Adarsh Library, Jaipur
Rahi Masum Saza
Front matter
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राही मामृम रजा
राजकमल प्रकाशन
नयी दिल्ली
परना
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वसीयत
मेरा फ़न तो मर गया यारो
मैं नीला पड़ गया यारो
मुझे ले जाके ग्राजीपुर को गगा की गोदी में सुता देना।
मगर शायद वतन से दूर मौत पाये
तो मेरी यह वसीयत है
मगर उस शहर में छोटी-सी एक नदी भी बहती हो
तो मुझको
उसको गोद में मुताकर
उससे कह देना
यह गंगा का बेटा प्राज से तेरे हवाले है।
मैं तीन माओं का बेटा हूँ। नफीसा वेगम, अलीगड युनिवर्सटी
और गंगा। यह 'सीन :७५' अपनी तीनो मामओ को मेंट करता हूँ।
नफीमा वेगम मर चुकी हैं। अब साफ़ याद नहीं आती। वाकी दोनी माएं
जिन्दा हैं और याद भी है।
---राही माराम रजा
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भूमिका
जिमको देखिए,
जिमसे मिलिए,
औरों-जसा लगता है।
इस बस्ती मे
जैसे किसी को अपनी कोई पहचान नहीं।
मीदियों पर
फिर किसी की चाप है।
फिर कोई व चेहरा होगा,
मुंह में होगी जिमके मक्सन को जवा।
मीने में होगा जिसके एक पत्थर का दिल ।
आयेगा,
और मुस्कराकर,
मेरे दिल का एक वरक ले जायेगा।
--राही मासूम रजा
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फेड इन खिड़की की सलाखों के उधर, ग्रिल के उस पार, नारियलों के झुण्ड तक उतरकर चांद रुक गया था और अली अमजद खिड़की की सलाखों से अपना चेहरा लगाये, नारियल के झुण्ड में उतरे हुए चांद को देख रहा था। यह पता नहीं कि अली अमजद कमरे के अन्दर कद था या चांद कमरे के वाहर। शायद दोनों ही गिरफ्तार थे ! एक कमरे के अन्दर और दूसरा कमरे के बाहर । चांद में जिन्दगी नही, और इधर कुछ दिनों से अली अमजद ने भी, अपने-आपको जिन्दों में गिनना छोड दिया था और शायद इसीलिए इधर कुछ दिनों से, उसे चांद अच्छा लगने लगा था ! कमरे में गयी रात का सन्नाटा था। गयी रात का सन्नाटा कमरे के वाहर भी था । खजूरो का झुण्ड चुप था। पुराने किले का संडहर चुप था। खंडहर को कमर में बांहे डाले हुए वह सड़क चुप यो जो बिला किसी वजह के उस साड़ी तक जाके यकायक सत्म हो जाती है जिसमे कभी मछेरो की हरे, पीले, गेरुये और तिरंगे झण्डोवाली नौकाएँ भी नहीं दिखायी देती। कभी वह साड़ी अवश्य किसी काम की रही होगी नही तो उसके मुंह पर किला क्यों बनाया गया होता! कभी नौकाएँ आती रही होगी उस साड़ी में और तभी वहाँ तक एक कच्ची सड़क बनायी गयी होगी जिस पर स्वतन्त्र भारत की एक कारपोरेशन ने तारकोल और कंक्रीट का गिलाफ चहा दिया और वह सड़क एक बा-इज्जत सड़क हो गयी। और जब वह सड़क दिना किसी कारण के बाइज्जत हो गयी तो उसमयम रखना भी जरूरी हो गया ! तो डेढ़-दो सौ वरस तक बनाम जी करने के बाद एकदम से उस सड़क का नाम पड़ गया ! सिमेंट का एक वडा-सा वोर्ड वना और उस पर रोमन, देवनागरी, और मराठी अक्षरों में 'लाला अशरफीलाल मार्ग' लिख दिया गया। एक उपमन्त्री ने नाम के उस बोर्ड का उद्घाटन किया और उद्घाटन के फौरन ही बाद वह उप- मन्त्री और सड़क पर बसनेवाले तमाम लोग उस सड़क का नाम भूल गये और नाम के शानदार बोर्ड का मजबूत स्तम्भ कुत्तों के मूतने के काम में आने लगा। कारपोरेशन से न किसी ने यह पूछा कि इस सड़क का नाम रखने की क्या जरूरत थी और न यही पूछा कि यह लाला अशरफीलाल कौन हैं, इस सड़क के मेक-अप और नामकरण पर कुल मिलाकर तीन लाख, सत्तासी हजार, आठ सौ सोलह रुपये, सवा चार आने खर्च हुए-सवा चार आने यूं कि जिन दिनों की यह वात है, उन दिनों नया पैसा नहीं चला था और आने-पाई ही में हिसाव हुआ करता था हालांकि उन दिनों की जवान पीढ़ी ने पाई की सूरत भी नहीं देखी थी। विद्यार्थियों ने बस, यह सुन रखा था कि पाई भी कोई चीज़ होती है और हिसाब-तिजारत में बहुत काम आती है। चार पाई का एक पैसा। चार पैसों का एक आना । चार आनों की एक चवन्नी । दो चवन्नियों की एक अठन्नी। दो मठलियों का एक रुपया। चवन्नी और इकन्नी के बीच में एक दुअन्नी। इकन्नी और पैसे के बीच में एक अघन्नी भी हुआ करती थी। तव हिसाव करने में बड़ा मजा आया करता था। पाई से रुपये तक एक सीढ़ी चढ़ जाना पड़ता था, इसीलिए पैसे और रुपये के बीच की कड़ियां गायब हो जाने से हिसाव का सारा रस सूख गया। और हिसाव का रस सूख जाने का फायदा उठाया सेठ-साहूकारों ने । जव तक लोग नये पैसे का मिजाज समझें-समझें, कीमतें आतमान पर चली गयीं और हर दमड़ीलाल लाला अशरफीलाल बन गया ! और जव हमारे मार्गवाले लाला का देहान्त दिल की गति बन्द होने से हुआ तब सारे देश को पहली वार पता चला कि लालाजी के सीने में कोई दिल भी था ! पत्र-पत्रिकाओं को वातें बनाने का मौका मिल गया! एक पत्रकार ने लिखा कि जब अल्लाह ने अशरफीलाल का पुतला बनाया तो स्टाक-रूम से खवर आयी कि स्टाक में कोई दिल ही नहीं है। ३०/सीन :७५ " - .. यहां पुतला तयार था। विल्टी भेजी जा चुकी थी। डेलिवरी की तारीख पड चुकी थी। इसलिए अल्लाह मियां ने दिल की जगह मलका विक्टोरिया वाला चाँदी का एक रपया रखकर अगरफीलाल को बुक कर दिया। यही कारण था कि लालाजी ने जिस चीज को हाय लगाया वह रुपया वन गयो । परन्तु इससे यह मतलब न निकाला जाये कि लालाजी ने घर में कोई टकसाल डाल ली थी। नही नहीं। लालाजी ऐसे आदमी नहीं थे। वह बड़े पार्मिक महापुरुष थे। जात-पात, धर्म-अधर्म, छूत-अछूत का भेद-भाव नही मानते थे ! हरिजन हो या गर्मा ब्राह्मण सबसे बराबर मूद लेते थे, सय पर वरावर नालिग करते थे और सबके यहां वरावर कुर्की लाते थे। उनके गांव महाराजगंज की चमटोली (चमारटोली) मे भारतमाता का जो सजीला और चमचमाता हुआ मन्दिर है उसका मारा खर्च लाला अशरफीलाल ही ने उठाया था। उनके शहर में जो मोमिन अंसार नेशनल हायर सेकेंड्री स्कूल है वह लालाजी ही को दान की हुई जमीन पर है। • लालाजी ने कई गोशालाएं और धर्मशालाएँ भी बनवायो"और जिन दिनी निकाह तक के लिए चीनी मुश्किल से मिलती थी, उन दिनी भी लाला अशरफीलाल की तरफ से महाराजगज को चीटियो को रोज पक्के मेर की एक पंसेरी चीनी खिलायी जाया करती थी। कहते हैं कि लालाजी के देहान्त के बाद भी चीटियों के गोल महीनो तक उन रास्तो पर लालाजी का इन्तजार करते रहे... दूसरे महायुद्ध मे लालाजी ने बडा पैमा बनाया। उन्हें कई फौजी ठेके मिल गये । और वह आदमी से बड़े आदमी बन गये। परन्तु उन्हीं दिनों उन्होंने यह भाप लिया कि भारत अब आजाद हुए विना नहीं मानेगा और देश पर गांधी की पार्टी राज करेगी, तो उन्होंने कई बडे नेशनलिस्टों की तरह अंग्रेजो से कुट्टी कर ली। रायसाहबी लौटाके जेल चले गये ! और चार महीने बारह दिन जेल में रहकर सन् पंतालीस की तेरह दिसम्बर को छूटे तो देशभक्तों में गिने जाने लगे। सन् बावन के चुनाव में उनका बड़ा बेटा एम.पी., छोटा बेटा एम. एल. ए. हो गया और खुद लालाजी का स्वर्गवास हो गया। देश नया-नया आजाद हुआ था। आजादी के फौरन बाद बड़े आदमियों की पैदावार एकदम से बढ़ गयी थी और सड़कों की गिनती में कोई खास बढ़ौती नहीं हुई थी। नतीजे में बड़े आदमी ज्यादा हो गये और सड़कें कम पड़ गयीं। तो एक-एक सड़क के दो-दो, तीन-तीन नाम रक्खे गये ! इस चौराहे से उस चौराहे तक यदि सड़क का नाम 'मौलाना अब्दुल खालिक मार्ग' है तो उस चौराहे से आगेवाले चौराहे तक वही सड़क 'बाबू दमड़ीप्रसाद मार्ग' है। जिस सड़क का नाम क्लाइव रोड था वह एक दिन 'नेताजी सुभापचन्द्र बोस मार्ग' हो गयी जैसे कि लार्ड क्लाइव और सुभाषचन्द्र बोस के रास्तों में कोई फर्क ही न रहा हो।" पर सड़कों के नाम बदलने और एक ही सड़क के कई-कई नाम रखने से भी समस्या खत्म नहीं हुई। वहुत-से बड़े लोगों के नाम बच रहे । तो, वाकी नामों को खपाने के लिए, स्कूल और कॉलेज खोले गये। जिसे हम 'शिक्षा विकास योजना' समझते और समझाते हैं, वह वास्तव में 'नाम-खपत योजना' थी और यही कारण है कि इन स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ाने के लिए वह लोग रक्खे गये जिन्हें समाज और सरकार ने किसी और काम के लिए स्वीकार नहीं किया। लाला अशरफीलालजी के बडे और छोटे दोनों बेटों को समझाया गया कि वह भी मौके का फायदा उठाकर लाला अशरफीलाल मिमोरियल नेशनल डिग्री कॉलेज खोलकर अपने साले को उसका प्रिंसिपल बना दें। यह भी अच्छा था कि दोनों भाइयों की बीवियां अलग-अलग थी, पर दोनों भाइयों के बीच में साला एक ही था। तो दोनों बीवियों और एकलौते साले ने भी बड़ा जोर मारा कि डिगरी कॉलेज खुल ही जाये। दोनों भाइयों को शिक्षा के फायदे बताये गये। पर वह डटे रहे कि उन्हें तो एक सड़क चाहिए। और पूरे भारतवर्ष में कोई सड़क बची ही नहीं थी. 'बड़ी मुश्किल से एक कच्ची सड़क का पता चला जो केवल तीन फलांग लम्बी है और एक वेनाम खाड़ी तक जाकर खत्म हो जाती है। इस सड़क का पता चलने के बाद लोगों की जान में जान आयी और यह तय किया गया कि लालाजी को इसी कच्ची सड़क पर टरखा दिया जाये। पर लालाजी के वेटे राजी न हुए, इसलिए सड़क पक्की बनवायी गयी और उत्तरप्रदेश के एक उपमन्त्री उस सड़क का नाम रखने के लिए पधारे। यह बताने की १२ / सीन : ७५ जरूरत नहीं कि यह उपमन्त्री छोटे और बड़े लाला के वही एकलौते साले थे जिन्हें रोजगार से लगाने के लिए डिगरी कॉलेज की योजना बनवायी गयी थी। राजनीति में वह बहुत सफल रहे । और यदि एक कार-एक्सिडेंट में उनका देहान्त न हो गया होता तो शायद वह उत्तरप्रदेश के मुख्यमन्त्री हो गये होते. अपोजीशन के एक साप्ताहिक ने एक सम्पादकीय टिप्पणी लगायी कि उत्तरप्रदेश यमराज का यह एहसान कभी नहीं भूलेगा। यदि लाला अशरफीलाल बडे आदमी न रहे होते और जो वह बडे आदमी रहे होते और यदि उनके दोनो बैटे एम. पी. और एम. एल. ए. न रहे होतो और जो दोनों बेटे एम. पी. और एम. एल. ए. भी रहे होते और यदि दोनों बेटो का एकलौता माला उत्तरप्रदेश में उपमन्त्री न लगा होता और उस साले का साला वम्बई में बड़े पैमाने पर सोशल वर्क न कर रहा होता तो उस सडक का नाम 'लाला अशरफीलाल मार्ग' न पडा होता। और यदि उस सडक का नाम 'अशरफीलाल मार्ग' न पहा होता तो हाउसिंग कोआपरेटिव सोसाइटियां उस सड़क के किनारे बिल्डिंगें 'न बांघती और यदि बिल्दिगें न बघती तो अली अमजद गयो रात के सन्नाटे की दलदल मे धंसा हुआ खजूरो के झुण्ड में अटके हुए चांद को न न देख रहा होता। सावित यह हुआ कि समय 'यदियो' का एक सिलसिला है और हर गरदन में कई-कई 'यदियो' का फन्दा पड़ा हुआ है। यदि जीवन में इस 'यदि' का दुम-उल्ला न लगा होता तो कितना अच्छा होता । ... "परन्तु 'यदि-वाई' और 'आदर्शवाद' से बचने की कोई मूरत नहीं है। दुमरे तमाम लोगो, मेरा मतलब है, तमाम शरीफ लोगो की तरह अली अमजद 'यदि-वादी' भी था और 'आदर्शवादी' भी। हरता तो 'यदि- वादी' हो जाता और इस डर पर झल्लाता तो 'आदर्शवादी'। और इमी डर और झल्लाहट के बीच में उसकी सारी जिन्दगी थी। अली अमजद एक मध्यमवर्गी या । वह तमाम मध्यमवगियों की तरह असन्तुष्ट भी था। वह ऐसा वीर भी नही था कि 'महावीर चक' पाय और ऐसा कायर भी नहीं था कि लड़ ही न सके। बनारस का रहनेवाला था। गोविन्दपुरा कला की एक अधेरी गली में उसके दादा ने एक ते सोन:
थरीला घर वनवाया था। वनारस के इन पथरीले छोटे और ऊंचे घरों में चे एक छोटी-सी सहंची होती है और मंजिलों पर सहंची की जगह लोहे, जो छड़ियों से पाट दी जाती है कि दोपहर की धूप झांककर सहंत्री को ख सके। धूप और खुली हवा न मिलने के कारण व्यक्तित्व पनप नहीं 'गता, इसीलिए बनारस नेताओं में सम्पूर्णानन्द और हकीमों में हकीम गजिम और गायरों में नजीर बनारसी से बड़ा कोई आदमी पैदा न कर का । और यह शहर, इसी लिए केवल अपने मन्दिरों, घाटों, तवायफ़ों चौरी गली, कण्ठे महाराज, विसमिल्लाह खाँ, सितारा देवी, छुट्टै साँड़ों लिए मशहूर होकर रह गया। बनारस ! पता नहीं आज वनारस कहाँ और कैसा है ! अली अमजद खिड़की से हट माया। चांद से भला आंखें लड़ाने में कौन जीत सकता है ! अतीत, वर्तमान, भविष्य, सबको आँखें झपक जाती पर चाँद की टकटकी नहीं टूटती । चाँद के मुकाबले में अली अमजद की तो विसात ही क्या थी ! उसकी आँखें तो यूही झपकी हुई थीं। वह जो अपने-आपसे आँख मिलाने में भी लगभग हार चुका था। उसने फिर चाँद की तरफ देखा। चाँद जहाँ-का-तहाँ था। कमरे के वाहर चाँदनी रात जाग रही थी और कमरे के अन्दर एक वेनाम, डरावना अन्धकार । मेज पर खुला हुआ क़लम जाग रहा था। रोशनाई के लिए अपने को वेचा किये हम । ताकि सिर्फ इसलिए कुछ लिखने से वाक़ी न रहे, कि क़लम खुश्क थे, और लिखने से माजूर थे हम। माजूर। मजबूर। बेवस। औरदीवार पर कैलेण्डरजाग रहा था। पांच जनवरी । सन् छिहत्तर। इतवार । पांच जनवरी। बाप रे बाप, कैसी ठण्ड पड़ रही होगी उघर ! हवा जाड़े से बचने के लिए लिहाफ़ों में धुसी जा रही होगी। जाड़ा अव । १४ / सीन : ७५ : मिर्फ एक याद है । बहुत गर्म याद। जैसे अभी पलट को घण्टी बजेगी और 'दरवाजा खुलते ही जाडा दौड़कर उसे लिपटा लेगा अली अमजद ने हाय बढाकर कैलेण्डर पर तारीख बदल दी। पांच जनवरी की जगह छ: जनवरी हो गयी। दिन इतवार की जगह सोमवार हो गया। अरे बाप रे बाप ! गजब हो गया! आज तो शूटिंग है । नौ वजे को शिफ्ट है। सोन तैयार नहीं है और कलाई पर बंधी हुई घड़ी एक चुहिया की तरह समय को कतरती चली जा रही है। दो बजकर सत्ताइस मिनट, पच्चीस.... छब्बीस सैकेंड हो गया ।...और मेज़ पर खुली हुई फाइल जाग रही थी। सोन :७५: दिन : डाकखाना कागज पर यह मुखी उमने शाम के साढे आठ बजे डाली थी। डाइ- रेक्टर हरीश राय ने चौयी बार जरा झल्लाके कहा था : "कमाल है अमजद ! इतना मिम्पिल मोन तुम्हारी समझ में नहीं आ रहा है ।" मोन वाकई साधारण था । मुशी सडक बैठे एक खत लिख रहे हैं और एक बुढिया खत लिखवा रही है । बुडिया का रोल लीला मिश्रा कर रही हैं और मुंशी मडक का रोल संजीव कुमार कर रहे हैं। परन्तु 'मीन :७५: दिन : डाकखाना' वाकई उसको समझ मे नही था रहा था। और हरीश राय का यह पूछना भी गलत नही था कि यह सीन उनकी ममझ में क्यों नहीं आ रहा है, क्योकि कमर्शियल हिन्दी सेनिमा मे वह सीन होते कहां हैं जो समझ में न आयें ? प्रेमचन्द ! यशपाल! अली अब्बास हुमंनो ! राजेन्द्र सिंह बेदी! कृष्णचन्द्र! इसमत चुगताई... और कमरे के अन्दर यह सारे नाम जाग रहे थे। फिल्म का नाम था 'चौराहे का दादा । और अब तो उसे बिना सोचे लिखने की प्रक्टिम हो गयी थी। सोन लिखना वायें हाय का खेल हो गया सीन :७५/१५ ..
था । पहले सोचके लिखा करता था तो डाइरेक्टर, हीरो, हीरोइन, धाक करेक्टर अटिस्ट सभी उन सीनों में कीड़े निकालने वैठ जाया करते थे क्योंकि फिल्मी दुनिया में लेखक के सिवा सभी लोग लेखक होते हैं । चाहे सही हिन्दी वोल न सकें, पर लेखक होते हैं। दिलीप कुमार से लेकर राजकुमार तक, सवको लिखने का बड़ा शौक़ है। राजकुमार, राजेश खन्ना, धर्मेन्द्र, दिलीप कुमार 'सभी के घरों में अच्छी किताबें हैं। कई लोगों का घर ही इस किताव-सप्लाई पर चल रहा है। पर यह विचारे स्टार तीन-तीन शिफ्ट करनेवाले, पढ़ने के लिए वक़्त कहां से निकालें ! पर लिखने में क्या वक़्त लगता है ? लेखक ही का क़लम लिया और सीन 'ठीक' कर दिया।.. पहले तो अली अमजद को सीनों की 'ठीक कराई' बहुत बुरी लगा करती थी। वह लड़ जाता था। वेरोज़गार रहा करता था। एक गेस्ट हाउस में पड़ा हुआ था। 'डिक्रूज़ गेस्ट हाउस।" वान्द्रा तालाव के नुक्कड़ पर । चार आदमी...सपनों के चार सौदागर मिलकर रहा करते थे एक कमरे में एक । पलंग था। कवाड़िये की दुकान से खरीदा हुआ एक सोफा था जिसका कपड़ा फट चुका था। पांच पतलूनें थीं। छ: क़मीजें थीं। वेशुमार खटमल थे और चार आदमी थे ! अली अमजद ! हरीश राय ! बी. डी. (नाम वीरेन्द्र कुमार था। एक मरतवा किसी को हो जायें तो छूटते नहीं थे, इसलिए वी. डी. कहे जाने लगे) ! अलीमुल्लाह खां! अली अमजद लेखक वनने आया था। फिल्म माध्यम का कैसा पब्लिक बलात्कार हो रहा है । हिन्दुस्तान एक जाहिल मुल्क है। जाहिलों के लिए फिल्म से ज्यादा पॉवरफुल कोई माध्यम हो ही नहीं सकता। कृष्णचन्द्र वेदी, इसमत ओपा ने तो लेखकों की नाक कटवा दी। लानत है शैलेन्द्र मजरूह और साहिर पर...लाल लाल गाल...वाह ! क्या शायरी है ! - - .. १६ / सीन : ७५ यह लोग विक गये हैं काले रपये के हाथ । अपना व्यक्तित्व और अपना आदर्श खो दिया है इन लोगों में।...मैं ऐमा नहीं करूंगा 1...में, मैं और मैं... डिक्रूज गेस्ट हाउस के मछरीले और खटमलिये कमरे मे आठ महीने यो शायद आठ बरस या शायद आठ मदियां गुजारने के बाद भी अपने मपनों को मूली पर चढ़ा रहा अली अमजद नकवी, एम. ए., एल.- एल. बी.। आपम में तय यह था कि जो पहले आयेगा वह मसहरी पर सोयेगा। इस ममहरी का भी एक किस्सा था। यह 'अदले-जहांगीर' नामी एक फिल्म में जहांगीर के सोने के लिए बनायी गयी थी। जिस दिन सेट पर आयी, उमी दिन जहांगीर की टांग टूट गयी। तीन महीनो के लिए शूटिंग रुक गयो । जहाँगीर की टांग ठीक हुई तो नूरजहाँ ने शादी कर ली और हनीमून के लिए यूरोप चली गयी ! दो महीनों के लिए शूटिंग बन्द हो गयी। फिर 'डेटें मिली तो नूरजहाँ की तलाक हो गयी और वह गम गलत करने के लिए कश्मीर चली गयी एक उभरते हुए सितारे के साय और वहां उन्होंने शराब के नशे मे कह दिया कि जहांगीर बनने के लायक तो यह है, वह पांच फीट पांच इंच का आदमी क्या खाके जहांगीर बनेगा! तो जहांगीर ने कहा कि हीरोइन बदलो। दो-तीन महीने और गये। हीरोइन बदली गयी। फिर सेट लगा। ठीक शूटिंग के दिन हीरो के घर मे बेटी पैदा हो गयी। हीरो का मूड खराब हो गया। पंक-अप हो गया। अब प्रोड्युसर को फ़िक्र हुई कि किस्सा क्या है । वी की धर्मावाली के यहां कारें दौड़ी। पता चला कि सारा कसूर पलंग का है ।...हरीश राय उस युनिट में फोर्थ असिस्टेंट लगा हुआ था। तो वह शाही पलंग उसने भाग लिया। इसलिए ईमानदारी की बात तो यह है कि वह मसहरी हरीश राय की थी। पर चारो के चारों लेफ्टिस्ट थे। सोगलिज्म, चेग्वारा, कानू सान्याल...गयी रात तक यह चारो इन्ही लोगो के साथ रहा करते थे 'और चारमीनार पिया करते थे । तो उस शाही पलंग पर एक आदमी 'का अधिकार कसे मानते ? यदि वह चार पतलूनों को सोलह पतलूनें मानकर जी सकते थे तो एक मसहरी एक ही मसहरी कैसे रह सकती थी ? सीन:
जो पहले आयेगा वह मसहरी पायेगा। अली अमजद भी उन दिनों काम से लगा हुआ था। फन्दाजी के लिए कहानियाँ लिख रहा था। फन्दाजी बड़े सेकुलर थे परन्तु मुसलमानों का छुआ नहीं खाते थे, तो हरीश ने अली अमजद को गौरीशंकर लाल 'क्रान्तिकारी' कहकर लगवा दिया था वहाँ और वह वहाँ कहानियाँ लिखने के सिवा उनकी बेटी पुष्पलता की कविताएं ठीक करने और फन्दा पटयालवी से मुसलमानों की हरमज़दगी का आँखों देखा हाल सुनने का काम किया करता था। हालांकि जब पिशावर, रावलपिण्डी और लाहौर में दंगे हो रहे थे तो फन्दाजी वरैली में दवाएँ बेचा करते थे ! वरसों वाद जव उन्हें पता चला कि गौरीशंकर लाल 'क्रान्तिकारी' वास्तव में अली अमजद है तो फिर उन्होंने अली अमजद से वात नहीं की और हरीश राय की तो वह सूरत देखने को तैयार नहीं थे। उन दिनों उनकी तूती बोल रही थी इसलिए विचारा हरीश राय कई जगहों से निकाला गया...और अव इस एक कमवस्त 'सीन : ७५ : दिन : डाकखाना' की वजह से दोस्त तक को झल्लाना पड़ा । 'चौराहे का दादा' हरीश की पहली बड़ी फिल्म थी। इसलिए उसे झल्लाने का पूरा हक था। वह क़लम को तलवार की तरह संभालकर बैठ गया। इस 'सीन : ७५ की तो ऐसी-तैसी...उसने लिखना शुरू कर दिया : "सीन मुंशी सड़क की छतरी से शुरू होता है । मुंशीजी एक पाँव मोड़े और दूसरे पाँव के उठे हुए घुटने पर तख्ती रक्खे खत लिख रहे हैं । मियानी के पास पाजामे की सीवन कुछ दूर तक खुल गयी है।" वह रुक गया ।'मियानी' से 'खुल गयी है' तक पर उन्होंने क़लम फेर दिया । एक तो सेन्सर बोर्ड में वैठनेवाली औरतें मुंशी की मियानी नहीं फटने देंगी और फाइनेन्सर और उसके खानदानवाले इस पर खफ़ा कि मियानी की सीवन खुलवाने के लिए मुंशी सड़क ही रह गया ! हारोइन को साढ़े चार लाख दिये हैं, उसकी सीवन खुले तो साली पब्लिक का कुछ भला भी हो ! बाद में सेन्सर काट दे तो वादा नहीं।... न जाने क्यों उसे माई के अड्डेवाली मिसेज़ डिसूज़ा याद आ गयीं ! कड़की के दिनों में वी. डी. ने उस अड्डे का पता चलाया था। मिस्टर १८/सीन : ७५ डिमूजा एक्माइज में जूनियर इन्स्पेक्टर थे और माई का अड्डा उन्ही के एलाके में था। हप्ता बंधा हुआ था। कहते हैं कि 'माई बड़े ग़जब की औरत हुआ करती थी। कहने को औरत थो पर मदों को गलियो याद करवाती थी। डोडा के बड़े-बड़े दादा उसे सलाम करते थे और उसे 'माई' कहते थे। तो नौवत यहां तक आयो कि पुलिसवाले भी उसे 'माई' कहने लगे। सुद विजीटेरियन थी, पर मनी ऐसी तलती थी कि पूछिए मत! उसके यहां शराब भी दूसरे अड्डों में अच्छी बनती थी और माई का अड्डा फिल्मवालों में बडा पापुत्तर या। राजकपूर मे लेकर साहिर लुधियानवी तक सभी उघार पो चुके हैं। वह फिल्मवालों के मिधा किमी को उधार देती भी नहीं थी। फिल्मवालों से उसका रिश्ता ही कुछ और था। उसका एकलौता बेटा श्यामलाल वनारसी फिल्मों में एक्मदा था। बड़ा सजीला जवान । हीरोइनें मरतो थी। पर वह किसी को तरफ आंख उठाके नहीं देखता था। मजे में दिन-भर फिल्मों में काम करता और गयी रात तक अड्डे पर। फिर उसे जाने क्या सूझी कि एक्सट्रा लोगों की यूनियन बनाने के चक्कर में पड गया । कहता था, "सप्लायर लोग मर सा जाता है। एक्सट्रा वहन लोग का इरजत अलग सराव करता है। ऊनि- यन बनेगा । इन्किलाब जिन्दावाद ।" एक दिन वह 'फेमस महालक्ष्मी' में मोटिंग करके आता रहा कि कोई पौधे से उसकी पीठ में छुरा घोर दिहिम!...तो फिल्मवाले वेटे तो हो ही गये ना । अड्डे पर उधार पौने- बालों में से जो भी मशहूर हो जाता, वह अड्डे पर उसका फोटा टोग देती और उसके बारे में यूं बात करतो जैसे वह किसी और मो का वैटा न हो, बल्कि उसका अपना श्यामलाल बनारसी हो। "उसे किसी ने रोते नहीं देखा था। पर श्यामलाल की मौत के बाद वह एकदम मे बूढी हो गयी। उन्ही दिनों मिस्टर डिसूत्रा रिटायर हुए तो उन्होंने 'माई का अड्डा' खरीद लिया। पर 'माई' मालिक न रह जाने के बाद भी मालिक ही रही। मिस्टर डिसूजा जरा टिर-पिर करते तो वह उनकी ऐसी खवर लेती कि जाते अड्डे का नाम भी 'माई का अड्डा' ही रहा। फिल्मवाले फरकड़ी के दिनों में उसी तरह आते रहे और उघार पोते रहे ! उनके छक्के छूट फिर एक रात ऐसा हुआ कि माई चुपचाप मर गयी । यह खबर जंगल की आग की तरह सारी फिल्म इण्डस्ट्री में फैल गयी कि माई मर गयी। सवेरा होते गाड़ियां आने लगीं। जूनियर आर्टिस्ट असोसियेशन, ऐक्टर्ज गिल्ड, असिस्टेंट डाइरेक्टर्ज एसोसियेशन, वगैरा-वगैरा की तरफ से अर्थी पर फूल-मालाएं चढ़ायी गयीं! डेविड अब्राहम और मनमोहन कृष्ण और महेन्द्रनाथ ने कन्या दिया "कहते हैं कि डाँडा से तव तक कोई ऐसा शान- दार जनाजा नहीं उठा था। 'ब्लिट्ज' में जनाजे का फ़ोटो भी छपा ! माई मर गयो । माई का अड्डा जिन्दा रहा। वहाँ के लोगों को 'माई' की आदत पड़ गयी थी तो धीरे-धीरे मिसेज डिसूजा माई कही जाने लगी। वी. डी. मिसेज डिसूजा या 'माई द सेकेंड' का चहीता बन गया था। उसने उन्हें यह झांसा दे रक्खा था कि वह रोजी डिसूजा से शादी करना चाहता है। इसीलिए माई के अड्डे पर उसकी वड़ी मान-जान थी। डिसूजा साहब वी.डी. को पसन्द नहीं करते थे; पर विचारे कर भी क्या सकते थे ! वी. डी. पैदायशी बेरोजगार था। वह अब तक तीन फिल्मों में काम कर चुका था। तीनों रोल बोलनेवाले थे। एक फिल्म में वह विलेन का वॉडी-गार्ड बना था। उसमें संवाद तो उसे वहुत मिलते। पर लेखक साला उससे जलता था। तो उसने उस पात्र को गूंगा वना दिया। दूसरी फिल्म में वह चौकीदार था। उसके सामने ही एक मर्डर हुआ। वह जोर से चिल्लायाः 'खून।' और किसी ने उसे गोली मार दी । उसके खयाल में यही चौकीदार फिल्म का नायक था क्योंकि इसी चौकीदार का दो वरस का वेटा आगे चल- कर हीरो बना और वाप के कातिलों का पता चलाये विना उसने दम नहीं लिया । तो एक हिसाव से फिल्म उसी पर आधारित थी। तीसरी फिल्म में वह डाक्टर-हीरो का कम्पाउण्डर था। डाक्टर का ज्यादा वक्त तो हीरो- इन के साथ लव-सीन करने और गाने गाने में गुजरता था, इसलिए मरीजों की देखभाल उसी को करनी पड़ती थी। उस फिल्म में उसे बहुत डाइलाग मिले। कोई पूछता, "डाक्टर साहव हैं ?" बोर वह कहता, "नहीं है।" (यह बात उसने पांच बार कही। ). इसीलिए वी. डी. अपनी गिनती कैरेक्टर आर्टिस्टो में करता था। 'माई द सेकेंड' को फिल्में देखने का बड़ा 'बौक था। नौर रोजी को वह हीरोइन बनाना चाहती थीं। वी. डी. के २०/तीन : ७५ लिए यही वहृत था। वह रोजी का पी. आर. ओ. हो गया। उसे हिन्दी- उर्दू भी पडाने नगा। माई ने उसकी शराव भुपत कर दी थी। "यह क्या बेहूदगी फैला रक्खी है तुमने !" एक रात अली अमजद ने उसे डांटा। वह रात वी. डी. की मसहरीवाली रात थी "वाहम-स्वाह विचारी को सब्जबाग दिखला रहे हो।" "वह देखती क्यों है ?" वी. टी. ने बहुत ही साधारण-मा सवाल करके सबको चुप कर दिया, "मैं पूछना हूँ बेरोजगारों के इस देश, भारत दैट इज इंडिया, में किसी लड़की की मां को क्या हक है कि वह अपनी बेटी का नाम रोजी रखे?" वी. डी. अजीब आदमी था। हर वक्त मौरियम रहा करता था, जैसे क्रान्ति साम उसी के पते पर आयेगी; जैसे हिन्दुस्तान में उसके भिवा किमी और को क्रान्ति का इन्तिजार ही नहीं था। कभी-कभी तो अलीमुल्लाह उस पर विगड जाता, "छोडो यार ! क्रान्ति आती भी हुई हो तो तुम्हारी सीरियसनेस देखकर डर जायेगी।" इसीलिए तो जव यह वी. डी. रोजी डिसूजा से खिलवाड़ करने लगा तो सबको बड़ा पाश्चर्य हुआ। वी. डी. और धोखाघडी ? सवाल ही पंदा नहीं होता जी! पर वी. डी. यही कहता रहा कि उमे रोजी का नाम पसन्द है। वह घण्टो रोजी को दिन-भर की रूदाद बताता। बी. आर. चोपड़ा ने आज रोजी को अपनी 'नेक्स्ट' फिल्म मे 'वेक' देने का पक्का वादा किया है। नामिर हुसैन तो बोले कि अभी लाव, नेक्स्ट फिल्म के लिए साइन कर लेता हूँ। पर वह तो विल्कुल ही 'इमकेपिस्ट' फिल्म बनाता है। मैं तुम्हें वहां काम नहीं करने दूंगा. अली अमजद और हरीश तो झेल जाते। पर अलीमुल्लाह पोलिटिकल माइन्स मे एम. ए. था। गांधी को दूर्जवाजी का एजेंट और नेहरू को प्रिटिश स्पाई कहा करता था। वह झल्ला जाता। कहता, "वी. डी., तुम्हारा माक्र्सवाद फ्राड है। तुम साला उसको इमसाक की गोली बनाकर खाता है ...' वी. डी. मुस्कुराता और कहवा, "रोजी बड़ी टैलेंटेड ल टैलेंट को मामा की ओम चटाते रहना चाहिए..."
"हाँ तो उसे आशा पारेख का सेकेट्री वनवा दो। साला, मुफ्त की शराव के लिए यह सव चक्कर चलाये हुए है।..." वी. डी. और अलीमुल्लाह में एक मिनट नहीं पटती थी। और अली- मुल्लाह ही कामवाला था। बाकी तीनों दोस्तों को महीने के आखिर में फाइनेन्स भी किया करता था। तीनों दोस्तों के महीने का आखिर अलग- अलग शुरू हुआ करता था। हरीश को महीने की १५ को तनख्वाह मिलती थी! तो उसके महीने का आखिर पहली-दूसरी से लगता था। कभी-कभी उसके महीने का आखिर कई महीनों तक फैल जाता था क्योंकि छोटी और मंझली फिल्म कम्पनियों में तनख्वाह का कोई भरोसा नहीं है। वी. डी. के महीने का आखिर लगभग साल-भर चलता था। अली अमजद के महीने का आखिर आम तौर से महीने के यातिर ही में होता था। वस, एक अली- मुल्लाह था जो साढ़े आठ सौ तन्वाह पाता था। सौ-पचास ऊपर से कमा लेता था। और ज्यादातर वी. डी. का वोझ उसी को उठाना पड़ता था। दोनों साथ के पड़े हुए भी थे। रसड़ा, जिला वलिया के रहनेवाले थे। साथ-ही-साथ बम्बई आये थे। एक-दूसरे को बहुत चाहते थे और एक-दूसरे से दिन-रात लड़ा करते थे। झीश और अली अमजद को अलीमुल्लाह से वी. डी. ही ने मिलाया था। अली अमजद और हरीश एक रात, 'माई के अड्डे पर अपनी फिल्म का प्रोपोजल बना रहे थे। वी. डी. पास हो वैठा दारू पी रहा था। पता नहीं कब और कैसे और क्यों वह उनके साथ मा बैठा और प्रोपोजल में ३३३% का साझेदार बन गया। उन रात अली अमजद और हरीश दोनों ही वे-घर थे। और इसी वेदर्द सच्चाई से पिण्ड छुड़ाने के लिए फिल्म के प्रोपोजल पर वहस कर रहे थे। राजेन्द्रकुमार को लेने या न लेने से साढ़े सात लाख का फर्क पड़ रहा था। ओवर-फ्लो अलग। अली अमजद कह रहा था कि राजेन्द्रकुमार ही को लेना चाहिए। हरीश कह रहा था कि राजेन्द्रकुमार घामड़ है। उसे ऐक्टिग करना आता ही नहीं"वीरे-धीरे दोनों की आवाजें ऊँची होने लगीं। हरीश डाइरेक्टर था। अली अमजद लेखक... वी. डी. ने कहा, "एक नया छोकरा आया है। राजेश खन्ना । सस्ता २२ / सीन : ७५
मिल जायेगा. चलिए, पर चलकर आराम से बात करते है।"
कट।
डिऋज़ गेस्ट हाउस । कमरा नम्बर माव ।
"यह अलीमुल्लासा हैं।" बी. डी. ने कहा, "मेरे ही साथ रहते
हैं। और--अरे | आप लोगों का नाम तो पूछा नहीं। खैर, क्या
पडता है ! यह बडे मशहूर डाइरेक्टर है और यह प्रसिद्ध लेखक । आज से
हमारे ही साथ रहेंगे"
कट।
अली अमजद ने माई के अड्डे, उसको मिसेज डिसूजा और डिज
गेस्ट हाउम की यादों में मुआफी मांग ली, क्योंकि चांद खजूरो के झुण्ड से
निकलकर न जाने कहां जा चुका था। कमरे के बाहर रात को आंख लग
चुकी थी। कमरे के अन्दर वह जाग रहा था।
उसने फिर कलम उठा लिया। पिछले लिखे को पड़ा।
सीन : ७५ दिन , डाकखाना
सीन मुशी सड़क की छत्री से शुरू होता है। मुशोजी एक
पांव मोड़े, और दूसरे पांव के उठे हुए घुटने पर तरुती रक्ल
खत लिख रहे हैं। ...
उसने लिखना शुरू किया।
अबुलखैर की अम्मो सामने बैठो अपनी छोटी-सी पोतल की
पन-कुटनी में पान का वीडा कूट रही है और खत का डिक्टेशन
दे रही हैं।
अबुलमर की मौ:
का लिक्खा बेटा?
मुंशोजी : (पढ़ते हैं)
अवुलखर के अब्बा को बाद मलामानेकुम के मालूम हो कि हम
ईखत नये मुंशीजी से लिखवा रहें। पुरानेवाले मुलुक चले
गये। इस वास्ते थोड़े लिक्खे को बहुत जानों
(वह अवुलखैर की माँ की तरफ़ देखता है।) अवुलखैर की मां: हाँ लिक्खो। थोड़े लिक्खे को बहुत जानो और खत को तार समझो। "गेट आउट !" भोलानाथ खटक की आवाज़ आयी। अली अमजद ने सामनेवाली दीवार को माँ-बहन की कई गालियाँ दीं उसी दीवार के पार खटकजी और श्रीमती रमा चोपड़ा का सीन शुरू चुका था। विल्डिंग के दूसरे लोग तो भोलानाथ और रमा के झगड़ों के दी हो चुके थे। पर अली अमजद नया-नया आया था, इसलिए यह झगड़े नकर वह घबरा जाया करता था। । फ्लैट की चावी देते वक़्त मनचन्दानी ने होशियार कर दिया था। पर वह इतना भी नहीं समझता था। यहां से अच्छा तो डिक्रूज़ गेस्ट हाउस ही या। वहां सड़क का शोर था। खटमल थे। मिसेज़ डिक्रूज़ थीं...पर एक भोलानाथ चोपड़ा उन सब पर भारी थे। उनका नाम भोलानाथ चोपड़ा था, पर 'सुरसिंगार' वाले उन्हें भोला- नाथ खटक या खटकजी कहा करते थे क्योंकि विल्डिंग में सबसे उनकी खटकी रहा करती थी। भोलानाथ खटक दिल से तो यह चाहते थे कि 'सुरसिंगार हाउसिंग सोसायटी लिमिटेड' में उनके सिवा कोई न रहे। वह अपनी बीवी और बच्चों को भी मुश्किल ही से अपनों में गिनते थे। इसलिए किसी ऐसे का उस बिल्डिंग में रहना उन्हें एक आंख नहीं भाता था जो उनकी वीवी- बच्चों में न हो। पर विचारे थे मध्यमवर्गी। पूरी सोसायटी में अकेले रह नहीं सकते थे । सोसायटी में कुल मिलाकर, चौवीस फ्लैट थे और चौवीस परिवारों के लिए थे और चौवीस ही परिवार रहते भी थे। और चौवीस परिवारों के नौकर-चाकर भी रहते थे। इस भीड़-भाड़ को भी खटकजी किसी-न-किसी तरह झेल भी जाते, परेशानी की बात यह थी कि तमाम नौकर-चाकर अपने-अपने मालिकों ही को मालिक मानते थे जब कि खटकजी यह चाहते थे कि परन्तु २४ / सीन : ७५ विल्डिग के सारे नौकर उनको अपना मालिक माने । विल्डिग के नौकरों को यह वात मजूर नहीं थी। परन्तु असली कयामत तो तब मायो जब ठीक उनके बगलवाले पलट मे अली अमजद आ गया। उसके परिवार में बाल-बच्चे थे ही नहीं। नौकर कई थे। अली अमजद के आने की खबर सुनकर वह बहुत भुनभुनाये कि भुनभुनाने का उन्हें बडा शोक था। 'सुरसिंगार' वालो ने पहले उनका नाम भुनभुन चोपडा ही रक्खा था। बाद में मिसेज गुप्त ने उन्हें खटकजी का खिताब दिया जो सर्वसम्मति से मान लिया गया। रमा चोपड़ा यानी श्रीमती खटक का कहना यह था कि 'सुरसिंगार' आने के बाद ही नाथ को न जाने क्या हो गया है । पहले वह ऐसे नहीं थे। तो फिल्म के प्रसिद्ध लेखक और 'सुरसिंगार' नम्बर बारह के निदासी श्री रामनाय ने छानबीन की और पता चलाया कि . 'मुरसिंगार' आने से पहले यह 'सी' ग्रेड बलकों की एक कालोनी में रहा करते थे। वह एलेक्ट्रानिक्स की एक कम्पनी में दिल-कलेक्टर थे। एक सौ बानवे रपये पगार पाते थे। भत्ता ऊपर से । रमा ने पलकों की उस वस्ती को एक हजार वानवे पगार बता रक्खी थी। भत्ते और ऊपर की मामदनी अलग । नयी-नयी शादी हुई थी। नयी नयी साडियां थी। नये- नये गहने थे। कुछ पैसे भी थे। तो बात बनी हुई थी। पैसों को रमा ने बड़ी उस्तादी से मूद पर चलाना शुरू कर दिया। एक का डेढ । क्लकों की बीवियों को पैसे की ज़रूरत तो हमेशा ही रहती है। इसलिए कालोनी मे रमा की बड़ी इज्जत हो गयी थी। खटकजी का भी बड़ा रोब या कि क्लर्क मिर अखकर जीने का आदी होता है। फाइलों के लिए जगह बनाने के लिए वह अपनी आत्मा को मरकाता रहता है, यहाँ तक कि आत्मा मेज से नीचे गिर जाती है और उने पता भी नहीं चलता । और भाडू देनेवाला, दूसरे दिन, उसे कल के कूड़े के माय फेंक आता है। पर दिना आत्मा का यह आदमी मल्लाया हुआ होता है और दूसरो की आत्मा को टोह मे लगा रहता है । उस कालोनी का भी यही हाल था। सब सटवजी की इज्जत भी करते थे और उनकी टोह मे भी लगे रहते थे। और कालोनी का यह टीन का भगवान, वेखवर, कालोनी की छत पर अपने कद के ५ फीट ११ इंच का झण्डा फहराता रहता था। कि एक दिन ऐसा हुआ कि उस कालोनी के एक क्लर्क ने लंच के वक्त अपने-आपको खटकजी के आफ़िस के आस-पास पाया। श्री बाबू- लाल श्रीवास्तव को लंच का भत्ता आफ़िस से मिलता, पर उन्होंने सोचा कि वह भत्ता बचा क्यों न लिया जाये । और यह उन्होंने इसलिए सोचा कि एक हजार वानवे पगारवाले पड़ोसी का आफ़िस पास ही था। तो वह भोलानाथ के आफ़िस की तरफ़ चल पड़े। परन्तु जब उन्होंने, बहुत अकड़. कर, एक चपरासी से डिप्टी सेल्ज सुपरवाइजर मिस्टर भोलानाथ चोपड़ा के बारे में पूछा तो चपरासी ने यह कहकर मक्खी-सी उड़ा दी कि वहाँ उस नाम का कोई डिप्टी सेल्ज सुपरवाइजर नहीं है। हाँ, एक असिस्टेंट विल कलेक्टर ज़रूर है। क्लर्क श्री बाबूलाल श्रीवास्तव समझे कि चपरासी मज़ाक कर रहा है । तो वह इससे उखड़ गये किएक चपरासी की यह मजाल किग्रेड तीन के क्लर्क से मज़ाक करे ! चपरासी भी विगड़ गया। बड़ी गर्मा- गर्मी हो गयी। वह तो ठीक उसी वक्त खटकजी आ गये नहीं तो वात शायद बहुत बढ़ गयी होती। परन्तु खटकजी ने जो श्रीवावूलाल को देखा तो उन्हें पसीना आ गया । तो, उन्होंने चपरासी को बोलने का मौका ही नहीं दिया। जल्दी से चपरासी को डांट-डपटके वह श्रीवास्तवजी को लेकर आगे बढ़ गये। सामने एक चिलिया का रेस्तोरा भी था और 'क्वालिटी' भी। वैसे तो रोज़ वह चिलिया के चायखाने में दिन को उसल-पाव खा लिया करते थे, पर श्रीवास्तवजी को लेकर तो उन्हें 'क्वालिटी' ही में जाना पड़ा। एक हजार वानवे पगार पानेवाला (भत्ते और कमीशन अलग) भला उसल-पाव कैसे खा सकता था! दस साल की नौकरी में खटकजी ने अब तक 'क्वालिटी' में वस एक वार चाय पी थी। एक सौ वानवे पगार पानेवाला 'क्वालिटी' जैसे रेस्तोरा में खाना नहीं खाता, केवल वोर्ड पढ़ता है और आगे बढ़ जाता है। "क्या खाइयेगा ?" खेटकजी ने जान पर खेलकर पूछा। "तन्दूरी मुर्ग हो जाये।" श्रीवास्तवजी ने कहा कि इसके आगे वह २६ / सीन : ७५ - कुछ जानते ही नहीं थे। और फिर उन्होंने मीनू-कार्ड उठा लिया । एक भीन-फाई पटकजी के हाथ मे भी या। श्रीवास्तवजी आर्डर देते जा रहे ये मौर खटकजी दिल-ही-दिल में, जल्दी-जल्दी हिसाव करते जा रहे दो तन्दूरी मुर्ग---१८ रुपये। "नहीं श्री वास्तवजी। आज मगल है ना। मंगल को मोट नहीं खाता में।" "अमा छोडिए । किस युग में रहते हैं आप..." श्रीवास्तव साहब फिर गुरू हो गये। दो शाही कोम-१४ रुपये। दो चिकन मक्खनवाला-२२ रुपये। .."भोलानाय खटक श्रीवास्तवजी की आवाज़ के गहरे कुएं में डूबते चले गये और उनका दिल उनकी जेब के रेगिस्तान में भटकता रहा।" बार्डर सुनते-सुनते उनकी भूस मर गयी। सत्तासी रुपये सोलह पैसों का दिल आया। वह तो खैरियत यह हुई कि खटकजी बिल वमूलने के दौरे से लौटे थे, इमलिए जेब मे पैसे थे। तो उन्होंने जेब में हाथ डालकर सौ-सौ के नोटों की गड्डी निकाली। फिर उन्होंने गड्डी से छांट-छांटके पुराने नोट निकाले। और उन पुराने नोटो में उन्होंने विल अदा किया। भलक श्री बाबूलाल श्रीवास्तव ने सौ-मो के इतने नोट एकसाथ नही देखे थे। और जब खटकजी ने वेटर के लिए पांच रुपये चोरासी पैसों का टिप छोडा तो वाबूलालजी वेहोश होते-होते बचे। तिरानवे रुपये खर्च तो हो गये, पर कालोनी पर घौंस भी बैठ गयो। रमा को यह सवर देर से मिली, क्योकि वह श्रीमती मरला मिढा के साथ मंटनी को देखने आयी हुई थी। तय यह हुआ था कि खटकजी 'नेपचून राकीज' के सामने मिलेंगे और फिर वह लोग मिढा साहब के यहां जायरी और वही खाना खायेंगे। रमा हफ्ते में दो-तीन बार सरला के साथ ऐसे प्रोग्राम जरूर बना लिया करती थी । इसमें कई फायदे थे। सेनिमा मुफ्त। रात का खाना मुफ्त । व्हिस्की मुफ्त । व्हिस्की भी कैसी ? असली स्काच । 'डिम्पिल', 'जॉनी वाकर' या कभी-कभी 'शिवास रीगल'। खटकजी को अच्छी व्हिस्कियों के नाम जवानी याद थे। चोर- बाजार से खाली बोतलें खरीदकर और उनमें चाय भरके उन्होंने अपने घर में पूरा वार सजा रक्खा था। पर अपने घर में वह पीते थे हिन्दुस्तानी व्हस्की और वह भी महीने दो महीने में एक-आध वार । पर जब सरला से रमा की दोस्ती हो गयी तो खटकजी रमा को याद दिलाने लगे कि उसे पेनिमा देखे दो दिन हो गये हैं और रमा तुरन्त पड़ोस के पब्लिक फ़ोनबूथ से सरला को फोन करती, "लिसिन (सुनो), आज बांद्रा टाकीज में बड़ी पोणी फिलम लगी है।" और सरला यूं तैयार हो जाती जैसे सेनिमा जाने को उधार खाये बैठी रही हो। वात यह है कि सरला विचारी की अपनी समस्याएँ थीं। मिढा साहब को दूसरों की बीवियाँ खूबसूरत दिखायी दिया करती थीं। और इसीलिए उन्हें सरला के लिए समय ही नहीं मिलता था। एक तरह से सरला को यह वात दुरी भी नहीं लगती थी। और उसे यह बात दुरी इसलिए नहीं लगती थी कि उसे मर्दो का शौक ही नहीं था। उसे खुद दूसरों की बीवियाँ प्रच्छी लगा करती थीं। और यह शौक़ उसे सोफ़िया कॉलेज की एक टीचर मेस डिक्रूज़ से मिला था। मिस डिक्रूज साहित्य पढ़ाया करती थीं। क्लास का काम न करो तो सालों में अजब तरह से चुटकी लिया करती थीं। खुश होती तो लिपटकर मजीव तरह से प्यार कर लिया करती थीं। सीनियर लड़कियाँ उन्हें मापस में, मिस की जगह मिस्टर डिक्रूज़ कहा करती थीं। पहले तो मिसेज़ मेढा (जो उन दिनों सीधी-साधी सरला हुआ करती थी) की समझ में ह बात नहीं आयी कि सीनियर लड़कियाँ अच्छी भली मिस डिक्रूज़ को मेस्टर डिक्रूज़ क्यों कहती हैं। कभी हिम्मत करके पूछती तो जवाब में एक अजीब-सी हंसी मिल जाती । फिर उसने देखा कि सूखी-सड़ी-सी मेस रुकया दिलगीर स्वाह-म-ख्वाह उससे जलने लगी है। वह ठीक काम रती तब भी मिस दिलगीर, किसी-न-किसी बहाने, उसे डांट जरूर पिला १८ / सीन:७५ 1 देती । वह उसे सबसे ज्यादा होम वर्क भी देती। उसके कपड़ों पर एतराज करती। सरला को समझ मे रक्त या का गुस्सा न माता तो वह रओसी होकर मिस डिक्रूज़ से कहती और वह मुस्कुराकर उसे लिपटा लेती और उसके होठों को चूम लेती या उसके होठों पर धीरे से दांत काट लेती या उसके मुंह में अपनी जबान डाल देती और सरला का कच्चा बदन एक अजीब-मी गुदगुदी से भर जाता। 'नतीजे में मिस दिलगीर और रूठ जाती। तव एक दिन स्टाफ-रूम मे मिस डिक्रूज ने, सारी टीचरों के मामने, मिम दिलगीर को बहुत डाटा कि वह सरला को नाहक परेशान करती हैं, मिम दिलगीर रोने लगी। और मिस डिक्रूज एक और टीचर से हंस-हंगके बातें करने लगी। सरला के आने से पहले मिस डिक्रूज और मिस दिलगीर में बहुत गाड़ी छना करती थी। तब दिलगीर इतनी उजडी-उजही भी नहीं रहा करती थी। विल्कुल लडकी दिखायी दिया करती थी। नमकीन सावले रंग, बडी-बड़ी आँखो और छरछरे वदनवाली एक लड़की। फिर सरता आ गयी और उसी दिन मिस दिलगीर अकेली रह गयी और उनकी आंखों का प्रयूज उड़ गया। एक रात सरला रीडिंग-रूम से आयी तो उसने क्या देखा कि मिस दिलगीर उसके विस्तर पर गहरी नोद सो रही है। वह हैरान हुई । मेज पर एक खत था। सरला ने वह सत पढ़ा। वह खत उसी के नाम था: "सरला, तुमने लिज को मुझसे छीनकर अच्छा नहीं किया। तुमने मेरी जिन्दगी छीनी है तो मैं कही और क्यो मरने जाऊँ ? अब लिज़ जब तुम्हें अपनी बाहों में लेगी या तुम्हारा मुंह चूमेगी या तुम्हारे ब्लाउज में हाथ डालेगी या "सोचने ही से मेरा दम घुट रहा है। सुदा तुम्हें गारत करे सरला "जब तुम अकेले मे सिज के प्यार का जवाब अपने कच्चे बदन के प्यार मे दे रही होगी तब तुम्हें मैं दिसायी दूंगी, तुम्हारे अपने विस्तर पर, लिज और तुम्हारे बीच मे, मरी हुई सरला इससे ज्यादा न पद पायो । वह दिलगीर की लाश को छोड़कर भागती चली गयो, यहाँ तक कि उसने अपने-आपको मिस डिज, सीनियर लड़कियों की मिस्टर डिक्रूज और मिस दिलगीर की लिज़ के कमरे के दरवाजे पर पाया । लिज न्यु ब्लाक की वार्डन थी। न्यु ब्लाक और ओल्ड ब्लाक के बीच में इमली का वह पुराना पेड़ भी था जिसके बारे में हास्टल में कहानियाँ मशहूर थीं कि उसपर कोई जिन या भूत रहता है जो लड़कियों को परेशान करता है। पर सरला को उस रात वह पेड़ जैसे दिखायी ही नहीं दिया। वरना वह तो दिन को भी उस पेड़ के आसपास नहीं फटकती थी। उसने दरवाजा पीटना शुरू किया। लिज़ ने दरवाजा खोला । वह सरला को देखकर घबरा गयी। सरला ने चुपचाप उसे दिलगीर का खत दे दिया और उस रात उसे यह भी मालूम हो गया कि सीनियर लड़कियाँ लिज़ को मिस्टर डिक्रूज़ क्यों कहती हैं ? सोफ़िया में हफ्तों सन्नाटा रहा। लिज़ ने दिलगीर का खत उसी रात फाड़ दिया था । सब जानते थे कि दिलगीर ने आत्महत्या क्यों की और सब यह भी जानते थे कि दिलगीर ने सरला के कमरे ही में आत्म- हत्या क्यों की, पर सब चुप रहे । कोई कह भी क्या सकता था...फिर थोड़े दिनों बाद लोग मिस दिलगीर को भूल गये और सीनियर लड़कियाँ सरला को मिसेज़ डिक्रूज़ पुकारने लगीं।" तो भला मिढा में उसे क्या दिलचस्पी हो सकती थी ! उसके साथ' सोलह वरस की एक नौकरानी आयी थी और वही उसका सब काम करती थी। मिढा कुछ कह भी नहीं सकते थे क्योंकि सरला को मिसेज़ मिढा बनाने ही से उन्हें इतना पैसा मिला था कि उन्होंने अपना कारोबार शुरू किया था। तो जब उन्हें अपनी बीवी नहीं मिली तो वह दूसरों की बीवियों में दिलचस्पी लेने लगे। बस, वह इसका खयाल रखते थे कि जिस वीवी पर सरला की निगाह हो, उससे दूर रहें। भोलानाथ विल-कलेक्टर की बीवी रमा मिढा को अच्छी लगी थी। लगता था जैसे एम-फॉम की बनी हुई है। चम्पई रंग । आँखें ऐसी कि लगता था जैसे आँखों की जवान समझ सकती हैं। तो उन्होंने भोलानाथ से दोस्ती. करने का फैसला किया। ३०/सीन : ७५ एक दिन मिडा अपनी फोड कन्वर्टिग्नपर ग्रेड-फोर आफिस हाउमिंग कोआपरेटिव सोसायटी में भोलानाय का फ्लंट पूछता आया। कालोनी. बालों ने ऐसी कार सिर्फ सड़को और हिन्दी या अंग्रेजी फिल्मों में देखी थी। पर यह कार तो ठीक उनकी कालोनी में पड़ी थी। सब मन्नाटे में आ गये। और जब उन्हें पता चला कि इस कार में बैठकर आनेवाला भोलानाय मे मिलने आया है तो कालोनी में भोलानाथ की इज्जत और बढ़ गयी और यू मिढा आने-जाने लगा। पहले तो वह भोलानाय के होते में आता रहा, फिर कभी-कभार यूं-ही-गुजर-रहा-या--सोचा-मिल-लू के सहारे दो-एक बार आया। फिर सटकजी के होते उसका आना बिल्कुल बन्द हो गया। उन्ही दिनो एक दिन इतिफाक मे एक दिन सरला और रमा की मुलाकात हो गयी। रमा मेहरावाद बाजार में अमरीकन जाजेंट की माडियो देख रही थी। उन दिनों वह साडियां खरीद नहीं सकती थी, मिर्फ देख सकती थी और फिर अपने खयालो मे वह फेंचशिफॉन, जार्जट, कांजीवरम, मैमूर सिल्क और बनारसी पोय पहनकर पा हो लिया करती यो। उसने दूकानें बाघ रक्खी थी। किसी एक दूकान पर वह महीने में दो वार नही जाती थी और दो महीने के बाद किसे यह याद रहता है कि कोई रमा चोपडा आयी थी जिसने सौ-सवा सौ साडियां देखी थी और एक साडी भी नहीं खरीदी थी। रमा एक समझदारी और करती थी कि उस दूकान पर रुकती थी जिसपर भीडभाड हो। साड़ियां देखते-देखते वगल में वैटी हुई औरत को राय देने लगती कि इसका सिल अच्छा नहीं है। इमकी वटी में जरा खरावी है। हां, यह मच्छी है और यह साड़ी उस दुकान पर यहां से चालीस रपये कम दाम पर मिल सकती है। यह बात तो उसे जबानी याद थी कि किस दूकान पर साड़ियों का नया स्टाक आया है और किम साड़ी को क्या कीमत है । "उसकी बातें सुनकर दूकानदार उसे दिल-ही-दिल में गालियां देता। पर समझता कि वह उस औरत के साथ है जो साड़ियां देख रही है, इसलिए दिल मसोसकर रह जाता और उम औरत के माय रमा को भी ठण्डो कोक का ग्लास' मिल जाता। फिर कोक पो-पाकर वह उमी औरत के साथ उस दुकान में टल जाती। अब चूंकि उसकी मुलाकात उसकी वजह से उस औरत के तीस-चालीस रुपये बचे हैं, इसीलिए वह औरत मज़बूरन उससे पूछती, "कहाँ रहती हैं आप?" इस सवाल से रमा हमेशा घबराया करती थी। यह कहने में सुबकी होती थी कि ग्रेड-फोर आफ़िसर्ज़ हाउसिंग सोसायटी में रहती है। तो कहती, "क्या बताऊँ बहेनजी वम्बई में कहीं रहने को जगह मिलती है ? तीन फ्लैट बुक करवा रक्खे हैं। एक पेडर रोड पर, एक कफ परेड पर और तीसरा जूहू में। पर वन ही नहीं चुकते किसी तरह । एक सम्वन्धी के साथ टिके हुए हैं वान्द्रा ईस्ट में । बड़ी तकलीफ़ है..." वातों-बातों में वह उस औरत का नाम-पता मालूम कर लेती। फ़ोन का नम्बर लिख लेती। और यदि वह औरत किसी पैसेवाले घर की निकलती तो एक-दो वार उसे फोन करती। और फिर उसके यहाँ आना-जाना शुरू कर देती तो दिन का खाना और शाम की चाय यूं निकल जाती। पर सरला से उसकी नहीं हुई क्योंकि मिढा साहव यह चाहते नहीं थे। मिढा साहव को रमा पसन्द आयी थी। पर वह अच्छी शराव की तरह अच्छी ऐयाशी के भी कायल थे। उन्हें न वह शराब पसन्द आती थी जो पहले ही छूट में हलक से उतरे और सर चढ़ जाये और न उन्हें वह औरत पसन्द आती थी जो पहली ही मुस्कुराहट के जवाब में पूछे कि वेड-रूम 'किधर है। उन्हें मंजिल से ज़्यादा रास्तों का शौक था। और वह अभी रमा के रास्ते पर चल रहे थे। वह अभी सरसों के साग में मक्खन मिला रहे थे। इसीलिए जव उन्होंने रमा को एक दूकान में देखा तो सरला को लेकर टल जाना चाहा क्योंकि उन दिनों सरला का मूड खराव था। उसकी नौकरानी किसी आदमी के साथ भाग गयी थी और सरला विना किसी साथी के थी। और वह ऐसे में तो सरला और रमा की मुलाकात विल्कुल ही नहीं करवाना चाहते थे। पर उनपर रमा की निगाह पड़ गयी । वह मुस्कुराकर उनकी तरफ लपक आयी। उसे दुकान से भागने का कोई मौका नहीं मिल रहा था और दूकानदार उसे उस एक साड़ी पसन्द करवा लेने में कामयाव हो गया था। दूकानदार के सामने वह बग़लें भी नहीं झांक सकती थी। सोच रही थी कि अपना वटवा खोले और एकदम से 'अरे' कहके दुकानदार से कहे कि 'पैसे लाना तो वह भूल ही गयी है। ३२ / सीन : ७५ । ।
। चेक चलेगा?" वह जानती थी कि चेक नहीं चलेगा। वह कई बार चेक-युक निकालकर देख चुकी थी। चेकलिखते-लिखते कहती, "ऐसा करती हूँ। बाघ घण्टे में आकर ले जाती हूं। आपका दिल भी धक-धका रहा होगा कि क्या र: पता चेक कैश होगा या नहीं..."और यह सुनते ही दुकानदार की जान-में- जान आती और वह कहता : "अरे बहेनजी, यह क्या बोलती हैं आप? यापकी दूकान है। जितना सामान जी चाहें ले जाइए । पैसे वहाँ मागे जा रहे हैं। ..."पर यह कहते-कहते वह मारी को रैप करना बन्द कर देता और उमे एक तरफ फेंकते हुए कहता, "वैसे आपकी मर्जी । आध घण्टे के बाद ले जाइयेगा।".."और वात खत्म हो जाती। पर यह दूकानदार चेक लेने पर न सिर्फ यह कि तैयार हो गया था बल्कि जिद कर रहा था कि विना माड़ी लिये वह रमा को जाने ही नहीं देगा। और रमा को मजबूरन चेक लिखना पड रहा था। चेक लिखने में कोई हर्ज नहीं था। पर बैंक में २७ रुपये २४ पैमै थे और साड़ी थी एक मो अट्ठारह की। तो रमा ने जैसे ही • मिढा को देखा, उसने वैसे ही, चील की तरह उसपर झपट्टा मारा। दूकानदार ने अपने सेल्ज़-मन से कहा : "अव साली साही खरीदने नहीं आयेगी।" और यूं एक दिन मेहराबाद में सरला और रमा की मुलाकात हो गयी और सरला को रमा पसन्द मी आ गयी। सरला की मुस्कुराहट देखकर मिढा के इक पर ओस पड गयी। वह समझ गया कि अब उसकी दाल नहीं गल सकती। चुनांचे सरला और रमा की दोस्ती हो गयी। सरला की गाड़ी कालोनी मे आने लगी । सरला रमा को पिक्चर दिखलाने लगी। साड़ियो प्रेजेंट करने लगी। पर वह दोनो एक-दूसरे पर इधर-उघर ताने भी मारती रही । रमा इमलिए ताने मारती कि दूसरों पर रोब डाल मके कि इतनी बड़ी गाड़ी पर आनेवाली सरला पर वह पैसे खर्च करती है और सरला इमलिए ताने मारती कि कोई समझ न जाये कि वह रमा के बारे में क्या सोचती है। नौकरानीवाली वात इधर-उधर फैल चुकी थी और बिल्डिंग को माएँ अपनी बेटियों को उससे बचाने लगी यो। तो वह यह नहीं चाहती थी कि यह बातें वक्त से पहले रमा को मालूम हो । फिर एक दिन ऐसा हुआ कि सरला एक जगह पूजा में गयी हुई थी। ।
उनके खून रमा नहीं जा सकी थी क्योंकि उसकी तबीयत सुस्त थी तो मौके का फायदा उठाते मिहा सरला की तरफ़ से रमा की तबीयत पूटने आ गये । रमा के सर में दर्द हो रहा था। वह जिद करके उसका सर दवाने लगे।" की रफ़्तार अभी बहुत तेज नहीं हुई थी। बस, यह हो रहा था कि उनके हाथ कभी-कभार फिसलकर रमा के सर से उसकी गरदन तक या जाते थे। उसकी गरदन बड़ी खूबसूरत थी। "कि भोलानाथ आ गया। मिढा घबरा गया। दूसरे दिन रक्षाबन्धन था। वाकी सारा दिन भोलानाथ और रमा में लड़ाई हुई। और दूसरे दिन मिढा ने रमा से राखी बंधवा ली। सच्ची दात यह है कि इसमें रमा बैचारी का कोई दोष नहीं था। पर रमा का खयाल था कि दुनिया में भोलानाथ से ज्यादा खूबसूरत कोई और मर्द ही नहीं है । और भोलानाथ भी रमा के इस खयाल से पूरी तरह सहमत थे। रमा के बारे में उनका भी कुछ इससे मिलता-जुलता खयाल था। इस- लिए भोलानाथ को जरा किसी पर शक होता तो वह तड़ से उसके हाथ में रमा से राखी बंधवा देते । कर नाले इश्क अपनी बहन से ! बाद में तो यह होने लगा कि जहाँ रमा किसी को राखी बांधती, लोग ताड़ जाते कि क्या किस्सा है। मिटा के राखी बंध जाने के बाद सरला ने भी इतमीनान का सांस ली। उसे थोड़ा-सा शक था कि शायद रमा मिढा में दिलचस्पी ले रही है। इसीलिए वह बड़ी चौकसी से आगे बढ़ रही थी कि अगर रमा प्यार का साना खाली दे तो रमा जल्दी में भी अपनी पोजिशन वदल सके। अभी तो वह बस इतना कर रही थी कि घण्टों रमा के वाल वनाती। फ़ेशल करती। ब्लैक हेड्स निकालती। कहती, "यह क्या साड़ी बांध रक्खी है तुमने ! पंजाबियों को साड़ी वांधना कभी नहीं आयेगा।"रमा हंसने लगती । सरला भी हँसने लगती। रमा साड़ी खोल देती। सरला कहती : "हाय रमा, तुम्हारी कमर क्या हुई..." रमा यह सुनकर खुश हो जाती । उसे वाकई अपनी कमर बहुत पसन्द थी। सरला हंसते हुए उसकी कमर में हाथ डाल देती और कहती, "उनको तो बड़ी तकलीफ़ होती होगी तेरी कमर तलाश करने में ।" इतना कह-कहकर गुदागुदा देती और रमा हँसते-हँसते पलंग पर ३४ / सीन : ७५ गिर जाती, दुहरी हो-हो जाती और सरला उसे मीषा करने के लिए उसके सारे बदन पर फिमलती फिरती।... सरला में अपनी दोस्ती का रमा ने पहला फायदा यह उठाया कि उमन सरला से माडी बांधना सीख लिया। उसने यह जान लिया कि माड़ी के बॉर्डर के साथ चप्पल का 'मंच' करना कितना जरूरी है। उसे यह भी पता चल गया कि किस रग की साडी के साथ लिपस्टिक का कौन-सा रोड चलता है। .. और दूसरा फायदा यह हुआ कि मिढा की सिफारिश पर भोलानाथ खटक ब्लेडी की एक कम्पनी के असिस्टेंट सेल्ज़ सुपरवाइजर हो गये। तनख्वाह भी बढ़ गयी और आमदनी भी । रमा ने सरला के प्यार से दस हजार उधार लेकर उसे सूद पर चलाना भी शुरू कर दिया। और यूं वह 'सुरसिंगार कोआपरेटिव हाउसिंग सोसायटी लिमिटेड' में एक फ्लैट बुक करवाने के काबिल हो गयी। मनचन्दानी के पास बिल्डिग की प्लम्बिग का ठीका था। रमा अपना फ्नंट अपनी आंखों के सामने बनते देखना चाहती थी। तो दोनो ही दिन- भर 'सुरसिंगार' में रहते । मनवन्दानी एक हममुख मर्द था। रमा एक मिलनसार औरत थी। दोनो मे दोस्ती हो गयी। रमा इस फिक्र मे थी कि दोस्ती की वजह से मनचन्दानी उसके फ्लैट में भी वही माल लगवायेगा जो अपने फ्लैट मे लगवानेवाला है। मनचन्दानी को भला एतराज हो क्योंकि रमा की मुस्कान में अब भी गेहूं के सेतो का खुशबूदार सोना था। खुली हुई किताब-मी मुस्कुराहट । यदि कुछ वक्त इस मुस्कु- राती हुई रमा के साथ गुजर जाये तो क्या बुरा है । तब तक मनचन्दानी को यह भी मालूम नहीं हुआ था कि रमा कोई 'ऐसी वैसी' लड़की या औरत नही है । "कि उसने खुद अपने चारों तरफ़ एक लक्ष्मणरेखा संच रक्खी है कि उसे सुनहरा हिरल जरूर चाहिए पर वह उस हिरन के लिए अपनी बनायी हुई सीमाओ से आगे नहीं बढेगी । वह मनचन्दानी से हंमदी- बोलती, उसे चाय पिलाती और फिर शाम को भोलानाथ सटक के साथ अपने घर लौट जाती.."उसकी आत्मा की प्लम्बिंग अच्छी थी। पर भोलानाय फिर भोलानाथ थे। थोड़े दिनों बाद उन्हें यह शक घुन की तरह लग गया कि बनते हुए फ्लैट में जाने क्या-क्या होता होगा! और सकता था, सीन :७५/३५.
विचारी रमा साहब शक का इलाज तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं था, तो किस खेत की मूली थी ! खटकजी का यह शक जव गहरा हुआ तो उनके व्यक्तित्व के लिफाफे पर डाक के टिकट की तरह चिपक गया और रमा को यह भांपने में देर नहीं लगी कि दाल में कुछ काला । चुनाँचे रक्षावन्धन के दिन मनचन्दानी को राखी बांधकर अपनी तरफ़ से यह किस्सा खत्म कर दिया। पर उसका दिल बहुत दुखा । वह खटकजी की शक्की तबीयत से आजिज़ आ चली थी। इस शक के पीछे वह अव तक तीन आदमियों को राखी बाँध चुकी थी। हर रात को पेट-भर खाना खाने के बाद भी वह उसे खाते यहाँ तक कि सुवह होते-होते वह मुश्किल से चौथाई या तिहाई रह जाती। और फिर लाख जतन करके दिन-भर में किसी-न-किसी तरह वह अपने व्यक्तित्व को पूरा करती। खटकजी-जैसे आदमी के साथ पूरी ज़िन्दगी निभाने का इरादा रखना भी बहादुरी का काम है। अब वह विचारी यह कैसे याद रखती कि फलवाले से मुस्कुराकर उसने क्या कहा था 'डाकिये के सामने वह खाली पेटीकोट-ब्लाउज में क्यों आयी थी...वह इस जिल्लत पर मन-ही- मन में कुढ़ती कि क्या उसके लिए फलवाले और डाकिये और पड़ोस के नौकर-चाकर ही रह गये हैं ! वह रोने लगती। वह रोती तो खटकजी का पारा और चढ़ जाता। उनका पारा और चढ़ता तो रमा भी झल्ला जाती और महाभारत शुरू हो जाती । महाभारत शुरू होती तो ग्रेड श्री के क्लकों की कालोनी में हर आदमी के वदन पर हजारों कान उग आते। एक हजार वानवे पानेवाले का भी पत्नी से झगड़ा होता है ! इसलिए साबित हुआ कि पत्नियां गड़बड़ करती हैं." इन झगड़ों में पहले तो रमा धीरे-धीरे कोसती रहती और खटकजी पंजावी, हिन्दी और अंग्रेजी में धाड़ते रहते। परन्तु आजिज़ आकर जव ऊँची आवाज में गालियाँ देना शुरू करती तो खटकजी की आवाज़ धीरे- धीरे धीमी होने लगती। उन्हें एकदम से यह खयाल आने लगता कि वह पास-पड़ोसवालों के कान से बहुत डरते हैं। दूसरे दिन वह पड़ोसियों का चेहरा देखकर मापने की कोशिश करते ३६ /सीन:७५ कि उन्होंने रात को बातें मुती है तो किस हद तक मुरी है। पर प्रेडशी और फोर के अफमरों को अपने चेहरे से मुठ बुलवाने को कला खूब आती है। पटकजी को यकीन हो जाता कि किमी को रमा से उनके झगडे का पता नहीं है और वह किमो दूसरे भक को पाल-पोसार वडा बनाने के लायक हो जाते। पर जब क्लर्क श्री बाबूलाल श्रीवास्तव ने 'क्वालिटी' में लंच साकर उन्हें चोट दी तो उन्हें अपने उन तमाम पहोमियो में एकसाय नफरत हो गयी जो उन्हें मुबह-शाम मलाम करते थे और जिनके बच्चे दिन-भर लपक-मपाकर उनके घर का सौदा करते थे और जिनकी पत्नियो रमा की चमवियां थी और जिनके महयोग विना ग्रेड धो और फोर के आफिमज कालोनी में उनका रह्ना नामुमकिन हो गया होता। पर सत्तासी रुपये सोलह पैसे का साना खिलाना और ही बात है। एक लंच पर आधी तनख्वाह में एक रुपया ज्यादा । मन श्री बाबूलाल श्रीवास्तव के सामने तो वह मुस्कुराता रहा, "अरे बाबूलालजी, बेटरों विचारों को मिलता ही क्या है । टिपो पर तो गुजर होती है गरीबों को। और साहद, सीधी बात यह है कि अच्छी टिप दीजियेगा तो अच्छी सविस मिलेगी।.." यह कहते हुए सटकजी खड़े हो गये। उठ तो सर बाबूलालजी भी गये, पर वह दिल-ही-दिल में यह सोचते उठे कि यदि एक वेटर दिन में वीस भादमियो को भी सानाखिलाता होगा और यदि पांच नहीं, तीन रुपये फी खाने का औसत माना जाये तो तीस दिन के महीने में वीस तियां माठ इनटू थर्टी बराबर अट्ठारह मौ रपये!.."मतलब यह निकला कि क्वालिटी' का वेटर मौलानाथ से ज्यादा कमाता है ! और खटकजी यह मोच-सोचकर, अन्दर-ही-अन्दर, सूखे जा रहे थे कि यह तिरानवे रपये कहाँ से आयेंगे। उस दिन शाम को भोलानाथ लोकल ट्रेन के एक डिब्बे में यहोश पाये गये। आध घण्टे तक तो उन्हें यही याद न आया कि वह कौन हैं और यहाँ हैं। उनकी घड़ी और जेब को मारी रकम गायव धी। तीमरी उँगलीवाली नकली हीरेवाली अंगूठी भी नहीं थी। पुलिस आ गयो । डाक्टर आ गया।
। इसमें कोई दो घण्टे लग गये। और तब धीरे-धीरे उन्हें अपना अता-पता याद आने लगा और फिर उन्हें यह याद आया कि उनकी जेब में कम्पनी के साढ़े बारह हज़ार रुपये भी थे। बयाना-वयानी होने लगी। पंचनामा तैयार हुआ। भोलानाय को बस इतना याद था कि उनकी सिगरेटें खत्म हो गयी थीं। पड़ोस के मुसाफ़िर ने उन्हें अपनी डिविया से एक सिगरेट दी। पहले एक सिगरेट उसने खुद ली थी और तब उसने इनकी तरफ़ डिविया बढ़ायी थी। इनको तलव सख्त थी। इन्होंने एक सिगरेट निकाल ली। पी! पड़ोस- वाले मुसाफ़िर से बातें करते रहे और फिर क्या हुआ यह उन्हें याद नहीं। पुलिस ने उस मुसाफ़िर का हुलिया पूछा। लम्बा कर । भरा हुआ वदन। तोते-जैसी नाक। बड़ी-बड़ी मूंछे 'वह रुक गये। पुलिस समझी कि वह याद कर रहे हैं। पर वह इसलिए रुके ये कि वह मिडा का हुलिया क्यान करने लगे थे। पर अब वह बीच में रुक तो सकते नहीं थे। तो उन्होंने मिटा का पूरा नाक-नक्शा पुलिस को बता दिया। एक बार तो जी चाहा कि पुलिस को नाम और पता भी बता दें। पर दिल मारकर रह गये क्योंकि पुलिस यह न मानती कि एक लखपति पत्नी के पति ने किसी असिस्टेंट बिल-कलेक्टर को डोप किया होगा। इसलिए वह हुलिये से आगे न बढ़े। वहाँ एक पत्रकार भी आ गया। उसने खटकजी की तस्वीर ली। वह दिल-ही-दिल में खुश हुए कि चलो इसी बहाने पेपर में तस्वीर छप जायेगी। तब पता चलेगा कालोनीवालों को कि भोलानाथ के साथ रहना कितनी बड़ी इज्जत की बात है ! पत्रकार से वात करते-करते उन्होंने चुपके से घड़ी देखनी चाही तो अपनी कलाई नंगी दिखायी दी और तब वह दिल-ही- दिल में मुस्कुरा दिये कि घड़ी तो साढ़े बारह हजार के साथ वम्बई सेंट्रल स्टेगन के क्लोक-रूम में रक्खी हुई है, एक संकेंडहँड सूटकेस के अन्दर । इसी बीच में उनके आफिस का भी एक आदमी आ गया। पुलिस ने केस रजिस्टर कर लिया। और खटकजी को घर जाने की इजाजत मिल गयी । उन्होंने आफ़िस के आदमी से दस रुपये एडवान्स लिये घर जाने के लिए। पत्रकार की घड़ी में सात बज रहे थे। इसका मतलब यह हुमा कि रमा सरला के साथ उसके घर जा चुकी होगी और घर पर मिढा स्कात्र ३८/सीन : ७५ ।
। व्हिस्की रहा रहा होगा और रमा सरला के बेडरूम में साड़ी वोधना सौख रही होगी या लिपस्टिक के दोड समझ ही होगी। स्काच का खयाल आते ही भोलानाथ की प्याम भडक उठी। लिजा ने दरवाजा खोला। लिजा सरला की नयी नौकरानी का नाम था। कैयौलिक थी। कान में जाती तो सरला की बात छोड़ जाती। पर अपने वाय-फेंड को हम-हंसकर सरला की तमाम बातें बताती। और फिर दोनो सरला पर हम पडते । मिढा भी लगातार उससे हल्का-फुल्का फ्लर्ट करने की कोगिमा कर लेते थे यह लिजा खटकजी को भी अच्छी लगती थी। और उसकी वजह में उन्होंने 'मिढाज' के यहां आना जाना काफी बढ़ा दिया था। लिजा की वर्ष- गांठ पर उन्होंने उसे लाल गुलाब की एक कली भी दी थी और रमा, मरला और मिहा के सामने हंसते-हंसते उससे, अग्रेजी में, यह भी कह दिया था कि उन्हें उससे प्यार हो गया है। इस पर कहकहा पडा था और लिजा भी -- हम दी थी और इसके उसने खटकजी को जबान भी दिखा दी थी। वह जवान जभी से केंचवे की तरह खटकजी के बदन पर रेंग रही थी। वह, इस बीच में, कई वार रमा को लिजा बनाकर उसके साथ सो भी चुके थे। और एक बार तो उन्होंने रमा को लिजा पुकार भी लिया था। वह तो सैरियत यह हुई कि रमा तब अपने ब्लाउज के बटन लगाने में गुम थी और उमने सुना ही नहीं कि सटकजी ने उसका नाम बदल दिया है।... लिजा उन्हें देखकर मुस्कुरा दी। वह भी मुस्कुरा दिये । वस, यह इश्क कोई साल-भर से यही टिका हुआ था। अन्दर मिढा स्काच पी रहे थे। बैडरूम से सरला और रमा के हंसने की आवाज आ रही थी। मिदा खटकजी को देखकर मुस्कुराया, हालांकि अब उन्हें देखकर बुग होने को जी नहीं चाहता था। अरे भई, रमा से इश्क ही नहीं लड़ाना है तो उसके पति को देखकर खुश होने की ज़रूरत ही क्या है फिर भी मरला के डर से मुस्कुराना तो था ही। तो मुस्कुराकर मिदा ने अपना फर्ज अदा कर दिया।
इसमें कोई दो घण्टे लग गये। और तव धीरे-धीरे उन्हें अपना अता-पता याद आने लगा और फिर उन्हें यह याद आया कि उनकी जेब में कम्पनी के साढ़े वारह हजार रुपये भी थे। बयाना-बयानी होने लगी। पंचनामा तैयार हुआ। भोलानाथ को वस इतना याद था कि उनकी सिगरेटें खत्म हो गयी थीं। पड़ोस के मुसाफ़िर ने उन्हें अपनी डिविया से एक सिगरेट दी। पहले एक सिगरेट उसने खुद ली थी और तब उसने इनकी तरफ़ डिविया बढ़ायी थी। इनको तलब सख्त थी। इन्होंने एक सिगरेट निकाल ली। पी! पड़ोस- वाले मुसाफ़िर से बातें करते रहे और फिर क्या हुआ यह उन्हें याद नहीं। पुलिस ने उस मुसाफ़िर का हुलिया पूछा। लम्बा क़द । भरा हुआ वदन। तोते-जैसी नाक। बड़ी-बड़ी मूंछे. 'वह रुक गये। पुलिस समझी कि वह याद कर रहे हैं। पर वह इसलिए रुके थे कि वह मिढा का हुलिया वयान करने लगे थे। .. पर अब वह बीच में रुक तो सकते नहीं थे। तो उन्होंने मिढा का पूरा नाक-नक्शा पुलिस को बता दिया। एक बार तो जी चाहा कि पुलिस को नाम और पता भी बता दें। पर दिल मारकर रह गये क्योंकि पुलिस यह न मानती कि एक लखपति पत्नी के पति ने किसी असिस्टेंट विल-कलेक्टर को डोप किया होगा। इसलिए वह हुलिये से आगे न बढ़े। वहाँ एक पत्रकार भी आ गया। उसने खटकजी की तस्वीर ली। वह दिल-ही-दिल में खुश हुए कि चलो इसी बहाने पेपर में तस्वीर छप जायेगी। तव पता चलेगा कालोनीवालों को कि भोलानाथ के साथ रहना कितनी बड़ी इज्जत की बात है ! • पत्रकार से बात करते-करते उन्होंने चुपके से घड़ी देखनी चाही तो अपनी कलाई नंगी दिखायी दी और तब वह दिल-ही- दिल में मुस्कुरा दिये कि घड़ी तो साढ़े वारह हज़ार के साथ वम्बई सेंट्रल स्टेशन के क्लोक-रूम में रक्खी हुई है, एक सैकेंड हैंड सूटकेस के अन्दर । इसी बीच में उनके आफ़िस का भी एक आदमी आ गया। पुलिस ने केस रजिस्टर कर लिया। और खटकजी को घर जाने की इजाजत मिल गयी । उन्होंने आफ़िस के आदमी से दस रुपये एडवान्स लिये घर जाने के लिए । पत्रकार की घड़ी में सात बज रहे थे। इसका मतलब यह हुआ कि रमा सरला के साथ उसके घर जा चुकी होगी और घर पर मिढा स्काच ३८ / सीन : ७५ - । व्हिस्की बहा रहा होगा और रमा सरला के वेड-रूम में साड़ी वोपना भीष रही होगी या लिपस्टिक के शेड समझ रही होगी। कार का खयाल आते ही भोलानाय को प्यास भडक उठी। लिजा ने दरवाजा खोला। लिजा सरला की नयी नौकरानी का नाम था। कोलिक थी कगन में जाती तो सरला की वात छोड जाती। पर अपने वाय-फेंड को हम हंसकर सरला की तमाम बातें बताती। और फिर दोनो मरला पर हम पडते । मिडा भी लगातार उससे हल्का-फुल्का पलट करने की कोगिन कर लेते थे। यह लिजा खटकजी को भी अच्छी लगती थी। और उसकी वजह से उन्होंने 'मिदाज' के यहाँ आना जाना काफी बड़ा दिया था। लिजा की वर्ष- गांठ पर उन्होंने उसे लाल गुलाब की एक कली भी दी थी और रमा, मरला और मिढा के सामने हंसते-हंसते उसते, अंग्रेजी में, यह भी कह दिया था कि उन्हें उससे प्यार हो गया है। इस पर कहकहा पड़ा और लिजा भी • हंस दी थी और इसके उसने खटकजी को जवान भी दिखा दी थी। वह सवान जभी से फेंचवे की तरह खटकजी के बदन पर रेंग रही थी। यह, इस बीच में, कई वार रमा को लिजा बनाकर उसके साथ सो भी चुके थे। और एक बार तो उन्होंने रमा को लिजा पुकार भी लिया पा। वह तो खैरियत यह हुई कि रमा तव अपने ब्लाउज के बटन लगाने में गुम थी और उमने सुना ही नहीं कि खटकजी ने उसका नाम बदल दिया है।" लिया उन्हें देखकर मुस्कुरा दी। वह भी मुस्कुरा दिये । वस, यह इस्क कोई साल-भर से यही टिका हुआ था। अन्दर मिढा स्काच पी रहे थे। बेह-रूम से सरला और रमा के हंसने की आवाज आ रही थी। मिदा खटकजी को देखकर मुस्कुराया, हालांकि अब उन्हें देखकर खुश होने को जी नहीं चाहता था । अरे भई, रमा से इसके ही नहीं लड़ाना है तो उमके पति को देखकर खुश होने की जरूरत ही क्या है ! फिर भी सरला के डर से मुस्कुराना तो था ही। तो मुस्कुराकर मिडा ने अपना फ़ाउं अदा । दिया।
"कि हाल..." खटकजी ने पंजावी शुरू खटकजी ने पंजावी शुरू की। वह मिढा से हमेशा जाबी बोलते थे, क्योंकि वह जानते थे कि मिडा पंजाबी से जलता है। यं ह मिढा को रमा से इश्क करने की सज़ा भी दे लिया करते थे। मिहा पंजावी नहीं था। उसके माता-पिता जरूर पंजाबी थे। उसने तो दिल्ली के एक शरणार्थी कैम्प में जन्म लिया था। फिर उसके पिता ने लख- नऊ में वकालत शुरू की जो नहीं चली। पर मिढा का पालन-पोसन लख- नऊ ही में हुआ। और वह लखनऊ की धुली और इस्त्री की हुई खड़ीबोली बोलने लगा। मसनवी 'जहरे-इश्क' और मसनवी 'गुलज़ारे-नसीम के शेर गुनगुनाने लगा । 'आतिश' की शायरी पर वहस करता और 'अनीस' के मरसियों पर सर धुनता। वी. ए. तक उसने उर्दू पड़ी और फिर सरला से शादी कर ली जो हिन्दी-उर्दू को गवारू भाषा समझती थी और घर में अंग्रेजी वोला करती थी। अंग्रेजी मिढा को भी पसन्द थी। पर सरला की ज़िद में वह अंग्रेज़ी से नफ़रत करने लगा था। बची पंजाबी। तो पंजाबी से नफ़रत करके वह अपने पिता को सजा दे रहा था जिन्होंने सरला से उसकी शादी करवायी थी। "एक दिन शराव की झोंक में वह अपने दिल की बातें खटकजी को बता गया था। यह तव की बात है जब खटकजी ने उसे रमा का सर दवाते नहीं देखा था। और अव भोलानाथ उसी का फायदा उठा रहे थे। भोलानाथ आराम से बैठकर अपने लिए व्हिस्की बनाने लगे। मिट के लिए तो भोलानाथ उसके खून का गिलास बना रहे थे। पर वह मुस्कु राता रहा क्योंकि उसने मुस्कुराना सीख लिया था। और वेड-रूम अब भी सरला और रमा के हंसने की आवाज़ आ रही थी... "जस्ट ट्राई इट डालिंग।" यह सरला की आवाज़ थी। मुझे तो नाथ की तरफ़ से परेशानी हो रही है ।" यह रमा आवाज़ थी। फिर सरला की हँसी की आवाज़ जो बड़ी गन्दी, बड़ी बेहूदा, अश्ल . * उर्दू की दो मशहूर मसनवियाँ, एक नवाब मिरजा 'शोक' की, दू दयाशंकर 'नसीम' की। - ४० सीन : ७५ हो गयी। पर भोलानाय को उस हमी पर सोवने का मौका नहीं मिला कोकि उसी वक्त सिजा वळं लेकर आ गयी और वर्क को मेज पर रसने के लिए मुकी। वह मुकी तो गहरे गले को मार भी आगे को तरफ़ भुकी न और भोलानाथ ने जियर से झांकती हुई छातियो की झलक देख ली। लिजा भी मव समझती यो। पन-भर को झुकी रही। और उस पल-भर में भोलानाय और मिदा दोनों के बदन का सारा लहू चेहरे पर सिंच आया और उनके दिल उनकी कनपटियों में घड़कने लगे और हलक. मूस गये और तिजा खिलखिलाकै हैम दी। मते हुए उसने पहले मिडा की तरफ़ देखा, फिर भोलानाय की तरफ। दोनों उसके ब्लाउज में झांक रहे थे। वह मीधी हो गयी और बोली, "यू नाटी वाएज !" और फिर वह हमती हुई किचन की तरफ चली गयी और यह दोनों उसे जाता हुआ देखते रह गये। लिजा जानती थी कि वह दोनों उमे देख रहे है तो उसके कूल्हों को लचक जरा और बढ़ गयी। लिजा ने किचन में अपने ब्वाय-फेंड को इन आँखों की बात बतायी। - दोनों हंसने लगे और सिटिंग-हम तक सरला-रमा की हमी के साय तिजा- पीटर की हेमी को आवाज भी आने लगी। पीटर का असली नाम रामनाय था। कानपुर का रहनेवाला था। कई बरस पहले राजेश खन्ना बनने और मुमताज से इश्क करने बम्बई भाग आया था। वम्बई आने के बाद दम-बारह दिन तो वह राजेश खन्ना के कार्टर रोडवाले घर के सामने से टला ही नहीं। राजेश खन्ना को आने- जाते देख लेता और वस। फिर वह राजेश खन्ना के घर के मामने सड़ा- सड़ा बोर हो गया तो स्टूडियोज के चक्कर लगाने लगा जहां उसकी तरह के और बहुत-लड़के भी हुआ करते थे। वह चूंकि घर से दाई-तीन सौ रुपये लेकर भागा था इसलिए उसे भूख की तकलीफ नही थी। जी भर स्टारों का तमाशा देखता और रात को कहीं-न-कही पड़कर सो जाता। उसे हिन्दी फिल्मोवाल किसी पुलिस कान्सटेबिल या 'दादा' ने परेशान भी नहीं किया और उसके दिल से वम्बई का डर निकल गया। मिडिल पाम था, इसलिए माली ममय में वह फिल्मों के लिए कहानियां लिखने लगा। एक दिन एक ईरानो चायखाने में वह अपने कुछ बम्बय्या दोस्तों को उमल.
व खिला रहा था और अपनी एक 'स्टोरी' सुना रहा था जो राजेश खन्ना र मुमताज़ के लिए विल्कुल फ़िट' थी। उसे यह पता नहीं था कि श्री म्दा पटयालवी उसके पीछेवाली मेज़ पर बैठे अपनी किसो फ़िल्म का न लिख रहे थे। सीन यह था कि हीरो किसी ईरानी चायखाने में बैठा । श्ता कर रहा है और वॉस का इन्तिजार कर रहा है। हीरो दर-अस्ल तो. आई.डी. का इन्सपेक्टर था पर बॉस का पता चलाने के लिए उसके रोह में शामिल हो गया था और स्मगलिंग का धन्धा कर रहा था और हीरोइन से इश्क लड़ा रहा था क्योंकि हीरोइन वॉस की लड़की थी हीरो का इश्क़ भी ड्यूटी बना हुआ था. यह सब तो ठीक ! पर श्री फन्दा पटयालवी कोई सात साल से किसी ईरानी चायखाने में गये ही नहीं थे। सात साल पहले वह इस लायक नहीं थे कि ईरानी चायखाने में जाकर चाय पियें। कभी कोई दोस्त फंस जाता तो वह एक तिकोना और एक प्याली चाय खा-पी लेते। फिर उनकी एक फिल्म हिट हो गयी और उन्होंने कार खरीद ली । अव ईरानी चायखाने इस लायक़ न रह गये कि श्री फन्दा वहाँ चाय पीने जाते। धड़ा-धड़ उनकी सात-आठ फिल्में हिट हो गयीं। प्रोड्यूं- सर और स्टार उनके आगे-पीछे घूमने लगे। आज राजेश खन्ना के यहाँ डिनर है। कल दिलीपकुमार उनके बच्चे की सालगिरह पर कोई महगा स्मगल किया हुआ खिलौना लिये खड़े हैं। सुनीलदत्त दूर से देख लेते हैं तो हाथ हिलाते हैं । देवानन्द वयान दे रहे हैं कि श्री फन्दा पटयालवी से अच्छा लेखक आज तक वम्बई आया ही नहीं। भगवती बाबू, यशपाल, अमृतलाल नागर, मण्टू, कृष्णचन्द्र, इसमत चुग़ताई, राजेन्द्रसिंह बेदी 'सब गये तेल वेचने। आधुनिक हिन्दी साहित्य में तो बस एक नाम है, श्री फन्दा पट- यालवी। श्री फन्दा एक क्रान्तिकारी लेखक थे। उन्होंने पहली बार मध्यम वर्ग के जीवन और उसकी राजनीति को हिन्दी फिल्मों से परिचित कर वाया। 'मजदूर का बेटा', 'कातिल कौन', 'चालीस अली वावा, एक चोर' 'कसम'.''आधे दर्जन से ज्यादा क्रान्तिकारी फिल्में लिख लेने के बाद श्री फन्दा को खयाल आया कि उन्हें एक आफ़-बीट फिल्म लिखनी चाहिए उन्होंने खुद ही उसे डाइरेक्ट करने का फ़ैसला भी किया । और उस कहान में कमवस्त हीरो एक ईरानी चायखाने में आ गया। श्री फन्दा ने दिमा - ४२ सीन : ७५ पर यहुत जोर दिया कि ईरानी चायखाना याद आ जाये, पर जब वह किसी तरह याद न आया तो उन्हें ईरानी चायखाने मे चाय पीने जाना ही पा। उनके पी आर. ओ. ने एक फोटोग्राफर भी भेज दिया। उसका । खयान या कि यह तस्वीरें श्री फन्दा का इमेज बनाने में सहायता करेंगी। चुनांचे वह सीन लिख रहे थे और फोटोग्राफर तस्वीरें खीच रहा था और चायखाने के गोर में छन-छनकर रामनाय को आवाज आ रही थी और फन्दा पटयालवी को यह फैमला करने में देर नहीं लगी कि रामनाय एक आरिजिनल, घामू और गोल्डन जुबिली 'सब्जेक्ट' मुना रहा है। तो फन्दाजी ने कलम रख दिया। फोटोग्राफर अपने काम में लगा रहा। फन्दाजी रामनाय की कहानी सुनते रहे।" चायग्वाने से उठते-उठते रामनाथ फन्दाजी का नौकर हो गया। रामनाय ने फन्दाजी का नाम तो मुन ही रवा था क्योकि वह राजेश पन्ना बनने आया था और राजेश खन्ना फन्दाजी की कई हिट कहानियो मे काम कर चुका था। इसलिए वह उनके यहां नौकरी करने पर फौरन तैयार हो गया। उसका खयाल या कि राजेश खन्ना फन्दाजी के घर तो आता ही होगा। पर फन्दाजी की तो नीयत ही कुछ और ही थी। यह तो पह चाहते धे कि रामनाय के जीनियम की फिल्मवालों में से किसी को हवा भी न लगे। वह उमे इटैलियन फियट पर अपने पलंट ले गये। मी ग्रीज के साइम माले पर उनका फ्लैट या। सामने अरब सागर था। पीछे वम्बई । रामनाथ को यह फ्लैट बहुत अच्छा लगा और उसने तय किया कि स्टार बन जाने के बाद वह इसी बिल्डिंग में पलट ले लेगा। चूंकि रामनाथ मिडिल पाम था, इसलिए उसे कोई काम नही आता था। तीन बेटियों पर एकलौता बेटा था इसलिए घर में उसकी बडी मान- जान थी। उससे कोई काम नहीं लिया जाता था। उसके पिता बाबू चन्द्रिका प्रसाद कानपुर को म्युनिसिपल कार्पोरेशन में क्लक थे। चुगी पर काम करते थे, इसलिए भगवान की दया और अल्लाह के करम से कार की आमदनी काफी थी। चमनगंज में उनका अपना दोम जिला पक्का मकान पा-'रामनाय भवन' । रामनाथ को मालूम था कि यह भवन उसका - सीन : ७५/४३ है। तो भला उसे काम करने की क्या ज़रूरत थी ! इसलिए जब फन्दाजी की पत्नी को पता चला कि उसे कोई काम ही नहीं आता तो वह बहुत बिगड़ी कि ऐसे आदमी को पचास रुपये तनखाह देने से क्या हासिल ! और फिर यह कि घर में पन्द्रह बरस की बेटी है पर फन्दाजी ने पत्नी की एक न सुनी और रामनाथ ने पहला इश्क फन्दाजी की बेटी पुष्पलता से किया । खैर यह कहना गलत है कि रामनाथ ने पुष्पलता से इश्क किया, क्योंकि पुष्पलता इस लायक ही नहीं थी कि कोई लड़का उससे इश्क करता। पर पुष्पलता ने उसे अपने इश्क पर नौकर रख लिया । पचास रुपये महीने उसे पुष्पलता से भी मिलने लगे। और सौ रुपये महीना, पचास रुपये महीने से अच्छा होता है। पुप्पलता विचारी की अपनी समस्याएं थीं। उसकी तमाम सहेलियाँ किसी-न-किसी पर आशिक थी। उनके साथ पिक्चरें देखने जाती थीं। बैंडस्टैंड की चट्टानों के पीछे अपने बॉय-फ्रेंड्ज़ के साथ नेकिंग करती थीं। दो-एक तो नेकिंग को हदों से भी आगे निकल चुकी थीं। दस-बारह चरस के सिगरेट पीती थीं। दो-चार एल. एस. डी. की यात्राएं भी करने लगी थीं । नेशनल कॉलेज में वे आपस में खूब-खूब बातें करतीं और विचारी पुष्पलता अपने-आपको अकेला पाती क्योंकि उसके पास अपनी दोस्तों से कहने लायक न कोई किस्सा था, न कोई अनुभव । पुष्पलता एका बदसूरत लड़की थी और फन्दाजी की कहानियों में भी कोई बदसूरत लड़की हीरोइन नहीं होती थी कि वह अपने-आपको वह हीरोइन ही फर्ज़ कर सकती।''तो उसकी जिन्दगी सूनी गुज़र रही थी। जिन्दगी जिसकी कोई दिशा नहीं थी। जिन्दगी जिसका कोई अर्थ नहीं था । फन्दाजी को इतनी फुरसत न थी कि पुष्पलता की समस्याओं पर सोचते और उसकी माँ पड़ोसिनों से बातें करने, साड़ियाँ खरीदने, गहने बनवाने में इतनी गुम थी कि कभी-कभी तो वह यह भी भूल जाती कि वह एक जवान बेटी की माँ है। राधिका, पुप्पलता की माँ, की सूरत भी अच्छी थी और काठी भी। वह ज्यादा-से-ज्यादा अपनी बेटी की बड़ी बहन लगती थी। जरा ध्यान से मेक-अप करती तो उसकी छोटी बहन दिखायी देने लगती। इसलिए पुष्प- . ४४/सीन :.७५ -- बातें करता, सता की बदसूरती से वह दिल-ही-दिल मे बुग भी थी कि जो घर में एक खूबसूरत जवान बेटी उसे मम्मी पुकार रही होती तो उसे अपनी उम्र छिपाने में परेशानी होती । अब तो यह होता कि जो प्रोड्युसर आता, जो हीरो आता, जो उभरता हुआ सितारा आता वह उसी को देखता, उसी से उसो को बातो पर कहरहे लगाता और वह उतनी देर के लिए कोई मुमताज, कोई शर्मिला टैगोर, कोई हेमा मालिनी बन जाती और मुकरियों में गुजरी हुई वीरान जिन्दगी पल-भर के लिए जैसे कही दूर चली जाती और हीर की धुन उसे ओल्ड-फेशण्ड लगने लगती और वह उठ कर रिकार्डप्लेयर पर पश्चिमी सगोत का कोई रिकार्ड लगा देती। वैसे उभे यह संगीत न पसन्द था और न ही समझ मे आता या, पर फैशन तो फिर फैशन है । वह नौशाद, जयदेव, खैयाम और सज्जाद की बुराई करती और आर. डी. एल. पी. और कल्याणजी-आनन्दजी की तारीफों के पुल बांधती । सव पर यह जाहिर करती कि वह राजेश खन्ना को राखी बांधती है और एल. पी. (लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल) के साथ तो रोज़ उठना-बैठना कहने का मतलब यह कि राधिका को पलता के बारे में सोचने का वक्त ही नहीं मिलता था और पुप्पलता अपनी मां के गन्दे-बेतकल्लुफ कहकहो की भीड में अपने-आपको बिल्कुल अकेली पाती थी। यही कारण है कि फन्दाजी जब रामनाथ को लाये तो पुष्पलता को एक अनजानी-सी खुशी हुई। अपनी इस खुशी का मतलब खुद पुष्पलता की समझ में फौरन नही आया, पर उसके लिए यही अनुभव बहुत था कि वह खुश है। रामनाय ने तो उसे गौर से देखा भी नहीं, क्योकि वह तो मुमताज के खयाल के साथ वाथरूमों मे वक्त गुजारा करता था। और वाकी वक्त फन्दानी के साथ गुजारा करता था और फन्दाजी घुमा-फिराके वहानियों को बात निकालते और रामनाथ उन्हें अपनी 'ओरिजिनल' कहानियाँ सुनाने लगता और फिर फन्दाजी उन कहानियो में चेज, कटंर ग्राउन, गार्डनर, क्रिस्थी' फेंटने में लग जाते। रामनाथ ने उनके यहां डेढ़ वरस काम किया। इस डेढ बरस में फन्दाजी ने सात 'ओरिजिनल' कहानियां वंची और दूसरे तमामयिी लेखकों की छुट्टी कर दी। हर फिल्म पार्टी में उन्हीं की बातें होने लगी और लोग यह कहते सुने गये कि फन्दाजी पट्यालवी नाड़े चार लाख लेने लगे हैं। रामनाय को यह पता भी नहीं चला कि वह फन्दाजी के नाम ने बहुत मशहूर फिल्मी लेखक हो गया है, क्यों कि अव उसका काफी वक्त पुष्पलता के कमरे में गुजरने लगा था। फन्दाजी तो दिन-रात गायब ही रहते थे। राधिका नी दिन-रात पड़ोस में ही गुजरती थी। फ्लैट में रामनाथ के सिवा कोई न होता। पुप्पलता कॉलेज से बातो तो उसे यह खयाल ही गुदगुदाना शुरू करता कि वह में रामनाय के साथ अकेली है। वह किसी-न-किसी बहाने से उसे अपने कमरे में बुलाती। वह आ जाता । वह भी खूब समझने लगा था कि पुष्पलता क्या चाहती है। पर वह कोई गिरी-पड़ी चीज नहीं था कि जो चाहे वही पा ले । और गिरी-पड़ी चीज उठाने के लिए नीतो झुकना पड़ता है। इसलिए उसने तय कर लिया था कि उसे पाने के लिए भी पुप्पलता को झुकना पड़ेगा 'यही हालत कुछ दिनों चलती रही। पुप्पलता नकती रही, उसकी तरफ़ देखकर मुस्कुराती रही । उसके हाथ से पानी का गिलास लेते-लेते उसके हाथ को छूती रही कि एक दिन उसके ब्लाउज के हुक को फंस ही जाना पड़ा और उसने रामनाथ को आवाज दी । राम- नाव आया। "क्या है वीवीजी?" पुप्पलता के दोनों हाथ पीठ पर ब्लाउज के हुक से उलझे हुए थे। "जरा यह हुक फंस गया है।" उसने जी कड़ा करके कह दिया। उसका हलक सूख रहा था। साँस तेज़ चल रही थी और खून के दबाव से कनपटियां फटी जा रही थीं और एक अजीब तरह का मीठा-मीठां-सा डर लग रहा था। उसने रामनाथ की बाहट अपनी तरफ बढ़ती सुनी तो डर की मिठास और बढ़ गयी... "क्या करते हो, कोई देख लेगा !" "वनो मत ।" उसने बड़ी वेदर्दी से कहा, "यहाँ मेरे सिवा है कौन कि देख लेगा!" रामनाय ने उसका अलाउज उतार दिया। उसे इन बातों का कोई अनुभव नहीं था। सब सुनी-सुनायी वातें थी और कुछ गालियां थीं जो उसने कानपुर की सड़कों पर सुनी थीं तो ४६ / सीन : ७५ उसने मोचा कि उन्ही गालियों को आजमाना चाहिए। रामनाथ ने कानपुर की सड़कों पर चलती-फिरती गालियों को बाज- माया और यह पाया कि गालियां सच्ची और मजेदार हैं। और उम अकेली दोपहर रामनाय की आमदनी पचास रपये बढ़ गयो... रामनाय अपनी जिन्दगी से नाखुश नहीं था। वह पुष्पलता को कभी मुमताज मान लेता, कभी गर्मिला टैगोर, कमी वहीदा रहमान एक- आप बार हेलेन, हेमा मालिनी और बिन्दु तक भी बात आ गयो। दूसरी तरफ पुप्पलता भी यही खेल खेल रही थी। वह भी अपनी बाँखें बन्द कर लेती और रामनाथ के हाय कभी धर्मेन्द्र के हाय बन जाते और कभी रामेशयन्ना के... मतलब यह है कि दोनो खुश थे। मायद यह दोनों यूं ही बहुत दिनो चुग रहते, पर एका रान राधिका एक पार्टी से लौटी तो उसके बदन के तार बिचे हुए थे । धर्मेन्द्र ने उनके कन्यो पर हाथ रखकर, उसकी आँखो मे झांकते हुए कहा था, "भावीजी, तुम भी कोई चीज हो..." उसके दिमाग में गस्त-भर यही बात गूंजती रही। उमने हजार बार दिल-ही-दिल में धर्मेन्द्र मे पूछा, "क्या चीज हूँ?" और इस सवाल पर धर्मेन्द्र हमकर इसकी तरफ थोड़ा-सा और मरक आया । यहाँ तक कि विल्कुल उम ऊपर आ गया और उसकी सांस घुटने लगी। उमके पजे कार की सीट की मखमल में गड़ गये "उसे पता भी न चला कि वार कर सकी और वूडे ड्राइवर ने कव कार का दरवाजा खोला।"राधिका को उस वक्त यूटा भली मुहम्मद भी गजव का जवान लगा और वह मुस्कुरा दी। अनी मुहम्मद ने पूछा, "अव गाडी रख दूं वीवीजी?" उसने अपनी आवाज सुनी, 'हो।" लिफ्ट की तनहाई में फिर धर्मेन्द्र ने उसे अपनी बांहो मे दबोच लिया। और लगा कि जैमें वह लिपट में नहीं बादलों के गदेले पर है और वह गदेला घोरे-धीरेधमन्द्रकी मांसो के साथ ऊपर जा रहा है। लिपट रक गयी और वह माम रोके धर्मेन्द्र से कहती रही कि यह क्या करते हो जी.." मोमायटी का चौकीदार लिएट के बाहर खड़ा राधिका के उतरने का इन्तजार कर रहा था। जव राधिका खड़ो मुस्कुराती ही रही तो टमने घबराकर दरवाजा खोला और दरवाजे के खुलने की आवाज पर राधिका पल-भर के लिए जागी और लिफ्ट से उतर गयी। चौकीदार जाती राधिका को हैरानी से देखता रह गया.. राधिका ने घण्टी बजायो । एक बार । पल-भर रुकी। दरवाजा नहीं खुला। उसने जरा लम्बी घण्टी बजायी । रुकी । दरवाजा नहीं खुला। वह झल्लायी और उसने घण्टी पर हाथ रख दिया 'रामनाथ ने दरवाजा खोला। और राधिका ने देखा कि उसकी कमीज़ के वन खुले हुए हैं और छाती के सुनहरे रोयें दिखायी दे रहे हैं। वह अब भी धर्मेन्द्र के नशे में थी। डाँटना भूल गयी। मुस्कुरायी और बोली : "सो गये थे क्या?" रामनाथ ने सर हिला दिया। वह अन्दर आ गयी। "उल्लू कहीं का!" उसने अपना चेहरा उसके चेहरे के पास ले जाकर कहा और रामनाथ के दिमाग में कानपुर की गलियों की गालियां गूंजने लगीं। राधिका ने कहा, "कोई इतनी जल्दी भी सोता है ?” उसने अपने पल्लू को सरक जाने दिया और फिर उसे अपने कन्धे पर यूं फेंका कि रामनाथ उसमें लिपट-सा गया। राधिका हंसने लगी। "मुझे एक गिलास पानी पिलाके सो जाना।" यह कहती हुई वह अपने कमरे में चली गयी। रामनाथ किचन में चला गया। पुष्पलता अपने बिस्तर पर जागती रही और फन्दाजी एक हीरो के घर एक छोटी हीरोइन को वैठे देखते रहे और छोटी हीरोइन बड़े हीरो के जुमलों पर हंसती रही और कुछ उठाने के लिए बार-बार झुकती रही और उसका ब्लाउज भी उसके साथ-साथ झुकता रहा और हीरो ब्लाउज के अन्दर झांकता रहा और फन्दाजी कहानी सुनाते रहे." "आ जाव।"राधिका ने दस्तक की आवाज का जवाब दिया। वह ट्रान्सपेरेंट नाइटी पहने पलंग पर लेटी हुई थी। यह नाइटी दरअसल हेमा- मालिनी की ड्रेसमेकर ने हेमा के लिए बनायी थी। वह उसे एक फिल्म में पहननेवाली थी। पर शुटिंग आगे बढ़ गयी और तीन महीने के बाद जब वह नाइटी पहनने का दिन आया तो पता चला कि अब वह हेमा को ४८/ सीन : ७५ छोटी पड़ रही है। डेम-मेकर मे राधिका की जान-पहचान थी तो यह नाइटी राधिका ने खरीद ली। और एक रात यूं ही वह नाइटो पहनकर लेट गयो फन्दाजी के लिए। पर फन्दाजी ने गौर ही नहीं किया । वह चड्ढी पहले वायरूम मे बाहर माये और राधिका अपने-आपको नंगी दिखायी देने लगी। उसे वह रात माद आया तो उमने होंठ सिकोड़ लिये। मामने राम- नाथ सहा या, ठण्डे पानी का गिलाम लिये। राधिका ने अंगड़ाई ली और नाइटी कुछ ऊपर मरक आयो और उमको पिण्डलियो नंगी हो गयी। गधिका को अपनी पिडलियां बहुत पमन्द थी। उसने देखा कि रामनाथ पिण्डलियो को देख रहा है। "आज पिण्डलियो में वडा दर्द है । जरा दवा दे।" राधिका ने कहा और यह कहते-कहते वह पलंग पर जरा परे सरक गयी और पलंग पर उसके लिए जगह बन गयी और रामनाथ के कान के पास मुंह लाकर कानपुर मालिया बसने लगा... पुष्पलता जागती रही । इन्तजार करती रही। बुढती रही। आखिर जब उससे न रहा गया तो वह अपने कमरे से निकली। उसने किचन में झोका । रामनाथ का बिस्तर खाली था। वाथरूम का दरवाजा खुला था। मिटिंग-रूम में भी रामनाथ का पता नही था। मां का बैडरूम बन्द था। वह दवे पांव मां के वेडरूम की तरफ़ गयी । उसने की होल मे झांका। पलंग दिखायी न दिया, पर मां के हंसने की आवाज आयो । वह यह आवाज पहचान गयो । यह तो में खुद उसकी हंसी का आवाज थी. वह हंसी, जो रामनाथ से प्लाउज का बटन खुलवाने में आती है। वह सन्नाटे में आ गयी क्योंकि भव रामनाथ उसका प्रेमी भी या और उमका सौतेला वाप भी।राधिका उसकी भी थी और उसकी रसीव भी । उमने दरवाजे पर दस्तक दी। हंसी बन्द हो गयी। उसने दरवाशा फिर मटखटाया। "कौन ?" मैं। मैं | में।"पुष्पलता अपने इस 'मैं' से भर गयी और पहली बार उसे ऐना लगा मानो उसका भी कोई वजूद है, राधिका से अलगखुद अपना एक व्यक्तित्व है । और उस एक पल में वह परछाई से औरत बन गयी। और वह मुस्करायी ।" कमरे का दरवाजा खुला। आँखें मलती, जंभाई लेती राधिका ने उसकी तरफ़ देखा और इस वार उसकी निगाहें पुष्पलता के आर-पार भी न देख पायीं। इतनी ही देर में पुप्पलता का व्यक्तित्व जमकर ठोस हो चुका था। "क्या है ?" यह प्रश्न एक औरत ने दूसरी औरत से किया। "रामनाथ कहाँ है ? यह प्रश्न भी एक औरत ने दूसरी औरत से किया। दोनों औरतों ने एक-दूसरे की आँखों में झांका । पल-भर के लिए दोनों ने एक-दूसरे का मुकावला किया, फिर राधिका हार गयी । वह बिगड़ गयी। पर पुष्पलता पर उसके विगड़ने का कोई असर नहीं हुआ । राधिका ने कहा भी कि रामनाथ इतनी रात गये उसके बेड-रूम में क्या कर रहा होगा। यह कहकर उसने दरवाजा वन्द करना चाहा, पर पुप्पलता अन्दर आ गयी और पहली बार राधिका को डर लगा और बाथरूम में छिपा हुआ रामनाथ धर्मेन्द्र से रामनाथ वन गया । और पुष्पलता कह रही थी कि रामनाथ को यूं तो विना कहे घर से बाहर नहीं जाना चाहिए। कोई काम भी निकल सकता है कि फन्दाजी आ गये । वहाँ जव बड़ा हीरो छोटी हीरोइन के साथ वेड-रूम में चला गया तो फन्दाजी क्या दीवारों और सोफों को कहानी सुनाते ! तो उठ, माये। चौकीदार ने बताया कि वीवीजी आ चुकी हैं। उनका खयाल था कि घर में सब सो चुके होंगे। इसीलिए उन्होंने घण्टी नहीं वजायी, चुपके से दरवाजा खोला कि वह जानते थे कि ज़रा-सी भी आहट हो तो राधिका की आँख खुल जाती है। पर अपने वेड- रूम में रोशनी देखकर वह घवरा गये क्योंकि इतनी रात गये तक राधिका का जागना खतरे की निशानी था। मतलब यह है कि वह लेटी-लेटी उसके और हीरोइन के बारे में सोच रही होगी। यानी रात गयी महाभारत में ! अपनी वीवी की इसी आदत से वह घवराये रहते थे, क्योंकि अव वह यह कैसे सावित करते कि जिस लड़की की तरफ देखकर वह मुस्कुराये थे, वह ५०/सीन : ७५ .
। केवल एक सामाजिक मुस्कुराहट थी और उम मुस्कुराहट का कोई मत. लब निकालना ठीक नहीं है । या अगर किमी पार्टी में किमी हीरोइन की बह्न या हीरोइन बनने का अरमान रखनेवाली किमी इण्डस्ट्रियलिस्ट को जवान और खूबसूरत या वदमूरत लडकी देर तक उनसे बात करती रही तो इसमे उनका कोई कुसूर नहीं था। कमरे मे वत्ती तो यही कह रही थी कि अब वरियत नहीं है । पर वह खुद उनका अपना बेडरूम था और वह भागकर कही और जा भी नहीं सकते थे। तो जान पर खेलकर, होठी पर उल्टी-सीधी मुस्कुराहट चिपकाकर वह कमरे मे गये और जाते ही ममझ गये कि बात कुछ और है। "क्या बात है ?" उसने पूछा। फन्दा पटयालवी उन पजावियो मे था जोप्रोड्युसरो से पजावी योलते हैं और घर के अन्दर हिन्दी कि उनके खयाल मे पंजाबी गवारू भाषा है। वह बहुत अकड़कर अपने को उई-वाला कहते हैं। इकवाल और गालिव की बात करते है । अम्रता पीतम से नहीं मिलते। जगन्नाय 'आजाद' को डिनर पर बुलाते हैं । ... "अरे, तुम इतनी जल्दी कैसे आ गये ?" राधिका मुस्कुरा रही थी। फन्दा पटयावली को अपनी आंखो पर यकीन नही आया। "जल्दी ? तीन बज रहे है।" फन्दाजी ने अपनी घडी देखी, "बल्कि तीन बजकर वारह मिनट।" उन्होने विल्कुल ठीक वक्त बता दिया और मसानों के दवाव को फिर महसूस करने लगे। हीरो के यहाँ से उठते उटते उन्होंने सोचा था कि घर पहुंचते ही वह सीधा पेशाव करेंगे। अव जो पेशाब फिर याद आया तो वह बाथरूम की तरफ लपके । वायरूम का दरवाजा अन्दर से बन्द था । उन्होंने मुड़कर देखा। राधिका और पुष्पलता दोनों ही उनकी तरफ देख रही थी। उनका हाथ दरवाजे के हैंडिल पर था और वह तेजी से यह तय करने की कोशिश कर रहे पे कि यदि वापरूम का दरवाजा अन्दर से बन्द हो और वेडरूम में वीवी के माय जवान बेटी भी खडी हो और दोनों दरवाजे ही की तरफ देख रही हों तो उन्हें क्या करना चाहिए। "अरे हो-" उन्हें जैसे एकदम से कोई बात याद आ गयी और वह । लौट आये। पर उनके लौट आने से किसी ने धोखा नहीं खाया। मगर उन्होंने इस बात की तरफ़ ध्यान ही नहीं दिया, "पुष्पी, वहां पार्टी में तुम्हारी वह सहेली मिली थी, क्या नाम है उसका ..." उन्होंने मदद के लिए राधिका की तरफ़ देखा। पर राधिका ने कोई मदद नहीं की। वह चुप खड़ी दाँतों से नाखून कुतरती रही। तो उन्होंने पुप्पलता की तरफ़ देखा। और फिर पूछा, "क्या नाम है उसका ?" "पहले आप वाथरूम से हो आइए ," पुष्पलता ने बड़ी वेदर्दी से कहा, "मुझं आपसे कुछ बातें करनी हैं।' "क्या बात है ? वाथरूम जाने की क्या जल्दी है ?" उन्होंने रास्ता निकालना चाहा। पर पुष्पलता रास्तों की फ़िक्र में नहीं थी। इसलिए वह कुछ नहीं बोली। बस, फन्दा पटयावली की तरफ़ देखती रही। फन्दा विचारे के पास पुष्पलता की आँखों का कोई जवाब नहीं था। उन्होंने अपनी किसी फिल्मी कहानी में ऐसी कोई सिचुयेशन ही नहीं बनायी थी आज तक। सच्ची बात तो यह कि उनकी कहानियों में बाथरूम ही नहीं आता था। उनका कहना यह था कि यथार्थ के नाम पर कामोड में झांकना गन्दी बात है। समाज की माओं-बहनों के डर से वह तो अपनी फिल्मी कहानियों में हीरो को हीरोइन के करीब तक नहीं आने देते थे। प्रोड्युसर बहुत ज़ोर डालते तो यह कोई ड्रीम-सीकुयेंस डाल देते । क्योंकि खयाल पर तो किसी का वस होता नहीं। बकिंघम पैलेस का साईस भी मलिका एलिजावेथ का सपना देख सकता था। इसलिए जव जीवन के यथार्थ में फन्दा पटयावली को वाथरूम का सामना करना पड़ा तो वह चकरा गया। "ठीक है।" उन्होंने कहा, "हो ही आता हूँ ! वाथरूम से । जव तक तुम एक गिलास पानी ला दो। बड़ी प्यास लग रही है।" पुष्पलता ने सुनी अनसुनी कर दी। कमरे में सन्नाटा हो गया। फन्दा पटयावली को वाथरूम के दरवाजे तक जाना पड़ा। इस बार दरवाजा खुल गया । वह अन्दर चला गया। उसने दाहिने-वायें नहीं देखा, सीधा वाश-वेसिन पर जाकर कुल्ली करने लगा। पर सामनेवाले आईने ५२ / सीन : ७५ में गमनाथ माफ नजर आ रहा था तौलिये से मुंह पोंछकर फन्दा पटयावली याहर आ गये। "हो पुप्पी, अब बताओ, क्या कहना है ?" "कुछ नहीं । पुष्पलता ने कहा। कोई फिर कुछ नहीं बोला। पुष्पलता चली गयी। फन्दाजी राधिका के माय अकेले रह गये। "यहुत नीद मा रही है।" फन्दाजी यह कहकर पलंग पर जा लेटे उन्होंने दीवार की तरफ मुंह कर लिया। गमनाथ चुपके से निकला । उमने मुंह फेरकर लेटे हुए फन्दा पटयालवी यी तरफ देखा । राधिका की तरफ दवा जिमने उमकी तरफ एक खामांग-मा योमा उछाल दिया। वह बाहर चला गया। वाहर जाकर उमने बेडरूम का दरवाजा धीरे मे बन्द कर पिया । पर जब अपने बिस्तर पर पहुंचा तो यह देखकर चौंक पड़ा कि उस पर पुष्पलता लेटी हुई है । वह घबरा गया। "और जो माहव या वाई आ गये ?" उसने पीछे देखते हुए कहा। "तो क्या हो गया ?" पुष्पलता ने सवाल किया । "देय लेंगे तो क्या कहो?" "वायरूम में देखकर क्या कहा था उन्होंने !" पुप्पलता ने पूछा। रामनाथ के पाम इस सवाल का जवाब नहीं था। और चूंकि उसके पाम पुष्पलता के मवाल का जवाब नहीं था, इसलिए वह पुष्पलता के साथ लेट गया और कानपुर की गालियां याद करने लगा। उस रात के बाद से रामनाथ का होमला बढ़ गया। वह फन्दाजी का नौकर था, पर एक हद तक उन पर हुक्म चलाने लगा। फन्दाजी की समस्या यह थी कि अभी तक उन्होंने रामनाय की तमाम 'ओरिजिनल' कहानियों पर कब्जा नहीं किया था और उसकी कहानी पर बननेवाली फिल्म अगले हफ्ते रिलीज़ होनेवाली थी और वह यह नहीं चाहते थे कि फिल्म की रिलीज के वक्त रामनाय किसी और घर मे हो। और वह यह भी जानते थे कि यहां से निकलते ही कोई-न-कोई फिल्मी लेखक या हीरो. लपक उमे हथिया लेगा। सोन:७५/५३ . रामनाथ को वड़ा आराम हो गया परन्तु कभी-कभार तो राधिका और कानपुरी गालियों का सम्बन्ध जोड़ना और वात है और दिन-रात यही करना असम्भव । अपर से पुष्पलता की मांगें भी बढ़ती जा रही थीं.... मां के सामने तो उसने झिझकना ही छोड़ दिया था। राधिका के सामने ही वह रामनाथ को छेड़ती और अपने कमरे में चलने के इशारे करती। जाहिर है कि राधिका जलने और चुप रहने के सिवा कुछ नहीं कर सकती थी. जिन दिनों यह किस्सा चल रहा था, लिज़ा से रामनाथ की मुलाकात हो चुकी थी। उसे लिज़ा अच्छी भी लगने लगी थी। और वह अपने- आपको कुछ-न-कुछ लिखा के लिए वचाना चाहता था। उसने लिजा को अपने चक्कर नहीं बताये थे। पर लिजा कब से कह रही थी कि वह फन्दाजी की नौकरी छोड़कर उसकी बाई के यहाँ नौकरी कर ले। उन्हें ऊपर का काम करनेवाले की जरूरत है। रामनाथ जानता था कि ऊपर का काम करने में तो उसका जवाब नहीं है। वह पुप्पलता और राधिका से थक भी गया था। फिर ऐसा हुआ कि उन्हीं दिनों कानपुर से उसका एक दोस्त भागकर वम्बई आ गया। वह उसे फन्दाजी के पास ले गया और बोला, "सेठजी, यह गफ्फार कानपुरी हमसे भी अच्छा इस्टोरी राइटर है..." चुनांचे ग़फ्फ़ार कानपुरी फन्दाजी के यहाँ लग गया और रामनाथ मिढा साहव के यहाँ चला गया। लिजा को तो रामनाथ अच्छा लगता था, पर उसकी मां मिसेज़ डिसूजा बड़ी सख्त कैथोलिक थीं और वह इसे गवारा नहीं कर सकती थीं कि लिजा कानपुर के किसी हिन्दू को डेट करे। इसलिए रामनाथ पीटर सिंघ हो गया। लिजा ने उसे सामने क्रास बनाना और 'एमेन' कहना सिखा दिया। वह इतवार को सूट पहनकर लिज़ा के साथ चर्च जाता। शुरू में तो चर्च से निकलता तो देर तक अपने घुटने सहलाता रहता। पर लिज़ा के लिए वह इतनी कुर्वानी करने को तैयार था। वाज़ार में ग़फ़्फ़ार कानपुरी से उसकी मुलाकात अक्सर होती रहती। फन्दाजी ने उसका नाम राममनोहर कर दिया था कि सुसायटी के लोगों को इस बात पर एतराज न हो कि उनके घर में एक मुसलमान नौकर कैसे ५४ / सीन : ७५ काम कर रहा है। तो वह गफ्फ़ार कानपुरी मे राममनोहर वानपुरी हो गया था। उसने फन्दाजी में साफ कह दिया कि नाम चाहे जो रख लो, पर वह वानपुरी जरूर रहेगा और फन्दात्री ने इस पर कोई सास एतराज न किया। । गएकार कानपुरी उर्फ राममनोहर कानपुरी ने पूरी तरह रामनाय की जगह ले ली। परन्तु गरफार रामनाथ मे सदा तेज था। उसे कानपुरी गालियां भी ज्यादा याद थी। इसलिए उनकी आमदनी भी रामनाथ में ज्यादा हो गयी । रामनाय ने गधिका से तनम्वाह नही ली थी, पर गफ्फार ने मोचा कि वह मुफ्त में क्यो काम करे। रामनाथ को वह मजे ले-लेकर किस्मे मुनाता । पुष्पलता उमे मचमुच अच्छी लग गयी थी। कहता, "करा लौण्डिया है यार | किरमिच के गेंद की तरह उछलती है।" और यह कि वह पुष्पलता के साथ भागने का प्रोग्राम बना रहा है। रामनाथ ने समझाया कि यह बेवकूफी न करना नहीं तो आज जो पुष्पलता उसका सचं उठा रही है, उसी पुष्पलता का खर्च उसे उठाना पड़ेगा। साले, चतिया हो गये हो ? पर गफ्फार वाकई चूतिया हो गया था। "फिर उन्ही दिनों एक अजीब घटना घटी जिसकी वजह में गफ्फार वो अपना प्रोग्राम आगे बढ़ाना पड़ा। हुमा यह कि कांच भवन कोआपरेटिव हाउमिंग मोमापटी में फन्दा जी के मामनेवाले फ्लैट में एक मदहोरा साहब रहते थे। फिल्मी कहानियाँ लिखते थे और उससे जो समय बचता था उसे रोजे नमाज मे गुजारते थे। उनके घर में एक नौकर, तीन बेटियां और एक वीवी के सिवा फिल्म-फेयर को दो ट्राफ़ियां रहती थीं। नौकर का नाम अब्दुल हसन था। अन्दुल पुकारा जाता था। मदहोश साहब मस्त मुसलमान थे। हिन्दु के हाथ का छुआ नहीं खाते थे। कहते थे कि मुगरिक नापाक होता है। होटल मे खाना नहीं खाते थे कि या पता गोश्त हलाल वा है या भटके का । इमलिए अब्दुल की बड़ी मान- जान थी। एक दिन पता चला कि उमका असली नाम तो मुरारीलान है। वाप का नाम घनश्याम प्रमाद। मां का नाम रुखमनी। पानी मान्दानी हिन्दू है। उसके हिन्दू होने का सबसे ज्यादा दुख मदहोश साव की बड़ी 10/y.in - बेटी आलिया को हुआ क्योंकि वह बड़ी मजहवी वच्ची थी। हिन्दुओं से जरा नहीं डरती थी। चुनाव में मुसलिम लीग का काम करती थी। पर उसे यह पता ऐसे वक्त पर चला जब वह कुछ कर ही नहीं सकती थी। उस वक्त वह एक मुसलमान लड़की नहीं थी, केवल एक जवान लड़की थी और उसी से पैसे लेकर अब्दुल ने सीज़र्स पैलेस में कमरा बुक किया था और वह कालेज से सीधी वहीं आ गयी थी और कमरे का दरवाजा अन्दर से बन्द था और वह अब्दुल के साथ अकेली थी।... उसने जब देखा कि अब्दुल मुसलमान नहीं है तो उसके पांव तले की जमीन निकल गयी और वह चकराकर अब्दुल की बांहों में आ गयी... अब्दुल जो मुरारीलाल था। अब यह मुरारीलाल यदि रामनाथ या ग़फ़्फ़ार कानपुरी की तरह समझदार रहा होता तो कुछ हुआ ही न होता। पर उसने तो ग़ज़ब यह किया कि सोसायटी के तमाम नौकरों में यह बात मशहूर कर दी कि मुसल- मान लड़कियों का मज़ा ही और होता है। कई नौकरों ने उसके जरिये आलिया को चखा भी और सव उससे सहमत भी हुए कि मुसलमान लड़- कियों का मजा ही कुछ और होता है। अव राममनोहर उर्फ गफ़्फ़ार कान- पुरी के लिए मुश्किल पड़ी। इस्लाम खतरे में था। तो जब मुरारीलाल उर्फ अब्दुल के ज़रिये उमे आलिया को चखने का अवसर मिला तो वह आलिया पर वरसा नहीं । उसने आलिया का गला घोंट दिया खलबली पड़ गयी। राममनोहर कानपुरी गिरफ्तार कर लिया गया। दूसरे दिन के अख- वारों में उसकी तस्वीरें छपी। पत्रकारों का खयाल था कि यह इश्क़ और रिकवात का मुआमला है । अलग-अलग पत्रकारों ने अलग-अलग कहानियाँ लिखीं। आलिया की तस्वीरें भी छपी और उसकी छोटी बहनों की भी। नतीजे में उसकी दोनों छोटी बहनों को कई प्रोड्युसरों ने अपनी फिल्मों की हीरोइनों के रोल में साइन कर लिया। खुद मदहोश साहव को कई फिल्में मिल गयीं.. जिस दिन केस शुरू हुआ, उस दिन सोसायटी के तमाम लोगों के अलावा सरला और रमा भी कचहरी पहुँची, क्योंकि राममनोहर पीटर का ५६/ सीन : ७५ दोस्त था ओर पोदर मरला का बावरची। तो जाहिर है कि इन दोनो को हमददियाँ राममनोहर कानपुरी के साथ थी। "तुम्हारा नाम ?" वकील सरकार ने सवाल किया। "अब्दुल गफ्फार वल्द अब्दुल जब्बार कानपुरी..." फन्दाजी सन्नाटे में आ गये। राधिका सन्नाटे में आ गयो। पुप्पलता खिलखिलाकर हंस पड़ी और अदालत से निकाल दी गयी। "क्या तुमने आलिया बाई का खून किया?" "किया साह्न ।" "क्यो?" "का करते साहव ? हम पूछ रहे कि का मुसलमान मरद सब मर- विला गये रहे कि ऊ बुरचुदौनी हिन्दुवन से..." --मैं, राही मासूम रजा, यहां कहानी में दाखिल होने की इजाजत चाहता हूँ। इस कहानी के तमाम पात्र काल्पनिक हैं और आधुनिक भार- तीय समाज में उनका कोई तअल्लुक नही है। यदि किसी को अपनी या अपने किसी दोस्त की अनुक मिल जाये तो उसके लिए क्षमा चाहता हूं। पर मैं कोई अल्लाह मियां तो हूँ नही कि मनगढन्त मूरत बनाता रहूँ। मैं सो देखी-भाली सूरतो ही को काट-छांटके अपनी कहानी के काबिल बना लेता हूँ। सन पूछिए तो मैं गफकार कानपुरी या मुरारीलाल की बातें करता ही नहीं चाहता था। पर यह लोग दरवाजा तोड़के कहानी में घुस आये तो मैं क्या करूं ! पात्र कथाकार से कहीं ज्यादा शक्तिशाली होते हैं। इसलिए माइए, मिडा साहब के किचन में लौट चलें। "रामनाय उर्फ पीटर ने लिजा के नाउज में हाथ डाला और लिजा ने हंसते हुए उसका हाय झटक दिया। लिजा ने कहा, "इ क्या करता है मैन !" रामनाथ ने कहा,"देखता है कि सव सैरियत है कि नहीं। अरे उसाला लोग का कोई ठीक है। तुम साफ-साफ वोल द्यो कि अपन से कव सादी बनायेगा। हम साला तुम्हारा ब्लाउज का वास्ते इहां नहीं आया है । फन्दा जो का पलंद मे दू-दूबनाउन था, और तुम्हारी मम्मी मरने का पिरोगेराम ।
चूम ही नहीं बनाती लिजा ने उसके होठों पर हाथ रख दिया और रामनाथ ने उसका हाथ लिया। यह बातें वह हिन्दी फिल्मों से सीख चुका था। लिज़ा बोली, "सादी बनायेगा तो रक्खेगा कहाँ ?" "दिल में।" रामनाथ ने छाती ठोंककर कहा। "वाथरूम करने कहाँ जायेगा?" रामनाथ के पास इस सवाल का जवाब नहीं था। सट-पटाकर चुप हो गया और भैप मिटाने के लिए उसने किचकिचाके लिजा का चुम्मा ले लिया । लिजा ने प्यार दे तो दिया, पर प्यार की गर्मी में वह काम की बात नहीं भूली । उसने फिर पूछा, "मैरेज बनाके कहाँ रक्खोगे ..?" सच्ची बात यह है कि रामनाथ शादी के मूड ही में नहीं था। वह लिजा से शादी करने के लिए बम्बई नहीं आया था। वह आया था फिल्म- स्टार बनने 'फिल्मस्टार न बन सके तो लेखक बनने। लिज़ा तो चाय की एक प्याली थी। थकन मिटाने के लिए वह एक-आध चुस्की ले लिया करता था । पर वह लिजा से यह बात कह नहीं सकता था। इसलिए उसने लिजा की गरदन में बांहें डालकर कहा, "डारलिंग, हुकुम द्यो । फ्लाट बुक करा लेते हैं दू बेडरूम का..." इसीलिए जब एक दिन रमा ने मनचन्दानी के लिए थरमस से चाय उड़ेलते-उड़ेलते 'सुरसिंगार' में रामनाथ को देखा तो चौंक पड़ी। "इत्थे की कर रहा तू रमा ने उसे ललकार लिया कि सरला राह देख रही होगी और वह मटरगश्ती कर रहा है। थोड़ी देर तक तो रामनाथ चुपचाप सुनता रहा। फिर उसने गरदन टेढ़ी करके कहा, "पलट बुक किया है वाई !" रमा पर जैसे बिजली गिर पड़ी। यह कैसे हो सकता है कि जिस विल्डिंग में उन्होंने फ्लैट बुक करवा रक्खा है उसी में सरला के नौकर का भी फ्लैट बुक है। मनचन्दानी ने रामनाथ की तरफ़ देखकर बुरा-सा मुंह बनाया। रामनाथ ने यह बातें नहीं देखीं। वह तो इस खयाल के नशे में था कि वह फ्लैट खरीदनेवाला है। इसलिए सीसें निकालकर उसने कहा, "वहन ?" ५८ / सीन :७५ 1 . वहेनजी। रमा सन्नाट में आ गयी। "मरे तू !" रमा ने भल्लाकर कहा, मैं तेरी बहेनजी कब हो गयी?" मनचन्दानी की तरफ मुडी। "को रव दी गान..." रमा ने जमाने की खराबी पर एक पूरा लेक्चर झाड दिया। यह जमाना तो केगव के युग से भी कही ज्यादा बुरा निकला। उन्हें तो जवान औरतो ने बारा ही कहा था। यहां तो सखी का नौकर बहेनजी कह रहा है और इमी पर वम नहीं। बहेनजी कहके सामने खडा मुस्कुरा भी रहा है । इमलिए रमा ने भाषण को तलवार भांजके, अपनी तरफ़ से, रामनाथ के टुकड़े उड़ा दिये। पर रामनाथ तो अब भी सामने बडा मुस्कुरा रहा था। बोला, "बहेनजी, मैं फिल्म रायटरी करता हूं." रमा को आंखें फटी-की-फटी रह गयो। रामनाथ समझ गया कि रमा को यकीन नहीं आया तो उसने जेब से फिल्म राइटर्ज अमोमियान का कार्ड निकालकर सामने कर दिया और तव रमा चोपड़ा को पता चला कि उसने अब तक तीन कहानियाँ वेच भी ली हैं। हुआ यह कि फन्दा पटयालवी तो रामनाथ के चले जाने के बाद मुमी- बत मे पड गये। रामनाथ के आने मे पहले वह दूसरे किस्म की कहानियाँ लिसा करते थे। और उनके बाजार में वह पहली जमी बात नहीं रह गयी थी। वह परेशान रहने लगे थे कि दो-एक बरस के बाद क्या होगा। और उन्हें इस चक्कर से निकलने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था कि भगवान ने रामनाय को भेज दिया और एकाएक श्री फन्दा पटयालवी की कहानियों का स्टाइल बदल गया । वडे-बड़े डाइरेक्टर, प्रोड्युसर, प्रोड्युसर-डाइरेक्टर और स्टार उनके आगे-पीछे घूमने लगे। जिसे देखिए, अपनी इम्पोर्टेड कार लिये फन्दा पटयालवी के दरवाजे पर खड़ा है । और फन्दाजी पहले की तरह फिर लोगों पर फिल्मी दुनिया के बड़े-बड़े नाम लुढकाने सगे। "क्या बताऊँ साहब, बी. आर. किमी तरह जान ही नहीं छोड़ते।" दिलीपकुमार से तो कल मैंने कह दिया कि आप अब रिटायर हो जाइए.'' राजजी, मतलव राजकपूर सर हैं कि स्वाजा साह्न से अब काम नहीं चन रहा है। पर साहब, मैं आदमी हूँ, मगीन तो नहीं है कि कहानियां ढालता जाऊं...॥ . फन्दा पटयालवी इसीलिए सबकुछ झेल रहे थे। घर के अन्दर क्या होता है वह किसे मालूम ! वह अपनी बीवी से बोर भी हो चुके थे। राम- नाथ की वजह से वह उस मेहनत से भी बचे हुए थे। और सच्ची बात तो यह है कि रामनाय ही के दौर में उन्होंने अपना सबसे ज्यादा लोकप्रिय उपन्यास, 'सांच की आंच', लिखा। और इस उपन्यास के बारे में कई आलोचकों ने यह लिखा कि इन दिनों जब कि जीवन के मूल्यों की टूटन को आवाज हर तरफ़ से आ रही है, 'सांच की आँच' लिखकर फन्दाजी ने अपने सामाजिक कर्तव्य का पालन किया है। मनुष्य केवल रोटी के सहारे नहीं जी सकता। उसे जीवन को जीने योग्य बनाने के लिए मूल्यों की जरू- रत हमेशा रहेगी और फन्दाजी ने पात्रों को पीछे हटाकर मूल्यों को पात्र बनाने की जो हिम्मत की है उसे आधुनिक आलोचना नजर-अन्दाज़ नहीं कर सकती... 'सांच की आंच' पर पुष्पलता और राधिका दोनों ही जी सोलके हंसी। पर उनकी हँसी फ्लैट के अन्दर थी। कहने का मतलब यह कि फन्दाजी रामनाथ के बिना जी ही नहीं सकते थे। और रामनाथ को लिजा उड़ा ले गयी। पहले तो वह जी-ही-जी में खुश हुए क्योंकि उनको पुष्पलता की तरफ़ देखकर मुस्कुराता हुआ राम- नाथ एक आंख नहीं भाता था। दूसरी तरफ़ पुष्पलता-राधिका-रामनाय त्रिकोण से घर में एक तनाव भी था । पुष्पलता और राधिका में खेचा-तानी मची हुई थी और दोनों ही रामनाथ को ज्यादा मेहरवानियों से अपने बस में रखने की कोशिश में लगी हुई थीं। जाहिर है कि उनकी मेहरबानियों का वोझ फन्दाजी की आमदनी पर पड़ता था। इसलिए पहले तो उन्होंने रामनाथ के जाने पर शुक्र किया। परन्तु एक प्रोड्युसर को कहानी सुनाते. सुनाते उन्हें एकदम से यह एहसास हुआ कि वह अपने पुराने स्टाइल की तरफ़ लौट रहे हैं। "एक वात दसू", प्रोड्यूसर ने कहा, "ए इस्टोरी में ओ वात नहीं, रस दी कमी ए.." ६०/ सीन : ७५ फन्दाजी का माथा ठनक गया। और वह इस नतीजे पर पहुँचे कि रखीव के विना अब उनका काम नहीं चल सकता। सांच को आंच लिसने की बात ठीक । पर यह भी उतना ही ठीक है कि प्रोड्युमरों को रामनाथ, मिडिल पास (या फेल), की कहानियो को जरूरत है। और यह भी ठीक था कि उन्होंने इस वादे पर एक उभरते हुए सितारे से पुष्पलता की शादी ठहरायी थी कि वह उसे हीरो लेकर एक फिल्म सुद प्रोड्यूस करेंगे। उन फिल्म और शादी के खर्च के लिए उन्हें लगभग सात-साडे सात लास रुपयो की जरूरत थी और यह रकम वह रामनाय की मदद के बिना नहीं जमा कर मकते थे। चुनांचे फन्दा-नायन टीम बन गयी। हिन्दी फिल्मो की दुनिया आधे-अधूरे लोगों की दुनिया है । यहाँ दो मिलकर तीन नही बनते। यहां दो के मिलने से एक बनता है । शकर- जयकिदान, लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल, कल्याणजी-आनन्दजी, सलीम-जावेद, सपन-जगमोहन, फैज़-सलीम, मजीद-नारवी-पीस,"दो से एक बनने का एक पूरा मिलसिला है । हद तो यह है कि यदि एक को अपने में मिलाने के लिए दूसरा नहीं मिलता तो वह अपने एकहरेपन को मिटाने के लिए अपने नाम को दुहरा कर लेता है। श्यामजी-धनश्यामजी। पर जिन दिनों की बात चल रही है, उन दिनों नामो की जीडी केवल फिल्मी संगीत की दुनिया में चालू हुई थी। फन्दाजी ने पहली लेखक-जोडी बनायी और अंग्रेजी साप्ताहिक स्क्रीन के पूरे पन्ने पर फन्दा-रामनाय फोटोग्राफ के साथ इस खबर का एलान किया गया और फिल्मी दुनिया में भूचाल आ गया जाहिर है कि फन्दा का पार्टनर मिढा साहब के यहां साना पकाने की नौकरी नहीं कर मरता था। इसलिए फन्दाजी ने उमे वहाँ मे अलग होने की राय दी। उसे खार में एक वेडरूम का पलट रहने को दिया। यह पलट बाद में वह अपने दामाद को देने का फैसला कर चुके थे और होने- वाले दामाद को यह बात बता भी चुके थे। इसलिए उन्होने 'देवनिवास' में अपने लिए जो पलट बुक करवाया था वह रामनाथ के नाम ट्रान्सफर कर दिया गया और यूं रामनाथ और रमा की मुलाकात 'देवनियाम' में - - "'"तू क्या करता है ?" रमा ने अचम्म से पूछा। "फिल्म रायटर।" रामनाथ ने कहा । उसे मालूम था कि रमायह बात नहीं मानेगी। और रमा ही क्यों, कोई यह बात नहीं मानेगा कि एक वाव- रची लेखक हो गया है, इसीलिए तो उसने ज़िद की कि स्त्रीन में उसका फोटो छपे और स्कीन की वह कापी उसकी जेब में धी। उसने वह कापी निकालके रमा के सामने कर दी। रामनाथ ने यह भी सोच लिया था कि आगे चलकर यह अच्छा नहीं लगेगा यदि किसी पार्टी-वार्टी में सरला या उसको किसी सहेली या मिटा या उनके किसी दोस्त ने यह कह दिया कि वह तो खाना पकाने की नौकरी किया करता था। इसलिए उसने राम और श्याम के जोड़ पर अपनी भी एक कहानी सोच ली थी। और वह कहानी भी जुड़वां भाइयों की थी। जो पीटर सरला के घर खाना पकाया करता था, वह रामनाथ का भाई था। उसने जब यह आइडिया फन्दाजी को दिया तो वह उछल पड़े कि यह तो गोल्डन-जुबिली-आइडिया है । तो रामनाथ ने इस गोल्डन-जुविली-आइडिया को रमा पर आज़माने का फैसला किया। वोला, "वहेनजी, आप शायद मुझे श्यामनाथ समझ रही हैं जो पीटर के नाम से कहीं खाना पकाया करता था..." रमा तो अपनी इज्जत बचाने के लिए कुछ भी मानने पर तैयार थी। यदि यह वह पीटर नहीं जो सरला के घर खाना पकाता है तो इसके पड़ोसी होने में क्या नुकसान है ! वात यह है कि सरला के मायके जाने के कारण चूंकि इधर कोई दो महीने से रमा का उधर आना-जाना नहीं हो रहा था, इसलिए उसे यह खबर ही नहीं थी कि पीटर अब वहाँ काम नहीं करता। सरला आज ही लौटी है और रमा मनचन्दानी को, रामनाथ के आने से पहले, यही बता रही थी कि आज सरला आयी है और वह उसे लेने स्टेशन भी नहीं जा सकी और इस पर सरला वहुत लड़ेगी" वह हँसी, "तुम दोनों की सूरत तो विल्कुल एक-जैसी है।" उसने थरमोस के ढकने में रामनाथ के लिए चाय उड़ेलते हुए कहा। उसने सोचा, अभी दोस्ती कर लो कि बाद में महूरत और प्रीमियर के इनविटेशन मांगने में परेशानी न हो। . ६२/ सीन : ७५ रमा रामनाय से दोस्ती करने पर जुट गये। मनचन्दानी वोर होकर स्क्रीन पड़ने लगा और उसे फन्दा-नायन जोड़ी के बारे में कई बातें मालूम हुई। पंचारण मिश्र, गुजराती-मराठी-हिन्दी-अंग्रेजी पत्रकार ने रामनाप को रामनाथन बनाकर उसकी पूरी जीवन-कथा लिख दी थी जिसमे मन- चन्दानी को पता चला कि रामनाथन अपने पिता के अचानक मर जाने के कारण एम. ए. का इमतिहान नहीं दे पाया। युनिवर्मटी के दिनों को रामनाथन अब भी याद करता है तो उदास हो जाता है। वह टेनिम लाय की बहार, वह ड्रामा क्लब के हंगामे । रामनाथन को ऐक्टिग का शौक तो बचपन में है। ऐक्टिग का गौक उसके स्वर्गवासी पिता को भी था और यह उत्तरप्रदेश की एक मशहूर नाटक-मण्डली का हीरो था. "रामनाथ जानता था कि यह तमाम बातें गलत हैं, पर पंचारण मिथ ने उसे यकीन दिला दिया था कि फिल्मी दुनिया में सबकुछ चलता है। मव जानते हैं कि यह बातें गलत हैं। पर सभी के बारे में यह बातें लिखी जाती हैं और इमीलिए कोई छान-बोन नही करता। पचारण मिथ ने तो अपनी तरफ मे रामनाथ के पसन्दीदा लेखकों के नाम भी लिख दिये थे। फन्दाजी ने स्क्रीन का लेख पढ़ने के बाद उमे बताया कि ड्रामा-लेखको में वह गेम- पियर और इमन का कायल है। उपन्यास लेखको मे बाल्जक और टॉल्मतॉय का आशिक है। कवियो में उमे कीट्स को उदामी और गेटे की नजर की गम्भीरता अच्छी लगती है. पवारण मिश्र ने इसका खयाल रक्सा था कि ऐसे ही लेखकों और कवियों का नाम लिया जाये जिन्हें फिल्मवाले नहीं पढ़ने पर कमी-कभार जिनकी यातें जरूर करते हैं । हिन्दुस्तानी थियेटर ने जब इन्सन के ड्रामे 'चार्लीज-ऑण्ट' का हिन्दी अनु- वाद खालिद की खाला' को स्टेज किया तो फिल्मवालों को पता चला कि मेयमपियर के सिवा भी कोई ड्रामे लिखा करता था । 'माहे फेयर लेष्टी' को रिलीज के बाद उन्हें वनड शों का नाम भी मालूम हो चुका था, पर इन्सन का नाम लोग बचाये रखते थे। उमके ड्रामो के नाम भी यार कर लिये गये थे और कई स्टार तो इसन की बात यू करने लगे थे जैसे इसन के नाम से मारे ड्रामे उन्होंने लिखे हैं । इमी वात को ध्यान में रखते हुए पंधारण मिश्र ने उसके इटरव्यू मे इन्मन का नाम टॉक दिया था।
पंचारण मिश्र का कहना था कि यदि कोई लेखक यह कहके सुदीपकुमार, बलराज कपूर, वृजेन्द्र या रमेश खन्ना को अपनी कोई सड़ी हुई कहानी भी सुना दे कि इस कहानी का आधार इन्सन का कोई ड्रामा है तो यह लोग तुरन्त तैयार हो जायेंगे और फिर लेखक प्रोड्युसर से मनचाहा दाम ले सकता है । वम्बई में कहानी नहीं, हीरो की 'हो' विकती है। और इसी- लिए पंचारण मिश्र ने इंटरव्यू में उसके चहीतों में किसी भारतीय लेखक का नाम तो इसलिए नहीं लिखा कि प्रोड्युसरों को लेखकों के नाम बताना अपने पांव में कुल्हाड़ी मारने के बराबर है। पर जब रामनाथन के चहीते ऐक्टरों की बात निकली तो पंचारण मिथ ने केवल भारतीय नामों से काम लिया। दो-एक बुझते हुए सितारों के खिलाफ़ भी रामनाथ ने अपने खयालों का इजहार किया ताकि उसकी इमेज यह बने कि वह बहुत साफ़-गो और मुंह-फ़ट आदमी है और मसकेबाजी के खिलाफ़ है।... मनचन्दानी पर रामनाथ की काबिलीयत का बड़ा रोव पड़ा। "आप लोग कहानी सोच कैसे लेते हैं ?" मनचन्दानी ने सवाल किया। रामनाथ हंस पड़ा। बोला, "कहानी लिखना कौन-सा मुश्किल काम है ? पेन लिया और लिखना शुरू कर दिया।" यह बात मनचन्दानी की समझ में नहीं आयी। वह सवाल करने ही वाला था कि रामनाथ ने जेब से ५५५ की डिविया निकाली और मन- चन्दानी की तरफ़ बढ़ायी। मनचन्दानी वीड़ी से तरक्की करके नये-नये चार- मीनार तक पहुंचा था। उसकी ज़िन्दगी में पहली बार ५५५ सिगरेट की डिविया पहली बार इस सादर पास आयी थी। तो उसने एक सिगरेट निकाल ली। रामनाथ ने सुनहरे लाइटर से पहले मनचन्दानी की सिगरेट सुलगवायी और फिर अपनी सिगरेट सुलगायी। "मगर आप लोगों को यह कैसे पता चल जाता है कि कहानी में किस बात के बाद कौन-सी बात होगी?" मनचन्दानी ने ५५५ का एक लम्बा कश लेने के बाद पूछा। रामनाथ फिर हँसा। वात यह है कि पंचारण मिश्र ने उसे यह बात अच्छी तरह समझा दी थी ६४ / सीन : ७५ । कि यदि कोई मवाल ममझ में न आये या जवाब न मालूम हो तो हम पड़ना चाहिए कि पूछनेवाले को यूं लगे जैसे उसने कोई वैवकूफी की वात पूछी थी और सवाल को हंसी ही में उडा देना चाहिए। वैसे पंचारण मिथ ने उमे तमाम जरूरी मवालो के जवाब पाद करवा दिये थे। जाहिर है कि पमे फन्दाजी के खर्च हो रहे थे । और ठहरी यह थी कि कुल कमाई का दम प्रतिशत पंचारण मिथ लेंगे। साठ प्रतिगत फन्दाजी और तीम प्रतिगत रामनाथ को मिलेंगे। पंचारण मिश्र ने अपने-आपको रामनाथ का सेवेट्री भी बना लिया था। इस काम के लिए वह कोई तनख्वाह नहीं बल्कि केवल तीन सौ रुपये महीना कार का खर्च लेनेवाला था! जो वात रामनाथ को मालूम नहीं थी वह यह है कि पंचारण मिथ फन्दा पटयालवी का पना कारगर खुद रामनाय के साथ पार्टनरशिप करने की मोच रहा था। और इमीलिए वह रामनाथ का इमेज वूस्ट-अप करने में जी-जान मे लगा हुआ था। । सच्ची बात यह कि पंचारण मिश्र अहमादाद से फिल्म-लेखक बनने आया था। दाल नही गली । क्योकि उन दिनो लेखक मुंगी कहा जाता था। 'उमके पास, उसके ख्याल में, बेशुमार फंटास्टिक कहानियां थी। पर पण्डित मुदर्शन, भरत व्याम, गम्म लखनवी वगैरा के मामने प्रेमचन्द, यशपाल, भगवतीचरण, अली अब्बाम हुसनो, कृष्णचन्द्र, वेदी, मण्ट्र और इसमत चुगताई की नहीं चली तो वेचारे पंचारण मिश्र किस खेत को मूली थे। परन्तु इन्होंने हिम्मत नहीं हारी। लेखक नहीं बन सके तो फिल्मी पत्रकार बन गये कि फिल्मी पत्रकार करने या वनने मे क्या जाता है । पर उससे भी काम न चला तो पब्लिक रिलेशन का काम करने लगे। फिल्म फेयर अवार्ड वेचने लगे। अपना फ्लंट हो गया, कार हो गयी, वीवी-बच्चे हो गये, छोटा-मोटा-सा वैक-बैलेंस भी हो गया। पर वह जो लेखक बनने की फांस दिल में चुभी हुई थी, वह खटकती रही. यहां तक कि फन्दाजी ने उनकी मुलाकात रामनाथ से करवा दी और होनहार विरवा के चिकने-चिकने पान वाली कहावत पंचारण मिथ को समझ में आयी और उन्होंने उमी यन्न, पहली ही मुलाकात के बाद, यह तय कर लिया कि अवतक वह वम्बई में रामनाथ ही को राह देख रहे थे तो उन्होंने गुर की तमाम बातें उसे । -- वाला दी। और एक अच्छे शिष्य की तरह रामनाथ उनके कह पर चलने भी लगा। मनचन्दानी की तरफ देखकर वह यू हसा कि मनचन्दानी झेप गया। "बात यह है कि," रामनाथ ने कहना शुरू किया, "पहले तो लेखक, मतलव राइटर, यह सोचता है कि कहानी ट्रेजिडी हो कि हैपी-एण्डिग वाली। फिर यह सोचता है कि हीरो मजदूर है कि डाक्टर कि डाकू यह तय हो जाने के बाद तो फिर काम आसान ही आसान रह जाता है..." मनचन्दानी ने न्यू गरदन हिलायी जैसे कि बात उनकी समझ में पूरी तरह आ गयी हो, जब कि बात उनकी समझ में बिल्कुल नहीं आयी थी। पर यही सवाल तीसरी वारपुछने की हिम्मत न पड़ी तो वह्यह सोचने लगा कि सिगरेट जल्द-से-जल्द खत्म कर ली जाये तो ५५५ की एक सिगरेट और मुलगायी जा सकती है। पर रामनाथ उसकी नीयत भांप गया और उसने सिगरेट की डिविया जेव में रख ली और भल्लाकर मनचन्दानी ने दूसरा सवाल करने के लिए रुख नीधा किया, पर ठीक उसी वक्त भोलानाथ 'खटक' आ गये और रमा ने कहा- "बड़े मजे दी गल सुनो जी..." पहले तो भोलानाथ को 'मजे दी गल' पर यकीन नहीं आया क्योंकि सामने बैग हुआ आदमी साफ़ पीटर था। पर स्क्रीन में उसका फोटो देख- कर वह भी चकरा गये और उन्हें मानना पड़ा कि जिन्दगी भी राम और श्याम हो सकती है चाहे उसमें दिलीप कुमार ऐक्टिग करें या न करें। भोलानाथ खटक, विला वजह, अपने-आपको फिल्मों पर सनद मानते थे। फिल्मों से उनका कोई जायज या नाजायज तअल्लुक नहीं था परन्तु उनके बड़े भाई, शोभानाय चोपड़ा, की शादी फिल्मस्टार रजनीवाला की सौतेली बहन से भी हो चुकी थी और इस नाते हिन्दी फिल्म जगत से वह अपना समधियाना सम्बन्ध मानते थे और फिल्मों के बारे में यूवात करते ये मानो हिन्दी की तमाम फिल्में उन्होंने बनायी हैं। तो भोलानाथ खटक ने मुस्कुराकर रामनाथ की तरफ देखा । राम- नाथ भी मुस्कुराया हालांकि वह दिल-ही-दिल में उन्हें मां-बहन की गालियां दे रहा था, क्योंकि रामनाय के लेखक हो जाने से क्या वह यह भी - ६६/सीन :७५ भूल माता था यह हरामी मिटा के माय लिजा से छुन छुलयों गेलने की टिप्पम में या। चूंकि हर मादमी की तरह भोलानाथ भी यही मानते थे कि उनमें अच्छा कथाकार तो आज तक जनमा ही नहीं, इमलिए रामनाय मे मिलते ही उनके दिमाग में कहानियों के कॅचव रेंगने लगे और वह पलंग फ़ई में चले गये: उनकी कहानियां डेंड-डेढ दो-दो लाप, हेढ-दो लास ही क्यो, सात- मात आठ-आठ लाख में बिक रही हैं। ठीक सागरतट पर दस वेडरूमी वाला उनका बंगला है, एक पली, तीन माशूकाएँ, आठ नौपर, दो नौकरा- नियां, चार कारें... और यू रामनाथ से भोलानाथ 'बटक' को दोस्ती हो गयी। बात यह है कि भोलानाय इसके बहुत कायल पे कि नीचे के लोगों में मिलने-जुलने में खराबी होती है। वह अपनी गिनती बुद्धिजीवियो मे किया करते थे और उन्होंने दिल-ही-दिल में, उमी वक्त यह तय कर लिया कि रामनाम में उनकी गाढ़ी होगी और उसे उल्लू बनाकर वह अपनी कहानियों के स्क्रिप्ट बनवा लेंगे और चंन की वंसी बजायेगे-वहीदा रहमान से मिलने का मौका भी मिल जायेगा। रमा को यह बात बिल्कुल नही मालूम थी कि भोलानाथ चुपके- चुपके वहीदा रहमान से इश्क करते हैं । वह रमा से, वहीदा का नाम लिये बिना, वहीदा-जैसे बाल वनवाते । उसे वहीदा-जैसे कपड़े पहनाने की कोगिग करते । महीने में एक-आप बार उसके साथ सोते तो दिल-ही-दिल में रमा को यहीदा मान लेते और खुद गुरुदत्त बन जाते। उन्हें यकीन था कि वहीदा गुरुदत्त से फंसी हुई थी और वह यह वात यार-दोस्तों को यू बताते थे जैसे खास गुस्दत से पूछ आये हैं । ...तो रामनाथ की मदद ने उनकी कोई कहानी विक भी सक्ती यी और वह यह शतं लगा देने पर ठन गये कि वहीदा हीरोइन होगी तो बहानी मिलेगी। उन्होंने उम फिल्म के लिए अपनी एक कहानी भी चुन लो। अरे वहीवाली जिसमे विलेन हीरोइन को रेप करने में सफल हो जाता है मोर हीरोइन गर्भवती हो जाती है और उसे बदनामी से बचाने के लिए हीरो उसमे गादी कर लेता है और दोनों चैन से रहने लगते है- इन विलेन का रोल करने पर भी वह तैयार थेइन खयाल ही ने खून कनपटियों की तरफ़ सिंचने लगा और वह टांग पर टांग चढ़ाकर बैठ गये। भोलानाथ की एक टांग ज्यादातर दूसरी टांग पर बड़ी रहा करती थी और इसीलिए वह समझते थे कि रमा को देखनेवाले भी टांग पर टांग वड़ा लेते हैं और यह न्याल उनसे झेला न जाता। मियां-बीवी में नगड़ होते। रमा मात्महत्या की धमकी देती, पर आत्महत्या करने की जगह वह रक्षाबन्धन के दिन उस आदमी को राखी बांध देती और खटक जी इतमीनान की सांस लेते। यहां तक कि वह फिर रमा को किसी के साथ मुस्कुराकर बातें करते देख लेते। देख लेते और महाभारत शुरू हो जाती। रमा बड़ी सीधी-जादी थी। उमे तो अभी तक यही पता नहीं चला या कि नरला हर वक्त उससे चिमटी क्यों पड़ती है। कनी-कभी तो उसे बुरा भी लगता, पर वह यह नोचकर टाल जाती कि सरला से बहुत-नारे कान निकालते रहते हैं । पैसों ने अलग सबसे बड़ा फायदा तो यही था कि सरला के नाम वह ऐसे घरों में आने-जाने लगी जहां सरला के विना जाने का वह स्वाब भी नहीं देख सकती थी। "सरला का चक्कर तो उसे काफी दिनों के बाद मालूम हुजा । बोर उने कॉलेज के दिन याद आ गये और उसने डर के मारे सरला से मिलना-जुलना विल्कुल बन्द कर दिया। बार भोलानाय सटक ने जनी से उसे सरला का ताना देना शुरू कर दिया। अली अमजद नम्बर दो में या और खटकजी नम्बर एक में। सैर यह कहना तो ठीक नहीं कि नम्बर एक में भोलानाथ रहते थे। नन्दर एक में वह कम रहते थे और उनका टेलीफोन ज्यादा रहता था। वह तो इस टेलिफोन के सजाने की रखवाली करनेवाले सांप दे। कद बोर टेलिफोन के सिवा उनमें और कोई बड़ाई नहीं थी। पर इन्हीं दोनों बड़ाइयों के आधार पर वह अपने-आपको 'देवनिवास हाउसिंग सोसायटी लिमिटेड के तमान देव-निवासियों से बड़ा समझा करते थे। एक गजब यह भी हो गया कि उनकी बड़ाई का करेला राजा सतना की दोस्ती की नीम पर भी चढ़ गया था। सोसायटी का कोई आदमी हाय में गंगाजल या कुर-जान लेकर तो यह कह नहीं सकता था कि वह इत्त ६८ /सीन : ७५ । दोस्ती के बारे में कुछ जानता है। पर भोलानाथ 'षटक' हर दूसरे या तीमरे कोई-न-कोई मौका निकालकर राजा साहब सतना को बात जरूर निकालते-यहां तक कि यह दोस्ती देव-निवामियो को जवानी याद हो गयी थी। हो, रमा कभी खुलके इस दोस्ती की बात नही करती थी। पर कभी- कभार इशारा-सा जरूर कर जाती थी कि जो सतना की राजकुमारी नाप पर लहलोट न हो गयी होती तो शायद यह दोस्ती कभी खत्म न हुई होती। और यह सुनकर खटकजी पवराने और शरमाने की वह ऐक्टिग करते कि बडे-बडे दिलीप कुमार मात । वहते, "रमा तुमसे कितनी बार कहूँ कि ऐमी वार्तं न किया करो । लोग सच समझ बैठते हैं ।" इस तरह की कोई बात भोलानाथ पजावी में कभी न कहते, या तो हिन्दी में कहते या अंग्रेजी मे कि कोई पूरी बात समझने से रह न जाये । वह लोगों को इस तरकीब से यकीन दिलाना चाहते थे कि राजकुमारी सतना से वह इश्क लड़ा चुके हैं । ऐसे मौकों पर हिन्दी भी वह कम ही बोलते थे। उनका खयाल था कि हिन्दुस्तान के तमाम पढ़े-लिखे लोगों को मातृ-भाषा अंग्रेजी ही है। इन तमाम तरकीवों के बाद भी सोसायटी में किसी को इस प्रेम- कहानी पर यकीन नहीं था। परन्तु इसी कहानी से भोलानाय की 'इगो' का साना-पानी चलता था और टेलिफोन को जरूरत से मजबूर होकर लोगों को यह कहानी बार-बार सुननी पडती थी। किस्सा यह भी तो पा कि भोलानाथ अपने-आपको हसीनों में गिना करते थे । रमा भी पयादातर उनके इस खयाल से सहमत ही रहा करती थी। उसके लिए वारिमशाह की हीर और सरसों के साग के बाद दिल से पेट तक उतर जानेवाली कोई और चीज थी तो खटकजी थे। भोलानाथ और रमा के सिवा इस परिवार में एक बेटी थी और दो बेटे थे। मीता पिलौंडी की औलाद थी और जलन्धर में व्याही हुई थी। उसका पति पुरानी कारो का कारोबार करता था, पर भोलानाथ और रमा ने सोसायटीवालों को यकीन दिला रक्खा था फि मियीलाल, यानी मीता का पति, जल्द ही कारों की एक फैक्टरी डालनेवाला है। और उनकी कम्पनी में बनी हुई कार संजय गांधी की मारुति कार से हजार गुनी अच्छी होगी जभी तो इन्दिरा गांधी रोज कोई-न-कोई अड़चन खड़ी कर देती है। मारुति पर इतना जोर इसलिए कि भोलानाथ के ख्याल में इन्दिराविरोध लगभग फैशन है और वह थे आदमी शोकीन । उनमें राज- नीति की समझ बिल्कुल नहीं थी। वह 'टाइम्ज आफ इण्डिया' रोज पढ़ते थे और यदि शाम को कोई फंस जाता तो 'शिवास रीगल' की वोतल से ब्लंक- नाइट' या 'डिप्लोमेट' उड़ेल-उड़ेलकर अकेले पीते और सामनेवाले को राजनीति समझा-समझाकर अधमुआ कर देते। बोलते इस यकीन से मानो निक्सन और ब्रेजिनेव के साथ खेले हुए हैं और चु-एन-लाई लंगोटिया यार है। इलसन-विलसन, इगाल-डिगाल, अआदत-सआदत और इटो-टिटो को तो वह किसी खेत की मूली ही नहीं समझते थे। और दिल्ली सरकार की पालिसियों के बारे में तो वह यू बात करते जैसे श्रीमती गांधी का तो वस नाम हो गया है, सरकार की सारी पालिसियां तो यह बनाते हैं । रमा हाँ में हाँ मिलाती और दोनों बेटे पास बैठे गरदन हिलाते रहते। वस, मीता जरा मुंहफट थी। भोलानाथ की उड़ान से बोर होती तो टोक देती। यही कारण था कि खटकजी, दिल-ही-दिल में, मीता से जला करते थे। यह बात भी खुद रमा ने मिसेज वर्मा को बतायी थी। बात यह है कि जिस दिन रमा भोलानाथ से रूठती उस दिन वह विल्डिंग की किसी-न-किसी औरत के कान के कीड़े जरूर झाड़ती। और भोलानाथ से वह हर दूसरे-तीसरे खफ़ा होती ही रहती थी। दर-अस्ल उसे भोलानाथ की जेब से रुपये निकाल लेने का बड़ा शौक़ था। जब मौक़ा मिलता, वह भोलानाथ की जेबों की धूल झाड़ देती। उसने मीता को भी यही सिखाने की कोशिश की, पर वह बड़ी कम-अक्ल निकली । उसने मां की बात नहीं मानी, पर रमा अपने काम से लगी रही। ज्यादातर तो भोलानाथ को पता न चलता, क्योंकि रमा बड़ी चालाकी से पच्चीस रुपये हों तो चार रुपये और चालीस रुपये सत्तर पैसे हों तो सात रुपये तीस पैसे निकाल लिया करती थी। भोलानाथ जिक्र निकालते तो रमा उनका मजाक उड़ाने लगती कि यह कैसी चोरी है? कोई चुरायेगा तो ज्यादा रकम छोड़ क्यों देगा? भोलानाथ जानते थे कि चोरी तो हुई है, ७०/ सीन : ७५ पर रमा की इस बात का उनके पास कोई जवाब नहीं होता था। इसलिए वह सून या व्हिस्की के चूंट पीकर चुप हो जाया करते थे। पर ताक मेरहते । रमा को गच्चा देने के लिए वह जेव के पैसे गिनकर डायरी में लिख लेते कि आज जैब में कितने पैसे हैं। और उस दिन रमा को शामत आ जाती। रात-भर रमा और भोलानाथ में गाली-गलौज होती रहती। भोलानाथ अग्रेजी और हिन्दी मे गाली देते, पर रमा को अपनी काबिलियत की घोस जमाने का कोई सास शौक नही था इमलिए वह पंजाबी दोलती रहती। पर जवाब तुर्की-द-तुर्को देती 'नतीजे में अली अस्तर के छोटे बेटे को बहुत-सी पंजाबी गालियां याद हो गयी थी और कभी-कभार वह मजे मे आकर बाप के गले में बह डालकर उसे 'हरामी दा पुतर' कहता तो अली अस्तर घबरा जाता और सीमा से कहता कि 'भई, यह क्या हो रहा है? वस्मू को गालियां ही सिखलानी है तो कायदे की गालियां सिखलाओ। यह हरामी दा पुत्तर तो बहुत ही वेसुरी गाली है, लेकिन जाहिर है कि अस्लर मियां-बीवी कर ही क्या सकते थे। अल्लर ने ए दिन इशारा करने के लिए भोलानाथ को एक लतीफा सुनाया। कहते हैं कि फिराक गोरखपुरी मम्वई आये तो फिल्मी धुरन्धरी ने उन्हें एक पार्टी दी। यह अजीव इतिफाक है कि हिन्दी फिल्म के सारे धुरन्धर या तो पंजाबी हैं या पंगाली हैं। बंगालियों को तो फिराक गोरखपुरी में कोई दिलचस्पी नहीं। तो बडे पंजाबी स्टार जमा थे। बी. आर. चोपड़ा, दिलीप कुमार, विनोद खन्ना, शम्मी कपूर फिराक माहव अकेले पड गये। यह लोग एक-दूसरे से पंजाबी मे यान करने लगे और फिराक साहब आंखें नया-नचाकर थोडी देर तक तो यह सब झेलते रहे, फिर दिलीप कुमार से बोले, "अमें यूसुफ, सोचता हूँ कि पंजाबी सोल ही डालूं।" तो यूसुफ साहब ने बड़ी संजीदगी मे कहा, "नही फिराक साहब, आपको पंजावी मीराने की क्या जरूरत है !" इम पर फिराक माहव ने कहा, "भई बूढ़ा हुआ, मरने की उम्र आयी। मारी जिन्दगी गुनाहों में गुजरी है। जाहिर है जहन्नुम में जाना पड़ेगा। वहां की आफिशियल मगुएज सीख लूं तो काम आयेगी।" यह लतीफ़ा सुनकर भोलानाप ने दिल खोलकर कहकहा लगाया और - - अमजद की डिविया से सिगरेट निकालकर उसे अपनी दियासलाई से जलाने में मग़ल हो गये। और अमजद अपनी और अपनी सिगरेट की डिबिया की जान बचाकर अपने फ्लैट में भाग आया और हरीश से बोला, "यार, यह खटक तो अजीव चीज़ हैं।" हरीश ने कहा, "मैं तो कहता हूँ कोई और घर ढूंदो।" अमजद ने कहा, "कहाँ ढूंढूं ? यही फ्लैट मुश्किल से मिला है।" और यह बात उसने ठीक ही कही थी। यह फ्लंट उसे बड़ी मुश्किल से मिला था। बात यह है कि वम्बई और मकान, यह दो अलग-अलग चीजें हैं। यह तो पता नहीं कि बम्बई में ढूंढे से भगवान मिलता है या नहीं, परन्तु मकान हरगिज़ नहीं मिलता। कारण शायद यह है कि फ्लैट दुवाई या अबू दावी से स्मगल नहीं किये जा सकते। और उलहासनगर में नकली मकान बनानेवाली कोई फैक्ट्री नहीं खुली है। मतलब यह कि अली अस्तर जैसे मध्यम वर्ग के मुसलमान के लिए बम्बई में घर मिलना अल्लाह ही के मिलने जितना मुश्किल है। भगवान, कम-से-कम, सिन्धी और उत्तरप्रदेशी में तो फ़र्क नहीं कर सकता, पर बम्बई के मालिक-मकान यह नाजुक फ़र्क भी कर लेते हैं। वम्बई के कब्रिस्तान भी मालिक-मकानों से पीछे नहीं हैं । वह भी सुन्नी-शीया, हनफ़ी-वहावी, शीया-शीया खोजा में फर्क कर लेते हैं। वम्बई में आसानी से न घर मिलता है, न न मिलती । अली अमजद को कन का अनुभव तो नहीं था, पर वह वम्बई में घर ढूंढ चुका था। वैसे तो अली अमजद अच्छा आदमी था, पर मकान के सिलसिले में देखा जाये तो उसमें कई खरावियां थीं। पहली खराबी यह कि वह मुसलमान था। दूसरी खराबी यह कि फिल्मों में था। तीसरी खराबी यह कि वह खोजा या कैथलिक या सिन्धी नहीं था। पर उसे घर की जरूरत थी। इसलिए उसने तोलाराम दलाल का पिण्ड नहीं छोड़ा। "आइए अमज़दजी" तोलाराम ने खीसे निकालकर कहा और 'ज' पर विन्दी लगाना नहीं भूले ! "मैं तो रोज़ ही आता हूँ साहब।" अमजद ने कहा । तोलाराम हँस पड़ा। बोला, "आप तो डाइलाग मार दिया।" यह ७२ / सीन : ७५ कहार वह अपनी जो सुजलाने लगा और अपनी टाइपिस्ट को दंगने लगा। सुजलाते वक्त वह आम तौर से टाइपिस्ट की तरफ देखने लगता था क्योकि उसके ववाल में लड़की की तरफ देखने से खुजलाने या मजा या जाता है । खुजली के दस-बीस हाय चलाने के बाद वोना, "कल वाइफ वौली, अमजद भाई को वह अपना वाला इशटोरी सुना डालो। साला यहत फसक्लाम सम्जेक्ट है। तीन तो माला रेप सीन ठोक दिया है। पहला सीन रेप साले हीरो की सिस्टर का होता है..." "पहले घर की बात करो तोलारामजी।" "अरे, घर तो समझो कि मिल गया अमजद माई ! तुम साली विगिनिंग का सीन सुन लो। साम का टाइम है। टाइटिल खतम..." "फ्लैट है कहाँ ?" उसने सवाल किया। "एही। बंड्ररा मे। हीरोइन विकिनी पहने, सायरा बानो समझो ना। क्या टांगे हैं साली की।..." वह टाइपिस्ट को देखकर अपनी जांच खुजलाने लगा और अली अमजद ने अपना सवाल सोस दिया, "एरिया क्या है उस फ्लैट का?" "आठ सौ फीट।" खुजली सरम हो गयी तो तोलाराम आगे बढ़ा, "हीरोइन को जो बेटर ने ऐमे देखा तो माले को हेकलाहट और बढ गयो। समझो कि वी. गोपाल हुवा वेटर । साले की मफल देखकर हंसी आती है "डिपॉजिट क्या लेगा?" "वही तीन महीने का भाडा। वाइफ बोली कि अमजद भाई को बोलो कि इसटोरी अपना नाम से बैच दें। वह तो साली तुम्हारी फैन हो गयी है । फिफटी-फिफटी फर लेंगे।" "चलके जरा वह फ्लैट देख लिया जाये।" "पर संड-लाई से ये मत बोलना कि तुम फिलिम राइटर हो।" तोलाराम ने उठते हुए कहा, "साला लोग फिलिमवाला को घर नहीं देता। साले लोग बोलते हैं कि फिलिमवाला लोग के रहने से बहू-बेटी लोग का साला इज्जत सतरे में पड़ता है। जयसे जो विल्डिंग मे फिलिम वाला लोग नही रहता है बिल्डिंग में यह 21- ---
पड़ता है ! अरे, साला सव वंकस है अमजद भाई ! ऐयसी बहू-बेटी क
बहुत इशटोरी है मेरे पास । अरे, अखतर भाई, हम तो इ वोलता है कि
अमजद-सोलाराम टीम बनाके सलीम-जावेद की छुट्टी कर दी जाय।"
"अमजद-तोला टीम से कहीं अच्छी तो तोला-माशा टीम होगी।
अली अमजद ने कहा।
तोलाराम ज़ोर से हंसा। उसकी टाइपिस्ट उसकी तरफ देखक
मुस्कुरा दो। तोलाराम ने उसे आँख मार दी। बोला, "मिस फरनाण्डित
की तकदीर भी बन जायेगी, हम लोग की टीम बन जाने से। साली रे
तीन को बहुत मजा लेकर टाइप करेगी..."
"आह, यू आर इम्पासिबिल !" मिस फर्नाण्डिस ने हंसकर कहा।
तोलाराम फिर हंसने लगा, "क्या नाम बताया था? तोलाराम
मासाराम।..."
उसकी हंसी की आवाज़ का सामने पड़ी हुई हिल रोड पर को
असर टाइपिस्ट पर नहीं हुना क्योंकि वह घर जाने की जल्दी में थी
सामनेवाले वस-स्टाप पर एक मोटी खोजन झुकी हुई अपनी पिण्डल
खुजला रही थी। और उसके पीछे एक नारियलवाला वैठा नारियल की
जटाएं छील रहा था। एक बड़ी खूबसूरत-सी लड़की, मिनी फ्रॉक पहने
तोलाराम के ग्राउण्ड फ्लोर वाले आफिस के सामने ने गुज़र गयी । मोटी
खोजन पिण्डली खुजाते-खुजाते सीधी होकर अपना पेट खुजाने लगी।
"चलो अमजद भाई।" तोलाराम की आवाज़ आयी और अमजद ने
सड़क से निगाहें हटाकर उसकी तरफ़ देखा।
"चलिए।"
"मिस फरनाण्डिस," तोलाराम ने कहा, "आफिस में ताला मारके
चावी वाइफ को दे देना। चलो अमजद भाई...'
तोलाराम और अली अमजद सड़क पर आ गये। अमजद साइड कार
में बैठ गया। तोलाराम मोटर साइकिल स्टार्ट करने लगा।
"लैण्डलार्ड कौन है ?"
"सिन्धी।" तोलाराम ने कहा । मोटर साइकिल स्टार्ट हो गयी। और
उसके शोर में उसकी वाकी वात गुम हो गयी।
७४ / सीन : ७५
लण्डलार्ड मोतवानी चिम्वुई की पतली-सी भीड़-महक्लेवाली गली में रहना था । कुलाये में उसकी किताबो की दूकान थी और वह केवल अंग्रेजी कितावें वेचता था । अग्रेजी मिगरेट पीता था। तीन बेटियों का बाप था ! पाली हिल की 'मूर्यदर्शन हाउसिंग सुमापटी' में उसके दो पलट थे। वह दोनों पलट किराये पर चल रहे थे और खुद वह किराये के घर में रह रहा था। पाली हिल वाले दोनो फ्लेटो का किराया एबीस सौ पचास रुपये आता था और खुद वह अपने वाईम सौ फीट के फ्लैट का मनानवे रपये किराया देता था। यानी दो हजार पांच मो निरेपन रपये महीने की बचत होती थी। असल चीज बचत है। और इसलिए मोतवानी अपने तीसरे पलंट के होनेवाले किरायेदार मे मुस्कुराकर मिला। "वया पीजियेगा?" "जी, सुप्रिया ।" अली अमजद ने कहा । "किन पेपर्ड मे लिखते हैं आप?' "परमयुग," तोलाराम बोला, "सारिका, साप्ताहिक हिन्दुस्तान । आप सो बस लिये जाव मंगजीनो के नाम । सबमे लिखते है।" "अच्छा-अच्छा," मोतवानी ने कहा, "तोलाराम ने आपको जर्नलिस्ट बताया था... "जी नही," अली अमजद ने वात काटी, "मैं जर्नलिस्ट नही, पत्रकार " " इस बीच में तोलाराम ने हाप वढाकर मोतवानी के सामने से 'इनहिल मिगरेट की डिविया उठा ली। बोला, "तुम कुछ कहो अमजद भाई, पर ग्रिटिम सिगरेटों का जवाब नहीं है।" "मेरे नाम में ज के नीचे विन्दी नही है।" तोलाराम हंस दिया। "आप भी लो।" उसने डिविया अली अमजद की तरफ़ वहायी। "ना माई। मैं अपनी सिनेट पियूँगा।" अली अमजद ने चारमीनार को डिरिया निकाली। "आपका नाम मैंने किसी फिल्म मंगजीन मे भी देखा था शायद। मोतवानी बोला।
- "अरे तो इसमें इनका क्या दोस?" तोलाराम ने मोतवानो को दौड़ा लया। वह जानता था कि जो फिल्म की बात आगे बढ़ी तो उसका दो तिशत कमीशन खतरे में पड़ जायेगा। और उसे यह भी मालूम था कि कतावों का कारोबार करने के वावजूद मोतवानी पढ़ा-लिसा आदमी नहीं ITI इसलिए उसने एक टुकड़ा भी लगा दिया, "हो सकता है कि भावीजी नाम पढ़ने में गलती हो गयी हो।" "कम्पनी लीज़ पर दे सकता हूँ।" मोतवानी ने कहा। "मैं फ्री-लान्सर हूँ !" अली अमजद ने कहा । "नहीं साब," मोतवानी ने गरदन हिलायी, “एक बार लीव-ऐंड- नाइसेंस में फंस चुका हूँ।" फिर उसने तोलाराम की तरफ़ देखना शुरू कया, "तुम्हीं तो बोला था कि फिलिमवालों ओर मुसलमानों के साथ इन्धा नहीं करना चाहिए।" अली अमजद के बदन का सारा खून खिंचकर उसके चेहरे पर आ या। "पर वह किरायादार तो पंजाबी हिन्दू था।" तोलाराम ने मोतवानी को दिल-ही-दिल में मां-बहन की गाली देते हुए कहा, "यह तो नेसलिस्ट पुसलमान है।" "बात यह है भाई साव," मोतवानी ने अली अमजद से कहा, 'सुसायटी की तरफ़ से किसी नान-सिन्धी को फ्लाट देने की परमिशन नहीं है।" मोतवानी ने सूखे मुंह से कहा। मैं मुसलमान भी हूँ मोतवानी साहब, और फिल्मों में भी काम करता है।" अमजद ने कहा। उसने यह कहना ज़रूरी जाना। वह कोई मजहवी नादमी नहीं था। अल्लाह को बाकायदा नहीं मानता था। नमाज नहीं ढ़िता था। रोजे नहीं रखता था । मुसलिम लीग और जमाअते-इसलामी नसी संस्थाओं का कट्टर विरोधी था। पर इस बात पर शर्मिन्दा भी नहीं गा कि उसने एक मुसलमान घराने में जन्म लिया है। वह अपने हिन्दुस्तान में अपना नाम छिपाकर अपनी और अपने हिन्दुस्तान की तौहीन नहीं करना चाहता था। तोलाराम ने रास्ते में कहा था कि फ्लैट किसी और नाम पर लेंगे। . ७६ / सीन : ७५ 1 पर जिन्दगी तोलाराम के दो प्रतिशत कमीशन से कहीं श्यादा कीमती नीज है। आदर्श नाम बदलकर नही जिया करता।... असी अमजद ने तोलाराम की तरफ देखा। तोलाराम सामनेवाली दीवार पर टंगे हुए कैलेंडर की तरफ़ देख रहा था। कैलेंडर था किसी दन्त- मंजन का और कैलेंडर पर सायरा बानो की एक तस्वीर थी। तस्वीर, जिममें कपड़ा कम था और बदन प्यादा।"तोलाराम तस्वीर के वात्री कपड़े उतारने की कोशिश कर रहा था और धीरे-धीरे अपनी जांध सुजलाने में लगा हुआ था। अमजद को अपनी तरफ देखता पाकर उसने उसकी तरफ झुककर धीरे से पूछा, "अमजद भाई, ये साली दांत में टूथ- बस करती है क्या?"." फिर वह खुद ही हंसने भी लगा। मोतवानी होठों पर बडी नेश्नल-इंटिगरेशन-छाप मुस्कुराहट चिपकाये इस इन्तजार में बैठे थे कि अमजद उनकी तरफ देखें तो वह अपनी बात कहें। जब उसने उनकी तरफ़ देखा तो वह बोले, "आपके घमं से मुझे क्या लेना-देना अमजदजी, पर सुमायटी के आर्डर से मजबूर हूँ।" मोनवानी ने ज पर बिन्दी मार दी, "जो बाप सिन्धी होते तो यह फ्लंट आप,ही को देता।" "पर मैं सिन्धी होता क्यों ?" अमजद ने पूछा। भोतवानी साहब हंसने लगे मानो अमजद ने मजाक किया हो। "मोतवानी साहब," अमजद ने कहा, "मुझे पलट को सख्त जरूरत है। आप कहते हिन्दू हो जाओ तो मैं हिन्दू हो गया होता पर सिन्धी हो जाना मेरे यम की बात नहीं है।" अपने मुंह की कड़वाहट से अली अमजद का दम घुटने लगा । वह खडा हो गया, "चलिए तोलारामजी..." और तोलाराम के चलने का इन्तजार किये बिना वह वाहर पला गया। बिम्वुई की गली में रात टहल रही थी। समुद्र की तरफ से आनेवाली हवा ठण्डी थी। वनिये की दुकान पर मिट्टी का तेल लेनेवालों की भीड़ थी। मामनेवाली दीवार पर मनोज कुमार की फिल्म 'शोर' का पोस्टर लगा हुआ था। और उस पोस्टर से मटा हुआ श्रीमती इन्दिरा गांधी की तस्वी वाला बड़ा पोस्टर था। इन्दिराजी मुस्कुरा रही थी और बम्बई कार्य कमेटी जनता को चौपाटो आफर प्रधान मन्त्री का भाषण सुनने की दावत दे रही थी। इन्दिराजी के मोतियों की तरह चमकते हुए दांत देखकर अली अमजद को मोतवानी की दीवार पर टंगा हुमा दन्त-मंजनवाला कैलेंडर याद बा गया जिसमें दांतों की जगह टांगों पर जोर था। "तुम फिकर तो करो मत लमजद भाई," तोलाराम आ गया, "तोलाराम को जिन्दगी में तुम बे-घर नहीं रह सकते । वाइफ आज ही बोली थी कि अमज़द भाई साब के साथ टीम बनानी है तो पहले घर दिलवाव उनको। बरे तुम देखना अमजद भाई, अव हम तुमको कोई सिन्धी ही का पलट दिलवायेंगे।" तोलाराम ने अपना वादा पूरा किया यह फ्लैट भी एक सिन्धी ही का था, छत्ताराम मनचन्दानी । बली अमजद ने उन्हें पहली ही मुलाकात में बता दिया कि वह मुसलमान भी है और फिल्म लेखक भी। पता नहीं यह सुनने के बाद मनचन्दानी उसे पलट देता कि नहीं पर श्रीमती साधना मनचन्दानी ने बीच ही में वात लोक ली, "भाई साव, आप मुझे राजेश खन्ना और धर्मेन्द्र से मिला देंगे?" "क्यों नहीं ? ज़रूर।" उसने कहा। "क्या धर्मेन्द्र और सायरा बानो का वाकई कोई चक्कर चल रहा है ?" साधना मनचन्दानी ने पूछा और अली अमजद साधना के 'वाकई के क को विन्दी पर हैरान रह गया। पता चला कि वह स्वाजा अहमद अब्बास की हीरोइन रह चुकी है और उन्होंने उसका शीन-काफ़ ठीक करवाने में पूरा एक साल लगाया था। बाद में वह फिल्म बनी तो पर रीलिज न हो सकी क्योंकि उसमें न कोई रेप-सीन था न हीरो और शेट्टी की कोई लड़ाई ही थी''पद्मा खन्नः का कोई कंत्रे-आइटम तक नहीं था। ..."पर साधना अपनी गिनती हीरोइनों में करती थी और फिल्मों के बारे में ५ वात करती थी जैसे फिल्मों में यह उसकी तीसरी पीढ़ी है । जब काई फिल्मी स्कैंडल सुनती तो एक लम्बी सांस लेती कि जो उसकी फिल्म . रिलीज हो गयी होती तो अब तक उसके बारे में भी न जाने कितने स्कैंडल्ज ७८/सीन : ७५ बन चुके होते । पंचारण मिथ उमके. पी. आर. ओ. रह चुके थे। उन्होंने कहा कि यदि वह स्टार बनना चाहती है तो नम्बर एक यह कि अपनी मादी की खबर छिपाये और नम्बर दो कि किसी मशहूर हीरो के साप और कुछ न कर सके तो बदनाम तो हो ही जाये। धर्मेन्द्र और राजेश खन्ना दोनों ही बहुत विजी थे, इसलिए पंचारण मिय के खपाल में इन दोनों में मे किमी के साथ बदनाम होने में कोई मजा नही था। उन्होंने चिंटू कपूर को चुना पर मनचन्दानी तैयार न हुआ और यूं माधना स्टार बनते-बनते रह गयो। उसी दिन से मनचन्दानी की तरफ से उसके दिल में वाल भी पड़ गया। एक तरह से मनचन्दानी के साथ व्याह फरफे यह पछता रही थी। वह कंस्ट्रक्शन के काम में था और फिल्मवालों से उमका कोई तअल्लुक ही नहीं था। इमलिए गादी के ठोक माडे चार माल बाद जय अली अमजद के रूप में उमे पहला फिल्मी आदमी मिला तो उसके पुराने घाव हरे हो गये। और यह अती अमजद से यूं बातें करने लगी जमे वह उनके पीहर का हो क्या राजकुमार वाकई गजा है। क्या देव साव फेम लिपट करवाते हैं ? क्या कमाल अमरोही ने सचमुच तीसरी शादी कर ली है ? क्या रेखा देखने में बत्तीस-तंतीस की नही लगती ? शर्मिला और नवाब पटौदी की शादी कितने दिन चलेगी? क्या गुलजार मीना कुमारी को भूलने के लिए राखी पर आगिक होने की सोच रहा है ? ... सवाल, सवाल और सवाल । मनचन्दानी को यकीन हो गया कि देव-निवासवाला पसंट अली अमजद को देना ही पड़ेगा। तो उसने चुपके से पचाम रपया किराया बढ़ा दिया और तोलाराम ने इस पर कोई एतराज न पिया क्योकि किराया बढ़ने में उसका कमीशन भी बढ़ रहा था। "पर एक बात का म्याल रखियेगा।" बातें तय हो जाने के बाद मनचन्दानी ने कहा, "नम्बर एक में भोलानाथ खटक रहते हैं, मिनने लायक नहीं हैं।" "नम्बर एक में रहते हैं तो साहव-मलामत रखनी ही पड़ेगी।" अली अमजद ने कहा। "रमा से बचियेगा।" माघना ने कहा, "बड़ी गि "रमा यानी मिसेज़ भोलानाथ ।" मनचन्दानी ने कहा, "मैंने तो राखी बँधवाकर जान बचायी।" मनचन्दानी हँसने लगा। मिसेज़ मनचन्दानी हँसने लगीं। तोलाराम दलाल हँसने लगा। अली अमजद नहीं हँसा क्योंकि उसकी समझ में नहीं आया कि इसमें हंसने की क्या बात है। "पर राजेश खन्ना से मिलाना मत भूल जाइयेगा।" मिसेज़ ने उसे फिर याद दिलायी। और जब अली अमजद ने वादा कर लिया तब उसे नम्बर दो सिंगार सुसायटी' की कुंजी मिली और उसे यक़ीन आया कि पलट उसे वाक़ई मिल गया है। कुंजी उसने झट-से जेब में रख ली पर उसे जेव के अन्दर भी पकड़े रहा जैसे कि उसे यह डर हो कि छूटते ही कुंजी हवा हो जायेगी। जब वह मचन्दानी के बारहवें माले फ्लैट से नीचे आया तो तोलाराम ने कहा, "अब किसी दिन वैठके वह इश्टोरी भी सुन लो अमजद भाई।" "क्यों नहीं? जरूर ।" उसने कहा। "फिफ्टी रुपीज की पुरानी इंग्लिस नाविले भी खरीद लिया हूँ।" तोलाराम ने बड़ी राज़दारी से कहा, "काम चल निकला, भगवान की दया से, तो रोज-रोज नयी इश्टोरियां कैसे बनेंगी? यह तरकीव वाइफ ने सुझायी। बहुत वण्डरफुल औरत है। फसक्लास बी. ए. है । एक नया नाबिल खरीदने लगा तो दुकानदार बोला, उसे भी मैंने ही फ्लैट दिलवाया था, कि तोलारामजी, फिल्मी रैटर बनना है तो यह नाविल मत लो । दस कापियां आयी थीं। दस रेटर ले गये। दस कापियों का आर्डर बुक है- फिर उसने ही मेरे लिए कितावें चुनीं। पचीस बरस से कम पुरानी कोई नाविल उसने खरीदने ही नहीं दी। आज के चालू फिल्मी रेटरों को खवर भी नहीं होयेगी उन किताबों की। कल रात वाइफ ने एक नाबिल सुनाना शुरू किया। पहला ही सीन साला ऐसा धांसू है कि छुट्टी हो गयी। होटल पुलिस आफिसर है और हीरोइन उस कातिल की बेटी है जिसे हीरो गिरिफतार करना चाहता है।..." "वैठते हैं किसी दिन।" अली अमजद ने वात काटी। "चलो तुमको वहाँ तक छोड़ आऊँ।" - ८० / सीन : ७५ :
। "अरे नहीं।" अली अमजद ने जल्दी से इन्कार कर दिया। उने डर था कि जो नोलाराम साय लग लिया तो पूरा उपन्यास सुना डालेगा। "अरे तकल्लुफ क्यों करते हो अमज़द भाई ?" उन्होंने फिर अमजद कीज पर विन्दी ठोक दी। "नही भाई।" अली अमजद ने कहा, "मैं चला जाऊंगा । मुसायटी के मेट्री के नाम मनचन्दानी साहब ने खत तो दे ही दिया है।" "ज्यादा मूटिंग-ऊटिंग मत दिखाना।" तोलाराम ने कहा। और यह पहकर वह अजीय तरह मे हमा। वोला, "मनचन्दानी तो दिन-रात में बनाने में जुटा रहता है और विचारी साधना भावी मूटिंग पर गुजारा कर रही है।" तोनाराम जोर में हेमा। उमको हँसी की आवाज़ उसको मोटर-माइकिल की आवाज में डिजाल्व हो गमी "फिर मिलते हैं ।" अली अमजद ने चिल्लाकर कहा । तोनाराम चला गया और अली अमजद पाती हिल्न अपार्टमेंट के नीचे फैले हुए देशी और विदेगी कारों के जगल में अकेला रह गया। "मुर सिगार सुमापदी" तक अली अमजद को किरायादारी को खवर अली अमजद से पहले ही पहुंच गयी। और सुमायटी में उसकी पहली मुलाकात रमा से हुई। वही इन्तिजार में थी। वह इस बात पर मनचन्दानी से खफा भी थी कि उसने अपना फ्लैट एक मुसलमान को क्यों दिया। पर वह चान्स लेनेवालियों में नहीं थी, इसलिए उसने दिन-भर में यह मालूम कर लिया कि आज तक उसकी कितनी फिल्में रिलीज़ हो चुकी हैं और वह कितनी फिल्मे लिख रहा है।--खटक परिवार पढा-लिखा परिवार था और पढ़े-लिखे लोग अपनी नफरत छिपाना जानते हैं। रमा के खयाल में उमे मुसलमानों से नफरत करने का पूरा अधिकार या। उसे यह अधिकार इसलिए था कि उसके घरवालो को सन मंतालिस की उथल-पथल में पंजाब छोड़ना पड़ा था। वह लोग पंजाबी किसानों को भारी मूद पर रुपया कर्ज दिया करते थे। जब पाकिस्तान को हवा चली तो गिरवी रक्गे हुए सोने-चांदी के तमाम तमाम गढे लेकर, दंगे शुरू होने सोन :७५/१ । से पहले ही, दिल्ली आ गये। रमा का कहना था कि उसके दादाजी के पास मनों सोना रहा होगा। जो देश का बंटवारा न हो गया होता तो रमा के दादाजी यह मनों सोना-चांदी लेकर दिल्ली न आ गये होते। देश के बँटवारे से सब घाटे में रहे, पर रमा के दादाजी की लह आयी। दिल्ली आकर उन्होंने अपना क्लेम दाखिल किया और अन्दुस्समद खां बिसाती की कोठी में जमके वैठ भी गये। और वाक़ी जिन्दगी उन्होंने भगवान की पूजा करने और मुसलमानों को गालियां देने में गुजार दी। संतालिस में रमा साढ़े बारह बरस की थी। साढ़े बारह वरस की लड़की नफ़रत और मुहब्बत करना सीख चुकी होती है। उसने मुहब्बत तो खैर किसी से नहीं की, पर दिल्ली आने के बाद उसने मुसलमानों से नफ़रत करना ज़रूर शुरू कर दिया था। मुसलमानों से नफ़रत करना उन दिनों उत्तर भारत के फैशन में भी दाखिल था। लोगों को पाकिस्तान में मारे जानेवालों का हिसाब जवानी याद था और लोग उस हिसाव में इस कदर उलझे हुए थे कि हिन्दुस्तानी सड़कों पर बिखरी हुई लाशों को गिनने का वक्त ही निकल पा रहा था। आम तौर से लोगों का खयाल यह था कि इज़्ज़त सिर्फ़ हिन्दू औरतों की होती है और मुसलमान औरतों के पास केवल बदन होता है। पर उन दिनों भी इघर और उधर, दोनों ही तरफ़, कुछ पागल ऐसे भी थे जो चिल्ला-चिल्लाकर यह कह रहे थे कि लाशों और खंजरों का कोई धर्म नहीं होता और इज्ज़त की कोई जात नहीं होती। पर इन पागलों में से कोई रमा का पड़ोसी नहीं था। इसलिए किसी ने रमा को यह बताया ही नहीं कि पाकिस्तान के हिन्दुओं की तरह हिन्दुस्तान के मुसलमान भी मारे जा रहे हैं । यदि यह सच था कि : आस कच्चे घड़े की तरह वह गयी सोहनी बीच तूफ़ान में रह गयी तो यह भी सच था कि: जामा-मस्जिद में अल्लाह की ज़ात थी चांदनी चौक में रात-ही-रात थी। पर पूरी वास्तविकता यूं थी कि : पांच दरियावों का गीत जलने लगा ८२/सीन :७५ कृष्ण के देश में कोई राधा न थी राम के देश में कोई सौता न थी हीर सडकों पे नंगी फिरायी गयी रावी में हर रवायत बहायो गयी कुछ लुटेरे बडे आदमी बन गमे और हम घर में शरणार्थी बन गये। औरतें सरहदो की तरफ चल पड़ी नाक की कील, सर को रिदा भी नहीं जूतियां घर की दहलीज पर रह गयी एक कारे-नुमाया हुआ है यहां घर जलाकर चिरागा हुआ है यहाँ। परन्तु यह पूरी वास्तविकता उन दिनो बहुत कम लोगो को मालूम थी । और रमा उन कम लोगों में से नहीं थी। इसलिए जब उसे यह पता चला कि वगलवाले फ्लैट में कोई मुसलमान आ रहा है तो वह समझ गयी कि यह माधना उसका दिल दुखा रही है । पर मध्यम वर्ग को घोड़ी-बहुत पढ़ी-लिसी औरतों की तरह रमा को भी फिल्म देखने, कभी-कभार अग्रेजी में बात करने और दैनिक समाचारपत्र पढने का बडा शौक था। दिल-ही- दिल में यह राजेश से भी मिलना चाहती थी और अली अमजद से दोस्ती करने के बाद उसकी तमाम फिल्मी स्वाहिों पूरी कर सकती थी। रमा कहती तो यह थी कि भोलानाथ की तस्वीर देखते ही बहू तह से उन पर आगिक हो गयी थी, पर सच्ची बात यह है कि भोलानाय के बम्बई में रहने पर बाशिक हुई थी। मतलब यह था कि मिमेज भोला- नाय चोपड़ा बनकर उमे बम्बई रहने और अपने दिलीप कुमारों, धर्मेन्द्रो और राजेशों से मिलने का मौका मिलेगा। राजेश खन्ना का पूरा नाम वह कभी नहीं लेती थी। राजेश खन्ना उनके लिए रगया। और जो इन लोगों में मिलना न हो भी सका तो उम सहर की हवा मे माम लेने रा मौका तो मिल ही जायेगा जिसमें यह स्टार सांस लेते हैं और इस्क करते हैं और वाद-पीड़ित जनता के लिए मदद मांगने के लिए जुलूस निकालते 1 सीन :७५/३ पर जब वम्बई आकर उसे पता चला कि वह जिसे दिलीप कुमार समझ रही थी, वह तो वास्तव में यूसुफ खां है तो उसने अपनी दर्शन- लिस्ट से उसका नाम काट दिया। तो बचेराजेश और धरम। और अली अमजद इन दोनों ही की फिल्में लिख रहा था। इसीलिए अपनी नफरत की आँखें बचाकर वह अली अमजद के आने की राह भी देख रही थी। बाहर जरा आहट होती तो रमा भागकर दरवाजे की आंख से अपनी आंख लगा लेती। और यूं 'सुरसिंगार' में सबसे पहले अली अमजद को रमा ही ने देखा। अली अमजद पहली ही बार 'सुरसिंगार' नम्बर दो का ताला खोल रहा था कि उसे लगा जैसे कोई उसे देख रहा है। उसने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। पर जब रमा बाहर निकल आयी तो उसकी तरफ देखना ही पड़ा। रमा निकली तो यूं थी कि जैसे वह किसी जरूरी काम से, बहुत जल्दी में, वाहर जा रही है और नये पड़ोसी को देखकर यूं ही पलभर को रुक गयी है। "नमस्तेजी।" अली अमजद के सलाम के जवाब में उसने मुस्कुराकर कहा । उसे दरअस्ल अपनी मुस्कुराहट पर बड़ा गुमान था, "आप अली अमजदजी है ना?" "जी हाँ।" उसे मजबूरन रुकना पड़ा, हालांकि वह दरवाजा खोल चुका था। । "कितना रेंट दे रहे हैं आप ?" "साढ़े छ: सौ।" "हे राम! इन सिन्धियों से भगवान बचाये। आप तो स्टैंडर्ड रेंट करवा लीजिए। मैं मिसेज रमा चोपड़ा हूँ। और देखिए भाई साहब, अब यहाँ रहने आ रहे हैं, तो मिसेज गुप्ता से बचियेगा। मौका मिलते ही वीस- तीस उधार मांग लेगी और आंख झपकते ही घर की एक-आध चीज साफ कर देगी। बड़ी हाथलपक है जी।..." रमा जोश में यह भूल गयी कि वह यह दिखाती हुई निकली थी कि बहुत जल्दी में है। वह 'सुर- सिंगार' पर रनिंग कमेंट्री देने लगी-“यह जो नम्बर चार की फेनी है, मिलने लायक नहीं है। मैं अपने मुंह से कुछ नहीं कहती। आप खुद देख ८४/ सीन : ७५ r ही लेंगे..." माधिन यह हुआ कि 'मुर्मिगार' मे चोपड़ाओं वे मिया कोई मिलने- मिलाने के लायक है ही नहीं। "भाभीजी कब आयेंगी?" परमों।" उमने अपनी भाभी के आने की खबर दे दी जो यनारम वाम मूटिंग देखने और दिलीप कुमार से मिलने बम्बई आ रही थी ! "फिर हम और भाभीजी रोज मंटनी शो देखने जाया करेंगी।" रमा लिलखिलाकर हंस पड़ी और फिर बोली, "नाय को तो कोई शौक ही नहीं है । बम, काम पर से आये नहीं कि व्हिस्को लेकर बैठ गये । पर दिल के बड़े अच्छे हैं।" अली अमजद ने दरवाजा पूरा खोल दिया। पर रमा ने इशारा नहीं ममझा । वह तो अपने मजे में बोलती ही चली गयी, "यम उनके फोन को कोई हाथ न लगाये । वात यह है भाई-साब, कि बिल्डिंग में फोन वम एक है। हमारे पास । अब जो हम लोग विल्डिंगवालो को मैसेज भिजवाने लग जायें तो और किसी काम के लिए टाइम ही न मिले । छः नम्बर में जो मिमेज चिन्तक रहती हैं, उनसे पहले मेरी बड़ी दोस्ती थी। मिस्टर चिन्तक किमी डेली पेपर मे काम करते हैं। तो मिसेज चिन्तक गयी मायके। भाई-माव, चार महीने तर मैंने चिन्तकजी को अपने घर खाना खिलाया। कपड़े उनके घुलते और घोबी का हिसाव में रसती। मैं हिसाव नहीं करती भाई साव, पर एक आदमी को चार महीने तक खिलाने में कुछ तो खर्च होता ही होगा । एक दिन उनका फोन आया। मैं नहा रही थी। नौकर बाजार गया हुआ था। नाप सेव कर रहे थे। तो उन्होंने यह दिया कि अभी मेसेज ले जानेवाला कोई नहीं है। वस भाई साहब, मैं क्या बताऊँ कि पीहर से लौटकर मिमेज चिन्तक ने इस बात का क्या बतंगड़ बनाया है। नाय भी जवान के जरा तेज हैं। उखड़ गये। बोले : निकलती है मेरे घर से कि जूते मारके निकालूं!' फ्लंट से तो वह डरकर भाग गयी, पर बाहर जाके मेरी मीता के बारे में बक-धक करने सगी कि वह भगवान न करे, किसी मुमलभान छोकरे से फेमी हुई है। आप बुरा न मानियेगा भाई-माब, पर मुसलमान न मुझे अच्छे लगे न मेरी मीता को यह ।
लीजिए। मैं भी पागल हूँ। आप ही से कह रही हूँ कि मुझे मुसलमान अच्छे नहीं लगते..." अली अमजद बड़ी मुश्किल मे जान बचाकर फ्लैट में जा सका। और उसके जाने के बाद रमा भी अपने फ्लैट में चली गयी। सिटिंग रूम में रक्खे टेलीफोन में ताला लगा हुआ था। अपने खयाल में इस ताले की कुंगी सिर्फ भोलानाथ के पास थी। वह इसलिए कि रमा को फ़ोन पर बातें करने का बड़ा शौक था और उसके गोर का विल भोलानाथ को भरना पड़ता था । पर रमा भी चंट थी। उसने वैसा ही एक ताला और खरीद लिया। एक कुजी तो उसने अपने पास रक्खी और दूसरी कुजी के साथ वह ताला उसने मिसेज मिदा के हाथ वेच दिया। मिसेज मिढा को अपने बेडरूम के लिए नया-नया फ़ोन मिला था। रमा ने उसे डराया कि पास-पड़ोसवाले फ़ोन कर-करके फ़ोन के खर्च को रसोई के खर्च जितना कर देंगे। इसलिए फ़ोन में ताला जरूरी है। उस वक्त सरला रमा ही के घर थी। सरला मिढा होल खा गयी और बोली कि घर जाते-जाते वह ताला खरीदती जायेगी। इस रमा ने वह एक कुंजीवाला ताला उसके सिर मढ़ दिया। दूसरी कुजी की जगह सरला के हाथ में कैश-मिमो थमा दिया। सरला ने दूसरी कुंजी के बारे में पूछा तो रमा ने कह दिया कि फ़ोन के ताले एक ही कुंजीवाले बनते हैं। और यूं उन्हें, विना जेब से कुछ सरकाये हुए फोन के ताले की एक कुंजी मिल गयी और भोलानाथ की ज़िद में उन्होंने दिल्ली फोन घुमा-घुमाकर मीता से खूब बातें करनी शुरू कर दी कि अब मीता अपने पति समेत दिल्ली ही में आ गयी थी। और जब टेलिफोन का लम्बा-चौड़ा विल आता तो भोलानाथ जमीन-आसमान एक करते, खूब-खूब चीखते-चिल्लाते और वह मजे में बैठी सेव या चकोतरे खाती रहती। इस पर भोलानाथ और भल्लाते और तब खाना खत्म करके रमा पंजे झाड़कर उनके पीछे पड़ जाती कि फोन में ताला बन्द रहता है''और भोलानाथ यह सुनकर ला-जवाब हो जाते "तो अली अमजद से मिलकर, फ्लैट में लौटते ही, पहले तो श्री कृष्ण की मूर्ति को प्रणाम किया, फिर उसके नीचे से फोन की कुंजी निकालकर सरला को फोन करने के लिए उसने ताला खोला। यह कुंजी ९६ / सीन : ७५ वह मूर्ति के नीचे यूं सजा करती थी कि भोलानाथ नास्तिक थे और के आस-पाम उनका आना-जाना नहीं था। वह तो वीफ भी पाते और रमा ने, उन्हें बताये बिना उनमे वरतन अलग कर रक्ने थे। मोला. नाथ की जेब में मारे हुए पैमें भी वह इसी मूर्ति के नीचे रक्षा करतो यो। और इन रुपयों की चोरी के इल्जाम मे, हर दूसरे-तीसरे, उनके नौकर निकाले जाने रहा करते थे।.. "तो मूर्ति के नीचे से कुजो निकालकर रमा ने मिसेज मिदा को फोन किया। बोली, "मरला, ए बड़े मजे दी गल सुनो जी..." उन्होंने अली अमजद से अपनी मुलाकात की पूरी कहानी मुना दी। सरला ने यह बात बार-बार पूछो कि क्या उसने सचमुच अली अमजद से यह कह दिया कि उमे मुसलमानों में मिलना-जुलना पसन्द नहीं है ? और रमा ने हर बार यही जवाब दिया कि क्या वह अली अमजद से डरती है किन कहती! सरला मिढा उन औरतों में मैं थी जो किसी मुमलमान लहवी मे १२ करने पर भी तैयार नहीं थी। मुसलमान तो दूर रहे, वह मिटा साहब का हुआ भी नहीं खाती थी। उमका खाना अलग पकता था। तो उमे हर था कि अली अमजद से रमा की मुलाकात हो गयी तो उसके लिए परेशानी हो जायेगी कि फिर अती अमजद मियां-बीवी का रमा के यहाँ आना-जाना शुरू हो जायेगा । और हालांकि रमा ने अब तक उसके इशारे पी जवान का कोई जवाब नहीं दिया था, पर सरला अभी तक पूरी तरह उससे मायूस नहीं हुई थी। "सरला को ट्रेजिडी यह थी कि वह कला- कार थी भौर समाचारपत्रों की सतह पर पाकर दिल की बात को खबर की तरह मुना देने के खिलाफ थी । उमे पाने से ज्यादा पाने की कोगिरा मैं मजा आया करता था । इसलिए वह रमा को मुसलमानो से अलग- अलग रखना चाहती थी, और रमा की ट्रेजिडी यह थी कि वह शौकीन- मिजाज यी और भोलानाय की आमदनी रमा के शोर से बसत छोटी पर जाया करती थी। इसलिए रमा भी सरला को हाथ में निकलने नहीं देती थी कि रमा के सेनिमा के शोर का साग सचं नरलाही उदाती थी और सालगिरह के दिन वह रमा को एक नयी और कीमती साड़ी पहनाकर मो.tam सबके सामने लिपटाकर उसका मुह चूमा करती थी।" यानी रमा और सरला दोनों ही को एक-दूसरे की ज़रूरत थी। पर रमा सरला से थोड़ा-बहुत जलती भी थी और उसका जलना बहुत अजीव भी नहीं था । सरला के पास दौलत थी और शौक़ न था। रमा के पास शौक थे और दौलत न थी। उसे अपना कोई छोटा-सा शोक पूरा करने के लिए भोलानाथ की जेब काटनी पड़ती और फिर किसी ईमानदार नीकर को चोरी के इल्जाम में निकालना पड़ता था। पर रमा अपनी नफ़रत और जलन को छिपाने की कला खूब जानती थी। यही कारण है कि सीमा से दोस्ती करने में उसे देर नहीं लगी। सीमा के आने के बाद दो-एक दिन तक तो अपने वनावटी हलो-जी' और एक मुस्कुराहट का चारा डालती रही, क्योंकि वह चाहती यह थी कि. पहल सीमा की तरफ से हो ताकि वह लोगों से कह सके कि वह तो सीमा को मुह लगाना नहीं चाहती, पर कोई सूरत पर सवार ही हो जाये तो क्या किया जाय ! मिलना ही पड़ता है... लेकिन सीमा को अली अमजद ने पहले ही चौकन्ना कर दिया था : "भाभी, मिसेज खटक से बच गयीं तो समझना कि कमाल कर दिया। औरत नहीं जोंक है, जोंक । चिपक गयी तो जान बचाना दूभर हो जायेगा।" सीमा बनारस के गोविन्दपुरा कलाँ से शूटिंग देखने, पापिंग करने और फिल्म स्टारों के साथ तस्वीरें खिंचवाने आयी थी। उसके पास भला मिसेज खटक के लिए वक्त ही कहाँ था। उसने तो बम्बई सेंट्रल स्टेशन ही से यह पूछना शुरू कर दिया था कि कौन स्टार कहाँ शूटिंग कर रहा है और किस- किससे उसकी दोस्ती है। पर रमा भी आसानी से हार माननेवालों में नहीं थी। पहले तो वह इन्तिजार करती रही कि सीमा मिलने आयेगी। पर जव सीमा संट बँच के बैठ गयी तो आजिज़ आकर खटकजी समेत आकरमाने नम्बर दो सर- सिंगार' की घंटी बजा ही दी। "अपने साव से वोलो दि "साव तो नहीं हैं।" नौ १८ / सीन : ७५ :
मेमनार की दोनो।" म साव भी नहीं है।" "उह । चलो,घर तो देख ही लें।" रमा यह कहार प्लंट में चली गयी। भोलानाय भी पीछे-पीछे आये। नौकर विचारा रोक तो मरना नहीं था। साय-माय लगा रहा। रमा ने पूरा फ्लैट देता। उसे युधचा नहीं। मारे पलट में तेज रंगों को कोई चीज ही नहीं थी। बम, गुलदानों में ताजा फल लगे हुए थे। मिटिंग-रूम की एक दीवार पर पिकामो का एक प्रिंट लगा हुआ था। वंठी हुई नगी औरत। रमा ने बहुत आने फाइ-फाइकर नंगी औरत को तलाश किया, पर वह उमे नजर नहीं आयी। बेडरूम मे तो उतूनी मखमत के पलंगपोश के मिवा किसी चीज पर उनकी निगाह ही नहीं ठहरी पर उमने यह तप कर लिग कि वह अपने पनंग पर भी मखमल का पलंगपोग डालेगी और गुलदानों से प्लास्टिक के फूल निकाल देगी और दीवार पर एक पेंटिंग लटकायेगी। पंटिंग तो उमो दिन आ गयी। हाजी अली के सामने रेसकोम मी तरफ वाटर कलर और ऑइल के फ्रेम किये हुए संड-स्केप विरते हैं। वह मिमेज मिडा को लेकर वहां गयी। बहाना तो था कि मेट्रो में मंटनी शो देखेंगे। नेशनल म्पोर्ट म क्लब से गुजरते ही लंड-सेप देगार उमने 'हाय' कहके कार सवा ली। "यह तेरे बेडरूम में बहुत जंचेगी। यह ड्राइग-रूम में..." उनने मरला मिडा की तरफ में चित्र पसन्द करना शुरु कर दिया। आखिर में उसने खेतों में चरती हुई एक बूढी गायवाला लंड-स्वेप पनन्द किरा, पर यह कहकर छोड़ दिया कि सरला के घर में जगह कहां है । तो सरला ने वह लंडस्केप रमा के लिए सरीर लिया । और यू मटाजी जब रात को लौटे तो उन्होंने बेडरूम में वह तंड. स्केप टंगा हुआ देवा। रमाने तुरन्त एक कहानी मुना दी कि दरवारे पर एक चित्रकार बेवने आया था। माठ मांग रहा था। मैंने दस में पटा गि। भोलानाय इतिझाक ने बुग थे, इसलिए बात नहीं बड़ी और रमा ने दम म भी ऐंठ लिये। दूसरे दिन जब सीमा अपने दरवाजे पर बैठो फूलवाने में फूल सरोर रही थी, रमा भी निकल आयी। "नमस्ते ? पैडजी" "नमस्ते।" रमा भी फूलवाले की टोकरी के पास बैठ गयी। "हम लोग कल आये थे।" "जी हाँ हम लोग एक फिल्म की महरत में गये हुए थे।" "कोन-कौन काम कर रहा है उसमें ?" "धर्मेन्द्र और हेमामालिनी। ये कार्नेशन कैसे दिये ?" सीमा फूलवाले से बातें करनी लगी, "तुम लूटते बहुत हो..." "नाइ बाई। हम खाली तुमारे वास्ते इस विल्डिंग में आता है। तुम ये बोलेगा कि हम लूटता तो कैसे काम चलेगा...?" "मुझे तो खुद फूलों का शौक है । पर इधर फूलवाले आते ही नहीं। यह ट्यूव रोज़ कैसे दिये ?..." फूल खरीदने पड़े, क्योंकि उसे सीमा पर यह साबित करना था कि उसे भी फूलों का बड़ा शौक है । सीमा ने पैतीस रुपये के फूल लिये। रमा ने पैंतालीस के चुने और यह कहकर अन्दर गयी कि पैसे लेकर आती है। पर वह दरवाजे पर खड़ी रही और सीमा के अन्दर जाने की राह देखती रही । सीमा पैसे देकर और फूल लेकर अन्दर चली गयी और जब उसके पलट का दरवाजा बन्द हो गया तब रमा निकली और फूलवाले से बोली, "हज़ार का छुट्टा होगा ?" जाहिर है कि फूलवाले के पास हज़ार का छुट्टा नहीं हो सकता था। इसलिए उसने कहा, "बाई, कोई बाँदा नहीं, कल ले जाऊँगा पैसे ।” परन्तु रमा कहां फंसनेवाली थी। बोली, "मैं उधार नहीं करती..." यह कहकर उसने फ्लैट का दरवाजा अन्दर से बन्द कर रमा को । लिया। रमा बहुत खुश थी कि उसने सीमा पर जमा दिया कि बिल्डिंग में एक वही फूल खरीदनेवाली नहीं है। पर उसे यह फ़िक्र फिर भी लगी रही कि सीमा ने कार्यों की बातें नहीं निकाली मिलने और दोस्ती करने की बात फिर टल गयी। उस रात उसने भोलानाय से कहा, "बहुत प्राउड लगती हैं मिस्टर ६०/ सीन : ७५ । -- अमजद की भाभी।" मोनानाय बहुंत यके हुए थे, इसलिए बात यहीं परम हो गयी। यो दिन और गुजर गये। बम, फूलवाले और मजीवाले की टोरी के पास मुलाकातें होती रही और टोकरी उट जाने के बाद परम होती रही । न मीमा कही गयी और न कोई उसके यहाँ आया। आसिर मिमेज गुप्ता से न रहा गया और एक दिन वह घण्टी बजाकर अन्दर आ ही गयी। श्रीकण्ठ गुप्ता नम्बर १० में रहते थे। मुरमिगार हाउर्मिग सुमायटी लिमिटेड के सेकेट्री और होम्योपेथी के डाक्टर थे। बांद में रहते थे और बोरिवली में प्रैक्टिम करते थे। लेखक भी थे और श्रीमती गुप्ता के पति भी। यह तीनों ही होल-टाइम काम हैं, पर गुप्ताजी यह तीनो काम यूं करते थे कि एक काम की समर बाकी दोनो कामों को कानो-बान नहीं होने देते थे। डाक्टरी ज्यादा नहीं चलती थी। लेखनी भी ज्यादा नहीं चलती पी। गौहरी भी उपादा नहीं चलती पी। उनकी गिनती 'कम-मे- कम' वालों में यो। 'सुरसिंगार' में वह मिसेज गुप्ता के पति के नाते ही जाने जाते थे। किमी से उनका मिलना-जुलना नहीं था। मवेरे ही चले जाते और गपो रात को वापस आते, पाना दाते, मी जाते। मीमा ने 'सुर- सिंगार' आने के कोई दो महीने बाद तो उनकी मूरत देसी। पर मिसेज गुप्ताविल्युल दूसरी तरह की थी। सबके दुस-ददं में गरीक और सबको अपने दुख-दर्द में गरीक किये हुए । उनका नाम किमी को नही मालूम था । वह मिसेज गुप्ता कही जाती थी। बड़े मिसेला गुप्ता कहते और छोटे गुप्ता बाटी। उनका कोई-न-कोई नाम जरूर रहा होगा। पर अपने नाम का प्रयोग वह पांच बरस में बस एक बार करती थी, जब पोट देने आती थी। ...मिसेज गुप्ता मिलनमार थी, इसलिए रमा के लगाये हुए 'करफ्यू' को ज्यादा न झेल पायी। कुछ अपनी परेगानियों में भी मजबूर हो गयी। इसलिए रमा की असि वचाकर वह मीमा के पाम आ ही गयी। सीमा उम वक्त बच्ची को दूध पिला रही थी और उसका बेटा यमीम कालीन पर अपनी बैट्रीवाली मोटरें दोहा रहा था, एक्मिर करवा रहा या । फिर लड़नेवाली कारों के ड्राइवर बनकर लडादा था, और फिर मीन.७५11 पुलिसवाला बनकर चालान कर रहा था या रिश्वत ले रहा था। मिसेज़ गुप्ता ने वसीम के सिर पर प्यार से हाथ फेरा । वसीम ने कोई नोटिस न लिया कि उस वक्त वह पुलिसवाला बनकर रिश्वत पटा रहा था। "वद-तमीज़ ।" सीमा ने डांटा, "आदाब नहीं किया आण्टी को !" वसीम ने एक आदाव घुमाके मार दिया। मिसेज़ गुप्ता हँस पड़ीं। बोली, "अरे जाने दीजिए बहनजी, आजकल बच्चों का यही हाल है।" फ़ातिमा ने नैपी गीली कर दी। मिसेज़ गुप्ता फ़ौरन हाथ बँटाने पर तैयार हो गयीं। नपी बदलते-बदलते वोली, "ये भोलानाथ बड़ा हरामजादा है।".."सीमा ने कोई बढ़ावा नहीं दिया। पर मिसेज़ गुप्ता को किसी बढ़ावे की ज़रूरत ही नहीं थी। वोलती चली गयीं, "मैं तो बहनजी, किसी के चक्कर में पड़ती नहीं। मैं क्या बताऊँ आपको। यह बिल्डिग रहने लायक नहीं है। पटेल हिंजड़ा है। फ़ेनी पेयिंग-गेस्टों पर गुज़ारा करती है। नजर भोलानाथ की भी खराब है। मिसेज़ चिन्तक और रमा की लड़ाई फ़ोन पर थोड़ी हुई थी। भोलानाथ ने मिसेज़ चिन्तक को फाँसना चाहा । वह नहीं फंसी तो भोलानाथ ने रमा से जड़ दिया कि मिसेज़ चिन्तक उस पर डोरे डालने की कोशिश कर रही हैं।".. मिसेज गुप्ता हंसी, "वह औरत पागल ही होगी जो भोलानाथ को फाँसने की कोशिश करेगी। पर रमा और भोलानाथ का अजीब किस्सा है। यह समझती हैं कि हर औरत भोलानाथ के चक्कर में है और वह समझते हैं कि हर मर्द रमा के चक्कर में है। मनचन्दानी और साधना से भी इन दोनों की लड़ाई इसी बात पर हुई थी। नहीं तो क्या दाँतकाटी दोस्ती हुआ करती उन चारों में ! भोलानाथ और रमा के विना उन्हें चैन नहीं और मनचन्दानी और साधना के बिना इन्हें करार नहीं। मनचन्दानी रमा को रमा बहन कहके लिपटाये हुए है और भोलानाथ साधना से भाभीजी कहकर लिपटे पड़ रहे हैं । तव मनचन्दानी के पास फ़ोन नहीं था। और भोलानाथ मनचन्दानी के साथ थोड़ा-सा रुपया लगाना चाहते थे कि मिसेज मिढा से दोस्ती के दिन चल सकती है भला ! मिसेज़ मिढा जरा दूसरे तरह की औरत है और रमा में चाहे दूसरे हज़ारों ऐब हैं, पर वह ऐब ६२ / सीन :७५ नहीं है। हां, तो क्या कह रही थी मैं । हां, मनचन्दानी के यहाँ तब फ्रोन नहीं था। फिर उसके पास फोन आ गया तो उमने भोलानाय से मानदारी भी नहीं की और तव भोलानाय को खयाल आया कि मनचन्दानी रमा पर बुरी निगाह डालता है। पति-पत्नी मे खूब लड़ाई हुई। भोलानाय पर दिल का दौरा पड गया। रमा ने कहा कि वह आत्महत्या कर लेगी। पर दोनो मरने का इरादा टाल गये और तय यह हुआ कि रमा मनवन्दानी को राखी बांध दे।" "यह कहते-कहते मिसेज गुप्ता हम पड़ी और बोली, "रमा की रासी का मतलब ही यह है कि भोलानाय ने फिर रमा पराक किया है..." मीमा तो कुछ दिनों बाद यह किस्से सुना-मुनाके चली गयी और अमजद उस बेसुरी 'सुरसिंगार' सुसायटी में अकेला रह गया। मुमायटी का हर आदमी बचे-मुने वन का लगभग तीनचीयाई हिस्सा पड़ोसियों की टोह में गुजारता था। जब तक सीमा रही, वह यह मोर्चा संभाले रही। उभे कंडल्ल जमा करने का बड़ा शौक था। इमोलिए रमा, मिसेज गुप्ता और दूसरी 'लेडीज' मे उसकी निभ गयी । पर नश्मा से गप लडाने में उसे सबसे ज्यादा मजा आता। नरमा एक काल-गलं थी। बनारस में तो वह यूं बेघड़क किमी काल-गलं में मिलने के बारे में सोच भी नहीं सकती यो । रमा और मिसेज गुप्ता ने उसे नरमा के बारे में कई जरूरी बातें बता दी थी। १. कि नग्मा बत्तीस साल से एक दिन कम की नहीं है । पर रहती है कि चौबीम की है। २. कि नश्मा इतनी खूबसूरत नहीं है, जितनी दिखायी देती है। ३. कि एक रात के चार-पांच सौ सेती है। ४. कि 'सुरसिंगार' के मदों के माय कनसेगन करती है। ५. कि किसी सेठ ने तो उसको रस छोड़ा है। फ्लंट का किराया और मेक-अप का सारा इम्पोर्टेड सामान वही देता है। ६. कि नग्मा ने हरीश राय को रस छोड़ा है।
- ७. कि पहले नज़्मा नीली के नाम से फिल्मों में छोटे-मोटे रोल किया करती थी और असिस्टेण्ट डाइरेक्टरों में बहुत पोपुलर थी। ८. कि हरीश को वह उन्हीं फिल्मी दिनो से जानती और मानती है। ६. कि चूंकि वह अली अमजद के घर में आती-जाती है इसीलिए अली अमजद को हरीश की फिल्म लिखने को मिल गयी है, नहीं तो हरीश भला रामनाथ को छोड़कर अली अमजद के पास क्यों आता ? रामनाथ उसकी सिलवर जुबली फिल्में लिख चुका था। सीमा बड़ी मुंहफट लड़की थी। हरीश से पूछ बैठो। "भाभी," हरीश ने कहा, "क्या झूठ है, क्या सच है, यह कोई नहीं जानता।..." सच्ची वात यह है कि यह हरीश की पिछली फिल्म का एक संवाद था। रामनाथ का लिखा हुआ हिट संवाद । हरीश को रामनाथ के संवाद इसीलिए पसन्द थे कि स्पेलिंग और ग्रामर की गलतियों के बावजूद हर मौके पर खप जाते थे। पर सीमा बड़ी सीधी-साधी लड़की थी । वह साधारण बातचीत करती थी। वह न संवाद वोले, न समझे। तो उसने हरीश को दौड़ा लिया। बोली, "झूठ वह है जो आप अभी वोले थे और सच वह होगा जो आप अव वोलेंगे।" हरीश चकरा गया। हँसने लगा। नज्मा से उसे कोई सीरियस किस्म का इश्क नहीं था। एक फिल्म के सेट पर मुलाकात हुई। और वह उसे अच्छी लग गयी। उन दिनों वह अँधेरी ईस्ट में रहा करता था। एक बेडरूम-हाल का फ्लैट था । और वह अकेला था। अली अमजद, वी. डी. और अलीमुल्लाह डिक्रूज़ गेस्ट हाउस ही में थे। वी. डी. और रोज़ी का एक-तर्फा इश्क अब भी चल रहा था हालांकि रोज़ी अब 'माई के अड्डे' पर नहीं रहती थी। कुलावा उठ गयी थी। वहां उसने अपना धन्धा शुरू कर दिया था। पर वी. डी. के प्यार पर उसके धन्धे का कोई असर नहीं पड़ा था। वह हफ्ते में एक-आध वार रोज़ी से मिलने जरूर जाता । कभी शिकायत न करता। बड़ी सादा १४/सीन : ७५ बात-चीत होती। "कमी हो?" "टीक है । तुम कंगा है ?" "हम भी ठीक हैं।" "चाय पियेंगा?" इतनी-मी बात में कोई घण्टा-डेढ घण्टा लग जाता। एक दिन वी. डी. बहुत उदास था। तो अलीमुल्लाह में बोला, "यार, बस यही एक सीन हुआ जा रहा है । लगता है जैसे किसी फिल्म की शूटिंग हो रही है और हम दोनों ही रोक पर री-टेक दिये जा रहे हैं । पॉट बी. के नहीं हो रहा है।" अलीमुल्लाह चुप रहा क्योकि फिल्म-मापा वह समझता ही नहीं था। बोला, "यार वी., डी. मेरी तो ममझ में नहीं आता कि तुम उम बहनचो तवायफ के चक्कर मे निकलते क्यों नहीं।" "औरत को मर्दानी गाली देते हो !" वी. डी. वो अलीमुल्लाह की ग्रामर की गलतियां पडने का वडा गौक था। "राही मासूम रजा का एक डायलाग मुनो। मोन यूं है कि हीरोइन, जो एक स्ट्रीटवाकर है, राजा नामी एक दादा को यह मोचकर अपनी कमाई देती है कि वह भी दादर के दादा टार्जन जैमा होगा। पर राजा कोरा है । वह धैमा कम हो मकता है ? तो वह गंगा को एक लाफा मारता है। गगा हीरोइन का नाम है । वहाँ साइड हीरो हिम्मत जौनपुरी भी है। वह राजा से कहता है कि औरत पर हाय नही उठाते। इस पर राजा रहता है, 'तुम साला रण्डी को औरत बोलता है ?' बम, मादड हीरो को तकरीर मारने का मौका मिल जाता है : 'यह तुम्हारी तरह असली दियिमो में नकली यूट-पालिग पा धन्धा तो नहीं करती। दूध में पानी तो नहीं मिलाती। चावल में ककर- परयर तो नहीं डालती। नस्ली दवा, नक्नी दारू, नकली नपने, नकली भविष्य तो नही बचती। विना विमो मिलावट, विना विमी भूमिरा, बिना किमी भाषण के अपना बदन बेचती है। अपनी इरजत बनती है। यह इसकी येइजती नहीं, इरजत के दाम है।" वी डी. चुप कमरे में सन्नाटा हो गया। भागे, मैला और बदबूदार मन्ना गया।
"पब्लिक साली इस डायलाग पर ताली मारेगी।" वी. डी. ने कुछ देर के बाद कहा और अपनी चारमीनार सुलगाने में लग गया। अली- मुल्लाह फिर चुप रहा। उसे मालूम था कि वी. डी. पर कभी-कभी कड़वड़ाहट के दौरे पड़ते हैं। " आधा गांव" के राइटर साले को हो क्या गया है ?" वी. डी. ने सवाल किया। "मैंने 'आधा गाँव' नहीं पढ़ी है।" अलीमुल्लाह ने कहा । "मैं हिन्दी नहीं जानता।" "सब चूतियापन्थी है।" वी. डी. ने कहा। "आज अम्माँ का एक खत फिर आया।" अलीमुल्लाह ने कहा । "कहो तो जवानी सुना दूं?" वी. डी. बोला, “यार मांओं के खत इतने मुनाटनस क्यों होते हैं। यहां पर सब खैरियत है। खैरियत की वात सुनके झांट सुलग जाती है।" "आजकल खैरियत का मतलव वदल गया है।" हरीश आ गया। नज्मा साथ थी। "खैरियत का मतलव अव यह है कि मरे नहीं जिन्दा हैं।" नमा खिलखिला के हंस पड़ी। उस कमरे के कड़वे वातावरण में वह कहकहा एक गाली-सा लगा। वी. डी. ने नज़्मा को पूरके देखा। "अपने देश के लोगों को दुख-दर्द की आदत पड़ गयी है वीरेन्द्र कुमार उर्फ बी. डी., दुख बहुत हैं।" "गलत," वी. डी. ने कहा, "दुख बहुत होते तो अब तक दुख पर टैक्स लग चुका होता।" नज्मा को फिर हंसी आयी, पर वी. डी. का गम्भीर चेहरा देखकर वह अपना दिल मार गयी। हरीश ने ५५५ की डिबिया निकाली । ५५५ की डिविया फिल्मी जगत में स्टेटस का चिन्ह है। हरीश डायरेक्टर हो चुका था। 'विल्स फ्लेक' या 'चारमीनार' नहीं पी सकता था। उसका लाइटर भी सुनहरा था। २२ कैरेट गोल्ड का । वी. डी. ने अपनी सिगरेट माचिस से जलायी। उसका थीसिस यह था कि लाइटर से जलाने में सिगरेट का आधा मज़ा खत्म हो जाता है। ६६ / सीन : ७५ .
"यह मेरी फिल्म को हीरोइन नरमा है।" हरोग ने परिचय करवाया। "असली नाम हलीमा, नवती नाम नश्मा, फिल्मो नाम नीली," नग्मा वहा। "नोलो क्यों?" वी. डी. ने मवाल किया, "अच्छी पामो मावली हो।" पह यात बी. डी. ने घटी मजीदगी मे कही थी। पर नामा ममेत मय हम पड जंगे उसने मजार किया हो और कमरे में जमरे बंटीई कड़वाहट दवे पांव बाहर चली गयी और या तो वीर मावरपर मार्ग उर्फ पोर बन्दर रोड को भीड़भाड मे मिल गयी या बांद्रा तालाब में कूद पड़ी। "आज अनीमुल्लाह को मां का खत फिर आया है ।" वी. टी. ने पहा। परन्तु नग्मा को अलीमुल्लाह, उमकी मां और वी. डो में पोई दिलचस्पी नहीं थी। उमे अपना ' डिज' आना ही अच्छा नहीं लग रहा था। वह एक फिल्म की हीरोइन, फाइनेंसर को रसल और डायरेक्टर को माशूका थी। उसके पास अपनी इटैलियन फिएट कार थी। 'डिपूज' और नज्मा का कोई मेल ही नहीं था। पर हरीश ने जिद को इसलिए उसे माना ही पड़ा। वह अपनी फ्रेंचशिफॉन की साडो को संभाले हुए मुस्किान मे बैठी थी और कमरे के फर्श पर बिखरे हुए मिगरेट के ठुरों को गिन रही भो। तंतालीस तक पहुंची कि उसे लगा, जैसे कोई उमै पुकार रहा है। "नमा, यह देखो अलीमुल्लाह की मंगेतर की तस्वीर।" हरीग उसे एक छोटा-सा फोटोग्राफ दे रहा था। उसने ले लिया । देसा । अपनी तरफ मे लड़को बहुत फेमन में थी। हेमा मालिनी के स्टाइल में आँखों का मेक-अप । मीना कुमारी के स्टाइल मे मुस्कुराहट । वहीदा रहमान के स्टाइल में गर्दन का सम । शर्मिला टैगोर के स्टाइल में गालो का गहना "लड़की नहीं, पंच-मेल मिठाई का डिव्या है।" वी. डी. ने टुकडा लगाया और नरमा फिर हंस पड़ी। वही फुलझड़ी-मी हमी । अलीमुल्लाह को वह हंसी बुरी लगी। वी. डी. की वात पौर थी। वह दोस्त पा। कुछ भी यह मरता था। पर बिस्तर की पादर की तरह विछी हुई यह लड़की उस लड़की पर नही हंस सकती जिसे अनीमुल्लाह की मां ने अलीमुल्लाह । - की बीवी बनने के लिए पसन्द किया हो वस, बात बढ़ गयी। वी. डी. ने नज्मा का साथ दिया। और वी. डॉ. नज्मा का साथ कैसे न देता ? वह एक पैदायशी प्रोलतारी था। वह जोश में आकर, हमेशा की तरह, पलंग पर अकड़कर बैठ गया और सिगरेट के लम्बे-लम्बे दम मारने लगा, और खांसने लगा, और तकरीर करने लगा। "आप अपने को समझते क्या हैं... वी. डी. को जब गुस्सा आता था तो वह 'आप-जी' पर उतर आता था।... किस्सा मुख्नसर यह कि अलीमुल्लाह ने उसी रात 'डिक्रूज़' छोड़ने का फैसला किया। हरीश ने बहुत समझाया। झगड़े के बीच में आ जानेवाले अली अमजद ने भी समझाया। पर वह न माना। और यूं अली अमजद और वी. डी. 'डिक्रूज' में पांच महीनों के बक़ाया किराये के साथ और अपनी-अपनी ज़िन्दगी के सूनेपन के साथ अकेले रह गये। और इसीलिए 'डिक्रूज़ गेस्ट हाउस' के कमरा नम्बर पाँच में वह रात बड़ी मुश्किल से कटी। वी. डी. को अपने जीवन के सूनेपन का मजाक उड़ाना आता था, और शायद इसीलिए उसकी गिनती हँस-मुख लोगों में होती थी ! पर अली अमजद को अपनी उदासी छिपाने की कला नहीं आती थी। पर वह एक बड़ी अजीव रात थी। कमरे का सन्नाटा इतना खुरदुरा था कि खयालों की नर्म जिल्द छिली जा रही थी। वी. डी. पलंग पर था। अली अमजद सोफे पर।...और वी.डी. उदास था। एकदम से बोला, "यार, मुझे उदास होना नहीं आता। बहुत बोरिंग चीज़ लगती है।" "तुम्हें अलीमुल्लाह की मंगेतर का मजाक उड़ाने की क्या जरूरत थी ?" "जब मैं अपना मज़ाक उड़ाता हूँ तव तो अलीमुल्लाह को कभी बुरा नहीं लगता। सईदा तो अभी नयी-नयी मंगेतर हुई है यार! मैं बचपन का दोस्त हूँ। नाइन्य क्लास में दोनों फेल तक साथ-साथ हुए। पहला इश्क तक ९८/सीन :७५ 1 हम दोनो ने मिल-जुलकर किया था..." कमर में फिर सन्नाटा हो गया, क्योंकि अली अमजद ने उम इसके बारे में कोई सवाल ही नहीं किया। दोनों अपने-अपने मैले और सख्त तकियों पर सर रक्मे छन की तरफ देखते रहे और गिगरेट पीते रहे। "उस इश्क के बारे में कुछ नहीं पूछोगे" योड़ी देर के बाद वी. दी. ने पूछा। "नहीं," अली अमजद ने कहा। उमके पास उमके अपने आधे अधूरे इश्क थे। रकया, मबीहा, किया- वर,...और क्या नाम था उमका? हो, लता। लगता है जैसे यह नाम पिछले जन्मों की कहानियों से निकल आये हैं । या जैसे यह नाम किमी और की कहानी या जिन्दगी मे तअल्लुक रखते हो। जैसे वह सिर्फ तमाशाई है... दूर बैठा खुद अपना तमाशा देख रहा है। भाव के निशान देखकर घाव अवश्य याद आते हैं, पर ददं तो नहीं याद आता ना! याद क्या है ? एक निशाने-जस्म, या एक रहगुजर है। स्वाव के नक्शे-कदम पर दर्द के नारे-कदम है। पता-रफ़्ता स्वाब के नक्शे-कदम भी ददं के नक्शे-कदम भी वस्त के सहरा मे जाकर साथ इन चंचल वगलों के कही पर, थको गिर जाते हैं शायद- गिरके मर जाते है सायद कौन उनकी जुस्तुजू में वक्त के सहरा मे जाये! किया, सबीहा, किरावर और लता मिन्हा।"चार नाम । माधारण दिखायी देनेवाले चार नाम । हिन्दुस्तान और पारिस्तान में न जाने कितनी रक्याएँ, सबीहाएं, किसवर और लता सिन्हाएं होंगी।
. परन्तु पाकिस्तान क्यों? परन्तु पाकिस्तान क्यों नहीं ? रुकया पाकिस्तान में है। सबीहा पाकिस्तान में है। किशवर पाकिस्तान में है। लता सिन्हा पाकिस्तान में है। और क्या 'जो विछुड़ जाये वह पाकिस्तान में है। अब जुदाई के कई नाम हो गये हैं। जुदाई की कई किस्में भी हो गयी हैं। जुदाई जो घर के अन्दर है। जुदाई जो घर के बाहर है। जुदाई जो देशी है। जुदाई जो विदेशी है। वह जो एक 'रटूमल भोंदूप्रसाद' हुआ करता था। हाँ, बाबू त्रिलोकनाथ श्रीवास्तव । घुटा हुआ-सा । लम्बी चोटी । मैली धोती। उजला कुरता। सुना था कि न्यूयार्क जाके टी. पी. श्रीवास्तव हो गया। नाम के वाकी अक्षर और सर की लम्बी चोटी गायब ! कोई दो बरस हुए टूरिस्ट विज़ा पर हिन्दुस्तान घूमने आया था। उसकी गोरी-चिट्टी पत्नी, मिसेज़ सारा श्रीवास्तव, साथ आयी थी। टी. पी. अमरीकन हो चुका था! और हिन्दुस्तान को देखकर अपनी पत्नी ही की तरह एक्साइटेड था।... टी. पी. एक इम्पोर्टेड जुदाई । अंग्रेज़ी लहजे में हिन्दी बोलती हुई जुदाई । दाल को डाल कहती हुई जुदाई।... रुकया, सबीहा, किशवर और लता सिन्हा। लिफ़ाफ़े पर टिकट की तरह चिपकी हुई जुदाई। मैं खैरियत से पाकिस्तान पहुँच गयी। तुम बहुत याद आ रहे हो। तुम्हारे विना कुछ अच्छा नहीं लग रहा है। जिस दिन बहुत जी घवरायेगा, सवको छोड़-छाड़कर भाग आऊंगी। तुम नहीं तो यह मैं खुदा की जन्नत में भी नहीं रह सकती.. "खुदा की बस्ती" से आया हुआ यह खत अली अमजद को जवानी याद था। यह याद नहीं आ रहा था कि यह खत रुक्कैया ने लिखा था या सवीहा ने । दोनों के खत वहुत मिलते-जुलते थे फिर दोनों की शादी हो गयी। अली अम- जद को पता चला कि दोनों बहुत खुश हैं। दोनों के पति भी बहुत खुश हैं। पाकिस्तान क्या, १. पाकिस्तानी उपन्यासकार शौकत सिद्दकी के उपन्यास का नाम 'खुदा की वस्ती' है। १०० /सीन : ७५ जो खुश नहीं है वह अली अमजद है । और अली अमजद उन दोनो से बहुत दूर है। रकया और सबीहा के बीच मे जो दो साल बारह दिन हैं, उनका क्या बना? किस हाल में गुजरे बह दो माल बारह दिन ? गुजरे कि नहीं? वह अपने इम मवाल से घबरा गया। "तुम कुछ भी कहो। मगर अलीमुल्लाह को यह नही करना चाहिए पा।" अली अमजद ने कहा। "मैं कुछ कह ही नहीं रहा हूँ।"वी. डी. ने कहा । कमरे में फिर सन्नाटा छा गया। "वात यह है," थोड़ी देर के बाद वी. डी. खुद ही बोला, "अलीम के अपने प्राब्लम्ज हैं। वह कई महानो से अलग होना चाहता था। पर कह नहीं पा रहा था। उसकी शादी होनेवाली है। जिम्मेदारियां बढनेवाली हैं। आज मुझे उस पर रहम आ गया तो मैंने उसे खफ़ा होने का मौका दे दिया।" "तो अब तुम करोगे का?" अली अमजद ने बड़ी बेदर्दी से सवाल किया। "किमी और से दोस्ती कर लूंगा।" वी. डी. ने बड़ी सादगी से कहा, "वमे एक विजिनेस भी ध्यान में आयी है।" "विजिनग और तुम ?" अली अमजद उठके बैठ गया। "हाँ।" वी. डी. ने सिगरेट मे सिगरेट सुलगायी, "अपने-आपको वेचना शुरू करता हूं। इस पर सेल्ज टैक्स भी नहीं है।" वी. डी. अपनी बात पर जोर से हँसा। रात के वम्बया सन्नाटे मे वह कहाहा वडा भयानक नगा। अली अमजद डर गया। उसने खिड़की से बाहर देखा। घोड़वन्दर रोड तालाव को टूटी हुई सीढ़ियो पर उकई बैठी मुंह धो रही थी और पूरव का एक मंया अपनी साइकिल पर दूध के डिम्ब लादे लपका चला जा रहा था।" अलीमुल्लाह दूसरे ही दिन बी. डी. को मनाने आया। पर वी. डी. ने उमे बहुत बुरा-भला कहके कमरे से निकाल दिया। अली अपजद मौजूद पा, मयकुछ जानता भी था, पर कुछ कह नहीं सकता था। .
उस दिन के बाद से वी. डी. और अलीमुल्लाह में वातचीत नहीं हुई। अलीमुल्लाह ने उसे अपनी शादी में भी नहीं बुलाया। वह चुपचाप 'डिक्रूज़' की दुनिया से निकल गया और शायद 'डिक्रूज़' को भूल गया। उसके पास जोगेश्वरी में एक बेडरूम-हाल का अपना फ्लैट था। एक खास अपनी, ओनरशिप की पत्नी थी। एक स्कूटर था। जीने के लिए और चाहिए भी क्या ! अलीमुल्लाह की पत्नी, सईदा, ने बहुत ज़ोर मारा कि वी. डी. जोगे- श्वरीवाले फ्लैट में उठ आये । पर वी. डी. टस से मस न हुआ। उसने तीन और दोस्त बना लिये । खुश भी था कि उसका नया धन्धा चल निकला था। हरीश जूहू- - वह फ़कीरों की एक वर्कशॉप चलाने और रोजी को याद करने और माई के अड्डे पर ठर्रा पीने और मछली के तले हुए कतले खाने ही को जिन्दगी समझ रहा था "शायद । रोजी कफ परेड पर अकेली थी। अलीमुल्लाह जोगेश्वरी के एक बेडरूम-हालवाले फ्लैट में अकेला था और उसी के साथ लेटी हुई यईदा विस्तर पर अकेली थी क्योंकि अली- मुल्लाह किसी दवा का इश्तिहार था.. खाने से पहले ! -पार्ले स्कीम के एक तीन बेडरूम-हाल वाले फ्लैट में अकेला था। उसके पास अपनी दो कारें और तीन रखैलें थीं। खुद उसे नज्मा ने रख छोड़ा था। पर वह अकेला था क्योंकि जिस फ्लैट में वह मालिकों की तरह रह रहा था, उस पर नज्मा की नेमप्लेट लगी हुई थी। हरीश अकेला है क्योंकि अलीम और अली अमजद की तरह उसने भी मार्क्सवाद से 'सिक लीव' ले रक्खी है। जिस दिन उसने 'रायल सैल्युट' पीना शुरू किया, उसी दिन उसने वी. डी. से मिलना छोड़ दिया। अली अमजद को यह बात बुरी लगी। पर वी. डी. ने यह बात भी हँसी में उड़ा दी। "अरे यार, इन बातों पर सोचने के लिए वक्त कहाँ है !" उसने 'चारमीनार' सुलगाने के बाद कहा, "जो मुझसे नहीं मिलता वह हम लोगों वाला हरीश थोड़े ही है। हम लोगों वाला हरीश तो यहाँ इस गन्दे १०२ / सीन : ७५ कमरे में सोच भी निरा करता था और जो भी लिया करता। इस हरीश को तो मोपने के लिए मन-एन-मंड का मुएट चाहिए"लिगने के लिए 'नोट ना' कलम चाहिए । पीने के लिए 'रॉयल मैल्युट' व्हिस्की चाहिए। सोने को डनलपिलो का गद्दा चाहिए और टॉप-क्लास को लडको पाहिए। गोली मारो हरीग को । मुझे एक डायलाग राइटर चाहिए।" "क्या चाहिए तुम्हे ?" अली अमजद चकरा गया। "डायलाग राष्टर।" वी. डी. ने कहा, "मेरे साथ काम करोगे?" "अरे, पर तुम्हें डायलाग राइटर की क्या जरूरत पड गयो ?" "एका डायलाग राइटर मे क्या काम बनेगा?" वी. डी. ने कहा, "आजकल मेरे पाम तीन डायलाग राइटर, दो डाइरेक्टर, पन्द्रह मेक-अप. मंन और चार ड्रेम-डिजाइनर काम कर रहे हैं। मैं तुम्हें राटिग डिपार्टमेंट का इन्चार्ज बनाना चाहता हूं अली अमजद ने पहली बार दी.डी. की तरफ गौर से देगा। उसके कपड़े अच्छे और माफ थे। जिम लाइटर से उसने अपनी 'भारमीनार जलायी थी, वह मोने का था। उमको ऐन का फेम मोपी का था। दाहिने हाथ को योचवाली उंगली में एक प्लटनिम की मिगनेट रिंग थी।... वी. डी. मुस्कुराया। बोला, "मैंने संकण्ड हैं। जिन्दगी का पन्या शुरू कर दिया है।" "फिल्म बना रहे हो क्या ?" "चूतिया हूँ कि फिल्म बनाऊंगा ! मैं भिसमगो वो एक वर्ष शोर चला रहा हूँ !" अली अमजद को यकीन नहीं आया। "दो हजार रुपये महीना दूंगा।" पी. डी. ने कहा, "सोच सो।" सोचना क्या था। अली अमजद चार महीनों गे बिन्कुल बैंकार था। जाहिर है, 'मगर' तो आयेगा बीच में । "वात क्या है कि भीख मांगने की तरफ अभी तक पई-लिग लोगों का ध्यान नहीं गया है ? अब तक यह पेट गुण्डों के हाथ में था और तुम जानो, गुण्डों में कोई ऐस्पेटिक सेंस तो होता नहीं। किसी की आंखें फोड़कर उसे अन्धा फ़कीर बना दिया। किसी की टाँगें तोड़ दीं.. वगैरा-वगैरा। एक दिन लेटे-लेटे लेन-वेव आ गयी कि भीख मांगने के काम को साइंटिफ़िक तरीके से आर्गनाइज़ किया जाये तो बहुत माल मिलेगा।..." पता चला कि वी. डी. ने इस सवाल की ऊँच-नीच पर बहुत सोचा है। काम जोखम का भी था। जो लोग बड़े शहरों में भीख मंगवाने का काम करते हैं, वह भला किसी वीरेन्द्र कुमार एम. ए. (इकोनॉमिक्स) को इस धन्धे में घुसने क्यों देंगे ! पर वी. डी. आदमी जिद्दी था। ठान गया कि मैं तो यही काम करूंगा। तो एक दिन वह हाजी फ़कीरा के पास यह प्रोग्राम लेकर चला ही गया कि यह काम उस धन्धे से मेल खाता था। उन दिनों हाजी फ़कीरा भी किसी नये धन्धे में पैसा लगाने की सोच रहे थे। यह वात बम्बई में हाजी फ़कीरा के सिवा कोई नहीं जानता था कि उनका असली नाम शिवमंगल प्रसाद है। पीलीभीत में तीन क़त्ल करके वम्बई भाग आये और शिवमंगल प्रसाद से हाजी फ़कीरा बन गये । दाढ़ी उग आयी । माथे पर सज्दे का निशान बन गया। हद तो यह है कि उन्होंने एक मामूली-सा आपरेशन भी करवा लिया कि किसी घपले का डर ही न रह जाये। दो-चार वरस में भिंडी वजार-महम्मद अली रोड-जे. जे. अस्पताल क्षेत्र में वह अच्छे-खासे मुसलिम लीगी नेता भी हो गये। कारपोरेशन का चुनाव हुआ तो लीग के टिकट पर चुनाव लड़े भी और जीते भी। पर उनका असली धन्धा था हाजियों को ब्लैक के भाव विदेशी पैसा देना और उनसे विदेशी माल मँगवाना। धीरे-धीरे उनका काम चल निकला तो उन्होंने एक फिल्म स्टारनी को डाल भी लिया और हज भी कर आये । पुलिस में उनका रुसुख दिन दुना, रात चौगुना बढ़ने लगा। अखिल भारतीय पीढी के नेता लोग उनके घर आकर चाय पीने लगे और अपनी-अपनी पार्टी के लिए चन्दा ले जाने लगे।.."तो समाज में उनकी इरजन बढ़ी। कई स्कूल कमेटियो के अध्यक्ष चुन लिये गये । अध्यक्ष चुने गये तो हस्ताक्षर करना सीखना पड़ा और ५ वी. डी. से उनकी पहली मुलाकात हुई। वी. डी. उन्हें बहुत पसन्द आया तो वह उनका सेक्रेट्री हो गया। उनके लिए तकरीरें लिखने लगा। और उसी ने उन्हें अंग्रेजी के १०४ / सीन : ७५ 1 पचास-साठ गाद ऐने याद करपापे fr जिन्हे या-101 में - फिमलाते रहने से वह पई-लिये मालूम होने गगे।"शा माता का चुनाव हुआ तो जनता ने हामो साहय के कतिको जोग.मोर दिया, क्योकि जनता जानती थी लिहामी फोरा ममता भगो भागी हैं । मिनिस्टरों मे उनकी दोस्ती है । अपोशिशत माती। पुलिस तनख्वाह सरकार से पाती है, पर कहा उनका मानती है... अब चूंकि थी. डी. की वजह से हाजी शाहप की गिनती मनोग पड़े-लिये लोगो में होने लगी थी, इसलिए उनके सरपार में उगको माग. जान भी बह गयौ थी। लोग अपने कामों के लिए जगणे गि 'नगे और उमसे डरने भी लगे और जल भीमगे।.."औरभीर पर हाजी साहब का एतयार भी माया रहा। उसके हाथ गे लागों होते, पर हामी माहप मेगमा यावजूद यह टिकूज नम्बर पोच गे निकगार 'गुर्गमगार Intein नहीं गया जो हाजी गाय ने उगी ये गिरीदा। बात यह है कि पी. डी. पहगान करने का दायरा उठाने के लिया था। कई बार हाजी गाय गे सफर पर (n.feer नम्बर पाच) में बैठ चुका था और वापिर आमित भागार ही आदमी भेजकर उमे युलवाते । मह पलीगपा पागोपन रावत भी किसी ऐसे ही दिन उमा ध्यान में थायी पी। हाली गरafrimar पर पफा हुए, यह नुनकर बोला, "नोकर। माRitem अपनी नौकरी। मैं चला ति।" "करेगा?" हाती माहब ने छायाकिया format ये, "पदकुमी रंगा कि भीग मानगा?" उस वक्त ना उमझी समझ में गगवायगावीचा माई के अड्डे पर पुाचा या मांगता Sir Amarathi काईनिंग मेंटर मांगने की मीम गदिमागमा अंग्रेजी में मागवारमादिपिमिरर दाना ही परंगा गि सर, मामय farmitt बाद दिन मनमोहगा Intentirit.- । क का खयाल उसे कम्पिटिशन के डरही से आया। "कमाल है।" हाजी साहव उसे देखकर हँसे, "तुम तो सुधर रहे हो। विना बुलाये ही आ गये !" "एक नया धन्धा समझ में आया तो सोचा कि पहले आप ही से पूछ लूं।" वी. डी. ने कहा, "आप मना करेंगे तो किसी और से बात करूगा..." हाजी फ़कीरा भला क्यों मना करते! और यूं 'वेगर्ज वर्कशॉप' खुल गयी। और तय यह पाया कि एक 'माल इंडिया वेगर्ज यूनियन' वनायी जाये। और यह यूनियन फ़कीरों को संघटित करने का काम करे। वी. डी. ने इस समस्या पर बहुत जी लगाकर विचार कर रक्खा था। उसका कहना था कि एक फ़कीर यदि एक ही क्षेत्र में भीख माँगता रहेगा तो थोड़े दिनों में लोग दूकानों के साइनबोर्डो और बिजली के खम्भों की तरह उसके आदी हो जायेंगे। नतीजे में आमदनी कम हो जायेगी। इसलिए उसका प्रोग्राम यह था कि फ़कीरों का बड्डा ही नहीं, उनका शहर भी बदलते रहना चाहिए। जैसे सरकारी अफसरों की बदली होती है, उसी तरह फकोरों को भी वदली होनी चाहिए। जो यूनियन का वफादार है उसे अच्छे सेंटर्ज़ में ट्रांस्फर किया जाये, जैसे : बम्बई, कलकत्ता, दिल्ली, काशी, प्रयाग, अजमेर और जो फकीर लीडरशिप से अकड़ने की कोशिश करें, उन्हें गाजीपुर, प्रतापगढ़ और इसी तरह के दूसरे सड़े हुए क्षेत्रों में सजा के तौर पर ट्रांस्फर कर देना चाहिए। हिन्दुस्तान के लोगों को भीख देने और भीख मांगने का बड़ा शौक़ है। जो भीख दे नहीं सकता वह किसी-न-किसी स्टाइल में भीख मांगने लगता है। यानी पूरी सामाजिक ज़िन्दगी भीख के धागे में पिरोयो हुई है, इसलिए यदि भीख का राजनीतिक प्रयोग किया जाये तो हिन्दुस्तानी गणराज्य 'वेगर्ड यूनियन के कब्जे में ला सकता है।" वी. डी. ने ऐसी पट्टी पढ़ायी कि हाजी फ़क़ीरा भारत गणराज्य के राष्ट्रपति होने के सपने देखने लगे। कि नाराम की जगह वही है। और यूं बी. डी. 'वेगर्जु वर्कशॉप' का करता-धरता बन गया। और वी. डी. । १०६ / सीन :७५ के दुश्मनों को भी यह बान माननी पड़ेगी कि वो. डी. ने उम 'वांगॉप' मे जी-जान में काम किया। पहले पह 'वकंगॉप' जोगेश्वरी के एक पुराने गैरेज में सोती गयी। यह गैरेज दो मंजिला था। नीचे एक साथ दो गैरेज । कपर तीन कमरे, एक छोटी-मी बालकनी और एकः मण्डास-कम-बायस्म । नीचे के एक गैरेज मे आफिम या। दूमरे में कस्ट्युिम मेवान, मेक- अप रूम और प्रापर्टी। ऊपर के तीनो कमरों में पलाम चलते थे। वी. डी. भीख मांगने को एक कमशियल आर्ट बनाना चाहता था। इसी लिए वह कुछ मवादलेखक, कुछ मेक-अप करनेवाले और एर-आप हारेक्टर रखना चाहता था जो फीरों को ठीक तरह से भीय मांगना मिखा सके। पहले तो फ़कीरों ने 'बैगजं वकंगाप' का कोई नोटिम नही लिया। परन्तु जब 'वर्कशाप' के फकीरों मे कॉम्पिटिगन हुआ तो फीरों ने देख लिया कि 'वर्कशॉप' वालो के सामने वह टिक ही नहीं मरते। तो धीरे-धीरे 'वर्कशॉप' की मेम्बरी बढने लगी और बी. डी. को एक कार के साथ दो बॉडीगार्ड भी मिले। क्योंकि फीरी का रैकेट चलानेवाले 'धक- साप' को आसानी में नहीं झेल सकते थे। दो-एक बार 'वकंगार' पर हमना भी हुआ । वी. डी को धमकाया भी गया। और यही हाजी फकीरा खाम तौर में काम आये। एक फकीर सेना' की स्थापना हुई और हाजी साहब उसके नेता हो गये ! उन्होंने एक प्रेस कान्फ्रेंस में कहा : 'ममाज और सरकार को चाहे यह अच्छा लगे या युरा, पर अपने देश मै करोड सवा करोड़ लोग मुमतकि तौर में, और तीन माई तीन करोड़ लोग टेम्पोररी तरीके से भीख मांगने का काम करते हैं। पानी फकीर ही मुमलमानो के बाद हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी माइनॉरिटी हैं और मुसलमानों और हरिजनो की तरह उन्हे भी यहां जीने और अपना कारोबार चलाने का पूरा अधिकार है। और मैंने उनरी मडाई लड़ने का फैसला किया है। आज मैं यह एलान करना चाहता हूं कि फीर मैना विरोधियों का मुंहतोड़ जवाब देगी..." और कुछ विरोधियों का मुंह जब मवमुच टूट गया तो फारी का सेंट चलानेवाले समझ गये कि 'वर्कशाप' ने सडना अपनी नामन " वुलवाना है'चुनांचे 'वर्कशाप' के पास बम्बई में भीख मांगने की मोनो- पली हो गयी। ."'अली अमजद हक्का-बक्का रह गया। उसने वी. डी. की तरफ़ देखा। वी. डी. देवताओं की तरह मुस्कुरा रहा था। "ट्राई करने में क्या हर्ज है यार?" वी. डी. ने कहा, "दो हज़ार रुपये महीना कम नहीं होते। सोच लो।" "ट्राई करता हूँ।" अली अमजद ने कहा। "तो कल ताजमहल में एक कमरा बुक किये देता हूँ। हरीश के साथ बैठ जाओ स्क्रिप्ट पर।" "हरीश के साथ ! "नाम के लिए उसका फ़ोर्थ असिस्टेंट वर्कशॉप में काम करता है।" वी. डी. ने कहा, "पर संवाद तुम लिखोगे तो तुमसे क्या पर्दा !" बात तय हो गयी। दूसरे दिन ताज में हरीश और अली अमजद की मुलाक़ात हुई। दोनों में से कोई सच बोलने को तैयार नहीं था। इसलिए तय हुआ कि दोनों ही वी. डी. के साथ फेवर कर रहे हैं। पुरानी दोस्ती है। दोनों ने कभी यह सोचा भी नहीं था कि वी. डी. इतना गिर भी सकता है । जब दोनों एक-दूसरे से यह बातें कह चुके और 'जिन और जिंजर' पी चुके, कोई चालीस-पचास फ़ोन करके लेखकों, कई प्रोड्यूसरों और डाइरेक्टरों को यह बता चुके कि वह 'ताज' से बोल रहे हैं जहाँ वह एक स्क्रिप्ट पर बैठे हैं, तब काम शुरू हुआ। हरीश और अली अमजद ने अभी हीरो यानी फ़क़ीर का नाम ही तय किया था कि वी. डी. का फ़ोन आ गया। "कौन, अमजद !" "हाँ।" "खबर आयी है कि शाहजहाँपुर में जबरदस्त हिन्दू-मुस्लिम दंगा हो गया है। इसलिए वह विहार के क त वाला स्क्रिप्ट अभी रहने दो। भुखमरी से लोग वोर भी हो चुके हैं। अरे, जब वम्बई ही में सैकड़ों लोग भूखे मर रहे हैं तो विहार के भूखों में कौन-से सुर्खाव के पर लगे हैं ! फिर १०८/ सीन: ७५ मुना है कि फिल्म वाले भी विहारियों के लिए जुलूस निकालनेवाले हैं। तो दिलीप कुमार, राजकपूर, देव आनन्द, राजेश सन्ना और धर्मेन्द्र के सामने हमारे आर्टिस्टों को कौन पूछेगा? तो जब तक फिल्म वाले विहारियों के लिए चन्दा मांगे, हम शाहजहांपुर के फमाद को क्यों नश कर लें। दो स्क्रिप्ट तैयार करो। एक भिंडी बाजार के लिए और दूसरा शिवाजी पार्क के लिए..." "अच्छी बात है।" "परमो तक शाहजहाँपुर से दोनों तरफ के सौ-सौ आदमी आ जायेंगे।" वी. डी. ने कहा, "कुछ बच्चेवाली औरतें भी मंगवायी है।" अली अमजद को एक जबरदस्त माइडिया आया। "यार, दो-चारजवान लडकियां भी मंगवा लो। रेप की कहानी अच्छी बनती है।" "रेप?" हरीश चौंका, "नही भर्द। फकीरिनो के रेप से किने हम- दर्दी होगी!" "फ़कीरिने नहीं । हिन्दू-मुसलमान लडकियो।" बी. डी. ने पहा । कमरे में मन्नाटा हो गया। शायद तीनों अपने-आपसे शरमा रहे थे। सायद तीनो यह नहीं जानते थे कि पोछे हटते-हटते वह यहां तक आ गये। शायद तीनो अपने-आपको पहचान नहीं पा रहे थे। शाहजहांपुर मां-वहन की गाली की तरह अश्लील हो गया था। "यार वी. डी. ...." हरीश कुछ कहते-कहते रक गया। "यह प्रोटेस्ट का मुग नहीं है।" वी. डी. ने कहा, "सिर नेहा कर वास्तविकता को ऐक्सेप्ट करना मोखो।..." फिर सन्नाटा। "या आरम- हत्या कर लो। तुम अली अमजद के किमी उपन्यास के पात्र नहीं हो कि लड़ते ही चले लाओगे। तुम तुम हो । मैं मैं हूँ। अली अमजद अली अमजद है। म तमाम लोग सोचते कुछ और हैं, करते कुछ और है। इसी कंट्राडिक्शन में हमारे जीने की मक्त है।" कोई कुछ नहीं बोला। अली अमजद ने दूसरा स्क्रिप्ट निसने के लिए मादा कागउ निकाल लिया। वी. डी.खड़ा हो गया। "चलता हूँ। फिल्म फेयर अवार्ड का चक्कर चलाना है।" "अवार्ड से तुम्हें क्या मतलब ?" अली अमजद ने जलकर पूछा। वी.डी. मुस्कुराया। "अखिल भारतीय बेगर्ज यूनियन में नौ लाख अस्सी हजार सात सौ वारह मेम्बर हैं। अवार्ड से मुझे मतलब नहीं होगा तो किसे मतलब होगा? आकाशवाणी और रेडियो सीलोन पर फ़रमाइशी गाने वजवाने की मोनोपली भी मेरे पास है । जिस म्युजिक डाइरेक्टर को कहो फ्लाप करवा दूं। अभी पिछले दिनों 'रैन बसेरा' फिल्म के खिलाफ़ मैंने ही आन्दोलन चलवाया था कि उसमें एक चोर का नाम वाल्मीकि था.. मैं क्या वालमीकि का रिश्तेदार हूँ। पर बड़े-बड़े प्रोड्यूसर और डाइरेक्टर, छेदीराम गवारा' के खिलाफ़ हैं कि उसने लो-बजड फिल्मों का चक्कर चला दिया है इसलिए बड़े-बड़े लोग उसकी फिल्मों की तारीफ़ करते हैं, पर एक 'एंटी छेदीराम गवारा फंड' भी है जो छेदीराम की फिल्में फ्लाप करवाने के लिए है । मैं एंटी 'छेदीराम युनाइटेड फ्रंट' की वकिंग कमेटी का परमानेंट इनवाइटी हूँ। अरे रे रे"दूसरी ज़रूरी वात भूल ही गया था। एक कैम्पेन के लिए डाइलाग की ज़रूरत है। हवा यह वाँधनी है कि राजेश खन्ना दिलीप कुमार से अच्छा ऐक्टर है।" "यह कौन मानेगा यार?" अली अमजद ने कहा। "कोई नहीं मानेगा।" वी. डी. वोला, "ऐटमास्फियर यह क्रियेट करना है कि राजेश खन्ना 'फिल्म फेयर अवार्ड' के लिए पैसे खरच रहा है। वह तो कर ही रहा होगा। पर 'बेगर्ज यूनियन' इस साल का अवार्ड मनोज कुमार को दिलवा रही है। आध घण्टे वाद वही मीटिंग है वी. डी. चला गया। हरीश लेट गया। "यार, यह किस चूतिया-चक्कर में फंस गये हम लोग ?" अली अमजद ने पूछा। हरीश थोड़ी देर तक अपनी अघखुली आँखों से उसकी तरफ़ देखता ११०/ सीन : ७५
रहा, जैसे उमके मवाल का जवाब सोच रहा हो। फिर बोला:
"हिन्दू लड़की का नाम लता रखते हैं।"
"अयें ?"
"सवाल यह है कि लता मायुर हो, कि लता गुप्ता।"
"यह हिन्दू लड़की कहाँ से आ गयो यार?"
"शाहजहांपुर से ।" हरीग ने कहा, "लता मिन्हा अच्छा नरहा है।
एकैया, सबीहा, किशवर और लता सिन्हा ।
देखते-देखते
मारे दिन की थकी धूप
इम गाम की झाड़ियों में कही खो गयी
और मैं
हिस के दर्द में मुवतला
अपनी परछाइयो से जुदा,
रास्ते पर अकेला खडा रह गया...
बली अमजद भी लेट गया। वह कंगा, मबीहा, रिसवर और नता
सिन्हा को याद कर लेने से पक गया था। याद कोई हकीपनी चीज
नहीं होती बादलों के गाले की तरह कि गुजर जाये और पता भी न बने।
हर याद गुजरा हुआ एक जमाना है और कोई उमाना हल्ला नही
होता।
अली अमजद ने मामनेवाले ड्रेसिंग टेबिल के आईने में अपना अक्स
देखा। यह अपने को पहचान न पाया। वहुत बदल गया था। तो उसने
आंखें बन्द कर ली । गुनगुनाने लगा:
जिनसे मैं छूट गया अब वह जहाँ कमे हैं
शाखे-गुल कैसी है
फूलों के मकां कैसे हैं
जिस गली ने मुझे सिसलाये थे आदाये-जुनूं
उन गली में मेरे पने के निगा कसे हैं?
माहरे-रमवाई मे चनती हैं हवाएँ कैसी
साख कमी है जवानों की
कीमते-चाके-गरीवा क्या है चाँद तो अब भी निकलता होगा चाँदनी अपनी हिकायाते-वफ़ा अव वहाँ किसको सुनाती होगी चांद को नींद न आती होगी मैं तो पत्थर था, मुझे फेंक दिया ठीक किया आज उस शहर में शीशे के मकाँ कैसे हैं... "यार, जब तक यह न पता हो कि उसकी उम्र क्या है, सूरत-शक्ल कैसी है, तव तक उसके बारे में सोचूं कैसे?" वहुत दूर से हरीश की आवाज़ आयी। "किसकी सूरत-शक्ल ?" अली अमजद ने चकराकर पूछा। "अरे यार वही, लता सिन्हा..." वही लता सिन्हा। तव तो वह चोवीस साल की थी। रंग साँवला। क़द लम्बा । चमकदार बड़ी-बड़ी आँखें, ন जिन छोटे-छोटे वालों के साये ने एक रात के सन्नाटे में चुपके से मेरे कमरे में आकर मुझसे वफ़ा का अहूद किया था। जिन होंठों ने मेरे सीने और चेहरे पर प्यार के अंगारे बोये थे। जिन गहरी-गहरी आँखों को मेरे होंठों ने चुपके से वन्द किया था। जिस पत्यर ने मेरे दिल में बैठके घर के स्वाव तराशे। उन पलकों, उन छोटे,वालों, होंठों, आँखों- और वेदार वदनवाली पत्थर की दिल-कश मूरत २१२ / सीन : ७५ हुए वाल.. . - .
बाना दादून मली है।
मैंने कमरे में,
गा,
परके चंचन मात्र को बनाने में लगा हूं
उनके बदन की बुगवू,
अपने बाल दिने
पादों का एक मंसामा परान पहने
इन कुरमी पर बैठे-बैठे उकतार गर उठ जाती है,
उन कुरमो पर बैठने फिर रोने साती है।
पहानी खतम । पंमा हजम ।
लता मिन्हा अली अमजद को जवानी याद थी.. अपने नाम कोता।
दूसरों के मूवमूरत शेरों की तरह। वह उसे गुनगुना पुरा। परन्तु गो
के खूबसूरत शेरों की सबसे बडी सरावो यह होती है कि भार उन्हें पर
गुनगुना सकते हैं। अपना नहीं सकते। मह सोचार उदास भी होतो,
कि वह दोर आपका क्यों नहीं है।
अली अमजद को लता सिन्हा से कोई शिकायत भी नही थी। उसकी
हूँ जिडी यह थी कि वह काना सिन्हा को पड़ी यन पी और महतो
मुमलमान से शादी कर लेती तो बान्ता के माह में भरपर पाती...fest
के आसपास भी कितनी पगडण्डियां होती हैं !
यह पगडण्डियां जंजीर बन जाती है और दिल की तरफ भागो
सपनों को जकड़ लेती है।
अली अमजद कान्ता की शादी का इन्तजार करने पर पारा
पर लता के दिल के पास से उसको बा मोबी पगरी भी गुजरती थी
और वह बड़ी बेटी को ब्याहे विना छोटी को पाने पर तैयार नहीं थी।
लता मिन्हा ने अली अमजद से बेवफाई नहीं। आतोमा
दिल मारकर, श्री वी. के. श्रीवास्तय, भाई.ए. एम. पाशमरी
और अली अमजद के दिल में सन्नाटा हो गया।
का जाव कि अब समयते-दिम, रालयत-दिप है।
बर दिल के पारने की भी मायाज गही ....
"एक मुसलमान भी तो है ?" हरीश ने पूछा । "हाँ।" उसने कहा, "किशवर।" "यह तो बड़ा खुबसूरत नाम है तो कहानी यह हुई, मध्यम वर्ग की रखते हैं उसे । वाप वकील था'.." "नहीं।" अली अमजद ने कहा, "किशवर का वाप लाजिक पढ़ाते थे। चूंकि लड़का लड़की से प्यार करता है, और लड़की लड़के से, इसलिए सावित हुआ कि मुहब्बत कोई अच्छी चीज़ नहीं है... "क्या ?" हरीश चकरा गया, “यह क्या लॉजिक हुई ?" "लॉजिक हुई हो या न हुई हो,” अली अमजद ने कहा, "दोनों की शादी नहीं हुई।" "हमे शादी से क्या मतलव ? बल्कि मैं, तो कहता हूँ कि शादी हुई। सुहागरात न मन सकी। वह बूंघट उठा ही रहा था कि बलवाई घुस आये। पति मार डाला गया और पत्नी को चौबीस आदमियों ने क्यू बना कर रेप किया।" "विला वजह । बल्वा हुआ ही नहीं था। किसी और से उसकी शादी जरूर हो गयी । भला-सा नाम है उसके पति का । मुहम्मद अब्दुल्लाह खां, सिविल इंजीनियर, मुरादाबाद !" "मुरादाबाद !" हरीश बोला, "मुरादावाद नहीं यार, शाहजहांपुर । कुछ और सोच रहे हो क्या ?" "नहीं। मगर उसका नाम किशवर था। वह इलाहाबाद की थी और उसकी शादी मुरादाबाद के सिविल इंजीनियर मुहम्मद अब्दुल्लाह खां से हुई थी। और..." वह चुप हो गया। "और क्या ?" "और यह कि मैं फिर अकेला रह गया।" कमरे में फिर सन्नाटा छा गया। और फिर थोड़ी देर बाद अली अमजद हरीश को कमरे के सन्नाटे के साथ अकेला छोड़कर चला गया। वह कहीं अकेला बैठकर जिन्दगी का वही-खाता ठीक करना चाहता था। वी. डी., अलीमुल्लाह, हरीश... रुकया, सवीहा, किशवर, लता सिन्हा । - ११४ / सीन : ७५
भोलानाय, रमा चोपडा, मिसेज बमा, पोटर उर्फ रामनाय लेगक..
अली अमजद ने अपने आपको नामो के एक घने जंगल में अकेला
पाया "यही हाल सबका है। सभी नामों के जगल में अपने व्यक्तित्व के
टूटे हुए आईनो में हजार सिरोवाले राक्षम बने सड़े हैं और अपन-आपको
इरा रहे है । आगे कोई बल नहीं। गुजारे हुए कल की दीवार से पीठ
लगाये सभी अपने वर्तमान की तरफ हरी हुई निगाहों से देख रहे हैं ।
बीते
हुए कल के सिवा जैसे कोई सच्चाई ही न रह गयी हो !
अली अमजद बहुत देर तक नामों के जंगल में भटकता रहा। और
सोचता रहा कि जीने और न जीने में क्या फर्क है! "वम्बई इस सवाल
से वेसवर अपनी सड़को पर, उसके चारों तरफ, अपनी भाग-दौड़ में लगी
बम्बई!
आव,
हम-तुम चलें
.
नीद के गांव में
धुन्ध के शहर में सारी परछाइयां सो गयी।
इस पसीन के गहरे समुन्दर के साहिल पै टूटी हुई
सारी अंगडाइयां सो गयी।
शोर कम हो गया।
कहकहे सो गये।
सिसकियों सो गयी।
--सारी सरगोशियां मो गयी।
रास्ते,
चलते-चलते,
घरों में समाते गये।
शहर अकेला सहाहा गया।
क्यों न हम इस अकेले, मटरते हुए सह को मापने पर्ने,
नौद के गांव तक।
रात ढलने लगी।
बांस जलने लगी। लफ्ज़ खुद अपनी आवाज के बोझ से थक गये। श्राव सरगोशियों की रिदा ओढ़ लें पाव सरगोशियों ही को रस्ते-सफ़र की तरह बाँध लें। परन्तु अली अमजद के पास सरगोशियाँ थीं ही नहीं। कोई नींद के गांव तक साथ जानेवाला भी नहीं था. "सड़कें जाग रही थीं। परापेट के उघर सागर जाग रहा था। बड़ी-बड़ी विल्डिंगों में रोगनियाँ जाग रही थीं।...बी. एस. टी. की बसें जाग रही थीं."बस, माई का अड्डा सो रहा था क्योंकि वहाँ समाज-कल्याण केन्द्र का ऑफिस खुल गया था। और भऑफिस शाम को बन्द हो जाते हैं। मिस्टर और मिसेज़ डिसूज़ा मंगलौर वापस जा चुके थे!... उसी रात उसे पता चला कि कुछ भीख मांगनेवालियों की दर्द-भरी कहानियां सुनने से शहर के कुछ क्षेत्र में हिन्दू-मुसलमान तनाव पैदा हो गया । एक-आध झड़पें भी हुई और वी. डी. मारा गया। अली अमजद को गालिब याद आ गये। मारा जमाने ने असदुल्ला खाँ तुम्हें ! वी. डी. जो यूं न मरता तो उसकी मौत वेमजा लगती। अव पता नहीं 'डिक्रूज' के उस कमरे में कौन रहेगा ! ...पहले दरवेश की कहानी खत्म हुई । वाकी तीनों दरवेश अपनी बारी के इन्तिज़ार में हैं। मिरज़ा ग़ालिव ने हरगोपाल तफ्ता को एक खत में लिखा था : "मुझको देखो, न आजाद हूँ न गिरफ़तार 'न खुश हूँ नाखुश । न मुर्दा हूँ न जिन्दा। जिये जाता हूँ। वातें किये जाता हूँ। रोटी रोज़ खाता हूँ। शराव गाह-गाह पिये जाता हूँ। जव मौत आयेगी मर रहूंगा । न शुक्र है । न शिकायत..." यह खत वी. डी. भी लिख सकता था। यह खत हरीश भी लिख सकता था। अली अमजद भी लिख सकता था... रात की कोई ग़ज़ल हो तो वही गाव कि इस सुवह के पास ११६ / सीन :७५
कोई नगमा,
कोई आवाज नहीं
न उभरता हुआ मूरज है
न हूबा हुआ चाद
रात के वन की तरफ
मुंह किये
हैरान
परीशान
खडे हैं हम लोग...
माम रोके हुए बैठी है हर एक राहगुजर
कोई आता ही नहीं लेके तमन्ना पी रासीय
मस्त हालात को पत्यर-सी जमी पर गिरकर
कहकहे पोशे को मानिन्द हमी,
दिल की तरह नाजुक थे,
कहकहे टूट गये।
हौसले पस्त हुए
रात-भर जागी हुई आँखों में
सुवह को तरसी हुई आँखों में
सिर्फ जलते हुए सम्हों को सपिग
एक वेनाम खलिस।
"जवान जरा मुश्किल है।" हरीश ने कहा, "लोग समझ नही गगरो।"
"कौन लोग?" अली अमजद ने पूछा, "यह लोग जिन्होंने यी.सी.
को मारा?"
"नहीं।" हरीश ने कहा, "यी. डी. को सो पड़े-लिग लोगों ने मारा।
जिस सीन मे वी. डी. करल हुआ यह मेरा लिपा हुमा पा और उसके
संवाद तुमने लिखे थे।"
पिछले दस-बारह दिनों से वह यही यान अपने-आप हिलाए
या। और शायद अपनी मासों में धूल भोंकने के लिए उसने या मपिता
भी लिसी थी। इसीलिए यह मल्ला गया।
।
- "न तुमने वह सीन लिखा था न मैंने वह संवाद।" उसने कहा, हमसे वी. डी. ने लिखवाया था और इस काम के पैसे वाकी हैं।" अली अमजद खुद ही अपनी बात पर तिलमिला गया। हरीश ने उसके गिलास में वोतल की बची-खुची व्हिस्की उड़ेल दी। "वी. डी. और वाकी पैसों को गोली मारो यार। शराव पियो।" अली अमजद पी गया और नीट व्हिस्की की कड़वी मजेदार गर्मी उसके सारे वदन में दौड़ गयी। उसे नशे से ज्यादा यह गनगनाहट पसन्द थी। इसीलिए वह अपनी शराव में पानी या सोडा नहीं मिलता था" वाकी तमाम चीज़ों में तो मिलावट है ही। दूध से लेकर राजनीति तक, विना मिलवट के वाज़ार में कुछ नहीं मिलता। शराव का भी कोई भरोसा नहीं। वोतलें असली होती हैं, शराव नकली.. तो फिर उसमें पानी या सोडा मिलाने से क्या हासिल ? "तो साबित यह हुआ कि मार्क्स इज़्म-विज्म में कुछ नहीं रक्खा है।" अली अमजद चौंक पड़ा। हरीश न जाने क्या-क्या कहकर इस नतीजे पर पहुँचा था । परन्तु वह यह नहीं कहना चाहता था कि उसने हरीश की वात ही नहीं सुनी। इसलिए होंठों में एक सिगरेट लटकाकर, माचिस ढूंढ़ते हुए बोला : "इसमें मार्क्स इज़्म का क्या कुसूर है ?" "मार्क्स इज़्म का कुसूर यह है कि हम उनसे अच्छे नहीं हैं, जिनके खिलाफ हम तक़रीर झाड़ते हैं। वी. डी. एक जमाने में जिला कमेटी का सिक्रेट्री हुआ करता था। स्टूडेंट फेडरेशन का नेता हुआ करता था। विलकीस बुखारी का आशिक हुआ करता था और मरा तो भीख मांगने का रैकेट चलाते ।" "विलकीस बुखारी तो बड़े मशहूरों में हुआ करती थी।" अली अमजद ने कहा, "दस-बारह दिन मुझ पर भी आशिक रह चुकी है। क्या चीज़ थी खुदा की कसम ! सब जानने थे कि वह किसी की नहीं। पर सव उसके इशारों पर नाचा करते थे। वह बहुत-से लड़कों को ले आयी स्टुडेंट फेडेरेशन में।" "तुम्हें भी ?" ११८ / सीन : ७५
"नहीं। म जरा पहले आ गया था।"
"मुझे तो वही लायी।"
"तुम्हें कितने दिनों बाद पता चला कि..."
"पलट थी साली।"
"पर थी बडी मजेदार। बिस्तर पर माय लेटती तो लगता कि सुबह
का टण्ठी हवा साय लेटी हुई है..."
वी. डी. की बात खुद-व-सुद खत्म हो गयी। बिलकीस युसारी की
वात होने लगी।"और जव गराव की दूसरी बोतल आधी रह गयी तो
दोनो यह बात भूल चुके थे कि वह अपने दोस्त वी. डी. की मौत का गम
गलत करने के लिए गराब पीने बैठे थे।
गम कोई हिमाव थोडे ही है कि गलत या सही होगा ! गम तो एक
वास्तविकता है। जिन्दगी की तरह । या शायद मौत की तरह । मौतें भी
तरह-तरह की होती हैं। एक मौत वी. डी. को भी है। और एक मीत वह
भी है जिने अली अमजद और हरीम अपनी ज़िन्दगी ममझ बैठे थे। और
एक मौत माई के अड्डे की भी है.. और एक मौन उन अच्छी कहानियों
की भी होती है जो बुरी हिन्दी फिल्म बनने के लिए फेमम महालक्ष्मी के
किसी आफिस या पाली हित और जूहू-पारले-म्कीम के किमी गले के ऐमै
ड्राइंगरूमों में वेची और खरीदी जाती हैं जिनमें उनके मालिको के व्यक्तित्व
का पता नहीं चलता।
मौत!
पाम तक सुबह से जी ऊब गया।
दिल भी सूरज की तरह डूब गया।
मौत !
मौज-दर-मौज है दद।
आस पट्टी से लगी बैठी है।
वक्त के हाथ हुए जाते हैं सदं ।
आस्मां खाली है,
मूरज है,
नचांद।
चाँदनी आंखों की अफ्सुरदा है। धूप चेहरे की है मांद दिल की धड़कन में किसी और की चाप । और वह, जिसका कोई रंग, कोई रूप नहीं। दिल के आंगन में कहीं धूप नहीं। अली अमजद घर आ गया। वी. डी. तो मरते ही रहते हैं। उसे सीन लिखना था। खिड़की की सलाखों के उधर ग्रिल के पार, नारियलों के झुण्ड तक उतरकर चाँद रुक गया था. कमरे में गयी रात का सन्नाटा था। भोला- नाथ खटक और रमा की लड़ाई खत्म हो चुकी थी। अली अमजद ने फिर लिखना शुरू किया। वही सीन ७५ । वही डाकखाना। वही मुंशी सड़क । वही अवुलखैर की अम्मा और वही खत । अवुलघर को मां: "और अवुलखैर के अब्बा को मालूम होय कि हियां सब खैरियत है। दू महीने से हम्में सांझ के वखत हरारत हो जा रही। अवुलखैर के बड़के वेटे को काली खांसी है। छोटके को माता निकली हैं। ओकी दुलहिन को कानी कोन विमारी हो गयी है। पता ना चल रहा । अवुलखैर को एक ठो माटीमिला टकसीवाला धकिया दिहिस। टॅगरी की हड्डी दू जगह से टूट गयी है। पलस्तर चढ़ गया है। उमीद है कि उहाँ भी सव खैरियत होगी। (मुंशी सड़क मुस्कुरा देता है।) मुंशी सड़क : सब तो बीमार हैं। फिर खैरियत क्यों लिखवा रही हो ? (राजा की आवाज़ आती है।) । राजा: खैरियत का मतलब अब ई है मुंसी सड़क, कि मरे नहीं जिन्दा हैं। १२० / सीन : ७५
(मुंगी उदासी मे राजा की तरफ़ देखता है।)
मुंशी:
पोस्ट आफिस पर बंटके खत लिखना शुरू किया तो जाना कि अपने
देश में दुख बहुत हैं।
राजा:
धीरे वोल । नही तो दुख साले पर मो टैक्स लग जायेगा।...
अली अमजद लिखते-लिखते रक गया। उसने आखिरी सवाद कई
वार पढा"
फिर उसने आखिरी संवाद को काट दिया। उसकी जगह उसने दूसरा
संवाद लिखा।
राजा:
चलो मुंशी सडक । कोई चीज तो साली जियास्ती है देस में।
उसने इस संवाद को भी काट दिया। उसने तीसरा संवाद लिखा
अरे दुख-मुख तो सब तकदीर का चक्कर है मुशी सडक । तुम साला
खत लिखे जावो और अपने पचीस पयसे सीधे किये जाव!
यह भी नहीं जंचा। उसने चौया संवाद लिखा।
राजा:
तुम साला मुशी सड़क है । कोई भगवान नहीं है। तुम साला सत लिख
रहा है । तगदीर नहीं लिख रहा है।
(मुंभी सड़क राजा की तरफ़ देखता है और थूक लगाकर अवुलखर
को मां का लिफ़ाफ़ा वन्द कर देता है।)
(कट)
मीन खत्म हो गया।
रात वाकी थी। कमरे के अन्दर और बाहर गयो रात का सन्नाटा
उसी तरह या। खजूरों का झुण्ड चुप था। पुराने किले का खव्हर चुप
।
था।
अली अमजद ने 'सोन :७५ को पढ़ा। कटी हुई लाइनों को पढ़ा। फिर
सीन :७५ /१२१
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1 डिज़ाल्व अली अमजद के मरने की खबर किसी पत्र मे नही छपी, क्यो कि जिन्दगी ही की तरह उसने मरने के लिए भी बुरा वक्त चुना। सधेरे के साडे तीन बजे मरना बड़ी वेवकूफी की बात है। 'स्टाप प्रेस' समाचार में भी जगह नहीं मिल सकती। उसके नौकर फर्नाडिस को साढ़े तीन बजे के करीब ऐसा लगा कि जैसे कोई उसे पुकार रहा हो । उसे जागने में कुछ देर लगी। वह जागा तो आयाज वन्द हो चुकी थी। वह फिर सो गया। साढे दस के आस-पास जब वह चाय की प्याली लेकर अली अमजद के कमरे में गया तो उसने देखा कि वह पलंग से नीचे गिरा हुआ है। फ़र्नाडिस की जगह कोई और नौकर रहा होता तो उसके हाथ-पांव फूल गये होते । पर फर्नाडिस समझदार आदमी था। पेरी मेसन, कार्टर पाउन, अगाथा फ्रिस्थी, आएन फ्लेमिंग, पोटर शेनी गरज कि वह उन तमाम लेखकों को पढ़ चुका था जिनको कहानियो चुरा-चुकाकर अली अमजद और दूसरे कई लेखक मशहूर फिल्मी लेखक बन चुके थे। वैसे तो वह मंगलोरियन था। परन्तु हिन्दी के एक लेखक के यहां नौकरी करने को कारण उसे भी साहित्य का चस्का पड़ गया था। वह अक्सर सवेरे की चाय पिलाते हुए या रात का खाना खिलाते-खिलाते अपना एक-आप 'आइडिया' अपने 'सहिबा' को सुना दिया करता था। उसकी हर कहानी गुरू एक ही तरह से होती थी, "साहब, रात नीद नई माता था। तो एक ऐडिया आ गया "विल्कुल हटके है ये ऐडिया।.." अली अमजद चुपचाप सुनता रहता । इसीलिए तो वह भली अमजद से प्यार करने लगा . , । फन्दा पटयालवी, रामनाथ बनारसी और कमाल अमरोहवी ने साना चाहा, पर वह किसी के चक्कर में नहीं आया। सहिवा साला प्यार करनेवाला सेठ अक्खा वम्बई कैयसा, साला अक्खा में नहीं है.' उसे एक दस सौ दस रुपये महीने की नौकरी कुवुल थी ह अपने सहिवा को छोड़ने पर तैयार नहीं था।... रामनाथ बनारसी के पास एक मरसिडीज़ कार और एक चौबीर स की प्राइवेट सेक्रेट्री थी-जो उर्दू-हिन्दी नहीं जानती थी। परख मनाथ उर्फ पीटर बनारसी भी यूंही-सी हिन्दी-उर्दू जानता था जर्नाडिस को वह सेक्रेट्री अच्छी भी लगती थी। जो वह रामनाथ वना के साथ टीम बना लेता तो शायद वह भी एक कार और एक सेक्रेट्री रख लेता। फन्दाजी ने तो उसे हज़ार रुपये महीने की नौकरी भी ऑफ़र की, पर फन्दाजी में वह सहिवावाली बात नहीं थी। वह अली अमजद के लिए माउंट मेरी और माहिम चर्च पर नोवीना करता। हर संडे को कैंडिल जलाता और उसे अपनी कहानियां सुनाता और जब अली अमजद आखिर मुस्कुरा देता तो फ़र्नाडिस की ज़िन्दगी का कोई मतलव निकल आता इसलिए जब फ़र्नाडिस ने यह देखा कि उसका सहिबा उसे छोड़ गया त पहले उसे यक़ीन ही नहीं आया कि सहिवा ऐसी धोकाधड़ी भी कर सक है। उसका जी चाहा कि वह सहिवा को झिझोड़कर पूछे कि उसने ऐ धोकाधड़ी क्यों की। परन्तु वह चेज़ और पेरी मेसन और किस्थी को चुका था। इसलिए उसने कमरे की किसी चीज़ को हाथ नहीं लगाया वह किचन में बैठकर रोने लगा। जासूसी उपन्यासों में उसने यह था कि पहले पुलिस को फोन करना चाहिए । पर पेरी मेसन उपन्यासों में पहले पेरी मेसन को फोन करते हैं । तो पेरी मेसन को वी. डी. मर चुका है। अलीमुल्लाह के पास फोन नहीं है। हरीश । और उसकी जिस फिल्म का प्रीमियर है, उसका ना 'पलकों की छांव' है, पर वह पेरी मेसन ही की एक कहानी से कहानी है। 'द केस ऑफ़ द क्रूकेड नोज'... तो फ़र्नाडिस ने हरीश को फोन किया, "साब ! सहिब गया।" में
हरीश सन्नाटे मे मा गया । पलंग पर पड़ी हुई नंगी लड़की ने एक
सिगरेट जलायी। यह कोई नयी लड़की थी। हरीश की किसी वननेवाली
फिल्म की साइड हीरोइन ।
हरीग ने उसकी तरफ देखा। उसके नंगे ददन पर यासे फेरी । गुजरी
हुई रात का मजा ताजा हो गया ।
"पुलिस को फोन कर दें साव?" उपर से फर्नाडिस ने पूछा।
"नहीं।" हरीश ने कहा, "पुलिस को मैं फ़ोन करूंगा। मैं अभी आता
वात खत्म हो गयी।
हरोग चक्कर में पड़ गया। यदि अली अमजद के मरने की सबर
फैल गयी तो प्रीमियर चौपट हो जायेगा।
"प्राव न हालिंग।" नंगी लडकी बोली, जो जागने के बाद से अब
तक न जाने कितनी वार, दिल-ही-दिल में हेमा मालिनी बन चुकी थी।"
हरीश ने कोई जवाब नहीं दिया। उसे प्रीमियर को फिक पी।
अली अमजद उसका दोस्त था।
उसने असिस्टेंट इंस्पेक्टर जोग को फोन किया, "पार जोग साहब,
एक बड़ा चक्कर हो गया।"
"क्या वह मैरिड निकली?" जोग ने पूछा।
हरोग हंस दिया।
"वह बात नहीं है।"
"फिर? वाई द वे, प्रीमियर के दो कार्ड पोर मिल सकते हैं ?"
"मुझे तो प्रीमियर ही होता नही दिखायी देता।"
"क्यों ?" नंगी लड़की ने पूछा।
"ओह ! पाट अप।"
"व्हाट?" जोग ने पूछा
"यार, यह लड़कियों को अक्ल कव यायेगी ?"
"नो होप।" जोग ने कहा, "तड़कियों को अक्ल आ जाये तो सरकार
फैमिली प्लानिंग पर खर्च होनेवाले करोड़ों रुपये बवा ले।" जोग अपने
मजाक पर जो खोलके हैंसा।
सोन: 02/२१
।
तो अमजद से मिलाया था न मैंने तुमको ?"... ह राइटर?" !" ।" हाँ-हां यार, याद आ गया। बड़ा मजेदार आदमी 'उसी का तो चक्कर है।" हरीश ने कहा, "आज ही प्रीमिर वह मर गया । समझ में नहीं आता क्या करूँ?" "मर कैसे गया ?" "पता नहीं। मैं अभी वहीं जा रहा हूँ।" "कहाँ जा रहे हो ?" नंगी लड़की ने पूछा। "मैं भी आता हूँ।" जोग ने कहा। "मैं कोई आधा घण्टे में पहुँचूंगा। अभी शेव तक नहीं किया है! वात खत्म करके हरीश सीधा वाथरूम की तरफ़ भागा। दाढ़ी वनाये विना घर से बाहर न निकलना उसकी ज़िन्दगी का उसूल नम्बर एक था। उसकी ज़िन्दगी का कोई और उसूल था ही नहीं। फिर वह यह भी जानता था कि अली अमजद की मौत पर उसे कोई- न-कोई वयान भी देना पड़ेगा । और एक मरतवा घर से निकलने के बाद उसे सोचने का मौका मिलनेवाला नहीं। यह वह अच्छी तरह जानता था। आईने में उसने अपने चेहरे को उदास बनाकर देखा। उसे अपन उदास चेहरा अच्छा नहीं लगा। उसने आंखों को और उदास कर लिया अली अमजद मरा नहीं, कत्ल किया गया है। और उसे कत्ल कि है इस जालिम समाज, वेमुरव्वत हालात और इस वेदर्द फिल्म इण्ड ने... उसने गरदन झटक दी। वयान का यह स्टाइल उसे अच्छा नहीं ल मेरा दोस्त अली अमजद एक आदमी की तरह जिया और हिन्दी फिल्म की तरह बिला वजह, खत्म हो गया।" दाढ़ी बनाते-बनाते उसने अपना बयान तैयार कर लिया। और जव वह अली अमजद के फ्लैट में दाखिल हुआ तो वह बिल्कुल + नहीं था। C |सीन : ७५
पनांडिस रो रहा था।
फिर जोगना गया। और तब हरीश उनके मार से अयर :-
रूम में गया।
अली अमजद पलंग के नीचे पड़ा हुआ था।
"मर चुका है।" जोग ने कहा।
हरीश ने अनी अमजद की सास की तरफ देशा।
"फिकर न करो।" जोग ने कहा, "मैं पोस्टमार्टम नही होने दूंगा।"
"नहीं।" हरीश ने कहा, "दोस्ती अपनी जगह है। पावन अपनी जगह
है। पोस्टमार्टम जरूर करपाव ।"
हरीश यह सोचकर घबराया था कि जो पोस्टगारंग गाभा तो हो
प्रीमियर के समय अली अमजद के दफन-कफन हो रहा होगा और का
असी अमजद के दफन-यफन को मिरा नहीं करना पाहाया। "आर
आल, यह मेरे दोस्त की लारा है।" उसने अपने-आपसे कहा, "प.in.
मोर, अली अमजद कभी यह न पाहता कि उसरी पात्रो ओंकी
छांव' का प्रीमियर न हो जब कि गुजराल साहम सास इस प्रीमिमा रे
लिए दिल्ली से आ रहे हैं.. और प्रीमियर के बाद साज इंटर कामिना
में कॉकटेल पार्टी है !"
"तुम्हारी मरजी।" जोग ने बाहा, "फोग किधर है ?"
"किचन में।"
जोग ऐम्युलेंस के लिए फोन करने पना गया। और जप ऐपुग
आयी तय 'सुरसिंगार हाउसिंग मुसापटी प्राइवेट लिमिटेड' के लोगों को
पता चला कि अली अमजद मर गया है।
रमा चोपड़ा फ़ोरन फोन घुमाने घट गयी। पहपा फोर उगने गिगेर
मिढा को किया, "एक गल गुनो, मैं कया, भनी अमजद आएग
लास्ट नाइट।" और फिर वह रायमुर रोने लगी।
रमा उस अली अमजद के लिए रो रही थी जो उगरायो गीपा,
"हाय विचारा। मीणा मुंहा था..."
पटकजी तौलिया बांधे वापरूम से निएम भा। उन्होंने मा
यात फाटके मनचन्दानीमा नम्बर डायम किया, "यो।"
हलो।" उधर से मिसेज़ मनचन्दानी बोली।
"वह तुम्हारा किरायादार रात मर गया।"
"क्या? कैसे मरा?"
"कैसे भी मरा हो। मुझे वह फ्लैट चाहिए। वेचना हो तो वेच दा।
राये पर देना हो तो वह भी चलेगा। पगड़ी लेनी हो तो वह कहो
क है। नहीं, शाम को नहीं। शाम को तो कफ़न-दफ़न में जाना पड़ेगा
कल सवेरे मिलता हूं
"शरम नहीं आती?" रमा ने कहा, "वह विचारा तो मरा पड़ा
और तुम फ्लैटां दी गल कर रहे हो !"
"तुम्हें इतना दुख क्यों हो रहा है उसके मरने का...?"
"आशिक था न मेरा।"
"क्या पता, रहा ही हो..."
फ़ोन की घण्टी बजी। खटकजी एकदम से भोलेनाथ बन गये।
"हलो।" उन्होंने प्यार से कहा।
"जी, मैं रामनाथ वनारसी बोल रहा हूँ। यह अली अमजद के वा
में क्या सुन..."
फ्लैट से निकलकर देख क्यों नहीं लेते?" वह भोलेनाथ
खटकजी बन गये। रमा से वोले, "उस हरामी दा पुत्तर के वास्ते अ
धरां विच रोणा-धोणा नहीं होयेगा..."
वह तौलिया बांधे-बांधे बाहर चले गये। वाहर सुसायटी के कई
खड़े थे। अली अमजद ही की बात हो रही थी। 'सुरसिंगार ह
सुसायटी प्राइवेट लिमिटेड' के पन्द्रह वरस के इतिहास में आत्महत्या
या शायद सीधी-सादी साधारण मृत्यु की यह पहली मिसाल थी।
इतने लोगों को देखकर खटकजी फिर अन्दर लपक लिये।
की शर्ट और जैतूनी वेलवाटम पहनकर, पांच सौ पचपन की ए
दवाये वह फिर आ गये।
वही लोग वहीं खड़े थे। और बातें यह हो रही थी कि
के घर से कोई तो आयेगा। कालीन अच्छा है। और उस का
।
लोगो की निगाह थी। रमाजी अन्दर सचमुच रो रही थी, उस तक भी कालीन की बातें आ हो गयी। उसने दरवाजा खोलकर, रोयी हुई लाल आंखो से लोगो की तरफ देखा। "उम कालीन की बात तो दो दिन हुए, में भाई साब से कर चुकी थी, वह कहते रहे कि में बहन से दाम नहीं लूंगा। मैं टिकी रही कि दाम तो मैं जरूर दूंगी। आठ सौ पर वात ठहर गयी थी।" "रमा मे तो स्वर्गीय अली अमजद को बड़ा प्यार था। क्या आदमी पा साहब ! मुसलमान लगता ही नहीं था । "अभी कोई दस-बारह दिन हुए, एक कटग्लास का वाज है ना ड्राइंगरूम में, मैंने तारीफ कर दी। वस, सिर हो गये कि ले जाओ. मैंने बहुत टाला। पर वह जिद कर गये। तो मैंने कहा, अच्छा अपनी वर्षगांठ पर ले लूंगा।" "वाज़ साला तो अपन से गिरके टूट गया।" फर्नाडिस ने आंसू पोंछते हुए कहा, "दू महीना से बेसी हुआ।" मिसेज वर्मा के सिवा किसी ने सटक की तरफ नहीं देखा। पर सब चुप जरूर हो गये। ठीक उसी वक़्त ऐम्बुलेंसवाले, जोग के पीछे-पीछे स्ट्रेचर पर अली अमजद की लारा लेकर निकले और 'सुरसिंगार हाउसिंग मुमायटी प्राइवेट लिमिटेड' के लोगों के बीच से गुजर गये। तव हरीश निकला। "नांडिस, घर का खयाल रखना । लाग तो कल दोपहर से पहले नहीं मिलेगी..." "जी साव।" "दफन-कफन तो कल शाम ही को होगा।" "जी साब।" "मैंने तो बड़ी कोगिरा की कि लारा का पोस्टमार्टम न हो।" हरीश ने सुमायटीवालों से कहा, "जोग मेरा दोस्त भी है । पर अपनी नौकरी को सतरे में तो नहीं डाल सकता। बोला कि मरनेवाला मशहूर आदमी था। उसकी आत्महत्या की खबर छिप नही सकती।"
त्महत्या?" कई लोग एकसाथ वोल पड़े। श ने जवाब देना मुनासिब न जाना । वह कन्धे झटककर आगे बढ़ र तेजी से सीढ़ियाँ उतरता सड़क पर आ गया। मने सागर ठहरा हुआ था। दो-तीन बच्चे एक-दूसरे के आगे-पीछे रहे थे और हरीश की 'नोवा' अपनी चमचमाती लाल पालिश में सागर र खड़ी हुई थी। और वह अली अमजद से फ़ारिग़ हो चुका था। हरीश को, यकायक, 'पलकों की छाँव' के प्रीमियर ने दबोच लिया। नहीं यूसुफ साहब आयेंगे या नहीं ! तय यह हुआ था कि दिलीपकुमार मेहमानों से 'पलकों की छाँव' के युनिट का परिचय करवायेंगे। धर्मेन्द्र, राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन को भी संभालना पड़ेगा। धर्मेन्द्र तो खैर फिर भी सादा आदमी है । हँसमुख । आमतौर से बुरा न माननेवाला। अमिताभ का भी ऐसा प्रावुलम नहीं था। पर राजेश खन्ना? इनफ़िरिया- रिटी कमप्लेक्स है कमवस्त को.. हरीश ने कार स्टार्ट कर दी। प्रीमियर नौ बजे रात को था। सात ही वजे से भीड़ लगने लगी। पहले पुलिस आयी। फिर लोग आये। तमाशाई स्टारों की कारें पहचानकर घिराव करने लगे कि एक सी रुकी। खटक और मिसेज़ खटक । खटकजी ने सूट पहन रखा थ हार रमा के गले में हीरे का वह पेंडेंट जगमगा रहा था जो उसने खा इसी मौके के लिए मिसेज़ मिढा से उधार लिया था। मिस्टर वर्मा न आये । मिसेज़ वर्मा आयीं। तोलाराम दलाल अपनी सिक्रेट्री समेत आय रामनाथ वनारसी आया। पंचारण मिश्र आये। अलीमुल्लाह आया वह तमाम लोग आये जिन्होंने अली अमजद के ज़रिये प्रीमियर के इन शन प्राप्त किये थे... सारा हाल खचाखच भरा हुआ था। बस, एक कुरसी खाल परन्तु भीड़-भड़क्के में किसी ने उस खाली कुरसी की तरफ ध्या दिया। वह कुरसी फिल्म के पटकथा लेखक सैयद अली अमज तिरमिजी वारहवंकवी की थी! "अली अमजद नज़र नहीं आया ?" कॉकटेल पार्टी में अब .
ने हरीश से पूछा।
"हो।" हरीश ने कहा, "वह कल रात किसी वस्त मर गया।" यह
कहते-कहने वह एकदम से मुस्कुरा दिया, क्योंकि एक फोटोग्राफर पास सड़ी
हुई हेमामालिनी के साथ उनकी तस्वीर ले रहा था।
फ़ेड प्राउट