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Lal Batti Jal Rahi Hai

Mahavir Agarwal · 2011/03

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लाल बत्ती जल रही है
(व्यंग्य संग्रह)
.
महावीर अग्रवाल
হা২িা হিলি
VERके.एल.कीडगंज.इलाहाबाद.

शारदा प्रकाशन
५४२ के. एल. कीडगंज
इलाहाबाद २११ ००३.
कापीराइट :श्रीमती संतोष अग्रवाल
संस्करण--१९८६
मूल्य : तीस रुपये
जय हनुमान प्रिंटिंग प्रेस
1/ बाई का बाग, इलाहाबाद
द्वारा मुद्रित
-
.
यावरण-अनिस फामड़े
Vyanga Sangrah
•Lal Batti Jal Rahi Hain.

भैय्या त्रिभुवन सिंह
और विद्या भाभी के लिए
जिनकी अंगुली पकड़कर
चलना सीखा

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भूमिका महावीर अग्रवाल का यह पहला व्यंग्य संग्रह है। मुख्यतः इसमें उनके समय-समय पर या नियमित लिखे गये व्यंग्य स्तम्भ तथा कुछ स्वतंत्र रचनाएं हैं। व्यंग्य विसंगति अतिरेक, ढोग, पाखंड, अनुपातहीनता आदि को सशक्त ढंग से अभिव्यक्त करने का माध्यम है। हमारे जमाने में चारों घरफ विसंगतियों ही विसंगतियां हैं और वे पहले से अधिक सक्षित को जा रही हैं । समाज एक संतुलन बनाए रखता है, एक आनुपातिकता-सामा- जिक क्रिया-कलाप और व्यवहार में होती है। एक स्तर होता है, एक मानदंड होता है। पानी जैसी समतलता समाज भी खोज लेता है। इस समसलता को 'नार्मल' होना कहा जाता है। जब यह समवनता गड़बड़ा जातो है तब हमारी चेतना को झटका लगता है चोर यदि हम लेखक हैं तो इस अतिरेक और असंगति के विद्रूप को प्रगट करते हैं । महावीर अपने निकट परिवेश का पर्यवेक्षण करते हैं। वे कही भागो- दार हैं और कहीं मात्र पर्यवेक्षक । वे स्वयं अध्यापक हैं, इसलिए स्कूल के वातावरण में भागीदार हैं । छात्रों के जीवन में उनकी दिलचस्पी है । साप हो वे इस जीवन के पर्यवेक्षक और आलोचक भी हैं। अब साधारणतः छात्रों को ट्यूशन को हमारे संतुलन ने स्वीकार कर लिया है । कोई-कोई घात्र अध्यापक के घर पढ़ने जाते हैं और पढ़ाई पूरी करते हैं । अध्यापक को हार का अभिभावक फीस देता है। यह एक संतुलन स्वीकार कर लिया गया है। पर अगर ऐसा हो कि पूरी कक्षा को अध्यापक स्कूल में न पढ़ाकर घर पर पढ़ाने लगे तो संतुलन बिगड़ता है, बतिरेक होता है । इस पर महावीर जी कटाक्ष करते हैं। इसको आलोचना करते हैं । यह कटाक्ष मात्र होता है चोट नहीं होती। यह असंतुलन, अनुपातहीनता और विगति को सामने रख देता है और निष्कर्ष निकालने के लिए पाठक स्वतन्त्र होता है। महावीर स्वयं निफर्ष निकालकर नहीं देते । महावीर जी की यही 'एप्रोच' है।

अपने निकट परिवेश से वे शुरू करते हैं । परिवेश का दायरा बढ़ता पाता है। यह राजनीति तक पहुँचता है, धर्म तक पहुंचता है । इसके साथ-साथ नये-पुराने सन्दर्भ जुड़ते हैं और लेखन को भूमिका तैयार होती है। चुनाव की राजनीति, कुर्सी के लिए दौड़, कुर्सी से चिपकना बाज आम प्रवृत्ति है । पर इसका अतिरेक लेखक को बर्दाश्त नहीं। मुखौटे उसे पसंद नहीं। यह इसकी ओर इंगित करता है। जोता हुवा उम्मीदवार और हारा हुआ उम्मीदवार दोनों ढोंग करते हैं, दोनों मुखौटे लगाते हैं। इसे लेखक उजागर करता है। तीर्थों में क्या याशा लेकर अदालु जाता है और वहां क्या होता है इस असंगति को भी लेखक परि- लक्षित करता है। महावीर जी अनुभव क्षेत्र व्यापक है। अनुभवों को उन्होंने 'कंडीशन' नहीं किया है। इस कारण उनकी रचनाओं में विविधता है। एकरूपता के दोष से वे बचे हैं। उनकी थैली और भाषा सधी हुई है । वे अनावश्यक शब्दावर नहीं करते। संतुलन बनाए रखते हैं। इसलिए ये रचनाएँ जिनमें कटाश के साप बालोचना है, सधी हुई रचनाएं हैं। हरिशंकर परसाई क्रम : ६ .. .. .. १६ २४ २८ ३४ , -- . ३७ : खण्ड-एक ॥ आदमी नया हूँ मगर सावधान है। सेठ को साहित्यिक यात्रा पंचवर्षीय योजनाएं एक उदीयमान की कविरा बाप ठगाइए ये साहित्यिक लठेत गोष्ठी में गोते लगाइए बुढ़ापे की लाठी गुरुः ब्रह्मा ट्यूशन उद्योग विकास संघ और डिमोशन हो गया दंगल परीक्षा केसरी का । फाइलों के जंगल में खण्ड-को ॥ नाय में बैठा है तूफान मेरे देश में ।। प्रजातंत्र के रखवाले कुर्सी प्रेमी कलयुगी कृष्ण मोग तेरे रूप अनेक धन्यवाद देने लगे नेता जी चमचों की याचार संहिता फुटपाथ के कुत्ते अमिनन्दन की वाह बलवे विधायक सोट के : .. ५२ 7 . .. .. ६३ .. : ७५ -

..
:
:
: ६६
(८)
रेल चली भई रेस
उद्घाटन मंत्रालय का उद्घाटन
उद्घाटन होलिकादहन का
ट्रम्पफाई और जोकर
चलन से बाहर
हाय री किस्मत दगा दे जाती है
खण्ड-तीन
॥ बड़ा अजीब समेटा है क्या किया जावे।
धाई बसंत बहार
आया ये मौसम प्यार का
आप पाए बहार आई
होरो अमरता की ओर
बोल-राधा-बोल
रेत पर चांद की तस्वीर बनाने वाले
पद पात्रा
चन्द्रमुखी ! सूर्यमुखी !! ज्वालामुखी !!!
और मेरा टी०पी० बाया
..
१११
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..
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१२६

सेठ की साहित्यिक यात्रा मुनोबाई बोर चमेलीबाई के कोठों पर धुंधरूमों की झंकार का समां बंधा है। वाह-वाह की गूंज है । बेला फूले पहली रात, लागा चुनरी में दाग, मिट्टी में मिल जाय हाय जवानी मौरी राम, हाय हाय बलमा बड़ा बेदर्दी और बेला महके आधी राव-जैसे तराशे हुए बोल सधी हुई बावाज में सुनना "सेठ" का सबसे बड़ा शौक है । "सेठ" का दूसरा शगल मंदिरों में चढ़ावे के साथ-साप भजन प्रतियोगिताओं का आयोजन करवाकर भगवान के साथ-साथ पुजारी को प्रसन्न रखता है । अपनी तारीफ के पुलो फे ऊपर से गुजरते हुए नगर के प्रसिद्ध समाजसेवी, दानवोर "सेठ" अपने आपको बड़ा साहित्य प्रेमी और कला संरक्षक मानते हैं । ऐसे "सेठ के बागे-पीछे चार लोग रहते ही हैं। बहुत से साहित्यिक प्रेमी और कवि हृदय साहित्यकारों पर भी उनकी कृपादृष्टि लगातार बनी रहनो वै । इनको सूची समय को धारा के अनुसार सेठ की इच्छानुसार बदलवो रहती है । मजे की बात यह होती है कि सेठ उन्हें अपना चमचा समझता है और कवि हृदय साहित्यप्रेमी सेठ को अपना मिन मानकर गदगद होते हैं। दोनों एक दूसरे को पाकर गौरवान्वित होते हैं। हर्षोल्लास से भर जाते हैं। प्रेम अपनी पराकाष्ठा पर कभी अनारदाने की तरह वो कभी फूलमट्टी को वरह मरता हुआ नजर आता है। चांदी के कलदारों को खनक और मुन्नीबाई के धुंघरूयों को झंकार में मगन रहने वाले सेठ को एक बार साहित्यकारों को जमात ने घेर लिया। उन्होंने कुछ कविताओं में चर्चा गोष्ठी में मुख्य अतिथि बनना स्वीकार कर लिपा । विषय था-कषिता में चेतना का सौंदर्य बोष ।" इसके अतिरिक्त भी दो-तीन बालेख पढ़े गये । उस गोष्ठी में एक उदीयमान कवयित्री भी मौजूद थी। रचना की अपेक्षा यादरणीया यानी १० लाल बत्ती जल रही है गलेवाजी और सुन्दरता के साथ-साथ कच्ची उम्र के लिए दूर-दूर तक प्रख्यात थो । गोष्ठी पूरे रंग पर थी। दमतम के साथ बहस जारी थी। अपनी-अपनी विद्वता का सोहा सभी मनवाने के लिए कटिबद्ध थे। महान साहित्यकारों के कथन को कोड करते हुए सब एक दूसरे को धोबी पछाड देने पर तुले थे। सेठ का दिमाग भन्ना रहा था। निराला, मुक्तिबोप, सूर, तुलसी, कबीर, मावर्स और लेनिन के विचारों के बोझ तले सेठ दवा जा रहा था। किसी ने कहा--कविता व्यक्ति और समाज के गहरे संबंधों को अभिव्यक्ति देने का सशक्त माध्यम है। दूसरे ने कहा-"कविता महज स्याली पुलाव नहीं है ? कविता आदमी के भीतर की गहराई से निकली पुकार है।" तीसरे ने कहा-"कविता में देश और समाज की तात्कालिक स्थितियों का चित्रण होना चाहिए । कविता परिवर्तन के लिए हथियार है । कविता से ही क्राति संभव है।" चौथे ने--"अज्ञेय" को कोड करते हुए कहा--"अज्ञेय के अनुसार साहित्य के माध्यम से क्रांति की बात करने वाले कुएं के भीतर उछलने वाले मेंढक होते हैं।" फिर किसी ने कहा--"कविता में अपने हृदय के स्पदन और सभी हृदयों को रोमांचित करने के लिए मानवता के अंकुर फूटने चाहिए।" किसी ने प्रेमचंद का यह कथन अपने विचारों के साथ प्रस्तुत किया- "साहित्य केवल मन बहलाव की चीज नहीं है । अब वह केवल नायक- नायिका के संयोग-वियोग की कहानी नही सुनाता किन्तु जीवन के समस्याओं पर भी विचार करता है और उन्हें हल करता है।" सेठ साब तकिए के सहारे अधलेटे थे। अधमुंदी माखों से उन्हें बार- बार मुन्नीवाई और चमेलीबाई की याद आ रही थी। सोच रहे थे भाज' बुरे फंसे । सेठ बीच-बीच में करवट बदलते थे। धीरज का बांध टूट गया . , सेठ की साहित्यिक याना । ११: सेठ ने बीच में हो बोलना प्रारंभ कर दिया । कविता का सौंदर्य सामने है । आप लोग क्या मैट-शेट बक रहे हैं । मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। आपने तो मुझे कविता में चेतना का सौंदर्य बोध सुनने बुलाया या .. मैं कविता में सौंदर्य की बात सुनने बाया था और बाप सब भाषण पर भाषण सिलाए जा रहे हैं। कवि सम्मेलन का यह नीरस पहला दौर समाप्त कीजिए । राव पवान हो चुकी है । दूसरे दौर की मानसिकता में बाइए । में बंचल की स्यातिलब्ध कवियत्री कोकिला देवी से अनुरोध करता हूँ कि वे अपनी कविता की रसधार बहाकर हमें कृतार्थ करें। कोकिल कंठी कोकिला देवी ने कविता में गले की मिठास घोलकर कानों में रस घोल दिया । आवाज का जादु सर पर चढ़कर बोलने लगा । खनखती हुई बावाज की मधुरता कानों द्वारा हृदयों तक पहुंचकर मन को मालादित करने लगी। मोठी और मधुर आवाज में कविता का रग जमने लगा। सेठ गदगद हो गया । पाह....काह....पाह.... या बात है-की झड़ी लगा दी । अपनी रसिकता और साहित्य के प्रति निष्ठा व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि बहसें भी जरूरी हैं । कविता मैं गरीबों को भी बात हो परन्तु और सभी विषयों पर भी कविताएं होनी चाहिए । गोष्ठी के मध्य इस परिवर्तन की धुष्टता के लिए उन्होंने खेद भगद किया । यागामी महीने में उन्होंने अपने जन्म दिवस को साहित्यिक गोष्ठी के माध्यम से मनाने को घोषणा की। सभी साहित्यकारों और कला प्रेमियों को डिनर पर बामनित किया। उप दिन कोकिला देवी के अभिनन्दन और गौतसुधा के वायोजन की घोषणा की गई। प्रयोगवादी रसिक कवियों ने गदगद भाव से तालियां बजाकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की। अनेक जनवादी कहे जाने पाने रचनाकारों और स्थापित समीक्षकों ने भो नाक मो सिकोड़ते हुए बालोचना का गुब्बारा फुलाते हुए इस साहित्यिक गोष्ठी का निमंत्रण स्वीकार कर लिया । सब के सब, मन हो मन बंग्रेजी पीने की लालसा और कोकिला देवो की रक्षा हेतु कटिबद हो धुके ये । इसलिये सिद्धान्ततः सहमत न होते हुए भी उन्होंने स्वीकृति दी।

१२ | सास बत्ती जल रही है जन्म दिन पर गोष्ठी का भव्य शुभारंभ हुआ । कविता और गीत अपनी पूरी बहार पर थे। मुफ्ते मास दिले बेरहम वाली कहावत परिवार्य हुई । सब पी पीकर लुढ़क चुके थे। कोकिला देवी और सेठ केवस दो लोग जाग रहे थे। बॉो ही आँखों में मुस्कुरा रहे थे । गोत सुधा थम रही पी। दूसरे दिन न्यूज पेपर के मुख्य पृष्ठ पर कवि गोष्ठी का स्वर्णक्षरों में उल्लेख हुवा था । सेठ द्वारा फोकिला देवी का सम्मान करते हुए मंच पर अनेक प्रसिद्ध साहित्यकार पावं दिखाई दे रहे थे । परन्तु एक साप्ताहिक पत्र ने बौधे पड़े लोगों की फोटो के साथ साहित्यिक गोष्ठी की रिपोर्ट इस टिप्पणी के साथ उछाल दी थी। हाकर चिल्ला-चिल्लाकर साप्ताहिक पत्र बेच रहे थे: अपनी साहित्यिक गोष्ठियों में उघड़ी, नंगी देह की चर्चा करते फिर किसी अश्लील चुटकुले पर तौद पर हाथ फेरते हुए हो-हो कर हंसते ..

पंचवर्षीय योजनाएँ-एक उदीयमान-की एक उदीयमान कवि, लेखक व कहानीकार अपने साहित्यिक जीवन के उपाकाल से ही डाक विभाग को अपनी पांडुलिपियां देश भर में लाने ले जाने के लिए मालामाल करता रहा। परंतु लगातार पांच वर्षों तक अपने प्रयत्नों की घनघोर वर्षा के बावजूद भी वे अपनी छपास की महत्वाकांक्षा भिगो नहीं पाए । प्रथम पंचवर्षीय योजना को असफलता के बावजूद भी निराशा उन्हें जकड़ने में पूर्णतः असमर्थ रहो। उन्होंने स्वयं यह सोचकर कि अभी उनकी उम्र गधापचोसो को है, व्यक्तित्व में गंभीरता की प्रतीक मानी जाने वाली कनपटी के बालों पर सफेदी थाने तक कुछ वर्ष और इन्तजार किया। एक-दो सफेद बाल जैसे ही कनपटी पर दिखाई देने लगे, उनकी महत्वाकांक्षा पुनः पर लगाकर साहित्यकाश में ऊँची उड़ान भरने लगी। उन्होंने पुनः बड़ी सूझ-बूझ लगन व मेहनत से विश्वास और बास्था के साथ, पक्षपातपूर्ण नीति एवं भाई भतीजावाद के कारण (उनके स्वयं के कयनानुसार) स्वयं को स्थापित नहीं कर सके । इस प्रकार उनकी सुन्दर मुडौल अक्षरों में टाईप की हुई पांडुलिपियों ने संपादकों के मानसिक संतुलन को असन्तुलित करने का ही कार्य किया। उदीयमान ने बचपन में अनेकों बार निराश हताश राजाओं को प्रोत्साहित कर आठवीं बार पढ़ाई के लिये प्रेरित करने पासी अनोखी मकड़ी की कहानी पढ़ी थी। उन्होने साहित्य एवं दर्शनशास्त्र में एम० ए० भी किया था। अतः वे स्वयं को कार्ल मावस, गांधो एवं पलीमेंशो का अद्भुत समन्वयवादी विचारक भी समझते थे। कर्मठता तो उनकी रग-रग में फड़पती थी, नई जवान नटनी की तरह । उस सांड को तरह -जो-अब भी षो कोई सामने याये, बस सोंग पर उछाल फेके । पसीने के स्थान पर सह बहाना वे अपना अधिकार समझते थे। इस तरह "हिम्मते मर्द-मददे १४ || लाल बत्ती जल रही है । सुदा" को भावना को हृदय में धारण कर, अपनी असफलताओं को भूलकर सोसरी पचवर्षीय योजना की रूपरेखा बनाने की उधेड़बुन में पूरी जामर्दी फे साथ मिह गये । दिमागी घोड़े को रास को उन्होंने ढोल दी और घोड़े ने अपना करतब दिखाना शुरू किया। अचानक घोड़ा ठिठका। विचार कीधा कि क्यो न तीसरी योजना का श्रीगणेश कवि गोष्ठी द्वारा किया जाए । इस प्रकार उन्होने अपने निवास स्थान पर धूमधाम से कवि गोष्ठी आयोजित की। इसमे नगर के स्थापित साहित्यकार, प्रसिद्ध पत्रकार तथा क्षेत्रीय कवियों को भी आमंत्रित किया गया। संयोगवश उसो दिन नगर में अखिल भारतीय पधारे । उदीयमान दोन सुदामा की तरह थातुर हो कृष्ण से मिलने चले। अपनी पिद्धता का वहां विनम्रतापूर्वक प्रदर्शन कर कवि गोष्ठी की अध्यक्षता करने की स्वीकृति उनसे जबरदस्ती प्राप्त कर ली। फिर क्या था सध्या दीवानी होने लगी। उदीयमान का पोर-पोर पुलक उठा । मस्ताना दरवार बरगवत्तियों की सुगंध के बीच स्वल्पाहार से नहीं परन दीर्घाहार से गोष्ठी में इंद्रधनुषी रंग चढ़ने लगा । वातावरण धीरे-धीरे साहित्यिक हुया । सभी कवियों ने अपने रचनाओं का पाठ कर लम्बे अरसे से कैद कविता कामिनियों ने उदीयमान को हृदय से धन्यवाद दिया । जैसे वे जाने लगी। धन्यवाद ज्ञापन कर उदीयमान ने झट उनका हाथ पकड़ा और अपने हृदयासन पर आसीन कर लिया। यह सब हुबा परन्तु आयो- जनकर्ता को कविता का रसास्वादन गोष्ठी में नहीं मिल सका क्योकि उन्हें जलपान व्यवस्था एवं अतिथि सत्कार में ही व्यस्त रहना पड़ा था। वे मज- बूरी में मन मसोस कर रह गये। तत्पश्चात उन्होने पत्रकारो एवं नगर के साहित्यकारों के साथ सम्पर्क बढ़ाना प्रारम्भ किया और कभी कमार अपनी रचना छापने के सम्बन्ध में इशारे करने लगे । शनैः शनैः गोष्ठियों के माध्यम से पत्रकारों एवं साहित्य- कारों से उनका सम्पर्क बढ़ने लगा और ये पुराने प्रेमी की तरह इशारा न करके अपनी कविता छापने के लिए अधिकारिक अनुरोध करने लगे परन्तु उनको प्रतिभा को स्वयं के द्वारा आयोजित गोष्ठियो की परिधि में ही पंचवर्षीय योजनाएँ-एक उदीयमान की ||-१५ , सिसक-सिसक कर रहने के लिए बाध्य होना पड़ा धौर तृतीय पंचवर्षीय योजना असफलता का लेबल लगाये समाप्त हो गई। परन्तु वे तो दर्शनशास्त्र के ज्ञाता थे। जीवट तो थे ही। अतः नए सिरे से गम्भीर चिंतन एव मनन द्वारा चतुर्थ पंचवर्षीय योजना की रोचक रूपरेखा बनाने लगे। चमचों की सफलता से चकित उदीयमान अब चमचा चनने की कोशिश करने लगे। परन्तु जन्मना, मनसा व कर्मणा साहित्य के सेवक उदीयमान केवल पास के लिए ही जीते थे। छपास के लिए मरते थे। चम्मचबाली उन जैसे उच्चकोटि के विज्ञान और साधक के बसबूते की बात न थी। अतः उन्होंने सोधे-सीधे हघोड़ा छाप चमचे का अपनी कोमल-कोमल जोन्हा रानी के साथ पानीग्रहण किया। अब क्या था । उदीयमान को जीव्हा रानी हयौड़े सी चोट करने लगी। यह देखकर वे आनन्दमग्न हो जाते । लोग उन्हे देखते रह जाते और वे लोगों को समय के बदलते हुए रंगों को पहनान कर उन्होंने छोटे-बड़े सम्पादको की सेवा करने की ठानी। एक दर्जन केले के साथ हाफ केजी० मिठाई का डिब्बा लिये, कंधे पर झोले में स्वरचित कविताओं की लाश ढोते हुए सम्पादकों के घर पर कमो सुबह वो कभी शाम पहुँच जाते । उनको अनुपस्थिति में धरना देकर बैठ जाते। इस प्रकार सभी रंगीन, साहित्यिक, प्रयोगधर्मी, फिल्मी, धार्मिक एवं सामाजिक चेतना को दिशा देने वाली पत्रिकामों के सम्पादकों ने उन्हें पांडुलिपियों सहित ससम्मान गेट का रास्ता बताया। अनेकों भार लौटाया गया। खीझकर गेट-आउट कह कर कार्यालयों से निकलवाया गया। इस तरह दरबार ठोकरें खाकर, अपमान और तिरस्कार का पुरस्कार पाकर रुआंसी मुस्कुराहट के साथ उन्होंने चतुर्थ पंचवर्षीय योजना की समाप्ति की घोषणा कर दी। इस प्रकार चौथो योजना भी उनके सपनों को चकनाचूर कर समाधिस्थ हो गई। परन्तु उन्होंने हार नही मानी । वे अच्छी तरह जानते थे, "रंग लाती ' है हीना पत्थर पर घिस जाने के बाद ।" वे करने लगे फिर से मेहनत । घिसने लगे मई मई कलमें। पिस-घिस कर तोड़ने लगे निवें। जोड़ने लगे .

१६ ॥ लाल बत्ती जल रही है शब्द । रचने लगे साहित्म । लिखने लगे धार्मिक भजन और करने लगे तुकबन्दी में अभिनन्दन । सोच-सोचकर प्रतिदिन बनाने लगे योजना । आखिरकार हारे हुए जुआड़ी को तरह उन्होंने और अधिक बड़ा दांव लगाया। हापी की तरह विशालकाय परन्तु मन्दगामी पांचवी पचवर्षीय योजना बनाई । युग की मांग के अनुरूप इस योजना में उन्होंने भेंट-पूजा, दलिया एवं वस्शीश को केन्द्र विन्दु बनाया इसमें दलालो के माध्यम से छपास पुनः उछलने लगी। बरसाती मेंढको की तरह टर-टर्र कर शांत हो गई। दलालों को भरपूर, टी. ए., डी. ए. दिया गया। इस प्रयास में उदीयमान की पैतृक सम्पति बिक गई योर जमा पूंजी साफ हो गई । उस पर भी हरामखोर दलालों ने डकार तक न ली। उनके लिये तो यह ऊंट के मुंह मे जीरा पाली कहावत सिद्ध हुई 1 उदीयमान कुछ-कुछ निराश, कुछ- कुछ थफे-पके से अपनी ही सलैया में गोते लगाते रहे और सब कुछ खोकर फिर से भूल-मूलैया की नई-नई योजना बनाते रहे । पांचवी योजना की इस शानदार चोट को अपने फोलादी सीने पर खाने के बाद भी वे ऐसा समझते हैं कि, इब्राहीम सिंकन की तरह कर्म क्षेत्र को अधिकाश लड़ाइयाँ हारकर वे भी अपनी बतिम लड़ाई में अवश्यमेव विजयी घोपित होंगे। देखिए उन्होंने छठवी योजना के शुभ मुहूर्त में कैसा गुल खिलाया । साहित्य के बाग को कैसे गुलजार बनाया। अपने भाव और विचार, अपने हाथ और अपनी कलम जमाने के रंग में रंग फर एक बार फिर जोर माज- माईश करने की ठानी। उन्होंने जमाने को देखा, विचार किया। समझा और पहचाना । नेतागिरी के इस युग में उन्हे ऐसा लगा कि सफलता के लिए नेता बनना बहुत आवश्यक है । अतः वे "नेतां शरणं गच्छामि" हो गए और आगे बढ़ने के लिए साहित्य में नेतागिरी को जन्म दिया। उन्होंने नगर के एक "समकालीन साहित्य विकास समिति" को स्थापना की। सौ, दो सौ लोगो को घर बांधकर समिति का संस्थापक सदस्य बनाया गया और स्वयं सफे वध्या बन बैठे। प्रारम्भ में तो नई-नई सुशील पनो को तरह समिति मी दिसोदिमाग पर सर करने लगी। पाहवाही की चाह में डूबे पंचवर्षीय योजनाएं एक उदीपमान को ॥ १७ सभापति अंधाधुंध खर्च करने लगे। बकरी की मां बाखिर कब तक खर सौगती नियति ने अपना कमाल दिखाया साझे की हाण्डो ठीक चौराहे पर सबके सामने पुल्लम-खुल्ला फूटी। चंदे की अभाव में एवं अप्रत्याशित अंधाधुंध सर्वे के भार से समिति का आर्थिक ढांचा चरमराने लगा। चूं-धूं करते ढांचे के कार बिजली गिरी और समिति का लुभावना शीश महल चूरचूर हो गया। चंदे के गबन की घटना ने समिति को कार इस कदर सोड़ी को उस पर कोई रोने घाला भी न बचा । उदीयमान का नेवागिरी का दिवास्वप्न भी मिट्टी में मिल गया। नेता बनने पर सफलता ने उनके चश्मे कदम चूमने से साफ इंकार कर दिया। वे चारों खाने चित हो गए। हठोसी असफलता कुरूप एवं झगड़ालु बीवी की तरह उनसे प्रेमपूर्वक चिपक गई। फिर भी वे डटे रहे मैदाने जग में। और उन्होंने सातवों पंचवर्षीय योजना बनाने के लिए गंभीर चितन, मनन एवं अध्ययन प्रारंभ किया। वर्षों से वैजर पड़ी जमीन पर सहलहाती फसल उगाने के गुर वे ढने लगे। सतर हाई बम्प और पोल बम का अम्मा करने लगे। चारों योर से उन्हें पाहवाही मिलने लगी। अपने जीवन भर के अनुभवों की बंधित पूंजी उन्होंने दाव पर लगाने की छानो । साहित्य के दौर में क्रांति का विगुल का बीड़ा उठाया। जब वे कवि और कहानीकार नहीं हो सके छो भरखा गया न करता के सिद्धांत को अपनाकर समीक्षक बनने के लिए एडो पोटो का घोर सला दिया। वे अब दिगज एवं स्याविनास साहित्यकारों के प्रह की समोशा के नाम पर कटु आलोचना करने लगे। कुछ दिन तो ठीक पनी गाड़ी। फिर वे पुनरावृत्ति के दोष से घिर गये और परिणाम- स्वस्ल उनको यातलोचना को धोयालेदर होने लगी । उनका भोर का सपना भंग हो गया । सरको साठवीं पंचवर्षीय योजना भी कुछ दूर चलकर सह- पाने सगी । पर दे लगे रहे। धावों पंचवर्षीय योजना बनाते हुए बचानक ही उन्हें ज्ञात हुआ कि महानगर बंबई में देश को प्रषिद्ध पत्रिकाबों के सम्पादकों का सम्मेलन होने वादा सिमें युवा उदीयमान साहित्यकारों को प्रतिमा को १८ ॥ लाल बत्ती जल रही है विकसित करने, उन्हे मागे बढ़ाने पर विचार किया जायेगा । वे हपतिरेक से उछल पडे । असफलता ही सफलता की पहली सीढ़ी है ऐसा मान सफलता के सोपान पर पहुँचने के लिए एक दांव और लगाया। अन्य उदीयमान साहित्यकारो के साथ वे भी साक्षात्कार हेतु उपस्थित हुए। सभी सम्मादकों ने अपने पुराने सरदर्द को पहचान लिया। परन्तु वे इनको उदीयमान साहित्यकारों के साथ देखकर भौचक्के रह गये। क्योकि उदीयमान साठ पार कर चुके थे । सठिया चुके थे। साथ ही बुढ़ापे से नाता जोड़ चुके थे। सम्पादकों को मौं चक्का देखकर उदीयमान ने अपनी साहित्यिक प्रतिमा का परिचय देते हुए फरमाया: "शायद मुझे निकाल कर पश्ता रहे हैं बाप । महफिल में इस स्याल से फिर आ गया हूँ मैं ॥"

कविरा आप ठगाइये... प्रेमपत्र जब जब लिखे गये हैं उन्होंने दो युवा हृदयों के भीतर ही भीतर हलचल मचा दी है, फूटने को बेताब सुप्त ज्वालामुखी की तरह । प्रेम आंवले के फल की तरह होता है तुरन्त चखने पर कसैला परन्तु मुरब्बा डालने पर मिठास से भरा पूरा, बिटामिन युक्त और स्वास्थ्यवर्धक । यह गर्मी में शीतलता प्रदान करता है। प्रेमी के शरीर में मिथी की तरह घुल- कर अपना असर दिखाता है। दूर-दूर रहने पर अपने कोमल स्वरूप को -साकार करने वाला पत्र ही "प्रेमपत्र" कहलाता है। प्रेम जब भी प्रगट हुया है उसने भूकम्प की तरह झटके दे.देकर ऊंची-ऊँची हथेलियां हिला दो हैं । चाहे वे अनुकूल प्रभाव डालने वाले प्रेमपत्र हों या वे प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले प्रेमपत्र हो। उन्होंने एक जैसा करिश्मा दिखाया है। दिन में •पारे और रात को सूरज दिखाने की क्षमता प्रेमपत्रों की ही होती है । पहले प्रेम राजकंवरों और राजकुमारियों के बीच होता था। यदि किसी ने औकात भूलकर प्रेम किया अर्थात् प्रेमियों के बीच वर्गभेद या रंगभेद रूपी कीड़ा सामने नजर बाया वो प्रेम का अंकुर फूटते हो बिनाका गीतमाला को तरह क्रमशः पायदानों पर चढ़ने की अपेक्षा छलांग लगाकर अव्वस आ जाता था। जो दिखलाई पड़ता या "गंधर्व विवाह" के रूप में। ऐसी स्थितियो को निमित करने में प्रेमपत्रों की भूमिका विशिष्ट हुआ करती 'यी। प्रेम तत्कालीन राजाओं और नर्तकियों के बीच भी होता था। राजा के मन में अब भी प्रेम का उबाल उठता था राजा प्रेमपत्र लिखता, दूत के हापों भिजवाता और नर्तकी नंगे पाय दौड़कर प्रेम करने पहुँच जाती थी वैसे ही जैसे कृष्ण वपने बाल सखा सुदामा से मिलने दौड़े थे और प्रेम शुरू हो जाता था। राजा का प्रेम उस राजतंत्र में वेशरम के पौधों की तरह २० || लाल बत्ती जल रही है होता था। जिस और चरण पड़े जहां नजर मिली प्रेम हो गया। प्रेम में भूल होती थी, और घूल का फूल खिल जाता था, मुरझाने के लिये। समयानुसार और कालानुसार प्रेमपन ने अपने रूप बदले हैं। कभी कविता में आता है तो कभी कहानी मे । कभी हंसते हुए आग है विपक की तरह कमी आँसू ढरकाते हुए अबला जीवन की तरह तो कभी भी गुस्से में थरंपराते हुए परशुराम को धरह पाता है। प्रेमपत्र बहुरूपियों की तरह अपना पेट भरने के लिये नये नये स्वांग रचाते हैं और प्रेम जताते हैं । कमी आफिसर, स्टेनो टाइपिस्ट को प्रेमपन डिक्टेट कराते कराते अपनी बात रखते हैं। वो कमी काफी पुस्तकों के बीच प्रेमपत्रों की लुका छिपी का घेत आगे बढ़ता है। कभी-कभी सामूहिक प्रेमपत्र भी लिखे जाते हैं । छापनेता अनशन, बहिष्कार और हड़ताल का प्रेमपत्र देते हैं और उनकी लाइन क्लीपर हो जाती है । अर्थात् उस पर प्रेम से स्वीकृति की मुहर लगा दी जाती है क्योंकि ऐसे प्रेमपत्रों को अवहेलना अर्थात सोते हुए शेर को ससकारना माना जाता है। हां कभी-कभी शेर न माने तो उसे गोली का शिकार बना ही देते हैं बन्दूकधारी शिकारी। परीक्षा के दिनों में प्रेमपन उफनते हुए दूध की तरह कार उठते जाते हैं। ऐसे प्रेमपत्र लिसने पासे गुमनाम रहते हैं फिर भी लाम लेते हैं। ये प्रेमपत्र प्रतिवर्ष नियमानुसार नये साल की मीटिंग की तरह थोक के भाव में बाते हैं और फिर रद्दी के भाव येचे पाते हैं। ये प्रेमपत्र परीक्षा से नहीं परन् परीमान से प्रेम करते हैं कर्म करो फम को या ना करो के विपरोस पेवन पर पीछा करते हैं कर्म नहीं उरते। वृष रिस्मर- पीय और रितीप नमूने पाओं को भेंट करता हूँ अब ऐसे प्रेमपत्रों के । एक यार प्रेमपत्र पाया । सिसा पा उन्होंने प्रेमापंक । पफर ऐसा हो मगा। पर मापवास मारे गुणो रहे मेरा रोम मंगर है....। मैं बापसी पहपाना बार मुझे मही पानते । भागने प्रयास भी मन पीरिया में यह भी जाना है कि इस बार रिया आ पाए। दाप्रमागरणा मार्गीपार गिर। ये मेरी बाग कविरा बाप ठगाइये.... ॥ २१ पलाने की है। अक्ल साथ नहीं देखी परन्तु डण्डा कमी भी घोसा नही देता । साये को तरह साथ रहता है । बच्चा पुनः एक बार प्रणाम करता हूँ दण्डवत । आशीर्वाद दीजिए। दूसरे प्रेमपत्र की भाषा तो प्रेम रस में पूरी तरह लिपटो हुई थी। देखिए इस प्रेम मा की सत्य प्रतिलिपि । बेटा ! समझ लेना पिताजी ने हो पत्र लिखा है। रोल नम्बर इसलिए नहीं लिख रहा हूँ ताकि तुम मेरी पहचान न कर सको। रोल नम्बर का पूरा एक बण्डल किनारे लगा देना वर्ना छठी का दूध याद करा,दूंगा। बुरा मत मानना । मेरी भाषा ही ऐसी है। तीसरे प्रेमपत्र की झलक देखिए। आपकी पदोन्नति होना ही चाहती है । चाहते हो अपनी पदोन्नति वो मेरी श्रेणी में उन्नति कीजिए अन्यथा घुमाते रहिये मनके मन की माता फै। फोड़ते रहिये लड्डू मन ही मन बीते हुए तीन सालों की तरह । समक जाइए मैं यही हूँ जिसने बापके पिछले सालों में भी दो प्रेमपत्र मिजवाये थे और बापने लबालब प्रेम से भरा हमारा हृदय टुकड़े-टुकड़े कर दिया था। मैंने फिर से जोड़ लिया है उन टुकड़ों को, ये टुकड़े जुड़े रहेंगे सो पदोनति होती रहेगी। हमारा स्वभाव तो कुत्ते का है जो रोटी डालता है उसके वफादार होते हैं हम । आपके दरवाजे पर खड़े हैं। चौपा प्रेमपत्र इस प्रकार था मेरे पिताजी कहते हैं कि बवुया हो तो ऐसा हो । कुल का नाम रोशन कर दिया। .सच ही तो है। आपने अपनी कर्मठता अध्ययन, सदाचरण और सहयोग की भावना के बस पर ही इस कच्ची उम्र में इतना बड़ा पद प्राप्त किया है। हे बाज हिपार्टमेंट और डोन बनने की खुशी में हमारी भी वघाई स्वीकारें। हमारे मित्र की एक विटिया है। लाखों में एक ! मैंने उसे तुम्हारे लिए चुना है। वेरा । पैसे तुम स्वयं समझदार हो। अंतिम निर्णय स्वयं से लेना। बस क्या कहूँ बेटा साक्षात् लक्ष्मी का अवतार है। सरस्वती जिल्ला पर बैठी है । गुणी इतनी कि शुरू से ही प्रथम श्रेणी पाती - २२ ॥ साल बत्ती बल रही है रही है। इस वर्ष भी टॉप करेगी। युनिवर्सिटी में। देख लेना । खाना ऐसा बनाती है कि अंगुली ही नही अंगूठा भी चाटते रहो । गा भी लेती है। कुछ काम से वे लोग सपरिवार आपके शहर में आ रहे हैं अगले सप्ताह इस गाड़ी से । रिसीव कर लेना जैसा सहयोग चाहे तुम्हारी और से मिलेगा हो । न जमे तो शादी मत करना परन्तु शिष्टाचार और सहयोग से कोई कमी न होने पाये। सचमुच एक सप्ताह बाद की तिथि मैं भूस चुका था। स्टेशन नहीं पहुंच पाया रिसीव करने । लेकिन हृदय के कोने में कहीं न माहीं पत्र की चिंगारी वो थो हो । आग उगलती मरो दोपहरी में एक दिन कालबेल चीख उठी। दरवाजा खोलते ही पसीने से तर बतर एक अपरिचित बुजुर्ग तपा उनके साथ एक २३-२४ वर्षीया तरुणी खड़ी थी। स्वभाविक शिष्टाचार पश मैंने कहा आइये । वे आये और ड्राइंगरूम में बैठकर इत्मिनान से पसीना पौटने लगे (मानो उनका स्वयं का घर हो) पसीना पोछते हुये मैरी और मुखातिब होते हुये उन्होंने कहा, "बड़ी गर्मी है" यया एक ग्लास पानी मिलेगा। मुझे कुछ शमिन्दगी महसूस हुई क्योंकि मैंने आतिथ्य को औप- चारिकता नहीं निभायी थी। मैं लपक कर भीतर गया और तीन ग्लासों में रूह बाफजा बना लाया। उन्होंने एक ग्लास स्वयं उठाया दूसरे के लिये तरुणी को इशारा किया और मुझसे कहा बाप लीजिये ना । हम तीनों शवंत पीने लगे, शर्बत पीने के तुरन्त बाद उन्होने अपने कुरते के जेब से चांदी का एक छोटा हन्ना निकाला । करीने से सजे हुए पान की गिलौरियाँ मेरी बोर बढ़ा दो। मैं पान नही खावा पर संकोचवश उस दिन खा लिया - उन्होंने शहद पके स्वर में वार्तालाप शुरू किया। भाई साहब ने पिछले सप्ताह आपको पत्र लिखा था। इसी सिलसिले में बाया था। सोचा बापसे मिसता परौं । यह मेरी छोटी लड़की मालती है। इसी वर्ष फिलासफी का अंतिम वर्ष है। अब तो इसके हाप पोले करके छुट्टी पाना चाहता हूँ। तरुणी ने संकोच से मुस्कुराते हुए दोनों हाथ जोड़ दिए । मैंने भी प्रत्युत्तर कविरा आप ठगाइये.... || २३. - . । दिया। घंटे डेढ़ घंटे चर्चा होती है । एक दौर चाय का चला । तीन-चार दौर चांदी के डिब्बे के पान के चले। वे उठकर चलने लगे। प्रसन्नबदन. अशीप देते हुए । जुग जुग जियो । फ्लो फलो । खूब आगे बढ़ो। लगभग दो वर्ष बीत चुके हैं । लबालब प्रेम से भरे हृदय को भी मैंने नहीं तोड़ा है। मेरे अंतस में चिलचिलाती धूप सी तरुणी भी मेरिट में आ चुकी है । सुना था प्रेमपत्रों को निर्णायक भूमि वसंदिग्ध रही है। अतः मैंने भी प्रेमपत्र लिखे पदोन्नति के लिए और फिर विवाह के लिए । कुत्ते का स्वभाव नहीं बदलता । पर आदमी का वदल चुका है। पदोन्नति किसी दूसरे को हो चुकी है । मेरिट में आने वाली तरुणी भी अन्यत्र शुभ विवाह रचा सुकी है। एक दिन भेंट होने पर कहने लगी। नमस्ते प्रोफेसर साहब । मैंने पूछा कहो कैसी हो? कहने लगी। मातृत्व लाभ में जुटी हूँ। आप सुनाइए । कैसा चल रहा है। मैंने कहा सब कपर वाले की दया से ठीक चल रहा है और फिर सोधे उस ओर बढ़ गई जहां उनके पतिदेव स्कूटर लिए खड़े थे । वर्ष पर वर्ष बीतते जा रहे हैं । पेपर भी जांच रहा हूँ। नये नये प्रेमपत्र भी पढ़ रहा हूँ। पढ़ते-पढ़ते सोचता हूँ- चलती चक्की देखकर दिया कबीरा रोय। कविरा आप ठगाइये और ठगियो कोय । 1 D0 ये साहित्यिक लठत "लाठी" जामर्दी की प्रतीक रही है। जमोदारों के रुतबे और उनकी शान-शौकत को भरकरार रखने में उनके लठैत हमेशा लाठी का जोर थाजमाते हैं। मालगुजारों को उज्जवल कोवि ने सठेतों के बल पर ही आकाश चूमा है। बड़े-बूढ़ों के मुख से तत्कालीन लठतों की बहादुरी के किस्से आप सुनने चैठिए । रात बीत जायेगो, पता भी न चलेगा । लठैतों के चमत्कार वे इतने रससिद्ध और प्रभावोत्पादक ढंग से प्रस्तुत करते हैं कि सुनने पर ऐसी लगती है कि कोई फिल्म देख रहे हैं। वे भावविभोर होकर उनकी बहादुरी की गाथा सुनाते हैं । वे बताते हैं जमींदार लठतों के दम पर कैसे राज करते थे। अत्याचार करते थे। केवल चार-छः लठैतों की टीम पूरा का पूरा गांव उजाड़ने को दामता रखती थी। जब चाहा व खड़ी फसल काट ली। जिस पर नजर ठहरी, उसे दिनदहाड़े उठवा लिया। साठी का जोर ही सब कुछ था । यह युग लाठी पाले हाथों का युग पा। इसीलिए इस कहावत का जन्म हुबा-"जिसकी लाठी उसकी भैंस।" अब यह युग फलम का युग है, फलम धाले हाथों का बाज जमाना है। पत्रकार हो या लेखक-कसम का पोर सव मनवा लेते हैं। बुद्धि- जीवियों की बढ़ती और चढ़ोतरी का युग है । साहित्यिक चर्चाओं, गोष्ठियों और शिविरों का माहौल गरम रहता है। जमकर लिखा पा रहा है। जिसे कहते हैं साहित्य । साहित्यकारों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि श्रोता और पाठक कम हो गए हैं । पचास लोग मिलकर प्रयोगधर्मी नाटक खेलते हैं तो देखने वालों की संख्या पच्चीस रहती है। उसके अतिरिक्त खूब कधि हैं ढेर सारे । कोई कहानीकार है तो कोई उपन्यासकार । कोई नाटककार सो कोई व्यंग्यकार । स्थिति ऐसो है कि भीड़ में फंकड़ फेकिये । जिसे लगेगा, यह साहित्यकार ही होगा। अब तो पन्नासेठों के सक्ष्मीपुत्रों को भी 1 ये साहित्यिक लठत । २५ कविता का शोक चर्राया है। घर वाले चिल्लाते रहते है----कवि के रूप में फुल कलंक पैदा हो गया। परन्तु साहबजादे साहित्य को सेवा में मस्त रहते हैं। वाहवाही करने चार साहित्यिक हमेगा साथ लगे रहते हैं । लगन बरावर बढती जा रही है। ये अपने नये संग्रह के लिए एक साहित्यिक सठेत की खोज में हैं। 1 क्या कहा ? साहित्यिक लति । हाँ, जो हो । साहित्यिक लठैत को खोज में है। मुनिए साहब । साहित्यिक लठेव उन्हें कहते हैं जिनको साहित्यिक जगत में तूती बोलती है। साफ-साफ बताइए । पहेलियां मत वुझाइये । तो मुनिए !....!! जिस प्रकार पहले जमीदारों और मालगुजारों का उत्थान-पतन उनके लठेतों पर रहता था, उसी प्रकार समकालीन साहित्यिक जगत में किसी भी साहित्यकार का उत्थान और पवन समीक्षकों को टोली पर निर्भर करता है। इन्हें ही चालू भाषा में साहित्यिक लठैत कहते हैं । वात कुछ कुछ जमती है भाई । पूरी बात तो सुनिए । जैसे जमीदारों के सहैतों की लाठियां आक्रमण के साथ-साथ समय पड़ने पर सुरक्षा भी अख्तियार करती थी, उसी प्रकार साहित्यिक लठत विरोधियों पर जमकर आक्रमण करते हैं । और जब विरोधी खेमे मे साहित्यिक लठन किसी कृति की धज्जियां उड़ाते है, तो ये सुरक्षा कवच बनकर सामने आते हैं । कहा जाता है कि यदि दिग्गज समीक्षक आपके पहले संग्रह पर अनुकूल टिप्पणी दो दें, तो देखते ही देखते याप साहित्याकाश पर चमकने वाले सितारे होंगे । आपको तुलना तोड़ती पत्थर, ब्रह्मराक्षस, कामायनी, आंसू, कुरुक्षेत्र से होने लगेगी। लोग समझने लगेंगे कि एक दिव्य प्रतिमा का अवतरण सोहित्यिक जगत में हो चुका है । और यदि ये साहित्यिक लठेत नाराज हो गये तो आपके पचीसों संग्रह आने के बाद भी आप बौने ही रहेंगे और लगातार आकाश छुने के लिए फड़फड़ाते रहगे । एक दिन मैंने २ ।

२६ ॥ लाल बत्ती जल रही है अपने-अपने क्षेत्र के प्रख्यात तीन समोक्षकों से भेंट की। दो पंक्तियो उनको कागज पर लिखकर दी और कहा की आप इन पंक्तियों को सजीव व्याख्या कीजिए । वे राजी हो गये । उनमें से एक थे-कथावाचक जो भक्तों की भीड़ के बीच हारमोनियम के माध्यम से कीर्तन भी कर रहे में और सस्वर पाठ करने के बाद अपने ढंग से व्याख्या या समीक्षा करते जा रहे थे। भगवान अदृश्य है, सबको सुनते हैं । सव कुछ करते हैं पर नजर नहीं आते। मैं तो दिन-रात उनके ही चरणों की वन्दना करता हूं। दूसरे नामी गिरामी विद्वान थे । उद्भट विद्वान, प्रकांड पंडित जैसे शब्द छोटे पड़ जाते हैं उनके सामने । हमेशा कार पर चलने वाले । शोषण के विरुद्ध नाम वुलंद करने वाले मावर्सवाद में गहरी आस्था रखने वाले समीक्षक थे। वे जनसभा को संबोधित कर रहे थे। यह सही है कि मैंने गरीबी नहीं देखी । अभावों का दुख नहीं जाना । बचपन से ही वैभव के बीच रहा, लेकिन मजदूर हमारे भाई हैं । इनका दुख हमारा दुख है। उनकी मांग हमारी मांगे हैं। उनके अधिकारी के लिए मैं आखिरी दम तक लडूंगा। और तीसरे थे पुस्तको के प्रेमी एक पढ़ाकू युवक । उभरते हुए कवि और समीक्षक के रूप में उनकी पहचान बन रही थी कि अचानक उनकी मंगनी हो गई। मानाकारी पुत्र होने के कारण वे वाग्दता को देखने भी नहीं गये । परन्तु अपनी इस प्रेयसी का भूच उन्होंने स्वयं के सर पर चढ़ा लिया। भाषी पत्नी और धर्तमान प्रेमिका के प्रेम में मस्त होकर उन्होंने भी उन दो पंक्तियों की समीक्षा की जो मैंने उन्हें लिखकर दी। तीनो जाने-माने समीक्षक थे । पंक्तियाँ वे ही थी परन्तु नजर अलग- अलग पो । पहले क्थावाचक ने कहा~मैंने भगवान नही देखा पर उनका गुणगान करता हूँ। दूसरे कार वाले मावसंवादो कहा मैंने मजदूरी नहीं की गरीवी नहीं देखी लेकिन उसके लिये सर्व करता हूँ। और वोसरे पढ़ाकू युवक ने कहा अभी तक मैंने अपनी प्रेमिका को नहीं देखा तो क्या हुवा। धोनों साहित्यिक लठठों ने अपने-अपने ढंग से दो पक्तियों की व्याख्या

ये साहित्यिक सहैत २७
फो। चौथे से मिलता तो वे भी अपने ढंग से नई व्याख्या करते। इसीलिए
वो कहता हूँ रचनाकारों से कि साहित्यिक लठतों से न उलझे । अब आपको
भी वे दो पंक्तियां समीक्षा हेतु परोस रहा हूँ:
उन पर हम जान देते हैं अनवर,
जिन्हें अब तक देखा नहीं है।
on

गोष्ठी में गोते लगाइए अभिषा, लक्षणा बोर व्यंजना की दुलारी बेटी होती है "गोष्ठी" । चंदा को शीवसतायुक्त काव्य गोष्ठी या फिर सूरज सो तपती समीक्षा गोष्ठी । मिरची की तरह तीखी, फरेले को तरह कडवी, आंवले की तरह स्वास्थ्यवर्धक-कसैली और सीताफल की तरह मीठो गोष्ठी का चलन खूब वदा है। आम आदमी मौज मस्ती के लिए किसी विशेष तिथि को विशेष स्थान पर भीड़ के रूप में इकट्ठे होते हैं तो उसे मेला कहा जाता है। इसी प्रकार जब माम आदमी के हितो का चिन्मन करते हुए बुद्धिजीवियो के रूप में ख्यातिलब्ध और नये-नये पढ़ाकू इकट्ठे होकर अपनी मुर्गा की एक टोंग उठाकर प्रतिद्वदी को ललकारते हैं और धोषी पछाड़ देते हैं तब उस पाक युद्ध को गोष्ठी के नाम जाना जाता है। स्वयं का पेट काटकर हवन करते हुए हाथ जलाने वाली गोष्ठियों और प्रथम श्रेणी का किराया जेब में डालकर धीमे-धीमे मुस्कुराते हुए लौटाने वाली गोष्ठियों, दोनो के कर्णधार, आयोजक अपना-अपना झंडा फहराये विजय का सेहरा बांध दुदुभी बना रहे हैं । गोष्ठी अंधेरे मन में ज्ञान का दीपक जलाती है। कुद और मोघरी सोच को धार तेज करती है । गोष्ठी किसी के लिए पाठशाला तो किसी के लिए अखाड़ा होती है। सवेदना, यथार्थ, दर्शन और संघर्ष के नये-नये पठ्ठों के जोडे वजन के अनुसार लड़ाये जाते हैं । साहित्यिक पहलवान अपने-अपने दांवपेंचों द्वारा एक दूसरे को चित्त करने की होड़ में जुटे रहते हैं। छोटे-छोटे रपी अपने-अपने महारथी द्रोणाचार्यों से, वाचार्यों से, कृपाचार्यों से दीक्षा ग्रहण करते है। ज्ञानचक्षु के खुलते ही टूटे-फूटे एक-दो वाक्य बोलकर अपनी पीठ ठुकवावे हैं। पाजकल हिप्पो घिस तरह ब्राउन सुगर की खोज में भटकते हैं।

गोष्ठी में गोते लगाइए । २६ नवजात रंगकर्मी दूरदर्शन के पर्दे को, दूजबर दूल्हा अपनी नई नवेली दुल्हन को ललचाई नजरों से घूरता है वैसे ही नया लेखक गोष्ठी में अपने मुखारबिंद से फूलों की झड़ी लगाने को आतुर रहता है । जिनका नाम उछलता है गोष्ठियो में उन्हें मन में मीठी-मीठो सुधियों की मकरन्द बिखेरती चली इठलाती प्रिया सी लगती है, और जिसका नाम निदा पुराण के शब्दभेदी बाणों का लक्ष्य वनवा है उस स्वनामधन्य लेखक फे लिए बालोचक की मालोचना सहने के लिए मुस्कुराती हुई बुलेटप्रूफ विनम्रता ही उसे नया जीवन प्रदान करती है। दर्जन भर मिरची भजिया खाने के बाद शोच के सुख सी होती है, दर्जन भर आलोचकों की टिप्पणियाँ । कमी-कमी आलोचक ऐसा भी कहते हैं। मैंने पहली बार आपका नाम सुना, यह मेरो अज्ञानता है मैं बहुत बहुत क्षमाप्रार्थों हूँ। रियाज अच्छा हो तो गोष्ठियों में मन इस परह रमता है। मानों ब्लू फिल्म देख रहे हो, अन्यथा कला फिल्मो की तरह मृग मरीचिका सा मन भटकता है । जबकि घवताओ की वारधारा चेरापूजी की तरह वरसती है। मानसूनी हवा बनकर श्रोताओं के हिमालयी उन्नत भाल से टकराकर ! बारम्बार टकराकर ! गोष्ठियों में धन और यश, भोजन और दाल के साथ हो मेल मिलाप भो होता रहता है। अनेक वुद्धिजीवी केवल इसी सालच में गोष्ठी को पिकनिक स्पॉट अथवा डिनर का आमंत्रण मानकर पहुँचते है । कहते भी हैं । पर्चे और परिचर्चा जैसी भी रही हो व्यवस्था बहुत उत्तम रही । सूप से श्री गणेश करते हुए चोर, हलुभा, मटर पनीर तो फोमा बौर मुर्ग मुसल्लम भी उच्चकोटि का और फिर भोजन के समापन समारोह में आईसक्रीम । आजकल तो बाराउ जाने पर सड़की का बाप भी ऐसा स्वागत सत्कार नहीं करता। आइए एक गोष्ठी में बापको ले चलता हूँ। শুম্ম ঋতিথি স্ব স্ব ষষ্টীয় স্কা বা অমিল। तालियों की गड़गड़ाहट ३० ॥ बाल बत्ती जल रही है निष्णात विद्वान द्वारा एक पर्चा आधे घंटे तक कान बंद करके सभासद् सुनते रहे। गोष्ठी के लिए सज्जित मंच लगामहीन उन्मत घोड़ों की तरह कैसे रोंदा जाता है देखिए- चर्चा का प्रारंभ- पक्ता (१)-आलेख अच्छा है, परन्तु कुछ महत्वपूर्ण तथ्य छूट गये हैं। जिनका मैं बाद में उल्लेख करूंगा। आनेखकार अन्धेपोवृत्ति हमें आशा बंधाती है। पक्ता (२)-मियों! नयी जमीन तैयार हो रही है परन्तु तथ्यों को तोड़- मरोड़कर प्रस्तुत किया गया है। शन्दों और अर्थों को लेकर आलेख- कार का भटकाव स्पष्ट है । पक्ता (३)-भाईयों और बहनों ! मैं अपनी बात बहुत शार्ट में कहूंगा। संस्कृति को नकारकर आलोचना आगे नहीं बढ़ सकती। वंदरिया जैसे मृत बच्चे को चिपकाए घूमती है वैसे ही आलेख में "कोटेशन" चिपका दिये गये हैं। पक्ता (४)---आलेख प्रारंभ में ठीक है। बाद में भटक गया है। व्यापक विषय को रचनात्मक बावड़ी में समेट नहीं पाए फिर भी सार्थक प्रश्न उठाये गये हैं ? रचनाकार स्वयं मालोचक होकर अनुभव में से व्यक्तिगत और सामाजिक अनुभव चुनते हैं, जिसमें रचना का जन्म । होता है। वक्ता (५)-वे कवि भो थे। कहानीकार भी थे। आलोचक और उप- न्यासकार भो । नाटकार मी थे । सारी विधाएं उनकी ऋणी है । वक्ता (६)-भाषा भोग्या होती है। लेखक उसे जिन (कुमारो) बनाता है। यात्मताप द्वारा विकसित जीवनदृष्टि से रचीपची रचनाएं हैं। जीवन और शास्त्र के बीच जो खाई थी उसे अपने चिंतन से पाटा है उन्होंने । पाने, खोजने बौर योनने का अन्तद्वंद साफ नजर बाता है।

गोष्ठी में गोते लगाइए | ३१ पता (७)--मैं अचानक ही पकड़ लिया गया। इसलिए अपनी आधी- अधूरी तैयारी के साथ आपके सामने हूँ। "रचना के प्रतिमान", काव्य का सौंदर्यशास्त्र कविता को समझने में, कविता को जानने में कविता को खुलासा करने में सहायक होता है। रचना प्रक्रिया की सघन जांच पड़ताल करते हुए समान रूप में समझने में सौंदर्यशास्त्र सहयोग देता है। नई कविता की सौंदर्यदृष्टि और सामाजिक एक्य का समावेश हुआ है। वक्ता (८)-हिंदी को अपनी कोई समीक्षा पद्धति नहीं है, यह या तो संस्कृत समीक्षा से दबी हुई है या अग्रेजी समीक्षा से घायल है। वक्ता (6)-(याक्रोश में) सच तो यह है कि, बित्ते भर का आदमी बाँस भर के आदमी की आलोचना कर रहा है। मैं इसलिए कुछ नही कहता क्योंकि अयोग्य को गाली देना भी उसका सम्मान करना है। सच तो यह है कि, हिन्दी में ऐसा महान चितक नहीं हुआ । समूचे हिन्दी साहित्य में जीवनदृष्टि से संवाद करते हुए वे बोले हैं । धक्ता (१०)-हिन्दी साहित्य में ऐसा काम पहली बार हुआ, जिसमें अति दूरदर्शिता के साथ-साथ वर्तमान की चिंता है। लेखक आस्था और विश्वास को चट्टान पर खड़ा हुआ है। जिससे वैचारिक संघर्ष को लगातार बल मिलता है। लगातार एक घंटे के वक्तव्य के बाद उन्होने कहा अब दो-चार मुद्दों की बात कहकर मैं अपनी बात समाप्त करूंगा। वक्ता (११)-सायियों ! आलेखकार ने मुक्तिबोध और अज्ञेय की तुलना करते हुए मुक्तिबोध के विराट कैनवास और उनकी महानता को सम- झने में भूल की है । कह न होगा कि, व्यक्तिमुखी चेतना के कारण "अज्ञेय" का व्यापक लेखन सामाजिक सरोकार से कटकर बौना है। बोन्साई द्वारा गमले में लगाया हुमा "बह" और "पोपल" है । जबकि मुक्तिबोध ने यथार्थ और सामाजिक संघर्ष द्वारा अपना रचना संसार निर्मित किया है। उन्होंने जिस रचना को शुरूआत की यह जीवन के ३२ ॥ साल बत्तो पल रही है सरोकार से भरी पूरी है । एकान्त उन्हें पसन्द था । परन्तु उस एकांत में पूरा जीवन, पूरा समाज, पूरा अनुभव मौजूद रहता है । मनुष्य को सही पहचान सामाजिक यथार्थ के साप-साथ उसके अकेलेपन द्वारा हो यह धारणा उन्होंने विकसित की। आलेखकार के पर्चे में कोई दम नहीं है। इसी बीच आलेखकार ने गुस्से में तमतमाते हुए कहा, चिंतक और विचारक किसी पार्टी की बपौती नही है । चाहे वे मुक्तिबोध हों या निराला । "मोहन तो है सबका प्यारा रे" बात ये विश्वबन्धुत्व की करते हैं और उन पर अपनी मोनोपली जमाते है इससे बड़ी विसंगति और त्रासदी क्या हो सकती है। आलेखकार को शांत करते हुए अध्यक्ष महोदय ने माइक की बागडोर अपने हाथ मे थामी। एक कोने में आयोजक बैठे-बैठे ऊँघ रहे थे । पढ़े गये आलेख पर वाक्-- युद्ध जारी है। बौद्धिक आसक्ति से ऊबकर बरामदे में टहलते हुए कुछ इस तरह बतिया रहे है ।.... पहला-उद्घाटन समारोह मे भगत जरा ज्यादा ही हो जाते हैं और यह बैकुंठ छोटा हो जाता है। नैतिक मूल्यों के लिये भाषण झाड़ने वाले कल रात कमरों में पी पीकर कुत्तों की तरह भौंक रहे थे। काबलियत के घमण्ड में अपने आपको हिन्दी का खुदा समझ रहा है। सारे बिम्ब, सारे रूपक, सारी चेतना और सारी रचनाधर्मिता का बोझ अकेले उठाकर चलता है पट्ठा । सम्मिलित हंसी और और कुछ लम्बे ठहाके। दूसरा-सैकडों गोष्ठियों में देख लिया । बस यही कहा जाता है । "आलेख अच्छा है। फिर भी मेहनत द्वारा अधिक मच्दा बनाया जा सकता दोसरा--अब वह चुगद संस्मरण सुनाये वगैर मानेगा नहीं। पी० एच० हो० और डी० लिट् का पुलाला लगते ही अपने आपको हिन्दी का *-1 +4 गोष्ठी में गोते लगाइए । ३३ संवाहक समझते है । मसीहाई अन्दाज में बातें करते हैं । चौथा-सव साले रटी रटायी शब्दावली में बोलते हैं । मौलिकता तो किसो में है ही नहीं। और न ही द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की समझ । बस वही एक राग "चम्पे को कनकलता को देह" की रट लगाते हैं । पांचवां-उदीयमान समीक्षक मस्का लगाते हुए हुँकारू भरता है। सच कहा दादा आपने बेवकूफी का कोई इलाज नहीं है लेकिन मूर्खता हो सबसे बड़ी मौलिकता है। आइए । भीवर भव्य हॉल में चलें। यज्ञ में पूर्णाहुति अध्यक्षीय आसंदी से इस प्रकार शुरू हो रही है.... समय बहुव अधिक हो चुका है इसलिए गोष्ठी में जो अनेक मुद्दे उभरकर सामने आये है उन पर संक्षेप मे एकाग्न होकर अपने को व्यक्त करने की कोशिश करूंगा। ढेर सारे वक्ताओं को देख-सुनकर एक लघुकथा माद या रही है "स्थानापन्न ।" रचनाकार का नाम याद नहीं पा रहा । लघुकथा कुछ इस प्रकार थो.... "निराला जयन्ती बसन्त पंचमी के अवसर पर नगर की एक साहि- त्यिक संस्था ने एक बयोवृद्ध साहित्यकार के सम्मान का आयोजन कर अभिनन्दन-पत्र भेंट किया। सम्मानित साहित्यकार ने अपने वक्तव्य "निराला" को महानता की भूरि-भूरि प्रशंसा की । आयोजन के बाद उन्हें अपने घर के ड्राइंग रूम में अभिनन्दन-पत्र लगाना था। चारों ओर राज- नेताओं, खिलाड़ियों और फिल्मी हस्तियों के चित्र टगे थे। अंततोगत्वा उन्होने काफी सोच-विचार कर एक चित्र हटाकर उसके स्थान पर अपना थमिनन्दन-पन लगा दिया। हटाया गया चित्र महाकवि निराला का था।" चोट खाए महारपियो को सलाम करते हुए अर्ज है- बादमी नया हूँ। मगर सावधान हूँ। 00 बुढ़ापे की लाठी महानता के अनेक प्रकार हैं। कुछ लोग सचमुच महान होते हैं । कुछ स्वभाव और प्रकृति से महानता की गोद में जा बैठते हैं। कुछ लोग जो मुंह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा होते हैं, महानता पोड़ी-दर-पीढ़ी लोक फला लोकगीतो की तरह हस्तातरित होती है। कुछ धीरे-धीरे अपनो कर्मठता के बल पर महानता की ओर बढ़ते है । बहुत से ऐसे होते है जो महान तो नहीं होते परन्तु अपनी चालाकी और क्षुद्रता के बल पर अपने को महान सिद्ध करते हैं । कुछ महानता का ढोल पीटते रहते है । पालाको और क्षुद्रता के बल पर अपने को महान सिद्ध करते है। खेल के मैदान से लेकर साहित्याकाश में महानता की होड़ में ढेर सारे लोग दोड़ते है । मुंह के बल गिरते हैं । फिर भी दौड़ते हैं । दोडना गति का लक्षण है । आशा और विश्वास को चमक उन्हें दौड़ने के लिए बाध्य करती है । तिकड़मों के बीच नई-नई तिकड़मों और नई-नई योजनाओं के चक्र- व्यूह में स्वयं फंस जाते हैं। लगातार असफल होने पर "अंगूर खट्टे हैं।" कहकर पीछे लौट जाते हैं और अप्रिम पक्तियों में खड़े सफल लोगों की नुक्ताचीनी करते हुए अपनी महानता सिद्ध करते हैं । लोग भी रस ले लेकर मुनते हैं । बड़ा होने का सपना घटकोले रंग के समान नजर बांध सेवा है। एकबारगी लुमा जाता है । महान व्यक्तियों का बुढापा सम्मान और शांति से फटठा देखकर महानता को बुढ़ापे को लाठी मारने लगते हैं । बुढ़ापे की लाठी के लिए छीना झपटी वैसे ही करते हैं, जैसे नेता "कुर्सी" के लिए करते हैं । नाम कमाना चाहते हैं । इन्द्रधनुषी रंगों सो दूर दूर तक फैली है महानता। कहते है कषियों में यहा कवि यह जिसके नाम के पहले "राष्ट्रकवि" का विशेषण लगा हो । गपापचोसो को उम्र में रेखांकित करने योग्य वह जिसके नाम के पहले "युवा तुर्क" या रि "युवा हृदय सम्राट" का बुढ़ापे को लाठी । ३५ विशेषण लगा हो । मतलब यह कि महानता सिद्ध करने के लिए विशेषण जरूरी है। पहले विशेष के रूप में चिपकाया जाता था पूज्य श्री १००८.... या धूम रहती थी कर्मठ, त्यागी और दानवीर जैसे शब्दों की । अब विशेषण की मात्रा और गुणवत्ता दोनों बदली है क्योंकि ये विशेषण अपनी चमक खो चुके हैं ! लगातार प्रयोग में आने के कारण घिस गये हैं । इवकीसवी सदी की ओर बढ़ते इस युग में अब पन्द्रहवीं और अठारहवी सदी के विशेषण से काम नहीं चलेगा । अब तो नाना प्रकार के दूसरे विशेषण महानता सिद्ध करने के लिए जरूरी हो गये हैं । साहित्य के बड़े-बड़े ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य परिषद के पुरस्कार छोटे पड़ने लगे हैं । अब इन पुरस्कारों से लेखक की महानता सिद्ध नहीं हो पाती । सुनते है, नोबल पुरस्कार की साख भी पहले जैसी नहीं रही । अब हिन्दी के रचनाकारों में महान वे माने जाते हैं जिनके नाम से बड़े-बड़े महत्व का आयोजन किया गया हो। जिनके हिस्से में स्वीकृति आई है, उनको अमी देर है । परन्तु मंजिल साफ नजर आ रही है उन्हे भी । इसके साथ ही लेखकों के बीच बड़ा लेखक वह माना जा रहा है जिसके नाम से ग्रंथावली छपकर आ गई हो । ग्रंथावली में रचनाकार की सारी रचनात्मक ऊर्जा का समन्वय किया जाता है। कहना न होगा कि अधिकांश रचनाकार कवि, कहानीकार, नाटककार या व्यंग्यकार के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त करने के पहले कविता भी लिखता है, कहानी भो । कभी समीक्षा रूपी छुरी चलाता है वो कमी दूसरी विधाओ में भी हाप-पाव मारता है। प्रारंभ में बहुमुखी प्रतिभा की इमेज बनाना चाहता है परन्तु रपना रपता बेचारा अपनी गलतफहमी स्वयं दूर कर लेता है और किसो एक विया ही छवि निवारने के लिए प्रयत्नशील हो जाता है । परन्तु जब प्रकाधक ग्रंथावली धापने के लिए पहुँचता है और देखा है ग्रंपावसी सुकटी सो दुवसो-पतली ही बनेगी तो प्रकाशक अन्वेषक का कार्य भी करता है । ग्रंयावती को मोटा बनाने के लिए रचनाकार द्वारा लिये गये पत्र, रचनाकार के पास बाए हुए पत्र-पावली में सम्मिलित

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गुरु ब्रह्मा बडे गुरु जी का नाम गड़बड़ानन्द प्रसाद सिंह है। आज गांव में बड़े गुरुजी को धाक है। बड़े गुरुजी गांव में सबसे अधिक पढ़े-लिखे हैं । गुरुजी बुजुर्ग और अनुभवी हैं । गाँव भर की चिट्ठी गुरुजी वाटते है । गुरुजी गांव के किसान हैं । बड़े गुरुजी अब गांव के नेता जी है । पिछले ३० वर्षों से गांव की सेवा कर रहे हैं गुरुजी । कभी-कमो मौज में आने पर बताते हैं गुरुजी । मैं बचपन में बहुत गड़बड़ करता था। सोना फुलाकर कहते हैं--अट्टाहास के बीच-आखिर ठाकुर हूँ न । इसलिये मेरे दादाजी ने मेरा नाम गड़बड़ प्रसाद सिंह र दिया था। वही चला आ रहा है । जब ३० साल पहले इस गाँव में आया था विल्कुल अकेला था। फिर यहीं शादी की। मै तो जात-पात, जास्त मानता नहीं था। गांधी जी का भक्त था। उनका उपदेश शिरोधार्य किया। गांप की एक अछूत लड़को से विवाह रचाया। तुम लोग नहीं समझ सकते बेटा । ठाकुरो के बीच तब कितना बावेला मचा था 1 वर । यह बात को बाई गई हो गई। अब तो बच्चे बड़े-बड़े हो गये है। यही गांव में जीवन भर रूखा खाकर मकान बनवाया । चार बीघा जमीन खरीदा । दो लड़कियों को ससुराल भेजा। एक लड़के को डॉक्टर बनाया, एक को इजीनियर । दो छोटे लडके खेती किसानी देखते हैं। सब के सब मेहनती हैं । अब युढ़ापा साराम से कटेगा । लक्ष्मी सरस्वती दोनों की कृपा है । बड़े गुरुजी की दिनचर्या अनोखी है । बडे गुरुजी शुरू से ही खादोधारो और बब भी हैं। कुरता, टोपो और धोती पहले मटमैली हुआ करती यो। अब सफेद झतक रहती है। पान के बेहद शौकीन है बड़े गुरुजी । बतीसो रंगी रहती है हरदम । कुरते को बड़ी जेब मे पान और सुरती का डब्बा हमेशा साथ रहता है। गुरुजो ब्रह्म मुहूर्त में उठकर मुगदल घुमाते हैं ।

३६ | लाल बत्ती जल रही है करता है । रचनाकार की पहली कविता भी इस टिप्पणी के साथ सम्मिलित की जाती है कि चार दशक पूर्व पूत के पांव पालने में ही दिख गये थे। काट छांट, मांजने और जोड़ने की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है । यदि रचनाकार के जीवनकाल मे ही ग्रंथावली छपती है, तो उसके विचार और उसके इण्टरव्यू भी इनमें सम्मिलित किए जाते हैं । यदि वह दीन-दुनिया से उठ चुका है, स्वर्गीय या नरकीय हो चुका है तो किसी के पास मुरक्षित उसको अतिम थरथराहट भरी आवाज से विचार संकलित कर छापे जायेंगे। पह प्रकाशक के साथ-साथ रचनाकार के लिए भी जरूरी है। पयोकि सवाल रायल्टी का है ? दुबली-पतली ग्रंथावली कौन कितने में बेचेगा । स्लीम होना अच्छा है परन्तु उम्र के साथ-साथ चर्वी थोड़ी तो पढ़नी ही चाहिए । जिंदगी भर हिंदी की सेवा की । साहित्यकार बनकर नाम रोशन किया। हालाकि परिवार वाले कुढ़ते रहे । पत्नी से लेकर धुजुर्ग तक सब के सब एक स्तर पर कुल कलंक मानकर कुनगुनाते रहे । रचनाकार ने पूरे जीवन भर दोनों वक्त भोजन के साथ ताने, व्यंग्यबाण, झिड़कियां और गालियां भी खायी । परिवार में उपेक्षित रहकर लेखको की दुनिया में सत्कार पाया । धूरे के दिन बदले । सामाजिक तौर पर सम्मानित हुआ है वेचारा । वही फुल कलंक रायन्टी के बल पर ठाठ से जीने लगा है। सरस्वती पुत्र अब छोटे-मोटे लक्ष्मीपुत्र सा भी होने लगा है। यह सब ग्रंथावली को माया है। लक्ष्मी या सरस्वती पुत्रों से उतना वैर नही रखतो कि खाने के लाले पडे हों। ग्रंधावसी वुढ़ापे की लाठी हो गई है। सोही हो गई है ऊपर चढ़ने को। रचनाकारों को सपने में ग्रंथावनी और प्रपावली के भावी प्रकाशक नजर आते हैं । युवा लेखक सपने में प्रेयसी के बदले प्रकाशक को ढूंढते हैं । जिसके पैर काब को ओर बढ़ रहे है और ग्रंथावली नहीं छप रही यह सोच सकही बम कोयला मई, कोयमा पल भयो राख । मैं पैरन ऐसी जसी, कोयला भई न राख ।

गुरु ब्रह्मा बड़े गुरु जी का नाम गड़बड़ानन्द प्रसाद सिंह है । आज गांव में बड़े गुरुजी की धाक है। बड़े गुरुजी गांव में सबसे अधिक पढ़े-लिखे है । गुरुजी बुजुर्ग और अनुभवी है। गांव भर की चिट्ठी गुरुजी वाटते है । गुरुजी गांव के किसान है । बड़े गुरुजी अब गांव के नेता जी है । पिछले ३० वर्षों से गांव की सेवा कर रहे है गुरुजी । कभी-कभी मौज में आने पर बताते हैं गुरुजी । मै बचपन में बहुत गड़बड़ करता था। मीना फुलाकर कहते हैं-अट्टाहास के बीच-आखिर ठाकुर हूँ न । इसलिये मेरे दादाजी ने मेरा नाम गड़बड़ प्रसाद सिंह रख दिया था। वही चला आ रहा है। जब ३० साल पहले इस गाँव में पाया था बिल्कुल अकेला पा । फिर यहीं शादी की । मैं तो जात-पात, छुआछूत मानता नहीं पा । गाँधी जी का भक्त था। उनका उपदेश शिरोधार्य किया। गाँव की एक बहूत लड़को से विवाह रचाया । तुम लोग नही समझ सकते बेटा । ठाकुरों के बीच तब कितना बावेला मचा था। खैर। यह बात को थाई गई हो गई । अब तो बच्चे बड़े-बड़े हो गये है । यही गाँव में जीवन मर रूखा खाकर मकान बनवाया । चार बीघा जमीन खरीदा। दो लड़कियों को ससुराल भेजा। एक लडके को डॉक्टर 'बनाया, एक को इंजीनियर । दो छोटे लडके सेती किसानो देखते हैं । सब के सब मेहनती हैं । अब बुढापा याराम से फटेगा । लक्ष्मी सरस्वती दोनों की कृपा है। बड़े गुरुजी की दिनचर्या अनोखी है । बडे गुरुजी शुरू से ही खादीधारी थे और अब भी हैं। कुरता, टोपी और धोती पहले मटमैली हुआ करती यो। अम सफेद झक्क रहती है। पान के बेहद शौकीन हैं बड़े गुरुजी । बतीसी रंगी रहती है हरदम । कुरते को बड़ी जेब में पान और सुरती का डब्बा हमेशा साथ रहता है । गुरुजी ब्रह्म मुहूर्त में उठकर मुगदल घुमाते है । फिर - ३८ ॥ लाल बत्ती जल रही है अपने खेतों की ओर टहलते हुए हवाखोरी से अपनी दिनचर्या प्रारम्भ करते हैं। चपरासी और स्कूल के छोटे गुरुजी वारी-बारी वडे गुरुजी के खेतो की देखमाल करते हैं । वही दो बड़ी गाए है । दूध-दही को मौर रहती है। गांव में स्कूल का खुलना और बन्द होना बड़े गुरुजी के साथ-साथ चलता है। स्कूल की चाबियो का गुच्छा गुरुजी को धोतो के एक छोर से बंध कर कंधे पर पड़ा रहता है । जब तक बड़े गुरुजी स्कूल नहीं पहुँचते, तब तक सब बाहर खड़े रहते हैं । दोपहर, भोजन के बाद १२ बजे बाद बड़े गुरुजी स्कूल आते हैं। पारियां कधे से उतार कर स्कूल खोलती है। बड़े गुरुजी स्कूल का प्रारम्भ करते ही अपनी थकान मिटाना प्रारम्भ करते हैं। स्कूल को एकमात्र टेवल पर पैर फैलाकर कुर्सी से टिककर सोना बड़े गुरुजी की पुरानी यादत है । ३ बजे तक गुरुजी जागते हैं। उसके बाद स्कूल में ही गांव की छोटी-मोटी चौपाल लगती है। कभी चिट्ठी पढ़ते है गांव पालों की, कभी समझौता कराते हैं । गांव को विकास को योजना बताते हैं । अपने एक छोटे बबसे से बड़े गुरुजी मरीजो को वही दवाई देते हैं । स्वमूत्रपान को बडे गुरुजी हर बीमारी के लिये औषधि मानते हैं । इसे वे बौखो के लिए बश्न कहते हैं । दांतो को मजबूती के लिए इससे अच्या मंजन कोई नहीं है, ऐसा गुरुजी बताते हैं और अपनी वतीसो दिखाते हैं । कभी चार कभी पांच बजे घंटी टन-टन बजती है। बड़े गुरुजी फिर अपने खेतो का एक चक्कर लगाते हैं। रात को गांव के सरपच फे यहाँ बैठक जमती है । सरपंच गुरुजी को बहुत मानते हैं । अतिपि सत्कार का गुण सरपंच को खानदान से मिला है । बडे गुरुजी को जमकर बावमगत होती है। रात मे कभी रामायण कभी हार कीर्तन कभी गम्मत तो कभी नाच-गाने का कार्यक्रम जमता है। याधी रात एक गुरुजी पर लौटते हैं। गांव के भारतीय फिल्मों के नायक की तरह गुरुजी को भी सर्वगुण सम्पन्न हो नहीं सर्वशक्तिमान मान लिया गया है। राष्ट्र निर्माता" गुरु : ब्रह्मा || ३६ का लेबल चिपकाए गुरुजी गदगद है । गुरुजी ने स्कूल के नये भवन का उद्घाटन मंत्री महोदय से करवाया था, अब स्कूल की दोवारो में दरारे ही दरार है। फिर भी गुरुजी कहते हैं कि चिंता की कोई बात नहीं। बड़े गुरुजी बताते हैं-स्कूल के ब्लैकबोर्ड अब सफेद हो गये है । चाक भी खत्म हो गई। बड़े गुरुजी समाजवाद और इक्कीसवी सदी के गहरे पक्षधर हैं । वे कहते हैं-चाक समाप्त हो गयी तो भी चलेगा। नवशे फट गये और पुस्तको को दीमकों ने पचा लिया यह भी बहुत अच्छा हुआ। प्रत्येक जीव पर दया हमारी संस्कृति का मूलमत्र है । स्वयं अंधेरे में रहकर बच्चों को प्रकाश की ओर ले जाने वाले गुरुजी के लिए पुस्तकों का युग बीत गया । हमारे प्रधानमंत्री राजीव गांधी स्कूल में टी. वी. और कम्प्यूटर की व्यवस्था करवा रहे है। उन्हें राजीव गांधी बहुत पसंद हैं क्योंकि राजीव गांधी के साथ गाँधी शब्द जुड़ा हुआ है । और वे गांधी के परम भक्त हैं। अब टेप रिकार्डर द्वारा व्याख्यान होंगे। कम्प्यूटर हर कदम पर हमारा साथी होगा। गुरुजी अब कभी-कभी चौक में भाषण भी देते हैं। वे कहते हैं अपने मुखारबिन्दु से। इक्कीसवीं सदी एक नवीन युग होगा, दुनिया में अब न दरिद्रता होगी न दीनना होगी न कमी दुमिक्ष पड़ेगा। बड़े गुरुजी रिटायर हो गए । अब स्कूल की चाबी के गुच्छे का स्थान बदल गया। गुरुजो अब स्कूल के बदले अपने धर्मार्थ औषधालय में बैठने लगे। दिन भर गांव के लोगों का दुख-दर्द मुनते हैं, चिट्ठी बांचते हैं, दवाई देते हैं। धीरे-धीरे गांव में प्राइवेट कालेज खुलने की चर्चा चली। अचानक पता चला बड़े गुरुजी कालेज के प्रिंसपल बन गये । स्कूल में हो सध्या समय कालेज लगने लगा । गुरुजी का रंग फिर जमने लगा। गुरुजी अब शिक्षाशास्त्री हो गए। दूर-दूर से बुलावा आने लगा । गुरुजी शिक्षा में क्रियात्मक ज्ञान के प्रेरणा स्रोत बने । विशेपकर खेती किसानी के क्षेत्रों में बड़े गुरुजी कहते है । हम असली काम कर रहे हैं । ठोस भूमि तैयार कर रहे हैं। प्लास्टिक की हरी पत्ती और रंग-बिरंगे फूलों से काम नहीं निकालना है। बगीचा हरा-भरा बनाना है । दौड़धूप जारी है। गार्डनिंग

४० लाल बत्ती जल रही है
है। एस० यू०पी० उन्यू है। बड़े गुरुजी की बातें सुन-सुनकर दिमागो
मैदान से अनचाहे झाड झंखाड़ उखाड़कर फेंकते हुये सोचता हूँ।
सच्चाई छुप नहीं सकती, बनावट के उमूलों से।
खुशबू आ नहीं सकती, कभी कागज के फूलों से ।
00

ट्यूशन उद्योग विकास संघ बड़ी-बड़ी चिमनी वाले उद्योगों ने कुटीर उद्योगों को लगातार 37 पिसा-पिलाकर हल निमोनिया के पास पहुंचा दिया है । लेकिन सूरान रूपी कुटीर उद्योग दिन दूनी रात चोगुनो तरक्की कर रहा है। इस उद्योग ने लक्ष्मी और सरस्वती के सदियों पुराने बैर को तोड़कर मिश्रा और महनापे की संधि पर हस्ताक्षर करवा दिए हैं। आजकन गुरुजी को सबसे अधिक गौरव और ऊंचाई प्रदान की है "ट्यूशन" को महिमा ने । आप मानते ही हैं कालचक्र के पहिए के साथ-साथ शब्दों के अर्थ एवं भाव बदलते रहते हैं । प्राचीन काल में गुरुकुलों की शिक्षा भी ट्यूशन का प्रारंभिक स्वरूप थो । जव ट्यूशन का उपयोग विद्यार्थी अपने ज्ञानदीप को प्रज्वलित करने के लिए करता था । अब समय बदला है। "ट्यूशन" ने विकास को कई मजिसे पार की है। परीक्षा में पास होने के ठेके का ही दूसरा नाम "ट्यूशन" । ठीक भी वो है । जब तक ठेका न हो, वोछित प्रतिफल न मिले तब तक गाजियन समय और पैसा क्यों जाया करेगा। इस हाप देकर उस हाय लेने का युग है। संतुलन और समीकरण द्वारा सब के सब सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं। कृष्ण को गोता का संदेश "कर्मण्येवाधिकारस्ते....किवल पाने और स्वर्णादारों में मढ़वाकर दोवार पर शोमा बढ़ाने के लिए है। एफसमा उनके हो कदम चूमती है, जो कर्म के साथ-साथ फम को इछा रखते हैं, "फस" तोड़ने के लिए प्रयत्न करते हैं। पौरपही सापकोटि का कार्य विद्यार्थी करते हैं । गार्षिमन मी फल की इच्छा कर ए "यूशन" पाये हैं । गुरुषों को बादर देते हैं । मास्था का दीप नहीं परत द्यूम मा und हैं । असकी दुपिया रोशनी में बच्चों का भविष्य पारी। ट्यूशन ने अय एक लघु उद्योग का प धारण कर लिया बस पर अच्छे-अच्छे घर पाते हैं यूशन भी नापार - ४२ लाल बत्ती जल रही है भी वैतरणी पार कर लेते हैं। जिस तरह राजनीति मे पिता के बाद पुत्र, पति फे बाद पत्नी, ससुर के बाद दामाद और भाई के बाद भाई नेता बनकर देश की सेवा में अपना जीवन खपा-खपा देते हैं। पारिवारिक सहयोग से नीतियों का निर्धारण करते हैं। सहकारिता की भावना का पूरी तरह विकास करते हुए परिवार के प्रमुख सदस्यों के बीच अधिकारों का विकेन्द्री- करण करते हैं । उसी प्रकार अब "ट्यूशन" ने अपनी करामात दिखलाई है। गुरुजी के परिवार में भी अव आपसी सहयोग का नया रूप देखा जा सकता है । समाजशास्त्रियों के लिए यह शोध का विषय है। अर्थशास्त्री इसके माध्यम से मांग और पूर्ति का सिद्धांत बहुत सरलतापूर्वक व्याख्यायित कर सकते है । हिंदी वाले लोकोक्ति और मुहावरे (वक्त पड़े बांका तो गधे को कहो काका) का साक्षात् रूप दिखाकर अपनी विद्वता प्रमाणित कर सकते है । "ट्यूशन उद्योग विकास संघ" में गुरुजी तो लगे ही रहते है । उनके साथ उनकी २० वर्ष पूर्व को माठवी पास पत्नी भी बढ़े मनोयोग से सहयोग देती है । वी० ए० फेल बेरोजगार पुत्र को धक्के खाने और न्यूज पेपर में रोजगार खोजने के बदले अच्छा खासा रोजगार मिल जाता है। पाठ वर्षीय बबलू दौड़-दौड़कर सवको पानी पिलाता है। कभी-कभी पास की दुकान से पान भी ला देता है । इस प्रकार "ट्यूशन उद्योग विकास संघ" के उत्पान के लिए सब के सब परोक्षा रूपी अर्थी को कंधा देने के लिए जी पान से जुटे हए है । बारी-बारी से अपना कंधा देते हुए एक बार फिर पह प्रमाणित करते हैं कि यावश्यक्ता याविष्कार की जननी है। पुस्तकों का हरा-मरा पहाड़ रपा गया है जिसमें सुरंग मनाएर विद्यार्षी को स्वयं निकसना है । बोनहीं निकल पाते वे पहाड़ के ऊपर होली पसा हैं। ठेके को दुनिया में याजास धूम मचा दी है पुस्तक छापने पासों ने । वनडे सीरीज, विश्य थी, स्योर समेस, दुर्लम, गारटी, सुपर, पन पोक रोहिंग बोर नाइट स्टार जैसे सुभावने शीर्षक उपसता का ठेका पोय-पोय कर देते हैं। पतुर और अनुमपो तो इनके सहारे पार सग पाते परंतु समचौर हदप पाले पपड़ा हैं । इदन के भय से बचने के लिए व .

ट्यूशन उद्योग विकास संघ ॥ ४३ "ट्यूशन रूपो स्टीमर" में बैठकर चैन की बंशी बजाते हैं। स्कूलों और कालेजों में ऐसे धात्र कभी-कभी दर्शन लाभ देते हुए वाचायो पर कृपा करते हैं । परंतु घरों में उनको नियमितता का क्रम कमी नहीं टूटता । एक कमरा पूरी तरह उनके लिए रिजर्व रहता है ताकि ये शांतिपूर्वक इच्छानुसार ट्यूशन का वानंद उठा सकें । मारधाड़ से बोतप्रोत अमिताभ बच्चन की और श्रीदेवी की गुदगुदाने पालो रंगीन फिल्मों में ओपनिंग शो की तरह ट्यूशन रूपो फिल्म प्रतिदिन हाउसफुल रहती है। जिस बोर देखो उस घोर "एड्स" से भी भयंकर इस महामारी की जय जयकार हो रही है। इसकी लोकप्रियता को देखते हुए इस नये उद्योग के फलने-फूलने के पर्याप्त अवसर है । अपनी विकास यात्रा में इसने कुटीर उद्योग से लघु उद्योग तक को यात्रा सफलतापूर्वक पूर्ण कर ली है। अब ट्यूशन उद्योग को बड़े पैमाने के विशालकाय उद्योगों की श्रेणी तक पहुँचाना इसके अभिभावकों का कर्तव्य हैं । आवश्यकता है इसकी उन्नति के लिए एक संध बनाने की । यह "ट्यू- शन उद्योग विकास संघ" सबकी सहायता करे । इसका प्रतिनिधि मंडल केन्द्र और राज्य सरकार के सम्मुख अपनी मांग प्रस्तुत करे। सवका विकास करें। कुटीर उद्योगों को जिस प्रकार बाधिक अनुदान दिए जाते हैं उसी प्रकार ट्यूशन उद्योग को भी बहुत कम ब्याज को दर पर दीर्घकालीन ऋण प्रदान किया जाये । बयोंकि सबसे अधिक गारंटी ज्ञानदान की ये हो देते हैं। इन सबका कहना है सहायक 'सामग्री और श्यामपट के बिना हो हम शिक्षा में गुणात्मक विकास कर रहे हैं । अनुदान मिलने पर विकास की गति अधिक तौर होगी।' विद्यार्थियों के संकट को दूर करने में तत्पर गुरुजी प्रतिदिन ट्यूशन का पाठ गाँधी जी के इस प्रिय भजन के साथ प्रारंभ वैष्णव जन तो तेने कहिए। जे पीर पराई जाणे रे। DO.

और डिमोशन हो गया आज नारियल पर नारियल फोड़े जा रहे हैं । आज होली भी है। ईद भी है, बड़ा दिन भी है, और दीवाली भी है। आज छोटे से लेकर लम्बे तक सब के सब गद्गद हैं। कुछ लोगों के लिए घासीदास जयंती है तो कुछ लोग आज इसे अपना दूसरा जन्म दिन मना रहे हैं। कुछ लोग मौत के मुंह से निकलकर मा गये हैं। सब एक दूसरे को बधाइयां बांट रहे हैं । थोक के भाव में मिठाइयां बांट रहे हैं । भारत की धर्म-निरपेक्षता आज अपने सही स्वरूप में अंगड़ाई लेकर सुबह-सुबह जागी है । सर्वपा सम्भाव का दृश्य आज सभी स्कूलों में साकार हो उठा है । आज हजारों- लाखों के लिए फैसले का दिन होता है। कोई रोते हुए पर जाता था, पर आज सब के सब प्रसन्न बदन पर जा रहे हैं क्योंकि आज ३० अप्रैल है । सबको जनरल प्रमोशन मिल गया है। फिसड्डी से फिसड्डी भी धागे की कक्षा में पहुंच गया है आज हिन्दू, मुस्लिम, सिख इसाई, सेड्यूल कास्ट, सेड्यूल ट्राईव, सब के सब खुशियां मना रहे हैं क्योकि उनके गये हैं। उनकी वर्ष भर की चिंता का जनाना निकल चुका है । आज का दिन भाई-चारे का दिन है। फ्रांस की राज्य क्रांति के समता और बंधुता के नारे को और रूस की क्रांति के समाजवाद को भी पीछे छोड़कर मध्य प्रदेश के शिक्षा जगत में एक ऐतिहासिक क्रांति हुई है-जिसका नाम है "जनरल प्रमोशन" बिना भेदभाव के सम-दृष्टि के आधार पर सभी का जनरल प्रमोशन कर दिया गया है। घोषणा तो वहुत पहले हो चुकी थी परन्तु उसका क्रियान्वयन माज हुआ है। छात्रों के हाप में उत्तीर्ण होने के प्रमाण-पत्र आ चुके हैं और सही मायने में जनरल प्रमोशन पर मोहर लग चुकी है। बालक हर्षातिरेक मे हुये हैं, मास्टरों के चक्कर लगाने से बच गये । ट्यूथन के शिकंजे से छूट गये । हर्रा लगा न फिटकरी लगी, और रंग चोखा हो गया। कुछ का जनरल बच्चे पास और हिमोशन हो गया ४५ प्रमोशन हो तो कुछ का डिमोशन भी हो गया है । डिमोशन के घेरे में आने वाले भीतरी चोट खा चुके हैं फिर भी मुस्करा रहे हैं कपर ऊपर, गया करें? मजबूरी है। छोटे-बड़े प्रकाशकों के, गेस पेपर छापने वालों के, गाईड छापने वालों फे, श्योर सक्सेस वालों के और गारंटी लेकर पास कराने वालों के करम फूट गये हैं। वार्षिक परीक्षा के पेपर छापने वाले भी ताकते रह गये । बेचने वालों के हाथों के तोते उड़ गये । सब के सब सर पर हाय घर के बैठे हैं। नई-नई शिक्षा पद्धति थी, नया-नया माहौल था, पौवारह की उम्मीद थी। क्या किया जावे? पासा उलटा पड़ गया। हण्डेड परसेन्ट सीधे-सीधे जीरों में बदल गया । कहा जाता है ना पीठ पर लात बर्दाश्त हो जाती है, पेट पर नहीं होती। परन्तु जनरल प्रमोशन मया हुमा बहुतों का डिमोशन हो गया। प्रकाशकों, पुस्तक विक्रेताओं, एजेन्टों के साथ- साय मास्टरों के पेट पर ही ऐसी लात लगी की वे अभी तक सहला रहे हैं। कुछ अमृतांजन लगा रहे हैं तो कुछ तो येरलगन खा रहे हैं, तो कुछ लोग को डिसेन्ट्री की शिकायत हो गई हैं । जिसको जैसे मार पड़ी है वह उतना ही कराह रहा है । राजा के अगाड़ी और घोड़े के पिछाड़ी रहने पर ऐसा ही होता है, वैसे सब मुस्कराते हुए कहते हैं, चलो इस बार पेपर सेट करने से और फिर जांचने से और फिर टेबूलेशन करने से छुट्टी मिली । इस साल बड़ा आराम है । परन्तु उनकी बात्मा जानती है कि इप मुस्कराहट और इस आराम के पीछे कैसा दुःख का पहाड़ और असंतोष का ज्वालामुखी छिपा हुआ है । पर क्या करें ? आदत आदमी को पालतू बना देती है। तोता भी मालिक की भाषा में बोलता है। कुत्ता भी मालिक की इच्छानुसार भोंकता है । सब अपना-अपना काम बड़ी नफासत से करते हुए जुटे हैं । फिर भी फुटफुसाहट वो चल ही रही है। एक-दूसरे का दुःख कान से मुंह सटाकर कह रहे हैं। स्कूलों में जनरल प्रमोशन, ट्यूशन, डिमोशन और बजट पर चर्चा जोरों पर है। एक गुरुजी कह रहे ये सच पूछो तो शिक्षा की जड़ें हिल गई हैं।

४६ ॥ लाल बत्ती जल रही है विद्यार्थी स्कूलों में तो जाते ही नहीं। थोड़ा बहुत ट्युशन से ही ज्ञान प्राप्त करते थे, सो ट्यूशन की अर्थी ही निकलवार इस जनरल प्रमोशन ने ! अब घर में बैठे हताश व निराश शिक्षक क्या करें ? या तो बुढ़ाती पलि रो प्रेम की पेगें बढ़ाए और दिल को तसल्ली दें, या कोसते रहें जिसे चाहे । नाम ले ले कर कोसें। कमरे के भीतर गालियां देंगे तो उनका कोई बिगाड़ सकता है। गुरुजी कह रहे थे, बजट सबका मला करता है । बजट तो राम-बाण औषधि है । निम्न वर्ग, मध्यम वर्ग, उच्च- मध्यम वर्ग उच्चवर्ग और यहां तक की भिखमंगों को भी प्रसन्न करता है । व्यापारी कीमत बढ़ने से प्रसन्न होते हैं, और आम आदमी मंहगाई की धीमी गति देखकर प्रसन्न होता है। प्रसन्न सब होते हैं। परन्तु जनरल प्रमोशन से गुरुजी का बजट फेल हो गया। बजट की रायल्टी और महत्ता और उसकी ऊंचाई किसी से ऑकी जा सकती है को रिकार्ड तोड़ने की गति से काम किया गया । गुरुजी कहें या मास्टर । सम्मान करना चाहें तो प्रोफेसर साहब कहिये । आपस में वतिया रहे हैं । भट्टा बैठ गया यार इस बार तो। सीजन सूखा निकल गया । पूरा का पूरा बजट फेल हो गया । रोज पत्नी के व्यंग वाणों से बिंधा जा रहा है । सोचा था इस बार की गर्मों में तपना नहीं पड़ेगा । ट्यूशन को सनाखन वर्षा से कूलर की ठंडी-ठंडी हवा का मजा लेंगे । पली प्यार से सहलायेगो भी परन्तु हाय री तकदीर पब गुड़ गोवर हो गया। जनरल प्रमोशन क्या हुआ, ट्यूशन से जो चमकाना चाहते थे तकदीर यो साझे की हांडी की तरह सरे माम चौक पर फूट गई। गुरुजी आपस में चर्चा कर रहे हैं, चलो यार आज सामूहिक रूप से मातम मनायें गोंकि आज ३० अप्रेल है । सब के सब जनरल प्रमोशन में पास हो गपे और हम सब का डिमोशन हो गया। ट्यूशन रूपी खीर- पूड़ी तो पहले ही सपना हो चुकी थी, अब गर्मी को खुर्चन पानी भी जाती । कुछ लड़के जो सप्लीमेन्ट्री पाते थे, कम से कम दो महीने तो और डिमोशन ही गमी सेवा करते ही थे । गर्मी की दो मास छुट्टियों में भी तयवट बनी रहती थो, और हमारा सत्रावासन ३० अप्रेल के बदले ३० जून को होता या परन्तु इस बार धोखा खा गये । सप्लीमेन्ट्री तो बहाना होती थी। मौका बार-बार देने की हमारी भारतीय संस्कृति की विशेषता से सब अपना- अपना पेट पालने का प्रयास करते थे। जब श्योर "सक्सेस में से हायर सेकेण्ड्री के प्रश्न छप्पर फाड़कर सीधे झोली में आते जा रहे हैं तो सप्लीमेन्ट्री की जरूरत भी नहीं पड़ी सारे के सारे लड़के सीना तान कर स्कूल से लौट रहे हैं । ताली पीट-पोट कर मजा ले रहे हैं- गुरुजी गुरुजी चाम चुटियाँ । गुरुजी मरगे उठा खटिया ॥ - 30 दंगल : परीक्षा केसरी का परीक्षा दुधारी तलवार है। वह अपनी चमक से दोनों को धमकाती रहती है । परीक्षक को भी, परीक्षार्थी को भी। दोनों मन ही मन उससे बचना चाहते हैं परन्तु दोनों उसके शिकजे में कैद अपने-अपने ढंग से। दोनों घबराते हैं इसके नाम से। एक को डर रहता है कि वह परीक्षा में फेल न हो जाय तो दूसरे को दूसरा डर रहता है कि वह फेल करने पर सरेआम पीटा ने जावे । परीक्षा हल रूपी मैदाने-जंग में परीक्षा केशरी के इस दंगल मे हिन्द केशरी और रूस्तमे हिन्दी जैसे दंगल मारने वालों के भी छक्के छूट जाते हैं । दोनों ओर के पहलवानों को दिन मे भी तारे नजर आवे हैं । फिर भी प्रतिवर्ष ये दंगल होते ही हैं। माई के लाल उतरवे हैं, अपनी-अपनी ताकत आजमाते हैं। बस जोड़े बदलते रहते हैं पर उद्देश्य एकमात्र वही होता है। किसी तरह धोबी पछाड़ लगावें और दंगल जीत कर विश्व सुन्दरी की तरह गौरवान्वित हो सके। फोटो न छपे न सही परन्तु आस-पास से लेकर दूर-दराज के विशिष्ट क्षेत्रो में नाम का डंका तो बज ही जाता है। छोटे पहलवान इतना भोग पाकर संतुष्ट हो जाते हैं। कहते हैं इतिहास अपने को दुहराता है और कही इतिहास अपने को दुहरावे या न दुहरावे परन्तु महाभारत का इतिहास इस परीक्षा केशरी के दंगल में जरूर दुहराया जाता है । अर्जुन और द्रोणाचार्य की तरह ही माधुनिक गुरु-शिष्य, युग के सत्य एवं अपनी आवश्यकताओं के अनुसार तयारी करते हैं। अपनी प्राचीन उदात्त एवं तेजस्वी संस्कृति की रक्षा के लिए कटिबद्ध अपनी परम्परा का निर्वाह करते हुमे वाल ठोंक कर एक दूसरे के सामने हट जाते हैं। अपनी अस्मिता की रक्षा के ये दोनों परीक्षा रूपी धर्म युद्ध के लिए तैयार रहते हैं। दोनों पक्षों के दंगल: परीक्षा केसरी का || ४६ ज्ञान-चक्षु खुल चुके हैं अतः उपदेश के लिए किसी कृष्ण की आवश्यकता नही रहती और दोनों ही अपने-अपने चक्रव्यूह की रचना इस ढंग से करते हैं कि वह अन्त तक अभेद्य बना रहे। मजे की बात यह है कि इस दंगल की तैयारो दोनों पक्ष उतने जोर- शोर से करते हैं कि साठे को पार चुके पाठे पर विजयी अमरीकी राष्ट्र- पति रीगन की कूटनीति भी उनके सामने बौनी लगने लगती है। परीक्षा प्रारम्भ होने के कुछ समय पूर्व ही अधिकांश विद्यालय/महाविद्यालय के प्राचार्य वरिष्ठ गुरुजन एवं प्रोफेसर्स अपने भाषण में (जो विरोधी पार्टी के उखड़े हुए उस नेता की तरह होता है जो पुनः जमना चाहता है) यह कहते हुए पाये जाते हैं- प्यारे छात्रों/विद्यार्थियों दोस्तो, आप सब इस विद्यालय की गौरवशाली परम्परा से पूरी तरह परि- चित हैं । हमें गर्व है कि इस महाविद्यालय ने देश को एक सक्षम प्रशासन एवं प्रदेश को एक मुख्यमंत्री सौंपा है । इस विद्यालय से पढ़कर निकले हुए भूतपूर्व छात्र मान महान नेता बन चुके हैं । अनेकों बार मंत्री के पद को सुशोभित कर चुके हैं । उनके जीवन के अंतिम चरण में हमे अब उनमें राष्ट्रपति एवं प्रधान मंत्री बनने की संभावना के भी दर्शन होते हैं । आज जब कि दूसरे स्कूलों एवं कालिजों के छात्र पढ़ाई पूरी करने के बाद पनवाड़ी से लेकर पटवारी तक बनते हैं। हमारे यहां के पढ़ाकू लड़के बनते हैं, नेता और मंत्री नबकि दूसरों का प्रोडक्ट है आज-कल डाकू और सन्तरी । यह सव इसलिए होता है क्योंकि आप सब मेहनत करते हैं साल साल भर । ईमानदारी से परीक्षा देते हैं और हम ईमानदारी से परीक्षा आयोजित करते हैं। परन्तु इस वर्ष हमारे इन प्रयलों को बड़ा धक्का लगा है। हमारी गौरवशाली परम्परा को कुछ स्वार्थी तत्वों ने तोड़ने का प्रयास किया है पर उसको हम टूटने नहीं देंगे । कुछ बेईमान शिक्षकों ने रुपये लेकर पेपर आउट कर दिये हैं उनके लिए हम निदा का प्रस्ताव पास करते हैं और अब समय मा गया है कि हमारी गौरवशाली परम्परा ५० ॥ लाल बत्ती जल रही है को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए ऐसे लोगों का ट्रांसफर करवाना ही पड़ेगा। साथ ही कुछ छात्र जिनके नाम मैं जानता हूँ पर अभी आपको नही बताऊंगा उन्होंने इंगडूंगपुर, डूमरजीह, डोंगर गांव और डोंगरगढ़ तक बम्लेश्वरी देवी के दर्शन के साथ-साथ प्रेस के भो चक्कर काटे हैं यह हमारे लिए शर्म से हुब मरने की बात है। (कुछ फुसफुसाहटे-लेकिन हम डूबकर नहीं मरेंगे) हमारे माथे पर यह फलंक का टीका है। हम इसे मिटा कर रहेंगे । हम इसे मिटा कर रहेंगे। तालियों की गड़गड़ाहट के साथ छात्रों की भीड़ छट जाती है । हंसते/मुस्कुराते कनखियों से इशारे करते हुये एकलव्य के छोटे भाई इतना सब सुनकर ध्यानस्य होकर लक्ष्य प्राप्ति में जुट जाते हैं । छात्रों की टोलियों की टोलियां पूरे उमंग और उत्साह से भर कर उन महान शिक्षकों की खोज में लग जाती है। जो रुपये लेकर पेपर आउट करते हैं । गुरु दक्षिणा का यह माधुनिक दौर (एकलव्य की तरह पुराना और घिसा-पिटा नहीं) नई दृष्टि और नये वजन से लैस होकर सामने आता है । नई अभिनेत्री के पहले जन्म दिन की तरह/पहली हिट फिल्म की तरह । कुछ को टिकट मिल जाती है। किसी का घांस लग जाता है तो कोई सिल्वर जुबली मनाता है । जो पिछड़ जाते हैं वे रोते रह जाते हैं । जिस दिन परीक्षा का दुखारम्भ होता है इनकी दिनचर्या भी दर्शनीय होती है । आँखें धन्य धन्य हो जाती हैं सब कुछ देखते हुये । ये भले मानुष तीन-चार पेनों की सफाई करते हैं रगड़-रगड़ कर फिर स्याही मरते हैं, अगरबत्ती का घुओं दिखाते हैं और प्रणाम करते हैं और प्रणाम रूपी गाड़ी आशीर्वाद पाने की लालसा में दौड़ने लगती है राजधानी सुपर फास्ट की तरह । पेन के बाद पुस्तक-कापो के साप-साथ सरस्वती जो के मूर्वि पर माथा टेका जाता है और ये बहादुर रण में कूद पड़ते हैं। परीक्षा केसरी का दंगल मारने के लिए । परीक्षा भवन के गेट से लेकर गैलरियों एवं मुख्य द्वार सभी बगह माथा टेकते हुए जाते है जनाव। कमरे में प्रवेश करते समय इनकी मुद्राएं, इनको पकराहट और दंगल : परीक्षा केसरी का ॥ ११ इनको सकुचाहट नई नवेली दुल्हन को भी मात देती है। फिर भी किसी तरह अपने रोल नम्बर वाले डैक्स के पास पहुंच कर पूरी श्रद्धा के साथ माथा टेकते हैं । माथा टेकते-टेकवे माथे पर भट्ठ पड़ जाता है, पर उन्हें कोई चिन्ता नहीं वे उत्तर पुस्तिका देखते ही अपनी पता पुनः दर्शाते हैं। प्रश्न पत्र देखने के बाद इनका माथा स्वाभाविक गति से स्वतः टिक जाती है क्योंकि प्रश्न पत्र में माथा टेकने की प्रक्रिया पर कोई प्रश्न नहीं रहता । परन्तु जो समझदार होते हैं/होशियार/चुस्त और घालाक होते हैं वे भाज-कल इतनी जगहों पर माथा नहीं टेकवे । वे पता लगाते हैं। उद्धारक कौन है उनका । उनके ही चरणों में माथा टेकते हैं । गुरु दक्षिणा देते हैं भरपूर । दीक्षा मिल जाती है । परीक्षा रूपी कली मधुरस पाकर फूल बन जाती है, उत्तीर्ण हो जाती है। खिल जाती है और खिलखिलाती है । इस तरह कुछ के सर पर परीक्षा का भूत सवार रहता है तो कुछ परीक्षा के भूत को पैरों तले रौंदते हैं। अपने कुशाग्र बुद्धि के दम पर। अपनी तिकड़मों के दम पर परीक्षा केसरी का दंगल मारते हैं । परन्तु भूत तो भूत ही है वह अपना जलवा दिखाते हुये कहता परषों की ये लूट है लूट सके तो लूट । फिर पछताये होगा क्या, जब परचा जायेगा फूट ।

फाइलों के जंगल में बड़े बाबू खुशदिल आदमी हैं । हरदम प्रसन्नचित रहते हैं। मुंह का पान उदर तक पहुंचाने के बाद मस्ती में गुनगुना रहे हैं-'मेरे अंगने में भीड़ लगी भारी मैं किसको किसको प्यार करूं।' दूर केबिन में बैठे साहब भी सुनकर मुस्कुरा रहे हैं। वे जानते हैं जब बड़े बाबू अपनी प्रसन्नता का वेग सम्हाल नही पाते, तब माफिस में इन्ही पंक्तियों को गुनगुनाते हए प्रवेश करते हैं। वे समझ जाते हैं आज तेजी से दस्तखत करने हैं। फाइलों पर। हो सकता है, देर रात तक बैठना पड़े। आज मुहुर्त हुआ है । बड़े बाबू दूर की कौड़ी लाये हैं। बड़े बाबू के कमरे में टैबल के चारों ओर ढेर नमूने अनोखी मुद्राओं में खड़े भी हैं और मैठे भी हैं । बड़े बाबू अपने मातहत से चर्चा कर रहे हैं । जानते हो वर्मा-फाइल का, वजन से बहुत आत्मीय और गहरा संबंध रहता है । जब फाइल के ऊपर पेपर वेट के रूप में ठोस और चपटा गोला रखा जाता है, तब फाइल उसके वजन से दव जाती है । विज्ञान की परीक्षा में फेल होकर छोटे बाबू बतलाते हैं । सही है सर। प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। रबर की गेंद जिवनी जोर से आप दीवार पर मारेंगे, उतनी ही वेग से वह आपके पास वापस आयेगी । बड़े बाबू का व्याख्यान पुनः गति पकड़ता है। वे कहते हैं जिस तरह समुद्र से रत्न निकालने के लिये गोताखोर बहुत नीचे तक गोता लगाते हुए बाते हैं तव ही उन्हें सीपियों से मोती मिलते हैं। उसी प्रकार रलगर्भा धरती के भीतर से कितनी मेहनत से हीरा और सोना निकाला जाता है। फिर उसे साफ किया जाता है। धोया जाता है, मांजा जाता है । तब कहीं सोने की सुनहनी आमा और हीरे को चमक हम देख पाते हैं। ये मागे बताते है-इसी तरह कार्यालय में देर सारी फाइलें पड़ी कि वे समझ रहे हैं। सभी जल्दी-जल्दी फाइल रोपेर प्रक्रिया में जुट गये। सभी अच्छी तरह समा गये ) भी कार्यालय की धड़कन है । जिस तरह पारस attinimum mil नायिका के सुन्दर चेहरे के चारों भोर पर elhi कार्यालय के छोटे से छोटे बाबू से लेकर मोरा भी। फाइलों के गंगल मे | ५३ रहती हैं। उनको पर लाने के लिये बहुत परिश्रम करना पड़ता है। पेपर वेट को हटाने के लिये उससे अधिक ताकत हाथों में चाहिये । सही फाइल को ढूंढ़ निकालने के लिए दृष्टि भी साफ होनी चाहिये । जिनकी दृष्टि साफ नहीं होती अपवा दृष्टि साफ करने के लिये हाई पावर का चश्मा तो वे लगाते हैं परन्तु उन्हें व्यावहारिक जगत की गतिविधियाँ साफ नजर नहीं आती, तो उनकी फाइल दवो रह जाती है । कुछ लोग अपनी काबिलियत के बल पर फाइल आगे बढ़ाना चाहते हैं परन्तु फाइल तो फाइल होती है । वह अड़ियल घोड़े की तरह अड़ी रहती है । तो ऐसे साधु पुरुष छोटे बाबू और बड़े साहब के सामने तो हाथ जोड़कर दंत- निपोरी करते हैं । परंतु पीठ पीछे उन्हें गालियां देते हैं । फाइल का भी अपना उसूल होता है। वह तो तभी बढ़ती है आगे जब पेपर वेट उसके ऊपर से उठा लिया जाए । जो व्यावहारिक गतिविधियों से परिचित होते हैं, वे अपनी दृष्टि साफ करते हुए चपरासी के साथ-साथ छोटे बामू को भी खुश करते हैं। बड़े साहब का तो नाराज करने का प्रश्न हो नही उठता । इस प्रकार म्यवहार कुशल व्यक्ति अपनी व्यावहारिकता से अपनी फाइल पर लाल चिट लगवाने में सफल हो जाता है । जिरा पर यई-प्रो लाल-लात अक्षरों में लिखा रहता है-'तत्काल' या अंग्रेजी में मट' और फिर तूफानी गति से फाइल सभी टेबल पर दौड़ने लगी है। फतह हो जाता है। बड़े बाबू के इस लम्बे-चौड़े व्याख्यान से बोर हो होगी। का पूरा व्याख्यान पवा लिया । मुस्कुराते हुये मौन रहकर it atten ' पर हस्ताक्षर के लिये वहफती रहती है। मोती .

२४ । सात पो रही है पनवे दूसरे और दूसरे से बोरे के कभी न समाप्त होने वाले चक्कर में पुमाते रहते है। सभी मते रहते है। फिर भी घे प्रसन्न रहते हैं। योकि जहें भी यह फाइन बोरनदाशिनी शक्ति प्रदान करती है। ये सबके सब फाइत को काशात बापु का अवतार मानते हैं । शदिवारके भीतर यह सब भागमभाग, दूरदष्टि और कठोर परिश्रम की पदभुत क्षमता नहीं है, तो आप पहजे हुए सूरज के साथ-साथ प्रतिदिन कार्यालय में प्राइसे। डूबते हुये सूरज के साम लौट जाइए। मापकी फाइल इधर से उधर और उधर से धर भटकती रहेगी । एक दिन ऐसा होगा कि आप रिटायर हो जायेंगे। रिटायर होने के बाद भी पंदि मापकी समश पिकसित नहीं होती (बाल पुराण के अनुसार) तो फाइलों के जंगल में आपको फाइल भटकती रहेगी। आपकी अर्जी कभी पार फाइन में अटकेगी तो कभी लेटी फाइल में लेटो रहेगी या खड़ी फाइल में भादेश के इंतजार में हाय बधेि खड़ी रहेगी। कार्यालय की महत्ता और यहाँ के कर्मचारियों का रुतवा फाइल की बाधा दौड़ के कारण हो है। कहा जाता है- भारतीय कृपक ऋण में जन्म लेता है, ऋण मे पलता हुआ बूढ़ा हो जाता है, ऋण में ही मर जाता और आने वाली पौड़ी के लिये ऋण ही छोड़ जाता है । कही ऐसा तो भी अपनी फाइल निपटापे बिना हमेशा-हमेशा के लिये कूच अपनी पीढ़ी के लिये फाइल के लिये धक्कर लगाने पामेंगे। ऐसे ही स्थितियो में देश को आगे बढ़ाने : भूदकर जोर-जोर से इस लगायेंगे- मेहनत और रोटी . . जल्दी वाम व प्रजातंत्र के रखवाले कर्तव्यनिष्ठ दरबान का काम हवेली या फ्लेट की रक्षा करना होता है । उसी प्रकार नेता नामक प्राणो प्रजातंत्र का सबसे बड़ा दरवान माना जाता है । बुद्धि के ठेकेदारों के मुख से अक्सर सुना जाता है कि मजबूत विपक्ष प्रजातंत्र की सफलता के लिए बहुत जरूरी है । हमें सत्ता के तलवे चाटना छोड़कर विपक्ष को मजबूत करना होगा । और फिर स्वयं ही अपनी आदत से बाज नहीं आते। शुरू कर देते हैं तलवे चाटना । वाद-विवाद में पक्ष और विपक्ष दोनों ही अपनी पैनी, सटीक व्यक्ति- गत से जनता को लुभाते हैं । अर्थ कुछ नहीं केवल चटपटी बातें । सपना रंगीन दुनिया का। आश्वासनों का ढेर परोसते हैं। प्रजातंत्र की रक्षा का भार शोहदों ने भी उठा लिया है । वे भी अच्छे दरवान माने जा रहे हैं । ये उनमें से हैं जो स्वयं हवेली में संघ लगवा देते हैं । रक्षक ही भक्षक बनकर सेवा करने का ढोंग करते हैं । इधर कुछ सट्टा पट्टी लिखने वाले भी छोटे-छोटे दरबान बन गये हैं। झूठी जमानत लेने वालों की गिनती मंझोले दरबानों में होने लगी है। एक बहुचचित मेले में बहुत सारे दरबान एकत्रित हुये। सबका अपना फलसफा है । किसी दरवान ने हरे रंग का झंडा अपनाकर युद्ध की घोषणा की है, तो कोई अपने भगवे झंडे में मस्त है । तो कोई.दरबान सर से पैर तक सफेद है । हाथ में झंडा भी सफेद, लिये हैं। केवल चेहरा काली हंडी की तरह दमक रहा है। बड़े-बड़े दरवानों की चर्चा यू रंग ला रही थी। सफेद झंडा उवाच: भाई मेरी बात मानो । पुलिस के डंडे खाना-चुल्लू भर पानी में हूब मरने लायक बात है। देखो कैसी सघी हुई पिटाई की है। मेरे बदन का २६ । लाल बत्ती जल रही है एक-एक पोर दर्द कर रहा है । सर से पैर तक सफेद हूँ। परन्तु एक बूंद भी मूम का दाग नहीं । षकि उन्होंने मार-मार कर मेरा मुरता बना दिया । कम्बल में लपेटकर मारते हैं साले । अब तो उसको नौकरी से निकलवाना ही पड़ेगा । आज से हमारा नारा होगा- "पुलिस की तानाशाही नहीं पलेगी। नही चलेगी............नहीं चलेगी।" हराझंग उवाच: तुमको अपनी पड़ी है । इधर मेरा सब कुछ लुट गया। पिछले महीने उस साले मास्टर के पास में दस बार गया कि इस मार मेरे चिरंजीव को अवश्य पास कर दे । दो बार फेल हो चुका है । अब को फेल हुआ तो मेरे लाडले की जिंदगी बर्बाद हो जायेगी। परन्तु उस दो टके के मास्टर ने तीसरी बार भी मेरे प्रतिभाशाली और होनहार जवान को केवल इसलिये फेल कर दिया क्योंकि एक बार उसने मास्टर की कॉलर पकड़ ली थी। और मैंने उस मास्टर को पास करने के लिये पांच सौ रुपये नहीं दिये। क्या समझता है ? साला अपने आपको। छठी का दूध याद फरा दूंगा उसको । आज से मेरा नारा होगा- "शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार । चंद करो............बंद करो।" लाल झंडा उवाच तुम लोग समझते नहीं हो । ये सब तो चलता ही रहता है। पहले अपनी आगे की सोची । अपना "भारत बंद" तो सफल रहा परन्तु नगर बंद के लिये कोई तैयार नही है । यदि बंद के दिन भी दुकानें खुल गई तो फजीता जो जायेगा । इसलिये नारा लगामो और बंद वापस लेने की तरकीब सोचे- "जिला प्रशासन हाय हाय । जिला प्रशासन हाय हाय ॥". .

प्रजातंत्र के रखवाले ॥ ५७ भगवा झंडा उवाच: मुझे नाप सबको बातें सोलह आने सही लगती हैं। तीन नारों के साथ चोथा नारा मैं क्वाता हूँ। इसे भी शामिल कीजिये- "जो हमसे टकराएगा। चूर-चूर हो जायेगा॥" बड़े-बड़े दरवान मिलकर नारे लगा रहे थे। वंद को वापसी के लिये जुलूस आगे बढ़ा रहे थे। पुलिस प्रशासन के लिये हाय-हाय कर रहे थे । शिक्षक को सस्पेंड कराने के नारे थे। बड़ी-बड़ी मांगे थी। विधानसभा पर धरना की बातें थी। नगर बंद का माह्वान था। सब टॉय-टाय फिस्स हो गया। एक छोटे से स्थानांतरण की घोषणा होते ही दरवानों का रंग- विरंगा विद्रोही फुगा सुई की नोंक लगाते ही सिकुड़ गया। सबने एक स्वर में इस ट्रांसफर को तानाशाही ताकतों पर प्रजातंत्र की विजय घोषित करते हुये अपना आंदोलन वापस ले लिया । अब वे जनता को भी बाध्य कर रहे हैं कि जनता इसे प्रजातंत्र की विजय का प्रतीक माने परन्तु जनता समझदार है । ढोल की पोल वह जानती है । परन्तु चूहे समक्ष रहे हैं कि उन्होंने हाथी को पछाड़ दिया। सभी दरवानों ने प्रजातंत्र की इस विजय पर उत्सव मनाया जाम पर जाम टकराए । डिस्को हुमा । भागड़ा हुआ। और अंत मे केवरे भी। अपनी-अपनी पिनक और रो मे झंडे बोलने लगे । अंत में वरिष्ठ एवं वयोवृद्ध झंडे ने समापन कुछ इस तरह किया । हमारी इस विजय से हम आल्हादित हैं । एक सच बात कहता हूँ । अपने ही बीच रखना । दीवारो के भी कान होते हैं । हमारी लड़ाई जनता की भलाई के लिये नहीं वरना अपनी नहं की तुष्टि के लिये है । हमारा प्रमुख कार्य जनता को मूर्ख बनाना है। प्रश्न हमारे अस्तित्व की रक्षा का भी है । हम तो गधे को भी जरूरत पर काका बनाते हैं। हवलदार को सलाम करना हमारी संस्कृति है । हम फिर से मिलजुलकर किसी ऐसे अवसर की तलाश करें ताकि जनता में हमारी छवि धूमिल न हो।

५९ ॥ लाल बत्ती जल रही है अधिकांश दरवानों ने दो महापुरुषों के मादर्श को मारमसात किया। एक और विवेकानंद के अनुसार स्वस्थ शरीर में स्वस्थ दिमाग रहता है। ऐसा मानते हुये दिन में दंड पेलते हैं । बदन बनाते हैं । लाग घुमाते हैं । तो दूसरी ओर गांधीजी के अबोद्वार को अपने ढंग से लागू करते हुये अछूत कन्याओं का उद्धार करते हैं । मौका पड़ने पर वह उद्धार करते हैं । समापन के रूप में अपने-अपने ढंग से देश का उद्धार करते हुये वे निकल पड़े पुनः किसी एक छोटी-सी बात की तलाश में इनको देखकर ही मुकीम भारती ने लिखा है- "नांव में बैठा है, सूफान मेरे देश में । द्वार पे सोया है, दरवान मेरे देश में।" - .

. - कुर्सी प्रेमी : कलयुगी कृष्ण प्रेमपत्र की भाषा कभी-कभी ऐसी होती है कि पढ़ने वाले का ब्लड प्रेशर हाई हो जाता है। आप घबराइये मत। आपके लिए ऐसा कोई खतरा नहीं है । साहित्यकार इसी प्रक्रिया को हृदय का स्पंदन कहते हैं। और चलताऊ भाषा में लोग कहते हैं इसे कलेजे का धकधकाना । जो भी हो प्रेमपत्र, प्रेमपत्र ही होता है । रस की वर्षा करते हैं-प्रेमपत्र । प्रेमपत्र आपने भी पढ़ा होगा। सुना और गुना भी होगा। द्वापर के कृष्ण फा राधा के प्रति लगाव प्रख्यात है। प्रेम की इस दौड़ में आज-कल के नेता लगातार अव्वल आ रहे हैं। कलयुगी कृष्ण का कुर्सी के प्रति प्रेम सात समंदर पार कर अपनी कीर्ति का पताका फहरा रहा है । इसे पाने के लिए वह क्या-क्या नहीं करता। इस बार उसने कलम का प्रयोग तलवार की तरह किया है। अपनी प्रिय कुर्सी को पाने के लिये उसने लगातार पत्र लिखे है । उसकी यह क्षमता दूज की धांद की तरह एक- एक कली बढ़ती ही गई है। उन्होंने जो पत्र लिखे हैं उसके कुछ ताजे नमूने उपचुनाव के पहले अवलोकनार्य और समीक्षार्थ प्रस्तुत है । जम- कर पटकनी देने वाली जरूरत से ज्यादा समझदार मतदाताओं के दरबार में । गौर फरमाइये-गोवर्धन उठाने में सहयोगी मेरे भूतपूर्व ग्वालबाल सब भाइयों और संज्जनों। । संकट के समय काम आने वाले मेरे साथियों । मुझे घनघोर दुख है कि आपने मुझे दिल्ली जाने के योग्य नही समझा और सरे बाजार मेरी इज्जत उतार दी। मेरे कहने का मतलब यह है कि आपने मुझे लोकसभा पुनाव में वोट नहीं दिया और मेरी जमानत जन्त हो गयी । तुम्हारी इस ब्रोधाग्नि का कारण मैं नहीं समझ पा रहा हूँ। मेरे सामने दुःख का सागर लहरा रहा है जिसमें एक बड़ी फुर्सी पर बैगते-बैठावे आपने मुझे ६० ॥ लाल बत्ती जल रही है दुवो ही दिया था। वह तो मैं ठरना जानता या इसलिए हिम्मत बांध कर, पूर्वजों की शक्ति का स्मरण कर निकल आया हूँ। इसके बाद मेरे सामने यी दुःख की ऊंची-नीची तूफानी लहरों पर एक छोटी-सी विधान- सभाई कुर्सी । मैंने निवेदन किया था कि मुझे उस कुर्सी पर बैठाइये, परन्तु आपके ऊपर मेरे लच्छेदार भाषणों का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ा और आपने मुझे विधान सभा में भी क्लीन बोल्ड करवा दिया । पर से निकलना मुश्किल हो गया, परन्तु मैं तो हमेशा से आपकी सेवा करता आया हूँ । हार-जीत को मैं कर्मयोगी की तरह समभाव से ग्रहण करता है। परन्तु आज की स्थितियों में सेवा करने की इच्छा रखने वालो को कुसी पर बैठना जरूरी हो गया है। उसके बिना सेवा कार्य हो ही नही सकता । भारतीय संस्कृति में तो दुश्मन के यहाँ भी जब 'गमो' होती है तो हम उसे सांत्वना देने जाते हैं। मेरे यहां गमी का माहौल किसी देहावसान के कारण नहीं वरन् लोकसभा चुनाव एवं विधान सभा चुनाव में मेरी जमानत जब्त होने के कारण है । आपका यह कर्तव्य है कि मेरे दुःख में शरीक होकर मुझे सांत्वना दें। वैसे भी द्वापर में जब संकट माया या गोर्वधन आप लोगों ने लाठियों से उठाया था। मैंने तो केवल अंगुली । जब जो भी संकट सामने आता है, अपनी आदत के अनुसार में अंगुली लगाता है, परन्तु आप लाठी नहीं लगावे, अतः संकट से मुक्ति नहीं मिल पाती । इसके लिए आप मुझे दोषी नही ठहरा सकते । यह को मंहगाई का पहाड़ है, उसे आपकी लाठी ही झेल सकती है मेरी अंगुली नहीं। आओ अब एक साथ मिलकर इसे उखाड़ फेंकें, परन्तु इससे पहले माप अपना वोट देकर होने वाले उपचुनाव में मुझे कुर्सी पर बैठा दीजिए। दही सूट के लिए उकसाने वानी मेरो भूतपूर्व गोपिकाओं और माताओं और बहनों, माप दो युगों से मुझे बानती है, पहचानती हैं। कैसे मैंने द्रोपदी कुर्सी प्रेमी : कलयुगी कृष्ण । ६१ की सहायता चीरहरण के समय की थी। जहां तक मेरे स्वभाव का प्रश्न है, में विनोदी और नटखट तो बचपन से ही हूँ। द्वापर युग कितनी मटकियां फोड़ी थी, कितना दही लूटा था । आप जब जमुना तट पर नहा रही थी, आप सबके वस्त्र लेकर भाग गया था। इतना नाराज तो आप तब भी नहीं हुई थों । इस बार अपने पिछले कार्यकाल में मेरी चुहलबाजी थोड़ी बढ़ गयी थी और कुछ रमणियों से इतिहास की पुनरा- वृत्ति मैंने को। वह भी चोरी-चोरी। पर पता नही पत्रकारों ने कैसे संघ लिया और कुछ भी गलत-सलत छाप दिया । आप लोगों ने उसे सच मान लिया और लोकसभा चुनाव में घर आंगन से निकाला तपा विधान सभा चुनाव में मंदिर से ही निकाल दिया । मुझे अपार दुःख है । बुढ़ापे की ओर बढ़ती उम्र में तुम लोग मेरा साथ छोड़ रही हो। मैंने तुम्हें कितना समझाया था। पुरानी बालसखी समझ सारी भेद की बातें बतायी थी और कहा था कि इन नये-नये छोकरों का भरोसा मत करो। अधिक नहीं तो केवल पांच साल और बिठाओं अपने मन मंदिर में परन्तु तुमने एक न सुनी और दोनों बार जमानत जब्त करवाकर सड़क पर खड़ा कर दिया। मेरा ये छोटा-सा प्रेमपत्र पढ़कर आप लोग नाराज मत होना नहीं तो मैं जोवे जी मर जाऊंगा। आप सब जानते हैं इस समय होने वाले उप- चुनाव के लिए टिकिट हथियाने की चक्कर में मैं बहुत व्यस्त हूँ और जैसे ही धुनाव होंगे, मैं दौरा कार्यक्रमो द्वारा, डोर टू डोर सम्पर्क करूंगा। अभी सावधानी और सुरक्षा की दृष्टि से मैंने सभी के लिए एक साथ पत्र लिख दिया है जिसके बहुत सारे उद्देश्य हैं। लोग मेरी साहित्यिक प्रतिभा से परिचित होंगे । बार-बार होने वाली लघुशंका की तरह मेरी छपास को भावना को भी थोड़ा सुकून मिले और मागामी उपचुनाव में आप मुझे वोट तो देंगे ही। मैंने हिम्मत हारना नहीं सीखा है । कहा भी गया है मन के हारे हार है, मन के जीते जीत ।

१२ | लाल बत्ती जल रही है।
बापका,
'वोट के विरह से व्यथित
कलयुगी कृष्ण
पुनश्चः लोकसभा में मैं हारा, कारण मेरा कर्म पा, विधान सभा में
फिर हमारा कारण आपका मर्म है ।
मव उपचुनाव में जीवना मेरा अधिकार और वोट देना मापका
अनिवार्य धर्म है।
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'मोग' तेरे रूप अनेक मांग भरना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है' कहकर भारतीय नारी ने 'मांग' के नखरे बढ़ा दिए हैं। सम्मान पाकर मांग फूली नही समा रही। इठलाती, बलखाती घूम रही है । धारों ओर । सचमुष कभी छोटी तो कमी बड़ी होकर, कभी टेड़ी होकर तो कभी सीधी होकर उभरती हुई लाली नारी जाति को गरिमा, और विशिष्टता को पहचान होती है परन्तु आजकल यह लाल मांग, साही ग्लास के साथ मैच करती हुई पोली, नीली और हरी भी देखने में मावी है। भारतीय नारी की मांग के अलावा भी मांग के कई रूप हैं । जैसे भिखमंगों की मांग अलग होती है दयनीय, उपेक्षित और फरणा से भरी हुई। इसी प्रकार अर्थशास्त्र में लोगों की जेब खाली करती हुई पूर्ति के इंतजार में वस्तुओं की लोचदार और बैलोचदार मांग। यह कभी अधिक लोचदार है तो कभी कम लोचदार होती है। और एक मांग यह होती है जो ऋतुचक्र की तरह माती है । पृथ्वी की तरह अपनी कोल पर घूमती है । हर पांच वर्ष बाद आपके दरवाजे पर माकर खड़ी हो जाती है। इसे कहते हैं 'नेताओं की मांग। वोटों की मांग । वोटों को यह मांग जब फेल होती है तो वह भारतीय नारी की धुली हुई मांग की तरह (वैधव्य की प्रतीक) उपेक्षा और अपरागुन की शिकार होती है । अब जनता जिसे चाहे चढ़ावे जिसे चाहे उतारे । उसकी इच्छा ही सर्वोपरि है । आजकल मतदान के कुरुक्षेत्र में वोटों की मांग पर चर्चा-सुखियों में है। सामान्यतः धूमधाम होती है । शादी ब्याह मे, पुत्र रल की प्राप्ति में । होली, दीवाली, ईद में, रोशनी होती है । बैड बाजे बजते हैं । मुंह मीठा करते हैं एक दूसरे का गले मिलकर बधाइयों बंटती हैं। इनके साथ-साथ १५ अगस्त और २६ जनवरी को हलचल भी देखते बनती ६४ ॥ लाल बत्ती जल रही है है । परन्तु इनके साथ प्रत्येक पांच वर्ष में (कभी-कभी जल्दी भौ) एक दिन और भी धूमधाम होती है । मिठाई बंटती है और लोग गले मिलते हैं वह होता है भारतीय प्रजातंत्र में वयस्क मताधिकार के स्वतंत्र उपयोग का दिन । गुप्तदान की महत्ता तो आपने बहुत सुनी होगी, पढ़ी होगी, गुनी होगी परन्तु यह होता है गुप्तदान से भी वजनदार मतदान का दिन । इस दिन मतदाता, मतपेटी में मत डालकर नन्हे-नन्हे पौधों के साथ-साथ हजारों दिग्गजों के भाग्य का फैसला करते हैं। कभी-कभी प्रतिभा और पद के मणिकांचन संयोग को भी मे धूल घटा देते हैं और कभी-कभी उपेक्षित, तिरस्कृत एवं अनजाने रंक को भी ये चीसवीं सदी का राजा बना देते हैं। जो इनको नजरों से उतरा यह धार ही धार बह जाता है। पता ही नहीं लग पाता। जो नजरों में पड़ा यह धुनार को पैतरणी पार उतर जाता है । बिना हाप-पैर हुलाये । वोटों की मांग पर सर उठाती है दो चारों ओर मिषमंगे दिसनाई पड़ते हैं । सब अपने-अपने तरीके से मांगते हैं। सम्यता और संस्कृति की पासनी में हुवकर मांगते हैं । हाथ जोड़कर मांगते हैं, धूम-घूम कर मांगो है । मतदाता को ये यापक त्रिपुरारी, भोले भंडारीको सरह पूमते हैं। क्योकि यदि त्रिपुरारी त्रिनेत्र पोसै कोषमानत जन्तीरा ग्रिला देर मी-अन्यों को भोपारा कर देते है । गर भोले मंगरी प्रसमाएको मीसवीं सदी का देवाज वारयाद घोषित कर देते हैं । पुनामी मापाशी पूरी बागडोर समय माता के दापों में ही होती है। वह बंगा पाहे नपान न समो। सब समाये हैं मोर नाप १r नमो गार पाना परी होता है । ये प्रगार से पार, परतु पाय गानों के मिरगी भीमा पाने पानों के लिए एर प्रममा मारो गाना साना साना पार पाडार पदने हो तर रिमोगे।' माया भीमगार याना पाहो है। मारो महा सामगोनासो RITER ।। २५ । की तरह रंभा रही है। सारा का सारा राष्ट्र आंदोलित है । सभी की स्थिति भ्रम पैदा करने वाली है। वीडियो कैसेट्स जमकर चल रहे हैं। टैप रिकार्ड चतुर्दिक बज रहे हैं । बोर्ड और बैनर के साथ-साथ पोस्टर कह रहे हैं इंदिरा जी की अंतिम इच्छा-बूंद-बंद से देश की रक्षा । इसी प्रकार न्यूज पेपर में बड़े-बड़े विज्ञापन हैं 'बिना रिश्वत के सीमेट तो सीमेंट राशनकार्ड तक नहीं मिलता/वाह री काम करने वाली सरकार भाजपा-समर्पित, 1. कुशल ईमानदार । इनके साथ-साथ घोदे, हाथी, तराजू- बैलगाड़ी और हलघर किसान के. साथ अनेक लोग वोट मांग रहे हैं दिग्गजों के भाषणों में भी हल्की, चटपटी और ओछी बातें आप सुन सकते हैं । संघर्ष गुरु-चेले का, मां-बेटे का, सास-बहू का, भाई-भाई का, साले-बहनोई का एक केवल वोट की मांग को लेकर है। कुछ लोग नये नारें उछाल रहे हैं। नये खून से मत टकराना-~-अब बुड्ढों का गया जमाना । इतना सब है फिर भी मतदाता में जोश खरोश नही है। क्योंकि वे समझते हैं, सत्ता.को कुर्सी पर कोई भी आए जनता की बुनियादी गरीबी बनी रहेगी सबकी अपनी-अपनी ढपली है अपना राग है । कोई मुर में नहीं गा रहा । जनता सोचती है। कोई जाति का ढोल पीट रहा है तो कोई धार्मिक भावना को उभाड़ रहा है । आचार संहिता का पालन मभी कर भी रहे हैं और सभी नहीं भी कर रहे हैं। देखना अब किनकी मांग सार्थक होती है। मतदाता के कंधों पर भार है दानों में महादान इस मतदान का- लोहा गरम हो चुका है, चोट करना बाकी है। दुल्हन खड़ी है सामने, मांग भरना बाकी है। T धन्यवाद देने लगे नेता जी देवियों और सज्जनों देवताओं और सज्जनियों, कह सकता हूँ, आपने मुझ पर 'सील' लगाकर मुझे कृतार्थ कर दिया । मतपत्रों पर लगी हुई हजारों हजारों सालों से गुपचुप मेरे शील (इज्जत) की रक्षा की है। आपने मुझे विजयश्री दिलाकर मेरे सात पुरखों को वार दिया है । मैं किस मुंह से आपका आभार व्यक्त करूं । मेरा मुंह इस लायक नहीं है कि आपका अभिनंदन कर सके । केवल यही कह सकता हूँ मुझ पर विश्वास व्यक्त करके मापने मेरे भविष्य को 'सुनहरे हरफों' से लिखा है । जैसा कि आप जानते हैं व्यक्ति के उत्पान से ही समाज का विकास होता है। जैसे-जैसे हम बदलेंगे, वैसे-वैसे युग बदलेगा । इसी गणित के अनुसार कह सकता हूँ जब मेरा भविष्य अब स्वणिम प्रभाव से दमकते दिनमान की ओर बढ़ रहा है तो मेरे साथ- साय मापका और आपके साथ-साथ देश का भविष्य भी बीसवी सदी के स्वर्णयुग की ओर बढ़ेगा। आवष्यकता इस बात की है कि हम सब एकजुट होकर कठोर परिश्रम करें। खाद्य समस्या के संकट को आधा पेट खाकर दूर करें। आवास और वस्त्र समस्या का निदान पूर्वजो की तरह तेजस्वी बनकर करें। संतों की तरह लंगोटी पहने और राणा प्रताप को तरह राष्ट्रभक्ति का परिचय दें। अन्दर मेरा विस्तर है और धरती बिछौना' गीत गाते हुए भागे बढ़े। मैं कह सकता है घुटकी बजाते-बनाते सारी समस्याएं हल हो जायेंगो । मुझे विश्वास है भारत के गौरवशाली अतीत को पुनः महिममंहित करने के लिए सहयोग करेंगे। मुझे अपार हर्ष हो रहा है कि इस मुम अवसर पर आपने मुमति जैसे भरे और दुर्लभ विषय पर बोलने के लिए आमंत्रित किया । सप तो धन्यवाद देने लगे नेता जी ॥ ६७ यह है भाइयों और बहनों कि नूतन के प्रति मनुष्य का आकर्षण शाश्वत है मेरा आशय फिल्म की नूतन से नहीं है । नयेपन से है। अज्ञात और अपरिचित की खोज ही क्रांति है । 'क्रांति' शब्द का प्रयोग करते ही हमें एक ऐसे परिवर्तन का आभास होता है जो समाज में पूरी तरह उथल- पुथल मचा देता है । सब पुराने रीति-रिवाजों, मूल्यों, परम्पराओं और विश्वासों को अस्वीकार कर उसकी जगह नई व्यवस्था स्थापित करता है । उसो प्रकार जैसे आपने अपना मत देकर मुझे स्थापित किया है । इचे इस क्षेत्र की छोटी-सी क्रांति कह सकता हूँ । जब हम क्रांति के उद्देश्यों की चर्चा करते हैं तो क्रांति में जनता की सुख-शांति के लिए क्रांतिकारी को छटपटाहट वैसे ही दिखनी चाहिए जैसे दर्पण में चेहरा । इतिहास मताता है कि इब्राहिम लिंकन, लेनिन, कार्लमाक्स, गांधी और जयप्रकाश नारायण सब किसी-न-किसी प्रकार मानव मूल्य की रक्षा के लिए बेचन थे । वैसे ही जैसे आप मुझे मानव जाति के नये मूल्यों के लिए छटपटाते हुए देख रहे हैं धीरे-धीरे मेरो निष्ठा रंग लायेगी और मैं क्रांति करुंगा पुनः “धन्यवाद कह सकता हूँ क्योंकि आपने मेरी देश की सेवा की छटपटाहट को, हार्दिक इच्छा को पहचाना और मुझे चुनाव में चुनकर वहाँ पहुँचा दिया जहां जाने को देवता भी तरसते हैं । जो स्वर्ग से बढ़ । में कर है। कह सकता हूँ, क्रांतियां बहुत हुई। सर्वप्रथम मांस को राज्य क्रांति जिसने मानव जाति को सबसे पहले स्वतंत्रता, समानता और बंधुता का बोध कराया । उसके बाद रूस को बोल्शेविक क्रांति शायद यह १८१७ में हुई । रूसी जारशाही पर सर्वहारा को विजय संसार में एक अप्रत्याशित और स्तंभित कर देने वाली घटना मानी गई । जिसने प्रथम बार शोषितों को सत्ता के सिंहासन पर आसीन हो सकने का गौरवपूर्ण अवसर सुलभ कराया था। इसके बाद क्रांतियां तो बहुत हुई परन्तु आप अधिक बोर न हो इसलिये सीधे भारतवर्ष में हुई समप्रांति पर आ जाता जिसने भाई-भाई के भाईचारे और द्वंद्व युद्ध दोनों की मिसाल कायम की। जिसने ६८ ॥ लाल बत्ती जल रही है प्रधानमंत्री पद पर क्रांति की मुहर लगाते केवल ३ वर्षों में दो-दो नये प्रधानमंत्री दिए । इस समग्र क्रांति के प्रणेता लोकनायक जयप्रकाश नारायण थे । लेकिन कुर्सी मिलने के बाद नेताओं ने उनको पूछ कम कर दी थी तब जनता ने अपने सच्चे हमदर्दो को, सच्चे सपूतों को, सच्चे सेवकों को सेवाभाव के लिए चुना था परंतु वे सेवा नहीं कर सके । अभागे ये बेचारे । कह सकता हूँ वैसे ही जैसे याप लोगों ने इस बार मुझे धुना है । पुनः जनता जनार्दन का अभिनंदन करता हूँ। मैं ईमानदारी से पूरे पांच वर्ष सेवा करूंगा । क्रांतियों के क्रम में समग्रक्रांति का मोहभंग होता है और इंदिरा जी की वापसी को भी मैं विश्व के इतिहास में एक अभिनव क्रांति मानता है। इसी क्रांति का में भी एक सिपाही हूँ। कह सकता हूँ क्रांतियां तो आज भी ढेर सारी हो रही है पर हम देख नहीं पा रहे हैं । आवश्यकता है खुली आँखों की, खुले दिमाग को या यों कहें सम्पन्न दृष्टि का सानिध्य ही सोपरि है। आप देखिए धृतराष्ट्र की तरह और मैं वेदव्यास की दिव्य दृष्टि का प्रयोग करते हुए आपको दिखाता हूँ 'बीसवी सदी के भारत में प्रांतियों के बीच महा. भारत' । फमेन्ट्री साप साप चलेगी। सबसे पहले हम देखें कि परिवार नियोजन पर करोड़ों रुपये व्यय करने के बाद भी बच्चे सटासट पैदा हो रहे हैं । इमे जनसंख्या प्रांति कहेंगे। उत्पादन के क्षेत्र में पुराने रिकार्ड घोड़कर 'उत्पादन क्रांति' के झंडे गाड़े जा रहे हैं । ओलम्पिक में बापने देखा कि योड़ा-सा पिछड़ने के बाद भी पी. टी. उपा ने भारतीय महिना भगत के सेलफूद में प्रति कर दी। महिलाएं सभी क्षेत्रों में क्रांति कर रही है । राकेश शर्मा ने भारत की ओर से पहली बार की उड़ान भरने हुए कारिदा मारा करके अंतरिया में भी शांति कर दी। शिम्मी अमि- नेताओं ने नेता बनने की टानी, पुनावी विगुन कृपा और जाति कर दी उन्होंने राजनीति में पनया दिखा दिया। नये वर्ष की गुमनामों के शाप मापगो नपा नारा देता है। प्रक्षेत्र में rifa करना हमारा धर्म ही नहीं बम है।" और मा धन्यवाद देने लगे नेता जी ॥ ६६ नारा होगा। हम मरते दम तक उसके लिए संघर्ष करेंगे, मुझे विश्वास है इसी तरह मैं आपको भाषण रूपी गरमा-गरम चाय पिलाता रहूँगा और आप सब मुझे बारम्बार सेवा का अवसर देते रहेगे । मुझे भाषण के साथ- साथ शेरो शायरी का भी फितूर है । कुछ-कुछ भूल गया हूँ। फिर प्रयास करता हूँ। हाँ तो लीजिए प्रस्तुत हैं दुष्यंत का एक तगड़ा शेर :- हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा उद्देश्य नही मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिये - 00 ६८ ॥ लाल बत्ती जल रही है प्रधानमंत्री पद पर क्रांति की मुहर लगाते केवल ३ वर्षों में दो-दो नये प्रधानमंत्री दिए। इस समग्र प्रांति के प्रणेता लोकनामक जयप्रकाश नारायण थे। लेकिन कुर्सी मिलने के बाद नेताओं ने उनकी पूछ कम कर दी थी तब जनता ने अपने सच्चे हमदर्दो को, सच्चे सपूतों को, सच्चे सेवकों को सेवाभाव के लिए चुना या परंतु वे सेवा नहीं कर सके । अभागे पे बेचारे । कह सकता हूँ वैसे ही जैसे आप लोगों ने इस बार मुझे पुना है । पुनः जनता जनार्दन का अभिनंदन करता हूँ। मैं ईमानदारी से पूरे पांच वर्ष सेवा करूंगा । क्रांतियों के क्रम में समग्रक्रांति का मोहभंग होता है और इंदिरा जी की वापसी को भी मैं विश्व के इतिहास में एक अभिनव क्रांति मानता हूँ। इसी क्रांति का मैं भी एक सिपाही हूँ। कह सकता हूँ क्रांतियों तो आज भी ढेर सारी हो रही हैं पर हम देख नहीं पा रहे हैं । आवश्यकता है खुली आंखों की, खुले दिमाग की या यों कहें सम्पन्न दृष्टि का सानिध्य ही सर्पोररि है। आप देखिए धृतराष्ट्र की तरह और मैं वेदव्यास की दिव्य दृष्टि का प्रयोग करते हुए आपको दिखाता हूँ 'बीसवी सदी के भारत में क्रांतियों के बीच महा. भारत' । कमेन्ट्री साथ-साथ चलेगी। सबसे पहले हम देखें कि परिवार नियोजन पर करोड़ों रुपये व्यय करने के बाद भी बच्चे खटाखट पैदा हो रहे हैं । इसे जनसंख्या क्रांति कहेगे। उत्पादन के क्षेत्र में पुराने रिकार्ड तोड़कर 'उत्पादन क्रांति' के झंडे गाड़े जा रहे हैं। ओलम्पिक में आपने देखा कि थोड़ा-सा पिछड़ने के बाद भी पी०टी० उपा ने भारतीय महिला जगत के खेलकूद में क्रांति कर दी। महिलाएं सभी क्षेत्रों में क्रांति कर रही हैं । राकेश शर्मा ने भारत की ओर से पहली बार ऊंची उड़ान भरते हुए अंतरिक्ष यात्रा करके अंतरिक्ष में भी क्रांति कर दी। फिल्मी अभि- नेताओं ने नेता बनने की ठानी, चुनावी विगुल फूंका और क्रांति कर दी उन्होंने राजनीति में जलवा दिखा दिया। नये वर्ष की शुभकामनाओं के साथ आपको नया नारा देता हूँ। 'प्रत्येक क्षेत्र में क्रांति करना हमारा धर्म ही नही कर्तव्य है । और दूसरा धन्यवाद देने लगे नेता जी || ६६ नारा होगा । हम मरते दम तक उसके लिए संघर्ष करेंगे, मुझे विश्वास है इसी तरह मैं आपको भाषण रूपी गरमा-गरम चाय पिलाता रहूँगा और आप सब मुझे बारम्बार सेवा का अवसर देते रहेंगे 1 मुझे भाषण के साथ- साथ शेरो शायरी का भी फितूर है । कुछ-कुछ भूल गया हूँ। फिर प्रयास करता हूँ। हाँ तो लीजिए प्रस्तुत हैं दुष्यंत का एक तगड़ा शेर :- हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा, उद्देश्य नही मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिये 'चमचों' की आचार संहिता भारत बढ़िया-बढ़िया त्योहारों का देश है । मेला हमारी भारतीय संस्कृति का एक खास अंग है। मेले में ढेर सारी चीजें बिकती हैं। प्रश्न पह है कि आप क्या खरीदते हैं । वहां तो भाव-ताव तय होते हैं और मेल- जोल की लीलाएं घटती हैं । संबंधों का दायरा बढ़ता ही जाता है । मेले में सर्कस, हवाई झूला भी होता है । मिठाई, खिलौना और पाउडर, टिकली की दुकानें भी आती हैं। और तो और नाचने-गाने वाले भी आते हैं । जादूगर भी आते हैं। मेले के एक कोने में मजमा जमाए जादूगर कह रहा है । आइये-आइये पधारिये मेहरवान, कद्रमान । स्वागत है श्रीमान । याइये, पधारिये, मेहरवान कद्रदान....! आपको हाथों का कमाल और बातों की सफाई दिखाता हूँ। कोई अजूबा नहीं आपके ही बीच के एक आदमी के बारे में आपको बताता हूँ। बोल जमूरा कुछ तो बोल । चुप मयों है? जमूरा-क्या बोलू? जादूगर-आज हमारी पहली जरूरत क्या है ? जमूरा-हमारी पहली जरूरत माज 'चमचा' है। जादूगर-क्या कहा ? रोटी, कपड़ा, मकान के बदले पहली जरूरत चमचा। अमूरा-हाँ । क्योकि ढंग का चमचा मिल गया तो रोटी, कपड़ा, मकान के साथ-साथ नौकरी भी मिल जाती है और फिर छोकरी भी। षादूगर-अच्छा तो बता चमचे को पहचान क्या है ? जमुरा-चमचा दाण-साण में रूप बदलता है फिर भी उसकी पहचान बताता हूँ । पेहरे पर चाशनी और कमान की तरह जबर्दस्तो जुकाई गई कमर के चौसटे में जो पिट दिखता है वही धमधा है।

चमचों की आचार संहिता ॥ ७१ जादूगर-चमचा' कमर क्यों झुकाता है ? जमुरा--'हजुर' को सम्मानित करने के लिए वह कमर झुकाता है । जादूगर-हवर' किस बला को कहते हैं ? जमूरा-अरे सीधे बोल सोधे। नहीं तो अभी अन्दर हो जायगा। ज्यादा पागल मत बन । सुन । इतना भी नहीं जानता। जो अन्न- दाता होता है । जिसके चारों ओर भीड़ जय जयकार करती है । जो विशिष्ट मुद्राओं में बैठता है । जो विशिष्ट मुद्रामों में खड़ा होता है । और जो विशिष्ट मुद्राओं में बोलवा है। हर चीज उसकी नपी तुली होती है । हर कदम संतुलित होता है । काम छोटे-छोटे लेकिन बातें बड़ी-बड़ी करता है । विजय की मुस्कान जिसके चेहरे पर हरदम खेलती रहती है। जो इक्कीसवीं सदी में ले जाता है । चमनों के लिए वही 'हुजूर' होता है । जो छलांग लगाता है। एक साथ हाईजम्प और लोग जम्प दोनों में बाजी मारता है । वही मालिक वही अन्न- दाता होता है। जादूगर, अच्छा । तो इसे हुजूर कहते है । और तब चमचा क्या काम ." जमूरा-चमचे का इतिहास बतलाऊ क्या? जादूगर-अरे हो हो । पूरा इतिहास बता नहीं तो जादू देखने वालों को मजा कहां आयेगा। जमूरा-अठारहवी सदी में चमचा घर-घर में कढ़ाई में करछुल के रूप में सब्जी बनाने के काम आता था। भारत में जब अंग्रेज राज • करने लगे तो उन्नीसवी सदी मे इसने अपना विकास किया । टोस्ट पर मक्खन लगाकर अपना कर्तव्य पूरा करने मे भिड़ गया। आजादी के बाद बीसवी सदी में चमवे का प्रमोशन हो गया। इसने अपने दुर्लभ गुणो द्वारा 'भाट' की परम्परा को भी बहुत पीछे छोड़ दिया है । अव बो चमचे इक्कीसवी सदी में जाने की तैयारी कर रहे हैं वे अपने गणो को हिमालय की बुलन्दियों तक पहुँचाने की .

७२ ॥ लाल बत्ती जल रही है कोशिश में हैं । कहावत जो है न~'पीर बावर्ची भिश्ती घर/डूंद के लाओ....'इन विशिष्ट गुणों वाले चमचों को ही आजकल चांदी है । ये चमचे हैं भी अद्भुत । यातों ही बातों में आपको खटारा मोटर में बिठालकर क्षण दो क्षण में राकेट पर घुमाने का सुख प्रदान करने को कला में दक्ष हैं । आप भी खुश । ये भी खुश । क्योंकि ये चमचे बिना हाड़ की जीभ चलाने के भी माहिर हैं। जादूगर- तो फिर कोई चमचा दिखाओ जमूरे । जमूरा-चो देखो जा रहा है। जादूगर-चिल्लाता है । अरे भाई । जरा इधर माना । चमचा-अरे नाम लेकर क्यों नहीं पुकारता? जादूगर-मैं तुमको पहचानता नहीं भाई । इसलिए नाम नहीं मालूम । चमचा-क्या कहा ? तुम मुझको नहीं पहचानते । मेरा नाम चमचा है जनाब । तुमसे अच्छा तो तुम्हारा जमूरा है वह मुझे पहचानता है । चमचा-(भीड़ की ओर मुखातिब होकर) अरे नही पहचाना भाइयों, माताओं, बहनों ! नही पहचानोगे तो गये काम से । आज का युग चमचों का है। मेरी विशेषताओं को जानों और मुझे पहचानो। नही तो गये काम से । सच कहूँ। मूर्ख से मूर्ख आदमी भी मुझसे सरोकार रखता है। जादूगर-ये सरोकार क्या होता है चमचे जी महराज । चमचा-अरे बुद्ध जादूगर । इतना भी नही जानते घले हो जादू दिखाने अरे सरोकार के कई अर्थ होते हैं । बैटवा । सुनो। जरूरत, मतलब, आवश्यकता। कभी-कमी सरोकार का अर्थ सेवा भी होता है जादूगर । समझे कि नाही। चमचा--(भीड़ की मोर मुखातिब होकर) आप लोगों को षव भी कोई जरूरत हो, कोई काम हो, मतलब हो, बड़े आफिस में, छोटे बाबू के पास-मंत्री की सिफारिश या इक्कीसवी सदी में जाने की इच्छा हो और मेरी आवश्यक्ता समझें। या कभी आपको गाड़ी विना 'चमची' को आचार संहिता ७३ : दलदल में फंस जावे तो मुझको याद कर लेना। मैं सब चुटकी बनाते ही सब मामला हल करवा देता हूँ। बहुत ऊंची पहुंच है हमारी । हम चीज भी ऊंची हैं। ऊंची चीज का नाम याद रखना । भूलना नही । नाम है हमारा चमना । आम आदमी -~-अच्छा काम करते हो भैय्या। सबकी सेवा करते हो। हमारे दू तीन काम अटके हैं कचहरी में जरा करा देऊ । भगवान तुम्हारा भला करे। चमचा-काम तो तुम्हारा तुरन्त हो जायगा भइया । कुछ खुरचन पानी रखे हो ?....क्या कहा ? नहीं रखे। तो भाग यहां से बड़ा आया भगवान भला करे कहने वाला । मरे पगले भगवान दुनिया में हो तो भला करे ना । भला तो करते हैं नगद नारायण । केवल नारायण को अब कुछ नही चलतो इस जमाने में हमारा समय मत खराब करो। हमारा नाम चमचा है चमचा । पहले चम्मच मे धी- शक्कर भरी । मुंह मीठा कराओं । फिर करेंगे आपका संकट मोचन । जादूगर-- र--समझ गये न जमूरा दद्दा । चमचे कैसे होते हैं ? जमूरा-अभी तुम का समझे हो जादूगर चचा। कुछ नांही समझे । अब मैं तुमको बताता हूँ चमचा क्या होता है ? बादूगर अच्छा बताओ भला। जमूरा-चमचों ने अपनी पहचान और जानकारी के लिए आचार संहिता बनाई है जो निम्न प्रकार है। (अप्रकाशित) किन्तु पूरी की पूरी सच्ची है- आचार संहिता के अनुसार चमचे के तीन गुण होते है। पहला गुण यह कि वह हरदम परछाई की तरह 'हुजूर' के साथ रहता है । जिस तरह परछाई अंधेरे में साथ छोड़ देती है उसी तरह चमचा दुदिनों में हुजूर का साथ छोड़ देता है। चमचे का दूसरा युग यह माना जाता है कि चमचा जाति, धर्म, भाषा, देश, शहर और सम्प्रदाय की भावना से पर उठा होता है। सारी सीमाओं को तोड़कर वह अपने हुजूर से प्रेम करता है । और निष्ठापूर्वक प्रेम करता है, उसके अन्त तक प्रेम करता है। + - ५ ७२ । लाल बत्ती जल रही है कोशिश में है । कहावत जो है न-पोर बावर्ची भिती घर/ढूंढ़ के लाओ....'इन विशिष्ट गुणों वाले चमषों को ही 'आजकल चाँदी है। ये चमचे हैं भी अद्भुत । बातों ही बातों में नापको खटारा मोटर में बिठालकर क्षण दो क्षण में राकेट पर घुमाने का सुख प्रदान करने की कला में दक्ष हैं । आप भी खुश । ये भी खुश । क्योंकि ये चमचे बिना हाड़ की जीभ चलाने के भी माहिर हैं। जादूगर-तो फिर कोई चमचा दिखाओ जमरे । जमूरा-वो देखो जा रहा है । जादूगर-चिल्लाता है । अरे भाई । जरा इधर आना । चमचा-अरे नाम लेकर क्यों नहीं पुकारता? जादूगर-मैं तुमको पहचानता नहीं भाई । इसलिए नाम नहीं मालूम । धमचा-क्या कहा ? तुम मुझको नहीं पहचानते । मेरा नाम चमचा है जनाव । तुमसे अच्छा तो तुम्हारा जमूरा है वह मुझे पहचानता है । चमचा-(भीड़ की ओर मुखातिब होकर) अरे नहीं पहचाना भाइयो, माताओं, बहनों! नही पहचानोगे तो गये काम से । आज का युग चमचों का है। मेरी विशेषताओ को जानों और मुझे पहचानों। नहो तो गये काम से । सच कहूँ। मूर्ख से मूर्ख आदमी भी मुझसे सरोकार रखता है। जादूगर-ये सरोकार क्या होता है चमचे जी महराज । चमचा-अरे बुद्ध जादूगर । इतना भी नहीं जानते चले हो जादू दिखाने अरे सरोकार के कई अर्थ होते हैं बेटवा । सुनो । जरूरत, मतलब, आवश्यकता। कभी-कमी सरोकार का अर्थ सेवा भी होता है जादूगर । समझे कि नाही। • चमचा-(भीड़ की ओर मुखातिब होकर) आप लोगों को अब भी कोई जरूरत हो, कोई काम हो, मतलब हो, बड़े आफिस में, छोटे बाबू के पास- मंत्री की सिफारिश या इक्कीसवी सदी में जाने की इच्छा हो और मेरी आवश्यकता समझे। या कभी आपकी गाड़ी विना . . ।

चिमचों की आचार संहिता ॥ ७३ । दलदल में फंस जावे तो मुझको याद कर लेना। मैं सब चुटकी बजाते ही सब मामला हल करवा देता हूँ। बहुत ऊंची पहुंच है हमारी। हम चीज भी ऊंची हैं। ऊंची चीज का नाम याद रखना। भूलना नहीं । नाम है हमारा चमचा । आम मादमी-अच्छा काम करते हो भग्या। सबकी सेवा करते हो। हमारे दू तीन काम भटके हैं कचहरी में जरा करा देऊ । भगवान तुम्हारा भला करे। घमचा-काम तो तुम्हारा तुरन्त हो जायगा मइया । कुछ खुरचन पानी रखे हो ?....क्या कहा ? नही रखे। वो भाग यहाँ से बड़ा आया भगवान भला करे कहने वाला। अरे पगले भगवान दुनिया में हो तो भला करे ना । भला तो करते हैं नगद नारायण । केवल नारायण को अब कुछ नहीं चलती इस जमाने में । हमारा समय मत खराव करो। हमारा नाम चमचा है घमचा । पहले चम्मच मे घी. शक्कर भरो । मुंह मीठा कराओ। फिर करेंगे आपका संकट मोचन । जादूगर-स 1-समझ गये न जमूरा दहा । चमचे कैसे होते हैं ? जमूरा--अभी तुम का समझे हो जादूगर चचा। कुछ नांही समझे । अब मैं तुमको बताता हूँ चमचा क्या होता है ? जादूगर--अच्छा बताओ भला । जमुरा-चमचों ने अपनी पहचान और जानकारी के लिए आचार संहिता बनाई है जो निम्न प्रकार है। (अप्रकाशित) किन्तु पूरी की पूरी सच्ची है- आचार संहिता के अनुसार चमचे के तीन गुण होते है । पहला गुण यह कि वह हरदम परछाई की तरह 'इजूर' के साथ रहता है । जिस तरह परछाई अंधेरे में साय छोड़ देती है उसी तरह चमचा दुदिनों में हुजूर का साथ छोड़ देता है। चमचे का दूसरा युग यह माना जाता है कि चमचा जाति, धर्म, भाषा, देश, शहर और सम्प्रदाय की भावना से ऊपर उठा होता है । सारी सीमाओं को तोड़कर वह अपने हुजूर से प्रेम करता है । और निष्ठापूर्वक प्रेम करता है, उसके अन्त तक प्रेम करता है। ५ ७४ । लाल बत्ती जल रही है उसका प्रेम पत्नी के प्रेम से भी आठ डिग्री ऊपर और अधिक विश्वसनीय माना जाता है । चमचे का तीसरा गुण भाषण पिलाने की कला में निष्णात होता है । इसी कला के कारण आज-कल छुटभैय्ये नेताओं को भी ऊंचे ग्रेट का चमचा माना जाने लगा है। वे भापण अच्छा देते हैं । घूम-घूम कर प्रचार करते हैं और अच्छा समां बांधते हैं। बहते पानी की तरह उनका जीवन होता है। एक बगल में बिस्तर रखते हैं और दूसरी बगल में प्रचारिका । जो प्रचार के समय प्रचार करती है । सेवा के समय सेवा । ये सब कहते हैं-'सदा सत्य बोलो' का नारा अब भाउट आफ डेट हो गया । उसके स्थान पर सब के सब धर्मराज युधिष्ठिर की तरह 'अश्वस्थामा हतो नरों व कुंजरो' के अनुरूप सत्य बोलते हैं । कभी-कभी इस प्रकार भी सत्य बोलते हैं। क्या करूं भाई। दूसरो की सेवा के लिए मुझे कड़ी मेहनत करनी पड़ती है । दिन-रात दौडना पड़ता है। ऐसी स्थिति में स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से ठर्रा की जगह रम पीना और पानी के बदले बीयर पीना ही मुझे रास आता है। मूमफल्ली की जगह बादाम और चना मुर्रा के बदले काजू-किसमिस का भोग लगाना मेरा अधिकार हो जाता है। यह सब उपलब्ध कराना आपका कर्तव्य भी होता है। ऋषियों ने भी कहा है, 'भूखे भजन न होय गोपाला, ले तो अपनी कंठी माला' जव संतों और तपस्वियों के लिए पेटपूजा जरूरी है तो फिर मैं बीसवी सदी का एक छोटा चमचा हूँ। इसकीसदी सदी में राने की चाहत लिए अन्त में मैं घमचा समुदाय की ओर से यही निवेदन रना चाहता हूँ नम्रतापूर्वक । आप सबके लिये मेरे हृदय में वैसी ही क्ति है जैसी राम के प्रति हनुमान के मन में थी। जैसे पत्नीवता होती बैसी ही हम हरखता है। लेकिन उसी समय तक जब तक आप जे चमचागिरी के लिये भरपूर पारिश्रमिक देते रहेगे । मंथरा की बात हराना चाहता हूँ जो एकदम सच्ची है- कोई नृप होम हमे का हानी। घेरि छोहि के होवे रानी ॥ 00 फुटपाथ के कुत्त पशु-पक्षी से प्रेम करना हमारी सांस्कृतिक विशेषता है। वजनदार बात यह है कि भारतीय संस्कृति में प्रेम की महत्ता सर्वोपरि है। प्रेम करने के साथ-साथ उस सद्गुणों को आत्मसात कर हम अपना विकास करने के आदी हैं। गाय, बकरी, सूअर, बैल, कोयल, चीता, हिरण, बिल्ली, गोवा, मैना और हाथो के साथ-साथ घोड़े में से कुछ को हमने पालतू बना लिया है। उनमें ही एक प्राणी होता है-"कुत्ता"। कुत्ते हर गली में, हर मोहल्ले में, हर गांव में, हर शहर में दिखलाई पड़ते हैं। "कुत्ता" अपने ढेर सारे सद्गुणों के कारण बहुत लोकप्रिय है--मारतोय जनमानस में। जब किसो कुत्ते का कर्म रूपो पेड़ फल देने लगता है तो अट्टालिकाओं के पावानुकूलित शयनकक्ष में अप्सराएं उन्हे आदर और सम्मान के साप बाआमंत्रित करती है । दोनों एक दूसरे के पूरक बनते हैं । एक वर्गीय समाज को संरचना होती है। दोनों एक दूसरे को पाकर गौरवान्वित होते है। हिंदी साहित्य में स्वामिभक्ति का प्रतीक के कुत्ता । कुता उर्दू की वफादारी को भी साकार करता है। पूंछ हिलाना उसका स्वभाव है। पूंछ टेढ़ी रखना उसको मजबूरो है। फिर भी अपनी टेढ़ी पूंछ हिलाकर यह अपनी उपस्थिति, औकात थोर विश्वसनीयता की जानकारी बराबर देता है। दुत्कारे जाने पर भी कू करते हुए मालिक के पैरों में लेदना उसको पादत है । हे बौर गालियां खाकर गांधीवादी असहयोग की मावता उसमें घर पर चुकी है । हिंसा उसका सबसे बड़ा अस्त्र भी है और शस्त्र भी। इसे वह शास्त्रसम्म मानता है। परंतु अकेले में मौका पाते ही चोरी- वोरो दिल्ली के चोपड़े-चोपड़े कर डालता है । मुंह में सगा खून पोचकर फिर से शाकाहारी बीवन को अनिवार्यता पर बल देता है । कुत्ते का यह बद्भुत परिम ही उसको सफलता का राज बन जाता है । वैसे भी साहित्य ७६ || लाल बत्ती जल रही है में "मुंह में राम बगल में छुरो" जैसे मुहावरे ऐसे कुत्तों के चरित्र को स्पष्ट करने के लिये ही गढ़े गये हैं । कुत्ते के रंग उसके रूम और नस्ल के ढेर सारे हैं । देशी कुत्ता और विदेशी कुतिया की जोड़ी चर्चित होती है फिल्मी जोड़ी की तरह । खास विदेशी कुत्ते पालना भी कुछ की आदत होती है । कोई झवरेला कुत्ता पसद करता है, किसी को काले कुत्ते की खोज रहती है तो कोई दूध की तरह भकाझक सफेद कुत्ते पर ही मेहरबान होते है । वुलडाग बहुत कम लोग पालते हैं षयोकि बुलडाग को बावश्यकताओं को मेनटेन करना और उस पर फन्ट्रोल रखना दोनों खतरनाक होता है फिर भी जिनमें सामर्थ होती है वे पालते हैं बुलडाग। किसी भी जाति का हो कुत्ता-कुत्ता ही होता है । कुत्तों को भी अपनी- अपनी जाति के अनुसार पहचान होती है। सबको अलग-अलग आचार संहिताएं होती हैं । वे भी समय देखकर बात करते हैं । आदमी पहचानते हैं । प्राणशक्ति तेज होती है, इसलिए हवा के रुख और उसमें घुलो बाख्दी गंध या रजनीगंधा संपकर ही कदम बढ़ाते हैं आगे । कुत्ता इतना चतुर रहता है कि यह भूत का विश्लेपण करता है। वर्तमान की लगाम खीचकर रखता है और भविष्य पर भी न भूकने वाली पैनी नजर रखता है। साभ-हानि के मौखिक गणित में कम्प्यूटर को भी पीछे छोड़ देते हैं- कुत्ते । स्थितियों पर इनकी चौकसी सौतन को चौखट को भी मात्र कर देती है। अषसर के अनुरूप समझदारी दिखाने का षवर्दस्त गुण हो इनकी सफलता का राज होता है । इसलिये अवसर देखकर कुछ कुते मौकते हैं। पुष मौन साप लेते हैं। संकट के समय मौन साधना सेतों का काम होता है। इस मूत्र में उनका पित्वास है। समय बोर माग्य बड़ा वलयान होता है। समय-समय को यात रहती है । तलवे चाटने पाले कुत्ते भी गुरनि सगते हैं। कुछ कुठे भोंक कर अपने पापको शेर याना पाहते हैं । पर पर थे देते हैं उनका भोपना "गणित के सवात में हासित वाया शून्य" फुटपाथ के कुत्ते ॥ ७७ की तरह हो गया है, तो वे भौंकना छोड़कर फिर से तलवे चाटने लगते हैं । कुत्ते पूरे जीवन को पृष्ठभूमि में दुहाई देते हैं। कुत्ता उवाच : मालिक मेरे आका । मेरा विश्वास कोजिये मैं स्वामि- भक्त हूँ। मालिक : (चेहरे पर तनिक मुस्कान को रेखा के साथ)-हूँ। कुता : मैंने पूरी जिन्दगी आपके खानदान को सेवा की है। मैं आपका सच्चा और वफादार सिपाही हूँ। मैं आपको गोद में खिलाया है। अंगुली पकड़कर चलना सिखाया है। मालिक : (हंसते हुए) ठीक है । ठीक है। कुत्ता : आप सर्वशक्तिमान हैं । आप गाड फादर है । दूसरे कुत्तों ने आपके कान भर दिये हैं। मैं.... मालिक : नो । नो, नो, नो। कुत्ता ; मैं सच कहता हूँ। मैंने नमक खाया है आपका । मैं अपनी अन्तिम सास और खून की आखिरी बूंद तक मैं आपको चौखट पर माथा टेकता रहूंगा। ऐसे डायलॉग बोलने में अधिकांश फुत्त दक्ष होते हैं । इतनी चिरौरी फरने के बाद भी यदि मालिक दुत्कार देता है, तो कुत्ते का स्वर बदल जाता है। यह बदलती हुई युगीन चेतना के स्वर में स्वर मिलाकर भोंकने लगता है। बलवे चाटना छोड़कर सीधे काटने के प्रयास में जुट जाता है। कहता है-मालिक-नौकर का युग बीत गया। सब बरावर है। यह निरंकुशता और तानाशाही नही चलेगी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर यह बाधात आखिर कब तक? मनमानी नहीं होने देंगे। दूसरी तरफ कुछ कुत्ते जानते हैं उनके दांत तोड़े जा चुके हैं । सपेरे को चालकी ने उसे विषहीन कर दिया है । अब वे भीतर से खोखले हो सुके है। अतः वे बेचारे धूम-घूमकर मौकते हैं। भौंक-भौंक कर ही आत्मतुष्टि पाते हैं ताकि सब समझे भौंक रहा है तो कमी काट भो देगा। लेकिन चतुर पन सममते हैं ये गरजने वाले बादल हैं, बरस नहीं सकते।

७८ ॥ लाल बत्ती जल रही है वे कुत्ते के भौंकने को मुस्कुराते हुए स्वीकार कर लेते हैं। वे जानते हैं कुत्ते का स्वभाव हो ऐसा जो रोटी के टुकड़े डालता है वे उसके आगे हो दुम हिलाते हैं। इसी प्रकार कुछ कुत्ते वापरम फुहारे के नीचे "हम तुम कमरे में बंद हो धौर चावी को भाय" गुनगुनाते हैं । कभी अबूझमाड़ को कमी झाबुआ वो कमी बस्तर के "पोटुल" देखने में ही अपनी शान समझते हैं। ये लोक मला, लोक संस्कृति और उन्मुक्त लोक ओवन को नजदीक से देखते हैं। पंजाब समस्या पर ये नहीं सोचते और न ही उस ओर मुंह करके बात करते है । इनका यादर्श को बस यही "हम तुम कमरे में...." इन कुत्तो से भादमी ने बहुत कुछ सीखा है। ऐसे कुत्तों के बारे में बाम यादमी अपने विचार इस प्रकार प्रगट करता है: बैठे हुए हैं तस्त पर फुटपाय के कुत्ते, बस मौकना हो जानते फुटपाप के कुत्ते । फल तक न यो नसीब किराये की गाडियो, अव दोखते हैं प्लेन में फुटपाप के कुते ।।

अभिनन्दन की चाह बड़े ही उमंग, उत्साह और धूमधाम से शोभायात्रा निकाली जा रही है। प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी गणपति वदन और अभिनंदन का मौसम आ गया है। प्रचार-प्रसार जोर-शोर से हो रहा है। चूहे पर सवारी गांठती गणेश को आकृतियों घर-घर पूजी जा रही हैं । कलाकारों ने अब गणेश को हेलीकाप्टर और इम्पाला पर भी सजाया है। दूसरी ओर मंच पर नेताओं और साहित्यकारों के अभिनंदन समारोह मे तेजी से वृद्धि हुई है। चमकते उत्तरीय और शानदार दुशालों के बीच सकुचाते और लजाते चेहरे की बानगी देखते बनती है। समारोहों में मुख्य आकर्षण का केन्द्र है सुनहरे झेम में सजे प्रशस्ति-पत्र । प्रसिद्धि ज्ञानमय न होकर प्रसिद्धिमय हो गई है । छत्तीसगढ़ में "पोला" त्योहार के अवसर पर बैलों को सजाया-संवारा जाता है । उस दिन उसकी "पूजा की जाती है। अनेक आयोजनों में उनकी महत्ता का बखान होता है । उसी तरह शिक्षक दिवस के दिन शिक्षकों की महत्ता वखानी जाती है। राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री के संदेश पढ़े जाते हैं । शिक्षकों का एक दिवसीय सम्मान किया जाता है। भूतपूर्व शिक्षकों की पूछ होतो है। निवृतमान शिक्षकों को खोज-खोजकर समारोह की अध्यक्षता हेतु बुलाया जाता है। गुरुग्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु महेश्वर कहकर उन्हें चने के झाड़ पर चढ़ाया जाता है। सस्वर सुरोले कठो से स्वागत होता है एक दिन फिर यही ढाक के तीन पात । परन्तु वर्ष में एक बार उनके अभिनंदन के लिए सूची बनाई जाती है । अभिनंदन करवा सकने की योग्यता सिद्ध करवाने के लिए आवेदन पत्र भरवाए जाते हैं। उनमें से चुन-सुनकर अभिनंदन किया जाता है । "राष्ट्र-निर्माता" को उपाधि से विभूषित किया जाता है।

८० || लाल बत्ती जल रही है परिवार मे मी अभिनंदन के इस एक दिवसीय ज्वर ने अपना प्रभाव दिखलाया है। घर में अक्सर दुत्कारे जाने वाले बच्चे के बर्थ डे के अवसर पर उसका अभिनंदन किया जाता है। उसे नये कपड़े पहनाए जाते है। मिठाई खिलाई जाती है। इसी क्रम में परिवार की महत्वपूर्ण इकाई पत्नी भी लाभान्वित होती है । हमेशा पति की प्रताड़ना सहने को मजबुर पत्नी "मैरिज डे" की प्रतीक्षा करती है। इस दिन व्यस्त पति भी पत्नी को पिकनिक पर ले जाता है । इच्छानुसार मार्केटिंग में सहयोग देता है। पत्नी अपने पाप को नई नवेली दुल्हन की तरह समझने लगती है । कभी शर्माती है, कभी रिझाती है । सब कुछ जानती है, समझती है फिर भी अपने एक दिवसीय अभिनंदन पर बहुत खुश होती है । परिवार में अधि- कवर उपेक्षा झेलने वाले बुजुर्गों का अभिनंदन मरणोपरान्त किया जाता है । प्यार के दो बोल के लिए तरसते दुनिया छोड़ देते हैं, तब तेरहवी के दिन ब्राह्मण मोज और दुनियादारी में उनके अभिनन्दन को झलक मिलती है। जीते जी जब उनको अभिनन्दन की पाह पूर्ण नहीं होती, वो बाद में इन माध्यमों से मृतात्मा को शांति पहुंचाने का प्रयास किया जाता है। अमिनन्दन करवाने की अनेक रीतियां हैं । आप कितनै चाकपटु-व्याव- हारिक और दिलेर हैं ? यह सोचना-समझना आपका काम है । कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं, जो कवि सम्मेलनों का टेका लेते हैं। उसी प्रकार कुछ संस्थाएं ऐसी होती हैं जो अभिनन्दन का ठेका लेती हैं। बिल्कुल उसी तरह जैसे मंदिर में मापके चढ़ाने और थापकी भेंट-पूजा के मापदण्ड के अनुसार, यापको प्रसाद मिलता है। आप जितनी बड़ी कम्पनी को ठेका देंगे, बापका अभिनन्दन उतना हो गरिमामय होगा। अभिनन्दन के पूर्व आप यह भी देखिए कि आपका संबंध किन-किन संस्थाओं से है ? यदि बाप उदरता- पूर्वक अपनी अंटी ढीली कर सकते हैं तो अनेक संस्थाएं सम्मिलित रूप से आपका बभिनन्दन समारोह आयोजित करने में सक्रिय नबर बायेंगी। सफल अभिनन्दन समारोह अब आयोजित किया पाता है, तो सबसे रहले हजारों को संस्था में श्रोता एकत्रित किए जाते हैं। फिर यपनी वाणी अभिनन्दन की चाह || ८१ द्वारा आपकी महत्ता प्रतिपादित करने वाले वक्ता आमंत्रित किये जाते हैं। परन्तु वक्ता के संबंध में भी आप जितना गुड़ डालेंगे, उतना ही मोठा होगा शबंत-कहावत सही सिद्ध होती है । यदि आप प्रथम श्रेणी में आने- जाने वाले वक्ता को ससम्मान बुलवाते हैं वो यापकी लक्ष्मी की कृपा से सरस्वती ववता की जिह्वा पर नर्तकी की लुभावनी मुद्रा में थिरकती है और चवता अपने मुखारबिंद से गुणगान करता हुवा रस वर्षा करता है । बुलाए गये श्रोता यह भी जानते हैं कि कब और कहाँ तालियों की गड़गड़ाहट से सभाभवन गूंजना चाहिए । ववता और श्रोता दोनों मिलकर मापके अभि- नन्दन समारोह में चार चांद लगा देते हैं । अभिनन्दन समारोह में यदि विशिष्ट विभूतियां हों, ठेका भी बड़ा हो तो न्यूजपेपर और महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में तो आप फ्लेश होंगे ही। दूरदर्शन पर भी आँखों देखा हाल आप देख सकते हैं। अभिनन्दन का संस्मरण से, चोली दामन का संबंध है । जितने उच्च- स्तरीय लोग आपके संबंध में अपने संस्मरण सुनाते है, समारोह उतना ही अधिक सफल होता है । प्रश्न इस बात का है कि आपके बालसखा, आपको छवि कितनी निखारते हैं। यदि कोई महत्वपूर्ण नेता या साहित्यकार यह कहता है कि आज हमारे मित्र का अभिनन्दन हम करा रहे है, इन्हें आप लोगों ने बहुत देर से पहचाना । बचपन में ही कविता लिखकर इन्होंने अपनी योग्यता बहुत पहले सिद्ध कर दी यो । हीरे के ऊपर जमी धूल को आपने पोंछकर आज उसे पहचाना है । यह दिन दूर नहीं जब ये नगर के साथ-साथ हमारे देश का भी नाम रोशन करेंगे। इनको प्रतिमा और चितन को समर्पितइन दो पंक्तियो के साथ अपनी वाणी को विरामः देता हूँ: . चितन हमारा विष में इतना, सन चुका है दोस्तों। एक चाकू की तरह थी, उन चुका है दोस्तों।

जलवे विधायक सीट के क्या पता? किस्मत का बल्ब कव जल उठे? कोशिश तो करके देखो। "चढ़ जा बेटा सूली पर-मला करेंगे राम" को दर्शनीय मुद्रा में देक्सी स्टैंड का स्पेशल हॉकर, टैक्सी में ढूंस-ठूसकर सवारी वैसे ही भरता है, जैसे बोरों में दवा-दवाकर इमलो या अन्य कोई वस्तु भरी जाती है । एक टोपीधारी नेतानुमा आदमी से देवसो के उस स्पेशल हॉकर ने कहा-- डायरेक्ट भोपाल चाहिए, विधायक सीट खाली है। केवल एक सीट । आइए टेवसी की वाल्कनी मे बैठने का मजा लीजिये । विधायक सीट खाली है, घेवल एक सीट। नेवानुमा आदमी ने गुस्से से हॉकर को कहा-क्यों वे ? मजाक करता है । कल का छोकरा बड़ी-बड़ी बातें करता है। टैक्सी धमतरी जा रही है या भोपाल? हाकर : साहव नाराज क्यों होते हैं ? देख नहीं रहे-याजकल छोकरों का ही जमाना है । हममें से हो धड़ाधड़ मुख्यमंत्री बन रहे हैं । यह सब अन्तराष्ट्रीय युवा वर्ष की देन है । असम का जलवा देखा। नेवानुमा आदमी : ठीक है । बकबक मत कर । सीधे से पता टैक्सी 'कहां जा रही है। हाकर-साहब ! टपसी धमतरी जा रही है। परंतु इसमें केवल एक विशेप सीट । जो देखिए सामने सवारियों के बीचोंबीच दूज के चंदा सी दिखलाई पड़ रही है। उसे हो हम विधायक सोट कहते हैं । नेवानुमा आदमी : तो फिर भोपाल चलो डायरेक्ट । क्यों चिन्लाना है? हाकर : ऐसा है मालिक । हमारा भी पेट है योर यह टैक्सी स्टेंड का मुहावरा हो गया है । जैसे ही हम चिल्लाते हैं-विधायक सीट खाली है।

जलवे विधायक सीट के ॥ ८३ : डायरेक्ट भोपाल चलो। तो आसपास धूमती सवारियां समझ जाती हैं कि अब टैक्सी घटने वाली है। नेतानुमा आदमी : परंतु अब भविष्य में डायरेक्ट महासमुंद और डायरेक्ट दुर्ग कहा करो। हाकर : ठीक है साहब । भाप वैठिए तो। आप जैसा कहते हैं वैसा हो करूंगा। स्पेशल हाकर फिर चिल्लाने लगा। केवल एक सीट । विधायक सीट खाली है । डायरेक्ट भोपाल ! बरे नही । गलती हो गई। डायरेक्ट दुर्ग चलिए। नेतानुमा बादमी : शाबास ! बहुत अच्छे। चल जल्दी स्टार्ट करवा दे। हाकर : आप जहां कहेगे, चलेंगे साहब । गाड़ी आपकी है। परन्तु मह जो विधायक सीट है ना। जोवन में अनेक 'सधों से मिलती है। आप बैठकर देख लीजिए । एम० एम० ए० बनने के लिये कितनी कोशिश करनी 'पड़ती है। उससे भी अधिक संपर्प टैक्सी को इस विधायक सीट पर बैठने पर करना पड़ता है। इस विधायक सीट के गृण अद्भुत हैं। इस सोट पर बैठते ही आंधे मुंदने लगती है और यात्री टैक्सी में बैठे-बैठे। थोड़ा जागते, थोड़ा सोते सुनहरे स्वाब देखने लगता है। कहते है, संगत का असर होता है । जरूर ! हाकर से बारबार यह सुन-सुनकर कि विधायक सीट खाली है । उस विधायक सीट पर बैठते हो चारा यात्री, विधायक की महत्ता के बारे में सोचने के लिये बाध्य हो जाता है। मन ही मन विधायक बनने का सपना सजाने, संवारने लगता है । वानंद मगन हो जाता है याप ही बाप । "मूत न कपास जुलाहे में लछम सहा" पाली कहावत चरितार्थ हो जाती है । सपने में मह सोषवा है: प्रजावत्र मे विधायक होना गौरव की बात है । सत्यनारायण को कपा में -जिस तरह सौलावतो पबित होती है, उसी तरह प्रजातंत्र म विधापक पवित्र होका परिवार में किमो Pam ४॥ लाल बत्ती जस रही है परिवार के लिये सुख, शांति और समृद्धि के साप-साथ सौभाग्य की बात मानी जाती है। भीड़ तंत्र में विधायक पद पाने वाला यदि चतुर और दुष्टि सम्पन्न होता है तो वह जनता जर्नादन का भला तो करता हो है। इष्ट मित्रों और सगे सम्बन्धियों के दुदिनों को भी बदलता जाता है सुख भरे दिन में। कभी-कमी भोड़ तंत्र में विधायक ऐसे लोग भी बन जाते हैं जो विधान सभा और विधायक का अर्थ नही जानते । फिर भी धीरे- धोरे जागृति फैल रही है । मूर्खानंद से लेकर चतुरानंद तक सभी यह दो कह ही लेते हैं : में जनता की सेवा करूंगा। इस क्षेत्र की समस्याओं को जड़ से उखाड़ फेंकूँगा। चाहे जो हो, बावन पत्ते के खेल में जोकर का जो महत्व होता है उससे अधिक महत्व आज की राजनीति में विधायक का है। महत्वपूर्ण राजनीतिज्ञों की संचित पूंजी उनके विश्वासपात्र विधायकी को संख्या मानी पाती है। विधायक सीट पर बैठा यात्री विधायक बनते हो मुख्यमंत्री का बायां हाय बनने की सोच में डूबा रहता है। अचानक ही सड़क पर गति अवरोध सामने आ पाता है। तेज गति से दौड़ती हुई जोप उछलती है और विधायक सीट पर बैठे विधायक बनने का सपना देखने वाले का सर लोहे की राड से टकरा जाता है । सपना भंग हो पाता है । सर पर गूमड़ उभर आता है। अब सहलाते रहिए । जब सर्पा- कार मोड़ आते हैं और स्टेरिंग तेषी से घूमती है, तो मावी विधायक आजू- बाजू बैठी सवारियों को बोर लुढ़क जाता है। सवारियां देती हैं धक्का। यह मन मसोसकर रह जाता है। इसी प्रकार जब देश में खिचड़ी सरकार को स्थापना हुई थी, साल बसों मे लिखा होता था-"विधायक सीट" भीतर प्रारम्म को कुछ सीटों पर । सम्माननीय विधायक महोदय के बाने पर, सीट खाली करें। यह मोट उनके लिये सुरक्षित है। हो भाई बारक्षण का जमाना है। चाहे रेस में यात्रा करना हो या वक्ष में । पहले बारक्षण कराइए । ठीक उसी प्रकार कम योग्यता के आधार पर कैची नौकरी पाना हो तो वारक्षित जाति में जन्म

जलवे विधायक सीट के || ८५
सीजिए और आरक्षित कोटे से पद पाइए। अगर अब भी आप नही समझे
स्रो किसी की गोद में बैठ जाइए तथा उनका दत्तक पुत्र होने का गौरव
प्राप्त कीजिए । कुछ "विधायक सोद" भी आरक्षित है । चाहे तो उसमें ही
अपने आपको आजमाइए । हमारा वो इतना ही कहना है:
ठोकरें खा के न संभले तो मुसाफिर का नसीब ।
राह में फर्ज अदा करता है पत्पर अपना ।।

रेल चली मई रेल "आपनी यात्रा मंगलमय हो" सुरीली आवाज कानों से टकराती है और यात्रा का प्रारंभ होता है ।। बनेकों बार गर्मी के दिनों में भीड़ अधिक होने पर आर रेस की छतों पर बैठकर भी यात्रा करते हैं। पायदान पर खड़े होकर यात्रा करते हैं, क्योंकि भीतर ठसाठस सवारियां भरी होती हैं। इन सबके बावजूद आपको यात्रा मंगलमय होती है-यह आपके लिये प्रसन्नता को बात है। "यापकी यात्रा मंगलमय हो।" इस कामना के साथ आपको शुम यात्रा का प्रारम्भ रेसवे स्टेशन अपनी उद्घोपणा में कमी-कमी करता है । इसके मूल कारण पर कभी आपने गौर किया। जब यातायात के साधनों का विकास पूरी तरह नहीं हुआ था, तब परिवार एवं गांव के लोग तीर्थयात्रा पर जाया करते थे तब वे गांव में समी से मिलते थे, भेंट फरते थे क्योकि तीर्थयात्रा से पापस माना हो या न हो। जबसे यातायात के क्षेत्र में प्रगति हुई है-तीर्थयात्रा से जीवित लौटने का प्रतिशत बढ़ा है। यदि दुर्घटना नहीं हुई तो । "यापको यात्रा मंगलमय हो" "७२ यात्रियों के बैठने के लिये" यक्ति रेल डिब्बे में २०० से अधिक यात्री सुविधापूर्वक बैठ जाते हैं। मौज में यात्रा करते हैं। उनकी यादत जो पढ़ गई है। रेल विमाग सब कुछ जानता है, समझता है। इसीलिये प्रत्येक रेलवे स्टेशन पर चमचमाता हुआ बोर्ड नजर बाता है । "में बाई हेल्प यू।" रेल विभाग अपने रेल कंडक्टर और टी० टी० माई के रूखे व्यवहार, यात्रियों के प्रति उपेक्षित दृष्टि के बारे में भी जानता है । इसलिये गंदे डिब्बों में मजबूरी में बैठे और चढ़ते-उतरते समय धक्का खाते यात्रियों को वह बड़े ही प्रेम से पूछता है ? "मैं आपको क्या सहायता कर सकता रेल चली भई रेल || ८७- हूँ" ऐसे चमचमाते हुए बोर्ड प्रत्येक रेलवे स्टेशन की व्यवस्था को गौरवा- वित करते हैं क्योंकि अधिकांश समय वहां मक्खियां भिनभिनाती हैं । जब ट्रेन छूटने को होती है तब काले कोट घाले वहां आते हैं और यात्रियों की सहायता कमी गुर्राते हुए तो कभी भुनभुनाते हुए करते हैं । हां, कभी-कभी जव विशिष्ट अधिकारी या मंत्री महोदय ट्रेन से यात्रा करते हैं तो ये भौंकना भूलकर उनके आस-पास डिब्बे को व्यवस्था देखते हुए दुम हिलाते हैं । रेल की प्रगति और उसके द्वारा प्रदत्त सुविधाओं के बखान में जुट जाते है । जब कभी व्ही, आई. पी. आते हैं तो रेल स्टेशन में खोजने से भी गदगी नजर नहीं आती। स्टेशन सर से पैर तक दुल्हन की तरह सजा हुआ नजर बाता है। नेता और मत्री जी, इस ओर जाते हैं ऐसी भी व्यवस्था के दर्शन उन्हे रेल विभाग करवाता है। अतः रेल के लिये नये पुल का या रेलवे स्टेशन का अथवा नई रेल लाईन का उद्घाटन करते हुए वे अपने भाषण में शान से कहते हैं-रेलों ने बहुत प्रगति की है। देशवासियो को भावनात्मक रूप से जोड़ने में रेलों की महत्वपूर्ण भूमिका है। रेल के चक्के देश की प्रगति के चक्के हैं। रेलों के माध्यम से ही विश्वबंधुत्व की भावना का प्रचार और प्रसार हो रहा है। भारतीय रेल अपनी वापसी सदाशयता यौर थाप सब की सुविधाओं के लिये पूरे देश में दौड़ रही हैं। रेसे हमें फेसर को पयारी. से कन्याकुमारी वफ षोड़ रही है । रेलों ने बहुत प्रगति को है। "बापको यात्रा मंगलमय हो" एक कंडेक्टर के पीछे २५-३० मात्रियों को प्रत्येक स्टेशन पर भागते,. इधर से उधर दौड़ते यात्रियों को देखकर हो बाप कह सकते हैं-सचमुच रेल विभाग ने कितनी प्रगति कर ली है। रेत यात्रा में हम बनेक वा सोखते हैं, वो हमें पोवनपर्यन्त काम पाती है। पहली महत्वपूर्ण बात तो यह है कि रेलयाना हमारे आत्मविश्वास में वृद्धि करने का निशुल्क टानिक है। घरका-मुनको में मअपूतो के साथ बड़े रहने और कंडक्टर के फटकार ८|| लाल बत्ती जल रही है को सहन करने की क्षमता-योग्यता बढ़ाने का अवसर हमें रेल विभाग बक्सर प्रदान करता है। इसके साथ हो कैसी भी परिस्थिति में जीने का, संघर्ष करने का मादा भी बार-बार रेल द्वारा यात्रा करने से हो पाता है। पनियल चाय और मिट्टी तेल को गंध से महकतो कॉफी के साथ ही अपने ढन का अनोखा और दुसम भोजन करते हुए आपकी तबियत बाग-बाग हो जाती है। "आपको यात्रा मंगलमय हो" दूसरी बात जो हम सोखते हैं, वह है गहन अंधकार में भी सफलता की किरण का संबल पामे रहना। तूफानों के बीच भी आशा का नन्हा सा दीपक जलाये रखना । चूंघट में छुपा चेहरा सभी देखना चाहते हैं, चाहे उसका एक बाजार बंद क्यों न हो? या पूरा चेहरा सिल जैसा दंका हुआ वयों न हो ? परन्तु हाय रे पर्दा । क्या कहने तुम्हारे । कोई बात तो है ? रेल के डिब्बे में बंधी जिन्दगी के जानकर कंडेक्टर किसी को पूंघट उठाने ही नहीं देते । मजे की बात यह है कि बार-बार कंडेक्टर के मना करने पर भी आप विश्वास का दामन नहीं छोड़ते और गाड़ी चलते ही उसके पीछे- पीछे डिब्बे में सवार हो जाते हैं। अंत में पारसी समझ और सदाशयता में आप चुपके से कंडेक्टर की हथेली गर्म कीजिए, आपको वर्ष मिल जायेगी। "आपको यात्रा मंगलमय हो" तीसरी बात जो आप और हम सीखते हैं यह है समय की पाबंदी । समय की पावंदी वया सिर्फ रेसों के लिये है। नही सबके लिये है। ऐसे वाक्यों को सुनने और पढ़ने से हमें रेल विभाग को कर्तव्यनिष्ठा का बोध होता है। रेलों की तरह हम भी जीवन में समय को पावदी का महत्व सीखते हैं। हम १५ मिनट लेट पहुंचते हैं स्टेशन तब तक रेल जा चुकी होती है। इंडेफिनिट लेट को डेफिनिट में बदलते हुये माइक से प्रसारित होता है। ४२० डाउन गाड़ी ४ घंटे लेट चल रही है। ट्रेन का इंतजार

रेल चली मई रेल ! ८६
फौजिये । "आपकी यात्रा मंगलमय हो" इंतजार करते हुए बचपन को
स्मृतियां आकार लेने लगती है :
रेल चली मई रेल, देखो ये बंदर का खेल
एक के पीछे एक बाओ, रेल बनानो रेल बनाओ
छुक-छुक, छुक-छुक, छुक-छुक, छुक-छुक रेल चली गई रेल
देखो ये बंदर का खेल, रेल चली गई रेल ।
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उद्घाटन मंत्रालय का उद्घाटन उद्घाटन रोज होते हैं । स्वतन्त्र भारत में उद्घाटन की शानदार परम्परा का शुभारम्भ हो चुका है । शृंगार सदन से लेकर साड़ी संसार को दुकानों का उद्घाटन होने लगा है । सुहाग महल और सोप फैक्ट्री का उद्- पाटन छुटभैया जमात के लोग करते हैं। बड़े-बड़े मंत्री शिलान्यास करते हैं । कभी अस्पतालों का, कभी जेलों का, गांव-गांव में ढेर सारी पाठशालाओं का उद्घाटन दीप जलाकर किया जाता है। फिर उनमें बंधकार अपना रंग जमाता है। कभी-कभी भूमि पूजन होते हैं । धन महोत्सव में चांदी की खुरपी से गड्ढा खोदने का अभिनय करते हुए नन्हा पौधा लगाकर उद्- घाटन किया जाता है, जिससे कुछ घंटौ बाद बकरी को बात्मा प्रसन्न होती है । अधिकांश शिलान्यास नींव के ऐसे पत्थर बन जाते हैं जिन पर कोई महत खड़ा नहीं हो पाता। हिंदुस्तान में हम अपने गौरवशाली अतीत की बातें करते कभी नही पकते । पुष्पक विमान से लेकर कृष्ण के विराट रूप की कहानी और राणा- शिवा की बहादुरी से लेकर पृथ्वीराज चौहान के शब्दभेदी बाणों को चर्चा बार-बार करते हैं । इसमें कोई शक नहीं कि इन्होंने समय-समय पर भारत का गौरव बढ़ाया है, परन्तु पीते हुये कल में इक्कर ढोल पीटने का मजा हो और है । उसी प्रकार उद्घाटन करने का मजा मी योर हो है । किसी भी सड़क के किनारे उद्घाटन चमचमाते दुधिया फर्श पर हीरे-मोती हो की तरह जड़े जाते हैं । या मुख्य द्वार पर पंक्ति होकर गौरवान्वित होते हैं। उद्घाटन कायों को अमरत्व को दिशा में यह एक बढा हुवा कदम प्रतीत होता है । उन्हे अपार सुख की प्राप्ति होती है । समाज में मान बढ़ता है। जीम की खुजली मिटती है। रोव जमता है। प्रतिस्पधियों को जमकर पट- फनी देते हैं । उद्घाटन से जनसंपर्क भी बढ़ता है । स्वागत मी भरपूर होता - -- उद्घाटन मंत्रालय का उद्घाटन || ६१ है। चमचों के बीच भी साख बढ़ती है। सरकारी दौरा कार्यक्रमों द्वारा कर्तव्यनिष्ठा की मुहर भी लग जाती है। पांच वर्ष में एक दो बार दर्शन देने वालों की श्रेणी से साफ बच जाते हैं । जनता के व्यंग्य बाणों से, उद्- घाटन कवच का काम करता है । चुनाव के समय आत्मविश्वास से कहते हैं मैं तो लगातार मापकी सेवा में माता रहा हूँ अर्थात आगामी विजय की भूमिका बनाते चलते हैं। इसलिये किसी-न-किसी उद्घाटन की योजना के अवश्य कार्यान्वित करते हैं। रिकार्ड तोड़ने में भारत के क्रिकेटर भी आगे रहे हैं । विजेता को धरह हारकर भी रिकार्ड तोड़ते हैं। जीतकर भी रिकार्ड तोड़ते हैं । राजनीति में बहुगुणा और बाजपेयी हारकर रिकार्ड तोड़ते हैं। फिर कविता लिखते है । कहते हैं प्यादे से फर्जी भयो टेढो-टेढो जाय । पैदली मात की भी खुशी अलग होती है। सच कहा है। उसी प्रकार उद्घाटन में भी रिकार्ड टूट रहे हैं। जल्दी से जल्दी कुर्सी पर रहते-रहते उद्घाटन की सेन्चुरी मारना चाहते हैं । जो शतक मार चुके हैं, वे दोहरे शतक की तैयारी में है। इच- लिये खूब उद्घाटन करते हैं। समाज सेवा का व्रत लेने वाले अवसर की खोज में रहने वाले समाज सेवी आपस में चर्चा कर रहे थे। १९८६ के शांतिवर्ष के बाद अब १६८७ को उद्घाटन वर्ष के रूप में मनाया जाना चाहिये । उद्घाटन उसके लिये विधिवत पुरस्कारों की घोषणा हो । जो १९८७ में सर्वाधिक उद्घाटन करेंगे, उन्हे उद्घाटन शिरोमणि की उपाधि से विभूषित किया जाये। क्योंकि जनता तो कभी उद्घाटन करतो नहीं। यह पं उद्घाटन प्रति- योगिता का हो । उद्घाटन प्रतियोगिता का प्रारम्भ होने से विकास को निश्चित रूप से गति मिलेगी। इसके लिए एक उद्घाटन मंत्रालय का गठन किया जाना चाहिये । जिसमें सारे उद्घाटनों का रिकार्ड रखा पावे। उद्- घाटन मंत्रालय रिकार्ड रखेगा तो लोग जन्मदिन से लेकर दाह संस्कार तक के सोलह संस्कारो का उद्घाटन फीता काटकर या दीप जलाकर करवायेंगे। उद्घाटन के नये से नये और बेहतर से बेहतर अवसर उपलब्ध होंगे। ।

६२ | लाल बत्ती बल रही है उद्घाटन मंत्रालय को देखरेख में उद्घाटन होते हो युद्ध स्तर पर कार्य प्रारम्भ कर दिया जावेगा । यदि ऐसा नहीं किया गया तो उद्घाटन स्वमेव 'निरस्त माना जायेगा । उद्घाटन के समान अवसर प्रदान करेगा। उद्घाटन मंत्रालय को इस बहुउद्देशीय योजना के अन्तर्गत जब कोई पहली बार उद्घाटन करेगा तो नई नवेली दुल्हन की तरह शर्मायेगा। परन्तु धीरे-धीरे सब समझ जायेगा । देखेगा वो उसको बा खिल पायेगी। उसके स्वागत के लिये कैसी भव्य तैयारी की जाती है। द्वारचार से लेकर सेब तक फूल सी कोमल नजरें बिछो रहती हैं। सास-ससुर हो या साली- साले सब स्वागत को आतुर रहते हैं और फिर पति के वो कहने ही क्या है ? परन्तु जैसे-जैसे समय बीतता है सबकी नजरें बदलती हैं । उद्घाटन कर्ता भी अपने सद्गुणों के जौहर दिखलाते हैं। कई बार एक ही स्थान पर तीन-तीन चार-चार बार उद्घाटन होते हैं। भाषण देते हैं। मेवा खाते हैं । स्वास्थ्य बनाते हैं और चले जाते हैं । उद्घाटन मंत्रालय को पता हो नहीं लग पाया और उद्घाटन मंत्रालय का उद्घाटन हो गया। उद्घाटन मंत्रालय के उद्घाटन का चमचमाता पत्थर समय की मार से घूल घूसरित हो चुका है और कुत्ते एक टांग उठाकर समय-समय पर उसका सदुपयोग करते हैं । उद्घाटन के प्रतीक उस भूतपूर्व चमकदार पत्थर के दिल से इसकी आह निकलती है। दिलों में रख सो निगाहों मे बसा लो मुझको। जिंदगी हूँ मैं-किसी शक्ल में ढालो मुझको ।। .

उद्घाटन होलिका दहन का . चेहरे पर कश्मोरी मुस्कुराहट और हृदय में धधकते हुए पंजाब को लेकर वे गले मिले पर वैसे ही जैसे ढाल से तलवार मिलती है । कहने लगे माज तो होली है। कोई छोटा नही, कोई बड़ा नही, कोई दोस्त नहीं, कोई दुश्मन नहीं है । सब बराबर है। भाई भाई हैं । होली ही दुनिया में एक ऐसा त्योहार है जिसमें लोग कीचड़ उछालते हैं । मुख पर मलते हैं काला रंग तब भी मन का मैल धुल पाता है । हृदय गंगा जल की तरह पवित्र हो पाता है। होली के दिन रंग-बिरंगे चेहरों और कपड़ों के बीच काले और गोरे सभी एक से दिखलाई पड़ते हैं । "बुरा न मानो होली है" के नारों के बीच गाली को भी लोग सहज भाव से ग्रहण करते है । मुझे विश्वास है आपकी सदाशयता पर बाप सब होली के इस शुभ अवसर पर मेरे भाषण पर अण्डे, दमाटर या जूते नहीं फेकेंगे। अपनी रंग बदलने की कला में गिरगिट को भी मात करने वाले राजनीति के पंडित, महान कूटनीतिज्ञ, प्रकाण्ड विद्वान, मूर्धन्य लेखक, समाजसेवी, फर्मठ, जुझारू एवं अन्यान्य उपाधियों से विभूषित अखिल भारतीय स्तर पर कुख्यात मंत्री महोदय अपनी मंजी हुई मौलिक एवं बोर करने वाली शैली में अपना उद्घाटन भाषण प्रारंभ कर रहे थे। बीच-बीच में अपनी तिरछी टोपी ठीक करते थे। साथ ही बाहर की बोर निकल आये पृथ्वी के ग्लोब की तरह अपने विराट उदर पर बारम्बार हाथ फेर रहे ये । शायद उदर को केपेसिटी देख रहे हों कि फुटवाल रूपी उदर में भाषण रूपी हवा कम तो नहीं है । पर वे हर बार पूरी तरह संतुष्ट एवं प्रसन दीख पड़े । उन्होंने कहा हम और हमारे देशवासी यदि प्रतिवर्ष अपने दुर्गुणों में से मात्र एक दुर्गुण को होली की लपटो में भस्म करें तो भारत दिन दूर नहीं जब राम राज्य की स्थापना का स्वप्न साकार हो उठेगा।

6४ ]] साल बत्ती जल रही है यदि हम अपने संकल्प को दृढ़ता के साथ पूर्ण करें तो गांधी जी की इच्छा के अनुसार हर गरीव को पांख का आंसू पोंचा जा सकेगा। छोटे से लेकर बड़े सभी घरों में बच्चे महिलाएं और बुजुर्ग समो मुख की गहरी नौद सो सकेंगे। मजदूरों के लिये गिरते हुए जीवन स्तर एवं समाज के नैतिक पवन के लिए उन्होंने शरीर के उपयोग को दोषी ठहराया। शराब को बुराइयों का गहराई से उल्लेख करते हुए उसको आहुति होली में देने को पुरषोर कोशिश जन सामान्य के बीच कर रहे थे। जिस समय मंत्री महोदय जन मानस का आह्वान कर रहे थे कि शराब को त्याग दें उसो समय उनको श्वांस के साथ एक तेज गंध वातावरण को दूषित कर रही थी। साथ ही उनके चेहरे पर अंगूर को बेटी अपना प्रभाव दिखला रहो यो । अपने कर्तव्य एवं सिद्धात के प्रतीक अटूट निष्ठा रखने का निर्देश देते हुए महामानव गांधी, लौह पुरुष पटेल, योगी विवेकानन्द एवं न जाने कितनों का उदाहरण उन्होंने दिया । कठिनाइयों का सामना करते हुए उनके समान हो आगे बढ़ते रहने का प्रगति के पथ पर अग्रसर होने का अनुरोध नाम समा से किया। उन्होंने अभी-अभी दस बदला था । अपने दल बदल को समयानुसार निरूपित करते हुए देश की प्रगति के लिए अत्यंत यावश्यक बतलाकर स्वयं के द्वारा उठाये गये कदमों के पक्ष में असंख्य सकहीन प्रमाण प्रस्तुत किए। ।। उन्होंने दागे कहा कि सत्य एवं त्याग की राह पर चलकर हो व्यक्ति छोटे एवं गरीब परिवारों में जन्म लेकर भी उच्च पद प्राप्त करता है। कुछ लोग वंदनीय भी हो चुके हैं । इब्राहिम लिंकन, लाल बहादुर शास्त्री, रामकृष्ण परमहंस, मुकर्ण, अम्बेडकर आदि का नाम बिजलो को तेजी से उन्होंने गिनाया। अपने ज्ञान की पराकाष्ठा पर स्वये हो गवित होकर विशाल जन समूह के चारों ओर अपनी दृष्टि घुमाने लगे। परन्तु आदत से मजवूर आँखें मंच के पास खड़ी हुई दो मुन्दरी युवतियों, मृगनियों पर कुछ सेकण्ड के लिए अटक हो गई । उन्हें शीघ्र ही परिस्थितियों की गहनता एवं अपने स्थान की उच्चता का स्मरण हो पापा । उन्होंने तुरंत हो स्वयं उद्घाटन होलिका दहन का || ६५ को संयमित किया और पुनः मापण को उल्टी सोधी बौछार करने लगे। चमचों ने मापण समाप्त करने का इशारा किया पर वे चोट खा चुके थे यतः गाड़ी फिर चलने लगी। खूबसूरती को चोट से घायल सर्प को तरह फुफकारते हुए नेता जी चरित्र की दुहाई देने लगे। पाव ताजा था। विपय अभी-अभी प्राप्त हुआ या देश में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, नैतिक मूल्य गिर रहे हैं कहते हुए सफल अभिनेता की तरह चेहरे पर विपाद के बादल गहराने लगे । चरित्र की तरह ईमानदारी और सत्य के पथ पर चलने की अपील करते हुए कोठियो, इम्पाला एवं बिस्कुटों के मालिक बन बैठे भूतपूर्व दखि नारायण (मंत्री जी) पर अब जनता जर्नादन की ओर से फुसफुसाहट के फूलों को वर्षा होने लगी पो चमचों ने बदसती हवा को पहचाना एवं उन्हे भाषण समाप्त करने का संकेत दिया पर गाड़ी चलती रही। होलिका दहन का मुहुर्त निकला जा रहा था पर मंत्री महोदय अपनी भाषण कला की धाक उन समस्त पत्रकार, डॉक्टर, वकील, नेता, व्यापारी एवं पुजारी पर बैठा देना चाहते हैं जो होलिका दहन में अपनी बची हुई अच्छाइयों की आहुति देने आये थे । उनसे कहने लगे होली हृदय का उल्लास है। निष्कपट प्रेम और भाईचारे की प्रतीक है। देवर भाभी की ठिठोली है। साम्प्रदायिक सद्भाव का वातावरण बनाती है । यतः होली केवल हिन्दुओं का नहीं घरन सिक्ख, मुसलमान और ईसाई भाइयो को भी बहुत प्रिय है । होलिका दहन धास्तव में असत्य पर सत्य को और अन्याय पर न्याय की विजय का पर्व है। होलिका दहन पर बुराइयों को जलाने का उद्घाटन उन्होंने चुनाव में हारे हुए अपने प्रमुख प्रतिद्वंदी को पहले गुलाल लगाकर और बाद में गले लगाकर किया। वे गले उनसे जरूर मिले पर वैसे ही जैसे ढाल से घलवार मिलती है । उन्होंने जाते-जाते फिर फरमाया- बिना मारे बैरी मरे, ठाढ़ो ईस विकाय । होली के दिन मां, या सुख कामे समाय ।।

ट्रम्पकार्ड और जोकर एक जमाना था जब ट्रम्पकाई बोर जोकर की भूमिका केवल ताश के खेलों में होती थी। धीरे-धीरे "जोकरों" ने सरकस को अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया और अब तो दुनिया के बडे-बड़े फूटनीतिज्ञ और पटुकुट- नीतिज्ञ भी इनके महत्व को स्वीकारने लगे हैं। "खेल-खेल में रेल/रेल चली भई रेल" को स्वर लहरियो के बीच छोटे-छोटे बच्चे एक दूसरे के पीछे-पीछे रेस की तरह छुक-छुक, छुक-छुक की आवाज निकाल रहे हैं । बीच-बीच में मुंह से इंजन की सीटो भी दे रहे हैं । नन्हे-नन्हें बच्चों की तरह कर्मठ राजनेताबों की रेल मी दौड़ रही है। मारपीट, लड़ाई, झगड़े और वापसी स्त्रीचातानी के लिए यह एक आदर्श स्थान है। यह अपने पूरी फार्म पर दीख पड़ती है। उनकी भाई चारे की भावना । पुजारी जब भारती के बाद पहचान पहचानकर प्रसाद बांटता है तब वे एक दूसरे को टांग खीचने की प्रतियोगिता शुरू करते हैं । भावना यही रहती है, हम तो डूबेंगे सनम तुझे भी लेकर डूबेंगे। खरों पर भारत की दयनीय स्थिति पर धुरंधर वक्तायों ने खूब कहा है एक वयोवृद्ध नेता जी की बात दिमागी खोपड़ी में गुदगुदी कर रही है वात ऐसी थी-"भारत एक गरीब देश है, यहाँ फुटबाल से २०-२५ खिलाड़ी खेलते हैं। मैं इस बात का प्रयास करूंगा कि भारत में प्रत्येक फुटबाल खिलाड़ी के पास स्वयं का फुटबाल हो और यह अकेला फुटबाल खेल सके।" अपने अनोखे भाषण में खेल-खेल में ऐसा कहकर वे शान से अपनी गर्दन अकड़ा लेते हैं मानों उन्होने कोई महत्वपूर्ण बात कहकर जगे मैदान मार लिया हो। राजनीति में खेल और खेल में राजनीति बाने-जाने लगी है। इनमें रोटी बेटी का लेनदेन लगा है। इनका साप चोसी दामन के साथ हो गया है। एक के विना दूसरी यधूरी है । अनेकों बार खिलाड़ी (चाहे मैदान का ट्रम्काई और जोकर || हो या राजनैनिक अखाडे का ) कमजोरी को धोखेघड़ी और . दबाव की दुहाई देकर छुपाना चाहते हैं । आड़े, तिरछे, कंचे, नीचे यक्तव्य,दे.,देते है.। कई बार स्थिति यह रहती है "नाच न जाने आगन टेढा ।" सच तो यह है कि दुनिया में जितनी भी सेल प्रतियोगिताएं होती हो। चाहे यह एशियाड हो चाहे विम्बलडन हो सब खेलों को चुनावी प्रतियोगिता की धार मात करती है। इस धार के सामने प्राचीन तलवार को धार हो मा आधुनिक ब्लेड की धार दोनों मोपरी प्रतीत होती है। वैज्ञानिक प्रगति की रफ्तार और राजनीति के खेल की रफ्तार दोनों में किसकी रफ्तार अधिक है तय करना कठिन है। कहा भी गया है- कभी मुसोलिनी तो कभी हिलदर को हुँकार तो कभी गांधी की अहिंसक पुकार राजनीति का खेल कमी हिरोशिमा-नागासाकी का बम्बार्ड तो कभी कांग्रेस, बनता और भाजपा का घिसा हुआ ग्रामोफोन रिकार्ड हो गई यह ५२ पत्तों में ट्रम्पकाई समय की बलिहारी है अब इन खेलों से भी आदमी का शारीरिक और मानसिक विकास होता है। खेलों में ही धीरे-धीरे नेतृत्व की क्षमता का विकास होता है। सचमुच खिलाड़ी अनुशासनप्रिय हो जाता है। ऐसे ही अनुशासन को पुष्पित व पल्लवित करने की परम्परा हाली जा रही थी। अनुशासन इस तरह भी उछाला गया था "आपात स्थिति अनुशासन अर्थ है। अनुशासन पर एक व्यंग्यकार की अभिव्यक्ति का उल्लेख इस संदर्भ में जरूरी लग रहा है-हमने जूते पाले से पूछा | यह पांव में काटता तो नहीं है ? वह बोला, हुजूर यह जूता है / बीसवीं सदी का आदमी नहीं है | कि थापको काटेगा / यह तो आपात्कालीन मंत्रियों को वरह / आपके चरण वाटेगा। कवि तो कह गये सो कह गये । चारों ओर दिखलाई भी यही पड़ता है । ट्रम्पकार्ड और जोकर का खेल अब केवल ताश तथा घर के कमरों तक २८ लास बत्ती जस रही है ही सीमित नहीं रह गया है। उसने घर आंगन को पार करके "वसुधैव कुटुम्बकम" को मावना को अपनाया है। हर घर में, हर माहौल में, हर चुनावी नेता के यहां अपना डेरा जमाया है। ताश के ५२ पतो की षगह जोकर जौहर दिखाने लगे हैं ५४४ बरगदी पत्तों के मोच ! यह वरगद्दी पत्ते प्रत्येक पांच साल में झड़ जाते हैं और इनमें नयी कोपलें फूटती हैं । कभी- फभी इनफा खेल २९६ और ३२० पत्तों का भी होता है। अकबर जिस वरह जीवित मोहरों से मन बहसाता पा। आजकल के मकसी महाराजा इन षोकरों से मन बहलाते हैं जो असली होते हैं। समय-समय पर इनका उपयोग करके बाजी बीत जाते हैं । कभी-कभी जब ट्रम्पकार्ड की "शह" को जोकर अचानक भूत की तरह प्रगट होकर "माव" से वदल देता है तो चे निराश अपने साथियों को कुछ इस तरह कोसते हुए पाए जाते हैं- जमाने में अजी ऐसे कई नादान होते हैं। यही ले जाते हैं करतो वहां तूफान होते हैं ।।

चलन से बाहर गुणों के जब के शहनाई के स्वर हमारे कानों में रस घोलते हैं, हम मोठी, गुदगुदाती स्मृतियों के ज्वार भाटे में डूबते / उतराते हैं। वे भी क्या दिन थे'-को वर्ज में भोंदूराम भी अपनी काबलियत के झंडे गाड़ने लगता है। लोग सुनकर भी अनसुना करते हैं । कन्नी काटते हैं। भोंदूराम सब समझता है परन्तु अपना भोंदू पुराग वह चालू रखता है। इस गति से कि शहनाई के स्वरों की गूंज मार्ग में रोड़ा न बन सके । किसी तरह भोंदूराम जी से पिंड छुड़ाकर हम शहनाई बजने वाले घर की चौखट लांघते हैं, तो यहाँ उल्लासमरी खिल-खिलाहटों के बीच खनकतो चूड़ियों के साथ दुल्हन चाँद सा मुखड़ा दिखाई पड़ता है। लाल साड़ी में लिपटी काली कलूटी -दुल्हन को बलैया "सास" सौ-सो बार लेतो नहीं पकती। बहू पुल बांधती हुई नहीं अघाती। जमकर दहेज लाने वाली बहू को साक्षात लक्ष्मी का अवतार बदलाती है। परन्तु धीरे-धीरे खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। कुछ महीने और साल के बीतते-बीतते लक्ष्मी साक्षात रणचंडिके नजर आती है सास को। गृहयुद्ध की रणभेरी शीतयुद्ध की तरह समानान्तर बजने लगती है। कभी बहू सास को तो कभी सास बहू को-खोटे सिक्के को तरह समझती है । वाकयुद्ध में नित नये सुभाषितों का अविष्कार होता है। समय पाकर सास या बहू दोनों में से किसी एक को चलन से बाहर होना पड़ता अर्थात् बहू बुरी होती है तो सास को घर से बाहर निकलना पड़ता है। और सास बुरो होती है, तो बहू को घर से बाहर निकलना पड़ता है। इस प्रक्रिया को अर्थशास्त्रीय "ग्रेशम का नियम" कहते हैं। ये महत्वपूर्ण नियम अर्थशात्र में निम्न प्रकार प्रतिपादित हुआ है-"बुरी मुद्रा अच्छो मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है ।" जायदाद का बंटवारा होता १०. लाल बत्ती जल रहो है है भाई-भाई के बीच । यही नियम अपनी सार्वभौमिकता सिद्ध करता है। झगड़ता भाई धुरी मुद्रा का रूप धारण कर अच्छो मुद्रा को अपने सोधे-साधे भाई को घर से बाहर कर देता है। राजनीति खुली पुस्तक है। अपने कारनामों से प्रसिद्धि के शिखर पर भी है । रीतिकालीन कवि कहा करते थे-सुंदरी का रूप वर्णन करते हुए कि खुदा ने बहुत फुरसत मे गढ़ा है उनकी नायिका को। आजकल लोग कहते है-नेताओं को भगवान ने फैजुअल लीव लेकर बनाया है। राजनीति में सब कुछ जाया मानने वाले ये नेता भी ग्रेशम के नियम को प्रमाणित रूप में प्रस्तुत करते हैं । जो सही में देशभक्त रहता है, सेवा और त्याग में ही जो अपना जीवन व्यतीत करता है-वह ताम्रपत्र का अधिकारी होता है अथवा स्वतंत्रता सेनानी का विल्ला लगाकर ही गौरवान्वित होता है । और अच्छी मुद्रा की तरह राजनीति के चलन से बाहर हो पाता है। जबकि बुरी मुद्रा को तरह राजनीति में वे चलते हैं वे पूजे जाते हैं जो शाम, दाम, दण्ड भेद और स्वार्थ में दक्ष होते हैं। फिल्मी दुनिया में उद्देश्यपूर्ण और कलात्मक फिल्मों के हस्र से बाप परिचित हैं । बाक्स आफिस पर वे फिल्में सफल होती हैं जो पूरी तरह व्यावसायिक होती हैं । बुरी मुद्रा की तरह अपनी भूमिका से वे अच्छी मुद्रा (अच्छी फिल्म ) को चलने से बाहर कर देती हैं। पालक अपने बच्चों को प्रारम्भ से ही आचारवान बनाने की कोशिश करते हैं, पर वे माचारहीन बनकर मुंह चिढ़ाते हैं । सदा सघ बोलने की शिक्षा प्राप्त करते-करते वे भूठ बोलने में निष्णांत हो जाते हैं । जितने भी सद्गुणों के बीज बालको में अंकुरित होते है, ये व्यावसायिक फिल्में दुर्गुणों के बाधार पर उन्हें चलन से बाहर कर देती हैं। पुस्तकों के बाजार में दो शिम का नियम का वर्चस्व है। सस्ती बश्लील और सुटकुले बानो से ओतप्रोत हल्की-फुल्की पुस्तको से बाजार भरा पड़ा है। उनकी मांग भी है । वे विकतो भी हैं । साहित्य में मापदण्ड को स्थापित करने वाली साहित्यकारों की पुस्तके लायन्नेरी में बंद रहती है। ।

चलन से बाहर ॥ १०१ मूले भटके लोग उसके दर्शन करते हैं। साहित्यिक गुटबंदी में भी उखाड़-पछाड़ चलती रहती है। आरोप, प्रत्यारोप होते है । कोई पीठ पपथपाता है, तो कोई सामने गड्डा खोदने को तैयार खड़ा रहता है । खडन होता है । फिर मंडन की योजनाएं बनती हैं। कभी-कभी पुस्तकों के बाजार में अच्छी मुद्रा की तरह अच्छी पुस्तकें भी दिखलायी पड़ती हैं। कवि सम्मेलन के मंच पर कभी-कमी अच्छे कवि भी नजर आते है । परन्तु जिस सरह बुरी मुद्रा अच्यो मुद्रा को अधिक समय तक चलने नही देती, उसी प्रकार बुरी पुस्तकें अच्छी पुस्तकों को बाजार के चलने से बाहर कर देती हैं और वे पुस्तकालयों की शोभा बढ़ाती हैं । चालू चाय की तरह बुरी मुद्रा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफल होती है। इठलाते हुए कहती है । पंछी बनू उड़ती फिर्स मस्त गगन में। आज नया जादू हूँ, दुनिया के चमन में ।

हाय री किस्मत दगा दे जाती है विधायक, सेण्डिल और युवा शन्द मल्टीपरपज हैं । ढेर सारे उद्देश्य होते हैं । इन शब्दो के । सुपर बाजार में जिस तरह बहुउद्देशीय कंपनियां कंठच्छेदी प्रतियोगिता में लगातार फूटती जा रही हैं, उसी प्रकार कही विधायक, तो कहीं युवकों के तेवर, तो कही सेंडिलें अपना स्ववा अपना दवदवा सिद्ध करने के लिए बेकरार हैं । और जब विधायक, सेण्डिल और युवा इन तीन रेखाओ के माध्यम से त्रिभुज बनता है, तो यह त्रिभुज "लाल तिकोन" को भी मात कर देता है । सेण्डिल को यह खासियत है कि आप उसका प्रयोग इच्छानुसार कर सकते हैं। कहीं कोई बाध्यता नहीं है। बाप चाहे तो उसे नंगे पैर में पहने और चाहें तो मोजे के साथ । फोते को एड़ी में कसकर यूट की तरह भी पहन सकते हैं और सामने को तरफ मोड़कर चप्पल को तरह भी पहन सकते हैं। जिस तरह प्रजातंत्र में सभी टोपीधारी, कासी टोपो वाले को या सफेद टोपी वाले, नोली टोपी पाले हों या हरी टोपी वाले, पोलो टोपो वाले हो या साल-लाल टोपी वाले- समाजवादी और लोकतंत्र शन्दों का इच्छानुसार प्रयोग करते हैं । उसी तरह सष्टक पर दादागिरी से लेकर चरणरज रक्षक के रूप में आप सेण्डिल का उपयोग करने के लिए स्वतंत्र हैं। भारतीय प्रजातत्र में ही नही संपूर्ण विश्व में अन्तर्राष्ट्रीय युवा वर्ष के बाद युवकों ने अपने जलवे दिखाए हैं। "युवा" उत्साह, सगन, सक्रियता और कर्मठता के प्रतीक माने जाते हैं । बहुत पहले मध्यप्रदेश की विधान- समा में भी कुछ तत्कालीन युवा विधायकों ने सेंडिल और जूते के साय अपना रागात्मक संबंध स्थापित किया था। "देर ना लगाना-अंधेर न मचाना, ख्याति मेरी झोली में छम से चले याना" के वर्ज पर, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर विधानसमा में फूलों को तरह सेण्डिल उछाल दी हाय रो किस्मत दगा दे जाती है | १०३ यो । कहते है, स्वतंत्रता का जो अधिकार है प्रजातंत्र में इसी प्रकार बहुत से युवा बोर अनेक विधायक भी भूतपूर्व विधायकों के पदचिन्हों का अनुसरण करने को बातुर दिखायी देते हैं। इसी प्रकार की एक घटना है। धूम्रकेतु की तरह राजनीति में एक युवा नक्षम का उदय हुआ था ! हेलीकाप्टर पर बैठते हुए उनकी चप्पले पैरों से फिसलकर गिर पड़ी। फिसलना स्वभाव होता है दोनों का । तब एक मंत्री जी ने दौड़कर चप्पल उठाई । केवट ने चरण धोये थे । राजाराम को उसी परम्परा का निर्वाह करते हुए उन्होने चप्पल उस नक्षत्र के चरण कमलों में पहना दी। प्राचीन काल में लंगोटी पहनने पाले साधू भी खडाऊ पहनते थे। सूर्यवंशीय राजा रामचन्द्र के चौदहवर्षीय बनवास जाने पर भी भरत ने राम को खड़ाऊ के माध्यम से राज्य चलाया था । युग के अनुरूप नाम बदले हैं। खड़ाऊ का स्थान अब सेन्डिल ने ले लिया है। राजतंत्र का स्थान प्रजातंत्र ने परन्तु गुणवत्ता में बहुत फर्क नहीं आया है । खड़ाऊ को उप- योगिता और उसका वजन "भरत" ने सेवक होकर भी सिद्ध कर दी थी। इसलिए बहुत से विधायक सेन्डिल पहनते हैं । सेन्डिल के कारण मुखियो में रहते हैं। राजनांद गांव में हमारे एक मित्र हैं। रूचि सम्पन्नता वौर मुस्कुराती हुई हाजिर जवाबी में भी उनका कोई जवाब नहीं । एक बार भोपाल-दुर्ग: की यात्रा में उनके साथ विधायक भी थे और स्वाभाविक है सेन्डिलें भी। बस चर्चा चल निकली। अनेक कोणों से युवा, विधायक और सेन्डिल भब्दों की व्याख्या होने लगी। सुदर्शना नारी के बदले उन्होंने नन्ही सी डिबिया की तारीफ में पुल बांध दिए । डिविया में थो लौंग, इलायची और सुपारी। चर्चा यूं होने लगी। कुछ विधायक ऐसे होते हैं । खड़े होते हैं। खड़े तो लौंग और बैठते हैं वो इलायची की तरह नजर आते है और कुछ सुपारी की तरह ठोस होते हैं । जो विधायक लौंग, इलायची और सुपारी सहित १०४ || लाल बत्ती बल रही है कत्थे चूने का अच्छा सामंजस्य बैठा लेते हैं, ये मोठा पान बन जाते है। पान की दुकान में "मोठा पान" राजा होता है और विधायकों के बीच में मुख्यमंत्री। राजा बनने के बाद सेन्डिल को आवश्यकता नही रह पाती। राजा का बड़प्पन नंगे पैर दौड़ने में दिखलाई पड़ता है। वैसे ही जैसे राजा कृष्ण अपने बाल सखा सुदामा से मिलने नंगे पैर दौड़ पड़े थे। अतः जब तक विधायक हैं, चमकती से डिलों को निरंतर चमकाना जरूरी मानते है राजा बनने का स्वप्न देखने वाले । और सेंडिल चमकाते भी रहते हैं। चमकती सेंडिलों के कारण युवा विधायकों की पूछ मुख्यमंत्री के पास भी बढ़ जाती है। इसीलिए कुछ विधायक प्रमुख द्वार तक सेंडिल को दुशाले में लपेटकर ले जाते हैं । ताकि यह घूल और गर्द से बची रहे । ऐसे चमकती रहे कि चेहरा देखा जा सके । दरबान के पास मुख्यद्वार पर पहुँचते ही विधायक मंत्री बनने की चाह में कायाकल्प करते हैं अपना । पहनी हुई चप्पल झोले में और दुशाले में लिपटी हुई सेन्डिलें पैरों में चमकती हैं तथा दुशाला कंधे पर सज जाता है। विधायक से चमचे कहते हैं-सचमुच आपके चरण कमल सेन्डिल के कारण खिल उठे हैं और मुख कमल की काति में दुशाले ने चार चांद लगा दिए हैं । यापको यह ओजपूर्ण तेजस्वी मुद्रा पूरी तरह मंत्री पद के योग्य है । हुजूर, भोवर पधारें। मंत्री पद आपके स्वागत के लिए दुल्हन की तरह आतुर है। करवर खड़ा मंद मंद मुस्कुरा रहा है। युधा विधायक का भीवर प्रवेश । परन्तु हाय री किस्मत बार बार दगा दे जाती है चीवेजी छवे जी बहने जाते हैं और दुवैजो बनकर लौट पाते है । फिर भी युवा विधायक गोवा में कृष्ण के इस उपदेश को हृदय में धारण कर निरंतर प्रयासरत हैं । सेन्डिलें चमका रहे है, थायद भाग्य भी चमके: फर्मणयेवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्म फल हेतु भूमी ते संगोण्स्त्वकर्मणि ॥ DO आई बसंत बहार बरो ओ धनिया । अरे ओ होरी। अब तो चेतो भाई । देखो वो, खोलो आँखें । कव तक सोते रहोगे ? अब तो जागो। देखो, गौर से देखो कौन बाया है ? बसत आया है बसंत । चिलचिलाती धूप के दिनों भी बसंत आया है। कभी देखा है तुमने अपने जीवन में बसंत । नहीं देखा न । अब देखो जी भर कर देखो। धनिया तुम भी केवल सुना करती थी और होरी से झगड़ा करती थी 'बसंत आता है तुम मुझको बताते तक नहीं ।' होरी अव तुम धनिया को बतायो। वसंत आया है तुम लोगों के लिए खुशबूदार गुलदस्ता लेकर वाया है। तुम अब बाम से खास हो गये हो न । तुम्हारी जरूरत अब समझने लगे हैं लोग । इसलिये तुम्हारा स्वागत करने बसंत आया है। 'तुम्हें सजाने-संवारने की दिली इच्छा हाथ में लिए हुए कहवा है, "भूल 'जायो पुराने दुदिनों को, उनकी याद में आँखों के दरिया कब तक वहाते रहोगे" देखो में आ गया हूँ। मैंने सारे सहे-गले पत्तों को झड़ा दिया है। दीमक लगे पट वृक्ष अपने आप धराशायी हो रहे हैं। जर्जरित हुए पेड़ों को भी मैंने तुम लोगों को खातिर उखाड़ फेंका है। नई-नई कोपलो से भरा पूरा संसार लेकर आया हूँ। कहता है बसंत । अभी सफाई अभियान चालू है। जो भी कूड़ा करकट बच गया है उसे भी सफा कर दूंगा । चमचमाते फों पर आपका स्वागत है अपना चेहरा देखिए । मुस्कुराइए और दूसरों को मुस्कुराने दीजिए । कोपनों का स्वागत कीजिए । बापके दिन फिर बायेंगे। कहता है वसंत। वाप तो जानते ही हैं। विज्ञ पाठक है। हिन्दी तरुणाई का ही दूसरा नाम पसंत है । सफलता उन को किसी भी मोड़ पर आये । चमन और चेहरे खिलने लगते हैं । गर्मी हो या सर्दी सफलता हो वसेतो बपार का सुख देती है। चिलचिलाते हैं वे पान याउ पर। वरुणाई मादक मुशबू रो ७ १०६ ॥ सास बत्ती जल रहो है सारा गुलशन महकने लगता है । स्वागत है इस पसंदी बहार का। शो की पाव है बसंत में संकट से लोहा लेने की क्षमता है। निराशा और विफलता के स्थान पर सफलता का लेवर लगातार सगाती जा रही है। परन्तु चार दिन की चटफ चांदनी न हो पाये यह वसन्ती बहार । ऋतुराब को सिवनी मो वारीफ की जाय कम है। ऋतुराज ने इस बार सबका ध्यान रखा है। फिल्मी दुनिया से भी नृत्यांगना, अभिनेत्री, यमिनेता और निर्देशक लेकर वाया है। जरूरत है एक प्ले येक सिंगर को और शूटिंग शुरू क्योंकि प्रोड्यूसर तो यहाँ बहुत हैं । लोक सभा में चुनकर पहुँचे हुए इन फिल्मी कलाकारों ने अच्छे-अच्छे. महारपियों को दिन में तारे दिखा दिये हैं। ये फिल्मी दुनिया पाले परदे पर तो अपना जोहर (एक्टिग के माध्यम से) दिखाते ही रहे हैं । इस बार इन्होंने मैदाने जंग में भी इनको पीट दिया है। जन-जन के अभिनेता क्व जन-जन के चहेते नेता हो गये हैं । नयों न हो आखिर बसन्त आया है। गाया उनके पराक्रम को दिक् दिगन्तों तक में गूंजने लगी है। युवकों की कर्मठता, उनपे उल्लास, उनकी क्षमता का प्रतीक बनकर बसन्त माया है । अंतर्राष्ट्रीय युवा वर्ष में युवा प्रधानमंत्री का तेज गति में लिपटा संतुलन जनसे सप्रेम भेंट करने आया था। शालीनता की कसौटी पर खरे उतरते हुए शांति और सहयोग से उत्थान का संदेश लेकर आया है । इसलिए इस पर्ष को हम "शांति पर्ष" के रूप में मना रहे हैं । आखिर क्यों न हो इस बार सचमुच बसन्त मामा है। असम और पंजाब समस्या का समाधान लेकर आया है । विपक्ष के सम्मान की बात भी होने लगी है । मीठी चासनी में डूबी जलेबी की तरह सब के सब आश्वासनों की मीठास से लबालब भर गमै है । कल्याणकारी घोषणाबों की निरंतरता बनी हुई है। बसन्त वोन जाने कब का बीत गया। अब तो मुलसा देने वाली गर्मी बाई है । फिर भी यह हमें बसन्त की बहार की तरह लगती है क्योंकि यह गर्मो सूखाग्रस्त क्षेत्रों में हरितक्राति का संदेश लेकर आई है। सब हमें बकाल का सामना नहीं करना पड़ेगा। कानों के पास से गुजरती गरम-गरम तू के झोंके आई बसंत बहार । १०७ इसका संदेश दे रहे हैं। इसीलिए सब कह रहे हैं पाई बसन्त बहार । जो धूक गये हैं उन्होंने बाशा का दामन नहीं छोड़ा है। क्यों छोड़े आखिरकार उनके जीवन में पहली बार बसन्त आया है। अभी-अभी आप लिखते हैं थापा-धापी से, दौड़-धूप से, पक्का-मुक्की से, वीख-चिल्लाहट और नारों की गूंज से आपने प्रयोग किया है अपने अधिकारों का। पुनः सुहानी बेला मा रही है पैरों में माहुर और हाथों में मेहदी लगाये दुल्हन की तरह मुस्कुराती। भविष्य के गर्भ में कांटों का ताज छिपाये । फिर भी छुटभैयों को बन आयो है। सब उचक रहे हैं। छोटे से लेकर बड़े सभी "दे दाता के नाम पर" भोपाल और दिल्ली में अड़े हुए है। जोड़-तोड़ बैठा रहे हैं सुनिये ध्यान से सुनिये-- बड़े शौक से सुन रहा था जमाना । तुम हो चुप हो गये दास्तां कहते कहते ।।

आया ये मौसम प्यार का ऋतुएं बदलती है । तुओं के साथ-साथ मौसम भी बदलता है। आदमी तो यक्सर रूप बदलने लमा है । बाहर से कुछ और भीतर से कुछ और रहता है। हाथी के दौर की तरह यादमी का व्यक्तित्व । लेकिन यह आम आदमी का व्यक्तित्व नही है। खासमखास इन्सान का है। ऐसे विशिष्ट व्यक्तित्व से सम्पन्न व्यक्ति मौसम के अनुसार ही सामने आते हैं । ईद के चांद की तरह कभी-कभी दिखाई देते हैं । ऐसे दुर्लम रत्नों का मौसम मम फिर या गया है। नियमानुसार अपने-अपने मौसम में सभी प्यार देते हैं । स्वागत करते है । सम्मान करते हैं । अभिनन्दन करते है। कहते है न "समय पड़ा बांफा तो गधे को कहो काका", यह भी मौसम को बलिहारी है । जब जब पहली तारीख पाती है तब तब मौसम पलो के प्यार उडेलने का और आपका प्यार पाने का मौसम होता है। नौकरीपेशा पति जब घर लौटते हैं तब तुनक मिजाज और पूरे महीने भर उदास रहने वाली, मुरझायी बेल को तरह पत्नी को भी पहली तारीख को खिली हुई देखकर पविदेष गदगद हो जाते हैं । चिड़िया की तरह फुदकने की कोशिश में भारी भरकम भंस भी उस दिन स्वप्न सुदरी बनने के लिए की जान से है। साठोतरी कविता की तरह विना साज श्रृंगार के ही वह लुभाने का प्रयास करती है और सफल भी होती है । इस पहली तारीख का साप्ताहिक कार्यक्रम अपने पूरे जोर शोर से व्यापारियों के यहां भी दीख पड़ता है। रहे के बल पर वसूली होती है और मुद्रा रूपी लक्ष्मी का स्वागत करने घर की लक्ष्मी सदा तैयार खड़ी रहती है । यहां भी मौसम मरपुर प्यार का होता है। हां बदलते युग और बदलते परिवेश में ये पलियो माथे पर विलक लगाकर बारठी नही उतारती परन्तु उनको भावना करीब-करोव वैसी ही होती है । पहली तारीख में स्वागत और सम्मान रण जीवने की खुशो से भर देता है । सबको एक साथ । जुट जाती बापा ये मौसम प्यार का १०६ रमाबंधन भाई-बहन के प्यार का नौतम होता है बहन राखी बांधतो है। मुंह मोठा कराती है तिलक लगाती है । नारियल भेंट करती है । भाई, वहन को प्रेमोपहार में साड़ी में करता है या मनुहार करती बहन को अपनी सीमावों में महमांगा घरदान देता है । रक्षाबंधन के इस पर्व को एक विशेष वर्ग ने "दोनबद्धो बली राजा...." के इकलौते मत्रोच्चारण के साय धंधे के रूप में अपना लिया है । कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है मौसम देखकर कि रक्षाबंधन का सही स्वरूप धुंधना पड़ता जा रहा है। कच्चे धागों में पणा हुआ भाई-बहन के स्नेहिल प्रेम प्रचोक को इस्पात को सी मजबूती प्रदान करने वाला यह पर्व अपनी मूल भावना से हटकर पार्श्व गायकों की तरह पर्दे के पोछे षा चुका है और सामने खड़ी है राखी बांधकर रकम ऐंठने वालों की जमात । अब राखियां धीरे-धीरे उनके घधे की प्रवीक होती पा रही हैं । इसी प्रकार पुनः मौसम बाया है टोपी वासों का पुनः प्यार बताने का । नारेबाजी का । पाहवाही लूटने का द्वारे द्वारे घूमने का हाप जोड़ने का । जमकर बभिनय करने का। कमी-कमी आकाश में बचानक बेमौसम भी बादल छा जाते हैं और गरजते हैं भरपूर । भारतीय कृपक का मनमयूर बच्छी वर्षा को संमावना से नाच उठता है। बिजली भी कड़कती है। बादल पार-बार गरजते हैं। गरज के साथ कुछ छोटे भी पड़ते हैं । सब भ्रम में पड़ जाते हैं। उम्मीद की वर्षा नही हो पाती । बादल गरजकर चले जाते हैं क्योकि ये बादल केवल गरजने वाले होते हैं, कभी बरसते नही बस गरज-गरजकर धोखा देते हैं । सब भ्रम में पड़ जाते हैं। ये केवल अपनी महत्ता सिख करने आते हैं । आकाश में जमे रहना चाहते हैं । अमीन से गले मिलने की ससक नही होती इनमें । केवल नाटक करते हैं धरती को हरी-भरी करने का। हवा कुछ ऐसी बह चली है कि बसंत ने अपनी मुहानी खटा के प्रभाष से वातावरण की सुशियों से भूमते पेड़ों को उत्साह और उमंग से भर दिया है लबालब । चारों बोर हरियाली छाई है। इन्द्रधनुषी षाकाश में पता ही नहीं चलता कि हवा इतरा रही है या पौधे। पर मय फेसर भूम रहे हैं।

११० || लाल बत्ती जल रही है गुमान कि चूहे फुदकने लगे हैं । पुनः भूसको भव को स्मृति को विस्मृत कर चूहे अपने यापको सचमुच का शेर समझ रहे हैं । ठोकर खाकर भी आँखें खुल नहीं पाई हैं । सबकी अपनी-अपनी ढपली है । अपना-अपना राग है वसुरा। उन्हे नहीं मालूम ज्यादा शेखी बघारी तो जनता जर्नादन पुनः मूसको भव की स्थिति में पहुँचा सकती है। हालत यह हो गई है कि कौवों को यह कोयल से अच्छा गाने लगे हैं । कवि के शब्दों में-हजारों जगमगावे / बल्वों के बीच / कतार में लगे एक फ्यूज बल्ब को भो | यह गलतफहमी / उसके ही बालोक से | यह शुभ विवाह सम्पन्न हुआ है । होली सबके बीच प्यार लुटाने का मौसम होता है। शादी-विवाह के अवसरों पर "भड़ौनी" गाने में कोई बुरा नहीं मानता बल्कि सभी रस लेते है उन गालियो में । इसी प्रकार होली में भी देवर-भाभो को ठिोली और जीजा-साली के प्यार मे छलकती बोली सबके कानों में रस घोलती है । "होली है कोई बुरा न माने" कहकर लोग कुछ भी बोल रहे हैं और बुरा मानकर भी बुरा मानने वाले बुरा नहीं मान रहे हैं । क्योंकि आया है मौसम प्यार का । वाया था मौसम वोट मांगने का । परंतु जिनकी टिकट फट चुकी है उनके पास कोई चारा नही है सिवा सिर धुनने फे। हां उनको इस मौके पर पाणो कबीर को याद करना जरूरी हो गया है- माटो फहे, कुम्हार से, तू षया रौदे मोय । इक दिन ऐसा आयेगा, मैं रौंदूगो तोय ।। - Do आप आए बाहर आई भारत एक अमीर देश है जहां गरीब रहते हैं। इस कथन को सत्यता लगातार प्रमाणित होती जा रही है। मंहगाई और आवादी के सारे पुराने रेकार्ड ध्वस्त होते जा रहे हैं। नया सूरज, नयी रोशनी में नये रेकार्ड कायम करने में अपनी समूची ताकत न्यौछावर कर रहा है। इसलिये भारत में अमीरी खूब बढ़ी है। प्रगति चतुर्दिक है। सोपान नये-नये हैं। इसलिये अमीरी के साथ-साथ गरीबी भी खूब बढ़ी है। विकास भी खूब हये हैं । अवमूल्यन भी। सभी प्रगति के पथ पर दौड़ रहे हैं । निरंतर इक्कीसवी सदी की ओर । चर्चाओं के दौर में एक नेता से घिरे-चमचे तरह-तरह से अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। इसी बीच मंत्री न बन पाने का गुस्सा नेताजी ने इस प्रकार व्यक्त किया। मंत्री बनना आजकल बिल्कुल बेकार है। मंत्री जनता से कट जाता है । सच यह है कि जितनी तीव्रगति से देश में रुपये का अवमूल्यन हुआ है, उससे अधिक अवमूल्यन मंत्री शब्द का हुआ है। पहले थोड़े से मंत्री होते थे। कभी-कभी दौरा करते थे। पर अब तो आए दिन कोई न कोई मंत्री रेस्ट हाउस में जमा रहता है । ख्याति सारी की सारी जो गुब्बारे की तरह फूली पो, पंचर हो चुकी है । फिर भी वे आते हैं और आते रहेगे। हम स्वागत करते हैं और करते रहेगे। जब भी छोटे या बड़े मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री आते है, अधि. सारी चौकन्ने हो जाते हैं। दीपावलो आने के पूर्व जिस तरह व्यापारी अपने घरों में रंग रोगन करता है, दुकानें एक बार फिर से चमकाता है, उसी प्रकार जिधर से भी मंत्री महोदय को गुजरना होता है, उधर लीपापोती के माध्यम से सब कुछ पेंट कर दिया जाता है । लम्बे-लम्बे ११२ | लाल बत्ती जल रही है कीचड़ भरे रास्तों का डामरीकरण किया जाता है। चमगीदड़ भगाने के लिये हजारों रुपये का लोहबान जला दिया जाता है। इतना सब होने पर भी जनता जर्नादन खुश इसलिये नहीं होती कि मंत्रीजी आ रहे हैं । आकर इधर से गुजर जायेंगे परन्तु उनका दुख-सुख सुनने की फुरसत उन्हें नहीं है। आम आदमी भी जानने-समझने लगा है इनके वादे कोरे वादे होते हैं । जो सिखाए पूत होते हैं, वे कभी-कभी ही घोड़े पर चढ़ पाते हैं । हो---आश्वासन की चासनी कानों में रस जरूर घोलती है । फिर भी इनका आना बुरा नहीं लगता। सड़कों के गड्ढे भर दिये जाते हैं । जीर्णोद्वार की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। और कभी महामहिम या प्रधानमंत्री जी के चरण रज पढ़ने की संभावना होती है तब तो भागमभाग का नजारा देखते ही बनता है। उन क्षेत्रों, रास्तों और गांवों का कायाकल्प हो जाता है जिधर से उनकी सवारी को गुजरना है । नये-नये बिजली के संभे गाड़े जाते है । सब कुछ चकाचक हो जाता है । 'बहारों फूल बरमाओ-मेरा महबूब आया है' के तर्ज पर स्वागत, अभिनन्दन की तैयारी और अखबारों में एक-एक पृष्ठ में बड़े-बड़े विज्ञापन सुलभ दर्शनीय हो जाते हैं । लगता है क्षेत्र की जनता से लेकर राजनैतिक नेता और अधिकारी सब के सब जागरुक और कर्तव्यनिष्ठ हैं । सबको कर्मठता के फलस्वरूप बसंत अपने समूचे उल्लास के साथ गुनगुनाता हुआ नजर आता है ।। कवायद का असर होना जरूरी है। मेहनत दो-चार दिनों में ही फलने लगती है । रातों-रात फौज लगाकर गांव वालों का उद्धार किया जाता है । उनकी तकलीफें सुनी जाती हैं। फिर दूर करने के प्रारम्भिक प्रयास भी होते है जिन गांवो में महामारी के समय भी डाक्टरों के दर्शन दुर्लभ रहे । उन गांव वालों को अपने जीवन में पहली बार डाक्टरों और नसों को देखने का सौभाग्य प्राप्त होता है। दवाइयों के ढेर को देखकर तो वे आश्चर्यचकित रह जाते हैं। जिन स्कूलों में गुरुजी गायब रहते थे, वहाँ गुरुजी के साथ-साय सा सुपरी टाट-पट्टियाँ और ब्लैक बोर्ड

आप आए बहार आई । ११३
भी सजा-धजा कर उपस्थित कर दिये जाते हैं। नये-नये स्कूल खोल
दिये जाते हैं । गांवों में पोस्ट आफिस के बोर्ड भी लटका दिये जाते हैं ।
रातों-रात वृक्षारोपण हो जाता है। पर्यावरण में तेजी से सुधार होने
लगता है।
यही राजनीति का जादू है
आदिवासी भी कहते हैं
यही जादू नगरी का खेल है
मजदूर और उद्योगपति
दोनों एक साथ कहते हैं-
यही जादूगर का कमाल है
व्यापारी भी खुश हैं वे भी कहते हैं
यह वाटर आफ इंडिया है
डिसकवरी आफ इंडिया है
स्टेप अप में ऋण पाने वाले बेरोजगार भी कहते हैं, "आप आए
बहार आई....।" युवा पीढ़ी के हृदय सम्राट अपनी सफलता पर फूले
नही समाते । ऐसी ही खूबसूरत, मुस्कानों और स्थितियों पर शायर की
ये दो पंक्तियां कही गई हैं-
सच्चाई छुप नही सकती बनावट के उसूलों से।
खुशबू आ नही सकती, कभी कागज के फूलों से ।।
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हीरो अमरता की और गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को दिशानिर्देश देते हुये पूरे आत्मविश्वास के साथ कहते हैं-आत्मा अजर-अमर है। न उसे कोई जिला सकता है, न भिगो सकता है और न काट सकता है। इक्कीसवी सदी को ओर बढ़ते इस भौतिक युग में यह कथन सोचने-समझने के अनेक आयाम छोड़ता है। कृष्ण आगे कहते हैं-मैं सर्वशक्तिमान हूँ। तुम तो निमित मात्र हो । कर्म कर फल की चिंता मत कर । महाभारत के महारथी भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कर्ण और अश्वत्थामा भी जानते थे जहाँ कृष्ण है वहाँ विजय होगी। आज चांद पर कदम रखने वाले वैज्ञानिक भी इस अमरता के रहस्य को नहीं जान सके, लेकिन भारतीय फिल्म उद्योग के बड़े-बड़े कर्णधार प्रोड्यूसरों और डायरेक्टरों ने अमरता के इस रहस्य को पा लिया है। अपनी-अपनी कथा में यह कर्णधार फिल्मी हीरो के जीवन के अनेक उतार-चढ़ाव को चटपटे ढंग से परोसने की कला में सिद्ध हो चुके हैं । वे जानते हैं जिस तरह मारमा अजर-अमर है--जहाँ कृष्ण है वही विजय है-उसी तरह जहां भारतीय फिल्म का हीरो है वहीं विजय है। आत्मा की तरह ही भारतीय फिल्म का हीरो भी अजर- अमर है। ये कर्णधार बताते हैं नेपोलियन ने कभी कहा था 'असफलता' शब्द मेरे शब्दकोष में नही है। भारतीय फिल्म का हीरो पूरी तरह मैपोलियन के कथन पर अपने पदचिह्न रखता हुआ हमारे सामने आता है। फिल्मी परदे पर हम देखते हैं-सभी गुण कांचन हीरो नामक उछलते-कूदते प्राणी में नजर आते हैं । भारतीय फिल्म का हीरो-सर्वगुण-सम्पन्न और सुदर्शन वो होता ही है, यह सर्वशक्तिमान भी होता है। किसी भी फिल्म में देखिये उसको चाहने वालों को भीड़ होती है। परन्तु जिस हीरोइन पर उसका दिल होरा अमरता का भार ॥ ११५ आ जाता है, उस हीरोइन के चाहनेवाले भी जरूर होते हैं । उसका अपहरण गुंडे करते है । एक गैग के सरगना के सामने या तो हीरोइन को बांधा जाता है या उसे नाचने के लिए बाध्य किया जाता है। कुछ गुंडे फिल्म के हीरो को लाकर बांध देते हैं । लेकिन फिल्म के अंत होने से पहले हीरो कोई न कोई तरकीब लड़ाकर अपने बंधन काट लेता है और ढेर सारे गुण्डों की पिटाई करता है । उसके कुछ साथी भी इस समय पहुंच जाते हैं । खलनायक हीरोइन को लेकर भागता है और हीरो उसका पीछा करता है । खलनायक कार या घोड़े पर हीरोइन के साथ भागता है और हीरो पहाड़ की पगडंडियों पर दौड़ता है उसके पीछे । फिर भी वह कार के ऊपर पहाड़ के किसी उपरी हिस्से से कूद जाता है । फिर मारा- मारी होती है। खलनायक उसे धक्का देता है और हीरो कार के नीचे लटक जाता है। सड़क पर कई किलो मीटर कार के पीछे घिसटता है परन्तु उसे खरोंच भी नही आती। हीरो अजर, अमर जो है । पुनः कार पर चढ़कर खलनायक की पिटाई करता है। कार रुक जाती है। जब हीरो, खलनायक को जान से मारना चाहता है तो पुलिस आ जाती है । हीरो को हीरोइन मिलती है । इनाम मिलता है चूंकि वह सर्वशक्तिमान सिद्ध होता है। कभी-कभी जब खलनायक हीरोइन को उठाकर ले जाते हैं और जब भी वे हीरोइन की इज्जत लूटने का प्रयास करते हैं बिल्कुल देवदूत की तरह अवतरित होकर हीरो अपनी हीरोइन की रक्षा करता है । ऐन मौके पर पहुंचने में उसे कभी देर नहीं होती क्योंकि वह अंतरयामी होता है। कई बार जब हीरो तस्करी समाप्त करने का बीड़ा उठाता है तो वह सी० आई० डी० के पुलिस के बड़े अधिकारी के रूप में परदे पर आता है । भारतीय फिल्म का यह हीरो कार एवं ट्रक से लेकर हेली- काप्टर तक सफलतापूर्वक चला सकता है। कई बार तो वह कार उछालकर नदी पार कर लेता है । जंगल का क्षेत्र हो तो घुड़सवारी द्वारा अपराधियों का पीछा करता है । यदि महानगर हो तो १०-१० मंजिल के भवनों में छलांग लगाते हुए बढ़ता है । कभी उससे चूक नहीं होती। सफलता हमेशा उसके चरणरज चूमती है। कभी-कभी दुनिया भर के ११३॥ लाल बत्ती जल रही है छटे हुए और प्रसिद्ध अपराधी उसे घेर लेते हैं । वह निहत्था रहता है । अपराधियों के पास अस्त्र-शस्त्र रहते हैं परन्तु फिर भी वह एक लोहे की छड़ से ही सबको धराशायी करने में सफल होता है क्योकि वह मात्मा की तरह अजर-अमर है। जब कभी भारतीय फिल्म का कोई नायक कालेज में पढ़ने वाला छात्र होता है, तो वह पढ़ाई में सबसे तेज रहते हुए गोल्ड मेडल पाता है । यूनिवसिटी लेबल का खिलाड़ी भी होता है । क्रिकेट में लगातार सेन्चुरी मारकर गावस्कर को भी मात करता है । कालेज के स्नेह सम्मेलन मैं तो उसकी प्रतिमा में चार चांद लग जाते हैं। कालेज के लड़के- लड़कियां जब पिकनिक मनाने जाते हैं तो वहाँ वह कभी माउथ आर्गन तो कभी बांसुरी बजाकर उनका मनोरंजन करता है । डिस्को झन्स भी करता है। भारतीय फिल्म में यह जरूरी है कि यहां किसी न किसी माध्यम से कालेज की सबसे खूबसूरत लड़की उस पर मोहित होती है। वहाँ भी कालेज के कुछ बदमाश लड़के उसे छेड़ते हैं । आप जानते ही हैं, उन सबकी पिटाई करना भारतीय हीरो का जन्मसिद्ध अधिकार है। इस घटना के बाद धीरे-धीरे हीरो-हीरोइन का प्रेम परवान चढ़ता है। भारतीय फिल्म का हीरो अपने डायलॉग और कारतमे द्वारा हृदय परिवर्तन की भी शक्ति रखता है। कई बड़े-बड़े लपराधी उससे प्रभावित होकर आत्मसमर्पण करने को तैयार हो जाते हैं। यदि फिल्म में हीरो गरीब है और हीरोइन करोड़पति बाप की बेटी है, तो प्रारंभ में निश्चित रूप से हीरोइन का बाप उनके प्रेम का विरोध करता है। वह पैसे से हीरो का प्रेम खरीदना चाहता है। परन्तु असफल हो जाता है। धीरे- धीरे फिल्म के अन्त तक गरीब होरो के सद्गुणों से बहुत प्रसन्न हो जाता है । अपनी गलती मानकर होरो को सहर्ष अपना दामाद बनाना सीकार करता है । कुल मिलाकर भारतीय फिल्म का हीरो अद्भुत होता है । लेकिन फिल्मी दुनिया के ये कर्णधार नही जानते और हीरो भी नहीं जानता: वो अपने डंसने को खुद पाल रहा है विषधर । बड़ा अजीब सपेरा है क्या किया जाये। d बोल-राधा-बोल स्पीकर से चारों ओर पंहे चिल्ला रहे हैं । इधर आइए आइए । माता जी पधारिए । सस्ता और विश्वसनीय । देर बिल्कुल नहीं लगेगी सीधे स्वर्ग की गारंटी । पेपर वैक की तरह एकदम किफायती संस्करण निकाला है सुविधा के लिए। पंहे बारंबार गला फाड़ रहे हैं । गला बैठा है फिर भी रुक नही रहा । पापी पेट का सवाल है। इसलिए दिन और रात चलो भाइयो चलो। माताओं और बहनों जाओ। देखो फिर बारह वर्ष तक सुनहरा मौका हाथ नही लगेगा । आओ और बटोर लो ढेर सारा पुण्य । इस सदी का यह है । कुंभ का मतलब आप जानते ही हैं । गंगा स्नान और इस लोक के साथ-साम परलोक भी सुधारना । दानी भी पीछे छोड़ देते है । दोनों हाथ से उलीचते हैं लक्ष्मी । और सरस्वती के संगम का है। पर भागते हैं, सब संगम होता है यहां लक्ष्मीपुत्रों का । कहते हैं न बारह बरस के बाद धूरे के दिन भी फिर जाते हैं। वैसे ही कुंभ दर कुंभ होते हैं--और ठीक बारह बरस बाद सट्टे की डबल जोड़ी की तरह है चतुर्दिक संगम ही संगम । बचपन से ही संगम की महिमा उसकी गौरवगाथा सुनता आ रहा है। सभी बड़े-बूढ़ों ने, नानी ने, दादी ने संगम की महत्ता गाई । नाना प्रकार की कहानियों में । मेरा बालक मन मधुर लगाकर संगम देखने के लिए छटपटाता रहता था। इसी समय राजकपूर की फिल्म 'संगम' देखने का सुयोग आया तो तीर्थराज प्रयाग का संगम देखने को मन बेताब बैचेन रहता । वर्षों बाद संगम स्नान की दीर्घकालीन मनोकामना पूर्ण हुई और संगम का चमत्कार देखा । गंगा-यमुना के साथ संगम तो नहीं देख पाया। बताया गया सरस्वती अदृश्य है । वहाँ दुसरे संगम देखे । आइए आप भी देखिए । मेरे साथ :--- ठंड की गुलाबी दुल्हन ने-सुबह-सुबह जैसे ही अपना घूघट खोला इमारी स्पेशल बस नदी के पास आ खड़ी हुई । उतरकर देखा । जिस ११८ ॥ लाल बत्ती जल रही है मोर नजर जाती उस मोर छत्ते की तरह आदमी ही आदमी दिसाई पड़ने लगे । एक-एक कर हाथ में लोटा लिए दिशा मैदान की खोज । ऐसा लगा उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव की पोज विना बर्फ के हुई है। परन्तु न मिलना था अतः नहीं मिली साफ-सुथरी जमीन । किनारे दूर- दूर तक गू की अनन्त ढेरियां अपने विभिन्न रूपों में इठला रही थी। थामंत्रित कर रही थी आप भी थाइए। कैसे इस अद्भुत बाजार में इक्कीसवी सदी में जाने का पसंद प्रवुद्ध मानव समूह सब कुछ भूल चुका था। थोड़ी-थोड़ी दूर में कभी न समाप्त होने वाले इस महायज्ञ में सभी अपना योगदान दे रहे थे। छोटी-छोटी बासी ठेरियो को पैरों से रौंदते हुए घृणा से मन भर जाता था। पुनः याद आती संगम की । मुक्ति की आकांक्षा लिए मन कड़ा करके में आगे बढ़ गया। यह था संगम से मेरा पहला साक्षात्कार । सचमुच यहां ब्रह्म एकाकार हो जाता है। स्नान के पश्चात मंदिर जाते हुए मंदिर के भीतर गूगल और अगरवत्तियों के साथ गन्दी नाली के बदबू का संगम । मंदिर के दोनों और कतारबद्ध कोढ़ियों, अपाहिजों, भिखारियों और कामगारों के साथ गले में कैमरा लटकाये विदेशियों का संगम । विदेशी भी खूब आते हैं। रिर्पोताग लिखते हैं । फिल्में बनाते हैं और वाहवाही लूटते हैं । वहाँ देखिये आप कृष्ण और सुदामा का मिलन नये अंदाज में । मंदिर के आसपास गोदान द्वारा स्वर्ग की टिकिट का रिजर्वेशन होता है । इक्कीस रुपये दीजिये और रिजर्वेशन पाइए। देखिए वहां पाखंडी मुस्टंडों का संगम । नंग-धडंग फकीर और थी पीस सूट में कार से उतरने वाले शहंशाह का संगम । विशाल भीड़ भरे मेले में दुकानों पर एक-एक क्विटल उबले आलुओं का ढेर और उस पर लगी हल्दी का संगम । नवपल्लवित कोपलों की तरह कोमल किशोरियो के साथ-साथ आम के मोरों की तरी यौवन भार से लदी रमणियों और टूठ की तरह सुखी कुबड़ी वृद्धाओ का संगम पूरे मेले में तैर रहा था। इनके आस-पास भी घूम रहा था परोपकारी के पुण्य और भ्रष्टाचारी के पाप का संगम ।

बोल-राधा-बोल। ११६ वहाँ मापस में कुछ लोग चर्चा कर रहे थे। कोई कह रहा था कि मिट्टी के घड़े को कुम्भ कहते हैं। कोई कह रहा पा गंगा स्नान को ही कुम्भ कहते हैं। पंडों द्वारा लुटा गया एक ग्रामीण बेचारा बोल रहा था-भाई लूट-खसोट का ही दूसरा नाम कुम्भ है। यहाँ मंदिरों में प्रसाद बिकता है। भगवान के दर्शन के लिए भी घूस देना पड़ता है। एक नेतानुमा आदमी बोल रहा था। सरकारी कार्यालयों में आफीसरों की जिस तरह काकागिरी चलती है उससे बढ़कर दादागिरी कुम्भ पर्व में पंडों की रहती है। एक नेताजी धार्मिक पुस्तकों की दुकान का उद्- घाटन करते हुए कह रहे थे। भारत धर्मप्राण देश है । कुम्भ हमारी धार्मिक परंपरा का उज्जवल प्रतीक है । कुम्भ का अर्थ है दीन-दुखियों की सेवा करना । हमारी पार्टी दीन-दुखियों के साथ हरिजन, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों की सेवा के लिये दृढ़ संकल्प ले चुकी है। गंगा सब को मां है ।... मेरा किशोर मन घुपके से मुसकुराता है-बोल राधा बोल-संगम होगा कि नहीं ? इधर नेताजी का भाषण चल रहा है और उधर इम्पोर्टेड कार से उतरते हुए अपने पुराने जजमानों को देखकर एक वृद्ध का सूटधारी नौजवान बेटा गुनगुनाने लगता है- हम तुम्हें चाहते हैं ऐसे। मरने वाला कोई जिंदगी चाहता हो जैसे । - रेत पर चाँद को तस्वीर बनाने वाले कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं होती परन्तु वी० आई० पी० की दुम दो रूपों में सामने नजर आती है । कभी दुधारू गाय की तरह सीधी तो कभी मरकहे सांह की तरह टेढ़ी । समय का फेर है जब जैसा रूप वे दिखा दें। दुम की विशेषता के आधार पर ही वी० आई० पी० का भूगोल पढ़ा जाता है और फिर कोरे कागज़ पर चांदा एवं त्रिभुज का प्रयोग कर सूत्र सिद्ध होते हैं । वी० आई० पी० ट्रीटमेंट मिलते ही आदमी, आदमी नही रह जाता । सीधे परलोक में पहुंच जाता है। कल्पनालोक की लम्बी उड़ान में स्वयं-भू बनकर इतराने लगता है । अपनी गणना विश्व की महानतम विभूतियों में करके प्रसन्न होता है। फिर भी संतोष नहीं होता । शेख- चिल्ली की भांति वह घड़े पर लात नही जमाता तब तक उसे होश नहीं माता । ऐसी हरकते करने लगता है कि बच्चे भी तालियां बजाकर हंसते हैं । महिलायें भी उसे अपनी जिह्वा के केन्द्र में ले जाती हैं। बुजुर्ग कहते हैं-"दिमाग चढ़ गया है ससुरे का।" कोई कहता है-"पगला गया है", तो कोई "चर्बी चढ़ गई है साले को।" आदि अनेक आख्यान योर कहावतों का जन्म होता है । परन्तु सामने पड़ते ही सब के सब हाथ में फूलों की माला लिए दंतनिपोरी करते खड़े हो जाते हैं । कोई रोकने- टोकने वाला नही होता । सव जी हुजूरी करते है। लगातार वाहवाही से घिर कर वी० आई० पी० का दिमाग कुंद होने लगता है। कुछ लोग बेचारे कुछ भी नही होवे । जानते हैं वे अपने जीवन में कभी वो० आई०पी० नही बन पायेंगे। वे वी० आई० पी० मूटकेश खरीद कर ही अपनी आत्मा को शांति प्रदान करते हैं। पत्नी का मन बहलाते हैं । अपने नन्हें आवास गृह में प्रत्येक आंगतुक को चमचमाते वी० आई०पी० का दर्शन जरूर कराते हैं। बताते हैं। वह ऐसा वैसा नहीं है । वह भी वी० आई० पो० प्रीफकेश रखता है। वैसे आज-कल -- रेत पर चांद को तस्वीर बनाने वाले || १२१ बी० आई०पी० ब्रीफकेश का स्थान मिनी टी. वी. ने लिया है । टी. वी० आज के समाज का यथार्थ बन गया है । वही ड्राइंग रूम की शोभा है । परन्तु यात्रा करते समय वी० आई० पी० ब्रीफकेश के शान ही निराली होती है। बार-बार उसे खोलना और बन्द करना । श्रीफकेश की गुणवत्ता का बखान करते हुये, सहयात्री की वानवृद्धि करते हुए अपने को छोटा-मोटा वी० आई० पी० सिद्ध करना उनकी चारित्रिक विशेषता बन जाता है। व्यक्ति बी० आई० पी० न हो तब भी अपने आपको सिद्ध करने के लिए अनेक सूत्रों का उपयोग करता है । क्योंकि यह मांग और पूर्ति के 'लिये नियम के अनुसार युग की धड़कन है। अपने आपको वी० आई० पी० सिद्ध करना एक फैशन है। पहले सूत्र के अनुसार गम्भीरता का चोला वैसे ही ओढ़ लेता है जैसे गदहे ने राजा बनने की सोचकर शेर को खाल ओढ़ ली थी। उच्छृखल व्यक्ति जब धोर, वीर, गम्भीर बनता है तब ऐन मौके पर ओढ़ी हुई गम्भीरता गधै की आवाज को तरह धोखा दे देती है । हाँ, जब तक वह गये की तरह चीपों ची...पों नहीं करता वी० आई० पी० के नाटक में अपना रोल सफलतापूर्वक अभिनीत करता है। सूत्र नम्बर दो के अनुसार पारिवारिक उत्सवों में, मरनी-धरनी मे, पूजा मे, विवाह उत्सव में और विभिन्न डिनर पार्टियों में कभी भी समय पर न पहुंचाना । विलम्ब इतना अधिक करें की आयोजक पुनः पधारे। फिर भी धकमे पे चकमा । कभी सिरदर्द तो कभी विस्मृति की आड़ लेकर उससे हंसते हुए बिनम्र क्षमा याचना और वी० आई० पी० की औकात सिद्ध कर देना। कुछ लोग इससे भी दूर को कोड़ी लाते हैं । जब कभी दूर गांव या अपने शहर में कोई सांस्कृतिक, राजनैतिक, सामाजिक या साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित हो, पहले जुगाड़ फिट करना । मुख्य अतिथि के लिये जब आयोजक प्रस्ताव लेकर आये तो नई नवेलियों की तरह नखरे १२२ । लाल बत्ती जल रही है करना । फिर भी 'मन भावे मूड़ हिलावे' के सिद्धांत के अनुसार स्वीकृति देकर ऐन मौके पर खिसक जाना। इंतजार की तो बात ही अलबेलो है। जब कोई भेट हेतु पहुँचे तो तब भीतर से चन्द्रमुखी की तरह मुस्कुराते हुए आना जब वह जाने लगे, यदि भूल से वे बैठक में ही विराजमान है तो बैठे-बैठे ही मुस्कुराकर उनका स्वागत करना । फिर न्यूज पेपर पढ़ने में मग्न हो जाना । जब आगन्तुक लोटकर जाने लगे तो बैठे-बैठे ही उन्हे विदा कर देना। यह सब अपने आपको वी० आई० पी० सिद्ध करने की कला के नमूने हैं और भी बहुत से कलात्मक क्रिया-कलाप हैं। को मुंछ के तेवर दिखाकर अपनी कला पेश करता है। तो कोई पहलवानी का दाव दिखाकर वी० आई० पी० बनता है । बहुत से लोग टोपी पहनकर अपने करतब दिखाते हैं । कोई लाल टोपी पहनता है तो फोई नीली-पीली। किसी को काली टोपी पसन्द है तो किसीको सफेद टोपी । कुछ लोग हरी टोपी पहनकर हरीतिमा और शांति का सन्देश देते हैं । कुछ लोग टोपी का रंग मौसम के अनुसार बदल लेते है । वी० आई० पी० लम्बी फौज में ऐसी ही विशेष दुम के लिए किसी शायर ने कहा है- क्या मिलेगा तुझे विखरे हुए स्वाबों के सिवा । रेत पर चाँद की तस्वीर बनाने वाले। .

पद यात्रा मदारी का जमूरा जैसे दर्शकों को रिझाने के लिए नये-नये करतब दिखाता है। हंसाता है । वैसे ही जब जब चुनावी बादल आकाश पर मंडराने लगते हैं नेता भी नये-नये करतब दिखाते हैं। आश्वासनों की बिजली चमकाते हैं । जनता को रिझाने के लिए । कुर्सी पाने के लिए । करवबों में मया करतब बना है इस बार "पद यात्रा" और पद यात्रा के बहाने जन- सम्पर्क । जनसम्पर्क के बहाने मस्का लगाना । फिर चुनाव का आना । और फिर वोट का पाना और फिर कुर्सी को हथियाना । वैसे चरम पद की प्राप्ति के लिए स्वयं के "पदो" का सदुपयोग भारत की एक प्राचीन परंपरा है। जो बनती-बिगड़ती रही है। इतिहास साक्षी है कि पद यात्रा के तपस्वियो ने अनेक राजमुकुटों को धूल में मिलाया है। अनेक राजसिंहासन के सरताजों को नंगे पांव जमीन पर चलने को बाध्य किया है। ऐसा कहा पाता है कि निःसंतान अकवर ने मीलों चिलचिलाती धूप में नंगे पांव चलकर फकीर मोलिया की दरगाह से दुआ के बहाने सलीम को मांगा था। पद यात्रा के इतिहास की खोज खबर लेते हुए पद यात्रा के महत्व को हिमालय की ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाला एक और पुराना किस्सा जेहन में कुलबुला रहा है। किस्सा यों है कि किसी जमाने मे वर्षों से एक बीमार यादमी था। तत्कालीन राज रोग तपेदिक का। सौभाग्य से सम्पन्न था। परन्तु उसका दुर्भाग्य वह अपनी सम्पन्नता को तपेदिक के कारण नहीं भोग रहा था। उसके हृदय में कमचील की फांस की तरह गहरे फंसकर यह रोग उसे रात-दिन वेचैन किये रहता था। सैकड़ों वैद्य, गुनिया, तांत्रिक सभी ने इलाज किया परन्तु उसे वे तपेदिक से छुटकारा न दिला सके । कारण पा हरदम पसरे रहना । दिन-रात जुगाली करना और कोढ़िया वैल की तरह मेहनत से जी चुराना। वे घटोरे सज्जन किसी के भी निर्देशों को - १२. लाल बत्ती जल रही है अमल में नही लाते थे। फलस्वरूप यह कहावत सच उतर रही थी उनको कंचन सी काया पर--"ज्यों ज्यों दवा की मज बढ़ता ही गया।" एक बार गाय की सीमा में एफ सिद्ध योगी पहुंचे । रोगी ने उनके चरणों में दण्डवत प्रणाम किया और अपनी व्यथा कही । योगी जी बौने, वत्स ! एक वर्षको पद यात्रा पर यकले निकल जायो। निम्न दो बातों का कड़ाई से पालन करना । पहली, एक गांव में एक रात रुकना । दूसरी, जिस गांव मे रुको यहां एक बार भीख मांग कर पाना । एक वर्ष बाद जव वापस आयोगे तपेदिक से मुक्त हो जाओगे । सचमुच एक पपं बाद यह ठीक हो गया । कारण उस जमाने में गांव बहुत दूर-दूर होते थे । अतः ८-१० कोस प्रतिदिन चलना पड़ता था इस प्रकार अधिक मेहनत और रूखा-गूखा व कम खाना इन दोनों दातों के संयोग ने उसका रोग दूर कर दिया। उसी समय से पद यात्रा का महत्व बढ़ा और परैवेति-चरैवेति का मूल मंत्र बहुत सोकप्रिय हुआ। राजतंत्रीय व्यवस्था में राजा, महराजा बोर नवाव भी कमी-कमी पद यात्राएं करते थे वोंकि वे पद यात्रा के महत्व को समझते थे । रप, घोडे और सजे-धजे हाथियों की सवारी में जब वे निकलते थे तो राज्य में चारो और उन्हें अमन चैन ही दिख पहता था। तत्कालीन समाज मे जनता के सुख-दुख को अपने वजीरो की, मंत्रियों को और सलाहकारों की फौज द्वारा नहीं जान पाते थे। अपनी गुप्तचर व्यवस्था पर उन्हे पूरा भरोसा था फिर भी वे "पद यात्रा" के महत्व को समझते थे। राज्य में चल रही आतरिक गतिविधियो की जानकारी के लिए वे वेश बदल कर यात्राएं करते थे । पद याना द्वारा अपनी पकड़ मजबूत रखते ये अपने राज्य पर । फिर बाजकल तो प्रजातंत्र है । हमेश-हमेशा न सही कभी-कभी तो अपने महत्व को पुनः प्रतिपादित कराने के लिए पद यात्रा का फैशन चल पड़ा है। पद यात्रा के इस दौर में जाने-अनजाने सभी सम्मिलित हो गये हैं । जैन सम्प्रदाय के मुनियों ने भी पद यात्रा को बहुत महत्ता प्रदान की है । पर्तुमास के विशेष अवसरों को छोड़कर वे अपना सारा जीवन सत्संग पद यात्रा। १२५ और धर्म प्रसार के लिए समर्पित करते है । यह प्रसार वे पद यात्रा द्वारा ही करते है। जैन साधु एवं साध्वी सभी पद यात्रा पर निकलते है। एफ शहर से दूसरे शहर, सांसारिक राग-विराग से दूर होकर इन सन्यासियों को पद यात्रा के दौरान गांव की या शहर की सीमा तक सांसारिक मोह माया के जाल में डूबे इनके अनुयायो श्रद्धालु भक्त रास्ता बुहारते (साफ करते) चलते है । ताकि इनके नंगे पैरों को पद यात्रा के दौरान कोई कष्ट न हो। बीसवी सदी के आधुनिक इतिहास में पद यात्रा के सबसे बड़े पक्षधर विनोबा भावे रहे हैं । "जैसी कथनी वैसी करनी" के अनुरूप हो उन्होंने पद यात्रा का संकल्प लेने के बाद आजीवन पद यात्रा हो को। कभी अपवाद स्वरूप मजबूरी में स्वास्थ्य गिर जाने के कारण "कार यात्रा' भी कर ली। अन्यथा वे पद यात्रा के सच्चे समर्थक थे । मनसा वाचा कर्मणा । बड़े-बड़े ओलम्पिक और एशियाड हो गये । परन्तु पद यात्रा उनके रिकार्ड को विश्व में कोई छू भी नहीं सका। क्योंकि बेचारे आयोजक भी वैसी कोई पद यात्रा को प्रतियोगिता रखने में अपने आपको असमर्थ पाते हैं । हो "ऐसा माना जाता है कि विनोबा भावे पद यात्रा के विशिष्ट उद्देश्यों को लेकर, गांव-गांव भूदान के उद्देश्य से भूमिपतियों के हृदय परिवर्तन के लिए करते थे। परन्तु समय के साथ शब्दों के महत्व भी बदल जाते हैं । उद्देश्य भी बदल जाते हैं। यही हाल पद यात्रा के साथ हुआ है। हमारे एक कवि साथी हैं मुकुन्द कौशल, उन्होंने वर्तमान संदर्भ में पद यात्रा के अर्थ पोर महत्व को नये ढङ्ग से, नये रूप से परिमापित कर सही अर्थ प्रदान किया है। एक नयो परिभाषा गढ़ी है पद यात्रा को-पद के लिए / पद के द्वारा जो यात्रा को पाती है | यह पद यात्रा कहलाती है । "वाज परिस्थितियों के दबाव में युग के सत्य को प्रतिविवित करती है।" उनको पह परिभाषा । कहते हैं महत्वकांक्षा जब उछाल मारती है तो सारे घेरे छोटे हो जाते हैं। स्वार्य जब अपना सर मचा उठाता है तब सारी मर्यादाओं को तोड़कर आदमी अपने कर्तन दिक्षाने लगता है। सरकस के १२६ | लाल बत्ती जल रही है जोकर की तरह अनोखी हरकतें करता है। उसका उद्देश्य जनता का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना हो जाता है । इन नवीन संदी में सब के सब धनुर्धारी अर्जुन के नक्शे पर चल पड़े हैं। जिस प्रकार अर्जुन को लक्ष्य भेद के समय केवल चिड़िया को आंख दिखलायी पड़ रही थी उसी प्रकार इन्हें केवल कुर्सी दिख रही है । अर्जुन ने धनुष-बाण के बदले हैं पद यात्रा, पद यात्रा और लक्ष्य है कुर्सी। साम्राज्य न सही एक कुर्सी ही मिल जाय तो इनकी मनोकामना पूर्ण हो जायेगी । और जिन्हे मिल चुकी है कुर्सी, वे चाहते हैं वरकरार रहे परम्परा कुर्सी की आने वाली पीढ़ियों के लिए भी । राजा रामचन्द्र ने भी १४ वर्प सपत्नीक पद यात्रा रामराज्य के स्थायित्व के लिए ही की थी। इसलिए बीसवी सदी के आधुनिक राम भी पद यात्रा करने में जो जान से जुड़ गये है। हालांकि उनकी स्थिति धन के मार्ग पर वनवास जाती हुई सीता की तरह हो जाती है । तुलसी के शब्दो में- पुर ते निकसी रघुवीर बघू, धरि धोर दए मग मे डग दें। झलकी भरि भाल कनी जल की, पुट सुखि गये मधुराधर वै ।। पर क्या करें बेचारे मजबूर हैं । युग की मांग के अनुरूप अचारण करना ही पड़ता है। अभी फैशन चला है इस पद यात्रा का । लगता है बस यही एक रास्ता रह गया है। सड़क के ससद तक जाने का । धान के कटोरे से विधान सभा के झरोखे तक पहुंचने का दिल्ली और भोपाल में पांच साल के लिए मिल जाय हवाखोरी करने का पास । इसलिए कर रहे हैं धुंआधार पद यात्रा सब के सव । कुछ समय की पुरानी बात है एक दाढ़ी वाले महारयो ने सम्पूर्ण थार्यावतं नाप लिया पैरोसे । कश्मीर की बर्फीली चोटियो से हिन्द महासागर की गोद मे कन्याकुमारी तक पद यात्रा कर डाली। कुन्दन को धरह चमकने सगी उनकी छवि । सभी को चारों खाने चित कर दिया । झण्डा गाड़ दिया कंचा। विनोबा के बाद घाली लिस्ट में चमकने लगे । ताल ठोंक हो । है कोई माई का लाल । मन ही मन मुस्कुराने लगे। सभी महत्वपूर्ण व्यक्ति उनसे पद याना ॥ १२७ मिलने जाने लगे। और वे चैन की बंशी बजाने लगे। सबसे बड़ो कुर्सी पाने के ख्वाब सजाने सगे। भारत तो ऐसे महारथियों और दिग्गजों का गढ़ रहा है। भारत के प्रथम प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का निधन हुआ था तब किसी ने कहा था, "माना कि हमने एक साल खो दिया है परन्तु भारत मां की गोद में लालो को कमी नहीं है।" भारत तो माई के सालों का देश है । महारथी की इस सुनौती को यहाँ के कण-कण में फैले "लाल" सर के ऊपर से कैसे जाने देते। स्वीकार किया उन्होने और करने लगे यात्रा । अरे नहीं भाई-पद यात्रा । हंके की चोट पर अपनी-अपनी औकात देखकर। जिनके मन में दिल्ली का दरबार देखने की चाहत ने अंगड़ाई ली उन्होंने बना दी सड़क अपने घर से राष्ट्रपति भवन तक । वहाँ पहुँच हो गयी। कछुए की चाल से । पद यात्रा के मध्य तुलसी और मौसंबी के रस पीते हुए, ताजे फल खाते हुए गुलाबी से लाल होते हुए । स्वागत हुआ भरपूर । होना ही था । बधाई मिली । फ्लैश चमके हरी झंडी और आश्वासन दोनों मिस गया आने वाले समय के लिए । भविष्य सुरक्षित हो गया। पद यात्रा के इन दावेदारों में कुछ लौटे हवाई जहाज से तो कुछ लौटे रेलगाड़ी से । कुछ लोगों ने मुनियों, त्यागियो और तपस्वियों को सास्कृतिक परपरा को ध्यान में रखा रामराज्य और भारतीय संस्कृति की दुहाई देते हुए। जंगल, पहाड़ और नदी की ओर बढ़ चले । पद यात्रा प्रारंभ हुई । उपेक्षित और तिरस्कृत आदिवासी हरिजन, मादिम जाति एवं जन जाति के स्यायो निवासों के दुर्गम क्षेत्रों को अपने इस महायज्ञ (पद यात्रा) का लक्ष्य बनाया । कहने लगे द्वार-द्वार जाकर अब चिन्ता की कोई बात नहीं है । तुम्हारे सच्चे दिन आ गये है। हम लोग जाग गये है । अब घर-घर जाकर सबकी समस्याएं सुनेंगे । (कोई मसखरा बीच में ही चुहल करता है, भाई अभी ये फेवल समस्याओं को सुनेंगे फिर पांच साल बाद आयेंगे तो उन्हे हल करने पर विचार करेंगे । और फिर पांच साल बाद आयेंगे तो हल करने की दिशा में कारगर कदम उठायेगे।)

१२८ || लाल बत्ती जल रही है बड़े-बड़े महाराषियों ने जब पद यात्रा कर डासो वो छुटभैये क्यो पीछे रहते उनका तो मूल मंत्र है-महाजनो येन गतः...| वे भी चल पड़े हैं अपने अगुवा महारथियों की राह पर । पद के लिए पद यात्रा की राह पर । सभी अपने-अपने क्षेत्र में साप्ताहिक पद यात्रा का आयोजन कर रहे हैं। कुछ एक दिवसीय पद यात्रा में अपना योगदान देकर ढोल पीट रहे हैं । नित-नयी योजनाओं और करिश्मों के इस देश में अवसरवादी अब पद याना का मोह छोड़ कर करने लगे हैं शीर्षासन । चाटने लगे हैं तलुवे । फिर भी पद यात्रा के विना जनता के सुख-दुख से नहीं जुहा जा सकता। इस जेट विमान के युग में । कभी-कभी रेल मत्री भी एयर कडीशन के शानदार डिब्बों को छोड़कर अचानक द्वितीय श्रेणी के डिब्बों में यात्रा करके जनता के दुख-दर्दो में हिस्सा बंटाते हैं। उन्हें दूर करने के प्रयत्न करते हैं । उसी प्रकार यब हमारे स्वयंभू नेतागण भी पद यात्रा द्वारा जनता के दुखो को गहराई तक जानने में लगे हैं । जी जान से । वे यहां-वहाँ पद यात्रा करते हुए पाये जाते हैं- "जाके पैर न फटी बेवाई, वे क्या जाने पीर पराई।

- सुनिए । ववुया चन्द्रमुखो ! सूर्यमुखी !! ज्वालामुखी !!! कुलीन नारियों ने दस्तखत करते सोखे । उनकी सुपुत्रियों को जिस शिक्षा ने साभर बनाया है उसी किवावी शिक्षा का प्रचार-प्रसार बढ़ा है । अपनी मुर्गी को एक टांग वाले बुद्धिजीवी भी बहुत पैदा किए हैं उसने । ऐसे युवको को जन्म दिया है बहुत बही वादात में जो हाय मे डिग्रियाँ थामे दरबदर नौकरी के चक्कर में चप्पलें ही नही अपनी उम्र भी घिस रहे है । ऐसे हो युवकों का प्रतिनिधित्व करने वाली एक युवक की सरस प्रेमकथा प्रेमक 1 उसको चन्द्रमुखी पत्नी की प्रेमकया । वबुआ प्रतिदिन चिलचिलाती धूप में हर दरवाजे पर जाते हैं । "नो वेजेन्सी" का ठंडा-मीठा शबंत पीते हैं । रात को घर लौटने पर कभी बाजो को तो कभी अम्माजी की डॉट खाते हैं। कभी-कभी भाभी जी भी पट रस भोजन में प्यारी-प्यारी झिड़कियां परोसती हैं । कल तक छान नेता पे तो सब और पूछ होती थी। आज बेरोजगार हैं तो सब कुछ छिन गया । तूफानी विद्रोही व्यक्ति धीरे-धीरे दब्बू होता जा रहा है। फिर भी एक दिन बिल्ली के भाग से छीका टूट गया। मिल गई नौकरी चार सौ रुपल्ली की। बबुआ धूमधाम के साथ क्लर्क हो गये। गढ़ जीत लिया। इसके बाद सूर्य पचन्द्र को तरह अटल "वेटिंग सिस्ट" मे अटकी हुई नौकरी के बाद माती है छोकरी जिसे बाद में पत्नी के नाम से जाना जाता है। बहुत भाग्यशाली थे बबुबा । क्लर्क होकर भी प्रोफेसर पली मिली। पहले पहल चन्द्रमुखी पली के प्रेम में लिपटे बबुआ बहुत तारीफ करते थे अपनी प्रोफे- सर पत्नी की । धीरे-धीरे बेचारे बबुआ का मोह भंग हो गया । पत्नी को पालने को इच्छा रखते हुए भी अब पत्नी उन्हें ही अपने यादेश के पालने में मुलाने लगी। मैंने एक दिन उन्हे समझाया था । ज्यादा मत रीझना बबुआ। मेरो बात गांठ बांध लो। पत्नी रूपी दुल्हन पहले १३० || लाल बत्ती जल रही है पहल जब देहरी पर पैर रखती है तब उसे सभी चन्द्रमुखी कहते हैं और वह वर्ष भर चन्दाको तरह शीतल बनी रहती है। पति वेचारापारिवारिक नाटक के प्रथम अंक मे ही अपना होश खो बैठता है । पर जैसे-जैसे पारि- पारिक जीवन को मालादिव करने वाली राम ढलती है । मूर्योदय होता है। धीरे-धीरे चन्द्रमुखी अपने सद्गुणो से सूर्यमुखी कहलाने लगती है। समय का मूर्य जैसे-जैसे कपर उठता है सूर्यमुखी का तेज बढ़ता जाता है । विकास प्रकृति का नियम है । प्रगति के उच्चतम सोपानों को लोधता पत्नी चन्द्रमुखी से सूर्यमुखी बनती है और धीरे-धीरे वह घर भर के लिए ज्वाला- मुखी बन जाती है। प्रारम्भ में बबुआ ने मेरी एक न सुनी पर यब कभी-कभी आ जाते है । चन्द्रमुखी से सूर्यमुखी बनी पत्नी की गाथा सुना जाते हैं । कहते हैं पत्नी का प्रमोशन भी धड़ाधड़ हो रहा है। उसकी मुस्कुराहट के साथ हो । मैं वही खूटे पर बंधा हूँ। हर जगह पुरुषों के हाथ से तोते उड़वे जा रहे है । वे दुखी स्वर में कहते हैं क्या करूं भाई । करनो का फल भोग रहा हूँ। माफिस में महिला सुपरिटेन्डेन्ड का कड़ा प्रशासन रहता है तो घर पर पत्नी प्रोफेसरी बघारती रहती है। पढ़ी-लिखी पत्नी पाने का सुख हो और है। बराबरी की मांग करतो है हर कदम पर। कहती है पहले प्रोफेसर बनी फिर अपना शान वधारना। एक बात कहो तो दस सुनाती है। एक मारो वो दो मारती है। गया जमाना मर को बाल का। और क्यों न जावे ? अब तो सब सफाचट क्लीन शेव का मामला रखते हैं। प्रोफेसर पली कहती है। पहले घर में समाजवाद लायो । मुझे अवसर की समानता दो। मैं भी मित्रों के साथ १२-१२ बजे रात तक घूमना चाहती हूँ। तुमने अकेले ठेका नहीं ले रखा है। पहले मेरी सुनो। मेरी सेवा करो। फिर लाना समाजवाद देश में। पहले बाल-बच्चों के लिए संघर्ष करो फिर दोन- दृषियों को सेवा करना। उनके अधिकारों के लिए संघर्ष करना । बड़े कम्युनिस्ट बने फिरते हो। पूरी जिंदगी में दो कमरे का मकान नहीं बना पार। सरकार बनाने चले। तुमसे अच्छो तो मैं हूँ। देखो ! जहाँ जाती चन्द्रमुखी ! सूर्यमुखी !! ज्वालामुखी !!! || १३१ हूँ-सम्मान पाती हूँ। मैडम के पदचिन्हों पर चल रही हूँ। मुझे तो इस वार हो टिकिट के लिए आफर दिया था उन लोगों ने। मैंने ही मना कर दिया। तुम्हारी घर गृहथो का जंजाल नही होता तो मैं भी एम० एल० ए० बनकर ठाठ से भारत भ्रमण करती। कहीं उद्घाटन वो कहीं शिलान्यास करती। अपने लड़के को कुछ न कुछ बनाती । पर तुमसे पिंड टूटे तब न। इस बीच बबुआ का ट्रांसफर हो गया। वह वर्ष अन्तर्राष्ट्रीय महिला अपं था जब बबुआ का ट्रासफर हुआ । आज उनका पत्र दस-बारह वर्षों बाद आया है। सूर्यमुखी से ज्वालामुखी बनी पत्नी का लेखा-जोखा है। लिखा है भैय्या तुम्हारी बात सच निकलो। अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष में पत्नी की सैकड़ों बेवकूफियां झेली। पूरे ३६५ दिन कमी गोष्ठी, कभी सम्मेलन तो कभी पार्टी में जाती रही। लोटने का कोई ठिकाना नही । पूछने पर कहती। तुम क्या जानो ? महिलाओं के विकास के लिए हमको कितने पापड़ बेलने पड़ रहे हैं। कभी तुमने पापड़ बेले हों तो उसके दर्द को समझी। कभी हाथ नही रखने दिया। थकी हारी आई हूँ कहकर । तुम लिखा कितने ही पढ़ लिख जाओ। तुम्हारी जाति हो ऐसी है। भावना और प्रेम को नहीं समझ सकते। तुम्हारे लिए तो पत्नी एक खिलौना है । अन्तर्राष्ट्रीय महिला घर्ष से अन्तर्राष्ट्रीय युवा वर्ष तक लगा- तार सुन रहा हूँ। अब शाति वर्ष की बात मत पूछो ? युवा घर्ष में ही। बुढ़ा गयी थी। परन्तु फिर से युवा बनाने की धुन सवार यो। कहती थी । जब प्रधानमन्त्री ४० वर्ष में युवा हैं तो मैं क्या ४५ वर्ष में ही बूढ़ी बनकर बैठ जाऊँ। तुम बैठे रहो हाथ पर हाथ धरकर । आखिर तुम भारतीय युवक हो न । पत्नी को पैर को तो ही समझते रहोगे । खून का असर कभी नही जाता । आखिर तुम्हारे पूर्वजों का पून जो दौड़ रहा है तुम्हारी रगों में । शेर की खाल ओढ़ लेने से सिपार शेर नही हो जाता। ध्या करूं भाई भाषण बन्द करने के लिए २-२ बजे रात को चाय बनाकर पिलाना पड़ता है। और फिर उनके खर्राटे सुनकर रात विवाती हूँ। कठोर १३२ ॥ लाल बत्ती जल रही है हृस्या कोमलांगी पली के भीतर इस सद्गुण ने उसी वर्ष जन्म लिया था। धौर धीरे-धीरे वह अपना आकार-प्रकार बढ़ाता पा रहा है। बाज पानी हर से गुजर गया भैय्या! शांति अभियान में निकली थी। दो दिन बाद रात २ बजे सोटी एक मुस्टंड के साथ । मैंने पूया? बोली ! यह मेरा अंग रक्षक है। घर तक पहुंचाने आया था | मैंने कहा । अब यह सब थोड़ों। बच्चे बडे हो रहे हैं। उन पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ेगा। उसने कहा । मैं तो बहुत कुछ छोड़ना चाहती हूँ। यह अन्तर्राष्ट्रीय शांति घर्ष है। इसलिए चुप हूँ। नही वो दिखा देतो पतिदेव जी। आपको भी दिन में भी वारे। बबुआ यह मुनकर हक्के-बक्के रह गये और कोसने लगे उस पडी को भूतपूर्व चन्द्रमुखी (अव ज्वालामुखी) को देखकर उधार की ये दो पंक्तियों कही थो: सब कुछ खुदा से मांग लिया है तुझको मांगकर । उठते नहीं है हाप मेरे इस दुआ के वाद ।।

और मेरा टो० वी० आया मोहल्ले के अधिकांश घरों में दो० वी० दामाद की तरह प्रवेश पा चुका है। घर के बच्चे से लेकर बूढे तक उसे सर यांखों पर बैठाते है । बड़ी आवमगत होती है। जिस महीने जिसके यहाँ टो० वी० आया उसने पार्टी दो और टी० पी० देखने के लिए आमंत्रित करते हुए अपने आपको गौरवान्वित महसूस किया। मेरी गृहस्थी की गाड़ी विना टो० वी० के छोटी रेल लाइन की तरह छुकछुकाती जा रही है। जिसे मजाक में भैंसा- गाड़ो की उपमा दी जाती है। जब कभी भी टी० वी० पर कोई बढ़िया फिल्में, नाटक या सम्मेलन होता तो दूसरे दिन आफिस में जमकर चर्चा होती है । अर्जेन्ट को लाल चिटे लगी फाइलें लालफीताशाही को निहारती रहती हैं टुकुर-टुकुर । जो चर्चा मे भाग नहीं ले पाता वह टायलेट में जाकर मुंह छिपाता है। क्योंकि एक साथ सब के सब गोली की तरह अपना प्रश्न दागते हैं। "यू डेन्ट हैच टी० बी०" ? और बिना टी. वो० वाले हड़काए कुत्ते की तरह रिरियाते से कहते । अगले माह लूंगा यार । अमी "पोजीशन जरा टाइट है। जिन घरों में टी० पी० आया वे सव के सब इक्कीसवी सदी में जाने की बाते करने सगे। ऐसा लगता है कि टी० बी० देखकर ही इक्कीसवी सदी में पहुँच जायेंगे। बच्चों को सारे सीरियल को कहानियाँ कंठस्थ हो चुकी हैं । कलाकारों को पहचानने में वे विशेषज्ञ हो चुके हैं । इसी तरह ज्ञान के भंडार का लगातार विकास हो रहा है। कूल्हे मटकाते चित्रहार और नए- नए विज्ञापन दिखाकर बच्चों की मेघा शक्ति का सदुपयोग हो रहा है। टी० पी० आते हो घर भर का रुतबा बढ़ जाता है। दो० वी० वाले कहते हैं । खर्च जरूर हुआ परन्तु टो० वो० से लाभ बहुत है । बच्चे अव घर पर ही रहते हैं। बच्चों को बादत में बहुत सुधार हो गया है किसी से लड़ते-झगड़ते नहीं । टी० पी० में फिल्मों के साथ-साप योगा और भजन- कीर्तन का भी आनंद मिलता है। घर बैठे दुनिया को सैर हो जाती है। जन्माष्टमी और रामनवमी को झांको कितनी बढ़िया रहती है । तुम क्यों नहीं आए कल । नही लिया टी० बी० तो कोई बात नहीं हमारे यहां आ १३४॥ साम बत्ती जन को है पापा करो। मामोसी को भी से। माना । बोर फिर यहो हो । टी यो पाले समझाते हैं। मे भी फरो। टी० पी० सेसो यार। तुम नही पानते । टीयो० पपों में जान में भी यव यदि होती है । पेसाद को शिक्षा देते हैं टी० पी० । रिकेट भी दिखाता है। हाकी और फुटयाल भी। सान टेनिस से लेकर टेबल टेनिस का यह दिन दूर नहीं पद बार टी०पी० पर मुगों को सहाई भी देगे। यजन बनाने की विधि भी महिमा सीस सकती हैं। मैं कहता हूँ कि कुछ दिनों बाद पात्र योगे कि परीक्षा में नकम करते समय पेगे सावधान रहा जाय । नई-नई टेक्निक और पम्प्यूटर का प्रयोग टी० पी० यताएगा पति को कैसे नियंत्रण में रगे। पतियों को पतारमा कि बीवी को कैसे पुश रखा जाय। टी० पी० आधुनिक क्राति का सबसे बड़ा प्रतीक है। पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन को उपल-पुपत करने में इसका योगदान ऐतिहासिक है । इतिहास के पन्नों में इसे स्वर्णाक्षरों में लिखा पायेगा। दाइंग रूम या बैठक में टी० पी० का होना हो सम्य प शिक्षित परिवार को निगानी है। विश्वबन्धुत्व का सपना साकार कर रहा है टी० पी०। पूरा का पूरा परिवार है । पाहे बापको लोबिया पर अमरीकी हमले की जानकारी लेना हो। या लड़की के लिए वर को तलाश हो । टी० बी० के सामने बैठिए । अखवार के वैवाहिक विज्ञास्नों में घोरे की संभावना बनी रहती है । अब टी० बी० में ऐसा होगा कि विवाह योग्य युवक-युवतियां देखिए और घर बैठे ही मनचाहा पर या बेटे के लिए लाडली बहू पाइए । यही कहावत चरितार्थ होगी-"सोडा लगे न फिटकरी रंग चोखा का चोखा" । अनेक परिवारों में टी० बी० ने गृहयुद्ध को जन्म दिया है। वार्तालाप के कुछ . वंश सुनिए- पत्नी-मैं पूछती हूँ ? आखिर कब खरीदोगे टी० बी०? जब मेरी अर्शी निकल जाएगो? पति--खरीदूंगा भागवान ! कुछ दिन और रुक जा। पत्नी-ऐसा कहते-कहते तीन साल गुजार दिए ।

....और मेरा टी० बी० आया ॥ १३५
पति-अभी देख तो रही हो कितनी तंगी है।
पली-तुम्हारा हाथ तो जिंदगी भर लग रहेगा।
पति-अच्या तुम्हारे अगले जन्मदिन पर खरीदेंगे।
पल्ली-पया बुढ़ापे में खरीदोगे। तब तुम्हारे आधा दर्जन बच्ची को
पालुंगी या टी० बी० देखूगी। मुझे तो आज ही चाहिए टी० पी० ।
पति-मेरी मानो भागधान । टी० बी० का घर में थाना अच्श नहीं
होता । मोवो खाना बनाने से भी कतराती है।
पत्नी-लेकिन मैं हमेशा बनाऊँगी।
पति-मैंने बहुत से घरो में देखा है। टी० पी० देखने के बाद रात
१० बजे पली बड़े प्यार से पति के गले में हाथ डालकर कहती है ।
माज टी० बी० मे मजा आ गया। बहुत थक गई हूँ। चलो न आज
का डिनर होटल में लेकर आते है।
पली-तुम चिंता मत करो। मैं दोपहर को ही ढेर सारे परांठे बनाकर रख
दिया करूंगी।
पति-देखो। हम लोग हर रविवार को पिकनिक के लिए जाते हैं । मित्रो
से मिलते है । सब बंद हो जायेगा।
पत्नी-हो जाए बंद । सबके यहाँ टी० पी० है। कोई भी रविवार को
अपने यहाँ मेहमान का आना पसद नहीं करते। हम नहीं जानते ।
याज ही लाइए दी० पी० ।
पति--देखो। तुम तो पढ़ी-लिखी हो। ये वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे है ।
बार-बार न्यूज पेपर में भी तुम पढ़ती हो । बच्चों की आंखो पर बुरा
असर पड़ता है । टी० बी० देखने से ।
पत्नी-अब पड़ता है तो पड़ने दो। भाड़ में जाए तुम्हारे चहेते वैज्ञानिक ।
जैसा समाज होगा वैसे हम होंगे।
पतिः -उस दिन आया था पेपर मैं। दूरदर्शन बच्चों का मोलापन नष्ट कर
रहा है।
पत्ली -अच्छा है जी। नष्ट होने दो भोलापन | आजकल भोले लोगो को

१३६ ॥ माल बत्ती जल रही है जीने कोन दे रहा है। पति-बच्चे फिर किसी की मुनते भी नही । पढ़ते-लिखते नहीं, दिन-रात टो० धो० से चिपके रहते हैं । पच्चे विगढ़ जायेंगे। पत्नी-दुनिया में तुम्हीं एक बच्चे पाले नही हो । बोरों के भी बच्ने है । तुम यह क्यों नही सोचते कि बच्चे भरी दुपहरी में इधर-उधर भटकते हैं। टी० पी० घर में आ जाए तो बावारागर्दी से बचे। पति-लेकिन बच्चे तो पड़ोस में टी० बी० देख ही लेते हैं। कभी-कभी तुम भी चली जाया करो। पत्नी-बच्चों को टी० बी० वाले कई वार भगा देते है । सब कहते हैं। टी० पो० नहीं ले सकते तो बच्चो को घर पर रखना चाहिए । दोपहर में दूसरों के यहां घूम मचाने के लिए भेज देते हैं। मेरे तो कान के परदे फट जाते हैं । सर नीचा हो जाता है । मैं कुछ नही जानती। आज ही लाकर दो टी० पी० । राजनीति में यूककर चाटने की कला को-शृंगार रस कहते हैं । घर पर टी० बी० को उपस्थिति श्रृंगार रस को अर्थात् प्यार के रस को जन्म देती है । अनेक पतियो ने बताया जब तक टी० पी० नही खरीदा गया पत्नी फी मुद्रा धीर रस की बनी रही। घोरे-धीरे रौद्र रस का रूप धारण करले लगी थी मुद्रा । मुझे पत्नी से पालाप को स्थिति आद आई । मैं भी घोररस की मुद्रा को रौद्र रस की ओर नही बढ़ने देना चाहता था कि वोर रस की मुद्रा पुनः शृगार रस की ओर झरने सो कलकल करती हुई बहने लगे । अतः मेरी जेब से चार हजार रुपये निकल गये। टी० घो० आ गया । पत्नी प्रसन्न हुई । टी० पी० आने की खुशी में होटल में डिनर का कार्यक्रम पहले ही बन चुका था। उस दिन पत्नी ने आंखों ही बाँखों में बहुत प्यार किया । तथास्तु को मुद्रा में उसको मौन अभिव्यक्ति कुछ इस प्रकार रहो- अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम । दास मलूका कह गये, सबके दाता राम ॥ ud

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महावीर अग्रवाल
जन्म तिथि-२५ मई १९४६
जन्म स्थान-रायपुर जिले का गांव 'कुरुद'
शिक्षा-वाणिज्य से स्नातकोत्तर
पिछले ६ वर्षों से बहुचर्चित लघुपत्रिका
'सापेक्ष' का सम्पादन ।
प्रगतिशील साहित्यिक व सांस्कृतिक गति-
विधियों में सक्रिय और रचनात्मक हिस्सेदारी ।
अधिकांश लघुपत्रिकाओं और व्यावसायिक
पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित ।
तीन दैनिक पत्रों में नियमित स्तम्भ लेखन ।
शीघ्न प्रकाशय:
(१) श्वेतकपोत की वसीयत
(२) छत्तीसगढी लोक नाट्य
(३) कविता संग्रह,
(४) व्यंग्य संग्रह
सम्पर्क-एच० २४८, सिविल लाइन, कसारी-
डीह, दुर्ग (म०प्र०) ४६१-००१

Lal Batti Jal Rahi Hai

Author
Mahavir Agarwal
Title
Lal Batti Jal Rahi Hai
File name
Lal Batti Jal Rahi Hai
Text
OCR done
Citation
1957
Published
2011/03
Publisher
Sharda Prakashan Driyaganj New Dehli
Language
Sanskrit
Pages
146
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551256
Barcode
4990010032015.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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