। घोतंत इव खद्योता-स्तत्र रेणुतमोघने ॥ ७२ ॥ घोरांधकारे तत्राश्व-खुरक्षुपरजोभरैः । विध्यंति रिपुमर्माणि वीराः शब्दानुगैः शरैः ॥ ७३ ॥ कबंधास्तत्र धावंतः पथि घ्नंति तरू- नपि । प्रतिपक्षधिया खड्गैः स्फूर्जद्वीररसोद्भटाः ॥ ७४ ॥ तत्र तूर्यारवो- स्फुल्ल-पुलकोत्साहसाहसाः । वीरास्तृणाय मन्यते जीवितेन समं जगत् ॥ ७५॥ यद्येवंविधसंग्रामे परिभूयेत कहिचित् । अतुच्छविक्रमैम्लेच्छचक्रगै- श्चक्रिणश्चमूः ॥ ७६ ॥ तदा सन्नह्य सेनानी-र्योदु प्रक्रमते दृढं । तुरंग- रत्नमारूढः खड्गरत्नं करे दधत् ।। ७७ ॥ एतस्मिन् युध्यमाने च भज्यंते (सायोचीया ) ने डोळी नांखे अने शत्रुशोना मुखरूप कमळोने हणी नासीने पृथ्वीने कादवाळी करे. (६९) त्यां रुधिरनी नदीमो वहेवा मांडे सते सुमटोना मस्तको तेमा कमळरूप जणाय अने मरण पामेला मदोन्मत्त हाथीभीनी श्रेणी तटरूप जणाय.(७०) वळी तेमां पडेला पायो तरता एका मत्स्योना समूह जेवा लागे अने सुमटोना मूकेला पाणो भाकाशमा रह्या सवा पक्षीयो जेवा जणाय. (७१) हाथीमो पोताना दायडे परस्पर युद्ध करवामां उधत थये सवे वेना घर्पणथी उडता अग्निना कणीयानो उडती रेणुबडे थयेला गाढ अंधकारमा खज्जुबानी जेवा लागे. (७२) घोडामोनी खरीथी सोदायेली जमीनना रजसमूहयडे घोर अंधकार थइ गये सवे सुमटो शन्दवेधी पाणोवडे शनुमोना मर्मने वींपे. (७३) त्यां स्फूरायमान वीररसथी उद्भट एवा सुमटोना घडो दोडवा सता मार्गमा प्रतिपक्षीनी पुद्धिए सद्गोवडे पृतोपर पण प्रहार करे. (७४) त्या रणपाजिमोना रवयी उत्फुल्ल भने पुलकावडे उत्साहित साहसवाळा वीर सुभटो पोताना जीवितसहित आसा जगतने पण तृण समान गणे. (७५) भावा प्रकारना संग्राममा जो कदाच अत्यंत पराक्रमवाळा म्लेच्छोना समूहथी चक्रीनी सेना कांइक परामय पामे. (७६) एटले सेनानी पोते दृढपणे पख्तर पहेरी श्रधरस्नपर भारूढ , हाथमा गद्गरत्न धारण फरी वरव न युद्ध करवा तत्पर थाय. (७७) ज्यारे सेनानी युद्ध करवा लागे सारे देवतामो पण वेना सामे टकी शके नहीं - .. (३४४) श्रीकाललोकप्रकाश । नाकिनो यदि । तदा के नाम ते म्लेच्छा गजद्विपि वृका इव ॥७८॥ अथासौ भटकोटीर-स्तीवशस्त्रज्वरांकुशैः । कुक्षिक्षिप्तः शमयति प्रति- पक्षमदज्वरं ॥७९॥ तदाच केचिन्नश्यति केचित्कंदंति चार्दिताः । लुठंति केचिद्भूपीठे तिष्ठत्यन्ये मृताइव ॥४०॥ केचित्यजति शस्त्राणि वस्त्राणीवास्त- चेतनाः । क्षिपति वदने केचि-द्दीनवाचो दशांगुलीः ॥ ८१ ॥ तृणान्या- धाय दंतेपु याचंते जीवितं परे । लज्जाविलक्षाः शोचंति चेति केचिद- धोमुखाः ॥ ८२ ॥ हा गतं राज्यमस्माकं हा गता स्वैरचारिता । ते धन्याः प्राविपन्ना ये धिगस्मान् दुःखदर्शिनः ॥ ८३ ॥ अश्लाघामहि ये शौर्य-मात्मीयं योषितां पुरः । ते कथं कातरास्तासां मुखं दर्शयितास्महे ॥ ८४ ॥ वृथाभूदोर्मदोऽस्माकं वृथाभूच्छस्रकौशलं । भग्नैः कथमथ स्थेय-मस्माभिर्भटपर्षदि ॥ ८५॥ विषमा इति ते स्वेष्ट-देवाननुस्मरंति चेत् । तदा ते बोधयंत्येवं खिद्यध्वे किं जडा मुधा ॥ ८६ ॥ एप पखंडभूपालैः सेव्यते युद्धनिर्जितैः। तो पछी म्लेच्छोनो शो श्राशरो १ तेश्रो तो सिंहने जोतां वरुणो नासी जाय तेम नासी ज जाय. (७८) सेनानी शत्रुमटोना मदरूप ज्वरने तेनी कुतिमा वि शस्त्रोरूप ज्वरां- कुश दाखल करीने नाश करे. ( ७९ ) ते वखते केटलाक नासी जाय, केटलाक पीडा पाम्या सता रोवा लागे, केटलाक जमीनपर भाळोटवा लागे, केटलाक जाणे मरण पामेला होय तेम जमीनपर बेसी जाय, (८०) केटलाक चेतना विनाना जेम वस्त्र वजी देय तेम शस्त्रो तजी देय, केटलाक मोढामी दशे अंगुळीओ नाखीने दीन वाणी पोलवा लागे, (८१) केटलाक दांतमा तृण लइने जीवितनी याचना करवा लागे, केटलाक लज्जाथी विलखा थयेला नीचुं मुख राखीने ा प्रमाणे शोक करवा लागे-(८२) ' हा इति खेदे ! श्रमारं राज्य गयुं, अमारु स्वेच्छाचारीपणुं नाश पाम्युं, जेभो अमारी भगाउ मरण पाम्या छे तेश्रोने धन्य छे भने पावा दुःखने जोनारा श्रमने धिकार छे. (८३) जे अमो अमारी स्त्रीयो पासे श्रमास शौर्यनी प्रशंसा करता हता ते श्रमो प्रत्यारे कायर थइ जवाथी तेनी पासे मुख केवी रीते देखाडी शकशुं ? (८४) अमारो भुजानो मद पृथा थयो, श्रमार शस्त्र-कौशल्य वृथा थयु, भग्न एवा अमे सुभटोनी पर्पदामां केवी रीते घेसी शकशुं ? (८५) आप्रमाणे खेद पामेला एवा तेश्रो जो पोताना इष्ट देवने संभारे तो ते त्या भावीने तेमने समजावे के 'हे मुखों ! कैम फोगट खेद पामो छो ? (८६) युद्धमा जीतायेला छ खंडना राजा- .

सर्ग ३१ मो। (३४५) युप्माकमत्र का लज्जा न दुःखं पंचभिः सह ॥ ८७ ॥ पराजयोऽपि शोभायै महता विद्विषा युधि । भवेज्जयोऽपि लजायै हीनानां युधि भूभृतां ॥ ८८ ॥ या विधिप्रापितौन्नत्यैः स्पर्धा स्वस्यैव साऽहिता । निर्दताः स्युर्गजा एव खनंतः स्पर्द्धया गिरीन् ॥ ८९ ॥ अथैयामुपरोधेन तद्गृह्या नाकिनोऽपि चेत् । कुर्वत्युपद्रवं चक्रि- सैन्येऽकालांवुदादिकं ॥ ९० ॥ तदा विज्ञाय तान् शीघ्रं चक्रभृत्सेवकाः सुराः । मृगानिव त्रासयंति तत्कृतोपद्रवैः सह ॥ ९१ ॥ अनन्यगतय- स्तेऽथ मध्ये कृत्वांतपूरुपान् । नताश्चभूपतिं तेन नीयते चक्रिणोंतिके ॥ ९२ ॥ ढौकयित्वा प्राभृतानि नत्वा विज्ञपयंत्यदः। प्रभो दृष्टोऽनुभा- वस्ते वयं स्मः सेवकास्तव ॥ ९३ ॥ अज्ञानात्प्रातिकूल्यं च यदस्माभिः कृतं स्वया । कृपामाधाय सह्यं त-च्छरणागतवत्सल 1 ॥ ९४॥ चक्र- .. भोपा चक्रीने सेवे छे. तो तमने शुं लाज भावे तेम छे. १ पांचनी साथे दुःख होतुं नथी. (८७) युद्धा मोटा-पराक्रमी शत्रुथी पोतानो पराजय थाय ते पण शोभामाटे के अने पळहीन राजामोना युद्धमा जो पोवानो जय थाय तो ते पण लजा माटे न थे. (८८) जे विधिना योगे उन्नत अवस्था पामेल होय तेनी साथेनी स्पर्धा ते पोताने ज भहितकारक छे जेमके पर्वतनी साथे स्पर्धा करी तेना पर दातवडे प्रहार करनार हाथी दांत विनाना थाय ज छे.' (८९) श्रा प्रमाणे क्या छतां म्लेच्छोना उपरोधथी तेना आराघेला देवो चक्रीना सैन्यने अकाळे वर्षा विगैरे करीने उपद्रव करे. (९०) तो ते हकीकतने जाणीने चक्रवतीना सेवकभूत देवो वेना उपद्रवो सहित हरणीमानोनी जेम तेोने त्रास पमाडीने मगाडी मुके. (९१) पछी वीजु कोइ पण शरणभूत नथी एम जाणीने ते म्लेच्छराजामो पोताना भाप्तजनने आगळ करीने सेनानी पासे जद तेने नमे, एटले ते तेप्रोने चक्रवची पासे ला जाय. (९२) तेमो चक्रीने प्रणाम करी मेट' परीने विचप्ति करे के-'हे प्रभो! ममे तमारो प्रभाव जोयो. भाजपी ममे तमारा सेवको छीए. (९३) मशानडे श्रमे जे मापनी साधे प्रतिकूळ भाचरण कयं तेने हे शरणागतवत्सल । तमे छपा करीने घमजो.' (९४) पधी चक्री मनो सत्कार करीने मीठी वाणीवडे तेयोने शांत करे भने .. (३४६) श्रीकाललोकप्रकाश। वर्त्यपि सत्कृत्य स्निग्धगीः सांत्वयत्यमून् । सुखं वसंतु निर्भीका मदा. ज्ञावशवर्तिनः॥ ९५॥ सेनापतिमथाहूय चक्रभृद्विनयानतं । श्रादिशत्युत्तरार्द्धस्थ-सिंधु- निष्कुटसाधनं ॥ ९६ ॥ अस्य प्राच्यां नदी सिंधु-रुदीच्यां हिमवान् गिरिः। दक्षिणस्यां च वैताढ्यः प्रतीच्या लवणांवुधिः ॥ ९७ ॥ अथ निर्जित्य तान् म्लेच्छा-नादाय प्राभृतानि च । सार्वभौमं नमत्याशु पूर्ववत्पृतनापतिः॥ ९८॥ श्रथान्यदा चकरत्नं ततश्चरति सोत्सवं । कनिष्ठहिमवच्छेला-भि- मुखं चक्रिणान्वितं ॥ ९९ ॥ प्रथमं च प्रयातीद-मैशानीगामिनाध्वना । थियासोहिमवन्मध्य-मृजुरध्वायमेव यत् ।। २०० ॥ अंतर्गतान् वशीकुर्वन् देशग्रामपुराधिपान् । प्रयाणेर्योजनांतः स प्राप्नोत्युपहिमाचलं ॥१॥ निवेश्य कटकं तत्र पूर्ववद्विहिताष्टमः । प्रातस्तुर्येऽह्नि सन्नह्या-रूढः सांयामिक रथं ॥ २॥ अनुयातो नृपैः सर्वैर्वज्रभृत्रिदशैरिव । प्रेरयं- स्तुरगान् रथ्यान् रंहसा वायुजित्वरान् ॥३॥ हिमवद्भूभृतो भित्ति कहे के-'मारी श्राज्ञामा वर्तता सता तमे नही आनंदथी निर्भय थइने रहो. पछी चक्रवर्ती सेनापतिने बोलावे अने विनयवडे नन एवा तेने आज्ञा करे के-'तमे उत्तरार्धमा रहेला सिंधुना निष्कुट ने साधी श्रावो.' (९६) ए खंडनी पूर्वे सिंधु नदी, उत्तरे हिमवान पर्वत अने दक्षिणे वैवाढ्य तथा पश्चिमे लवणसमुद्र आवेल छे. (९७ ) चक्रवर्तीनी आज्ञाने पामी ते सेनानी त्या जइ त्यां रहेला म्लेच्छोने जीती तेभोना भेटणा लइ चक्रवर्ती पासे भावीने प्रथमनी जेम नमस्कार करे. (९८) अन्यदा चक्ररत्न त्यांथी उत्सवसहित चूलहिमवान् पर्वत तरफ चाले. चक्री पण तेनी पाछळ सर्व सैन्यसहित चाले. (९९) प्रथम ते ईशान दिशा तरफ गमन करे, पेमके हिमवानना मध्यभाग तरफ जवानी इच्छावाळाने आ मार्ग ज सरल छे. (२००) दररोज एक योजनप्रमाण प्रयाण करता भने मार्गमा आवता देश, ग्राम अने नगरना स्वामी- ओने जीतीने वश करता अनुक्रमे हिमाचळपर्वत समीपे पहोंचे. (२०१) त्यां सैन्यनी छावणी नाखीने प्रथमनी जेम अट्ठम करे, चौथे दिवसे प्रात:काळे सनद्ध थइने संग्राम- संबंधी रथ उपर चक्री प्रारूढ थाय. (२०२) पछी देवोए परिवरेला इंद्रनी जेम अनेक राजाओथी परिचरेला चक्री वेगवडे वायुने पण जीते एका रथना अश्वोने प्रेरणा करीने चलावे. ( २०३) ९ रीते चलापीने ते कुशळ ची स्थना अग्रभागवडे हिमवंतपर्वतना ' वर्ग ३१ मो। (३४७). रंथाग्रेणातिरंहसा । त्रिस्ताडयित्वा तुरगा-निगृह्णाति स कोविदः ॥४॥ प्राग्वन्नामांकित वाणं धनुष्यारोप्य निर्भरं । मुंचत्याकर्णमाकृष्यो-न्नतह- ष्टिविहायसि ॥ ५॥ उत्पत्य योजनानि द्वा-सप्ततिं स शरः स्फुरन् । हिमवगिरिदेवस्य पुरः पतति दूतवत् ॥ ६॥ तं दृष्ट्वा सोऽपि रुष्टः प्राक् पश्यन्नामाथ चक्रिणः। प्रीत्या प्राभृतमादाय राजेंद्रमुपतिष्ठते ॥ ७ ॥ वत्येवं सकलं क्षेत्रं त्वयेदं तरसा जितं । त्वत्सेवकोऽस्म्यहं देवा-दीच्य- पर्यंतरक्षकः ॥ ८॥ सर्वोपधीस्तथा कल्प-द्रुमपुष्पसजोऽद्भुताः । हिमव- गिरिकुंजोत्थं चंदनं तद्धृदांवु च ॥९॥ उपादायोपदां तस्ये-त्या. दिकां भूपभूपतिः । तं सत्कृत्य विस्मृज्याथ व्यावर्त्तयति वाजिनः ॥ १०॥ अशेषदिक्तटव्याप्त-जयतूर्यव्रजध्वनिः । उपत्यृषभकूटादि चक्री शक इवर्द्धिमान् ॥ ११ ॥ त्रिः स्पृष्ट्वा तं रथाग्रेण पौरस्त्ये कटकेऽस्य च । रत्नेन काकिणीनाम्ना निजं नाम लिखत्ययं ॥१२॥ तच्चैवं-ओसप्पिणी इमीसे तइयाएँ समाएँ पच्छिमे भाए । श्रहमंसि चक्कवट्टी भरहो इन नितंब भागने अति जोरथी प्रण वखत ताडन करे. पछी घोडाओने स्थिर उमा राखे, (२०४) भने प्रथमनी जैम पोतानुं नामांकित पाण धनुष्यपर भारोपण करी धनुष्यने कर्णपर्यत अत्यंत खेची उंची दृष्टि करीने आकाशमा छोडे. (२०५) ते स्फुरायमान पाण योतेर योजन उंचे जइ हिमवतगिरिना स्वामी देवनी पासे (तेनी समामा) दूतनी जेम बहने पडे. (२०६) तेने जोइने प्रथम तो ते पण रुष्टमान थाय पण पछी वाण उपर चक्रानुं नाम यांचीने शांत थइ प्रीतिपूर्वक भेटणुं लइने चक्रो पासे आवे, ( २०७ ) अने नमस्कार करेंनि कह के-भा सर्व चन तमें पराक्रमबडे जोती लोधलंच तेथों हे देव समारो सेवक छु भने भरतपना उत्तरना पर्यतमागनो रक्षक छं.' (२०८) पछी सर्वोपधि, कम्पपना पुप्पोनी अद्भूतमाळा, हिमवंतपर्वतना कुंजमा उगेलुं चंदन अने वेना परना (पद)द्रहवें पाणी विगेरे भेट तरीके घरे. (२०८) ते सर्व भेटने ग्रहण करीने चक्री तेना सरकार फरी विसर्जन करे, भने ते घोडामोने पाला वाळे. ( २१०) पछी समस्त दिशामा व्यापी रहेला जयवाजिनोना ध्वनिपूर्वक इंद्रममान ग्राद्धि- वाला चक्री त्यांची ऋषमकूट समीपे भावे. (२११) ते झपमटने रथना थग्रमाग पडे प्रण घार स्पर्श करीने पूर्व बाजुना तेना क्टक उपर काकिणीरत्नपडे घकी पोतार्नु नाम लरो. (२१२) मा पा प्रमाणे लऐ-"भा भवसर्पिणीमा पीना पाराने पाडले (३४८) भीकाललोकप्रकाश। नामधिज्जेणं ॥ १३ ॥ अहमंसि पढमराया अहं य भरहाहिवो णरवरिंदो णस्थि महं पडिसत्तू जिअं मए भारहं वासं ॥ १४ ॥ रीत्यानया यथा- क्षेत्रं यथाकालं यथाह्वयं । नामलेखनमाभाव्यं सर्वेषामपि चक्रिणां ॥ १५॥ ततो निवृत्य कटक-मुपेत्य कृतपारणः । हिमवगिरिदेवस्य विधत्तेऽष्टाहिकोत्सवं ॥१६॥ महोत्सवे समातेऽस्मिन् व्याघुट्येतः प्रवर्तते । वैताढ्याभिमुखं चक्र याम्यदिग्गामिनाध्वना ॥ १७ ॥ वैताढ्यस्योदग्नि- तवे निवेशितचमूस्ततः । जेतुं विद्याधराधीशान् पूर्ववत्कुरुतेऽष्टमं ॥१८॥ एतेऽनुकंप्यमनुज-मात्रत्वात्तत्र नोचितं । शरमोक्षणमित्येष नैनमाद्रियते विधि ॥ १९ ॥ इति श्रीजंबूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे, यत्तु श्रीहेमऋषभचरित्रे भर- तस्यात्र शरमोक्षणमुक्तं तन्मतांतरमवसेयं. अथ विद्याधरास्तेऽपि जानंति चक्रवर्त्यसौ । स्मरत्यस्मान् वयं चास्य सेवकाः शाश्वतस्थितेः ॥२०॥ यदमी अवधिज्ञाना-धभावेऽपि . 1 भागे हुँ भरत एवा नामनो चक्रवर्ती थयो छु. (२१३) हुं प्रथम राजा छु. हुं भाखा भरतनो स्वामी नरेंद्र छु, मारो कोइ प्रतिशत्रु नथी. में श्राखा भरतक्षेत्रने जीतेलुं छे. (२१४)श्रा रीते जे क्षेत्रमा जे काळे जे नामना चक्री थाय ते पोतपोताना क्षेत्रसंबंधी ऋपमकूट उपर पोतार्नु नाम लखे. या प्रमाणे सर्व चक्री माटे समजवू. (२१५) हवे चक्री त्यांथी पाला वळीने सैन्यमा आची पार| करे अने हिमवगिरिना देवसंबंधी अष्टाहिका महोत्सव करे. ( २१६ ) महोत्सव समाप्त थये चक्ररत्न त्यांची पाछु वळे ने दक्षिण दिशा सन्मुखना मार्गवडे वैवाढ्य सन्मुख चाले. (२१७) चक्री पण तेनी पाछळ चालीने वैताळ्य पर्वतना उत्तर बाजुना नितंब पासे लश्करनी पडाव करे, अने विद्याधरोना स्वामीने जीतवा माटे पूर्वनी जेम अहम करे. (२१८) वैवाढ्यपर रहेला विद्याधरो अनुकंपा (कृपा ) करवा लायक मनुष्यो ज होवाथी वाण मूकवा विगैरे क्रिया करवानुं त्या उचित नधी तेथी ते क्रिया न करे. ( २१९) मा प्रमाणे श्रीजंबूद्वीपप्रज्ञप्ति सूत्रमा कहेलुं छे. श्री हेमचंद्राचार्यकृत श्रीऋपमचरित्रमा मरतचक्रीए बाण मूक्यानुं कह्यु छे, ते मातर जाणवो. हवे विद्याधरो पण जाणे के-'भा चमावर्ती भावेल छ, ते अमने संमारे छे. अमे एना सेवक छीए एवी शाश्वत स्थिति के.' (२२० ) मा विद्याधरो अवधिज्ञाननो श्रमाव सर्ग ११ मो। (३४९) विदंति वै । चक्रिणश्चितितं तच्चा-चिंत्यदिव्यानुभावतः ॥ २१॥ सौध- मशानगा देव्यो यथोर्ध्वस्वर्गवासिनां । कामुकानामभिप्रायं जानंति दिव्यशक्तितः ॥ २२ ॥ तेऽथ प्राभृतमादाय स्त्रीरत्नादिकमद्भुतं । नमंति चक्रिणं स्वामिन् वयं स्मः सेवका इति ॥ २३ ॥ युयुत्सवः कदाचित्ते चेद्भवंति धृतायुधाः। साधितानेकविद्यास्त्रा भटंमन्या महाभुजाः ॥ २४ ॥ तदा रणरसं तेपा- मापूर्य विविधाहवैः । वशीकरोति तांश्चक्री निपादी कुंजरानिव ॥२५॥ श्रत एव जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिचूर्णो भरतचयधिकारे ' अपणे भगती' त्यु- स्वा द्वादशवर्षावधि नमिविनमिभ्यां सह युद्धमुक्तमिति ज्ञेयं. स्वीकृत्य प्राभृतं तेषां सोऽथ सस्कृत्य तानपि । विसृज्य मुदितस्तेषां कुरुतेऽष्टा- हिकोत्सवं ॥ २६॥ वैताढयात्तत ऐशान्यां गंगादेवीगृहं प्रति । प्रतिष्ठते चक्ररत्नं गंगाखं- डजयोत्सुकं ॥ २७ ॥ अत्र जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिवृत्तिः-यञ्चक्री ऋषभकूटतः छतो पण मा प्रमाणे चक्रवर्तीतुं चिंतित जाणे ते अचिंत्य एवा दिव्य अनुभावथकी जाण. (२२१) जुभो सौधर्म ने ईशान देवलोकमा रहेली देवीभो तेनी उपरना देव. लोकमा रहेला देवोनी कामुक अवस्थाना अभिप्रायने दिव्य शक्तिवडे जाणे छ तेम भहीं समजवू. (२२२) पछी ते विद्याधरो स्त्री-रत्नादिक अद्भुत भेटणुं लइने चक्रवर्ती पासे भागे भने वेने नमस्कार करे. पछी कहे के-'हे स्वामिन् ! अमे तमारा सेवको छीए. ( २२३) कदापि अनेक विद्या अने अखने साधनारा, पोवाने महाभुज एवा सुमट तरीके माननारा वेभो युद्ध करवानी इन्छाथी शस्रने धारण करी युद्ध करवा पाये छे (२२४) त्यारे तेमना पुदरसने विविध प्रकारना संग्रामवडे पूर्ण करीने मावत जेम हाथीने वश करे सेम ते विधाघरोने चक्री वश करे थे. ( २२५) आज कारणथी श्रीजंबूद्वीपप्रज्ञप्सिनी पूर्णिमा भरतचक्रीने अधिकारे 'अन्य कहे थे' एम फहीने पार वर्ष सुधी नमि विनमि साधे युद्ध थयानुं कहेल थे. पछी ते विद्याधरोनुं मेटणुं स्वीकारी, तेमनो सत्कार करीने चक्री वेमने विसर्जन करे छ, भने हर्प पाम्या सता तेना निमित्ते अष्टाहिकोत्सव करे. ( २२६ ) महोत्सव पूर्ण थये गंगाखंडने जीतवाने उत्सुफ ए चकररन वैतादयधी ईशान कोपनी सामे गंगादेवीना गृह तरफ चाले. ( २२७ ) भही जंयुद्धीपप्रतिनी धिमा ।

(३५०) श्रीकाललोकप्रकाश। प्रत्यावृत्तो न गंगां साधयामास तद्वैतात्यवत्तिविद्याधराणामनात्मसात्क- रणेन परिपूर्णोत्तरखंडस्यासाधितत्वात्कथं गंगानिष्कुटसाधनायोपक्रमत इत्यवसेयं. निवेश्य कटकं गंगा-देव्याश्च भवनांतिके । सिंधुवत्साधयत्येप तां नता निहितोपदां ॥२८॥ यच्चात्र भरतचक्रिणो गंगादेवीभोगेन वर्ष- सहस्रातिवाहनं श्रूयते, तज्जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे चूर्णौ चानुक्तमपि श्रीऋ- पभचरित्रे प्रोक्तमस्तीति ज्ञेयं. तस्या अप्युत्सवे पूर्णे चक्ररत्नं ततः पुनः । गंगापश्चिमकूलेन दक्षि- णस्यां प्रतिष्ठते ॥२९॥ क्रमाखंडप्रपाताया गुहाया द्वारसन्निधौ । उपेत्य चक्रभृत्तत्र स्कंधावारं निवेशयेत् ॥३०॥ कृताप्टमतपाश्चित्ते नक्तमालं गुहाधिपं । चिंतयेत्सोऽप्युपत्येनं सोपदः कृतमालवत् ॥३१॥ ततस्तस्योत्सवे पूणे जिगीपुश्चक्रवर्त्यथ । समादिशति सेनान्ये गंगानिष्कुटसाधनं ॥३२॥ गंगा प्रत्यग् वहत्यस्य प्राच्यां लवणतोयधिः । वैताढ्य हिमवंतौ च दक्षिणोत्तरयोर्दिशोः ॥३३ ॥ चतुर्भिः कृतसीमापि गंगया मध्यखंडतः । को छ के-'अपभकूटथी पाला वळेला चक्री गंगाने साधवा नथी कारण वैताट्यवर्ती विद्या- घरोने वश नहीं करेला होवाथी परिपूर्ण उत्तरखंडने साध्या विना गंगानिष्कुटने साधवानी उपक्रम केम करे ? पछी चक्री गंगादेवीना भवनपासे लश्करनो पहाग करीने सिंधुदेवीनी जेम गंगादेवीने साधे, ते नमस्कार करीने भेटणुं घरे. (२२८) अहीं जे भरतचक्रीए गंगादेवी साथेना उपभोगमा हजार वर्ष व्यतिक्रमाव्यानुं सामळीए बीए से जंबूद्वीपप्रम- प्तिसत्रमा के वेनी चूर्णिमा कहेल नथी. मात्र पमचरित्रमा कहेल छ एम समजवू. चक्री त्यां गंगादेवी संबंधी अष्टाहिकोत्सव करे अने ते पूर्ण थये सते चक्ररत्न गंगाना पश्चिम किनाराने मागें दक्षिण वरफ चाले. (२२९ ) अनुक्रमे ते खंडप्रपातागुफानी समीपे भावीने उसे रहे. तेनी पाछळ चालवा चक्री पण त्या भावीने पडाव करे. (२३०) पछी अहमतप करीने चित्तमा ते गुफाना अधिपति नक्तमालदेवतुं ध्यान फरे. ते पण भासनकंपची तरत ज चक्री पास भावे भने भेटणुं धरी कृतमालदेवनी बेम सेनी भाशा स्वीकारे. ( २३१ ) तेना संपंधनो अष्टाहिकोत्सव पूर्ण धये सवे जीतवाने इच्छवा चक्री गंगाना उचरनिप्फुटने साधवानी सेनानीने आज्ञा करे. (२३२) ए विमागनी पश्चिमे गंगा बहे छे, पूर्व लवणसमुद्र भायेलो छ भने दक्षिण सेम ज उसर दिशाए पैतार ने हिमवत पर्वत पावेला 2. ( २३३ ) मा प्रमाणे ज चतुःसीमा.

सर्ग ३१ मो। (३५१) पृथवकृतं विभज्येति गंगानिप्कुटमुच्यते ॥ ३४ ॥ सोऽपि गंगामथोत्तीर्य चर्मरत्नेन सिंधुवत् । म्लेच्छानिर्जित्य तत्राज्ञां प्रवर्तयति चक्रिणः ॥ ३५॥ चरितार्थो गृहीत्वा त-प्राभृतान्यर्यमद्युतिः । नत्वा चक्रिक्रमौ वक्ति तजयं निहितोपदः ॥३६॥ विसृष्टश्चक्रिणाप्येष भूरिसत्कारपूर्वकं । स्वावासे विहितस्नान-भोजनो रमते सुखं ॥ ३७ ॥ चक्री वक्त्यन्यदाकार्य द्वारं भो पृतनापते ! । दर्याः खंडप्रपाताया औत्तराहं प्रकाशय ॥ ३८ ॥ तमिनायाम्यदिग्द्वारो-द्घाटने यो विधिः कृतः । तेनैव विधिना द्वार-मुद्घाटयति सोऽप्यदः ॥ ३९ ॥ तेनेव वि- धिना चक्री विशत्यस्यां चमवृतः । प्रात्मा कर्मावृतो मातुः कुक्षाविव शिवाप्तये ॥ ४० ॥ मंडलान्यालिखन् भित्त्यो-नद्यावुत्तीर्य ते उभे । निर्याति याम्यद्वारेणो-द्घाटिताररिणा स्वयं ॥४१॥ ननु च-तमि- वाळा मध्यसंडमाथी गंगाए विमाग पाडीने तेने जूदो पाडेल छे, तेथी ते (उत्तर) गंगा- निष्कुट कहेवाय छे. ( २३४ ) सेनानी पण चरित्नवहे सिंधु नदीनी जेम गंगा नदी उत- रीने म्लेच्छोने जीती त्यां चक्रीनी प्राज्ञा प्रवावे. ( २३५) पछी चरितार्थ थयेल सूर्यनी जेवी कातियाको सेनानी ते राजाओना भेटणा लइने चक्रवर्ती पासे आवे अने तेमना घरणने नमीने मेटपुं भागळ घरी म्लेच्छोना जयनी हकीकत निवेदन करे. (२३६) चक्री भत्यंत सत्कारपूर्वक तेने रजा पापे एटले ते पण पोतांना भावासे भावी स्नान मोनन करीने आनंदमा प्रव. ( २३७) भन्यदा सेनानीने पोलावीने चक्री श्राज्ञा करे के-'हे सेनानी ! संडप्रपाता गुफाना उघर बाजुना द्वारने प्रकाशित करो (उपाहो). (२३८) सेनानी पण तमिस्रागुफाना दक्षिण दिशाना द्वार उपाडवा माटे में विधि कर्यो हतो ते प्रमाणे सर्व विधि नहीं पप फरीने तेना दार उघाडे. (२६९) पछी चक्री पण पूर्वोक्त विधि प्रमाणे जेम मोक्ष प्राप्तिने माटे वर्मात एवो यात्मा मातानी कुषिमा प्रवेश करे तेम सेनासहित तमा प्रवेश करे. ( २४०) मंदरनी ने भीतो उपर मंडळो मासीने, पंने नदीमो उतरीने पोतानी मेळे उघडी गयेला वारणावाळा दक्षिणपाजना दारबहे चक्री सेना- सहित गुफानी बहार नीरले. (२४१ ) रहीं कोई शंका करे थे के-चक्री तमिसागुफा. १ मोपप्राप्ति मनुष्यमय पिना यह शपती नथी, मेथी मनुष्यपणानी प्राति माटे गर्म. प्रवेश करपो परे.

(३५२) श्रीकाललोकप्रकाश। स्त्रया प्रविशति विनिर्गच्छति चक्भृत् । खंडप्रपातया तत्र किं कारणमि. होच्यते ॥ ४२ ॥ एवं दिग्विजयः सृष्ट्या कृतः स्याद्यच्च शोभनं । कार्य तक्रियते सृष्टथा सूदकं स्यात्तथा च तत् ॥ ४३ ॥ तत्पूर्वोक्तक्रमेणैवो- पक्रमते जयाय ते । प्रवर्तयेत्ताने हि चक्रं तन्मार्गदेशकं ॥ ४ ॥ स्कंधावारं निवेश्याथ गंगायाः पश्चिमे तटे । अष्टमं कुरुते चक्री निधानानि नव स्मरन् ॥ ४५ ॥ श्रथाटमपरीपाके निधीनामधिदेवताः। प्रत्यक्षीभूय सिंति नत्वैवं चक्रवर्तिनं ॥ १६ ॥ भवता भूरिभाग्येन वयं स्वामिन् वशीकृताः । भृत्यानस्मानिधींश्चैता-न्नवापि, स्वीकुरु प्रभो 1४७॥ यथेच्छमुपयुक्ष्वामूं-स्त्वदायत्तानथ प्रभो । स्वैरं नियोजयास्मांश्च किंकरान्निधिरक्षकान् ॥ १८ ॥ वशीकृतनिधिश्चक्री ततः पूर्णीकृताप्टमः स्नातभुक्तो निधानानां विधत्तेऽष्टाहिकोत्सवं ॥ ४९ ॥ कदाचिदथ सेनान्य-माहूयाज्ञपयत्यसौ । अपाच्यभरतार्धस्थ-गंगा- निष्कुटसाधनं ॥ ५० ॥ प्राच्यपाच्योः समुद्राभ्यां प्रतीच्यामथ गंगया । वडे प्रवेश करे अने खंडप्रपातावडे नीकळे तेनुं शुं कारण ? वेने जवाब मापे के के 'श्रा रीते ज सृष्टिना एटले सवळी-जमणी वाजुना क्रमवडे करेलो दिग्विजय कहेवाय छ, तेथी लोकमां पण जे शुभ कार्य होय ते सर्व सृष्टिना क्रमवडे ज कराय छे. ते प्रमाणे कर- वाथी ते कार्यनो परिणाम सारो भाये छे, (२४२) वेथी करीने सर्व चक्रीमो उपर कहेला क्रमवडे ज विजयने माटे यत्न करे के अने तेमने मार्ग देखाडनार चक्ररत्न पण वेमने एज रीते प्रवावे छे.' (२४३-४४) हवे चक्रवर्ती गंगाना पश्चिम किनारे लश्करनी पडाव करीने नव निधाननुं स्मरण करता सता अहम करे. (२४५) अहम पूर्ण थता नवनिधिना अधिष्ठायक देवो प्रगट थाने चक्रवतीने नमस्कार करी भा प्रमाणे कहे के-'हे स्वामिन् ! अत्यंत भाग्य- पाळा एवा तमे अमने पश कर्या छ तो हवे हे प्रभो ! सेवक एवा अमारो भने भा नवे निधानोनो तमे स्वीकार करो. (२४७) हे प्रभो ! भा तमारे वश एवा निधानोनो यथेच्छ उपयोग (उपभोग) करो, अने अमे ते निधिना रक्षको जे तमारा सेवको छीए नेने स्वेच्छाए मापना कार्यमा बोडी घो, (२४८) वश थयेला छे निधि जेने एवा चक्री प्राम पूर्ण यये सते स्नान-मोजनादि करीने ते निधानो संबंधी अष्टाहिकोत्सव करे. (२४९) अन्यदा पनी सेनानीने पोलावीने पाया करे के 'दघिण मरवार्धमा रहेला गंगा निप्पुटने साधी भावो.' (२५० ) ते निष्फुटनी पूर्व ने दक्षिणे लवण समुद्र छे, पधिम ..

- संगै'३१ मा (३५३) वैताव्येनोत्तरस्यां त-निष्कुट विहितविधि ॥ ५१ ॥ सोऽप्युत्तीर्य तथा गंगा' म्लेच्छानिर्जित्य पूर्ववत् । उपत्तिप्राभृतः सर्वं निवेदयति चक्रिणः ।। ५२॥ एवं साधितपट्खंडे कृतकार्येऽथे' चक्रिणि'। स्वराजधान्यभिमुखं चलते' चक्रमुत्सवैः ॥ ५३ ।। ततश्चक्री गजारूढ-श्चांमरच्छत्रशोभितः। निनदन्मंगलातोद्य साश्चर्य वीक्षितो जनैः ॥'५४ ॥ स्वराज्यधान्यां अभ्यणे स्कंधावार निवेशयेत् । कृताष्टमतपस्तित्र कुरुते पौषधत्रयं ॥ ५५॥ स्वराजधान्यधिष्ठातु-देवस्यानेन साधनं'। कुरुते' तच्चं निर्विघ्न-वासस्थै- र्यार्थमात्मनः ॥ ५६॥ अथाष्टमपरीपाके प्रोरुह्य जयकुंजर। नदसु भूरि- वाये विविधर्द्धिसमन्वितः ।। ५७॥'सोश्चर्य वीक्षितो लोकः पूर्वपुर्णयः प्रशंसिभिः'राजधानी'प्रविशति यंदा चकी'महोत्सवः॥ ५८ ॥ तदा- भियोंगिका देवा' बहिरंत:प्रमार्जिता । सुगंधिनीरेः सिक्तां तां कुर्युनाना- ध्वजांचितों ॥ ५९॥ केचिंच मुंदिता देवाः पुरी विंशति चक्रिणि । वृष्टिः गंगा नदी छे भने 'उचरे'वैताध्य पर्वत मावेले छे. नाप्रमाणे ने निष्कुटनो भवधि को के. ( २५१ ) सेनांनी पण प्रथम प्रमाणे जगंगाने उतरीने, ग्लेच्छोने जीतीने, यांनी पासेथी भेटणुं लाने चक्रवर्ती पासे भावें'भने ते हकीकत निवेदन करें. ( २५२') मा प्रमाणे छए खंड साधीने चक्री कृतकार्य थये सते चक्र उत्सवपूर्वक राजधानी वरफ वळे: (२५३ ) तेनी पछयाई हाथीउपर सीने चालता चक्री चामर-छत्रवरे शोमवा, मंगळवाजिनो वागता भने लोकोपी आश्चर्यपूर्वक जीवाता पोतानी राजधानी समीप भावीने त्या लश्करनी पडाय करे. पछी अट्ठमनो तप करीने अण पोसह करे. (२५४-५५) भाषी रीते अहमवहे पोतानी राजधानीना भधिष्ठाता देवनी साधना पो. साने निर्विघ्नपणे स्थिरतापूर्वक त्यो रहेवार्नु थवा माटे करे. ( २५६ ) अट्टम पुरो थये हांधीउपर सीने विविध प्रकारनी ऋद्धिसहित अनेक प्रकारना वाजियो वागते सते भने पूर्वपुण्पनी प्रशंसा करता लोकोथी अावर्षपूर्वक जीवाते सते चक्रवर्ती ज्यारे महो. सषपूर्वक पोतानी राजधानीमा प्रवेश करे से पखते तेना मामियोगिकदेवो नगरीने अंदर ने पहोरपी साफ करे, सुगंधी बळपडे सी भने नानाप्रकारनी घजामोपडे व्याप्त करे. (२५७-५९) पेटलाफ ही पामेला देवो चक्री नगरीमा प्रवेश करे ते बसते भामरण, , .. (३५४) श्रीकाललोकप्रकाश । माभरणस्वर्ण-रत्नववितन्वते ॥ ६०॥ तदा तं बहवः काम-भोगद्र- व्यार्थिनो जनाः। प्रशंसंतः स्तुवंतश्चो-चारयंत्याशिषां शतान् ॥ ६१ ॥ . बहुभिर्वासरैदृष्टा-मपूर्वामिव तां पुरीं । निरीक्षमाणः सानंद-मतिक्रामन् गृहावलीः॥ ६२॥ नरनारीसहस्राणां नमस्कारांजलीन्मुदा। श्राददानः क्रमादेति स्वप्रासादावतंसकं ॥६३ ॥ अथावस्ह्य नागेंद्रात् सेवकान्नाकिनो नृपान् । सेनापत्यादिरत्नानि सर्वं चान्यपरिच्छदं ॥ ६४ ॥ सत्कृत्य विस्तृजत्याशु गमनाय निजाश्रयान् । स्त्रीभिर्नाव्यैः परिवृतो विशत्यंत- हिं स्वयं ॥ ६५ ॥ तत्र स्वजनवर्ग स्वं मित्राणि ज्ञातिजानपि.। संबंधि- नश्च.भृत्यांश्चा-लापयेत्क्षेमपृच्छया ॥६६॥ कृतस्नानस्ततो भुक्ते जिना- र्चाचनपूर्वकं । ततोऽद्भुतैर्गीतनाव्या-दिभिभुक्ते, सुखानि सः ॥ ६७ ॥ अथ पोडश देवानां सहस्राः पार्थिवास्तथा । सेनापत्यादिरत्नानि परिवारस्तथाखिलः ॥ ६८॥ एत्य विज्ञपयंत्येवं प्रणताश्चक्रवत्तिनं । जिग्ये क्षेत्रमिदं स्वामिन् चतुरंतावधि त्वया ॥ ६९ ॥ तत्कुर्मश्चक्रवर्ति स्वर्ण, रत्न अने वज्रमणिनी वृष्टि करे. ( २६०) ते वखते कामभोग ने द्रव्यना अर्थी घणा जनो चक्रीनी प्रशंसा करे, स्तवे अने सेंकडोगमे श्राशिपो श्रापे. ( २६१ ) घणा दिवसोए दीठेली ते नगरीने जाणे अपूर्व जोता होय तेम आनंदपूर्वक जोता अने गृहोनी श्रेणियोर्नु अतिक्रमण करता, हजारोगमे नर-नारीओना नमस्काररूपी अंजळिने हर्पथी ग्रहण करता अनुक्रमे पोताना प्रासादावतंसकपासे भावे. (६२-६३) पछी त्यां हाथी उपरथी नीचे उतरीने प्रथम सेवक देवतामोने, राजाश्रोने, सेनापति विगेरे रत्नोने अने सर्व प्रन्य परिवारने सत्कार करीने पोतपोताने स्थानके शीघ्र जवा माटे विसर्जन फरे ( रजा आपे ). पछी स्त्रीमोथी अने नृत्य करनाराओथी परिषर्या सता पोताना महे- लमा प्रवेश करे. (६४-६५) पछी (पाछळ राजधानीमा रहेला पघा) पोताना स्वज. नवर्गने, मित्रोने, ज्ञातिजनोने, संबंधीमोने आने सेवकोने कुशळ पूछे. (सर्वनी खबर लेय ). (६६) पछी स्नान करी, जिनार्चन करीने मोजन करे. त्यारवाद अद्भुत एवा गीत-नाट्यादिवडे सुखभोग भोगधे. (६७) अन्यदा सोळ हजार देवो भने सोळ हजार राजाम्रो तथा सेनापति रल विगेरे समस्त परिवार चक्रवती पासे भाषीने प्रणामपूर्वक मा प्रमाणे विज्ञप्ति करे-'हे, स्वामिन् । आ भरतक्षेत्र चारे दिशाना छेडापर्यंत भाप जीती लीधुंछ, तेथी भमे महोत्सवपूर्वक वर्ग ३१ मो। वा-भिषेक समहोत्सवं । यथा वो रुचिरित्येवं चक्री तदनुमन्यते ॥ ७० ॥ श्रथ राज्याभिषेकार्थ-मष्टमं कुरुते तपः । अभिपेकास्पदं सज्जी- कारयत्याभियोगिकैः ॥ ७१ ॥राजधान्यास्ततस्तेऽस्या ऐशान्यां विमली- कृते । भूतले रचयंत्युच्च-मभिपेकाय मंडपं ॥ ७२ ॥ रत्नबद्धक्षितेस्तस्य रत्नस्तंभशतस्पृशः। विकुर्वत्यभिपेकार्थ मध्ये पीठं मणीमयं ॥ ७३ ॥ चतुर्दिशं त्रिसोपान-प्रतिरूपकशालिनः। मध्येऽस्य रचयंत्येक रत्नसिं- हासनं महत् ॥ ७४ ॥ इत्यादि विरचय्यते नवा शंसंति चक्रिणं । प्रभो सजीकृतोऽस्माभि-रभिपेकाय मंडपः ॥ ७५॥ ततश्चक्री गजा- रूढः सोत्सवं सपरिच्छदः। उपेत्य मंडपे तस्मिन् कृत्वा पीठप्रदक्षिणा ॥७६ ॥ तत्र प्राच्यत्रिसोपान-पथेनारुह्य सोत्सवं । सिंहासनमलंकृत्यं तिष्ठति प्राड्मुखः सुखं ॥ ७७ ॥ अथोत्तरप्रोष्ठपदा-प्रमुखे विहितोडुनि । विजयादौ मुहूर्ते च तेs- भिषिचंति चक्रिणं ॥ ७८॥ तथा चोक्तं-अभिपिक्को महीपालः श्रुति- आपने चक्रीपणानो अमिपेक मापनी रुचि अनुसार करवा इच्छीए छोए.' एटले चक्री ते यातनो स्वीकार करे. (६८-७० ) हवे राज्याभिषेकने माटे चक्री अहमतप करे अने राज्याभिषेक करयानुं स्थान प्रामियोगिक सेरको पासे तैयार करावे. (७१) तेश्रो मा राजधानीना ईशानकूणमा स्वच्छ करेली जमीन उपर मोटो अमिपेकमडप रचे. (७२) से मंडपनी जमीन रत्नोवडे वाघे, तेमा रत्नोना सेंकडो स्तमो होय छे. तेनी मध्यमा भभिषेकने माटे मणिमय पीठ निकुः (रचे) 2. (७३) ते पीठनी चारे पाजु प्रण प्रण पगयीमा एकसरसा ने शोमिता होय छे. तेनी मध्यमा एक गोटु रत्नमय सिंहासन रचे छ (७४) मा प्रमाणे तैयार करीने तेस्रो चक्रवर्ती पासे भावी नमस्कार करीने से हकीकत निवेदन करे के-'हे स्वामिन् ! अमे अभिषेक माटे मडप तैयार कयों छे.' ( ७५ ) पछीचक्री हाथीउपर बेसी उत्सयसहित ने परिवारसहित ते मंडप समीपे प्रावे. त्यां हाथीपरथी उतरी पीठने प्रदक्षिणा करी उत्मवसहित पूर्व पाजुना प्रण पगयीभावडे पीठउपर घडीने पूर्व दिशा सन्मुसना सिंहासन पर मानंदपूर्वक चेसे. (७७) पछी उत्तर प्रोष्ठपदा प्रमुख नपत्रो आरे सते विजयादि सर्तमा वघा मळीने चक्रीने भाभिषेक करे. (७८) पुंछ के-श्रवण, ज्येष्ठा, लघु (हस्त, अधिनी, भमिनिन्, .

+ श्रीकाललोकप्रकाश । ज्येष्ठालघुधुवैः । मृगानुराधापौर्णेश्च चिरं शास्ति - वसुंधरां ॥ ७९ ॥ .विजयमुहूर्तश्चैवं-द्वौ यामौ घटिकाहीनौ द्वौ यामौ घटिकाधिकौ।। .विजयो नाम योगोऽयं सर्वकार्यप्रसाधकः॥८॥ प्राग्वर्णितोऽभिपेको या क्षेत्रलोके सविस्तरः । वैमानिकानामुत्पत्तौ ,सर्वोऽप्यत्रानुवर्त्यतां ॥ ८१ ॥ तथाभिषिक्तं तं गंध-कापायया रूचितांगकं । सर्वांगालंकृतं कुर्यु-भूषणैर्मुकुटादिभिः॥,८२ ॥ जय चकिन् जय स्वामिन् जपातुल- पराक्रम,। राजराज जय प्रौढ-मुण्य,भद्रं सदास्तु ते ॥ ३ ॥ त्वया जितमिदं क्षेत्रं चतुरंतं महौजसा । तत्सालयासंख्यवर्ष-कोटीनिर्विघ्न- मस्तुते ॥६४॥ एवं देवाश्च भूपाश्च सौराश्च सपरिच्छदाः । वदंतो मंगलालापा-नभिपिच्य जसति तं ॥५॥ ततः कृताभिपेकोऽसौ भृत्यानाहूय शंसति । पुर्यामस्यां गजारूलता विष्वगुद्घोपयंत्विति ॥ ६॥ सर्वे महोत्सव सौराः कुर्वतु द्वादशादिकं । पुष्य ) ध्रुव (रोहिणी, प्रण उत्तरा) तथा मृगशिर, अनुराधा ने रेवती नक्षत्रमा करेलो के राज्याभिषेक जेने,एवो, राजा.पणाकाळपर्यंत पृथ्वीने पाळे छे.(७९) विजयमहूर्त माप्रमाणे छे-प्रथमनाये पहोर एक-घडीहीन व्यतीत थये सते अने.एक घडी अधिक वे पहोर लाकी रो सते सर्व कार्यनो प्रसाधक एवो विजययोग, थाय छे. (८०) पूर्व क्षेत्रलोकमा वैमानिक- देवनी उत्पचिने प्रसंगे जे,अमिपेक सविस्तर वर्णवेलो- छे ,ते सर्वे ते जप्रमाणे नहीं समजी लेवो. (८१) तेवा प्रकारे अभिषेक कर्या .पछी गंधकापायी वसपरे चक्रीना शरीरने जळाहित करीने (लुहीने ) सर्व अंगने मुक्टोदि भूपयोपडे भलंकृत,फरे. (८३) ते बखते ' हे चक्री ! तमे जय पामो, है. स्वामिन् । समारो जप थामो, हे अतुलपरा- क्रमी 1.जय पामो, हे राजामीना,राजा । तमे, विजय पामो, हे प्रौढपुण्यवाळा ।समारं सदा कल्याण थामो. ( ८३ ) तमे।मा भरतक्षेत्रने चारे दिशाना पर्यंत मागसुधी महा- पराक्रमवडे जीती लीधु थे लेने असंख्यकोटी वर्षपर्यत पाळो भने समने निर्विघ्नपणं यामो.' (८४ ) मा प्रमाणे सक्रीने अभिषेक करीने परिवारसहित देखो, राजामो भने नगरजनो मंगळालापने चोलता सता नमस्कार करे. (८५) पछी करायेल छे भभिषेक जेने एवा चक्री सेवकोने धोलावीने या प्रमाणे कहे के- 'समे हाथी उपर पेसीने ,भाखा नगरमा चोवरफ फरीमा प्रमाणे उघोपया करो (८६) के-'हे पौरजनो! तमे सर्वे पार वर्षपर्यंत प्रा महोत्सव करो.' एनी.पवति । .. सर्ग:मो.। (३५७) अष्टाहिकोत्सवस्येव ज्ञेया:सर्वात्र पद्धतिः ॥ ८७॥ ततो,याम्यत्रिसोपान- मार्गेणोचीर्य पीठतः । पट्टहस्तिनमारुह्य चक्री:सर्वसमृद्धिभिः ॥ ८८॥ प्रासादं निजमागत्य स्नात्वा :कृतजिनार्चनः । स्वर्णस्थाले सुखासीनः कुरुतेऽष्टम्पारणं ॥ ८९॥ वारांस्त्रयोदशैवं च कुर्यादिग्विजयेऽष्टमान् । बारांश्च चतुरश्चक्री -कुरुते शरमोक्षणं ।। ९०.॥ तीर्थत्रय:सिंधुगंगा-देव्योवैताट्यनाकिनः।। गुहेशयोः कृतमाल-नक्तमालकसंज्ञयोः ॥९॥ हिमवद्गिरिदेवस्य विद्या. घरमहीभृतां । निधीनां राजधान्याश्चाभिषेकावसरेऽपि च ॥१२॥ त्रयो- दशाटमा एवं निर्दिष्टाश्चक्रवर्तिनातीर्थत्रये हिमवति चतुर्पशरमोचणं .॥९३ ॥ अतुच्छेरुत्सवैरेवं :प्रजाभिस्सह चक्रिणः । यब्वेषु द्वादशस्वाशु संपूर्णेषु निमेपवत् ॥९॥ ततो यक्षान्नृपश्चिापि रत्नान्यपि च नागरान्। -वक्री यथार्ह सत्कृत्य भुक्त राज्यमकंटकं ॥१५॥ युग्मं । पखंडराज्ये संजाते निःशल्य इति चक्रिणः । प्रविशत्यस्त्रशालायांचरत्नमहामहैः ।।९६ ।। चक्रं.१ दंड ,२.स्तथा.खड्गं ३ छत्रं:४.चर्म ·५ तथा मणिः ६। पधी अष्टाहिकोत्सव प्रमाणे जाणवी. (८७) आम कहीने दक्षिण बाजुना त्रण प्रग- थीमाभोवडे पीठपरथी उतरी पट्टहस्तीपर चेसी-चक्री सर्व समृद्धिवडे पोताना प्रासादमा भाये. त्या स्नानपूर्वक जिनार्चा करी सुखपूर्वक बेसीने सोनाना थाळमां अहम उपर्नु मारणं करे. (८८-८९) उपर कमा प्रमाणे दिविजयमा कुल तेर वखत अहम तप करे, भने चार बखत बाण मूके. (९०) त्रण तीर्थ, गंगा अने सिंधुदेवी, वैवाल्यकुमारदेव, घे गुफाना स्वामी कृतमाल ने नक्तमालदेव, हिमगिरिदेव, विद्याधर राजाओ, नव निधानो, राजधानी अने अभिषेक अवसर-मा १३ प्रसंगे चक्री अहम करे एम कर्दा छ भने तेमांना प्रण ती.तथा हिमवंत पर्वते-एम चार,ठेकाणे वाण म्के एम कयुं छे. (९१-९३) प्रजा. साथे मविरोप उत्सवमा वा चक्रीने घार वर्ष तो एक निमेषमाप्रमा पूरा यह जाय. (९४).पछी यचो, राजामो, रत्नो भने ,नगरजनोनो यथायोग्य सत्कार करे ,भने निष्कंटक एवं राज्य मोगवे. (९५).ए.प्रमाणे- पदरांड राज्पनी प्राप्ति चक्रीने नि:श- न्यपणे पये सते पक्ररत्न मोटा महोत्सवसाथे,भायघशाळामा प्रवेश करे. (.९६) चक, दंर, सद्ग, छत्र, धर्म, मणि अने काकिणी मा सात,एकेंद्रिय ,भने १ सेना- .. (३५८) श्रीकाललोकप्रकाश। स्युः काकिणीति ७ रत्नानि सप्तैकाक्षाणि चक्रिणां ॥ ९७ ॥ सेनापति १ हपति २-द्धिकिश्च ३ पुरोहितः ४ । गजो ५ ऽश्वः ६ स्त्री ७ ति रत्नानि सप्त पंचेंद्रियाण्यपि ॥ ९८ ॥ चक्ररत्नं भवेत्तत्र मुख्यं विजय- साधनं । वज्रतुंबं लोहिताक्षा-रकं जांबूनदप्रधि ॥ ९९ ॥ मणिमौक्ति- कजालेना-लंकृतं किंकिणीयुतं । नानारत्नमणिस्वर्ण-घंटिकाजालवेष्टितं ॥ ३००॥ सर्व जप्रसूनस्रक्-पूजितं रविवियवत् । दीपं द्वादशभंभादि- तूर्यध्वनिनिपेवितं ॥१॥ अनेकदिव्यवादिन-निर्घो षैः पूरितांबरं । सदा नभः- स्थितं यक्ष-सहस्रपरिवारितं ॥ २॥ चतुर्भिः कलापकं ॥ अमोघशक्तिक तच्च खेचरक्ष्माचरादिपु । विना स्वगोत्रं सर्वेषु वैरिषु प्रोत्कटेष्वपि ॥३॥ पाताले वा पयोधौ वा वज्रकोष्ठे स्थितस्य वा। रिपोः शीर्ष छिन- त्येत-चक्रिमुक्तं चिरादपि ॥४॥ अकृत्वा तच्छिरश्छेदं न कदापि निवर्त्तते । मासैर्बहुभिरब्दैर्वा तं हत्वैवैति चक्रिणं ॥५॥ नाप्नोत्यक्सरं याव-त्तावत्तद- नुशात्रवं। इव श्येनोऽनुशकुनि भ्रमीति दिवानिशं ॥ ६ ॥ इति चक्ररत्नं. पति, २ गृहपति, ३ वार्धकी, ४ पुरोहित, ५ गज, ६ अश्व भने ७ स्त्री-श्रा सात पंचें- द्रिय कुल १४ रत्नो चक्रवर्तीने होय छे. (९७-९८) तेमा विजयना मुख्य साधनरूप चक्ररत्न बनना तुंध (मध्यभाग)वाळु, लोहितावना पारावालं, जांबुनदनी परिष वालं, मणिमोतीनी जाळ (माळा )वडे अलंकृत, घुघरीभोवालं, नानाप्रकारना रत्न मणि अने सुवर्णनी घटडीमोथी वेष्टित, सर्व ऋतुमा थनारा पुष्पोनी माळाओधी पूजित, रविचिंय जे तेजस्वी, पार प्रकारना संभादि वाजिनोना ध्वनिथी सेचिव, अनेक दिव्य वाजिबोना निर्घोपथी आकाशने पूरी देनारु, सदा आकाशमा ज रहेनारं श्रने हजार यक्षोथी परिवरेलुं होय छे (२९९-३०६) अमोघ शक्तिवाळू ते चक्र स्वगोत्री शिवाय वीजा सर्व प्रोत्कट एवा दमाचर के खेचरै एवा कोइ पण उत्कट शत्रुपर चक्रीए मूक्यं सतुं पाताळमां, समुद्रमा के वजना कोठामा कोइपण स्थाने शनु गये सवे तरत अथवा भाककाळे तेना मस्तकने छेदीने ज पार्छ चक्रीपासे आवे छे (३-४) तेना मस्तकनो छेद कर्या पिना ते कदापि पार्छ श्रावतुं नथी. घणा दिवसो, मासो के वर्षों अतिक्रमे तो पण तेने हणीने ज चक्रीपामे पाये छे. (५) यांसुधी शत्रुनु मस्तक छेदवानो भव. सर मळतो नथी त्यांसुधी ते श्येन पची जेम तेना मत्यरूप वीजा पधीनी पाछळ भमे तेम शत्रुनी पाडळ राप्रदिवस मम्या करे छे. (६) इति चरत्नं. १ पृथ्वीपर घालनार. २ विद्याधर. , , मो । सर्ग (३५९) स्याइंडरत्नं सर्वत्रा-व्याहतं वज्रनिर्मितं । स्फुरद्रत्नमयैर्दीनं पंच- भिः पर्वभिः शुभैः ॥७॥पथि संचरतश्चक्रि-सैन्यस्य सुखहेतवे । क्षुद्राद्रिग- रौपापाण-विषमक्ष्मोपमईकं ॥ ८॥ युग्मं ॥ प्रयोजनविशेपेण प्रयुक्तं स्वामिना च तत् । सहस्रयोजनोद्विद्धं कुर्यात्खातं भुवि द्रुतं ॥९॥ परिखाष्टापदस्थाद्रे-यथा सगरनंदनैः । सहस्रयोजनोद्विद्धा दंडरत्नेन निर्मिता ॥१०॥ भेदन(क)शत्रुसैन्यानां कुलिशं भूभृतामिव । नृदेवतिर्य- गुत्पन्ना-शेपोपद्रवजिच्च तत् ॥ ११ ॥ ज्वलनप्रभनागेंद्रा-सगरस्यांग- जन्मनां;। योऽभूदुपद्रवः सत्य-प्यस्मिन् स त्वनुपक्रमः ॥ १२ ॥ ध्वंसः सोपक्रमस्यैवो-पद्रवस्य भवेदितः। इतरस्तु भवत्येव वीरांतेवासिदाहवत् ॥ १३ ॥ तथेदं चक्रिणां सर्व मनश्चितितसाधकं । महाप्रभावः स्याद्यक्ष- सहस्रसमधिष्ठितं ।। १४ ।। इति दंडरत्नं. खद्गरत्नं भवेत्तीक्ष्ण-धारं नीलाब्जमेचकं । नानारत्नलताचित्र-वि- चित्रं च सुगंधि च ॥ १५॥ रत्नस्वर्णादिरचना-विचित्रोत्कृष्टमुष्टिकं । २ दंडरत्न-सर्वत्र अव्याहत होय छे, वजनुं पनेलं होय छ, स्फुरायमान रत्नोना शुभ एवा पांच पर्वोवडे दीप्त होय छे. (७) मार्गे चालतां चक्रीना सैन्यना सुखने माटे नाना सरखा टेकरा, साडा, पापाण भने विषम पृथ्वीने सम करनार (उपमर्दन करनार ) होय 2. (८) कोई प्रयोजन विशेषे चक्रीए हुकम कर्यो होय तो जमीनमा उई एक हजार योजन खोदी शके छे. (९) जेमके सगरचक्रीना पुत्रोए दंडरत्नवडे अष्टापद पर्ववनी फरती खाइ एक हजार योजन उंडी वेनावडे खोदी हती. (१०) पर्वतने गेदनार वजनी जेम शत्रुसैन्यनुं भेदन करे छे. वळी देव, मनुष्य ने तिर्यचना करेला सर्व उपद्र- वोने जीतनार होय छे. (११) सगरचक्रीना पुनोने ज्वलनप्रम नागेंद्र तरफयी ते दंड- रत्न छत पण जे उपद्रव थयो (तेश्रोने बाळी नाख्या) ते उपद्रव अनुपक्रमी हतो. (१२) मा दंडरत्नथी सोपक्रमी उपद्रवनो ज नाश था शके थे। निरुपक्रमी उपद्रव तो थायज छे. जेम वीरप्रमुना शिष्योने गोशाळे पाळी दीधा तेम. (१३) मा दंडरत्न चक्रीना मनचिंतित सर्व अर्थन साधक, महा प्रमाववालं ने एक हजार पचोवडे अधिष्ठित होय छे. (१४) इति दंडरत्न. ३ खड्गरत्न-तीक्ष्ण धारवाळ, नीलकमळ बेधुं श्याम, नाना प्रकारनी रल- मय लवादी चित्रविचित्र भने सुगंधी होय छे. (१५) रत्नस्वर्णादिकधी रचेली (३६) औकाललोकप्रकाश। सद्यः शाणोत्तीर्णमिव शश्वत्तेजोभरौद्भुतं ॥ १६॥ गिरिवज्रादिदुर्भेद- भेदकं शत्रुसैन्यभित् । चराचराणां सर्वेषां छेदनेऽमोघशक्तिकं ॥ १७॥ त्रिभिर्विशेषकं । पंचाशदंगुलायाम षोडशांगुलविस्तृतं । स्याद गुलबाह- ल्य-मेतयक्षसहस्रयुक् ॥ १८॥ तथोक्तं जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे-पण्णासंगुर लदीहो सोलसअंगुलाई विच्छिण्णो । श्रद्धंगुलसोणीको जेट्ठपमाणो अंसी भणिओ ॥ १९॥ यत्तु संग्रहण्यां 'वत्तीसंगुलखग्गो' इति श्रूयते तन्मध्यममानापेक्षंया, यदाह वराहः-अंगुलशतार्द्धमुत्तम ऊनः स्यात्पंच- विंशतिं खङ्गः । अनयोश्च संख्ययोर्यो मध्ये स तुःमध्यमो ज्ञेयः॥२०॥ इति खड्गरलं. छत्ररत्नं भवेत्पूर्ण-शरच्छीतांशुमंजुलं । नवनवत्या संहले रेशला: काभिरकितं ॥ २१ ॥ दर्शनादेव दस्यूनां भुजशस्त्रादिशक्तिहृत् । पुष्टप्रौढ स्वर्णदंड-नानाचित्रेश्च चित्रंकृत् ।। २२ ॥ स्थाने च दंडारोपस्य' पंजरा- कारराजितंग परितो मौक्तिकालीभि-मणिरत्नेश्चा मंडितं ॥२३॥ पृष्टंया. विचित्र एवी उत्कृष्ट मुठवाळु होय छे तरतमा ज शराण उपरथी' उतारेलं होय तेवू चोत- रफ फेलाता तेजवहे अद्भुत होय छे. ( १६.) पर्वत ने बजादिक दुर्मेध वस्तुमाने पण भेदी शके छे. शत्रुना सैन्यनो नाश करे. छ.- चरं ने स्थिर एवी सर्व वस्तुभोना छेदनमा अमोघ शक्तिवालं होय छे. (१७) पचास अंगुळं लायु ने सोळ अंगुळ पहोळ होय छे. अर्ध अंगुळ जाई भने एक हजार' यक्षोपडे अधिष्ठित होय छे. (१८) श्रीजं). द्वीपप्रज्ञप्तिमनमा पचास अंगुल ला सोळ अंगुल पहोलं भने अर्थ भंगुल जाई मा प्रमाणे मोटा प्रमाणवालं ज खड्ग कयुं छे. (१९) संग्रहणीमा जे ३९ अंगुलर्नु प्रमाण फझुं छे ते मध्यम मानपाळा खड्ग माटे समजबुंः ते विप वराह कहेछे के-५० अंगुळं. प्रमाण उत्तम भने २५ भंगुळप्रमाण-ते जघन्य कहेल के माघे संख्यानी मध्यनी संख्याना प्रमाणवालं ते मध्यम जाणवू. (२०) इहि.सद्गरत्नं. ४'छत्ररत्न-शरतुना पूर्णचंद्र जेधु मंजुल ( मनोहर) होय छे. ९९ हजार सुवर्णनी सळीभोपालं होय छे. २१) जोवामाथी न शत्रु विगैरेनी भुजा (चोरी)नी ने तेना शस्त्रादिनी शक्तिने हरनारु होय छे. नाना प्रकारना चित्रोवडे चित्रीत पुष्ट भने प्रौढ स्वर्णनादरवाळु होय छे. (२२) दंडन मारोपण करवाने स्थाने एटले छाना मप्रमागने स्थाने से पंजराकार जेघु शोमें छे चौतरफ मोती मने मणिरत्नीनी शिमो-माळामोथी मंडित होय . (२३) टि, ताप, पवन भने शीतादि उपद्रवनुं निवारक गोप छ. तपगुच- - सर्ग ११ मो। (३६१) तपमरुच्छीता-ग्रुपद्रवनिवारकं । विषादिनानादोषघ्न-च्छायं प्राप्यं तपो- गुणैः ॥ २४ ॥ शीतकाले विशालोष्ण-च्छायं ग्रीष्मे च शीतलं । सर्वर्तु- सुखदच्छायं विमानमिव जंगमं ॥ २५ ॥ ऐश्वर्यशौर्यधैर्यादि-प्रदलक्षण- लक्षितं । चक्रिभाग्यमिवाध्यक्ष राजचिह्न महोज्ज्वलं ॥ २६ ॥ पभिः कुलकं ॥ व्यामप्रमाणमप्येत-द्विस्ताराध्यवसायिना । व्याप्नोति चक्रिणा स्पृष्टं साना द्वादशयोजनीं ॥ २७ ॥ साधिकत्वं चात्र परिपूर्णचर्मरत्नपि- धायकत्वेनेति जंवृप्र० ० । इति छत्ररत्नं । चर्मरत्नं भवेच्चारु-श्रीवत्साकारवंधुरं । मुक्तातारार्द्धचंद्रादि-चित्रै- श्चित्रं समंततः ॥ २८ ॥ समग्रचक्रभृत्सैन्यो-द्वहनेऽपि मनागपि । न न्यंचति द्विपच्छौ-र्दुर्भदं वनचर्मवत् ॥ २९॥ महानद्यंभोधिपार-प्रापकं- यानपात्रवत् । तत्कालं गृहपत्युप्त-शाकधान्यादिसिद्धिकृत् ॥ ३०॥ तादृक्प्रयोजने ह्यस्मिन् धान्याद्युप्तमहर्मुखे । लुनाति सायं निष्पन्नं रत्नं कौटुंविकाग्रणीः ॥ ३१ ॥ द्विहस्तमानमप्येतत् स्पृष्टं विस्तारका घडे प्राप्य शक्तिवालं अने तेनी छायामा रहेनारना विषादि नाना प्रकारना दोपर्नु नाश करना होय छे. (२४) शीतकाळे विशाळ एवी उष्ण छाया थापनार अने ग्रीष्मकाळे शीतळ छाया प्रापनार होय छे. जंगम एवा विमाननी जेम सर्व ऋतुमा सुख- कारी छायाने श्रापे छे. ( २५) अश्वर्य, शौर्य, धैर्यादिने प्रापे तेवा लषयोथी लक्षित होय छे. जाणे प्रत्यक्ष एवं चक्री, भाग्य होय एयुं भने महाउज्वळ राजचिन्हरूप होय छे. (२६) एक व्याम अथवा चे हाथ प्रमाण सामाविक होय के परंतु कार्यपरत्वे तेनो विस्तार करवो होय त्यारे चकाना हाना सर्शधी पार योजन झाझे रिस्तार पामे छे. (२७) 'भहीं साधिकपणुं कडं थे ते परिपूर्ण पार योजन विस्तृत चर्मरत्नने ढाकी देनार होवाथी समजवू.' या प्रमाणे जंगीपप्रज्ञप्तिमा कयुं छे. इति छपरत्न. ५ धर्मरत्न-सुंदर एया श्रीवत्सना भाकारवाळ, मुस्वा, वारा ने मर्षचंद्रादि चियोपडे चौतरफ चित्रित, पासी चक्रवर्तीनी सेना सेनी उपर चडापनमा पारे तो पण किंचित्मान न नमे एy, बजना चर्मनी जेम शमोना शस्रोधी दुर्भेद (न मेदाय से), प्रवहपनी जेम महानदी भने समुद्रना पारने पमाडनारं, गृहपतिना पानेला शाक पान्यादिने तरतज उगाडना, या साप्त प्रयोजन चखते तेनी उपर सबारे पालुं धान्य-शाकादि सांजे सेट्टनोए लषी लेबाय ठेवू, (२८-३१) पे हाथना प्रमाण.

(३६२) श्रीकाललोकप्रकाश । क्षिणा । व्याप्नोति योजनानि द्वा-दशैतदधिकानि वा ॥ ३२ ॥ ननु- चक्रिसैन्यावकाशाय व्यासो द्वादशयोजनः । अस्य स्यादुचितो यच्चा- धिक्यं तत्तु निरर्थकं ॥ ३३ ॥ अत्रोच्यते-सत्येव किंचिदाधिक्ये सुखं तिष्ठति सा चमूः । स्याच्चैवं छत्रयोगेऽस्य संपुटत्वं निरंतरं ॥ ३४ ॥ तथोक्त-चर्मच्छत्रयोरंतरालपूरणायोपयुज्यते साधिकविस्तार इति जंबूप्र० वृ० श्रीवत्साकारमप्येत-नानाकारं यथाक्षणं । स्यात्ततश्छत्रयोगस्य संपु- टत्वं न दुर्घटं ॥ ३५ ॥ श्रूयते भरतक्षेत्रा-ईस्योदीच्यस्य साधने । तत्र. त्यम्लेच्छपक्षीयै- गर्मघमुखाभिधैः ।। ३६ ।। मूशलस्थूलधाराभिः सप्ता- हानि निरंतरं । वृष्टौ कृतायां भरत-चक्रिसैन्यमहातये ॥ ३७॥स चक्री छत्रचर्मभ्यां कृत्वा संपुटमद्भुतं । सैन्यमस्थापयत्तत्र वेश्मनीवानुपद्रवं ॥३८॥ पार्थिवत्वेऽपि तत्साम्या-चर्मेति व्यपदिश्यते । अन्यथास्य श्रुतख्यात-मेकाक्षत्वं विरुध्यते ॥ ३९ ॥ दंडोऽप्येवं पार्थिवस्त-साम्या- 'पालं भने विस्तार करवानी इच्छाबडे चक्रीना हस्तस्पर्शथी बार योजन अथवा तेथी कोइक अधिक विस्तृत थाय तेवु होय छे. (३२) अहीं कोई प्रश्न करे छ के–'चक्रीना सैन्यना प्रकाश माटे पार योजन यस छ, तेथी अधिक कयुं ते निरर्थक छे.' (३३) तेने उत्तर प्रापे के के-'कहिक अधिक होयाथी ज मां लश्कर सुखे रही शके, वेम ज छत्रनी साथे वरापर संपुटपणुं प्रांतरारहितपणे बनी शके. (३४) या संबंधां श्रीजंबूद्वीप- प्रज्ञप्तिवृत्तिमा का छे के-' चर्मछत्रनो अंतराळ भाग पूर्ण करवा माटे साधिक विस्तारनी जरुर छ.' श्रीवत्सना आकारवाछं छतो ते योग्य समये नाना प्रकारना प्राकारवाळू पण होय थे भने वेनी साथे छत्ररत्ननो योग थाय त्यारे संपुटपणुं पण परापर थाय छ, ते वात घटमान छे. (३५) शास्त्रमा सांभळीए बीए के भरतक्षेपना उत्तरार्धना साधन वसते त्यां रहेला म्लेच्छना पक्षवाला मेघमुस नामना नागकुमारोए मरवचक्रीनां सैन्यने मोटी पीडा उत्पन्न करवा माटे मुशळ- प्रमाण स्थूळ धारावडे सात दिवस सुधी अविच्छिन्न पृष्टि करी, ते वसते चक्रीए चर्म ने छत्ररत्ननो अद्भुत संपुट बनावीने उपद्रय विनाना घरनी जेम तेनी अंदर सैन्यने स्थापन पर्यु हत. (३६-३८) पा रत्न पृथ्वीकाय थे तो पण ते चर्म समान होवाची एनो धर्म नामथी ध्यपदेश मान फराय छे. नहीं तो तेनुं एकाच( एफेंद्रिय पणुं जे ध्रुवमा कहल के तेमा विरोध भावे. (३९) दंड पण एजरीवे पार्थिव छ, दंड जेवा भाकारथी । मर्ग २१ मो। (३६३) तद्वयपदेशभाक् । भाव्यमेवं पार्थिवसं सतानामपि धीधनैः ॥ ४० ॥ इति चर्मरत्नं ॥ मणिरलं भवेद्विश्वाद्भुतं निरुपमद्युति । वर्यवैडूर्यजातीयं श्रेष्ठं सर्व. मणिष्विह ॥ ४१ ॥ सर्वेषामपि भूतानां प्रियं न्यस्तं च मूर्द्धनि । सर्व. दुःखहरं क्षेम-तुष्ट्यारोग्यादिकृत्सदा ॥ ४२ ॥ सुरासुरनृतिर्यग्जा-शेषो- पद्रवनाशकं । जयप्रदं च संग्रामे शस्त्राघातनिवारक ॥४३॥ त्रिभिर्वि- शेषकं । सदावस्थिततारुण्य-मवद्धिष्णुनखालकं । विप्रमुक्तं भयैः सर्वे- रिदं कुर्वीत धारकं ॥४४॥ सांधकारे तमित्रादा-बुद्योतं कुरुतेऽर्कवत् । अचिंत्यावाच्यमूलं त-देवानामपि दुर्लभं ॥ ४५ ॥ इदं हि प्रागुरुच्छत्र- चर्मसंपुटसंस्थिते । सवितेवाकृतोद्योतं सेन्ये भरतचक्रिणः ॥ ४६ ॥ गुहाद्वये प्रविशत-श्चेदमेव हि चक्रिणः । कुंभिकुंभस्थितं ध्वांत-बातघा- ताय कल्प्यते ॥४७॥ चतुरंगुलदीर्घ स्या-दंगुलद्वयविस्तृतं । मध्ये वृत्तो- नतं तच्च पद्भिः कोणैरलंकृतं ॥ ४८ ॥ इति मणिरत्नं ॥ ज वेनो व्यपदेश ते नामथी कराय छे. या प्रमाणे साते रत्नोनुं पुद्धिमानोए पार्थिवपहुं समजी लेवू. (४०) इति चर्मरत्न. ६ मणिरत्न-विश्वमा अद्भुत एवं भने निरुपम कांतिकालु होय थे. श्रेष्ठ एवी पैर्यजातिनुं भने सर्व मणिमोमा श्रेष्ठ होय छे. (४१) सर्व प्राणीओने प्रिय लागे तेवू म ज जो मायापर राख्युं होय तो सर्व दुःखने हरनारं अने सदा क्षेम, तुष्टि तथा प्रा. रोग्यने करनालं होय छे. (४२) सुर, असुर, मनुष्य ने वियंचसंबंधी सर्व उपद्रवोनो नाश करनालं, संग्राममा जय आपना म ज शस्त्रना घाउने निवारना होय छे. (४३) या रत्न पोताना धारकने सदा तरुणावस्थाने अवस्थित रासनारु, नस-केशने न वधवा दे तेवू भने सर्व भयथी रहित करनालं होय छे. (४४) तमिसागुफा विगेरेना मंध- कारमा सूर्यनी जेवो प्रकाश करना अचिंत्य ने भवाच्य सरूपवाळु म ज देवोने पण दुर्लम होय छे. (४२) पूर्व कही गया प्रमाणे चर्म ने छपना संघटमा रहेला भरत चक्रीना भासा सैन्यमा मा मणिरत्ने सूर्यनी जेवो उद्योत को हतो. (४६) चक्री ज्यारे वैतादयनी ने गुफामा प्रवेश करे त्यारे हाथीना कुंमस्थळ उपर स्थापन करेलु मा मणिरस्न ज अंधकारना समूहनो नाश फरयामा समर्थ पाय थे. (४७) ते पार भंगुळ लाघु ने ये अंगुळ पहोलं होय छे. मणमा वृत्त ने उन्नत होप छ तेम ज छ एग्णा (छ होश)पटे शोभित होय छे. (४८) इति मणिरत्नं.

(३६४) श्रीकाललोकप्रकाश भवेच्च काकिणीरत्नं पट्तलं द्वादशास्त्रकं । तथाष्टकर्णिक तौल्ये सु- वर्णरष्टभिर्मितं ॥ १९॥ स्वर्णकारोपकरणं ख्याताधिकरणिर्जने । तामा. कृत्यानुकुरुते चतुरस्रत्वसाम्यतः ॥ ५० ॥ चतुर्दिशमधोऽथोषं तत्रैवं स्युस्तलानि पट् । न्यस्तं भूमाववैषम्या-त्तिष्ठेयेनेह तत्तलं ॥ ५१ ॥ प्रत्ये. कमध ऊर्ध्वं च चतसृष्वपि दिनु च । तच्चतुःकोटिसद्भावाद् द्वादशात्रं प्रकीर्तितं ॥ ५२ ॥ मिलत्यत्रित्रयं यत्र स कोणः कर्णिकोच्यते । उपर्य- धश्चतसृणां तासां युक्त्याष्टकर्णिकं ॥ ५३ ॥ सुवर्णः स्यात्कर्ममाघे-- स्तौल्ये पोडशभिः समं । कर्ममाषप्रमाणं च प्रागनास्ति निरूपितं ॥५४॥ सुवर्णैरष्टभिस्तुल्यं काकिणीरत्नमीरितं । एतदार्षभिकालीयं मानं ज्ञेयं विचक्षणैः॥ ५५॥ अन्यथा कालभेदेन मानवैषम्यसंभवे । न भवेत्का- किणीरत्नं सर्वेषां चक्रिणां समं ॥ ५६ ॥ इप्यते तुल्यमेवेदं सर्वेषामपि चक्रिणां । पुरातनेषु शास्त्रेषु तथैव प्रतिपादनात् ॥ ५७॥ किंच-केचि- दात्मांगुलैराहुः काकिणीमणिरत्नयोः । मानमौत्सेधिकैः केचि-तत्प्रमा- .. ७ काकिणीरत्न-छ तळवाळु, फरती बार हांशवाळु ने आठ कर्णिकावालं होय छे. तोलमा पाठ सौनया जेटलुं होय छे. (४९) सोनीन उपकरण लोकोमा अधिक- रणी (एरण) तरीके भोळखाय छे. चतुरस्रपणानी साम्यताथी वेनी भाकृति जेवू पा होय छे. (५०) चार दिशाए, अधो ने ऊर्ध्व एम तेना छ तळ होय छे. एवी रीते होवाथी विष. मपणाहित होवाने लीधे भूमि उपर सारी रीते स्थापन करी शकाय छे. (५१) अधो, 'ऊर्ध्व भने चारे दिशामा चार-चार कोटी होवाथी बार असवालं कहुं छे ते परापर छे. (५२) ज्यां चार अस मळे ते कोण कर्णिका कहेवाय छे, तेथी उपर ने नीचे एवी चार-चार कर्णिका होवाथी अष्टकर्णिक क्युं छे ते पण घरावर छे. (५३) तोलमा सोळ कर्ममारवडे एक सुवर्ण कहेवाय थे. कर्ममापनुं प्रमाण अहीं पूर्व कहेवामां आवेल 'छ. (५४) एवा थाठ सुनर्ण (पाठ तोला) सर तोलमा काकिणीरत्न कां छे. श्रा मान विचक्षणोए मरतचक्रीना समयनुं जाणवू. (५५) अन्यथा काळमेदे करीने माननी विषमतानो संभव होचाथी काकिणीरत्न सर्व चक्रीयोर्नु समान थशे नहीं, (५६) अने पा रत्न तो सर्व चक्रीमोनु तुन्य ज इच्छयुं छेकारण के पुरातनशास्त्रमा देवी रीते व प्रतिपादन करेल 2. (५७) 'केटलाक काकिणी ने मणिरत्ननुं प्रमाण भात्मामुळे कहे थे, केटलाफ उत्सेपांगुळे कहे छे ने केटलाक प्रमाणांगुळवडे कहे थे. (५८) , । सर्ग ३१ मो। (३६५) णांगुलैः परे ॥ ५८ ॥ तथा चोक्तं जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिवृत्तौ-पत्र चाधिकारे एतानि च मधुरतृणफलादीनि भरतचक्रवर्तिकालसंभवीन्येव गृह्यते, अन्यथा कालभेदेन तद्वैपम्यसंभवे काकिणीरलं सर्वचक्रिणां तुल्यं न स्यात्, तुल्यं चेष्यते तदित्येतस्मादनुयोगद्वारवृत्तिवचनादेतद्देशीयादेव स्थानांगवृत्तिवचनात्-"चतुरंगुलो मणी पुण तस्सद्धं चेव होइ विच्छिणो। चउरंगुलप्पमाणा सुवषणवरकागणी नेया ॥१॥" इहांगुलं प्रमाणांगुलम- वगंतव्यं. सर्वचक्रवर्तिनामपि काकिण्यादिरत्नानां तुल्यप्रमाणत्वादिति मलयगिरिकृतवृहत्संग्रहणीवृहद्वृत्तिवचनाच्च केचनास्य प्रमाणांगुलनिष्प- नत्वं, केचिच " एगमेगस्स णं रणो चाउरंतचकवहिस्स असोवण्णिए कागणिरयणे छत्तले दुवालसंसिए अट्टकण्णिए अहिगरणिसंठाणसंठिए पण्णते, तस्स णं एगमेगा कोडी उस्सेहंगुलविरकंभा तं समणस्स भग. वो महावीरस्स श्रद्धंगुलं, इत्यनुयोगद्वारसूत्रबलादुत्सेधौगुलनिष्पन्नत्वं, केऽपि चैतानि सप्तकेंद्रियरत्नानि सर्वचक्रवर्तिनामात्मांगुलेन ज्ञेयानि, ते विष श्रीजंबूद्वीपप्रज्ञप्तिनी टीकामा कायु छ के-'श्रा अधिकारमा श्रा मधुर एवा रणफळादि भरतचक्रीना काळमां संभचे तेवा ज जाणवा. अन्यथा काळमेदे करीने तेनी विषमता मानवागां श्रावे तो काकिणीरत्न पण सर्व चक्रीमोनुं समान थशे नहीं, अने शास्त्रमा तो तेने तुन्य कयु छ. ' श्री अनुयोगहारथतिमा तेम ज तेने सदृश ज स्थाना- गचिमा पण ए प्रमाणे ज कहेलुं के जुभो-'मणिरत्न चार अंगुळ लोधु ने तेथी माधु विस्तारमा शेप छे, म ज चार अंगुल प्रमाणबाई, सारा पर्णकालं काकिणील पण होय छे.' अहीं अंगुळ ते प्रमाणांगुळ समजची. सर्व चक्रवर्तीयोना काकिणी विगेरे रस्नो तुन्य प्रमाणवाळा होबाथी अने मलयगिरिकृत वृहत्संग्रहणीनी पह- तिमा ए प्रमाणे कहेल होवाथी. श्रीअनुयोगद्वारसूत्रमा कj छ के--" एक एक चाउ- रंत चवीनु काकिणीरत्न पाठ सोनेयाप्रमाण तोलवालं, छ वळनालं, पार असालं, भाठ कर्णि कायार्छ भने अधिकरीना संस्थानवाळु कहुं छे. वेनी एक एक कोटि उत्से- घांगुळना प्रमाणवाळी कही थे ते महावीर परमात्मानी श्रधांगुळप्रमाण जाणवी. कथनना पळयी उत्सेघांगुळनिप्पचप्रमारा समजाय . वळी केटलाक ' एफेंद्रिय रत्नो सर्व चक्रीना पारमांगुळ प्रमाणे प्रमाणवाळा जाणवा मने पाकीना सात पंचेंद्रिय रत्नो तो तत्कालीन पुरुष उचित प्रमाणवाला ज होय छे. एम प्रवचनसारो- था साते " श्रीकाललोकप्रकाश। शेषाणि तु सप्त पंचेंद्रियरत्नानि तत्कालीनपुरुषोचितमानानीतिः प्रवच- नसारोद्धारवृत्तिवलादात्मांगुलनिष्पन्नत्वमाहुः, अत्र च पक्षत्रये निर्णयः सर्वविद्वेयः, अत्र तु बहु वक्तव्यं, तत्तु ग्रंथगौरवभयानोच्यते इति ज्ञेयं. अस्त्रयो द्वादशाप्यस्य चतुर्भिरंगुलैर्मिताः । स्युः प्रत्येकं समचतु- रस्त्रत्वात्सर्वतः समाः ॥ ५९ ॥ अयं भावः-विष्कंभायामयो त्र विशेषः कोऽपि विद्यते । पण्णामपि तलानां त-च्चतुरंगुलमानता ॥६०॥ तथोक्तं जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे-' तं चउरंगुलप्पमाणमित्तमित्यादि । अनुयोगद्वार- सूत्रे तु यदस्य काकिणीरत्नस्यैकैका कोटिरुत्सेधांगुलप्रमितोक्ता तन्मतां- तरं, तत्सूत्रं प्राग् लिखितमिति ज्ञेयं. जंगमादिवहुविध-विपापहरण- क्षमं । तादृग्जातीयगांगेय-निष्पन्नत्वाद्भवेदिदं ॥ ६१ ॥ तदानीं सर्व मानानां तत्प्रामाण्यप्रवर्तकं । अनेनैवांकितानि स्यु-स्तानि प्रत्याय- कानि यत् ॥ ६२ ॥ यथाधुनाप्याप्तक्लुप्त-निर्णयांक प्रतीतिकृत् । कुडवादि भवेन्मानं व्यवहारप्रवर्तकं ॥ ६३ ॥ खटीखंडादिवञ्चैत-द्भि- खारनीतिना पळथी ( कथनथी ) श्रात्मांगुळप्रमाण (सात एकेंद्रिय रत्नो) कहे के या प्रमाणे प्रणे पक्षोनो निर्णय सर्वज्ञ ज जाणी शके छे. अहीं घणुं वक्तव्य छ पण ग्रंथगौरवना भयथी कहेता नथी. काकिणीरत्ननी पारे अस्र चार चार अंगुळ प्रमाण होय छे अने ते चोखंडा होयाथी सर्वत्र समान थाय छे. (५९) नहीं पा भाव समजवो-विष्कम अने मायाममां महीं फाइ विशेष नी भने छए तळ चार अंगुळनी समानतावाळा होय थे. (६०) श्रीजंयू- द्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रमा पण ते सर्वतः चार अंगुळ प्रमाणयालं ज होय एग कथु छे. अनुयोग- द्वारसत्रमा जे मा काकिणीरत्ननी एकेक कोटि उत्सेधांगुळ प्रमाण फही छे ते मतांतर समजवो. तेनो सूत्र-पाठ उपर लखी गया छीए. ए काकिणीरत्न जंगमादि अनेक प्रका. रना विपने शमाववाने समर्थ होय थे, केमके ते तेवा प्रकारना सुवर्णमाथी निम्पन्न थयेल होय छे. (६१) ते वखते सर्व प्रकारना मानना प्रामाण्यनुं प्रवर्तक ए होय छे केमके एनावडे ज अंकित करेला ते मानो प्रमाणभूत गणाय 2. (६२) जेम प्रत्यारे पण प्राप्त पुरुपनो करेलो निर्णयांक प्रतीतिवाळो गणाय छे. अने तेना उपरथी ब कुडवादि पधा मान व्यवहार प्रवतेल होय छे. (६३) पडीना ककहानी जेम एनावडे सर्ग ३१ मौ। (३६७) त्यादौ मंडलादिकृत् । स्थिरोद्योतं करोत्येत-न्मंडलैर्गुहयोस्तयोः ॥६४॥ इति काकिणीरत्नं इति. ससैकेंद्रियरत्नानि. अथ सेनापतिरत्नं भवेत्प्रौढपराक्रमः । हस्त्यादिचक्रिसैन्यानां स्वा- तंत्र्येण प्रवर्तकः ॥६५॥ समग्रभरतव्याप्त-यशाराशिमहावलः । स्व- भावतः सदोदात्त-स्तेजस्वी सात्त्विकः शुचिः ॥ ६६ ॥ यवनादिलिपौ दक्षो म्लेच्छभाषाविशारदः । ततो म्लेच्छप्रभृतिषु सामदानाद्युपायकृत ॥६७ ॥ विचारपूर्वकाभापी यथावसरवाक्यवित् । गंभीरमधुरालापो नीतिशास्त्रार्थकोविदः ॥ ६८॥ जागरूको दीर्घदर्शी सर्वशस्त्रकृतश्रमः । ज्ञातयुद्धविधिश्चक्र-व्यूहायूहविशेपवित् ॥ ६९ ॥ रिपुमित्रगणस्यापि दंभादंभादिभाववित् । प्रत्युत्पन्नमति/रो-ऽमूढः कार्यशतेष्वपि ॥ ७० ॥ स्वामिभक्तः प्रजाप्रेष्ठः प्रसन्ननयनाननः । दुर्दर्शनो द्विषां वीर-रसावेशे भीत विगैरेनी उपर मंडळो पाळेखी शकाय थे, अने तेना मंडळोवडे ज पंने गुफाम्रो स्थिर उद्योतवाळी करवामां आवे छे. (६४) इवि काकिणीरत्न. इति एकेंद्रिय सात रत्नोतुं स्वरूप. हवे पंचेंद्रिय सात रत्नोनुं स्वरूप कहे छ- १ सेनापतिरत्न-प्रौढ पराक्रमी होय ले, हस्ती विगैरे चक्रवर्तीनी पाखी सेनानो स्वतंत्रपणे प्रवर्वावनार होय छे. (६५) समग्र भरत क्षेत्रमा तेनो यशोराशि विस्तरेल होय छे, महा पळयान होय छ, समावधी ज सदा उदाच, तेजस्वी, साधिक भने पवित्र होय छे. (६६) यवनादि लिपि पांचवा-लपबामा दक्ष होय छे, म्लेच्छ मापा विशारद होय छे, तेथी करीने म्लेच्छ विगैरे राजाश्रीने वश करवाा सामदा. नादि उपायनो करनार होय छे. (६७) विचारपूर्वक पोलनार होय छे. योग्य मत्र- सरे केम पोलघु तेने समजनार होय छे. गंभीर, मधुरालापी अने नीतिशास्त्रमा प्रवीण होय थे. (६८) जागरूक (निरंतर जागृत रहेनार), दीर्घदशी, सर्वशम्रो यापरवा संबंधी श्रम करेल, युद्धविधिनो जाण भने चक्रव्यूहादि प्यूहोनो जागनार होय छे. (६९) शत्रु ने मित्र समूहना दम भने अदमादिमावने जाणनार होप थे. प्रत्युत्पन्न मतिवाळो, धीर भने सेंकडो कार्यमा पण न झंझाय एवो होय छे.' (७०) स्वामीमठ, प्रजाप्रिय, नेत्र ने मुखनी प्रसनताबाळो, शत्रुनोधी दुस्खे जोर शकाय तेवो भने पीर- १ पमीना मंग्रीनी गरज ते बारे थे. पीने जूदो मंत्री होतो नपी. . .

(३६८) श्रीकाललोकप्रकाश। भयंकरः ॥ ७१ ॥ लंचादिलोभानाकृष्टः स्वामिकायैकसाधकः । सल्ल- क्षणः कृतज्ञश्च दयालुर्विनयी नयी ॥ ७२ ॥ जेतव्यवर्षे निनोच्च- जलशैलादिदुर्गवित् । नानाविषमदुर्गाणां भंगादानादिमर्मवित् ॥ ७३ ॥ संधाने प्रतिभिन्नानां संहतानां च भेदने । उपायज्ञोऽप्रयासेन द्विपतैव द्विषं जयन् ॥ ७९ ॥ दशभिः कुलकं ॥ तदुक्तं नीतिशास्त्रे-भंगोऽस्तु कस्याप्येकस्य योधने द्विषतो द्विषा । भवत्युभयथा लाभो मिथो मोद- कयोरिव ॥ ७५ ॥ इति सेनापतिरत्नं. कोठागाराधधिकृतो रत्नं गृहपतिर्भवेत् । सर्वेषां चक्रिसैन्यानां भोज्यवस्त्रादिचिंतकः ॥ ७६ ॥ सुलक्षणः सुरूपश्च दानशौंडो विशेष- वित् । स्वामिभक्तः कृतज्ञश्च विवेकी चतुरः शुचिः॥ ७७ ॥ शाल्यादि- नानाधान्यानां शाकानां चातिभूयसां । सिद्धिकृत्प्रातरुप्तानां सायं ताह- प्रयोजने ॥ ७८ ॥ त्रिभिर्विशेषकं ॥ एतस्यैवानुभावेन सैन्यं भरतच. रसना आवेश वखते मयंकर होय छे. (७१) लांच विगेरेना लोमथी न सँचाय तेषो, स्वामीना कार्यनो अद्वितीय साधक, सारा लक्षणवाळो, कृतज्ञ, दयाल, विनयी अने न्यायी होय छे. (७१) जीतनायोग्य क्षेत्रमा आवेल नीचा-उंचा माग, जळ अने पर्व. तादि दुर्गनो जाणनार होय छे, तथा विविध प्रकारना विषम दुर्गनो-किशानो मंग करवामां अने तेने जीती लेवा विगैरेनी युक्तिने जाणनार होय छे. (७३) जूदा पडे- लामोन संधान करवामां अने भेळा मळेला होय तेनो भेद करवामा उपायज्ञ अने द्वेष करनारा शत्रुओने वगर प्रयासे शत्रुबडे ज जीती लेनार होय छे. (७४) नीतिशास्त्रमा कमु छ के-'शत्रुनी साथे शत्रुनु युद्ध थाय तो तेमा माथी गमे तेनो भंग-पराजय थाय तेमा लाभ ज के केमके ये मोदकने सामसामा अथडाववाथी जे मोदक मांगे ते ठीक ज छे. बने प्रकारे लाभ ज छे.' (७५) इखि सेनापतिरत्नं. २ गृहपतिरत्न-कोष्ठागार (अनादिना कोठार) विगेरेनो अधिकारी भने चक्रवर्तीना सी सैन्यनी भोजन-वस्त्रादिकनी चिंता करनारो होय छे. (७६) सारा लक्षणवाळो, रूपवत, दानशूर, विशेषज्ञ, स्वामीमक्त, कतज्ञ, विवेकी, चतुर अने पवित्र होय छे. (७७) तेवा प्रकारचें खास प्रयोजन होय त्यारे शापयादि अनेक प्रकारना धान्य अने अनेक प्रकारना पुष्कळ शाक (चर्मरत्न उपर ) सवारे पापीने सांजे उगाह- नार होय छे. (७८) एना प्रभावी ज भरतचक्रानुं सैन्य धर्म भने छाना संपुटमा " . सर्ग ३१ मो। (३६९) क्रिणः । चर्मच्छत्रसमुद्गस्थं सप्ताहान्याप भोजनं ॥७९॥ तथोक्तं ऋषभः चरित्रे-चर्मरत्ने च सुक्षेत्र इवोप्तानि दिवामुखे । सायं धान्यान्यजा- यंत गृहिरत्नप्रभावतः॥८०॥ इति गृहपतिरत्नं । अथ स्याद्वार्द्धकीरत्नं दक्षधीस्तक्षकाग्रणीः । स्कंधावारपुरग्राम- निवेशेऽधिकृतः शुचिः ।। ८१ ॥ स चाधीति व्याकरणे वास्तुशास्त्रार्थ. तत्त्ववित् । शब्दव्युत्पत्तिशून्यो हि शास्त्रं किमपि नार्हति ॥ २॥ तथाह सिद्धांतशिरोमणौ भास्कराचार्यः-यो वेद वेदवदनं सदनं हि सम्यम् ब्राम्याः स वेदमपि वेद किमन्यशास्त्रं । यस्मादतः प्रथममेतदधीत्य धीमान् शास्त्रांतरस्य भवति श्रवणेऽधिकारी ।। ८३ ॥ पत्तनग्रामनगर.. प्रासादापणवेश्मनां । निवेशने यथौचित्यं दिक्स्थानादिविचक्षणः ॥८॥ गृहाणां वहवो भेदा वास्तुशास्त्रोदिताश्च ये । तत्र सर्वत्र दक्षोऽसौ शिल्पवित् प्रतिभापटुः ॥ ८५ ॥ तथाहि-ध्रुवं १ धन्य २ जयं ३ नंदं रा इतुं त्यारे सात दिवससुधी भोजन मेळवी शक्युं हतुं. (७९) श्रीऋपमचरित्रमा कथु छ के-'गृहपतिरत्नना प्रभाषथी सारा क्षेत्रनी जैम चर्मरत्नपर सवारे चालु धान्य सांजे उगी शके छे' (८०) इति गृहपतिरत्न. ३ वार्धकीरत्न-कुशळ बुद्धिवाळो, तक्षको ( सुथारो )ने विष अग्रेसर, लश्क- रनी छावणी, नगर, गाम विगेरे नया स्थापन करवामा अधिकारवाळो भने पवित्र होय छ.(८१) ते व्याकरणशास्त्र मणेलो होपायी वास्तुशास्त्रना अर्थने अने तरसने जाण- नार होय छे; कारण के जो कोइ पण मनुष्य शन्दनी व्युत्पचिना ज्ञानरहित होय तो ते कोइ पण शास्त्र जाणवामा लायक होतो नथी. (८२) ते विपे सिद्धांतशिरोमणि नामना प्रथमां मारकराचार्य क्युं छे ये-"सरस्वतीना घररूप वेदवदन (व्याकरण)ने जे मनुष्य सारी रीते जाएँ छ, ते वेदने पण जाणे है तो पछी अन्य शास्त्रने जाणे तेमा | पy ? तेथी करीने पुद्धिमान मनुष्य प्रथम व्याकरणशास्त्र मणीने ज पीजा शास्त्रो श्रवण करवानो अधिकारी थाप थे. (८३)" बळी ते वार्घकीरत्न पाटण, गाम, नगर, प्रा. साद, दुकान भने घर विगेरे पनाववामा तेनी यथायोग्य दिशा, स्थान घिमेरे जाणामा विचक्षण होय छे. (८४) तथा कारीगरीने जाणनार भने फुशदिवाळा वे वार्ध- की पातशास्त्रमा घरोना जे अनेक प्रकारो क्याथे से सर्व प्रकारो जाणवामा निपुण होप थे. (८५) परना सोळ प्रकार प्राप्रमाणे कहेला थे.-ध्रुव , धन्य २, जय ३, नर (३७०) श्रीकाललोकप्रकाश। ४ खरं ५ कांतं ६ मनोहरं ७ । सुमुख ८ दुर्मुखं.९ क्रूरं १० विपक्षं ११ धनदं १२ क्षयं १३ ॥ ८६ ॥ आक्रंदं १४ विपुलं १५ चैव विजयं १६ चेति षोडश। संप्रत्यमीषां पस्त्यानां प्रस्तारः प्रतिपाद्यते ॥ ८७ ।। लघुर्भवेत्सरलया वक्रया रेखया गुरुः । प्रस्ताररचनाथैभिः कर्तव्या वृत्तजातिवत् ॥ २८॥ तत्रायमाम्नाय:- गुरोरधो लघु न्यस्येत् पृष्ठे त्वस्य पुनर्गुरून् । अग्रतस्तूप्रवदद्या- द्यावत्सर्वलघुर्भवेत् ।। ८९ ॥ चत्वारो गुरवः स्थाप्या प्राद्यपंक्तौ ततः परं । शेषासु पंक्तिषु स्थाप्यो लघुरायगुरोरधः ॥ ९० ॥ अग्रे तूर्ध्वपंक्ति- समं रिक्त स्थाने तु'दीयते । गुरुरेवं कृते भंगों-तिमः सर्वलघुर्भवेत्॥९१॥ . - ४, खर ५, कांत ६, मनोहर ७, सुमुख ८, दुर्मुख ९, क्रूर १०, विपंच ११, धनद १२, क्षय १३, आक्रंद १४, विपुल १५ अने विजय १६. हवे आ सोळ प्रकारना घरोनो प्रस्तार कहे छे.-(८६) सीधी उभी लीटी (1) करवी ते लघु कहेवाय छ भने बाँकी (5) जेवी रेखा करवाथी ते (5) गुरु कहेवाय छे. आ लघु अने गुरुए करीने वृत्त. जाति (श्लोकनी जाति )नी जेम घरसंबंधी प्रस्तारनी रचना करवी, (८६) तेमा नहीं पा प्रमाणे आम्नाय ( परंपरा) छे.- पहेला गुरुनी नीचे लघुने स्थापन करबो (मूकदो), तेनी पाछळ (पहेलो) मूकवा अने तेनी भागळ (पछी) उपली पंक्तिमा जे रीते गुरु-लघु होय तेज प्रमाणे मूकवा. भा प्रमाणे ठेवट सर्वे (चारे) लघु आवे त्यांसुधी करघु. (८९) एटले के-पहेली पंक्तिमां चारे गुरु स्थापना. त्यारपछी चीजी श्रीजी विगेरे पाकीनी पंक्तिमामा पहेला गुस्नी नीचे लघु मूकवो. वेनी पली उपरनी पंरिता होय ते प्रमाणे गुरु-लघु मूकवा भने तेनी पहेला जेटला खाली स्थान होय तेमां गुरु ज मूकवा. प्राम करवाथी छेना (सोळमा) मंगमा सर्वे (चार) लघु भापशे. (९१) वेनी स्थापना- गुरुने १ कोई ठेकाणे 'मुपध' कां छे.

सर्ग ११ मो। (३७१) अथ प्रकृतं-प्रतिशालाद्यलिंदाढ्या 'दिक् स्यालघूपलक्षिता । गुरूद्दिष्टाऽनावृता स्या-ताश्चतस्रो यथाक्रमं ॥९२ ॥ तत्र स्यात्प्रथमे भंगे चतुर्भिर्गुरुभिर्यहं । एकोऽपवरकोऽलिंद-वर्जितः स चतुर्दिशं ॥ ९३ ॥ फळ. 5 S S S 5 S 5 S S S 5 S S S S S S S 1 5 S S S S S S घरनुं नाम. प्रस्तार. शुभाशुभ. पूर्व दक्षिण पश्चिम उत्तर स्थिरता शुभ २ धन्य घिनप्राप्ति ३ जय जय शुभ ४ नंद शुभ दारिय अशुभ ६ कांत सर्वसंपत् शुम ७ मनोहर मननो आहाद शुम ८ सुमुख लक्ष्मी शुभ ९ दुर्भस भशुम विषमता ময়ম ११ विपक्ष(सुपथ) बांधव शुम १२ धनद घन शुम १३ चय मशुम १४ माद 'मृत्यु अशुभ १५ विपुल पारोग्य शुभ १६ विजय सर्पसंपत शुम इथे प्रात कहे थे-अही दरेक (सोळे प्रकारना) घरमा ने दिशाए लघु मुक्यो छे ते दिशा भलिंदी व्याप्त छ एटले ते दिशाए प्रलिंद होय एम जागवू, अने जे दिशाए गुरु मुक्यो होय ते दिशा प्रावरणरहित एटले भलिद विनानी छ एम जाणवू से दिशामो पूर्वादिफना अनुक्रमे चार छ, (९२) मा पहेला मंगमा (पंक्तिमा) पारे गुरुवाळू घर कां थे, तेपी वे चारे दिशाए भलिंदरहित मात्र एक ज ओरडो 2. तेने धुव नामर्नु पहेलुं पर फयुं थे; क्या धन्य नामर्नु बे पोर्नु पर थे, तेमा पूर्व दिशाए १ भोसरी, परसाळ, पोरती विगेरे नानो माग, S S - । S क्षय S 5 S 5 (३७२.) भीकाललोकप्रकाश । ध्रुवसंज्ञं गृहं तत्स्या-द्वन्यं प्राच्यामलिंदयुक् । यस्यां दिशि गृहद्वारं सा च प्राची भवेदिह ॥ ९४ ॥ तथोक्तं विवेकविलासे-पूर्वादिदिग्विनि- श्या गृहद्वारव्यपेक्षया । भास्करोदयदिक् पूर्वा न विज्ञेया यथा क्षुते ॥ ९५ ॥ दक्षिणस्यामलिंदः स्या-यत्र तज्जयसंज्ञकं । एवं स्युः पोडशे भंगे चतुर्दिशमलिंदकाः ॥ ९६ ॥ वास्तुशास्त्रे फलं चैपामेवमाहुः- अलिंद होय छे. अहीं जे दिशामा घरनुं ( ओरडार्नु) द्वार होय तेने ज पूर्व दिशा समजवी. (९३-९४ ) ते विप विवेकविलास नामना ग्रंथमा कयु छ के-" घरना हारनी अपेक्षाए पूर्वादिक दिशा कहेची, परंतु जे दिशाए सूर्य उगे छे तेने (पा प्रसं- गमा) पूर्व दिशा न कहेवी. जेम छींकने विपे सूर्योदयनी अपेक्षाए पूर्णदिक दिशा धार- वामां प्रावती नथी, परंतु जे दिशातरफ मुख राखीने पोते छींक खाधी होय तेज लेनी पूर्व दिशा कहेनाय छे अथवा वीजाए छींक खाधी होय तो पोतानुं मुख जे तरफ होय ते पूर्व कहेवाय छ तेम. (९५)" तथा जे घरमां दक्षिण दिशाए अलिंद होय ते घर जय नामर्नु (त्रीजु ) जाणवू. श्राज प्रमाणे सोळमा मांगावाळा घरमा चारै दिशाए मलिंद होय छे. (९६) तेनी स्थापना- जय ३ नंद ४ खर ५ ध्रुव १ घन्य २ SSSS Iss SI55 SSIS कांत ६ मनोरम ७ सुमुख ८ दुर्मुख ९ । 5551 1551 . विपक्ष ११ धनद १२ क्षय १३ प्राकंद १४ विपुल १५ विजय १६ SISI १ मर्ग ३१ मो। (३७३) - 'स्थैर्य १ धनं २ जयं(यः) ३ पुत्रान्(त्राः) ४ दारिद्यं ५ सर्वसंपदः ६ । मनोहलादः ७ श्रियो ८ युद्धं ९ वैषम्यं १० बांधवा ११ धनं १२ ॥९७ ॥ क्षयश्च १३ मृत्यु १४ रारोग्यं १५ सर्वसंपदिति १६ क्रमात् । ध्रुवादीनां फलं ज्ञेयं सान्वर्थाख्यान्यमून्यतः ॥ ९८ ॥ इयं पोडशभंगीह दिग्मा- प्रार्थं प्रदर्शिता । एकापवरकादीनां भेदास्त्वेपामनेकशः ॥-९९ ॥ उक्तं च रत्नमालाभाप्ये—बेश्मनामेकशालानां शतं स्याच्चतुरुत्तरं । द्विपंचा- शद् द्विशालानां त्रिशालानां द्विसप्ततिः ॥४०॥ नंद्यावर्त वर्द्धमानं स्वस्तिकं च तथा परं । सर्वतोभद्रमित्याद्याः स्युभेदा वेश्मनां शुभाः -॥४०१ ॥ तथाह वराहः- नंद्यावर्त्तमलिंदैः शालाकुड्यात्प्रदक्षिणांतगतः । द्वारं पश्चिमम- स्मिन् विहाय शेषाणि कार्याणि ॥२॥ द्वारा(रोड)लिंदान्तगतःप्रदक्षिणोन्यः वास्तुशास्त्रमा श्रा सोळ प्रकारना घरोनुं फळ आ प्रमाणे कयुं छे-स्थिरता १, धन २, जय ३, पुत्र ४, दारिध ५, सर्वसंपदा ६, मननो भाइलाद ७, लक्ष्मी ८, पुद ९, विषमता १०, बांधव ११, धन १२, आय १३, मृत्यु १४, भारोग्य १५ भने सर्व- संपदा १६. मा प्रमाणे ध्रुव विगैरे घरोनुं अनुक्रमे फळ जाणवू, कारण के ते ध्रुव विगेरे नामोज सार्थक छ-तेना नाम प्रमाणे ज तेना शुभाशुभ फळ छे. (९७-९८) भा .सोळ मंग एटले सोळ प्रकारनां घरो नहीं दिशामात्रथी ज पताध्या छे. एक ओरडावाळा पे भोरडावाळा विगेरेनी पृद्धि करवाथी तेमना पणा मेदो थाय छे. (९९) ते विपे 'रत्नमाला झाप्पा कहुं छे के-" एक शाळा ( भोरडा)ना परो एक सो ने चार प्रका- रना थाय छ, ये शाळानां घरो पावन ( एक सो ने पायन १) प्रकारना थाय थे भने प्रय शाळाना घरी पोतेर ( एक सो ने यतिर, १) प्रकारना थाय 2. (४००)"बळी नंघा. पत, पर्धमान, स्वस्तिक भने सर्वतोभद्र विगेरे घरोना शुभ प्रकारो होय छे. (४०१) ते विपे पराह कहे थे के- "मकाननी भीनथी प्रदक्षिणाना वेडापर रहेला अलिंद एटले मोशरीए करीने नंदायत नामर्नु गृह थाय थे. मा परने विप पत्रिमदिशाने छोटीने पाकीनी प्रणे दिशाए द्वार पराय छे. (२)द्वार भने मलिंद (ोशरी) ए पेने देडे रहेल एक १ रानी नाप जे पहोळु लाहुं अथवा पत्थर सरुवामां भावे देना उपर भार. नार माणम पग मूकीने साये वे अथवा पहार मागना पानी पाजुए मोरीयो र. पामा प्रायेले. माया रे म पण मलिंदना करेला ये. - ((३७४) मीकाललोकप्रकाश। शुभस्ततश्चान्यः । तस्मिश्च वर्द्धमाने द्वारं तु न दक्षिणं कार्य ॥ ३ ॥ अपरांतगतोऽलिंदः प्रागंतगतौ तदुत्थितौ चान्यौ । तदवधिविधृतश्चान्यः प्रारद्वारं स्वस्तिके शुभदं ॥ ४ ॥ अप्रतिपिद्धालिंदं समंततो वास्तु सर्व- तोभद्रं । नृपविबुधसमूहानां कार्य द्वारैश्चतुर्भिरपि ॥ ५॥ तथा-वास्तुक्षेत्रोद्गतैर्वल्ली-वृक्ष खातपूरितैः । वेश्माभ्युदयिक दुःख-कृद्वा वेत्ति विचक्षणः ॥६॥ आसन्नफलदा वास्तु-प्ररूढा गर्भिणी लता । अनासन्नफला कन्या वंध्या भवति निष्फला ॥७॥ वृक्षाः प्लक्षवटाश्वत्थो-दुंबरायाः शुभाः स्मृताः । अप्रशस्ताः कंटकि- नो रिपुचौरादिभीतिदाः ॥ ८॥ तथाह वराहः-शस्तौषधिगुमलता- प्रदक्षिणा होय, तेथी एक पीजी शुभ प्रदक्षिणा पण होय ते पर्धमान गृह कहेवाय. तेने विपे दक्षिण दिशाए द्वार करवू नहीं. (३) पश्चिमदिशाना छेडे रहेल श्रोशरी होय भने पूर्व दिशाना छेडे रहेली ते मकानसाथे जोडायली पीजी के प्रोशरी होय भने ते पोशरीनी मर्यादाथी धारण करायेली एक जूदी ओशरी होय एवं पूर्वदिशाना द्वार- वाळु शुभने आपना स्वस्तिक नामनुं गृह कहेवाय छे. ( ४ ) सर्व बाजुए नथी निषेध करायेलो अलिंदनो जेमां, अर्थात् चोतरफ श्रोशरीपाळो राजा अने पंडितोना समुदायोने उचित एवं सर्वतोभद्र नामर्नु गृह होय छे. तेने चारे दिशाए द्वारवालं करवु. (५) (चार गृहोनुं स्वरूप वराहसंहितानी साक्षीथी श्रीजंबूद्वीपप्रज्ञप्ति टीका कारे कहेल के तेज प्रमाणे नहीं लोकप्रकाशकारे पण कहेल छे. जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिना मूळमा मा चार नामोनी साथे चक्र नामनो पांचमो प्रासाद पण कहेलो . आ संबंधनी विशेष हकीकतना जिज्ञासुए समरांगणसूत्रधार नामना छपायेला शिल्पसंबंधी ग्रंथ विगे. रेनी सहाय मेळवी.) सथा-वास्तु ( घर ) बनायवानुं जे क्षेत्र (भूमि ) होय तेमा वेलामो के दो विगेरे जे उगेला होय ते उपरथी तेमा थनारं घर सुखकारक छे के दुःखकारक छ ? ते विद्वान् पुरुष जाणी शके छे. (६) जेमके वास्तुक्षेत्रमा उगेली लता जो गर्भवाळी होय तो ते शीघ्र फळ आपनारी थाय छ, कन्या (बाल्यावस्थावाळी-कुमारिका) होय तो ते चिर- काळे फळ पापनारी थाय के अने वंध्या (वांझणी-फळरहित ) होय तो तेनुं काइपण फळ मळ्तुं नथी. (७) वास्तुना क्षेत्रमा प्लक्ष (पीपळो ), वड, अश्वत्थ (पीपळा जेवू वृक्ष ) अने उमरा विगेरेनां वृक्षो उगेला होय तो ते शुभ कहेला छे. काटावाळा वृक्षो उगेला होय वो ते अशुभ कहेला छ भने ते शत्रु तथा चोरादिकनो भय आपनार थाय छे. (८) ते विषे वराह कहे छ के-" उचम प्रौषधि, वृच भने लतावाळी, मधुर, सर्ग ३१ मो। (३७५) मधुरा सुगंधा स्निग्धा समानशुषिरा च मही नराणां । अप्यध्वनि श्रम विनोदमुपागतानां धत्ते श्रियं किमुत शाश्वतमंदिरेपु ॥ ९॥ विज्ञो वास्तुण्वथायर्त-व्ययांशादीन् विचारयेत् । श्रमीभिरनुकूलै- यत् स्यादभ्युदयकृद्गृहं ॥ १०॥ विवक्षिते गृहक्षेत्र विस्तारो योंगुला- स्मकः । देयेणांगुलरूपेण गुण्यते जायतेऽथ यत् ॥ ११ ॥ तत्स्यात्ने- त्रफलं तस्मि-नष्टभक्तेऽधिकं च यत् । तदंकमानस्तत्राय-स्तेषां नाम- क्रमस्त्वयं ॥ १२ ॥ ध्वजो १ धूमो २ हरिः ३ श्वा ४ गौ ५ खरो ६ हस्ती ७ द्विकः ८ क्रमात् । पूर्वादिवलिनोऽष्टाया विषमास्तेषु शोभनाः ॥ १३ ॥ ईशानांतासु दिक्ष्वेते पूर्वादिक्रमतः स्थिताः । सान्वर्थनामधेय- वा-समाः कापि न शोभनाः ॥ १४ ॥ एषां स्थापनव्यवस्था चैवं . सुगंधी, स्निग्ध ( चिकाशवाळी-रसवाळी ) अने सरखा छिद्रवाळी पृथ्वी उपर मार्गमा चालवाथी श्रमित थयेला राजाश्रो मात्र विश्रांति लेवा माटे ज थोडो वखत वेठा होय तो पण तेमने तेवी पृथ्वी लक्ष्मीने आपनारी थाय छे, तो पछी तेवी पृथ्वी उपर निरंतर रही शकाय तेवा मकानो कर्या होय तो ते लक्ष्मीने आफ्नार थाय तेमा शुं कहे ? (९)" हवे वास्तुशास्त्रना विद्वाने पाय, नक्षत्र, व्यय अने अंश विगेरेनो विचार करवों, कारण के ते सर्व अनुकूळ होय तो ते घर शुभ उदयने करना थाय छे. (१०) वे भा प्रमाणे-इच्छेला घरनी भूमिनो विस्तार जेटला अंगुलनो होय तेने लंबाइना अंगुलबडे गुणवो. ते प्रमाणे लंपाइ पहोळाइना अंगुलनो गुणाकार करता जे श्रावे ते क्षेत्रफळ सम- जवू. ते क्षेत्रफळना अंगुलनी संख्याने पाठे मांगतां जे शेष यधे, तेटली संख्यावाळो (वेटलामो ) ते क्षेत्रनो भाय जाणवो. ते पायोना नाम अनुक्रमे या प्रमाणे छे. (११- १२)- ध्वज १, धूम २, हरि ३, श्वान ४, पळद ५, गधेडो ६, हाथी ७ अने कागडो ८. पा माठ पायो अनुक्रमे पूर्वादिक दिशाभोमा वळवान छ. तेमांना एकी (१-३- ५-७) पायो शुभकारक छे. (१३) पूर्वादिकना अनुक्रमे ईशान खूणापर्यत रहेला भा पाठे भायोनो नाम सार्थक होपाथी घेकी (२-४-६-८) आयो कदापि शुम नथी. (१४) मा भायोने स्थापवानी व्यवस्था विवेकपिलास नामना ग्रंथमा भा प्रमाणे कही - १ पूर्व-प्वज, २ अग्नि-धूम, ३ दक्षिण-सिंह, ४ नैव-धान, ५ पश्चिम-पभ, ६ वापध्य-खर, ७ सयर-गम, शान-काक.

। (३७६) मोफाललोकप्रकाश विवेकविलासे-वृपं १ सिंहं २ गजं ३ चैव खेटकर्यटकोट्टयोः । द्विपः पुनः प्रयोक्तव्यो वापीकूपसरस्सु च ॥ १५ ॥ मृगेंद्रमासने दद्या-च्छय- नेषु गजं पुनः । वृषं भोजनपात्रेषु छत्रादिपु पुनजं ॥ १६ ॥ अग्निवे- श्मसु सर्वेषु गृहे वहथुपजीविनां । धूमं नियोजयेस्किंच श्वानं म्लेच्छादिजातिषु ॥ १७ ॥ खरो वेश्यागृहे शस्तो ध्वांतः शेषकुटी' च । वृपः सिंहो गजश्चापि प्रासादपुरवेश्मसु ॥ १८॥ इत्यायो वास्तुनः प्रोक्तो नक्षत्रमथ कथ्यते । तत्र सामान्यतो वास्तु-जन्मभं कृत्तिका भवेत् ।। १९ ॥ यदुक्तं व्यवहारप्रकाशे-भाद्रपदतृतीयायां शनिदिवसे कृत्तिकाप्रथमपादे । व्यतिपाते रात्र्यादौ विष्टया वास्तोः समुत्पत्तिः॥२०॥ यथेष्टवास्तुनः क्षेत्र-फलांकेऽष्टगुणीकृते । विभक्त सप्तविंशत्या शिष्टं भवति जन्मभं ॥ २१ ॥ अस्मादेव च नक्षत्रा-दगृहाणां स्वामिना सह । राशेर्बलं प्रीतिपड-टमकादि विचिंतयेत् ॥ २२ ॥ सप्त सप्तानिभादीनि -" खेट ( गाम ), कट (नगर ) अने विनाने विपे वृष, सिंह अने गज प्राय लेवो. वाव, कूवा भने सरोवरने विपे द्विप ( हाथी) श्राय लेवो, श्रासनमा सिंह प्राय लेवो, शय्यामां गज आय लेवो, भोजननां पात्रोमा पभ प्राय लेवो, छत्रादिकने विषे ध्वज प्राय लेयो, सर्व प्रकारना अग्निना घरो (रसोडा विगैरे )ने विषे तथा अग्निवडे भाजीविका करनारना घरोने विपे धूम भाय लेवो, म्लेच्छादिक जातिनां घरोमां श्वान श्राय लेयो, वेश्याना घरमा खर श्राय श्रेष्ठ छे, बीना नीच वर्णोनी झुपडीओने विषे ध्वांत ( काक) आय लेवो, तथा प्रासाद, पुर अने सारा घरोने विषे वृप, सिंह भने गज प्राय लेवा सारा छे. (१५-१८) या प्रमाणे वास्तुनो आय करो. हवे तेनुं नक्षत्र कहे छे-तेमा सामान्य रीते वास्तुनुं जन्मनक्षत्र कृत्तिका छे. (१९) ते विषे व्यवहारप्रका- शमां कह्यु छ के-" भादरवानी त्रीजने दिवसे, शनिवारे, कृत्तिका नक्षत्रना पहेला पायामां, व्यतिपात योगा, रात्रिना प्रारंभमा अने विष्टि योगमां वास्तुनी उत्पत्ति थयेली छे.” (२०) हवे इष्ट वास्तु (घर)ना क्षेत्रफळनी जे संख्या होय वेने पाठे गुणी सत्ता- चाशे मांगतां जेटला बाकी रहे तेने ते वास्तुनुं जन्म नक्षत्र जाणवू. (२१) या प्रमाणे श्रावेला घरना जन्म नक्षत्रधी गृहस्वामीनी साथे राशिवळ, प्रीति अने पडाष्टक विगेरे विचार ( २२) परिघचकनी जेम चक्र करीने तेमा पूर्वादिक दिशाए अनुक्रमे कत्तिकादिक सर्ग ३१ मो। (३७७) न्यस्येत्परिघचक्रवत् । पूर्वादिषु चतसृषु दिविमानि यथाक्रमं ॥ २३ ॥ इष्टस्य वास्तुनो जन्म-धिपण्यमेवं समेति चेत् । द्वारदिश्यस्य गेहस्य तदोह्योऽभिमुखः शशी ॥ २४ ॥ पाश्चात्यभित्तिदिक्प्रासे जन्मभेऽभीष्ट- वास्तुनः । चंद्रो भवति पृष्ठस्थो-ऽनिष्टौ चैतावुभावपि ॥२५॥ तथाहुः- प्रारब्धं संमुखे चंद्रे न वस्तुं वास्तु कल्पते । पृष्ठस्थेस्वामिघाताय द्वयोस्तेन त्यजेद्गृही ॥ २६ ॥ गृह एव निषिद्धोऽयं चंद्रमाः सन्मुख- स्थितः । प्रासादनृपसौधश्री-गृहेषु त्वग्रगः शुभः ।। २७ ॥ गुरुशिष्यादिवत्तारा वात्रापि विवेकिभिः । तृतीया पंचमी चापि सात सात नक्षत्रो स्थापन करवा. तेमा इष्ट वास्तुनुं जन्मनक्षत्र जो घरना द्वारनी दिशामा श्रावे तो ते घरनी सन्मुख चन्द्र छ एम जाणवू, ( २३-२४) अने इष्टगृहनुं जन्मनक्षत्र जो पाछली भीतनी दिशामा भाये तो चन्द्र पाछळ रहेलो छ एम जाणवू. पा सन्मुख अने पाछळनो ए पंने चन्द्र श्रशुम थे. ( २५) ते विपे कडं थे के-" चन्द्र सन्मुख होय तो प्रारंभेलुं घर वसवा लायक नथी भने चन्द्र पाछळ होय तो घरघणीनो नाश थाय छे, तेथी गृहस्थे मा बन्ने चन्द्र त्याग करवा लायक छ. (२६) आ सन्मुख रहेलो चन्द्र घरने विप ज निषेध करेलो छे, परंतु प्रासाद (चैत्य ), राजमहेल अने खजानाना परने ( मंडार ) विषे तो सन्मुख रहेलो चन्द्र शुभ कहेलो छे. (२७) क. रो. मृ. पा. पु. पु. भ. पूर्व घ. श. पू. उ. रे. प. म. •YA दक्षिण म. पू. उ. ह. चि. स्वा. पि. । '... ' ' मा परनी पारतमा विवेकी पुरुषोए गुरु-शिष्यादिकना संबंधमा जेम भशुम तारा ४ (३७८) श्रीकाललोकप्रकाश। सप्तमी चापराः शुभाः ॥ २८ ॥ तथोक्तं-गणयेत्स्वामिनक्षत्रा-द्याव- द्विष्ण्यं गृहस्य च । नवभिस्तु हरेद्भागं शेषं तारा प्रकीर्तिता । ॥ २९ ॥ शांता १ मनोरमा २ क्रूरा ३ विजया ४ कलहोद्भवा ५ । पद्मिनी ६ राक्षसी ७ वीरा ८ आनंदा ९ चेति तारकाः ॥ ३० ॥ इति नक्षत्रं ॥ नक्षत्रांकेऽष्टभिर्भक्त शेषांकेन व्ययो भवेत् । भागाप्राप्तावथा- धाभि-भांक एव व्ययो भवेत् ॥ ३१ ॥ स्यानिधासौ च पैशाचो राक्षसो यक्ष एव च । पायेन तुल्योऽभ्यधिको न्यूनचायाद्यथाक्रमं ॥ ३२ ॥ तथाह-पैशाचस्तु समायः स्या-द्राक्षसश्चाधिके व्यये । आयातूनतरो यक्षो व्ययः श्रेष्ठोऽष्टधा त्वयं ॥ ३३ ॥ शांतः १ क्रूरः २ प्रद्योतश्च ३ श्रेया ४ नथ मनोरमः ५। श्रीवत्सो ६ विभव ७ श्चैव चिंतात्मको ८ व्ययोऽष्टमः ॥३४॥ अत्र च-एकशेपे व्ययः शांतो द्विशेपे क्रूर इष्यते । घर्जिवानी छे तेम त्रीजी, पांचमी भने सातमी तारा वर्जवा लायक छ, ते सिवायनी वीजी तारामो शुभ छे. (२८) ते विपे का छे के-" गृहस्वामीना नक्षत्रथी घरनु जन्मनक्षत्र गण. जे संख्या पावे तेने नवे माग देवो. पाकी ले रहे ते (वेटलामी) तारा कहेली थे. (२९) तेना नाम था प्रमाणे-शांता १, मनोरमा २, क्रूरा ३, विजया ४, कलहोद्भवा (क्लेश करनारी) ५, पदमिनी ६, राक्षसी ७, वीरा ८ अने श्रानंदा ९. (३०) इति नवनाविचार. हवे व्यय कहे छे-नघनना अंकने भाठे मांगता ने शेष रहे ते व्यय कवाय थे. तेमा जो पाठे भाग न चाले तो ते नक्षत्रनो अंकज व्यय कहेवाय छे. (३१) ते व्यय त्रण प्रकारको छे-पैशाच १, राक्षस २ अने यक्ष ३. तेमा प्रायनी तुन्य व्यय होय तो ते पैशाच कवाय छे. पायथी अधिक होय तो वे राक्षस कवाय छ भने प्रायथी न्यून होय तो ते यह कहेवाय छे. (३२) ते विष कयु छ के-" मायनी समान संख्यावाळो व्यय होय तो ते पैशाच कवाय छे. आयनी संख्याथी व्यपनी संख्या अधिक होप वो ते राचस कहेवाय छ भने मायनी संख्याधी घ्ययनी संख्या न्यून होय तो ते यह कवाय छे तेमा यक्ष नामनो ध्यय ज श्रेष्ट थे." ते व्यय माठ प्रकारनो थे. तेना नाम भा प्रमाणे-शांत १, क्रूर २, प्रद्योत ३, थेयान ४, मनोरम ५, श्रीवरस ३, विमव ७ तथा भाठमो चिंतात्मक ८. (३३-३४) मही (नवाना अंकने माठे मा. पाला. इति या पाठा नगं ११ मो। (३७९) एवं यावत् शून्यशेपे भवेञ्चितात्मको व्ययः ॥ ३५ ॥ इति व्ययः॥' व्ययांकनाभीष्टवेश्म-नाड्यश्चाक्षरसंख्यया। मुक्त क्षेत्रफले भक्त त्रिभिः शेषमिहाशकः ॥ ३६॥ इंद्रांशः स्यादेकशेपे द्विशेषे च यमांशकः। शून्यशेपे ज राजांशो-ऽधमस्तत्र यमांशकः ॥ ३७॥ इत्यंशकः ॥ तथा बैशाखे श्रावणे मार्गे पौपे फाल्गुन एव च । कुर्वीत वास्तु- प्रारंभ न तु शेपेषु सप्तसु ॥ ३८ ॥ एते तूक्ताश्चंद्रमासाः शुक्लप्रतिपदा- दिकाः । सौरमासांश्चैवमाहुः सूर्यसंक्रांतिचिह्नितान् ॥ ३९ ॥ धामार- भेतोत्तरदक्षिणास्यं तुलालिमेपर्षभभाजि भानौ । प्रापश्चिमास्यं मृग- कर्ककुंभ-सिंहस्थिते दूधंगगते न किंचित् ॥४०॥ तुलालीत्याद्युक्तेऽपि पूर्वोक्तचंद्रमासपंचक एव, न शेपमासेष्विति स्वयं ज्ञेयं. संक्रांते द्विस्व- गतां जो) एक शेष रहे तो शांत नामनो व्यय जाणवो, चे शेष रहे तो क्रूर नामनो घ्यय जाणयो. ए ज प्रमाणे यावत् शून्य शेष रहे तो चिंतात्मक व्यय जाणवो. (३५) इति व्यय विचार. हवे अंश कहे छे-व्ययनो अंक, इच्छित घरनी नाडी एटले जे नामर्नु घर होय तेना अधरोनी संख्यानो अंक भने क्षेत्रफळनो अंक, श्रावणे अंकने एकठा करवा (सरवाळो फरवो ). पछी तेने त्रणे मांगता जे शेष रहे तेने अंश जाणवो. (३६) तेमा जो एक शेप रहे तो ते इंद्र अंश जाणवो, घे शेष रहे तो यम अंश जाणवो भने शून्य शेप रहे तो राजा अंश जाणवो. या प्रणेमा यम अंश अधम-अशुभ छ (पाकीना ये शुम छे). (३७) इति अंश विचार. हवे वास्तु प्रारंभ करवानो विचार कहे थे-वैशाख १, भावण २, मार्गशीर्ष ३, पोप ४ अने फान्गुन ५, भा पांच मासमा ज घर चणावधानो प्रारंभ करवो. पाकीना सात मासमा थारंभ करवो नहीं. (३९) अहीं शुक्ल प्रतिपदाथी आरंभ थता चांद्र- मासो क्या छ भने सूर्यमास लेवा होय तो सूर्यनी संक्रांतिवडे युक्त पा प्रमाणे कया छे. (३९) तुला, वृषिक, मेष भने वृप ए चार संक्रातिमा सूर्य होय त्यारे उत्तर अने दक्षिण दिशाना द्वारवाळा घरनो भारंम करवो तथा मकर, कुंम, फर्क अने सिंह ए चार समाविमा सूर्य होय त्यारे पूर्व भने पविम दिशाना द्वारवाळा धरनो थारंम करवो. परत द्विस्वभाव राशि एटले मिथुन, कन्या, धन धने मीन ए चार संक्रांतिमा सूर्य होय त्यारे कोइपण घरनो आरम करवो नहीं. (४०) ही तुला, वृधिक विगेरे संक्रांति माथी प्रामामासपणुं थे वोपण पूर्वे कहला पांच चांद्र मासमा ज परनो भारंम (३८०) श्रीकाललोकप्रकाश । भावेषु राशिष्वकें न कल्पते । एकस्या अप्यभिमुखं सदनं दिक्च- तुष्टये ॥४१॥ अथ दक्षिणपार्थोप-पीडं सुप्तस्य वास्तुनः। नागस्य स्याच्छिरः १ पृष्ठं २ पुच्छं ३ कुक्षिर्यथाक्रमं ॥ ४२ ॥ भाद्रादिमासत्रितये दिनु पूर्वादिषु क्रमात् । मार्गादिमासत्रितये दिनु स्युर्दक्षिणादिषु ॥४३॥ फाल्गुनादित्रये तु स्यु-दितु ते पश्चिमादिषु । ज्येष्ठादिपु त्रिपूदीच्या- दीनां चतुष्टये दिशां ॥ ४४ ॥ कर्त्तव्यो वास्तुनः कुक्षौ प्रथमं खननो- द्यमः । यथा स्यात्सुखसंपत्ति-वपरीत्ये विपर्ययः ॥४५॥ तथोक्तं- करवो, वीजा मासोमा न करवो. एम पोतानी मेळे ज समजी लेबुं. द्विस्वभाव राशिमा एटले मिथुन, कन्या, धन अने मीन राशिमा सूर्यनी संक्रांति होय त्यारे चारे दिशामाथी एक पण दिशाना द्वारवाळा धरनो प्रारंभ फरवो योग्य नथी. (४१) इति वास्तुप्रारं- भना मासनो निर्णय. हये खातर्नु मुहूर्त कहे छ-नागना श्राकारवाळो वास्तुपुरुष पोताना शरीरना जमणा पडखान दवावीने सुतेलो छे. तेनुं मस्तक १, पृष्ठ २, पुच्छ ३ श्रने कुषि ४ श्रा चार अवयवो अनुक्रमे भाद्रपदादिक त्रण त्रण मासमा पूर्वादिक दिशाना अनुक्रमे होय छ एटले के-भाद्रपद, आश्विन ने कार्तिक ए प्रण मासमां वास्तुपुरुपर्नु मस्तक पूर्व दिशामा होय छ, पृष्ठ दक्षिण दिशामां, पुच्छ पश्चिम दिशामा भने कृषि उत्तर दिशामा होय छे. ए ज रोते मार्गादिक त्रण मास एटले मार्गशीर्ष, पोष अने माघ मासमा दक्षिणादिक दिशामा होय छे एटले के-दक्षिण दिशामा मस्तक, पश्चिम दिशामा पृछ, उत्तर दिशामा पुच्छ भने पूर्व दिशामा वास्तुपुरुपनी कृषि रहेली होय थे. एजरीते फाल्गुनादिक त्रण मासमा पश्चिमादिक चार दिशामा होय छे एटले के-फान्गुन, चैत्र अने वैशास ए व्रण मासमा वास्तुपुरुपर्नुमस्तक पश्चिम दिशामा, पृष्ठ उचर दिशार्मा, पुच्छ पूर्वदिशामा भने कृषि दक्षिण दिशामा होय छे. ए जीते ज्येष्ठादिक त्रण मासा उत्तरादिक चार दिशामा होय छे एटले के-ज्येष्ठ, अपाढ अने श्रावण मासमा वास्तु- पुरुपर्नु मस्तक उत्तरदिशामा, पृष्ठ पूर्वदिशामां, पुन्छ दक्षिण दिशामा भने कृषि पधिम दिशामां होय छे. (४२-४४) श्रहीं वास्तुनी कृषिने विप प्रथम खोदवानो उपम फरवो (सात करघु). तेथी सुरासंपचि प्राप्त थाय छ भने विपरीतपणे करवापी विपर्यय याय के एटले कृषि सिवाय वीजा अवयवमा सात करे वो ते अधुम फळने पापनार थाय छे.

सर्ग ११ मो। (३८१) शिरः खनेन्मातृपितृन्निहन्यात् खनेञ्च पृष्ठे भयरोगपीडाः । पुच्छं खनेत् स्त्रीशुभगोत्रहानिः स्त्रीपुत्ररत्नान्नवसूनि कुक्षौ ॥ ४६ ॥ इति वास्तुनो दिनियमः ॥ विदिग्नियम स्वेवमाहुः-ईशानादिषु कोणेषु वृषादीनां त्रिके त्रिके। शेषाहेराननं त्याज्यं विलोमेन प्रसर्पतः॥४७॥ यदा च मुखमैशान्यां नाभिराग्नेयगा तदा । पुच्छं भवति नैर्ऋत्यां वायव्यां मुत्कलं शुभं ॥४८॥ एवं च-वृपादौ मुखमैशान्यां सिंहादौ वायुकोणके । वृश्चि- कादौ च नैर्ऋत्यां कुम्भादौ हुतभुग्दिशि ॥ १९ ॥ वृपादौ वायवी श्रेष्ठा सिंहादौ नैति त्रिके । वृश्चिकादौ शुभाग्नेयी तथैशानी घटादिषु ॥ ५० ॥ इति खातारभंः॥ अथ वास्तुनि भागाः स्यु-देवतानां पृथक् पृथक् । भागानां स्वा. (४५) ते विपे कयु के के-" चास्तुपुरुपना मस्तके खात करवामां आवे तो घरघणीना मातापिता मरण पामे, पृष्ठ उपर खात करवाथी भय रोग भने पीडा उत्पन्न घाय, पुच्छ खोदवाथी स्त्री, शुभ अने गोत्र ( कुळ )नी हानि-नाश पाय अने कुचिमा सात करवायी स्त्री, पुत्र, रत्न, अन्न भने धननी प्राप्ति थाय छे. (४६) इति वास्तुदिशा नियम. वास्तुनी विदिशानो नियम पा प्रमाणे को छे-पादिक त्रण प्रण संक्रातिमा ईशा. नादिक चार खूणाने विपे विलोम ( उलटा) पणाए फरता एवा शेष नागर्नु मुख तजवा लायक छ. (४७) ज्यारे शेपनागर्नु पुस ईशान खूणामां होय त्यारे तेनी नामि भग्नि सूणाम होय छे. पुच्छ नैर्मत्य खूणामा होय छे भने वायव्य सुणो साली होय छे वेपी ते शुम थे. (४८) आधी करीने वृष, मिथुन अने कर्क ए प्रण संक्रांतिमा शेपर्नु मुरा ईशान सुणामां होय छे. सिंहादिक एटले सिंह, कन्या अने तुला संक्रांतिमा शेपर्नु मुख वाय- घ्य सुणामा होय छे. पृधिकादिक एटले वृश्चिक, धन अने मकर संक्रांतिमा शेप, मुख नैत्य खूगामा होय है. तथा कुंमादिक एटले कुंम, मीन भने मेप संक्रांतिमा शेपर्नु मुख भग्नि सूणाम होय थे. (४९) तथा पारने माटे वृपादिक प्रण संक्रांतिमा पापु खूणो (खाली होवायी ) श्रेष्ठ थे, सिंहादिक प्रण संक्रांतिमा नैर्मत सूणो श्रेष्ठ थे, पृषिकादिक प्रण संक्रांतिमा अग्नि सुणो श्रेष्ठ थे प्रने कुंमादिक प्रण संक्रांतिमा ईशान सुणो श्रेष्ठ थे. (५०) इति विदिशा नियम. इति पातारंम. हवे धास्तषेत्रना देवो कहे थे-पारस्तुना क्षेत्रमा देयवाभोना जुदा शुदा माग होप थे. .

(३८२) श्रीकाललोकप्रकाश । मिनः पंच-चत्वारिंशसुराः स्मृताः ॥ ५९॥ तत्र भागाश्चतुःषष्टिः पुरे नृपगृहेषु च । एकाशीतिः शेषगृहे शतं प्रासादमंडपे ॥ ५२ ॥ तथोक्तं सूत्रधारमंडनकृतवास्तुसारे-चतुःषष्टया पदैर्वास्तुपुरे राजगृहेऽर्चयेत् । एकाशीत्या गृहे भाग-शतं प्रासादमंडपे ॥ ५३ ॥ ईशः १ पर्जन्यो २ जये ३ द्रौ ४ सूर्यः ५ सत्यो ६ भृशो ७ नमः ८ । अग्निः ९ पूषा १० थ वितथो ११ गृहक्षत १२ यमौ १३ ततः ॥ ५४॥ गंधर्वो १४ भंगराजश्च १५ मृगः १६ पितृगणस्तथा १७ । दौवारिको १८ ऽथ सुग्रीवः १९ पुष्पदंतौ २० जलाधिपः २१ ॥५५॥ असुरः २२ शोष २३ यक्ष्माणौ २४ रोगो २५ ऽहि २६ मुख्य २७ एव च । भल्ला( खल्वा)ट २८ सोम २९ गिरय ३०-स्तथा बाह्ये दिति ३१ दितिः३२॥५६॥ श्रापा ३३ पवत्सा ३४ वीशाने सावित्रः ३५ सविता ३६ ग्निगौ । इंद्र ३७ इंद्रजयो ३८ ऽन्यस्मिन् वायौ रुद्रश्च ३९ रुद्रराट् ४० ॥ ५७ ॥ मध्ये ब्रह्मास्य ४१ - ते सर्व मागोना स्वामी तरीके पास्तालीश देवो कहेला छे. (५१) तेमां नगर भने राजाना गृहोने विपे सर्व देवोना मळीने चोसठ भाग ( पद ) होय छे, बाकीना गृहोने विषे एकाशी भाग होय छे अने प्रासाद तथा मंडपन विष सो भाग होय छे. (५२) ते विपे मंडन नामना सूत्रधारे करेला वास्तुसार नामना गंथमा कमु छ के-" नगरने विषे अने राजाना गृहने विषे चोसठ पद (भाग) वडे वास्तुनी पूजा करवी, पीजा गृहोने विपे एकाशी पद बडे अने प्रासाद तथा मंडपने विषे सो पद वडे वास्तुनी पूजा करवी" (५३) तेना पीस्ताळीश देवो अनुक्रमे श्रा प्रमाणे छे-ईश १, पर्जन्य २, जय ३, इंद्र ४, सूर्य ५, सत्य ६, भृश ७, नम ८, अग्नि ९, पूषा १०, वितथ ११, गृहपत १२, यम १३, गंधर्ष १४, शृंगराज १५, मृग १६, पिरगण १७, दौवारिक १८, सुग्रीव १९, पुष्पदंत २०, जलाधिप (वरुण) २१, असुर २२, शेप २३, यक्ष्मा २४, राग २५, अहि २६, मुख्य २७, मन्नाट (खन्वाट)२८, सोम २९, गिरि (शैल)३०, अदिति ३१, अने दिति ३२, मा वत्रीश देवोने चारे दिशाना पहारना मागमा स्थापवा. पछी अंदरना भागमा ईशान खूणामां आय ३३ भने आपवत्स ३४ ए पे देवो स्थापया, भग्नि खूणमा सावित्र ३५ अने सविता ३६ ए ये देवो स्थापवा, नैर्मत खणामां इंद्र ३७ भने इंद्रजय ३८ ए ये देवो स्थापना तथा वायव्य रणामा रुद्र ३९ भने रुद्रराद् ४०. ए "सर्ग मो (३८३) चत्वारो देवाः प्राच्यादिदिग्गताः । अर्थमाख्यो ४२ विवस्वांश्च ४३ मैत्रः ४४ पृथ्वीधरः ४५ क्रमात् ॥ ५८ ॥ ईशकोणादितो वाह्ये चरकी १ च विहा(दा)रिका २ । पूतना ३ पापा ४ राक्षस्यो हेतु(ति)काद्या(ट्या)श्च. निष्पदाः ॥ ५९ ॥ चतुष्पष्टिपदे देवा वास्तुब्रह्मा चतुप्पदः। अर्यमाद्या- श्वतुर्भागा द्वियंशा मध्यकोणगाः ॥ ६०॥ वहिःकोणेवभागाः शेपा एकपदाः सुराः। एकाशीतिपदे ब्रह्मा नवाद्यास्तु पट्पदाः ॥ ६१ ॥ द्विपदा मध्यकोणेऽष्टौ वाह्ये द्वात्रिंशदेकशः। शते ब्रह्माष्टसंख्यांशो बाह्य- कोणेषु सार्द्धकौ ॥ ६२ ॥ अर्यमाद्यास्तु वास्त्वंशाः शेपाः स्युः पूर्ववास्तु- वत् । हेमरत्नाचताद्यैस्तु वास्तुक्षेत्राकृतिं लिखेत् ॥ ६३ ।। चे देवो स्थापना. पछी यराबर मध्य भागमा ब्रह्मा ४१ स्थापयो तेनी पूर्वादिक चार दिशाए अर्यमा ४२, विवस्वान ४३, मैत्र ४४ भने पृथ्वीधर ४५ ए चार देवो अनुक्रमे स्थापवा. (५४-५८) ते उपरांत मंडळनी बहार ईशान विगैरे सुणामां अनुक्रमे परकी १, विहा (दा) रिका २, पूतना ३ अने पापा ४ ए चार राक्षसीमो शस्त्र सहित स्थापची. मा चार राक्षसीओ पद ( भाव ) रहित . ( एटले के वास्तुनी भूमिमा मर्नु स्थान नथी. तेथी अलगज छे.) अहीं वास्तु क्षेत्रना चौसठ पद करीए त्यारे मध्यमां रहेला प्रमाना पार पद ( माग ) बाणवा, अर्यमा विगैरे चार देवोना दरेकना चार चार पर बाणपा. मध्यना खूणामा रहेला भाठ देवोना दरेकना पये माग जाणवा. पहारना सुणामा रहेला माठ देवोनो दरेफनो भर्ध मर्ध भाग जाणवो. तथा पाकीना चोवीश देवोनो रेकनो एक एक भाग जाणवो. (कुल ६४ पद थाय छे.) हवे वास्तुक्षेत्रमा एकाशी पदनुं मंडळ करीए त्यारे प्रधाना नव पद (९) अर्यमा विगेरे चारना छ छ पद (२४) मध्पना चार गुणाना माठ देवोना में ये पद (१६) तथा पहारना पत्रीश देवोनुं एक एक पद (३२) थे. (कुल ८१ पद थाय के ). हवे यास्तुपेत्रमा सो पदनुं मंडळ करीए स्यारे प्रमाना १६, भर्यमादि पारना माठ आठ होवायी ३२, मध्य सुपाना पाठना परे होपापी १६, पहारना सुणाना भाठना दोढ दोट होवापी १२, पाकीना २४ नु एकेक पद होवाची २४-एम फुल मळीने सो पाय छे. हो पास्तुक्षेत्रनी मारुति सवर्ण, रल के पोखा विगेरेपी भासवी. (५९-६३) (३८४) श्रीकाललोकप्रकाश. ६४ चोसठ पदनो वास्तु. चरकी विदारिका धा प पू स म भृ अ पू श्राप सावित्र अर्यमा शै | पापवत्स सविता वि - कु पृथ्वीधर ब्रह्मा वैवस्वत मु मैत्रगण इंद्र रुद्रदास जय मृ व पु नं पापा पूतना (३८६) श्रीकाललोकप्रकाश। १०० सो पदनो वास्तु. चरकी विदारिका .har सू स श्रा दि BE सावित्र सविता अर्यमा 5 प्रापवत्स पू पृथ्वीधर ब्रह्मा चैवस्वत म म. ना रुद्रदास मैग्रगण रा जय पाप शो घ नं पित पापा पूतना सर्ग ३१ मो। (३८७) अभ्यर्च्य पुष्पगंधायै-वलिं दध्याज्यमोदनं । दद्यात्सुरेभ्यः सोंकारै- नमोतैर्नामभिः पृथक् ।। ६४ ॥ वास्त्वारंभे प्रवेशे च श्रेयसे वास्तुपूजनं । अकृते स्वामिनाशः स्या-तस्मात्पूज्यो हितार्थिभिः ॥६५॥ इत्यादि कियवास्तुशास्त्रं श्रीजंबूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रेऽपि संग्रहीतं बोद्धव्यं. तथा च सूत्रं-एगासीतिपदेसु सव्वेसु चेव वत्थूसु णेगगुणजाणए पंडिए विहिपणू पणयालीसाए देवयाणमित्यादि वार्द्धकिरत्नस्वरूपनिरूपणे. अशान्यां देवगृहं महानसं चापि कार्यमाग्नेय्यां। नैर्ऋत्यां भांडोपस्करो- ऽर्थधान्यानि मारुत्यां ॥६६॥ दंडः प्रकाशे प्रासादे प्रासादकरसं. ख्यया । सांधकारे पुनः कार्यों मध्यप्रासादमानतः ॥ ६७ ॥ इत्यादि- वास्तुशास्त्रज्ञ-श्चक्रिरत्नं स वार्द्धकिः । मुहूर्त्तमात्राद्रचयेत् स्कंधावारपुरा- दिकं ॥ ६८॥ इति वार्द्धकिरत्नं ॥ भवेत्पुरोहितो रत्नं कुर्वन् शांतिकपौष्टिकं । चतुर्दशानां विद्यानां पुष्प भने चंदन विगेरेवडे पूजीने पछी दही, घी अने भातर्नु पलिदान देयं. ते वखते ॐकारपूर्वक ते वे देवोनुं नाम ( चतुर्थी विभक्ति युक्त) लइ पाछळ नमः वोलवू. या प्रमाणे सर्व देवोना पृथक् पृथक् मंत्र. बोली पूजा भने पलिदान कर. (६४) वास्तुना प्रारंभमा तथा प्रवेश करती वखते कल्याणने माटे वास्तुनुं पूजन कर. जो पूजन न करे तो स्वामीनो विनाश थाय, तेथी पोताना हितनी इच्छावाळा पुरुपोए वास्तुनी पूजा करवी जोइए, ( ६५ ) इत्यादि केटलुक वास्तुशास्त्र श्रीजंबूद्वीपप्रज्ञप्ति सूत्रमा पण कहेलुं छे त्यांथी पण जाणी लेवं. तेमा प्रा प्रमाणे सूत्र लख्युं छे.-"एकाशी अदिक पदवाळा सर्व प्रकारना वास्तुने विप अनेक गुणना जाणनार विधिज्ञ पांडवोए पीस्तालीश देवतागोनी पूजा करवी." इत्यादि वार्धकीरत्ननुं स्वरूप कहेती वखते कहां छे. घरना ईशान खूणामां देवगृह कर जोइए. अग्नि खूणामां रसोड, नैर्ऋत्य खूणामां वासण विगेरे सामग्री राखवावें स्थान, भने वायव्य खूणामा धन-धान्य विगेरे राखवावें स्थान कर जोइए. (६६) प्रकाशवाळा प्रासादमा प्रासादना हाथनी संख्या प्रमाणे ध्वजादंड करवो जोइए भने अंधकारवाळा प्रासादमा मध्य प्रासादना मानवडे ध्वजा- दंड करवो जोइए. (६७) इत्यादि वास्तुशास्त्रने जाणनार ते चक्रवर्तीनो वार्धकीरत्न एक मुहर्च मात्रमा ज स्कंधावार, नगर विगैरेनी रचना करी शके छे. (६८) इति वार्धकीरत्न. ४ पुरोहितरत्न-शांतिक पौष्टिकनो करनार, चौद विद्यानो पारगामी अने निर- (३८८) श्रीकाललोकप्रकाश। पारदृश्वा सदा शुचिः ॥ ६९ ॥ अनेकगुणसंपूर्णः कलावान् कुशलः कविः। विज्ञः शब्दादिशास्त्राणां मंत्रयंत्रादिमर्मवित् ॥ ७० ॥ इति पुरोहितरत्नं ॥ भवत्यथ गजो रत्नं सप्तांग्या भूप्रतिष्ठितः। उत्तुंगो भद्रजातीय ऐरानत इवापरः ॥ ७१ ॥ वलीयान्मांसलः शूरः पटुर्वप्रादिभेदने । दृष्ट- मात्रोऽपि शत्रूणां सैन्यशस्त्रादिदर्पहृत् ॥ ७२ ॥ शास्त्रोक्तैर्लक्षणैयक्षः प्रशस्तर्लक्षितः शुचिः । लक्ष्मीलीलागृहं रूप-शाली सर्वसमृद्धिकृत ॥ ७३ ॥ त्रिभिर्विशेषकं ॥ इति गजरत्नं ॥ अश्वो रलं भवेच्चारु-प्रकृतिविनयान्वितः । द्वात्रिंशदंगुलोमुंग- मूर्द्धावस्थितयौवनः ॥७४ ॥ चतुरंगुलदीर्घोच्चैः स्तब्धकर्णश्च यौवनात् । पततो हि जरस्यश्व-कर्णों नारीकुचाविव ॥ ७५॥ विंशतिं चांगुला- न्यस्य बाहा भवति देयतः । वाहा त्वधः शिरोभागा-जानुनोरुपरि स्थिता ॥ ७६ ॥ षोडशांगुलजंघोऽयं चतुरंगुलजानुकः । तावदुच्चखुरोs- शीति-मंगुलान्येवमुच्छ्रितः ॥ ७७ ॥ एकन्यूनांगुलशत-परिणाहो भव- न्तर पवित्र होय छे. (६९) वळी अनेक गुण संपूर्ण, कळावान्, कुशळ, कवि, शन्दादि शास्त्रमा प्रवीण अने मंत्रयंत्रादिना तश्वमां पण विज्ञ होय छे. (७०) इति पुरोहितरत्न ५ गजरत्न-सात अंगवडे पृापर प्रतिष्ठित होय छे, उंचो, भद्र जातिनो भने जाणे बीजो ऐरावत होय तेवो होय छ. (७१) पळवान, मांसल, शूर, गढ विगेरेने तोडवामा प्रवीण, देसवामानथी ज शत्रुना सैन्यशनादि अहंकारनो नाश करनारो होय छे. (७२) शास्त्रोक्त एपा प्रत्यक्ष ने प्रशस्त लक्षणोक्डे लक्षित तेम ज शुचि होय छे. लक्ष्मीना क्रीडागृह जेवो, रूपशाळा अने सर्व प्रकारनी समृद्धिने प्राप्त करावनार होय छे. (७३) इति हस्तिरत्नं. ६ अश्वरत्न-स्वभावे ज सुंदर अने विनयान्वित होय छे. पत्रीश अंगुळ उंचा मस्तकपाळो श्रने अवस्थित यौवनचाळो होय छे. (७४) चार अंगुळ दीर्घ ने उंचो म ज स्तब्धकर्णवाळो यौवनावस्थाने लइने होय छ, केमके अश्वना फर्ण पण स्वीना कुचनी जैम जरावस्थामा नमी पडे थे. (७५) वीश अंगुळ लांची पाहा होय छे. भा पाहा शिरो- भागी नीचे ने जानुनी उपरनी गणाय छे. (७६) सोळ भंगुळनी जंघायाळो, चार थंगुळनी जानुवागे, चार अंगुळ उंची सुरावाळो एम एकंदर अंशी भंगुळ उंचो होय छे. (७७) नवाणु अंगुळना परिणाह (पेठफ )वाळो अने १०८ अंगुळ लामो होय छे.

सर्ग ३१ मो। (३८९) त्यसौ । अष्टोत्तरांगुलशत-दीर्घश्च परिकीर्तितः ॥ ७८ ॥ तुंगत्वं स्यात्तु. रंगाणा-माखुरात् श्रवणावधि । पृष्ठोदरस्य परिधिः परिणाहो भवेदिह ॥ ७९ ॥ आपुच्छमूलमायामो मुखादारभ्य कीर्तितः । भवत्यत्रांगुलं मान-विशेषस्तद्ज्ञदर्शितः ॥ ८॥ इत्यश्वरत्नमाश्रित्य निर्दिष्टं मान. मागमे । लोके वन्योत्तमहया-पेक्षयेदं तदीरितं ॥ ८१॥ जघन्यमध्य- श्रेष्ठाना-मश्वानामायतिर्भवेत् । अंगुलानां शतं हीनं विंशत्या दशभि- त्रिभिः ॥ ८२ ॥ परिणाहोंगुलानि स्या-त्सप्ततिः सप्तसप्ततिः । एका- शीतिः समासेन त्रिविधोऽयं यथाक्रमं ॥ ८३॥ तथा पष्टिश्चतुःपष्टि- रष्टषष्टिः समुच्छ्यः। द्विपंचसप्तकयुता विंशतिः स्यान्मुखायतिः॥ ८४ ॥ इत्यादि, पृष्ठं तस्य भवेदीप-न्नतं मृदुलमांसलं । सल्लक्षणं कशावेत्र- लताद्याघातवर्जितं ॥ ८४ ॥ अश्वोचितानेकरल-स्वर्णालंकारभासुरः । भवत्यसौ च निर्दोषा-रौद्रपक्षमललोचनः ॥ ८५ ॥ उदात्तगतिवेगेन मनःपवनता_जित् । मृणालांभोनिश्रयापि लाघवेन समुत्पतन् ॥८६॥ (७८) मा अश्वनी उंचाइ जे ८० अंगुळनी कही ते खरीथी मांडीने कर्ण सुधी समजवी अने.पीठ तथा उदरनी परिधि ते परिणाह समजवो. (७९ ) पुच्छना मूळथी मुखपर्यंत लंबाइ समजवी. अहीं अंगुळ ए अमुक प्रकारचं मान विशेष छे. ते ते यना कारे वतालुं समजबु. (८०) अश्वरत्नने पाश्रीने या प्रमाणे मान आगममा कयु छ. लोकर्मा तो उत्तम अश्वने श्राश्रीने श्रा प्रमाणे मान कहुं छे. (८१)-जघन्य, मध्यम भने श्रेष्ठ अश्वनी लंबाइनुं मान सोमां वीश, दश ने प्रण अंगुळ अोछु कह्यु छ एटले जघन्यनुं ८०, मध्यनु ९० ने श्रेष्ठ- ९७ अंगुळ समजवू. (८२) परिणाह जघन्य, मध्यम ने श्रेष्ठना ८०-७७ ने ८१ अंगुकना अनुक्रमे संक्षेपथी कहेल छ, (८३) तथा ६०-६४ ने ६८ अंगुळ मुखनी उंचाइ होय छे अने लंबाइ २२-२५ ने २७ अंगुळ होय छे. (८४) इत्यादि. वेनी पीठ काइक नमेली, मृदु, मांसल, सारा लक्षणमाळी अने चाबुक, वेत्र के लताना आघातरहित होय छे. (८५) अश्वने उचित एवा अनेक रत्न अने स्वर्णना अलंकारोबडे शोमतो होय थे, अने निर्दोष तथा अरौद्र पापणयुक्त नेत्रवाळो होय छे. (८६) उदाच एवी गतिना वेगवडे मन, पवन अने गरुडने पण जीते एको होय छे. मृणाल अने जळनो आश्रय करीने पण ते एकदम लघुलाघवीकळावडे उत्पतिने उलंधी जनार होय छे. (८६) वळी ते अश्व सारा कुळमा उत्पन थयेल, सुजातिवान्, शुचि भने श्रीकाललोकप्रकाश । सुकुलोत्थः सुजातिश्च शुचिः शास्त्रोक्तलक्षणः । तनुस्निग्धोल्लसद्रोमा मेधावी भद्रकोऽल्परुट् ॥ ८७ ॥ अंभप्रकाग्निपाषाण-वालुकोलंघने पटुः । अद्रिग दिविषम-पथे जितपरिश्रमः ॥ ८९ ॥ लताघातास्यदं- शादि-दुष्टचेष्टाविवर्जितः । रिपुष्वर्कितापाता-स्यात्सुशिष्यवदानयः ॥ ९० ॥ कालहेषी रक्ततालु-जिह्वो जितपरीपहः । निद्रालुः सर्वदा जाग-रूकश्च समरांगणे ॥ ९१ ।। तथोक्तं-सदैव निद्रावशगा निद्रा. छेदश्च वाजिनां । जायते संगरे प्राप्ते कर्करस्य च भक्षणे ॥ ९२ ॥ तथा- रोहकप्ताग-सुखावहवपुर्गतिः । प्रशस्तद्वादशावतॊ ऽनश्रुपाती श्रमे- ऽपि हि ॥ ९३ ॥ सप्तभिः कुलकं ॥ द्वादशावर्त्ताश्चेमे वराहोक्ता:-ये प्रपाणगलकर्णसंस्थिताः पृष्ठमध्यनयनोपरिस्थिताः । ओष्ठसक्थिभुजकु. क्षिपार्श्वगा-स्ते ललाटसहिताः सुशोभनाः ॥ ९४ ॥ अत्र प्रपाणमुत्तरो- ष्ठतलं, सक्थिनी पाश्चात्यपादयोर्जानृपरिभागाः, कुक्षिरत्र वामो, दचि. णकुच्यावर्तस्य गर्हितत्वात्. अत्र कर्णनयनादिस्थानानां द्विसंख्याकत्वे- शास्त्रोक्त लक्षणवाळो होय . पातळा स्निग्ध अने उन्नसायमान रोमवाळो, मेधावी, भद्रक अने अन्प क्रोधवाळो होय छे. (८८) पाणी, कादव, अग्नि, पापाण भने रेतीनुं उल्लं. घन करवामां चतुर होय छे. पर्वत, खाडा विगैरे विषम पंथमा पण परिश्रमने जीतनार अर्थात् विनापरिश्रमे तेने उन्लंघनार होय छे. (८९) लताघात ( पादु मारवी अने भास्यदंश (फरडवू) विगेरे दुष्ट चेष्टारहित होय छे. शत्रुनोने विपे अतर्कित आपात करनार (पडनार ) होवाथी मुशिष्यना श्राश्रय जेयो होय छे. (९०) अमुक काळे हेपा. रव करनार ( काळहेपी), रक्त ताल ने जिह्वायाळो, परीपहने जीवनारो, निरंतर निद्राल अने समरांगणमा जागृत रहेनारो होय छ। (९१) कयु छ के-'अश्वो सदैव निद्राश होय छे. तेमनो निद्राछेद संग्राममा अने खावामा कांकरो भावे त्यारे थाय छे. (९२) आरो- हण करनारने सर्वांग सुख प्रापे वेवी शरीरनी गतिवाळो, प्रशस्त एवा पार आवर्तवालो भने थम वसते पण थांसु न पाडे तेयो होय छे. (९३) अश्वोना शरीर उपर पार पावर्त होय छे. ते वराहे या प्रमाणे कहा छ-१ प्रपाण, २ गळसंस्थित, ३ फर्णसंस्थित, ४ पृष्ठो. परि, ५ मध्योपरि, ६ नयनोपरि, ७ मोड, ८ सक्थि, ९ भुजाए, १० कुपीए, ११.पडसे भने १२ ललाटे-सारा शोमता होय.(९४) नहीं प्रपाण ते उत्तरोष्ठतुं वळ समजबु. सविथ एटले पछवाडेना पे पगना जानुनो उपरनो माग समजवो. कुषि ते ही धाम पाजुनी समजवी-दक्षिण कृषिनो भावते वो निदित गणाय थे. मही कर्णनयनादि स्थान मग ३१ मो। ऽपि जात्यपेक्षया द्वादशैव स्थानानि, स्थानभेदानुसारेण स्थानिभेदा अपि द्वादशैवेति. तत्र कंठे स्थितोऽश्वानां स्याद्देवमणिसंज्ञकः। महाल- क्षणमावतः केपांचित्पुण्यशालिनां ॥ ९५ ॥ इत्यश्वरत्नं ॥ स्त्रीरत्नं च भवेत्सर्व-नारीवर्गशिरोमणिः । रूपलक्षणसंयुक्ता मानो- न्मानप्रमाणयुक् ॥ ९६ ॥ अवद्धिष्णुरोमनखा सदा संस्थितयौवना । आशु स्पर्शमहिम्ना च सर्वरोगोपशांतिकृत् ॥ ९७ ॥ वलवृद्धिकरी भोक्तुः सर्व पु सुखावहा । शीतकाले भवत्युष्णा ग्रीष्मकाले च शीतला ॥१८॥ फुल्लाब्जाक्षी शशिमुखी पीनस्तब्धोन्नतस्तनी । प्रशस्तजघना चारु- चरणा गजगामिनी ॥ ९९ ॥ सुस्मिता मधुरालापा सुस्वरा प्रियदर्शना । हावभावविलासादि-चतुरा स्वर्वधूपमा ॥ ५०० ॥ इति स्त्रीरत्नं । चतुर्दशैवं रत्नानि चक्रिणां प्राज्यपुण्यतः । स्युः सहस्रेण यक्षाणां सेवितानि पृथक् पृथक् ॥ ५०१ ॥ द्वौ सहस्रौ च यक्षाणां चक्रभृद्देह- रक्षकौ । चतुर्दश च रलानां सहस्राः पोडशेत्यमी ॥ २ ॥ वे बेनी संख्यावाळा होय छे, छता जातिनी अपेक्षाए चार स्थानो जाणवा. स्थानमेदना अनुसारे अहीं स्थानना भेदो पण पार ज समजवा. तेमा प्रश्चना कंठ उपर रहेलो देवमणि नामनो महालक्षणवाळो आवर्त कोइ पुण्यशाळी अश्वने ज होय छे. (९५) इति अश्वरत्नं. ७ स्त्रीरत्न-सर्व नारीवर्गमा शिरोमणि होय छे. रूपलक्षण संयुक्त अने मानोन्मान प्रमाणयुक्त होय छे. (९६ ) रोम ने नख न वधे तेवी, सदा अवस्थित यौवनवाळी, स्पर्शना महिमाथी शीघ्रपणे सर्व रोगनी शांति करनारी होय छे. (९७) मोक्ताना चळनी वृद्धि करनार, सर्व ऋतुमा सुख आफ्नार, शीतकाळे उष्ण अने उष्णकाळे शीत स्पर्शवाळी होय छे. (९८) प्रफुल्ल कमळ जेवा नेत्रवाळी, चन्द्र समान मुखवाळी, पान- स्तब्ध ने उन्नत स्तनवाळी, प्रशस्त जघनवाळी, सुंदर चरणवाळी अने हाथी जेवी गतिवाळी होय छे. (९९) सुंदर स्मित करनारी, मधुर पोलनारी, सुंदर स्वरवाळी, प्रियदर्शनवाली, हावमावविलासादिमा चतुर अने देवांगनानी उपमाने योग्य होय छे. (५००) इति स्त्रीरत्नं. मा प्रमाणे चौद रत्नो चक्रीने पूर्व पुण्यना योगथी प्राप्त थाय थे. वे दरेक रत्न हजार हजार यघोक्डे सेवित होय छे. (५०१) चे हजार यक्षो चक्रवर्तीना पोवाना देहना रक्षक होय छे. ते भने १४ रत्नना १४००० मळी कुल १६००० यो चक्रीना सेवक होय छे. (२) (३९२) श्रीकाललोकप्रकाश। अथैवं सार्वभौमानां भवंति निधयो नव । नैसर्पः १ पांडुकश्चैव २ पिंगलः ३ सर्वरत्नकः ४ ॥३॥ महापद्मश्च ५ कालश्च ६ महाकाल ७ स्तथापरः । तथा माणवकः ८ शंखः ९ शाश्वता अक्षया श्रमी ॥४॥ पुस्तकानीह नित्यानि संति दिव्यानि तेपु च । आख्यातास्त्य- खिला विश्व-स्थितिरेकमिदं मतं ॥ ५॥ मतांतरे तु तस्कल्प-पुस्तक- प्रतिपादिताः । साक्षात्प्रादुर्भवत्यर्था-स्तेषु तेषु निधिविह ॥ ६ ॥ पाकरग्रामनगर-पत्तनानां निवेशनं । मडवानां द्रोणमुख-स्कंधावारा- वेश्मनां ॥७॥ स्थापनाविधयः सर्वे वास्तुशास्त्रेऽधुनापि ये । दृश्यंते तत्पु- स्तकानि संति नैसर्पके निधौ ॥ ८॥ तत्र वृत्यावृतो ग्रामो लोहायुद्भव श्राकरः । नगरं राजधानी स्या-द्रत्नयोनिश्च पत्तनं ॥९॥ जलस्थल- पथोपेत-मिह द्रोणमुखं भवेत् । अर्द्धतृतीयकोशांत-मिशून्यं मडं- बकं ॥ १०॥ इति प्रथमो निधिः॥ दीनारनालिकेरादेः संख्येयस्य धनस्य यः । पारिच्छेद्यस्य मुक्तादेः प्रकारश्च समुद्भवे ॥ ११॥ प्रस्थादिमेयं यद्धान्यं तोल्यं यच्च गुडादिक। तदुपरांत चक्रवर्तीने नव निधिो होय छे. तेनां नाम-१ नैसर्प, २ पांडुक, ३ पिंगळ, ४ सर्वरत्नक, ५ महापद्म, ६ काळ, ७ महाकाळ, ८ माणवक ने ९ शंख. आ निधियो शाश्वत ने अक्षय होय छे. (३-४) ते निधियामां शाश्वत ने दिव्य पुस्तको होय छे. तेमा अखिल विश्वनी स्थिति लखेली होय छे एवो एक ( कोइनो) मत छे. (५) मतांतरे तो ते कम्पपुस्तकमा प्रतिपादित एचा पदार्थो ते ते निषिमाधी साक्षात् प्रगट थाप छे. (६) मा खाण, ग्राम, नगर ने पत्ननोना निवेशन, मंडवको, द्रोण मुखो, स्कंधावार (छापणी), हाट भने घरोनी स्थापनानो बधो विषय तथा हाल जे वास्तुशास्त्रमा देखाय छे ते संबंधी पुस्तको नैसर्प नामना पहेला निधिमां होय छे. (७-४) तेमां वाडथी श्रावृत ते गाम कहेवाय, लोहादि धातु जेमाथी नीकळे ते भाकर (साण ) कहे- पाय, नगर ते राजधानी कहेवाय अने रत्नयोनि ते पचन कहेवाय. (९) जळ ने बने प्रकारना मार्गवाळा ते द्रोणमुख अने अढी गाउ फरतुं कोइ गाम न होय ते मडंपक समजवो. (१०) इति प्रथमो निधिः धन, सोनया ने नाळियेर के ने गणाय, मुक्ता विगेरेना प्रकार के उभरती बसते पारिछेध, धान्य केले प्रस्थादिवडे मपाय, गोळ विगैरे जे बोलाय ते सर्वतुं प्रमाण वेवा स्थळ सर्ग ३१ मो। (३९३.) तयोः सर्व प्रमाणं च मानोन्मानं च तादृशं ॥ १२॥ शाल्यादिधान्यवी- जानां वापार्हाणामनेकधा । उत्पत्तिपद्धतिः सर्वा दर्शिता पांडुके निधौ ॥ १३ ॥ इति द्वितीयः । विधा प्राभरणानां या नानास्त्रीपुरुषोचिताः। तुरंगाणां गजानां च ख्याताः पिंगलके निधौ ॥ १४ ॥ इति तृतीयः ॥ चक्रिणां यानि रत्नानि चक्रादीनि चतुर्दश । व्यावर्णिता तदुत्पत्तिः सर्वरत्ने महानिधौ ॥ १५॥ स्फातिमंति भवत्येत-निधानस्य प्रभा. वतः । चतुर्दशापि रत्नानी-त्येवमाहुश्च केचन ॥ १६ ॥ इति चतुर्थः ॥ उत्पत्तिः सर्ववस्त्राणां रंगाद्यारचनापि च । ख्याता निधौ महापद्मे विधिश्च क्षालनादिकः ॥ १७॥ इति पंचमः ॥ कालज्ञानं निधौ काले ज्योतिःशास्त्रानुवंधि यत् । तथा वंशास्त्रयो येऽर्ह-चक्रभृत्सीरिशाहिणां ॥ १८ ॥ तेषु वंशेषु यद्भूतं वर्तमानं च भावि यत् । शुभाशुभं तद्वि- ज्ञेयं सर्वमस्मान्महानिधेः ॥ १९ ॥ कर्मणां कृषिवाणिज्या-दीनां शिल्प- शतस्य च ॥ निरूपिता स्थितिःसर्वा-प्यस्मिन्नेव महानिधौ ॥ २०॥ प्रकारचें मानोन्मान भने वाववालायक शाल्यादि अनेक प्रकारना धान्यपीजनी अनेक प्रकारे उत्पचिनी पद्धति वे बधुं बीजा पांडुक निधिमा वतावेलुं छे (११-१३) इति द्वितीय: ॥ स्त्री-पुरुषोने उचित तेम ज अश्वने भने गजने उचित अनेक प्रकारना श्रामरणो संबंधी विधिो श्रीजा पिंगलक निधिमा वतावेल छे. (१४) इति तृतीयः॥ चक्रीना चक्र विगेरे जे चौद रत्नो तेनी उत्पत्ति सर्वरत्न नामना चोथा निधिमा चतावेली छे. (१५) ए निधानना प्रमावथी चौद. रत्नो घणा कातिवाळा थाय ले, एम. केटलाक कहे छे. (१६) इति चतुर्थः ॥ सर्व प्रकारना वस्रोनी उत्पत्ति, तेमने रंगवा विगे- रेनी रचना तेमज घोवा विगेरेनो विधि पाँचमा महापद्म निधानमा बतावेलो छे.(१७) इति पंचमः ।। काळ नामना छठा निधिमा काळज्ञान के जे ज्योति शास्त्रानुबंधी छे ते होय छे, तथा मारिहंत, चक्री, वासुदेव ने वलदेवना वंशो, ते वंशमा भूत, वर्तमान भने भविष्यका- ळने लगतुं जे शुभाशुम होय तेनुं जाणपणुं आ महानिधिमाधी थाय छे. (१८-१९) कृषि वाणिज्यादि कर्म भने सो शिल्प ते सर्वनी स्थिति ( हकीकत ) या काळनिधिमा यता. वेली 2. (२०) इति षष्ठः ॥ भनेक प्रकारनी लोहनी, रुपानी, सोनानी, चंद्रकांत " (३९४) श्रीकाललोकप्रकाश इति षष्ठः ॥ नानाविधस्य लोहस्य स्वर्णस्य रजतस्य च। मणीनों चंद्रकां- तार्क-कांतादीनां महात्विषां ॥ २१॥ मुक्तानां स्फटिकानां च' प्रवा- लानां य आकराः। तेषामुत्पत्तिराख्याता महाकाले महानिधौ ॥ २२ ॥ इति सप्तमः ॥ खड्गकुंतादिशस्त्राणां नानावरणवर्मणां । उत्पत्तियुद्धनी- तिश्च सत्यूहरचनादिका ॥ २३ ॥ सामदानादिका दंड-नीतयो विवि- धाश्च याः। हाकाराद्याश्च ताः सर्वाः प्रोक्ता माणवके निधौ ॥ २४ ॥ ताः स्युर्हाकार १ माकार २ -धिकाराः ३ परिभाषणं ४ । मंडले बंधनं ५ कारा-क्षेपणं ६ चांगखंडनं ७॥ २५॥ परिभाषणमाक्षेपा-मा गा इत्यादि शंसनं । संरोध इंगित क्षेत्रे मंडले बंध उच्यते ।। २६ ।। तथोक्तं स्थानांगे-'सत्तविहा दंडनीई पाहता, तं० हक्कारे १ मक्कारे २ धिक्कारे ३ परिभासे ४ मंडलिबंधे ५ चारते ६ छविच्छेदे ७॥ इत्यष्टमः ॥ सर्वो- ऽपि नाट्यकरण-प्रकारो नाटकस्य च । अभिनेयप्रबंधस्य प्रकारा येड- प्यनेकशः ॥ २७ ।। चतुर्विधस्य काव्यस्य तूर्योगाणां च भूयसां । नाना- विधानामुत्पत्तिः ख्याता शंखे महानिधौ ॥ २८ ॥ काव्यचातुर्विध्यं चैवं सूर्यकांतादि महातेजवाळा मणिनी, मोतीनी, स्फटिकनी अने प्रवाळादिकनी जे खाणो तेनी उत्पत्ति महाकाळ नामना सातमा निधिमा बतावेली छे. (२१-२२) इति सप्तमः ।। खड्ग अने मालादि शस्त्रोनी अने नानाप्रकारना पख्तरोनी उत्पत्ति, युद्धनीति भने उत्तम व्यूहरचना विगेरे तेम ज साम, दामादि विविध दंडनीति तथा हाकारादि सर्व नीतियो माणवक नामना पाठमा नीधिमा बतावेल के. (२३-२४) ते नीतिमो या प्रमाणे-१ हाकार, २ माकार, ३ धिक्कार, ४ परिभाषण, ५ मंडळमा बंधन, ६ काराक्षे. पण ने ७ भंगखंडन. (२५) भामा परिमापण ते श्राक्षेपवडे 'न जा' इत्यादि कहे ते. अने इंगितक्षेत्रमा जे संरोध ते मंडळे बंध समजवो. (२६) ते विपे स्थानांगपत्रमा का के के- 'सात प्रकारनी दंडनीति कही छे. ते या प्रकारे-हकार १,मकार २, धिकार ३, परिमासा ४, मंडलिबंध ५, चारक्षेपण ६ने छविछेद ७.' इति अष्टमः ॥ सर्वे नाट्य परवाना प्रकारनी, अभि- नय प्रबंधवाळा नाटकना अनेक प्रकारोनी, चार प्रकारना काव्यनी ने अनेक प्रकारना वाजिनानी चिघि एम नानाप्रकारनी उत्पत्ति शंख नामनानवमा महानिधिमां पतावेली छे. (२७-२८) काव्यर्नु त्रण प्रकारे चातुर्विध्य भा प्रमाणे-धर्म, अर्थ, काम ने मोघ ए सर्ग ११ मो । (३९५) धा-धर्मार्थकाममोक्षाख्यं पुरुषार्थचतुष्टयं । काव्यं तत्प्रतिवद्धत्वा- दुधैरुक्तं चतुर्विधं ॥ २९ ॥ संस्कृतं प्राकृतं चाप-भ्रंशं संकीर्णकेति च । भाषाश्चतस्त्रस्तद्वद्धं भवेत्काव्यं चतुर्विधं ॥ ३०॥ तत्र संस्कृतप्राकृते प्रतीते. अपभ्रंशो भवेत्तत्त-देशेषु शुद्धभापितं । संकीर्णा सौरसेन्यादि- र्भापा प्रोक्ता विचक्षणैः ॥ ३१ ॥ गद्यं पद्यं च गेयं च चौणं चेत्यथवा भिदः । तत्र स्याद्गद्यमच्छंदो-बद्धं वद्धं च तैः परं ॥ ३२ ॥ गांधर्वरीत्या यद्दद्धं गेयं गानोचितं हि तत् । चौर्ण भूरि वाहुलक-गमाव्ययनिपात- युक् ॥ ३३ ॥ इति नवमः ॥ नवयोजनविस्तीर्णा द्वादशयोजनायताः। उच्छ्रिता योजनान्यष्टा- वष्टचक्रप्रतिष्ठिताः ॥ ३४ ॥ सौवर्णा विविधै रत्नैः पूर्णा वैडूर्यरत्नजैः । कपाटेश्चारुरचना-रमणीयैरलंकृताः॥ ३५॥ निधिनामसमाख्यानां पल्याः युष्कसुधाभुजां । श्रावासास्ते महर्डीनां सदा स्युर्जाह्नवीमुखे ॥ ३६ ॥ चक्रवर्तिनि चोत्पन्ने तद्भाग्येन वशीकृताः। वर्ष जित्वा वलमानं गृहान् प्रत्यनुयांति तं ॥ ३७ ॥ तथोक्तमृषभचरिते-इत्यूचुस्ते वयं गंगा-मुख- - चार पुरुषार्थसंबंधी जे काव्य ते तत्प्रतिबद्ध होवाथी पंडितोए चार प्रकारचें कडं थे. (२९) संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश ने संकीर्णक-ए प्रमाणे जे चार भाषा उत्पतिबद्ध काव्य ते पण चतुर्विध कहुं छे. (३०) तेमा संस्कृत अने प्राकृत भाषा को प्रसिद्ध छे. ते ते देशमा शुद्ध भाषा तरीके गणाय ते अपभ्रंश अने शौरसेनादि जे भाषा ते संकीर्ण विच. क्षणोए कहेल थे. (३१ ) वळी कान्पना गद्य, पद्य, गेय ने चौर्ण एम चार प्रकार पण वह्या छे. तेमां गद्य ते मछंदोबद्ध भने पद्य ते छंदोबद्ध. (३२) गांधर्व रीतिए जे बद्ध होय ते गानोचित गेय अने घणा बाहुलक, गम, अव्यय ने निपातवालं ते चौर्ण. इति नवमः ।। ए निधानो नव योजन विस्तीर्ण, चार योजन आयत ( लांबा ), भाठ योजन उंचा अने पाठ चक्र (पैडा ) उपर रहेल होय छे. (३४) वळी ते सुवर्णना होय छे, विविध रत्नोए पूर्ण होय छ, बैडूर्यरत्नना यनावला कपाटो( पारणाओ )वडे चारु रचनानी रमणिकताथी अलंकृत होय छे. (३५) ते निधिना नाम समान नाम- चाळा, पल्योपमना आयुष्यवाळा भने महर्दिक एवा ते निधिना अधिष्ठाता देवोना मावासो गंगा नदीना मुस पासे होय छे. (३६) ज्यारे चक्री उत्पन्न थाय त्यारे वेना भाग्यवडे वशीकृत थयेला एवा ते निधि ते क्षेत्र जीतीने पाला वळता एवा चक्रोनी पाछळ चाले छे. (३७) श्री ऋपमचरित्रमा कडुं छे के ते निधियो चक्रीने कहे के के-'हे महामाग्यपान .

(३९६) श्रीकाललोकप्रकाश. मागधवासिनः । अागतास्त्वां महाभाग त्वद्भाग्येन वशीकृताः॥३८॥ पातालमार्गेणायांति तिष्ठति च पुरावहिः । तेषां नगरतुल्यानां पुर्या- मनवकाशतः ॥ ३९ ॥ एवं सेनाश्चतस्रोऽपि पत्त्यश्वेभरथामिकाः। पुर्या न प्रविशत्यंत-रवकाशविवर्जिताः ॥ ४० ॥ तथोक्तं जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे- 'णवरि णव महाणिहीयो चत्तारिसेणामो ण पविसंतीत्यादि' लोके तु- महापद्मश्च १ पद्मश्च २ शंखो ३ मकर ४ कच्छपौ ५। मुकुंद ६ कुंदो ७ नीलश्च ८चर्चश्च ९ निधयो नव ॥१॥ चतुर्दश सहस्राणि यक्षा रत्नाधिदेवताः। द्वे सहस्रे चांगरक्षाः सहस्राः पोडशेति ते ॥४१॥ एकातपत्रं पटूखंड-राज्यं नगरनीवृतां । मौलि- भृद्भूपतीनां च स्युर्द्वात्रिंशत्सहस्रकाः ॥ ४२ ॥ गजानां च रथानां च निःस्वानाना च वाजिनां । स्युःप्रत्येकेन चतुर-शीतिः शतसहस्रकाः ॥ ४३ ॥ ऋतुकल्याणिकानां स्युः पुरंध्रीणां सहस्रकाः । द्वात्रिंशतश्च सुस्पर्शाः सर्व षु सुखावहाः ॥ ४४ ॥ देशाधिपानां कन्या या उदूढा- अमे गंगाना मुख पास रहेनारा छीए भने तमारा भाग्यथी वश थयेला भमे तमारी पासे भाग्या छीए. (३८) तेभो पाताळ मार्ग चक्रवर्तीनी पाछल चाले छ भने नगरनी वहार रहे छे, केमके राजधानीना प्रमाण जेटला विस्तारवाळा ते एकेक निधान होवाथी तेनो नगरमा निवास शी रीते थइ शके ? (३९) ते जरी चक्रवर्तीनी सेना गज, प्रश्व, रथ भने पदातिरूप चार प्रकारनी के ते पण तेने रहेवा जेटलो नगरमा अवकाश न होवाथी नगरीमा प्रवेश करती ज नथी. (४०) जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिस्त्रमा कह्यु छ के-'एटलं विशेष के नवनिधि ने चार प्रकारनी सेना नगरमा प्रवेश करती नथी. ' लोकिकर्मा "१ महापद्म, २ पद्म, ३ शंख, ४ मकर, ५ कच्छप, ६ मुकुंद, ७ कुंद, ८ नील भने चर्च-ए नामना नव निधि कशा छे. चौद हजार चौद रत्नोना अधिष्ठायक यचो आने पे हजार चक्रीना अंगरक्षक यो एम कुल १६ हजार यक्षो होय छे.' (४१) एकातपत्रवालंछ खंडनुं राज्य होय छे. नगरीयो, देशो ने मुकुटधारी राजाभो प्रत्येक ३२००० होय छे. (४२) हाथी, घोडा, रथ अने याजियो-प्रत्येक ८४ लास ८४ लाख होय छे. (४३) ऋतुकन्याणी एवी पुरंध्रीमो ३२००० सारा स्पर्शवाळी मने सर्व ऋतुमा सुख मापनारी होय छे. (४४) १-५०१ मो श्लोक आ ज भाषषाळो 2. २ ऋतु एटले पटकाव नियमित मावतो होवाथी कल्याणकारफ.

मर्ग २१ मो। (३९७) श्चक्रवर्तिना । तासामपि सहस्राणि द्वात्रिंशत्स्वर्वधूश्रियां ॥ ४५ ॥ पुरं- ध्रीणां भवत्येवं चतुप्पष्टिः सहस्रकाः। भवंति द्विगुणास्ताभ्यः सुरूपा वारयोपितः॥४६॥ एकं लक्ष द्विनवति-सहस्राभ्यधिकं ततः। अंतः पुरीणां निर्दिष्ट भोगार्थ चक्रवर्तिनः ॥ ४७ ॥ द्वात्रिंशत्पात्रबद्धानां नाटकानां सहस्त्रकाः। द्वात्रिंशद् ढौकितानां स्त्र-कन्योताहेऽखिलैर्नृपः ॥४८॥ ग्रामाणां च पदातीनां कोट्यः षण्णवतिः स्मृताः । रत्लस्वर्णा- द्याकराणां विंशतिः स्युः सहस्रकाः ॥४९॥ स्तोत्रे तु षोडश सहस्रा रत्ना- कराणामुक्ताःसंतीति. द्वासप्ततिः पुरवर-सहस्राणि भवंत्यथ । सहस्रा नव- नवतिः श्रुता द्रोणमुखा अपि ॥ ५० ॥ अष्टचत्वारिंशदेवं पचनानां सह- स्त्रकाः । कर्वटानां मडवानां सहस्रा जिनसंमिताः ॥ ५१ ॥ द्वीपांतराणां खेटानां स्युः षोडश सहस्रकाः । भवंति कोटयस्तिस्रो हलानामथ गंत्रिणां ॥ ५२ ॥ संवाहानां सहस्राणि चतुर्दश भवत्यथ । वेलाकुलसह- स्राश्च-पट्पंचाशत्प्रकीर्तिताः ॥ ५३ ।। कोटयोऽष्टादशाम्दानां महतां परिकीर्तिताः। अभ्रंलिहानेकवर्ण-वजानां दश कोटयः॥ ५४ ॥ महा.- देशाधिपानी जे कन्या चक्रवर्ती परणे छे. वेनी संख्या पण ३२००० नी होय छे. ते देवांगनाओने पण जीवे एवी रूपवंत होय छे. (४५) ए रीते एकंदर ६४०००वीमो होय छे भने ते करता यमणी १२८००० रूपवंत एवी वारांगनामो होय छे. (४६) ए प्रमाणे १९२००० अंत:पुरीमो चक्रवर्तीने मोगने माटे कहेली छे. (४७) पत्रीशरद एया नाटको ३२०.० होय छे, ते दरेक राजामोए पोसपोतानी कन्पामोना विवाह पखते पनीने अर्पण करेला होय छे.(४८)पदाति ९६ क्रोड होय थे, ९६ कोड ग्राम होप के भने वीश हजार रत्न भने स्वर्णादिकनी खाणो होय छे. (१९) (एक स्तोत्रमा सोळ हजार रत्नोनी खाणो कहेली ) घोवेर हजार मोटा नगरो होय छे, नवाणु हजार द्रोण- मुसो होय थे, (५०) भडताळीश हजार पचन होय छे, चोवीरा हजार कर्बटो ने मडरो होय छ. (५१) पीजा द्वीपो ने खेसामो सोळ-सोळ हजार होय थे, प्रण कोड हळ भने गाड होप थे. (५२) संवाह चौद हजार होप थे, भने वेळाकुळ धपन हबार होय थे. (५३) मदार क्रोह मोटा मयो होप छ भने भाकाश मुधी पहोंचे एवा अनेक वर्ष पाळी दश फोर पसाभो होय छे. (५४) महादी एपा पंदीमो ६४ हजार दोप के.

(३९०) श्रीकाललोकप्रकाश । बंदिवंदिनां च चतुःषष्टिः सहस्रकाः। तथा गोकुलकोट्येका भोज्यं कल्या- णनामकं ॥ ५५ ॥ अंगमईकसंवाहि-सूदभूपणधारिणां । पट्त्रिंशत्को- टयस्तिस्रो लक्षा भोजनवेश्मनां ॥ ५६ ॥ प्रातोयधारिणां तिस्रो लक्षा दीपकधारिणां । पंचलचीत्यादि नाना संपत्स्याच्चक्रवर्तिनां ॥५७॥ इयं च चक्रवर्त्तिनां समृद्धिः कियती श्रीजंबूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रानुसारेण, शेषा च चक्रिसमृद्धिगर्भितश्रीशांतिनाथस्तोत्रानुसारेणेति ज्ञेयं. हारो मुक्तामणि- मयः स्याच्चतुःषष्टियष्टिकः।महा?ऽत्यंतरुचिरः सर्वेषामपि चक्रिणां ॥५८॥ यथागममिति प्रोक्तं स्वरूपं चक्रवर्तिनां । अथ तद्वासुदेवानां प्रो- च्यते सीरिणामपि॥ ५९॥ एतेऽपि प्राग्भवाचीर्ण-तपासंयमसंवरैः। अर्जि- तोत्तमकर्माण उत्पद्यते सुधाशिपु ॥६०॥ तेभ्यश्च्युत्वोच्चगोत्रेषु महर्द्धिक- महीभृतां । कुलेषु ते प्रजायते न तु नीचाल्पसंपदा ॥ ६१ ॥ वैमानिके- भ्य एवात्र वासुदेवा भवंति ते । अवश्यं तत्पदप्राप्त्यै प्राक्कल्पितनिदा- नकाः ॥ ६२ ॥ अत एवातिगान भुत्वा भोगाननुत्तरान् । प्रयांति एक क्रोड गोकुळ होय छ भने कन्याण नामर्नु भोजन होय छे. (५५) अंगमर्दक, संवाहक, रसोइमा अने भाभूषण जाळवनारा छत्रीश क्रोड होय छे.त्रण लाख भोजनशाळा होय छे. (५६) त्रण लाख वाजिनधारी अने पांच लाख दीवीना धरनारा होय छे. इत्यादि अनेक प्रकारनी संपचि चक्रवर्तीने होय छे. (५७) आ चक्रवर्तीनी ऋद्धि श्रमे केटलीफ जंबूदीपप्रज्ञप्तिने अनुमारे अने पाकीनी चक्रीममृद्धिगर्भित श्रीशांतिनाथना स्तोत्रने अनुसारे कही छे. सर्व चक्रवर्तीने चोसठ सरनो मुक्तामणिमय हार होय छे. ते हार मोटी कीमतवाळो भने अत्यंत मनोहर होय छे. (५८) एम अर्थथी चोथा अंगमा कमु छ. श्रा प्रमाणे यथागर्म चक्रवर्तीनु स्वरूप कपु. हवे वासुदेव ने बळदेवनु स्वरूप कहीए छीए. (५९) ए वासुदेव ने पळदेव पण पूर्वभवे आचरेला तप, संयम अने संवरवडे उत्तम कर्मने उपार्जन करीने देवलोकर्मा उत्पन थयेला होय छे. (६. ) त्यांथी व्यवीने उच्चगोत्रमा भने महर्दिक एवा राजाना कुळमां उत्पन्न थाय छे; पण नीचकुळमां के अल्प संपदावा- ळाने त्या उपजता नथी. (६१) वासुदेवो वैमानिकमाथी भावीने ज उपजे छ भने तेश्रो ते पदनी प्राप्तिने माटे पूर्वभवमा अवश्य नियाj करेला ज होय ॐ (६२) तेथी मति १ भागममा का प्रमाणे.

.. सर्ग ३१ मो। (३९९) नरकेप्वेव ते व्रताऽप्रभविष्णवः ॥ १३ ॥ वलदेवास्तु देवेभ्यः सर्वेभ्योऽपि भवंति ते । प्राग्भवे निर्निदानत्वा-दंते स्वीकृत्य संयमें ॥ ६४॥ स्वर्ग यांत्यथवा मुक्ति-मेषां वैराग्यवासना । खिन्नानां जायते विष्णौ विपन्ने प्रेष्ठवांधवे ॥६५॥ यत्तु श्रीमहानिशीथे पंचमाध्ययने कुवलयाचार्य- प्रबंधे कुवलयप्रभाचार्यो मृत्वा व्यंतरो बभूव १, ततः सूनाधिपो २, मृत्वा सप्तमपृथिव्यां ३, ततो मृगजातिः ४, ततो महिष ५, स्ततो मनुष्य ६, स्ततो वासुदेव इति मनुष्यभवादनंतरमागतस्य वासुदेवत्वमुक्तं तन्मतांतरमिति ज्ञेयं एतौ च द्वौ विमात्रेयौ भवतो भ्रातरौ मिथः । जगत्यनुत्तरस्नेही हली ज्येष्ठो हरिलघुः ॥ ६६ ॥ एते जितत्रिखंडाः स्यु-श्चक्रितोऽर्द्धसमृ- द्धयः । महीभृतां सहस्रैश्च सेव्याः पोडशभिस्सदा ॥६७ ।। त्यक्तनिष्का- रणकोधाः सानुकोशा श्रमत्सराः। प्रकृत्यैव परगुण-ग्राहिणो गतचापलाः गृद्धतायडे अनुत्तर एवा भोगने भोगवीने नरकमा ज जाय छे. व्रत लेवाने समर्थ तेभो थता न नथी. (६३ ) पळदेव चारे प्रकारना देवोमाथी प्रावीने उपजे थे. तेश्रो पूर्वम- वमा नियाj कर्या दिनाना होय छे तेथी ते अंते संयम ग्रहण करीने स्वर्गे अथवा मोते जाय छ। परंतु एमने वैराग्य वासना वहाला बंधुरूप विष्णु (वासुदेव) मरण पाम्या पछी ते कार्यथी खेद पामे छे त्यारे थाय थे. (६४-६५) श्रीमहानिशीथना पांचमा अध्ययनमा कुवलयाचार्यना प्रबंधमा कुवलयाचार्य मरण पामीने ब्यंतर थाय छ, त्यांची च्यवी साइखानाना स्वामी थाय छ, मरीने सातमी नरके जाय छे, त्यांची नीकळी मृग थाय छ, पछी महिए थाय छे, पछी मनुण थाप छ भने पछी वासुदेव थाय के एम फ्धु थे. एटले के मनुष्यमाथी अनंतर वासुदेव थवानुं कडुं छे ते मनावर बाण. ए बने (पळदेव ने वासुदेव ) जुदी जुदी माताना पुत्ररूपे माइनो थाय छे, परंतु सेमनो स्नेह जगतमा भनुचर करो छे. तेमां पळदेव मोटा होय छे ने वासुदेव नाना होय छे. (६६) एमओ प्रण खंडने जीते छ भने चकरी करता अर्ध समृदिवाळा होय थे. वेमो निरंतर सोळ हजार राजामोथी सेवाय थे. (६७) पासुदेय ने पळदेव ने निष्कारण झोप नहीं करनारा, अनुक्रोशवाळा, मत्सरविनाना, स्वमाये न परगुणने ३ दपायुक पित्ताग.

. . (-४००) श्रीकालज्ञोकप्रकाश। ॥६॥ गंभीरमधुरस्वल्पा-लापाः सदुचितस्मिताः। सत्यसंपूर्णवचनाः शरणा- गतवत्सलाः ॥६९॥ लक्षणानां शतेनाष्टा-धिकेनांचितभूघनाः । उत्कृष्ट- सत्वाः संग्राम-शूराः प्राप्तजयाः सदा ॥७० ॥ प्रचंडाज्ञा अनलसाःप्रति- पक्षाऽसहिष्णवः । सितच्छत्रेण सततं चामराभ्यां च शोभिताः॥ ७१ ॥ श्रीवत्सलांछनाः पद्म-नयनाः प्रियदर्शनाः । यशःकीर्तिसुधापूर्ण-त्रैलो- क्या गजगामिनः ॥७२॥ श्यामलद्युतयस्तत्र वासुदेवा महौजसः । पीत- कौशैयवसना नरसिंहाः स्फुरद्रुचः ॥ ७३ ॥ रत्नेन कौस्तुभाख्येन सदा- लंकृतवक्षसः। उदात्तसत्वाः संग्राम-सोत्साहा गरुडध्वजाः ॥७४ ॥ 'तथोक्तं-'जुद्धसूरा वासुदेवा' पांचजन्याभिधः शंखः १ स्याच्चक्रं च सुदर्शनं २ । गदा कौमोदिकी ३ चापं शाई ४ खड्गस्तु नंदकः ५ ॥७५॥ मणिश्च ६ वनमाला ७ च सप्तरत्नी भवेदियं । उत्कृष्टा वासुदेवानां सदा ..देवैरधिष्ठिता ॥७६ ॥ तत्राशक्यो वादयितुं शंखोऽन्येन हरिं विना । श्रुत्वैवास्य ध्वनि हप्तं वैरिसैन्यं पलायते ॥ ७७॥ दंडरत्नवदुत्कृष्ट-प्रभा- ग्रहण करनारा, चपळता विनाना, गंभीर, मधुर अने स्वल्प पालापवाळा, सारं अने उचित स्मित करनारा, सत्यथी संपूर्ण वचनवाळा, शरणागतना वत्सल, एक सो पाठ लक्षणयुक्त शरीरवाळा, उत्कृष्ट सवधाळा, संग्रामशूर, निरंतर जयना मेळवनारा, प्रचंड माज्ञावाळा, आळसविनाना, प्रतिपक्षने सहन नहीं करनारा, श्वेत छन अने चामरोवडे शोभित, श्रीवत्सना लंछनवाळा, कमळसमान नेत्रवाळा, प्रियदर्शनवाळा, यश कीर्तिरूप मुधावडे प्रैलोक्यने पूर्ण करतारा अने हाथी मरखी प्रतिवाळा होय छे. १६८-७२) तेमा वासुदेव श्याम कातिवाळा, मोटा पराक्रमवाळा, पीळा वर्णना कौशेय (रेशमी) चलने धारण करनारा, नरमा सिंहसमान भने स्फुरायमान कांतिवाळा होय छे. (७३)ते निरंतर कौस्तुभ रत्नवडे अलंकृत वक्षास्थळवाळा, उदाज सत्ववाळा, संग्राममा उत्साहवाळा अने गरुडना चिन्हयुक्त ध्वजावाळा होय छे. (७४) 'जुद्धमरा वासुदेवा' एम फयु के. १ पांचजन्य शंख, २ सुदर्शन चक्र, ३ कोमोदिकी गदा, ४ शाई धनुष्य, ५ नंदक खद्ग, ६ कौस्तुभ मणि ने ७ वनमाळा-या सात सदा देवोए श्रधिष्ठित एवा रत्नो उत्कृष्टपणे वासुदेवाने होय छे. (७५-७६) मा शंख छ वे चासुदेव सिवाय पीजा कोइ वगाडी न शके एवो होय छे. वेना शन्दने सांभळता ज दर्पधारी वैरीनुं सैन्य पलापन करी जाय के. (७७) दंडरलनी बेबी उत्कृष्ट प्रभाववाली, बीजाथी न उपाठी शकाय वेची अने - .

सर्ग ३१ मो। (४०१) वाढ्या परेण च । दुर्वहा स्याद्दा दृप्य-द्वैरिदोर्मदखंडिनी ॥७८॥ दुरा- कपं धनुः शाई-मन्येनाद्भुतशक्तिकं । पलायते शत्रुसैन्यं यस्य टंकार- वादपि ।। ७९ ॥ श्रूयते धातकीखंडं गते चरमशाहिणि । द्रौपदीहारिणः सैन्ये पद्मोत्तरमहीपतेः ।। ८० ॥ पांचजन्यस्य शब्दन तृतीयोंशः पला- यितः। शेषो नष्टस्तृतीयोशो धनुष्टंकारवेण च ॥ ८१ ॥ वनमालाभिधा च लक् सदा हृदयवर्तिनी । अम्लाना सततं सर्व- कपुष्पातिसौरभा ॥ ८२ ॥ चक्रादीनां च रत्नानां वर्णनं प्राग् निरूपितं । यथासंभवम- त्रापि योजनीय मनीपिभिः ॥ ८३ ॥ प्रश्नव्याकरणसूत्रे तु वासुदेव- वर्णने शक्तिः शस्त्रं दृश्यते, मणिश्चान न दृश्यते, तथा च तग्रंथः- 'संखचक्कगयसत्तिणंदगधरा इति ' शक्तिश्च त्रिशूलविशेप इति तवृत्ती. भवंति बलदेवास्तु गौरांगा नीलवाससः। योषिकामणीभूत-रू- पास्तालध्वजान्विताः ॥ ८४ ॥ एषां स्युस्त्रीणि रत्नानि सेवितानि सुरैः सदा । धनुः परैरनाकर्ण्य मुशलं च हलं वरं ॥८५॥ त्रीण्यप्यमूनि दर्पधारी रीना मुनामदने संडन करनारी गदा होय छे. (७८) शाई धनुष्य वीजा' चहावी न शके तेथु, अद्भुत शक्तिवालं अने जेना टंकारचमात्रथी पण शत्रुसैन्य पल.. पन करी जाय एघु होय छे. (७९) सामळीए बीए के छेल्ला वासुदेव (कृष्ण) धातकी खंडा गया हता त्या द्रौपदीनु हरण करनारा पोचर राजाना सैन्यनो श्रीजो माग पांचजन्य (शंस)ना शब्दथी भने श्रीजो माग शाई धनुष्यना टंकारवधी युद्ध क्षेत्र- माथी पलायन करी गयो इतो. (८०-८१) वनमाळा नामनी माळा निरंतर वासुदेवना हृदयवी होय छे, ते म्लान यती नयी अने सतत सर्व ऋतु संबंधी पुष्पोनी अत्यंत सुगंधवाली होय छे. (८२) चक्रादि रत्नौनु वर्णन जे पूर्षे वर्णवेलुं 2 ते यथासंभव मही पण पुद्धिमानोए जोडी दे. (८३) श्री प्रश्नव्याकरणस्त्रमा वासुदेवना वर्णनमा शक्ति नामर्नु शस्त्र देसाय छ भने मणि देसातुं नधी. तेनो पाठ मा प्रमाणे- शंख चक्र, गदा, शक्ति ने नंदकने धारण करनारा-' मामा शक्ति एटले त्रिशूळ समजवु एम बेनी प्रतिमा क्युं छे. पलदेव गौर शरीरयाला अनेगील वनवासा, सीमोनी दृष्टिने कार्मणरूप एवा भसत रूपराला, भने तालना चिन्हयुक्त घनायाला होय थे. ८४) एमने प्रय रत्नो देयोपडे सेपित होय छे. पीला रोंची न शके एयु धनुप्प, श्रेष्ठ एवं हळ मने म्बर (८५) (४०२) श्रीकाललोकप्रकाश। द्विषतां पटूनि मदभेदने । दुर्लभानि सुराणाम-प्यमोघानि च सर्वदा ॥८६॥ उक्तानि चैतानि रामचरित्रेऽनंगलवणमदनांकुशसंग्रामे पद्मस्य बलदेवस्य. तथाहि-पद्मनाभोऽप्यभापिष्ट ममापि शिथिलायते । धनुः श्वभ्रे स्थितमिव वज्रावर्तन कार्यकृत् ।। ८७ ॥ अभून्मुशलरत्नं च वैरि- निर्दलनक्षम । कणखंडनमात्राह-मेवैतदपि संप्रति ।। ८८॥ अनंकुशेंकु- शीभूतं यद्दष्टनृपदंतिनां । हलरनं तदप्येत-दभूभृपाटनोचितं ॥ ८९॥ सदा य रक्षितानां विपक्षक्षयकारिणां। तेषामेव ममास्त्राणा-मवस्था त्वियमागता ॥ ९० ॥ इत्यादि. स्युः पोडश सहस्राणि विष्णूनां प्राणवल्लभाः । जगदुत्तरसौभाग्य- शालिन्यः स्वर्वधूसमाः ।। ९१ ॥ तथोक्तं दशमांगे- सोलसदेवीसहस्स वरनयणहिययदइया' इति, अंतकृत्सूत्रस्याप्यादौ कृष्णवर्णने 'रूप्पि- णीपामोरकाणं सोलसण्हं देवीसहस्साणं इति । केचिद्वासुदेवानामर्द्धच- क्रित्वेन द्वात्रिंशत्सहस्राणि प्रेयसीनामहाः. तथोक्तं पष्ठांगे पंचमाध्ययने 'रूपिणीपामोरकाणं बत्तीसाए महिलासाहस्सीणं' इति ज्ञेयं. मात्रणे शत्रुना मदने मेदवामा प्रवीण होय छे. देवोने पण दुर्लभ होय छे अने सदा अमोघ होय छे. (८६) मा हकीकत रामचरित्रमा अनंगलवण ने मदनांकुश सार्थना संग्राममा पन (राम) नामना बळदेवना अधिकारमा कहेल छ के-पमनाभ ( रामचंद्र ) पण लक्ष्मणने कहे के के-मारुं आ पत्रावर्त धनुष्य पण प्रत्यारे शिथिल थाय के अने खाडामा पडेलुं होय तेम कार्य करतुं नथी. (८७) जे भूशळरत्न वैरीगोने दळी नांख- वाने समर्थ हतं ते अत्यारे अनाज खांडवाने योग्य थह गयुं छे. (८८) अन्य राजाओ- रूप हाथीओने अंकुशरूप नहीं छतां पण अंकुशरूप थतुं हळरत्न अत्यारे जमीन खोदवा योग्य थइ गयुं छे. (८९ ) निरंतर यक्षोथी रक्षण कराता अने विपक्षनो क्षय करनारा एवा ते ज मारा शस्त्रोनी आवी अवस्था थइ गइ छे.' इत्यादि. (९०) वासुदेवने १६००० स्त्रीरो होय छे ते जगतमा उत्तम सौभाग्यवडे शोभती भने देवी- गनाओ जेवी होय छे. (९१) दशमा अंगमा कह्यु छ के-' श्रेष्ठ एवी नयनने तेम ज हृदयने वहाली सोळ हजार देवी( राणी )मो होय छे.' श्रीअंतकृतसूत्रमा पण कृष्णना वर्णना कमु छ के--रुक्मिणी प्रमुख सोळ हजार देवीोना' इति तथा केटलाक वासुदेवोने अर्धचक्रीपणाथी ३२००० स्त्रीयो कहे . ते ज प्रमाणे छठा अंगना पांचमा अध्ययनमा पाछे के-'कमिणी विगेरे वत्रीश हजार महिलामोना' इति. . , - मग ३१ भो। सीरिणां तु प्रियासंख्या-नैयत्यं नोपलभ्यते । ज्ञेयो दिग्विजयोऽ- मीषां कथंचिच्चक्रवर्तिवत् ॥ ९२ ॥ पोडशाशेषसैन्यायाः पार्थिवानां सहस्रकाः । श्राकर्पत्यंधुकंठस्थं वद्धं शृंखलया हरिं ॥ ९३ ॥ नौष्ठोपपीडं स्वं स्थाम प्रयुंजाना अपीशते । पदाच्चालयितुं ते तं महीधरमिव द्विपाः ॥ ९४ ॥ स तु तान् शृंखलाप्रांत-विलग्नान् कीटकानिव । तांबूलभक्षण- व्याजा-दाकर्षत्येकहेलया ॥ ९५ ॥ बलमेवंविधं कोटि-शिलोत्क्षेपक्षम भवेत् । विष्णूनां द्विगुणं तेभ्यो बलं स्याच्चक्रवर्तिनां ॥९॥ अगोचरं जग- द्वाचा-मनंतं बलमहतां । प्रकंप्य मेरुं वाल्येऽपि महावीरेण दर्शितं ॥१७॥ घनश्यामस्निग्धवर्णा-धिष्ठिता देवतागणैः । शिला कोटिशिला याम्य-भरताहें भवेदिह ॥९८॥ चंदनैः कुंकुमोपेतै-रचिता कुसुमोत्करैः। सा शिला भाति देवीव भूपणभूषिताभितः ॥ ९९ ॥ सिंधुदेशे दशा- र्णाद्रि-समीपे वा मतांतरे। योजनायामविष्कंभो-च्छ्या सास्ति नि- रत्यया ॥ ६०० ॥ श्राद्यं मतं पद्मचरित्रे, द्वितीयं विचारसप्ततौ, पळदेवनी प्रिया संबंधी चौकस संग्या जणाती नथी. एमनो दिग्विजय कथंचित् चक्रवर्षी प्रमाणे समजी लेवो. ( ९२ ) वासुदेवना वळ उपर दृष्टांत पापे छे-सोळ हजार राजाओ पोताना सर्व सैन्य साथे एक कुवाने सामे कांठे रहेला वासुदेवने सकिळवडे बांधीने होठ भीसीने पोताना पळनो उपयोग करे तो पण जेम हाथी पर्वतने चलावी शके नही तेम एक पगला जेटलुं पण वासुदेवने चलावी शके नहीं, (९३-९४) अने वासुदेव तांबूल खावाने मिपे एक हेलावडे आकर्षण करे तो ते शृंखलाना प्रांत माग साथे वळ- गेला ते सर्वने कीडानी जेम पाही देय. (९५) मा प्रकारचें वासुदेवोर्नु पळ कोटि- शिलाने उपाडवाने समर्थ थाय 2. वासुदेवधी यमणुं पळ चक्रवतीनु होय 2, (९६) अने जगतनी वाणीने अगोचर अनंतपळ अरिहंतनुं होय छे के जे वळ पाळपणामो मेरुने कंपाचीने महावीरे वताव्युं हतं. (९७) मेघना जेवा प्रत्यंत श्याम ने स्निग्धवर्णवाळी, देवताओना समूहयी अधिष्ठित कोटिशिला नामनी शिला दक्षिण भरतार्धमा होय छे. (९८) फेशरयुक्त चंदन भने पुप्पना समूहथी पूजेली ते शिला चार बाजुधी भूपणोवढे भूपित देवीनी जेपी शोभी रहेली होय छे. (९९) मतांतरे ते सिंधु देशमा दशार्ण पर्वतनी समीपे होय थे. एक योजन लंपाइ, पहोलाइ भने उंचाइवाळी ते शिला शाधती होय छे. (६००) पहेलो मत पचरित्रनो छ भने बीजो मत विचारसप्तचिनो थे.

(४०४) श्रीकाललोकप्रकाश । विजित्य भरतस्यार्द्ध-मत्र सर्वेऽपि केशवाः । निजं बलं परीक्षते समुदस्य शिलामिमां ॥ १ ॥ इमा वामभुजस्याग्रे नयत्यादिमकेशवः । द्वैतीयीक्श्च शिरसि कंठपीठे तृतीयकः ॥२॥ वक्षःस्थले तुरीयश्च पंचमो जठरोपरि । षष्ठः कटितटेऽथोरु-प्रदेशे सप्तमो हरिः ॥३॥ श्राजानु चाष्टमोत्यश्च कंथचिज्जानुसंनिधौ । क्रमोऽयमवसर्पिण्या-मुत्स. पिण्यां विपर्ययः॥४॥ गणभृच्छातिनाथस्या-मुष्यां चक्रायुधाभिधः । श्रादौ सिद्धिं गतोऽनेकैः कलितः साधुसिंधुरैः ॥५॥ ततस्तस्यैव गण- भृ-पुंगवस्य क्रमादिह । द्वात्रिंशता युगैः सिद्धाः संख्येया मुनिकोटयः ॥ ६ ॥ ततः श्रीकुंथुनाथस्याष्टाविंशत्या युगैः सह । सिद्धाः शिलायामेत. स्या संख्येया मुनिकोटयः॥७॥ अरस्य चतुर्विशत्या युगैदश कोटयः। श्रीमल्लेयुगविंशत्या मुनीनां कोटयश्च षट् ॥८॥ तिस्रः कोव्यः सुव्रतस्य तीर्थ कोटिनमिप्रभोः।सिद्धा मुनीनामित्येषा नाम्ना सिद्धशिलाप्यहो ॥९॥ स्वरूपं प्रतिविष्णूना-मप्यमं वासुदेववत् । पर्यते त्वायुषोऽमीषां बघा वासुदेवो भरतार्धने जीतीने अहीं पाये छ, भने श्रा शिलाने उपाडीने पोताना पळनी परीक्षा करे छे. (१) तेमा प्रथम वासुदेव पा शिलाने उंचा करेला डावा हाथना अग्रभाग सुधी उंची करे छे, वीजा मस्तक सुधी, श्रीजा कंठ सुधी, चोथा वक्षःस्थळ सुधी, पांचमा जठर सुधी, छहा कटितट सुधी, सातमा उरुप्रदेश सुधी, पाठमा जानु सुधी भने नवमा कांइक जानुथी नीचे सुधी उंची करे छे. श्रवसर्पिणीनो था क्रम समजवो, उत्सर्पि- णीमा तेथी विपर्यय समजवो. (२-४) आ कोटिशिला उपर शांतिनाथ प्रसुना गण- घर चक्रायुध अनेक मुनिमहाराज साथे प्रथम सिद्धिपदने पामेला छे. (५) तेज गणधर- श्रेष्ठधी पत्रीश पाट सुधी संख्याता क्रोडो मुनि श्री सिद्ध थया छे. (६) त्यारपछी कुंथुनाथ प्रमुना मुख्य गणधर अने तेना २८ पाटो सहित संख्याता कोडो मुनि श्रहीं सिद्ध थया छे. (७) अरनाथ प्रभुना मुख्य गणधरना २४ पाट साथै १२ कोड पनि अहीं सिद्ध थया छे. मल्लिनाथ प्रभुना मुख्य गणधरना २० पाट साथे छ कोड मुनि नहीं सिद्ध थया छे. (८) मुनिसुव्रतस्वामीना तीर्थमा त्रण क्रोड ने नमिनाथना तीर्थमा एक कोड मुनि महीं सिद्ध थया के तेथी पा शिलानुं पीजु नाम सिद्धशिला पण छे. (९) प्रतिवासुदेवनुं स्वरूप पण वासुदेव प्रमाणे समजवू. तेमना भायुष्यना छेवटना मागे सर्ग ११ मो। (४०५) विष्णुर्जगति भते ॥ १० ॥ मिथश्चोपस्थिते युद्धे मुक्तं विष्णुजिघां- सया । जायते विष्णुसाच्चक्र लंचयेव वशीकृतं ॥ ११ ॥ तेनैवाथ स्वश- स्त्रेण चक्रेणामोघशक्तिना। प्रयांति नरकं मृत्वा हरिणा छिन्नमस्तकाः ॥ १२ ॥ नवानां वासुदेवानां काले स्युरिदा नव । तेषां मनाप्रिया नाना-देशवा दिशंसिनः ॥ १३ ॥ तथोक्तं रामचरित्रे तत्कालीननार- दस्वरूपं-मरुत्तो रावणं नत्वो-वाच कोऽयं कृपानिधिः । पापादमुष्माद्यो ह्यस्मां-स्त्वया रवामिन्न्यवारयत् ॥ १४ ॥ आचख्यौ रावणोऽप्यासी- न्नाम्ना ब्रह्मरचिर्द्विजः । तापसस्याभवत्तस्य भार्या कूर्मीति गुळभूत् ॥ १५ ॥ तत्रेयुः साधवोऽन्येद्यु-स्तेष्वेकः साधुरब्रवीत् । भवभीत्या गृह- वास-रत्यक्तो यत्साधु साधु तत् ॥ १६ ॥ भूयः सदारसंगस्य विषयै - ब्धचेतसः । गृहवासाद्वनवासः कथं नाम विशिष्यते ? ॥ १७ ॥ श्रुत्वा ब्रह्मरुचिस्तत्तु प्रपन्नजिनशासनः । तदेव प्रावजत्सा च कूर्म्यभूच्छाविका परा ॥ १८ ॥ मिथ्यात्ववर्जिता तत्र सा वसंत्याश्रमे सुतं । सुपुचे नारद चासुदेव देने जीते छ भने राज्य मेळवे छे. (१०) ते चनेना परस्परना युद्धमा विष्णुने मारवा प्रतिविष्णु चक्र मूके थे. एटले ते चक्र लांची वश करेला अधिकारीनी जेम वासुदेवर्नु थह जाय छे. (११) तेज प्रतिवासुदेवना शस्त्ररूप अमोघ शक्तिवालं चक्र वासुदेव प्रति- वासुदेवपर मुफे छे ते वेनुं मस्तक कापीनासेचे. एटले ते मरण पामीने नरके जाय छ (१२) नषे वासुदेवना वसतमा नव नारदो थाय छे. तेश्रो वासुदेवोना मनने प्रिय होय छे भने विविध देशनी वार्तादिक तेमने कनारा होय छे. (१३) श्री रामचरित्रमा तेना पसवमा थयेला नारदर्नु स्वरूप शा प्रमाणे कयुं छे-" मरुत्त राजा रावणने नमीने पूछ छ फे-हे स्वामिन् । मा कृपानिधि कोण छे के जेणे तमारी साधे भावीने भा महा- पापपी मने निवार्यों ? ( ४ ) त्यारे रावण कहे छ के-" प्रहरुचि एवा नामनो ब्राह्मण तापस थयेलो हतो तेने कमी नामनी स्त्री हती ते सगर्मा थइ. (१५) त्यां अन्यदा कोई साधु भाव्या. तेमाथी एक साधु पोन्या के-'संसारना भययी जेणे सारी रोते गृहयास तज्यो होय ते साधु पण जो विषयमा लुब्धचिचवालो थाने फर्गने स्वदा. रानो संग करे तो गृहवासथी वनवासमा यार ?' (१७) ते सौमळीने प्रमरुपि प्रतिपोध पाम्या. तेथे जिनशासन स्वीकार्य भने तरत ज ते मुनि पामे दीक्षा लीधी; सपा कूर्मी श्रेष्ठ भाषिका पद. (१८) मिथ्यात्वरहितपणे ते माश्रममा बसता गीए पुत्र . श्रीकाललोकप्रकाश । नाम रोदनादिविवर्जितं ॥ १९॥ गतायाश्चान्यतस्तस्या-स्तं जदुर्जेभि- कामराः। पुत्रशोकादिंदुमाला-यांतिके प्रावजच्च सा ॥ २०॥ तेऽमराः पालयामासुः शास्त्राण्यध्यापर्यश्च तं । आकाशगामिनी विद्यां ददुस्तस्मै क्रमेण च ॥ २१ ॥ अणुव्रतधरः प्राप यौवनं च मनोहरं । स शिखाधा- रणान्नित्यं न गृहस्थो न संयतः ॥ २२ ॥ कलहप्रेक्षणाकांक्षी गीतनृत्य- कुतूहली । सदा कंदर्पकौकुच्य-मौखर्यात्यंतवत्सलः ॥ २३ ॥ वीराणां कामुकानां च संधिविग्रहकारकः । छन्निकाख्यो वृषीपाणि-रारूढः पादुकासु च ॥ २४॥ देवैः स वर्द्धितत्वाच्च देवर्षिः प्रथितो भुवि । प्रायेण ब्रह्मचारी च स्वेच्छाचार्येप नारदः ॥ २५ ॥ इत्येतदनुसारेण परेषामपि भाव्यतां । स्वरूपं नारदर्षीणां यथासंभवमागमात् ॥ २६ ॥ एवं चासौ रामचरित्रायनुसारेण सम्यग्दृष्टिरणुव्रतधारी च प्रतीयते. षष्ठांगे तु तत्कालीनस्य नारदस्य स्वरूपमेवमुक्तमर्थतः-कच्छुल्लो नारदो नाम दर्शनेनातिभद्रकः । विनीतश्चेष्टयुद्धत्वा-दंतःकलुपिताशयः ॥२७॥ प्रसव्यो. तेनुं नाम नारद-जन्म वखते रुदन न करवाना कारणथी प्राप्यु. (१९) कूर्मी काइक आधीपाछी गइ तेथे अवसरे ते वाळकने मुंभक देवो (पूर्वभवना स्नेहथी ) उपाडी गया. पुत्रविरहना शोकधी तेणे इंदुमाळा श्रार्यानी पासे चारित्र लीधुं. (२०) देवो ते चारकने पाळया लाग्या, तेने शास्त्रो मणाच्या अने अनुक्रमे तेने आकाशगामिनी विद्या पापी (२१) ते नारद अणुव्रतधारी थयो. अनुक्रमे मनोहर एबुं यौवन पाम्यो. ते नित्य शिसाने धारण करतो होवाथी गृहस्थ नहीं ने मुनि पण नहीं एवो थयो. (२२) ते नारद वलह जोवानो इच्छक, गीतनृत्यमा कुतूहळी, सदा कंदर्प, कौकुच्य अने मुखरपणा. वाळो तेम ज अत्यंत वत्सलमाववाळो थयो. (२३) वीरोमा अने कामीमोमा संधि ने विग्रह करायनारो, छनिक नामनो, हाथमा दर्मनुं श्रासन धारण करनार श्रने पादुका उपर आरूढ थनारो थयो. ( २४ ) देवोए तेने उछरेलो होवाथी ते देवर्षि तरीके पृथ्वीपर प्रसिद्ध थयेलो छे. नारदो प्रायः ब्रह्मचारी तेमज सेच्छाचारी होय छे." (२५) श्राने अनुसारे वीजा नारदोनुं स्वरूप पण आगमोधी यथासंभव जाण. (२६) मा प्रमाणे रामचरित्रने अनुसारे नारदने समकित दृष्टि अने अणुव्रतधारी समजी शकाय छे. छठा अंगमा तो तत्कालीन नारदमुं स्वरूप प्रा प्रमाणे अर्थथी कयुं 2.- 'कच्हन नामनो नारद जोवामाथीज अतिमद्रक, विनीत, युद्ध (श) इष्ट होचायी भंकर- - सर्ग ३१ मो। (४०७) तित्वाधृतमाध्यस्थ्यः श्रितानां प्रियदर्शनः । सुरूपो वल्कवसनो मुकु. टभ्राजिमस्तकः ।।२८॥ वक्षःक्लुप्तोत्तरासंगः श्यामेन मृगचर्मणा । यज्ञो. पवीतयुक् दंडी कमंडलुं करे दधत् ।। २९ ।। शोभितः कटिसूत्रेण रुद्रा- क्षजपमालया । विज्ञः कच्छपिकापाणि-गीतगांधर्वकौतुकी ॥३०॥ श्राका- शगामी सकल-भूतलाटनलंपटः । विविधानां स विद्यानां निधानं केशवप्रियः ॥३१॥ युद्धप्रियस्तदन्वेपी जनानामसमाधिकृत् । पार्थिवांतः. पुरादाव-प्यनिरुद्धगतिस्सदा ।। ३२ ॥ स चाप्रत्याख्यातपाप-कर्मा विर- तिवंचितः । पेशून्यभीरुभिर्भूपै-मिथ्यागपि पूज्यते ॥ ३३ ॥ तथोक्तं पष्ठांगवृत्तौ-न प्रतिहतानि सागरोपमकोटीकोठ्यंतःप्रवेशनेन सम्यक्त्व. लाभतः, न च प्रत्याख्यातानि सागरोपमकोटीकोट्याः संख्यातसागरो- पमैयूँनताकरणेन सर्वविरतिलाभतः पापकर्माणि ज्ञानावरणीयादीनि येन स तथा. प्रश्नव्याकरणवृत्तावप्युक्तं-नारदमुनिर्गगनादवततार, अभ्युत्थि- तश्च सपरिवारेण पांडुना, द्रोपद्या तु श्रमणोपासिकात्वेन मिथ्याष्टिम- णना कलुपित आशयवाळो, व्रती होवाथी माध्यस्थ्यने धारण करनारो, यामितीने प्रिय छे दर्शन जेनुं एवो, रूपवंत, यन्कलना वस्त्रोवाळो, माथे मुकुट (शिखा ) ने धारण करनारो, काळा मृगचर्मयी जेणे वक्षःस्थळ उपर उत्तरासंग कयुं छे एवो, यन्त्रोपवीत धारण करनारो, दंडी (दंड राएनारो), कमंडल्ल हाथमा सपनारो, कटिश्य भने रुद्राचनी जपमाळावडे शोमती, विश, हाथमा कच्छपिका नामनी वीणाने राखनारो, गीतगांधर्वनो कौतुकी, भामाशगामी, सरळ जगतमा फरपानी चाहनावाटो, विविध प्रकारनी विद्यामोनो निधान, यासुदेवनी प्रीतिवाळो, युद्धप्रिय, युद्धन चळ जोवामा तत्पर, जनोमा असमाधि करनारो, गजाना अंत:पुरोमा परा जेनी गति रोकाती नधी एवो (यगर भटकावे जनारो), पापना त्याग विनानी, विरविरहित भने तनी पिशुनवायी मप पामेला राजामो मिघ्यावी पमा पप ने पूजे है एवो होय छे. ( २७-३३ ) पट्ठा मंगनी प्रतिमा कामु छ के- ( सात फर्मोनी) तामागरोपम कोटाकोटीनी स्थिति पयारडे यनारा सम्यक्त्सना सामधील मिध्यात्वन प्रतिहत करेल नधी एवा, मंत:कोटाकोटी सागरोपमनी स्थिति माधी पप संख्याता सागरोपमनी स्थिति पटाडवाधी पनारा सर्वविरविना लामवढे जेरो भाभोना पपपणाप कर्यानी एको, तेम ज झानापरणांपादि पापकोनो जेरो धयोप. शाम कयों नधी, एको नारद होय थे." प्रश्नध्याकरपनी प्रतिमा पर कलेके-'नारद पनि पाकाशमाथी त्या उतपो. पाद्वराजाए परिवार सरिस सेनुं मम्मुत्यानादि कर्प, परंतु (४०८) श्रीकाललोकप्रकाश । निरयमिति कृत्वा नाभ्युत्थित इति. रुद्रा अपि भवत्येव-मेकादश महो- द्धताः । वशीकृतानेकविद्यो-र्जिताः सम्यक्त्वशालिनः॥ ३४ ॥ जघन्यमध्यमोत्कृष्टा-स्त्रिधा ये पुरुषा भुवि। तेपूत्कृष्टा श्रमी प्रोक्ता. स्त्रिधा धर्मादिभेदतः ॥ ३५ ॥ श्रहंतो धर्मपुरुषा-श्चक्रिणो भोगपूरुषाः । वासुदेवाः पुनः कर्म-पुरुषा इति कीर्तिताः ॥ ३६ ॥ एते यथोक्ताः पुरुषा विदेहेषु निरंतरं । भवंत्यन्येपु दशसु भरतैरावतेषु तु ॥ ३३ ॥ स्युः क्रमादवसर्पिण्या-मुत्सर्पिण्यां तथोत्क्रमात् । श्रायुर्देहादिभिस्तुल्या जगतामुपकारिणः ।। ३८॥ इति गदितया रीत्या विश्वे भवंति हि चक्रिणो, भुजवलजितस्वस्वक्षेत्राः क्षताखिलशत्रवः । हरिहलभृदादीनामप्यूह्यतां दिगियं बुधाः, श्रुतजलनिधेरेषां शेषं विदंतु विशेषतः ॥ ३९ ॥ द्रौपदीए श्रमणोपासिका होवाथी या मिथ्या दृष्टि मुनि छे, एम जाणीने अभ्युत्थानादि न कयु.' इति नारदस्वरूपं. हवे रुद्रोनुं स्वरूप कहे छे.-रुद्रो पण अग्यार थाय छे. ते महाउद्धत होय छे, अनेक विद्याोने वश करेली होवाथी ऊर्जित होय छे अने सम्यक्त्व- शाळी होय छे. (३४) पृथ्वीपर जे जघन्य, मध्यम ने उत्कृष्ट एम ऋण प्रकारका पुरुषो कहा छ, तेमा उत्कट- पुरुषो धर्मादिकना भेदथी त्रण प्रकारे कया छे. (३५) ते आ प्रमाणे-अरिहंतने धर्मपुरुष, चक्रवतीने भोगपुरुष अने वासुदेवने कर्मपुरुष कह्या छे. (३६) ए यथोक्त पुरुषो पांच महाविदेहमा निरंतर होय थे भने भरत-ऐरववरूप दश क्षेत्रमा तो क्रमथी अवसर्पिणीमा भने उत्कमधी उत्सर्पिणीमा आयु देहादिवडे तुल्य भने जगतना उपगारी थाय छे. (३८) मा प्रमाणे उपर कहेली री विश्वमा चक्रवर्तीमो भुजायळथी पोतपोवाना क्षेत्रने जीतनारा अने सर्व शत्रुनो निरास करनारा होय छे. तेमनी तेमज वासुदेव-वळदेवनी हकीकत पण युधजनोए उपर कह्या प्रमाणे जाणवी. वेगनी शेष हकीकत विस्तारथी शास्त्ररूपी समुद्रथकी जाणवी. (३९) स्द्रोने माटे मात्र मा एक ज लोक छे. सेना विप कांद पण विशेष हकीकत जपाय- घामा माथी नथी. क्यारे याय छे ते पण जणाव्युं नथी.

सर्ग ११ मो। (४०९) विश्वाश्चर्यदकीर्तिकीर्तिविजयश्रीवाचकेंद्रांतिप- द्राजश्रीतनयोऽतनिष्ट विनयः श्रीतेजपालात्मजः । काव्यं यत्किल तत्र निश्चितजगत्तत्वप्रदीपे किले- कत्रिंशत्तम एष पूर्तिमभजत्सों निसर्गोज्ज्वलः ॥ ६४०॥ ॥ इति लोकप्रकाशे एकत्रिंशत्तमः सर्गः समाप्तः श्रीरस्तु ।। ग्रं.७१७ १ पूर्वभव. विधने माश्चर्य करे तेवी कीर्ति के जेनी एवा श्री कीर्चिविजयवाचकेंद्रना शिष्य- राजश्री अने तेजपाळना पुत्र विनयवान् विनयविजये जे काव्य रच्युं छे, ते जगतना तन्त्र- रूपप्रदीपने निश्चय करनारा काव्यने विष प्रा स्वभावथी ज उज्वळ एवो एकत्रीशमो सर्ग संपूर्ण थयो. (६४०) ॥ इति श्रीलोकप्रकाशे एकत्रिंशत्तमः सर्गः समाप्तः ॥ ग्रं० ७१७ -का- ३२ मा सर्गमा दरेक तीर्थकरना वर्णनमां आवेली विगतो. १२ जन्म पछी पाछळ चोथो पारो केटलो? १ खंड ने क्षेत्रनुं-विजयतुं नाम. १३ नाम पाडवानुं कारण. २ नगरीनुं नाम. १४ शरीरप्रमाण ३ पोतानुं नाम. १५ आयुप्रमाण. ४ गुरुनुं नाम. १ कौमारावस्थामा २ क्या स्वर्गे गमन ने भायु २ राज्यावस्थामां ३ चारित्रावस्थामा ३ देशर्नु नाम. १६ व्यस्थकाळ. ४ नगरीनें नाम. १७ दीचा वखवनी शिविकार्नु नाम ५ पितातुं नाम- १८ प्रथम पार' या गाममा कोणे ६ मातार्नु नाम. कराव्यु ? ७ प्रसूनुं नाम. १९ ज्ञानवृक्ष. ८ पांच कल्याण कनी तिथि ने नक्षत्र. २० लायन शेर्नु? ९ गर्मस्थिति. २१ मुख्य गणधर. १. प्रमुनी राशि. २२ मुख्य साध्वी. ११ पूर्व प्रसना निर्वाण पछी क्यारे जन्म ? २३ मुख्य श्रावक-यापिका. प्रस्तुत मवमा (४१०) २४ परिवारनी संख्या. १ गणधर. २ साधु श्रीकाललोकप्रकाश। ७ मनःपर्यवज्ञानी. ८ अवधिज्ञानी. ९ चौदपूर्वी १० वैक्रियलन्धिवाळा. ११ वादी. २५ यचर्नु वर्णन. २६ पक्षणीनुं वर्णन. ३ साध्वी. ४ श्रावक. ५ भाविका. ६ केवळज्ञानी. : , महावीरचरित्रअंतर्गत बधा प्रभु माटे आवती विगतोः- १ समकित पाम्यापछीना २४ प्रसुना भवो. २१ केवळज्ञानतप. २ चोवीश प्रभुना वर्ण. २२ केवळज्ञानसमय. ३ आर्यअनार्य देशमा विहार. २३ संघस्थापना क्यारे ? ४ उत्कृष्ट तप कोने चारे केटलो ? २४ तीर्थनुं व्यवच्छिन अवच्छिन्नपगुं. ५ प्रमादकाळ. २५ वीरप्रभुन शासन ऋषमप्रभुना शासन ६ उपसर्गों कोने थया-कोने नहीं ? पछी केटले काळे प्रवयं ने केटलो ७.देवप्यकाळ. काळ प्रवर्तशे? ८ प्रथम दान देनारनी गति. २६ दश प्रछेरा क्या क्या प्रभुनातीर्थमा ? ९ राज्य करीने के राज्य कर्या विना ? २७ सिद्ध थयाना स्थान, १० विवाह करीने के विवाह कर्या विना? २८ सिद्धि बखते आसन. ११ पाछले बीजे भवे राजा के चक्री ? २९ माचकल्याणके तप. १२ दीक्षा दिवसे तप. ३० सिद्धि समये परिवार. १३ दीघा वखते परिवार. ३१ सिद्धिगमननो काळ. १४ दीक्षानगरी. ३२ ११ गणधरोनी घणी हकीकत. १५ दीक्षावन. ३३ परिवारना ११ प्रकारको सरवाळो. १४. दीक्षा वखते केटला सटिलोच ? ३४ अनुत्तरोपपातिक संख्या. १७ दीक्षासमय. ३५ प्रकर्णि ने प्रकीर्णकार पापत. १८ प्रथम पारणुं शेर्नु कयु ? ३६ फेटला पाट सिद्ध १९ पाळकाळ, मध्यकाळ ने व्रतकाळमां शेनो ३७ पूर्वश्रुत ने अपरश्रुतनो काळ. माहार ? ३८ श्रादेश पावत. २० केवळज्ञाननुं स्थान. ३९ मुख्य श्रावक-श्राविकाना नाम पारत.

(४११) मर्ग १२ मो। ॥ अथ द्वात्रिंशत्तमः सर्गः प्रारभ्यते ॥ . अथास्यामवसर्पिण्या क्षेत्रेऽत्रारे तृतीयके । अंतिमस्यैव पल्यस्या-टमे भागे किलोतिमे ॥१॥ सप्ताभूवन कुलकरा श्राद्यो विमलवाहनः । चतु- प्मांश्च यशस्वी चा-भिचंद्रश्च प्रसेनजित् ॥२॥ मरुदेवश्च नाभिश्च क्रमादेषामिमाः प्रियाः। चंद्रयशाश्चंद्रकांता सुरूपा प्रतिरूपिका ॥३॥ चक्षुःकांता च श्रीकांता मरुदेवा स्वभर्तृवत् । एतासामायुरुञ्चत्वा-दिकं तदिह वक्ष्यते ॥ ४ ॥ स्त्रियः सप्तापि चतुष्मान् यशस्वी च प्रसेनजित् । प्रियंगुवर्णा गौरोऽभि-चंद्रोऽन्ये कांचनविषः ॥ ५॥ प्राद्यसंहननाः सर्वे श्राद्यसंस्थानशालिनः । याम्यस्य भरतार्द्धस्य मध्ये खंडेऽभवन्नमी ॥६॥ पल्यस्य दशमो भाग श्रायुराद्यस्य कीर्तितं । ततः पूर्वाण्यसंख्यानि न्यून 'न्यूनान्यनुक्रमात् ।। ७॥ श्रायुर्भवति पंचानां स्यान्नाभेः सप्तमस्य तंत् । संख्येयान्येव पूर्वाणि तत्पत्न्या अपि तादृशं ॥ ८॥ असंख्यपूर्वायुष्कत्वे सर्ग ३२ मो. - - मा अवसर्पिणीमा मा भरवक्षेत्रमा त्रीजा पारामा छन्ला पन्योपमनो बेग्लो पाठमो माग बाकी रह्यो त्यारे सात कुलकरो थया. तेना नाम-१ विमलवाहन, २ चक्षु- मान् , ३ यशस्वी, ४ अभिचंद्र, ५ प्रसेनजित् , ६ मरुदेव ने ७ नाभि. तेमनी प्रियाना नाम अनुक्रमे या प्रमाणे-१ चंद्रयशा, २ चंद्रकांता, ३ सुरूपा, ४ प्रतिरूपा, ५ चक्षुकांता, ६ श्रीकांता ने ७ मरुदेवा. एमनुं श्रायुष्य ने शरीरनी उंचाइ एमना पति प्रमाणे ज हतं ते मही आगळ कहेवाशे. (१-४) साते स्त्रीओ भने चक्षुष्मान् , यशस्वी ने प्रसेनजित् ए प्रण कुलकर प्रियंगु सरखा वर्णवाळा, अमिचंद्र गौर वर्णवाळा ने वीजा त्रण कुलकर (विमळ- वाहन, मरुदेव ने नामि ) कंचन सरखा वर्णवाळा हता. (५) ए सर्वे प्रथम संहननवाळा ने प्रथम संस्थानवाला हता भने तेश्रो दक्षिण भरताना मध्यखंडमां थया हता. (६) पहेला कुलकरनुं प्रायुष्य पन्योपमना दशमा मागर्नु अने त्यारपछीना पांच कुलकरोतुं असंख्याता पूर्वनुं पण अनुक्रमे एक चीजाथी मोर्छौछु भने सातमा भिकुलकरतुं संख्या- खा पूर्वनं जाणवू भने तेनी प्रियानुं पण वेटलुंजायुष्य समजबूं. (७-८) जो सातमा कुल- 3 .. - । (४१२) श्रीकाललोकप्रकाश । त्वस्य पल्याः कथं भवेत् । निवृतिमरुदेवाया निजभर्तृसमायुषः ॥९॥ अयं भाव:-पल्योपमस्य कल्प्यते चत्वारिंशल्लवा यदि । तदा तद- ष्टमोऽशः स्या-द्यावान् पंचलवात्मकः ॥ १० ॥ तावानभूत्कुलकर- कालः सर्वात्मनाऽपि हि । तत्र पल्यस्य दशमो भाग श्राद्यस्य जीवितम् ॥ ११ ॥ पल्यस्य दशमांशेन चत्वारिंशद्विभाजिताः। पूर्वोदिताः स्युश्च- त्वारो भागाः कुलवदायुपि ॥ १२ ॥ श्राद्ये कुलकरे पूर्णा-युषि पल्योप- मस्य तत् । अंशश्वत्वारिंशदेकः शिष्यतेऽस्मिन् परेऽखिलाः ॥ १३ ॥ विदेहे पश्चिमेऽभूतां सुहृदौ वणिजावुभौ । एकोऽभूत्तत्र मायावी "द्वितीयः सरलाशयः ॥१४॥ तयोर्मृत्वाऽथ मायावी क्षेत्रेऽस्मिन् कुंजरोऽ- भवत् । उज्ज्वलो भद्रजातीयो युग्मी कुलकरः परः ॥१५॥ गजोऽसौ प्राग्भवस्नेहाद् दृष्ट्वा तं युग्मिपुंगवं । स्कंधमारोपयामास सुरेंद्र हस्तिमल्ल- वत् ॥ १६ ॥ ततश्चैतस्य विमल-वाहनेत्यभिधाऽभवत् । परेषु युग्मिपु प्राप गौरवं तेन सोऽधिकम् ॥ १७ ॥ करनुं मायुष्य मसंख्याता पूर्वनें होय तो तेना समान आयुवाळा मरुदेवा मोघे केम जाय ? (कारण के उत्कृष्ट कोडपूर्यना आयुवाळा मनुष्यो ज मोचे गाय छे.) (९) आयुष्य संबंधी हकीकतनुं रहस्य मा छे.-पन्योपमना जो ४० भाग कपीए तो तेनो माठमो अंश पांच भागवाळो भावे. वधा कुलकरनो मळीने एटलो काळ छे. (कारण के पम्योपमनो माठमो माग श्रीजा आरानो शेष रहे त्यारे कुलकरोनी उत्पति थाय के एम उपर कछु के.) तेमा पहेला कुलकरचें आयुष्य पन्योपमना दशमा मागर्नु छे. (१०-११) एटले पायोपमना दशमा भागे पूर्वे कहेला चालीशने मांगता चार भाग भावे. तेटलुं भाद्य कुलकरचें आयुष्य पूर्वोक्त पांच मागधी पाद करीए त्यारे वाकी चालीशीभो एक माग रहे, तेमा वाकीना बंधा कुलकरोना भायुष्यनो समावेश गणवो. (१३) पथिम महाविदहमा चे वणिक मित्रो हता. तेमा एक मायावी हतो ने एक सरल आशयपाळो हतो. (१४) माथी मायावी मरण पामीने मा क्षेत्रमा उज्वळ ने मद्र नाविनो हाथी थयो. चीजो सरल हतो ते मरण पामीने युगलिक प्रथम कुलकर विमळ: पाहन थयो. (१५) मा हाथीए ते श्रेष्ठ युगलिकने जोइने पूर्वभवना स्नेहथी सुरेंद्रने नेम ऐरावण हाथी पोतानी उपर पेसाढे तेम संबवडे उपाडीने पोताना स्कंध उपर बेसा- घ्या. (१६) सेथी ए युगलिकनुं नाम विमळवाहन कहेवायुं भने वेषी करीने ते बीजा युगलिकोमा अधिक गौरवने पाम्या. (१७) + सर्ग १२ मो। (४१३) प्रागभूवन् दशविधाः कल्पवृक्षास्ततः पुनः। तेऽवाशिष्यंत विमल- वाहने सति सप्तधा ॥ १८॥ तथोक्तं स्थानांगे सप्तमे स्थाने-विमलवा- हणे णं कुलगरे सत्तविहा रुका उवभोगत्ताए हव्वमागच्छिसु, तं०-मत्तं. गया य १ भिंगा २ चित्तंगा ३ चेव होति चित्तरसा ४ । मणियंगा य अणियणा ६ सत्तमगा कप्परुरका ७ य ॥१॥ 'कप्परुरकत्ति, उक्त- व्यतिरिक्तसामान्यकल्पितफलदायित्वेन कल्पना कल्पस्तत्प्रधाना वृक्षाः कल्पवृचा. कालेन हीयमानेन कल्पद्रुपरिहाणितः । युग्मिनां कलहे लोभा-द- न्योऽन्यं नीतिविप्लवे ॥१९॥ हाकाराख्यां दंडनीति चक्रे विमलवाहनः । कशयेव तुतोदाश्वं तया नीत्यापमार्गगं ॥२०॥ युग्मम् ॥सलज्जास्तेऽपि तेनैव दंडेन द्वीवशंवदाः । कदापि न पुनर्नीति-मतिकामंति भद्रकाः ॥ २१ ॥ द्वयोः कुल कृतोरेपा कालेनास्या व्यतिक्रमे । माकाराख्या वभूवान्या सा तृतीयचतुर्थयोः ॥ २२ ॥ श्राद्या स्वल्पापराधानां द्वितीया प्रचुरागसां । पूर्वे दश प्रकारना कम्पवृक्षो हता ते विमळवाहनना वखतमा सात प्रकारना रया. (१८) ते विष श्रीस्थानांगमनना सातमा स्थानमा कमु छ के-"विमळवाहन कुल- करना वसतमा सात प्रकारना कन्पवृक्षो उपभोगने माटे प्राप्त थया ते था प्रमाणे- १ मचांग, २ भंगांग, ३ चित्रांग, ४ चित्ररसांग, ५ मण्यंग, ६ भनाग, ने ७ कम्पयत. नहीं कन्पश्च शन्दे-प्रथम कहेला छ प्रकारथी अन्य सामान्य कल्पित (वांच्छित ) फळदायीपणाए करीने जे कन्पना उत्प्रधान जे वृष ते कल्पवृक्ष (अर्थात् सामान्य रीते पांच्छित प्रापनार पक्ष ) समजबु. हवे काळना हीयमानपणारडे कल्पचनी पण परिहानि थवाधी लोमने लीधे अन्योन्य नीतिनो नाश करनार कलह उत्पन्न धये सते हाकार नामनी दंडनीति विमळवाहने शरु करी, ते नीतिथी मधने चायुफवडे ताडन करवापी पाहा थाय तेवी उन्मार्गे जनार पुग- लिकने पीडा यवा लागी. (१९-२०) सलज्ज एवा तेभो पण ते दंडनीविवडे लाने पश था भद्रक होवाधी फरी कदापि ते नीतिनुं अतिक्रमण करनारा न यया. (२१) थे कुलकरोनी वखतमा ए नीति पाली पछी तेनो भतिक्रम पया लाग्यो एटले घीजा- चोया कुलकरना पसवमा पीजी माकार नामनी नीति शरु . (२२) स्वम्प भपरा- घाळा माटे पहेली भने प्रचुर अपराधषाळा माटे धीजी नीति यपरावा लागी. पांचमा .

(४१४) भीकाललोकप्रकाश पञ्चमादित्रये स्वन्या धिक्काराह्वा बभूव सा ॥२३॥ अंल्पागां भवत्याद्या द्वितीया मध्यमागां । अत्युत्कृष्टापराधानां दंडनीतिस्तृतीयिका ॥२४॥ नवा १ ष्टौ २ सप्त ३ सा ः पट् ४ प ५ सार्धाः पंच ६पंच च। पंचविंशाः ७ क्रमादेषां देहमाने धनुःशताः ॥२५॥ दशभागीकृतस्यैपा- मायुषः प्रथमोऽशकः । कुमारत्वेऽतिमश्चांशो वाईके परिकीर्तितः ॥ २६ ॥ अष्टासु मध्यमांशेषु कुलकृत्पदगौरवः । सप्तानामप्यमीषां स्यु-रेकैको वाहनं गजः ॥ २७ ॥ हस्तिनां च भवत्यायु-निजैः कुलकरैः समं ॥ द्वौ सुवर्णकुमारेपू-त्पन्नौ कुलकरौ क्रमात् ॥ २८ ॥ अथोदधिद्वीपकुमा-रेषु द्वौ द्वौ यथाक्रमं । नाभिर्नागकुमारेषु तथा षणां प्रिया अपि ॥ ३९ ॥ निता मरुदेवा तु सप्तापि करिणोऽभवन् । नागदेवा मतेऽन्येषां कोचि. स्वाद्य एव सः ॥ ३०॥ तथोक्तं श्रीज्ञानसागरसूरिकृतावश्यकावचूर्णी- हस्तिनः सप्तापि षट् च स्त्रियो नागकुमारेषु भवत्युत्पन्नाः, अन्ये व्याच- क्षते हस्ती एक एव, पट् स्त्रियो नागेषु शेषैर्नाधिकार इति. विगेरे प्रण कुलकरना वखतमां पीजी धिक्कार एवा नामनी नीति शरु थइ. (२३) तेमा अन्प पपराघवाळा माटे पहेली, मध्यम अपराधवाळा माटे चीजी अने अत्युत्कृष्ट अपरा- धवाळा माटे श्रीजी नीतिनो उपयोग थवा मांड्यो. (२४) साते कुलकरो, देहमान अनुक्रमे-नव सो १, पाठ सो २, सात सो ३, साडायसो ४, छसो ५, साडापांचसो ६ तथा पांच सो ने पचवीश ७ धनुष्य प्रमाण हतुं. (२५) एमना मायुष्यना दश भाग करवा. तेमा पहेलो भाग कुमारपणामां अने छेमो माग वृद्धपणामो कयो छे, (२६) तथा मध्पना आठ भाग कुलकरपणाना गौरवने सूचन- नारा जाणवा. ते साते कुलकरने एकेक हाधीन पाहन हतुं. (२७) ते हाथीभोनुं आयु पोतपोताना कुलकर समान समजवू. सात कुलकरोमाथी प्रथमना ये सुपर्णकुमारमा, ये उदधिकुमारमा, घे द्वीपकुमारमा ने छना नाभिकुलकर नागकुमारमा (भवनपविमा) उत्पन थया छे. तेमांना प्रथमना छ कुलकरनी स्त्रीभो पतिप्रमाणे ज देवपणे उत्पन्न थएल छ भने सातमा कुल करनी स्त्री मरुदेवी मोक्षे गयेल छे. साते कुलकरना हाथी कोइना मते नागफुमारमा उत्पन्न थयेल के भने अन्य मते पहेला कुलकरनो हाथी ब नागकुमारमा गयेल थे. (२८-३०) श्रीज्ञानसागरमूरिकत श्रीमावश्यकनी अयपूर्णिमा कपुंछ के-साते हाथीभो भने प्रथमना छ कुलकरनी स्त्रीमो नागकुमारमा उत्पम या छे. अन्य कहे के के-हस्ती एक ज अने छ श्रीमो नामकुमारमा गयेल छे. माकीना हायी क्या गपा तेनो अधिकार पतावेलो नयी.'

सर्ग ३२ मो। (४१५) आवश्यकाभिप्रायोऽयं पाठोपांगे तु तात्त्विकैः । उक्ताः कुलकराः पंच-दश तेऽमी यथाक्रमं ॥ ३१ ॥ सुमतिश्च १ प्रतिश्रुति २-भवेत्सी- मंकरः परः ३ । सीमंधरः ४ क्षेमंकरः ५ क्षेमंधर ६ स्ततः परं ॥ ३२ ॥ विमलवाहन ७ श्चक्षु-प्मान् ८ यशस्व्य ९ भिचंद्रकः १० । चंद्राभः ११ प्रसेनजिच्च १२ मरुदेव १३ स्तथाऽपरः ॥ ३३ ॥ नाभिः १४ श्रीऋषभ- स्वामि-प्रभोस्तत्त्वाविवक्षया । उक्ताः कुलकराः पद्म-चरित्रे तु चतुर्दश ॥ ३४ ॥ पल्योपमाष्टमांशस्य पंचभागीकृतस्य ये । चत्वारोंशास्तावदायु- मतेऽस्मिन् सुमतेः स्मृतं ।। सर्वेऽप्यन्ये पंचमेंशे द्वादशानां च जीवितं । असंख्येयानि पूर्वाणि नाभः संख्येयकानि च ॥ ३६ ॥ पंचानां प्रथमा नीतिः प्रथमानां प्रकीर्तिता । द्वितीयानां द्वितीया स्या-तृतीयानां तृतीयिका ॥ ३७॥ नाभेः कुलकरस्याथ मरुदेवामृगीदृशः । भूमौ भाविविनीतायां पुत्रत्वेनादिमो जिनः ॥ ३८॥ वर्तमानावसर्पिण्याः संबंधिनि तृतीयके। था आवश्यकनो अभिप्राय छे. छा उपांगमा तो तात्विकोए पंदर कुलकरो यार्नु कधु छ. सेना नामनो अनुक्रम मा प्रमाणे थे (३१)-१ सुमति, २ प्रतिश्रुति, ३ सीमं- कर, ४ सीमंधर, ५ क्षेमंकर, ६ क्षेमंघर, ७ विमळवाहन, ८ चक्षुष्मान, ९ यशस्वी, १० भमिचंद्र, ११ नंद्राम, १२ प्रसेनजित् , १३ मरुदेव, १४ नामि अने १५मा श्रीपमा स्वामी. तस्वथी श्रीरुपमस्वामीनी विवक्षा नहीं करवाथी श्रीपाचरित्रमा चाँद कुलकरो कक्षा छे'. (३२-३४) या मतमा पन्योपमना पाठमा भंशना पांच भाग फरीए एवा चार भागनुं मायुष्य पहेला सुमति कुलकरचें कयुं छे, (३५) अने पीजा सर्वे पांचमा अंशमा कसा छे. मां पार कुलकरोर्नु प्रायुष्य असंख्याता पूर्वोर्नु भने नाभिकुलकरचें संख्याता पूर्वनुं कहुं छे. ( ३६ ) प्रथमना पांचमा पहेली एक नीति, पीजा पांचमां बीजी नीति भने त्रीजा पांचमा श्रीजी नीति कही छ. (३७) नाभिकुलकरनी मरुदेवानामा स्वीपी विनीता नगरी ज्या पमपानी हती ते भूमिमा पुत्रपणे प्रथम जिनेचर थया . (३८) ते वर्तमान अवसर्पिणीना पीना भाराना नेपाशी पक्ष भने एक टिवांगे पाकी रक्षा त्यारे भया के. (३९) सेमो मपाढ मासना १ भामा प्रयमनाइने ११ मा पंद्राम पधारे है. बाकीना . प्रथम प्रमाणे ज . २८५ मास पूर्व.

(.४१६) श्रीकाललोकप्रकाश. अरे नवाशीतिपक्ष-त्रुटितांगावशेपके ॥ ३९ ॥ शुचिश्यामलतुर्याया-मा- गात्सर्वार्थसिद्धितः। स्थिति समाप्य तत्रत्यां त्रयस्त्रिंशत्पयोधिकां ॥४०॥ त्रयोदशे भवे सोऽस्मा-सार्थवाहोधनाभिधः। श्रासीत्ससार्थः सोऽचा- ली-वसंतपुरमन्यदा ॥४१॥ वर्षाकाले पथि प्राप्ते कांतारे तस्थिवा- नसौ । सहागतान्मुनीस्तत्र सस्मार शरदागमे ॥ ४२ ॥ अन्ये जीवंति कंदाद्य-मुनयस्तु कथं हहा !। ततः प्रगे तानाकार्य स घृतैःप्रत्यलभयत् ॥४३॥ तत्र च प्राप सम्यक्त्वं मृत्वा कालांतरेऽथ सः । बभूवोत्तरकुरुषु युग्मी मृत्वा ततोऽपि च ॥ ४४ ॥ सौधर्मे त्रिदशोऽथाभू-द्विदेहेषु महा- बलः । ईशाने ललितांगोऽथ वज्रजघो महीपतिः ॥ ४५ ॥ विदेहेष्वभ- वत्सोऽथ युग्म्युत्तरकुरुष्वथ । सौधर्मे त्रिदशोऽथाभू-द्विदेहेपु चिकित्सक श्रेष्ठिभूपामात्यसार्थ-वाहपुत्रैः सुहृद्वरैः । संयुक्तः स पटूचके कृमि- कुष्ठादितं मुनि ॥ १७ ॥ लक्षपाकं ददौ तत्र तैलं वैद्यसुतः स्वयं । गोशी- - कृष्णपक्षनी चतुर्थीए सर्वार्थसिद्धि विमानथी त्या संबंधी तेत्रीश सागरोपमनी स्थिति पूर्ण करीने मरुदेवा मातानी कुक्षिमा भावेला चे. (४०) तेो भा भवथी प्रथमना तेरमे भवे धन नामना सार्थवाह हता. ते अन्यदा सार्थसहित वसंतपुर जचा चान्या. (४१) मार्गमा वर्षाकाळ प्राप्त थवाथी एक अटवीमा टकी जq पडद्यु, त्या साथे श्रावेला मनि तेने शरदऋतु श्रावता सामर्या. (४२) तेणे विचार्यु के-चीजा मनुष्योए तो कंदादिकथी निर्वाह कर्यो हशे परंतु ए मुनिमोनुं शुं थयुं हशे ? ( कारणके तेओ तो कंदादि वापरता नथी.) पछी ते मुनिश्रीने बोलावी पीपडे प्रतिलाभ्या. (४३) त्यां ते धनसार्थवाह समकित पाम्या. त्यांथी काळांतरे काळ करीने उत्तरकुरुमा युगलिक थया. त्यांची पण मरीने त्रीजे भवे सौधर्म देवलोके देव थया. चोथे भवे महविदेहमा महा- बळ नामे राजा थया. पांचमे भये ईशान देवलोकमां ललितांग नामे देव थया. छठे भवे महाविदेहमा वनजंघ राजा थया. सातमे भवे उत्तरकुरुमा युगलिक थया. भाठमे भवे सौधर्म देवलोकमा देव थया. नवमे भषे महाविदेहमा वैद्य थया. (४४-४६) ते मपमा राजानो, श्रेष्ठीनो, अमात्यनो ने सार्थवाहनो एम चारना पुत्रो वेना मित्रो हता, ते भवमा कृमिकृष्ठना व्याधियी पीडाता मुनिने सेणे चारे मित्रोनी सहायधी निरोगी १ (भापाढशुकृपष्ठयां स) इवि पाठोऽपि भेष्टि-देव.-साल-जैनपु० मतो लिखितस्तन्मूलं सुग्य, कल्पसूत्रेऽपि भषाढणचतुर्येव लिखिवा.

सर्ग ३२ मो। (४१७) पचंदनं लक्ष-मूल्यं च रत्नकवलं ॥ १८॥ वणिग् ददौ विना मूल्यं साधुभक्त्या महाशयः । प्रतिपद्य स चारित्रं संविग्नः प्रययौ शिवं ॥४९॥ चतुभिस्सह मित्रैः स यतीभूय चिकित्सकः । देवोऽभूदच्युते तस्माच्च्यु- स्वा पंचापि ते सुराः ॥५०॥ विजये पुष्कलावत्यां पुरी या पुंडरीकिणी । तत्राहद्वन्नसेनस्य समजायंत नंदनाः ॥५१॥ तत्र वैद्यस्य जीवोऽभू-द्वन- नाभाभिधोऽग्रजः। बाहुः सुवाहुः पीठश्च महापीठ इतीतरे ॥ ५२ ॥ उत्सृज्य सार्वभौमद्धि वज्रनाभोऽनुजैः सह । उपादत्त परिव्रज्या-मर्हतः पितुरंतिके ॥ ५३ ।। अध्यगीष्ट स पूर्वाणि चतुर्दश परे पुनः। अंगान्ये. कादशाद्योऽत्र तीर्थकृत्कर्मभागभूत् ।। ५४ ॥ द्वितीयश्चान्नपानाद्यै-भक्तिं कुर्वन्महात्मना । चकिभोगफलं कर्मा-जयदार्जवपावनः ॥ ५५॥ तारी- यीकश्च साधूना-मंगसंवाहनादिभिः । लोकोत्तरं वाहुबल-फलं कर्म किलार्जयत् ॥ ५६ ॥ ज्येष्ठप्रशंसामात्सर्यो-दयाच्चारित्रिणावपि । वेद- कर्या. (४७) ते कार्यमा वैद्यपुत्रे लथपाक तेल पोतार्नु वापर्यु भने गौशीर्षचंदन तथा लक्षमूल्यन रत्नकंपळ एक वणिक महाशये वगरमूल्ये मात्र मुनिराजपरनी भक्तिथी भाप्यं. ते संविन पणिक तो चारित्र अंगीकार करीने ते भवमा ज मोवे गयो. (४८-४९ ) चारे मित्रो साथे वैधपुत्रे पण दीक्षा लीधी ने ते पांचे जणा पारमा देवलोके देव थया. पांचे देवो स्वर्गमाथी च्यवीने पुष्कलावती विजयनी पुंडरीकिणी नगरीमा वज्रसेन नामना तीर्थकरना पुत्रो थया. (५०-५१) मा वैधनो जीव यजनाम नामनो मोटो पुत्र थयो; पीजा चार पाहु, मुगाह, पीठ ने महापीठ नामना पुत्रो धया. (५२) वजनामे चक्रवर्तीपणानी ऋद्धि (मोगवीने ) वजी दइने पारे भाइयोनी साथे पोताना पिता बनसेन वीर्थकरनी पासे चारित्र ग्रहण कर्यु. ( ५३ ) वजनामे चाँद पूर्वनो अभ्यास कर्यो ने वीजा चार मुनियो भग्यार भंगना अभ्यासी थया. पहेला वचनामे तीर्थकरनामकर्म उपार्जन कयु. (५४) पीजा पुत्र पाहुए महात्मानोनी मनपानादिवडे भक्ति करीने मार्जवतावहे पवित्र था पवर्षीपणाना मुखमांगनी प्राप्ति करावनार भोगफळपालं कर्म उपार्जन कर्यु. (५५) श्रीजा सुपाहुकुमारे साधुभोना भंगसंवाहनादि वैयावच्चवडे लोकोचर एवं पाहुनु पळ प्राप्त करापनार फर्म उपार्जन कर्य. (५६) चोथा ने पांचमा पीठ ने महापीठ पुनिए चारित्र (४१८) श्रीफाललोकप्रकाश । मर्जयतः पीठ-महापीठौ च योपितां ॥ ५७ ॥ ततः पंचापि सर्वार्थ- सिद्धेऽभूवन् सुधाभुजः। च्युत्वादौ च ततो वज-नाभजीवोऽभ- वज्जिनः ॥५८॥ मासान् गर्भे नव स्थित्वा चतुभिरधिकान् दिनैः । चैत्रस्य श्याम- लाष्टम्या-मजनिष्ट जिनेश्वरः ॥ ५९ ॥ गर्भे जन्मनि राज्याप्तौ दीक्षायां केवलोद्भवे । भं प्रभोरुत्तराषाढा राशिः स्याद्धनुरायः ॥ ६० ॥ व्रतो- द्वहनधुर्यत्वा-दादौ वृषभवीक्षणात् । स्वप्नेषु मात्रा वृपा-कत्वाच वृषभाभिधाः ॥ ६१ ॥ वृषभः प्रथमो राजा-दिमो भिक्षाचरोऽपि च । श्राद्योऽर्हन् केवली चेत्य-भूवन् पंचाभिधाः प्रभोः ॥ ६ ॥ देशोनवर्षवयसि प्रभो हरिरुपागमत् । जीतमाद्याहतो वंश-स्थापन ज्ञानतो विदन् ॥ ६३ ॥ इचुं शक्रकरे वीक्ष्य प्रसारितकरे प्रभौ। वंशमि- क्ष्वाकुनामानं स्थापयामास वासवः ॥ ६४ ॥ श्राकुशध्दो भक्षणार्थे इक्षो- पालता छतां पण पोताना वडील मुनिमोनी थती प्रशंसा न सहन थवाथी मात्सर्यने लइने स्त्रीवेद उपार्जन कर्यो. (५७) त्यांची काळ करीने पांचे मुनिश्नो सर्वार्थसिद्ध विमानमा देवपणे उत्पन्न थया. त्यांथी वजनामनो जीव प्रथम च्यवीने प्रथम जिन तरीके मरुदेवानी कुतिमा उत्पन्न थयो. (५८) नव मास ने चार दिवस गर्भमां स्थिति करीने चैत्र वदि ८ नी रात्रिए प्रथम जिनेश्व- स्नो जन्म थपो. (५९) प्रभु गर्ममा श्राव्या त्यारे, जन्म वखते, राज्यप्राप्ति अवसरे, दीवासमये ने केवळज्ञाननी उत्पत्ति वखते नक्षत्र उत्तराषाढा (मोक्षकल्याणके नक्षत्र अभि- जिद) अने राशि धनु समजवी. (६०) व्रतोतुं वहन करवामां धोरी समान होपाधी तेम ज माताए स्वप्नमा प्रथम पम दीठेल होवाथी अने घृपभनुं लांछन (चिन्ह ) होवाथी अपम (वृषभ) एy नाम स्थापन करवामां थायूं. (६१) ऋपमदेव, प्रथम राजा, प्रथम भिक्षाचर (साधु), प्रथम भरिहंत ने प्रथम फेवली-एवा पांच नाम वेमनाथया. (६२) प्रभु काइक ऊण एक वर्षनी वयना यया त्यारे प्रभुना वंशन स्थापन करघु ए मारो प्राचार छ एम ज्ञानवडे जाणीने इंद्र प्रभु पासे प्राध्या. (६३) इंद्रना हाधमां तु जोहने ते लेवा माटे प्रभुए हाथ लांचो फर्यो तेथी इंद्रे प्रभुना वंश इक्ष्वाकु नाम स्थापन कयु. (६४) आकु शम्द भषणार्थमा छे. इक्षु जे शेरडी-ते सावानी इच्छा होयाथी भगवान N सर्ग (४१९) स्तद्भक्षणेच्छया । इक्ष्वाकुर्भगवानेत-इंश्याश्चैक्ष्वाकवः स्मृताः ॥६५ ॥ एवं च-इक्ष्वाकुवंशजा ज्ञेया जिना द्वाविंशतिर्बुधैः । हरिवंशसमुद्भूतौ श्रीनेमिमुनिसुव्रतौ ॥ ६६ ॥ तदा च दंपती कौचि-द्विमुच्य सुतनंदने । तालस्याधः प्राविशता क्रीडायै कदलीयहं ॥६७ ॥ तालतः पतता पक्व-फलेन तनयो मृतः । अकालमृत्युरायोऽत्रा-वसर्पिण्यामभूदयं ॥ ६८ ॥ अवशिष्टां ततः पुत्री प्रतिपाल्य दिवं गतौ । युग्मिनौ दंपती स्वल्प-कपायौ तौ शुभाशयौ ॥ ६९ ॥ अथात्यंतोत्कृष्टरूपां कन्यामेकाकिनीमिमां । दृष्ट्वा न्यवेदयन् युग्मि-मनुजा नाभयेऽन्यदा ॥ ७० ॥ भविष्यति सुनंदेयं ऋपभस्य परिग्रहः । इति प्रज्ञाप्य तान् सर्वान् नाभिराहतवानिमां ॥ ७१ ॥ अथ भोगसमर्थ तं विज्ञाय जगदीश्वरं । अकार्षीद्धरिरागत्य तत्पा- णिग्रहणोत्सवं ॥ ७२ ॥ विधिं वरोचितं सर्व-मकार्षीत्तत्र वासवः । कन्योचितं द्वयोः कन्योः शच्योऽकार्षः प्रमोदतः ॥ ७३ ॥ ताभ्यां च इक्ष्वाकु भने तेमना वंशजो ऐक्ष्वाकु एटले इक्ष्वाकुवंशमा उत्पन्न थयेला कहेवाया, (६५) ए प्रमाणे पावीश तीर्थकर इक्ष्वाकु वशमां थयेला अने नेमिनाथ ने मुनिसुव्रतस्वामी ए वे हरिवंशमा थयेला पंडितोए जाणवा. (६६) हवे अन्यदा कोइ युगलिक दंपती पोताना पुत्र तथा पुत्रीने एक ताडवृक्षनी नीचे मूकीने कदलीगृहमा क्रीडा करवा गया. (६७) तेवामा ताडवृक्षपरथी पडेला एक फळ. घडे पुनर्नु मृत्यु थयुं. श्रा अवमर्पिणीमां या पहेलु काळ मृत्यु थयुं. (६८) त्यारपछी अवशिष्ट रहेल पुत्रीनुं अमुक पसत प्रतिपालन करीने ते स्वन्पकपागवाळा ने शुभाशय- चाळा युगलिक दंपती स्वर्गे गया. (६९) हवे एकदा अत्यंत उत्कृष्ट रूपवाळी ते कन्याने एक्ली फरती जोइने कोइ युगलिकोए ते हकीकत नामिराजाने निवेदन करी. (७०) एटले 'ए सुनंदा नामनी ऋषभनी पत्नी घशे । एम ते सर्वने कहीने ते कन्याने नामि. राजाए ग्रहण करी. (७१) हये प्रभुने भोगसमर्थ जाणीने इंद्रे प्रावीने मनो पाणिग्रहरा महोत्सव कर्यो. (७२) तेमा वरोचित पधो विधि इंद्रे कर्यो भने कन्या उचित पधो विधि ने कन्या संबंधी इंद्रायीमोए प्रमोदपूर्वक कर्यो. (७३) ते पंने स्त्रीमोनी संगारे विविध प्रकारना मोग (४२०) श्रीकानलोकप्रकाश। सह भुंजाने विविधान् विषयान् विभौ । षट्स्वतीतेषु लक्षेषु पूर्वाणां जन्मकालतः ।। ७४ ॥ पंचमानुत्तराच्च्युत्वा पीठो बाहुश्च युग्मजौ । जातौ सुमंगलादेव्यां ब्राह्मीभरतसंज्ञको ॥७५॥ महापीठः सुबाहुश्च सुने- दाकुक्षिसंभवौ । सुंदरीबाहुबल्याख्या-वभूतां च सुतासुतौ ॥७६ ॥ ततः सुमंगलैकोन-पंचाशतमसूत च । पुनर्युग्मानि पुत्राणां फलानीव युसल्लता ॥ ७७ ॥ शतमेवं च पुत्राणा-मभूत्पुत्रीद्वयं प्रभोः । नमिश्च विनमिश्चेति परौ कोडीकृतौ सुतौ ॥ ७८ ॥ युग्मिनां कलहे जातु रीत्या पूर्वोक्तयोत्थिते । निवेदयंति तत्सर्वे ज्ञास्वा ज्ञानाधिकं प्रभुं ॥७९॥ प्रभुरप्याह राजैव निवारयति दुर्नयात् । स चाभिषिक्तः सर्वेषा-मैश्वर्याद्दरतिक्रमः ॥ ८॥ स राजास्माकमप्यस्तु तेरित्युक्तेऽवदत्प्रभुः । नत्वा नाभिं कुलकरं याचवं भूपमीप्सितं ॥८१॥ तैर्विज्ञप्तोऽवदन्नाभि-भूयावृषभ एव च । राजेति तेऽभिषेकार्थ यावद्द- च्छंति वारिणे ॥ ८२ ॥ तावत्कंप्रासनः शक्रो-ऽभ्यर्षिचद् द्रुतमागतः । मोगवतां जन्मथी छ लाख पूर्व गया त्यारे पांचमा अनुत्तर विमानमाथी व्यवीने पीठ ने पाहुना जीप सुमंगलादेवीनी कुक्षिमा पुत्री-पुत्रपणे उत्पन्न थया. तेमनो प्रसव थतां सेमनां भरत ने ब्राह्मी नाम स्थापन कर्या. (७४-७५) महापीठ ने सुबाहुना जीव त्यांथी ज व्यवीने सुनंदानी कुक्षिमा उत्पन्न थया. तेमनो प्रसव थतां तेमना बाहुबली ने सुंदरी नाम स्थापन कर्या. (७६ ) त्यारपछी कन्पवृक्षनी लता फळोने पापे तेनी जेम सुमंग- लाए ४९ पुत्रना युगळने भनुक्रमे जन्म आप्यो. (७७) ए रीते ऋषभदेवने १०० पुत्र ने ये पुत्री थयो. नमि ने विनमि ए ये तो प्रधना खोळे लीधेला ( उछरेला ) पुत्रो हता. (७८) हये कदाचित् युगलिकोनी अंदर पूर्वे कह्या प्रमाणे कलह उत्पम थये सते तेओए प्राचीने पम प्रभुने वघारे ज्ञानवाला जाणी ते हकीकत निवेदन करी. (७९) प्रभुए कर्यु के-'एका अन्यायनुं तो राजा ज निवारण करी शके. ते राजा अभिषेक करायेल जोइए अने तेनुं श्रेश्वर्य बहुलतावडे बीजामोथी भतिक्रम न कराय ए जोइए. (८०) युगलिकोए कह्यु के-'श्रमारे पण तेवो राजा हो ' त्यारे प्रभुए फयु के-'तमे नामिरानाने प्रणाम करीने तमारा इच्छित राजानी मागणी करो. (८१) तेमोए नामि राजा पासे जइने विज्ञप्ति करी. त्यारे नामिराजाए कछु के-अपम ज तमारा राजा हो' त्यारे तेश्रो तेमने राज्याभिषेक करवा माटे पाणी लेवा गया, तेवामा जेनो भासनकंप मग १२ मो। (४२१) राज्येऽहन्तं धृतच्छत्रं रत्नसिंहासनस्थितं ॥ ८३ ॥ युग्मम् ॥ अथांभः पूर्णनलिनी-पत्रभाजनपाणयः। अागतास्ते प्रभुं दृष्ट्वा सर्वालंकारभासुरं ॥ ८४ ॥ विस्मिता मुदिताश्चांत-रुत्कंठासंभृता अपि । उद्यद्विवेकास्तै- नीरैः प्रभोरस्नपयन् पदौ ॥ ८५॥ तथाह धनपालः परमार्हतः- धन्ना सविम्हयं जेहिं झत्ति कयरजमज्जणो हरिणा । चिरधरियन- लिणिपत्ता-भिलेश्रसलिलेहिं दिट्ठो सि ॥८६॥ विनयेन ततस्तेषां संतुष्टो वासवो भृशं । विनीता नगरीमेषां निवासार्थमरीरचत् ॥ ८७॥ अस्याः स्वरूपं चैत्रमाहुः-श्रीविभो राज्यसमये शकादेशानवां पुरीं । धनदः स्थापयामास रत्नचामीकरोत्करैः ॥८॥ द्वादशयोजनायामा नव- योजनविस्तृता। अष्टद्वारा महाशाला साभवत्तोरणोज्ज्वला ।।८९॥ धनुषां द्वादश शता-न्युच्चस्त्वेऽष्टशतं तले। व्यायाम शतमेकं स व्यधाद्वप्रं सखा. तिकं ॥ ९०॥ सौवर्णस्य च तस्योचं कपिशीर्षावलिर्वभौ। मणिजामरशै- थयो छ एवा सौधर्मेंद्रे उतावळे प्रभु पासे आवीने प्रभुने राज्याभिषेक कर्यो अने राजाने योग्य छत्र माथे धारण कयु तेमज रत्नसिंहासनपर प्रभुने बेसाड्या. (८२-८३) हवे कमळ- पत्रना माजन (पडीया) करीने तेमां पाणी मरी युगलिको ते लइने प्रभु पासे भाव्या त्यां प्रभुने तो सर्वालंकार संयुक्त जोइने विस्मय पाम्या-हर्पित थया, अने अंत:करणमा उत्कंठायुक्त थया छतां पण उत्पन थयो के विवेक जेने एका तेश्रोए लावेला जळवरे प्रभुना पगोनुं प्रक्षालन कयु. (८४-८५) धनपाळ 'परमाईत 'पा संबंधमा कहे थे के- 'ते वखते इंद्रे उतावळे श्रावीने जेनो राज्याभिषेक कर्यो के एवा तेमने नलिनीना पत्रमा भभिषेक जळ लावी, चिरकाल सुधी हाथमां धारण करीने जे युगलिपाश्रोए विस्मय सहित जोया के तेभोने धन्य छे.' (८६) त्यारपछी युगलिकोना विनयथी प्रति संतुष्ट थयेला इंद्रे एमना निवास माटे विनीता नामनी नगरी बनावी दीधी. (८७) से नगरीनुं स्वरूप आ प्रमाणे छे-श्री विभुना राज्यसमये शकेंद्रना प्रादेशची रत्न- सुवर्णना समूहवडे धनदे नवी पुरीनुं स्थापन कयु. (८८) वे नगरी चार योजन लांची, नव योजन पहोळी, पाठ दरवाजावाळी मोटी शाळामोवाळी अने तोरणादिवडे उज्वळ पनाची. (८९) ते नगरीनो गढ १२०० धनुष्य उंचो, जमीनपर पाठ सो धनुष्य पहोलो ने उपर एक सो धनुष्य पहोलो फरती साइवानो पनाव्यो. (९०) ते गढ उपर सोनाना कांगरामो - (४२२) श्रीकाललोकप्रकाश। लस्थ-नक्षत्रालिरिवोद्गता ॥ ९१ ।। चतुरस्राश्च व्यस्राश्च वृत्ताश्च स्वस्ति- कास्तथा । मंदाराः सर्वतोभद्रा एकभूमा द्विभूमकाः ॥ ९२ ॥ त्रिभूमाद्याः सप्तभूमं यावरसामान्यभूभुजां। प्रासादाः कोटिशस्तत्रा-भवन रत्नसुवर्णजाः ॥ ९३ ॥ युग्मं ॥ दिश्यैशान्यां सप्तभूमं चतुरस्त्रं हिरण्मयं । सवप्रखा- तिकं चक्रे प्रासादं नाभिभूपतेः ॥ ९४ ॥ दिश्यां सर्वतोभद्रं सप्तभूमं महोन्नतं । वर्तुलं भरतेशस्य प्रासादं धनदोऽकरोत् ॥ ९५ ॥ आग्नेय्यां भरतस्येव सौधं बाहुवलेरभूत् । शेषाणां च कुमाराणा-मंतरा ह्यभवं- स्तयोः॥ ९६ ॥ तस्यांतरादिदेवस्य कविंशतिभूमिकं । त्रैलोक्यविभ्र. माह्वानं प्रासादं रत्नराजिभिः ॥ ९७ ॥ सवप्रखातिकं रम्यं सुवर्णकल- शावृतं । चंचध्वजपटव्याजा-न्नृत्यंतं निर्ममे हरिः ॥ ९८ ॥ युग्मं ॥ अष्टोत्तरसहस्रेण मणिजालैरसौ बभौ । तावत्संख्यैर्मुखैर्भूरि ब्रुवाण इव तद्यशः ॥ ९९ ॥ कल्प?मैर्वृताः सर्वे-ऽभूवन् सेभहयौकसः । सप्राकारा बृहद्वासः-पताकामालभारिणः ॥ १०॥ सुधर्मसदृशी चारु-रत्नमय्य- शोभी रह्या. ते कांगरा मणिमय अमरशैल (मेरु ) पर रहेल उगती एची नक्षत्रनी श्रेणि ज़ेवा जणावा लाग्या. (९१) ते नगरीमा चोखंडा, त्रिकोण, गोळ, स्वस्तिकाकृतिवाळा, मंदार, सर्वतोभद्र, एक भूमियाळा, ये भूमिवाळा, प्रण भूभिवाळा यावत् सात भूमिवाळा रत्न ने सुवर्णना वनावला क्रोडोगमे प्रासादो सामान्य राजायो माटे बनाववामां पाव्या. ( ९२-९३ ) ईशान कोणमा सात भूमिवाळो, चोखंडो, सुवर्णमय अने गढ तथा खाइ- वाळो प्रासाद नामिराजा माटे यनाववामा श्राव्यो. (९४) पूर्वदिशाए सर्वतोभद्र प्रासाद सातभूमिनो, घणो उंचो अने गोळ भरवेश माटे धनदे बनायो. (९५) थमिकोणमा भरवना जेवो ज प्रासाद पाहुगली माटे बनाववामां आव्यो. पाकीना कुमारो माटे ते पेना अांतरामा जुदा जुदा प्रासादो पनाववामा श्राव्या. (९६ ) ते पधानी मध्यम प्रादिदेव माटे एकवीश भूमिवाळो, प्रैलोक्यविभ्रम नामनो, रत्नश्रेणियोक्डे शोभतो, गढ़ तथा खाइवालो, सुवर्णना फळशयुक्त चंचळ एपी ध्वजायोना मिपथी जाये नृत्य करतो होप तेवो प्रासाद इंद्रे पनाध्यो. (९७-९८) ते प्रासाद एक हजार ने आठ मणिमय जाळी- मोवहे जाणे वेटला सपोवडे तेमनो यश योलतो न होय तेवो शोमतो हवो. (९९) मा पधा प्रासादो कल्पवृक्षोक्डे विंटायला हवा, हाथीयो भने मधोनी शाळायो महिव हवा, फरता गढवाळा हता भने मोटा पसनी पताकामोना समूहयडे शोभावाळा हता. (१००) पुगादिदेवना मुख्य प्रासादनी आगळ सुधर्मासमा देवी सर्वप्रभा नामनी " .

सर्ग ३२ मो। (४२३) भवत्पुरः । युगादिदेवप्रासादात् सभा सर्वप्रभाभिधा ॥ १ ॥ चतुर्दिछु व्यराजंत मणितोरणमालिकाः । पंचवर्णप्रभाकूर-पूरडंवरितांबराः ॥ २ ॥ अष्टोत्तरसहस्रेण मणिविवैविभूषितं । गव्यूतिद्वयमुत्तुंगं मणि- रत्नहिरण्मयं ॥ ३॥ नानाभूमिगवाक्षाढ्यं विचित्रमणिवेदिकं । प्रासाद जगदीशस्य व्यधाच्छीदः पुरांतरा ॥ ४॥ युग्मं ॥ सामंतमंडलीकानां नंद्या. वर्तादयःशुभाः। प्रासादा निर्मितास्तत्र विचित्रा विश्वकर्मणा ॥ ५॥ अष्टोत्तरसहस्रं तु जिनानां भवनान्यभुः । उच्चैर्ध्वजाप्रसंक्षुब्ध-तीक्ष्णांशु- तुरगाण्यधः ॥ ६ ॥ चतुष्पथप्रतिवद्धा-श्चतुरशीतिरुच्चकैः । प्रासादाश्चा- हतां रम्या हिरण्यकलशेषभुः ॥७॥ सौधानि हिरण्यरत्न-मयान्युच्चैः सुमेरुवत् । कौवेर्यो सपताकानि चक्रे स व्यवहारिणां ॥ ८॥ दक्षिण- स्यां क्षत्रियाणां सौधानि विविधानि च । अभूवन् शस्त्रागाराणि तेजां- सीव निवासिनां ॥ ९ ॥ तद्वप्रांतश्चतुर्दिक्षु पौराणां सौधकोटयः । व्यरा- जंत द्युसद्यान-समानविशदश्रियः ॥ १० ॥ सामान्यकारुकाणां च बहिः रत्नमय सुंदर समा बनावी. (१०१) ते समानी चारे दिशाए मणिमय तोरणोनी श्रेणि हती ते पांच वर्णनी प्रभाना अंकुरामोवडे श्राकाशने पण भरी देती हती. (२) ए नगरीना मध्यमा धनदे एक हजार ने आठ मणिमय विंयोथी विभूपित, वे गाउ उंचो, मणि, रत्न ने सुवर्णमय अनेक भूमियो ने गवाक्षोवाळो वेमज विचित्र मणिमय वेदिकावालो एक जगदीशनो प्रासाद बनान्यो. (३-४) ते नगरीमा सामंत अने मांडलिकोना नंधा- वर्नादि अनेक शुभजाविना प्रासादो विचित्र प्रकारना विश्वकर्माए पनाव्या. (५) उंचे रहेली बजाना अग्रमागथी सूर्यना अश्वोने क्षोम पमाडे तेका एक हजार ने भाठ जिन- भवनो पनाव्या. (६) चतुष्पथमा वनावेला उंचा मनोहर अर्हतना चोराशी प्रासादो सुवर्णमय फळशोषडे शोमता हता. (७) व्यवहारीयोना घरो हिरण्यरत्नमय मेरुपर्वत जेवा उंचा पताका सहित उत्तरदिशामां बनान्या. (८) दक्षिण दिशामां चत्रियोना विविध प्रका- रना महेलो पनाच्या अने त्यां रहेनारायोना जाणे तेज होय एवा अनेक शस्त्रागारो पनाव्या. (९) ते नगरीना गढमा चारे दिशाए देवतामोना विमान जेवा उज्वळ शोमा. घाळा कोटिंगमे मकानो पौरजनो माटे बनाववामां आव्या. (१०) सामान्य कारुको माटे गढनी यहार चारे दिशाए सर्व प्रकारना धनना श्राश्रयवाला कोडोगमे घरो पना- (४२४) भीकाललोकप्रकाश। प्राकारतोऽभवन् । कोटिसंख्याश्चतुर्दितु गृहाः सर्वधनाश्रयाः ॥ ११ ॥ अपाच्यां च प्रतीच्यां च कारुकाणां वभुम्रहाः । एकभूममुखासयत्रा- स्त्रिभूमिं यावदुच्छ्तिाः ॥ १२ ॥ अहोरात्रेण निर्माय तां पुरी धनदोऽकिरत् । हिरण्यरत्नधान्यानि वासांस्याभरणानि च ॥ १३॥ सरांसि वापिकूपादीन् दीर्घिकादेवताल- यान् । अन्यच्च सर्व तत्राहो-रात्रेण धनदोऽकरोत् ॥१४॥ विपिनानि चतुर्दिक्षु सिद्धार्थश्रीनिवासके । पुष्पाकरं नंदनं चा-भवन् भूयांसि चान्यतः ॥ १५ ॥ प्रत्येकं हेमचैत्यानि जिनानां तत्र रेजिरे । पवनाहृत- पुष्पाणि पूजितानि द्रुमैरपि ॥ १६ ॥ प्राच्यामष्टापदोऽयाच्यां हेमशैलो महोन्नतः । प्रतीच्यां सुरशैलस्तु कौवेर्यामुदयाचलः ॥ १७ ॥ तत्रैवमभ- वन शैलाः कल्पवृक्षालिमालिताः । मणिरत्नाकराः प्रोच्चै-जिनावासप- वित्रिताः ॥ १८॥ शक्राज्ञया रत्नमयी-मयोध्या परनामतः। विनीता सुरराजस्य पुरीमिव स निर्ममे ॥ १९ ॥ यद्वास्तव्यजना देवे गुरौ धमें व्या. (११) दक्षिणमा ने पश्चिममा कारुकोना एक भूमिथी त्रण भूमि सुधी उंचा त्रिकोण गृहो बनाव्या. (१२) श्रा प्रमाणेनी नगरीने एक महोरात्रमा बनावीने धनदे तेमां हिरण्य, रत्न, धान्य, वस्त्रो अने आभूपणो विगेरे वरसान्या, (१३) तेम ज सरोवरो, चावो, कुवरामो, दीपिकाओ, देवालयों अने बाजु बधु एक अहोरात्रा धनदे बनावी दाधुं. (१४) नगरीनी चारे दिशाए सिद्धार्थ, श्रीनिवास, पुष्पाकर अने नंदन ए नामना चार बनो बनाव्या, ते सिवाय वीजा घणा वनो बनाज्या. (१५) ते प्रत्येक वनमा सुपर्णतुं एकेक जिनचैत्य बनाववामां आव्यू के जे चैत्योने पवनधी उडतां पुष्पोवडे द्रुमो पण पूजे छ, एम जणाया लाग्यु. (१६) ए नगरीनी पूर्व अष्टापद, दक्षिणे महाउन्नत एवो हेमशैल, पश्चिमे सुरशैल भने उत्तरे उदयाचळ युम चार पर्वतो आवेला छे. (१७) ते पर्वतो कन्पक्षोनी श्रेणिमोथी मंडित, मणिरत्ननी खायोवाळा भने घणा उंचा जिनप्रासादोथी पपित्रित हता. (१८) इंद्रनी श्राज्ञाथी रत्नमय अने जेनुं वौजु नाम अयोध्या के एवी श्रा विनीता नगरी इंद्रनी पुरी जेवी धनदे निर्माण करी. (१९) वे नगरीमा रहेनारा जनो देव, गुरु ने धर्ममा श्रादरवाळा, स्थैर्यादिगुणयुक्त, सत्य, सर्ग २१ मो। (४२५) च सादराः । स्थैर्यादिभिर्गुणयुक्ताः सत्यशौचदयान्विताः ॥ २० ॥ कला- कलापकुशलाः सत्संगतिरताः सदा। विशदाः शांतसद्भावा अहमिंद्रा महोदयाः ॥ २१॥ युग्मं ॥ तत्पुर्यामृषभः स्वामी सुरासुरनरार्चितः। जगत्सृष्टिकरो राज्यं पाति विश्वस्य रंजनात् ॥ २२ ॥ अन्वयोध्यमिह क्षेत्र-पुराण्यासन् समंततः। विश्वसृष्टशिल्पिवृंद-घटितानि तदुक्तिभिः ॥ २३ ॥ विंशतौ पूर्वलक्षेषु गतेषु जनिकालतः । तत्रैवं हरिणा राज्ये- ऽभिषिक्तो वृषभः प्रभुः ॥ २४ ॥ कुर्वन्नश्वगजादीनां संग्रहं सुस्थितां स्थितिं । राज्यस्य सकलां चक्रे न्यायाध्वनि पूरस्सरः ॥ २५ ॥ प्रभुणा दर्शितेष्वेवं मूलशिल्पेषु पंचसु । प्रावर्तत शिल्पशत-कर्माण्यपि ततः परं ॥ २६ ॥ तद्वयक्तिस्तु प्रारदर्शिता. प्रावर्त्ततानपाकादि-राहारविषयों विधिः। शिल्पं घटादि कृप्यादि-कर्माणि वचसा प्रभोः॥ २७ ॥ नाना- रत्नायलंकारैः प्रभोर्देहविभूषणां । दृष्ट्वा देवैः कृतां लोके प्रावर्त्तत विभू. पणा ॥ २८ ॥ ब्राम्या दक्षिणहस्तेन दर्शिता लिपयोऽखिलाः । एक- शौच ने दयासंयुक्त, कळाकलापमा कुशळ, निरंतर सत्संगतिमा रक्त, विशद (डाह्या), शांत स्वभावी, अहमिंद्र ने मोटा उदयवाळा होता हवा. (२०-२१) ते नगरीमा सुरा- सुर ने नराचित एवा जगत्सृष्टि ( व्यवहार ) ना करनारा मदेव विश्व, रंजन करवा. घडे राज्य, प्रतिपालन करवा लाग्या. (२२) मा अयोध्या नगरीनी पछी तेनी चोतरफ क्षेत्रो भने नगरो पण हता, ते विश्वकर्माना कहेवाथी तेना शिन्पिोए बनाव्या हता. (२३) जन्मथी वीश लाख पूर्व गया त्यारे इंद्रे प्रसने राज्यपर स्थापन कर्या. (२४) पछी तेमणे हाथी, घोडामो विगेरेनो संग्रह कर्यो भने न्यायमार्ग पुरस्सर एवा तेमणे राज्यनी पधी स्थिति सुस्थित बनावी. (२५) प्रभुए बतावेला मूळ पांच सिन्पमाथी सो शिप प्रवर्त्या अने पीजा को प्रवा. (२६ ) तेनी विगत प्रथम पवावधामा भावेल थे. प्रसना कहेवा प्रमाणे अन्नपाकादि माहारसंबंधी विधि, घटादि शिन्पो भने कुप्पादि कर्मों प्रवा. (२७) नाना प्रकारना रत्नना भलं कारोवडे देवोए फरेली प्रभुना शरीरनी शोमा जोड्ने लोकोमो पण माभूपणो करायवानी (पहेरवानी) प्रवृत्ति चाली. (२८) प्रसए जमये हा प्राप्तीने सर्व प्रकारनीलिपिनो वताची भने सुंदरीने डासा हाधचंड एक (४२६) श्रीकाललोकप्रकाश. ध्यादि च संख्यानं सुंदर्या वामपाणिना ॥ २९ ॥ काष्ठपुस्तादिकमवं भरतस्योपदर्शितं । दर्शितं बाहुबलिने स्त्रीनराश्वादिलक्षणं ॥ ३०॥ वस्तूनां मानमुन्मान-मुपमानं तथाऽपरं । प्रमाणं गणितं चेति पंचक व्यवहारकृत् ॥ ३१॥ मानं द्विधा धान्यमानं रसमानं तथाऽपरं । धान्यमानं सेतिकादि कर्पादि च रसस्य तत् ॥ ३२ ॥ पूगीफलादे- गण्यस्यो-न्मानं संख्यानुमानतः । सहस्रं नालिकेराणां पुंजेऽस्मिन्नि- ति कल्पना ॥ ३३ ॥ उपमानं च तौल्येन पलादिपरिभावनं । हस्तदं- डादिना भूमि-वस्त्रादेर्वा मितिः स्फुटा ॥ ३४ ॥ इयवर्णामिदं स्वर्ण- मियत्पानीयकं विदं । रत्नमित्यादि प्रमाणं गणितं प्राग्निरूपितं ॥ ३५ ॥ प्रोतं देवरके मण्या-दीनां सम्यग् निवेशनं । समु- द्रादौ च घोहित्थ-वाहनं पोतमूचिरे ॥ ३६ ॥ व्यवहारो विसंवादे गत्वा राजकुलादिषु । न्यायस्य निश्चयो यद्वा वस्तूनां क्रयविक्रयौ ॥ ३७ ॥ नीतिः सामादिका युद्धं वाहुयुद्धाद्यनेकधा । इपुशास्त्रं धनुर्वेदो विगेरे संख्या (अंकविद्या ) बतावी. (२९) काठपुस्तादिकर्म भरतने शिखव्या अने पाहुबलिने स्त्री, पुरुष नै अश्वादिना लक्षणो समजा-या. (३०) वस्तुअोना मान, उन्मान, उपमान, प्रमाण ने गणित ए पांच प्रकारे व्यवहार बताव्यो. (३१) तेमां मान बे प्रकारे- धान्यमान ने रसमान-धान्यमान सेतिकादि अने रसमान कर्षादि समजवू. (३२) सोपारी विगेरे गणीने वेचवा लायफनी संख्या अनुमानथी नक्की करवी -या नाळीयेरना ढगलामां हजार नाळीयेर छे, एमं कल्पनाथी कही देवू ते उन्मान समजबु. (३३) तोलवडे करीने आटला पलादि वोलमा छे एम कहे तेम ज हाथ अने दंडादिवडे भूमि तेम ज वस्त्रादिनुं जे स्फुटपणे प्रमाण कहे, ते उपमान समजवू. ( ३४ ) आवा वर्णवालं आ स्वर्ण छे अथवा भाचा पाणीचालु आ रत्न छ, एम कहे ते प्रमाण समजवू अने गणित तो पूर्व कही आवेल बीए ते प्रमाणे समजबू, (३५) (श्रा रीते पांच प्रकारो समजवा.) दोरीमा मणि विगेरे सम्यक् प्रकारे गोठवधा ते प्रोत भने समुद्रादिकमां वहाण विगेरे चलायचा ते पोत कहेवाय छे. (पा पण शीखव्यु) (३६) विसंवाद थये सते राजकु- लादिमा जइने न्याय मेळववो ते, अथवा वस्तुनो क्रय-विक्रय करवो ते व्यवहार कहेवाय छे. (३७) नीति सामादिक, युद्ध पाहुयुद्धादि अनेक प्रकारतुं, इप्रशास्त्र, धनुर्वेद, सर्ग ३२ मो। (४१७) राजादीनां च सेवना ॥३८॥ वैद्यशास्त्रं नीतिशास्त्रं बंधनं निगडादिभिः। मारणं नागपूजाद्या यज्ञा ऐंद्रादयो महाः ॥ ३९ ॥ मेलको गोष्ठिकादीनां पूर्मामादिपरिग्रहः । प्रयोजनविशेपेण ग्रामादिजनसंगमः ॥ ४० ॥ एषु किंचिजिने राज्यं भुंजानेऽजायत क्रमात् । किंचिच्च भरते किंचित् प्रावर्तत तदन्वपि ॥ ४१ ॥ पडूभिः कुलकं ॥ स्वयं त्वदर्शयत्सर्वाः कला शिल्पानि च प्रभुः । तेषामनेकभेदत्वं ततस्तेने जनः क्रमात् ॥ ४२ ॥ स्वस्तिका- दिमंगलानि रक्षादिकौतुकानि च । प्रभोः कृतानि देवेः प्राक् प्रावत ततो जने ॥ ४३ ॥ केशवस्त्राद्यलंकारै-दृष्ट्वा देवरलंकृतं। जगदीशं परेड- प्येवं कुर्वति स्म जना भुवि।। ४४ ॥ चूलाकर्मादि वालानां तिथिधिष्ण्या- दिसौष्ठवे । लेखशालोपनयनं प्रावर्त्तत विभोगिरा। ॥४५॥ प्रभोरिं- द्रकृतं दृष्ट्वा विवाहस्य महोत्सवं । लोका अपि तथा चक्रुः पाणिग्रहण- मंगलं ॥ ४६॥ युग्मिधर्मनिपेधाय भरताय ददौ प्रभुः। सोदर्यो वाहु- चलिनः सुदरी गुणसुंदरीं ॥४७॥ भरतस्य च सोदर्या ददो ब्राह्मी .. . राजादिकनी सेवना केम करवी ? ते, वैद्यशास्त्र, नीतिशास्त्र, निगडादिवडे बंधन, मारण, नागपूजादि यज्ञो, इंद्रादिक महोत्सवो, गोष्ठिकादिनो मेळाप, नगरपामादि ग्रहण करवा, कोइ प्रयोजन विशेपे ग्राम्यजननुं एकत्र मळg-श्रा पधामा केटलुक प्रभु राज्य करते सते थरं, त्यारपछी अनुक्रमे केटलुक भरतचको राज्य करते सवे प्रवश्यु भने केटलुक त्यारपछी पण थयु. (३८-४१) सर्व कळा अने शिन्पो प्रमुए पोते बतान्या पछी लोकोए तेना अनेक भेदोनो विस्तार पोतपोतानी बुद्धि प्रमाणे कयों. (४२) स्वस्तिकादि मंगळो भने रक्षादि कौतुको प्रथम देवोए प्रभुना संबंधमां कर्या पछी लोकोमा प्रवा. (४३) केश, घस्र अने अलंकारादिवडे देवोए प्रभुने अलंकत कर्या ते जोड़ने वीजा लोको पण पृथ्वीपर ते प्रमाणे करवा लाग्या. (४४) पाळकानुं चूलार्म विगैरे भने लेखशाळाए साड विगैरे सारी तिथि ने नक्षत्रमा प्रमुए यताच्या प्रमाणे करवानुं शरु थ'. (४५) प्रमुनो इंद्रे करेलो विवाहमहोत्मव जोइने लोको पण ते ज प्रमाणे पाणिग्रहण महोत्सव करया लाग्या. (४६) पुग्मधर्मनो निषेध करवा माटे पाहुपलिनी सहोदरी गुणोवडे सुंदर एवी सुंदरी प्रमुए मरतने पापी (४७) भने मरतनी सहोदरी मामीने प्रमुए पाहु. १ पाळ उतराववा.

(४२८) श्रीकाललोकप्रकाश । जगत्प्रभुः । भूपाय बाहुबलिने तदादि जनताप्यथ ॥ ४८॥ भिन्नगोत्रा- दिकां कन्यां दत्तां पित्रादिभिर्मुदा । विधिनोपायत प्रायः प्रावर्त्तत तथा ततः॥४९॥ एवं च पालयामास तद्राज्यं वृषभो नृपः । त्रिषष्टिं पूर्वलक्षाणि प्रीणितप्राणिमंडलः ॥ ५० ॥ व्यशीती पूर्वलक्षेषु गतेष्वेवं च जन्मतः। व्यतरद्वार्षिकं दानं जिघृक्षुः संयम प्रभुः ॥ ५१॥ ददतं वार्षिकं दानं दृष्ट्वा च जगदीश्वरं । प्रावर्त्तत जनोऽप्येवं दानं दातुं यथाविधि ॥५२॥ एवं च धनरत्नादि दानं प्रावर्तत क्षितौ । अद्यापि तत एवेद-मविच्छिन्नं प्रवर्तते ॥ ५३॥ विभज्यादाजिनो राज्य-शतं पुत्रशताय च । ततः पिता स्वपुत्रेभ्यो दद्यादित्यभवत् स्थितिः ॥ ५४ ॥ प्रवर्द्धमानवैराग्यः संप्राप्तः पश्चिमं वयः। सुदर्शनाख्यां शिविका- मारूढः ससुरासुरः ॥ ५५ ॥ कृतषष्ठतपा उग्र-भोगादीनां सहस्रकैः । चतुभिः सार्द्धमागत्य विनीतायाः पुरो बहिः ॥ ५६ ॥ स सिद्धार्थवनो- बलिने भापी. त्यारथी लोकोमा ते प्रमाणे प्रवृत्ति चाली. (४८) तेमज भिन्न गोत्रादिक- वाळी भने तेना मातापिताए दीघेली कन्यानुं विधिप्रमाणे पाणिग्रहण कर एवी प्रवृत्ति पण त्यारथी ज चाली. (४९) ए प्रमाणे वृषम राजाए त्रेसठ लास पूर्व सुधी अनेक प्राणीवर्गने सुख उपजाववा- पूर्वक राज्यनी प्रतिपालना करी. (५०) ए रीते जन्मी त्राशी लाख पूर्व व्यतीत थया त्यारे संयम ग्रहण करवाने इच्छता प्रभु वार्षिकदान प्रापवा लाग्या. (५१) जगदीश्वरने वार्षिक दान देता जोइने लोको पण ते ज प्रमाणे यथाविधि दान देवामा प्रवा. (५२) ए रीते धन-रत्नादिनुं दान पृथ्वीपर प्रवत्यु के जे अद्यापि अविछिन्नपणे प्रवर्ते छ. ( ५३ ) प्रभुए राज्यना सो भाग करीने सो पुत्रोने वडेंची दीधा त्यारथी पिता पोताना पुत्रोने भाग वहेंची श्रापे एवी प्रवृति शरु थइ. (५४) ए प्रमाणे प्रवर्धमान वैराग्यवाळा अने पश्चिमवयने पामेला प्रश्न सुदर्शना नामनी शिषिकामा बेसीने मुरासुरना परिवार साथै, छठ तप करीने, उनमोगादि जातिना चार हजार राजपुरुषोनी साथे विनीतानगरीनी बहार उद्यानमा प्राध्या. (५५-५६) त्या सिद्धार्थ- सर्ग १२ मो। (४२९) द्याने तलेऽशोकमहातरोः । चके लोचं चतुर्मुष्टि-मपराहणे जगत्प्रभुः ॥५७॥ स्वर्णवर्ण स शृंगस्थं केशमुष्टिं च पंचीं। ररक्ष शक्रविज्ञप्त्या दक्षो दाक्षिण्यसेवधिः॥ ५८ ॥ अनुप्रवजितास्तेऽपि स्वामिमार्गानुगामिनः । अरक्षन् पंचमी केश-मुष्टिं स्कंधोपरि स्थितां ॥ ५९ ।। चैत्रस्य श्यामला- टम्या-मेमाचवतःप्रभुः। विजहार क्षितावंगी-कृतमौनायभिग्रहः॥३०॥ तदानी च न जानाति लोको भिक्षा नु कीदृशी। कीदृशाः खलु भिक्षाका दीयते सा कथं कदा ॥ ६१ ॥ अनुप्रव्रजितास्तेऽथ कच्छायाः क्षुत्तृडर्दिताः । पृच्छंति भोजनोपायं प्रभुं प्रणतमौलयः ॥ ६२ ॥ अज- ल्पति प्रभौ नित्यं क्षुद्वयथामसहिष्णवः । गंतुं गृहेऽनुचितमि-त्यभूवं- स्तापसा वने ॥ ३३ ॥ अगृह्णन्नबुधैर्लोक-र्दीयमानं धनादिकं । हस्तिनागपुरं प्रापा-देन धमा विहरन् विभुः ।। ६४ ।। स्वामी किंचिन्न लातीति श्रुत्वा जनम- हारवं । दृष्ट्रा च प्रभुनेपथ्यं श्रेयांसाख्यो नृपात्मजः ॥ ६५ ॥ जातजा- वन नामना उद्यानमा प्रशोक नामना महावृक्षनी नीचे अपरान्हे जगत्प्रभुए चारमुष्टि लोच कर्यो. (५७) पछी मस्तकरूप शृंगपर रहेला स्वर्णसरखा वर्णवाला एक मुष्टि- प्रमाण केशोने इंद्रनी विज्ञप्तिथी दक्ष भने दाक्षिण्यताना भंडार एवा प्रभुए रहेवा दीघा. (५८) स्वामीना मार्गानुयायी भने स्वामीनी साथे प्रवजित थयेला राजपुत्रोए पण स्कंधपर रहेल पंचम मटिगत केश रहेका दीपा. (५९) ए प्रमाणे चैत्रवदि अष्टमीए प्रमुए व्रत ग्रहण कर्यु अने अंगीकार कर्या छ मौनादि अमिग्रह जेणे एवा प्रभुए पृथ्वीपर अन्यत्र विहार कर्यो. (६०) हवे ते वसते लोको जाणता नहोता के मिचा केवी होय ? मिनावर केवा होय ? मिक्षा केम देवाय ? भने क्यारे देवाय १. (६१) तेथी प्रमुनी साथे प्रवजित थयेला कच्छ विगेरे क्षुधा ने सपाधी पीडित थया सता प्रभुने नमस्कार करीने मोजननो उपाय पूख्वा लाग्या; (६२) परंतु प्रभु वो बोलता नहोता-जवाव भापता नहोता एटले निरंतर सुधा- तृपाने सहन नहीं करी शकनारा तेरो पाछा परे जवू ते पण अनुचित जाणीने वापसो यया भने वनमा रहेवा लाम्पा. (६३) हवे प्रस प्रधानलोको तरफधी देवा माटे घरवामां भावता धनादिकने प्रहण नहीं करता मनुक्रमे विचरता एक वर्ष लगमग व्यतिक्रमे हस्तिनापुरमा भाव्या. (६४) 'स्वामी कांद लेता नथी' एवो लोकोधी यतो महाशब्द सांमळता भने प्रसनो वेश जोत (४३०) भीकानझोकप्रकाश । तिस्मृतिश्चित्ते चिंतयामासिवानिति । अहो प्रभुर्यतीभूतः किं कुर्वीत धनादिभिः ॥ ६६ ॥ भवादहं तृतीयेऽस्मा-स्वामिनश्चक्रवर्तिनः । सारथिः सार्द्धमेतेना-भवं पालितसंयमः ॥ ६७ ॥ नवकोटिविशुद्धं त-द्भोज्यम- स्योपयुज्यते । कर्मक्षयसहायस्य साधोदेहस्य धारकं ॥ ६८ ॥ घटमिक्षु- रसस्यैक केनचित्प्रामृतीकृतं । तदा भगवते सोऽदा-निर्दोषं विशदा- शयः ॥ ६९ ॥ अत्र चावश्यकचूर्णावेक इक्षुरसघट उक्तः, पद्मानंदका- व्यहेमऋषभचरित्रयोस्तु (भक्तामरवृत्तावपि ) ते बहव उक्ताः संतीति ज्ञेयं. पाणिभ्यां च गृहीत्वा तं प्रभुः पाणिपतद्ग्रहः । वार्षिकी पारणां चक्रे बिंदुमप्यकिरन् भुवि ॥ ७० ॥ यतः-माइज्ज घडसहस्सा अहवा माइज सागरा सब्वे । जस्सेबारिसलद्धी सो पाणिपडिग्गही होइ ॥७१॥ स्पांना राजा चंद्रयांना पुत्र श्रेयांसने जातिस्मरण शान उत्पन्न , तेथी ते चित्तमा विचारवा लाग्या के-'अहो! प्रभु तो मुनि थया छे. ते धनादिकने शुं करे ? १६५-६६ ) मा भवथी त्रीजे भवे प्रभु ज्यारे महाविदेहमा चक्रवर्ती हता त्यारे हुँ तेमनो सारथी हतो, भने एमनी साथे में पण चारित्र लीधुं हतुं अने पाळ्युं हतं (६७) वेथी हुँ जाणुं छु के आ प्रमुने तो नवकोटिवडे परिशुद्ध भोजन ज उपयोगी थाय. कार- ण के साधुने कर्मक्षयमा सहायक एवा देहने ते मददगार पाय छे.' (६८) श्रेयांस मा प्रमाणे विचारे छे तेवामा कोइए श्रावीने इचरसनो एक घडो तेने भेट कर्यो. एटले विशद श्राशयवाळा तेणे ते निर्दोष वस्तु प्रभुने मापी-वहोरावी. (६९) अही श्रावश्यक र्णिमा इनरसनो एक घडो को छे, परंतु पद्मानंद काव्यमा श्रने हेमाचार्यकृत ऋपम- चरित्रमा ( तथा भक्तामरनी टीकामा पण ) पणा घडा कह्या छ एम जाणवू. प्रभु पाणि- पतद्ग्रह एटले हस्तरूपपात्रवाळा होवाधी प्रभुए ते रम हाथमा ज लीधो भने वर्षांतपर्नु पार| कर्यु. ते रसमाथी एक बिंदु पण जमीनपर पडधुं नहीं. (७० ) का छे के-हजारो घडा समाइ जाय अथवा सर्व समुद्र पण जेना हाथमा समाइ जाय एवी जेने लब्धि होय ते ज पाणिपात्र ( हस्तपात्र ) थाय. (७१) ते वखते त्यां पंचदिव्य प्रगट थया अने १ अत्रान्तरे च कश्चि-नव्येतुरसेन संभृतान् कुम्भान् । युवराजपुरोऽढोकय-दिनुवशा यद्विभोर्वश्याः ॥ १८ ॥ (एकविंशश्लोकवृत्तौ) २ बाहुबलिना पुत्र. ३ आ अवसरे युवरा- जनी पासे कोइक पुरुपे ताजा इक्षुरसना भरेला घडामो लावीने मूक्या, केमके प्रभुना वंशजो इक्षुने वश छे. १८. ( २१ मा श्लोकनी टीका) । - मर्ग ३२ मो। (४३१) पंचदिव्यान्यजायंत प्रससार यशो भुवि । श्रेयांसोपक्रमं पात्र-दानं प्रावर्तत क्षितौ ॥ ७२ ॥ तथोक्तमावश्यकनियुक्तो-संवच्छरेण लद्धा भिरका उसहेण लोगनाहेण । सेसहिं धीश्रदिवसे लदाउ पढमभिरकाउ ॥ १॥ अत्र यद्यपि-राधशुक्लतृतीयायां दानमासीद्यदक्षयं । पर्वाक्षय- तृतीयेति तदद्यापि प्रवर्तते ॥ १ ॥ इति शत्रुजयमाहात्म्यवचनात्, चैत्र- कृष्णाष्टम्या अक्षयतृतीयायां साधिकं वर्ष स्यात्तथापि किंचिदाधिक्य- स्याविवक्षया वर्षमुक्तमिति संभाव्यते, अत एव भक्तामरवृत्तावुक्तं- साधिकवर्ष चतसृषु दिक्षु बहल्यादिमंडलानि विभुः। व्यहरन् मुक्ताहारो मुनिभिक्षामूर्खमनुजवशात् ॥ १॥ सहस्रमेकं वर्षाणां विजहार क्षिताविति । प्रमादकालस्तत्राहो-रात्रं संकलितोऽभवत् ॥ ७३ ॥ शाखापुरे विनीतायाः पुरिमतालसंज्ञके । उद्याने शकटमुखे न्यग्रोधस्य तरोस्तले ॥ ७४ ॥ विहिताप्टमभक्तस्यो- स्पेदे केवलमुज्ज्वलं । फाल्गुने श्यामैकादश्यां पूर्वाग्रे ध्यानशुद्धितः ॥७॥ श्रेयांसनो यश पृथ्वीपर विस्तार पाम्यो. या पृथ्वीपर थेयांसथी ज पात्रदाननी प्रवृत्ति शरु थइ. (७२ ) श्रीश्रावश्यकनियुक्तिमा कहां छे के-" श्रीऋषमलोकनाथे एक वर्षे मिधा मेळवी. वीजा ग्रेवीशे प्रभुए दीक्षाने बीजे दिवसे ज प्रथम मिधा प्राप्त करी." अहीं " वैशाख शुक्ल तृतीयाने दीवसे भक्षय दान अपाणुं वेथी ते दिवस अक्षयतृतीया नामना पर्व तरीके अद्यापि पण प्रवते छे. श्रा प्रमाणे श्रीशचुंजयमाहात्म्यमा कडुं छे. धे वदि ८ थी अघयतृतीयाए साधिक वर्ष (१३ मास ने १० दिवस) थाय छ, वयापि काइक अधिकनी विवक्षा न करवाथी एक वर्ष कहेल छे एम जणाय थे. भाज कारणथी मक्तामरनी वृत्तिमो कई छ के-'साधिक वर्षे पर्यंत चारे दिशामा बहलि विगेरे देशमा विचरता छता सर्वत्र मुनिभिक्षाथी अज्ञान मनुष्यो होवाथी प्रस आहार- रहित रखा. ए प्रमाणे प्रभु एक हजार वर्षसुधी पृथ्वीपर विचर्या. मां प्रमादकाळ पघो एकत्र पर एक महोराय जेटलो थयो. (७३) प्रति विनीतानगरीना परिमताल नामना शासापुरमा शकटमुख नामना उद्यानमा न्यग्रोध (पट) वृधनी नीचे अष्टमभक्त को थे जेथे एषा प्रसुने फागण यदि मग्यारशे पूर्वान्हे ध्यान दियी केवळधान उत्सन भयं. (७४-७५) ते वसते भरत चक्री मरदेवी माताने हाथीपर बेसाडी साथै लाने प्रमुने १ भापणी फागण पदि ८. - , (४३२) भीकाललोकप्रकाश। तदा च मरुदेवांचा साकं भरतचक्रिणा। गजारूढा प्रभुं नंतु-मागच्छन्ती शिवं ययौ ॥ ७६ ॥ एतस्यामवसर्पिण्यां सिद्धोऽयं प्रथमोऽभवत् । अंत- मुंहतमात्रेण प्रभोः केवललाभतः ॥ ७७ ।। मरुदेवाशरीरं च देवैः सत्कृत्य संस्कृतं । प्रावतत ततो लोके शवसत्कृतिसंस्क्रियाः ॥ ७८ ।। एवं च-यादितस्तद्भवेऽष्टानां निर्वृता मातरोऽहतां । अष्टाप्टौ स्वर्गताः शेषा-स्तृतीयतुर्ययोः क्रमात् ॥ ७९ ॥ नाभिर्नागकुमारेऽगा-सप्ताहाटी ततः क्रमात् । द्वितीयादिपु नाकेपु त्रिष्वगुः पितरोऽहतां ॥८० ॥ इति प्रवचनसारोद्धाराद्यभिप्रायः, जितशत्रुसुमित्रविजयौ दीक्षितौ सिद्धौ इति तूत्तराध्ययनदीपिकायां. 'जितशत्रुर्ययौ मुक्तिं सुमित्रत्रिदिवं गतः' इति योगशास्त्रवृत्तौ, 'तृप्तो न पुत्रैः सगर' इति श्लोकवृत्तौ. श्रीवी- रमातापित्रोस्तु श्रीयाचारांगे दादशदेवलोकेऽपि गतिरुक्तेति ज्ञेयं. शतानि पंच पुत्राणां सप्त नप्तृशतानि च । भरतस्याद्यसमव-सरणे प्रावजन् प्रभोः ॥ ८१ ॥ अष्टापदाद्रौ समव-मृते च श्रीजिनेऽन्यदा । बोदवा श्रावता हता, वेवामां ने माता शिवपदने पाम्या -मोक्षे गया. (७६) श्रा अव- सर्पिणीमा ए प्रथम सिद्ध थया, कारण के प्रभुने केवळज्ञाननी प्राप्ति थया पछी अंतर्मुहूर्ते तेश्रो सिद्ध थया. (७७) मरुदेवा माताना शरीरनो देवोए सत्कार करवापूर्वक संसार कर्यो, त्यारथी लोकोमा शयनो सत्कार अने संस्कार शरु थया. (७८) प्रथमथी मांडीने आठ प्रभुनी माता तेज भवे मोने गया भने पीजा ने श्रीजा आठ माठ प्रभुनी माताओ त्रीजा ने चोथा देवलोकमां अनुक्रमे गया. (७९) नाभिराजा नागकुमारमा देव थया अने पाकीना सात, पाठ ने आठ प्रभुना पिता अनुक्रमे बीजा, त्रीजा ने चोथा देवलोकमां गया. (८०)श्रा प्रमाणे श्रीप्रवचनसारोद्धारनो अभिप्राय छ, परंतु श्रीउत्तराध्ययनसूत्रनी दीपिकामां तो अजितनाथना पिता जितशत्रु ने तेमना माइ सुमित्रविजय चंने दीक्षा लइने सिद्धिपदने पाम्या, एम कर्तुं छे. श्रीयोगशास्त्रनीवृ- तिमा 'तृप्तो न पुत्रैः सगरः' ए श्लोकनी टीकामा जितशत्रुराजा मोक्षे गया अने सुमित्र स्वर्गे गया' एम कडं छे. श्रीवीरप्रभुना मातापितानी गति श्रीश्राचारांगसूत्रमा बारमा देवलोकनी कही छे. इत्यादि. हवे ऋषभप्रभुना प्रथम समवसरणमा भरतना पांच सो पुत्रोए अने सात सो पुत्रना पुत्रोए प्रपासे चारित्र ग्रहण कयु. (८१) अन्यदा प्रभु अष्टापद पर्वते समवसर्या, ते सर्ग ३२ मो। (४३३) भरतोऽढौकयद्भोज्य-मनसा पंचभिः शतैः ॥ ८२ ॥राजपिंडोऽभ्याहृतश्च न यतिग्रहणोचितः। इत्युक्त स्वामिना खिन्नो भरतोऽथ हरिस्तदा ॥ ८३ ॥ पप्रच्छावग्रहं प्रोचे भगवांस्तं च पंचधा । इंद्रस्य चक्रिणो राज्ञो गृहेशस्य सधर्मणः ॥ ८४ ॥ वाध्यते पूर्वपूर्वोऽय-मय्याग्येण यथो. चरं । यथेंद्रावग्रहश्चय-वग्रहेणेह वाध्यते ।। ८४ ॥ श्रथ शक्रो विह- रतां श्रमणानामवग्रहं । अनुजज्ञे ततस्तुष्टो भरतोऽपि तथाकरोत् ॥८६॥ पप्रच्छ भरतोऽथेंद्रं रूपं कीदृगकृत्रिमं । भवतां वर्णिकाय चां-गुलीमेषो- ऽप्यदीहशत् ॥ ८७ ।। अष्टाहिकोत्सवं चके मुदितो भरतस्ततः। ध्वजो- सकः प्रववृते स एवंद्रमहोत्सवः ॥ ८८ ॥ अाहारेणोपनीतेना-मुनाथ विदधामि किं । अवादीद्भरतेनेति पृष्टः स्पष्टं सुरेश्वरः ॥ ८९॥ गुणा- धिकेभ्यः श्रध्धेभ्यः श्रद्धया दीयतामिति । भरतः श्रावकान् भक्त्या- हूयेत्यूचे कृतांजलिः ॥ ९०॥ अतः परं भवद्भिर्मे गृहे भोक्तव्यमिच्छया। घसते मरते मुनिदान माटे पांचशे गाढा परीने भोज्य ( पक्कान) प्रभु पासे धर्यु. (८२) त्यारे प्रभुए राजपिंड ने अभ्याइत ( सामो भावेलो) पिंड मुनिने ग्रहण करवायोग्य नथी एम कर्दा तेथी भरतराजा बहु खेद पाम्या. ते चसते इंद्रे प्रमुने भवग्रहसंबंधी पृच्छा करी. भगवंते कडु के-'इंद्रनो, चक्रीनो, राजानो, घरना स्वामीनो ने स्वधर्मी (साधु) नो एम पांच प्रकारनो अपग्रह कयो छे. (८३-८४) तेमा भागळ भागळना भरग्रहयी पूर्व पूर्वनो अवग्रह अनुक्रमे बाधा पामे छे. जेम इंद्रनो अवग्रह चक्रीना अाग्रहथी बाधा पामे थे. (अर्थात् इंद्रनो अपग्रह न होप पण चक्रीनो भवग्रह होय तो ते काम भावे छे). (८५) मा प्रमाणे समिळीने इंद्रे विचरता एवा मुनि मोने पोवाना प्रवाहमा विचर- पानी मामा मापी त्यारे संतुष्ट थाने भरते पण ते रीते कर्य. हवे भरत इंद्रने प्लेछे के-'समा स्वाभाविक रूप से होय हे?' वे बसवे पानकी तरीके इंद्रे पोवानी एक मांगळी यताबी, ना तेन सा पण चक्री जोर शक्या नहीं. (८७) से वसते मरते हर्ष पामीने नो अष्टाहिकोत्सव कों. ते पखवधी धजो. सपनी प्रचि शरु घर ते जद्रोत्सा समजवो. (८८) हवे मरते इद्ने पक्ष्यु के- 'मारे मा लावेला भाहारनु गु करयुं ?' एटले इंद्रे स्पष्ट रीते कार्य के-(८९) 'गुपा- पिक एवा यायकोने श्रद्धापूर्वक मापो. ' पछी मरत गुणवान पायकोने पोलादी हाय जोडीने पहेचा लाग्या (९०) के-'भाजयी उमारे मारे घरे इन्धापूर्वक जमई. भोजन श्रीकाललोकप्रकाश। कार्य न कार्य कृप्यादि भोज्योपार्जनहेतवे ॥ ९१ ॥ प्रासितव्यं सदा स्वच्छः शास्त्रस्वाध्यायतत्परैः । मह्यं वाच्यश्चोपदेशः समक्षं संगताविति ॥ ९२॥ जितो भवान् वर्द्धते च भयं मा हन तन्नृप । ततस्तेऽपि तथा चकु-निश्चिताः सद्बतस्पृशः ॥९२॥ सुखसागरमग्नत्वा-त्प्रमत्तो भरतोऽ- प्यथ । वांसि तेपामाकर्ण्य चेतस्येवं व्यचिंतयत् ॥ ९ ॥ एते वदंति किं हंत जितोऽहं कैर्भयं च किं । श्राः कपायनिर्जितोऽह-मेभ्य एवैधते भयं ॥९५॥ एवं विबोध्यमानस्तै-भरतेशोतरांतरा । संवेगं याति क- आणि श्लथानि कुरुते ततः॥ ९६ ।। - यथेच्छमप्रयासेन भोक्तव्यमिति नेकशः । ख्यापयंतः श्रावकं स्व- मभूवन् भोजनार्थिनः ॥९॥ ततश्च तावतां भोज्य-मुपस्कर्तुमनीश्वराः । व्यजिज्ञपन्नरेद्राय सूदास्ते विनयानताः ॥ ९८ ।। न विद्मो जनवाहुल्या- त्कः श्राद्धोऽत्र परश्च कः । ततश्चेत्यादिशदाजा भोज्यास्ते प्रश्नपूर्वकं मेळवा माटे तमारे खेती विगेरे उद्यम न करवो. (९१) तमारे निरंतर स्वच्छ थइने शास्त्रना स्वाध्यायमा तत्पर रहे, अने मने सर्व समक्ष मा प्रमाणे उपदेश वाक्य कहेवू के-(९२) 'जितो भवान् वर्द्धते भयं तस्मात् हे नृप ! मा हन'-तुं जीतायेलो छ, भय वधे छे, तेथी हे राजा ! तुं तारा मात्माने हण नहीं.' भरतचक्रीना भा प्रमाणे कहेवाथी तेस्रो पण ते ज प्रमाणे निश्चित थइने तेम ज व्रतधारी थइने करवा ने कहेवा लाग्या. (९३) सुखसागरमा मग्न थयेल होवाथी मरत प्रमत्तभाव पामतो हतो ते तेमना वचनो सामळीने चित्तमां आ प्रमाणे विचारया लाग्यो (९४) के-'हंत इति खेदे । श्रा कहे के के हुँ जितायेलो छ तो केनाथी जितायेलो छु ' अने भय वधे के एम कहे छे तो केनो मय वधे छ ? हा. हा. घरावर कहे छे. हुं कपायोथी जितायेलो छु अने तेनाथी ज भय बधे छे.' (९५) मा प्रमाणे प्रांतरे अांतरे चोध पमाडातो मरत संवेगने पामे के भने कर्मोने शिथिल करे ले. (९६) नहीं भरतराजाए श्रावकोने 'यथेच्छपणे प्रयास कर्या विना नहीं जमg' एम वारंवार कहेलुं होवाथी भोजनार्थी एवा घणा मनुष्यो पोताने श्रावक कहेवरावीने जमवा आववा लाग्या, (९७) तेथी तेटलायोनुं भोजन संधवामां असमर्थ थवाथी विनयथी नम्रपणे रसोइयायो मस्तचक्री पासे प्रापी विज्ञप्ति करवा लाग्या. (९८) के-'हे स्वामी ! घणा माणसो जमवा श्रावधाथी भमे समजी शकता नधी के आमां श्रावक सर्ग १२ मो। (४३५) ॥ ९९ ॥ अप्रानुस्तेऽथ चेयुयं श्रावकास्तहि कथ्यतां । कः श्राद्धधर्मः किं तत्व-त्रयं रत्नत्रयं च किं ॥२००॥ अजानतो निराकृत्य जानतस्तांश्च चक्रभृत् । रत्नेन काकिणीनाम्ना चक्रे रेखात्रयांकितान् ॥ २०१ ॥ षष्ठे पष्ठे च मास्येवं तत्परीक्षां नृपोऽकरोत् । ततस्ते माहना जाताः पर्यंता- त्तमहावताः ॥२॥ स्वसुतांस्ते च साधुभ्यो दत्तवतो महाशयाः । अभू- वन् श्रावकोत्तंसाः संयमाप्रभविष्णवः ॥ ३ ॥ तीर्थंकरस्तुतिप्रायान् श्राद्धधर्मनिरूपकान् । कृत्वार्यान् भरतो वेदान् तेभ्योऽदात्पाठहेनवे ॥४॥ अथैतांश्चक्रिमान्यत्वा-न्मन्यते स्म जनोऽखिलः । दानं च पात्रवुद्ध्यादा. द्रव्यवस्त्रग्रहादिकं ॥ ५॥ देवप्रतिष्ठोद्वाहादि यद्धम्यं यच्च लौकिकं । तत्तदेतान् पुरस्कृत्य गृहिकार्य जनोऽकरोत् ॥ ६ ॥ इत्यष्टौ पुरुषान् याव- दादित्ययशश्रादिकान् । अभवन्मान्यता तेषां भोजनं च नृपालये॥ ७॥ तत्रादित्ययशाः कुर्वन् पष्ठे मासि परीक्षणं । चकार काकिणीरत्नाऽ-भा- कोण छ भने अन्य कोण छे ?' त्यारे भरतचक्रीए प्राज्ञा करी के-'तमारे तेमने अमुक प्रश्नो पूछीने पछी जमाडवा.' (९९) एटले तेश्रो जमवा भावनारने पूछवा लाग्या के- जो तमे भावक हो तो कहो श्रावकधर्म शुं तवत्रय ने रत्नत्रय शु! (२००) आ प्रश्नोनो जवाब जे न पापी शके तेने दूर करीने जे परावर उत्तर प्रापे तेने चक्रवर्ती पासे मोकलता. चक्री तेने काकिणीरत्नवडे प्रण रेखा करीने अंकित करवा लाग्या. (२०१) पछी छ छ महीने या प्रमाणे परीघा चक्री करवा लाग्या. नेमा पास थनारामो 'माहन' थया भने पर्यते तेश्रोमांना फेटलाक महावना धारण करनारा (मुनि) थया. (२) वळी ते महाशयो पोताना पुत्रोने साधुनोने शिष्य तरीके पापवा लाग्या. संघम लेगाने असमर्थ एवा ते मो श्रावकावतंस (श्रावक श्रेष्ठ) थया. (२०३) तीर्थकरनी स्तुतिवाळा भने भारकधर्मनुं निरूपण करनारा एवा वेदो मरते रच्या भने ते भावकोने मणचा भाप्पा. (४) एमो चक्रीने मान्य थवाधी सर्व लोको ने मानया लाग्या अने पाप्रयुद्धिए द्रष्प, वस्त्र ने गृहादिकनुं दान आपवा लाग्या. (५) देवप्रतिष्ठा ने विचाहादि धर्म भने लोकिक एवा गृहस्थीमोना कृत्य होय ते लोको तेमने भागळ करीने करवा लाग्या. (६)मा प्रमाणे मरतना पुत्र आदित्ययशाथी माडीने भाठ पेढीसुधी वेनी मान्यता पाली भने राजभुवनमा मोजन परवानुं शरु रा. (७) तेमा मादित्ययशाए छ छ मासे परीक्षा परीने काकिणीरत्न न होवाची सुवर्णना दोरानी (४३६) श्रीकाललोकप्रकाश । वाच्चि सुवर्णजं ॥८॥ महाशयः प्रभृतयः केचिद्रूप्यमयं ततः। पट्टसूत्र- मयं केचि-ततः सूत्रमयं परे ॥ ९ ॥ यज्ञोपवीतमेतेषां तदद्यापि प्रव- र्तते । त्रितंतुकं पूर्वरूढ्या तत्त्वशून्यात्मनामपि ॥ १०॥ साधुमार्गव्यव- च्छेदा-दथ कालेन गच्छता। द्विजा मिथ्याविनोऽभूवन केऽप्यासन् श्रावका अपि ॥ ११ ॥ क्रमात् पर्वतसुलस-पिष्पलादादिभिः कृताः । वेदा थनार्यास्ते यज्ञ-जीवहिंसादिदूषिताः ॥ १२ ॥ प्रभोरभूवंश्चतुर-शीतिर्गणधरोत्तमाः । पुंडरीकप्रभृतयो गणास्तावंत एव च ॥ १३ ॥ कल्पसूत्रे च प्रथमगणधर ऋपभसेन इत्यभिधीयते, पुंडरीकस्यैव नामांतरमित्यन्ये. स्वदीक्षिताश्च चतुर-शीतिः साधुसह- स्रकाः । ब्राह्मीसुंदर्यादिसाध्वी-लक्षास्तिस्रः प्रकीर्तिताः ॥ १४ ॥ श्रेयांसादिनाद्धलक्ष-त्रयी पंचसहस्रयुक् । सुभद्रादिश्राविकाणां पंच लक्षास्तथोपरि ॥ १५॥ चतुष्पंचाशत्सहस्राः केवलज्ञानिनां पुनः। स्यु- विशतिः सहस्राणि लोकालोकावलोकिनां ॥ १६ ॥ सकलाक्षरसंयोग- विचतुर्दशपूर्विणां । चतुःसहस्री संयुक्ता पंचाशैः सतभिः शतैः॥ १७॥ निशानीयो करी. (८) महायशा विगैरेमा केटलाके रूप्यमय, केटलाके पट्टसूत्रमय अने कैटलाके सूत्रमय निशानीभो करी. (९) ते यज्ञोपवित कहेवाणी के जे अद्यापि तत्वशून्य आत्मानो पण पूर्वरूढिथी त्रण दोरावाळी धारण करे छे. (१०) हवे केट- लोक काळ गया पछी साधुमार्गनो व्यवच्छेद थवाथी ते घणा द्विजो मिथ्यात्वी थइ गया; केटलाक भावको पण रया. (११) अनुक्रमे पर्वत, सुलस अने पिप्पलाद विगेरेए यज्ञ भने जीवहिंसादिवडे क्षित एवा अनार्य वेदो बनाव्या. (१२) ऋपमप्रभुने पुंडरीक विगेरे चोराशी गणघरो थया ने गण पण तेटला ज प्रवा. (१३) श्रीकल्पसूत्रमा प्रथम गणधर ऋपभसेन कहेल छे ते पुंडरीकर्नु ज नामांतर के, एम अन्य कहे छे. प्रभुना स्वहस्तदीक्षित ८४००० साधुओ थया. ब्राह्मी-सुंदरी विगैरे त्रण लाख साध्वीश्रो थइ. (१४) श्रेयांसादि त्रण लाख ने पांच हजार श्रावको थया. सुभद्रा विगैरे पांच लाख ने चोपन हजार श्राविकाओ थइ. लोकालोकावलोकी वीश हजार केवळज्ञानी मुनिश्रो थया. (१५-१६ ) सर्वाक्षरसंयोगने आणनारा चौदपूर्वी मुनि चार हजार सात सो ने पचास थया. (१७) नव हजार अवधिज्ञानी थया. वीश- सर्ग ३२ मो। (४३७) अवधिज्ञानभाजां तु सहस्राणि नवाभवन् । शता वैक्रियलब्धीनां पट् सहस्राश्च विंशतिः ॥९८ ॥ मनःपर्यायभाजां च सहस्रा द्वादशोपरि । पंचाशाः षट्शता ज्ञेयाः पंचाशाः सप्त वा शताः ॥ १९ ॥ वादिनां च सहस्रा द्वा-दशा द्वय श्च पट्शताः । निग्रंथानां सहस्राणि मुक्ति प्राप्तानि विंशतिः ॥२०॥ मुक्तिं प्राप्ताश्च साध्वीनां चत्वारिंशत्सहस्रकाः । स्वदीक्षितापेक्षयैपा संख्या सर्वा भवेदिह ॥२१॥ द्वाविंशतिः सहस्राणि शतानि च नवोपरि । अनुत्तरविमानेपू-त्पन्नान्यंतिपदा प्रभोः ॥ २२ ॥ पंचचापशत्तोत्तुंगः स्वर्णरुक् वृपलांछनः । व्यहात्पूिर्वलक्षं स सह- नाव्दोनितं भुवि ॥ २३ ॥ सच्छ्रीरोमकृताकार-महतां लांछनं भवेत् । व्यक्त्योपलक्ष्यावयव वृपेभतुरगादिकं ॥ २४ ॥ वरदं चाक्षमाला चा- पसव्यकरयोर्दधत् । मातुलिंगं पाशकं च बिभ्रद्वामकरद्वये ॥२५॥ यक्षः श्रीगोमुखः स्वर्ण-वर्णांगो गजवाहनः । चतुर्भुजो जयत्यादि-देवसेवक- वत्सलः ॥ २६ ॥ वामे धनुर्वनचक्रा-कुशान् पाणिचतुष्टये । दक्षिणे वरदं वाणं चक्रं पाशं च विभ्रती ॥ २७ ॥ देवी चक्रेश्वरी नाम्ना-प्रति. हजार ने छ सो बैंक्रियलन्धिवाळा थया. (१८) मनापर्यवज्ञानी चार हजार छ सो ने पचास अथवा सात सो पचास थया. (१९) यादी पार हजार छ सो ने पचास थया. घीश हजार मुनिश्री मोक्षे गया. (२०) साध्वीभो चाळीश हजार मोथै गइ. या पधी संख्या स्वदीधिनी अपेक्षाए समजवी. (२१) वाशि हजार ने नव सो प्रभुनी पर्पदाना मुनियो भनुत्तरविमानमा उत्पन्न थया. (२२) पाचशे धनुष्य उंचा, स्वर्णसमान वर्णवाला ने पमना लायनवाला प्रमुए केवळनान पाम्या पछी एक हजार वर्षे न्यून एक लारा पूर्व पृथ्वीपर विहार कर्यो. (२३) अरिहं- तने लाछन शोमायाळा गेममा तेवा श्राकारवालं होय छे. तेमां धूपम, तुरगादिकना अवरको प्रत्यक्ष भोळखी शकाय छे. (२४) प्रमुनो यच गोमुख नामनो, दक्षिण तर. फना पे हाथमा वरद ने भघमाळाने धारण करनारो अने डापी पाजुना पे हाथमा मातुलिंग (पीजोरुं) ने पाशने धारण करनारो, स्वर्णवर्णी शरीरवाळो, गजना पाहन. पाठो, चार मुजावालो जयवंत चते थे. ते आदिनायना सेपकोनो वत्सल थे. (२५-२६) यही पधरी नामनी डावी पाजुना पार हाथमा धनुप्प, वज, चक ने भंकुशने धारण करनारी तथा जमणी पाजुना धार हायमा वरद, पाण, पक भने पाशने धारण करनारी, .

.. (४३८) श्रीकाललोकप्रकाश। चका मतांतरे । जयत्यष्टभुजा तार्य-चाहना कनकद्युतिः ॥ २८ ॥ पूर्वाणां लक्षमित्येकं श्रामण्यं परिपाल्य सः । अष्टापदं महाशैलं जगाम विहरन् विभुः ॥ २९ ॥ तत्रोत्तमानगाराणां सहस्रैर्दशभिः सह । विधायानशनं पड्भि-रुपवासैरपानकैः ॥ ३० ॥ माघासितत्रयोदश्यां धिष्ण्ये चाभिजिदाहये । पूर्वाहे प्राप पर्यका-सनस्थः परमं पदं ॥३१॥ ततः पूर्वोक्तविधिना शक्राद्यैः समहोत्सवे । प्रभोः कृतेंगसंस्कारे गृहीतेषु च सक्थिषु ॥ ३२ ॥ चक्रिरे भस्मना तेन तिलकानि नृपादयः । ततः शेषा यथालाभं भस्ममिश्रमृदादिभिः ।। ३३ ॥ अत्र चितादिस्वरूपमेवमावश्यकवृत्तौ हारिभयां-पूर्वेण भगवत- श्चिता वृत्ता, दक्षिणेनेवाकूणां चिता व्यत्रा, अपरेण शेषसाधुचिता चतुरस्त्रा, ततोऽग्निकुमारा वदनैः खल्वग्निं प्रक्षिप्तवंतस्ततो लोकेऽग्नि- मुखा देवा इति प्रसिद्धमित्यादि. प्रभोश्चिताग्निमसकृ-याचिता माहनः सुराः । पाहुस्तान याचकांस्ते च तथैव प्रथिता भुवि ॥ ३४ ॥ सदा- पाठ भुजावाळी, गरुडना वाहनवाळी अने कनकसमान कांतिवाळी, जेनुं बीजुं नाम अप्रतिचक्रा छे ते जय पामे छे. (२७-२८) एकंदर एक लाख पूर्वनो श्रमणपर्याय पाळीने पृथ्वीपर विचरता प्रभु प्रांते अष्टापद पर्वतपर पधार्या. ( २९ ) त्या पाणी विनाना छ उपवासवडे दश हजार उत्तम मुनिमोनी साथे प्रभुए अनशन कयु' (३०) अने माघ चदि त्रयोदशीए अभिजित् नक्षत्रमा पूर्वा- हुने पर्यकासने स्थित रहेला प्रभु परमपदने पाम्या. (३१ ) पछी पूर्वे कही गया प्रमाणे विधिपूर्वक शक्रादिक ऋपभप्रभुनो महोत्सवपूर्वक अंगसंस्कार कर्यो अने इंद्रादिके दाढा विगेरे लीधी. (३२) पछी नृपादिके तेनी रक्षावडे तिलक कर्या अने त्यारपछी भस्ममिश्र मृत्तिकाविगेरे जे लम्य थयु तेनावडे वीजामोये तिलक कर्या. (३३) अहीं चिता विगैरेनुं स्वरूप हारिभद्री यावश्यकवृत्तिमा या प्रमाणे कहेल छ:--पूर्व बाजुए भगवंतनी चिता गोळ, दक्षिण चाजुए इक्ष्वाकु मुनियोनी ( गणधरोनी ) त्रिकोण अने पश्चिमे शेष साधुनी चिता चोखुणी करे. पछी अग्निकुमारदेवो पोताना बदनवडे अग्नि क्षेपन करे, तेथी लोकोमा देवो अग्निमुख होय छे एम प्रसिद्ध थयेल छे. इत्यादि. प्रभुनी चिताना अग्निनी माहनोए देवो वारंवार याचना करी त्यारे देवोए तेमने याचक कथा तेथी तेश्रो याचक तरीके पृथ्वीमा प्रसिद्ध थया. (३४) तेओ ते .. सर्ग ३२ मो। (४३९) निर्वाणमग्निं तं धृत्वा कुंडेषु वेश्मसु । त्रिसंध्यं पूजयंतस्ते संजाता श्रा- हिताग्नयः ॥ ३५ ॥ अर्हदेदवास्वन्यसाधु-चितात्रयसमुद्भवः । त्रिविधोऽ- ग्निः कष्टपापहरोऽभूदग्निहोत्रिणां ॥ ३६ ॥ अथ वार्द्धकिरत्नेन भरतस्तत्र पर्वते । अचीकरजिनगृहं गव्यूतत्रि- तयोच्छ्रितं ॥ ३७॥ योजनायामतदर्द्ध-विष्कभं तच्चतुर्मुखं । चतुर्विंशदर्ह दर्चा मानवर्णान्विता दधौ ।। ३८ ॥ तस्मिन् सिंहनिषद्याख्ये प्रासादे भरतश्वरः । अकारयजिनार्चानां प्रतिष्ठां मुनिपुंगवैः ॥ ३९ ॥ भ्रातृणां नवनवतेः प्रतिमामात्मनोऽपि च । तथा स्तूपशतं तत्र चितास्थानेष्व. रीरचत् ॥ ४० ॥ नवनवतेतृणा-मेकं स्तूपं जगद्गुरोः । मा कात्कि- श्चिदाकाम-नेतदाशातनामिति ॥ ४१ ॥ संतक्ष्य दंडरत्नेन परितोऽष्टा- पदं गिरिं । अष्टौ योजनमानास्त-मेखलाः स व्यरीरचत् ॥ ४२ ॥ चके लोहमयान् यंत्र-पुरुपान् द्वारपालकान् । ततः क्रमेण सगरा- त्मजैश्यानुरागतः ॥ १३ ॥ कृतात्र दंडरत्नेन परिखा दिव्यशक्तिना । भगीरथेन सा गंगा-जलौघैः पूरिता ततः ॥ १४ ॥ निर्वाणनो अग्नि पोताना घरमा कुंडनी अंदर दाखल करीने त्रिसंध्य तेनी पूजा करपा लाग्या तेथी सेमो प्राहिताग्नि (अग्निहोत्री) यया. (३५) अरिहंत, इक्ष्वाकु (गण- घरो) अने अन्य साधुनी प्रण प्रकारनी चिताथी उत्पन्न थयेलो प्रिविध अग्नि अग्निहो- प्रीमोने कष्ट ने पापनो हरनार थयो. (३६) हचे वार्धकीरत्न पासे चक्रीए ते पर्वत उपर एक महान् जिनगृह कराव्युं. ते प्रण पाठ उंचु, एक योजना लाई, अर्ध योजन पहो, चार द्वारवालं अने चोवीशे वीकरला देहमान तथा पर्णवाळी चोवीश प्रतिमावडे अलंकत कर्प(३७-३८) ते सिंहनिषया नामना प्रासादमा भरसचक्रीए श्रेष्ठमुनिमो पामे जिनप्रतिमामोनी प्रतिष्ठा करावी. (३९) नवाणु भाइयोनी तेम ब पोतानी प्रतिमा करावी भने चिताने स्थाने सो स्तूप पनाव्या. (४०) मा ९९ स्तूप ९९ माइमोना ने एक प्रभुनो एम १०० स्तूप मा स्थाननी कोर पालवाथी भाशावना न करो एम विचारी चितास्थाने ज को. (४१) पछी दंडरत्नपडे सोदाषीने भष्टापद पर्वत फरती योजन योजनप्रमाण माठ मेसलामो करी (४२) भने द्वारपाल वरीके लोहमय यंत्रपुरुषो कर्या. अनुक्रमे सगरचक्रीना पुरोए पासाना वंशजना भनुरागधी दंडरत्लवडे दिम्पपितथी पर्वत फरती खाइ करी भने मगीरपे से सार गंगाना जळपडे पूरी. (४३-४४) । (४४०) श्रीकालनोकप्रकाश अथ प्रकृतं-पुत्रपौत्रादिका शिष्य-प्रशिष्यायेति च द्विधा । नाभे- यस्य भगवतो-ऽभवत्पपरंपरा ॥ ४५ ॥ तत्र शिष्यप्रशिप्यादि-पारं- पर्यव्यपेक्षया । पहाधिपाः प्रभोः संख्या-तीताः प्रापुः परं पदं ॥ ४६ ॥ आदित्ययशश्रादीनां या तु निर्वाणपद्धतिः । सर्वार्थसिद्धांतरिता नंदि- सूत्रादिपूदिता ॥ १७ ॥ सापेक्ष्य पुत्रपौत्रादीन् पद्देशान् कोशलाप- तीन् । प्रतिलोमानुलोमादि-स्तत्रैवं सिद्धदंडिका ॥ १८ ॥ पट्टे वृषभदेवस्य प्रथमं भरतेश्वरः । श्रादर्शग्रहसंप्राप्त-केवलो निवृतिं ययौ ॥४९॥ ततो राजादित्ययशा-स्ततो राजा महायशाः । ततश्चातिवलो राजा ततो राजा महाबलः ॥ ५० ॥ तेजोवीर्यः कीर्ति वीर्यो दंडवीर्यो महीपतिः । जलवीर्यश्चेति भूपाः ख्याता वृषभवंशजाः ॥ ५१ ॥ अयं स्थानांगाभिप्रायेण नामक्रमः, अावश्यके तुराया आइ- चजसे १ महाजसे २ अतिवले य ३ वलभद्दे ४ । बलविरिय ५ कित्ति विरिए ६ जलविरिए ७ दंडविरिए य ८॥१॥ इह चान्यथात्वमेक. स्यापि नामांतरभावाद्वाथानुलोम्याच संभाव्यत इति स्थानांगवृत्तौ. एभिरेवाष्टभिर्मोला-वधारि मुकुटः प्रभोः। वोढुं नाशक्यतान्यैस्तु क्रमा- हवे प्रस्तुत कहे छे-नाभिराजाना पुत्र ऋषभदेवनी पट्टपरंपरा पुत्र-पौत्रादिकथी श्रने शिष्य-प्रशिष्यादिकथी एम चे प्रकारे चाली. (४५) तेमां शिष्य-पशिष्यादि परंपरानी अपेक्षाए प्रभुना असंख्य पट्टाधिप मोक्षे गया. (४६) श्रादित्ययशा विगेरेनी जे निर्वाण- पद्धति सर्वार्थसिद्ध अंतरित छे ते नंदीसूत्रादिकमा कहेली छे. (४७) पुत्रपौत्रादिनी अपेक्षाए कोशळापतिनी पट्टपरंपरा प्रतिलोम-अनुलोमादिवडे सिद्धदंडिकामां आ प्रमाणे बतावेली छे. (४८) ऋषभदेवनी पाटे प्रथम भरतेश्वर थया ते आदर्शभुवनमा केवळज्ञान पामीने मोक्षे गया. (४९) तेनी पाटे आदित्ययशा, तेनी पाटे महायशा, तेनी पाटे अतिथळ, तेनी पाटे महाबळ, (५० ) पछी तेजोवीर्य, पछी कीर्तिवीर्य अने पछी दंडवीर्य ने आठमे पाटे जलवीर्य-ए प्रमाणे ऋषभप्रभुना वंशमा राजाओ थया. (५१) स्थानांगने अभिप्राये श्रा क्रम छे. आवश्यकमा तो-'आदित्ययशा, महायशा, अतिवळ, बळभद्र, बळवीर्य, कीर्तिवीर्य, जळवीर्य ने दंडवीर्य -एम माठ पाट कही छे. 'अहीं जे जुदापणुं छे ते नामां- तरना कारणथी अथवा गाथाना अनुलोमपणाथी जणाय छ, एम स्थानांगनी वृत्तिमा कड्युं छे. भा पाठ पाटसुधीना राजामोए ऋषभप्रानो मुकुट मस्तके धारण कर्यो. त्यार- सर्ग ३२ मो। (४४१) द्वीनवपुर्वलैः ।। ५२ ॥ भुक्वते भरतार्द्धस्य राज्यमादर्शसद्मनि । केवलं प्राप्य प्रपन्न-मुनिवेषाः शिवं ययुः ॥ ५३ ॥ एवं निरंतरं सिद्धिं ययुर्लक्षाश्चतुर्दश । ततः सर्वार्थसिद्धेऽगा-देक- स्तस्यान्वये नृपः ॥ ५४ ॥ पुनर्निरंतरं जग्मुः सिद्धिं लक्षाश्चतुर्दश । एकः सर्वार्थसिद्धेऽगा-पुनरेवमिति क्रमः ॥ ५५ ॥ तावद्यावदसं. ख्याः स्यु-नृपाः सर्वार्थसिद्धिगाः । चतुर्दशचतुर्दश-लक्षव्यवहिता अपि ॥ ५६ ॥ ततः पुनर्ययुर्मुकि नृपलक्षाश्चतुर्दश । द्वौ च सर्वा- सिद्धेऽथ मुक्तिं लक्षाश्चतुर्दश ॥ ५७ ॥ भूयः सर्वार्थसिद्धे द्वौ मुकौ लक्षाश्चतुर्दश । यावच्च द्विकसंख्याका असंख्येया भवंति ते ॥ ५८ ॥ एवमंतरिता लक्षै-श्चतुर्दशभिरंतरा । निरंतरं नृप- वरै-गच्छद्भिः पदमव्ययं ॥५९।। स्युः प्रत्येकमसंख्येया एवंत्रिचतुरादयः। पंचाशदंताः सर्वार्थ-सिद्धि प्राप्ता महाशयाः ॥ ६० ॥ युग्मं । उक्तं च- चउदसलका सिद्धा निवईणेको य होइ सवठे । एवं एकट्ठाणे पुरि- सजुगा होतऽसंखेज्जा ॥ ६१ ॥ पुणरवि चोदसलका सिद्धा निवईण पछीना पाटे आवेल राजामो अनुक्रमे होनशरीर ने हीनपळवाळा होवाथी ते मुकुटने धारण फरी शक्या नहीं. (५२) ए आठे पाटना राजामा मरताना राज्यने भोगवीने भारिसा- भुवना केवळशान पामी मनिषेप धारण करी मोक्षे गया. (५३) सिदंडिका शरु-एम चौद लास पाटसुधी बघा राजामो मोघे गया पछी तेनी पाटना एक राजा सर्वार्थ सिद्ध गया. (५४) पाछा चौद लास मोई गया पछी एक राजा सर्वार्थसिद्धे गया. ए प्रमाणे त्यांसुधी समजवु के चौद लाखने भांतरे मातरे एकेक सर्थसिद्धिए गया ते असंख्य थाय. (५५-५६ ) त्यारपछी चौद लास मोघे ने पे सर्वा- सिदे गया. त्यारपछी चौद लाख सक्तिए गया. (५७) फरीधी ये सर्वार्थसिद्धिमा गया भने त्यारपछी चौद लास मुक्तिमो गया, ते घरेनी संख्यावाला पण असंख्य थाय त्यासुधी समजयं. (५८) पटी चौद चौद लाख निरंतर मोघे जनारा राजामोना गा. बामा प्रण प्रण भने पछी चार चार सर्वार्थसिद्ध बाय. से पण प्रख्याता पाय त्यांगुधी समजयं. एम यावत् प्रांतरे भीतरे पचास पचाससुधी मर्यामिदे जनारा पण असंख्याता पाप त्यांमुधी समज. (५९-६०) (ग्रही प्रण मागधी गामामो छ तेनो मर्थ उपर (४४२) श्रीकाललोकप्रकाश। दोवि सव्वछे । दुगठाणेवि असंखा पुरिसजुगा होति नायव्वा ॥ ६२ ॥ जाव य लखा चोइस सिद्धा पन्नास होति सम्वटे । पन्नासट्टाणे वि हु पुरिसजुगा होतऽसंखेज्जा ॥ ६३ ॥ अनुलोमा भवेत्सिद्ध-दंडिकेयमि- तोऽन्यथा । रीत्यानयैव भवति विलोमा सिद्धदंडिका ॥ १४ ॥ तथाहि-सर्वार्थसिद्धे प्रथमं ययुर्लक्षाश्चतुर्दश। तत एकोऽगमसिद्धिं पुनर्लक्षाश्चतुर्दश ॥ ६५ ॥ सर्वार्थं जग्मुरेवं च स्युरेकैफेऽप्यसंख्यकाः । मुक्ताश्चतुर्दश चतु-दशलक्षकृतांतराः ॥६६ ॥ एवं पंचाशदंतानां विमु- कानां निरंतरं । स्यात्प्रत्येकमसंख्यानां विलोमा सिद्धदंडिका ॥ ६७॥ उक्तं च-विवरीयं सबढे चउदसलरकाउ निव्वुयो एगो । सच्चेव य परिवाडी पन्नासा जाव सिद्धीए ।। ६८॥ मुक्तौ सर्वार्थसिद्धे च द्वे वे लक्षे निरंतरं । ययुस्ते समसंख्याका एयं त्रिचतुरादयः ॥६९॥ यावल्लक्षा असंख्येयाः स्युस्तुल्या उभयोरपि । समसंख्या भवेत्सिद्ध-दंडिकेयं तृतीयिका ॥ ७०।। उक्तं च-तेण परं प्रमाणे जथे.) (६१-६२-६३.) आ अनुलोमसिद्धदंडिका जाणवी. भा रीते ज प्रति- लोमसिद्धदीडका (त्यारपछी) बीजी जाणवी. (६३) ते भारीते-सर्वार्थसिद्धे चौद लाख गया पछी एक सिद्ध थाय. वळी चौद लाख सर्वा- र्थसिद्धे गया पछी एक सिद्ध थाय.ए एकेक पण चौद चौद लाखना प्रांतरावाळा असंख्याता थाय. ( त्यारपली चौद लाखना अांतरामा चे सिद्ध थाय ते पण श्रांतरावाळा असंख्याता थया पछी त्रण त्रण, चार चार ) यावत् पचाम पचास प्रांतरे आंतरे सिद्ध थनारा असंख्याता थाय त्यांसुधी समजवू. पा पिलोमसिद्धदंडिका समजची. (६५-६७) कझु छ के-'प्रथमथी विपरीतपणे एटले चौद लाख सर्वार्थे ने एक सिद्धिए. ए परिपाटीए यावत् पचास पचास सिद्ध थाय त्यासुधी समजवू.' (६८) (आ बीजी प्रतिलोम- सिद्धदंडिका जाणवी.) त्यारपछी ये लाख मुक्तिमा बे लाख सर्वार्थे एम सरखी संख्याए जाय, ते असं- ख्याता थया पछी ते जरीते त्रण लाख मुक्तिए ने प्रण लाख सार्थे एम असंख्याता थया पछी ए रीते पण त्रण लाख, चार चार लाख असंख्याता थाय. एम सरखी संख्या- वाळा असंख्याता संख्याता मुक्तिए ने सर्वार्थसिद्धे जाय. मा श्रीजी समसंख्यासिद्ध- दंडिका जाणवी. (६९-७०) कयुं छे के-'त्यारपछी चे वे लाख पे स्थानके एटले सर्ग ३२ मो। (४४३) दुदुलकाइ दो दो ठाणाइ समग वञ्चंति । सिवगइसबहिं इणमो तेसि विहा होइ ॥७१॥दो लका सिद्धीए दो लरका नरवईण सबढे । एवं तिलक चउ पंच जाव लरका असंखिज्जा ॥ ७२ ॥ ततश्चित्रांतराः ख्याता-श्चतस्रः सिद्धदंडिकाः। एकादिरेकाभ्यधिका तत्राद्या सिद्धदंडिका ॥ ७३ ॥ एकादिद्वयुत्तरान्या स्या-देकादिव्युत्तरा परा । स्यासिद्धदंडिका तुर्या द्विव्यादिविषमोत्तरा ॥ ७४ ॥ आदावेको ययौ मुक्तिं द्वौ सर्वार्थेषु जग्मतुः । ततस्त्रयो ययुर्मुक्तिं सर्वार्थेऽथ चतु- प्टयं ॥ ७५ ॥ इत्येकोत्तरया वृद्ध्या मुक्तिसर्वार्थसिद्धयोः । तावद्वाच्या असंख्येयाः स्युर्यावत्ते द्वयोरपि ॥ ७६ ॥ इयमेकोत्तरकादिः स्याच्चित्रां- तरदंडिका । द्वितीया द्वथुत्तरैकादिः साप्येवं परिभाव्यते ॥ ७७ ॥ आदावेको ययौ मुक्तिं सर्वार्थे च ततस्त्रयः । ततो मुक्तौ ययुः पंच सर्वार्थे सप्त ते ययुः ॥७८॥ एवं द्वयुत्तरया वृद्ध्या मुक्तिसर्वार्थसिद्धयोः । यावद्भवंत्यसंख्येया-स्तावद्वाच्या द्वयोरपि ॥ ७९ ॥ एकस्ततः परं मुक्ती सर्वार्थे च चतुष्टयं । मुक्तौ जग्मुस्ततः सप्त सर्वार्थे च ततो दश ॥८॥ सिद्धगतिमा ने सर्वार्थे जाय. ए प्रकारे तेनुं विधान जाणवं. वे लाख सिद्धिए ने चे लाख राजाभो सर्वार्थे, ए प्रमाणे प्रण प्रण लाख, चार चार लाख, पांच पांच लाख यावत् असंख्याता लाख सिद्धे ने असंख्याता लाख सर्वार्थे जाय. (७१-७२) त्यारपछी चोथी चित्रांतरा सिद्धदंडिका चार प्रकारे जाणवी. एकादि एकाधिक पहेली दंडिका, एकादि ये अधिक वीजी दंडिका, एकादि त्रण अधिक त्रीजी दंडिका अने चोथी वे त्रण विगैरे विषमोचर संख्यावाळी दंडिका जाणवी. (७३-७४) तेमा पहेली दंडिकामा एक मुक्तिए, ये सर्वाय, त्रय मुक्तिए, चार सर्वार्थ-(७५) आम एकेकनी घृद्धिए सिद्ध थनार ने सर्वार्थे जनारनी संख्या त्यांसुधी समजवी के ते घंने असंख्याता थाय. (७६) मा एकादिएकोत्तरचित्रांतरदंडिका जाणवी. त्यारपछी पीजी एकथी भारमीने पये अधिक संख्यावाळी दंडिका पा प्रमाणे समजवी-(५७) एक मोचे, प्रण सर्वार्थे, पांच मोक्षे, सात सर्वार्थे. (७८) या प्रमाणे द्विउत्तर वृद्धिए त्यांसुधी वधके. ते ते मोक्ष जनार ने सर्वाथै जनारनी संख्या असंख्याती थाय. (७९)त्यारपछी त्रीजी दंडिकामा एक मुक्तिए, चार सर्वार्थे, सात मुक्तिए, दश सर्वाथे, (८०) एम प्रण N .

(४४४) श्रीकाललोकप्रकाश एवं व्युत्तरया वृद्ध्या-ऽसंख्येयाः स्युयोरपि । तृतीया व्युत्तरैकादिः स्याचित्रांतरदंडिका ।। ८१ ॥ चतुर्थी च विचित्रा स्या-त्तस्याः पूर्व- महर्षिभिः। उपायोऽयं वक्ष्यमाणः परिज्ञानाय दर्शितः ॥२॥ एक ऊर्ध्व- मधश्चकः पुनरूवमधः पुनः । ऊर्ध्वाधः परिपाट्यैव-मेकोनत्रिंशतं त्रिकान् ॥ ८३ ॥ स्थापयेत्प्रथमे चात्र प्रक्षिपेन्नैव किंचन । प्रक्षेपाः स्युः क्रमादेते द्वितीयादित्रिकेषु तु॥ ८४ ॥ दुग २ पण ५ नवगं ९ तेरस १३ सत्त- रस १७ दुवीस २२ छच्च ६ पट्टेव ८ । वारस १२ चउदस १४ तह अट्ठा-वीस २८ छव्वीस २६ पणवीसा २५॥ ८५॥ एकारस ११ तेवीसा २३ सीयाला ४७ सत्तरि ७० सत्तहत्तरिया ७७ । इग १ दुग २ सत्तासीई ८७ इगहतरि ७१ मेव पावट्ठी ६२ ॥ ८६ ॥ अउणत्तरि ६९ चउवीसा २४ छायाल ४६ सयं १०० तहेव छव्वीसा २६ । एए किर परकेवा वीश्रतिगाईसु अणुकमसो ॥ ८७ ॥ क्षेपेष्वमी क्षिप्तेषु यद्रूपाः स्युस्त्रिका इमे । मात्तावंतस्तावंतः सिद्धिसर्वार्थसिद्धयोः॥ ८८ ॥ त्रयो मुक्तौ ततः पंच सर्वार्थेऽष्टौ ततः शिवे । ततो द्वादश सर्वार्थे ततः षोडश निर्वृतौ ॥ ८९॥ इत्येवमेकोनत्रिंश-त्तमे स्थाने ययुः शिवं । एकोनत्रिंश- वण वधता त्यांसुधी वधg के यावत् मोचे जनार अने सर्वार्थे जनारनी संख्या असं- ख्याती थाय. पा त्रीजी एकादितिउत्तराचित्रांतरदंडिका जाणवी. (८१) चोथी विचित्रदंडिका जाणवानो उपाय महर्षिश्रोए मा प्रमाणे को छ-(८२) एक लाइ- नमा अथवा उपर नीचे भोगणत्रीश अगडा मूकवा. पछी तेमा नीचे प्रमाणे प्रक्षेप करवो. तेमा पहेला गडानी नीचे का प्रक्षेप करवो नहीं. बाकीना २८ ऋगडा नीचे श्रा प्रमाणे प्रक्षेप करवो. ( ८३-८४), पांच, नव, तेर, सत्तर, पावीश, छ, माठ, पार, चौद, अहावीश, छचीश, पचवीश, अग्यार, त्रेवीश, सुडवाळीश, सीचेर, सत्तोतेर, एक, बे, सत्ताशी, इकोर, यासठ, भोगणोतेर, चोशि, छताळीश, सो भने छवीश. मा प्रमाणे ( जुदा जुदा २८) प्रक्षेप वीजा विगेरे त्रिकमां अनुक्रमे करवा. (८५-८७) ए प्रमाणे नाखवाथी जे रूपना अंको थाय ते क्रमे तेटला तेटला सिद्धिमा ने सर्वार्थमा गमन करनार जाणवा. (८८) ते पा रीते-त्रण मुक्तिमा, पांच सर्वार्थे, भाठ मुक्तिमा, पार सर्वार्थे, सोळ मुक्तिमां. (८९) वीश सर्वार्थ, पचीश मुक्तिए, नव सर्वार्थे, . ३-२ ३-२२ मर्ग १२ भो। (१४५) देषाया विषमोत्तरदंडिका ॥ ९० ॥ उक्तं च-सिवगइसव्वटेहिं दो दो ठाणा विसमुत्तरा नेया। जाव उणतीसठाणे गुणतीसं पुण छवीसाए ॥ ९१ ॥ अत्र जावेत्यादि यावदेकोनत्रिंशत्तमे स्थाने त्रिकरूपे षड्विंशतौ प्रक्षिप्तायामेकोनत्रिंशद्भवंति. ततो भवेद् द्वितीयेह विषमोत्तरदंडिका । पूर्वाचार्योदिताम्नायात् श्रूयतां सा विभाव्यते ॥९२॥ प्रथमाया दंडिकाया अंकस्थानं यदंतिमं । एकोनत्रिंशतं वारान् तल्लिखित्वा यथाक्रमं ॥ ९३ ॥ प्राग्वदाद्यं परित्य- ज्य द्वितीयादिपदेषु च । प्रागुक्तक्षेपकक्षेपे संख्या भवति यावती ॥ ९४ ॥ तावंतः सर्वार्थसिद्ध-सिद्ध्योर्जेया यथाक्रमं । एवं भवंत्यसं. ख्येया विषमोत्तरदंडिकाः ॥ ९५ ॥ श्राद्यायामादिमं स्थानं निर्वाण- गतसूचकं । द्वितीयायां दंडिकायां सर्वार्थगतसूचकं ॥ ९६ ॥ तृतीयायां दंडिकायां पुनर्मुक्तिनिरूपकं । चतुर्थ्यां चादिमं स्थानं भग्यार मुक्तिए, पंदर सर्वार्थे, सत्तर मुक्तिए, एकत्रीश सर्वार्थे, भोगणत्रीश मुक्तिए, अठावीश सर्वार्थे, चौद मुक्सिए, छवीश सर्वार्थे, पचास मुक्तिए, तोतेर सर्वार्थे, ऐंशी सक्तिए, चार सर्वार्थे, पांच मुक्तिए, नेव॒ सर्वार्थे, चुमोतेर मुक्तिए, पांसठ सर्वार्थे, पोतेर मुक्तिए, सत्ताचीश सर्वार्थे, भोगणपचास मुक्तिए, एक सोत्रण सर्वार्थे भने योगणत्रीश मुक्तिए) या प्रमाणे भोगणत्रीशमे स्थाने भोगणत्रीश मोक्षे गया. ए पहेली विषमोचर- दंडिका जाणवी. (९०) कयु छ के-शिवगतिए ने सर्वार्थे वे वे स्थाने अनुक्रमे एवी रीवे जाणवू के यावत् भोगणत्रीशमे स्थाने त्रणमा छवीश नांखवाथी भोगणत्रीश मुक्तिए जाय. (९१ ) अहीं जावशब्दे भोगणत्रीशमा त्रिकरूपस्थानमा २६ नो प्रक्षेप होवाथी २९ धाय छे. हवे चीजी विपमोत्तरदंडिका पूर्वाचार्यकथित आम्नायथी या प्रमाणे समजवी. (९२) पहेली दंडिकानुं अंत्य भंकनुं स्थान जे २९ श्रावेल छे. ते २९ नो अंक भोगणनीश यार लखवो. पछी अनुक्रमे पूर्वनी जेम पहेलं स्थान वर्जीने २८ स्थानमा पूर्वप्रमाणे भंकनो प्रक्षेप करवो. ते प्रक्षेपसाथे मेळवता जे संख्या श्रावे ते अनुक्रमे सर्वार्थे ने मुक्तिए जनारी समजवी. या प्रमाणे असंख्याती विपमोचरदोडका थाय. (९३-९५) तेमा पहेलीमा पहेलुं स्थान सिद्धि सूचक, पीजीमा पहेलुं स्थान सर्वार्थसूचक, (९६ ) बीजीमा पहेलं " १-१२ ३-२८ - . ३-७१ ३-२४ (४४६) भीकाललोकप्रकाश पुनः सर्वार्थसूचकं ॥ ९७ ॥ द्वितीयायां यथैकोनत्रिंशद्रूपंकके क्रमात् । एकोनत्रिंशतं वारान् लिखिते क्षेपकेषु च ।। ९८॥ पूर्वोक्तेषु योजितेषु सर्वार्थसिद्धमोक्षयोः । गतानां जायते संख्या सा चैवं भाव्यते क्रमात् ॥ ९९ ॥ एकोनत्रिंशदत्रादौ सर्वार्थे प्रययुस्ततः । एकत्रिंशययुः सिद्धि द्विकपकयोगतः ।। ३०० ॥ सर्वार्थे च चतुस्त्रिंश-दष्टात्रिंशत्ततः शिवे । पर्यंते पंचपंचाशत् सर्वार्थेऽत्र ययुनृपाः ॥ ३०१ ॥ एकोनत्रिंशतं वारान् पंचपंचाशतं न्यसेत् । पूर्वोक्तक्षेपकक्षेपा-दा- व्या तृतीयदंडिका ॥ २ ॥ क्षेपकास्तु सर्वास्वपि दंडिकासु ' दुगपणन- वर्ग ' इत्यादयः पूर्वोक्ता एव ज्ञेया:. भाव्या एवमसंख्येया विषमोत्तर- दंडिकाः । तावद्यावत्समुत्पन्नः पिता श्रीजिताहतः ॥ ३ ॥ उक्तं च- विसमुत्तराए पढमा एवमसंखा विसमुत्तरा नेया । सव्वत्थवि अंतिलं अन्नाए प्राइमं ठाणं ॥४॥ अउणत्तीसं वारा ठावेउं नस्थि पढमि उ- + स्थान सिद्धिसूचक, चौथीमा पहेलुं स्थान सर्वार्थसूचक ए प्रमाणे क्रमसर जाणवं. (९७) बीजी विषमोत्तर दंडिकामा ओगणत्रीशनो अंक २९ पार लखवो भने पछी पूर्व- प्रमाणे क्षेपकनी संख्या जोडवी एटले सर्वार्थ ने मोचे जनारनी संख्या अनुक्रमे आ प्रमाणे पावशे. (९८-९९ ) आदिमा प्रक्षेप न होवाथी २९ सर्वार्थे, वीजीमा धेनो प्रक्षेप होवाथी ३१ मुक्तिए, (३०० ) त्रीजीमा पांचनो प्रक्षेप होवाथी ३४ सर्वार्थे, चोथीमा नवनो प्रक्षेप होवाथी ३८ एक्तिए-ए प्रमाणे पर्यते ५५ राजा सर्वार्थे जनारा आवशे. (कारण के त्या २९ मा २६ नो प्रक्षेप छे.) (३०१) हवे त्रीजी विषमोत्तरदडिकामा उपरनो छेलो अंक ५५ छे ते प्रोगणनीश वार लखवो अने तेमा पूर्वप्रमाणे प्रथम स्थानने मूकीने २८ स्थानमा २८ जुदा जुदा अंकनो प्रक्षेप करवो. ए प्रमाणे घे अंक मेळ्ववाथी जे अंक प्रावे ते सिद्ध ने सर्वार्थे जनार समजवो. श्रा त्रीजी दंडिका थइ. (२) क्षेपक अंक वधी दंडिकामा पूर्वे कया प्रमाणे चे, पांच, नव विगेरे समजवा. भा प्रमाणे असंख्य विषमोत्तरदंडिका समजवी. ते त्यां सुधी के यावद अजितनाथजीना पिता जितशत्रु राजा थया. (३) कयु के के-'रिपमोत्तरमा पहेलीनी जेम असंख्य विष- मोत्तरादंडिका जाणवी. ते बधीमा पहेलीजें छेल्लु स्थान ते बीजी- श्रादिस्थान जाणवं. (४) ते भोगणत्रीश वार स्थापवू ने तेमा पहेला स्थाना प्रक्षेप न समजबो. बाकीना सर्ग १२ मो। (४४७) केवो । सेसे अडवीसाए सव्वत्थ दुगाइयो खेवो ॥५॥ सिक्गइपढ- मादीए वीयाए तह य होइ सम्वटे । इय एगंतरियाए सिवगइसवट- ठाणाई॥ ६॥ एवमसंखिज्जायो चित्तंतरगंडिया मुणेयव्वा । जाव जिनसत्तुराया अजिजिणपिया समुप्पन्नो ॥ ७॥ एवं-सर्वार्थसिद्ध- निर्वाणे विहायान्यगतिष्विति । ययौ न पट्टभृत्कोऽपि वंशे श्रीवृषभप्रभोः ॥ ८॥ सर्वार्थसिद्धशब्दोऽत्र रूढोऽनुत्तरपंचके । अवकाशो भवत्यत्र-ता- वतामन्यथा कथं ॥९॥ उक्तं च-सर्वार्थशब्देन पंचानुत्तरविमानानि लभ्यंत इति सिद्धदंडिकास्तोत्रावचूर्णो. एवं च-अनुलोमा १ विलोमा २ च समसंख्या ३ ततः परा । एकद्विव्युचरा ६ एका-दिकाः स्युर्विपमो- चराः ॥ १० ॥ एताश्च सप्तधा सिद्ध-दंडिकाः पूर्वमुक्तवान् । चक्रिणः सगराख्यस्य सुबुधिः सचिवाग्रणीः ॥ ११ ॥ अष्टापदाद्वियात्रार्थ गतः सगरनंदनैः । गतिं वृषभवंश्यानां पृष्ट ऐतिह्यकोविदः ॥ १२ ॥ अहावीश स्थानमा प्रथम कह्या प्रमाणे चे, पांच विगैरे अंकनो प्रक्षेप करवो. (५) तेमा प्रथम दंडिकामा पहेलुं स्थान मक्ति अने पछी सर्वार्थे, अने पीजी दंडिकामा पहेलुं स्थान साथै ने चीजें मुक्तिए पाप्रमाणे एकातरे सर्व स्थान समजवा. (६) आप्रमाणे असंख्याती विचित्रदंडिका यावत् अजितनाथना पिता नितशत्रु राजा थया त्या सुधी समजवी. (७) आप्रमाणे ऋषभदेवना वंशमा कोइ पण पट्टधर राजा सर्वार्थमिद्ध के सिद्धस्थान सिवाय बीजे गयेल नथी. (८) सर्वार्थसिद्ध शब्द अहीं पांचे अनुचर विमानवाचक समजवो; नहीं वो एकला सर्वार्थसिद्धा तो संख्याता देवो होवाथी तेनो समावेश ज थर शके नहीं. (९) का छे के-' सर्वार्थ शब्दे करीने पांचे अनुचर पिमान समजवा. इति सिद्धदंडिकास्तोत्रावचूॉ. ए प्रमाणे अनुलोम १, प्रतिलोम २, समसंख्या ३, एकद्वित्रिउत्तरा एकादिका ४-५-६ अने विषमोचरा ७ मा प्रमाणे सात सिद्धदंडिका पूर्व सगर नामना चक्रीना सचिवाग्रणी सुबुद्धि प्रधाने अष्टापद पर्वते यात्रार्थे गयेला सगर चक्रीना पुत्रोए ऋषभदेवना वंशमा थयेलानी गति पूछी त्यारे पूर्वस्थिति जाण- पामा प्रवीण एवा तेणे कहेली ते अही दाखल करी छे. (१०-१२) इति सिद्धदंडिका.

१ अनुलोमसिद्धदंडिका. (१) १४ १४ १४ १४ सिद्धे १४ लाख | १४ ला. १४ ला.] १४ ला. १४ ला. सर्वार्थ ३ १४ १४ १ यावद ५०सुषी भसंख्या २ w ८ ९ २ प्रतिलोमसिद्धदंडिका (२) श्रीकाललोकप्रकाश । सर्वार्थे १४ लाख | १४ ला.| १४ ला. | १४ ला. १४ ला. १४ १४ १४ १४ १४ १४ यावत् ५०सुधी असंख्य w सिद्धे १ ३ ५ ८ ९ ११ १२ ३ समसंख्या सिद्धदंडिका (३) ४ लाख ५ला. ६ला. ७ला. सिद्ध | २ लाख | ३ लाख | सर्वार्थे २ लाख ३ लाख ८ ला..९ ला. १० ला. ११ ला.। १२ ला. यावत् असंख्य ७ला.८ ला.|९ ला.१०ला. ११ ला. १२ ला. लाख लाख। ५ लां. ६ ला. (288) (888) चोधी चित्रांतर दंडिका. ४. १ एकोत्तरा सिद्धदंडिका. (४) १ ३ ५ 8 ११ १३ १९ सिद्ध सर्वार्थ ૨૨ यावत् असंख्य. २ ४ १० १२ १६ २० २२ २४ २ द्विउत्तरा सिद्धदंडिका. (५) सिद्ध १ १३ १७ २१ २५ २९ ३३ ४१ सर्ग ३२ मो. यावत् असंख्य. सर्वार्थ 6 ३ ११ १५ २३ २७ ३९ ३ त्रिउत्तरा सिद्धदंडिका. (६) सिद्ध १ १३ २५ ३१ ५९ यावत्. असंख्य. सर्वार्थ. १० २२ २८ ३४ (४५०) श्रीकाललोकप्रकाश ४ विचित्रा-चिपमोत्तर सिद्धदंडिका. (७) पहेली. बीजी. त्रीजी. क्षेपक क्षेपक IFE गति अंक मृल संख्या घेनो सरवालो गति गति अंक . ५५ २ सि. स. सि. ३ ५५ । १३ । ६८ ७२ ह सि. स. सि. ७७ ८ द सि. सि. सि. १२ २८ २६ २५ ८० ३ ३ | सिद्धि | २६ २६ स. ३ २ ५ सार्थ २६ सि. ३ - सिद्धि | २६ ३४ स. ३ ह २६ ३८ सि. सि. २६ १३ | ४२ स. ३ २० २६ ४६ सि. ३ ૨૨ २५ सि. २६ २२ ५१ ३ ६ २६ सि. ३ सि. ३ १२ ४१ सि. ३ २६ ४३ ३ २८ ३१ स. २६ २८ सि. ३ | २६ / २६ सि. २६ / २६ स. ३ २५ सि. ३ सि. २६ ४० स. ३ २३ | २६ २६ २३ सि. ३ सि. २६ स. ३ ७३ स. २६ ७० 88 सि ३ सि. २६ स ३ १ ४ २६ १ ३० सि. ३ ૨ ५ सि. २ ३ ८७ स. ८७११६ | सि. ३ ७१ ७४ सि. २६ ७१ | १०० स. सि. ३६. ७२ सि. २६ स. २४ सि. सि. स. ३|१००/१०३ स. २६१००/१२६ सि ३ | २६ २६ सि. २६ | २६ / ५५ स . सि. स. सि. स. सि. ૨૩ ७८ ४७११०२ ७७|१३२ सि. २ ८७|१४२ २४ स. सि. स सि. स. सि. स. सि. २४ ७६ ८१ सर्ग १२ मो। (४५१) एवं च-स नवाशीतिपक्षेपु पंचाशल्लक्षकोटिपु। द्वासप्ततिपूर्वलक्ष- न्यूनेषु जलधिष्विह ॥ १३ ॥ अतिक्रांतेषु वृषभ-प्रभोनिर्वाणकालतः । अजायत जिनः श्रीमा-नजितो जितकल्मषः ॥ १४॥ अजायंतारके तुर्ये निवते त्वजितप्रभौ । परिपूर्णाः पयोधीनां पंचाशल्लक्षकोटयः ॥ १५॥ जंबूद्वीपे पुरात्रैव प्राग्विदेहविभूषणे । वत्साख्ये, विजये शीता-नद्या याम्यतटस्थिते ॥ १६ ॥ सुसीमायामभूत्पुर्यां राजा विमलवाहनः । प्रव. बाजारिदमन-गुरोः पार्श्वे स शुद्धधीः ॥ १७ ॥ मृत्वोत्पन्नश्च विजय- विमानेऽमृतभुक्तया । त्रयस्त्रिंशत्सागरायु-भुक्तवाभूदजितो जिनः ॥१८॥ पूरयोध्या कोशलेषु जितशत्रुः प्रभोः पिता । विजया जननी राशि-वृषो हस्ती च लांछनं ॥ १९ ॥ राधशुक्लत्रयोदश्यां माघेऽष्टम्यां सितविपि । माघे नवम्यां पौपे चै-कादश्यां विमलद्युतौ ॥ २० ॥ चैत्रस्य शुक्लपंच- म्यां पंच कल्याणकान्यथ । चतुर्ष रोहिणी भं स्या-मृगशीर्ष च पंचमे ॥ २१ ॥ सर्वेषां च्यवनं स्वर्गा-ज्जायते जन्म चाहतां । अर्द्धरात्र एव वृषभप्रभुना निर्वाण काळथी बातेर लाख पूर्वे न्यून अने ८९ पक्षे अधिक पचास लाख क्रोड सागरोपम व्यतीत थये सते जीत्या के कन्मप (पाप) जेणे एवा श्री अजितनाथ प्रभु थया. (१३-१४ ) अजितप्रभु निर्वाण पाम्या त्यारे चोथा पाराना परिपूर्ण पचास लाख क्रोड सागरोपम थया. ( कारण के अजितनाथ प्रभुनुं आयुष्य बोतेर लाख पूर्वन हतुं.) (१५) . श्रीमजितनाथ प्रभुर्नु वृत्तांत-पूर्व भा ज जंबूद्वीपना पूर्वमहाविदहना भूपणरूप अने शीता नदीना दक्षिण किनारे रहेला वत्स नामना विजयमा सुसीमा नामे नगरी छे तेमा विमळवाहन नामे राजा थया. ते शुद्ध घुद्धिवाळाए अरिदमन गुरुनी पासे दीक्षा लीधी. (१६-१७) ते मरण पामीने विजय नामना अनुत्तर विमानमा देवपणे उत्पन्न थया. स्यां तेत्रीश सागरोपमर्नु भायुष्य भोगवीने कोशल देशमा अयोध्या नगरीमा जितशत्रु राजा पिताना अने विजया माताना पुत्र पराशि ने हस्तिना लांछनवाळा अजितनाथ थया. (१८-१९) वैशाख शुदि १३, माघ शुदि ८, माघ शुदि ९, पोस शुदि ११ अने चैत्र शुदि ५-या प्रमाणे तेमना पांच कल्याणकनी तिथि समजची. तेमा चार कन्याणक रोहिणी नक्षत्रमा अने पांचमु मृगशीर्ष नक्षत्रमा थयेल समजवू. (२०-२१ ) सर्व प्रमनु स्वर्गथी च्यवन अने जन्म अर्धरात्रे ज थाय छे. ब्रता.

(४५२) श्रीकामलोकप्रकारा। वेला-नयत्यं न व्रतादिषु ॥ २२ ॥ अहोभिः पंचभियूंना मासा गर्भ- स्थितौ नव । ततः कृतजनानंदजन्माभूदजितप्रभोः ॥ २३ ॥ द्वासप्तत्या पूर्वलक्ष-रधिके तेजसाधिकः । शेपे तुर्यारकस्याः जातोऽसौ जगदीश्वरः ॥ २४ ॥ अत्र तुर्यारकस्याई द्वाचत्वारिंशद्वर्षसहस्रोनपंचाशल्लचकोटिसा- गरोपममानमवसेयं. रागाद्यैर्नजितो यस्मा-गर्भस्थे वा प्रभौ प्रसूः । द्यूते यन्न जिता पत्या ततोऽभूदजिताभिधः ॥ २५ ॥ अष्टादश पूर्वलक्षाः कौमार्यमभवत्प्रभोः । त्रिपंचाशत्पूर्वलक्षाः सपूर्वोगा नरेंद्रता ॥ २६ ॥ धनुःशतानि सानि चत्वारि वपुरुच्छ्रयः । सुप्रभाख्या च शिविका व्रतकालेऽभवत्प्रभोः ॥ २७ ॥ ब्रह्मदत्तगृहेऽयोध्या-पुरे प्रथमपारणा । छाास्थ्यं द्वादशाव्दानि ज्ञानं सप्तच्छदे तरौ ॥२८॥ सपूर्वांगाः पूर्वलक्षा गृहे स्थित्वेकसप्तति । पूर्वांगोनं पूर्वलच-मेकं संयमितां दधौ ॥ २९ ॥ द्वासप्ततिं पूर्वलक्षा-ण्यायुः सर्वमपालयत् । अभूवन् पंचनवतिःप्रभोर्गण- धरोत्तमाः ॥ ३० ॥ स्वदीक्षितानां साधूनां लक्षमेकमभूत्प्रभोः। तिस्रो लक्षाश्च साध्वीनां सहस्रस्त्रिंशताधिकाः ॥३१॥ त्रिलक्षी द्विसहस्रोना दिकमां काळनो नियम नथी. (२२) पांच दिवसे न्यून नव मासनी गर्भस्थिति पूर्ण थये उत्पन्न कर्यो छे लोकमा श्रानंद जेमणे एवो जितप्रभुनो जन्म थयो. (२३) चौतेर लाख पूर्व अधिक अर्घ चोथो पारो शेष रो सते तेजवडे सूर्यनी समान जगदीश्वर अजितनाथ थया. (२४) मही चोथा भारानु अर्ध ४२ हजार वर्षे ऊन पचास लाखकोड सागरोपम प्रमाण जाण. रागादिकवडे नहीं जीतावाथी तेम ज प्रभु गर्भमा हता त्यारे माता पतिसाथे द्यूत रमतां पतिथी न जीताणा तेथी अजित एवं नाम पाडवामा श्राव्युं. (२५) अजितप्रभुना अढार लाख पूर्व कौमारावस्थामा व्यतीत थथा भने एक पूर्वाग (८४ लाख वर्ष) युक्त पन लाख पूर्व राज्यपणुं पाळयु. ( २६ ) प्रश्न शरीर ४५० धनुप्य उंचं हतुं. दीक्षा अवसरे तेमनी शिविका सुप्रभा नामनी हती. (२६) प्रथम पारणुं अयोध्यामा ब्रह्मदत्तने घरे कयु. चार वर्ष छद्मस्थपणे रया भने सप्तच्छद घृक्षनी नीचे केवळज्ञान पाम्या. (२८) गृहवासमां एक पूर्वाग युक्त एकोतेर लाख पूर्व रह्या अने चारित्रपर्याय एक पूर्वांगे न्यून एक लाख पूर्वनो थयो. (२९) ए प्रमाणे कुल ७२ लाख पूर्वनु आयु पाळयु. अनितप्रभुने ९५ उत्तम गणधरो थया. (३०) प्रसना हस्तदीक्षित एक लाख साधु श्रने त्रण लाख नेत्रीश हजार साध्वीभो थइ. (३१) श्रावको सर्ग ३२ मो (४५३) श्राद्धानां श्राविका पुनः । पंच लक्षाः पंचचत्वारिंशत्सहस्रकाधिकाः ॥ ३२ ॥ विंशतिश्च सहस्राणि केवलज्ञानिनां प्रभोः। द्वाविंशतिः सह- स्राणि ते निर्दिष्टा मतांतरे ॥ ३३ ॥ मनोविदां सहस्रा द्वा-दशाढ्याः पंचभिः शतैः । साविधिभाजां तु स्युश्चतुर्नवतिः शताः ।। ३४ ॥ सप्तत्रिंशच्छता विंशाः स्युश्चतुर्दशपूर्विण । विंशतिक्रियवतां सहस्राः .सचतुम्शताः ॥ ३५॥ सहस्राः द्वादश चतुः-शताढ्या वादिनां मताः। प्रत्येकबुद्धा विज्ञयाः स्वशिष्यसमसंख्यकाः ॥ ३६ ॥ एवं सर्वेपामपि ज्ञेयं. सिंहसेनाभिधः श्रीमान् गणभृत्प्रथमः प्रभोः । तथा प्रवर्तिनी फल्गुः सगरो भक्तभूपतिः ॥ ३७॥ वरदं मुद्गरं चाक्ष-सूत्रं पाशं च दक्षिणे । दोष्णां चतुष्टये विभ्रद् वामे करचतुष्टये ॥ ३८ ॥ वीजपूरं चाभयं चां-कुशं शक्तिं समुद्वहन् । महायक्षाभिधो यक्षः श्यामवर्णश्च- तुर्मुखः ॥ ३९ ॥ करींद्रवाहनोऽष्टाभि-भुजैः पात्यष्ट दिग्गजान् । द्विती- यस्याऽद्वितीयस्य प्रभोश्चरणसेवकान् ॥ ४०॥ दधाना दक्षिणे पाणि- द्वये वरदपाशकौ । वीजपूरांकुशौ वामे गौरवर्णा चतुर्भुजा ॥११॥ लोहा- २९८००० थया, श्राविकाम्रो ५४५००० थइ. (३२) वीश हजार केवळज्ञानी थया. मतांतरे याधीश हजार कया छे. (३३) मनपर्यवज्ञानी पार हजार पांचसो ने पचास थया. अवधिज्ञानी ९४०० थया. (३४) ३७२० चौदपूर्वी थया. २०४०० वैक्रिय- लब्धिवाळा थया. (३५) १२४०० वादी थया. स्वशियनी (मुनिभोनी) समसंख्या- चाळा प्रत्येकवुद्ध जाणवा. (३६) या प्रमाणे वधा प्रभु माटे जाणवू. सिंहसेन नामना प्रमुना प्रथम गणधर थया, फल्गुश्री मुख्य प्रवर्जिनी थह, सगरचक्री भक्त राजा थया. दक्षिण बाजुना चार हाथमा वरद, मुद्गर, अक्षसूत्र ने पाशने धारण करनार भने डाची पाजुना चार हाथमा वीजपूर, अभय, अंकुश ने शक्ति धारण करनारो, श्यामवर्ण- वालो ने चार मुखवाळो, महायक्ष नामनो यक्ष थयो. (३८-३९) ए हाथीना वाहन- वाळो यच पाठ सुजाओवडे पाठ दिग्गजो के जे अद्वितीय एवा द्वितीय प्रमुना चरणना सेवको हता तेमनुं रक्षण करतो हतो. (४०) दक्षिण पाजुना पे हाथमा वरद भने पाश तथा डाली याजुना ये हाथमा वीजपूर ने अंकुशने धारण करनारी, गौरवर्णवाळी, (४५४) मीकाललोकप्रकाश। सनाधिरूढा च नाम्नाजितवला सुरी। अजितप्रभुभक्कानो कम्रा दिशति संपदः॥४२॥ इति श्रीअजितः जंबूद्वीपे प्राग्विदेहे विजये रमणीयके । पुर्या शुभायां विपुल-ध- लोऽभूभृपतिः पुरा ॥ ४३ ॥ अवेयके सप्तमेऽभू-संभ्रांतगुरुदीक्षितः। सैकोनत्रिंशदध्यायु-स्त्रिदशोऽथ च्युतस्ततः ॥ १४ ॥ कुणालदेशे श्राव- स्त्यां जितारिनृपतेः सुतः । श्रभूत्सेनाकुक्षिरत्नं तृतीयः संभवो जिनः ॥ ४५ ॥ फाल्गुनस्याष्टमी शुक्ला शुक्ला सहचतुर्दशी। मार्गशीर्षस्य राका च कार्तिकासितपंचमी ॥ ४६ ॥ चैत्रस्य पंचमी शुक्ला कल्याणतिथयः प्रभोः । चतुर्यु मृगशीर्ष त-दार्दा भवति पंचमे ॥ ४७॥ मासा नव दिनैः पद्भि-रधिका गरभस्थितिः । तुरगो लांछनं राशिः प्रभोमिथुन- संज्ञकः ॥ ४८ ॥ अनैः षष्ट्या पूर्वलदै-सिंशता लक्षकोटिभिः। वार्डीनां श्रीमदजित-निर्वाणाच्छंभवोऽभवत् ॥ १९ ॥ युक्ताः षष्ट्या.पूर्वलक्ष-वि- शतिर्लक्षकोटयः। तुर्यारकस्याशिष्यंत वार्डीनां प्रभुजन्मनि ॥ ५० ॥ भुजावाळी, लोहासनपर भारूढ भयेली भजितप्रभा नामे देवी अजितप्राना भक्तोने सुंदर एवी संपदा प्रापनारी थइ. (४१-४२) इति श्रीजिता श्री संभवनाथ वर्णन-जंबूद्वीपना पूर्वमहाविदेह क्षेत्रमा रमणीय नामना विजयमा शुभा नामनी नगरीमा पहेलो विपुलवळ नामनो राजा हतो. (४३) तेणे संभ्रांत गुरुनी पासे दीचा लीधी. मरण पामीने सातमा अवेयकमा २९ सागरोपमने भाउखे देव थयो. त्यांची व्यवीने कुणालदेशमा श्रावस्ति नामनी नगरीमा जिवारि राजानी सेना नामनी राणीनी कुक्षिमा पुत्ररत्नपणे उत्पन्न थया ते त्रीजा संभवनाथ तीथकर थया. (४४-४५) फान्गुन शुदि ८, मार्गशीर्ष शुदि १४, मार्गशीर्ष शुदि १५, कार्तिक वदि ५ अने चैत्र शुदि ५-मा तेमना पांच कल्याणकोनी तिथि छे. चार कल्याणक मृगशीर्ष नक्षत्रमा भने पांच भाा नव- त्रमा थयेल छे. (४६-४७) गर्भस्थिति नव मास ने छ दिवसनी, तुरगनुं लांछन अने प्रमुनी राशि मिथुन जाणवी. (४८) भी अजितनाथजीना निर्वाणथी साठ लाख पूर्व ऊण त्रीश लाख क्रोड सागरोपम व्यतीत थया त्यारे श्री संभवनाथजी गर्ममा पाण्या. (४९) ते वखते चोथा पाराना वीश लाख क्रोड सागरोपम ने साठ लाख पूर्व बाकी हता. (५०) सर्व भरिहंतोना जन्म समये चोथो आरो जेटलो पाकी रहे तेमा तेमनु सर्ग ३२ मो. (४५५) सर्वेषामहतां जन्म-न्युक्तस्तुर्यारकस्य यः। शेषः स स्वायुपा हीनः शेषो भवति निर्वृतौ ॥ ५१ ॥ स्वाम्यभूसंभवो नाम्ना शुभातिशयसंभवात् । उत्पन्ने वा प्रभौ भूमौ भूरिशस्यसमुद्भवात् ॥ ५२ ॥ पूर्वलक्षाः पंचदश कुमारत्वेऽवसत्प्रभुः । राज्ये चतुश्चत्वारिंश-चतुःपूर्वांगसाधिकाः ॥ ५३॥ धनुःशतानि चत्वारि स्युः प्रभोर्वपुरुच्छ्रये । सिद्धार्थी शिविकाव्दानि छामस्थ्येऽस्य चतुर्दश ॥ ५४॥ सुरेंद्रदत्तः श्रावस्त्यां दाता प्रथमपारणे। तले सालतरोआनं प्रादुरासास्य पंचमं ॥ ५५ ॥ चतुःपूर्वांगोनमेकं पूर्व- लक्षं च साधुता । पष्टिश्च पूर्वलक्षाणि सर्वमायुः प्रकीर्तितं ॥ ५६ ॥ द्वधाढ्यं शतं गणभृतो। वे लक्षे साधवः स्मृताः। लक्षत्रयं च साध्वीनां सपत्रिंशत्सहस्रकं ॥५७॥ लक्षद्वयं त्रिनवतिः सहस्राः श्रावकाः प्रभोः पडू लक्षाणि सहस्राश्च पत्रिंशत् श्राविकाः स्मृताः॥ ५८ ॥ सहस्राणि पंचदश केवलज्ञानशालिनां । सहस्रा द्वादश शतं सार्द्ध मानसवेदिनां ॥ ५९ ॥ नवावधिज्ञानभाजां सहस्राः पट्शताधिकाः। द्वे सहस्त्रे शतं साई स्युश्चतुर्दश पूर्विणः ॥ ६० ॥ वादिनां द्वादश सह-स्रास्तथा वैक्रि- यस्पृशां । एकोनविंशतिः साट-शताः स्युः सत्सहस्रकाः ॥३१॥ चारूरु- आयुष्य पाद करीए तो तेटलो तेमना निर्वाण पछी बाकी रहे. (५१) शुभाविशयना संभवथी अथवा प्रभु गर्ममा भाव्या त्यारथी भूमिमां घणुं धान्य उत्पन्न थवाथी प्रमनुं नाम संभवनाथ पाडवामां आव्युं. (५२) पंदर लाख पूर्व कुमारावस्थामा व्यतीत थया भने चार पूर्वांग युक्त ४४ लाख पूर्व राज्यनी प्रतिपालना करी. (५३) प्रसुनुं शरीर ४०० धनुष्य उंचं हतुं. दीक्षा अवसरे शिपिका सिद्धार्था नामनी हती. छमस्थपणामा चौद वर्ष रक्षा हता. (५४) प्रथम पारणुं श्रावस्तिमा ज सुरेंद्रदत्तने त्यां कयु हतुं अने साल चनी नीचे पांचमुं ज्ञान ( केवळज्ञान ) प्रगट थयु हतुं. (५५) चार पूर्वागे न्यून एक लाख पूर्वनो दीक्षापर्याय भने एकंदर साठ लाख पूर्वनुं आयुष्य कड्यं छे. (५६) संभव- नाथनीने १०२ गणघर, बे लाख साधु, ३३६००० साध्वीश्रो, (५७ ) २९३००० भावको, ६३६००० भाविकाओ कही छे. (५८) १५००० केवळज्ञानी, १२१५० मन- पर्यवज्ञानी, (५९) नव हजार ने छसो (९६००) अवधिज्ञानी, २१५० चौदपूर्वी, (६०) १२००० वादीमो अने १९८०० पैक्रियलन्धिवाला थया. ( ६१ ) चार (४५६) श्रीकाललोकप्रकाश। गणभृन्मुख्यः प्रभोः श्यामा प्रवर्तिनी । सदा भक्तो महीपालो मित- सेनः प्रकीर्तितः ॥ ६२ ॥ दक्षिणे नकुलं दामा-भयं विभृत्करत्रये । मातुलिंगं नागमक्ष-सूत्रं वामे करत्रये ॥ ६३ ॥ त्रिनेत्रस्त्रिमुखः श्याम- वर्णो वहिणवाहनः । षड्भुजस्त्रिमुखो जीया-त्रिमुखो नाम यक्षराट् ॥६४ ॥ वरदं चाक्षसूत्रं च दक्षिणे करयामले । वामे फलं चाभयं च दधानेति चतुर्भुजा ।। ६५ ।। दूरितारिर्गौरवर्णा कल्याणं मेषवाहना । सदा ददाति भव्यानां संभवप्रभुसेविनां ।। ६६ ।। इति श्रीसंभवः । जंबूद्वीपे प्राग्विदेहे विजयो मंगलावती । तत्र रत्नसंचयायां पुर्या राजा महाबलः ।। ६७ ॥ स चादाय परिवज्यां गुरोविमलवाहनात् । जयंतेऽभूत्रयस्त्रिंश-त्पयोधिस्थितिकः सुरः ॥ ६८ ॥ ततोऽयोध्यामहा- पुयां देशे कोशलनामनि । सिद्धार्थाप्तवरक्ष्माभृ-रसुतोऽभदभिनंदनः ॥ ६९ ॥ शुक्ल चतुर्थी वैशाखे माघे शुक्ला द्वितीयिका । शुक्लव द्वादशी माघे पौपेशुक्ला चतुर्दशी ॥ ७० ॥ श्रावश्यके तु-'पोसे सुद्धचउहसि नामना मुख्य गणधर, श्यामा नामे प्रवर्जिनी अने सदा भक्त मितसेन नामनो राजा कझो छे. (६२) दक्षिण बाजुना त्रण हाथमां नकुल, दाम अने श्रमयने धारण करनार तथा डावी बाजुना त्रण हाथमा बीजोरु, नाग ने अवसूत्रने धारण करनार, त्रण नेत्रवाळो, अण मुखवाळो, श्याम वर्ण वाळो ने मोरना वाहनवाळो, छ भुजावाळो त्रिमुख नामनो यच जयवंत वर्ते छे. (६३-६४ ) जमणा चे हाथमा वरद ने अक्षसूत्र अने डाबी वाजुना वे हाथमा फळ ने अभयने धारण करनारी चार भुजावाळी, गौरवर्णवाळी, मेषना वाहनवाळी दुरितारि नामनी देवी संभव प्रभुनी सेवा करनारामोनुं निरंतर कल्याण करे छे. (६५) इति श्री संभव: श्री अभिनंदनस्वामी वर्णन-श्रा जंबूद्वीपना पूर्वमहाविदेहमा मंगळावती विज- यमा रत्नसंचया नामनी नगरीमां महाबळ नामे राजा थया हता. (६६) तेश्रो धिमळ- चाहन नामना गुरु पासे प्रव्रज्या अंगीकार करी, काळ करीने जयंत नामना अनुत्तर विमा- नमा ३३ सागरोपम भाउखे देव थया. (६८) त्यांची व्यवीने कोशळ देशमा अयोध्या नामनी महापुरीमा सवर राजा अने सिद्धार्था नामनी राणीना पुत्र अभिनंदन नामना थया. (६९) वैशाख शुदि ४, माष शुदि २, माघ शुक्ल १२, पोप शुक्ल १४ ने वैशाख शुदि ८ श्रा पांच तेमना कन्याणकनी तिथिमो छे. चार कन्याणको भमिचि सर्ग १२ मो। (६५७) अभीइमभिनंदणजिणस्स त्ति ' ज्ञानकल्याणकदिनं दृश्यते, न चेयं शुद्ध- चतुर्दश्येव भाविनीति वाच्यं, तस्या अभीचियोगासंभवात्पौषशुद्धचतु. दश्यां हि पुनर्वस्वोरेव प्रायो योगः संभवेदिति. शुक्लाष्टमी च वैशाखे कल्याणतिथयः प्रभोः। चतुर्पु धिष्ण्यमादित्यः पंचमे पुष्यमेव च ॥७॥ अष्टौ मासा दिनान्यष्टा-विंशतिर्गरभस्थितिः । वानरो लांछनं राशि-मि- थुनाख्योऽभवत्प्रभोः ॥ ७२ ॥ पंचाशत्पूर्वलक्षोन-दशभिर्लक्षकोटिभिः। सागरैर्भगवांस्तुर्यो-ऽभवत्संभवमोक्षतः ॥ ७३ ॥ सपंचाशत्पूर्वलक्षा दशाब्धिलक्षकोटयः । अशिष्यंत प्रभोर्जन्म-काले तुर्यारकस्य च ॥७॥ यतोऽभिनंद्यते शकैः स्तूयते गर्भगोऽप्यतः । अभिनंदननामाभू-धद्वा विश्वप्रमोदकृत ॥ ७५ ॥ लक्षा द्वादश पूर्वाणां सार्धाः कौमार्यमष्ट च । पूर्वागान्यथ पट्त्रिंश-लक्षाः सार्दाश्च राजता ॥ ७६ ॥ पूर्वांगैरष्टभिन्यूनं पूर्वलक्षं च साधुता । पंचाशत्पूर्वलक्षाणि सर्वमायुः प्रकीर्तितं ।। ७७ ॥ धनुःशतत्रयं सार्द्ध प्रज्ञप्तो वपुरुच्छ्रयः। अभिनंदनदेवस्या-भिनंदितशि- नक्षत्रमा अने पांचमामा पुष्य नक्षत्र जाणवू. (७०-७१) अहीं आवश्यकसूत्रमा तो पोप मासमा शुद्ध (शुक्ल) पक्षनी चतुर्दशी ने अभीचि नक्षत्र श्रमिनंदनस्वामीनो ज्ञानकल्या. णकनो दिवस देखाय छे. श्रा शुद्ध चतुर्दशी ज हशे एम न कहे, केमके तेमां अभीपि नक्षत्रना योगनो असमय , पोप शुदि चतुर्दशीए तो पुनर्वसु नक्षत्रनो योग ज प्रायः संभवे छे." गर्भस्थिति माठ मास ने भठाचीश दिवसनी, वानरर्नु लांछन अने प्रभुनी मिथुन राशि जाणवी. (७२) संभवनाथजीना मोक्षथी पचास लाख पूर्वे न्यून दश लाख क्रोड सागरोपम गया त्यारे अभिनंदन प्रभुनो जन्म थयो. एटले श्रीभनंदनस्वामीना जन्मसमये चोथो आरो पचास लाख पूर्वसहित दश लाख क्रोडपूर्व शेप रह्यो एम जाणवू. (७३-७४ ) प्रभु गर्भमा हता त्यारे शके अभिनंदित कर्या-स्तव्या तेथी म ज विश्वने प्रमोद करनार होवाथी तेमनुं नाम अभिनंदन स्थापयामा भाव्युं. (७५) साडा चार लाख पूर्व कौमारावस्थामा व्यतीत थया भने आठ पूर्वाग युक्त माडीछत्रीश लाख पूर्व राज्यनी प्रतिपालना करी. (७६ ) पाठ पूर्वाग न्यून एक लाख पूर्व साधुपणामां व्यतीत कयु. एकंदर पचास लाख पूर्व- आयुष्य कहेलुं छे. ( ७७ ) अभिनंदित करी छे शिवश्री (मोघलक्ष्मी) जेणे एवा अभिनंदनस्वामीनुं शरीर उंचं साडारण सो धनु- (४५८) मीफाललोकप्रकाश । वश्रियः॥ ७८ ॥ व्रतेऽर्थसिध्धा शिविका प्रथमं पारणं प्रभोः । अयो. ध्यायामिंद्रदत्त-मंदिरे समजायत ॥ ७९ ॥ छद्मस्थकालो विज्ञेयो वर्षाण्यष्टादश प्रभोः । ज्ञानद्रुमः प्रियालः स्यात् पोडशं गणिनां शतं ॥ ८०॥ लक्षास्तिस्रो भगवतः संयतानां महात्मनां । पलक्षाः संय. तीनां च सहस्रस्त्रिंशताधिकाः ॥ ८१॥ अष्टाशीतिः सहस्राणि श्राध्धा लक्षद्वयं तथा । श्राविकाणां पंचलक्षाः सहस्राः सप्तविंशतिः ॥ ८२ ॥ चतुर्दश सहस्राणि केवलज्ञानशालिनां । एकादश सहस्राः पट् शताः सार्धा मनोविदः ॥८३॥ अवधिज्ञानिनामष्टा-नवतिः स्युः शतानि च । शतानि पंचदश च स्युश्चतुर्दशपूर्विणः ॥ ८४ ॥ सवैक्रियाणामेकोन-विं. शतिः स्युः सहस्रकाः । एकादश सहस्राणि वादिनामभवन् विभोः ॥ ८५॥ वज्रनाभो गणधरः प्रथमः प्रथितः प्रभोः । प्रवर्तिन्यजिता मित्र-वीर्यो भक्त नृपोऽभवत् ॥ ८६ ॥ मातुलिंगाक्षसूत्राढ्या-पसव्यकर. यामलः । नकुलांकुशयुग्वाम-करयुग्मश्चतुर्भुजः ॥ ८७ ॥ ईश्वराख्यो यक्षराजः श्यामांगो गजवाहनः । अभिनंदनभक्तानां करोति कुशलं संदा ॥ ८८ ॥ बिभ्रती वरदं पाश-मपसव्ये करद्वये । वामे नागांकुशौ - ध्यनुं कडं थे. (७८) व्रतारोपण चखते शिविका अर्थसिद्धा नामनी हती अने प्रथम पारणुं प्रमुए अयोध्यामा इंद्रदत्तने घरे कयु हतुं. (७९) प्रभुनो छद्मस्थ काळ अढार वर्षनो भने ज्ञानवृक्ष प्रियाल नामर्नु हतुं. अभिनंदन प्रभुने ११६ गणधर हता. (८०) त्रण लाख महात्मा साधुओ, ६३०००० साध्वीओ, २८८००० श्रावको, ५२७००० श्राविकानो, (८१-८२) १४००० केवळज्ञानी, ११६५० मनःपर्यव- ज्ञानी, (८३) ९८०० अवधिज्ञानी, १५०० चौदपूर्वी, (८४) १९००० वैक्रियलब्धि. वाळा भने ११००० चादीयो थया. (८५) बज्रनाभ नामना प्रथम गणधर थया, अजिता नामनी मुख्य प्रवर्तिनी थइ श्रने मित्रवीर्य नामना राजा परम भक्त थया. (८६) मातुलिंग ने अक्षत्र जेना जमणा हाथमा छे ने नकुळ ने अंकुश जेना डाया हाथमा छे एयो, चार सुजावाळो ईश्वर नामनो यक्षराज श्याम अंगवाळो ने गजना वाहन- चाळो थयो. ते श्री अभिनंदनस्वामीना भक्तोतुं निरंतर कुशल करे छे. (८७-८८) जमणा ये हाथमा वरद ने पाश अने डापा बे हाथमा नाग ने अंकुशने धारण करनारी, सर्ग ३२ मो। (४५९) श्याम-कायकांतिश्चतुर्भुजा ।। ८९ ॥ पद्मासना सुरी काली नाम्ना धा. म्नातिभासुरा । वितनोति श्रियां नंदि-मभिनंदनसेविनां ॥ ९०॥ इति श्रीअभिनंदनः। विजये पुष्कलावत्यां धातकीखंडमंडने । प्राग्विदेहेषु विदिता नगरी पुंडरीकिणी ॥९१ ॥ एवं श्रीवासुपूज्यांता जिना श्रष्टौ विचक्षणः । उत्प- नाः प्राग्विदेहेपु ज्ञेयाः प्राक्तनजन्मनि ॥ ९२ ॥ अभूदनिवलस्तत्र राजा स्वीकृत्य स व्रतं । सीमंधरगुरोः पार्श्वे जयंते निर्जरोऽभवत् ॥ ९३ ॥ स्थितिं तत्र त्रयस्त्रिंश-त्सागरामनुभूय च । देशेषु कोशलाख्येपु पुरे साकेतनामनि ॥ ९४ ॥ मेघभूपालतनयो मंगलाकुक्षिसंभवः । पंचमः सुमतिर्नाम्ना जिनोऽभूत्क्रौंचलांछनः ॥ ९५ ॥ शुक्ला द्वितीया नभसो वैशाखस्य सिताष्टमी । तस्यैव नवमी शुक्ला चैत्रस्यैकादशी सिता ॥१६॥ चैत्रस्य नवमी शुक्ला कल्याणकदिनाः क्रमात् । स्याच्चतुर्पु मघा धिष्ण्यं पंचमे च पुनर्वसुः ॥ ९७ ॥ प्रभोर्गर्भस्थितिर्मासा नव पडूवासराधिकाः। चार मुजाचाळी, श्याम कांतिवाळी, पद्मना आसनवाळी, नामे करीने काळी परंतु तेजबहे प्रति भास्वर हती ते अभिनंदनस्वामीना सेवकोनी लक्ष्मीने निरंतर विस्तारे थे. (८९-९०) इति अभिनंदनः सुमतिनाथ वर्णन-घातकीखंडना मंडनभूत पूर्वमहाविदेहमा पुष्कळावती पुंडरीकिणी नामनी नगरी छे. (९१) अहीं सुमतिनाथथी वासुपूज्यसुधीना पाठ तीर्थ- करो पूर्वजन्ममा पूर्वमहाविदेहमा उत्पम श्रेला हता एम विचक्षणोए समजबु. (१२) ते नगरीमा अतिवळ नामे राजा हता, तेणे सीमंधर गुरुनी पासे चारित्र अंगीकार कर्यु, भने मृत्यु पामीने जयंत विमानमा देवपणे उत्पन्न थया. (९३) त्यां तेत्रीश सागरो- पमनुं श्रायुष्य अनुभवीने कोशळ नामना देशमा साकेत नामना नगरमा मेघ नामना राजानी मंगळा नामनी राणीनी कुक्षिमा पुत्रपणे उत्पन्न थया, वे क्रौंचना लांछनवाळा पांचमा सुमतिनाथ जिनेश्वर थया. (९४-९५ ) श्रावण शुदि २, वैशाख शुदि ८, वैशाख शुदि ९, चैत्र शुदि ११ ने चैत्र शुदि ९ ए पांच फल्याणकना अनुक्रमे दिवसो जाणवा. तेमांना चार न्याणक मघा नक्षत्रमा ने पांच, पुनर्वसु नक्षत्रमा थयु. (९६-९७) प्रसनी गर्मस्थिति नव मास ने छ दिवसनी, वणसो घनुष्यप्रमाण शरीर (४६०) গাঁজাসায়। धनुःशतप्रयं देहो-च्छ्रयो राशिम॑गाधिपः ॥ ९८ ॥ अभिनंदननिर्वाणा- नवभिः कोटिलक्षकैः। चत्वारिंशत्पूर्वलक्ष-न्यूनः पाथोधिभिः किल ॥९९।। सुमतेरभवजन्म शेपे तुर्यारकस्य च । चत्वारिंशत्पूर्वलक्षा-धिकेऽब्धि- कोटिलक्ष के ॥ ४०० ॥ हेतोरेकस्य पुत्रस्य सपन्योरुभयोरभूत् । विवाद एकदा भूयान् मृते पत्यौ धनाशया ॥४०१ ॥ साक्षी न कोऽपि तत्रा- सीत् पुत्रोऽपि न विवेद सः । विमातरं मातरं वा ताभ्यां साम्येन ला- लितः ॥ ४०२ ॥ कुंठेषु निर्णये तस्मि-न्नरेंद्रसचिवादिषु । अवादीन्म- गला राज्ञी तदा चोत्पन्नया धिया ॥ ३ ॥ गृहसर्वस्ववत्पुत्रो-ऽप्येष वेधा विभज्यतां । अनुमेने विमाता त-माता प्रोचे च साश्रुदृक् ॥४॥ अस्या एवास्तु पुत्रोऽयं गृहद्रव्यादिभिः सह । अस्मिश्चिरायुषि प्राप्त सर्वस्वमखिलं मया ॥ ५॥ अदापयत्ततस्तस्यै सुतं निश्चित्य मंगला । गर्भस्थस्य प्रभोरेव-मनुभावादभून्मतिः ॥ ६ ॥ स्वयं च शोभनमति- स्तस्मात्सुमतिसंज्ञकः । कौमारं विभरामास पूर्वलक्षाण्यसौ दश ॥७॥ अने सिंहराशि समजवी. (९८) अभिनंदनस्वामीना निर्वाणथी ४० लाख पूर्व न्यून नव लाख क्रोड सागरोपमे सुमतिनाथनो जन्म थयो त्यारे ४० लाख पूर्षे अधिक एक लाख क्रोड सागरोपम प्रमाण चौथो पारो पाकी रह्यो हतो. (४९९-४००) सुमतिनाथ नाम पाडवानुं कारण एवं चन्यु के एक पुत्रने माटे वे शोक्योने तेमनो पति मरण पाम्ये सते पतिना धननी श्राशाथी विवाद उत्पन्न थयो. (पने जणी पुत्र पोतानो छ एम कहेवा लागी) (४०१) तेमा साक्षी कोइ नहोतुं श्रने पुत्र पोतानी साची माताने के अपरमाताने ओळखतो नहोतो केमके ते बनेए सरसी रीते तेने उछर्यो हतो. (४०२) राजा अने मंत्री विगैरे तैनो निर्णय करवामां कुंठितवुद्धिवाळा थये सते मंगळा राणी ते वखते बुद्धि उत्पन्न थवाथी बोच्या (३) के-'गृहसर्वस्वनी जेम ा पुत्रने पण घे भाग करीने बहेंची भापो.' एटले ते वात विमाताए स्वीकारी. खरी माता प्रखमा मासु लावीने चोली (४) के अमारा घरना द्रव्यादिक साधे मा पुत्र पण भले एनो थानो. पुत्र चिरायु थशे एटले हुँ यधुं पामी एम मानीश. (५) या प्रमाणे तेना कहेवाथी राणीए निश्चय करीने ए पुत्र तेने ज सौंपाव्यो. गर्भमा रहेला पुषना प्रभावी ज तेमने भावी मति उपजी. (६)पा कारणथी अने ते प्रभु पोते शोभनमविवाळा होवाथी मर्नु नाम सुमतिनाथ पाडवामा श्राव्यु. दश लास पूर्व तेमणे कौमारावस्थामा व्यतीत .

सर्ग ३२ मो। (४६१) एकोनत्रिंशतं स्वामी पूर्वलक्षाण्यपालयत् । सातिरेकाणि पूर्वांगै राज्यं द्वादशभिर्भुवि ॥ ८॥ व्रतं द्वादशपूर्वांग-न्यूनं च पूर्वलक्षकं । चत्वारिं- शत्पूर्वलक्षा-ण्यायुश्छाम्येऽब्दविंशतिः ॥ ९ ॥ ज्ञानद्रुमः प्रियंगुः स्या- व्रतार्थमभयंकरा । शिविका पारणं चायं पद्मोऽदाद्विजये पुरे ॥ १०॥ प्रभोः शतं गणभृतां सविंशतिसहस्रकं । लक्षत्रयं स्युर्मुनयो गुण- माणिक्यभूभृतः ॥ ११ ॥ पंच लक्षाः संयतीनां सहौस्त्रिंशताधिकाः । लक्षद्वयं श्रावकाणां सैकाशीतिसहस्रकं ॥१२॥ पंच लक्षाः श्राविकाणां सपोडशसहस्त्रकाः। त्रयोदश सहस्राणि प्रभोः केवलशालिनां ॥ १३ ॥ शतैश्चतुर्भिरद्धय?ः सहस्रा दश साधिकाः। मनोविदा सहस्राश्चै-का. दशावधिवेदिनां ॥ १४ ॥ शताश्चतुर्विंशतिश्च स्युश्चतुर्दशपूर्विणां । अष्टा- दश वैक्रियाढ्य-सहस्राः सचतुःशताः ॥ १५॥ सार्बेः पद्भिः शतैर्युक्ताः सहस्त्रा दश वादिनां। चमरो गणभृन्मुख्यः काश्यपी च प्रवर्तिनी ॥१६॥ मतांतरे च निर्दिष्टाः सहस्रा दश वादिनां। शतैश्चतुर्भिरद्धय?-रधि- काः श्रुतकोविदः ॥ १७ ॥ सत्यवीर्यो नृपो भक्तो यक्षः स्यात्तुंवरुः स च । चतुर्भुजः श्वेतवर्णः श्रीमान् गरुडवाहनः ॥ १८ ॥ दधानो वरदं कर्या. (७) पार पूर्वागयुक्त २९ लाख पूर्व पृथ्वीनी प्रतिपालना करी, (८) दीक्षा- पर्याय पार पूर्वागे न्यून एक लाख पूर्वनो थयो. ए प्रमाणे एकंदर ४० लाख पूर्व- प्रा. युष्य थयुं. छयस्थपणामां वीश वर्ष व्यतीत थया. (९) ज्ञानवृक्ष प्रियंगु नामर्नु, व्रतार्थे शिपिका अभयंकरा नामनी अने प्रथम पारणुं विजयपुरमा पमराजाने त्यां थयुं. (१०) सुमतिप्रभुने सो गणधर थया, साधु प्रण लाख ने पशि हजार गुणरूप माणिक्यना पर्वत समान थया. (११) पांच लाख ने त्रीश हजार साध्वीओ, २८१००० थावको, (१२) ५१६००० भाविका, १३००० केवळज्ञानी, (१३) १०४५० मनाप. यवज्ञानी, ११००० अघधिज्ञानी, (१४) २४०० चौदपूर्वी, १८४०० वैफियलन्धि वाळा, (१५) १०६५० वादी-मतांतरे श्रुतकोविदोए १०४५० कक्षा के. चमर नामे मुख्य गणधर, काश्यपी नामनी प्रवर्तिनी (१६-१७) श्रने सत्यवीर्य राजा प्रसनो मक्त थयो. यच बरु नामनो थयो, ते चार मुजायाळो, श्वेत वर्णवालो ने गरुडना वाहन- वाळो थयो. (१८) तेना जमणा पे हाथमा वरद ने शक्ति अने डापा पे हाथमा गदा (४६२) श्रीफासलोकप्रकारा। शक्ति-मपसव्यकरद्वये । गदा च नागपाशं च वामहस्तद्वयेऽदधत् ॥१९॥ देवी भवेन्महाकाली स्वर्णवर्णावुजासना । चतुर्भुजा सवरद-पाशयाम्य- करद्वया ॥ २० ॥ मातुलिंगांकुशोपेत-वामहस्तद्वयानिशं । सुमतिप्रभुभ. कानां पूरयंती मनोरथान् ॥ २१ ॥ इति श्रीसुमतिः ॥ प्रागभूद्धातकीखंडे विजये वत्सनामनि । सुसीमायां महापुर्यां नृपो नानापराजितः ॥ २२ ॥ सोऽभूत्प्रपद्य चारित्रं सुगुरोः पिहिताश्रवात् । एकत्रिंशत्सागरायु-देवो ग्रैवेयकेंतिमे ॥ २३ ॥ वत्सदेशे सुकोशायां नगर्यां धरभूपतेः । अभूत्सुतः सुसीमायां राइयां पद्मप्रभस्ततः ॥ २४ ॥ माघस्य षष्ठी कृष्णाथ द्वादशी च त्रयोदशी। कार्तिकस्यासिता चैत्र- पौर्णीमासी ततः पुनः ॥ २५ ॥ कृष्णा मार्गकादशी च कल्याणक- दिनाः क्रमात् । धिष्ण्यं च पंचस्वप्येषु चित्रासंज्ञकमीरितं ॥ २६ ॥ पडूवासराधिका मासा नव गर्भस्थितिः प्रभोः। कन्याराशिश्च विज्ञेयो लांछनं च सरोरुहं ॥ २७ ॥ त्रिंशत्पूर्वलक्षहीने-नवत्याभूत्सहस्रकैः । नागपाश धारण करेला हता. ( १९) देवी महाकाली नामनी थइ ते स्वर्णसरखा वर्णवाळी, कमळना पासनवाळी, चार भुजावाळी, तेमां जमणा बे हाथमा वरद ने पाश अने डावा वे हाथमा मातुलिंग ने अंकुश धारण करनारी सुमतिनाथप्रभुना भक्तोना मनोरथोने निरंतर पूरनारी थइ. ( २०-२१) इतिश्री सुमतिः श्रीपानमनभुवर्णन-- पूर्वभवमा धातकीखंडना पूर्वमहाविदेहमां वत्स नामनी विजयमा सुसीमा नामनी महापुरीमा अपराजित नामे राजा हता. (२२) ते पिहिता- श्रव नामना गुरुपासे चारित्र अंगीकार करीने नवमा अवेयकमा ३१ सागरोपमने पाउखे देवपणे उत्पन्न थया. ( २३ ) त्यांथी च्यवीने वत्सदेशमा सुकोशा नामनी नगरीमा धर राजा अने सुसीमा राणीना पुत्रपणे पद्मप्रभु नामना छठा जिनेश्वर थया. (२४) माह यदि ६, कार्तिक पदि १२, कार्चिक वदि १३, चैत्र शुदि १५ अने मार्गशीर्ष वदि ११-या पांच कल्याण कना दिवसो अनुक्रमे थया. पांचे कल्याणको चित्रा नक्षत्रमा थया. (२५-२६) नव महिना ने छ दिवसनी गर्मस्थिति, कन्याराशि भने कमळनुं लांछन थयु. ( २७ ) सुमतिनाथ निर्वाण पाम्या पछी त्रीश लाख पूर्व न्यून नेवू हजार क्रोड सागरोपमे पमप्रभुनो जन्म थयो. (२८) ते वखते चोथो पारो श्रीश लास पूर्व अधिक - सर्ग ३२ मो। (४६३) पद्मप्रभोऽन्धिकोटीना-महत्सुमतिनिवृतेः ॥ २८ ॥ सहस्रा अब्धिको- टीनां दश तुर्यारकस्य च । प्रभुजन्मन्यशिष्यंत सत्रिंशत्पूर्वलक्षकाः ॥ २९ ॥ पद्मवनिर्मलो यस्मा-मातुर्गर्भस्थिते प्रभौ । पद्मप्रभांकश- व्यायां दोहदात्तादृशाह्वयः ॥ ३० ॥ धनुःशतद्वयं साई स्वामिनो वपु- रुच्छ्रयः । सार्द्धानि पूर्वलक्षाणि सप्त ज्ञेया कुमारता ॥ ३१॥ राज्य- श्वर्य पूर्वलक्षा-एयद्ध्यर्द्धान्येकविंशति । सातिरेकाणि पूर्वांगैः पूर्णैः षोडशभिर्दधौ ॥ ३२ ॥ पूर्वलक्षं च पूर्वांगै-रूनं पोडशभिर्वतं । त्रिंश- पूर्वलक्षजीवी मासांश्च पडकेवली ॥ ३३ ॥ शिविका निर्वृतिकरा प्रथमां पारणां ददौ । ब्रह्मस्थले सोमदेव-छत्रौघो ज्ञानपादपः ॥ ३४ ॥ सप्तो- त्तरं गणभृतां शतं संयमिनां प्रभोः । तिस्रो लक्षाः सहसाश्च त्रिंशद्वि. मलचेतसां ॥ ३५॥ लक्षाश्चतस्रः साध्वीनां सहस्राणि च विंशतिः । पट्सप्ततिः सहस्राणि द्वं लक्षे श्रावकोत्तमाः ॥ ३६ ॥ लक्षाः पंच सह- स्राश्च पंच स्युः श्राविकाः प्रभोः । सहस्रा द्वादशाभूवन् केवलज्ञानशा- लिनां ॥ ३७ ॥ सहस्राणि दश प्राहु-स्तथा त्रीणि शतानि च । मनो- विदामथ दश सहस्राण्यवधिस्पृशां ॥ ३८॥ शतास्त्रयोविंशतिश्च स्युश्च- दश हजार क्रोड सागरोपम बाकी हतो. ( २९ ) पद्मनी जेवा निर्मळ होवाथी तेम ज माताने प्रभु गर्ममा हता त्यारे पद्मनी शय्यामा सुवानो दोहद थयो हतो तेथी ए प्रभुन नाम प धप्रभ पाडवामा श्राव्यु. (३०) तेमनु शरीर अढी सो धनुष्य उंचं हतुं. साडासात लाख पूर्व कौमारावस्थामा व्यतीत थया, (३१) अने सोळ पूर्वागयुक्त २१॥ लाख पूर्व राज्यनी प्रतिपालना करी. (३२) सोळ पूर्वांगे न्यून एक लाख पूर्वनो चारित्रप- र्याय थयो. एकंदर त्रीश लाख पूर्वनुं आयुष्य भोगव्यु. छ मास ज छद्मस्थपणे रह्या. (३३) दीक्षा भवसरे शिपिका नितिकरा नामनी हती. प्रथम पारणुं ब्रह्मस्थळ नग- रमा सोमदेवने त्यां पयु. ज्ञानवृक्ष छौंघ नामनुं हतुं. (३४) पद्मप्रभ प्रभुने १०७ गणधरो, ३३०००० निर्मळ मनवाळा मनियो हता. (३५) चार लाख ने वीश हजार साध्वी, २७६००० उत्तम श्रावको, (३६) पांच लाख ने पांच हजार भाविकामो, चार हजार केवळज्ञानीनो, (३७) दश हजार ने प्रण सो मनापर्यवज्ञानी, दश हजार भवधिज्ञानी, (३८) २३०० चौदपूर्वी, नव हजार .

(४६४) श्रीकाललोकप्रकाश। तुर्दशपूर्विणां । सहस्राश्च नव प्रोक्ता वादिनां पट्शताधिकाः ॥ ३९ ॥ सहस्राः पोडश शतं चाष्टाढ्यं वैक्रियस्पृशः । सूर्याख्यो गणभृन्मुख्यो रतिसंज्ञा प्रवर्तिनी ॥ ४०॥ नृपश्चाजितसेनाख्यः प्रभुभक्तिपरायणः । यक्षश्च कुसुमो नील-वर्णो हरिणवाहनः ॥ ११ ॥ अभयं च फलं चाय- मपसव्ये करद्वये । नकुलं चाक्षसूत्रं च धत्ते वामे चतुर्भुजः ॥ ४२ ॥ देवी भवेदच्युताख्या श्यामाख्येयं मतांतरे । चतुर्भुजा श्यामवर्णा भास्वरा नरवाहना ॥ ४३ ॥ युक्तं वरदवाणाभ्यां स्यादक्षिणकरद्वयं । कार्मुकाभययुक्तं च वाममस्याः करद्वयं ॥ ४४ ।। इति पद्मप्रभः । विजये रमणीयाख्ये धातकीखंडमंडने । प्राग्विदेहेषु च शुभा-पुर्या नंदनरेश्वरः ॥ ४५ ॥ संयमं प्रतिपद्याभूत् स चारिदमनाद्गुरोः । षष्ठे ग्रैवेयके देवो-ऽष्टाविंशत्यधिजीवितः ॥ ४६॥ काशीदेशे वाराणस्यां प्रतिष्ठनृपतेस्ततः । राइयां पृथिव्यां तनयः श्रीसुपार्श्वजिनोऽभवत् ॥४७॥ भाद्रमासेऽष्टमी कृष्णा ज्येष्ठे च द्वादशी सिता। ज्येष्ठे त्रयोदशी शुक्ला ने छसो वादी ( ३९ ) अने १६१०८ वैक्रियलब्धिवाळा थया. सूर्य नामना मुख्य गण- धर, रवि नामे प्रवर्तिनी (४०) अंने अजितसेन नामनो राजा प्रमुभक्तिमां परायण थयो. कुसुम नामनो यक्ष नीलवर्णवाळो, हरिणना वाहनवाळो, (४१) अभय ने फळ जमणा चे हाथमा ने नकुळ ने अक्षसूत्र डाबा वे हाथमा धारण करनारो, चार भुजावाळो थयो. (४२) अच्युता नामे देवी मतांतरे श्यामा नामे देवी चार भुजावाळी, श्यामव- वाळी, मास्वरशरीस्याळी, नरना वाहनवाळी, (४३) दक्षिणबाजुना बे हाथमा परद ने बाण अने डायीवाजुना ये हाथमा कार्मुक ने अभयने धारण करनारी थइ. (४४) इति पद्मप्रमा -श्रीसुपार्श्वनाथवर्णन-धातकीखंडना मंडनभूत रमणीय नामना विजयमा शुभापुरी नामनी नगरीमा नंद नामना राजा इता. (४५) तेमणे अरिदमन गुरुनी पासे चारित्र अंगीकार कयु श्रने छठा अवेयकर्मा २८ सागरोपमने पाउखे देवरूपे उत्पन्न थया. (४६) त्यांथी च्यची काशीदेश, वाराणसी नगरीमा प्रतिष्ठराजानी पृथ्वीराणीनी कृतिथी श्रीसु. पायजिन पुत्रपणे उत्पन्न थया. (४७) भाद्रपद बदि ८, ज्येष्ठ शुदि १२, ज्येष्ठ शुदि १३, फान्गुन वदि ६ अने भाद्रपद यदि ७-ए अनुक्रमे पांच कन्याणकनी तिथियो समें १२ मो। (४६५) कृष्णा षष्ठी च फाल्गुने ॥४८॥ श्यामा च सप्तमी भाद्रे कल्याणति- थयः क्रमात् । चतुर्यु भं विशाखा स्था-दनुराधा च पंचमे ॥ ४९ ॥ सैकोनविंशतिदिना मासा गर्भस्थितिर्नव । तुलाराशिश्च विज्ञेयो लांछनं स्वस्तिकं प्रभोः ॥५०॥ अभूत्सुपार्थो नवभि-द्धिकोटिसहस्रकैः । विंशतिपूर्वलक्षोनैः श्रीपद्मप्रभमोक्षतः ॥ ५१ ॥ सहस्रमब्धिकोटीनां विंशत्या पूर्वलक्षकैः । अशिष्यताधिकं तुर्या-रकस्य प्रभुजन्मनि ॥५२॥ शुभपार्थः सुपार्श्व: स्या-न्मातुर्गर्भस्थिते प्रभौ । सुपार्श्वताभवदेहे ततो- ऽयं तादृशाह्वयः ॥५३॥ मातुरेवं फणशय्या-स्वप्नात्प्रोक्ताः फणाः प्रभोः। एको वा पंचे नवे वा संप्रदायविशारदैः ॥ ५४ ॥ तथोक्तं सुपार्श्वचरित्रे पद्मानंदे-फणिन्येकफणे पंच-फणे नवफणेऽपि च । सुप्तं स्वप्ने प्रभौ गर्भ-स्थिते माता स्वमैक्षत ॥ ५५॥ पृथ्या स्वप्नेक्षितं तादृक् सर्प शीर्पोपरि स्थितं । शको विचक्रे समव-सरणेषु सदा विभोः ॥ ५६ ॥ पूर्वाणां पंच लक्षाणि कौमार्येऽथ नरेंद्रता । पूर्वांगविंशतियुताः पूर्व- थइ. चार कल्याणकमा विशाखा नक्षत्र अने पांचमामा अनुराधा नक्षत्र जाणवू. (४८-४९) नव मास ने १९ दिवसनी गर्मस्थिति, तुलाराशि अने स्वस्तिकतुं लांछन जाण. (५०) श्रीपप्रभुना मोक्षयी वीश लाख पूर्वे न्यून नव हजार क्रोड सागरो- पम व्यतीत थया त्यारे सुपार्श्वनाथनो जन्म थयो. (५१) ते चखते वीश लाख पूर्वे अधिक एक हजार कोड सागरोपम चोथो पारो पाकीमा हतो. (५२) शुम पासा होवाथी सुपार्थ अथवा प्रभु गर्नमां स्थित हता त्यारे माताना देहमा सुपार्श्वता-सुंदर पडखापणुं थयुं वेथी सुपार्श्व नाम पाडवामां आव्यू. (५३) माताने फणानी शय्यार्नु स्वप्न भावेलुं होवाथी संप्रदायना विशारदोए सुपार्श्वनाथनी प्रतिमाने एक, पांच अथवा नव फणा करवान कहेलं छे. (५४) श्रीमुपार्श्वचरित्रमा पद्यानंदे कमु छ के-'पृथ्वी. माताए प्रभु गर्ममा हता त्यारे एक फणा, पांच फणा ने नव फणावाला सर्प उपर सुतेला पोताना भात्माने स्वप्नमा जोयो हतो. (५५) पृथ्वीदेवीए स्वप्ना जोयेला तेवा प्रकारना सर्पने शकेंद्र समवसरणमा निरंतर प्रभुना मस्तकपर रहेलो रचता हवा.' (५६) पांच लाख पूर्व फौमारावस्थामा भने वीश पूर्वागयुक्त चौद लाख पूर्व राज्याव- स्थामा म ज वीश पूर्वागे न्यून एक लास पूर्व श्रमणावस्थामा ध्यतीत थवाची एक. .

(४६६) श्रीकाललोकप्रकाश । लक्षाश्चतुर्दश ।। ५७ ॥ एकं विंशतिपूर्वांग-न्यूनं च पूर्वलक्षकं । श्रा. मण्यं तत्र छाास्थ्यं मासा नव विभोः स्मृताः ॥ ५८ ।। विंशतिः पूर्व- लक्षाणि सर्वमायुरभूद्विभोः । श्रभूच्च वपुरोन्नत्यं विभोश्चापशतद्वयं ॥५९।। मनोहरा स्याच्छिविका ददौ प्रथमपारणं । महेंद्रः पाडलीखंडे शिरीषो ज्ञानपादपः ॥ ६०॥ गणेंद्राः पंचनवति-लक्षाणि त्रीणि साधवः । लक्षाश्चतस्त्रः साध्वी- नां सहस्रस्त्रिंशताधिकाः ॥ ६१ ॥ सहस्राः सप्तपंचाश-ल्लक्षे द्वे श्रावको त्तमाः । सहस्राणि त्रिनवतिः श्राद्धीलक्षचतुष्टयं ।। ६२ ॥ एकादश सह- स्राणि केवलज्ञानशालिनां। पंचाशानि शतान्येक-नवतिश्च मनोविदा ॥ १३ ॥ अवधिज्ञानभाजां च सहस्रा नव कीर्तिताः । स्वगोचरानुसारेण मूर्त्तद्रव्याणि पश्यतां ॥ ६४ ॥ सहस्रौ त्रिंशदधिको द्वौ चतुर्दशपूर्विणां । वैक्रियाणां पंचदश सहस्रास्त्रिशताधिकाः ॥ ६५॥ स्युः प्रभोर्वादिनामष्टौ सहस्राः सचतुःशताः। विदर्भो मुख्यगणभृ-प्रभोः सोमा प्रवर्तिनी ॥ ६६ ॥ दानवीर्यो नृपो भक्तो यक्षो मातंगसंज्ञकः । चतुर्भुजो नील- वर्णः श्रीमान् कुंजरवाहनः ॥६७ ॥ स राजते बिल्वपाश-युग्दक्षिण- करद्वयः । नकुलांकुशसंयुक्त वामहस्तद्वयोऽपि च ॥६८॥ जात्यचामी- दर वीश लाख पूर्वनुं आयुष्य थयु. मां छद्मस्थपणे मात्र नव मास रह्या. शरीरनी उंचाइ यसो धनुष्यनी थइ. (५७-५९ ) दीक्षा अवसरे शिविका मनोहरा नामनी श्रने प्रथम पारगुं पाडलीखंड नगरमा महेंद्र राजाने त्यां थयु. शिरीष नामनुं ज्ञानवृक्ष हतुं.(६०) श्रीसुपार्श्वनाथने ९५ गणघर, त्रण लाख साधुओ, चार लाख ने त्रीश हजार साध्वीओ, (६१) २५७००० श्रावको, ४९३००० श्राविकाओ, (६२) ११००० केवळज्ञानी, ९१५० मनापर्यवज्ञानी, (६३) ९००० अवधिज्ञानी, तेसो पोताना ज्ञाना- नुसार रूपी द्रव्यने जोनारा हता. (६४) २०३० चौदपूर्वीयो, १५०३० वैक्रियल- ब्धिवाला (६५) भने ८४०० वादी थया. मुख्य गणधर विदर्भ नामना, प्रवर्तिनी सोमा नामनी (६६) अने दानवीर्य राजा प्रभुनो भक्त थयो. मातंग नामनो यक्ष चार मुजावाळो, नील वर्ण वाळो, शोमीतो, कुंजरना वाहनवाळो थयो. (६७) तेना जमणा घे हाथ पीच्च ने पाशयुक्त भने डावा वे हाथ नकुळ ने अंकुशयुक्त हता. (६८) + सर्ग १२ मो। (४६७) करज्योति-जासीना चतुर्भुजा । धत्तेऽक्षसूत्रं वरद-मपसव्ये करद्वये ॥ ६९ ॥ दधाति शुलमभयं या च वामकरद्वये । सुपार्श्वसेविनां शांति देवी शांता करोतु सा ॥ ७० ॥ इति सुपार्श्वः ॥ श्रीवर्माख्यो नृपः पूर्वं सौधर्मेऽभूत्सुरस्ततः । ततश्चाजितलेनाख्यो विख्यातश्चक्रवर्त्यभूत् ॥ ७१ ॥ इंद्रस्ततोऽच्युतेऽथायं धातकीखंडमंडने । विजये मंगलावत्या प्राग्विदेहविभूषणे ॥ ७२ ॥ श्रीरत्नसंचयापुर्या पद्मनामा नृपोऽभवत् । युगंधरगुरोः पार्श्वे स प्रवज्यामुपाददे ॥ ७३ ॥ वैजयंतविमानेऽभू-ततो देवो महर्द्धिकः। त्रयस्त्रिंशत्सागरायु-स्ततच्युत्वा स्थितिक्षये ॥ ७४ ।। पूर्वदेशे चंद्रपुर्यां महसेनमहीपतेः । चंद्रप्रभोऽभू- द्भगवान् लक्ष्मणाकुक्षिसंभवः ॥ ७५ ॥ अत्र चंद्रप्रभजन्मपुर्या नाम 'चंदाणण त्ति ' आवश्यके. चैत्रस्य पंचमी कृष्णा पौपस्य द्वादशी शितिः । पौषफाल्गुनयोः कृष्णा त्रयोदशी च सप्तमी ॥ ७६ ॥ भाद्रस्य सप्तमी श्यामा कल्याणकदिना विभोः । अनुराधा चतुर्षु स्याद्धिष्ण्यं ज्येष्टा च पंचमे ॥ ७७ ॥ प्रभोर्गर्भस्थितिर्मासा नव सप्तदिनाधिकाः । जात्यवंत सुवर्ण सरखी कातिवाळी, हाथीना वाहनवाळी, चार भुजावाळी, जमणा ये हाथमा अक्षसूत्र ने वरद अने डावा वे हाथमा शूळ ने अभयने धारण करनारी शांता नामनी देवी सुपार्श्वनाथना भक्तोने शांति करो. (६९-७० ) इति श्रीसुपार्थः श्रीचंद्रप्रमप्रसुवर्णन-श्रीवर्म नामनो राजा पूर्वे सौधर्म देवलोकमां देव थयो हतो ते त्यांची च्यवीने अजितसेन नामना विख्यात चक्रवर्ती थया. (७१) त्यांथी वारमा अच्युत देवलोका इंद्र थया. त्यांची व्यवीने धातकीखंडना मंडनभूत अने पूर्वमहावि. देहना आभूषणभूत मंगळावती विजयमां श्रीरत्नसंचया नामनी नगरीमा पद्मनामे राजा थया. तेमणे युगंधर गुरुनी पासे चारित्र अंगीकार कर्यु (७२-७३) भने वैजयंत विमानमा तेत्रीश सागरोपमने पाउखे महर्द्धिक देव थया त्यांची स्थितिक्षये च्ययीने पूर्वदेशमां चंद्रपुरी नगरीमा महसेन राजानी लक्ष्मणा नामनी राणीनी कुविधी चंद्रप्रम नामे जिनेश्वर थया. (७४-७५) 'अहीं भावश्यकसूत्रमा चंद्रप्रमनी जन्म- पुरीनुं नाम चंद्रानना कहेल छ । चैत्र पदि ५, पौष वदि १२, पोप वदि १३, फागुन यदि ७ अने माद्रपद वदि ७-मा तेमना पांच कन्याणफनी तिथिो जाणवी. चार मल्याणकमा अनुराधा नक्षत्र अने पांचमामा ज्येष्ठा नपत्र बाण. (७६-७७) प्रसुनी (४६८) श्रीकानलोकप्रकाश। शशभूल्लांछनं राशि-वृश्चिकाख्योऽभवत्प्रभोः ॥ ७८ ॥ ींना नवभिः कोटि-शतैः सुपार्श्वनिर्वृतेः । अभूत्प्रभोर्जन्म दश-पूर्वलक्षोनकैः किल ॥ ७९ ॥ अधिक दशभिः पूर्व-लक्षैस्तुर्यारके तदा । शतमंभोधिको- टीनां शिष्यते स्मेशजन्मनि ॥ ८०॥ प्रभौ गर्भगते मातु-चंद्रपानम- नोरथात् । यāदुसौम्यलेश्यत्वा-त्स्वामी चंद्रप्रभाभिधः ॥ ८१ ॥ पूर्व- लक्षद्वयं साई सार्धाः पट् पूर्वलक्षकाः । चतुर्विंशतिपूर्वांगा-धिकाः कौमार्यरज्ययोः ॥ ८२॥ चतुर्विशतिपूर्वांग-न्यूनं च पूर्वलक्षकं । श्रामण्यं तत्र मासानां त्रयं छद्मस्थतास्थितिः ॥ ८३ ॥ पूर्वाणां दश लक्षाणि सर्वमायुरभूत्प्रभोः । धनुषां च शतं सार्दू भगवद्वपुरुच्छ्यः ।। ८४ ॥ मनोरमाख्या शिविका प्रथमा पारणां ददौ । पद्मखंडे सोम- दत्तो नागाख्यो ज्ञानभूरूहः ॥ ८५ ॥ गणेशाश्च त्रिनवति-रध्यर्द्ध लक्षयोयं । संयतानां संयतीनां लक्षास्तिस्त्रस्तथोपरि ॥८६॥ स्युरशीतिः सहस्राणि श्राद्धा मुनि- मिता मताः । पंचलक्षी नवसह-स्रोनाश्चोपासिका मताः ॥८७॥ सर्व गर्मस्थिति नव मास ने सात दिवसनी, चंद्रनुं लांछन अने प्रभुनी राशि वृश्चिक जाणवी. (७८) सुपार्श्वनाथना निर्वाणथी दश लाख पूर्वे न्यून नयसो क्रोड सागरोपमे चंद्रप्र. मनो जन्म थयो. (७९) ते वखते दश लास पूर्वे अधिक एक सो क्रोड सागरोपम प्रमाण चोथो भारो वाकी हतो. (८०) प्रभु गर्भमा हता त्यारे माताने चंद्रपाननो मनोरथ थयो हतो तेथी तेम ज चंद्रसमान सौम्य लेश्या( कांति वाळा होवाधी सेमर्नु नाम चंद्रप्रभ पाडवामां आव्यु. ( ८१ ) अढी लाख पूर्व कौमारावस्थामा भने चोवीश पूर्वागयुक्त साडाच लाख पूर्व राज्यावस्थामां व्यतीत थया. (४२) चोवीश पूर्वागे न्यून एक लास पूर्व श्रमणावस्थामां व्यतीत थया. ए रीते एकंदर दश लाख पूर्वनुं चंद्रप्रभ प्रसनु प्रायुष्य जाण. छप्रस्थावस्थामा प्रण मास ज रमा. एमनुं शरीर दोढसो धनुष्य प्रमाण उंचं हतं. (८३-८४) दीक्षा भवसरे मनोरमा नामे शिपिका हवी. प्रथम पारणं पखंड नगरमा सोमदचने त्यां ययु. छानच नाग नामर्नु इतुं. (८५) चंद्रप्रमप्रसुने गणधर ९३, भढी लाए साधुमो, प्रण लारा ने ८० हजार सावी. भो, मढी लारा भावको ने ४९१००० भाषिकामो, (८६-८७) १०००० केवळझानी, सर्ग ३२ मो। (४६९) ज्ञानां सहस्राणि दशाष्टौ च मनोविदा । अष्टावधिस्पृशां वैक्रि-याख्यानां च चतुर्दश ॥ ८८ ॥ सहस्से द्वे भगवतः स्याच्चतुर्दशपूर्विणां । अभूवन वादिनां सप्त-सहस्राः पट्शताधिकाः ।। ८९ ॥ दिन्नो गणधरो मुख्यः सुमनाश्च प्रवर्तिनी । भक्तश्च मघवा भूमान् यक्षः स्याद्विजयाभिधः ॥९० ॥ स च त्रिनेत्रो हरित-वर्णागो हंसवाहनः । चक्रयुग्दक्षिणकरो वामपाणी समुद्गरः ॥ ९१ ॥ प्रभो लाभिधा देवी भृकुटिश्च मतांतरे । चतुर्भुजा पीतवर्णा वरालकाख्यवाहना ॥ ९२ ॥ वरालको जीवविशेषः । सा खड्गमुद्गरौ धत्ते हस्तयोरपसव्ययोः। फलकं परशुं चैव सव्ययोः करपद्मयोः ।। ९३ ॥ इति चंद्रप्रभः ॥ विजये पुष्कलावत्यां प्राग्विदेहेषु पुष्करे । नगयां पुंडरीकियां महापद्मोऽभवन्नृपः ॥ ९४ ॥ स सर्वजगदानंद-गुरुपाच॑ धृतवतः । एकोनविंशत्यब्ध्यायु-रानते त्रिदशोऽभवत् ॥ ९५ ॥ शून्यदेशेऽथ काकंद्यां पुर्या सुग्रीवभूपतेः । रामाराज्ञीकुतिभवः पुत्रोऽभूत्सुविधिर्जिनः . ८००० मनःपर्यवज्ञानी, ८००० अवधिज्ञानी, १४००० पैनियलब्धिवाळा, (८८) २००० चौदपूर्वी अने ७६०० वादीो थया. ( ८९) गणघरमा मुख्य दिन नामना, साध्वीमा मुख्य सुमना प्रवर्तिनी अने मघवा नामनो राजा भक्त थयो. यक्ष विजय नामनो थयो. (९०) ते त्रण नेत्रवाळो, हरितवर्णवाळो, हंसना वाहनवाळो, दक्षिण हाथमा चक्र ने डावा हाथमा मुद्गरवाळो थयो. (९१) प्रमुनी यक्षिणी ज्वाळा नामनी मतांतरे भृकुटी नामनी थइ. ते चार भुजावाळी, पीत वर्णवाळी, वरालक नामना वाहन. वाळी ( वरालक जीव विशेष जाणवो), (९२) जमणा ये हाथमा खड्ग ने मुद्गर अने डावा ये हाथमा फलक ने परशुने धारण करनारी थइ. (९३ ) इति श्रीचंद्रप्रमा श्रीसुविधिनाथ वर्णन-पुष्करार्घद्वीपना पूर्वमहाविदेहमा पुष्कळावती विजया पुंडरीकिणी नगरीमा महापद्म नामे राजा हता. (९४ ) तेमणे सर्व जगदानंद नामना गुरुनी पासे चारित्र ग्रहण कर्य. त्यांथी काळ करीने बानत नामना नवमा देवलोकर्मा १९ सागरोपमने आउने देवपणे उत्पन्न थया. (९५) त्याथी च्यवीने शून्य देशमा काकंदीपुरीमा सुग्रीव राजानी रामा राणीनी कृषियी सुविधिजिन पुत्रपणे उत्पन्न थया.

(७०) भीकाललोकप्रकारा। ॥ ९९ ॥ फाल्गुने नवमी श्यामा कृष्णा मार्गस्य पंचमी । श्यामा पष्ठी च तस्यैव तृतीया कार्तिकेसिता ॥ ९७ ॥ भाद्रस्य नवमी शुक्ला कल्या- तिथयः प्रभोः। पंचस्वप्येपु नक्षत्रं मूलं राशिर्धनुर्भवेत् ॥९८ ॥ अष्टौ-मासाः स्थितिर्गर्भे षड्विंशतिदिनाधिकाः । मकरो लांछनं देहो- च्छ्रयश्च धनुषां शतं ॥ ९९ ॥ नवत्यांभोधिकोटीनां पूर्वलक्षद्वयोनया । श्रीचंद्रप्रभनिर्वाणा-जातः श्रीसुविधिर्जिनः ॥ ५०० ॥ दश कोव्यः सागराणां पूर्वलक्षद्वयाधिकाः । तुर्यारके स्म शिष्यंते श्रीमत्सुविधिज. न्मनि ॥ ५०१ ।। शुभक्रियापरत्वेन विख्यातः सुविधिः प्रभुः । माता वा गर्भकालेऽभू-सुविधिर्यत्ततस्तथा ॥ ५०२ ॥ पंचाशदेव पूर्वाणां कुमारत्वे सहस्रकाः । अष्टाविंशतिपूर्वांगा-धिकास्ते राज्यसंस्थितौ ॥ ३॥ अष्टाविंशतिपूर्वांग-न्यूनं च पूर्वलक्षकं ।व्रते छद्मस्थता तत्र प्रभोर्मासच- तुष्टयं ॥ ४ ॥ पूर्वलक्षद्वयं सर्व-मायुरासीजगत्पतेः । सूरप्रभाख्या शि- विका मल्लिः स्याद् ज्ञानभूरुहः ॥५॥ पूष्याभिख्यः श्वेतपुरे पारणां प्रथा (९६ ) फाल्गुन वदि ९, मार्गशीर्ष वदि ५, मार्गशीर्ष वदि ६, कार्तिक वदि ३ ने भाद्रपद शुदि ९ ए पांच कल्याण कनी तिथि जाणवी. पांचे कल्याणक मूळ नक्षत्रमा थया. प्रमुनी राशि धनु जाणवी. ( ९७-९८) आठ मास ने २६ दिवसनी गर्भस्थिति, मकरनुं लांछन भने देह सो धनुष्य उचो जाणवो. (९९) श्रीचंद्रप्रमप्रभुना निर्वाणथी पे लास पूर्व ऊन ने क्रोड सागरोपमे सुविधिनाथ उत्पन्न थया. (५००) सुविधिना- थना जन्म वखते चोथो आरो वे लास पूर्वे अधिक दश कोटी सागरोपम बाकी हतो. (५०१) शुभ क्रियामा तत्पर होवाधी तेम ज मावाने गर्भकाळे सुविधिमा तत्परता थएल होषाची सुविधिनाथपणे प्रसिद्ध थया. (५०२) पचास हजार पूर्व कौमारावस्थामा भने २८ पूर्वांगे अधिक पचास हजार पूर्व राज्यावस्थामा व्यतीत थया. (३) २८ पूर्वागे न्यून एक लाख पूर्व व्रतपणामा रया. तेमा छमस्थमाव चार मासनो ज हवो. (४) फुल भायुप्प जगत्पति सुविधिनाथ- पे लाख पूर्वनुं हतं. दीक्षा अवसरे सूरप्रमा नामे शिविका इती भने ज्ञानयुष मनी नामनुं हतं. (५) प्रथम पारणुं श्वेतपुरमा पूज्य राजाने त्यांथ हां.

। सर्ग ३२ मो । (४७१) ददौ । अष्टाशीतिगणभृतो वे लक्ष मुनिसत्तमाः ॥६॥ लचमेकं च साध्वीनां सहस्राणि च विंशतिः । एकोनत्रिंशत्सहस्रा द्वे लक्षे श्रावकों- त्तमाः॥७॥ श्राविकाणां चतुर्लक्षी सहस्राण्येकसप्ततिः। केवलज्ञान- भाजां स्युः शतानि पंचसप्ततिः ॥ ८॥ शताः पंचसप्ततिश्च मनःपर्या- यशालिनां । अवधिज्ञानिनामष्टौ सहस्राः सचतुःशताः ॥ ९ ॥ शताः पंचदशाभूवन् सच्चतुर्दशपूर्विणां । लसद्वैक्रियलब्धीनां सहस्राणि त्रयो. दश ॥ १० ॥ वादिनां पट्सहस्राणि गणी ज्येष्टो वराहकः। प्रवर्तिनी वारुणीति युद्धवीर्यो नृपोऽर्चकः ॥ ११ ॥ अजिताख्यो यक्षराजः श्वेतभीः कूर्मवाहनः । मातुलिंगाक्षसूत्रा. ढ्य-वामेतरकरद्वयः ॥ १२ ।। तथा च कुंतनकुल-शालिवामकरद्वयः । एवं चतुर्भुजः प्रीतिं दत्ते सुविधिसेविनां ॥ १३ ॥ देवी सुतारा गौरांगी धत्ते वृषभवाहना । अक्षसूत्रं च वरद-मपसव्यकरद्वये ॥ १४ ॥ दधती कलशं चैवा-कुशं वामकरद्वये । सुविधिप्रभुभक्तानां पिपर्ति द्रुतमी- प्सितं ॥ १५॥ इति सुविधिः ।। पुष्करस्थप्राग्विदेहे विजये वत्सनामनि । श्रभूत्पुर्यां सुसीमायां सुविधिप्रभुने ८८ गणघर, बे लाख मुनियो, (६) १२००० साध्वीमो, ये लाख ने भोगणत्रीश हजार श्रावको, (७) ४७१००० श्राविकामो, ७५०० केवळज्ञानी, (८) ७५०० मनापर्यवज्ञानी, ८४०० अवधिज्ञानी, (९) १५०० चौदपूर्वी, १३००० वैकि- यलब्धिवाळा (१०) अने ६००० वादीलो थया. मुख्य गणधर वराहक नामे, प्रव. तिनी वारुणी नामे अने युद्धवीर्य नामनो राजा प्रभुनो भक्त थयो. (११) अजित नामनो यक्ष श्वेत वर्णवाळो, कूर्मना वाहनयाळो, दक्षिण बाजुना वे हाथर्मा मातलिंग ने अक्षसूत्र भने डावी बाजुना ये हाथमा कुंत ने नकुलने धारण करनारो, चार भुजावाळो श्रीसुविधिजिनना सेनकोने प्रीति उत्पन करनार थयो. (१२-१३) देषी मुतारा नामे गौर वर्णवाळी, पमना वाहनवाळी, अचसूत्र ने वरद वे जमणा हाथमा भने कळश ने अंकुश चे डापा हाथमा धारण करनारी सुविधिप्रभुना मक्तोने शीघ्र पांछितने श्रापनारी थइ. (१४-१५) इति श्रीसुविधिः श्रीशीतळनाय वर्णन-पुष्करवरद्वीपना पूर्वमहाविदेहमा वत्स नामनी विजयमा (४७२) श्रीकाललोकप्रकाश। पद्मनामा महीपतिः ॥ १६ ॥ सार्थवाहयुरोः पार्श्वे स च स्वीकृत्य संयम । देवोऽभूत्प्राणतस्वर्गे विंशत्यर्णवजीवितः ॥ १७॥ ततो मलय- देशेऽभू-पुरे भदिलनामनि । श्रीशीतलो दृढरथो-शिनंदात्मजो जिनः ॥ १८ ॥ वैशाखपट्यां श्यामायां च्युतः स्वर्गाजिनेश्वरः । माघ- स्य कृष्णद्वादश्यां जातो दीक्षामवाप च ॥ १९ ॥ पौपश्यामचतुर्दश्यां लेभे केवलमुज्ज्वलं । राधकृष्णद्वितीयायां प्रभुः प्रापापुनर्भवं ॥ २० ॥ पूर्वापाढा च नक्षत्रं कल्याणेष्वेषु पंचसु । नव मासा दिनैः पभि-र्युक्ता गर्भस्थितिः प्रभोः ॥ २१ ॥ न्यूनाभिः पूर्वलक्षेण नवभिर्वाद्धिकोटिभिः । सुविधिप्रभुनिर्वाणा-जातः श्रीशीतलो जिनः ॥ २२ ॥ एका कोटी सागराणां पूर्वलक्षाधिका किल । अशिष्यतारके तुर्ये शीतलप्रभुजन्मनि ॥ २३ ॥ शेषस्तुर्यारकस्योक्तो नवानां जन्मनीह यः । स द्विचत्वारिंश- दब्द-सहस्रन्यून जातां ॥ २४ ॥ इतः परेषामष्टानां यश्च जन्मनि वक्ष्यते । शेषस्तुर्यस्यारकस्य सातिरेकः स ऊह्यतां ॥ २५ ॥ सचतुर- शीतिसहस्त्रैः शरदां लक्षश्च पंचपष्टिमितः । श्ररनाथावधि विज्ञेय- मंतरमेवं धियां निधिभिः॥ २६ ॥ युग्मं ॥ सुसीमा नामनी नगरीमा पद्यनामे राजा हतो. (१६) तेणे सार्थवाह नामना गुरुनी पासे संयम ग्रहण फयु अने प्राणत नामना दशमा देवलोकमां वीश सागरोपमने आउखे देवपणे उत्पन्न थया. ( १७ ) त्याथी च्यवीने मलयदेशमा महिलपुर नामना नगरा हदरथ राजा ने नंदा राणीना पुत्रपणे उत्पन्न थया. ते शीतळ नामना जिनेश्वर थमा. (१८) वैशाख वदि छठे स्वर्गमाथी च्यघ्या, माघ यदि १२शे जन्म्या भने तेज तिथिमे दीघा अंगीकार करी, पोप चदि १४शे उज्वळ केवळज्ञान प्राप्त कयु भने वैशाख यदि २ अपुनर्भवपणाने मोषने पाम्या. (१९-२०) मना पांचे कल्याणको पूर्वा- पाढा नक्षत्रमा थया छे. तेमनी गस्थिति नव मास ने छ दिवसनी जाणवी (२१) सुविधिनाधना निर्वाणधी एक लाख पूर्षे न्यून नव कोटी सागरोपमे शीतळनापजी थया. (२२) शीतळनापना जन्म वसते चौथो भारो एक प्रोड सागरोपम एक लाख पूर्व भाषिक बाकी रह्यो हतो. (२३) नहीं नव प्रसना जन्ममां चौथो भारो शेष रसानुं जे प्रमाण का छे ते ४२००० वर्षे न्यून जाण. (२४) हवे पछी जे मीजा आठ प्रसना जन्मने विषे शेष रहेल चोथा भारानुं प्रमाण कहेवारी ते ३५ लाख ने ८४००० वर्षे न्यून एटले कुल ६६२६००० वर्षे न्यून बाग. भरनाथमधी.ए प्रमाणे पुद्धिमानोए भंतर नागपुं.

सर्ग १२ मो । (४७३) प्रशशाम पितुर्दाहो गर्भस्थेशानुभावतः । नंदाराज्ञीकरस्पर्शात् शीतलः प्रथितस्ततः ॥ २७ ॥ जगत्तापहरत्वेन भगवान् शीतलोऽथवा । अभूद्राशिर्धनुर्नामा श्रीवत्सो लांछनं प्रभोः ॥ २८ ॥ कुमारत्वं सह- त्राणि पूर्वाणां पंचविंशतिः । पंचाशच सहस्राणि पूर्वाणां राज्यवैभवं ॥ २९ ॥ व्रते पूर्वसहस्राणि पूर्णानि पंचविंशतिः । सर्वमायुः पूर्वलक्ष छाास्थ्यं च त्रिमासिकं ॥ ३० ॥ शुक्रप्रभाख्या शिविका प्रथमां पारणां ददौ । पुनर्वसू रिष्टपुरे प्लक्षो ज्ञानद्रुमः प्रभोः ॥ ३१ ॥ एकाशीतिगणधरा लक्षमेकं च साधवः । प्रायः पटकाधिक लक्ष- मेकं साध्व्योऽभवन् विभोः ॥ ३२ ॥ लक्षद्धयं श्रावकाणां नवाशीति- सहस्रयुक् । सहस्राण्यष्टपंचाश-चतुर्लक्षी तथास्तिकाः ॥ ३३ ॥ सर्व- ज्ञानां सहस्राणि सप्त चेतोविदा पुनः । सहस्राः सप्त कथिता अधिकाः पंचभिः शतैः ॥ ३४॥ द्विसप्ततिः शतान्यास-नवधिज्ञानशालिना । चतुर्दशपूर्वभृतां चतुर्दश शतानि च ॥ ३५ ॥ लसद्वैक्रियलब्धीनां दादशैव सहस्रकाः । सहस्राः पंच संयुक्ता पादिनामष्टभिः शतैः ॥ ३६॥ धनुपि नवतिदेहो नंदो मुख्यो गणाधिपः । प्रवर्तिनी च (२६) गर्भमा रहेला प्रमुना प्रमावधी तेमना पिता दृढरय राजाने जे दाह थपेलो ते नंदा राणीना फरस्पर्शथी शमी गयो ते उपरथी अथवा जगतनो ताप हरनार होवाधी प्रमनुं नाम शीतळनाथ पाडवामा भा'. तेमनी राशि धनु इती भने लोचन श्रीव- रसनुं हतं. ( २७-२८ ) कुमारपणामा २५००० पूर्व, राज्यवैभवमा ५० हजार पूर्व (२९) भने प्रतावस्थामा २५००० पूर्व-एम सर्व मळीने एक लास पूर्वन मापुष्प हतं. प्रस्थपर्याय प्रण मासनोन हतो. (३०)दीधा अवसरे शुक्रप्रमा नामे शिक्षिका हवी. प्रथम पारj रिटपुरमा पुनर्वसु राजाने त्यां पपुं हतं.मानवध प्लप नामनुंहतुं.(३१) शीवळनाथजीने ८१ गणघर, एक लाए साधुभो, एक लारा ने छ भधिक सा. ध्वीमो, (३२) २८९.०० बायको, ४५८००० श्राविका, (३३) ७००० केवळझानी, ७५०० मनापर्यवमानी, (३४) ७२०० भवधियानी, १४.. चौदपूर्वी, (३५) १२००० पक्रिपलब्धियाळा भने ५८०. वादीमो यया. (३६) प्रसनुं शरीर १० पनुपर्नु भने नंद नामना मुम्प गएपर, मुपशा नामे प्राचिनी तया सीमंघर नामे राजा (४७४) श्रीकाललोकप्रकाश। सुयशा भक्तः सीमंधरो नृपः ॥ ३७ ॥ ब्रह्मा यक्षश्चतुर्वक्त्रः श्वेतवर्ण- स्त्रिलोचनः । पद्मासनो दिशोऽष्टापि पालयन्नष्टभिर्भुजैः ॥ ३८ ॥ मुद्गरं मातुलिंगं च पाशकं चाभयं तथा । अपसव्ये दधात्येष स्पष्टं पाणिच- तुष्टये ॥ ३९ ॥ नकुलं च गदामेव-मंकुशं चाक्षसूत्रकं । दधाति धीर- धुर्योऽयं वामे पाणिचतुष्टये ॥ ४० ॥ देव्यशोका नीलवर्णा पद्मासीना चतुर्भुजा । दधाना वरदं पाश-मपसव्यकरद्वये ॥४१॥ वामपाणिद्वये चैषा दधती फलमंकुशं । शीतलप्रभुभक्तानां वितनोति समीहितं ॥४२॥ इति श्रीशीतलः ॥ घभूव पुष्करद्वीपे विजये रमणीयके । प्राग्विदेहे शुभापुयाँ नलि- नीगुल्मभूपतिः॥ ४३ ॥ वज्रदत्तगुरोः पार्श्वे स स्वीकृत्य व्रतं सुधीः । देवोऽभूदच्युतस्वर्गे द्वाविंशत्यर्णवस्थितिः ॥ ४४ ॥ शून्यदेशे सिंहपुर्या प्रेयस्यां विष्णुभूपतेः । विष्णुनाम्न्यां सुतो जज्ञे श्रेयांस इति विश्रुतः ॥४५॥ ज्येष्ठस्य श्यामला पष्ठी द्वादशी च त्रयोदशी । फाल्गुनस्या- भक्त थयो. (३७) ब्रमा नामनो यक्ष चार मुखवाळो, श्वेत वर्णवाळो, त्रण लोचनवाळो, पाना भासनवाळो, आठ भुजाओवडे आठे दिशाओने पाळनारो, (३८) चार जमणा हाथमा मुद्गर, मातुलिंग, पाश ने अभयने धारण करनारो (३९) तथा डामा चार हाथमा नकुल, गदा, अंकुश ने प्रक्षसूत्रने धारण करनारो वीरजनोमा धुरंधर थयो. (४०) देवी अशोका नामनी नील वर्णवाळी, पमना पासनवाळी, घार मुजावाली, जमणा मे हाथमा वरद ने पाश भने डाचा ये हाथमा फळ ने अंकुश धारण करनारी शीतळप्रभुना भक्तोना इच्छितने पूरनारी थइ. (४१-४२) इति श्रीशीतळः ।। श्रीश्रेयांसनाथवर्णन-पुष्करवरद्वीपमा पूर्व महाविदेहमा रमणीयक नामना विज- यमा शुभा नामनी नगरीमा नलिनीगुन्म नामे राजा हता. (४३) ते यजदत्त गुरुनी पासे चारिन अंगीकार करीने पारमा अच्युत कम्पमा २२ सागरोपमने माउरो देव थया. (४४) त्याथी घ्यवीने शून्य देशमा सिंहपुरीमा विष्णु नामे राजानी विष्णु नामनी प्रियाना पुत्रपणे उत्पन्न थया, ते श्रेयांसनाथना नामथी प्रसिद्ध धया.(४५) ज्येष्ठ यदि ६, फान्गुन वदि १२, फान्गुन वदि १३, माह वदि०) मने थावण पदि ३-ए पाप । सर्ग ३२ मो। (४७५) सिते माघमासस्य च कुहूः किल ॥ ४६॥ तृतीया श्रावणे कृष्णा कल्याणकदिनाः प्रभोः। चतुर्पु श्रवणं धिष्ण्यं धनिष्ठा पंचमे पुनः॥४७॥ गर्ने स्थितिः प्रभोर्मासा नव पडूवासराधिकाः । खड्गी जीवः प्रभो- लक्ष्म राशिर्मकरसंज्ञकः ॥ ४८ ॥ चतुरशीत्याव्दलःः पूर्वोक्ताब्दैः शतेन च । श्रब्धीनामूनया वाद्धि-कोव्या शीतलनिवृतेः॥४९॥श्रेयां- सस्याभवजन्म तदा तुर्यारकस्य च । शिष्यते स्मार्णवशतं स्वायुःपूर्वो- कवर्षयुक् ॥५०॥ शय्यामानामत्सुराधि-ष्ठितां गर्भस्थिते प्रभौ । निर्विघ्नमवेति श्रेय-स्करस्वात्तादृशाभिधः ॥ ५१ ॥ कुमारत्वेऽदल- क्षाणि निर्दिष्टान्येकविंशतिः। द्विचत्वारिंशदब्दानां लक्षाणि राज्यवै. भवे ॥ ५२ ॥ लक्षाणि वतपर्याये चाब्दानामेकविंशतिः । एवं लक्षाणि चतुर-शीतिः सर्वायुराहितं ॥ ५३ ॥ छाद्मस्थ्यं मासयोर्युग्मं शिविका विमलप्रभा । सिद्धार्थाख्यपुरे नंदः पारणां प्रथमां ददौ ॥५४॥ तिदुको ज्ञानवृक्षः स्या-दशीतिधनुरुच्छ्रितं । वपुः पट्सप्ततिश्चोक्ताः प्रभोर्गण- भृतः श्रुते ॥ ५५ ॥ प्रभोश्चतुरशीतिश्च सहस्राणि मुमुक्षवः । लक्षमेकं कल्याणकना दिवसो जाणवा. चार कन्याणका श्रवण नक्षत्र अने पांचमा कन्याण. का धनिष्ठा नक्षत्र जाणवू. (४६-४७ ) गर्मस्थिति नव माम ने छ रागी (गेंडा )नु लायन भने मकरराशि जाणवी. (४८) शीतळनाथना निर्वाण पछी ८४ लास वर्ष भने पूर्वे कहेला छ तेटला ( ६६ लाख २६ हजार ) यर्य भने सो सागरोपमे न्यून एक मोड सागरोपमे श्रेयांसनाथनो जन्म थयो. त्यारे चोथो पारो सो सागरोपम, स्वायु भने पूर्वोक्स (६५ लाख ८४ हजार) वर्षे अधिक वाकी रह्यो हतो. (४९-५०) प्रस गर्ममा हता स्गारे सुराधिष्ठित शय्यानुं माताए निर्षिमपणे आक्रमण कर्यु तेथी भने प्रभुना श्रेयस्कारीप- णाधी श्रेयांस नाम स्थापन कयु. (५१) कौमारपणामा २१ लाख पर्प, राज्यवमयमा ४२ लास वर्ष (५२) अने व्रतपर्यायमा २१ लास वर्ष एम कुल ८४ लाए वर्षनुं प्रभुनु मापुप्य संपूर्ण प{. (५३ ) छपस्थपणे ये मास ज रखा. दीघा भवसरे शिक्षिका पिमळपमा नामनी भने प्रपम पारपुं सिद्धार्थ नामना नगरमा नंद राजाने त्या फर्य. (५४) मानवृष सिंदुक नाम, इतुं भने ८० धनुम्पप्रमाण शरीर इतं. प्रभुने ७६ गणघरो, (५५) ८४००० समभुमो (साघुमो) एक लारा ने प्रण हजार मापीमो, (४७६) श्रीकाललोकप्रकाश च साध्वीनां सहस्रत्रितयाधिकं ॥ ५६ ॥ श्राद्धा लक्षद्वयमथै-कोनाशी- तिसहस्रकाः । चतुर्लक्ष्यष्टचत्वारिं-शत्सहस्राण्युपासिकाः ॥ ५७ ॥ शतानि पंचषष्टिश्चा-भूवन्निःशेषवेदिनां । षट् सहस्राणि शमिनां मनः पर्यायवेदिनां ॥ ५८ ॥ स्फुरद्वैक्रियलब्धीना-मेकादश सहस्रकाः । सहस्रा वादिनां पंचा-वधिज्ञानभृतां च षट् ॥ ५९ ॥ सच्चतुर्दशपूर्वाणां शतान्यासंस्त्रयोदश । कौस्तुभो मुख्यगणभृ-धारिणी च प्रवर्तिनी ॥ ६० ॥ त्रिपृष्ठवासुदेवोऽभू-प्रभुभक्तनृपः प्रभोः । यतश्च मनुजा- भिख्य ईश्वराख्यो मतांतरे ॥ ६१ ॥ स त्रिनेत्रः श्वेतवर्णो वृषारूढश्च- तुर्भुजः । मातुलिंगगदायुक्त-सदक्षिणकरद्वयः ॥ ६२॥ नकुलं चाय- सूत्रं च दधद्वामकरद्वये । श्रियं श्रेयांसभक्तानां वितनोति समीहितं(ता) ॥ ६३ ॥ श्रीवरसाख्या प्रभोर्देवी मानवी वा मतांतरे । सिंहासीना गौरवर्णा सा निर्दिष्टा चतुर्भुजा ॥ ६४ ॥ धत्ते दक्षिणयोः पाण्यो-वरवं मुद्गरं च सा । धत्ते च वामयोः पाण्योः क्रमाकलशमंकुशं ॥६५॥ इति श्रीश्रेयांसः॥ विजये मंगलावत्यां पुष्करप्राग्विदेहगे । सद्रत्नसंचयापुर्या राजा (५६) २७९००० श्रापको, ४४८००० श्राविकाओ, (५७) ६५०० केवळज्ञानी, ६००० मनापर्यवज्ञानी, (५८) ११००० वैक्रियलब्धिवाळा, ५००० वादीओ, ६००० अवधिज्ञानी, (५९) १३०० चौदपूर्वी थया. कौस्तुम नामना मुख्य गणधर, धारिणी नामे प्रवर्तिनी (६०) भने त्रिपृष्ठ वासुदेव प्रभुनो परम भक्त थयो. मनुज नामनो मतांतरे ईश्वर नामनो यक्ष, (६१) प्रण नेप्रवाळो, श्वेत वर्णवाळो, वृषभना वाहनपाळो, चार भुजाधाळो, जमणी चे भुजामा मातुलिंग ने गदा धारण करनारो (६२) अने डाची पे सुजामा नकुळ ने अचसूत्रने धारण करनारो, श्रेयामनाथना भक्तोना इच्छित पूरनारो थयो. (६३) प्रभुनी देवी श्रीवत्सा नामनी मतांतरे मानवी नामनी सिंहना भासनमाळी, गौरवर्णवाळी, चार भुजावाळी, ये जमणा हायमा घरद ने मुद्गर भने पे टापा हाथमा फळश ने अंकुशने धारण करनारी था. (६४-६५) इति श्रीश्रेयांस॥ श्रीवासुपूज्यवर्णन-पुष्करपरदीपना पूर्व महाविदेहमा मंगळायवी विजयमा रत्न- .

सर्ग १२ मो। (४७७) पद्मोत्तरोऽभवत् ।। ६६ ।। गुरोः श्रीवजनाभस्य पार्श्वे स प्राप्य संयमं । सुरोऽभूत्प्राणतस्वर्गे विंशत्यर्णवजीवितः ॥ ६७ ॥ चंपापुर्यामंगदेशे वसु- पूज्यमहीपतेः। राझ्या जयायास्तनुजो वासुपूज्यस्ततोऽभवत् ॥ ६८ ॥ उज्ज्वला नवमी ज्येष्ठे भूतेष्टा फाल्गुने शितिः । फाल्गुनेऽमावसी माघे द्वितीया च समुज्ज्वला ॥ ६९ ॥ शुक्लापाढस्य भूतेष्टा कल्याणकदिनाः प्रभोः । श्राहियुघ्नं पंचमे भं चतुर्पु शततारिका ॥ ७० ॥ दिनानि विंश- तिर्मासा-श्चाष्टौ गर्भस्थितिः प्रभोः। राशिः कुंभो लांछनं च महिपः किल कीर्तितः ॥ ७९ ॥ पूज्यते वसुभिः शक्रेर्वासुपूज्यः स्मृतस्ततः । वसुपूज्यनृपापत्य-मिति वा तादृशाहयः ॥७२ ।। द्विसप्तत्यदलक्षोने- श्चतुष्पंचाशताब्धिभिः । जन्माभूद्वासुपूज्यस्य श्रीमच्छ्रेयांसनिर्दृतेः ॥७३॥ पट्चत्वारिंशदब्धीनां शेषस्तुर्यारके तदा । वेदनाग (८४ ) सहस्राढ्य- धाणर्नु (६५) लक्षवर्षयुक् ॥ ७४ ॥ अष्टादशाब्दलचाणि कुमारत्वेऽ. वसद्विभुः । ततः प्रपेदे चारित्रं पृथिवीशिविकां श्रितः ॥ ७५ ॥ चतुप्पं- चाशदब्दानां लक्षाणि व्रतमादधौ। द्विसप्तत्यन्दलक्षायु-धनुस्सप्तति- संचया नगरीमा पयोधर नामे राजा हता. (६६) तेश्रो वजनाम गुरुपासे संयम ग्रहण करीने प्राणत देवलोकमा वीश सागरोपमने भाउखे उत्पन थया. (६७) त्यांची ध्यवीने अंगदेशमा चंपापुरी नगरीमा पसुपूज्य राजा ने जया राणीना पुत्र वासुपूज्य नामे तीर्थकर थया. (६८) ज्येष्ठ शुदि ९, फान्गुन यदि १४, फाल्गुन यदि )), माप शुदि २ भने भशाड शुदि १४-मा पांच कल्याणकना दियसो जाणवा. चार कल्याणका शतवारिका (शवमिपा) ने पांचमा कल्याणकमा उत्तराभाद्रपद (माहियुध्न ) नक्षत्र जाण. (६९-७०) माठ मास ने पीश दिवमनी गर्मस्थिति, कुंभराशि अने महिपर्नु लांछन माण. (७१) इंद्रे वसुबडे पूजेला होषाधी तेमज पसुपूज्य राजाना भपत्य होपाधी पासुपूज्य नाम स्थापन कर्प. (७२) यांमनाथना निर्यापधी ७२ लास वर्षे ऊन ५४ सागरोपमे पासपूज्यनो जन्म भयो. (७३) वे पसते चोयो भारो ६५ लाख ८४ हजार वर्षे न्यून भने ७२ लारा वर्षे भधिक ४६ सागरोपम पाकी रपो हतो. (७४) मटार सारा वर्ष कुमारावस्थामा म्पतीत करीने पछी पृथिवी नामनी शिपिकामा भारो- इप करीने पारित भंगीकार कर. (७५) ५४ लारा वर्ष पारित्र धारण कप. एकंदर ७२ सास वर्षर्नु मापुप्प भने ७० धनुपर्नु शरीर हतं. (७६) प्रथम पार मा.

(४७८) श्रीकाललोकप्रकारा। मुच्छ्रितः ॥ ७६ ॥ महापुरे सुनंदाख्यः प्रथमां पारणां ददौ । छान- स्थ्यमेको मासोऽभूद् ज्ञानदुः पाटलाभिधः ॥ ७७ ॥ जगत्प्रभोर्गणभृतः षट्पष्टिः साधवः पुनः । द्विसप्ततिः सहस्राणि साध्वीनां लक्षमेव च ॥ ७८ ॥ सहसा: पंचदश च द्वे लक्षे श्रावको- तमाः। चतुर्लक्षी श्राविकाणां पत्रिंशच्च सहसूकाः ॥ ७९ ॥ सर्वज्ञानां सहसाः षट् मनोज्ञानवतामपि । अवधिज्ञानिना पंच सहस्राः सचतुःशताः ॥ ८०॥ चतुर्दशपूर्वभृतां सहसू द्विशतोत्तरं । स्फुरद्वैक्रियलब्धीनां सह- साणि दशाभवन् ॥ ८१॥ वादिनां सप्त चत्वारिं-शच्छतानि मतांतरे । द्विचत्वारिंशच्छतानि तत्त्वं जानाति केवली ॥ ८२ ॥ सुभूमो गणः न्मुख्यो धरणी च प्रवर्तिनी । द्विपृष्ठवासुदेवश्च नृपश्चरणसेवकः ॥८३॥ यक्षः कुमारः श्वेतांगः श्वेतयानश्चतुर्भुजः । मातुलिंगबाणशालि- सद्दक्षिणकरद्वयः ॥ ८४ ॥ कोदंडनकुलाभ्यां च शोभितो वामहस्तयोः। पिपर्ति श्रीवासुपूज्य-जिनसेविसमीहितं ।। ८५ ।। प्रवराख्या प्रभोर्देवी चंडाख्या च मतांतरे । चतुर्भुजा श्यामवर्णा सत्तुरंगमवाहना ॥ ८६ ॥ रमा सुनंद नामना राजाने त्या कर्य. छद्मस्थपणुं एक मासर्नु ज हतुं ने ज्ञानवृक्ष पाटल नामे हतुं. (७७ ) ( वासुपूज्यस्वामीए विवाह के राज्य स्वीकार्या शिवाय ज चारित्र ग्रहण कर्य हतुं एम केटलाक कहे छे अने केटलाक विवाह को हतो एम कहे छे.) जगत्मा वासुपूज्यने ६६ गणघर, ७२००० साधुओ, एक लाख साध्वीओ, (७८) २१५००० श्रावको, ४३६००० श्राविकाओ, (७९) ६००० केवळज्ञानीयो, ६००० मनापर्यवज्ञानीओ, ५४८० अवधिज्ञानी, (८० ) १२०० चौदपूर्वी, १०००० वैक्रिय- लीन्धवाळा (८१) अने ४७०० मतांतरे ४२०० वादीमो थया. तचकेवळी जाणे. (८२) सुभूम नामे मुख्य गणधर, धरणी नामे प्रवर्तिनी भने द्विपृष्ठ नामे वासुदेव चरणसेवक थयो. (८३) फुमार नामनो यक्ष श्वेत वर्णवाळो, श्वेत वाहनवाठो, चार भुजावाळो, दक्षिणनी से भुजामा मातलिंग ने पाण भने डाची ये सुजामा कोदंड ने नकुलने धारण करनारो श्रीवासुपूज्यना सेवकोना समीहितने पूरनारो भयो. (८४-८५) प्रवरा नामे मतांतरे घंडा नाम देवी चार सजावाली, श्याम वर्णवाळी, शोमिता अधना पाहनवाळी, घे , सर्ग ३२ मो। (४७९) दधाति वरदं शक्तिं भुजयोरपसव्ययोः । दधाति सव्ययोः पुष्पं गदा चैपा महाशया ॥ ८७ ॥ इति श्रीवासुपूज्यः । धातकीखंडभरते महापुर्यां नृपोऽभवत् । पद्मसेनाह्वयः सर्व-गुप्तर्षेः सोऽग्रहीद्वतं ॥ ८८ ॥ ततः सुरः सहसारे-ऽष्टादशार्णवजीवितः। भूत्वा पांचालदेशेऽभू-त्पुरे कांपील्यनामनि ॥ ८९ ॥ श्यामाराज्ञीकुक्षिरत्नं कृतवर्ममहीपतेः। पुत्रः पवित्रचारित्र-विमलो विमलाह्वयः ॥ ९॥ वैशाखद्वादशी शुक्ला माघे शुक्ला तृतीयिका । माघे चतुर्थी शुक्ला च पौपे षष्ठी तथोज्ज्वला ॥ ९१ ॥ श्रापाढे सप्तमी कृष्णा कल्याणकदिनाः प्रभोः । आहिर्बुध्नं चतुर्पु स्या-द्विण्यं पौणं च पंचमे ॥ ९२ ॥ मासा अष्टौ दिनान्येक-विंशतिर्गरभस्थितिः । राशिौनाह्वयो लक्ष्म शूकरः कीर्तितः प्रभोः ॥ ९३ ॥ गर्भस्थेऽस्मिन्मातुरास्तां मत्थंगे विमले इति । अंतर्वहिश्च विमल-तया वा विश्ववर्यया ॥ ९४ ॥ विमलो नामधेयेना- देयनामा स कीर्तितः । पष्टिचापोन्नतः पष्टि-लक्षाब्दायुर्जगद्विभुः जमणा हाथमा वरद ने शक्ति अने डावा ये हाथमा पुष्प ने गदाने धारण करनारी, सुंदर प्राशयवाळी थइ. (८६-८७) इति श्रीवासुपूज्यः ।। श्रीविमळनाय वर्णन-घातकीखंडना भरतक्षेत्रमा महापुरी नामनी नगरीमा पद्म- सेन नामना राजा हवा. तेमणे सर्वगुप्त मनिनी पासे चारित्र ग्रहण कयु. (८८) त्यांची सहस्रार नामना भाठमा देवलोकमा १८ सागर पमने आउखे देव थया. त्यांची व्यवीने पांचाळदेशमा कांपीन्यपुर नगरमां कृतवर्म राजा अने श्यामा राणीना पुत्र पवित्र चारि. प्रवडे विमळ (निर्मळ ) एवा विमळ नामना तीर्थकर थया. (८९-९०) वैशाख शुदि १२, माघ शुदि३, माघ शुदि४, पौष शुदि६ अने पापाढ चदि -ए पांच कल्याण कनीतिथिमो जाणवी. चार कन्याणक उत्तराभाद्रपद नक्षत्रमा भने पांचभु कन्याणक पौण (पुष्य) नपत्रमा जाण. (९१-९२) ८ मास ने २१ दिवमनी गर्मस्थिति, मीनराशि अने शूकरचें लांछन जाणवू. (९३ ) प्रभु गर्ममा हता त्यारे मातानी चुद्धि अने भंग निर्मळ थवाथी म ज भंवर ने गाय विश्वमा श्रेष्ठ एवी निर्मळतावाला होवाथी विमळ नामना भादेपनामवाळा जगमा प्रसिद्ध थया. साठ धनुप्पन शरीर भने ६० लाख पर्नु प्रमनुं भायुष्य इतं. (९४-९५) श्रीवासुपूज्यना निर्वाणथी साठ लाख वर्षे न्यून . .

. (९८०) श्रीकाललोकप्रकाश। ॥ ९५ ॥ युग्मं ॥ श्रीवासुपूज्यनिर्वाणा-त्रिंशता सागरोपमैः । पष्टिल- क्षशरन्न्यून-जन्माभूद्विमलप्रभोः ॥ ९६ ॥ तुर्यारकेऽब्धयः शेषाः पोडश प्रभुजन्मनि । पूर्वोदितैर्वपलक्ष-स्तत्सहस्त्रैश्च साधिकाः ॥ ९७ ॥ तुर्यारकस्य शेषो यो जिनजन्मनि वक्ष्यते । इतः प्रभृति स स्वस्वा- युषाभ्यधिक ऊहतां ॥९८ ॥ लक्षाः पंचदशाब्दानां कुमारत्वेऽवस- द्विभुः । लक्षाणि त्रिंशतं राज्ये लक्षाः पंचदश व्रते ॥ ९९ ॥ तन्त्र द्विमासी छामस्थ्य शिविका च व्रतक्षणे । देवदिन्ना जयो धान्य-कटे प्रथमदायकः ॥ ६०० ॥ जंवूतरुतले स्वामी पंचमज्ञानमाप सः । नि- र्दिष्टाः सप्तपंचाश-द्विभोर्गणधरोत्तमाः ॥ ६०१ ॥ श्रयमावश्यकाभि. प्रायः, समवायांगे तु षट्पंचाशद्गणधरा उक्ता इति ज्ञेयं. अष्टषष्टिः सहस्राणि साधूनां शीलशालिना । लक्षमेकं च साध्वीनां शतैः साधि- कमष्टभिः ॥ ६०२ ।। लक्षद्वयं च श्राद्वानां सहस्रैरष्टभिर्युतं । चतु. लक्षी श्राविकाणां सहस्रा जिनसंमिताः ॥३॥ शतानि पंचपंचाश- स्केवलज्ञानशालिनां । मनःपर्यायचिद्भाजां तावत्येव शतानि च ॥४॥ 'अष्टचत्वारिंशदेव शतान्यवधिशालिनां । एकादशशतान्यस्य सच्चतुई- शपूर्विणां ॥ ५ ॥ लसद्वैक्रियलब्धीनां सहस्राणि नवाभवन् । वादिनां श्रीश सागरोपमे विमळप्रभुनो जन्म थयो. (९६) विमळनाथना जन्म वखते चोथो भारो १६ सागरोपम, ६० लाख वर्ष ने पूर्वे कहेला बीजा वर्षोए अधिक बाकी इतो. (९७) चौथो पारो जिनजन्ममा जे कहवामां भावशे ते अहींथी मांडीने पोतपोवाना आपुषे अधिक समजवो. ( ९८ ) पंदर लाख वर्ष प्रभु कौमारावस्थामा रया, ३० लाख वर्ष राज्यावस्थामा व्यतीत थया अने १५ लाख वर्ष चारित्रावस्थामा व्यतिक्रम्या. (९९) तेमा छयस्थावस्था ये मास प्रमाण जाणवी. बतावसरे शिधिका देवदिवा नामनी अने धान्यकटमा नयराजा प्रथम दाता (पारणुं करावनार ) थया. (६०० ) जंपनी नीचे प्रभु केवळज्ञान पाम्या. तेमना परिवारमा ५७ गणघरो, (६०१) (मा भावश्यकनो भभिप्राय छे. समवायांगा तो ५६ गणघरो कहेला छे.) चारित्रशाष्ठी एवा ६८००० साघुमो, एक लाख ने माठ सो साध्वीमो (२)२०८००० थावको, ४२४००० भावि- कामो, (३) ५५०० केवळ ५५०० मनापर्यवज्ञानी, (४) १८०० अवधिशानी, ११०० चौदपूर्वी, (५) ९००० वैशियलब्धिवाळा अने ३६०० पादी पपा. (६) सर्ग ३२ मो । (४८) च सहस्राणि त्रीणि पटू च शताः किल ॥ ६ ॥ मंदरो मुख्यंगणभृ- द्वराख्या च प्रवर्तिनी । स्वयंभूर्वासुदेवश्चा-भवद्भक्तनृपः प्रभोः ॥७॥ यक्षश्च पण्मुखः श्वेत-वर्णांगः शिखिवाहनः । स द्वादशभुजस्तीर्था- धिष्ठाता विमलप्रभोः॥८॥'फलं चक्रं च वाणं च खड्गं पाशाक्षसू- के । स भुजेष्वपसव्येषु पट्सु धत्ते महाबलः ॥ ९॥ नकुलं चक्रमि- वासं फलकं चांकुशाभये । भुजेषु पढ्सु वामेपु धत्ते मत्तेभविक्रमः ॥ १० ॥ देव्यभूविजयाभिख्या विदितां च मतांतरे । वर्णतो हरिता- लाभा पद्मासीना चतुर्भुजा ॥ ११ ॥ तनोति शं वाणपाश-युग्दक्षिण- करद्वया । धार्मिकाणां धनुर्नाग-शालिवामकरद्वया ॥ १२ ॥ इति श्रीविमलः॥ नृप रावतक्षेत्रे धातकीखंडवर्तिनि । रिष्टपुर्यामभूत्पद्म-रथश्चि- त्ररथान्मुनेः ॥ १३ ॥ संप्राप्य संयमं विंश-त्यध्यायुः प्राणतेऽभवत् । सुरः स पुर्ययोध्यायां देशे कोशलनांमनि ॥ १४ ॥ सिंहसेनस्य नृपतेः मंदर नामना मुख्य गणधर, वरा नामनी प्रवर्तिनी भने स्वयंभू नामे वासुदेव प्रमुनो मुख्य भक्त थयो. (७) पण्मुस नामनो यक्ष श्वेत वर्णवाळो, मोरना वाहनवाको अने पार भुजावाळो विमळ प्रभुना शासननो अधिष्ठाता थयो. (८) महापळवान एवा तेना जमणा छ हाथमा फळ, चक्र, पाण, खड्ग, पाश अने अक्षसूत्र हता (९) ने डाया छ हाथमा मदोन्मत्त हाथीनी जेगा पराक्रमवाळो ते नकुळ, चक्र, धनुष्य, फलक, अंकुश में भमयने धारण करतो हतो. (१०)देवी विजया नामनी मनांतरे विदिता नामनी था. ते हरिताल जेवा वर्णवाळी, पमना श्रासनवाळी, चार भुजावाळी, (११) जमणा' पे हाथमा वाण ने पाश अने डाया ये हायमा धनुष्य ने नागने धारण करनारी, धार्मिक बनोना सुखने विस्तारनारी थर. (१२) इति श्रीविमलः ।। श्रीमनंतनाथवर्णन-घातकीसंडना ऐरावतक्षेत्रमा रिटपुरीमा पमरथ नामे राजा हता, तेमणे चित्ररय नामना मुनिपासे चारित्र ग्रहण कयु. काळ करीने प्राणत देवलोकमा धीश सागरोपमने माउसे उत्पन्न थया. त्यांची व्यवीने कोशलदेशमा अयोध्यापुरीमा सिंहसेन राजानी राणी सुयशानी कृषिधी उत्पन्न भएल अनंतजिद नामना पुत्र चौदमा । (४८२) श्रीकाललाफप्रकाश । सुयशाकुक्षिसंभवः । तनयोऽनंतजिन्नाम्ना जिनेंद्रोऽभूञ्चतुर्दशः ॥ १५ ॥ श्रावणे सप्तमी कृष्णा वैशाखस्य त्रयोदशी । भूतेष्टा चासिते पक्षे वैशा- खस्य चतुर्दशी ॥ १६ ॥ चैत्रस्य पंचमी शुभ्रा कल्याणकदिनाः प्रभोः । पंचस्वप्येषु नक्षत्रं रेवती परिकीर्तितं ॥ १७ ॥ नव गर्भस्थितिर्मासाः प्रभोः पदिवसाधिकाः । अंकः श्येनो मीनराशि-र्धनुः पंचाशदुच्छ्रयः ॥ १८॥ ज्ञानादीनामनंतत्वा-दनंत इति कीर्त्यते । अनंतमणिदाम्नां वा मात्रा स्वप्ने निरीक्षणात् ॥ १९॥ विमलस्वामिनिर्वाणा-नवभिः सागरोपमैः । त्रिंशल्लक्षशरन्न्यूनै-रंनतोऽजायत प्रभुः ॥ २० ॥ शिष्य- ते स्म तदा तुर्या-रके सप्त पयोधयः। लक्षैः सहस्त्रैर्वर्षाणां पूर्वोक्तैरधिकाः किल ॥ २१ ॥ सप्त सार्दा वर्षलक्षाः कुमारत्वेऽवसद्विभुः। भूपालत्वं पंचदश-वर्पलक्षाण्यपालयत् ॥ २२ ॥ सा नि सप्त वर्षाणां लक्षाणि व्रतमादधौ । लक्षाणि त्रिंशदब्दानां सर्वमायुरभूत्प्रभोः ॥ २३ ॥ व्रते सागरदत्ताख्या शिविका विजयाभिधः । वर्द्धमानग्रामवासी प्रभोः प्रथम- दायकः ॥ २४ ॥ मासत्रयं च छानस्थ्ये-ऽश्वत्थश्च ज्ञानभूरुहः । प्रभो- तीर्थकर थया. (१३-१५) श्रावण वदि ७, वैशाख वदि १३, पैशाख वदि १४, वैशाख वदि १४ अने चैत्र शुदि ५-ए पांच कल्याणकनादिवसो जाणवा. पांचे कल्याण कमां नक्षत्र रेवती जाण. (१६-१७) गर्मस्थिति नव मास ने ६ दिवसनी, मीनराशि ने श्येननुं लांछन जाणधुं. पचास धनुप्यतुं शरीर जाणवू. (१८) ज्ञानादिक अनंत होचाथी तेम ज मणिनी अनंत माळामो माताए स्वप्नमां देखेल होपाथी अनंत नाम स्थापन कपुं. ( १९) विमळस्वामीना निर्वाणथी त्रीश लाख वर्षे न्यून नव सागरोपमे अनंतनाथनी थया. (२०) ते वसते चोथो पारो सात सागरोपम अने त्रीश लाख वर्ष पूर्व कोला वर्षों (६५८४०००) ए अधिक बाकी रह्यो हतो. (२१) प्रभु साहासात लाख पर्ष कौमारावस्थामा रया, १५ लास वर्ष भूपाळपणानी प्रतिपालना करी (२२) भने ७॥ लास वर्ष चारित्रावस्थामा रखा-ए रीते फुल ३० लारा वर्षतुं आयुष्य पूर्ण प. (२३) दीघा भयसरे सागरदचा नामे शिपिका हती. प्रथम पारगुं वर्धमानप्रामवासी विजये कराव्यु. (२४) प्रण मास प्रस्थावस्थामा रसाः शानष अश्वत्थ नामर्नु हतुं. प्रभुना । वर्ग ३२ मो। (४८३) गैणभृतः श्रेष्ठाः पंचाशत्परिकीर्तिताः ॥ २५ ॥ इत्यावश्यकाभिप्रायः, समवायांगे तु चतुष्पंचाशद्गणधरा उक्का इति ज्ञेयं. पट्पष्टिश्च सहस्त्राणि साधूनां सत्त्वशालिनां । द्वापष्टिः संयतीनां च सहस्राण्यभवन् विभोः ॥ २६ ॥ लक्षद्वयं च श्राद्धानां पट्सहस्राधिक प्रभोः। श्राविकाणां चतुर्लक्षी सहस्राश्च चतुर्दश ॥ २७ ॥ तथा पंचस- हस्राणि केवलज्ञानशालिनां । तावत्येव सहस्राणि मनोज्ञानवतामपि ॥ २८ ॥ चत्वारोऽवधिभाजां च सहस्रास्त्रिशताधिकाः । सहस्रमेकं पूर्ण च सच्चतुर्दशपूर्विणां ॥ २९ ॥ लसद्वैक्रियलब्धीनां सहस्राण्यष्ट जज्ञिरे । द्वाभ्यां शताभ्यामधिका त्रिसहस्री च वादिना ॥ ३०॥ यशोनामाद्य- गणभृ-त्पद्माख्या च प्रवर्तिनी । पुरुषोत्तमो विष्णुश्च सदा चरण- सेवकः ॥ ३१ ॥ दधत्पद्मखड्गपाशा-नपसव्ये करनये । नकुलं फलक चाक्ष-सूत्रं वामकरत्रये ॥ ३२ ॥ पातालयक्षस्त्रिमुखो रक्तो मकरवाहनः । पड्भुजः कुरुते प्रीति-मनंतप्रभुसेविनां ॥ ३३ ॥ युग्मं ।। पादधाना खड्ग- पाशौ वामेतरकरद्वये । वामे करद्वये शश्व-दधाना फलकांकुशौ ॥३४॥ गणधरश्रेष्ठो पचास कझा छे (२५) ए आवश्यकनो अभिप्राय छे. श्रीसमवायांग- मां वो ५४ कहा छ. भनंतप्रसने सचशाळी एवा ६६००० साधु मो, ६२००० साघीमो, (२६) २०६००० श्रावको, ४१४००० श्राविकाओ, (२७) ५००० केवळज्ञानी, ५००० मन:- पर्यवज्ञानी, (२८) ४३०० अवधिज्ञानी, १००० चौदपूर्वी, (२९) ८००० चैक्रियल- धिवाळा भने ३२०० यादीमोनो परिवार धयो. (३०) प्रथम गणघर यश नामना, प्रथम प्रवर्तिनी पना नामनी भने पुरुषोत्तम नामना वासुदेव प्रसना मक्त थया. (३१) पासाळ नामनो यप प्रण मुसवालो, रक्त वर्णवाळो, मकरना चाहनवाळो, छ मुजावाली, जेनी दक्षिण याजुनी प्रण सुजामा पन, सद्ग अने पाशने धारण करनारो भने डावी पाजुनी प्रण सुजामा नकुल, फलक ने अक्षम्मने धारण करनारो अनंतप्रमुनी सेवा करनारने प्रीति उपजावनार ययो. ( ३२-३३) जमणी पाजुना ये हापमा सड्ग भने पाश तथा डाची पाजुना पे हाथमा फलक ने अंकुशने निरंतर धारण करनारी पपना . . (४८४) भीकाललोकप्रकाश। पद्मासना गौरवर्णा देव्यंकुशा चतुर्भुजा । अनंतप्रभुभक्तानां दत्तेऽनंतां सुखश्रियं ॥ ३५॥ इत्यनंतजित् ॥ भारते दिलपुरे धातकीखंडमंडने । नृपो दृढरथोऽसौ च गुरोवि. मलवाहनात् ॥ ३६ ॥ श्रादाय संयम जज्ञे विजयेऽनुत्तरे सुरः । द्वात्रिंशद- रणवायुष्क-स्ततः शून्याख्यनिर्वृति ॥ ३७ ॥ पुरे रत्नपुरे भानो-नृपस्य तनयोऽभवत् । सुबतायाः कुक्षिरनं धर्मनाथो जिनेश्वरः॥३८॥ वैशाखे सप्तमी शुक्ला तृतीया माघजोज्ज्वला । माघे त्रयोदशी शुक्ला तथा पौष- स्य पूर्णिमा ॥ ३९ ॥ ज्येष्ठस्य पंचमी शुक्ला कल्याणकदिनाः प्रभोः । पुष्यं च पंचस्वप्येपु भं राशिः कर्क एव च ॥४०॥ अनंतस्वामिनिर्वाणा- चतुर्भिः सागरोपमैः । जातो दशाब्दलक्षोनैः श्रीधर्मो जगदीश्वरः ॥४१॥ शिप्यते स्म तदा तुर्या-रकस्यांभोधयस्त्रयः । पंचपष्टिश्चाब्दलक्षा वेदनागसहस्रकाः ॥ ४२ ॥ स्वयं धर्मस्वभावत्वा-गर्भस्थे वाभवद्विभौ । मातातिधार्मिकी तस्मा-धर्मनाथ इति स्मृतः ॥ ४३ ॥ देहोच्छ्यः पंचच- स्वारिंशञ्चापमितः स्मृतः । वजं च लांछन वर्ष-लक्षाणि दश जीवितं आसनवाळी, गौर वर्णवाळी, तेम ज चार भुजावाळी अंकुशा नामना देवी अनंतप्रमुना भक्तोने पारावार सुखलक्ष्मीने आपनारी थइ. (३४-३५) इति श्रीअनंतः।। श्री धर्मनाथजीवर्णन-धातकीखंडना मंडनभूत भरतक्षेत्रमा महिलपुर नामना नगरमा दृढरथ नामनो राजा हतो. तेणे विमळवाहन नामना गुरुपासे पारित भंगीकार कर्यु. मरण पामीने विजय नामना अनुत्तर विमानमा ३२ सागरोपमने भाउखे देव थया. त्यांची च्यवीने शून्य नामना देशमा रत्नपुर नामना नगरमा भानु नामना राजानी सुव्रता नामनी राणीनी कृषिथी धर्मनाथ नामे जिनेश्वरनो जन्म थयो.(३६-३८) वैशाख शुदि ७, माघ शुदि ३, माघ शुदि १३, पोस शुदि १५ ने ज्येष्ठ शुदि ५-ए पांच तेमना कन्याणकनी तिथिो जाणवी. पांचे कल्याणकोमा नक्षत्र पुष्य जाणवू, राशि कर्क जाणवी. (३९-४०) अनंतनाथना निर्वाणथी दश लास वर्ष ऊण चार सागरोपमे, धर्मनाथ प्रस थया. (४१) ते वसवे चौथो भारो प्रण सागरोपम, दश लास वर्ष तथा ६५ लाख ने ८४००० वर्ष याकी रयो हतो. (४२) पोट धर्मना स्यमाववाला होपाधी भने प्रभु गर्मस्प हता त्यारे माता मति धार्मिकी ययेल होपाधी धर्मनाथ एवं नाम स्थापन कयु. (४३) प्रमुर्नु शरीर ४५ धनुप्पन, लांछन वजनुं भने दश लास वर्षतुं मायुप्पहतं. (४४) वेमा अढीलास ..

सर्ग ३२ मो। (४८५) ॥४४॥ वपलक्षद्वयं साई कुमारत्वे व्रतेऽपि च । राज्ये पुनः प्रभुः पंच- वर्षलक्षाण्यपूरयत् ॥ ४५ ॥ शिविका नागदत्ताख्या छानस्थ्यं मासयो- यं । धर्मसिंहः सौमनस-ग्रामेऽदादाद्यपारणां ॥ १६ ॥ ज्ञानवृक्षश्च निर्दिष्टो दधिपर्ण इतिप्रभोः। द्वि(त्रि)चत्वारिंशदादिष्टाः श्रीजिनस्य गणा- धिपाः ॥ ४७ ॥ चतुःषष्टिः सहस्राणि संयतानां जिनेशितुः । तथा सह- सा द्वापष्टिः साध्वीनां सचतुःशताः ॥४८॥ चतुस्सहसाभ्यधिके द्वे लक्षे श्राद्धपुंगवाः । चतुर्लक्षी श्राविकाणां सहसाश्च त्रयोदश ॥ ४९ ॥ शतानि पंचचत्वारि-शत्केवलजुपां विभोः । तावत्येव शतान्येव मनःपर्यायिणामपि ॥ ५० ॥ त्रयोऽवधिज्ञानभाजा सहसाः पट्शताधिकाः । वर्य वैक्रियल- व्धीनां सहसाः सप्त कीर्तिताः ॥ ५१ ॥ शतानि नव चोक्तानि सच्चतु. दशपूर्विणां । वादिनां च सहसे द्वे शतैरष्टभिरन्विते ॥५२॥ अरिष्टो मुख्य- गणभृत् शिवार्या च प्रवर्तिनी। विष्णुः पुरुपसिंहश्च नृपश्चरणसेवकः॥५३॥ वीजपूराभयगदा-स्त्रिषु दक्षिणपाणिषु । गदापद्माक्षनकुलान् दध- द्वामेषु च त्रिपु ॥ ५४ ॥ त्रिमुखः किन्नरो यक्षो रक्तांगः कूर्मवाहनः । पड्भुजोऽभीष्टमाधत्ते श्रीधर्मप्रभुसेविनां ॥ ५५ ॥ देवी च पन्नगाभिख्या वर्ष कुमारावस्थामां, पांच लाख वर्ष राज्यावस्थामा भने भढी लाख वर्ष व्रतावस्थामा ध्यतीत कर्या. (४५) दीक्षा अवसरे शियिका नागदचा नामनी पने छद्मस्थ पर्याय में मासनो हतो. प्रथम पार[ सौमनस ग्रामे धर्मसिंहे कराव्यु. (४६) ज्ञानवृष दधिपर्ण नामर्नु हतुं. धर्मनाथ प्रसुने ४२ (४३) गणधरो, (४७) ६४००० साधुनो, ६२४०० साघीमो, (४८) २०४००० श्रावको, ४१३००० श्राविकाओ, (४९) ४५०० फेरळज्ञानी, तेटला न एटले ४५०० मनापर्यवज्ञानी, (५०) ३६०० अवधिज्ञानी, ७००० चैकियलन्धिवाळा, (५१) ९०० चौदपूर्वी अने २८०० वादीनो परिवार थयो. (५२) भरिट नामना मुख्य गणधर, शिवार्या नामे प्रवचिनी अने पुरुषसिंह नामनो घासुदेव प्रसुनो चरणसेवक (भक्त) थयो. (५३.) प्रण जमणा हाथमा पीजपुर, अमय ने गदा तथा डावा प्रण हाथमा गदा, पमाच ने नकुलने धारण करनार, रक्त वर्णवालो, कूर्मना वाहनवाळो छ सुजापाठो भने प्रण मुस- पाळो किन्नर नामनो यह भी धर्मनाथ प्रसुना सेवकोना भमीष्टने पूरनार भयो. (५४-- ५५) तथा पनगा नामे मतांतरे कंदर्पा नामे देवी चार भुजावाली, गौर वर्णवाळी, मत्स्य.

(४८६) श्रीकाललोकप्रकाश। सा कंदर्पा मतांतरे । चतुर्भुजा गौरवर्णा राजते मत्स्यवाहना ॥ ५६ ॥ उत्पलांकुशसंयुक्त-सदक्षिणकरद्वया। पद्माभयांचिता वामपाण्योदते सुखं सतां ॥ ५७ ॥ इति श्रीधर्मनाथः॥ श्रीपेणभूपतिः पूर्वं तद्राज्ञी चाभिनंदिता । उभौ युगलिनी जातौ ततो जातौ सुधाभुजौ ॥५८॥ ततश्चामिततेजानी-विजयाख्यौ महाधिकौ । ततश्च प्राणतस्वर्गे सुपर्वाणौ बभूवतुः ॥ ५९॥ बलदेववासुदेवौ ततो जातो महाभुजौ । बलोऽभूदच्युताधीशो हरिस्त्वाद्यां भुवं ययौ ॥ ६०॥ उध्धृ- तस्तु ततोऽवाप्य खेचराधीशता हरिः। परिवज्याच्युतस्वामि-सामानिक- सुरोऽभवत् ॥ ६१ ॥ ततश्च्युत्वादिमो वजा-युधाहश्चक्रवर्त्यभूत् । तदं- गजोऽपरस्त्वासीत् सहस्रायुधसंज्ञकः ॥६२॥ ग्रैवेयके तृतीये तो जग्मतु- जनकांगजौ । मतांतरे च नक्मे गतौ अवेयकेऽथ तौ ॥ ६३ ॥ विजये पुष्कलावत्यां जंबूद्वीपे ततश्च्युतौ । नगर्या पुंडरीकिण्या-मभूतां सोद- रावुभौ ॥ ६४ ॥ मेघरथदृढरथौ श्रीमेघरथमेकदा । प्रशशंस मुदेशान- सुरेंद्रः सुरपर्षदि ॥६५॥ अहो मेघरथस्यांतः स्फुरन् जीवदयारसः । ना वाहनपाळी, ये जमणी भुजामा उत्पल ने अंकुशवाळी अने डाबी थे भुजामा पद्म ने अभयवाळी सज्जनोने सुख प्रापनारी थइ. (५६-५७) इति श्रीधर्मनाथः ॥ श्री शांतिनाथवर्णन-पूर्वभवे श्रीपेण नामना राजा ने अभिनंदिता नामे राणी हवा. ते ने मरण पामीने युगलिक थया. त्यांची देव श्या. (५८) त्यांथी च्यवीने अमिततेज ने श्रीविजय नामना महर्द्धिक थया. त्यांथी प्राणत देवलोकमां देव थया. (५९) त्यांथी व्यवीने महापराक्रमी बळदेव ने वासुदेव थया. त्यांथी मरण पामीने पळदेव अच्युतेंद्र थया ने वासुदेव पहेली नरके गया. (६०) वासुदेवनो जीव नरकर्माथी नीकळीने खेचराधीशपणुं पामी, दीक्षा अंगीकार करी अच्युतेंद्रनो सामानिक देव थयो. (६१) त्यांथी च्यवीने अच्युतेंद्रनो जीव वज्रायुध नामे चक्री थया ने सामानिक देव वेनो सहस्रायुध नामे पुत्र थयो. (६२) ते पिता-पुत्र मरण पामीने त्रीजे अवेयके देव थया. मतांतरे नवमा अचेयके देव थया. (६३) त्यांथी व्यवीने जंबूद्वीपना पूर्व महाविदेहमा पुष्कलावती विजयमा पुंडरीकिणी नगरीमा बने भाइयो मेघरथ अने दृढरथ नामना थया. एकदा ईशानेंद्रे देवोनी पर्षदामा मेघरथ राजानी प्रशंसा करी (६४-६५) के-'अहो !

सर्ग ३२ मो । (४८७) न शक्यते शोपयितुं कृतयत्नैः सुरैरपि ॥ ६६ ॥ अश्रद्दधानस्तत्कश्चि- देवः शूलभृतो वचः । परीक्षितुं नृपं दक्ष-मन्यो भूलोकमाययौ ॥६७॥ पूर्ववैरााझ्यमानौ श्येनपारापतावथ । अधिष्ठाय स दंभेना-जगाम नृप. सन्निधौ ॥ ६८।। ऊचे पारापतस्तत्र रक्ष रक्ष कृपानिधे !। श्येनो हिन- स्ति मां पीनो दीनं निःशरणं हहा ॥ ६९ ॥ ऊचे वीक्ष्य भयातं तं समुत्पन्नकृपो नृपः । यमादपि प्रकुपिता-मा भैपीनाथ ते भयं ॥ ७० ॥ कंपमाने खगे तस्मि-न्नृपोत्संगमुपाश्रिते । श्येनोऽपि सहसागत्य क्षुधा. क्षामोऽब्रवीदिति ॥ ७९ ॥ रक्ष रक्ष क्षुधा मार्य-माणं मां दचपुंगव ।। देहि देहि चिरात्प्राप्तं भक्ष्यं पारापतं मम ॥ ७२ ॥ एकस्योपेक्षसे प्राणां-स्तानन्यस्य च रक्षसि । तुल्येऽपि कोऽयं जीवत्वे पंक्तिभेदः किलावयोः ॥ ७३ ॥ श्येनमूचे नृपः पक्षिन् ! दीनोऽयं मुच्यतां खगः । गृहाण नानापक्वान्नं दयाधर्मोऽस्तु ते महान् ।। ७४ ॥ श्येनः प्रोचे च मेघरथ राजाना अंतःकरणमा एटलो जीयदयानो रस छ के बेनु शोषण करवाने प्रयत्न करता देवो पण समर्थ थइ शके नहीं.' (६६) ते शूळभृत (ईशानेंद्र )नुं वचन नहीं सहहीने कोइ मिथ्यामतिदेव पोताने डायो मानतो संतो मेघरथ राजानी परीक्षा करवा पृथ्वीपर भाष्यो. (६७) ते वसते पूर्वना वैरथी परस्पर युद्ध करता श्येन ने पारापत (पारेवा) मा ते दमबडे अधिष्ठित थइने मेघरथ राजापासे श्राव्यो. (६८) पारापत राजाने कहेछ के-'हे कपानिधि! मारी रक्षा करो, रक्षा करो. श्रा महापीन (मजबूत) एवो श्येनपधी निःशरण ने दीन एवा मने मारी नाखे छे.' (६९) तेने मयार्च जोइने उत्पन्न था छे कपाजेने एवा राजाए कडु के-'कोपेला एवा यमची पण हवे वीश नहीं, हवे ने भप नथी.' (७०) एटले ते पक्षी कंपायमान थतो सतो राजाना सोळामा मराइ गयो. श्येन पण एकदम भावाने तुधाची दुर्वळ थयो सतो या प्रमाणे पोल्यो (७१) के-'हे दयपुंगव ! मने मारी बाराती एवी चुधाधी मारूंरक्षण कर, रक्षण कर. पणे काळे पामेला मा मारा मदप पारापवने मने माप, पाप. (७२) तमे एकना प्राणनी उपेक्षा करो छो भने एकना प्राणनी रक्षा करो छो. तुन्य एवा जीवत्वमा मावो पंक्तिभेद अमारा उपर भाप फेम करो घो ११(७३) राजाए श्येनने कयं के-'हे पधीमा पषी दीन थे, वेने मूकी दे, सेना पदलामा नाना प्रकारना परवामने ग्रहण कर. वने मोटो दयाधर्म यो.' (७४) स्पेन कहे थे के-'धर्माधर्मनी विचारणा तमारा जेवा दसने पाप, (४८) श्रीकाललोकप्रकाश। भूपाल!धर्माधर्मविचारणा। भवादृशां स्यात्तृप्तानां क्षुधार्तानां तु सा कुतः ।।७५॥ विना सद्यस्कमांसं च नाहारोऽस्मादृशां परः। तद् द्रुतं दीयतामेष हत्या वा गृह्यतां मम ॥ ७६ ॥ नृपोऽथाचिंतयत्पारा-पतोऽयं सर्वथा मया । रक्षणीयोऽयमप्यंगी तर्पणीयो बुभुक्षितः ॥ ७७॥ श्येनं तत्त. पैयाम्येनं निजेमासर्यथोभयोः । दया स्यान्ननु देहेऽस्मिन् कः स्नेहः क्षणभंगुरे ॥ ७८ ॥ ततस्तुलायामारोप्य मायापारापतं नृपः । उत्कृत्य स्वोरुमांसानि तोलामास सात्त्विकः ॥ ७९ ॥ यथा यथा स्वांसानि तुलायां भूधवो न्यधात् । तथा तथा प्रववृधे केपोतो वीवधेन सः i. ८० ॥ दीनानने पुरजने कंदत्यंतःपुरेऽखिले । तुलामारुह्य सोत्साह रसेनः श्येनमित्यवक् ॥ ८१ ॥ गृहाण श्येन ! देहं मे कृतार्थ जीवरक्ष- णात् । तृप्तिस्तवाभयं चास्य भूयान्मम च निर्जरा ॥ ८२॥ तं देहेऽपि गतस्नेहं निस्संदेहं जिनागमे । नृपं वीक्ष्य दयावीरं तुष्टस्तुष्टाव निर्जर: ।। ८३ ॥ साधु साधु महाधीर ! वीरकोटीर ! सांप्रतं । ईशानेशोऽनिशं अमारा जेवा क्षुधार्सने क्याथी, थाय ? (७५ ) वळी अमारा जेवाने तरवना मांस शिवाय चीजो आहार होतो नथी, माटे तरत ज मने ए पक्षी पापी घो; नहीं तो पछी मारी हत्या क्यो.' (७६) राजा विचारे छे फे-'या पारापत तो मारे सर्वथा रक्षणीय के मने भा भूख्या पक्षीने पण तृप्त करवो जोइस, (७७) तेथी मारा मांसाडे आ श्येनने हप्त करूं के जेथी नेनो पचा ने दया थाय. आ क्षणभंगुर देह उपर शुं स्नेह करवो ? (७८) पछी वाजवू मंगावी तेना एक पाजुना पल्लामा मायावी पारापतने मूकी । साविक पोताना साथळनुं मांस कापीने वीजा पनामां मूकी तोळवा लाग्या. (७९) महीं जेम जेम राजा पोतार्नु मांस तुलामा मूके थे तेम तेम कपोत तोलमां वधतोजाय छे. (८०) ते वखते आ स्थिति जोइने नगरजनो दीन मुखवाळा थह गया. पाखं अंतःपुर भाकंद करवा लाग्युं. प्राजवामा पारेवा जेटलो मांसनो तोल न थवाधी उत्साहसहित प्राजवामा चडीने राजाए श्येनने कयु (८१) के-हे श्येन ! जीवरधाची कवार्य पयेला पा मारा देहने ज तुं ग्रहण कर जेपी ने प्ति थाय, माने भमय मळे ने मने निर्जरा थाय. (८२) एरीवे देहने विपे नि:स्नेह भने जिनागममा निसंदेह दयावीर एषा राजाने बोरने ते देष अत्यंत संतुष्ट धइ स्तुति करवा लाग्यो (८३) के-'साधु, साधु. हे . .

सर्ग ३२ मो। (४८९) स्तौति सत्वं ते देवपर्पदि ॥ ८४॥ शंसितोऽसि दयावीर ! यादृशः शूल- पाणिना । ततः शतगुणोत्साहो वीचितोऽसि परीक्षणे ॥ ८५ ॥ खेदि. तोऽसि वृथा राज-न्नपराधं क्षमस्व मे। इति ब्रुवाणः पुष्पाणां वृष्टिं - हृष्टस्ततान सः॥ ८६ ॥ प्रादुष्कृत्य स्वरूपं स्वं सज्जीकृत्य च भूपति । चमत्कारचलन्मौलिः सुरः स्वर्ग जगाम सः ।। ८७ ॥ करुणावज्रायुध- नाटके उत्तराध्ययनलघुवृत्तौ च वजायुधचक्रवत्तिभवेऽयं देवपरीक्षणा- दिर्व्यतिकर उक्तोऽस्तीति ध्येयं, तथा करुणावत्रायुधे परीक्षकौ द्वौ देवावुक्तौ इति ज्ञेयं. गुरोर्घनरथात्प्राप्य दीक्षा मेघरथो नृपः। मृत्वा सर्वार्थसिद्धेऽभूत्परम- स्थितिकासुरः।।८८॥ जीवो दृढरथस्यापि भविष्यन् गणभृद्विभोः। मृत्वा तत्रैव देवोऽभू-च्च्युस्खा मेघरथोऽथ च ॥८९॥ कुरुदेशशिरोरत्ने पुरे श्रीहस्ति- नापुरे । विश्वसेनस्य भूभर्तुः पुत्रोऽभूदचिरांगजः ॥१०॥ प्रभौ गर्भे समु. त्पन्ने शशामोपद्रवोऽखिले । देशे जनानां मार्यादि-स्ततः शांतिरिति स्मृतः महावीर ! हे वीरकोटीर ! श्राजे ईशानेंद्रे वारंवार देवसमामांवमारी प्रशंसा करी. (८३- ८४ ) हे दयावीर ! शूळपाणिए जेवी तमारी प्रशंसा करी ते करतां सोगको उत्साह वमारी परीक्षा करता में तमारामा जोयो छे. (८५) हे राजन् ! में पृथा वमने खेद पमाख्यो छे, ते मारो अपराध क्षमा करो.' या प्रमाणे हर्पित थइने पुष्पोनी वृष्टि करी, (८६) पछी पोतानुं स्वरूप प्रगट करी, राजाने वरापर सज्ज करी, चमत्कारवडे चलित मुकुटवाळो ते देव स्वर्गे गयो. (८७) करुणायजायुध नाटकमा भने उचराध्ययन लघुपत्तिमा तो वजायुष चक्रीना भवमा प्रा देवपरीक्षणादि वृत्तांत कयो , तथा करुणावजायुध नाटकमां पे देवो परीक्षा करवा पाव्यानुं कडं छे-इति ज्ञेयं. घनरम नामना तीर्थकर गुरुनी पासे दीचा अंगीकार करीने मेघरथ राजा सार्थ- सिद विमानमा उत्कृष्ट भाउसे देव थया. (८८) दृढस्य पण मरण पामीने त्यांज देव थयो. ते शांतिनाथ प्रभुना गणधर थशे. हवे मेघरथ राजानो जीव स्वर्गधी व्यवीने कुरुदेशना शिरोरल जेवा हस्तिनापुर नगरमा विश्वसेन राजानी अचिरा राणीना पुत्र घया. (८९-९०) प्रस गर्ममा पाव्या एटले पासा देशमा मारी विगेरेनो उपद्रव हतो ते सर्व शांत थइ गयो तेथी अथवा शांति एटले क्रोधनो विजय (परामब) अथवा (४९०) श्रीकाललोकप्रकाश ॥९१ ॥ अथवा-शांतिः स्यात्क्रोधविजयः शांतिर्वोपद्रवक्षयः। शांतिः शांतरसो वा त-प्रधानत्वात्तथाभिधः ॥ ९२ ॥ भाद्रस्य सप्तमी श्यामा ज्येष्ठे कृष्णत्रयोदशी । ज्येष्ठे चतुर्दशी कृष्णा पौपे च नवमी सिता ॥ ९३ ॥ ज्येष्ठे त्रयोदशी कृष्णा कल्याणकदिनाः प्रभोः । धिष्ण्यं च पंचस्वप्येषु कीर्तितं यमदैवतं ॥ ९४ ॥ नव मासाः स्थितिर्गर्भ स्वामिनः पडूदिनाधिकाः । चत्वारिंशत्कार्मुकानि प्रज्ञतो वपुरुच्छ्रयः ॥ ९५ ॥ पादत्रयेण पल्यस्य वर्षलक्षेण चोनितैः। त्रिभिः पयोधिभिः शांति-धर्मनिर्वाणतोऽभवत् ॥ ९६ ॥ पल्यपादत्रयी शेषा तदा तुर्यारके. ऽभवत् । पूर्वोक्तैः शरदां लक्षः सहलैश्च . समन्विता ॥ ९७ ।। राशि#पो मृगो लक्ष्म वर्षलक्षं च जीवितं । तुल्यैश्चतुभिर्भागैस्त- त्पृश्यामास विश्वजित् ॥ ९८ ॥ पंचविंशतिमब्दानां सहस्राणि कुमारतां । तावरकालं च बुभुजे मंडलाधीशतामपि ॥ ९९ ॥ पंचविंशतिमेवाद- सहस्रान् सार्वभौमतां । कालं तावंतमेवायं व्रतपर्यायमाश्रयत् ॥ ७०० ॥ सर्वार्थी शिविका वर्ष-मेकं छद्मस्थता मता। सुमित्रो मंदिरपुरे पारणां . प्रथमां ददौ ॥ ७०१ ॥ अत्र वर्षमेकं छद्मस्थता मता इत्यावश्यका• शांति एटले उपद्रवोनो नाश अथवा शांति एटले शांत रस, या सर्व ते प्रभुमा मुख्य पणे होवाथी तेमनु नाम शातिनाथ थयु. (९१-९२) मादरवा वदि , ज्येष्ठ पदि १३, ज्येष्ठ वदि १४, पोप शुदि ९ अने ज्येष्ठ वदि १३ श्रा तेमना कल्याणकना दिवसो थया. तेमना पांचे कन्याणकोमा नक्षत्र भरणी जाणवू. (९३-९४ ) गर्मस्थिति ९ मास ने ६ दिवसनी ने ४० धनुष्यनुं शरीर जाण. (९५) धर्मनाथना निर्वाण पछी पोणा पन्यो- पमे ने एक लाख वर्षे ऊण त्रण सागरोपमे शांतिनाथनो जन्म थयो. (९६ ) ते वखते चौथो पारो पोणो पन्योपम, एक लाख वर्ष ने पूर्व कहेला वर्षोए अधिक शेष रहेल जाणवो. ( ९७) प्रमुनी राशि मेप ने लंछन मृगर्नु जाण. लाख वर्षर्नु आयुष्य वेना चार सरसा माग पाडवा अने या चार भागे आयुष्य पूर्ण थयेनुं जाणयु. (९८) एक भागना २५००० वर्ष कौमारावस्थामा, एक भाग मंडळाधीशपणामां, (९९) एक माग चक्रवर्तीपणामा ने एक भाग मतपर्याय तरीके नाणवो. (७००) दीक्षा भवसरे शिषिका सर्वार्था नामनी जाणवी. एक वर्ष छमस्थकाळ जाणो. प्रथम पारणं मंदिरपुरमा समित्र राजाने त्यां थ'. (७.१) महीने एक वर्ष बयस्थता कही थे सर्ग ३२ मो. (४९१) पेक्षया, सप्ततिशतस्थानकापेक्षया च पाठः-ननु ज्येष्ठासितचतुर्दश्याः पौषसितनवमीं यावद्गणने साधिकाः सप्त मासाः स्युः, यदि चाधिकमासः संभवेत्तदापि साधिका श्रष्ट मासा एव स्युः, तत्कथं वर्ष संभवति छानस्थ्यकालमानमिति चेत्सत्यं, परमर्दाधिक्ये रूपं (पूर्ण) देयमिति गणितज्ञवचनानुवृत्त्येदमप्युक्तं भावीति संभाव्यते, ग्रंथांतरे तु तदनपे- क्षणादधिकमासापेक्षणाच साधिकमासाष्टकसंभवे नव मासा अप्युक्ता दृश्यते इति ध्येयं. नंदीनामा ज्ञानवृक्षः प्रज्ञप्तोऽस्य जिनेशितुः। पत्रिंशदेव गण- भृ-द्वरा भगवतः स्मृताः ॥२॥ इदं गणधरमानमावश्यकानुसारेण, समवायांगे तु श्रीशांतनवतिर्गणधरा इति दृश्यते. द्वापष्टिश्च सहस्राणि साधवः शुद्धसंयमाः । संयतीनां चैकपष्टिः सहस्राः पट्शताधिकाः ॥३॥ श्रावकाणां सनवति-सहस्रं लक्षयोयं । श्राविकाणां त्रिल- क्ष्याढ्या विनवत्या सहस्रकैः॥४॥ सर्वज्ञानां सहस्राश्च चत्वारस्त्रि- शताधिकाः । शतानि चत्वारिंशच्च मनःपर्यायशालिनां ॥५॥ सह- स्राणि त्रीण्यभूव-नवधिज्ञानधारिणां । अष्टौ शतानि प्रोक्तानि सञ्च- श्रावश्यकने अभिप्राये जाणवी. सप्ततिशतस्थानकनी अपेक्षाए तो ननु इति प्रश्ने 'ज्येष्ठ वदि १४ शे दीक्षा ने पोप शुदि ९ मे केवळज्ञान ए रीते गणतां तो साधिक सात मास थाय. कदि (पोप मास) अधिक मासनो संभव होय तो पण साधिक आठ माम थाय, रख बयस्थकाळ एक मनो शीरीने संमतेने उत्तर आपछे के तार कहे मस्य थे, परंतु भर्घषी अधिक पूर्ण समजवु एगणिवतनुं वचन छे, ते अनुमारे मा कथन करेलु हशे एम संभवे छे. ग्रंथावरमा वो सेवी अपेक्षा नहीं करीने भने अधिक मासनी अपेक्षा करीने साधिक माठ मासनो संभव होवाथी नव मास कहेला पण देसाय छे. इति क्षेयं. प्रभुनुं ज्ञानवृक्ष नंदी नामर्नु कहेलुं छे. शांतिनाथने गणधरो ३६ कहेला छे. (७०२) 'मा संख्या आवश्यक अनुसारे जाणवी. समवायांगमा तो श्री शांविनापने ९० गणधरो कहेला देखाय छे. ' बीजो परिवार नीचेप्रमाणे-६२००० शुद्ध संयमघारी साधुओ, ६१६०० साधीभो, (३) २९०००० श्रावको, ३९३००० भाविकायो, (४) ४३०० फेवयानी, ४... मनापर्यवहानी, (५) ३००० प्रवधिज्ञानी, ८०० चौदपूर्वी, भा (.) तुर्दशपूर्विणां ॥ ६ ॥ विभ्रतां वैक्रियां लब्धि सहस्राः षण्महात्मना। वादिनां च सहस्से द्वे निर्दिष्टे सचतुःशते ॥ ७ ॥ जीवो दृढरथस्याथ च्युत्वा सर्वार्थसिद्धितः । प्रथमः प्रथमानश्रीः श्रीशांतेर्योगजोऽभवत् ॥ ८॥ गणाधिपाग्रणीः सोऽभू-चक्रायुध इति प्रभोः। प्रवर्तिनी च सुमति-भक्तः कोणाचलो नृपः ॥ ९॥ वराहवाहनः क्रोड-वदनः श्यामलद्युतिः । वीजपूरकसत्पद्म-युग्दक्षिणकरद्वयः ॥ १०॥ नकुलं चाक्षसूत्रं च दधद्वामकरद्वये । यक्षो विजयते दक्षो गरुडाख्यश्चतुर्भुजः ॥ ११ ॥ पुस्तकोत्पलसंयुक्त-सद्दक्षिणकरद्वया । कमंडलुं च कमलं दधत्यन्यकरद्वये ॥ १२ ॥ पद्मासना चतुःपाणि-निर्वाणी कनकच्छविः । श्रीशांतिनाथभक्तानां कुरुते मंगलावली ॥ १३ ॥ इति श्रीशांतिः ॥ श्रावर्तनाम्नि विजये जंबूद्वीपस्य मंडने । प्राग्विदेहे खड्गिपुर्या नृपः सिंहायोऽभवत् ॥ १४ ॥ स संवरगुरोः पार्श्वे प्रतिपद्य शुभवतं । प्रयस्त्रिंशरसागरायुः सर्वार्थे त्रिदशोऽभवत् ॥ १५॥ कुरुदेशे गजपुरे .. . (६) ६००० मुनिओ वैशियलब्धिवाळा अने २४०० वादी साधुभो जाणवा. (७) घढरथनो जीव सर्वार्थसिद्धिथी च्यवीने विस्तारवंत शोभावाळा शांतिनाथना जे प्रथम पुत्र थया ते चक्रायुध नामे गणधरना अग्रणी थया. प्रवर्तिनी सुमति नामे थइ अने कोणाचळ नामनो राजा भक्त थयो. (८-९) वराहना वाहनवाळो, क्रोड ( सुवर) समान मुरवाळो, श्याम कांदिवाळो, दक्षिणना में हाथ वीजपूरक ने सत्पमवाळा भने डापा ये हाथ नकुल ने अक्षसूत्रवाळा छ जेना एवो, दक्ष भने चारभुजावाळो गरुड नामनो यक्ष जयवत वर्ते छे. (१०-११) पुस्तक ने उत्पल संयुक्त जेना जमणा पे हाथ छ भने कमंडळ ने कमळघाळा ये डायरा हाथ छे जेना एवी पमना भासनवाळी, चार भुजावाळी, कनकसमान कांतियाळी निर्वाणी नामनी देवी श्री शांविनायना भक्तोने मंगळोनी श्रेणि करे थे. (१२-१३) इति श्रीशांतिः ॥ श्रीकुंथुनाथवर्णन-जवृद्धापना मंहनरूप पूर्व महाविदेहमा खड्गीपुरीमा सिंह नामनो राजा इतो. (१४) तेणे संवर नामना गुरुपासे शुम व्रत (चारित्र) अंगीकार कर्प. काळ करीने सर्वार्थसिदमा ३३ सागरोपमने भाउखे देव थया. (१५) त्यांची । सर्ग ३२ मो (४९३) ततः सूरमहीपतेः । सुतोऽभूत्कुंथुनामाईन् श्रीदेवीकुक्षिमौक्तिकं.॥ १६॥ श्रावणे नवमी कृष्णा राधे कृष्णा चतुर्दशी । चैत्रे च पंचमी कृष्णा तृतीया च मधोः सिता ॥ १७ ॥ वैशाखकृष्णप्रतिपत् कल्याणकदिनाः प्रभोः । नक्षत्रं कृत्तिकासंज्ञं पंचस्वप्येषु कीर्तितं ॥१८॥नव गर्भस्थि- तिर्मासाः प्रभोः पंचदिनाधिकाः । पंचत्रिंशत्कार्मुकाणि ख्यातो देहो- च्छ्यः प्रभोः ॥ १९ ॥ मेपो लक्ष्म वृषो राशिः स्तूपो यद्रलजो भुवि । मात्रा निरीक्षितः स्वप्ने ततः कुंथुरिति श्रुतः ॥ २०॥ श्रीशांतिनाथ- निर्वाणा-रपल्यानाभवत्प्रभुः । श्रीकुंथुः पंचनवति-सहस्राब्दोनताजुषा ॥ २१ ॥ पादः पल्योपमस्यैकः शेषस्तुर्यारके तदा ॥ पंचपट्या वर्षलक्षः सहस्त्रैश्चोदितैर्युतः ॥ २२ ॥ त्रयोविंशतिमन्दानां सहस्रान् पर्यपूरयत् । चतुवंशेषु प्रत्येकं सार्द्धसप्तशताधिकान् ॥ २३ ॥ कौमार्य मंडलेशत्वे चक्रित्वे संयमे च सः। सर्वायुः पंचनवतिः सहस्त्राः शरदा प्रभोः ॥ २४ ॥ विजया शिविकाव्दानि छाद्मस्थ्ये पोडश प्रभोः । प्रथमां पारणां व्याघ्र-सिंहश्चक्रपुरे ददौ ॥ २५ ॥ ज्ञानवृक्षश्च तिलका-भिधानः . प्याने फुरुदेशमा गजपुर नगरमा सूरमहीपतिना पुत्र कुंथु नामना तीर्थकर श्रीदेवी मातानी कुतिमा मौक्तिकरूपे उत्पन्न थया. (१६) थावण वदि ९, वैशास यदि १४, चैत्र वदि ५, माह शुदि ३ अने वैशाख यदि १-मा पांच कन्याणकनी तिधियो सम- जवी. पाचे कन्याणका कृत्तिका नक्षत्र जाणवू. (१७-१८)९ मास ने पांच दिव- सनी गर्मस्थिति, ३५ धनुष्यनुं शरीर, (१९) मेपर्नु लंछन भने पराशि जाणयो. माताए रत्ननो स्तूप पृथ्वीपर रहेलो स्वप्नमा जोएल होवाथी कुंधु नाम स्थापन कयु. (२०) शांतिनाथना निर्वाणथी ९५००० वर्षे न्यून अर्ध पन्योपमे कुंथुनाथनो जन्म थयो. (२१) ते वटवे चोथो भारो पा पन्योपम, ९५००० वर्ष ने ६५८४००० वर्ष पाकी रह्यो हतो. (२२) कुंथुनापर्नु मायुष्य ९५००० वर्षतुं हतु ते चार विमागे पूर्ण कर्यु हतं. एफ भाग २३७५० वर्ष प्रमाण कौमारावस्थामां, एक भाग मंडळिकपणामां, एक भाग पपीपणामा ने खेलो एक माग संयमावस्थामा व्यतीत को हतो. (२३- २४) दीपावसरे शिपिका विजया नामनी हती भने उपस्थपणामों सोळ पर्प व्यतीत पया हता. प्रथम पारणं चक्रपुरमा ध्याघसिंह राजाने त्या परं हतं. (२५) धानाप- । (४९४) भीकाललोकप्रकारा। कीर्तितः प्रभोः । पंचत्रिंशद्गणभृतः श्रीकुंथुस्वामिनः स्मृताः ॥ २६ ॥ पष्टिः सहस्राः साधूनां साध्वीनां षट्शताधिकाः। श्रावकाणां लक्षमेको- नाशीतिश्च सहस्रकाः ॥ २७ ॥ लक्षास्तिस्त्रः श्राविकाणां सेकाशीति- सहस्रकाः । द्वात्रिंशद् द्वाविंशतिर्वा केवलज्ञानिनां शताः ॥ २८ ॥ त्रयस्त्रिंशच्छताश्चत्वारिंशा मानसवेदिनां । अवधिज्ञानभाजां च शतानि पंचविंशतिः ॥ २९ ॥ सच्चतुर्दशपूर्वाणां शताः षट् सप्तति- स्पृशः । शतान्यथैकपंचाश-त्सद्वैक्रियजुषामिह ॥ ३० ॥ वादिनां च सहस्से द्वे शंवो गणधरोऽग्रिमः । प्रवर्तिनी दामिनी च कुवेरो भक्त- भूपतिः ॥ ३१ ॥ गंधर्वयक्षः श्यामांगो हंसगामी चतुर्भुजः । अपसव्ये करद्वंद्वे दधद्वरदपाशकौ ॥ ३२ ॥ मातुलिंगांकुशौ वामे दधानः पाणि- यामले । श्रीकुंथुनाथभक्तानां समर्थयति वांछितं ॥ ३३ ॥ बीजपूरक शूलाढ्य-सद्दक्षिणकरद्वया । मुसंढिपद्मसंशोभि-वामहस्तांबुजद्वया ॥ ३४ ॥ चतुर्भुजाच्युता देवी बलाख्या च मतांतरे । मयूरवाहना स्वर्ण-द्युतिः शं कुरुते सतां ॥ ३५॥ इति श्रीकुंथुनाथः ॥ तिलक नामर्नु हतुं. श्रीकुंथुनाथस्वामीने ३५ गणधर, (२६) ६०००० साधुनो, ६०६०० साध्वीमो, १८९००० भावको, (२७) ३८१००० श्राविकाओ, ३२०० अथवा २२०० केवळज्ञानी, (२८) ३३४० मनापर्यवज्ञानी, २५०० भवधिज्ञानी, (२९) ६७० चौदपूर्वी, ५१०० वैक्रियलन्धिवाला (३०) अने २००० वादीमोनो परिवार थयो. मुख्य गणधर शंघ नामे, मुख्य प्रवर्तिनी दामिनी नामे भने मुख्य भक्त कुवेर नामे राजा थयो. (३१) गंधर्व नामनो यद श्यामवर्णवाळो, हंसना वाहनवाळो, चार भुजा वाळो, जमणा ये हाथमा वरद ने पाश अने डावा वे हाथमा मातुलिंग ने अंकुशने धारण करनारो श्रीकुंथुनाथना भक्तोना वांच्छितने पूरनार थयो. (३२-३३) देवी अच्युता अथवा पला नामे दक्षिण बाजुना पे हाथमा चीजपूरक ने शूलने धारण कर. नारी भने डावी बाजुना ये हाथमा ससंढी ने पमने धारण करनारी, सेनावडे शोभित करफमळवाळी, चार भुजावाळी, मयूरना वाहनवाळी भने स्वर्णसमान कांविवाळी सम. नोने मुखनी भापनारी पइ. (३४-३५) इति भीकुंथुनाथः ॥ " " सर्ग ३२ मो. (४९५) जंबूद्वीपे प्राग्विदेहे वत्साख्ये विजये नृपः । सुसीमायां धनपतिः प्रव्रज्य संवराद्गुरोः ॥ ३६ ॥ त्रयस्त्रिंशत्सागरायुः सर्वार्थे निर्जरोऽभवत् । ततः कुरुपु देशेपु नगरे हस्तिनापुरे ॥ ३७॥ सुदर्शनस्य नृपते-देवी- कुक्षिसमुद्भवः । अरनामाभवन्नंद्या-वत्ताकोऽष्टादशो जिनः ॥ ३८ ॥ द्वितीया फाल्गुने शुक्ला मार्गे च दशमी सिता । उज्ज्वलैकादशी मार्गे द्वादशी कार्तिके सिता ॥ ३९ ॥ मार्गे च दशमी शुक्ला कल्याणकदिना इमे । एषु पंचसु नक्षत्रं रेवती परिकीर्तितं ॥ ४०॥ अष्टघस्त्राधिका मासा नव गर्भस्थितिर्विभोः। राशिर्मीनस्तथा त्रिंश-चापानि वपुरुच्छ्यः ॥ ११ ॥ वंशादिवृद्धिकरणा-दरो नाम्ना जिनोऽभवत् । महारत्नारकस्व- मा-नुसाराद्वा तथाभिधः ॥ ४२ ॥ पल्योपमस्य पादेन न्यूनेन शरदा- मिह । एककोटिसहस्रेण वेदनाग (८४) सहस्रकैः ॥ ४३ ॥ श्रीकुंथुस्वा- मिनिर्वाणा-जन्माभवदरप्रभोः । तदा तुर्यारेऽब्दकोटि-सहस्रमवशि- प्यते ॥ १४ ॥ पूर्वोक्तैः शरदां लक्षैः सहस्त्रैश्च समन्वितं । युक्तं चायु- प्ककालेन श्रीमदष्टादशाहतः ॥ १५ ॥ अपूरयत्कुमारत्वे सहस्राण्येक- श्री अरनाथवर्णन--जंयुद्धीपना पूर्व महाविदेहमा वत्सा नामनी विजयमा सुसीमा नामनी नगरीमा धनपति नामे राजा हतो. तेणे संवर नामना गुरु पासे चारित्र अंगीकार फयु. त्यांची मरण पामीने सर्वार्थसिद्ध विमानमा ३३ सागरोपमने पाउखे देवपणे उत्पन थया. त्यांची व्यवीने कुरु नामना देशर्मा हस्तिनापुर नगरमा सुदर्शन नामना राजानी देवी नामनी राणीनी कुतिथी नंद्यावर्त्तना लांछनवाळा भारमा भर नामना तीर्थ- कर थया. ( ३६-३८) फान्गुन शुदि २, मार्गशीर्ष शुदि १०, मार्गशीर्ष शुदि ११, कार्षिक शुदि १२ भने मार्गशीर्ष शुदि १०-मा पांच कल्याणकना दिवसो जाणवा. ए पांघे म्याणकमा नपत्र रेवती जाण. (३९-४०) गर्भस्थिति ९ मास ने ८ दिवसनी राशि मीन भने ३० धनुष्प प्रमाण शरीर जाणवू. (४१) शादिनी दि करवाथी सेम ज महारत्नना भरको स्वप्नमा जोयेल होपाधी भरनाथ नाम स्थापन क'. (४२) भी युनापना निर्वाणधी एक हजार कोड वर्षे भने ८४००० वर्षे न्यून पा पन्योपमे भरनाथनो जन्म थयो. ते वसते चोयो भारो एक हजार मोट भने पूर्वे कमा प्रमाणेना वर्षों तथा ८४००० वर्ष पाकी रपो हतो. (४३-४५) श्री भरनाय प्रसए २१००० (४९६) श्रीकाललोकप्रकाश। विंशति । वर्षाणां मंडलेशत्वे चक्रित्वे संयमेऽपि च ॥ ४६॥ शरत्स- हस्रांश्चतुरं-शीतिमेवमपालयत् । श्रायुः सर्वं तत्र वर्ष-त्रयं छद्मस्थता विभोः ॥ १७॥ शिविका वैजयंत्याद्य-भिक्षां राजपुरे ददौ । नाम्ना- ऽपराजितश्चूता-ख्यस्तु ज्ञानतरुः प्रभोः ॥४८॥ त्रयस्त्रिंशद्गणभृतः पंचाशसंयतात्मनां । सहस्राः संयतीनां च निर्दिष्टाः षष्टिरागमे ॥४९॥ एक लक्षं सहस्राश्च-तुरशीतिरुपासकाः । लक्षत्रयं श्राविकाणां द्वासप्त- तिसहस्रयुक् ॥५०॥ शतान्यष्टाविंशतिश्च केवलज्ञानशालिनां । द्वे सहस्र शताः पञ्चै-कपञ्चाशा मनोविदाम् ॥ ५१ ॥ अवधिज्ञानिनां द्वेच सहसे पट्शताधिके । शतानि पट् दशाढ्यानि , सच्चतुर्दशपूर्विणां ॥ ५२ ॥ शतास्त्रिसप्ततिश्चोक्ता विभ्रता क्रियश्रियं । चादिनां पोडश शताः शिष्टैर्व्यक्तीकृताः श्रुते ॥ ५३ ।। कुंभो गणभृतां मुख्यो रक्षिता; ख्या प्रवर्तिनी । सुभूमनामा नृपतिः :सदा चरणसेवकः ॥ ५४ ॥ बीजपूरं शरं खरं मुद्गरं पाशकं तथा । अभयं च क्रमादिभ्रत् षट्सु दक्षिणपाणिषु ॥ ५५ ॥ दधानो नकुलं चापं फलक शूलमंकुशं । अक्षसूत्रं च वामेपु करेषु षट्स्वपि क्रमात् ॥ ५६ ॥ त्रिलोचनः श्याम- वर्णः पडास्यः शंखवाहनः । स द्वादशभुजो यचे-द्राख्यो यक्षो ह्यरप्रभोः वर्ष कौमारपणामां, २१००० वर्ष मंडलिकपणामां. २१००० वर्ष चक्रीपणामां अने २१००० वर्ष संयमीपणामां व्यविक्रमाव्या. ( ४६ ) ए रीते कुल ८४००० वर्षनु भायप्य पाळ्यू. तेमा छमस्थावस्था प्रण वर्पनी जाणवी. (७) शिविका वैजयंती नामे जाणवी. प्रथम पारणुं राजपुरमा अपराजित राजाने त्यां थयु. ज्ञान- वृक्ष चूत (पान) नामनुं जाणवू. (४८) अरनाथ प्रसने ३३ गणधरो, ५०००० साधुनो, ६०००० साध्वीओ, (४९) १८४००० श्रावको, ३७२००० श्राविकामो, (५०) २८०० केवळनानी, २५५१ मनःपर्यवज्ञानी, (५१) २६०० अधिनानी, ६१० चौदपूर्वी (५२) ७३०० वैक्रियलब्धिवाळा भने १६०० वादीमोनो परिवार सिद्धांता व्यक्त कहेलो छे. (५३) कुंभ नामना मुख्य गणघर, रक्षिता नामनी प्रवर्तिनी अने सुभम नामनो राजा तेमनो सदानो चरणसेवक ( भक्त) भयो. (५४) यसेंद्र नामनो यक्ष पार भुजाचाळो, तेमां जमणी पाजुनी छ मुजाया चीज़पूर, शर, सुग सद्गर, पाश ने अमयने घारण परनारो तथा डाची पाजुनी छ मुजामा नकूल, चाप फलफ, शूळ, अंकुश ने भवसनने धारण करनारो, छ मुसवालो, पण लोचनवाळो, श्याम वर्णवालो भने शंखना वाहनवाळो भरनाथनो भक्त थयो. (५५-५७) धारिणी सर्ग १२ मो। (४९७) ॥ ५७ ॥ मातुलिंगोत्पलोपेत-सद्दक्षिणकरद्वया । पद्माक्षसूत्रसंयुक्ता- ऽवामवामकरद्वया ॥ ५८ ॥ देवी श्रीधारणी नील-वर्णा पद्मावरासना। चतुर्भुजा क्षिणोत्यार-मरस्वाम्यहिसेविनां ।। ५९ ॥ इति श्रीधरः ॥ विजये सलिलावत्यां जंबूद्वीपस्य मंडने । प्रत्यग्विदेहे पूर्वीत-शोका तत्राभवन्नृपः ।। ६० ॥ नाम्ना महावलः पड्भि-मित्रैर्युक्तः स संयमं । वरधर्मर्पितः प्राप्य मनस्येवमचिंतयत् ॥ ६१ ॥ इति पष्ठांगाभिप्रायः, सप्ततिशतस्थानके तु मल्लेः प्राग्भवे श्रमण इति नाम श्रूयते ॥ प्रव्रज्यावसरे स्नेहा-तिरेकादनुयायिभिः । तुल्यं कार्य तपोऽ- स्माभि-रिति संधाविधायिभिः ॥ ६२ ॥ मित्रैरमीभिः सदृशं करि- प्यामि तपो यदि । तुल्य एव भविष्यामि तदामीभिर्भवांतरे ॥ ६३ ॥ युग्मं ॥ ततः केनाप्युपायन करोम्येभ्यस्तपोऽधिकं । ज्येष्ठो येन भवाम्यत्रा-मुत्राप्येभ्यस्तपोबलात् ॥ ६४ ॥ ततो वृथा व्यथाशंसी मायया वयंस्तपः ॥ मुधा वबंध स्त्रीवेदं धिमायां स्वोपघातिनी नामनी देवी जमणी माजुना ये हाथमा मातलिंग भने उत्पल भने डावी पाजुना पे हाथमा पम ने अपने धारण करनारी, नील वर्णवाळी, श्रेष्ठ पद्मना आसनवाळी, चार भुजावाळी भरनाथ प्रसुना चरणसेवीना कएने नाश करनारी थइ. (५८-५९) इति श्रीमरनायः॥ श्री मलिनायवर्णन-द्वीपना मंडनरूप पथिममहाविदेहमा सलिलावती नामनी विजयमा पीवशोका नामनी नगरीमा महारळ नामे राजाहतो. तणे वयमण, अचल, धरण, पूरण, पसु ने भामचंद्र ए छ मित्रो साये परधर्म पिपासे चारित भंगीकार क. (मावो थोडावाधर्मकथा नामना रहा भंगनो भभिप्राय थे-सप्तविशतस्थानक ग्रंपमा वो महिनापर्नु पूर्वमवे थमण एनाम कहेल छ.) तेणे मनमा भा प्रमाणे विचार फर्यो (६०-६१ ) के- ममे प्रयश्या लीघी त्यारे परस्परना स्नेहना अतिरे- कपणाधी भापये पधाए एक सरसो तप करवो एवी प्रतिक्षा करी छे. हये जो ९ मा पपानी सरसो सप फरूं तो मावता भवमा देमनी सरसो ज पाउं, (६२-६३) माटे कोरपण उपापपरे तेमनापी अधिक तप फर के जेपी से उपना प्रमाणे भा भवमा भने मारता मरमा पप वेमनापी ज्येष्ठ पाउं, (६४)मा प्रमाणे विचारीने खोटी सोटी पापिनुं पार्नु कादी मनापी विशेष तप मापापहे कों जेपी फोगट नीचे पापो.-'मारी .

(४९८) श्रीकाललोकप्रकाश। ॥ ६५॥ अर्जिताहत्पदः स्थान-विशत्याराधितस्ततः । मित्रैस्सह जयंतेऽभू-त्परमस्थितिकः . सुरः ॥ ६६ ॥ मिथिलायां विदेहेषु ततः कुंभमहीपतेः । कुक्षौ राज्याः प्रभावत्याः पुत्रीत्वेनोदपद्यत ॥ ६७ ॥ जेत्री मोहादिमल्लानां ततो मल्लिरिति श्रुता । मातुर्वा माल्यशय्यायां दोहदात्तादृशाह्रया ॥ ६८ ॥ चतुर्थी फाल्गुने शुक्का मार्गे चैकादशी सिता । मार्ग एकादशी शुभ्रा मार्गे चैकादशी सिता ॥ ६९ ॥ फाल्गुने द्वादशी शुभ्रा कल्याणकदिना अमी। चतुर्वेष्वश्विनी धिष्ण्यं भरणी पंचमे पुनः ॥ ७० ॥ प्रभोर्गर्भस्थितिर्मासा नव सप्तदिनाधिकाः । राशि मेंपो भगवत्याः कुंभो लक्ष्म प्रकीर्तितं ॥ ७१ ॥ पंचपंचाशता वर्ष, सहरूनके गते । सहस्र वर्षकोटीनां निर्वाणात् श्रीभरप्रभोः॥७२ ।। जन्म मल्लिजिनस्याभू-च्छेषं तुर्यारके तदा । जिनायुः शरदां लक्षाः (६५) सहस्राश्च (.८४) पुरोदिताः ॥ ७३ ॥ शरच्छतं कुमारत्वे व्रते नवशताधिकाः । चतुष्पंचाशत्सहस्रा अहो. रात्रमकेवली ॥ ७४.॥ सहस्राः ' पंचपंचाश-च्छरदां सर्वजीवितं । पोतानोज घात करनारी मायाने धिक्कार छे!' (६५) ते भवमा वीश स्थानकना भाराध- नवडे अरिहंतपद उपार्जन कयु. छए मित्रो साथे काळधर्म पामीने जयंत विमाना उत्कृष्ट (३३ सागरोपम ) आयुवाळो देव थयो. (६६) त्यांची व्यवीने महाबळ राजानो जीव विदेहदेशमा मिथिलानगरीमा कुंम राजानी प्रभावती राणीनी कुक्षिथी पुत्रीपणे उत्पक्ष थया. (६७) मोहादि मन्लोने जीतनार होवाथी तेम ज माताने माळानी शय्यामा सुवानो दोहद थवाथी मल्लि नाम स्थापन कर्यु. (६८) फान्गुन शुदि ४, मार्गशीर्ष शुदि ११, मार्गशीर्ष शुदि ११, मार्गशीर्ष शुदि ११ ने फान्गुन शुदि १२- ए पांच.कल्याणकना दिवसो जाणवा..चार कल्याणकमा अश्विनी नक्षत्र अने पांचमा कल्याणकमां भरणी नक्षत्र जाणवू (६९-७०) प्रसनी गर्मस्थिति ९ मास ने ७ दिवसनी, राशि मेप अने लांछन कुंमनु कहेलं छे. (७१) श्रीमरनाथना निर्वाणधी ५५ हजार वर्षे न्यून एक हजार कोड वर्ष व्यतीत थये श्रीमल्लिनाथनो जन्म थयो. ते घसते चोयो भारो ६५ लाख ८४००० वर्ष भने ५५००० वर्ष पाकीमा इतो. (७२-७३) तेमणे एक सो वर्ष कुमारावस्थामां ने ५४९०० वर्ष श्रमणावस्थामा व्यतीत कर्या. तेमां एक महोरात्र ज प्रस्थावस्थामा व्यतीत करी; याकीनो घो काळ केवळी अवस्थामा व्यतीत कों. (७४) कुल ५५००० पर्पन भायु पूर्ण कर्प. मणि- सर्ग ३२ मो। (४९९) समुच्छ्रयः शरीरस्य धनुषां पंचविंशतिः ॥ ७५॥ अयोध्यानगरीनेता चंपावाराणसीनृपौ । श्रावस्तीहस्तिनागेशौ कांपील्यपुरनायकः ॥ ७६ ॥ एतान् प्राग्जन्मसुहृदो विज्ञातस्वामिनीगुणान् । चित्रकृत्प्रमुखोदंतै- भूरिस्नेहवशीकृतान् ॥ ७७ ॥ समेतान् युगपत्पाणि-ग्रहाय प्रतिवोध्य च। स्वर्णस्वप्रतिमोपाया-त्साई प्रावाजयत्प्रभुः ॥ ७८॥ त्रिभिवि. शेपकं । जयंती शिविका विश्व-सेनोऽदादाद्यपारणां । मिथिलानगरी- वासी अशोको ज्ञानपादपः ॥ ७९ ॥ अष्टाविंशतिरादिष्टाः स्वामिन्या गणधारिणः । चत्वारिंशत्सहस्राणि साधूनां विशदात्मना ।। ८०॥ साध्वीनां पंचपंचाश-सहस्राः कीर्तिताः श्रुते । श्रावकाणां लक्षमेकं सत्यशीतिसहस्रकं ॥८१॥ त्रिलक्षी श्राविकाणां च ससप्ततिसहस्रकाः । एवं चतुर्विधः संघः सद्गुणाढ्यः प्रभोरभूत् ॥ ८२ ॥ सर्वज्ञानां सहस्रे द्वे श्रीमल्लेशिताधिके । मनो. विदां सहस्रं च सार्द्धसप्तशताधिकं ॥ ८३ ॥ द्वाविंशति शतान्याहु- रवधिज्ञानशालिनां । शतानि साष्टपष्टीनि पट् चतुर्दशपूर्विणां ॥ ८४ ॥ अत्रेयं मनोज्ञानिनामवधिज्ञानिनां संख्या सप्ततिशतस्थानकाभिप्रायेण, प्रभुनुं शरीर पचवीश धनुष्यनुं हतं. (७५) भयोध्या, चंपा, वाराणसी, श्राव- स्ति, हस्तिनागपुर भने कोपिन्यपुरना स्वामी ए छ प्रमुना पूर्वजन्मना मित्रो हता. तेश्रो चित्रकार विगेरेना कहेवाथी प्राना गुणोने जाणीने अत्यंत स्नेहने वश थया. तेश्रो एक साधे पाणिग्रहण करया आल्या. तेमने स्वर्णमय पनावेला पोताना प्रतिषिथी प्रति- पोध पमाडीने पोतानी साये ज दीक्षा लेबरावी. (७६-७८) दीचावसरे शिक्षिका जयंती नामनी इती भने प्रथम पारj मिथिलानगरीवासी विश्वसेन राजाए कराव्युं हतं. सानप मशोक नामर्नु हतं. (७९) श्रीमलिनाथ प्रभुने २८ गणघर, पवित्र आत्मावाळा ४०००० साधुनो, (८०) ५५००० साध्वीभो, १८३००० श्रावको, (८१) ३७०००० भाविकामो- -मा प्रमाणे प्रमुनो सद्गुणाढ्य एवो चतुर्विध संघ थयो. (८२) श्रीमतिनाथने २२०० फेवनानी, १७५० मनापर्यवज्ञानी, (८३) २२०० प्राधिज्ञानी, ६६८ चौदपूर्वी, (८४) (अहीं मनोज्ञानी ने प्रवधिशानीनी जे संख्या वही छे ते सप्तविशवस्पानकने अभिप्राये कही (५००) श्रीकाललोकप्रकाश । षष्ठांगे तु प्रष्ट शतानि मनोविदा, द्वे सहस्त्रे चावधिज्ञानिनां, तुर्यागे तु सप्तपंचाशच्छतानि मनोविदामेकोनषष्टिश्च शतान्यवधिज्ञानिनामुक्का- नीति ज्ञेयं. सवैक्रियाणामेकोन-त्रिंशतं प्रोचिरे शतान् । शतैश्चतुर्भिः सहितं सहस्रं वादिनां मतं ॥ ८५॥ भिषग्ज्येष्ठो गणी बंधु-मती चाभूत्प्रवर्तिनी । अजिताख्यो महीपालो-ऽभवद्भको जगत्प्रभोः ॥ ८७ ॥ वरदं परशुं शूल-मभयं दक्षिणे दधत् । दोष्णां चतुष्टये वामे पुनः पाणिचतुष्टये ॥ ८७ ॥ बीजपूरं तथा शक्तिं मुद्गरं चाक्षसूत्रकं । दधानोऽष्टभुजो हस्ति-वाहनश्चतुराननः ॥ ८८ ॥ इंद्रायुधद्युतिर्यधः कूवरः कुरुते श्रियं । श्रीमल्लिनाथभक्तानां कुबेरोऽसौ मतांतरे ॥ ८९ ॥ वरदं चाक्षसूत्रं च या दक्षिणकरद्वये। बीजपूरं तथा शक्ति धत्ते वामकरद्वये ॥ ९॥ पद्मासना श्यामवर्णा सा वैरोट्या चतु- भुजा । पिपत्ति प्रार्थितं प्रीता श्रीमल्लिजिनसेवनात् ॥ ९१ ॥ इति श्रीमल्लिः ॥ शिवकेतुरभूत्पूर्व सौधर्मे त्रिदशस्ततः । ततः कुवेरदत्तोऽथ , छे. छठा अंगमां तो ८०० मनोज्ञानी मने २००० अवधिज्ञानी कहा के. चोथा भंगा ५७०० मनोज्ञानी अने ५९०० अवधिज्ञानी कया छे.) २९०० क्रियदन्धिवाला ने १४०० वादीमोनो परिवार थयो. (८५) मुख्य गणधर भिषक् नामना, मुख्य साध्वी पंधुभती नामनी अने अजित नामनो राजा जगदं प्रमुनो भक्त थयो, (६) जूनर नामनो यक्ष जमणा चार हाथमा वरद, परशु, शूळ ने श्रमय तथा हावा चार हाथमा वीज- पूर, शक्ति, मुद्गर ने अक्षसूत्रने धारण करनारो, पाठ भुजावाळो, हाथीना वाहनवाळी, चार मुखवाळो, इंद्रायुध ( वज्र ) समान कातिवाळो श्रीमल्लिनाथना भक्तोने लदमीने पापनारो थयो. तेनुं पीजु नाम कुपेर मतांतरे थे. (८७-८९) प्रभुनी देवी वैरोय्या नामनी जमणा घे हाथमा वरद ने अक्षसूत्र ने डापा पे हाथमा पीजपूर ने शक्तिने धारण करनारी, पयना भासनवाळी, श्याम वर्णपाळी, चार भुजावाळी श्रीमन्निनाथनी सेवा करवायी सेवा करनारना प्रार्थितने प्रीतिवडे पूर्ण करनारी था. (९०-९१) इति श्रीमग्निः ॥ श्रीमुनिसुव्रतजिनवर्णन-पूर्वभवे शिषकेतु नामे राजा हवा ते प्रथम स्वर्गे देव थया, पर्ग १२ मो। (५०१) सुरः स्वर्गे तृतीयके ॥९॥ वज्रकुंडलनामाथ ब्रह्मस्वर्गे सुरस्ततः। ततोऽ- स्मिन् भरतक्षेत्रे चंपापुयाँ रमाजुपि ॥ ९३॥ नृपः श्रीवर्म(ब्रह्म)नामाऽसौ सुनंदगुरुसन्निधौ । प्रवज्य परमायुष्को देवोऽभूदपराजिते ॥ ९४ ॥ ततो मगधदेशेऽभू-पुरे राजगृहे जिनः। पद्मावतीकुक्षिजन्मा सुमित्र- नृपतेः सुतः ॥ ९५ ॥ पौर्णमासी श्रावणस्य कृष्णा ज्येष्ठस्य चाष्टमी। फाल्गुने द्वादशी शुक्ला द्वादशी फाल्गुनेऽसिता ॥ ९६ ॥ कृष्णा च ज्येष्ठनवमी कल्याणकदिना श्रमी । एषु सर्वेषु नक्षत्रं निर्दिष्टं श्रवणा- ह्वयं ॥ ९७ ॥ नव गर्भस्थितिर्मासाः प्रभोरष्टदिनाधिकाः । कूमोंको मकरो राशि-धनुर्विंशतिरुच्छ्रयः ॥ ९८ ॥ प्रभौ गर्भस्थिते माता मुनिवत्सुव्रताभवत् । स्वयं च सुव्रतस्तस्मा-नाम्नाहन्मुनिसुव्रतः ॥१९॥ चतुष्पंचाशता वर्ष-लक्षः श्रीमल्लिनिवृतेः । त्रिंशद्वर्षसहस्रोने-जन्मा- भूरसुवतप्रभोः ॥ ८०० ॥ लक्षाण्येकादशाब्दानां वेदनागसहस्रकाः । तुर्यारके स्म शिष्यते युता श्रीसुव्रतायुषा ॥ १ ॥ कौमार्येऽन्दसहस्राणि त्यांची व्यवी कुवेरदच थाने त्रीजे स्वर्गे गया. (९२) त्यांथी वजकुंडळ थइने पांचमे देवलोके गया. त्यांची व्यवी मा भरतक्षेत्रमा लक्ष्मीवडे युक्त चंपापुरीमा श्रीवर्म (ब्रह्म) नामे राजा थइ सुनंद गुरुनी पासे चारित्र लइने अपराजितविमानमी परमायुष्य ( ३३ सागरोपम ) वाळा देव थया. (९३-९४) त्यांची व्यवीने मगध देशमा राजगृह नगरमां सुमित्र राजानी पद्मावती नामनी राणीनी कृषिथी पुत्रपणे जिनेश्वर जन्म्या. (९५) श्रावण शुदि १५, ज्येष्ठ वदि ८, फान्गुन शुदि १२, फान्गुन वदि १२ भने जेठ वदि ९-मा पांच कन्याण कना दिवसो जाणवा. पांच कन्याणकमा नक्षत्र श्रवण जाणवू. (९६-९७) गर्मस्थिति नव मास ने ८ दिवसनी, कूर्मनुं लांछन, मकरराशि भने २० धनुष्य उचुं शरीर जाणवू. ( ९८) प्रभु गर्ममा हता त्यारे माता मुनि जेवी सुखपाली यह तेथी सेम ज पोते सुमवाळा होवाथी मनुं नाम मुनिसुव्रत मापवामा भाव्यु. (९९) श्रीमष्ठिनाथना मोपथी त्रीश हजार वर्षे न्यून चोपन लाख वर्षे श्रीमुनिसुव्रतनो जन्म थयो. (८००) ते पखते चोयो भारो ११ लाख ८४००० वर्ष ने सुग्रवना मायुना ३०००० वर्ष जेटलो पाकीमा हतो. (८०१) मुनिसुयतस्वामी कौमारावस्थामा साहासात १ विपष्टिमां प्राएव देवलोक कहेल के.

(५०२) श्रीकाममोकप्रकाश। सप्त सार्कीन्यथोषितः। राज्ये पंचदशाब्दानां सहस्राणि ततः पुनः ॥२॥ सार्धन्यब्दसहस्राणि सप्त व्रतमपालयत् । त्रिंशदब्दसहस्राणि सर्वमायुरपालयत् ॥ ३॥ मोहापराजितस्यास्य शिबिका स्वपराजिता । पुरे राजगृहे ब्रह्म-दत्तोऽदादाद्यपारणां ॥ ४॥ मासा एकादश छद्म- स्थतामुष्य विभोर्मता । ज्ञानवृक्षश्चंपकोऽभू-दष्टादश गणाधिपाः॥५॥ त्रिंशत्सहसाः साधूनां साध्वीनां खशरै ( ५०)मिताः। श्राद्धानां लच. मेकं च द्वासप्ततिसहसूयुक् ॥६॥ सा स्त्रिलक्षाश्चाहत्यः सर्वज्ञानां तथा शताः । अष्टादश पंचदश मनःपर्यायवेदिनां ॥७॥ अवधिज्ञान- भाजाम-प्यष्टादश शताः स्मृताः । शतानि पंच दधतां पूर्वाणि च चतुर्दश ॥ ८॥ सवैक्रियाः सहसे द्वे वादिनां द्विशताधिकं । सहसूमेकं गणभू-न्मुख्यो मल्लिरिति श्रुतः॥ ९ ॥ प्रवर्तिनी पुष्पवती सदाभक्त- नृपः प्रभोः। विजिताख्योऽभवद्यक्षो वरुणश्चतुराननः ॥ १०॥ बीज- पूरं गदा वाणं शक्तिं करचतुष्टये । दक्षिणे नकुलं पद्मं धनुः पशुं च वामके ॥ ११ ॥ दधानोऽष्टभुजः सौख्यं कुर्याद् वृषभवाहनः। त्रिलो. हजार वर्प रहा, राज्यावस्थामा पंदर हजार वर्ष रया (२) अने साहासात हजार वर्ष सुधी व्रतनुं पालन कयु-ए प्रमाणे कुल ३० हज वर्पना आयुष्यनी प्रतिपालना करी. (३) मोहथी नहीं जीतायेला एवा या प्रसुना दीक्षावसरनी शिविका अपराजिता नामनी हती, राजगृहनगरमा ब्रह्मदत्त राजाए प्रथम पारj कराव्यु. (४) ११ मासनो छमस्थपर्याय हतो, ज्ञानवृक्ष चंपक नामर्नु हतं. मुनिसुव्रतस्वामीना परिवारमा १८ गणधर, (५) ३०००० साधुनो, ५०००० साध्वीमो, १७२००० श्रावको, (६) ३५०००० श्राविकाओ, १८०० केवळज्ञानी, १५०० मनःपर्यवज्ञानी (७) १८०० अवधिज्ञानी, ५०० चौदपूर्वी, (८)२००० वैक्रियलन्धिवाळा भने १२०० बादी धपा. मनि नामे मुख्य गणधर, (९) पुष्पवती नामे प्रवर्तिनी मने विजित नामनो राजा सदा प्रभुनो भक्त थयो. वरुण नामनो यक्ष चार मुजावालो, बीजपूर, गदा, पाण ने शक्ति जमणा चार हाथमा भने नकुल, पम, धनु ने परशु डावा चार हाथमा धारण करनारो कुल आठ भुजावाळो, अपमना पाहनवाळो, प्रण लोचन- चाळो, श्वेत वर्णवालो, बटा मुकुटधी भूषित एवो वे प्रभुना भक्तोने मुख करनारो भयो.

सर्ग ३२ मो. (५०३) चनः श्वेतवर्णो जटामुकुटभूषितः ॥ १२ ॥ वरदं चाक्षसूत्रं च या दक्षिणकरद्वये । धत्ते तथा वीजपूरं शक्ति वामकरद्वये ॥ १३ ॥ सा भद्रासनमारूढा स्वर्णवर्णा चतुर्भुजा । तस्याच्छुप्ता बभौ देवी नरदत्ता मतांतरे ॥ १४ ॥ इति श्रीमुनिसुव्रतः ।। जंबूद्वीपस्य भरते कौशांव्यां पुरि भूपतिः। सिद्धार्थो नंदगुर्वते परिव्रज्यामुपाददे ॥ १५ ॥ ततोऽभूत्प्राणतस्वर्गे विंशत्यर्णवजीवितः । उदात्तवैभवो देव-स्ततश्च्युत्वा स्थितिक्षये ॥ १६ ॥ विदेहदेशे मिथिला- पुर्या विजयभूपतेः। वप्राराज्ञीकुक्षिरनं नमिनामा जिनोऽभवत् ॥ १७ ॥ आश्विनस्य पौर्णमासी श्रावणस्यासिताष्टमी । नवम्यापाढस्य कृष्णा मार्गस्यैकादशी सिता ॥ १८ ॥ राधस्य दशमी कृष्णा कल्याणकदिना इति । सर्वेष्वप्यश्विनी धिष्ण्यं राशिमपः स्मृतः प्रभोः ॥ १९ ॥ अष्टघसाधिका मासा नवाभूगरभस्थितिः । नीलाज लक्ष्म चापानि देहः पंचदशोच्छ्रितः॥ २०॥ गर्भस्थिते प्रभौ द्रंग-रोधिनो रिपयो (१०-१२) देवी मध्छुसा नामनी जमणाचे हाथमा वरद ने प्रक्षसूत्र भने डावा ये हाथमा वीजपुर ने शक्तिने धारण करनारी, मद्रासनपर आरूढ थयेली, स्वर्ण सरखा वर्णवाळी, चार भुजापाठी थइ तेनु मतांतरे नरदक्षा एवं पीजु नाम थे. (१३-१४) इति श्रीमनिसुव्रतः॥ श्रीनमिनाथ वर्णन-जम्बूद्वीपना भरतक्षेत्रमा कौशांचीपुरीमा सिद्धार्थ नामे राजा हतो. वेणे नंदगुरुनी पास चारित्र अंगीकार कयु, (१५) मरण पामीने प्राणत नामना दशमा देवलोकमा वीश सागरोपमने पाउस मोटी समृद्धिवाळो देव थयो. स्थितिधये स्यांची व्यवीने विदेहदेशमा मिथिला नगरीमा विजय राजानी वा राणीनी कुत्तिषी नमि नामे पुत्रपणे उत्पम या तीर्थकर थया. (१६-१७) आश्विन शुदि १५, श्रावण पदि ८, पापाढ वदि ९, मागशर शुदि ११ भने वैशाख वदि १०-ए पांच कन्याण- फना दिवसो जाणवा. पांचे कल्याणका नवप्र अश्विनी नाणवू. प्रसुनी राशि मेष नागपी. (१८-१९) गर्मस्थिति नव मास ने भाठ दिवसनी, नील कमग्नुं लांछन भने पंदर पनुम्प उंचो देह जायचो. (२०) प्रा गर्ममा हवा त्यारे किन्नाने रोकीने रहेला (५०४) श्रीकाललोकप्रकारा। नताः । तस्मान्नाम्ना नमी रागा-धरीणां नमनेन वा ॥ २१॥ षभिश्च शरदां लक्ष-मुनिसुव्रतनिर्वृतेः । दशवर्षसहसोने-रजायत नमिप्रभुः ॥ २२ ॥ लक्षाणि पंच वर्षाणां सहसा वाद्धिदिग्मिताः (८४)। जिनायुश्चावशिष्यते तदा तुर्यारके ध्रुवं ॥ २३ ॥ साढ़े वर्षसहसे द्वे कुमारत्वेऽवसद्विभुः । पंच वर्षसहस्राणि प्राज्यं राज्यमपालयत् ॥ २४ ॥ पुनः साढ़े सहस्र द्वे पालयामास संयम । दशाब्दानां सहस्राणि सर्वमा- युरप्पुरत् ॥ २५ ॥ शिविका देवकुर्वाख्या श्रीनमिस्वामिनो , व्रते । भाद्यां वीरपुरे भक्त्या दिन्नो दत्ते स्म पारणां ॥ २६ ॥ मासा तवैव छास्थ्यं वकुलो ज्ञानभूरुहः । प्रभोर्गणभृतः सप्त-दश पेशलसंयमाः ॥ २७ ॥ महर्षीणां सहस्राणि विंशतिः कीर्तितान्यथ। साध्वीनामेकच- त्वारि-शदेव च सहस्रकाः ॥ २८ ॥ लक्षं सहस्त्रैः सप्तत्या समन्वितमु. पासकाः । लक्षास्तिस्रोऽष्टचत्वारिं-शत्सहस्राण्युपासिकाः ॥२९॥ केवल- ज्ञानिनामेकं सहस्रं षट्शाताधिकं । शता द्वादश पंचाशाः षष्ट्याख्या वा मनोविदां ॥ ३०॥ अवधिज्ञानिनां पद्भिः सहस्रमधिकं शतैः। राजाओ प्राचीने नम्या तेथी तेम ज रागादि शत्रुश्रोने नमावनार होवाथी नमि नाम स्थापन करवामां आव्यु. (२१) मुनिसुव्रतस्वामीना निर्वाणथी दश हजार वर्षे न्यून छ लाख वर्ष व्यतीत थये नमिनाथनो जन्म थयो. (२२) ते वखते चोथो पारो पांच लाख ८४००० वर्ष भने प्रभुना श्रायुना १०००० वर्ष जेटलो वाकी रह्यो हतो. (२३) नमिप्रभुए अढी हजार वर्ष कुमारपणामां व्यतीत कर्या, पांच हजार वर्ष प्राज्य एषा राज्यनी प्रतिपालना करी (२४) अने अढी हजार वर्ष चारित्रनी प्रतिपालना करी. ए रीते दश हजार वर्षतुं मायुष्य पूर्ण कर्यु. (२५) नमिस्वामीना दीपावसरे शिक्षिका देवकुरु नामनी हत्ती, प्रथम पार| वीरपुरीमा दिन नामना राजाए मक्तिपूर्वक कराव्यं. (२६) प्रमुनो छपस्थपर्याय नव मासनो हतो, घानवृक्ष बकुल नामनुं हतं. नमिप्रभुना परिवारमा १७ गणधर, शुद्ध संयमवाळा (२७) २०००० महर्पिमो, ४१००० साध्वीमो, (२८) १७०००० भावको, ३४८००० श्राविकामो, (२९) १६०० केवळपानीमो, १२५० अथवा १२६० मनापर्यवज्ञानी, (३०) १६..

. सर्ग ३२ मो (५०५) चतुर्दशपूर्वभृता-मध्यर्द्धा च चतुःशती ॥ ३१ ॥ सहस्रं वादिनां पंच- सहस्रा वैक्रियस्पृशां। शुभाख्यो गणभृन्मुख्यो-ऽनिलाख्या च प्रव- र्तिनी ॥ ३२ ॥ प्रभोर्भक्तनृपश्चक्री हरिपेणाभिधोऽभवत् । यक्षश्व भृकुटिर्जीया-चतुर्वक्त्रस्त्रिलोचनः ॥ ३३ ॥ सुवर्णवर्णो वृषभ-वाहनो दक्षिणैर्भुजैः। वीजपूरं नथा शक्तिं मुद्गरं चाभयं दधत् ॥ ३४ ॥ वामैश्च नकुलं पशुं वज्रमेवाक्षसूत्रकं । दधानोऽष्टभुजः सम्यग्दृष्टिः प्रीणाति धार्मिकान् ॥ ३५ ॥ दधाना वरदं खड्ग-मपसव्ये करद्वये । वीजपूरककुंताभ्यां व्यग्रवामकरद्वया ॥३६॥ चतुर्भुजा श्वेतवर्णा गांधारी हंसवाहना । देवी दिशति कल्याणं श्रीनमिस्वामिसेविना ॥ ३७॥ इति श्रीनमिः। श्रभूद्राजा धनस्तस्य नाम्ना धनवती प्रिया । दंपती तावभूतां द्रौ सुरौ सौधर्मताविपे ॥ ३८ ॥ खेटश्चित्रगतिस्तस्य प्रिया रत्नव- तीति तौ। भवे तृतीये जज्ञाते सौधर्मस्वर्गतच्युतौ ॥ ३९ ॥ ततो माहेंद्रनाके तो देवौ जातौ प्रियौ मिथः । ततो धनस्य जीवोऽभू-द्राजा अवधिनानी, ४५० चौदपूर्वी, (३१) १००० चादी अने ५००० वैक्रियलन्धिवाळा धनिभी हता. मुख्य गणधर शुम नामना, प्रवर्तिनी अनिला नामनी (३२) भने हरिपेण चक्री प्रमुनो भक्त हतो. भृकुटि नामनो यच चार मुखवाळो, प्रण लोचनवाळो, सुवर्णसमान वर्णवालो, धूपमना वाहनवाळो, चार जमणी भुजामा चीजपूर, शक्ति, सद्गर ने अमय तथा चार वाम भुजामा नकुल, परशु, पज ने अचसूत्रने धारण करनारो, माठ धजावाळो भने सम्पदृष्टि धार्मिकजनोने प्रेम करनारो थयो. (३३-३५) गांधारी नामे देवी जमणा मे हाथमा वरद ने सङ्ग तथा डापा ये हाथमा वीजपूरक ने कुंतने धारण करनारी, चार मुजायाळी, श्वेत वर्णवाळी, हंसना पाहनपाळी श्रीनमिस्वामीने सेवन करनारतुं कन्याण करनारी था. ( ३६-३७) इति श्रीनमिः ॥ श्रीनेमिनायवर्णन-पूर्वमवमा धन नामे राजा भने तेनी धनयती नाम प्रिपा से दंपती मरण पामीने सौधर्म देवलोका पने देव यया. (३८) त्यांची व्यवीने विप्रगति नामे विद्याधर ने तेनी प्रिया रलवती नामे श्रीजा मधे यया. (३९) तेश्रो मरण पामीने माहेंद्र नामना पोथा देवलोकमां बने देव पया. त्यांची पचीने धननो 1 . १४ (५०६) भीकानलोकप्रकाश। नाम्नापराजितः : ॥४०॥ धनवत्याश्च जीवोऽभू-दपराजितभूपतेः । राज्ञी प्रीतिमती जातौ ततो द्वावारणे सुरौ ॥ ११॥ ततोऽपराजित. स्यात्मा सुप्रतिष्ठाभिधो नृपः । मतांतरेऽभूच्छंखाख्यो जंबूद्वीपस्य भारते ॥ ४२ ॥ पुरे राजगृहेऽथास्य प्रियैवाभूद्यशोमती । जीवश्च्युत्वा प्रीतिमत्याः स्वर्गादारणसंज्ञकात् ॥ ४३॥ गुरोरतियशःपार्था-त्तावु- रीकृत्य संयमं । ज्येष्ठायुष्की सुहृद्देवी जातौ द्वावपराजिते ॥४४॥ जीवोऽथ यो यशोमत्याः स च च्युत्वापराजितात् । अजायतोग्रसेनस्य नाम्ना राजीमती सुता ॥ ४५ ॥ सुप्रतिष्ठस्य जीवोऽथ ततश्च्युत्वापरा- जितात् । समुत्पेदे कुशा ख्ये देशे शौर्य पुरे पुरे ॥४६॥ समुद्रविजया- ख्यस्य दशार्हस्य महीपतेः । सुतोऽभवच्छिवादेवी-कुक्षिजन्मा जिनेश्वरः ॥४७॥ कात्तिके द्वादशी कृष्णा श्रावणे पंचमी सिता । षष्ठी च "श्रावणे शुक्ला-मावास्याश्विनमासि च ॥ ४८ ॥ आषाढस्याष्टमी शुक्ला कल्याणकदिनाः प्रभोः । चित्रानक्षत्रमेतेषु राशिः कन्याह्वयः स्मृतः ॥४९॥ दिनैरष्टाभिरधिका मासा गर्भस्थितिर्नव । शंखो लक्ष्म दशे- जीव अपराजित नामे राजा थयो (४०) अने धनवतीनो जीव अपराजित राजानी राणी प्रीतिमती नामे थयो. त्यांथी मरण पामीने ते बंने पारण नामना भग्यारमा देवलोकमां देवपणे उत्पन्न थया. (४१) त्यांथी व्यवीने अपराजितनो जीव सुप्रतिष्ठ नामनो मतांतरे शंख नामनो जंबूद्वीपना भरतक्षेत्रमा राजगृहनगरमा राजा थयो. प्रीतिमतीनो जीव धारण नामना देवलोकथी च्यवीने हे राजानी यशोमती नामे प्रिया तरीके थयो. (४२-४३) अतियश नामना गुरु पासे संयम ग्रहण करीने ते पंने अपराजित विमानमा उत्कृष्ट प्रायुवाळा मित्र देव थया. (४४) अपराजित विमानथी च्यवीने यशोमतीनो जीव उग्रसेन राजानी राजीमती नामे पुत्री थयो. (४५) सुप्रतिष्ठनो जीव अपराजित विमानथी च्यवीने कुशा- देशमा शौर्यपुर नामना नगरमा समद्रविजय नामना दशाई महीपतिनी शिवादेवी राणीनी कृषिमा उत्पन्न था जिनेश्वर थयो. (४६-४७) कार्तिक पदि १२, श्रावण शुदि ५, श्रावण शुदि ६, पाश्विन पदि )) भने आपाढ शुदि ८.-ए पांच कल्याणकना दिवसो जाणवा. ए पांचे कल्याणकमा नक्षत्र चित्रा जाणवू. राशि कन्या नामनी जाणवी. (४८-४९) नव मास ने माठ दिवसनी गर्भस्थिति, शंखनुं लांछन अने दश धनुष्यनुं शरीर जाण. (५०) १ प्रतियशसः इति भिन्ने बक्तव्ये समासश्चिन्त्यः, ।

सर्ग ३२ मो. (५०७) प्वास-प्रमितो वपुरुच्छ्रयः ॥ ५० ॥ रिष्टरत्नमयीं चक्र-धारामेक्षत यत्प्रसूः । प्रभौ गर्भस्थिते रिष्टनेमिरित्याख्यया ततः ॥ ५१ ॥ अमंगलव्यपोहाया-ऽकारोऽत्र परिभाव्यतां । पापवृक्षे चक्रधारा-तुल्यो वा तत्तथाह्वयः ॥ ५२ ॥ एकवर्षसहस्रोनैः पंचभिः शरदां गतः। लवैः श्रीनमिनिर्वाणात श्रीनेमिरुदपद्यत ॥५३॥ श्रीनेमिगर्भावसरे पंचाशीतिः सहस्रकाः । शेपास्तुर्यारकेऽब्दानां जिनायुयुक्तया(क्ता चा)भवन् ॥५४॥ कदाचित्कौतुकान्नेमि-वयस्यप्रेरितो ययौ । हरेरायुधशालायां तत्रा- खाण्यखिलान्यपि ॥ ५५ ॥ लीलया कलयामास पांचजन्ये च वादिते । प्रस्तातुराश्वेभनरा सा पुरी चुक्षुभेऽखिला ॥ ५६ ॥ कृष्णोऽपि द्रुतमा- गत्य परीक्ष्य च विभोर्वलं । विपसादेति राज्यं मे सुखेनैप ग्रहीप्यति ॥ ५७ ॥ तत श्राकाशवागेव-मभन्नेमिरयं जिनः । प्रनजिप्यति कौमार्य इत्युक्तं नमिनार्हता ॥ ५८ ॥ अभ्यर्थितो विवाहाय जलक्रीडामिपात्ततः । सांतःपुरेण कृष्णेन नर्ममर्मचटूक्तिभिः ॥ ५९ ॥ कृते मौने भगवता माताए प्रभु गर्भमा हवा त्यारे स्वप्नमा रिटरत्नमयी चक्रधारा जोयेली होवाधी रिटनेमि एघु प्रसुनुं नाम प्रख्यात थयुं. (५१) रिष्ट शन्द भमंगळसूचक के तेथी सेने दूर फरवा माटे अ अघर उमेरीने अरिष्टनेमि कयु. अथवा प्रसु पापरूपी वृक्षमा चक्रधारातुन्य होवाथी ते रिष्टनेमि नाम पण यथार्थ थयु. (५२) श्रीनमिनाथना निर्वाणथी एक हजार वर्ष न्यून पांच लाख घर्ष व्यतिक्रम्ये सते धीनेमिनाथनो प्रादुर्भाव थयो. (५३) श्रीनेमि- नाथनी गर्मोत्पत्ति वसते तेमना प्रायुप्पसहित ८५००० वर्ष चोथो आरो शेष रयो हतो. (५४) अन्यदा कदाचित् नेमिकुमार मित्रोनी प्रेरणाथी कणवासुदेवनी प्रायुधशाळामा गया. त्या रहेला पधा भस्रो लीलावडे फळी लीधा-नो उपयोग जाणी लीधो. पछी पांचजन्य शंए यगाट्यो. तेना स्वरथी हाथी, घोडा अने मनुप्पो त्रास पाम्या. भासी नगरी चोमायमान धइ. ५५-५६) कृष्ण उतावळे त्या प्राध्या अने प्रसुना वळनी परीक्षा करीने सेद पाम्या. तेणे घायु के-'मा मारुं राज्य सुसे ग्रहण करी शकशे.' (५७) वे वसते भाकाशवाणी या के-'मा नमिकुमार कौमारावस्थामा ज चारित्र प्रहण करशे, एम नामिनाथ प्रसु कही गपाई.' (५८) पछी नस्क्रीडाना मिषधी हास्य ने मर्मयुक्त पादु उक्तिवडे अंतःपुरमहित कृष्णे विवाहने माटे नेमिप्रसुनी प्रार्थना करी. (५९) प्रा मौन रखा एटले सौए उद्घोपणा करी के-'विवाह स्वीकार्यो.' 'निपेय - (५०८) श्रीकाललोकप्रकारा। सरुद्घोषितं ततः । विवाहः स्वीकृत इति न निषिद्धं हि संमतं ॥६॥ ततः साडंबरं राजी-मत्याः कत्तुं करग्रहं। ययौ मुक्त्याप्तिसंकेत-मिव कत्तुं प्रियस्त्रियाः॥ ६१ ॥ ततो जन्यजनातिथ्यं कर्तुमा न्नियंत्रितान् । पशून् वीक्ष्य परावृत्तः स प्रावाजीदयामयः ॥६॥ शतानि शरदा त्रीणि कुमार- त्वेऽथ संयमे । शतानि सप्त सर्वायुः सहस्रं शरदां प्रभोः ॥ ३ ॥ चतुष्पंचाशदिनानि छानस्थ्यमभवद्विभोः । वरदत्तो द्वारिकाया- माद्यभिक्षां प्रभोर्ददौ ॥ ६४ ॥ शिविका द्वारवत्याख्या वेतसो ज्ञानभू- रुहः । अष्टादश गणाधीशा एकादश मतांतरे ॥६५॥ अष्टादश सहस्त्राः स्युः साधूनां गुणशालिना । चत्वारिंशत्सहस्राश्च साध्वीनां विमला- स्मनां ॥ ६६ ॥ श्रावकाणां लक्षमेको-नसप्ततिसहस्रयुक् । लक्षास्तिस्रः सहस्राः पट् त्रिंशच्चोपासिका मताः ॥ ६७ ॥ सातिरेक पंचशत्या सहस्रं सर्ववेदिनां । सहस्रमेकं संपूर्ण मनःपर्यायवेदिनां ॥ ६८ ॥ सहस्रमवधि- ज्ञान-भाजां पंचशताधिकं । शतानि तस्य चत्वारि सच्चतुर्दशपूर्विां ॥ ६९ ॥ लसद्वैक्रियलब्धीनां शताः पंचदशोदिताः । वादिना स्युः न फर्यो ते संमत गणाय छे.' (६०) पली आडंबरसाथे राजीमतीनुं पाणीग्रहण करवा माटे चान्या, ते जाणे पूर्वभवोनी प्रिय प्रियाने मोक्षप्राप्सिनो संकेत करवा गया होय एम लाग्यु. (६१) त्यां जतां मार्गमा जानमा आवनार अविथिोनुं आविध्य करवा माटे नियंत्रित करेला पशुमोनो मार्चस्वर सांभळीने दयामय एवा प्रस पाया वळ्या ने संयम ग्रहण कयु. (६२) नेमिप्रमुए कुमारावस्थामा त्रण सो वर्ष ने श्रमणा- वस्थामा सात सो वर्ष व्यतिक्रमाव्या. एकंदर हजार वर्षतुं श्रायुष्य पाळयुं. (६३) प्रसनो छद्मस्थकाळ मान ५४ दिवसनो ज थयो. प्रथम भिक्षा द्वारिकापुरीमा वरदचे प्रभुने पापी. (६४) दीक्षा अवसरे शिषिका द्वारवती नामनी हती अने ज्ञानवृक्ष वेवस नामर्नु हतुं. नेमिप्रभुना परिवारमा १८ मातरे ११ गणधर, (६५) गुणशाळी एवा १८००० मुनिमो, निर्मळ मात्मावाळी चाळीश हजार साध्वीमो, (६६) १६९००० भावको, ३३६००० भाविकामो, (६७) १५०० केवळज्ञानी, १००० मनापर्यवसानी, (६८) १५०० अवधिज्ञानी, ४०० चौदपूर्वी, (६९) १५०० वैशियलम्धिवाळा भने देवोयी .

सर्ग ३२ मो 1. (५०९) शतान्यष्टा-वजय्यानां सुरैरपि ॥ ७० ॥ वरदत्तो गणी मुख्यो यक्षदिन्ना प्रवर्तिनी । पितृव्यपुत्रः कृष्णाख्यो वासुदेवश्च सेवकः ॥ ७१ ॥ मातुलिंगं च परशुं बिभ्रच्चक्रं च दक्षिणे । करत्रयेऽथ नकुलं शूलं शक्ति च वामके ॥ ७२ ।। गोमेधयचस्त्रिमुखः श्यामः पुरुपवाहनः। षड्भुजो नेमिभक्तानां वितनोति समीहितं ॥ ७३ ॥ अाम्रलुंविपाशयुक्ता-पसव्य- करयामला । पुत्रांकुशव्यग्रवाम-करयुग्माधिकातिः ॥ ७४ ॥ मृगेंद्र- वाहना जात्य-स्वर्णज्योतिश्चतुर्भुजा । श्रीनेमिभक्तान् पात्यंवा-देव्यंवेव हितावहा ॥ ७५ ॥ इति श्रीनेमिः।। कमठो मरुभूतिश्च द्वावभूतां सहोदरौ । ब्राह्मणौ कमठस्तत्र भ्रातुर्जायामरीरमत् ॥ ७६ ॥ ज्ञातः कुर्वस्तमन्यायं कदाचिन्मरुभूतिना । भूपाय ज्ञापितस्तेना-प्यन्यायीति विडंवितः ॥ ७७ ॥ अनात्मज्ञस्तत- श्चासौ भ्रातरि द्वेषमुद्वहन् । तापसोऽभूत्सोदरेण खिस्यमानश्च तं न्यहन् ॥ ७८ ॥ मरुभूतिरभून्मृत्वा श्वेतेभः कमठः पुनः । महाविपः कुकूटाहि- पण अजय्य एवा ८०० वादी थया. (७०) गणधरमा मुख्य वरदच, प्रवचिनी यच. दिना भने काकाना पुत्र कृष्ण वासुदेव मुख्य सेवक थया. (७१) गोमेघ नामनो यच जमणी पाजुना प्रण हाथमा मातुलिंग, परशु ने चक्र अने डावी बाजुना प्रण हायमा नकुल, शूळ ने शक्तिने धारण करनारो, प्रण मुखबाळो, श्यामवर्णवाळो, पुरुषना पाहनवाळो भने छ भुजावाळो नेमिनाथना भक्कोना वांच्छित पूरनार थयो. (७२-७३) भने भंपा नामे देवी जमणा पे हाथमा पानटुंबी ने पाश तथा डावा ये हायमा पुत्र ने अंकुशने धारण करनारी, अधिक कादिवाळी, मिहना पाहनवाळी, जातिवंत सर्ण जेषा वर्णवाली, चार मुजावाळी श्रीनेमिनाथना भक्तनी मातानी जेची हितावह ने रक्षण करनारी था.(७४-७५) इति थीनेमिः॥ श्रीपार्धनाथवर्णन-कमठ भने मरुभूति नामे पे सहोदर पंधु माझणजातिना इता, सेमा कमठ माइनी स्त्रीसाये लुन्ध थयो. (७६) आवो भन्याय करता वेने एक पसत मरुभूतिए बायो एटले तेणे ते हकीकत राजाने जणावी. राजाए कमठने भन्यापी जाणीने हेनी विडंपना करी (काढी क्यों). (७७) भनात्मन (पोवानी भूल. ने नहीं समजनार) एवो ते मानी उपर देप वहन करतो मचो तापस पपो. माइए वेनी पारे फती करी सेपी सेणे ने हणी नाल्यो. (७८) मरुभूति मरण पामीने घेत - (५१०) भीकालोकप्रकाश । र्दष्टस्तेनाहिना मृतः ॥७९॥ गजः सुरः सहस्रारे स सर्पोऽभूच्च नारकः । नारकोऽभूत्पुनः सर्पः स देवोऽभूञ्च खेचरः ॥ ८० ॥ खेचरोऽथाच्युत- स्वर्गे सर्पश्च नरके ययौ। ततोऽच्युतसुरः पृथ्वी नाथोऽभूच्छवरः परः ॥ ८१ ॥ राजा अवेयके देवः शबरोऽभूच्च नारकः । नारकोऽसौ मृगेंद्रो- ऽभूद्-ग्रेवेयकः सुरः पुनः ॥ ८२ ॥ अयोध्यायां महापुर्यां जंबूद्वीपस्य भारते । श्रानंदनामा भूपोऽभू-दामोदरगुरोः स च ॥ ८३ ॥ पार्श्व- चरित्रे तु महाविदेहे सुवर्णयाहुनामा चक्री अष्टमभवे भगवानासीदिति दृश्यते. चारित्रं प्राप्य सिंहेन तेन क्षुण्णोऽपि स क्षमः । देवोऽभूत्प्राण. तस्वर्गे विंशत्यभोनिधिस्थितिः॥ ८ ॥ सिंहश्च मृत्वा नरके ययावेवं च पंचसु । भवेपु मरुभूत्यात्मा मारितः कमठात्मना ततः कमठजीवोऽसा-पृष्धृत्य नरकात्ततः। कठो दरिद्रविप्रोऽभू-क्र. मादुःखेन तापसः ॥ ८६॥ मरुभूतेरथो जीव-श्च्युत्वा प्राणततावि. पात् । काशीदेशे वाराणस्यां पुर्यामाश्चर्यकृच्छ्रियां ॥ ८७॥ अश्वसेनस्य ॥८५॥ हाथी थयो. कमठ महाविषवाळो कुर्कुट जातिनो सर्प थयो. तेना डसबाथी हाथी मरण पाम्यो. (७९) ते भाठमा सहस्रार देवलोकमां देव थयो. ते सर्प नारकी थयो. नरकर्माथी नीवळीने ते पाछो सर्प थयो. देव व्यवीने खेचर (विद्याधर ) थयो. (८०) खेचर मरण पामीने पारमा देवलोके गयो. सर्प मरीने नरके गयो. अच्युतदेव च्यवीने पृथ्वीनाथ (राजा) थयो. वीजो नरकमाथी नीकळीने मिल थयो. (८१) राजा मरण पामीने अवेयकर्मा देव थयो. मिल्ल नरके गयो. ते नारकी त्याची नीकळीने सिंह थयो. प्रैवेयकसुर त्यांधी च्यवीने जंयूद्वीपना भरतमा भयोध्या नामनी महापुरीमा मानंद नामे राजा थयो. ( पार्श्वनाथचरित्रमा आठमे भवे महाविदहमा सुवर्णपाहु नामे चमी थमा एम जणावेल थे.) हवे भानंद राजा दामोदर नामना गुरुपासे चारिम अंगीकार करीने सिंहना पराभवधी मरण पामी प्राणत नामना दशमा स्वर्गमा यीश सागरोपमनी स्थितियाळा देव थया. (८२-८४) सिंह मरण पामीने नरके गयो. या प्रमाणे पाच मवमा कमठना जीवे मरुभूविना जीवने मरण पमाघ्यो. (८५) कमठनो जीव नारकी- माधी उद्धरीने कठ नामनो दरिद्री ब्राह्मण थयो. ते अनुक्रमे दुःखने लीधे तापस थयो. (८६ ) मरुभूतिनो जीव प्राणत देवलोकधी च्यवीने काशीदेशमा माचर्य उत्पन्न करे देवी शोमावाळी वाराणसी नगरीमा अश्वसेन राजानी यामाराधीनी कुषिरूप शुक्तिपी सर्ग १२ मो। (५११) भूभर्तुः । सुतोऽद्भुतगुणोत्तरः। वामाराज्ञीकुक्षिशुक्ति-मुक्ताफलमभूजिनः ।। ८८ ॥ कृष्णा चतुर्थी चैत्रस्य पौषस्य दशमी सितिः। पौपस्यैकादशी कृष्णा चतुर्थी चासिता मधौ ॥ ८९ ॥ श्रावणस्याष्टमी शुक्ला कल्याणानां दिना इमे । विशाखाधिष्ण्यमेतेपु राशिश्च स्वामिनस्तुला ।। ९० ॥ प्रभोर्गर्भस्थितिर्मासा नव पभिर्दिनैर्युताः । भुजंगो लांछनं हस्ता नवैव वपुरुच्छ्रयः ॥ ९१ ॥ रात्रौ यांतमहिं पार्श्वे-ऽपश्यद्गर्भक्षणे प्रसूः । ततः पार्थाभिधः स्वामी त्रैलोक्यं पश्यतीति वा ॥ ९२ ॥ श्रीनेमिनाथनिर्वाणात् त्र्यशीत्याव्दसहस्रकैः। अध्यर्द्धपट्शतोपेतैः श्री- पार्थोऽजायत प्रभुः ॥ ९३ ॥ वामेयगर्भकालेऽस्य चतुर्थस्यारकस्य च । सार्धाः शतास्त्रयोऽब्दाना-मवशिष्टतया स्थिताः ॥ ९४ ॥ त्रिंशददानि कौमार्ये व्रते वर्षाणि सप्ततिः । दिनानि तत्र चतुर-शीतिश्चाद्मस्थ्यमी. रितं ॥ ९५ ॥ सर्वायुः शतमन्दानां विशाला शिबिका व्रते। धन्यः कोपकटग्रामे पारणां प्रथमां ददौ ॥ ९६ ॥ पंचाग्नीन् साधयन् कष्टं सासहिः कठतापसः । प्रभुणा दर्शिते मुक्ताफळ समान अमृत गुणोवाळो पुत्र थयो. (८७-८८) चैत्र वदि ४, पोस वदि पोस वदि ११, चैत्र वदि ४ अने श्रावण शुदि ८-ए पांच कल्याणकनी तिथि जाणवी. पांचे कल्याणका विशाखा नक्षत्र जाणवू भने स्वामीनी राशि तुला जाणवी. (८९-९०) गर्भस्थिति नव मास ने छ दिवसनी, सर्पनुं लांछन अने नव हाथ शरीरनी उंचाइ जाणवी. (९१) प्रभु गर्भमा हवा त्यारे माताए रात्रे पडखे थइने जता सर्पने जोयो तेथी म ब त्रैलोक्यने (पासे होय तेम) जोनारा होवाथी प्रभुनु नाम पार्थ स्थापन कयु. (९२) नेमिनाथना निर्वाणथी ८३६५० वर्ष व्यति थये श्रीपार्श्वनाथ प्रभु थया. (९३) ते पखते एटले पार्थप्रमु गर्ममा भाच्या त्यारे चोथो आरो ३५० वर्ष पाकी रह्यो हतो. (९४) पार्थप्रभु श्रीश वर्ष कौमारावस्थामा रया भने ७० वर्ष अमणपणे रसा. कुल १०० वर्षतुं भायु मोगष्यु. तेमा ८४ दिवसो बयस्थपणामां व्यतीत थपा. प्रता- यसरे शिपिका विशाळा नामनी हती. प्रमुए प्रथम पारj कोपफट ग्रामे धन्यने त्यां कर्प. (९५-९६) हवे कठ सापस पंचाग्निने सापतो घणुं कष्ट सहन करतो हतो. प्रमु संसारी- (५१२) श्रीकाशलोकप्रकाश। सर्प प्रज्ज्वलत्काष्ठकोटरात् ॥ ९७ ॥ लज्जितस्तपसा तेन मेघमाली सुरोऽभवत् । ववर्षातितरां रोपा-दुपद्रोतुं जिनेश्वरं ॥ ९८ ॥ धरणेंद्र- स्वमासाद्य स सर्पो विचलासनः । भक्याच्छाद्य फणैरेन-मुपसर्ग न्यव- र्तयत् ॥ ९९ ॥ ततस्त्रयोऽथवा सत फणा एकादशापि च। भवंति पार्श्वनाथस्ये-त्युक्तं पूर्वमहर्षिभिः ॥ ९०० ॥ धातकी ज्ञानवृक्षः स्यात् श्रीपार्श्वस्य जगत्प्रभोः । प्रभोरष्टौ गणभृतो नामतः कीर्तयामि तान् ॥ १॥ शुभ १ स्तथार्यघोषश्च २ वशिष्ठो ३ ब्रह्मचार्यपि ४ । सोमश्च ५ श्रीधरश्चैव ६ वीरभद्रो ७ यशोऽभिधः ८॥ २ ॥ अयं श्रीकल्पसूत्रस्याभिप्रायः, आवश्यकसप्तति- शतस्थानकादिषु च दश गणभृत उक्ताः संति, किंच श्रीकल्पसूत्रपार्श्व- चरित्रादौ श्रीपार्श्वस्य धातकी ज्ञानवृक्ष उक्तः, श्रीउत्तराध्ययनवृहद्वृत्तौ तु अशोक उक्त इति ज्ञेयं. पोडशैव सहस्राणि साधूनां भावितात्मनां । अष्टात्रिंशत्सहस्राणि साध्वीनां च शुभात्मनां ॥३॥ श्राद्धानां सचतुःषष्टि-सहस्र पणामां तेनी पासे गयेला ते वखते काष्ठना कोटरमा पळतो सर्प देखाड्यो तेथी ते तापस बहु लसा पाम्यो. ते मरण पामीने मेघमाली देव थयो. पार्श्वजिनेश्वरे दीक्षा लीधा पछी छमस्थावस्थामा ते मेघमाळीए अत्यंत रोपथी तीवधाराए वरसाद वरसावीने तेमने उपद्रव कर्यो. (९७-९८) अग्निमा पळतो सर्प मरण पामीने धरणेंद्र थयेलो ते भासन चलित थवाथी त्यां प्राव्यो. तेणे भक्तिवडे प्रभुने फणाथी आच्छादित करीने ते उपसर्ग निवारण कयु, ( ९९) तेथी प्रण, सात अथवा अग्यार फणा पार्श्वनाथनी मूर्ति उपर, करवामां आवे छे एम पूर्व महर्षिोए कडुं छे. (९००) श्रीपार्थ जगत्प्रभुतुं ज्ञानवृक्ष घातकी नामर्नु हतुं. तेमने मुख्य आठ गणधर थया तेना नाम हुं कहुं छु (१) ते आ प्रमाणे-शुम, आर्यघोष, वशिष्ठ, ब्रह्मचारी, सोम, श्रीधर, वीरभद्र अने यश. (२) मा कम्पननो अभिप्राय छे. श्रीआवश्यकसूत्र अने सप्ततिशतस्पानकादिमा तो दश गणधरो कक्षा छे. वळी श्रीफन्पत्र ने पार्थचरित्रादिमा भीपार्थनाथ शानघ धातकी कयु छ, पण श्रीउपराप्ययन वृहद्धतिमा अशोक कधू थे. श्रीपार्थनायना परिवारमा माषितात्मा एवा १६००० साधुभो, शुमात्मा एवी ३८००० साम्वीमो, (३) १६४००० श्रावको, वेमा प्रभु नो अग्रेसर थायक सूर्य नामनो सर्ग १२ मो। लक्षमीरितं । अग्रेसरः श्रावकश्च प्रभोः सूर्य इति स्मृतः ॥ ४॥ लक्षास्तिस्रस्तथैकोन-चत्वारिंशत्सहस्रकाः । श्राविकाणां तासु मुख्या सुनंदा नामतः स्मृता ॥५॥ सर्वज्ञानां सहस्रं च मनःपर्याय- वेदिनां । पंचाशदधिकाः सप्त शताः प्रोक्ता मनीषिभिः ॥ ६ ॥ अवधि- ज्ञानभाजां च चतुर्दश शताः प्रभोः । सच्चतुर्दशपूर्वाणा-मध्यर्धा त्रिशती मता ॥ ७॥ विकुर्वणासमर्थानां शतान्येकादशाथ च। सुरा- सुरैरजय्यानां पट्शती वादिनामभूत् ॥ ८॥ शुभाभिधो गणी मुख्य थार्यदिन्नो मतांतरे । प्रवर्तिनी पुष्पचूला भक्तभूपः प्रसेनजित् ॥ ९ ॥ धीजपूरोरगोपेता-पसव्यकरयामलः । नकुलं च भुजंगं च दधद्वामकर- दये ॥ १० ॥ श्यामवर्णः फणिफणा-चक्रमंडितमस्तकः । चतुर्भुजश्चतु. वक्त्रो गजास्यः कूर्मवाहनः॥ ११॥ नाम्ना श्रीवामनो यक्षः पार्था- रुयश्च मतांतरे । श्रीपार्श्वनाथभकानां सान्निध्यं कुरुते सदा ॥ १२ ॥ भाविभ्रती पद्मपाशा-वपसव्ये करद्वये । सव्ये करद्वये कम्रौ दधती च फलांकुशौ ।। १३ ॥ चतुर्भुजा हेमवर्णा कुर्कुटोरगवाहना। श्रीपार्श्व स्मरतां दचे देवी पद्मावती श्रियं ॥ १४ ॥ इति श्रीपार्श्वः ॥ कहेलो छे. (४) ३३९००० श्राधिका, तेमा मुख्य सुनंदा नामनी कही छे. (५) १०. केवळनानी ने ७५० मनापर्यवधानी पुद्धिमानोए कहेला छे. (६) १४०० भव. धिशानी, ३५० चौदपूर्षी, (७) ११०० वैक्रिय विकर्वणा करवाने समर्थ मुनिभो भने सरासरने पण अजय्य एवा ६.० यादी निमो थया. (८) गणधरमा मुख्य शुम नामे मतावरे मार्यदिन नामे थया, प्रवर्तिनी पुप्पचूला भने मक्तराजा प्रसेनजित् पया. (९) श्रीपार्श्वनाथनो यक्ष वामन नामनो मतांतरे पार्थ नामनो जमणाचे हायमा पीज- पूर ने सर्प भने सारा ये हायमा नकुल ने मुजंगने धारण करनारो, श्याम वर्णवाळो, फणिना फयामोना समूहथी मंडित मस्तकबालो, चार भुजावाळो, पार मुसवालो, हाथी जेया मुखवालो भने कूर्मना बाहनवालो थयो. ते श्रीपार्थनाप प्रभूना मस्तानी नित्य सानिध्य कर थे. (१०-१२) देवी पावती नामनी जमणा ये हायमा पर ने पाराने पारण करनारी भने सपा सपा सुंदर एवा फळ ने भंकराने धारय करनारी, घार एमापाठी, सुवर्णसरा पर्णपाठी, पुर्वष्ट जातिना सर्पना पाहनवाळी, श्रीपार्थनापर्नु मरण करनारने लक्ष्मी मापनारी पा. (१३-१४) इति श्रीपा: ॥

(५१४) श्रीकाललोकप्रकाश। पश्चिमेषु विदेहेषु नयसाराभिधोऽभवत् । ग्रामनाथः स काष्टार्थ बनेऽगात् स्वाम्यनुज्ञया ॥ १५ ॥ भोजनावसरे वांछ-न्नतिथीनां समा- गर्म । सार्थभ्रष्टान ददर्शीन् क्षुधातन्मार्गविच्युतान् ॥ १६ ॥ ततस्तान् परमप्रीत्या प्रणम्य परिचर्य च । शुद्धाशनादिभिः पश्चा-स्वयं मार्गम- दर्शयत् ॥ १७॥ प्रापितस्तत्र सम्यत्तवं योग्योऽयमिति साधुभिः । ततो भवे द्वितीयेऽसौ सौधर्मे त्रिदशोऽभवत् ॥ १८॥ ततो मरीचिना. माभू-पुत्रो भरतचक्रिणः । स प्रववाज वैराग्या-त्समीपे वृषभप्रभोः ॥ १९ ॥ अधीतकादशांगोऽपि सोऽथ तापादिपीडया । पीडितो भृश- मुद्विग्न-श्चेतस्येवं व्यचिंतयत् ॥ २० ॥ मया न शक्यते वोढुं दुर्वहः संयमो न च । गृहेऽपि शक्यते गंतुं गर्हितेगावकीर्णिना ॥ २१ ॥ ततस्त्रिदंडिनामेष नव्यं वेषमकल्पयत् । विजहारार्हता साई शुद्धं धर्म प्ररूपयन् ॥ २२ ।। अनेकान् राजपुत्रादीन् प्रतिबोध्येति शास्त्यसौ । जैनधर्म प्रपद्यध्वं गत्वा श्रीजिनसन्निधौ ॥ २३ ॥ श्रीमहावीरजिनवर्णन-पश्चिम महाविदेहमा नयसार नामनो ग्रामाधिप हतो, ते पोताना स्वामीनी श्राज्ञाथी बनमा काटने माटे गयो. (१५) भोजनावसरे अतिथिना समागमने इच्छता एवा तेणे सार्थभ्रष्ट ( साथथी छुटा पडी गयेला) क्षुधा भने मार्ग भूलेला एवा मुनिमो दीठा. (१६) एटले तेमने परम प्रीतिथी नमस्कार करीने शुद्ध अशनादि देवावडे परिचर्या करी अने पछी पोवे साथे जइने मार्ग पवाव्यो. (१७) मनिए श्रा योग्य जीव छ एम जाणीने उपदेशवडे तेने समकित प्राप्त कराव्यु. त्यांची पीजे भवे ते सौधर्म देवलोके देव थयो. (१८) त्यांची व्यवीने त्रीजे भवे भरतचक्रीनो पुत्र मरीचि नामे थयो. तेणे वैराग्यथी पृषभ प्रभुनी पासे दीपा लीधी. ( १९) अग्यार अंग मण्या छतां तापादिकनी पीडाथी पीडित थपेल ते अत्यंत उद्विग्न थइने भाप्रमाणे चिंतषवा लाग्यो (२०) फे-'पा दुःखे वहन फरवा योग्य संयमने वहन करवाने ई समर्थ नधी, मज व्रत भंग थवाथी गर्हित थपेला मारे घरे पण जर शकाय सेम नपी. (२१) भाम विचारीने तेणे त्रिदंडीना नवा पेपनी कल्पना करी, भने शुद्ध धर्मने प्ररूपता सता प्रभुनी साथै विचरवा लाग्या. (२२) अनेक राजपुत्रादिफने प्रवियोध पमाडीने ते एम कहेता के-'श्रीजिनेवर पासे जाने जैन धर्मने भंगीकार करो. (२३) सर्ग ३२ मो। (५१५) कदाचिरसमवासार्षी-दयोध्यायां जिनेश्वरः। तत्रागतो नमस्यार्थ पप्रच्छ भरतः प्रभुं ॥ २४ ॥ एतस्यामवसर्पिण्या-मस्मिश्च भरते प्रभो!। भविष्यति जिनः कोऽपि जनोऽस्यां पर्षदि स्थितः ॥ २५ ॥ तदोचे भगवानेप मरीचिस्तनयस्तव । चतुर्विशोऽत्र भाव्यर्हन् महावीरायो नृप ॥ २६ ॥ चक्री च प्रियमित्राख्यो विदेहेषु भविष्यति । प्रथमो वासुदेवोऽपि भरतेऽत्रैप एव च ॥ २७ ॥ भरतोऽपि ततो गत्वे-त्यूचे नत्वा कृतांजलिः । जिनश्चक्री हरिर्भावी मरीचे भाग्यवानसि ॥२८॥ आरिवाज्यं न ते वंदे न च ते चक्रिशाद्भिता । भविष्यसि जिनो हि त्वं प्रणमामि ततो मुदा ॥ २९ ॥ एवमुक्त्वा विनीतांत-विनीते नृपतौ गते । मरीचिर्मानसाविष्टा-ऽमानमानोऽब्रवीदिति ॥३०॥ प्रायोऽहं वासुदेवानां पिता मे चक्रवत्तिनां । पितामहो जिनेंद्राणां ममाहो उत्तम कुलं ॥ ३१ ॥ प्रथमो वासुदेवोऽहं मूकायां चक्रवर्त्यहं । चरम- स्तीर्थराजोऽहं पर्याप्तमियतैव मे ॥ ३२ ॥ कुर्वन्नेवमहंकारं नीचैर्गोत्रं अन्यदा श्रीजिनेश्वर अयोध्यामा समवसर्या. तेमने नमवा भावेला भरतचक्रीए प्रभुने पूछ ( २४ ) के-'मापनी पर्पदामा एको कोइ मनुष्प छै के जे आ भवसर्पिणीमा भा भरतमा तीर्थंकर थाय ? ' (२५) मगवंते कधू के-'मा तारो पुत्र मरीचि हे नृप ! मा घोषीशीमा ज चोवीशमा महावीर नामे तीर्थकर थशे. (२६) वळी महाविदेहमा प्रियमित्र नामे पक्रयीं थशे भने मा भरतमा पहेला वासुदेव पशे.' (२७) भा प्रमाणे सांभळीने भरतपकीए मरीचि पासे जइने अंजळी जोडी नमस्कार करीने कपुंके- 'हे मरीचि ! तु तीर्थकर, चक्री ने वासुदेव थइश तेथी तुं माग्यवान छु. (२८) हुँ सारा परिमाजकपणाने के चक्री तथा पासुदेवपणाने नमस्कार करतो नयी परंतु वीर्थकर मानो हुँ सेपी हर्षवडे तने नमस्कार करुं छु. (२९) मा प्रमाणे कहीने विनीत अंतःकरणयाला धक्री विनीतामा गये सते मनमा ब्यापी गपुंछ भमान अमिमान बने एपो मरीचि पोल्यो (३०) के-'हुँ पासुदेवमा पहेलो, मारा पिता पक्रवामां पोला भने मारा पितामह जिने परमा पहेला तेथी महो! मार गुळ उचम 2. (३१)ई पहेलो वासुदेव पाश, मका नगरीमा परी पाश ने छनो तीर्थकर पाशवेधी मने माम पस्तु प्राप्त छे. एटलापीबई एरेसरो उपहुं.' (३२) मा प्रमाणे महंकार , भीकाललोकप्रकाश । वबंध सः । जातिलाभकुलादीना-महंकारो हि पातयेत् ॥ ३३ ॥ कदाचित्कपिलं राज-कुमारं प्रत्यबुधत् । प्रेरयच्चापि चारित्रं ग्रहीतुं साधुसन्निधौ ॥ ३४ ॥ ततो बहुलकर्मायं मरीचिमवदद्विभो । किं सर्वथा न धर्मोऽस्ति भवदीयेऽत्र दर्शने ॥ ३५॥ ततो मरीचिरूचे तं भावितावद्भवस्थितिः । मार्गे ममापि धर्मोऽस्ति मार्गे जैनेऽपि विद्यते ॥ ३६ ॥ उत्सूत्रवचसानेन मरीचिः समुपार्जयत् । संसारमेकपाथोधि- कोटाकोटिमितं तदा ॥ ३७ ॥ ततस्तुर्ये भवे ब्रह्म-लोकस्वर्गेऽभव- सुरः । कोल्लाकसन्निवेशेऽथ विप्रोऽभूत्पंचमे भवे. ॥ ३८ ॥ ततश्च मृत्वा भूयांसं कालं संसारमाटिटत् । भवास्ते च न गण्यते भवानां सप्तविंशतौ ॥ ३९ ॥ षष्ठे भवे च स्थूणायां नगर्यो ब्राह्मणोऽभवत् । सौधर्मकल्पे देवोऽभूद्भवे मृत्वा च सप्तमे ॥ ४० ॥ भवेऽष्टमे ततश्चैत्य- सन्निवेशेऽभवद् द्विजः । ईशानदेवलोकेऽथ निर्जरो नवमे भवे ॥ ४ ॥ मंदराख्ये सन्निवेशे ब्राह्मणो दशमे भवे । एकादशे भवे देवो-ऽभव- स्वर्गे तृतीयके ॥ ४२ ॥ भवे च द्वादशे पुर्या श्वेतांब्यां ब्राह्मणोऽभवत् । फरवाथी तेमणे नीच गोत्र यांध्यु. जाति, लाभ भने कुळादिकनो मद (अहंकार) प्राणीने नीचा पाडी दे छे. (३३) अन्यदा मरीचिना उपदेशथी कपिल नामनो राजकुमार प्रतियोघ पाम्यो. मरीचिए साधुपासे जइने चारित्र लेवा प्रेरणा करी, (३४) परंतु बहुलकर्मी एवा तेणे मरीचिने कई के-'हे विभो । शुं तमारा दर्शनमा सर्वथा धर्म नथी । (३५) त्यारे मरीचि सेटली मव- स्थिति वधवानी होवाथी चोन्या के-'मारा मार्गमां पण धर्म के अने जैनमार्गमा धर्म छे. (३६) प्रा उत्सूत्र वचनधी मरीचिए एक कोटाकोटी सागरोपम संसार पधार्यो. (३७) त्यांची मरण पामीने चोथे भवे ब्रह्म देवलोकमां देव थया. त्यारपछी पांच मे भये कोजाक सन्निवेशमा विप्रथया. (३८) त्यांधी मरण पामीने घणो काळ संसारमा रसध्या. तेमा करेला पारावार भवो मुहा २७ भवोमा गणवामां आव्या नथी. (३९) छठा भवे स्धूणानगरीमा प्रामण थया. मरण पामीने सातमे मवे सौधर्मकन्पमा देव थया१०) पाठमा मवमा चैत्यसनिवेशमा ब्राह्मण थया. नवमा भवे ईशान देवलोका देव थया. (४१) दशमे मवे मंदर नामना सनिवेशमा मामय थया. भग्यारमे मवे त्रीमा सर्गमा देव थया. (४२) पारमे मवे श्वेतांचीमा ब्राह्मण घया. तेरमे मवे चोथा देवलोकमा देव पण .

। वर्ग ३१ मो। त्रयोदशे च माहेंद्रे कल्पेऽभूत्रिदशो भवे ॥ ४३ ॥ ततः कियंतं कालं च भ्रांतोऽसौभवसागरे। चतुर्दशे ततोराज-गृहेऽभूब्राह्मणो भवे ॥४४॥ भवे पंचदशे ब्रह्म-लोकस्वर्गे सुरोऽभवत् । मरीच्यादिनुभवानां पट्के सोऽभू- त्रिदंडिकः॥४५॥ पोडशे च भवे विश्व-भूत्याख्यो युवराजसूः। संभूतिमुनि- पादांते पप्रेदे संयम स च ॥ ४६॥ अन्यदा मासतपसः पारणायां स जग्मिवान् । मुनिर्गोचरचर्यायां तत्र धेनुहतोऽपतत् ॥४७॥ दृष्टः पितृव्य- पुत्रेण हसित: कुपितो भृशं । गां शृंगयोगृहीत्वा द्राग् नभस्यभ्रमयदुपा ॥४८॥ निदानं कृतवांश्चैवं भूयासं तपसामुना । भूयिष्ठवीर्यो मृत्वा च महाशुक्रेऽभवत्सुरः ॥ ४९ ॥ वासुदेवस्त्रिपृष्ठाख्यो-ऽजायताष्टादशे भवे । वाल्येऽप्यदारयसिहं यः स्थाम्ना जीर्णवस्त्रवत् ॥ ५० ॥ नरके सप्तमेऽथैको-नविंशतितमे भवे । सिंहोऽभूविंशतितमे चतुर्थे नरके गतः ॥५१॥ निर्गत्य नरकातुर्यात् स वभ्राम भवान् बहून् । द्वाविंशेऽथ भवे नृत्वं प्राप्य पुण्यान्युपार्जयत् ॥ ५२ ॥ भवे ततस्त्रयोविंशे। प्रियमि- थया. (७३) त्यारपछी पाछा केटलोक काळ संसारसागरमा भम्या. चौदमे मवे राज- गृहमा ब्राह्मण थया. (४४) पंदरमे भवे पांचमा ब्रह्मदेवलोकमां देव थया. मरीचि विगैरे छ मनुष्य भवोमा ते त्रिदंडी यया हता. (४५) सोळमे मवे विश्वभूति नामे युव. राज थया. तेमणे संभूतिमुनिनी पासे दीक्षा लीधी. (४६) अन्यदा मासंखमणने पारणे विवभूति मुनि गोचरचर्या माटे शहेरमा गया. त्यां एक गापना प्रथडावापी मुनि पडी गया. (४७) ते जोइने तेना काकानो पुत्र विशाखनंदी हस्यो.ते जोइ मुनिने घणो कोप उत्पन्न थयो. तेणे गायने शींगडावडे पकडी क्रोधधी भाकाशमा फेरवी फेंकी दीधी (१८) भने निपाणुं कयं के-'मारा भा पणा वपना प्रमावधी हुँ पणी शक्तिवाळो पाउं.' सत्तरमे मवे महाशुक्र नामना सातमा देवलोकमां देव थया. (४९) भढाग्मे भवे प्रिपृष्ठ नामे वासुदेव थया. बान्यावस्थामा ज तेणे सिंहने पोताना पळवडे जीर्ण बननी जेम फाडी नाख्यो. (५०) भोगणीशमे मवे सातमी नरकमा नारकी थया. वीशमे मवे सिंह यया. २१ मे मवे पोथी नरके नारकी थया. (५१) चोथी नरकमांची नीकळीने ते (पीजी वार ) घणा मवमा मम्या. २२ मा मवे मनुष्यपणुं पामीने पुण्य उपार्जन कर्य, (५२) तेथी २३ मे मवे प्रियमित्र नामे चक्रवर्ती थया. ते चक्री चारित्र (५१८) भीकाललोकमकारा। त्राभिधोऽभवत् । चक्रभृत्त च चारित्रं धृत्वा शुक्रेऽभवत्सुरः ॥ ५३ ॥ ततश्च्युत्वेह भरत-क्षेत्रेऽहिच्छत्रिकापुरे। जितशत्रुमहीपाल-भद्रादेव्योः सुतोऽभवत् ॥ ५४ ॥ पंचविंशतिलक्षाब्द-जीवितो नंदनाह्वयः । दीक्षा लक्षावशेषायु-राददे पोटिलाद्गुरोः ॥ ५५ ॥ अयमावश्यकाभिप्रायः, समवायांगसूत्रवृत्त्योस्तु भगवान् पोहिलाभिधानो राजपुत्रो बभूव, तत्र वर्षकोटिं प्रव्रज्यां पालितवान्, ततो नंदनाभिधानोराजसूरित्युक्तमस्तीति ज्ञेयं. यावजीवं ततो मास-क्षपणानि निरंतरं। कुर्वन् स विंशतिस्था- ना-न्याराध्याहत्यमार्जयत् ॥ ५६ ॥ सुरोऽभूत्प्राणतस्वर्गे षड्विंशतितमे भवे । विंशत्यब्ध्यायुर्विमाने पुष्पोत्तरावतंसके ॥ ५७॥ भवे ततः सप्तविंशे ग्रामे ब्राह्मणकुंडके । विप्रस्यर्षभदत्तस्य देवानंदा- ह्वयस्त्रियां ॥ ५८॥ मरीचिभवबद्धन स नीचैर्गोत्रकर्मणा । कुक्षौ प्रभुक्त- शेषेण विश्वेशोऽप्युदपद्यत ॥ ५९॥ अहंतश्चक्रिणश्चैव सीरिणः शाहि- णोऽपि च । तुच्छान्वयेषूत्पद्यते कदाचित्कर्मदोषतः ॥ ६० ॥ जायंते तु कदाप्येते तादृग्वंशेषु नोत्तमाः। इति दत्तोपयोगस्य सुरेंद्रस्यानु- लइने २४ मे भये महाशुक्र (७ मा) देवलोकमां देव थया. (५३) त्यांची व्यवीने २५ मे भवे आ भरतक्षेत्रमा अहिछत्रिका नगरीमा जितशत्रु राजा ने मद्रादेवीना पुत्र थया. (५४) त्यां तेनुं नंदन नाम पाडयुं, तेमनुं २५ लाख वर्षनुं आयुष्य हतं. एक लाख वर्ष वाकी रह्या त्यारे पोट्टिल नामना गुरुपासे चारित्र लीधु. (५५) श्रा भावश्यक- सूत्रनो अभिप्राय छे. समवायांगसूत्र ने तेनी पृचिमा तो भगवान पोट्टिल नामना राजपुत्र थया. त्या एक कोटि वर्ष प्रव्रज्या पाळी पानते देव थया. त्यारपछी नंदन नामे राज. पुत्र थया एम कहां छे. नंदन मुनिए यावजीव निरंतर मासखमण कर्या भने धीशस्थानक पाराधवावडे अरिहंत नामकर्म उपार्जन कयु. (५६) छवीशमे भवे प्राणत नामना दशमा देवलोके वीश सागरोपमना मायूवाळा पुष्पोत्तरायतंसक विमानमा देव थया. (५७) स्यारपछी २७ मे मवे ब्राह्मणकुंडग्रामे ऋपमदच ब्राह्मणनी देवानंदा नामनी स्त्रीनी कुक्षिमा मरीचिना भवमां बांधेल नीचगोत्रकर्म भोगवतां शेष रहेलु तेना कारणधी विधेश (तीर्थकर ) थवाना छता उत्पन्न थया. (५८-५९) अरिहंत, चक्री, पासुदेव, बळदेव कदाचित कर्मना दोपथी नाक्षणादि तुच्छ कुळमा उपजे, (६०) परंतु उत्तम. पुरुषो तेवा वंशमा जन्मे तो नहीं ज. भा प्रमाणे उपयोग देवाची शकेंद्रे जाण्युं वेपी , .

मूक्या सर्ग ३२ मो. (५१९') शासनात् ॥ ६१ ॥ पुरे क्षत्रियकुंडाख्ये सिद्धार्थस्य महीपतेः। त्रिशलाया महाराश्याः कुक्षावक्षीणसंपदः ॥६२ ॥ मुक्ता द्वयशीत्यहोरात्रा- तिक्रमे नैगमेपिणा । अजायत सुतत्वेन चतुर्विंशो जिनेश्वरः ॥ १३ ॥ एवं च-उसह १ ससि २ संति ३ सुव्वय ४ । नेमीसर ५ पास ६ वीर ७ सेसाणं ८॥ तेर १ सग २ घार ३ नव ४ नव ५। दस ६ सगवीसा य ७ तिन्नि ८ भवा ॥ ६४ ॥ इति समर्थितं । श्रीसमवायांगे कोटिसमवाये 'तित्थकरभवग्गहणातो छठे पोटिल्लभवग्गहणे' इति सूत्रे श्रीवीरस्य देवानंदागर्भस्थितिस्त्रिशलाकुक्ष्यागतिश्चेति भवद्वयं विवक्षि- तमस्तीति ज्ञेयं. तेमणे श्राज्ञा करपाथी नैगमेपीदेवे नहीं प्राचीने क्षत्रियकुंड ग्राममा सिद्धार्थ राजानी अधीय संपदावाळी त्रिशला महाराणीनी कुतिमा प्रभुने व्याशी रात्री अतिक्रम्या पछी अने त्यां चोवीशमा तीर्थकर पुत्रपणे जन्म्पा. ( ६१-६३ ) समीकत पाम्पा पछीना मवोनी गणत्रीने अंगे कयुं छे के-'ऋपमदेव, चंद्रप्रमु, शांतिनाथ, मनिसुव्रत, नेमीश्वर, पार्थ, वीर अने वाकीना १७ प्रभुना अनुक्रमे तेर- सात-बार-नव-नव-दश-सचावीश भने प्रण-त्रण मव जाणवा. ' (६४) श्रीसमवायांगे कोटिसमयाये तीर्थकरना भवग्रहणथी (पाछला) हा पोट्टिलना मवग्रहणमा-एम कहेवावडे या सूत्रमा श्रीवीरप्रभुना देवानंदागर्मस्थिति अने त्रिशलानी कुदिमा भागति एम मे भवनी जूदी विवक्षा फरी छ एम जाणवू." (श्रीसमवायोगस्पनी छापेली टीकामा पृष्ठमा कछु छ के-भगवान पोहिल नामना राजपुत्र धया. त्या एक कोड वर्ष अनन्या पाळी ते एक मव, त्यांची देव थया ते वीजो भव, त्याथी छनामनगरीमा नंदन नामे राजपुत्र थया ते बीजो भव, त्यांची एक लाख वर्ष सर्वदा मासचपणवडे तप तपीने दशमा देवलोके पुष्पोचरवरविजयपुंडरीक नामना विमानमा देव पपा ते चोयो भव. त्यांची नावणकुंड ग्राममा ऋपमदच प्राम- पानी मार्या देवानंदानी कुतिमा उत्पन्न यया ते पाचमो भव. त्यांची प्राशीमे दिवसे षत्रियकुंडप्रामनगरे सिद्धार्थ महाराजानी त्रिशला नामनी राणीनी कृषिमा इंदना पात्रा- कारी हरिनगमेपि नामना देवे संहर्या ने तीर्थकरपणे जन्म्या ते छठो मक. ए रीते मव प्र. इप कर्या विना पीजी कोड रीते भगवंतनुं छह मवग्रहणपणुं शास्त्रमा जाणवामा भायूं नयी. मा रोवे ज हा मवग्रस्यपणुं कहेल छे. जे भवना ग्रहणधी भा छठो भय ते भर मानाथी पाछळ गया छटोज पाय, तेथी तीर्थकरना भवग्रहणथी पारले छठे पोहिलना मधे मोर पर्प पारिन पाध्यं एम कहे ते मतुं पाये थे.)

(५२०) श्रीकाललोकप्रकाश । प्राषाढ़े धवला षष्ठी चैत्रे शुक्ला त्रयोदशी। मार्गस्य दशमी कृष्णा वैशाखे दशमी सिता ॥६५॥ कार्तिकस्यामावसीति कल्याणकदिनाः प्रभोः। अभूगर्भापहारे तु त्रयोदश्याश्विने सितिः ॥ ६६ ॥ फाल्गुन्य उत्तरा धिष्पयं कल्याणकचतुष्टये । तथा गर्भापहारेऽपि निर्वाणे स्वाति- रिष्यते ॥ ६७॥ द्वयोमहिलयोर्गर्भ स्थितिः संकलिता विभोः । नव मासाः सातिरेकाः सप्तभिः किल वासरैः ।। ६८।। श्रीपार्श्वनाथनिर्वाणा- दभूजन्मांतिमाहतः। साधिकेनाष्टसप्तत्या शतेन शरदामिह ॥ ६९ ॥ श्रीवीरगर्भकाले च वर्षाणां पञ्चसप्ततिः तुर्यारकेऽवशिष्टाऽऽसीत् सार्धमा- साष्टकाधिका।। ७०॥ राशिरासीद्विभोः कन्या लांछनं च मृगाधिपः। देहो. च्छूयः सप्त हस्ताः प्रशस्तांगद्युतिश्रियः ॥७१॥ गुणागतानि नामानि त्रीण्यभूवन् जगद्विभोः । वर्द्धमानः श्रमणश्च महावीर इति स्फुटं ॥७२॥ अवतीर्णे प्रभौ ग्राम-राष्ट्रादि यदवर्द्धत । ततः पितृभ्यां विहित- मादिम नाम सार्थकं ॥७३॥ तपस्यति श्राम्यतीति नाम श्रमण अपाड शुदि ६, चैत्र शुदि १३, मार्गशीर्ष वदि १०, वैशास शुदि १० भने कार्चिक वदि ०)) ए पांच कन्याणकना दिवसो जाणवा. प्रभुनो गर्मापहार पासो बदि १३ शे जाणवो. चार कल्याणकमा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र जाणवू. गर्भापहारमा पण ते नक्षत्र जाणवू भने निर्वाणमा स्वाति नक्षत्र जाणवं. (६५-६७ ) प्रभुनी बने महिलाना गर्भनी मळीने एकत्रित स्थिति सात दिवसे करीने अधिक नव मासनी जाणधी. (६८) श्रीपार्श्वनाथना निर्वाणथी काइक प्रधिक १७८ वर्षे वीरप्रसनो जन्म जाणयो. (६९) श्रीवीरममना गर्भकाळे चोथो भारो ७५ वर्ष ने ८॥ मास बाकीमा हतो.' (७०) प्रभुनी राशि कन्या अने लंछन सिंहनुं जाणवू. देहनी उंचाइ सात हाथनी अने प्रशस्त एवी अंगनी घुति (कांति) तेम ज शोमा हती. (७१) गुणथी प्राप्त थयेला प्रसना प्रण नाम हता. वर्धमान, श्रमण ने महावीर. (७२) प्रमु गर्ममा भाज्या त्यारथी सिद्धार्थराजा मामराष्ट्रादियी धद्धि पाम्या तेथी मातापिताए सार्थक एमु पहेलु वर्धमान नाम पाड. (७३) तपस्या करवायी, थम करवायी श्रमण एवं पीजु सार्थक नाम १ फल २९३ वर्षे ने <॥ मासमा प्रमु २५० वर्षे निर्याए पामा ३ वर्ष ने ८॥ मास बोयो भारो बानी रहेरो. " -- सर्ग ३२ मो. इत्यभूत् । तृतीयं नाम शक्रेण विहितं तन्निशम्यतां ॥७४ ॥ प्रशशंसान्यदा शक्रः स्वामिधैर्य स्वपर्षदि । अश्रद्दधानस्तकश्चि- द्देवो भूलोकमीयिवान् ॥ ७५ ॥ क्रीडति स्वामिनि क्रूर-सर्परूपमदी- दृशत् । निक्षिप्ते स्वामिना दूरं तस्मिन्निर्भीकचेतसा ॥ ७६॥ कुमार- रूपमाधाय चिक्रीड प्रभुणा सह । छलेन स्कंधमारोप्य प्रभुं स यवृधे भृशं ॥ ७७ ॥ तथाप्यभीतो भगवान् शनैर्मुष्ट्या जघान तं। ततः शको व्यधात्तुष्टो महावीराभिधं विभुं ॥ ७८ ॥ तथोक्तं-बालत्तणे वि सूरो पयइए गुरुपरकमो भयवं । वीरति कयं नामं सक्केणं तुचित्तेणं । ७९ ॥ श्रीयोगशास्त्रगच्छाचारवृत्त्यादौ तु यदा प्रभुणा जन्मोत्सवे मेरुः कंपितस्तदा शक्रेणतन्नाम कृतमित्यस्तीति ज्ञेयं. पूर्ववैरिसंगमसुरो. पहितकालचक्राप्रधृप्यत्वादिंद्रादयो वीरनामानमुच्चैरुच्चेरुरिति : तत्त्वार्थवृ० स्वामी कनकवर्णाग-स्तथा पंचदशापरे । पद्मप्रभवासुपूज्यौ यमु. श्रीजुं महावीर नाम शके पाडयुं तेनी हकीकत सामळो-(७४) भन्यदा शकेंद्रे पोतानी पर्पदामा स्वामीना धैर्यनी प्रशंसा करी. तेने नहीं महहीने एक देव पृथ्वीपर पाव्यो. (७५) तेणे क्रीडा करवा एवा स्वामीनी पासे क्रूर सर्पन रूप देसाइयं. एटले तेनाथी नहीं व्हीता चित्तवाळा प्रभुए तेने दूर फेंकी दीघो. (७६) एटले ते देव कुमारनु रूप करीने प्रभुनी साथे रमवा आयो भने छळथी प्रभुने पोताना स्कंधपर चडावीने घणो ज वधवा लाग्यो; (७७) तथापि अमीत (नहीं भय पामेला) एवा भगवाने धीमेथी तेनापर मुष्टिवडे प्रहार कर्यो. ( एटले देव संकोच पामी, अपराध समावी स्वस्थानके गयो). आ हकीकतथी संतुष्ट थयेला इंद्रे प्रमनु महावीर एवं नाम स्थापन करें. (७८) कयु के के–'पाळकपणामां पण शूर अने स्वभावे ज भति पराक्रमवाळा भगवाननुं वीर एवं नाम तुष्टमान थयेला शके स्थापन कर्य. (७१) श्रीयोगशास्त्र ने गच्छाचारनी चि विगेरेमा तो ज्यारे प्रसए जन्मोत्सव समये मेरुने कंपाध्यो त्यारे शकेंद्रे महावीर नाम स्थापन कर्यु एम कहेलुं छे तथा श्रीतार्थनी प्रतिमा पूर्ववैरी संगमसुरे करेला काळचक्रधी पण प्रम रग्या नहीं त्यारे इंद्रादिक वीर नामपी उंचे स्वरे पोलता हवा' एम पधुंके, धीरप्रभुनो कनकसमान पर्ण हसो म ज बीजा १५ प्रमुनो पण तेवो पर्ण हतो, - - (५२२) श्रीकाललोकप्रकारा। पद्मरागारुणयुती ॥ ८०॥ नीलवर्णों मल्लिपार्था-वुज्ज्वलौ नवमाष्टमौ । सजलामोधरश्यामौ श्रीनेमिमुनिसुव्रतौ ॥ ८१ ॥ थनंगीकृतसाम्राज्यो गृहवासेऽवत्सद्विभुः । त्रिंशद्वर्षाणि चारित्रं तत्तश्च प्रत्यपद्यत ॥८॥ पड्भिर्मासैः किलाध्यः शरदो द्वादशा- धिकाः । छद्मस्थता प्रभोस्तत्र यत्तपोऽभूत्तदुच्यते ॥ ८३ ॥ द्वे षण्मा- सक्षपणके तत्रैकं पंचभिर्दिनः । न्यून नव चतुर्मास-क्षपणान्यकरोद्विभुः ॥८४ ॥ सार्द्धद्विमासक्षपणे त्रिमासक्षपणे अपि । वे दे द्विमासक्षपणा- न्यकार्षीत् पडू जिनेश्वरः ॥ ८५ ॥ सार्द्धकमासक्षपणे द्वे मासक्षपणानि च । द्वादश द्वासप्ततिश्च पक्षक्षपणकान्यथ ॥ ८६ ॥ द्विधस्त्रा भद्रप्र. तिमा महाभद्रा चतुर्दिना । प्रतिमा सर्वतोभद्रा दशभिर्दिवसमिता ॥ ८७ ॥ एकोनत्रिंशदधिकं षष्ठभक्तशतद्वयं । त्रिशत्येकोनपंचाशा पारणानां समुच्चिता ॥ ८७॥ अष्टमानि द्वादशकं प्रव्रज्यादिनमित्यसौ। सर्वसंकलने छद्मस्थताद्धा स्यात्पुरोदिता॥ ८९ ॥ सर्व चतुर्विधाहारं स्वा. मिनेदं तपः कृतं । द्वित्राण्यपि दिनानीह न च भुक्तं निरंतरं ॥ ९ ॥ पप्रम ने वासुपूज्यनी पद्मरागमणिनी जेवी रक्त कांति हती, (८० ) मल्लिनाथ ने पार्श्व- नाथ नील वर्णना हता, नवमा ने पाठमा ( सुविधिनाथ ने चंद्रप्रम ) उज्वळ वर्णना हवा अने जळसहित अंभोघर (मेघ) समान श्याम वर्णवाळा श्रीनेमिनाथ ने मुनिसुनव- स्वामी हता. (८१) साम्राज्यने अंगीकार कर्या सिवाय त्रीश वर्ष प्रभु गृहवासमा रया. त्यारपछी चारित्र ग्रहण कर्य. (८२) चार वर्ष ने साडाछ मास प्रसुनुं छमस्थपणुं रखु. सेमा प्रभुए जे तप कर्यो ते कहे थे:-(८३) ये छमासी-तेमा एक पांच दिवस ऊणो भने नष चउमासी तप प्रभुए कर्या (८४) भढीमासी, प्रणमासी पये ने ये मासक्षपण छ जिनेश्वरे कर्या. (८५) दोढमासी थे, मासक्षपण पार ने पाक्षिक तप ७२ को. (८६) थे दिवसनी भद्र प्रतिमा, चार दिवसनी महामद्र प्रतिमा ने दश दिवसनी सर्वतोभद्र प्रतिमा प्रमुए भाराधी. (८७) २२९ छठ, पार अहम, एक प्रमज्यानो दिवस ने ३४९ छल पारणाना दिवस-मा पधानी संकळना करवाथी पूर्वे कसा प्रमाणे प्रस्थपणानो काळ पूर्ण पाय थे. (८४-८९) मा तप पउविहारपडे स्वामीए कयों छे अर्थात् तपमा पाणी पावयु नधी भने निरंतर एटले उपराउपरी पे के प्रण दियस पण पाहारलीधो नमी. (९०) मर्ग १२ मो। (५२) नाप्रीतिमद्गृहे वासः १ स्थेयं प्रतिमया सदा २। न गेहिविनयः कार्यो ३ मौनं ४ पाणौ च भोजनं ५ ॥ ९१ ॥ अभिग्रहानिमान्पंचा- भिगृह्म परमेश्वरः । श्रार्यामार्येषु देशेपु विजहार क्षमानिधिः ॥ ९२ ॥ एवं विजहुवृषभ-नेमिपार्श्वजिनेश्वराः । पार्यानार्येषु शेषास्तु सदार्येष्वेव विंशतिः॥ ९३ ॥ एकोनत्रिंशतं वर्षाण्यध्यर्द्धान्यंतिमो जिनः। पक्षो. नानि च सर्वज्ञ-पर्यायं पर्यपूरयत् ॥ ९४ ॥ बभार व्रतपर्यायं द्विचत्वा- रिंशदव्दकं । एवं द्विसप्ततिर्वा-ण्यायुः सर्वमभूद्विभोः ॥ ९५ ।। अयं कल्पसूत्राद्यभिप्रायः, समवायांगे साधिकानि द्विचत्वारिंशद्वर्षाणि व्रतपर्यायः, साधिकानि द्विसप्ततिवर्षाणि सर्वायुरित्युक्तमिति ज्ञेयं. तपो वृपभतीर्थेऽभू-दुत्कृष्टं वार्षिकं तथा । पाण्मासिकं वीरतीर्थे शेपेषु चाष्टमासिकं ॥ ९६ ॥ प्रमादकालोऽहोरात्र-प्रमितो वृषभेशितुः । अंतर्मुहूर्त वीरस्य शेषाणां स न विद्यते ॥ ९७ ॥ श्रीवीरनेतुर्भूयांसः श्रीपार्श्वस्य च तेऽल्पकाः । द्वाविंशतेश्च शेषाणा-मुपसर्गा न जज्ञिरे ॥९८ ॥ शमन्यस्तं देवदूप्यं स्कंधे वृषभवीरयोः। संवत्सरं सातिरेक अनीतिवाळे स्थळे वास न करवो १, निरंतर काउसग्गध्याने उमा रहेवू २, गृहस्थनो विनय न करवो ३, मौनपणे रहे, ४ अने हाथमा लइने ज भोजन करवू ५ (९१) भा पांच अभिग्रह करीने घमानिधि एवा प्रभुए आर्य ने अनार्य देशोमा विहार कर्यो. (९२) ए रीते वृषभदेव, नेमिनाथ ने पार्श्वजिनेश्वरे पण मार्य भने अनार्य देशोमा विहार कर्यो छे. पाकीना यीश प्रभु आर्यदेशमा ज विचर्या छे. (२३) २९ वर्ष ने ५॥ माम प्रमुए सर्वज्ञपर्यायवढे परिपूर्ण कर्या थे. (९४) एकंदर व्रतपर्याय ४२ वर्पनो थवाथी कुल ७२ वर्षतुं मायु वीरप्रभुनु पूर्ण छे. (९५) या कल्पसूत्रादिनो अभिप्राय छे. सम. बायोगमा तो साधिक ४२ वर्ष प्रतपर्याय ने साधिक ७२ वर्पनुं सर्वायु कहेलु छे. पम प्रधना तीर्थमा उत्कृष्ट वार्षिक तप, वीरप्रभुना तीर्थमा छमामी तप ने पाकीना २२ प्रमुना तार्थमा भटमासी तप करवामा पावतो हतो. (९६) प्रमादकाळ ऋपमप्रसनो एक महोरात्र, वीरप्रसनो अंतर्त भने पावीश प्रसनो पिलकुल नहीं. (९७) श्री वीरमसुने पणा भने पार्श्वप्रसने भम्प थया छ ने पारीश प्ररने रिलाल उपसर्गो थया ज नधी. (९८ ) शके स्थापलुं देषप्य ऋषभदेय तथा वीरप्रसने भीकाललोकप्रकाश । शेषाणां सर्वदा स्थितं ॥ ९९ ॥ अत्र श्रीजंबूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे श्रीवृषभ- देवस्य श्रीकल्पसूत्रे श्रीमहावीरस्य साधिकं वर्ष देवदूष्यस्थितिरुक्ता, श्रीसप्ततिशतस्थानकग्रंथे च-सक्को य लकमुलं सुरदूसं ठवइ सबंजिणखधे । वीरस्स वरिसमहियं सयावि सेसाण तस्स ठिई ॥१॥ इत्युक्तमिति ज्ञेयं. चंद्रप्रभाख्या शिविका बहुलो भैक्ष्यमादिमं । कोल्लाकसन्निवेशे- ऽदात् सालो ज्ञानतरुः प्रभोः ॥१०००॥ अष्टाद्यास्तद्भवे सिद्धा अर्हत्प्रथमभक्ष्यदाः। शेषास्तृतीये सेत्स्यति सिद्धाः केऽपि च तद्भवे ॥१॥ वासुपूज्यमल्लिनेमि-पार्श्ववीरजिनेश्वराः। प्रवव्रजुर्वयस्याये-ऽनुपात्तराज्य- संपदः ॥ २॥ प्रवबजुर्भुक्तराज्याः शेषा वयसि पश्चिमे । मंडलेशाः परे तेषु चक्रिणः शांतिकुंश्वराः॥३॥ अभोगफलकर्माणौ मल्लिनेमिजिने- श्वरौ । निरीयतुरनुदाही कृतोद्वाहाः परे जिनाः ॥ ४॥ सार्वभौमोऽभव- सर्व श्रीनाभेयजिनेश्वरः । इतो भवे तृतीयेऽन्ये जिनाः सर्वेऽपि पार्थिवाः सा तिरेक संवत्मर सुधी भने शेष तीर्थकरोने सर्वदा रहेलुं छे. (९९) श्री अंदीपप्रज्ञप्ति- सूत्रमा धीमपभदेवने अने श्रीकल्पसूत्रमा श्रीमहावीरने माधिक वर्ष देवघ्यनी स्थिति कही छ. श्री सप्ततिशतस्थानक ग्रंथमा तो-'शक लाखमून्यनुं देवम्य सर्व प्रसना स्कंधपर स्थापन कर के, ते वीरप्रमने एक वर्ष झालं रघु के अने वीजा सर्व प्रसने कायम रझुके.' एम कहेल के. दीपावसरे शिनिका चंद्रप्रमी नामनी अने प्रथम पार| कोलाकसभिवेशमा पहले फरापुं. ज्ञानवृक्ष साल नामर्नु जाण. (१०००) प्रभुने प्रथम मिचा आपनारमा प्रथमना भाठ तमने सिद्ध थया के पाकीना १६ प्रभुने पारणुं फरावनार केटलाक तद्भवे ने केटलाक श्रीजे मवे सिद्ध थया छे. (१) वासुपूज्य, मछिनाथ, नेमिनाथ, पार्थनाथ ने वीरप्रभु-ए पांच तीर्थकरोए राज्यसंपदा स्वीकार्या सिवाय प्रथमावस्था- मा ज प्रमज्या ग्रहण करी छे. (२) पाकीना १९ प्रभुए राज्य भोगवीने पत्रिम वयमा प्रमन्या प्रहण करी छे. तेमां पण १६ मंरलिक राजा हता प्रने शांति, कुंधु ने भर ए प्रण पक्रवर्ती पपा हता. (३) जेमने मोगफळकर्म नहोतुं एवा मलिनाथ ने नेमिनाथे विवाह का पिना पारित्र लाई भने माकीना २२ प्रमुए विवाह कर्या पछी लीधेल छे. (४) सर्ग १२ मो। (५२५) ॥५॥ श्रीपावोऽपि तच्चरित्रानुसारेण चन्यासीदिति दृश्यते. सुमतिनित्यभक्तन मल्लिपावों कृताष्टमौ । चतुर्थेन द्वादशान्ये कृतषष्ठाः प्रवत्रजुः ॥ ६ ॥ वासुपूज्यः शतैः पभि-मल्लिपार्यो त्रिभिः शतैः । एको वीरः सहस्रश्च चतुर्भिवृषभो नृणां ॥७॥ व्रतं भेजुः सहस्रेण सह शेषा वृषध्वजः । विनीतायां द्वारिकायां नेमिर्जन्मपुरेऽपरे ॥ ८॥ सिद्धार्थवन उद्याने प्रावाजीवृषभः प्रभुः । वने विहारगेहाख्ये वासुपूज्यो जिनेश्वरः ॥ ९॥ श्रीधर्मो वप्रकाभिख्ये विंशो नीलगुहाहये। श्रीपार्श्व पाश्रमपदे ज्ञातखंडेंतिमो जिनः ॥ १०॥ सहस्राम्रवणे शेषा-श्चतुभिर्मुष्टिभिस्तथा । नाभेयः कृतवान् लोचं मुष्टिभिः पंचभिः परे ॥ ११॥ मल्लिश्रेयांससुमति-नेमिपार्श्वजिनेश्वराः। पूर्वाहे जगृहु- दीक्षां पश्चिमा परे जिनाः ॥ १२॥ श्राद्येनाद्यपारणायां लब्धोऽन्दे- नैक्षवो रसः । परमान्नं द्वितीयेऽह्नि लेभे सर्वैः परैजिनः ॥१३॥ चाल्ये सुधाभुजः सर्वे शुद्धाहाराशिनो व्रते । श्रायः कल्पद्रुफलभुग- श्री नामेय जिनेश्वर (अपभदेव ) पाछला श्रीजे भये चक्रवर्ती हता; वीजा वधा सामान्य राजानो हवा. (५)' श्री पार्श्व प्रभु तेना चरित्र अनुसारे पाछले त्रीजे भवे चक्री हता.' सुमतिनाथे नित्यभक्तपणे, मल्लिनाथ ने पार्थनाये अहम करीने, पार प्रभुए चतुर्थ- भक्त करीने अने पाकीना ९ प्रमुए छह करीने दीवा लीधी हती. (६) वासुपूज्ये ६०. नी साथे, मशिनाथ ने पार्श्वनाथे ३०० नी साथे, वीरप्रसए एकला, अपमदेवे ४००० साधे भने पाकीना १९ प्रमुए हजार हजार मनुष्य साये दीक्षा लीधी हती. ऋषभदेवे विनी. तामा, नेमिनाथे द्वारिकामा भने पाकीना २२ प्रमुए जन्मवाळी नगरीमो ज दीधा लीधी. (७-८) रमप्रभुए सिद्धार्थवन उद्याना, वासुपूज्ये विहारगेह वनमा, धर्मनाथे वप्रक नामना वनमा, मुनिसुव्रते नीलगुहा नामना वनमां, पार्श्वनाथे पाश्रमपद वनमा, पीरप्रमुए प्रातखंडवनमा अने पाकीना १८ प्रभुए सहमान बना चारित्र ग्रहण कयु. तथा ऋ. पमदेवे चारमुष्टि लोच कर्यो भने वीजा पघा प्रमुए पंचमुष्टि लोच को. (९-१०-११० मनिनाथ, श्रेयांमनाथ, सुमतिनाप, नेमिनाथ अने पार्श्वनापे पूर्वाहे दीपा लीधी भने पीजा १९ प्रभुए पश्चिमाहे लीधी. (१२) माघ प्रमुने भाष पारणं एक पर्षे - ना रमधी भने पाकीना पधा प्रसए दीवाने बीजेज दिवमे परमाभाडे पार' क. (१३) पाळकाळमा सर्वे प्रभु अंगुठावडे अमृतमोजी, ग्रत लीघा पक्षी सर्वे शुद्ध भादारना (५२६॥ भीकाललोकप्रकारा। गार्हस्थ्येऽन्येऽन्नभोजिनः ॥ १४॥ विनीतायाः पुरः शाखा-पुरे पुरि- मतालके । उद्याने शकटमुखे वृषभः प्राप केवलं ॥ १५ ॥ बहिः श्रीभिकाग्रामा-दुपर्जुवालिकातटं । केवलं प्राप वीरोऽन्ये स्वस्वदीक्षा- वनेषु च ॥ १६ ॥ श्रीपार्श्वनेमिनाभेय-मल्लीनामष्टमस्पृशां । केवलं वासुपूज्यस्य चतुर्थभक्तशालिनः ॥ १७ ॥ शेषाणां कृतषष्ठाना--मुत्पन्नं सन्नकल्मषं । सर्वेषामपि पूर्वाह्ने पश्चिमातिमप्रभोः ॥ १८ ॥ श्राये समवसरणे सर्वेपामर्हतामिह । उत्पन्नं तीर्थमंत्यस्य जिनेंद्रस्य द्वितीयके ॥ १९ ॥ यावदुत्पद्यते तीर्थ-मग्रिमस्य जिनेशितुः । तावत्पूर्वस्य पूर्वस्य भवेत्ती- र्थमखंडितं ॥ २०॥ अस्यामवसर्पिण्यां तु-श्राद्यासुविधिपर्यंत शांते- श्चात्यजिनावधि । अष्टस्वष्टस्वंतरेषु तीर्थमासीन्निरंतरं ॥ २१ ॥ मध्ये सप्तस्वंतरेषु नवमात्योडशावधि । यावत्कालमभूत्तीर्थ-विच्छेदः स निरूप्यते ॥ २२ ॥ पुष्पदंतशीतलयोः शीतलश्रेयसोरपि । एकैकः पल्य- भोजी ने गृहस्थपणामा भाद्य प्रभु कल्पवृक्षना फळना भोगी; वीजा बधा प्रभु अनमोजी जाणवा. (१४ ) विनीता नगरीना पुरिमताल नामना शाखापुरमा शकटमुख नामना उद्यानमा पमप्रभु केवळज्ञान पाम्या, (१५) वीरप्रभु जृमिका गामनी बहार ऋजु- वालिका नदीना तट उपर फेवळज्ञान पाम्या अने वीजा पधा प्रभु पोतपोताना दीवा- चनमा केवळज्ञान पाम्या. (१६) श्रीपार्श्वनाथ, नेमिनाप, ऋषभदेव ने मल्लिनाथने अहम तपवडे केवलज्ञान थयुं, वासु- पूज्यने चतुर्थभक्तवडे केवळज्ञान उत्पन्न थयु (१७) भने याकीना १९ प्रभुने छछ तप कर्ये सते पापनो नाश करनार केवळज्ञान थयु. श्रीवीरप्रभुने पश्चिमा फेवळज्ञान भयं मने चीजा यधा प्रभुने पूर्वाधे थयु. (१८) यधा भरिहंतोना तीर्थनी स्थापना प्रथम सम- वसरणे थइ, भत्य प्रभुनी वीजा समयसरणमा थ६. (१९) ज्यांसुधीमा पीजा प्रभुनुं वीर्थ प्रवर्ते त्यांसुधी पूर्व पूर्व प्रपन शासन अखंडपणे प्रवां करे; (२०) परंतु भा अवसर्पिणीमा तो पहेलाथी सुविधिनाथसुधी ने शांतिनाथथी अत्य जिन वीरप्रवसुधी पाठ आठ भांतरामा भविच्छिमपणे तीर्थ प्रवत्र्य. (२१) मध्यना नवमाथी सोळमासुधीना सात भातरामा जेटलो काळ तीर्थ विच्छेद पाम्यं ते कहीए छीए-(२२) 'पुष्पदंत (सुविधिनाय ) ने शीतळनाथना भने शीळनाथ ने धेयांसनाथनामांतरामा पापा पम्योपम वीर्य-म्युच्छेद .

सर्ग १२ मो (५२७) तुर्याश-स्तीर्थमत्रुट्यदंतरे ॥ २३ ॥ त्रयः पल्यचतुर्थांशाः श्रेयांसवासुपः ज्ययोः । वासुपूज्यविमलयो-स्तुर्यः पल्योपमांशकः ॥ २४ ॥ त्रयः पल्यस्य तुर्याशा विमलानंतयोरपि । एकः पल्यचतुर्थांशो मध्ये चानंत. धर्मयोः ॥ २५ ॥ एकः पल्यस्य तुर्यांशो धर्मशांत्योः किलांतरे । केचि. स्पल्योपमान्याहुः पल्यतुर्याशकास्पदे ॥ २६ ॥ तथाहुः सप्ततिशतस्थानके-- इगइगतिगेगतिगइग इगं सइइगारपलिअचउभागे । वितन्ने इथ पलिए सुविहाइसु सत्ततिस्थंते ॥ २७ ॥ दुप्पमारकपर्यंत तीर्थ वीरजि- नेशितुः । प्रवर्ततेऽज्यवच्छिन्नं छिन्नजन्मजरामयं ॥ २८ ॥ द्वाविंशति- सहस्राब्द-न्यूनैकपूर्वलक्षयुक् । तीथं वीरस्याब्धिकोटा-कोटी नाभेय- तीर्थतः ॥ २९ ॥ कालमानमिदं चादि-जिनतीर्थप्रवृत्तितः । श्रीवीरती- र्थपर्यंतं यावद् ज्ञेयं विचक्षणैः ॥ ३० ॥ उपसर्गा १ स्तथा गर्भा-पहारो २ ऽभाविता सभा ३ । चमरोत्प. तनं ४ चंद्र-सूर्यावतरणं ५ तथा ॥ ३१॥ हरेरमरकंकायां गमनं ६ रहो, (२३) श्रेयांम ने वासुपूज्यना भांतरामा पोj पन्योपम, वासुपूज्य ने विमळनाथना भीतरामा पा पन्योपम, (२४) विमळनाथ ने अनंतनाथना अंतरमा पोj पन्योपम, अनंतनाथ ने धर्मनाथना मांतरामा पा पन्योपम ने धर्मनाथ ने शांतिनाथना मांतरामा पा पन्योपम' नहीं फेटलाफ पन्योपमना चोथा मागने पदले मासु पन्योपम कहे छे. (२५-२६) श्री सप्ततिस्थानमा कपुंछ के-एक, एक, ग्रण, एक, प्रण, एक ने एक-मा प्रमाणे कुल ग्यार पन्योपमना चोथा माग ( २॥ पन्योपम ) जाणवा. अन्य मविधि विगैरे सात तीर्थकरोना भोतरामा पन्योपम पन्योपम कहे छे. (२७) खेदी नाख्या के जन्म, जरा ने मरण जेणे एवं वीरप्रसनुं शामन पांचमा दुप्पमारकना प्रांत सुषी अव्य. वच्छिन्नपणे प्रवर्वशे. (२८) श्रीमपमदेवना तीर्थ पछी वीरप्रभुन वीर्य पावीश हजार वर्षे न्यून भने एक लाख पूरे अधिक एक कोटाकोटी सागरोपमे प्रवर्यः (२९) मा कारमान मादिजिने ती प्रवर्ताप्पु त्याथी ( एटले एक हजार वर्षे न्यून एक लास वर्षनुं सेम, भायुप्य पाकी हतं त्यारे प्रवर्गव्युं त्यांधी) वीर प्रभुन तीर्थ प्रवयं त्या मुषी विषपणोए समज. (३०) मा भय सर्पिणीमा दश भाषर्य (भोर) थयो ते भा प्रमाणे-१ केवळचान थया पी उपसर्ग, २ गर्भापार, ३ प्रभावित पर्षदा, ४ चमरेंद्रनो उत्पात, ५ चंद्रमूर्य, मूळ- .

(५२८) मीकाललोकप्रकाश। स्त्रीजिनेश्वरः ७। हरिवंशकुलोत्पत्ति -पर्चा चासंयतात्मनां ९ ॥ ३२ ॥ साष्टकशतस्य सिद्धि-ज्येष्ठावगाहनावतां १० । अनंतकालभावीनि दशाश्चर्याण्यमून्यहो ॥ ३३ ॥ श्राद्यानि पंचाश्चर्याणि तीर्थत्यस्यापराणि तु । नेमिमल्लिशीतलश्री-सुविधिप्रथमाहतां ॥ ३४ ॥ नाभेयोऽष्टापदे वीरो-ऽपापायां पुरि निर्वृतः । वासुपूज्यश्च चंपायां नेमी रैवतकाचले ॥३५॥ अन्ये संमेतशिखरे पर्यकासनसंस्थिताः।श्रीनेमि- वीरवृषभाः कायोत्सर्गासनाः परे ॥३६॥श्राद्यः षभिरुपवास-भ्यिां वीरः शिवं गतः। शेषा मासक्षपणेन तपसा नितिं ययुः। ३७॥ श्रायः सहस्त्रै दशभिः पड्भिस्तैर्विमलो जिनः । अनंतजित्सप्तभिस्तैः श्रीशांतिनवभिः शतैः ॥३८॥ सप्तमैकोनविंशौ च पंचभिः पंचभिः शतैः । सिद्धः पद्मप्रभः सार्द्ध त्रिभिरष्टोत्तरैः शतैः ॥ ३९ ॥ नेमिः पत्रिंशदधिकैः साधूनां पंचभिः शतैः । षभिः शतैर्वासुपूज्यो धर्मः साष्टशतेन च ॥ ४० ॥ त्रयस्त्रिंशत्साधुयुक्तः पार्श्वनाथः शिवं ययौ। एकाकी चरमः स्वामी .विमाने अवतरण, ६ वासुदेवनुं अमरकंका जर्बु, ७ स्त्रीतीर्थकर, ८ हरिवंशकुलोत्पत्ति, ९ भसंपतिनी पूजा भने १० ज्येष्ठ अवगाहनावाळा १०८ नी एक समये सिद्धि. भावा भावों अनंते काळे थाय छे. (३१-३३) श्रा दश आश्चर्यमा प्रथमना पांच माश्चर्य वीरप्रभुना तीर्थमा, बाकीना पांचाथी नेमिनाथ, मल्लिनाथ, शावळनाथ, सुविधिनाथ ने ऋपभप्रभुना तीर्थमा एकेक समजवू. (३४) अपमप्रभु प्रयापदे, वीरप्रभु अपापालगरीए, वासुपूज्य चंपानगरीए अने, नेमिनाथ रैवताच सिद्धिपद पाम्या (३५) भने याकीना २० प्रभु समेतशिखरे सिद्विपदनै पाम्या. श्रीनेमिनाथ, वीरप्रभु ने ऋपमदेव पर्यकासने भने चाकीना २१ प्रभु कायोत्सर्गा- सने सिद्धिपदने पाम्या छे. (३६) ऋषभदेव छ उपवासे ने वीरप्रभु ये उपवासे मोघे गया, पाकीना २२ प्रभु मासषपणना तपपडे नितिपदने पाम्या. (३७) अपमदेव दश हजारसाये, विमनाथ छ हजारसाथे, अनंतनाथ सात हजारसाथे, शांतिनाथ ९.. नी साथे, सातमा सुपार्श्वनाथ ने भोगणीशमा मलिनाथ पांचशे पाचशेनी साथे, पबमा ३०८ नी साथे, नेमिनाथ ५३६ नी साथे, वासपूज्य छर्शनी साधे, धर्मनाथ १०८ बी साणे, पार्थनाय ३३ साधुनी सापे, पीरमा एकला ने पाकीना १२ प्र हजार , .. सर्ग ३२ मो। (५२९) सहस्रेणान्विताः परे ॥४१॥ अष्टात्रिंशत्संहस्राणि पंचाशीतिसमन्विता'। चतुःशती जिनैः सार्द्ध निर्वृताः सर्वसंख्यया ॥.४२ ॥. तृतीयपष्ठनवम- द्वादशा अपराह्नके । शेषाः श्रेयांसपर्यंताः पूर्वाह्ने वृषभादयः ॥ १३ ॥ धर्मारनमिवीराश्चा-परराने शिवं गताः । शेषास्तु पूर्वरात्रेऽष्टौ सिद्धाः श्रीविमलादयः॥४४ ॥ इंद्रभूतिरग्निभूति-र्वायुभूतिरमी त्रयः । सहोदरास्तथा व्यक्त- सुधर्माणौ द्विजोत्तमौ ॥ ४५ ॥ षष्ठो मंडितपुत्राख्यो मौर्यपुत्रश्च सप्तमः । अकंपितोऽचलभ्राता मेतार्यश्च प्रभासकः ॥४६॥ श्रमी गणधरा एका-दश श्रीचरमप्रभोः । अथैषां परिवारादि-स्वरूपं किंचि. दुच्यते ॥ ४७ ॥ वसुभूतिसुताः पृथ्वी-कुतिजाः प्रथमे त्रयः । पंचशिष्यशतोपेता गौर्बरग्रामवासिनः ( वेदवेदांगपारगाः) ॥४८ ॥ कोल्लाकाख्यसन्निवेश-वास्तव्यौ तुर्यपंचमौ । वारुणीमातृकस्तत्र । तुरी- यो धनमित्रभूः ॥ १९ ॥ पंचमो भद्दिलाकुक्षि-रत्नं धम्मिलनंदनः । उ- हजार मुनियोनी साथे मोक्षे गया छे. ( ३८-४१) सर्व संख्याए ३८४८५ मुनिश्री २४ प्रमुनी साथे मोक्षे गया छे. (४२) त्रीजा, बट्टा, नवमा ने बारमा-ए चार प्रभु अपराले भने बाकीना अपमदेवथी श्रेयांसनाथसुधीना ८ (१-२-४-५-७-८-१०-११ मा) पूर्वाहे, धर्मनाथ, भरनाथ, नमिनाथ ने वीरप्रभु पाछली रात्रे मोले गया के ने पाकीना पाठ (१३-१४-१६-१७-१९-२०-२२-२३ मा) प्रभु श्रीविमळनाथ विगेरे पूर्व रात्रिए मोहे गया छे. (४३-४४ ) वीरप्रभु गणधरवर्णन-इंद्रभूति, मग्निभूति, वायुभूति, (आत्रण सहोदर) तथा सुधर्मा (पा ये द्विजोत्तम ), छठा मंडितपुत्र, सातमा मौर्यपुत्र, अपित, भचळ- आता, मेतार्य ने प्रमास-मा अगियार श्रीचरम प्रभुना गणधरो जाणवा. ए गणघरोना परिवारादिनुं स्वरूप कांइक कहे छे. (४५-४७) प्रथमना प्रण चसुभूतिना पुत्र, पृथ्वीनी कुषिधी थयेला, गौर गामना रहेनारा, पांच सोपांच सोशिष्योना परिवारवाळा, (वेद-वेदांगना पारगामी) हता. (४८) चोथा ने पांचमा कोलाकसभिवेशना रहेनारा हता, तेमा चोथा धनमित्र पिता ने वारुणी माताना पुत्र अने पाचमा धम्मिलना नंदन भदिलानी कृषिथी थयेला हता. ए पंने पांच सो पांच सो शिप्योयी सेवा कराता हता. ध्यक्त (५३०) श्रीकाललोकप्रकाश। पास्यमानौ दावेनौ शिष्याणां पंचभिः शतैः ॥ ५० ॥ तथा मौर्यसन्निवेश- वासिनी षष्ठसप्तमौ । धनदेवसुतः षष्ठः सप्तमो मौर्यनंदनः ॥ ५१ ॥ विजयातनुजौ सार्द्ध-शतत्रयपरिच्छदौ । देशाचारादविरुद्धा पृथपि तृकता तयोः ॥ ५२ ॥ तत्र देशे कुले ह्यास्मिन् मृते भर्तरि योपिता । प्राचीर्णत्वादविरुद्धो धांतरपरिग्रहः ॥५३।। जयंतीतनुजो देव-नंदनोऽ- कंपिताहयः । मिथिलापुरवास्तव्यः शतत्रयपरिच्छदः ॥ ५४ ॥ नवमो कोशलावासी नंदाभूर्वसुवप्तकः । तुंगिकाख्यसन्निवेश-वास्तव्यो दशमो गणी ॥ ५५ ॥ स दत्तपुत्रो वरुण-देवागर्भसमुद्भवः । एकादशो राजगृह- वासी द्विजकुलध्वजः ॥ ५६ ॥ सोऽतिभद्राकुक्षिरत्नं सर्वेऽपि नवमादयः । उपासिता व्यक्तभक्ति-सक्तैः शिष्यशतैस्त्रिभिः॥ ५७ ॥ ज्येष्ठा १ च कृत्तिका २ स्वातिः ३ श्रुति ४ रर्यमदैवतं ५। मघा ६ ब्राम्यु ७ तरा- पाढा ८ मार्गा ९ श्विन्यौ १० च पुष्यभं ११॥५८॥ एकादशानां जन्म - .ण्येतानि गणधारिणां । गृहस्थत्वादिपर्याय-परिमाणमथ ब्रुवे ॥ ५९ ॥ गार्हस्थ्येऽब्दानि पंचाशत् छाास्थ्ये त्रिंशदेव च । सर्वज्ञत्वे द्वादश द्वा- (४९-५०) छठा ने सातमा मौर्यसन्निवेशना रहेनारा हता. तेमा छठा धनदेवना पुत्र ने सातमा मौर्गना पुत्र हता. ते चनेनी माता विजया हती अने तेमने साडात्रणसो साडात्रणसो शिष्योनो परिवार हतो. तेमनुं जुदा जुदा पितापणुं त्यांना देशाचारथी अविरुद्ध हतुं. (५१-५२) ते देशमां ने ते कुळमां भर्तार मरण पामे सते स्त्री बीजा भरिने ग्रहण करी शकती होवाथी ते प्राचीर्ण होवाने लीधे अविरुद्ध छे. (५३) आठमा अपित देव नामना पिवाना ने जयंती माताना पुत्र मिथिलापुरमा रहेनार त्रणशेंना परिवारवाळा हता. (५४) नवमा कोशलावासी ने नंदामाता ने वसुपिताना पुत्र हता. दशमा तुंचिका नामना सनिवेशमा रहेनार, दत्तपिताना पुत्र, वरुणादेवीना गर्भथी उत्पन्न थयेल हता. अग्यारमा राजगृहवासी द्विजकुळमां बजसमान (चलना ने) अतिभद्राना पुत्र हता. नवमा, दर्शमा ने अम्मारमा प्रगटपणे मक्तिमा आसक्त एवा व्रण सो त्रण सो शिष्योथी सेवा कराता हता. (५५-५७) ज्येष्ठा १, कृत्तिका २, स्वाति ३, श्रवण ४, उत्तराफाल्गुनी ५, मघा ६, रोहिणी ७, उत्तरापाढा ८, मृगशीर्ष ९, अश्विनी १० अने पुष्य ११-अग्यार गणधरना ए जन्म नक्षत्र जाणवा. हवे तेना गृहस्थत्वादिपर्यायर्नु प्रमाण अने सर्वायु कहीए बीए. (५८-५९) पहेला गणधरनु गृहस्थपणामा ५० वर्ष, छद्मस्थपण्यामा ३० वर्ष भने - मर्ग १२ मो। नवतिश्चायुरादिमे ॥६०॥ अग्निभूतौ च षट्चत्वारिंशद् द्वादश षोडश।' गार्हस्थ्यादिपु सर्वायुः स्युश्चतुःसप्ततिः समाः ॥६१॥ वायुभूतौ' द्विच- त्वारिं-शदशाष्टादशापि च । गृहस्थत्वादिभावेषु सर्वायुः सप्ततिः समाः ।। ६२॥ व्यक्तस्वामिनि पंचाशद् द्वादशाष्टादशापि च । त्रिषु भावेषु. सर्वायु-रशीतिः शरदः स्मृताः ॥ ६३ ॥ पंचाशच्च द्विचत्वारिं-शदष्टौ शरदः क्रमात् । सुधर्मस्वामिनो गाई-स्थ्यादिष्वायुश्च तच्छतं ॥ ६४ ॥ संवत्सरास्त्रिपंचाश-चतुर्दश च पोडश । गार्हस्थ्यादिषु षष्ठस्य व्यशीतिर- खिलं जनुः ॥६५॥ मौर्यस्याब्दाः पंचपष्टि-श्चर्तुदश च षोडश । गहि- त्वादिपुभावेषु शतं पंचोनमन्वितं ॥६६॥ अकंपितस्याप्टचत्वारिंशन्नवैक- विंशतिः । गृहित्वादिपु वर्षाणि सर्वायुरष्टसप्ततिः ॥ ६७॥ नवमस्य पट्- चत्वारिं-शद् द्वादश चतुर्दश । त्रिपु भावेषु वर्षाणि सर्वमायुविसप्ततिः ॥६८ ॥ मेतार्यस्य च षट्त्रिंश-दश पोडश वत्सराः।पर्यायेपु त्रिषु प्रोक्तं द्वापष्टिः सर्वजीवितं ॥ ६९ ॥ प्रभासस्य पोडशाप्टौ क्रमात् पोडश वत्सराः । पर्यायेपु त्रिवशेष चत्वारिंशच जीवितं ॥ ७० ॥ सिद्धा चार वर्ष सर्वज्ञपणामां कुल ९२ वर्षतुं आयुष्य हत. (६०) अग्निभूतिनुं ४६ वर्ष गृहस्थ- पणामां, पारवर्ष छमस्थपणामां ने १६ वर्ष सर्वज्ञपणामा कुल ७४ वर्षतुं भायुष्य हतुं. (६१ ) वायुभूतिर्नु ४२-१० ने. १८ एम गृहस्थत्वादिभावने विपे वर्ततां कुल ७० वर्षतुं भायु इतुं. (६२) व्यक्तस्वामीनु ५०, १२ ने १८ वर्ष त्रणे भावमा वर्ततां कुल ८० वर्षतुं श्रायु हतुं. (६३ ) सुधर्मास्वामीन ५०-४२-८ वर्ष गृहस्थत्वादिभावमा वर्तता कुल १०० वर्षनुं भायु इतुं. (६४) छठा मंडितपुत्रनुं ५३-१४ ने १६ वर्ष गृहस्थादि- भावमा वर्ततां कुल ८३ वर्षतुं मायु हतुं. (६५) मौर्यपुत्रनुं ६५-१४ ने १६ वर्ष गृहस्थादिभावमा वर्तत कुल ९५ वर्ष- भायु हतुं. (६६) अकंपितर्नु ४८-९ ने २१ वर्ष गृहस्थादिगावमा वर्ततां कुल ७८ वर्षतुं श्रायु हतं. (६७) नवमा अचळभ्रातार्नु ४६-१२ ने १४ वर्ष गृहस्थादिभावमा वर्वतां कुल ७२ वर्षतुं आयु हतुं. (६८) मेवार्यतुं ३६-१० ने १६ वर्ष गृहस्थादि प्रणे भावमा वर्तयां कुल ६२ वर्षतुं श्रायु हतं. (६९) प्रभासद् १६-८ ने १६ वर्ष गृहस्थादि प्रणे पर्यायमा वर्ततां कुल ४० वर्षy भायु हतं. (७०) ए अग्यारे गणधरो राजगृहीपासे वैमारगिरि उपर एक मासन (५३२) भीकाललोकप्रकाश । एकादशाप्येते गिरी वैभारनामनि । विहितानशना मासं पुरे राजगृहा- ऽभिधे ॥ ७१ ॥ नव सिद्धिं गता वीरे नाथे जीवत्यथादिमः । सिद्धे प्रभौ द्वादशभि-विशत्यान्दैश्च पंचमः ॥ ७२ ॥ सुधर्मस्वामिनः शिष्यः प्रशिष्यस्त्रिशलाभुवः । चरमः केवली जंबू-स्वामी चामीकरच्छविः ॥७३॥ स राजगृहवास्तव्य ऋषभदत्तनंदनः । धारणीकुचिसंभूत प्राजन्म ब्रह्म- चार्यभूत् ॥ ७४ ॥ पोडशाव्दानि गार्हस्थ्यं छद्मस्थत्वं च विंशति । सर्व- ज्ञत्वं चतुश्चत्वा-रिंशतं पर्यपालयत् ॥ ७५ ॥ वर्षाण्यशीति सर्वायुः परिपूर्यातिमप्रभौ । शिवं गते चतुःषष्ट्या वर्षभैजे शिवश्रियं ॥ ७६ ॥ अत्र च-अकंपिताचलनात्रो-यन्मेतार्यप्रभासयोः । एकाभूदाचना तस्मा- द्वीरनेतुर्गणा नव ॥ ७७ ॥ एकवाचनिकः साधु-समुदायो भवेद्गणः । तेऽन्येपामर्हता ज्ञेया गणभृत्संख्यया समाः ॥७८॥ समुञ्चिता गणा- धीशाः सर्वेपामर्हता समे । स्युद्विपंचाशदधिका-श्वतुर्दश शता इह ॥७९॥ श्रीवीरस्वामिनः साधु-सहस्राणि चतुर्दश । षट्त्रिंशच सहस्राणि अनशन करीने सिद्धिपदने पाम्या छे. (७१) एमाथी नव वीरप्रभुनी हयातिमा सिद्धिस्थानने पाम्या थे. प्रथम गणधर प्रभुना निर्वाण पछी १२ वर्षे ने पांचमा सुधर्म गणधर प्रभुना निर्वाण पछी २० वर्षे सिद्धिपदने पाम्या छे. (७२) त्रिशलामाताना पुत्र वीरप्रभुना प्रशिष्य भने सुधर्मास्वामीना मुख्य शिष्य जंबूस्वामी सुवर्णसरखी कातिवाळा ते छल्ला केवळी थया छे. (७३) तेओ राजगृहीना रहेनारा ऋपमदत्तना पुत्र धारिणीनी कुतिथी थयेला हता ने जन्मधीज ब्रह्मचारी रह्या हता. (७४) तेश्रो गृहस्थपणामा १६ वर्ष, छद्मस्थपणामा २० वर्ष ने सर्वज्ञपणाम ४४ वर्ष रहेवाथी कुल ८० वर्षनुं श्रायु परिपूर्ण करीने अंतिम प्रभु सिद्ध धया पछी ६४ वर्षे सिद्धिपदने पाग्या छे. (७५-७६) मा ११ गणधरमा अपित ने अचळभ्रातानी म ज मेतार्य ने प्रमासनी एक वाचना होषाथी वीरप्रमुना गण नव थया छे. (७७) एक चाचनाचाळा साधुना समुदायने गण कहेवाय छे. वीजा पधा प्रभुना गणधरनी संख्या जेटला जगण थया छे. (७८) सर्व अरिहंतना सर्व गणधरोनी संख्या एकत्र करीए तो १४५२ नी थाय छे (७९) भीवीरप्रभुना परिवारमा १४००० साधु ने ३६००० महात्मा एवी साध्वीश्रो सर्ग ३२ मो. संयतीनां महात्मनां ॥ ८० ॥ इदं किल चतुरशीतिसहस्रादिकमृषभा- दीनां तीर्थकृतां श्रमणपरिमाणं प्रधानसूत्रविरचनसमर्थान् श्रमणानधि- कृत्य वेदितव्यं, इतरथा पुनः सामान्यश्रमणाः प्रभूततरा अपि तस्मिन् तस्मिन् ऋषभादिके आसीरन् इति नंदीवृत्तौ, गच्छाचारवृत्तौ च. श्राद्धानां लक्षमेकोन-षष्ट्या युक्तं सहस्रकैः । लक्षत्रयं श्राविकाणा-मष्टा- दशसहस्त्रयुक् ॥ ८१॥ सर्वज्ञानां शताः सप्त पंच मानसवेदिनां । सहस्रमेकमवधि-ज्ञानिना त्रिशतान्वितं ॥ ८२ ॥ वैक्रियाणां शताः सप्त सच्चतुर्दशपूर्विां। त्रयः शता वादिवर-मुनीनां च चतु:शती ।। ८३ ॥ सर्वेऽष्टाविंशतिर्लक्षाः सर्वेषां साधवोऽहतां । अष्टाचत्वारिंशता च सहस्रैरधिकाः स्मृताः ॥ ८१ ॥ संयतीनां चतुश्चत्वारिंशल्लक्षाः सहस्त्रकाः । पट्चत्वारिंशदेवाथ पटसंयुक्ता चतुःशती ॥ ८५ ॥ लक्षाणि पंचपंचाशत् श्रावकाणां गुणोकसां । सहस्रष्टचत्वारिं-शतोपेतानि नि- श्चितं ॥ ८६ ॥ एका कोटी पंच लक्षा-ण्यष्टात्रिंशत्सहस्रकाः सर्वानं श्राविकाणां च सर्वेषामहतामिह ॥ ८७ ॥ षट्सप्ततिसहस्राट्यं लक्षमेकं शताधिकं । सर्वेषामहतामुक्तं सर्वाग्रं सर्ववेदिनां ॥ ८८ ॥ लक्षमेकं तथा जाणवी. (८०) नहीं ८४००० विगैरे अपमादि तीर्थकरोना श्रमणतुं परिमाण कहेलु छे ते प्रधानसूत्र रचवामा समर्थ श्रमणोने भाश्रीने जाणवू. ते विना सामान्य साधुभो घणी मोटी संख्यामां ते ते अपमादिक प्रभुना परिवारमा थया हता, एम. श्री. नंदीममनी पृत्तिमा तथा गच्छाचारनी धृत्तिमा कहेलु के श्री वीरप्रभुना पायको १५९००० ने श्राविकाओ ३१८०००, (८१) केवळनानीमो ७००, मनापर्पयज्ञानी ५००, अवधिशानी १३००, ( ८२ ) बैंक्रियलम्पियाला ७००, चौदपूर्वी ३०० भने वादि मुनिमो ४०० हता. (८३) चोवीशे प्रभुना मळीने साधु महाधीश लाग ने ४८ हजार भने साधीभो ४४ लाख ४६ हजार चार सो ने छ पाय थे (८४.८५) गुणवढे श्रेष्ठ भावको ५५ लाए ने ४८ हजार ने याचिकामी १०५३८००० पाय छ. (८६-८७) सर्व प्रमुना केवळमानीनी संख्या १७६१००नी कहेली छे (८८) भने मनःपर्यवज्ञानीनी संख्या १४५५९१ नी .. (५३४) भीकानलोकप्रकारा। पंच-चत्वारिंशत्सहस्रकाः। शताःपंचैकनवति-युक्ता मानसवे दिनां ॥९॥ लक्षमेकं त्रयस्त्रिंश-त्सहस्राः सचतुःशताः। उक्ता जिनानां सर्वेषा-मवधि- ज्ञानशालिनः ॥ ९० ॥ त्रयस्त्रिंशत्सहस्राणि शतानि नव चोपरि । थष्टा- नवत्युपेतानि स्युश्चतुर्दशपूर्विणः ॥ ९९ ॥ लक्षद्वयं तथा पंच-चत्वारिंश- सहस्रकाः । श्रष्टाढये वे शते सर्वे लसवैक्रियलब्धयः ॥ ९२ ॥ पति शतिः सहस्राणि लक्षमेकं शतद्वयं । वादिनो मुनयः सर्वे भवत्येवं समु- चिताः ॥ ९३ ॥ उक्ता विशेषमुनयो येऽमी गणधरादयः । तैर्वर्जिताः सर्वसाधु-संख्याः पूर्वनिरूपिताः ॥ ९४ ॥ सामान्यमुनिसंख्याः स्युः सर्वेषामर्हतामिह । यथायोगं भावनीयास्ताः सर्वास्तात्विकैः स्वयं ॥१५॥ एकोनविंशतिर्लक्षाः षडशीतिः सहस्रकाः। एकपंचाशदधिकाः सामान्य- मुनियोऽखिलाः ॥ ९६ ॥ तथोक्तं-गणहर १ केवलि २ मण ३ मोहि ४ पुब्धि ५ वेउब्धि ६ वाइ७मुणिसंखं ।मुणिसंखाए सोहिय नेया सामन्न- मुंणिसंखा ॥ ९७॥ द्वाविंशतिः सहस्राणि तथा नव शतानि च । वृषभस्यानुत्तरौप- पातिका मुनयो मताः ॥९८॥ श्रीनेमिपाचवीराणां षोडश द्वादशाष्ट च। कहेली छे. (८९) अवधिज्ञानीमोनी संख्या १३३४०० नी कहेली छे. (९०) ३३९९८ नी संख्या चौदपूर्वीनी कहेली छे. (९१) वैफियलब्धिवाळानी संख्या २४५२०८ नी कही छे. (९२) अने वादी मुनियोनी संख्या १२६२०० नी कही छे-पा प्रमाणे एकत्र संख्या थाय छे. (९३) जे महीं गणधरादिक विशेष मुनियोनी संख्या (८६१९४९) कही छे तेने पूर्वे कहेली सर्व साधुओनी ( २८४८०००) संख्मामाथी बाद करवाथी जे संख्या भावे ते सर्व तीर्थकरोना सामान्य साधुनोनी संख्या थाय छे ते यथायोग्य रीते प्रत्येक तीर्थकरोमां पण तात्विकोए पोतानी मेळे जाणी लेवी. (९४-९५) मा प्रमाणे करता सामान्य मुनिश्रीनी संख्या १९ लाख छाशी हजार ने एकावननी थाय थे.(९६) ते विषे कह्यु छ के-गणधर, केळी, मनापर्यवज्ञानी, अवधिज्ञानी, चौदपूर्वी, वैक्रियल- न्धिवाळा अने वादियोरूप विशिष्ट मुनिओनी ( आठ लाख एकसठ हजार नव सो ने ४९ नी) संख्याने कुल मुनिसंख्यामाथी बाद करतां सामान्य मुनिमोनी संख्या थाय छे. (पने मळीने २८४८०००) थाय छे. (९७) श्री वृषभूदेवना अनुत्तरोपपातिक मुनियोनी संख्या २२९०० नी कही छे. (९८) श्री नेमि, पार्श्व ने वीरप्रभुनी अनुक्रमे १६००, १२०० ने ८०० नी संख्या कही छे. - सर्ग ३२ मो। (५३५) क्रमाच्छतास्ते शेषाणां न ज्ञायतेऽधुनाहतां ॥ ९९ ॥ येषां जिनानां यावंतः शिष्यास्तै रचितानि च । प्रकीर्णकानि तावंति तेषामित्युदितं श्रुते ॥ ११०० ॥ तावंत एव प्रत्येक बुद्धा अपि निरूपिताः । प्रकीर्ण- कानां मोऽथ स्वरूपं किंचिदागमात् ॥ १॥ अहंदुक्तानुसारेण श्रमणा यन्महाधियः । रचयंतीह तत्सर्व शास्त्रं ज्ञेयं प्रकीर्णकं ॥ २॥ उत्कालि- कमंगबाह्यं दशवैकालिकादिकं । अंगबाह्यं कालिकं य-चोत्तराध्ययनादिक ॥३॥ प्रकीर्णकानि सर्वाणि तानि ज्ञेयानि धीधनैः । प्रत्येकवुद्धैरन्यैर्वा रचितानि महात्मभिः ॥४॥ अत्र च मतत्रयं-श्रीऋषभादिजिनानां चतुरशीतिसहस्रादिप्रमाणैः स्वस्वशिष्य रचितानि तावत्संख्याकान्येव प्रकीर्णकानीति केचित् । ऋप- भादिजिनानां स्वस्वतीर्थभाविभिश्चतुर्विधवुद्धथुपेतैरपरिमितेः साधुभिर्विर- चितानि अपरिमितान्येव प्रकीर्णकानीत्यन्ये, पभादिजिनानां स्वस्वती- र्थभाविभिरपरिमितः प्रत्येकवुद्धविरचितानि अपरिमितान्येव प्रकीर्ण- कानीत्यपरे, इत्याद्यर्थतो नंदीसूत्रवृत्तितोऽवसेयं, गच्छाचारवृत्तिर्वा विलोकनीयेति. बाकीना २० प्रसुनी अनुत्तरोपपातिकनी संख्या अधुना जाणवामां नथी. (९९) जे प्रभुना जेटला शिष्यो होय तेमना रचेला वेटला प्रकीर्णको होय एम श्रुतमा का छे. (११००) अने प्रत्येकयुद्ध पण तेटला ज कह्या . प्रकीर्णकोर्नु स्वरूप भागमाधारे कांहक कहीए छीए. ( १ ) अरिहंतना कथनने अनुसारे महावुद्धिमान श्रमणो जे शास्त्र रचे छ ते अहीं प्रकीर्णक जाणवा. (२) उत्कालिक अंगपाश दशवकालिकादि जाणवा भने अंगबाह्य कालिक उत्तराध्ययनादि जाणवा, (३) सर्व प्रकीर्णको युद्धिमानोए ते प्रकारना जाणवा के ले प्रत्येकवुद्धोए अथवा अन्य महात्माओए ज रचेला होय. ( ४ ) अहीं प्रण मत छे ते मा प्रमाणे- श्रीऋपमादि तीर्थकरोना ८४००० विगेरे प्रमाणवाळा पातपाताना शिष्यरूप मनिओए जे रचेला तेटला ज प्रकीर्णको जाणवा, एम केटलाक कहे छे. केटलाक कहे छे के-ऋपमादि जिनोना स्वस्वतीर्थमावी चतुर्विध बुद्धियुक्त अपरिमित साधुओए रचला अपरिमित ज प्रकीर्णको जाणवा. वळी वीजा एम कहे छ के-ऋषमादि जिनोना स्वस्वतीर्थभावी अपरिमित प्रत्येकबुद्धोए रचेला अपरिमित ज प्रकीर्ण को जाणवा. इत्यादि अर्थथी श्रीनंदीसूत्राचिथी जाण. अथवा गच्छाचारनी चि बोवी.

(५३६) श्रीकाललोकप्रकाश। पट्टाधिपानसंख्येयान् यावत् श्रीवृषभप्रभोः । अविच्छिन्ना गतिर्मोक्ष प्रावर्तत महात्मनां ॥ ५॥ तानष्टौ चतुरो यावत् क्रमात् श्रीनेमिपार्श्वयोः त्रीन् वीरस्य परेषां तु संख्येयान्निखिलार्हतां ॥ ६ ॥ अंतर्मुहूर्तेऽतिक्रांते श्रीनाभेयस्य केवलात् । प्रावर्त्तत गतिर्मोक्षे नेमेर्वपद्वये गते ॥७॥ पार्श्वस्य त्रिषु वर्षेषु चतुषु चरमप्रभोः । शेषाणां पुनरेकादि-दिवसाति- क्रमे सति ॥८॥ श्रभूत्प्रवृत्तिः पूर्वाणा-मायाकुंथुजिनावधि। असंख्यकालं संख्येय- कालं पार्वजिनावधि ॥ ९॥ एक सहस्रं वर्षाणां महावीरस्य साभवत् । एतावान् पूर्वविच्छेद-कालोऽपि सकलार्हतां ॥ १० ॥ परं वर्षसहस्राणां विंशतिश्चरमेशितुः। पार्श्वस्य नासौ सर्वेषा-मातीर्थमपरं श्रुतं ॥११॥ श्रुतेष्वंगादिष्वबद्धा ज्ञानिभिश्च प्रकाशिताः। श्रादेशास्ते शताः पंचां- त्यस्यान्येषामनेकधा ॥ १२ ॥ कुरुटोत्कुरुटौ साधू सप्तमं नरकं गतौ ।। श्रीऋषभप्रभुना असंख्याता पट्टाधिप एवा महात्माभोनी अविच्छिन्नपणे मोक्षगति जाणवी. (५) भीनेमिनाथना आठ पाट ने पार्श्वनाथना चार पाट मोचे गयेल जाणवा. श्रीवीरप्रभुना त्रण पाट जाणवा. बाकीना सर्व तीर्थंकरोना संख्याता पाट मोते गयेल जामवा. (६) श्रीऋषभदेवस्वामीने केवळज्ञान प्राप्त थयुं त्यारपछी एक अंतर्मुहूर्ते मोक्षमार्ग शरु थयो, नेमिनाथना केवळज्ञान पछी चे वर्षे, श्रीपार्श्वनाथप्रभुना केवळझान पछी त्रण वर्षे, छेल्ला महावीरस्वामीना केवळज्ञान पछी चार वर्षे अने बाकीना चीश प्रभुना केवळ- ज्ञान पछी एक विगेरे दिवस गया पछी मोक्षमार्ग शरु थयो. (७-८) पूर्वोनी प्रवृचि प्रथम जिनेश्वरथी कुंथुनाथ सुधी असंख्य काळ जाणवी, भने त्यांथी पार्धजिन सुधी संख्यात काळ जाणवी. (९) श्री वीर परमात्मा पछी एक हजार वर्ष मुधी प्रवृत्ति जाणवी. पूर्वविच्छेदकाळ पण सर्व जिनेश्वरोनो ए प्रमाणे ज जाणवो, (१०) पूर्व विनाना वीजा ध्रुतनो काळ पूर्वना विच्छेद पछी वीश हजार वर्ष सुधी एटले कुल २१ हजार वर्ष सुधी जाणवो. श्री पार्श्वनाथ माटे प्रावो काळ न समजवो. (तेमनी पछी तो चीर प्रभु थता सुधी पूर्वश्रुत रहेल छे.) अने बाकीना प्रभु माटे तेमनुं तीर्थ चालता सुधी अपरश्रुतनो-पूर्वविनाना श्रुतनो काळ जाणवो, (११) जे अंगादिश्रुतमा गुंथायेला न होय भने हानीनोए प्रकाशित करेला-होय ते आदेशो समजवा. तेवा प्रादेशो भंस्य प्रमसंबंधी ५०० जाणवा भने अन्य प्रभुसंबंधी अनेक प्रकारना जाणवा. (१२) कुरुट , सर्ग ३२ मो। (५३७) वाल्येंगुष्टाग्रसंपर्का-मेरुवीरेण कंपितः॥ १३ ॥ विहाय वलयाकारं स्वयं- भूरमणांवुधौ । संति पद्मानि मत्स्याश्च समग्राकारशालिनः ॥ १४ ॥ अत्यंत स्थावरा सिद्धा मरुदेवा महासती । असंहब्धाः श्रुते ज्ञेया श्रादेशा एवमादयः ॥१५॥ श्रेयांसः श्रावको मुख्यः श्रीनाभेयजिनेशितुः । ते नंदसूर्यशंखाख्या- त्रयाणां नेमितोऽहंतां ॥ १६ ॥ सुभद्रा महासुत्रता सुनंदा सुलसापि च । मुख्याः स्युः श्राविका प्राद्य-नेमिपातिमाहतां ॥ १७ ॥ शेषाणां स्वप्रसिद्धा इति. इंद्रभूतिर्गणी मुख्य-श्चंदना च प्रवर्तिनी । श्रेणिको नृप- तिर्भक्तः सम्यक्त्वं क्षायिकं दधत् ॥ १८ ॥ यक्षः श्रीवर्द्धमानस्य मातं. गो गजवाहनः । द्विभुजो नकुलोपेता-पसव्यकरपंकजः ॥ १९॥ वामे करे च रुचिरं दधानो वीजपूरकं । श्यामांगकांतिः पुष्णाति श्रियं श्रीवीरसेविनां ॥ २० ॥ देवी सिद्ध'यिका सिंह-वाहनाढ्या चतुर्भुजा । पुस्तकाभयसंयुक्ता-पसव्यकरयामला ॥ २१ ॥ वीजपूरकवीणाढ्य- ने उत्कुरुट साधु सातमी नरके गया. बाल्यावस्थामा अंगुठाना संपर्कथी वीरप्रभुए मेरु कंपान्यो, (१३) स्वयंभूरमण समुद्रने विष वलयाकारने मूकीने समग्र आकारवाळा पणो ने मत्स्यो छे. (१४) अत्यंत स्थावर एवा (स्थावरमांथी तरत आवेला एवा) महासती मरुदेवा सिद्धिपदने पाम्या' इत्यादि आदेशो भुतने विपे असंहन्ध जाणवा (१५) श्री नामेयजिनना मुख्य श्रावक श्रेयांस हता अने नेमि, पार्थ तथा वीरप्रमुना नंद, सूर्य ने शंख नामना मुख्य श्रावक जाणवा. (१६) तेम ज सुभद्रा, महासुव्रता, सुनंदा ने मुलसा ए चार अनुक्रमे आद्य जिन, नेमि, पार्श्व ने वीरप्रभुनी मुख्य भाविका जाणवी. (१७) शेष तीर्थकरोना मुख्य श्रावक ने श्राविकाना नाम अप्रसिद्ध छे. थी वीरप्रभुना मुख्य गणधर इंद्रभूति, मुख्य प्रवर्चिनी चंदना ने दायिक समकितने धारण करनार नृपति श्रेणिक मक्त जाणवा. (१८) श्रीवीरप्रभुनो यक्ष मातंग नामनो, गजना वाहनवाळो, ये भुजावाळो, तेमां जमणी भुजामा नकुलने धारण करनार अने वाम सुजामा सुंदर एवा चीजपूरने धारण करनार, श्याम भंगकांतिवाळो, श्रीवीर परमा- स्मानी सेवा करनारने लक्ष्मी प्रापनारो थयो. (१९-२०) देवी सिद्धायिका नामे सिंहना पाहनवाळी, चार भुजावाळी, जमणा ये हाथमा पुस्तक ने अभय भने डापा ये (५३८) श्रीकाललोकप्रकाश। वामपाणिद्वया सतां । श्रीवीरभक्ता हरित-वर्णा दिशतु वांछितं ॥२२॥ यथास्यामवसर्पिण्या-मेवं प्राप्ता महोदयं । चतुर्विशतिरहत-स्तथा भाव्याः परास्वपि ॥ २३ ॥ इहेतदवसर्पिणीभरतवर्षभूयोपितो- विशेषसुषमाकृतो जिनवराश्चतुर्विंशतिः । मयाऽप्रतिमया मुदा प्रतिहतामयाश्चिन्मया: स्तुता विगतविक्रियाः कृतधियां क्रियासुः श्रियं ॥ २४ ॥ विश्वाश्चर्यदकीर्तिकीर्तिविजयश्रीवाचकेंद्रांतिष- द्राजश्रीतनयोऽतनिष्ट विनयः श्रीतेजपालात्मजः। काव्यं यत्किल तत्र निश्चितजगत्तत्वप्रदीपोपमे सोऽयं प्रथितो निसर्गसुभगो द्वात्रिंश एपोऽभवत् ॥ २५ ॥ ॥ इति श्रीलोकप्रकाशे द्वात्रिंशत्तमः सर्गः समाप्तः ॥ श्रीरस्तु । हाथमा बीजपूरक ने वीणाने धारण करनारी हरितवर्णवाळी श्री पीर परमात्माना भक्तोना वांच्छितने पापो. ( २१-२२) जेम मा अवसर्पिणीमा उपर कही गया प्रमाणे चोवीश तीर्थंकरो महोदयने प्राप्त करनारा या तेम पीजी अवसर्पिणीमा पण जाणी लघु. (२३) अहीं भा अवसर्पिणी भने भारतवर्षनी पृथ्वीरूपी चन्ने स्त्रीने विशेष सुख करनारा, सर्व प्रामयनो विनाश करनारा, ज्ञानमय अने विक्रिया रहित एवा २४ तीर्थकरोनी में मोटा हर्षथी स्तवना करी ते बुद्धिमानोने लक्ष्मीप्रत्ये आपो. (११२४) विश्वने भाचर्य पमाडनार के कीर्ति जेमनी एवा श्री कीर्तिविजय वाचकेंद्रना शिष्य अने राजश्री तथा तेजपाळना पुत्र श्री विनयविजये जे या काव्य रच्युं छे ते निश्चित एवा जगत्तवने प्रकाश करवामां दीपकसमान भा काध्यमां स्वभावे ज सुभग एवो मा वत्रीशमो सर्ग संपूर्ण थयो. (१९२५) इतिभी गणधरो संबधी यंत्र. वीरप्रभुशिष्य १ २ ३ ४ ६ ७ ८ सुधर्माशिष्य. गणधरनाम भ्राता नगरनाम | इंद्रभूति अग्नि वायुभूति व्यक्त सुधर्मा | मंडित मौर्यपुत्र अकंपित अचल मेतार्य | प्रभास | जंबूकुमार भूति पुत्र गौवर गौवर गौवर कोल्लाक कोल्लाक मौर्य मौर्य | मिथिला कोशला| तुगीक | राजगृह) राजगृहनगर सं. सं. सं. सं. सं वसुभूति घसुभूति वसुसूति धनमित्र धम्मिल धनदेव मौर्य देव वसु पभदत्त पृथ्वी | पृथ्वी | पृथ्वी | वारुणी | भहिला| विजया विजया जयंती नंदा वरुणदेवीप्रतिभद्रा धारिणी पितानाम बल मातानाम सर्ग ३२ मो ar जन्मनक्षत्र ज्येष्ठा कृत्तिका स्वाति श्रवण उत्तरा फाल्गुनी मघा रोहिणी | उत्तरा मृगशीर्ष अश्विनी पुण्य पाढा ५० ५० ५३ น ४२ १२ १४ है १२ २० १० ४४ गृहस्थपणे छद्मस्थपणे केवलीपणे सर्वायु शिष्यपरिवार १८ १६ ८० ९२ ७० ९० ६३ ७२ ५०० ५०० ५०० ५०० ५०० ३५० ३०० ३०० ३०० गौतम | गौतम | गौतम भारद्वाज अग्नि-वाशिष्ट काश्यप गौतम हारिता कोडीन कोडीन काश्यप वेश्य गोत्र यन चोवीशे तीर्थकरना मुनिओ संबंधी यंत्र. अंक प्रभुनाम. गणधर केवली | मनःपर्यवी अवधिशानी चौदपूर्वी वैक्रियलब्धि वाला वादी सातनो सरवाला सामान्यमुनि | कुलमुनि संख्या ४७५० ८४००० ૩૭૨૦ २१५० १००००० २००००० २०००० १२७५० २०००० १२५०० ६४०० १५००० १२१५० ९६०० १४००० ११६५० १८०० १३००० १०४५० । ११००० १२००० १०३००, १०००० ११००० ६१५० ९००० १०००० ८००० २४०० भीकाललोकप्रकाश। । ३००००० ३२०००० ३३०००० ३३०००० २५०००० สิน ८००० ८८ ७४०० ७५०० ८४०० १] ऋषभदेव ८४ २ अजितनाथ १५ ३ संभवनाथ | १०२ ४ अभिनंदन ११६ ५ सुमति १०० ६ पद्मप्रभ १०७ ७ सुपार्श्व ८ चंद्रप्रभ ६३ ६/सुविधि १० शीतल ८१ ११ यांस १२ | वासुपूज्य १३ | विमल १४ अनंत ५० १५ | धर्म ४३ १६ [ शांति ३६ १७ | कुंयु १८ ३३ २०६०० | १२६५० ७६८३४ ४१६६ २०४०० १२४०० ७८५१५ २१४८५ १९८०० १२००० ७०८०२ १२६१६८ १६००० ११००० ६७०६६ જરૂ૨૯૨૪ १८४०० १०४५० ६५८०० २५४२०० १६०० ६०४१५ | २६१५८५ ।। १५३०० ८४०० ५४९७५ २४५००५ १४००० ७६०० ४६६६३ २००३०७ १३००० ६००० ४३६८८ १५६०१२ १२००० ४०६८१ ५२०१६ ११००० ५००० ३५८७६ ४८१२४ १०००० ४७०० ३३३६६ ३८६३४ १००० ३२०० २६५५७ ३८४४३ ३२०० २६५५० ७००० २८०० २३३४३ २४०० २०५३६ ೪೪೯೪ ५१०० २००० १६८४५ ४३१५५ ७३०० १६००, १७४९४ ३२५०६ ७००० ७५०० ७२०० २३०० २०३० २००० १५०० १४०० १३०० १२०० ११०० १००० ९०० ५८०० २००००० १००००० ८४००० ५४०० င၀၀ ६००० ५५०० ५००० ५५०० ४८०० ५००० ८००० ३१४५० ४०६५७ ४५०० ४५०० ७२००० ६८००० ६६००० ६४००० ६२००० ६०००० ५०००० ४००० ४३०० ३६०० ३००० २५०० २६०० ८०० ६००० (081) ४३०० ३२०० ३३४० २५५१ २८०० ૯ ४०००० (18) ६६६ -५०० १४०० १२०० १००० ४५० १९ मल्लि २० मुनिसुपत २१ | नमि २२ | नेमि २३|पाव २४ महावीर २२०० १७५० १८००१५०० १६०० १२५० १००० १००० ७५० ७०० ५०० २२०० -१८००- १६०० १५०० १४०० १३०० २६०० ----२००० ५००० १५०० ११०० २८८५४ २११८२- २०६३ ११२८६ १०७६० ૨૦૦૮ १५०० ४०० ८८१८ १०६१७ ६७११ ५२१० ३६११ ८०० -३०००० २०००० १८००० १६००० १४००० १० ६०० ३५० "३०० ४०० कुल १४५२ १७६१०० १४५५६१ | १३३४०० ३३६१८ २४५२०८ १२६२००६ ८६१६४९ | १९८६०५१ २८४८००० सर्ग १२ मो। वादी मुनिमोनी संख्या लोकमकाशकारे विमळनाथजीनी ३६०० लखेली ते प्रमाणे गणता संख्यामा ४०० वध- वाथी श्री प्रवचनसारोद्धार सटीकमा तपासता तेना टीकाकारे स्पष्टपणे प्रण हजार ने बसो कह्या छे, परंतु दृष्टिदोपना कारणथी वेना मूळमां व नो छ थइ गयेल जणाय छे. ते उपरथी भा ग्रंथमा पण विमळनाथ चरित्रमा ३६०० लखायेला जणाय छे. श्रीसचरीसयस्थान प्रकरणमा ने तेना यंत्रमा पण भा ज कारणथी ३६०० लखायेला परंतु सरवाळो बधा ग्रंथोमा १२६२०० नोज होवाथी ३२०० वरावर लागे छे. ज्ञानपंचमीनी पुकमा ज्ञानपंचमीना देवना अर्थनी नोटमा चे त्रण संख्यामा जुदी संख्या लखी छे ने अरनाथना भूलथी १६०० ना १५०० लख्या छे ते प्रसंगे लख्युं छे.

(५४३) मीचोकमारा। श्रीमान् तीर्थकर, चक्रवर्ती, वासुदेव विगेरेनु क्रमसूचक यंत्र. . अंक तीर्थकर, चक्रवती. वासुदेव. बळदेव. प्रतिवामदेव. १ ऋषमदेव मरत १ २ अजितनाथ सगर २ ३ संभवनाथ मभिनंदन सुमतिनाथ ५ ६ पप्रम सुपार्श्वनाथ चंद्रप्रम मुविधिनाथ शीतळनाथ श्रेयांसनाथ त्रिपृष्ठ १ प्रचळ १ अश्वग्रीव १ १२ विजय २ तारक २ घासुपूज्य विमळनाथ भद्र ३ मेरक ३ द्विपृष्ठ २ स्वयंभू ३ पुरुषोत्तम ४ पुरुषसिंह ५ १४ अनंतनाथ ४ सुप्रम ४ धर्मनाथ मधु निशुंभ सुदर्शन ५ ५ मरवा ३ सनवकुमार ४ शांतिनाथ ५ ६ शांतिनाथ वर्ग ११ मो। (५६) 2 कुंघुनाथ कुंथुनाथ ६ धरनाथ मरनाथ ७ पुरुषपुंडरीक ६/ मानंद ६ बाल सुभूम . नंदन ७ ७ 9 मलिनाथ मुनिसुव्रत २० महापथ लक्ष्मण रामचंद्र रावण नमिनाथ हरिपेण १० अय ११ २२ नेमिनाथ छम्य पळभद्र है जरासंध है ब्रह्मदच १२ पार्श्वनाथ २४ महावीरस्वामी १ जे सीर्थकरनी लाइनमा चक्री के पासदेवादि लख्या छे ते सेमना विचरता बखतमा ययेला समजवा भने जे नीचे जुदा खानामा सख्या ते तेमनुं शासन पर्वता थपेला समवना.

(५४४) भीकाललोकप्रकाश। ॥ अथ त्रयस्त्रिंशत्तमः सर्गः प्रारभ्यते ॥ तथास्यामवसर्पिण्यां प्रथमश्चक्रवर्तिपु । अभूद्भरत इत्यादि-देवस्य तनुजोऽग्रिमः ॥ १ ॥ सुमंगलाकुक्षिरत्नं पंचचापशतोच्छ्रितः । स्वर्णरुक् चतुरशीति-पूर्वलक्षसुजीवितः ॥ २ ॥ सांधिताशेषपखंडः स चादर्श- गृहेऽन्यदा । निरंगुलीयका पश्य-नंगुली पर्यभावयत् ॥३॥ शरीरासारतां द्राक् च लेभे केवलमुज्ज्वलं । प्रदत्तसाधुवेपश्च शक्रेणागत्य वंदितः ॥४॥ सहस्रैर्दशभी राज्ञां सेवितः स्वीकृतवतैः । विहृत्य लक्षं पूर्वाणा- मवाप परमं पदं ॥ ५॥ इति भरतः ।। अयोध्यायां नगर्यां च द्वितीयश्चक्रवर्त्यभूत् । स्वर्णवर्णः सार्द्धचतु-धनुःशतसमुच्छ्रितः ॥ ६॥ ॥ द्वासप्ततिपूर्वलक्ष-जीवितः सगराह्वयः । सुमित्रविजयक्ष्माप-यशोमत्योस्तनूद्भवः ॥ ७ ॥ अजितस्याहतश्चासौ पितृव्यतनयोऽभवत् । यतः सुमित्रविजयो •e - - सर्ग ३३ मो. 22 - श्रा अवसर्पिर्णामां प्रथमजिनेश्वरना मोटा पुत्र भरत, चक्रवर्तीयोमा प्रथम' थया. (१) ते सुमंगलादेवीनी कुक्षिमा रत्नसमान, पांच सो धनुष्य उंचा देहवाळा, सुवर्ण- समान कातिवाळा अने ८४ लाख पूर्वना आयुवांळा हता. (२) समस्त छ खंड साध्या पछी एकदा भादर्शभुवनमा हता ते वखते हाथनी एक अंगुळी मुद्रिकाविनानी देखता तेमणे शरीरनी असारता भावी अने तरत ज उज्ज्वळ केवळज्ञान पाम्या. शक्रंद्रे श्रावीने मुनिवेष प्राप्यो भने (ते धारण कर्या पछी ) वाद्या. (३-४) चारित्रने स्वीकारेला एवा दश हजार राजाप्रोधी सेवाता ते एक लाख पूर्वसुधी पृथ्वीपर विचरीने परमपदने पाम्या. (५) इति भरतः १. वीजा चक्रवर्ती सगर नामना अयोध्या नगरीमा थया. ते सुवर्णसमान देहना वर्ण- बाळा, साहाचार सो धनुष्यनी उंचाइवाळा, ७२ लाख पूर्वना भायुवाळा अने सुमित्र- विश्य राजा तथा यशोमतीना पुत्र हता. (६-७) ए अजितनाथजीना काकाना पुत्र इवा, कारण समिविजयनो नितशत्रु राजा सहोदर दो. (८) ते पण पोताना मर्ग ३३ मो। (५४५.) जितशत्रुश्च सोदरौ ॥ ८ ॥ सोऽपि स्वपुत्रमरण-प्राप्तवैराग्यवासनः। अजितस्याहतः पार्श्वे परिव्रज्य शिवं ययौ ॥९॥ इति सगरः॥ अभून्नगयां श्रावस्त्यां समुद्रविजयो नृपः। भद्रा प्रियतमा , तस्य मघवा तनयस्तयोः ॥ १० ॥ द्विचत्वारिंशदद्ध्यर्दा धनुषां वपुरुच्छ्यः । लक्षाणि पंचवर्षाणा-मायुष्कं चास्य कीर्तितं ॥ ११॥ संसारानित्यता ध्यायन् जातवैराग्यवासनः । सोऽगाग्रहीतचारित्रः स्वर्गलोकं तृतीयकं ॥१२॥ इति मघवा ॥ कुरुजंगलदेशे च हस्तिनागपुरे पुरे । कुरुवंशे महीशोऽभू- दश्वसेनाह्वयो महान् ॥१३॥ सहदेवी च तद्भार्या शीलसौभाग्यशालिनी सनत्कुमारस्तत्पुत्र-श्चतुर्थश्चक्रवर्त्यभूत् ॥ १४ ॥ अथर्धान्येकचत्वारि- शद्धपि स उच्छ्रितः । तथा त्रिवर्षलक्षायु-जगदुत्कृष्टरूपवान् ॥ १५ ॥ तस्मिन्नवसरे कोऽपि सौधर्मेंद्रस्य पर्पदि । ईशानस्वर्गवास्तव्यः संगमाख्यः सुरोऽविशत् ॥ १६ ॥ तत्तेजसा सुराः सर्वे प्रत्यूपे तारका इव । तार्कि- का इव वा जैने बभूवुर्गततेजसः ॥ १७ ॥ गते तस्मिन् सुरैः सर्वेः पृष्टः पुत्रोना मरणथी वैराग्य वासनाने पामीने अजितनाथपासे प्रव्रज्या अंगीकार करी मोक्षे गया. (९) इति सगरः २. भावस्तिनगरीमा समुद्रविजय नामे राजा हता. वेने भद्रा नामे प्रियतमा हती. मना मघवा नामे पुत्र (त्रीजा चक्रवर्ती ) थया. (१०) तेमनुं देहमान ४२॥ धनु- प्यनुं ने आयुष्य पांच लाख वर्षतुं हतं. (११) संसारनी अनित्यता ध्यातां वैराग्यवा. सना उत्पन्न थवाथी तेमणे चारित्र अंगीकार कर्यु भने मरण पामीने श्रीजे देवलोके देव थया. (१२) इति मघवा. ३. कुरुजंगल देशमा हस्तिनागपुर नगरमा कुरुवंशमा अश्वसेन नामना महान् राजा यया. (१३) तेने शील सौभाग्यशाळी सहदेवी नामे भार्या हती. तेना पुत्र सनत्कुमार नामे चोथा चक्री थया. (१४) तेमना देहनी उंचाइ ४१॥ धनुप्यनी हती अने प्रण लाख वर्षतुं भापु हतं. जगतमा उत्कृष्ट रूपवाळा हता. (१५) ते अवसरे सौधर्मेंद्रनी सभामा ईशानस्वर्गवासी कोई संगम नामनो देव कार्यप्रसंगे आष्यो. (१६) तेना तेजयी सर्वे सौधर्मकल्पवासी देवो प्रमाते तारानी जेबा भने जैननी पासे तार्कीकोनी जेवा तेजपिनाना यह गया. (१७) ते देवना गया पछी सर्वे देवोए सौधर्मद्रने (५४६.) श्रीकाललोकप्रकाश। सौधर्मनायकः । जगावयं भवे पूर्वे भावितात्माभवन्मुनिः ॥ १८॥ श्राचा- माम्लवर्द्धमानं तत्राकात्तिपो महत् । तेजस्तदनुभावेन् विभय॑यमनु- त्तरं ॥ १९ ॥ स्वामिन्नन्यस्य कस्यापि रुपमस्त्यधुनेदृशं । इति पृष्टः सुराधीशः शशंसवमसंशयः ॥२०॥ रूपं सनत्कुमारस्य वर्त्तते चक्रवर्तिनः । देवेभ्योऽप्यधिकं नास्मा-दृशां वचनगोचरः ॥ २१ ॥ श्रश्रद्दधानौ तत्कौ- चि-द्विप्रीभूयागतौ सुरौ । रूपं दिदृचू चक्री च तदासीनानवेश्मनि ॥ २२ ॥ अभ्यक्तस्त्यक्तशृंगारो रूपमालोक्य विस्मितौ । तौ प्रत्युवाच द्रष्टव्यं रूपं मयि सभास्थिते ॥ २३ ॥ ततः स्नातोऽलंकृतश्च दृष्टः सिंहा- सने स्थितः। ताभ्यां विषहचित्ताभ्यां तेन पृष्टे च कारणे ॥२॥ रोगो- त्पत्तिं जगदतु-स्ततः स्वीकृत्य संयम । सहते स्म गदान् सप्त सप्तवर्ष- शतावधि ॥ २५ ॥ तथोक्तं योगशास्त्रवृत्तौ-कच्छू १ शोप २ ज्वर ३ श्वासा ४-रुचि ५ कुक्ष्य ६ क्षिवेदनाः ७ । सप्ताधिसेहे पुण्यात्मा सप्त पूलथु के-'पार्नु भावु अत्यंत तेज केम छे ।' इंद्रे कड्युं के–'पूर्वभवे ए भावि- तात्मा मुनि हता. ( १८) ते भवमा तेमणे मोटो आचामाम्लवर्षमानतप कर्यो हतो तेना प्रभावथी ए देव अनुत्तर तेजने पामेल छे. ' (१९) फरी देवोए पूछथु के-'भ त्यारे श्रावु अपूर्व तेज बीजा कोइर्नु छ ?' मा प्रमाणे इंद्रने पूछवाथी इंद्रे निःशंसयपणे मधु (२०) के-' हाल सनदकुमार चक्रीनुं रूप देवो करतो पण अधिक छे, ते अमारे वचनगोचर पण थइ शके तेम नथी अर्थात् अमे पण ते रूपनुं वर्णन करी शकीए तेम नथी. ' (२१) या प्रमाणे इंद्रना वचनने नहीं सद्दहीने कोइये देव विप्रनुं रूप करी चक्रीपासे तेमनुं रूप जोवा आध्या. ते वखते चक्री स्नानगृहमा हता. (२२) अभ्यंगन करावेलुं हतं ने शृंगार वजी दीधेला हता. ते वखते तेमनुं रूप जोइने ते प्रावेल देवो विस्मय पाम्या. तेमने चक्रीए कयु के-' मारुं रूप तो हुँ सभामा बेठो होउं त्यारे जो.' (२३) पछी चक्री स्नान करी बसालंकार धारण करी सभामा भावीने वेठा. एटले ते में विप्रो पण आव्या. तेमने भा वखतनुं रूप जोइने विपएणचित्तवाला थयेला जोइने चक्रीए कारण पूछy. (२४) एटले तेमणे शरीरमा रोगोत्पत्ति थइ गयानुं कडं, तेथी वैराग्य पामीने ते चक्रीए चारित्र ग्रहण कर्यु भने सात महाव्याधिनो सात सो वर्षसुधी सहन कया. (२५) श्री योगशास्त्रनी वृत्तिमां कडं के के-'कन्छु १, शोष २, ज्वर ३, वास ४, अरुचि ५, कुक्षिवेदना ६, अधिवेदना ७ श्रा सात व्याधि ते पुण्या- सर्ग १५ मो. (५४७) वर्पशतानि सः ॥ २६ ॥ उत्तराध्ययनवृत्तेरयमेवाभिप्रायः, ऋषिमंडले तु- कंडू १ अभत्तसद्धा २ तिव्वा वेत्रणा उ अच्छि ३ कुच्छीसु ४ । कासं ५ सासं च ६ जरं ७ अहियासह सत्त वाससए॥१॥ मरणसमाधिप्रकी- णके तु-सोलस रोगायंका सहिया सह चकिणा चउत्थेण । वाससहस्सा सत्त उ सामन्नधुरं उवगएणं ॥१॥ सप्तवर्षसहस्राण्याष्टादश रोगानधि- सोति तु उत्तराध्यनदीपिकायां. शकप्रशंसाऽश्रद्धाना-पुनर्देवैः परीक्षितः। प्राप्तश्चिकित्सानाकांक्षी तृतीयं स्वर्गमुत्तमः ॥२७॥ इति सनत्कुमारः ।। श्रीशांतिः पंचमश्चक्री पष्ठः कुंथुजिनेश्वरः । अरोऽर्हन् सप्तम- स्तेयां चरितं प्राग्निरूपितं ॥ २८ ॥ हास्तिनाख्ये पुरेऽनंत-वीर्योऽभूत्पृथिवीपतिः । रेणुकायाः स्वसा तस्य प्रियाभूजितशत्रुजा ॥ २९ ॥ तस्मिन्नवसरे दुःस्थो विप्रो व्युच्छि- न्नवंशकः । अग्निनामा भ्रमन् प्राप तापसाश्रममेकदा ॥ ३० ॥ सुतत्वेना- ग्रहीदग्निं जमः कुलपतिश्च तं । ततः स जमदग्न्याख्य-स्तापसोऽभून्महा- । माए सात सौ वर्ष सुधी सहन कर्या. (२६) श्री उत्तराध्ययनवृत्तिनो पण मा अमि- प्राय छे. ऋषिमंडळमा तो-कंड १, अभक्तश्रद्धा-अरुचि २, तीव्र प्रतिवेदना ३, तीन कृतिवेदना ४, कास ५, श्वास ६ ने जर ७-या व्याधियो सात सो वर्षसुधी सहन कर्या'. एम कहेल छे. वळी मरणममाधिप्रकीर्णकमा ' श्रमणपणानी धुराने प्राप्त थयेला चोथा चक्रीए सात हजार वर्ष सुधी सोळ रोगांतक ( महारोग) सहन कर्या -एम कहेल छ. श्री उत्तराध्ययननी दीपिकामा तो ' सात हजार वर्षमुधी अढार रोगने सहन कर्या' एम को छे. फरीने पाठी इंद्रे चक्रीनी प्रशंमा करी तेने नहीं सद्दहीने श्रावेला देवे कोइ पण प्रकारनी व्याधिनी चिकित्साने ते चक्री इच्छता नथी ए वायतनी परीक्षा करी. ते चक्री मृत्यु पामीने त्रीजा स्वर्गमा उत्पन्न थया. ( २७ ) इति सनत्कुमारः ४ श्री शांतिनाथ पांचमा चक्री, श्री कुंथुनाथ छट्ठा चक्री अने श्री अरनाथ सातमा चक्री थया. मनुं चरित्र पूर्व निरूपण करेल छे. (२८) ५-६-७ हस्तिनापुर नामना नगरमा भनंतवीर्य नामे राजा थया. जितशत्रु राजानी पुत्री रेणुकानी बहेन तेनी राणी थइ. ( २९ ) ते अवसरे अग्नि नामनो दुःखी अने व्युच्छिन्न वंशवानो विप्र एकदा ममतो भमतो कोइ तापसना पाश्रममा आयो. (३०) त्यांना .

भीकाललोकप्रकारा। तपाः ॥ ३१ ॥ जैनशैवौ तदा वैश्वा-नरधन्वंतरी सुरौ । विवदंतौ नृलो- कं चा-गतौ धर्म परीक्षितुं ॥ ३२ ॥ परीक्षणीयो जैनेषु प्रथमं दृश्यतेऽत्र यः । परीक्ष्यस्तापसप्रष्ठः शैवेष्वित्यत्र संगरः ॥ ३३ ॥ तदा भावयतिः पद्म-रथाख्यो मिथिलापतिः । गुरुश्रीवासुपूज्यांते गच्छन् व्रतजिघृचया ॥३॥ प्रातिलोमानुलोमाभ्या-मुपायैर्विविधैरसौ । परीक्षितो न चुक्षोभ पवनैरिव मंदरः॥ ३५॥ अगातां तौ ततो देवौ जमदग्निं परीक्षितुं । चटकौ दंपती भूत्वा तस्य ३मश्रुण्यतिष्ठतां ॥ ३६ ॥ अनुमन्यस्व मां कांते गत्वाऽयामि हिमालयं । इत्यूचिवांसं चटकं चटकाथैवमब्रवीत् ॥३७॥ द्रुतं नैति भवानन्य-कांतासक्तः स्वभावतः। लंपटानां कुतोमोक्षः-परस्त्री- नागपाशतः ॥ ३८॥ स स्माहावश्यमेष्यामि न चेदगोघातपातकैः । गृह्येऽथवा विनश्यामि पापैविश्वस्तघातिनां ॥ ३९॥ चटकोचे प्रिया- लीकैः पर्याप्तं शपथांतरैः । तापसस्यास्य पापेन गृह्येऽहमिति शप्यता ॥ ४० ॥ ततः स तापसः क्रुद्धः खगौ धृत्वा करेण 'तौ । उवाच कुलपति जमे ते अपिने पुत्रपणे ग्रहण कर्यो. त्यारथी ते जमदाम नामनो महातप करनारो तपस्त्री थयो. (३१) जैनधर्मी ने शैवधर्मी एवा वैश्वानर ने धन्वंतरी नामना चे देवो परस्पर बाद करता धर्मनी परीक्षा करवा माटे मनुष्यलोकमां भाव्या. (३२) जैनमा जे प्रथम एटले धर्मनी शरुमातवाळो देखाय तेनी परीचा करवी अने पछी शवधर्मी वाप- समां जे श्रेष्ठ गणाता होय तेनी परीक्षा करवी एवो निर्णय कर्यो. (३३) ते वखते भाव- यति एवो मिथिलापति पद्मरथ नामनो राजा श्रीवासुपूज्य गुरुनी पासे व्रत लेवानी इच्छाथी जतो हतो. (३४) तेनी ए देवोए अनुलोम-प्रतिलोम एवा विविध उपायोवडे परीक्षा करी, पण ते पवनवडे मेरुपर्वत चलित न थाय तेम चलित थया नहीं. (३५) पछी ते देवो जमदग्निनी परीक्षा करवा गया अने चफला चकलीन रूप करी तेनी दाढीमा रह्या. (३६) तेमाथी चकलो चोन्पो के-'हे कांता ! मने रजा प्राप.हुँ हिमालय जइने पाछो तरत श्रावीश' श्राम कहेता चकलाने चकलीए कह्यु (३७) के-' स्वभावथी ज पन्य कातामा आसक्त एवा तमे उतावळा पाला न श्रावो, केमके लंपटो परस्त्रीरूपी नागपाश- माथी शी रीते छुटी शके १' (३८) एटले चालो चोल्यो के-'हुँ अवश्य भावीश. जो ना तो गौहत्यानुं पातक मने लागे अथवा विश्वासघातीना पापथी मारो विनाश थाय.' (३९) त्यारे चकली चोली के-'हे प्रिय! वीजा सोगन लेवाथी सयु. भा तापसर्नु पाप मने लागे एवा सोगन खाओ.' (४०) मा प्रमाणे सांभळीने ते तापस क्रोधायमान थयो भने बने मर्ग ३६ मो। (५४९) मयि किं पाप-मीहगाजन्म सुनते ॥ ४१ ॥ ऊचतुस्तौ खगौ पापं पापर्षे किमतः परं । अनुत्पादितपुत्रेण यत्वया चर्यते तपः ॥ ४२ ॥ ततो भ्रष्ट- मनाः सोऽभू-स्त्रीपाणिग्रहणोत्सुकः । मिथ्यादृशां हि वैराग्यं कुलटाचि- तचंचलं ॥ ४३ ॥ अखिद्यत सुरो धन्वं-तरिस्तं वीक्ष्य तादृशं । 'किमे- भिस्तापसैमूढ़-रित्यभूदयमार्हतः ॥ १४ ॥ भूरिकन्यं ययाचेऽसौ जितशत्रुमृषिपं । स्वामिच्छंती ददामीति सोऽवादीच्छापभीरुकः ॥ ४५ ॥ चामं भिक्षाचरं वीक्ष्य निखिलाः कृत- थूस्कृतीः । कुजीचकेऽसको शापा-देकोनं कन्यकाशतं ॥ ४६ ॥ रेणु- क्रीडापरां लम्वी रेणुकानामकन्यकां । फलैः प्रलोभ्य मामेपा वृणोती- त्यवदन्नृपं ॥ ४७ ॥ नृपेण दत्तामादाय तां प्रसन्नः परा अपि । बटुः कन्याः पटूकृत्य वने नीत्वा पुपोष तां ॥ ४८ ॥ तातवत्परिपोष्यापि पक्षीने हाथवडे पकडी कडु के-' जन्मथी मांडीने व्रतधारी एवा मारामा शुं एवं पाप छ के चकलीए ए पाप लेवानुं कर्तुं ?' (४१) एटले ते ने पक्षी बोल्या के-' हे पापपि ! प्राथी वधारे पाप क्यं छे के तमे पुत्रोत्पत्ति कर्या सिवाय तप तपो छो?' (४२) आप्रमाणे पचीसोना वचनो सांभळी तापसर्नु मन चलित थयु अने ते कोई पण स्त्रीसाथे पाणिग्रहण करवाने उत्सुक थया, कारण के मिथ्यात्वीनो वैराग्य कुल- टाना चित्त जेवो चंचळ होय छे. (४३) जमदमिनी मा प्रमाणे स्थिति जोइने धन्वंतरी देव खेद पाम्यो भने विचार्य के-'मा मृढ एवा तापसोथी | अर्थात् एश्रोमा वास्तविक धर्म जणातो नथी' आम विचारीने ते श्रावक थयो. ( पछी बने देव स्वर्गे गया ). (४४) अहीं जमदग्निए घणी कन्यावाळा जितशत्रु राजा पासे जइने एक कन्यानी मागणी करी एटले तेना शापथी मय पामता राजाए कह्यु के- जे कन्या वमने इच्छशे ते पापीश. '(४५) परंतु भा दुर्बळ मिक्षाचरने जोइने वधी कन्याओए थुपुकार कों एटले ए तापसे एक ऊणी सो (९१) कन्याओने शापवडे कुपडी करी दीधी. (४६) पछी धूळमां क्रीडा करती सौथी नानी रेणुका नामनी कन्याने फळबडे लोमानीने आ मने इच्छे के एम वेणे राजाने कर्यु. (४७) एटले राजाए तेने पापी. तेने लइने प्रसन्न थयेला ते तापसे कुवढी करेली बधी कन्याभोने पाछी यथास्वरूप करी भने रेणुकाने लाइने ते बनमा-पोताना थाथममा आन्यो. त्या ते तेनुं पोपण करवा लाग्यो. (४८) पितानी जेम परिपालन कर्या लता कामने वश एवो भने भंगो - (५५०) भीकानलोकप्रकारा। सोऽथ कामवशंवदः । जरनरीरमहाला श्लथांगोऽप्यश्लथस्पृहः ॥ १९ ॥ ऋतुकालेऽथ तेनोक्ता सा बाला त्वत्कृते चरूं । साधयामि यतस्ते स्या- नंदनो ब्राह्मणोत्तमः ॥ ५० ॥ सावग् द्वौ साधय चरू तत्र ब्राह्मः कृते मम । अन्यः क्षात्रोऽनंतवीर्य-प्रियाया मत्स्वसुः कृते ॥ ५१ ॥ साधितौ द्वौ चरू तेन ब्राह्मक्षत्रमहोनिधी । ततः साऽचिंतयच्चित्ते रेणुका दीर्घया दृशा ।। ५२ ॥ मा भूत्सुतोऽपि मे मद्व-दारण्यो हरिणादिवत् । ध्यात्वेति स्वयमादत्सा क्षात्रतेजाकरं चरुं ॥५३॥ द्वितीयं चापरा तेन जातो कुलविलक्षणौ । रामः पुत्रो रेणुकायाः परस्याः कृतवीर्यकः ॥ ५४॥ कोऽपि विद्याधरो भ्रष्ट-नभोगतिरूपासितः । रामेण विद्या तइत्ता पार्शवी साधिता क्रमात् ॥ ५५ ॥ स्वसृप्रेम्णान्यदा चागा-द्रेणुका हस्तिनापुरे । भुक्ता चानंतवीर्येण श्याली जातसुताप्यभूत् ॥ ५६ ॥ ससुतामपि तां निन्ये जमदग्निर्निजं गृहं । क्रुद्धश्च पशुरामस्तो सर्डिभां मातरं न्यहन् ॥ ५७ ॥ तद्भगिन्योदितं पत्ये क्रुद्धोऽथानंतवीर्यराट् । शिथिल थयेल छता जेनी स्पृहा शिथिल थइ नथी एवो ते वृद्ध तापस ते चाळानी साथै कामक्रीडा करवा लाग्यो. (४९) भन्यदा ऋतुकाळे तापसे ते बाळाने कर्यु के- 'वारे माटे एक चरु साधु के जेथी तने ब्राह्मणोत्तम पुत्र थाय.' (५०) एटले ते रेणुका बोली के ' तमे वे चरु साधो, मां ब्राह्मचरु मारे माटे अने क्षात्रचरु अनंतवीर्यनी प्रिया मारी बहेनने माटे.' (५१) आम कहेवाथी तेणे ब्राह्म अने चत्रना तेजना निधान समान वे चरु साध्या. ए वखते रेणुका दीर्घदृष्टिथी विचारवा लागी (५२) के-'मारो पुत्र पण मारी जेम वनमा रहेनारो हरिणादिक जेवो न थायो' श्राम विचारीने क्षात्रतेज करनार चरु पोते ग्रहण कर्यो (५३) भने पीजो पोतानी पहेनने आप्यो तेथी कुळमा विलक्षण एवा नेने पुत्र थया. रेणुकानो पुत्र राम नामनो थयो भने तेनी व्हेनने कृतवार्य नामनो पुत्र थयो. (५४) अन्यदा कोइ विद्याधर भाकाशगमन करतां भ्रष्ट थयेलो भूमिपर पडेलो तेनी रामे सारी रीते उपासना ( चाकरी) करी, तेथी तेणे रामने पार्शवी (परशु संबंधी) विद्या मापी. तेणे अनुक्रमे ते विद्या साधी. (५५) बहेनना प्रेमथी अन्यदा रेणुका हस्तिना- पुरमा श्रावी. त्या अनंतषीय ते श्याळीने भोगवी भने तेने पुत्र पण थयो. (५६) जमदग्नि पुत्रसहित तेने पोताना पाश्रममा लइ गयो. तेने जोइ क्रोध पामेला परशुरामे पुनसहित माताने दणी नाखी. (५७) मा वात रेणुकानी पहेने पोताना पति अनंत- वर्ग १३ मो। कीडनार्थ गते रामे द्वाग्ममर्द तदाश्रमं ॥ ५८ ॥ ततश्च पशुरामेणा-नंत- वीर्यो निपातितः । कृतवीर्यस्ततस्तस्य पदेऽभूत्पृथिवीपतिः ॥ ५९ ॥ तेन कुद्धेन नीतश्च जमदग्निर्यमालयं । रिपोस्ताते हते स्वस्य तातदुःखं हि शाम्यति ।। ६०॥ ततश्च पशुरामेण प्रज्ज्वलत्पशुतेजसा । कृतवीर्यः क्षयं नीतो नि- खिलैः क्षत्रियैः सह ॥ ६१ ॥ कृतवीर्यप्रिया तारा ततो गुर्वी पलायिता। कृपया तापलैस्त्राता स्वाश्रमे भूमिवेश्मनि ॥ ६२ ।। क्रमाचतुर्दशस्वप्न- सूचितोऽस्याः सुतोऽभवत् । चखाद भूमिमित्युक्तः सुभूम इति तापसः ॥ ६३॥ हस्तिनापुरसाम्राज्यं रामः स्वीकृत्य भूतलं । निःक्षत्रियं सप्तवारां- श्वकार क्रोधदुर्द्धरः ॥ ६४ ॥ अन्यदा क्षत्रियान्वेषी सुभूमालंकृताश्रमे । जगाम रामस्तत्रास्य जज्वाल परशुः क्रुधा ॥ ६५ ॥ कोऽप्यत्र क्षत्रियोऽ. स्तीति पृष्टः कुलपति गौ। तापसाः क्षत्रियाः संती-युक्तेऽसौ व्यरम- वीर्यने करी एटले क्रोधायमान थयेला तेथे राम क्रीडा करवा माटे बहार गयेल ते वखते त्या जइने तत्काळ तेनो आश्रम तोडीफोडी नारूपो. (५८) ए वात जाणीने पशुरामे अनंतवीर्यने मारी नाख्यो एटले तेने स्थानके कतवीर्य पृथ्वीपति (राजा) थयो. (५९) ते कृतवीर्ये क्रोधायमान थइने जमदग्निने मारी नाख्यो. 'शत्रुना पिताने हणवाथी पोतानुं पितासंबंधी दुःख शांत थाय छे'. (६०) पछी जाज्वन्यमान पथुना तेजथी पशुरामे कृतवीर्यने मारी नाख्यो. ते साथे समग्र पत्रीभोने पण मारी नाख्या. (६१) ते वखते कतवीर्यनी स्त्री तारा सगर्मा हत्ती ते भागी गइ. तेने कोइ तापसे कपावडे पोताना आश्रमना मायरामा राखीने तेनुं रक्षण कयु. (६२) अनुक्रमे तेने चौद स्वमसूचित पुत्र थयो. ते वान्यावस्थामा माटी खावा लाग्यो तेथी तापसोए तेनुं नाम सुभूम पाइथु. (६३) अहीं पशुरामे हस्तिनापुर- राज्य स्वीकारीने दुर्धर क्रोधवाळा तेणे सात बार निम्घात्रिय (चत्रीविनानी) पृथ्वी करी. (६४) अन्यदा चत्रियोने शोधतो राम सुभूमधी अलं- कृत पाश्रममा भाग्यो. त्यां तेनी पशु के जे दत्रियने देखीने बावन्यमान थती हती ते क्रोध करीने जाज्वन्यमान थइ. (६५) एटले तेणे कुलपतिने पूछयु के-'मही कोई पण क्षत्रिय छे' कुलपतिए कछु के-'भा तापसो चत्रियो न छे. 'माम कहेवाची .

भीकाशनोकप्रकाश स्क्रुधः ॥ ६६ ॥ हतानां क्षत्रियेंद्राणां दंष्ट्रिकाभिरवीभरत् । स्थालमकं महद्रामः संग्रामोद्दामदोर्मदः ॥ ६७ ॥ य एताः पायसीभूताः भोक्ष्यते स वदंतकः । इति नैमित्तिकेनोक्तो रामस्तन्निणिनीषया ॥ ६८॥ अवा- रितं पुरे सत्रा-गारं निर्माय तत्र च । दंष्ट्रास्थालांकितं सिंहा-सनमा- दावतिष्ठिपत् ॥ ६९ ॥ विद्याधरो मेघनादः सुतां पद्मश्रियं ददौ । सुभूमाय निमित्तज्ञ-गिरा तं चक्रिणं विदन् ॥ ७० ॥ सुभूमस्तातवृत्तांतं ज्ञात्वा गदितमंघया। क्रुद्धो रामं संजिहीर्षु-र्द्राग् ययौ हस्तिनापुरं ॥ ७१ ॥ गत्वा सिंहासने तस्मि- निषतः सिंहशाववत् । दंष्ट्रास्ताः पायसीभूता बुभुजे च भुजोर्जितः ॥ ७२ ॥ हतेषु. मेघनादेन तदारक्षिद्विजातिषु । रामोऽप्यागा- त्तत्र काल-दूताहूत इव द्रुतं ।। ७३ ॥ मुक्तः सुभूमे रामेण परशुः प्रज्ज्व- लन्नपि । स्वयमेव शशामाशु न्यायभाजीव दुर्जनः ॥ ७४ ॥ चक्ररत्नी- तेनो क्रोध विराम पाम्यो. (६६) संग्रामोने विषे उद्दाम दोर्मदवाळा पशुरामे पोते हणेला पत्रिद्रोनी दाढायोवडे एक मोटो थाळ भर्यो. (६७) 'जेना जोवाथी श्रा दाढाओ धीर जेवीथइ जशे अने ते क्षीरनुं जे भोजन करशे ते तने मारनार थशे' एम नैमित्तिके कहेलं होवाथी रामे तेनो निर्णय करवा माटे ते नगरमा एक अवारित एवी कोइने भटकायत नहीं करनारी दानशाळा शरु करी भने तेना मुखद्वारपासेज ए दाढावाळा स्थाळयुक्त एक सिंहासन स्थापन कर्यु. (६८-६९) नहीं मेघनाद नामना विद्याधरे निमित्तानी वाणीथी मुभूमने चक्री थनार जाणीने पोतानी पद्मश्री नामनी पुत्री तेनी साथे परणाची. (७०) पोतानी माताना कहेवाथी पोताना पितासंबंधी वृत्तांत जाणीने क्रोधायमान थयेल सुभूम पधुरामने हणवा माटे एकदम हस्तिनापुर गयो. (७१) ते दानशाळापासे गयो भने त्यो सिंहासन पडेलु जोइने सिंहना बाळकनी जेम तेनी उपर घेठो. तेना जोवाथीज दाढा वीररूप थइ गइ एटले पळवान सुजावाळो ते यधी पीर खाइ गयो. (७२) मेघनाद तेनी साथे आवेलो हतो तेणे ते दानशाळाना रक्षक ब्राह्मणोने मारी नाख्या. ए हकीकत जाणीने काळते बोलाव्यो होय तेम पशुराम तरत ज उतावळो त्या भाग्यो. (७३) श्रावता त ज तेणे जाज्वन्यमान पर्श सुभूमउपर मूकी; परंतु न्यायपान पासे दुर्जन शांत थइ जाय तेम ते स्वयमेष शांत यह गइ. (७४) एटलामा वो पक्ररत्नपणे परिणमी गयेल थाळरूपचक्र P- सर्ग ३३ मो। (५५३) भवस्थालं सुभूमप्रेरितं ततः । शिरश्चिच्छेद रामस्य पुण्यतः किं न संभवेत् ।। ७५॥ त्रिःसप्तकृत्वो निर्विप्रं स चकार महीतलं । वैरनिर्यातनं कुर्व-स्त्रि- गुणं मत्सरोल्वणः ॥ ७६ ॥ निर्जिताशेषपखंडः स चंडक्रोधदुर्द्धरः । विप्रघातान्निववृते न मनागपि निर्दयः॥ ७७ ॥सोऽन्यदा धातकीखंड- भरतं जेतुमुत्सुकः । निवारितोऽपि मंत्र्यायै-भृशं दुःशकुनैरिव ॥ ७८ ॥ रत्नेन चर्मणांभोधि तरीतुमुपचक्रमे । प्रभुच्च बुद्धिर्देवानां चर्मरत्नभृतां तदा ॥ ७९ ॥ विभ्रत्येवेदमन्येऽमी विश्राम्यामि क्षणं त्वहं । युगपचिंत- यित्वेति सर्वैस्तन्मुमुचे श्लथं ॥ ८० ॥ ततः स चर्मणा तेन पापेनेव गरीयसा । ममज्ज वार्डो देहेन दुर्गतावात्मना पुनः॥८॥ तथोक्तं-तुर्या- कपायात्पंचत्वं प्राप्य पट्खंडभूपतिः । सप्तमं नरकं प्राप-दष्टमश्चक्रव. हँसौ ॥८२॥ अष्टाविंशतिकोदंडो-तुंगदेहोऽयमीरितः । पष्टिवर्षसहस्रायु- श्वामीकरतनुद्युतिः ॥ ८३ ।। इति सुभूमः ।। सुभूमे राम उपर मूक्यु, तेथी रामनो शिरच्छेद थइ गयो. 'पुण्य थी शुं संभवतुं नथी ? (७५) पछी ते सुभूमे त्रण सप्तक एटले २१ वार पृथ्वीतळने ब्रामणरहित कयु. 'तीव्र रोपथी वैरनुं निर्यातन प्रणगणो बदलो वाळे त्यारे थाय छे.' (७६ ) प्रचंड क्रोधी दुर्धर एवो ते निर्दय सुभूम समस्त छ खंडने साध्या छत्ता विप्रना घातथी किंचित् पण निवयों ( पालो चल्यो) नहीं. (७७) अन्यदा धातकीखंडना भरतने जीतवाने ते उत्सुक थयो. दुःशकुननी जेम मंत्री वगेरेए बहु रीते वार्या छतां चर्मरत्नवडे लवणसमुद्र तरी जवाने ते तैयार थयो. ( अने वधु लश्कर चर्मरत्नपर चडावीने चाल्यो) ते वखते धर्मरत्नने उपाडनारा दरेक देवोनी भावी बुद्धि थइ (७८-७९ ) के-'भा रत्नने वीजा देयो उपाडे छे तेथी हुँ क्षणमात्र विसामो लऊ.' पा प्रमाणे समकाळे सर्वे ( हजारे) देवोनी एषी पुद्धि थवाथी पधा देवोए ते चर्मरत्न छोडी दीधुं. (८०) महापापथी जेम संसारसमद्रमा इषी जाय तेम ते चर्मरत्नसहित सुभूम चक्री शरीरखडे समुद्रमा डूय। गयो अने प्रात्मावड़े नरकमा गयो. (८१) कुयु छ के- चोथा कपाय (अनंतानुबंधी लोम) थी छ खंडनो राजा पाठमो चक्रवर्ती सुभूम सातमी नरके गयो. (८२) ते महावीश धनुष्य उंचा देहवाळो, साठ हजार वर्पना श्रायुवाळो अने सुवर्ण जेवी देहनी कातिवाको हतो. (८३) इति सुभूमः ८ (५५४) भीकाललोकप्रकाश । श्रासीद्वाणारसी नाम काशीदेशे महापुरी । तत्र पद्मोत्तरो नाम राजा ज्वाला च तत्प्रिया ॥८॥ अत्र-जम्म विणीय १ उज्झा २ सावस्थी पंच हस्थिणपुरंमि ८ वाणीरसि ९ कंपिल्ले १० रायगिहे चेव ११ कंपिल्ले १२ ॥१॥ इत्यावश्यकनियुक्त्यभिप्रायेण नवमस्य चक्रिणो वाणारसी जन्मपुरी प्रतीयते, श्रीशांतिसृरिकृताष्टादशोत्तराध्ययनवृत्तौ त्वस्य कुरु- देशे हस्तिनागपुरमुक्तमस्तीति ज्ञेयं. विष्णुनामा तयोः पुत्रो हर्यक्षस्वप्नसूचितः। महापद्मः परश्चकि- सूचकस्वप्नसूचितः॥८५॥ तदोज्जयिन्यां श्रीवर्मो राजा तस्य पुरोहितः। नमुचिर्नाम मिथ्या-गभूत्तस्मिन् पुरेऽन्यदा ॥ ८६ ॥ मुनिसुव्रतनाथ- स्य विनेयः सुनताह्वयः । मूरिभूरिपरीवारो विहरन् समवासरत् ॥ ८७ ॥ गच्छतस्तन्नमस्याथ पू-र्जनान् वीक्ष्य भूपतिः । उपाचार्यमुपेयाय युक्तो नमुचिनामुना ॥ ८८ ॥ वदन वितंडावादेन नमुचिमुरुभिस्सह । शिष्येण लघुनैकेन सद्यो वादे पराजितः ॥ ८९ ॥ विलक्षीभूतवदन-स्ततो द्विष्टः काशी देशमा वाणारसी नामे मोटी नगरी हती. त्यां पद्मोत्तर नामे राजा हता अने ज्वाळा नामे तेनी प्रिया हती. (८४) श्रहीं ' चक्रीयोनो जन्म विनीता १, अयोध्या २ ने श्रावस्तिमा ३, पांच चक्रीनो हस्तिनापुरमा-४-५-६-७-८, पछी वाणारसी ९, कांपिल्य १०, राजगृही ११ अने कांपिन्य १२ मां समजवो. श्रा प्रमाणे भावश्यकनियु- क्तिना अभिप्रायथी नवमा चक्रीनी जन्मपुरी वाणारसी होवार्नु प्रतीत थाय छ, परंतु श्री शातिमरिकृत उत्तराध्ययनसूत्रना १८ मा अध्ययननी वृत्तिमा तो एनो जन्म कुरुदेशमा हस्तिनापुर नगरमा कह्यो छे. पद्मोत्तर ने ज्वाळानो प्रथम पुत्र सिंहस्वमसूचित विष्णु नामनो थयो भने पछी बीजो पुन चक्रवर्तीना जन्मसूचक चोंद स्वमनडे महापमनामे थयो. (८५) ते वखते उज्जयिनीमा श्रीवर्म नामे राजा हतो. वेने नमुचि नामे प्रधान हतो ते मिथ्यादृष्टि हतो. अन्यदा ते नगरमा मुनिसुव्रतस्वामीना शिष्य सुव्रत नामना आचार्य पणा परिवार सहित विचरता विचा- रता समवसयो. (८६-८७) तेने वंदन करवा माटे नगरजनोने जता जोइने राजा नमुचि प्रधानसहित त्यां गयो. (८८) त्यां गुरुनी साथे वितंडावादबडे वाद करता नमुचिने जोइने एक लघुशिष्ये थोडा वखतमा ज तेने वादमा पराजित कर्यो. (८९) एटले चिरुखा एखवाळो थइने ते पोताने स्थाने गयो. पछी दुष्ट बुद्धिवाळो भने द्वेषी एवो ते सर्ग ३३ मो। (५५५) स दुष्टधीः । मुनीन् हंतुं गतो रात्रौ देवेन स्तंभतो दृढं ॥ ९० ॥ प्रातर्नु- पादिभिर्लोक-दृष्टः कष्टेन मोचितः । धिक्कृतो हीविलक्षास्यः स ययौ हस्तिनापुरं ॥ ९१ ॥ मंत्री जातो महापद्म-युवराजस्य तत्र सः। जग्राह सिंहसामंतं दुष्टं जनपदगुहं ।। ९२ ॥ ततो वरं वृणीष्वेति महापद्मोऽन- वीदमुं। स स्माहास्तु वरः कोशे याचिप्येऽवसरे विभो !॥ ९३ ॥ ततो महापद्ममात्रा-ऽकारि जैनरथोमहान् । लक्ष्मीनाम्न्या सपल्या च शैव्या ब्राह्मरथोऽत्र च ॥ ९४ ॥ श्रादावुत्सवमाश्रित्य विवादे प्रसृते तयोः । द्वयोः साम्याय भूपस्तौ रथौ द्वावप्यवारयत् ॥ ९५॥ महापद्म- स्ततोऽध्यासी-द्धिग्मां जातमनर्थकं । मयि सत्यपि यन्मातु-हतो रथ- मनोरथः ॥ ९६ ॥ अहो ममापि न मनाग् पित्रा दाक्षिण्यमीक्षितं । इति देशांतरं द्रष्टुं स मानी निरगात्ततः ।। ९७ ॥ यदि राज्यमहं लप्स्ये तदा मातुर्मनोरथं । पूयिष्यामि निर्माय इमामर्हच्चैत्यमंडितां ॥ ९८ ॥ नमुचि रात्रे गुरुमहाराजने हणवा गयो, एटले देवे तेने दृढपणे स्तंभित करी दीघो. (९०) प्रभाते राजाविगैरे लोकोए ते स्थितिमा तेने जोयो अने महाकटे छुटो कराव्यो. अहीं धिकार पामेलो अने लज्जावडे विलच वदनवाळो थयेलो ते उज्जयिनी छोडीने हास्तनापुर गयो. (९१) त्यां ते महापद्म युवराजनो मंत्री थयो. त्यां रह्यो सतो ते ते देशनो द्रोह करनारा सिंह नामना दुष्ट सामंतने बांधी लाग्यो. (९२ ) तेना पराक्रमी तुष्टमान थयेला महापनकुमारे ' वर माग' एम तेने कां. ते बोल्यो के-' हाल तो हे स्वामी ! ए घर भंडारमा राखो, अवसरे मागीश. (९३) हवे महापानी माताए एक जैनरथ घणो मोटो कराव्यो भने तेमनी सपत्नी शैव. धर्मी लक्ष्मी नामे हती तेणे नासरथ कराव्यो. (९४) ते रथने फेरववानो प्रथम उत्मव करवानी ने राणीमोए आग्रहपूर्वक मागणी करी एटले राजाए समानता जाळवा माटे चनेना रथनो महोत्सव बंध रखाव्यो. (९५) ते चखते महापद्म विचारवा लाग्यो के- निरर्थक जन्मेला एवा मने धिक्कार छ के मारी हयाति छतां मारी मातानो मनोरथ हणाइ गयो ! (९६ ) अहो ! मारा पिताए मारुं कांह पण दाक्षिण्य साचव्युं नहीं.' एम विचारीने मानी एवो महापद्म देशांतर जोवानी इच्छाथी त्यांधी नीकळी गयो (९७) अने विचार्यु के-" जो हुँ गज्य पामीश तो प्रथम मातानो मनोरथ पूर्ण करीश अने मा पृथ्वी जिन चैत्योबडे मंडित करीश अर्थात् संख्याबंघ जिनचैत्यो करावीश. " (९८) (५५६) भीकाललोकप्रकारा। ध्यायन्निति भुवि भ्राम्यन् स लेभे विविधाः श्रियः । निधानानि नव प्राप रत्नानि च चतुर्दश ॥ ९९ ॥ साधयित्वा च पट्खंड-राज्यं प्राज्य. पराक्रमः । हस्तिनापुरमागत्य स ननाम पितुः पदौ ॥ १०० ॥ स्त्रीरत्न चास्य मदना-वली नागवतीभवा । जनमेजयराजस्य सुता चंपा- पतेरभूत् ॥ १॥ सुव्रतस्वामिशिष्यस्य सुव्रतस्यांतिके मुनेः। पद्मोत्तरश्च विष्णुश्च वैराग्यरसवासितौ ॥ २॥ व्रतं जगृहतुः पद्मो-त्तरस्तत्र ययौ शिवं । वि. ष्णुश्चोत्पन्नविविध-लब्धिर्विहृतवान् भुवि ॥३॥ महापद्मोऽभिषिक्तोऽथ चक्रित्वेऽशेषपार्थिवैः । मातुर्मुदे रथं जैनं पुरेऽभ्रमयदुत्सवैः ॥ ४ ॥ चकार भारती भूमि जिनचैत्यैरलंकृतां । परशतैः पुरग्राम-दुर्गशैलव- नादिपु ॥ ५॥ तस्थिवत्सु चतुर्मासी हस्तिनाख्यपुरेऽन्यदा । सुव्रतर्षिषु दुष्टात्मा नमुचिर्जेनसाधुपु ॥ ६ ॥ महापद्मादयाचिष्ट प्रभोासीकृतं वरं । सोऽपि तेनार्थितं राज्यं ददौ यज्ञोत्सवा- या प्रमाणे विचारीने पृथ्वीपर ममतो ते विविध प्रकारनी संपदा पाम्यो. नव निधान पाम्यो भने चौद रत्नो मेळव्या. ( ९९ ) पछी अत्यंत पराक्रमवाळा तेणे छ खंड साध्या-वधा राजाोने वश कर्या अने पछी हस्तिनापुर भावी पिताना चरणमा नमस्कार कर्यो. (१००) चंपापति जनमेजय राजा भने नागमतीनी पुत्री मदनावली तेनुं स्त्रीरत्न थयु. (१) अन्यदा मुनिसुप्रतस्वामीना शिष्य सुघताचानी पासे पैराम्य रंगपी चासित थयेला पद्मोत्तरराजाए भने विष्णुकुमारे चारित्र ग्रहण कयु. तेमां पद्मोत्तरराजा मोक्षे गया अने अनेक लन्धिो जेने उत्पन्न थमेल के एवा विष्णुकुमार मुनि पृथ्वीपर विहार करवा लाग्या. (२-३) अहीं पद्मोत्तर राजाए दीक्षा लीधी तेज वखते समस्त राजाभोए मळीने महापद्मने चक्रीपणानो अभिषेक कर्यो. पछी माताने हर्ष पमाडवा माटे घणा उत्सवपूर्वक तैमनो करावेलो जैनस्थ श्राखा नगरमा फेरवाव्यो, ( ४ ) तेम ज पुर, ग्राम, दुर्ग, पर्वत अने वन विगेरे सर्व ठेकाणे सेकहो जैनचैत्यो करावीने तेवडे तेणे समग्र भरतखंडनी पृथ्वी सुशोभित करी. ( ५ ) अन्यदा सुव्रताचार्य हस्तिनापुरमा आवीने चातुर्मास रह्या. ते वखते जैन साधुप्रत्ये परमदेषी दुष्टात्मा नमुचिए महापद्मपासे थापणरूप राखेलो वर माग्यो. महापो पण , मर्ग ३३ मो। (५५७) वधि ॥७॥ युग्मम् ॥ अथैनं पार्थिवं नव्यं सर्वे सेवितुमैयरुः । पाखंडिनो विना जैन-मुनीन् छिद्रं तदेव च ॥ ८॥ पुरस्कृत्याब्रवीत्सोऽपि साधू- नाहूय संसदि । भो यूयं लोकमर्यादा-मपि वित्थ न किं जडाः ? ॥९॥ युग्मम् ॥यन्नंतुंनागता नव्य-नृपं तदथ गच्छत । दूरं विहाय मद्देशं न चेन्नि- ग्रहमाप्स्यथ ॥ १० ॥ घोधितोऽप्यवदद्दष्टः स चेत्सप्तदिनोपरि। यः कोऽपि भवतामत्र स्थाता हंतव्य एव सः ॥ ११ ॥ ततो लब्धिमतैकेन साधुना विष्णुमायन् । सूरयो वत्सरशतान् पष्टिं तीव्रतपोजुपं ॥ १२ ॥ ततो विष्णुकुमारेण बोधितोऽपि कदाग्रही । पदत्रयमितं स्थानं याचितस्त- इंदौ क्रुधा ॥ १३ ॥ त्रिपद्याः परतस्तिष्ठन् शीर्पच्छेद्यो भवत्विति । तेनोक्ते धितो विष्णु-विचके वैक्रियं वपुः ॥ १४ ॥ द्वाभ्यामाक्रम्य पादाभ्यां प्राक्प्रत्यग्वाद्धिवेदिके । नमुरमुचन्मूर्ध्नि तृतीयं चरणं ततः ॥१५॥ इत्युपदेशमालाकर्णिकाद्यभिप्रायः, त्रिषष्टीयपद्मचरित्रोत्तराध्य- तेनो यज्ञ चालता सुधी (७-८ दिवस ) तेणे प्रार्थना कर्या प्रमाणे राज्य सोप्यु. (६-७) मा नवा राजानी सर्वे सेवा करवा अाव्या, सर्वे पाखंडीभो तेनी पासे श्रावी गया; मात्र जैन मुनि न अाव्या. ते छिद्र पामीने ते यातने भागळ करी जैनमाधुने सभामा बोलाची तेणे कर्दा के-' हे मूर्यो ! शुं तमे लोकमर्यादा पण जाणता नथी ? (८-९) केमके नवा राजाने प्रणाम करवा माटे पण तमे पाव्या नथी, तो हवे तमे मारो देश मूकीने दूर चाल्या जाओ नहीं तो हुँ तमारो निग्रह करीश. ' (१०) तेने घणी रीते समजाव्या छता ते दुष्ट वोल्यो के-' सात दिवस पछी जो तमारामाथी कोइ पण अहीं मारा राज्यमां रदेशे तो तेने मारी नांखवामां श्रावशे. (११) पा प्रमाणे तेनो हुकम थता आचार्य लब्धिवाळा एक मुनिने छ हजार वर्षथी तीव्र तप करता विष्णुकुमारने ( मेरुपर्वतनी चूलिकापरथी) चोलाववा मोकन्यो. (१२) तेणे जइने बधी हकीकत कही एटले तेणे गुरुपासे प्रावीने वधी वात सांमळी. पछी ते नमुचिपासे गया. विष्णुकुमारे बहु रीते समजाव्या छतां ते कदाग्रही नमुचि समज्यो नहीं. लेवटे तेमणे त्रण पगला जमीन मागता नमुचिए क्रोधायमान थइने आपी अने कां के प्रण पगलाथी बहार रद्देशो तो शिरच्छेद करवामा प्रावशे.' आम कहेवाथी क्रोधायमान ययेला विष्णुकुमार मनिए वैक्रिय शरीर विस्तायु, (१३-१४ ) अने तेना ये पगवडे पूर्वने पश्चिम लवणसमुदनी वेदिकार्नु भाक्रमण करीने-तेनी जगती उपर चे पग मूकीने त्रीजो पग नमुचिना मस्तक- पर मूल्यो. (१५) या प्रमाणे उपदेशमाळाकर्णिका विगेरेनो अभिप्राय छे. विषष्टीय- .

.. (५५८) भीकामलोकप्रकारा। यनवृत्त्याधभिप्रायस्त्वेवं-अपातयत्पातकिन नमुचिं भूतले ततः । एत्य ज्ञातस्वरूपेण महापद्मेन चक्रिणा । क्षमितः शमितो देवां-गनाभिः शम- गीतिभिः ॥ १६ ॥ नतः स्तुतो जनः सर्वेः प्रशशाम महाशयः। थालो. चितातिचारोऽसौ केवलं प्राप्य निर्वृतः ॥ १७ ॥ कालांतरे महापद्म-श्वक्रवर्त्यपि चिंतयन् । संसारासारतां दीक्षा कक्षीकृत्य ययौ शिवं ॥१८॥ त्रिंशदव्दसहस्रायु-स्तुंगश्चापानि विंशति । नवमोऽनवमश्चक्री महापद्मोऽयमीरितः ॥ १९ ॥ इति पद्मः । महाहरिरभूद्राजा कांपील्यपुरभुपतिः। तस्य मेराभिधा भार्या हरिपेणः सुतस्तयोः॥२०॥ साधिताशेषपखंडो दशमश्चक्रवर्त्यसौ। कदाचिच्चिंतया- मास चतुरश्चतुरोचितं ॥२१॥ मया समृद्धिलब्धेयं प्राग्भवाचरितैः शुभैः। ततोऽमुत्र हितं कुर्वे भविष्यद्भद्रसिद्धये ।। २२ ॥ कक्षीकृत्य ततो दीक्षा तपः कृत्वा च दुष्करं । अवाप्य केवलज्ञानं स लेभे शाश्वतं सुखं ॥२३॥ दशवर्षसहस्रायुः स्वर्णकांतिर्महामतिः । कोदंडान्युच्छूितः पंच-दशासौ पमचरित्रनो ने उचराध्ययनवृत्तिनो अमिप्राय तो प्रावो के के महापापी एवा नमुचिने पृथ्वीपर पाही दीघो. ते वखते मा हकीकत जाणवाची तरत ज महापम चक्रीए त्यां प्राचीने विष्णुकुमारने खमाध्या अने देवांगनाभोए शांतिमय संगीत करवावडे शांत कर्या.' (१६) त्यारपछी सर्व लोकोए मावीने नमस्कार कर्या भने स्तव्या ण्टले ते महाशय शांत थया. पछी ते अतिचारने आलोवी प्रतिक्रीने विष्णुकुमार मुनि केवळज्ञान पामी मोक्षे गया. (१७) काळांतरे महापद्म चक्रवर्ती पण संसारनी श्रमारता चिंतकीने दीक्षा अंगीकार करी मोक्षे गया. (१८) तेमनुं आयुष्य त्रीश हजार वर्ष, अने शरीर वीश धनुष्यनुं हतुं. श्रा प्रमाणे श्रेष्ठ एवा नवमा चक्री महापद्मनुं चरित्र अमे कडं. (१९) इति पद्मः ९ कोपिन्यपुर नगरमा महाहरि नामे राजा हता. तेने मेरा नामे भार्या हती. तेनो पुत्र हरिपेण नामे थयो (२०) समस्त छ खंड साधीने ते दशमा चक्री थया. अन्यदा चतुर एवा तेमणे चतुर पुरुपने योग्य होय ते, चिंतव्यु (२१) के-' में पूर्वभवमा आचरेला शुभकार्यवडे श्रा ऋद्धि मळेल छ तो हवे आगामी भवन हित करूं के जेथी भविष्य- काळमां कल्याणनी-मोचनी सिद्धि थाय.' (२२) आम विचारी दीक्षा अंगीकार करीने दुष्कर तप तपी केवळझान पामी तेणे शाश्वतसुख मेळव्यु. ( २३) ते महामतिर्नु दश हजार वर्षतुं श्रायु हतं, स्वर्णसमान देहकांति हत्ती अने पंदर धनुष्य प्रमाण शरीर हतं.

पगै १३ मो । (५५९) कीर्तितः श्रुते ॥ २४ ॥ इति हरिपेणः । अश्वसेनाभिधोऽथासी-द्राजा राजगृहे पुरे । वप्रा तस्य प्रिया प्रेष्ठा जयनामा तयोः सुतः ॥ २५॥ एकादशश्चक्रवर्ती सोऽन्यदा भावयन् हृदि । भवस्वरूपं संप्राप्त-वैराग्यो जगृहे व्रतं ॥ २६ ॥ स द्वादशधनु- स्तुंगः प्राप्य केवलमुज्ज्वलं । आयुर्वर्षसहस्राणि त्रीण्यापूर्य ययौ शिवं ॥ २७ ॥ इति जयः। ब्रह्माह्वयोऽभवद्राजा कांपील्यपुरभूपतिः। चुलनी दयिता तस्य ब्रह्मदत्तस्तयोः सुतः ॥ २८ ॥ अस्य च ब्रह्मराजस्य चत्वारः सुहृदोऽ. भवन् । कणेरदत्तः कुरुराट् काशीशः कटको नृपः ॥ २९ ॥ दीर्घराजः कोशलेशः पुष्पचूलोंगभूपतिः। पंचापि वर्पधारेण तेऽवसन्नेकपत्तने ॥३०॥ द्वादशाब्दं वयः प्राप्ते वह्मदत्ते पितास्य च । व्यपद्यत शिरःशूलात् शेषै- मित्रैस्ततः क्रमात् ॥ ३१ ॥ बालस्य मित्रपुत्रस्य पालनायानुवत्सरं । एकैकेन स्थेयमिति प्रतिज्ञातं हितावहः ॥ ३२ ॥ अथ तत्र स्थितो दीर्घ- ए प्रमाणे शास्त्रमा कहेल छे. (२४) इति हरिपेणः १०. राजगृह नगरमा अश्वसेन नामे राजा हतो. वप्रा नामे तेनी वहाली प्रिया हती. तेमनो जय नामे पुत्र थयो. ( २५) ते अग्यारमा चक्री थया. एकदा तेमणे संसारस्वरूप हृदयमा विचारता वैराग्य उत्पन्न थवाथी चारित्र अंगीकार कर्पु. ( २६ ) पार धनुष्यना शरीरवाला ने त्रण हजार वर्षना आयुष्यवाळा ते केवळज्ञान पामी आयु पूर्ण करीने मोखे गया. (२७) इति जयः ११ कोपिन्यपुरमा ब्रह्म नामे राजा हतो. तेने चुलनी नामे स्त्री हती. तेमने ब्रह्मदत्त नामे पुत्र थयो हतो. (२८) ते ब्रह्मराजाने चार मित्रो हता. १ कुरुदेशनो राजा कणेरदच, २ काशीदेशनो राजा कटक, ३ कोशलदेशनो राजा दीर्घ भने ४ अंगदेशनो राजा पुष्पचूल-एमा ए राजानो एक एक वर्षना वारा प्रमाणे एक एक मित्रना राज्यमा एकठा मळीने रहेता हवा. (२९-३०) ब्रह्मदत्त चार वर्षनो थयो ते वखते मस्तकशूलना ध्याधिथी तेना पिता ब्रह्मराजा मरण पाम्यो. एटने चाकीना चार मित्र राजामोए प्रमाद चर्नु हित इच्छीने पाळ एवी मित्रपुत्रनुं परिपालन करवा माटे एकेक वर्ष वारा फरवी तेना राज्यमा रहे एवी प्रतिज्ञा करी. (३१-३२) पहले वर्षे त्यां रहेल दीर्घराजा (५६०) मीकाललोकप्रकाशा राजो रक्तामरीरमत् । चुलनीं राज्यसर्वस्वैः सहोदूढामिव स्त्रियं ॥३३॥ मंत्री च घमराजस्य धनुर्नामा व्यचिंतयत् । मार्जार इव दुग्धस्य रा- ज्यस्यास्यैप रक्षकः ॥ ३४ ॥ मित्रपत्नी रमयता यशो गमयता निजं । धिगनेन ब्रह्ममैत्री शातिता लज्जया सह ॥ ३५॥ मैवं स्त्रीराज्यलुब्धोऽयं ब्रह्मदत्तं वधीदिति । धनुर्वरधनुं पुत्रं तद्यनाय न्ययोजयत् ।। ३६ ॥ बह्मदत्तोऽपि विज्ञाय दीर्घराजकुचेष्टितं । दृष्टांतर्विविधैः स्पष्टं स्वाभिप्रा- यमदीहशत् ॥ ३७॥ संयोज्य वायसं हंस्या तौ हत्वा चैवमब्रवीत् । एताविव मया घात्यौ नीतिविप्लवकारिणौ ॥३८॥ अहं काकस्त्वं पिकीति बालो न्यायमदर्शयत् । जारेण चुलनीत्युक्ताप्राह बालादिभेपिकि ? ॥३९॥ एकदा भद्रहस्तिन्या संयोज्य मृगहस्तिनं । ऊचाने पूर्ववद्वाले राज्ञी दीर्घा जगाविति ॥४०॥ नावयोर्जीवितं कांते जीवत्यस्मिन् सुते तेनी साथे रक्त थयेली चुलनीनी साथे राज्य सर्वस्वनी साथे ज परणेली स्त्रीनी जेम कामक्रीडा करवा लाग्यो. ( ३ ) प्रा बधुं जोइने ब्रह्मरा- जानो धनु नामनो मंत्री विचारवा लाग्यो के-' मार्जारने जेम दूध सौंप- वामां आवे तेम पाने या राज्यनो रक्षक को छे. (३४) आ दीर्घराजाए मित्रपत्नीसाथे रमता भने पोताना यशने गुमावतां लजानी साथे ब्रह्मराजाप्रत्येनी मैत्रीनो पण नाश कर्यों छे. तेने धिक्कार छ । (३५) पण हवे स्त्री अने राज्यमा लुब्ध एवो ए ब्रह्मदत्तपुत्रनो वध न करो' एम विचारी धनुमंत्रीए पोताना वरधनु नामना पुत्रने तेनुं रक्षण करवा राख्यो-तेनी योजना करी. (३६) ब्रह्मदत्त पण दीर्घराजानुं कुचे. टित समजी जइने विविध दृष्टांतोपडे पोतानो अभिप्राय स्पष्टपणे तेने जणाववा लाग्यो. (३७) कागडाने हंसीसाथे जोडी दइने ते बनेने हणी नाखी आ प्रमाणे बोल्यो के- 'पानी जेम जे नीतिनो लोप करशे तेने हुं मारी नाखीश. (३८) भा हकीकत सांम- ळीने जार एषा दीर्घराजाए चुलनीने कमु के–' हुँ कागडो ने तुं कोयल- श्रा प्रमाणे या बालके न्याय बताव्यो छे एटले चुलनी कहे छे के- भावा पाळकथी तेम शामाटे बीहो को ? ( ३९ ) एकदा भद्र जातिनी हाथिणी साथै मृगहस्तीनी संबंध करावीने पूर्व प्रमाणे ज ब्रह्मदत्त बोन्यो, एटले चुलणी राणीने दीर्घराजाए कह्यु (४०) के--' हे प्रिया ! मा १ इनकी जातनो हाथी. . - सर्ग ३६ मो। तव । तदस्मै यदिवा प्रेम्णे देयोऽवश्यं जलांजलिः ॥४१॥ एतादृग्दुर्वधः पुत्र-स्तादृक् प्रेमापि दुस्त्यजं । इति दोलावलं विन्यां चुलन्यामयमत्र- वीत् ॥ ४२ ॥ नाहं न च तं सत्यस्मिन् मत्सत्वे वहबोंगजाः । व्यापा- योऽयमवश्यं तन्मां जीवंतं यदीच्छसि ।। ४३ ॥ ततः प्राणसमः पुत्र प्राणेशस्तु ततोऽधिकः। ध्यात्वेत्यात्मजघातं सा तदाक्षिण्यादमन्यत ॥४४॥ उक्तं च-नितंविन्यः पतिं पुत्रं पितरं भ्रातरं चणात् । आरो- पयंत्यकार्येऽपि दुर्वृत्ताः प्राणसंशये ॥ ४५ ॥ अथ मंत्री धनुर्दीर्घ-राजमूचे कृतांजलिः। यामि तीर्थमहं जीर्णः पुत्रस्त्वां सेविता मम ॥ ४६ ॥ धीमाननर्थ मा कार्षी-स्पतितोऽयमितो बहिः । इत्यूचे मंत्रिणं दी? दंभकोमलया गिरा ॥४७॥ त्वयैवं त्वत्प्रभो राज्यं सनार्थ साक्षिणो वयं । तत्तपस्व तपोऽत्रैव स्वैरं सुरसरित्तटे तारो पुत्र जीवतो रहेशे तो भापणुं जीवित समजवू नहीं; माटे क्यां तो एने ने क्यां तो भापणा प्रेमने अवश्य जलांजलि आपवी पडशे.' (४१) आ प्रमाणे तेना वचनो सामळीने चुलनीनुं मन हिंचोळे चडधु के एक वाजु आवो ( चक्रवर्ती थनार ) पुत्र दुर्वध (बध न करी शकाय तेवो) छे अने चीजी बाजु दीर्घसानो प्रेम पण दुस्त्यज (तजी न शकाय तेवो) छे. भावी रीते विचारमा पडेली चुलनी प्रत्ये दीर्घ बोन्यो (४२) के-'आ पुत्र छते तो तुं ने हुँ जीववाना ज नथी. वळी हुं छतां तारे घगा पुत्रो थशे, माटे जो मने जीवतो रहेवा इच्छती हो तो तारे अवश्य आ पुत्रने मारी नाखको ज पडशे.' (४३) या प्रमाणे समिळीने “प्राणसमान पुत्र के अने आ प्राणेश तेथी पण अधिक थे" एम विचारीने तेनी दाविण्यताथी पुत्रनो वध करवानुं चुलनीए कभूल कयु. (४४) कह्यु छ के-दुराचरणी स्त्री पतिने, पुत्रने, पिवाने तेमज भाइने पणमात्रा प्राणसंशयरूप अकार्यमां पण भारोपण करे छ अर्थात् तेमा जोडी दे छ- प्राणनो नाश करे छे.'(४५) हवे धनुमंत्री दीर्घराजा पाप्ते भाषी हाथ जोडीने कहे छ के-'हुं वृद्ध थयो छु तेथी तीर्थे निवास करवा जाउं छु भने मारो पुत्र तमारी सेवा करशे.' (४६) ते सामळीने 'भा मंत्री अहीथी बहार गयो सतो अनर्थ म करो' एम धारीने दीर्घराजाए दंभवडे कोमळ एवी वाणीथी मंत्रीने कर्यु के-'तमारावडे ज तमारा सामानु भा राज्य सनाथ छे. अमे तो सापीरूप बीए, तेथी तमे भहीं ज गंगा नदीने किनारे निघास (५६२) भीकामलोकप्रकारा। ।। ४८ ॥ नतः स्वर्गापगातीरं सत्रागारे स तस्थिवान् । पुरांतःपुरवात्ता च विदन् सवा सुतोदितां ॥ १९ ॥ कन्यका पुष्पचूलस्य ब्रह्मदत्तकृतेऽर्थिता । चुलनीदीर्घराजाभ्यां जिघांसुभ्यां छलेन तं ॥५०॥ सुतं हतुं जतुगृहं चुलनीदीर्घका- रितं । ज्ञात्वा सुरंगां द्विकोशां धनुश्छन्नामकारयत् ॥ ५१ ॥ तत्सर्व पुप्पचूलस्य धनुना ज्ञापितं रहः । ततः सोऽपि सुतास्थाने दासी- मप्रेषयद्वरां ॥५२॥ जातेऽथ सुतवीवाहे सुतं प्रैपीत्स्नुपान्वितं । जातुके वासभवने चुलनी कुलनीलिका ॥ ५३ ॥ बालं सुप्तं सुतं सद्यः परिणीतं स्नुपान्वितं । अंत्यदेहापि चुलनी जिघांसामास धिक् स्मरं ॥ ५४॥ जाग्रस्येव ब्रह्मदत्ते मित्रचित्रकथारसैः। जज्वाल चुलनीक्षिप्तो ज्वलनोऽस्मिन् गृहेऽभितः ॥ ५५ ॥ ततोऽधःस्थसुरंगां मां मंत्रिपुत्रेण दर्शितां । लूतापुटवदुद्भिद्य निरगान्मित्रयुक् ततः करीने स्वेच्छापूर्वक तप तपो.' (४७-४८) श्राम कहेवाथी ते गंगा नदीने किनारे दान- शाळामा रह्यो भने तेना पुत्रनी कहेली नगरनी ने अंतापुरनी वार्ता बधी यथार्थ समि- ळवा लाग्यो. (४९) कोइ पण प्रकारनो छळ करीने ब्रह्मदत्तने मारी नाखवाने इच्छता एवा चुलनी ने दीर्घराजाए ब्रह्मदत्तने माटे पुष्पचूल राजानी पुत्रीनी मागणी करी. तेणे ते मागणी स्वीकारी. (५०) पछी ब्रह्मदत्तने हणवा माटे चुलनी ने दीर्घराजाए एक लाखनुं घर तेने शयन करवा सारु करापुं. १ पात जाणीने धनुमंत्रीए ते लाखना परथी ये माउ- सुधी सुरंग प्रच्छन रीते करावी. (५१) पछी ए वात धनुमंत्रीए पुष्पचूल राजाने जणावी एटले तेणे पण पुत्रीने बदले एक सुंदर दासीने मोक्ली. (५२) पछी पुत्रनो विवाह थये सते पुत्रवधू सहित पुत्रने ते लासना घरमा कुळने काळं करनारी चुलनीए सुवा माटे मोकन्या. (५३ ) की कहे छ के-'जुश्रो ! बाळक, पुत्र, सुतेलो, तरतनो परणेलो भने पुत्र- वधू सहित तेने पण मारवा माटे अंत्यदेहा (छेना शरीरवाळी-चरमशरीरी) एवी पण चुलनी तैयार थइ तेथी एका कामदेवने धिक्कार छे! (५४) अहीं ब्रह्मदत्त पोताना मित्र वरधनुसाथै विचित्र कथारसने लीधे हजु जागे के तेवामा दो चुलनीए क्षेपन करेलो ममि मा लाखना घरने चोतरफथी पाळवा लाग्यो. (५५) ते वखते मंत्रीपुत्रे बतावेली शय्यानी नीचना भागमा रहेली सुरंगनी पृथ्वीने करोलीयाना पहनी जेम पर्ग ३१ मो। ॥ ५६ ॥ धनुना धारितावश्वा-वारुह्येतावुभावपि । निशि तस्यामया- सिष्टां पंचाशद्योजनी द्रुतं ॥ ५७ ॥ अतिश्रमाद्विपन्नौ तौ तुरंगौ पंचहा- यनौ । ततः पद्भ्यां प्रस्थितौ तौ छन्नं दीर्घचमूभयात् ॥ ५८ ॥ प्राच्य- पुण्यानुभावेन ब्रह्मदत्तः पदे पदे । पर्यणेपीद्बहुतरा भूचरीः खेचरीः कनीः ॥ ५९ ॥ क्रमास भूरिसंपत्तिः पितृमित्रैस्त्रिभिर्नृपः। ससैन्यैः कृतसाहाय्यः कांपील्यपुरमभ्यगात् ॥ ६०॥ रुद्धऽभितः पुरे तस्मिन् दीर्घोऽपि निरगाद्वहिः । तयोः प्रववृते युद्धं रामरावणयोरिव ॥ ६१ ॥ अयुध्य(ध्ये)तामथ ब्रह्म-दत्तदी! परस्परं । शस्त्रच्छलेन रोपानि क्षिपतौ चिरसंचितं ।। ६२ ।। खिन्नस्य ब्रह्मदत्तस्य दुर्जये बलवत्यरौ । अलंचके 'करं चक्र-रत्नं पुण्यमिवांगभृत् ॥ ६३ ॥ दत्तायां दीर्घनिद्रायां तेन दीर्घस्य दृप्यतः । चक्रिन् जयजयेत्यस्मिन् पुष्पाणि वपुः सुगः ॥६॥ साधयित्वाथ पखंडां पृथिवीं प्रौढशासनः । निदानोपार्जितांश्चक्री भो. गान् भुक्ते स्म गृद्धिभाक् ॥ ६५ ॥ भेदीने ब्रह्मदत्त मित्र सहित तेमाथी बहार नीकल्यो. (५६) त्यां धनुमंत्रीए तैयार राखेला ये अश्योपर प्रारोहण करीने ते पंने पाकी रहेली रात्रिमा ज उतावळा पचास योजन नीकळी गया. (५७) त्यो पांच पांच वर्पनी वयवाळा ते घोडा अतिश्रम लाग- याधी मरण पाम्यां. एटले पछी ते ने दीर्घराजानुं लश्कर भावी पहोंचवाना मययी पगपाळा छानी रीते भागळ चान्या. (५८) पूर्वपुण्यना प्रमावधी प्रसादच स्थाने स्थाने घणी भूचरी ने खेचरी कन्याभो परण्यो. (५९) अनुक्रमे ते घणी संपत्ति मेळवीने पिवाना प्रणे मित्रोए सैन्पसहित करेली सहायवड़े कोपिन्यपुर भाम्पो. (६०) तेणे चौतरफथी सैन्यवडे नगरने वींटी लीधुं एटले दीर्घराजा पण नगरनी बहार नीकळयो. पछी रो बनेनु-ब्रह्मदत्त ने दीर्घराजानुं युद्ध राम-रावणनी जे प्रयत्यु. (६१) ब्रह्मदत्त ने दीर्घ शसने मिषे चिरकाळना एकत्र करेला रोपानिने क्षेपवता सता परस्पर लडवा लाग्या. (६२) एवी रीते बळवंत ने दुर्जय शत्रुनी साये लहतां ब्रह्मादच खिन्न थयो. एटलामा अंगधारी पुण्यनी जेवा पक्ररत्ने प्रावीने तेना हाथने शोमाव्यो.(६३) सरत ज ते चक्र- बडे मतदत्ते दीर्घराजाने दीर्घनिद्रा पमाट्यो अर्थात् मारी नांख्यो. ते वखवे ' हे चक्री ! जयवंता वों, तमारो जय यानो' एम पोलता देवोए मना पर पुष्पनी घष्टि करी.(६४) पछी पटसंड पृथ्वीने साधीने प्रौढ शासनवाळो प्रहादत नियागारहे उपार्जन करेला मोगोने मां अत्यंत पासक्त थाने मोगववा लाग्यो. (६५) (५६४) भोकालोकप्रकारा। मां प्राप्तराज्यमाकर्ण्य तूर्ण मित्रापतेरिति । दुर्दशासु सहायं यं चकी स्माह द्विजं पुरा ॥६६॥ स चक्रिणमुपेयाय दीयमाने च वांछिते । ऐच्छत् पत्नीधिया भोज्यं प्रतिगेहं सदक्षिणं ॥६७॥ प्रारभ्य स्वगृहाच्चक्री ददौ तस्मै तदीहितं । श्रन्यदा प्राक्संस्तुतोऽन्य-स्तं विप्रः कोऽप्युपाग- मत् ।। ६८ ॥ सोऽयाचिष्ट मुदा चक्रि-भोज्यं कल्याणनामकं । नेदं ते जीर्यतीत्युक्ते कृपणोऽसीत्यवक स तं ॥ ६९ ॥ सकुटुंवं द्विजं चक्री स्वं भोजनमभोजयत् । ततः सर्व स्मरोन्मत्तं तत्कुटुंबमभून्निशि ॥ ७० ॥ मातृपुत्रसुतावतृ-स्नुपाश्वशुरभेदमुक् । तत्कुटुंवं निशा सर्वा-मप्रवर्चत मैथुने ॥ ७१ ॥ ततस्त्रगतुरस्त्यत्वा कुटुंब निर्ययौ बहिः । विप्रोऽजानन् निजं दोपं चक्रिणि द्वेपमुद्वहन् ॥ ७२ ॥ कंचित्काणीकृताश्वत्थ-पत्रं कर्करिकाकगः । ऐक्षत क्वाप्यजापालं सूक्ष्मवेधकृतश्रमः ॥७३॥ चक्रिणं शिक्षयाम्यद्य मस्कुटुंबविडं विनं । ध्यात्वेति तं वशीचक्रे स द्रव्यदक्षिणा- ब्रह्मदचने पूर्षे दुर्दशाना बखतमा एक द्विजे सहाय करेली तेणे कहेलु के-'हे मित्र ! मने राज्य प्राप्त थयानुं सांमळ एटले तुं तरत मारीपासे भावजे ' तेथी ते द्विज नक्रीपामे प्राव्यो. तेने जे इच्छे ते आपवानुं चक्रीए कधू एटले तेथे पत्नीनी पुद्धि ( मलाह ) प्रमायो आखा भरतक्षेत्रमा प्रत्येक गृहे भोजन ने दक्षिणा मळे एम माग्यु. (६६-६७) चक्रीए तेना मागवा प्रमाणे पोताना घरथी ज शरुभात करीने प्रथम भोजन प्राप्यु. अन्यदा पूर्वना परिचयवाळो चीजो कोइ विन चक्रीपासे भाव्यो. (६८) तेणे हर्षवडे चक्रवतींना न्याण भोजननी याचना करी. चक्रीए कह्यु के-'ते वने जरशे (पचशे ) नहीं. ' एटले विप्र बान्यो के-'तमे कृपण छो.' (६९) चक्रीए सहकुटुंब ते विप्रने पोतार्नु भोजन जमाइयुं, तेथी तेनुं श्राखं कुटुब रात्रे कामोन्मत्त थयु. ( ७० ) एटले माता-पुर, पुत्री-पिता, पुत्रवधू-सासरो विगेरेना भेद विना तेनुं कुटुंब माखी रात्री मैथुनक्रियामा प्रवत्यु. (७१) श्राम थवाथी पेलो विप्र लज्जातुर थह पोताना मुटुंचने तजी दइने पोताना दोष न जाणतो अने चक्रीपर द्वेपने वहन करतो त्यांधी बहार- गाम नीकळी गयो. (७२) तेणे मार्गे जा सूक्ष्मवेध करचामा जेणे प्रयास करेलो के एवा अने कांकराबडे पीपलाना पानने कांणा करता (विधता) एवा एक प्रजापाळ ( भरवाड) ने दीठो. (७३) वेने जोइने मारा कुटुंगने विडंबना पमाडनार चक्रीने परापर शिक्षा प्रा.' एम विचाराने ते विप्रे दक्षिणामां मळेला द्रव्यवडे ते भरवाडने । . . - मर्ग ३३ मो। गतेः ॥ ७४ ॥ धृतच्छत्रो गजारूढो योऽयमेति चमूवृतः विनाशयेदृशौ तस्य द्रुतं कर्कशकर्करैः॥ ७५ ॥ स कुड्यांतरितश्चक्र-वर्तिपापैरिवेरितः। लघुहस्तस्तथाकार्षात् पार्श्वस्थेषु सुरेष्वपि ॥ ७६ ।। जुष्टः सुरसहस्राभ्या- मंसस्थाभ्यां नृनिर्जरः । पामरेणांधलीचक्रे चीणे पुण्ये वृथा वलं ॥७॥ तथोक्तं-प्रतिकूलतामुपगते हि विधौ, विफलत्वमेति बहुसाधनता। अव- लंबनाय दिनभर्तुरभू-न्न पतिष्यतः करसहस्रमपि ॥ ७८॥ ततश्च-धृतो नश्यन्नजापाल-श्चक्रियोधैरुदायुधैः । श्रदर्शयत्ताड्यमानो वित्रं तत्र प्रयोजकं ॥ ७९ ॥ कुद्धेन चक्रिणाघाति स विप्रः सान्वय- स्तथा । पुरोहितादयोऽन्येऽपि मूलादुन्मूलिता द्विजाः ।। ८०॥ तथाप्य- शांतकोपेन मंत्रीत्यूचेऽथ चक्रिणा । ढोकय स्थालमेकैकं नित्यं विप्राचि- भिर्भूतं ॥ ८१ ॥ श्लेष्मातकफलैः पूर्ण सोऽपि पात्रमढौकयत् । स्पृशन् विप्राक्षिवुद्ध्या त-न्मुमुर्देतर्दुराशयः ॥ ८२ ॥ अनुभूयांधतामेवं क्रूरः वश कर्यो. (७४) पछी तेने समजाघ्यु के- हाथीउपर पठेलो, माथे छत्र धरावेलो भने सेनाथी परिवरेल जे भा भावे छ तेना ये नेत्रने कर्कश एवा का करावडे तुं फोडी नांख. (७५) ते भरवाडे चक्रवतीनी पासे देवोनी हाजरी छत भीवनी ओथे रहीने चक्रवतींना पापे ज जाणे तेने प्रेरणा करी होय तेम लघुहस्तरूप कळावडे ते प्रमाणे कर्यु अर्थात् पसीना पंने ने फोडी नख्यिा. (७६ ) संभापर रहेला ये हजार देवतामोथी सेवावा एवा ननिर्जर (चक्री) ने पामर एवा भग्वाडे अंध कर्यो, माटे 'पुण्य पीय थये सते पळ नकार छे.' (७७) कमु छ के-'विधाता प्रतिकूळ थये सवे पणुं साधनपणुं पण निष्फळ- पणाने पामे थे. जुभो । सूर्यने नीने पटती पसते करसहस-हजार हाथ (किरण) पण अवलंबनमूत यता नथी.' (७८) पछी भागता एवा मजापाने उंचा करेला भायुधोवाळा चक्रांना योद्धामोए पकट्यो. तेने ताडना करता तेणे मा कार्यना प्रयोजक (प्रेरक) विप्रने यताबी दीघो. (७१) शोधायमान थयेला पक्रीए ते विप्रने सहकुटुंब मारी नसाव्यो भने पुरोहितादि पीजा द्विजोने पण मूळची उन्मूलित करी नारुया. (८०) देम करतो पण कोप शांत न य. पापी पीऐ मंत्रीने फ्यु के-'तमारे दररोज प्रामणोनी मोखो कडाचीने वेनो मरेलो एकेको थाळ मारी पासे घरवा (मको). (८१) मंत्री सम्माठकना फट (पीकणा गुंदा ) बडे पाळ मरीने दररोज मनी पासे म्कया लाग्यो. तेमा प्रामगोनी मांसो के एरी पुदिपी से फळीने पोळतो माठा मंतःकरणपालो चक्री सुशीथवा लाम्पो. (८२) मा . १ श्रीकाललोकप्रकारा। षोडशवत्सरी । विपद्य रौद्रध्यानेन सप्तमं नरकं ययौ ॥ ३॥ सप्तवर्ष- शतायुष्कः सप्त चापानि चोच्छ्रितः । चक्रभृत्सप्तमः पष्ठात् सप्तमीमगम- भुवं ॥ ८४ ॥ इति ब्रह्मदत्तः ॥ गोत्रतः काश्यपाः सर्वे वर्णतः स्वर्णकांतयः । अमीभुवनविख्याता- श्चक्रिणो द्वादशोदिताः ।। ८५ ॥ पट्टराइयो द्वादशानां चक्रिणां द्वाद- शाभवन् । स्त्रीरत्नाख्याश्चतुर्थांगे सुभद्राद्या इमाश्च ताः ॥ १॥-पढमा होइ सुभद्दा १ भद्द २ सुणंदा ३ जया य ४ विजया ५ य । कण्हसिरी ६ सूरसिरी ७ पउमसिरी ८ वसुंधरा ९ देवी१० ॥१॥ लच्छिमती ११ कुरुमती १२ इस्थिरयणाण णामाई। तृतीयश्च चतुर्थश्च गतौ स्वर्ग तृतीयकं । अष्टमश्च द्वादशश्च सप्तमी जग्मतुर्भुवं ॥ ८६ ॥ शेषाश्च चक्रिणो येऽष्टौ गतास्ते परमं पदं । प्रावाजीद्भरतस्तत्र नृपायुतपरिच्छदः ॥ ८७ ॥ भूपतीनां सहस्त्रेण विरक्तेनान्विताः परे । प्रावश्चक्रिणः सर्वे विनात्र द्वादशाप्टमौ ॥८८ ॥ ऋषभाजितयोारे भरतः सगरः क्रमात् । प्रमाणे सोळ वर्ष पर्यंत अंधपणाने अनुभवीने ते क्रूर एवो ब्रह्मदत्त रौद्रध्याने मरण पामी सातमी नरके नारकीपणे उत्पन थयो. (८३) सात सो धर्पना आयुष्यवाळो ने सात धनु- प्यना शरीरवाळो ने छठ्ठाथी सातमो अर्थात् पारमो चक्री सातमी नरकपृथ्वीए गयो. (८४) इति ब्रह्मदत्तः १२॥ काश्यपगोत्री अने वणे सुवर्णसमान वर्णवाळा आ भुवनमा विख्यात एवा मा वार चक्रवर्तीयो कह्या छे. (८५) ए बार चक्रीने पार पटराणीओ स्त्रीरत्न तरीके ओळखाती थइ तेना सुभद्रादि नामो पा प्रमाणे चोथा अंगमा कह्या छ-प्रथम १ सुभद्रा, २ भद्रा, ३ सुनंदा, ४ जया, ५ विजया, ६ कृष्ण श्री, ७ सुरश्री, ८ पद्मश्री, ९ वसुंधरा, १० देवी, ११ लक्ष्मीवती ने १२ कुरुमती. ए स्त्रीरत्नना नामो छे. गति-श्रीजा ने चोथा चक्री बीजे देवलोके गया, पाठमा ने वारमा चक्री सातमी नरके गया (८६ ) अने नाकीना आठ चक्री परमपदने पाम्या. (परिवार )-तेमा 'पहेला भरत चक्री दश हजार मुनिना परिवारसाथै अने बीजा नव चक्रीओए विरक्त एवा हजार-हजारना परिवारसाथे चारित्र लीधुं हतुं. (८७-८८) (समय)-भरत ने सगर चक्री अनुक्रमे ऋषभदेव ने अजितनाथने वारे थया, श्रीजा ने चोथा चक्री धर्मनाथ १ सर्ग २३ मो। (५६७) जातौ तृतीयतुर्यों च धर्मशात्योरिहांतरे ॥ ८९ ॥ त्रयश्च चक्रिणोऽहंतः शांत्याद्याः स्वयमेव हि । भरमल्ल्योरंतराले सुभूमश्चक्रवर्त्यभूत् ।। ९० ।। नवमोऽभून्महापद्मो मुनिसुव्रतवारके । दशमो नमिवारेऽभून्नमिनेम्यंतरे जयः ॥ ९१ ॥ अभवद्बह्मदत्तश्चां-तरे श्रीनेमिपार्श्वयोः। स्वरूपं चक्रि- णामेव-मुक्तं वक्ष्येऽथ शाह्मिणां ॥ ९२ ॥ त्रिपृष्ठश्च १ द्विपृष्ठश्च २ स्वयंभूः ३ पुरुषोत्तमः ४ । तथा पुरुषसिंहश्च ५ पुरुषः पुंडरीकतः ६ ॥ ९३ ॥ दत्तो ७ नारायणः ८ कृष्णो ९ वासु- देवा श्रमी नव । अचलो १ विजयो २ भद्रः ३ सुप्रभश्च ४ सुदर्शनः ५ ॥ ९४ ॥ आनंदो ६ नंदनः ७ पद्मो ८ राम ९ श्चेति यथाक्रमं । अमी विष्णुविमात्रेया बलदेवाः स्मृता नव ॥ ९५॥ अश्वग्रीव १ स्तारकश्च २ मेरको ३ मधुकैटभः ४ । निशुंभ ५ वलि ६ प्रहलाद ७-रावणा ८ मगधेश्वरः ९ ॥ ९६ ॥ नवानां वासुदेवानां नवामी प्रतिविष्णवः । वासुदेवकरात्तस्व-चक्रेण प्राप्तमृत्यवः ॥ ९७ ॥ ने शांतिनाथना आंतरमा थया, (८९ ) त्यारपछी त्रण अरिहंतो शांतिनाथ विगैरे पोते ज चक्री थया, माठमा सुभूम अरनाथ ने मल्लिनाथना प्रांतरामा थया, (९०) नवमा महा- पद्य मुनिसुव्रतस्वामीने वारे थया, दशमा चक्री नमिनाथने वारे थया, भग्यारमा जयचक्री नमिनाथ ने नेमिनाथना आंतरामा थया, (९१) अने चारमा नमदत चक्री नेमिनाथ ने पार्श्वनाथना प्रांतरामा थया. या प्रमाणे चक्रवतीमोनुं स्वरूप कयु, हवे वासुदेवोर्नु चरित्र कहीए बीए. (९२) इति चक्रवर्तीवरित्र. वासुदेव विगेरेनां चरित्रो. १ त्रिपृष्ठ, २ द्विपृष्ठ, ३ स्वयंभू, ४ पुरुपोचम, ५ पुरुषसिंह, ६ पुरुषपुंडरीक, ७ दत्त, ८ नारायण (लक्ष्मण ) ने ९ कृष्ण. या नव वासुदेव जाणवा. १ प्रचळ, २ विजय, ३ भद्र, ४ सुप्रम, ५ सुदर्शन, ६ भानंद, ७ नंदन, ८ पद्य, (रामचंद्र ) ने ९ राम (बळभद्र) मा नव भनुक्रमे वासुदेवनी अपरमातायी जन्मेला पळदेवो जाणवा. (९३-९५) १ अश्वनीय, २ तारक, ३ मेरक, ४ मधुकैटभ, ५ निशुम, ६ पलि, ७ प्रहाद, ८ रावण ने ९ मगधेश्वर ( जरासंध ). (९६) मा नव वासुदेवना शनु नत्र प्रतिवासुदेव मनु- झमे जायचा. ते वासुदेवना हाथमां गयेला पोवाना सुदर्शनचकपीज मृत्यु पामे छे. (९७) (५९८) श्रीकाललोकप्रकाश। अथ पूर्वभवाद्येषां वच्मि किंचित् श्रुतोदधेः। जीवोवीराहतो राज-गृहे यः षोडशे भवे ॥ ९८ ॥ कोट्यष्टायुर्विश्वभूति-र्युवराजात्मजोऽभवत् । वनेऽतिनंदने सोऽगा-संते रंतुमन्यदा ॥ ९९ ॥ विशाखनंदिना नुन्नो वने तत्र रिरंसुना । विश्वनंदी नरेंद्रस्त-पितृव्यः स्वीयसूनुना ॥२०॥ सामंतविजयव्याजा-द्विश्वभूति ततो वनात् । निःसारयामास शूरः सोऽप्यगात्तत्पुरं ततः ॥ १ ॥ विधेयं तं च वीक्ष्याशु तस्मिन् व्रजति तद्वनं । विशाखनंदी प्रविष्ट-स्तत्रोचे संवशो भटैः ॥ २ ॥ दंभोऽयं मत्पितृव्येन मां निस्सारयितुं वनात् । सुतं च तत्रासयितुं कृत इत्युच्चु- कोप सः ॥ ३॥ समीपस्थं कपित्थुद्धं ततो मुष्ट्या प्रहत्य सः । तत्फ- लौघं प्रपात्यो| योधास्तानभ्यधाकुधा ॥ ४ ॥ मौलीन् वः पातया- म्येवं भक्तिः स्याद्राज्ञि चेन्न मे । यूयं जीवत रे स्वामि-संयुता मदु- पेचिताः॥५॥ हवे तेना पूर्वभव विगैरे कांइक श्रुतसमुद्री जाणीने कई छं- पहेला वासुदेव वीरप्रभुना जीव सोळमे मवे राजगृहमा विश्वभूति नामे युवराजना पुत्र तरीके पाठ करोड वर्षना आयुष्यवाळा थया हता. ते अन्यदा वसंतऋतुमा नंदनी पण मनो- हर एवा वनमा क्रीडा करवा गया हता. (९८-९९) वेने तेना काका विश्वनंदीए ते वना क्रीडा करवा इच्छता एवा पोताना पुत्र विशाखनंदीनी प्रेरणाथी सामंत राजाने जीतवा जवाना मिपथी ते वनमाथी बहार काढ्यो. त्यारे शूरवीर एवो ते पण सामंतने नगरे गयो. (२००-१) ते त्यां तेने आज्ञावर्ती जोह पोताने नगरे प्रावी उतावळे ते वनमा जवा लाग्यो. एटले त्या उमेला सुभटोए ते वनमा विशाखनंदी पोतानी प्रियासहित गयेल छ (तेथी तमाराथी जवाशे नहीं.) एम कयु. ( २ ) ते सांगळी विश्वभूतिए विचार्य के-' मारा काकाए था वनमाथी मने काढवा माटे भने पोताना पुत्रने दाखल करवा माटे मा दम कर्यो छे. ' आम विचारीने ते प्रति कोपायमान थयो. (३) पछी तेणे नजीकमा रहेला कोठाना झाडने मुष्टिवडे प्रहार करीने तेना सर्व फळोने पृथ्वीपर पाडी दह ते योद्धामोने क्रोधवडे कमु (४) के-" हे सुमटो ! जो मने राजा विश्वनंदी प्रत्ये भक्ति न होत तो तमारा मस्तको पा रीते ज छुटा पाडी नाखत. तमे तमारा स्वामी सहित मारी उपेक्षाथीज जीवता रहो." (५) १ सप्रियः इति लिखिवप्रतिपाठा - सर्ग ३३ मो । (५६९) इत्युक्त्वानर्थमूलत्वं भोगानां परिभावयन् । संभूतमुनिपादांते संयमे प्रत्यपादि सः ॥ ६॥ स दुष्करं तपः कुर्व-नेकदा मथुरापुरे । मासक्षप- णपर्यंते गतो गोचरचर्यया ॥७॥ तत्राहत्यैकया धेन्वा कृशीयान् पातितो भुवि । तत्रोद्वाहार्थमेतेन दृष्टो विशाखनंदिना ॥ ८ ॥ हसि- तश्च क ते बंधो कपित्थच्यावनं बलं । ततः क्रुद्धः स तां धेनुं शृंगे धृत्वांवरेऽक्षिपत् ॥ ९॥ निदानं कृतवांश्चैवं तीत्रेण तपसामुना । भूयिष्ठ- वीर्यो भूयास-मजय्यस्त्रिदशैरपि ॥ १०॥ निदानं तदनालोच्य ततो मृत्वा समाधिना । अभूत्स्वर्गे महाशुक्रे उत्कृष्टस्थितिकः सुरः॥ ११ ॥ इतश्च पोतनपुरे प्रजापतिरभून्नृपः । मृगावती स्वपुत्रीं स वीक्ष्य कामवशोऽभवत् ॥ १२॥ देशे पुरेतःपुरे च रत्लस्य जनिमीयुषः । नृप एव प्रभुरिति लोकसंमतिपूर्वकं ॥ १३ ॥ तां पत्नीकृत्य वुभुजे तादृकर्मा- नुभावतः । विश्वभूतिसुरश्च्युत्वा तस्याः कुक्षाववातरत् ॥ १४ ॥ त्रिपृष्ठ- भा प्रमाणे कही सांसारिक भोगोनुं अनर्थमूळपणुं विचारता एवा तेणे संभूतमुनिनी पासे चारित्र अंगीकार कयु. (६) दुष्कर तपने तपता एवाते मुनि अन्यदा मधुरापुरीए गया भने मासक्षपणने अंते गोचरचर्याए नीकळया. (७) त्यां कोई गाये ते दुर्घळ यह गयेला मनिने माधुं मारीने पृथ्वीपर पाडी दीधा. वखते त्यां विवाहप्रसंगे आवेला विशाखनंदीए तेमने पडी जता दीठा. (८) एटले ते हांसी करीने पोन्यो के-'हे पंधो! पेठे कोठा पाडी देवावालं पळ क्या गयुं ?' ते सांभळीने तेणे शोधायमान था ते गायने शीगडावडे उपाडी भाकाशमां फेरवीने फेंकी दीधी. (९) पछी निपाणुं कर्प के- मा वीय तपना मळयी हुं अत्यंत पळवाळो भने देवोथी पण अजय एवो थाउं.' (१०) मा नियाणाने भालोध्या विना समाधिवडे मरण पामीने सातमा महागुफ देवलोका उत्कृष्ट मायुषालो देव पयो. (११) हवे पोतनपुर नगरमा प्रजापति नामे राजा थे, ते पोतानी पुत्री मृगावतीने (प्रति रूपवान् ) जोड़ने कामवश थयो. (१२) पछी देशमा, नगरमा अने अंतःपुरमा जे रत्न उत्पम थाय वेनो स्वामी राजाज होय एवी लोकोनी संमति मेळवीने ते मृगावतीने पोवानी स्त्री करी सेनी सापे कामक्रीडा करवा लाग्यो. तेवा प्रकारना कर्मना उदयपी विधभूतिनो जीव स्वर्गमांधी व्यवीने सेनी कृषियी पुत्रपणे उत्पम थयो. (१३-१४) (५७०) भीकाललोकप्रकाश। वासुदेवोऽसा-वशीतिधनुरुच्छ्रितः । तथा चतुरशीत्यव्द-लक्षायुरचला- नुजः॥ १५॥ इति त्रिपृष्ठः॥ युद्धे सुरूपवेश्यार्थं निर्जितो विंध्यशक्तिना। सुभद्रगुरुपादांते दीक्षा पर्वतकोऽग्रहीत् ॥ १६ ॥ भूयासं तपसानेन विंध्यशक्तिविनाशकः । नि- दानमिति सोऽकार्षी-पुरे कनकवस्तुनि ॥ १७ ॥ ततो मृत्वा प्राणते. भू-देवश्च्युत्वा ततः पुनः । अभूत्पुरे द्वारवत्यां ब्रह्मभूपोमयोः सुतः ॥१८॥ स च सप्ततिचापोच्चो द्विपृष्ठ इति नामतः। द्वासप्तत्यदलक्षायु- विजयाख्यवलानुजः ।। १९ ॥ इति द्विपृष्ठः । धनदत्तनृपो द्यूते बलिभूपेन निर्जितः । सुदर्शनगुरोः पार्श्वे प्रव्रज्यां प्रतिपन्नवान् ॥ २० ॥ स च तीवं तपः कुर्वन् श्रावस्त्यां विहरन् गतः । संस्मृतप्राक्तनद्वेषी तत्र क्रोधवशंवदः ॥२१॥ बलिभूपवधाय स्या-मिति कृत्वा निदानकं । उत्पन्नो लांतके कल्पे ततश्च्युत्वा स्थितिक्षये ॥२२॥ रुद्रो राजा द्वारवत्यां पृथिवी स्त्री तयोः सुतः।स्वयंभूर्वासुदेवोऽभू-तृतीयो भा त्रिपृष्ठ वासुदेव ८० धनुष्य उंचा शरीरवाळा भने ८४ लाख वर्षना भायुवाळा अचळ बळदेवना नाना भाइ समजवा. (१५) इति त्रिपृष्ठः १ रूपवंत वेश्याने माटे विंध्यशक्तिनी साथे युद्ध करवामां जीताएला पर्वतके सुमद्र नामना गुरुनी पासे दीक्षा लीधी. (१६) कनकवस्तुपुरवासी तेमणे अत्यंत तप तपीने प्रांते " हुँ भा तपवडे विंध्यशक्तिनो विनाश करनार थाउं." ए नियाj कर्पु. (१७) त्यांथी मरण पामीने दशमे देवलोके देव थयो. त्यांथी च्यवीने द्वारवती नगरीमा प्रम- नामे राजा अने उमा नामनी राणीना पुत्रपणे उत्पन्न थयो. (१८) तेमनुं नाम द्विपृष्ठ पाडवामां आव्यु. तेनुं शरीर ७० धनुष्यनुं अने आयुष्य ७२ लाख वर्षतुं हतुं. ते विजय नामना बळदेवना नाना भाइ थया. (१९) इति द्विपृष्ठः २ धनदत्त राजाने द्यूतमा बलिराजाए जीत्यो तेथी तेणे सुदर्शन गुरुनी पासे प्रव्रज्या अंगीकार करी. (२०) तीव्र तपने करता तेश्रो विहार करतां श्रावस्तिनगरीए गया. त्यां पूर्वना देषी बलिराजाने जोइने क्रोषवश थया, (२१) तेथी निया| कर्यु के-' मारा तपना प्रमावधी ९ बलिराजाने मारनार था.' पछी मरण पामीने अठा लांतक देवलोके गया. त्यांची स्थितिषये च्यवीने द्वारवतीमा रुद्र नामे राजा भने पृथ्वी नामनी तेमनी बीना मर्ग ३६ मो। भुरिविक्रमः ॥ २३ ॥ स पष्टिवर्पलक्षायुः पष्टिचापसमुच्छ्रितः । अनुजो भद्रसंज्ञस्य बलदेवस्य कीर्तितः ॥ २४ ॥ इति स्वयंभूः । समुद्रदत्तः प्रात्राजीत् हृतायां निजयोषिति । श्रेयांसगुरुपादांते प्रत्र- ज्योग्रं तपोऽतनोत् ॥ २५ ॥ चक्रे वधाय स्त्रीहर्नुः श्रावस्त्यां स निदानकं । मृत्वोत्पन्नः सहस्रारे ततश्च्युत्वायुपः क्षये ॥ २६ ॥ द्वारवत्यां नृपः सोमः सीता राज्ञी तयोः सुतः। पुरुषोत्तमनामाभू-द्वासुदेवस्तुरीयकः ॥ २७ ॥ स त्रिंशद्वर्षलक्षायुः पंचाशद्धनुरुच्छ्रितः । अनुजः सुप्रभाख्यस्य वलदेव- स्य कीर्तितः ॥ २८ ॥ इति पुरुषोत्तमः। सेवालनामा भूपालो रणे वैरिपराजितः । कृष्णाख्यस्य गुरोः पार्थे वैराग्यादग्रहीद्वतं ॥ २९ ॥ निदानं सोऽरिघाताय पुरे राजगृहेऽकरोत् । माहेंद्रे च समुत्पन्नः स्वर्गे च्युत्वा ततः पुनः ॥३० ॥ शिवो राजाऽम्मका राज्ञी नगरेऽश्वपुराहये । ख्यातः पुरुषसिंहोऽभू-त्सनयस्तनयस्तयोः पुत्र स्वयंभू नामना श्रीजा पासुदेव अत्यंत पराक्रमवाळा थया. (२२-२३) ते साठ लाख वर्पना मायुवाळा ने ६० धनुष्पना शरीरवाळा हता तेम ज भद्र नामना पळदेवना नाना माइ हवा. (२४) इति स्वयंभू ३ समद्रदचे पोतानी स्त्री, हरण थवाथी यांस नामना गुरुपाते प्रवज्या अंगीकार 'करी भने उग्र तप कर्यो. (२५) श्रावस्तिनगरीमा तेणे पोतानी स्त्रीना हरण करनारने मारनार थवानुं निपाणुं कयु. मरण पामीने सहस्रार नामना पाठमा देवलोकमां देव घपा. त्यांची स्थिविषये च्यवीने द्वारवतीमा सोमराजा ने सीता राणीना पुत्रपणे उत्पन्न पया. ते चौथा पुरुषोत्तम नामे वासुदेव यया. (२६-२७) तेमनुं त्रीश लास वर्पनुं आयुष्ण ने पचास धनुष्यप्रमाण शरीर हतुं, तेम ज ते सुप्रम नामना बळदेवना नाना माह हवा. (२८) इति पुरुपोचमः ४ सेवाल नामना राजाने या वैरीए पराजित कर्या. तेमणे वैराग्य पामीने कृष्ण नामना गुरुपासे चारित्र अंगीकार कयु. (२९) तेमणे राजगृहपुरमा पूर्वशत्रुनो पात करनार पवार्नु नियाj कयु. मरण पामीने चोथा माहेंद्र देवलोकमा देवपणे उत्सन्न पया. त्यांची व्यवीने शिव नामना राजा भने अम्मका नामनी राणीना पुत्र अधपुर नामना नगरमा न्याययुक्त पुरुषसिंह नामे प्रख्यात पपा. (३०-३१) मा पाँचमा वासुदेव ॥ (५७२) भीकातलोकप्रकारा। ३१ ॥ अयं च पंचचत्वारि-शत्कोदंडसमुच्छ्रितः। तथा दशाब्दलचायुः ख्यातः सुदर्शनानुजः॥ ३२ ।। इति पुरुपसिंहः । प्रियमित्रोऽपि भार्यायां हृतायामाददे व्रतं । श्रीगंगगुरुपादांते का. कंयां च गतोऽन्यदा ॥ ३३ ॥ निदानमकरोत्तत्र प्रियाहर्तुर्वधाय सः । मृत्वोत्पन्नो ब्रह्मलोके ततः पूर्णस्थितिश्च्युतः ॥ ३४ ॥ लक्ष्मीवत्याः कुक्षिरत्नं महाशिवनृपात्मजः । पुरुषपुंडरीकाख्यो-ऽभवचक्रपुरे हरिः ॥ ३५॥ पंचषष्टिसहस्राब्द-जीव्यानंदवलानुजः। एकोनत्रिंशतं तुंग- श्वापान्ययमुदीरितः ॥ ३६ ॥ इति पुरुषपुंडरीकः । राजांगजोऽभूल्ललित-मित्रः स क्षमापपर्पदि । राज्यायोग्योऽयमि- त्यूचे मंत्रिणा भूपतेः पुरः॥ ३७॥ राज्ञोऽपमाने जातेऽथ भूपभूरादवे व्रतं । सागरस्य गुरोः पार्श्वे मिथिलायां गतोऽन्यदा ॥ ३८ ॥ वधाय मंत्रिणस्तस्य निदानं चकृवानथ । सौधमें त्रिदशः सोऽभू-संपूर्णस्थि- तिकस्ततः ॥ ३९ ॥ वाराणस्यामग्निसिंह-नृपशेषवतीसुतः । वासुदेवोऽ- ४५ धनुष्यना शरीरवाळा ने दश लाख वर्षना मायुष्यवाळा सुदर्शन नामना बळदेवना नाना भाइ हता. (३२) इति पुरुषसिंहः ५ प्रियमित्रे पण पोतानी स्त्रीनुं वीजाए हरण करवाथी श्रीगंग गुरुनी पासे चारित्र अंगीकार कयु. अन्यदा काकंदीनगरीए गया. (३३) त्या पोतानी प्रियानुं हरण कर- नारना मारनार थवानुं निया' कयु. मरण पामीने पांचमा ब्रह्मदेवलोके देव थया. त्यांथी स्थिति पूर्ण थये च्यवीने चक्रपुरनामना नगरमा महाशिव नृपना पुत्र लक्ष्मीव- वीनी कुक्षिमा रत्नसमान पुरुपपुंडरीक नामना छठा वासुदेव थया. (३४-३५) तेश्रो ६५ हजार वर्षना श्रायुवाळा, २९ धनुष्यना शरीरवाळा अने आनंद नामना पळदेवना नाना भाइ हता. ( ३६ ) इति पुरुषपुंडरीका ६ ललितमित्र नामे राजपुत्रने माटे मंत्रीए राजसभामा मा राज्यने अयोग्य छ एम राजाने कडं, (३७) तेथी राजा तरफथी अपमान थये सते ते राजपुत्रे सागर गुरुनी पासे चारित्र अंगीकार कयु. अन्यदा ते मिथिलानगरीए गया. (३८) त्यां मंत्रीने मारनार थवानुं निया' कयु. मरण पामीने पहेला सौधर्म देवलोके देव या. त्यांथी पूर्णस्थितिए च्यवीने वाराणसीनगरीमा अग्निसिंह राजा अने शेषवती , सर्ग ३३ मो। (५७३) भवन्नाम्ना दत्तो मत्तपराक्रमः ॥४०॥ षट्पंचाशत्सहस्राब्द-जीवितः सप्तमः स च । पड्विंशतिधनुस्तुंगो नंदनस्यानुजः स्मृतः ॥ ११ ॥ इति दत्तः । भरतेऽत्र क्षेमपुरे नयदत्तवणिक्सुतौ। धनदत्तवसुदत्तौ सुनंदाकुक्षि- संभवौ ॥ ४२ ॥ तत्र सागरदत्तोऽभू-रपुत्रो गुणधरोऽस्य च । पुत्री गुणवती पित्रा धनदत्ताय सा ददे ॥४३ ॥ मात्रा च रत्नप्रभया श्री. कांताख्याय सा ददे । वसुदत्तेन तज्ज्ञातं याज्ञवल्क्यसुहृन्मुखात् ॥४४॥ वसुदत्तस्ततो भ्रातृ-स्नेहाद्वाऽवधीनिशि । श्रीकांत सोऽपि खड्गेन वसुदत्तमुभौ ततः ॥ ४५ ॥ विध्याटव्यां मृगौ जाता-वनूढा गुणवत्यपि। अभून्मृगी कृते तस्या-स्तत्र युध्ध्वा मृतावुभौ ॥ ४६ ॥ मिथो वैरपरा. वेवं भूयसश्चक्रतुर्भवान् । धनदत्तोऽप्यभूभ्रातृ-वियोगेनोन्मना भृशं ॥४७॥ भ्रमन्निशि मुनीन् दृष्ट्वा क्षुधितोऽयाचताशनं । श्राद्धीकृतस्तैः प्रज्ञाप्य धर्म सौधर्ममासदत् ॥ १८॥ महापुरे ततश्च्युत्वा धारणीमेह- राणीना पुत्र दत्त नामे मदोन्मच पराक्रमी सातमा वासुदेव थया. (३९-४०) तेनुं ५६ हजार वर्षर्नु भायु ने छवीश धनुष्य उंचु शरीर हतुं भने ते नंदन नामना बळदेवना नाना भाइ हता. (४१) इति दचा ७ मा भरतक्षेत्रमा क्षेमपुर नामना नगरमा नयदत्त नामना वणिकना सुनंदानी कृषियी थयेला धनदच ने वसुदच नामना ये पुत्रो हवा. (४२) ते ज नगरमा सागर- दच नामे एक वणिक रहेतो हतो, वेने गुणधर नामे पुत्र ने गुणवती नामे पुत्री हती. ते पुत्री धनदच वेरे सेना पिताए मापी हती (४३) अने रत्नप्रमा माताए श्रीकांतने पापी हती. वसुदचे पा वात याज्ञवल्क्य नामना पोताना मित्रना मुखे सामळी. (४४) एटले माइना स्नेहथी वसुदचे श्रीकांतने त्या बइने राने तेने मारी नाख्यो. तेणे वसु- दचने खगवडे मारी नोख्यो, एटले ते यंने मरण पामीने विघ्याटवीमा मृग थया. कौमारावस्थामा ज मरण पामीने गुणवती पण हरणी थइ. तेने माटे युद्ध करता ते ने मृगो मरण पाम्या. (४५-४६ ) आ प्रमाणे परस्पर वैरना अनुबंधथी ते पंनेए घणा भियो कर्या. भहीं धनदच पण माइना वियोगथी अत्यंत उन्मत्त दशावाळो थयो. (४७) राधे ममता ने मुनि मळ्या. क्षुधित ययेला तेणे मनिपासे खापार्नु माग्यु. मुनिए उप. देशवडे वेने श्रावक बनान्यो भने धर्म समजान्यो, तेथी ते मरण पामीने सौधर्म देवलोके गयो. (४८) त्यांची व्यवीने महापुरमा धारणी ने मेरुनो पुत्र पपरुचि नामे श्रावक- , -- (५७४) भीकालोकप्रकारा। देहभूः । अभूत्पद्मरुचिर्नाम श्रेष्ठी श्रावकपुंगवः ॥ १९॥ स चैकस्या- सन्नमृत्योः परमेष्ठिनमस्क्रिया । वृषभस्य ददौ सोऽभू-च्छत्रच्छायन- पांगजः ।। ५०॥ दत्ताराझ्याः कुचिजातो नाम्ना च वृषभध्वजः।। स तत्रैव पुरे भ्राम्यन् वृषमृत्युभुवं ययौ ॥ ५१ ॥ प्राप्तश्च जातिस्मरणं तत्र चैत्यमचीकरत् । भित्तावालेखयामास तत्रासन्नमृतिं वृषं ॥ ५२ ।। परमे- ष्ठिनमस्कार-दायिनं पुरुपं च तं । अलीलिखत्समीपस्थ-सपर्याणतुरंगमं ॥ ५३ ॥ श्रेष्ठी पद्मरुचिस्तच्चा-पश्यत्तचैत्यमागतः । वृषभाय नमस्कार- दानं स्वं वीक्ष्य विस्मितः ॥ ५४॥ नियुक्तैः पुरुषैस्तत्र पृष्टश्चोचे यथा- स्थितं । मया तुरगमारुह्य गच्छता गोकुले पुरा ॥ ५५ ॥ वृषभस्य नम- स्कारो ददे तदिह चित्रितं । केनापि दृश्यते भित्तौ विस्मितोऽहं तदीच- णात् ॥ ५६ ॥ ततो नियुक्तपुरुषै-विज्ञप्तो वृषभध्वजः । पूर्वोपकारिणं पद्म-रुचिमेत्य नमोऽकरोत् ॥ ५७ ॥ राज्यं मम गृहाणेदं त्वं मे देवो गुरुः प्रभुः । इत्युक्त्वा तेन सौहाई-मद्वैतमतनोदयं ॥ ५८ ॥ तौ श्राद्ध- श्रेष्ठ एवो श्रेष्ठी थयो. (४९) तेणे एक वखत एक भासनमृत्युवाळा वृषमने नमस्कार- मंत्र संमळाव्यो. ते वृषम मरण पामीने छत्रच्छाय राजानो पुत्र दचा राणीनी कुचिथी उत्पन्न थयेलो वृषभध्वज नामे थयो. ते ज नगरमा फरतो ,फरतो ते राजपुत्र वृषभना मृत्युस्थाने भाग्यो. (५०-५१ ) त्यां तेने जातिस्मरण थयुं एटले तेणे त्यां एक चैत्य बंधाव्यु अने तेनी भीतउपर आसनमृत्युवाळा वृपमनुं चित्र कढाव्यु. ( ५२ ) तेनी समीपे परमेष्ठि नमस्कारमंत्र संमळावनार पुरुपर्नु चित्र कराव्यु तेम ज पासे उमेलो पलाणसहित घोडो चित्राग्यो. (५३) श्रन्यदा पद्मरुचि श्रेष्ठी ते चैत्ये श्रान्यो. त्यां ते पमने नमस्कार संमळावता पोताने चित्रमा मोइने विस्मय पाम्यो. (५४ ) राजपुत्रना राखेला पुरुषोए तेने विस्मय पामेल जोड्ने कारण पूछ| एटले तेणे यथास्थित हकीकत कही बतावी के-' पूर्व घोडापर बेसीने गोकुळे जतां में आ वृपमने नमस्कारमंत्र प्राप्यो हतो. तेनुं चित्र कोइए आ भींत उपर चितरेखें जणाय छे. ते जीवाथी हुं आश्चर्य पाम्यो.' (५६-५६ ) नियुक्त पुरुषोए तरत ज वृषभध्वजपासे जइने आ वात जयात्री एटले ते वरत ज त्यां प्राध्यो भने पूर्वोपकारी पगरुचिने तेणे नमस्कार कर्यो (५७) अने का के-'मा मारुं राज्य तमे ग्रहण करो, तमे ज माग देव, गुरु तेम ज प्रभु को.' मा प्रमाणे कहीने तेणे अद्वैत एy सौहार्द ( मित्रपणं) पताव्यु. (५८) पछी से बने श्रावकमर्म पर्ग १३ मो। (५७५) धर्ममाराध्यो-स्पन्नौ स्वर्गे द्वितीयके । ततः पद्मरुचिश्च्युत्वा मेरोरपरतोऽ- भवत् ॥ ५९ ॥ नंदावर्तपुरे वैता-ढ्याद्रौ नंदीश्वरांगजः । नाम्ना च नय; नानंदः कनकाभातनूद्भवः ॥ ६ ॥ स राजादाय चारित्रं तुर्ये स्वर्गेऽभव- रसुरः । ततश्च्युत्वा क्षेमापुर्या प्राग्विदेहेष्ववातरत् ॥ ६१ ॥ विपुलवाहन- भूप-पद्मावत्योः सुतो नृपः । श्रीचंद्रनामा प्रव्रज्य ब्रह्मलोकेंद्रतां ययौ ॥ ६२ ॥ ततश्च्युत्वा पद्मनामा वलदेवोऽष्टमोऽभवत् । रामोऽपराजिता- कुत्क्षि-जातो दशरथात्मजः ॥ ६३ ॥ वृषभध्वजजीवस्तु सुग्रीवोऽभूत्कपी- श्वरः। पूर्व कृतोपकारवा-दत्यंतं पद्मवत्सलः ॥ ६४ ॥ श्रीकांतोऽपि भवान् भ्रांस्वा मृणालकंदपत्तने । शंभुर्हेमवतीजातो नृपोऽभूद्वनकंवुभूः ॥६५॥वसुदत्तस्य जीवो यः श्रीकांतमवधीत्पुरा विजयस्य स पुत्रोऽभू- च्छंभुराजपुरोधसः ॥ ६६ ॥ रत्नचूडाकुचिजन्मा श्रीभूतिर्नामतः स च । क्रमेण प्राप्ततारुण्यः पितृभ्यां परिणायितः ॥ ६७ ॥ गुणवत्यथ सानर्थ- मूलं भ्रांत्वा भवान् बहून् । पुरोधस्तनयस्यास्य श्रीभूतेरभवत्सुता ॥६॥ सरस्वतीकुक्षिजाता नाम्ना वेगवतीति सा । क्रमेण ववृधे पद्म-लतिकेव माराधीने वीजा देवलोकमां देव थया. पद्मरुचि त्यांची व्यवीने मेरुपर्वतनी अपर बाजुए वैताब्य पर्वतउपर नंदावर्तपुरमा नंदीश्वर ने कनकाभानो पुत्र नयनानंद नाम थयो. (५९-६०) ते राजा थइ चारित्र लइने चोथे स्वर्गे देव थयो. त्यांची व्यवीने चेमापु. रीमा पूर्वमहाविदेहमा विपुलवाहन राजा ने पद्मावतीनो पुत्र श्रीचंद्रनामे थयो. ते दीक्षा लइने पांचमा ब्रक्षलोकमा इंद्र थयो. (६१-६२) त्यांथी व्यवीने पद्म भथरा राम नामे माठमा मळदेव दशरथ राजा ने अपराजिता राणीना पुत्र थया. (६३) पमन्यजनो जीव सग्रीव नामे वानराधिपति थयो. ते पूर्वे उपकार करनार पद्म ( रामचंद्र) नी साथे अत्यंत वात्सन्यमाव धरावा लाग्यो. (६४) श्रीकांतनो जीव पण भवमा मर्माने मृणालफंद नगरे वजकंयुनो पुत्र ने हेमवतीथी जन्मेलो शंमु नामनो राजा धयो. (६५) वसुद- चनो जीव के जेणे पूर्वे श्रीकांतने मार्यों हतो ते शंभु राजाना पुरोहित विजयनो रल- घानी कुतिथी भूति नामे पुत्र थयो. ते अनुक्रमे तारुण्य ( यौवन) पाम्यो एटले लेना मातापिताए वेने परणान्यो. (६६-६७) पधा अनयतुं मूळ गुणवती वा मवीमा ममीने भा पुरोहितना पुत्र श्रीमतिनी स्त्री सरस्वतीनी कुविधी वेगवती नामे पुत्री था. सरोवरमा पघलवा बघे तेम ए वेगवसी अनुक्रमे वृद्धि पामी. (६८-६९) रुवावस्थाने (५७६) भीकामलोफप्रकारा सरोवरे ॥ ६९ ।। उत्तारुण्यान्यदा सा च कायोत्सर्गस्थितं मुनि । सुद- र्शनं जनैः पूज्य-मानं वीक्ष्येदमभ्यधात् ॥ ७० ॥ श्रयं मुनिर्मया दृष्टः क्रीडन्नंगनया समं। हास्यात्तयोदितोऽप्येष कलंकः प्रथितो जने ॥७१॥ जग्राहाभिग्रहं सोऽपि शासनन्यक्रियाभिया। उत्तीर्णेऽस्मिन् कलंकेऽहं पारयिष्यामि नान्यथा ॥ ७२ ॥ वेगवत्यथ सोत्सून-मुखा दैवतरोषतः। ज्ञातसाधुव्यतिकरै-र्जनकायैश्च भत्सिता ॥ ७३ ॥ अध्यक्ष सर्वलोकाना- मित्यूचे रचितांजलिः । निर्दोषोऽप्येष निग्रंथो धिग्मया मंदभाग्यया ॥ ७४ ॥ अलीकदोषारोपेण दूषितः कृतहास्यया । तत् श्रुत्वा मुदिताः सर्वे जनास्तं मुनिमस्तुवन् ॥ ७५॥ त्रिभिर्विशेषकं । दिव्यानुभावादु- लाधा साभवद्वेगवत्यपि । निशम्य जैनधर्म च श्राविकाभूत्तदादितः ॥७६॥ अथ वेगवतीरूप-मोहितः शंभुभूपतिः । ययाचे तत्पिता मिथ्या- दृशे तस्मै ददौ न तु ॥ ७७ ॥ ततश्च शंभुः श्रीभूतिं हवा तां बुभुजे बलात् । भवांतरेऽहं भूयासं त्वद्वधायेति साशपत् ॥ ७८॥ मुक्ता सा पामेली तेणे अन्यदा कायोत्सर्गध्याने रहेला सुदर्शन नामना मुनिने लोकोथी पूजाता जोइने श्रा प्रमाणे का (७०) के-'मा मुनिने में स्त्रीसाथे क्रीडा करता जोयेला छे.' हास्य- मात्रथी तेणे कहेलु भा कलंक लोकमा विस्तार पाम्यू. (७१) एटले मुनिए पण शास- ननी हीलना थवाना मयथी अभिग्रह कर्यों के-'पा कलंक उतरे त्यारे नहुँ कायोत्सर्ग; पारीश, अन्यथा पारीश नहीं.' (७२) शासनदेवताना रोषथी वेगवती विलखा मुखवाळी थइ अने जाण्यो के साधुसंबंधी व्यतिकर जेथे एका तेना मातापिताविगेरेए तेणीनी घणी निर्भत्सना करी. (७३ ) एटले तेणे पण सर्व लोकोनी समक्ष त्यां श्रावी हाथ जोडीने कडं के-'भा निग्रंथ मुनि तद्दन निर्दोष छे. तेने कलंक मापनार भने निर्भाग्य एवी मने धिक्कार छ. में मात्र हांसीवडे खोटा दोषारोपथी मुनिने दूषित कहा हता. मा प्रमाणे सांभळीने सर्व लोको हर्ष पाम्या अने ते भनिनी करवा लाग्या. (७४-७५) दिच्यानुभावी ते वेगवती पण निर्दोष. थइ. पछी जैन धर्म सांभळीने ते दिवसथी ते भाविका थइ. ( ७६ ) हवे वेगवतीना रूपथी मोहित थयेल शंभु राजाए तेना पितापासे तेनी मागणी करी परंतु ते शंभु मिथ्याइष्टि होवाथी तेने तेणे प्रापी नहीं. (७७) एटले शंस राजाए श्रीभूतिने मारी नांखीने बलात्कारे तेने मोगवी. एटले वेगवतीए ‘मातरमा हुँ वारा स्तवना सर्ग ३३ मो (५७७) शंभुना दीक्षा जग्राह चरणांतिके । आर्याया हरिकांताया ब्रह्मलोकमि- याय च ॥ ७९ ॥ मिथिलायां ततश्च्युत्ता सीता नाम महासती । जाता वेगवतीजीवो सा भामंडलयुग्मजा ॥ ८०॥ रावणस्य विनाशाय शंभुजीवस्य साभवत् । मुनेम॒षाकलंकस्य दानात्तं प्राप सा स्वयं ॥८१ ॥ शंभुजीवोऽपि संसारे भ्रामं भ्रामं द्विजोऽभवत् । पार्श्वे विजयसेनः प्रभासाख्योऽग्रहीद्वतं ॥ ८२॥ कनकप्रभनामान-मन्यदा खेचरेश्वरं । यांत सम्मेतयात्रायै सोऽपश्यत्परमद्धिकं ॥ ८३ ॥ ईदृक्समृद्धिर्भूयास- मनेन तपसेति सः। कृत्वा निदानमुत्पन्नः स्वर्गलोके तृतीयके ॥ ८४ ॥ ततश्च्युत्वा हरिस्वप्न-सूचितः समभूत्सुतः। कैकसीकुक्षिजो रत्न-श्र- वसो राक्षसेशितुः ॥ ८५ ॥ भीमेन राक्षसेंद्रेण मेघवाहनभूभुजे । पूर्व प्रदत्तो यो हारो नवमाणिक्यनिर्मितः ॥ ८६ ॥ नागानां च सहस्रेण रक्षितो निधिराजवत् । अनीशैर्वोढुमखिलैः पूर्वजैः पूजितः क्रमात् ॥८॥ पधने माटे थइश एवो तेने आप दीपो. (७८ ) एटले शंभु राजाए तेने मूकी दीघी. पछी वेगवतीए हरिकांता नामनी आर्याना चरणसमीप दीक्षा लीधी अने मरण पामीन पांचमा प्रयदेवलोकमां गइ. (७९) त्यांची व्यवीने वेगवतीना जीवे मिथिला नगरीमा सीता नामे महासती तरीके भामंडळनी साये युगलपणे जन्म धारण कर्यो. (८०) ते शंभुनो जीव जे रावण थयो तेना विनाश माटे कारणभूत थइ. पूर्व भवमा मुनिने कलंक आपेलुं होपाधी तेने सीवाना भवमा कलंक प्राप्त थयु. (८१) शंभुनो जीव पण संसा. रमा ममतो ममतो प्रमास नामे प्रामण थयो. तेणे विजयसेन मुनिनी पासे दीक्षा लीधी. (८२) तेमणे अन्यदा कनकप्रम नामना परम ऋद्धिवाळा विधाघरेश्वरने सम्मेव तीर्थनी यात्राए जवा जोया. (८३) ते जोईने मा उपना प्रमावथी हुँ भावो समृद्धिवाळो थाउं एवं तेमणे निया' कयु. मरण पामीने पीजे देवलोके देव थयो. (८४) त्यापी पीने रत्लथवा राघसनी स्त्री केकमीनी कुषियी सिंहस्वमचित पुत्र थयो. ( ८५ ) मीम नामना राषसनिकायना ध्यंतरेंद्र मेघवाहन राजाने पूर्व नप माणिक्यनो पनायलो जे हार माप्योहयो भने निषिराजनी बेम एक हजार नागोपी सेषातो हवो क्या तेने वहन करवाने- पोरवाने भसमर्थ एवा पषा पूर्वजोपी मनुक्रमे सेवातो हतो ते हार पाठक एवा वे पुरे (५७८) भीकाललोकप्रकाश तं च हारं स वालोऽपि न्यधात्कंठे कराहृतं । मुखैस्तद्रत्नसंक्रांतः सोऽ. भूदशमुखाह्वयः ॥ ८८ ।। त्रैलोक्यकंटकं चैनं वाली निर्जित्य संगरे। वैराग्येण प्रववाजा-का पीच्च विविधं तपः॥ ८९ ॥ तं पुप्पकावमानाधि-रूढो दशमुखो ब्रजन् । अष्टापदाचलेऽपश्य-प्रतिमास्थं स्खलद्गतिः ॥ ९० ॥ दृष्ट्वा च वालिनं क्रुद्धो-ऽवादीदेवं दशाननः । निर्जित्य मां भयादेव दंभेन व्रतमग्रही: ॥ ९१ ॥ मां बाहुमूले निक्षिप्य यथाऽभ्राम्यस्त्वमंबुधीन् । तथा त्वां साद्रिमुत्क्षिप्य लवणाधौ क्षिपाम्यहं ॥ ९२ ॥ इत्युदीर्य विदार्य क्षमा- मष्टापदगिरेस्तले । प्रविश्य युगपदविद्या-सहस्रं मनसि स्मरन् ॥ ९३ ॥ धराधरं तमुद्दभ्रे चलयनचलातलं । झलज्झालायितांभोधि पतगिरिशिर:- शतं ॥ ९४ ॥ अद्याप्ययं मयि क्रोधा-दनथं कुरुते हहा। मा भूद्भरतचै- त्यानां भ्रंशोंतरिति चिंतयन् ॥ ९५ ॥ अवधिज्ञानवान्नाना-लब्धिर्वाली महामुनिः । गतस्पृहः शरीरेऽपि चैत्यत्राणाय केवलं ॥ ९६ ॥ अपीडय- (रावणे) हाथवडे उपाडीने पोतानी डोकमा नाख्यो. ते हारना नव रत्नमा संक्रांत थता नव मुखोथी एकंदर ते दशमुख नामथी प्रख्यात थयो. (८६-८८) ते दशमुख त्रैलोक्यकंटक तरीके प्रसिद्धि पाम्यो. तेने संग्राममा जीतीने वालि विद्या- घरे वैराग्यथी दीक्षा अंगीकार करी अने विविध प्रकारना तप तपवा लाग्या. (८९) तेवामा पुष्पक विमानमां वैसीने जता दशमुखे अष्टापद पर्वत उपर कायोत्सर्गच्याने रहेला ते मुनिने जोया. कारण के त्यां तेनुं विमान स्खलना याम्युं. (९०) एवीरीते विमाननी थयेली स्खलनाथी भने तेना कारण तरीके वालिमुनिने जोवाथी क्रोधायमान थयेलो दशानन एम बोल्यो के-' मने जीतीने मारा भयथी ज ते चारित्र ग्रहण कर्यु के. ते वखते मने पाहुमूळमा क्षेपन करीने जेम ते समुद्र फरतो मने फेरव्यो हतो तेम तने आ पर्वत सहित उपाडीने हुं लवणसमुद्रमा नांखी दउं छ.' (९१-९२) आ प्रमाणे कहीने पृथ्वीने विदारी प्रयापदपर्वतनी नीचे प्रवेश करी तेणे हजारे विद्यार्नु स्मरण कयु. (९३) पछी पृथ्वीवळने चळावता तेणे ते पर्वतने उपाख्यो ते वखते समुद्रना जळ उबळचा लाग्या अने पर्वतमा सेंकडो शिखरो पडवा लाग्या. (९४) वालमुनिए पर हकीकत जाणीने विचार्य के-'हजु पण भा रावण मारा उपरना क्रोधथी अहो ! महा मनर्थ करे थे, परंतु वेनामा कत्यथी भरतचक्रीए ा पर्वतपर करावेला चैत्योनो अंश सर्ग मो। (५७९) पदांगुष्ठा-प्रेणाप्टापदभूमिकां । तेनाक्रांतश्च भारार्त-कंधरो दशकंधरः ॥ ९७ ॥ भयातः संकुचद्गात्रो रावयन् सकलां महीं । आरावीदृशमा. कंदै-स्ततोऽभूद्रावणाह्वयः ॥ ९८॥ अभूतां सोदरावस्य भानुकर्णविभीषणौ । स्वसा चंद्रणखा पट्ट- राज्ञी मंदोदरीति च ॥ ९९ ॥ भानुकर्णस्य कुंभकर्ण इति, चंद्रणखायाः सूर्पणखेति च नामांतरं. धनदत्तवसुदत्त-सुहृद्यो ब्राह्मणः पुरा । आसी. नाम्ना याज्ञवल्क्यः क्रमासोऽभूद्विभीषणः ।।३००॥ निहतः शंभुना राज्ञा श्रीभूतियः पुरोहितः । शुभध्यानात्स चोत्पेदे स्वर्गे च्युत्वा ततोऽभवत् ॥१॥ सुप्रतिष्ठपुरे विद्या-धरो नाम्ना पुनर्वसुः । द्वासप्ततिकलाशाली चतुरः सुभगः सुधीः ॥२॥ युग्मं । स चैकदा त्रिभुवना-नंदस्य चक्र वर्तिनः । सुता कामवशो जद्दे नामतोऽनंगसुंदरीं ॥ ३ ॥ पुंडरीकाख्य- विजया-द्गच्छन्निजपुरी प्रति । चक्रभृत्प्रहितविद्या-धरैः स रुरुधे युधे । ॥४॥ विद्यास्त्रेविविधैर्नाग-ताक्ष्यांभोदानिलादिभिः । एतस्य युद्ध्य- न थाो. ' एम मनमा विचारीने अवधिज्ञानवाळा, अनेक प्रकारनी लब्धिवाळा अने शरीरने विपे पण स्पृहा विनाना वालि महामुनिए केवळ चैत्योना रक्षणने माटे पगना अंगुठाना अग्रभागवडे भ्रष्टापद पर्वतनी भूमिकाने दयावी, तेथी पाकात थयेलो-दवायेलो अने भारवडे पीडित थयेली कंधरावाळो दशकंधर (रावण) भया ने संकुचित गात्रवाळो थयो. वेणे अत्यंत आनंदवडे सर्व पृथ्वीने शन्दवाळी करी. त्यारथी ते रावण कहेवायो. (९५-९८) रावणने मानुकर्ण ने विमीपण नामना वे भाइयो हता. चंद्रणखा नामे बहेन हती भने मंदोदरी नामे पट्टराणी हती (९९) मानुकर्णन चीजें नाम कुंभकर्ण ने चद्रणखानु चीजें नाम सूर्पणखा जाणवू. पूर्वे धनदत्त ने वमुदत्तनो मित्र ब्राह्मण के जे याज्ञवल्क्य नामनो हतो ते अनुक्रमे विमीपण थयो हतो. (३००) शंभुराजाए पूर्वे जे श्रीभूति नामना पुरोहितने मार्यो हतो ते शुभ ध्यानी मरण पामीने स्वर्गे गयो हतो ते त्यांची व्यवीने सुप्रतिष्ठपुरमा पुनर्वसु नामे विधाघर थयो ते पहातेर फळावान् , चतुर, सुभग भने पुद्धिमान् थयो. (१-२) तेणे एकदा त्रिभुवनानंद चक्रवर्तीनी अनंगसुंदरी नामनी पुत्री- कामना वशथी हरण कयु. (३) तेने पुंडरीक नामनी विजपथी पोतानी नगरीए जतां चक्रवर्तीना मोकलेला विधाघरोए युद्ध करपा माटे पटकाव्यो. (४) तेमनी साये नाग, सार्य, अमोद ने भानिलादि विविध प्रकारना विद्याशखोपी युद्ध करवां वेनी (५८०) भीकालोकप्रकाश। मानस्य वैयग्यात्स्व विमानतः ॥५॥ क्वचिद्वननिकुंजे सा पपातानंग सुंदरी । विरराम ततो युद्धा-द्विरक्तात्मा पुनर्वसुः ॥ ६ ॥ समुद्रगुरुपादांते ततः स्वीकृत्य संयमं । काश्यां गतोऽन्यदाऽकार्षी-नि- दानमिति चेतसा ॥७॥ अभविष्यं भवेऽस्मिश्चे-ञ्चक्रिणोऽर्द्धघलोऽप्यहं । तन्मत्तश्चक्रिसैन्याा-ऽयास्यन्नानंगसुंदरी ॥८॥ भवांतरेऽपि भूयासं तपसानेन तादृशः । तथा प्राणप्रिया भूयात् सैषा मेऽनंगसुंदरी ॥ ९ ॥ पुनर्वसुस्ततो जातः सुरः स्वर्गे तृतीयके । चारित्रोपार्जितं तत्र बुभुजे शं यथास्थिति ॥१०॥ अतितीवं तपोऽकार्षी-द्वनस्थानंगसुंदरी । विहितानशना चांते जन- सेऽजगरेण सा ॥ ११ ॥ ततः समाधिना मृत्वा देवलोके तृतीयके । सुरत्वेन समुत्पेदे वुभुजे चाद्भुतं सुखं ॥ १२ ॥ इतश्च-नैमित्तिकोक्त्या स्ववधं ज्ञात्वा दशरथात्मजात् । प्रैषीदशरथं हतुं दशग्रीवो विभीषणं ॥ १३ ॥ नारदर्षिर्दशरथ-भूभुजे द्राक् सधर्मणे । व्यग्रताने लीधे तेना विमानमाथी अनंगसुंदरी कोइ वनना निकुंजमां पडी गइ. एटले ते पुनर्वसु युद्धथी विराम पाम्यो भने तेनो आत्मा संसारथी विरक्त थयो. (६) तेथी समुद्रगुरुना चरणसमीपे तेणे चारित्र अंगीकार कयु. अन्यदा ते काशीमा गयो त्यो तेथे मनमा भा प्रमाणे निया' कयु. (७) के 'भा भवमा जो हुँ चक्रवर्ती करतो अर्ध वळवाळो पण होत तो चक्रीना सैन्यथी भार्च थयेला मारा हाथथी अनंगसुंदरी छुटी शकत नहीं, (८) माटे भवांतरमा पण भा तपना प्रभावथी हुँ एवो वळवान थाउं अने श्रा अनंगसुंदरी मारी प्राणप्रिया थाय. । (९) प्रा प्रमाणे नियाएं करनार पुनर्वसु मुनि मरण पामीने त्रीजे देवलोके देव थया. त्या चारित्रना प्रभावी उपार्जन करेलुं सुख यथास्थिति एटले स्थिति प्रमाणे भोगव्यु (१०) विमानमांधी पडेली अनंगसुंदरीए अति तीव्र तप कर्यो. प्रांते अनशन कयु. ते स्थितिमा तेने अजगर गळी गयो. (११) त्यां समाधिवडे मरण पामीने ते श्रीजे देव- लोके देवपणे उत्पन्न थह. त्यां तेणे अद्भुत सुख भोगव्यु. (१२) हने नहीं नैमित्तिकनी कथनथी पोतानो वध दशरथ राजाना पुत्रथी थवानो जाणीने दशरथ राजाने मारी नाखवा माटे दशग्रीवे विभीषणने मोकल्यो. ( १३ ) नारदमुनिए श्रा वात दशग्रीवनी राजसभामा सांभळीने तरत ज पोताना सधर्मी दशरथराजापासे .

मर्ग मो। (५४१) अजिज्ञपद्दशग्रीव-संसयाकर्ण्य तो कथा ॥ १४ ॥ श्रुत्वा दशरथोऽप्येव- मयोध्याया विनिर्ययौ । समर्प्य मंत्रिणे राज्यं वेषांतरतिरोहितः ॥१५॥ मूर्ति दशरथस्याथ कृत्वा लेप्यमयीं सुधीः । वेश्मन्यस्थापयन्मंत्री राज्ञः प्रख्यापयन् रुजं ॥ १६ ॥विभीषणोऽपि तत्रैत्य संरंभात्तमसि स्थिता । तन्मूर्ति लेप्या हत्वा कृतकृत्यो न्यवर्त्तत ॥ १७ ॥ अथो दशरथो भ्राम्य-नयासीदुत्तरापथे। स्वयंवरोत्सवोदंगे दंगे कौतुकमंगले ॥ १८ ॥ पर्तिवरां पर्यणेपी-द्राज्ञः शुभमतेः सुता । श्रद्भुतां तत्र कैकेयीं द्रोणमेघसहोदरीं ॥ १९ ॥ अस्मासु सत्सूदहति कन्या कार्पटिकः कथं । इतीय॑या प्रववृते योध्धुं शेषनृपवजः ॥ २०॥ कैकेय्या सारथित्वेन कृतसाहाय्यको नृपः । प्रतिपक्षान् पराजिग्ये कैकेय्यै च वरं ददौ ॥ २१ ॥ कैकेयी परिणीयाथ वलैकैर्महावलः । जग्राह नगरं राज- गृहं निर्जित्य तत्प्रभु ॥ २२ ॥ लंकेश्वरभयात्तत्र तस्थुपोऽस्य महीपतेः । चतुर्दिग्जैत्रदोर्या-श्चत्वारोऽथाभवन् सुताः ॥ २३ ॥ तत्रापराजिता आवीने जणावी. (१४) ए बात सामळीने दशरथ राजा अयोध्यामांची नीकळी गपा. राज्य मंत्रीने सोप्युं भने पोते वेषांतर करीने अदृश्य थइ गया. (१५) अहीं बुद्धिमान मंत्रीए दशरथ राजानी मूर्ति लेप्यमय बनावीने राजमहेलना अंधारा ओरडामा राखी भने 'दशरथ राजा व्याधिप्रस्त छे' एवी वात जाहेर करी. (१६) विभीपणे पण त्यां भावाने उतावळा अंधकारमा रहेली दशरथराजानी ले प्यमयी मूर्तिने हणी नांखी भने कृतकृत्य थइने पालो गयो. (१७) दशरथ राजा ममता ममता उत्तरापथमा गया. त्यां कौतुकमंगळ नामना नगरमा स्वयंवरनो उत्सव हतो. (१८) ते प्रसंगमा दाखल थइने शुममति राजानी पुत्री भने द्रोणमेपनी यईन फैकेयी जे अद्भुत रूपवाळी हती तेने परण्या. (१९) ते प्रसंगे त्यां अनेक राजाभो मावेला हता ते बघा राजामो ' अमने यधाने मूकीने आ फन्या कापढीने केम बरे १' एम ईयाथी कहेता सता लडवाने तैयार थइ गया. (२०) ते वखते दश. रथ राजाने कैकेयर्याए वेना सारथि थइने भत्यंत सहाय करी ठेथी ते वधा प्रतिपधीमोने दशरथराजाए जीत्या. एटले तेणे कैकयीने घरदान प्राप्यं. (२१) कैकेयीने परणीने पणा सेन्यवहे महापळचान थयेला दशरथराजाए राजगृहना राजाने जीती तेनुं नगर पोते ग्रहण क. (२२)लंकेश्वरना भयपी त्यों ज रहेला दशरथ राजाने चारे दिशामा रहेला राजामोने जीते एवा पाहुना वीर्यगळा चार पुत्रो धया. (२३) मा प्रपम (५४१) मीकालसोकप्रकारा। देवी हर्यक्षे दुभास्करैः । तनयं सूचितं स्वप्ने-लं पद्ममजीजनत् ॥२४॥ स्वर्गात्सनत्कुमाराख्या-5च्युत्वा जीवः पुनर्वसोः। समुत्पेदे सुमित्रायाः कुक्षावक्षामभाग्यभूः ॥ २५ ॥ सिंहेभसूर्यचंद्राग्नि-श्रीवास्वप्नसूचितं । नारायणाभिधं विष्णुं सुमित्रा सुपुवे सुतं ॥ २६ ॥ सुतं चासूत कैकेयी भरतं भरतोपमं । प्रासूत सुप्रभा पुत्रं शत्रुघ्नं शत्रुखंडनं ॥ २७ ॥ जीवोऽथानंगसुंदर्या-श्युत्वा कल्पात्तृतीयकात् । पन्यो प्रियंकरा- नाम्न्यां द्रोणमेघस्य भूपतेः ॥ २८ ॥ सुताभवद्विशल्याख्या मातुर्व्याधि चिरंतनं । या जहारागता गर्ने जाता सा निरुपद्रवा ॥ २९ ॥ प्राक् तप्ततपसोऽमुष्याः नानांभोभिर्जनेऽभवत् । व्रणसरोहणं शल्या-पहारो रोगसंक्षयः ॥ ३०॥ राज्याभिषेकायाहूतं रामं दशरथोऽप्यथ । विससर्ज बनायाः कैकेयीवरयांचया ॥३१ ॥ सह लक्ष्मणसीताभ्यां पद्मस्य वनमीयुषः । जहार रावणः सीतां छलारसूर्पणखोदितां ॥ ३२ ॥ ज्ञातसीताव्यतिकरौ अपराजिता राणीए हाथी, सिंह, चंद्र ने सूर्य-ए चार स्वप्नवडे पचित पद्म नामना बळ- देवने जन्म प्राप्यो. (२४) सनदकुमार देवलोकथी व्यवीने पुनर्वसुनो जीव अत्यंत माग्यशाळी एवो सुमित्रा नामनी राणीनी कुक्षिमा उत्पन्न थयो. (२५) सिंह १ हाथी २ सूर्य ३ चंद्र ४ भग्नि ५ लक्ष्मी ६ ने समुद्र ७-ए सात स्वप्नोथी मचित नारायण (लक्ष्मण) नामना वासुदेव थनार पुत्रने ते सुमित्राए जन्म प्राप्यो. (२६) कैकेयीए भरत जेवा भरत नामना पुत्रने जन्म प्राप्यो भने सुप्रमाराणीए शत्रुनुं खंडन करनार शत्रुघ्न नामना पुत्रने जन्म प्राप्यो. (२७) अनंगसुंदरीनो जीव त्रीजा देवलोकमाथी च्यवीने द्रोणमेघराजानी प्रियंकरा नामनी राणीथी विशन्या नामनी पुत्रीपणे उत्पन थयो. ते गर्ममा आवतो ज घणा वखतनो मातानो व्याधि दूर थयो भने तेनो निरुपद्रवपणे जन्म थयो. (२८-२९) पूर्वभवमा तपेला तपना प्रभावथी मा विशल्याना स्नानना जळथी लोकोमा व्रणरोहण, शन्यनो अपहार ने रोगनो संक्षय थवा लाग्यो. (३०) श्रही भन्यदा राज्याभिषेक माटे बोलावेला रामचंद्रने दशरथ राजाए कैकेयीए करेली पोताने आपला वरदाननी मागणीथी पीडा पामीने वनवास माटे विस- र्जन कर्या. (३१) लक्ष्मण ने सीता सहित रामचंद्र वनमा गया. त्या सूर्पणखाना कहे. वाथी रावणे छळ करीने सीतार्नु हरण कयु. (३२) जाण्यो छे सीवानो व्यतिकर जेणे .

सर्ग ३१ मो। (५८३) पद्मनारायणावथ । विद्याधराधिपैर्नेकैः सुग्रीवादिभिराश्रितौ ॥ ३३ ॥ गत्वा नभोऽध्वना लंका मानिना दशमौलिना । योद्धं प्रववृताते तो शत्रुप्राणापहारिणौ ॥३४॥ अथात्यंत हितोऽवादी-दशवक्त्रं विभीषणः मंत्र्यादिभिर्हितैर्नीति-शास्त्रविज्ञैः समन्वितः ॥ ३५॥ कार्षीद(र)नीति मा भ्रात-र्द्राक् प्रत्यर्पय जानकीं। श्रातिथेयीयमेवास्तु रामस्याभ्यागत- स्य नः ॥ ३६ ॥ यम एवास्य मच्छतो-रातिथेयीं करिष्यति । एतद्गृह्यो वदन्नेवं त्वमप्येनमनुवज ॥ ३७ ॥ इति निर्भत्सितो वाढं भ्रात्रा दुर्नय- कारिणा | रामं विभीषणो न्याय्यं शिश्राय प्राग्जनुःसुहृत् ॥ ३८ ॥ जायमानेऽथ संग्रामे दशमौलिविभीषणं । हंतुं युद्ध्यंतमप्सी- च्छक्तिं सद्योऽरिघातिनीं ॥ ३९ ॥ सौमित्रिमवदद्राम-स्तदायं हन्यते हहा । विभीषणः संश्रितोऽस्मान् धिग् नः संश्रितघातिनः ॥ ४०॥ ल- क्ष्मणः पुरतो गत्वा पृष्ठे कृत्वा विभीषणं । आचिक्षेप दशग्रीवं कुद्धः एवा पम ने नारायण (रामचंद्र ने लक्ष्मण ) ने सुग्रीवादिक भनेक विद्याधरोना राजाश्रो भावी प्रावीने मळया-तेमना भाश्रित थया. (३३) शत्रुना प्राणने अपहरण करनारा एवा ते पंने भाकाशमार्गे लंकानगरीए गया अने अत्यंत अमिमानी एवा दशमुख (रावण )नी साथे युद्ध करवामा प्रवा. (३४) मही नीतिशास्त्रने जाणनारा हितेच्छु मंत्रीविगेरेवडे युक्त एवा अतिहितेच्छु विमीपणे दशहराने कडु (३५) के-'हे भ्रात! मनीति न करो भने जानकी (सीता)ने पाछी भापी घो. सामा आवेला प्राहु. पारूप रामर्नु भापणी तरफथी एवी रीते भातिथेय (परोणागत ) थामओ.' (३६) ते समिर्जी रावणे कर्यु के-'यमराजा ज पा मारा शत्रुर्नु प्रातिय करशे. बाकी तैनी पचपाती ग्राम पोलतो एवो तुं पण एनी पासे चान्यो जा.' (३७) मा प्रमाणे भन्या- यकारी माइए मत्यंत निर्मित करेला विमीपणे न्यायी एवा रामनो के जे पूर्वमवना मित्र हता तेमनो माश्रय कर्यो. (३८) हवे संग्राम घालवा दशमौलिए युदमा उतरेला विभीषणने मारवा माटे तत्काळ शत्रुनो पात करे एवी ममोपविजया नामनी शक्ति तेना उपर नांखी. (३९) ते वसते लक्ष्मय- प्रत्ये रामे कछु के-'हाहा!पा भापणो माश्रित पयेलो विमीपण हणाय थे. माश्रित- नो पाव पवा देनार मापणने धिकार छ।'(४०) पीलपंधुना भावा वचन सांभ- लीने लक्ष्मण विमीपणनी पागळ ययो भने सेने पोतानी पाछळ करी दीपो. पक्षी (५८४) भीमामलोकप्रकाश। सोऽप्येवमाह तं ॥ ४१ ॥ नोत्क्षिप्ता शक्तिरेषा त्व-त्कृते किं म्रियसे मुधा । अन्यस्य मृत्युना या मार्य एव खमप्यसि ॥ ४२ ॥ तया च भिन्नहृदयः सौमित्रिभूतलेऽपतत् । मूच्छितो मृतवत्पद्म-सैन्ये शोको महानभूत् ॥ ४३ ॥ पद्मं विभीषणोऽथोचे किमधैर्यमिदं प्रभो । शत्या नया हतो रात्रि-मेका जीवति यत्पुमान् ॥४४॥ प्रतीकाराय तेनास्याः सर्वथा प्रयतामहे । पद्मादयोऽपि चकुस्ता-स्तेऽभवन् किंतु निष्फलाः ॥४५॥ पद्म निराशे खिन्नेऽथ प्रतिचंद्राभिधो निशि। एत्य विद्याधरोऽवादी- सौमित्रर्जीवनौषधं ॥४६॥ विशल्यास्नाननीरेणा-भूवं शल्योज्झितः पुरा। तत्कार्यसिद्धियुष्माकं तेनावश्यं भविष्यति ॥ १७ ॥ अस्ति मातुलपुत्री सा भरतस्य महीपतेः । ततो युष्मदधीनैव द्रोणमेघनृपात्मजा ।। ४८ ॥ ततो भामंडलहनू-मदाद्याः खेचरेश्वराः । लब्धोपाया विमानेन द्राग्ज- ग्मुनिशि कोशलां ॥ ४९ ॥ भरतं च पुरस्कृत्य पुरे कौतुकमंगले । गत्वा दशग्रीवने भाक्षेप को एटले क्रोधायमान थयेलो रावण तेना प्रत्ये चोल्यो (४१) के- ' में प्रा शक्ति तने मारवा माटे नाखी नथी, माटे फोगट शासारु बीजाना मृत्युमा तुं मरे छे ? अथवा तुं पण मारवा योग्य ज छु. ' पाम कहीने तेणे अमोघशक्ति मकी, (४२ ) एटले तेथी भेदायल हृदयवाळी सौमित्रि भूतळपर मृतना जेवो मूच्छित थइने पख्यो भने रामचंद्रना पाखा सैन्यमा महान शोक वर्ती रह्यो. (४३) हवे विभी. पण रामचंद्रने कहे जे के 'हे स्वामी ! तमे प्रत्यारे अधैर्यवान् न थामो, धैर्य धारण करो, कराण के आशक्तिथी हणायेलो पुरुष मात्र एक रात्रि ज जीवे छे. (४४) माटे एना प्रतिकार सारु पापणे सर्व प्रकारना प्रयत्नो करीए.' रामचंद्रादिके तेना कहेवा प्रमाणे भनेक प्रयत्नो कर्या, पण ते वधा निष्फळ थया. (४५) तेथी रामचंद्र अत्यंत निराश भने खिन थइ गया. एवामां मध्य रात्रिए प्रतिचंद्र नामनो एक विद्याधर त्यां प्राव्यो अने तेणे सौमित्रिनु जीवनौषध पताव्यु. (४६) तेणे कडं के " विशन्याना स्नानना नीरथी हुँ पूर्वे शन्य रहित थयेलो छु, तेथी ते ज जळवडे तमारा कार्यनी सिद्धि पण अवश्य थशे. (४७) वळी ते भरत राजाना मामानी पुत्री थाय छ, द्रोणमेघराजानी पुत्री छे, तेथी ते तो तमारे आधीन न छे." (४८) या प्रमाणे सामळीने मामंडळ, इनुमान विगेरे विद्याधरेश्वरो योग्य उपायने पामीने एकदम रात्रिए ज विमानक्टे अयोध्याए गया. (४९) अने त्यांची मरतने लइने कौतुकमंगळ नगरे जइ द्रोणमेघ राजा पासे विशन्या १ मा भष्टापदपर प्रसम याने धरणेंद्रे मापेली शक्ति के.

सर्ग ३३ मो। (५८५) द्रोणमयाचंत विशल्यां कन्यकां ततः ॥ ५० ॥ सह कन्यासहस्रेण ददौ सौमित्रये तदा । विशल्यां द्रोणमेघो य-द्रलं रत्नेन योज्यते ॥ ५१ ॥ समादाय विशल्यां ते निशाशेपेऽथ खेचराः । पनं पश्यंतमध्वानं दीना- ननममूमुदन् ॥ ५२ ॥ विशल्यापाणिसंस्पर्शा-लक्ष्मणस्यांगतो द्रुतं । निरगात्सा महाशक्ति-मंत्रान्नागीव वेश्मतः ॥ ५३ ॥ हनूमता सा नि- याती धृता हस्तेऽब्रवीदिति । अमोघविजयाख्याहं महाशक्तिर्महामते ॥ ५४॥ धरणेंद्रेण दत्तास्मै रावणायोग्रभक्तये। प्रज्ञप्त्या भगिनी देव- स्यापि लग्ना सुदुःसहा ॥ ५५ ॥ विशल्यया भवे पूर्वे कृतानां तपसा महत् । तेजः सोढुमनीशास्मि द्रुतं गच्छामि मुंच मां ॥ ५६ ॥ पटूभूतोऽथ सौमित्रिः प्रातः पद्मानुशासनात् । सह कन्यासहस्रेणो- वहति स्म विशल्यकां ॥५७॥ पुनः प्रवृत्ते संग्रामे सौमित्रिदशकंठयोः। मुमोच रावणश्चकं लक्ष्मणस्य जिघांसया ॥ ५८ ॥ तत्तु प्रदक्षिणां कृत्वा कन्यानी मागणी करी. (५०) एटले ते द्रोणमेघे हजार कन्यामो साथै विशन्याने सौमित्रीने भापी. कारण के रत्न रत्ननी साथे ज योजाय छे. (५१) विशल्याने लइने काइक रात्री बाकी रही तेवे रखते विद्याधरो छावणीमा पाव्या अने मार्गने जोइ रहेला दीन मुखवाळा रामचंद्रने हर्ष पमाड्यो. (५२) विशल्याना हाथना स्पर्शी ज लक्ष्मणना शरीरमाथी मंत्रथी जेम नागणी घरमांथी वहार नीकळे तेम ते महाशक्ति बहार नीकळी गइ. (५३) हनुमाने वेने नीकळता ज हाथवडे पकडी एटले ते बोली के- 'हे महामति हुं अमोपविजया नामे महाशक्ति छु. (५४) उग्र (प्रस) मक्तिवाळापा रावण- ने धरणेंद्रे आपली थे. हुं प्रज्ञप्तिविधानी बहेन छु अने देवोने पण हुं लागी सती सुदुःसह था पर्छ तेवी छु, (५५) परंतु विशन्याए पूर्व भवे करेला महातपना तेजने सहन कर- पाने असमर्थ ई. तेथी हुँ उतावळी जवा इच्छु टु माटे मने मूकी घो' (५६) (मा प्रमाणे सौमळीने हनुमाने मूकी दीधी) सौमित्रि शरीरे स्वस्थ थया. पटले तेणे सवार रामचंद्रना कहेवाथी हजार कन्गामो सापे विशन्यानुं पाणिग्रहण कयु. (५७) फरीने सौमित्री ने दशकंठनो संग्राम शरु थयो एटले राषणे लक्ष्मणने हणी नारावा माटे पक मूक्यु. (५८) ते चक्र लघमणने प्रद- (५८६) श्रीफासलोकप्रकाश सौमित्रेर्दक्षिणं कर । अलंचके वशीभूतं चिरपालितपक्षिवत् ॥ ५९ ॥ सचक्र चूर्णयिष्यामी-त्युन्माद्यंतं दशाननं । चके तेनैव चक्रेण विष्णुः पाटितवक्षसं ॥ ६० ॥ ततश्च ज्येष्ठबहुलै-कादश्यामपराहके । यामे तृतीये नरकं चतुर्थं रावणो ययौ । ६१ ॥ लंकाराज्येऽभिषिच्याथ पद्म- राजो विभीषण । सीतामादाय सौमित्र-सेवितः कोशलां ययौ ॥ ६२ ।। तत्र त्रिखंडभूपालै-रभिषिक्तः सुरैरपि । लक्ष्मणो वासुदेवत्वे बलत्वे पद्मभूपतिः ॥ ६३ ॥ द्वादशाब्दसहस्रायु-स्तुंगश्चापानि पोडश । अष्टमो वासुदेवोऽय-मुक्तः पद्मानुजः श्रुते ॥ ६४ ॥ इति लक्ष्मणः ॥ गंगदत्तो वणिग्मातु-रपमानाद्विरागवान् । द्रुमसेनर्षिपादांते प्रवज्यां प्रतिपन्नवान् ॥ ६५॥ निदानं चकृवानेवं सोऽन्यदा हस्तिनापुरे । भूयासं तपसानेन जनानां वल्लभो भृशं ॥६६॥ ततः स्वर्गे महाशुक्र स संजातः समाधिना । वृंदारको महासौख्यो महाकांतिमहास्थितिः ॥ ६७॥ पिणा करीने तेना हाथमा भावी घणा वखवधी पाळेला वशीभूत पचीनी नेम स्थित थयु. (५९) ते वखते चक्रसहित लक्ष्मणने पण चूर्ण करी नाखवाना अभिमानवाळा दशानन उपर लक्ष्मणे चक्र मूक्यु. तेणे तेना हृदयने फाडी नांख्यु-शतखंड करी नांख्यु. (६०) ए रीते ज्येष्ठ कृष्ण एकादशीए पोर पछीना वखते श्रीजे पहोरे मरण पामीने रायण चोथी नरके गयो. (६१) लंकाना राज्यउपर पद्म विभीपणनो अभिषेक कर्यो. भने सीताने लइने सौमित्रिथी सेवित रामचंद्र अयोध्यामां आव्या. ६२) त्या भरतक्षे. ना दक्षिण बाजुना त्रण खंडना सर्व राजाओए भने देवोए मळीने लक्ष्मणनो वासुदेव तरीके भने पद्मनो चलदेव तरीके अभिषेक कर्यो. (६३) आठमा वासुदेव चार हजार वर्षना आयुवाला ने सोळ धनुष्यना शरीरवाळा रामचंद्रना नानाभाइ तरीके शास्रोमा वर्णवेला छे. (६४) इति लक्ष्मणः । गंगदत्त नामनो वणिक माताना अपमानथी वैराग्यवाळो थयो. तेणे हमसेन मनिनी पासे प्रव्रज्या अंगीकार करी. (६५) ते शन्यदा हस्तिनापुर गया. त्यां तेमणे 'श्रा तपना प्रभावथी लोकोनो अत्यंत वल्लभ थाउं' एq नियाकयु. ( ६६ ) भने समाधिपूर्वक मरण पामीने ते महाशुक्र नामना सातमा देवलोकमां महाकांतिवाळा, महासुखवाळा भने पूर्णस्थितियाळा देव थथा. (६७) पर्ग १३ मो। (५८७) इतश्च मथुरापुर्यां हरिवंशे नृपोऽभवत् । वृहदलाढयस्तस्य तनयो यदुसंज्ञकः ॥ ६८ ॥ तत्सुतो भूपतिः शूर-स्तस्याभूतामुभौ सुतौ । नृपौ शौरिसुवीराख्यौ जाग्रन्नीतिपराक्रमौ ॥ ६९ ॥ शूरः शौरि न्यस्य राज्ये व्रते प्रववृते स्वयं । ततः शौरिः कनिष्ठाय मथुराराज्यमार्पयत् ॥ ७० ॥ स्वयं कुशादेशेषु चक्रे शौरिपुरं नवं । जज्ञिरेंधकवृष्ण्याद्या-स्तनयाः शौरिभूपतेः ॥ ७१ ॥ भोजवृष्ण्यादयोऽभूवन् सुवीरनृपतेः सुताः । न्य. वीविशन्नवीनं च स सौवीराख्यपत्तनं ॥ ७२ ॥ भोजवृष्णिमहीनेतु-र्म- थुरानगरीपतेः। उग्रसेनोऽभवत्पुत्रो योऽसौ राजीमतीपिता ॥ ७३ ॥ नृपस्यांधकवृष्णेश्च सुभद्राकुक्षिसंभवाः । दशाभूवंस्तनुभुवो दशार्दा इति ये श्रुताः॥ ७ ॥ समुद्रविजयो १ ऽक्षोभ्य २-स्तिमितः ३ सागरस्तथा ४ । हिमवा ५ नचलाभिख्यो ६ धरणः ७ पूरणोऽपि च ८ ॥ ७५ ॥ अभिचंद्रो ९ वसुदेव १०-स्तेषु प्राच्यनिदानतः । वसुदेवोऽतिसौभाग्यात् स्त्रीणामासीदतिप्रियः ॥७६ ॥ गंगदत्तस्य जीवोऽय-मष्टमाद्देवलोकतः। स्थितिक्षये ततश्च्युस्खा मथुरायां महापुरि ॥ ७७॥ वसुदेवस्य भूपस्य देवकीकुक्षिजोंगजः । नहीं मधुरापुरीमा हरिवंशमा बृहद्वळ नामे राजा थयो, तेनो पुत्र यदु नामे थयो. (६८) तेनो पुत्र शूर नामे राजा थयो. तेने चे पुत्र शौरि ने सुधीर नामे जागृत एवी नीति ने पराक्रमवाळा थया. ( ६९ ) शूर राजाए शौरिने राज्यपर स्थापन करीने पोवे व्रत भंगीकार कर्यु. शौरिए पोताना नानामाइ सुवीरने मथुरार्नु राज्य भाप्पु (७०) अने पोते कशाचे देशमा शौरिपुर नामर्नु नवु शहेर वसायु. शौरि राजाने अंधष्णि विगैरे पुत्रो थया. (७१) अने सुधीर राजाने मौजवृष्णि विगैरे पुत्रो थया. तेणे सौवीर नामर्नु नवीन नगर वसाव्यु. (७२) मोजवृष्णि मधुरा नगरीनो स्वामी थयो. तेने उग्रमेन नामनो पुत्र थयो के जे राजीमतीना पिता थाय. (७३) मंधकवृष्णि राजाने सुमद्रा राणीनी कृषियी दश पुत्रो थया. ते दशाह नामथी प्रमिद्धि पाम्या. (७४) तेना नाम समुद्रविजय १, मधोम्य २, स्तिमित ३, मागर ४, हिमवान् ५, प्रचळ ६, धरण ७, पूरण ८, भमिचंद्र ९ ने वसुदेव १०. तेमा पूर्व मवे नियाj करेलुं होवाची अत्यंत सौभाग्यपणुं प्राप्त थवाथी वसुदेव स्त्रीमोने मत्यंत प्रिप थया. (७५-७६) हवं गंगदचनो जीव माठमा देवलोफयी भायुचये च्यवीने मधुरा नामनी महापुरीमा यसुदेव राजानी देवकी नामनी राणीनी विधी कम्ण नामे पुत्र थपा. ते नवमा वासुदेव (५८८) श्रीकाललोकप्रकाश। कृष्णाख्यो वासुदेवोऽभू-नवमोऽनवमद्युतिः॥ ७८ ॥ रामाख्यो बल- देवोऽभू-द्रोहिणीकृषिसंभवः । अस्य भ्राता विमात्रेयः परमप्रीतिभाजन ॥ ७९ ॥ अयं श्रीनेमिनाथस्य पितृव्यतनयः स्मृतः । यतः समुद्रविजय- वसुदेवौ सहोदरौ ॥ ८० ॥ अयं वर्षसहस्रायु-र्दशचापोच्छ्रितोऽभवत् । विभ्ररक्षायिकसम्यक्त्वं श्राद्धो नेमिजिनेशितुः ॥ ८१ ॥ इति कृष्णः॥ पंचाशीतिर्वत्सराणां लक्षाण्याद्यस्य जीवितं । द्वितीयस्यायुरब्दानां लक्षाणि पंचसप्ततिः ।। ८२ ॥ पंचपष्टिस्तृतीयस्य वर्षलक्षाणि जीवितं । तुर्यस्य पंचपंचाश-दर्षलक्षास्तदीरितं ॥ ८३ ॥ लक्षाण्येवं सप्तदश पंचमस्यायुरद्भुतं । पष्ठस्याब्दसहस्राणि पंचाशीतिर्भवेदिदं ॥८४ ॥ पंच- पष्टिः सहस्राणि वर्षाणां सप्तमस्य तत् । वत्सराणां पंचदश-सहस्राण्यष्ट- 'मस्य च ।। ८५ ॥ शतानि द्वादशाव्दानां नवमस्यायुरीरितं । नवानां बलदेवानां क्रमः प्रोक्तोऽयमायुपां ॥८६॥ वलदेवात्रयश्च्युत्वा-ऽनुत्तरा- ख्यविमानतः । जातात्रयो महाशुक्रा-ब्रह्मलोकात् त्रयः क्रमात् ॥८॥ विश्वनंदिः १ सुवुद्धिश्च २ तथा सागरदत्तकः ३ । अशोको ४ ललित ५ श्चैव वराह ६ धनसेनको ७ ॥ ८८ ॥ तथापराजितो ८ राज- । अनवम (अतिसुंदर ) कांतिवाळा थया. (७७-७८) तेमना मोटा भाइरोहिणी राणीनी कुक्षिी थयेला राम नामना पळदेव थया. ए कमानी अपरमाताना पुत्र छतां परमप्री- तिना भाजन थया. (७९) ए बने नेमिनाथना काकाना पुत्र का छे. कारण के समुद्र- विजय (नेमिनाथना पिता) ने वसुदेव ने सहोदर हता. (८०) मा कृष्ण एक हजार वर्षना आयुवाळा, दश धनुष्य उंचा शरीरवाळा, क्षायिक समकितने धारण करनारा अने नेमिनाथना धावक हता. (८१) इति कृष्णः ९ । नव वळदेवमा पहेलानुं आयुष्य ८५ लाख वर्षमुं, वीजार्नु ७५ लाख वर्ष®, श्रीजानुं ६५ लाख वर्षर्नु, चोथार्नु ५५ लाख वर्षनु, पांचमार्नु १७ लाख वर्षतुं, छहार्नु ८५ हजार वर्ष, सातमा ६५ हजार वर्षतुं, आठमानुं १५ हजार वर्मनुं भने नवमान १२०० वर्ष, हतुं. (८२-८६ ) त्रण पळदेव अनुत्तरमाथी च्यत्रीने, त्रण महाशुक्रथी च्यवीने, प्रण ब्रह्मदेवलोकी व्यवीने थया हता. (८७) ए वळदेवोना स्वर्गनी अगा- उना भवमा विश्वनंदी १, सुबुद्धि २, सागरदत्त ३, अशोक ४, ललित ५, वराह ६, सर्ग ३१ मो। ललित ९ श्चेति तीर्थपाः । नामानि बलदेवानां स्वर्गात्प्राच्यभवे जगुः ॥ ८९॥ बलदेवा ययुर्मुक्ति-पदमष्टौ यथाक्रमं । दशाब्धिजीवितोंत्यश्च -ब्रह्मलोके सुरोऽभवत् ॥ ९० ॥ उत्सर्पिण्यां भविष्यंत्यां ततश्च्युत्वात्र भारते । भाविनः कृष्णजीवस्या-ऽहतस्तीर्थे स सेत्स्यति ॥ ९१.॥ सप्त- म्यां प्रथमो विष्णुः षष्ट्यां पंच गताः क्रमात् । पंचम्यां च चतुर्थ्यां च तृतीयायां क्षितौ परे ॥ ९ ॥ विष्णवो वलदेवाश्च सर्वे गौतमगोत्रजाः । पद्मनारायणौ तु द्वौ ज्ञेयौ काश्यपगोत्रजौ ॥ ९३ ॥ पंचाभूवंत्रिपृष्ठाद्या वारेषु हरयः क्रमात् । श्रेयांसस्वामिमुख्यानां पंचानामर्हतामिह ॥ ९४ ॥ अंतराले च षष्ठोऽभू- दरनाथसुभूमयोः। सप्तमोऽप्यंतरालेऽभू-सुभूममल्लिनाथयोः ॥ ९५ ॥ मुनिसुव्रतनम्योश्चां-तराले रामलक्ष्मणौ । श्रीनेमिजिनवारे च कृष्णो- ऽभून्नवमो हरिः ।। ९६ ॥ तथोकं-दो तित्थेस सचक्कि १, २ अ य जिणा १० तो पंच केसी- जुया ५-१५, दो चक्काहिव ३, ४ तिन्नि चकियजिणा १६-१७-१८ धनसेन ७, अपराजित ८ अने ललितराज ९ नामो तीर्थंकरोए कहा छे. (८८-८९) आठ वळदेवो मोक्षे गया छ भने दश सागरोपमने श्राउखे छेल्ला बळदेव ब्रह्मदेवलोके गया छे. (९०) ते श्रावती उत्सर्पिणीमा त्यांथी घ्यवीने आ भरतक्षेत्रमा मनुष्यपणे उत्पन थशे भने कृष्णना जीव के जे अरिहंत थशे तेना तीर्थमां सिद्धिपदने पामशे. (९१) पहेला वासुदेव सातमीए, त्यारपछीना पांच छठ्ठीए अने स्यारपछीना त्रण अनुक्रमे पांचमी, चोथी ने प्रीजी नरके गया छे. (९२) बधा वळदेव ने वासुदेव (८-८) गौतमगोत्री छे. अने पद्म ने नारायण ( रामचंद्र ने लक्ष्मण) ए ये काश्यपगोत्री थया छे. (९३) त्रिपृष्ठ विगेरे पांच वासुदेवो अनुक्रमे श्रेयांसनाथ विगेरे पांच प्रभुना चारामां थया छे. (९४) छठा वासुदेव अरनाथ ने सुभूमचक्रीना अांतरामा अने सातमा वासुदेव सुभूम ने मल्लिनाथना तिरामा धया के. (९५) पाठमा वासुदेव ने वळदेव एटले राम-लक्ष्मण मुनिसुव्रत ने नमिनाथना मांतरामा भने कृष्ण नामना नवमा वासुदेव नेमिनाथने वारे थया छे. (९६) कहूंछ के-चे तीर्थकर साथे ज ये चक्री थया १-२-१-२, पछी पाठ तीर्थंकर थया. (३ थी १०) स्यारपछी पांच तीर्थकर वासुदेवसाधे थया. (५) (११ थी १५) त्यार- (५९०) भीकासलोकप्रकाश। ५-६-७ तो केसि ६ चक्की ८ हरि ७ ।तित्थेसो इगु तो १९ सकिय ९ जियो २० केसी ८ सचक्की १० जिणो २१, चक्की ११ केसव ९ संजुश्रो जिणवरो २२ चक्की य १२ तो दो जिणा २३, २४ ॥ ९७ ॥ चक्रिवा- सुदेवयोश्च क्रममेवमाहुः-चक्किदुगं हरिपणगं पणगं चकीण केसको चक्की । केसव चक्की केसव दुचक्कि केसी य चक्की य ॥ ९८ ॥ त्रयोऽहंतश्चक्रिणो य-बच्चात्योऽहत्पदद्वयं । दधौ द्वाभ्यां शरीरा- भ्यां तीर्थकृवासुदेवयोः ॥ ९९ ।। तदस्यामवसपिण्यां पष्टिदेहाः प्रकी- चिताः । त्रिषष्टेः शलाकापुंसा-मेकोनषष्टिरंगिनः ॥ ४०० ।। भीमावलि १ जितशत्रुः २ रुद्रो ३ विश्वानलोऽपि ४ च । सुप्रतिष्ठः ५ पंचमः स्या-द्भवेत् पष्ठोऽचलाह्वयः ६ ॥ १ ॥ पुंडरीको ७ जितधरो ८ जितनाम ९ स्तथापरः । पेढालः १० सत्यकिश्चेति ११ रुद्रा एकादशो- दिताः॥२॥ गतौ रुद्रावादितो द्वौ सप्तमी नरकावनीं । ततः कमात्पंच पष्ठी-मष्टमः पंचमी भुवं ॥ ३ ॥ तुयां च नवमदशमौ तृतीयां नरक- पछी ने चक्री थया ३-४, त्यारपछी त्रण तीर्थकरो (१६-१७-१८ मा )ज पक्री थया. ५-६-७, त्यारपछी वासुदेव ६ हा, चक्री ८ मा, वासुदेव ७ मा, पछी १९ मा तीर्थकर, पछी चक्री ९ मा, तीर्थकर २० मा, वासुदेव ८ मा, चक्री १० मा, तीर्थकर २१ मा, चक्री ११ मा, वासुदेव ९ मा, तीर्थकर २२ मा, चक्री १२ मा भने वे तीर्थकर २३ मा ने २४ मा थया. (९७) चक्रवर्ती ने वासुदेवनो क्रम या प्रमाणे- ने चक्री, पांच हरि (वासुदेव ), पांच चक्री, एक केशव (वासुदेव), १ चक्री, १ केशव, १ चक्री, १ केशव, २ चक्री, १ केशव, १ चक्री-ए प्रमाणे २१ जाणवा. (९८) प्रण अरिहंतो ज चक्री थया. छेना तीर्थकर पहेला वासुदेव पण थया हता एटले तीर्थकर ने वासुदेवना शरीरमा जीव तरीके एक ज हता; (९९) तेथी भा अवसर्पि- गीमा ६३ शलाकापुरुपना देह ६० भने जीव ५९ हता. (४००) मा चोवीशीमा थयेला ११ रुद्रोना नाम-भीमावलि १, जितशत्रु २, रुद्र ३, विश्वानळ ४, सुप्रतिष्ठ ५, प्रचळ ६, पुंडरीफ ७, जितधर ८, जितनाम ९, पेढाळ १० भने सत्यकी ११-मा प्रमाणे कह्या . (१-२) ए रुद्रोमाथी प्रथमना चे सावमीए, त्यारपछी पांच छहीए, भाठमा पांचमीए, नवमा-दशमा चोथीए अने अग्यारमा त्रीजी सर्ग ३१ मो. क्षितिं । एकादशो जगामेति नवमे पूर्व ईरितं ॥ ४ ॥ श्राद्यो वृषभवारेऽ- भूद् द्वितीयोऽजितवारके । अष्टानामर्हता तीर्थे-प्वष्टौ च पुष्पदं ततः ॥ ५॥ एकादशः सत्यकिश्च तीर्थे वीरजिनेशितुः । तीर्थव्यक्तिः प्रतिहरि-चलानां वासुदेववत् ॥ ६ ॥ त्रिपष्टिरेते कथिताः शलाका-पुमांस ऐश्वर्यगुणाभिरामाः । क्षेत्रे किल्लास्मिन् भरतेऽत्र काले-ऽवसर्पिणीनामनि नाममात्रात् ।। ७॥ विश्वाश्चर्यदकीर्तिकीर्तिविजयश्रीवाचकेंद्रांतिप- द्राजश्रीतनयोऽतनिष्ट विनयः श्रीतेजपालात्मजः। काव्यं यत्किल तत्र निश्चितजगत्तत्वप्रदीपोपमे, संपूर्णः प्रथितो निसर्गसुभगः सर्गस्त्रयस्त्रिंशता ॥ ४०८ ॥ ।। इति श्रीलोकप्रकाशे प्रयस्त्रिंशत्तमः सर्गः समासः ॥ श्रीरस्तु ।। नरके गयेला छे. पा प्रमाणे नपमा पूर्वमा कहेलुं छे. (३-४) ते अग्यारमा पहेला ऋषभदेवने वारे, वीजा अजितनाथने वारे, पुष्पदंतथी एटले सुविधिनाथथी माठ प्रभु (९ माथी १६ मा ) ने वारे त्यारपछीना भाठ (त्रीजाथी दशमा) ने छेना ११ मा सत्यकि वीरप्रभुने वारे थयेला छे. प्रतिवासुदेव ने बळदेव क्या प्रसने वारे थया? ते वासुदेव प्रमाणे ज जाणी लेवू. (५-६ ) उपर प्रमाणे या अवसार्पणीमां आ मरतक्षेत्रमा थयेला झैश्वर्यगुणवडे अमिराम एवा त्रेशठशलाका पुरुषोने नाममात्रथी कशा अर्थात् संक्षेपथी मनुं चरित्र कडं. (७) विश्वमा पाश्चर्य पमाडे एवी कीर्तिवाळा श्रीकीर्तिविजय वाचकेंद्रना शिष्य भने तेजपाळ तथा राजश्रीना पुत्र विनये (विनयविजय उपाध्याये ) जे भा काव्य रच्युं छे ते निश्चित एवा त्रण जगतना तखने जोयामा दीपकसमान पा लोकप्रकाश नामना काम्यमा स्वभावे ज सुभग एवो तेत्रीशमो सर्ग संपूर्ण थयो. (४०८) ॐ श्री भी श्री (५९२) भीकाललोकप्रकाश। ॥ अथ चतुस्त्रिंशत्तमः सर्गः प्रारभ्यते ॥ -.- इत्यस्या अवसर्पिण्या यथोक्ता उत्तमा नराः । वाच्यास्तथावसर्पि एयु-त्सर्पिणीष्वखिलासु ते ॥ १ ॥ स्यातां किंववसर्पिण्या-मादिमौ जिनचक्रिणौ । तृतीयारकपर्यंते परे तुर्यारकेऽखिलाः ॥ २ ॥ उत्सर्पिण्यां तु सर्वेऽमी स्युस्तृतीयारके क्रमात् । परं तुर्यारकस्यादा-वंतिमौ जिन. चक्रिणौ ॥ ३॥ यादृश्यतेऽवसर्पिण्या-मायुर्देहादिका स्थितिः । उत्स- पिणीमुखे तादृग् जिनचक्र्यादिदेहिनां ॥ ४ ॥ भाव्यमेवं प्रातिलोम्यं पदार्थेष्वखिलेष्वपि। उत्सर्पिण्यवसर्पिण्यो-य॑क्त्या तु कियदुच्यते ॥५॥ श्रथ प्रकृतं-इत्येवमवसर्पिण्यां दुःपमसुषमारके । पूर्णे सति प्रविशति पंचमो दुःपमारकः ॥ ६ ॥ अस्मिन् कालेऽपि पूर्वोक्तं भूमिवृक्षादिवर्णनं । अनु- संधीयतां किंत्व-नंतघ्नन्यूनपर्यवं ।। ७॥ स्यात्संहननमत्रादौ संस्थानमपि षड्विधं । व्यवच्छेदे क्रमादेकं सेवार्तमवतिष्टते ॥ ८॥ यथास्यामवस- सर्ग ३४ मो. आ प्रमाणे यथोक्त उत्तम पुरुषो मा अवसर्पिणीमां थयेला जाणवा. एज प्रमाणे बधी अवसर्पिणी-उत्सर्पिणीमां थाय छे (१) परंतु अवसर्पिणीमा पहेला जिन ने चक्री श्रीजा मारानी प्रांत थाय छे भने पाकीना बधा जिन ने चक्री चोथा पारामां थाय छे. (२) उत्सर्पिणीमां ते सर्वे ( २३ ने ११) अनुक्रमे त्रीजा पारामां थाय के ने छेल्ला जिन ने चक्री तेना चोथा पाराना प्रारंभमां थाय छे. (३) जेवी भवसर्पिणीना अंतमां आयुष्य ने देहादिकनी स्थिति होय छे तेज प्रमाणे उत्सर्पिणीना प्रारंभमां जिन, चक्री विगेरे जीवोनी स्थिति होय छे. (४) ए प्रमाणे सर्व पदार्थमा उत्सर्पिणी अवसर्पिणीनी प्रतिलोम स्थिति जाणवी. तेमां व्यक्तिपडे केटलुं कही शकाय ? अर्थात् न्यक्तिवडे कही शकाय नहीं. (५) हवे प्रकृत वात कहे थे- प्रथम कही गया प्रमाणे अवसर्पिणीमां दुषमसुपमा नामनां चोथो थये सते पाचमो दुःपमा नामनो पारो प्रवेश पामे छे-शरु थाय के. (६) ते काळमां पण पूर्वे कया प्रमाणे भूमिवृक्षादिकना वर्णननुं अनुसंधान करी ले, परंतु ते चोथा भारा करता अनंतगुणा न्यून पर्यववालं समजबु. (७) ए भारानी आदिमा संहनन भने संस्थान ए होय छे परंतु संघयणमा क्रमथी विच्छेद थाछवटे एकलं सेवा रहे थे. (८) पारो समाप्त सर्ग ३४ मो। (५९३) पिण्या-मरेऽस्मिन् प्रथमं गतं । दिवं गते स्थूलभद्रे वर्षों तच्चतुष्टयं ॥९॥ त्रिंशमन्दशतं चायुः स्यादत्रादौ शरीरिणां । कालक्रमाद्धीयमान- मंते विशतिवार्पिकं ॥ १०॥ सप्तहस्तमितं देहं स्यादत्रादौ शरीरिणां । एकहस्तमित चाते हीयमानं यथाक्रमं ॥ ११ ॥ चतुर्थारकजाताना- मिह मोक्षोऽपि संभवेत् । एतस्मिन्नरके जात-जन्मनां तु भवेन्न सः । ।॥ १२ ॥ जाते तु निर्वाणोच्छेदे संहननानुसारतः । शरीरिणो यथाकर्म स्युश्चतुर्गतिगामिनः ॥ १३ ॥ दुर्लक्षणे पुत्र इव वर्द्धमानेऽरकेऽत्र च । क्रमादुच्छेदमायांति सद्भावाः केवलादयः॥ १४ ॥ न मनःपर्यवज्ञानं न चात्र परमावधिः । क्षपकोपशमश्रेण्यौ नैवमाहारकं वपुः ॥१५॥ लब्धि- नर्मात्र पुलाकाख्या नाप्यंत्यं संयमत्रयं । सामायिकं स्याच्छेदोप-स्थापनीयं च कुत्रचित् ॥१६॥ नात्र तादृग्लब्धिमंतो नाहतो न च चक्रिणः । वासु. देवादयो नैव शलाकापुरुपा इह ॥ १७॥ जातिस्मृत्यवधिज्ञान-बैकियो. द्भावनादयः । ये भावा अव्यवच्छिन्ना-स्तेऽपि कालानुभावतः ॥१८॥ ते आवी रीते-पा अवसर्पिणीमा स्थूळभद्र स्वर्गवासी थया पछी पहेलु संघयण विच्छेद पाम्युं भने बजर्पिना स्वर्गवासी थया पछी त्यारपछीना चार संघयण विच्छेद पाम्या छे. (९) भा पांचमा भाराना प्रारंभमां प्राणीओनुं उत्कृष्ट प्रायु १३० वर्ष- होय छे, तेमा काळक्रमे हानि था-घटता घटता पांचमा भाराने छेडे वीश वर्षतुं रहे थे. (१०) मा भारानी प्रादिमा सात हाथर्नु शरीर होय छे ते अनुक्रमे घटतुं घटतुं एक हाथर्नु रहे थे. (११) चोथा पारामा जन्मेलानो पा पारामा मोक्ष समवे छे; आ आरामां जन्मेलाने मोक्षनी प्राप्ति थती नथी. (१२ ) निर्वाणनो उच्छेद थये सते संहननने अनु- सारे जीवो पोतपोताना कर्म प्रमाणे चारे गतिमा जनारा होय छे. (१३) दुर्लक्षण- बाळा पुननी जेम था आरो पृद्धि पामते सते अनुक्रमे केवळज्ञानादि सद्भावो उच्छेद पामे छे. (१४ ) आ पारामा केवळनान उपरांत मनःपर्यवज्ञान, परमावधिज्ञान, तपक ने उपशमश्रेणि, आहारक शरीर, पुलाकलब्धि भने अंतना त्रण चारित्र (परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसपराय ने यथाख्यात) एटले कुल दश वाना (जयूस्वामीना निर्वाण पछी) होता नथी. सामायिक ने छेदोपस्थापनीय चारित्र पण क्यांक क्योंक होय छे. (१५-१६) पा मारामां सेवा लब्धिमानो, अरिहंत, चक्रवर्ती भने वासुदेवादि शलाका पुरुषो होता नथी. (१७) जातिस्मरणज्ञान, अवधिज्ञान भने वैक्रिय शरीर विगेरे अव्यवच्छिन्न छतां पण काळना प्रमा- १ घायु १२० वर्षतुं प्रारंभमा भने अंते शरीर वे हायर्नु अन्यन कहेल .

(५९४) भीकाललोकप्रकाश । भवंति विरला एव गुणा इव दुरात्मनि । श्रार्हतानामपीह स्यु-मतभेदो अनेकशः॥१९॥ युग्मं ॥ जनाःप्रायेण बहुल-कपाया दुर्णयप्रियाः । अधर्मरा- गिणो धर्म-द्विष्टा मर्यादयोज्झिताः ॥ २०॥ ग्रामाः श्मशानतुल्याः स्यु- आमाभनगराणि च । कुटुंघिनश्चेटतुल्या राजानश्च यमोपमाः ॥ २१ ॥ वित्तं गृहंति लोभांधा महीपाला नियोगिनां । प्रजानां तेऽधमाश्चैवं मात्स्यो न्यायः प्रवर्तते ॥ २२ ॥ उत्तमा मध्यमाचारा मध्यमाश्चात्यचे- प्टिताः। विसंस्थुलाश्च देशाः स्यु--दुर्भिक्षाद्यैरुपद्रवैः ॥ २३ ॥ मितं वर्षति पर्जन्यो न वर्पत्यपि कहिचित् । वर्पत्यकाले काले च न जनैः प्रार्थितोऽपि सः ॥ २४ ॥ अन्नं निष्पद्यतेऽनेकै-रुपायैः सेचनादिभिः । निष्पन्नमपि तत्कीर-शलभायैर्विनश्यति ॥ २५ ॥ वदान्या धार्मिका न्याय-प्रियास्ते निर्धना जनाः । अनीतिकारिणो दुष्टाः कृपणाश्च धन- भृताः ॥ २६ ॥ निर्धना वह्वपत्याः स्यु-निनोऽपत्यवर्जिताः । श्राढ्या वथी दुरात्मामा गुणोनी जेम बहु विरल देखयामां आवे छ, भने मरिहंतना मतने मान- नाराअोमा जुदा जुदा अनेक मतभेदो पण थाय छे. (१८-१९) मा काठमां मनुष्यो पण प्राये बहु कपायोपाळा, अन्यायप्रिय, अधर्मना रागी, धर्मना द्वेपी अने मर्यादारहित होय छे. (२०)श्रा काळमां धीमे धीमे प्रामो स्मशानतुन्य, नगरो ग्रामतुल्य, कुटुंबीयो दासतुल्य भने राजामो यमतुल्य थशे. (२१) लोमांध एवा राजाभो अधिकारीमोने दंडीने तेनुं द्रव्य ग्रहण करशे अने अधम एवा अधिकारीयो प्रजानुं द्रव्य ग्रहण करशे. या प्रमाणे मात्स्यन्याय प्रवर्तशे. (२२) उत्तमो मध्यम आचारवाळा, मध्यमो कनिष्ठ भाचारवाळा थशे अने देशो दुर्मिक्षादिकना उपद्रवथी विसंस्थुळ थइ जशे. (२३) वरसाद बहु थोडो श्रावशे, कोई वखत वरसशे ज नहीं, अकाळे वरसशे भने काळे लोको तरफथी प्रार्थना कराया छतां पण वरसशे नहीं. (२४) पाणी सिंचवा विगेरे अनेक उपायोवडे अन्न पाकशे तो तेनो पालो पोपट अने शलम विगैरे पक्षीमो विनाश करी नाखशे. (२५) धार्मिको भने न्यायप्रिय मनुष्यो निर्धन थशे अने अनीति करनारा, दुष्टो भने कृपणो धनवडे भरपूर थशे. (२६) निर्धनो बहु बाळबच्चावाळा थशे, धनवानो अपत्य (चाळक) विनाना थशे धनाढ्यो मंदाग्निवाळा ने व्याधिवाळा थशे अने १ मत्स्यमा मोटो मत्स्य नाना मत्स्यने गळी जाय एवो न्याय ज प्रवः छे.

सर्ग ३४ मो, (५९५) मंदाग्नयो रुग्णा दृढाग्न्यंगाश्च दुर्विधाः ॥ २७ ॥ दृढांगा नीरुजो मूर्खाः कृशांगाः शास्त्रवेदिनः। विलसति खलाः स्वैरं प्रायः सीदति साधकः ॥ २८ ॥ अतिवृष्टिरवृष्टिश्च मूषकाः शलभाः शुकाः । स्वचक्र परचक्रं च स्युर्भूम्नेतीतयो भुवि ॥ २९ ॥ रात्रौ चौराः पीडयंति प्रजा भूपाः करै- दिवा । नीरसामपि शैलक्ष्मा-मिव दावाग्निभानवः ॥३०॥ श्राधिका- रिण एव स्यु-नृपाणामधिकारिणः। लंचासेवादिभिर्वश्या न्यायमार्गा- नपेक्षिणः ॥ ३१ ॥ नृपा मिथ्यादृशो हिंस्रा मृगयादिपु तत्पराः । विप्रा- दयोऽपि लोभांधा लोकानां विप्रलंभकाः ॥ ३२ ॥ असंयता अविरता नानानाचारसेविनः । गुरुंमन्यास्तेऽपि विप्राः पूज्यंते भूरिभिर्जनैः ॥३३॥ पाखंडिनोऽपि विविधैः पाखंडैर्भद्रकान् जनान् । प्रतारयति दुःखाब्धे- वयं निस्तारका इति ॥ ३४ ॥ म्लेच्छमिथ्यादृगादीनां स्वस्वाचारे दृढास्थता । पाहतानां च शुद्धेऽपि धर्मे न प्रत्ययो दृढः ॥ ३५॥ पंचा- दुर्भागीयो दृढ अग्निवाला ने दृढ शरीरवाळा थशे. (२७) मूर्यो हद अंगवाला ने निरोगी थशे, शास्त्रज्ञो कृश शरीरवाळा (दुवळा) थशे. खळजनो स्वेच्छाए विलास कर- नारा थशे अने साधुजनो प्राये सीदाशे. (२८) वळी १ अतिवृष्टि, २ अनावृष्टि, ३ मूषक, ४ शलभ, ५ शुक, ६ स्वचक्रनो भय ने ७ परचक्रनो भय-श्रा सात ईतिभो पृथ्वीपर वारंवार थशे. (२९) रात्रै प्रजाने चौर पीडा करशे, दिवसे राजा करवडे प्रजाने पीडशे. नीरस एवी पण पर्वतनी पृथ्वीने दावाग्नि ने भानु (सूर्य) जेम रात- दिवस पीडा करे तेम नीरस एटले कसविनानी एवी पण प्रजाने रात्रे चोरो पीडशे श्रने दिवसे राजा करवडे पीडशे. (३०) राज्यना अधिकारीओ श्राधि- उपाधिना करनारा थशे, लांच ने सेवादिवडे ते वश थशे अने न्यायमार्गनी अपेक्षा विनाना थशे. (३१) राजाश्रो प्राये मिथ्या दृष्टि, हिंसक प्रने शिकारादिमा तत्पर थशे, विप्रादिक पण लोमांध, लोकोने ठगनारा, असंयत, अविरत अने अनेक प्रकारना अना- चार सेवनारा छतां पण पोताने गुरुतरीके माननारा थशे. ते विप्रो पण घणा लोकोथी पूजाशे. (३२-३३ ) पाखंडीमो पण विविध प्रकारना पाखंडोथी भद्रकजनाने छेतग्शे अने अमे ज दुःखसमद्रमांथी तारनारा छीए एम कहेश. (३४ ) म्लेच्छो भने मिथ्याह- टिमो पोतपोताना आचारमा दृढ प्रास्थावाला थशे अने आईतो (श्रावको) तो शुद्ध धर्ममो पण दृढ विश्वासवाळा नहीं थाय. (३५) अन्य तापसादिको पंचाग्निसापन, .

(५९६) श्रीकाललोकप्रकाश । निमाघस्नानादी-न्यन्ये कष्टानि कुर्वते । पाहतास्त्वलसायंते सुकरावश्य- कादिपु ॥ ३६ ॥ यत्याभासा गणं त्यक्त्वा स्युः केचित्स्वैरचारिणः । श्राद्धा अप्यनुगच्छंति तान् वाला ग्रहिलानिव ॥ ३७॥ गणस्थिताश्च निग्रंथा धर्मोपकरणेष्वपि । ममत्वाभिनिवेशेन स्युः परिग्रहविप्लुताः ॥ ३८॥ आराधयंति नो शिष्या गुरून् गुणगुरूनपि । विज्ञंमन्या गुरु- भ्योऽपि विनयं न प्रयुंजते ॥ ३९ ॥ तनयाश्चावजानंति मातापित्रादि- कानिति । जानंति किममी तत्त्वं जराजर्जरबुद्धयः ॥ ४० ॥ परस्परं विरुध्यते स्वजना: सोदरादयः । परकीयैश्च सौहाई कुर्वते हार्ददर्शिनः ॥४१॥ वाल्ये प्रवाजिताः शिष्याः पाठिताः शिक्षिताः श्रमात् । गुरो- स्तेऽपि प्रतीपाः स्युर्ये कीटाः कुंजरीकृताः ॥ ४२ ॥ प्रहिता ये वणि- ज्यायै विश्वस्तैरन्यभूमिषु। श्रेष्ठिना तेऽपि सर्वस्वं मुष्णंत्याढ्यीकृता अपि ॥ ४३ ॥ छलेनाश्वास्य जल्पायैः क्षत्रिया घ्नंति वैरिणः । प्राये- माघस्नानादि अनेक प्रकारना कष्टो सहन करशे अने श्रावको तो सहेलाइथी थइ शके एवा श्रावश्यकादिकमां पण आळस करशे. ( ३६ ) केटलाक यत्याभासो' गच्छने तजी दइने स्वेच्छाचारी थशे अने जेम पाळको गांडा माणसनी पाबळ जाय तेम केटलाक श्रावको पण तेना अनुयायी थशे. ( ३७ ) गण (गच्छ ) मा रहेला निग्रंथ मनिमो पग धर्मोपगरणने विषे ममत्वना अभिनिवेशथी परिग्रहधारी जेवा थशे. (३८) गुणे करीने गुरु ( गुणवान् ) एवा गुरुनी पण शिष्यो आराधना करशे नहीं, एटले के पोताने गुरुथी पण विशेष विज्ञ माननारा एवा तेश्रो गुरुनो पण विनय नहीं करे. (३९) पुत्रो पण मातापितादिकनी अवगणना करशे अने 'भा जराथी जर्जर बुद्धिवाळा थइ गयेला तवने शुं जाणे ?' एम कहेशे. (४०) स्वजनो श्रने सहोदरो विगेरे परस्पर विरुद्धता धरावशे अने प्रेमदर्शी बनीने परजनोनी संगाते प्रेमभाव धरावशे. (४१) बाळपणामाथी दीक्षा आपीने भणाला-शिक्षित करेला अर्थात् कीडीमाथी कुंजर जेया करेला शिष्यो पण गुरुर्नु प्रतिपक्षीपणुं करशे. (४२) वेपारीओए विश्वास करीने जेमने परदेशमा व्यापार माटे मोकलेला होय तेवा नोकरो शेठे द्रव्यवान् बनावेला होय छतां पण शेठवें बधुं द्रव्य पोतानुं करी वेसशे ( चोरी लेशे ). (४३) चत्रियो कपटयुक्त पाणीवडे आश्वा- सन पापीने वैरीभोने हणी नाखशे अने मृत्युना भीरु एवा तेो प्राये अनीतियुद्ध ज १ मुनिवेपवाळा पण मुनिनो प्राचार पाळनारा नहीं ते, (५९७) मर्ग ३४ मो। णाऽनीतियुद्धानि कुर्वते मृत्युभीरवः ॥ ४४ ॥ स्नुषाः श्वशुरयोः सम्यग् विनयं न वितन्वते । प्रसादमुचितं तेऽपि वधूटीषु न कुर्वते ॥ ४५ ॥ यैः सर्वस्वव्ययः पोपं पोषमुद्वाह्य वर्द्धिताः । तेभ्यः पितृभ्यो भिन्नाः स्युः क्रोधांधाः स्त्रीमुखाः सुताः ॥ १६ ॥ प्रविश्य हृदयं पत्युः खरा वक्रमुखी वधूः । पितृपुत्रौ पृथक्कुर्या-कुंचिकेवाशु तालकं ॥ ४७॥ मातापित्रोर-. विश्वासः श्वश्रूश्वशुरयोः पुनः । विश्वासः परमः पत्नी-वचसा हंति मातरं ॥४८॥ नापि पुष्णंति संपन्नाः पितृमात्रादिपक्षजान् । पत्नीव- ग्यांश्च पुष्णति वित्तवस्त्राशनादिभिः ॥ १९ ॥ स्नुपासुतेषु प्रौढेषु गृहे विषयसेविषु । सेवंते विषयान् वृद्धाः पितरोऽपि गतत्रपाः॥५०॥ वली- लुलितचर्मापि पलितश्वेतकूर्चकः । कंप्रः श्लथोऽपि नो पाला-मुद्वहन लज्जते जनः ॥ ५१ ॥ विक्रीणते सुताः केचि दुरवस्थाः सुतानपि । आसन्नमृत्यवे दद्युः स्वपुत्री धनलिप्सवः ॥ ५२ ॥ राजामात्यादयो येऽपि करशे. (४४) पुत्रवधू सासु-ससरानो सम्यक्प्रकारे विनय नहीं करे भने ते सासुससरा पण उचित प्रसाद पुत्रवधूप्रत्ये नहीं करे. (४५) जेने सर्वस्वना व्यय करीने पोषण करी करीने परणावीने वृद्धि पमाड्या होय तेवा पुत्रो पण क्रोघांघ ने खीमुखा थाने पिताथी जुदा थशे. (४६ ) खर-कठोर भने वक्रमुखी एवी वधू पतिना हृदयमा पेसीने कुंची जेम ताळाना ये भागने जुदा पाडे तेम शीघ्र पिता-पुत्रने जुदा पाडशे. (४७) पुत्रो मातापितानो अविश्वास करशे अने सासु-ससरानो विश्वास करशे. वळी पत्नीना वचनथी मावाने पण हणशे-मार मारशे. (४८) पुत्रो द्रव्यसंपन थया सता पिता-माता विगेरेना पक्षीमोने पोपण प्रापशे नहीं, परंतु द्रव्य वस्त्र ने भशन-खानपानादिवडे स्त्रीना संबंधीनोनु-सासरीयानुं पोपण करशे. (४९) प्रौढावस्थावाळा थयेला पुत्र ने पुत्रवधू जे घरमां विषयसेवन करता होय त्या लजाविनाना वृद्ध माता-पिता पण विषयसेवन करशे. (५०) चामडीमा वळीया पडी गया होय, माथे घोळा पळी भान्या होय ने दाढी-मुछ पण श्वेत थह गया होय, शरीर कंपतुं होय, विसंस्थूल थइ गर्दा होय छत्ता तेवो पुरुष चाळीने परणता लाजशे नहीं. (५१) केटलाक निर्दयो पुत्रीने वेचशे, दुरवस्था पाम्या सता पुत्रोने पण वेचशे अने धनना इच्छको पोतानी पुत्रीने भासन्नमृत्युवाळा मनुष्यने पण आपशे. (५२) राजा, ममात्यादिको जे कोइ न्यायमार्गना प्रवर्तक होय १ लघुवयनी कन्या.

(५९४) .. भीगनलोकप्रकारा। न्यायमार्गप्रवर्तकाः । ते परान् शिक्षयंतोऽपि स्वयं स्युर्व्यभिचारिणः ॥ ५३॥ साकूतोक्तिकटाक्षौघैः स्तनदोर्मूलदर्शनैः । गणिका इव चेष्टते नित्रपाः कुलयोषितः ॥ ५४ ॥ मातुः स्वसुः समचं स्युः पुत्राया भाण- वादिनः । श्वशुरादिसमक्षं च वदंत्येवं स्नुषा अपि ॥ ५५ ॥ पंचकाः स्वार्थनिष्ठाश्च स्युमिथः स्वजना अपि । वृत्तिं कुर्वति वणिजो दंभैः कूट- तुलादिभिः ॥ ५६ ॥ हानिः प्रत्युत वाणिज्ये दुष्कराजीविका नृणां । न च लाभेऽपि संतुष्टि-स्तृष्णा स्यादधिकाधिका ॥ ५७॥ वहवो दुर्विधा लोकाः खिद्यते धनकांक्षया । विषयाणां तृष्णयैव पूरयंत्यखिलं जनुः ॥ ५८ ॥ रूपचातुर्युदारेषु निजदारेषु सत्स्वपि । परदारेषु मन्यते रंवा- स्मानं गुणाधिकं ॥ ५९ ॥ स्यादकिंचित्करो लोके सरलः सत्यवाग्जनः। कुटिलो वक्रवादी च प्रायः स्याजनताहतः ॥६०॥ वेश्मवीवाहसीमंता- दिषु संसारकर्मसु । ऋणं कृत्वापि वित्तानि विलसंति घना जनाः ॥११॥ से बीजामीने शिखामण भापशे छतां पोत व्यभिचारी थशे. ( ५३ ) लाजविनानी कुळसीमो पण पाठवाळी वाणीवडे अने कटाक्षोना समूहबडे तेम ज स्तन अने हाथर्नु मूळ देखाडवावडे गणि कानी जेवी चेष्टा करशे. (५४ ) माता ने बहेननी समक्ष पुत्रादि अपशब्दो बोलशे अने श्वशुरादिनी समक्ष वधू पण तेवा शब्दो चोलशे. (५५) स्वजनो पण अंदर अंदर एकबीजाने छेतरनारा अने स्वार्थनिष्ठ थशे. वणिको कपटवडे अने खोटा तोल-मान-मापादिवडे भाजीविका चलाक्शे, (५६) परंतु एम करवायी उत्लटी चेपा. रमा हानि थशे अने मनुष्योने आजीविका दुष्कर थइ पडशे. वळी लाभ प्राप्त थये सते पण संतोष थशे नहीं, उलटी वृष्णा अधिकाधिक वधती जशे. (५७) घणा दुर्भागी मनुष्यो धननी इच्छाथी बहु खेद पामशे अने विषयोनी तृष्णावडे ज पाखो जन्म पूरो करशे. (५८) रूप अने चातुरीचडे उदार ( श्रेष्ठ) एवी स्त्री छतो पण परदारागमन करीने पोताना प्रात्माने गुणाधिक मानशे. (५९) लोको सरल भने सत्यवादी मनुष्योने बहु थोडं मान प्रापशे अने कुटिल तेम ज वनवादी मनुष्यने प्रायः जनता विशेष आदर आपशे. (६०) घणा मनुष्यो घर बांधवामा भने विवाह तथा सीमंतादि संसारी काममा देवू करीने पण द्रव्य वापरशे (६१ ) अने चैत्य, उपाश्रय, देवपूजा, प्रतिष्ठा, उत्स- सर्ग १४ मो। (५९९) चैत्योपाश्रयदेवार्चा-प्रतिष्ठाद्युत्सवेषु तु । उपदेशं न शृण्वंति शक्ता अप्येडमूकवत् ॥ २॥ श्रद्धाहानिद्रव्यहानि-धर्महानिर्यथाक्रमं । श्रायुहीनिवपुर्हानिः सार- हानिश्च वस्तुषु ।। ६३ ।। कौटिल्यमग्रजः स्वल्पं वेत्त्यनल्पं ततोऽनुजः । यथाकनिष्ठमित्येवं तद्वद्धताधिकाधिक ॥ ६४ ॥ मणिमंत्रौषधीतंत्रा--स्ता- दृग्माहात्म्यवर्जिताः। देवा भवंति नाध्यक्षाः सम्यगाराधिता अपि ॥ ६५ ।। स्वल्पत्तुच्छाऽरसफलाः सहकारादयो द्रुमाः। गोमहिष्यादयोऽ- प्यल्प-दुग्धास्तान्यरसानि च ॥ ६६ ॥ दुर्णयो वर्द्धते कूट-तुलादिलो- भवृद्धितः । ततः स्युर्जलदास्तुच्छाः पृथिवी नीरसा ततः॥६७ ॥ भोप- ध्यस्तेन निस्तारा मानवानां ततः क्रमात् । श्रायुदेहवलादीनां परिहाणिः प्रवर्तते ॥ ६८॥ तथोक्तं तंदुलवैचारिके-संघयणं संठाणं उच्चत्तं श्रा. उयं च मणुआणं । अणुसमयं परिहायई ओसप्पिणिकालदोसेण ॥१९॥ कोहमयमायलोभा ओसन्नं वड्दए य मणुपाणं । कूडतुलकूडमाया तेण- वादिकने विषे द्रव्य वापरवानो उपदेश पण सांभळशे नहीं, ते वखते तो शक्तिमान् छता पण चकरा जेवा मंगा बनी जशे. (६२) पा काळमा अनुक्रमे श्रद्धाहानि, द्रष्पहानि, प्रायुहानि, वपुहानि भने वस्तुप्रोमा सारपणानी हानि थया करशे. (६३) मोटो भाइ कुटिलता थोडी करी जाणशे, तेना करतां मनुज (नानो) भाइ वधारे कुटिलता करी जाणशे, (वधारे कुटिलता करशे.) भने जेम जेम कनिष्ठ तेम तेम कुटिलता अधिकाधिक वृद्धि पामशे. ( ६४ ) मणि, मंत्र, औषधि, क्षेत्र विमरे उपाप्रकारला माहात्म्परहित पद जशे अने देको सम्पक प्रकारे आराध्या छता पण प्रायः प्रत्यक्ष थशे नहीं. (६५) सहकार विगेरे वृक्षो स्वन्प, तुच्छ अने रसविनाना फळने पापनारा थशे. अने गाय भैश विगेरे पण अन्प दुध पापनारी भने ते पण रस विनानुं पापनारी थशे. (६६) खोटा तोला विगेरे दुर्नय (अन्याय) लोमनी वृद्धियी वृद्धि पामशे अने तेथी वरसाद तुन्छ (थोडो) भने पृथ्वी नीरस थशे. (६७) पृथ्वी नीरस थवाथी औषधि (धान्यादि ) निःसार थशे, तेथी मनुष्योना भायु, देह, वळादिनी अनुक्रमे परिहानि थती जशे. (६८) श्री तंदुलवैचारिकप्रकीर्णकमां कह्यु के के-" मनुष्योना संघयण, संस्थान, उंचाइ, मायु, भवसर्पिणी काळना दोपथी प्रतिसमय हानिमावने पामशे (६९) भने ते मनुष्योना क्रोध, मद, माया ने लोम प्राय षषता नशे. खोटा खोला, खोटा मान थशे (६००) भीकाललोकप्रकाश। णुमाणेण सव्वंपि ॥ ७० ॥ विसमा अजतुलामो विसमाणि य जणवएसु माणाणि । विसमा रायकुलाई तेण उ विसमाई वासाइं ॥ ७१ ॥ वि. समेसु श्र वासेसु हुँति असाराई श्रोसहिवलाई । ओसहिदोब्बलेण य पाउं परिहायइ नराणं ।। ७२ ॥ वकुशाश्च कुशीलाश्च स्युर्दिधैवात्र साधवः । न स्युः पुलाकनिर्मथ- स्नातकाः कालदोपतः ॥ ७३ ॥ यस्यातिचारपंकेन चारित्रं बकुशं भवेत् । बकुशः श्रमणः स स्यात् बकुशं नाम कर्वरं ॥ ७४ ॥ स च द्विधोपक- रण-देहातिचारभेदत्तः। प्राद्यस्तत्र पद्धेऽपि काले निर्णेक्ति चीवरं ।।७५॥ परिधत्ते विभूषायै श्लक्षणं सारं तदीहते । दंडपात्रादिकं मृष्टं कृतशोभ विभर्ति च ॥ ७६ ॥ मात्राधिकं चेहते तत् वकुशोऽयमिहादिमः। अन्य- स्तु नखकेशादि विना कार्य विभूषयन् ॥ ७७ ॥ वकुशो द्विविधोऽप्येष स्वस्येच्छति परिच्छदं । पांडित्यादियशःकांक्षी सुखशीलः क्रियालसः ॥७८ ॥ तथोक्त पंचनिग्रंथ्यां-तह देससव्वछया-रिहेहिं संबलेहिं ए अनुमानथी ए सर्वनी वृद्धि थती जशे. (७० ) तोला विगेरे विषम थशे अने जन- पदमा मान-माप पण विषम थशे. राजकुळमां विषमता आवशे तेथी घरसाद पण विषम भावशे. (७१ ) वरसाद विषम भाववाथी औषधिोना पळ पण असार थशे ( धान्यो कसविनाना उगशे ) अने भौषधिना दुर्बळपणाथी मनुष्योतुं श्रायु पण परिहानि पामशे." (७२) मा पांचमा पारामा साधुओ यकुश ने कुशील ए चे प्रकारना ज थशे. काळदोषथी पुलाक, निग्रंथ के स्नातक मुनिनो नहीं थाय. (७३) जेमर्नु चारित्र अतिचाररूप पंक- वडे करीने यकुश होय ते बकुशश्रमण कहे वाय, यकुश एटले कर्घरसमान जाणवू. (७४) ए पकुश थे प्रकारना छे. उपकरण पकुश भने देहातिचारचकुश. तेमांना पहेला ऋतुबद्ध- काळे पण वस्त्रने धुए छ, (७५) तथा झीणा अने सारा देखाववाळा वस्त्रो धारण करे छे, दंडपात्रादिकने घटारी मठारीने शोमावाळा करीने तेने धारण करे के (७६ ) अने प्रमाणथी अधिक उपकरणो पहेला प्रकारना बकुश मुनि राखे छे. वीजा प्रकारना बकुश सनि नखकेशादिनी कार्यविना पण विभूषा करे छे. (७७) मा बने प्रकारना पशो पोतानो परिवार वधारवा इच्छे छे भने पांडित्यादि बतावीने यशना इच्छक, सुख- शील भने क्रियामा पास होय . (७८) पंचनिग्रंथी प्रकरणमा कपुंछ के-" तेम ज । . सर्ग ३४ मो। (६०१) संजुओ बउसो । मोहकयस्थमज्झु-ठिो य सुत्तमि भणियं च ॥ १ ॥ उवगरणदेहचुक्खा रिद्धीजसगारवा सिया निच्चं । वहुसवलचेयजुत्ता निग्गंथा वाउसा भणिया ॥२॥ शीलं यस्येह चारित्रं कुत्सितं स कुशीलकः। प्रतिसेवाकपायाभ्यां द्विविधः स प्रकीर्तितः॥ ७९ ॥ द्वैधोऽप्ययं पंचविधो ज्ञानदर्शनयोर्भवेत् । तपश्चारित्रयोश्चैव यथासूक्ष्मे च तादृशः ॥ ८० ॥ स ज्ञानादिकुशीलो यो ज्ञानादीनुपजीवति । यथासूक्ष्मस्तु स स्याद्यः प्रीयते स्वप्रशंसया ॥ ८१ ॥ ज्ञानादिषु कुशीलाः स्युः पंचामी प्रतिसेवया । कपायतोऽथ ज्ञानादि-कुशीलान् ब्रूमहे परान् ॥ ८२ ॥ यः कपायैः संज्वलनै स्तपो ज्ञानं च दर्शनं । अनुयुक्ते कषायेण स ज्ञानादिकुशीलकः ॥ ८६ ॥ शाप यच्छंश्च चारित्र-कुशीलः स्यात्कषायतः । यथासूक्ष्मश्च मनसा यःक्रोधा- दिकषायकृत् ॥ ८४ ॥ यद्वा कषायैः क्रोधायै-यो ज्ञानादिविराधकः । कपायतः स ज्ञानादि-कशील इह कीर्तितः ॥ ८५॥ पुलाकमिह निः- देश अथवा सर्व छेदने योग्य संपळ ( दोप) तेणे करीने युक्त ते यकुश, परंतु ते मोहना चयमाटे अभ्युत्थित थयेला होय छे, एम सूत्रा कहेलुं छे. (१) ते पकुशना ये भेद- १ उपकरण ने २ देहशुश्रूपा. जेयो ऋद्धिगारव ने यशगारववाळा नित्य होय, बहु दोषवाळा चारित्रयुक्त होय तेने पकुशनिग्रंथ कह्या छे. (२) हवे बीजा कुशील निग्रंधमाटे कहे छे. शील ते अहीं चारित्र. ते जेनुं कुत्सित होय ते कुशीलक कहीए. तेना पण चे प्रकार-१ प्रतिसेवाकुशील ने २ कपायकशील-ए प्रमाणे कह्या छे. (७९) ए ने पांच प्रकारना छे-१ ज्ञान, २ दर्शन, ३ तप, ४ चारित्र ने ५ यथासूक्ष्म. (८०) तेमा ज्ञानादि कुशील ज्ञानादिवडे जे उपजीविका करे प्रथमना चार प्रकारे भने जे पोतानी प्रशंसावडे प्रीति पामे-राजी थाय ते यथासूक्ष्म कुशील. (८१) मा ज्ञानादिने विषे प्रतिसेवना कुशीलना पांचे प्रकार समजवा. हवे कपायवडे ज्ञानादि कुशीलना पांच प्रकार कहे छे. (८२)-जे संज्वलन कपायवडे तप, ज्ञान, दर्शनने जोडे तेने कपायथी ज्ञानादि कुशील कहीए. (८३) जे श्राप प्रापे ते कपायथी चारित्रकुशील कहीए अने मनवडे जे क्रोधादि कपाय करे ते यथासक्षम कपाय कुशील कहीए. (८४) अथवा क्रोधादि कपायोवडे जे ज्ञानादिकना विराधक होय ते कपायथी ज्ञानादि कुशील कहीए. (८६) इवे पुलाक माटे कहे छ.-पुलाक ते निःसार . (६०२) श्रीकाशलोकप्रकाश । सारं धान्यं ताहक्चरित्रयुक् । स लब्धिप्रतिसेवाभ्यां पुलाको द्विविधः स्मृतः ॥ ८६ ॥ यतिर्यया चक्रिसैन्य-मपि चूर्णयितुं क्षमः । लब्धिः सा स्यात्पुलाकाख्या तो संघादिप्रयोजने ॥ ८७ ॥ प्रयुंजानो भवेल्लब्धि-पु. लाकोऽन्यस्तु पंचधा । ज्ञानदर्शनचारित्र-लिंगसूक्ष्मविभेदतः ॥ ८८ ॥ ज्ञानं दोषैः स्खलितायैः शंकिताद्यैश्च दर्शनं । मूलोत्तरातिचारैश्च चारित्रं यो विराधयेत् ॥ ८९ ॥ स ज्ञानादिपुलाकः स्या-कुन्नि कारणं च यः। वेषांतरं भवेलिंग-पुलाकः स श्रुतोदितः ॥ ९० ॥ संयताकल्प्यवस्तूनां मनसा यो निपेवकः । स निर्दिष्टो यथासूक्ष्म-पुलाकः श्रुतपारगैः॥११॥ विनिर्गतो मोहनीय-कर्माख्याद्ग्रंथतोऽत्र यः । स निग्रंथो द्विधा क्षीणो-पशांतमोहभेदतः ॥ ९२ ॥ शुक्लध्यानजलैः स्नातो दूरं कर्ममलो- ज्झितः। स स्नातकः स योगी चा-योगी चेति द्विधा भवेत् ॥ १३ ॥ ततश्च-अरकेऽस्मिश्च बकुश-कुशीलाख्येऽपि संयमे । भवेत्क्रमेणा- पकपः शक्तिसत्त्वादिहानितः ॥ ९४ ॥ सत्यप्येवं भवेयुयें मूढाः संघे चतु. धान्य तेवा चारित्रवाळा ते पुलाकनिग्रंथ. ते लब्धि भने प्रतिसेवापडे चे प्रकारना कहा छे. (८६) मुनि जे लब्धिवडे चक्रवर्तीना सैन्यने पण चूर्ण करवाने समर्थ थाय ते पुलाफलब्धि कहेवाय छे. ते लब्धिना संघादिकनो प्रयोजने उपयोग करे सते लब्धि- पुलाक कहेवाय छे. पीजा प्रतिसेवनापूलाक ज्ञान, दर्शन, चारित्र, लिंग ने सूक्ष्म एवा भेदथी पांच प्रकारे छे. (८७-८८) स्खलितादि दोपे करीने ज्ञानने, शंकितादिवडे दर्शनने अने मूळगुण के उत्तरगुणमा अतिचार लगाडवावडे चारित्रने जे विराधे ते ज्ञानादिपुलाक कहेवाय छे श्रने निष्कारण जे वेषांतर करे तेने लिंगपुलाक श्रुतमा कहेल छे, (८९-९. ) तेमन संयति (मुनि )ने अकम्प्य एवी वस्तुनो मनथी पण जे सेव- नार होय तेने श्रुतपारगामीओए यथासूक्ष्मपुलाक कहेल छे. (९१) हवे निग्रंथ माटे कहे छे-मोहनीयकर्मरूप ग्रंथथी जे नीकळी गया अर्थात् जेनुं मोहनीयवर्म नाश पाम्युं ते निग्रंथ कहेवाय छे. तेना चे प्रकार क्षीणमोह ने उपशांत- मोहरूप थाय छे. (९२) शुक्लध्यानरूप जळवडे जे नाया अने कर्ममळरहित-तेनाथी दूर थया ते स्नातक. ते सयोगी श्रने अयोगी एम चे प्रकारना होय छे. (९३) श्रा पांचमा भारामां चकुश ने कुशील ए वे प्रकारना संयम होय छे. तेमां पण शक्तिसञ्चादिकनी हानिथी अनुक्रमे अपकर्ष थतो जाय छे. (९४) शाम छतां पण ने - । मर्ग ३४ मो। (६०३) विधे । धर्म च नास्तिकाः कार्या-स्ते भव्यैः संघतो बहिः॥९५ ॥ यथा धृतादिवस्तूनां पूर्वकालव्यपेक्षया । स्नेहमाधुर्यादिहानि-यद्यप्यध्यक्षमी- क्ष्यते ॥ ९६ ॥ तथापि कार्य तत्साध्यं स्यात्तैरेव घृतादिभिः। न पुनस्त- त्पदन्यस्तैः स्वच्छैरपि जलादिभिः ॥ ९७ ॥ पूर्वर्ण्यपेक्षयैवं च हीनहीन- गुणैरपि । मोक्षमार्गाद्यवाप्तिः स्या-निग्रंथैरेव नापरैः ॥ ९८ ॥ विपमेऽपि च कालेऽस्मिन् भवत्येव महर्षयः । निग्रंथैः सदृशाः केचि-चतुर्था- रकर्तिभिः ।। ९९ ॥ यथास्यामवसर्पिण्या-मेतस्मिन् पंचमेऽरके । त्रयोविंशतिरादिष्टा उदयाः सततोदयः॥ १०॥ विंशतिः १ प्रथमे तत्र युगप्रधानसूरयः। उदये स्युद्वितीयस्मिन् त्रयोविंशतिरेव ते २॥ १॥ तृतीयेऽष्टाढ्यनवतिः ३ चतुर्थे चाष्टसप्ततिः ४ । पंचसप्तति ५ रेकोन-नवतिः ६ शतमेव ७ च ॥२॥ सप्ताशीति ८ स्तथा पंच-नवतिश्च ९ ततः परं । सप्ताशीतिः १० षट्सप्तति ११-रष्टसप्ततिरेव च १२ ॥ ३॥ चतुर्नवति १३ रेवाष्टौ १४ त्रयः १५ सप्त १६ चतुष्टयं १७ । शतं पंचदशोपेतं १८ त्रयस्त्रिंशं । मूढ चतुर्विध संघमां के धर्ममा नास्तिक होय अर्थात् चतुर्विध संघ के धर्म नथी एम कहेतो होय तेने भव्यजनोए संघथी बहार करवो. (९५) जेम घृतादि वस्तुमा पूर्वका- ळनी अपेक्षाए स्नेह अने माधुर्यादिनी हानि प्रत्यक्ष जोवामां आवे छे (९६) वा पण तेनाथी साधवालायक कार्य (मिष्टान्नादिक) तेजघृतादिक वडे थाय छे-करवामां आवे छे. पण तेना स्थानके स्थापित करवामां आवेला स्वच्छ एवा जम्मादिकथी यतुं नथी. (९७) तेज रीते पूर्व मुनियोनी अपेक्षाए हीन हीन गुणवाळा छतां पण मोक्षमार्गनी प्राप्ति तो तेवा निग्रंथ मुनिमोथी ज थाय छे-पीजाथी थती नथी. (९८) या विषमकाळमां पण कोइ मुनिओ चोथा पाराना निग्रंथ मुनिश्री जेवा पण होय छे. (९९) जेमके-श्रा अवसर्पिणीमामा पांचमा पारामा सतत उदयवाळा परमात्माए २३ उदय थवाना कहा छे. (१००) तेमांना पहेला उदयमा २०, वीजामा २३, श्रीजामा ९८, चौथामा ७८, पांचमामा ७५, छठामा ८९, सातमामा १००, पाठमामा ८७, नव- मामा ९५, दशमामा ८७, अग्यारमा ७६, पारमामा ७८, वेरमामा ९४, चौदमामा १०८, पंदरमामा १०३, सोळमामां १०७, सतरमामा १०४, अढारमामां ११५, श्रोग- (६०४) भीकाललोकप्रकाश। शतं १९ शतं २० ॥ ४॥ पंचाधिकाथ नवति २१-नवतिश्च नवाधिका २२ । चत्वारिंशत् २३ क्रमादेते यथोक्तोदयसूरयः ॥ ५ ॥ श्रीसुधर्मा १ च वनश्च २ सूरिः प्रतिपदाभिधः ३ । हरिस्सहो ? नंदिमित्रः ५ शूरसेन ६ स्तथापरः॥६॥ रविमित्रः ७ श्रीप्रभश्च ८ सूरिमणिरथाभिधः ९ । यशोमित्रो १० धनशिखः ११ सत्यमित्रो १२ महामुनिः ॥७॥ धम्मिल्लो १३ विजयानंद १४-स्तथा सूरिः सुमंगलः १५। धर्मसिंहो १६ जयदेवः १७ सुरदिन्नाभिधो गुरुः १८ ॥ ८॥ वैशा. ख १९ श्वाथ कोडिन्यः २० सूरिः श्रीमाथुराहयः २१ । वणिक्पुत्रश्च २२ श्रीदत्त २३ उदयेष्वाद्यसूरयः ॥ ९॥ स्यारपुष्पमित्रो १ ऽहन्मित्रः २ सूरिर्वेशाखसंज्ञकः ३ । सुकीर्चि ४ स्थावर ५ रथ-सुताश्च ६ जयमंगलः ७ ॥ १०॥ ततः सिद्धार्थ ८ ईशानो ९ रथमित्रो १० मुनीश्वरः । श्राचार्यो भरणीमित्रो ११ दृढमित्राह्वयोऽपि च १२ ॥ ११ ॥ संगतिमित्रः १३ श्रीधरो १४ मागध १५ श्चामराभिधः १६ । रेवतीमित्र १७ सत्कीति-मित्रौ १८ च सुरमित्रकः १९ ॥ १२ ॥ फल्गुमित्रश्च २० कल्याण २१-सूरिः कल्याणकारणं । देवमित्रो २२ दुःप्रसह २३ उदयेष्वंत्यसूरयः ॥ १३ ॥ णीशमामा १३३, वीशमामा १००, एकवीशमामां ९५, बावीशमामा ९९ भने त्रेवीश- मामा ४० ए प्रमाणे कुल २००४ युगप्रधान श्राचार्यों थशे. (१०१-१०५) ए त्रेवीशे उदयमा पहेला पहेला आचार्य श्रीसुधर्मा १, वज्र २, प्रतिपद ३, हरि- स्सह ४, नंदिमिन ५, शूरसेन ६, रविमित्र ७, श्रीप्रभ ८, मणिरथ ९, यशोमित्र १०, धनशिख ११, महामुनि सत्यमित्र १२, धम्मिल्ल १३, विजयानंद १४, सुमंगळसूरि १५, धर्मसिंह १६, जयदेव १७, सुरदिन्न नामना गुरु १८, वैशाख १९, कौडिन्य २०, माथुर २१, वणिकपुत्र २२ अने श्रीदत्त २३-श्रा नामना थशे. (६-९) ए वीशे उदयमा छेल्ला प्राचार्य पुष्पमित्र १, अर्हन्मित्र २, वैशाख ३, सुकीर्चि ४, स्थावर ५, रथासुत ६, जयमंगळ ७, सिद्धार्थ ८, ईशान ९, रथमित्र मुनीश्वर १०, भरणी- मित्र भाचार्य ११, दृढमित्र १२, संगति मित्र १३, श्रीधर १४, मागध १५, चामर १६, रेवतीमित्र १७, सत्कीर्तिमित्र १८, सुरमित्र १९, फन्गुमित्र २०, कल्याण- ना कारणरूप कल्याणसरि २१, देवमित्र २२ अने दुःप्रसह २३ नामना थशे. (१०-१३) .

- सर्ग ३४ मो। (६०५) श्रीसुधर्मा च जंबूश्च प्रभवः सूरिशेखरः। शय्यंभवो यशोभद्रः सं. भृतिविजयाह्वयः ॥ १४ ॥ भद्रबाहुस्थूलभद्रौ महागिरिसुहस्तिनौ । धन- सुंदरश्यामार्यों स्कंदिलाचार्य इत्यपि ॥ १५ ॥ रेवतीमित्रधर्मों च भद्र- गुप्ताभिधो गुरुः। श्रीगुप्तवज्रसंज्ञार्य-रचितौ पुष्पमित्रकः॥ १६ ॥ प्रथम- स्योदयस्यैते विंशतिः सूरिसत्तमाः । त्रयोविंशतिरुच्यते द्वितीयस्याथ नामतः॥ १७ ॥ श्रीवजो नाग- हस्ती च रेवतीमित्र इत्यपि। सिंहो नागार्जुनो भूत-दिन्नः कालकसंज्ञका ॥ १८॥ सत्यमित्रो हारिलश्च जिनभद्रो गणीश्वरः । उमास्वातिः पुष्प- मित्रः संभूतिः सूरिकुंजरः ॥ १९ ॥ तथा माढरसंभूतो धर्मश्रीसंज्ञको गुरुः । ज्येष्ठांगः फल्गुमित्रश्च धर्मघोषाह्वयो गुरुः ॥ २० ॥ सूरिविनयमि- त्राख्यः शीलमित्रश्च रेवतिः । स्वप्नमित्रो हरिमित्रो द्वितीयोदयसूरयः स्युस्त्रयोविंशतेरेव-मुदयानां युगोत्तमाः । चतुर्युक्ते सहस्र द्वे मी. लिताः सर्वसंख्यया ॥ २२ ॥ एकावताराः सर्वेऽमी सूरयो जगदुत्तमाः। श्रीसुधर्मा च जंबूश्च ख्यातौ तद्भवसिद्धिकौ ॥ २३ ॥ अनेकातिशयोपेता हवे पहेला उदयना वीश युगप्रधान आचार्योना नाम मा प्रमाणे-१ श्रीसुधर्मा, २ जंयू , ३ मरिशेखरसमान प्रभय, ४ शय्यंभव, ५ यशोभद्र, ६ संभूतिविजय, ७ भद्रवाह, ८ स्थूलभद्र, ९ महागिरि, १० सुहस्ति, ११ धनसुंदर, १२ श्यामार्य, १३ स्कंदिलाचार्य, १४ रेवतीमित्र, १५ धर्म, १६ भद्रगुप्त नामना गुरु, १७ श्रीगुप्त, १८ वज, १९ भार्य- रक्षित, २० पुष्पमित्र. हवे वीजा उदयना २३ युगप्रधान प्राचार्योना नाम कहे छे.-(१४-१७) १ श्री. वज, २ नागहस्ती, ३ रेवतीमित्र, ४ सिंह, ५ नागार्जुन, ६ भूतदिन, ७ कालक, ८ सत्य- मित्र, ९ हारिल, १० जिनमद्र गणीश्वर, ११ उमास्वाति, १२ पुष्पमित्र, १३ प्राचार्योमा हस्तीसमान संभूति, १४ माढरसंभूत, १५ धर्मश्री, १६ ज्येष्ठांग, १७ फन्गुमित्र, १८ धर्मघोष नामना गुरु, १९ विनयमित्र, २० शीलमित्र, २१ रेवति, २२ स्वप्नमित्र ने २३ हरिमित्र. (१८-२१) ए प्रमाणे २३ उदयमा थनारा युगोत्तम (युगप्रधान) पुरुषो सर्व मळीने ये हजार ने चार सर्व संख्याए थाय छे. (२२) या यघा जगदुत्तम भाचार्यों एकावतारी जाणवा. तेमां श्रीसुधर्मा ने अयूं तद्भवसिद्धिक समजवा. (२३) मा युगप्रधानो अनेक अतिशय- (६०६) भीकाललोकप्रकाश । महासत्ता भवंत्यमी । नंति सार्द्धद्वियोजन्यां दुर्भिक्षादीनुपद्रवान् ॥२४॥ एकादशसहस्राश्च लक्षाश्च पोडशाधिकाः । युगप्रधानतुल्याः स्युः सूरयः पंचमारके ॥ २५ ॥ तथोक्तं दुष्पमारकसंघस्तोत्रे-जुगपवरसरिससूरी दूरीकयभवियमोहतमपसरं । वदामि सोलसुत्तर इगदसलके सहस्से य ॥१॥ संतु श्रीवर्द्धमानस्येत्यादि दीवालीकल्पे तु-जुगप्पहाणसमाणा एगारस लक सोलस सहस्सा । सूरिओ हुँति श्ररए पंचमए जाव दुप्प- सहे ॥ २॥ कोटीनां पंच पंचाश-लक्षास्तावंत एव च । सहस्राश्च शताः पंच सर्वे स्वाचारसूरयः ॥ २६ ॥ त्रयस्त्रिंशच्च लक्षाणि सहस्राणां चतुष्टयी । चतुःशत्येकनवतिः सूरयो मध्यमा गुणैः ॥ २७ ॥ अस्मिन्नेवा- रकेऽभूवन् पूर्वाचार्या महाशयाः । श्रीजगचंद्रसूर्याद्या-स्तपागच्छान्व- यक्रमे ॥ २८ ॥ सूरयो वप्पभयाख्या अभयदेवसूरयः । हेमाचार्याश्च मलय-गिर्याद्याश्चाभवन् परे ॥ २९ ॥ विजयंतेऽधुनाप्येवं मुनयो नय- कोविदाः । अत्युग्रतपसश्चारु-चारित्रमहिमाद्भुताः ॥ ३०॥ एवं मध्य- वाळा तेम ज महासत्त्वशाळी होय छे. तेमना प्रभावथी अढी योजन (दश गाउ )मां दुर्मि- क्षादि उपद्रवो नाश पामे छे. आ पांचमा पारामा सोळ लाख ने अग्यार हजार युगप्रधान सरखा प्राचार्यो थशे. (२४-२५) श्री दुष्पमारकसंघस्तोत्रमा को छे के-"युगप्रधान- सदृश सोळ लाख ने अग्यार हजार प्राचार्यों के जेमणे भविक जीवना मोहरूप अंधकारनो प्रसार दूर कयों छे एवा थशे. एमने हुं वंदना कर छु (१)" संतु श्रीवर्द्धमानस्य ए पदनी शरुभातवाळा दीवाळी कल्पमा तो-'युगप्रधानसरखा अग्यार लाख ने सोळ हजार प्राचार्यो पांचमा आरामा यावत् दुष्प्रसहसरिपर्यंत थशे. (२)' एम कहेल छे. पांच कोड, पचाश लाख, पचास हजार ने पांचशे सर्वे उत्तम प्राचारवाळा श्राचार्यों थशे. (२६) तेत्रीश लाख, चार हजार, चारशें ने एकागुं मध्यम गुणवाळा आचार्यो थशे. ( २७) पा पारामां महाशय एवा पूर्वाचार्यों श्रीजगञ्चंद्रसरि विगेरे तपागच्छना अन्व. यक्रममा थया छ. ( २८ ) श्रीयप्पभट्टीसूरि, श्री अभयदेवमूरि, हेमचंद्राचार्य, मलयगिरि विगेरे पीजा घणा आचार्यों थया छे. ( २९) प्रत्यारे पण न्यायमा प्रवीण भने अत्युग्र तप करनारा तेम ज चारित्रना महिमावडे अद्भुत एवा केटलाक मुनिमो विजयवंत वर्वे छे. (३०) या प्रमाणे मध्यम दृष्टिए विचार करीने विवेकीओए पांचमा भारामां शुद्ध सर्ग ३४ मो. (६०७) स्थया दृष्ट्या पर्यालोच्य विवेकिभिः । न कार्यः शुद्धसाधूनां संशयः पंच- मेऽरके ॥३२॥ दुप्पमारकपर्यंता-बधि संघश्चतुर्विधः । भविष्यत्यव्यवच्छिन्न इत्यादिष्टं जिनः श्रुते ॥३३॥ तथोकं भगवत्यां-जंबूद्दीवे णं दीवे भारहे वासे इमीसे ओसप्पिणीए देवाणुप्पियाणं केवइयं कालं तिस्थे अणुसज्जिस्स- ति ? गो० जंबू० भारहे इमीसे ओस० ममं एकवीसं वाससहस्साई तित्थे अणुसज्जिस्सति, इति भग० श० ८ उ० ८ । दीवालीकल्पे तूकं-वासाण वीससहस्सा नव सय तिम्मास पंचदिणपहरा । इक्का घडिया दोपल अखर अडयाल जिणधम्मो ॥१॥ पर्यते त्वरकस्यास्य सूरि१ःप्रसहाभिधः । रनिद्वयोच्छूितो विंशत्य- व्दजीवी भविष्यति ॥३४॥ स्वर्गाच्च्युस्खा समुत्पन्नो गृहे द्वादशवत्सरी । स्थित्वा सामान्यसाधुत्वे चत्वार्यब्दान्यसौ शुचिः ॥ ३५ ॥ चत्वार्यब्दानि सूरित्वे स्थित्वाष्टान्दानि च व्रते । स्वर्गमेष्यति सौधर्म-मंते कृत्वाष्टमं कृती ॥ ३६॥ दशवकालिकं जीत-कल्पमावश्यकं च सः । अनुयोग- द्वारनंदी-नतेंद्रो धास्यति श्रुतं ॥ ३७ ॥ साध्वी तदा च फल्गुश्रीः साधुश्रोसंबंधी संशय न करवा, (३१) कमके दुपम श्राराना छेडापर्यंत अव्यवच्छिन्न- पणे चतुर्विधसंघ रहेशे. एम जिनेश्वरोए सिद्धांतमा कहेलुं छे. (३२-३३) श्री भगवतीसूत्रमा कमु छ के-'हे भगवंत ! जंबूद्वीपमा मरतक्षेत्रमा प्रा अवसर्पिणीमा श्राप देवानुप्रिय तीर्थ केटला काळसुधी अविच्छिन्न वर्तशे ?' प्रभु कहे के के-' हे गौतम ! आजपूद्वीपमा भरतक्षेत्रमा आ अवसर्पिणीमा मारुतीर्थ एकवीश हजार वर्षपर्यत अविच्छिन्न वर्तशे.' श्रा प्रमाणे भगवती शतक ८, उद्देशा ८ मामा कयु छ. दीवाळीकम्पमा तो कह्यु छ के- 'वीश हजार नवसो वर्ष, त्रण मास, पांच दिवस, पांच प्रहर, एक घडी, ये पळ ने ४८ अचर सुधी जैनधर्म रहेशे. (१) (आ संख्या- कारण समजातुं नथी) आ श्राराने छेडे दुःप्रसह नामना सूरि वे हाथ उंचा शरीरवाळा ने वीश वर्षना श्रायुवाळा थशे. (३४) ते स्वर्गथी च्यवीने मनुष्यपणुं पामशे. चार वरस गृहवासमा रहेशे, चार वर्ष सामान्य पवित्र साधुपणे रहेशे ( ३५ ) अने चार वर्ष प्राचार्यपणे रहेशे. एक- दर भाठ वर्ष श्रमणपणामां रही अंते अहम करी सौधर्म देवलोके देव थशे. (३६) ते काळे दशवकालिक, जीवकन्प, श्रावश्यक, अनुयोगद्वार ने नंदी एटलुं श्रुत जेने इंद्र नभ्या हे एका ते पाचार्य धारण करशे (३७) ते घखते साध्वी फल्गुश्री नामे, . . - (६०८) श्रीकाललोकप्रकाश। श्रावको नागिलाभिधः । सत्यश्रीः श्राविका चेति ज्ञेयः संघश्चतुर्विधः ॥ ३८॥ यतः-एगो साहू एगा य साहुणी सहो य सही वा। श्राणा- जुत्तो संघो सेसो पुण अहिसंघाओ ॥ ३९ ॥ उत्कृष्टं श्रुतमेतेषां दश- वैकालिकावधि । पाण्मासिकतपस्तुल्यं पष्ठभक्तं भविष्यति ॥ ४० ॥ मंत्रीशः सुमुखाभिख्यो राजा विमलवाहनः । भविष्यतस्तदा लोके नीति- मार्गप्रवर्तकौ ॥ ४१ ॥ श्रयं दुःप्रसहाचार्यो-पदेशेन करिष्यति । चैत्य- स्यांतिममुद्धारं राजा श्रीविमलाचले ॥ ४२ ॥ कोट्येकैकादश लक्षाः सहस्राणि च पोडश । उत्तमानां क्षितीशानां संख्यैषा दुष्पमारके ॥४३॥ कोटयः पंचपंचाश-लक्षाश्चापि सहस्रकाः। तातोऽथ शताः पंच पंच- पंचाशदन्विताः ॥ ४४ ॥ ५५५५५५५५५ इयंतो दुःपमाकाले निर्दिष्टाः सर्वसंख्यया । नवभिः पंचकर्नाम-धारिणोऽधमसूरयः ॥ ४५ ॥ इत्य- तो दीपालिकाकल्पे. एवं च सर्ववर्षाव-सर्पिणीष्वखिलास्वपि । पंचमानामरकाणां यथार्ह भाव्यतां स्थितिः ॥ ४६ ॥ एवमुक्तस्वरूपस्य पंचमस्यारकस्य च । प्रांते मूलाद ज्ञातिधर्मो विवाहादिविलीयते ॥ ४७ ॥ धर्मो विलीयते शाक्या- श्रावक नागिल नाम अने श्राविका सत्यश्री नामे थशे. ए रीते चतुर्विध थशे.(३८) कधुं छे के एक साधु, एक साध्वी, एक श्रावक ने एक श्राविका पण भाज्ञायुक्त होय तो तेने संघ कहेवो, ते सिवायनाने अस्थिनो संघ समजवो.' ( ३९ ) पाचमा भाराना प्रांत मागे एसोनुं उत्कृष्ट श्रुत दशवैकालिकसुधी ने उत्कृष्ट तप छठनो ते पाण्मासिक तप जेवो थशे (गणाशे ). (४०) राजा विमळवाहन ने मंत्री सुमुख नामनो ते वखते लोकमा नीतिमार्गना प्रवर्तक थशे. (४१) मा राजा दुम्पसह प्राचार्यना उपदेशथी श्रीविमळाचळउपरना चैत्यनो छल्लो उद्धार करशे. (४२) मा दुषमा आरामा एक कोड, अग्यार लाख अने सोळ हजार उत्तम राजामो थशे. (४३) पंचावन क्रोड, पंचावन लाख, पंचावन हजार, पांचसो ने पंचावन एप्रमाणे नव पांचडारूप संख्यावाळा आ दुःपमकाळमां नामधारी अधम सूरिनो (प्राचार्यों) थशे. या प्रमाणे अर्थधी दीपालिकाकम्पमा कहेल छे. ए रीते सर्व (पांच भरत ने पांच ऐरवत ) क्षेत्रमा सर्व अवसर्पिना पांचमा भा. रामा यथायोग्यपणे स्थिति समजवी. (४६ ) ए प्रमाणे उक्त स्वरूपवाळा पांचमा भाराने प्रति मूळथी विवाहादि ज्ञातिधर्म नाश पामशे. (४७) शाक्यादि अन्य पाखंडीमोनो .

सर्ग ३४ मो। (६०९) धन्यपाखंडिनामपि । राजधर्मो दुष्टशिष्ट-निग्रहानुग्रहादिकः ॥ १८ ॥ धर्मोऽथ श्रुतचारित्र-लक्षणोऽपि विलीयते । साध्वादिनाशे तन्नाशः पात्रनाशे घृतादिवत् ।। ४९ ॥ तथा चोच्छिद्यते वह्नि-रन्नपाकादिभि- स्सह । अतिस्निग्धेऽतिरूक्षे च काले भवति नैप यत् ॥ ५० ॥ अनति- स्निग्धरूक्षेषु सुपमदुप्पमादिषु । कालेपूत्पद्यते वह्नि-स्तत्साध्याश्च क्रिया अपि ॥ ५१ ॥ एवं पूर्णे पंचमेऽरे-ऽनतर्वर्णादिपर्यवैः । हीयमानः प्रविशति दुप्पः मदुप्पमारकः ॥ ५२ ॥ स च कालो महाभीष्मः शुन्योऽशेषजनक्षयात् । प्रवर्द्धमानदुःखार्त्त-लोकहाहारवाकुलः ॥ ५३॥ तस्मिन् कालेऽतिकठिना दूरोदंचितधूलयः । वाता वांति भृशं भीष्मा असह्याः प्राणहारिणः ॥ ५४ ॥ धूमायंते दिशोऽभीक्ष्णं परितोऽतिरजस्वलाः । प्रसृत्वरांधत- मसै-निरालोका दिवानिशं ॥ ५५ ॥ कालरौक्ष्येणांगरौक्ष्या-दंसह्यम- हितं महः । शीतं मुंचति शीतांशु-रुणं चोष्णकरः खरः ।। ५६॥ सूर्य- धर्म पण नाश पामशे. दुष्टनो निग्रह ने शिष्टनो अनुग्रह करवारूप राजधर्म नाश पामशे. (१८) श्रुत अने चारित्रलक्षण धर्म पण नाश पामशे, केमके साधु विगैरेनो नाश थये सवे पात्रनाशे घृतादिना नाशनी जेम ते नाश पामे ज. ( ४९ ) तथा अनपाकादिनी साधे अग्नि पण नाश पामशे, कारण के अतिस्निग्ध के अतिरून काळमां अग्नि होवोज नथी. (५०) अनविस्निग्धरूत एटले भतिस्निग्ध नहीं अने अतिरून नहीं एवा सुपमदुःपमादि काळमां वे अग्नि अने तेथी साध्य एवी क्रियाओ प्रर्वते छे. (५१) मा प्रमाणे पांचमो पारो पूर्ण थये सते तेना करतां अनंता वर्णादि पर्यवे हीन थतो दुष्पमदुप्पम नामनो छठो आरो प्रवेश करशे. (५२) ते काळ महामीष्म, अशेष ( समस्त ) जननो क्षय थवाथी शून्य, वधता जता दुःखोथी पीडा पामता लोकोना 'हाहारवथी आफळ प्रवर्तशे. (५३) ते काळे अति कठिन, दूरथी पुष्कळ धूळने उडाड- नारा, अत्यंत भीष्म ( भयंकर), असह्य भने प्राणहारी वायरो वाशे. (५४) वारंवार दिशामो धूनमय, चोतरफ रजयुक्त अने अंध करे एवा तामसवडे रात्रि-दिवस लोकोपडे न जोइ शकाय तेची थशे. (५५) काळना रौक्ष्यपणाथी अंगर्नु अत्यंत रौक्ष्यपणुं थशे अने तेथी सूर्य-चंद्रन तेज असह्य ने अहितकारी थइ पडशे. चंद्रमा अत्यंत शीतता मूकशे भने सूर्य अत्यंत उष्णता मूकशे. (५६) ए सूर्य ने चंद्र जगतने उपकारी छता (६१०) पीकाललोकप्रकाश। चंद्रमसावेतौ जगतामुपकारिणो । हंत कालपरावः स्यातां तावेव दु:- खदौ ॥ ५७ ॥ सर्जादिक्षारसदृश-रसवाःपूरवर्षिणः । करीपरसतुल्यांवु- मुचोऽम्लरसवारयः ॥ ५८ ॥ अग्निवदाहकृद्वारि-किरो विषमयोदकाः । बजोदकाः पर्वतादि-प्रतिभेदप्रभूष्णवः ॥ ५९॥ विद्युत्पातकृतोऽभीक्षणं कर्करादिकिरोऽसकृत् । जनानां विविधव्याधि-वेदनामृत्युकृजलाः ॥६॥ तदा चंडानिलोद्भूत-तीनधारातिपातिनः । कर्णद्रोहिध्वनिकृतो-ऽसकृ. द्वर्षति वारिदाः ॥ ६१ ॥ चतुर्भिः कलापकं । एषां क्षारादिमेघानां श्रीजंबूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रवृत्त्योः कालमानमुक्तं न दृश्यते-'अभिलणं अभि- कणं अरसमेहा विरसमेहा खारमेहा खत्तमेहा यावत् वासं वासं वासि- हिंति' एतद् वृत्तावपि अभीक्ष्णं पुनः पुनरित्यादि. कालसप्ततौ तु एतेषां कालमानमेवं दृश्यते. तो खारग्गिविसंबिल-विज्जूघणा सगदिणा पिहु कुपवणं । वरिसिभ बहुरोगिजलं काहंति समं गिरिथलाई ॥ १ ॥ ग्रंथां- तरे तु-एते क्षारमेघादयो वर्षशतोनेकविंशतिवर्षसहस्रप्रमाणदुष्पमाका- खेदनी यात छे के काळना परावर्तपणाथी ते पंने दुःसने श्रापनारा थइ पडशे. (५७) साजी विगेरे क्षारसदृश रसवाळा पाणीना वरसाद वरसशे, तेम ज करीपना रसतुल्य पाणीना, अम्ल रसवाळा पाणीना, अग्नि जेवा दाह करनारा पाणीना अने विषमय रस- वाळा पाणीना वरसाद वरसशे अने वनजेवा पाणीना वरसाद पर्वतोने पण भेदवाने समर्थ एवा चरसशे (५८-५९) वारंवार विजळी पाडशे, वारंवार करायो पाडशे, लोकोने विविध प्रकारना व्याधिनी घेदना अने मृत्युने उपजायनारा जळ परसशे, (६०) तेमज प्रचंड पवनधी उद्धत एवी तीव्र धारावाळा, कर्णद्रोही घनिना करनारा वरसादो वारंवार वरसशे. (६१) आ क्षारादि मेघोनुं काळमान श्रीजंबूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रमा तथा तेनी वृत्तिमां कहेल जणातुं नथी. तेना मूळमां तो 'अरसमेघ, विरसमेघ, हारमेघ, क्षतमेघ, . यावत् विपमेघ वारंवार बरसशे.' एम कहेल छे. तेनी वृत्तिमा पण अभीक्ष्ण एटले वारंवार इत्यादि लख्युं छे. काळसप्ततिप्रकरणमां तो एy काळमान आ प्रमाणे कयुं छे-'हार, अग्नि, विष, अम्ल ने विद्युत्-श्रा पांच प्रकारना मेघ सात सात दिवस वरसशे. माठा पवनयुक्त बहुरोगी जळने वरसीने पधा पर्वत ने स्थळने सरखा करी नाखशे.' ग्रंथां तर तो-"ए धार मेघादि सो वर्षे न्यून एकवीश हजार वर्ष दुषमा (पांचमा भाराना) व्यतिक्रम्ये सते वरसशे' एम कल छे. जे मेघो काळना सा ३४ मो। (६११) लातिकमे वर्षियंतीति' दृश्यते. ये जगजीवनास्ताप-च्छिदः सर्वेप्सि- तागमाः। एवं तेऽपिप्रवर्त्तते मेघाः कालविपर्यये ॥१२॥ नगरपामखेटादीन् द्विपदांश्च चतुष्पदान् । अपदान् खेचरान् भूमि-चरानंभश्चरानपि ॥ ६३ ॥ अरण्यवासिनो द्वीप-वासिनः शैलवा. सिनः । विद्याधरान्नैकविद्या-साधनोजितशक्तिकान् ॥ ६४ ॥ त्रसान् द्वित्रिचतुःपंचें-द्रियांश्च स्थावरानपि । वृक्षगुल्मलतागुच्छौ-पधी नातृ- णादिकान् ॥६५॥ विना वैताट्यवृपभ-कूटेभ्योऽन्यान् धराधरान् । गंगासिंवादिसिंधुभ्यः परान् सर्वान् जलाश्रयान् ॥ ६६ ॥ विध्वस्येत्या- दिकान् सर्वान् भावांस्ते विपमा घनाः । भस्मीकुर्वति दशसु क्षेत्रेषु भरतादिपु ॥ ६७ ॥ पंचभिः कुलकं । वर्षति वैताढ्यादीना-मुपर्यपि घना अमी । तत्रस्था अपि नश्यति खेचरास्तत्पुराणि च ॥ ६८ ॥ किंतु ते भूधरास्तेषां प्रासादाः शिखराणि च । न मनागपि भिद्यते शाश्वतं ह्यविनश्वरं ॥ ६९॥ , - जगतने जीवन प्रापनार, तापनो नाश करनार, सर्व इच्छितने पूरनार छ ने पण काळनो विपर्यय थये सते भावी रीतनी (अनिष्ट ) प्रवृत्ति करे छे. (६२) ए विपम वरसादो नगर, ग्राम, खेडा विगैरेने, द्विपद, चतुष्पद, अपद'ने, तेम ज खेचर, भूमिधर ने जळचरने, अरण्यवासी, द्वीपवामी ने शैलवासीने, अनेक विद्यासा- धनथी ऊर्जित शक्तिवाना विद्याधरने, पेइद्री, तेइंद्री, चौरेंद्री, पंचेंद्रियरूप सोने, वृक्ष, गुन्म, लता, गुच्छ, श्रीपधि अने अनेक प्रकारना तणादिरूप स्थावरोने, वैवाढ्य ने पमकूट मिचायना बघा पर्वतोने, गगा ने सिंधु सिवायनी बीजी नदीओने, सर्व जळा शयोने इत्यादि सर्व भावोने विध्वंस करीने मरतादि दशे क्षेत्रोमा भस्मीभूत करी नाखशे. (६३-६७) आ बरसादो वैवाट्यादि पर्वतोनी उपर पण बरसे के तेथी त्यां रहेला खेचरो तेम ज तेना नगरो पण नाश पामे छे. (६८) मात्र ते पर्वत श्रने तेना प्रासाद म ज शिखरो किंचित् पण भेदाता नथी, कारण के वे शाश्वत अने अवि- नश्वर छे. (६९) १ अपर-सादिक । (६१२) भीकालसोकप्रकाश । अस्मिश्च भरतक्षेत्रे श्रीशत्रुजयपर्वतः । तत्रापि काले.भविता शाश्व- तप्राय एव यत् ॥ ७० ॥ अशीति योजनान्येष विस्तृतः प्रथमेऽरके .। द्वितीये सप्तति पष्टिं तृतीये कथितोऽरके ॥७१ ॥ योजनानि च पंचाश-तुरीये पंचमे पुनः । योजनानि . द्वादश स्युः सप्तहस्तास्ततों- तिमे ॥ ७२ ॥ उत्सर्पिण्यां कराः सप्ता-रके ह्याचे द्वितीयके । योज: तानि द्वादश-स्यु-र्मानमेवं परेप्वपि ॥ ७३ ॥ पंचाशतं योजनानि मूले यो विस्तृतोऽभवत् । दशोपरि तथाप्टोचो विहरत्यादिमेऽर्हति ॥ ७ ॥ विच्छिन्नेऽपि हि तीर्थेऽस्मिन् कूटमस्यर्षभाभिधं । सुरार्चितं स्थास्यतीह पद्मनाभजिनावधि ॥७५॥ अस्मिन्तृषभसेनाद्याः संख्यातीता जिनेश्वराः। 'निर्वाणैश्च विहारैश्च बहुशोऽ पावयन्महीं ॥ ७६ ॥ भाविनः पद्मनाभाया :श्रहंतोऽत्र महागिरौ । निजैविहारनिर्वाणैः पावयिष्यति मेदिनीं ॥७७॥ वर्तमानावसर्पिण्या-मस्यां नेमिजिनं विना। त्रयोविंशतिरहँतो निन्युरेनं कृतार्थतां ॥ ७८ ॥ पंचभिर्मुनिकोटीभिः सहात्र वृषभप्रभोः । निर्वृतश्चैः त्रराकायां पुंडरीको गणाधिपः ॥ ७९ ॥ चतुर्मासी स्थितावत्रा-जित- श्रा भरतक्षेत्रमा श्रीशचुंजय पर्वत ते काळे पण रहेशे. कारण के ते शाश्वतप्राय छे. (७०) ते पर्वत पहेले मारे ८० योजननो, बीजे मारे ७० योजननो, चीजे शारे ६० योजननो, चोथे पारे ५० योजननो, पांचमे आरे १२ योजननो अने छठे आरे सात होधनो होय छे. (७१-७२) उत्सर्पिणीमा पहेले पारे ७ हाथनो, बीजे आरे १२ योजननो ए प्रमाणे अवसर्पिणीथी विपर्यय मान समजबु. (७३) श्रीऋपमदेव भगवान विंचरता हता त्यारे (बीजा पाराने छेडे ) शत्रुजय पर्वत पचास योजन मूळमां विस्तार- वाळो, उपर दश योजन विस्तारवाळो अने पाठ योजन उंचो हतो. (७४) पांचमा भाराने छेडे या तीर्थ विच्छेद पामे सते पण एर्नु ऋषभ नामनुं कूट देवोथी पूजायुं सतुं पद्मनाभ तीर्थकर थशे त्या सुधी कायम रहेशे. (७५ ) श्रा पर्वतनी पृथ्वी ऋपमसेन विगेरे जिनेश्वरोए विहारपडे ने निर्वाणक्डे पवित्र करेली छे. (७६ ) भावी काळे धनारा पद्मनाभादि अरिहंतो प्रा पर्वत उपरनी पृथ्वी पोताना निर्वाण अने विद्यारवडे पावन करशे. (८७) वर्तमान अवसर्पिणीमा नेमिनाथ विनाना २३ तीर्थकरोए श्रा पर्वतनी पृथ्वीने कृतार्थ करी छे. (७८) पांच करोड मुनि साथे चैत्र शुदि पुनमे श्री घृषभ- प्रभुना पुंडरीक नामना गणघर या तीर्थे निर्वाण पाम्या छे. (७९) या तीर्थपर अजि- मर्ग ३४ मो। शांती जिनेश्वरौ । क्षेत्रमेतदनंतानां सिद्धानां विशदात्मनां ॥-८० ॥ श्रीनेमिगणभृन्नंदि-पेणो यात्रार्थमागतः। सत्प्रभावाश्रयं यत्रा-जितशांति- स्तवं व्यधात् ।। ८१॥ जनकोटौ यथाकामं भोजितायां यदय॑ते । तदेकेनोपवासेन सुकृतं सिद्धभूधरे ॥ ८२ ॥ इत्याद्यर्थतः श्रीशत्रुजयक-- त्पादौ प्रायः पापविमुक्ताः स्यु-स्तियंचोऽत्र निवासिनः। प्रयांति सद्गता वेव स्पृष्टैनं श्रद्धया गिरिं ॥ ८३ ॥ सर्वेषामपि तीर्थानां यात्रया विश्वव. तिनां । यावदुरपद्यते पुण्यं तावत्सिद्धाद्रियात्रया ॥ ८४ ॥ यश्चैत्यं जि-. नर्विवं वा कारयेरिसद्धपर्वते । स भुक्त्वा सार्वभौमत्वं भवेद्देवो महर्द्धिकः ॥ ८५॥ ध्वज छत्रं पताकां च स्थाल गारचामरान् । विद्याधरो. भवेद्दत्त्वा रथं दत्वा च चक्रभृत् ॥ ८६॥ पाहुर्विद्याप्राभृते च नामान्यस्यैकविंशति। यथानुभावं क्लृप्तानि मुनिस्वर्गिनरादिभिः॥ ८७॥ तथाहुः-विमलगिरि' १ मुत्तिनिलओ२ सितुंजो ३ सिद्धखित्त ४ पुंडरिओ ५। सिरिसिद्धसेहरो तनाथ अने शांतिनाथ प्रभुए चतुर्मास करेल छ, अनंता निर्मळ भात्मावाळा सिद्धार्नु था क्षेत्र थे. (८०) श्री नेमिनाथ प्रभुना नंदिपेण नामना गणधर अहीं यात्रा करवा पाव्या हता. तेमणे प्रगटप्रभाववालं अजितशांति स्तोत्र अहीं रचेलं छे. (८१) क्रोड मनुष्योने यथेच्छ रीते जमाडतां जे पुण्य उपार्जन थाय तेटलुं पुण्य प्रा सिद्धाचळपर्वते एक उपवास करवाथी थाय छे. (८२) इत्यादि अर्थथी श्री शQजयकल्पादिकां कडं थे. अहींना निवासी तिर्यचो पण प्रायः पापविमुक्त घाय छ भने श्रद्धापूर्वक था गिरिने फरसबाथी जीच सद्गतिमा ज जाय छे. (८३ ) विश्ववर्ती सर्व तीर्थोनी यात्राथी जेटलं पुण्य थाय तेटलुं पुण्य प्रा सिद्धाद्रिनी एक यात्राथी थाय छे. (८४) जे कोइ प्रा सिद्धपर्वतउपर चैत्य कराये के जिनपिंय पधरावे ते सार्वभौमपणुं ( चक्रीपर्यु) मोगवीने महर्दिक देव थाय छे. (८५) या तीर्थे घज, छत्र, पताका, स्थाळ, शृंगार, चामर विगेरे दे छे-मूके छ ते विद्याधर- पणुं पामे छे भने रथ पापनार (मूकनार ) चक्रवर्ती थाय छे. (८६) श्री विद्याप्रामृत- मा प्रा तीर्थना २१ नाम श्रापेला के के जे नामो यथानुमाव मुनि, देवो भने मनुष्योए करेला ( स्थापेला) छे. (८७) ते नामो पा प्रमाणे-" विमळगिरि १, मुक्तिनिलयः२, (६१४) मीकालसोफप्रकाश ६ सिद्ध-पञ्चओ ७ तित्थराओ य ८ ॥१॥ बाहुवली ९ मरुदेवो १० भगीरहो ११ सहसपत्त १२ सयपत्तो १३। कूडसयमुत्तरओ १४ नगाहिराओ १५ सहसकमलो १६ ॥ २ ॥ ढंको १७ कवडिनिवासो १८ लोहिच्चो १९ तालज्झओ २० कयंबुत्ति २१ । सुरनरमुणिकयनामो सो विमलगिरी जयउ तित्थं ॥३॥ एप चाऽशाश्वतो नाशा-न्मूलाऽनाशाच्च शाश्वतः। ततः सोभय- धर्मत्वा-च्छाश्वतप्राय उच्यते ॥ ८८ ॥ श्रथ प्रकृत-अंगारमुर्मुरप्राया भूमिर्भस्ममयी तदा । देहिभिर्दुष्क- रस्पर्शा सतीव व्यभिचारिभिः ॥ ८९ ॥ कुरूपाश्च कुवर्णाश्च दुगंधा दुष्टलक्षणाः। हीनदीनस्वरा दुष्ट-गिरोऽनादेयभाषिताः॥ ९०॥निर्लज्जाः क्लेशकपट-वैरद्रोहपरायणाः । निर्यादा मिथो युद्ध-वधबंधविसंस्थुलाः ॥९१ ॥ अकार्यकारिणो नित्य-मन्यायोत्पात(द)तत्पराः। पित्रादिविनया- ज्ञादि-व्यवहारविवर्जिताः ॥९२॥ भूम्ना काणांधवधिरा न्यूनांगुल्यादयः शत्रुजय ३, सिद्धक्षेत्र ४, पुंडरीक ५, श्रीसिद्धशेखर ६, सिद्धपर्वत ७, तीर्थराज ८, पाहु- पलि ९, मरुदेव १०, भगीरथ ११, सहस्रपत्र १२, शतपत्र १३, अष्टोचरशतकूट १४, धिराज१५, सहस्रकमळ, १६, ढक १७, कोडी (कपर्दी) निवास १८, लौहित्य १९, तालध्वज २० अने कदंब २१-या प्रमाणे सुर, नर ने मुनिना करेला जेना नामो छे, ते विमळगिरि तीर्थ जयवंत वों" (१-३) श्रा पर्वत नाश पामतो होवाथी ते अशाश्वत छे अने मूळथी नाश पामतो न होवाची शाश्वत छे. ए प्रमाणे उमयधर्मी होगाथी ते शाश्वतप्राय कहेवाय छे. (८८) अथ प्रकृवं-ते काळे पांचमा थाराने छेडे-छहा आराना प्रारंभमा भूमि अंगाराजेवी, मुर्मू- रजेवी तेम ज भस्ममयी होय छे, ते जेम व्यभिचारी पुरुष सती स्त्रीने स्पर्श करीन शके तेम प्राणीमोने दुष्कर स्पर्शचाळी थाय छे. (८९) ते काळे मनुष्यो कुरूपी, कुवर्णी, दुर्गधी, दुष्टलक्षणी, हीनदीन स्वरवाळा, दुष्ट वाणीवाळा, अनादेय मापाचाळा, निर्लज, क्लेश- कपट-वैर ने द्रोह करवामां तत्पर, मर्यादाविनाना, अंदरअंदर युद्ध-वध ने बंधथी विसं- स्थुळ स्थितिवाला, अकार्यकारी, निरंतर अन्याय ने उत्पातमा तत्पर, (अन्यायी धन उपार्जन करवामां तत्पर) पिनादिना विनय के भाज्ञादि व्यवहारथी विवर्जित, प्राये काणा, अंध के बघिर, न्यून पांगळी विगेरेवाला, दुर्घळ, हाथे डंठा, पगे पांगळा, श्याम वर्ण- नगा- , सर्ग ३४ मो। कृशाः । कुणयः पंगवः श्यामाः कामार्त्ता वाल्यतोऽपि हि ॥ ९३ ॥ प्ररू- ढप्रौढकठिन-रोमाणः शूकरादिवत् । असंस्कृतश्मश्रुकेशाः प्रवृद्धनखराः खराः ॥९४॥ कृतांतसदृशाः काला नीलीकुंडोद्गता इव । स्थूलव्यक्त- स्नसाजाल-नद्धाः स्फुटितमौलयः ॥ ९५॥ वाल्येऽपि कपिलश्वेत-मू- र्द्धजा वलिभिः श्लथाः । अशक्ता निपतदंता जरसा जर्जरा इव ।। ९६ ।। घटोद्भटमुखा वक्र-नासिकाः कुटिलेक्षणाः। उत्कंडूयाः क्षतशत-विग- लत्पूयशोणिताः ॥ ९७ ॥ खरोष्ट्रगतयः संह-ननेनांत्येन निर्यलाः। कुसं. 'स्थानाः कुप्रमाणाः कुस्थानशयनासनाः॥ ९८ ॥ सदाप्यशुचयः स्नान. ब्रह्मचर्यादिवर्जिताः । शास्त्रसंस्काररहिता मूर्खा विकृतचेष्टिताः ॥९९ ॥ निस्सत्त्वाश्च निरुत्साहाः सोच्छिष्टा नष्टतेजसः । शीतोष्णपवनव्याधि- प्रमुखातिशताश्रयाः ॥ २००॥ प्रस्वेदमलसंदोह-बीभत्सा धूलिधूसराः । 'बहुक्रोधमानमाया-लोभमोहभयोदयाः॥१॥ व्रतेर्मूलोत्तरगुणैः प्रत्या- ख्यानश्च वर्जिताः । सम्यक्त्वेनापि रहिताः प्रायः स्युर्मनुजास्तदा ॥ २॥ - श्राव- , वाळा, पाळपणाथी ज कामार्ग, मुंडनी जेवा प्ररूढ-प्रौढ-कठिन रोमराजियाळा, दाढी- मुछना वाळोनो संस्कार कर्या विनाना, वघेला के नखो जेना एवा, कर्कश, यमराज जेवा अने गळीना कुंडमाथी नीकळ्या होय वेवा श्याम, स्थूळ अने व्यक्त एवी नसोनी जाळ- बाळा, फुटेला माथावाळा, बाल्यावस्थाथी ज कपिलश्वेत ( कामरा) केशोवाळा, कीओवडे श्लथ, अशक्त, पडी गयेला दांतवाळा, जरावस्थावडे जर्जर थयेला होय वेवा, घडा जैवा उद्भट मुखवाळा, वाकी नासिकावाळा, कुटिल नेप्रवाळा, वृद्धि पामेली खर- जवाळा, सेंकडो तमाथी परु ने लोही नीकळ्या करे के एवा सेंकडो चांदायुक्त शरीर- वाळा, खर ने उंट जेची गतिवाळा, छेल्ला संघयणे करीने निर्वळ, माठा संस्थानवाला, खराव प्रमाणवाळा, माठे स्थाने शयन आसन करनारा, निरंतर अपवित्र, स्नान अने प्रह्मचर्यादिथी वर्जित, शास्त्रसंस्कार विनाना, मूर्ख, विकृत चेष्टावाळा, निम्मान, निरु- त्साह, उच्छिष्टतावाळा, नटतेज, शीत-उष्ण-पवन ने च्याधि प्रमुखने लइने सेंकडो प्रका- स्नी प्राति( पीडा )वाळा, प्रस्वेद ने मळना समूहथी बीमत्स, धूळिवडे धूसर थयेला, बहु क्रोध-मान-माया-लोभ-मोह ने भयना उदयवाळा, मूळ-उचरगुणरूप व्रतोथी अने प्रत्या- रुपानपी चर्जित, सम्यक्त्वे करीने पण रहित एवा प्राये मनुष्यो होय छे (१९०-२०२) " .

(६१६) श्रीकाललोकप्रकाश । कदाचिदेवां केपांचित् सम्यक्त्वं संभवत्यपि । संक्लिष्टाध्यवसायत्वा-द्विर- तिस्तु न सर्वथा ॥ ३ ॥ तथोक्तं भगवत्यां-'योसणं धम्मसन्नपठभट्टा' जंबूद्वीपप्रज्ञप्त्यां च-'ओसामं धम्मसन्नसम्मत्तपरिभट्टा ' ओसन्नमिति प्रायोग्रहणारक्वचित्सम्यक्त्वं प्राप्यतेऽपीति भावः. प्रायः कच्छपमत्स्यादि-मांसक्षौद्रादिभोजिनः । तुच्छधान्याशिनः केऽपि बह्वाहारा बहुतुधः ॥४॥ प्रायो विपद्योत्पद्यते तिर्यक्षु नरकेषु ते । तिर्यग्भ्यो नरकेभ्यश्च ते प्रायेण स्युरागताः॥५॥ चतुष्पदा मृगव्याघ्र-सिंहाश्वौतुकादयः । पक्षिणो ढंककंकाद्याः सरटाद्याः सरीसृपाः ॥ ६॥ एतेऽपि सर्वे नरक-तिर्यग्दुर्गतिगामिनः। स्युमासभक्षिणः क्रूरा-ध्यवसायाश्च निर्दयाः ॥ ७ ॥ षष्ठस्य चारक- स्यादौ नरा हस्तद्वयोच्छ्रिताः । हीयमानाः क्रमादंते चैकहस्तोच्छ्रिता मताः ॥ ८॥ उत्कृष्टमायुरेतेषा-मादौ वर्षाणि विंशतिः । अंते पोडश व- पाणि हीयमानं शनैः शनैः ॥ ९॥ तथोक्त- सोलसवीसइवासपरमा- कदाचित् तेमांना कोइक मनुष्योने सम्यक्त्व समवे छे पण संक्लिष्ट अध्य वसायवाळा होवाथी विरति तो सर्वथा होती ज नथी. (३) श्रीभगवतीसूत्रमा कयुं छे के-'प्राय धर्मसंज्ञाथी ज प्रभ्रष्ट होय छे.' जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिमा कमु छ के-'प्राये धर्मसंज्ञा ने सम्यक्त्तथी परिभ्रष्ट होय छे' प्रोसन्न एटले प्रायःशब्द ग्रहण करेल होवाथी क्वचित सम्यक्त्व पामी शके छे, एम समजबु. ए मनुष्यो प्राये काचवा ने माछला विमेरेना मांसना तेम ज मध विगेरेना खानारा, कोई तुच्छ धान्यना खानारा तेम ज यहु आहारवाळा ने बहु क्षुधावाळा होय छे. (४)ए मनुष्यो मरण पामीने प्राये तिर्यचमा ने नरकमा उत्पन्न थाय छ भने तेश्रो प्राये नरकने तिचगतिमाथी ज पावेला होय छे. (५) हवे चतुष्पद हरण, वाघ, सिंह, अश्व, वरगडा, पीलाडा विगेरे, पक्षीयो ढंक, केक- विगेरे, सरिसृप सरडा विगेरे-ए सर्वे नरक ने तिर्यचरूप दुर्गतिगामी होय के कारण के ते मांसभक्षी क्रूर अभ्यवसायवाला ने निर्दय होय छे. (६-७) छठा भारानी आदिमा 'मनुष्यो वे हाथ उंचा होय छे. ते अनुक्रमे घटता घटता छठ्ठा आराने अंते एक हाथ उंचा रहे थे. (८) एमनुं श्रायुष्य हा आरानी आदिमां वीश वर्षतुं होय छे, अंते धीमे धीमे (घटतुं सोळ वर्षतुं रहे थे. (१९) श्री जंबूद्वीपप्रज्ञाप्तिसूत्रमा काछ के-'हे श्रमवायुष !

मर्ग ३४ मो। (-६१७) उा समणाउसो' इति श्रीजंबू०प्र० सूत्रे, एतवृत्तावपि-इह कदाचित् पोडश वर्षाणि, कदाचिच्च विंशतिवर्षाणि परममायुर्येपां ते इति. वीर- चरित्रे तु पोडश स्त्रीणां वर्षाणि, विंशतिः पुंसां परमायुरिति. वैताट्यपर्वतादा-गंगायास्तटयोईयोः । बिलानि स्युर्नव नव तावंति सिंधुकूलयोः॥ १०॥ त्रिंशति विलेष्वेवं दक्षिणा निवासिनः। वसंति मनुजाः पक्षि-पशुगोधोरगादयः ॥ ११॥ वैताढ्यात्परतः सिंधु-गं. गयोः कुलयोर्द्वयोः । षट्त्रिंशति विलेष्वेते वसंत्युत्तरपार्श्वगाः ॥ १२ ॥ द्वासप्ततिर्विलान्येवं स्युः क्षेत्रेषु दशस्वपि । तेपु तिष्ठति वीजानि सर्वे. पामपि देहिनां ॥ १३ ॥ रथचक्राक्षमात्रोंडो रथाध्वमात्र विस्तृतः। तदा जलप्रवाहः स्यात् सरितोः सिंधुगंगयोः ॥ १४ ॥ तावदप्युदकं तासां भूरिभिर्मत्स्यकच्छपैः। प्राकीर्णं पंकिलं भूरि-जीवमल्पतमांबुकं ॥१५॥ ननु तुल्लहिमवदा-दिपु शैलेपु नैधते । श्ररकाणां परावर्त-स्ततस्तजात- जन्मनां ॥ १६ ॥ गंगादीनां निम्नगानां हानिः पठेऽरके कथं । किं चैवं । . ते सोळथी मांडीने वीश वर्षना परमायुवाळा होय छे.' तेनी वृत्तिमा पण कडुं छे के- कदाचित् सोळ वर्षतुं ने कदाचित् वीश वर्ष, परमायु जेमर्नु होय छे ते.' श्री वारचरि- समां तो सोळ वर्षतुं स्त्री, अने वीश वर्षनुं पुरुपर्नु परमायु समजवू एम कयुं छे. वैवाट्यपर्वतनी समीपमा आ पाजु गंगानदीना वंने तटउपर नव नव पिलो होय छे अने सिंधुना किनाराउपर पण ते ज प्रमाणे नव नव बिल होय छे. (१०) ए रीते कुल ३६ बिलमा भरतना दक्षिणार्धमा रहेनारा मनुष्यो तेम ज पशु, पक्षी, घो अने सर्पादि रहे छे. (११) पैताट्यनी बीजी वाजु (उत्तर तरफ) गंगा ने सिंधुना पने किनारे मळीने छत्रीश बिलो चे. तेमा उत्तर बाजुना मनुष्यो ने तिर्थचो रहे छे. (१२) था प्रमाणे कुल ७२ पिलो दशे क्षेत्रोमां होय छे. तेमा सर्व जीवो चीजमान रहे छे. (१३) ते वसते गंगा ने सिंधुनो जळप्रवाह रथना पैडाना मध्य भाग जेटलो (बचली धरी ने एटलो) उंडो अने रथना मार्ग (चीला) जेटलो पहोलो होय छे. (१४) तेटलं पण ते नदीन पाणी पणा मत्स्य कच्छा विगेरेथी व्याप्त होय छे, कादववालं होय छे भने घणा जीयो. वालं ने अन्प जम्वालं होय छे. (१५) महीं शिष्य प्रश्न करेले के-"तुलाहमववादिपर्व- तमा भारामोनी परापत्ति असर करती नधी वो माथी उत्पन्न धयेली गंगाविगेरे नदी- ७८ .. . (६१८) श्रीकाललोकप्रकाश । कथमेतासां विघटेत न नित्यता ॥ १७ ॥ अत्रोच्यते-हिमवत्पर्वतो- स्थस्य हानिन स्यान्मनागपि । गंगादीनां प्रवाहस्य स्वकुंडनिर्गमावधि ॥ १८ ॥ ततः परं त्वेप यथा शुभकालानुभावतः । नद्यंतरसहस्रानु-प. गेण वर्द्धते क्रमात् ॥ १९ ॥ तथा नद्यंतराऽसंगा-द्भरितापात्तथा क्षितेः। शुष्यत्यपि प्रवाहोऽयं दुष्टकालानुभावतः ॥ २० ॥ पद्मादिइदनिर्गच्छ-त्म- वाहापेक्षयैव च । स्याच्छाश्वतत्वमेतासां ततो युक्तं यथोदितं ॥ २१ ॥ चतुर्भिः कलापकं । निवसंति मनुप्यास्ते प्रागुक्तेषु बिलेष्वथ । भीष्मेपु घोरध्वांतेपु स्तेना: कारागृहेप्विव ॥ २२ ॥ कृताऽकार्या इव वहि-स्तेऽहि नागंतु- मीशते । गोपतेरुत्प्रतापस्य करसंतापभीरवः ॥ २३ ॥ निशायामपि नेशा- स्ते निर्गतुं विलतो वहिः । असह्यं ददतो जाड्यं विधोीता निशाचरात् ॥ २४ ॥ रजनी गतचंद्रापि निशाचरवधूरिव । भवेत्प्राणोपघाताय तेषां शीतान्वेिपिनां ॥ २५॥ ततः प्रातः प्रदोपे च नात्युप्णे नातिशीतले । मोनी हा पारामां हानि केम थाय छ ? यळी जो ए प्रमाणे होय तो तेमनी नित्यतामा दोष केम न कहेवाय? "(१६-१७) तेने उत्तर प्रापे के के-"हिमवत पर्वतमाथी नीकळे छे त्यांथी ते तेना प्रपातकुंडमाथी नकळे छे त्यां सुधी गंगानदीविगेरेना प्रवाहमा किंचित् पण हानि थती नथी. (१८) त्यारपछी ते प्रवाह जेम शुभकाळानुभावथी पीजी हजारो नदीनो प्रवाह मळवाथी अनुक्रमे वधतो जाय छे (१९) तेम दुष्टकाळा- नुभावथी बीजी नदीओनो प्रवाह न मळवाथी भने पृथ्वीना अत्यंत तापथी भा प्रवाह सुकाय पण छे. (२०) पमादिद्रहमाथी नीकळता प्रवाहनी अपेक्षाए ब ते नदीमोनुं शाश्वतपणुं छे तेथी जे कहेवामा प्रावेल ले ते युक्त ज चे." (२१) ते काळना मनुष्यो पूर्व कझा ते बिलो के जे भयंकर अने घोर अंधकारवाळा होय छे, तेमा जेम चोर कारागृहमा (चंदीखानामा ) रहे तेम रहे छे. (२२) अकार्य करनार मनुष्यनी जेम तेत्रो प्रबळ तापवाळा सूर्यना किरणोना संतापथी भय पाम्या सता दिवसे पण यहार नीकळी शकता नथी. (२३) रात्रे पण असह्य जडताने श्रापनारा निशाचर एवा चंद्रथी भय पाम्या सता पिलनी चहार नीकळी शकतानथी. (२४) चंद्रविनानी रात्री पण शीतनी पीडाथी धुनता एवा तेश्रोने निशाचरनी वधूनी जेम प्राणपात माटे थाय छे. (२५) वेथी प्रमाते अथवा प्रदीप समये (सांजे ) व्यारे अति उष्णता के अति शीत- सर्ग ३४ मो. (६१९) निर्गच्छंति विलेभ्यस्ते शृगाला इव भीलवः ॥ २६ ॥ उपेत्य गंगासिंधु. भ्यो गृहीत्वा मत्स्यकच्छपान् । स्थले क्षिपंति पाका) सद्यस्का दुर्जरा हि ते ॥ २७॥ दिवा तरणितापेन रात्रौ शैत्येन भूयसा । तेपामाहारयो. ग्याः स्युः कथिता नीरसाश्च ते ॥ २८ ॥ मंदाल्पजठराग्नीना-मपक्वाः सरसाश्च ते । न जीर्यतेऽग्न्यभावाच्च तेषां पाकोऽप्यसंभवी ॥ २९ ॥ श्रादाय पूर्वनिक्षिप्तान् प्सांति ते मत्स्यकच्छपान् । भविष्यद्भोजनार्थ च निक्षिपति पुनर्नवान् ॥ ३० ॥ जीविका स्यात्सदाप्येषां यदेवं पाप- साधनं । स्युस्तियंचो नारकाश्च प्रायस्तत्तेऽपि पापिनः ॥ ३१ ॥ सूत्रे च प्रायःशब्दोक्तेः क्षुद्रान्नकृतजीविकः । अक्लिष्टाध्यवसायश्च कश्चित्स्वर्गेऽपि गच्छति ॥ ३२ ॥ तथाहुः-' ओसामंसाहारा मच्छाहारा खुड्डाहारा इत्यादि. तथा ओसणं णरगतिरिकजोणिएसु उववनिहिंति त्ति श्री. जंबू०प्र० सूत्रे. तदा पवर्षवयसो गरभं दधते स्त्रियः। सकृच्छ्रे सुवतेऽभीक्ष्ण- , ळता न होय त्यारे वीकण शियाळनी जेम तेश्रो बिलनी बहार नीकळे छे. (२६) बहार नीकळीने गंगा-सिंधुमाथी मत्स्यो ने कच्छपोने ग्रहण करी तेन पकववा माटे स्थळउपर नाखे छे, कारण के तरतना काढेला ते तेमने पचता नथी. (२७) दिवसे सूर्यना तापपी ने राने अत्यंत शीतथी कोही गयेला ने नीरस थयेला ते मत्स्यादि तेमने सावा योग्य थाय छे. (२८) मंद ने अल्प जठराग्निवाळा तेस्रोने अपक्व ने सरस एवा मत्स्यादि पचता नथी, तेम अग्निनो प्रभाव होवाथी तेने पकवधानो पण असंभव छे. (२९) पूर्वे जमीनमा नाखेला (दाटेला) मत्स्यने तथा कच्छपाने काढी लइने तेश्रोसाय चे अने भागळ खावा माटे वीजा पाहा तेमां नाखे छ (दाटे छे). (३०) निरंतर प्राप्रमाणे जे पापने साध. नारी तेमनी आजीविका के तेथी एवा पाप करनारा तेश्रो पण प्रायः नारकी ने तियेची थाय छे. (३१) सूत्रमा प्रायः शब्द होवाथी तेमांना कोइक मनुष्यो जुद्रानडे जीविका करनारा अने अनिष्ट अध्ययमायवाळा होय ते सर्गे पण जाय छे. ( ३२ ) तथाहु:- प्राये मासाहारी, मच्छाहारी, जुद्रानाहारी, इत्यादि, तथा प्राये नरक तिर्यगयोनिमा उपजे छे. आ प्रमाणे श्रीजंयूद्वीपप्रज्ञप्तिम्नमा कयुं छे.- ते वसते छ चर्पनी स्त्री गर्भ धारण करे छ, घणा कष्टसाथे प्रसवे के अने वारंवार .

- (६२०) भीकाललोकप्रकाश। मपत्यानि बहूनि ताः ॥ ३३ ॥ वहूभिः पुत्रपौत्राद्यैः क्लिष्यंतेऽल्पायुषोऽपि ते । पापिनः पापिभिर्वाल-विट्चरैविट्चरा इव ॥ ३४ ॥ यूकामत्कुण- लिक्षाद्या येऽप्यमी सुद्रजंतवः । तुदंति तेऽपि दुष्टास्ता-नजीर्णान्नान गदा इव ॥३५॥ एवं पप्ठेऽरके पूर्णे संपूर्येतावसर्पिणी । उत्सर्पिणी प्रविशति ततोऽ- मुष्या विलक्षणा ॥३६॥ श्रारंभसमये योऽय-मुत्सर्पिण्या भवेदिह । पंच- दशानां कालानां स एवादिक्षणो भवेत् ॥ ३७ ॥ ते चामी-श्रावल्या १ नप्राण २-स्तोक ३ लव ४ मुहूर्त ५ दिन ६ निशाः ७ करणं ८। नक्षत्र ९ पक्ष १० मास ११-वय १२ नानि च १३ हायन १४ युगे १५ चं ॥ ३८ ॥ यद्यपि ग्रंथांतरे ऋतोरापाढादित्वेन कथनादन श्रावणमासे ऋतोरारंभो न घटते, तथापि भगवतीवृत्त्युक्तस्य ऋतौ श्रावणादिपक्षस्या- श्रयणान्न दोष इति जंबू० प्र० वृ० । एवं च-नभःश्यामप्रतिपदि करणे वालवाभिधे । उत्सर्पिणी प्रविशति नक्षत्रेऽभिजिदाह्वये ॥ ३९ ॥ तदैव गर्भ धारण करवाथी घणा अपत्योवाळी ते होय छे. (३३) अल्पायुषी छतां ते पापीमो पापी एवा पुत्रपात्रौदिकवडे मुंडना बच्चांभोवडे झंडोनी जेम पीडाय छ- क्लेश पामे छे. (३४) जेने अन जरतु न होय तेने जेम व्याधियो हेरान करे वेम जू, माकड, लीख विगेरे क्षुद्र जंतुओ दुष्ट एवा तेभोने घणा हेरान करे छे. (३५) श्रा प्रमाणे छछो पारो पूर्ण थये सते आ अवसर्पिणी पूर्ण थाय छे. त्यारपछी एनाथी विलक्षण एवी उत्सर्पिणी प्रवेश करे छे. (३६) श्रा उत्सर्पिणीना प्रारंभ समये जे समय होय छे ते काळना पंदर प्रकारना प्रारंभनो प्रादि क्षण कहेवाय छे. (३७) काळना १५ प्रकार या प्रमाणे-१ पारळी, २ भानप्राण, ३ स्तोक, ४ लव, ५ मुहूर्त, ६ दिन, ७ निशा, ८ करण, ९ नक्षत्र, १० पक्ष, ११ मास, १२ ऋतु, १३ अयन, १४ हायन (वर्ष ), १५ युग. (३८) जो के ग्रंथांतरमा ऋतुनी शरुआत अपाडथी थवी होवाथी ही श्रावण मासे ऋतुनो प्रारंभ घटशे नहीं, तथापि श्री भगवतीनी पृत्तिमा कहेली ऋतुमा श्रावणादिपचनो पाश्रय करेलो होवाथी दोप नथी. एम श्रीजंबूद्वीपप्रज्ञप्ति वृत्तिमा कडं छे. तेथी करीने श्रावणमासनी कृष्ण प्रतिपदाए अने पालव करणे तैम ज अभिजित् नक्षत्रे उत्सर्पिणीनो प्रवेश थाय छे. (३९) तेज वसवे दुष्पमदुष्पमा नामनो उत्सर्पिणीनो सर्ग ३४ मो। (६२१) च प्रविशति दुप्पमदुष्पमाभिधः। अरकः प्रथमोऽमुष्या उत्सर्पिण्या मुखा- धमः ॥ ४० ॥ अस्मिन् सर्वपदार्थानां वर्णगंधादिपर्यवाः। क्षणे चणे विवर्द्धते प्रभृति प्रथमक्षणात् ॥ ११॥ प्राग्भावितोऽवसर्पिण्यां यथानंत- गुणक्षयः। वर्णादीनामुपचयो भाव्योऽत्रानुक्षणं तथा ॥ ४२ ॥ मनुजाः प्राग्वदनापि विलवासिन एव ते । आयुर्वेहादिपर्यायैः किंतु वद्धिष्णवः क्रमात् ॥ ४३ ॥ प्रथमं पोडशाव्दानि जनानामिह जीवितं । वर्षाणि विशतिं चांते वर्द्धमानं शनैः शनैः ॥ ४४ ॥ एकहस्तोचवपुपः प्रथम मनुजा इह । वर्द्धमानाः क्रमादंते भवंति द्विकरोच्छ्रिताः॥ ४५ ॥ आहारा. दिस्वरूपं तु तेषामत्रापि पूर्ववत् । प्रयोति दुर्गतावेव मांसाहारा थमी अपि ॥४६॥ एवमायेऽरके पूर्णे द्वितीयः प्रविशत्यरः। दुःपमाख्यः प्रातिलोम्या- प्रागुक्तदुष्पमोपमः॥४७॥ प्रथमे समयेऽथास्य पुष्करावर्त्तवारिदः । प्रादुर्भवेन्महीमाश्वा-सयनहन्निवामृतैः ॥ ४८ ॥ पुष्करं नाम शंस्तांबु पहेलो पारो पण प्रारंभमा अधम एवो प्रवेश पामे छे. (४०) या काळमां सर्व पदार्थोना वर्षगंधादिपर्यव भादिना प्रथम क्षणी क्षणे क्षणे वृद्धि पामे छे. (४१) पूर्व अवसर्पि. पीमा जेम अनंत गुण आय को इतो तेम उत्सर्पिणीमा प्रतिक्षणे वर्णादिकनो उपचय पक्ष अनंतगुणो समजवो. (४२) मनुष्यो पा मारामां पण पूर्वनी जेम पिलमा रहेनाराज होय छे. पण आयुदेहादि पर्यवोक्डे क्रमसर वृद्धि पामनारा होय छे. (४३) प्रारंममा १६ वर्षर्नु मनुष्याने आयुष्य होय छे ते अनुक्रमे बघतुं वधतुं वीश वर्षेनुं थाय छे. (४४) अने प्रारंभमा मनुष्योनुं शरीर एक हाथर्नु होय छे ते अनुक्रमे वतुं पधतुं पा शाराने अंतेचे हाथर्नु थाय छे. (४५) आहारादिनुं स्वरूप तो तेमनु भा पारामा पण पूर्वनी जेम ज ( बहा पारानी जेम ब) होय छ भने मांसाहारी एपा ते श्राराना मनुष्यो पण दुर्गतिमा ज जाय छे. (४६) ए प्रमाणे पहेलो पारो पूर्ण थये सते चीजो दुप्पमा नामे पारो प्रवेश करे छे. ते प्रतिलोमपणाथी पूर्व कही गयेला दुप्पमा श्रारा जैवो ज होप छे. (४७) श्रा भाराने प्रथम समये अरिहंतनी जेम अमृत समान देशना जेवा जळवडे पृथ्वीने आश्वासन बापतो सतो पुष्क- रावत मेघ प्रगट थाय छे. (४८) पुष्कर एटले प्रशस्त एवं जम तेनावडे यावृत्ति पमारे (६२२) श्रीकाममोकप्रकाश। तेनावर्त्तयति क्षितेः । संहरत्यशुभावस्थां पुष्करावर्त्तकस्ततः ॥ १९ ॥ त. तत्क्षेत्रप्रमाणः स्या-द्विष्कंभायामतः स च । तीवार्कतापच्छेदाय चंद्रो. दय इव क्षितेः ॥ ५० ॥ क्षणाक्षेत्रमभिव्याप्य सर्व स मृदु गर्जति । सांत्वयन्निव भूलोकं दुष्टमेघैरुपद्रुतं ॥ ५१ ॥ स चाभितः प्रथयति विद्युतो द्युतिमालिनीः। शुभकालप्रवेशार्हा इव मंगलदीपिकाः॥ ५२ ॥ मुशलस्थूलधाराभिः स च वर्षन् दिवानिशं । निर्वापयति भूपीठं स्वादु. स्वच्छहितोदकः ॥ ५३ ॥ स सप्तभिरहोरात्रै-रंतः स्नेहामृतादितां । क्ष्मां कुर्याच्छांतसंतापां प्राणेश इव वल्लभां ॥ ५४ ॥ ततस्तस्मिन्नुपरते पुष्करावर्तकांबुदे । प्राप्तवार इव प्रादु । प्राप्तवार इव प्रादुर्भवति क्षीरवारिदः ॥ ५५ ॥ सप्त प्राग्वदहोरात्रान् सोऽपि वपन दिवानिशं। चारुगोक्षीरतुल्यांबु-वर्णा- दीन् जनयेक्षितौ ॥ ५६ ॥ क्षीराब्दे विरते तस्मिन् घृतमेघो घृतोदकः सप्त वर्षन्नहोरात्रान् स्नेहं जनयति क्षितेः ॥ ५७ ॥ अहोरात्रांस्ततः सप्त वर्षन्नमृतवारिदः । नानौषधीजनयति नानावृक्षलतांकुरान् ॥ ५८॥ रस- छे-पृथ्वीनी अशुभावस्थाने संहरे छे तेथी ते पुष्करावर्त कहेवाय छे. (४९) ते मेघ विष्कम ने आयामथी ते ते क्षेत्र प्रमाण अने पृथ्वीने लागेला तीन सूर्यना तापना चेदने माटे ( तपेली जमीनने शांत करवा माटे) चंद्रना उदय जेचा होय छे. (५०) अने ते मेघ प्रथमना दुष्ट मेघोए उपद्रवित करेली पृथ्वीने जाणे शांत करतो होय तेम षण- मात्रमा भाखा क्षेत्रमा व्यापीने मृदुगर्जारव करे छे. (५१) अने शुभकाळना प्रवेशने योग्य जाणे मंगळदीपिका होय तेवी कांतियुक्त वीजळीोने चौतरफ विस्तारे छे. (बधे चमकारा करे छे.) (५२) रात्र-दिवस मुशल जेवी स्थूळधारावडे वरसतो ते वरसाद स्वादु, स्वच्छ ने हितकारी जळने वरसतो बधी जमीनने शांत करी दे छे. (५३) ए प्रमाणे सात अहोरात्र वरसवाथी प्राणेश जेम वल्लभाने शांत संतापवाळी करे तेम सर्व पृथ्वीने अंगास्नेहामृतवडे आर्द्र करे छे. (५४ ) त्यारपछी ते पुष्करावर्त मेघ उपरत थये सते पोतानो वारो आव्यो होय तेम वीरनो मेघ प्रादुर्भाव पामे छे (५५) ते पर- साद पण पूर्वना वरसादनी जेम सात अहोरात्रसुधी सतत वरसे छे भने ते पृथ्वीने सुंदर गोपीरना वर्ण सरखा जळ्थी वर्ण, गंध, रस ने स्पर्शवाळी रे छ. (५६) ते जीर- मेघ विराम पामे सते घृतमेघ घृतोदकने सात अहोरात्र सुधी सतत वरसावे छे अने ते पृथ्वीमा स्नेहने (स्निग्धताने ) उत्पन्न करे छ. (५७) त्यारपछी अमृतमेघ अमृत जळने सात अहोरात्रसुधी सतत वरसावे छे ते नाना प्रकारनी औषधिोने म ज नाना प्रकारना वृक्ष ने लताना अंधुराने उत्पन्न करे छे. (५८) त्यारपछी रसमेघ सात अहो- सर्ग २४ भो । (६२३.) मेघस्ततः सप्ता-होरात्रान् सुरलोदकः । वनस्पतिषु तिक्तादीन् जनयेत्प- चधा रसान् ॥ ५९ ॥ पंचानामेव भेदानां यद्रसेपु विवक्षणं । तल्लवण- मधुरयो-रभेदस्य विवक्षया ॥ ६० ॥ माधुर्यरससंसर्गो लवणे स्फुटमी- क्ष्यते । स्वादुत्वं लवणक्षेपे भवेत्सर्वरसेपु यत् ॥ ६१ ॥ अत्युत्तमा श्रमी मेघाः पुष्करावर्तकादयः । जनयंति जगत्स्वस्थं पंचेव परमेष्ठिनः ॥६२॥ श्राद्योऽत्र शमयेद्दाहं द्वितीयो जनयेच्छुभान् । वर्णगंधरसस्पर्शान् भुवः स्नेहं तृतीयकः ॥ ६३ ॥ तुर्यो वनस्पतीन् सर्वान् पंचमस्तद्गतान रसान्। पाहुः प्रयोजनान्येवं पंचानामप्यनुक्रमात् ॥ ६४ ॥ तत: क्रमाद्भवेद्भूमि-भूरिभिर्नवपल्लवैः । वृक्षगुच्छलतागुल्म-तृणा- दिभिरलंकृता ।। ६५ ॥ तदा प्रसन्ना तृप्ता च भूमि ति नवांकुरा । रोमांचितेव भूयिष्ठ-कालेन कृतपारणा ॥ ६६ ॥ प्राप्तधातुक्षया शुष्का या मृतेवाभवन्मही । सा पुनर्यौवनं प्रापि सत्कालेन रसायनैः ॥१७॥ मनोरमां सुखस्पर्शी प्रोत्फुल्लद्रुममंडितां । तदा विलोक्य ते भूमि मोदंते . , . रात्र सुधी सुरसादक वरसावे छे. ते वनस्पतियोमा तिक्तादि पांच प्रकारना रसने उत्पन्न करे छे. (५९) श्रही जे पांच रस कह्या छे ते लवण ने मधुररसना अमेदनी विपक्षाथी कह्या छे. (६०) कारण के माधुर्य रसनो संसर्ग लवणने विषे प्रगट देखाय छे. सर्व रसमा लव- णना क्षेपनधी स्वादुपणुं थाय छे. (६१) मा पुष्करावर्त विगैरे मेघ प्रत्युत्तम छे. ते पंचपरमेष्ठिनी जेम जगतनी स्वस्थताने उत्पन्न करे छे. (६२) एमां प्रथमनो मेघ दाहने शमा छ, पीजो मेघ शुभ एका वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, उत्पन्न करे छ, त्रीजो मेघ जमी. नमा स्निग्धता लाये चे, चोथो मेघ सर्व वनस्पतियो उत्पन्न करे के भने पांचमो मेघ तद्गतरसने उपजावे छे. ए प्रमाणे पांचे प्रकारना मेघना अनुक्रमे प्रयोजन कहेल छे. (६३-६४) त्यारपछी अनुक्रमे जमीन घणा नवपनववाळा वृक्ष, गुच्छ, लता, गुल्म ने तणादि- बडे अलंकृत थाय छे. (६५) ते वखते जमीन प्रसन्न, तृप्त, नवा अंकुरावाळी, रोमां. चित थयेल होय तेवी अने घणे काळे पारणुं करेल होय तेवी थाय छे. (६६)जे पृथ्वी धातुक्षयने पामेली, शुष्क भने मरण पामेला जेवी बाती हतीते सारा पखवमा रसायणबडे नवु पौवन पामती होय तेवी देखाय छे. (६७) ते वखते मनोरम, सुख स्पर्शवाळी, (६२४) मीकाललोकप्रकाश। विलवासिनः ॥६८॥ ततो विलेभ्यस्ते मातृ-गर्भेभ्य इव निर्गताः । अपू. मिव पश्यंति विश्व प्राप्तमहासुखाः ॥ ६९ ॥ गणशस्तेऽथ संभूय वदं- त्येवं परस्परं । जातो भोः सुखकृत्कालो रमणीयं च भूतलं ॥ ७० ॥ वनस्पतिभिरभिश्च दलपुष्पफलांचितैः । मधुरैः पावनैः पथ्य-राहारो नो भवत्वथ ॥ ७१ ॥ अतः परं च यः कोऽपि मत्स्यकूर्मादिजांगलैः । करिष्य. त्यशुभैर्वृत्ति स पापोऽस्मद्गणा हिः॥ ७२ ॥ तस्य नामापि न ग्राह्यं वीक्षणीयं मुखं न च । छायाप्यस्य परित्याज्या दूरेंगस्पर्शनादिकं ॥७३॥ इति व्यवस्था संस्थाप्य ते रमते यथासुखं । भूतलेऽलंकृते विष्वग् रम्यैस्तृणलतादिभिः ॥ ७४ ॥ कुतश्चित्पुरुषात्तेऽथ जातिस्मृत्यादिशा- लिनः । क्षेत्राधिष्ठातृदेवाद्वा कालानुभावतोऽपि च ॥ ७५ ॥ ते जनाः प्राप्तनैपुण्या व्यवस्थामपरामपि । कुर्वति नगरग्राम-निकायरचनादिका .॥७६ ॥ अन्नपाकांगसंस्कार- वस्त्रालंकरणान्यपि। विवाहराजनीत्यादि क्रमात्सर्वं प्रवर्तते ॥ ७७॥ तथोक्तं जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिवृत्तौ एतदरकवर्णने- - विकस्वर वृक्षोथी मंडित एवी ते भूमिने जोइने विलवासी मनुष्यो हर्ष पामे छे. (६८) तेथी पिलमाथी माताना गर्ममाथी नीकळे तेम नीकळीने महासुखने पामेला तेभो अपूर्व एवा विश्चने जीता होय तेम चमत्कार पामे छे. (६९) पछी तेश्रो समुदायमा एकठा थाने परस्पर कहेवा लागे छ के-" अरे माइयो ! सुखकारी काळ थवाथी भूतळ रमणीक थयेल छे. (७०) हवे आपणो आहार पत्र पुष्प ने फळवाळी अने मधुर पावन भने पध्य एवी भा भौषधिभोवडे थानो. (७१) हवे पछी जे कोइ मत्स्य कूर्मादिना मांसादि अशुभ पदार्थवडे वृत्ति करशे (खाशे) ते पापीने अमारा समूहमाथी यहार समजवो. (७२) तेनुं नाम पण न लेवु. वेनुं मुख पण न जोयु. तेनी छाया पण वजवी तो पछी अंगस्प- र्शनादिकनी वात तो दूर न जाणवी.” (७३)श्रा प्रमाणे व्यवस्था स्थापन करीने तेश्रो सुंदर एवा तृण ने लतादिवडे अलंकृत एवी पृथ्वीपर सुख उपजे तेम रमवा ( रहेवा) लागे छे. (७४) त्यारपछी तेमाथी कोहक जातिस्मरण वाळा मनुष्यथी अथवा क्षेत्रना अधिष्ठायक देवना कथनथी अने काळना अनुमावथी लोको निपुणता प्राप्त करीने नगर ग्राम विगैरेनी बीजी व्यवस्थाश्री पण करे छे. (७५-७६ ) अने तेज रीते भवनो पाक, भंगनो कार अने वस्त्रालंकारो तेम ज विवाह ने राजनीति विगैरे पधुं अनुक्रमे प्रचते छे. (७७) श्रीजंबूद्वीपप्रज्ञासिनी धृतिमा ए श्राराना वर्णनमा कह्यु छ के-" चीजे . सर्ग ३४ मो। (६२५) द्वितीयारे पुरादिनिवेशराजनीतिव्यवस्थादिकृजातिस्मारकादिपुरुपद्वारा वा क्षेत्राधिष्ठायकदेवप्रयोगण वा कालानुभावजनितनैपुण्येन वा तस्य सुसंभ- वत्वादिति. कालसप्ततौ तु-द्वितीयारके नगरादिस्थितिकारिणः कुलकरा भवंतीत्युक्तं । तथाहि-"बीए उ पुराइकरो जाइसरो विमलवाहन १ सुदामो २। संगम ३ सुपास ४ दत्तो ५ सुमुह ६ सुमई ७ कुलगरति ॥ १॥" स्थानांगसप्तमस्थानेऽप्युक्तं "भरहे वासे प्रागमेस्साए ओसप्पिणीए सत्त कुलकरा भविस्संति, तं जहा-मित्तवाहणे १ सुभोमे २ य सुप्पभे ३ य सयंप- भे ४ । दत्ते ५ सुहुमे ६ सुबंधू ७ य श्रागमेसाण होकत्ति ॥ १ ॥ पट् संस्थानानि ते दध्युः क्रमात्संहननानि च । यांत कर्मानुसा- रेण जना गतिचतुष्टये ॥७॥ उत्कर्षादरकस्यादौ ते विंशत्यब्दजीविनः । अंते च त्रिंशदधिक-शतवर्षायुषो जनाः ॥ ७९ ॥ पादौ स्युढिकरोतुंग- वपुषस्ते ततः क्रमात् । वर्द्धमानोच्छ्या अंते सप्तहस्तसमुच्छ्रिताः ॥८॥ वर्णगंधरसस्पर्श-जीवितोच्चत्वपर्यवैः । वर्द्धमानैर्द्धमानैः पूर्णेऽस्मिन् मारे नगरादिनुं वसावq तथा राजनीतिसंबंधी व्यवस्थादि करनार जातिस्मारकादि' पुरुषद्वारा श्रथया क्षेत्राधिष्ठायक देवना प्रयोगथी अथवा काळानु मावजनितनिपुणताथी तेनो सारी रीते थवानो संभव छे." काळसप्ततिमो तो वीजे पारे नगरादि स्थितिना कर- नारा कुलकरो थशे एम कयुं छे. ते आ प्रमाणे-" बीजे आरे नगरादि करनारा जाति- स्मरणवाळा विमलवाहन १, सुदाम २, संगम ३, सुवास ४, दत्त ५, सुमुस ६ ने सुमति ७ ए कुलकरो जाणवा " (१) श्री स्थानांगसूत्रना सातमा स्थानमा पण कमु छ के- "भरतक्षेत्रमा आवती उत्सर्पिणीमा सात कुलकरो थशे. १ मित्तवाहन, २ सुभूम, ३ 'सुप्रभ, ४ स्वयंप्रम, ५ दच, ६ सुधर्म ने ७ सुपंधु-भा प्रमाणे भागामी काळे थशे." (२) ते काळना मनुष्यो अनुक्रमे छर संस्थानना अने छए संघयणना धारण करनारा तेम ज कर्मानुसारे चारे गतिमा जनारा थाय छे. (७८) उत्कृष्टथी ते बारानी आदिमा वीश वर्षना प्रायुवाळा अने अंते एक सो त्रीश वर्षना आयुवाला जनो थशे. (७९) प्रारं- भमा पे हाथ उंचा शरीरवाळा भने अनुक्रमे वृद्धि पामता ते भाराने अंते सात हाथनी ऊंचाइवाळा मनुष्यो होय छे. (८०) वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, जीवित, उच्चस्य विगैरे पर्यवोबडे १ जेने जाविस्मरण ज्ञान भयुं के वेवा (६२६) भीफाललोकप्रकाश। दुष्पमारके ॥ ८१ ॥ तृतीयोऽरः प्रविशति दुःपमसुपमाभिधः। स प्रातिलो. म्यात्पूर्वोक्त-चतुर्थारकसन्निभः ॥ ८२ ॥ श्ररकस्यास्य पक्षेषु गतेपु प्रथमक्षणात् । एकोननवतावाद्य-जिनो- त्पत्तिः प्रजायते ।। ८३ ।। तथाहुः-कालटुगे तिचउत्था-रएसु एगणनव- इपरकेसु । सेसगएसु सिझंति हुंति पढमंतिमजिणंदा ॥ ८४ ॥ एपोऽ. वसर्पिणीजात-चतुर्विशजिनोपमः। प्रायोंगमानवायु:-कांतिप्रभृतिपर्यवैः ॥८५॥ इत्युत्सर्पिण्यवसर्पि-पयहच्चक्यादयोऽखिलाः । प्रातिलोम्या- नुलोम्याभ्यां भाव्यास्तुल्या मनीषिभिः ॥ ८६ ॥ मिथोंतरं तावदेव यस्योत्पत्तिर्यदोदिता । शेपेऽरकेऽवसर्पिण्यां सोत्सर्पिण्यां गतेऽरके ॥७॥ गतेऽरकेऽवसर्पिण्यां यस्योत्पचिर्यदोदिता । शेपेऽरके सोत्सर्पिण्यां स्वयं भाव्या विवेकिभिः ॥ ८८ ॥ त्रयोर्वितिरहत-स्तथैकादश चक्रिणः। श्ररकेऽस्मिन् भवत्येवं सर्वे. ऽपि केशवादयः ।। ८९ ॥ श्रायुरब्दशतं त्रिंश-मादावनांगिनां भवेत् । वधता वधता ए दुष्पम धारक पूर्ण थये सते त्रीजो पारो दुष्पमसुपम नामनो प्रवेश पामे के. ते प्रतिलोमपणे पूर्षे कहेला अवसर्पिणीना चोथा आरा जेवो होय छे. (८१-८२) श्रा पाराना प्रथम क्षणथी नेच्यासी पक्षो गये सते प्रथम जिननी उत्पनि थाय ले. (८३) काछ के-पने प्रकारना काळमां श्रीजा ने चौथा आराना नेव्याशी पक्षो गये सते ने रो सते पहेला ने छेता जितेंद्र सिद्धि पामे छ ने नवा थाय छे. (८४) श्रा प्रथम तीर्थकर अवसर्पिणीगत चोवीशमा प्रमुसरखा अंगमान, वर्ण, आयु, काति विगेरे पर्य- बोमा प्राये समान होय छे. (८५) ए प्रमाणे उत्सर्पिणी ने अवसर्पिणीमा अरिहंत ने चक्री विगेरे वधा शलाकापुरुपौने प्रातिलोम्ये ने भानुलोम्ये करीने बुद्धिमानोए जाणी 'लेवा. (८६) एक वीजा मरिहतादि बच्चेनुं अंतर पण वेटनु ज समज. जे जे प्रभुनी उत्पत्ति 'अवसर्पिणीमा जे भारी बाकी रखे सवे कहेली के तेज प्रमाणे उत्सर्पिणीमा ते प्रभुनी उत्पत्ति वेटलो आरो गये सते समजवी. (८७) श्रवसर्पिणीमा जे प्रभुनी उत्पत्ति जेटलो पारो गये सते कही छे तेमनी उत्पत्ति उत्सर्पिणीमा तेटलो पारो भाकी रह्ये सते विवेकी- 'श्रोए पोतानी मेळे भाववी-समजवी. (८८) वीश अरिहंतो ने अम्पार चक्रवर्ती तथा सर्व वासुदेव विगेरे पानीजा आरामा थशे. (८९) या पाराना प्रारंभमा १३० वर्षतुं श्रायु अने धीमे धीमे यपतुं वतुं अंते ह h .

मग ३४ मो। (६२७) पूर्वकोटिमितं चांते वर्द्धमानं शनैः शनैः ॥ ९० ॥ श्रादौ स्युः सप्तह- स्तोच-वपुपो मनुजास्ततः । वर्द्धमानाः पंचचाप-शतोच्चांगाः स्मृताः श्रुते ॥ ९१ ॥ एवं पूर्णे तृतीयेऽरे चतुर्थः प्रविशत्यरः। स प्राक्तनतृतीयाभः सुप- मदुष्पमाभिधः ॥ ९२ ॥ एकोननवतौ पक्ष-वतीतेष्वादिमक्षणात् ।। चतुर्विंशस्याहतोऽस्मि-ग्नुत्पत्तिः स्याजिनेशितुः॥ ९३ ॥ अरकेऽस्मिन् भवत्येवं द्वादशश्चक्रवर्त्यपि । तत्पद्धतिस्तु सर्वापि विज्ञेया पूर्ववर्णिता ॥ ९४ ॥ उत्सर्पिण्यां स्युस्त्रिषष्टिः शलाकापुरुषा इति । दशव्यां तृतीयारे तुर्याऽराद्यांशसंयुते ॥९५ ॥ ( एवं पंचमपठारा-वपि भाव्यौ विपर्ययात् । पूर्वोदितावसर्पिण्या द्वितीयाद्यारकोपमौ ॥१६॥) उत्सर्पिण्यां यथैष्यंत्यां क्षेत्रेऽस्मिन् भरताभिधे । पद्मनाभाभिधः श्रीमान् प्रथमोऽहन् भविष्यति ॥ ९६ ॥ स च श्रेणिकराजस्य जीवः सीमंतकेऽधुना। नरके वर्तते रत्न- प्रभायां प्रथमक्षितौ ॥ ९७ ॥ स्थिति स तत्र चतुर-शीतिवर्षसहस्रिकां । । फोड पूर्वनु थशे. (९० ) प्रारंभमा सात हाथ ऊंचा शरीरवाळा मनुष्यो थशे अने अनु- कमे बघतां वधता पाचशें धनुष्यनुं शरीर थशे एम श्रुतमा कयुं छे. (९१) मा प्रमाणे त्रीनो पारो पूर्ण थये सते चौथो श्रारो प्रवेश करशे ते पूर्वना श्रीजा पारा जेवो ने सुपमदुष्पमा नामनो थशे. (९२ ) ते शाराना प्रथम क्षणथी ८९ पक्षो व्यतीत थये सते श्रा पारामा चोवीशमा प्रभुनी उत्पत्ति थशे. (९३ ) श्रा पारामा पूर्वनी रीसे वारमा चक्रवर्ती पण थशे. तेनी पद्धति यधी पूर्व कही गया प्रमाणे समजवी. (९४ ) ए प्रमाणे दशे क्षेत्रमा उत्सर्पिणीमा चौथा भाराना प्राद्य अंश सहित बीजा बारामां प्रेसठ शलाकापुरुषो थाय छे. (९५) ( ए प्रमाणे पांचमो-छछो भारो पण विपर्ययपणे समजवो. वे पूर्व कहेल अवसर्पिणीना वीजा ने पहेला पारा समान समजवा)-(९६) श्रावती उत्सर्पिणीमा प्रा भरत नामना क्षेत्रमा पमनाम नामना श्रीमान् प्रथम परिहंत थशे. (९६ ) ते श्रेणिक राजानो जीव प्रत्यारे रत्नप्रभा नामनी प्रथम पृथ्वीमा सीमंतक सामना नरकावासमा वर्ते छ. (९७) वेमनी स्थिति त्यां मध्यम एवी ८४००० वर्षयी - (६२८) भीकाललोकप्रकाश मध्यमामनुभूयाब्दैः कियद्भिरधिकां ततः ॥ ९८॥ पादमूले भारतस्य वेताढ्यस्य महागिरेः । देशे दूरगतक्लेशे पांडुवर्द्धनसंज्ञके ॥ ९९ ॥ शत- द्वाराभिधपुरे सुतरत्नं भविष्यति । सुमतेः कुलकरस्य भद्रास्त्रीकुक्षिसंभवः ।। ३०० ॥ श्रीवीरपद्मनाभयोरंतरं चैवं-चुलसीवाससहस्सा वासा सत्तेव पंच मासा य । वीरमहापउमाणं अंतरमेयं वियाणाहि ॥१॥ इति नंदी- वृत्ती. इदं वीरमहापद्मयोनिर्वाणोत्पादयोरंतरं ज्ञेयं. श्रेणिकराजजीवस्य तु नरके किंचिदुक्तांतरकालादधिकमेवायुः संभवि, श्रेणिके मृते तु कियत्कालं वीराहत इह विहारात्तावतः कालस्य तदायुष्यधिकत्वादिति. स चतुर्दशभिः स्वप्नैः सूचितः शकपूजितः। जनिप्यते दिने यस्मिन् तस्मिस्तत्र पुरेऽभितः ॥ १॥ अंतर्वहिश्व पद्मानां रत्नानां चातिभूयसां । वृष्टिभविष्यति प्राज्या वारामिव तपात्यये ॥ २ ॥ ततः पित्रादयस्तस्य मुदिता द्वादशे दिने । करिष्यति महापद्म इति नाम गुणानुगं ॥३॥ साधिकाप्टाब्दवयस-मथेनं सुमतिः पिता । स्थापयिप्यति राज्ये स्वे ततो काइक अधिक थे. तेने अनुभवीने ( भोगवीने) भरतक्षेत्रमा प्रावेला वैताट्य महागिरिना पादमूळमां जैमाथी क्लेश नाश पामेल छ एवा पांडुपर्धन नामना देशमा शतद्वार नामना नगरमा सुमति नामना कुलकरनी भद्रा नामनी स्त्रीनी कुतिथी पुत्ररत्नपणे उपजशे. (९८- ३००) श्रीवीरप्रभु ने पदनामनुं अंतर या प्रमाणे-'८४ हजार वर्ष सात वर्प ने पांच मासन वीरप्रभु ने महापद्म प्रभुनुं अंतर जाणवू.' (१) इति नंदीचौ. आ अंतर वीरप्रभुना निर्वाण ने महापद्म प्रभुनी उत्पत्तिनुं जाणवू, तेथी श्रेणिकराजाना जीवन नरकायु मा अंतर च्या नमा लेता ८४००० वर्षथी अधिक संभवे छ, केमके आ पांच वर्ष ने सात मासनुं तथा श्रेणिकराजाना मरण पछी केटलोक काळ वीरप्रा विचर्या हता तेथी तेटला काळनुं तेना श्रायुष्यमा अधिकपणुं समजवू. ते चौद स्वप्नवडे सूचित अने इंद्रपूजित प्रभु जे दिवसे जन्मशे ते दिवसे ते नगरनी चौतरफ अंदर ने बहार अत्यंत पद्मोनी ने रत्नोनी घृष्टि ग्रीष्मऋतुसंबंधी ताप गया पछी पुष्कळ जळनी दृष्टि थाय तेवी थशे, (१-२) तेथी मातापिता विगैरे हर्ष पाम्या सता पारमे दिवसे महापद्म एवं गुणनिष्पन्न नाम स्थापन करशे. (३) काइक झाझेरी माठ वर्षनी वये सुमति पिता तेमने राज्यपर स्थापन करशे एटले ते राजा थशे. (४) सर्ग ३४ मो। (६२९) राजा भविष्यति ॥४॥राज्यं पालयतस्तस्य शक्रस्येव महौजसः । देवौ महर्द्धिकावेत्य सेविष्येते पदद्वयं ॥५॥ यक्षाणां दाक्षिणात्यानां पूर्णभद्राभिधः प्रभुः । माणिभद्रश्चौत्तराह-यक्षाधीशः सुरेश्वरः ॥ ६ ॥ एतौ द्वावपि यतेंद्रौ प्रभोस्तस्य करिष्यतः । सेनान्याविव सैन्यस्य कार्य शत्रुजयादिकं ॥ ७ ॥ सामंतादिस्ततस्तस्य श्रेष्ठिपौरजनादिकः । मिथः परिच्छदः सर्वः संभूयैवं वदिष्यति॥ ८॥ यहो सुरेंद्रौ कुर्वाते अस्या- स्माकं महीपतेः। सेनाकार्य महाश्चर्य-पुण्यप्राग्भारशालिनः ॥ ९ ॥ महापद्मनृपस्याथ देवसेन इति स्फुटं । नामास्तु गुणनिप्पन्नं द्वितीयं रुचिरं ततः ।। १० ।। देवसेननृपस्याथ राज्यं पालयतः क्रमात्। उत्पत्स्यते हस्तिरत्नं चतुर्दतं महोज्ज्वलं ॥ ११ ॥ शक्रमैरावणारूढ-मिव तं तेन हस्तिना । विचरतं शतद्वार-पुरे वीक्ष्य जनाः समे ॥ १२ ॥ वदिष्यति मिथस्ते य-देवसेनमहीपतेः । वाहनं विमलो हस्ती ततो विमलवाहनः ॥ १३ ॥ तृतीयमिति नामास्तु त्रिनामैवं भविष्यनि । महापद्मो देवसेनो राजा विमलवाहनः ॥१४॥ एवं त्रिंशतमब्दानि राज्यं भुक्त्वा महाशयः । . तेभने राज्य पाळता सता शक्रनी जेवा महापराक्रमी चे महार्द्धिक देवो आवीने तेमना चरणद्वयनी सेवा करशे. (५) दक्षिण पाजुनी यदनिकायना इंद्र पूर्णभद्र नामे अने उत्तर बाजुनी यक्षनिकायना इंद्र माणिभद्र नामे ए बने यवेंद्रो ते प्रभुना सैन्यना सेनाप- तिनी- जेम शत्रुनो जय करवानुं कार्य करशे. (६-७) ते पखते तेमना सामंतादिको भने श्रेष्ठ तेम ज पौरजनादिको अने सर्व परिवार अंदर अंदर एकठा थइने एम कहशे (6) के-'अहो ! अमारा भा महीपतिनुं सेनासंबंधी कार्य इंद्रो कर छे तेथी ते महा अाचर्य- कारी पुण्यना प्राग्मारवाळा जणाय छ, (९) तेथी ए महापद्मराजानुं देवसेन एघु बाजु गुणनिष्पन्न, सुंदर ने प्रगट एवं नाम हो. (१०) ए देवसेन राजाने राज्य पाळता सता अनुक्रमे चार दांववालो ने महाउज्वळ हस्तिरत्न उपजशे (प्राप्त थशे.) (११) शक जेम ऐरावत हस्तिपर भारुढ थाय नेम ते हस्तिपर भारुढ थाने शतद्वारपुरमा तेमने करता जोइने सर्वे जनो अंदर अंदर कहेशे के-'देवसेन राजानुं वाहन विमळ हस्ति के तेथी तेनुं विमळवाहन ए, त्रीनुं नाम हो.' ए रीते तेमना महापद्म, देवसेन ने विमळवाहन-ए 'प्रण नाम थशे. ( १२-१४ ) ए प्रमाणे त्रीश वर्षनी वप था सुधी राज्य मोगवीने ए " (६३०) भीकालसोकप्रकाश । दानं दत्त्वाब्दिकं प्रौढो-रसवैः स प्रवजिप्यति ॥ १५ ॥ द्वादशाव्दानि सार्दानि पक्षणाभ्यधिकान्यथ । छद्मस्थत्वे तपः कृत्वा स केवलमवाप्स्य- ति ॥ १६ ॥ सप्रतिक्रमणो धर्मो यथा पंचमहानतः । मुनीनां श्राव- काणां च द्वादशवतबंधुरः ॥ १७ ॥ महावीरेण जगदे जगदेकहितावहः । महापद्मोऽपि भगवांस्तथा सर्व वदिप्यति ॥ १८ । युग्मं । अस्य प्रभोर्ग- गधरा एकादश गणा नव । श्रीवीरवद्भविष्यति वर्णलक्ष्मोच्छ्याद्यपि ॥ १९ ॥ कल्याणकानां पंचानां तिथिमासदिनादिक। श्रीवर्द्धमानवद्भावि पद्मनाभप्रभोरपि ॥ २० ॥ सार्द्धपण्मासहीनानि वर्षाणि त्रिंशतं च सः। पालयिष्यति सर्वज्ञ-पर्यायं सुरसेवितः॥ २१ ॥ द्विचत्वारिंशदव्दानि श्रामण्यमनुभूय च । द्विसप्तत्यब्दसर्वायुः परमं पदमेष्यति ॥ २२ ॥ सुपार्थो वर्द्धमानस्य पितृव्यो यः प्रभोरभूत् । सूरदेवाभिधो भावी स द्वितीयो जिनोत्तमः ॥ २३ ॥ पोहिलस्य च यो जीवः स तृतीयो भविष्यति । सुपार्श्वनामा देहादि-मानैर्नेमिजिनोपमः ॥ २४ ॥ यस्तु हस्तिनापुरवासी भद्रासार्थवाहीपुत्रो द्वात्रिंशद्भार्यात्यागी वीरशिष्यः .. महाशय वार्पिकदान प्रापी प्रौढ महोत्सवपूर्वक चारित्र ग्रहण करशे. (१५) छमस्थ- पणामां साडापार वर्ष एक पक्षे अधिक रही तप करीने केवळज्ञान प्राप्त करशे. (१६) पछी प्रतिक्रमण युक्त पांच महाव्रतरूप धर्म मुनि माटे अने वारव्रतरूप धर्म श्रावको माटे जेम महावीर प्रभुए कहो हतो तेम जगतना अद्वितीय हितेच्छु एवा महापाप्रभु पण ते ज प्रमाणे सर्व कहेशे. (१७-१८) ए प्रभुना ११ गणधर ने नव गण चरिप्रभु प्रमाणे थशे, तेम ज वर्ण, लंछन अने शरीरनी उचाइ पण ते न प्रमाणे थशे. (१९) पांच न्याणकनी तिथियो, मास, दिवस विगैरे धुं पद्मनाभप्रभुर्नु महावीरस्वामी प्रमाणे समजबुं. (२०) सुरसेवित एवा ते प्रभु साडाछ मासे ऊणा त्रीश वर्ष सर्वज्ञपर्याय पाळशे. (२१) ए रीते ४२ वर्ष श्रमणपणुं अनुभवी, पोतेर वर्षनुं सर्वायु मोगवी परमपदने पामशे. (२२) वर्धमान प्रभुना काका सुपार्श्व नामे जे हता तेनो जीव सुरदेव नामना वीजा जिनो. तम (पार्श्वनाथ जेवा) थशे. ( २३ ) पोष्टिलनो जीव ते सुपार्श्व नामे देहादिना मान विगेरेमा नेमिनाथ जेवा थशे. (२४) 'जे हस्तिनापुरवासी भद्रा सार्थवाहीना पुत्र, चत्रीश सीना त्यागी, वीरप्रभुना शिष्य, सर्वार्थसिद्धमा उत्पन्न थयेल छ भने .. मर्ग ३४ मो। सर्वार्थसिद्धोत्पन्नो महाविदेहात्सेत्स्यन्नौपपातिकोपांगे प्रोक्तः स त्वन्य एव. जीवो दृढायुपस्तुर्यो जिनो भावी स्वयंप्रभः । कार्तिकात्मा च सर्वानु-भूतिः पंचमतीर्थकृत् ॥ २५ ।। श्रावस्त्यां शंखशतका-वभूतां श्रावकोत्तमौ । तत्र कोष्टकत्ये च श्रीवीरः समवासरत् ॥२६॥ भगवंतं नमस्कत्तुं शंखाद्याःश्रावका ययुः । ततो निवर्तमानांस्तान् श्राद्धः शंखोऽब्रवीदिति ॥ २७ ॥ उपस्कारयत प्राज्य- माहारमशनादिकं । यथा तदद्य भुंजानाः पाक्षिकं पर्व कुर्महे ॥ २८ ॥ ते च शंखवचः श्राद्धा-स्तथेति प्रतिपेदिरे । शंखश्च निर्मलमति-हे गत्वा व्यचिंतयत् ॥ २९ ॥ न श्रेयानद्य भुत्तवा मे पौषधः पाक्षिकेऽहनि । तत्कुर्वेऽपोपणेनैव विशुद्धं पर्वपौषधं ॥ ३०॥ शंखमागमयंते स्म श्राद्धास्ते सजभोजनाः। श्रनागच्छति तस्मिश्च तदाबानाय तद्गृहे ॥३१॥ शतका- परनामा द्राक् पुष्कली श्रावको ययौ। शंखभार्योत्पला चास्य चकाराभ्या- गतोचिति ॥ ३२ ॥ ततः पोपधशालायां शंखाढ्यायां विवेश सः। प्रतिक- महाविदेह क्षेत्रमा उत्पन्न था सिद्धिपदने पामशे एम उपपातिक उपांगमा कयु छ ते तो मानाची जुदा ज जाणवा." डायुप्पनो जीप चोथा स्वयंप्रभ नामे जिन थशे. का. चिक शेठनो जीव सर्पानुभूति नामे पांचमा प्रसु थशे. (२५) . भावस्तिमा शंख ने शतक नामे घे उत्चम भावको हवा. ते नगरना कोप्टक नामना उद्यानमा श्रीवीरप्रस समयमर्या. ( २६ ) मगवंतने वादयाने शंखादि भावको गया. वेभोने पांदीने पाया पळता तेमने शंसे कद्दु (२७) के-'अनादिक माहार पुष्कर सेपार करो के भाजे ते जमीने पछी काले पाक्षिक पर्व करीए (भाराधीए) (२८) ते धायकोए शंएर्नु पचन कपूल फ. निर्मळ मतिघालो शंस परे भने विचारवा लाग्यो .(२९) के-माने जमाने काले पाक्षिक दिवसे पापध करवो ने मने अंपकारी बगातुं नयी, पंधी मान जम्यायिनान कालनो पपौषध विशुद्ध करूं.' (एम महीने तणे पापयशागमा बाने पोपप लीपो) (३०) पेला थापको भोजन तैपार करीने शंसनी सहजावा साम्या, पप शंगन मारवाधी ने पोलावा तेने पर शतक भेनुं पीर्नु नाम पुकती से भाषक गपो. शेरानी मा उत्पलाए सेनी मम्पागन उपितमा बावी. (३१- ३२) पीनी पापपशालामा प्रदेश कर्यो भने यही परिस्मीने शंगमापरने श्रीकाललोकप्रकाश। म्येर्यापथिकं शंखश्रावकमित्यवक् ॥ ३३ ॥ सिद्धमन्नादि तच्छीघ-माग- च्छ श्रावकबजे । तद् भुक्त्वाद्य यथा पर्व-पौषधं प्रतिजारामः ॥३४॥ऊचे शंखः पौषधिको-ऽपोषणेनास्मि सोऽप्यथ । न्यवेदयत्तत्सर्वेषां तत्ते बुभु- जिरे ततः ॥३५॥ शंखोऽथापारयित्वैव पौषधं प्राणमजिनं । प्रातः श्राद्धाः परेऽप्येवं शुश्रुवुर्देशनां प्रभोः ॥ ३६ ॥ देशनांते श्रावकास्ते गत्वा शंख- स्य सन्निधौ । श्रवादिपुरुपालंभं ह्यः साध्वस्मानहीलयः ।। ३७ ॥ तत- स्तान् भगवानूचे मा शंखं हीलयंतु भोः । सुदृष्टिदृढधर्मायं सुष्टु जोग- रितो निशि ॥ ३८॥ एवं यो वर्द्धमानेन स्तुतस्तादृशपर्यदि । विदेहे सेत्स्यमानोऽसौ पंचमांग उदीरितः ॥ ३९ ॥ स्वर्गेऽस्यायुरपि प्रोक्तं श्रुते पल्यचतुष्टयं । षष्ठो जिनस्तु श्रीमल्लि-जिनस्थाने भविष्यति ॥४०॥ सतश्च-संख्येय एव कालः स्या-द्भाविषष्ठजिनोदये । तत पष्ठजिनजीवो यः शंखोऽन्यः सेति बुध्यते ॥ ४१ ।। स्थानांगवृत्तौ त्वयमेव शंखो भावि- तीर्थकृत्तया प्रोक्तस्तदाशयं न वेनीति. कर्पु (३३ ) के-"मधु अभादि तैयार थयुं छे माटे श्रावक समुदाय साथे जमवा माटे शीघ्र चालो, त्यां जमीने पछी आपणे पर्वपौषधनी प्रतिजागरणा करीए.".(३४) शंख मोन्यो के-" हुं तो जम्या विना ज पौषध करीश." तेणे जइने सर्पने वे बात करी एटले बाकीनाम्रो जम्या. (३५) हवे शंख पौपच पार्या विना ज पीजे दिवसे सबारे प्रभु- पासे वंदन करवा पाव्यो ने वंदन कयु. पीजा श्रापको पण पाव्या ने प्रभुनी देशना समिळी. ( ३६ ) देशनाने अंते तेोभे शंख श्रावक पासे जइने ओलंमो देवापूर्वक कथु के- 'फाले भली अमारी हीलणा करी !' (३७) एटले से भावकोने प्रसभे कडु के-'हे थावको ! तमे शंसनी हीलना न करशो, वे सुदृष्टि ने दृढधर्मा छे. रात्रे एणे यहु सारी जागरिका करी थे.' (३८) भाप्रमाणे श्रीवर्धमानस्वामीए. तेवी पर्पदामां तेनी प्रशंसा करी. ते (स्वर्गे जह) महाविदेह क्षेत्रमा ( मनुष्य थर) सिद्धिपदने पामशे एम पांचमा अंगमा कयुं छे. (३९) स्वर्गमा तेनुं आयुष्य पण चार पायोपमन के एम भुता कर्यु थे. भारती चोवीशीमा छहा प्रभु मद्धिजिनसरणा घशे, (४०) परंतु भावी छहा जिने. घर थवा सुधीमा संख्यातो काळ न व्यतीत पो. एटले छठा जिन यनारशंसनो जीव वे अन्य नायवो. (४१) स्थानांगचिमा तो मा शंखने ज मापी तीर्थकर पनार कहेल के सेनो भाशय समजी शफातो नयी. .

मर्ग १४ मो। जीवः शंखस्य षष्ठोऽर्हन् भावी देवश्रुताभिधः। भविष्यत्युदयाख्योऽर्ह- नंदीजीवश्च सप्तमः॥ ४२ ॥ अष्टमोऽर्हन् सुनंदस्य जीवः पेढालसंज्ञकः। श्रानंदजीवो नवमः पोहिलाख्यो जिनेश्वरः ।। ४३ ॥ दशमः शतकस्या- त्मा शतकीर्तिर्भविष्यति । शंखस्यायं सहचरः पुष्कलीत्यपराह्वयः ॥४॥ श्रीहैमवीरचरित्रे तु नवमः केकसीजीवो दशमस्तु रेयलिजीव इति दृश्यते. सुता चेटकराजस्य सुज्येष्ठा स्वीकृतव्रता । अातापनां करोति स्म निर्वस्त्रांतरूपाश्रयं ॥ १५॥ इतः परित्राट पेढालो विद्यासिद्धो गवेपयन् । विद्यादानोचित पात्र-मपश्यत्ता महासती ॥ १६ ॥ यद्यस्या ब्रह्मचारि- ण्याः कुक्षिजस्तनयो भवेत् । तस्याहः स्यात्तदा व्याघी-दुग्धस्य स्वर्ण- पात्रवत् ॥ १७॥ विचिंत्यैवं धूमिकया व्यामोहं विरचय्य सः। तद्योना- वक्षिपद्वीज क्रमाज्जातश्च दारकः ॥४८॥ सह मात्रान्यदा सोऽगा-जिना- भ्यर्ण तदा जिनं । विद्याभृत्कालसंदीपः को मां हंतेति पृष्टवान् ॥४९ ।। छठा अरिहंत देवश्रुत नामना शंखना जीव थशे भने सातमा उदय नामना भरिहंत नंदीना जीव थशे. (४२) पाठमा सुनंदना जीव पेढाल नामे तीर्थकर थशे. नवमा मानंदना जीव पोहिल नामे जिनेश्वर थशे. (४३) दशमा शतकना जीव शतकीर्ति नामे प्रा थशे. मा शंखनो मित्र जेतुं पाजु नाम पुष्कली हतुं ते जाणवो. (४४) श्रीहेमवीर चरित्रमा वो नवमा केकसीना जीव ने दशमा रेयलिना जीव कह्या छे. घेडा राजानी पुत्री सुज्येष्ठा जेथे चारित्र लीधेल हतुं. ते वस्त्र रहित उपाश्रयमा रहीने भातापना लेती हती. (४५) ते वसते पेढाल नामनो विद्यासिद्ध परिव्राजक विद्यादानने उचितपारने शोधतो त्या भावी चडयो. तेणे पा महासतीने जोइ. (४६) वेणे विचार्य के- बोमा प्रक्षचारिणीनी कृषिधी पुत्र थाय तो ते वाघणना दुध माटे स्वर्णना पानी जेम मारी विधा मापवाने पात्र (योग्य) थाय.(४७) भाम विचारी धून विकुर्ववावडे व्यामोह पमाडीने तेनी योनिमा वीजनुं ऐपन कयु, अनुक्रमे तेने पुत्र थ्यो (तेनुं सत्यकी नाम पाउछु)(४८) मासानी संगाते ते अन्यदा प्रसनी पामे गयो. वे वखते विद्याधर कालसंदिपे भावीन मारो। हणनार कोण पशे?' एम प्रमुने पूछथु. (४९) प्रभु कटु के (आ) सत्यकी थशे. १ मा शंख ने शतक(पुष्कलीना) संपंधमां पृष्ठ ६३१-२ उपर हकीकत थे मां जमीन रात्रिपोपप करवानुं समजबु. शंसे जम्पा वगर (उपवास करीने) शेप दिवमे रात्रिपोपध सह सोपेल मने से पौषध पार्या पिना सपारे प्रभु पासे पा भाषको भाव्या ऐ एम समज.

(६३४) श्रीकाललोकप्रकाश। स्वामिनोक्ते सत्यकिनि तमुपेत्य जहास सः। मारयिष्यसि मां वं रे इत्युक्त्वाऽपातयत्पदोः ॥ ५० ॥ अपहृत्यान्यदा साध्वी-सकाशाजनकेन सः । समग्रा ग्राहितो विद्या धीरः साधयति स्म ताः ॥ ५१ ॥ रोहिण्या विद्यया व्यापा-दितो जन्मसु पंचसु । पष्ठे जन्मनि षण्मासा-युषा तुष्टापि नाहता ॥ ५२ ॥ प्राग्जन्मसाधनात्तुष्टा भवेऽस्मिन् सप्तमे च सा । ललाटे विवरं कृत्वा हृदि तस्य विवेश च ॥ ५३॥ ललाटविवरं त्वक्षि जातं दिव्यानुभावतः । जघान कालसंदीपं स पेढालं च दांभिकं ॥ ५४॥ प्राप्तो विद्याधरेंद्रत्वं नत्वा सर्वान् जिने- श्वरान् । नाट्यपूजां प्रभोः कृत्वा रमते स्म यथासुखं ॥ ५५ ॥ महादेव इति ख्यातो रुद्र एकादशः स च । एकादशो जिनो भावी सत्यकी सुव्रताभिधः ॥ ५६ ॥ द्वारकाधिपतिः कृष्ण-वासुदेवो महद्धिकः । भक्तः श्रीनेमिनाथस्य सद्धर्मः श्रावकोऽभवत् ॥ ५७ ॥ अष्टादशसहस्राणि वंदमानोऽन्यदा मु. से सामळी तेनी पासे भावी ते हसीने पोल्यो के-'अरे! तुं मने मारीश!" तेने पोताना पगमा पाटी दीघो. (५०) अन्यदा साध्वी पासेथी तेना पिताए तेनुं हरण कयु भने तेने यधी विद्यालो पापी. ते धीरे ते बधी विद्यायो साधी. (५१) रोहिणी विद्याए पांच जन्ममा सत्यकीना जीवने या विद्या साधतां मारी नाख्यो हतो, छहा जन्ममा छ महीना शेष श्रायुष्य रघु त्यारे तुष्टमान थइ हती पण तेणे पोतार्नु अन्प भायु जाणी स्वीकारी नहोती, (५२)श्रा सातमा जन्ममा तेना पूर्व जन्मनी साधनाथी वे तुष्ट- मान थइ अने तेना ललाटमा विवर करी ते विवरद्वारा तेणे तेना हृदयमा प्रवेश कर्यो. (५३) ललाटर्नु विवर दिव्यानुमावथी नेत्ररूप थयु. (एटले ते त्रण नेप्रवाळो थयो.) पछी तेणे काळसंदीपने मार्यो भने दामिक एवा पेढाळ विद्याधरने (पोवाना यापने) पण मार्यों. (५४) पछी ते विद्याधरेंद्रपणाने पाम्यो. ते सत्यकी विधावडे सर्व जिनेश्व- रोने नमीने प्रभुनी पासे नाट्यपूजा करी, यथेच्छपणे-जेम सुख उपजे तेम (सीमोनी साथे ) रमतो हतो. (५५) ते महादेवना नामथी प्रसिद्ध थयो भने अग्यारमो रुद्र थयो. ए सत्यकी भावी चोवीशीमां अग्यारमा सुव्रत नामे तापकर थशे. (५६) द्वारकाधिपति महद्धिक एवा कृष्ण वासुदेव श्रीनेमिनाथना मक्त होइने सद्धर्मशाळी श्रावक थया हता. (५७) भन्यदा सेमणे अढारहजार निमोने बांधा-ठे महान् गुरु- एम कहीने मर्ग ३४ मो। नीन् । स वंदनेन गुरुणा सम्यक्त्वं क्षायिकं दधौ ॥ ५८ ॥ सप्तमक्षिति- योग्यानि दुःकृतान्यपवर्चयन् । चक्रे तृतीयक्ष्माहा॑णि तीर्थकृन्नाम चार्ज- यत् ॥ ५९ ॥ तथोक्तं-तित्थयरत्तं सम्मत्त-खाइयं सत्तमीइ तइयाए । वंदणएणं विहिणा बद्धं च दसारसीहेण ॥ ६॥ कृष्णजीवोऽममाख्यः स द्वादशो भविता जिनः। सुरासुरनराधीश-प्रणतक्रमपंकजः ॥ ६१ ॥ वसुदेवहिंडौ तु-कण्हो तइयपुढवीयो उवट्टित्ता भारहे वासे सयदुवारे नयरे पत्तमंडलियभावो पवज्ज पडिवज्जिय तित्थयरनामं पवज्जित्ता वेमाणिए उवजित्ता दुवालसमो श्रममनाम तित्थयरो भविस्सइ इत्यु- क्तमिति ज्ञेयं. बलदेवस्य जीवोऽहं-निष्कषायस्त्रयोदशः । कृष्णाग्रजः कृष्णतीर्थे सेत्स्यतीत्यन्य एव सः॥१२॥ 'भवसिद्धियो य भयवं? सिज्झिस्सइ क- पहतित्थंमि' । इत्यावश्यकनियुक्तिवचनात् . श्रीनेमिचरित्रेऽपि - 'गच्छंत्यवश्यं तेऽधस्ता-त्वं गामी वालुकाप्रभा । श्रुत्वेति कृपणः सद्योपि वंदनधी तेणे चायिक समकित प्राप्त कयु, (५८) सातमी नरक योग्य दुष्कृतनी अपव- ना करीने त्रीजी नरक पृथ्वी योग्य क्यु अने तीर्थकरनामकर्म उपार्जन कयु. (५९) कधु के के- तीर्थ करत्व, चायिक मम्यक्त्व अने सातमीपी श्रीजी नरकनुं प्रायु विधिपूर्वक चंदन करवायी दशारसिंह ने कृष्ण तेणे वाध्य. '(६०) ए कपणनो जीव वारमा श्रमम नामे तीर्थकर सुर असुर भने मनुष्योना स्वामीओए नम्या के चरण कमळ जेमना एवा थशे. (६१) श्रीवसुदेव हिंडिमां तो-'कृष्ण त्रीजी नरक पृथ्वीमाथी नीकळी, भरतक्षेत्रमा शतद्वार नगरमा मांडलिकराजा थइ, चारित्र लइ, तीर्थकरनामकर्म उपार्जन करी वैमा- निक देवपणे उत्पन्न थइ बारमा श्रमम नामे तीर्थकर थशे.' एम कहेलुं छे. पळेदेवना जीव तेरमा निष्कपाय नामे तीर्थंकर थशे. कृष्णना मोटामाइ पळमद्र कृष्णना (अममतीर्थकरना) तीर्थमां सिद्धिपदने पाममाना छे तेथी तीर्थकरना जीव बळदेव ते पीजा समजवा. (६२) श्री श्रावश्यक नियुक्तिमा कयु के फे-'हे भगवंत ! ते मध्य सिद्धि छ?" उत्तर-हा, ते कपणना तीर्थमां सिद्धिपदने पामशे. 'श्रीहेमचंद्राचार्यकृत श्रीनमिचरित्रमा (द्वारकाना दाहनी कपाने प्रसगे दीया संबंधी वात करता तेनो भाशय जाणीने प्रमुए कह्यु के वासुदेवो दीपाला शकता ज नथी.) ते मो अवश्य नीचे (नरकमा) न जाय थे, वमे पण श्रीजी घालुकाप्रभा पृथ्वीमा जशो.' मा प्रमाणे सांभळीने तत्काळ कृष्ण अत्यंत विघुर (विबळ)..

(६३६) मीकालोसप्रकारा। नितांतविधुरोऽभवत् ॥६३॥ भूयोऽभ्यधत्त सर्वज्ञो मा विषीद जनार्दन । तत उद्धृत्य मय॑स्त्वं भावी वैमानिकस्ततः ॥ ६४ ॥ उत्सर्पिण्यां प्रस. प॑त्यां शतद्वारपुरेशितुः । जितशत्रोः सुतोऽहंस्त्वं द्वादशो नामतोऽममः ॥६५॥ ब्रह्मलोकं बलो गामी मर्यो भावी ततश्च्युतः । ततोऽपि देव- तश्च्युत्वा भाव्यत्र भरते पुमान् ॥ ६६ ॥ उत्सर्पिण्यां प्रसपत्या-मममा. ख्यस्य केशव । तीर्थनाथस्य ते तीथे स मोक्षमुपयास्यति ॥ ६७ ॥ भावी जीवश्च रोहिण्या निष्पुलाकश्चतुर्दशः। जिनो वृजिनहृद्देव- नरदेवनतक्रमः ।। ६८॥ पुरे राजगृहेऽथासी-त्प्रसेनजिन्महीपतेः । नागाख्यो रथिकस्तस्य प्रेयसी सुलसाभिधा ॥ ६९ ॥ तया सुतार्थी स्वपति-रिंद्रादीन्मानयन् सुरान् । अन्यां परिणयेत्युक्तो न मेनेऽत्यंततन्मनाः ॥ ७० ॥ तस्याः सम्यक्स्वविषयां प्रशंसां शक्रनिर्मितां । अश्रदधत्सुरः कोऽपि मुनिरूपः समेत्य तां ।। ७१ ॥ ऊचे तव गृहे लक्ष-पाक तैलं यदस्ति तत् । दीयतां भिषजोक्तं मे ततः सा मुमुदे भृशं ॥७२॥ श्राहरंत्याश्च तत्तूर्णं भग्नं देवेन धनी गया. (६३) एटले फरीने सर्वज्ञ प्रभुए कह्यु के-'हे जनार्दन ! तमे खेद न पामो, ते नरकमाथी नीकळीने तमे मनुष्य थइ वैमानिक देव थशो (६४) भने त्यांधी पीने भावती उत्सर्पिणीमां शवद्वारपुरना राजा जितशत्रुना पुत्र थह वारमा अमम नामे तीर्थकर थशो. (६५) बळभद्र ब्रह्म देवलाकमा जइ त्यांची चवी मनुष्य यह देव थशे भने त्यां- थी चवीने श्रा भरतक्षेत्रमा प्रसर्पती (हचे पछी भापती) उत्सर्पिणीमा हे केशव ! बारमा मम नामना तीर्थकरना (तमारा) तीर्थमां मोचे जशे. (६६-६७) रोहिणीनो जीव निष्पुलाक नामना चौदमा तीर्थकर दुःखनो नारा करनारा तथा मर अने देवोए नम्पा के चरणकमळ जेना एवा थशे. (६८) राजगृहनगरमा प्रसेनजिवराजानो नाग नामनो रधिक (सारथि) हतो. तेने सुलसा नामे स्त्री हती. (६९) पुत्रार्थी होवाथी इंद्रादिक देवोनी मानवा करनारा पोताना पतिने वेणीए पीजी स्त्री परणो' एम को, परंतु तेनापर अत्यंतरागी एवा तेणे ते वात मानी नहीं. (७०) सम्यक्त्वना विषयमा तेणीनी शने करेली प्रशंसा सामळीने वेने नहीं सह- हतो एवो फोह देव मुनिनु रूप करीने तेनी पामे भाग्यो. (७१) मुनिरूप देवे को- तमारा परमां लक्षपाक वेल थे ते वैधे मने वापरवानुं कयुं थे तेथी आपो.' ते सांमळी- ने सुलसा घणी हर्पित था. (७२) पछी तेल लइने उतावळे मावा वेणीनु माजन देवे मांगी सर्ग मो (१३७) भाजनं । एक (वं).द्वितीयं तृतीयं नाखिद्यत तथाप्यसौ ॥७३॥ तत- स्तुष्टेन देवेन द्वात्रिंशद्गुटिका ददे । प्रासां प्रभावाद् द्वात्रिंश-द्भवितारः सुतास्तव ॥ ७४ ॥ प्रयोजनेऽहं स्मर्तव्य इत्युक्त्वा स तिरोदधौ । सर्वा- भिरेकः पुत्रोऽस्त्वि-त्याजहे गुटिकास्त्वसौ ॥ ७५ ॥ द्वात्रिंशत्यथ गर्भेषु कुर्वत्सु जठरव्यथां । स्मृतः स देवश्चके द्राक् स्वास्थ्यं सा सुपुवे सुतान् ॥ ७६ ॥ सा चेयं सुलसा पंच-दशोऽर्हन्निर्ममाभिधः । पोडशो रेवती. जीव-श्चित्रगुप्तो भविष्यति ॥ ७७ ॥ तथाहि- गोशालमुक्तया तेजो-लेश्यया ऋशितांगकः । अन्येयुढिकनामे श्रीवीरः समवासरत् ।। ७८ ॥ अभूत्सलोहितं वर्च-स्ततो वार्ता जने- भवत् । गोशालकतपस्तेजो-दग्धोऽहन्मृत्युमेष्यति ॥ ७९ ॥ तत् श्रुत्वा सिंहनामान-मनगारं महारवैः । रुदंतं प्रभुराहूये-त्येवं स्माह कृपानिधिः ॥ ८०॥ त्वया कि खिद्यते नाहं मरिप्याम्यधुना भुवि । विद्वत्याव्दान पंचदशा-ध्य‘न् गंतास्मि निवृतिं ॥ ८१ ॥ किं च त्वं गच्छ नगरे नाख्यु. एम पीजुं श्रीजु भाजन पण मागी नाख्युं तो पण ते जरा पण रोद न पामी. (७३) तेथी तुष्टमान थयेला देवे तेने ३२ गुटिका भापी भने कार्यु के-'पा गुटिकाना प्रभावथी तमने ३२ पुत्रो थशे. (७४) वळी कांड काम पढे तो मने संमारजो.' एम कहीने ते देव माश्य भयो. पछी 'श्रा पधी गुटिका एक साथे पावावडे (पत्रीश लक्षणों) एम विचारी ते बधी गुटिकाप्री साई गइ. (७५) एटले तेनागर्भमा ३२ जीवो उत्पम थया. तेटला गर्मथी जठरमा यहु व्यथा थवाने लीघे ते देवने संमायो. तेथे तरत ज स्वस्थता करी. अनुक्रमे ३२ पुत्रो जन्म्या. (७६) वे सुलसानो जीव पंदरमा निर्मम नामे तीर्थकर यशे. रेवतीनो जीव चित्रगुप्त नामे सोळमा तधिकर यशे. (७७) वेनी हकीकत मा प्रमाणे- गोशाळे मूकेली तेजोलेरयापी दुर्घळ शरीरवाळा ययेला बारप्रसु अन्यदा मेंटिक गामे समवसर्या. (७८ ) प्रभुने पुंठे लोही पडवा मांड, तेथी लोकोमा वार्ता या लागी के-गोशालाना तपतेजपी दग्ध थपेला परिहंत मृत्यु पामशे.' (७९) ते सामळीने मोटे स्वरे रुदन करता सिंह नामना भणगारने पोतानी पामे बोलापीने कपानिषि प्रमुए मा प्रमाणे १j (८०)क-शामाटे खेद पामे ? हमपा मरण पामबानो नपी. हनु पृथ्वीपर साहापदर वर्ष विपरीने पछी मोघे जवानो . (८१) म ना हुँ एक पुत्र थाम्रो (६९०) भीकाललोकप्रकाश । रेवतिश्राविकागृहे । द्वे कुष्मांडफले ये च मदर्थ संस्कृते तया ॥ ८२ ॥ ताभ्यां नार्थः किंतु बीज-पूरपाकः कृतस्तया । स्वकृते तं च निर्दोष- मेषणीयं समाहर ॥ ८३ ॥ ततश्च मुनिना तेन याचिता रेवती मुदा । कृतार्थ मन्यमाना स्वं ददौ तस्मै तदौषधं ॥ ८४ ॥ भगवानपि नीराग- मनास्तदुदरेक्षिपत् । तत्क्षणाक्षीणरोगोऽभू-संघः सर्वश्च पिप्रिये ॥ ८५॥ अर्जितानेकसुकृत-संचया रेवती तु सा । षोडशस्तीर्थकृद्भावी चित्रगुप्तोऽभिधानतः ॥ ८६ ॥ गवालिजीवः समाधि-र्भावी सप्तदशो जिनः। संवराख्योऽष्टादशोs- हैन भावी जीवश्च गार्गलेः ॥८७॥ एकोनविंशतितमो जीवो द्वीपायनस्य च ।यशोधराख्यस्तीर्थेशोभविता भवितारकः॥८॥ जिनोऽथ विंशतितमः कर्णजीवो भविष्यति । जीवोऽहन्नारदस्यक-विंशो मल्लजिनेश्वरः॥८९॥ विद्याधरः श्रावकोऽभू-स्परिबाडंवडाभिधः । सोऽन्यदा देशनां श्रुत्वा वर्द्धमानजिनेशितुः ॥ ९० ॥ गच्छन् राजगृहं चंपा-नगर्याः प्रभुणोदितः । सुलसाया मम क्षेम-किंवदंती निरूपयेः ॥ ९१ ।। इति मा नगरमा रेवति श्राविकाने त्यां जा. तेणे चे काळाना फळ मारे अर्थे मंस्कारित कर्या छ, (८२) तेनुं प्रयोजन नथी, परंतु तेणे वीजोरापाक पोताने माटे करेलो छे ते निर्दोष ने एपणीय छे ते लइ आव. (८३) पछी सिंहमुनिए हर्षवडे त्यां जइने रेवती पासे बीजो- रापाकनी याचना करी. एटले पोताना प्रात्माने कृतार्थ मानती एवी सेणीए ते औषध तेमने प्राप्यु. (८४) नीराग मनवाळा भगवंते तेने उदरमा क्षेपव्युं तेथी सत्षण रोग रहित थह गया, एटले सर्य संघ घणो हर्पित थयो. (८५) अनेक प्रकारना सुकतनो संचय करीने ते रेवती चित्रगुप्त नामना सोळमा तीर्थकर थशे. (८६) गवालीनो जीव समाधि नामना सत्तरमा प्रसु थशे अने गार्गलीनो जीव संघर नामे अढारमा जिन थशे. (८७) द्वीपायननो जीव यशोधर नामे श्रीगणीशमा तीर्थ- कर भव्यजीवोने वारनार थशे. (८८) कर्णनो जीव वीशमा विजय नामे प्रम यशे, नारदनो जीप एकरीशमा मल्ल नामे जिनधर थशे. (८९) अंघड नामे परिवाजक अनेक विद्याोने धारण करनार अन्यदा वर्धमान प्रसनी देशना समिळीने श्रावक थयो. (९०) तेने घंपानगरीधी राजगृहे जतां प्रसए कई के- 'सुलसाने मारा सुराशावाना समाचार कहेले.' (९१) इति स्थानांगचौ, कोई जग्याए ।

मर्ग ३४ मो. स्थानांगवृत्तौ. कचिद्धर्मलाभमवीवददिति श्रूयत. अंबडोऽचिंतयरपुण्य- वतीयं सुलसा सती । संदेशं संदिशत्येवं यस्यै श्रीत्रिजगद्गुरुः ॥ ९२ ॥ करोग्यस्याः परीक्षां च गुणस्तस्याः क ईदृशः। ध्यात्वेति गत्वा ते- नोचे परिबाड्वेषधारिणा ॥ ९३ ॥ भक्त्या मे भोजनं देहि धर्मस्ते भविता महान् । ततो जगाद सा शुद्ध-सम्यक्त्वैकदृढाशया ॥ १४ ॥ प्रदत्ते भोजने येभ्यो धर्मः संजायते महान् । विदिता एवं ते भ्रातः साधवो विजितेंद्रियाः ॥ ९५ ॥ सोंतरिक्षे ततः पद्मा-सनासीनो जनान् वहन् । विस्मापयामास मास-तपस्वीति जनाचितः ॥ ९६ ॥ लोकः पप्रच्छ भगवं-स्तपःपारणयानया। पावयिष्यसि के धन्यं स प्राह सुलसा- मिति ॥ ९७ ॥ दिप्ट्या तव गृहे भाग्यै-स्तपस्वी पारयिष्यति । सुलसो- का जनरूचे किं नः पाखंडिकैरिति ॥९८ ॥ अंबडोऽपि तदाका- चिंतययुक्तमादिशत् । संदेशं जिनराजोऽस्यै यस्याः सम्यक्त्वमीदृशं ॥ ९९ ॥ ततः परिवृतः पौरे-रुपेत्य सुलसारहे । एनां प्रोक्ताप्तसंदेशः धर्मलाम कहेवार्नु कमु एम संभळाय छे. ते सांमळी अंबड विचारवा लाग्यो के- 'मा मुलसा सती सरेसरी पुण्यवान् जणाय छे के जेने श्री त्रिजगद्गुरु श्रावो संदेशो कहेव. रावे छे, ( ९२ ) तो हवे हुँ तेनी परीक्षा फरूं के वेना एषा कया गुण छे?' तेणे परिग्राजकना पेपमा सेने त्या जइने कह्यु के-(९३)' भक्तिपूर्वक मने भोजन आप, वने मोटो धर्म थशे.' ते सामळीने तेणे शुद्ध सम्यक्त्वना अद्वितीय दृढ आशयथी कऍ (९४) के-'हे आता! बेपले भोजन देवाथी महान पुण्य थाय दे को विजिलेंद्रिय एवा साघुमो ज प्रसिद्ध छे. १ ( ९५ ) त्यारपछी त्यांची नीकळीने अंबड मंतरिक्षमा पद्मासन वाळीने अधर रही घणा जनीने विस्मय पमाटतो हवो. लोको तेने मास तपस्वी मानीने पूजवा हवा. (९६ ) लोकोए तेने पूलधु के-'हे मगरंच ! श्रा तमारा तपना पारणावडे तमे कोने पवित्र करशो ?' ते योन्यो के-' मुलसाने' (९७) त्यारे लोकोए सुलसाने कयु के-'तारा माग्यपी सारे घरे मा तपस्वी पारj करशे. पारे मुलसा पोली के-'मारे पाखंडीवडे | (९८) अंबडे ते समिळीने विधायु के-जिन- घरे बेनुं समीक्त आधु (निर्मळ ने घट) के सेने कहेवराघ्यो छे युक्त थे.' (९९) आम विचारीने पछी पुरजनोथी परिषयों सो से मुलसाने पर गयो भने एम विचारी , (६४०) श्रीकाललोकप्रकाश। प्रशशंस मुहुर्मुहुः ।। ४०० ॥ भविष्यत्यंवडः सोऽयं द्वाविंशो देवतीर्थकृत् । त्रयोविंशोऽनंतवीर्यों जीवो द्वारमदस्य सः॥ १॥ यस्त्वंबडो महाविदेहे लेत्स्यन्नौपपातिकेऽभिहितः सोऽन्य एव संभाव्यते इति स्थानांगवृत्तौ. चतुर्विंशः स्वातिजीवो भद्रकृन्नाम तीर्थकृत् । भविष्यति चतुर-स्यादौ श्रीवृषभोपमः ॥२॥ अयं भाविजिननामक्रमः श्रीवीरचरित्रोधृतपद्यदीवा- लीकल्पानुसारेण. श्रीजिनप्रभसूरिकृतप्राकृतगद्यदीवालीकल्पाभिप्राय- स्त्वेवं-तइओ उदाइजीवो सुपासो, चउत्थो पोहिलजीवो सयंपभो, पं- चमो दढाउजीवो सव्वाणुभूई, छट्ठो कत्तियजीवो देवसुओ, सत्तमो संख- जीवो उदओ, अट्ठमो पाणंदजीवो पेढालो, नवमो सुनंदजीवो पुटिलो, दसमो सयगजीवो सयकित्ती, इगारसमो देवईजीवो मुणिसुव्वओ, वार- समो कण्हजीवो अममो, तेरसमो सच्चईजीवो निक्कसामो, चउद्दसमो बलदेवजीवो निप्पुलामओ, पन्नरसमो सुलसाजीवो निम्ममो, सोलसमो रोहिणीजीवो चित्तगुचो, केई भांति कक्किपुत्तो सित्तुंजे उद्धारं करित्ता प्रमुए कहेल संदेश कही वारंवार तेनी प्रशंसा करी. (४००) ते अंबट प्रा मावीशमा देव नामना तीर्थकर थशे. त्रेवीशमा अनंतवीर्य नामना तीर्थकर द्वारमदनो जीव थशे. (१)जे अंबड महाविदेहमा सिद्धिपद पामशे एम औपपातिक सूत्रमा कल छे ते पीजो अंबड संगवे छे. इति स्थानांगवृत्ती. चोवीशमा भद्रकृत नामना तीर्थकर स्वाविना जीव थशे. ते उत्सर्पिणीना चोथा धारानी आदिमा ऋपभदेवनी जेवा थशे. (२) श्रा भावी जिनोनो नामक्रम श्रीवीरचरित्रमाथी उद्धरेल पद्यबंध दिवाळीकापने अनु- मारे लखेल छे. श्रीजिनप्रभसरिकृत प्राकृत गद्य दीवाळीकन्पमा तो या प्रमाणे कहेल छ- श्रीजा उदाइना जीव सुपास, चोथा पोट्टिलना जीव स्वयंप्रम, पांचमा दृढाधुना जीव सर्वा- नुभूति, छहा कार्चिकना जीव देवसुत, सावमा शंखना जीव उदय, आठमा आनंदना बीच पेढाळ, नवमा सुनंदना जीव पुट्टिल, दशमा शवकना जीव शतकीर्षि, अम्पारमा देवकीना जीव मुनिसुव्रत, पारमा कृष्णना जीव भमम, वेरमा सत्सकीना जीप निकषाप, चौदमा पळदेवना जीव निपुलाक, पंदरमा मुलसाना जीव निर्मम, सोळमा रोहिणीना जीव चित्रगुप्त कोई कहे थे के-कलंकीना पुत्र शगुंजयपर उद्धार करी जिनमवनोपरे मंरित पृथ्वी परीने करनामकर्म उपार्जन करी स्वर्गे जा चित्रगुप्त जिनवर थशे. भहीं सर्ग ३४ मो। (६४१) जिणभवणमंडियं पुहविं काउं अज्जियतित्थयरनामो सग्गं गंतुं चित्त- गुत्तो जिणवरो होही. इत्थ य बहुसुयमयं पमाणं. सत्तरसमो रेवईजीवो समाही, अठारसमो सयलजीवो संवरो, तेवीसइमो अरजीवो अणंतवि- रिओ, चउवीसइमो बुद्धजीवो भदंकरो. उक्तशेषाः प्राग्वत्. अत्र तृतीयो य उदायी उक्तः, स तु स्थानांगसूत्रोक्तवीरशासननि- बद्धतीर्थकृन्नामनवजीवांतःपाती कोणिकपुत्रः, यः कोणिके ऽपक्रांत पाड- लिपुत्रं नगरं न्यवीविशत्, यश्च स्वभवने पर्वदिनेषु सद्गुरूनाहूय परम- संविनः पौषधाद्यन्वतिष्ठत् , एकदा च देशनिर्घाटितरिपुराजपुत्रेण द्वादश- वार्षिकद्रव्यसाधुना अभव्येन पौषधिकः कंकायःकत्तिकया कंठकर्त्तनेन विनाशितः सोऽयमिति. समवायांगसूत्रे तु-महापउमे १ सुरादेवे २ सुपासे य ३ सयंपभे ४ । सव्वाणुभूति ५ अरहा दिवगुत्ते ६ जिणुत्तमे ॥ १ ॥ उदए ७ पेढाल- पुत्ते य ८ पोहिले ९ सतएति य १० । मुणिसुव्वते य अरहा ११ सव्व- भावविदु जिणे ॥ २॥ अममे १२ णिकसाए य १३ णिप्पुलाए य १४ .. पहुश्रुत कहे ते प्रमाण. सतरमा रेवतीना जीव समाधि, श्रढारमा सयलना जीव संवर, वीशमा अरना जीव अनंतवीर्य अने चोवीशमा युद्धना जीव मद्रंकर. पाकीना प्रथम कद्या प्रमाणे जाणवा. अहीं घीजाजे उदायी कह्या ते स्थानांग सूत्रमा कहेला वीरप्रभुना शासनमा नव जीवोए तीर्थकर नामकर्म बांध्यु छ तेमांना कोरिणकना पुत्र समजवा. जेणे कोणिक मरण पाम्ये सते पाटलिपुत्र नगर वसाव्यु. जे पोताना भुवनमा पर्वदिवसे सद्गुरुने पोलावीने परम संविज्ञ एवो पौषध लइने रहेतो हतो. एकदा तेणे देशमाथी काढी मूकेला शव राजाना पुत्रे-चार वर्ष सुधी द्रव्यसाधुपणे रहेला अमव्ये कंकलोहनी छरीवडे पौषधिक एवा तेमने कंठ कापवावडे मारी नाख्या हता ते आ उदायी समजवा. श्री समवायांगश्त्रमा तो-महापय १, सुरादेव २, सुपाम ३, स्वयंप्रम ४, सर्वानुभूति ५, देवगुप्त ६, उदय ७, पेढालपुत्र ८, पोटिल ९, शतक १०, मुनिसुव्रत ११, सर्व मावने जाणनार अमम १२, निष्कपाय १३, निपुलाक १४, निर्मम १५, चित्रगुप्त १६, ममाधि । (६४२) श्रीकाललोकप्रकाश। निम्ममे १५ । चित्तगुत्ते १६ समाही य १७ श्रागमेस्ताए होरकई ॥३॥ संवरे १८ अणिपट्टी य १९ विजए २० विमलेति य २१। देवोववाए २२ अरहा अणंतविरिए २३ भदेति य २४ ॥ ४ ॥ इति नाम- क्रमो दृश्यते. तेषां पूर्वभवनामान्यपि तत्रैवेत्थं दृश्यंते.-सेणिग्न १ सुपास २ उदए ३ पोटिल ४ अणगार तह दढाऊ ५ श्र। कत्तिथ ६ संखेश ७ तहा नंद ८ सुनंदे ९ अ सयए अ१० ॥१॥ बोधव्वा देवई चेव ११ सच्चइ १२ तह वासुदेव १३ बलदेवे १४ । रोहिणी १५ सुलसा १६ चेव तत्तो खलु रेवती १७ चेव ॥ २॥ तत्तो हवइ सयाली १८ बोधव्वे खलु तहा भयाली य १९ । दीवापणे श्र २० कण्हो २१ तत्तो खलु नारए चेव २२ ॥ ३ ॥ अंबडे अ २३ तहा साइ-बुद्धे अ २४ होइ बोधव्वे । उस्सप्पिणि आगमेस्साए तित्थयराणं तु पुत्वभवा ॥ ४ ॥ इति, प्रवनसारोद्धा- रेऽप्येवं दृश्यते. किं चात्र वासुदेवजीवस्त्रयोदशजिनः प्रोक्तः, अंतकृत्सूत्रे तु द्वादश- स्तदुक्तं-आगमेस्साए उस्सप्पिणीए पुढेसु जणवएसु सतदुवारे नयरे बारसमो अममो णाम अरहा भविस्सइत्ति. अत्र द्वादशतीर्थकरोत्पत्तिः १७, संवर १८, अनियहि १९, विजय २०, विमळ २१, देवोपपात २२, अनंतवीर्य २३, ने भद्र २४ ए यावती चोवीशीमा थनार प्रभुना नाम छे (४) थावानामनो क्रम देखाय छे. तेमना पूर्वमवना नाम तेमाज श्रा प्रमाणे फह्या छे.-१ श्रेणिक, २ सुपार्थ, ३ उदय, ४ पोट्टिल अपगार, ५ दृढायु, ६ कार्तिक, ७शंख, ८नंद,९ सुनंद, १० शतक, ११ देवकी, १२ सत्यकी, १३ वासुदेव (कृष्ण), १४ पळदेव, १५ रोहिणी, १६ सुलसा, १७ रेवती, १८ शताली, १९ भयाली, २० द्वीपायन, २१ कृष्ण, २२ नारद, २३ अंण्ड भने २४ स्वाति बुद्ध-या प्रमाणे आगामी चोवीशीमा थनारा तीर्थकरोना पूर्वभवना नामो जाणवा (४) प्रवचनसारोद्धारमा पण एज प्रमाणे देखाय छे. अहीं वासुदेवनो जीव तेरमा तीर्थकर कहा 2. अंतकवयत्रमा तो पारमा कमा छे. ते या प्रमाणे-भागामी उत्सर्पिणीमा पृथक् जनपदमा शतद्वार नगरमा पारमा भमम नामे तीर्थकर थशे.' ही पारमा तीर्थकरनी उत्पत्ति उत्सर्पिणीना श्रीजा पाराना कांक १ थगार वीर्थफरोना नाममा अमम नाम १२ मा प्रमुनु समवायांगमा ज छे भने पूर्व- भवना नाममा कपणतुं नाम सेरमं तेमां ज क के.

. . सर्ग ३४ मो। (६४३) साधिकपोडशाब्धिव्यतिक्रमे स्यात् , विमलजिनस्थानीयत्वात्तस्य, इयांश्च कालो नारकभवाद्यैश्चतुर्भिर्भवैः पूर्वोक्तः सुपूरः स्यात् , त्रयोदशजिनस्तु वासुपूज्यस्थानीयः, तदुत्पत्तिस्तु साधिकषट्चत्वारिंशदब्धिव्यतिक्रमे तावान् कालस्तु पूर्वोक्तैर्भवैर्दुप्पूरो वासुदेवजीवस्येति ध्येयं. अत्र चैतेपां पक्षाणां विसंवादे बहुश्रुताः सर्वविदो वा प्रमाणमिति ज्ञेयं. ये च नोक्ता व्यतिकरा जिनानां भाविनामिह । केचित्तेऽत्यंतवि- दिताः केचिच्चाविदिता इति ॥ ३ ॥ दीर्घदंतो १ गूढदंतः २ शुद्धदंतस्तृतीयकः ३ । श्रीदंत ४ श्रीभूति ५ सोमाः ६ पद्मः ७ सप्तमचक्रभृत् ।। ४ ।। महापद्मश्च ८ शमश्च ९ चक्री च विमलाभिधः १० । विमलवाहनो ११ रिष्टो १२ भाविनश्चक्रवर्तिनः ॥५॥ इति पद्यदीवालीकल्पकालसततिकयोः, किंतु दीवालीकल्पे श्रीदंत- स्थाने श्रीचंद्रो दृश्यते. पूर्वोक्तप्राकृतदीवालीकल्पे तु अष्टमो नायको नवमो महापद्म उक्तः, शेषाः प्राग्वत. समवायांगे तु-भरहे य १ दीहदंते य २ गूढदंते य ३ सुद्धदंते य ४ । सिरिगुत्ते य ५ सिरिभूई ६ सिरि- सोमे य ७ सत्तमे ॥ १॥ पउमे य ८ महापउमे ९ विमलवाहणे श्राधि सोळ सागरोपम व्यतिक्रमे थाय थे, कारण के ते विमळनाथ तीर्थकरना स्थानके थे. एटलो काळ नारकभव विगेरे चार भव पूर्वे कह्या प्रमाणे थाय त्यारे पूरो थाय 2. वेरमा जिनेश्वर तो वासुपूज्यने स्थाने गणाय. तेमनी उत्पत्ति तो साधिक ४६ सागरोपम व्यति- क्रमे थाय. तेटलो काळ तो पूर्व कह्या प्रमाणे वासुदेवना चार भवथी पण पूर्ण था शके नहीं एम जाणवू. अहीं ए पक्षोना विसंवादमा बहुश्रुत अथवा सर्वज्ञ कहे ते प्रमाण जाणवू. माधी जिनवरोना पूर्व भवना व्यतिकरो जे अही नयी कह्या तेमा केटलाक बहु प्रसिद्ध भने केटलाक प्रसिद्ध होवाथी कहेल नथी, एम जाणj (३) हवे भावी चक्रवतीना नामो कहे थे. १ दीर्घदंत, २ गूढदंत, ३ शुद्धदंत, ४ श्रीदंत, ५ श्रीभूति, ६ सोम, ७ पद्य, ८ महापा, ९शम, १० विमळ, ११ विमळाहन अने १२ रिट (४-५) आ प्रमाणे पद्य दीवाटीकल्प ने काटमाविकामा पहेल थे, परंतु दीवालीकम्पमा श्रीदतने स्थाने श्रीचंद्र देसाय छे. पूर्वोक्त प्राकृत दीवाळीकन्पमा तो पाठमा नायक ने नरमा महापम पहा छे-पाकीना पूर्व प्रमाणे कहेल दे. श्रीसमगायोगमा तो कयु के के-१ मरत, २ दीर्घदंत, ३ गूढदंत, ४ शुद्धदंत, ५ श्रीगुप्त, ६ श्रीभूति, (६४४) श्रीकाललोकप्रकाश । or । १० विपुलवाहणे ११ चेव । रिटे १२ वारसमे वुत्ते आगमेस्साण होकत्ति ॥ २॥ नंदिश्च १ नंदिमित्रश्च २ तथा सुंदरवाहुकः ३ । महावाहु ४ रति- वलो ५ महावल ६ वलाभिधी ७ ॥१॥ द्विपृष्ठश्च ८ त्रिपृष्ठश्च ९ वासु- देवा अमी नन । उत्सर्पिण्या भविष्यंत्यां भविष्यति महद्धिकाः ॥२॥ इति पद्यदीवालीकल्पकालसप्ततिकयोः, प्राकृतदीवालीकल्पे तु-सुंदरवा- हुरित्यत्र सुंदरो बाहुश्चेति द्वावुक्तौ, त्रिपृष्ठश्च नोक्त इति, शेषं प्राग्वदिति. नंदे य १ नंदिमित्ते य २ दीहवाहू ४ तहा महावाहू ४ । अतिबल ५ महव्वले ६ वलभद्दे य ७ सत्तमे ॥ १ ॥ दुविठू य ८ तिविठू य ९ श्राग- मिस्साण विण्हुणो । इति समवायांगे. रामा बलो १ वैजयंतो २-ऽजितो ३ धर्मश्च ४ सुप्रभः ५। सुदर्शनः ६ स्यादानंदो ७ नंदनः ८ पद्म ९ इत्यपि ॥ १॥ इति प्रागुक्तग्रंथयोः. प्राकृतदीवालीकल्पे तु-श्राद्यो वैजयंतो नवमः संकर्पणाख्यः, शेष प्राग्वत् . जयंत १ विजए २ भद्दे ३ सप्पभेय ४ सुदंसणे ५। थाणंदे ६ णंद ७ पउमे ८ संकरिसणे य ९ थपच्छिमे ॥ १॥ इति तु समवायांगे. ७ श्रीसोम, ८ पद्म ९ महापा, १० पिमळवाहन, ११ विपुळवाहन अने १२ रिट मा प्रमाणे (चक्रवर्तीयो) आगामी काळे थशे. (१-२) १ नंदि, २ नंदिमित्र, ३ सुंदरपाहु, ४ महाबाहु, ५ रतिवळ, ६ महावळ, ७ पळ, ८ द्विपृष्ठ, ९ त्रिपृष्ठ-या प्रमाणे नव वासुदेव महर्द्धिक पावती उत्सर्पिणीमा थशे. (१-२) श्रा प्रमाणे पद्य दीवाळीकल्प ने काळसप्ततिकामा कडुं छे. प्राकत दीवाळीकल्पमा तो सुंदरपाहुनी जग्याए सुंदर ने बाहु एम घे कह्या छ भने विपृष्ठ कक्षा नथी. ते सिवाय उपर प्रमाणे कहेल थे. श्री समवायांगसूत्रमा १ नंद, २ नंदिमित्र, ३ दीर्घबाहु, ४ महा- बाहु, ५ प्रतिवळ, ६ महापळ, ७ वळभद्र, ८ द्विपृष्ठ ने ९ त्रिपृष्ठ-या प्रमाणे आगामी विष्णुना नामो कडा छे. पलदेव १ पळ, २ जयंत, ३ अजित, ४ धर्म, ५ सुप्रम, ६ सुदर्शन, ७ आनंद, ८ नदंन भने ९ पद्म (१).भा प्रमाणे पूर्व कहेला पे ग्रंथमा नव वरदेवना नामो कया छे. मात दीपाळीकम्पमा तो पहेला धैजयंत ने नवमा संकर्षण नामना कमा छे. पाकी पूर्व प्रमाणे कहेल थे. श्रीसमवायांगा १ जयंत, २ विजय, ३ मद्र, ४ सुप्रग, ५ सुदर्शन, ६ मानंद, ७ नंद, मथने बेला ९ संकर्षण-या प्रमाणे नव पळदेवना नामो कक्षा के.

सर्ग ३४ मो। (६४५) तिलको १ लोहजंघश्च २ वज्रजंघश्च ३ केसरी। वलि ५ प्रहलादना. मानौ ६ तथा स्यादपराजितः ७॥९॥ भीमः ८ सुग्रीव ९ इति च भाविनः प्रतिकेशवाः । इहापि समवायांगे बलि स्ति. सप्तमो भीमोऽटमो महाभीमश्चेति दृश्यते. उत्सर्पिण्यां भविष्यंतः शलाकापुरुषा ग्रमी ॥ १०॥ एकपष्टि - विनोऽमी अरकेऽत्र तृतीयके । शलाकापुरुपौ च द्वौ चतुर्थेऽरे भविष्यतः ॥ ११ ॥ अथ प्रकृतं-सिद्धे जिने चतुर्विशे चक्रिणि द्वादशे मृते । संख्येय- पूर्वलक्षाणि धर्मनीती प्रवय॑तः ॥ १२ ॥ यदुकं प्रवचनसारोद्धारे- उस्सप्पिणि अंतिमजिण तित्थं सिरिरिसहनाहपज्जाया। संखिज्जा जाव- इया तावयमाणं धुवं भविही ॥१॥ इह तीर्थप्रवृत्तिकालमानमिदमुक्तं, नीतिरपि पंचमारकपर्यंत इव धर्म गावदेव स्थास्यतीति संभाव्यते. क्रमाकालानुभावेन स्वल्पस्वल्पकपायकाः । नापराधं करिष्यति मनुप्या भद्रकाशयाः॥ १३ ॥ शास्तागेऽपि प्रयोत्यंते न सौम्या दंड. १ विलक, २ लोहघ, ३ वनजंघ, ४ केमरी, ५ यलि, ६ प्रहलाद, ७ अपराजित, ८ मीम अने ९ सुग्रीव-श्रा प्रमाणे मावी प्रतिवासुदेवना नामो जाणवा. अामां पण समवायांगमा बलि नथी अने सातमा मीम ने थाठमा महामीम कहेलचे. या प्रमाणे उत्सर्पिणीमा शलाकापुरुषो (६३ ) पशे. (१० ) तेमा ६१ प्रीजा पारामो थशे. अने ये चौथा पारामा घश. (११) हये प्रकत कहे डे-चोवीशमा जिनेश्वर सिद्ध धया पछी मने पारमा नफरती मृत्यु पाम्पा पची संख्याता लास पूर्व सुधी धर्म अने नीति प्रवर्तशे. (१२) श्री प्रयघनसारोद्धारमा कधूछे फे-'उत्सर्पिणीना छेना तीर्थकर के जेमो श्री सपमदेव जैया धयाना के मनुं तीर्थ संख्याता पूर्वो सुधी ध्रुवपणे प्रवर्वशे' (१) ही वीर्यप्रतिनुं मा काठमान थे. नीति पय भवसर्पिणीमा पांचमा भाराना प्रांत मुधी प्रवर्नती हती नेम उत्मपिंगामां पण ज्या सुधी धर्म प्रवर्वशे त्या मुधी नीति पण रहेश एम समवे. ये त्यारपदी अनुक्रमे काटना अनुमावधी भोचा मोठा पायवाटा भने मद्रक भाशययाला मनुष्यो पशे. तेमो अपराध करशे नहीं (१३) भास्ता (शिषा करनार )नुं (६४६) श्रीकालखोकप्रकाश । मुल्वणं । श्रभावादपराधानां नापि दंडप्रयोजनं ॥ १४ ॥ तेषामल्पापरा- धानां दंडनीतिप्रवर्तकाः । चक्रिवंश्याः कुलकराः क्रमात्रिःपंच भाविनः ॥ १५ ॥ तेषां हाकारमाकार-धिक्कारा दंडनीतयः । पंचानां प्रथमानां स्यु-स्तिस्रो मंत्यनुसारतः ॥ १६ ॥ द्वितीयानां च द्वे नीत्यौ स्याताम- त्यविवर्जिते । तृतीयानां च पंचानां हाकार एव केवलं ॥ १७ ॥ एवं कुलकरेष्वेपु व्यतिक्रांतेपु कालतः । जनाः सर्वेऽहमिंद्रत्वं प्रपत्स्यते पराs- वशाः ॥ १८ ॥ स्वत एव प्रवर्तते ते न्यायेष्वेव मानवाः। न ते शासितु- महति तेषां शास्ता न कश्चन ॥ १९ ॥ एवं चात्रावसर्पिणीप्रालिलोम्यौचित्येनोत्सर्पिणीषु चतुर्थारकस्यादौ चतुर्विंशतितमजिननिर्वाणानंतरं पंचदश कुलकरा उक्ताः, परमेतन्निपेतुं न शक्यते यदुत्सर्पिण्यां द्वितीयारकपर्यंते कुलकरा भवंति उत चतु- रिकस्यादौ भवंति ? यत एप निर्णयो ह्यनंतरभविष्यदुत्सर्पिण्यनुसारेण कर्तुं शक्यते, भविष्यदुत्सर्पिण्यां च कुलकरानाश्रित्य शास्त्रे भूयान् विसं- प्रयोजन पण रहेशे नहीं, कारण के सौम्य मनुष्यने काइ आकरो दंड करी शकातो नथी. एटले अपराधोनो ज अभाव थवाथी दंड करवानुं प्रयोजन रहेशे नहीं. (१४ ) तेमने अल्प अपराधवाळाने दंडनीतिना प्रवर्तक ( दंड आपनारा) छेल्ला चक्रवर्तीना वंशज त्रण पार पांच एटले पंदर कुल करो थशे. (१५) तेमांना पहेला पांचना वखतमा हाकार, माकार ने धिक्कार ए त्रणे प्रकारनी दंडनीति अपराधना प्रमाणमा प्रवर्वशे. (१६) बीना पांच कुलकरोना वखतमा केली त्रीजी (धिकार ) नीति सिवायनी चे नीति प्रवर्तशे अने त्रीजा पांच कुलकरोना वसतमां पहेली हाकार नामनी एक ज नीति प्रवर्तशे. (१७) ए प्रमाणे ए (१) कुलकरो काळना क्रमे व्यतीत थये सते काळस्वभावथी सर्वे जनो अहमिंद्रत्व प्राप्त करशे के जेमा परवशपणुं पीलकुल नथी. (१८) ते मनुष्यो स्वतः ज न्यायमा प्रवृत्ति करे छे. तेश्रो शासन करवाने योग्य ज होता नथी, तेथी सेना शास्ता पण कोइ होता नथी. (१९) ए प्रमाणे श्रही अवसर्पिणीना प्रतिलोमना उचितपणाथी उत्सर्पिणीना चोथा प्रा. रानी श्रादिमा चोवीशमा तीर्थकरना निर्वाण पछी पंदर कुलकरो कहा थे, पण एनो निर्णय करी शकाय तेम नधी के उत्सर्पिणीमा चीजा श्राराने पर्यते कुलकरो थाय थे के चोथा भारानी धादिमां थाय छ ? कारण के श्रा वासनो निर्णय अनंतर धनारी उत्स- पिंणीने अनुसारे फरी शकाय छे, परंतु मावी उत्सर्पिणीमा कुलकरोने आधीने घणो . सर्ग ३४ मो। १६४७) बादो दृश्यते. तथाहि-कालसप्ततिकादीपालिकाकल्पादिषु च द्वितीयार. कपर्यंत विमलवाहनादयः सप्त कुलकरा उक्ताः, स्थानांगे तु सप्तमे स्थानके सप्त कुलकरा उक्ताः, तत्र सुमतिनामापि नोकं, दशमे तु सीमं- करादयो दशोक्तास्तत्र सुमतिनामोक्तं परं प्रांते न. समवायांगे तु सप्त तथैव, दश तु विमलवाहनादयः सुमतिपर्यंता उक्ताः । स्थानांगनवमस्था- नके च सुमतिपुत्रत्वेन पद्मनाभात्पत्तिरुक्ता, तथा जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रे च द्वितीयारके कुलकरा मूलत एव नोक्ताः, चतुर्थारके तु एकस्मिन् पक्षे मूलतो नोक्ताः, पक्षांतरे च पंचदशोक्तास्तथाहि-जाव अोसप्पिणीए प- च्छिमे तिभागे वत्तव्वया सा भाणियव्वा कुलगरवज्जा उसभसामिवज्जा. श्रो पति तीसे णं समाए पढमे तिभाए इमे पारस कुलगरा समुप्प. जिस्संति, तं जहा-सुमइ जाव उसमे सेसं तं चेव । दंडनीईओ पडिलो. माओ णेयवायो. अत्र च ऋपभनामा कुलकरो न तु अपभस्वामिनामा तीर्थकृदिति तद्वृत्ती. एवं च कुलकरानाश्रित्य दुप्पमाकालानुभावाद्वाचना- भेदजनितेपु उत्सर्पिणीकालभाविकुलकराणां भिन्नभिन्ननामताव्यस्तना- विसंवाद शास्त्रमा देसाय छे. ते रतावे छे-काळससतिका ने दीपाळीकल्प विगेरेमा वीजा पाराने पर्यते विमलवाहनादि सात कुलकरो थशे एम कथु छ. ठाणांगजीना सातमा ठाणामां पण सात कुलकरो क्या छ तेमां सुमतिनुं नाम ज नथी. तेना ज दशमा ठाणामां सीमंकरादिक दश कुलकरो कशा छ तेमां सुमतिनुं नाम कयुं छे, पण ते चेन्नु का नधी. समवायोगमा सात ते प्रमाणे ज करा चे अने दश वो विमल पाइनथी सुमतिपर्यत कया थे, तथा स्थानांगना नवमा स्थानमा सुमति कुलकरना पुत्र तरीके पद्मनाभनी उत्पत्ति कही छ. तथा श्रीजंबूद्वीपप्रज्ञप्ति सूत्रमा वीजा धारामा कुलकरो मूळधीज कया नथी. चोथे पारे एक पचे मूळयी कहा नथी भने पक्षांतरे पंदर कसा थे. ते भा प्रमाणे- 'श्रवसर्पिणीमा श्रीजाधाराने पाइलाबीजे भागेजे वक्तव्यताकही छत कुलकरने व ने तथा ऋपमदेयने व ने पाकीनी श्रहीं कहवी. वीजा कहे छे -ते चोथा भाराना पहेला श्रीना मागमा पंदर कुलकरो उपजशे. ते श्रा प्रमाणे-मुमति यावत् झपम; नाकी वर्षा नामो सेव प्रमाणे जाणवा. दंडनीति प्रतिलोमपणे जाणवी. अहीं शाम नामना कुलकर (जुदा) ममनवा. पभस्वामी नामना तीर्थकर न समबवा. एम तेनी प्रतिमा पर्दा २. मा प्रमाणे हलकरोने भाभीने दुप्पमा काटना अनुमावधी वाषनामेदानित उत्सर्पियो काळ मावी चकरोनी (६४८) भीकालगोफप्रकारा। मतान्यूनाधिकनामताभिन्नारकभाविताभिधायकेषुशास्त्रवाक्येपु सत्सु तत्त्वं सर्वविद्यिमिति ज्ञेयं. अथ प्रकृतं-क्रमेणात्यंतसारस्या-दथुच्छिन्ने पावके सति । अग्निप- कान्नाशनादि-स्थितिर्विच्छेत्स्यतेऽखिला ॥ २० ॥क्रीडिप्यंति यथेच्छं ते प्रादुर्भूतैरनुक्रमात् । कल्पद्रुमैर्दशविधैः पूर्यमाणमनोरथाः ।। २१॥ पंच- चापशतोत्तुंगाः स्युनित्यमशनार्थिनः । उत्कर्षतः पूर्वकोट्या-युपोऽत्र प्रथमं जनाः ॥ २२ ॥ एकपल्योपमोत्कृष्टा-युषः कोशोचभूधनाः । चतु- र्थभक्त भोकारः पर्यंते ते च भाविनः॥ २३ ॥ प्रवर्द्धमानपर्याये पृणे तुर्थेऽरके क्रमात् । सुषमा नाम सुखकृत् पंचमारः प्रवेक्ष्यति ॥२४॥ एककोशोच्छ्रिता एक-पल्योपमपरायुपः । तत्रैकाहांतराहारा भाविनः प्रथमं जनाः ॥ २५ ॥ द्विकोशोच्चाश्च पर्यंते द्विपल्यपरमायुषः । षष्ठभक्त- कृताहारा भविष्यति नरोत्तमाः ॥ २६ ॥ अरके पंचमे पूर्णे-ऽथैवं पर्याय- वृद्धितः । पष्ठोऽरकोऽथ सुपम-सुषमाख्यः प्रवेक्ष्यति ॥ २७ ॥ द्विक्रोशतुं. भिन्न भिन्न नामता, व्यस्त नामता, न्यूनाधिक नामता तेम ज भिन्नारक भाविताना अभिधायक शास्त्रवाक्यो सते तेनुं तव सर्वविद्-वेद्य समजवू. हवे प्रस्तुत कहे छे-अनुक्रमे अत्यंत सारस्यपणाथी अग्नि ध्युन्छिन थये सते अमिथी पकवेलुं भन्न खावा विगेरेनी सर्व स्थिति विच्छेद जशे. (२०) भने मनुष्यो तेमना मनो- रथने पूरनारा दश प्रकारना कल्पवृक्षो अनुक्रमे प्रादुर्भाव पामवाथी यथेच्छ क्रीडा फरशे. (२१) ते पाराना प्रारंममा पांचशें धनुष्य उंचा शरीरवाळा, दररोज भोजनना भर्थी अने फरोड पूर्वना उत्कृष्ट आयुष्यवाळा मनुष्यो थशे. (२२) भने ते भाराने अंते एक पल्योपमना उत्कृष्ट आयुष्यवाळा एक गाउ उंचा शरीरवाळा अने एकांतरे भोजन करनारा मनुष्यो थशे. ( २३ ) या प्रमाणे प्रवर्धमान पर्यायवाळो चौथो पारो पूर्ण यये सवे अनुक्रमे सुखने फरनार पांचो सुपमा नामनो मारो प्रवेश करशे. (२४) तेना प्रारं. भमा मनुष्यो एक कोश उंचा शरीरवाळा एक पन्योपमना उत्कृष्ट आपुवाळा ते एकावर श्राहार फरनारा थशे. ( २५ ) ए पाराने प्रांते ये गाउ उंचा शरीरवाळा, वे पन्योपमना उत्कृष्ट थायुवाळा ने पे दिवसने आंतरे भाहार करनारा उत्तम मनुष्यो थशे. (२६) ए प्रमाणे पर्यायनी पद्धिथी पांचमो पारो पूर्ण यये सवे सुपममुपमा नामनो छटो पारो प्रवेश करणे. (२७) तेना प्रारंममा मे गाउ उंचा शरीरवाळा, ये पन्योपमना उत्कर IFI वर्ग ३४ मो। (६४९) गाश्चात्रादौ द्विपल्योत्कृष्टजीविताः। द्विदिनांतरभोक्तारो भाविनो भुवि युग्मिनः ॥ २८ ॥ अते क्रोशत्रयोत्तुंगा-स्त्रिपल्यपरमायुपः। भवितारो युगलिन-स्त्रिदिनांतरभोजिनः ॥ २९ ॥ उत्कृष्टं ह्यरकप्रांते युग्मिनामु. च्छ्यादिकं । तेभ्यः पूर्वेषां तु तेषां किंचिदूनोनमेव तत् ॥ ३० ॥ एवं पंशुलिकादीनां वृद्धिरप्यूह्यतां स्वयं । कल्पवृक्षादिभावानां पर्यायाणां च भूयसां ॥ ३१ ॥ एवं पूर्णे कालचके पुनरप्यवसर्पिणी । पुनरुत्सर्पिणी- त्येवं कालचक्र पुनः पुनः ॥ ३२ ॥ उन्नमच्च विनमच्च संततं, पारिणामिकगुणेन संगतं । चक्रमेतदसद्विवर्तयन् , क्रीडतीव भुवि कालवालकः ॥ ३३ ॥ विश्वाश्चर्यदकीर्तिकीर्तिविजयश्रीवाचकेंद्रांतिष- द्राजश्रीतनयोऽतनिष्ट विनयः श्रीतेजपालात्मजः। काव्यं यस्किल तत्र निश्चितगतत्त्वप्रदीपोपमे सर्गः प्रापदशेषतां परिमितश्चारुश्चतुस्त्रिंशता ॥ ३४ ॥ ॥ इति श्रीलोकप्रकाशे चतुत्रिंशत्तमः सर्गः समाप्तः। श्रीरस्तु ।' भायुवाळा ने ये दिवसने अतिरे भोजन करनारा युगलिक मनुष्यो पृथ्वीपर थशे. (२८) वे धाराने अंते प्रण गाउ उंचा शरीरवाळा, नण पन्योपमना उत्कृष्ट मायुवाळा भने प्रण दिवसने अांतरे भोजन करनारा युगतिको थशे. (२९) भा भाराने प्रति युगलिकोना शरीरनु उंचपणुं विगैरे उत्कृष्ट थशे. तेनी पूर्व त ज पारातुं शरीर, श्रायु विगेरे काइक कोहक प्रोछु ओटुं जाणवू. (३०) ए प्रमाणे पासळी' विगैरेनी वृद्धि तेमज कन्पयवादि भावोनुं अनेक प्रकारना पर्यायोनुं वृद्धिपणुं स्वयमेव समजवू. (३१) ए प्रमाणे काळचक पूर्ण थये सते फरीने पण भवसर्पिणी ने उत्सपिगी तेमज पुनः पुनः काळचक्र समजवा (३२) पारिणामिक गुणे करीने संगत, उनम ने विनम्र एम सतत प्रवर्ततुं काळ चक्र वारंवार फरतुं सतुं पृथ्वीपर ते काळरूपी वाळक क्रीडा करतुं होय एम जणाय छे. (३३) विश्वने श्रार्थर्य उत्पन्न करनार के कीर्ति जेमनी एवा कीर्ति विजय याचद्रना शिष्य भने राजश्री तथा तेजपाळना पुन विनये जे या काव्य रच्यु के ते मा निस्थित एवा जगत्वने बताषयाने प्रदीप समान काव्यमा चारु 'एवों चोत्रीशनी संख्याना परिमाण. वाळो एटले पोत्रीशमो सर्ग संपूर्ण थयो. (४३४॥ इति श्रीलोकप्रकाशे चतुत्रिंशत्तमामर्गः समाप्त. १ उत्सर्पिणीना चोथा भाराने मते युगलियोना शरीरमा पसिठी ६४, पांचमा साराने पते १२८ अने दट्टा भाराने अते २९६ समजपी.

(६५०) भीकाललोकप्रकाश। अथ पंचत्रिंशत्तमः सर्गः प्रारभ्यते ॥ भन्न स्यात्पुद्गलपरावतः कालचरनंतकैः । द्रव्यक्षेत्रकालभाव-भेदात्स च चतुर्विधः ॥ १ ॥ एकैकश्च भवेद् द्वेधा सूक्ष्मवादरभेदतः। श्रष्टाना- मप्यथैतेषां स्वरूपं किंचिदुच्यते ॥२॥ औदारिकवैक्रियांगा-हारकतैजसोचिताः। भापोच्छ्वासमनःकर्म- योग्याश्चेत्यष्ट वर्गणाः ॥ ३ ॥ सजातीयपुद्गलानां समूहो वर्गणोच्यते । मौक्तिकानां मिथस्तुल्य-गुणानामिव राशयः ॥ ४ ॥ कुचिकर्णो यथा नाना-वर्णासंख्येयधेनुकः।चक्रे गवां सवर्णानां समुदायान् पृथक् पृथक ॥ ५॥ तथाकृते चाभूवंस्ताः सुज्ञानाः सुग्रहा यथा । तथा तीर्थंकरो. द्दिष्टाः पुद्गलवर्गणा अपि ॥६॥ तथाहि-एकाकिनः संति लोके येऽनंताः परमाणवः । एकाकित्वेन तुल्यानां तेषामेकात्र वर्गणा ॥ ७॥ यणुका- नामनंतानां द्वितीया वर्गणा भवेत् । त्र्यणुकानामनंतानां तृतीया किल सर्ग ३५ मो. अनंता काळचक्रोथी एक पुद्गळपरावर्तन थाय. ते पुद्गळ परावर्तन द्रव्य, क्षेत्र, फाळ ने भाव एम चार प्रकारनुं छे. (१)ते दरेक ये प्रकारे छे. सूक्ष्म ने चादर-ए रीते कुल आठ प्रकारना पुद्गळपरावर्तनन स्वरूप काइक कहे छे. (२) औदारिक, वैक्रिय, श्राहारक, वैजस, भाषा, उवास, मन अने कर्मने योग्य एवी पाठ प्रकारनी वर्गणाओ छे. (३) परस्पर श्वेतादि तुल्य गुणवाळा सजातीय पुद्गलोनो समूह ते ( तुल्यगुणवाळा ) मोतीओनी राशिनी जैम वर्गणा कहेवाय है. (४) कुचि- कर्ण नामनो शेठ जेम जुदा जुदा वर्णवाळी असंख्यात गायोना समूहमाथी एक सरखा पर्णवाळी गायोना समूहने पृथक् पृथक् रासतो हतो (५) तेम करयाथी ते गायो तेने जेम सुज्ञात भने सुग्रह थती हवी तेम तीर्थकरकथित पुद्गळ चर्गणामो पण सारी रीते समजी शकाय तेवी अने सारी रीते ग्रहण करी शकाय वेवी थाय छे. (६)तेनी विशेष स्पष्टता करे खे-एकाकी (छुटा) एवा जे अनंत परमाणुमो लोकने विपे घेते एकाकीपणे तुल्य होवाधी सेनी नहीं एक वर्गणा समजबी. (७) ये अणुवाला मनंता (स्कंधो )नी पीजी वर्गया, पण परमाणुयाळा अनंता धोनी श्रीजी वर्गणा (८) एपी रीते दिम.

सर्ग ३९ मो। (६५१) वर्गणा ॥८॥ यावदेवमनंतानां गण्यप्रदेशशालिनां । स्कंधानां वर्गणा गण्या द्वयणुकत्वादिजातिभिः ॥ ९॥ असंख्येयप्रदेशाना-मप्येकैकाणु- वृद्धितः । असंख्येया वर्गणाः स्युःप्राग्वजातिविवक्षया ॥ १० ॥ तथान- ताणुजातानां स्कंधानामपि वर्गणाः । भवत्येकैकाणुवृद्ध्या-ऽनंता इति जिनैः स्मृतं ॥ ११ ॥ अत्यल्पाणुमयत्वेन स्थूलत्वादखिला अपि । ग्रहे नायांति जीवानां ग्रहणानुचिता इति ।। १२ ।। अथोल्लंघ्याखिला एताः सिद्धानंतांशसंमितः। अभव्येभ्योऽनंतगुणैः परमाणुभिरुद्गतैः ।। १३ ।। स्कंधैर्याः स्युः समारब्धा वर्गणा विस्रसावशात्। जधन्या ग्रहणाऱ्याः स्यु-स्ताः किलौदारिकोचिताः ॥ १४ ॥ श्राभ्यश्चै- कैकाणुवृद्धा मध्यमा ग्रहणोचिताः । तावद् ज्ञेया यावदौदा-रिकार्होत्कृष्ट- वर्गणाः ॥ १५॥ उत्कृष्टौदारिका भ्य-श्चैकेनाप्यणुनाधिकाः। भवंति पुनरप्यौदा-रिकानीं जघन्यतः ।।१६।। ततश्चैकैकाणुद्धा अनीं मध्यमा बुधैः । तावद् ज्ञेया पुनर्याव-दुत्कृष्टाः स्युरनहकाः ॥ १७ ॥ एता वहणु. णुकत्यादि जातिवडे यावत् गण्य (संख्याता) परमाणुओवाळा अनंता स्कंधोनी संख्याती घर्गणा जाणवी. (९) ते करता एकेक परमाणु वधता असंख्याता असंख्याता पर- माणुमोना अनंता अनंता स्कंधोनी पूर्वनी जेम जातिनी विवक्षाए असंहपाती वर्गणा जाणवी. (१०) ते करता एकेक परमाणु वधता अनंता अनंता परमाणुओना स्कंधोनी श्रनंती अनंती वर्गणाओ जातिपणे पण मनंती जाणवी एम श्रीजिनेश्वरे कहुं छे. (११) ए वधी भत्यन्प परमाणुप्रोवाळी अने स्थूल (भवगाहनावाळी ) होवाची बीवोने ग्रहण करवाने भनुचित होवार्थी ग्रहणमो भावती नथी. (१२) हवे ते बघीने उल्लंघीने सिद्धने अनंतमे मागे ने अमन्यधी अनंतगुणा परमाणु- श्रोधी पनेला स्कंघोरडे विससा परिणामे (समावे) पनेली वर्गणामो श्रौदारिक शरीर योग्य जपन्य ग्रहण प्रायोग्य जाणवी. (१३-१४) ए वर्गणामो करता एकेक परमाणुनोए पघता कंपोवाळी वर्गणाओ मध्यम ग्रहण योग्य त्या सुधी जाणवी के ज्या सुधी प्रौदा- रिफ उत्कृष्ट ग्रहण प्रायोग्य वर्गणा थाय. (१५) उत्कृष्ट प्रौदारिक ग्रहण प्रायोग्प पर्गणाधी एक प्रदेश यधती परमाणुप्रोवाळी अनंती औदारिकने अयोग्य एवी अपन्य पर्गणा जाणवी. (१६) त्यारपछी एकेक भणुए यघवी मौदारिक अयोग्य मध्यम वर्गणामी पुषजनोए त्यो सुघी जाणवी के यावत् उत्कृष्ट मौदारिक अनई (अयोग्य ) वर्गणा याय.

(६५२) श्रीकाललोकमकाश। निष्पन्न-वात्सूक्ष्माः परिणामतः । तत औदारिकानर्हाः स्थूलस्कंधोद्भवं हि तत् ॥ १८॥ यथा यथाणुभूयस्त्वं परिणामस्तथा तथा । स्कंधेषु सूक्ष्मः स्यात्तेषा-मल्पत्वे स्थूलमिप्यते ॥ १९ ॥ औदारिकापेक्षयेव किलैताः प्रचुराणुकाः। स्युः सूक्ष्मपरिणामाश्च वैक्रियापेक्षया पुनः ॥ २० ॥ स्वल्पाणुजातत्वात्स्थूल-परिणामा अमूस्ततः। वैक्रियानुचिताः सूक्ष्म-स्कंधोत्थं प्राच्यतो हि तत् ॥ २१ ॥ उत्कृष्टौदारिकानीं यास्ता एकानाधिकाः । जघन्या वैक्रियाः स्यु-स्ततो याद्यणुभिर्युताः ॥ २२ ॥ मध्यमा वैक्रियाः स्यु-स्तदो. स्कृष्टकावधि । जघन्यमध्यमोत्कृष्टा वैक्रियानुचितास्ततः ॥ २३ ॥ वैकि- यापेक्षया भूयो-ऽणुकाः सूक्ष्मा 'अमूः किल । थाहारकापेक्षया च स्थूलाः स्तोकाणुका इति ॥ २४ ॥ एवमग्रेऽपि भाव्यं. (१७) ए वर्गणाश्रो बहु अणुरोधी निप्पम थयेली होवार्थी स्वभावे ज सूक्ष्म परिणा- मवाळी होय छे तेथी ते औदारिक शरीरने आग्रहण प्रायोग्य छे केमके औदारिक शरीर स्थूळ स्कंधोथी उत्पन्न थाय छे. (१८) जेम जेम परमाणुमो, वधारेपणुं थाय छे तेम तेम स्कंघोने विपे परिणाम सूक्ष्म थाय थे भने जेम जेम परमाणुप्रो ओछा होय छे तेम तेम परिणाम स्थूळ होय छे. (१९) श्रा वर्गणाओ औदारिकने श्राश्रयीने ज प्रचुर अणुभोपाळी अने सूक्ष्म परिणामवाळी होय छे अने वैक्रियनी अपेक्षाए तो स्वम्प पर. माणुंमोधी उत्पन्न थयेली होवाथी स्थूळ परिणामवाळी होय छे तेथी ते वैक्रियने अनु- चित ( ग्रहणने अयोग्य ) होय के फेमके ते पैकिय शरीर पूर्वना औदारिक करतो पधारे सूक्ष्म स्कंधोथी उत्पन्न थयेनुं होय छे. (२०-२१) श्रौदारिकने भयोग्य एवी उत्कृष्ट वर्गणा करतां एक अणुवडे थाधिक वे जपन्य वैफ्रियने ग्रहण योग्य वर्गणा समजवी. नेमां ये श्यादि अणुभोयुक्त थायी मध्यम क्रिप योग्य वर्गणाओ थाय ले. ते पक्रिय योग्य उत्कृष्ट वर्गणा सुधी समजवी. त्यारपछी यमियने अयोग्य एवी जयन्य, मध्यम ने उत्कृष्ट वर्गणामो जाणवी; ( २२-२३) केमके ते वैफियनी अपेक्षाए पधारे अणुगोपाळी भने सूक्ष्म परिणामपाळी थे तथा याहारकनी अपेक्षाए वे स्कूल परिणामवाळी अने ओचा अणुभोवाली होय छे. (२४) ए प्रमाणे भागळ पण रामजपुं.

.0 एता यथोत्तरं सर्ग ३५ मो. (१५३) जघन्यमध्यमोत्कृष्टा-स्तत आहारकोचिताः। तदनस्तितस्त्रेधा ततश्च तैजसोचिताः ॥ २५ ॥ ततस्तथैव त्रिविधा-स्तैजसानुचितास्ततः । वेधा भापोचिता भाषा-नुचिताश्च ततस्त्रिधा ॥ २६ ॥ अानप्राणोचिता. वेधा तदनस्तितनिधा । मनोऽस्तिदनश्चि त्रिविधाः स्युस्ततः क्रमात् ॥ २७ ॥ जघन्यमध्यमोत्कृष्टाः कर्मणामुचितास्ततः। भवंति वर्ग: णास्त्रेधा चाभ्यः कर्म प्रजायते ॥ २८॥ इतोऽप्यूचं ध्रुवाचित्ता-दयो याः संति वर्गणाः। नार्थाभावात्ता इहोक्ताः प्रोक्तास्त्वावश्यकादिषु ॥ २९ ॥ तदर्थना च ते ग्रंथा भावनीयाः सवृत्तयः। क्षेत्रावगाहाद्युक्तानां वर्गणा- नामथोच्यते ॥ ३०॥ सूक्ष्मा ज्ञेया वह्वणुका अपि। प्रथमौदारिकानह-व- गणायाः प्रभृत्यथ ॥ ३१॥ सर्वा श्रयंगुलासंख्य-भागमात्रावगाहनाः । यथोत्तरं च सूक्ष्मत्वा-स ऊनोनो विभाव्यतां ॥ ३२॥ औदारिकोचिता यावत् क्षेत्रं स्पृशति वर्गणा । तदनीं ततो न्यून भाव्या इत्यखिला अपि त्यारपछी श्राहारकने उचित जघन्य, मध्यम ने उत्कृष्ट वर्गणा जाणवी. त्यार. पछी तेने अयोग्य त्रण प्रकारनी जाणवी. त्यारपछी तैजसने उचित प्रण प्रकारनी जा- णवी. ( २५) पछी तैजसने अनुचित प्रण प्रकारनी जाणवी. पछी त्रण प्रकारनी भापाने उचित, पछी त्रण प्रकारनी मापाने भनुचित, (२६) पछी त्रण प्रकारनी भानप्राण (श्वासोश्वास ) ने उचित, पछी प्रण प्रकारनी आनप्राणने अनुचित, पछी प्रण प्रकारनी मनने उचित, पछी त्रण प्रकारनी मनने अनुचित एम अनुक्रमे जाण. (२७) पछी जपन्य, मध्यम ने उत्कृष्ट त्रण प्रकारनी कार्मणने उचित वर्गणाओ जाणवी के जेथी कर्म- बंध थाय थे अर्थात् जे कर्मबंध करवामां उपयोगी थाय 2. (२८) एनी पी चीनी ध्रुव अचिचादिक वर्गणाओ छे, पण ते श्रही जरुरनी न होबाथी कही नथी. भावश्यकादि- कमां ते फहेली छे. (२९) तेना अधीश्रोए ते यो वृत्तिसहित वाचना. हवे उपर कोली वर्गणामोनो क्षेत्रावगाह विगेरे कहे छे. (३०) ए वर्गमानो यथोचर चूहु परमाणुभोपाळी छतां सूक्ष्म अनगाहवाळी जारावी. तेमा प्रथम औदारिक अनई वर्गणाबोधी मांडीने यघी वर्गणायो भंगुळना अमंख्यावमा भागनी अवगाहनावाळी जाणवी. ए अवगाहनानुं उचरोत्तर सूक्ष्मपणुं होगाथी ते अंगुलनो असंख्यातमो माग ऊन ऊन जाणयो. (३१-३२) श्रौदारिकोचितर्गया जेटला क्षेत्रने अवगाहे (स्पर्श ) छे ते करता तेने अनई एपी त्यारपछीनी वर्गवा न्यूनघेपने भीमाललोकप्रकाश। ॥ ३३ ॥ औदारिकवैक्रियायं-तरालेष्वत्र वर्गणाः । उक्ता एकैकाणुव- ध्या-नीं या उभयोरपि ॥ ३४ ॥ ताश्च सिद्धानामनंत-तमभागेन संमिताः। अभव्येभ्योऽनंतगुणा मानतः परिकीर्तिताः ॥ ३५ ॥ श्रौदा- . रिकाद्यष्टकस्य जघन्या ग्रहणोचिताः। उक्ता या वर्गणास्ताभ्य उत्कृष्टा ग्रहणोचिताः ।। ३६ ॥ स्वस्वानंततमे भागे यावंतः परमाणवः । एकैक- वृद्वैस्तायनि-रधिकाः स्युः किलाणुभिः॥ ३७ ॥ अत एवांतराले स्यु- जघन्योत्कृष्टयोस्तयोः। अनंता वर्गणा मध्या एकैकाणुविशेषिताः ॥३८॥ सर्वाः परिणमत्येता वर्गणा विस्रसावशात् । यथास्वमुपयुज्यंते ततश्चौ- दारिकादिपु ॥३९॥ अयोग्याः स्युः पुनर्योग्याः योग्याः पुनरयोग्यकाः- परिणामपरावर्त्ता-द्विवर्त्तते हि वर्गणाः॥४०॥ स्पर्श के एम उत्तरोत्तर बधी वर्गणाओ माटे समजबु. (३३) अहीं औदारिक ने वैकि- यादिना अंतराळे जे वर्गणाओ एकेक अणुए वधती मने बनेने अयोग्य कही छे (३४) ते वर्गणाओ सिद्धने अनंतमे भागे अने अमव्योथी अनंतगुणी मानथी कली छे. (३५) औदारिकादि पाठ प्रकारमा जघन्य ग्रहणोचित जे वर्गणाओ कही छे ते करता उत्कृष्ट ग्रहणोचितवर्गणायो पोतपोताने अंनतमे भागे जेटला परमाणुथो थावे तेटला परमा- णुशो पैकी एक एक वधारीए तेटला परमाणुप्रोवडे अधिक होय छे. ( ३६-३७) पाथी करीने ज ते जघन्य अने उत्कृष्टनी बच्चेनी एक एक परमाणुवडे यधती मध्यम वर्गणाश्रो अनंती थाय छे. (३८) ए पधी वर्गणाओ विस्रसावशे ज परिणमे छ भने वेथी औदा. रिकादिकने विपे यथायोग्यपणे जोडाय छे. (३९) प्रथम अयोग्या, पछी योग्या, योग्या पछी पाली अयोग्या होय छे अने ते वर्गणाओं परिणामना परिवर्तनपणाथी पराव- तपणाने पामे के ( पलटाय के ). (४०) ग्रहण अग्रहण प्रायोग्य वर्गणाओनो क्रम. सर्वाग्रहण प्रायोग्य वर्गणा. १ औदारिक ग्रहण प्रायोग्य वर्गणा. ४ चैक्रिय अग्रहण प्रायोग्य वर्गणा. जघन्य-मध्यम-उरकृष्ट. जघन्य मध्यम-उत्कृष्ट २ औदारिक अग्रहण प्रायोग्य वर्गणा. ५ श्राहारक ग्रहण प्रायोग्य वर्गणा. जघन्य-मध्यम-उत्कृष्ट. जघन्य-मध्यम-उत्कृष्ट. ३ वैफिय ग्रहण प्रायोग्य वर्गणा. ६ माहारक अग्रहण प्रायोग्य वर्गणा. जघन्य-मध्यम-उत्कृष्ट जघन्य-मध्यम-उत्कए.

सर्ग ३५ मो। (६५५) Na ७ तैजस ग्रहण प्रायोग्य वर्गणा. १२ पानपाण धग्रहण प्रायोग्य वर्गणा. जघन्य-मध्यम-उत्कृष्ट जघन्य-मध्यम-उत्कृष्ट ८ तैजस श्रग्रहण प्रायोग्य वर्गणा. १३ मन ग्रहण प्रायोग्य वर्गणा. जघन्य-मध्यम-उत्कृष्ट. जघन्य-मध्यम-उत्कृष्ट. ९ भाषा ग्रहण प्रायोग्य वर्गणा. १४ मन अग्रहण प्रायोग्य वर्गणा. जघन्य-मध्यम-उत्कृष्ट जघन्य-मध्यम-उत्कृष्ट. १० भाषा अगहण प्रायोग्य वर्गणा. १५ कार्मण ग्रहण प्रायोग्य वर्गणा. जघन्य-मध्यम-उत्कृष्ट. जघन्य-मध्यम-उत्कृष्ट. ११ वानप्राण ग्रहण प्रायोग्य वर्गणा. ध्रुव अचिचादि वर्गणाओ. जघन्य-मध्यम-उत्कृष्ट औदारिकप्रभृतयएताश्चाहारकावधि । अष्टस्पर्शाः पंचवर्ण-रसा गंधद्वया न्विताः ॥ ४१ ॥ एकवर्णरसगंधः स्याद् द्विस्पर्शश्च यद्यपि । परमाणु- स्तथाप्येते समुदायव्यपेक्षया ॥४२॥ तैजसाद्या वर्गणा श्र-प्येवं वर्णादिभिः स्मृताः। स्पर्शतस्तु चतुःस्पर्शा-स्तेषां मृदुलघुध्रुवौ ॥४३॥ अन्यौ द्वौ च स्निग्ध शीतौ स्निग्धोष्णौ वा प्रकीर्तितौ। रूक्षोष्णो रूक्षशीतौ वा विर्वेधौ यथागमं ॥४४॥ अयं पंचसंग्रहवृत्तिशतकबृहट्टी- काद्यभिप्रायः, कर्मप्रकृतिप्रज्ञप्त्याद्यभिप्रायेण त्वेतासु स्निग्धोष्णरूक्षशी तरूपमेव स्पर्शचतुष्टयं स्यान्नान्यदिति. . तेमा औदारिकथी आहारक सुधीनी वर्गणाश्रो अष्टस्पर्शी, पंचवर्णी पंचरसवाळी, ने चे गंधवाळी होय छे. (४१) जो के परमाणुओ तो एक वर्ण, एक रस, एक गंध ने चे स्पर्शवाळा होय छे, परंतु आठ स्पर्शादिक जे कहेल छे ते समुदायनी (स्कंधनी) अपेक्षाए कहेल छे. (४२) तैजसादि वर्गणा पण ए ज रीते (प्रथमनी त्रण प्रकारनी वर्गणा प्रमाणे) वर्ण, गंध, रसवडे ( पांच वर्ण, पांच रस, पे गंधवाळी ) होय छे, परंतु स्पर्शथी चार स्पर्शवाळी होय छ. तेमा मृदु भने लघु ए ये स्पर्श ध्रुवपणे (निरंतर ) होय छ भने वीजा ये स्निग्ध ने शीत अथवा स्निग्ध ने उष्ण होय छे एम कहुं छे अथवा तो रूक्ष ने उष्ण के रूप ने शीत ए ये होय छे. एम विज्ञ पुरुषोए श्रागमना कथनधी समजवू. (४३-४४) मा पंचसंग्रहवृत्ति, शतकवृहट्टीका विगेरेनो अभिप्राय छे. कर्मप्रकृति अने प्रज्ञप्ति विगैरेना अभिप्राये तो ए वर्गणाओमा स्निग्ध, उष्ण, रूक्ष ने शीत ए चार स्पर्श न होय छ। वीजा होता नथी.

- भीकासलोकप्रकाश। सर्वलोकगतान् सर्वा-नणूनेकोऽसुमानिहः । औदारिकादिसप्तक- त्वेन स्वीकृत्य मुंचति ॥४५॥ कालेन यावता काल-स्तावानुक्तो जिने श्वरैः । द्रव्यतः पुद्गलपरा-वर्तो वादर बागमे ॥ १६ ॥ आहारकांगभा- वेन स्वीकृत्योत्सर्जनं पुनः। न संभवेत्समाणूनां मितवारं हि तद्भवेत् . ॥४७॥ सप्तानामथ चौदारि-कादीनां मध्यतः पुनः । भावेनैकेनैव चौदा-रिकांगत्वादिनासुमान् ॥ ४८ ॥ सर्वान् परिणमय्याणू-नेक एव विमुंचति । कालेन यावता तावान् द्रव्यतः सूक्ष्म इप्यते ॥ १९॥ सर्वस्य लोकाकाशस्य प्रदेशा निरनुक्रमं । स्पृश्यते मरणैः सर्वे जीवेनैकेन यावता ॥ ५० ॥ तावान् कालो बादरः स्यात् क्षेत्रतः पुद्ग- लोऽत्र च । खांशा अपूर्वस्पृष्टास्ते गण्याः स्पृष्टचरास्तु न ॥ ५१ ॥ यस्मिन् विवक्षिते व्योम-प्रदेशे स्यान्मृतोऽसुमान् । पुनस्तदव्यवहित- प्रदेशे म्रियतेऽथ सः॥ ५२ ॥ कालांतरे पुनरपि तृतीये तदनंतरे । म्रियते गण्यते सैप प्रदेशः खलु लेख्यके ॥ ५३ ॥ एवं लोकाभ्रप्रदेशैः हवे पुद्गळपरावर्त समजाये छ-सर्व लोकमा रहेला सर्व परमाणुभोने एक जीव औदारिक विगेरे सात वर्गणापणे स्वीकारीने (ग्रहण करीने ) जेटलाकाळे मूके तेटला काळजें जिनेश्वरोए चादर द्रव्य पुद्गलावर्त श्रागममा कयुं छे. (४५-४६) एमां पाहारक वर्जवानुं कारण ए छे के सर्व परमाणुषोनुं श्राहारक शरीरपणे स्वीकार करीने मूकबार्नु संभवी शके तेम ज नथी. कारणके श्राखा भवचक्रमा परिमित (चार ) वसत ज आहा- रक शरीर विकुर्वी शकाय छे. (४७) हवे ए सात औदारिकादि वर्गणामांधी कोइ पण एक वर्गणापणे सर्व परमाणुओने परिणमावीने एक ज जीव जेटले काळे मूके ते काळy नाम द्रव्यथी सूक्ष्म पुद्गळपरावर्त कहीए. (४८-४९) लोकाकाशना सर्व प्रदेशोने एक जीव अनुक्रम विना मरणयडे जेटलाकाळे स्पर्श तेटलाकाळे पादरक्षेत्र पुद्गळ परावर्तन थाय. एमां नवा माकाश प्रदेशने स्पर्शे ते गणवा; प्रथम पर्श करेलाने फरी फरीने स्पर्शे ते गणवा नहीं. (५०-५१) हवे कोइपण विव- क्षित आकाशप्रदेशे जीव मरण पाम्यो, सारपली कोइ काळे तेने लगता ज श्राकाश. प्रदेशे मरण पामे, ( ५२ ) वळी त्यारपछी कोइ काळे तेने लगता प्रदेशे, मरण पामे तेने लेसामा गणवा. (५३) ए रीते क्रमसर लोकाकाशना सर्व प्रदशोने एक जीव मृत्युवढे .. १ श्राहारक विना.

सर्ग ३५ मो। (६५७) सर्वैरपि यथाक्रमं । जीवेन मृत्युना स्पृष्टेः सूक्ष्मोऽसौ क्षेत्रतो भवेत् ॥५४॥ खप्रदेशे व्यवहिते एकद्वयादिप्रदेशकैः । भवेद्यन्मरणं तच्च गण्यते नात्र लेख्यके ।। ५५ ॥ जीवो यद्यप्यसंख्येयान् खांशान् जघन्यतोऽपि हि । अवगायैव म्रियते संख्येयान्न तु कहिचित् ॥ ५६ ॥ तथाप्यत्रावधीभूत एक एव विवक्ष्यते । नभःप्रदेशो मरण-स्पृष्टोऽन्येऽस्पृष्टका इति ॥ ५७॥ कालचक्रस्य समय-निखिलैंनिरनुक्रम। मरणेनांगिना स्पृष्टैः कालतो बादरो भवेत् ॥ ५८॥ कालचक्रस्य कस्यापि नियते प्रथमचणे । अन्य- स्य कालचक्रस्य द्वितीयसमयेऽसुमान् ॥ ५९ ॥ तृतीयस्य पुनः काल- चक्रस्यैव तृतीयके । समये म्रियते वा-त्तदैवायुःक्षये सति ॥ ६० ॥ कालचक्रस्य समयैः सवेरेवं यथाक्रमं । मरणेनांगिना स्पृष्टैः सूक्ष्मः' स्थादेप कालतः ॥६१ ॥ यत्र चायद्वितीयादि-क्षणक्रममतीत्य च । मरणं स्याकालचक्र लेख्यके तन्न गण्यते ॥ ६२॥ भावतः पुद्गलपरा-वर्त सूक्ष्म तथापरं । उपदेष्टुं यथाशास्त्रं वक्त- फरसे सारे वेटला काळनुं सूक्ष्म क्षेत्र पुद्गळ परावर्तन थाय. (५४) मामा एक वै विगेरे प्रदेशोथी व्यवहित आकाशप्रदेशे मरण पामे ते प्रदेशो नहीं लेखामां गणवाना नथी. (५५) जो के जीव जघन्यथी पण असंख्यात भाकाशप्रदेशने अवगाहीने ज मरण पामे छ, संख्याता प्रदेशोने पीने कदापि मरण पामतो नथी. ( ५६ ) तथापि वेना अवधि- भूत एक आकाशप्रदेशने ज मरणवडे स्पर्शल गणवो, वीजाने अस्पृष्ट गणवा. (५७) हवे काळचक्रना सर्व समयोने एक जीव अननुक्रमे मरणबडे जेटला काळे स्पर्शे तेटला काळे वादर काळपुद्गळ परावर्त थाय. (५८) अने कोइ पण काळचक्रना प्रथम समये जीब मरण परमे, त्यारपछी कोई पण काळचकना रजा समये मरण समे त्यारपछी वळी कोइ पण काळचक्रना वीजा समये मरण पामे,' एम अनुक्रमे काळचक्रना सर्व समयोने मरणवडे स्पर्श त्यारे वेटला काळ, सूक्ष्म काळपुद्गळपरावर्तन थाय. (५९-६१) जे पहेलो, वीजो, बीजो एम समयना क्रम शिवाय गमे ते समये कोइ पण काळचक्रमा मरण थाय ते आमा लेखे गणाय नहीं. (६२) हवे भावपुद्गळपरावर्त मूक्ष्म ने चादर बने प्रकारचं कहेवाने माटे यथाशास्त्र वक्त- १ नहीं मूळमां बीजा काळचक्रना बीजे समये, त्रीजा काळचकना प्रोजे समये एम मर्थ थाय थे तेवो अर्थ भन्यत्र कोइ ठेकाणे जणातो नी, अहीं पावा शब्द फेम लख्या हशे ते समजी शकातुं नथी.

(६५८) श्रीकासोकप्रकाश। व्यांतरमुच्यते ॥ ६३ ॥ एकस्मिन् समये जीवा ये पृथ्वीकायिकादयः । प्रविशंत्यवशाः कर्म-नुन्नाः सूक्ष्माग्निकायिपु ॥६४॥ लोकाकाशप्रमाणानां खखंडानां महीयसां। असंख्यानांखप्रदेशः प्रमितास्तेंगिनः स्मृताः॥६५॥ ये पुनः पूर्वमुत्पन्ना-स्तेजस्कायतयांगिनः। पुनर्विपयोत्पद्यते स्वकायेष्वेव कर्मभिः ।। ६६ ॥ ते पूर्वोद्दिष्टसूक्ष्माग्नि-प्रविशजीवराशिपु । न लेख्यके समायांति ते हि पूर्वप्रविष्टकाः॥६७॥ एकक्षणप्रविशद्भ्य एभ्यः सूक्ष्मा- ग्निकायिकाः । पूर्वप्रविष्टा ये ते स्यु-रसंख्येयगुणाधिकाः ॥ ६८ ॥ यतो जघन्यतोऽप्येतें-तर्मुहूर्त्तायुषोंगिनः । प्रतिक्षणं चासंख्येया उत्पद्यते नवा नवाः॥६९।। तेभ्यः कायस्थितिस्तेषा-मसंख्ययगुणाधिका । एकैकस्य द्यसंख्येय-कालचक्राणि सा गुरुः ॥ ७० ॥ ततोऽप्यस्या अनुभाग-बंध- स्थानानि तानि च । असंख्येयगुणानि स्युः संयमस्थानकानि च ॥७१॥ कायस्थितौ ह्येकैकस्यां स्थितिबंधा असंख्यशः । यथा जघन्यतः काय- स्थितिरंतर्मुहर्तिका ॥७२॥ ततः परैकसमया-धिकान्या द्विक्षणाधिका । विक्षणाभ्यधिका याव-दुत्कृष्टा सर्वतोंतिमा ॥७३॥ एकैकस्मिन्ननुभाग- व्यांतर कहे छे--(६३) एक समये पृथ्वीकायिकादिकना जेटला जीवो परक्शपणे कर्मनी प्रेरणार्थी सूक्ष्म अनिकायमा प्रवेश करे छे. (६४) ते जीयो असंख्य लोकाकाशना प्रदेशप्रमाण कह्या छे. ( ६५ ) वळी जे पूर्व तेजस्कायपणे जीवो उपजेला चे अने फरीथी कर्मवडे पोतानी ज कायमां मरण पामीने पाछा उत्पन्न थाय छे ( ६६ ) ते पूर्वोद्दिष्ट सूक्ष्म अग्निकायमा प्रवेश करती जीवराशिमा गणवाना नथी, केमके ते तो पूर्वे तेमा प्रवेशेला छे. (६७) एक समये तेमां (सूक्ष्म अनिकायमा) प्रवेश करता था जीवो करता सूक्ष्म अग्निकायमा पूर्वप्रविष्ट जीवो असंख्यगुणा अधिक छे, (६८ ) कारण के जघन्यथी पण ए अंतहिना श्रायुवाळा जीवो प्रतिक्षण नवा नवा असंख्याता उपजे छ. ( ६९ ) ते जीवोनी संख्या करता तेनी कायस्थिति असंख्यगुणाधिक के. केमके ते एकेकनी उत्कृष्टी कायस्थिति असंख्याता काळचकनी 2. (७०) ते करतां पण ते कायस्थितिना अनुभागपंधस्थानो भने संयमस्थानको असंख्यातगुणा थे, (७१) के.मके एफेक कायस्थितिमा स्थितिबंधस्थान असंख्याता होय छे. जेमके जघन्यथी फायस्थिति अंतर्मुहर्जनी छे तेधी भागळ पहेली एक समयाधिक, घीजी ये समयाधिक, श्रीजी त्रिसमयाधिक एम यावत् उत्कृष्ट सर्वथी लेनी स्थिति जाणवी. (७२-७३) ते एफेक " मर्ग ३६ मो। (६५९) बंधस्थानान्यसंख्यशः। स्थितिबंधे भवंतीति निर्दिष्ट तत्ववेदिभिः॥७॥ तथाहुः-एगसमयंमि लोए सुहुमगणिजिनाउ जे उ पविसंति । ते हुत संखलोग-प्पएसतुल्ला असंखिज्जा ॥७५ ॥ तत्तो असंखयुणिया अगणि- काया तेसिं कायठिई । तत्तो संजमश्रणुभाग-धंधट्ठाणाणिसंखाणि ॥ ७६ ॥ एवं च प्रवचनसारोद्धारसूत्रवृत्त्याद्यभिप्रायेण सूक्ष्माग्निकायिक- जीवकायस्थितेरनुभागवंधस्थानानि भावपुद्गलपरावर्त्तनिरूपणायोपका- तानि. पंचसंग्रहकर्मग्रंथसूत्रवृत्त्यादिषु तु सामान्यत एवानुभागबंधस्थाना- न्युक्तानि, तथाहि-भावपुद्गलपरावर्त्तमाह-अणुभागट्टाणेसुंअणंतरपरंप- राविभत्तेहिं । भावंमि वायरो सो सुहुमो सव्वेसणुकमसो ॥ १ ॥ इति पंचसंग्रहे. अथात्रानुभागबंधस्थानस्वरूपनिरूपणायोपक्रम्यते-प्राग यानि कर्म- योग्यानि द्रव्याण्युक्तानि तान्यथास्वाधिष्ठिताभ्रप्रदेशा-बगाढानीह चेतनः ॥ ७७ ॥ उपादाय कर्मतया द्राक् परिणमयत्ययं । किंचित्साधर्म्यतो स्थितिबंधमां तेना अनुमागपंधस्थानो असंख्याता असंख्याता छ एम तत्ववेदी महा- स्माओए का छे. (७४) तथाहुः--" एक समये लोकमां सूक्ष्म अग्निकायमा जे जीवो प्रवेश करे छे ते असंख्याता लोकाकाशना प्रदेशप्रमाण असंख्याता जाणवा. (७५) ते करता असंख्यातगुणा अग्निकाय जीवो छे. तेनी कायस्थिति ने ते दरेक स्थितिना अनु- भागबंधस्थान तथा संयमस्थान तेथी असंख्यातगुणा 2. (७६) आ प्रमाणे श्रीप्रवचनसारोद्धारसूत्र वृत्त्यादिनाअभिप्रायवडे सूक्ष्म अनिकाय जीयोनी कायस्थितिना अनुभागबंधस्थानो भावपुद्गळपरावर्त कहेवानी शरुपातमा लीधा ले. पंचसंग्रह, कर्मग्रंथसूत्रवृयादिकमां तो सामान्यथी ज अनुमागवंधना स्थान कह्या छे. तथाहि-' भावपुद्गळ्परावर्त कहे छे-अनुभागबंधना स्थान भनंतर ने परंपर- पणे ( आगळ-पाछळ ) एम वधा वेदाय ते बादरभावपुद्गळपरावर्तन ने अनुक्रमे ते सर्व स्थानो वेदाय ते सूक्ष्मभावपुद्गळपरावर्तन जाण, (१) इति पंचसंग्रहे. हवे अहीं अनुभागधना स्थाननुं स्वरूप कहेवानो प्रारंम करे छे-पूर्वे जे कर्मयोग्य द्रध्यो कह्या छे तेमांधी स्वथाधिष्ठित आकाशप्रदेशावगाढ जे होय तेने ज चेतन ग्रहण करीने ते समये ज कर्मपणे परिणमावे 2. काहक साधर्म्यपणुं होवाथी अग्निनुं दृष्टांत नहीं (६६०) भीकाललोकप्रकाश । वह्नि-दृष्टांतोऽत्र निरूप्यते ॥ ७८॥ यथा दहनयोग्यानि द्रव्याणि ज्वलनोऽपि हि । स्वगोचरस्थितान्येव प्रापयेद्वहिरूपतां ॥ ७९ ॥ न तु स्वविषयातीता-न्यग्निता नेतुमीश्वरः । जीवोऽपि स्वप्रदेशेभ्यो द्रव्यमेवं बहिःस्थितं ॥ ८०॥ नैव कर्मयोग्यमपि कर्मतां नेतुमीश्वरः । गृह्णाति तानि जीवश्च सर्वैरात्मप्रदेशकैः ॥ ८१ ॥ तथाहि-जीवप्रदेशाः सर्वेऽपि शृंखलावयवा इव । स्युः परस्परसंबद्धाः प्रतीका वपुषीव वा ॥ ८२ ॥ एकस्मिन्नपि तज्जीव-प्रदेशे व्यापृते सति। सर्वेऽपि व्याप्रियतेऽन्ये ग्रहीतुं कर्मणां दलं ॥ ८३ ॥ यथा घटायुपादातुं कराने व्यापृते सति । मणि- बंधकूर्परांसा-दयोऽप्यवयवाः परे ॥ ८४॥ व्याप्रियंते मंदमंद-तरमंद- तमं ध्रुवं । एवं सर्वात्मप्रदेश-व्यापारः कर्मसंग्रहे ॥ ८५ ॥ इदं च कर्म- द्रव्याणां ग्रहणं सादि भाव्यतां । तद्रव्यदेशकालाद्यैः स्यादनादिप्रवाहतः ॥ ८६ ॥ एषां च कर्मद्रव्याणां भागप्राप्तियथा भवेत् । एकेनाध्यवसायेन गृहीतानां तथोच्यते ॥ ८७ ।। कहेवामा भावे छे. (७७-७८) अग्नि पण दहन योग्य द्रव्यो जे स्वगोचर स्थित होय तेने ज अग्निपणे पमाडे छे. (७९) जे स्वविषयातीत होय तेने अग्निपणुं पमाडी शकतो नथी (अर्थात् तेने पाळी शकतो नथी) तेम जीव पण स्वप्रदेशी वहि:स्थित (पहार रहेला ) कर्मयोग्य पुद्गलोने पण कर्मपणुं पमाडी शकवाने समर्थ थतो नथी. हवे जे स्व- प्रदेशावगाढ होय ते कर्मयोग्य द्रव्योने सर्व प्रात्मप्रदेशोपडे ग्रहण करे . (८०-८१) तथाहि 'जीवना प्रदेशो सर्वे सकिळना अवयवोनी जेम परस्पर संबद्ध होय के अथवा शरीरना अवयवोनी जेवा होय छे. (८२) तेमांनो एक जीवप्रदेश पण कर्मना दळ ग्रहण करवा माटे व्यापार करे थे त्यारे पीजा पधा प्रदेशो पण व्यापार करे थे. (८३) म घटादिकने उपाडया माटे हाथनो अग्रभाग वापर्ये सते कांई, कोपी, सभा विगेरे पीजा पधा अवययो मंद, मंदतर, मंदतमपणे ध्रुष (चौकस ) व्यापार करे छे. तेम फर्मना संग्र- हमा ( ग्रहण करवामां) पण यधा श्रात्मप्रदेशो व्यापार करे थे (८४-८५) मा कर्म- द्रव्योनुं ग्रहण द्रव्य, देश, काळादिनी अपेचाए सादि समजबू, भने प्रवाहनी अपेक्षाए अनादि समजg. (८६) हवे एक अध्यवसायचडे ग्रहण करेला ए कर्मद्रव्योनी भागप्राप्ति बेरीते थाय छे (मर्थात् नेवी रीते भाग पडे थे) ते कहे छे. (८७)- .

सर्ग ३५ मो। (६६१) क्रमान्महत्तरो भागो महास्थितिककर्मणां । एवं स्थित्यनुसारण भागोऽष्टास्वपि कर्मसु ॥ ८८ ॥ आयुपस्तत्र सर्वेभ्यः स्तोको भागो भवे- दिह । सर्वेभ्योऽल्पस्थितिकत्वा-द्विशेषाभ्यधिकस्ततः ॥ ८९ ।। कर्मा- शानां भवेद्भागः कर्मणो मगोत्रयोः। परस्परापेक्षया तु द्वयोः स्यादेत- योस्समः ॥९०॥ ज्ञानदर्शनावरणां-तरायाणां बृहत्तमः । भागः स्यान्ना- 'मगोत्राभ्यां त्रयाणां च मिथः समः ॥ ९१ ॥ तेभ्योऽपि मोहनीयस्य भवेद्भागो वृहत्तमः। न्याय्यो महास्थितेरस्य महतां ह्यखिलं महत् ॥१२॥ वेदनीयस्य भागःस्या-न्मोहादल्पस्थितेरपि।सर्वेभ्योऽपि महीयान् य-तन्त्र हेतुनिशम्यतां ॥ ९३ ।। भागेऽल्पे वेदनीयस्य स्फुटत्वं सुखदुःखयोः । नानुभावयितुं शक्त-मिदं तादृक् स्वभावतः ॥ ९४॥ वेदनीयं च भवति प्रभूतदलिकं यदि । तदा स्वफलभूते ते सुखदुःखे स्फुटात्मके ॥ ९५ ॥ ईष्टे व्यक्त्या दर्शयितुं नान्यधेत्यंशकल्पना । एकाध्यवसायोपात्त-कर्मद्र- व्येषु भाव्यतां ॥ ९६ ॥ स चैकोऽध्यवसायः स्या-नानावैचित्र्यभाजनं। अनुक्रमे मोटो भाग मोटी स्थितिवाळा कर्मने मळे के. एम स्थितिने भनुसारे भाठे कर्मने विषे भागप्राप्ति थाय छे. (८८) तेमा आयुष्यने सर्व करता थोडो भाग मळे थे, कारण के तेनी स्थिति सर्वथी अल्प छे. तेना करतां विशेषाधिक कर्माशोनो भाग नाम ने गोत्र ए ये कर्मने मळे छे. परस्परनी अपेक्षाए ते बने सरखी स्थितिवाळा होवाथी बनेने सरखो भाग मळे छे. (८९-९०) ते करता ज्ञानावरण, दर्शनावरण ने अंतरायकर्मने मोटो माग मळे छे, कारण के नामगोत्र करतां तेनी स्थिति वधारे छे. परस्परमां ते त्रणेने सरखो माग मळे छे. ( कारण के ते त्रणेनी सरसी स्थिति के.) (९१) ते करतां मोहनीय कर्मने मोटो भाग मळे छे ते न्याय्य छ, कारण के तेनी स्थिति सर्वथी वधारे छे. एटले मोटानुं यधुं मोटुं होय छे. (९२) वेदनीय कर्मने मोहनीय कर्म करता अन्प स्थिति- वालं होवा छता सर्व करतां वधारे भाग मळे छे. तेमां हेतु शुं छे? ते सांभळो-(९३) जो वेदनीय कर्मने अन्य भाग मळे तो तेनो तेवा प्रकारनो स्वभाव होवाथी ते सुख-दुःखनु स्फुटपणुं अनुमवावी शके नहीं, (९४) तेथी जो वेदनीय प्रभूत दळवालं होय तो ते स्वफळभूत सुखदुःख स्फुटपणे व्यक्तिवडे बताववाने समर्थ थाय; अन्यथा व्यक्तपणे चतावयाने समर्थ थइ शके नहीं. मा अंशनी कल्पना एक अध्यवसाय ग्रहण करेला कर्मद्रव्यनी जाणवी. (९५-९६) ते एक अध्यवसाय नाना प्रकारनी विचित्रता, भाजन ((६६२) मीशाहलोकप्रकारा। अस्मिन्नेकस्वरूपे हि भवेत्कर्मापि तादृशं ॥ ९७ ॥ विना कारणभेदं हि कार्यभेदो न संभवेत् । कर्मवैचित्र्यवीजस्य तदस्यापि विचित्रता ॥९८॥ अयं विचित्रताग -ऽध्यवसायः स्वयं व्रजेत् । संक्लेशं वा विशुद्धिं वा ताहक्सामग्र्यपेक्षया ॥ ९९ ॥ सामग्री च द्रव्यक्षेत्र-कालभावात्मिका तया । संक्लिष्टो वा विशुद्धो वा-ध्यवसायः शरीरिणाम् ॥ १०० ॥ कदा- प्यष्टविधे बंधे हेतुर्भवति कर्हिचित् । सप्तविधे षड्विधे च कदाप्येकवि- धेऽपि सः ॥ १ ॥ उक्तं च-कहं एगज्झवसायगहियं दलियं अटुविहाइ बंधत्ताए परिणमइ ? उच्यते-तस्त अज्झवसाणमेव तारिसं, जेण अट्ट- विहाइ वंधत्ताए परिणमइ, जहा कुंभगारो मिइपिंडेण सरावाईणि परिणामेइ तस्स तारिसो परिणामो, तेणं परिणामेणं संजुत्तस्स दलियं अट्टविहाइत्ताए परिणमइ. प्राग्वञ्च रचनांशानां सप्तपड्विधर्वधयोः । सर्वत्र वेदनीयांशो ज्ये- ठोऽन्येषां यथास्थिति ॥२॥ यदा त्वेकं वेदनीयं कर्म वध्नात्यसौ तदा। होय छे. जो कदाच आ अध्यवसाय एक ज स्वरूपवाळो होय तो कर्म पण एक ज स्वरूप. वालं होवू जोहए, (९७) केमके कारणना भेद विना कार्यनो भेद संभवे नहीं; तेथी कर्मनी विचित्रताना बीजरूप भावी (अध्यवसायनी) पण विचित्रता समजवी. (९८) श्रा विचित्रतावाळो अध्यवसाय पोतानी मेळे तेवा तेवा प्रकारनी सामग्रीनी अपेक्षाए संक्लेशने अथवा विशुद्धिने पामे छ, (९९) अने जे सामग्री ले ते द्रव्य, क्षेत्र, काळ भने भावरूप छ, तेगा बडे जीकोना अध्यक्सार संक्रिट के विशुद्ध शय छे. (१०.) अध्यवसाय कोइ वखत अष्टविध बंधमा, कोइ वखत सप्तविध पंधमा, कोई वसत पविध पंधमा भने कोइ वसत एकविधधमां हेतुभूत थाय छे. (१०१) कमु के के-'एक अध्य- वसाये ग्रहण करेला कर्मदलिक अष्टविध पंधकपणे शा कारणथी परिणम उचर- " तेना अध्यवसाय ज तेवा के के जेथी अष्टविध बंधकपणे परिणमे चे. जेम कुंभार माटीना पिंडने सरायला विगेरेपणे परिणमावे छे. तेनो तेवो परिणाम होय छे तेथी तेया परिणामे युक्त कर्मदीलक अष्टविधपणे परिणमे थे." पूर्षे वयाप्रमाणे सप्तविध, पविध बंधनी रचनाना अंशमा वेदनीयनो अंश सर्वधी मोटो होय छे, ते शिवायना पीजा कर्मोना अंश पोतपोतानी स्थिति प्रमाणे होय थे. (२) सर्ग ३१ मो। (६६३) सर्व योगवशोपानं दलं तस्यैव भाव्यतां ॥३॥ तथोक्तं पंचसंग्रह-जं समय जावइयाई बंधए ताण एरिसविहीए। पत्तेयं पत्तेयं भागे निबत्तए जीवो ॥४॥ बन्नाति मूलप्रकृती-र्यथाल्पाल्पास्तथा तथा । प्रदेशबंधमुत्कृष्टं कुरुतेऽल्पिष्टमन्यथा ॥५॥न्याय्यमेतच्च खंडादे-यथांशः प्राप्यते महान्। विभाजकेषु स्तोकेषु तेषु भूयस्सु चाल्पकः ॥ ६ ॥ थाहुश्च-जह जह य अप्पपगईण बंधगो तहतहत्ति उकोसे । कुणइ पएसबंधं जहन्नयं तस्स वञ्चासे ॥ ७॥ इह पूर्व कर्मयोग्य-वर्गणावर्तिनोऽणवः । स्वाभाविकरसाढ्याः स्यु-हेतवः सर्वकर्मणां ॥८॥ यदा तु जीवैद्यते तदा तेषु किलाणुपु। कपायाध्यवसायेन ग्रहणक्षण एवं वै ॥ ९॥ अविभागपरिच्छेदा रससंबं. धिनोऽमिताः। प्रादुर्भवंति सर्वेभ्यो जीवेभ्योऽनंतसंगुणाः॥१०॥ विविधाश्च स्वभावाः स्यु-आनावारकतादयः। जीवानां पुद्गलानां चा-चिंत्यशक्ति- कता यतः ११ ॥ यथा शुष्कतृणादीनां पूर्व ये परमाणवः । प्रायेणैक- ज्यारे या जीव एकल वेदनीय कर्म ज बधि छे त्यारे योगना यशथी ग्रहण करेल सर्व दळ ते वेदनीयर्नु ज समज'. (३) श्रीपंचसंग्रहमा कयु छ के-'जे समये जेटला कर्मो बंधाय ते समये या विधि प्रमाणे जीव प्रत्येक प्रत्येकना मागनी वहेचण करे छे. (४) मूळ प्रकृति जेम जेम ओबी बंधाय तेम तेम प्रदेशबंध उत्कृष्ट करे अने जेम जेम मूळ प्रकृति वघारे बंधाय तेम तेम (त्यारे त्यारे ) प्रदेशबंध अन्पिष्ट करे. (५) जुभो खंड विगे- रेना जेम जेम विभाजक (भाग पडावनार ) भोछा होय तेम तेम अंश मोटा मळे अने भाग पडावनार वधारे होय त्यारे अंश नानो मळे ए न्याय्य ज छे. (६) कयु के के- 'म जेम जीव अन्य प्रकृतिमोनो बंधक होय तेम तेम प्रदेशबंध उत्कृष्ट करे अने तेना व्यत्यासमा ( फेरफारमा वधारे प्रकृतियो बंधाती होय त्यारे ) जघन्य प्रदेशबंध करे. (७) अहीं प्रथम कर्मयोग्य वर्गणामां वर्तता अणुभो सर्व कर्मना हेतुभूत स्वाभाविक रस- वाळा होय छे. (८) तेने ज्यारे जीव ग्रहण करे थे त्यारे ते अणुमोमा सकपायी अध्यवसायवडे ग्रहण समये न ते रससंबंधी अविमागपरिच्छेद सर्व जीवोथी अनंतगुणा अपरिमित था जाय छे. (९-१०) वळी ते पुद्गळो ज्ञानावारकवादि विविध स्वभाववाळा थाय के केमके जीव तथा पुद्गलो भचिंत्य शक्तिवाला छे. (११) जेम सुका पास (६६४) श्रीकाललोकप्रकाश. स्वरूपाः स्युः स्वाभाविकरसास्तथा ॥ १२ ॥ गवादिभिहीतास्ते क्षीरा- दिरसरूपतां । सप्तधातुपरीणामा-यांति चानेकरूपतां ॥ १३ ॥ तथैका- ध्यवसायात्ते-ध्वपि कर्मदलाणुषु । रसोद्भेदोऽनंतभेदो भवेत्तदर्श्यते स्फुटं ॥ १४ ॥ तथाहि-अभव्येभ्योऽनंतगुणैः सिद्धानंतांशसंमितः । निष्पन्नानणुभिः स्कंधा-नात्मादत्ते प्रतिक्षणं ॥ १५ ॥ अविभागपरिच्छे- दान् करोत्येषु रसस्य च । सर्वजीवानंतगुणान् प्रत्येकं परमाणुषु ॥१६॥ योऽर्द्धा न च्छिद्यमानो रसांशः सर्वविद्धिया।न दत्तेशं सोऽविभाग-परि- च्छेद इह स्मृतः ॥ १७ ॥ तत्रैकसमयोपात्ते कर्मस्कंधेऽत्र येऽणवः। सर्वा- ल्पिष्टरसाश्छिद्य-मानास्तेऽपि रसांशकैः ॥ १८ ॥ सर्वजीवानंतगुणान् प्रयच्छति रसांशकान् । एषां चाल्परसाणूनां निचयो वर्गणादिमा ॥ १९ ॥ श्रन्यासा वक्ष्यमाणानां वर्गणानामपेक्षया । स्युर्भूयांसोऽणवोऽ. त्राल्प-रसा हि वहवोऽणवः ॥ २० ॥ रसाविभागभागेन तत एकेन येऽधिकाः। द्वितीया वर्गणा तेषा-मणूनामिह कीर्तिता ॥ २१ ॥ इयं च विगेरेमा पूर्वे जे परमाणुओ होय छे ते प्राये एक स्वरूपवाळा ने स्वाभाविक रसवाळा होय छे. (१२) ते गायविगेरेना ग्रहण करवाथी क्षीरादि रसरूपताने तेम ज सप्तधातुपणे परिण- मवाथी भनेकरूपताने पामे छे. (१३) ते ज रीते एक अध्यवसाय ग्रहण करेला ते कर्म- दळाणुमा रसनो उभेद अनंत मेदवाळो थाय छे. ते स्फुट रीते देखाडीए छीए. (१४) तथाहि-श्रमव्यधी अनंतगुणा ने सिद्धने अनंतमे भागे एटला परमाणुप्रोवडे निष्पन्न थयेला स्कंधोने जीव प्रतिक्षण ग्रहण करे छ, (१५) अने ते प्रत्येक परमाणुमा रसना अधि- माग परिच्छेद सर्व जीवथी अनंतगुणा करे छे. (१६) जै रसाशनो सर्वशनी युद्धिए अर्ध. अर्धपणे छेद करतां छेवट अंश न यह शके-भाग न पडे तेने श्रहीं अधिमाग परिच्छेद कहीए. (१७) तेमा एक समये ग्रहण करेला कर्मस्कंधोमां ले परमाणु सर्व करता अन्प रमवाळा होय ते पण रसांशवडे छेदाता सता सर्व जीवथी अनंतगुणा रसाशने आपे छे. एया मन्प रसवाळा परमाणुप्रोनो जे समूह ते पहेली वर्गणा. (१८-१९) भागळ कहेवाशे एषी वीजी वर्गणाधोनी अपेघाए या वर्गणाना मन्प रसवाळा परमाणुमो पा विशेष होय छे, कारण के जे भन्परसबाळा परमाणुमो होय ते घणा होय . (२०) पहेली घर्गणा करता एफ रसाविभाग मागपडे अधिक एवा जे परमाणुमो के वेवा परमाणुभोना सम्हनी बीजी वर्गणा कही छे. (२१) था पर्गणा परमाणुमोनी अपेचाए पहेली वर्गणा सर्ग १९ मो. (६६५) वर्गणा हीना परमाणुव्यपेक्षया । आद्याया वर्गणाया य-देते तेभ्यो रसाधिकाः॥२२ ।। रसाविभागभागस्ये-त्येकैकस्य प्रवृद्धितः। वर्गणाः पर- माणूनां तावद्वाच्या मनीषिभिः ॥२३॥ भवंति वर्गणा याव-रिसद्धानं- तांशसंमिताः । अभव्येभ्योऽनंतगुणा-स्ता रसाशविशेपिताः ॥ २४ ॥ रसभागांश्च यच्छंति सर्वात्यवर्गणाणवः । सर्वाद्यवर्गणागुभ्यः किलान- तगुणाधिकान् ॥ २५॥ राशिश्चासा वर्गणानां स्पर्द्धकं प्रथमं भवेत् । समूहो हि वर्गणाना- मिह स्पर्द्धकमुच्यते ॥ २६॥ एकैकेन रसांशेन वृद्धाश्च परमाणकः। अथैत. स्मान्न लभ्यते प्रथमस्पर्द्धकात्परं ॥ २७ ॥ सर्वजीवानंतगुणै रसाशेरेव चाधिकाः । संप्राप्यते त एवेदं पूर्ण स्पर्द्धकमादिमं ॥ २८ ॥ क्रमाद्रस. निरंशांश-वृद्धौ हि स्पर्द्धकं भवेत् । स्यादन्यस्पर्द्धकारंभो निरंशांशक्रम- त्रुटौ ॥ २९ ॥ आद्यस्पर्द्धकपर्यंता-णुभ्यो येऽथ रसांशकैः। सर्वजीवानं- तगुणैः प्रवृद्धाः परमाणवः ॥ ३० ॥ तेषां च समुदायः स्यात् प्रथमा वर्गणा किल । द्वितीयस्य स्पर्द्धकस्य ततः स्यात्पूर्ववरक्रमः ॥ ३१ ॥ एकै- करता हीन छ, कारण के आ वीजी वर्गणाना अणुश्रो पहेली वर्गणाना अणुप्रो करता अधिक रसवाळा छे. (२२) श्रा प्रमाणे अकेक रसाविभाग भागवडे वधती वर्गणाश्रो पुद्धिमानोए त्यां सुधी कहेवी ज्या मुधी रसांशवडे वधती ते वर्गणाो अभव्योथी अनंतगुणी भने सिद्धना अनंतमा माग जेटली थाय. (६३-२४) सर्वात्यवर्गणानाणुओ सर्वाधवर्गणामा रहेला अणुभो करतां अनंतगुणाधिक रसाशने भाषे छे. (एटला रसांशो तेमा होय छे.) (२५) श्रा वर्गणामोनी राशि ते प्रथम स्पर्धक समजवो, केमके नहीं वर्गणा- सोना समूहना स्पर्धक कहेला छे. (२६) पहेला स्पर्धकथी आगळ एकेक रसाशे वधता परमाणुश्रो लभ्य थइ शके नहीं (जगतमा होय ज नहीं), परंतु सर्व जीवोथी अनंतगुणा रसांशे वधता परमाणुशोज लभ्य थइशके-एरीते पहेलु स्पर्धक पूर्ण थयुं जाणj. (२७-२८) अनुक्रमे रसना निरंश अंशोथी वधता परमाणुओ मळे त्यारे नवा स्पर्धको शय छ, ए अन्य स्पर्धकनो प्रारंभ निरंशांशक्रमत्रुटिने आते थाय छे. (२९) पहेला स्पर्धकना बेला अणुप्रोनी पछी सर्व जीवथी अनंतगुणा रसांशवडे वधता जे परमाणुओ होय तेनो समूह ते पीजा स्पर्धकनी पहेली वर्गणा छे. त्यारपत्री पूर्वनी जेम क्रम समजवो. (३०-३१) श्रीकाललोकप्रकाश। केन रसांशेन प्रवृद्धः परमाणुभिः । आरब्धा वर्गणा याव-सिद्धानंतांश- संमिताः ॥ ३२ ॥ एतासां वर्गणानां च समुदायो भवेदिह । द्वितीयं स्पर्द्धकं पूर्णी-भूतेऽस्मिन् स्पर्द्धके पुनः ॥३३॥ एकद्वयाद्यैः रसच्छेदैः-न प्राप्यतेऽणवोऽधिकाः। प्राप्यते किं तु ते सर्व-जीवानंतगुणैर्भुवं ।। ३४ ॥ अणूनां प्राग्वदेतेषां समूहो वर्गणादिमा । तृतीयस्य स्पर्द्धकस्य ततः स्यात्पूर्ववरक्रमः ॥ ३५ ॥ भवंति स्पर्द्धकान्येवं प्रवृद्धानि रसांशकैः । सिद्धानंततमभाग-तुल्यानीति जिना विदुः ।। ३६ ॥ अनुग्रहाय शिष्याणां दृष्टांतोऽत्र निरूप्यते । असद्भावस्थापनया वर्गणास्पर्द्ध कानुगः ॥ ३७ ॥ श्राद्यस्य स्पर्द्धकस्याद्या वर्गणा कल्प्यते यथा । रसांशशतसंयुक्तै-रारब्धा परमाणुभिः ॥ ३८ ॥ अथैकैकरसच्छेद- वृद्धाणूत्थाभिरादितः । दशभिर्वर्गणाभिः स्या-त्पूर्ण स्पर्द्धकमादिम ॥ ३९ ॥ ततो दशोत्तरशत-रसाशैः परमाणुभिः । नाप्यते वर्गणारब्धा नापि द्वथायंशकाधिकः ॥ ४० ॥ किंतु त्रिंशशतरस-च्छेदाढ्यैः परमा- णुभिः। प्राप्यते वर्गणारब्धा द्वितीये स्पर्द्धकेऽग्रिमा ॥ ४१ ॥ ततः पुनरपि एकेक रसांशवडे वधता परमाणुपोथी बनेली वर्गणाओ सिद्धना अनंतमा भाग जेटली थाय त्यारे ते वगणामोना समुदायतुं चीजें स्पर्धक थाय. या स्पर्धक पूर्ण थये सते पाया एक ये विगेरे रसांशे वधता परमाणुमो न पामीए किंतु सर्व जीवथी अनंतगुणा रसा शोथी वधता परमाणुगो पामीए. (३२-३४ ) तेवा परमाणुशोना समुदायनी श्रीजा स्पर्धकनी पहेली वर्गणा त्यारपछी पूर्व प्रमाणे कम जाणवो. (३५) एवी रीते रसांशोवटे वधता परमाणुनोना स्पर्धको सिद्धना अनंतमा मागप्रमाण थाया छे एम जिनेवरो कहे छे. (३६). सही शिष्यना अनुग्रहमाटे यसद्भाव स्थापनावडे वर्गण अने स्पर्धकने अनुमरतुं दृष्टांत कहे थे.(३७) पहेला स्पर्धकनी पहेली वर्गणासोरसांशवाळा परमाणुग्रोथी शरु करवी.(३८) हवे ते प्रथम वर्गणा करता एकक रसांशधी वधता अणुयोधी थयेली दश वर्गणाओवडे । १०९ सुधी) पहेलुं स्पर्धक पूर्ण करघु. (३९) त्यारपछी एक सो दश रसांशवाळा परमाणुमोथी एटले एक पे विगेरे रसांशोधी वधता परमाणुमो पामीए नहीं तेथी वीजी वर्गणा त्यांथी (१२९ सुधी) शरु पाप नहीं; (४०) परंतु एकसो ग्रीश रसांशवाळा परमाणुगो पामीए एटले सेटला रसांशपाळा परमाणुशोथी वर्गणामोनो आरंभ थाय भने ते वीजा स्पर्धनी पहली वर्गणा कहेवाय. (४१) मर्ग ३५ मो। (६६७) प्राग्व-द्रसैकैकलवाधिकैः । परमाणुभिरारब्धा लभ्यते खलु वर्गणाः ॥ ४२ ॥ क्रमवृद्धौ रसांशानां समाप्तानां समाप्यते । द्वितीयं स्पर्द्धक- मिति स्युरनंतान्यमन्यहो ॥४३॥ रसांशवृद्धरणुभि-रारब्धाश्च यथोत्तरं । अल्पाणुका वर्गणाः स्युः स्थापनात्र विलोक्यतां ॥ १४ ॥ इति प्रतिज्ञात अनुभागस्वरूपं नियूंढं. एतेषां चानुभागानां बंधस्थानान्यसंख्यशः। तेषां निष्पादका येऽध्य- वसायास्तेऽप्यसंख्यशः ॥ १५॥ तथाहि-एकप्रादेशिकी श्रेणिर्या लोक- स्य घनाकृतेः । असंख्येयतमे तस्या भागे येऽध्रप्रदेशकाः॥४६॥ तावंति त्यारपछी एकेक रसाशे वधता परमाणुओ पामीए एटले तेनी बीजी वर्गणाओ थाय. (४२) ए रीते क्रमथी वधता रसांशोवाला परमाणुो समाप्त थाय एटले के ज्यारे एक रसांश वधता परमाणुषो न मळे त्यारे चीजें स्पर्धक (१३९ सुधी पूर्ण थाय. ते वीजा स्पर्धकमा एवी वर्गणाओ अनंती थाय, (४३) परंतु ए प्रमाणे यथोत्तर रसांशयडे वधता परमाणुयोथी प्रारंभ कराती वर्गणाश्रो ओछा प्रोबा परमाणु प्रोवाळी थाय, एने माटे अही. करेली स्थापना जुश्रो. (४४.) श्रा प्रमाणे प्रतिज्ञात करेलुं अनुभागनुं स्वरूप कडं. प्रतिपरमाणुमा रसांश एकेक वर्गणामां परमाणु २सांश १०० १०१ १०२] १०३/१०४१०५ १०६ | १०७ | १०८ १०९ परमाणु १००० ९७५/ ९५० ९२५ ९००८७५ ८५०८२५ ७७५ वर्गणा पहेली बीजी | श्रीजी चौथी पांचमी छही सातमी आठमी नवमी दशमी उपर प्रमाणे पहेलुं स्पर्धक थया पछी ११० थी १२९ सुधीना रसांशवाळा परमाणु समले. पछी १३० थी १३९ सुधी म नेनु चीजें स्पर्धक थाय. प्रतिपरमाणु रसांश एकेक वर्गणामां परमाणु वीजा स्पर्धकनी वर्गणा. रसांश १३० १३१ १३२ | १३३ १३४ | १३५। १३६ | १३७ | १३८१३९ परमाणु ५५० ६२५ ६७५ ६५० ६२५/६०० ५७५/ ५५० | ५२५ वर्गणा पहेली बी.जी त्रीजी चोथी पांचमी छठी सातमी माठमी नवमी दशमी पानी पीना स्पर्धको माटे अने वर्गणानी संख्या माटे उपर प्रमाणे समजवू. ए अनुभागना बंधस्थानो असंख्याता छे. तेना निष्पादक एवा अध्यवसायो पण भसंख्यावा छे. (४५). तथाहि-पनीकृत लोकनी एक प्रदेशिकी जे श्रेणी तेना संख्या- ८०० ७०० (६६८) भीकाललोकप्रकाश । योगस्थानानि तेभ्योऽसंख्यगुणाधिकाः। तीवमंदादयो भेदा एकैक- प्रकृतेः स्मृताः ॥४७॥ प्रकृत्योरवधिज्ञान-दर्शनावरणाख्ययोः । स्युलॊकानामसंख्यानां खप्रदेशर्मिता भिदः ॥ ४८ ॥ भेदा असंख्या एवानु-पूर्वीष्वपि चतसृषु । एवं भाव्या भिदोऽसंख्याः प्रकृतिप्वपरास्वपि ॥ १९ ॥ तथोक्तं-ओहिणाणावरणओहिदसणावरणपगईओ असंखेज्जलोगागासप्प- एसमित्ताओ खेज्जइ भागे जत्तिया श्रागासपएसा तत्तियाओ. एक- वस्मिन्नुक्तयोग-स्थाने प्राप्यंत एव यत् । सकला बंधमाश्रित्य पूर्वोक्ताः प्रकृतभिदः॥ ५० ॥ ततः प्रकृतिभेदाः प्रा-गसंख्येयगुणाधिकाः। योग- स्थानेभ्यो यदुक्ता-स्तयुक्तमुपपद्यते ।। ५१ ॥ उक्तं च-जोगट्ठाणेहितो असंखेजगुणाओ पगईयो । एकेके जोगदाणे वट्टमाणे एयायो सव्वामो ॥१॥धइत्ति काउं। तेभ्यः प्रकृतिभेदेभ्य-श्चासंख्येयगुणाधिकाः। स्थिति- भेदा जघन्याद्या ज्येष्ठांता क्षणद्धितः ॥ ५२ ॥ स्थितिलप्वी स्थिति- तमा भागमा जेटला आकाशप्रदेशो होय तेटला योगस्थानो जाणवा. ते करता असंख्य- गुणाधिक तीव्र मंदादि भेदो एकेक प्रकृतिना कह्या छ. (४६-४७) ते या प्रमाणे- तीव्रतम तीवर तीव मंद मंदतर मंदतम प्रतिमंद अतिमंदतर अतिमंदतम अवधिज्ञानावरण ने प्रवधिदर्शनावरण प्रकृतिना भेदो असंख्य लोकाकाशना प्रदेश जेटला छे. (४८) चार भानुपूर्वीने विषे पण असंख्य मेदो छ. ए प्रमाणे पीजी प्रकृतियोमा पण असंख्य भेदो जाणवा. (४९). तेने माटे पहुं छे के-'अवधिज्ञानाचरण ने अवधिः दर्शनावरण प्रकातिना असंख्य लोकालाशना जेटला प्रदेशो थाय तेटला मागो समजवा-' एकेक उक्त योगस्थाने बंधने आश्रीने पूर्षे कह्या तेटला बधा प्रकृतिना भेद पामीए, (५०) तेथी प्रथम प्रकृतिमेदो योगस्थानो करता असंख्येय गुणाधिकजे कया छे ते युक्त जखे. (५१). पहुंथे के-'योगस्थानो परता संख्यातगुणी प्रकृतिश्रो छे, कारण के एकेक योगस्थाने यतो जीव यधी प्रकृतिमी बधि छे. ११ हवे ते प्रकृति मेद करता असंख्येयगुणाधिक स्थितिमेदो जघन्यधी मांडीने उत्कटपते समय समयनी वृद्धिधी थाय छे. (५२) सर्ग ३५ मो। (६६९) स्थानं प्रथमं परिकीर्तितं । सेकक्षणा द्वितीयं सा तृतीयं द्विक्षणाधिका ॥ ५३॥ इत्यादि. प्रतिप्रकृतिभेदं य-स्थितिभेदा असंख्यकाः । ततः प्रकृतिभेदेभ्य-स्तेऽसंख्येयगुणा इति ।। ५४ ।। स्थितिबंधाध्यवसाया- स्तेभ्योऽसंख्यगुणाधिकाः । एकैकस्मिन् स्थितिस्थाने वध्यमाने हि देहिभिः ॥ ५५॥ तद्धतवोऽध्यवसाया नानाजीवव्यपेक्षया। असंख्येय- लोकविय-प्रदेशप्रमिताः स्मृताः॥ ५६ ॥ एभ्यश्चाध्यवसायेभ्यो-ऽप्य- संख्येयगुणानि च । जिनदृष्टान्यनुभाग-बंधस्थानानि कर्मसु ॥ ५७ ॥ जंतोलेश्यापरीणाम-विशेषाः संभवंति ये । कपायोदयसंमिश्रा-स्तीव. मंदादयोऽमिताः॥ ५८॥ जघन्यादेकसमय-स्थितिकास्ते जिनः स्मृताः। उत्कर्पतोऽष्टसमय-स्थितिकाः समवेदिभिः ॥ ५९ ॥ स्युः साधकतमास्ते चा-नुभागबंधनं प्रति। ततोऽनुभागवंधस्य स्थानान्युच्यंत उत्तमैः ॥१०॥ एकैकस्मिन् स्थितिबंधा-ध्यवसाये ह्यसंख्गशः। दृष्टाः केवलिभिर्नाना- नुभागवंधहेतवः ॥ ६१ ॥ कपायमिश्रलेश्यानां तीवमंदादयो भिदः । स्थितिबंधाशयेभ्यः स्युः-स्तदसंख्यगुणा हि ते ।। ६२ ।। अनुभागसृजो सर्व करता लघु स्थिति ते पहेल्लू स्थितिस्थान कडुं छे, तेथी एक समय अधिक ते चीजें, चे क्षण अधिक ते त्रीजुं इत्यादि स्थितिस्थानो समजवा, (५३) जेथी करीने दरेक प्रकृतिमेदे स्थितिभेद असंख्याता थाय के तेथी प्रतिभेद करता स्थितिस्थान असंख्याव- गुणा सिद्ध थाय छे. (५४) स्थितिवंधना अध्यवसाय स्थान ते करता असंख्यगुणाधिक जाणवा, केमके जीवोवडे एकेक स्थितिस्थान बंधाता होय त्यारे तेना हेतुभूत अध्यवसायो अनेक जीवोनी अपेक्षाए असंख्याता लोकाकाशना प्रदेशप्रमाण कह्या छे. (५५-५६) ए अध्यवसायो करवां कर्मने विषे रहेला अनुमागना बंधस्थान असंख्यातगुणा जिने- भरोए क्या छे. (दीठा छे) (५७). प्राणीोने कपायोदय संमिश्र अने तीवमंदादिक अपरिमित जे लेण्यापरिणामावशेषो संभवे छे. (५८) ते जघन्यथी एक समयनी स्थितिवाळा अने उत्कृष्टथी पाठ समयनी स्थितिचाळा समवेदी एवा जिनेश्वरोए कह्या छे. (५९) से स्थानो अनुभागबंधप्रति साधकतम कारणभूत होय छे तेथी उत्तम एवा परमा- स्माए तेने अनुभागबंधना स्थान कह्या छे. (६०) एकेक स्थितिबंध अध्यवसाये असंख्याता अनुभागपंधना हेतु केवळीमोए दीठा छे. (कह्या छे.) (६१) तीवमंदादि मेदो कषायमिथ लेश्याना होय छे तेथी स्थितिबंधना अध्यवसायो करता वेभसंख्यातगुणा होय छे. (६२) ..

(६७०) मलिलोकप्रकाश जीवा-ध्यवसायाश्च ते द्विधा । कषायमिथलेश्यानां परिणामात् शुभा- शुभाः ॥ ६३ ॥ शुभैराधत्तेऽनुभागं क्षीरखंडरसोपमं । जीवः कर्मपुद्ग- लाना-मन्यनिवरसोपमं ॥६४॥ प्रत्येकमध्यवसाया श्रशुभाश्च शुभाश्च ते । संख्यातिगानां लोकानां प्रदेशैः प्रमिताः स्मृताः॥६५॥ शुभा विशेषा- भ्यधिकाः केवलं कथिता जिनैः। अशुभाः किंचिदूनाः स्यु-युक्तिस्तत्र निशम्यतां ॥ ६६ ॥ यानेव रसबंधस्या-ध्यवसायान् क्रमस्थितान् । संक्लिश्यमान ऊोर्ध्व-मारोहत्यसुमानिह ॥ ६७ ॥ विशुद्ध्यमानस्तानेवा- वरोहति क्रमादधः । शुभानां प्रकृतीनां तु रसबंधे विपर्ययः ॥ ६८ ॥ संक्लिश्यमानोऽवरोहे-दारोहेच्छुध्यमानकः । उभये च ततस्तुल्याः सौध- सोपानपंक्तिवत् ॥ ६९ ॥ केवलं क्षपको येष्व-ध्यवसायेषु संस्थितः । क्षपकश्रेणिमारोहे-त्तेभ्यो नासौ निवर्त्यते ॥ ७० ॥ क्षपकस्य ततः श्रेष्ठा-ध्यवसायव्यपेक्षया । ऊचिरेऽध्यवसायाः प्रा-गशुभेभ्योऽधिकाः शुभाः ॥ ७१ । एभ्योऽनुभागबंधस्य स्थानेभ्योऽनंतसंगुणाः । एकाध्य- तेथी अनुमागने सर्जनारा जीवोना अध्यवसायो कपायमिश्र लेश्याना परिणामने लीधे शुभ अने अशुभ एम चे प्रकारना छे. (६३) शुभ अध्यवसायथी जीप दीर- खांहना रस बेवो अनुमाग (रस) उत्पन्न करे चे, अने ए करता अन्य (अशुम अध्यव- साय ) थी लीवडाना रस जेयो कटुक रस उत्पन्न करे छे. (६४) ते शुम श्रने अशुभ चंने प्रकारना अध्यवसायो असंख्याता लोकाकाशना प्रदेशप्रमाण छ, (६५) ते नेर्मा शुम अध्यवसाय काइक अधिक जिनेश्वरोए कह्या छ भने अशुभ अध्यवसाय काइक न्यून कझा छे. तेमा युक्ति छे ते सांभळो. (६६) रसबंधना क्रमस्थित जे अध्यवसायो उपर •जीव संक्लिश्यमान थवो सतो उपर उपर श्रारोहण करे छे, ते ज अध्यवसायोथी अनुक्रमे विशुध्यमान थयो सतो नीचे उतरे छ, पण शुभ प्रकृतिना रसधा तेथी विपर्यय छे. (६७-६८) एटले के संक्लिश्यमान थयो सतो नीचे उतरे छ भने विशुद्धयमान थयो , सतो उपर चडे छे. ए रीते ते पन्ने महेलना पगथीमानी श्रेणिनी जेम तुल्य थाय थे, (६९) परंतु केवळ चपक जीव जे अध्यवसायोमा स्थित रह्यो सतो आपकणीपर भारोहण करे छे ते अध्यवसायथी ते पायो निवर्ततो नथी, (७०) सेथी आपकना श्रेष्ठ अध्यवसायोनी अपेक्षाए पूर्व अशुम करतां शुम अध्यवसायो अधिक कमा छे. .(७१) ए अनुभागपंधना स्थानो करतां एक मध्यवसाये प्रहय करेला फर्मयोग्य सर्ग ३५ मो। (६७१) वसायोपात्ताः कर्हिदलिकाणः॥ ७२ ॥ तेभ्योऽप्यनंतगुणिताः कर्मा- णुपु रसांशकाः। तच्च भावितमेव प्राक् । वर्गणास्पर्द्धकोक्तिभिः॥ ७३ ॥ तथोक्तं पंचसंग्रहे-सेढिअसंखेज्जंसे जोगटाणा तओ असंखिज्जा । पगडी- भेया तत्तो ठिइभेया होति तत्तोवि ॥ ७४ ॥ ठिइबंधज्झवसाया तत्तो अणुभागवंधठाणाणि । तत्तो कम्मपएसा-गंतगुणातो रसच्छेया ॥७५।। अथ प्रकृतं-जीवोनुभागवंधाध्य-वसायस्थानकान्यथ । मरणेन स्पृशत्येकः सर्वाणि निरनुक्रमं ॥७६ ॥ कालेन यावता काल-स्तावान् केवलिनोदितः। भावतः पुद्गलपरा-वों वादर आगमे ।।७७॥ एता- न्येव स्पृशत्येकः क्रमाकालेन यावता। भावतः पुद्गलपरा-वर्तः सूक्ष्मश्च तावता ॥ ७८॥ श्रयं भावः-कश्चित्सर्वजघन्येंगी यः कपायोदयात्मके। वर्तमनोऽध्यवसाय-स्थाने प्राप्तो मृतिं ततः ॥ ७९ ॥ भूयसापि हि कालेन स एवांगी द्वितीयके । श्राद्यात्परेऽध्यवसाय-स्थानके म्रियते यदि ॥ ८० ॥ तदेव मरणं तस्य गण्यते लेख्यके बुधैः । नान्यान्युत्क्रम- भावीनि तान्यनंतान्यपि स्फुटं ।। ८१ ॥ कालांतरे चेद्भूयोऽपि द्वितीय- दलिकना अणु अनंतगुणा छे. ( ७२ ) ते करतां अनंतगुणा ते कर्माणुप्रोमा रसांशो छे. ते पूर्व वर्गणा ने स्पर्द्धकनी उक्तिवडे बतावेल छे. (७३) तथोक्तं पंचसंग्रहे. “श्रेणिना असंख्यातमे भागे योगस्थान, ते करतो असंख्यातगुणा प्रकृतिभेदो, ते करतां असंख्यातगुणा स्थितिभेद, ते करता असंख्यातगुणा स्थितिभेदना अध्यवसायस्थान, ते करतो असंख्यात- गुणा अनुभागबंधना स्थान, ते करतां अनंतगुणा कर्मप्रदेशो ने ते करता अनंतगुणा तेमा रहेला रसच्छेदो जाणवा. (७४-७५) अथ प्रकृतं-जीव सर्व अनुभागबंधनामध्यवसाय स्थानोने अनुक्रम विना मरणो- चडे जेटले काले स्पर्श वेटला काळने भागममां केवळीए भावथी बादरपुद्गळपरावर्त कहेल छे. (७६-८७) ए पधा अध्यवसाय स्थानो क्रमसर जेटला काळे स्पर्श वेटला काळने भावी सूक्ष्मपुद्गलपरावर्त कहेल छे. (७८) एनो मा सार के के-जे कोइ जीव सर्व जघन्य कपायोदयरूप अध्यवसाय स्थाने वर्ततो मरण पामे, (७९) त्यार- पछी घणे काळे ते ज जीव पहेलाथी पीजा अध्यवसायस्थाने ज्यारे मरण पामे (८०) स्यारे ते मरण घुधजनो लेखामां गणे छे. उत्क्रममावी वीजा अन्य अध्यवसायोए मरण पामे सते ते लेखामां गणता नथी के जे मरणो प्रगटपणे मनंता होय थे, (८१) २६७२) भीलाललोकप्रकाश। स्मादनंतरे । तृतीये म्रियते सोऽध्य-वसायस्थानके स्थितः ॥ ८२ ॥ तदा तृतीयं मरणं गण्यते तस्य लेख्यके । त्यक्तामाणि शेषाणि नानं- तान्यपि तान्यहो ॥ ८३ ।। एवं क्रमेण सर्वाणि तानि कालेन यावता। स्पृश्यते म्रियमाणेन तेन संसारवारिधौ ॥ ८४ ॥ तावान् कालः स्या- दनंत--कालचक्रमितो महान् । भावतः पुद्गलपरा-वर्तः सूक्ष्मो जिनोदितः॥८५॥ क्षेत्रतः पुद्गलपरा-वों यः सूक्ष्म ईरितः । उपयोगी मार्गणायां स एवादियते श्रुते ॥ ८६ ॥ तथोक्तं जीवाभिगमसूत्रे सांतमिथ्याष्टि. स्थितिनिरूपणाधिकारे-जे से साइए सपज्जवसिए मिच्छदिट्ठी से जह- मेणं अंतोमुहुत्तं, उक्कोसेणं श्रणंताओ श्रोसप्पिणिउस्सप्पिणियो कालो, खेत्तयो अवह पोग्गलपरियट्ट देसूणमित्यादि. येऽन्ये च पुद्गलपरा-वर्ताः सत्तात्र दर्शिताः। ते स्युः प्ररूपणामात्रं न काप्येषां प्रयोजनं ॥ ८७॥ बादरेपु चतुर्थेषु (चतुर्पु च बादरेपु ) दर्शितेषु यथाविधि । भवंति सुगमाः सूक्ष्मा इत्येवेषां प्रयोजनं ॥ ८८ ॥ नन्वत्र पुद्गलपरा-वोंऽ. कारांतरे फरीने ते ज जीव वीजाथी अनंतर श्रीजे अध्यवसायस्थाने रह्यो सतो मरण पामे (८२ ) त्यारे ते त्रीजु मरण लेखामा गणाय. चाकीना अनंत मरणो पण क्रम- विनाना अध्यवसायवाळा गणतीमा लेवाता नथी. (८३) ए प्रमाणे क्रमसर सर्वे अध्य- वसायस्थानो जेटला काळे मरणवडे प्रा संसारवारिधिमा एक जीव स्पर्शे (८४) तेटलो महान् काळ के जे अनंतकाळचक्रप्रमाण थाय छे तेटलो काळ मायथी सूक्ष्म पुद्गलपरावर्तनो जिनेश्वरोए कह्यो छे. (८५). क्षेत्रधी सूक्ष्मपुद्गलपरावर्त जे कहेल के तेज मार्गणामा उपयोगी छे. थुतमा सेनो ज आदर करेल छे. (८६) तथोक्तं श्री जीवाभिगमपत्रे सांतमिथ्याटिस्थिातीनिरूप- णाधिकारे-जे सादिसपर्यवसित मिथ्यादृष्टि होय ते जघन्य अंतर्महर्च भने उत्कृष्ट अ. ख्याती उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी काळथी, क्षेत्रथी देशोन अपार्ष पुद्गलपरावर्व इत्यादि. मही चीजा जे सात पुद्गलपरावतों बताच्या छे ते प्ररूपणा मात्र समजवा. सेनुं काह पण प्रयोजन नथी, (८७) वळी चार पादर वो एटला माटे ज बतायेला छे के ते यथा- पवावे सवे पूक्ष्म जाणवा सुगम पडे, ए ज तेनुं प्रयोजन के. (८८) ननु इति प्रभे-'मी जे पुद्गलपरावर्त परमाणुमोनी दशांवररूप कहेल छे, ते तो द्रष्य पुगल- सर्ग ३५ मो। (६७३) मां दशांतरं । तद्व्यपुदलपरा-वर्त एवास्ति नापरे ॥ ८९ ॥ तत्कथं गलपरा-वर्तशब्दः प्रवर्तते । क्षेत्रशालादिभेदेपु ब्रूमहे श्रूयतामिह ९० ॥ परावतः पुद्गलानां शब्दव्युत्पत्तिकारणं । प्रवृत्तिहेतुस्त्वनंत- लचक्रप्रमाणता ॥ ९१ ॥ द्वावर्थधर्मों भजतः शब्दसंबंधहेतुतां । दव्युत्पादकः शब्द-प्रवृत्तिजनकोऽपि च ॥ ९२ ॥ यो गच्छति-स रत्र शब्दव्युत्पत्तिकृद्गतिः । शृंगसास्नादिमत्वं तु साथै शब्दप्रवृत्ति- [ ॥ ९३ ॥ व्युत्पत्तिहेतुसत्त्वेऽपि प्रवृत्तिहेत्वभावतः। गच्छत्यपि गजा. दौ गोशब्दो न प्रवर्त्तते ॥ ९४ ॥ व्युत्पत्तिहेत्वभावेऽपि गत्यभावात् पते गवि । प्रवृत्तिहेतुसद्भावात् गोशब्दोऽसौ प्रवर्त्तते ॥ ९५ ॥ तथा वादिभेदेषु शब्द एव प्रवर्तते । व्युत्पत्तिहेत्वभावेऽपि प्रवृत्तिहे- गोगतः ॥ ९६॥ एतच्च पुद्गलपरावर्तस्वरूपं प्रायः पंचसंग्रहकर्मग्रंथप्रवचनसारो- रसूत्रवृत्त्यायनुसारेण प्रोक्तं, श्रीभगवतीसूत्रद्वादशशतकचतुर्थोदेशक- वर्त ज के, पीजा नथी. (८९) तो पछी क्षेत्रकाळादि भेदमा पुद्गलपरावर्त शब्द केम त छ ? तेनुं कारण अमे कहीए छीए ते सामळो (९०) पुद्गळोनो परावर्त ए तो दोनी व्युत्पत्ति मात्र अर्थ छ वाफी प्रवृति हेतु तो अनंत काळचक्रनी प्रमाणता के. १) चे प्रकारना अर्थ शब्दसंबंधनी हेतुताने मजे छे. १ शन्दव्युत्पादक ने राब्दप्रधृचिजनक. (९२) जे गमन करे तेने गो (वृषम) कहीए ते शन्दनो व्युत्पत्ति- अर्थ छ भने शृंग (शींगडा) तथा गळकंपळादिवाळापणुं ते शन्दनो चिकृत अर्थ छे. (९३) व्युत्पत्ति हेतु छतो पण प्रवृचिहेतुना अमावथी गमन करे छे 1 पण गज ने अश्वादिमां गोशब्द प्रवर्ततो नथी (९४) अने व्युत्पचिहेतुनी व सते पण एटले गतिनो अमाव सते पण स्थित रहेल घृपभमा प्रवृत्ति हेतुना सद्- पथी गोशन्द प्रवर्ते छ (९५) ते ज रीते व्युत्पत्तिहेतुनो अमाव सते पण प्रवृत्ति- ना योगी चैत्रादि भेदोने विष पण ए (पुद्गलपरावर्त ) शन्द प्रवर्ते छे. (९६) मा पुद्गळपरावर्तनुं स्वरूप प्राये पंचसंग्रह, कर्मग्रंथ, प्रवचनसारोदारसूत्रवृत्या- अनुसारे कहेल छे. भी भगवतीस्त्र पारमा शतकना चोथा उद्देशानी वृत्तिमा तो (६७४) मीकाललोकप्रकाश। वृत्तौ तु औदारिकाद्रव्याणि सर्वाण्यप्येकदेहिना। अनुभूय विमुच्यते औदारिकवपुष्टया ॥ ९७ ॥ कालेन यावता तावान्' भवत्यौदारिकाभि- धः । पुद्गलानां परावर्त इत्युक्तं तत्त्वदर्शिभिः ॥ ९८ ॥ भाव्याः शेषाः षडप्येवं विबुधैःक्रियादयः । श्राहारकशरीराह-पुद्गलानां त्वसंभवी ॥ ९९ ॥ प्रत्येकमेते चानंत-कालचक्रमिता मताः । पुद्गलानाम- नंतत्वा-देकत्वाग्राहकस्य च ॥ २०० ॥ अतीताश्च भवत्येते-ऽनंताः सर्वशरीरिणां । भविष्यंतश्च भाव्यतां पूर्वोक्तेंद्रिययुक्तिवत् ॥ १ ॥ सा चैवं-न भवत्येव केपांचित् केषांचिच्च भवंति ते । एकद्विव्यादि- संख्येया-संख्यानंता यथाभवं ॥२॥ कार्मणस्तैजसश्चौदा-रिकानप्राणसंभवौ । मानसो वाचिकश्चाथ वैक्रियश्चेत्यनुक्रमात् ॥३॥ यथोत्तरं कालतोऽमी सप्तानंतगुणाधिकाः । उपपत्तिं वदंत्येवं तत्र प्राचीनसूरयः ॥ ४ ॥ सूक्ष्मत्वात्कार्मणाणून ग्रहणांच्च प्रतिक्षणं । अचिरेण समाप्यते ते तत्कालस्ततोऽल्पका एम का छे के:-" औदारिक योग्य सर्व द्रव्यो एक जीव औदारिकशरीरपणे अनुभ- चीने जेटला काळे मूके वेटला काळजें औदारिक नामनुं पुद्गलपरावर्त थाय, एम तस्वदर्शी- मोए कह्यं छे. (९७-९८ ) बाकीना छ वैक्रियादिक पुद्गळपरावर्त पण विषुधोए वे ज प्रमाणे भाववा. आहारक शरीर योग्य पुद्गलो माटे तो असंभव छे. ६.९९) ए प्रत्येक पुद्गलपरायतों पुद्गलोर्नु अनंतपणु होवाथी अने ग्राहकनु एकपणुं होवाथी अनंत काळचक्रप्रमाण कह्या छे. (२०० ) एवा पुद्गलपरावर्तो सर्व शरीरीमोए (जीवोए) अतीतकाळे अनंता कर्या छ भने पूर्व कहेली इंद्रियोसंबंधी युक्तिनी जेम भावी पण अनंता थवाना छे. (२०१) ते आ प्रमाणे-केटलाकने माविष्यकाळे न थाय भने केटला. कने एक-बे- -त्रण विगेरे संख्याता, असंख्याता के अनंता जेटलुं तेनै संसारमा रहेपार्नु होय ते प्रमाणे थाय. (२०२) कार्मण, तेजस, औदारिक, श्वासोवास, मानस, वाचिक ने क्रिय-ए अनुक्रमे ययो- तर काळपी ए साते अनंवगुणाधिक जाणवा. तेनी उपपत्ति प्राचीन भाचार्यों मा प्रमाणे कहे थे. ( ३-४ ) कार्मण परमाणुमो समपएं होवाची अने प्रतिस ग्रहण करवा- पणुं होवाथी से परावर्त थोडा काळमां समाप्त थइ जाय थे वेधी नेनो काळ अप कमो । N । सर्ग ३६ मो। (६७५) ॥५॥ तैजसाः पुद्गलाः स्थूलाः कार्मणापेक्षया ततः। कालोऽस्य भूयानल्पं हि गृह्यते स्थूलमेकदा ॥ ६ ॥ सर्पपबदरन्यायादिति शेषः. औदारिकाणां स्थूलत्वा-दशश्वग्रहणादपि । भूयान् कालोऽस्य ते ग्राह्या यदौदारिकदेहिना ॥७॥ श्रानप्राणाणवः सूक्ष्मा यद्यप्येभ्य- स्तथापि ते । पर्याप्तैरेव गृह्यते तत्कालोऽस्य ततो बहुः॥८॥ सूक्ष्म- वेऽपि .मनःपुद्ग-लानां स्यादरिकालता । एकाक्षादिमहाकाय- स्थितौ तेषामनाहतेः ॥ ९॥ भाषा द्वयक्षाद्यवस्थायां । यद्यप्यस्ति तथा- प्यसौ । भृशं स्थूला मनोऽणुभ्य-स्तदत्रानल्पकालता ॥ १०॥ भूयि- ठकाललभ्यत्वा-बैकियांगस्य सर्वतः । वैक्रियः पुद्गलपरा-वर्तोऽनंत- गुणाधिकः ॥ ११ ॥ पश्चानुपूर्व्या सप्तामी भूरिभूरितराः स्मृताः। जीवस्य दीर्घकालीनाः स्तोकाः स्युर्वहवः परे ॥ १२॥ इत्याद्यधिक भगवतीवृत्तितोऽवसेयं. छै. (५) तैजसना पुद्गळो कार्मणनी अपेक्षाए स्थूळ छे तेथी तेनो काळ कार्मणथी बंधारे कह्यो छे, कारण के स्थूळ वर्गणाओ एक समये ओछी ग्रहण करी शकाय छे. (६) सरसव ने बोरना न्यायथी. हवे प्रौदारिफर्नु वैजस करतां स्थूळपणुं होवाथी भने निरंतर ग्रहणपणुं न होवाथी तेनो वधारे काळ थाय छे, केमके तेने औदारिक शरीरी ज ग्रहण करे छे. (७) पानपान (श्वासोवास ) ना अणुओ जो के एना (औदारिकना) करता सूक्ष्म छत पर्याप्त जीवो ज ग्रहण करे (पर्याप्तपणाम ज ग्रहण थाय ) तेथी एनो काळ एना फरतां चधारे थाय छे. (८) तेना करतां मनोवर्गणा (मनना पुद्गलो) सुक्ष्म छतां पण एकेंद्रियादि मोटी कायस्थितिवाळा जीवो तेने ग्रहण करता नधी, तेथी तैनो काळ वधारे थाय छे. (९) मापा जो के बेइंद्रियादिक अवस्थामा पण छ तथापि मनोवर्गणा करता ते अत्यंत स्थूल होचायी तेनो काळ वधारे थाय छे. (१०) चैक्रिय- शरीरीपणुं सर्व करतां घणे लांचे काळे लम्य थतुं होवाथी सर्व करतां वैक्रियपुद्गल- परावर्त अनंतगुणाधिक काळप्रमाण थाय छे. (११) पश्चानुपूर्वीए मा साते पुद्गल- परावर्वो घणा भने प्रतिषणा कशा छे, कारण के जीवने दीर्घकालीन पुद्गलपरावर्त थोडा थाय छ भने अल्पकालीन पधारे थाय छे. (१२) इत्यादि अधिक भगवती- तिथी जाणवू.

(२७६) श्रीकाललोकप्रकारा. एवं वर्णितरूपपुद्गलपरावर्तेरनंतैर्मित-स्त्रैलोक्याखिलवस्तुवृंदवि- दुरैः कालो व्यतीतः स्मृतः। एतस्माच्च भवेदनंतयुणितः कालः किला- नागतो-अनादिः सांत इहादिमस्तदपरोऽनंतः सहादिः पुनः ॥ १३ ॥ तथाः-ओसप्पिणी अणंता पुग्गलपरियट्टओ मुणेयव्वो। तेणंतातीयद्धा श्रणागयता अणंतगुणा ॥१॥ यत्पंचमांगे गदित वनागते काले व्यतीता- समयाधिकत्वं । श्रानंत्यसाम्यादुभयोरनागते तद्वर्त्तमानक्षणसंगतेश्च ॥ १४ ॥ एवं च-अतीतकालादिह सर्वकालः क्षणाधिकः स्याद द्विगुण- स्तथैव । कालो व्यतीतोऽपि च सर्वकाला-जिनःप्रणीतः समयोनमर्द्धः) ॥ १५॥ कालोऽखिलोऽनागतकालतः स्यात् पूर्वोक्तयुक्त्या द्विगुणः क्षणोनः।क्षणाधिकार्द्ध किल सर्वकाला-कालो भविष्यन् भवतीति सिद्धं ॥ १६ ॥ तथोक्तं-'अणागतद्धाणं तीतद्धाणं समयाहियातीतद्धाणं श्रणागतद्धातो समयूणा' अत्र वृत्तिः-अतीतानागतौ कालावनादित्वा- नंतत्वाभ्यां समानौ, तयोश्च मध्ये भगवतः प्रश्नसमयो वर्तते, स चावि- नष्टत्वेनातीते न प्रविशति, इत्यविनष्टत्वसाधादनागते चिप्तः, ततः - . ए प्रमाणे वर्णव्यु छ स्वरूप जेनुं एवा अनंतपुद्गलपरावर्त प्रमाण काळ व्यतीत थपेल छ एम ऋण लोकमा रहेल अखिल वस्तुसमूहना जाणनारे ( केवळीओए ) कयुं छे. ए करता अनंतगुणो भनागत काळ के. अतीत काळ अनादिसांत छ भने अनागतकाळ सादिननंत छ. (१३) तथा:-'अनंती उत्सर्पिणीओए एक पुद्गलपरावर्त जाणवं. एवा भतीतकाले अनंता थया अने भनागतकाळे ते करतो अनंतगुणा यह शके तेम छे." (१) पांचमा भंगमा जे अनागत काळनु अतीत काल करतां समयाधिकपणुं फटुं छे ते नेनी आनत्यपणामां समानता होवाची अने अनागतमा वर्तमान समय उमेरवादी कहेल छे. (१४) ए रीते अतीतकाळ करतां सर्वकाळ एक समयाधिक द्विगुण कहवाय. सेमा पतीतकाळ जिनेश्वरोए सर्वकाळनी अपेक्षाए समयोन अर्ध करो छे. (१५) भना- गतकाळ करतां सर्वकाळ पूर्वोक्त युक्तिए एक चणे ऊण घमणो धाय भने सर्वकाळ करता भविष्यत् काळ क्षणाधिकथर्ध पाय एम समज. (१६) वथोकं-'अनागवकाळ अतीतकाळ करत समयाधिक अने अतीतकाळ अनागतकाळ फरवां समयोन.' मानी टीका-भवीव ने भनागतकाळ अनादिपणाधी भने अनंतपणाधी समान छे. ते षेनी बजे सर्ग ३६ मो। (६७७) समयातिरिक्तानागताद्धा भवति. इह कश्चिदाह-प्रतीताद्धातोऽनागताद्धाऽनंतगुणा, श्रत एवानं- तेनापि कालेन गतेन नासौ क्षीयते इत्यत्रोच्यते-इह समत्वमुभयो- रप्यंताभावमात्रेण विवक्षितमिति भगवतीश० २५ उ०५ । शिष्टोपदिष्टार्थवचोगरिष्ठः, क्षणाद्यनेकात्मविधो वरिष्ठः । स्वहेतुतोज्जीवितसर्वलोको, दिष्ट्या समाप्तः किल दिष्टलोकः ॥१७॥ विश्वाश्चर्यदकीर्तिकीर्तिविजयश्रीवाचकेंद्रांतिष- द्राजश्रीतनयोऽतनिष्ट विनयः श्रीतेजपालात्मजः । काव्यं यत्किल तत्र निश्चितजगत्तत्त्वप्रदीपोपमे पंचत्रिंश इहैव पूर्तिमगमत्सर्गो निसर्गोज्ज्वलः ॥ १८॥ ॥ इति श्रीलोकप्रकाशे पंचत्रिंशत्तमः सर्गः समाप्तः, तत्समाप्ती च समाप्तोऽयं दिष्टलोकः। - " भगवंतने प्रश्नने समय वर्तेले ते विनष्ट थयेल न होवाथी अतीतकाळमा प्रवेश पामी' शके नहीं, एटले अविनष्टत्वना साधर्म्यपणाथी तेने अनागवकाळमां नाख्यो छे. एटले अनागतकाळ समयाधिक थाय छे. नहीं कोई कहे छ के-प्रवीतकाळ करतां अनागतकाळ अनंतगुणो के तेथीन अनंतो काळ गया छतां ते क्षय पामतो नथी. ए संबंधमा कहे छ के-नहीं बनेनुं समपणुं जे कधुं ते अंतना अभाव मात्री ज कहुं छे. इति भगवतीशतक २५ ना उद्देशा पांचमामा फयु छे. शिष्ट पुरुषोना कहेला अर्थ ने वचनोवडे गरिष्ठ, क्षण ( समय ) मादि अनेक प्रका- रनो, वरिष्ठ एवो, स्वहेतवडे उजीवित कर्यो छे सर्व लोक जेणे एवो काळलोक भाग्य- योगे संपूर्णपणाने पाम्यो छे. (१७) विश्वमा आश्चर्यकारक छ कीर्ति जेनी एवा श्रीकीर्तिविजयवाचकेंद्रना शिष्य अने राजश्री तथा तेजपाळना पुत्र विनये जे काव्य रच्युं छे, ते मा निश्चित एका जगन्नयनुं स्वरूप बतायवाने दीपक समान लोकप्रकाश नामना ग्रंथमा स्वभाववडे उज्ज्वळ एवो भा पत्रिीशमो सर्ग संपूर्ण थयो छे. (१८.) इति लोकप्रकाशे पंचत्रिंशत्तमः सर्गः समाप्तः इति काललोकः समाप्त (६७८) भीभावलोकप्रकारा। अथ षट्त्रिंशत्तमः सर्गः प्रारभ्यते ॥ | अथ श्रीभावलोकप्रकाशः प्रारभ्यते । शंखेश्वरं प्रणिदधे प्रकटप्रभावं, त्रैलोक्यभावनिवहावगमस्वभाव । भावारिवारणहरि हरिसेवनीयं, वामेयमीश्वरममेयमहोनिधानं ॥१॥ स्वरूपं भावलोकस्य यथागममथ ब्रुवे । गुरुश्रीकीर्तिविजय-दीपोद्योतितद्ग्रहः ॥ २॥ स्वतस्तैस्तैहेतुभिर्वा तत्तद्रूपतयात्मनां । भवनान्यौपशमिका-दयो भावाः स्मृता इति ॥३॥ भवंत्यमीभिः पर्यायै-र्यद्वोपशमनादिभिः । जीवानामित्यमी भावा-स्ते च पोढा प्रकीर्तिताः॥ ४ ॥ श्राधस्तत्रौप- शमिको द्वितीयः क्षायिकाह्वयः । क्षायोपशमिको भाव-स्तार्तीयीको निरूपितः ॥ ५॥ तुर्य औदयिको भावः पंचमः पारिणामिकः। द्वया- दिसंयोगनिष्पन्नः षष्ठः स्यात्सान्निपातिकः ॥६॥ सर्ग ३६ मो. श्री शंखेश्वरपार्श्वनाथर्नु अमे ध्यान करीए छीए. ते वामामाताना पुत्र केवा छे ? प्रगट प्रभाववाळा, त्रण लोकमा रहेला भावोना समूहना स्वभावने जाणनारा, मावशत्रु- रूप 'गजनुं निवारण करवाने सिंहसमान, इंद्रोए सेवनीय भने पारावार तेजना निधान छे.(१) ए प्रभुने प्रणाम करीने श्री कीर्ति विजय गुरुमहाराजरूप दीपवडे प्रकाशित थयेल छ हृदयरूपी गृह जेनुं एवो हुँ (विनयविजय ) हवे जेम आगममा कयु छ तेम भाव- लोकन स्वरूप कई छ. (२) पोतानी मेळे अथवा ते ते हेतुअोपडे करीने ते ते रूपपणे प्रात्मानुं जे थर्बु ते भोप- भूमिकादिक भावो कहेला छे. (३) अथवा पा उपशमनादि पर्यायोबहे करीने जीवोना पावा भावो थाय छे. ते भाव छ प्रकारना कशा छे. (४) पहेलो औपशामिक, पीजो क्षायिक, बीजो बायोपशमिक, चोथो श्रौदयिक, पांचमो पारिणामिक भने छठो चे प्रण विगेरे भावोना संयोगथी निष्पन्न थयेलो सानिपातिक (५-६). हवे ते मानोनुं स्वरूप कहे थे- .

सर्ग ३६ मो। (६७९) - यः प्रदेशविपाकाभ्यां कर्मणामुदयोऽस्य यत् । विष्कमणं स एवौप- शामिकस्तेन वा कृतः॥जाक्षयःस्यात्कर्मणामात्यं-तिकोच्छेदः स एव यः। अथवा तेन निवृत्तो यः स क्षायिक इष्यते ॥८॥ अभावः समुदीर्णस्य क्षयोऽथोपशमः पुनः। विष्कभितोदयत्वं य-दनुदीर्णस्य कर्मणः ॥९॥ श्राभ्यामुभाभ्यां निवृत्तः क्षायोपशमिकाभिधः। भावस्तृतीयो निर्दिष्टः ख्यातोऽसौ मिश्र इत्यपि ॥ १० ॥ उदयावलिकायां य-त्प्रविष्टं क्षीणमेव तत् । तदन्यत्तु भवेत्कर्म, शेषमनोपशांतिमत् ॥ ११॥ वहेर्विध्यातशेषस्य भस्मच्छन्नस्य साम्यभृत् । क्षीणोपशांतं स्यात्कर्मे-त्यवस्थाद्वितयान्वितं ॥ १२ ॥ नन्वौपशमिकाद्भावो भिद्यते नैप कर्म यत् । तत्रापि क्षीणमु- दित-मुपशांतं भवेत्परं ॥ १३ ॥ अत्रोच्यते-स्यात्क्षयोपशमे कर्म-प्रदे- शानुभवात्मकः । उदयोऽप्यनुभागं तु नेषां वेदयते मनाक् ॥ १४ ॥ प्रदेशैरप्युपशमे कर्मणामुदयोऽस्ति न। विशेषोऽयमुपशम-क्षयोपशमयोः स्मृतः ॥ १५ ॥ श्रागमश्चात्र-से गुणं भंते णेरइयस्स वा तिरिकजो- जे प्रदेश ने विपाक बने प्रकारे कर्मना उदयने रोकवो ते औपशनिक अथवा तेथी उस्पन थयेल श्रात्मानो भाव ते श्रीपशमिक. कर्मोनो जे आत्यंतिक उच्छेद ते क्षायिक अथवा तेथी निष्पन्न थयेल भाव ते क्षायिक कहेवाय छे. (७-८) उदीर्णकर्मनो अभाव ते क्षय अने अनुदीर्णकर्मना उदयने रोकी देवो ते उपशम-श्रा बने (क्षय ने उपशम) बडे उत्पन्न थयेलो भाव ते त्रीजो क्षायोपशमिक भाव कहेलो छ. तेनुं बीजु नाम मिश्र पण कहेवाय छे. (९-१०) आ भावमा उदयावलीसां प्रविष्ट धयेला कर्मनी चय थाय छे अने शेषकर्म उपशांतिवाळा थाय छे. (११) अग्नि बुझाइ गयो होय अने काइक बाकी रह्यो होय ते भस्मथी ढंकाइ गयो होय तेना समानपणाने धारण करनार चे प्रकारनी व्यवस्थायुक्त मा मावमा कर्मो क्षीण अने उपशांत थाय छे. (१२) मही शिष्य प्रश्न करे छे के-'श्रीपशमिक भावथी श्रा भाव जुदो पड़ी शकश नहीं, कारण के ते भावमा पण उदितनो क्षय भने अनुदित उपशांत होय छे.' (१३) गुरु उत्तर प्रापे छ के-क्षयोपशम भावमां कर्मोनो प्रदेशानुभवरूप उदय होय छ, विपाकानु- भव किंचित् पण होतो नथी अने उपशम भावमां तो प्रदेशे पण कर्मोनो उदय होतो नथी. पा उपशम ने क्षयोपशमा तफावत छे.' (१४-१५) भागममा पा प्रमाणे कयु (६८०) श्रीभावलोकप्रकाश। णियस्स वा मणुस्सस्स वा देवस्स वा जे कडे कम्मे, णस्थि णं तस्स अवेयइत्ता मोरको ? हंता गो० ! से केणटेणं भंते ! एवं बुञ्चति ! एवं खलु गो० ! मए दुविहे कम्मे पन्नत्ते, तं० पदेसकम्मे य अणुभावकम्मे य, तत्थ णं जं पदेसकम्मं तं नियमा वेदेइ, तत्थ णं जं तं पणुभाव- कम्मं तं अत्थेगतियं वेदेति, अत्थेगतियं नो वेदेति, णातमेयं अरहता, विणायमेतं अरहता, अयं जीवे इमं कम्मं अज्झोवगमियाए वेदणाए वेदिस्सति, अयं जीवे इमं कम्मं उवक्कमियाए चेदणाए वेदिस्सति, अहाकम्मं अहानिकरणं जहा जहा तं भगवया दिटुं, तहा तहा विपरिणमिस्सतीति, से तेणद्वेणं एवं वुच्चति. यः कर्मणां विपाकेना-नुभवः सोदयो भवेत् । स एवौदयिको भावो निर्वृत्तस्तेन वा तथा ॥ १६ ॥ य एव जीवाजीवानां स्वरूपानुभवं प्रति । प्रतीभावः परीणामः स एव पारिणामिकः ॥ १७ ॥ परिणामेन निर्वृत्त इति चात्र न संभवेत् । अस्यां निरुक्तौ सादित्वं जीवत्वादेः प्रसज्यते ॥ १८॥ छ के-'हे भगवंत ! नारकीने, तियेचोने, मनुष्योने तथा देवोने तेना करेला जे कर्मों तेनो वेद्या विना तो क्षय थतो ज नींन ? ' भगवंत कहे छ के-'थाय छे पण खरो. ' गौतमस्वामी पूछे छे के-'हे प्रभु! आप एम शा कारणे कहो छो ?' प्रभु कहे के के- ' हे गौतम ! में कर्म चे प्रकारना कह्या छे. १ प्रदेशकर्म ने २ अनुभावकर्म. तेमा जे प्रदेशकर्म छे ते तो निश्चये वेदाय ले अने जे अनुमावकर्म छे तेमाथी कोइक वेदाय के ने कोइक वेदातां नथी. आ अरिहंते जाणेलुं छे भने अरिहंते विशेष रीते जाणेलु के के आ जीव आ कर्मने अझोवमिक वेदनाए (विपाकउदये) वेदशे भने श्रा जीव आ कर्म उपक्रमिक वेदनाए (प्रदेशउदये ) वेदशे. जे कर्म जेवा निकरणपणे जेवी जेवी रीते भगवते दीढ़ छे ते कर्म तेवी रीते विपरिणम एम समजवू. आ कारणे एम कहेलुं छे. हवे जे कर्मनो विपाकवडे अनुभव ते उदय कहेवाय के अने जे उदय तेज औदयिक भाव कहेवाय छे अथवा ते उदयथी उत्पन्न थयेलो जे भाव ते औदयिक माव समजवो. (१६) जे जीव के अजीवने स्वरूपानुभव करवामां जे तत्परता ते ज परिणाम कहेवाय छे. तेने ज पारिणामिक भाव जाणवो. (१७) परिणामवडे निर्वृत्त थयेलो-बनेलो भाव ते पारिणामिक भाव एवो अर्थ अहीं संभवतो नथी, केमके एवी व्युत्पत्ति एटले मर्थ करवाथी तो बीवत्वादिकनुं सादिपर्ण थाय. (१८) .. .

सर्ग १६ मौ. (६८१) अत्र चाद्यास्त्रयः प्रादु-र्भवेयुः कर्मघाततः। रजोभ्रविगमे तिग्म-र- श्मिकांतिकलापवत् ॥ १९ ॥ सर्वतो देशतश्चेति विघातः कर्मणां द्विधा । आद्यः स्ववीर्यापेक्षोऽन्यः सकर्मात्मप्रयोगजः ॥ २० ॥ तुर्यस्तु भावः स्वोपात्त-कर्मोदयसमुद्भवः । सुरामदोदयाद्गीत-नृत्तहास्यादिभाववत् ॥ २१ ॥ पारिणामिकभावस्तु निर्दिष्टो निनिमित्तकः । अत एव स्वार्थि- कोऽत्र प्रत्ययो राक्षसादिवत् ॥ २२ ॥ श्रादिमाश्च त्रयो भावा जीवाना- मेव निश्चिताः । अंतिमौ तौ पुनर्जीवा-जीवसाधारणौ स्मृतौ ॥ २३ ॥ एकत्र द्वयादिभावानां सन्निपातोऽत्र वर्त्तन । यो भावस्तेन निर्वृत्तः स भवेत्सान्निपातिकः ॥ २४ ॥ कर्मग्रंथसूत्रवृत्तितत्त्वार्थभाष्यभावप्रकर- णादिष्वयमेव भावपट्कोद्देशक्रमः, अनुयोगद्वारसूत्रमहाभाष्यसूत्रवृत्त्या- दिषु तु औदयिकौपशमिकक्षायिकक्षायोपशमिकपारिणामिकसान्निपाति- आ भावोमा प्रथमना त्रण भावो कर्मना घातथी उत्पन्न थाय छे. रज भने वादळा- ना दूर थवाथी थती सूर्यनी कातिनी जेम. ( १९) कर्मनो विघात सर्वधी भने देशथी एम चे प्रकारे थाय छे. तेमा पहेला (सर्वथी विघात) स्व(आत्म )वीर्यनी अपेक्षाथी थाय के अने बीजो (देशथी विघात) सकर्म एवा आत्माना प्रयोगथी थाय छे. (२०) चौथो (ौदयिक) भाव पोताना यांधला कर्मना उदयथी उत्पन्न थाय छे. मदिरापानना उदयथी थता गीत, नृत्य, हास्यादि भावनी जेम. (२१) पांचमी पारिणामिक भाव निनिमित्तक (श्रात्माना वीर्य के क्रियानी अपेक्षारहित ) कयो के तेथी अहीं रावसादि शब्दनी जेम स्वार्थमा इक प्रत्यय समजवो. (२२) आ पांच पैकी प्रथमना व्रण भावो जीवो- ने ज होय छ भने चौथो ने पांचमो ए वे भाव जीव-अजीव बनेने साधारण कहा थे. (२३). एकत्र ये विगेरे भावोनो जे सन्निपाव-मेळा थर्बु तेनुं जे वर्तन तेथी उत्पन्न थतो भाव से सान्निपातिक भाव कह्यो छे. (२४) कर्मग्रंथसूत्रवृत्ति, तवार्थभाष्य, भावप्रकरणादिने विपे ा प्रमाणे ज छ भावना उद्देशनो क्रम कहेलो छे. अनुयोगद्वार सूत्र ने महाभाष्य सूत्रनी वृत्यादिकमां तो मौदयिक, औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक, पारिणामिक ने साभिपातिक ए प्रमाणे क्रम कहेलो छे. तेमा कर्मग्रंथादि सूत्रोने विपे जे .

.. (६८२) श्रीभावलोकप्रकाश। का भावा इति. तत्र कर्मग्रंथादिसूत्रेषु यत्प्रवचनोक्तकमलंघनं तत्र लाघवं कालस्वामिभेदतारतम्यं च हेतुमामनंति. आंतमाहूर्तिकत्वेन यत आद्योऽल्पकालिकः । तथाल्पस्वामिक इति प्रथमं स प्ररूपितः ॥२५॥ न प्राप्नुयुर्यबहवः परिणाममिहेदृशं । भाव- स्तदौपशमिको मितस्वामिक इप्यते ॥ २६ ॥ भूरिभेदो भूरिकालो भूरि- स्वामिक एव च । क्षायिको ह्यौपशमिका-त्तदुक्तस्तदनंतरं ॥ २७ ॥ क्षायोपशमिकः पश्चा-रक्षायिकात्तत एव च । एवमौदयिकः प्रोक्तः क्षायोपशमिकादनु ॥ २८ ॥ ततो भूरिकर्मयोगात् स्वामिसाधर्म्यतोऽपि च । युक्तं क्षायोपशमिका-दन्वौदायिकशंसनं ॥२९॥ अत्यंतभिन्नः पूर्वे भ्यो महाविषय एव यत् । पारिणामिक इत्युक्तो भावादौदयिकादनु ॥ ३० ॥ पूर्वेपां द्वयादिसंयोगा-दाविर्भवति यन्ननु । तयुक्तमुदितः सर्व- पर्यते सान्निपातिकः ।। ३१॥ द्वौ नवाष्टादशाथैक-विंशतिश्च त्रयः क्रमात् । एपामुत्तरभेदाः स्यु- प्रवचनोक्त क्रमनुं उल्लंघन करेलुं के तेमा लाघव अने काळ, स्वामि अने भेदनुं तारतम्य ज हेतुभूत छे. ते या प्रमाणे.- प्रथम उपशम भाव कहेल के केमके ते प्रांतमहर्तिक स्थितिवाळी होवाथी अन्प- कालिक के अने तेना स्वामी पण अल्प होय छे. ( २५) कारण के अहीं तेवा प्रकारना परिणामने घणा जीयो पामता नथी, तेथीश्रा औपशामिक भावना स्वामी थोडा कया छे. (२६ ) ए औपशमिक भावी पणा भेदवाळो, घणा काळनी स्थितियाळो अने घणा स्वामीवाळो होवाथी चायिक भाव त्यारपछी ( पीजो) कहेलो छ (२७) भने तेज कारणोथी क्षायिकनी पछी क्षायोपशमिक भाव कहेलो छे. औदायिक भाव पण ते ज कारणोथी बायोपशमिकनी पछी कहलो छे. (२८) घणा कर्मोंना योगवाळो होवाथीने स्वामीना साधर्म्यपणाथी बायोपशमिफनी पछी औदायिक कहेल छे ते युक्त छे. (२९) पूर्वना बधा भावोथी अत्यंत भिन्न होवाथी अने महाविषयवाळो होवाथी औदयिक भावनी पछी परिणामिक भाव कहेलो छे. (३०) पूर्व कहेला भावोमाथी -त्रण विगेरेना संयो- गयी उत्पन्न थतो होवाथी सर्वनी प्रांते सानिपातिक भाव कहेल छे ते युक्त ज छ. (३१) पूर्वोक्त भावोना अनुक्रमे चे, नव, प्रदार, एकवीश अने त्रण ए प्रमाणे उत्सर भेदो छे. ते एकत्र करता ५३ भेद थाय ले. (३२) (ौपशमिकना मे, क्षायिकना नन, सर्म १६ मा । (६८३) स्त्रिपंचाशच मीलिताः॥३२॥ औ० २ क्षायि० ९ क्षायो० १८ औद० २१ पा० ३ सर्व० ५३ । सान्निपातिकभावस्तु पड्विंशतिविधो भवेत् । तत्रोपयुक्ताः षड्भेदा विंशतिस्त्वप्रयोजकाः ॥ ३३ ॥ सम्यक्त्वं यद्भवत्यादौ ग्रंथिभेदादनंतरं । स्याद्यच्चोपशमश्रेण्यां सम्यक्त्वं चरणं तथा ॥ ३४॥ द्वावौपशमिको भावी प्रोक्तावेतौ मह- पिभिः। ब्रूमहे क्षायिकस्याथ नवभेदान् यथागमं ॥ ३५ ॥ ये ज्ञानदर्शने स्यातां निर्मूलावरणक्षयात् । सम्यक्त्वं यच्च सम्यवत्व-मोहनीयक्षयो. द्भवं ॥ ३६॥ चारित्रं यच्च चारित्र-मोहनीयक्षयोत्थितं । याश्च दाना धंतराय-पंचकक्षयसंभवाः ॥३७ ॥ दानलाभभोगवीर्यो-पभोगलब्ध. योऽद्भुताः । नवामी क्षायिका भावा भवेयुः सर्ववेदिनां ॥ ३८॥ मतिश्रुतावधिमनः-पर्यायाणां चतुष्टयं । मत्यज्ञानश्रुनाज्ञान-विभंगा इति च त्रयं ॥ ३९ ॥ यतो ज्ञानावरणीय-क्षयोपशमसंभवाः । ततः क्षायोपशमिका भावाः सप्तोदिता मी ॥४०॥ ज्ञानी सम्यक्त्वयो. क्षायोपशमिकना १८, श्रौदयिकना २१ अने पारिणामिकना प्रण-कुल ५३.) सानिपातिक भाव २६ प्रकारनो छे. तेमा उपयोगी भेद ६ छे; वाकीना २० उपयोगमा भावनारा नथी. (३३) अनादि मिथ्यात्वीने ग्रंथि मेद करवाथी अनंतर प्रथम श्रौपशमिक सम्यक्त्व थाय छ भने उपशम श्रेणि मांडे त्यारे उपशम भावनुं समकित ने चारित्र बने थाय छे. (३४) वेधी महर्षिोए ए रीते श्रीपशमिक भाव चे प्रकारे कडेल छ, हवे क्षायिक भावन नव मेद भागमानुसारे कहे छे. (३५) ज्ञानावरणीय ने दर्शनावरणीय कर्म समूळ निर्मू थवाथी जे केवळज्ञान ने केवळदर्शन प्राप्त थाय छे ते चे २, समलित मोहनीयना चयथी उत्पन थतुं क्षायिक समाकत ३, चारित्रमोहनीयना क्षयथी उम्पन यतुं तायिक (यथा- ख्यात ) चारित्र ४ अने दानादिक पांच अंतरायनो चय थवाथी उत्पन्न यता चापिक. भावना दान ५, लाभ ६, भोग ७, उपमेाग ८ अने वीर्य ९. श्रा ना प्रकार चायिक भावना छे. ते सर्वज्ञने प्राप्त थाय छे. ( ३६ थी ३८.), हवे क्षायोपशमिक भावना १८ भेद कहे छः-मति, श्रुत, प्राधि ने मनःपर्यव-ए चार ज्ञान अने मति अज्ञान, श्रुत अज्ञान तथा विमंगज्ञान-ए प्रण अज्ञान-कुन ७ ज्ञानावरणीय कर्मना क्षयोपशमथी उत्पन थता होयाथी ते घायोपशमिक भावना कहै- (६८४) भीमावलोकप्रकाश। गेना-ऽज्ञानी मिथ्यात्वांश्च साक्षायोपशमिकत्वं त-दज्ञानानामपि स्फुट ॥४१॥ श्रचक्षुश्चक्षुरवधि-दर्शनानीति च त्रयं। दर्शनावरणीयाख्य- क्षयोपशमसंभवं ॥ ४२ ॥ सम्यक्त्वं यदनंतानु-बंधिदर्शनमोहयोः । भवेत्क्षयोपशमतः क्षायोपशमिकं ततः ॥ ४३॥ यद् द्वादशकपायादि- चारित्रमोहकर्मणः। भवेत्क्षयोपशमतः क्षायोपशमिकं ततः ॥ ४४ ॥ संकल्पवलुप्तात्प्राणाति-पातादेर्यन्निवर्तनं । प्रारंभोत्थादनिवृत्तिः संयमा- संयमो ह्ययं ॥ ४५ ॥ एप चारित्रमोहस्य यत्कपायाष्टकात्मनः । भवेत्क्ष- योपशमतः क्षायोपशमिकस्ततः॥ ४६ ॥ दानादिलब्धयः पंच छद्म- स्थानां भवति याः। क्षायोपशमिक्यो विघ्न-क्षयोपशमजा हि ताः ॥४७॥ भावा अष्टादशाप्येवं क्षायोपशमिका इमे। कर्मक्षयोपशमतो यद्भवंत्युक्तया दिशा ॥ १८ ॥ वाय छे. (३९-४०) तेमा सम्यक्त्वना संयोगथी जीव ज्ञानी कहेवाय छ भने मिथ्या- त्वना संयोगथी अज्ञानी कहेवाय छे तेथी अज्ञानोने माटे पण ज्ञानावरणीय कर्मनुं क्षायो- पशमिकपणुं सिद्ध थाय छे. (७) (४१) चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन ने अवधिदर्शन एत्रण दर्शनावरणीय कर्मना क्षयोपशमधी उत्पन्न थाय छे. (८-१०) (४२) अनंतानुबंधी चतुष्क भने दर्शनमोहनीयना क्षयोपशमी थतुं सम्यक्त्व ते पण क्षायोपशमिक कहेवाय छे. (११) (४३) बार कपायादि चारित्रमोहनीय कर्मना क्षयोपशमथी जे चारित्र (सर्ववि- रति) प्राप्त थाय छे ते क्षायोपशामिक भावनुं चारित्र कहेवाय छे. (१२) (४४) संकल्पीने (निरपेक्षपणे निरपराधि त्रसजीवनी) हिंसादिकथी जे निवर्तवू अने प्रारंभ (विगेरे)थी उत्पन्न थयेली हिंसादिकथी न निवर्तवू ते संयमासंयम (देशविरति) छे. (१३) (४५) श्रा देशविरति चारित्रमोहनीयना आठ कपायोना क्षयोपशमयी प्राप्त थाय छे तेथी ते वायो. पशामिक समजवी. (४६ ) छमस्थ जीवोने दानादि पांच लब्धियो अंतराय कर्मना क्षयोपशमथी उत्पन्न (प्राप्त) थाय छ तेथी ते पांच क्षायोपशमिकी समजची. (१४ थी १८) (४७) ए प्रमाणे क्षयोपशम भावना १८ भेद समजवा के जे उपर कह्या प्रमाणे कर्मोना क्षयोपशमी उत्पन्न थाय छे. (४८) (चार प्रकारना ज्ञान, त्रण प्रकारना अज्ञान, प्रथमना त्रण दर्शन, समकित, देश- विरति, सर्वविरति भने दान, लाम, भोग, उपभोग ने वीर्यरूप पांच प्रकारनी लन्धि, कुल १८ मेद क्षयोपशम भावना जाणवा.)

मा १६ मो। (६८५) अथाज्ञानमसिद्धत्व-मसंयम इमे त्रयः। लेश्याषट्क कपायाणां गतीनां च चतुष्टयं ॥ ४९ ॥ वेदास्त्रयोऽथ मिथ्यात्वं भावा इत्येकवि- शतिः। कर्मणामुदयाजाता-स्तत औदयिकाः स्मृताः ॥ ५० ॥ अतत्वे तत्वबुद्ध्यादि-स्वरूपं भूरिदुःखदं । मिथ्यात्वमोहोदयज-मज्ञानं तत्र कीर्तितं ॥ ५१ ॥ यदभ्यधायि-जह दुव्वयणमवयणं कुच्छियसीलं असी- लमसईए । भन्नइ तह नाणंपि हु मिच्छदिहिस्स अन्नाणं ॥ ५२ ॥ असिद्धत्वमपि ज्ञेय-मष्टकर्मोदयोद्भवं । प्रत्याख्यानावरणीयो-दयाच्च स्यादसंयमः ।। ५३ ।। लेश्याः कपायनिप्पंद इति येषां मतं मतं । तेषां मते कपायाख्य-मोहोदयभवा इमाः ॥ ५४॥ येषां मते त्वष्टकर्म-परि- णामात्मिका इमाः । श्रष्टकर्मोदयाचेपां मतेऽसिद्धत्ववन्मताः ॥ ५५ ॥ येषां योगपरीणामो लेश्या इति मतं मतं । तेषां त्रियोगिजनक-को- दयभवा इमाः ॥५६॥ इति कर्मग्रंथवृत्त्यभिप्रायः, तत्त्वार्थवृत्तौ च मनोयोगपरीणामोलेश्या इत्युक्तं, तथाहि-ननु कर्मप्रकृतिभेदानां द्वाविंशं . हवे श्रीदपिक मावना २१ मेद कहे थे-अन्नान, अमिद्धत्व ने भसंयम-ए प्रण, छ लेश्या, चार कपाय, चार गति, प्रण वेद ने एक मिथ्यात्व-मा २१ प्रकार फर्मोना उदयपी जीवने प्रास थाय छे. तेथी ते भोदयिक भाव कहेवाय छे. (४९-५०) सेमा प्रतवर्मा ववद्धि विगैरे स्वरूपवालं, अत्यंत दास प्रापनारुं भने मिथ्यात्व- मोहनीयथी उत्पन्न बनारु प्रज्ञान कहलं छे. (५१) क{ छ के-' जेम दुर्वचन ते भवचन भने भसतानुं कुत्सितशील ते भशील कोईवाय तेम मिथ्याटिनुं प्रान पण मशान कईयाय छे. (५२) माठे प्रकारना कर्मोन। उदयपी उत्पम पतुं प्रसिद्धत्व थे. प्रत्याख्यानावरणीय कपायना उदयपी असंयम प्राप्त थाप छे. (५३) जेना मवे कपा- पना निष्पंदरूप लेश्या के तेना मते कपायमोहनीयना उदयपी उत्पन्न धयेली छ लेरयामा छे. (५४) बेना मठे मष्टकर्मना परिणामरूप लेश्या छ, सेना मते ममिदतनी जेम घट कर्मोदयजन्य लेरया समजवी. (५५) भने जेना मते योगपरिगामरूप लेश्या, सेना मते पियोगीजनक कर्मना उदयपी उमरेली लेश्या ममवी. (५६) मा प्रमाणे कर्मग्रंपपिनो मभिप्राय वा समातिमा मनोयोगना परियामरूप लेरया कही भा प्रमाणे-'शिप प्रश्न को छ के-कर्मप्रकविना १२२ भेदनी प्रपिट भीभावलोप्रकाश। शतं प्रकृतिगणनया प्रसिद्धमानायेन च तत्र लेश्याः न परिपठिता- स्तदेतत्कथमुच्यते-वक्ष्यते नामकर्मणि मनःपर्याप्तिः, पर्याप्तिश्च करण- विशेषो, येन मनोयोग्यपुद्गलानादाय चिंतयति, ते च मन्यमानाः पुद्गलाः सहकरणान्मनोयोग उच्यते, मनोयोगपरिणामश्च लेश्या इति. एवं मतत्रयेऽपि यथास्वं लेश्यानामंतर्भावो वाच्यः। अत्र मतत्रयेंत्यं पटीयोऽन्ये चानीहशे इत्यादि द्रव्यलोके लेश्याधिकारे प्रपंचितमस्ति. कषायाः स्युः क्रोधमान-मायालोमा इमे पुनः। कषायमोहनीया- ख्य-कर्मोदयसमुद्भवाः ॥ ५७ ॥ गतयो देवमनुज-तिर्यग्नरकलक्षणाः। भवतीह गतिनाम-कर्मोदयसमुद्भवाः॥ ५८॥ नोकपायमोहनीयो-दयो- भृता भवत्यथ । स्त्रीपुंनपुंसकाभिख्या वेदाः खेदाश्रया भृशं ॥ ५९ ॥ मिथ्यात्वमपि मिथ्यात्व-मोहनीयोदयोद्गतं । एवमौदयिका भावा व्याख्याता एकविंशतिः॥६०॥ ननु निद्रादयो भावा-स्तत्तत्कर्मोदयोद्गताः। अन्येऽपि संति तत्केयं आम्नाय प्रमाणे गणना करता तेमा लेश्या प्रावती नथी वो समे मनोयोगना परिणाम- रूप तेने केम कहो छो?' तेनो उत्तर आपे छ के-'आगळ नामकर्ममा मनापर्याप्ति कहेवाशे. ते पर्याप्ति करणविशेष छे. के जे करणवडे मनोयोग्य पुद्गलोने ग्रहण करी चितवन कराय छे ते मनरूप थयेला पुद्गलो सहकारी कारण होवाथी मनोयोग कहेवाय छ. ते मनोयोगना परिणामरूप लेश्या छे एप समजQ. उपर प्रमाणे त्रण मतमा यथायोग्यपणे लेण्यानो अंतर्भाव समजवो. 'श्रावण मतमा छल्लो मत ठीक चे अने पहेलाचे मत घरावर नथी' इत्यादि द्रव्यलोकमा लेश्या. धिकारमा सविस्तर कहेलुं छे. हवे चार कषाय-क्रोध, मान, माया, लोभ, ते कपायो कपायमोहनीयकर्मना उदयथी थयेला छे. ( ५७ ) देव, ननुष्य, तियच ने नारकीरूप चार गति छे ते गतिनामकर्मना उदयी प्राप्त थाय छे. (५८) अत्यंत खेद आपनार स्त्री, पुरुप ने नपुंसक नामना प्रण वेद नोकपायमोहनीयकर्मना उदयथी प्राप्त थाय छे. (५९) मिथ्यात्वमोहनीयना उदयथी मिथ्यात्व प्राप्त थाय छे. आ प्रमाणे औदायिक भावना २१ भेदतुं विवरण समज. (६०) अहि शिष्य प्रश्न करे छ के- 'ते ते कर्मना उदयथी जीवने प्राप्त थता निद्रादिक भाव विगेरे चीजा घणा मावो छे, तो औदायिक भावना मेदनी संख्या २१ नी ज केम कही के?' (६१) तेने उत्तर भापे छ के-'सावर्षावडे, साहचर्यचडे, माक्षेपथी भने उपलक्षणधी मगे ३६ मो। (६८७) गणनाकविंशतः ॥ ६१ ॥ अत्रोच्यते-यथासंभवमेष्वेवां-तर्भाव्या अप- रेऽपि ते। सावर्ण्यसाहचर्याभ्या-माक्षेपारोपलक्षणात् ॥ ६२ ।। निद्रापंच. कमाक्षिप्त-मज्ञानग्रहणाद्यतः। स्यादज्ञानं मोहनीया-वरणद्वितयोद- यात् ॥ ६३ ॥ गतिग्रहणतः शेष-नामकर्मभिदा वजः। श्रातिप्यतेऽवि- नाभावा-त्सावाद्वोपलक्ष्यते ॥ ६४ ॥ श्रापि वेदनीये द्वे गोने द्वे इत्यमून्यपि । प्राक्षिप्यतेऽत्र गत्यैवा-ऽनन्यथाभावतः खलु ॥ ६५ ॥ जात्यादिनामगोत्रायुर्वेद्यानां कर्मणां ध्रुवं । भवधारणहेतूना-मसत्येक- तरेऽपि यत् ॥ ६६ ॥ गतिर्न संभवत्येवा-ऽव्यभिचारि ततः स्फुटं । ज्ञेय- मेषां साहचर्य-महत्यपि तथेक्षणात् ॥ ६७ ॥ हास्यादि पट्कमाक्षिप्त वेदानां ग्रहणादिह । यदेतेऽव्यभिचारेण वेदोपग्रहकारिणः ॥६८ ॥ यद्वा कपायग्रहणा-द्वास्यादीनां परिग्रहः । सावात्सहचाराच्च कपायनोक- पाययोः ॥ ६९ ॥ इत्यर्थतस्तत्त्वार्थवृत्तो. कर्मग्रंथवृत्तावप्युक्तं-ननु निद्रा. पंचकसातादिवेदनीयरत्यरतिप्रभृतयः प्रभृततरभावा अन्येऽपि कर्मोदय- ए चीजा भावोनो यथासंभव अंतर्भाव करी लेवो. (६२) जेमके निद्रापंचकनो अज्ञान ग्रहण करेल होपाधी तेमा भाक्षेप (समावेश) करवो. कारण के जे अज्ञान के ते मोहनीय पने ज्ञानावरणीय तथा दर्शनावरणीय एवे प्रकारना प्रावरणरूप कर्मना उदयथी ज थाय छ. ( ६३ ) गति ग्रहण करवाथी नामकर्मनी वीजी प्रकृतियोना समूहनो तेमा आक्षेप करी लेवो. कारण के ते प्रकृतिमोनो उदय गतिविना थतो नथी तेथी अथवा तो तेना सावर्ण्य- पणाथी तेनुं उपलक्षण करी ले. (६४) आयुकर्म, ये प्रकारचें वेदनीय ने ये प्रकारनुं गौत्रकर्म तेनी पण गतिथी ज ाक्षेप करी लेवो, कारण के तेनो उदय पण गतिविना थतो नी. (६५) जात्यादि नामकर्म, गोत्र, श्रायु ने वेदनीय कर्म के जे भवधारणना हेतुभूत छे, तेमाथी एकनो पण प्रभाव होय तो गतिनाम संमवे ज नहीं, तेथी सेनुं भव्य- भिचारीपणुं प्रगट ज छ भने साहचर्यपणुं पण ते ज प्रकारे सिद्ध थे.-(६६-६७ ) प्रण वेदना ग्रहण करयाची हास्यादि पदकनो तेमा समावेश करी लेवो, कारण के ते अन्य- भिचार्गपणे वेदोदयने उपग्रह करनारा 2. (६८) अथवा चार कपाय ग्रहण करवाधी हास्यादि पकनी तमा समावेश करी लेवो. कारण के कपाय अने नोकपायर्नु सावर्गपणं भने सहपारीपणुं छे. (६९) या प्रमाणे अर्थधी तयार्थप्रतिमा कोल छे. कर्मग्रंथनी प्रतिमा पण माथे के-'निद्रापंचरु, सातादि वेदनीय, रति भरति विगो पणा माशे (६८८) भीमावनोकप्रकाश जन्याः संति, तरिकमित्येतावंत एवेति निर्दिष्टाः ? सत्यं, उपलक्षणत्वा- दन्येऽपि दृष्टव्याः, केवलं पूर्वशास्त्रेपु एतावंत एव निर्दिष्टा दृश्यंते, इत्य- त्राप्येतावंत एवास्माभिः प्रदर्शिता इति. जीवत्वमथ भव्यत्व-मभव्यत्वमिति त्रयः । स्युः पारिणामिका भावा नित्यमीहक्स्वभावतः ॥ ७० ॥ यदभव्यो न भव्यत्वं भव्यो वा नैत्यभव्यतां । कदाप्यजीवो जीवत्वं जीवो वा न ह्यजीवता ॥७१॥ जीव एवात्र जीवत्वं स्वार्थिकः प्रत्ययो ह्ययं । भाविसिद्धिर्भवेद्भव्यः सिद्ध्यनर्हस्त्वभव्यकः ॥ ७२ ।। भावाः संति परेऽप्यस्ति-त्वादयः पारि- णामिकाः। किंतु जीवाजीवसाधा-रणा इत्यत्र नोदिताः ॥ ७३ ॥ जीव- स्यैव परं ये स्यु-न त्वजीवस्य कर्हिचित् । तेऽपि पंचाशदत्रोक्ताः सदौ- पशमिकादयः॥७४ ॥ तथोक्तं तत्त्वार्थभाष्ये-जीवत्वभव्यत्वाभव्यत्वा- दीनि च जीवत्वं भव्यत्वमभव्यत्वमित्येते त्रयः पारिणामिका भावाभवंति. श्रादिग्रहणं किमर्थमित्यत्रोच्यते-अस्तित्वमन्यत्वं कर्तृत्वं भोक्तृत्वं गुण- बीजा पण कर्मोदयजन्य छे ते छतां श्राटला ( २१) ज औदायिक भाव कम कह्या छ ? तेने उत्तर आपे छ के 'तारूं कहे सत्य छे, परंतु उपलक्षणथी बीजा मेदो पण ग्रहण करी लेवा केवळ पूर्व शाखामा आटला ज भेद बताच्या के तेथी धर्म नहीं पण तेटला ज मेद कह्या छे. हवे जीवत्व, भव्यत्व अने अगव्यत्व एत्रण भेद निरंतर एवो स्वभाव होवाथी पारिणामिक भावना कहेला छे. (७०) कारण के मध्य कदापि पण भव्य पत्तो नधी, भव्य अभव्य थत्तो नथी, अजीव जीवत्व पामतो नथी अने जीव अजीवत्व पामतो नथी. (७१) जीव ते ज जीवत्व ए रीते नहीं स्वार्थमा स्वप्रत्यय समजवो. जेनी भाविकाळे सिद्धि थवानी छे ते भव्य अने जे सिद्धिने अयोग्य छ ते अभव्य जाणवा. (७२) जीजा अस्तित्वादिक पण पारिणामिक भाव छ, परंतु ते जीव अने अजीवने माधारण होवाथी नहीं कहेवामा पाव्या नथी. (७३) उपर जे औपशमिकादि चार भावना पचास मेद कहेवामां आव्या छे ते जीवने ज होय छे, कदी पण अजीवने होता नथी. (७४) श्री तत्वार्थभाष्यमा कमु छ के-'जीवत्व, भव्यत्व भने प्रभव्यत्व विगेरे एटले जीवत्व, भव्यत्व ने भमन्यत्व एत्रण भेद पारिणामिक भावना छे.' अहीं भादि शब्द शामाटे ग्रहण कर्यो छे ?' तेने उत्तर भाप छ के- 'मस्तित्व, अन्यल, फर्चुन्च , .

सर्ग ३६ मो। (६८९) वत्त्वमसर्वगतत्वमनादिकर्मसंतानवद्धत्वं प्रदेशवत्त्वमरूपत्वं नित्यत्वमित्येव- मादयोऽप्यनादिपारिणामिका जीवस्य भावा भवंति धर्मादिभिस्तु समाना इत्यादिग्रहणेन सूचिता इति। अजीवानां कर्तृत्वभोक्तृत्वादिकं चैवं तत्त्वा- र्थटीकायां-कर्तृत्वं सूर्यकांतेऽपि सवितृकिरणगोमयसंगमादुपलभ्यतेऽग्नि- निर्वृत्तावेतरसामान्य, भोक्तृवं मदिरादिष्वत्यंत प्रसिद्ध, भुक्तोऽनया गुड इति. क्रोधादिमत्त्वाद्गुणवत्त्वं ज्ञानाद्यात्मकत्वाद्वा परमाण्वादावपि गुण- वत्वमेकवर्णादित्वात्समानं, अनादिकर्मसंतानवद्धत्वमिति कार्मणशरीर- मप्यनादिकर्मसंतानवद्धमिति चेतनाचेतनयोधर्मसाम्य, भाष्यकारः पुनर- प्यादिग्रहणं कुर्वन् ज्ञापयत्यत्रानंतधर्मकमेकं, तनाशक्याः प्रस्तारयितुं सर्वे धर्माः प्रतिपदं, प्रवचनझेन पुंसा यथासंभवमायोजनीयाः, क्रियावत्वं पर्यायोपयोगिता प्रदेशाष्टकनिश्चलता एवंप्रकाराः संति भूयास इति. सान्निपातिकभावानां कुर्महेऽथनिरूपणम् । तत्र स्युर्दिकसंयोगा दश ते नामतस्त्वमी ॥७५॥ श्राद्यः स्यादौपशमिक-क्षायिकाख्यसमन्वये। मोक्तृत्व, कर्तृत्व, असर्वगतत्व, मनादिकर्मसंतानवद्धत्व, प्रदेशवत्व, अरूपत्व, नित्यत्व, विगेरे पण अनादि पारिणामिक भावी जीवना होय छे. ते धर्मास्तिकायादि भजीयोनी साथे पण समान होय छे. एम श्रादि शन्दना प्रहणथी सूचव्युं छे. हवे अजीवोनुं कर्तृत्व, मोक्तृत्व विगेरे था प्रमाणे तत्त्वार्थ टीकामा कयुं छे.-सूर्यकांतने विपे पण सूर्यना किरण भने गोमयना संगम थकी भमि उत्पन्न करवामां कईत्व उपलब्ध थाय छे तेथी के रीते सामान्यता है. भोक्तृत्व मदिरादिकने विपे अत्यंत प्रसिद्ध थे जेमके भाणे (मदिराए) गोळ साधो के. ए रीते मोक्त्व पण समान थे. हवे क्रोधादिवाळो होवाधी अथवा शानादियाळी होवाची जेम जीवने विपे गुणवस छ तेम परमाणु विगेरेने विपे पण एक- गुणपर्णादि होपायी गुणववनी समानता है. तथा मनादिकर्ममतानगद्धत्व पापत विचार करता कामयशरीर पय भनादिकर्ममंतानबद थे. ए प्रमाणे चेतन भने अचेतनना धर्मर्नु साम्यपणुंचे. भाष्यकार पळी फरीची भादिशब्दने ग्रहण करता सवा मही जीव भने मजी पने अनंत धर्मयाला कहे थे, तेषी ते मर्वे धर्मों दरेक पदे जुदा पारया मशक्य है। माटे प्रवचन ना जाण पुरुपे यथासंभव लेनी योजना को लेवी क्रियायाल, पर्यापोपयोगिता, प्रदे- शाएकनिथळसा (माठ रुचकप्रदेशनुं निधळपj) इत्यादि भनेक प्रकारोपण समानमाषी हे. हवे साक्षिपातिक मापोनुं निरूपण करीए छोए.वेमा टिकमयोगी दरा मांगा पाप के वेना नाम मा प्रमाणे-भोपथमिक ने पायिक, २ भोपामिक ने पायोपशामक, (६९०) श्रीभावलोकप्रकाश द्वितीयस्त्वौपशमिक-क्षायोपशमिकान्वये ॥ ७६ ॥ तृतीयश्चौपशमिको- दयिकाख्यसमागमे । चतुर्थ औपशमिक-पारिणामिकसयुतौ ॥ ७७ ॥ क्षायिकक्षायोपशमि-कान्वयोत्थस्तु पंचमः।क्षायिकौदयिकाभ्यां च षष्ठो भंगः समन्वये ॥७८॥ सप्तमस्तु क्षायिकेण पारिणामिकसंगमे। अष्टमः स्यादौदयिक-क्षायोपशमिकान्वये ॥७९॥ पारिणामिकमिश्राभ्यां मि- श्राभ्यां नवमो मतः । दशमः स्यादौदयिक-पारिणामिकयोगजः ॥८॥ त्रिकसंयोगजा भंगा दश तत्रायमादिमः। क्षयक्षयोपशमजो-पश- मोत्थैः समागतैः ॥ ८१॥ क्षायिकौदयिकाख्यौप-शमिकाख्यैर्द्वितीयकः । तृतीयश्चौपशमिक-ज्ञायिकपारिणामिकः ॥ ८२ ॥ औदयिकौपशमिक- क्षायोपशामिकैः परः । पारिणामौपशमिक-क्षायोपशमिकैः परः ॥ ८३।। स्यात्पष्ठश्चौपशमिकौ-दयिकपारिणामिकैः । क्षायिकौदयिकक्षायो-पश- मिकैस्तु, सप्तमः ॥ ८४ ॥ पारिणामिकमिश्राख्य-क्षायिकैरष्टमः स्मृतः। नवमः स्यादौदयिक-क्षायिकपारिणामिकैः ॥८॥ पारिणामिकमिश्राख्यौ -दयिकैर्दशमोऽपि च। चतुःसयोगजाः पंच भंगकास्ते त्वमी श्रुताः॥८६॥ क्षायिकश्चौपशमिकःक्षायोपशमिकोऽपि च।ौदयिकश्चेत्यमीभिोगे प्रथमभंगकः॥ ८७ ॥ क्षायिकोऽथौपशमिकः क्षायोपशमिकाह्वयः। पारि- ३ औपशमिक नै औदायिक, ४ भोपशामक ने पारिणामिक, ५ क्षायिक ने बायोपशमिक, ६. क्षायिक ने औदयिक, ७ क्षायिक ने पारिणामिक, ८ चौदायक ने बायोपशमिक, ९ मिश्रथयेला पारिणामिक ने चायोपशामिक ने १० प्रौदपिक ने पारिणामिक. (७६-८०) हवे त्रिकसंयोगी १० भांगाचतावे थे.- १क्षायिक, क्षायोपशमिक ने औपशर्मिक, २ क्षायिक, औदयिक ने औपशमिक, ३ औपशमिक, चायिक ने पारिणामिक, ४ श्रौदायिक, औपशमिक ने चायोपशमिक, पारिणामिक, औपशमिक ने चायोपशमिक, ६ औपशमिक, औदायिक ने पारिणामिक, ७ क्षायिक, औदायिक ने क्षायोपशमिक, ८ पारिणामिक, चायोपशमिक ने चायिक, ९ औदायिक, चायिक ने पारिणामिक, १० पारिणामिक, क्षायोपशमिक ने औदायिक. हचे चतु:संयोगी पांच मांगा कहे छे (८१-८६) १ चायिक, औपशमिक, चायोपशमिक ने मौदयिक, २ चायिक, भौपशामिक, बायोपशामक ने पारिणामिक, ३ क्षायिक, औपशमिक, पारिणामिक ने श्रौदयिका-४ -- म ३६ मो। (६९१) गणामिक इत्येषां योगे भंगो द्वितीयकः ॥ ८८ ॥ क्षायिकौपशमिकाख्यौ पारिणामिक इत्यपि । थौदयिकश्चत्यमीपां योगे भंगस्तृतीयकः ।। ८९॥ क्षायोपशमिकश्चौप-शमिकौदयिकाहयो । पारिणामिक इत्येषां योगे भंगस्तुरीयकः ॥ ९॥ क्षायिकौदयिकाभिख्यौ क्षायोपशमिकाह्वयः । पारिणामिक एतेषां योगे भंगस्तु पंचमः ॥ ९१॥ पंचसंयोगजश्चैकः स्या- दौपशमिकादिभिः । पंचभिः सन्निपतितैः पड्विंशतिरमी समे ॥ ९२ ॥ बायोपशमिक, औपशमिक, चौदायिक ने पारिणामिक, ५ घायिक, औदयिक, क्षायोपश- मिक ने पारिणामिक. (८७-९१) पंचसंयोगी एक भागो उपर जणावेला पांच माधोना संयोगधी-थाय छे. ए रीते कुल २६ मांगा थाय छे. (९२) द्विकसंयोगी १० त्रिकसंयोगी-१० चतु:संयोगी-५ १ौपशमिक-नायिक १ औप०क्षायिक-क्षायोप०/१ औप० क्षायिक-वायो. २ औपशमिक-क्षायोप २ औप०क्षायिक-औदायिक मौदयिक शमिक ३ औपचायिक पारिणा०/२ औप० क्षायिक-वायो. ३ औपशमिक-श्रौदयिक ४ औप०क्षायोप-प्रौदयि० पारिणामिक. ४ औपशमिक-पारिणा ५ औप०क्षायोप-पारिणा० ३ औप०क्षायिक-मौद० मिक ६ औप०ौदयि०पारिणा. पारिणामिक. ५. क्षायिक-वायोपशमिक ७ दायिक-क्षायोपो ४ औप० छायो. औद० दयिक पारिणामिक. ६ क्षायिक-औदयिक ८ क्षायिक-क्षायोप० पा ५ क्षायिक-चायोऔद. ७ क्षायिक-पारिवामिक रिणामिक. पारिणामिक. ८ बायोपशमिक-औदायिक ९ क्षायिक-श्रौदपिक-पा. पंचसंयोगी १ ९ घायोपशमिक-पारि रिणामिक. १ आँपशमिक, घायिक, णामिक | १० घायोप० प्रौदयिक-पा क्षायोपशामिक, औद- १० भादयिक-पारिणामिक रिणामिक. यिक, पारिणामिक. मा कुल २६ मांगामांधी नीचेना ६ भंग उपयोगी छे. २० नाममात्र छ, १ द्विकसंयोगी-क्षायिक-पारिणामिक. ४ चतुःमयोगी-प्रोप० झायो प्रौद० पारि० २ त्रिकसंयोगी-पायिक-मौद० पारिणा० ५ चतुःसंयोगी-धायिक०क्षायोज्यौद०पारिक ३ विकसंयोगी-झायो० औद० पारिणा० ६ पंचसंयोगी उपर प्रमाणे- उपराधी प्रथम भंग सिमा होय, चीजो मंग सर्वज्ञने होय, श्रीजो-चोथो ने पानमो पारे गतिमा प्राप्त थाय भने छठी-चायिकममकिती उपशमश्रेणी मांडनार मनुप्पने होय. .

, (६९२) भीमावलोकप्रकाश। सप्तमो द्विकयोगोत्थो नवमो दशमोऽपि च । त्रियोगजो चतुर्योगे भंगौ चतुर्थपंचमौ ॥ ९३ ॥ एकः पंचकसंयोगी षडमी सान्निपा- तिकाः। जीवेपु सभवंत्यन्ये विंशतिः संभवोज्झिताः ॥ ९४ ॥ यत्तु तत्त्वार्थवृत्तावेवमुक्त, एषामेवौपशमिकादीनां द्विकादियोगेन सान्निपा- तिको निष्पद्यत षड्विंशतिविकल्पः, तत्रैकादश विरोधित्वादसंभवंत- स्त्यक्ता विकल्पाः पंचदशोपात्ताः संभविनः, प्रशमरतो षष्ठ इत्यन्यः पंचदशभेद इति वचनादिति तदभिप्रायं सम्यग् न विद्मः, यतोऽनु- योगद्वारवृत्तावेवमुक्तं, तदेवमेको द्विकसंयोगभंगको, द्वौ द्वौ त्रिकयोग- चतुष्कयोगभंगको, एकस्त्वयं पंचकयोग इत्येते षड्भंगका अत्र संभविनः प्रतिपादिताः, शेषास्तु संयोगमात्रतयैव प्ररूपिता इति स्थितं. एतेषु च षट्पु भगंकेषु मध्ये एकस्त्रिकसंयोगो, द्वौ चतुष्कयोगावि- त्येते त्रयोऽपि प्रत्येकं चतसृष्वपि गतिषु संभवंतीति निर्णीतमिति, गति- चतुष्टयभेदात्ते किल द्वादश वक्ष्यंते. ये तु शेषा द्विकत्रिकपंचकयोगलक्ष- एमां द्विकसंयोगी १ सातमो, त्रिकसंयोगी वे नवमो ने दशमो, चतुःसंयोगी ये पोथो ने पांचमो भने पांचसंयोगी १५ प्रमाणे कुल ६ सानिपाविक मांगा जीवमा संभवे छे. बाकीना चीश संभवता नथी. (९३-९४) तत्वार्थत्तिमा एम कमु छ के- 'ए मौपश- मिकादिक भावोना द्विकादि योगे करीने सनिपातिक भावना २६ विकल्प थाय छे, तेमांना ११ विकम्प विरोधी होवाथी संभवता नथी तेथी ते तजी देवा, पाकीना १५ विकल्पो संभवे छे ते ग्रहण करवा तेनो, तेम ज प्रशमरतिमा छठो सामिपातिक भाव १५ मेदवाळो कयो के एम का तेनो अभिप्राय अमे सम्पम् रीते जाणी शकता नथी,' थी भनुयो. गद्वारनी वृत्तिा एम कयु छ के-'एक द्विकसंयोगी भांगो, ये पे त्रिकसंयोगी ने चतुःसं- योगी भांगा अने एक पंचसंयोगी मांगो-ए प्रमाणे ब मंग संमये छे' तेथी कशा छ। पाकीना भंगो संयोगमात्रधी थता होपाथी कहेला छे.' हवे ए छ भांगामा एक त्रिकसंयोगी ने ये चतुःसंयोगी एम प्रण मांगा पारे गतिमा संभवे के एम निर्णय को छे. एटले ना गति चतुष्टय वडे गुणता १२ भेद पाय छे. पाकी एक द्विकसंयोगी, एक प्रिकर्मयोगी ने एक पंचसंयोगी-ए प्ररा मांगा सिद्धा, १ प्रशमरतिमां ने १५ भेद फहा छ सेनो अभिप्राय वो ६ मेद जे संभवे ये सेना उत्तर- भेर १५ याय ये से भ पहेका षणाय थे.

मर्ग ३६ मो। (६९३) णास्त्रयो भंगाः सिद्धकेवल्युपशांतमोहानां यथाक्रमं निर्णीतास्ते च यथो. क्तकस्थानसंभवित्वात्रय एवेत्यनया विवक्षया सान्निपातिको भावः स्था. नांतरे पंचदशविध उक्तो दृष्टव्यः. यदाह-अविरुद्धसन्निवाइय-भेया एते पणरसति' संभवत्सु च पट्स्वेषु सप्तमो द्विकयोगजः। सिद्धानामेव निर्दिष्टः चायिकपारिणामिकः ॥ ९५॥ ज्ञानादिक्षायिकं ह्येषां जीवत्वं पारिणा- मिक। सिद्धानामन्यभावानां हेत्वभावादसंभवः ॥ ९६ ॥ त्रिकसंयोगजो यस्तु नवमः प्राग्निरूपितः । स सर्वज्ञे क्षायिकाख्यौ-दयिकपारिणामिका ॥९७॥ जीवत्वादि यतस्तस्य वर्तते पारिणामिकं । औदयिकी नरगति- निादि क्षायिक तथा ॥ ९८ ॥ त्रिकसंयोगजो यस्तु दशमः प्राक् प्रद- शितः। स चतुर्धा भवेन्मिश्री-दयिकपारिणामिकः ॥ ९९ ॥ यतः क्षायोपशमिका-नींद्रियाणि भवंत्यथा औदयिकी श्वभ्रगति-जीवत्वं पारित णामिकं ॥ १०॥ एवं तिर्यगादिगत्य-भिलापेन त्रयः परे। भवंति भंग- कास्ते च स्वयं वाच्या विवेकिभिः॥१॥ चतुस्संयोगजो यौ च भंगी केवळीमा भने उपशांतमोहीमो अनुक्रमे संभवे छे. एटले तेना प्रण ने उपर जणावेला पार एम कुल १५ सामिपातिक मायना मेद या प्रकारे थाय थे. तेपी स्थानांतरे ते अनुसारे साभिपातिक माष पंदर प्रकारनो कहेलो छ एम जाणवू. कहुं छे के-'अविरुद्धसभिवा- इप-मेया एते पणरस चि'भा अविरुद्ध एवा सानिपातिक मेद पंदर छे. सामिपातिकना २६ मेदमा संमवित मेद छ कया छे, तेमा द्विकसंयोगी सातमो चायिक ने पारिणामिक रूप मेद सिद्धां न कहेलो छे. (९५) तेमने झानादि पापिक भावना छ भने बीवत्व पारिणामिक मारनुं छे. सिदमा वीजा मावोना हेतुनो ममाव होवाची बीजा मायोनो असंभव छे. (९६ ) त्रिकसंयोगी नयमो मंग चायिक, भौदीपक ने पारिणामिकरूप छे ते सर्वज्ञमा समवे छे. (९७) तेमने बीवत्वादि पारिणामिक मावर्नु, प्रौदपिकी नरगति भने चायिक मावना घानादि छे. ( ९८ ) विकसंयोगी दशमो मंग जे पायोपशमिक, भौदायिक ने पारिपामिकरूप छे ते चार प्रकारे छ। (९९) फेमके पायोपशमकी इद्रियो, मोदयिकी नरकगति ने जीवत्व पारिणामिक मारनुं नरक गतियाळा जीवाने होय छे. (१००) तेज प्रमाणे नियंच, मनुप्प ने देवगात माटे पर प्ररूपमा विवेकी सजनोए करी लेगी. (१०१) पतुःसंपोगी वे चोयो ने पांचमी ६९४) श्रीमावशोकप्रकाश। तुरीयपंचमौ । प्रत्येकं तावपि स्यातां गतिभेदाच्चतुर्विधौ ॥२॥ तथाहि- सम्यक्त्वमौपशमिकं कृतत्रिपुंजदेहिनां । खानि.मिश्राणि जीवत्वं स्यात्तेषां पारिणामिकं ॥३॥ गतिर्भवत्यौदयिकी यदेषां नरकादिका। चतु:संयो- गजस्तुर्य-श्चतुर्भेदो भवेदिति ॥ १॥ सम्यक्त्वं क्षायिक खानि मिश्राणि पारिणामिकं । जीवत्वमेवौदयिकी गतिः स्यान्नरकादिका ॥ ५॥ चतु:- संयोगजश्चैवं पंचमोऽपि चतुर्विधः । नृणामुपशमश्रेण्यां पंचसंयोगजः पुनः ॥६॥ यो हि क्षायिकसम्यक्त्वी मनुजः प्रतिपद्यते । विशुद्ध्योप- शमश्रेणी क्षायिकं तस्य दर्शनं ॥७॥ चारित्रं चौपशमिकं तन्मोहोपश- माद्भवेत् । गतिरौदयिकी खानि चायोपशमिकान्यथ ॥८॥ जीवत्वमथ भव्यत्वं भवेतां पारिणामिके । पंचसंयोगजस्यैक-विधस्यैवं हि संभवः ॥९॥ सान्निपातिकभेदानां पायां संभविनामिति । उक्ता भेदाः पंचदश प्रतिभेदविवक्षया ॥ १० ॥ जीवेषु षडमी भावा यथासंभवमाहिताः। अजीवेषु त्वौदयिक-पा. रिणामिकसंज्ञको ॥ १९ ॥ तथाहि-धर्माधर्माभ्रास्तिकाय-कालेषु पारि- वे मंग संभावित कया छे ते पण चारे गतिमा होवाधी चार प्रकारना समजवा. (२) ते पा रीते-समकित उपशममावर्नु के जेणे त्रण पुंज कर्या छे'. बायोपशमिकी इंद्रियो, पारिणामिक भावनुं जीवत्व ने औदयिफी नरकादिगति-ए रीते चतुःसंयोगी लोथो भंग ४ गति पाश्री चार प्रकारे समजवो, (३-४) अने चतुःसंयोगी पांचमा मंगमा दायिकमावतुं समकित, चायोपशमिकी इंद्रियो, पारिणामिकभावनुं जीवत्व भने भिौदयिकी मावनी नरकादिगति समजवी. ए रीते तेना पण चारगति भानी चार प्रकार समजवा; तथा पंचसंयोगी एक भंग मनुष्यने उपशमश्रेणिमा लभ्य थाय छ (५-६) केमके जे क्षायिक सम्यक्त्वी मनुष्य विशुद्धिषडे उपशमश्रेणि मांडे तेने दायिकमावर्नु समति, मोहनीय कर्मनो उपशम करवाथी उपशमभावनुं चारित्र, औदयिकी मनुष्य गति, बायोपशमिकी इंद्रियो भने जीवत्व तथा भव्यत्व पारिणामिकमावर्नु भा प्रमाणे पंच. संयोगी एक मंगनो संभव छे. (७-९) ए प्रमाणे सामिाविकमावना छ संमषित भेदना उचर भेद १५ प्रतिमेदनी विवधापूर्वक कमा. (१०) उपर प्रमाणे छ भाव जीवने विषे जे रीते मंमये छे ते रीते कही बताया. हवे अजीवने पिपे मौदपिक ने पारिणामिक चे मात्र होप छे. (११) ते भारी-धर्मास्ति- १ मही जेणे 'ए पुंज कर्या छ एम कहेवानो हेतु समजावो नयी. . .

.. सर्ग ३६ मो। (६९५३ णामिकः । एक एवानाद्यनंतो निर्दिष्टः श्रुतपारगैः ॥ १२ ॥ चलनस्थि- त्युपष्टंभा-बकाशदानधर्मकाः । सर्वदामी परिणताः परिणामेन तादृशा ।। १३ ॥ श्रावल्यादिपरीणामो-ररीकारान्निरंतरं । धनाद्यनंतो भावः स्या-त्कालस्य पारिणामिकः ॥ १४॥ वर्तनालक्षणः कालः क्षणाव. ल्यादिकः परः । इति द्वेधा निगदितः कालः केवलशालिभिः ॥ १५॥ तेन तेन स्वरूपेण वर्ततेऽर्था जगत्सुये। तेषां प्रयोजकत्वं य-द्वर्त्तना सा प्रकीर्तिता ॥ १६ ॥ सा लक्षणं लिंगमस्य वर्तनालक्षणस्ततः। सर्वक्षेत्र. द्रव्यभाव-व्यापी कालो भवत्ययं ॥ १७॥ समयावलिकादिस्तु समय- क्षेत्रवर्तिपु । द्रव्यादिष्वस्ति न ततो पहिर्वतिषु तेष्वयं ॥ १८॥ अन्या- न्यसमयोत्पत्ते-रेकक्षणात्मकोऽप्ययं । थावल्यादिपरीणामं सदा परि- णमत्यहो ॥ १९ ॥ म्यारपुद्गलास्तिकाये तु सायंतः पारिणामिकः । भवेदौदयि- कोऽप्यस्मिन् भावः स्कंधेपु केचित् ॥ २० ॥ स्कंधानां व्यणुकादीनां साधतः पारिणा मिकः। तेन तेन स्वरूपेण सायंतपरिणामतः ॥२१॥ काय, अधर्मास्तिकाय, भामाशास्तिकाय ने फाळ ए पारने विपे एक पारिणामिकमाव अनादिभनंत स्थितिवाळो छ, एम श्रुतपारगामीमोए का छे. (१२) तेमां चलन, स्थिति ने अवकाश देवाना धर्मवाळा प्रथमना पण तेवा परिणामे सर्वदा प्रणमेलाचे (१३) अने श्रावळी विगेरे परिणामने अंगीकार करवाथी निरंतर अनादिअनंतपये पारिणामिक भाव काळमां पण वर्ते छे. (१४) काळ ते वर्तनालपण अने समय मावळी विगेरे एम ये प्रकारनो केवळज्ञानीओए कसो छे. (१५) ते ते स्वरूपे जे पदार्थों जग- तमा पर्ने छ वेनुं प्रपोजकपणुं ते वर्तना कहेली छे. (१६ ) तेवू लवण प्रथया लिंग (चिन्ह ) के जेनुं ते वर्तनाला काळ सर्व क्षेत्र, द्रव्य ने भावव्यापी छे. (१७) भने समय भापलिकादि काळ समय क्षेत्र मढी दीप )वर्ती द्रष्यादिकमा छ, सेनी रहारना द्रव्यादिकमा नथी. (१८) भन्य भन्य समयनी उत्पत्तिधी भा एक ममयात्मक काळ पण मावलिकादि परिणामे सदा परिणमे छे.(१०) पुद्गलास्तिकायमा पारिणामिक माव सादिसात के भने मौदायिकमाव पण केटलाफ स्कयोमा मादिमविपणे छे. (२.) व्याकादि स्कंधोमा ते ते स्वरूपे मादिमांत परि- थाम होवापी पारिणामिकमाष सादिसातपये थे. (२१) परमाणुमी पण कंपनी । (६९६) मीमावसोफप्रकारा. स्यादेवं परमाणूनां साद्यंतः पारिणामिकः । स्कंधांतर्भावतो वर्ण-गंधा- दिव्यत्ययादपि ॥२२॥ अनंताण्वात्मकाः स्कंधा ये जीवग्रहणोचिताः । स्यात्पारिणामिको भाव-स्तेषामौदयिकोऽपि च ॥ २३ ॥ शरीरादिनाम- कर्मो-दयेन जनितो यथा । औदारिकादिस्कंधानां तत्तद्देहतयोदयः ॥ २४ ॥ ये जीवग्रहणानर्हाः स्कंधाः सूक्ष्माश्च येऽणवः । तेषां नौद- यिको भावः केवलं पारिणामिकः ॥ २५ ॥ उदय एवौदयिक इति व्युत्पत्त्यपेक्षया । कर्मस्कंधेष्वौदयिको भावो भवति तद्यथा ॥ २६ ॥ क्रोधादीनां य उदयो जीवानां जायते स वै । कर्मस्क- न्धोदयो ज्ञेयः कर्मस्कंधात्मका हि ते ॥ २७ ॥ कर्मस्कंधाश्रिता एवं नन्वीपशमिकादयः। संभवंतः कथं भावा अजीवेषु न कीर्तिताः ॥२८॥ सत्यं ते संभवत्येव तेषां किंच निरूपणे। अविवव हेतुत्वं बिभर्ति प्राक्तनाहता ॥ २९ ॥ भवत्वादयिकोऽप्येवं संभवन्नविवचितः। समाने संभवे पंक्ति-भेदोऽयं कथमर्हति ॥ ३० ॥ सत्यमेष पंक्तिभेदो -विज्ञैः अंदर रहेला होवाथी तथा तेना वर्ण-गंधादिकनो फेरफार थतो होवाथी ते परमाणुभोनो पण पारिणामिकमाव सादिसांत होय छे. (२२ ) अनंत परमाणुरूप जे स्कंधो जीवने ग्रहण करवा योग्य के तेमा पारिणामिकमाव होय छे, तथा शरीरादि नामकर्मना उदगी जनित भौदायिकमाव पण होय छे. जेमके औदारिकादि स्कंधोनो ते से देहरूपे उदय थाय के माटे. (२३-२४) जे जीवने ग्रहण करवाने अयोग्य स्कंधो छ भने सूक्ष्म एवा छुटा परमाणुनो के तेने भौदायिक भाव नथी; केवळ पारिणामिकमाव ज छे. (२५) उदय तेज औदपिक एवी व्युत्पत्तिनी अपेक्षाए अर्थ थतो होवाथी कर्मस्कंधोने विषे औदयिक- भाव छे ते मा प्रमाणे-(२६) जीवोने क्रोधादिकनो जे उदय थाय छे ते कर्मस्कंधोनो उदय जाणवो, कारण के ते कर्मस्कंधात्मक ज छे. (२७) शिष्य प्रश्न करे के के-'ए रीवे गणता तो भौपशमिकादि माचो पण कर्मस्कंधाधिवज छे तो मावो मजीवने विपे केम कमा नी ?' (२८) तेने उत्तर प्रापे छ के-'तारं कहे सत्य छे ते रीते वे भाषो पण संभवे थे, परंतु तेना निरूपणमा पूर्वपुरुषोए भादरेली अविवधा ज हेतमप छे.' (२९) शिम्प कहे थे के-'जो संभव छतां तेनी विषक्षा करी नपी तो मौदायिक माटे पण तेज रीते मानवं बोइए, केमके समान संभवपणामां एवो पंक्तिमेद केम योग्य गणाय' (३०)तेने उत्तर मापे छ के-'तारुको सत्य छ, केटलाक समोर एया पंक्तिमेदतुं निवारण .

- सर्ग २६ मो। ( ६९७) कैश्चिन्निराकृतः। अजीवेदितो यत्तैः केवलं पारिणामिकः ॥३१॥ तथोक्तं कर्मग्रंथवृत्ती-जन्वेवं कर्मस्कंधाश्रिता औपशमिकादयो भावा अजीवानां संभवत्यतस्तेषामपि भणनं प्राप्नोति, सत्यं, तेपामविवक्षितत्वादत' एव कैश्चिदजीवानां पारिणामिक एव भावोऽभ्युपगम्यत इति । जीवाजीवाश्रिता भावा इति सम्यगनिरूपिताः। अधिकृत्याथ कर्माणि कुर्मो भावप्ररूपणं ॥ ३२ ॥ क्षायिकश्चौपशमिको मिश्रश्च पारिणामिकः । तधौदयिक इत्येते पंचापि मोहनीयके ॥ ३३ ॥ ज्ञानदर्शनावरणां-तरा- येषु च कर्मसु । भावा भवंति चत्वार एवौपशमिकं विना ॥ ३४ ॥ तत्रापि केवलज्ञान-दर्शनावरणाख्ययोः । विपाकोदयविष्कंभा-भावा- निमश्रो न संभवेत् ॥ ३५ ॥ वेदनीयनामगोत्रा-युषां तु त्रय एव ते । विना मिश्रीपशमिको परिणामक्षयोदयाः ॥ ३६ ॥ तत्र च-क्षय पात्यं- तिकोच्छेदः स्वविपाकोपपादकः । उदयः परिणामस्तु जीवांशैमिश्रता भृशं ॥ ३७॥ यद्वा-तत्तद्रव्यक्षेत्रकाला-ध्यवसायव्यपेक्षया। संक्रमा- . , कयु छे. तेथी अजीवोमा एकलो पारिणामिकमाव ज कह्यो छ. (३१) तेने माटे कर्मग्रंथनी धृत्तिमा कमु छ के- ननु इति प्रश्ने कर्मस्कंधाश्रित औपशमिकादि भावो मजीवोमा संभवे छे तो ते भावोर्नु पण कद्देवापणुं प्राप्त थशे.' तेने उत्तर प्रापे छ के- 'तारुं कहे सत्य छ, परंतु मां ते भावोनी अविवक्षा ज कारणभूत छे. तेथी ज केटलाक भाचार्यों अजीवोने एकलो पारिणामिक भाव न कहे छे. उपर प्रमाणे जीव तथा अजीयने आश्रीने भावो सम्यक् प्रकारे निरूपित कर्या, हये कर्मोंने पाथीने भावोनुं निरूपण करे छे. ( ३२ ) मोहनीय फर्ममा चायिक, औपशमिक, बायोपशमिक, औदयिक ने पारिणामिक-ए पांचे भावो होय छे. (३३) ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय ने अंतराय ए त्रण कर्ममा भौपशमिक विना चार मावो ज होय छे. (३४) तेमां पण केवळज्ञानावरण ने केवदर्शनावरणने विपाकोदयना विष्कमनो प्रमाष होवाथी चायोपशामिकमान संभवतो नथी. (३५) वेदनीय, नाम, गोत्र ने मायु-ए पार कर्मने क्षायोपशमिक ने औपशमिक पिना पारिणामिक, धायिक ने औदायिक ए प्रण भाव होय छे. (३६) तेमा आय ते आत्यंतिक उच्छेद, पोताना विपासने पापे ते औदायिक भने जीवांश साथै अत्यंत मिश्रता ते पारियामिक, (३७) अथना ते ते द्रव्य, (६९८) श्रीभावशोकप्रकाश। दितया वा यः परिणामः स एव सः ॥ ३८॥ उपशमोऽत्रानुदया-वस्था भस्मावृताग्निवत् । स मोहनीय एव स्या-न्न जात्वन्येषु कर्मसु ॥ ३९ ॥ सर्वोपशम एवायं विज्ञेयो न तु देशतः । यद्देशोपशमस्तु स्या-दन्येषा. मपि कर्मणां ॥ ४०॥ चतुर्णा घातिनामेव क्षयोपशम इष्यते । कर्मस्व- टास्वपीह स्युः परिणामक्षयोदयाः॥४१॥ नृतिर्यग्देवनरक-रूपे गतिचतुष्टये । पंचापि भावा ज्ञेया य-जीवत्वं पारिणामिकं ॥ ४२ ॥ सम्यक्त्वमौपशमिकं क्षायिक चेंद्रियाणि च । क्षायोपशमिकान्यासु गतिरोदयिकी भवेत् ॥ ४२ ॥ तौ द्वावेव सिद्धगो क्षायिकपारिणामिको । ज्ञानादि क्षायिकं तत्र जीवत्वं पारिणामिकं ॥ १४ ॥ एवं च-गत्यादिमार्गणाद्वारे-प्येवं स्युनियतास्त्रयः। क्षायिकौपश- मिको तु भजनीयौ यथायथं ॥ ४५ ॥ यत्क्षायिकौपशमिक-भावयोः सति संभवे । वाच्याः पंचान्यथा मिनी-दयिकपारिणामिकाः ॥ ४६ ॥ क्षेत्र, काळ श्रने अध्यवसायनी अपेक्षाए अथवा संक्रमादिपणे जे परिणम ते परिणा- मिक भाव छ. ( ३८ ) उपशम ते अहीया भस्मथी ढांकेला अग्निनी जेवी अनुदयावस्था छे. ते भाव मोहनीयकर्मने ज होय छे, चीजा कर्मोने होतो नथी. ( ३९) श्रहीं सर्वथी उपशम समजयो पण देशथी ममजवो नहीं, कारण के देशथी उपशम तो वीजा कर्मोनो पण थाय छे. (४०) क्षयोपशम चार पाती कर्मनो ज इच्छाय छे भने पारिणामिक, क्षायिक ने औदयिक आत्रण भाव थाठे कोने होय छे. (४१) कर्म ज्ञाना• दर्शना / वेदनी | मोहनी/ आयु गोत्र अंतराय नाम माव ४ . ३ ३ ३ ३ हवे चार गति पाश्रयी भावो कहे छे.-मनुष्य, तिर्यच, देव ने नरकरूप पारे गविमर्मा पांचे भाव होय छे. ते याप्रमाणे-पारिणमिक माग्नुं जीवत्व, प्रौपशमिक ने चायिक सम. कित, वायोपशगिकी इंद्रियो ने श्रौदयिकी गति. (४२-४३) मिद्धगतिमा घायिक ने पारिणामिक ये भाव ज होय है. मां वायिक ज्ञानादि भने पारिणामिक जीवरस. (४४) एरीते गत्यादि मार्गपादारोने विपे पण नियत प्रय माव-घायोपशमिक, घौदयिक ने पारिवामिक होय छ भने चायिक ने भोपशमिक ए भाव ठो कथंगिद होपाधी भजनारूप थे. (४५) शायिफ ने सौपशमिक्नो समय ससे पार माय पहा भन्यथा पायोपशकि, शादपिक भने पारिणामिक ए प्रग मार कहेवा. (४६) घर्ग ३६ मो। (६९९) एवं कर्मस्वमी भावा यथाम्नायं निरूपिताः। यथो गुणस्थानकेपुकुर्मो भावप्ररूपणां॥४७॥ सम्यग्दृष्ट्यादिपु गुण-स्थानकेषु चतुर्बिह । भावास्त्र- योऽथ चत्वारो लभ्यते किल तद्यथा ॥४८॥त्रयःक्षायोपशमिक-सम्यग्दृष्टे- भवंति यत्। गतिरौदयिकी तेषां जीवत्वं पारिणामिकं ॥४९॥ क्षायोपशमिकं सम्यग्दर्शनं चेंद्रियाणि च । चत्वारश्चौपशमिक-क्षायिकदर्शन- स्पृशः॥५०॥सम्यक्त्वमौपशमिकं तेषां चक्षायिक भवेत्। मिश्राणि खानि जीवत्वं गतिश्चात्रापि पूर्ववत् ॥ ५१ ॥ अनिवृत्तिवादराख्य-सुसूक्ष्मसं. पराययोः। चत्वारः पंच बा भावा-स्त्रयस्तत्र च पूर्ववत् ॥५२॥ सम्यक्त्व. मोपशमिकं श्रेणावुपशमस्पृशि । क्षायिकं क्षपकपयां द्विधाप्येवं चतुष्टये ॥ ५३ ॥ पंचमस्त्वौपशमिक-चारित्रान्वय इप्यते । शास्त्रांतरे तत्क- थित-मनयोर्गुणयोरपि ॥ ५४ ॥ तथोक्तं कर्मग्रंथवृत्तौ-एपामेव चतुर्णा मध्ये ऽनिवृत्तिवादरसूक्ष्मसंपरायगुणस्थानकद्वयवर्तिनोऽप्योपशमिकचारि- वस्य शास्त्रांतरे प्रतिपादनादौपशमिकारित्रप्रक्षेपे पंचम इति. तथोपशांत. ए प्रमाणे कर्मने विपे ा मावो यथानाय निरूपित कर्या. हवे गुणस्थानाने विषे मावनी निरूपणा करवामा भाये थे. (४७)' सम्यग्दृष्टि विगेरे चार ( चोथु, पांच, छटुं ने साव) गुणस्थानोने विषेत्रण अथवा चार मात्र लामे छे ते पा प्रमाणे-(४८) प्रण भाव पायोपशमिक सम्यग्दृष्टिने होय छे. प्रौदयिकी गति, पारिणामिक जीवत्व भने पायोप- शमिक सम्यक्त्व अने इंद्रियो तथा चार माव औपशमिक अथवा घायिक समकितीने होय छे. तेने समक्ति औपशपिक अथवा चायिक, बायोपशमिकी इंद्रियो भने पारि. णामिक जीपस्य तथा भौदपिकीगति पूर्ववत् जायची. (४९-५१) अनिवृत्तियादर ने सूक्ष्मसंपराय ए पे नवमा देशमा गुणस्थानके चार अथवा पांच माव होय दे. तेमा प्रण तो पूर्ववत, (५२) अने उपशमश्रेरिवालाने भोपशामिक सम्पमन्व अने पपक- श्रेणियाळाने चायिक समकित एटले येमांधी एक उमेरतां चार माव धाय. (५३) भने पाँचमो भाव घायिक समक्तिी उपशमणि मोडे त्यारे उपशमभावनुं चारित्र दोवाथी भोपशमिक यधे थे. या ये गुपठाणे ते प्रमाणे होषानुं शाम्रोवरमा पर कयु दे. (५४) भीफर्मग्रंपत्तिमा कई छ के-'ए चार मात्रमा भनिचिकादर भने सक्षम संपराय गुपस्थानकवी जीयोने पर भोपशमिक पारिश्रनुशाग्रातरा कपन होगयी मोर. शमिकमावतुं चारित्र उमेरवापी पाप भार थाय थे, तथा उपविमोह भग्यारमे गुप- .

(७००) भीमावलोकप्रफाश। मोहेऽपि चत्वारः पंच वा स्मृताः । पंच क्षायिकसम्यक्त्व-भृतोऽन्यस्य चतुष्टयं ॥ ५५ ॥ चत्वारोऽपूर्वकरणे क्षीणमोहे च ते स्मृताः। त्रयस्तु पूर्ववन्मिश्री-दयिकपारिणामिकाः ॥ ५६ ॥ सम्यक्त्वं क्षायिक क्षीण- मोहे भावस्तुरीयकः । क्षायिकं चौपशमिक-मपूर्वकरणे पुनः ॥ ५७॥ मिथ्यादृष्टौ तथा सास्वा-दने मिश्रगुणेऽपि च । सयोगिकेवल्याख्ये चा- ऽयोगिकेवलिसंज्ञके ॥ ५८ ॥ पंचस्वमीषु प्रत्येकं त्रयो भावा उदाहृताः। तत्राद्यत्रितये मिश्रौ-दयिकपारिणामिकाः ।। ५९ ॥ अंत्यद्वये त्वौदयिक- क्षायिकारिणामिकाः। ज्ञानादि क्षायिकं शेषौ गतिजीवत्वगोचरौ ॥३०॥ भावाः स्वाम्यादिभेदेन विशिष्यैवं निरूपिताः । सामान्यतः संभ- "विनो भावान् वच्मि गुणेष्वथ ॥ ६१ ॥ त्रयस्त्रिषु गुणस्थाने-वाद्येपु ते च पूर्ववत् । तुर्यादिष्वष्टसु पुनः प्रत्येकं पंच कीर्तिताः ॥ ६१ ॥ तथाहि- सम्यक्त्वोपशमिकं चतुर्थादिगुणाष्टके । क्षायिकं च चतुर्थादि-ज्वेकाद- शसु संभवेत् ॥ ६३ ॥ मिश्रं सम्यक्त्वेंद्रियादि चतुर्थादिचतुष्टये । खं चा- ठाणे पण चार अथवा पांच भाव कहा छ तेमां पांच क्षायिक समकिताने अने बीजाने चार भाव समजवा. (५५) अपूर्वकरण-भाठमे अने क्षीणमोह पारमे चार भाव कमा छे, तेमांत्रण तो पूर्ववत-क्षायोपशमिक, औदयिक ने पारिणामिक. (५६) उपरांत पारमे गुणठाणे क्षायिक समकित होवाथी चायिकमाव चोथो समजवो भने अपूर्वकरणे औप- शमिक प्रथवा क्षायिक समकित होपाथी एक माव उमेरतां चार भाव थाय छे. (५७) मिथ्यादृष्टि, सास्वादन ने मिश्र-ए त्रण गुणठाणे तेम ज सयोगी तेरमे अने भयोगी चौदमे गुणठाणे पांच मावो पैकी प्रण भाव क्या थे. वेमा प्रथमना प्रण गुणठाणे चायोपशमिक, प्रौदयिक ने पारिणामिक छ भने देना चे गुणठाणे भौयिक, चायिक ने पारिणामिक समजवा. एटले ज्ञानादि क्षायिकमावना ने गति तथा जीवत्व वीजा घे , भावना जाणवा. (५८-६०) उपर प्रमाणे स्वाम्यादिफना मैदे करीने विशेष रीते चौद गुणस्थानके गावो कहा. हवे सामान्य संभक्ति भाव गुणस्थानोमां कहे थे. (६१) " पहेला पण गुणस्थानमा प्रण भावपूर्व प्रमाणे छे. चोथायी भग्यारमा सुधी आठ गुणस्थानने विषे दरेकमा पांच माव ससा थे. (६२) ते या प्रमाणे-मोपशमिक सम्यक्त्व चोथाधी अग्यारमा सुधीना माठ गुणस्पाने होय छे. चोथायी चौदगा सुधी अग्यार गुणस्थाने शायिक सम्पत्य होय छे. (६३) पोषाधी सातमा मधी चार गाठाणे सायोपशमिक सम्यकत्व भने इंद्रियादिक , - , + पर्ग ३६ यो। (७०१) रित्रे चाष्टमादौ त्रय एकादशे तु खं ॥ ६४ }गतिः सर्वत्रौदयिकी जीव. वं पारिणामिकं । एवं भावित एतेषु तावत्पंचकसंभवः ॥६५॥ क्षीण- मोहे च चत्वार-स्त प्रौपशमिर्फ विना । अंत्यद्वये त्रयो भावा मिश्री- पशमिको विना ॥ ६६ ॥ पंचाप्येवं मूलभेदा गुणस्थानेषु भाविताः । एतेष्वेवाथ भावानां प्रतिभदान् प्रतन्महे ॥ ६७ ॥ दश मिथ्यादृष्टिसास्वा-दनयोर्गुणयोः स्मृताः । क्षायोपशमिकाख्यस्य प्रतिभेदा जिनैर्यथा ॥ ६८ ॥ विघ्नक्ष- योपशमजाः पंच दानादिलब्धयः । अज्ञानत्रितयं चक्षु-रचक्षुर्दर्शने इति ॥ ६९ ॥ भेदा द्वादश मिश्राख्ये सम्यक्त्वं मिश्ररूपकं । दानादिपंचकं ज्ञान-दर्शनानां त्रयं त्रयं ॥ ७० ॥ ज्ञानाज्ञानान्यतरांश-बाहुल्यमिह संभवेत । कचित्कचिच्चोभयांश-समता वान यद्यपि ॥ ७१ ॥ तथापि होय छे. आठमा विगरे प्रण गुणठाणे इंद्रियो ने चारित्र ने क्षयोपशममावना होय छे, भने अग्यारमे इंद्रियोज धायोपशम भावनी होय छे.(६४) गति पधे भादयिकी होय थे, जीयत्व पारिणामिकमावर्नु होय छे. मा प्रमाणे ए पाठ गुण ठाणे पांच मायोनो संभव करो. (६५) वीणमोह गुणठाणे औपशमिक विना चार भाव होय छे अने खेला ये (१३-१४) गुणस्थाने घयोपशम ने उपशमविना पण माय होय छे. (६६) चौद गुणस्थाने मूळ भावनुं यंत्र. । गुणठाणु मि. सा. मि. अप्र. नि. अनि 'मुन्म उप.तीगमयोगी प्रयोगी - M २ ४ ७ ८ १० - " ३ ५ मूलमाय ३ ५ ३ 3 एप्रमाणे पाच मूळमेद गुणस्थानोमा क्या हये गुणम्पानामा ते ते मानांना उपर. भेद फहेपाय थे (६७) मिथ्याटि ने सास्वादन गुणस्थाने पायोपथमिक मावना दरा भेद जिन घरोए कहा ते मा प्रमाणे:-(६८) अंतरायकर्मना पाप रामपी दानादि पाच लम्पियो, प्रय प्रसान, पचभने मग दर्शन एम दश ममजया. (६९) मिगुएठाणे पार भेद धयोपशममारना कहा थे-मियरूप सम्पपत्त्य, दानादि पार लधिभो, मान- प भने दर्शन प्रय-पुस १: (७०) जो के ही कोई टेका मान के ममानमापी कोना परा भंशनी बहुलता मंमरे पे मधया फपिन् उमयागर्नु समरगुं पप समरे :

(७०२) श्रीमावलोकप्रशाश. विहानांश-बाहुल्यस्य विवक्षया । उक्तं ज्ञानत्रयं मिश्र-गुणस्थाने गुणाश्रये ॥ ७२ ॥ अस्मिंश्च यद्गुणस्थाने दर्शनत्रयमीरितं । तच्च सैद्धां- तिकमता-पेक्षयेति विभाव्यतां ॥ ७३ ॥ स्युादशैवाविरत-सम्यग्ट- श्यपि मिश्रवत् । क्षायोपशमिक(का) मिश्र-स्थाने सम्यक्त्वमत्र तु ॥७॥ द्वादशस्वेपु सद्देश-विरतिक्षेपतः स्मृताः । क्षायोपशमिका भावा-स्त्रयो. दशैव पंचमे ॥ ७५ ॥ एतेभ्यो देशविरति-त्यागे द्वादश ये स्थिताः । तेष्वेव सर्वविरति-मनोज्ञानसमन्वये ॥ ७६ ॥ षष्ठसप्तमयो वा भवंत्येते चतुर्दश । क्षायोपशमिकाख्येन सम्यक्त्वेन विना त्वमी ॥ ७७ ॥ त्रयो- दशाष्टमे भावा नवमे दशमेऽपि च । अष्टमादिपु सम्यक्त्वं क्षायोपशमिक न यत् ॥ ७८ ॥ एकादशद्वादशयो-गुणस्थानकयोरमी। विना क्षायो. पशमिकं चारित्रं द्वादशोदिताः॥ ७९ ॥ एकादशे गुणस्थाने यदौपश- मिकं परं । चारित्रं क्षायिकं च स्यात् केवलं द्वादशे गुणे ॥ ८०॥ दर्श- नत्रितयं ज्ञान-चतुष्कं लब्धिपंचकं । अमी भावा द्वादशोप-शांतक्षीण- विमोहयोः ॥ ८१ ॥ इति क्षायोपशमिक-प्रतिभेदा विभाविताः । (७१) तथापि ज्ञानांशनी बहुलतानी अपेक्षाए विज्ञ पुरुषोए नहीं गुणाश्रयभूत मिश्रगुणस्थाने ज्ञानत्रय कहेल छे. (७२) या मिश्रा थाने जे दर्शनत्रय कहेल छ । सैद्धांतिकना मतनी अपेक्षाए ( विभंगज्ञानमा अवधिदर्शन मानेलं होपाथी) समजवा. (७३) अविरत सम्यग्दृष्टि नामना चोथागुणस्थाने बायोपशमिकभावना १२ भेद मिश्रगुणठाणानी जैम समजवा. मात्र नहीं मिश्रने स्थाने सम्यक्त्व कहे. (७४) पांच गुणठाणे पा पारमा एक देशविरति भळवाथी क्षायोपशमिकमावना १३ प्रकार समजवा. (७५)ए तेरमाथी देशविरति नीकळी जबाथी पाकीना जे १२ रया तेमा सर्वविरति अने मनापर्यवज्ञान भळवाथी छठे सातमे गुणस्थाने १४ मेद होय छे. पाठमे, नवमे अने दशमे गुणठाणे क्षयोपशम समकितविना बाकीना १३ मेद होय छे कारण के पाठमे, नवमे अने दशमे गुणस्थाने बायोपशमिक सम्यक्त्व होतुं नथी. (७६-७८) अग्यारमे ने पारमे गुणस्थाने पण क्षायोपशमिक चारित्र विना १२ भेद होय थे, (७९) कारण के अग्यारमे गुणस्थाने केवळ औपशमिक ने बारमे गुणस्थाने केवल चायिक चारित्र ज होय छे (८०) उपशांतमोह अने क्षीणमोह गुणस्थाने प्रण दर्शन, चार ज्ञान अने दानादि लब्धिपंचक-श्रा बार प्रकार क्षयोपशम मावना होय छे. (वेरो, चौदमे गुणस्थाने बायोपशमिकमाव होतो ज नथी.) (८१) मा प्रमाणे बायोपशमिक- - सर्ग ३६ मो। (७०३) गुणस्थानेष्वौदयिक-प्रतिभेदान् ब्रवीम्यथ ॥ ८२ ।। अज्ञानाद्या औदयिका भावा य एकविंशतिः। सर्वेऽपि ते स्युर्मि- थ्यात्व-गुणस्थाने शरीरिणां ॥८३॥ सास्वादने च मिथ्यात्वं विना त एव विंशतिः। अज्ञानेन विनैकोन-विंशतिर्मिश्रतुर्ययोः॥ ८४ ॥ वेदाः ३ कपाया ४ गतयो ४ लेश्या ६ श्चासंयमोऽपि १ च । प्रसिद्धत्व २ ममी तुर्य-तृतीयगुणयोः स्मृताः ॥ ८५॥ एकोनविंशतेरेभ्यो देवश्वभ्र- गती विना । शेषाः सप्तदश ख्याता गुणस्थाने हि पंचमं ॥ ८६ ॥. नर- तिर्यग्गती लेश्या प्रसिद्धत्वमसंयमः । वेदाः कपाया इत्येते स्युरीणे देशसंवरे ॥ ८७ ॥ प्रमत्ते च पंचदश भावा श्रौदयिकाः स्मृताः। उद- येऽत्र भवेतां य-न्नतिर्यग्गत्यसंयमौ ॥८८॥ अप्रमत्ते द्वादशाद्य-लेश्या- त्रयविनाकृताः। कषाय ४ वेद ३ नृगति १-व्यत्यलेश्यमसिद्धता॥८९॥ नवमाष्टमयोस्तेजः-पद्मलेश्ये विना दश । नृगत्यसिद्धता शुक्ल-लेश्यावेद- कपायकाः ॥ ९० ॥ लोभः संज्वलनः शुक्ल-लेश्या नृगत्यसिद्धते । चत्वार एवौदयिका भवंति दशमे गुणे ॥ ९१ ॥ श्राद्यास्त्रयः कपाया य-त्रयो भावना प्रतिभेद कह्या. हवे गुणस्थानोए प्रौदयिकभावना प्रतिमेदो कहे थे. (८२) अज्ञानादि जे एकवीश प्रकार प्रौदयिकमावना कह्या छे ते सर्वे मिथ्यात्वगुण- स्थाने रहेला जीवोने होय छे. (८३) सास्वादने मिथ्यात्वविना वीश होय छे. वीजा भने चोथा गुणस्थाने अज्ञान विना १९ होय छे. (८४ ) ते या प्रमाणे-त्रण वेद, ४ कपाय, ४ गति, ६ लेश्या, १ असंयम, १ असिद्धत्व-कुल १९ श्रीजा प्रने चोथा गुण- स्थाने कहेला छे. (८५) पांचमे गुणस्थाने आ ओगणीशमांधा देव ने नरकगतिविना पाकीना १७ प्रकार होय छे. (८६ ) हे भा प्रमाणे-नर ने तिर्यच ये गति, ६ लेश्या, १ श्रसिद्धत्व, १ असंयम, ३ वेद ने ४ कपाय-या १७ देशविरति गुणस्थाने होय छे. (८७) प्रमत्तगुणठाणे तिथंच गति ने भंसयम ए ये उदयमा न होवाथी पाकीना १५ प्रकार प्रौद- यिकमावना होय छे. (८८) अप्रमचगुणठाणे प्रथमनी प्रण लेश्याविना यार होय से था प्रमाणे-४ कषाय, ३ वेद, १ मनुप्पगति, ३ छेनी लेश्या अने १ प्रसिदत्व. (८९) पाठमे नवमे गुणठाणे तेजो ने पम ये लेरयाविना १० होय ते मा प्रमाणे-१ नरगति, १ प्रसिद्धत्व, १ शुमलेश्या, ३ येद ने ४ कपाय (९०) दशमे गुग्णटारो १ नरगति, १ प्रसिद्धत्व, १ शुक्ललेश्या ने १ संज्वलन लोभ- ए चार मौदायिकमायना प्रकार होय (७०४) भीमावलोकप्रकाश वेदाः पडप्यमी । भावा औदयिकाः सूक्ष्म-संपराये भवंति न ॥ ९२ ॥ एकादशे विना लोभं द्वादशेऽपि त्रयोदशे । त्रयोत्यलेश्यासिद्धत्व-मनु- प्यगतिलक्षणाः ॥ ९३ ॥. थसिद्धत्वं च नृगति गुणस्थानकेंतिमे । लेश्या न स्यात्तत्र यस्मादयोगित्वमलेश्यता ॥९॥ एवमौदयिका भावा गुणस्थानेपु भाविताः । तथौपशमिको भावौ भावयामोगुणेष्वथ ॥१५॥ सम्यक्त्वमौपशमिक-मेकं तुर्यादिपंचके । ताइक्सम्यक्त्वचारित्रे नवमादित्रये पुनः॥ ९६ ॥ चारित्रमौपशमिकं नवमादिगुणत्रये शास्त्रां. तरेषु यत्प्रोक्तं कैश्चित्तेषां मतं ह्यदः ॥ ९७ ॥ येषां मते तु नवमे दशमे च गुणास्पदे । मिश्रोत्थं स्याद्वतं कृत्स्नं तन्मोहानुपातितः ॥९८॥ तन्मते स्वौपशमिकं व्रतमेकादशे गुणे । पूर्वे तु मन्वते सद्व-त्सत्सामी- प्यादनागतं ॥ ९९ ॥ इत्यौपशमिको भावौ गुणस्थानेषु भावितौ। प्रति- भेदा विभाव्यते क्षायिकस्य गुणेष्वथ ॥ २०० ।। छ, (९१) कारण के प्रथमना त्रण कपाय ने त्रण वेद ए छ औदायिक भावना प्रकार सूक्ष्मसंपराय गुणठाणे होता नथी. (९२) अग्यारमे, पारमे ने तेरमे पण लोमविना घाकीना अंत्य (शुक्ल ) लेश्या, नरगति ने प्रसिद्धत्व ए त्रण होय छे. (९३) चौदमे गुणठाणे लेश्याविना मनुष्यगति ने असिद्धत्व ए वे प्रकार होय छे, कारण के भहीं भयोगीपणुं होवाधी लेश्या होती नथी. (९४) या प्रमाणे औदयिक- उचर भेदो गुणठाणे करा. हवे औपशमिकभावना के मेद गुणस्थानो परत्वे कहे छे. (९५) औपशामिक सम्यक्त्व ए एक भेद चोथा विगेरे पांच ( चोथाथी पाठमा सुधीना) गुणस्थानकोए होय छे अने उपशमभावनुं समकित ने चारित्र ए बने नवमा विगेरे त्रण (९-१०-११) गुणठाणे होय छे. (९६ ) नवमा विगेरे प्रण गुणस्थाने शास्त्रांतरमा भोपशमिफ चारित्र कहेल छे. तेमना मते या हकीकत समजवी, (९७) परंतु जेमना मसे नवमे दशमे गुणस्थाने क्षयोपशममावर्नु चारित्र कह्यु छ वै समन चारित्रमोहनो उपशम करेलो न होवाथी कझुं छे. ( ९८ ) तेमने मते औपशामिक चारित्र मात्र भग्यारमे गुण- स्थाने ज जाणवं. प्रथमना मतवाळा प्राचार्योए सत्सामीप्यपणाथी उपशममावर्नु चारित्र प्राप्त नहीं थया छतां पण ( नवमै दशमे ) मानेतुं छे. (९९) मा प्रमाणे गुणस्थानोने विपे औपशमिकमाषना ये उत्तरभेद कक्षा. हवे गुणस्थानोमा जहायिकमापना उत्सर भेदो कहे थे. (२००) भावना सर्ग ३६ मो. (७०५) सम्यक्त्वं क्षायिकं प्रोक्तं तुरीयादिगुणाष्टके। चीणमोहे च चारित्र- सम्यक्त्वे क्षायिक उभे ॥ २०१ ॥ लब्धयः पंच दानाद्याः केवले ज्ञान- दर्शने । तथा सम्यक्त्वचारित्रे नवेत्यंत्यगुणद्वये ॥२॥ इत्येवं क्षायिका भेदा गुणस्थानेषु भाविताः । पारिणामिकभावस्य प्रतिभेदानथ ब्रुवे ॥२॥ अभव्यत्वं च भव्यत्वं तथा जीवत्वमित्यमी । मिथ्यादृष्टिगुणस्थाने भावाः स्युः पारिणामिकाः ॥४॥ द्वितीयादिक्षीणमोह-पर्यंतेपु गुणेषु च। स्यातां जीवत्वभव्यत्वे अभव्यत्वविनाकृते ॥ ५॥ स्यादेकमेव जीव- त्वं चरमे च गुणद्वये । सप्रभेदा गुणस्थाने-ध्वेवं भावाः प्ररूपिताः ॥६॥ कथं न ननु भव्यत्व-भावोंतिमगुणद्वये । निर्वाणगमना) हि भव्योऽहद्भिर्यतः स्मृतः॥७॥त्रोच्यते-प्रत्यासन्नभाविसिद्धा-वस्थायां तदभावतः । अत्रापि भव्यत्वाभावः शास्त्रकृद्भिर्विवक्षितः ॥ ८॥ यद्वाऽ. परेण केनापि हेतुना न विवक्षितं । भव्यत्वमिह शास्त्रेषु नोक्तमस्मा. भिरप्यतः॥९॥ चोथा विगेरे पाठ ( चोथाथी ११ मा सुधी) गुणठाणे क्षायिक सम्यक्त्व कडं थे. पीणमोद गुणठाणे चारित्र ने सम्यक्त्व बने घायिकभावना कह्या छे. (१) छेन्ने ये (१३-१४) गुण ठाणे दानादि पांच लब्धियो, केवळज्ञान ने केवळदर्शन तथा, सम्यकत्व ने चारित्र ए प्रमाणे नवे प्रकार कह्या छे. (२) मा प्रमाणे गुणस्थानोमा क्षायिकमावना भेद कह्या. हवे पारिणामिकमायना भेद कहे थे-मिथ्यादृष्टि गुणस्थाने अमव्यत्व, भव्य- त्व भने जीवत्व ए प्रण पारिणामिकमावना प्रकार होय छे. (४) जाधी पारमा तीणमोहसुधीना ११ गुणस्थाने श्रमन्यत्व विना पाकीना पे-जीयत्व ने भव्यत्व प्रकार होय छे. (५) छेना ये गुणठाणे एक जीवत्व ज होय छे. मा प्रमाणे उत्तरमेदो सहित गुणस्थानीए पांच मावो कहा. (६) श्रही शिष्य शंका करे छ के-' मध्यत्व देना पे गुणठाणे केम कयुं नथी ? कारण के तीर्थकरोए मध्यत्वने निर्वाणगमनने योग्य कहेल छे' (७) तेने उचर प्रापे छे-' सिद्धावस्था प्रति नजीकमां प्राप्त धवानी होवाधी भव्यत्वनी अपेक्षा न होवापी मही पण मध्यत्वनो ममात्र शास्त्रकारोए कहेलो थे, (८) अथवा वीजा कोइ पण हेतुपी मध्यत्वनी विवषा शास्त्रमा एपे गुणठाणे करी नयी थी भमे पण कहल नपी.' (९) .

.. (.७०६, बीमाषलोकाप्रकश। सान्निपातिकभावोऽथ गुणस्थानेषु भाव्यते । अनेकधा स च यथा गुणस्थानं परापरैः ॥ १०॥ यावतां यत्र भावानां भेदा यावंत ईरिताः। तेषां तत्र गुणस्थाने कृते संकलने सति ॥ ११ ॥ स्यात्तावद्भेदनिप्पन्नो भावोऽयं सान्निपातिकः । नामग्राहं गुणस्थाने-प्वेषोऽथ परिभाव्यते ॥१२॥ मिथ्यादृष्टावौदयिक-भावा यथैकविंशतिः । दश क्षायोपशमिका- स्त्रयश्च पारिणामिकाः ॥ १३ ॥ एवं भावाश्चतुस्त्रिंश-ज्जाताः संकलिताः समेचतुर्विंश दजात-स्ततोऽत्र सान्निपातिकः ॥ १४ ॥ भवेत्सास्वादने चैप द्वात्रिंशभेदभावितः। त्रयस्त्रिंशनेदजातो मिश्रे स्यात्सान्निपातिकः ॥ १५ ॥ पंचत्रिंशद्भेदभूतो गुणस्थाने तुरीयके । पंचमे च चतुस्त्रिंश- प्रतिभेदसमुद्भवः ॥ १६ ॥ प्रमत्ते च त्रयस्त्रिंश-द्वेदजः सान्निपातिकः । अप्रमत्तगुणस्थाने त्रिंशद्भेदसमुत्थितः ॥ १७ ॥ सप्तविंशतिभेदोत्थो गुणस्थानेऽयमष्टमे । नवमे च गुणस्थाने सोऽष्टाविंशतिनिर्मितः ॥१८॥ स सूक्ष्मसंपराये स्याद् द्वाविंशतिसमुद्भवः । तथोपशांतमोहेऽयं भेदविंशतिभावितः ॥ १९ ॥ क्षीणमोहेऽयमेकोन-विंशतिप्रतिभेदजः। स सयोगिनि सर्वज्ञे त्रयोदशभिदुद्भवः ॥ २० ॥ अयोगिनि द्वादशभि- हवे सानिपाविकभाव गुणस्थानोए कहे छे. ते गुणस्थानोना परापरपणाथी अनेक प्रकारे थाय छे, (१०) परंतु पांच मूळभावना उत्तरभेदो जे जे गुणस्थाने जेटला जेटला कह्या ले तेनो सरवाळो करवाथी साबिपातिकमावना उचरभेदनी संख्या भावी शकशे. एटला माटे भावोना नाम ग्रहण पूर्वक गुणस्थानोमां तेनी संख्या कहे छे. (११-१२) मिथ्यादृष्टि गुणठाणे औदपिकभावना २१, झायोपशमिकभावना १०, पारिणामिक- भावना ३ एम कुल ३४ उत्तरभेद थाय छे, तेथी पहेले गुणठाणे सान्निपातिकभाव ३४ मेदवाळो थाय छे, (१३-१४) सास्वादने ३२ मेदवाळो थाय छ, मिथे ३३ मेदवाळो सान्निपातिकमाव , (१५) चोथे गुणस्थाने ३५ मेदवाळो थाय छे, पांचमे ३४ भेदवाळो थाय छ, (१६) प्रमत्ते ३३ भेद सान्निपातिकना थाय छे. अप्रमत्तगुणस्थाने ३० भेद थाय छ, (१७) भाठमे २७ मेदवाळो थाय छे, नवमे २८ मेदवाळो धाय छ,(१८) सूक्ष्मसंपराये २२ भेदवाळो थाय छ, उपशांतमोहे २० भेदवाळो थाय छे, (१९) वीण- मोहे १९ भेदवाळो थाय छे, सयोगी सर्वज्ञ गुणस्थानके १३ भेदवाळो थाय छे. (२०) , मर्ग ३६ मो। (७०७) भेदैः स्यात्सान्निपातिकः । ज्ञेया भेदास्तु सर्वेऽमी सर्वत्रोक्तानुसारतः ॥२१॥ अत्र नवमदशमयोर्गुणस्थानयोरौपशमिकचारित्रांगीकारपक्षे द्वावौ- पशमिको भावौ, अन्यथा चैक एवेति ज्ञेयं. चतुर्भग्याथ भाव्यते भावा औदयिकादयः। साद्यंत १ साद्यनंता २ ना-दिसांता ३ नाद्यनंतकाः ४॥ २२॥ गत्या दिरत्रौदयिकः सादिः सांतो भवेद्यतः । नृदेवतिर्यग्नरक-गतीनां सादिसांतता ॥ २३ ॥ सादिश्चानंत इत्येष भंगस्त्वत्र न संभवेत् । सादिकानां गतीनां य-दनंतत्वमसंभव ॥ २४ ॥ अनादयोऽपि मिथ्यात्वा-दय औदयिकाश्च ये। भव्यानाश्रित्य विज्ञेया-स्तेऽत्र भंगे तृतीयके ॥ २५ ॥ अभव्यापेक्षया त्वेते भाव्या अने योगीगुणस्थाने बार मेदवाळो सानिपातिकभाव थाय छे. भा अधा भेदो पूर्व कही गया प्रमाणे समजवा. (२१) अहीं नवमा दशमा गुणस्थाने भोपशमिक चारित्र अंगीकार करनारना पक्षथी चे श्रीपशमिकभार होय छ, भन्यथा एक होय छ एम ममजबुं. ४ ५ २ मि. सा. मि १० १० १२ १० ११/१२ १३ १४ मप्र. नि अनि. सू उसी स अ ૧૩ ૧૨ 0 २१ २० गुणस्थान सख्या गुणस्थान नाम क्षायोपशमिकभेद औदयिफमेद ओपशामिकभेद क्षायिकभेद যােিকামিম सानिपातिकमेद . . १ १ १ ४ २ का था १ . ० . . २ ३ २ २ र २ . ३४ ३२ ३३ ३५ ३४ ३३ ३० २३११ २८ २००१९१३/१२ याच्या हवे श्रौदयिकादिभाव पार मंगीवडे कहे थे- १ सादिसांत, २ सादिभनंत, ३ अनादिसांत अने ४ भनादिभनंत. (२२) महीं गत्यादि प्रौदयिकमाव सादि- सांत होय छे, कारण के नर, देव, तिर्यक ने नरगतिनी सादिसविता .(२३) मादि. अनंत मंग मही संमवतो जनधी, कारण के गतिर्नु सादिपणुं 2 ठेपी तेनुं धनंतपएं भसमवित छे. ( २४ ) मिथ्यात्वादि प्रौदपिकमार मव्योने मापीने पीना मांगावाला एटले मनादिसांत जास्या भने पमध्यने आयपीन चोपा मागाठा-एटले मनादि- (७०८) जीमाषज्ञोकप्रकाश भंगे तुरीयके । भावनैवं कपायादि-भावानां क्रियते यथा ॥ २६ ॥ वेद- त्रयं च मिथ्यात्वं कपायाणां चतुष्टयं । लेश्याश्च पडसिद्वत्व-मज्ञानासंय. मावपि ॥ २७ ॥ अमी औदयिकाः सप्त-दश भव्यव्यपेक्षया । भंगे तृतीये तुर्ये च भंगेऽभव्यव्यपेक्षया ॥ २८ ॥ सम्यक्त्वमौपशमिकं चारि- त्रमपि तादृशं । द्वावापशमिकावेतो केवलं सादिसांतको ॥ २९ ॥ श्रादि- सम्यक्त्वलाभे य-च्छेण्यां वेदमवाप्यते । चारित्रमप्युपशम-श्रेण्यामेवे. दमाप्यते ॥३०॥ तयोचावश्यपातेन भंगोऽत्र प्रथमः स्थितः । तदाधि- स्योपशमिकं शून्या भंगास्त्रयः परे ॥ ३१ ॥ चारित्रं क्षायिकमथ दानादिलब्धिपंचकं । श्राश्रित्य क्षायिको भावो भंगे स्यात्सादिसांतके ॥ ३२ ॥ तथोक्तं महाभाष्ये-सम्मत्तचरित्ताई साईसंतो य उवसमियो। क्षणाइलद्धिपणगं चरणं पि अ खाइयो भावो ॥१॥ ननु चारित्रमस्त्येव सिद्धस्यापीति तत्कथं । तत्साधनंते भंगे स्या- दनाकर्णयतोत्तरं ॥ ३३ ॥ न चरित्री नाचरित्री न चरित्राचरित्र्यपि । - अनंत जाणवा. कपायादि भावोनी भावना पण ए प्रमाणे करी लेवी. ते था प्रमाणे- (२५-२६) त्रण वेद, मिथ्यात्व, ४ कषाय, ६ लेश्या, प्रसिद्धत्व, अज्ञान ने असंयम- रूप १७ औदपिकभाव भन्यनी अपेक्षाए त्रीजा मंगमा भने अभव्यनी अपेक्षाए चोथा भंगमा भावना करवी. (२७-२८) औपशमिक सम्यक्त्व ने चारित्र ए बने केवळ सादि- सांत ज समजवा, (२९) कारण के आदि सम्यक्त्वना लाभ वखते अने उपशमणि मांडती वखते उपशमभावनुं सम्यक्त्व लामे छे अने चारित्र पण उपशमभावनुं उपशम- योणिमा ज लामै छ (३०) तेमांथी अवश्य पात थतो होयाथी नहीं प्रथमभंग-सादि- सांत ज प्राप्त थाय छे. चाकीना त्रण मंग औपशमिकमाव पाश्रीने शून्य छे. (३१) चायिकमावमा क्षायिक चारित्र ने दानादि लब्धिपंचकने प्राश्रयीने दायिकमाव सादिसांत मांगे छे. (३२) महाभाष्यमा कयु छ के-'औपशमिक सम्बक्त्व ने चारित्र अने क्षायिकभावनी दानादि पांच लब्धि ने चारित्र सादिसांत मांगे छे.'(१) अहीं शिष्य प्रश्न करे के के-'सिद्धने पण चारित्र होय छ एम कहेल छे, तो क्षायिकमावतुं धारित्र सादिअनंत मांगे होवू जोइए. ' तेने उत्तर प्रापे छ के-(३३) सिद्धने न मर्ग १६ मो। (७०९) सिद्धा एवंविधाः प्रोक्ताः पंचमांगे जिनेश्वरैः ॥ ३४ ॥ · सिद्धे नो चरित्ती ' इत्यादि च तत्सूत्रं. सम्यक्त्वं क्षायिकमथ केवले ज्ञानदर्शने । इत्येतनयमाश्रित्य क्षायिकः साद्यनंतकः ॥ ३५ ॥ शेषौ तु भंगकावत्र शून्यावेव स्थितावुभौ । अनादिसांतोऽनाद्यतः क्षायिकः संभवेन्न यत् ॥३६॥ इच्छंति सिद्धस्याप्यन्ये चारित्रं लब्धिपंचकं । सिद्धत्वेऽपि हि निर्मूल-मेतदावरणक्षयात् ॥ ३७ ॥ एपामावरणाभावे-ऽप्यसत्त्वं यदि कल्प्यते। क्षीणमोहादिकेष्वेवं तदभावः प्रसज्यते ॥३८॥ तदेतन्मतमा- श्रित्य चारित्रे लब्धिपंचके । सिद्धेषु स्वीकृते साद्य-नंतः स्यात्क्षायिका परं ॥ ३९ ॥ शेषा भंगास्त्रयः शून्याः चायिकस्याप्यपेक्षया। भंगव्यवस्था क्रियते क्षायोपशमिकेष्वथ ॥ ४० ॥ छाद्मस्थिकानि ज्ञानानि चत्वार्याश्रित्य निश्चितं । क्षायोपशमिको भावः सादिः सांत इति स्मृतः ॥ ४१ ॥ भंगो द्वितीयः शून्योऽना-प्येपां सम्यक्त्वसंश्रयात् । यदुत्पातोंतश्च पुन-मिथ्यात्वे केवलेऽपि च ॥४२॥ चरित्री, न अचरित्री, न चरित्राचरित्री-एवा प्रकारना पांचमा अंगमा श्रीजिनेश्वरे कहेला छे. (३४) "मिद्धे नो चरित्ती." इत्यादि ते विषयनुं सूत्र के. घायिक सम्यक्त्व भने केवळ- ज्ञान वधा केवळदर्शन ए प्रण भेदने आश्रयीने घायिकमात्र सादिअनंत मांगे थे. (३५) पाफीना ये मंग प्रा मावमा शून्य थे, कारण के अनादिसांत भने भनादिमनंतर पंने मांगा चायिकमावर्मा संमक्ता नथी. (३६ ) अन्य प्राचार्यों सिदने पण चारित्र भने दानादि लन्धिपंचक इच्छे छे, केमके सिद्धत्वमा एना भावरग्योनो समूळ नाथ घलो छ, (३७) भने एना आपरयनो ममाव सते पण जो ठेनु मापपणुं मानीए वो पीण मोहादिने विपे पण तेनो प्रभाव प्राप्त थशे. (३८) एमना मतने मामयीने चारित्र ने दानादि लन्धिपंचक सिदमा स्वीकारीए तो ते ते छ प्रकारनो पापिकमार पण सादिमनंत मांगे गणी शकाय. (३९) एटले पाकीना प्ररो भंग पायिकनी अपे. धाए शून्प गपाय. हवे बायोपरामिकने प्राश्रयीने मंगम्यवम्पा कहे थे. (४०) बास्पिक पार मानने प्राथपीने निधये पायोपशमिक मात्र सादि सात ब कहलोछे (४१) पीत्री मांगो महीं पर शून्य समनचो. कारण के ते (मान)नी उत्पति समषिउने भाभीने मने तनो भंत पायो मिथ्यात्वे बाय स्यारे भयया केजरमान पामे स्पारे पाय थे. (४२) मतिममान ने भुतम्मान मम्पनी पपाए मनादि मीभाषलोकप्रकाश । मत्यज्ञानश्रुताज्ञाने स्यातां भव्यव्यपेक्षया । अनादिसांते तुर्ये च भंगेऽभ- व्यव्यपेक्षया ॥ ४३ ॥ क्षायोपशमिकोऽचक्षु-दर्शनापेक्षया भवेत् । भंगे तृतीये भव्याना-मभव्यानां तुरीयके ॥ १४ ॥ विभंगज्ञानमवधि-च. क्षुषी किल दर्शने । दानाया लब्धयः पंच संयमौ देशसर्वतः ॥ ४५ ॥ सम्यक्त्वमेपामित्येका-दशानां च व्यपेक्षया । चायोपशमिको भावः सायंतः केवलं भवेत् ॥ ४६ ॥ विशेषावश्यकसूत्रवृत्त्योस्तु केनापि हेतुना पालामेव क्षायोपशमिकानां भंगकव्यवस्थोक्का, ततः शेषाणामचक्षुर्दर्श- नादीनां द्वादशानां यथासंभवमस्माभिलिखितेति ज्ञेयं. पारिणामिकभावोऽपि सर्वपुद्गलगोचरः। सादिः सांतश्च विज्ञेयः पर्यायपरिवृत्तितः ॥ ४७॥ शून्य एव भवेद्भगो द्वितीयोऽत्रापि पूर्ववत् । सादीनां णुकादीनां ह्यनंतत्वमसंभवि ॥ १८॥ तथा भवति भव्यत्व- माश्रित्य पारिणामिकः । अनादिसांत: सिद्धा हि नाभव्या न च भव्यकाः ॥ ४९ ॥ तथोक्तं- सिद्धे न भव्वे नो अभव्वे , इति. अभ- व्यत्वं च जीवत्वं चाश्रित्यानायनंतकः । स्यात्पारिणामिको भावो-उन- . सात के अने श्रमव्यनी अपेक्षाए चौथे मांगे एटले अनादिअनंत छ. (४३.) प्रचक्षुदर्शनसंबंधी बायोपशमिक भाव मध्योने त्रीजे मांगे छ भने अमव्योने चोथे मांगे छे (४४ ) विभंगज्ञान अने अवधि तथा चक्षुदर्शन, दानादि पांच लब्धि भने देशविरति ने सर्वविरति तथा सम्यक्त्व-ए मायार प्रकारने अंगे क्षायोपशमिकभाव केवळ सादिसांत मांगे छे. (४५-४६) विशेषावश्यकसूत्र ने तेनी वृत्तिमा कोह पण हेतुए छ ज बायोपशमिकना प्रकारनी मंग व्यवस्था कही छे ( एटले अमे छ भेदनी विवक्षा ते प्रमाणे कही थे ) अने याकीना अचक्षुदर्शनादि बार प्रकारनी भंगव्यवस्था यथासंभव अमे लखी छ एम समजबु. पारणामिकमाव के जे सर्व पुद्गल गोचर छे ते पर्यायनी परावृत्तिथी सादिसांत थे. (४७) चीजो भंग नहीं पण पूर्ववत् शून्य छ, कारण के द्वयणुकादि स्कंधोर्नु पा- दिपणुं छे, तेथी तेनुं अनंतपणुं असंभाषित छे. (४८) भव्यच प्राधी पारिवामिकमाव अनादिसांत मांगे छे, कारण के सिद्धो श्रमव्य पण नी अने भव्य पण नधी. (१९) कह्यु के के-"सिद्धे नो भव्वे नो भवे" इति. श्रमव्यत्व अने जीवत्वने प्राश्रयीने पारिणा- मिकभाव अनादिअनंत छे. कारण के ए पेनो उद्भव के क्षय नथी. (५०) श्रा प्रमाणे सग १६ मा । (७११) योर्यन्नोद्भवचयौ ॥ ५० ॥ एवमुक्तचतुर्भग्या या भावानामवस्थितिः। सा भावकाल इत्युक्तो महाभाष्यप्रणेतृभिः ॥ ५१ ॥ साईसपज्जवसिओ चउ- भंगविभागभावणा एत्थ । उदइयाईयाणं तं जाणसु भावकालंतु ॥५२॥ इत्याद्यर्थतो विशेषावश्यकसूत्रवृत्त्योः । भावानां भगवदुपज्ञशास्त्रदृष्ट्या, दिग्मानं गदितमिहातिमानतुष्ट्या । पूणेऽस्मिन्निति गुणभाजि भावलोके, ग्रंथोऽयं समुदवहत्समाप्ति- लक्ष्मी ॥ ५३॥ विश्वाश्चर्यदकीर्तिकीर्तिविजयश्रीवाचकेंद्रांतिप- द्राजश्रीतनयोऽतनिष्ट विनयः श्रीतेजपालात्मजः । काव्यं यत्किल तत्र निश्चितजगत्तत्त्वप्रदीपोपमे, पत्रिंशत्तम एप निर्भररसः सर्गः समाप्तः सुखं ॥ ५४ ॥ इति श्रीलोकप्रकाशे पत्रिंशत्तमः सर्गः समाप्तः ॥ श्रीरस्तु ।। कहेली चार मगीवढे मावोनी जे अवस्थिति कही तेने ज महामाप्यना प्रणेताओए माव- काळ कहेलो छ. (५१) तेमणे या छ -साईसपलवसिमो, चउभंगविभागमावणा एत्य । उदइयाईयाएं, तं जाणम भावकालं तु ॥ ५२ ॥ इत्यादि अर्थ यी विशेषावश्यकम्प्रवृचिर्मा कहेल थे. भगवंतना कहेला शाखनी दृष्टिवडे करीने भहीं भमे माचोनुं दिशामात्र स्वरूप अति हर्पक्डे का छे. गुणना माजनरूप मा मावलोक पूर्ण थये सते आ ग्रंथ पण समासिरूपी लक्ष्मीने प्राप्त थाप छे. (५३) विश्वने पायर्य आपनार के कीर्ति जेमनी एवा श्रीकीर्तिविजय उपाध्यायना शिष्य भने राजधी ने तेजपाळना पुत्र विनयवंत विनयविजये कहेला निम्धित एया जगतना सपने प्रदर्शित करवामां दीपफसमान मा लोकप्रकाश प्रथमा निर्मर रसबाटो मा यीशमो सर्ग मुसे समाप्त भयो छे. (५४) ॥ इति श्रीलोकप्रकाये ३६ मो सर्ग समाप्त ।

(७१२ ) भीमाषझोकप्रकाश ॥ अथ सप्तत्रिंशत्तमः सर्गः प्रारभ्यते ॥ पाश् शंखेश्वरोत्तंसं प्रणम्य परमेश्वरं । लोकप्रकाशग्रंथस्य करोम्यु- तार्थवीजकं ॥ १ ॥ मंगलाचरणं ताव-दभिधेयप्रयोजने । शिष्टप्रसाद- नौद्धत्य-त्यागो ग्रंथस्य नामः च ॥२॥ अंगुलयोजनरज्जु-पल्याब्धिनिरू- पणानि गुणकारः। भागाहृतिसंख्येया-संख्यानंतानि चादिमे सर्गे ॥३॥ द्रव्यक्षेत्रकालभाव-लोकानां नाममात्रतः। श्राख्याथधर्माधर्माभ्र-सिद्धा. ख्यातिद्वितीयके ॥४॥द्वारेः सप्तत्रिंशता यै-रुक्ताः संसारिणोंगिनः। सर्गे तृतीयके तेषां द्वाराणामस्ति विस्तृतिः ॥ ५ ॥ पृथ्वीकायादयः सूक्ष्माः सर्गे तुर्येऽथ पंचमे । त एव बादराः षष्ठे तिर्यंचो द्वींद्रियादयः ॥ ६ ॥ मनुष्याः सप्तमे देवा अष्टमे नवमे पुनः । नारका दशमे जन्म- संवेधः सर्वदेहिनां ॥ ७॥ महाल्पवहुताकर्म-प्रकृतीनां च कीर्तनं । सर्ग ३७ मो. श्रीशंखेश्वरमंडन परम जैश्वर्यवान श्रीपार्श्वनाथ परमात्माने नमस्कार करीने श्रीलोक- प्रकाश ग्रंथर्नु बीजक-पूर्वे कही गयेल हकीकतनी अनुक्रमणिका कहुं छु. (१) मंगळाचरण, अभिधेय, प्रयोजन, शिष्टप्रसादन, औद्धत्य त्याग, ग्रंथर्नु नाम, (२) अंगुळ-योजन-रज्जु-पन्योपम ने सागरोपमनुं स्वरूप, गुणाकार, भागाकार, संख्येय, असंख्येय ने अनंतना प्रकारो विगैरे प्रथम सर्गमा कयुं छे. (३) बीजा सर्गमां द्रव्यलोक, क्षेत्रलोक, काळलोक ने भावलोकनुं नाममात्र भाख्यान अने धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय ने सिद्धनुं स्वरूप बतावेलु छे. (४) 'त्रीजा सर्गमा जे ३७ द्वारोवडे संसारीजीवोनुं स्वरूप बताववान ले ते ३७ द्वारनो विस्तार-तेनुं स्वरूप बतावेलुं छे (५) चौथा सर्गमा पृथ्वीकायादि पांच सूक्ष्म स्थावरनुं स्वरूप कडुं छे. पांचमा सर्गमा पृथ्वीकायादि पांच बादर स्थावरचें स्वरूप कहुं छे. छठा सर्गमा द्वींद्रियादि तिर्यचौर्नु, सातमा सर्गमा मनुष्योनु, पाठमा सर्गमा देवोर्नु, नवमा सर्गमा नारकोनुं भने दशमा सर्गमा सर्व जीवोना जन्मनो संवैध करो छे. (६-७) तेमज दशमा सर्गमा मोटो अल्पबहुत्व भने कर्मप्रतिमोनुं स्वरूप कयुं छे तथा पर्ग १७ मो। (७१३) एकादशे पुद्गलास्ति-कायस्वरूपवर्णनं ॥ ८॥ इति द्रव्यलोकः । क्षेत्रलोकेऽथ लोकस्य सामान्येन निरूपणं । दिशां निरूपणं लोके रज्जुखंडुककीर्तनं ।। ९॥ संवर्तितस्य लोकस्य स्वरूपं च निदर्शनं। महा त्तायामस्य रत्न-प्रभापृथ्वीनिरूपणं ॥ १० ॥ व्यंतराणां नगरादि-समृ- द्विपरिकीर्तनं । इत्यादि द्वादशे सर्गे सविशेष निरूपितं ॥ ११ ॥ स्वरूपं भवनेशानां तदिद्राणां च वर्णिता । सामानिकामपन्यादि-संपत्सर्गे प्रयोदशे ॥ १२ ॥ चतुर्दशे च सप्तानां नरकाणां निरूपणं । प्रस्तद- स्थितिलेश्यायु-वेदनाद्युक्तिपूर्वकं ।। १३ ॥ सर्गे पंचदशे तिर्य-ग्लोके द्वीपाधिशंसनं । जंबूद्वीपस्य जगती-द्वारतत्स्वामिवर्णनं ।। १४॥ क्षेत्रस्य भरतस्याथ वैताढयस्य च भूभृतः । सगुहस्य सकूटस्य गिरेहिमवतोऽपि च ॥ १५॥ पद्मइदस्य श्रीदेव्या गंगादिसरितामपि । दाढानगांतरद्वी. भग्यारमा सर्गमा पुद्गळास्तिकायना स्वरुपर्नु वर्णन छे. (८) मा रीते ११ सर्गमा द्रव्यलोक पूर्ण थाय थे. क्षेत्रलोकमां-धारमा सर्गमा मामान्यथी क्षेत्रनुं निरूपण, दिशानुं निरूपण, लोकमा रज्जु भने स्वरूप, मंवर्तित जोकनुं स्वरूप अने तेनी महचाने पायामउपर दृष्टांत तथा रत्नप्रमा विगेरे पृथ्वीनुं निरूपण, व्यंतरोनी नगरादि समृदिनु परिकिर्तन-भा सर्व सविशेषपणे निरूपित करेल 2.(९-१ तेरमा सर्गमा सुक्नपतिनुं स्वरूप तथा तेना इंद्रोना नाम वधा देना सामानिक देवो, अनमहिपीविगैरेनी संपदा विस्तारथी कही छे. (१२) चौदमा सर्गमा सात नस्कनुं निरूपण तेना प्रस्तर, दरेक प्रस्तरे शरीरस्थिति, लेश्या, भायु भने वेदना विगेरे कहेवापूर्वक पताम्युं थे. (१३) पंदरमा सर्गमा तियनोकर्नु स्वरूप, भमरख्यात द्वीप-सहद्रनुं वर्णन, यूटीपनी मगतिर्नु ने तेना द्वारर्नु तेम ज संना स्वामीनू वर्णन . मा सर्गमा विजयदेवनी दिनु यह विस्तारथी वर्णन थे. (१४) सोळमा सगमा भरत क्षेत्र, वैतायत, तेनी गुफामो तथा कुटो, हिमतपन, पपद्रह, श्रीदेवी, गंगा विगेरे नदीमो, लयमादमा नीकली पे पर्चनुनी भाउ दाढामो, तेनी उपर रहेला भतरदीपो, मा रहेता युगलिको, हैमवतधेन, तेमा रोल बनाय, महादिमतपर्वन, सेनी उपरना हमापानीस्तीनदीमा भने देना र सेलर ने स्टो, (७१४) धीजक | प-तद्वासियुग्मिवर्णनं ॥ १६ ॥ ततो हैमवतक्षेत्र-तद्वैताट्याद्रिवर्णनं । ततो महाहिमवतः सरिच्छेगइदस्पृशः ॥ १७ ॥ क्षेत्रस्य हरिवर्षस्य निप- धाद्रेश्च वर्णनं । शीताशीतोदयोः पंच-इदवत्योश्च पोडशे ॥१८॥ देवकुरूत्तरकुरु-पूर्वापरविदेहकाः । सामान्यतश्चतुर्धेति महाविदे- हवर्णनं ॥ १९ ॥ विजयानां वक्षस्कारां-तर्नदीनां च कीर्तनं । विजयेषु च वैताट्य-पटूखंडनगरीस्थितिः ॥ २० ॥ गंधमादनसन्माल्य-वतोश्च गजदंतयोः । उत्तराणां कुरूणां च विस्तरेण निरूपणं ॥ २१ ॥ यमका. योईदानां च कांचनक्ष्मामृतामपि । जंबूतरोः सकूटस्य साधिपस्य निरूपणं ॥ २२ ॥ सौमनसविद्युत्प्रभ-गजदंतनिरूपणं । स्थिति देवकुरूणां च विचित्रचित्रभूभृतोः ॥ २३ ॥ इदानां कांचनाद्रीणां तरोः शाल्मलिनोऽपि च । इत्यादि वर्णनं व्यक्त्या सर्गे सप्तदशे कृतं ॥ २४ ॥ मेरुश्चतुर्वनः कूट-मेखलाचूलिकादियुक् । साभिषेकशिलश्चाष्टा-दशे सर्गे निरूपितः :॥२५॥ गिरीलवतः कूट-इददेव्यादिशालिनः । शीतानारीकांतयोश्च नाम- मात्रेण वर्णनं ॥ २६ ॥ क्षेत्रस्य रम्यकाख्यस्य रुक्मिणोऽपि च भूभृतः । . हरिवपक्षेत्र, निषधपर्वत, शीता शीतोदा नदी भने पांच पांच द्रहोर्नु वर्णन छे. (१५-१६) सतरमा सर्गमा देवकुरु ने उत्तरकुरुक्षेत्र, पूर्व ने पश्चिम महाविदेह, श्रा प्रमाणे सामा- पथी चार प्रकारना महाविदेहर्नु वर्णन, लेमा रहेली विजयो, पृचस्कारपर्वतो, अंतन- दीओ, विजयमा रहेल चैताट्य, तेना छ खंड अने मुख्य नगरीओ, गंधमादन ने मान्यवंत, गजदेवार्नु वर्णन, उत्तरकुरुक्षेत्रनुं विस्तारथी निरूपण, यमकाद्रि, द्रहो, कंचनगिरियो, जंबूवृतनुं तेना कूटोसहित वर्णन, तेना अधिपतिनुं वर्णन, सौमनस ने विद्युत्प्रम- गजदंतान वर्णन, देवकुरुक्षेत्रनुं वर्णन, तेमा रहेला चित्र ने विचित्र पर्वतो, द्रहो, कंचन- गिरियो, शान्मलीवृक्ष विगेरेनुं वर्णन छ. (१७-२४) अढारमा सर्गमा मेरुपर्वत वर्णन, तेना चार चन, तेमा भाषेला फटो, मेरुनी त्रण मेखळा, उपर श्रावेली धूलिका अने पांडकवनमा प्रावेल तीर्थंकरोना जन्माभिषेकनी शिलामो ने सिंहासनोनुं वर्णन छे.( २५) ओगणीशमा सर्गमा नीलवंतपर्वत, तेनी उपर कूटो, द्रह, तेनी अधिष्ठायकदेवी, द्रहमाथी नकळती शीता ने नारीकांता नानु नाममात्र वर्णन, रम्यक्षेत्र, रुक्मिपर्वत, - .

सर्ग ३७ मो। (७१५) हैरण्यवतवर्षस्य गिरेः शिखरिणोऽपि च ॥ २७ ॥ क्षेत्रस्यैरवताख्यस्य पखंडस्य पुरीस्पृशः। वर्णनं च क्षेत्रशेला-दीनां साम्यनिरूपणं ॥२८॥ सर्वाग्रमद्रिकूटानां खेटश्रेणीपुरामपि । नंदीकुंडइदादीनां चक्रिरत्नार्हता- मपि ॥ २९ ॥ चंद्रसूर्यग्रहादीनां सज्जंबूद्वीपवर्तिनां । एकोनविंशे सर्गेऽत्र सर्वमित्यादि वर्णितं ॥ ३०॥ विस्तृता पंचभिर्दा रैः सूर्यद्वोमंडलादिभिः। चाररीतियोगश्च दिन- वृद्धिक्षयादि च ॥ ३१ ॥ ध्रुवराहोः पर्वराहो-स्तिथ्युत्पत्तेश्च शंसनं । द्वारैश्च पंचदशभि-नक्षत्राणां निरूपणं ॥ ३२ ॥ इत्यादि विंशतितमेसर्व सर्गे निरूपितं । एकविंशेऽत्र सर्गेऽथ वर्णनं लवणोदधेः ॥ ३३॥ सशि- खस्य सपाताल-कुंभस्य द्वीपशालिनः । सुस्थितादिसुराट्यस्य चंद्रार्का- दिद्युतिस्पृशः ॥ ३४ ॥ युग्मं ॥ धातकीखडकालोद-वर्णनं पूर्ववत्ततः । द्वाविंशे वर्णित सर्गे पृथक्क्षेत्रादिकीर्तनैः ॥ ३५ ॥ तथैव पुष्करार्द्धस्य मानुपोत्तरभूभृतः। ततोऽखिलनरक्षेत्रे क्षेत्रशै- लादिसंग्रहः ॥ ३६ ॥ ततः शाश्वतचैत्यानां सर्वसंख्यानिरूपणं । प्रयो- . हैरण्ययतक्षेत्र, शिसरीपर्वत, ऐरवनक्षेत्र, तेना छ खंड अने मध्यनी नगरी विगेरेनुं वर्णन, घेत्र ने पर्वतादिनु उत्तरदक्षिणमा साम्यपणुं, वेम ज सर्व पर्वतो, कूटो, विद्याधरनी श्रेणि- ओ, ते परना नगरो, कुल नदीमो, प्रपावकुंडो, द्रहो, चाची, वेनां रत्नो, अरिहंतो, वधा जयद्वीपवर्ती सूर्य, चंद्र, ग्रहादिकनी एकंदर संख्या विगेरे सर्व प्रापेल थे. (२६-३०) यीशमा सर्गमा मंडलादिक पांच द्वारवडे सूर्य-चंद्रनी गतिनी रीत विस्तारथी पवावी थेने नी साधे नक्षत्रना योग, दिनवृद्धि ने घयादिक, धुवराहुन ने पर्वराहुनु, विपिनी उत्पचिर्नु भने पंदर द्वारोवडे नक्षोनुं निरूपण करेलुं छे. (३१-३२) एकवीशमा सर्गमा लवणसमुद्रनु, तनी शिखान -पाताळ करशामोनु, एममुद्रमा रहेना दीपोर्नु, सुस्थितादि देवतुं भने चंद्र-सूर्यादि ज्योतिषीमोनुं वर्णन करेलुं छे. (३३-३४) पावीशमा मर्गमा जुदा जुदा क्षेत्रादिक फहरायडे घातकीखंडनु भने फाटोदधिर्नु पूर्वपत् पर्यन पायवामा प्राध्यं घे. (३५) रोपीशमा मर्गमा पुफरार्धद्वीपर्नु ने मानुपांतर पतनुं वर्णन थापर्नु छ भने नरम (पढीतीप) मा मारता समस्या भने पर्ववादिनो मंग्रह कोलोनम (७१६) बीजक। विशेऽखिलं सर्गे विविच्येत्यादि वर्णितं ॥ ३७ ॥ नृक्षेत्रात्परतश्चंद्र-सू. र्यादिश्रेणिकीर्तनं । पुष्कराब्धिक्षीरवर-दीपाब्ध्यादिनिरूपणं ॥३८॥ क्रमानंदीश्वरद्वीप-चैत्याद्याख्यानविस्तृतिः। इत्यायुक्तं चतुर्विशे स्वयं- भूरमणावधि ॥ ३९ ॥ पंचविंशे स्थिरचंद्र-ज्योतिश्चक्रव्यवस्थितिः । ऊर्ध्वलोकेऽथ सौधर्मे-शानयोर्देवलोकयोः ॥ ४० ॥ विमानावलयः पुष्पा- वकीर्णाश्च यथास्थिति । विमानमानप्रासाद-परिपाठ्यः सभा अपि ।। ४१ ॥ उत्पद्यते यथा देवा अभिषिच्यत एव ते । पूजयंति यथा सिद्धान् यथा भोगांश्च भुंजते ॥ ४२ ॥ याहस्वरूपा भाषां च यां भाषते सुधाभुजः । भवंति देव्यो यादृश्यः सेवंते च रतं यथा ॥ ४३ ॥ श्राहारो याहगेषामु-च्छ्वासश्च यावदंतरः । यथा मनुष्यलोकेऽमी आयांति स्नेहयंत्रिताः ॥४४॥ प्रेम्णा वशीकृता यांति यावतीपु मही- वधः । मध्येमहद्धिक यांति यथावधिदृशो यथा ॥४५॥ लोकपालाय- ज सर्व शाश्वत चैत्योनी संख्यानुं विस्तार साथे निरूपण कयुं छे. ( ३६-३७) चोवीशमा सर्गमां मनुष्यक्षेत्रनी बहार श्रावेला स्थिर ज्योतिषी पैकी सूर्य चंद्रनी श्रेणिर्नु वर्णन कयु छे. तथा पुष्करवर समुद्र, क्षीरवरद्वीप, क्षीरवरसमुद्र विगेरेनुं वर्णन, अनुक्रमे श्रावता नंदीश्वरद्वीपर्नु अने ते द्वीपमा आवेला शाश्वता चैत्योर्नु विस्तारथी वर्णन अने प्रति स्वयंभूरमण समुद्र सुधीन वर्णन आपलं छे. (३८-३९) पचवीशमा सर्गमा चर अने स्थिर एवा चंद्रादि ज्योतिपीनी व्यवस्थितिनुं सविस्तर वर्णन छे. छवीशमा सर्गमा ऊलोकनुं वर्णन शरु थाय छे. तेमा सौधर्म ने ईशान देवलोकनी हकीकत, तेना विमानोनी श्रेणियो, पुष्पावकीर्ण विमानो, तेनुं मान, तेमा प्रासादनी अने सभामोनी परिपाटी, नवो देव केवी रीते उपजे ?, तेना अभिषेकनी हकीकत, वेणे कराती सिद्धोनी पूजा, तेनाथी भोगवाता मोग, देवोना स्वरूपनुं वर्णन, देवो केवी भाषा चोले छे ? देवीमोना स्वरूपनुं वर्णन, तेनी सार्थना विलासर्नु (कामक्रीडानु) वर्णन, तेमनो बेवा प्रकारनो आहार ने तेयो आहार अने श्वासोच्छ्वास केटले अंतरे ले छे ? मनुष्यलोकमा स्नेहना अाकर्षणथी तेतुं प्राव, प्रेमना वशीकरणथी केटली नरकपृथ्वी सुधी तेनुं जवू, महर्द्धिक देवखरूप, तथा तेमना अवधिज्ञानतुं प्रमाण तथा लोकपाळ, सर्ग ३७ मो। (०१७) महिपी-सामानिकादिशालिनोः । शक्तिसंपद्विवरणं सौधर्मेशाननाथयोः ॥४६॥ पर्विशतितमे सर्गे इत्याखिलमीरितं । सप्तविंशे ततः सर्गे तृतीयतुर्यनाकयोः ॥ १७ ॥ वर्णनं ब्रह्मलोक- स्य तमस्कायस्य मूलतः । कृष्णराजी तद्विमान-लौकांतिकसुधाभुजां ॥४८॥ स्वर्गस्य लांतकस्याथ सकिल्लिपिकनाकिनः । जमालेश्चरितं शुक्र-सहस्रारादिवर्णनं ॥ १९॥ यावदच्युतनाकस्य कीर्तनं रामसीतयोः । चरितं तदनु प्रैवे-यकानुत्तरवर्णनं ॥ ५० ॥ ततः सिद्धशिलाख्यानं लोकांतस्य च संशनं । इत्यादिवर्णनैरेवं क्षेत्रलोकः समापितः ॥ ५१ ॥ ॥ इति क्षेत्रलोकः॥ दिष्टलोकेऽथ कालस्य युक्तिव्यक्तिमतद्वये । ऋतूनां वर्णनं परणां निक्षेपाः कालगोचराः ॥ ५२ ।। समयावलिकातुल्ल-भवादिपरिकीर्तनं । घटीमुहूर्त्तदिवस-पक्षमासादिशंसनं ॥ ५३ ॥ सूर्य चंद्रनक्षत्रा- भिवर्द्धिताह्वयाः क्रमात् । मासा वर्षाण्यथेतेपा-मुपपत्त्यादिवर्णनं अग्रमहिपी (इंद्राणी), मामानिक विगैरे देवोधी शोमता एवा सौधर्मेंद्र ने ईशानेंद्रनी शक्ति भने संपत्तिनुं वर्णन विगैरे आपेलु थे. (४०-४६) सत्तावीशमा सर्गमां घीजा ने घोघा देवलोकनुं वर्णन, पांघमा प्रमदेवलोफर्नु वर्णन, तेने अंगे मूळयी नीकळेला तमस्कायर्नु, छप्पराजीनुं भने तेना (कृष्णराजीना) मंतरे रहेला लोकोविकना विमानोन वर्णन, लांतक देवलोकनुं वर्णन, प्रण प्रकारना किन्चि- पिक देषोनुं वर्णन, जमालिनु चरित्र, शुक सहस्रारादि देवलोकानुं यावद भन्युत देवलोक सुधार्नु पर्यन, राम-सीतार्नु नारित्र, यक ने मनुत्तर धिमानोनुं वर्णन, त्यारपछी सिद- शिलानु भने लोकाते रहेला सिद्धोनुं वर्गन मापेठं छ. मा प्रमाणे १६ सर्गमा (१२ धी २७ सुधीमा ) क्षेत्रलोक पूर्ण करेलो हे. (४७-५१) ग्रीना काळलोकमा २८ मा सर्गमा कारने द्रव्य तरीके मान संबंधी पे मतने पायीने युक्तिनी स्पष्टता, घरतर्नु पर्यन, काठगोघर निषेपा, ममप, पावटी, शुधक- मपर्नु पर्यन, पडी, सर्च, दियम, पप, माम निगरेनुं चर्शन, सर्प, ऋतु, चंद्र, नपत्र ने ममियादित-एम पांच प्रकारका माम, पर्प भने तेनी उपपगिन परीन, युगनी भादि क्यारे पाय दरेक पुगमा मारता माम, शत प्रपनो ने दिएसोनुं प्रमाप, पषिम्माम, . .

बीजक। (७१८) ॥ ५४ ॥ युगस्यादियुगे माल-वयनानि दिनानि च । अधिमासा- वमरात्रा-वृत्तयो विपुर्वति च ॥ ५५ ॥ करणान्यत्वयनादे-नक्षत्रानयनं विधोः । वेश्च करणान्येषां ववादिकरणान्यपि ॥५६॥ पौरुष्यादिपरी- माणं तस्मात्तिथ्यादिनिश्चयः । सर्गेऽष्टाविंशतितमे इत्यादि युग- वर्णनं ।। ५७ ॥ युगात्प्रभृत्यव्दशत-सहस्रादिक्रमेण च । शीर्षप्रहेलिकांतांक-स्वरू- पप्रतिपादनं ॥५८॥ प्ररत्रयस्यायस्याव-सर्पिण्यां वर्णनं स्थितेः। कल्प- ढुंयुग्मिलोकादे-रेकोनत्रिंश याहतं ॥ ५९ ॥ अर्हता पद्धतिः सर्वा निर्वाणावधि जन्मतः । उक्ता त्रिंशत्तमे सर्गे एकत्रिंशे ततः पुनः ॥६०॥ चक्रिदिग्विजयः संप-निधिरत्नादिरस्य च । सामान्यतः शाहिसीरि-प्रतिविष्णवादिकीर्तनं ॥ ६१ ॥ सर्गे द्वात्रिंशत्तमेऽथ संक्षेपात्प्राग्भवादितः। जिनानां वृषभादीनां चरित्रस्य निरूपणं ॥ ६२ ।। एतस्यामवसर्पिण्यां वर्णनं जातजन्मनां । त्रयस्त्रिंशे चक्रिविष्णु- बलदेवादिसन्नृणां ॥ ६३ ॥ अवमरात्रिओ ने विपुवत्नी श्रावृचि, ऋतु, अयन अने नक्षत्रादि साथे चंद्रमानो योग, तेना करणो, सूर्यना करणी, वीजा बवादि करणो, पौरुषी विगेरेनुं परिमाण, तेनावडे तिथि आदिनो निश्चय विगेरे वतावेल छे. (५२-५७) २९ मा सर्गमा युगथी मांडीने सो, हजार विगेरेना क्रमथी शीर्षप्रहेलिका सुधीना अंकोनुं निरूपण, अवसर्पिणीना पहेला त्रण आरानुं वर्णन तेमज कल्पवृक्ष अने युगलि- कादिनुं वर्णन श्रापेलुं छे (५८-५९) त्रीशमा सर्गमा जिनेश्वरोनी जन्मथी मांडीने निर्वाणपर्यंतनी सर्व परिस्थितिनुं विस्तारथी वर्णन कर्यु छे. (६०) ३१ मा सर्गमा चक्रवर्तीना दिग्विजयनी हकीकत, तेनी संपत्तिनुं वर्णन, नव निधि ने चौद रत्नोनुं वर्णन तथा वासुदेव, बळदेव ने प्रतिवासुदेवनुं सामान्य वर्णन आपेलुं छे. (६१) ३२ मा सर्गमां अपमादि जिनेश्वरोर्नु पूर्वभवथी मांडीने संक्षेपथी चरित्र वर्णवेलुं छे. (६२) ३३ मा सर्गमा या श्रवसर्पिणीमा थयेला चक्रवर्ती, वासुदेव, वळदेव विगैरे सत्पु. - सर्ग ३७ मो। (.७१९) अरस्य पंचमस्याथ खरूपेण निरूपणं । अरेऽस्मिन् पंचमे ये चो- दयास्तत्सूरयश्च ये ॥ ६४ ॥ तेषां नामानि सर्वाग्र-माचार्यादिमहात्मना। ख्याता ततोऽरके पष्ठे धर्मोच्छेदादिका स्थितिः ॥ ६५ ॥ गिरेः,शत्रुजय. स्याथ वृद्धिहान्यादिशंसनं । विलवासिजनावस्थो-सर्पिण्यां च तथो- रक्रमात् ।। ६६ ।। परणामराणां पर्याय-वृद्धयाख्यानं यथाक्रमं । एतदुत्स- पिणीभावि-जिनचक्यादिकीर्तनं ॥ ६७ ॥ इत्यादिकं चतुस्त्रिंशे सर्गे सर्व निरूपितं । पंचत्रिंशेऽथ पुद्गल-परावर्चश्चतुर्विधः॥६८॥औदारिकादिका कार्म- णांता या वर्गणाष्टधा । अनुभागस्पर्द्धकानि कर्मणां परमाणुपु ।। ६९ ॥ एषां स्वरूपं मानं चा-तीतानागतकालयोः। संपूर्णो दिष्टलोकोऽय-मि- त्यादिपरिकीर्तने ।। ७० ॥ भावलोकेऽथ भावानां पणां सम्यग्निरूपणं । सर्गे पत्रिंश इत्येवं भावलोकः समर्थितः॥ ७१ ।। एभिर्विचारैर्मणिरत्नसारैः, पूर्णः सुवर्णोद्यदलंकृतिश्च । समौक्तिक- . रुपोर्नु चरित्र वर्णवेलुं छे. (६३-६४) ३४ मा सर्गमा पा पांचमा भाराना सरूपनु निरूपण अने तेमा थनारा उदयो तथा प्राचार्योर्नु वर्णन, तेमनां नामो अने ए महात्माअोनी कुल संख्या यतानी छे. त्यारपछी छटा भाराना प्रारममा थनार तीर्थोच्छेदादि स्थिति, शटुंजयगिरिनी पृद्धि-हानि अने छहा भारामां पिलयासी धनारा मनुष्यादिनुं वर्णन प्राप्युं छे तेम ज उत्सर्पिणीमा उत्क्र- एपणे थनारी पधी स्थिति, पर्यायवृद्धिवडे बघती छए भारानी स्थिति, भापती उत्सर्पि- गीमा धनारा जिन तथा चक्री विरेनु वर्णन झापामा मान्यू के (६५-६७) २५ मा सर्गमा चार प्रकारना पुद्गळपरावर्तनहुँ स्वरूप, भौदारिकथी माडीने फार्मण सुधीनी पाठे वर्गणानु स्वरूप, कर्मना परमाणुप्रोमा रहेला अनुमागना पद्धको- स्वरूप, मतीत, मनागव काळनु मान इत्यादि परिकी-नरहे दिष्ट( काळ )लोक संपूर्ण फरेलो थे. (६८-७० ) ३६ मा सर्गमा भावलोकनुं स्वरूप मापेतुं छे, वेमा द मायोर्नु सम्पक प्रकारे निरूपण फयु छ भने मावलोक समाप्त फर्यो छे. (७१) उपर जगाच्या प्रमाणे मारभूत विचाररूप मचिरत्नोरहे पूर्ण, सुपर्यना उपव भलंकारवाळो (मारा पर्ण ने भलंकारवाळो), मौक्तिक (सक्ति) नी शोमावाठो भने वि.

(७२०) वीजक। श्रीविवुधारतोऽयं, ग्रंथोऽस्तु सिद्ध्यै जिनराजकोशः ॥ ७२ ॥ श्रनाभोगो भूयान्न सदनुभवः शास्त्रविभवो, न सामग्री तादृग न पटुधना वाक्य- रचना । श्रियं सत्यप्येवं यदयमभजद्र ग्रंथनृपतिः, कृती हेतुस्तनोल्लसति सुमनःकोविदकृपा ॥७३॥ संतः शास्त्रसुधोधिौतरुचयो ये पूर्णचंद्राग्रजा, बंद्यास्तेऽद्य मया कवित्वकुमुदोल्लासेऽनवद्योद्यमाः । येऽपि द्वेषसितित्वि- पोऽतिकठिनास्तान्वस्तुतः संस्तुतान् , मन्ये प्रस्तुतकाव्यकांचनकपान् सम्यकपरीक्षाक्षमान् ॥ ७ ॥ विश्वाश्चर्यदकीर्तिकीर्तिविजयश्रीवाचकेद्रातिप- द्राजश्रीतनयोऽतनिष्ट विनयः श्रीतेजपालात्मजः। काव्यं यत्किल तत्र निश्चितजगत्तत्त्वे श्रितः पूर्णता सप्तत्रिंश उदीतचिद्रविरुचिः सर्गो निसर्गोज्ज्वलः ॥ ७५ ।। ॥ इति श्रीलोकप्रकाशे सप्तत्रिंशत्तमः सर्गः समाप्तः ॥ तत्समाप्तौ च समाप्तोऽयं श्रीलोकप्रकाशः ॥ श्रीरस्तु ।। बुधजनोए स्वीकारेलो जिनराजना कोशरूपी या ग्रंथ भव्यजनोनी सिद्धिने माटे हो. (७२) था ग्रंथमा सदनुभववाळो शास्त्र विभव नथी, घणे ठेकाणे अनाभोग (स्खलना) थयेल हशे, तेवा प्रकारनी सामग्री नथी, तेग ज एवी सुंदर वाक्यरचना पण नथी तो पण आ ग्रंथरूपी नृपति जे शोभाने पामे छे तेमा विद्वजनोनी कृपा ज उत्तम हेतुभूत छे. (७३) शास्त्ररूपी अमृतना तरंगोवडे उज्वळ थयेला अने पूर्ण चंद्रना पडील बंधु जेवा तेम ज कवितारूपी कमळने विकस्वर करवामां निर्मळ उद्यमवाळा एवा जे सत्पुरुषो के ते तो मारे वंद्य छ ज, पण जेओ द्वेषरूपी सूर्य जेवा अति कठोर छे तेोने पण प्रस्तुत कविता रूपी सुवर्णने कसवामां कसोटी जेवा-सम्यक् प्रकारे परीक्षा करवामां समर्थ होवाथी वस्तुगतिए हुं स्तवेला ज मार्नु छु. (७४) सकळ जगत्ने भाश्चर्य पमाडनारी छे कीर्ति जेनी एवा कीर्तिविजय उपाध्या- पना शिष्य श्रने माता राजश्री तथा पिता तेजपाळना पुत्र विनयविजय उपाध्याये श्रा काव्यग्रंथनी रचना करी छे ते जगतना तयने निश्चय करनारा पा ग्रंथमा उदय पामेला ज्ञानरूपी सूर्यनी कौविसमान भने स्वभावी ज उज्वळ एवो पा साउत्रीशमा सर्ग पूर्ण थयो छे. (७५) ॥ इति श्रीलोकमक सप्तत्रिंशत्तमः सर्गः समाप्तः । तत्समाप्तौ च समाप्तोऽयं श्रीलोकप्रकाशः ॥श्रीरस्तु॥

(७२१) ॥ अथ ग्रंथकर्तुः प्रशस्तिः ।। श्रेयः श्रीवर्द्धमानो दिशतु शतमखश्रेणिभिः स्तूयमानः, स दमाभृ. सेव्यपादः कृतसदुपकृतिर्गोपतिर्नूतनो वः। कालेऽप्यस्मिन् प्रदोपे कटु- कुमतिकुहूकल्पितध्वांतपोपे, प्रादुप्कुर्वति गावः प्रस्मरविभवा मुक्तिमार्ग यदीयाः ॥ १॥ तत्पद्देऽथेंद्रभूतेरनुज उदभवच्छ्रीसुधर्मा गणींद्रो, जंबूस्त- त्पदीपः प्रभव इति भवांभोधिनौस्तस्य पढे । सूरिः शय्यभवोऽभूत्स मनकजनकस्तत्पदाभोजभानु-स्तत्पीरावतेंद्रो जनविदितयशाः श्रीयशो. भद्रसूरिः ॥ २ ॥ तत्पट्टभारधुर्यो, गणधरवर्यों श्रियं दधाते द्वौ । संभूत- विजयसूरिः, सूरिः श्रीभद्रवाहुश्च ॥ ३ ॥ श्रीस्थूलभद्र उदियाय तयोश्च पट्टे, जातौ महागिरिसुहम्तिगुरू ततश्च । पट्टे तयोः श्रियमुभौ दधतुर्ग- अथ ग्रंथकर्तानी प्रशस्तिः , शवमस (इंद्रो-घुबडो) नी श्रेणिोपडे स्तुति कराता, मामृत (राजाओ-पर्वतो) घडे जेना पाद (पग-किरण ) सेवाय छे, तथा जे सर्व प्राणीमो उपर उपकार करे छे एया नवीन सूर्य जेया ते श्री घर्धमानस्वामी तमोने कन्याण पापो, के जेनी विस्तारना धैभववाळी गो (वाणी-किरण ) कटु कुमतिरूपी अमावास्या संबंधी अंधकारन (प्रज्ञा. ननु) पोषण करनारा आधा प्रदोष (दोपबाळा-सांजना) समये पण मुक्तिमार्गने प्रकाशित करे छे. (१) ते श्रीवर्धमानस्वामीनी पाटे श्रीइंद्रभूति (गौतम) गणधरना नाना भाइ (गुरुमाइ) श्रीसुधर्मास्वामी गणधर गया, तेनी पाटना दीपकरूप श्रीजयूसामी थया. तेनी पाटे संसारसमुद्रमा नौकासमान श्रीमभयस्वामी थया. तेना घरपकमब्ने विकस्वर करवामा सूर्यसमान श्रीशरपंभयररि धया. ते मनकना पिता हता. सेनी पाटे ऐराव- सेंद्र जेवा भने लोकमा प्रसिद्ध यशवाळा श्रीयशोभद्रगरि धया. (२) तेनी पाटरूपी मारने पहन करवामां वृषमसमान अने गणधरने विष श्रेष्ठ एवा श्रीसंभूतयिजयमूरि भने श्रीभद्रपाहुपरि लक्ष्मी (शोमा) ने धारण करनारा थया. (३) ते पनी पाटे श्रीस्थूलभद्रमरि उदय पाम्या. लारपछी श्रीमहागिरि मने श्रीमुहस्ति (७२२) प्रशस्तिः णींद्रौ, श्रीसुस्थितो जगति सुप्रतिवद्धकश्च ॥ ४॥ तत्पभूषणमणिर्मु- हरिंद्रदिन्नः, श्रीदिन्नसूरिरथ तस्य पदाधिकारी । पट्टे रराज गुरुसिंहगिरि- स्तदीये, स्वामी च वज्रगुरुरस्य पदे वभूव ॥ ५॥ श्रीवज्रसेनसुगुरुर्विभरांवभूव, पटं तदीयमथ चंद्रगुरुः पदेऽस्य । सामं. तभद्रगुरुरुन्नतिमस्य पट्टे चक्रेऽस्य पद्दमभजद्गुरुदेवसूरिः ॥ ६ ॥ प्रद्यो- तनस्तदनु तस्य पदे च मान-देवस्तदीयपदभृद्गुरुमानतुंगः । वीरस्त- तोऽथ जयदेव इतश्च देवा-नंदस्ततश्च भुवि विक्रमसूरिरासीत् ॥ ७ ॥ तस्मादभूव नरसिंह इति प्रतीतः, सूरिः समुद्र इति पट्टपतिस्तदीयः । सूरिः पदेऽस्य पुनरप्यजनिष्ट मान-देवस्ततश्च विवुधप्रभसूरिरासीत् ॥८॥ जयानंदः पट्टे श्रियमपुपदम्यास्य च रवि-प्रभस्तत्पद्देशः समजनि यशोदेवमुनिराट् । ततः प्रद्युम्नाख्यो गुरुरुदयतिस्माथ पुनर-प्यभून्माना. देवो गुरुविमलचंद्रश्च तदनु ॥ ९॥ तस्मादुद्योतनाख्यो गुरुरभवदितः नामना गुरु (सूरि ) थया. ते बन्नेनी पाटे श्रीसुस्थित अने श्रीसुप्रतिबद्धक नामना बन्ने गणींद्रो जगतमां लक्ष्मी (शोभा) ने धारण करनार थया. (४) तेमना पट्टरूपी भूपणना मणिसमान श्रीइंद्रदिन्न नामना गुरु थया. वेना पट्टना अधिकारी श्रीदिन्न नामना सूरि थया. तेनी पाटे श्रीसिंहगिरि नामना गुरु शोमता हता. तेनी पाटे श्री वज्रगुरुस्वामी थया. (५) तेना पट्टने सीवघ्रसेन गुरु धारण करता हता. तेने स्थाने श्रीचंद्रगुरु थया. तेना पट्ट उपर श्रीसामंतभद्र गुरु उन्नति करनार थया. तेना पट्टने श्रीदेवसूरि नामना गुरु भजता हता. (६) त्यारपछी श्रीप्रद्योतनसरि थया. तेने स्थाने श्रीमानदेवसूरि थया. तेना पट्टने धारण करनार श्रीमानतुंग नामना गुरु थया. त्यारपछी श्रीवीर नामना सूरि थया. त्यारपछी श्रीजयदेवसूरि थया. त्यारपछी श्रीदेवानंदसूरि अने त्यारपछी पृथ्वीपर श्रीविक्रम नामना सूरि थया. (७) त्यारपछी श्रीनरसिंह नामे प्रसिद्ध सूरि थया. तेना पट्टना स्वामी श्रीसमुद्र नामना सूरि थया. तेने स्थाने श्रीमानदेव सूरि अने त्यारपछी श्रीविबुधप्रभ सूरि थया. (८) तेना पट्ट उपर श्रीजयानंद भूरि लक्ष्मीनुं पोषण करता हता. तेनी पाटे श्रीरविप्रभ सरि श्या. तेनी पाटना स्वामी श्रीयशोदेव मुनिराज थया. त्यारपछी श्रीप्रद्युम्न नामना गुरु उदय पाम्या. त्यारप श्रीमानदेव थया. त्यारपछी श्रीविमलचंद्र गुरु थया. (९) त्यारपछी श्रीउद्योतन नामना गुरु थया. त्यारपछी श्रीसर्वदेव नामना प्रशस्तिः । (७२३) सर्वदेवो मुनींद्र-स्तस्माच्छ्रीदेवसूरिस्तदनु पुनरभूत्सर्वदेवस्ततश्च । जज्ञाते सूरिराजौ प्रगुणगुणयशोभद्रसन्नेमिचंद्रौ, विख्यातौ भूतलेऽस्मिन्न- विरतमुदितौ नूतनौ पुष्पदंतौ ॥ १०॥ मुनिचंद्रमुनिस्ततोऽद्भुतोऽथा- ऽजितदेवश्च तदंतिपद्वरेण्यः । अपरः पुनरस्य शिप्यमुख्यो, भुवि वादी विदितश्च देवसरिः ॥ ११ ॥ अजितदेवगुरोरभवत्पदे, विजयसिंह इति प्रथितः क्षितौ। तदनु तस्य पदं दधतावुभा-वभवतां गणभारधुरंधरौ ॥ १२॥ सोमप्रभस्तत्र गुरुः शतार्थी, सतां मणिः श्रीमणिरत्नसूरिः। पहे मणिः श्रीमणिरत्नसूरे-जज्ञे जगञ्चंद्रगुरुगरीयान् ॥ १३ ॥ तेपामुभावंति- पदावभूतां, देवेंद्रसूरिविजयाच्च चंद्रः । देवेंद्रसूरेरभवच्च विद्या-नंदस्तथा श्रीगुरुधर्मघोपः ॥ १४ ॥ श्रीधर्मघोपादजनिष्ट सोम-प्रभोऽस्य शिष्याश्च युगप्रमेयाः । चतुर्दिगुत्पन्नजनावनाय, योधा इव प्राप्तविशुद्धबोधाः ॥१५॥ श्रीविमलप्रभसूरिः, परमानंदश्च पद्मतिलकश्च । सूरिवरोऽप्यथ सोम- मुनींद्र थया. त्यारपछी श्रीदेवसूरि भने त्यारपछी फरीथी श्रीसर्वदेय नामना वीजा सूरि थया. त्यारपछी आ भूतळने विषे प्रसिद्ध जाणे के निरंतर उदय पामेला नवीन सूर्य-चंद्र होय एम घणा गुणवाळा श्रीयशोभद्र भने श्रीनेमिचंद्र नामना सूरिराज थया. (१०) स्यारपछी अद्भुत एका श्रीमुनिचंद्र नामना मुनि यया. त्यारपछी तेना शिष्योने विपे श्रेष्ठ एवा श्रीअजितदेव अने वीजा तेना मुख्य शिष्य श्रीदेवसूरि नामना वादी पृथ्वीमा प्रसिद्ध थया. (११) तेमांना श्रीश्रजितदेव गुरुने स्थाने पृथ्वीपर प्रसिद्ध एवा श्रीविजयसिंह सरि थया. त्यारपछी तेना पट्टने धारण करनारा, गच्छना मारने वहन करवामा धुरंधर एवा ये मूरि थया. (१२) मा पहेला श्रीसोमप्रभ गुरु शतार्थी ( एक गाधाना सो अर्थ करनारा ) हता भने वीजा श्रीमणिरत्न मूरि सत्पुरुषोना मणिममान हता. त्यारपछी श्रीमणि- रत्नसरिना पट्ट उपर मणि समान श्रीजगचंद्र नामना मोटा सूरि थया. (१३) तेमना श्रीदेवेंद्रसूरि भने श्रीविजयचंद्रमार ए ये मुख्य शिष्यो थया. त्सारपछी श्रीदेवेंद्र- सूरिना शिष्य श्रीविद्यानंदरि अने श्रीधर्मघोष गुरु थया.(१४) श्रीधर्मघोपनी पछी सेना शिष्य श्रीसोमप्रभरि यया. तेने चार दिशामा उत्पन्न ययेला मनुष्योनुं रखप करवा माटे योद्धामोनी जेवा चार शिप्पो विशुद्ध योधने पामेला थया. (१५) मना नाम मा प्रमाणे-श्रीविमलप्रभरि १, परमानंदसूरी २, पतिलक सूरीश्वर ३, - (७२४) प्रशास्ति। प्रभपदेशश्च सोमतिलकगुरुः ॥ १६ ॥ शिष्यास्त्रयस्तस्य च चंद्रशेखरः, सूरिर्जयानंद इतीह सूरिराट् । स्वपट्टसिंहासनभूमिवासवः, शिष्यस्त- तीयो गुरुदेवसुंदरः ॥ १७ ॥ श्रीदेवसुंदरगुरोरथ पंच शिष्याः, श्रीज्ञान- सागरगुरुः कुलमंडनश्च। चंचद्गुणश्च गुणरत्नगुरुमहात्मा, श्रीसोमसुंदर- गुरुर्गुरुसाधुरलः ॥ १८॥ श्रीदेवसुंदरमुनीश्वरपट्टनेतुः,श्रीसोमसुंदरगुरो. रपि पंच शिष्याः । तत्र स्वपट्टवियदंगणभानुमाली, मुख्योतिषद्गणधरो मुनिसुंदराख्यः ॥ १९ ॥ अन्ये श्रीजयचंद्रः, सूरिः श्रीभुवनसुंदराहश्च । श्रीजिनसुंदरसूरि-जिनकीर्तिश्चेति सूरींद्राः ॥ २० ॥ मुनिसुंदरसूरिपट्ट- भानु-गुरुरासीदथ रत्नशेखराख्यः । दधदस्य पदं बभूव लक्ष्मी-पदयुक् सागरसूरिरीश्वराय॑ः ॥ २१ ॥ सुमतिसाधुगुरुस्तदनु प्रभा-मुदवहदध- दस्य पदं प्रभुः । पदमदीदिपदस्य च हेमयुग्-विमलसूरिरुदात्तगुणोदयः ॥ २२ ॥ पट्टे तस्य बभूवुरुग्रतपसो वैरंगिकाग्रेसरा, आनंदाद्विमलाह्वया अने श्रीसोमतिलक नामना गुरु ४, ए सर्वे सोमप्रभसरिना पढेश हता. (१६) ते सोमतिलक सूरिना त्रण शिष्यो हता-श्रीचंद्रशेखरमूरि, श्री जयानंद नामना सरिराज अने पोताना पट्टरूपी सिंहासन उपर भूमींद्र (राजा) समान त्रीजा शिष्य श्री देवसुंदर गुरु थया. (१७) त्यारपछी श्रीदेवसुंदर गुरुना पांच शिष्यो थया- -श्री ज्ञानसागर गुरु १, देदीप्यमान गुणवाळा श्रीकुलमंडनसरि २, महात्मा श्री गुण- रत्न गुरु ३, श्री सोमसुंदर गुरु ४ अने श्री साधुरत्न गुरु ५, (१८). त्यारपछी श्री देवसुंदरमुनीश्वरनी पाटना नेता जे श्री सोमसुंदर गुरु हता तेने पण पांच शिष्यो हता. तेमा पोताना पट्टरूपी गगनांगणमां सूर्यसमान मुख्य शिष्य श्री मुनिसुंदर नामना गणधर हवा. (१९) वीजा श्री जयचंद्रसरि, त्रीजा श्री भुवनसुंदर नामना, चोथा श्री जिनसुंदर मूरि अने पांचमा श्री जिनकीर्तिसूरींद्र थया. ( २० ) त्यार- पछी श्री मुनिसुंदरसूरिना पट्ट उपर सूर्यसमान श्रीरत्नशेखर नामना गुरु थया. तेमना पट्टने धारण करनार अने राजाओने पण पूजवालायक लक्ष्मीशब्दवडे युक्त सागर एटले श्री लक्ष्मीसागर सूरि थया. (२१) त्यारपछी तेना पदने धारण करनार अने साधुनोना गुरु श्री सुमति नामना प्रभु (सूरि ) प्रभाने वहन करता हता, तेना पदने मोटा गुणना उदयवाळा हेमशब्द सहित विमल एटले श्री हेमविमलसूरि दीपाववा लाग्या. (२२) तेनी पाटे उग्र तपवाळा, वैराग्यवतमा अग्रेसर अने भन्योनो उपकार , . प्रशस्विः (७२५) गणभृतो भव्योपकारोऽधुराः। ये नेत्रेभशरामृतद्युतिमिते (१५८२) वर्षे क्रियोद्धारत-श्चक्रुः स्वां जिनशासनस्य शिखरे कीर्ति पताकामिव ॥ २३ ॥ प्रमादाभ्रच्छन्नं चरणतरणिं मंदकिरणं पुनश्चके दीप्रं रुचिररु- चिरव्दात्यय इव । सृजन् पद्मोल्लासं सुविशदपथश्चंद्रमधुरो, दिदीपे नि:- पंकः स इह गुरुरानंदविमलः ॥ २४ ॥ विजयदानगुरुस्तदनु युति, तप- गणेऽधिकभाग्यनिधिर्दधौ । श्रुतमहोदधिरेधित्तसद्विधि-विधुयशा जिनधर्म- धुरंधरः ॥ २५ ॥ भूत्पट्टे तस्योल्लसितविजयो हीरविजयो, गुरुर्गीर्वाणौ- घप्रथितमहिमास्मिन्नपि युगे। प्रबुद्धो म्लेच्छेशोऽप्यकवरनृपो यस्य वचसा, दयादानोदारो व्यतनुत महीमाईतमयीं ।। २६ ॥ तदनु विजय. सेनसूरिराज-स्तपगणराज्यधुरं दधार धीरः । अकबरनृपतेः पुरोजयश्री- र्यमववरीदुरुवादिवृंददत्ता ॥ २७ ॥ जयति विजयदेवः सूरिरेतस्य पट्टे, करवामां तत्पर एवा श्रीथानंदविमल नामना गणधर थया. तेमणे संवत १५८२ वर्षे क्रियानो उद्धार करीने जिनशासनना शिखरउपर पताकानी जैम कीर्त्तिने फेलाची हती. (२३) पद्म एटले कमळनो अने वीजा पक्षमा पद्मा एटले ज्ञानादिक लक्ष्मीनो उन्नास करता, निर्मळ मार्गवाळा अने पापरूपी पंकरहित एवा ते आनंदविमल नामना गुरु चंद्रनी नेम मनोहर दीपना हता. शरझातुनी जेम मनोहर कातिवाळा तेमणे प्रमादरूपी वादळाथै ढंकायेला अने तेथी करीने ज मंद किरणोवाळा ( मंद तेजवाळा ) चारिप्ररूपी सूर्यने देदीप्यमान को हतो. (२४) त्यारपची तेमनी पाटे तपगच्छमां अधिक भाग्यना निधिसमान, थुतना सागरसमान, सारा विधानने वृद्धि पमाडनार, चंद्र जेवा उज्वळ यशवाळा अने जिनधर्ममा धुरंधर एवा श्रीविजयदान नामना गुरु कांतिने धारण करता हता. ( २५) तेमनी पाटे विजयवडे उल्लास पामता श्रीहीरविजय नामना गुरु थया. तेमनो महिमा मा कलियुगा पण देवोना समूहे विस्तार्यों हतो. तेमना वचनपी म्लेच्छना स्वामी अकयर यादशाह पण बोध पाम्या ता तथा दया भने दानमा उदार एवा तेमणे भासी पृथ्वी अरिहंतना धर्ममय करी हवी. (२६) स्पारपछी तेमनी पाटे धीर एवा श्रीविजयसेन मरिराजे तपगच्छरूपी राज्यनी घसरीने धारण करी. तेमने पादशाहनी समक्ष मोटा वादीमोना समृहे यापली जयलक्ष्मी वरी हती. (२७) सेमनी पाटे मुकुटना मणिनी जेम जेनी कीर्तिरूपी कांचिनो प्रताप देदीप्यमान हतो, जेनी मोटी वपलदमी विस्तार पामी इती एपा तथा शुद्ध दिवाला, द्रभूति (गौतम) गणधरनी भकपर , (७२६) प्रशस्तिः मुकुटमणिरिवोद्यकीर्तिकांतिप्रतापः। प्रथितपृथुतपःश्रीः शुद्धधीरिंद्रभूतेः, प्रतिनिधिरतिदक्षो जंगमः कल्पवृक्षः ॥ २८ ॥ तेन श्रीगुरुणाहितो निज- पदे दीपोपमोऽदीदिपत्, सूरिः श्रीविजयादिसिंहसुगुरुः प्राज्यैर्महोभिर्ज- गत् । भूमौ स प्रतियोध्य भव्यनिवहान् स्वर्गेऽप्यथ स्वर्गिणः, प्रासो योधयितुं गुसौ विजयिनि प्रेमाणमुत्सृज्य नः ॥ २९ ॥ तदनु पट्टपति- विहितोऽधुना, विजयदेवतपागणभूभृता । गुणगणप्रगुणोऽतनुभाग्यभू- विजयते गणभृद्विजयप्रभः ॥ ३० ॥. निग्रंथः श्रीसुधर्माभिधगणधरतः कोटिकः सुस्थितार्या-चंद्रः श्रीचंद्रसूरेस्तदनु च वनवासीति सामंतभ- द्रात् । सूरेः श्रीसर्वदेवावटगण इति यः श्रीजगच्चंद्रसूरे-विश्वे ख्यातस्त- पाख्यो जगति विजयतामेप गच्छो गरीयान् ॥ ३१ ॥ इतश्च- श्रीहिरविजयसूरी-श्वरशिष्यौ सोदरावभूतां द्वौ । श्रीसोमविजय- वाचक-वाचकवरकीर्चिविजयाख्यौ ॥ ३२ ॥ तत्र कीर्तिविजयस्य किं . प्रतिकृतिरूप, अति दक्ष अने जंगम कन्पवृक्ष जेवा श्रीविजयदेव नामना सूरि थया. (२८) ते श्रीगुरुए (विजयदेवसरिए) पोतानी पाटे स्थापन करेला सूरि श्रीविजयसिंह नामना सुगुरु दीपकनी जेम पोताना मोटा तेजवडे जगतने दीपाववा लाग्या. तेभो पृथ्वीपर भन्यजनोना समूहने प्रतिबोध करीने पोताना गुरु विजयमान (विद्यमान) बां देवोने प्रतिबोध करवा माटे अमारा प्रेमनो त्याग करीने स्वर्गमा प्राप्त थया. (२९) स्यारपछी हमणा श्रीविजयदेव नामना तपगच्छना स्वामीए पोतानी पाटना स्वामी तरीके स्थापन करेला, मोटा गुणसमूहने धारण करनार अने मोटा भाग्यना स्थानरूप श्री विजयप्रभ नामना गणधर विजय पामे छे. (३०), श्रीसुधर्मा नामना गणधरथी निर्मथ नामनो गण ( गच्छ) प्रसिद्ध थयो, श्रीसुस्थित आचार्यथी कोटिक नामनो गण, श्रीचंद्रसूरिथी चंद्र नामनो गण, (वनमा रहेनारा) श्री सामंतभद्री वनवासी एवा नामनो गण, श्रीसर्वदेव नामना सूरिथी वट गण एवा नामनो गण प्रसिद्ध थयो; तथा श्रीजगचंद्र नामना सरिथी विश्वने विषे जे तप नामनो गण प्रसिद्ध थयो ते मोटो गच्छ जगतमा विजय पामो. (३१) अही-श्रीहीरविजयसूरीश्वरना ये शिष्यो श्रीसोमविजय वाचक (उपाध्याय) अने वाचकवर श्री कीर्तिविजय नामना सहोदर भाइयो हता. (३२) तेमां चंद्रनी जेवा , । प्रशस्तिः (७२७) स्तुमः, सुप्रभावममृतयुतेरिव । यत्करातिशयतोऽजनिष्ट म-प्रस्तरादपि सुधारसोऽसकौ ॥ ३४॥ प्रतिक्रियां कां यदुपक्रियाणां, गरीयसीनामनु- सर्तुमीशे । ज्ञानादिदानरुपचर्य सोऽयं, यैः कल्पितः कीटकणोऽपि कुंभी ॥ ३४ ॥ विनयविजयनामा वाचकस्तद्विनेयः, समदृभदणुशक्तिपंथमेनं महार्थं । तदिह किमपि यत्स्यात्क्षणमुत्सूत्रकाद्यं, मयि विहितकृपैस्तत्को. विदैः शोधनीयं ॥ ३५ ॥ सच्छाये सुमनोरमेऽतिफलदे काव्येऽत्र लीला- वने, प्रादिदिरमोदके सहृदयश्रेणीमरालाश्रिते ।दोपः कंटकिशाखि- वद्यदि भवेन्मन्ये गुणत्वेन तं, यन व्यर्थमनोरथस्तदनुदृग् नोष्ट्रः खलः खिद्यते॥३६॥ उत्तराध्ययनवृत्तिकारकैः, सुप्ठु भावविजयाख्यवाचकैः । सर्वशास्त्र- निपुणैर्यथागर्म, ग्रंथ एप समशोधि सोद्यमैः ॥ ३७॥ जिनविजयाभि- श्रीकीर्तिविजयना सुप्रभावनी अमे शी रीते स्तुति करी शकीए के जेना हाथना (चंद्रपक्षे किरणना ) अतिशयथी - मारा जेवा पत्थरथकी पए प्रावो अमृतरस झर्यो छे. (३३) तेमना मोटा उपकारोनो प्रतिकार करवाने माटे हुँ ज्ञानादिकना दानथी घणो उपकार करूं तो पण समर्थ थइ शकुं तेम नथी, केमके तेस्रोए मने एक लघुकीटने पण हाधी जेयो करी दीधो छे. (३४) तेमना शिष्य अन्प शक्तिवाळा विनयविजय नामना उपाध्याये (में) मा मोटा अर्थवाळो ग्रंथ रच्यो छे, तेथी आ ग्रंथमा कांह पण उत्सू. प्रादि भूलचूक थइ होय ते मारापर कृपा करीने पंडिवोए शुद्ध करवी. (३५) सारी छायांवाळा, प्रतिमनोहर, मोक्षादिक मोटा फळने आपनारा, पंडितोरूपी ममराने भानंद मापनारा श्रने ससनोनी श्रेणिरूपी इंसोए भाश्रय करेला श्रा काव्यरूपी क्रीडापनमा जो कदाच कोइक कांटावाला वृतनी जेम दोप रही गयो होय तो तेने हुं गुणकारक (मारो) मार्नु छ, केमके तेथी तेवी दोपदृष्टिवाळो सळरूपी उंट ध्यर्थ मनोरथवाळो याने खेद पामे नहीं. (३६). श्रीउचराध्यपननी पिने करनारा भने सर्वशास्त्रमा निपुण एवा थीभावविजय नामना उपाध्याय प्रागमनै भनुसरीने यत्नपूर्वक मा ग्रंथ सुधार्यों 2. (३७ ) शोधयं १ पूर्वना प्रयने भनुमरीने जे कह से नी छाया कहेवाय दे.

Lokprakash Granth Bhag-3-4

Author
Vinayvijayji
Title
Lokprakash Granth Bhag-3-4
File name
Lokprakash Granth Bhag-3-4
Text
OCR done
Citation
1934
Published
2012/08
Publisher
Bhavnagar.,shri Jain Dharm Prasar Sabha
Language
Sanskrit
Pages
799
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313257
Barcode
99999990321963.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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