Sanmati Library, Jaipur
Jainjyotish
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शासनदेवतासंबंधी ध्यानमें रखने योग्य श्लोक- PESHREERUser वरोपलिप्सयाऽशावान रागद्वेपमलीमसाः। देवता यदुपासीत देवतामूढमुच्यते ।। भयाशास्नेहलोभाच्च कुदेवागमलिंगिनाम् । प्रमाणं विनयं चैव न कुर्युः शुद्धदृष्टयः ॥ (श्रीसमंतभद्राचार्य) श्रावकेणापि पितरौ गुरूराजाप्यसंयताः । कृलिगिनः कुदेवाश्च न वंद्याः सोऽपि संयतः ।। टीका:-कुलिंगिनः तापसादयः पावस्थादयश्च !, कुदेवा रुद्रादयः भासनदेवतादयश्च ॥ अनगारधर्मामृत-माशाघर आपदाकुलितोऽपि दर्शनिकः तनिकृत्यर्थ शासनदेवतादीन् । कदाचिदपि न भजते पाक्षिकस्तु भजत्यपि ॥ सागारधर्मामृत-आशाधर. नाभेयाधपसव्यपार्थविहिवन्यासास्तदाराधका । अव्युत्पन्नदशः सदैहिकफलप्राप्तीच्छयाईति यान ।। आमंत्र्य क्रमशो निवेश्य विधिवत्पत्रांतरालेषु तान् । कृत्वारादधुना घिनोमि बलिमिर्यक्षांश्चतुर्विंशतिम् ॥ संभावयंति वृषमादिजिनानुपास्य । तद्वामपार्थनिहिता वरलिप्सवो याः॥ चक्रेश्वरीप्रभृतिशासनदेवतास्ताः । द्विद्वादशदलमुखेषु बजे निवेश्य ।। पंडितेभ्रष्टचारित्रैठरैश्च तपोधनैः । शासनं जिनचंद्रस्य निर्मलं मलिनीकृतं ।। अनगारधर्मामृत.
भूमिका. यह जैनज्योतिष नामका नंथ लैनसमाजमें प्रसिद्ध करनेका हेतु ऐसा है कि:- अन्यमतियोंके ज्योतिपथ-सूर्यसिद्धांत, सिद्धान्तशिरोमणि ( भास्कराचार्यके बनाये ), ग्रहलाघव [ गणेश दैवज्ञका बनाया हुवा ], मुहर्तमार्तण्ड, मुहूर्तचिंतामणि, जातकाभरण, जातकालंकार इत्यादि ग्रंथ मन्यमति वेदफे आधारसे बनाये हुए हैं। वेदके बारेमें श्री आदिनाथ पुराणके रचयिता श्री० जिनसेनाचार्य पर्व ३९ में कहते हैं।- " श्रोतान्यपि हि वाक्यानि संमतानि क्रियाविधौ ॥ न विचारसहिष्णूनि दुःप्रणीतानि तानि वै ।। १.॥ अर्थातः-धर्मफियाओंके करनेमें जो वेदोंके वाक्य माने गये है वे भी विचार करनेपर कुछ अच्छे नहीं नान पडते, अवश्य ही वे वाक्य दुष्ट लोगोंके बनाये हुए हैं ॥१०॥ इस परसे सिद्ध होता है कि-दुष्ट लोगोंके बनाये हुए वेद व वेदोंके माधारसे रचे हुवे. सिद्धान्तशिरोमणि गोलाध्यायादि प्रॉपर विश्वास रखकर रुई आलसी इत्यादि पदार्थोकी तेजी मंदी समझकर वेपार करते हैं, उस वेपारसे हजारों जनियोंने नुकसान पाया है। केईने तो अपना घरदार खो दिया है और नादार बन गये हैं। केईने तो कर्जदारीके भयसे आत्महत्या करलिई है। ऐसे बहोत संकटमें परे हुये देखे जाते हैं। सो ये गन्यमति मिध्यात्वी अर्थोपर भरवसा रखना ! अथवा जैनज्योतिष ग्रंथोंपर रखना ? ऐसा विचार उत्पन्न (२) होनेसे यह सर्वमान्य दिगंबरजैनाचार्यप्रणीत अंयोंके भाधारसे यह जैन- ज्योतिष ग्रंथ एकत्रित किया हैं । मिथ्यात्वी अन्यमती ग्रंथोंके आधारसे जो शुभाशुभ फल बतलाया गया है उसमें से कुछ वाक्य यहां उद्धृत किये जाते हैं। प्रयाणको शुभाशुभवार- ( ज्योतिषसार पृ. १७४) अर्के क्लेशमनर्थकं च गमने सोमे च बंधुप्रिये ॥ चांगारेऽनलतस्करज्वरमयं प्राप्नोति चाथै वुधे ॥ क्षेमारोग्यसुखं करोति च गुरौ लाभश्चशुक्रे शुभो । मंदे बंधनहानिरोगमरणान्युक्तानि गर्गादिभिः ॥ २२ ॥ अर्थात-रविवारको गमन करनेसे मार्ग में क्लेश और अनर्थ प्राप्त होता है. सोमवारको बंधु और प्रियदर्शन; मगंलको अग्नि, चोर व ज्वरमय, बुधको द्रव्य लक्ष्मी प्राप्ति. गुरुवारको क्षेम मारोग्य, सुख प्राप्ति; शुक्रवार- को लाभ शुभफलकी प्राप्ति; शनिवारको बंधन, हानि, रोग, मरण प्राप्त होता है । प्रयाणमें उक्त नक्षत्र- ( ज्योतिषसार पृ० १७३) हस्तेंदुमैत्रश्रवणाश्वितिष्यपोष्णश्रविष्ठाश्च पुनर्वसुश्च ॥ प्रोक्तानि धिष्ण्यानि नव प्रयाणे त्यक्त्वा त्रिपंचादिमसप्तताराः॥१७॥ अर्थात-हस्त, मृगशीर्ष, अनुराधा, श्रवण, अश्विनी, पुष्य, रेवती, धनिष्ठा, पुनर्वसु ये नक्षत्र गमनमें उक्त हैं, परंतु ३, ५, १, ७ ये वारा गमनमें त्यागना. ..
(३) मध्यम नक्षत्र उत्तरा रोहणी चित्रा मूलमा। तथैव च ।। जलोत्तरा भाद्रविश्वे प्रयाणे मध्यमाः स्मृताः ॥ १८ ॥ अर्थात्-रोहिणी, उत्तरा, मूल, चित्रा, आर्द्रा, पूर्वाषाढा, उत्तरा- भाद्रपदा, उत्तराषाढा ये नक्षत्र प्रस्थानमें मध्यम जानना. वर्ण्य नक्षत्र- पूर्वात्रय मघा ज्येष्ठा भरणी जन्म कृत्तिका ।। सार्प स्वाती विशाखा च गमने परिवर्जयेत् ॥ १९ ॥ एकविंशतयोऽग्नेस्तु भरण्याः सप्तनाडिकाः ।। एकादश मघायाश्च त्रिपूर्वाणां च षोडश ॥ २० ॥ विशाखासार्पचित्राणां रौद्रस्वात्योश्चतुर्दश ॥ आधास्तु घटिकास्त्याज्या: शेषांशे गमनं शुभं ॥ २१ ॥ अर्थात्-तीनों पूर्वा, मघा, ज्येष्ठा, भरणी, जन्मनक्षत्र, कृत्तिका, माश्लेषा, स्वाती, विशाखा ये नक्षत्र प्रयाणमें त्यागना; परंतु संकट समयमें तीनों पूर्वाकी १६ घडी, मघाकी ११ घडी, ज्येष्ठा संपूर्ण, भरणी ७ घडी, कृतिकाकी २१ घडी जन्मनक्षत्र संपूर्ण, आश्लेषा, विशाखा, चित्रा, स्वाती, आर्द्रा इन नक्षत्रकी आदिकी ११ घडी त्यागके प्रयाण करना। "ज्योतिःशास्त्रफलं पुराणगणकैरादेश इत्युच्यते " अर्थात्-पौराणिक ज्योतिषीलोग कहते हैं कि-गणितज्योतिष तो केवल शुभाशुभ निर्णय ही के लिये है।" (सिद्धान्तशि० गोला० पृ० २२ श्लो० २६) लग्ने च क्रूरभवने क्रूरः पातालगो यदा ॥ दशमे भवने क्रूरः कष्टं जीवति बालकः ॥ १ - - (४) अर्थात्-क्रूर ग्रहका लान होय और ४ स्थानमें क्रूर ग्रह होय, १० स्थानमें भी क्रूर होय तो उस बालकका जीवन बडा कष्टसे जानना। ज्योतिषसार भाषा पृ. ७३) सप्तमे भुवने भानोर्मध्यस्थो भूमिनन्दनः ।। राहुय॑ये तथैवापि पिता कप्टेन जीवति ॥ २॥ अर्थात- सप्तस्थानमें सूर्य होय और बारहवे स्थानमें राहु होय और इनके मध्यस्थानमें मंगल होय तो पिता बहुत कष्टसे बचे ! (ज्योतिषसार भाषा पृ०७३) अष्टमस्थो यदा राहुः केंद्रे चंद्रश्वनीचंगः ॥ तस्य सद्यो भवेन्मृत्युर्चालकस्य न संशयः ॥ ३ ॥ अर्थात्-मटमस्थानमें राहु और केंद्र में नीचका चंद्रमा होय तो बालक उसी वक्त मृत्यु पावे इसमें कुछ संदेह नहीं- ० सा० पृ० ७३) चतुर्थे च यदा राहुः पृष्ठे चंद्रोष्टमेऽपि वा ॥ सद्य एवं भवेन्मृत्युः शंकरो यदि रक्षति ॥ १ ॥ अर्थात्--जन्म समयमें चतुर्थ स्थानमें राहु ६ अथवा चंद्रमा ८ होय तो बालक तत्काल मृत्यु पावेगा; शंकर रक्षाकरे तो भी बचेगा नहीं. (ज्यो० सा० पृ० ७२) सूर्यात्रिकोणास्तगौ मंदारी पापभगौ जन्मनि पिताबद्धः॥ चंद्रेगे मन्देन्त्ये पापदृष्टे कारागारे जन्म ॥ २ ॥ अर्थात्-जन्मलग्नमें सूर्यसे नवम, पंचम वा सप्तम स्थानमें पापग्रह- की राशिपर शनि मंगल होवे तो उस बालकका पिता फैदमें समझना चाहिये ॥ चंद्रमा लानमें होवे और शनि बारहमें होवे और इनपर पाप- ग्रहकी दृष्टि होवै तो उस बालकका जन्म कारागार (जेलखाना ) में हुवा जानना ॥२॥ (ज्योतिषसार भाषा पु.६१) (ज्यो (५) ऐसे अन्यमति मिथ्यात्वी शास्त्रोंके आधार लेकर केई जैनीभाईने यात्रार्थ प्रयाण किया था। केई वर्षों पहले नातेपुते गांवके ( ता. मा- ळशिरस जि. सोलापुर ) अंदाज पचीस तीस जैनी श्रीसम्मेदशिखरजीके यात्रार्थ उत्तम सुमूहूर्त देखकर निकले थे. पीछे लौटते बखत सब बीमार होकर आये दो चार भादमी रेलमेंहि मर गये पर मकामें पोहोचनेपर कुछ दिन पीछे और भी दो चार मर गये । शोला- पुरके जैनी दसाइमड तलकचंद हरीचंद प्रेमचंद गुजराथमें सिद्धक्षेत्र तारंगाजीके पहाडपर मंदिरनीकी प्रतिष्ठा करनेकेलिये अन्यमति प्रख्यात ज्योतिपियों के पास सुमुहूर्त देखकर घरसे निकले थे परंतु उनके हाथसे वहां प्रतिष्ठा हुई नहीं. प्रतिष्ठा होनेके पहिले आठ दस दिन रास्तेमें ही मर गये। श्रीतीर्थक्षेत्र शत्रुजय पालिठाणामें मंदिरप्रतिष्ठा करनेकेवास्ते शोलापुरसे सेठ रावनी कस्तुरचंद भन्यमति प्रसिद्ध ज्योतियों के पास सुमुहूर्त देखकर घरसे निकले थे प्रतिष्ठाके समय भट्टारक गुणचंद्र और भट्टारक कनककीर्ति इनमें वहां शगढा हुवा सो पालीठाणाके फौजदारने मिटाया और सेठ रावजी कस्तुरचन्दका जवान पुत्र वहां ही मर गया । और भी शोलापुरके शेठ फत्तेचंद वस्ता गांधी केसरीयाजीके या- त्रार्थ जानेके समय अन्यमति प्रसिद्ध ज्योतिषियों के पास सुमुहूर्त देखकर- ही घरसे निकले थे। शोलापुर स्टेशनसे दो स्टेशनपर माढा गांव है वहां अपने सगेसोयरेको मिलनेके वास्ते उतरे थे परन्तु वहां खूनके गुन्हेमें वे पकडे गये पोलिस उनको पूनेको लेगये वहां उनको जन्मका- लापानीकी सजा हो गई भर भाखरको वहां ही उनका देहावसान होगया । पूनेके रा. बालगंगाधर तिलक बी. ए. एल्. एल्. बी. जिनकू राजद्रोहके गुन्हे बाबद सना हुई थी यह बात मि. व्हालंटाइन् चिरोल (६) . नामक एक अंग्रेजने अपने पुस्तकमें प्रसिद्ध की थी. उनके ऊपर बाल- गंगाधर टिलकने अपनी अब्रुनुकसानी हुई ऐसा दावा मिलायतके प्रीव्हीकौंसिलमें . दाखल किया था. वह दावा चलानेके वास्ते जब तिलकसाहन पुनेसे निकले उस बखत अन्यमति प्रख्यात ज्योतिषियोंने उनको कहा था कि-" तुमं दावा जीतोगे " परन्तु मि. तिलकने दावा जीता नहीं वे हार गये, यह बात उन्होंने पुनेके अखवारवालोंको लिखी ऐसा उस बखतके पूनेके ज्ञानप्रकाशपरसे मालुम होता है। मि. तिलकने उस बखत उन ज्योतिपशास्त्रीयोंको उद्देशकर अंग्रेजी अखबारों में लिखा था की-"व्हेअर आर दोन अस्ट्रा लॉजर्स हु प्रेडिक्टेड माय सक्सेस् । ऐसे ही- महात्मा गांधीजी ता० १२ नोव्हेंबर १९३० को जेलखानेसे मुक्त होनेवाले हैं ऐसे बहुतसे अन्यमति ज्योतिष लोगोंने भाषित किया हुवा अखबारोंमें उस वखत प्रगट हुवा था, लेकिन मान ता. १२ जानेवारी १९३१ हो गयी तो भी उनकी मुक्तता' नहीं हुयी! इस ही प्रकार अन्यमतके वसिष्ठ ऋपि नो रामचन्द्रजीके परम गुरु समझते हैं उन्होंने जिस दिन शुभमुहूर्तपर रामचंद्रजीको राज्याभिषेक करनको ठहरा था, लेकिन उस दिन रामचन्द्रजीको राज्याभिषेकके बदले वनवास ही भोगना प्राप्त हुवा ! इस आशयका अन्यमत ग्रन्थमें ऐसा उल्लेख है- कर्मणो हि प्रधानत्वं किं कुर्वन्ति शुभा ग्रहाः ।। वसिष्ठो दत्तलग्नश्च रामः किं भ्रमते वनम् ॥ १ ॥ इससे ऐसा तर्क होता है कि--रामचन्द्रजीके गुरु वसिष्ठाचार्य इनकी योग्यता अन्यमतमें बड़ी भारी मानी गई है व वे बडे विद्वान माने गये हैं तो ऐसे रामचन्द्रजीके परम पवित्र श्रेष्ठ गुरु वसिष्ठाचार्य इस फलज्योतिःशास्त्रमें निष्णात न थे क्या ? अथवा यह फलज्योतिःशाल (७) . ही असत्य है ? यहां यह किसकी गलती समझना ? इन बातोंका योग्य खुलासा निःपक्षपाती विद्वान् अवश्य करें? मुम्बईसे मद्राससे कलकत्तासे व पंजाबसे जो रेलगाडी निकलती हैं उसमें बैठनेवाले लोग वैधृति, व्यतिपात अमावास्या, मृत्युयोग, दग्ध- योग यमघंटयोग ऐसे कुमुहूर्तपर निकलते हैं व वे भी इच्छित स्थलकू खुषीसे पहुचते हैं । और उनमें बैठे हुए हजारों प्यासिंजर्स अनेक स्टेशनपर उतरकर मानंदसे अपने अपने मकानों में जाते हैं। कोई दफे अमृतसिद्धियोग सरीखे सुमुहूर्तपर निकली हुई रेलगाडी मकस्मात् होनेसे गिर जाती है इस बखत अन्दर बैठे हुये प्यासिनर्स मृत्युमुहमें पड़ते हैं या जखमी भी होते हैं। ऐसे समयमें सुमुहूर्त या तिथि उनको सहाय करते नहीं. इसी तरह सुमुहूर्त प्रयाण समयमें देखने की मावश्यकता नहीं है ऐसा सिद्ध होता है। कोई इसम कुयोगपर मरण पाया हो तो उस बखत-" पंचक किंवा सप्तक " उसको लगे हुये जान गेहूं के आटाके पांच या सात पुतले बनाकरके वे उस प्रेतके बराबर रखकर जलानेके अन्य मती मिथ्या- स्वी ज्योतिषी कहते हैं। लेकिन ऐसा करना पाप है ऐसें जैनशास्त्रों में कहा है। कितने उपाध्येलोग भी ऐसे प्रसंगमें-जिन भगवानकी मूर्तीका पंचामृतसे अभिषेक करना कहते हैं परंतु ऐसा भी. करनेको जनज्योतिषमें कहा नहीं हैं उपाध्ये लोग अपने स्वार्थकेलिये ऐसे कहते हैं। अन्यमती मिथ्यात्वी ज्योतिषशास्त्रों में वधुवरोंके घटित देखनेको कहा है उसमें-गण, नाडी, योनि, वैर योनि, प्रीति षडाष्टक, पाघडी- मंगल, मृत्युषडाष्टक, चुदडी मंगल वगैरह अनेक प्रकार वधुवरोंके जन्म- नक्षत्रोंसे देखते हैं उस बखत वधुवरोंके गुण अठारहसे जादा छत्तीस तक मानेसे वह घटित पसंत करते हैं। इस प्रकार उत्तम घटित जुले हुये ये (८) । दांपत्य इनमें से बहोत स्त्रियां विधवा हुई देखनेमें जाती है। चौर बहोत- से पुरुष भी विधुर हुये ऐसे देखने में आते हैं। इससे अन्यमति मिथ्यात्वी लोगों के ज्योतिषशास्त्रोंसे यह पटित देखना व्यर्थ है ऐसा कहना पड़ता. स्वयंघरके समय यह घटित देखना शक्य ही नथा, वहाँ एक- त्रिवहुये राजे उसमें से जो वर उस राजकन्याके दिलको आयगा वह ही पसंतकरके उसके गले में माला डालती है। जैनज्योतिषमें घटित देख- नेको कहा नहीं. इससे कितने कलियुगी पंडित कहते हैं कि-सब जैन- शास्त्र तुमने देखा है क्या ? दूसरे कितने कहते हैं- हाल मन्यमति प्योतिष सरिखा जैनज्योतिष ग्रंथ उपलब्ध होने वाद हम तुमको वतावेंगे । ऐसा कह कर हालही अन्यमति मिथ्यात्वी ज्योतिपथों के ऊपर विश्वास रखनेको कहते हैं व ब्राह्मणों के और अपने ग्रंथ एकही हैं उनमें समन्वय करना चाहिये ऐसे कहते हैं याने किसी प्रकारसे अन्यमति ब्रामों के ग्रंथ जैनलोकोंमें घुसड देना यह उनकी इच्छा दीखती है. कई पंडितलोक निमितशास्त्र में अन्यमति मिध्यात्वीका ज्योतिष- शास्त्र घुसड देना चाहते हैं। परंतु इस बारेमें मादिनाथ पुराण पर्व ४१ में नो लिखा है सो इस मुजव- तदुपझं निमित्तानि (दि) शाकुनं तदुपक्रमम् ।। तत्सों ज्योतिषां ज्ञानं तं मतं तेन तत्रयम् ॥१४७॥ इन दो श्लोकोंका अर्थ पं. दौलतरामजी अपने आदिपुराण वचनिका पर्व ४१ पत्र ७८६ में ऐसा लिखते है- अर निमित्तशास्त्र, शकुनशास्त्र ताहीके भाषे अर ताहीका भाख्या ज्योतिषशास्त्र ये तीन शास्त्र याहीके प्ररूपे सो सब शास्त्रनिके पाठी याही गुरु नानि आराधते भए ॥ ११७॥" - (९) इससे सिद्ध होता है कि-निमित्तशास्त्र अलग है और ज्योतिष- शास्त्र अलग है और शाकुन शास्त्र भी अलग है । हमने जो जैन- ज्योतिष इस ग्रंथमें बताया है वोहि ज्योतिष भरतचक्री जानते थे । निमित्तशास्त्र यह ज्योतिषशास्त्रसे अलग है इसमें कोई संदेह नहीं. केई पंडित जिनवाणीमें अन्यमति ज्योतिषी ग्रंथ घुसड देना चाहते हैं उसमेंका एक भास्कराचार्यने बना हुवा सिद्धांत शिरोमणि नामका ग्रंथ है उसमें गोलाध्याय नामका एक प्रकरण है उसमें पृथ्वी गोलाकार है और घूमती है ऐसा कहा है सो ऐसा लिखना जैनधर्मसे बिलकुल विरुद्ध है. जैनशासन में दो सूर्य और दो चंद्र बताये हैं उसका भी खण्डन सिद्धांत शिरोमणिमें किया है सो इस मुजब है- - अन्यमतके ज्योतिषशास्त्र- भास्कराचार्य सिद्धान्त शिरोमणेः गोलाध्यायः । भास्कराचार्यकृत सिद्धान्तशिरोमणि उसमेंका यह गोलाध्याय है, इस ग्रंथके पृ. २७ में लिखा है सो इस मुजब- "द्वौ द्वौ रवीन्दू भगणौ च तद्वदेकान्तरौतावुदयं व्रजेताम् यदब्रुवन्नेयमनम्बराया ब्रवीम्यतस्तान प्रति युक्तियुक्तं ॥८॥ अर्थात्-जैन लोग कहते हैं कि दो सूर्य, दो चंद्रमां, दो राशि- चक्र प्रभृति हैं जिन दो २ मेंसे एक के भीतर दूसरेका उदय होता है इसका उत्तर मैं कहता हूं ॥८॥ भूः खेऽधः खलु यातीति बुद्धिवौद्ध ! मुधा कथम् ॥ जाता यातन्तु दृष्ट्वापि खेयरिक्षप्तं गुरुक्षितिम् ॥ ९॥ अर्थात्-हे बौद्ध ? जिस समय किसी वस्तुको फेंकते हो तो फेंकते समय वह वस्तु पुनः पृथ्वीमें गिरती है, इसको देखते हुए और पृथ्वीको (१० २ गुरुपदार्थ जानते हुए भी पृथ्वी शुन्यमें नीचेको पतित होती है, ऐसा भ्रममूलक विश्वास क्यों करते हो? ॥९॥ किं गुण्यं तव वैगुण्यं यो वृथा कृथाः ॥ भादूना विलोक्यान्हा ध्रुवमत्स्यपरिभ्रमम् ॥ १० ॥ अर्थात्-जब ध्रुव नक्षत्रका परिभ्रमण प्रतिदिन देखते हो तो चंद्रमा, सूर्यादिकी दो २ व्यर्थ कल्पना क्यों करते हो? एक क्या तुझारे वैगुण्यमें न गिना नावे ! ॥ १० ॥ यदिसमामुकुरोदरसन्निभाभगवतीधरणीतरणिः क्षितेः ।। उपरिदूरगतोऽपिपरिभ्रमन्किमुनरैरमररिव नेक्ष्यते ॥ ११ ॥ अर्थात्-यदि यह पृथ्वी दर्पणोदरकी नाई समतल होती तो इसके ऊपर और दूर भ्रमण करनेसे . सूर्य क्यों देव और मनुष्योंको दृष्ट होगा १॥ ११ ॥ यदि निशाजनकः कनकाचलः किमुतदन्तरगः स न दृश्यते ।। उदगयं ननु मेरुरथांशुमान कथमुदेति च दक्षिणभागके ॥ १२ ॥ अर्थात्-यदि कनकाचलही रात्रि होनेमें कारण होता है तो सूर्यके भीतर जानेपर वह पहाड क्यों नहीं दीखता ? मेरु उत्तरगोलमें अदृश्य है तो सूर्य किस प्रकार दक्षिणगोलमें दृश्य होगा ? ॥ १२ ॥ भूपंजरस्य भ्रमणालोकादाधारशून्याकरिति प्रतीतिः॥ स्वस्थं न दृष्टश्च गुरुक्षमातः खेऽधः प्रयातीति प्रवदन्ति बौद्धाः ।। अर्थात - भूमण्डलके भ्रमणको देखकर पृथिवी आधार रहितता होना बोध होता है एवं पृथिवीके अलग होकर शून्यमें किसी गुरुपदा- थको अपने आप ठहरने नहीं देखकर बौद्ध लोग कहते हैं कि पृथिवी आकाशके नीचकी और जाती है ॥ ७ ॥" ( सिद्धांत शि० गोलाध्याय पृ. २७) (११) - यदि भास्कराचार्यादि अन्यमति सिद्धांत शिरोमणि आदि ग्रंथोमें जैनमतके सिद्धांतका खंडन किया हुवा देखनेमें आता है तो ऐसें अन्य- मति मिथ्यात्वियोंके ग्रंथोंपर जैनी कैसा विश्वास रख्खेगा ! विश्वास रख- नेसे समयमूढताका दोष उसको लगेगा यह स्पष्ट हैं. बृहदव्य संग्रहके संस्कृत टीकाकार श्री ब्रह्मदेवजी "जीबादीस- दहणं." इस गाथाके नीचे समयमूढताका लक्षण पृ० १५१ में लिखते हैं- " अथ सममूढत्वमाह-- । अज्ञानिजनचित्तचमत्कारोत्पादक ज्योतिष्कमंत्रवादादिकं दृष्ट्वा वीतराग़सर्वज्ञप्रणीतसमयं विहाय कुदेवागमलिंगाना भयाशास्नेहलोभैर्धर्मार्थ प्रणामविनयपूजापुरस्करादिकरण समयमूढत्वमिति ।" अर्थात्-अब समयमूढ माने शास्त्र अथवा ,धर्ममूढताको कहते हैं। मज्ञानी लोगोंके चित्तमें चमकार ( आश्चर्य ) उत्पन्न करनेवाले जो ज्यो- तिष अथवा मंत्रवाद आदिको देख कर; श्रीवीतराग सर्वज्ञ द्वारा कहा हुवा जो समय ( धर्म ) है उसको छोडकर मिथ्यादृष्टिदेव, मिथ्या मा- गम और खोटा तप करनेवाले कुलिंगी इन सबका भयसे, वांच्छासे, स्नेहसे और. लोमके वशसे जो धर्मकेलिये प्रणाम, विनय, पूजा, सत्कार मादिका करना उस सबको समयमूढता जानना चाहिये । इसपरसे सिद्ध होता है कि अन्यमति ज्योतिषशास्त्र मंत्रतंत्र- शास्त्र इनोंपर भरोसा रखना नहीं, फक्त सर्वमान्य दिगंबर जैनाचाचार्यप्र- णीत जैनशास्त्रोंपर ही भरोसा रखना सो ही सच्चा जैनी कहा जायगा । केई जैनीपंडित कहते हैं कि--" प्रभातके समय सूर्यका ताप बहोत कम लगता है और दोपहरको बडा प्रखर लगता है व शामको बहोत कम लगता है इससे सूर्यग्रहके किरणों में तीव्रता और मंदता सिद्ध .
(१२) होती है ऐसेही सभी ग्रहों के संबंध जानना चाहिए " इसका उत्तर हम ऐसा देते हैं-प्रभात कालकी गरमी और दोपहरकी गरमी व शामके वखतकी गरमीमें तफावत रहाही करता है । प्रभात समय सब प्राणियों को समा नतः भरमी कम लगती है व दोपहर के समय सब प्राणियोंको गरमी समानतः अधिक लगती है फिर शामके बखत वह गामी कम हो जाती है। मेपराशीवालेको गरमी अधिक लगती है. वहही गरमी वृषभ- राशीवालेको कम लगती ऐसा कभी नहीं हो सकता. देहलीमें घूपकालके वैशाख मासमें ११२ एकसौ बारह डिग्री गरमी रहती है। श्रावण मासमें ८० अस्सी डिग्री और पौष मासमें ६० साठ डिग्री अदाज रहती है सो सभी प्राणियों को समान जानी जाती वैसेही हरएक जगेमें अलग अलग प्रमाणसे गरमी गिनी जाती है परंतु मेष मादि राशीवालको अधिक और वृषभादि राशी वालेको गरमी कमती लगती है ऐसा जाननेमें आता नहीं है। सभीको थंडी या गरमी समान भासती है, अभ्यासके सबसे केई लोग थंडी गरमी नादा सहन करते हैं केई कम सहन करते हैं। सरदी गरमीको बोना मेप वृषभादि राशी ऊपर लादना तिरर्थक है । ये जैनी पंडित ब्राह्मणों के शास्त्रको अपनाया करते हैं, ब्राह्मणोंका ज्योतिषशास्त्र और जैनज्योतिष शास्त्रमें कोई भी सूरतसे समन्वय करना चाहते हैं माने मिला देना चाहते हैं. उनको लगता है कि-ब्राह्मणों का ज्योतिषशास्त्र जैनियोंने नहीं लिया तो जैनियों का ज्योतिषशास्त्र अधुरा रहजायगा; परंतु समझना चाहिये कि-निग्रंथाचार्यके रचेहुये प्रामाणिक ग्रंथोंके शिवाय अन्यमतिशास्त्र सब शास्त्राभास है । वे सब समयमृढता उपजावनेवाले है और मिथ्यात्व तरफ बैंच- नेवाले है । इस वास्ते मिथ्यात्वसे बचनेका उपाय जैनियोंने अवश्य करना चाहिये । जैनधर्ममें मिथ्यादर्शन सबसे बडा पाप है उसको छोड़ा - (१३) बिगर धर्मका मूल हाथमे लगता नहीं. कहा भी है- “ मिथ्यात्वादि- मलीसमं यदि मनो बाह्येत्ति शुद्धोदकैः ॥ धौतः किं बहुशोपि शुद्धयति मुरापुरःप्रपूर्णो घटः॥" मिथ्यात्वसे मलिन हुवा अंतकरण सम्यक्त्व विगर शुद्ध होता नहीं जैसे मद्यसे भरा हुवा घडा बाहरसे बार बार शुद्ध जलसे धोनेपर भी वह शुद्ध नहीं हो जाता उसके अंदरका सभी मध बाहर गिरा देनेसे ही शुद्ध होगा वैसा ही तीन मूढता अष्ट मद रहित सम्यक्त्व होनेसे सत्यार्थ धर्मका मार्ग मिलता है. इससे सबसे पहले मिथ्यात्वका त्याग करना चाहिये तभी सत्यार्थ जैनागमपर अपनी श्रद्धा .लगती है। प्रकाशक.
ग्रंथोंके नाम. श्रीमान् पंडितप्रवर संघई पन्नालालजी दूनीवाले इनके " विद्वज्जनबोधक " पुस्तकसे और श्रीमान् पंडित पन्नालालजी गोधा उदासीन इनके चिट्ठीपरसे अपि दिगंबर जैनाचार्य प्रणीत प्रामाणिक ग्रंथाकी यादी । नंबर आचार्योंके नाम. विक्रमसंवत् ग्रंथ संख्या. १ श्रीपुष्पदंत, भूतपलि, वृषभाचार्य श्रीधवल, महाघवल, जयधवल. २ श्री कुंदकुंदाचार्य २७ पंचास्तिकाय, समयसार, प्रवचनसार, नियमसार, रयणसार, अष्टपाहुड. १३ ३ श्रीजयसेनाचार्य-वसुविंदाचार्य ६० प्रतिष्ठापाठ. ४ श्रीउमास्वामि आचार्य ७६ तत्वार्थसूत्र. ५ श्रीसमंतभद्राचार्य १२५ देवागम, रत्नकरंडश्रावकाचार, स्वयंभूस्तोत्र, युक्त्यनुशासन. ६ श्रीमाघनंदि आचार्य १३६ वन्देतान्-जयमाला. श्रीशिवायनाचार्य भगवति माराधना. श्रीपूज्यपाद स्वामि १०० घोसामि० इत्यादि स्तोत्र, सर्वार्थसिद्धि, जैनेंद्रव्याकरण, समाधिशतक. १ ९ श्रीप्रभाचंद्राचार्य ४५३ प्रमेयकमलमार्तड, न्यायकुमुदचंद्रोदय, श्रीवीरनंदि आचार्य ५५६ आचारसार, चंद्रप्रमकाव्य, ४ ७ ८ २ आचार्योंके नाम. ग्रंयोंके नाम. १ १ २ १ ८ नंबर विक्रमसंवत् ग्रंथ संख्या- ११ श्रीमाणिक्यनंदि भाचार्य ५६९ परीक्षामुख १२ मीनेमिचंद्रसिद्धांत चक्रवर्ति ७३५ त्रिलोकसार, गोमट्टसार, लघिसार, क्षपणसार, द्रव्यसंग्रह. १३ श्रीमानतुंगाचार्य ७५६ भक्तामरस्तोत्र. १४ श्रीअभयनंदि आचार्य ७७५ गोमट्टसार टीका, वृहमनेन्द्र ब्याकरण. १५ श्रीचामुण्डराय ७९५ चारित्रसार. १६ श्रीवट्टकर स्वामि मुलाचार १७ श्रीभकलंकदेव आचार्य ८५६ नयी (३), लघुत्रयी (३), अष्टशती, राजवार्तिक १८ श्रीजिनसेनाचार्य ८७२ बृहत्आदिपुराण. १९ श्रीगुणभद्राचार्य ८७५ उत्तरपुराण, आलानुशासन, जिनदत्तचरित्र. २० श्रीकार्तिकेय स्वामि कार्तिकेयानुप्रेक्षा. २१ श्रीयोगींद्रदेव आचार्य परमात्मपकाश, योगसार. २२ श्रीविद्यानंदि आचार्य (पात्रकेसरी) ८८१ अष्टसहस्रो, आप्तपर का, प्रमाणपरीक्षा, पत्रपरीक्षा, लोकवार्तिक. २३ श्रीवादिराज आचार्य ९४८ एकीमावस्तोत्र. २४ श्रीअमृतचन्द्राचार्य ९६२ पुरुषार्थसिद्धयुपाय, तत्वार्थसार, नाटकत्रयी (३) २५ श्रीमलिषेणाचार्य ९६९ सज्जनचित्तवल्लभ. (१५) १ २ ग्रंथोंके नाम. ४ नंवर आचार्योंके नाम २६ श्रीअमितंगति आचार्य २७ श्रीशुभचंद्राचार्य : २८ श्रीकेशववर्णी २९ श्रीधर्मभूषण श्रीपद्मनंदि आचार्य ३१ श्रीकुंदकुंदाचार्य ३२ श्रीअनंतवीर्याचार्य ३३ श्रीसकलकीर्ति भाचार्य १ १ विक्रमसंवत. ग्रंथ संख्या १०२५ श्रावकाचार, सुभाषितरत्नसंदोह, धर्मपरीक्षा, योगसार. १०५० ज्ञानार्णव. १२२७ गोमटसारलघुटीका. न्यायदीपिका. पद्मनन्दिपंचविंशति. कल्याणमन्दिर स्तोत्र. प्रमेयचंद्रिका १५०० प्रश्नोत्तर श्रावकाचार, सार्थचतुर्विशतिका, धर्मप्रश्नोत्तर, मूलाचारप्रदीपक, सिद्धान्तसारदीपक, सद्भाषितावलि, सुकुमारचरित्र, शांतिनाथपुराण, पार्श्वनाथपुराण, वर्धमानपुराण. ज्ञानसूर्योदयनाटक. इप्टोपदेश. उपदेशसिद्धान्त रत्नमाला. श्रावकप्रतिक्रमण, और अकलंकाष्टक. २ (१६) ३४ श्रीवादिचंद्राचार्य ३५ श्रीपूज्यपादस्वामि ३६ श्रीनेमिचंद्रभण्डारी • M 0/- ज्योतिषवासी देवताओंके वर्णन. BRERHEEGUsso श्रीमत्पूज्यपाद विरचित- सर्वार्थसिद्धि चतुर्थाऽध्यायः ॥ ज्योतिकाः सूर्याचन्द्रमसो ग्रहनक्षत्रप्रकीर्णकतारकाश्च ॥ १२ ॥ (श्रीमदुभास्वा मिकृन) टीका-ज्योतिस्वमानवागां पंचानामपि ज्योतिष्का इति सामान्यसंज्ञा अन्वर्था । सूर्यादयस्तद्विशेप मजा नामकर्मोदय प्रत्ययाः। सूर्याचद्रमसाविति पृथग्रहण प्राधान्यख्यापनार्थ ॥ किंकृतं पुन: प्राधान्यं ? प्रभावादिकृतं ॥ क पुनस्तपामावासा इत्यत्रोच्यते -अस्मात्समानभूमिभागादृय सप्तयोजनशतानि नबन्युत्तराणि ७९. उत्पत्य सर्वज्योतिषामधोभागविन्यस्तास्तारकाचरति । ततो दशयो- जनान्युत्पत्य चंद्रमसो भ्रमन्ति । ततश्चत्वारि योजनान्युत्पत्य बुधाः । ततस्त्रीणि योजनान्युत्पत्य शुकाः । ततस्त्रीणि योजनान्युत्पत्य वृहस्पतयः नतस्त्रीणि योजनान्युत्पत्यांगारकाः । ततस्त्रीणि योजना- न्युत्पन्य गर्नश्चगवरन्ति ! माइप ज्योतिर्गणगोचरो नमोऽवकाशो दशाधिकयोजनशतवालस्तिर्यगगरुगातद्वीपसमुद्रप्रमाणो घनोदधिप- यन्तः । उक्तच- णउदुत्तरसत्तमयादरसीदीचदुदुगतिगचउकं ॥ तारारविससिरिस्खात्रुहभग्गवगुरुअगिरारसणी ॥ १ ॥ पंडित जयचन्द्रजीकृत हिंदी वचनिका- अर्थात्-इन पांचहीकी ज्योतिष्क ऐसी सामान्यसंज्ञा ज्योतिः .. - (२) स्वभान्त है, सो सार्थिक है। वहरि सूर्य चंद्रमा ग्रह नक्षत्र प्रकीर्णक तारका ऐसी पांच विशेष संज्ञा हैं । सो यहु नामकर्मके उदयके विशेषत भई है । बहुरि सूर्याचंद्रमसौ ऐसी. इन दोयकै न्यारी विभक्ति करी सो इनका प्रधान पणा जनावनके अर्थि है । इनके प्रधान पणा इनके प्रभाव आदिकरि किया है। बहुरि इनके आवास कहां है, सो कहिय है। इस मध्यलोककी समान भूमिके भागते सातसे नर्व योजन उपरि जाय तारानिक विमान विचरै हैं । ते सर्व ज्योतिषीनिके नीचे जानना । इनत दश योजन उपरि जाय सूर्यनिके विमान विचरे हैं । तात अशी योजन उपरि नाय चंद्रमानिके विमान हैं । तातै तीनि योजन पर नाय नक्षत्रनिके बिमान हैं । तातै तीनि योजन ऊपर जाय वुधनिके बिमान हैं। तातै तीमि योजन अपरि जाय वृहम्पतिके विमान है । तात चारि योजन ऊपर जाय मंगलके विमान हैं। ताते चारि योजन ऊपर जाय शनैश्चरके विमान हैं। यह ज्योतिष्क मंडलका आकाशमें तलैं ऊरि एकसौ दश योजन मही जानना । बहुरि तिर्यविस्तार असंख्यात द्वीपसमुद्रमाण घनोदधिवात वलय पर्यंत जानना । इहां उक्तंच गाथा है ताका अर्थ-सातसे नवे, देश, अशी, च्यारि त्रिक, दोय चतुष्क ऐसे एते योजन अनुक्रमत-तारा ७९० । सूर्य १० । चंद्रमा ८० । नक्षत्र ३ । वुध ३। शुक्र ३ । बृहस्पति ३ । मंगल ४ । शनैश्चर ४ । इनका विचरना जानना ।। ज्योतिष्काणां गतिविशेषप्रतिपत्यर्थमाह-- मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतयो नृलोके ॥ १३ ॥ (श्रीमदुमास्वामिकृत) टीका-मेरो प्रदक्षिणा मेरुप्रदक्षिणा । मेरुप्रदक्षिणा इतिवचनं गतिविशेषप्रतिपत्यर्थ विपरीतगतिर्मा विज्ञायीति ॥ नित्यगतय इति विशेषणमनुपरतक्रियाप्रतिपादनार्थ । नृलोकग्रहणं विषयाथ । अर्ध- तृतीयेषु दीपेसु द्वयोश्च समुद्रयोज्यौतिष्का नित्यगतयो नान्यत्रेति ॥
(३) ज्योतिष्कविमानानां गतिहेत्वभावात्तत्यभाव इतिचेन्न, असिद्धत्वात्। गतिरताभियोग्यदेवप्रेरितगतिपरिणामात्कर्मविपाकस्य वैचित्र्यात्ता हि गतिमुखेनैव कर्म विपच्यत इति ॥ एकादशभिर्योजनशतैरेक- विशेरुमप्राप्य ज्योतिष्काः प्रदक्षिणाश्चरन्ति ।। हिंदी वचनिका- भाग ज्योतिषीनिका गमनका विशेष जाननेके पर्थ कहते हैं- मर्थात्-मेरुप्रदक्षिणा ऐसा वचन है, सो गमनका विशेष, जान- नेकू है । अन्य प्रकार गति मति जानू । बहुरि नित्यातयः ऐसा वचन है सो निरंतर गमन जनावनेके अर्थ है । बहुरि नृलोकका ग्रहण है सो भदाई द्वीप दोय समुद्रमें नित्य गमन है अन्य द्वीप समुद्रनिमें गमन . नाहीं। इहां कोई तर्क कर है, ज्योतिषीदेवनिका विमाननि गमनका कारण नाहीं । ततै गमन नाहीं । ताकू कहिये, यह कहना अयुक्त है । नाते तिनके गमनविर्षे लीन ऐसें माभियोग्य नातिके देव तिनका कीया गतिपरिणाम है । इन देवनिकै ऐसाही फर्मका विचित्र उदय है, नो गतिप्रधानरूप कर्मका उदय दे है । बहुरि मेरुते ग्यारहवें इकईस योजन छोड ऊपरें गमन करें हैं। सो प्रदक्षिणारूप गमन कर हैं । इन ज्योतिषीनिका अन्यमती कहै है, जो भूगोल भल्पसा क्षेत्र है । ताके ऊपरि नीचे होय गमन है । तथा कोई ऐसें कहै है, जो ए ज्योतिषी तौ थिर है । अरु भूगोल मे है । ताते लोककू उदय अस्त दीखे हैं । बहुरि कहें हैं जो हमारे कहने से ग्रहण मादि मिले है । सो यह सर्व कहना प्रमाणवाधित है । जैनशास्त्रमें इनका गमनादिकका प्ररूपण निर्वाध है । उदय मस्तका विधान सर्वत मिले है । याका विधिनिषेधकी चर्चा श्लोकवार्तिकमैं है । तथा गमना- दिकका निर्णय त्रैलोक्यसार स्पादि ग्रंथानमैं है, तहां जानना ।।
(४) R - that - गतिमज्योतिरसम्बन्धन व्यवहारकालप्रतिपयर्थमाह- ॥ तत्कृतः कालविभागः ॥ १४ ॥ (श्रीमदुमास्वामिकृत) टीका-तद्ग्रहणं गतिमज्ज्योतिःप्रतिनिदेशार्थम् । न केवलया गत्या नापि कंवलज्यो तभिः कालः परिच्छिचने, अनुपलब्धपरि- वर्तनाच ।। काला द्विविधो व्यावहारिको मुख्यश्च ॥ व्यावहारिका कालविभागस्तस्कृतः समयावलिकादिः क्रियाविशेपपरिच्छिन्नोऽन्य- स्यापरिच्छिन्नस्य परिच्छेदहेतुः ।। मुख्योऽन्यो वक्ष्यमाणलक्षणः ।। हिंदी वचनिका- आगें इन ज्योतिपीनिके संबंधकरि व्यवहार कालका मानना तिसके अर्थि कहे हैं अर्थात्-- इन ज्योतिषी देवनिकरि किया कालका विभाग है । इहां तत्का ग्रहण गति सहित ज्योतिप्क देव निके कहनेक अर्थि है। सो यह व्यवहारकाल केवल गतिहीकरि तथा केवल ज्योतिषीनिकरि नाहीं जाना जाय है । गति सहित ज्योतिषी निकरि नाना नाय है । ताते तो इनका काकू दीर्ख नाहीं । बहुरि गमन न होय तो ये विरही हैं । तात दोऊ संबंध लेना । तहां काल है सो दोय प्रकार है । व्य- वहारकाल निश्चयकाल । तिनमें व्यवहारकालका विभाग इन ज्योतिषी- निकरि किया हुवा जानिये है, सो समय आवली धादि क्रिया विशेष- करि नाना हुवा व्यवहार काल है । सो नाहीं जाननेमें आवै ऐसा नो निश्चयकाल ताके जाननेकू कारण है सो निश्चय कालका लक्षण आग सो नानना । इतरत्र ज्योतिपामवस्थानप्रतिपादनार्थमाह- || बहिरवस्थिताः ॥ १५ ॥ [श्रीउमास्वामिकृत टीका--बहिरित्युच्यते कुतो बहिः । नृलोकात् ।। कथमवग- गमन कहसी, - - म्यते ! अर्थवशात् विभक्तिपरिणामो भवति ॥ ननुच नृलोके नित्यगतिवचनादन्यत्रावस्थान ज्योतिष्काणां सिद्धम् अतो वहि- स्वस्थिता इति वचनमनर्थकमिति । उन्न । किं कारणं ? नृलोका. दन्यत्र बहिज्योतिपामस्तित्वमवस्थान चासिद्धम् । अतस्तदुभयसि- यर्थ चहिरवस्थिता इत्युच्यते ॥ विपरीतगतिनिवृत्यर्थ कादा- चित्कगतिनिवृत्त्यर्थच सूत्रमारब्धं ॥ हिंदी पचनिका- आगें मनुष्य लोकतै बाहिर ज्योतिष्क अवस्थित हैं । ऐसा कहन… सत्र कई हैं- अर्थात्-वदि" कहिये मनुष्यलोकतै बाहिर ते ज्योतिष्क अवस्थित कहिये गमन रहित हैं इहां कोई कई है, पहले सूत्रमें कहा है नो मनुष्य लोक्त ज्योतिष्क देवनिके नित्यगमन है । सो ऐसा कहनेते यह जाना जाय है, जो यातै वाहिरकै गमन नाहीं । फेरि यह सूत्र कहना निष्प्रयोजन है। जो इस सूत्रत मनुष्यलोकतै बाहिर अस्तित्वमी जाना जाय है । अवस्थान भी जाना जाय है, यात दोऊ प्रयोजनकी सिद्धिके मर्थि यह सूत्र है अथवा अन्य प्रकार करि गमनका अभावके भर्थि भी यह सुत्र जानना ॥ ताका समाधान-- श्रीमद्भधाकलंक देव कृत राजवार्तिकमेंसे अध्याय ४ में ज्योतिष्क देवताओंके वर्णन सूत्र और भाष्य- ज्योतिष्काः सूर्याचंद्रमसौ ग्रहनक्षत्रप्रकीर्णकतारकाच ॥ १२ ॥ [श्रीउमास्वामिकृत ] द्योतनस्वभावत्वाज्ज्योतिकाः ॥१॥-द्योतनं प्रकाशनं तत्स्व- भावत्वादेषां पंचानामपि विकलानां ज्योतिष्का इतीयमन्वर्था सामान्य- संज्ञा । तस्याः सिद्धिः- (६) . ज्योतिःशब्दात्स्वार्थे के निष्पत्तिः ॥२॥-ज्योतिःशब्दात स्वार्थ के सति ज्योतिप्का इति निष्पद्यते । कथं स्वार्थ कः ? यवादिपु पाठात् । प्रकृतिलिंगानुवृत्तिप्रसंग इति चेन्नातिवृत्तिदर्शनात् ॥ ३ ॥- स्यान्मतं यदि स्वार्थिकोऽयं कः ज्योतिःशब्दस्य नपुंसकलिंगत्वात् कांत- स्यापि नपुंसकलिंगता प्राप्नोतीति ? तन्न । किंकारणं, अतिवृत्तिदर्शनात् । प्रकृतिलिंगातिवृत्तिरपि दृश्यते यथा कटीरः समीरः शुंडार इति । तद्विशेषाः सूर्यादयः ॥ ४ ॥-तेषां ज्योतिष्काणां सर्यादयः पंच विकल्पाः व्याः ।। पूर्ववत्तन्निवृत्तिः ॥ ५ ॥- तेषां संज्ञाविशेषाणां पूर्ववनिर्वृत्तिर्वेदि. तव्या देवगतिनामकर्मविशेषोदयादिति | सूर्याचंद्रमसावित्यानञ्देवताद्वंद्वे ॥ ६ ॥ सूर्यश्च चंद्रमाश्च द्वंद्वे छते पूर्वपदस्य देवताद्वंद्वे इत्यानम् भवति । सर्वत्रप्रसंगइतिचेन्नपुनद्वग्रहणादिष्टे वृत्तिः ॥ ७ ॥-स्यादेतत् यदि " देवताद्वद्वे " इत्यानञ् भवति इहापि प्राप्नोति ग्रहनक्षत्रप्रकीर्णक- ताराः किन्नरकिंपुरुषादयः असुरनागादय इति तन्न किं कारण ? आनन् द्वंद्व इत्यतः द्वंद्व इति वर्तमाने पुनर्द्वन्द्ववृत्तिर्जायते इति । पृथग्ग्रहणं प्राधान्यख्यापनार्थ ॥ ८॥ सूर्याचंद्रमसोर्ग्रहादिभ्यः पृथक् ग्रहणं क्रियते प्राधान्यख्यापनार्थ । ज्योतिप्केषु हि सर्वेषु सूर्याणां चंद्रमसां च प्राधान्यं । किंकृतं पुनस्तत् ? प्रभावादिकृतं । सूर्यस्यादौ ग्रहणं अल्पाच्तरत्वात अभ्यहितत्वाच ॥ ९ ॥ सूर्यशब्द भादौ प्रयुज्यते कुतः अस्यान्तरत्वात् अभ्यहितत्वाच्च सर्वा- भिमवसमर्थाद्धि अभ्यर्हितः सूर्यः । ग्रहादिषु च ॥ १० ॥- किमल्पान्तरत्वात् अभ्यर्हितत्वाच पूर्वनिपातः इति वाक्यशेषः । ग्रहशब्दस्तावत् अल्पःचतरोऽभ्य- हितश्च तारकाशब्दान्नक्षत्रशब्दोऽभ्यर्हितः । क पुनस्तेषां निवासः ?
(७) इस्त्रोच्यते अस्मात् समात् भूमिभाग'दृवं सप्तयोजनशतानि नवत्युत्तराणि उत्प्लुत्य सर्वज्योतिषां अधोभाविन्यस्तारकाचरंति । ततो दशयोजनान्यु- प्लुन्य सूर्याश्चरति । ततोऽशीतिर्योजनान्युत्प्लुत्य नक्षत्राणि । ततस्त्रीणि योजनानि उत्प्लुत्य बुधाः । ततस्त्रीणि योजनानि उत्प्लुय शुक्राः । ततः त्रीणि योजनान्युत्प्लुत्य अंगारकाः । ततः चत्वारि योजनान्युत्क्रम्य शनैश्व- राश्चरन्ति । स एष ज्योतिर्गणगोचरः नमोऽवकाशः दशाधिकयोजनशत: बहुल: तिर्यगसंख्यातद्वीपसमुद्रप्रमाणो घनोदधिपर्यंतः। उक्तं च- णवदुत्तरसत्तमया दससीदिच्चदुतिंग च दुग चदुकं ॥ तारारविससिरिक्खाJहभग्गवगुरुअंगिरारसणी ॥ १ ॥ तत्राभिजित् सर्वाभ्यंतरचारी, मूलः सर्ववहिश्चारी, भरण्यः सर्वाध- श्चारिण्यः, स्वातिः सर्वोपरिचारी । तततपनीयसमप्रभाणि लोहिताक्षमणि- मयानि अष्टचत्वारिंशयोजनकाष्टिभाविकभायामानि तस्त्रिगुणाधिका- रिधीनि चतुर्विशतियोजनकपष्ठभागवाहुल्यानि अर्धगोलक कृती नि षोडश- भिर्देवसहस्रब्दानि सूर्यविमानानि, प्रत्येकं पूर्वदक्षिणोत्तरप्न भागान् क्रमेण सिंहकुजावृषभतुग्गरूपाणि विकृत्य चत्वारि चत्वारि देवसहस्राणि वहति । एषामुपरि सूर्याख्याः देवास्तेषां प्रत्येकं चतस्र प्रमहिष्यः । सूर्यप्रभा सुसीमा अर्चिमालिनी प्रभंकरा चेति । प्रत्येकं देवीचतुःसहस्रविकरणसमर्थाः । ताभिः सह दिव्यमुखमनुभवतोऽसंख्येयशतसहस्राधिपतयः सूर्याः परिश्रमंति विमलमृणालवर्णान्यकमयानि चंद्रविमानानि षट्पंचाशयोजनकषष्टिमाग- विकभायामानि अष्टाविंशतियोजनकषष्ठिभागवाहुल्यानि, प्रत्येकं षोड- शभिः देवसहसः पूर्वादिपु दिक्षु क्रमेण सिंहकुंजराश्ववृषभरूपविकारि- मिरूढानि । तेषामुपरि चंद्राख्या देवाः । तेषां प्रत्येक चतस्रोऽग्रमहिष्यः चंद्रप्रभा सुसीमा अर्चिमालिनी प्रभंकरा चेति, प्रत्येक चतुर्देवीविकरणप- टवस्तामिः सह सुखमुपभुजंतश्चन्द्रमसोऽसंख्येयविमानशतसहस्साधिपतयो विहरन्ति । अंजनसमप्रभाणि अरिष्टमणिमयानि, राहुविमानान्येकयोज- (८) नायामविष्कंभाण्यतृतीयधनुःशतवाहुल्यानि। नवमल्लिकाप्रभाणि रजत- परिणामानि शुक्रविमानानि गव्यूतायामविक्रमाणि, जात्यमुक्ताद्युतीनि अंकमणिमयानि बृहस्पतिविमानानि देशोनगव्यूतायामविष्कंभाणि, कनकम- यान्यर्जुनवर्णनानि, बुधविमानानि, तपनीयमयानि, तप्ततपनीयामानि, शनैश्चरविमानानि, लोहिताक्षमयानि तप्तकनकप्रभाण्यंगारकविमानानि, 'बुधादिविमानान्यर्धव्यूनायामविकमाणि । शुक्रादिविमानानि गहुविमा- नतुल्यबाहुल्यानि । राहा दिविमानानि प्रत्येकं चतुर्भिर्देवसहरुह्यन्ते नक्षत्रविमानानां प्रत्येक चत्वारि देवसहस्राणि वाहकानि । तारकवि- मानानां प्रत्येकं द्वे देवमहले वाहके । राहद्याभियोग्यानां रूपविकारा- श्चंद्रवन्नेयाः । नक्षत्रविमानानां उत्कृष्टो विभः क्रोशः । तारकावि- मानानां वैपुल्य जघन्य क्रोशचतुभार्गः मध्यम साधिकः क्रोशचतुर्भागः। उस्कृष्टं उर्धगव्यूतं । ज्योतिष्कविमानानां सर्वजघन्यवैपुल्यं पंचधनुःश- तानि । ज्योतिषामिंद्राः सूर्याचन्द्रमसस्ते चाऽसंख्याताः । ज्योतिप्काणां गतिविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह- मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतयो नृलोके ॥ १३ ॥ (श्री उमास्वामि कृत) मेरुप्रदक्षिणवचनं गत्यंतरनिवृत्यर्थं ॥ १ ॥- मेरोः प्रदक्षिणाः मेरुपदक्षिणा इत्युच्यते । किमर्थ ? गत्यंतरनिवृत्त्यर्थं विपरीता गतिर्मा भूत् । गतेः क्षणेक्षणेऽन्यत्वात नित्यत्वाभाव इति चेन्नाऽऽभीक्ष्ण्यस्य विवक्षितत्वात् ॥ २ ॥-अयंनित्यशब्दः कूटस्थेप्वविचलेपु भावेषु वर्तते गतिश्च क्षणेक्षणेऽन्या, ततोऽन्या नित्येति विशेषणं नोपपद्यत इति चेन्न । किंकारणं ? आभीक्ष्ण्यस्य विवक्षितत्वात् । यथा नित्यपहसितो निय- प्रनल्पित इति आमीक्ष्ण्यं गम्यत इति । एवमिहापि नित्यगतयः अनुपर- '. तगतयः । इत्यर्थः । .
(९) भनेकान्ताच्च ॥३॥-यथा सर्वभावेषु द्रव्यार्थादेशात् स्यान्नित्यत्वं, पर्यायार्थादेशात् स्यादनित्यत्वं । गतावपीति नित्यत्वमविरुद्धमविच्छेदात् । नृलोकग्रहणं विषयार्थ ॥ ४ ॥ ये अर्धतृतीयेषु द्वीपेषु द्वयोश्च समुद्रयोज्योतिष्कास्ते मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतयः नान्ये इति विषयाव- धारणार्थ नृलोकग्रहणं क्रियते । गतिकारणाभावादयुक्तिरिति चेन्न गतिरताभियोग्यदेववह- नात् ॥ ५ ॥-स्थानमतं इहलोके भावानां गतिः कारणवती दृष्टा नच ज्योतिष्कविमानानां गते: कारणमस्ति ततस्तदयुक्तिरिति तन्न । किंका- रणं गतिरतामियोग्यदेवबहनात् । गतिरता हि भाभियोग्यदेवा वहतीत्युक्त पुरस्तात् । कर्मफलविचित्रमावाच ॥६॥ कर्मणां हि फलं वैचित्र्येण पच्यते ततस्तेषां गतिररिणतिमुखेनैव कर्मफलमवबोद्धव्यं । एकादशभिः योजन- शतरेकर्विशे रुमप्राप्य ज्योतिष्का प्रदक्षिणाश्चरन्ति । तत्र जंबुद्वीपे द्वौ सूर्यो, द्वौ चन्द्रमसौ, षट्पंचाशत नक्षत्राणि, षट्सप्तत्य- पिकं ग्रहशत, एककोटीकोटिशतसहसत्रयस्त्रिंशतकोटीकोटिसह- साणि . नवकोटीकोटिशतानि पंचाशच्च कोटीकोट्यस्तारकाणां । लवणोदे चत्वारः सूर्याः चत्वारश्चन्द्राः, नक्षत्राणां शत, द्वादशग्रहाणां, त्रीणि शतानि द्वापंचाशानि द्वे कोटी कोटिशतसहस्र सप्तषष्ठिः . कोटीको टसह- स्राणि नवच कोटीकोटिशतानि तारकाणां । धातकीखण्डे द्वादशसूर्याः, द्वादशचंद्राः, नक्षत्राणां त्रीणिशतानि, निशानि ग्रहाणां, सहस्से षट्प- चाशं अष्टौ कोटीकोटिशतसहस्राणि सप्तत्रिंशच कोटीकोटिशतानि तारकाणां । कालोदे द्वाचत्वारिंशदादित्याः द्वाचत्वारिंशचन्द्राः, एकादश नक्षत्रशतानि, पट्सप्तत्यधिकानि पर्शिशतग्राशतानि षण्णवत्यधिकानि अष्टाविंशतिः कोटीकोटिशतसहस्राणि द्वादश कोटीकोटिसहस्राणि नव कोटीकोटिशतानि पंचाशत्कोटीकोव्यस्तारकाणां । पुष्कराईं द्वासप्ततिः .
(१०) सूर्याः द्वासप्ततिश्चंद्राः, द्वे नक्षत्रसहन्ने, पोडशत्रिष्टिः प्रदशतानि, षट्- निशानि षटचत्वारिंशकोटीकोटिशतसहमाणि द्वे कोर्ट को शिते तारकाणां वाले पुष्कराच ज्योतिषामियमेव सान्यात्तश्चतुर्गुणाः पुष्करबरोदे, ततः परा द्विगुणद्विगुणा ज्योतिषां संख्या असेया । जवन्यं तारकांतरं गन्यून. सप्तमागः । मध्यं पंचाशत् गट्यूनानि । उन्कृष्ट योननसहसम् । जपन्न सूर्यातरं चंद्रान्तरच नवनवतिः सहस्त्राणि योजनानां पशतानि चत्वारि- शदधिकानि । उन्कृष्टमेकं योजनशतसटसं षट्शतानि पच्युतराणि हंबू. द्वीपादिपु एकस्य चंद्रमसः पट्पष्टिकोटीकोटिशतानि पंचरततिश्च फोटीकोट्यः तारकाणां । अष्टाशीतिर्मशाग्रहाः, सावितिनक्षत्राणि, परिवारः सूर्यस्य चतुरशीति मण्डलशतं । गनीतिः योजनशत अंद्वीपक्ष्य मंतरमवगाह-प्रकाशयति । तत्र पंचयष्टिान्तरमण्डलानि । लवणोद- स्यांतस्त्रीणि त्रिंशानि योजनशतान्यवगास प्रकाशयति । तत्र मण्डलानि याधानेकानविंशतिशत द्वियो जनमक कमण्डलान्तरं द्वे योजन अष्टम-शि- घोजनेकपष्टिभागाश्च एक समुदयानर, चतुश्चन्दारिशद्योजनसईनः अष्टामि- श्व शतविशरप्राप्य मेहं सर्वाभ्यंतरमण्डलं सूर्यः प्रकाशयति । तस्य विष्कमो नवनवतिः सहनाणि षट्शतानि चत्वारिंशानि योजनानां । तदाहनि मुहूर्नाः अष्टादश भवन्ति । पंचपहनाणिद्वेशत एपंचाशद्योजनानां एकान्नं- त्रिंशद्योजनपष्ठिमागाश्च महतगतिः । सर्वब घमण्डले चान्सर्यः पंचचत्वा- रिशवसहः त्रिभिश्च शतैः त्रिशोजनानां मेरुममाप्य मापयति । तस्य विष्कम्भः एकं शतसहन षट्शतानि च पट्य धकानि योजनानां । तदा दिवसस्य द्वादश मुहूर्ताः । पंचसहस्राणि त्रीणि शतानि पंचाताणि योजनानां पंचदश योजनष'ष्ठभागाश्च मुर्तगतिक्षेत्रं । तदा त्रिशद्योजनसह- सेपु अष्टसु च योचनशतेपु अर्धे द्वात्रिंशेपु स्थितो दृश्यते । लाग्यन्तरम- ण्डलदर्शनविषयपरिमाण प्रागुक्तं । मध्ये हानिवृद्धिक्रमो यथागवेदि. तव्यः । चन्द्रमण्डलानि पंचदशद्वीपावाहः, समुद्रावगाहश्च सूर्यवद्वेदित- व्यः । द्वीपाभ्यन्तरे पंचमण्डलानि । समुद्रमध्ये दश । सर्ववायाभ्यन्तरमः ..
(११) पडलविष्कम्भविधिः, मेरुचंद्रांतरप्रमाणं च सूर्यवत्प्रत्येतव्यं । पंचदशानां मण्डलानामन्तराणि चतुर्दश । तत्रकैकस्य मण्डलान्तरस्य प्रमाणं पंचत्रि- शत् योजनानि योजनेकष्ठिभागास्त्रिंशत्तद्भागस्य चत्वारः सप्तभागाः ३५-३०-४ । सर्वाभ्यन्तरमण्डले पंचसहस्राणि त्रिसप्तत्यधिकानि योजनानां ६१-७ सप्तसप्ततिर्भागशतानि चतुश्चत्वारिंशानि मण्डलं त्रयोदशभिर्भागसहसैः सप्तभिश्च भागशतः पंचविशैः स्थित्वामवशिष्टानि । चन्द्रः एकैकेन मुहूर्तेन गच्छति सर्वबाह्यमण्डले पंचसहस्राणि शतं च पंच- विशं योजनानां एकान्नसप्ततिर्भागशतानि नवत्यधिकानि मण्डल त्रयोद- शभिः भागसहसैः सप्तभिश्चभागशतैः पंचविशैः स्थित्वाअवशिष्टानि चन्द्रः एकैकेन मुहूर्तेन गच्छति । दर्शनविषयपरिमाणं सूर्यवद्वेदितव्यं । हानिवृद्धिविधानं च यथागमं अवसेयं । पंचयोजनशतानि दशोत्तराणि सूर्याचंद्रमसोश्चारक्षेत्रविष्कम्भः ॥ गतिमज्योतिःसंबंधेन व्यवहारकाकमतिपत्यर्थमाह- तत्कृतः कालविभागः ॥ १४ ॥-तदिति किमर्थं १ ॥ गति. मज्ज्योतिःप्रतिनिर्देशार्थ तद्वचन ॥ १ ॥- गतिमतां ज्योतिषां प्रतिनिर्देशार्थ तदित्युच्यते । नहि केवलगत्या नापि केवरेज्योतिभिः कालः परिच्छद्यते, अनुपलब्धेरपरिवर्तनाच्च । ज्योति परिवर्तनलभ्योहि कालपरिच्छेदः । कालो द्विविधः व्यावहारिको मुख्यश्च । तत्र व्यावहारिक: कालविभाग: तत्कृतः समयावलिकादियाख्यातः । क्रियाविशेषपरिच्छिन्नः भन्यस्यापरिच्छिन्नस्य परिच्छेदहेतुः मुख्योऽन्यो वक्ष्यमाणलक्षणः । माह न मुख्यः कालोऽस्ति सूर्यादिगतिव्यतिरिक्तो लिंगाभावात् । अपिच कलानां समहः कालः । कलाश्च क्रियावयवाः । किंच पंचास्तिकायोपदेशात् पंवा- स्तिकाया मागमे उपदिष्टाः न षष्ठः । ततो न मुख्यः कालोस्ति इत्यपरी- क्षिताभिधानमेतत्-यत्तावदुक्तं लिंगाभावान्नास्ति मुख्यः कालः इत्यत्रोच्यते क्रियायां काल इति गौणव्यवहारदर्शनात् मुख्यसिद्धिः । योयमादित्य- गमनादौ कियेति बढेः कालइति व्यवहारः कालनिर्वतनापूर्वकः मुख्यस्य (१२) कालस्यास्तित्वं गमयति । न हि मुख्य गव्यसति वाहीके गौणे गोशब्दस्य व्यवहारो युज्यते ॥ अत एच न कलासमूह एव कालः ।। २ ।। अत एव, कुतएव ? मुख्यस्य कालस्यास्तित्वादेव, कलानां समूह एव काल इति व्यपदेशो नोपपद्यते । करप्यते क्षिप्यते प्रेयते येन क्रियावद्रव्यं स कालस्तस्य विस्तरेण निर्णय उत्तरत्र वक्ष्यते । प्रदेशप्रचयाभावादस्तिकायेष्वनुपदेशः ॥ ३ ॥ प्रदेशपचयो हि कायः स एषामस्ति ते अस्तिकाया इति जीवादयः पंचैव उपदिष्टाः । कालस्य त्वेकप्रदेशत्वादस्तिकायत्वाभावः । यदि हि अस्तित्वमेव अस्य न स्यात् षड्दव्योपदेशो न युक्तः स्यात् । कालस्य हि द्रव्यत्वमस्त्यागमेऽपर- लक्षणाभावः स्वलक्षणोपदेशसद्भावात् ॥ इतरत्र ज्योतिषामवस्थाप्रतिपाद- नार्थमाह- चहिरवस्थिताः ॥ १५ ॥ बहिरित्युच्यते कुतोवहिः ? नृलोकात । कथमवगम्यते ? अर्थवशाद्विभक्तिपरिणाम इति ॥ नृलोके नित्यगतिवचनादन्यत्रावस्थानसिद्धिरितिचेन्नोभया- सिद्धेः॥१॥ स्यान्मतं नृलोके नित्यगतयः इतिवचनात अन्यत्र अवस्थान ज्योतिषां सिद्धं अतो बहिरवस्थिता इति वचनमनर्थक, इतितन्न किं कारण? उभयासिद्धः नृलोकादन्यत्र महियोतिषामस्तित्वमवस्थानं चाऽप्रसिद्ध अत- स्वदुभयसिद्धयर्थं " बहिरवस्थिताः" इत्युच्यते । असति हि वचने नृलोके एव सन्ति नित्यगतयश्च इत्यवगम्येत । श्रीमान् पं. पन्नालालजी दूनीवाले और पं. फत्तेलालजी कृत रानः वार्तिकका हिंदी अनुवाद ( तत्वकौस्तुभ ) अध्याय चतुर्थ- तृतीय निकायकी सामान्य तथा विशेष संज्ञाका संकीर्तनकै अर्थ कहे है, सूत्र- ज्योतिष्काः सूर्याचंद्रमसौ ग्रहनक्षत्रप्रकीर्णकतारकाश्च ॥१२॥ हिंदी अर्थः-सूर्यचंद्रमाग्रहनक्षत्रप्रकीर्णक तारा ए पांच मेदरूप ज्योतिष्कदेव है। वार्तिक-द्योतनस्वभावत्याज्योतिष्काः ॥१॥ संस्कृत टीका:- घोतनंप्रकाशनंतस्मभावत्वादेपपिचानामपि विकल्पानां ज्योतिष्का इतीयम- न्वर्था सामान्यसंज्ञा तस्याः सिद्धिः ।। अर्थ-द्योतन प्रकाशन स्वभावपणातै इनि पंच विकल्पनिकी ज्योतिष्क संज्ञा । ऐसैया सार्थक सामान्य संज्ञा तिनकी सिद्धि है। वार्तिक-ज्योतिःशब्दात्स्वार्थ के निष्पत्तिः । टीका-ज्योतिः शब्दात्स्वार्थे केसति ज्योतिप्का इति निप्पद्यते कथं । यवादिपु पाठात् । अर्थ-ज्योतिःशब्द स्वाकवि क प्रत्यय होता संता ज्योतिष्क ऐसो उत्पन्न हो हैं । प्रश्न-स्वार्थमैं क प्रत्यय कैसे होयहै। उत्तर- यवादिपुपाठनैं होय है ॥ २ ॥ वार्तिक-प्रकृतिलिंगानुवृत्तिप्रंसग इति चेनातिवृत्तिदर्श- नात् ॥ ३ ॥ टीका-स्यान्मतंयदिस्वार्षिकोयंकः ज्योतिःशब्दस्य नपुंसकलियाकान्तस्यापि नपुंसकलिंगता प्रामोतीति तन्न किंकारणम- तिवृत्तिदर्शनात् प्रकृतिलिंगातिवृत्तिापिदृश्यते । यथा कुटीरः समीरः शुण्डार इति । अर्थ, प्रश्न-जो यो स्वार्थिक कः प्रत्यय है तोज्योति शब्दकै नपुंसक लिंगपणातें ककारांत ज्योति शब्दकभी नपुंसकलिंगपणांकी प्राप्ति होय है। उत्तर-सो नहीं है । प्रश्न-कहा कारण । उत्तर-अतिवृत्तिका दर्शनते कि प्रकृति लिंग अतिवृत्ति कहिये उल्लंघनकरि प्रवर्तनको दर्शनकरिये है यात सो जैसें कुटीरः शुंहारः इनमैं कुटी सभी शुद्धा शब्दका स्त्रीलि- गवाची है। पर अल्प अर्थमे र प्रत्यय होत सते कुटीरा समीरा शुडारा (१४) नहीं भये । भर पुलिंबाची कुटीरः समीरः शुण्डारः भए तैसेंही का प्रत्यय होत सते ज्योति शब्द प्रकृत नपुंसक लिंगरूप नहीं रखो पुलिंगवाची ज्योतिष्क शब्द भयो ॥ ३॥ तद्विशेषासूर्यादयः ॥ ४ ॥ टीका-तां ज्योतिप्काणां सूर्यादयः पंच विकल्पाः दृष्टव्याः ॥ अर्थ-तिनज्योतिष्कनिके सूर्यादिक पांचभेद देखिने योग्य है ॥ ४ ॥ वार्तिक-पूर्ववत्तन्निर्वृत्तिः ॥ ५ ॥ टीका-तेषां संज्ञा बशेषाणांपूर्ववन्निवृत्तिवेदितव्या देवगतिनामकर्मविशेषोदयादिति ॥ अर्थ-वै संज्ञा विशेष पे हैं तिनकी पूर्ववत् रचना जाननेयोग्य है। कि देवगतिनामकर्मका जो विशेष ताका उदयतें जानने योग्य हैं ॥ ५ ॥ वार्तिक-सूर्याचंद्रमसावित्यानञ् देवताद्वन्द्वे ॥ ६ ॥ टीका सूर्यश्च चंद्रमाश्च द्वन्द्वकृते पूर्वपदस्य देवताद्वन्द्व इत्यानञ् भवति । मर्य-सूर्य अर चंद्रमा ऐसै द्वन्द्व समासकरतां संता पूर्वपदकू देवताद्वंद्वे यासूत्रतै आनन् प्रत्यय होयहै । अर्थात या सूत्रमैं सूर्य पद जोहै ताकै मानन् प्रत्ययके होने सूर्यापद भया है ॥ ६ ॥ वार्तिक-सर्वप्रसंगइति चेन पुनद्वग्रहणादिष्टे वृत्तिः ॥ ७॥ टीका-स्यादेतादिदेवताद्वंद्व इत्यानञ् भवति इहाऽपि प्राप्नोति ग्रहनक्षत्र- प्रकीर्णकताराः किन्नर किंपुरुषादयः । असुरनागादय इति तन्न किं कारणं भानम् द्वंद इत्यतः द्वंद्व इति वर्तमाने पुनद्व इति ग्रहणे इष्ट वृत्ति- नायत इति । अर्थ-प्रश्न-- जो देवताद्वन्द्वे यासूत्रत आनन् होय है तो इहां भी प्राप्तहोय है कि ग्रहनक्षत्रप्रकीर्णकताराः । तथा किंमाकिंपुरुपादयः । अमुरनागादयः । इहांभी आनन् प्रत्यय प्राप्त होगा । उसर-सो नहीं है। प्रश्न -कहा कारण उत्तर-आनन द्वंद्वे या पूर्वसूत्र देवताहूंढे या सूत्रमैं इंदपदकी अनुवृत्ति सिद्धि है (१५) तौह बहुरि द्वंद्वपदका ग्रहण होत सन्तै इष्ट स्थानमैं मानकी प्रवृत्ति होय है ।। ७ ॥ वार्तिक-पृथग्रहणं प्राधान्यख्यापनार्थ ॥ ८ ॥ टीका-- सर्याचन्द्रमसोहादिभ्यः पृथग्रहणं क्रियते प्राधान्यख्यापनार्थ ज्योतिष्केषुहि सर्वेषु सूर्याणां चन्द्रमसांच प्राधान्यं । किंकृतं पुनस्तत् प्रभावादिकृतं ।। मर्थ-सूर्य चंद्रमानिको ग्रहादिकनित पृथग्रहण करिये है सो इनके प्रधानपणांका जनावनें निमित्त है कि सर्व ज्योतिषीनिकै विर्षे संर्यचंद्रमा- निकै प्रधानपणी है। प्रश्न-इनके प्रधानपणों कहा कृत है । उपर-- प्रभाव भादित है ॥८॥ बार्तिक-सूर्यस्यादौग्रहणमल्पाचतरत्वादभ्यहितत्वाश्च ॥९॥ टीका-सूर्यशब्द आदौ प्रयुज्यते कुतोऽस्पान्तरत्वादभ्यहित्त्वाच्चसर्वा- भिभसमर्थाद्धि अभ्यर्हितः सूर्यः ।। मर्य-- सूर्य शब्द मादिकै विर्षे प्रयुक्त करिये है। प्रश्न- काहेत ? उत्तर अल्पाचनरपणांते अर अभ्यहितपणात हैं कि निश्चयकरि सर्वका तेजने तिरस्कार करने में समर्थ है। यात सूर्य अभ्यर्हित है कि पूज्य ॥ ९ ॥ वार्तिक--ग्रहादिषु च ॥ १० ॥ टीका-किमल्पाचतरत्वा- दभ्यर्हितत्वाच्च पूर्वनिपात इति वाक्यविशेषः ग्रहशब्दस्तावदल्पाचतरो- भ्यहितश्चं तारकाशनान्नमत्रशब्दभ्यरितः । क पुनम्तेषां निवास इसत्रो- च्यते अस्मात समादमिभागा सप्तयोजनशतानि नवत्युत्तराण्युरप्ल्युत्य सर्वन्योतिषामघोभाविन्यस्तारकाचरनि ततोदशयोजनान्युत्प्ल्युत्य सूर्या- श्चरति ततोशीतिर्योजनान्युप्व्युत्य चन्द्रमसोभवति ततस्त्र णि योजनान्यु- प्ल्युत्य बुधाः । ततस्त्रीणियोजनान्युत्प्ल्युत्यशुक्राम्ततस्त्रीनि योजनान्यु- प्ल्युत्य बृहस्पतयस्ततश्चत्वारियोजनान्युप्युल्य अंगारकाः ततश्चत्वारि है ( १६ ) योजनान्युत्क्रम्यशनैश्चाश्चरति । सएपज्योतिर्गणगोचरः नभोवकाशः दशा- घिकयोननशतबहुलः । तिर्यगसंख्यातद्वीपसमुद्रपमाणो धनोदषिपर्यन्तः । ॥ उक्तंच॥ णयदुत्तरसत्तमयादससीदिचदुतिगंचदुगचउक्कं ॥ तारारविससिरिक्खा बुहभग्गवगुरुअंगिरारसणी ॥ १ ॥ तत्राभिजित् सर्वाभ्यन्तरचारी। मूलः सर्वबहिचारी भरण्यः सर्वाधश्चा- रिण्यः । स्वातिः सर्वोपरिचारी तप्ततपनीयतमप्रमाणि लोहिताक्षमणिमयानि भष्टचत्वारिंशयोजनकषष्ठिभागविष्कमायामानि तत्रिगुणाधिकपरिधीनि चतुर्विशतियोजनकपष्टिभागबाहुल्यान्यर्धगोलकाकृतीनि पोडशभिर्देवसहरी- रूढानि सूर्यविमानानिप्रत्येक पूर्वदक्षिणोत्तरोत्परान् भागान् क्रमेण सिंह. कुंजरवृषभतुरगरूपाणि विकृत्य चत्वारि चत्वारि देवमहस्राणि वहति । एषामुपरि सूर्याख्यादेवास्तेषां प्रत्येक चतस्रोऽयमहिप्यः सूर्यप्रभा सुसीमा अर्चिमालिनी प्रभंकराचेति प्रत्येकं देवीरूपचतुःसहस्रविकरणसमर्थाः । ताभिः सह दिव्यं सुखमनुभवतः संख्येयविमानशतसहस्राधिपतयः । सूर्याः परिभ्रमंति विमलमृणालवर्णान्यकमयानि चन्द्र विमानानि पटपंचाशद्यो- जनकषष्ठिभागविष्कमायामान्यष्टाविंशतियोजनकपष्टिभागवाहुल्यानिप्रत्येक डिशभिर्देवसहस्रः पूर्वादिपु दिक्षु क्रमेण सिंहकुंजरवृषभाश्वरूपविभारिभि- रूढानि | तेषामुपरि चन्द्राख्यादेवास्तेपा प्रत्येकं चत्स्रोग्रमहिप्यः चन्द्र- प्रभा सुसीमा अर्चिमालिनी प्रभंकराचेति प्रत्येकं चतुर्दैवीरूपसहस्रविकरण. पटवस्तामिः सह सुखमुपभुर्जतश्चद्रमसोऽसंख्येयविमानशतसहस्राधिपतयः विहरति । अंजनसमप्रभाण्यारिष्टमणिमयानि राहुविमानान्येकयोजनायाम- विष्कभाग्य तृतीयधनुःशनबाहुल्यानि । नवमल्लिकाप्रभाणि · रजतपरि- णामानिशुकविमानानिगव्यूतायामविष्कमाणि जात्यमुक्ताद्युतीनि अकम- णिमयानि बृहस्पतिविमानानि देशोनगन्यूनायांमविष्कमाणि । कनक- मयान्यर्जुनवर्णानि बुधविमानानि तपनीयमयानि तप्ततपनीयामानि शनै- -
(१७) .
श्वरविमानानि लोहिताक्षमयानि तप्तकनकप्रमाण्यंगारकविमानानि । बुधादि
विमानान्यदंगन्यूतायामविष्कमाणि शुक्रादिविमानानि राहुविमानतुल्य
बाहुल्यानि । राहादिविमानानि प्रत्येकं चतुभिर्देवसईसरूपन्ते । नक्षत्रविमा-
नानां प्रत्येक चवारि देवसहस्राणि वाहकानि । तारकाविमानानां प्रत्येक
द्वे देवसहस्से वाहके राव्हाचाभियोग्यानां रूपविकाराश्चद्रवन्नेयाः । नक्षत्र-
विमानानामुस्कटो विष्कमः क्रोशः तारका विमानानां वैपुल्यं जघन्यं
क्रोशचतुर्भागः । मध्यम साधिकः क्रोशचतुर्भाग उस्कृष्टमगव्यूतं.। ज्यो-
तिष्कविमानानां सर्वजघन्यवैपुल्यं पंच धनुःशतानि । ज्योतिषामिंद्राः
सूर्याचंद्रमसस्ते चासंख्याताः॥
अर्थ-
-प्रभ-कहा । उत्तर- अल्पान्तरपणांत अभ्यर्हितपणांत
पूर्वनिपात है। ऐसो वाक्य शेष है । अर्थात्-प्रथम ग्रहशब्द है सो
भल्गच्तर है । भर अभ्यर्हित है । बहुरि तारकशब्दतै नक्षत्रशब्द
अभ्यर्हित है। प्रश्न-तिनके भावास कहां है। उत्तर-इहां कहिए है
कि या समभूमित ऊर्ध्व सातसे निव्वै योजन उल्लंघनकरि सर्व ज्योतिषीके
भावास है । तिनमैं अधोभागमैं तिष्ठनेवारे तो तारका विचरै हैं । बहुरि
तिनकै ऊपरि दशयोनन उलंघनकरि सूर्य जे? ते विचरै हैं । बहुरि तिनकै
ऊपरि मासी योजन उल्लंघनकरि जे चन्द्रमा है ते विचर हैं। तापीछे
तीनयोजन उल्लंघनकरि वुध जे हैं तेविनर हैं। महुरि ताऊपरि तीन योजन
उलंघन करि शुक्र ने हैं ते विचरै हैं। हुरि ताऊपरि तीन योजन उल्लंघन-
करि वृहस्पति हैं ते विचरै हैं । बहुरि ताप, चारियोजन ग्लंघन करि
मंगल में. ते विचरै हैं भ्रम हैं। तापीछे चारयोजन उलंघन करि शनीश्चर
ने हैं ते विचरै है, सो यो ज्योतिषीनिका समूहकै गोचर आकाशको
अवकाश एकसो दश योजन मोटो है पर असंख्यात द्वीपसमुद्र प्रमाण
घनोदधि पर्यंत तिर्यविस्तारवान् हैं । इहां उक्तंच गाथा है-
गर्वदुत्तरसत्चसया दससीदिचदुतिगं च दुगचदुकं ।।
वारारविससिरिक्खा बुहाग्गवगुरुअंगिरारसणी ॥ १ ॥
(१८) अर्थ:--चित्रापृथ्वीते सातसनियोजन ऊपरि तारागण हैं। ता पीछे ऊपरि ऊपरि सूर्य चंद्र नक्षत्र वुध शुक्र वृहस्पति मंगलं शमीश्वर दश अस्सी तीन तीन तीन तीन चार चार योजन ऊंचे उत्तरोत्तर है ॥ १ ॥ तिनमें नक्षत्र मण्डलके वि अभिजित तौ मध्यमैं गमन करने वारो हैं। पर मूल सर्वकै बाहिर गमन करने वारो हैं । पर भरणी सर्वनिक नीचे गमन करने वारो है । पर स्वाति सर्वकै उपरि गमन करने वारो हैं। अवै सूर्य विमान जनावै है कि तप्त जो तपनीय ताकै समान है प्रभा जिनकी अर लोहित नामा मणिमयी है। पर अड़तालीश योजनका इकसटिमा भाग प्रमाण चौरे लंबे हैं । अर यात किंचित् अधिक त्रिगु. णित है परिघि जिनकी मर चौवीस योजनका इकसठिवा भाग प्रमाण मोटे अर्धगोलकी है आकृति जिनकी मा सोलह हजार देवनिकरि धा- रण किये ऐसे सूर्यके विमान हैं। तिन. प्रत्येक पूर्व दक्षिण पश्चिम उत्तर भागनिनँ अनुक्रमकरि चार चार हजार देव धारण करे है । तिनके ऊपरि सूर्यनामा देव वसे है। तिनकै प्रत्येक सूर्यप्रभा ॥ १ ॥ सुसीमा ॥ २ ॥ अर्चिमालिनी ॥ ३ ॥ प्रभंकरनामा चार चार मन महिषी हैं। पर प्रत्येक देवी चार चार हजार रूप करवा समर्थ है तिनके साथि दिव्यसुखनैं अनुभव करते असंख्यातलाख विमाननिके अधिपति सूर्य जे हैं ते परिभ्रमण करै है। बहुरि निर्मल ततुका वर्णके समान हैं वर्ण जिनके अर चिन्हमयी चन्द्रविमान छप्पन योजनका इकविसमां भाग प्रमाण चौडे लंबे अर अठ्ठाईस योजनका इकवीसमां भाग प्रमाण मोटे हैं। .अर प्रत्येक षोडश हजार देवनिकरि पूर्व दक्षिण पश्चिम उत्तर दिशानिमैं अनुक्रमकरि कुंजर वृषभ अश्व रूप विकारवान देवनिकरि धारण किये है । तिनकै ऊपरिचंद्रनामां देव वसै है । तिनकै प्रत्येक चन्द्रप्रभा सुसीमा अर्चिमालिनी प्रभंकरानामा अमहिषी है अर प्रत्येक चारूं देवी चार चार हजाररूप करवा मैं चतुर है तिनकरि सहित सुख. उपमोगरूप करे है। ऐसे असंख्यात लाख विमाननिके अधिपति चंद्रदेव ने है ते (१९) विहार कर है । बहुरि अंजनसम प्रभावान परिष्टमणिमयी राहके विमान एक योजन लंबे चौडे पर ढाईसे धनुष मोटे है । बहुरि नवीन चमेली का फूलकी प्रभाके समान रजत परिणामी शुक्रनिक विमान एक कोश चौडे लंबे है । अर जातिमान मुक्ताफलकी क्रांतिकै समान अक मणिमयी वृहस्पतिनिके विमान किंचित् घाटि एक कोश प्रमाण चौडे लंबे हैं । बहुरि कनकमयी अर्जुनवर्ण बुध विमान है । बहुरि तपनीयमयी तप्त तप नीय समान क्रांतिमान शनीश्वरनिके विमान हैं। पर लोहिताक्ष मणि- मयी तप्त कनक प्रभावान अंगारकनिके विमान हैं । भर ए बुधने आदि लेय विमान माध कोश लंबे चौडे हैं । पर शुक्रादि विमान प्रत्येक चार चार हजार देवनिकरि धारण करिए हैं। भर नक्षत्र विमाननिके प्रत्येक चार चार हजार देव चलाक्ने वारे हैं। पर तारकानिके विमा- ननकु चलावने वारे प्रत्येक दोय दोय हजार देव हैं । पर राहु आदि के भाभियोग्य देव जे हैं तिनकै रूप विकार चन्द्रवत् जानने योग्य है । मर्थात् सिंह कुंजर वृषभ तुरंगरूपकरि विमाननित चलावै हैं। नक्षत्रनिके विमाननिका उत्कृष्ट चौडापणां एक कोशप्रमाण जानना पर तारकानिक विमाननिको मोटापणों जघन्य तौ एक कोशका चतुर्थ भाग प्रमाण है। भर मध्यम किंचित् अधिक एक कोशका चतुर्थ भाग प्रमाण है। मर ज्योतिषीनिके विमाननिका सर्व जघन्य मोटापणां पांचसै धनुष प्रमाण है । अर ज्योतिपोनिके इंद्र सूर्य भर चंद्र हैं ते असंख्यात हैं ॥ १२ ॥ भागे तेरमा सूत्रकी उस्थानिका कहे है। ज्योतिष्काणां गतिविशेष प्रतिप्रत्यर्थमाह- अर्थ-ज्योतिषीनिकी गतिविशेषकू जनावननिमित्त कहै है । सत्र- मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतयो नृलोके ॥ १३ ॥ ( श्रीउमास्वामिकृत) (२.) अर्थ--मनुष्यलोकके वि मेरकी प्रदक्षिणानप है नित्यानि जिनकी ऐसे ज्योतिषी देव है। वार्तिक-मरुप्रदक्षिणावपनं गत्यंतरनिवृत्यर्य ।। १॥ टीका- मेरोः प्रदक्षिणा मेरुदक्षिणा इत्युच्यते किमर्थ गत्यं नरनिवृत्यर्थ विरीता गतिर्मा भूत् ॥ अर्थ-मरुकी जो प्रदक्षिणा सो मेरु प्रदक्षिणा , ऐसे कहिए है । प्रश्न-ऐसे कडा निमित जहिये है। उत्तर-गन्यताकी नि- वृत्ति पर्थ करिये हैं । अर्थात् विपरीतगति मति है 10 ॥ वार्तिक-गतःक्षणेक्षणेऽन्यत्वान्नित्यवाभाव इतिचंन्नाऽमीक्ष्यस्य विवक्षितचात् ॥ २ ॥ टीका-अयं निशब्दः कूटम्ववियु मवेषु वर्तत गतिश्च क्षणेक्षणऽन्येतिततोऽस्या नित्येति विशेषण नोपपद्यत दृत्तिवन किंकारणमामीशयाय विवक्षितत्वात । यथा नित्यग्रहसितो नित्यप्रतिशत इति आमीक्ष्ण्यं ग-यत इति एवमिहापि नित्यगतयः अनुपरतगतय इत्यर्थः ।। बर्थ- -प्रश्न-यो नित्यशब्द कूटस्य अविचलमाव जे है तिनकै विष प्रवैत है । अर गति क्षणक्षणमें अन्यअन्य हैं । तात याको नित्य विशेषण नहीं उत्पन्न होय है । उत्तर-सो नहीं है ।। प्रश्न-कहा कारण । उत्तर- निरंतरपणांका विवक्षितयणांत । सो जैसे कहिये है कि यो पुरुष नित्य प्रहसित है । तथा नित्यप्रजस्पिन है ऐसें कहने से निरंतरपणाने लणा- वे है। ऐसे ही इहां भी नित्यगतयः पद जो है सो निर्विघ्न गतिमान है। एसा जनावनकै अर्थ है। वार्तिक-अनेकान्ताच्च ।। ३ ।। टीका-यथा सर्वभावपु द्रव्यार्था- देशात्स्यानित्यत्वं पर्यायादिशात्स्यादनित्यत्वा तथा गताबपति नित्वमविरुद्ध अर्थ-जैसे सर्वभावनिचिष द्रव्यार्थका आदेश कयंचित नित्यपों अर पर्यायार्थका आदेशतकथंचित् नित्यपगों है । तैसंगतिविमी नित्य- पणौ अविरुद्ध, है । क्योंकि उनकी गति अविच्छेदरूप है यति । नार्तिक-नृलोकग्रहण विषयाथै ॥ ६ ॥ टीका-कतृतीयेषु ।
(२१) दीपेषुद्वयोश्च समुद्रयोज्योतिप्कास्ते मेरुपद्रक्षिणा नित्यगतयःनान्ये इति विषयावधारणार्थ नलोकग्रहणं क्रियते । अर्थ-जे ढाईद्वीपमैं भर दोय समुद्रनिमें ज्योतिषी है ते मेरुपदक्षिणारूप नित्यगतिमान है । अन्य स्थानमैं गतिमान नहीं है। ऐसा विषयका अवधारणकै अर्थ नृलोक पदको ग्रहण करिए है ॥५॥ वार्तिक-गतिकारणाभावादयुक्तिरितिचेन्न गतिरताभियोग्य देववहनात् ॥५॥ टीका-स्यान्मतमिह लोके भावानां गतिः कार- णवती हटा न च ज्योतिष्कविमानानां गतः कारणमस्तिततस्तदयुक्ति रितितन्न किं कारणं गतिरताभियोग्यदेववहनात् । गतिरताहि आभियोग्य देवा वहन्तीत्युक्तं पुरस्तात् ॥ अर्थ- प्रश्न-यालोककैवियपदार्थनिकी गति कारणमानदेखी अर ज्योतिषीनिके विमाननिकैगतिको कारण नहीं है ताते गतिविक्षपण अयुक्ति है। उत्तर-सो नहीं है । प्रश्न-कहा कारण । उत्तर-गति है रति जिनकै ऐसे आभियोग्यदेवनिका धाग्णपणात । निश्चय करि गतिमैं रतिमान भाभियोग्यदेव धारण कर है। ऐसें पूर्व कहयो वार्तिक-कर्मफलविचित्रमाराच ॥६॥ टीका-कर्मणां हि फलं वैचित्र्येण पच्यते ततस्तेषां गतिपरिणतिमुखेनैव कर्मफलमवयोद्धव्यं । एका- दशभिर्योजनशतैरेकविशेमरुमप्राप्य ज्योतिष्का प्रदक्षिणाश्चरंति । तत्र जबूद्वीपे द्वौसयों द्वौचंद्रमसौ षट् पंचाशन्नक्षत्राणि षट् सप्तत्यधिक ग्रहशत एक कोटीकोटिशतसहस्त्र त्रयस्त्रिंशत्कोटीकोटिसह- स्राणि नवकोटीकोटिशतानि पंचाशच कोटीकोव्यस्तारकाणां । लवणोदे चत्वारः सूर्याश्चस्वारश्चंद्राः नक्षत्राणां शतं द्वादश ग्रहाणां त्रीणिशतानि द्वापंचाशानि द्वे कोटीकोटिशनसले सप्तषष्ठिः कोटीकोटि सहस्राणि नव च कोटीकोटिशतानि तारकाणां भातकीखण्डे द्वादशसूर्याः। द्वादशचंद्राः । नक्षाणां त्रीणि शतानि पड्विंशानि ग्रहाणां सहस्रं षट्पचाशं (२२) भष्टौ कोटीकोटिशतसहसाणि सप्तत्रिंशच कोटीकोटिशतानि तारकार्णा । कालोदे वाचत्वारिंशदादियाः द्वौं चत्वारिंशचंद्राः एकादश नक्षत्रसतानि पट् सप्तत्यधिकानि पत्रिंशदाइशतानि पण्णवत्यधिकानि अष्टाविंशतिः कोटीकोटिशतसहस्राणि द्वादश कोटीकोटिसहस्राणि नवकोटीकोटि- शतानि पंचाशत्कोटीकोट्यस्तारकाणां । पुष्कराधैं द्वासप्ततिः सूर्या द्वासप्त- तिश्चन्द्रा द्वे नक्षत्रसहस्रे षोडश त्रिपष्ठिः । ग्रहशतानि षड्विंशानि भाट- चत्वारिंशकोटीकोटिशतसहस्राणि द्वाविंशतिः कोटीकोटमाणि द्वे कोटीकोटिशते तारकाणां । वाद्ये पुष्करार्धेच ज्योतिषामियमेव संख्यतत- श्चतुर्गुणाः पुष्करवरोदे, ततः परा द्विगुणाद्विगुणा ज्योतिषां संख्यावसया जघन्य तारकान्तरं गव्यूतसप्तमागः । मध्य पंचाशत्गव्यूतानि । उत्कृष्ट योजनसहसं । जघन्यं सूर्यान्तरं चन्द्रनिरं च नवनवतिः सहस्राणि योज- नानां षट्शतानि चत्वारिंशदधिकानि उत्कृष्टमेक योजनशतसहस्रं षट्- शतानि षष्ठ्युत्तराणि । जंबूद्वीपादिपु एफैकस्य चंद्रमसः पष्टि कोटी- कोटिसहस्राणि नवकोटीकोटिशतानि पंचसप्ततिश्च कोटीकोख्यः तारकाणामष्टाशीतिर्महाग्रहाः । अष्टाविंशति नक्षत्राणि । परिवारः सूर्यस्य चतुरशीतिमण्डलशतमशीतिर्योजनशतं जंबुद्वीपस्यान्तरमवगाह प्रकाशयति तनय पंचषष्ठिरभ्यन्तरमण्डलानि लवणोदम्यांतस्त्रीणि त्रिंशानि योजन- शतान्यवगाध प्रकाशयति । तत्र मण्डलानि बाह्यान्यकोनविंशतिशत द्वियोजनमेकैकमण्डलान्तरं द्वे योजने अष्टचत्वारिंशद्योजनकषष्ठिभागाश्च एकैकमुदयांतरं चतुश्चत्वारिंशयोजनसहरष्टाभिश्वशतैर्विशरप्राप्यमेरु सर्वा- भ्यंतरमण्डलं . सूर्यः प्रकाशयति । तस्य विष्कभो नवनवतिः सहस्राणिषट्शतानिपत्यारिंशानि योजनानां तदाहनि मुहूर्ताः अष्टादश भवंति । पंच सहस्राणि द्वे शते एकपंचाशयोजनानां एकान्नत्रिंशद्योजन- पष्टिभागाश्च मुहर्तगतिक्षेत्रं सर्वबाद्यमण्डले चरन सूर्यःपंचचत्वारिंशत्सालस्त्रि- मिश्चशैतस्त्रिंशोजनानां मोरुमप्राप्य भासयति । तस्य विष्कम्म: एक शत- सहसं षट्शतानिचषष्ठयधिकानियोजनानां तदा दिवसस्य द्वादशमुहूर्ता:पंच- ( २३ ) सहस्राणि त्रीणि शतानिपंचोतराणि योजनानां पंचदशयोजनपष्ठिभागाश्च मुहूर्तगतिक्षेत्रं तदा एकत्रिंशद्योजनस् हसेप्यष्टसु च योजनशतेष्वर्धद्वात्रिशे- पुस्थितो दृश्यते सर्वाभ्यन्तरमण्डले दर्शन विषयपरिमाणं प्रागुक्तं मध्ये हानि- वृद्धिकमो यथागर्मवेदितव्यः । चन्द्रमण्डलानि पंचदंशद्वीपावगाहः । समुद्रा- वाहश्चसूर्यवद्वेदितव्यः द्वीपाभ्यंतरे पंचमण्डलानि समुद्रमध्ये दश सर्ववाद्या- भ्यन्तरमण्डल विष्कमविधिःमेरुचंद्रांतरप्रमाणंच सूर्यवत् प्रत्येतव्यं पंचदशानां मण्डलानामन्तराणि चतुर्दश ॥ तत्रैककस्यमण्डलान्तरस्य प्रमाणं पंच- त्रिशयोजनानि योजनकपष्ठिभागानिम्त् सद्भागस्य चत्वारः सप्तभागाः । ॥ ३५-३०-४॥ सर्वाभ्यतामण्डले पंच पइस्राणि त्रिसप्तत्यधिकानि योजनानां सप्तयप्ततिर्भागशतानि चतुश्चत्वारिंशानि मण्डलं त्रयोदशभिर्भा- गसहरीः सप्तभिश्चमागशतः । पंचविशस्थित्वावशिष्टानि चंद्रः एकैकेन मुहूर्तेन गच्छति सर्ववाद्यामण्डले पंच सहस्राणि शतं च पंचविशं योन- नानामेकान्नमततिर्भागशतानि नवत्यधिकानि मण्डलं त्रयोदशभिर्भागस- हसः सप्तभिश्चभागशतः पंचविंशस्थित्वाऽवशिष्णानि चन्द्रः एकैकेन मुहूर्तेन गच्छति । दर्शनविषयपरिमाणं सूर्यनद्वेदितव्यं हानिवृद्धिविधानंच यथागममवस्यं ।। पंनयोजनशतानि दशोतराणि सूर्याचन्द्रमसोश्वारक्षे- अविष्कमा . Pho पर्थ-अथवा निश्चयकर निको काल विचित्रपणां करि पचि है । तात तिनक गतिपरिणतिमुखकरिही कर्मको फल जानने योग्य है । मर ग्यारास इकवीस योजन मेरुनै छांडि ज्योतिषी · प्रदक्षिणाकरि विचरै । तिनमें जंबुद्वीपर्क विखें दोय सूर्य दोय चन्द्रमा भर छप्पन नक्षत्र हैं। पर एकसौ छिहत्तर ग्रह है। पर एक लाख कोटाकोटि अर तेईस हजार कोटाकोटि अर नवसै कोटाकोटि पर पचास कोटाकोटि तारानिको प्रमाण है । । भर लवण समुद्रकै विष चार सूर्य चार चंद्रमा है। भर नक्षत्रनि ( २४ ) है की संख्या एकसौ यारा है। पर ग्रह निको प्रमाण तीनसँ बावन है । भर तारानिको प्रमाण दोय लाख कोटाकोटि भर सडसठि हजार कोटा- कोटि पर नबसे कोटाकोटि है ।। अर धातकी खण्डकै वि द्वादश सूर्य अर द्वादश चन्द्रमा पर नक्षत्रनिको प्रमाण तीनसै छत्तीस है । अर ग्रहनिको प्रमाण एक हजार छप्यन है भर तारा आठ लाख कोटाकोटि अर सतीससे कोटा- कोटि है अर कालोदधि समुद्रकेविर्षे वियालीस सूर्य पर वियालीस ही चन्द्रमा है । पर अट्ठाईस लाख कोटाकोटि अर द्वादश हजार कोटाकोटि तारा हैं। पर पुष्कराधकै विर्षे बहत्तरि सूर्य हैं । अर वइत्तरही चन्द्रमा है । भर दो हजार सोला नक्षत्र हैं । अर तिरेपठिसे छत्तीम ग्रह है पर अड़तालीस लाख कोटाकोटि अर वाईस हजार कोटाकोटि पर दोयसै कोटाकोटि तारा है। अर बाद्य पुष्कराकैवि ज्योतिषीनिकी संख्या इतनीही है । ताते पुष्करवर द्वीपकवि चतुर्गुण है । तातै परें द्विगुण ज्योतिषीनिकी संख्या नाननी ॥ अर तारकानिक जघन्य अंतर एक कोशका सातमा भाग मात्र है । मध्य अंतर पचास मात्र है। अर उत्कृष्ट अंतर एक हजार योजन प्रमाण है । मा सूर्यनिर्क जपन्य अंतर तथा चन्द्रमा निकै जघन्य अंतर निन्याणवै हजार छसै चालीस योजन प्रमाण है । अर उत्कृष्ट अंतर एक लाख छसै साठि योजन प्रमाण है । अर जंबूद्वीपादिकनिविष एक एक चंद्रमाकै तारकानिकी छासटि हजार कोटाकोटि पर नवस कोटाकोटि अर पिचेतर कोटाकोटि है सो। भर भठ्यासी महाग्रह है सो। अर अट्ठाईश नक्षत्र है। भर सूर्यका एक सौ चौरासी महा- (३५) रूस मार्ग है ।तिनमैं सौं भस्सी योनन तौ जंबूद्वीपके मध्य अवगाहन करि प्रकास है । तहां पैंसठि अभ्यन्तर मण्डल है । अर लबण समुद्रकै विर्षे तीनसै तीस योजन अवगाहन करि प्रकासै है। तहां एक सौ उगणीस वाह्य मण्डल है । अर एक एक मण्डलकै दोय योजन प्रमाण अंतर है। भर दोय योजन पर महतालीश योजनका इकसठिमा माग प्रमाण एक एक उदयांतर स्थान है । भर चवालीश हजार आठौं वीस योजन मेस्तै दूरि होयकरि सर्व अभ्यन्तर मण्डलनै प्राप्त होय सूर्य प्रकाश है। ताको चौडापणौ निन्याणवै हजार छसै चालीस योजन को है । योही सूर्योन्तर है कि दोऊ सूर्यनिकै अंतर भी इतनहि है । भर या समय दिनमान भष्टादश मुहूर्त प्रमाण है। अर पांच हजार दोय से इकावन योजन अर उगणीश योजनका साठिमा भाग प्रमाणं एक मुहर्तमैं गमन क्षेत्र है। बहुरि सर्व सर्वबाह्य मण्डलमैं गमन करतो सूर्य चौपन हजार तीन से तीश योजन मेरुनैं नहीं प्राप्त होय प्रकास है। ताको घोडापौँ एकलाख छसै साठि योजन प्रमाण है। मर वा समय दिनमान द्वादशमुहर्त प्रमाण है। तहां पांचहजार तीनसैं पांच योजन भर पंदरायोजन का साठिमां भागप्रमाण एक मुहूर्तमें गमनक्षेत्र है । भर वा समय -सर्व अभ्यतर मण्डलकैविर्षे इकतीश हजार आठसै साडा बत्तीस योजनकै विखें तिष्ठतो सूर्य दीपै है। भावार्थ-भरतनिवासी एकतीस हजार आठसै साडा वत्तीस योजन पैर सर्व अभ्यतर मण्डलमैं दीखे है । अर दर्शनको विषयपरिमाण पूर्व दूसरी अध्यायमैं कहयोही है । पर मध्यके मण्डलनिकै विष हानि वृद्धिको अनुक्रम भागमकै अनुकूल जानने योध्य है । अर चन्द्र मण्डल पंचदश है । भर द्वीपको अवगाह तथा समुद्रको अवगाह सूर्यवत् जानने योग्य है कि द्वीपके मध्य तो पांच मण्डल है । अर समुद्र के मध्य दश मण्डल है। परं सर्व अभ्यन्तर मण्डलका 'विष्कभकी विधि अर मेलते चन्द्रमाकै अंतरको प्रमाण सर्यवत् नानने योग्य है। अर पंचदश ( २ ) मण्डलनिक अन्तर चतुर्दश है । तिनमें एक एक मण्डलका मन्ताको प्रमाण पैंतीस योजन अर एक योजनका इकसठ भाग करिये तिनमैं त स भाग र तिन भागनि एक भागके सात भागे करिये तिन सू चार भाग प्रमाण है । अर सर्व अभ्यंतर मण्डलमैं पांच हजार- तिहत्तर योजन पर सात हजार सातस चवाली का तेग हजार सातस पचीशमां भागममाण स्थिति रहिकरि चंद्रमा अवशेष क्षेत्रनै एक एक मुहूतं करि . गमन कर है। भावार्थ- सर्व अभ्यातरमण्डल में मन करता चंद्रमाकै. एक मुहूतमें पांचहज र तिहत्तर योजन अर सात हजार सातसै चवालीमका तेग हजार सातसै पच्चीशमा भाग प्रमण चा क्षेत्र है। घर सर्वबाह्य मण्डलविर्षे पांच हजार एक सौ पचीश योजन अर छ हजार नवस निर्वका तेग हजार सातसै चशमा भाग प्रमाण स्थिति रहिकरि चंद्रमा अवशेष क्षेत्रने एक एक मुहूर्तकरि गमन करें है। भावार्थ-सर्व वाह्य मण्डलमैं गमन करता चंद्रमांक एक मुहूर्तमें पांच हजार एकसो पच्चीस योजन अर छ हजार नवसै निव्वैका तेरा हजार सातस पच्चीशमा भाग प्रमाण चारक्षेत्र है। अर दर्शनका विषयको प्रमाण सूर्यवत् जानने योग्य है । अर हानिवृद्धिको विधान भागमकै अनुकूल जानने योग्य है । पर पांच सै दश योजन सूर्यचन्द्रमाको चार- क्षेत्र चौडो है ॥ ६ ॥ १३ ॥ अब चौदा सूत्रकी उस्थानिका कहै है- गतिमज्ज्योतिःसंबंधेन व्यवहारकालप्रतिपत्यर्थमाह । अर्थ-गतिमान ज्योतिषीनिका सबवकरि व्यवहार कालकी प्रति. पतिकै अर्थ कहे है- तन्कृतः कालविभागः ॥ १४ ॥ टीका-तदिति किमर्थे । अर्थ-विन ज्योतिषीनिके कियो कालको (२७) विभाग है । प्रश्न-तत ऐसो रद कहा निमित्त है । उतारून वार्तिक- गतिमज्ज्यातिःप्रतिनिर्देशार्थं तद्वचनं ।। १ ।। टीका-तिमतां ज्योतिषां प्रति निर्देशार्थ तदित्युच्यते नहि केवल- गत्या नापि केलैज्यो तभिः कालः परि च्छद्यते अनुपलब्धेरपरिवर्तनाच्च ज्योतिःपरिवर्तनलभ्योहि काल्परिन्छेदः । कालो द्विविधो व्यावहारिको मुख्यश्च तत्र व्यावहारिकः कालविभागस्तस्कृतः । समयावलिकादिा- ख्यातः । क्रियाविशेषपरिच्छिन्नः अन्यस्य पार च्छन्नस्य परिच्छदहेतु: मुल्योन्यो वक्षमाणलक्षणः। आह न मुख्यः कालोस्ति सूर्यादिगतिव्यतिरको लिंगामावात् । भपिच कलानां समूहः कालः कलाश्च क्रियावयवाः । किंच। अर्थ-गतिमान ज्योतिषीनिका किया कालविभागकू जनाव.के अर्थ तत् ' ऐसो शन्द कहिये है। भर निश्चयकरि केवल गतिकरि भी काल नहीं जानिये है। पर केवल ज्योतिषीनिकरिभी काल नहीं जानिये है क्योंकि अनुपलब्धि कि प्रत्यक्ष नहीं दाखन अर परिवर्तन कालकी सत्ता नहीं मालुम होय है। अर्थात् -काल प्रत्यक्ष भी नहीं दी है। र कालका पलटना भी नहीं दीखे है। यात ज्योतिषीनिका परिवर्तन कर ही कालको जानपन है । सो काल दोय प्रकार है कि एक व्यवहारिक है दूसरा मुख्य है। तिनमें व्यवहारिक कालको 'वभाग ज्योतिषीनिकी गति करि समय आपली भादि क्रिया विशेष करि जान्यू ऐसो व्याख्यान कियो सो अन्य अज्ञात जो मुख्य काल ताके जाननको हेतु है । अर दूसरो मुख्य काल वक्ष्यमाणलक्षण है। प्रश्न -सूर्य आदिकी गतिते भिन्न मुख्य काल नहीं है । क्योंकि वाका लिंगको अभाव है यात। अर और सुन कि काल की निरुक्त ऐसी है कि-कलानां समूहः कालः । याको अर्थ एसो है कि कलाको जो समूह सो काल है । मर कलाजे है ते क्रियाके अवयन है ॥ १॥ किंच वार्तिक- (२८) पंचास्तिकायोपदेशात् ॥ २॥ टीका-पंचवास्तिकाया भागमे उपदिष्टाः । न १ | तो न मुख्यः कालोऽस्तीति अपरीक्षिताभिधानमेतत् यचावदुक्तं किंगामावान्नास्ति मुख्यः काल इत्यत्रोच्यते क्रियायां काल इति गौणव्यवहारदर्षनान मुल्य- सिद्धिः । योयमादित्यगमनादी क्रियेतिरंदेः काल इति व्यवहारः काल- निर्वर्तनापूर्वकः मुख्यस्य कालस्यास्तित्वं गमयति नहि मुख्ये गव्यसति वाहोके गौणे गोशब्दव्यवहारो युज्यते । मर्थ-पांचहि मस्तिकाय भागमकै वि उपदेशकर है।भर छठों नहीं कन्यो है तातै मुख्य काल नहीं है । उत्तर-यो अपरीक्षिताभिमान है । सो ऐसे है कि-प्रथम तो लिंगका अमावत मुख्य काल नहीं है । इहां उसर कहिये है कि क्रियाकै विर्षे काल है ऐसा गौण व्यवहारका दर्शन मुख्यकी सिद्धि है। पर नो या मादित्यगमन मादि के विर्षे क्रिया है. सो रूढित व्यवहारकाल है सो कालकी निर्वर्तनापूर्वक होतो संतो मुख्य कालका मस्तित्वनै जनावै । क्योंकि मुख्य गौनें नहीं होता सन्तां गौणभूत बालकै वि गौशब्दको व्यवहार नहीं योग्य होय है ॥ २॥ वार्तिक-- . ॥ अतएव न कलासमूह एव काल:-॥ टीका-मतएव कुतएव मुल्यस्य कालस्यास्तित्वादेव कलानां समू- हएव काल इति व्यपदेशो नोपपद्यते करप्यते क्षिप्यते प्रेते येन किया- द्रव्यं स कालस्वस्य विस्तरेण निर्णय उचरत्र. वक्ष्यते । अर्थ-यातही मस्तित्वात ही कलाको समूह ही काल है ऐंसो उपदेश नहीं उत्पन्न होय है । भर काल शब्दकी निरुक्ति ऐसी है कि-कल्प्यते. क्षिप्यते प्रेर्यते येन क्रियावदव्यं स कालः । याको मर्म- ऐसो है कि बाकरि क्रियावान व्यर्ने कल्पना करिय तथा स्थापन करिये (२९) मथवा प्रेरणा करिये सो काल है। ताको विस्तारकरि निर्णय मागामी कहेंगे ॥ २ ॥ वार्तिक- प्रदेशमचयाभावादस्तिकायेष्वनुपदेशः ॥ ३ ॥ टीका - प्रदेश- प्रत्योहि कायः । स एषामस्ति ते मस्तिकाया इति जीवादयः पंचैवोप- दिष्टाः । कालस्य त्वेकप्रदेशत्वादस्तिकायवाभावः । यदिपस्तित्व मेवास्य न स्यात् षद्रव्योपदेशो न युक्तः स्यात् कालस्यहि द्रव्यत्वमस्त्या- ग़मे पररक्षणाभावः स्वलक्षणोपदेशसद्भावात् ।। मर्थ-निश्चय करि प्रदेशनिको प्रचय जो है सो काय है । भर नाकै काय है सो मस्तिकाय है । यातै जीवादिक पाचही भस्तिकाय- रूप उपदेश किया भर कालकै एकप्रदेशपणांत मस्तिकायपण को भभाव है। भर जो निश्चय करि याको अस्तित्व ही नहीं है तो षट् द्रव्यको उपदेश युक्त नहीं है । यात निश्चयकरि कालकै द्रव्यपणौं आगम केविर्षे है। क्योंकि पर जे जीवादिक तिनका लक्षणको अभाव अर अपना लक्षणका उपदेशको सद्भाव है यातें ॥ १३ ॥ १४ ॥ भमैं पनरमा सत्रकी उत्थानिका कहै हैं इतरत्र ज्योतिषामवस्थाप्रतिपादनार्थमाह- मर्य- मानुषोत्तर पर्वतकै बाहिरका क्षेत्रमें ज्योतिषीनिकी व्यवस्था का प्रतिपादन अर्थ कहै है । सत्र- ॥ बहिरवस्थिताः ॥१५॥ टीका-बहिरित्युच्यते कुतो बहिः । नृगेकात् कथमवगम्यते अर्थ- बशाद्विमक्तिपरिणाम इति । भर्य-मनुष्यक्षेत्र बाहिर ज्योतिषी हैं तें यथाव्यवस्थित है। या सूत्रमैं बहिर पद कहिये है तातै प्रश्न करिये है कि-काहेरौं बाहिर है ? | उत्तर-मनुष्य लोक नाहिर है सो यथावस्थित है ॥ प्रश्न- कैसे जानिये है कि या सूत्रमैं ज्योतिषीनिकोही मनुष्यलोक बाहिर .
(३०) अवस्थितपणों को है। उत्तर-पूर्वसूत्रमें नृलोके पद है ताकाही अर्थका वशतै विभक्तिको परिणमन होय नृरोकात् ऐसो अनुवृत्तिरूप भयो है तात नानिये है। वार्तिक- नृलोके नित्यगतिवचनादन्यत्रावस्थानसिद्धिरिति चेनोमया- सिद्धेः ॥१॥ टीका- स्यान्मतं नृगोंके नित्यातय इत वचना- दन्यत्रावस्थान ज्योतिषां सिद्धं अतो वहरवस्थिता इति वनमनर्थक- मिति तन्न किं कारणमुभयांसिद्धेः नृलोकादन्यत्र वहिज्योतिषामस्ति- समवस्थानं चाप्रसिद्ध अतस्तदुभयसिद्धयर्थ वहिरवस्थिता इन्युच्यते अस- तिहि वचने नृलोके एव सन्ति नित्यगतयश्चत्यवगम्यत । र्थ-प्रश्न-नृलोके नित्यगतयः ऐया पूर्व सूत्रमें वाक्य है । ताते अन्यत्र ज्योतिषीनि का अवस्थान सिद्ध है। यात पहिरवस्थिता ऐसो वचन जो है सो अनर्थक है ॥ उत्तर-सो नहीं है। प्रश्न कहा कारण! | उत्तर-ऐसे माने दोऊनिकी ही प्रसिद्धि होय है यात क्योंकि मनुष्यलो. कतै अन्यत्र बाहिर ज्योतिषीनिको अस्तित्व पर अवस्थान ए दोम्ही अप्रसिद्ध है यात दोऊनिकी सिद्धिकै पर्य वहिरवस्थिता ऐसे कहिये है । अर निश्चयकरि या वचननें नहीं होता. संतां मनुष्यलोक विषही है . अर निस्यगतिमान है ऐसे ही जानिये ॥१॥१५॥ ए .. श्रीमद्विधानन्दिविरचित- : तत्वार्थ श्लोकवार्तिक अध्याय ४ में ज्योतिष्क देवताओंके वर्णन. ज्योतिष्काः सूर्याचन्द्रमसौ ग्रहनक्षत्रप्रकीर्णकतारकाच ॥१२॥ ज्योतिष एवं ज्योतिडकाः को वा यावादेरिति स्वार्थिकः कः । ज्योतिः शब्दस्य यावादिषु-पाठात् तथाभिधानदर्शनात् प्रतिलिंगानुवृत्तिः कुटीरः समीर इति.क्या । सूर्याचन्द्रनसा इत्यत्रानदेवताद्वंद्ववृत्तेः ।
(३१)
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प्रहनक्षत्रप्रकीर्णकनारका इत्यत्र नानङ् । ननु द्वन्द्वग्रहणात्तस्येष्टविषये
व्यवस्थानादसुरादिवत् किंनरादिवञ्च । कथं ज्योतिषा: पंचविकल्पा:
सिद्धा इत्याह-
ज्योतिष्काः पंचधा दृष्टाः सूर्याचा ज्योतिराश्रिताः ।
नामकर्मवशात्ताहक संज्ञा सामान्यभेदतः॥१॥
ज्योतिष्कनामकर्मादये सतीराश्रयत्वज्योतिप्का इति सामान्यत-
स्तेषां संज्ञ' सूर्णदिनामकर्मविशेपोदयात्सूद्या इति विशेषसंज्ञाः । तएते
पंचधापि दृष्टाः प्रत्यक्षजा निमिः माक्षात्कृतास्तदुपदेशाविसंवादान्यथानुपपत्तेः।
सामान्यतोऽनुमेयाश्च छद्मस्थानां विशेषतः ॥
परमागमसंगम्या इति नादृष्टकल्पना ॥ २ ॥
॥ मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतयो नृलोके ॥ १३ ॥
ज्योतिष्का इत्यनुवर्तते । नृलोक इति किमर्थमित्यावेदयति-
निरुक्त्यावासभेदस्य पूर्ववद्गत्यभावतः ।
ते नृलोक इतिप्रोक्तमावासप्रतिपत्तये ॥१॥
न हि ज्योतिष्काणां निरुक्त्यावासमतित्तिभवनवास्यादीनामिवास्ति
यतो नृलोक इत्यावासप्रतिपयर्थ नोच्येत । क पुनर्नेलो के तेषामावासाः
श्रूयन्ते ?
अस्मात्समाद्धराभागादूचं तेषां प्रकाशिताः ||
आवासाःक्रमशः सर्वज्योतिषां विश्ववेदिभिः ॥२॥
योजनानां शतान्यष्टौ हीनानि दशयोजनैः ॥
उत्पत्य तारकास्तावञ्चरत्यध इतिश्रुतिः ॥ ३ ॥
तत सूर्या दशोत्पन्य योजनानि महाप्रमाः ॥
ततश्चंद्रममोशीति भानि त्रीणि ततस्त्रपः ॥ १ ॥
त्रीणित्रीणि बुवाः शुक्रा गुरवश्वोपरिक्रमात् ॥
चत्वारोंगारकास्तचत्वारिच शनश्वराः ॥ ५ ॥
(३२) - चरति तादृशाष्टविशेषवशतिनः ।। स्वभावाद्वा तथानादिनिधनाद्रव्यरूपतः ॥ ६ ॥ एष एव नभोभागो ज्योतिःसंघातगोचरः ।। बहला सदशकं सर्वो योजनानां शतं स्मृतः ॥ ७ ॥ सघनोदधिपतो नृलोकेऽन्यत्र वा स्थितः ।। सिद्धस्तियंगसंख्यातद्वीपांमोधिप्रमाणका ॥ ८॥ सर्वाभ्यंतरचारीष्टःतत्राभिजिदथो बहिः॥ सर्वेभ्यो गदितं मूलं भरण्योधस्तथोदिताः॥९॥ सर्वेषामुपरि स्वातिरिति संक्षेपतः कृता । व्यवस्था ज्योतिषां चित्या प्रमाणनयवेदिभिः॥ १० ॥ मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतय इति वचनात् किमिष्यत इत्याह- मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतयस्त्विति निवेदनात् ॥ नैवाप्रदक्षिणा तेषां कादाचित्कीष्यते न च ॥ ११॥ गत्यभावोपि चांनिष्ट यथा भूभ्रमवादिनः ।। भुवो भ्रमणनिर्णीतिविरहस्योपपत्तितः॥ १२॥ नहि प्रत्यक्षतो भूमेभ्रमण निर्णीतिगस्ति, स्थिरतयैवानुभवात् । नचार्य प्रान्तः सकलदेशकालपुरुषाणां तभ्रमणा प्रतीतेः । कस्यचिन्नावादिस्थिर- स्वानुभवस्तु प्रान्तः परेषां तदमणानुभवेन बाधनात् । नाप्यनुमानतो भू- भ्रमणविनिश्चयः कर्तुं सुशकः तदविनामाविलिंगाभवात् । स्थिरे भवक्रे सूर्योदयास्तमयमध्वान्हादिभूगोलभ्रमणे 'भविनामावलिंगमितिचन्न, तस्य प्रमाणबाधितविषयत्वात् पावकामौष्ण्यादिषु द्रव्यत्वादिवत् । भचक्रभ्रमणे सति भूभ्रमणमंतरेणाप्ति सूर्योदयादिप्रतीत्युपपत्तश्च । न तस्मात् साध्याविनाभावनियमनिश्चयः । प्रतिविहितं च प्रपंचतः पुरस्तात् भूगोल- भ्रमणमिति न तदवलंबनेन ज्योतिषां नित्यगत्यम'वो विभावयितुं शक्यः नापि कादाचित्कीष्यते गतिनित्यग्रहणात् । तद्गतेनित्यत्वंविशेषणानुप- .
(३३) पत्तिघ्रौव्यादिति न शंकनीयं, नित्यशब्दस्याभीक्ष्ण्यवाचित्वान्नित्यपहसि- तादिवत् ॥- ऊर्वाधोभ्रमण सर्वज्योतिषां ध्रुवतारकाः। मुक्त्वा भूगोलकादेवं प्राहुभ्रमवादिनः ॥ १३ ॥ तदप्यपास्तमाचार्यैर्नृलोक इति सूचनात.॥ तत्रैव भ्रमण यस्मानो/धोभ्रमणे सति ॥ १४ ॥ घनोदधेः पर्यते हि ज्योतिर्गणगोचरे सिद्ध त्रिलोक एव प्रमण ज्यो. तिषाम/धः कथमुपपद्यते ? भूविदारणप्रसंगात् । तत एव विंशत्युत्तरैकादश योजनशतविष्कंभत्वं भूगोलश्चाभ्युपगम्यत इतिचेन्न, उत्तरतो. भूमण्डलस्येय- चातिकमात् तदधिकपरिमाणस्य प्रतीतेः तच्छतभागस्यच सातिरेकैका- दशयोजनमात्रस्यैव समभूभागस्याप्रतीतेः कुरुक्षत्रादिषु भूद्वादशयोजनादि- प्रमाणस्यापि समभृतलस्य सुप्रसिद्धत्वात । तच्छतगुणविष्कंभभूगोलपरि- कल्पनायामनवस्थाप्रसंगात् । कथं च स्थिरेऽपि भूगोले गंगासिवादयो नद्यः पूर्वापरसमुद्रगामिन्यो घटेरन् ! भूगोलमध्यान्तप्रभावादितिचेत, किं पुनर्भूगोलमध्यं ? उज्जयिनीतिचेत्, न ततो गंगासिंध्वादीनां प्रभवः समु- पलभ्यते । यस्मात् तत्पभवः प्रतीयते तदेव मध्यमितिचेत्, तदिदमतिव्याहतं। गंगाप्रभवदेशस्य मध्वत्वे सिंधुप्रभवभूभागस्य ततोतिव्यवहितस्य मध्यत्व- विरोधात् । स्ववाद्यदेशापेक्षया त्वस्य मध्यत्वे न किंचिदमध्यं स्यात् स्वसिद्धां. तपरित्यागश्चोज्जयिनीमध्यवादिनां। तदपरित्यागे चोज्जयिन्या उत्तरतो नद्यः सर्वाउदमुख्यस्तस्या दक्षिणतोऽवाङ्मुरव्यस्ततः पश्चिमत: प्रत्य- मुख्यस्ततः पूर्वतः प्राङमुख्यः प्रतीवेरन् । भूम्यवगाहभेदान्न- दीगतिभेद इतिचेन्न, भूगोलमध्ये महावगाहप्रतीतिप्रसंगात् । नहि यावानेव नीचैर्देशेवगाहस्सावानेवो_भूगोले युज्यते । ततो नदीभिभूगोलानुरूपतामतिक्रम्य वहंतीति भोगोलविदाहरणमिति सममेव धरातलमबलंबितुं युक्तं, समुद्रादिस्थितिविरोधश्च तथा परिहृतः (३४) स्यात् । भूमिशक्ति विशेषात्म परिगीयत इति चेत्, तत एव समभूमौ छायादिभेदोऽस्तु । शक्यं हि वक्तुं लंकाभूमरीशी शक्तिर्यतो मध्यान्हे अल्पच्छाया मान्यखेट'द्युतम्भूमस्तु ताशी यतस्तधिष्ठिततारतम्यमा छाया । तथा दर्पणसमतलायामपि भूमौ न सर्वषामुपरि स्थित सूर्य छायाविरहस्तस्यास्तदमदनिमित्तशक्तिविशेषासभावात् तथा विषुमति समरानमपि तुल्यमध्यदिन वा भुमिशक्तिविशेषादस्तु । प्राच्यामुदयः प्रतीच्यामम्तमयः सूर्यम्य तत एव घटत । कार्यविशेषदर्शनाव्यस्य शक्ति वशेषानुमानस्याविरोधात् । अन्यथा दृष्टहानदृष्टकल्पनायाश्चा- वश्यं मावित्वात् । सा च पापीयसी महामोह विजुभिन्मावेदयति । न च वयं दर्पणसमतलामत्र भूमि भाषाम्हें प्रतीति विरोधात तस्याः कालादि- वंशानुपर्चयापचयसिन्निन्नताकाग्सद्भावात् । ततो नोज यन्या इत्त. रेत्तरममौ निम्नायां मध्यंदिने छायावृद्धिविरुष्यते । नापि ततो दक्षिण- क्षितौ समुन्नतायां छांयाहानिमनततराका मेदद्वागयाः शक्तिमइप्रसि- द्वेः । प्रदीपादिवादिस्यान्न दुरे छायाया वृद्धिघटनात् निकटे प्रमातो- पपत्तेः । तत एव नोंदयाम्तमययोः सूर्यादेविवादर्शन विरुध्यते भूमि. सलमतया का सूर्यादिप्रतीतिर्ने समाव्या, दूरादिभूमस्तथाविधदर्शनजनन- शक्तिद्भावात् ।। नच मृमाननिधना:समरात्रादयस्पां ज्योतिप्काति- विशेषनिवघनत्वादित्यावेदयति- समरात्रं दिवावृद्धिानिर्दोषाश्च युज्यते ॥ छायाग्रहोपरागादिर्यथा ज्योतिर्गतिस्तथा ॥१५॥ खखण्डमेदतः सिद्धा बाह्याभ्यंतरमध्यतः ॥ तथाभियोग्यदेवानी गतिभेदात्स्वभावतः ॥ १६.।। सूर्यस्य ताबच्चतुरशीतिशतमण्डलानि । तत्र पंचषष्ठिाभ्यंतरे बूद्वीपस्या- शीतिशतयोजनसमवगाह्मप्रकाशनार्जबूद्वीपादायमण्डलान्येकानविंशतिशत लवणोदस्याभ्यंतरे त्रीणि त्रिंशानि योजनशतान्यवगाय तस्य प्रकाशनात् । ܕ ܙ (३५) द्वियोजनमेकैकमण्डलान्तरं द्वेयोजने अष्टाचत्वारिंशद्योजनकपष्ठिभागाश्चै- कैकमुक्यान्तरं । तत्र यदा त्रीणि शतसहस्राणि षोडश सहस्राणि सप्त- शतानि घधिकानि परिधिपरिमाण विभ्रति तुलमेषप्रवेशदिनगोचरे सर्वमध्यमण्डले मेरुं पंचचत्वारिंशयोजनाष्टाविंशत्या योजनाष्ठभा- गैश्च प्राप्य सूर्यः प्रकाशयति तदाह नि पंचदशमुहूर्ता भवंति रात्रौ चेति समरात्रं सिद्धयति । विपुमति दिने द्वाविंशत्येकषष्ठिभागः साति- रेकाष्टसप्ततिद्विशतपंचसहस्रयोजनपरिमाणांकमुहूर्तगतिक्षेत्रोपपत्तेः । दक्षि- णोत्तरे समप्रणिधीनां चं व्यवहितानामपि जनानां प्राच्यमादित्यप्रती- तिच लंकादिकुरुक्षेत्रांतरदेशस्थानामभिमुखमादित्यस्योदयात् । अष्टच- त्वारिंशयोजनकष ठभागत्वात् प्रमाणयोजनापेक्षया सातिरेकत्रिनवतीयो- जनशतत्रयममाणस्वादुत्लेषयोजनापेक्षया दूरोदयावाच स्वाभिमुखलंबीद्ध- प्रतिभाससिद्धेः । द्वितीये महनि तथा प्रतिभासः कुतो न स्याचदविशे- पादिति चेन्न, मण्डलान्तरे सूर्यस्योदयात् तदंतरस्योत्सेधयोज- नापेक्षया द्वाविंशत्येकष्ठिभागयोजनसहस्रप्रमाणत्वात, उत्तरायणे त- दुरितः प्रतिभासनस्य. घटनात् । - सूर्यपरिणामदक्षिणोत्तरसमम.. णिधिभूभागादन्यप्रदेशे कुतः प्राची सिद्धिरिति चेत्, तदन- तरमंडले तथा सर्वाभिमुखमादित्यस्योदयादेवेति सर्वमनवयं, क्षत्रा- न्तरेऽपि तथा व्यवहारासद्धेः । तदेतेत प्राचीदर्शनाद्धरायां गोलाकारता साधनमप्रयोनकमुक्तं तत्र तत्र दर्पणाकारतायामपि प्राचीदर्शनोपपत्तेः । यदा तु सूर्यः सर्वाभ्यन्तरमण्डले चतुश्चत्वारिंशद्योजनसहस्रष्टा भिश्च योज- नशविस्तरैमर्रुमप्राप्य प्रकाशयति तदाहन्यष्टादशमुहूर्ता भवन्ति । चत्वा- रिंशषट्छताधिकनवनवतियोजनसहस्रविष्कभस्य त्रिगुणसातिरेकपरिघेस्त. मण्डलम्यकानविंशयोजनषष्ठिभागाधिक पंचाशद्विशतोत्तरयोजनसहस्र- पंचकमात्रमुहूर्तगतिक्षेत्रवसिद्धेः शेषाप्रकर्षपर्यंततः प्रासा दिवावृद्धिानि- श्च रात्री सूर्यगतिभेदाभ्यंतरमंडलात् सिद्धा । यदा च सूर्यः सर्ववाह्य- मण्डले पंचचत्वारिंशत्सहलै स्त्रिभिश्च शतै स्त्रिंशोजनानां मेरुमप्राप्य भासयति (३६) तदाहनि द्वादश मुहूर्ताः । पष्ठयधिकशतषट्कोतर योजनशतमहनविष्का- मत्य तत्रिगुणसातिरेकपरिधेः तन्मण्टलम्य पंचदशकयोजनपछिमागाधि- कपंचोत्तरशतत्रयसहस्रपंचकपरिमाणगतिमहत क्षेत्रत्वानशेपा परमप्रकर्षपयं. तमासा तावदिवाहानिर्वृद्धिश्च रात्रौ सूर्यगतिभेदात बापाद्दगनरूण्डम- पहलात् सिद्धा | मध्ये त्वनेकविधा दिनस्य वृद्धिानिश्चानेकमण्डलमेदात् सूर्यगतिभेदादेव यथागर्म मण्डल यथागणनं च प्रत्येतव्या तथा दोषावृद्धि- हीनिश्च युज्यते । तदेतेन दिनरात्रिवृद्धिानिदर्शनावो गोलाकारता- नुमानमपास्त, तस्यान्यथानुपपत्तिवकल्यादन्यथैव तदुपपत्तः । तथा छाया महती दुरे सूर्यस्य गतिमनुमापयति चंतिकेऽतिस्वक्ष्यां न पुन - मेोलकाकारतामिति छायावृद्धिहानिदर्शनमपि सूर्यगतिभेदनिमितकमेव । मध्यान कचिच्छायाविरहेऽपि परप्रतदर्शनं भूमोशकान्ता गमयति समम्मी तदनुपपत्तेरितिचेन्न, तदापि भूमिनिम्नत्वोन्नतत्व विशेषमावस्येव गतः तस्म च भरतैरावतयोर्दृष्टत्वात् भरतरावतयोवृद्धि हासौ पट्समयाभ्या- मुत्सर्पिण्यवसर्पिणीभ्यां " इति वचनात् । तन्मनुष्याणामुत्संधानुभ- वायुरादिभिर्वृद्धि हासो प्रतिपादितौ न भुमेरपरपुदीरिति मन्तव्यं, गौणशब्दप्रयोगान मुख्यस घटनादन्यथा मुख्यदा- तिक्रमे प्रयोजनाभावात् । तेन भरतरावतयोः क्षेत्रयोर्वृद्धिन्दासी मुख्यतः प्रतिपत्तव्यौ, गुणभावतस्तु तत्स्थमनुष्याणामिति तथा वचनं सफ- लतामस्तु ते प्रतीतिश्चानुलंपिना स्यात् । सूर्यस्य ग्रहोपरागःऽपि न भूगो- लच्छायया युज्यते तन्मते भूगोलस्याल्पावात सूर्यगोलस्य तच्चतुर्गुणत्वात् तया सर्वग्रासग्रहणविरोधात् । एतेन चंद्रच्छायया सूर्यस्य ग्रहणमपास्त चन्द्रमसोऽपि ततोल्पत्वात् क्षितिगोलचतुर्गुणच्छायावृद्धिघटनाञ्चंद्रगोल्वृद्धि- गुणच्छायावृद्धिगुणघटनाद्वा । ततः सर्वग्रासे ग्रहणमविरुद्धमेवेतिचेत् कुतात- त्र तथा तच्छायावृद्धिः । सूर्यस्यातिदुरत्वादिसिचेन्न, समतलभूमावपि ततएव छायावृद्धिभंगात् । कथंच भूगोलादेरुपरिस्थिते सूर्ये तच्छायाप्राप्तिः प्रतीतिविरोधातू तदा छायाविरहप्रसिद्धर्मध्वंदिनवत् ततः तिर्यस्थिते न (३७) सूर्ये तच्छायामाप्तिरितिचेन्न, गोलात् पूर्वदिक्षु स्थिते रवौ पश्चिमदिगभिमुख- छायोपपत्तेस्तत्प्राप्त्ययोगात् । सर्वदा तिर्यगेवसूर्यग्रहणसंप्रत्ययप्रसंगात् । मध्यदिने स्वस्योपरि तत्मतीतेश्च क्षितिगोलस्याधःस्थिते भानौ चन्द्रे च त. च्छायया ग्रहणमितिचेन, रात्राविव तददर्शनप्रसगात् । ननुचन तयावरण- रूपया भूम्यादिछायया ग्रहणमुपगम्यते तद्विद्भिर्यतोय दोषः। किंतर्हि ? उप- रागरूपया चंद्रादौ भूम्याद्युपरागस्य चन्द्रादिग्रहणव्यवहारविषयतयोगमात्। पटिकादौजपाकुसुमायुगरागवत् तत्र तदुपपत्तेरिति कश्चित्; सोऽपि न सत्यवाक्, तथा सति सर्वदा ग्रहणव्यवहारप्रसंग.त् भूगोलारसर्वदिक्षु स्थित चन्द्रादेस्तदुपरागोपपत्तेः । जपाकुसुमादेः समंततः स्थितस्य स्फटिकादेस्न्दु. परागवत् । नहि चन्द्रादेः कस्यांचिदपि दिशि कदाचिदव्यवस्थिति म भूगोलस्य येन सर्वदा तदुपरागो न भवेत् तस्य ततोतिविप्रकर्षात् कदाचिन्न भवत्येव प्रत्यासत्यतिदेशकाल एव तदुपगमादितिचेत्, किमिदानीं सूर्यादे- भ्रमणमार्गभेदोभ्युपगम्रते ? बाढमभ्युगम्यत इतिचेन्न, कथनानारा शिषु सूर्यादिग्रहणप्रतिराशिमार्गस्य नियमात् प्रत्यासन्नतमममार्गभ्रमण एव तद्ध टनात् अन्यथा सर्वदाग्रहणप्रसंग.स्य दुर्निवारस्वात् । प्रतिराशि पतिदिनं च तन्मार्गस्याप्रतिनियमात् समरान दिवसवृद्धिहान्यादिनियमाभावः कुतो विनिवार्येत ! भूगोलशक्तेरितिचेत, उक्तमत्र समायामपि भूमौ तत एव समस्त्रादिनियमोस्त्विति । ततो न भूछायया चंद्रग्रहणं चन्द्रछायया वा सूर्यग्रहणं विचारसह । राहुविमानोपरागोत्र चन्द्रादिग्रहणव्यवहार इति युक्तिमुत्पपश्यामः सकलबाधकविकलत्वात् । न हि राहुविमानानि सूर्यादि विमानेभ्योल्पानि श्रूयन्ते । अष्टचत्यारिंशयोजनकषष्ठिभागविष्कभायामानि तत्रिगुणसातिरेकपरिचीनि चतुर्विशतियोजनकषष्ठिभागबाहुल्यानि सूर्यविमा- नानि, तथा षट्पचाशयोजन कषष्ठिभागविष्कभायामानि तत्रिगुणसातिरेकपरि पीन्यष्टाविंशतियोजनकषष्ठिभागबाहुल्यानि चन्द्रविमानानि, तथैकयोज- नविष्कमायामानि सातिरेकयोजनत्रयारिधीन्यतृतीयधनुस्तु बाहुल्यानि राहुविमानानीति श्रुतेः । ततो न चन्द्रविवस्य सूर्यविवस्य वामदोरागो ( ३८ ) कुंठविषाणत्वदर्शन विरुध्यते । नाप्यन्यदा तीक्ष्शविषाणेवदर्शनं व्याहन्यते राहुविमानस्यातिवृत्तस्य अर्धगोलकाकृतेः परभागेनोपरक्ते समवृते अर्ध- गोलकाकृतौ सूर्यविचे चन्द्रविये तीक्ष्शविषाणतया प्रतीविघटनात् । सूर्या- चन्द्रमसां राहणां च गतिभेदात् तदुपगगभेदसंभवादग्रयुद्धादिवत । यथैव हि ज्योतिर्गतिः सिद्धा तथा ग्रहोपरागादिः सिद्धा हात स्याद्वादिनां दर्शनं । न च सूर्यादिविमानस्य राहुविमाननोपरागोऽसमान्यः, स्फटिक्स्येव स्वच्छम्य तेनासितेनोपरागघटनात् । स्वच्छत्वं पुनः मूदिविमानानां मणिमयत्वात् । तप्ततपनीयसमप्रभाणि लोहिताक्षमणिमयानि सूर्यविमानानि, विमलमृणास्त्र- र्णानि चन्द्रविमानानि, अर्कममिमयानि संजनसमप्रमाणि राहुविमानानि, अरिष्टमणिमयानीति परभागनाद्भावात् । शिरोमात्र राहुः सर्पाकारोवति प्रवादस्य मिथ्यात्वात् तेन ग्रहोपरागानुपपत्तेः वराहमिहगदिमिरप्यभिधानात् । कथं पुनः सूर्यादिः कदाचिद्राहुविमानस्याग्भिागेन महतोपरण्यमानः कुण्ठविषाणः स एवान्यदा तस्यापरभागेनाल्पेनोवरज्यमानस्तीक्ष्णविषाणः स्यादितिचेत,तदाभियोग्य : देवगतिविशेषाद्विमानपरिवर्तनोपपत्तेः । पोडशनिदेवसहरुह्यते सूर्य विमानानि प्रत्येक पूर्वदक्षिणोत्तरापरभागमात् क्रमेण सिंहकुज वृषभतुरंगरूपाणि विकृयचत्वारि . चत्वारि देवसहस्र णि वहंतीति वचनात् । तथा चन्द्रविमानानि प्रत्येक पोडशभिर्देवसहरुधन्त, तथैव राहुविमानानि प्रत्येकं स्तुभिर्देवसहरुमन्ते इति च श्रुतेः । तदामियोग्यदेवानां सिंहादिरूपविकारिणां कुतो गतिमेद- स्तादृक् इतिचेत्, स्वभावत एव पूर्वो पातकर्म विशेषनिमित्तकादिति ब्रूमः । सर्वेषामेवमभ्युपगमस्यावश्यं भाविवादन्यथा स्वेष्टविशेषव्यवस्थानुपपत्तेः तत्प्रदिपादकस्यागमस्यासंभवद्वाधकस्य सद्भावाच । गोलाकारा भूमिः समरात्रादिदर्शनान्यथानुपपत्तेरित्येतद्वारकमागमस्यास्येति हेतोरप्रयोजकत्वात समरात्रादिदर्शनं हि . यदि तिष्ठभूमर्गोलाकारतायां साध्यायां हेतुस्तदा न प्रयोजकः स्यात् माम्मभूमर्गोलाकारतायामपि तदुपपत्तेः । अथ अममर्गोलाकारतायाँ .. चेत् न, . अत्र ।
साध्यायां, तथाप्ययोजको हेतुस्तिष्ठत्भूगोलाकारतायामपि तद्धटनात् । अथ भूसामान्यस्य गोलाकारतायां साध्यायां हेतुस्तथाप्यगमकस्तियक- सर्यादिभ्रमणवादिनामर्थगोलकाकारतायामपि भूमेः साध्यायां तदुपपत्तेः । समतलायाममि भूमौ ज्योतिर्गतिविशेषात्समरानादिदर्शनस्योपपादितत्वाच्च । नातः साध्यसिद्धिः कालात्ययापदिष्टत्व च । प्रमाणपाधितपक्षनिर्देशानंतर प्रयुज्यमानस्य हेतुत्देतिप्रसंगात् । ततो नेदमनुमान हेत्वाभासोत्थं वाधक प्रकृतागमस्य येनास्मादेवेष्टसिद्धिर्न स्यात् ॥ ज्योतिः शास्त्रमतो युक्तं नैतत्स्याद्वादविद्विपाम् ।। संवादकमनेकान्ते सति तस्य प्रतिष्ठिते ॥ १७ ॥ नहि किंचित्सर्वथैकान्ते ज्योतिःशास्त्रे संवादक व्यवतिष्ठते प्रत्यक्षा- दिवत् नित्याधने कान्तरूपस्य तद्विषयस्य सुनिश्चितासमवहायकवाभा- वात्. तस्य दृष्टेष्टाभ्यां व.धनात् । ततः स्याद्वादिनामेव तद्युक्तं, सत्यने- कान्ते तत्प्रतिष्ठानात् तत्र सर्वथा बाघकविरहितनिश्चयात् ।। ॥ तत्कृतः कालविभागः ॥ १४ ॥ किंकृत इत्याह- ये ज्योतिष्काः स्मृता देवास्तस्कृतो व्यवहारतः ॥ कृतः कालविभागोयं समयादिर्न मुख्यतः ॥१॥ तद्विभागात्तथा मुख्यो नाविभागः प्रसिद्धयति ॥ विभागरहिते हेतौ विभागो न फले क्वचित् ॥ २॥ विभागवान् मुख्यः कालो विभागवत्फलनिमित्तत्वात क्षित्यादि- वत् । समयावलिकादिविभागवद्यवहारकाले लक्षणफलनिमित्तत्वस्य मु- ल्यकाले धर्मिणि प्रसिद्धयात् नाप्याश्रयासिद्धः, सकलकालवादिनां मुख्यकालें. विवादाभावात् तदभाववादिनां तु प्रतिक्षेपात् । गगना- दिनानकातिकोऽयं हेतुरिति चेन्न, तस्यापि विभागवदवगाहनादिकार्योः - (१०) त्पत्तौ विभागवत एव निमित्तत्वोपपत्तेः । ननु च यद्यवयवभेदो विभागस्तदा नासौ गगनादावस्ति तस्यैकद्रव्यत्वोपगमात् । पटादिवदवयकारभ्यत्वानुपए- तेश्च । अथ प्रदेशवतोपचारो विभागस्तदा कालेऽप्यस्ति, सर्वगतककालबादि- नामाकाशा दिवदुपचरितमदेशकालस्य विभागवत्वोपगमात् । तथा व तत्साधने सिद्धसाधनमितिकश्चित्, परमार्थत एव गगनादेः सप्रदेशत्वनि- श्वयात् । तस्य सर्वदावस्थितप्रदेशत्वात् एक्द्रव्यत्वाच्च । द्विविधा अवयवाः सदावस्थितवपुपोऽनवस्थितवपुषश्च । गुणवत्ता सदावस्थित- द्रव्यप्रदेशाः सदावस्थिता एवान्यथा द्रव्यस्थानवस्थितत्वप्रसंगात् । पटादिवदनवस्थितद्रव्यप्रदेशास्तु तत्वादयोनवस्थितास्तेषामवस्थितले पटादीनामवस्थितत्वापत्तेः कादाचिकत्वम्यतयावधारिवावयव- स्वस्य च विरोधात् । तत्र गगन धर्माधर्मकजीवाश्चावस्थित. प्रदेशाः सर्वे यतोऽधारितप्रदेशत्वेन वक्ष्यमाणत्वात् प्रदेशप्रदे.. शिमावस्य च तेषां तैरनादित्वात् । कथमनादीनां गगनादितत्पदेशानां प्रदेशप्रदेशिभावः परमार्थपथपस्थायी ! सादीनामेव तंतुपटादीनां तद्भाव- दर्शनात इति चेत्, कथामिदानी गगनादितन्महत्वादिगुणानामनादि- निधनानां गुणगुणिमाघः पारमार्थिकः सिध्येत् ? ते गुणगुणिलक्षणयोगात तथाभाव इति चेत्, तर्हितत्पदेशानामपि प्रदेशिपदेशलक्षणयोगात् प्रदेशप्र. देशिभावोऽस्तु । यथैव हि गुणपर्ययवद्रव्यमिति गगनादीनां द्रव्यलक्षणमस्ति तन्महत्वादीनां च 'द्रव्याश्रिता निर्गुणा गुणा' इति गुणलक्षण तथावयवा- नामेकरबपरिणामः प्रदेशिद्रव्यमिति प्रदेशिलक्षणं गानादीनामवयुत्तोऽत्रयः प्रदेशलक्षणं तदेकदेशनामस्तीति युक्तस्तेषां प्रदेशप्रदेशिभावः । कालस्तु नैक- द्रव्यं तस्यासंख्येयगुणद्रव्यपरिणामत्वात् । एकैकस्मिल्लोकाकाशप्रदेशे का- लाणोरेकैकस्य द्रव्यस्यानंतपर्यायस्यानभ्युपगमे तद्देशवर्तिद्रव्यस्यानंतस्य परमाण्वादेरनंतपरिणामानुपचेरिति द्रव्यतो भावतो वा विभागवत्त्वे साध्ये कालस्य न सिद्धसाधनं । नापि गानादिनानकांकिको हेतुः | क्षित्यादि- (४१) निदर्शनं साध्यसाधन विकलमिल्यपि न मन्तव्यं ताकार्यस्यांकरादेविभागवतः प्रतीतेः, क्षित्यादश्च द्रव्यतो भाव-श्व विभागवत्व सिद्ध रति सूक्तं विभाग- रहिते हेतौ विभागो न फले कचित् " इति ।। ॥ पहिरवस्थिताः ॥ १५ ॥ (श्रीउमास्वामि) किमनेन सूत्रेण कृतमित्याह- बहिर्मनुष्यलोकात्तवस्थिता इति सूत्रतः ।। तत्रासन्नाव्यवच्छेदः प्रादक्षिण्यमतिक्षतिः ॥ १ ॥ कृतेति शेषः । एवं सूत्रचतुष्टयाज्ज्योतिषामरचिंतनम् ॥ निवासादिविशेषेण युक्तं बाधविवर्जनातं ॥ २ ॥ ......... त्रिलोकसार- श्रीमन्न मिचंद्र सैद्धान्तिक विरचित त्रिलोकसार अध्याय तृतीय-"ज्योतिलोंकाधिकार प्रतिपादन अधिकार" हिंदीभाषा अनुवादकार स्वर्गीय पं० प्रवर श्रीटोडरमल्लजी छा. पु. पृ. १४१-२०४ ॥ तहां तारादिकनिका स्थितिस्थान तीन गाथानि करि कहै हैं- णउत्तर सत्त सए दससीदी चदुदुगे तिय चउके ।। तारिणमसिरिक्खचुहा सुक्कगुरंगारमंदगदी ॥ ३३२ ।। नवयुत्तर सप्तशतानि दश अशीतिः चतुद्विके त्रिकचतुष्क । तारेनशशिऋक्षवुधा शुक्रगुर्वगारमंदगतयः ।। ३३२ ॥ .
(४२) अर्थ-निवै अधिक सातसै विष उपरि दश असी च्यारि दोय स्थानविष तीन चारि स्थानविपै नाइ क्रमते तारा इन शशि मक्ष बुध शुक्र गुरु अंगार मंदगति तिष्ठ हैं ।। भावार्थ:-चित्रापृथ्वीते लगाई सातसै नियोजन उपरितौ तारे हैं । बहुरि तिन दश योजन उपरि इन कहिए सूर्य हैं। बहुरि तिनत असी योजन उपरि शशि कहिए चंद्रमा है । बहुरि तिनः च्यारि योजन ऊपरि ऋक्ष कहिए नक्षत्र हैं । बहुरितिनत च्यारि योजन उपरि बुध है । वहरि तिनते तीन योजन उपरि शुक्र है । बहुरि तिनते तीन योजन ऊपरि गुरु कहिये वृहस्पति है । बहुरि नितत तीन योजन उपरि मंदगति कहिए शनैश्चर है। ऐसे ज्योतिषी तिष्ठै हैं ।। ३३२ ॥ अवसेसाण गहाणं णयरीओ उपरि चित्तभूमींदो। गंतूण बुहसणीणं विचाले होति णिबाओ ।। ३३३ ।। अवशेषाणां ग्रहाणां नगर्य उपरि चित्राभूमितः ।। गत्वा बुधशन्योः विचाले भवंति नित्याः ।। ३३३ ।। अर्थ:-अठ्यासी ग्रह निविर्षे अब शेष तिनकी नगरी उपरि उपरि चित्रा ममित जाई वुध भर शनैश्चर इन दोऊनकै वीची अंतराल क्षेत्र- वि शाश्चती हैं ।। ३३३ ॥ अस्थइसणी णवसये चित्तादो तारगावि तावदिए । जोइसपडलबहल्लं दससहियं जोयणाण सयं ॥ ३३४ ॥ आस्ते शनिः नवशतानि चित्रातः तारका अपि तावंतः ॥ ज्योतिष्कपटलबाहुल्यं दशसहितं योजनानां शतम् ॥ ३३४ अर्थ-शनैश्चर चित्राभूमिते नवसै योजन उपरि आस्ते कहिए तिष्ठे है। बहुरि तारे हैं तेभी तावत कहिए नवस योजन पर्यंत तिष्ठे हैं । सो चित्रात सातसै निवै योजन उपरि सो लगाए. नवस योजन पर्यंत (४३) ज्योतिबी देवनिका पटलका बाहुल्य कहिए भोटाईका प्रमाण सो दश सहित एकसौ योजन प्रमाण जानना ॥ ३३४ ।। भागें प्रकीर्णक तारानिका प्रकार अंतराल निरूपण है- तारंतर जहण्णं तेरिच्छेकोससत्तभागो दु । पण्णास मज्झिमय सहस्समुक्कसयं होदि ॥ ३३५ ॥ तारांतरं जघन्यं तिर्यक् कोशसप्तभागस्तु । पंचाशत् मध्यमकं सहस्रमुत्कृष्टकं भवति ।। ३३५ ॥ अर्थ:-तारात ताराके वीवि तिर्यगरूप बरोबरिविषै अंतरालजघन्य एक कोशका सातवां भाग, मध्यम पचास योजन, उत्कृष्ट एक हजार योजन प्रमाण हो है ॥ ३३५॥ - भव ज्योतिषीनिक विमानस्वरूप निरूपै हैं- उत्साणठियगोलगदलसरिसा सव्व जोई सविमाणा । उवरि सुरणगराणि य जिणभवणजुदाणि रम्माणि ॥३३६।। उत्तानस्थितगोलकसदृशाः सर्वज्योतिष्कविमानाः ॥ उपरि सुरनगराणि च जिनभवनयुतानि रम्याणि ॥३३॥ अर्थ- गोलक नो गोलाताका दल कहिए तिस गोलाकौं वीचिमैं सौं विदारि दोय खण्ड करिए तिसविर्षे जो एक खण्ड सो उत्तान स्थित कहिए तिस आधा गोलाकों ऊंचा स्थापित किया होय चौडा ऊपरि पर ताफी अणी नीचे ऐसे घस्या होह ताका जैसा आकार तिह समान सर्व ज्योतिषीनिक विमान हैं । वहुरि तिन विमाननिके ऊपरि ज्योतिषी देवनिके नगर हैं । ते नगर जिनमंदिरनिकरि संयुक्त हैं। बहुरि रमणीक है ।। ३३६ ॥
(४४) आगै तिन विमाननिका व्यास अर बाहुल्य दोय गाथानिकरि को हैं- जोयणमेकहिकए छप्पण्णठदाल चंदरविवासं ।। सुक्कगुरिदरतियाणं कोसं किंचूणकोस कोसद्धं ॥ ३३७ ॥ योजनं एकपष्टिकते पटपंचाशदष्टचत्वारिंशत् चंद्ररविन्यासौ ।। शुक्रगुर्वितरत्रयाणां क्रोशः किंचिदून क्रोशः क्रोशार्धम् ॥ ३३७ अर्थ-एक योजनका इकसठि भाग करिए तहां छप्पन भाग प्रमाण तो चंद्रमाके विमानका व्यास है । बहुरि शुक्रका एक कोश, बृहस्पतिका किंचित् ऊन एक कोश, इतर तीन बुध मंगल शनैश्चर इनका माधकोश प्रमाण विमानव्यास नानना ।। ३३७॥ कोसस्स तुरियमवरंतुरिय हियकमेण जाव कोसोति ।। ताराणं रिक्खाणं कोसं बहुलं तु वासद्धं ॥ ३३८ ॥ क्रोशस्य तुरीयमवरंतुर्याधिक क्रमेण यावत् क्रोश इति । ताराणां ऋक्षाणां क्रोशं चाहुल्य तु व्यासार्धम् ॥ ३३८ ॥ अर्थ-तारानिका विमाननिका जघन्य व्यास कोशका चौथा भाग प्रमाण है। वहुरि चौथाई.अधिक एक कोश- पर्यंत नाननां तहां माध- कोश पाणैकोश प्रमाण-मध्यम व्यास जाननां । एक प्रमाण उत्कृष्ट व्यास जाननांगबहुरि शेष. जे. नक्षत्र तिनका विमानव्यास- एककोश प्रमाण जाननां । बहिरि सर्वविमाननिका व हुल्य कहिए मोटाईका प्रमाण सो अपने अपने व्यासत. आधा जानना ।। ३३८ ।। आगे राहु केतु ग्रह निकाः विमान व्यास वा तिनका कार्य वा ति- नका भवस्थानों दोय गाथानिकरि कहैं हैं-- राहु अरिहविमाणा किंचूर्ण अधोगता ॥ छम्मासे पव्वंते चंदरवीदादयन्ति कमे ॥ ३३९ ॥ राव्हरिष्टविमानौ किंचिदूनों योजनः अधोगतारौं । षण्मासे पर्वान्ते चंद्ररवीछादयतः क्रमेण ॥ ३३९।। कोश
(४५)
अर्थ-राहु पर अरिष्ट कहिए केतु इन दोऊनिके विमान - किछू
घाटि एक योजन प्रमाण है । बहुरि ते विमान क्रमकरि चंद्रमा भर
सूर्यका विमानकै नीचे गमन करे हैं । बहुरि छह मास भए । पर्वका
अन्तविष चंद्रमा सूर्यको माछादे हैं । राहुतौ चंद्रमाको माछादे
है, केतु सूर्यको आछादे हैं याका ही नाम ग्रहण कहिए
राहुअरिहविमाणधयादुवरिपमाणअंगुलचड़कं ।।
गंतुंण ससिविमाणा सूरविमाणां कमे होंति ॥ ३४ ॥
राव्हारिष्टविमानध्वजादुपरिप्रमाणांगुलचतुष्कम् ।।
गत्वा शशिविमानाः सूर्यविमानाः क्रमेण भवन्ति ॥ ३४' ।'
मर्थ:- राहु और केतुके विमाननिका जो ध्वनादण्ड ताके ऊपरि
च्यारि प्रमाणांगुल जाइ क्रम फरि चंद्रमाके विमान भर सूर्यके विमान
हैं। राहु विमानकै ऊपरि चंद्रमा विमान है केतु विमानकै ऊपरि सूर्य
विमान है ।। ३४०॥
भाग. चंद्रादिकनिकै किरणनिका प्रमाण कहे हैं-
चंदिणवारसहस्सा पादा सीयल खरा य सुक्को दु ।।
... अड्डाइज्जसहस्सा तिव्वा सेखा हु मन्दकरा ॥ ३४१ ।।
चंद्रनयोः द्वादशसहस्राः पादाः शीतलाः खराश्च शुक्र तु ।।
अधेतृतीयसहस्राः तीनाः शेपा हि मन्दकराः ।। ३४१ ।।
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अर्थ- चंद्रमा पर सूर्य इनके बारह बारह हजार किरण हैं। तहां
चंद्रमाके किरण शीतल हैं सूर्यके किरण खर कहिये. तीक्ष्ण हैं। बहुरि
शुक्र है ता अढाई हजार किरण है ते तीन कहिए प्रकाशकार
उज्वल हैं। बहुरि अवशेष ज्योतिपी मंदकरा कहिए मंद प्रकाश संयुक्त
हैं।॥ ३४१ ॥
(४६)
आगें चंद्रमाका मण्डलकी वृद्धिहानिका अनुक्रमकू कहै है-
चंदाणयसोलसमें किण्हो सुको य पण्णरदिणोत्ति ॥
हेडिल्ल णिच राहगमणविसेसेण वा होदि ॥ ३४२ ।।
चंद्रो निजपोडशंकृष्णः शुक्लश्च पंचदशदिनान्तम् ।।
अधस्तन नित्य राहुगमनविशेषेण वा भवति ॥ ३४२ ॥
अर्थ- चन्द्रमण्डल है सो अपना सोलहवां भाग प्रमाण कृष्ण पर
शुक्ल पंद्रह दिन पर्यंत हो है । भावार्थ-चंद्र विमानका जो सोलह भाग
विर्षे एक एक भाग.एक एक विर्षे श्वेतरूप होइ स्वयमेव- पंद्रह दिन
पर्यंत परिनमैं हैं। तहां चंद्रमाका विमानका क्षेत्र योननका छप्पन एक-
सठिवां भाग प्रमाण 4 है तो एक कलाका केता होइ। ऐसे ताकों
सोलहका भाग दिए आठ करि अपवर्तन किए योजनका एक सौ बाईस
भाग करि तामें सात भाग प्रमाण एक कलाका प्रमाण भाया बहुरि
एक कलाका प्रमाण होइ तो सोलह कलानिका केता होइ ऐसे दोय
का अपवर्तन करि गुणे छप्पन इकसठियां भाग प्रमाण आवै । बहुरि
अन्य कोई आचार्यानके अभिप्रायकरि चंद्रविमानकै नीचे राहु विमान
गमन कर है तिस राहुका सदाकाल ऐसा ही गमन विशेष है जो एक
एक कला चंद्रमाकी क्रमतै आछादे वा उघाडै है तिहकरि वृद्धि हानि
है॥ ३४२ ॥
आगैं चंद्रादिकनिके वाहक कहिए चलावनेवाले देव तिनका आ-
कार विशेष वा तिनकी संख्या कहैं हैं-
।
..
सिंहगयवसहजडिलस्सायारसुरा वहति पुवादि ।
इंदु खीणं सोलमसहस्समद्धमिदरतिये ॥ ३४३ ।।
सिंहगजकृषभजटिलावाकारसुरा वहंति पूर्वादिम् ।।
इंदुरचीणां पोडमासहस्राणि तदर्धाधनममितरत्रये ॥३१३॥
(४७) मर्थ- सिंह हाथी वृपम जटिलरूप साकारको धारि देव है ते विमाननिको पूर्वादि दिशानि प्रति वहति कहिये लेइ चालें हैं । देव चंद्रमा और सूर्य इनके तौ प्रत्येक सोलह हजार हैं । बहुरि इतर तीनके माघे आधे हैं तहां ग्रहनिक आठ हजार नक्षत्रनिके च्यारि हजार तारानिके दोय हजार विमानवाहक देव जानने ॥ ३४३ ॥ मागे कोशवि गमन करते ले केह नक्षत्र तिनके दिशाभेद को है ।- उत्तरदक्खिण उड्ढाधोमपझे अमिजि मूल सादी य ।। भरणी वित्तिय रिक्खा चरंति अवराणमेव तु ॥३४४ ॥ उत्तरदक्षिणो धोमध्ये अभिजिन्मूलः स्वातिश्च ॥ भरणी कृत्तिका प्रामाणि चरति अपराणामेवं तु ॥३४॥ मर्थ -उत्तर १ दक्षिण १ ऊर्ध्व १ अधः १ मध्यः १ इन विर्षे क्रमत अभिजित १ मूल १ स्वाति १ भरणी । कृतिका ए पंच नक्षत्र गमन कर हैं। अवराणं कहिए क्षेत्रांताकौं प्राप्त भए ने अभिजित आदि पंच नक्षत्र तिनकी ऐसी अवस्थिति है ॥ ३४४॥ आग मेरुगिरित कितने दूर कसे गमन करे - इगिवीसेयारसय विहाय मेरुं चरति जोगणा ॥ चदतिय वजित्ता सेसा हु चरन्ति एकपहे ॥ ३४५ ॥ एकविंशैकादशशतानि विहाय मेरुं चरति ज्योतिर्गणाः॥ चंद्रत्रयं वर्जयित्वा शेषा हि चरति एकपथे ।। ३४५ ॥ अर्थ-ईस अधिक ग्यारहवें योजन मेरुको छोडि ज्योतिषी समूह गमन कर हैं । भावार्थ:----मेरुगिरिनै ग्यारहसै इकइस योजन ऊपरै ज्योतिषी मेरुकी प्रदक्षिणारूप गमन करहैं। मेरुते ग्यारहर्स इकईस योजन पर्यंत कोक ज्योतिषी न पाइए हैं । बहुरि चंद्रमा सूर्य ग्रह इन तीन (४८.) विना अवशेष सर्व ज्योतिषी एक पथविर्षे गमन कर हैं। भावार्थ-चंद्र- मा सूर्य ग्रह तो कदाचिन कोई कदाचित् कोई परिधरूप मार्गचिव प्रमण करै हैं। बहुरि नक्षत्र अर तारे ए अपना अपना एकही परिधिरूप मार्गविष गमन करे हैं। अन्य अन्य मार्गवि नाहीं भ्रमण करै हैं ॥ ३१५॥ अब नंबूद्वीपते ' लगाय पुष्कराध पर्यंत चंद्रमा सूर्यनिका प्रमाण निरूपै है- दो दोवग्गं वारस वादाल वहत्तरिइणसंखा ॥ पुक्खरदलोत्ति परदो अवडिया सव्वजोइगणा ॥३४६ ॥ द्वौ द्विवर्ग द्वादश द्वाचत्वारिंशद्वामप्ततिरिद्विनसंख्या ।। पुष्करदलांत परतः अवस्थिताः सर्वज्योतिर्गणाः ॥३४६ ॥ अर्थ-दोय दोय वर्ग बारह वियालीस बहत्तर चंद्रमा सूर्यनिकी संख्या पुष्करार्ध पर्यंत है । भावार्थ-जंबूद्वीपविर्षे दोय लवण समुद्रविर्षे च्यारि धातुकी लण्डवि बारह कालोदकविर्षे धियालीस - पुष्कराविर्षे बहत्तरि चंद्रमा है । अर इतनै इतने ही सुर्य है। बहुरि पुष्करात पर ने ज्योतिषी देवनिका गण है ते अवस्थित है । कदाचित अपनें अपने स्थानतें गमन नाहीं करें हैं जहां हैं तहां ही स्थिरूप तिष्ठे है॥ ३४६ ॥ आरौं तहां तिष्ठं हैं जु ध्रुव तारे तिनकों निरूपै हैं - छक्कदि णवतीससयं दमयसहस्सं खवार इगिदालं ॥ गयणतिदुगतेवण्णं थिरताग पुक्खरदलोति ॥ ३४७ ।। षट्कृतिः नवत्रिशशतं दशकसहस्रंखद्वादश एकचत्वारिंशत् ।। गगनत्रिद्विकत्रिपंचाशत् स्थिरताराः पुष्करदलांतम् ।३१७॥ अर्थ-छहकी इतिः ३६ अर गुणतालीस अधिक सौ. १३९ अर दश अधिक हजार १०१० अर विंदी बारह इतालीस ४११२० अर विदी:तीन दोय तरेपन ५३२३० इतने पुष्कराध पर्यंत-स्थिर.तारे हैं। .
(४९) सौ भावार्थ-जवूद्वीपविष छत्तीस लवण समुद्रविर्षे एक सौ गुणतालीस धात- की खण्डविर्षे एक हजार दश कालोदकविर्षे इकतालीस हजार एक वीस पुष्कराविधै तरेपन हजार दोयसै तीस ध्रुवतारे हैं। ते कवई अपने स्थान गमन नाही करै हैं । जहाँके तहां स्थिररूप रहे हैं ॥ ३४७॥ आज ज्योतिपी समूह निकै गमनका क्रम विचारें हैं- सगसगजोहगणद्धं एक भागलि दीवउवहीणं ॥ एके भागे अद्धं चरंति पंतिकमेणेव ॥ ३४८ ॥ स्वकस्वकीयज्योतिर्गणाध एकस्मिन् भागे द्वीपोदधीनाम् ॥ एकस्मिन भागे अर्ध चरति पंक्तिक्रमेणैव ।। ३४८ ॥ अर्थ-अपना अपना ज्योतिषी गणका अर्ध तो दीप समुद्रनिका एक भागविखें भर एक भागवि पंक्तिका अनुक्रमकरि विरें हैं। भावार्थ-जिस द्वीप वा समुद्रवि जेते ज्योतिषी हैं तिनविर्षे आधे ज्योतिषी तौ तिह द्वीप वा समुद्र का एक भागवि गमन करें हैं आधे एक भाग विर्षे गमन करे हैं। ऐसे पंक्ति लिए गमन जाननां ॥३४८॥ आण मानुपोत्तर पर्वततै परे चंद्रमा सूर्यनिके भवस्थानका अनुक्रम निरूपें है- मणुसुत्तरसेलादी वेदियमूलादु दीवउवहीणं ॥ पण्णाससहस्सेहि य लक्खे लक्खे तदो क्लयम् ॥ ३४९ ॥ मानुपोत्तरशैलात घेदिकामूलात् द्वीपोदधीनाम् ॥ पंचाशत्सहस्त्रैश्च लक्षे लक्षे ततो वलयम् ॥ ३४९ ॥ अर्थ-मानुषोत्तर पर्वत परै अर द्वीप समुद्रनिकी वेदिनिके पर तो पचास इनार योजन जाइ प्रथम वलय है । वहुरि तिस प्रथम वलयत परै लाख लाख योजन पर जाइ द्वितीयादिक वलय हैं । भावार्थ - मानुषोत्तर
(५०)
पर्वत पचास हजार योजन व्यास पर जो परिधि-सो बाह्य पुष्करांप द्वीप-
फा प्रथम वलय है। तिह परै एक लाख योजन व्यास जाइ जो परिधि-सो
दुसरा घलय है । ऐसें लाख लाख 'योजन व्यास जाइ जो परिधि सो वलय
जाननां । बहुरि पुष्कर द्वीपकी अंत वेदिकाके पर पचास हजार योजन
व्यास जाइ जो परिधि सो पुष्का समुद्रका प्रथम वलय है । तोते पर
लाख योजन व्यास जाइ जो परिधि सो द्वितीय वलय है । ऐसे लाख
लाख योजन व्यास परै जाइ जो परिधि सो वलय जाननां । ऐसे ही
अन्य द्वीप समुद्रनिवि वलय जाननां ।। ३४९ ॥
माणु तिन वलयनविष तिष्ठते जे चंद्रमा सूर्य तिनकी संख्या कह
दीपद्धपढमपलये चउदालसयं तु वलयवलयेसु ।।
चउचठवड्ढी आदी आदीदी दुगुणदुगुणकमा ॥ ३५ ॥
द्वीपार्धप्रथमवलये चतुश्चत्वारिंशच्छतं तु वलयवलयेषु ।।
चतुश्चतुर्वृद्धयः आदिः आदितः द्विगुणद्विगुणक्रमः॥३५०॥
अर्थ-मानुषोत्तर पर्वततै बाह्यस्थित जो पुष्करार्घ ताका प्रथम
बलयविर्षे एकसौ चवालीस है। भावार्थ-जो मानुषोत्तर पर्वत परे पचास
हजार योजन परे जाइ जो परिधि ताविब एक सौ चवालीस चंद्रमा एकसौ
चवालीस सूर्य है। ऐसे ही द्वितीयादि वलय वलयविर्षे च्यारि च्यारि
बधती चंद्रमा सूर्य जानने ॥१४८ । १५२ । १५६ । १६० ।
१६४ । १६८।१७२ ॥ बहुरि उत्तरोत्तर द्वीप वा समुद्रका आदि विष
पूर्वपूर्व द्वीप वा समुद्रका आदितै दृणे दुणे क्रमते जाननें । जैसे पुष्क-
राधका आदिविर्षे एकसौ चवालीस, ताते दुणे पुष्कर समुद्रका आदि
विर्षे हैं, तातै द्वितीयादि वलयविर्षे च्यारि च्यारि बधती है। ऐसे ही
सर्वत्र जानने ॥ ३५० ॥
(५१) भाग तिस तिस वलयविः तिष्ठते चंद्रमात चंद्रमाका अंतराल सूर्यते सूर्यका-अंतराल परिधिविर्षे कई है- सगसगपरिधि परिधिगरविदुभजिदे दु अंतरं होदि ।। पुस्सलि सव्वसुरठिया हु चदा य अभिजिहि ॥ ३५१ ॥ स्वकस्वकपरिधि परिधिगरवींदुभक्ते तु अंतरं भवति ।। पुष्ये सर्वसूर्याः स्थिता हि चंद्राश्च अभिजिति ॥ ३५१ ।। मर्थ-अपना अपना. सूक्ष्म परिधिको परिधिविर्षे प्राप्त जे चंद्र वा सूर्य तिनके प्रमाणका भाग दिएं अंतराल हो है। तहां प्रथम जंबृद्वीपत लगाय दो तरफका अभ्यंतर द्वीपसमुद्रनिका वा वलयनिका व्यास मिलाएं बाघ पुष्कराधका प्रथम वलयका सूची व्यास छियालीस लाख योजन हो है। मानुषोत्तर पर्वतका सची व्यास पैतालीस लाख योजन गमै दोऊ तरफका वलयका व्यास पचास हजार योजन मिलाएं छियालीस लाख योजन हो है । याका " विष्कभवग्गदहगुण ॥ इत्यादि करण- सूत्रकरि सूक्ष्म परिधिविर्षे एक कोडि पैतालीस लाख छियालीस हजार च्यारि योजन प्रमाण होई ताको परिधिविर्षे प्राप्त सूर्य वा चंद्रमाका प्रमाण एकसौ चवालीस ताका भाग दिएं एक लाख एक हजार सतरह योजन भर गुणतीस योजनका एक सौ चवालीसवां भाग प्रमाण ०१.१७ सर्यंत सूर्यका अंतराल परिधिवि विम्बसहित जानना १४४ वहुरिः बिंब जो चंद्र वा सूर्यका मण्डल तीह विना अंत- राल ल्याइये है जो विबसहित अंतरालविर्षे योनन थे तिनमें सो एक घटाइए १०१०१६ । बहुरि तिस एक योजनकों गुणतीसका एक सौ चवालीसरा भाग सहित समच्छेद विधान करि जोडिए तव एक सौ तेहत्तरिका एकसौ चवाली. १४ १४४ १४४ सवां भाग होह तामें चंद्रका' विंब उनका इकसठिवा भाग सो समच्छेद २९ १४४ २९ (५३) सो ८७८४ १७३ ५६ १०५५३ ८०६४ २४८९ विधान करि घटाइए १४४ ६१ ८७ ६४ ७६४८ ८७८१ तब चौइसे निवासीको सित्यासीसे चौरासीका भाग दीजिये इतना भया ऐसे करि चन्द्रमाते चन्द्रमाका बिंध रहित अंतराल एक लाख एक हजार सोलह योजन अर चौइस निवासी योजनका सित्यासीसै चौरासी भाग. विषै एक भाग प्रमाण आया । बहुरि तीह एकसौ तेहत्तरिका एकसौ चवालीसवां भागविर्षे मठतालीसका इकसठियां भाग प्रमाण सूर्यविवकों समच्छेद विधान करि घटाए छत्तीस इकतालीसका सित्यासीस चौरासीवां १७३ १०५५३ ६९१२ ३६४१ भाग आया १४४ ८७८४ इतनैं करि अधिक एक लाख एक हजार सोलह योजन प्रमाण सूर्यते सूर्यका अंतराल जानना । ऐसे ही अन्य वलयनिविष अंतराल ल्यावना । बहुरि सर्व वलय संबंधी सूर्य तौ पुष्य नक्षत्रवि स्थित है । अर चंद्रमा अभिनित नक्षत्रवि स्थित हैं। भावार्थ:- सूर्यका विमान अर पुष्य नक्षत्रका विमान नीचे ऊपरि तिहे हैं। पर चंद्रमाका विमान अर अभिजित नक्षत्रका विमान नीचे उपरि है ।। ३५१ ॥ आज असंख्यात द्वीप समुद्रनिविर्षे प्राप्त जे चंद्रादिक तिनकी संख्या ल्यावनेकौं गछका प्रमाण त्यावता थका ताका कारणभृत असंख्यात द्वीप समुद्रनिकी संख्याको आठ गाथानिकरि कहैं हैं- रज्जूदलिदे मंदिरमज्झादो चरिमसायरतोति ॥ .. पडदि तदद्धे तस्स दु अभंतरवे दिया परदो ॥ ३५२ ।। रज्जूदलिते मंदरमध्यतः चरमसागरांत इति । पतति तदर्धे तस्य तु अभ्यन्तरवेदिका परतः ॥ ३५२ ॥ .
( ५३ ) .. अर्थ-राजूकों भाधा किएं मेरुका मध्यतै लगाय अंतका सागर- पर्यंत प्राप्त हो है । भावार्थ-मध्यलोक एक राज़ है तिस एक राजुकों आधा करिए तब मेरुगिरिका मध्यतै लगाय अंतका स्वयंभूरमण समुद्रपर्यंत एक पार्थविौं क्षेत्र हो हैं । बहुरि तिसको आधां किएं तिसकी अभ्यंतर वेदिकाके परै ॥ ३५२॥ कहा सो कहै है- दसगुणपण्णत्तरिसयजीयणमुवगम्म दिस्सदे जम्हा ॥ इगिलक्खहिओ एको पुव्वगसव्वुवहिदीवहिं ॥ ३५३ ।। दशगुणपंचसप्ततिशतयोजनमुपगम्य दृश्यते यस्मात् ॥ एकलक्षाधिकः एकः पूर्वगसर्वोदधिद्वीपेभ्यः ॥ ३५३ ।। मर्थ--दश गुणां पिचहतरिस योजन नाई राजू दीसे है। भावार्थ- स्वयंभूरमण समुद्रकी अभ्यन्तर वेदीत पिचहत्तर हजार योजन परै नाइ तिस माघ राजका अर्द्धभाग हो है । काहेते सर्व पूर्व द्वीप वा समुद्र निके न्यासको नोडे जो प्रमाण होइ तातै उतर द्वीप वा समुद्रका व्यास एक लाख योजन अधिक हो है । सो इसही कथनको स्पष्ट करै हैं-स्व- यंभ्रमण समुद्रको बत्तीस लाखयोजन प्रमाण व्यास कल्पिकरि जंबूद्वीपका आधलाख सहित सर्व द्वीप समुद्रनिका वलय व्यासके अंकनिकों जोडिए ५००००। २ ल। ४ ल । ८ल। १६ ल । ३२ ल । तव कल्पना करि आप राजूका प्रमाण साढा बासठि लाख योजन भए, बहुरि याको आधा किए इकतीस लाख पचीस हजार योजन प्रमाण दूसरी वार आधा किया राजूका प्रमाण होइ तिहविर्षे पूर्वद्वीप समुद्रनिका वलय व्यास ५००००।२।४।८।१६ ल । जो जोडै तीन लाख पचास हजार योजन प्रमाण भया । सो घटाए तिस स्वयंभूरमण समुद्रका अभ्यंतर वेदिकात पै पिचहत्तर हजार योजन समुद्रमें गये भाष राजूका अर्थ हो है। बहुरि तीह द्वितीयवार आधा किया राजू प्रमाण ३.१२५०० को आधा किए पंद्रह लाख वासहि, हजार पांचसे योजन तीसरी बार आधा किया राजूका प्रमाण हो है । तिहविर्षे पूर्वद्वीप समुद्रनिका वलय व्यास ५०००० । २ ल | ४ ल। ८ ल । मिलाएं साढां चौदह लाख योनन भए । सो घटाएं तिस स्वयंभूरमण द्वीपका अभ्यंतर वेदिकात एक लाख बारह हजार पांचसे योजन पर द्वीपविर जाइ तृतीयवार आधा किया हुवा राज क्षेत्रका प्रमाण हो है ऐसे ही पूर्व पूर्वको आधा करि तीह विर्षे पूर्वद्वीप समुद्रनिका वलय व्यास घटाएं जो जो प्रमाण रहे तितनां तितनां तिस तिस द्वीप वा समुद्रकी अभ्यंतर वेदिकात परै जाइ चतुर्थवार आदि आधा किया राजू क्षेत्रका प्रमाण नानानां ॥ ३५३॥ पुणरवि छिण्णे पच्छिमदीयभंतरिमवेदियापरदि ॥ सगदलजुदपण्णत्तरिसहस्समोसरिय णिपडदि सा ॥३५४.॥ पुनरपि छिन्नायां पश्चिमबीपाभ्यंतरवेदिकापरतः ।। स्वदलयुतपंचसप्ततिसहस्रमपसृत्य निपतति सा ॥ ३५४ ॥ अर्थ-बहुरि दूसरी वार छिन्न कहिए आधा किया राजू ताकी आधा किए ताके पीछे जो द्वीप ताकी अभ्यंतर वेदिकातै परें अपना भाषा साठा सैतीस हजार करि संयुक्त पिचहत्तरि योजन परै जाइ. सो राजू पडै है । संदृष्टि-द्वितीय वार छिन्न राजूका प्रमाण इकतीस लाख पचीस हजार योजन ताका आधा किये पंद्रह लाख बासठि हजार पांचसै. योजन होत सते स्वयंभूरमणते पाछला स्वयंभुरमण द्वीप ताकी अभ्यन्तर वेदिकात पर तिस द्वीप विर्षे अपना आधा करि अधिक पिचहत्तर हज़ार के भए.लाख चारह हजार पाँचसै सो इतनैं योजन जाइ सो. राजू पडे. है॥ ३५४॥ .. अर्ध चतुर्थ अष्टमादि राजूके अंश किए जहां जहां मध्यक्षेत्र होइ तहां तहाँ राजूका पडना कहिए है- (५५) दलिदे पुण तदर्णतरसायरमज्झंतरत्थवेदीदो॥ पडदि सदलचरणण्णिदपण्णत्तरिदससंयं गत्ता ॥ ३५५ ॥ दलिते पुनः तदनंतरसागरमध्यांतरस्थवेदीतः ॥ पतति स्वदलचरणान्वितपंचसप्ततिदशशतं गत्वा ॥ ३५५ ॥ अर्थ-बहुरि ताको आधा किएं ताके अनतरि अहिद्रवर नामा समुद्रकी वेदिकात परै अपना आधा अर चौथाईकरि संयुक्त पिचहत्तर दश सैकडां-प्रमाण योजन जाई सो राजू पडै है । संदृष्टि तीसरीवार 'भाधा किया खण्ड पंद्रह लाख बासठि हजार पांचसै १५६२५०. ताक मावा किए सात लाख इक्यासीहजार दोयसै पचास योजन होतसं तिस स्वयंभूरमण द्वीपके अनंतरि अहिंद्रवरनामा समुद्र ताका अभ्यंतर तटसे परे तिससमुद्रवि पिचहत्तरि दश सैकडाका पिचहत्तरिहजार भए- ताका बाधा सादा सैतीस हजार र चौथाई पौणा उगणीस हजार इनको मिलाएं एक लाख इकतीस हजार दोयसै पचास १३१२५० भए । सो इतने योजन जाइ सो राजू पडै है ॥ ३५५ ॥ इदि अभतरतडदो सगदलतुरियहमांदि संजुत्तं ॥ पण्णत्तरि सहस्सं गंतूण पडेदि साताव ॥ ३५६ ॥ इति अभ्यंन्तरतटतः स्त्रकदलतुर्याप्टमादि संयुक्तं ।। पंचसप्ततिसहस्र गत्वा पतति सा तावत् ॥ ३५६ ॥ अर्थ---ऐसेही अभ्यन्तर तरत अपना अर्ध चौथाभाग आदि संयुक्त पिचहत्तरि हजार योजन जाइ जाइ सो राजू तावत् पडै है । तहाँ चौथी बार भाधा किए अहिंद्रवर नाम द्वीपका आभ्यंतर तटतें अपना आधी ३७५००० चौथाई १८७५० अष्टमांस ९३७५ करि संयुक्त पिबहत्तरि ७५००० हजार योजन ४०६२५ नाइ एक पडे है बहुरि पांचई बार आधा किएं तातै पिछला समुद्रकी अभ्यन्तर वेदीत अपनां चौडाई अष्टमांश सोलहवा अंशकारि संयुत पिनहत्तर हजार योजन परै (५६) जाई राजू पडे है, बहुरि छठीवार आधा किए तिस समुद्रत पिछली द्वीपकी अभ्यंतर वेदीत अपना अर्ध चौथाई आठवां सोलवां बत्तीसा भाग संयुक्त पिचहत्तर हजार योजन परे जाइ राज पटें है, ऐसे ही पुट नेता अधिक होई तातें आधा आधा अधिकका अनुक्रम करि पिछला समुद्र वा द्वीपकी वेदीत परे नाइ सो रान पड़े है । तहां माघा आघा. का अनुक्रम करि जहां एक योजनका अधिपणा उवर तहां पर्यंत पिचहत्तर हजारके अर्द्धच्छेद सतरह हो है । बहुरि तहां पीछे ध्वर्या जो एक योजन ताफे अंगुल करिए तब सात लाख घडसठि हजार होइ तिनका आधा आधा क्रमकरि एक अंगुल उवर तहां पर्यंत उगणीस अर्घ छेद हो है । तिन सर्व छेदनिकों मिलाय ताका नाम संख्यात किया। बहुरि उवर्या था एक अंगुल ताके प्रदेशकारि साधा माधा अनुक्रम लिये अधिक करतें सूच्यंगुलके अर्ध छेदनिका जो प्रमाण तितनी वार भएं एक प्रदेशिका अधिकपणा आनि रडे सो संख्यात भर सच्यंगुलका अर्द्धछद मिलाय " संखेज्जरूवसंजुद" इत्यादि गाथा कई हैं ।।३५६॥ संखेज्जरूवसंजुदसूईअंगुलछिदिप्पमा जाय ॥ गच्छंति दीवजलही पडदि तहो साद्धलक्खेण ॥ ३५७ ॥ संख्येयरूपसंयुतसूच्चंगुलच्छेदप्रमा यावत् ।। गच्छति द्वीपजलधयः पतति ततः साधलक्षणेन ॥ ३५७ ॥ अर्थ -- संख्यातरूप करि संयुक्त ऐसे सूच्यंगुलके अर्ध छेदनिका जो प्रमाण यावत् होई तावत् ते द्वीप समुद्र पूर्वोक्त अनुक्रम करि अभ्यं- तर वेदीत परै जाइ रान पतनरूप क्षेत्रको प्राप्त हो है। तहां पीछे सर्व द्वीप समुद्रनिविर्षे ब्यौढ लाख १५०००० योजन परै अभ्यंतर , पर जाइ राजू पडै है। कैसे सो कहिए है " अंतधणं गुणगणियं मादिविहीणं रूऊणुताभनियं" पिचहत्तरि हजार ताकों गुणकार दोय करि गुणे ब्यौढ लाख भए तिनमैं इस करण सूत्र करि अंतका धन वेदीत
(५७)
आदिका प्रमाण एक प्रदेश घटाइए अर एक पाटि गुणकारका प्रमाण
एकताका भाग दीजिए तब एक प्रदेश पाटि ड्यौढ लाख योजन प्रमाण
भए । सो संख्यात सहित सूच्यंगुलका अर्द्धछेद प्रमाण द्वीपसमुद्र भए ।
मंतविर्षे अभ्यंतर वेदी इतनै परै जाइ राजू पडै है । बहुरि बाधा
७५००० ७५.. ७५००००००
आधाकी अर्थ संदृष्टि ऐसी-
२५
२ २०००४
स् २३ २११ इहां संदृष्टिविर्षे पहिले तो पिचहत्तर हजारते
२२
लगाइ आधे आधे किए आधा करनेकों दोयका भागहार जानना, ताके
भाषा करनेकों तिस भागहारको दोयका गुणकार जाननां । बहुरि मध्य
भेदनिके ग्रहणानिमित्त वींचि बिंदी जाननी । बहुरि आगे सुच्यंगुलते
लगाय भाधा आधा क्रम जाननां । बहुरि मध्य भेदनिके ग्रहणनिमित्त
बीचि विदी जाननी । बहुरि आगें सूच्यंगुलतें लगाय आधा आधा क्रग
जाननां । सूच्यंगुलकी सहनानी दोयका अंक जाननां । बहुरि मध्य
भेदनिके ग्रहण निमित व चि विदी जाननी । बहुरि भाग च्यारि दोय
एक प्रदेश जाननें ऐसै आधा आधाका प्रमाण जाननां । ऐसे पूर्व पूर्व
प्रमाणते उतर उत्तर प्रमाण अधिक करना । बहुरि अंक संदृष्टिकर जैसे
चौसठित लगाय एक पर्यंत आधा आधा करिये इहां जाननी । ६४।
३२ । १६ । ८।४।२।१। ऐमैं ड्योढ लाख योजनका क्रम
करि लवणसमुद्र पर्यंत भसंख्यात द्वीप समुद्रनिकों जाईकरि ॥३५७॥
कहा सो कहैं हैं।-
लवणे दु.पडिदेकं जंबूए देज्जमादिमा पंच ॥
दीउदही मेरुसला पयदुवजोगीण छज्जेदे ॥ ३५८ ।।
लवणे द्विः पतितः एक जंबो देहि आदिमाः पंच ॥
-- : द्वीपोदधयः मेरुशलाः प्रकृतोपयोगीनः न पट् चैते ॥३५८॥
(५८) छेछे इहां संख्यात अर्थ- लवण समुद्रविर्षे दोय अर्घ छेद पढ़ है । केसै ! राजको आधा आधा करते जहां दोय लाखका अर्धछेद करिए तब सतरहवार भय एक योजन उवरै । बहुरि एक योजनके चंगुल सात लाख अरसठि हजार तिनके अर्द्ध च्छेद करिए तब उगणीसबार भए एक अगुल उवर । बहुरि राजूका अर्धछेद किएं प्रथम अर्धछेद मेरुकै मध्य पच्या सो ऐसे सतरह उगणीस एक अर्धछद मिलि संख्यात अर्धच्छेद भए । बहुरि एक गुरु उवया था सो वह सूच्यंगुल है। सो सूच्यंगुलके अर्धछेद इतने छे छ। इहां पल्यके अर्ध छेदनिका वर्ग प्रमाण सूच्यंगुलके अर्घ छेद नानने । इनको मिलाएं संख्यात अधिक सूच्यंगुलके मर्घ छेद प्रमाण एक लाख योजनके अर्धछेद भए तिनकी सहनानी ऐसी अधिककी सहनानी कारि ऐसे १ जाननी । इतने मर्धछेदनिविर्षे अप- नयन त्रैगशिक विधिकरि घटाए जो प्रमाण आवे तितनी द्वीपसमुद्रनिकी संख्या जाननी अपनयन त्रैगशिक विधि कैसे सो कहे है । राजूका अर्घछेद इतने को छे छे छे ३ तहां पल्यके अर्ध छेदनिका असंख्यतवां भाग प्रमाण गुण्य जानना वहरि पत्यके अर्घ छेदनिका वर्ग तिगुणा सो गुणकार जाननां छे छे ३ तहां जो इतने छे छे ३ : गुणकारकों देखि करि.गुणकार. प्रमाण राशि घटानेकों गुण्यविर्षे एक इतना घटावनेके अर्थि गुण्यमें कितना घटाइए शिक करिए तहां प्रमाण राशि ऐमा छे छे ३ फलराशि १ इच्छा राशि ऐसा १ छे छे फल करि इच्छाको गुणि प्रमाणका भाग दीजिए तहां भाज्य राशि अर भागहार राशि दोऊनिवि पत्य मर्ष छेदनिका वर्ग ऐसा छे.छ. तिनको समान देखि भागहारविषैः उवा. तिनका ई छ तो १ घटाइए तो
(५९)
३
समुद्र जानने
१
अंक वाका भाज्यविष मसंख्यात उवरे तीह करि साधिक एकको भाग
दीजिए । इतनां गुण्यविय घट्या । ऐसे करि अपनां साधिक एकका
तीसरा भाग कर हीन पत्यका अर्ध छेदनिका असंख्यातवां भाग प्रमाण
गुण्यको पल्यका अर्ध छेदनिका वर्ग पर तीन करि गुणें जो प्रमाण होइ
इतने सर्व द्वीपसमुद्र हैं तिनकी सहनानि ऐसे छे छे छे ३ इहां अधिक
तृतीय भाग घटावनेकी सहनानी ऐसी, जाननी । ( इनविर्षे आधे
द्वीप भाधे
ऐसे द्वीप समुद्रनिकी संख्या
कहि अब जाका अधिकार है ताको कथनविई जोडे है । जंबू-.
द्वीप लाख योजनपपाण तासौं लाखयोजन रहै । तहां लवणसमुद्रका
मभ्यंतर पटलत ड्योढलाख योजन पर लवण समुद्रवि नाइ अर्ध पडे
है। ऐसे दो बहुरि ताका आधा लाख योजन भएं लवण समुद्रका
अभ्यंतर तटतै पचास हजार योजन परै जाइ अर्धच्छेद पडै है ऐसे
दोइ अर्धछेद नाननें । बहुरि तहां एक जंबूदीपकू देहु ।
भावार्थ-दोय म छेदनिविर्षे एक अर्घच्छेद तो लवण समुद्रका
गिनना । भर एक अर्षविर्षे पचास हजार योजन जंबूद्वीपके मिलाएं
लाख योजन होई सो इस मछेदकों जंबूद्वीपहीका गिननां ऐसे ए
अर्धच्छेद कहे । बहुरि इन अर्घछेदनिविर्षे आदिके जंवू द्वीपादी पांच
द्वीपसमुद्र संबंधी पांच अर्धछेद भर मेरुशलाका कहिए राजूको आधा
करते प्रथम अर्धछेद कह्या सो ऐसे ए छह अर्घच्छेद इहां अधिकार
रूप ज्योतिषी विवनिका प्रमाण ल्यावनेंविर्षे उपयोगी कार्यकारी नाहीं
जाते तीन द्वीप समुद्रनिके विवका प्रमाण जुवा ग्रहण करेंगे तातें पांच
मर्धच्छेद तो ए कार्यकारी नाहीं भर मेरुशलाका रूप प्रथम अर्धछेद
विः कोई द्वीप समुद्र माया नाहीं तात सो कार्यकारी नाही ऐमें छह
मछेद आ» घटावेंगे ॥३५८ ॥ कहां सो कहै है-
तियहीणसेदिछेदणमेत्तो रज्जुच्छिक्षी हवे गच्छो ।'
जादीवच्छिदिणा छरूपजुत्तेण परिहीणो ॥ ३५९ ॥
(६०) त्रिकहीनश्रेणिछेदनमात्रः राजुच्छेदः भवेत् गच्छः ।। जंबूद्वीपछेदेन पडूरूपयुक्तेन परिहीनः ॥ ३५९ ।। अर्थ-तीन धाटि जगच्छ्रेणीका अर्ध प्रमाण एक राजके पद्धच्छेद है । तिनमें अबूद्वीप लाख योजन प्रमाण ताके अर्धच्छेद छह अर्घछेदनिकरि संयुक्त घटाएं ज्योतिषी विवानिकी संख्या ल्यायनविष छे छे छे ३ गच्छका प्रमाण हो है । तहां जगच्छ्रेणी अर्धच्छेद इतने है इहां पत्यके अर्धच्छेदनिकी सहनानी ऐसी छे भर नीचे असंख्यातकी सहनानी ऐसी ७ ताका भागहार जानना । बहुरि आगें पत्य अर्धच्छेदनिका वर्गका गुणांकी सहनानी ऐसी छे छे छे ३ ताका गुणकार जाननां । बहुरि इनमें तीन अर्धच्छेद घटाएं राजूके अर्धच्छेद होहि ई जाते जगच्छेणीके सातवें भाग राजू हैं । सो ७ aa सातके तीन अर्धच्छेद होहि ताकी सहनानी ऐसी छे छे छे ३ इहां ऊपरि घटावनेकी सहनानी ऐसी जाननी बहुरि इन. अर्धच्छेदनिका प्रमाणविर्षे जंबूद्वीपकै अभ्यंतर पचास हजार योजन- अर वाह्य पचास हजार योजन मिलि एक लाख योजन प्रमाण जंबूद्वीप संबंधी अपंछेद कह्या था सो इन लाख योजननिकै अर्घच्छेद घटाइए। तहां एक लाखके अर्धच्छेद तिनमें छह करिए तव सत्रह १७ वार भएं एक योजन उवरै । बहुरि एक योभनके अंगुल सात लाख अडसठि हजार तिनके अर्ध छेद करिए तब उगणीसवार भएं एक अंगुल उवरै । बहुरि राजुका अर्धच्छेद कीए प्रथम अर्घच्छेद मेरुके मध्य पड्या सो ऐसे सत्रह उगणीस एक अर्धच्छेद मिलि संख्यात अर्ध- 'द भए । बहुरि एक अंगुल उवर्या था सो वह. सुक्ष्यंगुल है । सो - (६१) । सूच्यंगुलके अर्धच्छेद इतने छे । इहां पत्यकै अर्धच्छेदनिका वर्ग प्रमाण सूच्यंगुलके अर्धच्छेद जानने । इनकौं मिलाएं संख्यात अधिक सूच्यंगुल के अर्घच्छेद प्रमाण एक लाख योजनके अधच्छेद भए । तिनकी सहना- नी ऐसी छे छे । इहां संख्यात अधिककी सहनानी उपरि ऐसी ? जा- ननी । इतने अर्धच्छेद राजके अर्धछेदनिविर्षे अपनयन राशिक विधि- करि घटाइएं जो प्रमाण आवै तितनी द्वीप समुद्रनीकी संख्या जाननी । अपनयन त्रैराशिक विधि कैसे ? सो कहे हैं।- ~ विष एक घटाइए तौ राजुके अर्धछेद इतने कहे छे छे छे ३ तहां पश्यक अर्ध- छेदनिका असंख्यातवां भांग प्रमाण तौ गुण्य जानना छ । बहुरि पत्यके अर्धच्छेदनिका वर्ग तिगुणां गुणकार जानना छे छे ३ । इहाँ जो इतने छे छे ३ गुणकारकौं देखि करि गुणाकार प्रमाण राशि घटावनकौं गुण्य- इतना घटाव के अर्थ गुण्यमेंसौं कितना घटाइए ऐसें त्रैराशिक करिए । तहां प्रमाण राशि ऐसा छे छे ३ फलराशि एक १ इच्छा शशि ऐसा छे छे । फलकरि इच्छाकौं गुणि प्रमाणका भाग दीजिये, तहां भाज्य राशि अर भागहार राशि दोऊनिविर्षे पत्यका वर्ष छेदनिका वर्ग ऐसा छे छे। तिनकौं समान देखि भागहारविर्षे उवर्या तीनका अंक ताका भाज्यविर्षे संख्यात उव* तीहकरि साधिक एकौं भाग दीजिये, इजना गुणविष घटाया। ऐसें करि साधिक एकका ती- सरा भाग करि हीन पत्यका अर्धच्छेदनिका असंख्यातवां भाग प्रमाण गुण्यकों पत्यका अर्घच्छेदनिका वर्ण भर तिनकरि गुणें नो प्रमाण होह तामें तीन घटाइए । इतने सर्व द्वीप समुद्र हैं तिनकी सहनानी ऐसी छे छे छे ३ । । इहां साधिक तृतीय भाग घटावनें की सहनानी ऐसी ! जाननी । इनविर्षे आधे द्वीप आधे समुद्र जाननें । ऐसें द्वीपसमुद्रनिकी संख्या कहि। अब जाका अधिकार हैं ताकौं कथनविर्षे जोडै हैं । जंबूद्वीप लाख योजन प्रमाण ताके अर्धच्छेद तिनमें ( ६२ ) छेह अर्धच्छेद और मिलाइए, इनकौं जोडि जो प्रमाण होइ तितर्ने अर्धच्छेदं राजूके अर्धच्छेदनि स्यौं घटाएं जो प्रमाण होइ तितनां सर्व द्वीप समुद्रसम्बन्धी चंद्रसूर्यादिकनिके प्रमाणल्यावकों गच्छका प्रमाण जाननां । भावार्थ-यहु पूर्वे द्वीपसमुद्रनिकी संख्या कही तामैं छह घटाएं इहां गच्छका प्रमाण होहे ॥३५९ ॥ आज तिन ज्योतिषी विवनिकी संख्या व्यावनेवि जो गच्छ कहा ताकी मादि कहैं हैं- पुक्खरसिंधुभयधणं चउघणगुणसयछहत्तरी पभओ ॥ चउगुणपचओ रिणमवि अडकदिमुहसुर दुगुणकर्मा३६० पुष्करसिंधूभयधनं चतुर्धनगुणशतपट्सप्ततिः प्रभवः ।। चतुर्गुणप्रचयः ऋणमपि अष्टकृतिमुखसुपरि द्विगुणक्रमं ॥ अर्थ-स्थानिकनिका जो प्रमाण सो गच्छ कहिए वा पद कहिए। बहुरि गच्छविल जो पहला स्थानविर्षे प्रमाण सो थादि कहिये वा प्रभव कहिचे वा मुख कहिये । बहुरि स्थानस्थानप्रति जितनां जितनां बधै सो प्रचय कहियें। बहुरि सर्व स्थानका संबंधी वृद्धिका प्रमाण विनां जो आदि ताकौं जोड़ें जो प्रमाण होइ सो आदि धन कहिये । गडरि सर्व स्थानका संबंधी वृद्धिको नो. जो प्रमाण होइ सो अवर धन कहिये । सो इहां पुष्कर नामा समुद्रका प्रादि धन पर उत्तर धन मिलाएं च्यारिका धन चौसठि तीह करि गुण्या हुवा एकसौ छिहत्तरि प्रमाण उभय धन को है सो इहां प्रभव जाननां । बहुरि एक एक दीप या समुद्रपति चौगुणा चौगुणा वधती धन है सो प्रचय जानना । बहुरि ऋणविर्षे आठकी कति चौसाठि तीह प्रमाण तो मुल जानना । ऐसे धनराशि ऋण राशिको नानि धनराशिविर्षे ऋणराशिकों घटाए स्थानस्थान विर्षे प्रमाण जानना। तहां पुष्कर समुद्रका मादि धन उत्तर धन कैसे ल्यावनी सो कहिए है.
मादित आदि दणादणा क्रमः कहे थे नाते पुष्करार्घ द्वीपका भादि वलयविर्षे एक सौ चवालीस थे तिनसे दूणे पुष्कर समुद्रका आदि वलयविखे हैं । १४४ १२॥ सो इडा मुख जाननां । बहुरि "पदहतमुख- मादिधनं " इस सूत्र करि गच्छकरिगुण्या हुवा मुखका प्रमाण सो मादि धन है। सो इहां बत्तीस वलय हैं । तातै गच्छका प्रमाण बत्तीस तिहकरि मुखकौं गुणें जो मुखविर्षे दोयका गुणकार था ताकौं वत्तीस करि गुणि मर एकसों चवालीसके आगें चौसठीका कुणकार स्थापिएं १४१ । ६४ । इतना तो आदिधन जानना बहुरि " व्येकपदावन- चयगुणोगच्छउत्तरधनं । इस सूत्रकरि एक घाटि गच्छका थापा करि चयको गुणि तीहकरि गच्छकौं गुणें उत्तर धन हो है। सो इहां एक घाटि गच्छ इकतीस ३१ ताका आधा करि चयका प्रमाण एक एक वलय विष च्यारि च्यारि बधती है, ताते च्यारि च्यारि करि गुणि- ए ३११४ बहुरि इनको गच्छ वतीस करि गुणिए ३११४।३२ बहुरि 'मागहारका दूवा करि गुणकारका चौका अपवर्तन किए दोय होय ती- हकरि बत्तीसका गुणकार गुणें चौसठि होइ । ऐसें इकतीसकौं चौंसठि गुणां करिए.३१६६४ इतना उत्तरधन हुवा । बहुरि इस उत्तर धनविर्षे चौसठिका ऋण मिलावनां सो उत्तर धनविर्षे चौपठिका गुणकार जानि गुण्यवि एक मिलाया तवं वत्तीसकौं चौसठि गुणां करिए। इतना उत्तर धन भया ३२१६४ इहां ऋणका मिलावना बहुरि याहीको घटावनां सो सुगम गणित आवने के अर्थ करिएं हैं बहुरि आदिधन पर उत्तर धनविर्षे गुण्य बत्तीस इनको मिलाइ एक सौ छिहत्तरि गुण्य किया अर चौसठि गुणकार किया। ऐसे चौसाठि गुणां एक सौ छिहत्तरि १७६१६४ प्रधाण पुष्कर समुद्रका उभय धन सो ज्योतिर्विवनिका प्रमाण ल्यानके अर्थी .जो गच्छ कला था का प्रभव कहिए आदि जानना । बहुरि यात चौगुणां. वाह- -- .
(६४) णीवर · द्वीपदिपै धन जानना । कैसे सो कहिए है । पूर्व भादित दृर्णा इहां आदि वलय विर्षे है सो मुख १४४ २।२। जाननां । बहुरि "पद- हंतमुखमादिधनं " इससूत्रकरि याकों इहां वलय चौसाठि है तातें गच्छका प्रमाण चौसठि तीहकरि गुणिए । १४४।२।२।६४ । बहुरि- " व्येक पदार्धनचयगुणोगच्छ: उत्तरधनं " इस सत्र करि एक घाटि गच्छ प्रमाण तरेसठि ६३ ताका आधा को वलय वलय प्रति बधती २ प्रमाणरूप चय च्यारि करि गुणिए६३ | ४ बहुरि याकौं गच्छ चौसठि करि २ गुणिए ६३ २ २ २ ।४।६४ बहुरि दोयके भागहार करि गुणिए६३ । ४ बहुरि ६३ याकौं गछ चौसठि करि गुणिए ४ । ६४ बहुरि दोय के भागहार करि च्यारिका अपवर्तनकरि दुवाकों चौसठिके आगें स्थापिए ६४।६४ यामैं पूर्वोक्त दुणा ऋण मिलाइए सो दुगुणां चौसठि मिलाइए ६४।२ सो.दुगुणा चौसठिका गुणाकार समान देखि गुण्यविपैं एक मिलाइसे ६४ । ६४ । २ । बहुरि सर्वत्र चौसठि गुणां एकसौ छिहत्तरि करना ताते जिह- भांति बत्तीस रहे तैसे संभेदन करि चौसाठिकी जायगा तो बत्तीस करिए पर दोय आगै धरिए ३२ । २।६४ । बहुरि दोय दुवानिकौं परस्पर गुणि च्यारिका अंक लिखिए ३२ । ६४ । १ ऐसे उत्तर धन होइ । बहुरि आदि धन १४४।६।४। ४ । भर उत्तर धनं दोऊनिकौं मिलाएं चौसठि गुणा एक सौ छहतरिका चौगुणा उभयंधन होई ऐसे ही एक एक द्वीप वा समुद्रविर्षे चौगुणा चौगुगा तौ धन जानना । अर नो उत्तर धनविर्षे ऋण मिलाय था सो पुष्करवर समु. द्रविष तौ ऋण आठकी कृति जो चौसठ विह प्रमाण जाननां । पर परि दणा. परि दणा जानना । ऐसे धनविर्षे आदि तौं चौसाठि गुणा (६५) - एकसौ छिहत्तरि १७६ । ६४ बहुरि उत्तर गुणकार च्यारि गच्छ पूर्वो- क्त प्रमाण ऐसा छे छे छे ३ इनको ल्याइ ।। ३६० ॥ इनका संकलनरूप धनकौ ल्यावता थका सर्व ज्योतिषी विवनिके प्रमाण ल्यावनैका विधान कहे हैं- आणिय गुणसंकलिदं किचूर्ण पंचठाणसंठवियं ॥ चंदादिगुणं मिलिदे जोइसर्वियाणि सव्वाणि ॥ ३६१ ॥ आनाट्य गुणसंकलितं किंचिद्नं पंचस्थानसंस्थापितम् ।। चंद्रादिगुण मिलिते च्योतिष्कर्षियानि सर्वाणि ॥ ३६१ ॥ अर्थ-"प्रदमेते गुणयारे अण्णोण्णं गुणियरूव परिहीणे । रुऊण- गुणेगहिए मुइण गुणयम्मि गुणगणियं । ॥ इस करण सूत्रकरि गच्छ प्रमाण गुणकारको परस्पर गुणि ता में एक घटाइ ताकौं एक धाटि गुण- कारका भाग देई मुरबकरि गुणें गुणकाररूप सर्व गच्छके जोडका प्रमाण हो है सो । यहां गच्छका प्रमाण छे छे छे ३ सो इतनी जायगा गुण- कारका प्रमाण च्यारि ताते च्यारि अंक मांडि परस्पर गुणिए । तहां इस गच्छविर्षे उपरिका राशि: जगणीका अर्ध छेद प्रमाण ऐसा छे छे छ । ३ बहुरि च्यारिकों दोयका संमेदन करिए तब दोय जायगा दोय दोय होई २ | २ तहां “ तुम्मेतदुगुणे रासी " इस करण सुत्रके न्याय करि तिस जगच्छ्रेणीका अर्घच्छेद राशि छे छे छे ३ प्रमाण दुवा माण्डि परस्पर गुणें जगच्छ्रेणी होइ । वहरि दोय दोय जायगा दोय दोय थे। तातें दूसरीवार भी तैसेंही ऊपरिका राशि १ छ छे ३ प्रमाण वानिकों परस्पर गुणें जगछ्रेणी होइ और इन दोऊ जगछेणीनिकों परस्परगुणें जगत्मतर होइ । ऐसे ऊपरिका राशिनमाण गुणकारकों परस्परगुणे तौ जगत्पतर भया । बहुरि नीचे ऋणरूप राशि गुण्यका साधिक तृतीयभाग मात्र था - तिस वि सतरहतो लाखके अर्धच्छेद थे तिन प्रमाण दोय- ३ (६६) वार दूवानिको परस्पर गुणे एक लक्षका वर्ग मया । १ ल १ ल। महुरि अंगुलनिक अर्धच्छेद उगणीस थे तिन प्रमाण दोयवार दूवानिकों परस्पर गुणें सात लाख अहसठि हजारका वर्ग भषा ७६८००० / ७६८०००। बहुरि सूच्यंगुलका अर्घच्छेद प्रमाण दोयबार दृवानिकों पास्परगुणे प्रतरांगुल भया । बहुरि छह अच्छेद इहां उपयोगी न कहिं घटाए ॥ थे तिन प्रमाण दोषवार दूवानिको पासर गुणें चौसठिका वर्ग होइ । ब- हुरि जगच्छृणीका अर्धछेदमेंस्यौं तीन घटाएं राजूके अर्द्धच्छेद होइ ऐसा कहि घटाए थे। तिन प्रगाण दोयबार दूवानिकों माण्डि परस्पर गुणें सातका वर्ग भया । ऐसें ए सर्व अर्द्धन्छेद घटाए थे तिन प्रमाण दोयबार दोयका अंकमांडि परस्पर गुण जो जो प्रमाणभया ताका भाग- हार जाननां । जात-" विरलिज्जमाणरासिं जे त्तियमेत्ताणि हीणरुवाणि । तेसि अण्णोण्णहदी हारो अण्ण रासिस्म" ऐसा करणसूत्र पूर्व कहि आए हैं । ऐसें गछप्रमाण गुणकारका परस्परगुणना भया । बहुरि यामें एक घटाइए ताकी सहनानी ऐसी बहुरि याको एक घाटि गुणकार तीन ताका भाग दीजिए । बहुरि मुखका प्रमाण चौसठि गुणां एकसौ छिहत्तरि तीहकरि गुणिए तव धनराशिका जोडदिए जगत्म- तरको चौसठिगुणां एकसौ छिहत्तरिकरि गुणिए अर तार्को प्रतरांगुरूको सातलाख अडसठि हमारका वर्ग अर लाखका वर्ग मर चौसाठिका वर्ग भर सातका वर्ग भर तीनकरि गुणि ताका भाग दीजिए तामें एक घटाइए इतना संकलित धन-१७६६४ हो है । इहां जगत्पतरकी सहनानी ऐसी-प्रतरांगुल की. ऐसी है ४ । ७६८००० । ७६८००० । १ ल । १ ल । ६४ ।.६४। ७ । ७ । ३ । जाननां । बहुरि ऋणराशिका संकलित धनल्याइए तहां गुणाकारका प्रमाण दोय है तातै पूर्वोक्त गच्छका जितनां प्रमाण तितना दुवा मांडि परस्पर गुणिएं । तहाँ (६७) उपरितन राशि प्रमाण दुवा मांडि परस्पर गुणें जाच्छ्रेणी होइ । बहुरि नीचे ऋणरूप राशि तिह विर्षे सतरह आदि प्रमाण दुवा माण्डि परस्पर गुणे एकलक्ष भर सात लाख अडसठि हजार अर चौसठि र सान होइ इनका भाग दीजिए । बहुरि इनमें एक घटाइए, बहुरि मुख चौसठि करि गुणिर, बहुरि एक धाटि गुणकार एक ताका भाग दीजिये ऐसे करतें ऋण राशिका संकलित धन चौसठि गुणां जगच्छ्रेणीकौं सूच्यंगुल- कौं सात लाख अडसठि हजार अर एक लाख पर सात अर चौसाठि भर एक करि गुणि ताका भाग दीजिए । तामें एक घटाइए इतना भया ६। ४२ । ७६८००० । १ ल । ६४ । ७ इहां जगणीकी सहनानी ऐसी-सूच्यंगुलकी ऐसी ऐसी जाननी । अब तिस धन राशि- विर्षे जो एक सौ छिहत्तरिकर गुणकार था पर नीचे चौसाठिका भाग- हार था तिन दोऊनिकों सोलाकरि अपवर्तन किएं एकसौ छिहत्तरिकी जायगा ग्यारह हुवा, चौसठिकी जायगा चारि हुवा । बहुरि गुणकारके चौसाठिकौं भागहारके चौसठिकरि अपवर्तन किए दोऊ नायगा प्रभाव भया । बहुरि दोय जायगा सात लाख अडसठि हजार अर दोय जायगा लाख तिनकी सोलह विंदी स्थापिए । बहुरि अंगुलनिका दोय जोयगा सातसै अडसठिका अंक रह्या तिनकौं तिनकरि संभेदनकरि तिनकी जा. यगा. दोयसै छप्पन लिखिए आगै तिनका अंक लिखिए । बहुरि दोय जायगा दौयसै छप्पन भए तिनकों परस्पर गुणे पणठी- होई । बहुरि दोय नायगा तिनका अंक भए अर एक जायगा तीनका अंक मागें था इनकों परस्पर गुणे सत्ताईस होइ बहुरि सत्ताईसों सात- वर्ग गुणचास करि गुणें तेरहसै तेइस होइ इनकौं जो चौसठिकी जायगा च्यारि भए थे तिनकरि गुणे बावन बाणवै होइ । ऐसें करि जगत्मतरकों ग्यारहका गुणकार अर तरांगुलकौं पणही अर पांच हजार दोयस बाणवैके आगें सोलह बिंदी तिनकरि गुणें जो प्रमाण होइ ताका भागहार दिएं धन राशिका गुण संकलित धन हो है का ( ६८ ) ४।६५=५२९२०००००००००००००००० बहुरि जंबूद्वीपत लगाय पुष्कराध पर्यंत ॥ दोद्दोवगा " इत्यादि चंद्रादिकका प्रमाण कह्या २।४।१२। ४२ । ७२ तिनको मिलाएं एकसो बत्तीस भए । बहुरि मानुषोत्तर पर्वत पर्यंत पर पुष्कराध द्वीपवियें चंद्रमानिका प्रमाण ल्यावनकों कहें हैं। पदमेगेण विहीणं दुभाजिद उत्तरेण संगुणिदं ।। पभवजुदं पदगुणिदं पदगणिदं तं वियाणाहि ॥ १ ॥ इसकरण सत्रकरि इहां वलय पाठ है । तात गच्छका प्रमाण आठ तामैं एक घटाइए ७ ताका आधाकारि उत्तर नो वलय वलय. २ प्रति वरतीका प्रमाण च्यारि तिहकरि गुणिए । ४ अपवर्तन करिए. तव चौदह भए १४ इनविर्षे प्रमव जो प्रथम वलयविर्षे प्रमाण रूप मुख एक सौ चवालीस जोडिए १५८ । वहुरि इनको गच्छ आठकरि गुणिए तब बारहसौ चौसठि भए इनविष एकसौ बत्तीस अबूद्वीप आदिकके मिलाएं तेरहसै छिनवै होइ सो इनकों जो पूर्व ऋण संकलित धन भया था तिनमैं घटाइए हैं। जातै-'ऋणस्य ऋण राशेद्धनं इसवचनकरि ऋणमैस्यों घटावनां अर राशिमै मिलावनां इन दोऊनिका एक अर्थ है। तहां ऋण संकलित धनसहित तेरहसै छिनका समच्छेद करिए तब ऐसा होइ-- १३९६ सू २१७६८००० १ ल ६४।७।१ । सू २ । ७६८००० । १ ल । ६४ । ७ । १ सो यहु गुणकार भागहारा- दिकका अपर्वतनादिक किएं भाज्य राशिकौं परस्पर गुण संख्यात सूर्य- गुलप्रमाण भया । सो इनों पूर्वोक्त ऋण संकलित धनका भाज्यविर्षे घटाइर तव ऐसा भया । २। ७६८००० । १ ल । ७। ६४ । १ इहां संख्यात सूच्यंगुलकी सहनानी ऐसी २ जाननी । पर था» घटा- (६९) .वनेकी सहनानी ऐसी-जाननी । ऐसे ऋण संकलित धनविर्षे एफ जगच्छेणी । ताका सहित ऋण सहित जो धन संकलित धन पूर्व कहा तीहस्यौं समान छेद करिए तब ऐसा-सू २ । ६४ । ७६८००० । १ ल। ७ । ६४ । ३।४ । ७६। ८००० । ७६८०००। १ ल । १ ल ७ । ७ । ६४ । ६४ । ३ । भया । इसविर्षे सूच्यंगुल विना और सर्व गुणकारनिको संख्यातरूप मानि इस प्रमाणकों संख्यात सूच्यंगुल गुणित नगच्छ्रेणी प्रमाण ऋण राशिभया भया । ताकी सइनानी ऐसी--२ इनकों पूर्वोक्त धन संकलित ऐसा४।६५=५२९२।१६ इहां सोलह विदीनिकी सहनानी ऐसी १६ जाननी । सो इहां जगत्पतर वि श्रेणीका गुणाकार है तातें दोयबार श्रेणी है । तहां जगच्छ्रेणीको ऋण राशिकी जगच्छ्रेणीकेसमान देखि तहाही दुसरी गुणकाररूप जगच्छ्रेणी विर्षे घटाएं किंचित् न्यूनपणा आया ऐसे करि गुण संकलित धन कहिए गुणकार विषै जोडका प्रमाण ताको ल्यायें किंचित् न्यून किए संख्यात सूच्यंगुल गुणित जगच्छृणीकरि हीन नगरमतर किंचितन्यून ग्यारहगुणां ताको प्रतरांगुल पणट्ठी प्रमाणकों बावनसै वाणवै मागे सोलह विदीका गुणकार करि ताका भाग दीजिए इतनां प्रमाण भंया ०-२ । ११ । इहां जगत्प्रतरके भाग किंचिन ४६५-५२९२।१६ न्यूनकी सहनानी ऐसी ०-जाननी पर पार्टी संख्यांत सूच्यंगुलकी ऐसी २ सहनानी जाननी । अब इसप्रमाणकौं पांच जायगा स्थापि एक नायगा एक करि गुणे चंद्रनिका प्रमाण होइ एक जायगा एक करि गुणे सूर्य- निका प्रमाण होई । एक जायग्रा अध्यासी करि गुणें ग्रहनिका प्रमाण होइ । एक जायगा पठ्ठाईस करि गुणे नक्षत्रनिका प्रमाण होई एक नायगा छ्यासठि हजार नवसै पिचहत्तर कोडाकोडि करि गुणें तारानि- का प्रमाण होइ इन सब निकों जोडे । -२ । ११ । १3०२।११। ८८ (७०) ४१६५-५२९२।१६।४।६५५२९२।१६४/६५-५२९२।१६ =०२।११। २८%D०२।११।६६९७५ । १४ ४।६५-५२९२। १६ ॥ ४ ॥ ६५-५२९२ । १६ जगत्प्रतरकौं सात तीन छह सात दोय पांच अंक भर दश विदी अर आगें बारहवें अध्याणवै इनका गुणकार अर प्रतरांगुल पणट्ठी आगे बावनसें वाणवै सोलह बिंदी इनका भागहार भया । सो इतने सर्व योतिषी विव है । ७३६ ७२५०००००००००० ०००००१२९८ ४६५-५२९२०००००००००००००००० बहुरि स्थान सहश अपवर्तन कहिए हीन अधिक अंकनिकी न गिणिकरि दाहकी विर्षे दाहकी सैंकडा विर्षे सैकडा इत्यादि यथास्थान अपवर्तन करना तिस न्याय करि सात तीन आदिदै करि गुणकारकै वीस अंक पर पांच दोयनै आदिदेकरि भागहारकै वीस अंकनिका अपवर्तनकार दोय जायगा अभाव करना । ऐसा मनविय विचारि-"वेसदछप्पण्णंगुल" इत्यादि सूत्रकरि दोयसै छप्पन अंगुलका वर्ग जो पणठी गुणित प्रतरां- गुल ताका भाग जगत्प्रतरको दीजिए इतने ४ । ६५। ज्योतिषी बिंब हैं। ऐसा आचार्य कह्या । सोई असंख्यात द्वीप समुद्र संबंधी सर्व ज्योतिषी बिंबनिका प्रमाण जाननां ।। ३६१ ।। आगें एक चंद्रमाका परिवाररूप ग्रहनक्षत्र तारे तिनका प्रमाण कहे हैं- अडसीदठा वीसा ग्रहरिक्खा तार कोडकोडीणं ।। छावहिसहस्साणि य णवसयपण्णत्तरिगि चंदे ॥ ३६२ ।। अष्टाशीत्यष्टाविंशतिः ग्रहऋक्षयास्ताराः कोटीकोटीनां ।। षट्पष्ठि सहस्राणि च नवशतपंचसप्ततिरेकस्मिन् चंद्रे ॥ अर्थ:-अध्यासी अर अट्ठाईस ग्रह अर नक्षत्र हैं । भावार्थ-ग्रह- अध्यासी हैं नक्षत्र अध्यासी है। बहुरि तारे छ्यासहि हजार नवसै (७१) पिचहत्तरि कोडाकोडी है ६६९७५०००००००००००००० इतना एक चंद्रमाका परिवार है ॥ ३६२ ॥ मागे अध्यासी ग्रहनिका नाम आठ गाथानि करि कहैं हैं- कालविकालो लोहिदणामो कणयक्त कणयसंठाणा ।। अंतरदोतो कचयवदुंदुभिरत्तणिहरूवणिभासो ॥ ६६३ ॥ कालविकालो लोहितनामा कनकाख्यः कनकसंस्थानः ॥ अतरदस्ततः कचयका दुंदुभिः रत्ननिभः रूपनिर्भासः ॥३६३ अर्थ-~-काल विशाल १ लोहित १ कनक १ कनकसंस्थान १ अंतरद १ कवयव १ दुदुभि १ रत्नानिभ १ रूपनि स १ ॥३६३॥ णीलो णीलभासो अस्ससहाण कोस कंसादी ।। वण्णा कंसो संखादिमपरिमाणो य संखवण्णोवि ॥३६४॥ नीलो नीलाभासोऽश्वस्थानः कोशः कंसादि । वर्णः कसः शंखादिपरिमाणः च शंखवर्णोऽपि ।। ३६४ ।। अर्थ - नील १ नीलामास १ अश्व १ अश्वस्थान १ कोश १ कंसवर्ण १ क १ शंखपरिमाण १ शंखवर्ण १ ॥ ३६४ ॥ तो उदय पंचवण्णा तिलो य तिलपुच्छ छाररासीओ ॥ तो धूम धूमकेदि गिसंठाणक्खो कलेवरो वियडो ॥३६५॥ ततः उदयः पंचवर्णस्तिलश्च तिलपुच्छः क्षारराशिः ॥ ततो धूमो धूमकेतुः एक संस्थानः अक्षः कलेवरो विकटः॥ अर्थ-उदय १ पंचववर्ण १ तिल १ तिलपुच्छ १ क्षारराशि १ धूम १ धूमकेतु १ एक संस्थान १ अक्ष १ कलेबर १ विकट १ ॥ ३६५ ॥
( ७२ ) इह मिण्णसंधि गंठी माणचउप्याय विज्जुजिभणमा ।। तो सरिस णिलय कालय कालादी केड अणयक्खा ॥३६६ इहा मिन्नसंधिः ग्रंथिः मानश्चतुष्पादो विद्युज्जिहो नमः ॥ ततः सदृशो निलयः कालच कालादि केतुरनयाख्यः३६६ अर्थ-अभिन्नसंधि १ ग्रंथि १ मान १ चतुशद १ विद्युजिम्इ ! नभ १ सहश १ निलय १ काल १ कालकेतु १ अनय ।। ३६६ ॥ सिंहाऊ विउल काला महकालो रुदणाम महरदा ॥ संताण संभवक्खा सम्वहि दिमाय संतिवाशृणो ॥ ३६७ ।। सिंहायुर्विपुलः कालो महाकालो रुद्रनामा महारुतः ।। संतानः संभवाख्यः सर्वार्थीदिशः शांतिर्वस्तुनः ॥३६७॥ अर्थः- सिंहायु १ विपुल १ काल १ महाकाल १ रुद्र १ महा- रुद्र १ संतान १ संभव १ सर्वार्थी १ दिशा १ शांति १ वस्तुन ? ॥३६७ ॥ णिञ्चल पलभ णिम्मंत जोदिमंता सायंपही होदि ।। भासुर विरजातत्तोणिहुक्खो वीदसोमोय ॥३६८॥ निश्चल: पलंभो निमंत्रो ज्योतिष्मान स्वयंप्रभो भवति ॥ भासुरो विरजस्ततो निदुःखो चीतशोकश्च ।। ३६८ ॥ अर्थ-निश्चल १ प्रलंभ १ निर्मत्र १ ज्योतिप्मान १ स्वयंपम १ भासुर १ विरज १ निदुःख १ वीतशोक १ ॥ ३६८ ।। सीमंकर खेमभयंकर विजयादि चउ विमलतत्थाय ।। विजयण्हु वियसो करिकट्टि गिजडिअग्गिजाल जलकेदू ।। सीमंकरः क्षेमभयंकरः विजयादि चत्वारः विमलनस्तश्च ।। विजयिष्णुः विकसः करिकाष्टः एकजटिरग्निज्वालः ज्वलकेतुः ।।
( ७३ ) - अर्थः-- सीमंकर १ क्षेमकर १ अभयंकर १ विजय १ वैजयंत १ नयंत १ अपराजित १ विमल १ त्रस्त १ विजयिष्णु १ विकस १ करिकाष्ठ १ एकनटि १ मग्निज्वाल १ जलकेतु १ ॥ ३६९ ॥ केदू खीरसऽघस्सवणा राहू महगहा य भावगहो । कुज सणि बुह सुक्क गुरू गहाण णामाणि अडसीदी ॥३७०॥ केतुः क्षीरसः अघः स्त्रवणो राहुः महाग्रहश्च भावग्रहः ।। कुजः शनिः बुधः शुक्लः गुरुः ग्रहाणां नामानि अटाशीतिः॥ ॥ ३७०॥ अर्थ:-केतु १ क्षीरस १ अघ १ श्रवण १ राहु १ महाग्रह १ भावग्रह १ मंगल १ शनैश्चर १ बुध १ शुक्र १ बृहस्पति १ ऐसे ग्रह- निकै अठयासी नाम हैं ॥ ३७० ॥ मागे जंबूद्वीपविर्षे भरतादिक्षेत्र वा कुलाचल पर्वत तिनकै तारा. निका विभाग दोय गाथानिकरि कईहै-- णउदिसयभजिदतारा सगदुगुणसलासमन्मत्था ॥ मरहादिविदेहोति य तारावरसेयवस्सधरे. ॥ ३७१ ॥ नयतिशतभक्तताराःस्वकद्विगुणद्विगुणशलासमभ्यस्ताः ।। गरतादि विदेहांतं च ताराः वर्षे च वर्षधरे ।। ३७१ ॥ अर्थः- दोय चंद्रमासंबंधी तारे एकलाख तेतीस हजार नवस- पचास कोडाकोडी जवृद्वीपविपं पाईए है । १३३९। ५ । १५ इनकौं एकसौ निर्वका माग दीजिए जो प्रमाण होइ ताकों भरतादिक्षेत्र वा कुला- चलनिकी एकतें दूणी दणी शलाका विदेह पर्यंत हैं परै छांधी आधी । भरत क्षेत्रकी एक शलाका हिमवत पर्वत की दोय शलाका ऐसे दूणी दुणी किए विदेहकी चौसाठि शलाका तातै परें नीलादि विर्षे आधी जाननी ।१।२।४।८।१६ । ३२ । ६४ । ३२ । १.६ । - .
( ७४ ) ८। ४ । २ । १। तिनकरि गुणे मरतादिक्षेत्र वा हिमवत मादि कुलाचलनिविय तारानिका प्रमाण हो है ।। ३७१ ।। आगें पाया हुवा अकनिकों कई हैं..- पंचदुत्तरसत्तसया कोडाकोडी य भम्हताराओ !! दुगुणाहु विदेहोत्ति य तेण पर दलिददलिदकमा ।। ३७२ ॥ पंचोत्तरसप्तशतकोटिकोट्यः च भरतताराः ॥ द्विगुणा हि विदेहांतं च तन परं दलित दलितक्रमः ॥३७२।। अर्थ:-सातसे पांच कोडाकोडी भातवि तारे हैं । ताते दुप दुणे विदेह पर्यंत हैं तहां पर बाध माध क्रमते हैं सोई कहिए हैं। भातक्षेत्रविर्षे सातस पांच कोडाकोडी ७०५।१४ हिमवत . पर्वतविर्ष चौदहसै दश कोहाकोडी १४१ । १५ ईमवत क्षेत्रवि भट्ट'ईससे वीस कोडाकोडी २८२ । २० । १५ महाहिमवत पर्वतविपं छप्पनस चालीस कोडाकोडी ५६ । ५१५ हरिक्षेत्र विपं ग्यारजार दोयसें.मरसी कोडा- कोडी ११२८ । १५ निषध पर्वत विष बाईस हजार पांच साठि कोडाकोडी २३५६ । १५ विदेह क्षेत्रवि पैंतालीस हजार एकसौवीस कोडाकोडी ४५१२१५ नील पर्वतविर्षे वाईस हनार पांचसे साठि कोडाकोडी २२५६ । १५ रम्यक क्षेत्रवि ग्यारह हजार दोयसै अ- सी कोडाकोडी १२२८ । १५ रुक्मि पर्वतविर्ष छप्पन चालीस कोडाकोडी ५६४ । १५ हैरण्यवत क्षेत्रविर्षे अठ्ठाईसै वीस कोडा- कोडि २८२ । १५ शिखरी पर्वतविर्षे चौदसै दश कोहाकोडी १४१४१५ ऐरावत क्षेत्रविर्षे सातसे पांच कोडाकोडी ७०५ । १४ । तारे जानने ॥ ३७२ ।। आगें लवणादि पुष्करा पर्यंत तिष्टते चंद्रसूर्य तिनका अंतराल ( ७५ ) - सगरविदलविवृणा लवणादी सग दिवायरद्धहिया ॥ सुरंतरं तु जगदी आसण्ण पहंतरं तु तस्सदलं ॥ ३७३ ॥ स्वकरविदलवियोने लवणादेः स्वकदिवाकरार्धाधिकं ॥ सूर्यातरं तु जगत्यासन्नपथांतरं तु तस्यदलम् ॥ ३७३ ।। अर्थ-अपना अपना जहाँ जेते सूर्य हैं तहां तितनां सूर्यनिका प्रमाणते अर्ध प्रमाणकरि सूर्यके विवनिका प्रमाणको गुणिकरि जो प्रमाण होइ ताकी लवणादिकका व्यासमैस्यों घटाइए जो प्रमाण रहै ताको स्वकीय सूर्यनिका प्रमाणते आघां प्रमाणका भाग दीजिए यों किए नेता प्रमाण भावे तितनां सूर्य सूर्यवि. अंतराल जाननां । वहुरि जगती कहिए वेदी तिह थकी " आसन्नपथांतरं " कहिए निकटवर्ती सूर्य विंबका अंतराल सो तिहस्यौं अर्ध प्रमाण जाननां । तहां उदाहरण- लवण समुद्रवि सूर्य च्यारि हैं ताका अर्घ प्रमाण दोय तीह करि सूर्य वियका प्रमाण अठतालीसका इकसठियां भाग ताकौं गुणे छिनवैका इकसठिवां भाग होइ -५ याकों लवण समुद्रका व्यास दोय लाख योजन ६१ तामैं समच्छेद विधान करि घटाइए तब एक कोडि इकईस लाख निन्या- १२१९९९०४ णवे हजार नवसैच्यारिका इकसठिवां भाग प्रमाण होइ ६१ बहुरि एक तो सूर्यविर्षे अंतराल पर सूर्यते अभ्यंतर वेदिकाका अर द्वितीय सूर्यते वाह्य वेदिका मिलि करि एक अंतराल ऐसे दोय अंतराल १२१९९९०४ अंतराल होई तो एक अंतराल विर्षे केता ६१ अंतराल होइ ऐसैंकरि ताकौं अपने सूर्यनिका प्रमाण च्यारि ताते आधा दोय ताका भागदीएं निन्याणवें हजार नवसै निन्याणवै योजन पर एक योजनका एकमौ चाईम भागवि. छब्बीस भागताका दोयकरि अपवर्तन विर्षे इतना (७६) किए तेरह इकसठियां भाग प्रमाण सूर्य सूर्यविर्षे अंतराल जाननां । बहुरि वेदी निकट सूर्यवित्रका यंताल तातें आधा जाननां । तहां विषमकौं कैसे आधा करिए तातै राशिसँस्यो एक घटाइ ९९९९८ ताका आधा करिए तव गुणचास हजार नवसै निन्याण योजन भए । बहुरि अवशेष एककौं भाषा स्थापि पूर्वोक्त अवशेष तरह इकसठियां २ -- भाग थे ते राशिक अश थे तातै तिनका भी आधा स्थापिए १३ इन ६१४२ दोऊनिकों समच्छेद विधान करि मिलाइ दोइकरि अपवर्तन करिए तब ३७ सैंतीसका इकसठिवां भाग प्रमाण अवशेष आया। ऐसे ही धातकी खण्ड कालोदक समुद्र पुष्कराध द्वीप तिनविर्षे तिष्ठते सूर्य सूर्यनिकै वीचि संतराल अर वेदी सूर्यनिविर्षे अंतराल ल्यावनां । भावार्थ-लवण समुद्रादिवि च्यारि आदि सूर्य हैं तिनविय एक एक परिधिविर्षे दोय दोय सूर्य जाननें तहां लवण समुद्रविषं अभ्यंतर वेदीत गुणचासहनार नवसै निन्याण योजन अर सैतीस इक- सठियां भाग पर जाइ परिधि है वहां सूर्य का विमान हैं। सो अठतालीस इकसठिा भाग प्रमाण है । बहुरि तात पर निन्याणवै हजार नवसै निन्याणवै योजन अर तेरह इकसठिवां भाग पर जाइ परिधि है तहां सूर्यविमान है सो अठतालीस इकसठिवां भाग प्रमाण हैं । बहुरि तातें पएँ गुणचास हजार नवंसै निन्याणवै योजन भर सैंतीस इकसठियां भाग परै जाइ लवण समुद्रकी बाह्यवेदी है। ऐसे इनकौं मिलाएं दोय लाख योजन प्रमाण लवण समुद्रका व्यास होहै । याही प्रकार धातुकी खण्डविर्षे च्यारि लाख योजन व्यास है । तामैं छह जायगा एक एक परिधिविर्षे दोय दोय सूर्य हैं । तिनि छहौं परिधिनिके बीचि सूर्य सूर्यविर्षे पाँच अंतराल है । तिनका प्रमाणः त्यावना। बहुरि तिस प्रमाणतें आधा आधा
( ७७ )
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अभ्यंतर वेदी सूर्यविबै अर बाहा वेदी सूर्यवर्षे अंतराल है सो त्यावना ।
याही प्रकार कालोदक समुद्र पुष्कराध द्वीपविधैं भी अंतरालका प्रमाण
त्यावनां ॥ ३७३ ॥
अव चार क्षेत्र कहे हैं-
दो दो चंदरवि पडि एकेक हादि चारखेतं तु ॥
पंचसय दससहियं रविविवाहियं च चारमही ॥ ३७४ ॥
द्वौ द्वौ चंदरवीप्रति एकैकं भवति चारक्षेत्रं तु ॥
पंचशतं दशसहितं रविविवाधिकम् च चारमही ॥ ३७४ ।।
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४८
अर्थ-दोय दोय चंद्रमा वा सूर्यप्रति एक चार क्षेत्र सो कितना
है ? पांचसै दश योजन पर सूर्य विषका प्रमाणकरि अधिक है ।
भावार्थ-चंद्रमा वा सूर्यका गमन करने का जु क्षेत्र गली सो चार क्षेत्र
कहिए ताका व्यास पांचसै दश योजन भर योजनका अठतालीस
इकसठियां भाग प्रमाण है ५१० ।
तिस च्या क्षेत्र विर्षे गली निका
प्रमाण मांगें कहेंगे तहां जिस गली वि एकचंद्रमाका सूर्य गमन करै
तिसही गली विर्षे दूसरा गमन कर है। ताते दोय दोय चंद्रमा व सूर्यप्रति
एक एक चार क्षेत्र है ।। ३७४ ॥
आगें तिन चंद्रमासूर्यनिका जो चार क्षेत्र ताका विभागका नियम
कहे हैं-
जंबुरविंदू दीवे चरंति सीदि सदं च अवसेस ।।
लवणे चरति सेसा सगखेत्तेव य चरति ॥ ३७५ ॥
जंबूरविंदवः द्वीपे चरंति अशीति शतं च अवशेषम् ॥
लवणे चरंति शेपाः स्वकस्वकक्षेत्रे एव च चरंति ॥३७५॥
( ७८ )
अर्थ-जंबू द्वीप संबंधी सूर्य वा चंद्रमा तौ एकसौ
असी योजनतो द्वीपविषं विचर है। अब शेष लवण समुद्रपिं विचरे हैं।
बहुरि अबशेष सूर्यचंद्रमा अपना क्षेत्रही विषं विचर है। भावार्थ:-
चार क्षेत्रका जो व्यास कशा तामें जंबूद्वीपसबंधी चंद्रमासूर्यनिका एक सौ
असी १८० योजन तो जंवृद्वीपविय भर तीनसौ तीस योजन अर अट-
तालीस भाग लवण समुद्रविष चार क्षेत्रका व्यास नानना । अवशेष
पुष्करापर्यंत द्वीप वा समुद्रसंबंधी चंद्रसूर्यनिका चार क्षेत्र अपना अपना
द्वीपवासमुद्रही वि नाननां ॥ ३७५ ॥
आगें सूर्यचंद्रनिके वीथी जो गली तिनका प्रमाण कहें हैं:
पडिदिवसमेकवीथिं चंदाइचा चरंति हु कमेण ||
चंदस्स य पण्णरसा इणस्स चउसीदिसयवीथी ।। ३७६ ।।
प्रतिदिवसं एकवीथि चंद्रादित्याः चरति हि क्रमेण ।।
चंद्रस्य च पंचदश इनस्य चतुरशीतिशतं वीथ्यः ॥३७६॥
अर्थ:-दोय दोय मिलिकरि एक एक दिन प्रति एक एक वी-
यीप्रति चंद्रमा वा सूर्य विचरै हैं क्रमकरि । तहां चंद्रमाकी पंद्रह वीयी
बहुरि इन कहिए सूर्य ताकी एक सो चौरासी गली हैं ; भावार्थ-जो
चार क्षेत्र कह्या तिहविर्षे चंद्रमाकी तो पंद्रहगली है, सूर्यकी एकसौ
चौरासीगली हैं तहां एक एक दिन प्रति एकएक गलीविर्षे दोय चंद्रमा
वा दोयसूर्य गमन करें हैं ॥ ३७६ ॥
आग वीथीनिका अंतराल करि दिवसप्रति गति विशेषकों कहें हैं--
पथवासपिण्डहीणा चारक्खेचे णिरेयपथभजिदे ।।
वीथीण विच्चालं सगविजुदोदु दिवसगदी ॥ ३७७ ॥
पथव्यासपिण्डहीना चारक्षेत्रे निरेकपथभक्त ।।
वीथीनां विचालं स्वकवियुतं तु दिवसगतिः ॥ ३७७ ॥
( ७९ ) अर्थः-पथव्यास पिण्ड कहिए बिंबका व्यासकरि गुण्या हुवा वीथीनिका प्रमाण तीह करि हीन जो चार क्षेत्र ताको एक घाटि वीथी- निका प्रमाणका भाग दिएं वीथीनिका अंतरालका प्रमाण हो है । बहुरि स्वकीय विवप्रमाण तामैं जो. दिवस गतिका प्रमाण है । तहां सूर्य विबका व्यास योजनका अठतालीस इकसठिवां भाग तीहकरि वीथी- ४८ निका प्रमाण एकसौ चौरासीकों गुणिएं तब अध्यासीसै बत्तीसका इक- सठिवां भाग प्रमाण होइ ८८३२ याको समछेद विधानछरि चार क्षेत्रका ६१ प्रमाण विर्षे घटाइए तहां पांचसै दसयोजनमैंस्यौं समछेद किए इकतीस हजार एकसौ दशका इकसठिवां भाग होय ३१११० यामें सूर्य विंब- प्रमाण अधिकथा सो जोड इकतीस हजार एकसौ अट्ठावनका इक- ६१ सठिवां भाग भया ३११५८याविर्षे पथव्यास पिण्ड अट्यासीसौ बपत्तीका ६१ इकसठिवां भाग ८८३२ घटाइएं तब बाईस हजार तीनसै छब्बीसका इकस- ६१ ठिा भाग होय २२३२६ याकौं एक घाटि वीथीनिका प्रमाण एकसौ ६१ तियासी ताका भाग दीजिए तहां पूर्व भागहार इकसठि ताको एकसौ तियासी करि गुणि भाग दीजिये तब बाईस हजार तीनसे छब्बीसकों ग्यारह हजार एकसौ तेरसठिका भाग दीजिए इतना भया २२३२६ तहां भाग दिएं दोय योजन पाए, सो दोय योजन प्रमाण १११६३ वीथीके बीच अंतरान है बहुरि याने स्वकीय विच जो जो सुनिरका प्रमाण योजनका अडनालीस इकसठिवां भाग सो मिला एकमो तरिका इकसठियां भाग प्रमाण दिन दिन प्रति मानक्षेत्रका प्रमाण हो है। भावार्थ:- पूर्वोक्त चार क्षेत्रका व्यासविष कसी चौरासी र करने की गली है 1 तहां प्रधम गली आ दमी पली दिप दोय योजन- का अंतराल है ऐसे ही दोय दोय योजनका एक अंतराल जानना । बहुरि प्रथम गलीकी आदीत द्वितीय गलीकी आदि पर्यंत अंगल जानना ऐसे ही दिन दिन प्रति ताते दुसरे दिन तिस प्रथम गह योजनका एक सौ सत्तरीका इकाठिवा भाग परै जाइ दुसरी गलीवित गमन कर हैं। ऐसे दिन २ प्रति पर पर गमन क्षेत्रका प्रमाण जानना ! बहुरि ऐसे ही चंद्रमा चार क्षेत्र इकतीस हजार एक सौ अठ्ठापन योजन इसठियां भाग प्रमाण- ३११५८ तामें पथ व्यास पिण्ड आरसौ चालीसका इकठिवां भाग ८४० ताम घटाइ एक घाट चौदह १४ा - भाग दिएं पैंतीस योजन अर दोइस चौदहका च्यारिस सत्ताईसवां भाग प्रमाण नौ वीथी वीथीविषे अंतराल हो है। यामें चंद्रविका प्रमाण 'मिलाए छत्तीस योजन भर एकसौ गुण्यासीका चारिसे सत्ताईसवां भाग प्रमाण दिन दिन प्रति गमन क्षेत्रका प्रमाण जाननां ॥३७७ ॥ ऐसे ल्याया लो दिन प्रति गमन प्रमाण ताको आश्रय करि मेल्ने मार्ग मार्ग प्रति अंतराल अर तिन मार्गनिका परिधिको कई हैं सुरगिरिचंदनवीणं मग्गं पडिअंतरं च परिहिं च ।। दिणादित्तप्परिहीण खेवादो साइए कमसो ॥ ३७८ ॥ सुरगिरिचंद्ररवीणां मागं प्रत्यंतरं च परिधिः च ॥ दिनगतिन परिधीनां क्षेपात् साधयेत क्रमशः ॥ ३७८ ६ (८१) मर्थः- मेरुगिर भर चंद्रमा संयनिका मार्ग इनके वीचि अंतराल, बहुरि तिन मार्गनिका परिघि सो त्यावनां । कैसे सो कहिए हैं-जंबू- द्वीपका व्यासका एक लाख योजन तामै वृद्वीपके अंततें एकसौ अस्सी योजन नै मभ्यंतर मार्ग है । तात सन्मुख दोऊ पार्श्वनिका द्वीपसंबंधी चारक्षेत्र मिलाए तीनसे साठियोजन भए सो घटाएं निन्यानवे हजार छौ चालीस योजन प्रमाण अभ्यंतर वीथीका सूचीव्यास हो है। इतनांही अभ्यंतर वीपी विष तिष्ठने सन्मुख दोऊ सूर्य तिनके बीच अंतराल है। बहुरि तामें मेरुका ध्यास दशहजार योजन घटाइ ८९६४ ० आधा करिए चत्र चवालीस हजार आठसैवीस योजन प्रमाण मेरुगिरि भर अभ्यंतर वीथी विष तिष्ठता सूर्यफ वीचि अंतराल हो है । बहुरि यामें दिनतिका प्रमाण दोय योजन अर पठतालीसका एकसठियां भागप्रमाण मिलाएं चवालीसहजार भाठमैं बावीस योजन भर मठतालीसका इकसठिवां भाग प्रमाण दपरी वीथी विर्षे दिनगति- का प्रमाण मिलाएं. उत्तरोत्तर पथवि तिष्ठता सूर्य अर मेरुगिरिक बीचि अंतरालका प्रमाण हो है। वहरिमभ्यंतर वीथीका सचीव्यास ९९६४० विर्षे दगा दिन गतिका प्रमाण तीनिसै चालीसका इकसठिवां भाग ताका पांच योजन अर पैतीसका इकसठिवां भाग मिलाएं निन्याणवै हजार छसै पैंतालीस योजन' योजनका पैंतीस इकसठिवां भाग प्रमाण वीथीवि तिठते दोऊ सूर्य तिनकै वीचि अंतराल हो है। इतनाही दूसरी वीथीवि तिष्ठते दोऊ सूर्य तिसके बीचि अंतराल हो है । इतनांही दुसरी वीथीका सूची व्यास हो है । ऐसें अपना अभ्यंतरवर्ती पूर्वपूर्व व्यासविर्षे तिष्ठते दोऊ सूर्यनिकै वीचि अंतराल हो है । बहुरि- विक्खंभवग्गदहगुणकारिणी वट्टस्सपरिरहो होदि" इस कारण सूत्रकरि अभ्यंतर परिधिका (सूची ब्यास ९९६४० का परिघि अनाईये । तब तीन लाख पंद्रह हजार निवासी ३१५०८९ (८२ ) योजन प्रमाण होइ बहुरि यामें यामें दूना दिन गतिका प्रमाण ३४० का परिधिका) प्रमाण विष्कम ३४० का वर्ग दश गुणा ११५६००० ६१ ६१४६१ ताका वर्गमूल १०७५ ल्याइ अपना भाग हारका भागदिए सतरह योजन भर योजनका अठतीस इकसठि भाग होइ सो मिलाए तीन लाख पंद्रह हजार एकसौ छह योजन अर याजनका अठतीस इकसठियां भाग प्रमाण ३१५१०६ । ३८ द्वितीय वीथीका परिधि हो है । ऐसे ही दृणा ६१ गतिका परिधिका प्रमाण पूर्व पूर्व वीथीका परिधिविष जोडै उत्तर उत्तर वीथीका परिधि हो है । इस प्रकार करि दिन गतिके मिलावनेते अर दृगा दिन गतिका परिधिक मिलावनते क्रमते मेरुगिरि सूर्यके वीचि अंतराल पर वीथी निका परिधि साधिए हैं ॥ ३७८ ।। में ऐसे कह्या जु परिधि तिह विौं भ्रमण करता सूर्य ताके दिन रात्रिको कारणपर्ने अर तिन दिन रात्रनिका प्रमाण मार्गनिकी अपेक्षा करि कहे हैं- सूरादोदिणरची अहारस वारसा मुहुत्ताण ॥ अन्भन्तरम्हि एदं विवरीय वाहिरम्हि हवे ॥३७९ ॥ सूर्यात् दिनरात्री अष्टादश द्वादश मुहूर्तानाम् ॥ अभ्यन्तरे एतत् विपरीतम् बाह्ये भवेत् ।। ३७९ ।। अर्थः- सूर्यते दिन रात्र अठारह मुहूर्त प्रमाण अभ्यंतर परिधि- विर्षे हो है । यहु ही विपरीत उल्टा वाह्य परिधविष हो है। भावार्थः-जबूद्वीपकी वेदीलें रै एकसौ अस्सी योजन जो अभ्यंतर परिधि है तिहविर्षे सूर्य भ्रमण करै तिह दिन अठारह मुहूर्तका तो दिन हो है । अर बारह मुहूतकी रात्र हो है । बहुरि लवण समुद्रवि सूर्य वि प्रमाण करि अधिक तीन दस योजन पर जो बाह्य परिधि निहि .
(८३ ) . विर्षे सूर्य भ्रमण करै तिह दिन बारह मुहूर्तका दिन हो है । अठारह मुहूर्तकी रात्रि हो है ॥ ३७९ ॥ आज सूर्यका अवस्थिति स्वरूप भर दिन सनिविर्षे हानिचय हैं ककडमयरे सव्यमन्तरवाहिरपहाहि ओहोदि ॥ मुहभूमीण विसेसे वीथीणंतरहिदेय य चयं ॥ ३८० ॥ कर्कटमकरे सर्वाभ्यन्तर बाह्य पथस्थितो भवति ।। मुखभूम्योः विशेषे वीथीनामान्तरहिते च चयः ॥३८०॥ अर्थ:-कट अरमकरविर्षे सर्व अभ्यन्तर वाह्यपथविर्षे तिष्ठतो सूर्य है । भावार्थ-कर्कराशिविर्षे सूर्य प्राप्त होई तब अभ्यतर वीथी विर्षे भ्रमण करें हैं। बहुरि मकरगशीविर्षे सूर्य प्राप्त होय तब बाह्य वीथीविर्षे भ्रमण कर है । बहुरि तिस राशिकी समाप्ततापर्यंत दिनरात्रीका प्रमाण तितनाही रहे हैं कि विशेष है । तहां कहिए है दिन दिन प्रति हानिचय हैं । कैसे ? मुखतो वारह मुहूर्तक. दिन भर भूमि अठारह मुहूका दिन तहां विशेषे कहिए भूमिमस्यौं मुख घटाएं अवशेष छह रहे इनको वीथी एकसौ चौरासी तिनकै वीचि अन्तराल एकसौ तियासी सो इतनै दिननिविर्षे जो छह मुहूर्त होई तो एक अंतराल वि कितना मुहूर्त होइ । ऐसे किएं छहका तीनसौ तिया सिर्वा भाग हो है। तहाँ तीन करि अपवर्तन कीए दोय मुहूर्तका इकसठिवा भाग प्रमाण दिन दिन प्रतिहानि चय होय है। भावार्थ:-अभ्यन्तर वीथी विर्षे सूर्य जिह दिन भ्रमण करै तिह दिन अठारह मुहूर्तका दिन हो है । बहुरि तातै पर दूसरी वीथी विर्षे जिह दिन प्रमाण फेरै तिह दिन अठारह मुहूर्तमेस्यौं दोय मुहूर्तका इकसठिवां माग घटाइए इतने प्रमाण दिन हो है। ऐसेही दिन दिन प्रति घटना घटता वाद्याविर्षे सूर्य प्रमैं तिह दिन चारह मुहूर्तका दिन -- (८४ ) हो है । बहुरि तिसतै उ मार्गविष सूर्य मैं तिह दिन बारह मुहूर्तवि- पैं दोई मुहूर्वका इकसठिवां भाग मिलाइए इतना दिन हो है । ऐसे हानि चय जाननां । बहुरि तिस मुहूर्तका अहोरात्र है तामैं जितने प्रमाण दिन होय सो घटाएं अवशेष तहां रात्रिका प्रमाण जाननां ।। ३८० ॥ ऐसे कहे जु दिन रात्रि तिनवि तौ ताप पर तमको वर्तमान काल है । दिनवि तौ ताप कहिए तावडा वत है रात्रिवि तमकों कहिए अंधकार वत है । तातें तम तापका क्षेत्र प्रमाण निरूपण करत संता आचार्य श्रवण माह मासादिकनिक दक्षिणायन उत्तरायणकों निरूपै है- सावणमाघे सम्वन्मन्तरवाहिरपहहिहो होदि । सूरद्वयमासस्स य तावतमा सव्वपरिहीसु ॥ ३८१ ॥ श्रावणमाघे सर्वाभ्यंतर वाहपथस्थितो भवति । सूर्यस्थितमासस्य च तापतमसी सर्वपरिधीषु ॥ ३८१ ।। अर्थ:-श्रावण मासविबतौ सूर्य अभ्यन्तर मार्ग विषै तिष्ठै है। माघमास- विर्षे सूर्य सर्व ते बाह्यमार्गवि तिष्ठै है । तिस सूर्य तिष्ठनेको जु मास तिन विषै. ताप अर तमके वर्तनेका प्रमाण सर्व परिधिनिविर्षे त्यावनां । तहा छह महिनांके एकसौतियांसी दिन होय तौ श्रावण आदि एक मादिक महिनाके केते दिन होइ । ऐसें कीएं श्रावण भएं साढातीस, भादवा भएं एकसठि असोज़ भए सादा इक्याणवै कार्तिक - मए एक सौ बाईस मार्गशीर्ष भए एकसौ साढानावन पौष भए तिसी दिन हो हैं सो-एतौ दक्षिणायनके दिन है। बहुरि माघ भए इकसठि चैत्र भएं साढाइक्याणवै, वैशाख भएं एकसौ बाईस ज्येष्ठ भएं एकसौ साढाबावन, आषाढ भए एक सौ तियासी ए उत्तरायणके दिन हैं॥ ३८१ ॥ एकसौ (८५) सांग सर्व परिधिनि विपं तापतमके श्माणल्यावका विधान को गिरिमतरमज्झिमवाहिरजलछहभागपरिहि तु॥ सहिरिदेवष्ठियमुहत्तगुणिदे दु तायतमा ॥ ३८२ ।। गिर्यम्पतरमध्यमवाटाजलपष्टभागपरिधि तु ।। पष्ठिहिते मूर्यस्थितमुहुर्तगुणित तु नापतमसी ॥ ३८२ ॥ अर्थ:-मागिा भर अभ्यंतर पोथी अर जल विपं लवण समुद्राका शासका हा भाग पा जो जो परिधिका प्रमाण होई ताको साठिका माग दीजिए और सूर्य जिस मास वि तिष्ठतिस मास वि जो दिन रात्रिका मुहूर्ननिका प्रमाण तीहकरि गुणिर तत्र ए तब तीहमास विप जो दिन रात्रिका प्रमाण तीहकरि गुणिए नव तीह मास विर्षे तापतमका विषयभूतक्षेत्रका प्रमाण भाव है। तहां मरुगिरिका व्यास तो दस हजार योजन है । बहुरि जंबूद्वीप का व्यास १००००० वि दीपका चार क्षेत्र १८० को दोऊ पार्श्व- निका ग्रहणके गर्थि दुर्गाकरि ३६० घटाइए तब अभ्यनर वीथीका सूची व्यास नियाण हजार छसे चालीस योजन हो है ९९६४० बहुरि नार क्षेत्रका प्रमाण ५१० को आषाकरि २५५ या द्वीपसंबंधी चार क्षेत्र १८० श्टाइ अवशेष ७५ को दोऊ पार्श्वनिका ग्रहणके भर्थि दृणा १५० करि जेबूद्वीपका व्यास १००००० विर्षे मिलाएं एक लाख एकसौ पचास योजन प्रमाण मध्यम वीथीका सूची व्यास हो है। बहुरि लवण समुद्र संबंधी चार क्षेत्र ३३० को दोऊ पार्बनिका ग्रहण के गर्थि दुणा ६६० करि जंवू द्वीपका व्यास १००००० विर्षे मिलाएं एक लाख छसै साठि योजन प्रमाण वाझ वीथीका सूची व्यास होह बहुरि लवण समुद्रका व्यास २००.०० को छहका भाग देइ (८६) लब्धराशि ३३३३३२ को दोऊ पानिकों ग्रहणके अर्थिदणा करि ६६६६६- जंबूद्वीपके व्यास १००० ०१. विष मिलाए एक लाख छासठि हजार छसै छासठि योजन पर अपवर्तन किए दोयका तीसरा भाग प्रमाण जल षष्ठ भागका व्यास हो है। अब इस पांचौ व्यासनिकों-"विखं भवग्गदहगुणकारिणीवट्टस परिहिय होदि " इस करणसूत्रकरि परिधि का प्रमाण ल्याइये तब मेरु- गिरिका परिघि इकतीस हजार छौ वाईस योजन ३१६२२ अभ्यंतर वीथीका परिधि तीन लाख पंद्रह हजार निवासी योजन, मध्यम वीथोका परिधि तीन लाख सोलह हजार सातसे योनन, बाह्य वीथीका परिधि तीन लाख अठारह हनार तीनस चौदह योजन, जल षष्ठ भागका परिषि पांच लाख सत्ताईस हजार छियालीस योजन प्रमाण है. ऐसे परिधिका प्रमाण ल्याइ इन परिधिनिवि जो विवक्षित परिधि होइ ताको साठिका भाग दिएं पांचसै सत्ताईस योजन अर एकका तीसवां भाग प्रमाण होइ । बहुरि जिस मास विर्षे सूर्य तिष्ठ तिस मास संबंधी दिन रात्रिके मुहूर्तनिका अठारहसौं लगाय बारहपर्यंत प्रमाण १८ । १७ । १६ । १५ । १४ । १३ । १२ तिहकर गुणिए । जैसे पूर्वोक्त प्रमाण को अठारह करि गुण चौराणवैसै छियासी योजन अर अठारहका ३० तीसवां भागकौं छहकरि अपवर्तन किए तिनका पांचवा भाग प्रमाण होई ९४८६ ऐसे किए जो जो प्रमाण मा सो ताप तमका विषयभूत क्षेत्र जाननां । भावार्थ-मेरुगिरिका परिघि इकतीस हजार छसै वाईस योजन है ३१६२२ तीइदिएँ श्रावण मासिविर्षे जहां मंठारह मुहर्तकी रात्रि १ ७१ ५२. -- (८७) ३ । हो है वहां चौराणवस छियासी योजन अर योजनका तीन पांचवां भाग वे तो एक सूर्य के निमित्त तावडा है । अर तिनके वीचि अंत- सलविर्षे तरेसठ तेईस योजन पर दोयका पंचम भागविखं अंधकार है, भर ताके सन्मुख दूपरा अंतगालविर्षे इतनाही अन्धकार है, पर ता- के सन्मुख दमा तालविणे इतनाही अंधकार है इन सबनिको जोड ९४८३ ॥६३:४।६। ९४८६ । ॥ ६३२४ ॥६॥ इकतीस हजार छस च.वीस योजन प्रमाण परिधि हो है । ऐसेंही अन्य परिधिनिवि जाननां । बहुरि विवभिन परिधिको साठिका भागा देइ एक मुहूर्त करि गुण जो प्रमाण आवे तितना मासप्रति तापतमका घटती चधती क्षेत्रका प्रमाणरून हानिक्य जाननां तहां विवक्षिन मेरुगिरिका परिधिको सा- ठिका भाग देह एक मुहुर्त परि गुणें पांचसै सत्ताइस योजन अर एकका तीसवां भाग प्रमाण हानिचय होइ । एक महूर्त रात्रिदिन कैसे घटै वधै सो कहिए है । एक दिनवि दोय एकठिवां भाग प्रमाण हानिचय होय तो सादा तीस दिनवि कितना हानिचय होइ ऐसे का अपवर्त- नरिए एक मुहूर्त एक मासविर्षे भाव है । बहुरि साठि मुहर्तविष सर्व परिधि प्रमाणावपं गमन करे तो एक मुहूर्तवि कितना क्षेत्रवि गमन करें ऐसे परिधिका साठिवां भाग प्रमाण एकमुहूर्तविपं गमन क्षेत्रका भावार्थ:--मेरुगिरिका परिधि इकतीस हजार छसै बाईस योजन दिन है ३१६२२ तोहविर्ष श्रावणमासविपैं जहां अठारह मुहूर्तका बारह मुहूर्तकी रात्रि हो है तहां चौराणवैसै छियासी योनन योजना तीन पांचवां भागवि. सौ एक सूर्यके निमित्त तावडा पाइर हैं। अर ताके सन्मुख इतनाही दुसरे सूर्यके निमित्त तावडा है। पर तिनके वीचि अंतरालविर्षे तरेसठिस तेईस योजन पर दोयका पंचम भागविर्षे अंधकार है, अर ताके सन्मुख अर , (८८) दुसरा अंतालविर्षे इतनाही अंधकार है इन सबनिको जो २ I ५ ९४८३ । ॥ ६३२४ । । ॥ ९४८६ ॥ ६३२४ । इकतीस हजार छ बाईस योजन प्रमाण परिधि होई । ऐसें ही अन्य परिविनिविर्षे जाननां । बहुरि विवक्षित परिधिको साठिका भाग दे एक मुहूर्तकरि गुणें जो प्रमाण भाव तितना मास प्रति ताप तमका घटती वधती क्षेत्रका प्रमाणरूप हानिचत्र जाननां तहां विवक्षित मेहगिरिका परिधिको साठिका भाग देइ एक मुहूर्त करि गुण पांचसे सत्ताईस योजन भर एकका तीसवां शग प्रमाण हानिच्य होइ । एक मासविर्षे एक मुहूर्त रात्रिदिन कैसे घटें बधै सो कहिए है। एक दिनविर्षे दोय इकसठियां भाग प्रमाण हानिचय होय तो साहा तीस दिनविष हानि. चय होई ऐसे करते अपवर्तन किएं एक मुहूर्त एक मासविर्षे भावैहै। बहुरि साठि मुहूर्तवि सर्व परिधि प्रमाण वि गमन करे तो एक मुहूर्तविर्षे कितनां क्षेत्रवि गमन करे ऐसे परिधिका साठवां भाग प्रमाण एक मुहूर्तवि गमन क्षेत्रका प्रमाण अवैहै। भावार्थ:-मेरुगिरिक्षा परिधिवि श्रावणमासते भाद्रवमासविर्षे पांचसै सत्ताईस योजन अर एकका तीसवां भाग प्रमाण तापक्षेत्र घटतां है तम क्षेत्र बधता पाइए है । तहां एक सूर्यसंबंधी तापक्षेत्र निवासीसे गुणसठि योजन भर सतरह तीसवां भाग पर इतनाही दूसरा सूर्य संबधी । बहुरि एक अंतराल विर्षे तम क्षेत्र अहसठिसे इक्यावन योजन पर ग्यारह सत्तरह वां भाग भर इतनांही दुसरा अंतरालविर्षे ऐसे सर्व मिलि मेरुगिरिका परिधिप्रमाण हो है । ऐसेंही पूस मास पर्यंत दक्षिणा- यन विष तौ मास मास पर्यंत पांचौं सत्ताईस योजन भर एकका तीसवां भाग प्रमाण आताप क्षेत्र नौ घटता घटता अर तम क्षेत्र वधता जानना ।
(८९) बहुरि माघ फाल्गुनादिक आपाढ पर्यंत उत्तरायण विर्षे मास मास पर्यंत तितनाही ताप क्षेत्र बघता बघता अर तम क्षेत्र घटता घटता जानना । ऐसे ही सर्व परिधिनि विर्षे तापतम क्षेत्रका प्रमाण विवक्षित मास विर्षे त्यावनां । बहुरि इहां पांच परिधि विष मास मासनिकी अपेक्षा वर्णन किया है इस ही प्रकार विवक्षित क्षेत्र का परिषिविप विवक्षित दिन अपेक्षा तार तम क्षेत्रका प्रमाण त्यांवना । बहुरि इहां जंबूद्वीप संबंधी सर्यनिका लवणपमुदके व्यासका छठा भाग पर्यंत प्रकास है तात तहां पर्यंत ग्रहण किया है । बहुरि जिस क्षेत्र वियू ताप है तहाँ दिन जानना जहां ता है तहां रात्रि जाननी ॥ ३८२ ॥ भाग ऐसे ल्याया जु ताप तमका क्षेत्र ताका प्रवर्ततकों हैं हैं- परिहिम्हि जम्हि चिठिदि सूरो तस्सेव तावमाणदलं ।। विच पुरदो पसप्पदि पच्छामागे य सेसद्ध । ३८३ ॥ परिधौ यस्मिन् तिष्ठति सर्यः तस्यैव तापमानदलम् ॥ विवपुरतः प्रसर्पति पवाझागे च शेपार्धम् ॥ ३८३ ॥ अर्थ:-जिस परिधिविर्षे सूर्य तिष्ठ हैं तिस परिधिहीका तापका जो प्रमाण ताका आधा तो सूर्यके विवते आग फलें है, अव शेष आधा पीछे फैले है। भावार्थ:--परिधिविष जो तापका प्रमाण वह्या तिह विष जहां सर्यका विंच पाइप तिड क्षेत्रकै मागैतिस प्रमाणः आधा ताए फैले है, पर साधा पीछे फैले है। इहां प्रश्न-जो मेरुगिरिकी परिधीने आदि देकरि जिन परिधि. निविय सूर्यका गमन नाहीं तहां ताप कैसे फैले है ? ताका समाधान- सूर्य विवते सूधासन्मुख जो तिस विवक्षित परिधिवि क्षेत्र तात आण वीमाधा ताप फैले है । बहुरि ऐसा जाननां जैसे चिराकके भाग - (९०) - पी, प्रकाश हो हैं । बहुरि जैसे जैसे चिराक आगाने चाल से तैसे आगाने तो प्रकाश होता जाय पीछेते अंधकार होता भाव तैसे ही सूर्य विब जैसे जैसे आगें चले तैसें तैसे मागें ताप फैलता जाय पीछे पीछे तम होता आवै है ।। ३८३ । अब ताप तमकी हानि वृद्धिको कहै हैं--- पणपरिधीयो भजिदे दसगुण सुरंतरेण जल्लद्धं ॥ साहोदि हाणिवठ्ठी दिवसे दिवसे च तावतमे ॥ ३८४ ॥ पंच परिधिषु भक्तेपु दशगुण सूर्यातरेण यल्लब्धं ॥ सा भवति हानिवृद्धिर्दिवसे दिवसे च तापतमसा ॥३८॥ अर्थः-पांचो परिधिवि दशगुणां सूर्यके अंतरालनिका भांग दिएं जो लब्धिराशि होइ सो दिन दिन विर्षे तापतमकी हानि वृद्धीका प्रमाण जाननां । तहां पंच परिधिनिवि विवक्षित मेरुगिरि परिधि तहां साठि मुहूर्त निविर्षे इकतीस हजार छहसै वाईस योजन प्रमाण क्षेत्रवि गमन करै तौ दोय मुहूर्तका इकसठिवा भागमात्र दिनका वृद्धिहानिका जो प्रमाण तामैं कितनां गमन करै ऐसें तिस परिधिप्रमाणकौं साठिका भाग दिएं दोयका इकसठि भाग करि गुणे दोय करि अपवर्तन किएं सत्रह योजन अर पांच सौ बाराका अठारहसै तीसवां भाग प्रमाण आवै सोई सूर्यके गमन मार्गनिका अंतराल एकसौ तियासी ताकौं दसगुणां किएं अठारहसे तीस ताका माग विवक्षित मेरुगिरिक परिधि प्रमाणकौं दीए प्रमाण आवै ताते ऐसा विचार आचार्यनै ऐसा कह्या कि विवक्षित परिधिकौं दशगुणां सूर्योतरालका भाग दिएं ताप तमका वृद्धिहानिका प्रमाण आवै है । ऐसें सतरह योजन पर पांचसै बारहका योजन अर पांचसै बारहका अठारहसे तीसवां भाग प्रमाण दिन दिन प्रति उत्तरायण विर्षे ताप बधै है तम घटै है, दक्षिणायन विर्षे तम वर्षे ।
(९१)
है ताप घटै है । याही प्रकार मन्य परिधिनिविर्षे दिन दिन प्रति ताप
तमका घटनां धनां त्यावनां ॥ ३८१ ।।
भाग पांचौ परिधिनिके सिद्ध भए अंकनिकों दोय गाथानिकरि
चावीस सोल तिण्णिय उणण उदीपण्णमेकतीसं च ।।
दुखसत्तद्विगितीसं चोइस तेसीदि इगितीसं ॥ ३८५ ॥
द्वाविंशतिः पोडश त्रीणि एकोननवतिपंचाशदेकत्रिंशच ॥
द्विख सप्तपष्टयेकत्रिंशत् चतुर्दशत्र्यशीतिरेकत्रिंशत् ॥३८५॥
अर्थ:-वाईस सोला तीन ३ १६ २२ इन अंक क्रम करि इक-
तीस हजार छसै वाईस योजन प्रमाण मेरुगिरिका परिघि है वहुरि
निवासी पचास इकतीस ३१५०८९ इन अंक क्रमकरि तीन लाख
पंद्रह हजार निवासी योजन प्रमाण अभ्यंतर वीथीका परिधि है।
बहुरि दोय बिंदी सदसठि इकतीस ३१६७०२ इन अंक क्रमकरि
तीन लाख सोलह हजार सातसे दोय योजन प्रमाण मध्य वीथीका
परिधि है । बहुरि चौदह तियासी इकतीस ३१८३१४ इन अंक
कमणरि तीन लाख अठारह हजार तीनसौ चौदह योजन चाह्य वीथीका
परिधि है ।। ३८५॥
छादालसुण्णसत्तयवावण्ण होंति मेरुपहुदीण ।।
पंचण्हं परिधीओ कमेण अंककमेणेव ॥ ३८६ ॥
पट्चत्वारिंशच्छ्न्यसप्तकद्विपंचाशत् भवंति मेरुप्रभृतीनां ।
पंचानां परिधयः क्रमेण अंककमेणैव ॥ ३८६ ॥
अर्थ:-छियालीस सून्य सात बावन ५२७०४६ इन अंक
कमारि पांच लाख सत्ताईस हजार छियालीस योजन प्रमाण जल पृष्ठ-
भागका परिधि है । ऐसें भेरु आदि जै पंचनिका परिधिहै सो क्रमकरि
मंकनिका अनुकमकरि जाननां ॥ ३८६ ॥
(९२ ) भाग जिनका प्रमाण समान नाहीं ऐसी जु अभ्यन्तरादि परिधि तिनको समान कालकरि कैसे समाप्त करें हैं सो कई हैं- णीयंता सिग्यगदी पविसंता रविससी दु मन्दगदी। विसमाणि परिरयाणि दु साहति पमाणकालन ।। ३८६ ॥ निर्यातों शीघ्रगती प्रविशतो रविशशिनौ तु मंदगती ।। विषमान परिधीस्तु साधयतः समानकालेन ॥ ३८७ ॥ अर्थ- सूर्य पर चंद्रमा ए निकसते हुए ज्यों ज्यों अगली परि- धिकौं प्राप्त हुए त्यो त्यों शीघ्र गमनरूप हो हैं उतावले चले हैं । बहुरि पैसते हुए ज्यौं ज्यौं माहिली परिधिनिकों प्राप्त होइ त्यो त्यों मंद गमनरूप हो है धीरे चले हैं । ऐसे होइ समानकालकरि. विषम प्रमाणकौं लिएं जु स्मभ्यंतरादि परिधि तिनको समाप्त करें हैं गमनकरि साधे हैं ॥३८६॥ माणु तिन सूर्य चंद्रमानिका गमन विधान दृष्टांत मुखकर कहे हैं- गय हय केसरि गमणं पढमे मझतिमे य सूरस्स ।। पडिपरिहिं रविससिणो मुहत्तगदिखेत्तमाणिज्जो ॥३८८॥ गजहरिकेसरि गमनं प्रथमे मध्ये अंतिमे च सूर्यस्य ।। प्रतिपरिधि रविशशिनोः मुहूर्तगतिक्षेत्रमानेयम् ॥ ३८८ ॥ अर्थ-गज घोटक केशरी गमन प्रथम मध्य अंतविर्षे सूर्य चंद्रमाके होहै । भावार्थ-सूर्य चंद्रभा अभ्यंतर परिधिविर्षे हस्तीवत् मंद गमन करें हैं, बहुरि मध्य परिधिविर्षे घोटकवत् 'तात शीघ्र करें हैं । वहुरि बाह्य परिधिवि. सिंहवत् अति शीघ्र गमन कर है। बहुरि अब सूर्य चंद्रमानिके परिधि परिधि प्रति एक मुहूर्तविर्षे गमनका प्रमाण ल्यावनां । कैसे सो कहिए हैं-तहां सूर्यका परिधिविर्षे भ्रमणकी समाप्तताकी काल साठि मुहूर्त है। बहुरि अभ्यन्तर परिपिका प्रमाण तीन लाख पंद्रह हजार निवासी योजन है सो सूर्यके साठ मुहूर्त- ...
Aud- (९३) निका गमन क्षेत्र तीन लाख पंद्रह हजार निवासी योजन होह तो एक मुहूर्तका कितना होइ । ऐसें परिधि प्रमाणकौं साठिका भाग दिएं पांच हजार दोयसौ इक्कावन भोजन अर गुणतीसका साठिवां भाग मात्र सुर्यका अभ्यंतर परिधिविर्षे एक मुहूर्त करि गमन क्षेत्रका प्रमाण होई । ऐसे ही अन्य विवक्षित परिधिक प्रमाणकों साठिका भाग दिए सूर्यका विवक्षित परिधिवि एक मुहूर्व करि गमन क्षेत्रका प्रमाण साधनां । वहुरि ऐसेही चंद्रमाका भी त्रैराशिक विधानकरि ल्यावनां । तहां चंद्रमांका परिधिविर्षे भ्रमणकी समाप्त ताका काल बासठि मुहूर्त भर तेईसका दोयसै इकईसवां भाग प्रमाण ६२२२३ २२१ याका विधान आर्गे "अट्ठीसत्तरस" इत्यादि सूत्रकरि कहेंगे ॥ याकौं समच्छेदकर मिलाएं तेरह हजार सातसै पच्चीसका दोयसै इकईसवां भाग मात्र भया सो इतने कालविौं मभ्यंतर परिधिका प्रमाण तीन लाख पंद्रह हनार निकासी योजनप्रमाण गमन क्षेत्र होइ तौ,एक मुहूर्तविय कितना होइ । प्रमाण १३७२५ फल ३१५०८९ इच्छा मु १ ऐसें करि लब्धि २२१ राशि पांचहजार तहतरि योजन अर सात हजार सातसै चवालीसका तेरह हजार सातसै पच्चीसवां भाग मात्र ५०७३ । ७७४४ चंद्रभाका १३७२५ अभ्यंतर परिधिवि● एक मुहुर्तका गमन क्षेत्रका प्रमाण आया । ऐसे ही अन्य विवक्षित परिधिके प्रमाणको बासठि , अर तेईसका दोयसै इकईसवां भागका भाग दिएं विवक्षित परिधिपि एक मुहूर्तका गमन क्षेत्रका प्रमाण मावै है ।। ३८८ ॥ भागें अभ्यंतर वीथीवि तिष्ठता जु सूर्य ताका चक्षुःस्पर्शाध्वान जो दृष्टि विर्षे गायनेका मार्ग लाकौं तीन गाथानिकरि मनावै है- (९४) सहिहिदपढमपरिहि णवगुणिदे चक्षुफासअद्धाण ।। तेणं णिसहाचलचावद्ध ज पमाणमिण ॥ ३८९ ॥ पष्ठिहितप्रथमपरिधौ नवगुणिते चक्षुःस्पर्शाया । तेनोन निपधाचलचापा यत् प्रमाणमिदम् ।। ३८९ ॥ अर्थः-प्रजम परिधिका प्रमाणको साठिका माग देह नवकार गुणिए इतनां चक्षुस्पर्शअध्वान हैं। तहां साठि मुहर्तनिका प्रथम परिधि तीन लाख पंद्रह हजार निवासी योजन प्रमाण गमन क्षेत्र होइ तो नव मुहूर्तनिका कितना गमन क्षेत्र होइ ऐसे प्रथम परिधिको साठिका भाग ही नवका गुणाकार भया । इनकी तीन करि अपवर्तन किए वीसका भागहार तीनका गुणाकार हो है । तहां प्रथम परिधिको ३१५०८९ वीसका भाग देइ ३१५०८९ तीनकरि गुणिए २० ९४५२६७ तब अन्धराशि सेंतालीस हजार दोयसैतरेसठि योजन पर सातका वीसवां भाग मात्र चक्षुस्पर्शाध्वान हो है। भावार्थ:-अयोध्या नाम नगरकावासी महंत पुरुषनिकरि उत्कृष्ट- पने सैंतालीस हजार दोयसै तरेसठि योनन अर सातका वीसवां भाग मात्र क्षेत्रका अंतराल होते सूर्य देखिए हैं इतना ही चक्षु इंद्रीका उत्कृष्ट विषय हैं याहीका नाम चक्षुस्पर्शाध्वान है । बहुरि इहां अठारह मुहूर्तका जु दिन ताका आधा भएं मध्यान्ह- विर्षे सूर्य अयोध्याकी बरोबरी आवे अर इहां उदय होता सूर्यका ग्रहण है तातें नवका गुणकार किया है । अर परिधिविर्षे भ्रमणकाल साठि मुहूर्त है तातें साठिका भागहार किया है । बहुरि निषध नामा कुलाचल ताका चापका प्रमाण एक लाख तेईस हजार सातसै अडसठि योज़न अर अठारह उगणीसवां भाग ताका भाषा इकसठि हजार आठसै चौरासी योजन अर नवका उगणीसवां (९५) भाग तामैं पूर्वोक्त चक्षुःस्पर्शाध्वानका प्रमाण ४७२६३ % घटाइए भव शेष जो प्रमाण रहै ॥ ३८९ ॥ सो स्मगली थावि कहें हैं: इगिवीस छदालयसं साहिय मागम्म णिसहउचरिमिणो । दिस्सदि अउज्झमज्झे ते णूणो णिसहपासभुजो ॥ ३९० ॥ एकविंशतिपट्चत्वारिंशच्छतं साधिकं आगत्य निपधोपरि इना दृश्यते अयोध्यामध्ये ते नोनः निषधपार्श्वभुजः ॥ ३९० ॥ अर्थ:-इकवीस एकसौ छियालीस अंक क्रमकरि चौदह हजार छसे इकइस तौ योजन पर साधिक कहिए किछू अधिक कितना ? चक्षु- स्पर्शध्वानका अवशेष सातका विसवां भागकों निषध चापका अव शेष नवका उगणीसवां भागविपं समछेद विधानकरि १३३१८० घटाएं २००३८० संतालीसका तीनस सीवां भाग ४७ मात्र अधिक जाननां । सो निषध ३८० कुलाचलकै ऊपरि इतनै १४६२१ । ४७ उ आइ करि सूर्य है सो ३८० अयोध्याकै मध्य मईत पुरुषनिकरि देखिए हैं । भावार्थ.-प्रथम वीथीविर्षे भ्रमण करता सूर्य सो निषध कुलाचल- का उत्तर तटनैं चौदह हजार छसै इकईस योजन अर सैंतालीस तीनसै अस्सीवां भाग रै आवै तब भरत क्षेत्रवि उदय हो है। अयोध्यांके वासी महंत पुरुषनिकरि देखिए हैं। बहुरि निषधकी पार्श्वभुजा वीस हजार एकसै छिन योजन प्रमाण तामैं निषध अ आइ सूर्य देखने का जो प्रमाण कया १४६२१ । ४७ ताकौं घटाइएं ।। ३९० ।। ३८० (९६) १. आगें कहिए है सो है:- णिसहुवरि गंतव्वं पणसगवण्णास पंचदेसूणा ॥ तेत्तियमेत्तं गत्ता णिसहे अत्यं च जादि रवी ॥ ३९१ ॥ निषधोपरि गंतव्यं पंचसप्तपंचाशत पंचदेशोना ।। तावन्मानं गत्वा निपध अरतं च याति रविः ॥ ३९१ ।। अर्थ:-निषधके ऊपरि जानां पांच सत्तावन पांच इन अंक क्रम- करि पांच हजार पांचसै पिचहत्तरि योजन देशोन . कहिए कियाटि इतना निषध पर्वत ऊपरि जाइ सूर्य अस्तपनको प्राप्त हो । भावार्थ:-परिधिविष भ्रमण करतां सूर्य जब निषधपर्वतका दक्षिण तट" पर किछूघाटि पचावनसै पिचहत्तरी योजन जाई तब अस्त हो है। अयोध्यादिक भरतक्षेत्रके वासिनी करि न देखिए ।। ३९१ ।। अब जाका प्रयोजन तिस चापके ल्याव को तिसके बाण ल्याव- नैका विधान कहै हैं, चापादिकका वर्णन तो भाग होइगा इहां प्रयोज- नभूत वर्णन करिए है- जंबूचारधरूणो हरिवस्ससरो य णिसहवाणो य ।। इह वाणावट्ट पुण अभंतरवीहि विस्थारो ॥ ३९२ ।। जंबूचारधरोनः हरिवर्षशरः च निषधयाणश्च ।। इह वाणवृत्तं पुनः अभ्यंतरवीथीविस्तारः ॥ ३९२ ॥ अर्थ:-धनुषाकार क्षेत्रविर्षे जैसै धनुषका पीठ हो है तैसें जो होइ ताका नाम धनुष है वाः ताका नाम चाप भी है । बहुरि जैसें. धनु- पकै हो है तैसें जो होइ ताका नाम जीवा है। बहुरि जैसे तिस धनुषका मध्य जीवाका मध्य. पर्यंत तीरका क्षेत्र हो है तैसे जो होई ताका नाम बाण है । सो इहां जंबूद्वीपकी पेदी र हरि क्षेत्र वा निषध पर्वतकै वीचि जो क्षेत्र सो धनुषाकार क्षेत्र हो है। तहां हरि क्षेत्र वा निषध (९७) पर्वतते लगाय वेदी पर्यंत अंतराल क्षेत्र सो वाण कहिए वेदी ताका प्रमाण ल्याइए हैं तहां भरत क्षत्रकी एक शलाका हिमवन पर्वतकी दोय इत्यादि विदेह पर्यंत दणी दणी पीछे आधी २ शलाका जोडे सर्व जंबूद्वीपवि एकसौ निवै शलाका कहिए विसबा हो हैं। कैसे ?- . शटि गुणकार तहां भरतक्षेत्रतें लगाय हरिचर्ष पर्यंत जोड इकत्तीस शलाका होहैं । अंतषणं गुण गुणियं आदि विहीणं रूऊणुत्तर भजियं । " इस सूत्रकरि अंतविबै हरिवर्षकी शलाका सोलह ताकौं भरतादिकतै दोयका गुणार है । तातै गुणकार दोय करि गुणे बत्तीस तामैं आदि भरत क्षेत्रकी शलाका एकसौ घटाएं इकतीस, याकौं एक एक ताका भाग दीएं भी, ऐसे हरि वर्ष शलाका इकतीस है । बहुरि याही प्रकार निषधशलाका तेरसठि होई । वहुरि एकसौ निबै शलाका- निका एक लाख योजन क्षेत्र होइ तौ इकतीस वा तेरसठि शलाकानिका केता होइ ऐसे किए हरि वर्षका वाण तो तीन लाख दश हजारका उगणीसवां भाग प्रमाण हो है। . तो बहुरि निपधका बाण छह लाख तीस हजारका उगणीसवां भाग प्रमाण हो है । वदीके पर हरिवर्ष वा निपधकी वीचि इतना अंतराल है। बहुरि यहां चक्षुःस्पर्शाअध्वान क्षेत्र कहनां । तहां अभ्यंतर वीथी अर हरि क्षेत्र वा निषध पर्वतके वीचि जो धनुषाकार क्षेत्र तहां वीथी की परिधि सो धनुष है। बहुरि वीथी अर हरि क्षेत्र वा निषधका पूर्वपश्चिमकी तरफ लंचाईका प्रमाण सो जीवा है । तहां पूर्वं जो हरिवर्ष वा निषध पर्वतका वाका प्रमाण कह्या तामैं जंबूद्वीपसंबंधी चार क्षेत्र एकसौ असी योजन ताको उगणीसका भागहार करि समच्छेद किएं चौतीससे वीसका उगणीसवां भाग भया । सो इतनां घटाएं चक्षुःस्पर्शाध्वान क्षेत्र ल्यावने विर्षे तीन लाख छह हजार पांचसै अस्सीका उगणीसा ( ९८ ) भाग प्रमाण निषधका बाण हो है ३०६५८० ६२६५८० अब इन- १९ १९ का वृत्तविष्कम जो ऐसा क्षेत्र गोल होइ तब चौढाईका प्रमाण सो कहिए है- तहां जंबू द्वीपका वृत्तविष्कम एक लाख योनन नामें द्वीपसंबंधी चार क्षेत्र एकसो असीताको दोऊ पार्शनिका ग्रहण मर्थि दुणाकरि ३६० यटाएं अभ्यंतर वीथीका सचि व्यास निन्याणवै हजार छसै चालीस योजन हो है ९९६४७ । याकों समच्छेद करनेके अर्थि उरणीसका भाग दएं अठारह लाख तरेणवै हजार एकसौ साठीका उगणीसवां भाग होइ, बहुरि इहां प्रथम हरिक्षेत्रविर्षे कहिए है। " इसुहीण विखंभ चउगुणिदिसुणा हेदु हु जीव कदी । वाण कदि छह गुणिद तत्थ जुदे धणु कदी होदि ॥ १ ॥ ऐसा करण सूत्र मागें कहेंगे ताकरि वाणका प्रमाण ३०६४८० को विकभका प्रमाण १० १८९३१६० घटाइए १५८६५८० बहुरि बाणा जो प्रमाण ३०६४८० ताकौं चौगुणां किए १२२६३२० जो प्रमाण होई तोह १९ करि गुणिए-१९४५६५४७८५६०० तव जीवाकी कृति होइ । ३६१ याका वर्गमूल किएं जीवाका प्रमाण हो बहुरि बाण हो जु प्रमाण ३०६ ५८० ताका वर्ग करिऐ ९३९९१२९६९६४०.. बहुरि याकौं छह गुणां करिए ५६३ ९४७७७८ ४०० बहुरि याकौं जीवाकी कृति मैं (९९) कही तिसविर्षे जोडिए २५०९६०२५६४०० ऐसे किएं धनुपकी ३६१ कृति होई, याका वर्गमूल ग्रहण किए १५८१४१७२ अपना भागहार- का भाग दिएं तियासी हजार तीनस सतहत्तरि योजन पर नव उगणीसवां माग प्रमाण हरि क्षेत्रका चाप हो हैं ८३३७७९ । बहुरि निषधपर्वतका १९ कहिए । " इमुहीण विखंभं० " इत्यादि सूत्रकरि निषधका चाणको ६२६५८० पूर्वोक्त वृत्तविष्कम १८९३१६० मस्यौं घटा- १९ १९ इये अवशेष रहैं १२६६५८० ताकौं चौगुणां वाणका प्रमाण १९ २५०६३२० करि गुणिए ३१७४४५४७८५६०० तब निप- १९ ३६१ धका जीवाको कृति हो । याका वर्गमूल प्रमाण निषधकी जीवा है। पहुरि निषधका बाणको जो छति ३९२६०२४९६४०० ३६१ ताकी छह गुणां कहि २३५५६१४९७८४०० याकौं जीवाकी कृति ३६१ नोकही तिस विय जोडिए ५५३०६९७६४००० तव धनुःकृति ३६१ होइ । याका वर्गमूल ग्रहण करि २३५१६१० अपना भाग- १९ (१००) हारका भाग दिए एक लाख तेईस हनार सातसै अइसठि योनन र अठारह उगणीसवां भाग प्रमाण १२३७६८६, निषध कुलाचलका चाप हो है इस चायका अयोध्याके पासि अर्घषणां है ताते इस चापको आघा किया । बहुरि अयोध्यातें चक्षुःस्पर्शाध्वान प्रमाणक्षेत्रपर सूर्यदीस ताकौं तिस आधा प्रमाणमैंस्यौं घटाएं अवशेष जो रह्या तितन निषधचापविय उत्तर तटतै उ आइ सूर्य भरत क्षेत्र वि उदय हो है ऐसा भावार्थ जानना ।। ३९२ ॥ ऐसेल्याए जु हरि क्षेत्र निषध पर्वतके चाप तिनका कहा करना सो कहे हैं- हरिगिरिधणुसेसद्ध पास जो सत्तसगतितेसीदी ।। हरिवस्से णिसहधणू अडछस्सगतीसवारं च ।। ३९३ ॥ हरिगिरिधनुः शेषा पाश्वभुजः सप्तसप्तत्रि-यशीतिः ॥ हरिवर्षे निपधधनुः अष्टपट्सप्तत्रिशद् द्वादश च ॥३९३ ॥ अर्थः-निषधपर्वतका चापविष हरिक्षेत्रका चाप घटाई ताका आधा करिए इतना निपध पर्वतकी पार्श्व भुजा है । दक्षिण तटते. उत्तर तटपर्यंत चापका जो प्रमाण ताका नाम इहां पार्श्व भुजा जाननां । तहां निषध पर्वतका धनुः १२३७६८ । १८ विष हरिक्षेत्रका धनुः १९ ८३३७७ । ९ घटाइए तब अव शेष चालीस हजार तीनसै इक्याणवै १९ योजन अर नव उगणीसवां भाग प्रमाण होइ ४०३९१ ।९ याका आधा करना तहां योजन प्रमाणमैं स्यौं एक घटाइ आधा करिए तब पीस हजार एक सौ पिच्याणवै योजन होइ ! बहुरि जो एक घटाया था (१०१) इनकौं सम- २ ताश भाषा १ अर नव उराणीसवां भागका गाधा १९४२ च्छेद करि जोड २८ दोयका अपवर्तन किए चौदह उगणीसवां भाग भर । सो याको बिळू घाटि एक योजन मानि जो. किछू घाटि वीस हजार एकसौ छिन्व योजन प्रमाण निषध पर्वतकी पार्श्व भुजा हो है। सो इहां पार्श्वभुनावि उत्तर तटते चौदह हजार छसे इकईस योजन में यावत् सूर्य है तावः भरतक्षेत्रवाल वासीनीकौं दीसे पछि न दीस तात पार्थ भुजाविपं इतनां घटाइ मव शेष किल्लू घाटि पनावनर्स पिचहत्तर योजन दक्षिण तटते निषधकै उपरि चार विर्ष परै जाइ सूर्य अस्त होई ऐसा भावार्थ जानना अब हरिक्षके निषध पर्वतके धनुपके सिद्ध भए अंक कहे हैं । तहां सातसात तीन तियासी इन अंकनके क्रमकरि ८३३७७ तियासी इनार तीनसे सतइत्तरि योजन तो हरि वर्षका धनुः है। बहुरि आठ छह सतीस वारा इन इन संकनिके क्रमकरि १२३७६८ एक लाख तेईस हजार सानस पडसाठ योजना निषधका धनुष है ॥ ३९३ ॥ आगे कहे जू दोनिक धनुपका प्रमाण तहां अब शेष अधिकका प्रमाण वा वार्थभुजाके अंक तिनकों कहे हैं- माहवचंदुरिया णवयकला ण य पदप्पमाणगुणा ॥ पासभुजी बोदसकदि वीससहस्सं च देखणा ॥ ३९४ ।। माधवचंद्रोद्धना नवककला नयपदप्रमाणगुणाः ॥ पार्श्वभुजः चतुर्दशकृतिः विशसहस्रं च देशोनानि ॥३९४॥ वर्थ-हा पदार्थ नामकी संज्ञाकरि अंक कहे हैं सो भाषवचंद्र कहिए उगणीस जात माधव जो नारायण सो नग है । अदृश्यमान चंद्र एक है। इन दोऊ अंकनिकरि उगणीस भए तिनकरि उद्धृत नवकला ॥
(१०२) भावार्थ-एक योजनकों उगणीसका भाग दीजिए । तहां नवभाग प्रमाण तौ हरि क्षेत्रका चापका प्रमाण पूर्व कह्या तामें अवशेष अधिक जानना। बहुरि इहां नयस्थान कहिए नय नव हैं तात नवकी जायगा नव ताकौं प्रमाण कहिए प्रमाणका भेद दोय है सो दोयकरि गुणिए तब एक योजनका उगणीस भागविर्षे अठारह भाग प्रमाण होइ । सो इतना निषध पर्वतका चापका प्रमाण पूर्व योजनरूप कया तामें इतना अवशेष अधिक जाननां । बहुरि निषध पर्वतकी पार्श्वभुजा चौदहकी छती एकसौ छिनवै तिहकरि अधिक वीस हजार योजन २०१९६ प्रमाण है।।३९४ आज अयनवि विभागकौं न करि सामान्यपर्ने चार क्षेत्र विष उदय प्रमाणका प्रतिपादनके अर्थ यह सूत्र कहैं हैं- दिणगदिमाणं उदयो ते णिसहे णीलगे य तेसही ।। हरिरम्मगेसु दो दो सूरे णवदससयं लवणे ।। ३९५ ॥ दिनगतिमान उदया ते निपधे नीलके च त्रिपष्ठिः ॥ हरिरम्यकयोः द्वौ द्वौ सूर्ये नवदशशतं लवणे ॥ ३९५ ॥ अर्थ-एक दिन विर्षे चार क्षेत्रका व्यास विर्षे सूर्यका एक सौ सत्तरिका इकसठियां कह्या था सो इतना दिन गति क्षेत्रवि जो एक उदय होइ तो चारक्षेत्रका पांचसै दशयोजन विर्षे केते उदय होइ । ऐसे किएं लब्ध प्रमाण एकसै तियासी उदय आए । बहुरि पर्यंत विर्षे चारक्षेत्रवि अवशेष सूर्य बिंब करि रोक्याहुवा आठतालीस इकसठिवां भाग प्रमाण क्षेत्र तिहविर्षे एक उदय है ऐसे मिलि एकसौ चौरासी उदय है । जाते एक एक वीथी प्रति एक एक उदय संभवेहै । तहां निषष नीलविर्षे प्रत्येक तरेसठि अर हरिरम्यक क्षेत्रविषै दोय तोय अर लवण समुद्रवि, एकसौ उगणीस उदय हैं । गमनका प्रमाण भाग प्रमाण (१०३ ) । भावार्थ -समस्त चारक्षेत्रवि सूर्यका उदय एकसौ चौरासी होहै। तहां भरत अपेक्षा तरेसठि तौ निपर्वतवि होय हरिक्षेत्र विर्षे एकसौ उगणीस लवण समुद्रवि उदय स्थान है । अभ्यंतर वीथीत लगाय तेर- सठिवीं वीथी पर्यंत विप॑ तिष्ठता सूर्यतौ निषध पर्वतकै ऊपरि उदय होहै। भात क्षेत्रके वासीनिकरि देखिए हैं। बहुरि चौसठि सठिवीं वीथी विर्षे तिष्ठता सूर्य हरिक्षेत्र उपरि उदय हो । बहुरि छयासठिवीते लगाय संत पर्यत वीथीविष तिष्ठता सूर्य लावण समुद्रकै ऊपरि उदय हो । ऐसेंही ऐरावत अपेक्षा तरेसठि नील पर्वतविर्षे दोय रम्यक क्षेत्र. विष एकसौ उगणीस लवण समुद्रवि उदयस्थान जानने ॥ ३९५ ॥ आगे दक्षिणायविर्ष चार शत्रका द्वीप वदिश समुद्रका विभागकरि उदय प्रमागका प्ररूपणकै अर्थी राशिककी उत्पति कई है। दीऊयहिचारखिते वेदीए दिणगदीहिदे उदया ।। दीये चउ चंदरस य लवणममुद्दम्हि दम उदया ॥ ३९६ ॥ द्वीपोदधिचारक्षेत्र वेद्यां दिनगतिहिते उदयाः ॥ द्वीपे चतुः चंद्रस्य च लवणसमुद्रे दश उदयाः ॥ ३९६ ॥ अर्थ:--द्वीपगमुद्र संबंधी चा क्षेत्र अर वेदी इनको दिनगति प्रमा- का माग दिंग उदयनिता प्रमाण हो । भावार्थ:--चार क्षेत्रका व्यासविर्षे वीथीनिविर्ष सुर्यका जहां जहां जितने उदय पाइये है सो कहिए हैं। तहां जंब द्वीप संबंधी चार क्षेत्र एकसौ योजनमैस्यों जंबूद्वीपकी वेदीका व्यास नार योजन है सो दृरि किए द्वीप चारक्षेत्र एकसौ छिहत्तर -- योजन है। बहुरि च्यारि योनन वेदी उपरि चारक्षेत्र हैं । बहुरि तीनसैं तीस योजन अठनालीस इकसठियां माग प्रमाण लवग समुद्र ऊपरि चारक्षेत्र हैं इनको दिन गतिका प्रमाण एकसौ सत्तरिका एकसठियां भाग प्र- (१०४) माण ताका भाग दिएं जितना जितनां प्रमाण आवै तितना उदय जानने सो कहिए है। दिन गतिका प्रमाण एकसौ सतरिका इकसठिवां भाग १७० सो इतना क्षेत्रविषै एक उदय होय तो वेदिश रहित द्वीप चार क्षेत्रवि केते उदय होहिं ऐसे त्रैराशिक किए तरेसठि उदय पाए । तिनविय अभ्यंतर वीथीका उदय पूर्वला उत्तरायणवि गिनिए है ताते वासठि उदय भए अर अवशेष छवीस एकसौ सत्तरियां भाग प्रमाण उदयके अंग रहे । इहां द्वीप संबंधी अतका सूर्य सूर्यविर्षे अंतरालपर्यंत आए। बहुरि अव शेष छवीस एकसौ सत्तरियां भाग उदय अंश रहे थे तिनका योजन अंशरूप क्षेत्र करिये हैं । एक उदयका एकसौ सत्तरि योजनका इकसठिवां भाग प्रमाण क्षेत्र होइ तौ छवीस एकसौ सत्तरियां भाग प्रमाण उदय अंशनिका केता क्षेत्र होह । ऐसें त्रैराशिककरि फल राशिकौं गुणें छवीस योननका इकसठिवां भाग प्रमाण क्षेत्र भया । ए द्वीप संबंधी योजन अंश अगले विवकरि रोक्या हुआ क्षेत्रविर्षे देना। बहुरि एकसौ सत्तरिका इकसठिवां भागवि एक उदय होय तौ च्यारि योजन प्रमाण वेदिका क्षेत्रवि केता उदय होइ ऐसें त्रैराशिक करि भागहारका भागहार इकसठिकरि च्यारिकौं गुणे दोसैं चवालीस भए । इनकौं एकसौ सत्तरि भागहारका भाग दिएं एक उदय पाया अवशेष चहौतरिका एकसौ 'सत्तरियां प्रमाण उदय अंश रहे । इनको पूर्वोक्त न्यायकरि क्षेत्ररूप किएं चहौतरि योजनका इकसठिवां भाग प्रमाण क्षेत्र भया इसविष बाईस योजनका इकसठिवां भाग प्रमाण क्षेत्र अहि पूर्वोक्त द्वीपका अंत अवशेष क्षेत्र छन्वीस योजनका इकसठिवां भाग प्रमाण तिहविखें मिलाएं । मठतालीस योजनका इकसठिवां भाग प्रमाण सूर्यविनकरि रोक्या हुवा क्षेत्र संपूर्ण होहै। भाग . . ऐसे अभ्यंतर वीथी स्थिति सूर्य विवत चौसठि वीयी स्थित सूर्यविंबका.व्यास छब्बीस इकसठिवां भागं तौ द्वीप चार क्षेत्रके अर वाईस इकसठिवां भाग वेदिका चार क्षेत्रको मिलिकरि सिद्ध होहै । इहां चौसठिवीं वीथी द्वीप अर वेदिकाकी संधिविौं है ऐसा तात्पर्य जाननां । ताके आगें दोय योजनका अंतराल हैं, ताके आगें सूर्यकरि सेक्या हुवा मठतालीस इकसठिवां भाग प्रमाण क्षेत्र है । तातै परें दावन योजनका इकसठिवां माग प्रमाण क्षेत्र रहा सो आगिला दोय योजनका अंतसलवि. देना । ऐसे द्वीप वेदिका संधि वर्षे प्राप्त जो सूर्य विचका व्यास ताकौं प्राप्त भया बाईस योजनका इकसठिवां भाग प्रमाण क्षेत्र तिहिस्यौं लगाइ वेदीकाका च्यारि योजन प्रमाण क्षेत्र समाप्त भया बहुरि लवण समुद्र- वि एक सौ सत्तरिका इकसठियां भागवि एक उदय होइ तौ विध रहित समुद्र चार क्षेत्र तीनसै योजन सिंहविर्षे केते उदय होई ऐसे राशिककरि पाए उदय एकसौ अठारह । बहुरि अवशेष उदय अंश सत्तरि एकसौ सत्तरियां भाग प्रमाण इनका पूर्वोक्त प्रकार क्षेत्र किएं सत्तरियोजनका इकसठिवां भाग प्रमाण क्षेत्र भया । इनिकौं वेदीका संबंधी अंतरालविर्षे प्राप्त बावन योजनका इकसठिवां भाग मिलाएं भागहार इकसठिका भाग दिएं दोय योजन प्रमाण अंतराल संपूर्ण हो है। बहुरि यात परें रविविध सहित अंतर प्रमाणरूप दिनगति शलाका अंतका अंतराल पर्यंत एक सौ अठारह हैं ते सुगम है। तहां उदय भी एकसौ अठारह है | तातै परें बाह्य वीथीविर्षे तिष्ठता सूर्य बिंबका व्यासविर्षे एक उदय है । ऐसें सर्वमिलिं लवण समुद्रवि एकसौ उगणीस उदय है। ऐसे दाक्षायण विर्षे . एकसौ तियासी. उदय जाननें । इहां ऐसा भावार्थ जानना-वीथी वि तिष्ठता हुआ सूर्यका बिंब प्रमाण जो क्षेत्र ताका नाम प्रश्नपथव्यास है सो अठतालीस वोजनका इकसठिा भाग प्रमाण है। पर वीथी चीथनिकै वीचि जितनां चार क्षेत्र विर्षे अंतराल ताका नाम अंतर है सो दोय योजन प्रमाण हैं। तहां एकसौ छिहत्तरि योजन प्रमाण द्वीप संबंधी चार क्षेत्र विर्षे प्रथम अभ्यंतर पंथन्यास है ताकै आग प्रथम अंतराल है । ताकै मागे दूसरा पथभ्यास है। ताकै भागे दूसग अंतराल है। ऐसही क्रमः अंतवि तेरसठिवां पथव्यास भर ताके आगे तेरसठिवां अंतराल हो है । पर ताकै माग छन्वीस योजनका इकसठिवां भाग प्रमाण क्षेत्र अवशेष रया । बहुरि च्यारि योजन प्रमाण वेदिका संबंधी चार क्षेत्र हैं तामैं बाईस योजन इक- सठिवां भाग काढि तिस द्वीप संबंधी अवशेष क्षेत्रविर्षे जोडे चौसाठियां पथव्यास हो है । चौसाठिवीं वीथी द्वीप पर वेदिकाकी संघिविर्षे है। बहुरि तिस पथव्यासकै मार्ग चौसठिवां अंतराल है ताके आगै बावन योजनका इकसठिवां भाग प्रमाण क्षेत्रवे दिका चार क्षेत्रवि अवशेष रया बहुरि पथव्यास रहित समुद्र चार क्षेत्र तीनसै तीस योजन प्रमाण है। तामैं सत्तरियोजनका इकसठिवा भाग कादि वेदिका अवशेष क्षेत्र विज पैंसठवां अंतराल हो है । ताक मार्ग पथव्यास है ताकै मांगें अंतर है। ऐसे ही क्रम अंतविर्षे एकसौ तियासीनां अंतराल हो है । बहुरि ताकै माग पथव्यास प्रमाण अवशेष समुद्र चार क्षेत्रविर्षे एकसौ चौरासीवां पथन्यास है । बहुरि इहां जहां पथ व्यास है तहां वीथी जाननी । एक एक वीथीविषै प्राप्त होह सूर्यका दृष्टि विष आवना ताका नाम उदय जानना । ऐसें एकसौ चौरासी वीथीनिविर्षे एकसौ चौरासी उदय भए । तहां उत्तरायणमैंयौं आवता भावता सूर्य अभ्यंतर वीथीविष भावै सो वह उत्तरायणवि गिनि गिनि लिया भर लगता ही दूसरी. बार तहां उदय होइ नाहीं तातै दज्ञिणायनविर्षे नाहीं गिना ऐसे करि एकसौ तियासी उदय जाननें।
(१.७) भागै उत्तरायवि कहैं हैं:- लवण समुद्रविय रवि मित्रसहित चार क्षेत्र तीनसै तीस योजन पर मनालीस इकसठियां भाग प्रमाण है ताका समच्छेद करि जोडे बीस हजार एक सौ अठहतरिका इकसठियां भाग प्रमाण होई २०१७८ बहुरि एक सौ सतरिका इकसठिवां भाग क्षत्रेकी एक दिन- गति शलाका होई तो वीस हजार एकसौ मठहत्तरिका इकसठिवां भाग- की केती होई ऐसें त्रैराशिक किए एक सौ अठारह दिनति शलाका होइ । भर एकसौ सत्तरियां भाग अवशेष हैं इहां एक पाटि दिन- गति शलाका प्रमाण उदय एक सौ सतरह है। काहेत ? जात बाध पत्र संबंधी उदय दक्षिणायन संबंधी है सो इहां न गिन्यां। सौ अठारह बहुरि अवशेष एकसौ पठारहका एकसौ सतरिवां भाग प्रमाण रदय मंशनिका पूर्वाक्त प्रकार क्षेत्र किएं एक योजनका इकसठियां भाग प्रमाण क्षेत्र अवशेप रया, तिस विथी अठतालीस योजनका इकसठियां भाग प्रमाण तो जागिला पथव्यासविर्षे देना, तहां पथन्यासविर्षे एक उदय है । पर पूर्व एकसौ सतरह उदय मिलि उतरायणविष समस्त उदय लवणसमुद्रविर्षे एक सौ अठारह हो है । बहुरि भवशेष सतरि योजनका इकसठिवां भाग प्रमाण क्षेत्रलवण समुद्रविरमा सो अगिला अंतवि दैनां ऐसे समुद्र चार क्षेत्र समाप्त भया । बहुरि च्यारि योजन प्रमाण वेदिका क्षेत्रवि पूर्वोक्त प्रकार त्रैरा- शिककरि श्याय एक उदय हो है। और अवशेष चहौतरि योजनका इकसठिवां भाग प्रमाण क्षेत्र रहै है । तिहविर्षे बावन योजनका इकस- ठिवां माग प्रमाण क्षेत्रको समुद्रका अवशेष क्षेत्रवि मिलाएं दोय योजन प्रमाण अंतर संपूर्ण हो है। इस अंतर लागें एक दिनगति (१०८) .- विर्षे एक उदय होई मागे अवशेष वाईस योजनका इकसठिवां भाग रहा सो अगिला पथव्यास विर्षे दैनां । ऐसे च्यारि योजन प्रमाण वैदिका क्षेत्रभी समाप्त भया आगें वेदिका रहित द्वीप चार क्षेत्र एक सौ छिहत्तर योजन प्रमाण तामैं अभ्यंतर पथव्यास अठतालीसका इकसठिवा भाग प्रमाण समछेद करि घटाएं दश हजार छसै अठ्यासीको इकसठिवां भाग प्रमाण होइ १०६८८ बहुरि एक . ६१. सौ सत्तरिका इकसठिवां भाग क्षेत्रकी एक दिनगति. शलाका होइ तौ दश हजार छसै अठथासीका इकसठिवां भागकी केती दिनगति शलाका होह ऐसें त्रैराशिक किए वासाठि.दिनगति शलाका पावं सो इतनाही उदय जानना । : अव अवशेष एकसौ अठतालीसका एकसौ सत्तरियां भाग प्रमाण उदय अंश रहैं । इनका पूर्वोक्त प्रकार क्षेत्र किए एकसौ मठतालीस योजनका इकसठियां भांग प्रमाण होह तीह विर्षे छवीस योजनका इक- सठिवां भाग मात्र क्षेत्र नौ वेदिका अर द्वीपफी संविवि पथव्यास है तहाँ दैनां तब सा पथव्यास संपूर्ण होइ अवशेष एकसौ बाईसका इकसठिवां भागहार करि भाजिए तब दोय योजन पाए सो संधि पथभ्यासकै भाग अंतरालविर्षे देना । बहुरि तात पर वासठि दिनगंति शलाका हैं तहां तितने ही उदय है। आज अभ्यंतर पथव्यासविर्षे एक एक उदय है ऐसे वैदिको रहित द्वीप चार क्षेत्रवि संधिः उदयसहित चौसाठि उदय हो है। ऐसे मिलिकर उत्तरायणविर्षे सूर्यकै एकसौ तियासी उदयं जाननें । इहां ऐसा. भावार्थ जानना । अंतरका वा पथव्यासका स्वरूप प्रमाण पूर्वे कहा था तहाँ लवण समुद्रका चार क्षेत्रविर्षे प्रथम पथव्यास है। आज अंतराल है ताकै मा- अंतराल है ताकै आगै पथन्यास है । ऐसे ही क्रम एकसौ (१.९) अठारहवां अंतरालकै आ» एकसौ उगणीसवां पथव्यास है अवशेष सत्तरि योजनका इकसठिवां भाग प्रमाण क्षेत्र रहै है । बहुरि वेदिकाका चार क्षेत्र वि बावन योजनका इकसठिवां भाग अहि तामै मिलाएं समुद्र वैदिकाकी संविवि एकसौं उगणीसवां अंतराल हो है, ताके भाग एकसौ वीसवां पथव्यास है। । भाग एकसौ वीसवां अंतराल है ताके आगे वाईस योजनका इकसठियां भाग प्रमाण क्षेत्र अवशेष रहे हैं । बहुरि द्वीपचार क्षेत्रवि छन्वीस योजनका इकसठिवां भाग ग्रहि तामै मिलाएं एकसौ इकईसवां पथव्यास होहै । ताके आगे एकसौ इकइसवां अंतर है ऐसें क्रमते अंतवि एकसौ तियासीवां अंतरके मार्ग एकसौ. चौरासीवां पथव्यास है तहां एकसौ चौरासी पथयास प्रमाण उदयनिवि वाघ वीथीका उदय पूर्वदक्षिणायणवि गिनिए हैं । भर लगता तहां उदय न होहै तात समुद्रका मादि उदय घटाए उत्तरायणविर्षे सूर्यके उदय एकसौ तियासी ऐसें जानने । उदयादिकका स्वरूप पूर्वोक्त कहा ही था। बहुरि चंद्रमाका भी अयन भेद किए बिना द्वीप चार क्षेत्र १८० वि पांच उदय पर समुद्र ४८ चार क्षेत्र ३३० वि दश उदय हैं मिलिकरि पंद्रह उदय होहैं । ६१ आगै दक्षिणायणवि कहे हैं । अथवा " रापिंडहीणे " इत्यादि पूर्वोक्त सूत्रकरि चंद्रमाका दिनगति क्षेत्र पंद्रह हजार पाँचसै इकावन योजनका च्यारिस सत्ताईसा भाग प्रमाण है सो इतना १५५१ क्षेत्रविर्षे जो एक ४२७ एक सौ अस्सी योजन प्रमाण द्वीप चार क्षेत्रवि कितने उदय होहि ऐसे राशिक किएं चारि उदय पाए । उदय होय तो (१२) बहुरि अवशेष चौदह हजार छस् छप्पनका पंद्रह हजार पांचर्स इकावनवां भाग प्रमाण उदय वंश रहै । बहुरि एक उदयका पंद्रह हजार पांचसे इकावनका च्यारिसे सत्ताईसवां भाग प्रमाण क्षेत्र होइ चौदह हजार छसै छप्पनका पंद्रह हजार पाँचस इकावनवां भाग प्रमाण उदय अंशनिका केता क्षेत्र होइ ऐसे राशिक करि तिर्यच फलाशिक भाज्य करि इच्छा राशिक भागका अपवर्तन किए चौदह हजार छसे छप्पन योजनका च्यारिसे सचाइसवां भाग प्रमाण क्षेत्र अवशेष रह्या । बहुरि चंद्रमाका पथन्यासका प्रमाण छप्पन योजनका इकसठियां माग ताका सात करि समच्छेद किए तीनस वाणवै योननका च्यारिस सत्ताईसवां माग प्रमाण भया सो इतनां तिस अवशेष क्षेत्र विर्षे ग्रहि अगिला पथव्यासविष दैनां । तहां उदय एक, एसें नवद्वीपविष पांचसे उदय है तिनवि मभ्यंतर पथका उदय उत्तरायण संबंधी है ताते वाका न ग्रहण करने द्वीपविष च्यारि उदय है । द्वीप चार क्षेत्रवि अवशेष चौदह हजार दोयसै चौसाठिका च्यारिस सत्ताईसवां भाग प्रमाण क्षेत्र रह्या । सो यहु भागाहारका भाग दिएं तेतीस योजन अर एकसौ तहे- तरिका च्यारिस सचाईसवां भागप्रमाण क्षेत्र है । सो थाकी भगले अंत. तरालविर्षे दैनां । या समुद्रवि चार क्षेत्र तीनस तीस योजन अर अडतालीसका इकसठिवां भाग प्रमाण है । ताका समच्छेदकरि मिलाएं वीस हनार एकसौ अठहत्तंरिका इकसठिवां भाग प्रमाण भया । सो पंद्रह हजार पाँचसै इक्कावन योजनका च्यारिसै सत्ताईसवां भाग प्रमाण क्षेत्रवि एक उदय होइ तौ वीस हजार एकसौ अठहत्तरिका इकसठिवां भाग प्रमाण क्षेत्र - विपैं कितने उदय होहि । ऐसें राशिक किए इकसठिकरि अपवर्तनकरि सातकरि गुणें रन्धराशि एक लाल इकतालीस. हजार दोयसै छियालीसका पंद्रह हजार (१११) पांचसै इकावनवां भाग प्रमाण या सो भागहारका भाग दिए नव उदय पाए पर अव शेष बारहवें सत्यासीका पंद्रह हजार पांचसै इका- वनवां भाग प्रमाण उदय अंश रहै इनका पूर्वोक्तप्रकार क्षेत्रकिएं बारहवें सित्यासी योजनका च्यारिस सत्ताईसवां भाग प्रमाण क्षेत्र अवशेष रह्या । यामैं सौ चंद्रबिका प्रमाण छप्पन योजनका इकसठिवां भाग प्रमाण ताको सातकरि समन्छेद किए तीनस बाणवैका च्यारिस सत्ता- इसवां भाग प्रमाण अहि करि बाह्य पथविर्षे देना। तहां एक उदय ऐसैं लवण समुद्रविर्षे दश उदय हैं । बहुरि अवशेष आठसै पिच्याणवै योजनका च्यारिसै सत्ताईसवां भाग प्रमाण क्षेत्र रह्या सो अपना भागहारका भाग दिएं दोय योजन भर इकतालीसका च्यारिस सत्ताइसवां भाग प्रमाण क्षेत्र भया सो याकों द्वीपविर्षे अवशेष तेतीस योजन भर एकसौ तहेतरिका च्यारिसै सत्ताईसवां भाग प्रमाण क्षेत्रवि जोडे पैतीस योजन भर दोयस चौदहका च्यारिसै सत्ताईसवां भाग प्रमाण पांचवां अंतराल संपूर्ण हो हैं । ऐसें चंद्रमाका दक्षिणायनविष द्वीप समुद्रका मिलि चौदह उदय हो है। इहां ऐसा भावार्थ जानना-चंद्रमाका चार क्षेत्रविर्षे पंद्रह वीथी है तिनविर्षे चंद्रमाका दृष्टिवि भावना सोई उदय है । तहां वीथीनि. विर्षे जहां चंद्रविच छप्पन योजनका इकसठिवां भाग प्रमाण क्षेत्र रोकै ताका नाम पथव्यास है। वहुरि थीनिके वीचि वीचि पैंतीस योजन अर दोयसै चौदहका च्यारिस सताईसवां भागपमाण जो अंतराल ताका नाम अंतर है। दोऊनिकों मिश्राएं पंद्रह हजार पांचसै इकावनका च्यारिस सत्ताइसवां भाग प्रमाण दिनगति क्षेत्र होहै। तहां द्वीप संबंधी एकसौ असी योजन प्रमाण चार क्षेत्रप्रवर्षे प्रथम अभ्यंतर वीथी है तहां पथव्यास प्रमाण क्षेत्र है । ताकै आगें प्रथम अंतर है ताकै आगें दूसरा पथव्यास है। ऐसे क्रमते चौथा अंतरकै आर्गे पांचवां पथव्यास है ताकै मानें ( ११२) 11 द्वीप चार क्षेत्र विष ततीत योनन पर एकसौ तहेतरिका च्यारिस सक्षा- ईसा भाग प्रमाण क्षेत्र अवशेष रहे हैं। बहुरि लवण समुद्रका चार क्षेत्र तीनस तीस योजन र मटतालीसा इकसठिवां भाग प्रमाण तिहवि दोय योजन अर दोयर्स चौदहका च्यारिसे सताईसवां भाग प्रमाण क्षेत्र द्वीप अवशेष क्षेत्रविष जोडे । द्वीप पर समुद्रकी संधिविर्ष पांचवां अंतराल होई । तार्क मार्ग छठा पथव्यास है । ताके माग छटा अंतराल है । ऐसे ऋमत अंतविष चौदहवां अंतगलके आग पंद्रहयां बास पन्यास है । इन पंद्रह पथ. व्यासनिविप जे पंद्रह उदय तिनविष द्वीपचार क्षेत्रपिं पहला अभ्यंतर वीथीका उदय उत्तरायण संबंधी है । तात चदमाके दक्षिणायनविष ऐसे चौदह उदय जानने । आगै उत्तरायणवि ऐसे कई है। समुद्रका चार क्षेत्र तीनसतीस योजन अर अठतालीसका इकसठिवां भाग प्रमाण है ! तहां पूर्वोक्त प्रकारकरि ल्याएं नव उदय पाए । अर अवशेष उदय असं मारहसे सित्यासीका पंद्रह हजार पांचस इकावनवां भागप्रमाण रहे इनका पूर्वोक्त प्रकार क्षेत्र किए बारहसै सित्यासी योजनका च्यारिस सत्ताईसवां भाग प्रमाण हो है ।बहुरि यामें चन्द्रविका प्रमाण छप्पन योजनका इकसठियां भाग मात्र ताका सातकरि समछेदकिए तीनसे बाणवैका च्यारिस सत्तावीसवां भागप्रमाण हीको अहिकरि बास पयत लगाय नवमां अंतरा. लकै आगें जो पथल्यास तामैं देना वा तहां एक उदय ऐसे समुद्रवि दस उदय भए इनविर्षे वाम पथका उदय दक्षिणायन संबंधी है। ताते ताका ग्रहण न करना ऐसे नव उदय रहे, बहुरि समुद्र चार क्षेत्रविर्षे अवशेष दोय योजन अर इकतालीसका च्यारिसे सत्ताईसवां भाग प्रमाण क्षेत्र रथा सो दशवां अंतरालविषै देना। ऐसे किएं समुद्रका चार क्षेत्र समाप्त भया ।
(११३ ) आगें द्वीप चार क्षेत्रवि पूर्वोक्तपनका पंद्रह हजार पांचसै इकावन- भाग प्रमाण उदय मश रहे इनका पूर्वोक्त प्रकार क्षेत्र किएं चौदह हजार छसै छप्पनका च्यारिसै सत्ताईस योजनका च्यारिसे सत्ताईसवां भाग प्रमाण होइ याने पचीस योजन भर एक सौ तहेतरिका च्यारिस सत्ताईसवां भागका समन्छेद किए चौदह हजार दोयसै चौसठिा च्यारिस सत्ताईसवां भाग होइ सो अहिकरि दशवां अंतरालविर्षे देना ऐसे पैतीसै योजन अर दोयसै चौदहका च्यारिसै सत्ताईसवां भाग प्रमाण दशवां अंतराल संपूर्ण हो है। चहुरि अवशेष तीनसे याणवै योजनका च्यारिस सत्ताईसा भाग प्रमाण रया । ताकी सातकरि अपवर्तन किए छप्पनका इक्सठियं भाग प्रमाण होई सो यह अभ्यंतर पथव्यासविष देना । इसविर्षे चंद्रमाका उत्तरायणविर्षे पांच उदय हैं । इहां ऐसा भावार्थ जानना-चंद्रमाका पथन्यास अंतरादिकका स्वरूप प्रमाण तो पूर्वोक्त जाननां । तहां लवण समुद्रका अर क्षेत्रवि प्रथम वाह्य पथव्यास हैं। तार्क अभ्यंतरवर्ती मागै आगै प्रथम अंतर है । ता आगें द्वितीय पथव्यास है ताकै आगे द्वितीय अंतर है । ऐसे क्रमते नवां अंतरकै आगै दशवां पथव्यास है। ताफै बागै दोय योजन भर इकतालीसका च्यारिस सत्ताईसवां भाग प्रमाण क्षेत्र अवशेष रह्या । वहुरि माग द्वीप चार क्षेत्रवि तेतीस योजन अर एकसो तहेतरिका च्यारिसै सत्ताइसवां भाग प्रमाण क्षेत्र अहि अर समुद्रका अवशेष क्षेत्र प्रडि दशवां अंतरालकों दिएं समुद्र भर द्वीपकी संधि विर्षे दशवां अंतराल संपूर्ण हो है। ताकै आगै ग्यारहवां पथ- व्यास है ताके आगें ग्यारहवां अंतराल है। ऐसे क्रमतें अंतविर्षे चौदहवां अंगकै आगे पंद्रहवां अभ्यंतर पथव्यास है। ऐसे इन पंद्रह पथव्यासनिवि पंद्रह उदय हैं । तिनिविर्षे समुद्र संबंधी प्रथम व्यास विषै जो उदय है सो दक्षिणायन संबंधी ही है।
( ११४) जाते लगताः दूसरीबार तहां उदय न हो है तात चंद्रमाको उत्तरायणवि नव समुद्रवि पांच द्वीपविर्षे ऐसे चौदह उदय जानने वहुरि इहां सूर्य व चंद्रमाका उत्तरायणविर्षे उदयका विभाग मूलसूत्र कान कहा । तथापि दक्षिणायनका उदयमार्गकरि टीकाकार विचार करि कद्या है ।। ३९६ ॥ अब हक्षिण उत्तर उर्व अध विर्षे सूर्यके आतापका क्षेत्र विभाग मन्दरगिरिमज्झादो जावय लवणुवहि छहभागो दु । हेहा अहरससया उवरि सयजोयणा ताओ ।। ३९७ ॥ मंदरगिरिमध्यात यावत् लवणोदधि षष्ठभागस्तु ॥ अधस्तनो अष्टदशशतानि उपरि शतयोजनानि तापः।३९७/- अर्थः-मेरुगिरिके मध्यतै लगाय यावत् लवण समुद्रका छठा भाग पर्यंत सूर्यका आतार फलै है । ताका उदाइरण अभ्यंतर वीथी विप॑ तिष्ठता सूर्यकी अपेक्षा कहिए हैं। जंबू द्वीपका आधा क्षत्र पचास हजार योननं तामैं द्वीप चार क्षेत्र एकसो अस्सी घटाएं गुणचास हजार आठसै वीस योजन प्रमाण तो मेरुगिरिके मध्य लगाय अभ्यंतर वीथी पर्यंत उत्तर दिशाविर्षे आताप फलै है । बहुरि लवण समुद्रका व्यास दोय लाख योजन ताका छठा भाग तेत्तीस हजार तीनसै तेतस योजन अर एकका तीसरा भाग प्रमाण यामैं द्वीप चार क्षेत्र एक सौ अस्सी योजन मिलाएं तेतीस हजार पांचसै तेरह योजन र एकका तीसरा भाग प्रमाण अभ्यंतर वीथीनै लगाय लवण समुद्रका छठा भाग . पर्यंत दक्षिण दिशा विर्षे आताप फैले है । बहुरि ऐसे ही अन्य वीथीनिविर्षे भी जानना । बहुरि सूर्य विवते नीचे अठारहसै योजन पर्यंत अधः दिशावि आताप फैले है ।
( १९५) भावार्थ:-सूर्यवितै नीचें आठसे योजन तौ समभूमि है अर ताते नीचें हजार योजन पर्यंत चित्रापृथ्वी है तहां पर्यंत सूर्यका आताप फैले है । बहुरि सूर्यबिंबते उपरि सौ योजन पर्यंत उर्ध्व दिशाविर्षे आताप फैले है । विशेषार्थ:-सूर्यविनते ऊपरि सौ १०० योजन पर्यंत ज्योतिर्लोक है तहां पर्यंत सूर्यका आताप फैले है। ऐसे परिनिधिविष तो आताप फैलनेका प्रमाण पूर्व कह्या था इहां दक्षिण उत्तर उर्व अधः दिशाविर्षे आताप फैलनेका प्रमाण कह्या ॥ ३९७ ॥ आगें चंद्रमा सूर्य ग्रह इनके नक्षत्रभुक्तिके प्रतिपादन करनेकौ चाहता आचार्य सो प्रथम एक एक नक्षत्र संबंधी मर्यादारूप गगनखण्डनिकों कहे हैं। अभिजिस्स गगणखण्डा छस्सयतीसं च अवरमज्झवरे ॥. छप्पण्णरसे छक्के इगिदुतिगुणपणयुतसहस्सा ॥ ३९८ ॥ अभिजितः गगनखण्डानि षट्शतत्रिंशत् च अवरमध्यवराणि ॥ षट् पंचदशे पट्के एक द्वित्रिगुणपंचयुतसहस्त्राणि ॥३९८॥ अर्थः- अभिजित नक्षत्रके गगनखंड छसै तीस हैं। बहुरि जघन्य मध्य उत्कृष्ट नक्षत्र क्रमतें छह प्रमाणकौं धर तिनकै एक दोय तीन गुणां पांच संयुक्त एक हजार प्रमाण गगनखण्ड हैं। भावार्थ:-परिधिरूप जो गगन कहिए आकाश ताके एक लाख नव हजार आठसै खण्ड करिए तामें एक चंद्रमा संबंधी अभिजित नक्षत्रके छसै तीस गगनखण्ड है । छसै तीस खण्ड प्रमाण परिधिरूप आ- काश क्षेत्रवि अभिजित नक्षत्रकी सीमा मर्यादा है। बहुरि ऐसे ही छह जघन्य नक्षत्र तिन एक एकके एक हजार पांच गगनखण्ड है बहुरि पंद्रह मध्य नक्षत्र तिन एक एकके दोय हजार. दश गगनखण्ड हैं। बहुरि छह उत्कृष्ट नक्षत्र तिन एक एकके तीन हजार पंद्रह गगन- खण्ड है । बहुरि छह उत्कृष्ट नक्षत्र तिन एक एकके तीन हजार पंद्रह .
(११६ ) । गगन खण्ड हैं । बहुरि इतने इतने ही दुसरा चंद्रमा संबंधी है । यहां नक्षत्रनिके जघन्य मध्य उत्कृष्टपना गगनखण्डनिका. थोडा बहुत अति बहुतकी अपेक्षा कह्या है स्वरूपादिक अपेक्षा नाहीं कह्या है ॥३९८॥ आगै तिन जघन्य मध्यम उस्कृष्ट नक्षत्रनिकों दोय गाथानिकरि कहैं सदमिस भरणी अद्दा सादी असिलेस्स जेष्ठ मवरवरा ।। रोहिणि विसाह पुणव्यसु तिउत्तरा मज्झिमा सेसा ॥ ३९९ ।। शतमिषा भरणी आर्द्रा स्वातिः आश्लेपा ज्येष्ठा अबराणि चराणि रोहणी विशाखा पुनर्वसुः भ्युत्तराः मध्यमा शेपाः ।। ३९९ ॥ अर्थः-शतभिषक कहिये शतमिपा १, भरणी २, आर्द्रा ३, स्वाति ४, आश्लेषा ५, ज्येष्ठा ६, ए छह जघन्य नक्षत्र हैं । बहुरि रोहिणी १, विशाखा २, पुनर्वसु ३, उत्तरा कहिए उत्तरा फाल्गुनी ४ उत्तराषाढा ५, उत्तरा भाद्रपदा ६ ये छ। उत्कृष्ट नक्षत्र हैं । बहुरि अब- शेष नक्षत्र मध्यम हैं ॥ ३९९ ।। ते अवशेष कौन सो कहे हैं।- अस्सिणि कित्तिय मियसिर पुस्स महा हत्थ चित्त अणुहारा । पुवतिय मूलसवणा सधणिहा रेवदी य मज्झिमया ॥ ४०० ॥ अश्विनी कृत्तिका मृगशीर्षा पुष्यः मघा हस्तः चित्रा अनुराधा । पूर्वत्रिका मूलं श्रवणे सधनिष्ठा रेवती च मध्यमाः ॥ ४०० ॥ अर्थ:-अश्विनी १, कृत्तिका २, मृगशीर्षा ३, पुष्य ४, मघां ५, हस्त ६, चित्रा ७, अनुराधा ८, पूर्वत्रिका कहिए पूर्वा फाल्गुनी ९, पूर्वाषाढा १०, पूर्वाभद्रपदा ११, मूल १२, श्रवण १३, धनिष्ठा १४, रेवती १५ ए पंद्रह मध्यम नक्षत्र हैं ।। १०० ॥
(११७) आगे कहे जु ए गगनखण्ड तिनकों इकटेकरि चंद्रमा सूर्य नक्षत्र- निकी परिधिवि भ्रमण कालका प्रमाण कहैं हैं। दो चंद्राणं मिलिदे अहसयं णवसहस्समिगिलक्खं ॥ सगसगमुहत्तगदि णभखण्डहिदे परिधिगमुहुत्ता ॥ १०१ ॥ द्वि चन्द्रयोः मिलिते अष्टशतं नवसहस्र एकलक्षं ॥ स्थक स्त्रक मुहर्तगति नभाखण्डहिते परिधिमुहर्ताः ॥ ४.१॥ अर्थ:-- दोय चंद्रमानिके मिलाए भाठस सहित नव हजार मधि- क एक लाख गगनखण्ड हो हैं । कैसे ? जघन्य- मध्य उत्कृष्ट नक्षत्रनिका गगनखण्ड क्रमतें एक हजार पांच दो हजार दश तीन हजार पंद्रह इनको अपने नक्षत्र प्रमाण छह पंद्रह छहकरि गुणे जघन्य नक्षत्रनिके छह हजार तीस मध्य नक्षत्रनिके तीस हजार एकसौ पचास, उत्कृष्ट नक्षत्रनिके मठारह हजार निवै गगनखण्ड होहैं । ए खण्ड भर छसै तीस अभिजितके खण्ड मिलाएं चौवन हजार नवसै भए । बहुरि एक परिधिविर्षे दोय चंद्रमा हैं। तातें तिनकों दुणांकरि मिलाइए तब एक लाख नव हजार आठसै गगनखण्ड परिधिविष हो हैं। बहुरि इन गगनखण्डनिकौं अपना अपना एक मुहूर्तविर्षे गमनप्रमाण ने गगनखण्ड तिनका भाग दिएं परिधिविर्षे भ्रमण कालका प्रमाण भाव है। कैसे सो कहिए है- चंद्रमा सतरहसे अडसठि गगनखण्डनिविर्षे एक मुहर्तकरि गमन करै तौ एक लाख नव हजार आठसै गगनखण्डनिविष केते मुहर्तनिकरि गमन करे ऐसे त्रैराशिक किएं चंद्रमाका परिधिविर्षे भ्रमण करने का काल वासठि मुहूर्त आएं, अर एकसौ चौरासीका सतरहसे अइसठियां भागका आठ फरि अपवर्तन किए तेइस मुहूर्तका दोयसै इकईसवां भाग आया । बहुरि याही प्रकार सूर्य अठारहसै तीस गानरमण्डविले (१९८) मुहूर्त करि गमन करे तो एक लाख नव हनार .माठसै गगनखण्डविर्षे केते मुहूर्त निकरि गमन कर ऐसें त्रैराशिक किएं सूर्यका परिषिविष भ्रमण करनेका काल साठि मुहूर्त आधै है। बहुरि नक्षत्र अठारहस..पैतीस गगनखण्डनिविर्षे एक मुहूर्तकरि गमन करै तौ एक लाख नव हजार आठसै गगनखण्डनिवि केते मुहूर्तनि- करि गमन करै ऐसें त्रैराशिक किए नक्षत्रनिका परिधिवि भ्रमण करनेका काल गुणसठि नौ मुहूर्त लाए अर अवशेष पंद्रहसे पैतीसका अठारहवें पैंतीसवां भाग ताका पांचक्ररि अपवर्तन किए तीनसैं सात मुहूर्त निका तीनसैं सतसठिवां भाग आया। या प्रकार एक बार संपूर्ण एक परिधि- विर्षे भ्रमण करनेका काल प्रमाण कथा ॥ ४०१ ।। माणे सो एक मुहूर्तकरि अपना अपनां गगनखण्डनिवि गमन करनेका प्रमाण कहा सो कहै हैं- अठठी सत्तरसयमिदू वावहि पंचअहियकर्म । गच्छति सररिक्खा णभखण्डाणिगिमुहुत्तेण ।। ४०२ ॥ अष्टषष्ठिः सप्तदशशतं इंदुः द्वापष्ठिः पंचाधिकक्रमाणि ।। गच्छन्ति सूर्यऋक्षाणि नमाखंडानि एकमुहर्तेन ॥४०२॥ मर्थः-अहसाठि अधिक सतरहसै १७६८ गगनखण्डनिकौं चंद्रमा एक मुहर्तकरि गमन करै है । बहुरि तिनतै बासठिं अधिक ताका अठारहसै तीस गगनखण्ड निकौं सूर्य अर इन पांच अधिक ताका अठा- रहसै पैंतीस गगनखण्डनिकों नक्षत्र एक मुहूर्तकरि गमन करें हैं।१२। ... आगे चंद्रमादि तारापर्यंत ज्योतिषीनिकै गमन विशेषका स्वरूप ( १९९) चंदो मंदो गमणे सुरों सिग्घो तदो गहा तत्तों ॥ तत्तो रिक्खा सिंग्या सिग्घयरा तारया तत्तो ॥ ४०३ ॥ चंदो मंदो गमने सूरः शीघ्रः ततो ग्रहाः ततः ॥ ततः ऋक्षाणि शीघ्राणि शीघ्रतराः तारकाः ततः॥४. ३॥ अर्थ--सर्वते गमनविर्षे चंद्रमा मंद हैं मंद गमन कर है । गते सूर्य शीघ्र गमन कर हैं । तात ग्रह शीघ्र गमन करें हैं, ग्रह ताते नक्षत्र शीघ्र गमन करै हैं । तात अतिशीघ्र तारे गमन करे हैं। ४०३ । मागै अब चंद्रमा सूर्यके नक्षत्र भुक्तिकों कहै हैं। इंदुरवीदो रिक्खा सतही पंच गगणखण्डहिया ।। अहियहिद रिक्खखण्डा रिक्खे इंदुरवि अथणमुहुत्ता ।४०४ इंदुरवितः ऋक्षाणि सप्तपष्ठिः पंच गगनखण्डाधिकानि ।। अधिकहित ऋक्षखण्डानि ऋक्षे इंदुरविअस्तमनमुहूर्ताः॥४०. अर्थ:-चंद्रमा सूर्यके गगनखण्डनित क्रमतें सडसठि भर पांच गगन खण्ड अधिक नक्षत्रनिके एक मुहुर्तकरि गमन अपेक्षा गगनखण्ड है । सो इस अधिकका भाग अपने अपने नक्षत्र खण्डनिको दिएं नक्षत्र पर चंद्र वा सूर्यका आसन्न मुहूर्तनिका प्रमाण आवै है सो कहिये । है 1- एक ही वार चंद्रमा पर नक्षत्र साथि गमनका प्रारंभ किया. तहां एक मुहूर्तवि चंद्रमा ती सतरहसे अडसठि गगनखण्डनिप्रति गमन किया भर नक्षत्र अठारहसे पैतीस गगन खण्डनि प्रति गमन किया । वहां चंद्रमा नक्षत मतसठि गगनखण्ड पीछे रह्या । तहां अभिजित नक्षत्र पर चंद्रमा दोऊ साथि गमनका प्रारंभकरि एक मुहूर्तविपै पाभित-. तनैं चंद्रमा सदसठि गगनखड पीछे रखा , बहुरि दुसरा मुहूर्त विर्षे और सतसठि गगनाखण्ड पीछे रहा । ऐसें पीछे रहता रहता जितने कालकरि छमें तीस अभिजितके सर्व खण्डनिको छोडि पीछे रहै तितना काल -
(१२०.)
अभिजित नक्षत्र अर चंद्रमाका आसन्न मुहूर्त कहिए । सो अडसठि
अधिक खण्डनिके पीछे छोडनमें एक एक मुहूर्त होइ तौ छसै. तीस
अभिजित खण्डनिके पीछे छोडनेमें केते मुहूर्त होइ । ऐसें त्रैराशिककरि
अधिक प्रमाण सतसठिका भाग अपनें छसै तीस खण्डनिकौं दिएं लब्ध-
राशि नव मुहूर्त सत्ताईसका सतसठिवां भाग मात्र अभिजित अर चंद्रमा-
का आसन्न मुहूर्तका प्रमाण आया ।
इतने काल चंद्रमा अभिजित संबंधी गगनखण्डनिके निकटवर्ती
रहै है । ताः आसन्न मुहूत कहिए । बहुरि इस आसन्न मुहूर्त काल
ही विर्षे नक्षत्रमुक्ति कहिए । यावत्काल चंद्रमा अभिनित संबंधी
गगनखण्डनिके समीपवर्ती रहै तावत्काल चंद्रमाकै अभिजित नक्षत्रका
भोगवनां कहिए । बहुरि इसही कालवि योग कहिए यावत्काल जंद्रमा
भर अभिजित संबंधी गगनखण्डनिका संयोग रहै तावत्काल चंद्र मा अर
अभिजितका योग कहिए । बहुरि याही प्रकार अधिक प्रमाण सतस-
ठिका भाग जघन्य मध्यम उत्कृष्ट नक्षत्रनिके क्रमतें एक हजार पांच दोय
हनार दस तीन हजार पंद्रह गगनखण्ड निक्रों दिएं जघन्य नक्षत्रनिका
पंद्रह मुहूर्त मध्य नक्षत्रनिका तीस मुहूर्त उत्कृष्टनिका पैंतालीस- मुहूर्त
मात्र आसन्नमुहूर्त होहै।
बहुरि तीस मुहूर्तका एक दिन होइ तौ पंद्रह आदि मुहूर्तनिका
केता होइ ऐसें कहि पंद्रहका अपवर्तन किए जघन्य नक्षत्रनिका आधा दिन
३ मध्यम नक्षत्रनिका एक दिन उत्कृष्ट नक्षत्रनिका ब्योढ दिन
प्रमाण चंद्रमाको नक्षत्रमुक्ति काल हो है । बहुरि याही प्रकार अधिक
प्राण पांचका भाग अपने अपने नक्षत्र संबंधी गगनखण्ड निको दिए
•दिनादिक किएं सूर्यकै अभिजितका च्यारि दिन छह मुहूर्त जघन्य नक्षत्र.
का छह दिन इकईस मुहूर्त मध्यम नक्षत्रका तेरह दिन बारह मुहूर्त
उत्कृष्ट नक्षत्रका वीस दिन तीन मुहूर्त प्रमाण नक्षत्रभुक्तिका काल
नाननां ॥ ४.१॥
(१२१) भाग राहुका गगनखण्ड कहिकरि ताकै नक्षत्रभुक्ति कहे हैं- रविखण्डादो चारसमायण वज्जते जदो राहू ॥ तम्हा तत्तो रुक्खा चारहिहिदिगिसठिखण्डहियो || ४०५॥ रविखण्डतः द्वादशभागोनं व्रजति यतो राहुः ।। तस्मात्ततः ऋशाणि द्वादशहितकपष्टिखण्डाधिकानि ।।१०५ अर्थ:- जाते सूर्यके खण्डनिते एकका बारहवां भाग घांटि राहु गमन करे हे । सूर्यका पठारहसे तीस गगनखण्डनविर्षे एकका नारहवा भाग घटाएं भठारह गुणतीस गगनखण्ड अर ग्यारहका बारहवां भाग माग राहुकै एक मुहूर्त विर्षे गमन करनेका प्रमाण हो है । इनसे इकसठि- का बारहवां भाग अधिक नक्षत्रनिकै गमन करनेका प्रमाण हो है । कैसे इतना अधिक होई ? राहुका गगनखण्ट १८२९११ नक्षत्रका गगन- १२ खण्ड १८३५ मस्यौं घटाएं ग्यारहका बारहवां भाग घटाएं इकसठिका बारहवां भाग अधिकका प्रमाण हो है। बहुरि " अहियहिदरिक्खखंडे " इस सूत्रके न्यायकरि अधिकका माग अपने अपने नक्षत्रखण्डनिकौं दीएं सहके नक्षत्र मुक्तिका काल आवे है । तहां इकसठिका बारहवां भाग छोडनैवि एक मुहूर्त होइ तौ छसै सीस भमिजित खण्डनिके छोडनेवि केते मुहूर्त होइ ऐसे छसै तीसकों इकसाठिका बारहवां भागका भाग देनां तहां भागहारका भागहार बारह ताको छसै तीसका गुणकारकरि ताकौं इकसठिका भाग दैनां ६३० १२ बहुरि इनकों तीस सहित छहकरि अपवर्तन करना १२६ । २ ६१ याको अपने गुणकार करि गुणे २५२ भागहारका भाग दिए च्यारि ६१ -
(१९३)
दिनअर आठका :इकसठियां भाग प्रमाण राहु के 'थगिजित् नक्षत्रका
मुक्तिका काल है।
या ही प्रकार राहू के जघन्य नक्षत्र का छह दिन पर छत्तीसका इक-
सठिवां भाग मध्य नक्षत्रका तेरह दिन भर ज्या हका इकसटिवां भाग
उत्कृष्ट नक्षत्रका उगणीस दिन अर संतालीसका इकसठियां भाग प्रमाण
भुक्तिकाल जाननां ।। ४०५ ॥
भाग अन्य प्रकारकरि राहु के नक्षत्र भुक्तिकों कहें हैं।-
णक्खत्त सूरजोगज मुहुत्तरासि दुवेहि संगुणिय ॥
एकाहिहिदे दिवसा हवंति णखतराहुजोगस्स ॥ ४.६ ॥
नक्षत्र मरयोगज मुहुर्तराशि द्वाभ्यां संगुण्य ।।
एकपष्ठिहिते दिवसा भवति नक्षत्ररायोगस्य -।। ४०६ ॥
अर्थ:-नक्षत्र अर सूर्यका योग करि उत्पन्न जो महर्तनिका
प्रमाणरूप राशि ताकौं दोय करि गुणि इकसटिा भाग दीए जो प्रमाण
आवै तितनैं नक्षत्र मर रहके योगविष दिननिका प्रमाण जानना ।
तहां सूर्यकै अभिजित नक्षत्रका मुक्तिकाल च्यारि दिन छड मुहूर्त है ।
दिननिकौं तीस गुणांकरि मुहूर्त किएं सर्व पत्र सौ छवीस महत भए ।
इनको दोय करि गुणें दोयसै बावनं भए । इनको इकसठिका भाग
दिएं च्यारि अर आठमा इकसठियां भाग आया। सोई राहुकै मभिः
जित नक्षत्रका मुक्तिकाल च्यारि दिन अर मारका इकसठीवां भाग
प्रमाण है। ऐसैंडी अन्य नक्षत्रनिका भी विधान करना ॥ ४०६ ।
माग एक अयनविर्षे नक्षत्र मुक्ति सहित वा रहित ने दिन तिनको
अभिजादि तिसींदिसय उत्तरअयणस्स होंति 'दिवसाणि ॥
अधिकदिणाण्णि तिणि य गददिवसा होंति इगि अयणे ॥४०७॥
(१२३.) अभिजिंदादित्यशीतिशतं उत्तरायणस्य भवंति' दिवसानि ।। अधिकदिनानां त्रीणि च गतदिवसानि भवंति एकस्मिन अयने । अर्थ:-अभिजितको आदि दै करि पुष्य प्रर्यंत जे जघन्य मध्य उत्कृष्ट नक्षत्र तिनके एक्सौ तियासी दिन उत्तरायणके हो हैं।' बहुरि इजत अधिक दिन तीनः एक अयनविर्ष गत दिवस हो' हैं । ४०७ । आगें अधिक दिननिकी उत्पत्ति को कहैं हैं- एकपहल्लंघणपडि जदि दिवसिगिसहिभागमुबल्लद्धं ।। किं तसीदिसदस्सिदि गुणिदि ते होंति अहियदिगा 18.01 एकपथलंघनप्रति यदि दिवसकपष्टिभाग उपलब्ध.॥ कि ज्यशीतिशतस्येति गुणिते ते भवति अधिक दिनानि ।४.८1. अर्थः-वीथीरूप एक सूर्यका मार्ग ताका उलंघनप्रति जो एक दिनका इकसठियां भाग पावै तौ एकसौ तियासि मार्गनिका उल्लंघन- प्रति के दिवस- पावे ऐसे राशिक करि तह इकसठि करि अपवर्तनः करि गुणें अधिक दिन- तीन होहे । बहुरि एक भयनविर्षे एकसौ तियासी दिन कैसे हैं सो कहिए हैं। एक मुहूर्त वि. गमन योग्य सूर्यके अठारहसे तीस खण्ड अर नक्षत्रके मठारहसें पैंतीस खण्ड ताते सूर्यके नक्षत्रतै पांच खण्ड छोड. वि एक मुहूर्त होइ तौ अभिजित नक्षत्रके छसैं तीस खण्ड छोडने वि. केते मुहूर्त होइ ऐसे मुहूर्त करि ६३० ताकौं तीसका माग देइ. दिन ---- ६३० करने बहुरि भाज्य भाजकको तीस करि. अपवर्तन किए इकईस दिनका पांचवां भाग प्रमाण अभिजितका मुक्तिकाल आया। ऐसे ही जघन्य मध्य उत्कृष्ट नक्षत्र श्रवण आदि पुनर्वसु पर्यंत तिनके त्रैराशिका (१३४ ) विधिकरि मुहूर्त वा दिनकरि क्रमते पंद्रह तीस पंद्रहकरि अपवर्तनकरि जो जो पावै सो सो तिप्त तिस नक्षत्र विष स्थापन करना ।। ४.८॥ आगै पुज्यविर्षे विशेष हैं ताके प्रतिपादनकै गर्थि कहें हैं।- सतिपंचमचउदिवसे पुस्से गमियुत्तरायणसमत्ती ।। सेसे दक्षिणआदी सावणपडिवदि रविस्स पढमपहे ।। ४०९।। सत्रिपंचमचतुर्दिवसान पुष्ये गत्वा उत्तरायणसमाप्तिः ।। शेपान् दक्षिणादिः श्रावणप्रतिपदि रखेः प्रथमपथे ॥ ४०९ ॥ अर्थः-तीन दिनका पंचवा भाग सहित च्यारि दिन पुष्य नक्षत्र- का भुक्तिकालवि नाइकरि उत्तरायणकी समाप्तता हो है । एसें करि पूर्वोक्त प्रकार पुष्य नक्षत्र भुक्तिका कालको सहसठि दिनका पांचवां प्रमाण ल्याई तामें तीनका पांचवां भाग सहित च्यारि दिनका समछेद किए तेईस दिनका पांचवा भाग भया सो ग्रहिकरि उत्तरायणकी समा- ततावि देनां अवशेष चवालीस दिनका पांचवां भाग रहा तामें कोट पूरण करनेकै अर्थि तितना ही तेईस दिनका पांचवां भाग ग्रहि करि दक्षिणायनका प्रथम कोष्टविर्षे दिए यहु ही श्रावण मासविर्षे पडिवाके दिन सूर्यका प्रथम मार्गविर्षे दक्षिणायनका मादि हो है । अवशेष इक- ईस दिनका पांचवां भाग द्वितीय कोष्ट विखे दैनां । बहुरि ऐसेही पूर्वो- क्त प्रकार आश्लेषा आदि उत्तराषाढा पर्यंत नक्षत्रनिकी सूर्यके भुक्तिका काल ल्याइ तिहतिह नक्षत्रविर्षे स्थापन करना । भावार्थ:--सूर्यका उत्तरायणविर्षे प्रथम अभिजित नक्षत्रकी मुक्ति हो हे ताका काल पूर्वोक्त प्रकार किएं इकईस दिनका पांचवां भाग प्रमाण है। पीछे क्रम” श्रवण १ धनिष्ठा शतभिखा १ पूर्वाभाद्रपदा १ रेवती १ अश्विनी १ भरणी १ कृत्तिका १ रोहिणी १ मृगशीर्षा मार्दा १ पुनर्वसु १ इनकी मुक्ति हो है । तहां शतमिषा १ भरणी १ पार्दा १ ए तीन जन्य नक्षत्र हैं तिनका तो एक एकका भुक्तिकाल ( १२५ ) सडसठि दिनका दशवां भाग प्रमाण है । बहुरि श्रवण १ घनिष्ठा १ पूर्वाभाद्रपदा १ रेवती १ अश्विनी १ कृत्तिका मृगशीर्षा ए सात मध्य नक्षत्र हैं सो इनका एक एकका भुक्तिकाल सतसठि दिनका पांचवां माग प्रमाण है बहुरि उत्तराभाद्रपदा रोहिणी पुनर्वसु ए तीन उत्कृष्ट नक्षत्र हैं सो इनका एक एकका मुक्तिका दोयसै एक दिनका दशवां भाग प्रमाण है बहुरि पीछे पुष्य नक्षत्रका मुक्तिकाल सडसठि दिनका पांचवा भाग प्रमाण तामें तेईस दिनका पांचवां भाग मात्र काल पर्यंत पुष्य नक्षत्रकी मुक्ति इस अयनविर्षे हो है । ऐसें सर्व कालकों समच्छेद करि होहैं सूर्यके उत्तरायणविर्षे एकसौ तियासी दिन हो है । बहुरि दक्षिणायनका प्रारंभ श्रावण कृष्णकी पडिवाके दिन हो है। वहां प्रथम पुष्य नक्षत्र मोगिए हैं । पुष्य नक्षत्रका भुक्तिकाल सडसठि दिनका पांचवा भागविर्षे तेईस दिनका पांचवां भाग थे अवशेष चौवालीस दिनका पांचवा भाग इस अयनकी मादिवि भोगिए हैं । तहां उत्तरा- यण समान कोठे पूर्ण करनेको प्रथम कोठविर्षे तौ तेईसका पांचवां भाग देना । दूसरा कोठवि अभिजितकी जायगा । इकईसका पांचवां भाग तो उत्तरायणविर्षे भए देना। ऐसें प्रथम पुष्य नक्षत्रका भुक्तिकाल भएं पीछे क्रमते माश्लेषा मघा १ पूर्वा १ फाल्गुनी १ उत्तरा फाल्गुनी १ हस्त १ चित्रा १ स्वाति १ विशखा १ अनुराधा १ ज्येष्ठा १ मुल १ पूर्वाषाढा १ उत्तरापाढा इन नक्षत्रनिकों भोगवै है। तहां माश्लेषा १ स्वाति १ ज्येष्ठा । ये तीन जघन्य नक्षत्र है सो इनका तो एक एक एकका मुक्तिकाल सतसठि दिनका दशवां भाग प्रमाण है । बहुरि मघा, पूर्वा- फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, अनुराधा, मूल, पूर्वाषाढा ये सात मध्य नक्षत्र हैं। सो इन एक एकका भुक्तिकाल सलसठि दिनका पांचवां भाग ( १२६) . M प्रमाण हैं। बहुरि उत्तरा फाल्गुनी, विशाखा, उत्तरापाढा ये तीन उत्कृष्ट नक्षत्र है । सो इन सर्व भक्तिकालनिको बोले सूर्य के दक्षिणायन विप एकसौ तियासी दिन होहै। बहुरि अब चंद्रमाका कहिए हैं । पृक्ति प्रकार चंद्रमाका भुक्ति- काल इकईस दिनका सतसटिवां भाग प्रमाण ल्याई. तिस चंद्रमाहीक जघन्य मध्य उत्कृष्ट नक्षत्रनिका भुक्तिकालविपं.श्रवण आदि पुनर्वसु पर्यंत नक्षत्रनिकी पूर्वोक्त प्रकरर भुक्तिल्याइ.तिहविर्षे सर्वत्र. सदसठिको भाजक. करि भाज्यका अपवर्तन करि बहुरि भाजक तीस भर गाज्यका जघन्य. उत्कृष्ट नक्षत्रनिका पंद्रहकरि अपवर्तनकरिअर मध्यमनिक तीसके. अप- वर्तनकरि नो नो पावै सो सो तिस तिस नक्षत्रवि स्थापन करना । बहुरि पुप्यविप॑ सूर्यके मुक्ति सतठि दिनका पांचवां भाग मात्र वि. चंद्रमाके भुक्ति एक दिन प्रमाण होइ तो पुप्यवि सूर्यके. तेईस दिनका. पांचवा भागविर्ष चंद्रमा कती होइ. ऐसे राशिक करि आई: जो तेईसका सतसठिवां भाग भाग-प्रमाण मुक्ति सो उत्तरायणकी समाप्तताविष दैनी ऐसेही दक्षिणायनविय विधान करना । भावार्थ-चंद्रमाकै उत्तरायणविर्षे पहले. अभिजितकी मुक्ति हो । ताका काल इकईस दिनका सतसठिवां भाग मात्र है । पीछे श्रवण आदि. पुनर्वसु पर्यंत नक्षत्र क्रमते भोगिए हैं। तहां तीन जघन्य नक्षत्र- निविपैं-एक एकका भुक्तिकाल- अर्थ दिन है सात मध्य नक्षत्रनिविर्षे एक एकका मुक्तिकाल एक दिन है। तीन ठग्कृष्ट नक्षत्रनिविर्षे एक.. एकका भुक्तिकाल ड्यौढ दिन है । बहुरि तहां पीछे पुष्य नक्षत्रका . भुक्तिकाल एक दिनवि तेईसः दिनका सतसठिवां- भाग कालप्रमाण. पुष्य नक्षत्र-भोगिए हैं। ऐसे: सर्वकाल. जो चंद्रमाका. उत्तरायणविषैः तेरह दिन अर चवालीसके सडसठिवां भाग मात्र काल होह ! बहुरि दक्षिणायनविर्षे पहले पुष्य नक्षत्र भोगिएं हैं तहां पुण्य - (१२.७ ) नक्षत्रमा मुक्तिकाल एक दिन विर्षे तेईस दिनका सतसठिवा भाग मात्र काल उत्तरायणविर्षे गया अब शेष चवालीसका सडसठिनां भरग प्रमाण काल ,इहां भोंगिएं हैं । बहुरि आश्लेषा मादि उत्तराप:डा पर्यंत नक्षत्र क्रमत भोभिए हैं। तहाँ तीन जघन्य नक्षत्र ‘सात मध्य नक्षत्र तीन 'रस्कृष्ट निक्षत्रनिका मुक्तिकाल क्रमतें एक एकका आधा दिन एक दिन ड्योढ दिन जाननां । सर्वकाल मिलाएं चंद्रमाका दक्षिणायन विष तेरह दिन अर'चवालीसका सडसंठिवा भाग प्रमाण काल हो है। अब राहुका कहिए हैं राहुकै अभिजित आदि पुनर्वसु पर्यंत नक्षत्रनिकी भुक्तिन्याई तिस तिस नक्षत्रविर स्थापना करना । बहुरि पुष्यविप सूर्यके सतसठि दिनका पांचवां भाग प्रमाण भुक्ति होत राहुकै आठसे च्यारिसका इकसटिवां भाग प्रमाण भुक्ति होइ तौ सूर्यके 'तेईस दिनका पानवां भाग प्रमाण भुक्ति . होत राहूके केती भुक्ति होई ऐसैं- ल्याइ अपर्वतन कर दोयस छिहत्तरि दिनका इकसठिवां भाग प्रमाण भुक्ति उत्तरायणकी समाप्तिविष पुष्यकी स्थापना करनी बहुरि पूर्ववत् दक्षिणायन विष विधान करना। भावार्थ - राहुकै उत्तरायणविपै प्रथम अभिजितकी मुक्ति हो है ताका काल दोयस चानन दिनका इकसठिवां भाग मात्र है पीछे श्रव- णादि पुनर्वसु पर्यंत. नक्षत्रनिकी भुक्ति क्रमत हो । तिनविर्ष तीन जघन्य सात मध्य तीन उत्कृष्ट नक्षत्रनिका भुक्तिकाल क्रमते च्यारिसै दोयका इकसठिवां भाग बारहसै छैका इकाठियां भाग प्रमाण होहै । पंछै पुप्यकी भूक्ति होहै ताका काल आठसैच्यारि दिनका इकसठिवों भागविप दोयस छितरि दिनका ईकसठियां भाग मात्र पुण्यकी भुक्तिका काल होहै। ऐसे सर्वकाल मिलि राहूकै- उत्तरायण विनै एकसौ असी दिन हो।
( १२८ ) बहरिराहू दक्षिणायनविपै प्रथम पुप्यका मुक्तिकालविर्षे अवशेष पांचसै अठाईस दिनका इकसठिवां भाग प्रमाण काल पर्यंत तौ पुप्यकी भुक्ति हो । पीछे आश्लेषादि उत्तराषाढ पर्यंत नक्षत्रनिकी मुक्ति क्रम हो । तहां तीन जघन्य सात मध्य तीन उत्कृष्ट नक्षत्रनिका मुक्तिकाल क्रमते च्यारिसे दोयका इकसठिवां भाग माठसै च्यारिका इकसठिवां भाग चारहसै छैका इकसठिवां भाग मात्र है । ऐसें सर्वकाल मिलि राहु- के दक्षिणायनविर्षे एकसौ असी दिन हो । याप्रकार नक्षत्र मुक्तिकों समच्छेद करि जो. चंद्रमाके अयनके दिन तेरह अर चवालीसका सतसठिवां भाग होहैं । वहुरि दोऊ अयन मिलाएं बर्षके दिन सत्ताईस इकतीसका ईकसठिवां भाग होहैं । बहूरि सूर्यके अयन दिन एकसौ तियासी वर्ष दिन तीनसै छयासठि होई । बहुरि राहुकै अयनदिन एकसौ मसी वर्ष दिन तीनसैं साठि होहैं ॥ ४०९ ॥ माग अधिक मासका प्रतिपादनकै पार्थ सूत्र कहैं है- इगिमासे दिणवटि वस्से चारह दुवस्सगेसदले ॥ अहिओ मासो पंचयवासप्पजुगे दुमासहिया ॥ ४१० ॥ . एकस्मिन् मासे दिनवृद्धि वर्षे द्वादश द्विवर्षके सदले ॥ अधिको मासः पंचवात्मकयुगे द्विमासौ अधिकौ ॥४१०॥ अर्थ:- एक मासवि एक दिनकी वृद्धि होइ अढाई वर्षविर्षे एक मास अधिक होइ । पंच वर्षका समुदाय सोई हैं स्वरूप नाका ऐसा युग तिहविर्षे बारह दिन वधै तो अढाई वर्षविर्षे कितने दिन बधै ऐसे किए लब्धराशि तीस दिन होइ । ऐसे ही युगवि भी त्रैराशिक करना। भावार्थ:--एक वर्षके वारह मास एक मासके तीस दिन तहां इकसठिवें दिन एक तिथि घटे तातै वर्षके तीनसै चौवन दिन होइ । भर सूर्यके वीनस छासहि दिन है । सो वारह दिन एक वर्षविर्षे ( १२९) ववती भए सो अढाई वर्ष व्यतीत भएं एक अधिक मास होइ तब तेरह मासका वर्ष होइ । बहुरि ऐसे ही भढाई वर्ष और भए एक मास अधिक होइ । या प्रकार पांच वर्ष प्रमाण जो युग तिह विर्षे दोय मधिक मास होइ ॥ ४१०॥ अब पूर्व गाथाका जु अथै ताहीको माठ गाथानिकरि वर्णन करें हैं।-- आसादपुण्णमीए जुगणिप्पत्ती दु सावणे किण्हे ।। अमिजिम्हि चंदजोगे पाडिवदिवसम्हि पारभो ।। ४११।। आपाढपूर्णिमायां युगनिष्पत्तिः तु श्रावणे कृष्णपक्षे ॥ अभिजिति चंद्रयोगे प्रतिपदिवसे प्रारंभी ॥४११ ॥ मर्थ:---आपाट मासवि पृन्यो दिन उपरान्त समय उत्तरायण. की समाप्तता होते पंच वर्ष स्वरूप युगकी निष्पत्ति कहिए संपूर्णता सो हो हैं । बहुरि श्रावण मास कृष्ण पक्षविर्षे अभिजित नक्षत्र मर चंद्रमा- का योग होत पडिवाफै दिन दक्षिणायनका प्रारंभ हो है । भावार्थ:--आषाढ सुदि पून्यौं अपराहवि तौ पूर्व युगकी समा- तता भइ । बहुरि श्रावण वदि एकै दिन जहां चंद्रमाकै अभिजित नक्षत्र- का भुक्तिकाल होइ तहां सूर्यका दक्षिणायनका आरम हो है । सोई नवीन पांच वर्ष स्वरूप जो युग ताका प्रारंभ जानना ॥ ४११ ।। आगे किस वीथीवि किस अयनका प्रारंभ हो है सो कहैं हैं- पढमंतिमवीहीदो दक्खिणउत्तरदिगयणपारंभो ।। आउट्टी एगादीदुगुत्तरा दक्खिणाउट्टी ॥ ४१२ ॥ प्रथमांतिमवीथीतः दक्षिणोचरदिगयनप्रारंभः ।। आपत्तिः एकादिद्विकोत्तरा दक्षिणावृत्तिः ॥ ४१२ ॥ .
(१३०)
६
“अर्थ-प्रथम अंतिम वीथीते दक्षिण उत्तर दिशाका अयनका प्रारंभ
होहै । भावार्थ:-एकसौ चौरासी वीथिनिविर्षे प्रथम अभ्यंतर वीथीवि
तिष्ठता सूर्यके दक्षिण अयनका प्रारंभ होहै । अंतर बाह्य वीथीविर्षे
तिष्ठता सूर्यके उत्तर अयनका प्रारंभ होहै । बहुरि सोई दक्षिणायन पर
उत्तरायणकी प्रथम आवृत्ति है। पूर्व अयनको समाप्तकरि नवीन अयनका
ग्रहण ताका नाम आवृत्ति जाननां । तहां एककौं आदि देकरि दुगुत्तरा
कहिए दोय वृद्धि प्रमाणलिएं दक्षिण आवृत्ति होई ।। ४१२॥
उत्तरायणकी भावृत्ति कैसे है सो.कहते हैं-
उत्तरगा य दुआदि दुचया उभयत्थ पंचयं गच्छो ।
विदिआउही दु हवे तेरसि किण्हेसु मियसीसै ॥ ४१३ ।।
उत्तरगा च द्वयादिः द्विचया उभयत्र पंचकं गच्छः ॥
द्वितीयावृत्तिः तु भवेत् त्रयोदश्यां कृष्णेषु मृगशीर्षायाम् ॥४१३
अर्थः - उत्तरायण संबंधी आवृत्ति सो दोयकों आदि देकर
द्विचयाः कहिए दोयवृद्धि प्रमाण लिए हैं । बहुरि उभयत्र कहिए दोउ
जायगा दक्षिणायन उत्तरायणविर्षे गच्छ कहिए स्थान प्रमाण सो पांच
जाननां ।। भावार्य पूर्व अयनकौं समाप्तकरि नवीन अयनका ग्रहण होते
अयनकी जो पलटनी ताका नाम आवृत्ति है. । सो पंच वर्ष प्रमाण एक
युगविर्षे दश बार आवृत्ति हो है । तहां पहली तीसरी पांचवीं सातवीं
नबमी आवृत्ति तौ दक्षिणायन संबंधी है । जाते तहां उत्तरायणकौं समाप्त
करि दक्षिणायनका ग्रहण कीजिए है । बहुरि दूसरी चौथी छट्टी आठवी
दशमी भावृत्ति उत्तरायण संबंधी है। जाते तहां दक्षिणायनकौं समाप्त-
करि उत्तरायणको ग्रहण कीजिये हैं तहां दक्षिणायन संबंधी मावृत्ति
श्रावण मासविर्षे हो है ! सो प्रथम आवृत्ति तौ पूर्वं कही थी, बहुरि
दुसरी आवृत्ति कृष्णपक्षविर्षे तेरसिके दिन चंद्रमा - 'मृगशीर्षा नक्षत्रका
भुक्तिकालविर्षे हो है ॥ ४१३ .॥
(१३१ ) . तीसरी मादि मावृत्ति कब होत है सो कहै हैं ।- सुक्कदसमीविसाहे तदिया सत्तमिगकिण्हरेवदिए । तुरिया दु पंचमी पुण सुक्कचउत्थीए पुव्वफग्गुणिये ।।४१४ शुक्लदशमीविशाखे तृतीया सप्तमी कृष्णरेवत्याम् ॥ तुरिया तु पंचमी पुन: शुकचतुर्थी पूर्वफाल्गुन्याम् ॥४१४ अर्थः-शुक्ल पक्ष दशमी तिथिवि विशाखा नक्षत्रका योग होते तीसरी भावृत्ति हो है । बहुरि कृष्ण पक्षकी सप्तमी तिथिविर्षे रेवती नक्षत्रका योग होते चौथी आवृत्ति हो है। बहुरि शुक्लपक्षकी चौथी तिथिविर्षे पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्रका योग होते पांचवी आवृत्ति हो है॥४१४ ॥ इन करि कहा हो है सो कहैं हैं।- दक्षिणअयणे पंचसु सावणमासेसु पंचवस्सेसु ।। एदाओ भणिदाओ पंचणियट्टीउ सूरस्स ॥४१५ ॥ दक्षिणायने पंचसु श्रावणमासेसु पंचवर्षेषु ॥ एतः मणितः पंचनिवृत्तयः सूर्यस्य ।।४१५ ॥ अर्थः दक्षिणायनविर्षे पांच जे श्रावण मास पांच वर्षनिविर्षे होइ तिनविर्षे ए पांच आवृत्ति सूर्यकी कही हैं ।। ४१५ ।। उत्तरायणविर्षे आवृत्ति कैसे हे सो कहैं हैं।- माघे सत्तमि किण्हे हत्थे विणिवित्तिमेदि दक्खिणदो । विदिया सदभिससुक्के चोत्थीए होदि तदिया दु ॥४१६॥ माघे सप्तम्यां कृष्णे हस्ते विनिवृत्ति एति दक्षिणतः ॥ द्वितीया शतभिशुक्ले चतुर्यों भवति तृतीया तु ॥४१६ ॥ अर्थ:-माघमासविर्षे उत्तर आवृत्ति हो है तहां कृष्ण पक्षकी सप्तमी तिथिवि चंद्रमाके हस्त नक्षत्रकी मुक्ति होते अयन पलटै है - .
सोई उत्तरायणविर्षे प्रथम भावृत्ति है । बहुरि दूसरी बावृत्ति शतभिषक नक्षत्रका योग होते शुक्ल पक्षकी चौथी तिथिविर्षे हो है ।। ४१६ ॥ वहुरि तीसरी बादि आवृत्ति कैसे सो कहैं हैं।- पडवदि किण्हे पुस्से चोत्थीमूले य किण्हतेरसिए ॥ कित्तिय रिक्खे सुके दसमीए पंचमी होदि ॥ ४१७ ॥ प्रतिपदि कृष्णे पुण्ये चतुर्थी मुले च कृष्णत्रयोदश्याम् ॥ कृत्तिका ऋक्षे शुक्ल दशम्यां पंचमी भवति ॥४१७॥ अर्थ-कृष्ण पक्षकी पडिवातिथिवि पुष्य नक्षत्रका योग होते तीसरी आवृत्ति होहै । बहुरि चौथी आवृत्ति कृष्ण पक्षकी त्रयोदशी तिथिवि. मूल नक्षत्रका योग होते हो है। बहुरि शुक्ल पक्षकी दशमी तिथिविर्षे कृत्तिका नक्षत्रका योग होते पांचवी आवृत्ति हो है ॥४१७॥ कह्या अर्थको जोडे हैं- ताओ उत्तरअयणे पंचसु वासेसु माघमासेसु ॥ आउट्टीओ भणिदा सूरस्सिह पुत्वसूरीहिं ॥ ४१८ ।। ताः उत्तरायणे पंचसु वर्षेषु माघमासेषु ।। आवृत्तयः भणिताः सूर्यस्येह पूर्वसरिभिः ॥ ४१८ ॥ अर्थ- ते ए आवृत्ति उत्तरायणविर्षे पांच वर्षनिवि जे पांच माघमास होहि तिनविर्षे पूर्व प्राचार्यनिकरि सूर्यकी कही हैं । अब कही जु गाथा तिनका रचनाका उद्धार करनेका विधान कहिए हैं। पांच वर्षका समुदाय सो. युग है । जाते युगके मारंभते पांच वर्ष व्यतीत भए तिथि मादि रचना जैसे पहिले युगविर्षे गी तैसें ही है। सो युगविर्षे दक्षि- गायनका प्रारंभ तो पांच श्रावण मासनिवि होई अर उत्तरायणका प्रारंभ पांच माघमासनिविर्षे होइ । बहुरि वीचिविर्षे दक्षिणायनविर्षे . फाल्गुन मादि मास होहैं।
(१३३) तहां एक एक मासकी इकतीस तिथि स्थापन करनी। काहेत ? एक मासकी तीस तिथि होहै । भर-" इगिमासं दिणवड्ढी " इस सूत्र करि एक मासविर्षे एक दिन वधै तात इकतीस तिथि स्थापन करना । इहां पंद्रह पंद्रह दिनका पक्ष ग्रहण किया तातै एक मासके तीस दिनही ग्रहण किए । बहुरि नो तिथि पटै है तिहकी विवक्षा किए पक्षविर्षे भी घटती दिन कहना होह मासविर्षे भी कहना होइ तातै भावार्थ:- एक जानि तीस दिनही मासके ग्रहण कीए । तहां युगविर्षे दक्षिणायनविर्षे प्रथम श्रावण मासविर्षे कृष्ण पक्षके पंद्रह शुक्लके पंद्रह कृष्णका एक दुसरेवि कृष्णके तीन शतके पंद्रह कृष्णके तेरह, तीसरेवि शुक्लके छह कृष्णके पंद्रह शुक्लके दश, चौथेविर्षे कृष्णके नव शुक्लके पंद्रह कृष्णके सात, पांचवांविर्षे शुक्लके बारह कृष्णके पंद्रह शुक्लक च्यारि दिन हो है। बहुरि उत्तरायणविर्षे प्रथम माधवि कृष्ण पक्षके सात, दूसरेविखें शुक्ल के बारह कृष्णके पंद्रह कृष्णके एक चौथेविर्षे कृष्णके तीन शुक्लके पंद्रह कृष्णके तेरह, पांचवां माधवि शुक्लके छह कृष्णके पंद्रह शुक्लके दश दिन होहै । बहुरि दक्षिणायनवि वीचि जे भाद्रपदादिक मास अर उत्तरायणविर्षे वीचि फाल्गुन आदि मास तिनविर्षे मादिवि एक एक घटता पर अंतविपैं एक एक बंधता दिन स्थापन करिए ऐसे एक एक मासविषै इकतीस तिथी स्थापन किए तीह मासविर्षे वा तीह तीह भयन- विषै अधिक दिन भावें हैं। भावार्थ:-प्रथम प्रावणविषै वदि एफैः लगाय पंद्रह तिथी कृष्ण पक्षकी अर पंद्रह शुक्ल पक्षकी अर एक भाद्रपदका कृष्णकी मिली एकतीस तिथि होई । बहरि भाद्रपदविर्षे पंद्रह तिथि कही थी तामें एक घटाएं दोय अश्विनके कृष्ण पक्षकी मिलाएं इकतीस तिथि हो है । बहुरि अश्विनीविर्षे मादिमें एक घटाएं तेरह कृष्ण .
( १३४ ) पक्षकी पंद्रह शुक्ल पक्षकी अंतविबै एक वधाएं तीन कार्तिक कृष्ण पक्षकी मिलाएं इकतीस तिथी हो हैं । ऐसे ही कार्तिकवि बारह कृष्णकी पंद्रह शुक्लकी च्यारि कृष्णकी मार्गशीर्पविष ग्यारह कृष्णकी पंद्रह शुक्लकी पांच कृष्णकी पौषविर्षे दश कृष्णकी पंद्रह शुक्लकी छह कृष्णकी तिथि मिलें इकतीस तिथि होई । 'बहुरि उतरायणविर्षे माघवदी सात ते नव कृष्णकी इत्यादि रचना किए बहुरि दक्षिणायनविर्षे द्वितीय श्रावणमास विर्षे श्रावण वदी त्रयो- दशीत लगाय तीन कृष्णकी पंद्रह शुक्लकी तेरह कृष्णकी तिथि हो हैं। बहुरि भाद्रपदादिकवि रचना करानी । ऐसे रचना किए मासविष अयनविर्षे अधिक दिन आवै है। इस क्रमकरि पंचवर्षात्मक युगविने दोय अधिक मास हो हैं। ॥ ४१८ ॥ आगै दक्षिणायन और उत्तरायणके प्रारंभ विर्षे नक्षत्र ल्यावका विधान कहैं हैं। रूऊणाउट्टिगुणं इगिसीदिसदं तु सहिद इगिवीसं ॥ तिघणहिदे अवसेसा अस्सिणि पहुदीणि रिक्खाणि १४१९॥ .' रूपोनावृत्तिगुणं एकाशीतिशतं तु सहितं एकविंशत्या ॥ निधनहते अवशेषाणि आश्विनी प्रभृतीनि ऋक्षाणि ।४१९। मर्थः-रूपोनावृत्ति कहिए जेथवीं भावृत्ति होइ तामें एक घटाएं जो प्रमाण होइ तिहकरि गुण्या हुवा एकसौ इक्यासी तामें इकईस नोडिए अर ताकौं तीनका घन जो सत्ताईस ताका भाग दिएं जेता अवशेष रहै तेथवा नक्षत्र अश्विनी आदितै जाननां । उदाहरण-जैसे विवक्षित आवृत्ति प्रथम तामै एक घटाएं शुन्य अवशेष रहै तीहकरि एकसौ-इक्यासीकौं गुणिए सो शून्य करि गुण्या हुवा अंक शून्य ही होइ तातें गुणें भी शून्य ही पाया। तीह विदिविर्षे इकईस जो. इकईस ही भए । ..
(१३५ ) बहुरि इहां सचाईस ते अधिक होता तो सत्ताईसका भाग देते ताते इकईस ही रहे सो अश्विनी भरणी कृत्तिका मादि मनुक्रमते गिनें अश्विनी ते लगाय जो ईकईसवां नक्षत्र होइ सोई प्रथम आवृत्तिविय नक्षत्र होइ सो अश्विनी लगाय ईकईसवां नक्षत्र उत्तराषाढा है। परंतु इहां अभिजितका ग्रहण करना । काहेतै सो कहिए हैं । यद्यपि नक्षत्र अठ्ठाइस है। तथापि जहां नक्षत्रनि. की गणनादिक करिए हैं तहां सत्ताईस नक्षत्रनिहीका ग्रहण कीजिए हैं । अभिजित नक्षत्रका ग्रहण न कीजिए हैं जाते याका साधन सूक्ष्म है तातें इहां प्रथम आवृत्तिविर्षे स्थूलपनै साधन किए उत्तराषाढ गावै परंतु सूक्ष्मपर्ने साधन किए अभिजित नक्षत्र जाननां । आगैंमी अश्विनी मादिकतै वा कार्तिक मादिकतै नक्षत्र गणनावि अभिजित नक्षत्रका ग्रहण करना नाही। या प्रकार दक्षिणायनका प्रारंभवि प्रथम श्रावण मासविर्षे नक्षत्र ल्यावनैका विधान ह्या । अब दूसरा उदाहरण कहिए हैं। विवक्षित दुसरी आवृत्ति तामैं एक घटाएं एक रह्या तीह करि एकसौ इक्यासीकौं गुणे एकसौ इक्यासीही हुवा इनमें इकईस मिलाएं दोयसे दोय भए इन- को सत्ताईसका भाग दिएं अवशेष तेरह रहे सो अश्विनी नक्षत्रत तेरव्हीं नक्षत्र हस्त सो उत्तरायणका प्रारंभवि प्रथम माघ मासविर्षे हस्त नक्षत्र पाईए हैं । ऐसेही तीसरी पांचवी सातवी नवी आवृत्तिविर्षे दक्षिणाय- नका प्रारंभ श्रावण मासविषै होहै। तहां अर चौथी छठी आठवी दशवी आवृत्तिविर्षे उत्तरायणका प्रारंभ माघ मासविर्षे होहैं । तहां नक्षत्र साधन करनां ॥ ४१९ ॥ आ- दक्षिणायन उत्तरायणकै पर्व वा तिथि च्यावनेंविर्षे सूत्र फहे हैं- - (१३६) : । वेगाउद्विगुण तेसीदिसदं सहिद तिगुणगुणरूवे ।। पण्णरमनिदे पव्वा सेसा तिहिमाणमयणस्स ॥४२॥ व्येकावृत्तिगुणं त्र्यशीतिशतं सहितं त्रिगुणगुणरूपेण ।। पंचदशमक्ते पर्वाणि शेष तिथिमानं अयनस्य ।। ४२० ॥ अर्थः-व्येका वृत्ति कहिए जेथवी विवक्षित आवृत्ति होइ तामें एक घटाएं जो प्रमाण है तिहकरि एक सौ तियासीकों गुणिए, बहुरि जितनें गुणकारक एकसौं तियासीकौं गुणकरि ताकौं तिगुणाकरि तामें जोडिएं । बहुरि एक और जोहिए जो प्रमाण होई ताको पंद्रहका भाग दोजिए जो लब्ध प्रमाण मावै तितनें तौ पर्व जानने यबशेष रहे सो तिथि प्रमाण जाननां । दक्षिणायन वा उत्तरायणका ऐसेही जाननां उदाहरण विवक्षित आवृत्ति प्रथम तामैं एक घटाएं विदीही तिहकरि एकसौ तियासी- कों गुणों विंदी करि गुणें बिंदीही होइ इस न्यायकरि विदीही माई । बहुरि इहां गुणकार चिंदी ताकौं तिगुणां किएभी बिंदीवि बिंदी जोड़ें विंदी ही भई । बहरि नामैं एक जोडें एक भया योको पंद्रहका भाग लागै नहीं तातै पर्वका तो अभाव जाननां । अर अवशेष एक रह्या सौ तिथिका प्रमाण जानना ऐसें प्रथम मावृति दक्षिणायनका प्रारंभवि. प्रथम श्रावण मासविर्षे. पर्वका तो मभाव या पक्षकी पूर्णताभएं पूर्णमा वा अमावस्या जो होह ताका नाम पर्व है । सो युगका आरंभ भएं पीछे जेते पर्व व्यतीत होइ सोई . इहां पर्वनिकी संख्या जाननी । सो प्रथम आवृत्तिविर्षे कोऊ भी पर्व-व्यतीत भया तातै पर्वका अभाव जाननां । भर तिथिका. प्रमाण एक जाननां । बहुरि दूसरा उदाहरण विवक्षित मावृत्ति दूसरी तामैं एक घटाएं एक रया तीहकरि एकसौ तियासीकौं गुणे एकसौ तियासी भए । बहुरि गुणकारको प्रमाण एक ताकौ तिगुणा किए तीनसौ मिलाय एकैसौ छियासी भये । बहुरि तामैं एक और जोडै एकसौ सित्यासी भए ।
(१३७)
बहुरि तामैं एक और जोडै एकसौ सित्यासी भए । इनको पंद्रहका भाग
दिएं बारह पाएं सो बारह तौ पर्वको प्रमाण भया । युगका प्रारंभते
बारह पर्व व्यतीत भएं पीछे दूसरी मावृत्ति हो हैं । पर अवशेष सात
रहे सो सात तिथि जाननी । ऐसें दूसरी आवृत्ति उत्तरायणका प्रारंभ
होते प्रथम माघमासवि होई तहां युगके आरंभत बारह तौ पर्व व्यतीत
भए नानने भर सातै तिथि जाननी । याही प्रकार मन्य आवृत्तिनिविर्षे
भी पर्व वा तिथीका प्रमाण त्यानां ॥ ४२०॥
आगै दिन वा रात्रिका प्रमाण निहिंकालविर्षे समान होइ ताका
नाम विपुप हैं तिह विपुपविर्षे पर्व वा तिथि वा नक्षत्रानिकौं छह गाथा-
निकरि युगके दश अयनिवि कहे हैं।
छम्मासद्धगयाण जोइसयाण समाणदिणरत्ती ॥
तं इसुपं पढमं छसु पवसु तीदेखें तदिय रोहिणिए ॥४२०॥
पण्मासार्धगतानां ज्योतिप्काणां समानदिनरात्री ॥
तत् विपुर्व प्रथम षट्सु पर्वसु अतीतेषु तृतीया रोहिप्याम् ॥
मर्थः-छह मासका अर्द्ध ज्योतिषीनिके भएं समान रात्रि हो है
सोई विषुप है। भावार्थ:-एक अयन छह मासका हो है । तहां
आधा अयन भएं दिन अर रात्रिका प्रमाण समान हो है। सो जिस
कालवि दिन रात्रि होई ताका नाम विपुप है । सौ पंच वर्ष प्रमाण
युगवि दश विपुप हो हैं। पांच तो दक्षिणायनका अर्द्धकालविर्षे पर
पांच उत्तरायणका अर्द्धकालविष हो है तहां पहला विषुप दक्षिणायनका
अर्धकालविर्षे दूसरी उत्तरायणका अकालविर्षे ऐसै क्रमते जाननें । तहां
प्रथम विपुप मृगके आरंभ छह पर्व व्यतीत भएं तृतीय तिथिविर्षे
रोहिणी भुक्ति चंद्रमाकै होत होत सो हो सतें हो है ॥ ४२१ ॥
( १३८ )
विगुणणवपव्वऽतीदे णवमीए. विदियगं धणिहाए ॥
इगितीसगदे तदिय सादीए पण्णरसमम्हि ॥ ४२२ ।।
द्विगुणनवपर्वातीतेपु नवभ्यां द्वितीयकं धनिष्टायाम् ॥
एकत्रिंशगते तृतीय स्वातौ पंचदशाम् ॥ ४२२ ।।
अर्थः-दुगुण नव जो युगके मारंभ पीछे अठारह पर्व व्यतीतमएं
नवमी तिथिविर्षे धनिष्ठा नक्षत्रका योग चंद्रमाकै होते दुतीय विपुष
होई । बहुरि इकतीस पर्व व्यतीत भएं तीसरा विपुप स्वाति नक्षत्र सन्तै
पंचदशी तिथिविष होगहै । सो कृष्णपक्ष पक्ष पनेते अर्थतै अमावास्या
विषय होह ॥ ४२२ ॥
तेदालगदे तुरिय छडिपुणव्वसुगयं तु पंचमयं ।।
पणवण्णपन्चतीदे वारसिए उत्तराभद्दे ॥ ४२३ ॥
त्रिचत्वारिंशद्गतेपु तुरीयं पष्ठीपुनर्वसुगतं तु पंचमयं ।।
पंचपंचाशपर्वातीतेपु द्वादयश्यां उत्तराभाद्रे ॥ १२३ ।।
अर्थ:-तियालीस पर्व व्यतीत भए चौथा विपुष षष्ठीवि पुनर्नसु
नक्षत्रकौं प्राप्त भएं हो है । बहुरि पांचवां विषय पञ्चावन पर्व व्यतीत
भएं द्वादशी तिथिवि उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र होत सतै हो है ॥४२३॥
अडसहिगदे तदिए मित्ते छठे असीदिपनगदे ।।
णवमिमघाए सत्तममिह तेणउदिगदे दु अष्टमयं ॥ ४२४ ॥
अष्टपष्ठिगतेषु तृतीयायां मैत्रे पष्ठं अशीतिपर्वगतेषु ।।
नवमीमघायां सप्तम इह विनवतिगतेषु तु अष्टमम् ॥४२४॥
अर्थ:--अडसठि पर्व गए तृतीय तिथिवि मैत्र जो अनुराधा
नक्षत्र ताकों होत सत छठा विषुप हो है । बहुरि असी पर्व गएं
नवमी तिथिविष मघा नक्षत्र होते सातवां विषुप हो है । बहुरि इहां
तेरणवै पर्व गएं आठवां विषुप हो है ॥ १२४ ॥
( १३९ ) अस्सिणि पुण्णे पव्वे णवमं पुण पंचजुद सए पव्वे ।। तीते छट्टि तिहीए णक्खत्ते उत्तरासाढे ॥ ४२५ ।। अश्विनी पूर्ण पर्वणि नवमं पुनः पंचयुत शतेपु पर्वेषु ।। अतितेपु पष्टी तिथी नक्षत्रे उत्तरापाढे ॥४२५ ।। अर्थः-सो आठवां विपुप अधिनी नक्षत्र होते पूर्ण जो अमाव- स्या तिडविर्षे हो है । बहुरि नवमां विपुप एकसौ पांच वर्ष व्यतीत भएं षष्ठी तिथिचि उत्तरापाढ नक्षत्र होते हो है ॥ ४२५ ॥ चरिमं दसम विसुपं सत्तरहसुत्तर सएसु पव्वेसु ॥ तीदेसु बारसीए जाइति उत्तरगफग्गुणिए ॥ ४२६ ।। चरम दशमं विपुर्व सप्तदशोत्तर शतेपु पर्येषु ।। अतीतेपु द्वादश्यां जायते उत्तराफाल्गुन्याम् ॥ ४२६ ॥ अर्थः- अंतका दशवां विपुप एकसौ सतरह पर्व व्यतीत भएं द्वादशी तिथिविर्षे उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र होते हो है ॥ ४२६ ॥ आगें विपुपविर्षे पर्व वा तिथि स्थावनकौं सूत्र कहे है। - विगुणे सगिहइसुपे रूऊणे छग्गुणे हवे पव्वं ।। तप्पबदलं तु तिथी पवमाणस्स इसुपस्स ॥ ४२७ ॥ द्विगुणे स्वकेटविपुपे रूपोने पड्गुणे भवेत् पर्व ॥ तत्पदलं तु तिथिः प्रवर्तमानस्य विपुवस्य ॥ ४२७ ॥ अर्थः-- अपना इष्ट विपुप जेथवा होइ तीह प्रमाणको दुणाकरिएं तामैं एक घटाइए बहुरि अवशेषकों छइ गुणा किए पर्वनिका प्रमाण आवे है । बहुरि तिस पर्व प्रमाणका आधा सो प्रवर्तमान विवक्षित वि- पुपका तिथि प्रमाण हो है । तीह पर्वका अाधा प्रमाण पंद्रहते अधिक होइ तो पंद्रहका भाग दिएं जो लब्ध प्रमाण होइ सो तो पर्व संख्याविर्षे जोडिए आ अवशेष रहै सो तिथिका प्रमाण हो है । इहां उदाहरण- इष्ट - (१४) विषुप पहला ताकों दणां किए दोय तामै एक घटाएं अबशेप एक ताकौं छह गुणां किएं छइसो प्रथम विपुपविर्षे युग पारंमतें व्यतीत पर्वनिका प्रमाण छह है । बहुरि तीह पूर्व प्रमाणका आधा तीनसो प्रथम विपुप- विर्षे तिथि तृतीया है। दूसरा उदाहरण-इष्ट विषुप दशां ताकौं दूणा किए वीस तामें एक घटाएं उगणीस ताकौं छह गुणा किएं सौ चौदह सो पर्व प्रमाण ताका आधा सत्तावन ताको पंद्रहका भाग भाग दिएं तीन पाए सा पर्व संख्याविर्षे मिलाएं अंत विपुपविर्षे एकसौ सत्तरह तो पर्वनिका प्रमाण है। अर अवशेष बारह रहे सो तिथि द्वादशी । ऐसें अन्य विषुपनिवि भी जाननी ॥ ४२७ ॥ आगें भावृत्ति अर विपुपविर्षे तिथि संख्याको कहैं हैं,- वेगपद छग्गुणं इगितिजुदं आउद्विइसुपतिहिसंखा ॥ विसमतिहीएं किण्हो समतिथिमाणो हवे सुक्को ।। ४२८ ॥ व्येकपदं पड्गुणं एकत्रियुत आवृत्तिविषुपतिथिसंख्या ॥ विषमतिथौ कृष्ण समतिथिमानो भवेत् शुक्लः ॥ ४२८ ॥ अर्थः -- इष्ट भूत जेथवी आवृत्ति होइ तिस आवृत्ति स्थानक- मैंस्यों एक घठाइए अवशेष छह गुणाकरि दोय जायगा स्थापिए तहां एक जायगा एक और मिलाइए एक नायगा तीन और मिलाइए तन क्रमः आवृत्ति पर विपुपवि तिथिको संख्या हो है सिनिविर्षे जो एक तृतीया पंचमी भादि विषम गणनारूप तिथि होइ तौ तहां कृष्ण पक्ष है । बहुरि द्वितीया चतुर्थी षष्ठी आदि समतिथि हैं तो तहां शुक्ल पक्ष है। उदाहरण इष्ट आवृत्ति प्रथम तामैं एक घटाएं शुन्य ताकौं छइ गुणा किएं भी शून्य होइ ताकौं दोय जायगा स्थापि तातै एक नायगा एक नो. एक होइ सो प्रथम आवृत्ति विर्षे तिथि एक है सो यहु विषम तिथि है तातें इहां कृष्ण पक्ष जानना । बहुरि दूसरी जायगा तीन जोडै तीन होइ सो प्रमथ् आवृत्ति संबंधी (१४१) प्रथम विपुपविष तिथिका तृतीया है । यहुभी विषम तिथि है ताते इहां भी कष्ण पक्ष ही जाननां । बहुरि दूसरा उदाहरण-इष्ट भावृत्ति दशमी तामैं एक घटाए नव ताकौं छह गुणा किए चौवन तिनको दोय नायगा स्थापि एक जायगा एक और मिलाएं पचावन होई ताकौं पंद्रहका भाग दिएं अवशेष दश रहे सोई दशवीं मावृत्तिविषै दशमी तिथि है । इहां शुक्ल पक्ष जाननां । बहुरि दूसरी नायगा तीन और मिलाएं सत्तावन होइ ताको पंद्रहका भाग दिएं अवशेष बारह रहे सोई दशवां विषुपविर्षे तिथि द्वादशी है । यह भी सम तिथि हैं । तातै इहां भी शुक्ल पक्ष जाननां । ऐसेही अन्य आवृत्ति वा विपुपविक् साधन करना ॥४२८॥ मागें विषुपविय नक्षत्रनिका वा सर्व तिथि ल्यावनका विधान आउहिलद्धरिक्खं दहजुद छहदसमगेणूणम् ॥ . इषुपे रिक्खा पण्णरगुणपन्वाजुदतिही दिवसा ।। १२९ ।। आवृत्तिलब्धऋक्षं दशयुतं षष्ठाटदशमके एकोनं ॥ विपुवे ऋक्षाणि पंचदशगुणपर्वयुततिथयः दिवसानि ॥४२९ अर्थः-आवृत्तिविषै जो नक्षत्र पाया ताका आगला नक्ष. त्रसौं लगाय जो दशवा नक्षत्र होइ सो तोह आवृत्ति संबंधी नक्षत्र जाननां । तहां छठा आठवां दशवां विषुपविषै एक घटानना जो नवमां ही नक्षत्र होइ सो तीह विषुपविर्षे जाननां । उदाहरण-दूसरी भावृत्ति विर्षे हस्त नक्षत्र है । ताते आग चित्रातें लगाय दशवां नक्षत्र धनिष्ठा है । सोई दूसरा विषुपविर्षे नक्षन जाननां । बहुरि दूसरा उदाहरण छठी आवृत्तिविर्षे पुष्य नक्षत्र है। तातै अगिला आश्लेषा लगाय नवा नक्षत्र रोहिणी है सोई छटा विपुपविर्षे नक्षत्र जानना इहां छटा माठयां
(१४२)
दशवांवि. एक घाटि कहा है । तातै नवर्मा नक्षत्र ही ग्रहण किया।
इहां गणनांविर्षे अभिजितका ग्रहण करना । ऐसे ही अन्य विषुपनिविष
नक्षत्र साधन करना । बहुरि आवृत्ति वा विपुपविर्षे पर्व प्रमाणको पंद्रह
गुणां करि तामें तिथिप्रमाण मिलाएं समस्त दिननिका प्रमाण हो है।
उदाहरण-दूसरी आवृत्तिविष पर्वप्रमाण वारह तिनको पंद्रह
गुणां किएं एकसौ असी भएं, तहां तिथि प्रमाण सात मिलाएं एकसौ
सित्यासी भए सोई युगके भारंभते एकसो सित्यासी दिन व्यतीत भएं
दूसरी आवृत्ति हो है। इहां एकसौ तियासी दिन व्यतीत भए ही दूसरी
आवृत्ति हो है तथापि घटती तिथिफी विवक्षा न करि पक्षके पंद्रह
दिन गिणि ऐसा कथन किया है। ऐसे ही अन्य आवृत्ति वा विपुप-
निवि साधन करनां ॥ ४२९ ॥
आग विपुपविर्षे नक्षत्रका त्यापनां अन्य प्रकारकी दोय गाथानिकरि
आउट्टिरिक्खमस्तिणिपहुदीदो गणिय तत्थ अजुदे ॥
इसुपेसु होति रिक्खा इह गणना वित्तियादीदो ॥ ४३० ॥
आवृत्तिऋक्ष अश्विनीप्रभृतितः गणयित्वा तत्र अष्ट्युते ॥
विपुपेयु भवन्ति ऋक्षाणि इह गणना कृत्तिकादितः ॥४३०
अर्थ-आवृतिका नक्षत्रकों अश्विनी नक्षत्र लगाय गिणिए
जेथवा होइ तिहविर्षे आठ मिलाएं जो प्रमाण होइ तिहवि. आठ मिलाए
जो प्रमाण होई तेथवा नक्षत्र विषुपवि जाननां इहां गणना कृत्तिका
आदित करनी । उदाहरण-विवक्षित तीसरी आवृत्तिका नक्षत्र मृगशीर्षा
सो अश्विनी-मृगशीर्ष नक्षत्र पांचवो है । बहुरि पांचवि आठ मिलाए
तेरह होई तो कृत्तिका नक्षत्रतें तेरहवां नक्षत्र स्वाति है। सोई गणना
किए तीसरा विषुपविर्षे स्वाति नक्षत्र जाननां ॥ ४३० ॥
(१४३ )
आगै आवृत्ति नक्षत्रका प्रमाणविर्षे आठ मिलाए नक्षत्र प्रमाणते
राशि मषिक होइ तौ कहा करिए सो कहे हैं-
अहियंकादडवीसं छंडेज्जो विदियपंचमठाणे ।।
एक णिरिखवछठे दसमेवि य एकमवणिज्जो ॥ ४३१ ॥
अधिकांकादष्टविंशं त्याज्याः द्वितीयपंचमस्थाने ।
एक निक्षिपपष्ठे दशमेऽपिच एकमपनेयम् ॥ ४३१ ।।
अर्थ-आवृत्ति नक्षत्रकों अश्विनीतें गिनै जेथवा होइ तामैं आठ
मिलाए जो अट्ठाईसते अधिक राशि होइ तौ तिहमैंयौं अठाइस
घटाए । अर दूसरा पांचवां आवृत्तिस्थानविर्षे आठ मिलाए जो
राशि होइ तामैं एक और घटाइए । भर छटा दशां आवृत्ति
स्थानमेंस्यौं एक घटाइए इनका उदाहरण चौथी आवृत्तिविर्षे
शतभिषक नक्षत्र है सो अश्विनीत पचीसवां है । तामें आठ
मिलाए तेतीस होइ तिनमें सों अठाइस घटाए पांच रहे सो कृत्तिकाते
पांचवां नक्षत्र पुनर्वसु है । सोइ चौथा विषुपविर्षे जाननां ऐसे अन्यत्र
भी जाननां । बहुरि दूसरी आवृत्तिविर्षे हस्त नक्षत्र है सो अश्विनीते
तेरहवां है तामैं आठ मिलाएं इकईस होई एक और मिलाए बाईस होइ
सो कृत्तिकात वाईसवां धनिष्ठा है सोई दूसरा विपुपविष जानना ।
ऐसे पांचवां स्थानवि जानि लेना । बहुरि छट्ठी लावृत्तिविष पुष्य
नक्षत्र है सो अश्विनीते आठवां है । तामैं आठ मिलाए सोलह होई
तामैं एक घटाए पंद्रह रहे सो कृत्तिका पंद्रहवां नक्षत्र अनुराधा है।
सोई पांचवां विपुपवि. नक्षत्र हैं। ऐसे दहवां स्थानविर्षे भी जानि
लेनां । इहा अट्ठाईस नक्षत्रकी विवक्षा है तातै गणनावि. अभिजितका
भी ग्रहण करनां ॥ ४३१ ॥
(१४४ )
आगे नक्षत्रनिके नाम अनुक्रमतें कहैं हैं।-
कित्तिय रोहिणी मियसिर अद्दपुणव्वसु सपुस्स असिलेस्सा
महपुव्युत्तर हत्था चित्ता सादी विसाह अणुराहा ॥४३२॥
कृत्तिका रोहिणी मृगाशीर्षा आद्रा पुनर्वसुः सपुष्यः आश्लेषा ।
मघां पूर्वा उत्तरां हस्तः चित्रा स्वातिः विशाखा अनुराधा ।
अर्थ:-कृत्तिका, रोहिणी, मृगशीर्षा, आद्रा, पुनर्वसु, पुप्य,
आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति,
विशाखा, अनुराधा ॥ ४३२॥
जेहा मुल पुवुत्तर आसाढा अभिजिसवण सधणिहा ।।
तो सदमिस पुव्वुत्तर भद्दपदा रेवस्सिणी भरणी ॥ ४३३ ॥
ज्येष्ठा मुलं पुर्वोत्तरौ आपाढौ अभिजित श्रवणः सघनिष्ठा ।
ततः शतभिपा पूर्वोत्तर भाद्रपदा रेवती अश्विनी भरणी ॥
अर्थ:-- ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ, उत्तराषाढ, अभिजित, श्रवण,
धनिष्ठा, शतभिषक, पूर्वाभाद्रपदा, उत्तराभाद्रपदा,. रेवती, अश्विनी,
भरणी, ए अट्ठाईस नक्षत्रनिके नाम हैं। गणनावि इस क्रमतें गिननें ।४३३॥
आगै नक्षत्रनिके अधिदेवतानिकौं दोय गाथानिकरि कहैं हैं।-
अग्गि पयावदि सोमो रुद्दोदिति देवमंति सप्पो य ॥
पिदुभग अरियमदिणयर तोहणिलिंदग्गिमितिदा ॥ ४३४ ॥
अग्निः प्रजापतिः सोमः रुद्धः अदितिः देवमंत्री सर्पश्च ॥
पिताभगः अर्यमादिनकरः त्वष्टा अनिलद्राग्निमित्रंद्राः ॥१३४॥
अर्थ:-- अमि, प्रजापति, सोम, रुद्र, दिति, देवमंत्री, सर्प, पिता.
भग, अर्थमा; दिनकरः त्वष्टा, अनिल, इंद्रग्नि, मित्र, इंद्र ॥ ४३४ ॥
(१४५)
।
तो गेरिदि जल विस्सो बम्हा विण्हू वसूय वरुण अना ।।
अहिवडिपसण अस्सा जमोवि अहिदेवदा कमसो ॥ ४३५ ॥
ततः नैति: जला विश्वः ब्रम्हा विष्णुः वसुथ वरुणः अजः ॥
अभिवृद्धिः पूषा अश्वः यमोऽपि अधिदेवताः क्रमशः ॥४३५॥
अर्थ:--तहां पीछे नैऋति, जल, विश्व, आमा, विष्णु, बस, वरुण
भज, अभिवृद्धि, पूषा, भव, यम, ए कृत्तिका मादि नक्षत्रनिके मनु-
क्रमकरि- मषिदेवता है। नक्षत्ररूप तारानिके स्वामी जे देवं तिनके ९
नाम जानने ।। १३५॥
भार्ग नक्षत्रनिकी स्थितिविशेषका विधान कहैं हैं।-
कित्तियपडंतिसमये अहममपरिक्खमेदिमझण्हं ॥
भाराहारिक्खुदओ एवं सेसे वि मासिज्जो ॥ ४३६ ।।
कृत्तिकापतनसमये अष्टम महाऋक्षं एति मध्याहम् ॥
अनुराधाकक्षोदयः एवं शेषेषु अपि भाषणीयं ॥ ४३६ ।।
मर्थ:-कृत्तिका नक्षत्रका पतन समय कहिये मस्त होनैका काल
तिहविर्षे इस कृत्तिकाते आठवां मषा नक्षत्र सो मध्यान्ह कहिए वीषि
प्राप्त हो है । बहुरि तीह मघात भाठवां मनुराधा नक्षत्र सो उदय होय
है। ऐसे ही रोहिणी आदि नक्षत्रनिविर्षे जो नक्षत्र अस्त होइ तीर
समय ती नक्षत्रसौं भाठवां नक्षत्र मध्यान्हको प्राप्त होई। भर तीहौं
भाठा नक्षत्र उदयको प्राप्त होइ ऐसा करना ॥ ४३६॥
आगें चंद्रमाके पंद्रह मार्ग हैं तिनविर्षे इस मार्गवि. ५ . नक्षत्र
ति है। ऐसा तीन गाथानिकरि कहैं हैं।
अभिजिणवमादि पुवुत्तरा य चंदस्स पढममग्गम्मि ॥
वदिएमबापुणब्बसुससमिए रोहिणी चिचा ॥ १३ ॥
( १४६ ) .. . * अभिजिन्नवस्वातिः- पूर्वोत्तरा च चंद्रस्य प्रथममार्गे ॥ तुतीये मघा पुनर्वसु सप्तमे रोहिणी चित्राः ॥ ४३७ ॥ अर्थ:-- अभिजित आदि नव सो अभिजित, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपदा, उत्तराभाद्रपदा, रेवती, अश्विनी, भरणी, अर ए नंत्र स्वाति, पूर्वाफाल्गुनि, उत्तराफाल्गुनि ए चारह तो चंद्रमाके प्रथम मार्ग विर्षे विचरें हैं। चंद्रमाको प्रथम अभ्यंतर वीथीरूप परिषि तीहंविर्षे भूषण कर हैं। ऐसे ही तीसरा मार्गवि मघा पुनर्वसु ए दोय नक्षत्र विचरै हैं । सातवां मार्गवि रोहिणी चित्रा एं दोय नक्षत्र विचरें हैं ॥ ४३७ ॥ छहदसमेयारसमे कित्तिय: विसाह अणुराहा ।। जेहा कमेण सेसा पण्णारसमम्हि अहेवः।। ४३८ ।। पष्ठाटमदशमैकादशे कृत्तिका विशाखा अनुभधा ।। येष्ठा- क्रमेण शेषाणि पंचदशे अष्टैव ।।-४३८॥ छट्टा मार्गविषै कृत्तिका आठवांवि विशाखा दशवांविष अनुराधा ग्यारवांविर्षे ज्येष्ठा क्रमकरि विचर हैं। अवशेष आठ . नक्षत्र पंद्रहवां अंतका मार्गके ऊपरि विचर हैं ॥ ४३८॥ तेःशेष साठ नक्षत्र कौंन सो कहैं हैं: । हत्थं मूलतियं चिय मियसिरदुग पुस्सदोष्णि अडव ।। अंठपहेणक्खत्ता तिईतिहु वारसादीया ॥ ४३९यो । हस्तः मूलत्रयं अपि-मृगशीर्षादिकं पुण्यद्वयं अष्टव अष्टपथे नक्षत्राणि तिष्ठति हि द्वादशादीनि ॥ ४३९।- अर्थ:: हस्त, मूल त्रय कहिए-मूल पूर्वाषाढ, उत्तराषाढा, मृग- शीर्षा द्विक कहिए-मृगशीर्षा, मान, पुष्यद्वय कहिएमय आश्लेषा 1 ( १४७ ). - ए.माठ अवशेष जाननें । ऐसें प्रथमादिक पथनिवि आदि नक्षत्र चंद्रमा माठ पथनिकै ऊपरि ति हैं ॥ ४३९ ॥ भागें नक्षत्रनिके तारानिकी संख्या दोय गाथानिकरि कहै हैं । कित्तिय पहुदिसु तारा छप्पणतियएकछत्तिछक्कचऊ ।। दो दो पंचेकेकं चउछत्तियणवचउकचऊ ।। ४४० ॥ कृत्तिका प्रभृतिषु ताराः षट्पचतिस्रः एकपतिपट्चतु ।। द्वे पंच एकैका चतुः पकिनवचतुष्काः चतस्रः ॥४४०॥ अर्थः-कृ'तका आदि नक्षत्रनिके तारे अनुक्रमकरि छह पांच तीन एक छह तीन छइ च्यारि दोय दोय पांच एक एक च्यारि छह तीन नव च्यारि च्यारि ॥ ४४० ॥ तिय तिय पंचेक्कारहियस य दो दो कमेण बत्तीसो । पंच य तिण्णि य तारा अहावीसाण रिक्खाणं ।। ४४१ ॥ तिस्रः तिस्रः पंचकादशाधिकशतंद्वे द्वे क्रमेण द्वात्रिंशत् ॥ ... पंच च तिस्रः च तारा अंष्टाविंशानां ऋक्षाणां ।। ४४१ !! मर्थः-तीन तीन पांच्. ग्यारह अधिक एक सौ दोय दोय बत्तीस पांच तीन ऐसे ए तारा क्रमकरि अट्ठाईस नक्षत्रनिके हैं ॥ ४४१ ॥ भागे तिन तारानिका आकार विशेषकों तीन गाथानिकरि कहैं हैं; घीयणसअलुद्धीए मियसिरदीवे य तोरण छत्ते ॥ चम्हियगोमुत्ते विय सरजुगहन्थुप्पले दीवे ॥ ४४.२ ।। वीजनशकटाद्धिका मृगशिदीपे च त रण छने । वल्मीकगोमूत्र अपि शरयुगहस्तात्पले दंपे ॥ ४४२ ॥ अर्थ:- कृत्रिका क्षत्रके छह तारे हैं तिनका आकार.ब जनामश हैं। ऐसेही रोहिणी आदि नक्षत्र के तारानिका आकार. क्रमते गाडेकी (१४८) : अद्धिका, हिरणका मस्तक, दीपक, तोरण, छत्र, बंबई, गऊका मूत्र, शरमायुगल, हाथ, कमल, दीपक ॥ १४२ ॥ अधियरणे वरहारे वीणासिंगे य विच्छिए सरिसा ॥ दुक्कयवावीहरिगजकुंभ मुखे पतंतपक्खीए ॥ अधिकरणे वरहारे वीणागे च वृश्चिकेन सदृशाः ॥ दुष्कृतवापीहरिगजकुम्भेन मुरजेन.पतत्पक्षिणा ॥ ४४३ ॥ अर्थ:- अहिरिणी, उत्कृष्टहार, वीणाका शृंग, वीछू जीर्णा वावडी, सिंहका कुंभस्थल, मृदंग, पडतापंखी ॥ ४४३ ॥ सेणागयपुव्वावरगचे णावायस्स सिरसरिसा ॥ चुल्लीपासाणणिमा कित्तिय आदीणि रिक्खाणि ॥४॥ सेनागजपूर्वावरगाने नावाहयस्य शिरसाः सदृशाः ॥ चुल्लीपाषाणनिमाः कृत्तिकादीनि ऋक्षाणि ॥ १४ ॥ अर्थ:-सेना, हस्तीका भागिला शरीर, हस्तीका पाछिला शरीर, नाष, घोडेका मस्तक, चुरहाका पाषाण समान प्रकारको धरै हैं वारे जिनके ऐसे कृत्तिकादि नक्षत्र जानने ॥ ४४४ ॥ मागें कृत्तिकादि नक्षत्रनिके परिवाररूप तारानिकों हैं - एक्कारसयसहस्सं सगसगतारापमाणसंगुणिदं ।। परिवारतारसंखा कित्तियणक्खत्तपहुदीणं ।। ४४५ ॥ एकादशशतसहस्रं स्वकस्वकताराप्रमाणसंगुणितम् ।। परिवारतारा संख्या कृत्तिका नक्षत्रप्रभृतीनाम् ॥ ४४५ ॥ अर्थः---यारह अधिक-एकसौ सहित एक हजारको मपर्ने अपने तारानिका प्रमाणकरि गुणे जो प्रमाण होइ सो कृत्तिका नक्षत्र आदि नक्षत्रनिको परिवाररूप तारेनिकी संख्या जाननी ।
उदाहरण-कृत्तिका नक्षत्रके मुलतारे छह हैं इनिकौं ग्यारहस ग्यारहकरि-गुणे छह हजार छहसै छासठि तारे कत्तिका नक्षत्रके परिवार के हैं। ऐसे ही रोहिणी भादिके भी जाननें नक्षत्रनिके जे भाषिदेवता तिनिके अनुसारी इनिवि वसै है ॥ ४४५॥ आज पंच प्रकार ज्योतिषी देवनिकी आयु प्रमाण कहैं हैं। इंदिणसुकगुरिदरेलक्खसहस्सासयं च सहपल्लं ।। पलंदल तु तारे वरावरं पादपादद्धं ॥ ४४६ ॥ इंद्विनशुक्रगुर्वितरेपुलक्षलं सहस्रशतं च सहपल्यम् ॥ पल्यदलं तु तारा सुवरमवरं पादपादार्धम् ॥ ४४६ ।। : " अर्थः-चंद्रमा सूर्य शुक्र बृहस्पति इतर इनविर्षे क्रमते लाख हनारसौ वर्षसहित पल्य पर्द्धपत्य प्रमाण आयु है । भावार्थ:-चंद्रमाका आयु लाख वर्ष सहित पत्य प्रमाण है। सूर्यका मायु' हजार वर्षसहित पल्य प्रमाण है । शुक्रका आयु सौ वर्षसहित पत्य प्रमाण है वृहस्पतिका मायु पत्य प्रमाण है । इतर बुध मंगल शनैश्वरादिकका भायु.माध पल्य प्रमाण है । बहुरि तारे कहिए तारा अर नक्षत्र इनका आयु उत्कृष्ट तौ पाद काहिए पश्यका चौथा भाग प्रमाण है । भर जपन्य. पदार्थ. कहिए पल्यका बाठवां भाग प्रमाण है ॥ १४६ ॥ आगें चंद्रमा सूर्यनिकी देवांगनानिकों दोय गाथानिकरि कई हैं- चंदामा य सुसीमापहंकरा अच्चिमालिणी चंदें।। सरेदुदिनरपहापहंकराअचिमालिणी देवी ।। १४७ ॥ चंद्राभा च सुसीमाप्रमंकरा अर्चिमालिंनी चंद्रे ॥ सूर्ये युतिः सूर्यप्रभा प्रभंकरा अर्चिमालिनी देव्यः ॥४४७], अर्थ-चंद्रामा, सुसीमा, प्रभंकरा, अर्चिमालिनी ए च्यारि चंद्रमाके पष्ट देवांगना हैं । महुरि सूर्यके धुति, सूर्यप्रमा, प्रभंकाः अर्चिमालिनी ए च्यारि- पट्टदेवी हैं ॥ ४१७ ॥ .
(१५) जेहा ताओं. पुह पुह परिवारचंदुस्सहस्सदेवीणं ।। परिवारदेविसरिसं पत्तेयमिमा विउच्चन्तिः ॥ ४७८ ॥ ज्येष्ठाता पृथक् पृथक् परिवारचतुः सहस्रदेवीनाम् ॥ परिवारदेवीसदृशं प्रत्येकमिमाः विकुर्वन्ति ॥ ११८ ॥ अर्थ-ते ज्येष्ठ कहिए पट्ट देवी पृथक् पृथक् च्यारि हजार परिवार देवनिकी हैं। भावार्थ:-च्यारि च्यारि हजार परिवार देवांगनानिकी एक एक पट्ट देवांगना है। बहुरि इस परिवार देवी समान संख्याको प्रत्येक विक्रिया करै हैं । स्पष्टीकरण:- एक एक पट्टदेवांगना. विक्रिया करै तौ च्यारि हजार हो हैं ।। ४१८ ॥ आ» ज्योतिष्क देवांगनानिका आयु प्रमाण कहै हैं- जोइसदेवीणाऊ सगसगदेवाणमय होदि । सव्वणिगिसुराणां बत्तीसा होंति देवीओ ॥ ४४९ ।। ज्योतिष्कदेवीनामायुः स्वकस्वकदेवामधं भवति । सर्वनिकृष्टसुराणां द्वात्रिंशत् भवंति देव्यः ॥ ४४९ ॥ अर्थ-ज्योतिष्क देवांगनाका. आयु · अपने अपने भार देवनिका आयुतै अर्धप्रमाण जाननां । बहुरि इहां सर्वते निकृष्ट हीन पुन्यवान् देवतिनकै बत्तीस देवांगना हो हैं। मध्यविष यथायोग्य देवांगनानिकी संख्या जाननी ॥ ४४९॥ आगै भवनत्रिकविर्षे जे जीव उपज है तिनकौं कहैं हैं- उम्मग्गचारिसणिदाणणलादि मुदा अकामणिज्जरिणो ॥ कुदवा सबलचारित्ता भवणतियं जंति ते जीवा ४५०॥ : उन्मार्गचारिणः सनिदाना: अनलादिमृता अकामनिर्जरिणः ।। कृतपसः शबलचारित्रा भवनत्रये यांति ते जीवाः ॥ ४५.॥ . .
( १५१ )
अर्थ- मार्गचारी, कहिए जिनमतते विपरीत धर्मके
भाचरनवाले, बहुरि " सनिदानाः " कहिए निदानजिननें किया होइ ।
बहुरि " अनलादिमृता" कहिए अमि जल झंपापात आदिकतै
मूए, बहुरि " अकामनिरिणः " कहिए विना अभिलाष बंधादिकके
निमिततै परीषह सहनादि करि जिनकै निर्जराभई बहुरि " कुतपसः"
कहिए पंचामि आदि खोटे तपके करनेवाले बहुरि "शवल चारित्राः"
कहिए सदोष चारित्रके धरनहारे जे जीव हैं ते भवत्रय जो भवनवासी
व्यंतर ज्योतिषी तिनवि जाय उपजै हैं ॥ ४५० ॥
ऐसें ज्योतिर्लोकका अधिकार समाप्त भया ।
इति श्री नेमिचंद्राचार्य विरचित त्रिलोकसारमें
चौथा ज्योतिर्लोकका अधिकार
समाप्त भया ॥४॥
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निर्माल्यसंबंधी ध्यानमें रखनेयोग्य श्लोक. पुत्तकलत्तविहीणो दारिदो पंगुमूकबहिरंषो। चाण्डालाइकुजादो पूजादाणाइ दवहरो ॥ ३२ ॥ . (कुंदकुंदाचार्यकृत रयणसार) "देवतानिवेद्यानिवेद्यग्रहणम् ॥ (श्रीअकलंकाचार्यकृत रानपातिक) प्रमादाद्देवतादत्तनैवेद्यग्रहण तथा ॥ . ++ + इत्येवमंतरायस्य भवन्त्यास्रबहेतवः ॥ (श्रीमभृतचंद्रसरिकृत तत्वार्थसार) देवशास्त्रगुरूणां भो निर्माल्यं स्वीकरोति यः ॥ वैशच्छेदं परिप्राप्य स पश्चादुर्गतिं व्रजेत् ॥ ६३ ॥ (श्रीसकलकीर्तिकृत सुभाषितावलि) इत्यादिवर्णनोपेत नरके निषेधकाः। लमते च महादुःखं पूजाद्रव्यापहारिणः ॥ ८० ॥ निर्माल्यभक्षका ये च मानवा मदमोहिताः । तेऽपि तत्र महादुःखभाजिनः स्युर्न संशयः ॥ ८३ ॥ (श्रीसकलभूषणकृत-उपदेशरत्नमाला) देवार्चकश्च निर्माल्यभोक्ता जीवविनाशकः ॥ * * * इत्यादिदुष्टसंसर्ग संत्यजेत्पक्तिभोजने ॥ (पं० सोमसेनकृत त्रिवर्णानार) परस्त्रीगमने नूनं देवद्रव्यस्य भक्षणे । सप्तमं नरकं यान्ति प्राणिनो नात्र संशयः॥ सोमकीर्तिरिकत-पद्युम्नचरित्र) जो ण य भक्खेदि संयं तस्सण अण्णस्स जुज्जदे दादुं ।। भुत्तस्स.भोजितस्सहि णस्थि विसेसो तदों कोवि ॥ ७९ ॥ (स्वामिकार्तिकेयानुपेक्षा) - धर्मबंधु हो ? तुह्मास जर जैनधर्माचे खरे रहस्य समजून घ्यावयाच असेल तर ही पुस्तके मागविण्यास विसरू नका. अवश्य मागवा. शासनदेवतापूननचर्चा, निर्मात्यद्रव्यचर्चा, भूमिशयनचर्चा अशौच- निर्णय, खरीपूजा-होलीपूजा-भाडोत्रीपूजा वगैरे महत्वाच्या विषयांवर ज्या- मध्ये शास्त्रीय प्रमाणे व मोठमोठया विद्वान् लोकांचे अभिप्राय देऊन नि- भीडपणाने चर्चा केली आहे अशी हिंदी व मराठी पुस्तकें अवश्य मागवा. शासनदेवतापूजनचर्चा मराठी कार्तिकेयानुप्रेक्षातील गृहस्थधर्म -- भाग पहिला ..मिविवाह चर्चा हिंदीभाग दुसरा -11- वेश्यानृत्य करविल्यामुळे तेरापंथी- शासनदेवतापूजन व रत्नकरंड पणास बाधा येईल काय ? - टीकाकार प्रभाचंद्र अशौच निर्णय शासनदेवता व सहा माणे अंतर निर्मात्य द्रव्यचर्चा परिशिष्ट सचित्र। शासनदेवता घरी भाल्यावेळी सम्यक्त्ववर्धक मासिकांत भालेले सत्कार करूं नये ४ बावीस लेख १॥ थागम-प्रमाणतामें शास्त्रार्थ सत्तावीस लेख भूमिशयन मूलगुण चर्चा सहेचाळीस लेख. नवधाभक्तिचर्चा मराठी १॥ निर्मास्यद्रव्यचर्चा मराठी भाग १ -1- खरीपूजा, डौलीपूजा, भाडोत्रीपूजा हिंदी भाग २-1- लेखावरील आक्षेपांचे निरसन:- पं. अपाशास्त्रीके लेखका खंडन शासनदेवता पूजन चर्चा मराठी सम्यक्त्ववर्धक पत्रका उद्देश आदि भाग २ रा. भनेक लेख जैनधर्माचे प्राचीनत्व (ले. परिस्टर पापपुण्याची कारणे चंपतरायकृत इंग्लिश ग्रंथाचे व्यतरांच्या आराधनेपासून नुकसान:- मराठी भाषांतर) प्रोषध शब्दासंघाचे नाली ग्रंथका नमुना पूर्वाचार्याचे उतारे -1-पंचामृताभिषेक चर्चा पुरुषार्थसिद्धयुपाय सार्थ मराठी -11-गुरुपास्ति का होत नाही ? निर्माल्याच्या पापापासून वच- अकलंक प्रतिष्ठापाठकी लांच. तत्वार्थमूत्रादि पंचधावकाचार रत्नफरंड श्रावकाचार वचनीकेचे सकलकीर्ति श्रावकाचाराचे मराठी भाषांतर रु.२ मराठी भाषांतर जैन धक डेपो. ल १ अहमष्ट लेख . ण्याचा उपाय + 4
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