Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Shilpi

Shree Sumitranandan Pant · 2010/12

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शिल्पी

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शिल्पी
भी सुमित्रानंदन पंत
राजकमल प्रकाशन

मूम्या चारपए
१९. मुमिनामन पंत इलाहाबाप
प्रकास राजकमप्त प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेररिस्मी
नाप राष्ट्रमापा प्रिन्टर्म २७ सियापम क्वीन्स रोर पिम्मी

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पिम्मी में मेरे तीन कामनपा संग्रहीत है पो पंगत पाराममापी के
विभिन्न पेन्द्रों मे प्रमारित हो चुके हैं। सम्पर्को में बतमान विश्व-मनप कोवापी
देने के साप हीमपीन बीवम-निर्माण की विद्यापीभोर इगित करने का प्रपल
लिया गया।
१५विबर २
}
सुमित्रानदन पत

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870 मगेन्द्र को सस्नेह

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अनुक्रम
१ चिस्पी
२ बससेप
पप्सरा
पष्ठ

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शिल्पी कलाकार का प्रससपर्प)

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शिल्पी
शिप्या
दशकगण
प्राममित बन
मनमायक

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प्रथम दृश्य
[मिती का कतासविसमें शिक्षित मातार प्रकार की भूधिया रखी
है।मिमीको मिया मूतियों को भार पोदार मनमारियों में समो पी।
पर किसी परेको प्रारमें एक मधीन प्रतिमा निर्माण में संसान है।
पतचित होकर ली पर होरी मा हाई पर बीच में पुनमुनस्ता
पावाt]
यीत
मिर्मम हवय मिना ! (नियम)
कैसे मार प्रियतम को पनि
बड़ पापामरिक्षा!
मति की ती प्रिम ठित
पोश्य पन दमा कर मुठित
40
प्रदेठन पाइन
परसे रिमा मिला।
दीप इसे माया परियामा
मन मे ममता का तम पाता
प्रमर मा सर्प बिना कप
मामत कम मिला।
.
गरा पाराव नहीं मानैदा मैण मास!
निष्टर साब नही पिनेया इस पत्पर से
मामा पच्ची करमा पपना सिर चुनना है!
मचा मिष्ट्रप, पुण्पही परा पुष! "
सौम्म मचाके स्पोंसे से पेटवा
की मालामा स्वारमनपर!
भरली हे तिन का निरेप मा यह

मिापी अपना निष्क्रिय पामस सहन नहीं छोड़ेगा इसके अंतस में सोई यो मूक चेतना दुर्मति उमे नहीं पहने देपा बापक बन । मो नी भी टूट गई। चं, पुर पर गई मरी पार सिरपा सपा कर! सरता बेटी मुझे नया मुममुम पुलना तो देना बेटा ! मह किर्रा बेकाम हो गया पत पत्तियां नहीं काटता वितरा भी मेती भाना | हाँ पहिने मोसाई ने । यह हारना । ठोप पीट, ये पत्थर में फूल सिम उठे ! (फिर कार्प-म्पत हो जाता है) गीत पा पाता बसव पतभर में प्राणों का साबन प्रस्तर में जगती रिम्म ज्योति मवर में तम मम हिमा! मय वीपित होना प्रपकार पा में चेतना निमार मण माम पमय निराकार मन सार्पक मृगन कला! जीवन संबच होता मिरना परा मरण का भय हम रखना मर पुप प्रायोदय पर संग्राम भिमा! (पनी रमार मुति का निरीतपफरता है) सिर। प्रबगाररपापा मगीर हुमा छ। पुप विफर की पृष्ठभूमि मापार हो गई,- प्रसर के उर में युग गौरन का समुही हिम्मोमित हो ग्या मुष्प पन पागों में! पिपी- -

मेपों में विद्युत् धी तसन में मंत्र सी
पंपकार को बाप मई पेवना निमा मों
पौरपी पर मन में पीपित कर पत मानन !
माम्मत मस्तक विस्मय से सुमे हुए मह
विस्फारित सोचन विस्तृत ग्य, उठी भुमाएँ-
सापर नहरों-से रामा सपट से बनगण
जीवन प्राकामा से समते स्परित-कपित
मपुण्यामा से वेष्टित नबता पाताओं से !
निखिम दाम पट पावोलित है मन भावों से!
एक वृहत् पट्टान फरक ही सब चेतन हो
बीवन की गति से हो उठा पगार गरित!
रेखामों में पनिव हो उठा मूक प्रचेतन
प्राों के स्पर्शो से बाय उठी घिर मिना !
पा ममत पौवन पब फूट पड़ा पाहन में !
मपुर जीवन को बरी कर शिसार ने
अमर कर दिया कासाकीमति स्तमित कर!
मूर्व हो उठा नब बुम का इतिहास वृत्तही!
सौमा में निसीम पमरवा को मुभम में
माम पिया घामाको मन में इस पिस्स मे।
स मा नया है पम्प से स्थन मूक्म से!
(पनि-प्रमावरा माता का निरामा में परिमत होना)
किंतु नहाँ यह मात्र पावना का प्रमार है।
पारम मुपवा , भागुरु मन बहक हाद।
कमाकार के पहफार तू भाषक मत बन
तेरा या सिमुपों का सा उम्सास पर्व है।
हाय प्रमी वो तू पाया ही पा सका है,
प्रमी सर्म-सोपान पार करना है तुमको।
बिना पिसर के पर्वत सा? मह पौरखमय
बिबरममी पोमन तुममे। पात है मम ।
।

१८ सिपी शिपी- एकवर्मक- तीपरा- शिप्पा- उपर विस के कुछ विशिष्टि प्रतिमान पो। जो मबीन, संभव इनकी मामिन रषिको उनसे पृष्ठ परितोप मिने! निरषय ही से निस्सम सा प्रतीयों को प्रपसोकन करके किसकी मासे तृप्त न हॉपी। पति है। सो पर ही से रेमें यह पापानी की प्रतिमा है। जो यह प्रसिट दाबामा के जननायक मापीगी है। उम्नत मस्तक पर रोमी भारत का पन प्रमाका प्रवीक सा मंगत तिन मुपोभित । रखिप कर मस्थित उनी चिर परिचित नाठी हैदो में पर निरषय सी मागे पाने को उपत है। पाया पैर उठाप स्पिर निर्भय मुद्रा में मरे हुए युग प्रभात किरा मगित मेरु सिप्सर-मे मुम्बर मागते-दीपित मानम माफ जागरण की उग्रम बेतना सिखामे ! मारपस्याम के मुप पिसी पुटमो तापी मुगी पहने भारतीप उन गिपमनापी मिठ भूपा मो-उपपून पप स्पषिम उन पर नानी की प्रिय पार पोई सास्थिमा की रस पविरामी दुग्दोग्गन -- -पास मौम्प देवगुण से निपम नपते स्निाय हास्यमय गत प्रबाम एम महापुग्प को। जीवित है। चिन्तन पी मुझ म है मापूरी दम प्रतिमा में! तीमरा- शिप्या- पिया- तीसरा- को मोकप्रिय मुराईयह! कमान्यास में टांगों को पुटनों से मोग म्यान मौन प्रेत-स्मित है कर्मठ पुगाप्टा गोमम मिति पप पिना सी सपती ठर्ण , पपरों के सम्मुख रमिष कर की मुट्ठी भी हुई, मिर्मम सरूप से भरी। निश्चम पमों पर केनित एका दृष्टि मे स्पषिम पाया ममा यी सश्यि चिन्तन की- प्रवार को मेद युमों के भारत की रम्बम मानी गऐ उपम शिखर पर मानम गौवम के शिम्पी-मे मपते घोमित । बड़ी माप व्यंगा प्रतिमा है ! मुखमरम की मौन कांति यमीर मेष से बमबम सी यू पीई-पिता में प्राणा किरणों सी। विस्व संप मागीली का यह मर्याय है। अनुपम है ! मुखपर चिरपरिचित हास्य रेस है। 'पाति हिमाचल की चोटी पर मही मिमेगी उसे प्राप्त करना होपा मानव समार म प्रतिदिन के कर्मों में बीपन सपि में ऐमा काने बामे कर्ममिरत बापूनी सौम्म हास्य परसाते ए विपाष परा पर पनामत्त उरमा मुख बिवरपकर बमपम में ! निमसम पा बस्तुवादी पे बापू पर सह पापीनी सविनय हाप मोड़ कर। विविध प में पो सर्वत्र विराजमान हों! पभिवादम इममें ये बागम का मह प्रसि प्रतिकृति है उनसरी भारतमन के प्रिय प्रधिनायक मिस बिनम्रता की प्रतिमा महाति उसको सुस्मृति पिर जीवित रमलेगी। शिप्पा- घोसरा- एक- २. निस्पी - शिप्या- यहाँ प्राप रेसों के बनाया इम सुम में अंगरमकी स बह हवे घिरे निरंतर बही पहिसम बापू निर्मप सार्ग दूत से मुम पिपरत रहे परत मममम समूह में- मागर सहरा से गो पर पोपों में मुमरित उन्हे मुरक्षित रपते पारित कर। पपराजित पस्तिस्व रहा उनका वोपम । पावन कर गए बराको परण प्रमत्त पर मौतम मा-म बग को सम्देगरे अमर । गौतम बुर उपर पामित है प्पामापम्पिा । पारमा पर, पन्त म्मित हा मानम पताम प्रस्तर का या माप्मम भी पम्मानम हो ममाविस्त हो रग पति सा मूर्तिमान बन ! पप्रासन में मीन-अस्फुट युगम करकमत सर्ग या के पात्र पोमित स्वभिम बिय प्रीति पापापों मी पागानु बाहुएँ, परमा सविठ परा रीस गुपित सागर सा- पोपन ग्यानि पिना-मे जर्ष परिव ये मसीह रिम्य हवय साकार प्रम मे। मर्य गम पान मसात् जीरन की महिमा परिमा माईण पृथ्वी पर विषयो रापमहागरपमर बण मे! पर मकों को समिक पिरान पुग्पालात पर मा, घमा ग प्रीति बिनकर र परागपी निर्मनाबी मूगोको! गौतम ग गोपी का मनीषन सिमका विवादमा पर पानपर मापत में। मूवीची पुन पर्प मना पिया ना विप्या- तोमग-- माटेक शिप्मा- इसरा-- तोसरा- बाइक बमना होगा उसको उठा उपवर! यह कबीज का पर्याय है! कमा सृष्टि है। पूर्व साम्य है मुससंगम की रेनापों में ! पांत ममु मुख मुक्त भी पैसे स्वय काम्य है। पारितीय गायक ये निषय कषियों के काम गुरु रवीम् मब युगाप्टा मा जीवन लप्टा प्रमर कम्पमा-संस पास रलगाया स्मित सेतु पाप मो गए परा को मिमा स्वर्ग से -- सप्त मुखर मानों की निस्सर पद पापों में मत कर मानव प्रारमा के मीम मौन को। पत प्रतिमा पे रखीम इस पुम की निश्चय सोपन के गान यो निद्रित बमुमा को मबबीवन पोमा में गोकर मए बामरित! मेप मा पर्गम भर मरों सा मुगम कर नर वाषीदे गए, सर्वमत मनुष्यत्व को! राष्ट्र प्रेम का मंत्र बनमन समुद्र को मात भूमि के गौरव से कर गए एमसिठ! जीवित कमा मूर्ति ये कविपर। उपर देखिए मौह पुस्प सरार पटेम विराजमान है ! कर्मनिष्ठ बापू के सैनिक पम्प मूवि है। पर प्रविम मुख मा परिषम मठित कमेपर उत्तरीम चिर परिचित भूम हा कों पर विस्तृत पस विमान कंप यो पुस्पसिंह हों बा सामने | स्मित ममनों में कामा ममता मपक रही उरकी मंबर में रजत बाण सी! पर मवाक्ष पर पौधार प्रोभिटक्या? में मेरे प्रभिनव प्रयोग है पिसम्मा के प्रिया- चिती-

लिपी
(पात शाहर) पर कोमुरी की प्रतिमा यह समेत स्फटिक पर!
तीसरा पोह रजा निभरिमी सी उम्मुनत का में
ठमा रही पा प्रानों की परत सामा सी
अपनी ही शोमा में तम्मप तुहिन फेन पा
मीना प्रॉपग फहराए यह पिप स्वप्न मी
पुरव परिका है पायद !
स्पर्मीय कौति है।
मपमक विस्मय से स्मित बक्षस्थम
मर्म पीति के मृा मायरों से ममता सरित
वायवीय मामा मूर्त हो उटी शिमा में
स्पारिक पाप मैची की हानहा!
तीसरा मुक्त कौमुषी को निन पुसक्ति बाट परिभि में
मरम को सम्मुक या हसमुख पारे ।
सगता है मानो नब माकांक्षा कान पर
मूर्त हो उठा हो मनब सच यौवन में!
प्रवे सपनों में स्वप्नों का सम्मोहन
स्पति बपस्वस में तापपप पामब
प्रगी म विदित हो सम्मप मौन पूर्णिमा
पामा पसि सी मा मुहाती प्रिय मस्तक पर |
मौरीकर ही समय मा पर्प से
पर कौमुदी के प्रतीक बन गए हों प्रमर
रिम्प मुष्टि !
बह गया रापाप्म गुमम?
fie माप टीसराले है दोनों प्रथम दृष्टि में
रापााप्त पण समत
मेष रामिनी की मार: पापम पोमा पो
मूमित रन का प्रयास है घ्यिा पिम्स में।
दूसरा मौलिक निरय-नवीन पिता है यह निपप!
मौन विशक्ति मेष ण या ममता सुंदर

माटक तीसर- दूसरा- शिप- बापों की माई रेखा पीत बसन सी चाप का मेम बता मोर मुकुट सा मस्तक पर सोमित! गभीर सवार मेष धषि माष साम्प रखती है पद्भुत मनश्याम से । प्रर्ष निमीमित मोपन पुषित उसमी ममम करमा विगमिव मार, पोमा निर्भर बाह मीम गगन की पृष्ठभूमि में चमरी माति अनुपम तमती है! बारिश के उर से लिपटी पुनः मता पी मामा केही पठनु रामिमी थी राषा सी उम्मय मगठी अप्प प्रम में! पंचम पंचस चिसक उमसित बम स्वस से छाया सा मिपटा पिन कटि प्रदेस में । स्वण प्टि! घिल्पकमामा पमत्कार है। पूर्ण चंद्र सायर बता की प्रतिमा है बह, बाम पाई में! मूर्तिमाम प्रेमाकर्षक है! उमा ही रहाम मौन सागर की बेमा मग यौनम की पंचम सोभा में हिम्मोमित पाकृत बर्हि उठी मुक्त भावना पार स्री पूर्व र को पी करने बानुपास में ! पृष्ठवेश पर माराए पन होमस तम फों के स्मित फर्मों की माता से मुफित बनप्रसार मा फसा पम प्रचम पकृत पों प्रगर तर पूने की प्राधा से उमलित । प्रसुमे पाकर्म मीन मोषम है पपलक भूरेखा में चपम मंपियाँ मानो स्तभिव- स्फीत पन में पतम सिम्पुदी प्रीति रमयसित ! पूर्भ वा मुसद्वरा पा है, विजय वर्ष से २४ पिम्पो तीसा- इसरा- - रश्मिपाए में बांध उम्मर मा चार को ठामुम पपरों पर मीरवगन प्रमित कर! शक्ति मूर्ति की पोर है सपान मूर्ति यह बह कोने में एकाम्न है विण विनाधम ! परिचय देना स्वत गान प्रभव म सा । प्राहा पर गोमित है मनमोहन मुरमीषर, मैं इनको ही लार हा पासी हगिक मम्म मूर्ति है। पिता भी बम्प हो उठी। मार मुकुट मस्तक पर पवनों में मापन प्रिय गम यो माक ऐकुषित पमों में मुपर मासिका पपरमपुरस्मितिरेखम लिने अपम सप पीताबर म भूपित मीरपतन सपा विस्तृत उर म भूम रही बममामा मा ग्यासा मे रोमाषित गलवाही दी हो! केहरि कटि स्पित प्रप रर्पमिरमा के तट पर महोर पी जोमा स्तों सी जपाएँ,- परमों में बरसम्मी समिम पायम मिस्पर। मुवन मोहिनी है निमंग मुद्रा पितोगमप ज्यों माप बनना हो उटी मूर्तिमान हो ! प्रीतिपाप सी बहि तिर्यक मुव के प्रमुख गहुई प्रिम बराया परष्टित प्रकार मा नब कममा से पुगत परों के म प्रस्परिन मनुप्ति म म पाम मीरब मोहक मुरमी- माहन मुग्नी गिमके गोन मता पर मुम्प प्रति समाती पतितप में मतित ! मोहमपी मुग्मी पनीर है ममर पण को बह सम्मोग्न पगपरों का पापा प्रपन निर्मम वर्षा में बिग अप्प पर। मैं पसरता पाया ग भम्प मूर्ति को। धपि गुप मार! - इसरा- ग- इमरा- २५ नाटक स्पिी- तीसरा- । - प्रसम्म हुमा में मिसकर! पृथ्वी के पुष्पों के फल सा मुन स्फटिक का एक मनोरम देवामय सक्षिप्त स्वर्ग सा पेष्ठि पुत्र में बमबाया है इस प्रदेश में प्रमरा के प्रारोहण पप सा स्पर्म कसप स्मित- नीति स्तम सा स्पापित यो भगवत् महिमा का मुरतीपर को विम्म मूर्ति की गुभ मुहूर्व म प्राम प्रतिप्य होगी उसमें समारोह स- में सविनय मामंत्रित करता वहाँ मापा शिसा कोष से प्रकट किया जिसमे ईश्वर को। म सार्प प्राऊँगा उस मयत भवसर पर प्रभु की दया से प्ररित हो और पापकी पुत्र कीति से पाकपिट में पुष्प पड़ी में गृह से निकमा मुरलीपर की मूर्ति साबने ! धन्य हा उठा भाग पापकी अमर कता की स्पन सृष्टि को अमित कर इस कमा काम! स्वीकृत करें पापूर्वक गपु मम मर यह इस ममूस्य निधि के बदले- दिस्पी- मिस्सी- 1 निप्पी- पार पापके प्रसासित मधुर बचना से! मा मस्तक मेरा प्रणाम ! पिर मममहा हमको भी पापी ! पद के लिए क्षमा कर इस मा कक्ष का अनुपालन कर माय मात् प्ररमा मिसी! हम पिर घिस्स कमा की प्रतुम बरोहर में लिया श्री पामुप सौदर्य मापन मृगम लिया है इस दौरे से निन्तर में-निविस विष पंतर का प्रभप मद मषित कर पम से। निमम पापापों के उर को प्रानबाम पर गिस्पो तीसग- उनमें जीरन ई दिया भाई- पिमा इदय में सर्प देवना का कर पापन् । मूर्त कर रिमा माय सण प्रस्सर पमका पर सप पेटमा से मार कर मिस्पर पापा पग्म पापरे प्रमर गितको! उपासमा (धर्मकों का प्रस्थान) शिस्पी-

द्वितीय दृश्य
[विचाम मनोरम देवालय काश्य मुरतीपर की मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा
सपम्म हो रही है। पम्पा का समय मरिर प्रारतो समारोह से जगमया हा
है बाहर का प्रोपन प्रतिनियों से बचाव मराएमा है मपन-बाणे के पार
कीर्तन मत पाहै।]
गीत
जय मुरमीपर, पर पपापर
जय गिरिपर बनमासी
बप बन मन बनमाती।
गुमित नीरव मुरमी के सर
कपिव पर पर प्रबर सामर,
मुल्य मिरन सब मुम्ब परापर
तद देत तामा
मनमोहन
बनमाली।
स्वण मगरित बन मन मधुबन
अपक्षक मोचन के बाठापन
मम प्रीति मर्मर स पनुभय
रोमापित र गती
रहम मिसन बनमानी।
निस्तस प्राों का यमुना बन
इमामों की महरें उदय
या मन का गुरु वचत
मषो बासना कामिय
मेष बरप बनमानी।

२८ शिल्पी पीतावर पदिश्यामस तन पर समर्म रेस सीकसौ मिमप पर मीत गगम स लिपटी मुबर प्रथम उपा की सामी पीत बसन नमामी। बम पनत बप धावत प्रसार अप पमपर कोमस करनाकर बग्स हे प्रक्षय रम निर्भर जय मतुमित पसमाती एय रमत बममामी! एक मतिषि-असा मम्प प्रयोग कमा का देवधार या मौन प्रार्थना सा पृप्पणी की रठा पगन को- सी ही पीवत मूति है मुरलीपर की। जिनके पापन एर्णन मे इस महाभूमि पा जीवन का पौष सहसा माता के समुन पुन उवय हो उपना चिर प्राचीन पनाया। बामा पा पुम हापा निश्चम भारत का निसमै फस्पित हुपा पूर्व पवित्रत्व कृम मे महापुरुप का! उम पुष की समस्त धी गोमा भक्ति नाम रन की परमत महिमा परिमा निखिम रहम भाषना कप्ता कौशन का मन मूर्विमान हा उठा पण के पिम्प ए में! पभी मुनाई पड़वी चैम वह पी पनि मित मिनी गिरि पानी म मर्मर भरती यमुना की प्राइम महरों में ममु मुपरित हा नियन पाया बीपी पर मे अन मन हरली! एस प्रीति की मिप पाए पनी हागी तब इस भू पर उर मग्म प्रमर मोत गत भाने हंग उन बन दो विस्मिन विमुप्प पर!

२० तीसरा- पूर्ण सममित होगा उस युग का भू जीवन विध सम्तुसन होगा मानों में कर्मों में ! विष बिमोहन मुरमीपर की प्रमर कल्पना नोकतना भी पारवत प्रतिनिपि है मिय। काम कोप से कुण्ठित भगतृप्या मे मुठित पारमा को कर मोहमुत मुरली की मपु पनि मोनित अमरतम मे नि स्वर सुमित पती- निब मोपन माकपग से मामय पारमा को सतत उठाती रहती स्पर्मिक सोपानों पर मूदम माषना के नम में सपिरानम्मम ! मुरमीपर के पीचरों पर पारमार्पम कर पाम्त वृत्तिमा हो पाती कालिप पी मवित मान दम हो जाता संबित पापा फस मतिम बासना से विपुल हो उना प्रस्तर। मनोभूमि पर उतरे पे पी गम मनुर की मनावना को बिरह कर देह भीति से मर्याएँ बाप नीति की सदाचार की पष प्रास्त कर पए बों पा मोह निया में इग्रिप प्रस्त हमस की-योवनको पायाका मर्म मनु के परमों पर कर प विमुठिन ! मन के प्राों के स्तर पर प्रवतरित हुए पे मीमामय पीन भावना के समुद्र मो मपित कर मासमा पपत्त मामस पुमिनों को निस्तन मग्मित कर, अपंग जीवन पोमा का मर साबन पर पए परा में-मधुर मान में भक्ति प्रनित कर,रम प्रवाहमेगमापयतो! योवेवर ५ निरषय पुष्पोत्तम रहस्यमय 1 (भीतर के प्रांगन से संपोत के स्पर प्राते है) शेप-

मिापी
.
भाव गीत
यमुना तट पर मटनागर में
केसी
प्रामों में पमि आई!
बन पाई
मुरमी की पुन सुन भनुमाई
पूर्व री मानम यमुमा तर
प्रीतिपार महर्ण प्रार्नो.
मपु मारित हुई र गनी
कर उठी रोम मतवानी
मिहरी दह मना स्मृति पुषषित
प्रिय थिरीमन भाई प्रानों
पान पर भर पाए मोपन
बिमर मया मुधिपि उग्मन मन
पिरे पाम पन यमुगा उस में
पाया सी गाराई,प्रागों
हिप म पग भूल गया मप
पया पाने क्या मोगा पन
मापीर में भी बिबर
निम्ममप्पपानमा प्रानो.
बगी पी पनि ग मम्मोहन
नमम गर्न मामी मन ही मन
यमुना कर पी प्रिय परमा मुन
मामपुर मुमा'पानी
मन मन मान री मुरमीपर
ममें प्रीतिमप मपु मुग्मी पर
ापन यमुना पर बसी पर
भरममा पा' प्रामा

बा- माग पहमारे से इस देवालय में गायन बारन कीर्तन है बस हा निरवर एकभित हो ऐ उमा प्रविराम मोठ में मक्ति प्रामवन पुष्प स्नान करने उत्सव में । मया से प्रेरित हो मायों से गमित सस्मित प्रानन संरित मंतर, इपित सोचन मुरमीपर के दर्शन में पावन पर निब मम गुगा ऐ सुत पुस ठर उर के रइस मिसन में । निएचर मन मन में मरेर विश्वास पक्ति। मत मस्तक हो उठते जिसके सम्मुख पर्वत दुस्तर भवसागर में विसका सेतु पाप कर पार मनुग होते पिनों के भंग मौष कर! युम युग से करते पाए जन कीर्तन बरन पुग युग से सुनवे पाए मुनियों के प्रापन - पिर रहस्य में लिपटे बार्मिक उपयों के। किंतु नहीं पुष बबम समा जनगम का जीवन प्रषिणा पंधकार के प्रतम गर्न में बसा ही खा है जन मन-प्रबनियति का वास बना निर्मम विषिकी इण्या पर निर्भर मगता प्रतिमा पूजन मृत मावरों का पूवन भर है भर्म मीर दुर्यन मन मिनको पर से चिपकाए । स्वर्गदरक के मय से। संसति और कलाबी प्रतीक मात्र हो म प्रतिमामों मुन मत मस्तक होना अपमानित करना है मानव की पारमा को भपने पटवासी शहर के प्रति सर्यको कोई भी पार नहीं बो पूर्व चिरखन इस परिवर्तन शीत परत में रही निरवर मनुर रेलमा विकृमिव बति होती पती पनि पुग में अपने मत बीवन को प्रतिम कर!

१२ शिस्ती सातवी- पण परिस्थिनियों पीही गरिम बेतन जिसपर जीवन मूम्प निपिस पवरित पो मोर प्रतिपमित होनी जो सौन्दर्य बना में बह मामय के मन में पावर्मों का म पप्राण + मैती समयोपित हो पाप परिम्पितियों में जा परिवर्तन प्रा' जीयन मन के माम पापते पो पुगप- इसीलिए पापर्म मो किलिक सस्यों मूर्न , परिधिन होने पण मिन पापी-- पर्प माप या बस्नु परहीमही प्रथम भाष पा भी-जिमम पात है समम्म गा अपने ही र दी पामि में टॉप पीट- मानब न सलाम पर बस्तु जगत उसको निर पंतप्रपारा में भाष पित पामपि पौ मे पीमा पनि कर पा पर पर पासी उम मूपम पमूर्त सम्म प्राजकीपर पाना पा सापारण का मन प्रतिमा पूजन का महल ममि भरा बना रहेमा पर मन म जप के जोषा में विमा पि में मंदिर पाप्यास्मिक मर प्रतिमा ही, गणेश मित्र होने में पत्र- मा मौन पा? गमनाय मूनिमप्या- प्रतिमा पूजन के महाप पर अपना मन व गमापन पापाप ही इम रिकारी शिम्पी- पर प्रतिमा तामार मारामा प्रागन के प्रनि पहा मानवनि पार जाबारे प्रति का महीना पूरन ।

नाटक मार स मे बहीम्पाप्त मिसित जपत में मानव का मन ही उसका पावन मंदिर ! उमे सन्छ मुंबर रखना उन्नत माबों के मुमों में भूपित करना उर की इमाको प्रम को अर्पित करना ही मानस पूमन है ! परा पति की ही प्रतिमा है मूत प्राति भी मूर्य पर तारे विसका मीणन करते सागर मिसरे पावन पद प्रमामित पणा मेष समीरप शिम उमावा मर म्पगन निव पर इतुएँ मिसको परिषमा करती मंवत रंग रंग के फूलों की प्रगति स्नेह भेंट कर, प्मान मान रहते गिरि, मदियां गाती महिमा- रस निसर्ग को मपुर मूर्ति में दिग्प पति के नित्य स्प के वर्णन करता ही पूमन है। एकलना पति म्याप्त पाणीवन मन में विपिम मोर पारर्ग उसी के महत् युों के मूर्त है-म जीवन के पोपर पूरक । भी घोगा मानरमपी या पपन प्रश्मि ही निग्य प्रस्तरित होती एती मर स्पो में- विश्व विधात्री मपसमवी मर्मत गना। पौरा- पही सरय है युग परिपतन की सीमा का यही सरप बीवन की नित मभिनय मीमा का! पिर विकास प्रिय चिर सश्मि है य जीवन की प्रमर चेतना को मुष युग में मप स्पों में पमिय्यति पाती गठी पापारों में ! देशवाति मत भूत प्रादि का अनुभीमन कर, बस्नु परिस्थिति के अनुरूप हमें नए पुग: पावों की प्रतिमा निर्मिठ करमी होपी बाम विरोधों में भर अंत साम्प समम्बर ! बस हो रही प्राय माम्पवा। पुम पुम की १२ साता- बस्नु परिस्थितियों की ही मठिम बेतना रिसपर पीरम मुरम मिक्षित पवर्मवित पने पौर प्रतिपमित होती पोसौमदर्य कमा में - पायाभव पर म प्रादसोंपा भी प प्रहम करनी पंत पावित ! बाम परिस्थितियों में पव परिपतन पाना जीवन मन मान बदमते हत मुगपन् इसीलिए भारस पो कितिक सपा के मूर्त रूप है परिबपित होने पते नित । पांच- पर्ष सत्प यह बस्तु पक्ष ही नहीं प्रबम है माव पक्ष मीनबसमे पाइत समस्त मा। अपन ही उर भी पाति में ठौरपीट पर मानब ने सा है इस पर बस्नु पमठो उसको निगमंत प्रकार में मार पित कर प्रामामा के स्पर्गों में पोभा स्मित कर पर पट बट वासी उस मूल प्रमूर्व उप को प्रान नही कर पाता पर सामारण का मन प्रतिमा पूनम का महत्व इममिए सराहो बना रहेगा जन मन में बम के जीवन में। विपर दृष्टि है मैतिक प्राप्यात्मिक सत्प भी प्रतिमाएँ ही है सापेक्ष सिख होते थे ! पठा- पाप मान क्यों ? इस स्वर्गीय मूर्ति के मप्या- प्रतिमा पूमन के महत्व पर प्रपना मत । स्पर्भ समापन से प्राप ही इस पियार को! fशी-- या प्रतिमा तो मात्र भाव का हमारप है ! बीवन के प्रति पमा मानव प्रति मारय बीपों के प्रति स्नेह यही प्रभु का पूमन । पर समस्त संमृति ही पियरी महिमा है माटक सार रस में वही म्माप्त है निखित जमत में मानब का मन ही उसका पावन मंदिर है। उमे स्वन्ध मुंबर रखना उम्न भादोंके मुमों से भूपित करना उर की इबा को प्रम को पपित करना ही मानस पूरन है ! परा पति पी ही प्रतिमा है मूठ प्राति भी मूर्य चंद्र तारे रिसका मीरायन करते सागर बिसके पापन पर प्रक्षामित कणा गर समीरम गिमे ताता मर म्पमन नित ऋतुएँ मिसरी परिकमा करती मंतत रैप रंग के फर्मों की भेगमि स्नेह भेट कर, ध्यान मौन रहवे मिरिमारिया पाठी महिमा उस निसर्ग की ममुर मूर्वि में रिम पति के नित्य पके वन करना ही पूजन है। एक चेतना पति म्पाप्त सभीषन मन में विधिप मोफ पार उसी के महत् गुर्गों के मूर्त है-ग जीवन के पोपक पूक पी पोभा पारमयी पा मगन पमित्र ही नित्य प्रपतरित होती पती नर सों में- पिएर विपात्री मंगममयी मना सना। यही सत्य है युग परिवर्तन की पीड़ा का यही मप गीवन की निव पभिनय मीमा का। चिर विकास प्रिय चिर सक्रिय है बस जीवनमी प्रसर बनना मो युग युग में नब मों में पभिष्यतिपाती बमती के प्यापारों में । देग गाति मत मून प्राति का अनुभीवन कर, बस्तु परिस्थिति के मनुस्म हमें मद युप के प्रारमों की प्रतिमा निमित हरमी होगी पाए पिरोपों में मर मंतः साम्प समम्बप ! मंस हो पी माय माम्यता पुप मुप की - पांच- १४ मिपी निबर ऐ फिर सूक्ष्म पिपर मब पारमों सूबन प्राण मानव मन को उनके प्रकाश को मूदिमान करना होगा मय युग बीवम में- मानबीय ससति में संपोषित कर उनको मुग विप्मन में नम्प संचरण को सचेप्ट पर। यही प्रस्म है पाव कमा के सम्मुख निश्चम यो साम्म प्रतीत हो रहा कमाकार को बहिरवर की बटित विपमतामों में उसको नग समत्व भरना होगा सौम्बर्ष संतुलित । मामय उरकी पी में मष स्वर संपति मर भावपूर्ण कर निसिम प्रमानों के जीवन को । मम्प मृबन की कम्पपा से पीग्ति कब से कलाकार का पय विषम पौवन की प्रतिमा प्रकित करने को सर्माग पूर्णतम- अमयुम की निर्मम पापाम सिमाकेर में1- माह प्रेरणा का प्राकांक्षी है युग मानर कलाकार के योम्म महत्वाकांया है यह । भाव विश्व के सोने कोने में पाति की मूक्ष्म पसियाँ कार्य कर रही बम के मन में यो प्रधान पमी निश्चय ही भविष्य में मम वना विचर सगी बा परमी पर नम पीवन भी पोमा परिमा मे मूर्तित हो! म्पर्ष ममुब बाहर के मर में उसे सोषता ताठम में कोष बिपा बो प्रमत सत्य का मंत समिता धारा ही में प्रत्याहन कर पुग मरीपिका से विमुक्त होगा मानम मन- पाबाहन कराठी एम मारमा नब प्रकासका। पांच- (नेपम्प से बाहित पौत कस्बर)

मारक
गीत
नव प्रकास बन पामो!
जीवन के बम भपकारो
ज्योति द्रवित करनामो!
मंत्र स्मित हो मानव का मन
धांत बिन जीवन संघर्पण
मर स्वर महरी में पन भू का
*दन करण पामो।
पाया मृत प्रावों का उम
छाया बर मौतिकता भ्रम
पंप पीषियों में बन मन की
नब किरमें बरसायो।
माप को प्रीति अषित कर
महानाय में अमृत मषित कर
पविस्वासको चिर प्रतीति में
परिमत कर मुसकामो!
विष यानि में मम्म प पर
मी पोमा स्वर्णिम समय पर
बन बरबी में जम बीवन में
मन का स्वर्यबसायो।
गम्य बेणु दर में मब स्वर भर
मूकम्पपा हर, मब मुरमी पर,
अभिनव भी
पमा गरिमा में
परवी को चिपटामो ।

तृतीय दृश्य
[पिपी का कता-कम मिल्पी परकी पोट में अपनी प्रपूरी प्रतिमा का
निर्माण करने में स्तम्न है। उसकी मिष्या एक मोरटी हुई हरिपारों में चार
का ही है।
शिम्पी (मतिमा का निरीक्षण करणे इप)
मा सम्पठा जम्म से ही भाग परा पर
मा विमेरों पृमि निपषों को पाती के
पुन संगठित बोषित कर पर मंगल हित
नब बीवन के मासस सोभा सौप्य में।
पामित हो पा परिमी का सपणेतन
मरज पहा पुम पारोमित बन बीवन सापर
ना प्राधानासा के पिपरों में मारा कर,-
पवम मान करने पर परमी के पुसिनों को।
पौर रहा मूप देना के भूपों में
मंस हो पा विमत मन समन मनमा
भू मुठित हो रहे सौष गत मापसी के
पिन भिन्न हो पी रीति नीतिमा युमों की
टूट रो विसारा अंब तारों से हतप्रभ
विगत पुगों मान चित्र को मिटा परा।
ऐमे विस्वाति के युग में वर्नम म
योनिमय किरणों की रेनापों से मत
एक मनोरम पिम्म मूर्ति प्रस्फुटित हो पी
नए मार्यो की सप पुन पोमा में ष्टि।
बन मन स्वप्नों से पम्पित उसके ममयब
निषित विष नौ माकांपापों से पति उप
प्रीति मौन निस्वन करना सेवित विमोचन

माह ७ सिध्या- भाठ सौम्प मानन धी-गिसकी पावनता के अमृत स्पर्प से पीपित हो उठवा भीषम-सम ! चिर कम्मापममी प्रामाही पीरे प्रकट हो रही अंतरिक्ष में भतर्मन के नाम बीपम की महत् करना सी मूर्तित हो निखिम विषमतापाम भरने मर्ग समन्बय | सिमा फसफ में पंडित करना मार लिस्प हो रश्मि रेख सस नम्य पवना की प्रतिमा को मुम्मय प्रमों में संवार दृग सूक्ष्म स्पन को। फिलहाय बीवन की मिर्मम बास्तवता बाप नही पापी मनुब मारमा का वैभव मिट्टी की पाता विरोध करती प्रति पम पर मय प्रकार के प्रोमा स्पसौके प्रति मिरित्र्य । कुंठिन हो उठत्री फिर फिर गोठ कस्पना ! माप पर्व सहिप्न हो ऐ अपने मन में भमा कौन पी बह विवरण कस्पना यी है बिसे पाप साकार मही कर सके फिल्म में अपने कसा पुशमहाबों से ? "सका सूक्ष्म से सूक्ष्म भाव मी ममक उठे प्रस्तर के मुख पर ! मै काठी माप हप की परफन को भी प्रस्तुत कर सकते पाहन में प्रान फूंक कर! एक बार फिर से प्रयत्न कर रबेटी बज प्रान पाहन या संमय बित हो उठ! सुम बुग के बा मसारों में बड़ीमूत को पन के निचेतन का मिश्राम पिमा तट निसके मन् परमानु रे निर्मम धनस्य में गत प्रयासों के निकिम मानस से मित- नम बेठमा के सत्रिय सभा से उसको पुमारगीवित करना है नब मनुप्पस्व में 1 (फ्नो सबर पिता को पड़ने में व्यस्त हो जाता है) मिस्पी- - 14 शिम्पी गीत मन भू पर रो। युग मन भी पापाष पिताको करमा अषित करो! पाप है पीडित म पन कैम्प निराठा से कुंठित मन पुष रिपार को पीर, रिमपि मंतर में निवारो। स्वणमयी बिहसो पत्तों पर भावमयी बिससो र वम पर भब भी सुपमा में मूर्तित हा चिम्ममिपि पिपरो! बनीं मन में कवि पती म्पों व दीप सिखाएँ, पय बौवन की बाहों में घर का मुम्प भरो। सोनो हे मुज का अपमुख्न कर अपना हमसे मोषम प्रबकारमय पप बोतित कर मर पर पिड परो! मग प्रवीति में कर उर मुफित मर पापा से मन मन दुसुमित भू की बमवा हो देखन बन का मारो। (प्रतिमा को मारपूर्वक रेखते हुए) माह मंठ में ष्टि पून्य पाहन पमको पर म हो रहा स्वर्ग स्वप्न मानस मंतर का! पबयब की रेषापों में साकार हो उय पाराम मान

प्रिया-
मनक उसे बन मामयता से मभ्य शना
विस्मस पपमा दृस्यपटी में मूर्तिमान हो ।
मुबान का उन्नत भविष पालों के सम्मुख
वदय हो उठा वीर सुपों का पग्य पावरम ।
स्पनिक श्री सुपमा में हो परवरित पिमा पर
मा फसाना मे सपीय कर दिया दृश्य को !
शिवर, मेरा सन मनोरप पूर्ण हो गया ।
(भूति को रेपर पाहार)
माग उठा पापान हरप जीपन-बेतम हो
युग युगका बर मौन हो उठा पति से मुखरित ।
जैसी बीवित भावपूर्ण प्रतिक्षति उठी है
वर्पण पर विम्बित हा तात् मितिम इस्रपट !
विसमा निज परम पिता पर पहुंच मई,
प्रस्तुत यह पाप निवर्धन मूर्तिकरण का!
पट कार परवान हटापू प्रतिमा से ।
(पको हराती है)
कहाकम हो उठा नपम गोरप से मति !
मो मुहूर्त क्यों रेल मा ये दर्शकलम भी!
(दर्शकों का प्रोग)
पभिवावम | क्या पूर्ण हो गई मा सृष्टि ।
पर दलिए, ताकम मम माग में
स सिबर ही पिल्पकला के पंच मार कर
गने को रपत है मग तना सर्प म ।
मैं अब तक संघरण मकर पाई निररिस्मय!
माप सत्प कहती है पह पाश्चर्य है महत्
सिस्सयमा का मुख इस्टि पनिमेय हो उठी।
जम मन का सागर ही जीवन हिस्मावित हो
पनीठा पमा पौमिक इस्पपी म ।
शिमा-

४. शिल्पी मति से पाविरत मति से संक्ति मगता पाहन पविरत पति ही सूक्ष्म रुप हो से पाका। मौन हाट मग हा मुपर जीवन प्रोमा का पुग भावी रो मायासित रागती प्रतिमा ! बीज मुजा पर वस हे प भाष हदय के पा प्रगों में फनीमूत सी पक्ति स्फूति गर ! फूट रही पुस जीवन की भाषामालाएँ जनगम मानन से मर गरिमा मंदित हो! सिया पर कौन मा हे पर अमिको सपका के बननामा-से? हरय पाति का कम्पित कान प्रकारों से- पिली- उनको पाने को बटी। (चन-समूह का प्रदेश) एक स्वर- हम भूकी संगटित पक्ति हम पातीको कान्ति भरी उठती पुकार है, हम देखेंगे पाप यहाँ स्सों के सुमर मीर में छिपे कौन मा निर्माण कर पे बनगम के हित । दूसरा स्वर- मप्प बर्य की मा पप्प बासना पूर्वि के मर्ष मन मुस्सिव गंगारिक पि गा रहे ! तीसरा स्वर-बुध पम्प पर बब बनयम का बीवन - कलादरा में मैट, निभूत सस्पना स्वर्ग में माप स्पस्ट है यप की शिप्मा निय बा पापामों को कस्सित करने में प्रारम भाव त पीमित बनता से विरक्त हो! मधुर पवनों से कर अपनी उपर प्रति मिठ प्रात्मा के हित पाच बोयते पाप निरन्तर माणित कमायों से पोपन कर अपने मनका संसारी की घोमा में उसको मपेट कर ! प्रेरित हो इसरा स्वर-किंतु, पम्न उपगावे को हम परती से ना पाते या प्रासाद भवन, कम म सन पर हमें चाहिए क्या न मपुर पारमा का भावन ? भुषापूर्ति करते है यदि म राम्य पना की उन्ह पाहिए, भाग पूर्ति में करें हमारी इमें सम्पदा बरसे में और कमाकी बन उपयापी मपुर देन से पन मनको नब बीवन पोमा में वेष्टित करें। पितु, उफ पम्न बरुष का भी प्रमार हमको। 'पपपि एम ही अपने भुवयम से उत्पादन करते पाति मेष में मपपप पासन परत पगा। पही सम्पदा क्या इस युग की। वही न्याय है? पौषा स्वर-कहाँ सोबते माप यहाँहम यो बप्पी के प्रान्त गिस्पी है बो भू के निर्मम तर को बौरन हरियाप्ती में ग्राम प्ररोहित करत अपने अनपट कर कौएम से-कम को हम ही जन मन के सोमा पिल्पी मी हेमि निरषय हम में उपदे मारी स्वप्नों के सप्टा, नवप प्ररणा स्पषों से रोमांचित अंतर- मष विकसित मस्तिकों पयों के मन से पराबवना को उबर करने में समम! मोक निति निर्मापर बाग कसाकार बन इम रपिता को कर रेप भू निर्वासित ! पही बमोचित साभिमान है बता देतना मा पामरण की पर से कर पी प्रवीपा! फमा प्रमी ता संतों का मृगम कर सकी उसे वास्तविकता बमना पर म्याप ! स्वागत करणार बन का । पाप देखिए, मेरो भूवन प्रतिमा बन मन की बर्पन ।

शिल्पी हर किसान पा है परती के प्रतिनिधि-में वन सस्प हाती घिर पर पर उपर अमित नवयुग बीवन के निर्माता ए पुष्ट तन- निय बाहों में भूगोमा पो सिए र सो! नीचे समित बीपन सागर युग संघर्षण बन पापा का घोतक है! ऊपर जैस भव मापा मा सितिन पुम पहा मौन मर्मरित पम्स बम प्रवराम से! बननायड- चमत्कार मिरचय भद्मुत विस्तकमा का। ये पयेय हम न मोरगीवन के संबस बो परती की निर्मम जग्गाको विरीर प्राण प्ररोहों मे पुमक्ति करने का उर। यंग पक्ति है उधर, प्रबति सूचम नव युग की पर हमारा मिस विषमता पूर्ण कर निखिम नब समत्व भर पा बिरोबों में बीवन के। बन गीत - बन बरणी का बस हम बन मम का सेवन है हम ! सामी सबम हपौधे हसिया विपके कर्मठ कला पुस पृप्पी का पंबर वन हस पाया भवन सम्बता का प्रमात संगनाया हम में पीर पमी का सीना मानब का पर वार बसाया! वर्ष बरा संबम हत नापी सबस इपौड़े हसिया पिटके कर्मठ, कमा कुषस | माटक । मोह नियति को ठोंक पीट कर प्रतिक्षाप चन ने मिमित किमा महत् जय बीवन मुन दुनकर नित पस्यों के स्वमिम कम सिपे नै हुए भरा भर में भूपन कठिन तपों का है पमा भरती मटत मातृभूमि बमगन भाई सये हसिपा जिसके कमठ पम्प हो सकता पम इस जन उत्सब से! (प्रतिमा को समित कर) काम बक यह धूम मध्य युग परिवर्तन को सूचित करता मंतरिक्ष मे नर युग का रगि त्य हो रहा जिसकी स्मित किरणों से मरित परा सर्व के मम्प पड़ी मोमा सेतु पर मम्म बेतना की प्रतिमा घोभित निरपम! सर्व पानि नामिए बाम कर में रमिकर अमर रानोहा पर मुहा मे उठ कर- विजय भासा मंचम फहरा हा क्षितिज में ! भीरब करना ममता से स्परित बमस्पत विम्म पाति बरस ही स्मित मुख मंडल से मंस अंश हो कहि रीतियों के पाचन परमों पर है परे दिन गंपमा कहीमे। लोक मोहिनी विश्व शांति की मनोमूर्ति या अभिनव भी पोमा परिमा में भाग ही यो परा मिदिन पर गय बीवनोपयों निसिन समम्बित करने निव निधीमा में! मिस्पी- शिल्पी मावत कापा यह जिसके प्रिय संतों पर अमर प्रेरणाएं मरती पती परती पर, मय नप पारों में मुस्लों मे बल्पित हा! पार बहिर्दय बिबरे जन के बीवन का प्रेत म्रित व संयोजित कर फिर में नग समत्व म बाप ही या जीवन मासल ठपंग प्यापर मातमा में वितसित हो। मामा केन्द्रिक बीपन का सत्य पिरतन माननीय महिमा में मूर्तित हो स्पर्पोपम पुग जीवन के प्रसार को अमृत स्पर्म में नर प्रमात में बरस रही बह स्वर्णिम बेतन । धस्वर- निषम यह मन के मन मंदिर की प्रतिमा है बन पाकोपा की प्रतीक बन पीपनमय है। सामूहिर पतना हो मई मूर्तित राम सक्ति स्फूर्ति विस्वास भरेगी या जन मन में ! हम इसके हित प्रामों का बमिवान करग भु बीवन मे प्रान प्रतिष्ठित कर इसकी प्रापि निज कमी मे मूर्त करपे इसका भव | - युप युग तक गाएंग बनमप इसकी महिमा ! बक गिर पाति की प्रमर बतना को पिर बम हो ! नब पुग भीमन की पोमा प्रविमापी जय हो। पुग निर्मम पापाण पिमा में जिसने पभिमब प्राण मर दिए निम पासत अंठ प्रमाण- जय बाबम की मात चवमा को घिर पर हो। उप स्वर- तोक पति की पय हो मबयुम भी की जय हो । समवेत गीत पति पति माद मूर्ति पातितमे।

माटह
जयति मोक पमित मोक
मुषित तने।
मम पुग
जीवन प्रभात
निसरी तुम ज्योति स्नात
वर्ण रश्मि स्फुरित गात
मास्थर बने।
बना गान
स्वप्न मूर्तिमान
गूग उठे
मूक
प्राम
जनाएर ममे!
सफल हए योग ध्यान
सफन मक्ति कर्म नाम
बिले मनम् मम म्मान
मग तम पहने!
भाषाए मुक्त
मानव मन प्रीति युक्त
पति र पंप पुर
पति प्रियपरमे!
परसे हिम शुभ गति
निखरे फिर रिष्य काति
मू मन की मिटे प्रांति
बनपनगरा

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ध्वस-शेष (नव जीवन निर्माण का स्वप्न)

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युवती
पुग्प
प्राप्ति
मागरिक
सैनिक
द्रप्टा
प्रतिनिधि

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-
प्रथम दृश्य
[गिस्तृत राजमार्प को चोट साप पनिपुरकों (भार सीकर)
रामपोषचा हो रही है। एक मोर से भागका प्रम, बो शाति का-सा
प्रवी ममता पनिपूरमों के पोप मस्त होकर कार्मों पर हमेती
लिए, सबना किनारे एकसानो कोसी पहात नधुत भाता है।
(राममोपा)
पति पो हे भूगा पर्व मर्य पेमापो,
विष पुरकी मार्थका मा में मव सामो।
प्राकित मत हो यो बन में मूसरप भम
मिया बमरब माएप
रामाशा से
रवि पि 'सामपान बन हो पापो'
घव रहो बोषी प्रख्या महामो'
रामाशा यह सर पर साबमान हो आपो!
(हे की धोर)
(कमरे में प्रमेस कर)
यहाँ मा यया हाय नपाने यह भूम पर,
मटक मा बाहर के मन में ! ठीक रहा है
भूम ममम्मा यह दुनिया ! बोचे की ही
मा सम्पठाब संसारे समु एस्तारे
कृपया पारे पाहि मुरारे । पर मोविन्द
मग पोमिन गोविन भर मूमते !
पामै सी धूम मची राबमार्ग में 1.
बहरा हो पाना मैं न पनि सारे
निष्ट मार से, विस्फोटरसे फूट रहे यो।
मुषती (v)
पति"पुरका मम मारे पाप नगर में
लिकोटमटमे का मिम्पर प्रचार कर

१२ पिस्पी सनीम पपराप हो चुका । यह पोपिन रागामा से। समा कर अपपप देष में बाहर के कोलाहम से मन में बबना कर अनुमति मिए बिना ही पर भुरा पाया है। पक पक करताय मगर की रेम पेम है। उफ केसा बन प्रतिन सी हमषम है। पही हाय मापरिषरों का संरकत बीवन है? मुबती- पुरती- पुरती- पयोट है पाप स्पर्ष यो विचलित मत हो पति सुस्प हो उपर बैठ जाएँ पासम पर । (स्वस्थ होकर) पाप कौन ! देवि यही में कहाँ पा गया? समाचार पत्रों का कार्यामय । यह पया? नही पिता यह युप का मन है ! इसको कार्यासय ही समझे! (सावर्ष) सिर । मिरा पतीपी मई सभ्यता में जिसके सकेतों पर निवित पित्र पर नाच रहे मनमुषहो। (विमप बिमूत्र) क्या काती हो मेटी या या युग का मन है। हटे पूरे दीमक के बाए खानों का म मरे पवे पागर पर्षों में मिपटा कटे घंटे अपवारों के पम्ना सा बिसप बोबो वातों मारी भरकम पोषों से भरा माठस युग का मन है। ये मुकाए माटक 7 पुरती- पुषवी- बीम पुनितों के बोमों से !! सत्र कहती हो प्रस्तम्भस्त साकारा यह मुम का मन है? पिता पही युग का मन मुग मानव का मन है ! भाप वृषा प्रारधर्म मत करें! (तिर हिनाकर) सर्वनाम है। इसे प्रमापबपर समझे या चिदिमाखामा ! इसके संकरे बामों में प्रतिदिन की पौड़ी पटनाएँ है सी हुई, सब घोटी मोटी देश विदेमों की-परती पाए सिन्दुकी ! पग के पिा कमापोका मगर यार- भाप इसे मोशम कहे या मात्रामा ! (पर सिर हिलाता है) पर पूजीवन की कृम्म कटु मास्तपता का इसमें निर्मम परिचय संचित है बिम् म्यापक ! बीवन संघर्षका तीसा का पापमुभव सरिर सुम पुग का पपराया विस्मृत मन बरे यलपूर्वक संरक्षित किया पया है म विपनामों में गा प्रसाद से भरे। कैसा रिक्त प्रदर्सन बोपी गौरिष्ठा का।। माप भयानक ऍग महाँ बो मुनते प्रतिक्षम समाचारों के हलषस को पमिया पहन र पेबो संबार विविध रेणे मनुन मिति परति किटकिटाकोष सौम से! पायु मार्म से सिम्बु मार्ग से भूमि मात्र से मिबिन विश्व जीवन का ममका स्परमपन प्रविरत वाहित हो पारोमित करता पता पान परामोपी मनुष्य पाहत मम को- पर को हो पा सतत विद्युत् मन से।

१४ सिम्पो पुषती- - पुषती-- (मसि स्वर में) हाम प्रभागे मानम की ऐसी मिशेषना11 भू विस्तृत हो गया पिता मानव का मंतर, उसे ज्ञान प्रब रम पीन जापान में कहां का क्या है हो रहा पिविष के भागा मे ! प्रक संबन म्यूपाक पैठ कानों के भीतर मनमन करते पते परों के पापों से पेकिंग मास्को सब पौठो पर बम मन के पप माममा सी करता सम्य मनुन क्या करती बेटी मै पुन कम निरंतर पुपित तुपो सी विपमय फुफकार मोड़ती। मुनगों सी मुनमुना बाबुरों-सी टर्रा कर ! बिर पक्षियों सी ये अपने पंख पपा पार्वनारपती सब भाषा ठोक पौट कर- पप मन में मानव मन की निरयता से! ये काठी है पिता पान सब रेप परा के मोप सम्पता की संसति की मानवता की उन्ध पुकार ममा मोह प्रावरण राम कर सुन साधि की पप मोट में महाप्रलय का तर तप ष फे, मयंकर मानव को पाल पोस कर, समर संगठित करबनननको। (पनुवार से) पहा पामुरी हापो में पानी पक्ति फिर।। विगत पुर में प्रगान को रखा के हित जुम पे भू राष्ट्र रमठ में मना खा कर, प रमित करने दुर्मद फासिस्त सक्ति को पौर सरामिए समापन करने रहो। किंतु पान सब पन ममम के माकांक्षी बन पुरती- १५ विष प्राति के हतु रोखते पादुम उपत पर बाते बाते सैनिक घों का बम- पषम के प्रतिबम बना वियप मोरकबहु ! पार प्राप्ति के पीपे पागस मसान्त बम !! देख रहा हूँ बेटी में मम की पांचों से पनति दूपमीपण पुमिन पक्षिविषयमत का- हमकाप पंचों में मकर पता प्रापा महानाध का बम भू पर घोभित बरसावा!! शाम्त पाप हो बमके ! मेरे पर उपर में परचेवन का गहर कभी उमा उठया ! पर मानव धासक है भूपी भन्म नियति का पिपसा सवा सौह बच की निर्ममता पर और बरत सकवा भू पर जीवन प्रवाह का। देश हा मैं वाकार प्रनय का बाल उपप हो ऐ स्मन बिम्ब पर मा मोहित हो वर पा है उसे मीसमे हिन्तु साप ही उसकी स्वर्णिम प्रामा में बेतना पित हो युग प्रभात की मग पोमा में मुमग रहा है ! समझ रहा। मैं युग के पट संपर्पन को अर्पग समरिक संघरमों के बीच सिाबो पारपरा में भौतिक माम्मास्मिक विफल बन! पस्त हो ही पीर्ग मान्मवाएँ पन मन की बस पा पम जीवन के प्रति दृष्टिकोप भर एंटवा बाता भय संघय का बना हासा जाम से रहा ममुप्यत मब पम्तरिम में मनुन पाति को मु बीवन का मष पर देने। निगमी होया मामय यान्त्रिक सुप रामय पर, मबम बास्तविकता निबरेमी मौगिरता से-- नब प्रामारिमस्या का स्वपिम मनावम पा!

शिल्पी मुबाती पिता प्रापके वचनों को मुन कैप उठता मन मौर हर्ष नसा हो सठया कावर प्रन्टर। रक्त मेरो पंक में सभी मान मनुगता सात मही का होपा म पर बह सर्भेषम | पूर- नियत समय पर सब कुछ हो पाएमा बिटिपा निकट पा पी बीरे भय निरिष्ट पड़ी का यो मानव पन्तर में कय कोषम्म मे गरी परो सब ममम होगा। प्रया बेटी प्रम में जाता हूँ बोड़ा विप्राम करेगा। (पुरका प्रस्मान) (राजमार्प पर ममाकी चोरमाप पूर से प्राते हए रामपोषमा के स्व मुनाई देते है।) पात पाहे भूजन पर्षनर्य पेमापो विश्व गुरु की पासका मन में मत मामो ! पान्त रहो सब मूठी प्रष्ठाहे न उड़ापो राजाना यह सब जन सामानहो पामो ।

द्वितीय दृश्य
पिपरवा मीप सप रा गीत एक विशाल हमर बाहर
मेषष्य में मास्टयों में एक की ममानहानि पृष्ठभूमि के पा पर महा
पए की विकरात पाया पो है प्रनिकोमपों में लिपटे रमोन भूए के मारत
जमा है मार वे बाहित पीत के सममेत पर वीरे-धीरे स्पष्ट होणार
गीत
प्रमकर रे
उम सममित रमर
दुईम स्वर!
हक उठी ना पात
मार उटा गस् माम
महरू पा विप कराम
मग मम !
उपन पा पनि म्पोम
षा बिनाप होम
अपा पा तिमिर दोम
स
पप भू हिमठ
एक व हमा
भार मुम अब मर्मत
जय शिवर!
भस्म सार्य इमुप पोक
मस मगर पाम पोर
नियर हे नम
माम
विवभर

प्तिापी मौतिक मर प्रा पूर मानस प्रममा दूर बेदम में पूर हिम शिवतरहे! [पंतरिम में पुस्प मौर मइति का प्रवेश पुरष न्योति-रश्मियों से मामृत प्रति रामनुपी पाबा से बेपित है।] प्रहति- देख रहा इस्सन हाय क्या परती का मन ! महापस सा धाया कैसा भोर चतुर्षिक ? गहरा रही प्रमर की पाया बन बरणी पर मषियामी के दाम भयानक प्रप पावरण। सोभित हो उठा पण बेतना सिम्पु क्यों प्मानित करने भन्न प्राग मन के पुमिनों को। मीस सरोगह सौ कुम्हमा कर म्मान विधाएँ महापूम्प की पमकों सी मैर पी तमस में ! मीम रहा बन पकार मयभीत पोति को सिन्न भिन्न कर किरनों के भीने सतरम पट ए॒षसी सी पर पो रूप रेखाएँ पग की बाप हा क्या विषय हानि से निज विपन्न मुस मस प्रध हो रहे सबटम मा मूर्तो समाधिस्थ मा भाव हो पा स्पूत बगत क्यों 1 (पिका-सूचक पाच संपीत) प्रतय बसाहा सा पिर पिरकर पिणमिति में गरपहा संहार बोर मषित कर नम को महाकाम का मम पीर निन पट्टहास्य से पत मत पान निर्मोपों में प्रविनित हो । अपमित भीषन बच कार ठरो अंबर में सपनप पड़ित पिनाएं टूट रही परती पर महानाच किटकिटा पा कदमोहबत निय विष्ट एमबापो स्वासोसास छोर कर। ?

TRO रैम रंग के सपर्टी की निदाएं मपका कर हरित पीठ मारक्त मीस ग्यासामों के पम अमर हे विष पोपों के पन मार कर ज्वामित यो के निर्मर बरसा प्रम्निस्तम्म-से! भूपू करता तास मोम पू पुसती भू पूवमी विधा ममता पू सायर भमा पी की रज राग ये गन प्रस्सर मुमम रहे वन विटपी बह रहा समस्त पग! (महावियससूबर पाच संपीत) पनि मलम पपा हाय मत्म कर रेया मनु की इस मुम्बर मानसी सृषि यो रिसे गस प्रमय मप्न मही पर पाया दुस्तर महा बार में! पिचर वी कयातियां सी सी मू पर? प्रेत मोक बुम पया भार नपा मस्प माफ में ! सप्ण परम-से पोमम हवे ग्राम पुर मपर चित्रित हो यह माया पप बस वाया पट पर ! मूतों का पिडित बनत गम गित् स्पर्ष मे म बाप्प बनकर पिसीनहोपा निमिप में। पया स्मृति में ही ऐप एपी घंस मृषि प्रब दृश्य स्पर्प रस प पम्म पुष म बिहीन हो? मे पाया महामाप इस प्रथम बप स ? हाप कौन सा महादस्प यह मरक म नए प्रप परवा निसर्प को पक्षपात म।। महिपामुप तारा मामुर से भी भीषण महाकाय यह पा राना र हा गमन में पूमित रह पृषा प्रा ममते पाणी दी किमाकार पाप पर्वत भी रामापी पर भूतों की मूम शक्ति से मनुप्रामा उदम हा बह पमते प्याकेजमा मन। पुष्प- सिम्यो निर्गत पर मधुनों गे मत विपमम फूकारें पारण गर्जन से किकम्पित कर मम्त को। पत पत सहिद प्रपादों मा बह टूट पोम से पैर रहा जन भुको निर्मम नौह पों 8 मस्त पस्त कर अप में सामूगों के प्रषयम पूर्व पूर्ण कर परिम भूषरों के पयर! मोग्मत्त वा बिकट हास्य भरता विमारक महानाप का बर वावरण प्रस्त मुबन मे- पित मूमों से विषीर्ग पर परा बम को स भ्रम र निसिन सृष्टि को महावय मे ! पाहि पाहि मच ही प्रवनि में गगन पवन म पाहि पाहि कर ऐ सकम बम बमपर ममघर, पगबाती पा सरो की मम्न पुकारें पमि की गति से कही प्रकार मेम रस्य का! (विप्लव पन) का होगा तब ऐप हाय इस भूत मुष्टिका सप रग रेखामप मेरी निम्पम इति का? मुग्ध प्रेम के पमों पर सौवर्य सप्न सी मोहित करती ही सबा बो स्वर्ग मोकको! विस प्रभव के समन हर्प से पुमकित होकर सूक्ष्म स्पून के घायाळप को गुफिय कर मित जिसमें मैंने अपने पस कमा कौत से सीमा में निस्सीम पचिर में बांधा पिरको मृत्यु तमस में ग्रंप प्रमरता के प्रकाप को अवनता को पर्ष पनित है किया पब में ! अपने सर के एक्स-बान से जिस निसर्व को पुस मुम से पविराम स्नेह पम से सिंचित कर विकसित मन किया नित्य नब मी मुपमा मैं सप गुर्गों के सत्तल ताने माने भर कर ! (तुबन मावन घोतक बाट प्रमीत) प्रहक्ति- पाटक मे प्रहसित हुई नीमिमा मौन गमन की परती को रोमांच हा कब हरियाती में कैसे नाच उठी सागर उर में हिस्सोम प्राचनीय है मर्म का उस रहस सूबन की ! मुमें वाद है सुपा मम मा पूर्ण कर पर रगत हर्प से मनर उस मा प्रथम उपाके मुस पर सहसा बर मया भी मामी पौड़ी इंद्रधनुष का सेतु टंगा बब फेनिस नम में । पमी प्रमी तो फर्मों के पपमक ग मंचम पाहांसा से रंगे स्पण भावनायेच समा सकी प्राणों की प्राकृम सुरभि न उर मे कोपम का प्रावेप स्वरों में फूट पड़ा पत ! (कान पाच संगीत) कैसे मैं ममरों की इस पारी संसृति का रेल सपो काम पस प्रामुरी परिस से निसको मैंने मा की मरु ममता ममता से सतत संवारा निय प्रवर के निमृत कम में। वपित् कोप से विपटित हो भौतिक विधान सय बाण म बन तितर बितर हो हा ग्रम्प में सौम रहा मनु विगमित बातों का सापर मूर्य का गर्यो दूर पस पवा हो परती में ! उमा हे दुर्यप पूर्व उन्हयास विषमे परा पर्म की प्रप्ति फर पाई है बाइप गुंग रहा पह महामृत्यु संगीत चतुरिक पकापौष में बिमर रहे नपत्र पुन हों। उमड़ रहे बरयों से भूधर परा गर्भ से हिलोतों से उठ गिर, क्षण भर में लिप्तीन हो । महा प्रबल पशु विकात से दो परिणी बराबर हो पी रिपत मिट्टी के घट सी। (विश्व प्रमयसूचक वाच संपीत) १२ चिस्पी कैसे हाम ऐगा विद्युत् ताडित भू पर कोमल मौसम पोमा देही पुर्वन पोषन निसके मुख पर रोमा परती ममों मी स्मिष्ठि चितवन में पमती पोसों री मौन जनता पिसके उर में स्वर्म परा का वेतन वैभव जीत परता रहा भावनाम दोमिठ । मो जीवन सौन्दर्म यहाँ तक पत्ते भी मात नित धावत मुबमी मीरय मति मय में निग नयनों में मूग विश्व की घी सूपरता स्वप्नामस पसौ-से मप म.प प्रम मम्न हो। पो विराट् सौन्दर्य निभूत जिसके अंतर में घत रमि पशि पाराग्रह घोमा स्परित रहते चपा मकवी होम स्वर्ष पातायन नम का रखत पत्रिका मुभ्र धाति बरसाती मू पर! हाय माय या पिपि के निप्टर भू वितास से मुरम्य बामोपे तुम प्रसमय धूमिमात् हो ? पौष जगत पी मनुग तोक की दुर्मम घोमा गुप्त मिक्षित हो बाएमा कटु काम गर्म में ? बीवन की बपना मष्ट हो पाएगी क्या निपचेवन के प्रप्रकेत तम में विकीर्ण हो!। किसने जग्म रिया इस दुर्मर प्रनु रानव को कौन बच की कोष पीबह पिणमातिनी। किसने दिक महार सुमाया बन परमी पर, कहो कौन यह नारकीय मूभीमम होही | ! पुस्प- कातर मत हो प्रकृति तु, या मयों की सी करण मौषता नहीं सुहावी पात करो मन। मूत प्रलर या नही मात्र पइ मन अति पारोहण कर रही समता नब भिखरों पर।

तर्मन बी ही विभीपिका बाए बमत पर प्रतिविम्बित हो रही भयावह, भाष प्रताडित भौतिक मणु यामही दलित मानन पारमा मा प्याय कोप ही टूट हा पायक प्रपात सा मी परा मन के महर पर गो युग युम मे मनुर रेप की पषित मित्तिों में विभक्त है ! पार युगों के म्य मूर मानव प्रेतर का विपर मार मसकार हा निव मनुप्पस्व को संघर्पण पस हा पोर मानव के उर म यह विराट् विस्फोट उमी का राम इन' [स्वार्य नोम मादि की बोमो गुम पायाहतियां कुत्सित बेप्टापों का भभिनप परती है जिनके उपर एष विराट पन की पाया भूसार चोट करती है। मानव ही है सर्वाधिक मानव का मक्षम मौमिष मद मे बुद्धि का युगगीबी मानव दानब बनकर प्रात्ममात कर रहा पहा! छोपर पोपित में विभक्त प्रा पुग मानवता जाति पनि में वर्ग प्रेगि में नए एलि पनिमौका पमिरोंपा पन बम का जनबसपा या प्रतिम पुर्ष समर है विष विनाशक- सामूहिक मार तिपत विपफम । सिका! बास रहे है भार युगों के पीणि गोपिन रम्य जग पयर, मर पुगवन हो कर्म पुराम बग बीवन के पमबीवी पिरी तोर साम्म निर्माण हेतु मब पर प्राण हो। टूट परी पर नौह पसाएँ जनपण की मू रम बोबी पाबक पण हो ऐ प्ररोति पान ग निर पनि पपुफिर मोष प्रग्पपित भस्म कर रहे का इम्मप दृष्टि मानम !

प्रिस्पी 1 प्रयतम मनोमान से पीडित मानव प्रवरोहण पर रहा तिमिर के प्रतम गर्त में यमों की पामुरी भक्ति से बन पा मगर बिबर रहा बोपन प्रमत्त हो बहिर्यगत में। कहि ठग्ण मैतिकता से मात बेसना देश मही पाणी प्रपनि का पप विगमम मे मानव का ही पय-भोम मनु विस्फोटक बन महामाच पा मापान पर रहा धरा पर । संस्थानों में पच संगलि पर सभा सयम पा है उपर काम प्रपतन का तम छुपा पाम से रीर्थ धीर्ष हो गोर बेतमा पारोहन के पिमुख ममती पयोमुनी हो । (सभ्यता का बिनासम्बल पाच रंगीत) रेलो प्रिये विराट् भीम सौधर्म नाय का मत पी पोमा । बारम महावस की महा मात सा मत सहल फन तान गगम में महानास पलार भर या बच भोप कर। परत फेन के उगम महकते पूमिम पावन महामृत्यु राम मार विसामों में यह या हा पुष गुम मीपण प्रबकार की। खत मत पाबाएँ, बाबामन को मामाएँ चाट रही पहनों पिरियों सासर मारों को मुरंग स्फनिर्गों की फुहार में म को विसरा मर भर पाता वरित चकित हो तारापबयों! पोर नबंर, प्रबत प्रभवन पट्टहास भर पंच प्रस स्पों से वह पर, निषित भुवन को कुचम ऐ निब मृत्प मत्त उरण टापों से । पुष बुत बन निखिम भूत चूमते प्रलय के विकट मंबर में मार पुमा मेबर में!

१५ मारप उपम ये पर्वत दुर-मे मूम पर हो पसे प्रयद परम सिसस्ते गर्व घिपर पिर फूट रहे निर्भर निपाव पत वाहिन् स्वमित हो विपमित प्रस्तर वगेरे पापों से फमिम । उमर हा युधि पात फर बस स्मों में उठ हिस्सामों पर पस्मोसे परली प्रारोहग बाप्प घूम बन पिटक हे सतरंग बस के कग स्फीत सीकरों में सपैस सपा-से मोगित! भूमि प पतौड़ ऐ सत परा-बम पर गिमा भस्पिों को मासम रजको बहेरने फर फट पानी ग्गामामुतियां विकट बोप कर पित रत मग्या उरोसती परा उदर से- हस्य सोम जो उगम उबार्मों में बमनो म पूर रही हो मम के मुप्त पर पोर मुगा से ! प्रभु नपर्ट फुछकार मरी गीभे पटका पर पात्मसात् कर रही पदारों के दत्ता को समित द्रयों के पर्वत एट हे पृषी पर महरे गों में सिर्ण कर परा-बम को। सिंह गुहापों में पहाइते महावास से गर विमारते अस सीकर बरसा सूर्ण से दीप्त पूष मयों से पाइन म पुरते गिर गिर पाते विहग वन करते कपि परेप। विचलित मत हो प्रिये संबरम करो पपा को यह केवम दुस्वप्न मात्र है युग के मना तुम विकास रसिनी शक्ति हो मेरे उर की देख ही हो केवम समावित मरिष्य को! प्रविनापी दत्त पविन प्रविनापी। हम पविनाशी । भमर बेतना मर जीवों को माय नहीं होता विकास प्रिय अमृत सत्य का मिप्या या संहार प्रवासमाषी जग में।

सिस्पी पुन नित नेपप्य भोक में निग कौशम से मबम मृष्टि तुम पूरन करोगी महाकाप से- पराशक्ति के महामंप से प्रभिप्रेरित हो! पापी हम तुम मम हो जाये अब परोम में। (प्रस्त-म्यस्त बेम में सहसा मपमीत नागरिकों का प्रवेम) पौड़ रहे पर प्रसव परा का बम पौरो रोग यही सपर्ट पावक के घर पम पर टूट पो सत परक परसते पर मुंग इव छूट गए रिय के भूत पिशाच प्रेत हो। कम कर करते र बम फट फट पड़ते सिप, रफ्त मास मन्या मते पण पुम भाप बन- ष्ट गया पृप्पी के मीपण पापो का पट !। मुंग पुष मसित न पप्त में होते मोमम घटक मस्ति पंजर मन में मिलते मरण में। संतु-पाम सी त्वचा पिरती ममस ताप से पिन पसलियो पिर टहनियों सी पचभर की परमरपन दीपम में तमाम शिक्षा सी! चीकार करतीं बीकार फूट फठ से ब प्रतिपनियों सी तत्सप प मुक्त हो बाम गर स्त्री पुस्प युपर भयभित निरीबन निर्मम दरी पर पाते पाच पिनाथ की। महामृत्यु मुंह फा भयानक नरक गुहा सा नियम रही भू को सांसों में बीच मसक सी- पौधे मुंह गिर नगर तोरते परामर्म में गता में स उन स्पीत भूमित सिमरों में ! घायामों से पते रहते-पक्ष्य माम देष प्रासार दीखते हे याबद्- पूम ये मू प्रति मंबर में पड़ी मार-से । पुरों के नाटक पाई भोर तुमुल विभीपिका मन परगी पर परस पी पापक भाराएँ रक्त सूर्य से। मम मिमीत हो पा भयंकरता है प्रपनी मगर हो मर गई प्रतितों में ज्यों- माग हा बीवन अपनी ही साया से ग्र, निज प्रतिम परनों पर माता उगमग बग। (तेजी से प्रस्थान) (सैनिकों रुपा ममिकों के मन में पोषों का प्रवेष) रुप स्वर- बुम रहे म के पानर से भूरे बमपण पृझ पे महामाश से अपरावित बन अब मिस तत्वों ने अपना प्रदम्ब बम पर मन में भर रिया मनुम भी मांस पेशिया पर्वत सी उठ रोक रही एर्ष पशु को। माष रहा बा के घोमिव में जीवन पावर और ही उग्मत्त पिरामों में प्त विद्युत् बातेहै उनचास पबन सनदी सासों में! भीत नहीं होपा मामय इस महामापसे विश्व बस से मोड़ करपे मब बग निर्मित- मी समस्तमप मनुष्यल को कम्पबरम ! उपसर- फिर से मानव पितु रेतमे भूमपान में पुनः बहेपी बप के मा में जीवन पारा मस्त मर रहे प्रबत पक्ति बनके प्रामों में विस्तृत इरता बाप तुरुन यसमा उनका भस्मसात् पर पी पनि गौवन का काम मुष्ठ ऐपा शासन फिर महापाम से ऐप कर्म फल पोस सध्यता भू को सर भण्टे रिनाम मनुर की रिमय भगायो।

तृतीय दृश्य
[कान-पाग्म सूबह पाच सयौत इस बप के बाद काम्प प्रप्तिकाम
पति हो पपा है कुछ बसिष्ठ हाप फाबो हारा भारि मकर सो
तोते हर बीच में गा रहे हैं।
गीत
लोद खोद रे म हार !
पाति हुई पनि वृषि
पस घेप मम्न सृष्टि
सोग ही नम्न दृष्टि
मार पार, पार पार!
पर्न पराम
सिपे मूम
मिट्टी में
यही बीच वही फल
छानबीन कर विचार |
एकस्वर- बीत गए इस वर्ष पार पस पम्नि प्रनय को
श्री बीवन राम पड़ी पुम पर पारे,
कटटे गए ए के वारस नए सितिय की
पुंपनी रेखाएँ मुगुर हिमती विपन्न सो !
रिक्त दान का म्फोम पम रहा युम संप्या में
मनास हे म को मभन के तप समूो
मस्त पड़ा भूमाम सम्पता का गठहर
तप तरतु हित मिट्टी के काम म्प सा |
पोर निराधारा विचार तमके कपाट सा
प्रानों को पोईकर प्रनय प्रहरी बन
महापमान बना पाणी का पौषम प्रापण
वहाँ कमावता विमीय निर भैरवता है,

६ मृत्यु-सुम्प कांपता निदाहक सूनेपन से निर्बनता प्रतिफसित मिधि नियनतापों में! दूसरा स्वर-पर इपर हे खूद लाद कार हटामो पूरे बन से चोरी हाँ से कचरे को मही कही पापाण से टारा बटबट उपम रहा बिनयारी मेष भरा दुवात है। सी है यह पब पिता को प्रमय अग्नि से बम गम कर मी राख महीं हो सकी बसही! मिश्र यह पापामय प्रतिमा है कोई। एक साप बीरो पाबास। इसे सब मिमकर मरक योनि से बाहर नाकर पीपा रखो! मघर पॉप कर इसकी एक मनक दो से - किछिपि, कैसा हुत्सित विकराम अप t! पह, याक्या यमराम स्वयं या कोई मानव कान बस से बर पपरा गया परा में? तीसरासर-परे मही! यह बयपान इतिहास मूर्ति है रक्त पंक इसके प्रबयब बन भारति उसनों से या पक स्मृति पीमित उर- यह नर्मस पारिम बर्बरता पा प्रतिनिधि है मामवता का निर्मम मिमक चिर प्रम्यायी! इस वा दो पुनः पार से - इसे अंधेरे पतम यत में दफना रो ! मत मूबीवन की इस मीपन छाया को पहरे नरक र म रोबकेत इसबमिराफिर पाताल भेजो। (मूर्ति को नाकाने का प्रम) प्रस्तर युग से गीगारी गुम हम का यह पोभित रंगित सर्प मनुन को मिर्ममताका नई पीलिया इसकी पारति देन भयानर हो पाएँ बीपन से !

मिल्पी
एक वृत्त हो चुका समापन भू बीबम का
बरस पया नव दृष्टिसोन मग बीमन के प्रति
परत हा मानव मन बबम गया मू मानन
नया पृष्ठ सम रहा चेतना का सोबत
गत दुस्मृतिको मिरचेतन में मग्मित करो।
नया पृत्त सठ हा मात्र इतिहास नहीं की
मई बेठना का प्रमाण भू स्वर्ग विसापक।
गीत
सोच सोच कर प्रहार।
दबी काही मिते माग
चिनगी फिर ठेवाग
प्राधा को तू न त्याग
सोने को मिला।
भूमेर में वितीम
मुग भनेक पुराचीन
पंस या नही मबीन
मनन प्रनय दुनिवार।
रफ्त मास के सरे पंक से उमा पी।
महा पोर दुप हस हो उठती वासा
और पे सम प्रस्वि पत सर इस
स्थित रुमि संयुम करम में महालास के।
रिम्म्यापी संहार प्रसंस निरीह पोंगा
मूत सभ्यता का दामन उपहार भूषित !!
पपषित मनुर्षों की देहों की मौसम रण से
परती की मिट्टी का नब निर्मान हे पा
कितने मम मानों पर्यो का माफ संगन
कितने सर्वर मस्तिणों का वेतन मन
पप दि में सोकर एकाकार हो गया।
क्या पहबान मुझेगा स्पण प्ररोहों में नय!

इसरा स्वर- यह कौन कहा इस नरक र मे
पाचे मुंह गिर कर माहत मन सत विक्षत तम !
कोई पबना है यह क्या ? मागिम सी बेबी
मोट रही है पृष्ठ देश पर बात बाईसी!
से बीप बाहर कर इस पाप पुर से !
महिमामयी किसी नारी को रम्य मूर्ति यह
प भरे एम रचित प्रबर, रोग पपरमे
प्रमों से मावष्य टपकता मीही कोमम
दुषित पूनतिका ईवित पर नवा अयत को
पति भपिमा में सग मर विमाम मे रही !
मन मोहिनी रही होपी यह पुग्ण यौवना
हाय कपया सहसा क्यों इसका र स्पंदन
तोसरा स्वर-स् ? पो यह वर्ग सम्पता की अनुकृति है,
पोमा सग्या स्प मधुरिमा की प्रतिमा सी!
फूलों के मा मंग एय पापाम पिता सा
इसके स्वर में बाडू प्रबरों में दी ज्वाला
प्राधिकारों की मरिरा से प्रारक्त युम नयन
बन बन से स्वमिम मावत प्रिय प्रबयप
भूविलास से महा समर खिाते पे जग मे
नितिन बरा के पद सोपण पीड़न से पोपित
निसरी पी इसके अंगों की मोसन ग्रोभा।
स्वामाषिक ही प्रत हुप्रा इसका युम मू पर
पके विषमता के प्रससी पिर पट्टी स्वमें यह
ऐंठ हा वन मर कर भी नोक पा से 11
गीत
उबार!
खोच,
विश्व घंस का पममान

०२ क्षेप पबम गीभ बान पिजन भीठ मूल्य प्राण मरठे कातर पुकार काल रात्रि का प्रसार छाया प्रकार, निगल निराकार म्य स्वर्य पयाति द्वार। एकबर- फैस रहा कद प्रनाधार प्रह परा नरक में पूर्ण हो गया बिगत संगठन मानब मन का नैतिषता बीकार पर ही सदाचार पब दृष्टि हीन पन अपकार में राह टोहता। बर्बर युग की पोर पापा फिर मानब पा धर्म नीति पावर्स मिचिम नियमाप पर मूट पीट, हिंसा नृसता पट्टहास भर पर जमकर, रोद ये मानव प्रात्मा को। मर्माहत हो उठी मनु की मूक तना मोड विषावक बिल युद्ध की निर्ममता से गहरे प्रण पा गए परिणी के बीवन में पच कूद कटु मम नियति निकभी माना की ।। पवन पर्व में पड़ी सीबती विस सम्मता समा ही सम हिस्र वृत्तियाँ पबचेतन की मनुष्यत्व पा रक्त सहर, कमि सा मानव दानव बम कर रख रहा विग प्रष्ट रीड़ पर। अन्न-वस्त्र गृह प्राबागमों के प्रभाव से पुन अहेरी बीवन बिता ऐ भारी नए, प्राषि भ्यामि वा रोप टूटते भुषित गीप से काम कोष मर नोम पूमते नम नृत्य कर! स्पर्धा पुस्सा कट् कमह परस्पर मॉच ऐ मानव का मुख पने पड़ों से !! राग ोप इसरासर-देखो है यह कंपी प्रतिमा यहाँ मरी है? मूदित सी ममती विप वापों के प्रभाव से। इसे गर्त स बाहर मा उपचारतों का हिमा गुना कर ममब यह प्रतिस्य हा उठे। हट पुष ६ स पुछ माह बसबर पटिम पिरा तंत्रों में दो पी पव विषा टिक टिक करता हाय पिामा पाम या सा मंद पा यापीरे जिसका याषित संपन! यह महीनतम प्रविधि हैम पर युग की रिमी सर्व सपन्न मतिमी कति पिहली! पापो सहो तुगी हवा में रख सपनर इसके मुरमाए मुख पर गप क.पाट! तीसरा स्वर-पा. यह ता मौखिम युग की विज्ञान मृति पर हट जामो इसकी यह का प्रबिस्फूषित वि फिर गला रही है। प्सम मगनों से निरम ही विपदी नियाम बाम एस्त में रर मियों में भरा पात्र है! रशिप पर का मंगीवन पर फूट गया है ! यस्मामुर सा अपु बल कापरबान मारा पर पह अपने ही बरा इस से मस्म हो गया । एक स्वर- नहीं नहीं यह पपिक समय तक भस्मारहा मही ऐगा। यह प्रपन ही मस्म पप म मप मम्म म पुनः बी उठेगा पृमा पर इसक भीतर भूत सत्य का पमन प्रग इसरो अपने ही बिनाम म पाट सीकर दिमसक में निर्मायक बनकर गर्ने । गीत गोर शोर रे मेबार । बोपन हम हो महोर, चिस्पी बिना मूम मन से हो दूर भार होगी फिर पा कोर बीतीको पिसार 1 मतम उदधि में प्रकृति बिमा एक निष्प फूम बिना मास मंच प्रतुम मुफ्त मार! एकबर इस मिट्टी की मंच योनि में जाने कैसे कर बीवन का रीम पिर पड़ा प्रमयबर से जो प्राणों की हरिपामी में रोमाभित हो मग पन में छा मया प्रसस्य प्ररोहों में ईस । सुनवाबो गहराई में पैठ होगते पाते ये नित पूर रन पर यह मानष मन प्रतम प्रकूम गृहा । मिस एस मर्म को मरमही पाई मानव सम्पदा प्रमी अमरावर-यहाँ कौर भेटा मा कम में सिपटा बीवन प्रांत पविक सा जपती से विरक्त मन! काम स्वपिर कोई पि पिर निरा में सोमा देख रहा है स्यात् स्वप्न मठ मोक के! म्भत निप्पम सा नमार प्रति बी से ममम भग झरियों से पाना चरन पषित तन स्फटिक मान स्मित बम बत्र बांध बाहों में पर पुगारी सा मगता सूने मंदिर का दीपशिखा बुम गई भारती करो बिसगी । तीसरासर-माई, यह तो पार मूर्ति है वीर्ष वर्म की पिसके सम्मुर प्रमत ऐ युप गुप से मूबन तई पाम फैमा बिसने प्राकार बेलिसे पाप पुम्प में स्वमै मरक में उमममा मन ! रमापात पर हुए बरा पर इसके पारण

नमक
श्रीबम से हो रिमुख बने बन निर्जन सेगी
पोर पंप विश्वासों के कुहरे में लिपटा
हदि रीतियों में बाड़ा इसने जीवन को।
राबनीति ने सिंहासन मुख कर फिर से
भौतिक बम में बनीभूत कर, फिया पराजित
गत युध पी बीडिया के चौबम वर्मन में
पीराकर, इसके पब का किया परीक्षण!
बनन बनम बन रही टियो प्रवरिक्ष में
जनन पनन हो पा समापन एक महायुम !
स्पर्म मोप है मिमै पमित इस पुम्प मूर्ति को
पनगम सेवक महाप्राण पुग पर भर्म को।
रजन मसन मानव के अंव स्मित निसरों पर
मब भाप्यात्मिकता विचरे बबीबातम
बन समसमपर रजत पटिया वर्मम में
मम्मा बनना का मामाहम परती भू पर ।
गोष्ठ
बोर खोदबार सार।
सर बहिनि
पोग प्रप्ट पारमध्यान
रहिरवर कर सूमार।
भीतर ही पुग न मोड़,
दोनों के सूत्र बोड़
दोनों को स्वार।
एक स्वर- किसने ही रर्पन विज्ञान यह मनुष्य ने
रीति नीठियों की बांधी एक मर्यादाएँ,
मगर संभ से रागर्वष मी प्रमातंत्र पर
परिचालित नित कर मन्य समायो।

शिल्पी पर मिट्टी की प्रेम पता को मानम मन दीपित हाय न पर पाया प्रतःप्रकाप से उसकी घर निर्ममता को कर प्रीति बिपित संबो नही पाया विस्तृत बीवन पोमा में! बाति वर्ष के पर्म पेमि भषकार को पर युमों की संसतियों के सारो को राष्ट्रों की स्पर्धापों भिन्न मतों बारों को मनुप्पत्व में बास म यह पाया म म्यापम । संसति का मुबग़ पाने बम सम्प मेष में प्रमतरी पषु मान रहा गत मुम का मानय |! दूसरा स्वर- या सिर के दम परी भूति है किस मर पम्' मानब के पूर्व सा लगता माष मूग हो ! पुच्च विपाग विहीन भरा बहु रोगों से उन पप्प मचपी के से इस मौड़ी मुब प्राकृति मत्त वृपम का सा मासम निषमा तन इसका कौन परा मह पर मैं कीषा में पा तीसरा स्वर-पिसी मनोमिकमेपक की प्रतिमा लगती यह सीड़ी सीड़ी वर गान बासना गर्त में प्रपतन के प्रकार में मटक गया बो! ऊर्म भेनिया पोरबमा की बो निम्नग निश्चेतन में विचरा पसू मामस के स्वर प५ उसम प्रषिों में पसंम्प इडिय प्रम पीमित बोगन पाया पास्ममुशि का पत्र प्रतर्मुस- उभरे मोटे मोठो मे मानसा मुंठामो की रेखाओं से पर्चर प्रानन | एक स्वर- पौर अनेकों हरित बिहू महाँ गत मुग के पड़े चूम में प्रति मिन, ऍबसी स्मृतिमा प्रावि बनस्पति जगणीवन वियों की! महर्षिन क्या? जिसने बीवन विकास की । - -

माटक
विस्मृत करिया फित की निर पीवशास्त्र में
वर्यचयन परिच परिस्थिति को महत्व दे
बल बन ममघर के विकास काम मुत कर
सिर किमा मानब को एक भासा मृगका-
निष्क्रिय परवा मार मान बीवनी पाक्तिको!
इसरासर-यह संभवतः कासमार्म। समरिक बीबम का
विरमपप संपतेपन कर जिसने दियापक
नब मारमक भूतवाद का युग पर्थन दे
पारोमित कर दिया मोर पीवन समुद्रको
प्रशास्त्र का मब संगीवन पिसा बना को।
वर्ग क्रांति का दूत साम्य बन विषाया।
तीसरा स्वर-रेतो हे या गुरयों सी प्रियमाण पड़ी है
युपम मूर्तियां मुब पुर हो यहाँ बिनानी
सर गहित माइति इनकी बौना सार,
पक मुकुटि, दोन्नत पिर, पर मर स्फारित ग
रक्त सिक्य पृ९ इस्त कोष से फूले नहुने
मारी मरे पर रोते हों ज्यों मू को।।
दूसरा स्वर- रामनीति पौ' भनीति की प्रतिमाएं ये
मम सैम पो मित ही स्वामी ममाहा।
पुरभिसंधि करती पक रपती मन मू पर,
प्रांदोमन संग्राम जती रही निरंतर
बन संपठनों मिम मम अधिकार मोगती।
मादि में टिमनी क्षमता में महाकाय ये
महामंस माइ म पर पपुवन संपहर!
पूर्व पूर्ण कर दो इनका स्मृति पेप प है,
मिट्टी में मिलने दो मिट्टी के दैत्यों को,
बाहिरीयत के पंप दमस में रहे भटकते
पमा प्रेत ये निर्मम जगजीवन के पातका

शिम्पी गीत बोग बोर सर सार। वमस में छिपा प्रकार प्रलय में मुजम विकास मुत्यु प्रमर का मिलास बगत रे मही असार । पतझर में ना पसंद सीमा में घिर अनंव सपा नरम विगत युम प्रमात मुग निहार। एक सर- तिमिर वोम कैंट पा कट ऐ धमिल पर्वत स्वर्ष पिम मब उदित हो हा मनोपमन में मयत वना किरणो से पीपित प्रामाएँ, उत्तर पी है रिम्प बोति प्रेत टिसरों पर । मस्त विमत मानस माग्दर पड़ा परा पर, भूमिप्यात् गत भर मित्तियों के पुर्णम भा एका माप बन भू पोपक मौतिक प्राबर निकर यो मष सूर्गों से संपन्न परिणी! ऊम पंच उपती पमिनय प्राणों की होमा- स्वर्ण इस सौ वर पी निस्सर बन पर ज्योतिर्मयी गबन माम्पारिमकता मय वम । इसरा स्वर-यह किसकी प्रतिमा सयिक मामा मन्ति। बीपन सुपमा से निर्मित पिसके प्रिय प्रमपण विश्वप्रीति से स्परित विस्तृत कोमल अंतर, फरमा विगमित दृष्टि शान से दीपित मस्तक दक्षिण पर में अभय बाम में संघीवन में कौन उतर पाई मू तुम में यह मुरबाना! बरती की रषको पोभित करता इसका तन समा रहा बेतना विषु नब निस्तम घट में !

मारक
.
तीसरा स्वर-इसे देखते ही पहचान गया मेरा मन ।
मा संस्कृति की प्रतिमा मद प्रामा केही
प्रपन हो उर के प्रकाश है इस नियम से
निसका स्पतिर होता पता युम युग में !
बाम शक्तियां जब मपने ही युग विप्र में
मेस अप हो पाती कटु संघर्ष में निरत
मन्तर के पारबत प्रकार से यह न पौषक
नब मन निर्मित कप्ती रहती मम वेतन हो।
समापिस्थ सी यहाँ परी या पात्मनीन हो
इसे देख कर नब बीपित हो उठी एप में
नब बीवन मरग्योति प्रीति भी सुबमी पाता।
बप होमष मानबठा की बप मम संस्कृति की
बिसके पावन प्रमूव स्पर्प से बस पेप से
परा स्वर्ग पर निखर रहा मन मनःक्षितिय में!
(मामा-मानर-रत्साह योतक बाप संगीत)
-

चतुर्थ दृश्य [सिन्यु तर पर एक स्वप मुगर भाभम प्रमात का समय एक नबपुप इप्टा पौड़तापम नमोरित सूर्य के सब बिम्ब को प्राहारपूर्वक पपिसे रक्त- पबेत कमता को प्रेलि अर्पित कर हा है। प्रायवा से पारिक प्रकाश की रंगीन पसलियां बरस पीह। नेपप्प से प्रमात सना के साथ मपुर स्वर प्रसाहिल सपन स्वोदय जय हे जय हे! ज्योतितमस मिमन याम बम्प इस पी समाम जीवन मन पूर्ण काम जपत् म मय है! कमककमा परा सिता प्राम उदधि उठा निबर संगम भय गए विसर मुर नर विस्मय है। मिमे स्वसर्ग गरा बुरि बनी अमरा सिडि बड़ी स्वयंबरा वा चित् परिषय हे। देव बनुग मेष-मुस मनुन रागय मुका प्रेम प्रेम सहमत पिर ममममय है।

मारक पा- प्रस्तनम के प्रमाण पापत मुब के मुहास मति मानस बिनास निव मन प्रति हे मर पारा ज्योति द्वार पर प्रमपम में पीरे धीरे नुन रीपित करता विगत को मनःसिंधु की सहरों में रात स्वर्ण रपिमा देन पी पातोक र मार्यों से मुसरिता खर पी मय बीवन प्रतिमा पापा देही पोमा पंचों में ग म सों में मूर्तित स्पर्म शुभ महम कपोत विचरते मम में परस पा सौम्पर्य प्रमौषिक परा शिवरपर। कुमुमित पर मू का प्रोगम बन गृह कुर्गों में सप्न मरोगे मुसे दीप्त पन पम्नम दो पिचर ऐ गान ममर मर मन्नर्मोचन प्रीति पनित कर भूमार निम पर पापों मे ! तुप्त हो पा पत इसों की पापा स्मृति हप प्रपि दुत गौ, पुन पए के पम्मर पम्त समिमा बसना की बारा से पण मुखर हो रठे मन मनजीवन के तट। परिवनिमबीवन के प्रति बन भारोन पब राग प र पए, मिट गई ६मा स्पर्ण, दायाप हो गए जगत के मब अपमिठ। ईडिप पीडित बीभूत विग्मम पुटिन मन पारोहम करता प्रान्तमुख सोपानों पर रिप मान रेतना बन पई, प्राति जना मसिरियपटु मेरों में मर मंगति मर! वीरे पोरे उपवेतन निषेऊन पा उम पानोषित हो पहा मर्म स्परों में प्रेरित ६ ५२ शिल्पी गत युग के समविक पिरोष पम्म निलिम चुत मबम संतुसन पहन कर रहे मत पूरित ! स्थत रिम्प अवना पार संचालित करती मामय के पौवन के मन के म्पापारों को! तयार मिट मप न प्रब पौशिकता काम इग्दामों पा संपर्पच प्रामों का बिपाय ! पिषित बसम सी खिसक वेह से बीवन तृष्णा मानव के परमों पर पड़ी ममत माया सी। क्मा विरक्त हो गया मनुब मन बीवन के प्रति मही सुनता सहम मिट गई मामय मन की विससे गित स्वार्थ विमस्त पाबग बीवन | प्रहं भाव का स्थान ने लिया पात्म ऐक्य में मग हा सहा समन्वित पार हो गई मतरतम से योग पुक्त हो चेतन मानव मुक्त मपुर चिश्य मोगता विस प्राति का। प्रारम स्थित पाबीवन की प्राकामार्थोपा पासन पर स्वामी बह इप्टा भोता है। बीरम की कल्पना निधिस पम्त परिषत हो भी गोमा प्रानंदमबी बन गई परा पर प्राय रिसाएँ मुखरित अन्तर मगारों से सस्मित परनी का मुखममर कमा कोमन से बाम मोबनामों से अब म भातपित प्रत शोमन पर मन्तीवन निमाता। साहिबरसती अंतस का सौधर्मरसता ज्योति प्रीति स्मिठपरा मनाती बीवन रस्सप। (मानम्म-मवलमृथक पाच मीत बो विगुनों के स्रोतबा बोड़ों बसपा में या बाता है।) कौन प्रा पे में अस्वारोही सैनिकसे पत्रों से सग्नित प्रयापका बाप बनाते माटक भारम पवित मिण नियम प्राकामी बन- सभी ऐप है भू पर क्या पता बरता ? (कुरा निर्ग का प्रवेष) प्रतिनिधि- अभिवादन गत अभिवारन करके मद मस्तक हम पृप्पी के लोकतम सत्ता के प्रतिनिधि लिस प्रमप को निम्मा है यह संस्कृति मगन समापों से प्रेरित मैत्री स्थापित करने । सैनिक भूपा में? प्रतिनिधि- परती राम। महानास में प्रभव हा प्रदेश हमारा ! हाहाकार मचा वापर सारी भरती में भबबीवम निर्माण निरत पामोक्तम्भमा पर्षचती है बीत परपस मिण स को मोकसम्मता विद्युत् पति से पाये बाकर विकसित पब हो उठी परम सीमा में अपनी पम्न पस्त्र से घिर वा भू बीबी बममण पागहमारे पस्म स्मित उस महादेश में शिक्षा से संपन्न कमाकोसम में परीक्षित सामूहिक बीवन पिस्सी पप के प्रसिर । हमने विद्युत् पाप्म रश्मि अप को बस में कर रहे मोर भीवन रबमा में मिमा निमोनित सिन्धु ममन से सीप नित वरिए पक्ति को सव पारिका से रखर किया पराको। मए फूम म गई बनस्पतिया उपमा कर, नए बस्तु मा प्रथमक्ति के प्रहरी रखकर हममे बहु पोधिक मन बाधिक मन मिमित कर विश्व प्रतिको क्रिया मिनिट मामर ममता से! बासाते प्रय त्रिम मन प्रमुख बन सीकर, मरथम बीवन उर्वर पब, पर्षद मत मस्तक, सिम्मी इप्टा- वीण निसा का तमस रमापन के से स्वर्ग बन मई मू, मौतिक विज्ञान स्पर्ष से ! महत् सम्पता का निर्माण किया है हमने सोपम पीन से रक्षित कर पनयनमापम | R घिर स्वार्थ हो नठा निमत सागर पर यह पाम मापके गुमागमन से प्राण प्रफुन्नित मोक्ता मापरिको के प्रतिनिधियों का इम हार्दिक स्वामत करते हैं उनके पतुमित बीवन डौष्ठत से विस्मित हो ! प्रतिनिधि- क्या मह कोई नया सत्र याबीवन संस्थान मात्र है। यहाँ मनोमत्रों को विकसित कर सापकगण लम प्रयोग कर ऐ मनुर मन के विधान पर। मौ' अन्तविज्ञान निहित नियमों पर माभित सयों का अनुपीमन कर मानव जीवन का स्मान्तर पर हे प्रभीप्सा में रख प्रविरत । अन्तर्मन की सुप्त शक्तियों को बापत् कर दिप प्रबतरण को सचेष्ट करने२प्राीं पारम समर्पण से पता विश्वास प्रीति से पाबाहन कर रहे मह जीवन पान पर 1 मानव के प्रम्त शिखरों पर मम्म तना उतर सके जिससे ज्योतित स्वर्णिम प्रबाह सौ! हास्यासद सय ऐनले । पाम प्रापके समरिक प्रारों में नित बहिरंत मन को कर्मग जीवन प्राकाक्षा के स्वप्न हमारे किन्तु सापकों रासमार प्रनुभव निश्चित नयमत् चौरम होनीपत पा मनिप्प है। प्रतिनिधि- पाप यूषा सम्वेह मत करें अपने मन में मात प्रभावित प्रापकी कापी बम- दर मारह सत्य बानिए, पोस्ता के महाकाली मन का मन मय मारयों के प्रति जाग्रत् है । जीवन को इन्दाों से पप्तिप्त प्राम भौतिक सामाशिष साधारपता से अवगत मोभित सामूहिकता से हो मर्म मात वन मंतपितरों पर मारोहम को उचत है ! रिम्प ज्ञान की पीमा के उपयुक्त पान के पाप उन्हें सइप करें मभिनय प्रकारे मात्मा का स्पषिम पावक वितरण कर मन में गहन प्रमुभरों से पोषित कर उनके मन को। पत युम के पावर्ष बस्तु विपया विभेर पर ए समापनका वेतन का कटु समर्पण पर्म काम के बीच पट गई पुर्पम साई परा स्वर्ग को मिला दिया मम म्योति सेतु मे | बाह विरोष मिटे सब बीवन की सपा अपनी ही भंगुर सीमामों से सम्बित है। महद् प्रेरणा बिष्य गागरम के हित उत्सुक बहिर्गमन से मौत बोगते बन प्रतापप 1 सल्यामों के कोलाहम से कपित प्रार, पौमिकता के मौह पदों से बर बीबम समतम समता प्रचलित परिचित मध्यमता से पिरविरक्त हो मम स्वप्नों का माकांक्षी मय! परा मरम को भुना प्रदिर ऐहिकता के हित बना सकता मनुवम मनको दीर्घकाल तक। फिर ईशिय पिस्प हपय को मोह पिरत कर प्रेरित कप्ता नसे तत्व की बोग के लिए! सोपवत्र का यह पनुभव प्रब सामूहिकता निगम नहीं सकती प्रेत-स्थित मनुर सापको!- (बोति पावनता, मानरोतक बाप संगीत) शिल्पी ऐसी पावन शांति सहज पो म्याप्त है यहाँ हम नही प्रत्यन परा में मिप्ती कही मी ! यह कैसा मीहार काति वा रबत सांक है? विचरण करता इस यहाँ किन सोपानों से अंत मुरभिव स्तनों के मब मुगुमित पम में । जैसी सन्द सरम बीवन चेतना यहाँ है एक प्रपौकिक प्रापर्पन है प्याप्त पतुर्दिक ! सिहर रही पिस गोपन सुख से मनाचियए, मुल पढ़ते अंत मोमा के पट पर नर पट अपमानयनों के सम्मुख-मन को विमुग्ध कर! पाग पी सत सूक्ष्म प्रेरपाएँ मामस में मितरों पर मर सिपर उठ रहे स्पर्म विभव के प्रान सिन्दु को मब स्पर्ण से भावोमित कर। कौन देव ये स्वस्थ सौम्म स्मित मुखमंग्स से भाति काति पिरबरस पी किस प्रमुख की। दुर्मम । मह मोति प्रीति मानेर मरिमा पुर्वमन पर प्रमर बेचना का यह सत्सर । सुम पुम से मानब अंतर इस पमृत स्पर्ष की मर्म मपुर मनुमति के थिए उत्कंठित पा | मोकतंत्र का बीवन मब इस भीषन की चाया की पाया है, मर मरण में मुंठित । माप हमें परिवार्य करें मग हान दृष्टि से रिक्त बराको पूर्व करें निब अमर रान से | भाष परम धामाब मिला बन प्रतिनिधियों उच्चाकामा से प्रेरित बों को मुनकर । यह सिर की महत् पा है समय बीवन माय उपमुख प्राणप के हित उचत है। भाष बरा मंधकार का पर्व भर गया मब बीपन की प्राकांना मम प्रकास से भू बीवन मेड मिर पए, मेद मर गए, पा-

७
भाटक
स्पोवर हो रहा प्रकृति का परम दया से।
माप साग पाहिप्प करें स्वीकार हमारा
वापसगम को पनसेवा के हित प्रपसर !
मपबत् कक्ष्या बनगन पर चरितार्थ हो रही
पावर का समय निकट मब भू जीवनका!
रेख हा मानव मविप्प में मूपम दृष्टि से
बियत राजनीतिक प्राषिकतों पर विचमी
भू पर मानव तंब हो पा प्राण प्रतिष्ठित
मनुप्पत के मन मूपों पर मापारित!
बौशिक पादों स्पूम मतों से मुक्त परा यम
स्थत बिस ये पुमासे मत प्रतीति स्मित
उरके सौरम में मम्बित कर स्वर्वतोकको।
मामो बदन परें मान उस परम पक्तिका
श्रीमानक यह विश्व महत् बिसकी इच्या का!
गीत
पोति दायिनी
अमृत वाहिनी
पाबनी।
जमत
रतरो पर निकाम
बम मन हा प्रीति धाम
जीवन घोमा समाम
स्वप्न पायिनी।
मुमत रक्त सरप्रसार
वेतन में बसे ग्वार,
प्रानों में नव निबार
पतुप दाहिमी!

म
गिलो
मुमुमित भूपाय पार
अंतर्मुख पन विसार
मौतिक धी मुग मपार
स्वर्य मायिनी।
प्रम पर पड़ा प्रवीति
संसत हो रीति नीति
बिपित परारोप भीति
मृत्यु पापिनी।

अप्सरा (सौन्दर्य चेतना का स्पक)

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अप्सरा
साकार
ध्वनियां
प्रतिममियाँ
म

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प्रथम दृश्य
(भावोद्रेसन)
[मन मितिनामा बेतना में रय सरोवर के तट पर ताबारप्यान
मटा है। सामने मावमानों की वर्षगुन मेनियां, विचारों के रमत हासे
हो वीरकर निवर ही है। माकास से प्रेरणामों को सहरियों द्वारा मेरमपुर
स्वप्नवापर संगीत मुंगरित हो रहा है।
प्रप्सराका गीत
एमबमबम पम पायम
बरती मेरी प्रतिपम
नितमीरब मम मे रख
मरतामेराविकम!
प्रस्फुट स्वर
मर्मरभर
गावेदन के हात
नहरों पर
फिरती मरहमोमम!
मृापपर
सौरन इमप
सर्पग पप
पधि मुख पर
गता मेरा पंचम
पूंघट पर
हसती में स्वर्गोग्गत
प्रांगन में
उपाकी म्मिति निरदन
यायावर मैंप कैप
संध्या में पाठीमा
(संगीत-महरियो पोरे-गोरे पितोन होतो हैं)

१४ शिल्पी । कसाबार- यह कैसी संगीत पृष्टि हो ही पगन से मा मेरा ही प्याम मौन मन गा रखता है। कसा पाकर्पन है यह कैसा सम्मोहन मह सौन्दर्य मारिमा 'कोई मेरे मन को बैसे बरबस पीच हा हो । 'क्या है यह सम? प्रानों परी म्यादुमता जीमन को म्याकुलता पा मग तो मैं यौवन का रोमांच बार मी पार कर चुका पर मंजरित दिर्गत परा का पागम कर देता पा मनको! यह मारकवा पा सुन्दरता यह सम्मोहन प्रकपनीय है प्रकचनीय । पाश्चर्यचकित है। बाहर मीवर परमीचे-नील पोम पर, मिरि शिखरों पर हरित परा पर-नही मधुर सम्मोहम मुमतो गुना रहा है। सबने मुमको पर लिया है। सम्मु रजत सरोवर पर्वत की बाहों में से पा हुमा है। इन पावानों के भी क्या प्रेमाई य? ऐसा ही प्राप्त न हो मेरा मन भी बीमन के पुमिनों से टपणा पता है! से कोई पोमा बाया मेरे मन में लिपट यां हो पौर उसी के संवों पर मेरा बीवन नाच पा हो । विस्मित में! मही बानता स्पर्म लोकभी कौत पप्परा मेरे भीतर समा गई है, घिसने मन को निज सनौ म पाए में बांध मिया है। यह समस्त सौन्दर्य मुझे मगता हैसे उसका एक कटाम पात है। मुख पर मिममिस किलों का पट है स्वर्णिम पाया पर से पांचमिचौनी मिना करती है यह मुमसे !

नाटह
उसके पों के सौ सौ प्रायतों में पर
पहते हए कमाम सा मेरा मम पाने कर
बापाप से फू दूसरी
महरी के बस मंचात में वेष बाता है।
पोर परामकता ।प्रानों के प्रदेश में।
बतकमा के राबवर सा मोहित हो में
भटक पया किसी पप्त अप्सरानोक में!
प्रप्सरापा गोत
पर निमृत नीलिमा पुगों में
उपाएँ बग कर मुसकाठी
मैं मर्द सुमे बातायन से
अपना स्वरिक मुख बिताती |
जय हनक रश्मियो कमियों के
गोपन प्राबों रो उकसाठी
में पौरम को बम प्रमों में
गुगरण इस हूँ उसनवी ।
मैं पिकी रबत तरी परषा
तारापथ
से पाती बाती
मेपासतरंग घिबरों पर
स्वप्नों के फेवन पाती।
मैं मन पिविष के पार यहाँ
समिम माएँ मंगराती
गत संप्यापर्यों के पमों में
पमिनब प्रमात विकमाती !
करत र प्राविही का प्रोपग
में रेप वृष्टि में नहमादी

शिल्पी जाते है) में अंतर बम को भी अपनी स्वप्मिम सुपमा में मिपटाती। (गीत के स्वर प्रामोग्मारन बाप पनिमों में कासाकार- हाय कहाँ सो पया समस्त मनोबन पाने, प्राब मिसिम पम्पयन मनम चिन्तन बोपन का पर्व हो ममा ज्योतिरिगणों मे बनमम पर निष्प्रम परवे पाये है पावर्ष मुनहसे तारामागे फीके पा कर मते जाते दीपमान मेषों बन पंधकार में ज्योविव कर पा रहे नहीं ये नौबन का पर। किन प्रभाव गुहार्मों का उन्मत्त मिस मह भाष न पाने उमा पा पोषन मूल्यों को पतन निमरियरने मिन रमन प्रवाह में !! अंघस हो उठता फिर फिर मन] पापा बेगन प्राणों का मन है? या मन का प्रम? प्रभवा गरम पा पुग करपट ? मन भीवर नया सम मा बामणा महारामि। महसी मर्मर पनि बग उठती प्रामों में। बीवन के पंबर में नर सरन भर एक मा बेतमा सपेट ही मानस को प्रपनी स्थानिक भोमा अभिनय वैमा में पुसा पस्सबित हो उखा तन सूक्ष्म प से। स्वणों के रंगों में बेष्टित कर प्रामों को मष पर्यत हो फूर पहा प्रोमा स्मित ! पता परवा बाता मम का पिता सपप उपाय के गहरे गौ की विस्मृति में एक मया धौन्दर्य बार उष्ठा अन्तर है बरगी के या पुलिनों को प्रमाणित करने ! (पप्नवाहक पाचपात और लहान)

2.
पारा-
में सप्नों के इस पसाती
प्रहर सौरभ बन मा याती
में स्पहीन म विस्मित कर,
स्वर पम रहित सय में पाठी!
तुम हाया भी पिस बिममाठी
उर में
पाठमठा उपजाती
पो रंगमपी तुम पंवर को
पोमा स्वारों में
महमाती!
मैं मन के भयनों में माती
उर के पापों में बतमासी
में ध्यान मौन प्रवर्मभ में
स्मित भाग पर फैमाठी !
तुमको प्रतीति
पपित
उर की पा से प्रभिन रित
में पारम समर्पण भम में
निर्मर प्रकाम
के दामाती!
(पामाइनसूप बाय पीतयो मानसिक संघर्ष-योता संपौव परिपत

द्वितीय दृश्य
(मानसिक सघप)
(पीबन की हरी-भरी पाटी पृष्ठभूमि में प्रारोहण करता हुमा मन
सोपान रगत पमित गिरिम-सा रिहाई रे रहा है। नीचे मातम परचेतन
प्रेषकार में काली पठाएँ प्रनेड कत्तिात माहतिया परकर उमड़ रही है।
महार- कौन पुकार हा मुझको पाव देश से
या यह
मेरे ही प्रतरतम की पुकार है।
पागम कर पी भाषमा किन पनगाने
सोमाके सोपानों से किस मम्य मोक में
जीवन के मनके स्वाँरो पार कर निर्मिती
भर मामा के विकास काम्पोति शिखर उठ
पीरा रहा सम्मुख स्वपिम पमों से स्पषित !
पकाकी विचरण पर पंव स्मित मोमों में
स्वण मति तमा उतरती बप बरती पर
मही तुमुन बन कोताहन पुप पन छाया
तब पैसे समता है वास्तवता से कट कर
बाम सर सा अपने ही वासना बमत में
उरता फिरता । मन रिक्त कुहासा बन पर
अपने ही सणों के बनुप मे रजित ।
मारल भी बो नहीं बम सका विपके उर में
गर्गम हैन . विपुत् पम सीकर।
परस बरस पो परती को मित सर रखता
पानों की हंसमुख हरियाली में पुमकित कर ।
मोर पसंपति पार बाप भीतरबग में ||
गह या कैसा संपब का तम पिरवा मन में
माकार धन पायाशतियों में से कैप कर,

मारक रेंग रही भो ममक परीकी रग में 1 असर मीण भाकायों में मारा कर सूरन पेदना सी है मोककर्म को अनुप्राणित करमे अपने पभिनय प्रभाव है। मम्य सम्मान कर माएमा बम परपी के कर्मम समतम पीपन कोसोभापतितकर! (मेराश्मतूक शाप संगीत) युग चेतना का गोस युप-देवना- अमर हा प्रामकार, भाबकार हास नाश का मिस एनिवार । पती की गुहार रही पुकार उमरगा पोर सुबन प्रमय बार। प्रणयबार। पुष्य म्पनिया- ये सुंठित ठित कामाणे, ये मुग्छि पुषित छायाएं, भरती को बालों में पकने फिरती मोभी चाहें पसार ! परपी के परिणाम बिनका मिप्याभिमान बरा बेठना के प्रतिनिधि मानव मुभिधार । कोमल प्रतिप्यनिया - पे मार दिम के प्रबषा अपनी सीमाप्रा पोपक मय के बिपी निय कुठा मा पर प्रपार ! रेती सी बोरिकता के हर पर विबरी तृप्मा में मे मटका करणे बार बार । नौरस चमक सिमांतों की मृग १.. सिपी भार1 पम्प भनिया- गिरगिट-से रंग बदम प्रमाणित युग परियों को कर बिम्मित में मत प्रतिरोष बो परते मुग बीवन पारा के सिवार। निम्नग मयचेनम पूनम प्रताबम के पप कंटक शिरोही पर तुन्छ मानव द्रोही युम के मंगार। कोमल प्रतिबनिया- बन बीवन में बो उच्च महत् मा पर्ने नहीं होता गगत निम रमित मामसा का पन में मे रेखा करते बनको प्रिय नहीं उवात्त भाव मातुल्य वृमित से वित बाप पुष उमट गई। ऐसी मति 4 सिर के बल करते बिहार | पम्प म्पनिया- युग बौयम समवेत गाते बनवा बनता रटते उसमा मामयवा से कर बहिणार ये के बुद्धिमान प्राइव मिथ्याभिमान चेतना के प्रतिनिधि मानव का मुक्ति द्वार। पुष-वेतना- गुमर पा प्रबकार, प्रबकार, माप में विकास पा पा निवार, अन्तराम की गुहा मब प्रकास उठा रहा तिमिर बार, तिमिर मार। (पुष-विवर्तनसुबह पाच संगीत)

कत्ताकार- बिपर रहा अब विगत पम सगठम मनुजा
पूर्ण हो पा जीर्य महता का विमान मित
मार शेर मविशिष कामि पई ना भू पर
निमह पा जीवन तृप्मा का प्रयोजन म
मानव पास्मा के मूस्यों के ध्रुव प्रकाप को।
रतर नही पा ही मय सापर्य घना
युग करमप से पंकिम परबी के प्रोवम में!
पार नया रायित्व भार है मध्यवर्ग के
सुक्न प्रान युग वीरन पिस्पी के कम्मे पर,
परती की सौन्दय वना का प्रतिनिधियो!
पुम मन बिखरे पनगद उपकरपों को म
मनुष्यत्व पी नब प्रतिमा कल्पित कर उसको
प्राण प्रतिष्टित करना हैसन यन मन्दिर में !
युम पागों के कदुकोमाहन में उसको
मागीबम की सर संपति भरनी है पायक
बस्तु परिस्मिठियों से निपठन पाप को
उसे गममा विकसित मानक परिष में !

तृतीय दृश्य
(उमेप)
[सम्म पाप्मों का स्वविम पाया सेतु गवनुष की तए परती-पाकाप के
बीच टेपा है जिस पर बड़ा बताकार म्परको रेखहा है।
मप्सराका गीत
में ही बिहूँ मैं ही मुम्बर,
मैं मत सत्य प्रमस्वर,
में मुग मांकन से मुक्त भाग
फिर उतर ही बसुषा पर ।
पुग संदर पर जो मारावे
पीने पत्रों के पवम,
में उन्हें मिलाती मिट्टी में
नब मधुकी बार बना कर !
यो युग प्रमुबो मष बापत्
मारत
संवेदनपद
मैं चमड़े अन्तर घिस को
छूती फैसा स्पर्गिक पर ।
कमि पाप
चुमौ पोपो पर प्योपावर
में सरीसृपो का सप बोष वे
रंगा करते
भू
पर ।

पाटक मानवता की उप पूर पेतमा मात्पर निय इस सी से विकसाता भावों का वैभव प्रबर' पस्याण माठि ऐपय पिता मानद सरित रस निकर मनियर रही फिर प्राणों का पहने स्वभिम बायार ! (माघ पनि प्रापण करती हुई धीरे-धीरे विलीन हो जाती है) प्रसकार- एक नया पैतम्य नया अप्पारम परा पर एम से रहा मानव पवर के पतरम में निन स्वर्णिम किरणों के मन मे मग्बित कर मनुनय की निखिल खुरता म पाया ए महल पैतम्य उरम हो मानता र कर्ण मान पर मुकुट कहा स्पर्म स्पोति का। एक महद् मम्यारम पुमों की धार्मिक विक भीमापोको प्रविश्मर, मानव जीवन को सगो रहा फिर पूर्भ समय की समति में नम पानुजन भर मू की नियतमता में पार्षिक समता वर्ग हीनता के धो को अंतरप के रश्मि सतु में बांप प्रसाफिक भौतिकता को साम्यवार को भारमसात् कर! महासमन की विष्य प्रबठरष की मर्मर पनि गूग ही तरतम के गोपन गहनों में हिस्सोमित हो पा परा देखना सिन्दु पब मा मायमों के प्रति गति मंमा प्रमेम से मूम्म पार से ममत बौखते परा निवर सप मग काय रे दस वर्ष से प्रारमित हो ! उमिठ हो रहा पाइ म भवन का शिम्पी पत विरोध की सिवर तरंगों में भूमंग सा प्रामोषित हो उक्त पत पत फूकारें मप- गरम फेन बहु उगम पचेतन के नरकों का! पात्र मए राषम उपगे नए राम का पुग भमिपान करने को सतमुख धीमों से देवासुर संग्राम बिा रहा जन मन भू पर प्रभुत पार्यों से गुजित बग बीयन प्रावन । स्वयंवरा बन बड़ी [ठिया परा तना प्रकट हो रहे मनोनीत में मोर पुल्प नव- जी माग्यतापों का बर पाप तोड़ने मष पीवन की थी शोभा को परने के हित पाकुन पंचम प्राम पुम मन परमी का मन ! [मागोम्मारक पाच संगीत] पराभेसमा का गीत मैं प्यासीकी प्यासी । बरती की तमा मूक बन मंगाको अभिमापी! युग के कर्वम में लिपटा वन प्रबचेतनतम में भटका मन जीवम स्वर्ग बसाने को का से प्राकुल पटवासी। में सराच मार्यों को पोतक महद उमौकी पोपक सत्य बनने का ये मेरे स्वण प्रमर प्रविमापी। तुच राम पो से पीड़ित पुर पेषि वर्गों में परिव कर मेरे पन होये चेतन मानव मात्म प्रकापी] मानर मेग्र पुष यस्य पम परिमाऐगा वापत् उपम अंधकार में सुनी ऐसी बनी दुलों की बासी! मेरे मूकदर में प्रतिक्षण पमा एकासपिक स्परल प्रमरखना कर मरित हॅपि मृत्यु विमासो मापार- चिमात्य मि पहने इप्टा पि समिपो * अपती में गो कृष प्रसय । एमगमत् सत्ता है गय की मिश्रित बस्तुएँ पिरमय ही सप सार रूप में। पर विकास प्रिय मूबीमन के क्षेत्र में स्विर सांप्रत स्वाप से उसके मागी मम् सपही का माकामी मानव मन ! बगत भाव जीवन भिन्न पार्ष नहीं विर काही प्रश जय प्रारोहण पप पर, विसका पूर्व प्रकारावर होना निश्चित है। राग पप से मानवबीचम पिर सरमा समवस चाई में उठ कर। मनु नियति मग जीवन के दिन पर हो पार पुणे के बाद पुन चरितार्थ हो हो । ममुग निमति का गौत मनुग नियति में निर्मम बम जीवन के पम में जिससे हा पाया विषम पि वमित्राबोर पेरी पुन पर ही मुप रप मेरी महफिरपाकामियम हार में स्तर ऐ तुम मिस्सम !

१..
मित्पी
बीत रही पत मोर निशाएँ
निपर पी अब नई रिमाएँ,
गहन सविता प्रकाय का
पातक या सारण तम!
गुमना अब तारामों का नम
वृत्त भवमा का पत निप्पभ
बामा के प्रथम में मिपटा
भव प्रकाप का उपक्रम ।
सप्नों की चापों से पुंगित
यह पगपनि मेरो चिरपरिचित
पूर्व काम करने फिर मुमको
मबम तुम्हारा पानम |
सम्म पागप चिम्तन सापन
सफम युगों के मौन पामरप
पार्षक सौह पर्गों का मेरे
धुर्मम भूपब का मम ।

चतुर्थ दृश्य
(रूपांतर)
[प्रभात के प्रकार से स्वदिम जन परमो का प्रोगन मता-मतामों की
एक धेरी-मी मरी हार पर या सरकार नब प्रमात की गोमा रेख
बमाकार- माया सौन्दर्य बतना ? पग बीवन की
मंतरतम सर संगति बो पर प्रवर्नम
पिबरों से है उतर ही स्मनिम प्रवाह सी
स्पर्मों से गोमा उपर करमे पसुपा को।
पीवन का प्रामद RO ही मुर्विमान हो
रेख हा निज रलवाया स्मित मपको!
मानव अपना र धरत में मुखदोमित
रिम्प प्रेम का प्रमर स्वप्न प्रस्फुटित हुमा जय
प्रवर्मन की प्रथम सपा में घाव सौम्प स्मित,
बहू जीमम सौन्दर्य बेतना में मिपदा पा।
म्योति प्रीति पानव मरिमा - -प्रब मानवका
बीवन भी पर्याम बन पहा उसी सरय का।
प्रवरस्य में बाए साम्प में पंपोषित हो
मूबीवन मब घोमा का प्रविमान बन पहा ।
(भू-भीवन के पतिरका परमानेरनास्तासमप ममुर पाप संगीत)
अप्सरा का गीत
में बन परपी गिव में
स्वपिम पापा कम बरसाती
सम्पर्म प्ररोहों की सपर्ट
पेतना मूमि में उकसाती।

शिल्पी मैं ही भू सम्पा पर पाई में मिट्टी के तम में कोई में ही मपु ऋतुमा का वैभव जरे रामों में सुमगाती । सूबरता की सर मय में नित पीवन मानो कोपर मात सर्गिक गुपमा की जामा में मैं मानव उरका मिपटाती! माप्तीहरष पर पाठी में भामोके पर रंग पाती प्रामों के पोरम से गुफिन पायावप में कैप महराती । मैं परा वना की भाभा में स्वर्ग नितिन कीडामा मैं अपापों के मोति तु मानस सिरों पर पट्पती । सौन्दर्य पेमा में मम की मी पामा मानव जीवनकी मैं स्वप्न समिनी न बन की हिपहप म मुसकाती। उच्च उच्चतर सोपानों पर पर प्रषिमन + पति मानस रिम्प विमव से पभिप्रेरित हो मनुन बेतना सपचेतन भी अब गुहा को प्रबमाहित कर ही निखिम कत्मपम से! विगत महंता का विधान विकसित षिव हो मुक्त हो पा राग ट्रेप कुत्ता सर्धा से ! भेव भाव मिट थे, ऐट हा संचय का तम उपस हो दो प्रेठर्मुख भावना पाम्य की! मम प्रतीति से सहम प्रीति से प्ररित होकर मानव मानव को विशोषता गए कप में।

मादक १०१ भू मानस संपोषित हो रहा मनुब मन मय प्राय में सम्म मे रही ब मनुष्यता इस मिठिन में । मनदपेपना का गीत में मानो। मेघों के पन मन्तराप से स्वर्णिम मुम शिवमायो ! म्पस्त पड़ा थप मन का सम्हर उमा ऐ बमघोर पर, दिक कंपित प्रवर सिवरा पर ब प्रताप परसामो समित भू जीवन सागर मोट ही पत महर महर पर, मानवता की भरी सरी यह पार मयामो गुमा वृपा पूलों में पोक्ति जन बीवन की पारा घोपित पुमिम मम्मकार, नवनाका युग उठायो । पारम्पत्तिमात सुरसारण र में बम मपम हो जाम प्रमृत प्रीति की विरुष भावना मन में महत् पामो । प्रवर्मन से मिले प्रेरणा बन जीवन की बने योजना मात्म स्याम के पूत रफ्त में यू के मुप गाग्रो ! कलाकार- कैसा पुप कर हमारा हास नाम का कलाकार के लिए परफ हो गई परा पह, सिपी ही कुरापता योमाजीषी ठर को बीवन मागिन सी सती पठी घत फन फैमाए ! प्रामचेतना प्रपोमुपी हो प्रपतन के तम में सिपटी रेंग रही है भग्न ब पर, मारोहप कर पाती मही छाप प्राकाषा सण स सौन्दर्य चेतना के स्वगों में । प्राट कुंठित मजन प्रेरणा मृमवृष्णा बम मम के मा में भरक ही जीवन मिरक्त हो। जर्मन का विमा उतर प्रानों के स्तर पर धोमा मति पर पाएगा कर जीवन को? प्राण पेतमाागीत प्रामो में मिसरो। भू पर पर बीवन पोभा के मम पर बिषरो। रश्मि वृत्तियों की दर में पर मोरमीक प्रभिनव पंक्ति कर दुईम बग्या के प्राणों को संयत सपण सरित हो सब भायों के स्वर गुपित हो सप्नों से प्रतर मिग स्वर्णिम रष पोका रख मन में मत भरो। मम पासा से मुमित हो मग मन प्रमिलापा से मुबारित पप भवविकासमय भक्त प्रमतिमय निर्मय बरो! जोबन मंगल का हो उत्सव भी मुम सुपमा का हो भर

भाटक
मग रस के निर्मर से मर तुम
बन मन तृपा हो ।
ममृत स्पर्म से हो तम पुतपित
मौन मधुरिमा से मन मुर्तित
रिम शिक्षा से पुसतमस के
गहर में उतरो।

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मब रस के निरमे मर तुम
जन मन तृपा हो।
पमृत सर्प से हो उन पुतक्ति
मौन मरिमा से मम मुमित
पिम्म पिता से गुम तमस के
गवर में सरो।

Shilpi

Author
Shree Sumitranandan Pant
Title
Shilpi
File name
Shilpi
Text
OCR done
Citation
1940
Published
2010/12
Publisher
Delhi,rajkamal Parkasan P, L,
Language
Sanskrit
Pages
116
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Art
DLI number
514663
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4990010022359.00
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C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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