Adarsh Library, Jaipur
Ghar Bane Or Ghar Tute
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घर बने घर टूटे
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घर बने घर टूटे
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'घर बने घर टूटे मेरा पहला उपन्याम है, जो 1953 में 'प्रगति प्रकाशन' मे प्रकाशित हुआ था। लेकिन कुछ ही ममय बाद 'प्रगति प्रकाशन वद हो गया और इन उपन्याम का क्या हुआ, यह मुझे नहीं मालूम । कितने लोगों ने इन पढ़ा होगा, यह भी नहीं जानता। कई बार पुग्नक के पुनर्प्रकाशन की बात उठी, किन्तु मुझमें उत्साह का अभाव था। जून 1979 में योप्रकाश जी में एक संकलन के प्रकाशन के मिलमिले में यह तय हुआ कि इस उपन्याम का एक छोटा-मा भाग उममे प्रकाशित किया जाये। पर उस मंकलन से पूर्व ही उपन्याम को फिर मे छापने का निर्णय भी ले लिया गया । उपन्याम को पढ़ने ममय अधिक परिवर्तन की गुजाइश मुझे महमूम नहीं हुई, अन्यथा इमे दुवारा लिखना ही एक दूसरा रास्ता था। लेकिन उमने उपन्याम की पूरी कायापलट ही हो जाती। अतः भाषा मे इघर-उधर कुछ परिवर्तन करने के अतिरिक्त मैने पुस्तक को वैसा ही रहने दिया है। पच्चीम वर्ष पूर्व की लेखनी में जो मीमाएं एवं जो गुण ये, उन्हें स्वीकार करने में यापत्ति क्यों? रामकुमार
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'घर बने घर टूटे' मेरा पहला उपन्यास है, जो 1953 मे 'प्रगति प्रकाशन' से प्रकाशित हुआ था। लेकिन कुछ ही समय बाद 'प्रगति प्रकाशन' बंद हो गया और इस उपन्यास का क्या हुआ, यह मुझे नहीं मालूम । कितने लोगों ने इसे पढा होगा, यह भी नहीं जानता। कई वार पुस्तक के पुनर्प्रकाशन की बात उठी, किन्तु मुझमे उत्साह का अभाव था। जून 1979 में ओंप्रकाश जी से एक संकलन के प्रकाशन के सिलसिले में यह तय हुआ कि इस उपन्यास का एक छोटा-सा भाग उसमे प्रकाशित किया जाये। पर उस सकलन से पूर्व ही उपन्यास को फिर से छापने का निर्णय भी ले लिया गया । उपन्यास को पढते समय अधिक परिवर्तन की गुंजाइश मुझे महसूस नहीं हुई, अन्यथा इसे दुवारा लिखना ही एक दूसरा रास्ता या। लेकिन उससे उपन्यास की पूरी कायापलट ही हो जाती। अत भाषा मे इधर-उधर कुछ परिवर्तन करने के अतिरिक्त मैंने पुस्तक को वैसा ही रहने दिया है। पच्चीस वर्ष पूर्व की लेखनी में जो सीमाएं एव जो गुण थे, उन्हे स्वीकार करने में आपत्ति क्यों? रामकुमार
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वस्ती मे चारों ओर गहरा सन्नाटा छाया हुआ था, मानो यहां कोई न बमता हो। कभी-कभी अंधेरे में से किसी कुत्ते के मूंकने का स्वर रात्रि की निस्तब्धता को चीरता हुआ दूर-दूर तक फैल जाता था और ध्यान से थोड़ी देर तक देखते रहने के पश्चात बस्ती की कबड-खाबड़ झाडियां और पत्थर की बड़ी-बड़ी लाल शिलाएं उभरती हुई प्रतीत होती थी जैसे समुद्र मे बने हुए छोटे-छोटे द्वीप हो। देवू होठों मे सिगरेट दवाये कभी धुआं अपने चेहरे के सामने उछालता और कभी सीटी में किसी गाने की धुन गुन- गुनाता । वह धीमी चाल से फुटपाथ पर आगे बढ़ा जा रहा था। सड़क पर लगे एक विजली के खभे के नीचे वह थोड़ी देर के लिए ठिठक कर खड़ा हो गया, मानो उस धुंधली रोशनी में वह अपने चारो ओर फैली दुनिया को इन एकान्त के क्षणों में देख लेना चाहता हो । सडक के पार बने तीन ओर चार-मजिले फ्लटो की कुछ खिडकियो के अन्दर अब भी रोशनी दिखायी दे रही थी, किसी-किसी दीवार पर जमीन के ऊपर उठती हुई वेलें दीवारो मे चिपट गयी थी। देवू कुछ देर तक उन्ही मकानों की ओर देखता रहा, उनके अन्दर रहने वालो की जिंदगी के विषय मे सोचता रहा । मकानो के फाटक बन्द ये । यकायक पास ही किसी चौकीदार की सेज आवाज 'जागते रहों की चेतावनी सुनकर वह चौंक पड़ा और फिर दो कदम बढ़ाता हुआ फुटपाथ पर आगे बढ़ गया। देबू के बाल विखरकर उसके माथे पर झूलने लगे थे और गरमी होने घर बने घर टूटे 7 । के कारण उसने अपनी कमीज़ के बटन खोल रखे थे। उसके चेहरे का कोई भी भाग अपनी बनावट में कोई ऐसा विशेप आकर्षण नहीं रखता था, परन्तु उसके सारे शरीर को देखकर कोई उसे कुरूप भी नहीं कह सकता था। और देवू ने कभी शीशे में अपना चेहरा देखकर अपने विषय में कभी कोई धारणा नहीं बनायी थी। जिंदगी के 23 वर्ष कब और कैसे वीत गये, इस विषय में जव वह सोचता था तो इस लम्बी अवधि पर उसे स्वयं ही आश्चर्य होने लगता था। देवू ने एक हाथ से माथे पर बिखरे वालों को पीछे धकेल दिया और अनायास ही उसने एक लम्बी साँस खींची। सिगरेट के अंतिम भाग में जव उसकी उंगलियां जलने लगी तो उसने आखिरी दो कश खींचकर उसे फुटपाथ के नीचे झाड़ियों में उछाल दिया। तभी अपने सामने लगभग दस कदम के फासले पर किसी की लम्बी-सी परछाई देख- कर देवू चौंक पड़ा और उसके कदम अपने-आप वहीं रुक गये। "जग्गी, तू है ! मैं तो डर गया था। कहाँ से आ रहा है ?" "चला जा यहाँ से, नहीं तो आज मैं तेरा खून कर डालूंगा। अपने- आपको समझता क्या है ? देवकी मेरी है...!" देवू को जग्गी के मुंह से शराब की बू आयी। उसके मुंह से निकले शब्द बहुत ही अस्पष्ट थे। उसके होंठों से पान की पीक नीचे बह रही थी। "आज तूने फिर पी, जग्गी---और कल किसी के कहने पर तू मुकर जायेगा..." यह कहकर वह थोड़ा हँसने लगा। जग्गी के पाँव लड़खड़ा रहे थे और वह ध्यान से देवू की ओर देख रहा था, मानो उसे पहचानने की कोशिश कर रहा हो। "हाँ, मैं पीता हूँ, किसी साले का वाप मुझे नहीं पिलाता, मैं अपने पैसों से पीता हूँ..." "ठीक है जग्गी, तू अपने ही पैसों से पीता है; आ, तुझे तेरी झुग्गी तक पहुँचा दूं, नहीं तो रात को किसी खड्ड-वड्ड में गिर पड़ेगा..." फिर जग्गी का हाथ पकड़कर देवू फुटपाथ से नीचे पगडंडी पर धीरे- धीरे उतरने लगा। जग्गी के लड़खड़ाते पर पगडंडी पर बर्फ की भांति फिसले जा रहे थे और कितनी ही वार देवू को उसे गिरने से बचाना 8 घर वने घर टूटे जग्गी देवू को पहह्वान गया था। उसका हाथ पकड़कर पगडंडी पर चलने का उसने कोई विरोध नहीं किया। "मेरे दोस्त कभी-कभी पिला देते है, देवू, और मुफ्त की शराब पीने से मैं इनकार नहीं कर सकता । मेरा वाप कभी मुझे पैसा तक नहीं देता, भगवान उसे जल्दी उठा ले...." "चुप हो जा जग्गी, कोई सुन लेगा तो क्या कहेगा...?" देवू ने उसका हाथ धीरे से दबाते हुए कहा। "मुझे किसी का डर नही है । तू मेरे याप को नहीं जानता, देवू । वह हमेशा मुझसे छिपाता है कि उसने रुपये कहां छिपा रखे हैं, लेकिन एक दिन मैं सबका पता चला लूंगा । वस्ती वाले समझते हैं कि मैं उसके रुपये चुरा- कर पीता हूँ, लेकिन मैं सच कहता हूँ, देवू, कि मैंने उसके रुपये कभी नहीं चुराये। मैं कितना ही बुरा आदमी क्यों न होऊँ, लेकिन चोर नही हूँ, देवू, मैंने कभी किसी की चोरी नहीं की...।" जग्गी अपनी कांपती आवाज में कह रहा था। अंधेरे मे जग्गी का पर पगडंडी से हटकर एक बडे-से पत्थर से टकरा गया था, जिससे वह गिरते-गिरने बचा। वह फिर वुडबुड़ाते हुए कहने लगा, "सारी वस्ती में एक भी रोशनी नही है, लेकिन सड़को पर तो हजारों बत्तियां लगी रहती हैं, देवू, यहां भी दो-चार क्यो नहीं लग जाती?" झुग्गियों का तांता आरम्भ हो गया था। प्रत्येक के सामने उसमे रहने वाले परिवार के कुछ सदस्य चारपाइयो पर और कुछ ज़मीन पर लेटे सो रहे थे। कभी-कभी कोई सोता हुआ व्यक्ति नीद मे बुड़बुडा उठता था, जिससे उसके अस्फुट स्वर अंधेरे मे एक विकृतता पैदा कर देते थे। थोडी दूर पगडही से नीचे देवू ने वस्ती के छोटे-से तालाव की ओर देखा, जो रात में एक काली समतल चादर बन गया था। चारों ओर ऊँचे-ऊंचे टीले और कांटेदार झाड़ियां आदि होने के कारण वह तालाब ही वस्ती का एक ऐसा भाग या जहां प्रकृति की अराजकता परास्त हो गयी थी। ऊपर फुटपाथ पर बिजली की रोशनियां एक कतार में बढती हुई आगे जाकर गायब हो गयी थी। जग्गी का वाप अपनी झुग्गी के बाहर चारपाई पर बिना कुछ ओढ़े घर बने घर - पाँव पसारे सो रहा था और उसी के पास जग्गी की खाली चारपाई विछी हुई थी । दायीं ओर ऊँची-ऊँची झाड़ियों के घने झुंड विखरे हुए थे। झुग्गी का दरवाज़ा बन्द था। देवू ने जग्गी का हाथ छोड़ दिया और धीमे स्वर से कहा, "जा, चुपके से अपनी चारपाई पर सो जा। मंगत चाचा जाग गये तो कितनी ही देर तक शोर मचायेंगे !" "मुझे किसी का डर नहीं है, मैंने किसी की चोरी...।" तभी मंगत राम ने चिल्लाकर पूछा, "कौन है ?" रात को पत्तों की खड़खड़ाहट से भी मंगतराम की नींद उचट जाती थी और वह किसी चोर के आने की आशंका में घबरा उठते थे और झट से झुग्गी के वन्द दरवाज़े की ओर देख लिया करते थे। उन्हें सारी बस्ती में किसी के ऊपर भी विश्वास नहीं था। वस्ती वालों को भी उनके विषय में कुछ पता नहीं था कि वह क्या करते हैं और उनके पास कितना धन है ? वस्ती के किसी भी व्यक्ति के साथ उनका कोई घनिष्ठ परिचय नहीं था, जिसे उनके विषय में अधिक ज्ञान होता। घर में जग्गी के अलावा और कोई नहीं था। देबू जग्गी को उसकी झुग्गी के पास छोड़कर बायीं ओर की पगडंडी पर अपनी झुग्गी की ओर रवाना हो गया। कभी-कभी हवा का एक झोंका वस्ती की झोंपड़ियों को हिलाता हुआ आगे बढ़ जाता था। देवू की आँखों के सामने जग्गी की सूरत थी और वह उसकी जिंदगी के बारे में सोच रहा था। जग्गी शराब पीता है, दिन-भर वस्ती में आवारों की तरह घूमता है और कभी-कभी नल से थोड़ी दूरी पर बैठ कर औरतों को नहाते हुए देखता है। वह सबसे कहता है कि उसे कहीं नौकरी नहीं मिलती, लेकिन शायद नौकरी ढूंढ़ने के लिए उसने काफ़ी कोशिश भी नहीं की। ऊपर फुटपाथ पर भी सन्नाटा था। थोड़ी देर पहले सिनेमा का अन्तिम शो समाप्त हो जाने के बाद तीन-चार फटफटियाँ अपनी तेज़ गड़गड़ाहट और रोशनी से अंधकार को चीरती हुई आगे बढ़ गयी थीं। देवू की झुग्गी के बाहर छोटे-से मैदान में उसके घर वाले पांच-छ: चारपाइयों पर सो रहे थे। देवू और उसका छोटा भाई सुन्दर एक ही चारपाई पर सोते 10 घर बने घर टूटे - । थे। देबू चुपचाप एक कोने में सिमटकर लेट गया। सुन्दर पांव सिकोड कर सोता था जिससे देवू को सीधे सोने में थोडी कठिनाई पडती थी। देवू के कितनी ही वार कहने पर भी सुन्दर अपनी इस आदत को बदल नही सका था । सुन्दर का शरीर उसका स्पर्श कर रहा था। चारपाई पर लेटते ही वह और भी नीचे की ओर झुक गयी। थोडी देर बाद अपने दोनो हाथो को अपने सिर के नीचे दबाकर देवू ऊपर आममान की ओर देखने लगा, जहां कुछ धुंधले और कुछ चमकीले तारे बिसरे हुए थे। उसकी आंखो मे नीद नहीं थी। शनिवार की रात को देवू को जागना बहुत भला लगता था, क्योकि अगले दिन काम पर जाने की जल्दी नहीं होती थी। वह हमेशा देर तक अपनी चारपाई पर लेटा हुआ जागता रहता था। तभी दूर ऊपर मडक पर कोई तांगे वाला किसी फिल्मी गाने की लाइन तेज स्वर मे गाता हुआ अपना रास्ता काटने की कोशिश कर रहा था और कभी-कभी घोडे को तेज चलने के लिए, उत्साहित करने के लिए 'मेरे बेटे', 'मेरे बाशा (यादशाह)' कहकर उमे पुचकारता था। पक्की सड़क पर घोड के परो की चाप तांगे के दूर जाने के साथ-साथ धीमी होती चली गयी और कितनी ही देर तक देबू के कानो में गूंजती रही। सड़क के नीचे दूर-दूर तक खड्ड मे वस्ती की झुग्गियां बिखरी पड़ी थी-लकडी की फट्टियो की बनी छोटी-छोटी ताशके पत्तो-जैसी झुग्गियो। यहीं कही कुछ इंटों को जमा करके किसी परिवार ने एक कमरा बना रखा था; छसो के लिए किसी ने झाड-फूम डाल रखी थी और किसी ने टीन के कुछ टुकड़े। आने-जाने के लिए कोई निश्वित मार्ग नहीं था, लेकिन सड़क सक आने-जाने के लिए अनगिनत पतली-पतली पगडडियां बन गयी थी, जिन पर वस्ती मे रहने वाले आते-जाते थे। उन पर चलने से किसी झाड़ी के कांटों में कपडे उलझने का भय नहीं था। कही-कही लाल पत्यरो की बड़ी-बड़ी चट्टानें थी, जिन पर दिन मे वस्ती के बच्चे फिसला करते थे और जिनके चारो ओर दौड-दौड कर वे चोर-चोर खेला करते थे। बस्ती के दक्षिण में एक छोटा-सा तालाब था, जिसका पानी गर्मियों में सूख कर केवल घुटनो तक रह जाता था और बरसात में साल-भर की जमा हुई घर बने पर दे।
गंदगी थोड़ी-बहुत धुल जाती थी। तालाव के एक ओर पेड़ अव्यवस्थित रूप से बहुत पहले बड़े हो गये थे और पतझड़ में उनके पत्ते झड़ कर तालाव में गिर कर काई में उलझ जाते थे। इस से थोड़ी दूर पर एक नल लगा हुआ था, जहाँ वस्ती के सब लोग पानी भरा करते थे, सुबह-शाम पुरुप नहाते थे और दिन में औरतों का जमघट लगा रहता था। यह स्थान वस्ती की सामाजिक जिंदगी का एक केन्द्र था, जहाँ से कोई भी ख़बर बहुत तेजी से सारी वस्ती में फैल जाती थी। वस्ती के पूर्व में नानकचन्द अपनी दूकान के सामने एक टूटी-सी चारपाई पर बैठे हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। उनके एक हाथ में उर्दू का दैनिक अख़बार था जिस पर वह आँखें गड़ाये थे। उनकी आयु 52 के लगभग थी और वाल लगभग सारे सफ़ेद हो चुके थे। उनकी आँखों पर पुराने तार का एक चश्मा लगा हुआ था, जो सफ़ेद धागे से उनके एक कान पर बँधा हुआ था। चश्मे के एक शीशे पर एक दरार पड़ी हुई थी और यह शीशा वदलवाने की वात वे पिछले ढाई-तीन सालों से सोच रहे थे। उनके सिर पर एक मैली-सी पगड़ी बंधी हुई थी और सारे चेहरे पर कुछ इतनी स्पष्ट और गहरी झुरियाँ थीं जैसे सूखे पहाड़ पर वरसाती नाले हों। दूकान की छत से पुरानी बोरी का एक परदा दो वाँसों के सहारे सामने से सूरज की किरणों को रोकने के लिए खड़ा था। दूकान के अन्दर पीछे पुराने कोट, पतलूनें, वास्कटें, टाइएँ, कमीजें, कुछ फ़ौजी थैले, पुलोवर आदि एक सुतली के सहारे से टॅगे हुए थे, जिन पर दिन-भर की जमा हुई धूल को वह हर सुवह साफ़ किया करते थे। वस्ती के कुछ लोग सदियों में कुछ गरम कपड़े इत्यादि यहाँ से खरीद किया करते थे। कभी-कभी दफ़तरों में काम करने वाले चपरासी, ताँगे और ठेले वाले या शाम के अँधेरे में अपनी सूरतें छिपाने की चेष्टा करते हुए वस्ती के पर मकानों में रहने वाले वावू लोग चुपचाप दूकान के अन्दर कोट, पतलून की फ़िटिंग देखते और कभी-कभी कोई चीज़ पसन्द आ जाने पर दवी आवाज़ में नानकचन्द से उनका मोल-तोल करते। कभी-कभी नानकचन्द अपने पड़ोसियों से इन क्लर्कों और वावुओं की खोखली और कृत्रिम रईसी जिंदगी की हँसी उड़ाया करते थे। दो-तीन लकड़ी के सन्दूकों को मिलाकर अंग्रेजी, हिन्दी और 12 घर बने घर टूटे उर्दू के पुराने रसाले और जासूसी किताबो के ढेर रखे हुए थे। एक कोने में पुराने जूते, सेंडल, चप्पलें इत्यादि थे। दो-तीन छोटी-छोटी आलमारियां थी जिनके अन्दर फूलदान, प्लेटें, प्याले और दूसरे चीनी के वर्तन रपे हुए थे। कभी-कभी स्कूलों से लौटते हुए छात्र फुटपाथ से नीचे उतरकर दूकान में घुसकर पत्रिकाओ और किताबो के पन्ने उलटते या फिल्मी सितारो, सेक्स से भरी कुछ तसवीरों को देखकर रहस्यमयी दृष्टि से एक- दूसरे की ओर तनिक मुसकराकर देखते। कभी-कभी कोई साहसी बालक किसी एक पत्रिका या पुस्तक को ख़रीदकर चुपचाप अपनी मोटी-मोटी कापियों के बीच में छिपा लेता। बस्ती में कुछ लोगो का कहना था कि नानकचन्द ने दगों के समय अजमलखां रोड पर एक मुसलमान की दूकान लूटी थी और यह सामान उसी की दूकान का था, परन्तु इस बात का प्रमाण किसी के पास न था। तभी बाजार से लौटते हुए पडोस की झुग्गी मे रहने वाले निहालचन्द 'जै रामजी की' कहकर नानकचन्द के पास ही चारपाई पर आकर बैठ गये। नानकचन्द ने अखबार मोडकर अपने घुटने के नीचे दबा लिया और आँखो से चश्मा उतारते हुए बोले, "कहो लालाजी, कैसे हालचाल है ?" "ठीक है...।" निहालचन्द ने एक लम्बी सांस खीचते हुए कहा और फिर थोड़ी देर तक रुककर बोले, "मेरी समझ में नहीं आता कि रोज इन अखबारों मे क्या खबरें हुआ करती है, क्या ये कभी खत्म नही होती?" नानकचन्द थोड़ा-सा मुसकरा दिये, मानो अखबार पढने के ज्ञान का प्रभाव डालना चाहते हों। रोज डेढ-दो घटे तक अखवार पढ़ने की उनकी पुरानी आदत थी, यद्यपि बहुत-मे पेचीदा समाचार और विदेशी खबरें उनकी समझ में नहीं आती थी। "लालाजी, यह दुनिया बहुत बड़ी है और उतने ही ज्यादा झगड़े यहाँ होते हैं, इसी से रोज़ अखवारो को कई-कई खबरें मिल जाती हैं।" "हूं--अपनी मुसीबतें क्या कम हैं जो दूसरों की खबरें पढते फिरें। अखवार तो उन लोगों के लिए हैं जिनको अपनी मुसीबतें नहीं होती, जो चन की बंसी बजाते हैं।" नानकचन्द योडा-सा मुमकरा दिये। थोड़ी देर में नानकचन्द के बड़े - "क्या हुकम लड़के हुकम की स्त्री कौशल्या बग़ल में पीतल की बलटोई दवाये नीचे नल की ओर बढ़ी। अपने ससुर और निहालचन्द को चारपाई पर बैठे देखकर उसने अपनी चुन्नी सिर पर डाल ली। दोनों ने एक सरसरी-सी नजर कौशल्या पर डाली। "कुछ दिनों में अब एक और खाने वाला घर में बढ़ जायेगा...," नानकचन्द ने कौशल्या की पीठ की ओर देखते हुए धीमे स्वर में कहा । "सब भगवान की माया है, उसके सामने किसी की नहीं चलती, निहालचन्द बोले। नानकचन्द ने अपना हुक्का निहालचन्द की ओर बढ़ा दिया और फिर मानो अपने ही आपसे कहने लगे, "कमाने का यह हाल है कि हुकम किसी भी जगह वीस-बाईस दिन से ज्यादा टिक नहीं पाता। जहाँ भी कोई नौकरी करेगा वहाँ मालिकों की जूतियाँ चाटनी ही पड़ती हैं। आजकल बिना चापलूसी और खुशामद के कोई भी काम नहीं निकलता।" की नौकरी फिर छूट गयी?" "अब तुमसे क्या कहूँ लालाजी, तुम तो अपने घर ही के आदमी हो । हुकम 15 दिनों से घर पर वेकार बैठा है। क्या यह उम्र खाली बैठने की है ? मैं आज तक अपनी औलाद को समझ नहीं सका। दूसरे लड़के तरक्की कर रहे हैं। एक काम पर ज्यादा दिन टिकने से तरक्की होती है, मालिक का विश्वास बढ़ता है, लेकिन इनकी समझ में कुछ नहीं आता। और वह सुन्दर है जो रात-दिन अपनी किताबों में उलझा रहता है जैसे सरकारी अफ़सरी तो उसे ही मिलनी है...." थोड़ी देर तक दोनों चुप रहे, केवल हुक्के की गुड़गुड़ाहट शान्ति भंग कर रही थी। कहने के लिए तो नानकचन्द अपने घरवालों के विषय में सब पास-पड़ोसियों से बातें किया करते थे, परन्तु मन में इन्हें घर के किसी भी प्राणी के विपय में कोई चिन्ता नहीं थी। कोई बीमार पड़े या किसी की नौकरी छूटे, सव समाचार सुनकर उनके मन की उदासीनता और भी गहरी हो जाती थी ! घर में कौन किस तरह से रहता है, कव किसका किससे झगड़ा हो जाता है, किस को क्या दुख है-इसकी चिन्ता ने कभी उनकी दिनचर्या में या रात की नींद में कोई विशेप विघ्न नहीं डाला। 14 घर बने घर टूटे 1 दुकान से नीचे ढलान के खत्म होते ही नानकचन्द की लड़की लाली मेज़पोश काढ रही थी। फैजरोड के नुक्कड़ पर 'शरणार्थी वोमेन इस्टीट्यूट' से वह काढने के लिए मेज़पोश, पलेंगपोश और बुनने के लिए पुलोवर, मोजे, टोपी आदि ले आती थी, जिससे महीने में उसे सात से लेकर दस रुपये तक मिल जाते थे। उसके रूखे बाल हवा में उड रहे थे। चौडा । माथा, वडी-बडी आंखें और नुकीली ठुड्डी में उसके चेहरे पर बचपने की छाया झलकती थी, यद्यपि उसकी उम्र 15 के लगभग थी। आंखें थक जाने पर उसने सामने वाले टीले पर नजर दौडायी, जिसके ऊपर चढाई वाली सड़क पर बसो और मोटरो के ऊपरी भाग दिखायी दे रहे थे। कुछ देर तक वह सडक की ओर ही देखती रही। "आज फिर बादल घिरे हैं, शायद दिन में आंधी आये।" देवू चुपचाप लाली के पास आकर खड़ा हो गया था, इसका पता उसे नही चला था। लाली एक बार देवू की ओर देखकर मुसकरा दो--"पानी बरसेगा तो गर्मी कुछ कम होगी।" और वह फिर गोद में पड़े मेज़पोश की ओर झुक कर हरे धागे से लाल फूल के चारो ओर पत्तियां बनाने लगी। लाली कम बोलती थी, लेकिन उसका चेहरा सदा हँसता हुआ दिखायी देता था। "क्या तू हरी-हरी पत्तियां और लाल फूल बनाती थक नहीं जाती, लाली? पिछली बार तो पलँगपोश पर तूने कितने ही ऐसे फूल और पत्तियां बनाये थे...." "हमारे सेंटर में कभी-कभी एक औरत अपनी छोटी-सी मोटर में आती है, देबू ! उसे मेरा काम बहुत पमन्द है। वह कहती थी कि मैं ऐसे खूबसूरत फूल बनाती हूँ जैसे क्यारियो मे उगा करते हैं, हू-ब-हू वैसे ही फूल । मुझे उसके सामने मैले कपडे पहनकर जाते हुए शरम आती है। इस बार रुपये मिलने पर मैं अपने लिए छोट का एक नया मूट बनवा लूंगी..." देवू लाली के पास ही चारपाई पर बैठ गया और पैर के अंगूठे से जमीन पर निशान बनाने लगा। "काश कि आंधी के वक्त धूल न उडा करती तो कितना अच्छा । होता।"
लाली को आँधी और धूल में विशेष दिलचस्पी नहीं थी। अन्तर केवल इतना ही होता था कि आँधी के समय वह अन्दर जाकर झुग्गी में बैठ जाती थी और कभी तो आँधी के वक्त उसे वाहर बैठना भी अच्छा लगता था, जब टीनों के ऊपर जमी रेत हवा के साथ दूर तक ऊपर आसमान में उड़ने लगती थी और लाली अपनी आंखें बन्द किये चुपचाप खड़ी रहती थी। हवा चलने की ज़ोर-ज़ोर की आवाजें उसके कानों में सीटियाँ वनकर गूंज जाया करती थीं और वह अपनी उड़ती चुन्नी को कमर में वाँध लिया करती थी। ऊपर सड़क पर एक लारी सिनेमा का विज्ञापन लाउडस्पीकर से करती हुई धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी और उसकी आवाज़ नीचे तक आ रही थी। उसके पीछे बस्ती के कितने ही बच्चे शोर मचाते हुए पीछे- पीछे भाग रहे थे और लारी में बैठे हुए व्यक्ति द्वारा इश्तिहार फेंकने पर वे उन पर झपटते और दोनों हाथों से दबोच लेते थे। लाली ने उस शोर-गुल को सुन कर एक बार सामने सड़क की ओर देखा और फिर अपना मेज़पोश काढ़ने में लग गयी। "देख लाली, इस बार पहली तारीख को अपनी तनख्वाह मिलने पर मैं तुझे और जग्गी दोनो को सिनेमा दिखाने ले चलूंगा। तंबुओं में जो भगवती टाकीज़ है न, वहीं चलेंगे।" देवू सामने लारी के पीछे लगे बड़े-से इश्तिहार को देखकर कह रहा था। लारी धीमी चाल से तीसरे गीयर पर चढ़ाई में ऊपर चढ़ रही थी और विज्ञापन पर बने खूबसूरत चेहरे धुंधले होते जा रहे थे। परन्तु लाली चुप रही, देवू का प्रस्ताव सुन कर उसने कोई उत्सुकता नहीं दिखायी। वह चुपचाप मेज़पोश पर अपनी आँखें गड़ाये रही। "तू चुप क्यों है लाली, क्या सिनेमा देखने की तेरी तबीयत नहीं करती ?" लाली ने अपना चेहरा ऊपर उठाया और थोड़ा हँस दी, "तू कितनी वार सिनेमा चलने को कह चुका है देवू, लेकिन शायद तेरी पहली तारीख कभी नहीं आती।" देवू तनिक झेंप-सा गया, वह और भी जोर के साथ पैर के नाखून से 16 घर बने घर टूटे जमीन पर रेखाएं बनाने लगा। "हूं, मैं क्या करूं? हर पहली तारीख की शाम को बाबू मुझसे सारे रुपये छीन लेता है, लेकिन इस बार मैं पांच रुपये अपने पास रख लूंगा । मैं कह दूंगा कि मैंने अपने दोस्त से पांच रुपये उधार लिये थे वे चुका दिये।" "देवू, कल बाबू कह रहा था कि अब वह सुन्दर को नही पढायेगा। उसे कहीं नौकरी दिलवा देगा, हुकम की नौकरी भी तो छूट गयी है।" लाली देवू की ओर देखकर कह रही थी। देवू चुप रहा। कभी-कभी उसका मन होता था कि उससे कोई भी चर्चा न करे। उसकी अपनी जिंदगी की मुसीबतें क्या कम हैं कि दूसरों का भार अपने ऊपर डालकर वह अपने हृदय को और भी भारी बनाये। फिर वह सहानुभूति दिखलाने या उसके विषय मे सोचकर अपना जी दुखाने के अतिरिक्त और कर भी क्या सकता है ' सुन्दर को अगर बाबू ने नही पढाया तो उसमें क्या इतनी ताकत है कि वह वावू का विरोध करे ?आखिर उसकी विसात ही क्या है ? महीने के बाद चालीस रुपये वह बाबू के हाथ में अपनी तीस दिनी की कमाई धर देता है, और अगर कल को उसकी भी नौकरी छूट गयी तो जिस तरह हुकम पर घर वाले ताने कसा करते हैं और खाना ने खाते समय जैसे उसको कोसा करते हैं वैसा ही हाल उसका भी होगा, फिर वह क्या करेगा? इसी तरह दुकान की झुग्गी के सामने दिन-रात बैठा करेगा, या फिर दिन में नल की धार में नहाती हुई बस्ती की औरतो के गीले ब्लाउजों और बदन में चिपटी गीली धोतियों को देखा करेगा। नहीं, वह घर से भाग जायेगा...किसी दूसरे शहर, बम्बई या कलकत्ता...वहाँ उस नौकरी जरूर मिल जायेगी। हलकी-हलकी सुबह की हवा चल रही थी और बादल होने की वह से उसमे गर्मी नहीं भर सको यो । इतवार की छुट्टी देवू हमेशा हमी युग: बिना किसी जल्दी या चिन्ता के बिताना चाहता था. शनिवार की रात खाना खाने के बाद वह कितनी ही देर तक फुटपाथ पर बाबर देशा के कोने पर चला जाता था, और वहां पर धीरजमिह की दुक्त पर बह बैठकर रेडियो पर आते फिल्मी रेकॅ. सुनता रहता था, इस खीचा करता था, या सड़क पर चलते लोगों को देवा करदमागमा .
। वाहर से जल्दी लौट आता तो बाहर अपनी चारपाई पर सीधा पीठ के बल लेटकर ऊपर आसमान की ओर ताका करता था और आने वाली जिंदगी के वे सारे स्वप्न देखा करता था जो दूसरों को देखकर उसके दिमाग में घुस गये थे। इतवार की सुबह को भी वह अपनी चारपाई से काफ़ी देर में उठता । वाबू उससे कभी नहीं बोलते थे, लेकिन उसकी माँ सुभागी उसे लाटसाहव की तरह इस प्रकार लेटे देखकर दो-तीन वार डाँट देती थी, जिससे वह और भी देर तक सोता रहता था। अगर सूरज की किरणें उसके ऊपर चमकने लगतीं तो अपनी चारपाई को पास ही के पेड़ की छाया में घसीटकर वह फिर सो जाता था। देबू ने एक हाथ ठुड्डी पर रख लिया और अपनी बायीं ओर के बस्ती के टीलों की ओर विना किसी उत्सुकता के ताकने लगा। उसकी काली आँखों में चमक थी और गालों की हड्डियाँ उन टीलों की भांति उसके चेहरे पर उभर आयी थीं। उसके ऊपर के होंठ के ऊपर हलके हलके बाल उगने लगे थे, जिन्हें वह हर दो महीने बाद बाल कटाते समय नाई से साफ़ करवा देता था। उसकी कमीज़ के बटन खुले हुए थे, जिसके अन्दर उसकी छाती चमक रही थी। कभी-कभी शीशे में वाल बनाते समय वह थोड़ी देर के लिए ठिठक कर चेहरे की ओर कुछ क्षणों तक ताकता रहता था। लाली कह रही थी, "सुन्दर को पढ़ने का बहुत शौक है और अगर वाबू ने उसकी पढ़ाई छुड़वा दी तो उसे उसका बहुत ग़म होगा...।" इसके वाद थोड़ी देर तक वह सामने सड़क की ओर देखती रही और फिर एक लम्बी साँस खींचकर कहने लगी, "किसी दिन मैं भी सोचा करती थी कि मैं भी पढ़गी । जव कभी किसी मोटी किताब को किसी दुकान पर देखती थी तो हमेशा ही उसे पढ़ने की उत्सुकता मेरे मन में जाग उठती थी, लेकिन अपना नाम लिखने से आगे मैं नहीं बढ़ सकी..." हुकम का पांच साल का लड़का दीनू चारपाई के पास आकर खड़ा हो गया। वह केवल मैली बनियान पहने था, उसका पेट बाहर को निकल रहा था और पतली टाँगें वहुत कुछ बेडौल-सी प्रतीत होती थीं। वह गुड़ की बनी सेमियाँ खा रहा था। "देवू चाचा, बाबू की नौकरी कव लगेगी ?" 18 घर बने घर टूटे 7 देवू और लाली दोनो थोडी देर तक दीनू के चेहरे की ओर निहारते रहे। "मां कहती थी कि जब बाबू की नौकरी लगेगी तो वह मेरे लिए खिलौने लायेगा। देवू चाना, तुम बाबू की नौकरी क्यो नही लगवा देते?" देवू ने चुपचाप दीनू की पीठ पर हाथ रख दिया और उसके वालों को सहलाने लगा। लाली सिर झुकाकर अपना मेज़पोश काढने लगी थी। तभी सुभागी किमी काम से झुग्गी से बाहर आयो। उसके पके वालों के गुच्छे उसकी कनपटियो तक झुक आये थे, उसके चेहरे पर बुढापे की खीझ और छिपते हुए दिन की विवशता के कडे भाव उभर आये थे, जिससे नम्रता और स्नेह की भावनाएं धुंधली पड़ गयी जान पडती थी। लाली और देवू को इस प्रकार बातें करते देखकर उसे क्रोध-सा आ गया। कभी घर के दो प्राणियों को साथ बैठकर हंसते-बोलते देखकर वह खीझ जाती थी और किसी-न-किसी बहाने उनमे कोई कमूर निकालकर उन पर चिल्लाना आरम्भ कर देती थी। "लाली, क्या सारा दिन बाहर ही बैठी रहेगी घर को भी कोई फिक .है क्या? घर का सारा भार तो मुझ पर छोड रखा है न।" लाली चुपचाप मेज़पोश को तह करके अन्दर झुग्गी मे चली गयी। सुभागी के कभी व्यर्थ ही चिल्लाने पर भी वह कभी उलट कर जवाब नहीं देती थी, चुप रहने के अतिरिक्त और कोई मार्ग उसने नहीं अपनाया था। देवू ऊपर फुटपाथ पर आ गया। उसने अपनी जेब टटोली, उसमे दुअन्नी देखकर एक प्याला चाय और एक-आध वीड़ी पीने का उसने निर्णय किया । इतवार की सुबह का यह सबसे बड़ा आकर्षण था । सडक पर कुछ लोग आ-जा रहे थे, कभी-कभी एक-आध मोटर या लारी भी धूल उड़ाती हुई आगे भागी जाती थी । देवू ने एक दृष्टि नीचे खड्ड मे बिखरी वस्ती पर डाली, तालाब में कुछ भैसें अपनी गर्मी दूर करने के लिए पानी मे बैठी थी, केवल उनके सिर पानी से ऊपर उठे थे। नल पर स्त्रियो, पुरुषों और बच्चो की भीड़ पानी भरने के लिए जमा यौ। हवा चलने से तालाब के किनारे लगे पेड़ो की शाखाएं उसे हिट फुटपाथ की - दिखायी दी। देवू देवनगर की ओर आगे बढ़ गया। दिन-भर वह आराम करेगा, या वस्ती में इधर-उधर घूमेगा, या अपनी झुग्गी के सामने बैठकर सड़क पर आने-जाने वाले लोगों को देखेगा। उसकी कल्पना से उसे सुख मिलने लगा। और अव जाकर धीरजसिंह की दूकान पर बैठकर वह एक प्याला गरम चाय का पियेगा। अगर उसके पास पैसे होते तो वह भगवती टाकीज़ में जाकर कोई फ़िल्म देख आता। इस पहली तारीख को वह जरूर वाप से कुछ रुपये माँग लेगा। सुबह से लेकर शाम तक वह वचनसिंह की दूकान पर काम करता है, कभी पंचर लगाता, कभी हवा भरता और कभी 'ओवर-हाल' करता। कोई-न-कोई काम सदा उसका इन्तजार करता रहता है । और, वचनसिंह सुबह-सुबह ग्रंथसाहव का पाठ करता हुआ भी तिरछी आँखों से उसकी ओर देखता है और उसे जल्दी-जल्दी काम करने के लिए कहता है। उसे रात को जग्गी वाली घटना याद आयी। मंगतराम के मारने पर भी वह शराब पीना नहीं छोड़ता। वह रात को न जाने कौन-सी देवकी के बारे में बातें कर रहा था? बस्ती में तो देवकी नाम की शायद कोई औरत नहीं है, लेकिन जग्गी अच्छा आदमी नहीं है। सामने से तीन लड़कियाँ हँसती हुई उसके पास से गुजर गयीं। देवू ने इतने थोड़े समय में ही तीनों को ध्यान से देखने की कोशिश की और इस बात का निर्णय वह तीनों की पीठ देखते हुए करने लगा कि उनमें सवते खूबसूरत कौन-सी है ? दायीं ओर काली कमीज़ पहने लड़की के वालों के पीछे एक सफ़ेद फूल लगा था, बीच वाली के बालों की दो चोटियां थीं, एक आगे और एक पीछे और तीसरी की कमर जरा मोटी थी और पीठ भी काफ़ी चौड़ी थी। देवू को उसके चेहरे की थोड़ी-सी झांकी और दिखायी दी, उसका सफ़ेद रंग और काले-गहरे बाल और फिर विजली की भांति वे उसकी आँखों के सामने से गायव हो गयीं। देवू चुपचाप आगे बढ़ गया। सामने सड़क खत्म हो गयी थी और साथ पहाड़ी की चढ़ाई भी। सड़क के खत्म होते ही दायीं ओर पेट्रोल का पम्प था और उसके पीछे छोटा-सा ईटों का बना एक कमरा, जो दफ़तर का काम 20 घर बने घर टूटे W31 Liorary deadling Woom GEETA BY WIN, ADARSH NAGAR देता था, जिसके सिर पर एक किनारे लगे धने पीपल की छाया सदा छायी JAIPUR-302004 रहती थी और चढाई चड़ने के बाद लोग गर्मियों में अपना पसीना पोंछते हुए क्षण-भर के लिए वहां आराम करने लगते थे । देवू भी यहां थोड़ी देर के लिए ठिठक गया। सड़क के उस पारदो या तीन-मजिले साफ-सुथरे फ्लैटो की कतार थी। किसी मकान के आगे थोडा-सा बाग-बगीचा, या कुछ फूलों की 'क्यारियां, या फिर कुछ बेलें खिड़कियों के ऊपर दीवारों पर चिपटी हुई थी, जो दूर से अनगिनत काले-काले सुराख मालूम पड़ते थे। उनके पीछे कुछ मदिरो के कलश या पुरानी मसजिदों की टूटी हुई गुम्बदें, जिन पर वरसात का पानी उनके कच्चे रंगों को हमेशा धो दिया करता था, और फिर कुछ ऊबड़-खाबड झाड़ियां, कुछ जंगली पेड़ और कुछ टोले चमक रहे थे। इस दृश्य के दूसरी ओर नया बना हुआ शहर था, जिसमे मुख्यतः रिफ्यूजी ही रहा करते थे, अमीर और गरीब रिफ्यूजी दोनो। जिन अमीर रिफ्यूजियो को शहर में मकान नहीं मिल सके थे उन्होंने वहां जमीनें लेकर अपनी कोठियां बनवा ली थी। उन्होंने अपने कुछ कारखाने भी यहाँ खोल रसे थे, लेकिन बिज़नेस सारा शहर में ही हुआ करता था। देवनगर आरम्भ होते ही पहले चौराहे पर धीरजसिंह का चाय का स्टाल था, जहां हमेशा ही कभी तांगे वाले, कभी शाम को दफतर से लौटते हुए चपरासी या कभी कोई छात्र आकर बैठ जाते थे और कभी एक प्याला चाम, शिकजवी, कोकाकोला या लेमन पी लेते थे। हमेशा दुकान पर लगे रेडियो में किसी-न-किसी स्टेशन से फिल्मी रेकर्ड या खबरें आती रहती थी। पास ही तांगे वालों का अड्डा था और जब कभी किसी सवारी को बिना नम्बर का तांगा बिठा लेता तो वहाँ पर झगडा जाता था और राह चलते लोगो की भीड़ जमा हो जाती थी। कभी सडक पर गुजरता कोई सिपाही भीड़ देखकर अंदर घुस जाता और किसी एक का हाथ पकड़- कर उसे कोने में ले जाता और थाने ले जाने की धमकी देता, उससे कुछ पैसे ऐंठ लेता और फिर चुपचाप सीटी बजाकर शहर की ओर रवाना हो जाता। देबू ने धीरजसिंह से एक प्याला चाय बनाने के लिए कहा और स्वयं नाटा फटणार निधी कमी पर मेजोनीनपने उर्दू के अखवार रखे थे और देवू ने एक नजर उन पर डालकर फिर वहाँ से नज़र हटा ली । अख़बार में उसकी कभी तबीयत नहीं लगी थी, केवल कभी-कभी नयी फ़िल्मों के इश्तिहार जरूर देख लेता था। अपने पिता को रोज सवेरे अखबार पढ़ते हुए और सुन्दर को अपने स्कूल की मोटी और पतली, उर्दू और अंग्रेजी की किताबों में उलझे देखकर वह आश्चर्य से सोचने लगता था कि ये लोग किस प्रकार इतना समय पढ़ने में लगाते हैं, क्या वे ऊवते नहीं ! "अरे देवू, अच्छा तो है, आज वहुत दिनों बाद नज़र आया...! !" धीरजसिंह ने चाय का प्याला देवू के सामने मेज पर रखते हुए कहा । वह एक बनियान और एक कच्छा पहने हुए था, वालों पर पगड़ी नहीं थी जिससे उसकी लटें उसकी गरदन पर झुक रही थीं दाढ़ी और मूंछे इतनी घनी नहीं थीं, लेकिन टांगों और छाती के काले वालों ने उसके शरीर के असल रंग को छिपा दिया था। वह अपने किसी भी परिचित ग्राहक से सदा यही वाक्य हँसकर कहा करता था। पास ही की मेज़ पर एक प्रौढ़ व्यक्ति सिर पर सफ़ेद पगड़ी पहने एक स्त्री के साथ बैठा था, स्त्री की उम्र उसकी अपेक्षा वहुत कम जान पड़ती थी। थोड़ी-थोड़ी देर बाद स्त्री अपनी चुन्नी से अपनी आँखें पोंछ लेती थी और फिर मेज़ पर रखा शिकंजवी का गिलास होंठों से लगा लेती थी। "अव चुप हो जा, मरे के साथ मरा तो नहीं जाता।" वह पुरुप उस. स्त्री की ओर देखता हुआ कह रहा था, "बीमारी में छः महीनों से वह चारपाई पर तड़प रही थी, अब छुटकारा मिल गया...." पुरुप की बात सुनते ही स्त्री की आँखों में आँसू भर आये और हाथ का गिलास मेज़ पर रखकर उसने फिर अपनी चुन्नी के कोने को अपनी आँखों से लगा लिया। "लेकिन...उसके छोटे-छोटे बच्चे...उनका क्या होगा...?" वह फिर फफक उठी। "भगवान सवको पालता है, जिसे वह दुनिया में भेजता है उसकी देख- रेख की जिम्मेदारी भी वह अपने ही ऊपर लेता है..." फिर थोड़ी देर रुककर वह बोला, "तेरा जीजा आज काम का होता तो कोई फ़िकर नहीं 22 घर वने घर टूटे थी, लेकिन...उसे घर की फ़िकर कब हुई थी, शायद अब दूसरा ब्याह कर ले।" रेडियो में सवेरे की खबरें शुरू हो गयी थी और स्टाल के सामने कुछ लोग दातुन चवाते हुए खडे हो गये थे। किसी के शरीर पर एक बनियान श्री और कोई मिर्फ एक लुगी वांधे ही अपने रात के उलझे वालों मे उंगलियां घुसेड़ रहा था। कुछ सवारियां तांगे के अड्डे पर किराया तय कर रही थी। देवू धीरे-धीरे चाय का प्याला होठो से लगाता और थोड़ी-योडी चाय की चुस्कियां लेता, एक साथ ही जल्दी-जल्दी चाय खत्म कर देने की उसकी इच्छा नही थी। फिर उसने बीडी सुलगायो और सामने आनन्द पर्वत को पहाड़ियों की ओर देखते हुए बीड़ी के कश खीचने लगा। आसमान साफ था और सूरज की किरणों में धीरे-धीरे गर्मी बढने लगी थी। अचानक धीरजसिंह उसके पास वाली कुर्सी पर आकर बैठ गया और उसने अपनी एक बांह देबू के गले में डाल दी। देवू ने धीरजसिंह की बाँह का पसीना अपनी गरदन पर अनुभव किया । "सुना यार देवू, आजकल तो सुना है, तू काफी कमाने लगा है । अव तो वचनसिंह तुझे अच्छे पैसे देता है, कल ही वह मुझसे कह रहा था...." यह कहकर मुसकराते हुए उसने देवू की ओर देखा। "क्या कह रहा था वचनसिंह ?" देवू ने चाय का अतिम चूंट पीते हुए पूछा। "तू उससे कहना मत, उसने मुझे कसम दिलवायी थी कि मैं तुझसे नही कहूंगा, लेकिन यार तुमसे क्या परदा है लेकिन कहना मत, नही तो वह मुझ पर गुस्सा होगा और शायद मुक्खासिंह से मेरी शिकायत भी कर "तू डरता क्यो है, मैं वचनसिंह से नही कहूंगा।" "मुझे तेरी बात का भरोसा है। वह कहता था कि जब वह दुकान पर नही होता तो पचर या ह्वा भरवाने के पैसे शायद तू अपने पास रख लेता है...।" धीरजसिंह देवू को मांखों की तरफ़ देखकर कह रहा था। देवू चौंक पड़ा, जिससे धीरजसिंह को अपनी बांह उसके गले से उठानी पड़ी-"क्या वचनसिंह मुझे चोर समझता है...?" "अरे तू गुस्सा क्यों होने लगा? वह तो कहता था कि उसका ऐसा: ख़याल है। शायद सच न हो। तू उसकी बात का बुरा मत मानना । मुंह से चाहे वह जो कुछ कह ले, लेकिन दिल का वह साफ़ है..." "हुँ...सो वह मुझे चोर समझता है ! मैं उसकी गैरहाज़िरी में उसके पैसे अपने पास रख लेता हूँ ! मैं कल ही उसकी नौकरी छोड़ दूंगा।" देवू ने वीड़ी का एक कश खींचकर उस टुकड़े को दूर फेंक दिया। "क्यों पागलों की-सी बातें कर रहा है, वचनसिंह की नौकरी छोड़ देगा तो और कहीं काम मिलेगा तुझे? देखता नहीं है, आजकल कितनी वेकारी फैल रही है, कल एक 22 साल का वेकार लड़का कुतुब से कूदकर मर गया...!" धीरजसिंह ने फिर अपना नंगा हाथ देवू की पीठ पर रख दिया और उसकी ओर देखकर कहने लगा, "और तू समझता है कि तू वचनसिंह की नौकरी छोड़ देगा!" देवू ने अपनी गरदन हिला दी और चुपचाप विना धीरजसिंह की ओर देखे वह सामने धूप में चमकते पीले-पीले रेत और धूल से भरे आनन्द पर्वत के टीलों की ओर देखता रहा, जिस पर फ़ौजी बैरकों की लंबी-लंबी टीन की छतें चमक रही थीं। धीरजसिंह के सामने कहने को तो देवू कह गया . था कि बचनसिंह की नौकरी छोड़ देगा, परंतु मन में वह सोच रहा था कि आखिर वचनसिंह को उस पर शक पड़ ही गया। लेकिन उसने कभी भी महीने में दो-तीन बार दो-चार आनों से अधिक पैसे अपनी जेब में नहीं रखे। उससे ज्यादा रखने का उसमें साहस ही नहीं था, कहीं अगर रात पड़ने पर वचनसिंह उसकी जेबों की तलाशी ले लेता और पैसे उसकी जेब में मिलते तो वह नौकरी से बर्खास्त करने के अतिरिक्त नानकचन्द से उसकी चोरी की बात कहता और वस्ती में उसे बदनाम करता। इसी डर से कभी देवू ने चोरी से ज्यादा पैसे बचनसिंह की अनुपस्थिति में नहीं छिपाये थे। "मुक्खासिंह अपना व्याह करने की सोच रहा है, बातचीत भी उसने पक्की कर ली है, अब तो सरदारनीजी घर आ जायेंगी । मैं सोचता हूँ कि शायद फिर मुझे अकेले देखकर वह मेरे लिए भी कोई लड़की ठीक कर ले।" और धीरजसिंह ने अपने बालों के जूड़े में से लटकती लटें फिर बालों 24 घर बने धर टूटे में दूंसते हुए कहा-"रात को सोते वक्त में कितनी ही देर तक उस दिन के ख्वाब देखा करता हूँ। मुक्खासिंह जरूर कोई मेरे लिए भी ठीक कर देगा..." लेकिन देवू के कानो में ये सब बातें बाहर से ही टकराकर लौट रही थी। उसे साइकिल की दुकान पर नौकरी करना बिलकुल पसंद नहीं था, एक के बाद एक साइकिल के पंचर लगाना, ब्रेकों को ठीक करना, पम्प से हवा भरना...उसको सांस फूल जाती थी, उसके हाथ गंदे हो जाते थे, सदियों में उसकी उंगलियों मे रात-दिन दर्द होने लगता था। तभी स्टाल पर दो व्यक्ति और आकर बैठ गये और उन्होंने दो प्याले चाय मांगी। धीरजसिंह उछलकर बडे चूल्हे के पास जाकर बैठ गया और केतली मे पानी चढाने लगा। देवू ने एक वार धीरजसिंह की ओर देखा और उसे धीरसिह की जिंदगी से ईर्ष्या होने लगी--वह कितने मजे से सारा दिन अपनी दुकान के सामने बैठा चाय के प्याले और कोकाकोला में वर्फ़ डालकर उसके गिलास बनाता रहता है, उसे कही भागना-दौडना नहीं पड़ता, और जब उसकी मर्जी आये तो चाय का प्याला या स्वय शर्वत का एक गिलास चढा ले। उसे रोकने वाला भी कोई नही है । मुक्खासिंह उस पर शक नहीं करता, क्योकि वह उसका भाई है । काश कि हुकम भी इसी तरह की कोई दुकान सोल लेता तो वह बचनसिंह की नौकरी छोडकर उसकी दुकान पर काम करता। देवू थोड़ी देर बाद उठ खडा हुआ। यकायक आज इतवार होने की बात उसके दिमाग में बिजली की भांति दौड गयी और वह कोशिश करने लगा कि आज की छुट्टी का वह उपयोग करे, नही तो अगले छः दिनो मे उसे छुट्टी की कल्पना करने की भी फुर्सत नही मिलेगी। वह धीरजसिंह से की हुई सब बातें भूल गया। उसने जेब में रखे बीड़ी के पैकेट में से और बोडी निकाली और उसका धुआं छोडता हुआ वापिस अपनी वस्ती की ओर लौट पड़ा। आगे जाकर अपने को व्यर्थ में ही थकाने का प्रोग्राम उसे पसन्द नही आया। हवा जरा जोर से चलने लगी थी, लेकिन आसमान विलकुल साफ़ था, मटमैले से रंग का । गर्मी की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी। । . नाते . बस्ती के नुक्कड़ पर उतराई समाप्त होने के पश्चात एक घने जामुन के पेड़ के नीचे वचनसिंह की साइकिलों की मरम्मत करने की छोटी-सी झुग्गी में वनी एक दुकान थी, जिसके दरवाजे के सामने एक टीन के बोर्ड पर स्कर्ट स पहने, होंठों और गालों पर गहरी लाली लगाये और कटे हुए बाल वाली एक यूरोपियन युवती की साइकिल के साथ एक तसवीर बनी थी, जिसमें साइकिल की अपेक्षा उस यूरोपियन युवती का अधिक विज्ञापन होता था और सड़क पर चलते लोगों की दृष्टि अनायास ही उस चमकते गहरे रंगों वाले बोर्ड की ओर आकर्षित हो जाती थी। पेड़ की झुकी हुई कुछ शाखाओं पर साइकिल के पुराने टायर और ट्यूब लटके रहते थे और उनके नीचे एक बोरी के टुकड़े पर हवा भरने का पम्प, दूसरे औज़ार और पंचर लगाने के लिए एक चौड़े से तसले में गंदा पानी भरा रहता था। वचनसिंह झुग्गी के सामने एक कुर्सी पर बैठा रहता और खाली समय में कभी ग्रन्थ- साहब जोर से पढ़ता या लोगों को ताका करता था, और देबू बोरी के टुकड़े पर । जब ग्राहक अधिक संख्या में आते तब वह देवू का हाथ बँटाने के लिए यहाँ आ जाता और जब किसी साइकिल का ओवरहालिंग करना होता तो वह झुग्गी के सामने कभी पहियों की सफ़ाई करता और कभी साइकिल को उलटा खड़ा करके उनके पहियों और ब्रेकों को ठीक तरह से सीधा लगाने की कोशिश करता, कभी साइकिल में कोई नया पार्ट दिखायी देने पर वह उसे निकाल लेता और उसके बदले-दुकान में से एक डिब्बे से वैसा ही कोई पुराना पुर्जा लगा देता, तब उसकी आँखों में एक हँसी चमक उठती थी और काम समाप्त करने के बाद बड़े उत्साह से वह जोर से ग्रंथ- साहब पढ़ता, या देवू से बातें करने लगता। उस सड़क पर रोज़ ही सवेरे दफ्तरों में काम करने वाले क्लर्क, खाकी बर्दियां पहने चपरासी और कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र अपनी साइकिलों पर बड़ी तेजी से उतराई पर उतरते। मोटरों, तांगों और बैलगाड़ियों का ताँता भी बँध जाता और कभी साइकिलों की घंटियां, कभी मोटरों के हॉर्न और कभी तांगे वालों के 'बचना बावूजी', 'वादशाहो, ज़रा दायें चलो', 'मिस साहेब ज़रा संभलना' की आवाज़ों से सड़क गूंजा करती। ज्यों-ज्यों सूरज आसमान की छत की ओर बढ़ता, त्यों-त्यों लोगों का तांता कम होता 26 घर बने घर टूटे जाता। शाम को फिर वही घर लौटने वालो की भीड । इस बार साइकिल वाले चढाई देखकर साइकिलो से उतर जाते, परन्तु कोई अपनी ताकत का प्रदर्शन करने के लिए गद्दी से इच ऊपर उठकर अपनी पूरी शक्ति के साथ पंडल मारता हुआ अपनी विजय पर मुसकराता हुआ चढाई के ऊपर तक जा पहुँचता और पेट्रोल पम्प के पास पहुंचकर उसकी जान में जान आती। लोगों के थके पीले चेहरों, निस्तेज आंखो, और झुकी गरदनो में घर पहुंचने की ऐसी लालसा होती थी जो उनको चढाई चढ़ने पर भी थकाती नहीं थी। फिर शाम को घूमने वालो की टोलियां शहर की ओर जाती दिखायी देती। चमकते जूते, रेशमी बुशर्ट, साफ-सुथरी सफेद पतलून, अनेक रंगो की साड़ियां, नये-नये फैशन की चोलियां और मैडल और पाउडर, क्रीम और लिपिस्टिक की मीठी सुगध लोगो की आँखो को पल-भर के लिए चकाचौध कर देती, पेड़ो पर परिदे चहकने लगते, अंधरे की छाया धीरे- धीरे गहरी होती जाती और सड़क के दोनो ओर लगे लप-गोस्टो मे धुंधली बिजलियाँ चमकने लगती । दूर से चढाई को ये रोशनियां आसमान के सितारो से कम नहीं मालूम देती थी। देवू पिछले 15 मिनटो मे बेकार, वोरी के टुकडे पर अपने घुटनो पर ठुड्डी टिकाये बैठा था। उसकी बांह कोहनियो तक तेल, ग्रीज़ और धूल में सनी हुई थी और उसके कुछ निशान उसके पसीने से भरे माथे और गालों पर भी लगे हुए थे । वह चुपचाप अंधेरी सड़क पर भीड को देख रहा था, परन्तु उसका ध्यान कही और था । उसकी आँखें खुली हुई थी, उसके मन के विचारों के साथ सडक को भीड से बहुत दूर विचरण कर रही थी। वचनसिंह ने कभी अपना शक उस पर ज़ाहिर नहीं किया और वह जाकर धीरजसिंह से उसके बारे मे वातें कह आया। लेकिन शायद वह दिल का साफ़ है, तभी ग्रथसाहब का पाठ इतनी ज़ोर-जोर से किया करता है, लेकिन जब तक सड़क की बत्ती नही जल जाती तब तक वह अपनी दूकान वन्द नहीं करता, चाहे दूकान पर एक भी ग्राहक न आये। कल उसने चवन्नी छिपाकर छोड़ दी, किन्तु जब वचनसिंह को उस पर शक है ही तो फिर वह उसका फायदा क्यों न उठाये? "क्या थक गया, देवू ?"बचनसिंह अपनी कुर्सी से उठकर देवू के पास घर बने 17 आकर खड़ा हो गया। उसके चेहरे और घनी मूंछों और दाढ़ी पर दिन की उड़ती धूल जम गयी थी और जब वह वोलता था तो उसके दांत चमकने लगते थे। देबू ने अपना सिर उठाकर वचनसिंह की ओर एक बार ध्यान से देखा और यह जानने की कोशिश की कि कहीं इस तरह वातें करके वह अन्दर की बातें जानने की कोशिश तो नहीं कर रहा है ! "हूं, इस साइकिल की दुकान से कुछ नहीं बनता। सरदारनी मेरा दिमाग चाटा करती है, कभी नयी साटन की शिलवार वनानी है तो कभी नया जूता खरीदना है, वह अभी तक अपने-आपको जवान समझती है और रोज रात को सोने से पहले सज-बनकर तैयार हो जाती है जैसे कोई नयी व्याही दुलहन है...हूं...!" यह कहकर उसने एक ज़ोर का ठहाका लगाया। "मेरा क्या, मैं तो हर साल एक वच्चा पैदा कर दूं...अभी मुझमें इतनी ताकत है।" और उसने अपनी मूंछों पर ताव दिया और फिर सामने अंधेरी सड़क की ओर देखकर कहने लगा, "लेकिन बच्चों को खिलाऊँ कैसे? तू मेरे बड़े लड़के सोहनसिंह को जानता है, देबू ? इतना आवारा दन गया है कि क्या कहूँ, सब गली वालों से लड़ता है, कल एक का सिर फोड़ दिया, - वह तो मैंने मामला दबा दिया, नहीं तो पुलिस पकड़कर ले जाती और... और सरदारनी रोज रात को सज-बनकर तैयार हो जाती है और मुझे ललचाती है...।" सड़क पर बत्तियां जल गयी थीं, जिनकी धीमी रोशनी में सड़क पर चढ़ाई चढ़ते लोग अदृश्य लोगों की परछाइयों-से जान पड़ते थे। उनकी धीमी चाल लड़ाई से लौटती हुई पराजित सेना की भाँति थी, जो निराश हुए अपने घरों को थके-मांदे वापस लौट रहे हों। देवू उठ खड़ा हुआ और चुपचाप वोरी पर विखरे औजारों को लकड़ी के बक्से में रखने लगा। वचनसिंह उसके पास ही खड़ा उसे काम करते देखता रहा, कभी-कभी वह देवू की सहायता कर देता था और कभी इस प्रकार चुपचाप खड़ा उसे देखा करता था। "अब चलो सरदारजी, रोशनियां जल गयों।" देवू ने बक्से का ताला लगाते हुए कहा। 28 घर वने घर टूटे "रोशनियां जल गयीं, अब कोई ग्राहक नही आयेगा।" वक्से को झुग्गी मे रख देवू अपने घर की ओर रवाना हो गया। रास्ता काटने के लिए उसने एक बोडी सुलगाने की सोची, परन्तु फिर थकान और भूख मे बीड़ी का मजा न पाने के विचार से उसने अपनी जेब में हाथ नहीं डाला। उसके पैर मशीन की भांति चढ़ाई के फुटपाथ पर आगे बढ़े जा रहे थे, वह अनुभव कर रहा था मानो उनमे जान न हो। कभी-कभी नीचे की ऊबड़-खाबड़ झाड़ियो में शोर मचाती हुई हवा के झोकों से उसके चेहरे का पसीना सूख जाता था और देवू एक लवी सांस लेता था। सडक पर लोगों की भीड़ शहर से लौट रही थी जिनमें कुछ चपरासी, कुछ क्लर्क, कुछ मजदूरो की टोलियां और शाम की पढाई पढ़ने के बाद कप कॉलेजो से लौटते हुए छात्र थे। मोटरो और बसों की तेज रोशनियो से काली कोल- तार की सड़क रह-रहकर चमक उठती थी। देवू को इस भीड़ में से किसी में भी दिलचस्पी नही थी । वह अपने ही विचारो में मग्न सड़क पर चला जा रहा था । कभी-कभी दायी ओर बने प्लेटो की कतारो को ओर वह देख लेता था, किसी मकान मे रेडियो में से गाने की आवाज बाहर तक आ रही थी और किसी मकान के सामने वाग में आराम-कुसियों पर बैठे लोग लैमनस्क्वंश या ऑरेंजस्क्वैश या बियर पीते हुए परस्पर बातचीत में मग्न थे। दिन भर की गर्मी के कारण अदर वंद रहने के बाद अब वे खुली हवा मे आकाश के नीचे अपने मनोरंजन में व्यस्त थे । पहाड़ न जाने के कारण यही उसका आनन्द उठा लेना चाहते थे। पेट्रोल पम्प से थोड़ी दूर पहले ही वायी ओर उसने नीचे झुग्गियों की ओर जाने की एक पगडंडी पकड़ी। अधकार का पूरा साम्राज्य अभी तक बस्ती में नहीं जम पाया था। इक्की-दुक्की झुग्गी के भीतर मिट्टी के तेल की लालटेन या दीप जगमगाता दिखायी दे रहा था। हवा चलने से किसी झुग्गी की छत पर संभाल-संभाल कर संजोये गदे चीथड़ो के टुकड़े हवा में उड़ने लगते थे। घर से देवू तौलिया उठाकर साबुन की टिकिया हाथ मे दबाये सीधा तालाब के पास नल पर नहाने के लिए चला गया। यद्यपि यकान और भूख के साथ नल तक जाने और फिर वहां बैठ कर साबुन से सारा शरीर । घर बने। 29 - . रगड़ने की हिम्मत उसमें नहीं थी, परंतु दिन-भर पसीने के ऊपर जो धूल की तहें जम गयी थीं उनसे छुटकारा पाने के लिए उसने स्नान करना आवश्यक समझा। "देवू देवू...!" देवू ने किसी को पीछे से अपना नाम पुकारते सुना । उसने पीछे मुड़कर देखा तो भोला उसकी ओर बड़ी तेजी से अपने कदम आगे बढ़ाये चला आ रहा था। "कैसा है भोला, बहुत दिनों से दिखायी नहीं पड़ा!" भोला के आने पर देवू फिर नल की ओर पाँव बढ़ाने लगा। भोला की अवस्था वारह वर्ष से अधिक नहीं थी। सारी बस्ती में भोला एक ऐसा प्राणी था जिसकी कोई झुग्गी नहीं थी, जिसके मां-बाप, भाई-बहन, घर-वार--कुछ नहीं था, किसी को उसके अतीत का पता नहीं था। जिस प्रकार वस्ती में कितने ही कुत्ते, विना दूध देने वाली लावारिस गायें, बछड़े आदि थे उसी प्रकार भोला भी झुग्गियों के चक्कर ही काटा करता था, कोई उसे सुवह रोटी दे देता तो कोई शाम के खाने के बाद बची जूठन उसके सामने लाकर रख देता। पिछले जाड़ों में उसे सर्दी से ठिठुरता देखकर नानकचन्द ने उसे अपनी दुकान से एक पुराना वड़ा-सा कोट दे दिया था, जिस पर सुभागी ने उस दिन घर पर तूफ़ान मचा दिया था और नानकचन्द के दानी स्वभाव की दुहाई दी थी, और फिर अगले दिन सारी वस्ती में वह सुना आयी थी कि उसने तरस खाकर भोला को गरम कोट दे दिया है। "वाह देवू, अभी चार दिन पहले तो तूने मुझे एक बीड़ी पिलायी थी। तू बहुत जल्दी भूल जाता है।" भोला ने कहा। "हाँ, याद आ गया, भोला... तेरे गानों का क्या हाल है, तूने कोई नये गाने सीखे ?" देव ने भोला की ओर देखकर पूछा। भोला अपने फ़िल्मी गानों के लिए सारी वस्ती में मशहूर था । देवनगर जाकर वह चाय के स्टालों या पान-बीड़ी वालों की दुकानों के सामने खड़ा हो जाता था और रेडियो में चलते फ़िल्मी गानों के रिकर्ड बड़े ध्यान से सुना करता । पाँच-छ: बार एक गाना सुनने पर उसे थोड़ी-बहुत गलत- सलत तान याद हो जाती थी और फिर वह वस्ती वालों के सामने गानेगाया -- 30 घर बने घर टूटे । करता था। वम्ती के लोग भी दिन-भर की थकान मिटाकर जब अपनी चारपाइयों पर लेट जाते तो कभी भोला को वहां से गुजरते देखकर उसे आवाज़ लगाकर बुला लेते और उसके गाने सुना करते थे और उसके गाने की तारीफ़ै किया करते थे। "अभी कोई नया गाना नही सीखा है, मैं देवनगर गया ही नहीं। दीतू मामा की दीवार गिर पड़ी थी, सो सारा दिन मैं उनके साथ काम करता रहा..." "क्या तूने दीनू चाचा की दीवार बनाने में काम किया...?" देव ने आश्चर्य से भोला की ओर देखकर पूछा-"और अभी छ -सात दिन पहले उन्होंने जो तुझे पीटा था वह वात भूल गया.. तब तो तू उन्हे वाद मे गालियां दे रहा था और कहता था कि अब तू उनका कभी मुंह तक नहीं देखेगा...और अब तूने उनकी झुग्गी की दीवार उठायी, छि .. !" यह कह- कर देवू ने एक शिला पर थूक दिया भोला थोडी देर तक चुप सुनता रहा । उसने देवू की ओर देखा तक नहीं। फिर धीमे स्वर में कहा, "शाम को दीनू चाचा ने चवन्नी दे दी थी..." "हूं...!" देवू को क्रोध आ रहा था। थोडी दूर अंधरे में तालाब के एक कोने की गहरी छाया दिखायी दे रही थी, काई की इतनी मोटी तह जम गयी थी कि दूर से एक हरे-भरे बाग होने का संदेह होने लगता था । उसके ऊपर ही लगे पेड़ों की कुछ टहनियां झुककर तालाब के पानी को स्पर्श करने का प्रयास कर रही थी। उसमे भी ऊपर एक टीले पर सफेद रंग का एक मदिर बना था, जिसके अदर हनुमान की एक लाल मूर्ति थी और मदिर के ऊपर एक लाल झडा पतले बांस में लिपटा हुआ दूर से दिखायी देता था। मदिर के पास ही एक पेड की डालियो पर कितने ही रंगों के कपड़ों के चिथडे बंधे हुए थे। सारी वस्ती में यह बात मशहूर थी कि किसी बात का शक होने पर जव वडी भक्ति के साथ हनुमानजी की पूजा करने के बाद जो व्यक्ति इस पेड़ डाल पर कोई कपड़ा बांध जायेगा तो उसकी मनोकामना पूरी हो जायेगी और बस्ती में इन मनोकामनाओं को इच्छा रखने वालों की कमी नहीं थी। लोग एक के . बाद एक फ़रमाइशें लेकर पेड़ पर कोई फटा-पुराना रंगीन कपड़े का चिथड़ा वाँध जाते थे। "जा, तू मेरे साथ-साथ क्यों चला आ रहा है ? मैं तो नहाने जा रहा हूँ।" देवू ने विना भोला ओर की देखे कहा। परंतु भोला फिर भी देवू के साथ चलता रहा। वह कुछ नहीं बोला। देवू ने समझा कि शायद भोला एक वीड़ी के लालच में उसके साथ आ रहा है और उसे गुस्सा देखकर अभी तक उसे बीड़ी मांगने का साहस उसे नहीं हुआ। देवू ने फिर उसी लापरवाही के साथ पूछा, "बीड़ी पियेगा?" "नहीं...!" भोला ने तीव्र स्वर से उत्तर दिया। अचानक ही उसके स्वर में देवू ने ऐसा कम्पन और रुंधापन अनुभव किया कि उसका हृदय भोला के लिए दर्द से भर आया। आखिर भोला का इस दुनिया में कौन है, कल को अगर वह बीमार पड़ जाये तो उसके लिए कोई दवा लाने वाला भी नहीं है, अगर वह मर जाये तो उसकी लाश को जलाने का कष्ट भी शायद कोई न करे। उसका घर नहीं, मां-बाप नहीं...! "अच्छा भोला, तूं यहीं बैठ, मैं अभी नहाकर आता हूँ। फिर हम इकट्ठे वीड़ी पियेंगे । ले, मेरी कमीज़ ज़रा अपने पास रख ले, नल पर तो इतनी भीड़ है कि कोई कमीज़ उठा भी ले तो पता न लगे।" भोला ने चुपचाप देवू की कमीज़ को अपनी वग़ल में दवा लिया और नल पर पानी भरने वालों और नहाने वालों की भीड़ की ओर चुपचाप देखने लगा। देबू ने उसकी भरी हुई आँखें देखीं। देवू नल के पास जाकर पानी भरने वालों की कतार में खड़े स्त्री- पुरुपों को देखने लगा। नल के पास ही वस्ती की कुछ स्त्रियाँ अपनी वालटियों और टीन के कनस्तरों में पानी भर कर एक-दूसरे से वातें करती हुई नहा रही थीं। पुरुष नल के पास ही खड़े बालटियों का पानी अपने शरीर पर उँडेल रहे थे । देबू ने सोचा था कि वह अँधेरे में नल पर भीड़ न होने के कारण नल की धार के नीचे बैठकर शांति से नहाता रहेगा और उसके शरीर की सारी धूल पानी के साथ वह जायेगी, लेकिन यहाँ एक वालटी अपने ऊपर डालना भी उसे असंभव-सा प्रतीत होने लगा। थकान से उसका शरीर टूट रहा था। 32 घर बने घर टूटे । देवू कुछ देर तक चुपचाप खड़ा रहा, जिससे थोड़ी भीड़ हटने पर वह आगे बढकर किसी की वालटी मांग ले और फिर वही बैठकर पानी डाल- डालकर अपने शरीर को रगड़े। तालाव की ओर देखकर उसने सोचा कि आज इसमे साफ़ पानी होता तो वह कितनी ही देर तक उसमें तैरता रहता और किनारे पर खडा होकर वदन में साबुन लगाता, लेकिन यह तो अब सिर्फ भैसों के नहाने की जगह रह गयी है । तभी औरतों के झुंड में उसे अपनी भाभी कौशल्या भी नहाते हुए दिखायी दी। देवू ने एक बार ध्यान से उस ओर देखा। कौशल्या की धोती के नीचे उसका बड़ा-सा फूला पेट आगे की ओर उभरा आ रहा था, मानो किसी ही क्षण फट जायेगा। उसकी गीली धोती बदन से चिपक गयी थी और ऊपर के भाग पर सिर्फ साड़ी का पल्ला होने से उसकी फूली छातियां झांक रही थी। कभी-कभी मर्दो के झुड को अपनी ओर घूरते देखकर कोई युवती मुसकराकर अपनी पीठ मोड लेती थी और अपनी धोती से अपने शरीर को और भी ज्यादा कस लेती थी। "हूं, कैसा जमाना आ गया है !" अधेड-सी अवस्था का एक व्यक्ति नल पर खड़े लोगो को स्त्रियो के झुड की ओर धूर कर परस्पर मुसकराते हुए लोगों को देखकर कहने लगा, "किसी को भी आज कुछ शरम नही रह गयी है। खुलेआम इस तरह नंगी औरतो को घूरना ..हू...!" कुछ युवक और भी मुसकराने लगे और एक ने जोर का ठहाका लगाया, "मंगतरामजी शायद अपनी जवानी के दिन भूल गये।" दूसरे ने कहा, "सारा दिन फैक्टरी मे काम करते-करते मेरी कमर टूट जाती है, अगर शाम को ऐसे नजारे देखने को न मिले तब तो मैं एक ही दिन में मर जाऊँ।" "मेरी सगाई हो गयी थी और मैं सोचता था कि ब्याह के बाद अब मैं सब कुकर्म छोड़ दूंगा,लेकिन...ससुर जी को वाद में एक मुझसे अच्छा दामाद मिल गया...अब शायद मेरा घर कभी नही बसेगा।" यह कहकर उसने वालटी का रहा-सहा पानी अपने ऊपर उंडेल लिया। "मैं तेरी जगह होता तो उस साले का खून कर देता जो मेरी मंगेतर को व्याहता । हूं-तू नामर्द है..."
किसी ने बदन पोंछते हुए एक गाना शुरू कर दिया। देवू भी चुपचाप कभी मर्दो और कभी औरतों के झुंड की ओर देख रहा था। उसने एक से बालटी मांग ली और थोड़ी दूर जाकर एक पत्थर पर बैठकर टाँगों, बाँहों, पैर और मुंह पर पानी डालकर उसे साबुन से रगड़ने लगा। स्नान करके देवू की बहुत-सी थकान दूर हो गयी। वह भोला के साथ तालाब के ऊपर एक टीले के ऊपर बैठ गया। देवू की थकान दूर हो गयी थी। दोनों ने वीड़ियां सुलगायौं । हवा चलने लगी थी और ऊपर लगे पेड़ की धूल से भरी पत्तियाँ खड़खड़ाने लगी थीं। "भोला, तू कोई गाना सुना, कोई नया फ़िल्मी गाना...!" गाने की फ़रमाइश करते ही भोला गाना शुरू कर देता था, मानो इस क्षण की प्रतीक्षा कर रहा हो। "मैंने एक नया गाना सीखा है देवू, वही सुनाता हूँ। मैंने अभी-अभी परसों ही इसे धीरजसिंह की दुकान पर सुना था।" "कोई भी सुना, भोला !" भोला गाने लगा...उसकी आवाज़ टीलों से टकरा-टकराकर गूंजने लगी। परन्तु देवू का ध्यान गाने की ओर से कब दूर हटकर अपनी सीमाओं से. दूर पहुँच गया, इसका पता उसे नहीं चला । वह सामने वस्ती से दूर आसमान के नीले-पीले पर्वत की उठी हुई पहाड़ियों की ओर देख रहा था। समतल भूमि में ऊँची उठी हुई आनन्द पर्वत की ये पहाड़ियाँ, जो दिन की कड़कड़ाती धूप में रेगिस्तान के समान चमका करती थीं । काश कि मैं उस पहाड़ी पर किसी मकान में रहता होता, जहाँ से रात को किसी ऊँची जगह पर बैठकर विखरी वस्ती को देख सकता ! आनन्द पर्वत पर हवा भी कितनी तेजी से चलती है, मानो दूर तक तूफ़ान आता रहता हो। पर्वत पर पगडंडियों से चढ़ते समय बड़ा अजीब-सा मालूम होता है। देवू चौंक पड़ा। उसे मालूम नहीं पड़ सका कि भोला ने अपना गाना कब समाप्त कर लिया। वह चुपचाप भोला की ओर ताकने लगा। 34 घर वने घर टूटे "परसो धीरजसिंह कह रहा था कि अगर मैं थोडे गाने और सीस लू तो.." देवू ने बिना भोला की ओर देखे कहा, "तो तू गाना सिखाने वाला मास्टर बन जायेगा?" "नही देवू, वह कहता था कि मैं फिल्मों में गाने गा सकता हूँ. जैसे दूसरे लोग गाते हैं । क्या ऐसा हो सकता है, देवू?" भोला बडी उत्सुकता से 'देवू की ओर देख रहा था। "क्यों नहीं हो सकता?" देवू ने गभीर भाव से कहा, "तब तो तुझे बम्बई जाना पडेगा, भोला। जव तू फ़िल्मो में गाने लगेगा तो तुझे हजारों रुपये मिलेंगे, तब तू बंगलो में रहने लगेगा। फिर तुझे दीनू चाचा की गिरती दीवार भी नहीं बनानी पडेगी. ।" "नही देवू, तू हँसी कर रहा है।" भोला ने चितित भाव से कहा । "तू थोडे गाने और सीख ले और फिर बम्बई चला जा।" देवू सामने तालाव को ओर देखकर कह रहा था। तालाब के दृश्य मे देवू को एक प्रकार की ममता भी हो गयी थी। जब उसकी जेब मे पैसे नहीं होते थे और वह धीरजसिंह की दूकान पर बैठकर चाय नही पी सकता था तो यही आकर बैठ जाता था। थोड़ी देर बाद देवू अपनी झुग्गी की ओर आया और भोला देवनगर की तरफ़ चला गया। हुकम झुग्गी के बाहर एक पेड़ के नीचे चट्टान पर बैठा चाक से वांस को छोल रहा था, और उसके चारो ओर वस्ती में रहने वाले लडके उसे घेर कर बैठे हुए थे। बाँस पर चाकू से छोटे-छोटे छः सूराख कर आसानी से वह बांसुरी बना देता था और बस्ती में रहने वाले लड़के हमेशा ही हुकम से अपने लिए वांसुरी बनाने को फरमाइश किया करते थे। जब वह कोई काम करता होता तब छुट्टी वाले दिन तड़के ही वह इस चट्टान पर आकर बैठ जाता था , किसी ने वदन पोंछते हुए एक गाना शुरू कर दिया। देवू भी चुपचाप कभी मर्दो और कभी औरतों के झुंड की ओर देख रहा था। उसने एक से बालटी मांग ली और थोड़ी दूर जाकर एक पत्थर पर बैठकर टाँगों, बाँहों, पैर और मुंह पर पानी डालकर उसे साबुन से रगड़ने लगा। स्नान करके देवू की बहुत-सी थकान दूर हो गयी। वह भोला के साथ तालाब के ऊपर एक टीले के ऊपर बैठ गया। देवू की थकान दूर हो गयी थी। दोनों ने बीड़ियाँ सुलगायीं। हवा चलने लगी थी और ऊपर लगे पेड़ की धूल से भरी पत्तियाँ खड़खड़ाने लगी थीं। "भोला, तू कोई गाना सुना, कोई नया फ़िल्मी गाना...।" गाने की फ़रमाइश करते ही भोला गाना शुरू कर देता था, मानो इस क्षण की प्रतीक्षा कर रहा हो। "मैंने एक नया गाना सीखा है देवू, वही सुनाता हूं। मैंने अभी-अभी परसों ही इसे धीरजसिंह की दुकान पर सुना था।" "कोई भी सुना, भोला !" भोला गाने लगा...उसकी आवाज़ टीलों से टकरा-टकराकर गूंजने लगी। परन्तु देवू का ध्यान गाने की ओर से कव दूर हटकर अपनी सीमाओं से दूर पहुँच गया, इसका पता उसे नहीं चला । वह सामने बस्ती से दूर आसमान के नीले-पीले पर्वत की उठी हुई पहाड़ियों की ओर देख रहा था। समतल भूमि में ऊँची उठी हुई आनन्द पर्वत की ये पहाड़ियाँ, जो दिन की कड़कड़ाती धूप में रेगिस्तान के समान चमका करती थीं । काश कि मैं उस पहाड़ी पर किसी मकान में रहता होता, जहाँ से रात को किसी ऊँची जगह पर बैठकर बिखरी बस्ती को देख सकता! आनन्द पर्वत पर हवा भी कितनी तेजी से चलती है, मानो दूर तक तूफ़ान आता रहता हो। पर्वत पर पगडंडियों से चढ़ते समय बड़ा अजीब-सा मालूम होता है। रवू चौंक पड़ा। उसे मालूम नहीं पड़ सका कि भोला ने अपना गाना कव समाप्त कर लिया। वह चुपचाप भोला की ओर ताकने लगा। 34 घर बने घर टूटे "परसों धीरजसिंह कह रहा था कि अगर मैं थोड़े गाने और सीख लूं तो..." देबू ने बिना भोला की ओर देसे कहा, "तो तू गाना सिखाने वाला मास्टर बन जायेगा?" "नही देबू, वह कहता था कि मैं फिल्मों में गाने गा सकता हूँ. जैसे - दूसरे लोग गाते है । क्या ऐसा हो सकता है, देवू ?" भोला बडी उत्सुकता से 'देवू की ओर देख रहा था। "क्यो नही हो सकता?" देवू ने गभीर भाव से कहा, "तब तो तुझे वम्बई जाना पडेगा, भोला। जब तू फ़िल्मो मे गाने लगेगा तो तुझे हजारों रुपये मिलेंगे, तब तू बंगलों में रहने लगेगा। फिर तुझे दीनू चाचा की गिरती दीवार भी नहीं बनानी पडेगी. ।" "नहीं देवू, तू हँसी कर रहा है।" भोला ने चितित भाव से कहा। "तू थोडे गाने और सीख ले और फिर बम्बई चला जा।" देवू सामने तालाव की ओर देखकर कह रहा था। तालाव के दृश्य में देबू को एक प्रकार की ममता भी हो गयी थी । जव उसकी जेब मे पैसे नहीं होते थे और वह धीरजसिंह को दूकान पर बैठकर चाय नही पी सकता था तो यही आकर बैठ जाता था। थोड़ी देर बाद देवू अपनी झुग्गी की ओर आया और भोला देवनगर की तरफ़ चला गया। हुकम झुग्गी के बाहर एक पेड़ के नीचे चट्टान पर बैठा चाकू से बांस को छोल रहा था, और उसके चारों ओर वस्ती में रहने वाले लडके उसे घेर कर बैठे हुए थे। बांस पर चाकू से छोटे-छोटे छ. सूराख कर आसानी से वह बांसुरी - बना देता था और बस्ती में रहने वाले लडके हमेशा ही हुकम से अपने लिए बांसुरी बनाने की फरमाइश किया करते थे । जव वह कोई काम करता होता तब छुट्टी वाले दिन तड़के ही वह इस चट्टान पर आकर बैठ जाता था और छोटे-बड़े लड़के उसे चारों ओर से घेरे उससे नाना प्रकार की वातें पूछा करते थे और वह तेज़ चमकते चाकू की नोंक से वांस में सूराख बनाया करता था, छोटे-छोटे गोल सूराख...। "मेरे लिए उस मोटे वाँस की वाँसुरी बनाना...." "मेरी बाँसुरी में छः छेद करना...।" "और मेरी वाँसुरी कव बनाओगे, हुकम भैया, कल भी तुमने टाल दिया था।" एक ने शंका-सी आवाज़ में कहा। हुकम सबके जवाब देता, किसी की ओर देखकर मुसकरा उठता । जव कभी किसी की बांसुरी बनकर तैयार हो जाती तो हुकम उस लड़के की पीठ थपथपाकर उसके हाथों में बाँसुरी थमा देता और वह लड़का विजय की मुसकान से अपने दूसरे साथियों की ओर देखता हुआ अपने घर की ओर पगडंडी पार करता हुआ भाग जाता, जिससे अपने घर वालों को वह बाँसुरी दिखा सके। उसके जाने के बाद ही लड़कों की टोली में फिर खलवली सी मचने लगती और प्रत्येक वालक उससे अपनी बांसुरी बनाने के लिए कहता । वे आपस में झगड़ते और कभी-कभी हाथापाई की नौवत भी आ जाती, लेकिन हुकम उनको अलग करता और सबके लिए बांसुरी बनाने का ढांढस देता। हुकम स्वयं भी वाँसुरी बहुत अच्छी बजाता था, वचपन से ही उसे इसका शौक था और जव वह बहुत छोटा था तभी उसने पड़ोस के एक व्यक्ति से कुछ राग सीखे थे। झुग्गी के अन्दर से कौशल्या के चीखने की आवाजें फिर बाहर गूंजने लगी थीं। हुकम चाकू की नोक से धीरे-धीरे वाँस में छेद बना रहा था, लेकिन उसके कानों में बड़ी चीखें थों, दर्द की चीखें जो एक बार पहले भी दीनू के जन्म से पहले उसने सुनी थी, लेकिन तव और अव में बहुत अन्तर हो गया है...पहले वह एक सरकारी अस्पताल में दाखिल करवा दी गयी थी और वह एक ऐसे ही दिन अस्पताल के दरवाजे के बाहर खड़ा किसी शिशु के रोने की आवाज़ सुनने की वेचैनी को अपने हृदय में दवाये था और फिर दाई के वधाई देने पर वह बड़ी मुश्किल से दीनू को देखने की इच्छा को रोक सका था। दीनू का गोरा चेहरा, उसकी बड़ी-बड़ी आँखें जैसी कौशल्या . 36 घर बने घर टूटे .
की हैं, उसके पतले-पतले लाल होठ और सफेद हाथ-पांव-सब-कुछ उसे चिय की भांति प्रतीत हुआ था। और अब वही दीनू झुग्गी के बाहर घूल में लोटा करता है, जब वह सो जाता है तो उसकी गंदी आंखो और नाक पर मक्खियां भिनभिनाने लगती हैं, गमियो में वह एक मंली बनियान पहनकर कभी ऊपर की सड़क के फुटपाथ पर और कभी सामने के टीले पर पत्थरों से खेलता है, बस्ती के दूसरे लडकों के साथ झगडे करता है...। लेकिन कौशल्या की ये चीखें...आखिर इनकी अब क्या जरूरत पड़ गयी थी, क्या उसकी चीखो के बिना ही मैं कभी उसका दर्द नही समझ सका हूँ ? बेकार रहने पर मां जो अपना गुस्मा उस पर निकालती है और खाते समय वाबू जो घर-घूर कर मेरी थाली की ओर देखता है, मेरी रोटियों को गिनता है-उससे कौशल्या के दिल में जो दर्द उठता है उमे मैंने बहुत बार महसूस किया है...लेकिन महसूस करने की यह शक्ति भी अव कम होती जा रही है, उसे दूर करने का तो आखिर कोई रास्ता नहीं है। वे जवानी के बनाये सव सपने क्या हुए? क्या उनमे से कभी एक भी सच बन कर मेरी जिन्दगी मे नही आयेगा? मशीन की तरह बांसुरी के सीने पर कव उसने छ छेद कर दिये, इसका हुकम को पता नही चला और जव चाकू की नोक मे वह एक और छेद करने के लिए झुका तो नेमी चिल्ला पड़ा, “यह सातवां छेद क्यो कर रहे हो, हुकम भाई ? छ. तो हो चुके ।" हुकम ने नेमी की ओर देखा और फिर बांसुरी को बिना वजाये, बिना उसकी परीक्षा लिये उसने बांसुरी को नेमी के हाथों में थमा दिया। और बांसुरी बनाने की उसकी तबीयत नही की और दूसरे लडको से कल फिर बांसुरी बनाने का वायदा करके उसने उन्हें विदा किया। जिन लड़कों की बांसुरियां नहीं बन सकी थो उनके पीले चेहरे उदास हो गये, परन्तु वे जानते थे कि एक बार मना कर देने पर हुकम कभी बांसुरी नहीं बनाता। वे सब चले गये, जिनकी बांसुरियां बन । गयी थी वे बजाने लगे। कौशल्या की चीखें और तेज होने लगी थी। वह दर्द से अपने हाथ- पर पटक रही होगी, उसने अपने दांत भीच लिये होगे, उसके होठ नीले पड़ गये होगे और उसका फूला पेट... ..गर्भवती स्त्री कितनी भद्दी और - . अश्लील लगती है ! जब कभी पिछले दिनों वह कौशल्या को पानी भरने जाते देखता या नल पर गीली साड़ी में लिपटे उसके वेडौल शरीर को देखता तो घृणा से उसका मुंह सिकुड़ जाता था, उसे अपने पर शरम आने लगती थी और अपने पतन पर उसे अपने से ही घृणा होने लगती थी। जिस कौशल्या के शरीर को एक दिन उसने इतना प्यार किया था कि उसे अपनी आँखों से ओझल होते देखकर उसे दुख होता था, जिसके चेहरे को अपने हाथों में लेकर उसे छोड़ने की उसकी तबीयत नहीं करती थी... और वही शरीर अव नाली की बदबू बन गया है जिसके साथ रात-दिन रहने की विवशता है, कर्तव्य है और फिर उसका परिणाम महीनों के बाद...छि:! हुकम ने खाँसकर थूक दिया...कौशल्या पर उसे दया नहीं आ रही थी, उसकी दशा के साथ उसे सहानुभूति नहीं हो रही थी, अपने किये पर पछतावा या ग्लानि नहीं हो रही थी...बस एक घृणा, एक गहरी नफ़रत से उसका दिल भरता जा रहा था और जिस दिन यह पूरा भर जायेगा, तव क्या होगा? वह आगे नहीं सोच सका। हुकम उठ खड़ा हुआ, उसने चारों ओर एक नज़र दौड़ायी। सूरज तालाव के किनारे लगे पेड़ों और चट्टानों के पीछे छिप रहा था और क्षितिज पर जमा हुए बादल तरह-तरह के रंगों से चमक रहे थे। ठीक उसके सिर के ऊपर सफ़ेद बादल का एक बड़ा-सा टुकड़ा नीला, हरा और लाल बन गया था...तभी अपने पास किसी को खड़े देखकर उसने नजर उठायी तो दीनू आँखों को हाथों से मलता हुआ उसके पास खड़ा था। हुकम कुछ क्षणों तक उसकी ओर चुपचाप देखता रहा...दीनू के हाथ और पैर धूल में सने हुए थे, कान पक गया था और उसमें पीप पड़ गयी थी, जिससे वह रात-भर चिल्लाता रहता था, उसका पेट बाहर को निकला हुआ था कौशल्या की ही भांति...! "वावू...!" दीनू ने थोड़ी देर बाद हुकम को कुछ न कहते देखकर स्वयं ही बोलने का साहस किया। परन्तु हुकम उसकी ओर नहीं देख रहा था, उसके कानों पर यह 'वाबू' शब्द नहीं पहुंचा था। उसकी नौकरी लगी होती तब उसके हाथ में कुछ रुपये होते और वह शामनगर से किसी दाई को बुलवा लेता, दाई के 38 घर बने घर टूटे . - आने से कौशल्या को कुछ तो तसल्ली होती। पिछले दिनों रोज ही कौशल्या उससे कहती थी कि वह किसी दाई का प्रवन्ध अभी से कर ले, लेकिन हर बार वह उसकी बात को टाल देता था, और उसकी उदासीनता से वह रोने लगती थी और फिर हुकम उठकर कही चल देता था, तालाब के किनारे या फिर सड़क पार करके आनन्द पर्वत की तरफ, जहां से उसे सारा करोलबाग दिखायी देता था-राजेन्द्रनगर में ईंटों के मकानों के ऊपर पड़ी हुई मैली छतो को अनगिनत कतारें जिनका कोई अन्त नही होता था, अजमलखां पार्क का लम्बा-चौडा मैदान, उसके पीछे बिड़ला मन्दिर केलाल पत्थरों के कलश और दूर धुन्ध में फीकी पडी जामा मसजिद की गुम्बदें...वहाँ से शहर को नगा देख सकता था जैसे नंगी स्त्री के शरीर का अग-अंग उभर कर सामने आ जाता है...और नंगी कौशल्या का फूला हुआ पेट...स्त्री की कुरूपता की इन्तहा ! और अब उसको चीखें...जिनमें ददं नहीं, जिनमें बदला लेने की भावना नही, जिनमे विद्रोह की लपटें नही, केवल मशीन की तरह को खटाखट, या रेल के पहियों की एक जैसी आवाज, या इंजन की लगातार बजने वाली सीटियां...जैसे सरसो का तेल निकालने की मशीन की चिमनी मे से लगातार टिक-टिक के साथ धुआं निकलता है, लेकिन यह घुओं जैसे ठडे कोयलों का धुआं हो जिनकी लपटों मे हाथ डालने से हाथ नहीं जलते। "बाबू, मां क्यों चिल्ला रही है ? गुल्लू कहता था कि वह मर जायेगी, जैसे उसकी मां इसी तरह मर गयी थी. बाबू.. क्या वह मर जायेगी?" दीनू ने फिर कहा । उसको सिमकियां बन्द हो गयी थी। हुकम के कानों मे दीनू की बात पहुंची, लेकिन उसने उसका कोई जवाब नहीं दिया । शायद कौशल्या प्रसव-काल मे ही मर जाये, फिर दीनू का यह आखिरी सहारा भी टूट जायेगा । अब कभी-कभी किसी लडके के पीट देने पर, कभी कान मे जोर का दर्द होने पर, या भूख लगने से वह कौशल्या की गोद में अपना मुंह तो छिपा लेता है चाहे कौशल्या अपना गुम्सा उतारने के लिए उसे फटकार ही देती होगी या पीटती भी होगी, लेकिन फिर भी वह उसकी मां थी। उसके पैदा होने के बाद कभी-कभी दे दोनों उसके भविष्य के विषय मे बातें किया करते थे। कौशल्या चाहती थी कि वह बड़ा होकर कोई दुकान कर ले, दुकान मे आमदनी .
. है और अगर क़िस्मत अच्छी हो तो हजारों के वारे-न्यारे हो सकते हैं, और वह कहता था कि दीनू को पढ़ा-लिखा कर उसे किसी दफ़तर या बैंक में क्लर्क बनना चाहिए, वहाँ मेज़-कुर्सी पर बैठकर इज्जत भी होती है और महीने बाद बंधी तनख्वाह हाथ में आ जाती है, और फिर दीन की शादी की बात; दोनों ही उसकी शादी जल्दी करने के पक्ष में थे जिससे बहू के आने पर घर में चहल-पहल हो जाये और उसके लाल मेंहदी-भरे हाथ और पैरों में झाँझरों के बजने से घर में सदा ही रौनक़ लगी रहे-लेकिन यह सव आज किसलिए वह फिर से सोच रहा है, उसे अपने इन विचारों पर ही घृणा होने लगी ! जिंदगी जिस मोड़ पर आकर यकायक एक नये रास्ते पर बहने लगी थी उसमें इन सबके लिए स्थान नहीं है, आज जो है उसे स्वीकार करके वह ऐसी बातें नहीं सोच सकता। बाबू अपनी दुकान पर बैठे ग्राहकों का इन्तजार कर रहे होंगे, शायद इक्का-दुक्का जाड़े के लिए किसी गरम कोट की ट्राई कर रहा होगा, लेकिन वह शायद खरीदेगा नहीं, सात-आठ रुपये का कोट खरीदना कोई आसान वात नहीं हैं...माँ शायद ज़ोर-जोर से राम का नाम ले रही होगी, लेकिन मन में उन्हें कौशल्या पर गुस्सा आ रहा होगा कि अब एक नया प्राणी घर की सीमित पूंजी में हिस्सा बाँटने लगेगा, बच्चे की देखभाल करने के कारण कौशल्या ज्यादा काम नहीं कर सकेगी...लेकिन उन्होंने भी तो हम छः जनों को पैदा किया था, दो मर गये । अच्छा ही हुआ, नहीं तो अभी दो और होते...काश, उनमें से एक के बदले वह मर जाता ! रात को मां बाबू से कहेगी कि उनके पोता हुआ है...नहीं, शायद पोती । नहीं, लड़की बेचारी को ज्यादा दुख उठाने पड़ते हैं, बेचारी लाली... हम तो कभी-कभी सिनेमा भी देख लेते हैं, बाहर जाकर एक प्याला चाय भी पी सकते हैं, लेकिन वह सारा दिन घर में बैठी रहती है, कभी वुनती है, कभी काढ़ती है और कभी वर्तन मांजती है। मेरे पास पैसे होते तो मैं लाली के लिए एक सूट बनवा देता, नये सूट में उसका चेहरा खिल उठता, वह बदसूरत नहीं है, उसका रंग हम सब से ज्यादा गोरा है, वह कौशल्या जैसी मोटी नहीं है। हमारी झुग्गी के सामने सड़क के पार 22 नम्बर की कोठी में जो लड़की रहती है और रोज सवेरे साढ़े आठ बजे कितावें हाथ 40 घर वने घर टूटे - था कि प्रसव-काल स्त्रियों को मृत्यु के घर तक ले जाता है, परन्तु उनी जीने की उत्कट अभिलाषा उन्हें वहाँ से फिर दुनिया में घसीट लानी है। लेकिन कुछ द्वार पर ही अपनी आखिरी सांसें लेती है...लेकिन कारण में दबाये स्कूल या कॉलेज पढने जाती है, लाली उससे श्यादा खूबसूरत है। उसे साड़ी पहननी चाहिए, साडी में वह ज्यादा अच्छी लगेगी...अब शायद कौशल्या को चीखते देखकर वह रो रही होगी। सोचती होगी कि शादी के बाद इसी तरह एक दिन वह भी चीखेगी, हाथ-पैर पटकेगी जैसे सब औरतें चीखती हैं, मानो इसी दिन के लिए वे चुप रहती है और बस एक दिन गला फाड़ कर सारे दिनो की कसर निकाल लेती हैं. । अचानक उसने महसूस किया कि कौशल्या की आंखें बन्द हो गयी हैं, शाम का सन्नाटा फिर अपनी तनहाई मे खो गया है, दीनू भी हुकम को चुपचाप देखकर चला गया था, शायद किसी और से पूछने कि कौशल्या मरेगी तो नहीं ? हू...फिर उसने झुग्गी में जाने की ठानी, उसे कौशल्या के विषय में पूछना चाहिए, आखिर वह उसकी पत्नी है और वह उसका पति है, उमके दुख-सुख की ज़िम्मेदारी भी उस पर है और माज उसकी चीसों का कारण भी तो वही है...दीनू के जन्म से पूर्व कौशल्या को तडपते देख कर मन-ही-मन उसने कसम खायी थी कि वह अब दूसरा बच्चा पैदा नही करेगा, लेकिन कौशल्या का बेडौल शरीर...आखिर वह भी तो एक स्त्री का शरीर है और उसका उपयोग करना मर्द का अधिकार है...! वह धीरे-धीरे झुग्गी की ओर बढने सगा। झुग्गी के दरवाजे पर एक पुराना बोरी का टुकड़ा परदे का काम दे रहा था, झुग्गी के ऊपर पडे टीन के टुकड़े बहुत अव्यवस्थित रूप मे एक-दूसरे से लिपटे छत का काम दे रहे थे। उसकी दहलीज पर लाली चुपचाप घुटनों पर ठुड्डी टेके बैठी थी, उसकी गोद में वुनने की सलाइयां बाहर की ओर निकली थी। उसने हुकम को आते नहीं देखा। हुकम ने झुग्गी के अन्दर सन्नाटा पाया, न कौशल्या की आवाज आ रही थी और न ही किसी नये शिशु के रोने की आवाजें । अन्दर सन्नाटा पा। कही कौशल्या मर तो नही गयी? उमे पता . उनमे नहीं है। वह इस जिंदगी में भी जीना चाहती आंखो में काजल लगाती है, बालों में देर-सा - चुटिया बनाती है, तीज पर हाथों में मेंहदी चढ़ाती है जैसे उसकी शादी की पहली तीज हो । जब किसी के घर में शादी, मुंडन आदि हो तो वह आधी- आधी रात तक ढोलक पर टप्पे गाती है...वह मरना नहीं चाहती, अपने इस वेढंगे शरीर को अब भी वह सजा-बना कर उससे प्यार करना चाहती है। तभी सुभागी अन्दर से निकली, हुकम को देख कर उसने अपनी ओढ़नी से आँखें पोंछी। हुकम घबरा गया और खुली शून्य आँखों से सुभागी की ओर देखता रहा। उसने पूछा कुछ नहीं। लाली दहलीज़ पार करके खड़ी हो गयी थी और सुभागी की ओर और कभी हुकम की ओर देख रही थी। "बेचारी ने इतना दुख सहा, लेकिन फिर भी मरी हुई लड़की निकली...,” उसने फिर अपने आँसू पोंछे--"सब भगवान की माया है । इनसान को अपने पुराने पाप भुगतने ही पड़ते हैं, जो जैसा करता है उसे वैसा ही फल मिलता है।" हुकम ने पास आकर पूछा, "और कौशल्या कैसी है ?" "वह ठीक है, कमजोरी से उसकी आवाज़ नहीं निकल रही है। मैंने उसे नहीं बतलाया, नहीं तो बेचारी को दुख होता । तू अपने बाप को तो वुला ला, हुकम । इसे दवाने का इंतजाम करना होगा।" हुकम थोड़ी देर तक मूर्तिवत् खड़ा रहा। झुग्गी के अन्दर जाने की उसकी तबीयत नहीं की। वह फटी-फटी आँखों से झुग्गी के दरवाजे पर लटकते हुए बोरी के परदे की ओर देखता रहा। - देवू ने करवट बदल कर आँख खोली तो पेड़ों और झाड़ियों के झुंडों के पीछे आसमान के कोने से रोशनी आते देखी, मानो दूर कहीं आग लग गयी हो जिसकी परछाई से अंधकार में डूबा आसमान चमकने लगा हो। सिर के ऊपर कुछ धुंधले तारे अव भी टिमटिमा रहे थे, मानो अपनी रोशनी छीने जाने का विरोध कर रहे हों। वह उठ कर अपनी चारपाई पर बैठ 42 घर बने घर टूटे गया। इतनी सुबह वह कभी नहीं उठा था और नये दिवस का जन्म होने में आसमान दर्द से कितना चीखता है और उसका कालापन किस तरह एक उजलेपन में परिवर्तित हो जाता है, इसे देखने का अवसर उसे कम ही मिला था। वस्ती में दूर-दूर तक कही कोई आवाज नहीं आ रही थी, सब इस नये दिन के आगमन से अनभिज्ञ थे, शायद वे दिन का महत्व कभी नही समझ सकते और वे अपनी जिंदगी के इस स्तर की भांति इस दिन को भी दुनिया के पहाड़ों और तराइयों, रेगिस्तानो और समुद्र के असीमित फैलाव, अंधेरे और उजाले, महल और झोपडियो की वास्तविकता की मांति स्वीकार कर लेते हैं, कभी रात को बढ़ा देने या सूरज को छिपने न देने का ख़याल उनके मन मे नही आया ... अचानक ही देवू ने महसूस किया कि आज का दिन उसकी जिंदगी में बहुत ही महत्वपूर्ण है, जिसकी अभी तक उसने कोरी कल्पना ही की थी और कभी-कभी रात को चारपाई पर सोधे पर फैला कर लेटे-लेटे आस- मान को देखते समय इसका बयाल उसके मन में आया करता था। आज दिन में रलियाराम अपनी बेटी का शगुन चढाने आयेंगे। उनकी बेटी लिट्टो की उसके साथ सगाई हो जायेगी। लिट्टो को उसने देखा है, वह अकसर काले रंग की सलवार पहना करती है, परन्तु लाल दुपट्टे मे लिपटे शरीर को उसने कभी ध्यान से नहीं देखा। एक दिन उसकी आंखो मे काजल लगा हुआ देखा था। वह शायद दो-तीन बार अपनी मां के साथ उसके घर भी आयी थी, वह वीडनपुरा में रहती है, लेकिन गली का नम्बर उसे याद नहीं । वे लोग पहले भी उनके साथ रहते थे, मुझे मालूम नही लेकिन माँ यही कहती थी। रलियाराम कभी-कभी वावू के पास आकर बैठ जाते हैं। वाबू उनकी इज्जत करते है और पुराने दिनो का खयाल भी। उसने कभी नहीं सोचा था कि लिट्टो के साथ एक दिन उसकी सगाई हो जायेगी, शायद वह उसके लायक नहीं है, और शायद कोई भी लडका उससे ब्याह करके अपने को भाग्यवान समझता ! मैं .मैं उसे खुश रखने की कोशिश करूंगा। जब कभी दुकान पर बचनसिंह नही होगा तो मैं जरा और पैसे अपने पास रख लिया करूँगा, मु थोड़े-से पैसे जमा कर लेने चाहिए जिससे मैं उसके लिए कुछ खरीद सकू।
- एक बार उसने फिर आकाश की ओर ताका, बड़ी तेजी के साथ उजाला ऊपर को फैलता जा रहा था और रात को जिन बादलों के टुकड़ों ने तारों को ढंक लिया था, वे सूरज की धुंधली रोशनी में लाल, नीले, पीले रंगों में चमकने लगे थे। सगाई तो आज हो जायेगी लेकिन शादी नवम्बर से पहले नहीं हो सकती, क्योंकि उससे पहले का कोई मुहूर्त नहीं है, हँ...ये पंडित कभी शादी के महत्व को नहीं समझ सकते, ये रोज़ ही शादियाँ करवाते हैं, लेकिन उसकी शादी तो एक ही बार होगी, इन पांच महीनों का इंतजार वह कैसे सह सकेगा? जिंदगी के ये 23 साल कब और कैसे गुज़र गये, इसका उसे कभी पता नहीं चला...लिट्टो जब हँसती है तो उसके दांत मोतियों जैसे चमकने लगते हैं, वह न जाने मेरे साथ अपनी सगाई की बात सुनकर खुश हुई होगी। उसने मुझे देखा है, वह शायद मेरा नाम भी जानती है। वह न जाने हमेशा काली कमीज़ क्यों पहने रहती है ? शायद काली कमीज़ में उसका रंग और भी निखर जाता है। सारी वस्ती में लिट्टो जैसी खूबसूरत लड़की नहीं है। तालाब के किनारे जो कुछ रोड़ी कूटने वाले लोग रहते हैं उनकी कुछ लड़कियाँ ज़रूर आकर्षक हैं, लेकिन वे आखिर गाँवों की देहातिन औरतें ठहरी जो घाघरे और चोलियाँ पहनती हैं, जो ना किसी शरम के खुले में अपनी चोली ऊपर उठा कर अपने बच्चों को पिलाने लगती हैं। लिट्टो का उनके साथ भला कैसे मुक़ाबला किया जा सकता है...! कल रात को उसने मां और बाबू को बड़े एकाग्रचित्त होकर बातें करते सुना था। वे रलियाराम की बातें कर रहे थे, क्योंकि शायद दिन में शादी के प्रस्ताव को लेकर उनके पास आये थे, तभी माँ ने उसे बताया था कि कल उसका शगुन किया जायेगा और वह कुछ क्षणों तक भौंचक्का-सा खड़ा रहा था । बाबू ने कुछ विशेष उत्साह नहीं दिखलाया था, वह चुपचाप सुभागी की बातें सुनते रहे थे, लेकिन मां दौड़कर सारी वस्ती में देवू की सगाई की खबर फैला आयी थी और कुछ को आज शाम को घर आने का निमंत्रण भी दे आयी थी। रलियाराम उनकी अपेक्षा काफ़ी बड़े आदमी थे, अजमलखां रोड पर उनकी कपड़े की दुकान थी और आमदनी भी अच्छी हो जाती थी, देवू उन्हें पसन्द आ गया था, नहीं तो जिसके सामने - 44 घर बने घर टूटे पांच सौ की थैली रखते वही हाथ बढ़ाकर लिट्टो का हाथ पकड़ लेता। देवू पर उन्हें विश्वास था। दिन में हुकम को झुग्गी के वाहर एक बडी-सी चट्टान पर पत्थर उछालते देखकर देबू उसके पास जाकर बैठ गया। अंदर-ही-अंदर देवू के मन मे हुकम के प्रति दया और सहानुभूति थी। पहले जब हुकम बस में कंडक्टरथा और सौ रुपये कमाता था तो उसे उससे ईयां होती थी, लेकिन आज उसे चुपचाप चट्टान पर बैठे देखकर उसे उसके पास जाये बिना नही रहा गया। "वच सह कहता था, हुकम, कि तुम्हे काम दिलाने वाले दफतर में अपना नाम दर्ज करा देना चाहिए, वहां से जल्दी नौकरी मिल जाती है, और फिर तुम तो दसवी पास हो, तुम्हें दूसरों से पहले...!" हुकम को यह चर्चा पसन्द नही आयो। उसने बिना देबू की ओर देखे कहा, "आज तेरी सगाई हो रही है, देवू...." अपने बड़े भाई के मुख से अपनी सगाई की बात सुनकर देबू को शरम आने लगी। वह चुपचाप बैठा चट्टान के नीचे टूटे हुए पीले पत्थरो की ओर देखता रहा। जग्गी ऊपर की पगडडी से सड़क पर जा रहा था, हुकम और देवू को वहाँ बैठे देखकर वह भी उनके पास आ गया-"बड़ा किस्मत वाला है तू देवू, सबसे नम्बर मार गया, रलियाराम को तुझसे अच्छा लड़का नही मिला...!" यह कहकर उसने ठहाका लगाया-"आज, देवू, तेरी सगाई .होगी, तेरी मां बस्ती के सब लोगो से कहती फिर रही है. ।" देवू सोच रहा था कि उसका बस चलता तो वह सारे शहर मे ढोलक पीट-पीट कर सबको यह समाचार सुनाता । वह चाहता था कि वह 'जग्गी के साथ और अपने दूसरे दोस्तो के साथ अपनी सगाई की चर्चा करे, लेकिन शरम से उसके गाल कनपटियों तक लाल हो गये थे। हुकम ने जग्गी की ओर देखते हुए कहा, "तेरा नम्बर कब आयेगा, जग्गी?" जग्गी मुसकराता हुआ बोला, "मैं इस शादी-वादी के चक्कर पड़ता। दिना शादी के ही मेरा काम चल जाता है।" wom घमने . . हुकम भी हँसने लगा। और देव को वह दिन याद आया जब उसने जग्गी को नशे में वहकते हुए सुना था। वह किसी औरत के बारे में बातें कर रहा था। लेकिन वह बुरा है, कोई भला आदमी इस तरह के काम नहीं करता। सब शादी करवाते हैं, किसी की स्त्री सुन्दर और गोरी होती है और किसी की भद्दी और काली। लिट्टो का रंग साफ़ है, मेरी किस्मत अच्छी है जो लिट्टो जैसी पत्नी मुझे मिल रही है...! थोड़ी देर बाद हुकम बोला, “न जाने कोई कह रहा था कि बम्बई में जहाजों में माल उतारने और चढ़ाने का काम बहुत आसानी से मिल जाता है, लेकिन वम्बई का किराया 23 रुपये है...वह कहाँ से आयेगा ?" "एक वार एक अखबार में मैंने समुद्र की फ़ोटो देखी थी," देवू ने कहा, "समुद्र में वहुत ऊंची-ऊंची लहरें उठा करती हैं जिनमें कभी-कभी बड़े जहाज भी डूब जाते हैं।" "काश कि मैं बम्बई जा सकता...!" हुकम ने हथेली को गाल पर रख लिया और सामने झुग्गी की ओर देखता हुआ वोला, "मैं यहाँ से ऊब गया हूँ...यहाँ शायद मुझे कोई काम भी नहीं मिल सकता...और माँ हमेशा मुंह बनाये रहती है, उसे मेरी रोटियाँ अखरती हैं।" "क्या कह रहा है, हुकम ?" देवू ने चिल्लाकर कहा, "माँ ऐसी नहीं है...वस उसका गुस्सा तेज़ है, मन में वह शायद तुझे सबसे ज्यादा प्यार करती है।" हुकम थोड़ा-सा हंसा, "प्यार करती है ! देवू, तू अभी बच्चा है, जब तेरी शादी हो जायेगी तो देखना...अभी तो माँ तेरे ससुराल से माल आने के सपने देख रही है और फिर बाद में तुझे और लिट्टो को..." "हुकम...!" देबू चीख उठा, "क्या हो गया है तुझे, हुकम...कम-से- कम आज के दिन ऐसी बातें मत कह।" इस बार जग्गी ने ठहाका लगाया, "देवू को डर लग रहा है, क्योंकि आज उसकी सगाई है । हैं...!" हुकम भी हँसने लगा, परन्तु उसने कुछ कहा नहीं। देवू विना कुछ कुछ कहे तेज़ी से ऊपर की ओर चल दिया। अव भी उसके 46 घर बने घर टूटे . "है...!" .
कानो मे जग्गी और हुकम की हँसी के ठहाके गूंज रहे थे...वह दोनों की बातों को अनसुनी कर देना चाहता था, लेकिन वे मानो उसका साथ छोड़ने के लिये तैयार नहीं थी। सूरज चमकने लगा था और पक्की सडक पर लोगों की चहल-पहल जारी हो गयी थी। देवू देवनगर की ओर चला गया। धीरजसिंह की दुकान पर बैठकर एक प्याला चाय और एक सिगरेट पीकर वह हलका महसूस करना चाहता था, और फिर उसका सगाई का दिन था, उसके कानो में ढोलक की धप-धप गूंज रही थी जो उसकी सांस के साथ सुर मिला उमे बजती सुनायी दे रही थी। धीरजसिंह की दुकान पर कुछ लोग बैठे हुए थे, देवू भी एक कोने मे जाकर बैठ गया...आज चाय का प्याला पीन मे जो मजा आयेगा वह शायद पहले कभी नहीं आया होगा। मां कहती थी कि इन जाडो मे वह ब्याह भी कर देगी...ठीक तो है। "अरे देबू, क्या सोच रहा है ? चाय पियेगा?" धीरजसिंह ने अँगीठी के पास बैठे-बैठे ही दूर से पूछा। "हाँ, एक प्याला चाय ले आ, लेकिन गरम हो..," देवू ने मुसकराते हुए उत्तर दिया। गहरे हरे रंग की पगडी पहने अपनी सफेद दाढी हिलाते हुए एक सरदारजी ने कहा, "सुना है कि जवाहर बस्ती की सड़क पर जो दुकानें बनी हुई है उन्हें सरकार उठाने जा रही है। वहां सरकार जमीनें बेच रही पंडितजी ने सरदार की ओर मुख फेर कर कहा, "अजी, यह सरकार जो करे सो थोड़ा है।" सरदारजी ने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए कहा, "मेरे दामाद की वहां दुकान है, बेचारा न जाने अब कहाँ जायेगा?" यह कहकर उन्होने एक लम्बी सांस ली। धीरजसिंह ने चाय का प्याला देवू के सामने रख दिया, "कुछ सायेगा?" "नही...खास भूख नही है।"
धीरजसिंह को फिर अपने पास से जाते देखकर देवू ने पुकारा, "धीरजसिंह, जरा सुन तो...!" धीरजसिंह मुसकराता हुआ उसके पास आकर खड़ा हो गया-~-"ओहो ...आज तो बड़ी सिगरेट पी रहा है। क्या वचनसिंह की दुकान पर कोई बड़ा हाथ मारा है ?" देबू ने हँसकर कहा, "यहां बैठ जा...!" धीरजसिंह बैंच पर उसके पास आकर बैठ गया। "सुन धीरजसिंह...आज...आज मेरी सगाई हो रही है।" कहकर धीरजसिंह ने ध्यान से देबू की आँखों की ओर देखा, "तू रोज ही अपनी सगाई के ख्वाब देखता है, तुझे कौन...?" "चुप भी रहेगा। तू रलियाराम को जानता है न...?" "वही रलियाराम न, जिसकी अजमलखा रोड में दुकान है ?" "हाँ, वही। उसकी लड़की लिट्टो के साथ..." "सच...!" कहकर धीरजसिंह ने देवू को अपने पास और घसीट "झूठा...!" - लिया। . "बड़ा किस्मत वाला है तू, देवू...तो इस खुशी में यह चाय की दावत मेरी तरफ़ से रही। ले, केक भी खा।" यह कहकर धीरजसिंह प्लेट में कल के पुराने दो केक के टुकड़े प्लेट में रखकर ले आया। "तो तेरी सगाई हो रही है लिट्टो के साथ, शादी कब होगी ?" "माँ इन जाड़ों में कहती थी..." "और तू तो चाहता होगा कि आज हो जाये !" यह कहकर फिर धीरजसिंह ने देवू को अपनी ओर घसीट लिया। किसी ने एक प्याला चाय का मांगा, तो धीरजसिंह उसके लिए चाय बनाने चल दिया। देवू चुपचाप बैठा सड़क पर गुजरते लोगों को देखने लगा। आज का दिन उसे अन्य दिनों की अपेक्षा कुछ अधिक भिन्न-सा प्रतीत हो रहा था । उसे किसी दूसरी नौकरी की तलाश करनी चाहिए... लिट्टो उस झुग्गी में नहीं रह सकेगी। लेकिन लिट्टो अच्छे घर की खाती- पीती लड़की है, रलियाराम ने उसे छठी पास करवा दिया है, उससे इस वातावरण में नहीं रहा जायेगा...लेकिन व्याह को नहीं टाला जा सकता। 48 घर बने घर टूटे व्याह के बाद जब कही अच्छी नौकरी मिल जायेगी तो लिट्टो को साथ लेकर कही चला जाऊंगा। तभी मुक्खासिंह को बिना पगड़ी बाँधे उसने दुकान के पीछे से आते देखा, वह एक लम्बा-सा कुर्ता और लुंगी पहने था। आते ही उसने अपनी कर्कश आवाज मे धीरजसिंह से पूछा, "कल रात को कितने बजे दुकान बंद की थी?" "शायद दम बजे होंगे..." "हरामखोर, झूठ बोलता है।" यह कहकर उसने दो बूंसे बिना सोचे- समझे धीरजसिंह की पीठ पर जमा दिये, "मैं नौ बजे यहां आया तो तू दुकान बंद कर चुका था। तुझे मुफ्त की रोटियां देता हूँ, साले ! तुझे काम न करना हो तो निकल जा यहां से . !" दुकान पर बैठे ग्राहक कभी मुक्खा- सिंह की ओर और कभी हाथ मे पीठ सहलाते हुए धीरजसिंह की ओर देख रहे थे। उनकी ओर देखते हुए मुक्खासिंह ने कहा, "भाई होने का फायदा उठाना चाहता है...मैं ऐसा लिहाज़ नही करता...काम ठीक से नहीं करना हो तो साफ़-साफ बता दे, मैं किसी दूसरे का इन्तजाम कर लूंगा ।" चूंसो का तो जो ददं धीरजसिह को हुआ सो हुआ, लेकिन इतने लोगो को भीड में अपने पीटे जाने की ग्लानि मे उसकी गरदन जो एक बार नीचे झुकी, वह झुकी-की-झुकी ही रह गयी। मशीन की तरह वह प्यालो को धोता रहा। "अजी सरदारजी, अभी बच्चा ही तो है, कही सिनेमा वगैरह देखने की तबीयत कर आयी होगी।" चाय पीते हुए एक ग्राहक ने मुक्खासिंह की और देखते हुए कहा। धीरजसिंह ने अपनी गरदन ऊपर उठाकर चिल्लाकर कहा,"मैं सिनेमा नहीं गया या।" मुक्यासिंह दांत पीसता हुआ बोला, "तो मैं झूठ बोल रहा थोडी देर बाद धीरजसिंह एक प्याला चाय का देवू के पास बैठे एक व्यक्ति के पास रख गया। देवू ने धीरजसिंह की आँखो की ओर देखा, परन्तु न उनमें आंसू थे और न ही दुख की कोई छाया । धीरजसिंह उमी प्रकार नजरें झुकाये वापस लौट गया। देवू क-frx मी वक्त 1 मुक्खासिंह की दुकान से उठ जाये, उससे उसे घृणा-सी होने लगी थी। कितनी निर्दयता से वह धीरजसिंह को पीटता है, आज पहली बार उसने अपनी आँखों से धीरजसिंह को पिटते देखा था, यद्यपि पहले कितनी ही वार वातों-बातों में धीरजसिंह ने उसे बतलाया था...! मुक्वानिह ने देवू को वैठे देखा तो उसकी ओर देखकर मुसकराया। वह नानकचन्द को जानता था । उसने चिल्लाकर देव की ओर देखते हुए कहा, "अरे ठीक है देवू, वहुत दिनों बाद दिखायी पड़ा !" देवू मुंह से कुछ नहीं बोला, केवल अपनी गरदन हिला दी, वह उसी प्रकार चाय के चूंट भरता रहा । अगर वह धीरजसिंह की जगह होता तो निश्चय ही कहीं चला जाता...चाहे भीख ही क्यों न मांगनी पड़ती। थोड़ी देर तक मुक्खासिंह कभी अपनी दाढ़ी के वालों को मरोड़ता और कभी मूंछों को तीखी बनाता और छाती बाहर को निकाले सड़क पर चलते लोगों को देख रहा था, कभी किसी स्त्री को देखकर वह मुसकराता और जब उसका जी न मानता तो ज़ोर से कुछ-न-कुछ कह देता, या पंजाबी में किसी गीत की एक लाइन गा देता...थोड़ी देर बाद अपने किसी दोस्त के साथ चहलकदमी करता हुआ वह चला गया। दुकान पर भी ग्राहक ज्यादा न थे। धीरजसिंह देव का प्याला उठाने आया तो वह मुसकरा रहा था, उसके पीले दाँत उसकी हलकी काली दाढ़ी और मूंछों के बीच चमक रहे थे। उसने देवू की ओर देखते हुए कहा, "कुछ और लेगा?" देव ने भी मुसकराना चाहा, लेकिन धीरजसिंह की इस अजीव-सी कृत्रिम मुसकान को देखकर वह चुप ही रहा। धीरजसिंह हँसते हुए देवू के पास वेंच पर बैठ गया, "तू देखना कि एक दिन मैं मुक्खासिंह का खून कर डालूंगा, वह अपने-आपको समझता क्या है...जानवर कहीं का ! सारा दिन ठरें-पर-ठर्रा चढ़ाता रहता है और रात को न जाने क्या करता है, आधी-आधी रात तक कहाँ रहता है ? गुंडा...हा...देवू, वह एक गुंडे से कम नहीं।" देवू चुपचाप सामने सड़क पर देखता हुआ धीरजसिंह की वातें सुनता रहा । धीरजसिंह के चेहरे की ओर देखने की उसकी हिम्मत नहीं पड़ रही थी। थोड़ी देर बाद उसने कहा, "धीरजसिंह, तु यह काम छोड़ क्यों नहीं 50 घर बने घर टूटे - - N देता? कही और नौकरी कर ले।" इस बार फिर धीरजसिंह ने एक ठहाका लगाया और फिर देवू के कधे को पकडते हुए बोला, "देवू, तू नही जानता कि मुक्खामिह ने हमारे बाप का रुपया हजम कर लिया है और मुझे एक कोडी भी नहीं दी। पूछने पर मुकर जाता है, लेकिन मैं ऐसे नही छोडने का, उस पर हम दोनों का वरावर-वरावर हक है । इस दुकान पर भी मेरा उतना ही हक है जितना मुक्पासिंह का..." धीरजर्जामह ने एक-आध वार पहले भी इस विषय मे देवू मे चर्चा की थी और जब देबू उससे कहता कि एक दिन वह सारे मामले को मुक्सासिंह के साथ मुलझा क्यों नहीं लेता, तव हमेशा ही धीरजसिंह जोश के साथ कहता था कि वह सवका बदला एक दिन .एक वार निकाल लेगा, और देवू हैरान होता था कि आखिर वह दिन कब आयेगा मुक्सासिह के सामने धीरजसिंह हमेशा ही भीगी बिल्ली-सा बना रहता था, कभी उसके सामने मुंह खोलने की हिम्मत उसे नहीं होती थी। "नहीं तो मुक्वासिंह के पास शराब पीने के लिए पैसे कहाँ मे आते हैं ? वह नये-नये कपड़े किस तरह बनाता है, दुकान मे तो चार-पांच रुपये रोज़ से ज्यादा आमदनी नही होती।" धीरजसिह मानो अपने-आपसे ही वातें कर रहा था। देवू को धीरजसिंह की बातों में विशेष दिलचस्पी नही थी। "तू कुछ नहीं करेगा धीरजसिंह, तुझमे हिम्मत ही नही है । क्या तो जल्दी फैमला कर ले, नहीं तो उसका काम छोडकर कही और काम कर ले ।" "लेकिन काम कहां मिलता है, देवू? तुझे तो साइकिल बनाने का काम भी आता है, मैं तो सिर्फ चाय के प्याले बना सकता हूँ।" धीरजसिंह ने धीमे स्वर में कहा। "यहाँ से छोड दे तो कहीं-न-कही काम मिल ही जायेगा, आखिर इतनी वढी सारी दुनिया जिन्दा रहती है।" दुकान पर दो युवक आकर बैठ गये तो धीरजसिंह उठ खड़ा हुआ। देवू ने उसके मैले जाधिये और लम्बी-लम्बी टांगो मे उगे हुए काले बालो को देखा जो काली घास की भाँति खड़े हुए थे। सामने आनंद पर्वत पर टीन की छतें चमकने लगी थीं और सड़क की दुकानों, बिजली के खंभों के साये और भी गहरे हो गये थे। कुछ क्षणों के लिए देबू धीरजसिंह के विषय में ही सोचता रहा। वह कुछ नहीं करेगा, यह दुकान भी नहीं छोड़ेगा...उसमें हिम्मत ही नहीं है...। शाम को शगुन आया, 25 नुगदी के लड्डू, रोली और चार रुपये-देव- नगर में रहने वाली देवू के दूर के रिश्ते की बुआ और उसके बच्चे, रेगड़- पुरा में रहने वाले उसके मामा और मामी, कौशल्या की एक दूर के रिश्ते की बहन और वस्ती की पड़ोस की कुछ औरतें और मर्द आये । देवू शर्माता हुआ कभी मां के कहने पर किसी बड़ी उम्र वाले के पांव छूता और कभी हाथ जोड़कर प्रणाम करता। बस्ती में ही रहने वाले एक ब्राह्मण-~-जो 'पंडितजी' नाम से ही प्रसिद्ध थे-ने कुछ पूजा वगैरह की, देवू के रोली का टीका लगाया और कुछ संस्कृत के श्लोक पढ़े, जिन्हें कोई समझ नहीं सका। और फिर बस्ती की कुछ औरतें ढोलक लेकर गीत गानेर वैठ गयीं। औरतें झुग्गी में बैठी रहीं और मर्द बाहर दरी पर बैठकर इधर-उधर की बातें करते रहे। नानकचन्द लोगों से कभी हुकम को कोई काम न मिलने की बात करते और कभी अपनी दुकान के न चलने का जिक्र करते। दूसरे लोग इसके प्रत्युत्तर में अपने परिवारों की मुसीबतें, महँगी जिंदगी और काम न मिलने की शिकायतें कर रहे थे। किसी की सगाई, शादी या मौत पर ही इकट्ठा होने का अवसर उन्हें मिलता था, अतः इनमें वे जी भरकर अपने मन में जमा हुए विचारों को प्रकट करते - थे। जब रात को दिन-भर की थकान के बाद देबू बाहर अपनी चारपाई पर आकर लेटा तव भी अन्दर झुग्गी में से ढोलक पर गानों की आवाज आ रही थी। उसकी बुआ की लड़की की आवाज अच्छी सुरीली है, लेकिन देखने में वह कितनी भद्दी लगती थी...इस प्रकार के गानों में उत्साह नहीं 52 घर बने घर टूटे होता था, जिस अवसर पर वे गाये जाते थे। उनमें इन सब औरतों की आवाजो में अपना-अपना निजी दर्द और व्यथा झलकती थी। यह बात नहीं कि देवू की सगाई की खुशी में ये गाने गा रही हो, परन्तु उस प्रकार के मौको की तलाश में वे सदा ही रहती थी। देवू ने अपने दोनों हाथ सिर के नीचे दबा लिये और ऊपर आसमान की ओर ताका, तारे छिटके हुए थे लेकिन चांद का कही पता नहीं था, उसका दिल शान्त था। सुबह की भांति तेजी से ऊपर-नीचे नही उठ रहा था। अपनी जिंदगी के पिछले 23 वर्ष अनायास ही उसकी आंखों के सामने घूम गये, अतीत के मोठे-कडवे-धुंधले चित्र...और आने वाले भविष्य की सुन्दर आकृतियां और उनके सफल होने की शंकाएँ...और आसमान के नीचे ऊबड़-खाबड झाड़ियाँ, लाल पत्थरों की चट्टानें, झुग्गियो को धुंधली अस्पष्ट रोशनियां और उन सबके पीछे ढोलक के साथ-साथ नारी-स्वरो की मिश्रित गूंज ..जिनकी दवी हुई मुर्दा इच्छाएँ और अधूरे स्वप्न इन गानो द्वारा आवाज़ पाते हैं...। तभी दूर झाड़ियों में से एक धुंधली-सी आकृति उसे अपनी चारपाई की ओर आती दिखायी दी. ."अरे भोला, तू दिन मे नही आया...," देवू ने कहा। भोला थोड़ी देर तक उसकी चारपाई के पास चुपचाप खड़ा रहा, फिर थोडे से खाली स्थान पर बैठ गया, देवू ने अपने पांव सिकोड लिये। "तुझे पता है न भोला कि आज मेरा शगुन आया है ... "हां, अभी-अभी पता चला, तो मैं यहां तुम्हे देखने आ गया। शादी कब होगी, देवू ?" "शायद होली पर...." "हूं...देख, मैं तेरी शादी पर गाने गाऊंगा चाहे कोई लाख ही मुझे मना क्यो न करे...अब देवू, शायद तू नही जानता कि जब से मैंने यह खबर मुनी है तब से मेरा दिल ऐसा धकधक कर रहा है .।" देवू हँसने लगा। भोला को समझ नहीं आ रहा था कि किस प्रकार वह देबू को बताये कि उसकी सगाई की खबर सुनकर उसे कितनी प्रसन्नता हुई है ! सारी वस्ती मे वह केवल देवू को ही अपना समझता है, यद्यपि देवू हमेशा अपना वक़्त काटने के उद्देश्य से ही भोला से वातें किया करता था। हमेशा ही उसकी बातों का मजाक उसने उड़ाया था, लेकिन फिर भी भोला का अपने में विश्वास और निजीपन देखकर उसे भोला से बातें करने में एक अजीव-. सा आनन्द आता था। जो वात वह किसी से नहीं कहता था, उसे भोला से कहकर अपना भार हलका करता था। "तू जल्दी-जल्दी नये गाने सीख ले, भोला । मेरी शादी में रेकर्ड तो बजेंगे नहीं । बाबू कभी इतना ख़र्च करने पर राजी नहीं होंगे, इसलिए तू ही गाने गा देइयो...।" भोला चुपचाप अँधेरे में छिपी चट्टानों और पगडंडियों को देख रहा , था। - "तू जानता है भोला, मेरी बीवी बहुत खूबसूरत है...," देवू ने धीमे स्वर में हिचकिचाते हुए भोला की ओर देखते हुए कहा, "वह 'रत्न' पास है, भोला। लेकिन मैं उसे खुश नहीं कर सकता, मैं वचनसिंह की दुकान पर साइकिलें बनाने का काम करता हूँ, अब किसी और नौकरी की तलाश करूँगा। फिर कहीं और चला जाऊँगा, इस झुग्गी में उससे नहीं रहा जायेगा..." भोला उसकी बातों को सुनता रहा, लेकिन उसके विचार वहुत दूर- दूर तक उड़ रहे थे। दुकान बंद करने से पहले नानकचन्द ने दिन-भर की आमदनी पर एक नज़र डाली, केवल ढाई रुपये लकड़ी की मजबूत सिंदूकड़ी में पड़े थे। छ: आने की एक पुरानी जासूसी किताब एक लड़के ने मोल ली थी, एक रुपये की किसी क्लर्क ने गरम पतलून खरीदी थी, 12 आने का एक पुराना जूता बिक गया था, और भी छुटपुट का थोड़ा-सा सामान कुछ लोगों ने खरीदा था। उन्होंने दुकान के सामान पर एक नज़र डाली, लेकिन वह सब सामान दो-तीन साल पुराना था, कभी उन्होंने सामान वेचकर नयी चीजें नहीं खरीदी। ग्राहक कहते थे कि वे सब-की-सव बड़ी पुरानी चीजें हैं, जामा - 54 घर बने घर टूटे मसजिद के कवाडी हर 15 दिन नयी-नयी चीजें अपनी दुकानों पर सजाते है। लेकिन वह क्या करें, जो मिलता है वह खर्च हो जाता है, घर में खाने वाले भी तो कम नहीं हैं और अब सुभागी देवू का ध्याह करके एक नया प्राणी घर में लाना चाहती है । इस प्रकार कब तक गुजारा चल सकता है ? नानकचन्द की सफ़ेद घनी मूंछ क्रोध मे हिलने लगी और उनके हाथ दूकान | का ताला बन्द करते समय कांपने लगे। सड़क पर विजलियां जल गयी थी और दिन मे कुछ वर्षा होने के कारण गोली पक्की सडक मोटरों को रोशनियो में चमक रही थी। आसमान पर अब भी वादलो को घनी चादर छायी हुई थी, हवा तेज थी...और ठडी भी... घर पहुंचे तो झुग्गी के अन्दर अभी तक लालटेन नही जली थी, पास के चूल्हे मे कुछ लकडियो से जले हुए कोयले अंधेरे में चमक रहे थे। लाली बाहर खड़ी थी, नानकचन्द को आये देख अन्दर आकर उसने चुपचाप लालटेन जला दी। नानकचन्द चारपाई पर बैठ गये और लाती से पूछा, "तेरी मां कहां गयी है, लाली? झुग्गी में अभी तक रोशनी तक नहीं की !" "मां कही पड़ोस में गयी है. .।" "हूं...!" कहकर नानकचन्द अपने कपड़े बदलने लगे। सुभागी से कभी घर के अन्दर नहीं बैठा जाता, हमेशा पड़ोस में जाने को उसकी तबीयत करती है, दूसरे लोग भी क्या सोचते होगे कि इसे अपने घर में जैसे कोई काम नहीं है। लेकिन जरा-सा कहो तो वह रोने लगती है, अपने दुखड़े मुनाने वैठ जाती है, खाना नहीं खाती । वही एक कोने में उन्होंने सुन्दर को कम्बल ओढ़े लेटे हुए देखा, उसके बाल विखरे हुए थे और आँखें बन्द थी, वह हाथ का पलटा लिये लेटा था। "सुन्दर को क्या हुआ?" "वह तो दिन मे ही आ गया था, उसे सर्दी लग रही थी, शाम तक बुखार आ गया सो तब से लेटा है...," लाली ने ध्यान से नानकचन्द की ओर देखते हुए कहा। "हमारे लड़के भी दूसरे लड़कों से बिलकुल अलग हैं। जरा-सा - किया कि बुखार आ गया, आगे जाकर ये क्या करेंगे? काम मिलता है तो करते नहीं और फिर खाली बैठे-बैठे कहते हैं कि अब कोई नौकरी नहीं मिलती..." लाली को सारे घर-भर में सबसे अधिक स्नेह सुन्दर से था। सुन्दर ने कभी अपने विषय में किसी से कुछ नहीं कहा । जब बुखार आ जाता था, तो वह आँखें बन्द करके लेटा रहता था। लाली शायद वह दिन कभी नहीं भूल सकेगी, जिस दिन सुन्दर को स्कूल से उठा लिया गया था और निहाल- चन्द की दुकान पर वह काम करने जाने लगा था। एक बार भी स्कूल छोड़ने का उसने विरोध नहीं किया। बस, घर आकर अपनी सब कितावे- कापियाँ एक कपड़े में बाँधकर उसने एक कोने में रख दीं। और यह बात पड़ोसियों तक से छिपी नहीं थी कि सुन्दर पढ़ने में बहुत तेज़ था, हमेशा अपनी जमात में पहले या दूसरे नम्बर पर पास होता था और एक बार उसके मास्टर ने भी आशा प्रकट की थी कि दसवीं में उसे आगे पढ़ने के लिए वज़ीफ़ा ज़रूर मिल जायेगा। लेकिन नानकचन्द पर किसी का भी प्रभाव नहीं पड़ा...सब जानते थे कि सुन्दर को पढ़ाई छोड़ने का बहुत दुख था, घर पर चाहे वह किसी से न कहे, या अपने आँसू न बहाये । "पानी है, लाली, मुंह-हाथ धोने के लिए?" नानकचन्द ने लाल गमछे को अपने कंधे पर डालते हुए कहा। "पानी अभी भाभी लेने गयी हैं, लौटती ही होंगी।" नानकचन्द को तनिक क्रोध आ गया, "वह नल पर बातें कर रही होगी, उसे वही एक मौक़ा गप्पें लगाने का मिलता है...।" यह कहकर वह चारपाई पर बैठ गये। लाली चूल्हे के कोयले में फूंक मारती हुई लकड़ियाँ सुलगाने लगी और जब धुआँ काफी तेजी से उसकी ओर आता तो वह अपनी आँखें अपने घुटनों में छिपा लेती थी। सुभागी को देखकर नानकचन्द का सारा क्रोध उभर आया, वह एक चादर अपने शरीर पर लपेटे हुए थी। उसके चौड़े मुंह पर उसकी वढ़ती हुई आयु के चिह्न स्पष्ट रूप से उभरले जा रहे थे। उसने अन्दर घुसते ही एक नजर सारी झुग्गी के अन्दर डाली और फिर चादर उतारकर एक . 56 घर बने घर टूटे कोने में रख दी। नानकचन्द चुपचाप चारपाई पर बैठे अपने होंठ फड़फड़ाते "किसी को भी सुख नहीं है । जहाँ जाओ, वही सब अपना रोना रोते हैं...किसी की दुकान नही चलती, किसी के लड़के को काम नहीं मिलता और किसी की बहू बदचलन हो गयी है ।" सुभागी कभी नानकचन्द की ओर देख रही थी और कभी लाली की ओर...1 "पड़ोसियो के किस्से सुना करती हो, कभी अपने घर की तरफ़ भी देखा...!" नानकचन्द चारपाई से उठ खडे हुए । उन्हें क्रोध बहुत कम आता था और जब आता या तो वह चुपचाप बैठे हुक्का जोर-जोर से गुडगुड़ाने लगते थे और किसी के पूछने पर उसका जवाब नहीं देते थे। उनका क्रोध उदासीनता में बदल जाता था, परन्तु जब कभी वे अपने विचारो और दिमागी परेशानियों को शब्दों में प्रकट करते थे तव उनके मुंह मे कभी अस्पष्ट स्वर नही निकलते थे, उनकी सांस जोर-जोर से चलने लगती थी और वे अपना दायां हाथ कभी ऊपर उठाते और कभी नीचे गिराते थे । "अव फ्यादा दिनो तक दुकान से खाने का सामान जुटाया नहीं जा सकता। दुकान का सारा सामान ख़त्म हुए जा रहा है, नयी चीजें लाने के लिए कभी पैसे नहीं होते...हुकम अभी तक बेकार है, देवू के 30 रुपये में क्या होता है और सुन्दर को हर तीसरे दिन बुखार चढ आता है । खाने वाले बढते जा रहे है और फिर देवू का ब्याह...अगर ये तीनो ठीक तरह से कमाते होते तो मुझे फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं थी।" सुभागी एक कोने मे खडी नानकचन्द की ओर घूर रही थी। अन्य दिनों तो वह घर पर अपना रोव जमाये रहती थी, परन्तु जय नानकचन्द नाराज होते थे तब उसके मुंह से एक भी शब्द नही निकलता था। अपनी पुरानी स्मृतियां उसके दिमाग मे घूम जाती थी। कभी-कभी वह सुभागी को पीटते थे, तव का भय अभी तक उसके मन से भाग नही सका था, यद्यपि उसे विश्वास या कि अब सफ़ेद वालों में जवान लड़के और लड़कियो के सामने वह उसे पीटेंगे नहीं, परन्तु फिर भी...। "बाबू, तुम मुंह-हाथ धो डालो, मैं पानी ले आयी हूँ...," लाली ने - नानकचन्द के पास लोटा ले जाकर कहा । "एक दिन जव वाहर भीख माँगने की नौवत आयेगी तो पता चलेगा। हैं...मुझे इन सब झगड़ों से क्या ?" नानकचन्द चारपाई पर लेटे हुए हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे और सुभागी और कौशल्या रसोई का काम निवटा रही थीं। लाली ने उनके सामने खाने की थाली लाकर रख दी और वह धुंधली रोशनी में बिना कोई आवाज़ किये चुपचाप खाने लगे। सुन्दर की साँस तेजी से चलने लगी थी, जिसका स्वर झुग्गी की धीमी रोशनी में एक कोलाहल-सा पैदा कर रहा था। लाली ने उसके माथे पर हाथ रखा तो वह जल रहा था। उसने धीरे से सुन्दर के कंधे को पकड़कर हिलाते हुए पूछा, "दूध पियेगा, सुन्दर?" सुन्दर ने जवाब न देकर एक ओर को करवट बदल ली और कम्बल में अपना मुंह छिपा लिया। लाली थोड़ी देर तक चुपचाप सुन्दर के पास बैठी रही, फिर झुग्गी के बाहर निकल आयी, अंदर उसका दम घुट-सा रहा था। देवू भी खाना खाकर वाहर एक पत्थर पर बैठा था, लाली उसके पास तक चली गयी। "क्या आज फिर कुछ झगड़ा हुआ है, लाली?" देवू ने पूछा। "आज कोई नयी वात थोड़े ही है, रोज़ का किस्सा है।" लाली ने विना देबू की ओर देखे उत्तर दिया। वाहर हवा में सर्दी नहीं थी, लेकिन आज उसकी गति अवश्य तेज़ हो गयी थी। "ये रोज़-रोज़ के झगड़े...हँ ! सारा दिन काम करके आओ, और रात को यहाँ सबके फूले हुए मुंह देखने को मिलें। यह भी क्या जिंदगी लाली ने मानो देवू की बात सुनी नहीं। वह कह रही थी, "आज सुन्दर को फिर बुखार आ गया है, इस तरह वह बचेगा नहीं। उसका मुंह पीला पड़ता जा रहा है जैसे खून की एक भी बूंद न हो, वह किसी से कुछ नहीं कहता, कभी अपनी बीमारी की चर्चा नहीं करता और घर में किसी को भी उसकी फ़िकर नहीं है । देवू, क्या तुझे सुन्दर पर दया नहीं आती?". देवू चुप रहा...उसने कभी इस विपय में सोचा नहीं था। पहले जब 58 घर बने घर टूटे - सोचता था तो वेकार में उसका दिल दुखता था और कुछ भी करने की सामर्थ्य उसमे नहीं थी और आजकल तो घर और घर के प्राणियों के विषय में वह पूर्ण रूप से उदासीन हो चुका था। "सुन्दर मर जायेगा, देवू, एक दिन इसी तरह लेटा-लेटा वह मर जायेगा और किसी को पता भी नहीं चलेगा-उसकी आखिरी सांस भी नहीं सुनेंगे...." और लाली फूट-फूट कर रो पड़ी। झुग्गी के अन्दर से फिर जोर-जोर की आवाजें आने लगी थी, जिन्हें वे दोनो स्पष्ट रूप से सुन सकते थे । नानकचन्द कह रहे थे, "मैं अब तुझे और तेरे बीवी-बच्चों को नहीं खिला सकता। अगर नौकरी नहीं मिलती तो कही और ठिकाना देख । इन सफेद वालों में तुम्हारे लिए मैं भीख नही मांगूंगा।" कौशल्या को जोर-जोर से रोने की आवाजें आ रही थी और इस कोलाहल में दीनू भी जाग पडा था और अपनी मां को रोते देख भी गला फाड़-फाड़ कर चिल्ला रहा था । सुभागी चुप थी भी कुछ कह रहा था, लेकिन उसकी आवाज स्पष्ट नहीं थी। नानकचन्द फिर कह रहे थे, "मेरी जिंदगी बिगड गयी इन लोगों के मारे...नही तो मां-बेटे मिलकर घर संभालो और मैं कही चला जाता हूँ, मुझे दो रोटियों की कही कमी नहीं है।" फिर कौशल्या का तीखा स्वर : "तुम वोलते क्यो नही ? खिला नही सकते थे तो शादी क्यों की थी, मैं भी रात-दिन की इस किलकिल से तंग आ गयी हूँ...एक दिन में अपने गले में फांसी लगा लूंगी।" और फिर उसकी चीखें, गालियां और रोने की आवाजें हुकम कौशल्या को पीट रहा था और सुभागी रो रही थी। लाली और देवू में से कोई भी अन्दर नही गया। देवू उसी प्रकार घुटनों पर अपनी ठुड्डी टेके वंठा था और लाली अपनी चुन्नी के अन्दर अपने हाथ छिपाये तभी दोनों में हुकम को झुग्गी में से निकलते देखा और वह तेजी से ऊपर सडक की ओर चला गया, जहां मोटरों की तेज रोशनियाँ चमक रही थी। देवू और लाली-किसी ने भी उसे नहीं रोका। वे पत्थर की मूर्तियाँ हुए थी। घर बने घर टूटे 59 - बने हुए थे । झुग्गी से अव भी रोने की आवाजें आ रही थीं, लेकिन रात के बढ़ने के साथ वे भी कम होती गयीं और जब बाहर विलकुल सन्नाटा छा गया तो अन्दर भी लालटेन बुझ गयी । लाली अन्दर चली गयी, लेकिन देवू कुछ देर के लिए अभी सड़क पर मोटर के हॉर्न सुनकर इनकी रोशनियाँ देख रहा था...सुन्दर का बुखार स्थायी रूप से रहने लगा, जव बुखार तेज हो जाता तो वह बड़वड़ाया करता था, सब घर वाले इसके अभ्यस्त हो गये थे। और तो सव सुन्दर के विषय में उदासीन थे, परन्तु नानकचन्द कभी- कभी गुस्से में सब घर वालों को कोसते वक़्त सुन्दर को भी नहीं छोड़ते थे। वह समझते थे कि आरम्भ से ही सुन्दर का पढ़ाना उनकी ग़लती थी, जिसे अब सुधारना उनके वश के बाहर की बात थी। अजमलखा रोड पर ईश्वरदत्त वैद्य की दुकान से कभी देवू और कभी लाली सुन्दर के लिए दवा ले आते थे । कभी उसका बुखार उतर जाता और वह अपने विस्तरे पर वैठकर झुग्गी के दरवाजे से बाहर देखा करता था, परन्तु फिर दो-तीन दिन के बाद यकायक उसका शरीर तपने लगता और वह पुनः कम्बल के अन्दर पाँव सिकोड़ कर लेट जाता था। उसका मुंह पीला पड़ गया था और शरीर की हड्डियाँ पतझड़ में ढूंठों की भाँति उभर आयी थीं। हुकम उस दिन घर से गया तो फिर वापस नहीं लौटा। अगले दिन भागी के कहने पर देवू वचनसिंह से छुट्टी लेकर स्टेशन पर उसे ढूंढ़ने गया था। उसने अनमने भाव से कुछ गाड़ियाँ भी देखीं, आने वाली और जाने वाली दोनों, प्लेटफ़ॉर्म के चक्कर लगाये और फिर पुल पार करके वह जमुना के किनारे रेत पर भी थोड़ी दूर तक गया। हुकम को ढूंढ़ निकालने की उसकी उत्सुकता तो समाप्त हो गयी और रोज़मर्रा की डुबा देने वाली जिंदगी में कुछ परिवर्तन के विचार से वह सारा दिन शहर के चक्कर लगाता रहा। उसे हुकम के चले जाने का डर नहीं था, आखिर वह बड़ा है, कहीं काम की तलाश में निकल गया होगा। विना कहे चला गया तो इसमें अनोखी कौन-सी बात हुई ! एक दिन देवू काम करके शाम को लौट रहा था तो रास्ते में जग्गी मिल गया। जग्गी से देवू की कोई विशेष मित्रता नहीं थी, जब रास्ते में कभी मुठभेड़ हो जाती थी तो जग्गी हँसकर उस पर कोई वाक्य कस दिया । 60 घर बने घर टूटे करता था, कभी देवू उसका जवाब दे देता और कभी जवाव न देने पर हँसकर वह आगे बढ़ जाता था। "सुना देवू, तेरा ब्याह होली पर हो रहा है न?" जग्गी ने मुसकराते हुए पूछा। "हो जायेगा, अभी जल्दी क्या है ? तू अपने हाल-चाल बता, क्या कर रहा है ?" वह आजकल अपने ब्याह की चर्चा किसी से नहीं करता और किसी के पूछने पर उसको टाल देता था। "मैं क्या काम करूंगा, देवू ? दो वक्त का पका-पकाया खाना वाप तैयार रखता है, और मुझे कुछ नही चाहिए। मुझसे काम नहीं हो सकता..." "और पीना क्या छोड दिया ?" जग्गी ने ठहाका लगाया, "कभी-कभी यार लोग पिला देते है, देबू ? पीना कोई बुरी बात नहीं है; जो पीते नही उनमे हजारो तरह के ऐब होते है, लेकिन फिर भी वे शरीफ समझे जाते हैं . ।" दोनो साथ-साथ सड़क पर चलने लगे। देवू के दोनो हाथ साइकिल की मैल, तेल, ग्रीज आदि मे सने हुए थे और उसके मुंह पर भी उसकी काली उँगलियों के दो-तीन निशान बने हुए थे। कैप कॉलेज के लहके साइकिलो के पीछे अपनी किताबें बांधे तेजी के साथ घटी बजाते हुए अपने घरो की ओर चले जा रहे थे। कभी-कभी मोटर या वस की तेज रोशनी मे साफ़ सड़क चमक उठती थी और किनारे के कच्चे फुटपाथ की धूल तेजी से ऊपर की ओर उठती थी। "हाँ देयू, मैं भूला जा रहा था। क्या हुकम अभी तक नहीं लौटा।" देबू ने अपनी गरदन हिला दी। "मुझे कभी-कभी शक होने लगता है, देवू, कि...," और जग्गी ने देवू की ओर देखकर हकलाते हुए कहा, "कही हुकम ने...आत्महत्या तो नहीं कर ली?" देवू के मन में यह विचार दो-चार बार पहले भी उठा था, परन्तु उसने इमें कोई महत्व नहीं दिया था। हुकम बात्महत्या नहीं करेगा, वह इतना भावुक नही है और उस दिन की घटना कोई इतनी बाकस्मिक एवं घर बने घर टूटे 61 भयानक नहीं थी कि वह आत्महत्या करे। वह घर से चला गया, उस दिन नहीं तो फिर कभी किसी दिन चला जाता। शायद वह बम्बई चला गया हो...एक बार उसने इसकी चर्चा भी की थी। जग्गी ने फिर दवे स्वर में कहा, "तेरी भाभी को तो बड़ा अफ़सोस 1 हुआ होगा ?" - देवू कुछ नहीं बोला...लेकिन वह जानता था कि कौशल्या को भी हुकम की अनुपस्थिति अखरती नहीं। वह जानती थी कि बाहर जाकर कुछ-न-कुछ कमा ही रहा होगा...! घर पहुंचा तो सुभागी भरी वैठी थी। देबू को देखकर वह जोर-जोर से रोने लगी और मानो अपने ही आप से कह रही थी, "आप गया था तो इस कुलटा को भी अपने साथ ले जाता। यहाँ मेरी नाक कटवाने को छोड़ गया । पानी भरने के बहाने नल पर क्या जाती है कि वहाँ घंटों लगा देती है, आदमियों के सामने नहाती है और मर्दो को देखकर मुसकराती है... सव पास-पड़ोस वाले देखकर हँसते हैं और आपस में कानाफूसी करते हैं । वात करो तो उलटे सिर पर सवार हो जाती है...।" जब से हुकम गया था तव से सुभागी और . कौशल्या के संबंध दिन- प्रतिदिन बिगड़ते जा रहे थे। सुभागी एक कहती थी तो उसे चार सुननी पड़ती थीं। पड़ोस में भी दोनों एक-दूसरे की बुराइयाँ करती थीं। सुभागी ने यह नया हथियार सोच निकाला था कि वह उसको चरित्रहीन कहे तो उसका जवाब कोशल्या के पास कोई न होगा। "मेरा बुढ़ापा विगाड़ने के लिए हुकम इस नागिन को यहाँ छोड़ गया है। किसी घर के काम को कहो तो शर्म आती है, लेकिन बाहर के नाम एकदम उछल पड़ती है। मुझमें अव इतना दम नहीं कि पानी भरूँ। नहीं तो उसे पानी भरवाने को कभी न कहती । कैसा वक्त आ गया है...!" कुछ देर के लिए झुग्गी में सन्नाटा छा गया। भाभी सुन्दर के सिरहाने बैठी कुछ काढ़ रही थी और सुन्दर चुपचाप लेटे हुए खुली आँखों से छत की ओर देख रहा था। सुभागी की बात सुनकर दोनों में से कोई नहीं चौंका। वे दिन-भर इस प्रकार की बातें सुना करते थे। यकायक सुभागी की कही हुई वातें देवू के सामने एक नया विचार, । 62 घर बने घर टूटे । एक नमी उलझन वनकर आ खड़ी हुई। शायद उसकी शादी के बाद यदि लिट्टो ने भी इसी प्रकार का व्यवहार शुरू कर दिया तो. घर के इस वातावरण मे और देवू के अधिक न कमाने के कारण यदि वह भी इस विवाहित जिंदगी से तग आकर...देवू चौंक गया। विवाह का जितना आकर्षण और जितनी प्रसन्नता थी उस सबके बदले एक गहरी आशका फूट पडी। उसका बदन एक बार सिर से लेकर मेर तक कांप उठा । उसने अपने मैल और ग्रीज से भरे काले हाथ देखे...। वाहर अंधेरा बढ़ता जा रहा था। कभी-कभी अनगिनत पक्षियो के झुंड वसेरा लेने के लिए झुग्गी के ऊपर शोर मचाते हुए आगे निकल जाते थे और शाम का सूनापन और भी गहरा होकर छा जाता था। सुन्दर कराह रहा था। सिर की पीडा के कारण कभी-कभी वह चिल्ला उठता था और लाली तवे जैसे जलते माथे से उसके वालो को लर्ट हटाकर धीरे-धीरे माथा दवाने लगती थी। पिछले दो-तीन दिनों से लाली बहुत कम वाहर जाती थी। वह दिन-भर सुन्दर के पास बैठी रहती थी । जब सुन्दर होश में होता तो धीरे-धीरे उससे बातें करती थी-घर की, बाहर की, पिछले बीते दिनो की और आने वाले भविष्य की . सुन्दर चुपचाप आँखें खोले उसकी बातें सुनता रहता था। कभी-कभी किसी हंसी की बात पर उसके होंठ कोनो से खिच जाते थे। परतु वह बोलता बहुत कम था। शाम को नानकचन्द अपनी दुकान बद करके लौटे और खाना खाकर हुक्का गुड़गुडाते हुए सुभागी से कहने लगे, "आज रलियाराम दिन मे दुकान पर आये थे..." सुभागी ने उत्सुकता से पूछा, "क्या व्याह की तारीख ?" "मेरी बात वो सुन लो। मेरी समझ में नहीं आता कि तुम्हे देवू का व्याह करने की ऐसी कौन-सी हाय-तोवा मची हुई है ? एक का ब्याह करके तो देख लिया, अव दूसरे पर उम्मीदें लगा रही हो ।" देवू की आँख लगने ही वाली थी, लेकिन रलियाराम का नाम सुनकर उसके कान खडे हो गये और वह लेटा-लेटा ही उनकी बाते सुनने लगा सुन्दर के कभी-कभी कराहने से उसे बात स्पष्ट रूप से मुनायी नहीं देती थी और उसे सुन्दर पर क्रोध आता था। घर बने घर टूटे 63 । .
"उनकी लड़की को पिछले एक हफ्ते से बुखार है...वैद्यजी को टाइ फाइड होने का डर है।" देबू चौंक पड़ा। अगर परिस्थिति का ज्ञान उसे क्षण-भर पहले न हो जाता तो वह अपने विछौने से उठ पड़ता। "मैं कल ही लिट्टो को देखने जाऊंगी। अभी दस-बारह दिन पहले तो वह मुझे वाज़ार में मिली थी, अचानक यह बुखार कैसे आ गया...?" "यह सव तो तुम पता लगा लेना-मैं कोई डाक्टर-वैद्य तो हूँ नही जो वीमारी का पता लगाने जाऊंगा," नानकचन्द की आवाज़ में खीझ थी, "रलियाराम कह रहे थे कि शायद होली पर व्याह न हो सके...." "क्या जरा-से बुखार से वह व्याह टाल देना चाहते हैं ? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, मैं कल ही उनके घर जाऊंगी...उनकी मर्जी नहीं चलेगी, वह लड़की वाले हैं।" सुभागी के मन में लड़के की मां होने का अभिमान जाग उठा था। रलियाराम से उसने बहुत उम्मीदें बाँध रखी थीं। दूसरे, लिट्टो को अपने साथ मिलाकर वह कौशल्या को नीचा दिखाना चाहती थी। नानकचन्द ने क्रोध और खीझ में एक हँसी का व्हाका लगाया और हंसी के साथ-साथ उनकी खांसी भी उभर आयी। हुक्के की नली को क्षण- भर के लिए उन्होंने अपने मुंह से दूर कर दिया। उनकी बड़ी-बड़ी मूंछे उनकी खाँसी के साथ नीचे-ऊपर की ओर हिल रही थीं, "हाँ, वेटे की माँ...ज्यादा कुछ कहोगी तो वे सगाई तोड़कर अपनी लड़की का ब्याह कहीं और कर लेंगे, उन्हें लड़कों की कमी नहीं है। जिसके हाथ में चार पैसे रखेंगे वही उनकी बेटी का हाथ थामने को तैयार हो जायेगा...." "बस...चुप रहो जी। तुम्हें क्या हो गया है ? ऐसी बातें कहते तुम्हें दर्द नहीं होता, मेरा देबू सलामत रहे ।" और फिर थोड़ी देर पश्चात वह वोली, "मैं रलियाराम की औरत को जानती हूँ, वह एक वार वचन देकर दुवारा उसे नहीं तोड़ती। सगाई तोड़कर उसे विरादरी में वदनामी ही मिलेगी..." "लेकिन यह बात पक्की है कि वे होली पर व्याह नहीं करेंगे। हमारे लिए तो यह अच्छा ही है । ब्याह के लिए रुपया भी तो जुटाना पड़ेगा।" 64 घर बने घर टूटे - ।
...और उन्होने फिर हुक्के को गुड़गुड़ शुरू कर दी। सारी झुग्गी में वही तो एक आवाज थी जो देवू को शांत किये हुए थी। उसका बाप कितना निर्दयी था, जो हँसते-हंमते इतने सहज भाव में कह सकता था कि रलियाराम उनसे ब्याह का सबंध तोड़ लेंगे। लिट्टो को क्या हुआ...मामूली-सा बुखार होगा...या शायद किसी डॉक्टर ने उन्हें डरा दिया है कि उसको बीमारी खतरनाक है। उसे बीमारी का नाम याद नही रहा था। वह कल ही लाली से कहेगा कि वह रलियाराम के घर जाकर लिट्टो को देख आये और उसका हाल पूछ बाये ..और फिर कितनी हो देर तक देवू को नीद नही आयी। अंधेरे में भी वह अपनी आंखें खोले कभी दीवार की ओर, कभी छत की ओर देखता रहा। फाल्गुन का महीना आया। पेड़ो के गिरे पत्तो के ढेर हवा के चलने के साथ-साथ आगे बढ़ते या कभी ऊपर उडकर फिर घायल पक्षी की मानि नीचे आ गिरते । वस्ती के लोग इन सूखे पत्तो का देर अपनी झुग्गियों के सामने जमा करके छोटी-सी आग सुलगा लेते और उसके चारों ओर बैठकर उसकी आग सेंका करते थे। मदियां जैसे-तैसे बीत गयी। हवा में मी घट रही थी और दिन को धूप मे अव पसीना आने लगता था। लेकिन सवेर- शाम की सर्दी अब भी कंपकंपा देती थी और तहके ही एक हलकी-मी धुंध झुग्गियों के कपर वाली पक्की महक को छिपा लेती थी। शाम को कितनी ही बारातों के बैट, और इन्हें के लिए मनी दुई घोड़ियां और फूलों के हारो से ढंकी मोटर सडकों पर दिवानी देती थी। रात को बहुत देर तक लाउडस्पीकर में बजते हुए फिल्मी गानी रिकी दूर-दूर तक अपनी बावा पहुंचाते थे। देवू को पाल्गुन में अपने व्याह न होने का विष दुन्द हवा ही,पली बात नहीं यो। अपनी मगाई के बाद जब कमी दह विवाह के दिन सोचता था तभी एक बीव-मी कंपकपी में उनका दिन बग्ने नन्दा था।घर का इस प्रकार का वातावरण, मुमागी और कन्यादाई, - सुन्दर की बीमारी और नानी का चुपचार गो कार कारत काढ्ना बाहि दो पाही, नेकिन इनके बनादानिट्टी ऑसनकर, इन वस्ती में वो दूसरे विवाहित दमति रहत दे दीदह बना विनी हुए देखता वसर नहीं कर सकेगा। और अब यकायक उसका विवाह आगे खिसक जाने की जो वात हुई उससे उसे दुख और प्रसन्नता-दोनों ही हुईं। काम से लौटते समय या रात को अपनी झुग्गी में बैठकर जब बैंड और फ़िल्मी रिकर्ड उसे सुनायी देते तो अनायास ही वह अपने विचारों में खो जाता था और उसके सामने विना कोशिश किये लिट्टो का धुंधला-सा चेहरा घूम जाता था। लिट्टो को उसने कई बार देखा हो सो बात भी नहीं थी, लेकिन बहुत दिनों तक लगातार उसकी कल्पना करने से उसकी एक आकृति उसके मस्तिष्क में बन गयी थी। बचनसिंह किसी काम से कुछ दिनों के लिए अम्बाला गया हुआ था अतः देवू की छुट्टी थी। अपनी अनुपस्थिति में वह देवू को दुकान खोलने की इजाजत नहीं देता था, क्योंकि देवू पर अभी तक उसको विश्वास नहीं था। देवू सवेरे देर से उठता और फिर या तो देवनगर जाकर धीरजसिंह की दुकान पर बैठ जाता, या कभी वस्ती के चक्कर लगाता, तालाव के किनारे बैठी स्त्रियों को कपड़े धोते "लाली, कल तू लिट्टो को देखकर आयी थी न ?" अभी तक वह बिना किसी हिचकिचाहट के लिट्टो के विषय में लाली से वातें नहीं कर पाता था। लिट्टो का नाम लेते ही उसका चेहरा कनपटियों तक लाल हो जाता था। "वह ठीक है देबू, तू इतनी फ़िक्र क्यों करता है ? बुखार तो उतर गया है, लेकिन वह अभी कमजोर है, कमज़ोरी भी धीरे-धीरे चली जायेगी।" लाली बोली। देवू लाली की दृष्टि से बचने के लिए दूसरी ओर देखने लगा। "वचन- सिंह कहता था कि मियादी बुखार के बाद बीमार की ठीक तरह से देख- भाल होनी चाहिए, नहीं तो फिर बुखार होने का डर होता है...।" "उसके मां-बाप उसका ध्यान रखते हैं, देवू । वह फलों के रस पीती है, वैद्य की दवाई खाती है और दूध पीती है...हमारे जैसे वे नहीं हैं कि बीमार के लिए दवा-दारू का इंतजाम भी ठीक से नहीं होता..." लाली ने अपनी गरदन झुका ली, शायद अपने आँसुओं को रोकने का प्रयास कर रही थी। 66 घर बने घर टूटे देवू अपनी घुन मे इतना मस्त था कि वह लाली के अन्तिम इशारे को ममझ नही सका उस समय सुन्दर उसके विचारो से दूर...बहुत दूर था। वह धीमे स्वर में बोला, "हां.. वे हमारे जैसे नहीं है, उनका लड़का वैक में काम करता है, वह साइकिलो में हवा नही भरता।" "देवू .!" लाली ने देवू के चेहरे की ओर बड़े ध्यान से देखा, फिर थोडी देर तक चुप रहने के बाद उसने देवू की ओर देखते हुए कहा, "क्या हुकम ने कभी तुझसे कही बाहर जाने का जिक्र किया था?" "तुझं पता है लाली, कि हम दोनो मे कभी घुल-मिल कर बातें नहीं होती थी। हुकम ने शायद ही किसी को अपने मन की बात बतायी होगी। बस, एक दिन जग्गी के सामने वह कह रहा था कि बम्बई मे जहाजो मे काम करने की नौकरी आसानी से मिल जाती है . लेकिन उसके पास वम्बई जाने के पैसे कहाँ से आये?" "तो हुकम वम्बई चला गया . तीन महीनो से उसने एक खत तक नही लिखा। भाभी से कभी बात करो तो वह चुप रहती है । बेचारा, दीनू...!" योडी देर बाद देवू बाहर चला गया। सूरज छिपने वाला था. लेकिन अभी तक उसकी रोशनी काफ़ी मात्रा में फैली हुई थी। बिना किसी उद्देश्य के वह एक पगडंडी पर आगे बढ़ने लगा। वह सामने देख रहा था, बिना किसी नियम के स्वय ही उगे हुए पेडो को ऊपरी पत्तियां सूरज के प्रकाश मे चमक रही थी, उन्ही के पीछे खंडहर बनी हुई पुरानी मसजिद की सफेद दीवार का कुछ अंश दिखायी देता था। आस-पास कांटे वाली झाडियां ऊँची-नीची सतह बनाती हुई पगडडी के दोनो किनारो पर इस प्रकार सही थी, मानो सीमा पर सिपाही खड़े हो...देवू इन सबको देखता हुआ भी 'नहीं' के वरावर ही देख रहा था। आगे जाकर तालाब से थोड़ी दूर पर एक छोटे-से मैदान मे बस्ती के कुछ बच्चे गुल्ली-डंडा खेल रहे थे और मैदान के एक कोने मे आस-पास के इलाको से जमा किये हुए गन्द और कूड़ा-करकट से भरे लोहे के बड़े-बडे पोपो मे कुछ मूअर, गाय, बैलो के झुड अपना भोजन तलाश कर रहे थे, कभी-कभी किसी गाय या बैल द्वारा सूअर को हटाने के लिए सीग मारने घर बने घर टूटे -- से सूअर भयानक स्वर में चिल्ला उठता था। बस्ती के कुछ वच्चे भी इन ढेरों में से जले हुए कोयले ढूंढ रहे थे। मुझे कोई दूसरी नौकरी तलाश करनी चाहिए-देवू सोच रहा था- वचनसिंह की दुकान पर आखिर कब तक काम करता रहूँगा? थोड़ा पढ़ा- लिखा होता तो शायद इन बसों में टिकट देने का काम मिल जाता, शंभू व आठ घंटे ड्यूटी देनी पड़ती है और हर महीने 105 रुपये मिल जाते हैं, गर्मी, और जाड़ों की वरदी मिलती है सो अलग और बस में जो मुफ्त में सारे शहर का चक्कर लगाने का जो मज़ा आता है...देवू को पढ़ाया नहीं और अव सुन्दर को भी स्कूल से हटा लिया। लेकिन शायद सुन्दर पढ़ कर भी कुछ न करता, नौकरी पाने के लिए थोड़ी चालाकी की जरूरत होती है, जो सुन्दर में नहीं के बराबर है। लेकिन आखिर सुन्दर अकेला लेटा-लेटा सोचा क्या करता है ? क्या उसका जी ऊब नहीं जाता? तालाव के सामने से वापिस घर को लौटती हुई कुछ स्त्रियों के झुंड गा रहे थे और उन सव की आवाज़ मिलकर एक धीमा-सा अस्पष्ट कोलाहल पैदा कर रही थी, देवू कोशिश करने पर भी गाने के शब्द समझ नहीं सका, लेकिन फिर भी उनकी आवाज़ उसे मधुर लगी। अँधेरा बहुत तेजी के साथ बढ़ता जा रहा था। देबू ने ज़मीन से एक ढेला उठाकर तालाब में फेंका और फिर पानी में बनते हुए गोलाकारों को देखता रहा । तालाव के सड़ते हुए पानी की दुर्गन्ध उसके चारों ओर फैल रही थी। देवू ने जेब में से बीड़ी का पैकेट निकालकर एक बीड़ी सुलगायी और मुंह से धुआँ बाहर निकालकर वह उसकी बनती और विगड़ती आकृतियों को ध्यान से देखने लगा। घर लौटते समय काफ़ी अंधेरा हो चुका था। मैदान से बच्चों की टोलियां अपने घरों को वापिस लौट गयी थीं। तालाब से वस्ती जाने वाली पगडंडी पर स्त्री-पुरुषों के झुंड कभी-कभी आते-जाते दिखायी देते थे। नल पर भी तीन-चार स्त्रियाँ खड़ी पानी भर रही थीं और परस्पर बातें करती जा रही थी। तभी पगडंडी से थोड़ा हट कर एक चट्टान के किनारे देवू ने जग्गी को किसी से बातें करते देखा। वह कोट की जेबों में हाथ डाले था...उसके 68 घर बने घर टूटे पास खडी स्त्री को पहचानते ही देवू का मन सिहर उठा। वह कौशल्या थी, उसके एक हाथ में पानी की भरी हुई बालटी थी, उसकी चुन्नी हवा में उड रही थी। घर मे कौशल्या के विषय मे सुनी हुई सारी बातें उसके दिमाग में घूम गयी। कौशल्या जग्गी से क्या बातें कर रही है ? और उसे याद आया कि कुछ दिन पहले जग्गी ने भी उससे कौशल्या के विषय में पूछा था । शायद जग्गी कौशल्या से घर की बातें कर रहा हो? लेकिन जग्गी ठीक आदमी नही है-जग्गी से सबंधित सारी स्मृतियां उसके मस्तिष्क में घूम गयी, किस तरह एक बार रात को उसने उसे लडखडाते हुए देखा था, उसके मुंह से शराब की बू आ रही थी, वह एक स्त्री का नाम लेकर उसके विषय में । कुछ बातें कह रहा था, वह कहता था कि वह अपने बाप की हत्या करके उसका धन हडप लेगा। और कौशल्या उसके पास खडी उससे बातें कर रही थी, जग्गी हँस रहा था. लाख अपने को सात्वना देने पर भी एक आशका देवू के मन में छिपी ही रही, जिसे वह दूर नहीं कर सका। उस रात को कितनी ही देर तक वह इसी घटना के विषय में सोचता सदियो का कोहरा और रात को सूखे पत्तो और डालियो का जलना खत्म हो गया। दिन में सूरज के नीचे बैठना असम्भव हो रहा था और पेडों से छनती हुई हवा काम करने वालो के पसीने को सुसाया करती थी। बस्ती के एक किनारे पर ऊँचाई पर रोडी कूटने का एक कारखाना खुला था, जिसके चलने की आवाज दिन-भर गूंजा करती थी। इसके पास पत्यरों के छोटे-छोटे काले और सफेद टुकडो के पहाड वनते और फिर ट्रकों में भरकर उन्हे मकान बनवाने वाले ठेकेदार ले जाते। आस-पास के गांवों और बस्तियों में रहने वाले कुछ मजदूर और उनकी स्त्रियां कारखाने में काम करती थी, कुछ परिवार तालाब के ऊपर, जहां थोडी-थोडी समतल भूमि के वियरे टुकड़े थे, अपनी झोपड़ियां बनाकर वस गये थे और कुछ को काम समाप्त करके अपने बच्चों को अपनी पीठ पर वांधे अपने घरों की ओर रवाना हो जाते थे। वस्ती में रहने वाले भी कुछ लोग कारखाने में काम करने लगे थे। जिनको मिलों और कारखानों में काम करना अपनी हैसियत से नीचा मालूम देता था वे दूसरे लोगों से उनकी चर्चा किया करते थे और बुरे समय और अपने भाग्य की दुहाई दिया करते थे। कारखाने से वस्ती की जिंदगी में थोड़ा-बहुत परिवर्तन अवश्य हुआ था, लोगों को अपना समय काटने का एक और विपय मिल गया था। लाली बैठी हुई धीरे-धीरे कुछ गुनगुना रही थी। उसके बाल हलकी हवा के झोंकों से ऊपर उड़ रहे थे, उसकी चुन्नी खिसक कर उसके कंधे से नीचे लटक रही थी और उसकी आँखों में एक गम्भीरता छायी हुई थी। उसी के पास सुन्दर एक नीचे की ओर झुकती चारपाई पर लेटा हुआ कभी आँखें बंद करके और कभी आँखें खोले आसमान की ओर देख रहा था। उसके चेहरे पर भी पहले की-सी उद्विग्नता और अधीरता नहीं थी, जो बीमारी के पहले दिनों में छा गयी थी। उसके मुख का पीलापन और आँखों की मुर्दनी में शोक या चिन्ता की छाया नहीं थी, उसने अपनी बीमारी को मानो दोनों हाथों से अव वेवस होकर अपने में समेट लिया था, उससे संघर्प करने की अब न तो उसमें शक्ति थी और न ही उसकी इच्छा । सारा दिन चुपचाप लेटे रहना, या कभी-कभी थोड़ी देर के लिए बैठ जाना और सिर चकराने पर फिर लेट जाना—यही उसका कार्यक्रम था। कभी वह दिन- भर सोता रहता था और रात को अँधेरे में आँखें खोल कर लेटे कितने ही विचार उसके मन में आते थे । "सुन्दर, क्या अब भी उठने पर तेरा सर चकराता है ?" लाली ने विना सुन्दर की ओर देखे हुए पूछा। "हं...!" अपनी बीमारी के विषय में सुन्दर किसी से अधिक बातचीत करना पसन्द नहीं करता था। जब वैद्यजी को उसका हालचाल बतलाने कभी देवू या लाली जाते थे तब भी सुन्दर बहुत संक्षेप में उनके प्रश्नों का उत्तर दे दिया करता था। "इस बार जब मुझे अपने सिलाई के 'सेंटर' से रुपये मिलेंगे उनसे मैं तेरे लिए दूध वाँध लूंगी। विना दूध पिये भला तेरी कमजोरी कैसे जा 70 घर बने घर टूटे सकती है...?" "लाली, कोई और वात कर। तू हमेशा मेरी बीमारी की ही क्यों चर्चा किया करती है ?" लाली ने इस बार ध्यान से सुन्दर की ओर देखा, परंतु क्या कभी वह सुन्दर के चेहरे को देखकर उसके मन के भावों को जान सकने में सफल हुई है ? हमेशा ही सुन्दर का चेहरा उसके लिए एक अभेद्य दीवार से कम नहीं रहा। योड़ी देर बाद यकायक लाली हँसने लगी । सुन्दर ने प्रश्नसूचक रष्टि से उसकी ओर देखा। "मैं सोचती हूँ, सुन्दर, कि देबू को अपना ब्याह करवाने का कितना शौक है...अभी परसो उसने लाल झुमको को एक जोडी मुझे लिट्टो को देने के लिए दी थी। मैंने देबू को नहीं बताया, सुन्दर । लेकिन लिट्टो रोने क्यो लगी? वह मुझसे लिपट गयी। और उसने कहा कि मैं उसकी मां से इन झुमकों के बारे में कुछ न कहूँ...एक दिन भाभी भी बतला रही थी कि हुकम ने उसको शादी से पहले एक रेशमी रूमाल दिया था.. लेकिन आज वह भाभी को छोड़कर चला गया...." फिर क्षण-भर बाद हँसी की आवाज में उसने कहा, "और शायद एक दिन देवू भी लिट्टो को हमारे घर छोड़ कर कही चला जायेगा...!" "देबू का ब्याह होली पर क्यों नहीं हुआ, लाली?" "लिट्टो के मां-बाप शायद तब ब्याह करना नहीं चाहते थे, लिट्टो वीमार थी न, सुन्दर...लेकिन अव ठीक हो गयी है वह।" थोड़ी देर बाद सुन्दर बोला, "लाली, क्या हुकम मर गया?" "क्या कह रहा है, सुन्दर ! ऐसी बुरी बातें क्यों मुंह से निकाल रहा है ?" लाली ने तेज स्वर में सुन्दर को देखते हुए कहा। सुन्दर चुप रहा। वह अंधेरे मे डूबती हुई सामने वाली चट्टान को देखते हुए कह रहा था, "मैं जानता हूँ कि हुकम मर गया, तभी उसने एक भी चिट्ठी नही लिखी।" लाली इस वार चुप रही। जब कभी उसके मन में हुकम की विचार आता था तब वह अपने तर्को द्वारा उसे दूर करने का उपाय करती मृत्यु का नने 71 थी। लेकिन सुन्दर के अन्तिम वाक्य को सुन कर उसकी बात का विरोध करने का साहस उसे नहीं हुआ। फिर भी उससे चुप न रहा गया, वह बोली, "वह जानता है कि घर में किसी को उसकी परवाह नहीं है-वह चिट्ठी न भी लिखे तो किसी को उसका दुख नहीं होगा। कभी-कभी तो मुझे ऐसा मालूम देता है जैसे भाभी को भी हुकम की याद कभी नहीं आती।" तभी दीनू रोता हुआ उनकी ओर आया। उसके एक हाथ से खून निकल रहा था और खून के छींटे उसकी कमीज़ और पैरों में भी लगे हुए थे। लाली ने उसका हाथ पकड़ कर पूछा, “क्या हुआ, दीनू...क्या कहीं गिर गया था? ओह, कितना खून निकल रहा है !" दीनू रोता रहा...लाली के हाथ पकड़ने पर और भी जोर-जोर से रोने लगा। "कैसे चोट लगी है दीनू, क्या शीशा चुभ गया?" दीनू रोता हुआ वोला, "एक लड़के ने पत्थर मार दिया...और बड़ा दर्द हो रहा है।" "अभी ठीक हो जायेगा, रो नहीं, मैं पट्टी बांध देती हूँ।" यह कह कर वह उसे झुग्गी के अंदर ले गयी। सुन्दर चारपाई पर उठकर बैठ गया और उसने चारों तरफ़ एक नज़र डाली। ऊपर सड़क पर लोगों के आने-जाने का तांता लगा हुआ था, बायीं ओर रोड़ी कूटने के कारखाने की छोटी-सी इमारत दिखायी दे रही थी और उसकी मशीन चलने की आवाज़ वहाँ तक आ रही थी। सुन्दर का सिर चकराने लगा, अतः ज्यादा न वैठ कर वह फिर लेट गया और उसने अपनी आँखें बंद कर ली। लाली थोड़ी देर बाद आकर फिर बैठ गयी, "भाभी को दीनू से ज़रा भी मुहब्बत नहीं है । कभी उसका खयाल नहीं रखती, न जाने वाहर क्या करती रहती है !" सुन्दर चुप रहा। घर के किसी भी व्यक्ति के विषय में ऊपर से तो कभी ही वह बोला है, बल्कि अन्दर भी कम ही सोचने की कोशिश किया करता था। पहले तो जब वह स्कूल में पढ़ता था तो इस ओर कभी सोचने का मौका ही नहीं मिलता था, केवल पिछले तीन महीनों से, जब से उसकी 72 घर वने घर टूटे पीठ खाट पर लगी है तब से कभी-कभी वह एक-एक व्यक्ति की सूरत अपने सामने लाकर उसके विषय मे सोचा करता था-उसका अतीत, उसके साथ सबधित अतीत की स्मृतियों । और फिर उनके भविष्य को साकार बनाने का प्रयास किया करता था, परंतु प्राय: उसका बहुत-सा समय किसी के भी विषय में न सोचने पर ही वीस जाता था। झुग्गी के अंदर होता तो रसोई का सामान, सूटियो पर टंगे हुए कपड़े, चारपाइयां, इधर-उधर छलांगें लगाती हुई चुहियों आदि को वह देखता और बाहर लेटकर यह कि कौन- कौन से रगो के परिदे झाडियो से उछलते-कूदते है, उनकी चोचो का क्या रंग है, आदि-आदि। कोशल्या दूर पगडडी से नीचे उतरती दिखायी दी। वह एक काला दुपट्टा ओढे यी । लालो और सुन्दर को बाहर बैठे देखकर वह तनिक घबरा- सो गयी, फिर मुसकराने लगी। उसका चेहरा खिला हुआ था। इन रग- बिरंगे कपड़ों में वह बड़ी अजीब-सी लग रही थी। उसका भारी शरीर और ठिगना कद स्पष्ट रूप से ही पहचाना जाता था, मानो उसकी नग्नता इन कपड़ों से भी ढंकी नहीं थी, कोई भी व्यक्ति इस पोशाक के भीतर छिपे हाड़-मांस के टुकड़ों की सही रूपरेखा और आकृति का अदाज सहज मे ही लगा सकता था। हुकम के गायव हो जाने के पश्चात कौशल्या अधिक निखर आयी थी, वह स्वतत्रता से आती-जाती थी और सुभागी के कुछ कहने पर उससे झगड़ा करने के बजाय वह चुप रह जाती थी। "मुझे देर हो गयी, मैं देवनगर मे अपनी मौसी की लड़की के घर चली गयी थी, उससे मिले बहुत दिन हो गये थे।" लाली और सुन्दर दोनी की ओर मुसकराकर देखते हुए कौशल्या ने कहा। सुन्दर दायी ओर की पगडंडी पर फैक्टरी में काम करने के बाद घर लौटते हुए मजदूरों की टोली को देख रहा था, जिनके संगीत का स्वर उसके कानो में पड़ रहा था। लाली बिना किसी मुद्रा के कौशल्या की ओर देखती रही, मानो यह बात जानने का प्रयास कर रही हो कि कौशल्या तक बोला है ! "उनका पक्का मकान है, वह कभी-कभी सिनेमा भी देसती है और कहती थी कि अगले महीने जीजाजी की और भी तरक्की होगी। जीजाजी ने सत्य .
का स्वभाव भी बहुत नरम है, वह वड़ा चाहते हैं सुखदा को। दो महीने पहले उसके लिए एक हाथ की घड़ी ख़रीद कर लाये थे। बहुत किस्मत वाली है, नहीं तो मेरी मौसी के पास तो दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से जुटती थी...." कौशल्या मानो मशीन की तरह बोल रही थी। लाली और सुन्दर की उदासीनता देखकर थोड़ी देर बाद वह झुग्गी के भीतर चली गयी। लाली एकाएक ठहाका लगाकर हँसी जिससे सुन्दर ने चौंककर उसकी ओर देखा, लेकिन उसके हँसने का कारण पूछने की उसमें उत्सुकता नहीं - थी। लाली स्वयं ही वोली, "भाभी कितना झूठ बोलती है ! अभी परसों ही कह रही थी कि सुखदा अपनी माँ के पास फ़िरोज़पुर गयी है, एक ही दिन में क्या वह लौट भी आयी? भाभी शायद भूल गयी थी कि उन्होंने मुझे यह बात बतायी थी, नहीं तो वह कोई दूसरा बहाना बना लेती...और मुझसे कुछ भी कहने की भला क्या जरूरत थी ?" "लाली, मेरी चारपाई अन्दर बिछा दे, मुझे सरदी-सी लग रही है।" सुन्दर बोला। लाली के दिमाग़से क्षण-भर में कौशल्या का विचार भाग गया। उसने गम्भीर भाव से सुन्दर के चेहरे की ओर देखा, "सरदी लग रही है ? तो क्या आज रात को फिर बुखार चढ़ेगा? लेकिन वैद्यजी ने तो दस दिन पहले कहा था कि अब बुखार फिर कभी नहीं चढ़ेगा..." इस बार सुन्दर हंसा, लेकिन उसकी हंसी में आवाज़ नहीं थी। "तू वैद्यजी पर विश्वास करती है, लाली? वह झूठी दिलासा देना जानते हैं और उसके पैसे लेते हैं...वस, इससे ज्यादा और कुछ नहीं जानते।" "हं...तुझे चारपाई पर लेटने की आदत पड़ गयी है...लेकिन जब कभी मैं सोचती हूँ कि अगर इस तरह से मुझे थोड़े-से दिन चुपचाप लेटना पड़े तो मैं जरूर पागल हो जाऊँ। चार-पांच दिन तक तू बिलकुल ठीक रहता है और फिर बुखार चढ़ जाता है, आखिर यह कब तक चलेगा...?" सुन्दर चारपाई पर उठकर बैठ गया था, लाली पहले उसका हाथ पकड़कर झुग्गी के अन्दर ले गयी और फिर उसकी चारपाई उठाने बाहर , 74 घर बने घर टूटे । आयी। हवा हलकी-हलकी चलने लगी थी, जिससे पास ही लगे पेडों के पत्ते खड़खडाने का स्वर पैदा कर रहे थे। लाली के मन में सुन्दर की बीमारी का ध्यान फिर घूमने लगा था, उसकी वाहें कितनी सूख गयी थी, जब कभी वह आधो वाहों की कमीज पहनता था तो उसमें उसकी बांहें ऐसी झूलती थी मानो दो वेजान लकड़ियां हों । उसकी आंखों मे मानो रोशनी नहीं थी, उसकी छाती पहले से ही पिचकी हुई थी और अब तो बिलकुल ही समतल हो गयी थी ! और उसके मास्टर जी कहते थे कि वह जमात मे सबसे तेश है और दसवी में अवश्य ही उसको वजीफ़ा मिल जायेगा । वह सब झूठ था, जो बात वास्तविकता का रूप नहीं घरती उसमें मत्यता का अश नहीं होता। लाली को आंखें भर आयी, उसका मन चीख उठने को करा...तभी सुन्दर ने अन्दर मे चारपाई लाने की आवाज़ लगायी। लाली मानो सोते से जग पड़ी हो। नानकचन्द घर लौटे तो होठो पर थोडी-सी मुसकराहट अपने साथ लाये थे। सुन्दर की तबीयत के विषय में वह पूछते नहीं थे, क्योकि रोज- रोज़ पूछना उन्हें अरचिकर लगता था। सच मायनो में तो उन्हें सुन्दर की बीमारी पर विश्वास ही नहीं था, अगर वह अकेले सुन्दर के साथ होते तो अवश्य ही उसका हाथ पकड़कर उसे कही काम करने भेज देते...लेटे-लेटे तो भला-चंगा आदमी भी बीमार पड़ जाता है । जब कभी सुभागी सुन्दर की बीमारी के विषय में उनसे बात करती थी तो या तो चारपाई पर लेटे- लेटे उन्हें नीद आ जाती थी, या वह किसी अन्य विषय पर सोचने लग जाते थे.... कपड़े उतारते हुए उन्होंने सुभागी की ओर देखकर कहा, "आज शभू- दयाल जी मिले थे। तुम जानती हो न शभूदयाल जी को?" "वही न, जिनके दो सिनेमा रावलपिडी में थे?" "हां हां वहीं, यहां पर उन्होंने अपना एक छापाखाना पहाड़गंज में खोल रखा है। कहते थे कि रात-दिन खोले रहने पर भी काम पूरा नहीं कर पाते...इन चार-पांच सालों में काफ़ी कमा लिया है, पटेलनगर में अपना मकान भी बनवा रहे हैं।" "जिनके पास माया होती है भगवान उन्हें ही और भी देते हैं...किस्मत का स्वभाव भी बहुत नरम है, वह वड़ा चाहते हैं सुखदा को। दो महीने पहले उसके लिए एक हाथ की घड़ी ख़रीद कर लाये थे। बहुत किस्मत वाली है, नहीं तो मेरी मौसी के पास तो दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से जुटती थी...." कौशल्या मानो मशीन की तरह बोल रही थी। लाली और सुन्दर की उदासीनता देखकर थोड़ी देर बाद वह झुग्गी के भीतर चली गयी। लाली एकाएक ठहाका लगाकर हँसी जिससे सुन्दर ने चौंककर उसकी ओर देखा, लेकिन उसके हँसने का कारण पूछने की उसमें उत्सुकता नहीं थी। लाली स्वयं ही वोली, "भाभी कितना झूठ बोलती है ! अभी परसों ही कह रही थी कि सुखदा अपनी माँ के पास फ़िरोज़पुर गयी है, एक ही दिन में क्या वह लौट भी आयी ? भाभी शायद भूल गयी थी कि उन्होंने मुझे यह बात बतायी थी, नहीं तो वह कोई दूसरा बहाना बना लेती...और मुझसे कुछ भी कहने की भला क्या ज़रूरत थी ?" "लाली, मेरी चारपाई अन्दर बिछा दे, मुझे सरदी-सी लग रही है।" सुन्दर बोला। लाली के दिमाग से क्षण-भर में कौशल्या का विचार भाग गया। उसने गम्भीर भाव से सुन्दर के चेहरे की ओर देखा, “सरदी लग रही है ? तो क्या आज रात को फिर बुखार चढ़ेगा? लेकिन वैद्यजी ने तो दस दिन पहले कहा था कि अव बुखार फिर कभी नहीं चढ़ेगा...।" इस बार सुन्दर हँसा, लेकिन उसकी हँसी में आवाज़ नहीं थी। "तू वैद्यजी पर विश्वास करती है, लाली? वह झूठी दिलासा देना जानते हैं और उसके पैसे लेते हैं...बस, इससे ज्यादा और कुछ नहीं जानते।" "हं...तुझे चारपाई पर लेटने की आदत पड़ गयी है...लेकिन जब कभी मैं सोचती हूँ कि अगर इस तरह से मुझे थोड़े-से दिन चुपचाप लेटना पड़े तो मैं ज़रूर पागल हो जाऊँ। चार-पांच दिन तक तू बिल रहता है और फिर बुखार चढ़ जाता है, आखिर यह कब तक सुन्दर चारपाई पर उठकर बैठ गया था, लाली पर पकड़कर झुग्गी के अन्दर ले गयी और फिर उसकी च.. 74 घर बने घर टूटे । आयो। हवा हलकी-हलकी चलने लगी थी, जिससे पास हो लगे पेड़ों के पत्ते खड्खड़ाने का स्वर पंदा कर रहे थे। लाली के मन में सुन्दर को बीमारी का ध्यान फिर धूमने लगा था, उसकी बांहे कितनी सूप गयी थी, जब कभी वह आधी बाहों की कमीज पहनता था तो उसमे उसकी बहिँ ऐसी मूलती यी मानो दो वेजान लकडियां हों । उसकी आँखो में मानो रोशनी नहीं थी, उसकी छाती पहले से ही पिचकी हुई थी और अब तो बिलकुल ही समतल हो गयी थी। और उसके मास्टर जी कहते थे कि वह जमात मे सबसे तेज है और दसवी में अवश्य ही उसको वजीफा मिल जायेगा ।वह सब झूठ था, जो बात वास्तविकता का रूप नहीं धरती उममें सत्यता का अश नहीं होता। लाली की आंखें भर आयी, उसका मन चीख उठने को करा.. तभी सुन्दर ने अन्दर से चारपाई लाने की आवाज लगायी। लाली मानो सोते से जग पड़ी हो। नानकचन्द घर लौटे तो होठो पर थोड़ी-सी मुसकराहट अपने साथ लाये थे। सुन्दर की तबीयत के विषय मे वह पूछते नहीं थे, क्योकि रोज- रोज पूछना उन्हें अरुचिकर लगता था। सच मायनो मे तो उन्हे सुन्दर की बीमारी पर विश्वास ही नहीं था, अगर वह अकेले सुन्दर के साथ होते तो अवश्य ही उसका हाथ पकड़कर उसे कही काम करने भेज देते...लेटे-लेटे तो भला-चंगा आदमी भी बीमार पड़ जाता है। जब कभी सभागो मुन्दर की बीमारी के विषय मे उनसे बात करती थी तो या तो चारपाई पर लेटे- लेटे उन्हें नीद आ जाती थी, या वह किसी अन्य विषय पर सोचने लग जाते कपडे उतारते हुए उन्होंने सुभागी की ओर देखकर कहा, "आज शभू- दयाल जी मिले थे। तुम जानती हो न शंभूदयाल जी को?" "वही न, जिनके दो सिनेमा रावलपिही में ये?" "हाँ-हाँ वही, यहां पर उन्होंने अपना एक छापाखाना पहाडगंज में स्रोल रखा है। कहते थे कि रात-दिन खोले रहने पर भी काम पूरा नहीं कर पाते...इन चार-पांच सालों में काफी कमा लिया है, पटेलनगर में अपना मकान भी वनदा रहे हैं।" "जिनके पाम माया होती है भगवान उन्हे ही और भी देते हैं...स्मित । भी उनका साथ देती है।" लेकिन सुभागी की वात नानकचन्द ने सुनी ही नहीं, "मैंने सुन्दर की चर्चा उनसे की थी, यह भी बताया था कि आठवीं तक अंग्रेज़ी भी पड़ा है। उन्होंने वचन दिया है कि सुन्दर को वह अपने प्रेस में किसी काम पर लगा देंगे, 60-65 तक तनख्वाह भी शायद दे दें...." सुभागी थोड़ी देर कुछ नहीं बोली। उसने एक वार चारपाई पर निकुड़े हुए सुन्दर की ओर देखा, जिसके सर्दी के कारण दांत बज रहे थे, उसके सर्दी लगने पर लाली ने उसके ऊपर मैले कपड़े आदि तक डाल दिये थे। सुभागी ने धीमे स्वर में कहा, "आज फिर सुन्दर को बुखार चढ़ माया है। पहले वह ठीक हो जाये तो नौकरी का भी कहीं-न-कहीं वंदोवस्त हो ही जायेगा..." नानकचन्द के चेहरे की सारी हंसी मानो उड़ गयी। उनका चेहरा क्रोध और खीझ से तमतमा उठा और उसे दवाने में मानो वह अपनी पूरी कोशिश कर रहे थे। थोड़ी देर तक चुप रहने के पश्चात वे बोले, “यह तो हिम्मत ही हार वैठा है, लड़कों को बुखार भी आता है, बड़ी-बड़ी बीमारियाँ भी घेरती हैं और जब वे उठकर खेलने लगते हैं तो सारी बीमारी हवा हो जाती है। दो-चार दिन में फिर तगड़े हो जाते हैं। सुन्दर में तो बीमारी से पहले भी कोई फुर्ती नहीं थी । जव स्कूल में...!" सुभागी ने वात काटते हुए तनिक तीखे स्वर में कहा, "वह स्कूल में कसे अव्वल रहता था...तुमने कभी अपने लड़कों की बड़ाई नहीं की, कभी उन्हें प्यार नहीं किया...हमेशा वे तुम्हारी आँखों का काँटा बने रहे।" सुभागी का गला घ रहा था, "एक तो घर छोड़कर चला गया, मैं दूसरे को इस तरह अपने हाथों से नहीं खोऊंगी, आखिर मेरे क्रियाकर्म में तो यही काम आयेंगे।" नानकचन्द अपने विषय में इतना बड़ा उलाहना सुनकर क्षण-भर के लिए तो चौंक पड़े, फिर उन्हें सुभागी और सुन्दर पर क्रोध आया, परन्तु वह कुछ बोले नहीं । झुग्गी के भीतर सन्नाटा था; केवल चूल्हे में लकड़ियों की चटाख-पटाख हो रही थी और जब वे चुप हो जाती तो सुन्दर के दांत वजने का स्वर फैल जाता था। झुग्गी की छत में दो लकड़ियों के बीच में 76 घर वने घर टूटे जो स्थान ख़ाली था उसमे से आकाश पर चमकते चांद की थोड़ी-सी रोशनी अन्दर आकर फ़र्श पर पड रही थी। देवू सुन्दर की चारपाई के पास ही एक कोने में अघलेटा पड़ा था। सुन्दर के बड़बड़ाने पर लाली ने कंवल के भीतर सुन्दर के माये पर हाथ रखा तो देखा, वह जल रहा था। उसने अपनी बात किसी विशेष व्यक्ति को न सुनाते हुए कहा, "आज सुन्दर को बहुत तेज बुखार मालूम देता है, उसकी सर्दी अभी तक गयी नही..." खाना खाकर सब सो गये। सुभागी कुछ देर तक धीमे स्वर में- 'मेरी विनती सुनो नन्ददुलारे' का भजन गाती रही । आधा भजन गाते- गाते ही कब उसकी आँख लग गयी, इस बात का उसे पता नहीं चला। लाली की आँखो मे नीद नहीं थी। उसे प्रतीत हो रहा था, मानो अपनी सारी जिंदगी वह अब तक सोती रही और अब उसकी आँख बन्द होने से इनकार कर रही थी दुग्गी का आधा दरवाजा खुला था, जिसमे से कभी-कभी लाली बाहर की ओर देख लेती थी। हलकी-हलकी चांदनी मे कुछ पेड़, कुछ चट्टानें और कुछ झाडियां उसे दिखायी दे रही थी, परन्तु स्पष्ट कुछ भी नहीं था, मानो वे सब एक धुध या कोहरे की छाया मे डूबे हुए हो। भांति-भांति के विचार उसके मन में आने लगे. अपने अतीत की स्मृतियां जो इतने वर्ष बीत जाने पर भी आज इतनी ही ताजी हैं मानो वे सब कल की बातें हो। जब उनके बाप को फ़निचर की दुकान थी, खाता-पीता अच्छा घर था, चार कमरों का साफ-सुथरा मकान था । उसे अपने बचपन के दिन याद आये। हुकम, देवू, और लाली. .सुन्दर तब बहुत छोटा था, हमेशा मां के पास ही रहता था । बड़े होने पर भी कभी वह उन लोगो के साथ अच्छी तरह मिल-जुल नही पाया था। वे तीनों खेला करते थे, झगड़ा किया करते थे, माँ से शिकायतें करते थे और रात को नानकचन्द के डर से चुपचाप किताबें लेकर बैठ जाते थे। जब हुकम और देवू की स्कूल की छुट्टी होती थी तो उसे बहुत खुशी होती थी, क्योकि सारा दिन खेलने का प्रोग्राम बनता था ..सदियों में वे अंगीठी के चारों तरफ़ बैठकर कहानियां सुनाया करते थे, हुकम को भूतो की । - बहुत-सी कहानियाँ याद थीं, जिन्हें सुनते वक़्त उसके रोंगटे खड़े हो जाते थे और रात को वह माँ से लिपट कर सोया करती थी, कभी-कभी भूतों के स्वप्न भी उसे आते थे। लाली स्कूल नहीं जाती थी, घर पर ही पड़ोस के पंडितजी उसे हिन्दी, हिसाव पढ़ाने आते थे । हुकम और देवू पंडितजी की हँसी उड़ाते थे, लेकिन लाली मन-ही-मन उनसे घृणा करने पर भी दोनों भाइयों के सामने उनका पक्ष लिया करती थी। एक वार हुकम ने पंडितजी के थैले में मरी हुई चुहिया डाल दी थी, लाली को मालूम था और न जाने क्या सोचकर अपने वायदे को तोड़कर उसने पंडितजी को बतला दिया था कि यह हुकम की शैतानी है, फिर पंडितजी ने नानकचन्द से शिकायत कर दी थी और उन्होंने हुकम को पीटा था। हुकम के पिटने पर लाली को पश्चाताप हुआ था कि उसने क्यों बतलाया ! एक बार मामा की शादी में मां उन चारों को लाहौर ले गयी थी, लाली ने पहले-पहल लाहौर देखा था, उसकी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था, वह छोटे मामा के साथ बाज़ार जाती थी और सजी हुई दूकानों को देखकर उसकी आँखें खुली-की-खुली रह जाती थीं । नानी ने उन सब भाई-बहनों को व्याह के अवसर पर एक- एक उपहार दिया था, हुकम ने मुंह से बजाने का एक बाजा खरीदा, देवू ने चाभी वाली एक मोटर और वह तय ही नहीं कर सकी कि वह क्या खरीदे, क्योंकि चीजें इतनी ढेर-सी थीं। फिर बड़ी मुश्किल के बाद उसने सलमे-सितारों नाली एक जूती खरीदी थी। उसकी पसन्द देखकर हुकम और देबू ने उसका बहुत मज़ाक बनाया था और वह उस रात को खूब रोयी थी...उसे रोते देखकर सब घर वाले बहुत हँसे थे। नानी उन चारों को बहुत प्यार करती थी और अपनी बेटी के सौभाग्य की सब संबंधियों से चर्चा किया करती थी। उसे याद था कि मामा की शादी के बाद लाहौर छोड़ते समय वह कितना रोयी थी...तव नानी और मामा ने माँ से व था कि वे कुछ दिनों के लिए उसे और छोड़ जायें, लेकिन वह राजीन हुई...उसे फिर लाहौर भेजने का वायदा किया था। लेकिन वह फिर क नानी के पास नहीं गयी...स्मृतियों के धागे बढ़ते हुए उलझते गये लाली वास्तविकता की दुनिया से दूर...बहुत दूर होती गयी। उसे दुल्हिन बनने का बहुत शौक़ था, क्योंकि पड़ोस या रिश्तेदारों में 78 घर बने घर टूटे '...
के अवसर पर जब कभी वह वहाँ जातो यो तब हमेशा दुल्हिन को गहनों, और अच्छे अच्छे कपड़ो में लदे उसने देखा था और वह मोचती थीfr दुल्हिन बनने पर वह भी इस प्रकार सजे-बनेगी, उनके घर भी वारे वरंग और ढोलक पर गीत गाये जायेंगे। जब कभी कोई पड़ोमिन पृथ्वी हि उसका ब्याह कैसे होगा तो वह चुनरी का चूंघट काढ़कर बसना चहा छिपा लेती थी और पड़ोसिन हंस पडती थी और उनकी हमी में लाली भी खुश हो जाती थी.. उस बात को गुज़रे एक अरसा बीत गया। लेकिन अब उस तरह की दुल्हिन बनने का चाव खत्म हो गया, लेकिन एक पुरुष के साथ अलग घर बसाने का आकर्षण तो है ही जो हर एक लड़को में होता है । अपने भविष्य के सुनहरे सपने उसने कभी नही देखे, लेकिन भविष्य के लिए वह सोचती नही है ऐसी बात तो नही थी। अपने विचारो मे लाली इतना खोयी हुई थी कि सुन्दर के लगातार बड़बड़ाने की आवाज उसने नहीं सुनी। परन्तु जव हलकी-मी चीप उगई, मुंह से निकली तो लाली अनायास ही चौक पडी। उसने मुन्दर के पेट में कम्बल उठाकर एक बार उसके माथे को छुआ और फिर झुककर धीम पूछा, "क्या है, सुन्दर ? क्या अब भी सर्दी लग रही है ..?" "दुनिया गोल है, मास्टरजो.. जब-जब सूरज या चांद पर ग्रहण परदा है तो जमीन की छाया गोल वनकर पडती है . क्या मुझे वीजा लि सकता है, मास्टरजी. हा-हां, मेरे बाबूजी के पास मेरे पढ़ाने के दिन नहीं हैं, मैं...अब स्कूल छोड़ दूंगा, कही नौकरी कर लूंगा, मेरा बहाना बेकार है, मास्टरजी...!" लाली ठिठक गयी...उसने सुन्दर के माथे से चुपचाप हाय हटा लिया। शायद इस प्रकार बडबडाकर मुन्दर का जी हलका हो जांवर - बात वह होश से कभी नहीं कहता था, उन्हें वेहोशी की हार वतायेगा। लाली भी जानना चाहती थी कि सुन्दर को काम वह क्या सोचता है ? सुन्दर का बडबड़ाना जारी था, मान- बोल रहा हो...टूटा-फूटा रेकर्ड, जिसके वाक्य पूरे नहीं है क्रम से नहीं आते-"लेकिन में पढ़ना चाहता हूँ, मातरजी... रह सकता...मुझसे चाय की दुकान पर नहीं बैठा जायेंश मुझे नफ़रत है, अगर...अगर मेरा बस चलता तो मैं उसका खून कर देता... अव मैं अच्छा नहीं हो सकता...मेरा सारा बदन टूटा करता है...मेरा सर धूमता रहता है...मैं खड़ा नहीं हो सकता...मुझसे बैठा नहीं जाता...मैं अपनी सारी किताबें जला दूंगा। बाबूजी को मेरा घर पर भी पढ़ना अच्छा नहीं लगता, वह मुझे कामचोर समझते हैं...हे भगवान...अब उठा ले...!" अचानक लाली के मुंह से बड़े जोर की एक चीख निकली, जिसका उसे पता नहीं लग सका। उसकी चीख से सुन्दर का बड़बड़ाना बन्द हो गया और झुग्गी में सोये सब लोग जाग उठे और "क्या हुआ...क्या है लाली, तू चीखी क्यों?" प्रश्न पूछने लगे। लाली क्षण-भर तक चुप रही और फिर उसने सारी घटना को महसूस किया । वह अधीर स्वर में बोली, "सुन्दर बहुत बीमार है, तू वैद्यजी को बुला ला, देबू ।" देबू अपने बिछौने पर लेटा हुआ वहीं से लालो की ओर देख रहा था। नानकचन्द वोले, "तुम सब घर वालों को हो क्या गया है ? ज़रा बुखार चढ़ गया तो आधी रात को वैद्यजी को बुलाओ...तुम्हीं लोगों ने सुन्दर की बीमारी को दुगना कर दिया है... सुभागी ध्यान से लाली की जोर देख रही थी, उसे मालूम था कि सारे घर में लाली को सुन्दर की बीमारी की सबसे अधिक चिंता है । वह शान्त स्वर में बोली,"घबराने की कोई वात नहीं है, लाली। इस तरह का बुखार तो सुन्दर को कितनी बार चढ़ा है, सवेरे तक न उतरा तो देवू वैद्यजी को - बुला लायेगा।" - लाली रोने लगी। झुग्गी में अंधेरा होने के कारण किसी को उसके आँसू दिखायी नहीं दिये। नानकचन्द ने तनिक सख़्त और सर्दीले स्वर में कहा, "अव सो जाओ। रात को तो चैन से सोने दिया करो, किसी को बुख़ार है तो कोई चीख़ता है.......!" यह कहकर वह फिर लेट गये और कम्बल मुंह पर डाल लिया। सुभागी लाली को अपने विछोने पर ले आयी और लाली ने सुभागी से लिपटकर अपने दाँत भींच लिये, आवाज़ निकलने पर उसे नानकचन्द के .80 घर बने घर टूटे डांटने का भय था। सुबह सुन्दर की हालत काफ़ी बिगड़ गयी। उसके होठ हिल रहे थे, लेकिन उनमें से कोई आवाज नहीं निकल रही थी। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें खुली थी, लेकिन ऐसा प्रतीत होता था मानो उसे कुछ दिखायी न दे रहा हो । पड़ोस की झुग्गी में रहने वाले शामलाल को थोडी-बहुत नब्ज देखनी आती थी सो लाली उसे बुला लायी; उसने नाड़ी देखकर कहा कि मेह निश्चित रूप से नही चल रही है, लेकिन वैद्यजी को बुला लिया जाये। नानकचन्द ने सब घर वालो को सुन्दर की चारपाई के आस-पास खड़े देखा तो वह चुपचाप बिना किसी से कहे-सुने जल्दी ही अपनी दुकान खोलने के लिए चले गये। अपने घर वालो की कोई भी बात उन्हे पसन्द नही आती थी। देवू वैद्यजी को गुरुद्वारा रोड से बुला लाया। मुन्दर का निरीक्षण वह काफी देर तक करते रहे, कभी उसकी नाड़ी देखते, कभी उसके पेट को देखते और कभी उसकी छाती की हड्डी को बजाकर देखते । फिर ऐनक उतारकर एक नज़र सब घर वालो पर डालते हुए उन्होंने इस ढंग से बोलना आरम्भ किया मानो जज किसी मुकदमे का फैसला सुना रहा हो-"बीमारी ने शायद कोई नया रख अख्तियार कर लिया है, सांस ठीक से नहीं आ रही है लेकिन घबराने की कोई बात नही है, मैं अभी देवू के हाय दवा भिजवा दूंगा । मेरी दवाई ने मरते हुए लोगो को मौत के मुंह से बचाया है और बाकी तो सब उसके हाथ मे है। इसान के किये से क्या होता है ?" आसमान पर वादल छाये हुए थे और सूरज उनकी घनी चादर के भीतर छिप गया था। बस्ती में अन्य दिनों की भांति ही प्रात काल से जिंदगी के निशान उभरने आरम्भ हो गये थे। स्त्रियां, और जिन घरो मे स्त्रियां नहीं थी वहां के मर्द बालटी, वटलोई, पीपे लिये नल की और पानी भरने के लिए चले जा रहे थे और परस्पर बातें करने का तो कोई अन्त ही नही था । कारखाना रात-भर तक खामोश रहने के उपरान्त फिर अपने नियमित स्वर मे चिल्लाने लगा था। लाली, जो प्रात काल से ही सुन्दर के सिरहाने बैठी यो, वहाँ से उठी ही नही । सुभागी ने एक गिलास चाय का घर बने घटे 21 - और रात की रखी एक रोटी उसे दी तो लाली ने इनकार कर दिया। सुन्दर चुप था, विलकुल चुप। उसने वैद्यजी की दवा खाकर अपनी आँखें वन्द कर ली। सुवह उसके चेहरे पर जो थकान और असीम पीड़ा के चिह्न थे वे अब वहाँ नहीं थे, मानो बड़ा दुर्गम रास्ता पार करके कोई व्यक्ति शांति की आहें भरता हो, जिनमें मौत की कठिनाइयों की केवल स्मृति ही रहती है। सुन्दर सो गया। सुभागी पास ही के देवी के मंदिर में पूजा करने चली गयी। कौशल्या नल पर जो पानी भरने गयो सो दो घंटों से पहले नहीं लौटी। लाली ने देवू से कहा कि वह आज काम पर नहीं जाये । और देबू मन-ही-मन लाली की आशंका पर हँसा था, लेकिन लाली का कहना वह नहीं टाल सका। वचनसिंह से कहकर वह फिर वापस लौटकर झुग्गी के दरवाजे पर आकर बैठ गया और वीड़ी के कश खींचने लगा। उस रात को सुन्दर चल बसा। उसने बहुत देर तक घर वालों को मृत्यु और जीवन की उधेड़बुन में डाले नहीं रखा । वैद्यजी के आने से पहले ही उसने अपनी आखिरी साँस ली । नानकचन्द खाना खाकर शामलाल की झुग्गी में बैठे हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे, तभी सुभागी के ज़ोर-जोर से रोने की आवाज़ सुनकर वह उठ खड़े हुए, परन्तु स्थिति इतनी ख़तरनाक हो गयी है इस बात पर उन्हें विश्वास नहीं हुआ। चलते समय शामलाल से बोले, "मेरे घर वाले पागल हो गये हैं, जब उन्हें और कोई काम नहीं होता तो दूसरों की मौत की घंटी बजाने लगते हैं...।" अन्त समय तक उन्हें विश्वास नहीं था कि सुन्दर इस प्रकार मर सकता है। जिस धागे में उसका जीवन झूल रहा था उसके इतना कच्चे होने की आशंका उन्हें नहीं थी, और अचानक सुन्दर की मृत्यु से उन्हें मानो काठ मार गया, वह चुपचाप सुन्दर के मृत चेहरे की ओर देखते रहे। सुभागी की चीखें सारी वस्ती में रात के सन्नाटे में एक भयानक दृश्य पैदा कर रही थीं। वह सुन्दर से लिपट-लिपटकर रो रही थी, उसके बाल खुल गये थे, जिन्होंने सुभागी के चेहरे को और भी विकृत बना दिया था। लाली और देवू-दोनों चुप थे। देबू चारपाई के पास ही खड़ा था। लेकिन लाली सारा दिन सुन्दर के सिरहाने बैठने के पश्चात अब एक कोने में 82 घर वने घर टूटे - दुबकी हुई बैठी थी, उसके यात विखरे हुए थे और आँखो के नीचे काले गड्ढे पड़ गये थे। कितने ही पडोसी आये और अपनी सहानुभूति दिखाने लगे, जिन गुणों को किसी ने सुन्दर मे नहीं देखा था, उनका वर्णन करने लगे और फिर 'परमात्मा की मर्जी', 'किस्मत का खेल' आदि वाक्यों से वे परिवार वालों को दिलामा भी देते जा रहे थे। सुभागी जो एक वार लेटी तो उसे नीद ने आ घेर लिया। परिवार के अन्य सदस्य भी या तो पूर्ण रूप से सो गये थे, या अर्द्धजाग्रत अवस्था में थे। देवू कुछ देर तक पड़ोसियों को भीड से पीछा छुड़ाने के लिए बाहर चांदनी में बस्ती के चक्कर लगाता रहा, फिर लौटकर अपने विछोने पर लेट रहा । लाली देर तक वैठी रही, किसी का ध्यान उसको ओर नहीं गया। काफ़ी रात बीत जाने के बाद वह अवानक अपनी जगह मे उठ खड़ी हुई और कुछ देर तक सुन्दर के ढेके शरीर की ओर देखती रही, फिर उमने धीरे से चादर उठायो और सुन्दर के मुंह पर अपना सिर रखकर वह फूट-फूटकर रोने लगी। उसकी हिचकियां बंध गयी। शभूदयाल का 'नया हिंदुस्तान प्रेस' पहाडगज में पुल की ओर जाने वाली सड़क से थोड़ा पहले था। बगल में लड़कियों का एक स्कूल था जिसका प्रवन्ध एक मिशिनरी सस्था के हाथों में था। दूसरी ओर कागज, स्टेशनरी आदि की दुकानें थी। सड़क के पार 'टिम्बर मर्चेन्टस' थे, जिनके बडे-बड़े साइनबोई उनकी दुकानों की वास्तविकता को छिपाने का विफल प्रयास किया करते थे । सडक पर सुबह से लेकर रात तक मोटरी, बसो, तांगों और बैलगाड़ियो का तांता लगा रहता था, कभी-कभी तो किसी लॉरी के कल-पुों में कोई खराबी हो जाने पर उसके रुक जाने के कारण पीछे दूर- दूर तक ट्रेफिक बन्द हो जाता था और मोटरो के हॉर्न और तांगे वालो की आवाजें सुनायी देने लगती थी। दिन में रेलगाडियो के आने-जाने की आवास और इंजनो की सीटियां भी सुनायी देती थी। थोडी दूर आगे सहक मे लेकर कार प्रेस तक की जमीन पर घास-फूस, चीथडो आदि को 20-25 झोप- ड़ियाँ बनी हुई थीं जिनमें मजदूर, भिखारी आदि अपने परिवारों सहित रहा करते थे । बारिश पड़ने पर सड़क पर तालाव से बन जाते थे और किसी मोटर या लॉरी के गुजरने पर उसके छींटे दूर-दूर तक उड़ते थे। देवू इसी कारखाने में काम करने लगा। सुन्दर की मृत्यु के कुछ दिन पश्चात उसे अचानक याद आया कि एक दिन नानकचन्द सुभागी से कह रहे थे कि सुन्दर को शंभूदयाल अपने प्रेस में नौकर रख लेंगे और 60 या 65 रुपये वेतन दे दिया करेंगे...जव सुन्दर वहाँ काम कर सकता था तो उसे भी वह नौकरी मिल सकती थी, वह सुन्दर से बड़ा था और काम भी वह ज्यादा कर सकता था, उसे काम करने की आदत भी थी। उसी दिन शाम को उसने नानकचन्द से इस विषय में बात की। वह चुपचाप देवू की बात सुनते रहे, न कुछ बोले और न ही उत्साह दिखलाया। देबू क्रोधित होकर उठा, जव नानकचन्द इतने उदासीन हैं तो शायद ही वह उसे यह नौकरी दिलवा सकेंगे और वह विना अधिक कहे-सुने वहाँ से उठ आया। लेकिन तीन-चार दिन बाद दुकान बन्द करके लौटने पर उन्होंने देवू को 'नया हिंदुस्तान प्रेस' का पता ठीक से बता दिया और कहा कि वह अगले दिन सुबह दस बजे प्रेस में जाकर शंभूदयाल से मिल ले। तव भी देवू ने उनके चेहरे पर कोई खुशी या उत्सुकता नहीं देखी। देव को सुबह आठ बजे से लेकर शाम के छः बजे तक प्रेस में काम करना पड़ता था। शुरू-शुरू में उसे कितावों और अखवारों के वरकै मोड़ने का काम मिला । प्रेस के पीछे छोटे-से कमरे में वह अन्य लोगों के साथ दरी पर बैठ जाता और वे आपस में बातें करते हुए बड़ी फुर्ती के साथ काग़ज़ों को मोड़ते जाते, कभी-कभी कोई बहुत थक जाने के पश्चात एक बीड़ी सुलगा लेता और अपनी कमर सीधी करता। सड़क पर बैठकर साइकिलों का काम करते-करते इस प्रकार खुले आम काम करने की जो शरम-सी होती है वह उसमें अव शेष नहीं बची थी और अब अँधेरे कमरे में बाहर की दुनिया से दूर यह काम करना पहले-पहल उसे तनिक नया-सा लगा, आगे मशीनों की नियमित खटाखट का स्वर गूंजता रहता था। एक बजे खाने की छुट्टी आधा घंटे के लिए होती थी, जब प्रेस में काम करने वाले 12-15 व्यक्ति प्रेस के आगे वरामदे में या पीछे वाले दालान में अपनी- 84 घर वने घर टूटे । अपनी टोलियां बनाकर बैठ जाते और कपडे या कटोरदान में वन्द सुबह की बनी रोटियां, दाल-सब्जी वगैरह निकालकर खाते और फिर तबाकू पीने वाले लोग वीडियों और सिगरेटें सुलगा लेते। पिछले वरामदे में खड़े होकर स्कूल का खेलने का मैदान साफ दिसायी देता था और एक बजे उनको भी खाने को छुट्टी होती थी, तव प्रेस में कुछ कम उम्र वाले मजदूर वरामदे मे खडे होकर स्कूल के वाग की ओर ध्यान से देखा करते थे और लड़कियो के सबंध मे आपस में हंसी-मजाक किया करते थे और फब्तियां कसा करते थे। उनके लिए यह समय सबसे अधिक मन-बहलाव का था और इसकी बडी उत्सुकता से बाट जोहा करते थे। आपस की बातचीत घर के बच्चो, उनकी बीमारियो, नयी शादियों से लेकर सिनेमा, सरकस और विलायत को खवरो तक होती थी। कुछ लोगो को अखबार पढ़ने का शौक था और वे शाम को काम से लोटने पर अपने पड़ोसी या अखबार वाले की दुकान पर ही बैठकर अख़बार पढा करते थे और दूसरों को अपना ज्ञान जतलाने के लिए अगले दिन दूसरे लोगो मे उन समाचारों की चर्चा किया करते थे। जल्दी ही देवू का परिचय प्रेस में काम करने वाले लगभग सभी लोगों में हो गया, परन्तु न तो देवू इतना पढ़ा-लिखा था, न ही उसके शारीरिक गठन में कोई विशेष आकर्षण था और न ही उसकी जिंदगी के अनुभव इतने सनसनीदार थे कि कोई व्यक्ति उसके व्यक्तित्व से विशेष रूप से प्रभावित होता। वह एक साधारण व्यक्ति था, जिसमे दूसरो को दिलचस्पी नहीं होती। उसे न वे चुटकुले आते थे जिससे दूसरो को हँसाता; न ही उसे वे सनसनीदार रोमांचकारी घटनाएं मालूम थी जिन्हें सुनने की दूसरों को उस्मुकता होती। लोग उसका मुसकराकर स्वागत करते थे और बदले में वह भी हंस देता था, खाने की छुट्टी में वह दूसरों की बातें सुना करता था और कभी-कभी कोई छोटा-सा वाक्य भी कह देता था जिसकी ओर किसी का ध्यान नहीं जाता था। प्रेस में जाने के दो-तीन दिन बाद नानकचन्द ने दुकान से देवू को नौली धारियों वाली एक कमीज़ और फोज की एक खाकी पैट ला दी थी। यद्यपि पैट कमर से काफी खुली हुई थी, परन्तु फिर भी उसे पहनकर वह बाहर निकला तो हृदय में उसे अपनी पोशाक का ध्यान हो आया, उसे राह चलते ऐसा प्रतीत होने लगा था मानो सड़क पर चलते सब लोग उसकी तरफ़ ध्यान से देख रहे हों। बस्ती के अन्य लोगों से भी बातचीत करते समय वह महसूस करता था कि छोटी-छोटी दुकानों, रोड़ी कूटने के कारखाने, रेस्तरां आदि में काम करने वाले-~~इन सब लोगों की अपेक्षा उसे एक ऐसा सम्मानित पद प्राप्त था जो इन सबसे कहीं ऊँचा है। वह प्रेस में जाने से पूर्व शीशे के सामने खड़े होकर काफ़ी देर तक वालों पर कंघी करता, कमीज़ के कालर को दवाता और पैंट की सिलवटें दूर करता। तयार होते समय उसकी आँखों के सामने शंभूदयाल का पुत्र रामदयाल घूम जाता था जो अपने बालों में सुगंधित तेल लगाता था, अच्छी तरह से प्रेस किया हुआ सूट और लाल फूलों या किसी स्त्री की शक्ल बनी हुई वाली टाई पहनता था और उसके काले चमचम करते जूतों पर कभी एक क़तरा धूल का नहीं होता था। रामदयाल तीन-चार घंटों से ज्यादा प्रेस में नहीं बैठता था, वह अपने पिता के सामने सिगरेट और पाइप पीता और फिर अपनी छोटी-सी कार में गायब हो जाता था। काग़ज़ मोड़ने वाले कमरे से रामदयाल की मेज़ दिखायी देती थी और जब रामदयाल दफ़तर में होता तो देबू की नज़र बार-बार उसकी मेज़ की ओर चली जाती थी। यह बात नहीं कि देवू ने पहले सड़क पर चलते या कारों में बैठे अच्छी पोशाक पहनने वाले पुरुष-स्त्रियों की सराहना न की हो, परन्तु इतने समीप से किसी को देखने का अवसर उसे प्राप्त नहीं हुआ था और अब प्रेस में नौकरी कर लेने के बाद उसकी स्थिति भी बदल गयी थी। 70 रुपये का वेतन उसे 700 रुपये से कम नहीं मालूम पड़ता था, घर में भी उसके प्रति जो उदासीनता थी वह समाप्त हो गयी थी। प्रेस में काम शुरू करने के वाद तीसरा दिन शायद उसकी स्मृति से कभी दूर नहीं होगा। उस दिन छः बजे अपनी हाज़िरी समाप्त होने के पश्चात वेसिन में हाथ-पैर धोकर उसने धुंधले से शीशे में अपने बाल बनाये और वह सबसे बाद में प्रेस से निकलने लगा । संयोगवश उस दिन शंभूदयाल काम लेने के लिए नयी दिल्ली में किसी प्रकाशक के यहाँ गये हुए थे, जिससे रामदयाल को प्रेस में बैठना पड़ा था। काम कुछ नहीं था और वह 86 घर बने घर टूटे , नीली कार्डराय की पतलून और कफ़ लगी सफेद कमीज पहने अपनी कुर्सी पर आराम से बैठा किसी साप्ताहिक पत्रिका के पन्ने उलट रहा था। कभी-कभी वह वाहर की ओर भी झांक लेता था और भीड़ में जब किसी पर निगाह जाकर टिक जाती तो क्षण-भर वह उसी ओर देखता रहता था। सिगरेट उसके होठो में लगी थी और विलायती क्रीम में सने वाल चमक रहे थे। उसका चेहरा भरा हुआ था और रग भी साफ था, कुछ लोग उसे सुन्दर समझते थे, परन्तु उसकी आँखो में एक ऐसी छाया थी जिससे उसका चेहरा कुछ विकृत-सा लगता था। देवू को अपने पास से गुजरते देखकर रामदयाल ने आवाज लगायी, "ऐ, सुनो...!" देवू ठिठक गया। "तुमने अभी हाल मे ही प्रेस मे काम करना शुरू किया है न?" देवू रामदयाल के इतना समीप खड़े होने के कारण घबरा-सा गया था। जिन कपड़ो को वह बड़े शान से वस्ती के दूसरे लोगो को दिखलाता था, उन्ही से रामदयाल के सामने उसे लज्जा-सी आने लगी। जिस व्यक्ति को दूर से देखकर वह उसे अपना ही एक आदमी समझने लगा, उसके पास खडे होकर क्षण-भर के लिए उसके मन में उसके प्रति घृणा उभर आयो। उसने गरदन हिला दी, उसके मुख से आवाज नहीं निकली। रामदयाल उसे देखकर हँसने लगा, जिससे देवू का चेहरा कनपटियो तक लाल हो गया। "तुम्हारी क्या उम्र है ?" "जी...यही कोई 23 साल की...।" देवू को घबराहट बढ गयी थी। "तुम्हारा नाम ?" "जी...देबू ।" उसे अपने नाम से भी घृणा होने लगी थी, उसे अपने मां-बाप पर क्रोध आ रहा था कि उन्होंने उसका ऐसा नाम क्यों रखा? 'रामदयाल' नाम में एक प्रकार का बडप्पन है, उसे सुनकर कोई उसके बच्चे होने की कल्पना नहीं कर सकता और 'देवू' नाम ऐसा लगता है जैसे स्कूल का कोई बच्चा हो। "देवू-नाम बहुत अच्छा है। अच्छा देबू, बताओ, तुम्हें प्रेस का काम कसा लग रहा है ?"
"जी, बहुत अच्छा । मैं...मैं धीरे-धीरे काम सीख जाऊँगा, आप फ़िक न करें। रोशनलालजी कह रहे थे कि वरके मोड़ने मैं सीख गया हूँ और अब थोड़े ही दिनों में तेज़ रफ्तार के साथ मोड़ने लगूंगा। आप रोशन- लाल जी से पूछ लीजियेगा।" एक भयभीत बनाने वाली आशंका देवू के मन में घर करती जा रही थी। रामदयाल के प्रश्न पूछने पर उसे ऐसा लगा था कि शायद वह उसके काम से संतुष्ट नहीं हैं, तभी स्पष्ट रूप में न कह कर घुमा-फिरा कर वह बातें कह रहे हैं । अन्यथा रामदयाल प्रेस के किसी भी काम करने वाले से कोई बातचीत नहीं करता, उसकी ज़िम्मे- दारी शंभूदयाल पर थी। रामदयाल फिर हँसने लगा। उसने सिगरेट को ऐश-ट्रे में बुझा दिया और स्वयं पैरों को फैलाकर सुस्ताने लगा। "तुम पहले कहाँ काम करते थे, देवू ?" इस प्रश्न से देवू और भी घबरा गया। वह झूठ बोल देना चाहता था, लेकिन डर से वह नहीं कह सका। शायद नानकचन्द ने शंभूदयाल को बता दिया होगा कि वह पहले कहाँ काम करता था। उसने धीमे स्वर में उत्तर दिया,"जी...ऐसे तो मेरे वाप की दुकान है, वहां बैठता था, लेकिन... दो-तीन घंटे और कभी-कभी सारा दिन साइकिल की दुकान पर काम करता था। कमाने के लिए कुछ-न-कुछ तो इंसान को करना ही पड़ता - "हाँ-हाँ, सो तो है ही, कुछ-न-कुछ तो हर एक को करना ही पड़ता है । मैं प्रेस में बैठता हूँ...." थोड़ी देर चुप रहकर उसने सिगरेट के डिब्वे में से एक और सिगरेट निकाली और अपने होंठों पर लगा ली, "तुम सिगरेट पीते हो, देबू?" "कभी-कभी पी लेता हूँ...!" रामदयाल ने एक सिगरेट निकालकर उसकी ओर बढ़ायी। "नहीं..." देवू की आश्चर्य में आवाज नहीं निकल रही थी, "मेरी तवीयत नहीं है, मैं...मैं बहुत कम पीता हूँ।" रामदयाल ने हँसते हुए कहा, "अच्छा, अपने पास रख लो, घर जाकर पी लेना।" 88 घर बने घर टूटे देवू ने धीरे-से हाथ बढ़ाकर सिगरेट कमीज़ को जेब में रख ली। उसका दिल बहो उछलने लगा था और जो हर बातचीत के आरंभ में गा था, वह धीरे-धीरे दूर होता जा रहा था। वाहर धीरे-धीरे अंधेरा बढने लगा था। कभी-कभी बाहर मोटरों और लॉरियो के हॉर्न इतने जोर-जोर से बजने लगते थे कि अदर आवाज नना कठिन हो जाता था । जब रामदयाल की नजर किसी दूसरी ओर ताती तो देबू उसको कनखियों से देख लेता था। देबू को उसके कपड़े पसंद साये, उसको पीली टाई मे सफ़ेद फूल अच्छे लगे और उसकी पैंट की क्रीज की उसने सराहना की, परतु एक-आध बार ध्यान से उसके चेहरे की ओर रखकर उसे जग्गी का चेहरा याद आने लगा जिसे देखकर उसे डर लगने लगता था। उसके सम्मुख मुक्खासिंह का चित्र खिंच गया, जब उसने रजसिंह को पीटा था और फिर पीले-पीले गदे दांत बाहर निकाल दिये ने, जो मुद्रा उनमे थी वही रामदयाल के चेहरे पर भी दिखायी दी। परंतु हग्गी और मुक्खासिंह से कभी-कभी उसे नफ़रत हो जाती थी, परतु रामदयाल के विषय में इस प्रकार का कोई विचार उसने जबरदस्ती नही आने दिया। "डंडी कहते थे, देवू, कि तुम लोग भी हमारे ही शहर में रहते थे। वहां डैडी के तुम्हारे पिताजी से अच्छे-खासे ताल्लुकात थे। मुझे तो वस गार्डन कॉलिज की याद है जब मैं सेकड ईयर मे पढा करता था...वे दिन शायद कभी भूल नही सकूँगा। हाऊ लवली...और अव में यहाँ प्रेस में बैठता हूँ। मेरे पास कार है, शाम को गेलार्ड में बैठकर व्हिस्की पीता हूँ अच्छा देवू, तुम कभी 'गेलाडं' गये हो ?" अचानक रामदयाल देबू की ओर देखकर पूछ बैठा। देवू फिर घबरा गया था। अपनी अज्ञानता का परिचय न देना चाहता था, परंतु 'हाँ' कहकर यदि कोई नयी समस्या सामने आ खडी हुई तो फिर उसे सुलझाने में जो कठिनाई पड़ेगी...वह चुप हो रहा। "गेलाडं यहां का सबसे मशहूर रेस्टोरेंट है, देव...ओह, डैडी अभी तक नही आये...!" अचानक उसने कलाई पर लगी घड़ी की ओर देखते हुए कहा, "मेरा एपांटमेंट है, कभी-कभी तो बस डंडी को मेरा ख़याल ही घर बने घर टूटे 8902 , - नहीं रहता। अच्छा देवू, सामने की अलमारी में से एक सोडे की वोतल और गिलास ले आओ...।" देवू तत्काल ही अलमारी में से सोडा और गिलास ले आया। रामदयाल ने मेज़ की दराज में से एक बोतल निकाली, "तुम थोड़ी व्हिस्की पिओगे, देवू?" देवू ने इस बार ज़ोर से गरदन हिला दी, "अच्छा, मुझे देर हो रही है, दयाल साहब..." रामदयाल हँसने लगा, "अच्छा, किसी और दिन पिलाऊँगा तुम्हें..." जव देवू प्रेस के बाहर निकला तो शाम हो चुकी थी। सड़कों की वत्तियां जल गयी थीं। सड़क पर भीड़ भी कम हो गयी थी। पटरियों पर सब्जियाँ, फल और दूसरा सामान बेचने वाले जोर-जोर से चिल्लाकर राह चलती भीड़ का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश कर रहे थे। देवू ने अपनी जेब टटोली तो छ: आने थे। उसने पास ही के रेस्टोरेंट में बैठकर एक प्याला चाय पीने की सोची। प्रेस की नौकरी से उसका हाथ तनिक खुल गया था और आज तो रामदयाल के साथ बातचीत करके उसके मन में आशा की जो किरन फूटी थी उसके उपलक्ष में वह खुश होना चाहता था। गरम-गरम चाय पीने के साथ उसकी विचारधारा रामदयाल की ओर ही केंद्रित थी। रामदयाल कभी भी प्रेस में काम करने वालों से इस प्रकार की मैत्रीपूर्ण बातें नहीं करता। उसने दूसरे लोगों से रामदयाल की निंदा ही सुनी थी कि उसके मन में दया लेशमात्र को भी नहीं है। जब कभी वह किसी को सुस्ताते हुए देखता तो ज़ोर-जोर से डाँट देता.। एक- आध हलकी गाली भी उसके मुख से निकल जाती थी। एक बार तो उसने एक मजदूर के तमाचा लगा दिया तो दूसरे लोगों ने शंभूदयाल से इस विषय में शिकायत की। शंभूदयाल ने समझा-बुझाकर उन्हें शांत किया। और वही रामदयाल आज उससे घुल-मिलकर बातें करता रहा। अव जल्दी ही उसकी तरक्की भी हो जायेगी, परंतु वह किसी से इस विषय में कुछ नहीं कहेगा, वेकार में दूसरे लोग जलेंगे। 90 घर वने घर टूटे जब तक सिगरेट खत्म न हुई तब तक उसे रेस्टोरेंट से उठने का विचार नहीं आया। यदि सिगरेट का अंत न होता तो उसकी विचार-शृखला भी कभी न टूटती। रेस्टोरेंट के रेडियो से फिल्मी रिकॅर्ड बड़े तेज स्वर में वज रहे थे, परतु देवू का ध्यान उस ओर नही था। उस दिन के बाद तो देवू को अपने कपडो, जूतो आदि का विशेष ध्यान रहता। प्रात प्रेस जाने से पूर्व वह अपना बहुत-सा समय हाय-मुंह घोने में लगा देता था। जिंदगी मे पहली बार ध्यान से उसने अपना चेहरा शीशे में देखा था। नहीं, उसका चेहरा बदमूरत नहीं है, यदि वह रामदयाल की भांति सफेद रेशमी कमीज़, क्रीज़ वाली गरम पंट और पालिश किये हुए काले जूते पहन सकता तो अवश्य ही वह रामदयाल से अधिक सुदर दिखायी देने लगता। कपडो से इसान का रग-रूप भी निखर जाता है। जब से उसने नीली धारियो वाली कमीज और पेट पहननी आरभ की है और ठीक से वायी तरफ़ वालो की 'मांग' निकालनी शुरू की है तब से दो- तीन वार वस्ती के लोग उससे मिलने पर उसकी कायापलट पर आश्चर्य प्रकट करते थे और कहते थे कि वह पहचाना भी नहीं जाता और वह मन- ही-मन बहुत खुश हुआ था। उसने सोचा था कि अगले महीने अपने वेतन मे से वह अपने लिए कुछ कपड़े बनवा लेगा। एक दिन शाम के समय प्रेस से लौटकर वह अपनी कमीज़ पर बटन टॉक रहा था और सीटी बजाता जा रहा था। लाली सुभागी के साथ किसी संबधी के घर गयी हुई थी और कौशल्या चूल्हे के पास बैठी रोटियां बना रही थी। देवू कभी कौशल्या के साथ विना झिझक के नही बोला था। जव हुकम की शादी हुई थी तो देवू को इतनी उम्र थी, जब किसी भी लड़की को अपने सामने देखकर वह घबरा-सा जाता था और शरम से उसके गाल लाल हो जाते थे। ऐसे ही समय कौशल्या उनके घर आयी थी और पहले पहल तो देवू उसकी छाया से दूर भागा करता था। कौशल्या ने भी देवू के विषय में कोई उत्सुकता नहीं दिखायी थी। दोनो के रास्ते हमेशा एक-दूसरे से दूर रहे थे और कही भी क्षण-भर के लिए उनका मिलना सभव नहीं हो सका था। "मुझे भी कोई काम मिल जाये तो मैं भी कर लूं...," कौशल्या ने । 1 रोटी चकले पर बेलते हुए कहा, "इस तरह आखिर गाड़ी कब तक घिसटेगी? कपड़े फटे जा रहे हैं, उनके लिए मां से कहती हूँ तो वह कहती हैं कि वावू से मांग और बाबू से कहती हूँ तो वह कहते हैं कि उन्हें इन बातों से कुछ नहीं लेना-देना है...." देवू के हाथ में सुई अचानक रुक गयी। वह कुछ नहीं बोला, पर झुके सिर को ऊपर उठाकर उसने कौशल्या की ओर देखा। उसने सीटी बजानी बंद कर दी थी। "ज़रा-सी बात कहती हूँ कि मां मुझे कोसने लगती हैं कि मेरी वजह से उनका लड़का घर छोड़कर चला गया...ह...और यहां मेरी जो हालत हो रही है सो...सारा दिन लौंडी की तरह काम करवाती हैं तब कहीं जाकर दो वक़्त का खाना नसीव होता है...।" तभी देवू को झुग्गी के बाहर धीरजसिंह की आवाज़ सुनायी दी। देव ने कमीज़ को एक ओर रख दिया और बाहर निकल गया। "कह धीरजसिंह, आज इधर का रास्ता कैसे भूल गया? क्या दुकान बंद कर आया?" बाहर बिछी चारपाई पर दोनों बैठ गये। धीरजसिंह की आवाज सुन कर देवू को प्रसन्नता ही हुई थी, क्योंकि कौशल्या की उवा देने वाली बाते से उसे छुटकारा मिल गया था। कभी-कभी कौशल्या किसी अन्य व्यक्ति को अपने समीप न पाकर देवू से इस प्रकार की बातें करती थी। देवू से उनका जवाव पाने के लिए नहीं, वरन यह उसका अपना ही ज़ोर से सोचना होता था। कभी-कभी तो कौशल्या की बातें उसे चौंका देती थीं यद्यपि वह जानता था कि कौशल्या जो कुछ भी कहती है उनमें गंभीरत नहीं होती। कह चुकने के बाद वह उन्हें भूल जाया करती है। धीरजसिंह चुपचाप देबू से सटकर चारपाई पर बैठ गया। आम दिन की भांति आज न तो उसने आते ही देवू से कोई मजाक किया और उसके गले में वालों से भरा अपना हाथ डाला। "मैं बहुत दिनों से तेरी दुकान पर नहीं आ सका,धीरज। प्रेस की नौकरी करना कोई हँसी-खेल नहीं है। वहाँ साफ़-सुथरे कपड़े न पहनो तो लोग मज़ाक उड़ाते हैं । तनख्वाह भी तो शंभूदयाल कितनी-कितनी देते हैं । फि - 92 घर बने घर टूटे भी उसमें से अपने लिए नये कपड़े सिलवाना एक ज़रूरी खचं समझा जाता है। अगले महीने में एक खाकी पैट सरीदूंगा, पांच-छ, रूपये में आ जायेगी। उससे अगले महीने एक जूता भी मोल लेना होगा। मेरा जूता फट गया है, किसी दिन रामदयाल साहब ने देख लिया तो वह डाँट देंगे... वह मुझे दूसरे लोगो से अलग समझते हैं वरना कौन अपने डिच्चे से एक सिगरेट निकालकर मुझे देता और...हाँ धीरज, वह मुझसे एक गिलास शराब पीने को भी कह रहे थे...लेकिन मैंने पी नहीं। मैं नहीं चाहता कि वह मुझे एक लालची आदमी समझें..।" देवू विना धीरजसिंह की ओर देखे अपनी सारी कहानी उसे बतला रहा था। उसे स्वप्न में भी यह अनुमान नहीं था कि धीरज उसकी बातों को नहीं सुन रहा है...वह तो समझता था कि इससे बढ़कर दिलचस्प और रोमाचकारी वात कोई और हो ही नहीं सकती। अचानक धीरजसिंह के चेहरे की ओर देखकर देवू चौंक पडा, "अरे, तू तो रो रहा है, धीरज.. !" और इस वार देवू ने अपना हाय धीरज के गले में डालते हुए स्नेह-भरे स्वर में पूछा, "क्या बात हुई, धीरज ? क्या मुक्खासिंह ने फिर तुझे पीटा है ?" धीरजसिंह के आंसू और भी तेज गति से उसके गालो पर वहते हुए उसकी हलकी-हलकी दाढ़ी में समाते गये। उसकी हलकी-मी वैधी पगड़ी में से उसके वालों की लटें उसके माथे पर सरक आयी थी। उसने आंसू पोछने का कोई प्रयास नही किया । देवू को जवाब न देकर वह उसी प्रकार चारपाई पर बैठा जमीन की ओर ताकता रहा। "बोल न घीरज, क्या बात हुई है ?" उसे चुप देसकर देवू को तनिक सीझ होने लगी थी। धीरजसिंह से उसकी मित्रता अवश्य थी और वह जानता था कि उसकी खुशी में केवल धीरजसिंह को ही सबम फ्यादा खुशी होती है। प्रेस में नौकरी करने के पश्चात उसे धीरजसिंह में बातें करने का कभी अवसर नहीं मिला था और न पिष्ठले दो-तीन इतवारों को सुबह के समय वह धीरजसिंह की दुकान पर चाय पीने गया था। "मुक्सासिंह ने मुझे दुकान मे निकाल दिया...." "क्या...मुक्तासिंह ने तुझे निकाल दिया? क्या बात हुई थी, घोर?
यह तो बहुत बुरा हुआ।" "आज दिन-भर न जाने कहाँ ग़ायब रहा? शाम को आया तो बहुत पीये हुए था, मैं दुकान पर बैठा चाय बना रहा था।" धीरजसिंह अत्यन्त उत्सुकता से देवू को सारा क़िस्सा विस्तार के साथ सुना रहा था, "आते ही उसने पांच रुपये मांगे। मैंने सन्दूकड़ी खोलकर उसके सामने रख दी। उसमें ढाई से ज्यादा नहीं थे। वह गुस्से में आ गया और कहने लगा कि मैं पैसे खा जाता हूँ, दुकान में आमदनी ज्यादा होती है, लेकिन मैं बीच में से हड़प कर लेता हूँ। मुझसे यह झूठा इल्जाम इतने लोगों के सामने न सहा गया। मैंने कहा कि अगर उसे मुझ पर भरोसा नहीं है तो वह भी क्यों दुकान पर नहीं बैठता? मेरी सफ़ाई देने पर वह बिगड़ गया और ज़ोर- ज़ोर से गंदी गालियाँ देने लगा। मैंने ज़ोर से उसे चुप होने को कहा तो वह मुझे बुरी तरह से पीटने लगा। कुछ लोग छुड़ाने आये तो मैंने सबसे कहा कि मुक्खा नशे में है, इस पर वह फिर गालियाँ देता हुआ मुझे मारने दौड़ा। लोगों के बीच-बचाव करने पर उसने ज़ोर-जोर से कहा कि आज के बाद मैं फिर कभी दुकान पर न आऊँ और स्वयं दुकान बंद करके कहीं चला गया।" देवू बोला, "लेकिन धीरज, तू तो शायद एक दिन कह रहा था कि दुकान पर आधा तेरा हक़ है, उसने तुम्हारे बाप के रुपये से यह दुकान खोली है...।" धीरजसिंह ने तनिक जोश के साथ कहा, "वह तो सच बात है, देवू । उस बात को सारा मुहल्ला जानता था कि मुक्खासिंह के पास दो-ढाई हजार रुपया था, वह कहाँ से आया? मुक्खासिंह समझता है कि झूठ बोल कर वह मेरा हक़ मार लेगा, लेकिन मैं ऐसा नहीं होने दूंगा...मैं...मैं फिर कहता हूँ कि अगर सीधे से उसने मेरा हिस्सा न दिया तो मैं चुप नहीं बैठा रहूँगा । आखिर ये वकील, ये कचहरियाँ किसलिए हैं ?" देबू थोड़ी देर तक चुप रहा, फिर धीमे स्वर में कहने लगा, "मुक़दमों के लिए रुपये की ज़रूरत होती है । नहीं, धीरज...तू मुक्खासिंह से अच्छी तरह से बात कर। तेरे चाचा हैं न, उनके पास जाकर सारा हाल उन्हें बता, वह बीच-बचाव करवा देंगे।" - - 94 घर बने घर टूटे "अरे, वह नाम का चाचा है। कभी वह यह खोज-खवर तो लेता ही नही कि हम मर गये, या जीते हैं। वह उलटे हमारी हँसी उडायेगा और देवू, मुक्खासिंह उसे कुछ रुपये देकर अपने साथ मिला सकता है।" "तो फिर तू क्या करेगा?" "कुछ काम करूंगा, देवू, जिससे दो वक्त का खाना मिल जाये...." सुभागी और लाली लौट आये थे। उन्होंने बाहर देवू के साथ धीरसिह को बैठे देखा। धीरज ने खड़े होकर सुभागी के मामने दोनों हाथ जोड दिये। "ठीक तो है धीरज, बहुत दिनो वाद नजर आया। दुकान कमी चल रही है ?" "ठीक है. ।" सुभागी के झुग्गी के अदर चले जाने के पश्चात धीरजसिंह फिर चारपाई पर बैठते हुए देबू से कहने लगा, "तू अपने प्रेस के मालिक से पूछना। अगर उन्हें किसी आदमी की ज़रूरत हो तो..." देबू को वह बात पसन्द नही आयो। अपने सब परिचितों के मन में प्रेस के विषय मे वह ऐसे खाके खीचता था जिससे सवकी उत्सुकता प्रेस की जिंदगी के बारे मे बनी रहे। किसी-किसी बात को वह बहुत बढ़ा-चढाकर बतलाता था और किसी के बार-बार पूछे जाने पर भी चुप्पी साध लेता था। अतः अपनी इस छोटी-सी दुनिया में धीरजसिंह के आने की इच्छा सुनकर देवू को बुरा लगा। "नही धीरज, प्रेस मे अभी शायद कोई जगह नहीं है उसके पास पहले ही आदमी ज्यादा है, तू इस रोड़ी कूटने के कारखाने मे क्यो नही कोई काम तलाश करता? वहाँ तो वस्ती के बहुत से लोग काम करते हैं।" धीरजसिंह थोडी देर तक देव के चेहरे की ओर देखता रहा। उसकी आंखो मे न क्रोध था और न ही खीझ, केवल उदासीनता की एक गहरी छाया समाती जा रही थी। यकायक धीरज कहने लगा, "मैं यहाँ से चला जाऊँगा, मुझे यहां से नफरत हो गयी है । मैं यहां दूसरो के टुकडों पर नही जी सकता।" देयू धीरज की बात सुनकर ऊब उठा था। उसे भूख भी लग रही ? शाम । गया। - यह तो वहुत बुरा हुआ।" "आज दिन-भर न जाने कहाँ ग़ायव रहा को आया तो बहुत पीये हुए था, मैं दुकान पर बैठा चाय बना रहा था।" धीरजसिंह अत्यन्त उत्सुकता से देवू को सारा किस्सा विस्तार के साथ सुना रहा था, "आते ही उसने पाँच रुपये मांगे। मैंने सन्दुकड़ी खोलकर उसके सामने रख दी। उसमें ढाई से ज्यादा नहीं थे । वह गुस्से में आ गया और कहने लगा कि मैं पैसे खा जाता हूँ, दुकान में आमदनी ज्यादा होती है, लेकिन मैं बीच में से हड़प कर लेता हूँ। मुझसे यह झूठा इल्ज़ाम इतने लोगों के सामने न सहा मैंने कहा कि अगर उसे मुझ पर भरोसा नहीं है तो वह भी क्यों दुकान पर नहीं बैठता? मेरी सफ़ाई देने पर वह विगड़ गया और जोर- ज़ोर से गंदी गालियाँ देने लगा। मैंने ज़ोर से उसे चुप होने को कहा तो वह मुझे बुरी तरह से पीटने लगा। कुछ लोग छुड़ाने आये तो मैंने सबसे कहा कि मुक्खा नशे में है, इस पर वह फिर गालियां देता हुआ मुझे मारने दौड़ा। लोगों के बीच-बचाव करने पर उसने ज़ोर-ज़ोर से कहा कि आज के वाद मैं फिर कभी दुकान पर न आऊँ और स्वयं दुकान बंद करके कहीं चला गया।" देवू बोला, "लेकिन धीरज, तू तो शायद एक दिन कह रहा था कि दुकान पर आधा तेरा हक़ है, उसने तुम्हारे वाप के रुपये से यह दुकान खोली है..." धीरजसिंह ने तनिक जोश के साथ कहा, "वह तो सच बात है, देवू । उस बात को सारा मुहल्ला जानता था कि मुक्खासिंह के पास दो-ढाई हजार रुपया था, वह कहाँ से आया? मुक्खासिंह समझता है कि झूठ बोल कर वह मेरा हक़ मार लेगा, लेकिन मैं ऐसा नहीं होने दूंगा...मैं...मैं फिर कहता हूँ कि अगर सीधे से उसने मेरा हिस्सा न दिया तो मैं चुप नहीं बैठा रहूँगा । आखिर ये वकील, ये कचहरियाँ किसलिए हैं ?" देबू थोड़ी देर तक चुप रहा, फिर धीमे स्वर में कहने लगा, "मुक़दमों के लिए रुपये की ज़रूरत होती है। नहीं, धीरज...तू मुक्खासिंह से अच्छी तरह से बात कर। तेरे चाचा हैं न, उनके पास जाकर सारा हाल उन्हें बता, वह वीच-बचाव करवा देंगे।" - - 94 घर बने घर टूटे - पान किसी ने विशेष रूप । उम्र भी 25 या 26 से खें और चौडा माथा और इ लगाया था कि यह अन्य किया करता था और , नहीं था। खाना 1. ! और स्कूल टिप्पणियां किया करता था। तो खूबचन्द नाम का माग ही बन 1. REE7 अंग- लिमेritin पानीमा मुकाम - - थी। मां के डर से उसने धीरज को खाना खाने का निमंत्रण नहीं दिया, नहीं तो वह अवश्य टिक जाता । देबू को धीरज पर क्रोध आ रहा था, वह भला धीरज की सहायता कर सकता है, उसकी अपनी मुसीबतें क्या कम हैं...मैं भला रामदयाल से धीरज की सिफ़ारिश कैसे कर सकता हूँ और यदि कर भी सकता तो भी अपने परिचित को मैं प्रेस में काम करते नहीं देखना चाहता। थोड़ी देर बाद धीरज उठकर चला गया। देवू ने संतोप की साँस ली। वह चुपचाप कुछ देर तक धीरज के बढ़ते हुए क़दमों को देखता रहा, जो अँधेरे में गुम होते जा रहे थे। धीरे-धीरे देवू वस्ती की दुनिया से दूर होता गया, वहाँ की जिंदगी में उसकी दिलचस्पी कम होती गयी। शाम को प्रेस से लौटकर भी उसके कानों में प्रेस की मशीनों की खटाखट गूंजती रहती और उसी के विचार उसके मस्तिष्क में भरे रहते । अव उसकी कमीज़ में हमेशा बटन लगे रहते थे और कभी फट जाने पर वह बड़ी चतुराई साथ स्वयं ही उसे सी लेता था। लाली पर उसे विश्वास नहीं था। लाली घर पर उसका मज़ाक बनाया करती थी, उसे जूते साफ़ करते देखकर उसकी हँसी उड़ाती थी और कभी-कभी जब वह प्रेस जाने लगता तो उसे 'देवू वाबू' कहकर पुकारा करती थी। ऊपर से देवू झुंझलाता, क्रोध दिखलाता, कभी गुस्से में लाली की चोटी खींच देता परन्तु मन-ही-मन उसे प्रसन्नता होती थी, यह एहसास होता था कि चुपचाप उसमें कुछ अन्तर अवश्य हुआ है। 'घर' में उसे पहले ही दिलचस्पी कम थी, परन्तु अव तो उसका स्थान गहरी उदासीनता ने ले लिया। रामदयाल ने उस दिन के बाद फिर कभी देवू में विशेष उत्सुकता नहीं दिखलायी। जब कभी रामदयाल छ: बजे के करीब प्रेस में होता था तो बाहर जाते समय देबू विभिन्न तरीकों से उसका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की चेष्टा करता था, परन्तु सदा असफल रहता था। इससे देवू को काफ़ी निराशा हुई और एक दिन तो उसकी आँखों में आँसू भी टपक आये, परन्तु फिर कोई-न-कोई बहाना करके उसने अपने मन को ढांढस देने की कोशिश की। 96 घर वने घर टूटे
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"क्या तुम सोचता नहीं था कि किससे वह क्या बातें कर रहा है। कभी किसी से वह कोई सवाल पूछता तो झट दूसरे क्षण विना उसका उत्तर सुने कोई दूसरी वात करने लगता था। दिल्ली में बहुत दिन से रहते हो?" देवू ने धीमे स्वर में पूछा। खूबचन्द ने एक वार ध्यान से देवू की ओर देखा, बाल बनाकर कंधा उसने अपनी कमीज़ की जेब में रख लिया था और पैंट की जेबों में हाथ डालकर वह बोला, "मुझे तो यहाँ रहते ज़माना बीत गया। हाँ, सचमुच एक अरसा हो गया...दिल्ली की गलियों में ही मैं खेल-कूदकर बड़ा हुआ । दिल्ली के बाहर मैं गया ही नहीं।" "कहाँ रहते हो तुम ?" 'होजकाजी जानता है न ! उसी चौराहे के एक मकान में पांचवीं मंजिल पर मेरा एक कमरा है...एक दिन तुझे वहाँ ले चलूंगा, वहाँ से जामा मसजिद विलकुल साफ़ दिखायी देती है और...छतों पर औरतों की धोतियाँ...नीली-पीली धोतियां...." खूबचन्द के पीछे-पीछे देवू भी प्रेस से बाहर निकल आया। मेज़ रामदयाल एक फ़ाइल पर झुका बैठा था और उसकी उंगलियों में एक सिगरेट दबी हुई थी, परन्तु आज देवू ने उस पर केवल एक उड़ती हुई निगाह डाली। इस प्रकार अकेले खूबचन्द के साथ बातें करने का आज पहली ही वार उसे मौका मिला था। "हं...आज फिर हवा नहीं चल रही...बादल तो आ जाते हैं, लेकिन पानी नहीं वरसता...।" वाहर निकलकर खूबचन्द ने ऊपर आसमान की ओर ताकते हुए कहा। "एक प्याला चाय का पियोगे ? मेरा तो बदन ही टूट रहा है...." देवू ने खूबचन्द को चाय का निमंत्रण दिया। उसे खुशी हो रही थी कि उसकी जेब में आठ आने पड़े हुए थे, इस प्रकार उसकी खूबचन्द के साथ दोस्ती । बढ़ जायेगी और उससे बातें करने का भी मौका मिलेगा। "अगर पिलायेगा तो जरूर पिऊँगा...मेरे पास पैसे नहीं हैं...।" "चल, मेरे पास आठ आने हैं...." 98 घर बने घर टटे . और दोनों सामने वाले 'गुलजार रेस्टोरेंट' में जाकर बैठ गये। खूबचन्द की जेब में सिगरेटें थी, उन दोनों ने एक-एक सुलगायी। रेस्टोरेंट में भीड़ ज्यादा थी। रेस्टोरेंट का मालिक एक पेशावरी था और वह हमेशा लंबी कमीज और एक सलवार पहने रहता था। एक कुर्सी पर बैठा वह हुक्का गुइगुडाया करता था और जब प्राहक नहीं होते थे तो उर्दू का एक अखबार पढा करता था। रेस्टोरेंट की दीवारों पर कुछ फिल्मो के पोस्टर लगे थे और सामने गाधीजी और मुभाष बोस की तसवीरें फेम मे जडी हुई टंगी थी। "तुझे यहाँ प्रेस का काम कैसा लगा, देवू ? मेरी तो कभी-कभी यहां से छोड देने की तबीयत करती है, एक जगह टिककर मुझसे काम नहीं होता मेरी तबीयत हमेशा नये-नये काम और नये-नये आदमियों के बीच मे रहने को करती है, इसीलिए आज तक कभी मेरा कोई दोस्त नही वन सका ." और फिर सिगरेट का धुआं सामने की ओर फेंकते हुए उसने पूछा, "तू यहाँ आने के पहले मोटर के कारखाने में काम करता था न, शायद कोई कह रहा था ।" "मोटर के कारखाने मे नही, साइकिल की दुकान मे काम करता था...." "एक ही बात है .साइकिल बनाने की दुकान हो या कारखाना- तीन साल पहले मैं भी दरयागज के 'सुन्दर मोटर वस' में काम करता था, मैंने काफी काम सीख लिया था। उसके मालिक मेरे काम से खुश भी थे और तनख्वाह उन्होंने 150 रुपये कर दी थी लेकिन एक दिन किसी वात पर मालिक चिल्लाने लगा . हां, शायद उससे पहले दिन मैंने विना कहे छुट्टी ले ली थी...वस, मैंने उसी दिन काम छोड़ दिया। सात दिन की तनस्वाह बाकी थी, वह भी लेने नही गया..।" देबू जानता था कि प्रेस में भी खूबचन्द को सबसे अधिक काम आता है, मशीन के सामने खड़े होकर वह इस तरह फुर्ती से, सावधानी से काम करता था मानो मशीन उसके हाथ मे हो.. वह उसका मालिक हो। नौकर दो प्याले चाय के ले आया था, खूबचन्द बायी ओर दीवार पर लगी किसी अंग्रेजी एक्ट्रेस की एक तसवीर को देख रहा था और सीटी - में शायद कोई फ़िल्मी धुन गुनगुना रहा था। देवू कनखियों से उसके चेहरे की ओर देखता जाता था और खूवचन्द की बातें सुनकर उसके प्रति देवू के मन में भांति-भांति के विचार उठ रहे थे, कुछ अंदर के थे और कुछ उसकी लापरवाही के प्रति एक उपेक्षा की भावना थी। "किसी दिन मैं यह प्रेस भी छोड़ दूंगा, यहाँ काम करते मुझे डेढ़ साल हो गया है, बस अब मेरी तबीयत ऊबने लगी है, और शंभूदयाल-बेईमान. और चालबाज...अव्वल नम्बर का चालाक आदमी है । हजारों कमाता है और दोनों बाप-बेटे शराव में उड़ा देते हैं और वह साला रामदयाल...यहाँ का लफंगा आदमी, बहाने बनाने में नम्बर एक । प्रेस में तो उसका मन लगता नहीं और मोटर में लड़कियों को लिये घूमता फिरता है, मैंने कितनी ही वार उसे लड़कियों के साथ देखा है...और उस रात को...।" खूबचन्द हँसने लगा, फिर देबू की ओर देखकर कहने लगा, "तव तू नहीं आया था शायद छः महीने पहले की बात है...उस दिन मैं रात की ड्यूटी पर था, दो- तीन आदमी और थे जो पीछे काम कर रहे थे। "शंभूदयाल घर में सो रहा होगा, वह रात को प्रेस में कम ही बैठता है। रामदयाल रात को 12 बजे के करीब आया। उस दिन शायद बहुत पी हुई थी । उसके साथ एक लड़की थी, वह भी नशे में थी। शायद कोई रंडी थी...और फिर दोनों ऊपर की जो वैठक है न, उसमें चले गये..." वह हँसा, "समझा न, देवू...आधी रात को शराव में चूर रामदयाल और वह रंडी-दोनों बैठक में बंद रहे और फिर...मजे की बात तो अब आती है। फिर वे दोनों निकले । बाहर बरामदे में न जाने क्या खुसर-पुसर होती रही, उस रंडी की आवाज़ तेज होती जा रही थी। मैंने अंदाज़ लगाया कि किसी बात पर दोनों में झगड़ा हो रहा है। मैं दरवाजे के पीछे चुपचाप खड़ा होकर दोनों की बातें सुनने की कोशिश करने लगा। रामदयाल उसे 50 रुपये दे रहा था और वह 100 रुपये मांग रही थी...हां-हां, इसी बात पर दोनों का झगड़ा हो रहा था...." और खूबचन्द बड़े जोर से हँसने लगा। क्षण-भर के लिए देबू कांप उठा, परंतु यह भाव उसने अपने चेहरे पर व्यक्त न होने देने की कोशिश की। खूबचन्द ने एक और सिगरेट सुलगायी और एक देबू को दी। चाय 100 घर बने घर टूटे खत्म हो गयी थी लेकिन, खूबचन्द का ध्यान इस ओर नहीं था। कभी बाहर सड़क की ओर देखता था और कभी दीवार के चित्रों को। देवू शुरू से ही महसूस कर रहा था कि खूबचन्द उसके प्रति उदासीन रहा है, कभी पूरी दृष्टि से उसने देव की ओर नही देखा और जव देसा भी तब भी उसके विचार उमकी आंखो का साथ नहीं दे रहे थे । देवू ने उसे चाय का निमत्रण दिया-इसका उसने कभी कोई एहसान तक नहीं माना और यदि अव देव उठकर भी चला जाये तब भी शायद खूबचन्द को पता न चले। "और उस रात को रामदयाल ने बड़ी नम्रता से मुझसे कहा था कि इस विषय की चर्चा मैं कभी उसके बाप से नहीं करूं। जब तो उसने मुझे पांच रुपये का नोट भी देना चाहा था, लेकिन तब मेरा गुस्सा उबल पड़ा था। मैंने नोट उसकी मेज पर फेंकते हुए कहा था, 'वावूजी, अभी आप मुझे जानते नही, मैं इतना कमीना आदमी नही हू है...।' वह मुझे रिश्वत देना चाहता था। बाद मे मुझे अफमोस हुआ कि मैंने नाहक उसका नोट लौटा दिया । मुफ्त के रुपये मिल रहे थे ..ये सव-के-सव...छोटी तबीयत के आदमी होते हैं, सब की कीमत रुपयो से लगाते हैं..।" "तुम क्या अपने मां-बाप के माथ रहते हो, खूबचन्द ?" थोड़ी देर याद चुप्पी तोडने के विचार से देवू ने खूबचन्द की ओर देखते हुए पूछा। "मेरे मां-बाप नही हैं। मैं अकेला रहता हूँ, विलकुल अकेला..., खूबचन्द ने तनिक गभीर होकर कहा। देवू ने उसकी गभीर मुद्रा देखी तो महसूस किया कि शायद यह प्रश्न पूछकर उसने कोई गलती की है। इस बात को उसने आगे नही बढाया। परन्तु खूबचन्द स्वय ही कहने लगा, "मां न जाने कव मरी, लेकिन वाप...वह बेचारा चार-पांच साल हुए मर गया...अच्छा ही हुआ वह मर गया। दो साल तक खाट से लगा रहा ..रात को दर्द से चीखता था, लेकिन मुझे उसकी चीखों में भी सोते रहने की आदत पड़ गयी थी...और वह झूठ-मूठ पड़ोस वालो से कहा करता था कि मैं रात-भर उसके पांव दाबता रहता...." 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परन्तु देवू के कानों तक खूबचन्द के परिवार की सारी वात पूरी तौर से नहीं गयी। वह रामदयाल के विषय में ही सोच रहा था, जो तसवीर रामदयाल की उसने पहली मुलाकात के बाद अपने दिमाग में बतायी थी उसका दूसरा पहलू खूबचन्द ने उसके सामने रखा था और वह भी बिलकुल नंगी शक्ल में । उसे खूबचन्द से एक प्रकार की घृणा-सी होने लगी...वह शायद रामदयाल से इसी कारण से घृणा करता है कि उसके पास पैसे हैं, मोटर है और वह शराव पी सकता है, लड़कियों के साथ घूम सकता है और यदि खूबचन्द भी उसकी जगह होता तव शायद वह भी रामदयाल की भाँति व्यवहार करता...और यह खूबचन्द सबके विषय में इतनी घृणा से बातें करता है, फिर भी खूबचन्द के विषय में वह कोई निश्चित धारणा नहीं बना सका। "तेरी उम्र क्या होगी, देवू ?" अचानक देव की ओर बड़े ध्यान से देखते हुए खूबचन्द ने पूछा। देबू भी चौंक गया, उसने अन्यमनस्क स्वर में उत्तर दिया, “यही कोई 21-22 साल और क्या...!" और उसे हँसी-सी आ गयी। शायद मन- ही-मन खूबचन्द अभी तक वच्चा ही समझ रहा है और इसी कारण से वह इस प्रकार मुझसे बातें कर रहा है, वरावरी के स्तर पर उसका व्यवहार नहीं है । प्रेस में भी जब वह दूसरे लोगों से बातें करता है तो उसका लहज़ा दूसरा होता है। यह खूबचन्द अभी तक मुझे वच्चा क्यों समझता है, मेरी सगाई हो गयी है और शादी भी जल्दी ही हो जायेगी...मेरी ठुड्डी के नीचे वाल भी उगने लगे हैं...! "जानता है, देबू, कि मुझे छोटी-सी उम्र में सब बातें पता लग गयी थीं ...शायद मैं कभी वच्चा रहा ही नहीं। आठ साल से मैने बीड़ी पीना शुरू कर दिया था, गली के लड़कों के साथ हम दुकानों से सामान चुराया करते थे और फिर आधे दामों में वेचा करते थे। दिवाली परतो वस ईद हो जाती थी, भीड़ में दुकानों से सामान उड़ाना मुश्किल नहीं है । एक वार तो मैंने दिवाली वाले दिन एक आदमी की कलाई से घड़ी खींच ली और रफूचक्कर हो गया। वह बेचारा चिल्लाता ही रहा, लेकिन मुझे कोई नहीं पकड़ सका, फिर तीन-चार दिन बाद जब डरते-डरते एक घड़ीसाज़ को बेचने गया तो । 102 घर बने घर टूटे उसने घड़ी दवा ली, पंसे भी नहीं दिये। मैंने घड़ी वापस मांगी तो सिपाही को बुलाने की धमकी देने लगा...और मैं चुपचाप अपना-सा मुंह लेकर वहाँ से चला गया। अपने साथियो से घड़ी चुराने की बात न कहने का फल मुझे मिल गया...और यह रामदयाल साला समझता है कि हम सब भोले है, एक दिन कहीं टकरा गया तो साले की अक्ल ठिकाने आ जायेगी...देखा नही तूने, देवू...उसके गाल कितने पिचक गये हैं, आंखें पीली पड़ गयी हैं। मेला ऐश करता है, लेकिन ऐश करने का तरीका नही जानता. .वस एक भूखे कुत्ते की तरह हड्डियो पर झपटता है.......!" और वह फिर मुसकराया। बाहर अंधेरा होने लगा था, और मोटरो और बसो के हॉन से कभी- कभी गुलजार रेस्टोरेन्ट मे रखे रेडियो की आवाज उनमे गुम हो जाती थी। "अच्छा खूवचन्द...," अनायास ही उसका नाम लेते देवू को तनिक झिझक-सी हुई, "तुम्हे पहले-पहल प्रेस में देखकर मैंने सोचा था कि तुम यहां काम करने वालों से विलकुल अलग हो और मैं आज समझता हूं कि मेरी बात सच ही निकली. । लेकिन तुम्हारी . तुम्हारी बातो से कभी- कभी मुझे डर लगने लगता है...।" "ह. हः हः...!" सूबचन्द ने फिर एक ठहाका लगाया, कहता था न कि तू अभी बच्चा है, निरा बच्चा, तूने अभी तक दुनिया नहीं देखी । तू अभी तक कुछ नही जानता...।" देवू को बुरा लगा। उसे खूबचन्द पर क्रोध आने लगा। परन्तु वास्तव में खूबचन्द की वातो मे उसे एक छिपा हुआ सुख मिल रहा था, जो विचार बहुत ही धुंधली और विना शक्ल-सूरत की आरती में विखरे हुए-से उसके मन में आते थे उनका साकार रूप खूबचन्द उसके सम्मुख प्रस्तुत कर रहा यद्यपि ऊपर से देवू सोचता था कि यह सव उसके लिए नहीं है, उसका इन बातों से दूर का भी सम्बन्ध नहीं है। खूबचन्द जेव से कंधा निकालकर अपने वालो पर फेरने लगा। देवू उसकी आँखो की ओर देख रहा था, जिनमे वह खूबचन्द की गहराई को आंकने की कोशिश कर रहा था। था, घर बने घर टेटे 102 - अचानक देवू कह उठा, "एक दिन रामदयाल मुझसे बातें कर रहा था, तव उसने बहुत ही दोस्ताना तरीक़े मे मुझसे वर्ताव किया था। उसे इसकी क्या ज़रूरत पड़ी थी...हम उनके पैसों पर चल रहे हैं...हम आखिर उनके नौकर हैं...।" देवू और भी बहुत कुछ कहना चाहता था, परन्तु खूबचन्द को खुली आँखों से अपनी ओर ताकता देखकर वह चुप हो गया, उससे आगे कहने की उसकी हिम्मत ही नहीं हुई। परन्तु थोड़ी देर तक खूबचन्द कुछ बोला नहीं, इस बार उसके होंठों पर मुसकराहट नहीं थी। वह कुछ और ही सोच रहा था। देवू की वात उसने सुनी अवश्य थी, परन्तु उसके विषय में वह सोच नहीं रहा था। फिर धीमे स्वर में कहने लगा, उसके मुख पर गम्भीरता थी, "हमारी और रामदयाल की ज़िन्दगी में बहुत फ़र्क है, देवू...बस यहाँ प्रेस में हम लोग मिलते हैं नौकर के रिश्ते को लेकर, लेकिन वाहर कभी हमारे रास्ते एक नहीं होते...हो ही नहीं सकते । तू कहाँ तक पढ़ा है, देवू ?" प्रश्न सुनकर देवू का चेहरा लाल हो गया। इधर जव से उसने प्रेस में काम करना शुरू किया है तब से वह हमेशा यह महसूस करता है कि उसका पढ़ा हुआ न होना उसकी वेइज्जती है। वह धीमे स्वर में बोला, "यही कोई पाँचवीं-छठी तक पढ़ा हूँ...।" यद्यपि देवू चौथी के वाद फिर कभी स्कूल नहीं गया था। - "और मैं तो कभी स्कूल ही नहीं गया, हम किताबों की आँखों से दुनिया को नहीं देखते, हमारी अपनी ज़िन्दगी हमें सब-कुछ सिखा देती है । यही तो हमारे और रामदयाल जैसे लोगों में फ़र्क है, वह शायद बी० ए० पास है, कॉलेज में पढ़ा है और अब ऐश करता है। क्या कभी वह हमें समझ सकेगा? हमारे साथ क्या हमदर्दी दिखा सकेगा? मैं जानता हूँ, देवू, कि उनके और हमारे रास्ते कभी एक नहीं हो सकते...।" देवू ध्यान से खूबचन्द की वातें सुनता रहा। कुछ उसकी समझ में आयीं और कुछ को वह नहीं समझ सका । परन्तु वह अनुभव कर रहा था कि वे उस के लिए नयी हैं। घर लौटते समय कितने ही विचार देवू के मस्तिष्क में चक्कर लगा रहे थे और एक साथ उन सबको समझना और सुलझा लेना असम्भव-सा 104 घर बने घर टूटे जान पड रहा था। उसकी ज़िन्दगी की कुछ झांकियां जिनको धुंधली छाया देवू ने देखी थी, वे सब-को-सब उसके दिमाग में घूम रही थी। परन्तु रामदयाल के विषय में जो कुछ उनसे कहा था उससे देवू पूर्ण रूप से सहमत नहीं हो सका। वह उससे घृणा नहीं कर सका, जो उसने खूबचन्द की आंखों मे देखी थी। रामदयाल अमीर आदमी है, नयी दिल्ली में उसका बंगला है, मोटर है और नौकर-चाकर भी होंगे और इसीलिए वह शराब पी सकता है, लडकियों को लेकर घूम सकता है और अगर खूबचन्द या वह स्वयं उसके स्थान पर होता तो वह भी वही करता...फिर भला उससे घृणा कैसी, और क्यों? पान-सिगरेट की दूकानो पर भीड थी, लोग दिन-भर काम करने के पश्चात पसीना आदि सुखाकर नहा-धो लेने के बाद फिर बाहर सड़को पर माकर अपनी-अपनी टोलियां बनाकर खडे हो गये थे और परस्पर बातें कर रहे थे, मुंह में पान थे और होठो मे सिगरेटें। देवू को खस के शर्वत की सुगंध बहुत अच्छी लगती थी और उसका गिलास पीते समय तो उसकी तबीयत करती थी कि वह कभी खत्म हो ही नही ..और इसलिए वह काफी देर तक बर्फ घोलता-बोलता छोटे-छोटे चूंट भरता रहता था। थोडी-थोड़ी हलकी हवा चलने लगी थी, देवू ने अपनी कमीज़ के बटन खोल लिये और जब कोई ठंडी हवा का झोंका उसकी पसीने से भरी छाती से जा टकराता तो देवू के सारे शरीर मे ठडक की एक लहर घूम जाती थी। वह सीटी बजाने लगा...भोला से बहुत दिनों से मुलाकात नही हुई, वह शायद अब भी फिल्मों में गाने के स्वप्न देखता होगा, वस्ती के लोगों ने वेकार ही उसे झूठी आशाएं बंधा रखी हैं...अचानक एक लड़के को अपने सामने जाते देख- कर उसे सुन्दर को याद आयो...सुन्दर पीछे से बिलकुल ऐसा ही लगता था, लम्बी पतली गरदन और रूखे बाल...सुन्दर की याद शायद घर-भर मे उसे सबसे कम आती थी, परन्तु जब आती थी तो उसका सारा शरीर और मन झुलस-सा जाता था। वह महसूस करता था, मानो उसकी छाती में कोई भारी-सी चीज़ अकड़ी-सी जा रही है। लाली सोचती थी कि सुन्दर की मृत्यु से मुझे कोई दुख नही हुआ और इसी कारण से कुछ दिन तक वह मेरी ओर बड़ी अजीब-सी दृष्टि से देखती रही, लेकिन आखिर मैं उसे कैसे । 1 ? . समझाता ? सुन्दर की घर में किसी ने भी क़द्र नहीं की। वाबू ने उसे स्कूल से छुड़वाकर दुकान पर लगा दिया...लाली उसे चाहती अवश्य थी, लेकिन इसमें शक है कि वह उसे ठीक तरह समझ सकी थी। लाली ही क्या, शायद कोई भी उसे समझ नहीं सका था और भला समझ भी कैसे सकता था, सुन्दर चुप जो रहता था, अपने मन की बात उसने किसी से नहीं की। प्रेस की नौकरी देवू के लिए पुरानी पड़ती जा रही थी। यह बात नहीं कि उसमें उसे कोई उत्साह नहीं रहा था, या वह अपने काम से ऊबता जा रहा था, परन्तु जो रहस्यमय वातावरण उसे पहले-पहल प्रेस के चारों ओर दिखायी देता था, उसकी मशीनों के कालेपन के अन्दर जो चकाचौंध उसे दिखायी देती थी वह अव समाप्त हो गयी थी। रामदयाल के साथ उसका परिचय अधिक नहीं बढ़ा जिसकी पहली भेंट के बाद उसने उम्मीद लगायी थी, परन्तु उस दिन की खूबचन्द की बातें सुनकर भी देबू अपने और रामदयाल के बीच में वह रेखा नहीं खींच सका जिसकी उसने उस दिन कल्पना की थी। खूबचन्द के साथ भी यदा-कदा उसकी बातचीत होती रहती थी, वह चुपचाप उसकी बातें सुना करता था और बाद में कुछ वह भूल जाता और कुछ के बारे में अकेला सोचता। एक दिन शाम को काम से लौटकर वह बाहर लाली के पास बैठा उससे बातें कर रहा था, "कभी-कभी प्रेस में काम करते वक्त अचानक मुझे यह खयाल आ जाता है कि जहाँ मैं काम कर रहा हूँ, वह जगह सुन्दर के लिए थी। वाबू ने भी शंभूदयाल से सुन्दर के विषय में ही बातचीत की थी ...यह सोचकर क्षण-भर के लिए मेरे हाथ रुक जाते हैं...।" लाली ने कुछ नहीं कहा, वह उसी प्रकार चुपचाप वैठी हुई दूसरी झुग्गियों की ओर देखती रही। देवू ने धुंधली रोशनी में लाली के चहरे पर दृष्टि डाली, उसकी आँखें चमक रही थीं और गोल-से चेहरे पर बचपन के जो अन्तिम चिह्न वाकी बचे थे, वे सब धीरे-धीरे विदा ले रहे थे । उसके होंठ बन्द थे और वहाँ से आवाज़ निकालने की चेष्टा की भी कोई निशानी नज़र नहीं आ रही थी। थोड़ी देर तक देबू भी चुप रहा, जव कभी थोड़ी-सी हवा चलती तो ऊपर लगे पेड़ के पत्ते वज उठते थे, कभी-कभी वसेरा ढूंढते हुए पक्षियों की - - 106 घर बने घर टूटे एक टोली उनके ऊपर से गुजर जाती...। "परसो वावू कह रहे थे कि कमेटी के कुछ आदमी यहाँ वस्ती को देखने आये थे, वे कहते थे कि यहाँ की झुग्गियां गिरा दी जायेंगी और यहां ऊंचे- ऊँचे मकान बनेंगे जैसे पूसा रोड पर हैं..," लाली ने चुप्पी तोडले हुए कहा। कुछ देर तक तो देबू अपने ही विचारो मे मग्न था और लाली की अत उसके कानो तक पहुंच कर भी अपना मतलब उसे समझा नहीं मकी, परतु क्षण-भर वाद ही देव उसका अर्थ समझ गया—“हुँ ..झुग्गियो को गिरा कर यहां मकान बनेंगे, और झुग्गियों में रहने वाले कहां जायेंगे?" "यह तो पता नहीं, लेकिन वादू कहते थे कि यह जमीन नीलाम की जायेगी और फिर यह ऊंची-नीची सडक बराबर की जायेगी, यहां तीन और चार-मंजिले मकान बनेंगे, वाग बनेंगे, सडक बनेंगी..।" देवू ने कहा, "तुझे याद है न लाली, पांच साल पहले जब सारे शहर का चक्कर लगाते-लगाते हम इस बस्ती मे आकर टिके थे, तभी बाबू की कोई जान-पहचान वाला मिल गया था, उसने बाबू से यही एक झुग्गी वना लेने को कहा था, लेकिन तब यहां सन्नाटा था, वीरान था। तुझे याद है न लाली जब मैंने, हुकम ने और सुन्दर ने-सवने मिलकर यह झुग्गी बनायो थी, तब अपना यह छोटा-सा घर देखकर हम सबको कितनी खुशी हुई थी। लेकिन आज सब-कुछ बदल गया मालूम पड़ता है...दिन कितने जल्दी बीत जाते हैं ! कब सदियों के बाद गर्मियां, फिर बरसात और फिर सदियां आ जाती है...लेकिन...लेकिन अब मुझे इस बस्ती मे ज्यादा दिलचस्पी नही रही है...मैं यहां से ऊब रहा हूँ..." "और मुझे ऐसा महसूस होता है जैसे कि मैं हमेशा ही इस बस्ती में रहती रही होऊँ...," लालो ने थोड़ी देर बाद कहा, “ये पगडडियां, चट्टानें, झाड़ियां और ऊपर आसमान-सबसे मैं परिचित हूँ। अच्छा देबू, कभी- कभी मैं सोचती हूँ कि जिंदगी इसी तरह चलती रहती है, कभी यह रुक क्यो नहीं जाती? थोड़ी देर के लिए एक मिनट-भर के लिए ही सही- लोग जहाँ हैं वही रुक जायें, ये मोटरें, तांगे, साइकिलें कोई भी आगे न भाग सकें, तब मैं देवू कि लोग रुक कर क्या करते हैं, क्या सोचते हैं ?" देवू हंसा, "तू पागल है, लालो...हमारे प्रेस मे मशीनें हमेशा चला - करती हैं खटाखट...खटाखट...लेकिन जब थोड़ी देर के लिए रुक जाती हैं तो हम सवको बड़ा अजीब-सा लगने लगता है जैसे हम सब मर गये हों। उस सन्नाटे में कोई बात नहीं करता, और जव मशीनें फिर चलने लगती हैं तो हम सबके चेहरों पर शांति और तसल्ली वापिस आ जाती है। मेरे ख़याल में हम सब इन मशीनों जैसे हैं, जव रुक जाते हैं तो मर जाते हैं।" "और फिर...?" हात लाली ने देवू की ओर देखकर पूछा। "और फिर...फिर खत्म हो जाते हैं, राख हो जाते हैं...," देवू ने मानो क्रोध से कहा। "और स्वर्ग...नरक...फिर अगला जन्म...वह सव भी तो होता है।" देबू थोड़ी देर चुप रहा-"शायद होता होगा जिसे किसी ने नहीं देखा, किसी ने उसके बारे में नहीं बतलाया..." "तो सुन्दर ख़त्म हो गया, देवू ? उसने फिर जन्म लिया होगा...कहीं- न-कहीं वह फिर आया होगा...वह इस जन्म की सारी बातें भूल गया होगा, हम सवको भी..." उसका गला रुंधने लगा। देवू सुन्दर का नाम सुनकर चौंक पड़ा...तो उसी कारण से लाली वातों को धुमा-फिरा कर पूछ रही थी, शायद सोचती रही होगी। उसने ध्यान से लाली की ओर देखा, लेकिन अँधेरे में उसकी खोयी हुई आँखों को वह नहीं देख सका। वह धीमे स्वर में बोला, "हमारे लिए तो वह ख़त्म हो गया, लाली, अव चाहे कहीं भी पैदा हो...." "नहीं-नहीं देवू, ऐसा नहीं हो सकता। हम सब मर कर उससे मिलेंगे । एक दिन मां कह रही थी कि हम सब मर कर परलोक में फिर इकट्ठे रहा करेंगे । वहाँ ऐसी झुग्गियाँ नहीं होंगी, वहाँ महल होंगे। और अब सुन्दर महलों में रह रहा होगा...." देबू थोड़ी देर तक सोचता रहा, फिर मुसकराने लगा, लेकिन उसका मुसकराना लाली नहीं देख सकी। सुभागी बाहर से लौटी तो उन दोनों को झुग्गी के वाहर बैठे देख कर विना कुछ कहे-सुने अन्दर चली गयी। इधर पिछले कुछ दिनों से सुभागी कथा-वार्ता, कीर्तन, मंदिरों आदि में अधिक जाने लगी थी। हर मंगलवार को व्रत रखती और रोज़ सुबह तड़के ही कुछ अन्य स्त्रियों के साथ 108 घर बने घर टूटे मदिर चली जाती थी और लगभग दो घंटे बाद लौटती थी। परंतु घर में उसके व्यवहार में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ था, बल्कि कौशल्या के साथ उसका झगडा और भी बढ़ गया था; कौशल्या भी एक बात का जवाब चार-चार बातों से देने लगी थी। पहले तो कभी-कभी सुभागी को चिल्लाते देखकर वह चुप भी रह जाती थी, लेकिन अब ऐसा प्रतीत होता था कि जान-बूझ कर वह सुमागी से झगडा मोल लेना चाहती थी और जो बात सुभागी को बुरी लगती उसे ही वह दोहराया करती थी। वाहर लाली कहने लगी, "न जाने, भाभी को क्या होता जा रहा है... पता नही, उन्हें हुकम की कभी याद आती है या नहीं? और बाहर जाती हैं तो इतनी सज-बन कर कि मुझे शरम आने लगती है...." देवू ने धीमे स्वर में लाली से पूछा, "तुझे मालूम है, लाली, कि भाभी के पास पैसे कहां से आते हैं ? पिछली बार तुझे याद है न जब वह नया सूट बनवा कर लायी थी तब कहती थी कि उनकी मामी की लड़की ने दिया है, लेकिन मैं जानता हूँ कि यह झूठ है। कभी यहां आकर बात तक तो पूछी नहीं और वह सूट बनवाकर देते हैं...!" लाली ने भी चौंक कर देवू की ओर देखा, देबू के इस बात के पूछने का मतलब वह समझ गयी थी। जिस प्रश्न को पहले कितनी बार उसने अपने-आप से पूछा था उसी को देवू के मुख से सुनकर उसे सात्वना भी हुई और एक आशंका भी। "अभी कुछ दिन पहले मैंने उनके कपडो के नीचे एक पाउडर का डिब्बा भी देखा था। जब भाभी झुग्गी में अकेली होती हैं तो न जाने देर- देर तक शीशे में अपना मुंह देखती हुई कुछ गुनगुनाया करती है और जब कभी मैं उस समय वहां पहुंच जाती हूँ तो वह मुसकराने लगती हैं । एक बार वह पूछने लगी, क्या वह अभी तक खूबसूरत हैं ? मैं क्या कहती ! मुझे तो उनसे अकेले में बातें करने पर भी डर लगता है...." देबू चुपचाप लाली की बातें सुन रहा था। कुछ बातें वह स्वयं जानता था और कुछ का पता उसे लाली से लगा था। लेकिन आखिर कौशल्या क्या करे?हुकम तो उसे और दीनू को छोड़कर चला गया, लेकिन कौशल्या को तो अपनी सारी जिंदगी बितानी है । इस घर से तो दो वक्त का भरपेट पर बने घरटे 109 Ji खाना मिलने की भी उसको उम्मीद नहीं है। देवू इस वातावरण को देखता था और उसकी घर और वस्ती से ज्व और भी तीव्र होती जाती थी। इन बातों का विचार जव कभी उसके मन में आता तो वह उसे बाहर निकाल देने की भरसक कोशिश किया करता था। दिन-भर वह प्रेस में विताता था और रात को सोकर वह दिन-भर की थकान मिटाने की कोशिश करता था...! रात को जब नानकचन्द दुकान बंद करके लौटे तो देव और लाली खाना खा चुके थे। कौशल्या रोटी पका कर उठी थी और लकड़ियों की गर्मी और पसीने को वह ठंडे पानी से मुंह-हाथ धोकर दूर करने की कोशिश कर रही थी। सुभागी को रात को बहुत कम दिखायी देता था, लेकिन आज इस समय भी वह अपनी चुन्ली सी रही थी। देबू बाहर जाकर अपनी चारपाई पर बैठ गया। इधर पिछले कुछ दिनों से नानकचंन्द ने घर में किसी से भी वात करने की मानो क़सम खा ली थी। दुकान से लौटते तो चुपचाप खाना खाकर अपनी चारपाई पर पड़े रहते, नींद उन्हें 11 या 12 बजे से पहले नहीं आती थी। उनके चेहरे को देखकर कोई भी अनुमान लगा सकता था कि उम्र के तकाज़ों से पहले ही उन्होंने अपने सारे संघर्प को और सारी शक्ति को अपने से अलग कर दिया है। उनके चेहरे की झुरियाँ बहुत स्पष्ट रूप से प्रतिदिन गहरी होती जा रही थीं। सुभागी भी अव अपने और कौशल्या के झगड़ों के विषय में उनसे शिकायतें नहीं करती थी। 20 या 25 दिन पहले रोज़ की भाँति जव एक दिन नानकचन्द के सामने सुभागी अपने रोने रो रही थी तो नानकचन्द अपना सारा धैर्य खो बैठे और उस दिन बहुत ज़ोर-जोर से चिल्लाकर उन्होंने एलान कर दिया कि अगर फिर कभी उनसे किसी ने कोई शिकायत की तो वह घर छोड़ कर दिल्ली से कहीं वाहर चले जायेंगे। उनकी आवाज़ में एक ऐसी सच्ची धमकी थी जिसे सुनकर सुभागी काँप उठी और उनकी इस बात की सच्चाई का, आभास भी उसे लगा। उस दिन के बाद फिर कभी सुभागी ने उनसे कोई शिकायत नहीं की। उनके दुकान पर जाने के बाद वह अवश्य अपने भाग्य को कोसा करती थी। 110 घर बने घर टूटे कपड़े उतारकर चारपाई पर बैठते हुए उन्होंने कहा, "आज रलिया- राम दुकान पर आये थे..।" उनके स्वर मे आज अधिक नम्रता थी जिससे प्रतीत होता था कि सचमुच ही वे गभीरता और सहृदयता से वात करना चाहते हैं । चेहरे पर भी जो झुरियाँ और सफ़ेद मूछों के बाल एक सख्त मुद्रा का प्रदर्शन करते थे, वे सहानुभूति के प्रतीक बने हुए थे। लाली कोने में बैठी नानकचन्द की ओर देख रही थी, रलियाराम का नाम सुनकर एक बार उसने खुले दरवाजे से बाहर झांका और चांदनी मे चारपाई पर लेटे देवू को सिगरेट का धुआं उड़ाते हुए देखा । बाबू आज मुसकरा-से क्यो रहे है उनको मुसकराहट के पीछे दूसरो को चेतावनी देने वाली कोई अनुभूति छिपी है। वह क्षण-भर के लिए चौक-सी गयी। नानकचन्द को देखकर सदा उसके मन में एक छिपी आशका उभरने लगी थी कि अब वह हंस-हंसकर कोई ऐसी घटना बतलायेंग जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। सुभागी ने भी अपनी माला फेरना रोक दिया और कनखियो से नानकचन्द की ओर देखने लगी..। "उनकी लडकी को अब फिर बुखार रहने लगा है, कभी हलका हो जाता है और कभी तेज । मैं जानता हूं कि उसे तपेदिक है, लेकिन वह मुझसे छिपाने की कोशिश कर रहे थे...हू ..।" और वे तनिक ज़ोर से हम पडे ---"ऐसी सूरत मे ब्याह कैसे हो सकता है ? आज मैंने साफ इनकार कर दिया। बीमार लडकी को घर में लाकर उसकी दवा-दारू कराना मेरे वश की बात नहीं है, और अगर आगे जाकर कुछ हो गया तो रलियाराम सारी विरादरी में हमारी बदनामी करेंगे कि उनकी लडकी को हमने मार डाला।" कौशल्या सिर झुकाये कुछ बर्तन धोती रही। लाली को धक्का-सा लगा, उसे पता था कि देबू लिट्टो को कितना प्यार करता है, उसके बीमार होने पर उसकी उत्सुकता लाली से छिपी नही थी और वह लाल झुमकों को जोड़ी-जो देवू ने उसके हाथ लिट्टो के लिए भेजी थी, क्षण-भर के लिए लिट्टो का चेहरा उसकी आंखों के सामने घूम गया। नानकचन्द फिर कहने लगे, "रलियाराम तो चाहते हैं कि इस बार घर बने घर टूटे 11 - लिट्टो के अच्छा होने पर और फिर बुखार आने से पहले ही देवू और उसका व्याह कर दें, लेकिन मैं उनकी सव चालें समझता हूँ। और...और अब तो देवू को अच्छा काम मिल गया है, तरक्की भी होती जायेगी, रलियाराम से अच्छे घर मिलेंगे।" सुभागी ने फिर माला जपना आरम्भ कर दिया था। परन्तु उसके विचार कहीं और थे। लाली झुग्गी के दरवाजे के पास आकर खड़ी हो गयी और वाहर झाँकने लगी । चाँदनी में सब पेड़, विखरी हुई झुग्गियाँ, झाड़ियाँ, पगडंडियाँ चमक रही थीं, उसने ऊपर आसमान की ओर देखा, कहीं भी उसे किसी बादल का टुकड़ा दिखायी नहीं दिया। देवू अपने हाथों को सिर के नीचे दबाये लेटा हुआ था। नहीं-नहीं, लाली उसे यह समाचार नहीं बतलायेगी...उससे कहा ही नहीं जायेगा, कल सुबह उसे स्वयं ही सब-कुछ पता चल जायेगा। शायद लिट्टो भी मर जायेगी जैसे सुन्दर मर गया है। बहुत दिन पहले की बात है, एक बार किसी सहेली ने उसे बतलाया था कि मरकर सब तारे बन जाते हैं, तभी तो आसमान में इतने अनगिनत तारे हैं, अगर कोई गिने तो उसे पता चलेगा कि रोज़ ही इन तारों का नम्बर बढ़ता जाता है...तो शायद सुन्दर भी इन तारों में से होगा...और वह खोजने लगी। धुंधले और चमकीले तारे उसकी आँखों में मोतियों के समान घूमते गये, सुन्दर छोटा था, उसका छोटा और धुंधला-सा ही तारा होगा। वह दूर जो हलका-सा दिखायी दे रहा है, वही सुन्दर है और फिर आँख झपकते ही वह गुम हो गया। लिट्टो भी शायद ऐसा ही एक तारा बन जायेगी जो दिन में गायब हो जाते हैं और रात को अपने घर वालों और परिचितों की ओर एकटक लगाये देखते रहते हैं। दूर कहीं ढोलक की आवाज़ आ रही थी और उसी के स्वर में मिले हुए दो-तीन स्त्रियों के स्वर गूंज रहे थे। लाली फिर देवू की ओर देखने लगी। कुछ देर तक आसमान में तारों की ओर देखते रहने पर उसके मस्तिष्क में तारे इतने अधिक छा गये थे कि देबू के मुंह में लगी सिगरेट का जलता हुआ भाग भी उसे तारा जान पड़ा । देबू भी एक तारे से कम नहीं, वह जमीन का तारा है...हम सब ज़मीन के तारे हैं जो एक दिन आसमान में जा बसेंगे.. - 112 घर बने घर टूटे देवू खाना खाकर बाहर निकला तो उमने लाली को चारपाई पर बैठे देखा। कौशल्या घर में नहीं थी, तीन-चार दिन पहले वह अपने चाचा के घर आनन्द पर्वत कुछ दिन के लिए चली गयी थी, क्योंकि चाचा के लड़के की शादी थी और चाची स्वयं आकर उसे लिया गयी थी। थोडे दिनो के परिवर्तन की कल्पना से कौशल्या को खुशी ही हुई थी और सुभागी ने भी सोचा था कि घर में कुछ दिन के लिए शान्ति रहेगी। चारपाई पर लेटकर आसमान की तरफ़ देखते रहना और लिट्टो के विषय में सोचना देवू को अच्छा नहीं लगा। थकान होने पर भी जल्दी ही नीद नहीं आयेगी, यह वह जानता था। और थोड़ी ही देर में घर के काम से निवृत्त होकर सुभागी अपनी चारपाई पर बंठकर धीरे-धीरे कोई भजन गुनगुनायेगी-इस विचार को भी वह सहज मे ही सहन नहीं कर सका। अपने विचारों को देयू किसी ऐसे विन्दु पर केन्द्रित कर देना चाहता था जिससे उसका मन कही और दौडकर छलांग लगाने के बदले एक पिंजड़े में बन्द हो जाये, परन्तु चारपाई पर लेटकर ऐसा होना असभव है .. वह लाली से हो बातें करे—पिछले दिनो की, सुन्दर को, हुकम की, अपने बचपन की...हुँ...1 कोई भी बात करने पर वह अपने विचारो को बाँध नही सकेगा लाली की ओर देखते समय लिट्टो का चेहरा उसकी आँखों के सामने घूमेगा। "लाली, मैं जरा सर करने जा रहा हूँ, देर से लौटूंगा," देवू ने कहा। लाली ने जवाब नहीं दिया। वह चुपचाप फटी-फटी आंखों से देवू की ओर देखती रही। देवू ने समझा कि शायद लाली सोच रही है कि वह भी हुकम की तरह से चला जाये और शायद फिर न लौटे। इस विचार से उसे हंसी आने लगी। पगडडियां पार करता हुआ वह पक्की सड़क पर आ गया और ऊपर चढाई चढ़ने लगा। जेब में से सिगरेट का पकेट निकालकर उसने एक सिगरेट सुलगायी। सड़क पर अधिक भीड नही थी। कुछ साइकिलों वाले और कुछ बसें और मोटरें अपनी तेज रोशनी सडक पर डालती हुई आगे वढी जा रही थी। देवू मोटरों और बसों के पीछे लगे उनके नम्बर देखने घर बने घर टटे 113 । लगा। कभी-कभी रास्ता काटने के लिए वह ऐसा किया करता था। परन्तु आज उसने अनुभव किया कि ये राह चलते लोग उसके लिए परछाइयों से अधिक नहीं थे। वे केवल चाभी वाले खिलौनों की भांति मन्द चाल से चलते थे, जिनमें अपना कोई अस्तित्व नहीं था। वह सोचने लगा कि उसने इन सब लोगों से अलग हो जाना चाहा है, उनमें कभी उसने सहानु- भूति नहीं देखी, दर्द नहीं पाया, उनमें गति नहीं थी। परन्तु क्या वह अपने- आपको इस भीड़ से अलग कर पाया था? चाहे प्रेस के लोगों के बीच, या सड़क की भीड़ के साथ एक ही रास्ता तय करते हुए, या वस्ती के परिवारों के साथ जहाँ पाँच सालों से वह उनके साथ रह रहा था। अपने और उनके बीच में सदा एक रेखा खीचने का, सदा एक दीवार बनाने का प्रयास उसने मन-ही-मन किया था। रेस्तरां का नौकर चाय का प्याला उसकी मेज़ पर रख गया । देबू उस 14-15 साल के पहाड़ी नौकर को पीछे से देखता रहा । उसकी गरदन पर महीनों की जमा हुई मैल चमक रही थी और उसके बाल पीछे से किसी पक्षी का झोंपड़ा-सा मालूम पड़ रहे थे। उसके प्रेस का एक आदमी बतला रहा था कि रेस्तराँ का मालिक नौकर को दो-तीन महीने रखकर फिर उसे मारने-पीटने लगता जिससे वह विना वेतन लिये भाग जाये, इसी कारण से हमेशा यहाँ नये नौकर दिखायी देते थे। रेस्तरां में लगे रेडियो में एक फ़िल्मी रेकर्ड बजने पर अचानक देवू को खूबचन्द की याद आने लगी। वह अभी तक समझ नहीं सका था कि खूबचन्द के प्रति उसके मन में आदर था या घृणा? उसकी बातों का उस पर गहरा प्रभाव पड़ता था, इसे वह जानता था। उसकी कुछ बातों को वह मन-ही-मन अच्छा न समझते हुए भी उन पर घंटों सोच-विचार किया करता था और कभी-कभी तो उस जैसे बनने की तीव्र चाह उसके मन में उठती थी। खूबचन्द एक ऐसा आदमी था जो एक क्षण के निश्चय पर विश्वास करता था, एक बात एक वार उसके मन में समा जाती तो उसे पूरा करके ही छोड़ता, लेकिन वह लाख कोशिश करने पर भी ऐसा नहीं कर सका। खूबचन्द इससे कहता था कि वह इस नौकरी पर ज्यादा दिन नहीं टिकेगा, उसे रामदयाल से भी नफ़रत थी, और एक दिन प्रेस आने । - 114 घर बने घर टूटे पर देवू को पता चला कि खूबचन्द अब काम पर नहीं आयेगा । इस विषय पर प्रेस में काम करने वालों के बीच काफी चर्चा चली थी, बडी उम्र के लोग उनके विचारो से सहमत नहीं थे और कम उम्र के जवान उसकी बातों में अपनी अतृप्त अभिलाषाओ को पूरा होते देखते थे। परंतु इस बात पर कोई मतभेद नहीं कि वह आदमी एक ही था, उस जमे ज्यादा व्यक्ति दुनिया में दिखायी नहीं देते। देवू ने एक लम्बी सांस ली। उसकी थकान उतर गयी थी। सिगरेट के धुएँ को वह देखने लगा, मुंह से निकलने के बाद क्षण-भर मे वह बाहर की हवा मे मिलकर अपना अस्तित्व खो देता था। सामने वाली मेज पर दो छात्र किताबो पर कोहनियां टेक धीरे- धीरे चाय के चूंट भर रहे थे और परस्पर बातचीत में मग्न थे। देवू ने महमूम किया कि वह अकेला है, वहुत अकेला किमी से जी भर कर बातें करने की इच्छा प्रबल हो उठी। वे लडके किताबो की बातें करते होगे, अपनी परीक्षाओ के बारे में सोचते रहेंगे जैसे सुन्दर करता था. आखिर कब तक वह इस प्रकार घिसटता रहेगा जब कभी उसके काम से खुश होकर रामदयाल उसके वेतन में 5 या 10 रूपयो की तरक्की कर दें तो उसे खुशी होगी और जब वे गुस्मा होंगे तो उसे दुख होगा उसकी अपनी खुशी और अपना दुग्प दूसरो पर निर्भर है, यह महसूम करके उसे अपने-आप से ही विरक्ति-मी होने लगी। जो लोग आत्महत्या करते हैं, क्या वे दुनिया में सबसे ज्यादा दुखी होते हैं, क्या जीना उनके लिए असम्भव होता है ? और भोला कहता था कि उसे मरने से डर लगता है और उसके साधूबाबा मौत को जीतने की कोशिश कर रहे है । उसे हमी आने लगी...क्यो? क्या जिंदगी से वे संतुष्ट नहीं होते, क्या वही काफ़ी नही है ? कुछ लोगों के लिए एक जिंदगी भी भारी पड़ जाती है। सामने दीवार पर लगी घड़ी ने टन करके साढ़े छः बजाये तो देवू कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। उसने अनुभव किया मानो घटा-भर तक वह दूसरे लोगो से बातें करता रहा हो। मशीन चल रही थी और उसके सामने खडा एक व्यक्ति दूसरे के लिए कागज़ रखता जा रहा था। दूसरे कमरे में दुलीचन्द बठा दिन के छपे कागजी को चार तहों में मोड़ता जा रहा था, उसकी नाक पर पुराने जमाने के सुनहरे फेम का एक चश्मा लगा हुआ था। उसी के पास खडा केशो वीडी ।
- के कश खींच रहा था। उसके वाल उलझे हुए उसके माथे पर विखरे थे। केशो को कभी देवू ने प्रेस में किसी से ज्यादा बातें करते नहीं देखा था, देवू ने कई बार काम करते समय उसे चुपचाप मशीन की ओर झांकते हुए देखा था। प्रेस के एक-दो व्यक्तियों से पूछने पर उसे पता चला था कि केशो का दिमाग़ ठीक नहीं है, दो साल पहले चन्द ही दिनों में उसकी माँ और बहन हैजे का शिकार बन कर मर गयी थीं, उनकी मृत्यु का उसे इतना सदमा पहुँचा था कि वह सदा चुप ही रहा करता था। "क्या थक गया, केशो?" देवू ने उसके पास खड़े होकर कहा। प्रत्युत्तर में केशो थोड़ा-सा मुसकरा दिया और फिर बीड़ी के कश खींचने लगा। दुलीचन्द ने भी अपनी आँख ऊपर उठायी और क्षण-भर के लिए काम रोक दिया...इस केशो के बारे में यह पता लगाना मुश्किल है कि वह थका कि नहीं, कभी-कभी तो बिना सिर उठाये घंटों वह काम करता रहता है लेकिन हाथ में फुर्ती नहीं है..."अच्छा, एक बीड़ी तो दे, केशो, इस ओवर- टाइम का लालच भी बुरी बला है, 14-15 घंटे काम करने की अव मेरी उम्र नहीं है। हर वार सोचता हूँ कि एक दिन मालिक से कह कर यह बला हमेशा के लिए अपने सिर से टलवा दूंगा, लेकिन फिर घर का खयाल आ जाता है..." दुलीचन्द प्रेस में काफी पुराना काम करने वाला आदमी था । प्रेस में सब उसे 'चाचा' कहा करते थे। इतने सालों के प्रेस के अनुभव के बाद अगर कोई आदमी होता तो कहीं पहुंच गया होता, लेकिन दुलीचन्द को मशीन के पास जाते डर लगता था। कोई सात-आठ साल पहले वह मशीन पर काम करता था, लेकिन एक दिन धोखे से दो उँगलियाँ दव गयीं और फिर पांच- छः दिन अस्पताल में रहने के बाद काट दी गयीं। तव से वह मशीन की छाया से भी डरता था, कहता था कि मशीन इंसान की मौत है जो हमेशा उसकी छाती पर सवार होने के लिए आकुल रहती है। थोड़ी देर बाद तीनों बैठ कर अपना काम करने लगे। बाहर हलकी- हलकी बारिश होने लगी थी और रह-रहकर बादलों की गर्जना में मशीन की खटाखट खो जाती थी। अगस्त के वादल आसमान पर छा गये थे। 116 . घर बने घर टूटे रामदयाल अपनी मेज पर झुका एक अखबार के अतिम प्रूफ देख रहा था और कभी कोई गलती निकलने पर कम्पोजीटर को आवाज देकर उससे पूछ लेता था और कभी-कभी कुछ न समझने पर अपने कर्कश स्वर में चिल्लाता था, जिमसे मशीन के साथ-साथ उसकी आवाज़ भी गूंजने लगती थी । जब उसे केवल प्रेम मे बैठ कर काम की निगरानी करनी पड़ती - तब तक उसकी मुद्रा शात रहती थी, क्योकि वह मजे से सिगरेटें फूंकता, किसी को फोन करता या अलमारी मे से बोतल निकालकर पेग चढ़ाता, लेकिन जब कोई विशेष जिम्मेदारी उस पर आ पडती तो वह अपना धैर्य खो बैठता था। देवू कभी-कभी अपने स्थान पर, बैठा हुआ दरवाजे के आधे हिस्से से रामदयाल को देखता रहता था। उसे याद आया कि पहले-पहल रामदयाल को देखकर वह उसके प्रति कितना आकर्षित हुआ था | उसका मूट, टाई, जूता और सिगरेट पीने का ढंग देखकर उस दिन उसने भी रामदयाल जैसा वनने की इच्छा की थी, लेकिन खूबचन्द की बातें आज तक उसको समझ में नहीं आ सकी थीं। आखिर रामदयाल के प्रति उसके मन मे इतनी घृणा क्यों थी? "आज शायद आंधी आयेगी..," केशो ने बाहर देखते हुए कहा। देव ने अनुभव किया कि बाहर हवा चलने का असर अदर तक हो रहा है । छत से विजली के तार से लटकता हुआ लट्ट हलके हलके घड़ी के पेंडुलम की भांति आगे-पीछे घूम रहा था। रामदयाल ने जोर से आवाज लगायी, "सुबह जो स्कूल वाली किताब छपी थी, क्या उसकी बाइडिंग खत्म हो गयी ?" चाचा ने गरदन उठायी, "जा देबू, ज़रा रामदयाल से कह आ कि पौन घंटे तक तैयार हो जायेगी..." देवू के जाने पर चाचा फिर वुडबुड़ाने लगा-"इसे बात करने की भी तमीज नहीं, साला न जाने अपने-आप को कौन-सा लाट साहब समझता है ! एक दिन खुद वाइडिंग तो पता चले कि कौन-मा काम कितनी देर में होता है।" केशो ने धीमे स्वर में झुके हुए कहा, "यह रामदयाल काम तो कम करता है, लेकिन चिल्लाता ज्यादा है।" देबू आकर बैठा तो रामदयाल के विषय में ही सोचने लगा । खूबचन्द ने दुनिया देखी है, उसने जो उसके और हमारे बीच में दीवार वनी है उसका अनुभव बहुत जल्दी और सफ़ाई से किया था। रामदयाल के पास ज़रूर वहुत-सा पैसा होगा । खूबचन्द कहता था कि प्रेस सोना उगलता है, लेकिन मालिक अपने मजदूरों से हमेशा यही कहता है कि उसे घाटा हो । रहा है जिससे मजदूर अपने वेतन बढ़ाने के लिए न कहें। प्रेस 11 बजे के क़रीव बंद हुआ। देवू बाहर निकला तब उसने अपने चारों ओर गहरे अंधकार की एक चादर पायी। हवा अब भी तेज़ थी और कभी-कभी उसकी गति में तीव्रता आ जाने से एक अजीब-सा शोरगुल मचाती हुई गायव हो जाती थी। थोड़ी देर तक बरामदे में खड़ा देवू वाहर सड़क को देखता रहा। उसने एक सिगरेट सुलगा ली। दिन में इस सड़क पर पाँव रखने की जगह नहीं होती, मोटरें और बसें, विना रुके न जाने किन दिशाओं की ओर दौड़ा करती हैं और रात को कितना सन्नाटा हो जाता है। धीरे-धीरे वह क़दम बढ़ाता हुआ अपने चिर-परिचित रास्ते को पार करने लगा। कोई तांगा या साइकिल वाला रात्रि की निस्तब्धता को चीरता हुआ निकल जाता तो एकाएक देवू चौंक-सा पड़ता था। वक्त के साथ-साथ इंसान कितना बदलता जाता है। जिंदगी का हर क्षण उसके व्यक्तित्व के किसी पहलू को उभारता है जिसका आभास तक पहले उसे कभी नहीं था, अवसर आने पर वह ऐसे काम करने की शक्ति अपने अन्दर पाता है जिस पर उसे स्वयं अचम्भा होने लगता है। पहले घर बैठे-बैठे ही सारा दिन बीत जाता था। फिर वचनसिंह के यहाँ काम किया, वह जिंदगी भी बुरी नहीं थी, सड़क से हजारों लोग रोज़ गुज़रते थे, मोटरों में भी और साइकिलों पर भी, दफ्तर के बाबू भी और कॉलेजों के पढ़ने वाले लड़के भी और शाम को कनाटप्लेस का चक्कर लगाने वाली टोलियाँ भी। वह उन्हें देखा करता था और जो चेहरा उसे पसन्द आ जाता था उसे दुवारा देखने की कोशिश भी वह किया करता था...और अव प्रेस की नौकरी, जिसे वह एक दूसरी दुनिया समझता था जो उसकी पहुँच के बाहर थी, । 118 घर बने घर टूटे - लेकिन अब उसमे कोई नवीनता नहीं रही थी। जो चीज मनुष्य को नहीं मिलती उसी को पाने की लालसा उसके मन में क्यों उठती है और जव मिल जाती है तो उसका सारा आकर्षण क्यो खत्म हो जाता है ? वारिश बन्द हो गयी थी, लेकिन हवा पहले से भी अधिक तेज़ चलने लगी। देबू के बाल उड़ने लगे और उसने अपने सारे शरीर में एक अजीव- सी सिहरन अनुभव को। गमियो की हवा मे जो आनन्द आता है वही सदियों में तीरों की भांति चुभने लगता है। कभी-कभी किसी मकान की खिडकी हवा के साथ तेजी से बन्द हो जाती या खुल जाती, जिसके चटाख-पटाख का स्वर सडक के सन्नाटे में दूर-दूर तक पहुंच जाता था। उसने आसमान की ओर देखा, वह कही-कही साफ था जहां तारे दिखायी पड़ते थे। खूबचन्द से एक बार मिलना चाहिए । चाचा को उसके घर का पता होगां। उसमें सब-कुछ करने की हिम्मत है, जिस बात का जिस क्षण निश्चय कर लेता है फिर उसे करके ही छोडता है। क़दम-कदम पर सभल कर चलने वाले की जिंदगी भी भला क्या है ? और वह स्वय एक लकीर पर चलता है । न उससे दायें, न बायें...लेकिन ये तारे भी तो रोज निश्चित समय पर आसमान में चमकते हैं फिर हर सुबह को गुम हो जाते हैं, चाँद बडा-छोटा जरूर होता है लेकिन वह भी समय के मुताबिक, इसी तरह इसान की जिंदगी भी बंधी हुई है, कभी किसी की लाटरी आ जाये तो वह बात दूसरी है, लेकिन लाखो लोगों में से सिर्फ एक ही की तो लाटरी आती है। । बस्ती की झुग्गियो पास आ गयो । कही रोशनी नही थी, शायद नया व्यक्ति यहां आने पर रात को पहचान भी न सके कि यहां कितने लोग बसते हैं । वह हतके स्वर में सीटी बजाने लगा। उसे थकान नहीं थी, नीद भी नहीं थी और घर जाने की इच्छा भी नही थी। परन्तु फिर भी उसके पांव पगडंडी पर आगे बढ़ने लगे, वस्ती की पगडहियों पर चलने का वह इतना आदी हो गया था कि अब उसे किसी पत्थर से टकराकर गिर जाने का भय नहीं होता था। अचानक अपने से दस कदम आगे किसी को धीरे-धीरे पगडंडी से आते - - . देखकर वह चौंक पड़ा। "कौन है ?" उसने अपनी आवाज़ ऊँची उठाकर पूछा। आकृति रुक गयी और वहीं खड़ी रही, उसने कोई आवाज़ नहीं की। देबू को प्रतीत हुवा मानो कोई स्त्री हो, क्योंकि उसके बदन से चुन्नी दूर तक हवा में उड़ जाने का विफल प्रयास कर रही थी। पास आने पर देवू ने पहचाना, वह कौशल्या थी। "तुम देवू...?" कौशल्या ने बड़े गम्भीर भाव से कहा। देबू की आवाज़ नहीं निकली। वह सीधा कौशल्या के सामने खड़ा था, उसे अपनी ओर घूरते देखकर उसने अपनी आँखें दूसरी ओर फेर ली। उसका शरीर काँपने लगा, उसकी जवान मानो तालू से चिपक गयी। पहली वार आनन्द पर्वत पर उसे और जग्गी को साथ देखकर भी उसे आश्चर्य हुआ था, लेकिन भय नहीं था। "क्या मुझे देखकर हैरान हो गये, हूं...!" और कौशल्या धीमे स्वर में हँसने लगी..."ठीक तो है, इतनी रात को अकेली औरत को देखकर सव डर जाते हैं..." कौशल्या को सामने झाड़ियों की ओर देखते हुए देवू ने अच्छी तरह से कौशल्या के चेहरे की ओर देखा। उसके बालों की लटें हवा में उड़ रही थीं और चुन्नी के उड़ने से उसका उभरा सीना भी उसकी आँखों से छिपा नहीं रहा, लेकिन अँधेरा होने के कारण वह कौशल्या की आँखों को नहीं देख सका। "आखिर तुम जा कहाँ रही हो?" देवू धीरे-धीरे संभल रहा था। "यह अभी नहीं सोचा है कि कहाँ जाऊँगी, लेकिन जहाँ से आ रही हूँ, फिर वहाँ नहीं लौटूंगी...," कौशल्या के स्वर में दृढ़ता थी। देबू चौंक पड़ा, लेकिन कुछ बोला नहीं। "शायद जग्गी के साथ चली जाऊँ । लेकिन मुझे भरोसा नहीं कि वह मुझे ज्यादा दिनों तक रख सकेगा। जब वह ऊब जायेगा तब कहीं और ठिकाना देगी । एक औरत को सहारा मिलना ज्यादा मुश्किल नहीं है।" कौशल्या कह रही थी। "साफ़-साफ़ वात कहो, भाभी ! क्या घर में झगड़ा हुआ है, क्या माँ ने 4 । 120 घर वने घर टूटे कुछ कहा है ?" थोडी देर रुककर कौशल्या ने कहा, "आज कोई नयी बात नहीं है, मैं कितने ही दिनो से सोच रही थी और आज मन पक्का करके निकल पड़ी। कल यह बात सारी वस्ती को पता चल जायेगी, लेकिन उससे मुझे क्या...मैं अकेली नही रह सकती ।" हवा का एक तेज़ झोका झाडियो को हिलाता हुआ आया और तेजी से दूर भाग गया। देवू उस रात की बात सोचने लगा जब उसने कौशल्या और जग्गी को एक-दूसरे से लिपटे देखा था और उसी दिन उसने अनुभव किया था कि विवाहिता स्त्री कभी अकेली नहीं रह सकती, लेकिन पुरुष भी तो अकेला नहीं रह सकता। उसने ध्यान से कौशल्या के शरीर पर एक दृष्टि डाली। "क्या घर मे सबको मालूम है " देवू ने बातें करने के इरादे से पूछा, अन्यथा इसकी उसे विशेष उत्सुकता नहीं थी। "मालूम होना-न-होना, सब एक-सा है। जिस घर मे बेटा न हो, वहाँ उमकी औरत के लिए कभी जगह नही होती ..देवू कौशल्या को अपना नाम लेते देखकर वह एक बार फिर सिहर उठा। जो भय की लहर पहले-पहल कौशल्या को देखकर उसके मन में उठी थी वह अव दूर हो गयी थी। "तुम इस तरह नहीं जा सकती, कौशल्या...!" कौशल्या का नाम लेते समय वह तनिक हिचक रहा था, "तुम जग्गी के पास क्यो जा रही हो, वह अच्छा आदमी नहीं है-वह एक आवारा है।" इस बार कौशल्या ने देवू पर दृष्टि डाली। दोनो की आने पर परन्तु उनमे टकराव नहीं हुआ, अपने बीच में दोनों ने कोई सामान नहीं की। कौशल्या थोड़ा-सा मुसकरायी, "जग्गी अच्छा आदमी नहीं है और - मैं अच्छे या बुरे को बात नहीं सोच रही हूँ । डूबते हुए को यह का पड़ता कि उसे कौन-सा सहारा मिल रहा है, वह कम है। वस, वह सिर्फ सहारा चाहता है और औरत जब म काम गर है तो वह यह नहीं देखती कि वह मर्द कैसा है...." .
"कौशल्या...!" देवू ने चिल्लाकर कौशल्या की कलाई पकड़ ली। अचानक हाथ पकड़ने से कौशल्या के हाथ की कांच की एक चूड़ी टूटकर नीचे गिर पड़ी, परन्तु दोनों में से किसी ने भी उस पर ध्यान नहीं दिया। कौशल्या ने अपना हाथ नहीं छुड़ाया, लेकिन देबू ने महसूस किया कि वह काँप रही थी। थोड़ी देर तक दोनों चुपचाप खड़े रहे, हवा के झोंके दोनों के कपड़ों को, वालों को उड़ा रहे थे। दोनों एक-दूसरे से सटे खड़े थे, कोई एक-दूसरे की तरफ़ नहीं देख रहा था। नीचे वस्ती की झुग्गियां थीं, जहाँ कहीं भी रोशनी दिखायी नहीं दे रही थी। "तुम्हें मेरे साथ इस तरह खड़े होते डर नहीं लग रहा, देवू ?" । कौशल्या ने पूछा। देवू कुछ नहीं बोला, वह चुपचाप खड़ा था, कभी वह सामने की झाड़ियों और चट्टानों की ओर, और कभी ऊपर खुले आसमान की ओर देखता रहा । वह स्वयं नहीं जानता था कि वह क्या अनुभव कर रहा है, परन्तु जिस उत्तेजना का अंकुर उस रात को आनन्द पर्वत पर फूटा था आज वही भावना अपनी पूरी प्रबलता के साथ उसके मन में आ समायी थी, जिसे दवाने की उसने कोई कोशिश नहीं की और शायद कर भी नहीं सकता था। प्रतिक्षण उसकी लहरें उसे और भी तेज़ होती जान पड़ी। पिछले कितने ही महीनों का उसका अकेलापन अब पूर्ण रूप से उभर आया था और वह सोच रहा था कि उस जमा हुए ढेर-से गंदे पानी को निकाल फेंकने का वह अवसर उसके हाथ में आया था जिसे वह खो देना नहीं चाहता था। "तुम घर जाओ देवू, मैं भी अपने रास्ते पर चली जाऊँगी, हम दोनों के रास्ते अलग-अलग हैं...।" कौशल्या ने अपना हाथ छुड़ाने की हलकी-सी चेष्टा करते हुए कहा। का वाँध फूट पड़ा, उसके मन में एक आवाज़ उसे आगे बढ़ने के लिए कह रही थी। उसने कौशल्या के दोनों कंधे पकड़ लिये और उसके चेहरे को क्षण-भर के लिए देखता रहा और उसने महसूस किया कि उसकी आँखें, नाक, होंठ, ठुड्डी -सब कितने अजीव-से थे, जिनका पहले उसे कभी - देवू 122 घर वने घर टूटे । एहसास तक नहीं हुआ था। कौशल्या के चेहरे में उसे लिट्टो की छाप दिखायी दी, वह क्षण-भर के लिए कांप उठा। कौशल्या को देवू के व्यवहार पर अत्यंत आश्चर्य हो रहा था । वह समझ नही पा रही थी कि आखिर देवू उससे चाहता क्या है? वह मूत्तिवत् खडी थी, उसके अन्दर छिपी नारी की चेतना देवू के स्पर्श से -जागी नहीं थी, क्योकि देवू कभी उसके सम्मुख पुस्प बनकर नहीं आया था-"मुझे छोड दो, देवू ।" देवू ने कसकर कौशल्या को अपने से चिपटा लिया, उसे जग्गी की याद आयो । ईर्ष्या से उसका मन भर उठा-"तुम जग्गी के पास नहीं जाओगी, कौशल्या, मैं तुम्हे कही नहीं जाने दूंगा. ।" कौशल्या थोड़ी-बहुत वास्तविक स्थिति का अनुमान लगा सकी। उसने अपने-आपको देयू की बांहों से अलग करने की चेष्टा नही की । मन-ही-मन उसे अपनी विजय पर प्रसन्नता हुई। देवू भी सहारा चाहता है एक स्त्री का, किसी और को ढूंढने की उसमे क्षमता नही है । रात बीतती रही, आसमान में तारे स्पष्ट होते गये और हवा भी पहले की अपेक्षा अधिक मन्द गति से चलने लगी। धीरे-धीरे देवू के मन में उठा तूफान जब शान्त हो गया तो उसने अपने भीतर एक नये प्रकाश की रेखा देखी। दोनो एक चट्टान पर झाडियो के पीछे बैठ गये। देवू अस्फुट स्वर मे कह रहा था-"तुम नही जानती, कौशल्या, कि मैं हमेशा कितना अकेला अपने-आपको पाता हूँ, कभी-कभी मेरा अकेलापन मुझे ही खाने को दौडता है .।" परन्तु कौशल्या को देबू की इन बातो मे उत्सुकता नही थी, उसने थोड़ी देर बाद धीमे स्वर से कहा, "हुकम नै शायद कभी मुझसे प्यार नहीं किया, उसके लिए मैं हमेशा उसकी पत्नी से ज्यादा और कुछ नही थी, इसीलिए मुझे छोडते वक्त उसे शायद ज़रा भी दुख नही हुआ ! आज मैं महसूम करती हूँ कि अगर वह न गिता तो शायद मैं एक दिन उसे छोड- कर भाग जाती...." फिर कौशल्या थोड़ी देर चुप रही।
कौशल्या का हाथ पकड़ लिया, केवल यह सोचकर कि आसपास और कोई अवलम्ब भी तो नहीं मिल रहा था। घर में किसी व्यक्ति को इन दोनों के नये रिश्ते पर कोई शक नहीं हुआ। हुकम के चले जाने के बाद कौशल्या ने अपने-आपको झुग्गी की कड़ियों से धीरे-धीरे बाहर निकाल लिया था और अब वह काफ़ी स्वतंत्र हो गयी थी। वह वाहर क्यों जाती है, क्या करती है, किससे मिलती है- इसके वारे से कोई उससे अव पूछता नहीं था। नानकचन्द और भी अधिक उदासीन हो गये थे। देवू और कौशल्या के लिए रात को चुपचाप तालाव के ऊपर झाड़ियों के पास मिलना कोई असंभव नहीं था। घर में दोनों के पारस्परिक व्यव- हार में पहले की अपेक्षा कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ था। वस, जब कभी देवू वाहर होता और कौशल्या किसी काम से झुग्गी के बाहर निकलती तो देबू ध्यान से उसकी ओर देख लेता और जब वह ओझल हो जाती तो उसके विपय में सोचता रहता। उसको प्रत्यक्ष देखने की अपेक्षा उसके विषय में सोचने में उसे अधिक सुख मिलता था। पहले चन्द दिनों में, विशेष कर कौशल्या के साथ उस रात को नया रिश्ता वाँधकर देवू को एकाएक हुकम का विचार बड़े जोर से आया था। उसे अनुभव हुआ था, मानो हुकम उसके सम्मुख खड़ा होकर अपनी बड़ी- बड़ी खुली आँखों से उसे देख रहा हो, परन्तु यह विचार अधिक देर तक उसके मस्तिष्क में टिक नहीं पाता था। वह अपने-आपसे कहता था कि हुकम ने सदा ही कौशल्या के साथ अन्याय किया था और कौशल्या भी कहती थी कि उसने कभी उससे प्यार नहीं किया, फिर पति-पत्नी का रिश्ता कैसे? एक दिन शाम को प्रेस से लौटते समय सड़क पर अचानक ही ताँगे में लिट्टो को उसकी मां के साथ देखकर देवू चौंक पड़ा। उसने महसूस किया कि पहले की भांति इस वार लिट्टो ने उसे देखकर शरमाते हुए अपना मुंह दूसरी ओर नहीं फेर लिया, वह उसकी ओर विना किसी शरम-हया के ताकती रही, मानो उससे कोई प्रश्न पूछ रही हो। तांगा दूर चले जाने पर देवू को पता चला कि उसके चेहरे पर पसीने की बूंदें छलक 126 घर बने घर टूटे - भायी थी। उसने अपना हाथ अपने चेहरे पर फेरा और फिर म: सांस ली। माफ़ी रास्ते यह शिट्टो ये ही विषय में सोचता रहा, वह मिदनः दुबली हो गयी है, उसका मुंह सफेद पड़ गया है और उमको बागमन जाने यह कौन-सी विजसी थी जिगने उसे पकाचौध कर दिया था। अंदर फिर धीरे-धीरे लिट्टी में यदले कौशल्या पा चेहरा उसकी यांनी गरे धूमने लगा। न जाने क्यों देयू के मन में यह विचार आया दिदि इस प्रकार मुलाकात होना ठीक नहीं हुआ, परन्तु दूर हो धारा आशंका पर स्यय हगी आने लगी। रात को कौशल्या के पास बैठे हुए उगने बनायाग ही कहा, "TT मैने लिट्टो को सोगे में जाते देखा था. .." परेशव्या घोड़ी देर दर दान उसके मेहरे की ओर देखती रही, फिर फकाफक गर्न मगी। "तुग हैस पयो रही हो?" "तो अभी तक तुम लिट्टो के बारे में गोचा करते हो, दं?" "शायद तुग सगा नहीं सकती कि मिट्टी के माद बदमन हुई थी सय मैं करी-यमे गगने देखा करता था, लेकिन बद की दर है। अब मेरा उसके माय फोई रिश्ता नहीं है। लेकिन दिदा • इस तरह पुर-पर कर पयों देख रही थी? शायद मोदी अपने ऊपर विषयारा नहीं है।" देव धीरे-धीरे वह रहा था। "हू...किसी भी गर्द को अपने कार विश्वास नहीं होता। दृष्य भी नही पा, नगगी को भी नहीं था और तुम्हें भी..." देव ने कोषल्या की बात को बीच में ही काटते हुए कहा, "नट पाह रही हो।" और उराने कौशल्या का हाथ पकड लिया। कौशरया पिर जोर से हंस दी, परन्तु इस बार कोगल्या को हंसी दै के कानों तक नहीं पहुंची। वह कुछ और ही मोच रहा था और नहीं बाहदा था कि कौशल्पा को उसके विचार पता चलें। "तुग जानती हो कि मैं तुम्हे छोड़कर कही नहीं जाऊंगा। उन्हें मालूम है कि मैं कितना कमजोर हूँ, फिर तुम बार-बार मेरा मजाक ?" "जागी भी ऐसा ही कहता था, देवू, लेकिन मैं उसे जानती हूं। तुम्हें अभी इतना नहीं समझ पायी हूँ, लेकिन जब तक निभता है, लता रहेगा - और जिस दिन तुम मुझसे दूर जाना चाहोगे उस दिन मैं अपने-आप ही चली जाऊँगी, देवू !" देबू ने उसे अधिक नहीं कहने दिया। और एक दिन शाम को जब देवू प्रेस से लौटकर आया तो उसने झुग्गी के बाहर किसी परिचित चेहरे को देखा तो उसे अपनी आँखों पर सहसा विश्वास नहीं हो सका। कुछ क्षणों तक वह वहीं खड़ा उस विना हिलती- डुलती मूर्ति की ओर देखता रहा । वही चेहरा था, वही आंखें थीं और वही विखरे रूखे वाल थे। उसे महसूस हुआ, मानो क़ब में से उठकर कोई मुर्दा जीता-जागता उसके सम्मुख आ खड़ा हुआ हो। लेकिन आखिर हुकम इतने महीनों बाद बिना कोई सूचना दिये कहाँ से यकायक आ गया? अव क्या होगा? कौशल्या की शक्ल उसकी आँखों के सामने घूम गयी। उसे अकेला बैठे देखकर उसने अनुमान लगाया कि हुकम को वापस लौटे काफ़ी समय वीत गया होगा, नहीं तो घर वालों की भीड़ उसके इर्द-गिर्द होती पास आने पर देबू अनायास ही मुसकरा दिया, परन्तु हुकम पहले की ही भाँति निश्चल बना बैठा रहा। वह कभी देवू की ओर देखता और कभी सामने की ओर। घर के अंदर भी सन्नाटा था। उस रात को चारपाई पर लेटकर कितनी ही देर तक उसके मन में भांति-भांति के विचार घुड़दौड़ लगाते रहे। झुग्गी के अंदर हुकम और कौशल्या थे, परिवार के दूसरे लोग बाहर थे। आखिर हुकम इस मौके पर क्यों आ टपका? वह क्या फिर कौशल्या के साथ रहने लगेगा? लेकिन कौशल्या उसका विरोध करेगी, वह कहती थी कि उसे हुकम से कभी प्यार नहीं था और अगर हुकम न चला जाता तो वह भाग जाती। वह अव हुकम के साथ नहीं रहेगी, लेकिन उसे झुग्गी के बाहर निकल आना चाहिए। क्या हुकम उससे अपने प्यार की बातें कर रहा है, क्या वह पत्र न लिखने के लिए माफ़ी मांग रहा है ? कौशल्या मुझसे प्यार करती है, नहीं तो इतने बड़े ख़तरे का मुकाबला करके वह मुझसे इस तरह न मिला करती। उसने फिर झुग्गी के अंदर देखा, वहाँ रोशनी नहीं थी, उसकी तबीयत होने लगी कि वह किसी प्रकार उनकी बातें सुन सके । हुकम को कोई ठीक-सा काम नहीं मिल सका, वह मजदूरी करके अपना पेट . 128 घर बने घर टूटे भरता रहा। शायद वह वम्बई नही गया, नहीं तो उसे जहाज पर कोई- न-कोई नौकरी जरूर मिल जाती। लेकिन हुकम में शरम-हया बिलकुल नहीं है, नही तो वह इस तरह वापस न लौट आता। देबू ने सोने की कोशिश की, लेकिन उसे नीद नही आयी। बस्ती में चारों ओर सन्नाटा था, हवा वन्द थी। स्त्री का प्यार क्या होता है, उसके सहयोग में क्या सुख मिलता है, इसकी धुंधली-सी एक झांकी वह देख चुका था। कौशल्या का साथ पाने के लिए उसकी तबीयत मचलने लगी, किन आखिर हुकम कौशल्या का पति है, उसके शरीर पर उसे पूरा धिकार है चाहे कौशल्या उससे प्रेम न करती हो। वह कौशल्या का पति ही था, जब किसी के साथ उसका विवाह होगा, तब उस स्त्री पर देवू का पूर्ण अधिकार होगा। देवू ने एक जोर की सांस ली और वह पीठ के बल बारपाई पर लेट गया। अगले दिन प्रात. ही पुलिस की चार लॉरियां सिपाहियों और पुलिस- स्पेक्टरों से भरी आयो। सारी यस्ती में एक तहलका-सा मच गया। लिम के हाथो में डडे थे। वस्ती वालो को मालूम था कि इतवार तक इस्ती खाली करने का हुक्म उन्हे मिल चुका है, परन्तु इस पर किसी ने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया था। अब पुलिस को देखते ही सब कांप उठे। पुरुप अपनी झुग्गियो से बाहर निकल आये और स्त्रियो के झुड दरवाजो पर खडे होकर कानाफूमी करने लगे। निकट भविष्य की आशका से उनका जी डांवाडोल हो गया । सवको यह विश्वास हो चुका था कि पुलिस वाले जवरदस्ती उन्हे वस्ती से निकाल देंगे, परन्तु फिर भी अन्त समय तक आशा ने उनका साथ नहीं छोड़ा। शायद उनकी गिड़गिडाहट से इन वर्दी वालो के दिल पसीज जायें। "अब क्या होगा?" "कसे पटेलनगर जाकर वस जायें ? यहां जो दुकानें बनायी हैं उनका स्या होगा?" "इनके मन मे जरा भी दया नहीं है, आखिर इनके भी तो बाल-बच्चे होगे.." इस प्रकार के प्रश्न और उत्तर वस्ती के लोगों में उठ रहे थे। पुलिस वालों से डरकर कुछ बच्चे ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे और जव चुप कराने पर भी वे चुप नहीं हुए तो उनकी मांओं और बहनों आदि ने मार-पीटकर उन्हें चुप कराना चाहा, परन्तु उनकी चीखें बढ़ती गयीं। वस्ती में शोर-गुल हमेशा होता था, परन्तु इस नये वातावरण के शोर-गुल में एक वीभत्सता थी जिससे सबके दिल दहल गये थे। निहालचन्द बस्ती के एक बड़े बुजुर्ग समझे जाते थे, उनके सामने वस्ती की कोई स्त्री सिर-बुले नहीं आती-जाती थी। वस्ती वाले अपने दुख-दर्द लेकर उनके पास आते थे और वे अपनी बुद्धि के अनुसार सवको दिलासा और सहानुभूति से भरी राय देते थे। किसी के घर में शादी हो, मौत हो, कोई बीमार हो, निहालचन्द सदा वहाँ पहुँच जाते थे। जब झुग्गियाँ उठाने की बात वस्ती में फैली थी तव से निहालचन्द को चिंता होने लगी थी, परन्तु वस्ती के अन्य लोगों की भांति उन्हें भी यह पुलिस की केवल धमकी ही जान पड़ी और लोगों के इस विषय में पूछने पर उन्होंने दिलासा दी कि ऐसा नहीं हो सकता, सरकार उनकी मुसीबतों को इस प्रकार नज़रअंदाज़ नहीं करेगी। अब पुलिस को देखकर वे भी जैसे-तैसे जल्दी से सिर पर पगड़ी वाँध- कर अपनी झुग्गी से बाहर निकल आये और आस-पास की झुग्गियों के पुरुप उनके आस-पास आकर खड़े हो गये। निहालचन्द ने सबको दिलासा दी और फिर पुलिस वालों के पास धीरे-धीरे क़दम बढ़ाते हुए आगे बढ़ गये। नोटिस तुम "आज यहाँ से सारी झुग्गियाँ हटा दी जायेंगी। महीना-भर का लोगों को दिया जा चुका था...," हवलदार ने कड़ी निगाहों से निहालचन्द की ओर देखते हुए कहा । "लेकिन हवलदार जी...ये लोग कहां जायेंगे...?" निहालचन्द ने अपनी आवाज़ को अत्यंत नम्र बनाते हुए कहा। हवलदार का क्रोध बढ़ गया, "पटेलनगर में जगह तो दे दी है...लेकिन मैं यहाँ बहस करने नहीं आया हूँ।" निहालचन्द ने अपने दोनों हाथ जोड़ दिये,"आप नहीं जानते, हवलदार जी, कि किस खून और पसीने से यहाँ की झुग्गियाँ...!" , 130 घर बने घर टूटे "धुप हो बुड्ढे-आज तुम नही, ये सिपाही झुग्गियां गिरायेंगे...!" हवलदार ने डोर से एक सीटी बजायी और 50-60 सिपाही वस्ती के चारो तरफ अपने डडे सभालकर भागने लगे । झुग्गियों के बाहर खड़े लोगों की चीखे निकल गयी और औरतों का क्रन्दन गूंज उठा। देवू बाहर बैठा अपनी झुग्गी की दीवारो को गिरते देख रहा था, मिट्टी और इंटों की दीवारें इतनी शक्तिशाली हो सकती हैं, इसका उसे विश्वास नही था। उसने सदा ही झुग्गी को दीवारों को अपने जैसा कमजोर समझा था। परन्तु कुछ ईंटो के गिरने के बाद दूसरी इंटें तेजी के साथ नीचे गिरने लगी, छत की टीन का टुकड़ा बडी आसानी से एक भयकर आवाज करता हुआ नीचे आ गिरा। सुभागी जोर-ज़ोर से रो रही थी और घर का सामान वाहर रखती जाती थी, लाली और हुकम उसका हाथ वटा रहे थे, परन्तु दोनों में उतना उत्साह नही था मानो झुग्गी के नष्ट होने के बाद घर के टूटे-फूटे पुराने सामान के प्रति उसका कोई आकर्षण शेष नहीं रह गया था। दूसरी झुग्गियों का भी यही हाल था। जहां पुलिस का थोड़ा-बहुत विरोध किया जाता वही वे अपने डडो का सहारा ले लेते और फिर उनका मार्ग साफ हो जाता था। स्त्रियों और बच्चो का रोना बढ़ता जा रहा था। कुछ देर तक देवू को यह सब देखकर प्रसन्नता हुई। बस्ती से उसका लगाव नही रहा था, बस्ती के लोगो से उसे घृणा-सी होने लगी थी और इस विध्वस को देखकर उसे एक आत्मशाति-सी मिल रही थी। अव हुकम और कौशल्या रात को झुग्गी के अदर नही सो सकेंगे...अव कभी इन पग- डंडियो पर आने-जाने का कष्ट उसे नही उठाना पडेगा, उसका पिछले पांच- छ सालो का अतीत मानो इन ईंटों के नीचे दब जायेगा। इस विचार से उसे प्रसन्नता हुई। अचानक सुन्दर का विचार उसके मस्तिष्क में बिजली की भांति दौड गया । क्या आज सुन्दर की स्मृतियां भी सदा के लिए यहां दब जायेंगी? कभी-कभी उसकी याद आ जाने से उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगता था, लेकिन सुन्दर अव नही रहा। इसी झुग्गी के सामने बैठकर वह - - अपनी कितावों में झुका रहता था, यहीं बाहर चारपाई पर वे दोनों लेटते थे और उसकी गरम-गरम श्वास वह अनुभव करता था...और इसी झुग्गी में एक दिन ढोलक वजी थी, उसकी सगाई हुई थी। यकायक देवू ने अनुभव किया, मानो उसकी छाती में एक तीव्र वेदना उठ रही हो। उसने अपनी आँखें दूर उठायीं । चारों ओर सलवली मची हुई थी, औरतों और मर्दो की चिल्लाहटें थीं, इंटों के गिरने की आवाजें थीं। उसका हृदय रो पड़ा। वह समझ रहा था कि इस वस्ती में विताये पिछले पांच-छ: सालों में परि- स्थितियों ने उनके मन में वस्ती के प्रति केवल वैराग्य ही नहीं, वरन् एक घृणा-सी भी पैदा कर दी थी, परन्तु धीरे-धीरे देवू अनुभव कर रहा था कि वस्ती की प्रत्येक ईट के गिरने के साथ-साथ वह एक-एक क़दम बस्ती के और भी समीप पहुंच रहा है। उसने नहीं जाना था कि उसके मन में बस्ती की जिंदगी के प्रति छिपे हुए प्रेम और अपनत्व के गहरे अंकुर थे जो आज उस अवसर पर एकाएक उसकी मर्जी के विरुद्ध फूट गये थे। तभी अपनी झुग्गी के सामने पहले से कुछ अधिक कोलाहल सुनायी दिया, उत्सुकतावश उसने उस ओर नज़र दौड़ायी। लाली और एक सिपाही में न जाने क्या हाथापाई-सी हो रही थी। सिपाही लाली का हाथ पकड़कर उसे झुग्गी से वाहर खींच रहा था और लाली अपना हाथ छुड़ा- कर झुग्गी के अंदर जाना चाहती थी। सुभागी ज़ोर-ज़ोर से चीखें मार रही थी और अपने वालों को नोंचती जाती थी। देवू झटपट उठ खड़ा हुआ और फिर क्षण-भर के बाद बड़ी तीव्र गति से अपनी झुग्गी की ओर भागा। "वह दीवार मत गिरा, हम अभी यहाँ से चले जायेंगे...," लाली जोर-जोर से कह रही थी। देवू समझ नहीं सका कि लाली उस वची हुई दीवार को गिराने के लिए क्यों मना कर रही है ? अंदर इंटों की एक छोटी पहाड़ी बन गयी थी, कहीं लकड़ी के तहते थे और कहीं चीथड़े। अचानक देवू के सामने चार साल पहले की एक घटना घूम गयी। सुन्दर की किताबों के लिए कोई स्थान झुग्गी के अंदर नहीं बन सका था 132 घर बने घर टूटे और उसकी आवश्यकता भी किसी ने नही समझी थी, परन्तु सुन्दर जिद कर रहा था कि झुग्गी की एक दीवार से सटाकर एक ऐसा स्थान बना दिया जाये जहाँ सुन्दर अपनी किताबें रख सके। उस दिन सुन्दर ने गाना नहीं खाया था और वह कितनी ही देर तक रोता रहा था। अगले दिन लाली और सुन्दर ने मिलकर कुछ इंटो को सडा करके उसकी किताबो के लिए एक आलमारी-सी बना दी थी। लाली उसी आलमारी के गिराये जाने का विरोध कर रही थी। तभी देर होते देख सिपाही ने लाली को ज़ोर से एक ऐसा धक्का दिया जिससे वह जमीन पर गिर पड़ी। बिना सोचे-समझे देबू तेजी से आगे बढ़ा और उसने कसकर सिपाही के डडे को अपने दोनो हाथों से पकड लिया। उसके दांत कसकर आपस मे जकड़ गये थे जिससे उसके मुंह से कोई स्वर नहीं निकल रहा था। और वह उस दीवार को गिरा रहा था, आज उसका अग-अग उनका मुकाबला करने के लिए उतावला-सा जान पड़ता था। थोडी खीचा-तानी के बाद देवू ने अनुभव किया, मानो उसकी आँखो के सामने अंधेरा छा गया हो, वह औधे मुंह जमीन पर गिर पड़ा था और उसके कधे से खून निकल रहा था। बस्ती मे लोगो का चीखना-चिल्लाना, ईटो और लकड़ी के फट्टो के गिरने की आवाजें, बच्चो की चीत्कार-सब मिलकर एक मिश्रित-सा कोलाहल पैदा कर रही थी। सूरज ऊपर चढ आया था। कुछ लोग अपना बचा-खुचा सामान बचाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन कुछ अकर्मण्य- से चुपचाप अपनी-अपनी झुग्गियों के सामने हाथ-पर-हाथ घरे खड़े थे। बस्ती मे हल्ला सुनकर राह चलते लोग ऊपर सड़क पर खडे नीचे का तमाशा देखने लगे और कुछ अधिक कौतूहल वाले लोग पगडडी से नीचे उतर आये
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